Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Kavoor
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हिन्दी प्रत्यरत्नाफर सीरीजफा ३४ पाँ अन्ध ।
कावूर।
इटलीके पुनरुद्धारक, मुमसिद्ध देशभक्त
और राजनीतिज्ञ केमिली फारका
जीवन-चरित।
लेखपा,
पण्डित हरिभाऊ उपाध्याय,
सरस्वतीके भूतपूर्व सहायफ-सम्पादक ।
प्रकाशक,
हिन्दी-गन्धरत्नाकर कार्यालय, चम्बई ।
कार्तिक, १९७५ वि०।
प्रथमावृत्ति
नवम्बर १.१८ ई.।
[ मूल्य)
प्रकाशक- नाथूराम मेमी, हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर कार्यालय, हीराबाग, पो. गिरगॉव, बम्बई । स मुद्रक- मंगेश नारायण कुळकर्णी, कर्नाटक प्रेस, न० ४३४, ठाकुरद्वार, घम्बई ।
वक्तव्य । महत्वाकाक्षा उनतिका मूल है । क्योंकि महत्त्वाकाक्षाका अर्थ है-उनतिकी इच्छा, और जहाँ इच्छा ही नहीं वहाँ कार्यकी क्या सम्भावना ? महत्त्वाकाक्षा जिसमें नहीं, वह कार्यक्षमता रखते हुए भी ससारमे कोई विशेष कार्य नहीं कर पाता । इसमें सन्देह नहीं कि केवल महत्वाकाक्षी होनेसे ही मनुष्य उनति नहीं कर सकता, अन्य अनेक गुण यथा-निश्चय, साहस, कौशल, त्याग इत्यादि भी उसे दरकार होते हैं । परन्तु महत्त्वामाक्षा इन सबकी अपेक्षा अधिक आवश्यक है । ससारमे वह मनुष्य धन्य है जिसमें इन सत्र गुणोंका सद्गम हो। उसकी महत्ता, और कायशीलताका पूछना ही क्या ? मिद्धिको तो उसकी दासी ही समझिए । पर ऐसे अलौफिक पुरुप होते है इने गिने ही । इटलीम उद्धारक हमारा चरित-नायक केमिली कावूर उन्ही महान् पुरुषोंमेंसे है । वह अद्वितीय महत्त्वाकाक्षी था। पर उसकी महत्त्वाकाक्षा व्यक्तिगत न थी। वह देश प्रेम, लोकसेवासे लयाल्य भरी हुई थी । इटली-राष्ट्रका निर्माण ही उसकी एक मात्र भमिलापा थी-उत्तण्ठा थी। यही उसकी महत्त्वामासाकी बड़ी भारी विशेषता है । इसीके बल पर वह अद्भुत सफलता प्राप्त कर मका-उस समय असम्भव समझी जानेवाला इटलीकी राष्ट्रीय एक्ता पर सका । इसीमें उसके स्वाथत्यागका चीज है । महत्त्वाकाक्षाका सम्बन्ध जहाँ व्यक्तियोंमे होता है जहाँ व्यक्तिगत स्वाधम ही महत्त्वाकांक्षाफी परिसमाप्ति होती है-वहाँ स्वार्थत्याग और देश- भक्तिको कौन पूछता है । यदि वीजरूपमे ये गुण ऐसे मनुष्यमें हों भी तो वे अपना रास्ता रे रेते है। इन दिव्य गुणोंश विकास तो उन्दीम होता है जो वैयक्किा स्वाधको तुच्छ और जनता–समाज-के स्वाथको महत्त्वपूर्ण समझता हो । और ये गुण हमारे चरित-नायक कानूरके रोमरोममें व्याप्त थे। सारे यौर- पकी मा छोन डारिए इन गुणोंम अर्थात् स्वाथत्याग पूर्वक प्रत देशभक्तिम कावूरका टकरका कोई पुश्प जापन मिलेगा। इटला राष्ट्र के निर्माणमें ही कापूरने अपना सारा जीवन लगाया । अतएव उसका जीवन राजनैतिक जीवन था। रिसी कार्य्यम मनुष्य तभी सफलता ।
२ कर सकता है जब उसकी विधान विद्यामें भी वह निपुण हो । कावूरमें यह गुण भी विद्यमान् या । यह अद्भुत राजनीतिविशारद और बहा राजकाजी था कार्य-कुशल अथवा महात्मा तिलकके शब्दों में 'कर्मयोगी' तो वह पहले नम्बरका या । तत्कालीन योरपके समस्त राजनीनिकोंको उसकी राजनीति-पद्धता और कर्म-कुशलताका लोहा मानना पड़ता था। उन्नतिके लिए अन्य आवश्यक गुण--निश्चय, साहस, दूरदृष्टि इत्यादि भी- उसमे कूट कूट पर भरे थे। इनका परिचय उसके प्राय प्रत्येक काग्यसे मिलता है । यह देसकर कहना पड़ता है कि कापूर स्मिन्देह अलौकिक पुरुष या-दिव्य विभूति यी । स्वदेश-सेवाके लिए उसने अपने सारे सुखोंपर पानी फेर दिया था । यहाँतक कि देशसेवाव्रतमें बाधा पड़नेके सयालसे उसने आजन्म विवाह नहीं किया। वह यात्रह्मचारी था। उसी महात्माका यह चरित है, उसीका गुण-गान इस पुस्तकमें किया गया है। कावूरका यह चरिन हमें दिसलाता है कि उसमे वे समस्त गुण विद्यमान् थे जो एक बढेचढे देश-नायकमें होने चाहिए। इसी लिए उसका चरित प्रत्येक देशहितपीके लिए अनुकरणीय है । वह शिक्षाप्रद भी खूब है । अतएव भारत- भी वर्तमान स्थिति, युवाओंके लिए, वह आदर्शस्वरूप है । प्रस्तुत पुस्तक मराठी-भाषामें लिखित ' कापूर अथवा इटलीचा रामदास नामकी पुस्तकका अनुवाद है । अनुवादमें हमने प्रधानत भाव-दर्शनकी ओर विशेष ध्यान दिया है । हमारी रायमें यही अनुवादका उत्तम मार्ग है । मूल लेखकी सरसता अनुवादमें नहीं आसस्ती। कमसे कम हमारे मदृश अल्पज्ञ जनके लिए तो यह बहुत कठिन यात है । भाषा हमने सरल बोलचालकी लिखनेका प्रयत्न किया है। परन्तु हम इन बातोंमें कहातक कृतकार्य हुए है इसा हाल परीक्षक ही जान सकते ह, हम नहीं 1 भ्रम या प्रमाद मनुष्यके लिए स्वाभाविक है । हम भी इस नियमके अपवाद नहीं हैं । जो सज्जन कष्ट करके हमारी भूले दिसलानेकी कृपा करेंगे हम कृतज्ञता-पूर्वक उनका सुधार अगरे सस्करणमें करनेका प्रयत्न करेंगे। मूल मराठी पुस्तक किसी एक पुस्तकका अनुवाद नहीं है। रेसकने कावूरके चरिनसे सम्बन्ध रखनेवाली क्तिनी ही मिन मिन्न पुस्तकोंसे मसाला सग्रह करके .
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केमिली कावूर !
AUGARCIA BA..0911 CATHIA. JIY LIBRIR1.. BIKANER, RAJPUTANA. . इटली राष्ट्रका निर्माता कावूर। गेमाल पेदिया नि मथालय, पीपानर, (राजपुताना) १-परिस्थिति। कावूरका चरित्र क्या है, मानो उन्नीसवीं सदीके इटलीके पुनर्जीवन या पुनरुत्थानका इतिहास ही है । अतएव जबतक इटली-देशकी पूर्वपरस्थितिका थोडा भी परिचय पाठकोंको न होगा तबतक इस चरित्रका मर्म वे ठीक ठीक न समझ सकेंगे । सो पहले. इटलीकी तत्कालीन और तत्पूर्व दशाका वर्णन थोडेमें सुनिए- इटली-देश योरपखण्डके दक्षिणमें है । उसका आकार बूटके तलके सदृश है । इस देशकी सभ्यता कोई दो हजार वर्षांसे भी अधिक प्राचीन है । रोमन साम्राज्यके समय यह देश वैभनशिखर पर जा पहुंचा था । परन्तु जन रोमन- सामाज्य रसातलको चला गया तर इटलीकी बडी दुर्गति हुई । उसे कितनी ही भिन्न भिन्न राज्य-सत्ताओं के आगे सिर झुकाना पड़ा। रोमन साम्राज्य के नष्ट होजानेके पश्चात् इस देश पर विटेशियोंके आक्रमण शुरु हुए, जिससे उसके टुकड़े होने लगे । ५६८ ईसपीके लगभग लाम्बाई लोगोंने इटलीका उत्तर भाग अपने कब्जेमें कर लिया । दक्षिण-भागमें भी कितने ही छोटे छोटे स्वतत्र राज्य स्थापित हो गये । इसके पश्चात् सोलहवीं शताब्दीमें, स्पेनिश लोगोंने उसे .
२ कावूर। . अपनी साम्राज्य-सत्ताके अधीन कर लिया। फिर अठारहने शतको स्पेन-साम्राज्यके नष्टप्राय होजाने पर, आस्ट्रियाने उस पर अपना अधिका- जमाया। परन्तु आस्ट्रियाने सारा इटली-देश अपने राज्यमें नह मिलाया, सिर्फ उत्तरी विभागकी एक तहसील ( लाम्बर्डी) अपने राज्यमें मिला ली और शेष सारा प्रदेश जिनका या उन्हें सौप दिया ] हॉ उन प्रान्तोंके अधिकारियों पर उसने अपना राजनैतिक आधिपत्य अवश्य कायम रक्खा । लाम्बीको छोड कर अन्य प्रान्तोंमें, इस समय, आठ प्रधान रियासतें थीं । पर यी वे छोटी छोटी । उनमेंसे नेपत्स और सिसिली ये दो रियासतें बोरवोन राजवशके अधीन थीं। उनकी आवादी कोई ६० लाख थी। सार्डीनिया, जिसे पीडमाण्टका राज्य भी कहते हैं, सेवायके राजाशके अधिकारमें था । उसकी लोकसख्या कोई ३५ लाख थी । इन दोनों वशोकी सत्ता पूर्ण एकतन्त्रात्मक अर्थात् एक राजाधीन (Monarchy) थी। सरदार और धर्मगुरु ही उनकी सत्ताके-शासनके-आधारस्तम्भ ये। सर्वसाधारणको तो वे कोई चीज ही न समझते थे। इटलीके मध्यभागमें पोपके छोटे छोटे राज्य ये। वहाँका सारा काम-काज पोप और उनके सहायकों के द्वारा होता था। पेनिस और जिनोआ ये दो बड़े घरानोंके स्वसत्तात्मक राज्य थे। टस्कनी, पार्मा और मोडेना ये तीन छोटी छोटी जागीरे थीं। इनके अतिरिक्त दो और बहुत ही छोटे लोक सत्ताक राज्य तथा तीन जरा जरामी जागीरें थी । फ्रान्सकी राज्यक्रान्तिके (१७८९ ईसवी ) पहले इटली देशके इतने टुकडे हो गये थे। पूर्वोक्त सभी रियासते एक दूसरीसे अलग थीं। उनमें परस्पर वैमनस्य भी था । इससे उनमें बार बार झगड़ा हो जाया करता था। इन सब स्थानोंकी स्थिति और वहाँके लोगोंकी रहन-सहन एक दूसरेमे 4 परिस्थिति। ३ थोड़ी बहुत भिन्न थी । अतएव उनमें एकता स्थापित होनेकी सम्भा- वना कम ही रहा करती थी। धर्म और भाषा ऐक्यके बड़े ही महत्त्व- पूर्ण साधन है। ये साधन उनके लिए उपलब्ध तो ये, परन्तु उस समय पारस्परिक परिचय-प्राप्ति अथवा व्यवहारके मार्ग, आजकी तरह सुगम न थे । अतएव एक रियासतके लोग दूसरी रियासतके लोगोंसे बहुत कम मिलने-जुलने पाते थे। इससे पूर्वोक्त साधनोंका विशेष उपयोग न हो सकता था । प्रत्येक राज्यके साधारण लोग बिलकुल अज्ञान-दशामें थे । अर्थात् वहॉकी प्रजा यही समझती थी कि हेमारा राज्य ही सब कुछ है । सारा ससार इसीमें है । पहले दरजेके लोगोंको -~-सरदारों और वर्मगुरुओंको-कितनी ही राजनैतिक सुविधायें थीं। राजनैतिक मामलोंमें उनकी बहुत रियायत की जाती थी। उनकी मान-प्रतिष्ठा भी खून थी । इससे वे अपने ही बड़प्पनमें फूले न समाते और ऐशो आराममे चूर रहते थे । राजा लोग भी एक दूसरेके विषयमें उदासीन, बल्कि मत्सरग्रस्त, रहते थे। इस दशामे, इटलीमें, एकताके भावका प्रवेश कैसे हो सकता या सोलहवें शतकमें मैकवेलीने अपने ग्रन्थोंमें इस भावनाका दिग्दर्शन किया था, परन्तु उससे कुछ भी काम न निकला । उसके पीछेके कितने ही कपियो और ग्रन्थकारोंने, अपने अपने प्रथोंमें इस भावनाका कहीं कहीं उल्लेस किया है, परन्तु बहुत दिनोंकी पुरानी परिपाटी टूटना उन्हें असम्भव जान पड़ता था । अतएव उन्होंने इस पर विशेष विचार नहीं किया । अठारहीं सदीमें, रिटोरियो आलफेरी ( १७४९-१८०३ ईसवी) नामका एक प्रतिभा-सपन्न कवि हुआ। उसने अलबत्ते अपने काव्योंमें भानी इटली राष्ट्रका उज्जल चित्र खींचा है । तत्कालीन मुशिक्षित लोगो पर उसका असर भी अच्छा पड़ा, यद्यपि उनकी सरया बहुत कम थीं । 4 कार। इससे उन लोगोमें एक तरहको जागृति और तेजस्विता उत्पन्न हो गई । इन्हीं दिनों इटलीक उत्तर-भाग और टस्कनीमें, व्यापार और उद्योग -धन्धोंकी वृद्धिके कारण सधन लोगोंका एक दल तैयार हो गया था। धनवृद्धिके साथ साथ उन लोगोंमें शिक्षाकी भी वृद्धि हो चली थी। सम्पत्ति और शिक्षाकी प्राप्तिके कारण कितने ही विषयों में सरदारोंसे उन लोगोंका साझा पड़ने लगा। तब उन्हें आप ही सरदारोंके गुणदोोका ज्ञान होने लगा । इसी समय फ्रान्सके कुछ नामी ग्रन्थकर्ता सामाजिक, राजनैतिक और धार्मिक समताके सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करने लगे। उनका भी प्रभार इस 'नवीन दल पर पड़ने लगा। जोसफ पारिनी ( १७२९-१७९९ ईसवी ) नामक एक कपि इन्हीं दिनों मिलानमें होगया । वह भी पूर्वोक्त सिद्धान्तोंकी पुष्टि करने लगा ! उसके काव्योंने पूर्वोक्त दलके लोगोंमें विशेप करके मिलान और नेपल्सके लोगोंमें असन्तोप उत्पन्न कर दिया। उन्हें अपनी वर्तमान दशा पर खेद होने लगा। उसके सुधार–परिवर्तन- करनेकी आकाक्षा और भावनाका उदय उनके हृदयोंमें होगया । इट- लोके दक्षिण-भागमें अभी ऐसा दल तैयार न हुआ था। वहाँ पूर्वोक्त आकाक्षा और भानना उत्पन न हुई थी। वहाँ सिर्फ दो ही दल थे- एक सरदारों और पादरियोंका दल, दूसरा सर्व साधारणका कङ्गाल दल । यह दूसरा दल पहले दल पर सर्वथा अनलाम्बत या, अर्थात् उनका दास बन गया था । इस प्रदेशमें, उत्तरी प्रदेशके सदृश, उद्योग-धन्धोंकी उन्नति भी विशेष न हुई थी। अतएव वहाँ धन-सम्पन्न मध्यम दलकी सृष्टि अभी न होने पाई थी। इससे, वहाँ सर्व-साधारण- में शिक्षाका प्रचार भी जियादह न हो सका । उनका दारिद्य और न ये दोनों उनकी उन्नति के रास्तेमें काँटे बखेरते थे और उनें परिस्थिति। M अधिकाधिक हीन दशाको पहुँचाते थे। ऐसी दशा दक्षिण इटलीकी थी। परन्तु उत्तरी-भागकी स्थिति, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है, इसके बिलकुल विपरीत थी । वहाँके निवासी अपनी दशाका सुधार करनेके लिए अत्यन्त लालायित थे। इतनेहीमें फ्रान्समे राज्यक्रान्ति शुरू हुई और फ्रान्सकी तरफसे पहले नेपोलियनने इटलीपर चढ़ाई की। इस अवसरसे लाभ उठाकर कुछ उत्तरी राज्योंके लोगोंने नेपोलियनकी सहायतासे लोकसत्ताक राज्य स्थापन किये । पीछे, कुछ दिनोंमें, प्राय सारा इटली-देश नेपोलियन ब्जेमें आ गया । तर वहाँ, न्यूनाधिक परिमाणमें लोकसत्ताक राज्यपद्धति जारी हुई। नेपोलियनने इस देशमें, फ्रेंच आधिपत्यके अन्तर्गत भिन्न भिन्न माण्डलिक राज्य निर्माण किये और फ्रान्सके सदृश, शासन-सस्थाओं ( Institutions ) का भी बीज-वपन किया, जिसके बदौलत वहाँके लोगोंको शासन-कार्यकी शिक्षा भी मिलने लगी। आगे चलकर, इससे उनका बड़ा काम निकला । नेपोलियनका युद्ध-यज्ञ १८१४-१५ ईसवी में समाप्त हुआ । उस समय योरपके प्रधान राष्ट्रोंकी सम्मतिसे इटलीका पुनस्सगठन हुआ । उसमें सार्डिनिया, अर्थात् पीडमाण्टका राज्य, फिरसे सेवाय- राजपशके युवराजको मिला। इसी राज्यमें पहलेगाला जिनोआका लोकसत्ताक राज्य भी शामिल किया गया। आस्टियाने लाम्बर्डी और वेनिशिया प्रान्त अपने राज्यमें मिला लिये और इटाके अन्य भागोंमें जो भिन्न भिन्न रियासतें इस समय स्थापन हुई उनमेंसे पोपकी रिया- सतोंको छोड़कर बाकी जगह आस्ट्रियाके राजाशीय रिश्तेदार ही गद्दी- पर निठाये गये । अर्थात् पीडमाण्टको छोडकर प्राय सारे प्रदेश पर आस्ट्रियाका आधिपत्य हो गया । अकेला पीडमाण्ट ही उसके समर्गसे अलिप्त रहा। परन्तु उसका राजा, विक्टर इमेन्युअल दि फर्स्ट बूदा था।
कावूर। इ एक तन्त्री, अर्थात् एकराजाधीन, शासनप्रणालीका प्रेमी या र वहाँकी प्रजाको तो फ्रेंच लोगोंके ससर्गसे लोकसत्ताक शासन- इतिका मजा मालूम हो गया था। अतएव वह उस राजासे खुश थी-उसे न चाहती थी। परन्तु लोगोने उसे जियादह तग न किया। गोंकि उसे कोई सन्तति न थी। उसका भतीजा, चार्ल्स अलबर्ट, दार-शासन-प्रणालीका प्रेमी था और शीघ्र ही उसके सिंहासनारूढ़ नेकी सम्भावना भी थी । परन्तु १८२०-२१ ईसवीके बीच इट- के अधिकाश राज्योंके सैनिक सत्ताधारी लोगोंने विप्लव और सान्तिका झण्डा खडा कर दिया । पीडमाण्टके राज्यमें भी उनका डा बहुत प्रवेश होने लगा । तब विक्टर इमेन्युअल दि फर्स्टने तङ्ग कर राज्यसे इस्तीफा दे दिया-शासनसे अपना सम्बन्धमोचन कर लिया और अपने भाई चार्ल्स फेलिक्सको गद्दीका वारिस और अधिकारी ना दिया । चार्ल्स फेलिक्स इस समय मोडेनामें था । उसने चार्ल्स लिबर्टको अपना अस्थायी मुख्तार बना कर भेज दिया । चार्ल्स अल- टके विचार तो मुधारवादी लोगोंसे मिलते जुलते थे ही । बस, फिर या देर थी। अधिकार हाथमें आते ही उसने स्पेनकी शासन-प्रणाली. । ढंगपर शासनप्रणाली ( Constitution ) की घोषणा कर दी। सका यह काम चार्ल्स फेलिक्सको विलकुल न भाया । मोडेनासे ही उसने अलबर्टका घोपणापत्र रद कर दिया। फिर जब वह स्वय परिनको आया उसने चार्ल्स अलर्टके इस कार्यकी निन्दा करके उसे निकल जानेकी आज्ञा दी ! उस समय पुरोगामी अर्थात् सुधार- आदी पक्षके लोगोंने अलबर्टकी रक्षा करके उसका साथ देनेका जोड ड़ लगाया, परन्तु फिर यह सोच कर कि आस्ट्रियन सेनाकी सहा- तासे फेलिक्स अपना और अपने देशका सदाके लिए घात कर 1 परिस्थिति। ७ । बैठेगा, अलर्ट चुपचाप भाग निकला । उसके वहाँसे दवे-छुपे निकल भागनेपर पुरोगामी और अनियन्त्रित सत्तावादियोंमें लडाइयों छिडीं । उनमें पुरोगामियोंका पूरा पराजय हुआ। उनके नेताओंको अपने प्राणोंकी रक्षाके लिए, देशान्तरगमन करना पडा । इटलीके अन्य प्रान्तोंके सैनिकों के द्वारा किये गये उपद्रन भी आस्ट्रियाकी सहायतासे शान्त किये गये । तर फिरसे चारों तरफ अनियन्त्रित शासनका डका पिटने लगा । इस प्रकार यद्यपि अधिकारी और सैनिक पुरोगामियोके राजनैतिक सुधार-विपयक प्रयत्न विफल हुए, तथापि उन सुधारोंकी कल्पनाका बीज नष्ट न हुआ। फ्रेंचोंके संसर्गसे लोक स्वतन्त्रताका जो भाव इटलीमें उदय हुआ था उसकी जड बहुत गहरी जा चुकी थी। उसका उन्मूलन होना प्राय असम्भव था। बल्कि ये भाव वहाँ के सुशिक्षित समाजमें झपाटेसे फेड रहे थे । लेखन स्वातन्त्र्यका यद्यपि भयन्त सङ्कोच हो गया था तथापि, उस विपरीत परिस्थितिमें भी, उनका सङ्गोपन हो ही रहा था । नेपोलियनके समयकी पीटी- उसके जमानेकी जनता -अब न रह गई थी। उसकी जगह नई पीढीका उदय हो रहा था । नेपोलियन और आस्ट्रियाके द्वारा किया गया अपने देश- का वण्टाढार यह नर पीढी देख चुकी थी और उसके हृदय पर इसका असर भी बुरा हुआ था। अतएव उसके हृदयमें यही चिन्ता-यही धुन-दिनरात रहा करती थी कि यह दुर्दशा, यह विपन्न अवस्था कैसे दूर हो १ १८२०-२१ ईसवीके सैनिक पुरोगामी पक्षके कान्ति- कारक प्रयत्न असफल होने पर इटलीके अविकाश राज्योंमें प्रतिगामी शासन-पद्धतिने बडा जोर पकड़ा। अतएर लोग खुल्लमखुल्ला राज- नैतिक सुधारोका आन्दोलन न कर पाते थे । लाचार होकर वे गुप्त मण्डलियाकी स्थापना करके देशमें क्रान्तिकारक विचारों का प्रचार करने काबूर। MAR - लगे। इन गुप्त आन्दोलनका मुख्य अग्रणी था मेजिनी। मेजिनीके प्रयत्न तथा उनके परिणामोंके विषयमें कुछ कहनेकी यहाँ आवश्यकता नहीं । इटलीमें अकेले पीडमाण्टके राज्यको ही राजनैतिक स्वतत्रता प्राप्त थी। शेप प्राय सभी राज्य एक दूसरेसे द्वेप और ईर्षा करते थे। हॉ पोपकी रियासतें बहुत कुछ स्वतन्त्र थीं, परतु पोप भी या अनियन्त्रित- सत्तावादी । अतएव उसका और पुरोगामियोंका कभी बनाव बननेकी सम्भावना न थी । पीटमाण्ट पर भी आस्ट्रियाकी आँखे लग रही थीं। परतु यह राज्य फ्रान्सकी सीमा ( Buffer state )से सटा हुआ था । अतएव फ्रेंचसरकारके ऐतराजसे बचने के लिए उसने उसे स्वतन्त्र रहने दिया था । यद्यपि इन राज्योंकी शासन-पद्धति एकसूत्री यी तथापि वह बिलकुल असह्य न थी। वहाँ प्रातिनिधिक शासनसस्था स्थापन हो गई थी और किसी उदारचता और विवेकशील राजाके गद्दी पर बैठनेसे तद्विषयक अधिक सुधार होनेकी सम्भावना थी। इस परिस्थितिका भलीभांति परिशीलन करके पहले तो पीडमाण्टके और फिर समस्त इटलीके राजनैतिक सुधार करने के लिए तथा पीडमा- ण्टके राजवशीय राजपुरुषका एकछत्र राज्य स्थापन करनेके लिए कितने ही लोगोंने प्रयत्न किये वे सफल भी हुए। परन्तु उन सबमें हमारे चरित्रनायक कादूरका आसन श्रेष्ठ और ऊँचा है। इन सब प्रयत्नोंका सूत्रसचालक वही था । प्रधानत• उसीकी प्रतिभा और राज- नीति-पटुताफी बदौलत यह कठिन कार्य जो सामान्यत असम्भन समझा जाता था, सिद्ध हुआ। उस महत्कार्यका हाल आगे कावूरके जीवन- चरित्रसे आपको मालूम होगा। कावूरके प्रयत्नके सफल होनेमे पीडमाण्ट- के राजा पिक्टर इमेन्युअल दि सैकण्ड और, जनरल गैरीबाडिकी भी करणीमूत है । अतएव कावूरकी जीवनकथामें इन दोनों कुलकथा मोर शैशव। सज्जनोंका भी वर्णन थोड़ा बहुत किया जायगा, परन्तु उतना ही जितना कि उसके चरित्रसे सम्बन्ध रखता है । इस त्रिमूतिने, कोई १५ ही चोंके भीतर, इटलीकी गई हुई स्वतन्त्रता फिरसे प्राप्त कर ली और पीडमाण्टसे वहकि छोटे छोटे राज्योंकी एकता इतने आश्चर्यकारक ढंग- से की कि जगतके इतिहासमें इस घटनाकी जोड मिलना कठिन है । इन कारणोंसे कावूरका चरित अपूर्व और अत्यन्त महत्वपूर्ण है । नीतिपटु मनुष्य एक सीकके सहारे अपने बुद्धिवलके द्वारा कितनी भव्य और विशाल इमारत खडी कर सकता है, यह बात इस चरितके अध्ययनमे भलीभाँति जानी जा सकती है । २-कुलकथा और शैशव । कावूरका जन्म १८ अगस्त सन् १८१० ईसवीको टयूरिनमें, अपने परिवारके राजमहलमें हुआ। उसका परिवार पहलेहासे प्रसिद्ध या। इस कुलके कितने ही पुरपोंने अपने देशकी सैनिक सेवा करके नाम और कीर्ति कमाई थी। इस सेवाके उपलक्ष्यमें कापूरके किसी पूर्नजको तत्कालीन पीडमाण्टके राजाने 'मार्किस आग् कापूर' की पदवी प्रदान की थी। तभीसे उसका वश 'कावूर' कहलाने लगा। इमसे पहले वह 'बसोको नामसे मशहूर था। जिस समय कापूरका जन्म हुआ, उसके कुटुम्बमें-रिश्तेदार और आत्मीय मिडकर-भिन्न भिन प्रकृति के कितने ही लोग थे। उन सबमें एकता और मेल-मिलाप रखनेका कठिन काम उसकी दादीकी तरफ था । वह बड़ी चतुर कावूर। मुशील, समझदार और कर्तव्यक्षम 'त्री थी। इतने बड़े परिवारका प्रबन्ध मजेमें-बिना झगड़े और मनमुटायके-करके दिखलाना आसान काम नहीं । पर उसके लिए यह बायें हायका खेल था। यह परिवार पहले बडा धन-सम्पन्न या । परन्तु इस समय उसकी दशा हीन हो गई थी। इसका कारण था। पहले नेपोलियनने इटली पर कितने ही बार आक्रमण किया। इस वशकी धन और जन-सम्पत्ति उसके सैनिक अत्याचारका शिकार हो गई । यहीं तक बस नहीं, पूर्वोक्त देवी-कावूरकी दादी-को नेपोलियनकी बहनकी 'दासी' वन कर भी रहना पड़ा । उसके साथ वह नेपोलियनकी दूसरी शादीमें पेरिस गई । वहाँ उसने किसी फ्रेंच शिक्षकसे अध्यापनकला सीखी। उसका उद्देश यह था कि आगे चलकर मैं स्वय अपने नातियोंको शिक्षा दे सकूँ । कावूरके पिताका नाम मार्किस माइकेल वेन्सो या । स्त्रय कावूरका नाम था-केमिली। उसे सिर्फ एक ही जेठा भाई था। उसका नाम था गस्टाव । एडेल उसकी माताका नाम था। एडेलका पिता जिनीवा (स्वि- जरलैंट ) का काऊट अर्थात् सरदार था । उसे तीन लड़कियों थीं। तीनों अपने अपने स्वामियोंके साथ ट्यूरिनके 'पालात्सो कापूर - ( Palazzo Cavour) नामके राजमहलमें रहती थीं। हमारे चरित्र- नायक, केमिली कावूरका जन्म इसी राजमहलमें हुआ। इस महलमें काचूर- की उम्रके कितने ही बालक ये। सब अमीरी ठाटबाटमें रहते थे, परतु कमिलाका बरताव और रहन-सहन बहुत सादी थी। उसका हृदय भी वैसा ही उदार या। सरदारो और अमीरोंके सदृश ऐंठ, उद्दण्डता, अडिय- लपन, उससे दूर रहता था। वह बहुत शान्त प्रकृति और मिलनसार था, परतु कभी कभी उसके क्रोधका भी पारा चढ जाया करता था। अध्ययनमें उसकी विशेष रुचि न थी। तथापि उसकी बुद्धिमत्ता और , कुलकथा और शैशव । निर्णयशक्तिका विकास कम उम्रमें ही हो गया था। चतुरता या सार- घानी, जो राज-नीति-विशारदों या राजकाजियोंका मुख्य गुण है, लडक- पनले ही उसमें पाया जाता था। जन वह छ ही वर्पका था, उसने अपनी एक बालिका सखी-लड़कपनकी साथिनी-को एक पत्र लिखा था। वह पन आज भी मौजूद है । बालिका कहीं अन्यत्र चली गई थी। कावूर उसकी जुदाईसे दुखी था। वह चाहता था कि वह फिरमे वहीं रहे। अत- एव उसने उस पत्रमें लिखा या “ तुम तो मुझको छोड़ कर चली गई हो, पर मैं तुम्हें उसी तरह चाहता हूँ। एक बहुत ही सुन्दर बालिका- से मेरी जान-पहचान हो गई है। वह मुझे दो वार अपने सुनहले वागमें घूमनेके लिए ले गई थी।" इतने छोटे बालककी यह व्यन- हार-चतुरता देखकर किसे विस्मय न होगा। इसी समयकी उसकी धीरता और साहसकी भी एक कहानी मुनी जाती है । कापूरके घरके लोग हर साल अपने नानाके यहाँ जिनीवा जाया करते थे। एक बार वे अपने नानाके एक मित्र दलारिपके गाँधको घोडागाड़ी पर सवार हो कर गये थे। घोड़े अच्छे न ये इससे रास्तेमें उनको कुछ तकलीफ उठानी पडी। यह देख कर बालक कापूर क्रोधकी ऑचसे तपने लगा ! मुकाम पर पहुँचते ही उसने बडी शानसे दलारिवेसे हाथ मिलाया और कहा-" पोस्ट मास्टरने खरात्र घोड़े देकर हमारा अपमान किया है, उसे बरखास्त कर देना चाहिए।" इसपर दलारिवेने 'जनान दिया-" यह बात मेरे बसकी नहीं । यह तो प्रामाधिकारी सिंडिकी इच्छा पर भरलम्बित है ।" सुनते ही केमिटीने कहा--" ठीक है, सिंडिकसे मेरी भेट करा दीजिए। उत्तर मिला- सिंटिकको, जो उसका मित्र था, एक पत्र लिखा- - " थोड़ी ही देरके बाद रिवने यहाँक कल - । कावूर। . मजेदार बालक पाहुनकी भेट आपसे करानेवाला हूँ।" दूसरे दिन कैमिली घूमते-घामते सिंडिकसे मिलने गया । सिंडिकने उसका बहुत अच्छा स्वागत किया परतु उस आव भगतमें न भूल कर केमिलीने शान्तिपूर्वक अपनी शिकायत खुलासेवार सुनाई । फल यह हुआ कि पूर्वोक्त पोस्ट मास्टरकी बरखास्तीका आश्वासन उसे मिल गया। तब बड़ी खुशी खुशी आकर कैमिलीने दलारिवको कहा--" बस, अब वह जरूर बरखास्त हो जायगा । पीडमाण्टकी शासन-शैली अनियन्त्रित थी। उस राज्यमें सरदारों अर्थात् अमीर-उमरोंकी खूब चलती थी। वहाँके शासन-कार्यमें भी उन्हींकी तूती बोलती थी। कुछ अशोमे यह उचित भी था । क्योंकि उस राज्यकी प्रतिष्ठा और स्वतन्त्रताकी रक्षाके लिए उन्होंने असीम धन और रक्त खर्च किया था। अतएव उनकी यह अभिलाषा होना स्वाभाविक ही था कि शासन या सत्ताके अधिकारका अधिकाश उन्हींके हाथोंमें रहे । वे इस बातमे नाखुश थे कि अधिकार या सत्ताका कुछ अश सर्वसाधारणको दिया जाय । उन लोगोकी यही धारणा थी कि “ राजा और हम सिर्फ दोनों ही राज्यके मालिक है, तीसरा कोई नहीं।" हॉ, प्रातिनिधिक शासन-प्रणालीके वे थोडे बहुत कायल अवश्य थे, परन्तु इस सिद्धात, इस तत्तकी पहुंच सर्व साधारण तक करानेके लिए वे तैयार न ये । तथापि फ्रेञ्च राज्य- क्रान्तिके वाद सारे योरप-खण्डमें स्वतन्त्रता, समता और वन्धुभारका उदय सर्व साधारणमें हो गया था और फ्रेञ्चोंके ससर्गसे इटलीमें तो इन भावोंका प्राबल्य बहुत ही हो गया था ! फलत वहाँ सरदारों और सर्व साधारणमें शाब्दिक द्वन्द्व भी शुरू हो गया था। योरपके अधिकाश देशोंमें अव लोकमत अनियन्त्रित ( despotic ) शासन- कुलकथा यार शराव । ---- पद्धतिके प्रतिकूल और नियन्त्रित अथवा प्रातिनिधिक ( Limited Monarchy or representative Government ) शासन : प्रणालीके अनुकूल हो चला था । स्विजरलैंडके उच्चवर्गमें तो पूर्ण लोकसत्ता वादियोंका एक दल भी बन गया था। कावूर जबतक अपनी ननसार जाया करता था, वहाँ उसे सद पूर्वोक्त कथायें सुननेका मौका मिला करता। उसके कोमल हृदय प. उनका बड़ा असर पड़ता । इससे लड़कपनसे ही उसके विचार उदा और उच्च हो चले थे। उसके परिवारके अन्य लोगोंके-बालकों तक विचार पूर्वोक्त सरदारोंके विचारोंकी तरह थे। कावूर उनसे अविव मिलता जुलता न था। यह देख कर वे लोग उसकी दिदगी में उड़ाया करते । ऐसे समय कावूरकी नानी अलबत्ते उसकी तरफदार करती । घरके अन्य लोगोंकी अपेक्षा वहीं कावूरका जियादह दुला करती-हिमायत करती । वह थी भी उदार विचारोंकी अनुरागिणी कावरके उदार विचारों पर वह मुग्ध थी। कावूर हमेशा उससे दिल खोल कर बातचीत करता और वह भी उसके गुणों पर लट्टू वी दस वर्षकी अवस्था होने तक कावूरकी सामान्य शिक्षा पर ही प हुई। पश्चात् वह टयूरिनके सैनिक विद्यापीठमें भेजा गया। वहे गणित-शास्त्रकी शिक्षा बडी अच्छी दी जाती थी। उसने थोटे ही 'समयमें गणितमें अच्छी प्रवीणता प्राप्त कर ली । कावूर वार वार कह करता था कि गणित शास्त्रका यह अध्ययन उसके बड़े काम आया किसी भी विषयका अचूक अनुमान करनेमें उसे इससे वडी सहायत मिलती थी। मनुष्यकी सच्ची परख करनेका सामर्थ्य भी इसी अध्ययन कारण -इस अध्ययनके द्वारा प्राप्त हुई बुद्धिकी तरलता या कुशागत के कारण-~~-उसे प्राप्त हुआ। यह उसीका कथन है । उस पाठशाला .
काबूर। भापाकी शिक्षा बहुत थोड़ी दी जाती थी। अतएव वह प्रभाव-शाली भाषा या प्रबन्ध न रिख सकता था। इसका उसे वडा रज रहा । शिक्षाकमकी इस त्रुटि पर वह हमेशा कटाक्ष किया करता था । १८२४ ईसवीमें पीटमाण्टके भावी राजा चार्ल्स अल्बर्टन काबूरको अपने खिदमतगारकी जगह मुकर्रर किया । तव उसकी शिक्षाकी सारी जवाबदेही अलबर्ट पर आ गिरी ।* चार्ल्स अलवर्ट भी पहले उदार-मतो और सुधार-वादियोंका हिमा- यती था । परन्तु पीछे परिस्थिति उलट गई। तब उसे भी अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तिको ताकमें रखकर राजपरिवारके अन्य प्रभाव-शाली पुरुपोंके अनुदार अर्थात् प्रतिगामी मतोंका अनुकरण करना पड़ा । इस कारण कादूरसे उसकी पटी नहीं। शीघ्र ही कावूरके हृदयमें उसके प्रति बुरा भाव उत्पन्न हो गया और वह अन्त तक कायम रहा । १८२६ ईसवीमें कावूरकी सैनिक शिक्षा समाप्त हुई । अन्तिम परीक्षामें वह सर्वप्रथम पास हुआ। तब सैनिक विभागकी इजनियरिंग शाखामें लेफ्टनण्टके पद पर उसकी नियुक्ति हुई । यह नौकरी स्वी- कार कर चुकने पर उसने अंगरेजी सीखना आरम्भ किया । इस समयका लिखा हुआ उसका एक पत्र विद्यमान है। उसमे उसने इतिहास और प्रचलित भापाके अध्ययनकी आवश्यकता दिखलाई है। एक हि सावे सब सधे सब साधे सब जाय" के अनुसार उसने यह बात भी उस पत्रमें लिखी है कि बहुत विषयों के अध्ययनमें कालक्षेप और बुद्धि व्यय करनेकी अपेक्षा अपने मनोनीत एक ही दो * ट्यूरिन के सैनिक विद्या-पाठमें जो सरदार-जादे होते ये उनमें से राज-परि- वारके सिदमतगार नियत हुआ करते थे और जब तक उनकी शिक्षा पूरी न हो जाती ये राजाके रासे विद्यापीठमें रहते थे।
कुलकथा और शैशव । विपयों के अध्ययनमें अपनी शक्तिका प्रयोग करना श्रेयस्कर है। ज्यो ज्यों वह बड़ा होने लगा, अपने प्रागतिक विचारोंके कारण अपने घरके लोगों भोर आप्त इष्टोंका कुछ अप्रीतिभाजन होने लगा। चार्ल्स अलबर्टने कावूरके एक रिस्तेदारको पत्र लिसा था । उसमें उसने लिखा कि-"यह है तो होनहार और भला आदमी, परन्तु है असन्तुष्ट वृत्ति । अतएव सम्भव है, वर्तमान समयमें यह प्रास-दायक और भविष्यमें अहित-कारक हो ।" कावूरने सैनिक विद्यालयमे रहते हुए एक निनन्ध लिखा था । उसमें उसने चार्ल्स अलबर्ट ( पाठक जानते ही हैं, यह पहले उदार-मतवादी था) के पुराने मित्र सटोरी डी सट रोजाके उदार राजनैतिक मतोका अनुवाद किया था। सटो- राने एक पुस्तकमें अपनी यह उत्कट इच्छा प्रकट की थी कि अमे- रिकाको स्वतत्रता प्राप्त करा देनेनाले वाशिंगटनका अवतार इटलीमे हो । उसका एक वचन भी कापूरने अपने लेखमें उद्धृत किया था। उस निवन्धके कारण पूर्वोक्त विद्यापीठके अधिकारियोंमें बड़ी हलचल मच गई । परन्तु शौर-गुल न मचाकर उन्होने कावूरको खूब डॉट डपट दिया और निवन्ध छिपाकर रख दिया । तथापि इससे उसके सभागमें फर्क न पड़ा । हो, तबसे वह अपने मतोंके प्रतिपादनमे यथा-सम्भन साधान रहने लगा। उसके हृदयमें स्वदेशके सम्बन्धमे कौनसे विचार लहरें मार रहे थे, इसका दिग्दर्शन उसके एक दो खानगी पत्रोंसे किया जा सकता है। ये पत्र उसने उन्हीं दिनों लिखे थे । २१ वर्षको उममें लिखे अपने एक पत्रमें वह लिखता है- इटालियन लोगोंका पुनरुद्धार करना आवश्यक है। स्पेनिश और आस्ट्रियन लोगोंके निस्करणीय ओर अन्यायपूर्ण शासनके कारण काबूर। उनके सत्त्वका जो अधःपात हुआ, फ्रेञ्चोंके शासनसे उसमें सजीवता आगई है और देशके उत्साही युवक इटलीके एकराष्ट्रीयत्वके लिए लालायित हैं । परन्तु पूर्वस्थितिके दवारकी परवा न करके---उसे दूर करके-यदि इटली नूतन राष्ट्रको सृष्टि करना चाहता हो तो उसे दीर्घ प्रयत्न करना चाहिए । इसके लिए इस बातकी भी आवश्यकता है कि इटालियन लोगोंका भील सब तरहके स्वार्थत्यागोंकी भट्टीमें तपाकर जाँच लिया जाय । इस पत्रसे यह स्पष्ट प्रकट होता है कि ठेठ युवावस्थासे ही उसका यह विचार या कि इटलीके छोटे छोटे राज्यों को नष्ट करके उनका एक राष्ट्र बनाया जाय । कावूरने यह पत्र १८३१ ईसवीमें आल्स-पर्वतके समी- पस्थ वार्ड नामके किलेसे काउट डी सेलॉको लिखा या । कावूरकी नियुक्ति इस एकान्त स्थानमें, उसके पिताकी इच्छाके अनुसार, चार्ल्स अलबर्टने ( उस समय यह पीडमाण्टका राजा होगया था ) जान वूझकर की थी, इस हेतुसे कि वहाँ रहनेसे उसके प्रागतिक विचारोंका विकास न होने पावे | परन्तु उसके पिताका यह उद्देश सफल न हुआ। इस फिलेमें सैनिक इंजिनियरिंग-विभागमें नौकरी करते हुए कावूरको जो अवकाश और निश्चिन्तता प्राप्त हुई उससे उसने वडा काम लिया। इस अवधिमें उसने बेन्थम और एडन स्मिथ इन अगरेजी ग्रन्थकारोंके राजनीति और अर्थशास्त्र पर लिखे ग्रन्थोका अध्ययन किया। अगरेजी राजनीतिका भी अध्ययन वह करने लगा। सुदैव-वश वहाँ एक अंगरेज चितेरेसे उसकी जान पहचान होगई । इस कारण ॲगरेजी राजनीति और वहॉकी समाजस्थितिके सम्बन्धमें दिल खोल कर चर्चा करनेका मौका उसे घर बैठे मिल गया । इग्लैंडमें इस समय अर्थात् १८३२ ईसीमें, पहले रिफार्म विलकी मिट सभा , कुलकथा और शैशन। 1 चुननेके लिए सामान्य जनताको मतके अधिकार देनेकी हलचल हो रही थी। तद्विपयक सारी जानकारी प्राप्त करलेनेमें वह इस समय निमग्न था। अगरेजोंकी सामाजिक और राजनैतिक अवस्था तथा उनकी सामान्य मन प्रवृति अर्थात् स्वभान उसे बहुत पसन्द था। उनके विपयों जो अनुकूल विचार उसके हृदयमें इस समय पैठ गये ये अन्त तक वैसे ही कायम रहे । और साधारणत उसका यह खयाल हो गया था कि मेरे विचार और आकाक्षा खुले दिलसे प्रकट करनेका स्थान यदि कोई है तो वह अँगरेजी मनुष्यका अन्त करण है । इसका फल यह हुआ कि जब जब किसी अंगरेजसे उसका सानका पडता तब तब वह उससे खुले दिलसे मिलता और व्यवहार करता था। उसकी यह धारणा हो गई थी कि तत्कालीन इटालियन स्वजनों की अपेक्षा मेरा मनोगत जाननेकी पात्रता मैंगरेजोंमें अधिक है । कुछ अशोंमें उसकी यह भावना ठीक भी थी । क्योंकि पीडमाण्टमें उसके दरजेके जितने भी लोग थे प्राय सबके विचार अनुदार और अनियन्त्रित सत्ताके पोपक थे, तमा पीडमाण्टहीको अपना सारा ससार समझते थे। वे कृप-मण्डक ये । वहाँके मध्यम दलमें प्रागतिक विचारवाले युवकोंका एक दल तैयार हो अवश्य गया था, परन्तु उसका उद्देश सिर्फ पीडमाण्टका ही मुधार करना था । सारे इटली देशमें एकता प्रस्थापित करनेकी बात उसको पसन्द न थी । यह बात उसे सम्भर भी न मालम होती थी ।* कावूरके विचार इससे भिन्न थे। उसके जिस पत्रका अनुवाद पहले दिया जा चुका है उससे यह बात सिद्ध होती है । स्वदेश-बन्धुओंके पूर्वोक्त विचारोंको * इस युवक पुरोगामी ( सुधारवादी) पक्षके अतिरिक्त क्रान्तिकारक आन्दोरा रोवाला मेजिनीका पक्ष भी था । परन्तु उसके पिचार और मार्ग कादूरको पसन्द न थे। .
