Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Dash Karm Paddhati

Suri,sukhanand · 2012/08

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: दशकर्मपद्धति। भाषाटीकासहित। जिसको श्रीकान्यकुजवंशावतंसमुरादाबादनिवासिस्वर्गीय सुवानन्दसूरिसूनुपण्डित-कन्हैयालालमिश्रने भापानुवादसे विभूपित किया । -XO- उसीको गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास- अध्यक्ष लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर' छापेखानेमें मैनेजर पं० शिवदुलारेजी वाजपेयोने मालिकके लिये छापकर प्रकाशित किया। 'संवत १९७३. शके १८३८. कल्याण-मुंबई. सब हक यन्त्राधिकारीने अपने आधीन रक्खे है। . .. .

समर्पणपत्रम् । श्रीमान् ! अखण्ड प्रतापशाली दयादाक्षिण्यादि अनेक विशेषण विशिष्ट गो ब्राह्मण प्रतिपालक परमोदार प्रकृति क्षत्रिय वंशावतंस १०८ श्रीमन्महाराजा उदयराजमिहजू देववहादुर काशीपुर स्टेट जिला नैनीताल कर कमलेपु. मान्य महोदय ! हिन्दूधर्म ग्रन्याम जैसी रुचि और श्रद्धा आपकी है वैसी अन्य किसी में दिखाई नहीं देती, आपने अपने स्टेटमें शतशः लोकोपकारी कार्य करके अपनी प्रजा और ब्रिटिग गवर्नमेन्टसे विशेष सन्मान प्राप्त किया है। गौ और ब्राह्मणोंको रक्षा करनेमें आप निरन्तर यत्नवान् रहते हैं। आपके उपरोक्त गुणोंमे मोहित होकर मैंभी अपनी इस लघुकाय पुस्तक 'दशकर्मपद्धति ' को श्रीमान्के कोमल कर पल्लवमें अत्यन्त भक्ति तथा आदरके सहित समर्पण करता हूँ, आशा है श्रीमान् इस भेटको सुदामाके तन्दुलकी समान उदारतापूर्वक स्वीकार करके मुझे अनुगृहीत करंगे । इति । vvvivar Minuinuuuuuun.fuuly १५ । २ । १७ गुरुवार, विनीत निवेदक- पण्डित कन्हैयालाल मिश्र मोहल्ला दीनदारपुग मुगदावाद (यू पि.)

भूमिका। प्रिय पाठकवृन्द ! हमारा यह प्यारा भारतवर्ष आजतक सम्पूर्ण देशोकी अपेक्षा सवही बातोंमें चढा बढा हुआ रहा था । यहांके दानवीर कर्ण, महाराज प्रात:स्मरणीय हरि- श्चन्द्र, युद्धवीर अर्जुन, धर्मवीर महाराज युधिष्ठिर, महाँप जैमिनि, मुनिवर भगवान कृष्णद्वैपायन श्रीवेदव्यासजी, कपिल तथा कणाद इत्यादि इसी भारत माताके लाल थे, कि जिनके चरित्र तया ग्रन्यांको अवलोकन करनेसे मनुष्य संसारसागरसे तर जाते हैं। इसका कारण एकमात्र संस्कार है । ' संस्कार शब्दका अर्थ सुधार है जिस प्रकार हीरा पापाणकी आकर (खानि ) से निकलकर शानके संस्कारहीसे मूल्यवान होता है इसी प्रकार मनुष्य संस्कारसेही द्विजाति होता है । जैसा कि, मनुजी महाराजने कहा है 'जन्मना जायते शूद्रो संस्काराविज उच्यते ' अर्थात् जन्मसे मनुष्य शूद्र होता है किन्तु संस्कारसे द्विज कहलाता है जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त सोलह संस्कार होते हैं यथा- गर्भाधान १ पुंसवन २ सीमन्तोन्नयन ३ जातकर्म ४ नामकर्म ५ निष्क्रमण ६ अन्नप्राशन ७ चूडाकर्म ८ कर्णवेध ९ उपनयन १० वेदारंभ ११ समावर्तन १२ विवाह १३ चतुर्थी १४ मृतक १५ पोडश (दशाह)१६ । अव सर द्विजातिमात्रको चाहिये कि इन संस्कारोंको करके ऐहिक और पारमार्थिक फल प्राप्त करें, कारण कि इन्ही वैदिक संस्कारोंके करनेपर दिज, ब्राह्मण और विप्र पदवियोंको प्राप्त किया जाता है । अनाचाररहित व चैटिक कर्म करनेसे और ब्राह्मणी व क्षत्रियाणी तया वेश्यानीकी योनिमें जन्मा हुआही ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य होता है अतएव सर किसीको अत्यन्त भक्तिप्तहित वेदोक्त संस्कार अवश्य करना चाहिये और इसी लिये सब ऋषि मुनि ब्राह्मण व विद्वान पुरुष तथा खी आजतक इन संस्कारोको परम श्रद्धासे मानते और करते चले आये हैं। मेरी बहुत दिनोंसे इच्छा थी कि कोई संस्कार विषयका उत्तम पुस्तक रचा जाय जिससे मनुष्य अपने वेदोक्त संस्कार करके उत्तम फलके भागी बने-इसी बीचमें विद्यामचार निरत अखण्ड प्रतापशाली श्रीवकटेश्वर स्टीम यन्त्रालयाध्यक्ष मुम्बई निवासी श्रीमान् सेट खेमराज श्रीकृष्णदासजी महोदयकी आज्ञा मिली कि 'आप दशकर्म पद्धात ' का भापानुवाद कर दीजिये हम छापगे । उक्त महो- दयकी आज्ञा पातेही मैंने मीघ्रतासे इसका भाषान्तर करके सर्वसत्व सहित श्रीमान सेटजीको समर्पण कर दिया है-आशा है वे महोदय इसको शीघ्रहीका- शित करके आपके सन्मुख लावेंगे। यदि इस पुस्तकके द्वारा आपको कुछ भी लाभ पहुँचा तो मैं अपने परिश्रमको सफल समयूंगा। अन्तमें सहृदय पाटकोंसे करबद्ध प्रार्थना की जाती है कि यदि नर धर्मा- नुसार इस ग्रन्यमें कोई त्रुटि या अशुद्धि रहगई हो तो कृपापूर्वक उसको सुधारले या पत्रद्वारा उसकी सूचना मुझे देदेवें तो आगामी संस्करणमें उस दोषको दूर कर दिया जायगा । इत्यलम् । फाल्गुन कृष्ण अष्टमी पाटकीका चिर परिचित गुरुवार कन्हैयालाल मिश्र सम्बत् १९७३ मोहल्ला-दीनदारपुरा तारीख १५/२०१७ मुरादाबाद [ युक्तपदेश] अथ दशकर्मपद्धति-विषयानुक्रमणिका । विषय. पृष्ठ. ४२ .... .... ... .... . पृष्ठ १ कर्णवेधः उपनयनम् वेदारंभः १४ समावर्तनम् २१ .... विषय गर्भाधानम् पुंसवनम् सीमन्तोन्नयनम् जातकर्म नामकर्म निक्रमण अन्नमागनम् चूडाफर्म .... .... .... .... .... .... .... २२) सामी .... " .... विवाहा ३१ चतुर्थीकर्म इति दशकर्मपद्धतिविषयानुक्रमणिका समाप्ता । OP. पुस्तक मिलनेका ठिकाना-गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना, कल्याण-मुंबई.

श्रीगणेशाय नमः। अथ दशकर्मपद्धतिः। भाषाटीकासहिता। अथ गर्भाधानम् । तत्र ऋतुलाता चतुर्थदिने वधूः प्रातस्तूष्णीमादित्यमुपतिष्ठेत् ततस्तदिने मातृपूजाभ्युदयिके कृत्वा पोडशराबादक शुभरात्री मङ्गलाचरण। अखण्डमैश्वर्ययुतं परेशं विघ्नाटवीध्वंसनमेकमानम् । गजाननं तं मनसा प्रणम्य करोमि भापां दशकर्मपद्धतेः॥१॥ यतोऽभूजन्मादिः सततमपरोक्षस्य जगतः। परोक्षत्वं तस्मिन् गतवति च कस्तत्र विलयः॥ कृतातः सा भूनो बुधजनविकाशाय विदुपा । कन्हैयालालेन श्रियमियमपारं दिशतु वः ॥२॥ दोहा । विघ्न विनाशन गजवदन, नाशनहार कलेश। कृपा कीनिये दास पहुँ, दाता सिद्धि गणेश ॥ १ ॥ कर्मदेव पद वन्दि पुनि, गुरुको शीश नवाय । लिखत पद्धती कर्मकी, कीजिय आय सहाय ॥२॥ अब गर्भाधानसंस्कार लिसा जाता है । तहां चौथे दिन ऋतुस्लान करके स्त्री प्रातःकाल मौनव्रतधारणपूर्वक सूर्यके सन्मुख हाथ जोडकर खडी हो जाय । फिर उसी दिन पोडश मातृकाओंकी पूजा और नान्दीमुख श्राद्ध करके २ दशकर्मपद्धतिः। दक्षिणकरण पतिर्वध्वा उपस्थमभिस्पृश्य जपति । ॐ पूषा भगः सविता मे ददातु रुद्रः कल्पयतु ललामगुम् । विष्णुर्योनि कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिश्शतु । आसिंचतु प्रजापतिर्धाता मर्भ धातु ते ॥ इति मन्त्रेण । अथ प्राङ्मुख उपविष्ट उदङ्मुखो वा एता मभिमन्त्रयेदनेन । ॐ गर्भ धेहि सिनीवालि गर्भ घेहि पृथुष्टुके । गर्भ ते अश्विनो देवावायत्तां पुष्करखनौ इति मन्त्रेण । ततः ॐ रेतो मूत्रं विजहाति योनि प्रविशदिन्द्रियम् । गर्भो जरायुणावृत उल्लं जहाति जन्मना । इति मन्त्रेण रेतःस्रावणम् । अथ तस्या हृदयमालभेत् । ॐ यत्ते सुशीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम् । वेदाहं तन्मां तद्विद्यात्पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत शृणुयाम शरदः शतमितिमन्त्रेण । ततः स्वस्थो हृष्टमनाः हृद्देशे प्रसन्नामनातुरां कामयमानामभगश- उस चीका पति सोलह दिनसे पहले किसी शुभ रात्रिमें दाहिने हाथसे अपनी स्त्रीके योनिप्रदेशको स्पर्श करे और ( उस काल ) इस आगे लिखे मन्त्रको जपे। मन्त्र यथा-ॐ पूषा भगर सविता मे ददातु रुद्रः कल्पयतु ललामयम् । विष्णुनि कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिश्शतु । आसिंचतु प्रजापतिर्धाता गर्न दधातु ते ॥ इसके उपरान्त पूर्व अथवा उत्तरको मुख किये हुए पति इस अपनी पनीको निम्न लिखित मन्त्रसे अनिमन्त्रित करे। मन्त्र यथा-ॐ गर्न धेहि सिनीवालि गर्भ धेहि पृथुष्टुके । गर्भ ते अश्विनी देवा- वायत्तां पुष्करनजौ ॥ फिर आगे लिखे मन्त्रसे वीर्य दान करना चाहिये । ॐ रेतो मूत्र विजहाति योनि प्रविशदिदियम् गी जरायुणावृत उल्वं जहाति जन्मना ॥ अनन्तर उसके हृदयमें हाथ रखकर यह आगे लिखा हुआ मन्त्र उचारण करना चाहिये । मन्त्र यथा-ॐ यचे सुशीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसि "श्रितम् । वेदाहं तन्मां तद्विद्यात्तश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत५ शृणुयाम शरदः शतम् ॥ अनंतर स्वस्थ अथच प्रसन्न मन होता हुआ पति प्रसन हरपघाली, उद्देमरहित, पतिकी इच्छा करती हुई बीको उत्तम शय्यापर से .