कार। www. ~-~~~~~www -rwww , देखकर कावूरका अन्तःकरण वार बार उद्विग्न हो उठता था। इस उद्वि- ग्रताके सूचक उसके कुछ उद्गार उसके एक खानगी पत्रमें पाये जाते है । यह पत्र उसने १८३२ ईसवीमें, जब वह २२ सालका था, लिखा था । उसमें वह लिखता है-" एक समय ऐसा था जब यह विचार मेरे हृदयमें सहज ही पैदा होता था कि मेरे लिए किसी दिन इटली राज्यका पहला प्रधान मन्त्री होना बिल्कुल स्वाभाविक है।" इससे पाठकोंको कावूरकी महत्त्वाकाक्षा और उसके उद्देशका अच्छा परिचय मिल सकता है। उसके भावी जीवनमें यह महत्त्वाकाक्षा पूर्ण भी हुई है। कावूरको, यद्यपि उसके पिताकी इच्छाके अनुसार, सैनिक शिक्षा दी गई थी, तथापि स्वय उसकी रुचि इस पेशेकी ओर न थी। उसका झुकाव तो राजनीतिकी ओर ही विशेप था । इस विपयका शास्त्रीय अध्ययन भी वह करने लगा था । जब परिस्थितिका पूरा निरीक्षण बह कर चुका, उसने अपने स्वीकृत कार्यकी पूर्व तैयारी- पेशवन्दी-करनेकी ठानी और तुरन्त अपनी जगहका इस्तीफा दे दिया। (नवम्बर १८३१ ईसवी।) तब उसका पिता डरा कि कावूर कोई आन्दोलन न खडा कर दे । इसके लिए उसने तजवीज सोची। उसकी कुछ पैतृक सम्पत्ति-जमीन--लेरीमे थी। उसीके पास कुछ और जायदाद उसने खरीद ली और उसके प्रबन्धका भार कावूर पर छोड़ दिया। इसपर कावूरकी माताने ऐतराज किया कि स्वतन्त्रता-पूर्वक जायदादका प्रबन्ध कावूरके सुपुर्द करनेसे वह आलसी, दीर्घसूत्री और फजूलखर्च हो जायगा। परन्तु उसके पिताने कहा कि-नहीं, पचीसीके आसपास अगर मनुष्यको भला-बुरा जाननेकी लियाकत न आई तो फिर कभी नहीं आ सकती। बात कावूरकी माताको पट गई । अस्तु । इन्हीं दिनों पीडमाण्टके , कुलकथा और शैशव । राजा चार्ल्स अलबर्टने कापूरके पितासे अनुरोध, नहीं आग्रह, किया कि आप टयूरिनमे पिकारिओ अर्थात् पोलिस विभागके प्रधान अधि- कारीका पद स्वीकार कर लीजिए। उसने राजाकी बात मान ली। तब वह लेरीनाली अपनी जायदादका इन्तजाम और देख भाल करनेमें असमर्थ हो गया । इधर घरके और लोगोंने भी उस पर विशेष ध्यान न दिया । कुछ दिन इसी तरह अंधाधुन्धीमें बीते । इससे बड़ा नुकसान हुआ। तब कापूरने जायदाद अपने अधि. कारमें लानेकी ठानी, क्योंकि कानूनके अनुसार इस सम्पत्तिका वारिस उसका जेठा भाई था। इसके लिए उसने उसकी तथा अपने पिताकी अनुमति प्राप्त की। लेरीवाली यह जायदाद बहुत बड़ी थी। उसे अपने अधीन करते ही वह बहुत बडा जमींदार बन गया । सैनिक विभागकी नौकरी छोडनेके दिन तक खेतीके निपयमें उसे 'काला अक्षर भैसके बराबर ' था । परन्तु कामका भार उठाते ही उसने कृषि-शास्त्रके अध्ययनका सपाटा चलाया। थोड़े ही समयमें वह उस विषयका इतना ज्ञाता होगया कि जियादहसे जियादह पैदागार करने लगा । कृपि सुधारसे सम्बन्ध रखनेवाले नयेसे नये वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करनेकी उसने चेष्टा की । अपनी जमीनमें अपने प्राप्त ज्ञानका प्रयोग वह वार बार किया करता। इन प्रयोगोंके द्वारा वह स्थानीय अपढ़ और अज्ञान खेतिहरोंको भी कृपि-शास्त्रकी शिक्षा दिया करता। कावूरकी मह- चाकाक्षा क्या थी, यह पहले ही कहा जा चुका है। उसके सफल होने योग्य अनुकूल परिस्थिति अभी तक प्राप्त न हुई थी। मेजिनीके आन्दोलनके कारण देशमें एक ओर विद्रोह और विप्लव तथा दूसरी ओर अधिकारियोंकी धरपकड़ नीतिका युद्ध हो रहा था । मेजिनी- पक्षके लोगोंकी आकाक्षाओंके साथ कापूरकी सहानुभूति तो थी, पर ।
कावूर। उनकी सफलताके लिए जिन उपायोंसे वे काम लिया चाहते थे वे उसे बिलकुल पसन्द न थे। दोनों पक्षोंके वलाबल पर विचार करके उसने यह निर्णय कर रक्खा था कि गुप्त मण्डलियोंके गुप्त पड्यंत्रों- द्वारा इटलीका पुनरुज्जीधन नहीं हो सकता। उसकी यह वारणा थी कि पीडमाण्टके सदृश स्वतन्त्र राज्यकी सहायतासे ही यह काम वन सकता है। परन्तु देशमें जो अनिष्ट गुप्त आन्दोलन हो रहा था, उसका डर दूर हुए विना कावूरके साथ पीडमाण्टके अधिकारि-मण्ड- लकी सहानुभूति होना असम्भव था। इधर काबूरको भी यह अनुचित मालूम होता था कि जब तक अधिकारियोंकी धरपकड़ नीति कायम है, उनसे सम्बन्ध रक्खा जाय । ऐसे दुहेरी पेंचमें आजानेके कारण उसने निश्चय किया कि जब तक यह दशा दूर न होगी मैं राजनै- तिक मामलोमे प्रत्यक्षत न पढूंगा, पर उसे भावी उत्कर्ष पर पूर्ण विश्वास अवश्य था। अस्तु । कोई १५ साल उसे अपनी लेरीगाली जायदाद पर बिताने पड़े। परन्तु ये १५ वर्ष उसने निकम्मे बनकर आलस्यमें, एशो आराममें, फजूल नहीं गंवाये । बल्कि इटलीको एक राष्ट्र बनाकर उसका पहला प्रधान मन्त्री होने की जो उसकी सात्विक महत्त्वाकाक्षा थी उसीको पूरा करनेके उद्योगमें उसने अपना समय लगाया। इसका सविस्तर वर्णन आगेके प्रकरणमें किया ही जायगा। यहाँ तो सिर्फ लेरीमें उसके जीवनक्रमका तथा तद्विषयक एक दो छोटी बडी बातोंका ही उलेख किया जायगा । लेरीमे वह बहुत सादगीसे रहता था। भोर ही ४ बजे वह सोकर उठना । सुद ही अपने जानवरोंकी देख-रेख करता, फिर खेतों पर दौरा करता और मजदूरों तथा नौकरोंसे उनके जिम्मेका काम करवाता। कभी कभी खुद भी काम करता । निजका तहसीउ वसूल वह आप ही युलफया और शैशव। २१ करता। शामको अपने कितने ही चार दोस्तोंको सार टेकर यह भोजन करता । फिर सर्व साधारणमें जाकर उनसे खुले दिरसे कुछ देर हैसी- मजाक और गपशप करता { हर किसी दरजेके लोगों में हिटमिल जाने- की फलामें वह खून प्रवीण था। इस कारण वह लेरी तथा आसपासके नॉन-रोड़ोंके लोगोंका बड़ा स्नेह-पान बन गया था। अपने नौकरों- बाकरों के साथ वह बढ़ी दया और ममताका यरतान करता। इससे उसे श्वानपान और ईमानदार नौकरोंकी कमी न पड़ती थी। ये तथा आस-पासके किसान से अपने मा-यापकी नाई समझते थे। कावरका बभार बड़ा गम्भीर था । उसकी मनोरचना काव्य अथवा अद्भुत रम Romance ) में रमण करनेवालीन थी। वह आलोचना गरेपणा-प्रिय थी । अर्थात् रसिकता और प्रेम ( प्रणयि-प्रेम ) इन भानोंका उसमें प्रायः अभार पा। काव्यप्रन्थों में अकेले शेक्सपिअरके अन्य उसे प्रिय थे। क्योंकि उनमें माननचरितका तथा भिन्न भिन्न चित्तवृत्तिनाले मनुष्यों- के भिन्न भिन्न समय पर होनेवाले व्यवहारोंका सूक्ष्म ज्ञान प्रकट किया गया है। आर विशेष करके, वही उसे चाहिए भी था । रसिकताके अमानके कारण लेरीके सृष्टि-सौन्दर्य के मानन्दका अनुभव उसके हिस्सेमें न आता था। तथापि सादी रहन-सहन, शान्ति, अकृत्रिमता और व्यवहार-चतुरताकी जो शिक्षा उससे मिलनी थी उसे वह बडे महत्त- की मानता था। कानूरका जेठा भाई गस्टाय धर्मशास्त्र और तत्व-ज्ञानका वडा भारी पण्डित या। कावूरने अपने भावी जीवनके अधिकाश दिन इसीके घर पर बिताये । अखीर तक दोनों एक दूसरेको बहुत चाहते रहे । परतु युवावस्थामें एक बार, एक जरासी बातके लिए, दोनोंमें झगडा भी होगया था । तर गस्टारका मिजाज बड़ा तेज था | उसने कावूरके २२ कावूर। . सर पर एक कुरसी फेंक मारी, परन्तु कावूरने उस मौके पर विलक्षण आत्मसयमका परिचय दिया। कावूर पहले पहल जिनोआमें सैनिक इजिनियर विभागमें नियुक्त हुआ था। वहां रहते हुए स्थानीय स्वास्थ्य-रक्षा-विभागके अध्यक्ष- की पत्नीका उससे बडा स्नेह हो गया । उसके प्रेम और ममताकी सीमा न रही । वह बडी सुन्दरी और सुसंस्कृता थी । तिस पर भी वह कापूरकी पूर्ण भक्त बन गई थी। कावृरकी भावी उच्च योग्यताकी कल्पना करके या और किसी कारणसे, वह उसे इतना चाहती थी कि उसके लिए मन ही मन सूखने लगी। कोई १० वर्षों तक उसका वियोग-दुःख भोगकर अन्तमे वह मौतका शिकार बन गई । उसके राजनैतिक विचार लोकसत्ताक शासन प्रथाके अनुकूल थे । कापूर पूर्ण लोकसत्तानादी न था, वह प्रातिनिधिक और नियन्त्रित शासन-पद्धतिका प्रेमी था। तथापि शीघ्र ही उन दोनों में मैत्री हो गई थी। कावूर भी उसे चाहता या-उस पर अनुरक्त था, पर उसके साय विवाह नहीं कर सकता था । अतएव उसकी दशा पर तरस खानेक सिवा कापूर और कुछ न कर सका । उसके सारे जीवनमें प्रेम-सम्बन्धिनी यही एक घटना हुई । इसके बाद तो वह स्त्रियोंसे बहुत बचकर चलता था, संभल कर उनसे बरताव करता था। अविवाहित रहकर उसने अपनी सारी जिन्दगी इटलीके पुनरुद्धारके लिए खर्च करनेका निश्चय किया और मृत्युके दिन तक अपनी प्रतिज्ञा निमाई । पूर्वोक्त रमणीके सहवाससे उसके उत्तेजक विचारोंका प्रमाव कावरके हृदय पर बहुत पडता था। और फ्रान्सके क्रान्ति- कारक आन्दोलनोकी खबरें भी उसे बारबार सुनाई दिया करती थीं । इन कारणों से उसके भी मुंहसे एक बार राजनैतिक विषयमें कुछ फुलकथा ओर शैशव। min च्छृखल बातें निकल गई दीं। तबसे उसकी चाल-ढाल पर खुफिया लिसकी नजर रहने लगी। वह सुद भी इस बातको जान गया था, और इस कारण आगे वह फूक फेंक कर पॉच रखता। उसके बादके यवहार तथा सम्भाषणमें बहुत ही सावधानी दिखाई देने लगी। कापूर जब जिनोआमें था मेजिनी भी वहीं था। दोनाके हृदयोंमें क ही प्रकारके-इटलीके पुनरुज्जीवनके-विचार तरङ्गित हो रहे थे। रन्तु दोनोंकी मनोवृत्तियोंकी रचना एक दूसरेसे भिन्न थी। इस कारण दोनोंका परिचय होना तो दूर रहा, कभी भेट तक न हो पाई। क इतिहासवेत्ताका अभिप्राय है कि यदि उनकी मुलाकात हो जाती जो एक दूसरेके कितने ही हेतु-विपर्यास ( Misunderstand. ngs) या गलतफहमियों, दूर हो जाती और मेजिनीकी धींगा-धीगी भी कम हो जाती । परन्तु ऐसा अवसर उपस्थित न हुआ। इससे कावूरको अन्त तक मेजिनीकी नीतिका कमसे कम सार्वजनिक व्या- व्यानोंमें तो-निषेध ही करते रहना पडा । इससे लोग कभी कभी कावूर पर अप्रसन्न भी होजाते थे । परतु विकारकी अपेक्षा विचारकी और उसकी प्रवृत्ति सदैव अधिक रहती थी। उसका उद्देश भी शुद्ध और निरपेक्ष या । अतएव वह लोक-प्रियताके सदृश कुछ अंशमें बञ्चल वस्तुफी अधिक कीमत न करता था । अपनी ही कार्य- क्षमताके बल पर वह कार्य किया करता था और उसमें सफलता लाभ भी करता । उसका ध्येय निश्चित था । जिन उपायोंसे उसकी सिद्धि हो सकती थी, निडर होकर उनका उपयोग करनेमें वह कभी पीछे न हटता था।
.. कार। के मृत्युदिन तक उनके पास रहना ही मेरा परम कर्तव्य है। समें रहकर मैं क्या करांगा ? इटलीके कितने ही लोग अपना देश डकर आजकल अन्य देशों में जा बसे हैं । बताइए, उन्होंने कौनसा पार्थ कर दिखाया है ? हमारा देश दुर्दशाग्रस्त है। इसलिए वहाँसे गकर अन्यत्र चले जानेसे कोई भी विभव-वैजयन्ती नहीं प्राप्त कर कता । और चाहे यह सम्भव भी हो, पर मैं तो इसके लिए कदापि र न हूँगा । मेरा देश चाहे सुखी हो अथवा दुखी, अपना रा जीवन मैं उसीको अर्पण करेगा। यह विश्वास हो जानेपर कि और कहीं जानेसे मेरा भाग्योदय होगा, स्वदेशके प्रति कृतज्ञ न हूंगा-उसके साथ बेईमानी न करूँगा ।" इस पत्रसे उका निस्सीम स्वदेश-प्रेम तो प्रकट होता ही है, अपने तापिता पर उसका पूज्य भार भी स्पष्ट दर्शित होता है । अपने गतिक अर्थात् उन्नति-शील विचारों के कारण वह अपने मातापिताको प न था। कौटुम्बिक सुख उसे साधारण ही प्राप्त था । तिस पर भी ने मातापिताको वह इतनी आदरकी दृष्टिसे देखता था, यह बात शेप रूपसे याद रखने लायक है । अस्तु । कावूर जब पेरिसमें था तब कोलकी डिमामसी इन अमेरिका' नामकी प्रसिद्ध पुस्तक प्रका- त हुई । इस पुस्तकके बदौलत लेखककी सारे योग्पमें ख्याति हुई। बूरने भी उसे पढा । यद्यपि उससे उसने कोई नई बात न सीखी, पि उसने अपने कितने ही विचारोंका सुसम्बद्ध प्रतिपादन उसमें ता। इससे उसे बडा आनन्द प्राप्त हुआ। तत्कालीन माना-समाजकी कसत्ताक शासनपद्धतिकी ओर झुकती हुई प्रवृत्ति तथा राजसत्ता र धर्म-सत्ताको एक दूसरेसे अलिप्त रखनेकी ओर उनका झुकाव-इन श्योके सिद्धान्त कारके मस्तिष्कमें निर्णीत हो रहे थे । पूर्वोक्त तकमें उन्हींका उद्घाटन उसे मिला । पेरिसकी विद्वन्मण्डलीमें सेंट यात्रा और पूर्व तैयारी। २७ न्युचे और कुसिनसे उसकी मित्रता हो गई थी। रूपर, कोलार्ड, निक्जो, गुजो,- जुल्स, सिमा, मिचिरेट, ओजानम, किनेट और पोलिग फरि भडेम मिकेविक्न, इत्यादि पण्डितामणियोंसे भी उसका परिचय हो गया था.। वह उनके व्यारयान सुनने भी जाया करता । रेचेल नामकी एक तत्कालीन प्रख्यात नहीको भी यह बहुत चाहने लगा था। कानू- रकी चित्त-वृत्ति ऐसी न धीजो काव्य-नाटकादिमें रममाण हो । तथापि रेचेलके अत्युत्तम कला-कौशलको देखकर वह उस पर बहुत लव्य हो. गया था। किसी भी वस्तुके साधारण गुणको देखकर यह कभी सन्तुष्ट न होता था। उसका ध्यान उसके अलौकिक गुण-प्रतिभा- पर ही रहता था। यह उसे जहाँ मिल जाता वहीं वह बड़े समाधान- पूर्वक रम रहता। “रेचेलकी नाट्य-निपुणता पहले दरजेकी थी। इसीसे वह मेरा भी चित्त आकर्षित कर सकी। " स्वय कावूरका ही यह कथन है । पेरिसमें रहते हुए कापूरको जूआ खेलने और सट्टा करनेका चस्का लग गया था। एक बार उसे इसमें बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। उसकी पूर्तिके लिए उसे अपने पितासे द्रव्य-याचना भी करनी पड़ी। पिताने स्पया तो भेज दिया, पर साय ही एक सौम्प. शब्दोंमें पर सरत पर लिख कर उसे डॉटा-डपटा भी । पत्र पहुँचनेके पहले ही कापूर अपने किये पर लजाने और पछताने लगा था। पिताके उपदेश-पूर्ण पत्रको पाकर तो उसने इस अनिष्ट आपत्तिसे सर्वदा दूर ही रहनेका और भी दृढ निश्चय कर लिया । और, भविष्यमें फिर वह कभी ऐसे फन्देमें नहीं पडा । * * इसका वणन काउटेस मार्टिनेंगो सिजारेस्को नामक उसकी इटालियन चरितकाने, उसके यानगी रोज-नामचेके आधार पर किया है । इस रोजनामचेमें पूर्वोक्त रेरिका कहती है कि, कावूरने अपने लिए वार बार इस दुव्र्यसनका निषेध किया है और भविष्यमें ऐसा न करनेसी प्रतिज्ञा की है।
कावूर । । इग्लैंडमें कावरका कोई सगा-सम्बन्धी न था । तथापि वहाँ भी उच्च श्रेणीके प्रधान प्रधान लोगोंसे उसका परिचय शीघ्र ही हो गया । वे भी उसे चाहते थे । विलियम ब्रोकडन् नामका एक चित्रकार उसका मित्र था। वह उसे एक बार रायल जाग्रफिकल सोसाइटीके भोजमें ले गया । वहाँ सोसाइटीके मन्त्रीने अचानक कावूरके आरोग्य- चिन्तनका एक प्रस्ताव पेश किया, तब लाचार होकर कृतज्ञता प्रकट करनेके लिए कावूरको एक भापण करना पडा । उसका यह पहला ही सार्वजनिक भाषण या । इस व्याख्यानका प्रभार वहाँके लोगों पर इतना पडा कि लार्ड रिपनने उठकर सस्मित कहा "परमात्मा करें, इस भाषणसे ही कावूरके कार्यक्षम दीर्घ-जीवन क्रमका आरम्भ हो।" अर्थात् उसे अपने अङ्गीकृत कार्यके करनेका मौका मिले । जान मुरे, नामी गणितज्ञ बेवेज, हालेम, टाक्वहिल, बायरन और शेरिडनकी लडकियोंसे उसकी अच्छी जान-पहचान हो गई थी। इनके अतिरिक्त ट्रिनिटी कालेजके लाइबेरियन एडवर्ड रोमिलोके द्वारा डेवन पोर्ट नाम- के एक अॅगरेज जमींदारसे भी उसकी पहचान हो गई । उस जमींदारने अपनी प्रयोगशाला और उसके आसपासकी जमीन कुछ दिनों के लिए कानूरके सिपुर्द कर दी, जिससे कि वह अगरेजी कृपि-पद्धतिका ज्ञान प्राप्त कर सके । कावूरने परिश्रम करके उस प्रणालीका सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त कर लिया। वहॉकी भूमिगत-नालियोंकी पद्धति (Subsoul drainage) को उसने बहुत पसन्द किया । अंगरेजोंके आदर्श- प्रयोग-क्षेत्रों (खेतों) को देखकर वह सन्तुष्ट हुआ, पर चे उसे जेचे नहीं। क्योंकि ऐसे खेतोंसे छोटे खेतिहरोंको कुछ लाम नहीं । उनमे बडा सर्च पडता है। कावूर तो ऐसे खेतोंका मजाक उटाया करता। र कहा करता--इस प्रकारके मुधोरेन्चुकोंको चाहिए कि खेतीमें ' याना ओर पूर्व तेयारी। २९ किये जानेवाले सुधार किसानोंके लिए किफायतशीर होंगे या नहीं और अगर हों भी तो कितने और किस रीतिसे, इसका अनुभव वे करा दें। जनतक वे ऐसा न करें उनका कथन अनुमोदनीय नहीं । सामाजिक और आर्थिक सुधारों पर भी उसका व्यान था । अतएप उसने इग्लैंडके तत्कालीन नये Poor Laws (बेकारों के कानून) का अध्ययन किया । वहाँके धुएंके कारखानों, दवाखानों और कैदखानोंका भी निरीक्षण किया । वहाँके कैदखानोंमें वन्द कैदियोंके खानपानके प्रबन्धको उसने पसन्द किया । परतु पिसाई- का काम उसे अच्छा न लगा । उसका कहना था कि इससे कैदियोंका नैतिक-चरित्र भ्रष्ट हो सकता है । वे सदाचारी नहीं रह सकते। उसकी रायमें उपयोगी और थोडे बहुत फायदेका काम ही कैदियोंका सच्चा सुधार कर सकता है । इस यात्रामें उसने शेक्सपिअरकी प्रसिद्ध कन भी देखी । अंगरेजी शासन-शास्त्रका तो उसने बड़ी श्रद्धा- पूर्वक अध्ययन किया। कुछ फ्रेञ्च और स्विस मासिक पत्रों में उसने इस विषय पर महत्वपूर्ण लेख भी लिखे । (१८४३-४६ ईसी) जिनो- आ निवासी अपने मित्रोंकी प्रेरणासे उसने ये लेख लिखे ये । इन लेखोंके दो गुण बडे महत्त्वपूर्ण ये-(१) स्वतत्र-विचार-पद्धति और (२) अचूक परिपूर्ण जानकारी । इससे इंग्लैंड और फ्रान्समें उसकी प्रसिद्धि भी हुई और वहाँके लोग उसकी गिनती 'निचारशील । ( Thinlers) पुरुषोंमें करने लगे । इन लेखोंमें उसने पिट ओर पीलके शासन-विज्ञान और राजनीतिकी मार्मिक रीतिसे आलोचना की है। कुछ स्थानों पर तो उसने पीलको नीतिका अनुवाद भी किया है । यही नहीं, बल्कि उसने पीलके एक महत्त्वपूर्ण कामका भविष्य ।
३० कार। औरोंके पहले ही कयन कर दिया था। * आयलंड तथा तत्कालीन भावी स्थितिका जो निवेचन उसने किया था वह अपूर्व जाना गया । इस लेखमें की गई उसकी कितनी ही सूचनायें, आगे चलकर, कार्य- रूपमें परिणत हो गई । इन एक दो उदाहरणोंसे उसके बुद्धिसामर्थ्यका- उसकी बुद्धिमत्ताका अनुमान हो सकता है। उसने आयलेडकी समस्याका विचार साम्राज्यवादी मनुष्यकी दृष्टिसे किया था । परन्तु उस समय इग्लैडमें साम्राज्य-वादित्वको आजके इतना महत्त्व प्राप्त न या। तथापि उसने यह अनुमान करके कि भविष्यमें उसकी महत्त्व-वृद्धि होगी, उस स्थितिका ऐसा विवेचन किया है जो दोनों देशों ( इग्लैड और आयलड) को हितकारक हो । यह उसकी दूरदर्शिताका प्रमाण है। उसके एक चरित-लेखकका तो यह कहना है कि जिस दृष्टि से उसने इग्लैंड और आयलेंडके पारस्परिक सम्बन्धका विचार किया है उस दृष्टिसे इस निपयका विचार उसके पहले और पश्चात् आज तक किसी भी विदेशी विद्वानने नहीं किया । कावरकी कीर्ति, इस प्रकार, विदेशोंमें बढ रही थी। परन्तु उसके स्वदेश पर यदि दृष्टिपात किया जाय तो वहॉकी दशा बिलकुल ही खराब थी। उसे देखकर उत्साह भङ्ग हुए निना नहीं रह सकता था। भाषण-स्वातन्य और लेखनस्वातन्त्र्यको उस 4 वह काम है-Peel's abolition of corn Laws इस समय कावूरने जो लेस लिसे ये उनमें विशेष प्रसिद्ध लेस ये है (1) Thoughts on the condition of Ireland and its future (2) The English corn Laws (3) Pauperism and the official Report of the comon the Administration of the poor Law in England mission यात्रा और पूर्व तैयारी। -~- । देशमें अर्द्धचन्द्र दे दिया गया था। अन्य देशोके पत्र-पत्रिकायें मॅगानेकी भी आजादी वहाँवालोंको न थी। पेरिसका एक मामूली समाचार-पत्र कापुरकी मौसीको दरकार था । उसे मगानेके लिए उसे जमीन-आसमान एक करना पड़ा। फेञ्चराजदूतके द्वारा पीड- माण्टकी सरकारसे लिखा पढ़ी करना पड़ी, तब जाकर बडी कोशिशों पर कहीं उसे इजाजत मिली । रेलवे, तार, इत्यादि परिचय-वृद्धिके नवीन उन्नत सावनों तकको अपनानेके लिए पीडमाण्टके सत्ता- धारी और सरदार तैयार न थे । वहाँके अधिकाश लोगोंका, विशेष करके पोमका, खयाल था कि रेलवे, तार इत्यादिके स्मरूपमें प्रकट होनेवाली शक्ति शैतानोंकीशक्ति है--(Powers of darkness) | काउट पेटिट नामके एक लेखकने उन्हीं दिनों रेलरे पर एक पुस्तक लिखी । पीङमाण्टकी अक्लमद सरकारने उसे अपनी हदमें आनेसे रोक दिया । तथापि, किसी न किसी तरह, उसकी कुछ प्रतियाँ वहाँ आ ही पहुंची। एक प्रति तो स्वय पीडमाण्टके राजा चार्ल्स अलबर्ट के हाथोमें भी जा दाखिल हुई। मूल पुस्तकमें राजनैतिक बातोंकी बू तक न थी—जिक तक न था | हॉ, कावूरने अपनी समालोचनामें राजनैतिक दृष्टिसे रेलवेकी जो महिमा गाई थी, उसका वर्णन अल्पत्ते उसमें था । कावूरने अपने लेखमें यह लिखा था कि रेलवेकी वृद्धिसे इटलीमें नैतिक-मानसिक-एकताका मार्ग सुलभ होगा और उसके आगेकी सीढी राष्ट्रीय एकताके भाषका, भी प्रचार होनेमें बडी सहायता मिलेगी। उसने लिखा था कि- "रेलके प्रचारसे स्थानीय मत्सर और सङ्कुचित विचार दूर होगे, लोगोंके आचार- र-विचार अधिक उन्नत होंगे, उनकी दृष्टि और उनके मस्तिष्कका विकास होगा । इससे उनके पुनरुद्धारका काम बडा मुलभ , ३२ कावूर। AMRAAAAAnim . हो जायगा देशमें प्रचलित पारस्परिक और व्यक्ति-विषयक कलह तथा राजनैतिक मत-भेद भी इसके बदौलत नष्ट हो जायगा। उनके स्थान पर सव कहीं एक राष्ट्रीयताका भाव उदय हो जायगा । यदि ऐसा हो जाय तो फिर 'इटलीकी राष्ट्रीय स्वतन्त्रताका' कार्य जो हमारा अभीष्ट है, आसानीसे सिद्ध हो जायगा ।" कावूरके राजनैतिक लेखोंमें अथवा वातचीतमें 'स्वदेश'के लिए 'इटली' शब्द ही व्यवहृत होता था। ऐसे लेखोंमें पीडमाण्ट, वेनिशिया, इत्यादि प्रान्तीय भागोंका उल्लेख वह भूलकर भी न करता था। 'इटलीको एक' करके 'इटलीका राज्य स्थापन करना' ही उसकी महत्त्वाकाक्षा थी । अतएव राष्ट्रीयताके विषयमें जन कभी वह लिखता अथवा वातचीत करता तब 'इटली' शब्दका ही प्रयोग किया करता । यह ठीक भी या। अस्तु । उस समयके कितने ही इटालियन देशभक्तोंने यह आक्षेप किया कि-इटलीमें सर्वत्र रेल- वेका प्रचार हो जानेसे इटलीके गलेमें पड़ी हुई आस्ट्रियन सत्ताकी फॉसी और भी दृढ़ हो जायगी। तब कावूरने उन्हें उत्तर दिया- रेलके प्रचारसे अन्तस्थ ऐक्य बुद्धिमें हमें बहुत सहायता मिलेगी। यह प्राप्त हो जानेपर हमें आस्ट्रियासे डरने की कोई आवश्यकता न रह जायगी। रेलवेके आगमनसे देशी उद्योग-वन्धोंको खूब उत्तेजना मिलेगी। जर्मनीके सदृश गम्भीर और चतुर राष्ट्रसे नाता जोडना आसान हो जायगा । इस बुद्धिवाद अर्थात् तर्कनाके द्वारा उसने पूर्वोक्त कट्टर देशभक्तोंकी अकारण भीति और निरोध निर्मूल करनेका प्रयत्न किया । पूर्वोक्त लेखमें उसने आस-पर्वतको काटकर रेलवे लानेका और जर्मनीसे मित्रता करनेका भी थोडा बहुत जिक्र प्रसङ्गवश कर दिया था । ये दोनों योजनायें उस समय अगक्य समझी जाती थीं। इटलीकी एकता' भी तो पन्द्रह वर्षों में काया-पलट । ३३ - कहाँ उस समय सम्भव मानी जाती थी १ एक इटालियन तत्त्ववेत्ताने तो उस समय ढिंढोरासा पीट दिया था कि आजसे एक सदी आगे तक तो यह कभी सम्भव नहीं, तथापि कापूरके मस्तिष्कमें ये तीनों बातें प्रत्यक्ष करा देनेका सामर्थ्य सञ्चित हो रहा था। हाँ, उसके प्रकट होनेका असर अभी दूर था, उसके अनुकूल परिस्थिति अभी तक निर्माण न हुई थी। पर उसकी उत्पत्तिके चिह्न अलबत्ते देख पड़ने लगे थे। ४-पन्द्रह वर्षोंमे काया-पलट । राजनीतिक क्षेत्रसे प्रत्यक्षतः अलिप्त रहकर कापूरने जो १५ वर्ष विताये उतनी अवधि में इटली के अधिकाश प्रान्तोंमे कितने ही उत्साह- जनक उलट-फेर अर्थात् परिवर्तन हो गये । वे दिन शान्तिके थे। औद्योगिक आर्थिक उन्नति झपाटेसे हो रही थी। मेजिनी के क्रान्तिकारक तत्वज्ञानके सिद्धान्तोंके प्रचारके कारण होनेवाले बलये और अशान्ति भव प्राय निर्मूल हो गई थी। उनके उन्मूलनके लिए वहेकि अधि- कारियोंने जो उप्र स्वरूप धारण किया या अन वह बहुत सौम्य हो चुका था । वहाँके भिन्न भिन्न राज्योंके उच्चवर्गीय लोगोंके हृदयों में अपने अपने राज्योंके भौतिक सुधार करनेकी प्रवृत्ति भी उत्पन्न हो चली थी। राजनैतिक सुधारों के पक्षपाती भी अब मेजिनीके विचारोंको और मागको पसन्द न करते थे। अब यह समझने लग गये थे कि गुप्त-मण्डलियों और पइयत्रों की अपेक्षा खुलमखुटा विधि-विहित आन्दोलन करना आधक श्रेयस्कर है। अधिकाश एक राष्ट्रीयता-वादियोंके विचार भर ३४ कावूर। ऐसे ही थे। इस कारण उनमें और अधिकारि-वर्गमे जो वेढब बेबनाव हो गया था अब वह भी बहुत कम हो चला था। फलता रेलवेकी वृद्धि, । * मेजिनीके उत्तेजक और मनोविकारोंको उद्दीपित करनेवाले विनाराने इटलीके देशभक्तोंमें वड़ी जागृति की, इसमें सन्देह नहीं, परन्तु उसका राज- नैतिक लक्ष्य-ध्येय-और उसकी सिद्धिके लिए तजवीज किये गये उपाय उस देशके लोगोंकी पूर्वपरम्पराके अनुसार न ये। इस कारण उसके प्रयल सफल न हुए । और यह विलकुल स्वाभाविक था। अनियन्त्रित राजसत्ताके अन्यायपूर्ण शासनमें जिस राष्ट्रकी कितनी ही सदिया बीत गई हो वहाँ, विदेशियोंका राजनीतक प्रभुत्व होते हुए भी एक दम लाक्-सत्ताक शासन- शैली स्थापन करनेका हौसला करना, काल्पनिक या विचारटिसे चाहे कितना ही श्रेष्ठ हो, परन्तु व्यवहारकी दृष्टिसे उस ध्येयका सिद्ध हो जाना प्राय असम्भर है । इटलीके राष्ट्रोद्धारक पक्षने बहुसरयक जनधन स्वाहा करके यह असम्भावना सिद्ध कर दिसाई है। मेजिनीके उपाय जव स्वय उसीके देशमें विफल हुए और उसका राजनैतिक ध्येय भी अव्यवहार्य सिद्ध हुआ, इटलीके पुनरुनीवनके समय भी वह सिद्ध न हो पाया, तब भारतीयों लिए उस पयका पथिक होना और उस ध्येयकी धारणा करना कितना निष्प्र- योजन और कितना हानिकर है, इसके बताने की आवश्यकता नहीं। किसी भी देशमें कोई भी सुधार, उस देशकी प्राचीन परम्परा अनुसार ही करना चाहिए। अपनी परिस्थिति और परम्पराका विचार न करके नवीन मोहक विदेशी सस्थाओं और आन्दोलनोंका अनुकरण यदि यहॉरे लोग करेंगे तो उनके सामर्थ्यकी अकारण हानि और समयका दुय्य ही होगा। हिन्दुस्तानकी पूर्व-पीटिका अर्थात् प्राचीन परम्पराका यदि विचार किया जाय तो इटलीकी तरह, यहाँ भी, ले-सत्ताक ( Republic) शासन-प्रणाली स्थापन परनेकी आकाक्षा करना पागलपनके सिवा आर कुछ नहीं। यहॉकी परि- स्थिति और प्राचीन परम्पराके अनुसार तो यहाँ नियन्त्रित शासन-मत्ता (Constitutional Monarchy) अथवा अधिकसे अधिक, “यलाढय मध्यवर्ती सत्ता" के तन्त्रसे काम करनेवाला अनेक भागोंका एक सघ स्थापन करना उचित और सम्भव है।
पन्द्रह वाम काया पलट । - उद्योगधन्धोंकी उन्नति इत्यादि बातें बड़ी सुगमतासे हो रही थी। १८४० ईसवीसे ४६ तक इटलीके अधिकाश बड़े बड़े प्रधान भागोमें रेलने लाईनें बन गई थी, और स्वय पांडमाण्टमें भी, सब कहीं, रेलचे जारी करनेका काम शुरू हो गया था। १८४६ ईसवीमे काबूरने " Nouvelte Revue " नामके एक मासिक पत्रमें, एक लेख छपाया । उसमें उसने यह दिखलाया था कि इस रेलवेके बदौलत कौन कौनसे महत्त्वके लाभ होंगे। वह कहता है- "परिचय-वृद्धिका यह सुलभ साधन है। इसकी सिद्धिसे--प्राप्तिसे- हर तरहके आन्दोलनोंको विशेप उत्तेजना मिलेगी। आज तक एक भागके लोग दूसरे प्रान्तके लोगोंको विदेशी-गैर समझते है । अब ये उन्हें अपना समझने लगेगे । वे परस्पर एक दूसरेसे बार बार हिल- मिल सकेंगे । उनके हृदयकी विकल्पना, पारस्परिक मत्सर, और क्षुद्र भार नष्ट करनेमें ये लोहमार्ग खूब काम देंगे। * हमारी यह उत्कट इच्छा है कि ऐसा हो । यह हो जाय तो मानों हमने इटालियन स्वतन्त्रताके लिए एक प्रकारका विजय प्राप्त किया।" इत्यादि। इस तरह, रेलवे और औद्योगिक उन्नतिके कारण, मध्यम दलके लोगोंकी दशा बहुत मुधर गई । सम्पत्ति-वृद्धिके साथ ही साथ वहाँ विद्या और कलाकी भी अभिवृद्धि होने लगी। राजनैतिक चर्चा कर- नेकी मुविधा यद्यपि अभी न हुई थी तथापि अन्य विषयों के साहि- त्यकी सृष्टिके लिए सरकार लोगोंको उत्साहित करने लगी थी। लोगोंकी भी पुस्तक-पाठकी लालसा तीन हो रही थी। कितने ही सुन्दर और सचित्र साहित्यिक मासिकपन भी निकलने लगे थे। मासिकपत्रोंमें प्रतिभा सम्पन्न लेखक बीच बीचमें राष्ट्रीयताके भाव जागृत करनेवाले गम्भीर विचार प्रदर्शित किया करते थे। लोग भी ३६ कावूर। उनमेंसे इष्टार्थ ग्रहण करनेके आदी होते जाते थे। फलतः जनतामें राष्ट्रीय एकताके भाव धीरे धीरे वृद्धि पा रहे थे । १८४० ईसीसे पोप शासित राज्योंको छोड़कर अन्य सब राज्यों के प्रधान नगरोंमे हरसाल शास्त्रीय अर्थात् वैज्ञानिक और औद्योगिक सभायें होने लगी। इससे राष्ट्रीय ऐक्यके सवर्द्धनमें बडी मदद मिलने लगी। इन परि- पदोंके बदौलत देशके अधिकाश विद्वानों और कार्यक्षम पुरुषोंको सम्मिलन और विचार-विनिमयका अवसर मिला करता। १८४३-४६ ईसवीके लगभग सबके मस्तिष्कोंमें राजनैतिक सुधारके विचार उमड । रहे थे। उस समय मेजिनीके ही सदृश एक प्रतिभा-पूर्ण लेखक उत्पन्न हो गया था। उसका नाम थागोबर्टी । वह पीडमाण्ट-राज्यका निवामी था। १८३३ ईसवीमें भागकर वह ब्रुसेल्समें जा बसा। १८४३ ईसन में उसने एक पुस्तक "I1 Primato morale ecivile degli Italiani" लिखी । उसमें उसने इटलीका राजनैतिक सुधार, वहाँकी पूर्व-परम्पराके अनुसार, फिस तरह किया जा सकता है, इस विपयकी सविस्तर चर्चा की थी। उसने प्रधानत यह प्रतिपादन किया था कि "पीपकी अविसत्ताके अधीन इटलीके समस्त राज्यों का सङ्घ (Tederation ) निर्माण किया जाय । इससे यह देश राजनैतिक दृष्टिसे बलिष्ठ हो जायगा और राजनैतिक सुधारों का मार्ग अधिक सुगम हो जायगा। इस पुस्तककी विचार-सरणि सौम्य ( Moderate ) थी। अतएव इटलीमें उसके प्रवेशका निषेध नहीं किया गया । उसे बहुतोंने पढा। उन्हें उसके विचार पसन्द भी आये। इस पुस्तकमें पोपका प्रभुत्व स्वीकार करनेकी तथा अन्य सगस्त राज्योंकी अन्त स्वतत्रता कायम रखनेकी सलाह दी गई थी। अतएव यह किसी भी राज्यके अधिकारियाके रोपकी पान न थी और इसी पन्द्रह चाम काया पलट। ३७ लिए उसके प्रचारमें किसीने बाधा भी नहीं डाली। उसके विचारोंके अनुसार राजनैतिक उनति करनेकी इस्लासे शीघ्र ही वहाँ एक 'सौम्य राजनैतिक पक्ष' निर्माण हुआ । यह सुहमसुद्धा विधि-विहित राजनैतिक आन्दोलन करने लगा। राष्ट्रीय ऐक्यको वृद्धि के लिए मेजिनी और गोपर्टी दोनों एकही से सचिन्त और एक ही से आतुर थे। परन्तु राजनैतिक सुधारके अन्तिम साध्य और उसे सिद्ध करनेके उपायों- में दोनोंका तीन मतभेद था । गोवर्टी वर्तमान स्थितिको कायम रखकर भाषी स्थितिकी रचना करना चाहता या अतएव उसके विचार व्यवहार्य और सम्भवनीय थे । परन्तु, पक्षान्तरमें मेजिनी प्रचलित शासन-सस्थाओंका निर्मूलन करके उनके स्थान पर ऐसी नगीन शासन- सस्था स्थापन करना चाहता था जो देशकी पूर्व परम्पराके अनुकूल न थी, जिसका अनुमर उस देशकी प्राचीन-परम्पराको न था। कहना नहीं होगा, मेजिनीका यह प्रयत्न अव्यवहार्य और अत्यन्त दुर्घट था । गोपर्टी प्रकट विधि-विहित आन्दोलनका पुरस्कर्ता था और मेजिनी गुप्त और क्रान्तिकारक आन्दोलनका पृष्ठपोषक था । इन दोनों विचार-शील तत्वज्ञोंमें यही बड़ा भारी भेद या। दोनों ही प्रतिभा- सम्पन्न लेखक थे । अतएर दोनोंके अनुयायियोंकी सरया नहुत थी। तथापि अब लोगों का झुकार गोगर्टीके सौम्य दल की ओर विशेष होता जा रहा था, क्योंकि अब लोग समझ गये थे कि मेजिनीके उपाय और साधन कितने अप्रयोजक और कितने निष्फल हैं। गोवर्टी के दलका उद्देश था-पोपकी अधिसत्ताके अधीन इटलीकी राष्ट्रीय एकता करना। अतएव उसका नाम पड़ा-"New Guelfsn "Gueln के मान होते हैं सम्राटके विरुद्ध पोप पक्षकी पुष्टि करनेवाला सभासद । गोबर्टीकी पूर्वोक्त पुस्तक प्रकाशित हो जानेके बाद, शीघ्र ही, वाल्वो नामके दूसरे एक पीडमाण्ट-वासी लेखकने इसी विषयपर एक , कावूर। , पुस्तक लिखी। उसमे उसने गोबर्टीके इस विचारका कि पोपकी अविसत्ताके अधीन राष्ट्रीय एकता की जाय, अभिनन्दन किया। परन्तु एक बात पर उसने वडा ही जोर दिया। उसने लिखा कि इटलीमें यदि राष्ट्रीय एकता स्थापन करनी हो तो पहले आस्ट्रियाका प्रभुत्ल उस परसे हटाइए । यह विचार भी लोगोंको पसन्द हुआ । गोबर्टीका यह विचार था तो उत्तम और कुछ अशमे योग्य, परन्तु उस समय उसका व्यवहारमें लाया जाना बडा दुष्कर था। क्योंकि उस समय जो पुरुप पोपकी गद्दी पर विराजमान या वह अनियन्त्रित और एकाधीन सत्ताका कट्टर भक्त था। देशके भौतिक सुधारोंके विषयमें भी वह प्रतिगामी शासननीतिसे काम लेता था। राज्यका शासन-प्रवन्ध अच्छा न या और वह था भी अन्यायपूर्ण |* इस दशामें पुरोगामी पक्षकी इच्छाके अनुसार पोपकी अधिसत्ताके अधीन इटालियन राष्ट्रकी तैयारी- की बुनियाद डालना प्राय असम्भव था । तथापि पुरोगामियोंने अपना, , प्रयत्न न छोडा, यह देखकर पोप उन्हें हर तरहसे सताने लगा । पर अगरेज इतिहासलेखक, मेकालेने इस दशाका चिन, अपने अनुभवसे इस प्रकार असित किया है-- "The states of the Pope are, I suppose,the worst governed in the civilized world and in the imbecility of the Police, the venality of the public servants, the desolation of the country, and the wretchedness of the people, farce them . selves on the observation of the most heedless traveller -Macaulay's Letters from Rome " अर्थात् पोपके अधीन राज्योंकी शासन-व्यवस्था, मेरे सयालमें जितनी सराव है उतनी किसी भी सभ्य देशकी नहीं। पुलिसकी सिधाई और बेवकूफी, सरकारी नौकरोंकी घूस-सोरी, देशका उजड़पन और प्रजाझी हीन दशा, ये बातें सरसरी नजरसे देसनेवाले यात्रीके भी ध्यानमें आये विना नहीं रह सकती। ।
पन्द्रह वाम काया पलट । Andwo उन्होंने अपना व्रत न छोड़ा। उनके नेता, फारिनीने, अपने पक्षकी ओरसे एक विज्ञापन प्रकट किया, जिसमें उसने अपने पक्षकी मॉगोंका उल्लेख किया था। उसका साराश मुनिए- (१) राजनैतिक कैदियोंको निलकुल माफी दी जाय, अर्थात् वे छाड़ दिये जायें। (२) स्वदेशके दीवानी और फौजदारी कानून योरपके अन्य उन्नत देशोंके कानूनकी टक्करके बनाये जाय । (३ ) म्युनिसिपल कौन्सिलके सभासदोंका चुनार लोकमतके द्वारा हो और पोप उसे पसन्द करें । (४) म्युनिसिपल कौन्सिल जिन तीन सभासदोंकी सिफारिश करे उनमेंसे किसी एक सभासदकी नियुक्ति पोप प्रान्तीय विचार- समितिमें करें और प्रान्तीय विचार-समिति भी जिन तीन सभासदोंकी सिफारिश करे उनमेंसे एक सभासद उच्च विचार-समितिमें नियुक्त किया जाय । (५) इन समस्त समितियोंका आयव्यय पर कुछ अधिकार न रहे । शेष सब पिपयोंमें राय या सलाह देनेका उन्हें अधिकार होना चाहिए। (६) हर किसी मनुष्यको सब तरहकी सरकारी नौकरी पानेका समान अधिकार होना चाहिए। (७) लेखन और भाषणकी स्वतन्त्रताका गला घोटनेवाला कानून रद किया जाय। (८) विदेशी सेना तोड़ दी जाय और उसकी जगह स्वदेशी सैन्य तैयार किया जाय।
४० कार। . (९) समय और परिस्थिति के अनुसार अन्य योरपीय राष्ट्रोंकी तरह यहाँ भी सब तरहके सामाजिक सुधार किये जायें । इत्यादि । यह योजना ऐसी थी जो स्वभावत. ही पोपको स्वीकार न हो सकी थी। अतएव उसके अनुसार सुधार चाहनेवारोंके मुहे बन्द करनेकी जबर्दस्त कोशिशे पोपकी तरफसे की गई। इसके लिए न्याय अन्याय कुछ न देखा-सोचा गया। इससे चिढकर पोप-राज्यके, कुछ लोगोंने, १८४५ ईसवी में, बल्या किया, जो डण्डोंके जोर पर दबा दिया गया। परन्तु इससे भी पुरोगामियोंकी हलंचल बन्द न हुई। बल्कि लोग, जाहिरा तौर पर उनके विचारों और इच्छाओंका समर्थन करने लगे, एव तरह तरहसे उनका उत्साह बढाने लगे। इससे आन्दो- लनने बहुत जोर पकडा । अन्तमें उसका असर, पीडमाण्टके राजा, चार्ल्स अलबर्ट, पर भी पडा । उसे अब अपनी युवावस्थाके उदार विचारोंकी याद आने लगी, जिससे उसका दिल पुरोगामियोंकी ओर झुकने लगा । १८४६ ईसवीमे, चुगीके एक मामलेमे उसने आस्ट्रियाके साथ व्यवहार करनेमे स्वतन्त्र राष्ट्रोचित निर्भीकता प्रकट की और आष्ट्रियाके दबावसे अपने देशको मुक करनेकी इच्छा भी स्पष्ट रूपसे प्रकाश की । अलबर्टका यह काम, इटलीके अन्य राज्योंकी दशा देखते, पुरोगामियों के उत्साह बढानेमें, विशेष कारणीभूत हुआ। तब पुरोगामी उसे अपना नेता या नियन्ता मानने लगे। जून १८४६ ईसवी में एक और घटना पुरोगामियोंके अनुकूल हुई । इस समय 'पायस दि टेन्थ' नामझा नवीन पोप रोमकी गद्दी पर बैठा। वह बडा दयालु, उदारहृदय और मिलनसार था । पुरो- गामियों के आन्दोलनके साथ उसकी सहानुभूति थी। अतएन, गद्दी मिलते ही उसने उनकी पहली बात स्वीकार करके सारे राजनैतिक - ।
पन्द्रह पपी काया पलट। ४१ कैदियोंको छोड़ दिया उसके इम सत्कार्यके बदौलत लोगोंके हृदय- में, गोगर्टीके कथनके अनुसार, इस आशाका सच्चार होने लगा कि यह पोप अवश्य इटलीमें राष्ट्रीय एकता स्थापित कर देगा। अतएर जर जर पोप राजमहलसे बाहर निकलता, लोग उसका जय जय- कार करते-उसके नामकी जय बोलते । यह पोप तो चाहता था कि पुरोगामी पक्षका कार्यक्रम मजूर कर ले, परन्तु रोमन क्युरिया प्रान्तके अधिकाश मुखिया इसका विरोध करते थे । वे पोपके इस विचारमें बराबर बाधा डाला करते। इससे विचार ही विचारमें उसका बहुत समय निकल गया । इस परिस्थितिसे लाभ उठा कर उसके राज्यके पुरोगामियोंन रोम और बोलोमासे, १८४७ ईसीमें, दो समाचार-पत्र स्वतन्त्र रूपसे निकाले । उनके द्वारा वे अपने राजनैतिक विचारोंका प्रचार करने लगे। पनों के चल निकलने पर, शीघ्र ही, उन्होंने एक समिति (Club) भी स्थापन की । लोक-मतकी बढ़ती हुई लहरको देखकर आखिर पोपने भी अपनी इच्छा प्रकट की कि लोक-नियुक्त शासन सभाये स्थापित करनेको मैं तैयार है । क्यूरिया प्रान्तके लोगोंने उसका बहुत विरोध किया, परन्तु उनकी दाल न गली और उसी साल, नाम्बरमें, इस सभाका पहला अधिवेशन हुआ। इसके पश्चात्, कोई डेढ वर्ष खाली गया। परन्तु इस अवधिमें अन्य राज्योंके लोग भी आन्दोलनके लिए उठ खडे हुए । पोपका उदाहरण उनके सामने था ही । उनकी हलचल भी जोर पकड़ गई । सेक्सनीमें, पोपकी प्रणालीके अनुसार, राजनैतिक सुधार होने लग । पीडमाण्टके राजा चार्स अलर्टने तो " इटालियन स्वतन्त्रता हमारा ध्येय है," यह लोगोंके सामने साफ साफ प्रकट कर दिया । इस ध्येयकी सिद्धिके लिए जो लोग परिश्रम कर रहे थे - कावूर। अफसर । अतएव लोग उसे सन्देहकी दृष्टिसे देखते थे। पीडमाण्टमें इस समय स्थापित सत्तावादी (Conservative), उदार मतवादी (Liberal), और मूलगामी (Radical) ये तीन राजनैतिक दल थे। इन तीनों दलोंके लोगोंके विचार उसके खिलाफ थे। पहले दलके लोग जानते थे कि कावूर सुधारवादी है । इसलिए वे उसका विरोध करते थे। उसकी सामाजिक श्रेष्ठता और उसके पिताके बरतारके कारण उदार मतबादी लोगोंका उस पर विश्वास न था और मूलगामी दलके लोग उसके विचारोंको बहुत सौम्य ' मानते थे और उसका मार्ग उन्हें पसन्द न था । अतएव वे भी उसके निपयमें उदासीन रहते थे। ऐसे समयमे कावूरने अपना पत्र शुरू किया । परन्तु उसने इस विषम अवस्थानी परवा न की। उसका राजनैतिक ध्येय और उसकी सिद्धिके उपाय निश्चित थे, एव उसे दृढविश्वास था कि निष्ठापूर्वक उन उपा- योंका अवलम्बन करने पर कुछ दिनोंमें लोक-मत मेरी ओर झुक जायगा । अतएन लोकाराधन-लोकरसन के झगडेमें न पड़कर वह अपने निश्चित कर्तव्यका ही पालन करनेमें सोत्साह दत्तचित्त रहा । जिन दिनों कावूरने पर निकाला, इटलीके अधिकाश राज्योंमें नवीन राजनैतिक आन्दोलन प्रचार पा चुका था। यह देखकर आस्ट्रि- याने उसके रोकनेकी कोशिश की। लाम्बर्डी और वेनिशिया ये दो प्रान्त तो आस्ट्रियाके अधीन ये ही। इनके अतिरिक्त और जो राज्य उसके आधिपत्यमें थे उनमें भी सेना भेजकर उसने इटालियन लोगोंका आन्दोलन निर्मूल करना प्रारम्भ किया। इसका फल यह हुआ कि कितने ही राज्योंके लोगोंने, और लोगोंके आग्रहवश वहाँके राजाओंने आस्ट्रियाके प्रभुत्वको जलाञ्जलि देकर प्रातिनिधिक शासन-पद्धति जारी कर दी। इस सुअवसरसे लाभ उठाकर जिनोआ-तहसीलकी प्रजाने पत्र-सञ्चालन। ४५ C एक प्रार्थना पत्र तैयार किया । उसमें उसने नवीन राजनैतिक मुधारों- की चर्चा की थी और पीडमाण्टके राजा चार्ल्स अलबर्टसे प्रार्थना की थी कि शासनमें इतने सुधार और कर दीजिए । यह प्रार्थना-पत्र उसने अपने कुछ प्रतिनिधियों ( Deputation) द्वारा टयूरिन, पीडमाण्ट नरेशको भेजा । यह १८४८ ईसवीके जनवरी महीने की बात है । उन सुधारोंकी चर्चा करने के लिए उस समय एक सभा की गई जिसमें इटलाके प्रधान प्रधान समाचार-पत्रों के सभासद निमन्त्रित किये गये थे। कापूरके पास भी निमन्त्रण गया था। इसी सभा, पहले- पहल कावूरने अपने राजनैतिक मत स्पष्ट रूपसे प्रकट किये । जिनोआ-निवासियोंकी मॉग प्रधानत• यह थी कि जेजूईट लोग-देशसे निकाल दिये जॉय और हमारे नगरमें सरक्षक सेना (Civil Guard) रक्खी जाय । इम पिय पर जब सभामें वाद-विवाद छिडा तब कावूरने कहा-"निनोआ-निवासियोंकी मॉग बिलकुल थोड़ी है । वर्तमान समयमें इतनेसे काम नहीं चल सकता । हमें अपने राजनैतिक ध्येय- की सिद्धिक लिए ऐसी ही शासन व्यवस्था (Constitution) करानी चाहिए जिससे आगे चलकर नियमबद्ध प्रातिनिधिक शासन पद्धति स्थापन हो जाय । इसके सिवा दूसरी गति नहीं ।" कावूरने मुंहसे ये शब्द निकरते ही उपस्थित लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। क्योंकि उस समय पीडमाण्टमें प्रातिनिधिक शासन-पद्धति (Constitution) का नाम लेना बडे साहसका काम समझा जाता था । कावूरका कयन सुनकर कितने लोग तो उसके उद्देश्य पर सन्देह करने लगे और कितने उसकी मॉगको निष्प्रयोजक कहने लगे । अतएव इसका अन्तिम निर्णय दूसरे दिन पर रखा गया । इसी बीच पीडमाण्टके राजाने जिनोआ-निवासी प्रतिनिधियों से मुलाकात करनेसे इकार कर कावूर। दिया। दूसरे दिनकी समाचार-पत्र-सम्पादकोंकी सभामे भी "Concardia" पत्रके सम्पादक और पुरोगामी नेता, बेलिरियोने प्रातिनिधिक शासन-पद्धति ( Constitution ) की मोगका तीव्र विरोध किया अतएव जो थोडे पत्र-सम्पादक कावूरसे सहमत थे उन्होंने प्रातिनि- धिक शासन-प्रणाली (Constitution) की प्राप्तिके लिए प्रार्थना-पत्र लिखकर चार्ल्स अलबर्टको डाक द्वारा भेजा । कुछ दिनोंके बाद उस प्रार्थना-पत्रके सम्बन्धमें अपने एक मित्रसे बातचीत करते हुए चार्ल्स अल- वर्टने कहा "इटलीके पुनरुज्जीवन के लिए सिपाही दरकार हैं, कानूनटा नहीं। मेरी राय तो यह है कि इटलीकी राष्ट्रीय स्वतन्त्रताके ही हितके लिए प्रातिनिधिक शासन-पद्धति प्रचलित करना अभीष्ट नहीं ।" जब चार्ल्स अलबर्ट गद्दी पर बैठा तब उसने वादा किया था कि प्रचलित शासन- व्यवस्थाका भङ्ग न करूँगा । इस प्रतिज्ञाके उल्लङ्घनके लिए सहसा तैयार हो जाना उसे बहुत खलता या । इस कारण वह पूर्वोक्त प्रार्थना- पत्र स्वीकार करनेको राजी न था। परन्तु अब हवाका रुख झपाटेसे बदल रहा था। सिसली और नेपल्समें वलवे शुरू हो गये थे। वहाँकी प्रजाने अपने राजाओंसे फ्रान्समें, १८३० ईसवीमें प्रचलित शासन-प्रणालीके ढंगपर नवीन शासन-पद्धति प्रचलित करनेकी मंजूरी प्राप्त कर ली थी। यह देखकर अन्य स्थानोंकी प्रजा भी वैसी ही शासन-प्रथा प्रचलित करानेका प्रयत्न धडाकेसे करने लगी। इस दशामें चार्स अलबर्ट अपनी हठधर्मी अविक दिन तक कायम न रख सकता या । अतएव वह अपने परिवारके खास खास आदमियोंको बुलाकर उनसे इस विषयमें सलाह-मशवरा करने लगा। उसने कहा --" यदि नियमबद्ध शासन-पद्धतिकी राय आप देंगे तो मैं इस्तीफा देकर देशका शासन युवराजको सौंप दूंगा।" उसकी यह बात पन्न-सचालन । ४७ . , सुनकर उमकी रानी तो डरसे काठ हो गई । जिनोआका डयूक, जो उसका रिस्तेदार था, राजाको समझाने लगा कि नियमबद्ध शासन- प्रणाली कोई भयङ्कर वस्तु नहीं । युवगज पिक्टर इमेन्युमलने तो उसके इस्तीफे की बातको उदाही दिया। तन राजाने अपने धर्मगुरुकी राय ली और जव उमने राजाकी दिलजमई कर दी कि ऐन वक्त पर लोगोंको छोड़ जानेका पाप उस वचनम के पापस जिसका पालन करना प्राय असम्भव है, कहीं अधिक है, तब कहीं उसने डरते डरते कम्पित हस्तसे भागी नियन्त्रित शासन-प्रणालीके (Constitution ) कानून पर दुखित हृदयसे दस्तखत किये । इस कानूनकी धाराये १८३० ईससीके फ्रान्स देशीय कानूनके आधार पर तैयार की गई थी। इसके अनुसार पीडमाण्ट और जिनोआ-प्रान्तोंके समस्त लोक प्रतिनिधियोंकी दो सभायें (चेम्बर और सेनेट) निर्माण की गर्दै । उनमें से एक तो धी बडे आदमियों के प्रतिनिधियोंकी और दूसरी, सर्व-साधारण अर्थात् मध्यम श्रेणीके लोगोंकी । एक ओर तो इटलीके कुछ राज्यों में इस तरहके राजनैतिक मुधार हो रहे थे कि दूसरी ओर पोपने भी सुल्लम खुला आशीर्वाद दिया-" इटलीका कल्याण हो, उसका विजय हो।" तन तो लोगोंका उत्साह बहुत ही बढ़ गया । इतनेहीमे फिर राज्यक्रान्ति हुई। योरपके प्रत्येक देश पर उसका थोड़ा बहुत प्रभार हुआ। स्वय पिएन्ना नगरके लोगोंने भी आष्ट्रियाफे सम्राटसे प्रातिनिधिक शासन-प्रणाली ( Constitution ) जारी करनेकी इच्छा प्रकट की। यह देखकर लाम्बर्डी और वेनिशियाकी प्रजाने भी आस्ट्रियाक विरद्ध उपद्रव मचाया और अपने देशमे अस्थायी स्वतन्त्र शासन सस्थायें (Provincial Government) स्थापित कर ली । उनकी देखादेखी इटलीके अन्य राज्योंमें भी लोकसत्ताक अथवा प्रातिनिधिक .
कावूर। शासन-पद्धतियाँ प्रचलित होने लगी । यही नहीं, वहाँके लोग लाम्बर्डी और निशिया प्रान्तोंके लोगोंको भी, आस्ट्रियाको इटलीसे निकाल देनेके काममें सहायता देने लगे। लाम्बर्डीकी राजधानी, मिलान, की नई सरकारने पीटमाण्टकी सहायता इस विपयों चाही, परन्तु चार्ल्स अल्वर्ट तो इस समय दुबिधा-सागरमें गोते मार रहा था । अतएव, उसे सहायता मिलनेका कोई चिह्न न देख पडा। तब कावूरने अपने वर्तमान-पत्रमें इस विषय पर एक लेख प्रकाशित किया । (२३ मार्च १८४८ ईसनी।) उसमें उसने पीडमाण्ट- सरकारको यह उपदेश किया या- " सेवायके राजघरानेको यह बड़ा अच्छा मौका मिला है। इस समय दृढ निश्चय करनेकी जरूरत है । इसी समय पर साम्राज्य और जन-समाजकी भवितव्यता अवलम्बित है । लाम्बी और वेनिशियामें हुई घटनाओं पर ध्यान देनेसे दुविधावृत्ति, सशय और विलम्बको स्थान या आश्रय देना अब सम्भव नहीं । ऐसी नीति सबके लिए अत्यन्त हानि-कारिणी होगी। हम शान्त स्वभाव है । हम, हमेशा रिकारके वश न होकर विवेकका ही अनुसरण करते हैं। तथापि हम अपनी मनो-देवनाको स्मरण करके और अपने प्रत्येक शब्दका साधक-बावक विचार करके यह कहे बिना नहीं रह सकते कि राष्ट्र, मन्त्रि-मण्डल और राजा, इन सबके लिए सिर्फ एक ही मार्ग खुला है। वह यह एक क्षण भी मिलम्ब न करके युद्ध छेड़ दिया जाय ।" कापूरके इन वाक्योंसे यह अनुमान हो सकता है कि उसकी रिचार-सरणि कितनी गम्भीर, कितनी प्रौद और कितनी कुशान थी। जिस दिन उसका यह लेख प्रकाशित दुआ उस दिन रातको चार्ल्स अलर्ट ने इस विषयका निर्णय करने के लिए अपने परामर्शदाताओंको 41 पत्र सचालन । ~~ बुलाया और उनसे सलाह की । अन्तमे यह तय हुआ कि आस्ट्रियाके साथ युद्ध छेड़ देनेकी घोषणा कर दी जाय । चार्ल्स अलबर्टने उस समय यह भी प्रकट किया कि पीडमाण्टने इटलीका ऐक्य-दर्शक तिरङ्गी राष्ट्रीय झण्डा स्वीकार किया है । इस युद्धके सञ्चालनके लिए चार्ल्स अलबर्ट स्वय युद्ध-क्षेत्रमें गया। पहले तो उसीकी जीत होती गई, परन्तु कुछ महीनोंके बाद, आस्ट्रियन सेनाको ज्यों यो नवीन सेनाकी सहायता मिलती गई त्यो त्यों चार्ल्स अलबर्टकी सेनाको पीछे हटता आना पड़ा । एक दो जगह तो उसे भी खानी पड़ी । तर दोनों पक्षोंकी रजा-मन्दीसे कुछ दिनके लिए लडाई रोक दी गई । इस बीच आस्ट्रि- याने अपने नष्ट प्रभुत्वको फिरसे उन प्रान्तोंपर स्थापित करनेका प्रयत्न किया। यह देखकर देशके गरम दलवालोंसे न रहा गया । उसकी यह कारवाई उन्हें सहन न हुई । वे जोर-शोरसे उसके विरुद्ध आन्दोलन करने लगे । यहाँ तक कि स्नय पीडमाण्टमें भी उनका रङ्ग बहुत जमने लगा । तब उनकी स्वेच्छाचारिता टवानेके लिए कापूर- को अपने पत्रमें उनके विरुद्ध कितने ही लेख लिखने पडे । पार्टिया- मेंटमें भी उनका विरोध उसीको करना पडा । यह अप्रिय और कट परन्तु हितकर काम करते हुए पार्लियामेण्टमें प्रतिपक्षियोंकी ओरसे उसके भाषणमें बहुत विन-बाधायें उपस्थित की जाती थीं। परन्तु इससे वह कमी निराश न हुआ । उलटे वह कहता- "इन खुरा- फातोंसे डरनेवाला मैं नहीं । मुझे जो सच जान पडता है उसे कहनेमे मै जरा न ददूंगा । गोगा करके जो लोग बामा डालना चाहते हैं वे मेरा नहीं बल्कि इस सभाका अपमान करते हैं।" * तिरही झण्डा इटलीके क्रान्ति-कारक दलका झण्डा था । वही चास अलवर्टने अपने देशके लिए स्वीकार दिया। उसमे हरा, सफेद और लाल, ये तीन रस थे। ।
कापूर । van Amrav ANP इस समय पीडमाण्टकी दशा बडी शोचनीय हो गई थी। परा- जयके कारण उसकी सेनाका अब वह मान नहीं रह गया था। जब सेना पीछे हट रही थी, मिलानमें स्वय चार्ल्स अलबर्टका कितनी ही बार निरादर किया गया था। सरकारी खजाना खाली हो चला था। इस दशामें कावूरका मत था कि शासन-कार्य बडी सावधानीसे करना चाहिए। परन्तु आस्ट्रियाके अन्याय-पूर्ण व्यवहारके कारण वहाँका राज- नैतिक वातावरण (atmosphere) इतना क्षुब्ध हो गया था कि विचार- वानोंकी अपेक्षा विकारवश लोगोंका ही प्रावल्य शासन-कार्यमें बढ रहा था। अन्तमें चार्ल्स अलबर्टको भी शासनकी बागडोर गोबर्टीको, जो पुरोगामी दलका नेता था और जिसे वे लोग बहुत चाहते थे, सौंप देनी पडी। परन्तु थोड़े ही दिनोंमें गोवर्टीके सहकारि-मण्डल्में तीन मतभेद उत्पन्न हो गया और उसे इस्तीफा देना पडा। तब रेटेजी नामका उसका एक सहायक मन्त्री प्रधान मन्त्री बनाया गया। उसके शासन-कालमें फिर आस्ट्रियासे लडाई छिडी। यह युद्ध चार्ल्स अल- बर्टने केनल लोकमतको शान्त करनेके लिए जारी किया था। इस बार उसने लोगोंके आग्रहसे सेना-पतित्व स्वय न स्वीकार करके ट्सा- नॊस्कि नामके एक पुलिस सेनानी अर्थात् मेनापतिको सौंप दिया । परन्तु स्थिति थी बड़ी नाजुक, ट्सोनोंस्कि शत्रुको पराजित न कर सका। आस्ट्रियन सेनापति रेडेट्जी स्वय पीडमाण्टकी सीमामे घुस गया और नोरामें उसने पीडमाण्टकी सेनाको हटा दिया । लडाई सवेरेसे शामतक होती रही । चार्ल्स अलबर्टने स्वय युद्ध-कार्यमें योग देनेकी बहुत कोशिश की, पर दुर्दैववश वह सफल न हो सका। युद्धका निर्णय हो जाने पर उसने आस्ट्रियन सेनापतिसे अनुरोध किया कि लडाई मुल्तबी रक्खी जाय । तब उसने बडी बडी कड़ी शर्ते पेश P पत्र सचालन। की । यह देखकर चार्ल्स अलर्ट निराश होगया। उसने सोचा, मेरे गद्दी छोड देनेसे शायद युवराजके लिए यह शर्ते ढीली कर दे और राज्यका इस्तीफा दे दिया तथा उसी दिन रातको पोर्तुगालको चला भी गया । परन्तु यह शोकावेग उसे सहन न हुआ और २८ जुलाई १८४९ ईसनीको वह ससारसे चल वसा । चार्ल्स अलबर्टके निकल जानेके वाद उसका पुत्र, द्वितीय विक्टर इमेन्युअल, पीठमाण्टकी गद्दी पर बैठा । परन्तु जिस स्थितिमें उसने गद्दी संभाली वह अत्यन्त शोचनीय थी। सिंहासनारूढ होते ही उसे ऐसी शर्तों पर युद्ध स्थगित कराना पडा जो उसके लिए अपमान-कारक यीं । विक्टर इमेन्युअलका स्वभाव उसके पिताकी अपेक्षा अधिक निश्चयी और अधिक साहसी था। शासन-शास्त्र और राजनीतिमें भी उसकी अच्छी गति थी । अतएव उसने परिस्थिति पर ध्यान देकर आस्ट्रियन सेनापतिकी शर्ते कुछ समयके लिए मजूर कर लीं। परन्तु उसने उसकी यह शर्त स्वीकार न की कि देशमें फिरसे आस्ट्रियन अनियन्त्रित शासनकी धूम मचे । वह जान चुका था कि पीडमाण्टका सामर्थ्य प्रातिनिधिक शासन-पद्धति पर ही अवलम्बित है । अस्तु । उम समय वह बिल्कुल युवा-२९ वर्षका-था।* वह बडा सुस्वभान या। * इसमा जन्म २४ माच, १८२० ईसवी, को टयूरिनके कनिमानो नामके राजप्रासादमें हुआ । आगे चलकर इसी राजमहल में पारियामष्टके अधि- वेशन होने लगे। इसके जन्मसमय, इसका बाप चारस अलवट, चाल्स फेलिक्सी नाराजाके कारण, अपनी ससुराल टस्कनी डथूक के यहा सपलीक रहता था । यहाँ रहते हुए मितम्बर १८८२ ईसवी में एक दिन शाम के वका विक्टर इमेन्युअलके बिछौने के सामने के परदमें आग लग गई। वह गहरी नीदमे सो रहाथा । अनी उसकी धाय ही यहाँ थी। उसने बड़ी हिम्मत करके धध- कती हुई आगमें कूदार उसकी रक्षा की । राजमार तो बच गया, परन्तु कावूर। उसे भविष्य आशा-पूर्ण दिखाई देता था। उसे आशा थी कि विश होकर आज मै जो कुछ खो रहा हूँ शीघ्र ही फिरसे प्राप्त कर लूंगा और आस्ट्रियाको इसका खूब मजा चखाऊँगा । वह स्वय तो बड़ी आगा बाँधे बैठा था पर देशकी दशा कुछ और ही थी । नोवेरामें पीडमाण्टकी सेनाका पराजय जबसे हुआ तवसे आस्ट्रियाके लोगोंका उत्साह बढ़ने लगा और स्थान स्थान पर इटलीके शासन कार्यमें शोचनीय प्रतिक्रिया शुरू हो गई । इससे पीडमाण्टकी प्रजा अधीर और विचलित हो उठी। यहाँ तक कि वह अपने राजाको भी उसके उद्देशको भी सन्देहकी दृष्टि से देखने लगी । उसे यह शङ्का होने लगी कि जिस तरह अन्य राज्य आस्ट्रियाके दबावके कारण बिखर गये-तितर-बितर हो गये- उसी तरह कहीं इस राज्यकी भी दशा न हो। इस कारण प्रजाका विश्वास उस पर न होता था । अतएव, जब वह पार्लियामेण्टमें शपथ करने आया तब लोगोने उसका स्वागत विशेष नहीं किया और उसी दिन, अर्थात् २९ मार्च १८४९ को, जिनोआमे लोकसत्ता- वादियोंने बलवा कर दिया । ऐसी पेचीदा हालतमें अगर कोई दूसरा राजा होता तो घबड़ा जाता, अथवा चिढकर उसने प्रातिनिधिक शासन-पद्धति ही बन्द कर दी होती । परन्तु विक्टर इमेन्युअल तो था मजबूत-दिल और विचारवान् । उसने वडी वीरता और शान्तिके साथ इस घायके क्पदामें आग लग गई। उसका सारा शरीर जल गया। थोड़े दिनोंके याद वह मर भा गई । विक्टर इमेन्युअल भी कुछ झुलम गया था, पर वच गया । जिस समय उसका पिता तख्तनशीन हुआ, वह ११ वर्षका या। लड़कपनमें फौजी खेलोंसे वह बड़ा अनुराग रसता था। वह आनन्दवृत्ति, उदार-हदय और मिलनसार था। उसका स्वभाव भी बड़ा अच्छा था। नौकर-चाकर सिपाही और मामूली लोगोंका सहवास उसे बहुत पमन्द था । बड़े होने पर भी कुछ समय तक उसकी यही टेव रही। , पत्र संचालन । ५३ दशाको दूर करनेका सङ्कल्प किया। सुदैवसे उसने अपने प्रधान मन्त्री- के पद पर एक बडे नामी देशभक्त ओर राजभक्त पुरषकी नियुक्ति कर दी। इससे उसके सहल्पकी सिद्धिके लक्षण भी दिखाई देने लगे । उस महान् पुरपका नाम था-मासिमो डी आजेग्लिओ । उसका जन्म सरदार-कुलमें हुआ था। यह विद्या और कलाका बड़ा प्रेमी या । उसकी यह इच्छा थी कि इटली-रेश स्वतन्त्र हो । अपनी इस इच्छा, इस भावनाको प्रगट करनेके लिए उसने कितने ही उपन्यास लिग्वे और चित्र बनाये ये । यह विधि-विहित आन्दोलनका पक्षपाती था। अतएव वह अपने प्रागतिक विचार जाहिरा तौर पर साफ साफ प्रकट किया करता । इससे वह बड़ा ही लोकप्रिय हो गया था। मास्ट्यिासे युद्ध छिड़ते ही वह स्वय-सेवक ( वालटियर ) बन कर समर-क्षेत्रमे गया था और एक बार खूब घायल भी हुआ था । वह नहीं चाहता था कि प्रधान मन्त्रीका पद स्वीकार करे । परन्तु राजाके आग्रहसे उसे स्वीकार करना पडा । इस पदको ग्रहण करके उसने सचमुच अपने राज्यका बडा भारी हित-सारन किया । उसके प्रधान मन्त्री होते ही प्रजाका सन्देह राजा परसे दूर हो गया। इसका फट यह हुआ कि विक्टर इमेन्युअलको अपनी नीतिके अनुसार काम करनेमें मुभीता हो गया। पीडमाण्टकी दशा उस समय ऐसी विलक्षण थी कि यदि राजा और प्रजामें परस्पर विश्वास न होता तो राज्यकी दुर्दशा हुए विना न रहती । इम विश्वासका एफ-मात्र कारण डी आनेग्लिओ था । उसके शील और कर्तव्य क्षमताका लोग आदर करते थे। अतएव पीडमाण्टके शासन- की बागडोर उसके हाथमे जाते ही लोगोंकी शङ्का दूर हो गई । डि आजग्लिओके प्रधानमन्त्री होने पर शीघ्र ही, मात् १५ जुलाई कार। कानून पीडमाण्टके राज्यमें जारी होनेवाला था। इसके पहले राजाको यह अधिकार न था । और यह बात स्वभावतः ही वहाँके धर्मोप- देशकों और उनके अन्धभक्तोंको पसन्द होनेवाली न थी । अतएव उन्होंने उसका तीव्र विरोध किया। देशके प्रतिगामियोंकी वात जाने दीजिए । पार्लियामेण्टके उदार ( Liberal) दलके कुछ सभासदोंने भी उसका विरोध किया। इस आन-बानके समयमें कावूरने सरकारके, पक्षका समर्थन बड़ी उत्कृष्टतासे किया । सात दिनों तक यह वाद- विवाद होता रहा । अपने भाषणोंमें उसने सरकार और उसके प्रति. पक्षी दोनोंके हितकी बातें कहीं। उसने मन्त्रिमण्डलके प्रतिपक्षके लोगोंसे कहा-भाइयो ! पीडमाण्टकी नियन्त्रित शासन-सत्ताकी पुष्टि करके उसे सबल और कार्यक्षम करनेके लिए देशके सब हितेच्छुओको तैयार हो जाना चाहिए। इसीमें उनका भला है-यही उनका तरणो- पाय है । पक्षान्तरमे उसने मन्त्रिमण्डलको भी इग्लैडके प्रख्यात राज- नीतिज्ञ वेलिंग्टन, ग्रे और पीलकी उन्नतिशील नीतिका अनुकरण कर- नेकी सलाह दी। कावूरकी यह वक्तृता पार्लियामेण्टके अधिकाश सभासदों और दर्शकोंको बहुत पसन्द हुई । अन्तिम भाषण समाप्त होने पर तो गैलरीके लोगोंने, धर जाते समय उसका खूव जय-जयकार किया। पार्लियामेण्टमें सफलता प्राप्त करनेका यह पहला ही अवसर कावूरके लिए था। इसके पहले उसके व्याख्यान विशेष अनुराग (१) धर्मोपदेशक अपराधीके मुकद्दमेका फैसला करनेके लिए अलग न्यायालय स्थापित किये गये थे। (२) देवालय अथवा अन्य किसी पवित्र स्थानमें जब वे होते ये तर उनपर कानूनका व्यवहार नहीं किया जाता था । (३) कुछ ऐसे उत्सव और पर्व निश्चित किये गये थे जिनपर लोग दान करो पर वाध्य ये । इस आमदनीमे पादरियों की पेट-पूजा होती थी।
कार्यारम्म। और ध्यानसे न सुने जाते थे, क्योंकि वह प्राय सभी पक्षोंको अप्रिय था। इस कारण उसे अपने विचार प्रधानत अपने परके ही द्वारा प्रकट करने पड़ते थे। परन्तु अब जमाना पलट चला था । पूर्वोक्त वाद-निनादके बाद पार्लियामेण्टमें किये उसके भाषण बडे महत्वकी दृष्टिसे देखेजाने लगे और सभासद भी उसका कथन ध्यानसे सुनने लगे । इस वादविवाद के पश्चात् पूर्वोक्त बिल, जो मन्त्रिमण्डलके द्वारा पेश किया गया था, बहुमतसे पास हो गया । सेनेटमें * योडासा निरोध उसका हुआ अवश्य, पर वहाँ भी शीर ही बहुमतसे स्वीकृत हो गया । ८ अप्रेल, १८५० ईसवीकी यह बात है । इस निलके पास होजानेपर पादरी-पुञ्जमें बडा असन्तोष फैला । कितनी ही जगहोंके पादरियोंने तो लोगोंको उकसाया कि इस कानूनको मत मानो । तव उन पर मुकदमे चलाये गये । इही दिनों सेंटा रोजा नामक कृपि-विभागका मन्त्री अत्यन्त बीमार हो गया। पादरियोंने उसका मृत्युसमयका धर्म-सस्कार करना अस्वीकृत कर दिया । ट्यूरिनके एक प्रधान धर्म गुरुने कहा कि वह यदि पूर्वोक्त कानूनकी स्वीकृति पर अपना पश्चात्ताप प्रकट करे तो हम धर्म संस्कार करनेको तैयार है। सेंटा रोजाने यह शर्त मजूर नहीं की । अतएर उसे बिना ही धर्म-सस्कारके मरना पड़ा। सेंटा रोजा कापूरका मित्र था। इस घटनाकी खबर लगते ही उसने अपने पत्रमें धर्मगुरुओंके इम * पीडमाण्टकी पार्लियामेण्टकी दो शोखायें अर्थात् उपसमायें थीं-मेनेट और चेम्मर । पहली थी बड़े आदमियोंकी और दूसरी यी साधारण लोगों- की । साधारणोंकी मभामें काजरवेटिव, लिबरल फारवेटिव, लिबरल्स और रेडिक्ल्म-ये चार मुख्य पक्ष थे। रेडिकल दलम पीछेमे फूट हो गई। उसमे दो दल बन गये-माडरेट रेटिरल्म और रेडिकल्स । ।
६० कावूर। उसे अपनाना पड़ा । काबूरकी उच्च योग्यताका इससे उत्कृष्ट प्रमाण और क्या चाहिए और यदि चाहिए भी तो वह आगेके प्रकरणों मौजूद ही है । अस्तु । यह अधिकार प्राप्त हो जाने पर कावूरने अपनी खेती-बारी, रोजगार-धन्धा और समाचार-पत्र सब बन्द कर दिये। वह अपना सारा समय इसी अङ्गीकृत कार्यकी सिद्धिमें लगाने लगा। इतने दिनो तक तो व्यापार और कृपि-विभागके मन्त्रीकी जगह दूसरे दरजेकी मानी जाती थी, परन्तु जबसे कावूर उस पर नियुक हुआ उसकी प्रतिष्ठा बढ़ती चली । कृषि और व्यापारका अनुभव तो उसे अच्छा या ही । वह रोज कोई न कोई नवीन योजना सोचा और तैयार किया करता । वह खली व्यापार-पद्धतिको पसन्द करता था। उसका खयाल था कि पीडमाण्टकी वर्तमानदशामें यही प्रणाली लाभ- दायक होगी । अतएव उसने इस नीतिके अनुसार कितने ही कानून बनाये और फ्रान्स इग्लैंड और वेलजियम इन राष्ट्रोंसे उसने व्यापारिक सन्धियों की। थोड़े ही दिनों में वह सामुद्रिक विभागका भी मन्त्री बन गया । एक, दो, तीन, मन्त्रियोंके पोका काम वह अकेला कर सकता । इस कारण मन्त्रि-मण्डलमें उसका महत्व और प्रभुत्व झपाटेसे बढता गया । यहाँ तक कि थोड़े ही दिनोंमें मन्त्रिमण्डलका प्राय सारा काम वह अकेला ही करने लगा। उसका यह साहस देखकर प्रधान मत्री कभी कभी असन्तुष्ट हो जाता । परन्तु एक तो उसका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया था और दूसरे काबूरको कार्यक्षमता पर उसे विश्वास भी हो गया था । अतएव यह इस बात पर ध्यान न दिया करता । १८५१ ईसवीमें कापूरने राजस्व और कर-विभागके मन्त्री निवासे इस्तीफा दिलाया और स्वय उसका काम करने लगा । शिक्षा-विभागका मन्त्रि उममे कथनके अनुसार उसके मिन, एल. .
कार्यारम्भ। फारिनी, को दिया गया । वह बड़ा विद्वान् और उन्नतिशील विचार- का था। उसने अपने विभागकी जो उत्कृष्ट उन्नति की उसकी प्रशसा इग्लैटके नामी राजनीतिज्ञ ग्लैडस्टन साहन तकने की । इससे यह ज्ञात हो सकता है कि कावूर मनुष्यको कैसा पहचान लेता था और उसकी निर्णय-शक्ति कितनी बढी चढी थी। कावूरने अन्य राष्ट्रोंसे-देशोंसे जो व्यापारिक सन्धियाँ की उनसे उसने इटलीके अन्य राज्योंको भी कम जियादह लाभ उठाने दिया । इससे चुङ्गी निभागके सुधारमें उसे बड़ी सुगमता हुई । कावूरका उद्देश यह था-" राजसत्ताको कायम रखकर जनताको यथासम्भव शासनाधिकार देना और उसकी सामाजिक तथा आर्थिक उन्नति करके पूंजी और मजदूरीकी विषमता दूर कर देना, तथा नांचे दरजेके लोगोंकी दशाका सुधार करना । " उसकी महत्वाकांक्षा थी कि पीडमाण्टको समर्थ राष्ट्र बना कर उसकी सहायतासे सारे इटलीको एक राष्ट्र बनाया जाय । उसीके अनुसार उमने अपना कार्यक्रम तैयार किया था । पीडमाण्टको सब तरहसे सामर्थ्यशाली बनानेके लिए यह आवश्यक था कि उसके सैनिक और आर्थिक अङ्ग मुपुष्ट हों। अतएव उसने राजस्व और कर-विभागका मन्त्रिन्त्र अपने ऊपर लिया। आस्टियाका कर, सुधारोंके निमित्त होने- वाला बढता हुआ खर्च, अकालका दौरा इन कारणोंसे पीडमाण्टका खजाना खाली हो चला था । उसे भरा-पूरा रखनेके लिए नये कर लगानेकी आवश्यकता थी 1 परन्तु तकालीन लोकस्थितिका विचार करनेसे इस नीतिका अनुसरण करना उचित लाभ-प्रद न मालूम होता था। तथापि कावूरने हिम्मत करके उस काममें हाथ डाल ही दिया और जोड़ तोड़ लगाकर उसे पूरा भी कर डाला | कापूर .
कावूर। इस घटनाके कारण, डी आजेग्लिओका और उसका खानगी नाता नहीं टूटा । डी आजेग्लिओ इतना क्षुद्र-हृदय नहीं था, जो सार्वजनिक मतभेदके कारण खानगी मित्रताका विनाश कर बैठना । फिर कापूरके तो कितने ही गुणोंपर वह लट्टू या । अतएव कमसे कम कापूरके विप- यमें तो उसके हृदयमें कटुभान पैदा होना सम्भव न था । यही क्यों, यह उसीके सुहृद् भावका कारण है जो कावूरको शीघ्र ही प्रधान मन्त्री बननेका सुअवसर मिला। ७-प्रधान मन्त्री होना । -- इस्तीफा दे चुकने पर कावूर फ्रान्स और इलैंडकी यात्राको बिदा हो गया । जानेके पहले शिष्टाचारके अनुसार, वह विक्टर इमेन्युअलसे मिलने गया । तब विदा करते समय विक्टर इमैन्युअलने मुसकराते हुए कहा-"आपको फिरसे मन्त्रिमण्डलमें बुलानेमें अभी बहुत देर है।" सुनकर कावूर मन-ही-मन मुसकराया और विदा हो गया । इस बार इटैडमें उसका खूब आदर हुआ-जयजयकार हुई । पीडमाण्टकी पार्टियामेंटकी कन्यूबिओवाली घटना इग्लैंडके प्रख्यात राजनीतिज्ञोंको बहुत पसन्द हुई। इग्लैडके प्रधान-मन्त्री लार्ड पाल्म- र्टनने तो कावूरके साथ उस विषयमें खूब ही सहानुभूति दिखलाई और कहा कि “इस काममें आपको इग्लैंड नैतिक सहायता देगा। पीडमाण्टमें आपने जो लोक-नियन्त्रित शासन-प्रणाली प्रचलित की है उसे देखकर हमें बड़ा हर्ष होता है।" फिर सर जेम्स हडसन नाम- के एक उदार-मत-मादी पुरुपको टयूरिनके अंगरेज वकीलके स्थान पर प्रधान मन्त्री होना। ६७ नियुक्त किया जिससे पीडमाण्टके अधिकारिपर्गको यथा-सम्भव सहायता मिले और काबूरका पूर्वोक्त प्रयोग सफल हो। इस प्रकार इटालियन राष्ट्रीयताके काममें लन्दनके राजनीतिन और अधिकारि-मण्डल- की सहानुभूति प्राप्त करके कापूर पेरिस आया। वही रहकर उसने वहाँके समस्त दलोंके राजनैतिक नेताओंका पारस्पारिक द्वेप नष्ट करके उनमें एकता करवा दी। वहांकी राज्य-क्रान्तिका उल्लख करके उसने उनसे कहा-"जो बाते हो गई सो हो गई, उनके पिष्ट-पेपणसे अब कोई लाभ नहीं। अब तो आप सन राजनीतिज्ञोंका यही कर्तव्य है कि आप इस बात पर विचार करें कि उन नीती हुई वातोंसे अब हम देशको किस प्रकार लाभ पहुंचा सकते हैं।" सम्राट् नेपोलियन से भी कावूरने भेट की और अपने मित्र राटेजीसी भी भेट कराई । इस समय उसने फ्रान्स आनेके लिए राटेजीको जो पत्र लिखा था उसमें वह कहता है कि-" हमे पसन्द हो चाहे न हो, पीडमाण्टका भविष्य अनेक अशोंमें फ्रान्स पर ही अव- लम्बित है । अतएव फ्रान्सकी भावी शासन-नीतिमें हमें अवश्य भाग लेना चाहिए । " कावूरका चेहरा, उमकी बातचीत करनेका ढग और रौब ऐसा था कि उससे बातचीत करनेवाले पर उसकी बातोंका असर एकवारगी होता था । अतएन पहली ही मुलाकातमें उसने नेपोलियनको पिघलाकर मुग्ध वशीभूत-कर लिया । नेपोलियनका बरतार यों तो कठोर मालूम होता था पर वास्तबमें उसका हृदय था कोमल ( Emotional) | कापूरकी फुरती और कार्यतत्परता * १८५१ मे फ्रान्समें राज्यक्रान्ति हुई । तर नेपोलियन लोकमतके सहारे यहाँका सम्राट् बना और तभीसे वह तीसरे नेपोलियनके नाममे प्रसिद्ध हुआ। इसके पहरे वह क्ष शासन संस्थाका अध्यक्ष था और उसे प्रिन्स प्रेसिडेंट, कहते थे।
६८ काबूर। , राजनीति-चतुरता और निस्सोच व्यवहार देखकर वह उस पर बहुत खुश हुआ। उसने कापूरसे कितने ही राजनैतिक विषयों पर बातचीत की ओर जब तक वह पेरिसमें रहा, कितने ही बार उससे मुलाकात की। कितने ही इटालियन देशभक्तोंको इटली सरकारने देश-निकाग दे दिया था। ये पेरिसमें आकर बस गये थे। कावरने इस यात्रामें उनसे जान पहचान कर ली और उनके साथ अपनी सहानुभूति भी प्रकट की। उन लोगोंमें वेनिसके नेता डानियल मेनिनकी विचारशैली और उसका व्यवहार उसे बहुत भाया । 'इटलीका पुनरुद्धार ( The civil regeneration of Italy ) नामकी पुस्तकके लेखक गोर ने भी कारसे भेट की। दोनों बड़े प्रेम-पूर्वक मिले । इस तरह विदेशमें सफलता और कीर्ति प्राप्त करके तथा बड़े बड़े आदमियोंसे नई जान-पहचान करके कावूर शीघ्र ही स्वदेशको लौटा । तब तक यहाँ फिरसे पार्लियामेंट और पादरी-पुअमें झगडा उपस्थित हो गया था । १ प्रधान-मन्त्री डी आजेग्लिओ बीमार था। उसके पोर- फा घाव फिरसे भर आया था । इधर चिक्टर इमेन्युअल पर उसके मातापिता जोर डाल रहे थे कि पादरियोंका साथ दो। ऐसे समय सरकारके पक्षकी दृढ़ताके लिए प्रधान मन्त्रीको बड़ी दूरदर्शिता और समयसूचकतासे काम लेना चाहिए था । परन्तु अस्वास्थ्यके कारण डी आजेग्लिओ इस तरह बुद्धिमानीमे काम करनेमे असमर्थ था- वह क्षमता ही उसमें न रह गई थी । अतएव उसने इस्तीफा पेश कर । यह झगडा सिविल मेरेज बिल ( विवाहकी रजिस्टीका कानून ) के कारण सडा हुआ था । चेम्बरने बिल पास कर दिया, परन्तु सेनेट ने, जिसमें पादरियोंकी ही तूती बोलती थी, उसे नामजूर किया और पोप तो उसके विरुद्ध था ही।
प्रधान मन्त्री होना। दिया और विक्टर इमेन्युअलको सलाह दी कि कापूरको प्रधान मन्त्री बना दीजिए । तर राजाने कारको बुलाकर राय ली और बताया कि प्रधान मन्त्री होनेपर पोपसे निपटारा किस तरह किया जाय । कापूर उससे सहमत न हुआ । तर उसने राजाको राय दी कि काउट बाल्यो ( यह कापूरका पुराना मित्र था ) को यह पद दे देना चाहिए । राजाने मजूरी दे दी । परन्तु काउंट वाउमोने स्वीकार नहीं किया । तर राजाने अधिक नीच-ऊंच न मोचकर वेशर्त कापूरको ही मन्त्रिपद दे दिया (नवम्बर १८५२) और कानूरने भी उसे स्वीकार कर लिया । प्रधान मन्त्री होते ही कारने पुराने मन्त्रिमण्डल्मेंसे ही बहुतसे मन्त्री चुन लिये और अपने गजनेतिक मित्र राटेजीको भी शीघ्र ही मन्त्रिमण्डलमें ले लेनेकी आशा दिलाई । इससे वह भी सन्तुष्ट हो गया। प्रधान मन्त्रीके पदके अतिरिक्त राजस्व और कर विभागके मन्त्रिपदका भी भार उसने अपने ही ऊपर रक्खा । डम प्रकार सङ्गठित यह मन्त्रिमण्डल इतिहासमें • Gran nunisero' अर्थात् महत्- मन्त्रिमण्डलके नामसे प्रसिद्ध है । यही मन्त्रिमण्डल, आगे चलकर, इटालियन राष्ट्रके निर्माणमे सफल हुआ । अस्तु । अपना राजनैतिक उद्देश सफल करनेके लिए कारको जिस अवसर और जिस सत्ताकी आवश्यकता थी वह तो उसे मिल चुकी । परन्तु यह न समझिए कि इतनेसे उसका मार्ग निष्कण्टक हो गया था । पीडमाण्ट राज्यकी लोकसल्या ५० लाख थी । परन्तु नोनेराके पराजयके कारण वह हतनीय हो गया था। न तो उसकी आर्थिक दशा ही सत्तीपजनक थी और न उसे किसी वलशाली मिनका ही आश्रय था। इस दशामें कावूरको यह बिकट प्रश्न हल करना ना कि ऐसे छोटेसे देशके द्वारा ४ करोड जन-सख्यानाले आस्ट्रियाका प्रभुत्व नष्ट . . L to कावूर। Awanm , 1 करके (क्योंकि इसके बिना इटलीको स्वतन्त्रता मिलना और उसका एक राष्ट्र वनना असम्भव या ) इटालियन राष्ट्रका एकीकरण कैसे करना चाहिए। इसके लिए उसे सबसे पहले ये तीन काम करने थे-- (१) पीटमाण्टका सैनिक बल बढ़ाना, (२) देशकी आर्थिक उन्नति करके राजकोपको पुष्ट रखना और (३ ) किसी एक अथवा एका- धिक बलाढ्य राष्ट्रसे मित्रता करना और ऐसी मित्रताके लिए अपने देशको उसकी टक्करका बनाना । इन तीन बातोके किये बिना इटालियन राष्ट्रका एकीकरण करना असम्भव है, कावूरकी यह पक्की धारणा थी और वह थी भी उचित । क्योंकि उस समय तक मेजिनीकी कान्ति-कारिणी गुप्त सस्थाओंने इटलीकी भिन्न भिन्न शासन- सस्थाओंको नष्ट करके उन सबके बजाय एक ही लोकसत्ताक शासन- सस्था स्थापन करनेके उद्देशसे कितने ही गुप्त और प्रकट प्रयत्न किये, परन्तु आस्ट्रियाके सामर्थ्यके आगे वे सब विफल हुए । अतएव इटली- के अधिकाश नरम-गरम पुरोगामियोको यह यकीन हो चला था कि ऐसे उपायोंसे अभीष्ट-सिद्धि होनेकी नहीं । कावूर तो आरम्भही. से इस मार्गके विरुद्ध था । उसके वैर्य या साहस कम था सो बात नहीं । परन्तु उसका यह विश्वास था कि राजनैतिक उथल पुथल- उलट-फेर-सदा अपने प्रतिपक्षके बलाबलका विचार करके युक्तिसे ही चलनेसे होता है । इसी लिए वह क्रान्तिकारक आन्दोलनोंसे दूर रहता था। उसका खयाल था कि इटलीपरसे आस्ट्रियाका प्रभुत्व तभी नष्ट हो सकता है जब बराबर धीरतासे उसके पीछे पडे रहें । उसकी रायमें इसके लिए, योरपके शक्तिशाली राष्ट्रोंकी सहानुभूति, नहीं सहायता, प्राप्त करना एव पीडमाण्टको इतना सामर्थ्य-नान् बनाना कि वह उनकी सहायतासे लाभ उठा सके -उसका उपयोग कर सके-बड़ा प्रधान मन्त्री होना। ७१ ही आवश्यक था । अतएव पडिमाण्टके शासनसूत्र उसके हाथोंमें आते ही वह पहले इसी तैयारीमें लगा। सबसे पहले उसने पीडमाण्ट- की भौतिक उन्नतिके काममें हाथ डाला। पहला काम उसने यह किया कि सैनिक विभागके मन्त्री ला मार्मोराको सेना- सुधारकी पूरी अजादी दे दी । तर सरकारी खजानेकी पूर्तिके लिए उसने कर लगानेका अप्रिय काम फिरसे शुरू किया । साथ ही रेलने, आन-पाशीके लिए नहरें और अन्य सुधार तथा परिचय- वृद्धिके सार्वजनिक मार्गोंकी उन्नति और वृद्धिमें भी वह अविलम्ब प्रवृत्त हुआ। इन सब सुधारोंके लिए बहुत धनकी आवश्यकता थी। उसकी प्राप्तिके लिए कावूरने कितने ही नये कर लगाये । प्रधानत मध्यम और उच्च श्रेणीफे लोगों पर करोंका भार विशेप रूपसे रक्खा गया । इस बात पर उसने बहुत ध्यान दिया था कि गरीब लोग करके बोझसे न दब जायें । परन्तु मध्यम श्रेणीके कुछ लोग उसकी इस नीति के विरुद्ध थे । वे कावूरके विपयमें लोगोंका खयाल बिगाडने लगे। इसका नतीजा यह हुआ कि लोग चिढ गये और कावूरका प्राण तक लेने पर उतारू हो गये । अक्टूबर १८५३ में लोगोंने एकबार उसकी हत्याका प्रयत्न भी किया, पर वह निष्फल हुआ। उसकी जान बच गई । तथापि उन दिनों उसके लिए रास्तोंमें अकेला फिरना कठिन हो गया था। अस्तु। इसी समय न्याय-विभागके मन्त्रीका पद खाली हुआ। वह जगह उसने जान बूझकर नरम गरम पक्ष के नेता राटेजीको दी। तब लोग आप ही शान्त हो गये । लोगोंको कावूरके खिलाफ उकसाने- के लिए जो प्रयत्न किये वे भी अब असफल होने लगे । इसके पश्चात् कावूरने शीघ्र ही राटेजीको होम-मिनिस्टर ( Home Minister ) की जगह दे दी। अपने पहले मन्त्रिलके समयमें कावूरने राटेजी और - ।
कावूर। उसके दलसे जो मित्रता ( कन्यूविओ) की थी, वह पाठकोंको याद ही होगी। राटेजीको मन्त्रिमण्डलमें सम्मिलित करके उसने इस मित्रताको और भी दृढ़ कर लिया । फलत• राष्ट्रीय कार्यके लिए राजा और प्रजा पर अपनी इच्छा शक्तिका प्रभार डालना कावूरके लिए सुलभ-सुकर हो गया। "शक्तिके बिना मस्ती और कुश्ती व्यर्थ है," कावूर इस सिद्धान्तसे भलीभांति परिचित था। अतएव पीडमाण्टके राज्यके पुन सङ्गठन होने तक उसने आस्ट्रियासे अत्यन्त स्नेह और आदरका व्यवहार रक्खा | सो भी ऐसा कि उसे देखकर प्रख्यात आस्ट्रियन राजनीतिवेत्ता मेहर्निच भी दङ्ग रह गया । परन्तु उसका यह चिकना चुपड़ा वरतार अधिक दिनों तक न टिक सका। १८५३ ईसवीमें मेजिनी के उकसानेसे लाम्बर्डी प्रान्तके लोगोंने फिर बलवा किया । पिछले बलयोके अनुसार आस्ट्यिाने इसे भी शान्त कर दिया । इस प्रान्तके कुछ निवासी पहलेहीसे पीडमाण्टके राज्यमें आ बसे थे। चे उस राज्यके निवासी नागरिक हो गये थे। उनकी जमीन- जायदाद लाम्बर्डी प्रान्तमें थी। आस्ट्रियन सरकारका खयाल था कि इस बल्वेमें ये भी शामिल हैं, अतएव उसने उन लोगोंकी जमीन जन्त करनेका निश्चय प्रकट किया । अब तो पीडमाण्टकी प्रतिष्ठाके हकमे बड़ी बेढब बात पैदा हो गई । क्योंकि राष्ट्रीय कानूनके अनुसार जब तक यह प्रत्यक्ष साबित न हो जाय कि वे विद्रोहमें शामिल ये तब तक उनकी जमीन-जायदादका जन्त होने देना पीडमाण्ट के लिए अपमान जनक था । अतएन कावूर खामोश नहीं बैठ सकता था। वह बड़ा समझदार, विचारवान् , दूरदर्शा और सचेत था, परन्तु जहाँ सारासार-विचार ( Prudence ) डरपोकपन माना जानेका डर होता वहाँ वह राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और गौरवके काममें निशेप साहस दिख- । । 