भाषाटीकासहिता, य्यायां प्रदोपाध्यै स्त्रियमभिगच्छेत् सा यदि गर्भ न दधाति तदा पतिः कृतोपवासः पुष्यनक्षत्रे श्वेतकण्टकारिकामूलमुत्पात्योदकेन पिट्दा वधूदक्षिणनासापुटे तसं दद्यात् अनेनैव मन्त्रेण । ॐ इयमोपधी त्राय- माणा सहमाना सरस्वती । अस्या अह बृहत्याः पुत्रः पितुरिव नाम जग्रभमिति । इति गर्भाधानम् ॥१॥ अथ पुंसवनम् । तत्र गर्भमासापेक्षया द्वितीयतृतीययोरन्यतरस्मिन्करणीयं पुष्यपुन- वसुमृगशिरोहस्तमूलश्रवणान्यतमपुत्रामनक्षत्रयुतोभयचन्द्रतारानुक्ल- दिवसमवगत्य ततः पूर्वदिने वधूमुपया कारयित्वा अग्रिमदिने तस्याः नाताया अहतवासोयुगपरिधानानन्तरं शुचिः स्नातः कृताचमनो मातृ- घडी रात जानेके पीछे वीर्यदान करे। यदि कदाचित् वह स्त्री गर्भ धारण नहीं करे तो उसका पति उपवासी होकर पुष्यनक्षत्रके दिन सफेद रंगवाली कटेरीकी जडको उखाड लावे और उमको जलके साथ पीसकर उसका रस स्त्रीकी नासिकाके दाहिने स्वरसे सैंघावे और सैंधानेके समय इस नीचे लिखे मंत्रका पाठ करे । ॐ इयमोपधी प्रायमाणा सहमाना सरस्वती । अत्या अहं बृहत्याः पुत्रः पितुरिव नाम जयामिति । इति श्रीकान्यकुजवंशावंतसमुरादाबादनिवासि-स्वर्गीयमिश्रसुखानन्द- सूरिसुनुपण्डित-कन्हैयालालमिश्रकृतभापाटीकायां गर्भाधान- संस्कारः समाप्तः ॥१॥ अब पुंसवनसंस्कार कहा जाता है । गर्भके महीनेमें दूसरे या तीसरे महीनेमें, पुप्य, पुनर्वसु, मृगशिरा, हस्त, मूल और श्रवण इन नक्षत्रों से कोई पुल्लिंग नक्षत्र जिस दिन हो, तथा चंद्र और तारा भी जिस दिन अनुकूल हो, ऐसे दिनके मिल जाने पर ( पति ) उससे एक दिन पहले स्त्रीको उपवास (व्रत) करावे। दूसरे दिन स्त्री स्नान करके दो नवीन वस्त्र धारण करे । फिर उसका पति पवित्रतापूर्वक स्नान करके आसनपर बैठ आचमन करे । तत्पश्चाद भ " ४ दशकर्मपद्धतिः। पूनाभ्युदयिकादि कृत्वा वटप्ररोहं वशृंगाश्च आचारात्कुशकंटकमपि शिशिरेण जलेन पिष्ट्वा वधूदक्षिणनासापुटे तसं दद्यात् । ॐ गर्भः समवर्त्तताये भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । सदाधार द्यामुतेमां कस्मे देवाय हविपा विधेम ॥ १ ॥ ॐ अद्भयः पृथिव्य रसाच विश्वकर्मणः समवर्त्तताये । तस्य त्वष्टा विदधद्रूपमति तन्मय॑स्य देवत्वमाजानमो। इति मन्त्राभ्याम् । इति पुंसवनम् ॥२॥ अथ सीमन्तोन्नयनम्। तत्र गर्भमासापेक्षया पष्टेऽष्टमे वा पुन्नामनक्षत्रयुते चन्द्रतारानुकूलवि- हितदिने मातृपूजाभ्युदयिकादि कृत्वा बहि:शालायां कुशकण्डिकां कु. र्यात् तत्र क्रमः । कुशत्रयेण हस्तपरिमितचतुरस्रभूमि परिसमूह्य कुशा- पोडश मातृकाओंका पूजन और नान्दीमुख श्राद्ध करके बडका एक नूतन (कोमल ) पत्ता कि, जिसकी डंडीमें दोनों तरफ फल लग रहे हो तोडकर लावे तथा कुशकी जड लावे और फिर इन दोनों पदार्थोको शीतल जल द्वारा पीम और उनका रस निकालकर स्त्रीकी नासिझाके दाहिने स्वरसे सुंघावे और उस काल आगे लिखे दोनों मंत्रोंको उच्चारण करना चाहिये । मंत्र यथा-ॐ हिरण्यगर्भः समवर्तताये भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । सदाधार पृथिवीं यामुतेमां कस्मै देवाय हविपा विधेम ॥ॐ अन्यः संभृतः पृथिव्यै रसाच विश्वक- मणः समवर्तताये । तस्य त्वष्टा विदधगृपमेति तन्मयस्य देवत्वमाजानमये ॥९॥ इति श्रीकान्यकुजवंगावतंसमुगदावादानेवासि-स्वर्गीयमिश्रमुखानंदसारसनु- पाण्डत-कन्हैयालाल मिश्रकृतभाषाटीकायां पुंसवनसंस्कारः समाप्तः ॥२॥ अब सीमन्तोन्नयनसंस्कार कहा जाता है। गर्भके महीनेसे छठे या आठवें महीनेमे (पुरुष) पूर्वलिखित नक्षत्रयुक्त और चन्द्र तथा ताराके अनुकूल- वाले दिनों पहले षोडशमातृकाओंको पूजा और नान्दीमुख श्राद्ध करके बाहर शाला (मण्डप ) में आकर कुशकण्डिका करे उसका कम यथा, एक हाथकी बराबर लम्बी चौडी वेदो बनाकर ( चौकोन वेदी बनाकर ) उसको तीन कुशाओंसे भाषाटीकासहिताः। नेशान्यां निक्षिप्य गोमयोदकेनोपलिप्य वमूलेन स्पयेन वोत्तरतस्त्रि- रुल्लिख्योल्लेखनकमणानामिकांगुष्ठाभ्यां मृदमुद्धृत्य वारिणा तं देशम- भिपिच्य कांस्यपात्रेणाग्निमादाय तत्प्रत्यङ्मुखं निदध्यात् । ततो ब्राह्मणवरणम् । अद्य कर्त्तव्यसीमन्तोन्नयनहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षण- रूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बू- लवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे ॐ वृतास्मीति प्रतिवचनम् । ॐ यथा- विहितं कर्म कुर्विति होनाभिहिते ॐ करवाणीति प्रतिवचनानन्तरम- नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागग्रान्कुशानास्तीस्मिन्सी- मन्तोन्नयनहोमकर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय ॐ भवानीति तेनोक्ते बुहारे फिर उन तीनों कुशाओंको ईशानकोनमें फेंक देवे और गोबर तथा जल मिलाकर वेदीको छिडके फिर सुवेके पिछले भागद्वारा स्फ्य यज्ञपानसे प्रादे- शमान तीन लम्बी रेखा संचे और उन रेताओं से अनामिका तथा अंगुष्ट इन दो अँगुलियोंसे रेखा सेंचनेके कमसे मट्टी लेकर ईशानकोनमें फेंक देवे फिर वेदीके ऊपर जल छिडकना चाहिये । अनन्तर काँसीके पात्रमें अमिको लेकर उसको पश्चिमानिमुख वा उत्तराभिमुख स्थापन करे फिर ब्रह्मा ( ब्राह्मण) का परण करे और पुष्प चंदन पानादि वरणकी सामग्री हाथमें लेकर नीचे लिखी संस्कनका पाठ करके उस ब्रह्माको प्रदान करे "ॐ अद्य कर्त्तव्यसीमन्तोन्नयन- होमकमणि रुतास्तावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचन्दनताम्बूलवासोनिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे" तब ब्रह्मा उस सामग्रीको अपने हाथमें लेकर 'वृतोऽस्मि' उच्चारण करे फिर यजमान 'यथाविहितं कर्म कुरु ऐसा कहे और इसके उत्तरमें ब्रह्मा 'करवाणि' कहे। इसके पश्चात् वेदीसे दक्षिणकी ओरशुद्ध आसन बिछावे और उसके ऊपर पूर्वकी ओर अग्रभागवाले तीन कुशा रखकर यजमानको आगे लिखी संस्कृतका पाठ करना चाहिये । यथा-'अस्मिन् सीमन्तोन्नयनहोमकर्माण त्वं मे ब्रह्मा भर ' अर्थात् इस सीमन्तोन्नयनकर्ममें ६ दशकर्मपदतिः। अमिप्रदक्षिणं कारयित्वा ब्रह्माणं तत्रोपवेश्य प्रणीतापात्रं पुरतः जलेनापूर्य कुशेराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्यामेरुत्तरतः निध्यात् ततः परिस्तरणम् । ब्रह्मणाऽग्निपर्यन्तं नैर्ऋत्याद्वायव्यांतम् अग्नितः प्रणीतापर्यन्तं ततोऽने रुत्तरतः पश्चिमादाश पवित्रच्छेदनार्थ कुशवयं पवित्रकरणाथ साम- मनंतगर्भकुशपत्रद्वयम् प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थाली चरुस्थाली संमार्जन कुशा उपयमनकुशाः प्रादेशमितपालाशसमिधस्तिस्रः सुवः आज्यं पट्रपंचाशदुत्तरयजमानमुष्टिशतद्वयावच्छिन्नतंडुलपूर्णपात्रं तिलमुद्रमि- श्रास्तंडुलाः पूर्णपात्रं एतानि पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशि आर मरे ब्रह्मा हूजिये । इस प्रकार कहे । तब ब्रह्माके 'ॐ भवानि' ऐसा कहने पर अग्निकी परिक्रमा कराय यजमान उस पूर्व रचित आसनपर ब्रह्माको बैठाय देवे । फिर यजमान प्रणीतापात्रको आगे रखकर जलमे भर देवे और उसको कुशाओंमे ढककर तथा ब्रह्माका मुख देखकर अनिके उत्तरकी तरफ कुशाओंके ऊपर रख देवे इसके पीछे परिस्तरण करना चाहिये उसका क्रम यह है । मुट्ठीभर अथवा एक सौ कुश ग्रहण करके उसके चार भाग करे। पहला भाग अनिकोनसे ईशानकोनतक, दूसरा भाग ब्रह्माके स्थानसे वेदीतक, तीसरा भाग नत्यसे वायुकोनतक और चौथा भाग वेदीसे प्रणीतापात्रतक बिछा देना चाहिये । तदनन्तर अनिके उत्तरभागमें पश्चिम दिशा की तरफ पवित्र छेदन करने के निमिन तीन कुशा रक्खे और पवित्र बनानेके लिये अनन्तर्गर्न अर्थात् बीचका पत्र निकालकर दो कुश पत्र रक्खे फिर प्रोक्षणीपात्र,आज्यस्थाली, चरस्थाली, पांच संमार्जनकुशा और तीनसे तेरहतक उपयमनकुशा तथा प्रादेशमात्र तीन समि- पा, बुवा, धृत, यजमानकी दो सौ छप्पन मुट्ठी चावलोंसे भरा हुआ पूर्णपात्रं इन सब वस्तुओंको पवित्र च्छेदन कुशाओंके आगेआगे कमसे रख देवे। उनके आमे १ तिल और मूंगसे मिलेहुए चावलोंको पूर्णपात्र कहते हैं। - .

भाषाटीकासहिता। क्रमेणासादनीयानि तदुत्तरतःवीणागाथिनो । प्रादेशमात्रसाप्राइवत्थशंकु विश्वेतशल्लकोकंटकं पीतसूत्र पूर्णस्त'ः दुपिंजलिकात्रयं उदुंबर- युग्मफलसुवर्णघटितदेवकर्करादि युक्तसूत्रदोरकपुप्पविलादि फल युतवाराष्टतयादि अन्यद्यथाचारपरिप्राप्तद्रव्यमासादनीयम्। ततः पवित्र- च्छेदनार्थकुशेः प्रादेशमितपवित्रे छित्त्वा सपवित्रपाणिना प्रणी- तोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे कृत्वा अनामिकांगुष्ठाभ्यामुत्तराने पवित्रे गृही- त्वा त्रिरुद्दिगनं प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीप्रोक्षणं ततः प्रोक्षणीजलेन यथा- सादितद्रव्यसेचनं ततोऽग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रनिधानं ततः आज्यस्थाल्यामाज्यनिर्वापः चरौ तु तिलतंडुलमुद्रानां प्रणीतोदकेन वीणाके बजानेवाले दो गायकोंको बैठाल देवे । वहाँ प्रादेशमात्र. अग्रभागसहित । पीपलकाष्ठकी कील तथा सेई (पक्षी विशेप) का पर कांटा और पीला मृत लपेटकर (एक) तकुवा, तथा कुशाओंकी तीन पिंजूलिका बनाकर स्थापन करे। फिर गूलरके नवीन पत्तेकी डाली कि जिसके दोनों तरफ फल लगे हों और सुवर्णके तारयुक्त सूत्र अर्थात् डोरा पुष्प तथा बिल्वफल सहित अन्यान्य मांगलिक पदार्थ जो कि मंगल कार्योंमें होते हैं स्थापन करे। फिर पवित्र च्छेद- नार्थ जो पहले तीन कुशा रक्सी गई है उनसे पवित्र बनानेके निमित्त जो अन- न्तरगर्न कुशपत्र रक्खे गये हैं तिनके अग्रभागको प्रादेशप्रमाण छेदन करे और फिर उन पवित्रोंको हाथमें लेकर प्रणीतापात्रके जलको प्रोक्षणीपात्रमें तीन बार सेचन करे। फिर अनामिका और अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंसे पवित्रके अग्रभागको आगे करके पकडे और उन पवित्रोंसे तीन बार प्रणीतापानके जलको चलावे पीछे प्रणीतापात्रके जलमें उन्हीं पवित्रोंको डुबोकर प्रोक्षणीपात्रमें सेचन करे तत्पश्चात् प्रोक्षणीके जलसे उन्हीं पवित्रों द्वारा पूर्वमें स्थापन करी हुई सब वस्तुओंको प्रोक्षण (सेचन ) करे। फिर अनि और प्रणीतापात्रके वीचमें प्रोक्षणीपात्रको रख देना १ तेरह कुशाओंको कलावेसे लपेटनेपर एक पिजूलिका होती है। ऐसी तीन पिंजूलिका स्थापन करनी चाहिये।

म शकर्मपद्धतिः। विः प्रक्षालनं तत्र किञ्चिजलं दत्त्वा प्रक्षेपः । ततः स्वयं चहें ब्रह्मणा चाज्यं ग्राहयित्वा वह्नरुत्तरतश्चरुं दक्षिणतः आज्यं ध्यात् । ततः सिद्धे चरौ ज्वलत्तृणं प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वह्रो ततः स्रुवप्रतपनं त्रिः ततः संमार्जनकुशानामरंतरतो मूलेबर्बाह्यतः संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिः प्रताप्य दक्षिणतो निदध्यात् ततः आज्यमग्नितश्चरोः पूर्वेणानीयाये धृत्वा आज्यपश्चिमेन चरुमानीयाज्य- स्योत्तरतो निदध्यात् तत आज्ये प्रोक्षणीवदुत्पवनं अवेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनंततः पूर्ववत्प्रोक्षण्युत्पवनतत उत्थायोपयमनकुशानादायप्रजा- चाहिये। फिर आज्पस्थालीमें न डाले और चरु (साकल्य ) बनानेके निमित्त तिल चावल तथा मूंग मिलावे और फिर उनको प्रणितापात्रके जलसे तीन बार धोके, पीछे किसी एक पात्रमें जल भरकर उसमें वह तिल चावल तथा मूंग डाल देवे । तिस पीछे यजमान उस चरुपात्रको हाथमें लेकर और ब्रह्मासे घृतको ग्रहण कराकर वेदीस्थित अनिके उत्तरकी ओर चरुको रक्खे और ब्रह्माके हस्तस्थित घृतको दक्षिणकी ओर स्थापन करा देवे । फिर जिस समय चरु सिद्ध हो जाय अर्थात् पक जाय तब एक तिनकेको वाले और चरुपात्रके चारों तरफ घुमा- कर उसको अनिमें डाल देवे । तदनन्तर सुवेको आनिमें तीन बार तपाना चाहिये । फिर जो पहले संमार्जननामक पांच कुशा स्थापन करी गई हैं, उनके अपनागसे जुवेके भीतर और पिछले भागद्दारा सुवेके वाहर साफ करे । फिर प्रणीतापात्रके जलसे सुवेको प्रोक्षण करे । अर्थात् उसपर जल छिडके और फिर तीन बार अनिमें तपाकर उसको (वेदीके ) दक्षिणकी ओर रख देवे। अनन्तर घृतको अनिमेसे उठावे और चरुके पूर्वकी ओर लाकर फिर उसको अपने आगे रख देवे । फिर घृतके पश्चिमकी ओरको चरु लाकर घृतको उत्तर दिशामें स्थापन कर देवे । पश्चात् घृतको पूर्व निर्मित पवित्रोंसे कुछेक ऊँचा उछाले और देखे । यदि उसमें कुछ अपद्रव्य अर्थात् मक्खी इत्यादि पड़ी हो तो उसको निकालकर फेंक देवे । फिर पूर्ववत् प्रोक्षणीपात्रके जलको उछाले।