7 प्रधान मन्त्री होना। ७३ लाता था। वह यह जानता था कि इस छोटेसे देशके लिए आस्ट्रि- याके इस कार्यका प्रतिकार करना असम्भव है । पर यह खयाल भी उसे व्याकुल कर रहा था कि ऐसे समयमें डर जानेसे अपने देशकी उन्नतिमें वाधा पडेगी । अतएव उसने पहले योरोपियन राष्ट्रोंसे आस्ट्रि- याके कार्यकी शिकायत करनेकी ठानी। फ्रान्स और इंग्लैंड इन देशोंमें कावूरके कितने ही मित्र और गुप्त परामर्शदाता थे। उनके द्वारा कावूरको यह खबर नित्य लगा करती थी कि किस राष्ट्रके विचार पीडमाण्टके विपयमें कैसे हैं, अर्थात् कोन देश पीडमाण्टको किस नि गाहसे देखता है। अन्य बडे बडे गष्टोंमे भी ऐमी खरें भंगाने की तजनीज, उसने गुप्त वा प्रकट रूपसे, कर रखी थी। इस दक्षताके कारण उसे अपनी नीति कायम रखनेमें बड़ी सुगमता होती थी। सच पूछिए तो एक राजकाजी आदमीके लिए आवश्यक उत्कृष्ट कलानपुण्य, समष्टिरूपसे, उसमें कूट कूट कर भरा हुआ था । अस्तु । उसे ज्ञात हुआ कि पूर्वोक्त घटनाके विषयमें इग्लैंड और फ्रान्सका मत उसके अनुकूल ही होनेकी सम्भावना है । और इधर ला मार्मोराने भी उसे खबर दी कि हमारी सेना तैयार है । तर उसने आस्ट्रियाके पूर्वोक्त निश्चयकी शिकायत बलाढ्य योरोपियन राष्ट्रोंसे की और स्वय आस्ट्रियासे भी उसका जनान मोगा । यही नहीं, दोनों राष्ट्रोंने अपने अपने वकीलोंको भी वापस बुला लिया। उधर, उन्नतिशील योरोपियन राष्ट्रोंको कावूरकी शिकायत उचित जॅची। अतएव उन्होंने कारकै कमन- का समर्थन करके आस्ट्रियाके कार्यका विरोध किया । तब पीडमाण्टसे युद्ध ठाननेकी हिम्मत आस्ट्रियाको न हुई। परन्तु कापूर जानता था कि आस्ट्रिया आगे पीछे उसकी कसर जरूर निकालेगा। वह यह भी जानता था कि इटलीके एकीकरणके लिए उसे, एक न एक दिन, आस्ट्रियाणे . . क कावूर। अवश्य जूझना पडेगा । अतएव वह इस विचारमें डूबा हुआ था । किस तरह शक्तिशाली . राष्ट्रोकी सहायता प्राप्त करके आस्ट्रिया अकेला लडने पर वाध्य किया जाय । इतनेहीमें फ्रान्स और इग्लैंड रूसके विरुद्ध युद्धकी घोपणा की। १८५५ ईसीका 'क्रिमियन वार इसीको कहते हैं । यह युद्ध रूसने तुर्कस्तानसे क्रिमिया प्रान्त लेने लिए शुरू किया था। फ्रान्स और इंग्लैडने तुर्कस्तानका पक्ष ग्रहण किया था। परन्तु उसमें उनके लिए कितनी ही अडचने-रुकावटे-पैट हो गई थीं। अतएव वे आस्ट्रियाको अपनी तरफ करनेकी कोशिम कर रहे थे । परन्तु आस्ट्रियाका सम्राट् जारके विरुद्ध शस्त्र उठाने तैयार न था। तथापि उन्होंने उसे अपने पक्षमें मिला लेनेकी कोशिष्ट जारी ही रक्खी । ज्यो ही उन्होंने देखा कि उनके सफल होनेकी सम्भावन नहीं देख पड़ती, त्योंही पीटमाण्टको अपनी सहायताके लिए बुलाया कावूर तो ऐसे अवसरकी टोहमें ही था । बल्कि उसे उपस्थित करने लिए बान्दशे भी बोच रहा था । उसने तुरन्त पूर्वोक्त राष्ट्रों को सहायता देना स्वीकार कर लिया। परन्तु सहायताकी शर्ते तय करना अभी बाकी या । यह कठिन काम कावूरके पर राष्ट्रीय-विभागके मन्त्री डेबोरमिडाको सौंपा गया। उसने शताकी एक सूची तैयार की। उसमें उसने यह आश्वासन चाहा था कि युद्धके पश्चात् इटलीकी आवश्यकता पर विचार किया जाय और तब तक आस्ट्रियाको लाम्बर्डी प्रान्तके जमींदारोंकी जायदादकी जब्ती मुल्तवी करनेपर मजबूर किया जाय । परन्तु इग्लैंड और फ्रान्सको आस्ट्रियाको तग करना स्वीकार न था । अतएव उन्होंने ऐसा लेखी आश्वासन देनेसे इन्कार कर दिया। तथापि कावूर इस सुअवसरको खो देनेवाला आदमी न था। उसने टेवारमिडासे कहा कि आप इस्तीफा दे दीजिए । उसने वैसा ही किया प्रधान मन्त्री होना। ७५ । भी । तब वह स्वय परराष्ट्रीय-विभागका मन्त्री हुआ। और उसी दिन, १० जनवरी १८५५ ईसवीको, सन्ध्या-समय उसने दोनों राष्ट्रोंके जवानी आश्वासन पर ही भरोसा करके उनसे सन्धि की, इस विना पर कि जो हमारे मिन-शत्रु है उन्हें आप भी अपना मित्र शनु माने विक्टर इमैन्युअल भी इससे पूर्ण सहमत था । यह सुलह इस तरह हुई तो, परन्तु पार्लिगमेंटकी दोनों सभाओंमें उसका पास करा लेना बहुत कठिन काम था। चेम्बरके मूलगामी-पक्षीय सभासदोंकी ओरसे उसका तीव्र विरोध हो रहा था। वे लोग कहते थे कि " तुर्कस्तान के सदृश जङ्गली राष्ट्रकी सहायता करके राजनैतिक स्वतन्त्रताकी वृद्धिका यह बहुत अच्छा उपाय है ! आस्ट्रिया जिस पक्षको ग्रहण करेगा उस पक्षको सहायता देकर राष्ट्रकार्य्यकी सिद्धिकी यह अच्छी तरकीब है।" कहना नहीं होगा कि उनकी यह गय कितनी हास्यास्पद थी। ब्रोफेरियो नामके एक मूलगामी नेताने तो साफ साफ कह दिया कि " अर्थ- शास्त्रकी दृष्टिसे यह सन्धि फजूल-खर्चीकी-रुपया बहानेकी है, सैनिक दृष्टिसे मूर्खता पूर्ण है और राजनैतिक दृष्टि से अपराधके सदृश है ! " अतएन इस सन्धिके सम्बन्धमें पार्लियामेंटके चेम्बग्में जोर-शोरकी वहस छिडी । इस वादविवादमें कावूरने बड़ी गम्भीरता और शान्तिसे अपने प्रति-पक्षियोंका समाधान किया। उसने चेम्बरके सभासदोंके दिलपर यह बात अच्छी तरह जमा दी कि इस मुल्हके करते समय पीडमाण्टकी अपेक्षा सारी इटलीकी भानी स्थितिका प्रश्न मेरी दृष्टिके सामने विशेष करके या और उसके हल करनेमें इस सन्धिका बड़ा उपयोग होगा। * तब अन्तमे ९५ अनुकूल और ६४ विरुद्ध मतसे यह * इस रामय कावूरने जो भाषण किया उसका यह भाग मननीय है--- यह सवाल किया जायगा कि इस सन्धिसे क्या इटलीको कमी लाभ या उपयोग होगा और यदि हो भा तो किस तरह ? इसका उत्तर यह है कि कावूर। सन्धिप्रस्तान चेम्बरमें स्वीकृत हुआ। सेनेटमें भी उसपर ग्यूब बहस ठनी । पर अखिर वहा भी बहुमतसे पास हो गया । तत्र तुरन्त कावूरने, ला मार्मोराके साथ, पीडमाण्टकी सेना इग्लैंड और फ्रान्सकी सहायता- के लिए भेज दी । यह 'सन्धि-काण्ड ! समाप्त हुआ न हुआ होगा कि एक दूसरा जटिल प्रश्न उपस्थित हो गया । इटलीमें पोपका प्रभुत्व बहुत प्राचीन समयसे चला आता था। उसकी सत्ता बहुतसे क्रिश्चि- यन राज्योंपर भी थी । इटलीके भिन्न भिन्न संस्थानों पर तो वह विशेष रूपमे थी। उसे आस्ट्रियाने भी स्वीकार किया था। परन्तु पीडमा- एटमें राजसत्ता और धर्मसत्ताको एक दूसरेसे अलग रखनेका तथा राजनतिक दृष्टिसे धर्मोपदेशकोंका पद अन्य प्रजाके समान ही रखनेका योरपसण्डी वर्तमान दशाम हमारे तथा और रिसीके लिए भी, इटलीके उद्धारका जो मार्ग खुला है, सिफ उसी मार्गमे इस सन्धिका उपयोग होगा। इटलीके सुधार के लिए अत्यन्त आवश्यर और महत्त्वकी बात यह है कि उसकी मान प्रतिष्ठा, फिरसे प्राप्त की जाय । इसमें ससारके सभी लोक समाज-शासक और शामित दोनों-उसके गुणोंका गौरव करेंगे। इसके लिए दो बाते जरूरी हे- (१) योरपको यह दिसलाना कि इटली इतना राजनैतिक चातुर्य रखता है कि योग्य व्यवहार और स्वतन्त्रता-पूर्वक अपना राज काज कर सके और जो शासनपद्धतियाँ आज कल उत्तम गिनी जाती हैं उनका पचार करनेकी योग्यता उसमें है, (0) यह सिद्ध करके दिसा देना कि हमारा युद्ध-मामर्थ्य हमारे पूर्वजोकी ही टारका है। पिछले जमानेमे यह काम तुमने कर दिखाया है। उससे अधिक नहीं, तो उत्तना ही तुम्हारे हाथों भविष्यमे होना चाहिए। हमारे देशो योरपको यह दिसा देना चाहिए कि इटलीके पुन समर-क्षेनम शर योद्धाओंको शोभा देने योग्य ही रण-कोगल दिखला सकते हैं । और, सज्जनो, मुझे विश्वास है कि, पूर्ण प्रदेशमें (क्रिमिया ) हमारे जो सैनिक विजय प्राप्त करगे वह इटलीके भावी उत्कर्षका-जिन लोगोका यह सयाल है कि वकृत्व और लेगोमे हम इटलीका पुनरुद्धार कर रहे है, उनके हाथों- जो कुछ काम बन पड़ा है उसकी अपेक्षा अधिक सहायक होगा। । - प्रधान मन्त्री होना। ७७ ---- लाभ प्रयत्न जारी था। अर्थात् पीटमाण्टकी पार्लियामेंटमें ऐसे कानून पास किये जानेवाले थे जिनके अनुसार धर्मोपदेशक वर्गकी कुछ खास रियायतें नष्ट होनेको थीं। उनमेंसे कुछ कानून तो पहले ही पास हो चुके थे और कुछ अव पास होनेवाले थे । इस समय चेम्बरके सामने सरकारी खर्चसे चलनेवाली कुछ धर्म-सस्थायें बन्द करनेके कानूनका मसनिदा पेश किया गया था। यह बात तो निश्चित ही थी कि पादरी- पुञ्ज इस चिलका तीव्र विरोध करेगा । अतएव उसका विचार कावूरने पढ़ेहासे कर रखा था, परन्तु दुर्दैवसे उस समय विक्टर इमेन्यु- अल्की पत्नी, माता, और भाई, तीनों, कोई एक ही महीनेके भीतर कालकालित हो गये । इस कारण उसका चित्त खिन्न और उदासीन हो गया था। यह मौका देखकर पादरी पुञ्जके सहायकोंने उसके मनोदौर्बल्यसे खून उठाया । उन्होंने उसके दिल्में यह बात बिठा दी कि पारी-पुसके विरुद्ध जो उसने ये कानून पास कराये हैं, उसीका फर स्वरूप यह ईश्वरीय कोप उस पर हुआ है। साथ ही उन्होंने एक ऐसी योजना भी चेम्बरमें पेश की कि चेम्बरमें उपस्थित किये कानुनके मसविदेको वापस ले लेने पर जो कुछ आर्थिक हानि होगी वह हम पूरी कर देंगे परन्तु यह सब होने के पहले ही कावूरने, जटदी करके, उसे चे बरमें पास करा लिया । अतएव, अब, उस विषयमें लौट-फेर करना मत्रिमण्डल के लिए सम्भर न था । विक्टर इमेन्युगलकी मन स्थिति तो विचित्र ही हो गई थी। वह पादरी पुलके नेताओंके जालमें फंस गया। उनकी पूर्वोक्त योजना उसने पसन्द कर ली। परन्तु एक इस विषयमें लोकमत पूर्णत कावूरकी ओर था, दूसरे, पीडमाण्टमें प्रातिनिधिक शासन-पद्धतिक भले प्रकार चलनेके लिए पादरी-पुञ्जके व्यर्थ और शासन-यन्त्रके लिए ।
७८ कावूर। घातक प्रगुत्वको कम करना अत्यन्त आवश्यक था । अतएव विक्टर इमेन्युअलका किया रद्दोबदल स्वीकार करना कापूरके लिए सम्भव न या। परन्तु जब राजा हटसी ठान बैठा तम निरुपाय होकर कापूरने अपना इस्ताफा पेश कर दिया । क्योंकि इसके सिवा उसके लिए दुसरा मार्ग ही न था। ८-इसके बाद । कारका इस्तीफा मजूर कर लेनेके बाद रिक्टर इमेन्युअलने दूसरा मन्त्रिमण्डल सङ्गठित करना चाहा । परन्तु स्थिति यी बडी नाजुक, मत. उसकी इच्छाके अनुसार मन्त्रिमण्डलका सङ्गटन करके शासन-कार्यका उत्तर-टायित्व अपने सिर पर लेनेवाला कोई आदमी आगे न बढ़ता था । भूतपूर्व मन्त्री, मासिमो डी आजेग्लिओके भी विचार कावूरसे मिलते जुलते थे। अतएव फिरसे उस पर कामका भार डालना राजाको अभीष्ट न था। यही नहीं विक्टर इमेन्युअलको विश्वास था कि वह भी कावूरकी हॉमें हाँ मिलायेगा और उसीकी बात माननेकी सलाह देगा। अतएव वह उससे मिलना न चाहता था । परन्तु डी आजेग्लिओ ऐसे समय खामोश रहनेवाला आदमी न था । उसका पका विश्वास था कि राजा साहब इस समय बड़ी गलती कर रहे हैं, जिससे देशका अहित होना सम्भव है । अतएव उसने उनकी आँखें खोलनेके लिए एक हृदय-दापक पत्र लिखा । उसमे उसने राजासाहब- को समझाया कि धर्मगुरुओंके फेरमें पडकर आप मन्त्रिमण्डलके निर्धा- रित कार्य-क्रममें बाधा न डालिए । * इस पत्रकी बात रिक्टर * इस पनका नीचे लिसा भाग विशेष ध्यान देने योग्य है- - इसके बाद । 4A इमेन्युअलको नागनार हुई। परन्तु उसका प्रभार उसपर पडा खूब । तुरन्त उसने कापूरको बुलवाया और अपना काम पूर्ववत् करनेका अनुरोध किया। कावूरने भी उसकी बात मान ली । तब जिस विलके लिए ये सब कार्रवाईयाँ हुई वह फिर सेनेटमें स्वीकृतिके लिए पेश हुआ। लेकिन इस बार बिलके जनक राटेजीने राजाके इच्छानुसार धर्मोपदेशकोंकी एक विशेप सस्थाका नाम उसमेंसे निकाल ढाला। कावूरने तो इसका भी विरोध किया था, परन्तु अन्तमें, वह भी सह- मत हो गया। जब विलपर सेनेटमें चर्चा हो रही थी, पादरियोंकी ओरसे सभामें तथा बाहर कावूर पर तीक्ष्ण वाग्वाणोंकी अविराम वर्षा हो रही थी। परन्तु उससे न डरकर कावृरने इन सस्थाओंको जो आलस्यको बढानेवाली और रियासतके लिए निरर्थक भार रूप थीं, . " महाराज, आपके जिस पुराने और एकनिष्ठ सेयकने आपकी सेवा-कर- नेमे अपने राजाके हित ओर गौरव पर ही एकमान ध्यान रक्सा है उसकी बातोंपर निवास रखिए । आपके चरणों पर मस्तक झुकार मैं आपसे साउनय निवेदन करता हूँ कि आप अपने पहरे मार्गकी ओर ही मुँह फेरिए । पादरियों- के गुप्त पड्यन्त्रने आपके राजस्व कालकी सारी उत्तमता एक दिनम नष्ट कर दा है, देशर्म धाँधली मचा दी है, गासन प्रणालीको टाँवाहोल कर दिया है और आपकी सत्यवचाशीलताके यश पर कारिस पोत दी है। अब एक पल भी देर करना उचित नहीं। पीडमाण्टने सव कुछ महन किया है, परन्तु पादरियाकी अधीनतामें फिरसे जाना-छि यह कपनातक अभीष्ट नहीं। ऐसे गुप्त पड्यन्त्रा- को बदौलत इलेके राजा जेम्ग स्टुअर्ट, दसवें चान तथा और भी फितनाही. का नाम मिट चुग है । पादरियाने जो हुद्द मचाया है उसका सम्बन्ध धर्मसे नहीं, उनके स्वाथसे है । मेरे इस क्यनपर विश्वास रमिए । महाराज ! आप निश्चय रखिए, इससे आप भी इन पर विनय-लाम करेंगे । आप मुय पर शोधन पीजिएगा । मेरी यह सलाह एक मननकी मलाह ६, गजनिष्ठ प्रनाकी सलाह है और महारानके एक मित्रकी सलाद है।"
८० कावूर। , वन्द करनेकी आवश्यकता शान्तिपूर्वक, स्पष्ट शब्दोंमें, दिखलाई तब सेनेटमे भी वह बिल बहुमतसे पास हो गया । उसकी स्वीकृति होने तक कावूरको बडी मिहनत और परेशानी उठानी पड़ी। इससे उसका स्वास्थ्य कुछ खराब हो गया । अतएव विठ पास होते ही विश्राम करनेके लिए वह लेरी चला गया। एक महीना वहाँ आराम करके टयूरिन लौट आया । उस समय पूर्वोक्त तूफान शान्त हो चला था । जनताका व्यान पूर्वकी ओर भेजी गई सेनाकी तरफ लगा हुआ था । उसे समरक्षेत्रमें गये बहुत दिन हो गये थे, परन्तु उसके हाल- चालका पता लोगोंको न लगा था । यह देख कावूरका चित्त भी चिन्तित होने लगा। इसी समय उसे खबर लगी कि वहाँ महा-मारी शुरू हो गई है और सेनाके बहुतसे आदमी उसके शिकार हो रहे हैं। तब तो उसके चित्तकी अशान्ति बहुत ही बढ गई । उसे आगका होने लगी कि कहीं ऐसा न हो कि लड़ाई छिडनेका मौका आनेके पहले ही सेना यों व्यर्थ ही न नष्ट हो जाय । अतएव उसने ला मार्मोरा को लगातार चिहिया लिखी कि अपनी सेनाको युद्ध करनेका अवसर दिलाओ । फ्रान्सके तत्कालीन सम्राट् तीसरे नेपोलियनकी इच्छा थी कि वह सेना पीछे ही रक्खी जाय, लडाईका मौका उसे न दिया जाय; परन्तु जब कावूरका बहुत ही तकाजा देखा तो उसने अपना मनसूवा बदल दिया और १७ अगस्तके लगभग पीडमाण्टकी सेनाको फ्रेन्च और इग्लिश सेनाके साथ शत्रुसे लड़नेका अवसर दिया गया । सुदैवसे • इस समय कावूरको क्तिनी परेशानी हुई इमकी कल्पना उसके एक पनके नीचे लिसे अशसे हो सकती है, यह झगड़ा पालिकामेण्टमें ही नहीं दीवानके दफ्तरमें, दरवारमें और यहाँ तक कि रास्ते में भी जारी था। अनेक क्लेशकारक वातोंके बदौलत तो वह बहुत ही कष्टप्रद हो गया था।" प - इसके बाद । उस सेनाने अपनी शूरताकी पराकाष्ठा करके विजय प्राप्त किया और अंगरेज सेनापति सिम्सनने उसकी वीरताकी प्रशसा की । यह खतर उसी दिन तारके द्वारा कापूरको दी गई। उसने उसी दम यह गुभ वार्ता लोगों पर प्रकट कर दी। फिर क्या पूछना या ? उनके मान- न्टका पारागार न रहा । जो लोग इस सेनाको यहाँ भेजनेके लिए कावरको कोसते थे वे भी इस शुभ सवादको सुन कर गद्गद हो गये और अन्त करणपूर्वक कावूरकी प्रशसा करने लगे। इस विजयके बदौलत कावूर ओर पीडमाण्टकी प्रतिष्ठा योरपमें एक बार बढ़ गई और वर्षके अन्तमें (१८५५ ईसवी ) जव विक्टर इमेन्युअल इग्लैंड और फ्रान्स गया तर वहाँ उसका बडा जयजयकार हुआ । इस यात्रामे उसके साथ मासिमो डी आजेग्लिओ और कादूर दोनों ही गये थे। मासिमो डी आजेग्लिओ नरम पुरोगामी था । योरोपीय राजनीतियेत्ताओंमें उसका बड़ा आतङ्कया। कावूरके विचारोंको चे गरम ( Firebrand ) समझते थे । अतएव यह दिखलानेके लिए कि हम केवल कावूरकी ही सलाहसे नहीं चलते हैं, निक्टर इमेन्युअल डी आजेग्लिओको, विशेष रूपसे, साथ ले गया या । पहले तो कावूर उसके साथ जाना न चाहता था, परन्तु टी आजेग्लिओके सङ्केतपर उसने जाना स्वीकार कर लिया । लन्दन पहुँचने पर वहाँके लोगोंने सार्वजनिक रूपसे विक्टर इमेन्युअलका खूब सत्कार किया। रानी विक्टोरिया और प्रिन्स अल्बर्टने भी उसका सागत बड़े प्रेम- पूर्वक किया । कानूरसे बातचीतकर वे दोनों बडे प्रसन्न हुए और * उमने अपनी सरकारी रिपोर्टमें इसका जो उल्लेख किया है, वह यह है- इस लड़ाई में सार्डिनियन सेनाने यह दिसला दिया कि हम यूरोपके बढे बड़े सैनिक राष्ट्रों कन्धेसे कन्धा मिला कर लाने के योग्य है।" - i का०-६ । काबूर। +V~-~ wwmanwr पीडमाण्टके साथ उन्होंने अपनी सहानुभूति भी प्रकट की । लन्दन नगरके मेअर ( नगराध्यक्ष ) ने तो विक्टर इमेन्युअलका स्वागत बड़े ही उत्साहसे किया और उसके सन्मानार्थ एक सार्वजनिक भोड भी उन्हें दिया । उस समय विक्टर इमेन्युअलने एक भाषण किया उसका आशय यह है-" लन्दन नगरके अध्यक्ष और सज्जनो, आपकी रानी साहिबा और आपके देशसे भेट करने आया हूँ। यह देखकर आपने मेरा जो अभिनन्दन और स्वागत किया उसके लिए मैं आपका अत्यन्त कृतज्ञ हूँ। आपके किये इस स्वागतसे यह प्रकट होता है कि मैंने अपने राज्यमें जो नवीन शासनपद्धति जारी की है और आगे भी जिसे प्रचलित रखनेकी मेरी इच्छा है उसके साथ आपकी पूर्ण सहानुभूति है । "ससारके दो अत्यन्त बलाध्य देशोंमें-इग्लैंड और फ्रान्समें-मैं यात्रा कर रहा हूँ। उनमें जो मित्रताका सम्बन्ध हुआ है वह दोनों देशोंके शासन-कर्ताओंकी विचारशीलता-चतुरता-के योग्य और सन्माननीय है । यह स्नेह-सम्बन्ध क्या है, सभ्यताका विजय ही है। मेरे शासन-कालके पहले कुछ वर्ष यद्यपि सङ्कटमें बीते थापि स्वत- न्त्रता और न्यायकी रक्षाके लिए तलवार खींचना अपना कर्तव्य समझकर मै भी इस मित्रत्व-सम्बन्धका अगभागी हुआ | मेरे मित्रों की सहायताके लिए जो सेना मैंने भेजी वह यद्यपि कम है तथापि है वह अत्यन्त एकनिष्ट और कार्यतत्पर । अपने राजाके झण्डेके नीचे वह कहीं भी भिड़ जानेको-~-प्राण समर्पण करनेको तैयार है। जब तक हमारी प्रतिष्ठा और मर्यादाके योग्य स्थायी सन्धि न हो जाय, हमें हथियार नीचे न रखना चाहिए । प्रत्येक राष्ट्रकी न्याय्य आकाक्षा और वास्तविक स्वत्व एक मतसे प्राप्त करके हम, परमेश्वरको कृपासे, अपना यह उद्देश सिद्ध करेंगे।" न इसके बाद। ८३ इसके बाद उसने और एक बार झग्लैंडकी रानी और जनताको धन्यवाद देकर अपना भाषण समाप्त किया। पेरिसमें भी इन पाहुनोका ऐसा ही सत्कार किया गया। परन्तु नेपो- लिननको उचित समयके पहले ही युद्ध वन्द करके सन्धि करनेमें प्रवृत्त देखकर विक्टर इमेन्युल्का दिल जरा कड़वा हो गया उसे खेद हुआ। तथापि नेपोलियनने कावूरसे कहा कि पीडमाण्टको सहायता देनेकी मेरी बडी इच्छा है । आप तत्सम्बन्धी सूचनाओंकी एक सूची मुझे भेज दीजिए । कावूर इस अवसरको व्यर्थ खोनेवाला न था। उसने तुरन्त ही एक सुधार योजना ( Scheme ) उसके सामने पेश की, जिसके अनुसार आस्ट्रिया और पोपको प्रभुता इटलीपर कम होती थी । नेपोलियनने आश्वासन दिया कि मैं इनपर विचार करूँगा । इन दिनों इटलीके अन्य राज्योंका लोकमत भी पीडमाण्टको शासन-शैलीके अनुकूल हो रहा था। कितने ही राज्योंके नेता तो इस शासन पद्धतिकी सहायता करके पीडमाण्टके राज्य-छत्रकी छायामे जानेको उत्सुक थे । लोकसत्तावादियों के नेता और वेनिसके भूतपूर्व अध्यक्ष डेनियल मेनिन- ने पेरिसमें एक लेख प्रकाशित किया । वह इस प्रवृत्तिका सूचक है । उसका साराश यह है- दमन-नीतिसे त्रस्त लोकसत्तावादियोंका दल देशकार्यके लिए और भी कसर खाकर-तरह देकर-स्वार्थ त्याग करनेको तैयार है। उसको यह पूर्ण निश्चय हो गया है कि सब बातोंके पहले इटलीकी एकता और वर्तमान समयमें यही अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय है हो जानी चाहिए। अतएव यह दल पडिमाण्टके राजासे निवेदन करता है कि आप इटलीका एकीकरण कीजिए, फिर हमें आपसे मिला हुआ ही समलिए ।' और नियी वत-राजसत्तापादियोंसे हमारा कहना - ८४ कावूर। । कि 'इटलीको एक राष्ट्र बनानेकी ओर आप ध्यान दीजिए । केर पीडमाण्टकी कीर्ति बढ़ानेमें निमग्न न हो जाइए । आप इटालिय होइए, प्रान्तीय दृष्टि त्याग दीजिए। यदि आप ऐसा करें तो ह आपकी सेवाके लिए प्रस्तुत हैं ।' क्षुद्र पक्ष-भेदों और जरा जरार बातोंके लिए उनमें होनेवाली लडाईयोंको भूल जानेका समय अ आगया है। इस समय एक ही विषय महत्त्वपूर्ण है । वह है इटालिया राष्ट्रका एकीकरण । सम्प्रति इटलीमे दो ही पक्ष प्रभान हैं-एर ऐक्पनादी और दूसग पार्थक्ययादी । लोकसत्तावादियोंकी ओर मैं एकताका झण्डा खा करता हूँ। जिनकी यह इच्छा हो कि इटट एक राष्ट्र हो जाय, इसके नीचे उनका एकत्र होना आवश्यक है।' पूर्वोक्त विचार प्रकट करनेवाला डैनियल मेनिन, वेनिसमें मास्ट्रिया का प्रभुत्व पुन. स्थापित हो जानेके कारण, देश त्याग करके पेरिस जा वसा था। विक्टर इमेन्युअलसे भेट करते समय जब उसने फ्रान्स झण्डके पास इटालियन राष्ट्रको ऐक्य-वृद्धिका सूचक तिरङ्गी (हरा, सफेद और लाल) झण्टा देखा, तव उसे बडा आनन्द और सन्तोष हुआ। तत्रसे उसे निश्चय सा हो गया कि भविष्यतमें मेरी राजनैतिक भारना और आकाक्षा अवश्य सफल होगी। इससे उसके जीवनके अन्तिम दिन शान्ति-पूर्वक बीते । इटलीके दूसरे महान् पुरुप, जोसेफ गैरीवाल्डीके विचार भी अब ने न रहे थे । टेनियल भेनिनके विचारसे उसके विचारोंका बहुत कुछ साम्य हो चला था। इसके पहले वह मेजिनीके विचारोंका कायल था। उसने, बहुत समय तक, भिन्न भिन्न राज्योंके क्रान्तिकारक आन्दोल- नोंमें हार वटाया था । गैरीवाडी बड़ा साहसी, सयोजक और शूर भापति था। उसके पास कोई १००० स्वय-सेवक सदा तैयार इसके बाद। । - रहते थे। उन्हें उसने उत्तम सैनिक शिक्षा दी थी । अतएव इस छोटीसी ही सेनाके बल पर यह बड़े बड़े साहसके कार्य कर टाटता या। १८४८ ईसनीसे इटलीफे राज्यों में जो क्रान्तिकारक आन्दोलन जारी हुआ था उसमें समय समय पर गैरीगाडीने बहुत योग दिया था। परन्तु उस समय उसकी कुछ चली नहीं-उसे सफलता न मिली । तबसे वह अमेरिका, इंग्लैंड, आफ्रिका, चीन इत्यादि देशोंमें तरह तरहके उद्योग करके, कालक्रमण कर रहा था । मई १८५४ ईसवी में वह जिनोआ आया और वहाँसे अपनी जन्मभूमि नीसको चला गया । यहीं उसके बालबच्चे थे । घर पहुंचने पर उसके भाईकी सम्पत्तिमेसे कुछ रकम उसे मिली । तब उसने कैपेरेरा नामके टापूमें कुछ जमीन जायदाद खरीद ली और वहीं कायम मुकाम हो गया । इस टापूमें रहते हुए उसका ध्यान, फिर अपने देशके आन्दोलनक्की और आकार्पत हुआ | अब वह इस फिकरमें रहने लगा कि कत्र फिरसे युद्धक्षेत्रमें जानेका अवसर हाथ लगे। पीडमाण्टको राजनैतिक स्थिति और सुधारोंका विचार करने पर उसका चित्त उस रायकी मैनिक सेवा करनेको लालायित हो उठा । परन्तु कावूरकी औरसे उसको ऐसा अवसर मिलनेमें अभी मिलम्ब या | निक्टर इमेन्युअटके पेरिससे इटली लौटने पर कावूर अपनी नीति अधिक धीरता और अधिक दृढ़तासे काममें लाने लगा। सेनाकी उन्नति और कौशकी वृद्धि पर वह विशेष ध्यान देने लगा। उसकी पर-राष्ट्रीय-नीति अधिक बलवती होने लगी, अर्थात् पर-राष्टोके साथ व्यवहार करनेमें भी अब वह विशेष साहस और निर्भीकतासे काम लेने लगा । लोकमत भी अब उसकी नीति के बहुत अनुकूल होगया था। उसकी नीतिके जो विरोधी थे वे भी अब खामोश हो रहे । फिर कावूर। . क्या था, पीडमाण्टके राजनैतिक पट पर कावूरको मनमाना खेल खेल- नेकी आजादी होगई । उसके कुछ कामोंको कुछ लोग यद्यपि दिलसे नापसन्द करते थे, तथापि अब उसके विरोध करनेका साहस उनमें न रह गया था। उसके प्रतिपक्षी भी अब उसे कुछ अशमें विश्वासकी दृष्टिसे देखने लग गये थे। उन्हें विश्वाससा होगया था कि कावूरको आजाद रहने देने पर वह जो करेगा अच्छा ही करेगा। क्योकि अत्र लोगोंको अच्छी तरह ज्ञात होगया था कि इटालियन राष्ट्रका एकीकरण ही उसके शासनका प्रधान कार्य है। परन्तु इस ढंगकी कोई अधि- कारयुक्त अर्थात् बाजाब्ता बात अभी तक कावूर अथवा उसके मन्त्रि- मण्डलने प्रकट न की थी। पर उसके प्रतिपक्षी चाहते थे कि वह ऐसा कर दे, बल्कि मन्त्रिमण्डलसे यह कहलवाने के लिए पार्लियामेण्टमें भी ऊधम मचाया गया। उसके एक प्रतिपक्षीने पार्लियामेण्टमें बडे जोर शोरसे कहा कि “कावूरकी यह नीति बेवकूफ़ीसे भरी हुई है । इसके अनुसार आपको सफलता नहीं मिल सकती !" परन्तु कापूर तो था राज-नीति-पटुताका अर्क | उसके आगे उस प्रतिपक्षीकी दाल न गली । उस समय यदि कोई मामूली आदमी होता तो तीव्र वाग्वा- णोंके प्रहारसे चिढ उठा होता और अपनी नीतिका स्पष्टीकरण करके या तो उसने उसका समर्थन किया होता या अपने आरोपको मिथ्या बतलाया होता । परन्तु कापूरने ये दोनों मार्ग छोड दिये । अपने क्षुब्ध प्रतिपक्षीको उसने शान्तिपूर्वक इतना ही कहा कि "पीडमाण्टका मन्त्री इटालियन राष्ट्रीयताके सदृश महत्त्वपूर्ण विपयसे ध्यान खींच ही नहीं सकता-उसकी उपेक्षा कर ही नहीं सकता। मन्त्रिमडलकी इच्छा और नीति इस विषयमें क्या है यह प्रकट करनेका समय अभी नहीं है। अतएव आज ही इस विषयका निर्णयात्मक उत्तर नहीं दिया जा सकता । यह विपय अभी गर्भावस्थामें है । अतएव जन तक वह पूर्ण दशाको प्राप्त न हो तब तक, मुझे बलरती आशा है, कि आप धैर्य धारण किये रहेंगे और उसके विषयमें अपना निश्चित मत न प्रकट करनेका जो अधिकार प्रातिनिधिक गासन-सस्थाके मन्त्रीको प्राप्त है उसका पूर्ण उपयोग उसे करने देंगे।" कावूरके गम्भीरता-पूर्वक उच्चारित इन वचनोंको सुनते ही उसके प्रतिपक्षीके मुंहमें मानों ताला पड़ गया। ९-पेरिसकी परिपद । विक्टर इमेन्युअल और कावूरका ध्यान इस समय क्रिमियाके युद्ध- की ओर विशेष रूपसे लगा हुआ था। उन्हें आशा थी कि यह युद्ध अभी बहुत दिनों तक जारी रहेगा और उसमें पीडमाण्टकी सेनाको अपना जोर दिखानेका एकाध वार अवसर और भी मिलेगा । परन्तु इसी बीच आस्ट्रिया ऐसी चेष्टा करने लगा जिससे उनकी यह आगा सफल न हो। वह बीचमें पड़कर रूससे सन्धि करनेका आग्रह करने लगा और फ्रान्स तथा इग्लैंडकी भी विचनाई करनेकी कोशिशमें लगा। अन्तमें फ्रान्स और रूसने उसकी मध्यस्थी स्वीकार करके सन्धि- की इच्छा प्रकट की। इग्लैंड इस तजवीजसे अधिक सहमत न या। फ्रान्सकी उत्सुकता देखकर उसे यह योजना स्वीकार करना पड़ी। परन्तु फिर, सवकी सलाहसे, सन्धिकी शौका निर्णय करनेके लिए निश्चय हुआ कि पेरिसमें एक परिपद की जाय । इस परिषदमें आस्ट्रियाका प्रतिनिधि मध्यस्थके नातेसे विशेष सम्मिलित होनेवाला था। इससे कावूर यह जान चुका या -- ८६ कावूर। क्या था, पीडमाण्टके राजनैतिक पट पर कावूरको मनमाना खेल खेल- नेकी आजादी होगई ! उसके कुछ कामोंको कुछ लोग यद्यपि दिलसे नापसन्द करते थे, तथापि अब उसके विरोध करनेका साहस उनमें न रह गया था । उसके प्रतिपक्षी भी अब उसे कुछ अशमें विश्वासकी दृष्टिसे देखने लग गये थे। उन्हें विश्वाससा होगया था कि कावूरको आजाद रहने देने पर वह जो करेगा अच्छा ही करेगा। क्योंकि अब लोगोंको अच्छी तरह ज्ञात होगया था कि इटालियन राष्ट्रका एकीकरण ही उसके शासनका प्रधान कार्य है। परन्तु इस ढंगका कोई अवि- कारयुक्त अर्थात् बाजाना बाल अभी तक कावूर अपना उसके मन्त्रि- मण्डलने प्रकट न की थी। पर उसके प्रतिपक्षी चाहते थे कि वह ऐसा कर दे, बल्कि मन्त्रिमण्डलसे यह कहलवाने के लिए पार्लियामेण्टमें भी ऊधम मचाया गया । उसके एक प्रतिपक्षीने पार्लियामेण्टमें बड़े जोर शोरसे कहा कि “कावूरकी यह नीति बेवकूफीसे भरी हुई है । इसके अनुसार आपको सफलता नहीं मिल सकती !" परन्तु कापूर तो था राज-नीति-पटुताका अर्क । उसके आगे उस प्रतिपक्षीकी दाल न गली । उस समय यदि कोई मामूली आदमी होता तो तीन वाग्या- गोंके प्रहारसे चिढ़ उठा होता और अपनी नीतिका स्पष्टीकरण करके या तो उसने उसका समर्थन किया होता या अपने आरोपको मिथ्या बतलाया होता । परन्तु कावूरने ये दोनों मार्ग छोड़ दिये। अपने क्षुब्ध प्रतिपक्षीको उसने शान्तिपूर्वक इतना ही कहा कि " पीडमाण्टका मन्त्री इटालियन राष्ट्रीपताके सदृश महत्त्वपूर्ण विषयसे ध्यान खींच ही नहीं सकता-उसकी उपेक्षा कर ही नहीं सकता। मन्त्रिमडलकी इच्छा र नीति इस विषयमें क्या है---यह प्रकट करनेका समय अभी नहीं है। अतएव आज ही इस विषयका निर्णयात्मक उत्तर नहीं ।
पारसका पारपद । दिया जा सकता । यह विषय अभी गर्भावस्थामें है । अतएव जब तक वह पूर्ण दशाको प्राप्त न हो तब तक, मुझे बलमती आशा है, कि आप धैर्य धारण किये रहेंगे और उसके निषयमें अपना निश्चित मत न प्रकट करनेका जो अधिकार प्रातिनिधिक शासन-संस्थाके मन्त्रीको प्राप्त है उसका पूर्ण उपयोग उसे करने देंगे।" कावूरके गम्भीरता-पूर्वक उच्चारित इन वचनोंको मुनते ही उसके प्रतिपक्षीके मुंहमें मानों ताला पड गया । ९-परिसकी परिपद । विक्टर इमेन्युअल और कावरका ध्यान इस समय क्रिमियाके युद्ध- की ओर विशेष रूपसे लगा हुआ था। उन्हें आशा थी कि यह युद्ध अभी बहुत दिनों तक जारी रहेगा और उसमें पीडमाण्टकी सेनाको अपना जोर दिखानेका एकाध बार अवसर और भी मिलेगा । परन्तु इसी बीच आस्ट्रिया ऐसी चेष्टा करने लगा जिससे उनकी यह आशा सफल न हो। वह बीचमें पड़कर रूससे सन्धि करनेका आग्रह करने लगा और फ्रान्स तथा इग्लैंडकी भी विचवाई करनेकी कोशिशमें लगा। अन्तमें फ्रान्स और रूसने उसकी मध्यस्थी स्वीकार करके सन्धि- की इच्छा प्रकट की । इग्लैंड इस तजबीजसे अधिक सहमत न था । फ्रान्सकी उत्सुकता देखकर उसे यह योजना स्वीकार करना पड़ी। परन्तु फिर, सबकी सलाहसे, सन्धिकी शर्तोंका निर्णय करनेके लिए निश्चय हुआ कि पेरिसमें एक परिषद की जाय । इस परिपदमें आस्ट्रियाका प्रतिनिधि मध्यस्थके नातेसे विशेष रूपसे सम्मिलित होनेवाला था। इससे कापूर यह जान चुका था कि इस कावूर। Aruar- परिपदमें पीडमाण्टके विशेप हितकी कोई बात न होगी । उसे यह भी पता लग गया था कि पीडमाण्टके प्रतिनिधिके साथ समानताका व्यवहार करनेके लिए अन्य राष्ट्र तैयार नहीं है । अतएव बडे ही दुखित हृदयसे उसने इस परिपदमें जाना स्वीकार किया । इसके बाद वह पेरिस चला गया । फिर थोडे ही दिनोंमें, इग्लैंडकी राय लेकर, नेपोलियनने प्रकट किया कि हम चाहते है कि पीडमाण्टका प्रतिनिधि अन्य प्रतिनिधियोके बराबर समझा जाय-उससे बरावरीका व्यवहार किया जाय । तव लाचार होकर अन्य ोंके प्रतिनिधियोंको भी यह बात स्वीकार करना पडी । यह मुख्यत कापूरके व्यक्तित्वका ( Personality ) -उसकी व्यक्तिगत विशेषताओंका-ही परिणाम था। इस घटनासे यह बात अच्छी तरह ज्ञात होती है कि योरपके राजनीति-विशारदोंमें कावूरका प्रभाव किस प्रकार बढ़ता जा रहा था । इस तरह उसे समानताका रिश्ता तो मिल गया, परन्तु इससे यह नहीं माना जा सकता था कि पीडमाण्टका प्रश्न परिपदके सामने, प्रधान रूपसे, पेश किया जा सकेगा । अतएव कावूरने इस परिषदमें बडे ही मितभाषणसे काम लिया । इस बैठकमें यद्यपि उसे सङ्कुचित वृत्ति स्वीकार करना पड़ी तथापि, खानगी तौर पर उसने अपना बहुत काम बना लिया । यह परिपदके प्रतिनिधियों तथा अन्य प्रधान राज-काजियोंसे मिला और उनसे बातचीत करके उसने इटलीके राष्ट्रीय ध्येयके विषयमें उनकी सहानुभूति प्राप्त कर ली। तब जिन साधनों अर्थात गुप्त योजनाओं अथवा ऐसे परिचय इत्यादि जिनसे उसका काम अशत बन जानेकी सम्भावना उसे देख पडी उन सबसे काम लेनेका सिलसिला उसने जोर शोरसे जारी ।। नेपोलियनकी रानी साहिबाकी भी सहानुभूति प्राप्त करनेका 1 पेरिसकी परिपद । " पिचार उसने किया । इस कामके लिए उसने पहले रानीकी प्राणप्रिया सखी, मार्शनेस आव् एले, से बड़े देंगसे स्नेह जोड़ा, फिर उसके द्वारा रानी साहिवासे अपनी अभीट-सिद्धि कर ली । प्रिन्स नेपोलियन नामके एक राजपशीय पुरुपने फ्रेञ्च दरबारमें उसका काम साधनेकी हामी भरी । इसी प्रकार तीसरे नेपोलियनको अपनी ओर करनेके लिए उसने उसके विश्वास पात्र मनुष्य डाक्टर कान्यू ( यह नेपोलियनका गृह- वैद्य या) से मेल-जोल पैदा किया । यह मैत्री उनकी अन्त तक गुप्त रही अनेक महत्त्वपूर्ण राजनैतिक विषयोंमें काबूरका इम मैत्रीसे घड़ा काम निकला | * अँगरेज-प्रतिनिवि लाई हेरेंडनको भी उसने अपनी ओर झुका लिया। हाँ, स्वय परिषदकी बेठकमें अलबत्ते यह कुछ कार्य न कर पाया। तब उसने सोचा कि कोई काम ऐसा करना चाहिए जिससे कि परिषदको इटलीकी आवश्यकताकी चर्चा करने पर मजबूर होना पड़े। इसके लिए उसने नेपोलियनके सङ्केतके अनुसार, अँगरेज और फ्रेन्च प्रतिनिधियों के नाम एक सूची तैयार की। उसमें उसने पार्मा और मोडेना ये राज्य पीडमाण्टको मिलें और रोमा- ग्नामें विद्यमान् आस्टियन सेना वापस बुला ली जाय, इन दो शर्तोंका उल्लेख प्रधानरूपसे किया था। फ्रेव प्रतिनिधि और परिपदके अध्यक्ष, वेल्लेस्कीने परिपदके अतिम दिन उन शॉपर विचार करनेकी सिफा रिश की। इस पर आस्ट्रियन प्रतिनिपिने आपत्ति की कि इम सूचीकी शाका विचार करना इस परिपदके निश्चित कार्य-क्रमके बाहर है इसके सिवा इस विषयपर निश्चित मत देनेका भविकार भी मुझे अपनी सरकारसे प्राप्त नहीं है । आस्ट्रियन प्रनिनिधिको यह आपत्ति * इन राब अवसरोंपर कार और नेपोलियनके बीचमें सलाह सूत देने का राम मास्टर फान्योकिया है। , कावूर । राजनीतिज्ञोंके सामने पेश की जा सकी । यह बात हमारी वर्तमान स्थितिमें हमारे बड़े कामकी हुई । कमसे कम मेरा तो यही विश्वास है। दूसरा लाभ यह कि इटलीकी दु ख-कथा सुनकर अन्य राष्ट्रोंके प्रतिनिधियोंने हमारे साथ अपनी सहानुभूति प्रकट की । केवल इटलीके ही नहीं, बल्कि योरपके हितके लिए भी इस स्थितिका सुधार करनेकी आवश्यकता उन्होंने स्वीकार की । इन बातोंका परिणाम हमारे हकमें बहुत ही लाभकारक हो सकता है। इग्लैंड और मासके सदृश शक्तिशाली राष्ट्रोंके प्रकट किये हुए विचार और उनकी सम्मति व्यर्थ जायगी, यह बात बुद्धि कुबूल नहीं करती । अस्तु । इस सुपरिणामके लिए हमें अपना अभिनन्दन करना चाहिए । पर, साथ ही, हमें यह न भूल जाना चाहिए कि इसमे अनिष्टकी भी थोड़ी बहुत आशङ्का है । पूर्वोक्त परिपदके निमित्तसे आस्ट्रियन प्रतिनिधिके साथ बराबरीके नाते दो महीने तक मेरा निरन्तर सहवास रहा । उससे उसके सौजन्य और शिष्टताका मुझे उत्कृष्ट अनुभन हो गया । मुझे यह ज्ञात हो गया कि उनमें-~-आस्ट्रियनोंमे-और हममें समझौता होनेकी तिल मात्र सम्भावना नहीं । दोनोंकी इच्छा और दोनोंके मार्ग एक दूसरेके इतने विरुद्ध हैं कि उनमें समझौता कभी नहीं हो सकता।" इस भाषणका अन्तिम अश तत्कालीन परिस्थितिके लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण था । कावूरने इन शब्दोंका उच्चार क्या किया मानो राष्ट्रीयता- की कल्पनाका प्रकट रूपसे समर्थन ही किया। अतएव आस्ट्रियाने उसके इस भाषण पर आपत्ति की। उसने कहा पी.माण्टके प्रधान-मन्त्रीको समस्त इटलीके राज्य व्यवहारके सम्बन्धमें ऐसे विचार प्रकाश्यरूपसे प्रगट करनेका अधिकार नहीं । ऐसी बात मुंहसे निका- - आस्ट्रियाके अधीन प्रान्तस्थ लोगोंको बलके लिए उभाड़ना है।" " परन्तु उस समय उसकी आपत्ति पर किसीने विशेष ध्यान न दिया । कावूरने ये बातें उस समय जान-बूझ कर कही थीं। क्योंकि अब उमे जो चाल चलनी थी-जो दॉथ खेलना था-उसमें जीतने लिए इटलीके अन्य राज्यों के निवासियोंकी सहानुभूति और सहायता की आवश्यकता थी । यह कहाँ तक सम्भव है, इसीकी जाँचके लिए उसने पूर्वोक्त साहसपूर्ण उद्गार प्रकट किये थे। उसका परिणाम वैसा ही हुआ जैसा कि वह चाहता था। अर्थात् काबूरके पूर्वोक्त भाषण- के पश्चात् इटलीके कुछ राज्यों के पुरोगामी लोग-सत्ताधारी और असत्ता- धारी--आस्ट्रियाकी अधीनतासे अपना पिण्ड छुड़ानेके लिए अधीर हो उठे । इसके लिए वे दीनतापूर्वक पीडमाण्टका मुंह निहारने लगे । वे चाहने लगे- उनके हृदयमें यह भारना स्थान पाने लगी---किपीडमाण्ट- के नेतृत्वमें इटलीका एक राष्ट्र बनाया जाय। वे पीडमाण्ट पर अपनी श्रद्धा- भक्ति प्रकट भी करने लगे। काबूरकी नीतिका अनुमोदन करनेके रिए टस्कनी राज्यके लोगोंने उसे उसकी अर्द्धमूर्ति (Bust) सादर भेंट की ।* पोपकी राज्यकी ओरसे उसे एक सोनेका पदक अर्पण किया गया । इसके सिवा ट्यूरिनमें पीडमाण्टकी सेनाका विजय स्मारक स्थापन करने के लिए लाबर्डी राज्यके निवासियोंने चन्दा जमा किया । इटा- लियन रायोंके लोकमतका यह रुख देस कर कापूरका उत्साह और भी बढ गया । अव उसने आस्ट्रियाकी धमकियोंकी परवा न करके अपनी नीतिके अनुसार काम करनेका निश्चय कर लिया। वह बडा कार्यकर्ता और चतुर पुरुष या। किसी एक ही पक्ष अथवा मनुष्य- विशेषसे चिपक रहनेवाला वह न था। उसके कार्य के लिए उपयोगी इस पर “Colunche la difese a viso aperto" (धीरता- पूर्वक अपने देशकी रक्षा करनेवाला मनुष्य ) ये शब्द खोदे गये थे।
९४ कावूर। - शक्ति जहाँ कहीं उसे मिलती वहाँसे वह उसे बडे कौशलसे प्राप्त करता । परन्तु ऐसा करनेमें वह स्वय उस शक्तिके अधीन न हो जाता था, बल्कि उसकी बागडोर अपने हाथमे रखनेकी क्षमता रखता था । उसके इस व्यवहारके कारण भिन्न भिन्न विचारों और सम्प्रदायोंके लोगोंसे उसका सावका पडा करता और उनकी प्रणीय बातोंको वह बडे आनन्दसे ग्रहण करता था । परन्तु यह काम वह खानगी तौरपर करता था, राज-कर्मचारीके नातेसे नहीं । कभी कभी तो वह ऐसे काम गुप्तरूपसे किया करता था। ऐसी एक गुप्त बात प्रकट हो गई । वह यों है-~-कावूरके पेरिसपरिपदसे लौट- नेके कुछ दिनों बाद कुछ इटालियन देशभक्तोंने ट्यूरिनमें राष्ट्रीय सभा ( National Society ) नामकी एक नई सस्था स्थापित की। उसका उद्देश यह था कि समस्त इटालियन राज्य पीडमाण्टमें सम्मि- लित करके इटलीका स्वतन्त्र राष्ट्र निर्माण किया जाय । इस उद्देशकी सिद्धि के लिए काम करनेवाले दूत और प्रतिनिधि प्रत्येक राज्यमें फैले हुए थे। इस सस्थाका प्रधान सूत्रधार ला-फारिना नामका एक चतुर देशभक्त था । वह सिसिलीका रहनेवाला था। उसकी आन्तरिक इच्छा थी कि इस सस्थाको कारका आश्रय मिले | एतदर्थ उसने अपने एक मित्रके द्वारा कावूरसे भेट की और उसपर अपनी इच्छा प्रकट की। उसकी सस्थाके कार्यक्रममे कावूरकी उद्देश-पूर्तिमे अना- यास वहुत सहायता होनेकी सम्भावना यी । अतएव कापूरने उससे अपना सम्बन्ध करना स्वीकार किया । परन्तु दोनोंमें यह बात तय पाई थी कि अरुणोदयके अर्थात् पो फटनेके पहले ही छिप छिपे आकर ला-फारिना कावूरसे बातचीत कर जाया करे । यदि पार्लियामेण्ट अथवा राज-कार्य-कर्ताओंको इसका जरा भी सूत लगे, तो कावूर - + : 'तोबा तौबा' करने लग जाय । मुदैवसे उनकी इस योजनाका ॥ उचित समयके पूर्व किसीको न लगा । सितम्बर १८५६ ईस- से लेकर चार वर्षों तक बहुधा रोज इन दोनोंकी मुलाकात छिपे पे हुआ करती। इसके बहुत समयके बाद यह हाल लोगोंको छम हुआ । परन्तु तब तक उसका वहुत काम बन चुका था। --फारिनाकी तरह कावूरने और भी एक बड़े आदमीसे इसी तरह पना काम निकालना आरम्भ कर दिया था। वह पुरुष और ई नहीं, प्रख्यात गेरीबाडी था। इसका सक्षिप्त वृत्तान्त पीछे हा ही जा चुका है । अगस्त १८५६ ईसवीमें कावूरने ससे पहले पहल भेट की और आश्वासन दिया कि शीन ही पकी सहायता स्वीकार की जायगी । इसके बाद वह पीड- ण्टकी सेनाकी तैयारीमें लगा। उसने कुछ ऐसे काम नियमपूर्वक रू किये जिससे सेनाके काम-काजमे सुभीता हो । इसके लिए आवश्यक खर्चकी मजूरी भी उसने अपनी महत्ताके बल पर प्राप्त र ली। तात्पर्य यह कि अब वह अपना काम बडे साहस-पूर्वक डिल्लेसे करने लगा। इसी बीच फ्रान्स और इग्लेडने नेपल्सके राजा नौर रामके पोपको राय दी कि आप अपने अपने राज्यों में मनमानी न्दि करके शासन व्यवस्थामें उचित सुधार कीजिए । परन्तु उन्होंने इस पर विशेष ध्यान न दिया। आस्ट्रिया पर अल्पत्ते इस चिता- वनीका कुछ असर हुआ और उसने अपने अधीन लाम्बार्डी और वेनि- शिया प्रातोंके लोगोंको अधिक अधिकार--सास रियायते-दे दिये । और भी तरह तरह से वह उनका अनुरअन करने लगा। वहाँके नो निवासी पडिमाण्टमें जा बसे ये उनकी जायदाद उसने जन्त कर ली थी। वह उन्हें आप होकर वापस कर दी । वहाँका गर्नर लोगोंको अप्रिय कावूर। या। उसका तबादला कर दिया और उसकी जगह एक मिठत्रोला परन्तु मतलबी गवर्नर नियुक्त कर दिया। उसने राजनैतिक कैदियोंको छोड दिया । स्थानिक लोक-सभाओंका बहुतसा ऋण माफ कर दिया । स्वय आस्ट्रियन सम्राट् फ्रान्सिस जोसेफ मिलान और येनिसको गया। वहाँ जाकर उसने लोगोंको तरह तरहसे खुश करनेकी कोशिशें की । परन्तु उसकी सब कार्रवाईयों व्यर्थ गई। जिस दिन (१५ जनवरी १८५७ ईसवी ) वह सरकारी तौरपर मिलान नगरमें आया, उसी दिन टयूरिनके समाचार-पत्रोने यह समाचार प्रकाशित किया कि पीडमाण्टकी सेनाका विजय-स्मारक स्थापित करनेके लिए स्थानीय इन इन लोगोने इतनी इतनी रकमें दी । उसीके साथ उन्होंने आस्ट्रियाके गतकालीन क्रूर और अमानुप कृत्योंकी एक सूची प्रकाशित करके उसके सम्राटकी शासन-पद्धतिकी तीन आलोचना की । उसके घोड़े ही दिन बाद ट्यूरिनकी म्युनिसिपालिटीने मिलान-निवासियोका पूर्वोक्त दान प्रकट रूपसे, अभिनन्दन-पूर्वक, स्वीकार किया। इन दो घट- नाओंसे आस्ट्रियाके तलौकी आग सिरतक पहुंच गई । उसने अपने परामर्शदाता वकील या अधिकारी-( Changed affaires ) के द्वारा कापूरसे शिकायत की-तीत आपत्ति की । परन्तु कापूर तो अब वडा ढीठ हो चला था। उसने उस वकीलसे साफ कह दिया, " पीडमाण्टने पेन्सिकी परिपदमें इटलीकी तरफसे जो कार्य- सिद्धि की है उससे उऋण होनेके लिए कुछ रकम देनेकी इच्छा इटलीके भिन्न भिन्न प्रान्तवासियोंको होना स्वाभाविक है। इसमें कुछ भी अनुचित नहीं । और समाचार-पनोंको तो पीडमाण्टकी सीमा कानूनने पूरी स्वतन्त्रता दे रक्खी है । कानूनकी दृष्टिमें जब यह मा जायगा कि वे अपनी सतरताका दुरुपयोग कर रहे हैं तब उनका - २ पेरिसफी परिपद् । । उचित प्ररन्ध-उचित कार्रवाई किया जायगा । यह तोहमारा कर्तव्य ही है और इसके पालन करनेसे हम कभी मुह न मोडेंगे। अच्छा, हमारे यहाँके वर्तमानपान तो अधिकाशमें स्वतन्त्र हैं। तिम पर भी आप उनके व्यवहारकी हममे शिकायत करते हैं-हमको डॉटडपट बतलाते हैं परन्तु आपके देशके पत्र तो निलकुल आपकी मुट्ठीही- में है । वे हमारे राजासाहब और हमारे देशकी तौहीन प्रकट रूपमे किया करते हैं । उनकी इस करतूत पर आपकी दृष्टि क्यों नहीं जाती, समझमें नहीं आता यह निर्भीक उत्तर पाकर आस्ट्रियाने पीडमाण्टसे अपना मारा राजकाज बन्द कर दिया । कावूरने भी इसकी अधिक परचा न की । उसे तो किसी बहाने आस्ट्रियाको युद्धमें प्रवृत्त ही करना था । क्योंकि उसका निश्चय था कि जरता भाटियन प्रभुताका पलायन इटलीसे न होगा, इटालियन राष्ट्रका निर्माण नहीं हो सकता । पीटमाण्टसे सम्बन्ध-विन्डेट कर लेने पर आस्ट्रियाने लापर्टी-वेनिशिया-प्रान्तकी प्रजाके आराधनकी मात्रा और भी बढा दी ! परन्तु वहाँके निवासी पिछले अत्यन्त कटु अनुभवको न भूले थे । अतएर वे आन्ट्यिाके मनोमोहक जाटमें, मछलीकी नरह, फैम नहीं गये । उन्होंने देनियल मेनिनके कथनके अनुसार, जिसका उल्लेख पहले किया ही जा चुका है पीटमाण्टकी सहायतासे इटलीका पुनर. जीवन करना ही अपना व्येय माना था। इसी लक्ष्य पर उनकी दृष्टि यो । उनका कहना था कि-"हम यह नहीं चाहते कि आस्त्यिा हम पर अधिक दयालुता दिखाने, बल्कि हमारी तो इच्छा है कि नह यहाँसे अपना डेरा डण्डा उठा ले जाय ।" ट्यूरिनमें स्थापित राष्ट्रीय सभा भी यही चाहती थी । इस तरहकी सहानुभूति और सहायनासे का-७ कावूर। कायूरको अपने कार्यमें खूब प्रोत्साहन मिल रहा था। तथापि, अब भी, मेजिनीको काबूरका यह कार्य-क्रम पसन्द न था। लोगोंको बलके लिए उभाड कर इटलीमें लोक-सत्ताक राज्य स्थापन करना वह अब भी सम्भव ममझता था, अतएव वह इन्हीं दिनों इग्लैंडसे लुक छिप कर जिनोआ आया और वहाँके क्रान्तिकारक पक्षकी सहायतासे उसने इटालियन लोक सत्ताक राज्यस्थापनाका अन्तिम प्रयत्न किया। परन्तु उसके अन्य पूर्व- प्रयत्नोंकी तरह इसमें भी उसे सफलता न प्राप्त हुई। इससे उसके अनुगा- मियोको बडी हानि उठानी पडी। इस घटनाका उल्लेख इतिहाप्समें Sapri expedition के नामसे किया गया है । इस घटनाके बादसे मेजिनीका कार्य-क्रम लोगोंको नापसन्द हो गया। नरम और मूलगामी ( Radical ) सुधारवादी दलोंकी दोनों शाखाओंने एकमत होकर कापूर- के मार्गको ही स्वीकार किया। अब मी कुछ मूलगामी लोग कावूरके कार्यसे अलग रहा करते थे। उसी प्रकार, अनियन्त्रित सत्तावादी और प्रतिगामी दल ( Reactionaries ) के कुछ लोग भी उसके विरद्ध ये। परन्तु कावूरने इनमेंसे किसीकी परवा नहीं की । इससे उसके कार्यकी उन्नति झपाटेसे होती गई। वह स्वय अत्यन्त उद्योगी और दक्ष था । उसका स्वभाव भी बहुत अच्छा था । अतएव अस- फलताका सामना करनेकी आशङ्का उसे बहुत ही कम रहती थी। उसकी कार्य्य-क्षमता भी बडी विलक्षण थी । बड़े बड़े महत्त्व-पूर्ण गजकाजोंमे निमग्न रहते हुए भी छोटी मोटी बातों पर उसकी नजर रहा करती थी। वह सवेरे पाँच वजेसे पहले सोकर उठता और आठ बजे तक पत्रव्यवहार, खानगी काम, तथा गुप्त सलाह-मशनरा, करता था। फिर कुछ खाता था। इसके बाद सबका सलाम लेता और प्रेम भरे शब्दोंसे उन्हें सन्तुष्ट करता हुआ वह अपने दफ्तर जाया करता।
पेरिसकी परिपद् । इनमें अधिकतर दफ्तरमें काम करता और सरकारी कामसे आये हुए गोंसे मुलाकात करता । तीसरे पहर भिन्न भिन्न मुहकमोंके दफ्तरोंमें कर उनके अधिकारियोको आवश्यक सूचनायें और हुक्म देता। केर वह राजा साहबसे भेट करने जाता । शामके वक्त घर आता! माकर कुछ समय अपनी भतीजीसे गप-शप करनेमें बिताता । कोई 7 बजे अपने जेठे भाईके साथ भोजन करता । उसके बाद अपने अध्ययन-भवन ( Studying room ) में चला जाता । एक सिग- ट पीकर कुछ देर आराम करता और फिर सरकारी कागज-पत्र देखनेमें लग जाता। कोई १२ बजे रात तक काम करके सो जाता। कभी कहीं भोजन या नाटक इत्यादि मनोरञ्जनके काममें लग जाता, तो रात्रिका कार्य-क्रम भङ्ग हो जाता । परन्तु वाकीके सब काम यथावत् नियमानुसार हुआ करते । उनमें कभी व्यत्यय न आता। रातको १२ बजेके बाद वह सहसा कभी न जगता था। उसके इस नियमित व्यवहारके कारण उसके सब काम मुचारु रूपसे होते थे। भिन्न भिन्न दायित्व ओर महत्त्व-पूर्ण तथा कठिन कामों में भी उसके मनकी शान्ति भङ्ग न होती थी। उन्हें वह सहज ही पूरा कर लेता था । एक कामके करनेमें यदि कोई दूसरा झमेलेका काम आजाता, तो उसे भी वह उसी समय सुलझा देता | इस विद्यामें वह सिद्ध- हस्त था । इतने सब कामकाज करने पर भी महत्त्वपूर्ण पत्रव्यवहार वह स्वय करता था। भिन्न भिन्न विषयोंपर लिखे गये उसके तीन हजार- से भी ऊपर पत्र अव छपकर प्रकाशित हुए है। पाठको ! विचार कीजिए, उसके मज्जातन्तु कितने बलयान होंगे। इन पत्रोंमें उसका सुस्वभान, स्पष्ट-हृदयता, उदार-भान, (कार्यसिद्धिके लिए ) व्याकु- लता, मिलनसारी, सार्वजनिक हितकी उत्कट लालसा और तनि- पापर। PM-~-v4.4 *14 AL N - मित्त की कमी होनेयाय मनाशीन, यादि नारों पर सन् है । इन सबसे भी अधिक मास्यपूर्ण या जो प्रस्ट होना उसकतुकी शुरुना-निर्गना । मोरा-मेरो माया देशले उसके पतिकरिताहिकका समान भी सम्म कमाना। फापरके सरग रान-गाजी पर मताभिपी पुग्यमे या उस गुण विधमान था, उमति पर मेरठ ९ । १० वर्षाका अन्य परिगे इटारियन गएकी इमारत गती या मका--मो भी ऐना परिशिविरों जन कि बानोंका यार होने और अर्थका अनर्थ करने देर न लगती यो । सनारंग आज मा किाने ही गावाकांक्षी और महान पुत्य हो गये।, परन्तु उनमेने वरतीक ऐप और कार्य गुटग या नी व्यक्ति गत मात्यका या अन्य कोई मा भाग आपको कुछ न युर मिटेडागा । निरमा कारग्का समकात्रीनधार पर या मी का एकीटारका भादमी। परन्तु वह भी इन गुणमें उसकी बराबरी नहीं कर सकता। आधु- निक समयके ऐतिहासिफ महान् पुरषोंमें यह गुण हमारे देशके समर्थ रामदाममें * अलरते दिखाई देता है । योरपमें कावर अतिरिक्त यह गुण किसीमें नहीं देरा परता । इसी लिए अन्य सन महान् पुरोकी अपेक्षा कायूरफी योग्यता और महत्ता श्रेष्ठ मानी जाती है, जो सर्वथा रचित मी है। - । १०-लोम्बियरकी गुप्त-मन्त्रणा । कापूरने जो काम करना निक्षय किया या उसकी सिद्धिके लिए उसे पहले पहल किसी वलयान् राष्ट्रकी सहायता मावश्यक थी। क्योंकि * समर्थ रामदास प्रात स्मरणीय महाराज शिवाजीके गुरु थें । आपका विशेष हाल जानने के लिए 'हिन्दी दाम बोध'को देखिए।
प्लोम्बियरकी गुप्त-मन्त्रणा । १०१ आस्ट्रियाके सदृश प्रवल राष्ट्रसे जूझनेका सामर्थ्य अकेले पीडमाण्टमें नहीं था । अय इटालियन राज्योंकी ओरसे यद्यपि उसे सहायता मिल- नेकी आशा थी तथापि यह सहायता सैनिक दृष्टिसे न तो उपयुक्त ही थी और न महत्त्वपूर्ण ही । इसके सिवा जब तक आस्ट्रियाका परा- जय न हो जाय उस सहायता पर अवलम्बित रहना उचित न था । सैनिक दृष्टिसे, इस सहायताका मूल्य मामूली भीड़-भब्बरसे अधिक न था। नैतिक दृष्टि से उसकी महत्ता अपश्य बहुत अधिक थी । परन्तु , उससे लाभ उठानेके पहले आस्ट्रियाको समर-भूमिमें परास्त करना आवश्यक था । इस काममें उसे सिर्फ फ्रान्ससे ही सहायता मिलनेकी आशा थी। क्योंकि पेरिसकी परिपदके बादसे इग्लैंट और आस्ट्रियामें मेल बढ़ता जा रहा था । फ्रान्सका सम्राट्, तीसरा नेपोलियन, भी कुछ शिथिल हो गया था । परन्तु उसे तो कावूरने ज्यों त्यों करके फिरसे अपनी सहायताके लिए उत्सुक कर लिया। इतनेहीमें एक ऐसी अनिष्ट घटना होगई कि जिससे उसका दिल टूटने लगा । फेलिस आरसिनी नामक एक इटालियन देशभक्तने जनवरी १८५८ ईसवीमें नेपोलियनके सून करनेका प्रयत्न किया । नेपोलियन और आरसिनी दोनों युनाव- स्थामें साथी रह चुके थे-एक ही साथ रह और वर्त चुके थे। आर- सिनी इटलीकी एक क्रान्तिकारक गुप्त संस्थाका सभासद था । उस समय नेपोलियनको पूर्ण सहानुभूति उस मस्थाके साथ थी। यही नहीं, एक बार तो वह उसमें प्रकट रूपसे शरीक भी हुआ था। आगे दैवनश नेपोलियन फ्रासका सम्राट हो गया । तब आरसिनी आत्मरक्षाके लिए पेरिस आ बसा । यह और उसके पिछ-लाओकी इच्छा थी कि नेपोलियन इटलीको स्वतन्त्रता प्राप्त करादेनेके काममें ‘नेतृत्त्व स्वीकार करे । नेपोलियन उसमें आनाकानी कर रहा था। । । चल्कर, काबूर। १ शायद इसीसे जोशमें आकर आरसिनीने उसके वधका प्रयत्न किया होगा । अस्तु । कावूरको इन क्रान्तिकारकोंकी कार्रवाई बिलकुल पसन्द नयी । वह ऐसे कामोंसे सदा अलिप्त रहता था। तथापि इस दुर्घ- टनाके कारण उसके मनमें यह भीति उत्पन्न हो गई कि कहीं नेपोलि- यनकी सहानुभूति हमारे अभीष्टके साथ नष्ट न हो जाय । इसका यह भय कुछ अशमे सच भी निकला । कावूर बडा होशियार आदमी था। उसने पहलेहीसे आरसिनीके पड्यन्त्रसे सम्बन्ध या सहानुभूति रखने- वाले लोगोंको पीटमाण्टकी सीमामें न आने देनेका प्रबन्ध कर रक्खा या । परन्तु इससे भी नेपोलियनकी दिलजमई न हुई। इस दुर्घट- नासे नेपोलियन बाल बाल बच गया। एतदर्थ विक्टर इमैन्युअलने अपना दस्तखती अभिनन्दन पत्र देकर एक सरदारको विशेष रूपसे उसके पास भेजा । नेपोलियनने उससे शिकायत की कि कावूरने काफी प्रबन्ध नहीं किया। उसके प्रबन्धसे उसकी कमजोरी प्रकट होती है। उसने यह भी ध्वनित किया कि पीटमाण्टकी सरकारने यदि इससे तीन उपायोंकी योजना न की, तो हम आस्ट्रियासे सन्धि कर लेंगे। परन्तु इस समय विक्टर इमेन्युअलने साहस रख कर नेपोलियनको मुँह तोड़ जवाब दे दिया। उसने लिखा--"आपके विश्वासपात्र मित्रके साथ ऐसा व्यवहार करना आपको उचित नहीं, मैने आज तक किसीकी धमकीकी परवा नहीं की । मेरे राष्ट्रीय गौरवकी—जिसके लिए मुझे लोगों और भगवान के सामने उत्तर देना है-रक्षा करना मेरा धर्म है। कोई ८५० वर्षांसे पीडमाण्ट निष्कलङ्क उसकी रक्षा करता आया है। आज यदि कोई मुझे नीचा दिखानेकी चेष्टा करे तो मै उसके आगे सिर न झुकाऊँगा। इतना होते हुए भी मेरी इच्छा है कि मैं आपका सच्चा मिन बना रहूँ।" पहले ही कह चुके हैं कि नेपोलियन होम्बियरकी गुप्त-मन्त्रणा । १०३ मनोविकारवश मनुष्य या । अतएव इस उत्तरका प्रमाग उस पर ग्वामा हुआ। उसने विक्टर इमेन्युअलको नरमीका एक पत्र भेज दिया । इधर आरसिनीने कैदखानेसे नेपोलियनके नाम एक अत्यन्त हृदय- द्रावक और चित्तवृत्तियोंको उद्दीप्त करनेवाला पत्र लिखा । उसमे उसने इटालीको स्वातत्र्य प्राप्त करानेमें सहायता देनेके लिए बड़े आर्त स्वरमें उससे विनती की थी। उसका भी अभीट प्रभार उसके मन पर पड़ा। इससे इटालियन कार्यके साथ उसकी सहानुभूति फिरसे जागृत हो गई। आरसिनीको अपने अपराधमें मृत्युदण्ड मिला। इसके एक दो महीने बाद नेपोलियनने उसका यह अन्तिम पत्र प्रका- शित करनेकी आज्ञा दे दी । अस्तु । अव नेपोलियन इस बातका विचार करने लगा कि कावूरको किस बातमें किस तरह सहायता हूँ। इस तरह उसकी सहानुभूतिसे कापूरके मार्गको एक रुकावट तो दूर हो गई । परन्तु अभी उसे एक और बाधासे पार पाना था। पीडमा- ण्टके पुरोगामी पक्षके अधिकाश लोगोका खयाल नेपोलियनके विषयमे बुरा था। उससे मेल करके उसकी सहायता प्राप्त करनेका विचार उन्हें अभिमत न था । उन्हें डर था कि कहीं ऐसा न हो कि आगे- पीछे यह इटली पर अपनी प्रभुता कर बैठे-अपना आतङ्क जमा ले । स्वय कापूरको भी यह शङ्का थी । परन्तु उस समय उसे सकार्यकी सिद्धिके लिए उससे मैत्री किये बिना दूसरी गति ही न थी। तथापि कानूरको यह विश्वास था कि नेपोलियन यदि ऊपरा-चढ़ी करनेका जोड- तोड लगावेगा तो इग्लैडसे मन्त्रणा करके पलड़ा समतोल रख लेंगे। परन्तु प्रकाश्य रूपसे यह प्रकट कर देना प्रयोजनीय न था। अतएव इस तजनान- राजन् ! मेरे देशको स्वतन्त्रता प्राप्त करा दीजिए। आपको दाई करोड़ इटालियनोंकी आशीष मिलेगी!" उसके ये शब्द विशेप ममपूर्ण थे ।
१०४ कावूर। का जिक्र करना असम्भव था । तथापि परिस्थितिका उद्घाटन करके पार्लियामेण्टको यह निश्चय करा देनेमें उसने कोई बात उठा न रक्खी -कि इस स्थितिमें फ्रेञ्च राष्ट्रसे सहायता प्राप्त करना आवश्यक है। उसने कहा-~-अपनेसे भिन्न हित-सम्बन्ध ( Interest ) रखनेवाले दूसरे राष्ट्रको क्षुब्ध न करके प्रागतिक नीतिका अवलम्बन करनेकी जो सदिच्छा हमारे भूतपूर्व राजा साहबकी थी, उसका पालन करना अब असम्भव होगया है | xxxxxxx x x अब यह छिपानेमे कुछ सार नहीं कि परिस्थिति अब बिकट और भयङ्कर हो गई है । सरकार और राष्ट्र दोनोको इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए । जिस राष्ट्रका मैं उल्लेख कर रहा है उसके सामर्थ्यसे अपने सामर्थ्यकी तुलना कीजिए। तब, सज्जनो, आप जान जायेंगे कि हमारी स्थिति सचमुच खतरेमें है। x x x x इस समय हमारे सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न यही है कि यह अशुभ, यह गतरा, किस प्रकार नष्ट हो, अथवा हम किस प्रकार उसका सामना करें ? इस प्रश्नको अच्छी तरह हल करनेके लिए हमने उन पश्चिमी राष्ट्रोंसे मित्रता करनेका प्रयत्न किया है जिनके हितसम्बन्ध हमारे हित- मम्बन्धोंमे भिन्न नहीं हैं । xxx x x x राज-काजके प्रश्न यपि सामान्यतः राजनीतिज्ञोंके द्वारा कानून, बुद्धिवाद, अर्थात् तर्कना और टेखन-चातुर्यकी सहायतासे हल किये जाते है, तथापि उनका अन्तिम निर्णय विभिन्न राष्ट्रोंके सैनिक बल पर ही अवलम्बित रहता है। और अदृष्ट ऐसे न्याय्य पक्ष-सत्पक्ष-के ही सदा अनुकूल नहीं रहता। परन्तु जिसका सैनिक सामर्थ्य अधिक होगा उसके अनु- कूल अदएका होना निशेष सम्मननीय है । अतएव सङ्कटके समय जब युद्ध-भूमि पर खड़ा होने के लिए यथेष्ट सैनिक बल किसी राष्ट्रमें न हो 1 लोम्बियरकी गुप्त-मन्त्रणा । तो उसे अपने मित्रोंकी सेना अपनी सहायताके लिए काममें लानी चाहिए-इसके सिवा दूसरा उपाय नहीं ।" इस आशयका भाषण उसने अपरेल १८५८ ईसवी में किया था । इसके कोई डेढ महीने बाद नेपोलियनका वैद्य, डाक्टर कान्यू (इसका परिचय पहले ही कराया जा चुका है ) नेपोलियनका गुप्त सन्देश लेकर यात्राके निमित्तसे टयूरिनमें आया । उसने कापूर और निक्टर इमेन्युअलसे गुप्त रूपसे मुलाकात की ओर नेपोलियनका गुप्त सन्देश उन्हें सुनाया । निश्चय हुआ कि शीघ्र ही कावूर किसी न किसी बहाने शेम्बियर्सको जाकर नेपोलियनसे जो वहाँ सैर करनेके लिए गया था, भेट करे । ठहरायके अनुसार कापूर विलकुल गुप्त रूपसे यात्रा करता हुआ २० जुलाई, १८५८ ईसनीको होम्बियर्स जा पहुँचा ! दूसरे दिन सवेरे उसने नेपोलियनसे भेट की । शिष्टाचार- की बातें हो जाने पर नेपोलियनने कापूरसे कहा कि आस्ट्रियासे यदि पीटमाण्टकी लड़ाई छिडी तो मै निश्चय-पूर्वक पीडमाण्टकी सहायता करूंगा । पर शर्त यह है कि युद्धका आरम्भ आस्ट्रियाकी ओरसे होना चाहिए और युद्धका अवसर ऐसा होना चाहिए, जिसका योरोपियन राष्ट्र अनुमोदन करें। यह न मालूम होना चाहिए कि युद्ध कान्ति- कारक पक्षकी इष्टसिद्धिके लिए जान बूझकर छेड़ा गया है । ये शत तय होजानेके बाद दोनोंमें इस बातकी चर्चा होती रही कि शर्तोंका पालन किस प्रकार किया जाय । विचार करते करते वे इस नतीजे पर पहुंचे कि युद्धके अभीष्ट कारणके लिए आवश्यक परिस्थिति मो.ना-राज्यमें विद्यमान है । मोडेना और पार्मा ये छोटेसे जागीरी राज्य थे । वे पीडमाण्टकी पूर्वसीमासे लगे हुए थे। उन राज्योंकी मासा और कैरेराकी प्रजा स्थानीय डयूकके जुल्मी शासनसे अ यन्त दुखी थी । अतएव कावूरने यह सोचा कि नहीकी प्रजासे निक्टर १०६ कावूर। इमेन्युअलसे सहायता मंगवाई जाय | तब विक्टर इमेन्युअल उनका पक्ष लेकर मोडेनाके ड्यूफको एक कटा पत्र लिखे । बस काम हो जायगा । क्योंकि निश्चय सा था कि आस्ट्रियाकी गय होनेके कारण वहाँका ड्यूक उस पत्रका उत्तर उद्धतता-पूर्वक देगा। तब विक्टर इमेन्युअल मासा शहरको अपने अधीन कर ले । इसपर आस्ट्रिया आप ही युद्धके लिए तैयार होगा। परन्तु इस प्रकार युद्ध आरम्भ हो जाने पर नेपल्स और रोमके सत्ताधारियोंपर इसका अनिष्ट प्रभाव पड़ेगा। इसका क्या प्रवन्ध किया जाय, यह समस्या उत्पन्न हुई। क्योंकि एकके साथ जारकी और दूसरेके साथ फ्रान्सके केथोलिक लोगोंकी सहानुभूति थी। अतएव नेपोलियन उनसे कटुता या मनोमालिन्य पैदा करनेको तैयार न था। परन्तु कापूरने इस जटिल प्रश्नको हल कर दिया । उसने कहा- " इटलीसे आस्ट्रिया किस तरह निकाल दिया जाय, यह तय हो जाने- पर वाकी सब बातें आप ही आप तय हो जायेगी। १८४९ ईसवीसे रोममें जो फ्रेञ्चसेना रक्खी गई है उसकी सहायतासे सम्राट् पोपके देशों में शान्ति रख सकेंगे। सिर्फ आस्ट्रियाके अविकृत रोमाग्ना तह- सील्के लोगोंको गदर करनेका मौका आप दे दीजिए । नेपल्सके विपयमें मौनावलम्बके सिवा आपको कुछ भी करनेकी आवश्यकता नहीं । वहाँकी प्रजा परिस्थितिका उचित उपयोग करनेमें समर्थ है।" कावूरकी यह राय सम्राटको पट गई । फिर उस युद्धके स्वरूप और कार्यके विषयमें बातचीत छिडी । आस्ट्रियाको इटलीसे निकाल देनेसी -- बात नेपोलियनने स्वीकार की । निश्चय हुआ कि इसके बाद रोमाना -सहित इटलीके उत्तरी * प्रदेशका एक ही स्वतन्त्र राज्य चिक्टर इमे. * यह तय हुआ था कि " किंगडम भाव अपर इटला यर नाम इसका रक्या जाय और इसमें पीडमाण्ट, जिनोआ, मोडेना, पामी, रोमामा, लाम्बडौं- -वेनिशिया मास आव अनेकानो इतने राज्योंका समावेश किया जाय । 1 " लोम्बियरकी गुप्त-मन्त्रणा। १०७ - न्युअल स्थापन करे और सेनाय तहसील फ्रान्सको द दी जाय । नेपो- लियनकी इच्छा थी कि नीस-शहर भी फ्रान्समें मिलाया जाय । परन्तु कावूरने उसे समझा दिया कि यह काम इटालियन राष्ट्रीयताका निघातक होगा। तन उसने उस समयके लिए यह आग्रह छोड दिया। इसके उपरान्त युद्धके साधनोंका विचार होने लगा । नेपोलियनने कहा-यह प्रबन्ध होना आवश्यक है कि इस युद्ध में आस्ट्रियाको किसी भी राष्ट्रसे सहायता न मिल्ने पारे । रूस, इग्लैंड, और प्रशियाकी तटस्थताका मुझे पूर्ण विश्वास है, तथापि आस्ट्रियाके पास सैनिक बल बहुत है और वह छह भी खूब है। प्रत्यक्ष विएनापर वाना किये बिना इटली परसे आस्ट्रियाका प्रभुत्व नष्ट करना कठिन है । अतएव इस युद्धके लिए कमसे कम तीन लाख सैन्य तैयार करना चाहिए । इसमेंसे दो लाख तो मै दे दूंगा, बाकी एक लाख सेना इटालियन लोगोंकी तैयार होनी चाहिए । ११ बजे दोपहरसे लेकर तीसरे पहर ३ बजे तक यही सलाह-मशवरा होता रहा । तीन बजे बाद कावूरको छुट्टी मिली । पर चार बजे फिर उसे नेपोलियनने घूमनेके निमित्तसे बुलाया। निश्चयके अनुसार चार बजे कापूर और नेपोलियन एक सुन्दर फिटनमें बैठकर घूमनेके लिए निकले । इस समय सारयिका काम स्त्रय नेपोलियन कर रहा था। साथमें सिर्फ खिदमतगार था। होम्बि- यससे बाहर होते ही नेपोलियनने अपने भतीजे, प्रिस जेरोम नेपो- लियन, का विवाह विक्टर इमेन्युअलफी कन्या ( उसका नाम था साटिल्डी) से करा देनेकी वात कावूरसे छेड़ी। परन्तु प्रिन्स नेपो- लियनका कुल-शील शिक्टर इमेन्युअलके कुल-शीलसे हलका या । अतएव उसे अपनी कन्या देनेकी वात विक्टर इभेन्युअलको कहाँ तक .
०८ कार। " - नॅचेगी, इसका ठीक अनुमान काबूर न कर सका । उसने सम्राटको कोई निश्चयात्मक उत्तर नही दिया । उस बातचीतमे कावूर इतना नान गया कि नेपोलियन इस विषय पर बड़ा जोर दे रहा है। यदि इसकी बात न मानी जायगी तो अपनी अभीष्ट----भाषी राजकाजकी- सद्धिमें वावा पड़नेकी सम्भावना है। अतएव उसने अपने स्वामी विक्टर इमेन्युअलको इस पर राजी कर लेनेका निश्चय किया । वह कोई दो देन प्लोम्बियर्समें रहा । फिर वहाँसे जर्मनीको गया। यहाँ उसे कितने ही राजों, राजनीतिज्ञों, तथा प्रसङ्गवश आये हुए रशियन प्रतिनिधि अर्थात् वकीलसे बातचीत करने का अवसर मिला । इससे उसे निश्चय होगया कि भावी युद्धमें इन दोनों राष्ट्रोंकी ओरसे आस्ट्रियाको जरा भी सहायता मिलनेकी आशङ्का नहीं । तव जर्मनीसे ही उसने चिक्टर इमेन्युअलको एक हृदय-द्रावक पत्र लिखकर उसकी कन्या प्रिन्स नेपोलियनको दे देनेके लिए प्रार्थना की । उसने लिखा--"इटालि- यन राष्ट्रके भागी कल्याणके लिए यह अत्यन्त दु सह स्वार्थत्याग करना आवश्यक है । इसके बिना सम्राट् नेपोलियनको सन्तोप न होगा और उसके सन्तुष्ट हुए बिना उसकी सहायताके बल पर रचा गया अपना यह राजकीय व्यूह सफल न हो सकेगा।" उसने विक्टर इमेन्युअलकी चार कन्याओंके उदाहरण देकर यह भी दिखलाया कि "राजकन्या- ओंके विवाह चाहे कितनी ही सावधानी और दक्षतासे किये जायें, उन्हें वे हमेशा मुसकर ही होंगे, इसका निश्चय नहीं ।" इसके अति- रिक्त उसने ला मार्मोराको भी एक पत्र लिखा कि मैंने विक्टर इमेन्यु- अलको यह यह लिखा है। यदि आपसे वे राय लें तो आप कृपा करके ऐसी चेष्टा कीजिएगा कि जिसमे वे मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लें ।"* * इस विषयमावूरकी मन स्थिति कितनी विचित्र होगइ थी वह कितना धवड़ा गया था यह-बात उसके इस पत्राशसे ज्ञात होगी-- प्लोस्चियरकी गुप्त मन्त्रणा। १०९ कानूरकी यह बात विक्टर इमेन्युअलको पसन्द आना कभी सम्भव न था। उसके सामने यह पडी समस्या उपस्थित हो गई। परन्तु वैयक्तिक विचार और हिताहितकी अपेक्षा राष्ट्रीय विचार और राष्ट्रके हितकी ओर विशेष ध्यान रखनेके लिए आवश्यक मनोधैर्य और मानसिक सामर्थ्य उसमें था। अतएव नात्सल्यके कारण होनेवाली हृदयकी व्याकुलताको ताकमें रख कर उसने, कुछ समयके वाद, यह बात स्वीकार कर ली। अस्तु । कारवू शीघ्र ही जर्मनीसे स्वदेश लोट आया । तरसे आस्ट्रियाके साथ युद्ध छिड़नेके दिन तक उमका शासन-काल • बड़े महत्वका है। इस समयमें कापूरका मन तरह तरहके विचारों और चिन्ताओंसे अत्यन्त व्याप्त हो गया था । उसके इस महत्कार्यकी सिद्धि इस भागी युद्धके फलाफल पर ही सर्वथा अवलम्बित थी। अतएव उसने निश्चय कर लिया कि युद्धका परिणाम अपने अनुकूल निकालनेके लिए जितने उपाय आवश्यक देख पडेंगे उनका अवलम्बन करनेसे मै न चूकूँगा । नेपोलियनने यद्यपि उसे बड़ी भारी सैनिक सहायता देनेका वादा किया था तथापि इतने " सम्नारसे मैनी करना और साथ ही, उमी समय, उसरा ऐसा अपमान करना जिसे वह भूल न सके, बड़ी भारी गलनी होगी। मैंने राजा साहयको पत्र लिख कर पातर भावसे प्राथना की है कि-'साहस-सूरक यह वर्तमान उत्कृष्ट अवसर कुलीनतामी कल्पनाके पेरमें पड़कर आप न सो- दीजिएगा।' राजा साहय जर आपसे राय ले, मेरी आपसे प्राथना है, कि आप मेरे पथनकी पुष्टि करें। इसी बात पर अपने राजाके मुकुट और हम लोगोंकी भवितव्यताका फेसला होनेवाला है । अतएव या तो आप इस कामम हाथ ही न डालें, या डालें तो फिर इसमें विजय प्राप्त करने के लिए जो जो बाते सहायक होनेवाली हों उनकी अवहेलना आप न करनी चाहिए-उनके करनेमें आपसे उपेक्षा न दिखानी चाहिए।" -- काबूर। . पर उसकी दिलजमई न हुई। क्योंकि एक तो नेपोलियन 'चञ्चलचित्त था, उस पर सर्वथा ही अवलम्बित रहना जोखोंका काम था। दूसरे इटलीके सभी काम यदि उसकी सहायतासे पूरे हुए तो आस्ट्रियाकी तरह इटली-पर उसकी नीयत बिगड जानेका टर उसे दिखाई देता था। अतएव उसने यह निश्चय किया कि पीडमाण्टकी सेनाकी सहायता- के लिए इटलीके देशभक्त स्वय-सैनिकोंकी भी सहायता ली जाय । यह सहायता गेरीवाल्डीकी ओरसे मिल सकती थी । अतएव कावूरने उसे तुरन्त चुलाया और कहा कि आप सब तरहसे तैयार रहिए। आज तक गेरीबाल्डीका जीवन इटलीके क्रान्तिकारक दलकी सहायतामें बीता था । अतएव जब कावूरने उससे यह प्रकट सम्बन्ध किया तब तो पीडमाण्ट तथा अन्य प्रान्तोंके वैव-आन्दोलनकारियोंने तीन आपत्ति की । परन्तु कापूरने उस पर कुछ भी ध्यान न दिया । सच पूछिए तो अब उसके पास जबानी-जमाखर्चके लिए वक्त ही न था । जिन जिन उपायोंसे उसने अपने कामकी बुनियाद मजबूत होती देखी, उन्हीं कामाको वह करता गया। इसके लिए उसने पार्लियामेण्टकी मजूरी की भी राह न देखी । इस समय वह सब काम अपनी ही मरजीसे कर रहा था । पर उसे विक्टर इमे- न्युअलका पूरा जोर था। आस्ट्रियासे युद्ध करनेकी इच्छा विक्टर इमेन्युअलको कावूरसे भी अधिक तीव्र थी। कभी कभी तो राजकीय- नीति ( Diplomacy ) की रक्षाके लिए कापूरको राजाकी यह उत्सुकता मर्यादित करना पड़ती थी। उसे एक और भी मार्केकी बात इस समय साधना थी। इसके लिए उसे अपना दिमाग बहुत कुछ छीलना पड़ता था । वह बात थी आस्ट्रियाको युद्धमें प्रवृत्त किस तरह करना चाहिए। आस्ट्रिया उद्धतता-पूर्वक यदि पीडमाण्टसे होम्बियरकी गुप्त मन्त्रणा । -- युद्ध छेडे तभी नेपोलियन तथा अन्यान्य राष्ट्रोंकी सहायता मिल सक- ती थी । परन्तु आस्ट्रिया इसके लिए न तो तैयार ही था और न तैयार होनेकी सम्भावना ही देख पडती थी । इधर कापूर, अपनी चतुरता और कौशलके बल पर, उसे प्रवृत्त होने पर बाध्य करनेकी चेष्टा कर रहा था। परन्तु तत्कालीन किसी भी राजनीतिज्ञको यह विश्वास न था कि कावूर इसमें सफल हो सकेगा। प्रसिद्ध अंगरेज राजनी- तिज्ञ मिस्टर ओडोरसेल इस समय टयूरिनमें आया था। उसकी जत्र कावूरसे इस विषय पर बातचीत हुई, तब उसने काबूरसे कहा कि “आप कुछ भी कीजिए, आस्ट्यिा युद्धके लिए तैयार न होगा ।" इस पर कावूरने कहा परन्तु मै उसे युद्धमें प्रवृत्त होने पर मजबूर कर दूंगा। कावूरके इस साहस-पूर्ण उत्तर पर रसेलको विश्वास न हुआ। उसे कावृरकी यह वात असम्भन जान पड़ी। अतएस कावूरका उपहास करनेकी इच्छासे उसने पूछा आप यह कब तक कर दिखाइएगा। कावूरने शान्ति-पूर्वक उत्तर दिया "मईके पहले सप्ताकै इधर- उधर तक | " रसेलने आजकी बातचीत अपने रोजनामचेमें दर्ज कर ली, पर जब उसने यह सुना कि आस्ट्रियाने इस अवधिके पहले ही युद्धकी घोषणा कर दी, तब तो उसके तथा अन्य राजनीतिज्ञोंक भी आश्चर्यकी सीमा न रही । तर उन्होंने कावृरकी राजनीति-पटुताकी सूब तारीफ की । कितनोहीके मुंहसे तो निकल पड़ा-" इसीको कहते हैं राजनीति-पटुता ! " कावूरके इस परिश्रम और उद्योगको देखकर उससे कितने ही विषयोंमें मत-भेद रखनेनाठा, भूतपूर्व प्रधान मन्त्री, मासिमो डी आजेग्लिओ, भी उससे बड़ा ही सुश हुआ। उसने कावूरको एक प्रोत्साहन-पूर्ण पन टिखा-" आपकी नीति कैसी है, इसको चर्चा करनेकी अब आवश्यकता नहीं रह गई । अन तो .