भाषाटीकासहिता। पात मनसा ध्यात्वा तूष्णीमनौ क्षिपेत् । समिधो घृताताः अथोपविश्य सपवित्रमोक्षणीजलेनानि प्रदक्षिणकमेण पयुर्घ्य प्रणीतापाचे पवित्र धृत्या' ब्रह्मणान्मारब्धः पातितदक्षिणजानुर्जुहुयात् ततआहुतिचतुष्टये प्रत्याहु- 'त्यनन्तरं हुतशेपस्य घृतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः ततः समिद्धतमेऽनौ अ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये। इति मनसा । * इन्द्राय स्वाहा इद- मिन्द्रायः । इत्याघारो। ॐ अग्नये स्वाहा इदमनयेॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागौ । ततोऽन्वारब्धः स्थालीपाकेन होमः ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये। इति मनसातितोऽनन्वारब्धो जुहुयात् तत्तदाहुत्यनन्तरं युवावस्थितहुतशेपस्य प्रोक्षण्यां प्रक्षेपः तत्रैवाज्य स्थालीपाकाभ्यां स्विष्टकृद्धोमः । ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा इदमग्नये पश्चात् यजमान खडा होकर बाँये हाथमें उपयमन नामवाली तीनसे तेरहतक जो कुशा पहिले कही गई हैं उनको ग्रहणपूर्वक मनमें प्रजापतिका ध्यान करता हुआ पूर्वस्थापित तीन समिधाओंको घृतमें भिगोकर स्वाहा उच्चारणपूर्वक चुपचाप अनिमें डाल देवे। इसके पीछे यजमान आसनमें बैठकर पवित्रों सहित प्रोक्षणीके जलको हाथमें लेकर अग्निके चारों ओर छिडके और फिर उन पवित्रोंको प्रणीतापात्रमें रखदेवे पश्चात् यजमान ब्रह्मासे मिलकर और शहिने घुटुएको नवायकर प्रज्वलित अनिमें हवन करे । यहाँ घृतकी चार आहुति दी जाती हैं। उनमें एक एक आहुति देनेके अनन्तर सुवेमें शेष रहे हुए वृतको प्रोक्षणीपात्रमें डालते जाना चाहिये यथा,-ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा। ॐ इन्द्राय स्वाहा इदं इन्द्राय इत्यापारौ । ॐ अनये स्वाहा इदममये। ॐ सोमाय स्वहा इदं सोमाय० । इत्याज्यभागौ । फिर घृत मिलाकर स्थालीपारका ( अर्थात् पहले जो चरु बनाया गया है उसका) होम करे यहाँ दो आहुति तो ब्रह्मासे युक्त होकर दी जाती हैं और शेर ब्रह्मासे पृथक् होकर दी जाती है। इन आहुतियों में भी शेपरहा हुआ घृतादि पूर्ववत् प्रोक्षणीपात्रमें डालते जाना चाहिये। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । ॐ अनये स्विष्टकते स्वाहा दशकर्मपद्धतिः। स्विष्टकृते । ॐ भूः स्वाहा इदमग्नये न-मम । ॐ भुवः स्वाहा 'वायवे०। ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय० । एता महाव्याहृतयः। अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अब यासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेपासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमनीवरुणाभ्यां । अस त्वन्नो अग्ने व्वमो भवोती नेदिष्टो अस्या उपसो व्युष्टौ । अब यवनो वरुण रराणो व्योहि नृडीकर सुहयो न एघि स्वाहा इदमग्री- वरुणाभ्यां ।*अयाश्चाग्नेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्वमया असि । अयानो यज्ञं वहास्ययानो धेहि भेषजर स्वाहा इदमनये । ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महातः । तेभिनों अब सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वाः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भयः स्वभ्यश्च न मम । ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधर्म विमध्यम्। श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय० । इति सर्वप्रायश्चि- इदमग्नये स्विष्टकतेः । ॐ भूः स्वाहा इदममये न मम । ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे० । ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय० । एता महान्याहृतयः। ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो अव यासिसीष्टाः । यजिष्टो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमग्रीवरुणायाम् ॐ सत्त्वनो अमे चमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उपसो व्युष्टौ । अव यक्ष्वनो वरुण रराणो वीहि मृडीक · सुहवो न एधि स्वाहा इदमनीवरुणान्याम् । ॐ अयाश्चानेस्य- नभिशस्निपाच सत्वमित्त्वमया असि । अयानो यज्ञं वहास्ययोनो धेहि पजर स्वाहा इदमग्नये । ॐ ये ते शतं वरुण ये सहनं यज्ञियाः पाशा वितता म- हांतः तेभिर्ना अद्य सविनोत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतःस्वाः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विधेयो देवायो मरुद्भ्यः स्वयश्च न मम । ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधर्म रिमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इंदं वरुणाय । इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं भाषाटीकासहिता। त्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति प्राजापत्यम् । अथ संस्रवणाशनम् । ततः आचम्य अद्यसीमन्तोन्नयनहोमकर्मणि कृताकृ- तावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्टार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेवतममुकगोवाया- मुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे अस्वस्तीति प्रति- वचनम् । ततो ब्रह्मग्रन्थिविमोकः। ततः ॐ सुमित्रिया नआपओषधयः सन्तु इति पवित्राभ्यां प्रणीताजलेन शिरः संमृज्य ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै संतु योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः इत्यैशान्यां प्रणीतान्युजीकरणम् । ततः स्तरणक्रमेण वर्हिरुत्थाप्याज्येनाभिवार्य ॐ देवा गातुषिदो गातुं वित्वा गातुमितमनसस्पत इमं देवयज्ञ स्वाहा व्यातेधाः स्वाहा इति मन्त्रेण बहिहोमः ततः पश्चादग्गनेर्वधूमहतवाससी परिधाय्य मृदासने प्रजापतये । इति प्राजापत्यम् । फिर होमकी समाप्ति होनेपर यजमान संखवप्राशन अर्थात् प्रोक्षणीपात्रसे जल लेकर यत्किंचित् पान करे । फिर आचमनपूर्वक पूर्णपात्रका संकल्प करके ब्रह्माको (दक्षिणा) प्रदान कर देवे । संकल्प यथा- 'ॐ अद्य सीमन्तोन्नयनहोमकर्मणि कताकताचेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायाऽमुकशर्मणे ब्राह्मणाप ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रदटे ' तब ब्रह्मा स्वस्ति ' इस प्रकार कहकर उस पूर्णपात्रको ग्रहण कर लेवे। फिर पवित्रकी ब्रह्मपंथिको खोल देना चाहिये। इसके पीछे आगे लिखे मंत्रद्वारा प्रणीतापात्रके जलसे यजमान अपने शिरमें मार्जन करे। मन्त्र यथा-'ॐ सुमिनिया न आप ओपधयः सन्तु ' इसके उपरान्त 'ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः । इस मन्त्रसे प्रणीतापात्रको ईशानकोनमें उलटा कर देवे । तदन्तर पहले बिछाये हुए कुशाओंको क्रमानुसार अर्थाद जिस कमसे बिछाये थे उसी क्रमसे उठाकर वृतमें गिोवे और 'ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्वा गातुमित मनसस्पत इमं देवयज्ञर र स्वाहा लाते धाः स्वाहा' इस मन्त्रद्वारा अनिमें स्वाहा उचारण करके डालदेवे । पश्चात् नवीन वस्त्र धारण करी हुई गर्भवती स्त्रीको - -- दशकर्मपद्धतिः। स्विष्टकृते । ॐ भूः स्वाहा इदमग्नये न-मम । ॐ भुवः स्वाहा 'वायवे०। ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्यायः । एता महाव्यातयः। अने वरुणस्य विद्वान देवस्य हेडो अब यासिसीष्टाः । यजिष्ठो शोशुचानो विश्वा द्वेपासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमग्रीवरुणाभ्यां ॐ स त्वन्नो अग्ने व्यमो भवोती नेदिष्टो अस्या उषसो व्युष्टौ । अब यवनो वरुण रराणो वीहि मृडीकर सुहवो न एधि स्वाहा इदमग्री- वरुणाभ्यां । ॐ अयाश्चास्यनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्वमया असि । अयानो यज्ञं वहास्ययानो घेहि भेपज र स्वाहा इदमनये ।ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महातः । तेभिनों अद्य • सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भयः स्वभ्यश्च न मम । ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधम विमध्यम् श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय । इति सर्वप्रायश्चि- इदमनये स्विष्टकते । ॐ भूः स्वाहा इदमग्नये न मम । ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे० 101 ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय: । एता महान्याहृतयः। ॐ त्वन्नो अमे वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो अव यासिसीठाः । यजियो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा देषासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमग्रीवरुणान्याम् ॐ सत्त्वन्नो अग्ने वमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उपसो व्युष्टौ । अव यक्ष्वनो वरुण रराणो वीहि मृडीक र सुहवो न एधि स्वाहा इदमनीवरुणायाम् । ॐ अयाश्चास्य- ननिशस्तिपाश्च सत्वमित्त्वमया असि । अयानो यज्ञ बहास्ययानो धेहि भेषजर स्वाहा इदमनये । ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता म- हांतः । तेभिः अद्य सावनोत विष्णुविधे मुंचंतु मरुतः स्वः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विवेत्यो देवायो मरुद्भ्यःस्वयश्च न मम । ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधर्म विमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तबानागसो अदितये स्याम स्वाहा इंदं वरुणाय० । इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं भाषाटीकासहिता। त्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति प्राजापत्यम् । अथ संत्रानाशनम् । ततःआचम्य ॐ अघसीमन्तोन्नयनहोमकर्मणि कृताक- तावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्टार्थमिदं पूर्णपात्र प्रजापतिदैवतममुकगोत्राया- मुकर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे वस्तीति प्रति- वचनम् । ततो ब्रह्मपन्थिविमोकः। ततः ॐ सुमित्रियानआपओपधयः सन्तु इति पवित्राभ्यां प्रणीताजलेन शिरः संमृज्य ॐ दुर्मिबियास्तस्मै संतु योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः इत्येशान्यांप्रणीतान्युजीकरणम्। ततः स्तरणक्रमेण चर्हिरुत्थाप्याज्यनाभिचार्य ॐ देवा गातुविदो गातु वित्वा गातुमितमनसस्पत इमं देवयज्ञ स्वाहा बातेधाः स्वाहा इति मन्त्रेण बहिहोमः ततः पश्चादग्वधूमहतवाससी परिधाय्य मृदासने प्रजापतये । इति प्राजापत्यम् । फिर होमकी समामि होनेपर यजमान संस्रवप्राशन अर्थात् प्रोक्षणीपात्रसे जल लेकर यत्किंचित् पान करे । फिर आचमनपूर्वक पूर्णपात्रका संकल्प करके ब्रह्माको (दक्षिणा) प्रदान कर देवे । संकल्प यथा- 'ॐ अद्य सीमन्तोन्नयनहोमकर्मणि कताकतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायाऽमुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं सम्प्रददे ' तब ब्रह्मा 'स्वस्ति' इस प्रकार कहकर उस पूर्णपात्रको ग्रहण कर लेवे । फिर पवित्रकी ब्रह्ममंथिको खोल देना चाहिये। इसके पीछे आगे लिखे मंत्रद्वारा प्रणीतापात्रके जलसे यजमान अपने शिरमें मार्जन करे। मन्त्र यथा-'ॐ सुमित्रिया न आप ओपधयः सन्तु ' इसके उपरान्त 'ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्दृष्टि यं च वयं द्विप्मः । प्रणीतापात्रको ईशानकोनमें उलटा कर देवे । तदन्तर पहले बिछाये हुए कुशाओंको क्रमानुसार अर्थात् जिस क्रमसे बिछाये थे उसी क्रमसे उठाकर चुतमें भिगोचे और 'ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्वा गातुमित मनसस्पत इमं देवयजर स्वाहा व्वाते धाः स्वाहा' इस मन्त्रद्वारा अनिमें स्वाहा उच्चारण करके डालदेवे । पश्चात नवीन वस्त्र धारण करी हुई गर्भवती बीको इस मन्त्रसे . १२ दशकर्मपद्धतिः। उपवेशयेत् लीत्रितयोदुम्बरफलयुग्मान्चितप्रादेशमितशाखाभिर्वर्तुलीकृत्य सीमन्न -मूर्द्धनि विनयति ॐ भूर्भुवः स्वः विनयामि इति मन्त्रेण सकृत् । ॐ भूनियामि। ॐ भुवनियामि । ॐ स्वनियामि इति मन्त्रेण वार- जयं ततः उदुम्बरफलयुग्मान्वितशल्लकीकंटकादिपञ्चकं वधूसीमन्तदक्षि- गतो वेणीकृत्वा पतिनाति ॐ अयमूर्जाव्यतो वृक्ष उर्जीव फलिनी भव इति मन्त्रेण । तत उदुम्बरफलादिसमन्वितसूत्रदोरकं वधू- ग्रीवायां अनेनैव क्रमेण वा आचारानीयात् । ततो बिल्लादिसमन्वित वाराष्टतयेन स्लपनम् ततः फलपुष्पादिकं नूतनवस्त्रेण बद्धा प्रतीक्ष्य धर्तव्यं प्रतिस्नपने स्वामिपठनीयो मन्त्रः ॐ अयमूर्जेति राजान५ संगा- अनिके पश्चिमकी तरफ कोमल आसनपर बैठाले और फिर सेई (पक्षी) का (कांटा ), पीपलकी कीली, पीले डोरेसे लिपटा हुआ तकुआ, तथा तीन कुशाओंकी पिंजूलिका और गूलरकी दो फलयुक्त डाली इन पांचों पदार्थोंसे पति अपनी स्त्रीके बालोंको आगे लिखे 'भूर्भुवः स्वः विनयामि' इस मन्त्रसे 'एक वार 'ॐ भूनियामि' 'ॐ भुवनियामि' ' स्वर्विनियामि इन मन्त्रोंसे तीन वार इकहा करे अनन्तर उन्ही पांचों पदार्थोंद्वारा माँग निकालनेकी रीतिसे आगे लिखे 'ॐ अयमूर्जावतो वृक्ष उजीव फलिनी भव ' इस मंत्रसे गूलरके फलादिसहित ओरेको परम्परानुसार वधूके गले या चोटीमें बाँध देवे और फिर सुवर्णरचित तागे अथवा पीले तागेसे वधूकी वेणी बाँध देनी चाहिये। फिर जो बिल्वफलादि मांगलिक पदार्थ कहेहैं, उनको जलमें डालकर आठ वार (लोटे अथवा मोलुएसे ) पलीको स्नान करावे । यहाँ फल पुष्पादि नये वनमें बाँधे और उनको देखकर अपने निकट रख लेवे । प्रत्येक वार म्नानके समय पति आगे लिखे मन्त्रको पढे और उसी समय वीणागायकोंको 'आप किसी राजा अथवा वीरपुरुषके यशको गाओ ऐसी आज्ञा देवे । स्नानका मन्त्र 'अयमूर्जावतो वृक्ष उजीव फलिनी अव' (वीणागायकोंके गानेका मन्त्र ) भाषाटीकासहिता। येतामिति प्रेपानन्तरं सोम एवं नो राजेमा मानुपीः प्रजाः अविमुक्तचक्र आसीरंस्तीरे तुभ्यमसौ श्रीअमुकदेवी इति गाथां चीणागाथिनो गायेतां अन्यो वा वीरतरः। ततो या ग्रामसन्निहिता नदी तस्या नाम गृह्णीयात् । तत उत्थाय वधूदक्षिणकरेण सुवस्पृष्टेन फलपुष्पसमन्वितधृतेन ॐ मृीनं दिवो अरर्ति पृथिव्या वेश्वानरमृत आजातमग्निम् । कविर सम्माजमातिथिं जनानामासना पात्रं जनयंत देवाः स्वाहा इति मन्त्रेण । ॐ पूर्णादर्वि परापत सुपूर्णा पुनरापत वस्रव विकीणा व्वहा इपमूर्जर शतक्रतो स्वाहेत्यनेन पूर्णाहुति दत्त्वोपविश्य सुवेण भस्मानीय दक्षिण- करानामिकाग्रगृहीतभस्मना ॐ न्यायुपंजमदग्नोति ललाटे ॐ कश्य- पस्य व्यायुपमिति ग्रीवायाम् ॐ यद्देवेषु व्यायुपमिति दक्षिणबाहु- मूले ॐ तत्रो अस्तु व्यायुपमितिहदि इति न्यायुपं कुर्यात् । अनेनैव 'सोम एव नो राजेमा मानुपीः प्रजाः अविमुक्तचक्र आसीरस्तीरे तुभ्यमसौ' श्रीअ- मुकदेवी फिर जिस नगर या ग्राममें यजमानका घर हो उसके समीप बहनेवाली नदीका नाम पत्नीसे उच्चारण करावे फिर पति अपनी नीके साथ खडा होजाय, और पत्नीके दाहिने हाथसे सुचेको स्पर्श कराय उस चुवेमें घृत फल, पुष्प, स्थापनपूर्वक 'ॐ मर्दानं दिवो अरति पृथिव्या वैश्वानरमृत आजातमग्निम् । कविर सम्राजमतिथि जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः स्वाहा ॐ पूर्णादा सपन सुपूमर पुरसएन । बस्नेत विकोपारहा इसम तक्रतो स्वाहा' इस मंत्रसे पूर्णाहुति करावे । फिर बैठकर सुबमें कुंड (वेदी) की भस्म लगाय दाहिने हाथकी अनामिका अँगुलीसे सुवेमें लगी हुई भस्म ग्रहण कर 'ॐ त्र्यायुपं जमदग्नेः' यह कहकर माथेमें, 'ॐ कश्यपस्य न्यायुपं ' बोलकर गलेमें, 'ॐ येद्देवेषु श्यायुपं' कहकर दक्षिणबाहुमूलमें और 'ॐ तन्नो अस्तु न्यायुपं' ऐसा उच्चारण करके उसको हृदयमें लगाना चाहिये । इसी प्रकार व १ अमुकदेवोंके स्थानमें स्वीका नाम लेवे ।