कावूर। - इसी बातका विचार होना अभीष्ट है कि आपका स्वीकृत कार्य सिद्ध किस तरह हो ।"* मसिमो डी आजेग्लिओका यह पत्र पाकर कावर बहुत सन्तुष्ट हुआ। जो महान् विचारवान् प्रभावशाली, मनुष्य किसी समय अपना प्रतिस्पर्धी रहा हो उसके विचार ऐसे ऐन मौके पर अपने पक्षमें देख कर किस मनुष्यको आनन्द प्राप्त न होगा । कौन अपनेको धन्य धन्य न कह उठेगा ? उस समय जो कुछ जोड- तोड लगाये जारहे थे वे इतनी होशियारीसे और इतने छिपे तौर पर हो रहे थे कि साधारण आदमीको उनकी जरा मी खबर न होती थी। परन्तु लोगोंका विश्वास कावूर पर खूब बैठ गया था, यहाँ तक कि वे उसके चेहरेको देखकर ही परिस्थितिका अनुमान करके सन्तुष्ट हो जाते थे । उसके मुंहसे स्पष्टीकरण तककी आवश्यकता वे न समझते, थे । इस सम्बन्धमें एक मजेदार आख्यायिका है। इन्ही गडबडीके दिनोंमें एक बार ट्यूरिनमें रहनेवाले रूमी वकीलकी स्त्री एक दुकान पर सौदा लेने गई । दुकानदार उसके हाथमें माल देते ही देते रास्तेकी ओर भाग खडा हुआ और थोड़ी देरमे लौट आया । उस स्त्रीने इसका कारण पूछा । उसने कहा-“काउंट कापूर अभी इसी रास्तेसे गये है। मैं अपने देशकी वर्तमान स्थितिको जाननेके लिए उनका चेहरा देखने गया था। उनकी मुद्रा प्रफुल्लित और मतेज थी। इससे जान पड़ता है, सब कहीं ठीक ठीक है । " देशके जिम कार्य- * कावूरको कार्यक्षमताके विषय में शत्रु-पक्षके, अयीत् आस्ट्रियन, राज- नीतिज्ञ वृद्ध मेटर्निचने भी ( इसने पहले नेपोलियन तकको छकामा था ) आदर प्रस्ट स्यिा है। उसने एक बार कहा-- There is only one diplomatist left in Europe, and he unfotrunately, is against us, I mean count Cavour" Chour s life by Pietr oarsi p 246 ।
आस्ट्रियासे युद्ध। क्षम मनुष्य पर जनताका इतना विश्वास हो, वह किस काममें सफल नहीं हो सकता ' निजकी कार्य-क्षमता, और लोगोंका विश्वास तथा प्रेम, इन दिव्य साधनोंकी सहायतासे ही कावूरने दो ही तीन वर्षां- में यह बात सम्भर करके दिखा दी जिसे टोग कहते थे कि इस पीढीमें तो यह असम्भव है । वह कौनसी बात है, इसका हाल आगे देखिए । ११-आस्ट्रियासे युद्ध । ( सन् १८५९ ईसवी।) काउँटेस मार्टिनेंगोने आस्ट्रियन युद्धके पहले कावूरके शासन-कालके सम्बन्धमें लिखते हुए कहा है कि यह समय मानों कावूरको कर्तव्य- क्षमताकी कसौटी ही था। कावूर उस पर कस भी गया और पूरा भी उतरा । परन्तु प्राण-पणसे परिश्रम करनेके कारण उसे, खेद है, असमय ही मृत्युका शिकार हो जाना पड़ा । अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिए उसने भरसक दावपेच खेले । नेपोलियनके साथ होम्बियर्समें उसने जो मन्त्रणा की वह बिल्कुल गुप्त थी । नेपोलियनके पर-राष्ट्र- सचिनको भी उसका हाल मालूम न था-आर नेपोलियन या चञ्चल- चित्त । अतएव कावृरने पहले नपाोलयनके वचनको लेखबद्ध करानेकी चेष्टा की। थोड़े ही दिनोंमें नया वर्ष आरम्भ होनेवाला था। उसके पूर्व ही प्रिन्स नेपोलियनका वियाह दिक्टर इमेन्युअलकी पुत्रीसे होना निश्चित हुआ था। इसके लिए कानूरको ट्यूरिन आना था। यह मौका अच्छा देखकर कापूरने अपना काम बना लिया । सन्धिपत्र विरकुल गुप्त रखा गया । तथापि मेजिनी तथा योरपके अन्य राजनीतिनेत्ताओंमें यह कावूर। । अफवाह फैल गई कि कापूर और नेपोलियनमें कुछ न कुछ गुप्त सन्धि हो गई है। प्रत्येक मनुष्य अपने अपने विचारके अनुसार सन्धिकी शर्तों पर तर्क-वितर्क करने लगा। परन्तु अन्त तक सच्ची स्थितिका पता किसीको न लगा । पूर्वोल्लिखित राष्ट्रीय सभाके द्वारा इटली के प्रान्तोंमें आस्ट्रियाके विरुद्ध जो जोरका आन्दोलन हो रहा था उसने खूव ही वल पकड़ा। पीटमाण्टमें तो जिधर देखिए उधर युद्ध ही युद्ध- की तैयारी हो रही थी। और किसी काममें इतना विशेष रूपसे ध्यान न दिया जाता था। नवीन वर्षके आरम्भमें पीडमाण्टकी पालि- यामेण्टमें राजाने एक भापण किया । * उससे यह स्पष्ट जाना जाता * इस भाषणका मसविदा कावूरने तैयार किया था । उसने जय अपने अन्य सहकारियों-परामर्शदाताओं-मन्त्रियोंको वह दिसलाया तब उन्होंने कहा कि भाई, इसमें तो बडे जोशकी बातें हैं। फिर कावूरने उसे नेपोलियन के पास परिस भेजा। उसने उसमें कुछ सुधार किया। परन्तु कुछ वाक्य तो उसने मूलकी अपेक्षा भी अधिक जोरदार जोड दिये । उसका पसन्द किया हुआ मसविदा यह है- हमारा गतकालीन अनुभव उत्साह पद्धक है। अतएव भारी प्रसनोंका --आपत्तियोंका-सामना धैर्यपूर्वक करनेको हम तैयार हैं। हमारा भविष्य आनन्दमय होगा। क्योंकि हमने न्याय, स्वातन्त्र्य-प्रेम, देश-प्रेम, की नींव पर अपनी नीति निश्चित की है । हमारा देश बहुत लम्बा-चौड़ा नहीं । यह छोटा है, तथापि उसका महत्त्व कम नहीं । उसने योरपके राज-दरवारों में सम्मान प्राप्त किया है । इसका कारण है। वह समयकी आवश्यकताके अनुकूल तत्त्वोंका हिमायती है । उमकी इस नीतिके साथ बड़े बड़े राष्ट्रोंकी सहानुभूति मी है । इसीसे उसका महत्त्व पट गया है । पर, यह न समझिए कि यह स्थिति सङ्कट-रहित है। क्योंकि हमारे सन्धिके लिए तैयार रहने पर भी इटली के कितने ही भागोंसे जो दुसभरी आवाजें हमारे कानोंमें गूंज रही हे उनका प्रभाव हमारे हृदय पर हुए विना न रहेगा । हम एफ-मतके कायल है। हमारा कार्य न्याय्य है। इस पर विश्वास रख कर दूरदर्शिता और निश्चयपूर्वक जैसी ईश्वरी प्रेरणा होगी उसके अनुसार काम करने के लिए म सानन्द तैयार है।" ।
मास्दियासे युद्ध । था कि इटली युद्धके लिए कितना उत्सुक या । इसी प्रकार पेरिसमें नूतन वर्यारम्भके उपलक्ष्यमें हुए दरवारमें नेपोलियनने आस्ट्रियन कीटको सम्बोपन करके कहा--"आपकी सरकारके और हमारे सम्बध सन्तोपकारक नहीं। तथापि आपके राजा साहबका आदर मेरे मनमें कम नहीं हुआ है।" नेपोलियनका यह भाषण सुनकर आस्ट्रियन तथा अन्य योरोपियन राष्ट्रोंके राज-नीतिज्ञोंके मन साशा हो गये । इतनेहीमें ३० जनवरी १८५८ ईसवीको प्रिन्न नेपोलियनका विवाह विक्टर इमेन्युभलकी कन्यासे हुआ । इस घटना- मे तो आस्ट्रिया मानों युद्धके स्वप्न ही देखने लगा। उसने अपने अधिकृत राम्बडी-प्रान्तमें अधिक सेना भेज दी-इस खयालसे कि मोका पड़ने पर उससे मदद मिले । यह सेना उसने पीडमाण्टकी सरहद पर रक्खी । आस्ट्रियाका यह ढंग देखते ही कारने अपना कदम और भी आगे बढ़ा दिया । उसने, विशेष-खर्चके नाममे, ५ करोड लायर्स की * मंजूरी पार्लियामेण्टसे मोगी। पार्लियामेण्टने भी तत्काल मजूरी दे दी। शहरके नेताओंने भी खानगी तौरपर सहायता करनेका अभिरचन कापूरको दिया । यह रकम ऋणके स्वरूपमें ली जानेवाली थी। लोग घटाघड थेलियाँ साली करने लगे । इससे यह सूचित होता है कि कारका कार्यक्रम लोगोको कितना पसन्द था और उसपर उनका कितना अधिक विश्वास या । इस प्रकार द्रव्यका प्रवन्ध हो चुकने पर कानूरने मेरीनाल्डोको बुलाकर कहा कि आप अपने स्वयसैनिझोंका दल तैयार कीजिए । यह उसने इस उद्देशसे किया कि भानी युद्धको राष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त हो जाय । इसके लिए उसने और भी काम किये । उसने पूर्व-कथित राष्ट्रीय सभाके द्वारा इटलीके * १ लायरस अथवा आने-उस समय कोई छ आने ।
कावूर। भिन्न भिन्न प्रान्तोंसे स्वयसैनिक प्राप्त करनेका प्रयत्न गुप्त रूपसे जारी किया। उसमें वह सफल भी हुआ । प्राय समस्त राज्योंसे स्वय- सनिकोके झुण्डके झुण्ड पीडमाण्डमें एकत्र होने लगे। पर पीडमाण्टके सेनिक और माली अधिकारी नहीं चाहते थे कि इन स्वयसैनिकोंसे सहायता ली जाय । अतएंव उन्होंने तत्सम्बन्धी कुछ कानूनी बाधायें कापूरके सामने पेश की । परन्तु कावूरने उनकी परवा न की। यही नहीं, बल्कि स्वय-सैनिकोंकी सेना तैयार करनेका काम उसने अपने ही हाथोंमे ले लिया। अतएव अन्य अधिकारियोंको उसकी प्रवृत्तिकै अनुसार काम करने पर-व्यवहार करने पर-बाध्य होना पड़ा । नेपो- लियनने भी पहले अपने गुप्त वचन-पत्रमें यह शर्त की थी कि अन्य प्रान्तोंके स्वय सैनिकोंसे युद्धमे काम न लिया जाय । परन्तु पीछे कावूरने जोर देकर वह शर्त रद्द करा ली । स्वयसैनिकों की सहायता लेनेके लिए इतना जोर देने में उसका अभिप्राय था। वह यह कि विजय प्राप्त होने पर नेपोलियनको यह डीगें हॉकनेका अवसर न मिले कि केवल हमारी' ही सहायतासे जीत हुई । इसके सिवा दो और उद्देश भी उसके ये- (१) जितनी अधिक हो सके सेना तैयार की जाय, जिससे युद्ध में जय अवश्य प्राप्त हो और ( २) इटलीके समस्त प्रान्तोमें एकराष्ट्रीय- ताके भाव उदय हों। उसके ये उद्देश अन्नमें सफल भी हुए । इस तरह कानूर भावी युद्धको तयारी अपनी तरफसे भली भाँति कर रहा था। पर यह चिन्ता कि यह युद्ध छिड़ किस तरह जाय, उसे रात-दिन चैन न पड़ने देती थी। आस्ट्रिया आप होकर युद्धकी घोपणा करे, तभी फ्रान्सकी सहायता मिले । परन्तु क्या आस्टिया ऐसा करेगा? क्या इग्लैंट बीचमें पड़कर उसे चुप रहने पर बाध्य न करेगा। पीड- माण्टके लिए आस्ट्रियासे युद्ध करना नेपोलियनके दरवारी लोगोंको आस्ट्रियासे युद्ध। पसन्द नहीं और नेपोलियन भी स्वयं चञ्चल-चित्त मनुष्य है । अतएव कहीं ऐसा न हो कि ऐन वक्त पर वह धोखा दे बैठे ! इत्यादि शङ्का- ओंका निराकरण हुए बिना उमका मनोरथ सफल होना कटिन था । अतएव उसे इस समय पर-राष्ट्रोंकी गुप्त-मन्त्रणाओंकी- राजनैतिक चालोकी-ओर काक-दृष्टिसे घात लगाये बैठना आनिवार्य था । इग्लैंडके शासन-सूत्र इस समय लार्ड डाक हाथमें ये । वह स्थापित-सत्ता-बाढी या । अतएव इटलीको आकाक्षासे वह अधिक सहानुभूति न रखता था । उसने अपने पेरिस- स्थित वकील, लार्ट काउली, को खास तौर पर सिएन्ना भेजा और उसके द्वारा आस्ट्रियाको युद्धसे परावृत्त करनेका प्रयत्न किया नेपो- लियनको भी फोड लेनेकी कोशिश उसने की । नेपोलियन नहीं चाहता था कि इग्टैंडसे विगाड़ करे । अतएव उसने ऊपरी मनसे, इग्लैंडके मन्त्रिमण्डलकी बात स्वीकार कर ली । परन्तु इस शान्ति-पाट- पर-शान्तिकी इस चेष्टाकी सफलता पर-आस्ट्रियाको अधिक विश्वा- स न था। अतएव वह दुरङ्गी चाल चलने लगा। एक ओर वह शान्ति- स्थापनाका भी उद्योग कर रहा था और दूसरी ओर सेन्य एकत्र करनेका भी। इस अवसरसे लाभ उठाकर कावूरने भी ८ मार्चको प्रकट किया कि "आस्ट्रियाकी तैयारीकी और व्यान देकर अब हमें चुप न बैठना चाहिए।" उसने प्रकाश्यरूपसे अपने सैनिक अधिकारियोंको सेना संग्रह करनेके लिए माज्ञा दे दी। जन तक इतनी तैयारी इधर * स्वय नेलिया आस्ट्रियासे युद्ध करने को तैयार था। पर उनके दरयारके लोग -स्वय उसका पर-राय-मचिव मी इसके विरोधी थे। फ्रान्म- में रहनेवाले थोलिक सम्प्रदायके नेता भी इस विचारके प्रतिकूल थे, क्योरि परिमाण्टमी प्रभुता यद जानेसे पोपी सत्तामें पाधा पहुँचोको सम्भावना थी।
कावूर। उस समय ऐसी न यी कि इन बातोंसे उसे आनन्द या सान्वना होती। वह कुछ खिन्न और उदासीन हो रहा था। तथापि उसने अपने इच्छित कामसे हाथ न खींच लिया। एक ओर वह आस्ट्रियाको चिढा- कर उसे युद्ध में प्रवृत्त करनेके लिए उपाय कर रहा था और, दूसरी ओर, योरोपियन शान्ति-परिषदमें भी शामिल हो गया। कावूर नाराज होकर वापस लौटा, यह बात पेरिसस्थ आस्ट्रियन वकील जान गया । और उसके जानेके बाद, पेरिसमें भी इधर-उधर शान्तिकी चर्चा छिड़ने लगी। फलत उसने अपनी सरकारको यह खबर भेजी कि यहॉकी स्थिति ऐसी है । इस दशामें यदि युद्ध छिड जाय तो पडिमाण्टको फ्रान्सकी ओरसे सहायता न मिलेगी। आस्ट्रि- यन दरबारमें इस समय युद्धके अनुकूल पक्षका खूब दवदवा या । आस्ट्रियाका बादशाह फ्रान्सिस जोसेफ ( २२ नवम्बर, १९१६ ईसवीको इसकी मृत्यु हो गई ) इस समय भर जवानीमे था । अतएव वह स्वय भी पीटमाण्टके सदृश ( उसकी दृष्टिमें) तुच्छ राज्यकी हरकतोंको निर्मूल करनेके लिए तुला बैठा था। उसका परराष्ट्रीय मन्त्री, काउट फौन व्यूओल, भी उन्मत्त स्वभावका आदमी था। फिर, अनेक युक्तियों के द्वारा, कावूरने उसे भुलावा भी खूब दिया था। इन सब कारणोंसे आस्ट्रियन दरबारमें शान्तिकी चर्चाकी गुजर, अधिक दिन तक होना, सम्भावनीय न था । शान्तिपरिपदकी शर्तोकी चर्चा करनेमें कावूरने बहुत ही दिन लगा दिये । यह देखकर आस्ट्रियन सरकारको सटका हुआ। उसने अपरैल महीनेके आरम्भमें अपने इटलीस्थ सेनापतिको युद्धकी पूर्व सूचना दे दी । तदनुसार आस्ट्रियन सेनाध्यक्ष जनरल ग्युलेने युद्धार्थ तैयार रहनेका आज्ञापत्र, जो बडी जोरदार भाषामें लिखा हुआ था, अपने सैनिकोंको पढ़ आस्ट्रियासे युद्ध। सुनाया। दूसरे ही दिन पीडमाण्टके समाचार-पनोंने वह आज्ञा पन अक्षरश. प्रकाशित कर दिया और लिखा कि आस्टियाने ही पहले युद्धका आरम्भ किया, इस बातका यह प्रत्यक्ष प्रमाण है । यह सनर पाते ही विक्टर इमेन्युअलके सिरसे पैर तक आग टग गई। उसने तुरन्त वह मजमून प्रिन्स नेपोलियनको पेरिम भेजा । इधर कापूरको भी उसने एक पत्र लिखा कि मेरी इच्छा है कि लड़ाईकी पहली तोप आज रातहीको दाग दी जायें। इस घटनाके होते ही अन्य योरोपियन राष्ट्र और भी जोरशोरसे शान्ति स्थापन करनेका प्रयत्न करने लगे। इग्लैंडने यह उपसूचना पेश की कि पूर्वोक्त परिपदमें इटलीके समस्त राज्यों के प्रतिनिधि बुलाये जाँय और परिपद होनेके पहले तक आस्ट्रि- या और पीडमाण्ट दोनों अपनी सैनिक तैयारी बन्द रक्खें। इग्लैंडके आग्रहसे फ्रान्सको यह सूचना स्वीकार करनी पड़ी। तब १८ अपरेल- को टयूरिनमें रहनेवाले फ्रेञ्च वकीलको इस आशयका तार दिया गया । उसीमें यह भी लिख दिया कि पीडमाण्टकी सैनिक हलचल बन्द. करनेके विषयमें कावूरकी राय शीघ्र भेजो–उसको सहमत करके शीघ्र इत्तला दो । तार मिलने ही फ्रेञ्च वकीलने उसे अपने सेक्रेटरीके हाथ कापूरको भेजा । कानुर उस समय सो रहा था । परन्तु सेक्रेटरीके आगमनकी खबर पाते ही उसने उसे भीतर बुलाया । सेक्रेटरीने उसे तार दिया । निछौने पर ही कावूरने उसे पहा। पढ़ने भरकी देर थी कि तत्क्षण उसका चेहरा लाल और चित्त उद्विग्न हो मया। उसे लगा, मानो फ्रान्सने हमें ऐन वक्त पर दगा दे दिया और उसके विश्वास पर मेरे हाथों अपने देशका सत्यानाश हो जायगा । सेक्रेटरीके चले जाने के बाद शोकानेगमें उसने यहाँ तक कह डाला कि " कपाल-मोक्ष कर लेने---सिर पीट लेने के सिवा दूसरी गति नहीं ।"
૨૨૨ कार।। उस रात उसे पल भर नींद न आई । सबेरे तक वह तड़पता और विछौने पर करवटें बदलता रहा । दूसरे दिन सवेरे ही फ्रेञ्च वकील स्वयं उससे मिलने आया। तब कावूरने अधिक बातचीत न करके इस आशयका खलीता उसे लिख दिया- - जब कि फ्रान्स और इंग्लैंड मिलकर यह चेष्टा करते हैं कि युद्धका अवसर न उपस्थित हो और इसकी सिद्धिके लिए पीडमाण्ट लोगोंसे शस्त्रास्त्र छीन ले तब, यद्यपि राजाके मन्त्रि-मण्डलको यह देख पडता है कि यह शर्त इटलीकी अन्त स्थ शान्तिके लिए अत्यन्त हानि- कारक होगी तथापि वे उसे स्वीकार करनेके लिए तैयार है।" इन शब्दोंको लिखते समय कावूरका कलेजा टूक टूक हो रहा था । क्यों कि, उसे यह डर था कि कही ऐसा न हो कि इस घटना- से मेरे जीवन भरके सारे श्रम पर पानी फिर जाय । कावूरके जीवनमें यह दिन अत्यन्त दुःखद और करुणास्पद था । पूर्वोक्त खलीता लेकर फ्रेञ्च मन्त्री तो चला गया। इधर कावूर अपने दफ्तरके कमरे में जा बैठा और उसने सब दरवाजे बन्द कर लिये । पहरेवालोंको उसने ताकीद कर दी कि किसीको अन्दर न आने देना । उसका यह ढंग देखकर इसके नौकर-चाकर तथा मित्रों को बडी चिन्ता हुई। उसने यद्यपि यह आज्ञा दे रक्खी थी कि अन्दर कोई न आने पावे तथापि उसका पुराना मित्र केस्टेली उसके कमरेका दरवाजा खोलकर भीतर घुस गया। भीतर जाकर वह क्या देखता है कि कावूर कुछ कागज पत्रोंके तो टुकड़े टुकड़े कर रहा है और कुछको अपने पासकी भट्टीमें 'अग्नये स्वाहा कर रहा है | केस्टेलीके अदर घुसते ही कावूरने उसकी ओर तीन दृष्टिसे देखा। उस समय केस्टेलीकी आँखें डबडबा आई । , आस्ट्रियाले युद्ध। १२३. 1 , उसने आर्त-स्वरसे कहा-"क्या ऐन वक्त पर काउट कापूर हमें छोड' जायेंगे ? " सुनते ही कावूर अपनेको न सँभाल सका । वह उसके गलेसे लिपट गया और उसने कातर-स्वरमें धीरेसे कहा-" शान्त होइए, जो कुछ होगा हम सब मिलकर धैर्यपूर्वक सहन करेंगे ।" तब कहीं केस्टेलीके जीमें जी आया और वह वहाँसे चला गया । कावूरके हृदयकी यह दशा हो गई थी। इधर आस्ट्रियाने यह जोड-तोड लगाया कि इस समय पीडमाण्ट अकेला है। ऐसेहीमें उसे धर दबाना चाहिए । इसके बाद जर्मनीकी सहायतासे फ्रान्सकी खबर लेनी चाहिए । यह सोचकर उसने पीडमाण्टको अन्तिम निश्चयात्मक खलीता भेजा । इग्लैंडने आस्ट्रियाको समझानेकी बहुत चेटा की, पर नतीजा कुछ न निकला । आस्ट्रियाका यह निश्चयात्मक खलीता एक खास अधिकारीके द्वारा भेजा जानेवाला था । वह अधिकारी २३ अपरेलको टयूरिन पहुँच जानेवाला है, यह खबर कापूरको लगी । यह सुनकर उमे कितनी खुशी हुई होगी, इसका अनुमान पाठक स्वयं ही कर लें। उसी दिन कापूरने पार्लियामेण्टके चेम्बरकी एक विशेष बैठक की । क्योंकि उन दिनो ईस्टरकी छुट्टियाके कारण पार्लियामेण्ट बन्द थी। उसने इस सभामें यह प्रस्ताव पास करा लिया कि युद्धका अवसर उपस्थित होने पर तत्सम्बन्धी सारे अधिकार राजा साहवको दिये जाय। शामको ५५ बजे आस्ट्रियन अधिकारी वह निश्चयात्मक अन्तिम खलीता लेकर कापूरसे मिला । खलीताका आशय यह है- "पीडमाण्टको तुरत ही अपनी सैनिक हलचल बन्द कर देनी चाहिए। यह ऐसा करनेके लिए तैयार है कि नहीं, इसका उत्तर 'हाँ' या 'नहीं' इन शब्दों में उसे तीन दिनके भीतर देना चाहिए । - ।
१२४ कावूर। नकारात्मक उत्तर आने पर अथवा कुछ भी उत्तर न मिलने पर हमें जबरन ऐसी तदवीर करना पड़ेगी कि वह ऐसा करने पर मजबूर हो।" इसे पढ़ते ही कावूरका आनन्द दूना हो गया। क्योंकि नेपोलियनने उससे यह शर्त करा ली थी कि जब आस्ट्रिया पहले युद्ध छेड़ेगा तभी मैं सहायता दूंगा । वह शर्त इस सलीतेकी भाषासे सहज ही पूर्ण हो सकती थी वह खलीता क्या, युद्धका एक घोषणा-पत्र ही या। उसने उसी दम उसे सरकारी तौर पर तारके द्वारा नेरोलियनको भेज दिया और राजाकी ओरसे सेनाकी सहायता मांगी। अब तो नेपोलि- यनको आगा पीछा करनेकी गुजायश ही न रह गई । जो स्थिति वह चाहता था वह इस खलीतेकी बदौलत आप ही आप प्राप्त हो गई। अतएव उसने इस समय अपनी चञ्चल-वृत्तिका पुन. परिचय न देकर अपने सैनिकोंको पीडमाण्ट रवाना होनेका हुक्म दे दिया । पूर्वोक्त खलीता पढ़ चुकने पर काबूरने आस्ट्रियन अविकारीसे कहला भेजा कि खलीतेमें लिखे अनुसार तीन ही दिनके भीतर उत्तर मिल जायगा । फिर २५ तारीखको उसने पार्लियामेण्टके सेनेटमें भी सब अधिकार राजा साहबको देनेका प्रस्ताव पास करवा लिया । दूसरे दिन उसने आस्ट्रियन खलीतेका जो उत्तर लिखा वह यह या- " इस विषयमें इग्लैड और फ्रान्सने जो अन्तिम निर्णय किया है उससे अधिक हम कुछ नहीं कर सकते ।" अब क्या देर थी। दूसरे ही दिन दोनों राष्ट्रोंमें युद्धकी घोषणा प्रकाशित हो गई। इस युद्धमें आस्ट्रियाकी ओर १ लाख ७० हजार सेना थी और पीडमाण्टकी ओर स्वय पीडमाण्टका सैन्य ६० हजार और नेपोलियनका १ लाख २० हजार मिलाकर कुल १ लाख ८० हजार सैन्य या! नेपोलियनकी सेनाके आनेके पहले यदि आस्टियाने टयूरिन -
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फाबूर। - ओर भगा दिया था । एवं कोमो शहर पर अधिकार करके वह वर्ग- मोकी तरफ, उनका सम्बन्ध विछिन्न करने के लिए, धागा कर रहा था। बीचमें जहाँ कहीं आस्ट्रियन अविकार नष्ट हो गया था वहाँके लोग विक्टर इमेन्युअलके अधिकारियोंका स्गगत करके उनके अधीन होते जाते थे। इस पराजयकी खबर आस्ट्रियाके बादशाहको मिलते ही उसने अपने सेनापति ग्यूलेको पदच्युत कर दिया और आप स्वय, सेनाका बुरीणत्व स्वीकार करके, रणस्थल पर पहुंचा। पहली जगह फ्रेञ्च और दूसरी जगह पीडमाण्टिज और आस्ट्रियन सेनाका कोई १२ घण्टे घमासान युद्ध हुआ । अन्तमें आस्ट्रियाको हार खानी पड़ी। इस विज- यके बाद फ्रेञ्च और पीटमाण्टिज सेना जान गई कि अब हमें इटलीसे आस्ट्रियाको भगा देना कठिन नहीं है। इसकी सिद्धिके लिए उसने नवीन व्यूह रचने-चाल चलने-का आरम्भ भी कर दिया। इधर तो लडाईका काम इस प्रकार हो रहा या उधर कापुरको भी ट्यूरिनमें बहुत काम करना पड़ता था । युद्ध-मन्त्री ला मार्मोरा रण- भूमि पर गया था। उसका काम भी कापूर ही करता था। इसके सिवा परराष्ट्रीय-विभागका काम, अन्तस्थ मन्त्रीका काम, जलसेना- विभागका काम, इतने सब काम करके उसे इटलीके अन्य प्रान्तोंमें प्रचलित आन्दोलनोंकी देख भाल-नियमन----भी करनी पडती थी। रणस्थल पर उपस्थित सेनाके लिए अन्न-वस्त्र, गोला बारूद, आदमी इत्यादि भरपूर भेजनेकी जिम्मेदारी भी उसी पर थी। इस विषयमें उसने इतनी बुद्धिमानी और दक्षतासे काम लिया कि फ्रेञ्च सेनाके एक दो बार कसौटी पर चढ़ानेकी कोशिश करने पर भी उसे हार न खानी पड़ी। उन्होंने जितना सामान माँगा उससे कहीं अधिक ही उसने भेजा, कम नहीं! इतने सव काम एक ही समयमें उसने किस प्रकार सेभाले होंगे, 1 आस्ट्रियासे युद्ध। १२७ - - इसका अनुमान करना भी अशक्य है । सामान्य मनुष्यके लिए तो केवल कल्पना करना भी असम्भर है । युद्ध शुरू होते ही, टस्कनी, बोलोग्ना, माडेना, पार्मा, इत्यादि इटालियन राज्यों के लोगोंने विप्लर-कान्ति-करके उन राज्योंको पीड- माण्टमें शामिल कर दिया। यह सब काम राष्ट्रीय मण्डलके द्वारा हुए। अर्थात् इसमें काबूरका भी हाथ या ही। अन्य राज्योंमें भी ऐसे ही आन्दोलन खड़े हो गये थे। कानूर उन्हें भी छिपे छिपे उत्तेजना दे रहा था । परन्तु इटली में जो यह नवीन चाल वह चल रहा या वह नेपो- लियनको पसन्द न थी। वह इस बातके लिए तो तैयार था कि इटली आस्ट्रियाके अत्याचारसे मुक्त हो जाय, पर वहाँ स्थानिक राजाका एकच्छत्र राज्य स्थापित हो, यह नेपोलियन निलकुल न चाहता था। मोडेना, णर्मा, बोलेग्ना, इत्यादि छोटे राज्योको पीडमाण्टमें शामिल कर लेना उसे सम्मत था। परन्तु टस्कनीका सम्मिलित हो जाना उसे स्वीकार न था । मध्य इटलीके राज्योंकी हलचल तो उसे बिल- कुल ही अप्रिय थी। परन्तु उनै बन्द करना उसके बूतेका न था । और उतना प्रकट प्रमाण भी उसके पास न था कि वह कानुरको छ इस समय उसके मजा-तन्तुओंपर कितना जोर पडता था, इसका वर्णन उसके एक सेक्रेटरीने इस तरह क्यिा है-- अपरैल, मई और जून (१८५९ ईसवी ) इन महीनों में उसके पास बैठा हुआ कोई भी मनुष्य इस बातकी पूरी क्ल्पना नहीं कर सकता था कि काम करनेका सामर्थ्य उसमें कितना है । उसका विछाना युद्धविभाग दफ्तरमै लगा रहता था । रातके ममय लगदा मोटे कमी परवानेके विषयम, कभी पर राष्ट्रोंसे पत्रव्यवहारके सम्बन्धमें और भी पुलिसके विषयमे हुक्म मुनाता मुआ वह एक विभागके दफ्तरसे दूसरे विभागके दफ्तरमे बड़ी तेजीसे जाता हुआ दिखाई देता था। " ।
૨૨૮ कावूर ।। । उलाहना दे सके-उसपर दोषारोपण कर सके । इन कारणांसे युद्धके अवसर पर जो उत्साह उसने दिखलाया वह अब कम हो चला। इसके सिवा, उसकी इस विजयके कारण उधर जर्मनीको भय होने लगा। उसके आस्ट्रियासे मिल जानेके चिह्न दिखाई देने लगे। और फ्रान्सके पादरी-पुञ्ज भी युद्धक विषयमें लोकमत प्रतिकूल बना रहे थे- लोगोंको बहका रहे थे। फिर इस युद्धमें अपनी सेनाके कुछ दोप- भी उसके नजरमें आये । अतएर नेपोलियनने सोचा कि यदि इस दशामें जर्मनी और आस्ट्रियाने मिलकर सामना किया तो बड़ी विकट अवस्था उत्पन्न हो जायगी । इस लिए, मान मार्टिनोकी लडा. ईके बाद, उसने सन्धिकी बातचीत करना आरम्भ कर दिया और आस्ट्रियाके बादशाहको कहला भेजा कि युद्ध बन्द हो जाना चाहिए। बादशाहने उसकी बात मान ली। इसके पश्चात् तीनों सेनाओंके सेनापतियोंकी भेट होकर यह तय हुआ कि १५ अगस्त तक युद्ध स्थगित रक्खा जाय । फिर दो दिन बाद नेपोलियन और फ्रान्सिस जोसेफ विलाफाङ्कामें मिले। इस भेटमे सन्धिकी जो शर्ते ठहरीं वे ये हैं- (१) आस्ट्रियाके सम्राट् लाम्बर्डी-प्रान्त नेपोलियनको दे दें और नेपोलियन फिर उसे विक्टर इमेन्युअलको दे दे। (२) पोपकी अध्यक्षतामें इटालियन राज्योंका सङ्घ निर्माण किया जाय और उस सङ्घका एक भाग वेनिशियाके अधीन रहे । (३) टस्कनी और मोडेनामें पहले के राजनश स्थापित किये जाये। (४) पार्मा और पापसेंजा, ये जागीरें पीडमाण्टमें मिलाई जाये, या इस पर कुछ आपत्ति न करे । 11 ।
आस्ट्रियासे युद्ध। सन्धिकी खबर पाते ही कावूर वायुवेगसे रणस्थल पर दौड आया। वह विक्टर इमेयुअल्से मिला और बोला कि आप सन्विके इस प्रस्तावसे कुछ वास्त न रखिए। विक्टर इमैन्युअलने जब सन्धिकी पूर्वोक्त शर्ते कावूरको मुनाई तब तो उसका भस्तिष्क सन्तापसे भ्रमिष्ट हो गया । गस्ट्रियाको पराजित करनेके लिए कावूरको आकाश- पाताल एक. करना पडा। यह उसने इस लिए किया कि इटली स्वतन्त्र राष्ट्र बन जाय। यही उसके जीवनका एक मात्र उद्देश्य था। आस्ट्रियाके पराजयके कारण यह सुअवसर उपस्थित सा हो गया था। वही इस रद्दी सन्धि-प्रस्तावके बदौलत खोया जानेवाला था । यह देखते ही अपनी सारी जिन्दगीकी कमाईको नष्ट होते देखते ही-कावूरका खून उबल रठे तो इसमें आश्चर्य ही क्या यह तो स्वाभाविक ही है। इस समय तक उसने बहुत ही शिथिलता और शान्तिसे काम लिया था। परन्तु अपने परिपक परिश्रम-फलके रसास्वाद लेनेके ऐन मौके पर उस फल का एकाएक उिन जाना कावृरके रिए अत्य त असह्य पा । इसका फल यह हुआ कि आज तक जो मनोविकार उसने अपने मस्तिष्क मदिरमें बन्द कर रक्से ने अब रे अत्यन्त प्रपत हो उठे। उनके आनेगमें उमने विक्टर इमेन्युअलको कुछ सख्त मुस्त भी कह डाला। विक्टर दमे अल्ने उसे गात करने-समझाने-की बहुत चेष्टा की, पर वह निष्फल हुई । म्वय विक्टर इमेन्युअलको भी इन शतों पर मन्धि करना दिलसे पसद न था। ऐन वक्त पर नेपोलि- यनने जो यह विश्वास-घात किया, उस पर यह भी नहत असन्तुष्ट या । परन्तु एक बात उसे मन्धि करने पर विवश कर रही थी। यदि यह सचि न की जाय तो सारे योरोपियन राष्ट्रीकी सहानुभूति नए होनेकी मम्भावना है। उस दगामे हम अकेले रह जायेंगे। पिर - 10 फादूर। आस्ट्रियाको भगाना कठिन हो जायगा । इस विचारसे, वह, निरुपाय होकर, कहता था कि कमसे कम कुछ दिनोंके लिए तो यह सन्धि कर लेना चाहिए। परन्तु काबूरका मन इस समय अत्यन्त निकार- चश हो गया था। उसे उसका कहना न भाया । जन्मभर तरह तरहके कष्ट सहकर जिस इमारतको खडा किया उसके पूरा होनेके समय पर ही, उसके एकदम इस प्रकार गिर जानेकी कल्पना तक, उसके लिए दु सह हो गई । उसने अपना इस्तीफा पेश कर दिया। विक्टर इमे- न्युअल इस घटनासे बडा दुःखी हुआ । परन्तु उसे सहन कर सन्धि- पत्र-पर हस्ताक्षर करना उसे अनिवार्य या । अतएव उसने यह वाक्य जोड कर कि "मैं अकेला इससे सहमत हूँ" बड़े दुखित दृदयसे उस पर सही की। १२-आन-बानका अवसर। विलाफाङ्काकी सन्धि इटलीके किसी भी विचारवान् देश-भक्तको पसन्द न हुई। क्योंकि उसके बदौलत आस्ट्रियाके अत्याचारपूर्ण शासनसे इटलीके मुक्त होनेका प्राप्त अवसर खोजानेकी सम्भावना थी। इससे वे विशेष दुखी हुए। उन्होंने मनमें कहा नेपोलियनने ऐन मौके पर हमें दगा दिया ।" उसके इस कार्य्यने उन्हें बहुत सन्तप्त कर दिया। कावूरने तो एम. पेत्री नामक नेपोलियनके एक अधि- कारीसे क्रोधानेशमें साफ साफ कह दिया कि "आपके बादशाहने मेरी बड़ी बदनामी की है।" हो, विक्टर इमेन्युअलने अलबत्ते इस समय अपने चित्तकी समतोलताको हायसे न जाने दिया । काबूरने आन-चानका अवसर। १३२ सालिक क्रोधके आवेगमें उसकी निर्भर्सना करके इस्तीफा दे दिया था। इस घटनासे शिक्टर इमेन्युअलको बडा ही हार्दिक दुख हुआ। परन्तु इस समय उसने अपने मनोविकारोंको प्रनल न होने दिया । उसने राज्य-शकट खींचनेका सकल्प करके राटेजीको प्रधान मन्त्रीका पद दे दिया । राटेजीकी नियुक्ति के बाद उसे नगीन मन्त्रि-मण्डलका सङ्गठन करनेमें कोई एक हफ्ता लगा । इस अवधिमें कावूरहीको प्रधान मन्त्रीका काम करना पडा । अतएर मिलाफाकाकी सन्धिके अनुसार टस्कनी, रोमाग्ना, मोडेना इत्यादि स्थानोंमें चिक्टर इमेन्युअलके नाम पर शासन-कार्य करनेवाले कमिशनरोंको यह हुक्म भेजनेका काम उसीके सिर पड़ा कि ये राज्य पहलेके राजाओंको मौंप दो। उसने बडे ही व्यथित हृदयसे ये हुक्मनामें लिखनाकर भिजवाये । परन्तु उसके साथ ही उसने पूर्वोक्त अधिकारियोंको खानगी तौर पर साग्रह कहला भेजा कि आप अपना काम (इटालियनोंका राष्ट्रीकरण) पूर्ववत् जारी रखिए । सरकारी आज्ञा पहुँचते ही मोडेनाके कमिशनर फारिनीने उसे तार द्वारा खबर दी कि "जिस नवीन सन्धिकी शर्तोंका मुझे कुछ भी पता नहीं, उनके बल पर यदि मोडेनाका डयूक फिरसे वापस आगा तो मैं उसे राजा और देशका शत्रु समझ कर काम करेगा।" इस पर कावूरने उसे तार द्वारा उत्तर दिया कि " प्रधान मन्त्रीका अन्त हो गया ! मित्रके नाते वह आपके निश्चय पर बधाई देता है। एक विचारवान् इटालियन राजकाजी मनुष्यकी यह राय है कि उस समय कानूरके शरीरमें मेजिनीका सञ्चार हो आया था। अनेकाशमें यह सत्म भी है । इटलीकी उन्ननिके लिए कावूरने उस समय तक अत्यन्त सापवानी और शान्तिपूर्वक प्राणपणसे परिश्रम किया था, परन्तु अपनी मिहनतका फल पल्ले पदनेके ऐन मौके पर जिलाफासाकी फापूर। A MANur h ' सन्धिके द्वारा उसको एकदम छीन लेनेका प्रयत्न होते देखकर काबू- रका, कुछ समयके लिए, विमनस्क हो जाना मनुष्य-स्वभानके अनु-- सार ही है। कुछ समय तक उसका यही हाल रहा । तथापि शीन ही उसकी चित्तवृत्ति बदल गई । उसकी विवेक-शक्ति फिरसे जागृत हुई । तब वह इस बात पर विचार करनेके लिए कि प्राप्त स्थितिमें मैं, अपना अभीष्ट किस तरह सिद्ध कर सकूँगा, अपने विश्रामस्थान लेरीको चला गया । पिलाझाझाके कब्जे-अस्थायी-सुलह्नामेके अनुसार पार्मा, मोडेना, बोलोग्ना और हारेन्सके अपने गवर्नरों अर्थात् कमि- शनरोंको पीडमाण्टकी सरकारने वापस बुलाया तो, पर वहाँकी जन- ताकी इच्छा यही थी कि वह पिक्टर इमेन्युअल्की ही छत्रच्छायामें रहे । अतएव वे लोगोंकी कामना पूर्ण करनेके लिए वहीं रह गये। सरकारी तौर पर उन्होंने अपना अधिकार त्याग दिया, परन्तु लोगोकी औरसे पुन अपने हायमे उसे ले लिया। उदाहरणके लिए-मोडेनाके गवर्नरने पीटमाण्टके गजाके प्रतिनिधिके नाते अपनी सत्ता नष्ट हो जानेकी घोपणा प्रकाशित की। परन्तु उसी समय उसने यह भी प्रकट कर दिया कि मोडेना शहरके लोगोंकी ओरसे हम 'सर्व-सत्ताधारी बनाये गये हैं। इसी पुरुपको फिर कमसे पार्मा और रोमाग्नाके लोगोने अपने अपने रायोका 'सर्व सत्ता-वारी' ( Dictator ) बनाया। इन सब छोटे छोटे राज्योंका समावेश 'इटली के 'एमिलिया' प्रान्तमे होता था । यह सारा प्रान्त फारिनीके अधिकारमें था । परन्तु फारिनी था इटलीका एक राष्ट्र करनेकी महत्त्वाकाक्षा रखनेवाला । वह तत्का-- लीन परिस्थितिका सामना करनेमे समर्थ भी था। इमसे कावरकी ध्येय-सिद्धिका मार्ग अव अधिक सुगम होगया। टस्कनीकी राजधानी झारेन्समें भी, पीडमाण्टके सरकारी कमिशनरकी सत्ता नष्ट हो जाने , आन-बानका अवसर। १३३ पर वहाँका शासन-मूत्र लोगोंने बैरन रिकाजोली नामक एक धीर पुरुषको मोंप दिया। यह भी उन्हीं लोगोंमेंसे था जो चाहते थे कि सारा इटली-देश विकटर इमेन्युअलके अधीन हो जाय । अतएव उमने तत्काल फारिनीसे मिल कर पूर्वोक्त चारों राज्योंसे कोई ४० हजार आदमियोंकी एक मयुक्त सेना तैयार कर ली । इस सेनाका अधिपति मानफेडो फाटी नामका एक देशाभिमानी वीर पुरुष बनाया गया। इसी बीच पूर्वोक्त चारों राज्योंकी लोक-नियुक्त मभाभोंने अपनी अपनी राज- धानियोमें* अपनी बैठकें करके एक प्रस्ताव प्रकट रूपसे पास किया। उसका आशय यह था कि "प्राचीन राजपशकी राजमत्ताकी इनिश्री फिरसे हो गई और ये राज्य निक्टर इमेन्युअलके राज्यमें शामिल किये . गये " - इटलीके मध्यभागमे हुई यह कार्रवाई आस्ट्रियाको पसन्द न आई । यह स्वाभाविक भी था । इस पर उसने आपत्ति की और यह धमकी दी कि विलाफाङ्काकी सन्धिकी शाके अनुसार सन्धिका कार्य पूर्ण करनेके लिए टयूरिनमें जो परिषद् स्थापन हुई है वह तोड दी जायगी। स्वयं फ्रान्सके बादशाह तीसरे नेपोलियनको भी यह बात अच्छी न लगी। मोडेना, पार्मा इत्यादि छोटे राज्यों के विषयमें तो उसे आपत्ति न थी, परन्तु टस्कनीके मदृश बडे राज्योंको पीडमाण्टमें समाविष्ट करना उसे बिलकुल पसन्द न पा । पर इस समय एक बात इटलीके बड़े अनुकुल हो गई थी । इन दिनों इग्लैंडमे फिरसे सुधारसादी दल अधिकारारुढ हो गया था और इटलीकी आकाक्षाओंसे सहानुभूति फ्लारेन्स, बोलोग्ना, मोडेना और पार्मा इन राजधानियोंमें ये सभाये हुई। ये शहर मसे टस्कनी, रोमामा, मोडेना और पामी इन चार राज्योंकी राजधानी ये। 4 - काचूर। रखनेवाले लार्ड पाल्मर्टन प्रधान मन्त्रीके पद पर प्रतिष्ठित थे । अत- एव मध्य इटलीके राज्योंके पूर्वोक्त कार्योंके विपयमें अगरेजी सरकार और राष्ट्रकी सहानुभूति, किम्बहुना अनुमति, ही थी। इस कारण, कास और आस्ट्रियाको यह हिम्मत न होती थी कि इटालियनों के पूर्वोक्त कार्यका तीव्र निषेध और प्रकटरूपसे उसका प्रतिकार करे । यदि अकेला आस्ट्रिया ही ऐसा करना चाहता तो वह भी न कर सकता था, क्योकि नेपोलियनकी सेना अभी तक लाम्बर्टी प्रान्तमें ही थी। उस समय रिक्टर इमेन्युअलके मन्त्रि-मण्टलको जरा साहससे काम टनेकी आवश्यकता थी। उसे अगरेजी सरकारकी इस अनुकूलतासे लाभ उठा कर इटलाके चारों राज्योंकी प्रजाके अनुरोधके अनुसार उन्हें विक्टर इमेन्युअलके राज्यमें सम्मिलित कर लेना चाहिए था। परन्तु मन्त्रि-मण्डलके अग्रणी, राटेजी और लामार्मोरामें, न तो इतना साहस ही था और न इतनी राजकार्य्य-पटुता ही। अतएव वे दुनि- धामें पड़ गये । स्वय चिक्टर इमैन्युअल्को भी यह इच्छा थी कि ये उसके राज्यमें शामिल किये जायें। उसने अपना यह विचार प्रकट भी कर दिखाया था । परन्तु उसके मन्त्रि-मण्डलके मनोदौर्बल्यके कारण उसका यह अभीष्ट सिद्ध न हो रहा था । अन्तमें इस मन्त्रि- मण्डलने अपनी कमजोरीका पूरा पूरा परिचय दे दिया। उसने न्यूरिचमें विटाफाबाकी सन्धि पकी कर टाली । पूर्वोक्त चारों राज्य फिरसे उनके पूर्व अविपतियोंके ही अवीन किये जायें या नहीं, इस विषयका निर्णय अलग एक दूसरी परिपद् करके किया जाय यह निश्रय भी उसमें किया गया। यह परिषदकी वात नेपोलियनने उठाई। क्योंकि शिलामाङ्काकी सन्धिकी बातचीत होने पर उसने निक्टर इमे- न्युअलको यह सूचना दे दी थी कि सेवाय-प्रान्त मुझे टेनेकी जो शर्त , आन-बानका अवसर। - काबूरने मुझसे शोम्चियर्समें की हे उसे मै अपनी खुशीसे रद्द करता हूँ । परन्तु यह देखते ही कि मध्य इटलीके चारों राज्य उसके राज्यमें सम्मिलित हुआ चाहते है और इंग्लैंड भी इस विषयमें विक्टर इमेन्यु- अटका पृष्ठ-पोषक है, अपने राष्ट्रको सन्तुष्ट करनेके लिए सेवाय और नीस ये छोटे प्रान्त ले लेनेकी लालसा नेपोलियनको हुई। पर वह नहीं चाहता था कि यह बात पूर्वोक्त सन्धिके समय, किम्बहुना इष्टसिद्धि होने तक, प्रकाशित की जाय । अतएव उसने पूर्वोक्त राज्योंकी वात, इस परिपदके मिस, आगे ढकेल दी । सच पूछिए तो उसकी यह बिलकुल इच्छा न थी कि वह परिषद् सचमुच की जाय । पीडमाण्टकी सरकारसे पूर्वोक्त प्रान्त प्राप्त करनेका जोड़-तोड़ छिपे छिपे लगानेके लिए अवकाश प्राप्त करना उसे अभीष्ट या और इसी लिए उसने यह परिषदकी युक्ति निकाली थी। अस्तु । विक्टर इमेन्युअलका मन्त्रि- मण्डल, अपनी दुर्वलताके कारण, दिनों दिन लोगोंको अप्रिय हो रहा था। ऐसेहीमें इस परिषदकी कार्रवाई शुरू हुई । अतएव लोगोंने इस बात पर जोर दिया कि इस परिपदमें इटलीकी तरफसे कावूर भेजा जाय । लोकमतका प्रवाह इस समय कावूरकी ओर इतने जोरसे वह रहा था कि उसको रोकनेका साहस मन्त्रिमण्डलको न होता था। अतएव उसने लोकमतके आगे सिर झुकाया और काबूरका वहाँ भेजा जाना निश्चित हुआ । इग्लैंडकी भी उत्कट इच्छा थी कि इटलीकी तरफसे कावूर ही इस परिषदमें आरे। अतएव नेपोलियनने उसकी नियु- क्ति पर कुछ आपत्ति न की। परन्तु वह तो चाहता ही न था कि परिपन हो। अतएव अपना मतलब गाँठने के लिए अब वह गुप्त-मन्त्रणाओं -साजिशों से काम लेने लगा। राटेजीके मन्त्रि-मण्डलने कावूरकी नियुक्ति परिपदके लिए की तो, परन्तु उसकी मातह्तीमें काम करना कावूर। . + कावूरको अच्छा न लगा । इस दुर्वल मन्त्रिमण्डलको भङ्ग करने तथा अपने अभीष्टकी मिद्धि करनेके लिए उसके प्रयत्न निरन्तर जारी थे। तथापि उसने प्रकटरूपसे राटेजीसे वेर बढाना उचित न समझा। उसने कहा-इससे देशमें अनिष्टकारिणी फूट उत्पन्न होगी और यह मुझे अभीष्ट नहीं । अतएन उसने परिपदमें जाना स्वीकार कर लिया। परन्तु कावूरके इम पीकार-पत्रसे ला मार्मोरा किसी कारण असन्तुष्ट हो गया और उसने अपना इस्तीफा पेश कर दिया । तन विक्टर इमेन्युअल्ने भावी कल्याण पर दृष्टि रखकर तथा कापूरके पिछले कोपकर व्यवहारको सहन करके फिरसे उसीको अपना प्रधान मन्त्री बनाया । कानूर तो ऐसे मौकेकी धातमें ही था । वह उसे अनायास मिल गई । फिर क्या था, उसने तत्काल नवीन मन्त्रि-मण्डलकी रच- ना की और मध्य इटलीके मोडेना, पार्मा, रोमाना और टस्कनी इन राज्योंको अपने राज्यमें समाविष्ट करनेमें निमग्न हो गया। पहले उसने मुख्य मुख्य योरोपियन राष्ट्रोंको एक सूचनापत्रके द्वारा यह खबर की कि पूर्वोक्त चारों राज्योंकी प्रार्थनाको अस्वीकार करना -उसका अनादर करना--अब हमारे राजा साहबके लिए अशक्य हो रहा है । इग्लैंडकी उत्कट सहानुभूतिके बदौलत ही उसने यह साहस भी कर डाला | तूतन इटालियन राष्ट्र निर्माण करनेमें फ्रान्सके तीसरे नेपोलियनने सेना द्वारा सहायता की थी, अतएव वहाँ इसका प्रमुख विशेप बढ़ने की सम्भावना थी। परन्तु इग्लैडको अपने राजकार्यकी दृष्टिसे यह बात अनिष्ट जान पड़ती थी। इग्लैटका उदारवादी दल तो उसे बहुत ही बुरी समझता था। इसका फल यह हुआ कि क्लिाफाङ्काकी सन्धिके कारण इटलीके कार्यक्षम मनुष्य जय नेपोलियनसे नाखुश हो गये, तब इग्लैडने नेपोलिय- - आन-यानका अवसर। - . नका प्रभुत्न-प्रभाष-कम करके अपना प्रभार बढाना आरम्भ किया। इसके लिए उसने अपनी यह नीति बनाई कि इटलीके एक राष्ट्र बनाये जानेमें यथाशक्ति सहायता की जाय । इलैडकी यह नीति ज्योंही कावरमी नजर में साफ तौरसे आई, उसने इन दोनों राष्ट्रोंकी पारस्प- रिक स्पर्डी-बुद्धिका उपयोग, यमासम्भव स्वदेश हितके लिए करनेका सङ्कल्प किया । यही क्यों, उसके तत्कालीन कितने ही उद्गारोसे * यह भी प्रकट होता है कि दोनों राष्ट्रोंकी इस स्पर्द्धाका उद्दीपन करना भी उसे अभीष्ट था। इग्लैंडके राजनीतिवेत्ताओंकी चालों तथा कावूरके पहलुओंको देखकर नेपोलियन भी संभल गया। वह इटालियन राष्ट्रको सन्तुष्ट रखके अपना प्रभार कायम रखनेका प्रयत्न करने लगा । इस कामको सहज-साध्य करनेके लिए उसने इटालियन उच्च आकाक्षा- ओंके विरोधी अपने पर-राष्ट्रीय-विभागके मन्त्री, वेल्वेस्की, को पदच्युत कर दिया और उसके स्थान पर टोनेल नामके एक राजकाजी आद- मीको नियुक्त किया। इसके द्वारा उसने पीडमाण्टके दरबारसे मेल- जोलका व्यवहार आरम्भ किया। उसने कहा कि विक्टर इमेन्युअलने यदि ये चारो राज्य अपने राज्यमें जोड़े तो उसके राज्यका विस्तार बढ़ेगा, ऐसी दशामें फ्रासको सन्तुष्ट करनेके लिए हमे सेनाय और नीस ये दो प्रान्त अवश्य मिलने चाहिए। कानूर यह जानता था कि नेपोलियन कुछ न कुछ जरर मांगेगा ओर लोम्बियर्सके ठहरावके अनुसार यह सेवाय-प्रान्त देनेके लिए तैयार भी था, परन्तु नेपोलियन * पेट्रोओमा नामके कावूररे एक चरित-लेसम्ने कावूरके एतद्विपया उदारोंका उल्लेख और उनका सुलासा इस तरह किया है-"हमने जिम एक मागमा अवलन्यन किया था वह अव वन्द हो गया है। कुछ परवा नहीं, ह" दूसरा मार्ग प्रहण करेंगे । वह यही कि इग्लैंड पर भरोसा रबार मान्स इग्लैंड दोनों राष्ट्रोंकी स्पर्धासे लाभ उठाना । " 1 १३८ काबुर। - तो नीसको भी हडपना चाहता था। अतएव कुछ कालके लिए, कावूर चिन्तित हो गया । नेपोलियनका यह पेंच उसे बडा दु सह और जबरदस्त मालूम हुआ । परन्तु उसकी सेना अभी इटलीमें मौजूद थी। और नेपोलियनने उसे यह गुप्त आज्ञा दे रक्खी थी कि यदि नीस हमें न मिला तो बोलोग्ना और फारेन्स नगर हस्तगत कर लेना । अतएव इस अरिष्टको टालनेके लिए, निरुपाय हो कर, उसे नेपोलियनकी इच्छाके अनुसार नीस भी उसको देना पड़ा। कावूर चाहता था कि यह सब मामला अपनी पार्लियामेण्ट में पेश किया जाय और उसमें पूर्वोक्त प्रान्त देनेकी बात मजूर कराई जाय । पर नेपोलियनकी हठधमासे ऐसा न हो सका । उसने इस बात पर जोर दिया कि यह बात जबतक बिलकुल पकी ( Accomplished fact) न हो जाय, प्रकट न होनी चाहिए। कावूरको यह भी स्वीकार करना पडा । परन्तु इन सब बातोंसे-घटनाओसे-कावूरका चित्त अत्यन्त दुखी रहता था । पार्लियामेण्टके विना पूछे ही अपने देशका कुछ भाग एक जबरदस्त लुटेरेको, लाचार होकर देनेमें भी, वह यह समझ रहा था कि मैं यह पाप कर रहा हूँ। इसके अतिरिक्त यह खयाल भी कि पार्लियामेण्टमें इसका समर्थन करना कितने साहसका और कितना बिकट काम है, उसके चित्तको अस्वस्थ चिन्तित- कर रहा था । पर उसको इतमीनान या कि नेपोलियनसे खुले खुले शत्रुता उत्पन्न करना स्वदेशहितके लिए अत्यन्त विघातक है । क्योंकि उस अवस्थामें नेपोलियन और आस्ट्रियाके एक हो जानेकी सम्भावना । थी। इसी लिए उसने इस बातकी सारी जवाबदेही अपने अर्थात् मन्त्रिमण्टलके सिर पर ले ली । इग्लैंडकी सहानुभूति पर उसका सारा भरोसा-~-आधार या । परन्तु फ्रान्सके पर-राष्ट्रीय-मन्त्रीके इग्लैडके , । 1 आन-यानका अवसर। १३२ , - दरबारको यह लिखने पर भी कि हम ये दो प्रात इटटीसे माँगगे, उसने कुछ आपत्ति न की, तब कायूरने अनुमान किया कि इग्लंडकी महानुभूतिसे यह काम न बनेगा । इसका यह खयाल गल्त भी न या। इस अवसर पर कावूरकी योग्यायोग्यताके विषयमें योरोपियन इतिहासकारोंमें वठा ही मतभेद है । स्वय कापूरफे हृदयमें भी अन्त तक यह घटना चुभती रही और उसका हृदय तलमलाता था कि ब ये प्रान्त फिरसे वापस ले लूं। परन्तु उसके असमय ही काल-- करित हो जानेसे उसकी यह महत्वाकांक्षा मनकी मनमें रह गई। इम विपयमें कापूरके व्यवहारके सम्बन्धमें चाहे फिसीका कितना ही मत-भेद क्यों न हो, उसके सद्धेतुके सम्पन्धमें-उसकी नेकनीय- तीके गारमें-किसीका भी मत-भेद नहीं, और होना सम्भर भी नहीं। प्रत्येक कार्यकर्ता पुरुपके जीवनमें ऐसे कितने ही आन-बानके अनसर आते है ओर उस समय उसे अपनी अभीष्ट-सिद्धिके रिए कभी कभी न्यायासगत और अप्रिय, परन्तु अन्तमें पथ्यकर, मार्ग धैर्यपूर्वक क्रमण करना पड़ता है । पर जन उसकी कार्य-सिद्धि हो जाती है तब निकम्मे वक्त गपगप लड़ानेवाले वकवादी लोग, उसके कार्यकी आजओचना ही करते है-उसे बुरा भला कहा ही करते है । तथापि इस आलो- चनासे भी, ससारके कल्याणमें सहायता मिलती है। पर एक बात है। ऐसे टीकाकारोंकी नजरके सामने उस मनुष्यके समयकी स्थिति हूबह तो रहती नहीं । अतएन महत्त्वपूर्ण विषयोंमें उनके निर्णय कभी कभा गलत-भ्रमपूर्ण-भी हो सकते हैं। जान पड़ता है, कावूरके पूर्मोक्त कार्यके शिपयमें मतभेद प्रकट करनेवालोंने ऐसी ही गल्ती की होगी। उसके निजके उदार और चारों ओरकी परिस्थितिकी जो कुछ जान- कारी नो नो गती . ar - १४० कार। अपनी परिस्थितिमें भरसक निर्दोप और उत्तम मार्ग ग्रहण किया था ।* फ्रेच राष्ट्र और नेपोलियनकी मित्रता कायम रखनेके L . काउटेस मार्टिनगो सिजारेस्को-लिसित कावूरके चरितमें इस विषय पर जो कुछ लिखा गया है उसके नीचे लिखे अशसे कावूरकी इस योजना पर विशेष प्रकाश पड़ेगा- मिस्टर यूवेनेलने साफ साफ कहा है कि यदि पीडमाण्टने अपने राज्यमे और अधिक प्रदेशोंको मिलाया तो सेवार और नीस इन प्रान्तों पर मेरा हरू है, यह प्रतिपादन करना फ्रेञ्च वादशाहको अभीष्ट है । इसकी सूचना इस समय अँगरेजी मन्त्रिमण्डलको भी दी गई थी । कावूरको निश्चय हो गया था कि स्वय नेपोलियनसे ही यह मामला तय कर लेना उचित है। यह प्रश्न इसी एक तरी- केसे हल हो सकता है । शेम्बियर्समे एक प्रान्त देनेकी शर्त करना उसे जितना' राला-असरा-इस समय उससे भी अधिक मनोवेदना उसे होने लगी। पिछले छ महीनों तक नेपोलियनसे इस मौदेकी वातचीत-घटा बढी होती रही। उसका प्रभाव कावूर पर ऐसा पड़ा कि उसका जी यहाँ तक ऊन उटा कि उसने कह दिया 'फ्रेच सेनाको इटलीम लानेका प्रयत्न अब म कभी न करूँगा।' यह बात अन्त तर कायम रही। वह कहता था-'ये दोनो प्रान्त नेपोलियनको देना, किसी मिन पर उपकार नहीं बल्कि किसी बटमारको राजी करना है । " परन्तु उगे यकीन था कि ऐसा किये बिना गुजर नहीं । काउट निट्जयूम नामके एक स्पष्टदृष्टि-सुलझी हुई तबीयतके-पर- राष्ट्र-राजकाजी आदमीने अपना मत इस प्रकार प्रकट किया है--"जिस जनवरी १८५९ ईमवीकी सन्धिके अनुसार फ्रान्सकी मित्रताका उपहारस्वरुप सेवाय और नीम प्रान्त देनेका वचन दिया गया, सरने यदि उसे न स्वीकार किया होता-उसका भन्न कर दिया होता-नो नेपोलियन ऐसी कैचीमे फंस जाता कि उमें अपनी माँग एकदम डोस देनी पड़ती। परन्तु इस व्यवहारसे झान्स, देश और नेपोलियन रुट-अत्यन्त असन्तुष्ट--अवश्य हो जाता । इटालियन जनताका यह रायाल कि प्रेत्र राष्ट्रका उदार अन्त करण ' अपनी ओर है, निरा भ्रम था। पर यावूर अव इमका बिलकुल कायर न रहा । एक बार उसने महा पा-'प्रान्स यदि लोकमत्तान हो जाय तो भी उसमे इटलीको कुछ लाभ जान-बानका अवसर। १४१ लिए तमा इटली के पूर्वोक्त चार राज्योको अपने राज्यमे शामिल करनेमे वे बाधा न डालें इस खयालसे, बड़ी खिन्नतापूर्वक निरुपाय होकर उसने २४ मार्च १८६० ईसवीको सेवाय, और नीस प्रान्त नेपो- लियनके हवाले कर देनेवाले सन्धिपत्र पर हस्ताक्षर कर दिये। मुदेवसे विक्टर इमेन्युअलने भी बहुत जागा-पीछा न कर परिस्थिति पर ध्यान दे कावूरके कार्यको स्वीकार कर लिया। परन्तु इतनेहीसे • इस मामलेका निपटारा न दुआ । उसे वाजान्ता बनानेके लिए पालियामेण्टके चेम्बरमें उसका पेश होना आवश्यक था और वहाँ उसका विरोध भी होनेको बहुत सम्भावना थी। इस बैठकमें पूर्वोक्त चारों राज्योंके प्रतिनिधि आनेवाले थे। अतएन कापूरको हिम्मत होने नहीं, बल्कि उसका परिणाम इससे उलटा होगा।' अभी अनेक वाद ग्रस्त विपर्योस निर्णय होना यामी था। फिर रोममी, जहाँ नेपोलियनकी प्रभुता है और उसकी सेना भी है, विकट समस्या उसके सामो उपत्यित की। इस दशामे यह फ्रेंच लोगोके हृदयम मुलगनेवाली द्वेपानिको भड़ाने देना न चाहता था----उससे डरता था । कावूरको अभी तक यह आशा थी कि नीम वचा लेंगे -जाने न दगे। इतनेहीमें बेनिटी पेरिमसे आया। उसने कहा कि यदि सम्पूर्ण गुम मन्धि पर दस्तसत न पिये तो बादशाह अपनी सेना लाम्बडीसे वापम युला रेगा। इस पर कहते है-कापूरने जवान दिया--"जितनी जल्दी युला ले उतना ही अच्छा ।' तब उसी दम बेनीडेटीने बादशाहका सानगी आना पत्र दिगा कर कहा, यह देखिए मुझे सेना लोटा रेनेकी आमा मिली अवय है, परन्तु माम रे जानेकी नहाँ बोरोग्ना और लारेन्सम पड़ाव डारी । सन्धिी गुप्त रखना न रंगा-प्रस्ट न होने देना-कारके सरान था। नियमबद्ध घागन-पद्धतिके नियम के अनुसार सही करने पहले उसे पार्लियामेंटमे पा करना लाजिमी था। अतएव ग्मने नपोठियनको मममा उपानी यहुत कोशिश की -प्रयतरी पराकाष्टा पर टी-परन्तु सम्राटने अपना नामह न छोड़ा। यह यही कहता रहा कि आपदे दस्तग्यत होने वाद हा सरानिक पालियामेपरम किया जाय और तभी योरपवालों को इसकी पर की जाय, इमर पहले नही ।"
१४२ काचूर। लागी कि उन प्रतिनिधियों के आधार पर यह गुत-सन्धि पार्लियामेण्टमें पास करा देगा । अस्तु । गुप्त सन्धिका काम समाप्त होने पर उन्हे अपने राज्यमें शामिल करना कहीं प्रधान योरोपियन राष्ट्रोंको आपत्ति- जनक न जेंचे, इस लिए उसने एक तरकीब निकाली। उसने उन चारों राज्योंकी जनताको सम्मति लेना शुरू की। उसने यही दो सवाल किये-(१) तुम्हें स्वतन्त्र शासन-पद्धति चाहिए, या (२) तुम चिक्टर इमेन्युअलके राज्यमें शामिल होना चाहते हो ? अन्तमें दो तिहाईसे भी अधिक सम्मतियाँ दूसरे प्रश्नके अनुकूल उसे मिलीं ।*. तब उसने उन्हें विक्टर इमेन्युअलके राज्यमें जोड़ लिया । सेवाय और नीस-प्रान्त भी, यह तरकीब लड़ाकर ही नेपोलियनके हवाले करनेका ठहराव हुआ था। इनमेंसे सेवाय-प्रान्त तो आदिसे ही फ्रेञ्चोंका तरफ- दार या-उनके पक्षमें था । हो, नीसमें अलबत्ते कृत्रिम लोकमत तैयार करना पड़ा । अस्तु । पूर्वोक्त चारों राज्य पीडमाण्टके राज्यमें मिला लेनेके बाद एक संयुक्त प्रथम पार्लियामेण्टकी बैठक २ अपरैल १८६० ईसगीको हुई। आरम्भमें शिष्टाचारके अनुसार राजाने सब प्रान्तोंके प्रतिनिधियोंका स्वागत किया और फिर वह सभा-स्थानसे चला गया । इसके बाद नेपोलियनसे की गई गुप्त सन्धिका प्रस्ताव कावृरने सभामें- पेश किया। जब वह उसे पढ रहा था, सभामें सन्नाटा या । सब लोग , चुप थे । सबका ध्यान सन्धिपत्रके मजमूनकी ओर लगा हुआ था । वह दृश्य अत्यत गम्भीर या । कावूरके लिए तो यह प्रमङ्ग बडा टेढा- में टस्कनी राज्यमें ३,६६,५७१ सम्मतियाँ पीडमाण्टके राज्यमें सम्मिलित होके लिए और १४,९२५ स्वतन्त्र शासन पद्धतिको पक्षमे मिली। पामी, मोडेना और रोमामा पूवात क्रमसे ४,२६,००६ और ७५६ सम्मतियाँ प्राप्त हुई।
मार-पानका भयमर। आन-बाना-धाम पिनसीन होोही पर उसका गीरय फापम रह सफा मा और उसका जीवन सफल समझा जा सकता था । यदि ऐमा न होता तो उने मुंह दिखानेको भी जगह न मिटमी । यही नहीं, देशद्रोह का फल भी उसके गधे मा जानेयी पूर्ण समारना थी। यह बात समोरागाने कर दी थी। न दशामें, यह काल सालिक तेजके बल पर, अपने ग्रन्यका समर्थन करनेके रिए पदा हुआ। उस समय उसके नारे पर कि किन मनोविकारोंकी-मानीकोपटा देग पनीधी यह निक्षयपूर्णफ नहीं कहा जा सका । तथापि उसका धैर्य निधी तिठमान कान हुआ था। और उसका आत्मविश्वास निरन्तर उसे उत्नाहित कर रहा या । सन्धि पत्र जन पहली बार पढ़ा जा चुका तर उस पर वाद- विवाद शुरू हुआ, जो दस दिनों तक होता रहा । उसमें सर- फारके प्रतिपक्षियोंकी औरते जोरका विरोध होने लगा। नीस गैगे- वान्टीनी जन्मभूमि धी । उसे गरोंके हमाले होते देख मेरी नाल्डीकी मोगामि भड़क उठी। शोधावेगमें उसने कार पर कठोर शब्दोंको झडी लगा दी। आस्ट्रियाके साथ इसी युतमें गरीमान्डीने अपने स्वयसैनिकों की महायासे इटालियन लोगोंकी तरफसे समर मूमि पर अपना बल-पराक्रम दिखाकर इटालियन देश भक्तों को उपकारबद्ध किया या । इस कारण उन पर उसका खूप प्रभाव था । नीसके दे देनेमे गैरीवाल्डीके चित्तको अन्यन्त दुख होगा और इसके लिए कारण भी प्रल है, यह देखकर फितने ही सभासदाकी सहानुभूति उसके साथ होने लगी। उनमेंसे कितने ही लोग तो निर्भर्सना करने पर भी तुल गये । एकने तो केरठ दोप-दृष्टिसे ही उसकी तुडना इंग्लैंडके मन्त्री अर्ल आर क्लेरेडनसे कर डाली। ।
१४४ कावूर। . कावरने भी, अन्तमे अपने प्रतिपक्षियोंको उत्तर देते हुए हरेंडनका है उदाहरण दिया और शत्रुओंके रूपमें अपने शत्रुओंका और उनके दु स्वभावका खाका, व्याजोक्तिमें, खूब ही खींचा । सभाके समास सम्पोंको सम्बोधन कर उसने कहा-" जिस प्रकारकी राजनीतिके बदौलत इतने थोडे ममयमें मिलान, फ्लारेन्स, बोलोग्ना ये प्रान्त हमे मिले, उस नीतिको निवाहनेके लिए सेवाय और नीस प्रान्त दे देना अत्यन्त आवश्यक था। लोकप्रियता हमें सदाकी ही तरह प्रिय है, और बहुतसे मौकों पर मेरे सहकारियोको और मुझे उस लोकप्रियतारूपी पेयके, जो कभी कभी मादक भी होता है, आरवाद करनेका अवसर मिला है। परन्तु जब हमें अपने कर्तव्यके वशीभूत होकर उसका त्याग करना पड़ता है तब यह कैसा करना चाहिए, यह हमें मालूम है । इस सन्धिपत्र पर दस्तसत बनाते समय हमें पूरा निश्चय था कि हम पर लोकनिन्दाकी वर्षा होगी, परन्तु हमने उसको सहन करना उचित समझा । क्योकि हमारी रायमें यह काम करके हमने इटलीका हित ही साधन किया है। इस प्रकार खुलासा करके प्रतिपक्षके आरोपोंका योचित खण्डन कर चुकनेके बाद बहुतसे समझदार सभासदोंको इस सन्धि पर बहुत दुख हुआ। तथापि अन्त में उन्होंने कावूरके पक्षमे ही अपनी सम्मति दी। कावृरके भाषणका बहुत कुछ अभीष्ट प्रभाव सभासदों पर पडा। फिर उसकी देशभक्ति के विषयमें उनका चित्र नि शक था । इन कारणोंसे अनुमानसे भी अधिक बहुमतसे सन्धिपन्न स्वीकृत हो गया । (२० अपरेल १८६० ईसनी) इस प्रकार यद्यपि कावृरने सफलता-सम्पा- दन की, तथापि अपना राज्याश गैरको दे देना उमे जीवन भर खटता रहा । उसके भावी जीवनमें जब जब उसे इस घटनाकी याद आती तब तब उसे अत्यन्त मनोवेदना होती और, इस कारण, फिर समझदार लोगोंने उसके आगे इस घटनाका जिक्र तक करना छोड दिया था। , कापूरकी राजनीति पटुता। LywwwHARA Prawnanvarwww.raw-- १३--कावूरकी राजनीति-पटुता और गैरीयाल्डीकी शूरता। HOOL . , मध्य इटलीके चारो राज्य निक्टर इमेन्युअलके राज्यमें शामिल हो जानेके नाद, गीत ही, दक्षिण इटलीके लोगोंको भी उसके राज्यमे मम्मिलित होनेकी अत्यन्त प्रवल इच्छा हुई। दक्षिण-इटलीमें सिमरी और नेपल्स ये दो राज्य बडे थे। ये फ्रान्सके प्रसिद्ध वीरवन राज- वशके शजोंके कजेमें थे। अतः उन्हें नेपोलियनका आश्रय गा। इस दशामें इन राज्योंकी जनताकी उठाके अनुसार काम करनेपर नेपोलियनकै रुष्ट हो जानेकी और आस्ट्रिया, सस इत्यादि अन्य राष्ट्रोका भी बखेड़ा पैदा होनेकी सम्भावना नी । यह देखकर काबूर कुछ दिनों तक उम ओर ध्यान न देना चाहता था । जो चार राज्य अभी शामिल किये गये हैं उनके सहित अपने राज्य उत्तर-इटलीमें, स्थिरता उत्पन्न करनेके लिए-उसकी बुनियाद पक्की करनेके लिए-उसे अभी एक वर्ष नये झगड़े न पैदा करनेकी आवश्यकता जान पटती नी । परन्तु इटालियन लोगों पर एकराष्ट्रीयत्वकी धुन इतनी ज्यादह समार थी कि कावूरको उनकी हलचल पर ध्यान देकर उसका प्रबन्ध कर- नेका काम अपने सिर पर उठाना पडा । पिछले प्रकरणमें उटिखित पहली पार्लियामेण्टका अधिवेशन जब टयूरिनमें हो रहा या उन्हीं दिनो मिसलीमें क्रान्तिकारक आन्दोलनमें बाढ आरही थी । वहाँके मुग्य बाहर और बन्दर---पालेर्मो-~के लोगोंने ४ अपरैल १८६० ईसवीको गदरका झण्टा खड़ा कर दिया । परन्तु राजपक्षीय सेनाने बलको नहस-नहस कर दिया । तथापि, इसके बाद, बलकी लपटें प्रयेक का.-१० कावूर। vv जिलेसे धधकने लगी और मेसिना तथा केटनिया नगरोंमें दड़े शुरु हो गये । इस बगावतकी खबर उत्तर-इटलीमें पहुंचते ही वहोंके लोगोने उन्हें सहायता देनेके लिए एक स्वय-सैनिकोकी सेना भेजनेका प्रबन्ध किया और इस काममें नेतृत्व स्वीकारनेके लिए वे गैरीबाल्डीसे प्रार्थना करने लगे। परन्तु गैरीबाल्डीको शङ्का ही थी कि इस तरह सिसली- पर चढाई करनेसे यश-प्राप्ति होगी या नहीं, अतएव वह उनकी बात कुबूल करनेमे आनाकानी करने लगा। इतनेहीमें सिसलीके जानकार और देशभक्त अगुआ फ्रान्सिस्को क्रिस्वी और शूर योद्धा निनो- विक्जोंने आकर उससे कहा कि आप निश्चय रखिए, वहाँको परि- स्थिति बिलकुल अपने अनुकूल है । तब गेरीवाल्डीने उनकी बात मान ली। कावूरकी इच्छा थी कि सिसलीके बलवाइयोंकी सहायता की जाय। परन्तु पहले वह इस बातसे सहमत न हुआ कि गेरीवाल्डी प्रकट रूपसे जाकर सिसली पर आक्रमण करे । क्योंकि इससे बलशाली योरोपियन राष्ट्रोंके क्षुब्ध होनेकी और इटली राष्ट्रके भावी ऐक्यके अहित होनेकी सम्भावना थी । परन्तु गैरीबाल्डीकी इस मुहीमसे विक्टर इमेन्युअल सहमत था । अतएव इस विषयपर उसका और कावूरका खूब ही कड़ा वाद-विवाद हुआ। परन्तु अन्नमें गैरीनाल्डीकी योग्यता और महत्त्व तथा राजाकी इच्छा पर ध्यान देकर कापूरने इस आक्रमणका विरोध करना छोड दिया। यही नहीं, उसने गुप्त रीतिमे याशक्य सहायता देकर यह योजना की कि इस हमलेसे जितना लाभ हमारा राज्य उठा सके, उठाया जाय । तथापि, इस खयालमै कि योरोपियन राष्ट्रोंको आपत्ति करनेका मौका न मिले, उसने बाहरसे इस आक्रमणके विरोधी होनेका स्वाँग बना लिया । इस समय बह जान बूझकर राजधानी छोडकर मिस्टर इमेन्युअर के साथ मोटेना चल गया-यह दिखलाने के लिए , .