दशकर्मपद्धतिः। क्रमेण वध्वा अपित्र्यायुपं कुर्यात् तत्रतत्ते अस्तु व्यायुषं. ततो ब्राह्मणभोजनम् । इति सीमन्तोनयनम् ॥ ३ ॥ अथ जातकर्म। तब प्रथमं शूलवतीमद्भिः परिपिंचति ॐ एजतु दशमास्यो मो जरायुणा सह । यथायं वायुरेजति यथा समुद्र एजति एवायं दशमास्यो अजरायुणा सह । इति मन्त्रेण । ततो वधूसमीपे पतिर्जपति ॐ अवेतु 'पृश्नि शेवल ५शुने जराद्यत्तयेनेव मासेन पीवरीं न कस्मिंश्च नायतन मव जरायुपद्यतामिति । ततः पुत्रे जाते नाभिवर्धनीयात् प्राक्कृताभ्यु- दयिकः कुमारं दक्षिणकरस्यानामिकया स्वर्णातार्हतया मधुघृते एकी- कृत्य घृतमेव वा प्राशयति ॐ भूस्त्वयि दधामि ॐ भुवस्त्वयि दधामि फिर अपनी पत्रीके भी व्यायुप करे अर्थात् भस्म लगावे । किन्तु पनीके भस्म लगाते समय तन्नो अम्तुके स्थानमें 'तत्ते अस्तु' उच्चारण करे और फिर पाछे ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये । इति श्रीकान्यकुब्जवंशावतंसमुगदाबादनिवासि स्वर्गीयमिश्रसुखानन्दसू- रिस्नुपण्डित-कन्हैयालालमिश्रकृतभापाटीकयां सीमन्तो- न्नयनमस्कारः समाप्तः ॥३॥ अब जातकर्मसंस्कार कहा जाता है । जिस समय प्रसव होनेसे पूर्व स्त्रीको प्रसवकी प्रथम पीडा उपस्थित हो तो उसका पति आगे लिखे 'ॐ एजतु दशमास्यो गर्भो जरायुणा सह । यथायं वायुरेजति यथा समुद्र एजति एवायं दशमास्योऽसृजरायुणा सह' इस मंत्रसे जलोंसे पली पर अभिषेक करे । इस मंत्रको पलीके समीप जपे। ॐ अवैतु पृश्नि शेवल ५ शुने जरायनवेनैव मार. सेन पीवरी न कस्मिंश्च नायतनमव जरायुपदानाम् ' तत्पश्चात् पुत्रके उत्पन्न होनेपर नाल काटनेसे पहले नान्दीमुख नामक श्राद्ध करके बालकको सुवर्ण सलाईसे अनामिका अंगलिद्वारा शहत और घृतको मिलाकर अथवा केवल मात्र वृतकोही चटावे । और इन आगे लिखे हुए मंत्रोंको उस समय उच्चारण करे।'ॐ भूस्त्वयि दधामि ॐ भुवस्त्वयि दधामि ॐ स्वस्त्वयि दपाव भापाटीकासहिता। अस्वस्त्वाय दधामि ॐ भूर्भुवः स्वः सर्वं त्वयि दधामि इति मन्त्रेण । एतच्च मेधाजननम् । ततः कुमारस्य दक्षिणकर्णे नाभ्यां वा सुखं दत्त्वा ॐ अग्निरायुष्मान्स वनस्पतिभिरायुप्मास्तेन त्वायुपायुष्मंतं करोमि ॥ १ ॥ ॐ सोम आयुष्मान्स ओपधीभिरायुप्मास्तेन त्वायुपायुमंत करोमि ॥ २ ॥ॐ ब्रह्मायुष्मत्तद्वाह्मणैरायुष्मत्तेन त्वायुपायुमंत करोमि ॥३॥ ॐ देवा आयुप्मतस्तेऽमृतेनायुष्मंतस्तेन त्वायुपायु- मंतं करोमि ॥ ४॥ ॐ ऋपय आयुष्मंतस्ते व्रतैरायुमंतस्तेन त्वायु- पायुष्मंतं करोमि ॥ ५॥ ॐ पितर आयुमंतस्ते स्वधाभिरायुष्मं- तस्तेन त्वायुपायुमंतं करोमि ॥६॥ ॐ यज्ञ आयुष्मान्त्स दक्षि- णाभिरायुष्मास्तेन त्वायुपायुष्मंतं करोमि ॥७॥ ॐ समुद्र आयुष्मान्स स्रवतीभिरायुप्मास्तेन त्वायुपायुष्मंतं करोमि ।। ८ ॥ इति त्रिपित्वा । ॐव्यायुपं जमदग्नेः कश्यपस्य व्यायुपं यद्देवेपु न्यायुपं तन्नो अस्तु व्यायुपं इति विर्जपित्वा । अथ तस्य दीर्घमायुःकामयमानः पुत्रमाभ- ॐ भूर्भुवः स्वः सर्व त्वयि दधामि' एतच्च मेधाजननम् । तिस पीछे (पिता या आचार्य ) कुमारके दाहिने कान अथवा उसकी नाभिके समीप अपना मुख लगाकर आगे लिखे हुए मंत्रोंको तीन वार जपे।'ॐ अनिरायुप्मान्स बनम्प- तिभिरायुष्मास्तेन त्वायुपायुष्मतं करोमि ॥ ३ ॥ ॐ सोम आयुष्मान्स ओषधी- चिरायुष्मास्तेन त्वायुपायुष्मंतं करोमि ॥२॥ ॐ ब्रह्मायुष्मत्तबामणेरायुष्मत्तेन वायुपायुष्मंतं करोमि ॥३॥ ॐ देवा आयुष्मंतस्तेऽमृतेनायुप्मतस्तेन त्वायुपा- युष्मंतं करोमि ॥ ४॥ ऋषय आयुष्मतस्ते बौरायुष्मतस्तेन त्वायुपायुप्मतं करोमि ॥ ५॥ अपितर आयुष्मतस्ते स्वधाभिरायुष्मंतस्तेन त्वायुपायुमंत करोमि ॥६॥ ॐ यज्ञ आयुष्मान्त्सदक्षिणाभिरायुप्मास्तेन त्वायुपायुष्मतं करोमि ॥ ७ ॥ ॐ समुद्र आयुष्मान्स सवंतीभिरायुष्मांस्तेन वायुपायुष्मतं कोमे ॥ ८॥ तत्पथात आगे लिखे हुए व्यायुपं जमदग्नेः कश्यपस्य व्यायुषं यदेवेषु व्यायुम (और) तन्नो अस्तु व्यायुषम् ' मन्त्रको तीन बार जपकर दशकर्मपद्धतिः। स्पृशन वाय जपति स चायंॐ दिवस्परि प्रथमं जज्ञे आमिरस्य परि जातवेदाः । तृतीयमप्सु नृमणा अजस्रमिधान एनं जरते ॥१॥ॐ विद्मा ते अग्ने त्रेधा त्रयाणि विद्मा ते धाम बिभृता विद्या तेनाम परमं गुहा यद्विमा तमुत्सं यत आजगंथ ॥२॥ॐ त्वा नृमणा अपस्वतंचक्षा ईधे दिवो अन ऊधन् । तृतीये त्वा , तस्थिवासमपामुपस्थे महिषा अवर्द्धन् ॥३॥ अक्रंददग्निः यत्रिव द्योःक्षामारे रिहरीरुषःसमंजन् । सद्यो जज्ञानो बिहीमिद्धो अख्यः दा रोदसी भानुना भात्यंतः॥४॥ॐ श्रीणामुदारो वरुणो रयीण मनीपाणां प्रार्पणः सोमगोपाः ।। वसुःसूनुः सहसोअप्सु राजा विभात्यय उपसमिधानः ॥ ४॥ ॐ विश्वस्य केतुर्भुवनस्य गर्भ आ रोदसी अपृ. णाजायमानः। वीडं चिदद्रिमभिनत्परायं जनायनिमयजंत पंच ॥६॥ ॐ उशिक , पावको अरतिः सुमेधा मर्तेप्यानरमृतो निधायि । इयर्ति पिता यदि पुत्रके दीर्घायु होनेकी कामना करे तो फिर पुत्रके शरीरको अपने हाथसे स्पर्श करता हुआ इन आगे लिखे हुए मत्रोंको जपे । प्रथमं जने अनिरस्मद्वितीयं परि जातवेदाः । तृतीयमप्सु नृमणा अजस्रामिंधान एनं जरते स्वाधीः ॥ १॥ ॐ विना ते अमे त्रेधा त्रयाणि विना ते धाम बिभृता पुरुत्रा। विना ते नाम परमं गुहा यदिद्मा तमुत्सं यत आजग्रंथ ॥ २ ॥ ॐ समुद्र त्वा नृमणा अप्स्वंतर्नृचक्षा ईधे दिवो अम ऊधन्तृतीये त्वा रजास तस्तिवाममपामुपस्थे महिषा अवर्द्धन ॥ ३ ॥ ॐ अक्रंददनिस्तनयन्निव यौः क्षामारे रिहद्वारुधः समंजन् । सद्यो जवानो विहीमिद्धो अख्यदा रोदसी भानुना भात्यंतः॥ ४ ॥ ॐ श्रीणामुदारो वरुणो रयीणां मनीषाणां पार्वणः सोमगोपाः। वसुः सूनुः सहसो अप्मु राजा विभात्यम उपसामिधानः ॥५॥ ॐ विश्वस्य केतुर्भुवनस्य गर्ने आ रोदसी अपृणानायमानः। वीडु चिदरिद्रमभिनत्परा जनायदप्रिमयजंत पच ॥६॥ ॐ उशिक् पावको अरतिः सुमेधा मय- "ॐ दिवस्परि son भाषाटीकासहिता। धूममरुष भरिप्रदुच्छुकेण शोचिपा द्यामिनक्षन् ॥ ७॥ ॐ शानो रुक्म उा व्यद्योदुर्मर्षमायुःश्रिये रुचानः अग्मिरमृतोअभवद्वयोभिर्य- देनं द्यौरजनयत्सुरताः॥८॥ अयस्तेअद्यकृणवद्भद्रशोचेपूपं देवघृत- वंतमग्ने । प्रतनय प्रतरं वस्यो अच्छाभि सुम्नं देवभक्तं यविष्ठ ॥९॥ ॐ आतं भज सोश्रवसेवन उक्थ उक्थ आभज शस्यमाने । प्रियः सूर्य प्रियो जग्गा भवात्युजातेन भिनददुजनित्वैः॥१०॥ॐ त्यामग्ने यजमाना अनुयून विश्वा व्वसु दधिरे वार्याणि । त्वया सह द्रविणमिच्छमाना व्रजं गोमंतमुशिजो विवन्नुः ॥ ११॥ ततः कुमारं प्रतिदिशमेकैकं ब्राह्मणं मध्ये पंचममूर्ध्वमवेक्षमाणमवस्थाप्य तमुद्दिश्य इममनुप्राणितेति पिता ब्रूयात् ततस्तेषु प्राणेति पूर्वो व्यानेति दक्षिणोऽपानेति अपर उदानेति वामिरमृतो निधायि । इयति धूममरुपं जरिवदुच्छुळेण शोचिपा यामिनक्षन् ॥ ७ ॥ ॐ शानो रुक्म उा व्ययौदुर्मर्पमायुः श्रिये रुचानः । अग्नि- स्मृतो आक्छयोभिर्यदेनं द्यौरजनयत्सुरेताः॥ ८॥ ॐ यस्ते अद्य कृणवद्र शाचे पूपं देव धृतवंतमन्ने । प्रतनय प्रतरं वस्यो अच्छामि सुम्नं देवभक्तं यविष्ठ ॥ ९॥ ॐ आतं भज सौश्रवसेप्वम उक्थ उक्थ आज शस्यमाने प्रियः सूर्ये प्रियो अमा भवात्युजातेन जिनददुजनित्यैः ॥ १० ॥ ॐ त्वाममे यजमाना अनुयून् विश्वा वसु दधिरे वार्याणि त्वया सह द्रविणमिच्छमाना ब्रजं गोमंत- मुशिजो विवत्रुः ॥ ११ ॥ " तिसके पीछे बालकके पूर्व पश्चिम उत्तर और दाक्षण इन चारों दिशामें चार बाह्मणोंको बैठाल देवे और उनके बीचमें एक पाँचवें ब्राह्मणको ऊर्ध्वष्टि करके बैठाले अर्थात् यह पाँचवां ब्राह्मण ऊपरको देखता रहे । तब पिता पूर्व तरफके ब्राह्मणकी ओर देखकर 'इममनुप्राणितेति , कहे। तत् पश्चात उन चारों बाह्मणों से पूर्वकी ओर बैठा हुआ बाह्मण 'प्राणेति' उच्चारण करे । दक्षिणकी दिशामें बैठा हुआ ब्राह्मण 'व्यानेति' पश्चिमदिशामें बैठाहुआ ब्राह्मण 'अपानेति' और उत्तर दिशामें बैठाहुआ ब्राह्मण 'उदानेति' उच्चारण करे । तथा वाचमें ऊर्ध्वष्टि खडा हुआ ब्राह्मण' N २ दशकर्मपदतिः। उत्तर उपरिष्ठावेक्ष्यमाणः समानेति पंचमो बयात् । एषामसंभव मेव तत्र तत्रोपविश्य तथैव ब्रूयात् । अथ कुमारस्य येत् ॐ वेद ते भूमि हृदयं दिवि चंद्रमसि श्रितम् । वेदाई तन्मां त्पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत शृणुयाम ... अथ कुमारमभिमृशति । अश्मा भव परशुर्भव हिरण्यमश्रुतं . वे पुत्रनामासि त्वं जीव शरदः शतमित्यनेन । तत्र • येत् । इडासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनथाः1 सा त्वं वीरवती भा यास्मान्वीरवतोकरत् इत्यनेन । ततः कुमारनाभिवर्द्धने कृते तस्या दक्षिणस्तनं प्रक्ष्याल्य कुमाराय प्रयच्छति ॐइमस्तनमूर्जस्वंतं धया पां प्रपीनमग्रे सरिरस्य मध्ये उत्सं जुपस्व मधुमंतमर्वन्त्समुद्रिय सद नमाविशस्व इति मंत्रेण । ततो वामस्तने प्रक्षाल्य प्रयच्छति इमर 'समानेति' उच्चारण करे। यदि उस समय यह पाँच ब्राह्मण नहीं मिल सकें तो पिताको चाहिये कि उन पूर्वादि चारों दिशाओंमें स्वयं जाकर उन उन मन्त्रको उच्चारण कर देवे । फिर आगे लिखे 'ॐ वेद ते भूमि हृदयं दिवि चन्द्रमसि नितं वेदाहं तन्मां तद्विद्यात्पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत शृणु- याम शरदः शतम् ' इस मन्त्रसे कुमारकी जन्मभूमिको भी अभिमन्त्रित करे। अनन्तर आगे लिखे 'अश्मा भव परशुभव हिरण्यमश्रुतं भव आत्मा वै पुत्र- नामासि त्वं जीव शरदः शतम् ' ईस मन्त्रसे कुमारको स्पर्श करे। इसके पश्चाद आगे लिखे 'इडासि मैत्रावरुणी वीरे वीरमजीजनथाः सात्वं वीरवती भव यास्मा- वीरवतोऽकरत ' इस मन्त्रसे कुमार (बालक) की माताको भी अभिमन्त्रित के फिर बालकके नालछेदन करनेपर उसकी माताके दाहिने स्तनको धुलावे और मार लिखे 'ॐ इमर स्तनमूर्जस्वन्तं, धयापां प्रपीनमरे सरिरस्य मध्ये उत्सं जुषस् मधुमतसनित्समुरियर सदनमाविशस्व' इस मन्त्रसे बालकको दुग्धपान करा अर्थात् बालकके मुखमें स्तन देवे। फिर बाये स्तनको धोकर पूर्वोक्त 'ॐइस स्तनमूर्जस्वन्तं ' इत्यादि और दूसरे 'यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभों स्वा भोपाटीकासहिता। स्तनमित्यादि। यस्तेस्तनःशशयोयो मयोभूयो रनधावसुविधः सुवः। येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवेऽका इति मंत्राभ्याम् । ततः प्रप्तवित्री शयनीयमस्तकोपरि भूमौ वारिपूर्णभाजनं निदध्यात् अपो देवेषु जागृथ यथा देवेषु जागृथ एवमस्यां सूतिकायां सपुत्रिकायां जागृथेत्यनेन मंत्रेण । तच्च सुतिकोत्थापनपर्यतं तवैव धर्तव्यम् । ततः सूतिकागृहद्वारप्रवेशे पंचभूसंस्कारान् कृत्वानरुपसमाधानं स चानिरुत्था- नदिनपर्यंतं तत्रैव धर्तव्यः। तत्र चानो संध्ययोः फलीकरणांस्तंडुलांस्त- मिश्रान सर्पपान् दश दिनानि पिता अन्यो वा ब्राह्मणो नित्यं इस्तेन जुहोति तवप्रथमाहुती मंत्रः। ॐ शंडामर्का उपवीरः शौडिकेय उलूखलः मलिम्लुचो द्रोणासच्यवनो नश्यतादितः स्वाहा इदं शंडामर्काभ्यामुपवी- राय मलिम्लुचाय द्रोणेभ्यश्च्यवनाय । द्वितीयाहुतो ॐआलिखन्ननि- मिपः किंवदंत उपश्रुतिहर्यक्षः कुंभीशत्रुः पात्रपाणिमणिहंत्रीमुखः सर्ष- वसुविद्यः सुत्रः। येन विश्वा पुप्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवेऽकः । इस मंत्रसे बालकको देवे। फिर उस पुत्रवती स्वीके शिरहानेकी तरफ आगे लिखे ' आपो देवेषु जामथ यथा देवेषु जापथ एवमस्यां मृति- । कायां सपुत्रिकायां जामथेति ' इस मन्त्र द्वारा एक जलसे भराहुआ पात्र ( कलश स्थापन करे और दश दिनपर्यन्त अर्थात् जबतक सूतक निवृत्त न हो उसको वहांसे नहीं उठावे । फिर जहां पुत्र जन्मा हो उसी कोठरी (सोवर ) के दरवाजे पर पञ्चभूसंस्कारपूर्वक आगिको स्थापन करे । यह अमिमी सूतकान्ततक रहनी चाहिये। उस घरकी स्थापित अग्निमें प्रातः तथा सायंकालको धानॉकी पृथक् की हुई सुस्मी ( चोकर) चावलोंकी कनी और सरसों मिलाकर आगे लिखे "ॐ पण्डामर्का उपवीरः शौडिकेय उलूसलः ॥ मलिम्लुचो द्रोणासन्यवनो नश्यतादितः स्वाहा इदं शंडामाायामुपवीराय मलि- म्लुचाय द्रोणेयश्च्यवनायक द्वितीयाहुतौ ॐ आलिसन्ननिमिषः किंवदंत उपश्रु- तिईयक्षः कुंमीशत्रुः पात्रपाणिनृमणिहत्रीमुखः सर्पपारुणश्च्यवनो नश्यतादितः

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दशकमपदाता।.
पारुणश्च्यवनो नश्यतादितः स्वाहा इदमालिखतेऽनिमिषाय
उपश्रुतये हर्यक्षाय कुंभीशनवे पात्रपाणये नृमणये स्त्रीमुखाय
रुणाय । अथ यदि दशाहाभ्यंतरे कुमारग्रहो वालमाविशेत्तेनाविष्टो
नामयति नरोदतिनहष्यतिन तुष्यति च तदेतत्रमित्तिकं कर्तव्यं तदा
बालकंजालेन प्रच्छाद्य उत्तरायेण वाससा अंकमादायतं बालं
कूकुरस्तु कुर्कुरः कूकुरो बालबंधनः चेच्चेच्छुनक सृज नमस्ते
सीसरोलपेतापव्हरत्सत्यं यत्ते देवा वरमददुः सत्वं कुमारमेव
चेञ्चेच्छनक सृज नमस्ते अस्तु सीसरोलपेतापव्हर सत्यं यत्ते सरमामाता
सीसरः पिता श्यामशबलोभ्रातरोचेञ्चेच्छुनक सृजनमस्ते अस्तु सीसरे
लपेतापव्हरोति जपः। न नामयति न रोदिति न हृप्यति न ग्लायति यत्र
वयं वदामो यत्र चाभिमृशामसि।इत्यभिमृशति ॥ इति जातकर्म ॥१॥
स्वाहा इदमालिखतेऽनिमिपाय किंवदद्य उपश्रुतये हर्यक्षाय कुंजीशत्रवे पात्रपा
णये नृमणये हन्त्रीमुखाय सर्षपायारुणाय० । इन मंत्रोंसे पिता अथवा और
कोई ब्राह्मण दश दिनतक आहुति देता रहे फिर यदि दश दिनके भीतर बाल-
कको किसी (पूतनादि ) बालग्रहजनित पीडा ( व्याधि ) मालूम हो,
और उससे ग्रसित होनेपर बालक न हाथ पैर हिलावे, न रोवे, न हंसे और न
प्रसन्न रहे तब इस व्याधिके शमनार्थ यह कर्म करना चाहिये कि उस बालकको
उसके ओटनेके वस्त्रसहित जालसे ढककर पिता अपनी गोदीमें बैटाले और
इन आगे लिखे 'कूकुरस्तु कूकूरः कूकुरो वालवन्धनः चेचेच्छुनक सृज नमस्ते
अस्तु सीसरोलपेतापह्वरत्सत्यं यत्ते देवा वरमददुः सत्त्वं कुमारमेव वावृणाथा-
चेञ्चेच्छुनक सुज नमस्ते अस्तु सीसरोलपेतापह्वरत्सत्यं यत्ते सरमा माता
सीसरः पिताश्यामशबली भातरी चेञ्चेच्छुनक सृज नमस्ते अस्तु सीसरोल-
पेतापहरेनि जपः । न नामयति न रोदिति न हृप्यति न ग्लायति यत्र वयं वदामो
यत्र चालिमृशाममि " इत्यनिमशति मंत्रोंको जपे।
इति श्रीकान्यकुब्जयंगारतममुरादावादानकासि स्वगीयमियमुखानन्दसरिसून-
पण्डित-कन्हैयारालमिश्रकृतभाषाटीकायां जातकर्मसंस्कारः समाप्तः ॥४॥

भाषाटीकासाहिता। अथ नामकर्म। अथ दशमेऽहनि सुतिकां चोत्थाप्यैकादशेऽहनि विहितदिनांतरे वा पिता नाम कुर्यात् तत्र प्रथमं मातृपूजाभ्युदयिकादि कृत्वा ब्राह्मणार भोजयेत्। कुमार संस्नाप्य अहतवासः परिधाय्यकृतस्वस्त्ययनं प्राङ्मुखं दक्षिणकणे अमुकशासति त्रिः श्रावयति। अथ आयुर्वेदात्मंत्रः । ॐ अंगादंगात्संभवति हृदयादधिजायसे आत्मा वै पुत्रनामाप्ति स जीव शरदः शतम् । नाम द्यक्षरं चतुरक्षरं सुखोद्यं शर्मातं ब्राह्मणस्य वातं क्षत्रियस्य गुप्तांतं वैश्यस्य दासांतं शूदस्य ॥ इति नामकर्म ॥५॥ अब नामकर्मसंस्कार कहा जाता है। दश दिन सूतिकाको स्नान कराकर घरको (झाड बुहार लीप पोतकर) शुद्ध करे। फिर ग्यारहवें दिन नामकरण संस्कार करना चाहिये। यदि कदाचित उस दिन न होसके तो जिस दिनको निश्चय कर लिया है उसी दिन कर देवे। उस दिन पहले मातृपूजा और नान्दीमुखश्राद्ध करके ब्राह्मणोंको भोजन करावे फिर बालकको स्नान कराकर नवीन वस्त्र पहरावे । अनन्तर स्वस्तिवाचनपूर्वक पूर्वको मुख किये हुए बालकके दाहिने कानमें 'अमुक शर्मासि ऐसा तीन बार सुनावे और फिर अगले 'ॐ अंगाद- गात्सम्भवसि हृदयादधिजायसे आत्मा वै पुत्रनामासि सजीव शरदः शतम् मंत्रका पाठ करे। ब्राह्मणके पुत्रका नाम दो अक्षरयुक्त चार अक्षरयुक्त सहजही उच्चारण करने योग्य और शर्मान्त करे अर्थात् नामके अन्तमें शर्मा पद जोड देना चाहिये । क्षत्रियका वर्मान्त नाम करण करे अर्थात् उसके नामके पीछे वर्मा पद जोड देना चाहिये । वैश्यका गुतान्त नामकरण करे अर्थाद वैश्यके नामके अन्तमें गुप्त पद जोड देना चाहिये और शूद्रका दासान्त नामकरण करे अर्थात् शूद्रके नामके अन्तमें दासपद जोड देना चाहिये। इति श्रीकान्यकुब्जवंशारतंसमुरादावादानेवास-मिश्रसुखानंदसारसनु- पण्डितकन्हैयालालमिश्रकृतभापाटीकायां नामकर्मसंस्कारः समाप्तः ॥५॥ , '२२ दशकर्मपद्धतिः। अथ निष्क्रमणम्। तत्र चतुर्थ मासि चंद्रतारानुकूले दिने नातमलंकृतं शिशु रानीय पितान्यो वा ब्राह्मणः सूर्यमुदीक्ष्यति ॐ तत्र फलपुष्पान्वितपयसाभास्करस्य अर्को देय इति निष्कमणम् अथान्नप्राशनम्। तत्र षष्ठे मासि चंद्रतारानुकूलशुभदिने स्त्रातः शुचिराचातः वासाः पिता सूतिकागृह एव कुशकंडिकां कुर्यात् तत्र कुशेहस्तपरिम- तचतुरखभूमि परिसमूह्य तानेशान्यां निक्षिप्य गोमयोदकेनोपलिय स्पयेन सवेण वा प्रादेशमात्रमुत्तरोत्तरक्रमेण प्रागयं त्रिरुल्लिख्य उल्लेखन अब निष्क्मण संस्कार लिखा जाता है । यह संस्कार चौथे महीनेमें और चन्द्र ताराकी अनुकूलताके दिन करना चाहिये । प्रथम बालकको स्नान करा- कर नवीन गहने ओर वस्त्र पहिराय पिता या कोई दूसरा पुरुष उसको बाहर ले जावे और फिर इस आगे लिखे 'ॐ तचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक.' इत्यादि मन्त्रका उच्चारण करके बालकको सूर्यनारायणका दर्शन करावे। फिर उप- रोक्त मन्त्रका पाठ कर चुकनेपर फ्ल पुष्प गन्धयुक्त जलके द्वारा भगवान् सूर्यको अध्यं देना चाहिये। इति श्रीकान्यकुब्जवंशावतंसमुगदाबादनिवासि स्वगीयमिश्र मुखानन्दसरिसनु पण्डितक्न्हैयालालमिश्रकृतभाषाटीकाया निष्क्रमणमंस्कारः ममाप्तः ॥६॥ अब अन्नप्राशन संस्कार लिखा जाता है। यह संस्कार छठे महीने में जिस दिन चन्द्र और नारा अनुकूल हों उसी शुभ दिनमें करना चाहिये । उस दिन पिता प्रातःकाल मानपूर्वक शुद् हो आचमन करके पवित्र हो सफेद वस्त्र धारणपूर्षक जिस घरमें बालकका जन्म हुआ हो उसी घरमें चौखूटी वेदी बनावे और उससे वेदीको तीन कुशोंसे बुहारकर उन कुशोंको ईशान दिशामें फेंक देवे। फिर गोबरसे को लीपकर स्पय नामक यज्ञपात्र अथवा मुक्से क्रमशःप्रादेशप्रमाण तीन रेसा करके भनामिका भऔर अंगुष्ठसे रेखा सेंचनेके क्रमानुसार मिट्टी उठाकर फेंक .

नापाटीकासहिता। २३ क्रमेणानामिकांगुष्ठाभ्यां मृदं समुद्धत्य वारिणा तं देशमभ्युक्ष्य कांस्यपा- त्रस्थं वाह्न प्रत्यङ्मुखमुपसमाधाय ॐ अद्यकर्तव्यानप्राशनहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचंदनतांबूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे इति ब्रह्माणं वृणुयात् ॐवृतोऽस्मीति प्रतिवचनं ॐ यथाविहितं कर्म कुर्विति यजमानेनोक्ते ॐ करवाणीति तेनोक्ते अग्नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं निधाय तदुपरि प्राग- ग्रान कुशानास्तीर्य अमिं प्रदक्षिणं कारयित्वा ब्रह्माणमुदङ्मुख तत्रोप- वेश्यास्मिन्नन्नप्राशनहोमकर्णणि त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय ॐ भवा- नीति तेनोक्त प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशेराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्यानरुत्तरतो निध्यात् । ततः परिस्तरणम् । पहि- पश्चतुर्थभागमादायानेयादीशानांतं ब्रह्मणोऽमिपर्यंत नैर्ऋत्याद्रायव्यांत देवे। फिर जलसे वेदीको सेचन करे । अनन्तर कांसीके पात्रमें अग्निको लेकर पूर्वकी ओर उसका मुख करके स्थापन करे फिर आगे लिखे 'ॐ अद्य कर्तव्यान- प्राशनहोमकर्मणि कताकतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मण- मोमिः पुप्पचन्दनताम्बूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे ' इस संकल्पको उच्चारण करके ब्रह्माका वरण करे तब ब्रह्मा उस पुष्पादि सामग्रीको लेकर 'ॐ वृतोऽ- स्मि' कहे फिर यजमानके 'ॐ यथाविहितं कर्म कुरु ' ऐसा कहनेपर ब्रह्मा ॐ करवाणि ऐसा कहे । फिर अमिके दक्षिणको तरफ चौकी इत्यादि शुद्ध आसन बिछा और उसपर पूर्वको अग्रभाग करके कुशा पिछावे और फिर ब्रह्मासे अनिकी प्रदक्षिणा कराकर और उत्तरकी तरफ मुख कराकर उस- पर ब्रह्माको बैठाल देवे और कहे कि 'अस्मिन्नन्नप्राशनहोमकर्मणि त्वं मे बसा भव' तब इसके उत्तरमें ब्रह्मा 'ॐ भवानि ऐसा कहे तत्पश्चात् यजमान प्रणीता- पात्रको अपने आगे रखकर जलसे भर देवे और कुशोसे उसको ढक देवे और ब्रह्माका मुख देखकर अभिके ( वेदीके) उत्तरकी ओरको रख देवे । इसके पीछे पारस्तरण करना चाहिये। एक मुट्ठी कुशा लेकर उसके चार जागकरे। पहले भाग - २४ A . दशकर्मपद्धतिः। अमितः प्रणीतापर्यंतम् । ततोऽनेरुत्तरतः पश्चिमादीश कुशवयं पवित्रकरणाथै साप्रमनंतर्गतिकुशपत्रद्वयं प्रोक्षणीपात्रं स्थालीचरुस्थाली संमार्जनकुशाः उपयमनकुशाः धस्तिस्रः खुवः आज्यं लपूर्णपात्रं चर्वस्तंडुला एतानि पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशिक्रमे णासादनीयानि । ततः पवित्रच्छेदनकुशेर्यजमानप्रादेशमितपवित्रच्छे. दनं सपवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे निधाय द्वाभ्यामना निकांगुष्ठाभ्यामुत्तराये पवित्रे गृहीत्वा विरुत्पवनं ततः प्रोक्षणीपात्र सव्यहस्तेन गृहीत्वा दक्षिणानामिकांगुष्टाभ्यां पवित्रे गृहीत्वा बिरु- दिंगनं ततः प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीपात्रमभ्युक्ष्य प्रोक्षणीजलेनासा- दितवस्तुसेचनम् । अग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपावं निदध्यात् । ततः द्वारा अमिकौनसे ईशान कोनतक, दूसरे नागद्वारा ब्रह्माके आसनसे अग्निपर्यन्त, तीसरे भाग द्वारा नैर्ऋतकोनसे वायव्यकोनतक और चौथे भागको अग्नि (वेदी) से लेकर प्रणीतापात्रक बिछा देवे फिर अमिके उत्तरकी ओर पश्चिम दिशामें पवित्र छेदनके लिये तीन कुशा रक्से। पवित्र बनाने के लिये अग्रभागसहित तथा बीचके पत्तेसे रहित (अर्थात् जिनके भीतर अन्य कुशन हों) दोकुशपत्र रखने चाहिये। फिर प्रोक्षणीपात्र, आज्यस्थाली, चरुस्थाली, पाँच संमार्जन कुशा, तीनसे लेकर तेरहतक उपयमनकुशा, पादेशप्रमाण (बिलस्तार लंबी) ढाककी तीन समिधा, झुवा, वृत, दो सौ उपपन मुट्टी चावलोंसे भरा हुआ पूर्णपात्र और चरुके निमित्त चावल इन सब वस्तुओंको क्रमशः पवित्रच्छेदनकी कुशाओंके पूर्वपूर्वकी ओर रखता जावे। फिर पवित्रच्छेदनकी कुशाओंसे यजमान पादेशप्रमाण पवित्रच्छेदनपू- र्वक पवित्रोंको हाथमें ग्रहण कर प्रणीताके जलको तीन वार प्रोक्षणीपात्रमें डाले। अनन्तर अनामिका और अंगुष्ठसे पवित्रोंको पकडकर तीन बार प्रोक्षणीके जलको उछाले फिर प्रोक्षणीपात्रको बायें हाथमें रख दाहिने हाथकी अनामिका और अंगुष्ठद्वारा पवित्रोंको ग्रहण करके तीन बार प्रोक्षणीका जल ऊपरको आपाटीकासहिता। आज्यस्थाल्यामाज्य निरूप्य प्रणोतोदकेंन तंडुलान्प्रक्षाल्य चरुपात्रे प्रणीतोदकं दत्त्वा तत्र तंडुलान् प्रक्षिप्य स्वयं चरुं गृहीत्वा ब्रह्मा चाज्यवसावुत्तरतश्चरं दक्षिणतः आज्यं निदध्यात् । ततः सिद्धे चरो तृणादि प्रज्वाल्य उभयोरुपरि प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वह्नी तत्प्रक्षेपः । ततत्रिः मुवप्रतपनम् । संमार्जनकुशानामग्रेरंतरतो मूले- बाह्यतः सुवं संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिः प्रतप्य दक्षिणतो निदध्यात् तत आज्यमनितश्चरोः पूर्वेणानीयाये धृत्वा आज्यपश्चिमेन चरुमानीयाज्यस्योत्तरतोनिदध्यात् । ततआज्यस्य प्रोक्षणीवविरुत्पवनं फेंके । तिसके पीछे प्रणीताके जलसे प्रोक्षणीका सेचन करे फिर प्रोक्षणांके जलसे पूर्व स्थापन करी हुई सब वस्तुओंको सेचन करे । पश्चात् अमि ( वेदी) और प्रणीताके बीचमें प्रोक्षणीपात्रको रख देवे । अनन्तर आज्यस्थालीमें घृत डालकर प्रणीताके जलसे चरुके निमित्त रक्खे हुए चावलोंको धोवे और चर पकानेके पानमें प्रणीताका जल डालकर फिर उसमें चावलोंको डाल देवे पीछे यजमान चरुपात्रको उठाकर और ब्रह्मा घृतपात्रको लेकर अमिमें उत्तरकी तरफको चर और दक्षिणकी तरफ घृतको रख देवे ! फिर चरके पक जानेपर एक तिनकेको वाले और उसको चरु तथा घृतके ऊपर दक्षिण तरफसे घुमाता हुआ अनिमें डाल देवे । तत्पश्चात् सुरेको तीन बार अग्निमें तपाना चाहिये फिर संमान कुशाओंके अग्रसे युवेके जीतर और मूलभागसे बाहरकी तरफ मुबेको झाडे अर्थात् शुद्ध करे । अनन्तर प्रणीताके जलसे जुवेको छिडककर फिर तीन बार तपाकर (वेदीके ) दक्षिणकी ओर रख देवे। फिर वृतको अग्नि- मसे उठाकर और उसको चरुके पूर्वभागसे लाकर अपने आगे रक्से और फिर घृतके पश्चिमकी तरफसे चरुको लाकर घृतके उच्चरकी ओर रख देवे पश्चात् प्रोक्षणीकी तरह तीन वार पवित्रोंसे उछाले और देखे यदि उसमें कोई 1 . २६ दशकर्मपद्धतिः। मवेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनं ततः प्रोक्षण्युत्पवनं तत उत्थान नकुशान्वामहस्ते कृत्वाप्रजापति धस्तिस्रः प्रक्षिपेत् तत उपविश्य सपवित्रप्रोक्षण्युदकेन पर्युक्ष्य प्रणीतापाचे पवित्रे निधाय ब्रह्मणान्वारब्धः समिद्धतमेऽनौ जुहुयात् । तत्र प्रथमाइतिचतुष्टये तत्तदाहुत्यनंतरं वस्थितहुतशेषस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं तये।इति मनसा अइंद्राय स्वाहा इदमिद्राय इत्याघारो।ॐअम- येस्वाहा इदमनये । सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागो। ततोऽनन्वारब्धेनासाधारणासाधारणाहुतिद्रयम् तत्र प्रथमाहुतिमंत्रः ॐ देवी वाचमजनयंत देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदति सानो मद्वेषमूर्ज मक्खी इत्यादि अशुद्ध वस्तु पडी हो तो उसको निकालकर बाहर फेंक देवे फिर प्रोक्षण के जलको भी उछाले और फिर यजमान खडा होकर उपयमन कुशाओंको बायें हाथमें ग्रहणपूर्वक मनसे प्रजापतिका ध्यान करता हुआ तीनों समिधाओंको घृतमें भिगोकर स्वाहा मंत्रके सहित चुपचाप अनिमें डाल देवे । तदनन्तर आसनमें बैठकर पवित्रों के साथ प्रोक्षणीका जल हाथमें ग्रहणपूर्वक दक्षिण कमसे अमिके चारों तरफ छिडके फिर पवित्रोंको प्रणीतापात्रमें रख देवे। अनन्तर ब्रह्मासे मिलकर और दाहिनी जानुको नवायकर जलती हुई आनिमें होम करे। पहली चार आहुति देनेके अनन्तर में शेष रहे घृतको मोक्षणी पात्रमें डालता जाय। ॐ प्रजापतये स्वाहा इंदं प्रजापतये । इति मनसा । ॐ इन्द्राय स्वाहा इदं इन्द्राय० । इत्याघारौ । ॐ अग्नये स्वाहा इदं अगये। ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागौ । फिर ब्रह्मासे मिलेहुए यजमानको आगे लिखे मन्त्रोंसे साधारण और असाधारण दो' आहुति देनी चाहिये । तिनमें पहली आहुतिका मन्त्र निम्न लिखित जानना ॐ देवों वाक- मजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सानो मन्द्रेषभूज दुहाना धेनुर्म १ यह दो आहुति आग्यमाग कहाती हैं।