कावूरफी राजनीति-पटुता। १४७ मानों गैरीगोल्डीकी करतूतोंका हाल उसे कुछ भी मालूम नहीं । उसने एक और भी चाल चली । पालेर्मो-स्थित अपने अधिकारियोंको उसने दो आज्ञापत्र दे रक्खे थे-एक तो यह कि गैरीबाल्टीको कैद कर लो और दूसरा यह कि उसे छिपे छिपे सहायता दो । पहला हुक्म केवर बनारटी था। उसका उपयोग तभी किया जानेवाला था जर गेरीवाल्डी- को सफलता न मिले और नतीजा भोगनेका प्रसङ्ग आ पडे । इधर कापूर इस तरह चालें चल रहा था, उघर ५ मई १८६० ईसचीकी शामको गैरीबाल्डीने रुनाटिनो कम्पनीके जिनोआ बन्दरमें ठहरे हुए दो जहाजों पर घेरा डाला और उन्हें वह क्वार्टी नामक एक गॉरमें ले आया। इस जगह उसके सङ्केतके अनुसार कोई १,२०० स्वयसैनिक सिमली पर चढ़ाई करनेके लिए एकत्र हुए थे । इस आक्रमणके लिए गैरीमान्डीका निश्चय हो जाने पर कावूरने उससे छिपा कर, ला फारिना और ला मासा इन दो नामी देशभक्त और कार्यक्षम पुरुषोंको उसकी ओर भेजा । कायरकी इच्छा देखकर उन्होंने भी स्वय सैनिकोंके दल्में प्रवेश किया और गैरीबाल्डीकी सहायताके लिए वे उसके साथ रवाना हुए । इन स्वयसैनिकोंमें कोई ४०० आदमी तो अच्छे गृहस्य थे और बाकी सामान्य श्रेणीके ये वे सब आपसके भेद-भावको भूल कर एकदिलसे काम करनेमें लगे हुए थे । उत्कट देशाभिमान और स्वातन्त्र्य-प्रेम, इन दो उदात्त भाव- नाओंसे उनका हृदय सना हुआ था । अतएव उनके शरीरमे विलक्षण साहस उत्पन्न होगया था। उनकी धुन अपने स्वीकृत कार्यकी सिद्धिमें ही एकसी लगी हुई थी। उनका यह अद्भुत उत्साह, स्फूर्ति और चैतन्य देख कर यह भास होता था मानों पृथ्वीकी दासता गुलाम- गौरी-नष्ट करनेके लिए ये देवदूत ही आकाशसे आ उतरे है ! अस्तु ।
कावूर। कार्टोसे चलकर गैरीवाल्डी पहले पोंबिनोके जल डमरु-मध्यके पास आया। वहाँ टस्कनीसे आये हुए कुछ स्वयसैनिक उसे मिले। ७ मई, १८६० ईसवीको चहाँसे रवाना होकर टालमोना द्वीपसे कुछ दूर पर ठहरा । वहाँ उसने हङ्गेरियन कर्नल टरके द्वारा जो उसके साथ था निकटस्थ आनेटलो नामके किलेसे पीटमाण्टके सेनापतिसे जितना मिल सका गोला-बारूद और कुछ पुरानी तोपें हस्तगत की। वहसि उसने कोई ६० सिपाहियों की एक टोली पोपके राज्यों पर भेजी। यह तजवीज योरोपियन राष्ट्रोंको चमका देनेके लिए उसने की थी। उसने उन्हें यह धोखा देना चाहा कि इस आक्रमणका रुख पोपके राज्यो पर है, सिसली पर नहीं। कोई १० दिनों में इस टोलीने पोपकी सीमा पार कर ली। इधर ९ मईको गैरीबाल्डी टालमोना बन्दरमें आया और वहाँसे उसने बोरवोन सरकारके लडाऊ जहाजोंकी नजर चुकानेके लिए, छिपे रास्तेसे प्रयाण किया। ११ मईको वह सिसलीके मार्साला बन्द- रमे आ पहुँचा । उस समय सुदैवसे यहाँ दो अँगरेजी सैनिक जहाज अपने राष्ट्रके हितोंकी रक्षाके लिए आये हुए थे । इधर नेपल्स के राजाके दो जहाज उसी समय किनारे पर चूमने-घामने निकल गये थे । गैरी- बाल्डीने सोचा यह मौका बड़ा अच्छा है और अपना इतिहास प्रसिद्ध देश-भक्त स्त्रय-सैनिक दल सामान-सहित किनारे पर ला उनारा । इतनेहीमें पूर्वोक्त नेपल्सके जहाजोंको, जो घूमने निकल गये थे, उसकी हल-चलकी आहट मिल गई। उन्होंने समुद्रसे ही उस पर गोले बर- साना शुरू कर दिया। तब अँगरेजी जहाजका कप्तान गोला बरसाने- वाले जहाज पर गया और उससे बोला कि देखना, मार्सालाकी ॲग- रेजी कोठीको धक्का न लगने पाने । तब उनका गोला बरसाना आप ही आप बन्द होगया । इतनी अवविमें गैरीबाल्डीने अपना सब सामान , फापूरफी राजनीति पटुता । १४२ - । और सार आदमी बन्दरमें पहुंचा दिये और अपने जहाजमें आग लगा दी। दूसरे दिन समेरे वह अपने दस्बर सहित सालेमी शहरको चठ दिया । यहाँ भाते ही उसने विक्टर इमेन्युअटके नामकी दुहाई फेर दीपोर उसके प्रतिनिधियो नातेसे मिसलीकी सारी शासन-सत्ता अपने हाथों में ले लेनेकी घोषणा कर दी । परन्तु अभी उसे सिमलीका प्रधान नगर पाटो हस्तगत करना बाकी था। रास्तेमें उसका प्रती- कार करनेके लिए उसको रोकनेके लिए नेपल्सके राजाकी मैना तैयार खड़ी थी। इस सेनासे उसका पहला सामना केलटेफिमी नामके घाटकी तलहटीमें हुआ । ग्यून घमासान लड़ाई हुई । गैरीवाल्डौंका लड़का मेनाटी इस लड़ाईमें जख्मी होगया और उसे असफलताके लक्षण दिखाई देने लगे। तब उसके सहकारी सेनाध्यक्ष निनोविक्जोने जो उसीकी तरह शूर और साहसी पा, सखेद कहा -"मैं समझता है हमें भाग जाना होगा ।" इस पर गैरीबाल्डीने आनेश-पूर्वक उत्तर दिया--- "या तो हम यहाँ इटालियन राष्ट्रका निर्माण करेंगे या जूझ मरंगे। ऐसा निश्चयामक उत्तर देनेका कारण धा। गैरीगाल्टीके आक्रमणका फलाफल- निफटता--प्रमानन उसके गौरव पर अपलम्भित था । ऐसे आन- बानके समय कञ्ची खा जानेसे-पीछे हट जानेसे--उसका गौरव तो नष्ट होता ही, साथियों और अनुयायियों के भी पैर उखड़ जानेकी सम्भावना थी । अतएव उसने प्राणोंकी भी परवा न करके विजय प्राप्त करलेने तक लड़ाई करनेका निश्चय किया और अन्तमें उसी निश्चयरूपी शक्तिके सहारे उसे विजय प्राप्त हुआ। इस सफलताके बाद तुरन्त ही उसने पालेर्मो-शहर पर धावा कर दिया। वहीं सङ्गीनोंसे काम लेना पड़ा । अन्तम नह शहरमें घुम गया | नेपल्सके राजाकी सेनाने उससे पाले में और भी कुछ दिन युद्ध किया। पर अन्तमें -सफलता १५० कावूर। -- उसे हारकर पालेर्मो छोड जाना पड़ा। (७ मई १८६० ईसवी ।) इधर गैरीबाल्डी इस तरह विजय-सम्पादनमें लगा हुआ था, उधर कावूर परराष्ट्रीय क्षुब्धताके अभ्रोंका-बादलोंका-निवारण करनेमें दत्तचित्तः था । इतने दिनों तक तो वह गैरीबाल्डोके सम्बन्धमे " नरो वा कुञ्जरो वा " कह कर अपनी बात बनाये रखता था, परन्तु गैरी- बाल्डीके सिसली-टापू अधिकृत करके पालेर्मों में प्रवेश करनेके बाद वह उसकी सहायतामें अधिक ढीठतासे काम लेने लगा। उसने जिनोआ- से गैरीबाल्डीकी सहायताके लिए मेटिकी नामके सेनापतिके अधीन ३ हजार आदमियोंको सिसली भेजा । इसके सिगा पोलेर्मोस्थित अपने जल-सेनापतिको उससे गैरीबाल्डीका स्वागत आदरपूर्वक करनेका भी सङ्केत किया था । तदनुसार गैरीवाल्डी उससे मिलने गया तब १९ तोपोंकी सलामीसे उसका स्वागत किया गया और सिसली पर उसका आधिपत्य भी स्वीकार किया गया । गैरीबाल्डी यद्यपि अत्यन्त उदार और उत्कट देशाभिमानी पुरुष या, तथापि वह राजनीति-निपुण न था और, उसका स्वभाव कुछ उच्छृखल तथा विकारवश भी था। लोकसत्तावादी उच्छृखल लोग सदा उसे घेरे रहा करते थे। इस दशामें सिसलीकी सारी राजकीय सत्ता-शासनसत्ता-उसके हाथोमे रहने देना भानी इटालियन स्वतन्त्रता और राष्ट्र-सङ्गठनके लिए अहित कर होगा, यह काबूरका ख्याल या । अतएव वह इस बात पर जोर देने लगा कि यह प्रान्त विक्टर इमैन्युअलके राज्यमें शामिल किया जाय । परन्तु गैरीबाल्डी इसके लिए तैयार न था । कापूरका खयाल था कि गेरीवाल्डी पर मेजिनीका प्रभार अधिक है इससे उसका चित्त ठिकाने न था । पर बात वास्तसमें ऐसी न थी । इस अवसर पर मेजिनी अपने ही विचारोंको प्रधान कायूरी राजनीति पटुता। न समझ रहा था-अपनी ही बात पर जोर न देता था । चल्कि जिस प्रकार हो सके इटालियन राष्ट्रकी एकताका ही ध्यान रखता था । परन्तु इनका ज्ञान कापूरको न था और हो भी नहीं सकता था। क्योंकि ये दोनों महान् पुरुष सदा ही एक दूसरेके हेतु- काविपर्यास करते ये 1 गैरीवाल्डोको शासन न-कार्यका अनुभव तो कुछ था ही नहीं। इस दशामें कहीं ऐसा न हो कि वह आसपासके उदृखल लोगोके पोंमें फंस जाय और ऐसे ऊटपटॉग काम कर बैठे जिमसे योरोपियन राष्ट्रोंके चकरमें आजाय, एवं उसका फल पीडमाण्टरे राज्यको भी भोगना पडे, यह डर काबूरको या। इसी लिए वह इस चातके लिए तैयार न था कि गैरीबाल्डोके हायमें एक-मूत्री अधिकार ( dictatorship ) अधिक दिन रहे। इसके विरुद्ध गैरीबाल्डी समझता था कि सम्पूर्ण इटलीको स्वतन्त्र करनेके लिए इस प्रकारकी सारी सत्ता उसके हाथमें रहना आवश्यक है । इस प्रकार इन दोनोंमें बहुत ही मत-भेद, नहीं बेबनाव, सा उत्पन्न हो गया । तब कापूरने यह निश्चय किया कि गैरीनाल्टीको असन्तुष्ट करनेसे राष्ट्रकी हानि ही होगी, अतएर युक्ति-प्रयुक्तिसे ही अपना काम निकालना चाहिए । नदनुसार उसने सिसली-प्रान्तको अपने राज्यमें जोड़नेका प्रस्ताव पार्लियामेण्टमें पेश करनेका खयाल छोड़ दिया । यदि कावूरने ऐसा न किया होता-सिमली गैरीबाल्डीसे ले लिया होता तो उसका गोरन बढ़ जाता और वह फिर गैरीनाल्डीको शह भी दे सकता । परन्तु अपने गौरवकी अपेक्षा कापूरका ध्यान स्वदेश-हितकी ही ओर अधिक था । अतएन उसने गैरीबारडीका विरोध न करके उसे अपने इच्छानु- सार काम करने दिया। सिसलीकी राजधानी पालेर्मों हाथ आते ही गैरीपान्डीकी सना उस टापूमें सर्वत्र स्वीकार कर ली गई। तथापि मिलाजो नामक शहर- शहर कावूर। - " . के पास नेपल्सक राजाकी एक बड़ी भारी सेना उसे परास्त करने के इरादेसे पड़ी हुई थी। गैरीबाल्डीके पास भी इस समय सेना खूब श्री । बहुतसे नवीन सैनिक आ गये थे। अतय उसने इस सेना पर आक्रमण करके २० जुलाई १८६० ईसवी के करीब उसे हरा दिया। सितगकी यह उथल-पुथल अकेले इग्लेटको ही पसन्द थी। क्योंकि स्वयं ग्लेडस्टन माहबने ही, कुछ वर्ष पहले, कहा था कि सिमलीकी शासन-पद्धति अत्यन्त जगली और अत्याचारपूर्ण है । अतएव इग्लैट- के मन्त्रिमण्डलने कानूरको सलाह दी कि गेरीवाल्टीको अपनी इच्छाके अनुसार काम करने दीजिए । परन्तु फ्रान्स, रस और आस्ट्रियाको सिसलीका यह स्थिति-परिवर्तन न स्चता था। वे. आपत्ति करने लगे। परन्तु इन तीनों राष्ट्रोंमें ऐक्य भाव न या । और म तथा आस्ट्रियाको इस झमलेमें पडनेकी फुरसत न थी । अतएव वे केवल आपत्ति करके ही चुप रह गये । परन्तु फ्रान्सके समाट् तीसरे नेपोलियनका पोपसे तथा बोरवोन बगीय राजासे निकट राजकीय सम्बन्ध या । अतएव उसने इस बातका प्रयत्न किया कि इंग्लड गैरी- बाल्डीके इस कार्यका जोरसे निपेध करे । इग्लैंडने इस समय उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया । तचापि पूर्वोक्त राष्ट्रोंने उससे कह दिया कि आप अपनी इच्छाके अनुसार कार्यवाही करनेके लिए स्वतन्त्र हे । अर्थात उन्होंने नेपोलियनको यह कह दिया कि यदि आपने गेरीवा- - ल्डीका प्रतीकार किया तो हम लोग तटस्थ रहेंगे। इधर तो यह हो रहा था, उधर सिसली और नेपल्सके राजा दूसरे फ्रान्सिसने हार कर विक्टर इमैन्युअलसे दया-प्रार्थना की और पीडमाण्टसे मित्रता करके नियम-बद्ध शासनपद्धति (constitution) प्रचालित करना स्वीकार कर लिया । रिक्टर इमेन्युअलने इससे तीन ही महीने पहले ।
कावूरकी राजनीति-पटुता। •wwwwww - उसको लिखा था कि अपने राज्यमें ऐसी शासन-पति जारी कीजिए, परन्तु उस समय उसने यह स्वीकार न किया था, अतएव अब उसकी इस प्रार्थना पर ध्यान देना निक्टर इमेन्युअलके लिए सम्भर न था। परन्तु इधर यह रङ्ग दिखाई देने लगा कि यदि यह प्रार्थना अस्वीकार की जायगी तो नेपोलियन रुष्ट हो जायगा । अतएव उसे विवश होकर गेरीवाल्डीको बाह्यत लिख देना पडा कि अब आगे नेपल्सके राजाके देश पर चढाई न कीजिए । ज्योंही यह पत्र सरकारी तौर पर रवाना हुआ, कानूरने पालेर्मो-स्थित अपने जल-सेनाधिकारी (पर्सानो ) को लिख भेजा कि आप अपनी चढाईका काम पूरा कर डालिए । नेपल्सका राजा पीटमाण्टके राजाशमे जन तव विरोध किया करता और उस राज्यकी राष्ट्रीय आकाक्षाओं की वृद्धि में बाधा डाला करता था । अतएव कारकी यह इन्छा थी कि यह कण्टक-भूत राज्यवश जितने जल्द नष्ट हो जाय,अच्छा। उसकी सिद्धिके लिए उसने ऊपर कहे अनुसार गैरीनाल्टीको केरल सन्देश ही नहीं भेजा, वरिक उसके-गैरीबाडीके- मेसिना जस्टमरुमध्यके पार करके नेपल्सके राज्यके देशमें पॉर रखनेके पहले ही नहीं बलवे पंदा करानेकी तरकीब लडा दी। इधर निक्टर इमेन्युअल्के तरकारी तौरसे आये हुए पत्र पर गैरीनाल्डीने कुछ भी ध्यान न दिया- परन्तु उसने राजाको यह सयाल भी बनानेका मौका न दिया कि गैरीनाल्टीने मेरे पनका अपमान किया। गरीबाडीने राजाके पत्रका यह उत्तर लिखा...- महाराज! श्रीमानके चरणों में मेरी फितनी सादर भक्ति है यह श्रीमानको ज्ञात ही है । श्रीमानका आज्ञा मुझे शिरोवार्य है। परन्तु इटलीकी स्थिति देखते उसका मैं सर्वधा पालन नहीं कर सकता। नेपल्सपर चढ़ाई करनेके लिए वहांके लोगोंने मुझे आह्वान किया है, कावूर। - An NAH यही नहीं वे निरन्तर तकाजा भी कर रहे है । मैंने उनसे बार बार कहा----अपने प्रयत्नकी परकाष्ठा कर दी-कि इससे अधिक अन्डा, अधिक अनुकूल, मौका आने तक आप धीरज रखिए । परन्तु फल कुछ न हुआ। इस समय यदि मैं कदम पीछे करूँगा तो मैं अपने मातृ- भूमि-विषयक कर्तव्यसे भ्रष्ट होऊँगा और उसकी स्वतन्त्रताके महत्- कार्यमें बाधा पड़ेगी। अतएव इस समय श्रीमान् मुझे एक बार अपनी आज्ञा न पालन करनेकी अनुज्ञा कृपा करके दें। अत्याचार-पीड़ित अपने देशभाइयोंकी इच्छासे प्राप्त यह कर्तव्य पूर्ण होते ही मै अपनी तलवार श्रीमानके चरणों पर रख दूंगा और फिर आमरण श्रीमानका आज्ञा- चारक सेवक बन कर रहूंगा। श्रीमानका- गैरीबाल्डी।" इस तरह राजाकी उपेक्षा करके गैरीवाल्डी नेपल्स पर चढाई कर- नेको तैयार हुआ। १९ अगस्तकी रात को उसने मेसिनाके जलडमरु- मध्यको पार करके केलात्रिया-प्रान्तमें प्रवेश किया। इस समय तक राज्यक्रान्तिकी हलचल नेपल्सके पड़ौसी बेसलिकाटा-प्रान्त तक फैल चुकी थी, फलत गैरीबाल्डीका प्रमेश होते ही आस-पासके समस्त लोगोके गरीरमे स्वतन्त्रता-देवीका सञ्चार होगया। ये बडी श्रद्धापूर्वक गैरीबाटीके आसपास जमा होगये और इस तरह स्वागत करने लगे मानो गैरीबाल्डीके रूपमें कोई देवदूत उनकी मुक्तिके लिए आया है । वहाँकै समझदार आदमियोंने घोषणा कर दी कि नेपल्सके राजा दूसरे फ्रानिममकी सत्ता नष्ट होगई और स्थान स्थान पर कान्तिकारिणी कमेटियाँ स्थापन करके शासन-कार्य चलानेका प्रवन्ध कर दिया । इसका उच्छेद करनेके लिए नेपल्सके राजाने जो सेना भेजी थी वह भी बदल कर उसमें मिल गई । इस तरह ग्लैडस्टनसाहब-वर्णित इटालियन राष्ट्रकी प्राण-प्रतिष्ठा । "जङ्गली और अत्याचार-मूलक शासन-सत्ता" की इतिश्री, आनकी आनमें, होगई । तब गैरीवाल्डोंने अपनी सेना पीछे छोड़ दी और कुछ चुने हुए जनान-सैनिक अधिकारी-साथ लेकर वह शीघ्रता-पूर्वक नेपल्म शहरको चल पडा। रास्तेमें उसका जगह जगह जयजयकार होता जाता था। यह खबर लगते ही कि गैरीगाडी नेपल्स-शहरके नजदीक आगया, वहाँके राजाके छक्के छूट गये । वह यहाँसे गेटा नामके बन्दरमें चला गया। दूसरे दिन दोपहरको अर्थात् ७ सितम्बर १८६० ईस- वीको, गैरीवाडीने बड़े समारोहसे नेपल्स-शहरमें प्रवेश किया । राजा तो वहाँसे पहले ही चल दिया था। बस सारी सरकारी इमारतें गैरी- बाल्डीके कब्जे हो गई। उस पर उसने विक्टर इमेन्युअलके झण्दे फहरा दिये । सारे शहरमें उसके नामकी दुहाई फिरवा दी और घोषणा कर दी कि सिसली और नेपल्स दोनों राज्योंका शासन भार (Dic. tatorship ) मैंने अपने ऊपर लिया है। १४–इटालियन राष्ट्रकी प्राण-प्रतिष्ठा । पिउळे प्रकरणमें कहा जा चुका है कि गैरीगाल्डीने सिसली आर नेपल्सके राज्य प्राप्त कर लिये-दक्षिण-इटली पर अपना अधिकार कर लिया । अतएव कावूरने समझा कि अब सर्व इटालियन राष्ट्रके एकी. करणका अवसर उपस्थित हो गया है और यह उन राज्योंको विक्टर इमेन्युअलके राज्यमें शामिल करनेका प्रयत्न करने लगा। मार्चेस और उम्भिया ये दो राज्य पोपके अधीन थे। पोपके शासनसे ये प्रान्त बहुत तङ्ग हा गये थे-उकता उठे थे। अतएव इन प्रान्तों पर भी चढ़ाई करके उन्हें स्वराज्यमें मिलानेका निश्चय कावूरने किया । वहकि लोगोंने कावूर। , भी, कुछ दिन पहले, विक्टर इमेन्युअल्के नामका जयघोष करके बल्वा किया था। परन्तु पोपने उसे शान्त करके उन्हें डरानेके लिए वहाँ विदेशियोंकी एक सेना रख दी । इस सेनाका अविपति था एक फ्रेञ्च सरदार-लामोरिसियर । इस सेनाने वहाँ बडा अत्याचार मचा रक्खा था। यह अवसर कावूरने अपने अनुकूल देखा और ७ सित- म्बरको विक्टर इमेन्युअलकी तरफसे पोपके पास एक वकील भेजकर कहलाया कि "मार्चेस प्रान्तमें विदेशी सेनासे बड़ी प्राणहानि हो रही है । इस ओर आपका ध्यान जाना चाहिए और उस सेनाको . वहाँसे हटानेका प्रबन्ध होना चाहिए। नहीं तो विक्टर इमेन्युअलको विवश होकर उस प्रान्तके लोगोंकी रक्षा करना पडेगी ।" कावूरका यह सन्देशा एक चाल मात्र यी । क्योंकि किसी न, किसी बहाने उन प्रान्तों पर आक्रमण करने का इरादा उसने पहलेही- से कर रखा था । यदि कावूर स्वय ऐसा विचार न करता तो बहुत सम्भव था कि गैरीबाल्डी ही चढाई कर देता । गैरीगाल्डी बडा साहसी और शूरवीर या । परन्तु उसके पास इतनी सेना नहीं थी, जो लामोरिसियरकी सेनाको परास्त कर सके। इस दशामे यदि कहीं उसे मुहकी खानी पड़े तो आज तककी कमाई व्यर्थ जानेकी तथा फ्रान्सके बीचमें कूद पडनेकी आशङ्का थी । इसके अतिरिक्त गैरीबाल्डीके द्वारा उन प्रान्तोंको जीत कर उन्हे विक्टर इमेन्युअल्के राज्यमें मिलाने की अपेक्षा म्वय विक्टर इमेन्युअलकी सेनाके द्वारा ही उनको हस्तगत करके स्वराज्यमे सन्निविष्ट करना राज- काजकी दृष्टिसे अधिक अभीष्ट या । पोपका 'रोमाग्ना' प्रान्त पिक्टर-इमेन्युअलने खालसा कर लिया था, अर्थात् पोपसे छीन कर अपने राज्यमे मिला लिया था। अतएव पोपने, कापूर, विक्टर इमेन्यु- - इटालियन राष्ट्रकी प्राण-प्रतिष्ठा । . अल और उसकी प्रजाका बहिष्कार कर दिया था। बस, पोपकी अ ठिकाने लानेके लिए यह एक अच्छा कारण मिल गया । कावृरने चढाई करनेके पहले नेपोलियनसे अनुमति प्राप्त करनेके लिए अपने दो प्रतिनिधि भेजे। इन दिनों नेपोलियन अपने नर-प्राप्त सेनाय प्रान्तमें दौरा कर रहा था । वहाँ चेन्ने नामक गाँवमें कावूरके प्रतिनिधिसे उसकी गुप्त मन्त्रणा हुई। अन्त पर्य्यन्त यह सम्भापण इतना गुप्त रखा गया कि आज दिन उसकी ठीक तारीख भी माइम करनेका कोई माधन नहीं । तथापि किंवदन्ती यह है कि नेपोलियनने उस समय हाँ हूँ करके कापूरको अपनी ही जनाबदेही पर सब कुछ करनेकी आजादी दे दी थी। तब कापूरने यह समझ- कर कि नेपोलियन कमसे कम हमारे कार्यका प्रतिकार न करेगा, जनरल काल्डिनीके सेनापतित्वमें मार्चेस और उम्त्रिया-प्रान्तोंके लिए बड़ी भारी मेना भेजी। उमने विक्टर इमेन्युअलसे कहा कि इस सेनाका आधिपत्य आप स्वय ग्रह्ण कीजिए । निक्टर इमैन्युअलने उसकी राय पमन्द की और यह सेनाके साथ हो लिया । ११ सितम्बरको इस सेनाने पोपकी सीमामें प्रवेश किया । इस समय मिर्फ इग्लैट और स्वीडन राष्ट्रोंको छोडकर शेप सव योरोपीय राष्ट्रोंने कापूरके इम कार्य पर अपनी अप्रसन्नता प्रकट की और निक्टर इमेन्युअलके दरवा. रमें अपने जो वकील थे उन्हें खुश लिया। नेपोलियन इस समय मार्सेल्समे था । उसके मन्त्रिमण्डलने उससे तार द्वारा पूछा कि अब हमे क्या करना चाहिए " पर उसने कुछ उत्तर न दिया । तत्र फ्रेञ्च मन्त्रिमण्डलो रोमस्थित अपने वकीलके द्वारा इस आक्रमण पर अप्रसन्नता प्रदर्शित कराई और कहलाया कि उसके प्रतिकारके लिए हमने हुक्म ोड दिया है । परन्तु नेपोलिपन १५८ कावूर। इस समय दुविधामे था । अतएव उसका मन्त्रिमण्डल इस योजनाके अनुसार काम न कर सका । तथापि पोपके सेनापति लामोरिसियरने काल्डानीकी सेनाका खूब ही मुकाबला किया । परन्तु अन्तमे काल्डी- नीने केस्टेल फिडारोकी पहाडी पर उसे परास्त कर दिया (१८ सितम्बर) । फिर वह आकोना शहरमें घुसा। परन्तु वहाँ भी सार्डिनियन सेनाने स्थल-जल पर घेरा डाल दिया । तब उसे लाचार होकर २९ सितम्बरको वह शहर भी उनके हवाले करना पड़ा । इसी बीच विक्टर इमेन्युअलके दूसरे सेनापति जनरल फाटाने उम्ब्रिया-प्रान्तके पेरगिया शहर पर धावा बोल दिया और ज्यों ही वह विटर्बो शहरके पास आया, उसे समाचार मिला कि रोमस्थित फ्रेञ्च सेनाकी एक पल्टनने उस शहर पर अपना अधिकार कर लिया। यह नेपोलियनकी अबूरी नीतिका परिणाम था । परन्तु अधूरे काममें कभी सफलता नहीं मिल सकती, इस नियमकी प्रतीति करानेके ही लिए मानों फाटाने फ्रेव-सेनाको हरा दिया और शहर अधिकृत कर लिया। इस पराजयके बाद लामोरिसियर खिन्न होकर स्वदेशको लौट गया। फलत सारा मार्चस-प्रान्त विक्टर इमेन्युअलके हार लग गया । यहाँसे निकल कर वह तो अपनी सेनासहित एब्रूजी प्रान्तमें प्रयाण कर रहा था और इधर गैरीबाल्डी और नेपल्मके राजाकी सेनाका घमासान युद्ध हो रहा था। ( अक्टूबर १-२ ।) गेरीनाल्डीके पास इस समय २४ हजार सेना थी । परन्तु राजसैन्यकी सरया इसकी दुगुनी थी। तथापि गैगवाल्हीके जवान जी-जान लगाकर एकदिलसे लड़ रहे थे । अतएव जीत भी अन्तमें उन्हीं की हुई । इस परार ऐसी हताश हुई कि उसने फिर उनका नाम न बाल्टी मिसली और नेपल्मका शासनकार्य से. .
इटालियन राष्ट्रकी प्राण-प्रतिष्ठा । १५९. कुछ योरोपीय राष्ट्र एक तो पहले ही गैरीबाल्टीके इन साहसपूर्ण कामोंसे असन्तुष्ट थे, इधर विक्टर इमेन्युअलको पोपके प्रान्तों पर चढाई करते देख कर और भी अधिक भडक उठे। उन्होंने कावूरके पाम निषेधात्मक-अप्रसन्नता-दर्शक-खलीतोंका ताँता बाँध दिया और आस्ट्रिया तो युद्धकी घोषणा कर देनेकी भी तैयारी करने लगा। तब कापूर बड़ी चतुराईसे योरोपियन राष्ट्रोंके इस तूफानको शान्त करनेकी कोशिश करने लगा । उसने नेपोलियनकी अधूरी सम्मति-अनुज्ञा–पहले ही प्राप्त कर ली थी। इधर ब्रिटिश वकील सर जेम्स हडसनकी महायतामे इग्लैंडकी भी सहानुभूति किम्बहुना सम्मति ही प्राप्त कर ली । इग्लैडके पर-राष्ट्र सचिन लाई जान रसेल कावूरका ही तरफदार था । उसके द्वारा कानूरने प्रशियाके राजाको भी तटस्थ-वृत्ति धारण करने पर राजी कर लिया । अब रह गये सिर्फ रूसके जार साहब । उसे अपना तरफदार बनाने के लिए आस्ट्रियाका सम्राट् विशेष रूपसे वार्सा पहुंचा था, परन्तु वहाँके लोगोंने उसका विशेप आदरातिथ्य नहीं किया । जारने पोपके लिए इटलीके झगड़ेमें पडनेसे इनकार कर दिया । तर लाचार होकर आस्ट्रियाको भी चुप बैठ जाना पड़ा। क्योंकि अब विक्टर इमेन्यु- अलके पाम इतना जन-बर और सामग्री-वल था कि अकेले आस्ट्रियाका सामना वह कर सके । फिर आस्ट्रियाको यही डर था कि नेपोलियन कहीं नीचमें ही कुछका कुछ न कर बैठे। इस तरह इस तूफानके आप ही आप शान्त होनेका रङ्ग दिखाई दे रहा था कि इतनेही- में नेपोलियनने निक्टर इमेन्युभर के कार्यका विचार करनेके लिए प्रधान योरोपीय राठोंकी परिपद करनेका प्रस्तार किया। परन्तु इस ममय इंग्टेडके परराष्ट्र मन्त्री लाई रमेलने विक्टर इभेन्युअल्के सर कार्योका मण्डन स्पष्ट शब्दोंमें करके नेपोलियनका मुँह बन्द कर कापूर। -~~-~- उसने इस विषयमें इटलीस्थित अपने वकील सर जेम्स हटसनको स्पष्ट लिख दिया कि "इटलीकी वर्तमान राज्यक्रान्ति बडी बुद्धिमानी और मन्दगतिसे हो रही है। उसमें न तो कहीं अत्याचार ही किया गया है और न कोई गैर कानूनी बात ही हुई है । इस क्रान्तिमें विधि- विहित शामन-पद्धतिके तत्वोंकी अनहेलना नहीं की गई है। बल्कि इसके विपरीत एक विभवशाली राजवाके राजपुरुपका सम्बन्ध उससे है।xx इस क्रान्तिके कारणों तथा चारों ओरकी परिस्थितिको देखते, आस्टिया, रूस और प्रशियाकी तरह सार्डिनियाके राजाके कार्य पर अप्रसन्नता दिखलानेका कोई कारण श्रीमती रानी साहिवाको नहीं दिखाई देता। बल्कि इटालियन लोगोंको योरोपीय राष्ट्रोंकी सहानुभूतिसे अपने राष्ट्रकी स्वतन्त्र इमारत बनाते देख कर रानी सरकारको प्रसन्नता ही होती है।" अगरेजी राज्यकी इस स्पष्टनीतिको देख कर नेपोलियनको भी खामोश रहना पडा । योडे ही दिनो बाद कानूरने सरकारी तौर पर प्रकट किया कि नेपल्स और मार्चेसकी घटनाओंका सम्बन्ध इटलीहीसे है। अतएव उनका निर्णय करनेका अधिकार हमीको है । अन्य राष्ट्रोंकों हस्तक्षेप करनेका प्रयोजन नहीं। इधर पर-राष्टोंमें इटलीके सम्बन्धमे इस तरह चर्चा हो रही थी, उधर विक्टर इमेन्युअल नेपल्सके लिए रवाना हुआ। कावूर चाहता था कि ये राज्य निफ्टर इमैन्युअल्के राज्यमें मिला लिये जायें । पर गैरीबाटी इस बात पर तैयार न था, अतएव उसे अप्रसन्न न करके, काचूर इस कार्यको सिद्ध करनेकी चिन्ता करने लगा। नीस शहर जवसे कावूरने नेपोलियनको दे दिया था, तबसे गैरीवाल्डी उससे बहुत नाराज रहता था । तथापि कावूरके हृदयमें उसके प्रति पूर्ण आदर,था और गैरीवाल्डीकी महत्त्वपूर्ण देश- मेगा पर भी उसका ध्यान या । अतएव उमने विक्टर इमेन्युअलको.