आपाटीकासहिता। दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतेतुः । इदं वाचे । द्वितीयाहुतिस्तु ॐ देवीं वाचमित्यादिमंत्रः ॐवानो नो अद्य प्रसुवाति दानं वाजो देवार ऋतुभिः कल्पयाति । वाजो हि मा सर्ववीरं जजान विश्वा आशा वाजपतिर्जयेयर स्वाहा इदं वाचे वाजाय । इति मंत्राभ्याम्। ततःस्थालीपाकेनाइतिच- तुष्टयम् ॐ प्राणेनान्नमशीय स्वाहाइदंप्राणायॐ अपानेन गंधमशीय स्वाहा इदमपानायॐचक्षुपा रूपाण्यशीय स्वाहा इदं चक्षुपेॐ श्रोत्रेण यशोऽशीय स्वाहा इदं श्रोत्रायः । ततो ब्रह्मणान्वारब्धकर्तृको होमः तत्र तत्तदाहुत्यनंतर मुवावस्थितहुतशेपद्रव्यस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षे- पः। तत्रैवाज्यस्थालीपाकाभ्यां स्विष्टकृतम्।ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा इदमग्नये स्विष्टकृते । तत आज्येन ॐ भूः स्वाहा इदममये । गस्मानुपसुष्टुतेतु. इदं वाचे स्वाहा । और दूसरी आहुतिका वही पहला 'ॐ देवीं वाचमित्यादि' मन्त्र जिससे कि प्रथम आहुति दी गई है और एक यह नीचे लिखा तीसरा मन्त्र जानना।'ॐ वाजो नो अद्य प्रसुवाति दानं वाजो देवार ऋतुतिः कल्पयाति । वाजो हि मा सर्ववीरं जनान विश्वा आशा वाजपति- जयेय स्वाहा इदं वाचे वाजाय० ' अर्थात् पहली आहुतिका मन्त्र और एक दूसरा मंत्र इन दोनोंको मिलाकर दूसरी आहुति देनी चाहिये। इसके अनन्तर स्थालीपाकमें वृत मिलाकर आगे लिखे 'ॐ प्राणेनान्नमशीय स्वाहा इदं प्राणाय 1 ॐ अपानेन गन्धमशीय स्वाहा इदमपानायॐ चक्षुपा रूपाण्य- शीय स्वाहा इदं चक्षुपे. । ॐ श्रोत्रेण यशोऽशीय स्वाहा इदं श्रोत्राय ।' मन्त्रसे स्थालीपाक चरुकी चार आहुति देवे । इसके आगेका हवन भी ब्रह्माते मिलकरही किया जाता है प्रत्येक आहुतिके अनन्तर सुवेमें बची हुई वस्तुको मोक्षणीपात्रमें डालना चाहिये । अब प्रथम घृत और चर इन दोनोंसे आगे लिसे 'ॐ अग्नये स्विष्टकते स्वाहा इदमनये स्विष्टकते' मन्त्रद्वारा स्विष्टलद आहुति देवे। फिर घृतद्वारा आगे लिखे भरादि मन्त्रोंसे नव आहुति देवे १ यह दोनों आधार आहुति कहलाती हैं। .

- २८ दशकर्मपदतिः। ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे न० । ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय न । महाव्याहृतयः । ॐ त्वनो अग्ने वरुणस्य विद्वान देवस्य हेडो' यासिसीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषासि स्वाहा, इदमनीवरुणाभ्यां । ॐ स त्वनो अग्नेऽवमो भवोती अस्या उपसो व्युष्टौ अब यक्ष्वनो वरुण रराणो वीहि मृडीकर न एघि स्वाहा इदमग्नीवरुणाभ्यां । अयाश्चानेस्यनभिशस्तिपाय सत्वमित्वमया असि । अयानो यज्ञं वहास्ययानो धेहि भेषजर स्वाहा इदमग्नयेॐ ये ते शतं वरुणये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महांतः। तेभिः अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतःस्वाः स्वाहा इदं वरु णाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यः ॐउदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवा- धमं विमध्यमर श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय० । इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा। इति प्राजापत्यम् । अथ संस्रवप्राशनम् । ॐ भूः स्वाहा इदमनये । ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे न० । ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय न० । एता महाव्याहृतयः। ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अब यासिसीष्ठाः। यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्सा देपा-सि प्रमुमुग्ध्य- स्मत्स्वाहा इदमनीवरुणायाम् । ॐ स त्वन्नो अमेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उषसो व्युष्टौ । अब यक्ष्व नो वरुणः रराणो व्याहि मृडीक सुहवो न पधि स्वाहा इदमनीवरुणान्यां० । ॐ अयाश्यामेस्यननिस्लिपाश्च सत्वमित्व- मया असि। अयानो यज्ञं वहास्ययानो धेहि शेषजः स्वाहा इदममये । ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महांतः। तेनिन। अद्य सवि. तोत विष्णुर्विश्वे मुंवंतु मरुतः स्वर्गः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वायो देवेन्यो मरुद्भ्यः स्वयश्च० । ॐ उदुत्तमं वरुणपाशमस्मदवाधर्म विमध्यमः श्रथाय । अथा क्यमादित्य व्रते तवानागसोअदितये स्याम स्वाहा इई वरुणाय । इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति आपाटीकासहिता। तत आचम्य ओमद्य कृतेतदन्नप्राशनहोमकणि कृतांकृतावेक्षणरूपब्रह्म- कर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेवतममुकगोवायासुकशर्मणे ब्राह्म- णाय ब्रह्मणे दक्षिणांतुभ्यमहं संप्रददे इति दक्षिणां दद्यात् । अस्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततः प्रणीताविमोकः । ॐ सुमित्रिया न आप ओषधयः संतु इति पठित्वा पवित्राभ्यां प्रणीताजलमानीय तेन शिरःसंमृज्य ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै संतु योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः इत्यैशान्यां प्रणी- तान्युन्जीकरणम् ततस्तरणक्रमेण बर्हिरुत्थाप्याज्येनाभिधार्य इस्तेनैव जुहुयात् । ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्या गातुमित मनसस्पत । इमं देव यज्ञ स्वाहा वाते धाः स्वाहा । इति वर्हिहोमः । अथ सर्वान कटु- मधुरलवणादिरसान्सर्वाणि च शाल्यादीन्यन्नानि यथासंभवमुद्धृत्येकस्मि- मनसा । इति प्राजापत्यम् । अनन्तर प्रोक्षणीपात्रके जलको यत् किंचित् पान करे फिर शुद्ध जलसे आचमन करे पुनः आगे लिखे हुए 'ओमद्य कतेतदन्न- प्राशनहोमकमणि कतारुतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापति- दैवतममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुज्यमहं संपददे । ऐसा संकल्प करके पूर्णपात्रका दान करके ब्रह्माको देवे । तब ब्रह्मा 'ॐ स्वस्ति' कहकर उसको ग्रहण करे । फिर पवित्रोंसे प्रणीतापानके जलको लेकर आगे लिसे 'ॐ सुमित्रिया न आप ओपधयः सन्तु ' मन्त्रसे अपने शिरमें टिडके । अनन्तर आगे लिखे 'ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्वेष्टि यञ्च वयं दिप्मः' मंत्रसे प्रणीतापात्रको ईशानकोनमें उल्टा कर देना चाहिये । इसके पीछे स्तरणकमसे अर्थात जिस क्रममे कुश बिछाये थे उसी क्रमसे कुशीको उठाकर घृतमें भिगोये और फिर उनको हायसे ही आगे लिसे 'ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्वा गातुमित मनसस्पत । इदं देव यजर स्वाहा बाते धाः स्वाहा' इस मन्त्रद्वारा अग्निमें होम कर देवे फिर सब प्रकारके कडवे, तारो, कसैले, मीठे, खट्टे, लवण रसोको, सब प्रकारके चावल इत्यादि अन्नको, जिस परिमाणसे घरमें बनाये गये हों, उस दशकर्मपद्धतिः। त्रुत्तमपात्रे कृत्वा कृतस्नानादिरलंकारादियुतो बालस्तूष्णों से इति मंत्रेण वा अन्नपतेऽन्नस्य नो देह्यनमीवस्य शुष्मिणः तारिष ऊर्जनो धेहि द्विपदे चतुष्पदे इत्यनेन वा प्राशनीयम् । कुमारस्य वाक्प्रसरणकामन भरद्वाजमांसेन अनाधकामेन मांसेन मस्त्येन जवनकामस्य आयुःकामेन कृकलासमांसेन सकामेन आटिमांसं सर्वफलकामेन कथितसर्वमांस काजल: गौरतित्तिर इति केचित् । अलाभे पिष्टकमयानां भरद्वाजप्रभृती, नामेकदेशः प्राशयितव्यः । तत आचम्योत्थाय फलमूलपुष्पसम- वितघृतेन घुवं परिपूर्य ॐ मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वेश्या नरमृत आजातमग्निम् । कविर सम्राजमतिथि जनानामासना पात्र सबमेंसे थोडाथोडा एक उत्तम पात्रमें परोसकर सानपूर्वक शुद्ध नवीन वस्त्र पहराये हुए बालकको चुपचाप 'ॐ हन्त' या आगे लिखे 'अन्नपतेऽन्नस्य नो देहानमी- वस्य शुष्मिणः प्रदातारं तारिष ऊर्जनो धेहि द्विपदे चतुष्पदे' मन्त्रसे उस पात्र में रक्खे हुए सब अन्न बटा देवे । यहाँ विशेषता यह है यदि पिता इच्छा करे कि यह मेरा बालक उत्तम वक्ता हो तो भारद्वाज (पक्षी विशेष) के मांससे उसको प्राशन कराना चाहिये। यदि बालकके विशेष अन्नशाली होनेकी कामना हो तो कपिजल (पक्षी) के मांससे प्राशन कराना चाहिये। यदि पुत्रके वेगवान् होनेकी चाहना हो तो मत्स्यमांस द्वारा, विशेष दीर्घायु होनेकी लालसा होनेपर ठकलास (गिरगट ) के मांस द्वारा और पुत्रके ब्रह्मतेजस्वी होनेकी अभिलापा होनेपर सफेद तीतरके मांससे प्राशन कराना चाहिये। यदि बालकके सर्पगुण- सम्पन्न होनेकी अभिलाषा हो तो उसको सब प्रकारके भक्ष्य मांसद्वारा प्राशन कराना चाहिये । यदि उपरोक्त मांस न मिल सके तो आटे द्वारा उन उन पक्षियोंका आकार (मूर्ति) बनाकर उसके कुछ अंशको प्राशन करा देखे फिर आचमनपूर्वक मुवेमें मल फल पुष्प वृत भरकर खडा होजाय और आते लिखे ॐ मूतिं दिवो औरति पृथिव्या वैश्वानरमृत आजात ममिम् । कवि .

भापाटीकासहिता। जनयंत देवाः स्वाहा । इति मंत्रेण पूर्णाहुति दद्यात् । तत उपविश्य भस्मानीय दक्षिणानामिकायगृहीतभस्मना ॐ त्र्यायुपं जमदग्नोरिति ललाटे ॐ कश्यपस्य व्यायुष्यमिति ग्रीवायां ॐ यद्देवेषु व्यायुपमिति दक्षिणवाहुमूले ॐ तत्रो अस्तु न्यायुपमिति हृदि । अनेनैव क्रमेण कुमारललाटादायपि तन्त्रो इत्यत्र तत्ते अस्त्विति विशेषः ततो । दूर्वा- क्षतादिदानं ब्राह्मणानां भोजनं च । इत्यन्नप्राशनम् ॥ ७ ॥ अथ चूडाकर्म । तच पूर्णव तृतीये वा असंपूर्णे उपनीत्या सह वा यथाचारं उदग- यन आपूर्यमाणपक्षे शुक्रास्तादिदोपरहितरिक्तादिदोपरहितसोमगुरुबुध- समाजमतिथि जनानामासना पात्रं जनयंत देवाः स्वाहा' इस मन्त्रसे पूर्णाहुति देवे । ततयाद आसनमें बैठकर सुवेमें होमकी भस्म लगावे और फिर अना- मिका अंगुली द्वारा उस मुवेकी भस्म लेकर 'ॐ ज्यायु जमदनेः 'उचारण करके माथेमें, ॐ कश्यपस्य व्यायुपं' कहकर गलेमें, 'ॐ यद्देवेषु व्यायुपं' पढकर दक्षिणबाहुमूलमें और 'ॐ नमो अस्तु व्यायुपं ' ऐसा बोलकर उस भस्मको हृदयमें लगा लेना चाहिये । इस प्रकार पिता अपने भस्म लगाकर फिर ऐसेही पुत्रके भी लगावे किन्तु जब पुत्रके भस्म लगावे तब 'तन्नो अस्तु' के स्थानमें 'तते अस्तु ऐसा उचारण करे। फिर बामणसे दुर्वा अक्षत पुष्पादि द्वारा आशीर्वाद ग्रहण करे इसके उपरान्त ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। इति श्रीमुरादाबादनिवासिकान्यकुजवंशावतंसवर्गीयामेथ्रमुखानन्दसारमनु- पण्डितकन्हैयालालमिश्रकृतमापाटीकायामन्नप्राशनसंस्कारः समाप्तः ॥७॥ अब चूडाकरणसंस्कार लिखा जाता है । यह चूडाकरणसंस्कार वर्षके पूर्ण हो जाने पर अथवा तीसरे वर्ष या यज्ञोपवीत संस्कारके साथ अपने यहाँ- को रीतिके अनुसार किया जाता है। चूडाकरण संस्कार उत्तरायण शुक्लपक्ष और शुकादिके अस्तरहित समपमें तथा रिकातिथिरहित समपमें और सोम, ३२ दशकर्मपद्धातः। शुकान्यतमवारविहितनक्षत्रसमन्वितायां तिथो मातृपूजाभ्युदयिकादि कृत्वा मंडपे परिष्कृतभूमी तत्र क्रमः । कुशैहस्तमितां भूमि परिसमूह तानशान्यां गोमयोदकेनोपलिप्य खुवमूलेन प्रादेशमा त्रिरुल्लिख्य णानामिकांगुष्ठाभ्यामुद्धृत्य , वारिणा तं देशमभ्युक्ष्य मानीय प्रत्यङ्मुखमनेरुपसमाधानं कुर्यात् । ततोऽग्नेः पश्चिमतो . नदक्षिणदिशि नापितमहतवासः परिधाय्य कुमारमंके निधाय उपविशति । ततः पुप्पचंदनतांम्बूलवासांस्यादाय अद्य कर्तव्यचूडा. करणहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकश- मणिं ब्राह्मणमेभिः पुप्पचंदनतांबूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे इति गुरु, बुध तथा शुक्र इन वारोंमें और ज्योतिषशास्त्रोक्त चूडाकर्म कथित नक्षत्र- युक्त तिथिमें होना चाहिये । उस दिन यजमान स्नान तथा नित्यकर्म करके मातृपूजा और नान्दमुख श्राद्ध कर रचे हुए मण्डपको शुद्ध भूमिमें वेदी वनायकर कुशकण्डिकाका आरंज करे । प्रथम तीन कुशाओंसे वेदीको परि- कार (साफ) करे और फिर उन कुशाओंको ईशानकानमें फेंक देवे । अन- न्तर गोबरमें जल मिलाकर वेदीको लीपे फिर सुवेसे प्रादेशप्रमाण तीन रेखा बैंचकर रखा खेचनेके क्रमानुसार अनामिका और अंगुष्ट द्वारा उन रेखाओं से मिट्टी उठाकर ईशानकोनमें डाल देवे तत्पश्चात् वेदीको जलसे सेचन करना चाहिये और कॉसीके पात्रमें अमि लाकर उसको पश्चिमाभिमुख करके वेदीमें स्थापन करे। फिर अनिके पश्चिमकी तरफ आसन विछाकर यजमान नवीन वस्त्र पहरफर उसपर बैठे पश्चात् बालरको स्नान कराय नवीन वस्त्र पहराय माता अपनी गोदीमें लेकर पतिके दाहिनी तरफ बैठे तदनन्तर पुष्प, चन्दन, ताम्बूल तथा वस्त्र लेकर यजमान आगे लिखेहुए ॐ अद्य कर्त्तव्यचूडाकरण- होमकर्माण कताकतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं बास णमोभिः पुष्पचन्दनताम्बूलवासोभिब्रह्मलेन त्वामहं वृणे, इस संकल्पको उपात भाषाटीकासहिता। ब्रह्माणं वृणुयात् ॐ वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् ॐ यथाविहितं कर्म कुर्विति यजमानेनोते ॐकरवाणीति प्रतिवचनम् । ततो यजमानोऽग्ने- दक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि पागवान् कुशानास्तीर्याग्निं प्रद- क्षिणं कारयित्वा अस्मिन्कर्मणि वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय भवा- नीति तेनोक्ते ब्रह्माणमुदङ्मुखं तत्रोपवेश्य प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशेराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्यामेरुत्तरतः कुशो- परि निदध्यात् । ततः परिस्तरणं वहिपञ्चत्तुर्थभागमादायानेयादीशांनातं ब्रह्मणोऽग्निपर्यंत नैर्ऋत्याद्वायव्यांतं अमितः प्रणीतापयतै तताऽग्नेरुत्तरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनाथै कुशवयं पवित्रकरणाथै सायमनंतर्भित- कुशपत्रद्वयं प्रोक्षणीपात्रं आज्यस्थाली संमार्जनकुशाः समिधस्तित्रः रण पूर्वक ब्रह्माका वरण करे तब ब्रह्मा उस पुष्पादि सामग्रीको लेकर ॐ वृतोऽस्मि' ऐसा कहे । फिर यजमान 'ॐ यथाविहितं कर्म कुरु ' कहे कब (उसके उत्तरमें ) ब्रह्मा ॐ करवाणि' ऐसा कहे । तत्पश्चाव यजमान अनिके दक्षिणकी ओर चौकी आदि शुद्ध आसन बिछाकर उसपर पूर्वको जिनका अग्र- भाग हो ऐसे कुश विछावे और ब्रह्मासे अनिकी प्रदक्षिणा कराकर 'अस्मिन्कमणि त्वं मे ब्रह्मा भव' अर्थात् इस कर्ममें आप मेरे ब्रह्माहो ऐसा कहे तब इसके उत्तरमें ब्रह्माके 'ॐ भवानि' कहने पर उस आसनपर ब्रह्माको उत्तराभिमुख करके बेढाल देना चाहिये । फिर प्रणीतापात्रको आगे रखकर जलसे परि- पूर्ण करके कुशाओंसे ढक देवे और ब्रह्माके मुखकी तरफ देखकर अनिके उत्तरकी ओर कुशाओं पर रख देवे तिसके पीछे अग्निके सब ओर परिस्तरण करना चाहिये । मुट्ठीजर अथवा सौ कुश लेकर उसके चार भाग करे । प्रथम भाग अमिकोनसे लेकर ईशानकोनतक, दूसरा भाग ब्रह्माके आसनसे अनिकोनतक, तीसरा भाग नैर्ऋत्यकोनसे वायुकोनतक और चौथा भाग अनिसे प्रणीतापात्रपर्यन्त बिछा देवे | फिर अमिसे उत्तर पश्चिम दिशामें पवित्रच्छेदनके लिये तीन कुशा रक्से और पवित्र बनाने के लिये २ ३४ दशकर्मपद्धतिः। खुवः आज्यं H २ पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वादाश क्रमणासादनाय साधारणवस्तून्युपकल्पनीयानि तत्र शीतोदकमुष्णोदक तान्यतमस्य पिंडः विश्वेतशल्लकीकंटकं लोहक्षुरः नापितः वृपभगोमयपिंडः ततः पवित्रच्छेदनकुशाः पवित्रे छित्त्वा सपवित्रकरण प्रणीतोदक प्रोक्षणीपावे निधाय द्वाभ्यामनामिकांगुष्ठाभ्यामुत्तराये पवित्रे त्रिरुत्पवनं ततः प्रोक्षणीपात्रं वामहस्ते कृत्वाऽनामिकांगुष्टगृहीतपवित्रा- भ्यां प्रोक्षणीजलं विरुक्षिप्य प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीपात्रमभ्युक्ष्य प्रोक्षणी जलेनासादितवस्तून्यभिपिच्यानिप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात्। अग्रभागसहित और बीचके पत्तेसे रहित ऐसे दो कुशपत्र रक्खे । फिर प्रोक्ष- णीपात्र, आज्यस्थाली, पांच संमार्जनकुशा, तीन समिधा, युवा, घृत और दो सौ छप्पन मुट्ठी चापलोंसे जरा हुआ पूर्णपात्र इन सब पदार्थोंको पवित्र- • च्छेदनकी कुशाओंके आगे आगे रखता जावे और इन सबके आगे आगे अन्यान्य साधारण वस्तुओंको भी रखता जावे । ( इनके सिवाय ) शीतल और उप्णजल रक्खे । घृत, दही अथवा माखन इनमें यथालब्ध किसी एक पदार्थका गोलाकार विंड बनाकर रख देवे । तीन स्थानमें सफेद सेही पक्षीका • कांटा, सचाईस कुशा, लोहेका उस्तरा, नापित (नाई), बेलके गोबरका पिंड (लौंदा) तथा अन्यान्य कमलके पत्ते इत्यादि मांगलिक पदार्थोंको स्थापन करे । फिर पवित्रच्छेदनकी कुशाओंसे पवित्र छेदनकर उन पवित्रों को हाथमें ले प्रणीताके जलको प्रोक्षणीपात्रमें डाले । पश्चात् अनामिका और अंगुष्ठ इन दोनों अंगुलियोंके द्वारा पवित्रोंको पकड प्रोक्षणीका जल तीन बार उछाले । फिर प्रोक्षणीपात्रको बायें हाथमें रखकर अनामिका तथा अंगाने पकडे हुए पवित्रोंसे प्रोक्षणीका जल तील बार ऊपरको छिडके। पीछे प्रणवाके जलसे प्रोक्षणीपात्रको सेचन कर प्रोक्षणीके जल द्वारा पूर्वस्थापित सब .