इटालियन राष्ट्रकी प्राण-प्रतिष्ठा । खास तौर पर लिखा कि " गैरीबाल्डीसे मिलते समय बडे सन्मानपूर्वक उससे व्यवहार कीजिएगा।" * इसके सिवा वह यह भी चाहता था कि उसके सैनिकोकी देश-सेवाके उपलक्ष्यमें कृतज्ञता-पूर्वक उनका सत्कार. किया जाय । इसके लिए उमै अपने सैनिक अधिकारियोंसे चड़ी कड़ी वहस करनी पड़ी । परन्तु गैरीवाल्डी कापूरके हृदय और उसके रहस्यको न जान पाया था । अतएन वह वरावर उसके खिलाफ आवाज उठाता रहा । कापूरकी यह सलाह कि सिसली और नेपल्म विक्टर इभेन्युअलके राज्यमें सम्मिलित कर लिये जाये, माननेके लिए यह तैयार न होता था। तब कापूरके कुछ मित्रोंने यह सलाह दी कि गैरीबाल्डीको अपनी इच्छा तृप्त करनेके लिए कुछ दिनों तक एक-मूत्री शासन करनेकी अनुज्ञा पार्लियामेंटसे दिला दीजिए, परन्तु कावृरने ऐसा करनेमे साफ इनकार कर दिया। उसने कहा में अपने शीलको भन न करूँगा । जन्मभर मैंने जिन तत्त्वोंके अनुमार आचरण किया है उनके विद्ध मैं व्यवहार न करूँगा । मैं स्वतन्त्रताका उपासक हूँ और उसीके पुरस्कारके बदौलत मैं आज इस महत्त्वको प्राप्त हुआ हूँ। अतएव मेरे हाथों ऐसा काम कदापि न होगा जो स्वतन्त्रताका निघा- तक हो।" कावूरके इन वचनोस यह अच्छी तरह जाना जा सकता है कि विधि-निहित राजनैतिक सतन्त्रताका वह कितना कट्टर अभिमानी था ।x इधर निश्चयके अनुसार विक्टर इमेन्युअल नेल्स जा पहुँचा । उसो लिगा-“गैरीबाल्टी मेरा बड़ा शत्रु बन गया है, परन्तु उसका पूरी तरह सन्तुष्ट हो जाना इदलीके कल्याण और महाराज गौरतको दृष्टिमे अभीष्ट है।" ४ कावूर लोक-मियन्त्रित शासन पद्धतिका पार्लभटरी गमिट कायदा उपासक और फार अमिमानी था। एक बार उसने कहा था “प्रामानिक और उद्योगी–वर्तव्य-क्षम मन्त्रिमण्डलको इम पद्धनिसे उमा पुछ भा पा.-११ १६२ 'कावूर। तब गैरीबाल्डीने आदर-पूर्पक उससे मुलाकात की और उसने में उसका यथोचित सत्कार किया । परन्तु राज-काजकी-शासन-विष यकी-बातचीत छिड़ते ही गेरीवाडीने उससे प्रकटरूपसे अनुरो किया कि आप कावूरको पदच्युत कर दीजिए । अपने प्रति गेरीबा ल्डीके सदृश मनुष्यके इस प्रकार प्रकट रूपसे अनादर और अविश्वास प्रकट करने पर कावूर खामोश न रह सका। उसने तत्काल ही पार्लिया. मेण्टका अधिवेशन किया और कहा कि-" गैरीबाल्डीके सदृश प्रत्यार देशभक्त मनुष्यने हमारी कार्यक्षमता पर अविश्वास प्रकट किया है अतएन इस बातका निर्णय होना आवश्यक है कि हम अपना काम आगे बढ़ायें या इस्तीफा पेश करें।" तब पार्लियामेण्टने प्रकट किया कि आप पर हमारा पूर्ण विश्वास है। तदुपरान्त उसने यह प्रस्ताव सभामें पेश किया कि दक्षिण और मध्य इटलीके जो राज्य बहुमतसे प्रयोजन नहीं। यह तो बड़ी अच्छी चाज है । फिसी भी पक्षके मूलगामी रोगा- की धमकियोंकी परवा न करके शासन कार्य सुचारुरूपसे चलायेमें इस पद्धतिका वहा उपयोग होता है। १३ वर्षोंके अपने अनुभवसे मेरा यही मत पका हो गया है । कारके एतद्विषयक भाषणकी प्रतिमा, रेट्रो ओसी नामके कावूरके एक चरित्र लेखकने इस प्रकार सींची है- अन्य शासन-शैलियोगी तरह लोकनियन्त्रित शासन-प्रणालीम भी बाधायें और कठिनाइयाँ होती है, परन्तु, इन त्रुटियोंके होते हुए भा अन्य सभा शासनप्रणालियोंकी अपेक्षा यह बेहतर है । हाँ, कुछ विशेष प्रकारका निरोध मुझे बिलकुल मन नहीं होता और में उसका बल-पूर्वक प्रतिकार करता है। परन्तु उसके विरोधका परिणाम मेरे अनुकूल ही होता है । क्योंकि उससे मुझे अपने विचार अधिक स्पष्ट रूपसे प्रकट करनेमे और जमताको सम्मति प्राप्त करनेमें दुगुने बलसे प्रयत्न करना पड़ता है। अनियन्त्रित मन्त्री तो आज्ञा करता है परन्तु नियन्त्रित मन्नीको लोगोको अपने अनुकूल नाना पड़ता है। मेरी इच्छा सदा रहा करती है कि लोगोंको यह समझाकर निश्चय क्ग कि मेरा भाग अच्छा है। 1 इटालियन राष्ट्रकी प्राण प्रतिष्ठा । १६३ निक्टर, इमेन्युअलके राज्यमें शामिल होनेको तैयार हों उन्हें अपने राज्यमें मिला लिया जाय । सभामें यह प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। (१ अक्टवर ।) अर्थात् कावूरने गैरीबाल्डीको मात कर दिया । तब गैरी- बाल्डीको भी होश हुआ। उसने अपने परामर्षदाताओंको बुलाया और उनकी राय पूछी। फिर अपने ही हाथोंसे चिक्टर इमेन्युअलको खलीता लिख भेजा कि ये प्रान्त आप अपने राज्यमें जोड़ लीजिए। इस तरह गैरीवाल्डीने अत्यन्त साहस और कठिन परिश्रमसे प्राप्त दोनों प्रान्त आनकी आनमें निस्स्वार्थ-भावसे विक्टर इमेन्युअलको अर्पण कर दिये। विक्टर इमेन्युअलने उसे बडी पदवी, जागीर, जहाज और सम्पत्ति देना चाही, पर उसने इनमें से किसीका भी स्वीकार न किया । जैसा आया वैसा ही खाली हाथ अपने घर लौट गया । इतना निस्सीम स्वार्थत्याग और अपरिमित देशभक्ति बहुत कम लोगोंमें मिलती है । गैरीबाल्डीकी इस निस्वार्थ देशसेवाके कारण उसकी कीर्ति समस्त योरप खण्डमें फैल गई और मृत्युके पश्चात् भी उसका नाम अजरामर हो गया। कानूर गैरीबाल्डीकी चित्तवृत्तिको अच्छी तरह जानता था। उसे पह- चानकर ही उसने उसे इस प्रकार अपना कथन स्वीकार करने पर विवश किया । इसमें कापूरको सफलता भी मिली, जिससे उसके दिलको बड़ा सन्तोष हुआ। गेरीवाल्डीके अपने घर ( कैप्रेरा टापू) चले जानेके बाद कावूर कुछ दिनके लिए नेपल्स गया । वहाँके लोगोंने उसका बड़ा सत्कार किया। फिर शीघ्र ही, मार्चेस, उनिया, सिसली और नेपल्मके लोगोंके मत लिये गये। चारों प्रान्तोंका बहुमत हुआ कि विक्टर इमेन्युअलके राज्यमें हम शामिल कर लिये जायें। तत्र नवम्बर १८६० ईसवी में वे वाकायदा स्वराज्यमें सम्मिलित किये गये। इस तरह, कावूरकी इच्छाके अनुसार उसीके हाथों इटली राष्ट्रका. .
कार। , । करण हो गया । कावूरने अपनी कल्पनाके अनुसार इटालियन राष्ट्रका निर्माण तो किया, परन्तु अभी उसमें दो तीन कण्टक विद्यमान् थे। और जब तक वे चूर्ण न हों, कावूरको तसल्ली न होती थी कि राष्ट्र- निर्माण कार्य पूर्ण हो गया । पहला, कण्टक था पोप । उसके अधिकारमें रोम और उसके आसपासका बहुतसा भाग वाकी बच रहा था । दूसरा शल्य था नेपल्सका राजा । वह अभी गेटा-बन्दरमें नेपोलियनके आश्रयमें था। किस समय वह नेपोलियनकी सहायतासे उठ खड़ा होगा, इस बातका निश्चय नहीं था। इस लिए कापूर पहले उसीकी दवामें लगा । उसने अपनी सेनाके द्वारा जल और स्थल दोनों मार्गसे उस वन्दरको घेर लिया और शहर पर कब्जा कर लेनेका प्रयत्न शुरू कर दिया। ब्रिटिश सर- कारने नेपोलियनको समझा बुझाकर कहा कि अब आगेसे इटालियन लोगोंके रास्तेमें व्यर्थक विघ्न न उपस्थित कीजिएगा। तब उसने गेटा-बन्दरसे अपनी जल-सेनाको बुला लिया, जो नेपल्सके राजाकी रक्षाके लिए उसने वहाँ रक्खी थी। इसके थोड़े ही दिन बाद नेपल्सका राजा फेन्सिस, नेपोलियनकी रायसे, एक फ्रेञ्च जहाजमें बैठकर पोपके राज्यमें चला गया। इस तरह यह कण्टक निर्मूल होकर गेटा-बन्दर विक्टर इमेन्युअलके अधीन होगया । (१३ फरवरी १८६१ ईसवी ।) सेनिक दृष्टि से यह बन्दर अत्यन्त महत्वपूर्ण या । इसके हस्तगत हो जानेसे कारकी एक चिन्ता, दूर हुई । तीसरा कण्टक था-वेनि- शिया प्रान्त । यह प्रान्त अभी तक आस्ट्रियाके ही अधीन था। रोम और वेनिशिया इन कण्टकोंका निर्मूलन आसान नहीं था । अतएव इस कामको उसने आगे पर छोड़ दिया और उनको छोड कर अन्य दयन राष्ट्रोंकी नवीन पार्लियामेष्ट बनानेके उद्योगमें वह लगा।
इटालियन राष्ट्रकी प्राण-प्रतिष्ठा। इटलीका नकशा निकालकर देखिए। पश्चिमी और रोम शहर है और उसके आसपास एक छोटासा प्रान्त है। यही पोपके अधीन था । उत्तरको और आस्ट्रियाकी सरहदसे लगा हुआ वेनिशिया अर्थात् वेनिसका प्रान्त है । यह आस्ट्रियाके कब्जेमें था । इन दो डोटेसे प्रान्तोंको छोड़कर शेष सारा इटली देश अब विस्टर इमेन्यु- अलकी छत्रछायामें आगया था। उस समस्त राज्यको" इटालीके राध्य " सज्ञा दी गई । फिर १८ फरवरी, १८६१ ईसवीको टयूरिनमें समस्त इटालियन राष्ट्रोंकी पहली पार्टियामेण्ट सभा हुई जिसमें प्रकट किया गया कि यह राज्य विक्टर इमेन्युअलके शासनाधिकारमें किया गया है । इस समय इस सभाके सभासदोंकी संख्या ४४३ तक बढ़ गई थी । इटलीके प्राय सभी प्रख्यात पुस्पोंका समावेश उसमें किया गया था । कार्यारम्भ होनेके पहले प्रथम विक्टर इमेन्युअलका प्रास्ताविक भाषण हुआ। उसमें उसने आज तकफी घटनाओंका घोड़ेमें सिंहावलोकन करके कहा कि इटालियन राष्ट्रकी भव्य इमारत खडी करनेका काम मेरी जिन्दगीहीमें पूरा होगया, इस बातकी मुझे बड़ी खुशी है । फिर उसने उन सजनोंके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापन की जिन्होंने इस काममें परिश्रम किया और सहायता दी थी। उसमें उसने इंग्लैंडके प्रति अपना बहुत आदर-भार व्यक्त किया !* " इग्लैंड स्वतन्त्रताको मातृ-भूमि है । वहाँकी जनता और सरकारने अपनी उन्नति आप ही कर लेने ( Arbiter of one's fate ) का स्वत्व बड़े उदारता पूर्वक (Nobly ) स्वीकार किया है और हमारे काममें सहायता देनेमें भी उन्होंने उदारतासे काम लिया है। इसके लिए उनके प्रति हमारा कृतज्ञता-भाव अविचल रहेगा।"-पीट्रो ओसी लिखित कावूरका बरिन, पृष्ठ ३२७।
कापूर। आजतक विक्टर इमेन्युअलफ नामके साथ 'सार्डिनियाके राजा' यह मामूली खिताब लगाया जाता था । पर अब उसे 'इटलीके राजा' पदवी धारण करना आवश्यक था । अतएव 'इसके लिए एक बिल अर्थात् कानूनका मसविदा सभामें पेश किया गया । उसीमें इटालियन राष्ट्रकै एकीकरणका भी उल्लेख था। पर कानून समस्त मुख्य इटालियन लोगोंकी इच्छाके अनुसार पेश किया गया था । अतएव उसकी भाषामें ही थोड़ी बहुत काट-छाँट होकर १४ मार्चको वह सेनेट और चेम्बर दोनों सभाओंमें एकमतसे पास हुआ। १७ मार्चको उस पर राजाने अपने हस्ताक्षर किये और वह वाजान्ता कानून माना गया । विक्टर इमेन्युअलको नोवेराके पराजयके पश्चात् खिन्न दशामें पीडमाण्टकी गद्दी स्वीकार किये आज कोई १२ वर्ष हो गये थे। इतनी अवविमें मैं समस्त इटलीका अधिपति होजाऊँगा,इसका खयाल भी उसे न हुआ होगा। उसकी इच्छा और महत्त्वाकाक्षा तो थी कि इटालि- यन राष्ट्रका एकीकरण हो । परन्तु जिस समय वह सिंहासनारूढ हुआ उस समयकी, परिस्थिति बड़ी निराशाजनक और विकट थी। उससे पार पाकर अपने जीवन-समयमें ही यह शुभ दिन देखना मिलेगा, इसका निश्चय उसे अवश्य ही न था । सय कावूर भी यह नहीं जानता था कि यह सुदिन इतना शीघ्र उदय हो जायगा । परन्तु उसके सदृश मुयोग्य राज-काजी मनुष्यके परिश्रम और भाग्य की अनुकूलता इन दोनोंके योगसे, जो उसे एक ही समयमें प्राप्त हो गये थे, चिक्टर इमैन्युअल अपने जीवनमें ही अपनी महत्वाकाक्षाको सफल देख सका । अस्तु । परन्तु इटालियन राष्ट्रका स्वतन्त्र राज्य स्थापित हुआ देख पोप और आस्ट्रियाके सम्राटको बड़ा सन्ताप हुआ। आस्ट्रियाके पत्रोंने तो बड़ी अपमानजनक भाषाके द्वारा अपने द्वेष.
इटालियन राष्ट्रफी प्राण-प्रतिष्ठा । के फूत्कार प्रकट किये । परन्तु पोपप्रान्तीय और वेनिशियाके लोगोंने नूतन इटालियन राष्ट्रका हृदयसे अभिनन्दन किया । इसी बीच इग्लैंडने भी इस नव-स्थापित राज्यको स्वीकार किया । उसके पश्चात् शीघ्र ही अमेरिका और स्विजरलैंडने भी उसे स्वीकार कर लिया। नवीन राज्यकी स्थापना होने पर वैध शासनपद्धतिके शिष्टाचारके अनुसार कापूरने अपने सहित अपने मन्त्रि-मण्डलका इस्तीफा दिया । निक्टर इमेन्युअल्को काबूरका अभिमान सहन न होता था । अतएव केनल शिष्टाचारके लिए दिये गये कावूरके क्षण-कालीन इस्तीफेको उसने सदाके लिए मजूर करके वैरन रिकाजोलीको प्रधान मन्त्रीका पद देनेकी योजना की । परन्तु उसने राजाको यही सलाह दी कि आप कावरको ही फिरसे प्रधान मन्त्री बनाइए । तब उसने कावूरको ही कहा कि नये मन्त्रि-मण्डलका सङ्गठन कीजिए । कापूरने पहलेसे ही सगठन कर रक्खा या । इस बार उसने अपनी तरफ पर-राष्ट्र- विभाग और जल-सेना-विभाग दोनोंका काम रक्खा था। उसके अभीष्ट कार्यका अत्यन्त विकट और कठिन समय अब बीत गया था। और पिछले कामोंके बदौलत सारे योरप-खण्डमें राज-काजीके नामसे उसका गौरन और महत्व भी बहुत बढ़ गया था। उसकी कार्य- क्षमता पर उसके देश-भाइयोंका पूरा विश्वास हो गया था । उसे स्वय भी अपने बुद्धिसामर्थ्य पर पहलेसे अधिक विश्वास हो चला था। इस दशामें उसके देश-बन्धुओंको तथा स्वय उसे भी यह जान पडता था कि वेनिगिया और रोमका प्रश्न भी सहज ही हल हो जायगा। कोसुथ नामके एक हङ्गेरियन देश-भक्तसे उसने एक बार कहा था- "मेरे और राजाके इच्छानुसार यदि परमेश्वरकी भी इच्छा होगी तो आगामी जाड़ेमें-कमसे कम एक वर्षके भीतर--बेनिशिया .
कावूर । - अधीन हो जायगा और हङ्गेरी स्वतन्त्र होगा।" इसके थोड़े ही दिन वाद बेनिशियन देशभक्त डेनियल मानिनके स्मारकमें टयूरिनमें एक उत्सम हुआ । कावूर यह दिखलानेके लिए कि निशियन लोगोंका खयाल उसे है, उस समारम्भमें उपस्थित हुआ। इसके सिवा आस्ट्रियाके पसे वेनिशियाको छुड़ानेके लिए उसने प्रशियाके सम्राटसे कुछ गुप्त मन्त्रणा भी आरम्भ की थी । रोमके लिए तो उसने और भी ढीठतासे काम लिया। परन्तु दुर्दैववश, उसी वर्ष, उसका देहावसान होगया। अतएव उसकी यह इच्छा मनकी मनहीमें ' रह गई ! १५-कापुरका अन्तिम साहस और स्वर्गवास । रोम-रूपी कण्टक यद्यपि बिकट था तथापि उसे निर्मूल किये बिना इटारियन राष्ट्रका सङ्गठन स्थायी नहीं हो सकता था। दक्षिण-इटलीके राज्य निक्टर इमेन्युअलके अधिकारमें आनेके पहले ही उसने टयूरिनकी, पार्लियामेण्टमें रोमको हस्तगत करनेकी आवश्यकता स्पष्ट शब्दोंमे प्रकट की थी । यही नहीं, इटालियन राष्ट्रकी पहली पार्लियामेण्ट भी इसी बात पर अधिक ध्यान दे, इस लिए उसने चेम्बरमें एक प्रस्ताव भी उपस्थित किया । उसका आशय यह था कि रोम-नगर इटालियन राष्ट्रकी भावी राजधानी बनाया जाय ! इस प्रस्तार पर उसने जो भाषण किया वह देशमें बहुत विख्यात हो गया है । कावूर दर्शकों- उपस्थित जनसमाज-की कल्पनाशक्तिको प्रज्वलित करके तालियाँ पिटवानेवाला वक्ता न था। उसका व्याख्यान सदा विचार-परिप्लुत, उदात्त और गम्भीर तथा तर्क शास्त्रसम्मत होता या। अतएव विचार- शील लोगों के हृदय पर उसका विलक्षण प्रभाव पटता था । उनका कापूरका अन्तिम साहस और स्वर्गवास । wwwmMN wran - चित्त झट उसकी बात स्वीकार कर लेता था। उसकी भाषा आलकारिक न होती, परन्तु आत्म-प्रत्यय और आत्म-विश्वासके तेजसे सनी हुई ही होती थी । प्रत्येक विपयका निवेचन कार्य- कारण-परम्पराके अनुसार सुद्धल होता था। अतएव, उसके व्याख्यानोंका प्रभार क्षणिक नहीं, दीर्घकालिक होता था-बहुत दिनों तक रहता था। अपनी इस शैलीका अनुसरण करके कावूरने पार्टि- यामेण्टको दिखला दिया कि " रोम शहर जब तक इटलीकी राज- वानी न होगा, राष्ट्रकी एकता स्थायी न होगी।" अपनी जन्म- भूमि टयूरिनको छोड़कर रोमको जाना यद्यपि उसे अच्छा न मालूम होता था, तथापि ' रोम' के दो अक्षरोंमें २५०० चौंका देदीप्य- मान इतिहास भरा हुआ था । इटालियन राष्ट्रसे उसका अति निकट सम्बन्ध था। अतएव नैतिक और राजकीय दृष्टिसे यही शहर उस राष्ट्रकी राजधानीके उपयुक्त उसे ऊँचता था। रोम शब्दमें भग हुआ जादू अथना उसके विषयमें इटालियन लोगोंकी, नहीं सारे संसार की, विशेष भावना ही मानों इटालियन राष्ट्रका प्राण यी । रोमके चिना इटालियन राष्ट्र निर्जीव है । उसे सजीव करके चिरस्थायी बनाना चाहिए । पर इसके लिए रोमको राजधानी बनाना अत्यन्त आवश्यक था । और इसी बात पर काबूरने पार्लियामेण्टका ध्यान आकर्षित किया । रोमको हस्तगत करनेके लिए पोपकी सत्ता नष्ट करना अनिवार्य था । और कापूर बहुत दिनोंसे उसे निर्मूल करने- की फिकरमें भी था । उसका कहना था कि धर्मसत्ता और राज- सत्ता एक दूसरेसे अलग रहनी चाहिए। उसका सयाल था कि धार्मिक स्वतन्त्रता मिलने पर लोग अधिक धर्मनिष्ठ होंगे---धर्म-कार्य अच्छी तरह होगा । उस भाषणमें कायूरने इस वातका भी 10 दिया था। प्रनवर बन गह-विकलार बन्न, २७ मात्र, १८०१ मत्री, ने पाठियानेन्द्रले बेबाने वह प्रायः एकमत- में पास हो गया। परन्तु टम बटनाने पडे ही कारने पोर और नेपोलियनसे गुप्त ने बातचीत शुरू कर दी थी। उसे निश्चय या जि मुझे सफटता भी मिलेगी ! पत्नु भवितव्यता बुह गैर ही विचारमें थी। अतएन दत कार्य सिद्धि प्राप्त करनेका लेगर उते न मान हुला । इन्हीं दिनों पाठिमाग एक न दर पेत घो। गैरीवाल्डीके जिन स्वय. सैनिकोंने इवलियन राजे सारन्के हिरकपन खून बहाया था, उनका पित पर AIR करके स्नते का चोरों सैनिक पद देनेन देने के सम्म निचार हो रहा था । । । था कावूरका अन्तिम साहम और स्वर्गवास । तो कानूरने शान्तिपूर्वक सहन कर ली। परन्तु जब उस पर देशमें विरोध फैलानेका आरोप किया गया तब वह चुप न बैठ सका। वह भी कुछ कम उम्र न था, तुरन्त ही इस आरोपका उत्तर देनेको उठ खड़ा हुआ। उस समय सर सभासदोंमें सनसनी फैल गई। वे डरे कि इन दोनों महान् देशभक्तोंमें कहीं ठनाठनी न हो जाय । परन्तु कावूर अच्छी तरह जानता था कि गैरीबाल्डीसे ठनाठनी होनेसे उसका परिणाम इटलीके लिए हानिकारक होगा । अतएव यह सिर्फ उसके आरोपका निषेध भर करके शान्तिपूर्वक बैठ गया । कावूरका स्वभार यद्यपि उन था तथापि यह था राजकाजी आदमी । अपने क्रोधको रोकनेमें वह बहुत कुछ सिद्ध-हस्त था। उसने इस समय पूरी सहन-शीलताका अवलम्बन करके गैरीबाल्डीको खूब मनमाना बोलनेका अवसर दे दिया। गैरीबाडीके भाष्णकी समाप्ति के बाद बड़े शान्त और गम्भीर भावसे उसने उत्तर दिया । आरम्भमें उसने कहा--" गैरीबाल्डी साब जो मुझसे मनमुटाव रखते हैं उसका एक कारण है। वह मुझे भी ज्ञात है। परन्तु जिस बातसे—सेवाय और नीस प्रात फ्रान्सको देनेकी सलाह राजा और पार्लियामेंट सभाको देनेसे. वे अप्रसन्न है उसे मैंने एक अत्यन्त खेदजनक कर्तव्य समझकर किया है। इससे स्वय मुझे जो दुख हुआ उससे मैं अनुभन करता हूँ कि गैरीगाल्डी साहनको कितना दुख होता होगा। इस घटनाके लिए यदि उन्होंने मुझे न क्षमा किया तो मैं उन्हें दोप न दूंगा।" फिर उसने गैरीनाल्डीके आक्षेपोंका यथोचित खण्डन किया। गैरीबाल्डी और काबूरके इस बेबनानको देखकर विक्टर इमेन्यु- अलको बड़ा दुख हुआ। उसने दोनों सजनोंको अपने राज-प्रासादमें चुलाकर उनमें मेल करा दिया। उस समय कापूरने गैरीनाल्डो - १७२ कार।। - सामने दिल खोलकर इस बातका स्पष्टीकरण किया कि आस्ट्रिया और फ्रान्सके साथ व्यवहार करनेके लिए किस नीतिका अवलम्बन किया गया है तथा आगे किया जायगा । तब गैरीबाल्डीके भी गले उसकी बात उतर गई और उसने कावूरका कार्य-क्रम पसन्द किया । इस तरह इन दो प्रख्यात और कार्य-क्षम देशभक्तोंके हृदयका पारस्परिक वैमनस्य दूर हो गया । इसके थोड़े ही दिन बाद ( १८ मई १८६१ ईसवी) गैरीबाल्डीने कावूरको इस आशयका पत्र लिखा--- " विक्टर इमेन्युअल इटलीके बाहु और आप इटलीके मस्तक हो । आपके विशाल सामर्थ्य पर और देशहित करनेकी दृढ़ इच्छा पर भरोसा रखकर मैं इस बातकी बाट जोहता रहूँगा कि कब मुझे फिरसे समरभूमिके लिए आह्वान हो ।" इससे कावूर और गैरीगाल्डीकी आत्मसान्त्वना---दिलजमई तो हो गई, परन्तु देश-हितार्थ उसका उप- योग करनेके लिए कापूर बहुत दिनों तक संसारमें न रहा । इटलीके राष्ट्रका सङ्गठन करके उसका एकछत्र राज्य किया जाय, इसके लिए पिछले १२ वर्षों तक उसने जो प्राणपणसे परिश्रम किया उससे कावरका स्वास्थ्य खराब हो चला था और उसके लक्षण स्पष्ट रूपसे उसके चेहरे पर देख पड़ने लगे थे। तथापि उसे यह खयाल न था कि मै इतनी जल्दी चल बसूंगा । वह समझता था कि रोम-शहरको इट- लीकी राजधानी बनानेके बाद मेरा स्वीकृत कार्य पूर्ण होगा और उसे मै पूर्ण कर सकूँगा-उतने दिन मैं जीऊँगा । तथापि उसका स्वास्थ्य दिन पर दिन बिगड़ता ही गया। उसे व्यायाम या मनोरजनकी आदत न थी। मनोरमक साहित्यसे भी उसे विशेष प्रेम न था । उसका सारा ध्यान एक मात्र इटालियन कार्यकी ओर ही लगा रहता था । दिन रात उसके दिमागमें यही विचार धूमा करता था । उसकी सिद्धिके फापूरका अन्तिम साहस और स्वर्गवास । १७३ - लिए वह मन-वचन फर्मासे निरन्तर उयोग किया करता था। कमी उसका चित्त स्वस्थ न रहा-उसे निघाम न मिला । उसका स्वभाव कुछ उग---क्रोधी पा। अतएव वह किसी भी कार्यको तत्काल कर डाल्नेका आदी हो गया था। इससे उसके गनको बहुत परिश्रम करना परता था । यह काम वद जाने पर तो उसके मस्तिष्क पर अधिक ही मोझ पड़ने लगा । इससे, आगे चल कर, उसे रातमें गाढ़ी नींद न पड़ने लगी । बिछौने पर पड़े रहते भी उसके दिमागमें निरन्तर विचा. रोंका तूफान उठा करता था । उसको रोकनेके लिए यह जहाँ नींद न आई कि कमरेमें कुछ देर टहलने लगता और थोड़ी देरके बाद फिर सोनेकी कोशिश करता । परन्तु इसका भी विशेष फट न होता था। पल भर आखें लगी या न लगी कि फिर विचारों- का तूफान उठ खड़ा हुआ । इससे वह भी जान गया था कि मेरे मस्तिष्ककी अवस्था अच्छी नहीं है। उसने अपने मित्र केस्टेलीसे कहा भी था कि अब मेरा दिमाग मेरे वसका न रहा । पर उसने विश्राम ग्रहण न किया, या यों कहिए कि विश्राम-प्रहणकी गुजा- यश ही उसे न थी । दक्षिण इटलीके राज्य उसके अधीन हो जाने पर उसकी झन्झटें और भी बढ़ गई थी । रोज एक न एक नवीन विषय उपस्थित होता था और उसका मन व्या हो जाता था। ऐसे समय भला विश्राम ग्रहण करनेकी बात उसे कैसे अच्छी लगती ! पार्लियामेण्टके अधिरेशनों में वह कभी गैरहाजिर न रहता था। महत्त्य- पूर्ण कार्य वह कभी अपने मातहतों ( Subordinates ) को न सोपता था। निद्रा नाशके कारण उसके मस्तिष्क पर बहुत जोर पड़ रहा था । परन्तु इसी स्थितिमें वह चार महीने और घसीट ले गया तब मईके उत्तबर्ष में उसके म्यमान और व्यवहार में फर्क पड़ने लगा। उसके चेहरे कावूर। mmarANAA-Aar AN A - क्षीणताकी छाया पहले ही पड चुकी थी। अब उसका स्वभाव चिदचिद और उतावला हो गया। अब विपक्षकी टीका--आलोचना-उसे सहन न होने लगी। पार्लियामेण्टको बहसोंमें उसका सिर घूमने लगता । एक दिन पूर्वोक्त सभामें अपने स्थान पर बैठे हुए उसने कहा- "इटालियन राष्ट्रका एकीकरण हो जाने पर देशके अलङ्कारशास्त्रके अध्यापकों के समस्त पद तोड़ देनेका एक विल अर्थात् कानूनका मसविदा मैं पार्लियामेण्टमें पेश करनेवाला हूँ।" उसी दिन अर्थात् २९ मईकी शामको, उसे जोरका बुखार भाया । उसका गृह-वैद्य वहाँ मौजूद न या। दूसरा डाक्टर बुलाया गया । कावूरने उससे विशेष प्रकारके औषधोपचार करनेको कहा । तदनुसार कोई चार दिनोंमें पाँच बार उसके शरीरसे खून निकाला गया । तब उसे कुछ आराम मालूम होने लगा। इसी समय उसने सरकारी काम-काज देखनेकी इच्छा प्रकट की और घर पर कौन्सिल्के मेम्बरोंको बुलाया। कौन्सि के सभास- दोंको भी उसकी तबीयत कुछ अच्छीसी मालूम हुई। अतएव उन्होंने भी कुछ आपत्ति न की घण्टों वह उनसे बातचीत और काम- काज करता रहा । इससे तबीयत फिर गिरने लगी । दूसरे दिन पह- लेमे भी जोरका बुखार चढ़ा । एक दो दिनके बाद तो तबीयत बहुत ही खराब हो गई। वीचमें वह बर्राने लगा-सन्निपात हो गया। इसी दशामें वह सहसा चिल्ला उठा-" राजा साहबको बुलाओ।" पास आनेवाले लोगोंको वह पहले तो पहचान लेता, परन्तु फिर धीरे धीरे भूलता जाता । उसकी बीमारीकी खबर तत्काल सारे शहरमें फैल गई । मुनते ही झुण्डके झुण्ड लोग उसके मकानके आस-पास जमा हो गये। तबीयतका हाल जाननेके लिए सब बड़े चिन्तित थे। पर हालत खराब ही होती गई। यह देखकर उसके घरके लोगोंने काबूरका अन्तिम साहस और स्वर्गवास " अन्तिम धर्म-संस्कारके लिए मा गायकोमो नामक धम्मोपदेशकको बुलाया । उसी दिन अर्थात् ५ जूनकी शामको, विक्टर इमेन्युअल भी उसको देखने आया। विछौनेके पाम आते ही कावूरने उसे पहचान लिया और यह चिल्ला उठा-0 Maesta (स्वामिन् ) परन्तु फिर उसे भूलता गया। राजा उसको सान्त्वना दे रहा था। बीचहीमें उसने उन्हें रोककर कहा-" यह नेपोलियनकी सेना यहाँसे हटा देनी चाहिए । * इतना कहने पर फिर उसने हुक्म दिया कि 'हमारा सेक्रेटरी कर सबेरे पाँच बजे काम-काज लेकर यहाँ आये।" फिर कहा समय खोना अच्छा नहीं।" इसी तरह लगातार बकता- बर्राता था। अपने जीवनमें जो जो काम उसने किये और जिन कामोंको आगे यह करना चाहता था उन्हींके सम्बन्धमें वह बकता झकता था । दूसरे दिन, ६ जून १८६१ ईसवाको, सबेरे मानों मै पार्लियामेण्ट सभामें मन्त्रीके नातेसे भाषण कर रहा हूँ इसी खयालमें वह वर्ग रहा था कि एकाएक बेहोश हो गया । जबान बन्द हो गई। इसके दो घण्टे बाद उसने इस भूलोकको त्याग दिया। विक्टर इमेन्युअलकी इच्छा थी कि दफन-विधि वहाँ कराई जाय जहाँ राजनशके लोग दफनाये जाते है । परन्तु कावूरने यह इच्छा दिखलाई थी कि मेरे घरानेके लोग जिस जगह (अर्थात् सेंटेना नामके गॉनमें) टफनाये जाते हैं वहीं मेरा शन भी धरा-शायी किया जाय । यह मालूम होनेपर राजाने कावूरकी इच्छाके ही अनुमार उसकी अन्त्येष्टि- क्रिया होने दी। * १८४८ इसवीका क्रान्ति-कारक हलचलके उपरान्त नेपोलियनको बहुतसी सेना पोपकी रक्षाके लिए रोम गहरमें पड़ी हुई थी। उसे हटालेने के लिए कावूरने नेपोलियनमे लिखा पती शुरू की थी। इसीका सङ्केत इस उद्गारमें पाया जाता है।
काबूर। - - कावूरकी असमय मृत्युसे इटालियन राष्ट्रकी वडी भारी हानि हुई। उसका सोचा हुआ काम यद्यपि प्राय: पूर्ण हो चुका था तथापि सभी रोम और वेनिस ये दो प्रान्त स्वराज्यमें मम्मिलित न हो पाये थे। इतना फाम बाकी ही था। उसकी पूर्तिके लिए यदि यह जीवित रहता तो पिर उसके आनन्दका क्या पूछना या उसकी मृत्युके बाद उसके देश भाइयोंने भी रहा-सहा काम पूरा किया ही, परन्तु और दस वर्षों के बाद । कापूर होता तो बहुत जल्दी और बड़ी कुशलतासे कर डालता। कोई एक ही वर्षके भीतर वेनिस ले टेनेकी वह हिम्मत रखता या । रोगकी समस्या भी दान पेंच टगाकर यह शीघ्र ही पूरी कर डालता । उसकी मृत्युके पश्चात् सङ्गठित हुए मन्त्रिमण्टलने पहले हारेन्स शहरको अपनी राजधानी बनाया, फिर रोमको । कावूर सीधा रोमहीमें पहुँच जाता । उसके चरित्रका परिशीलन करनेवालोंका यही अभिप्राय है। भरत । इममें सन्देह नहीं कि राजनीतिज्ञ, गज-काजी और कार्यक्षम गनु- ध्यके नाते कारकी योग्यता तत्कालीन सर्य राज-काजियों की अपेक्षा अरिक बढ़ी घड़ी थी। उसके गशीय गन और अनुभवी गज-- फाजी मिन्स मेटनिन ( आस्ट्रिपन गनी ) ने तो एक बार गहों तक फा था फि योरपरामें इस समग उसकी जोड़या कोई मग तिज पुरुष नहीं। उसफेहान्तके आपदा पापियामेण्ट हलिके मनी लाई पागस्टनने भी दमका गुणगान किया धा। नीरको दृष्टिसे भी फायूग्णी योग्यता यात पड़ी नही भी। दस हाथों अशम्पार मला भी। पर उसने टमका की दरयोग मसिदा । यही नी, नाग- RAIPा मामा लिए भी टमरे उममे सामनी उठाया। उसया मामा और पनि सपा निर्मः मोर गार भी। - 1 काबूरका अन्तिम साहस । १७७ उसमें स्वार्थकी जरा भी बू नहीं थी। उसने जितने काम किये सब निर्मल हृदयसे, शुद्ध हेतुसे और वह भी इटालियन कार्यकी सिद्धिमें दृष्टि रख कर, किये । इसके सिवा, जिस प्रतिकूल परिस्थितिमे उसने इटालियन राष्ट्रका भव्य भवन खडा किया उस परिस्थितिका विचार करने पर यही स्वीकार करना पड़ता है कि उसने बडा अद्भुत तपा अतिमानुप कार्य सिद्ध कर दिखाया, इसमें सन्देह नहीं । फिर भी यह कार्य उसने एकतन्त्री अधिकार----हुकूमत के वल पर नहीं बल्कि लोक-स्वतन्त्रताके तत्वके अनुसार उसकी महायतासे, लोगोंको सुश रखके, उनकी सन्तोपयुक्त सम्मतिसे, किया। इस बातपर ध्यान देनेपर यह कहना अत्युक्ति न होगा कि उसके कार्य अलौकिक थे- देवी थे। भिन्न भिन्न विषम परन्तु सबल शक्तियोंका अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिए एकीकरण करके उनके द्वारा अपने इच्छानुसार काम कर लेनेकी कलामें वह ग्खूब सिद्ध-हस्त था। यही कारण है जो यह इतनी विपरीत परिस्थतिमें, थोडे सावनोसे, इतना बड़ा दुष्कर काय्य केवल १२ वर्षमें ही सम्पादन कर सका ! कानूरके उदाहरणको ही रेकर, आगे, प्रशियाकै मन्त्री विस्मार्कने भी जर्मन राष्ट्रोंका ऐसा ही एकीकरण किया । इस तरह कावरका उदाहरण औरों के लिए आदर्शभूत हुआ है और आगे मी होने योग्य है। ऐसे पुरप चाहे जिस देशमें पैदा हों, समस्त मसारके श्रद्धाभाजन होते हैं और भूतडका प्रत्येक राष्ट्र अर्थात् मानवसमाज सदैन उन्हें आदरकी दृष्टिने देखता है। , १७८ कावूर। १६-उपसंहार । - - कारका व्यक्तिगत चरित पिछले प्रकरणमें समाप्त हो गया । परन्तु उसके सार्वजनिक अङ्गकी पूर्ति न हुई । अतएव इस प्रकरणमें उसकी पूर्ति की जाती है। कावूरके जीवनका मुरय कार्य था- इटालियन राज्योंका एक स्वतन्त्र राष्ट्र निर्माण करके वहा लोकनियन्त्रित राजसत्ताकी स्थापना करना । अपने जीवनमें उसने इस कार्यको बहुत कुछ पूरा किया भी। उसकी मृत्युके समय वेनिशिया और रोम दो ही इटालियन प्रान्त दूसरी राजसत्ताके अधीन थे। कावूरने अपने जीते जी ही इटलीकी पार्लियामेण्टमें यह प्रस्ताव स्वीकृत करा लिया था कि रोम इटलीकी राजधानी बनाया जाय । इससे भविष्यका मार्ग निश्चितसा हो चुका था । अतएव उसके पश्चात् जो लोग उसके पद पर प्रतिष्ठित हुए उन्हें इस कामके किये बिना दूसरी गति न थी। । परन्तु उसकी मृत्युके अनन्तर दो तीन मन्त्रियोंसे यह कार्य न वन पडा । वे कावूरके सदृश बुद्धिमान् और कार्यक्षम न थे। इसके सिवा उनका प्राय सारा समय प्राप्त राज्योको आवादी करने तथा उसमे शान्ति और स्वस्थता स्थापन करनेमे ही चला गया । तथापि रिका- जोली और मिद्धेटि नामके मन्त्रियोंने उस कार्यकी सिद्धिके लिए थोड़ी बहुत चेष्टा की। राटेजाने अलबत्ता अपने शासन-कालमें सन्तोप- जनक प्रयत्न नहीं किया । यह देख कर गैरीबाल्डी बहुत उत्तेजित हो उठा, उसने स्वय अपने स्वयसैनिकोंको साथ लेकर रोम-पर चढ़ाई कर दी। परन्तु इससे फ्रान्स-सम्राट् नेपोलियन आपेसे बाहर हो गया । उसने इटालियन सरकारको धमकी दी कि गैरीबाल्टीको सभालकर समझा दीजिए नहीं, तो मैं युद्ध शुरू कर दूंगा। तब गैरीबाल्डी- . , उपसहार। १७९ को रोकने के लिए राटेजीको अपनी सेना रोममें भेजनी पड़ी । उमकी सेनाने गेरीवाल्डीके पय-सैनिकों पर गोलियों झाड़ना शुरू कर दिया। दोनों दलोंमें लढाई छिड़ गई । तर आपसीका यह युद्ध बन्द कर- नेक रिए गैरीवाल्डी दोनों दलों के बीचमे घुमा । उस समय भूल्से दो गोलियों उसे भी लग गई। यह घायल होगया और फिलेमें पहुं- चाया गया। उसके सेनापति और सिपाही सब कैद कर लिये गये । इसके एक ही दो महीने बाद रिक्टर इमेन्युअलकी कन्याका विवाह हुआ। उसकी खुशीमें इटालियन सरकारने समस्त देशभक्तोंको माफ कर दिया-छोड दिया। इसी समय मेजिनीने वेनिशिया प्रान्तको स्वतन्त्रताके लिए बलपेका झण्डा उठाया। परन्तु इससे अधिक काम न निकला। गैरीवाल्डीके मनमें भी वेनिशिया-प्रान्तको स्वतन्त्र करनेकी धुन समाई । इसके सिद्धयर्य इग्लैडकी सहायता प्राप्त करने के लिए वह नहीं गया । ( मार्च १८६४ ईसनी ।) वहाँ उसका अश्रुतपूर्व स्वागत किया गया । परन्तु फ्रान्स और इग्रेट, परस्पर, विशेष राज- नैतिक सम्बन्ध रखते थे। अतएन उसे सफलता न प्राप्त हुई । उसे निराश होकर वापस लौटना पड़ा। इसी बीच इटलीके मन्त्री मिचेटीने रोम-स्थित फ्रान्सकी सेनाको हटालेनेके सम्बन्धमे लिखा पढी शुरू की । नेपोलियनने इस शर्त पर यह बात कुबूल की कि कारेन्स इटली ~की राजधानी बनाया जाय और पोपके प्रान्त पर किसी प्रकार अन्या- चार न हो । इस प्रकार दोनों पक्षोंका निर्णय होने पर १८६५ ईस- , वीमें लारेन्समें इटालियन सरकारका दफ्तर कायम हुआ । नेपोलियनने भी अपनी सेना रोमसे हटा ली। १८६२ ईसपीमें ही जर्मनीमें बिस्मार्कका शासन शुरू होगया था । फ्रान्स और आस्ट्रिया ये दो राष्ट्र इटलीकी तरह ही जर्मनीके शत्रु थे । कावूरने अपने . .
१८० कार। । समयसे ही जर्मनीसे मित्रता करनेकी नींव डाल दी थी। उसी नीतिके आधार पर १८६६ ईसवीमें जर्मनी और इटालियन राष्ट्रकी सन्धि हुई । शर्त हुई-सम-शत्रु-मित्रत्वकी। फिर तुरन्त ही जर्मनी और आस्ट्रियामें युद्ध छिड़ गया ! उसमें जर्मनीकी ओरसे इटलीको लडना पड़ा । इस युद्धमे इटलीकी अधिक विजय नहीं हुई। तथापि युद्धके अन्तमें वेनिशिया-प्रान्त उसे मिला । ७ नवम्बर १८६६ ईसनीको वेनिस नगरमें विक्टर इमेन्युअलने सरकारी तौर पर प्रवेश किया । इस समय नेपोलियनकी सेना रोमसे चली गई थी। इटालियन मन्त्रिमण्डलका सूत्रधार फिरसे राटेजी होगया था। पहले उसने गैरी- बाल्डीके विरुद्ध सेना भेजी थी। अतएव उस समय लोगोंने उसे खूब फटकारा था। इस ढगामें गैरीबाल्डीने समझा, राटेजी मुझे न रोकेगा और फिर एक बार रोम पर धावा बोल दिया। यह देख कर नेपो- लियनने फिरसे इटालियन सरकारको युद्धकी धमकी दी। तब राटेजीने गैरीबाल्डीको पकडकर कैप्रेरा टापूमें नजरबन्द कर दिया । परन्तु इसके बाद भी गैरीबारडोके स्वय सैनिक रोमकी सरहदमें घुसकर उपद्रव करने लगे । स्वय रोम-नगरमें भी एक बलवा उन्होंने करा दिया । परन्तु क्रूरतापूर्वक उसका निर्मूलन किया गया। इस बलवे- में सहायता देनेके लिए गैरीवाल्डीके कोई ७० आदमी नैवर नदीके पास आये थे । पोपकी सेनाने उनके टुकडे टुकडे कर डाले। इतने- हीमें गैरीबाल्डी भी नजरकैदसे निकल कर रोमन प्रान्तमें आपहुँचा । एक जगह तो उसने पोपकी सेनाको पूरा परास्त कर दिया । परन्तु नेपोलियनकी सेना पोपकी सहायताके लिए आजानेसे गैरीवाल्डीको पीछे हटना पड़ा । रोमपर यह दूसरा आक्रमण भी व्यर्थ गया । १८६७ ईसवी1) पर इससे इटालियन लोगोंकी रोम पर आधिपत्य उपसंहार। करनेकी उत्सुकता बहुत बढ़ गई। वे कहने लगे-चाहे जो करना पड़े, पर रोम तो हस्तगत करना ही चाहिए । इस समय इटलीके राज्यसूत्र गियोवानी लॉजा नामके एक बुद्धिमान् और कार्य क्षम युपकके हाथमें थे। ( १८६९ ईसवी ) कानूरकी नीनिके रहस्य- का वह पूर्ण ज्ञाता था । उसका शील भी तत्कालीन सभी इटालियन राजनीतिज्ञोंसे बढ़ा चढ़ा था। उसके प्रधान मन्त्री होते ही फ्रान्स और प्रशिया अर्थात् जर्मनीमें लडाई छिडनेका रङ्ग दिखाई देने लगा। इस अवसरसे लाभ उठाकर रोमकी समस्या सदाके लिए हल करनेका इरादा उसने किया । जत नेपोलियन लल्लो-चप्पोकी बातें करने लगा तर गियोवानी लॉजाने उससे कहा कि १८६७ ईसवीमें जो सेना रोममें आपने भेजी थी उसे वहासे हटा लीजिए । नेपोलियनने इस वातसे इनकार करदिया । परन्तु आगे जब आप ही फ्राको-जर्मन युद्ध- में उसकी हार होने लगी तब उसने अपनी सेना रोमसे हटा ली। सेडनमें नेपोलियनका पूरा पराभन हुआ। तब विक्टर इमेन्युअलने पोपको एक पत्र लिखकर अनुरोध किया कि आप कृपा करके रोम परसे अपनी मुल्को सत्ता हटा लीजिए । परन्तु उसने उसपर ध्यान न दिया । तर इटालियन सरकारने रोम पर अपनी सेना भेजी । २० सितम्बर १८७० ईसपीके आसपास रोम नगर पर गोले दागे गये लगातार गोलोंकी वर्षा होती रही। अन्तमे उसकी दीवार छिद गई और विजयी इटालियन सेना उसके द्वारा शहरमें घुसगई। तब पोप अपने राज-महलमें छिप गया। २ अक्टूबरको रोमन-प्रान्तीय लोगोंसे पूछा गया कि आप स्वतन्त्र शासन-सस्थाकी स्थापना चाहते हैं या विक्टर इमेन्युअलके राज्यमें शामिल होना चाहते हैं ? पहले प्रश्नके अनुकूल १,५०७ और दूसरेके अनुकूल १,३३६,८१ मत प्रात काबूर। - हुए। तब यह घोषणा कर दी गई कि रोम-प्रान्त विक्टर इमेन्युअल राज्यमें सम्मिलित किया गया । इसतरह भूगोल और आबादी दृष्टिस ' इटालियन' शब्दमें जिन प्रान्तोंका समाश हो सकता उन सब प्रान्तोंको एक ही शासन-सत्ताके अधीन करके उसकी एक करनेका जो कार्य कावूरने आरम्भ किया था वह सम्पूर्ण हो गया इटालियन सरकारका आधिपत्य रोममे वाजान्ता हो जाने पर उन्हों पोपको उसके समस्त धर्माधिकार दे दिये। खर्चके लिए उसे बहुत इलाका और नकद रकम देनेका भी प्रबन्ध कर दिया। फिर शीघ्र । अर्थात् १८७१ के जुलाई महीनेमें, रोम नगर इटालियन सरकारव राजधानी बनाया गया । तबसे आज तक वही इटलीकी राजधान चला आरहा है।
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हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-सीरीज । . विश्मसवत् १९६९ से यह प्रयमाला निपल रही है । हिन्दी गगारम यह अपने हगकी अद्वितीय और सबसे पहली प्रन्थमाला है । जब तक इसमे ३७ ग्रन्थ निकल चुरई, जो भाव, भाषा, छपाई, सौन्दय आगि सभी दृष्टियोंसे जोड,हे। प्राय सभी साहित्य सेवियों। उनी मुस्तकण्ठमे प्रशमा की है। इतिहाग, जीवनचरित, तत्त्वज्ञात, मदाचार, राजनीति, नाटक, उपन्याम आदि सभी विषयोंके अन्य निकरे है । यहाँ केवल दो जीवनचरितोंका परिचय दिया जाता है। स्थायी ग्राहकोको सर प्रन्थ पानी कीमतम दिये जाते है । स्थायी प्राहर बननकी 'प्रवेश फी' आठ आने है । ग्राहक बनने समयसे आगेके राव ग्रन्थ स्थायी ग्राहकोंको रेशा पटते हे। पिछरे अन्य रैना न रेगा उनकी इच्छा पर है। । प्रत्येक हिन्दी भक्तको इस प्रन्यमालाका ग्राहक होना चाहिए । आत्मोद्धार । आत्मावलम्बनमी तात्त्विक शिक्षा देनेवाली सैकड़ो पुस्तकोंसे जो राम न होगा, वह आत्मोद्धारकी अद्भुत मूर्ति वाशिंगटनचे आत्मचरितसे हो सक्ता है । यह अमेरिकाके प्रसिद्ध हवशी ( नीग्रो) नेता डा. बुकर टी वाशिंगटनका आत्मचरित है । अमात् यह स्वय वाशिंगटन महाशयके रिसे हुए जीवनचरितका अनुवाद है । इसके प्रारभमें २५, ० पृष्टकी विस्तृत भूमिका है, जिसमे इम विषयका विचार रिया गया है, कि यह प्रथ भारतवासियों के लिए क्यो उपयोगी है और इस जीवनचरितका अनुकरण वे कहॉतक कर सकते है। इसे पढकर पाठक जान सकगे कि एक दरिद्र गुलामके धरम पैदा हुआ लडका अपने सदाचरण, उद्योग, परिश्रमप्रियता, आत्मविश्वास और परोपकारशीलतासे स्तिनी उन्नति कर रास्ता है। मसारम इस विषयका वाशिंगटन जैसा दृमरा उदाहरण नदी मिल सकता । अपने अतिम समय तक वाशिंगटन सारी नीग्रो जातिके नेता समझे जाते ये उनका विद्यालय अमेरिकाका सर्वश्रेष्ठ आदर्श विद्यालय है, जिसमें इस २०० अध्यापक और कई हजार विद्यार्थी है । यही विद्यालय आजसे कोई २ वर्ष पहले उन्होंने एक झोपडीमे १५, २० विद्यार्थियों को इकट्ठा करके वो था । उन्होंने इस विद्यालयकी किस तरह इतनी उनति की, किन किन कठिन इयोंको पार किया, किन सिद्धान्तोंका अवलम्बन करके सफलता पाई, अस शिक्षापद्धति कैसी होती है, एक गरीव कामको कैसी शिक्षा मिलना चाहि आदि बातें प्रत्येक देशहितैपीके मनन करने योग्य है। शिक्षासस्थानोंके संर लकों और कार्यकर्ताओको इसे अवश्य पढना चाहिए। दूसरी बार छपा है मूल्य एक रुपया दो आने अब्राहम लिंकन। अमेरिका-मयुक्तराज्यके सुप्रसिद्ध प्रेमीडेंटका जीवनचरित। लिकन रफ राजा कैसे हो गया, झोपड़ीका रहनेवाला राजमहलका निवामी कैसे बन गया, स्कूलमे केवल एक वर्ष शिक्षा पार भी प्रसिद्ध वक्ता, रेसर और राजनीतिक कैसे बन गया, गुलामों पर जुम करनेवालोंके वशमे उत्पा होने पर भी उसके हृदयमै दयाका झरना कैसे बहने लगा और उस मारनेसे अमेरिकाके हय- शियो या तीनो लोगों के अनन्त कष्ट कैसे खुल गये, उन्हें स्वाधीनता से मिल गई, आर गुलामोके लिए मिविल-वार ( घरु युद्ध ) केसे हुआ, आदि प्रश्नोके उत्तर इस महात्माके जीवनचरितके पढनेसे मिलेंगे। अगेरजीक कई जीवन- चरितोके अधारसे इमे वाचू दयाचन्द्रजी गोयलीय, पी ए ने बहुत ही सरल भापामे लिखा है । मूल्य दस आने । नोट-मीरीनके अन्यान्य ग्रन्योंका परिचय पाने के लिए बड़ा सूचीपन मॅगाकर टेपिए। मिल्नेका पता-- मेनेजर, हिन्दी-ग्रन्थ-रत्नाकर-कार्यालय, हीराबाग पो० गिरगाँव, धम्बई।