भाषाटीकासहिता। आज्यस्थाल्यामाज्यं कृत्वाधिश्रित्य ज्वलत्तृणादिकमादायाज्यस्यापार प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वह्नी तत् क्षिपेत् । ततस्त्रिः मुवप्रतपनं संमार्जन- कुशानामोरंतरतो मूलैाह्यतः मुवं संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पूर्ववत् त्रिः प्रताप्य दक्षिणतो निदध्यात् । ततः अगितः प्रदक्षिणक्रमणाज्यम- वतार्यायतो निदध्यात् । ततः प्रोक्षणीवत्रिराज्योत्पवनं अवेक्ष्य सत्य- पद्रव्ये तन्निरसनं पूर्ववत्प्रोक्षण्युत्पवनं तत उत्थाय उपयमनकुशानादाय वामहस्ते कृत्वा प्रजापति मनसाध्यात्या तूष्णीमनों घृताक्ताः समिध- स्तिस्रः प्रक्षिपेत् । तत उपविश्य सपवित्रप्रोक्षण्युदकेन प्रदक्षिणकमेणार्मि पर्युक्ष्य प्रणीतापाचे पवित्रे कृत्वा ब्रह्मणान्धारब्धः पातितदक्षिणजानुः ऑको छिडके। फिर उस प्रोक्षणीपात्रको अनि और प्रणीताके बीचमें रख देना चाहिये । अनन्तर आज्यस्थालीमें घृत डालकर उसको येदीकी अग्रिमें रख देवे । फिर एक तिनका बालकर घृतके चारों ओर दक्षिण कमसे घुमाकर अग्निमें डाल देवे तदनन्तर तीन बार युबेको (वेदीकी अमिसे ) तपाये और फिर संमार्जनकुशाओंके अग्रभागसे भीतर और मूलभागसे बाहरकी तरफ स्रोको शुद्ध कर प्रणीताके जलसे छिडके अनन्तर पूर्वोक्तमकारसे ही फिर तीन बार तपाकर दक्षिणकी ओर ग्खदेवे । तत्पश्चात दक्षिण क्रमसे अग्रिसे घृतको उठाकर यजमान अपने आगे रख लेवे फिर प्रोक्षणीपात्रकी तरह यजमान उस घृतको पवित्राद्वारा उछाले और देखे यदि उसमें मक्खी इत्यादि कोई अपवित्र वस्तु पड़ी हो तो उसको निकालकर फेंक देना चाहिये । फिर पूर्ववत् पवित्राद्वारा तीन बारही मोक्षणापात्रके जलको उछलना उचित है। फिर यजमान खडाहोउपयमन कुशाओंको बायें हाथमे ले मनमें प्रजापति का ध्यान करता हुआ उन पूर्व स्थापित तीनों समिधाओंको घृतमें भिगोकर स्वाहा शब्दके साथ चुपचाप अनिमें डाल देवे । फिर आसन पर बैठकर पवित्र और प्रोक्षणीका जल हाथमें ग्रहणपूर्वक अनिके चारों तरफ डिडक पवित्राको प्रणीतापात्रमें रखदेवे फिर बलासे मिलकर और अपने दाहिने खुटुएको नवायकर प्रज्वलित अभिमें होम r- . 'दशकर्मपद्धतिः। समिद्धतमेऽनौ जुहुयात् । तत्र प्रत्याहुत्यनंतरं स्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः। ॐ प्रजापतये स्वाहाइदं प्रजापतये मनसा । ॐ इंद्राय स्वाहा इदमिंद्राय०२। इत्याचारों। स्वाहा इदमग्नये ३। सोमाय स्वाहा इदं सोमाय०४१.. ॐ भूः स्वाहा इदमनये० ५। ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे० ६ ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय ७ । एता महाव्याहृतयः । ॐ अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अब यासितीष्ठाः। शोशुचानो विश्वा द्वेपारसि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमग्रीवरुणाभ्यां० ८ अस त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्टो अस्याउपसो व्युष्टो । अब नो वरुणररराणो वीहि मृडीकर सुहवो न एघि स्वाहा इदमग्रीवर- णाभ्यां०९। अयाश्चानेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्वमया आसि । अयानो यज्ञं वहास्ययानो घेहि भेपजर स्वाहा इदमनये० १० । करे प्रत्येक आहुति देनेपर बेमें जो घृत शेष रहे उसको प्रोक्षणीपात्रमें डालता जाय । हवन करनेके मन्त्र यथा । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापत्ये न मम । ॥ ३ ॥ इति मनसा । ॐ इन्द्राय स्वाहा इदमिन्द्राय न मम ॥२॥ इत्याघारौ। ॐ अनये स्वाहा इदमनये न मम ॥ ३॥ ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय न मम ॥ ४ ॥ इत्याज्यभागौ । ॐ भूः स्वाहा इदमनये न मम ॥ ५॥ ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे न मम ॥ ६ ॥ ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय न मम ॥ ७ ॥ एता महान्याहृतयः । ॐ वनो अमे वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो ऽअव यासि- सीठा । यनिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वादेषासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमयी वरुणायां ॥८॥ ॐ स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदियो अस्या उषसो न्युटौ। अब यक्ष्व नो वरुण रराणो वीहि मृडीक सुहवो न एधि स्वाहा इद मशीन वरुणायां न मम ॥ ९ ॥ ॐ अयाश्वानेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्वमपा मसि । अयानो यज्ञ वहास्ययानो धेहि भेषजः स्वाहा इदमनये. ॥१.

७ भाषाटीकासहिता। ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महांतः । तेभिनों अद्य सबितीत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वर्काः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो -मरुदयः स्वर्केभ्यश्च० ३१ । ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मवाधमं विमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तथानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरु- गाय० १२।इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजा- पतये० १३ । इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा इदमनये स्विष्टकृते. १४ । इति स्विटकृत् । अथ संस्रवप्राश- नम् । तत आचम्य *अद्यामुप्य कुमारस्य कृतेतचूडाकरणहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपनाकर्मप्रतिष्टार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेवतममुक- गोवायाऽमुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे । इति ब्रह्मणे दक्षिणां तु दद्यात् । ॐ स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततो ब्रह्मग्रं- ॐ ये ते शतं वरुणये सहवं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेशिअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वर्कीः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेश्यो देवेन्यो मरुन्यः स्वायश्च न मम ॥ ११ ॥ ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्म- दयाधम विमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तपानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय० ॥ १२॥ इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये ॥ १३ ॥ इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । ॐ अनये स्विष्टकते स्थाहा इदममये स्विष्टकते ॥ १४ ॥ इसके पीछे प्रोक्षणीके जलद्वारा प्राशन करना चाहिये और फिर दूसरी बार शुद्ध जलसे आचमन करे अनन्तर आगे लिखे 'ॐ अद्यामुप्य कुमारस्य कतैतन्डाकरण होमकमणि सतारतावे. क्षणरुपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोत्रायाऽमुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुल्यमहं सम्प्रददे' इस संकल्पको पढकर ब्रह्माके निमित्त पूर्णपात्रका दान करे । तब ब्रह्मा ॐ स्वस्ति' कहकर वह दक्षिणा लेले- वे। फिर पवित्रोंकी गांठ खोल देनी चाहिये और उन्हीं पवित्रोंसे आगे लिखे । थिविमोकः । तत. ॐ सुमित्रिया न आप ओषधयः संतु इति त्राभ्या प्रणीताजलमानीय तेन शिरः संमृज्य ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै योऽस्मान्द्वष्टि यं च वयं द्विष्म । इत्येशान्या ततस्तरणक्रमेण बहिरुत्थाप्याज्येनाभिचार्य देवा गातुविदो वित्वा गातुमित मनसस्पत इमं देव यज्ञ स्वाहा व्बाते घा. स्वाहा इति मंत्रेण वहिहोमः। अथ शीतोदकमुष्णोदकेन * उष्णेन वा उदकेनेादिते केशान्वप इति मंत्रेणाभिषिच्य तक्रमिश्रितोदके ताद्यन्यतापडं तूप्णी प्रक्षिप्य दक्षिणपश्चिमोत्तरक्रमेण कुमारकेशटिकात्रये दक्षिणटिकाम् । ॐ सवित्रा प्रसूता देव्या आप उंदंतु ते तनु दीर्घायुत्वाय वर्चसे । इति मंत्रं पठित्वातना मिश्रितवारिणा 'ॐ सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु' यह मन्त्र पढकर यजमान प्रणीताके जलद्वारा शिरम मार्जन करे ओर पश्चात् आगे लिसे 'ॐ दुर्मित्रियास्तस्मे सन्तु योऽस्मान् देष्टि य च वय दिप्म' इस मत्रको पढकर प्रणीतापात्रको ईशानकोनमें उल्टा कर देवे । तिस पीछे बिछानेके क्रमानुसार अर्थात् जिस क्रमसे कुश बिछाये थे उसी कमसे उन कुशीको उठारे और फिर उनको वृतमें मिगोकर आगे लिखे 'ॐ देवा गातुषिदो गातुं पित्वा गातुमित मनस्पत इम देव यज्ञर स्वाहा याते धाः स्वाहा इस मन्त्रसे आनिमें डाल देवे तदन तर पूर्वस्थापित शीतल जलको गरम जलमें आगे लिखे 'ॐ उप्णेन वा य उदकेनेह्यादिते केशान वप' इस मन्त्र द्वारा मिलावे । फिर उस जलमें थोडासा महा डालकर पूर्व स्थापित घृत, दही या माखनके पिंडमेंसे भी यत्किंचित् पिडहीं बनाकर चुपचाप उसमें डालदेने । फिर चूडाकर्मके निर्दिष्ट दिनसे पहले दिन बालकके केशाके तीन भाग कर कलावेसे दक्षिण पश्चिम उत्तर तीन तरफ जटिका (जून) बाधे । उन पहले दिन बाँधी हुई तीनों जूटिकाओमे दक्षिण तरफवाली जूटि- काको आज चूडाकर्मके दिन आगे लिखे 'ॐ सवित्रा प्रसूता देन्या आप उन्दन्तु ते तनुम् । दीर्घायुत्वाय वर्चसे इस मन्त्रको पटकर शीतोदक, उष्णोरक -- भाषार्टीकासाहिता। ततो दक्षिणभागस्थितजटिकाभागत्रयं कुर्यात् तत्र एककां जूटिकां प्रति कुशपत्रत्रयसंयोजनं कुर्यात् शल्लकीकंटकेन तूष्णीं विवरणं कृत्वा भागवयं कुर्यात् ततः-सप्तविंशतिकुशपत्रतः पत्रत्रयमानीय तत्के- शमूलसंलगायजूटिकाप्रथमभागमध्यांतरितं कुर्यात् ॐ ओपधे बायस्व स्वधिते मेन हिल्सीः शिवोनामासिस्वाधितिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मा मा हि सीः इति मंत्रेण लोहक्षुरं गृहीत्वा ॐ निवर्तयास्यायुपेन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोपाय सुप्रनारत्वाय सुवीर्याय इति मंत्रेण जूटिकासं- लगं कुर्यात् ततः कुशपत्रत्रयसहितां जूटिकां छिनत्ति। येनावपत्सविता क्षुरेण सोमस्य राज्ञो वरुणस्य विद्वान् । तेन ब्रह्माणो वपतेदमस्यायुप्यं जरदष्टियथा सत् । इति मंत्रेण पश्चिमजूटिकाछेदन कुर्यात् । ततत्तान लूनकुशपत्रत्रयसहितान् अनडुगोमयपिंडोपरि उत्तरस्यां निदध्यात् । अव पूर्वप्रक्षालितपरभागद्वये कुशपत्रिनयांतनिधानादि च्छेदवजे महा और दधि इत्यादि मिश्रित जलसे भिगोये । फिर उस दक्षिण तरफकी जटिकाके भी सेहीके काटेसे सुलझाकर तीन भाग करे और पूर्व स्थापित सत्ताईस कुशोमेंसे तीन कुश ले कलावा लपेटकर उनकी जी पिंजुलिका बना लेवे और पहली जूटिकाके साथ उस पिंजूलिकाको युक्त करे । अनन्तर आगे लिखे 'ॐ ओरधे त्रायस्व स्वपिते मैन रिती शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मा मा हि सी।' इस मन्वसे उस्तरेको हाथमें लेवे । तदनन्तर आगे लिखे 'निवर्तयाम्यायुपेऽन्नाधाय प्रजननाय रायस्पोपाय सुप्रजा- स्त्वाय सुवीर्याय' इस मन्वसे उस उस्तरेको बालोंमें लगाये और फिर आगे लिखे ॐ येनावपत्सविता क्षुरेण सोमस्य राज्ञो वरुणस्य विद्वान् । तेन ब्रह्मणो वपते- दमस्यायुष्यं जरदष्टियथा सद।' इस मंत्रसे उस पिंजूलिकासमेत वालोंके जूडाको काट लेवे । पश्चात उन कुशसहित काटे हुए बालोंको उत्तरको ओर स्थापित बलके गोबर पर रसदेवे फिर पहले भिगोई हुई दक्षिणजागकी दोनों जूटिकाको तीन तीन कुशोंकी पिंजूलिकामे युक्त कर केश काटनेके अतिरिक्त तीन तीन दशकर्मपद्धतिः। सर्व पूर्ववदेव च्छेदनं तूष्णीम् ततः पश्चिमजूटिकायां मंत्रण प्रक्षालनं तूष्णी शल्लकीकंटकेन भागत्रयकरणं लग्नागकेशांतरितमध्यकुशपत्रत्रयधारणक्षुरग्रहणतत्संयोजनानि तत्तम- त्रेणेव । तत्र प्रथमजूटिकाछेदने मंत्रः ॐ त्र्यायुषं जमदग्नेः पस्य न्यायुपं यद्देवेषु व्यायुपं तन्नो अस्तु व्यायुपं इति मंत्रण छित्त्वा ततः पूर्ववद्गोमयपिंडोपरि निदध्यात् । तत्रावशिष्टभागदपे कुशपत्रत्रयं केशांतर्निधानादि च्छेदनवनै सर्व पूर्ववदेवच्छेदनं तूष्णी मेव लूनकुशपत्रत्रयकेशानां गोमयपिंडोपरि धारणं च । तत उत्तर- भागजूटिकायां प्रक्षालनादिक्षुरसंयोजनांतेषु पूर्ववत्तत्तन्मत्रं प्रयोज्य प्रथमभागजूटिकायां छेदने मंत्रः अयेन भूरिश्वरा दिवं ज्योक्च पश्चाद्धि सूर्य तेन ते वपामि ब्रह्मणा जीवातवे जीवनाय सुश्लोक्याय स्वस्तये । कुशपत्र रखना तथा सेहोके काँटेका लगाना इत्यादि सब काम पूर्ववत् करे, किन्तु छेदन अर्थात् वालोंके काटनेका काम चुपचाप करे अनन्तर पश्चिमकी तरफके जूडामें पूर्ववत् तत्तन्मन्त्रों द्वारा मिजोना सेईके कोटेसे चुपचाप बालों- के तीन भाग करना और फिर तीन तीन कुरा पिंजूलिकाओंका युक्त करना, क्षरे (उस्तरे ) को हाथमें लेना, बालोंमें उस्तरेका लगाना यह सब काम करे। पश्चात् आगे लिखे 'ॐ त्र्यायुपं जमदनेः कश्यपस्य व्यायुपं यद्देवेषु न्यायुष तन्नो अस्तु व्यायुषम् ' इस मन्त्रसे पहली जूडाको काट लेवे । फिर पूर्ववत् काटी हुई जूटिका इत्यादिको उसी गोवरके लौंदे पर रख देवे । अनन्तर बची हुई दो जुटिकाओंको तीन तीन कुशोंसे संयुक्त कर छेदनके अतिरिक्त सब कार्य पूर्ववत् करे किन्तु छेदन चुपचाप करना चाहिये। फिर इन केश और पिंजूलि- काको पूर्ववत् गोबरके लौदे पर रख देवे इसके पश्चात् उत्तर भागके जूडामें बाल भिगोनेसे लेकर बालोंमें छुरेको रखनेतक उन उन मन्त्रोंद्वारा सब कार्य पूर्ववत् करके प्रथम भागके जूडाको आगे लिखे 'ॐ येन भरिबरा दिवं ज्यो- क्व पश्चादिसुयं तेन तेवपामि ब्रह्मणा जीवात जीवनाय मुश्लोक्याय स्वस्तये।

भापाटीकासहिता। ग. पसार गामयपिंडोपार निध्यात् । ततोऽवशिष्टभागद्रये कुशप- ऋत्रये केशांतर्निधानादि च्छेदनवर्ज सवै पूर्ववदेव च्छेदनं तूष्णी गोमय- पिडोपरि धारणमपि । ततः समस्तशिरः प्रक्ष्याल्य त्रिः केशोपरि क्षुरं प्रदक्षिणक्रमेणानुकेशान् भ्रामयति। ॐ यत् क्षुरेण मजपता सुपेशसा वप्वा वपति केशांछिधि शिरोमास्यायुः प्रमोपीः। इति मंत्रेण । तत- स्ताभिरेवाद्भिः समस्तं शिरः प्रक्ष्याल्य ॐ अक्षण्वन्परिवप इति नापि- तायक्षुरं प्रयच्छति अथ नापितः शिखां धृत्वा समस्तशिरोवपनं यथा- कुलधर्म कुर्यात् । तांश्च केशान्नतनवस्त्रेण प्रतीक्ष्य माता दधिभक्त- दुग्धसमन्वितगोमयपिंडोपरि निदध्यात् । इति समाचारः पूर्वत्पूर्णाहुतिः ॐ मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आजातमनिम् । कविर सम्राजमतिथि जनानामासन्ना पात्र जनयंत देवाः स्वाहा इति मंत्रेण इस मन्त्रसे छेदन करे अर्थात् काट. लेवे। फिर उन केश तथा कुशाओंको गोबरके लौदेपर रस देवे। तत्पश्चात् शेष रहे उनरके दो भागोंमें तीन तीन कुशागेको केशोंके भीतर रखना इत्यादि सारे कार्य पहलेकी नाई चुपचाप करे और बालोंको काटकर गोबर लादेपर रख देवे । तदनन्तर ममस्त शिरको गीला कर अर्थात् जलसे मिजोकर छुरेको दक्षिण क्रमसे तीन बार आगे लिखे ॐ यत्सुरेण मजयता सुपेशसा वप्त्वा वा वपति केशांश्चिन्धि शिरोमास्यायुः प्रमोश इस मन्त्रद्वारा शिरके कारों ओर घुमाने पर उन्ही पहले घृतादि मिले शीतल और उष्ण जलसे सारे शिरको भिगोकर ॐ अक्षण्वन्पारवप' ऐसा उच्चा- रण करके उस छुरे (उस्तरे) को नाईके हायमें देदेना चाहिये और तब फिर वह नाई कुलधर्मानुसार शिखाको छोडकर शेष समस्त शिरका मुण्डन कर देखें। अनन्तर बालककी माता उन बालोंको नवीन वचमें लपेटकर दही दूध सहित गावरके लौंदेपर रख देखें । इस रीतिको सब किसीके पक्ष समान जानना चाहिये। फिर पूर्ववत् आगे लिखे 'ॐ मूनि दिवो अतिं पृथिव्या वानरमृत आजात मानम् । कविर सम्राजमतिथि जनानामासन्ना पार्वजनपन्त देवाः स्वाहा' ४२ दशकमपद्धांतः। पूर्णाहुतिः । तत उपविश्य सुवेण भस्मानीय स्मना व्यायुपं कुर्यात् ॐ त्र्यायुपं जमदगोरिति ललाटे ॐ व्यायुपमिति ग्रीवायां ॐ यद्देवानां व्यायुपमिति दक्षिणबाहुमूले तत्रो अस्तु व्यायुपमिति हादि अनेनैव क्रमेण कुमारललाटादावपि तत्र तत्ते अस्तु इति विशेषः। ततो दूर्वाशतादिग्रहणम् । ततस्तान केशान सगोमयपिंडान गोप्टे सरित्तीरे वा अन्यस्मिन्नुदकांतरे वा निदध्यात् । तत आचाराद्भोज्यादिकम् ॥ इति चूडाकरणम् ॥ ८॥ अथ कर्णवेधः। तत्र तृतीये व पंचमे वा पुप्येंदुचित्राहरिरेवत्यन्यतमनक्षत्रसमन्वि- तरिक्तातिथिपूर्वाले पितान्यो वा पूर्वाभिमुखोपविष्टः कुमारस्य. मधुरं इस मन्त्रमे पूर्णाहुति देनी चाहिये । फिर आतनपर बैठकर सुवेसे अमिकी भस्म ले दाहिने हाथकी अनामिका अंगुलीसे उस भस्मको ॐ व्यायुपं जमदग्नेः ऐसा कह कर माथेमें, ॐ कश्यपस्य घ्यायुपं यह कहकर गलेमें ॐ यद्देवानां ध्यायुपं ऐसा कहकर दक्षिणबाहुमूलमें और ॐ तन्नो अस्तु ज्यायुपं कहकर यजमान अपने हृदयमें लगावे । फिर इसी रीतिसे पुत्रके भस्म लगानी चाहिये । किन्तु जब पुत्रके जस्म लगावे तब तन्नो अस्तु के स्थानमें 'तने अस्तु' उच्चारण करे फिर दूर्वाक्षतादिरूप आशीर्वाद ग्रहण करे। तत्सवात् उन केशोंको गोबरके लौदे समेत गोशालामें अथवा किसी नदी किनारे किंवा किसी अन्य जलाशयके समीप रख देवे और फिर अपने कुलकी रीतिके अनुमार ब्राह्मण तथा इष्ट मित्रोंको भोजन करावे । इति श्रीकान्यकुब्जबंशावनममुरादाबादनिपासिस्वर्गीयमिश्रमुखानन्दरिस्नु- पण्डित-कन्हैयालालमिश्रकृतभापार्टीकायां चूडाकरणसंस्कारः समाप्तः ॥८॥ अव कर्णवेध ( कनछेदन ) संस्कार लिखा जाता है। तीसरे अथवा पाँचवें वर्षमें पुष्य, इन्दु, चित्रा, हार, रेवती, इन नक्षत्रों से कोई नक्षत्र युक्त, रिका अतिरिक्त अन्य तिथिके पूर्वाह समयमें पिता अथवा दूसरा घरका ।

आपाटीकासहिता। दत्त्वा ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा सस्तनूभिव्यशेम देवहितं यदायुः ॥ इति मंत्रेण दक्षि- णकर्ममभिमन्य ॐ वक्ष्यंती वेदा गनीगति कर्णप्रिय सखायं परिप- स्वजाना । योपेव शिक्त वितताधि धन्यज्या इय" समने पारयंती॥ इति मंत्रेण वामकर्णमभिमंश्येत् । ततो मध्यं वीक्ष्य नापितद्वारा वेध- 'येत् । तस्मिन् समये मधुरादिदानमाचारात् । ततो ब्राह्मणभोजनम् ।। इति कर्णवेधः ॥ ९ ॥ अधोपनयनम् । तत्र शुद्धसमय रविगुरुचंद्रतारादिशुद्धौजन्मतो गर्भाटमेऽध्देवानुकू- ल्ये पोडशसंवत्सराभ्यंतरे ब्रह्मवर्चसकामस्य पंचमेऽप्युद्गयन आपूर्वमा- कोई वृद्ध पुरुष पूर्वाभिमुख बैठ कर बालकके हाथमें कोई मादकादि (मीठी ) वस्तु देकर आगे लिखे 'ॐ अदं करणोनिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभि- र्यजत्राः । स्थिरस्तुष्टुवा गस्तनमियशेमहि देवहितं यदायुः' इस मन्त्रसे दाहिने कानको अनिमन्त्रित करे फिर आगे लिखे मन्त्रसे वा कानको भी अभिमन्त्रिन करे मन्त्र यथा ॐ पश्यन्ती वेदा गांगति कर्ण प्रियः ससा परिपत्खजाना घोपेर शिने वितताधि धनान्या इस समने पारयन्ती 'अनन्तर कर्णवेधके ठीक मध्यस्थानको देखकर नाइके द्वारा वेध करावे अर्थात् कानको छिदावे कर्णवेधक समय पालकके हाथमें मोदकादिका देना समाचार अर्थात् परंपरा है। तत्पश्चात् बाह्मणांको भोजन कराना चाहिये । इते श्रीकान्यकुञ्जशास्तममुगदावादानेवारी-स्वायमिनमुररानंदसरिसनु- पण्डित-कन्हैयालालमिप्रकृतभाषाढीकायां कर्णधगंस्कारः ममाप्तः ॥९॥ अब उपनयन संस्कार लिखा जाता है। सूर्य,गुरु,चन्द्र, तारादिकी शुद्धिवाले शुभ समयमें जन्म अयवा गर्नसे आठवें वर्ष अथरा सोलह वर्षके भीतर अपने अनुकूल समपमें और ब्रह्मनेनकी इच्छा करनेवाला पुरुष पाँचवें वर्ष उचरायण १ यहां नाई मन्दसे वर्णकारको समझना चाहिये।

४४ दशकर्मपद्धतिः। णपक्षेऽनध्यायषष्ठीरिक्ताद्यतिरिक्ततिथों रविगुरुशुकान्यतमवारे मध्याहा- दर्वाकू कुमारपित्राभ्युदयिक कृते तदभावे आचार्येणेव कृतेबाह्मणान्मा. णवकंच भोजयित्वा सशिखकृतोरंखानानंतरं यथाशक्त्यलंकृत्वाबहिः शालायां तुषकेशशर्करादिशून्यपरिष्कृतभूमो.आचार्योऽग्निस्थापनं कुर र्यात्। तत्र हस्तमात्रपरिमितचतुरस्रभूमिकुशकरणकसमूहनानंतरंगोम- योदकेनोपलिप्य सुवमूलेन प्रागयप्रादेशमात्रमुत्तरोत्तरक्रमेण विरुलिख्य उल्लेखनक्रमेणाऽनामिकांगुष्ठाभ्यांमृदमुद्धृत्य जलेनाभ्युक्ष्य नवीनकांस्य- पात्रेणानिमानीय स्वाभिमुखं निदध्यात् । ततः कुमारमाचार्यः शिष्यदा- रानेः पश्चादक्षिणपार्श्वेऽवस्थापयति ततः कुमार बद्धांजलिं संबोधयति ब्रह्मचर्यमागामि बहि इति प्रेपानंतरं ब्रह्मचर्यमागामिति कुमार और शुक्लपक्षयुक्त कालमें, अनध्याय षष्ठी रिक्ताके सिवाय अन्यान्य तिथिमें, रवि, गुरु, शुक्र इन वारोंके बीच किसी पारमें मन्याह्नसे पहले .यज्ञोपवीत करना चाहिये । पिता अथवा पिताके न होनेपर आचार्य नान्दीमुख श्राद करके ब्राह्मण और बालकको भोजन करावे। फिर शिखा धरवाय क्षौर करवाय खान करावे और उस बालकको अपनी सामर्थ्यके अनुसार अलंकृत कर बाहर तुष- केश धरि इत्यादि रहित संस्कृत तथा शुद्ध भूमि पर रची हुई शालामें आचार्य अनि स्थापन करे। तहाँ एक हाथ परिमित चौकोन वेदी बनाकर कुशोंसे शुद्ध करनेके अनन्तर गोबरसे उमको लीपना चाहिये । फिर सुवेकी जडसे पूर्वको अयनामवाली प्रादेशप्रमाण उत्तरोत्तर क्रमते तीन रेखा सैंचकर रेखाओंके कमानुसार अनामिका और अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंद्वारा रेखाओं से मिट्टी उठाकर ईशानकोनमें डाल देवे फिर जलसे उस वेदीको सेचन करे पीछे नवीन काँसीके पात्रमें अग्नि मंगाकर अपने सन्मुख अर्थात् पश्चिमाभिमुख स्थापन करे। फिर आचार्य उस कुमार (बालक) को अपने शिष्यके द्वारा अनिके पभिम ओर अपनी दाहिनी तरफ बैठाले तदनन्तर कुमारसे हाथ जुड़वाकर कहे कि ॐ ब्रह्मचर्यमागाम् ' ऐसा उझारण कर इस प्रकार आज्ञा देवे। ऐसी आशा १ अन्यान्य पद्दतिया में तीन ब्राह्मणोंको भोजन कराना लिखा है।

जापाटीकासहिता । आह । ततः ॐ ब्रह्मचार्यसानीति बृहीत्याचार्येणोक्ते अब्रह्मचार्यसानीति कुमारआह । अय माणवकमाचार्योवासः परिधापयति तत्र आचार्यपठ- नीयो मंत्रः । ॐ येनेंद्राय बृहस्पतिप्तिः पर्यदधादमृतं तेन त्वा परिदधा- म्यायुपे दीर्घायुत्त्वाय बलाय वर्चसे । ततो माणवकस्य द्विराचमनम् । अथ माणवकस्य वेष्टनत्रयेण तत्प्रवरग्रंथितां मेखलामाचार्यों वनाति तत्र माणवकपठनीयो मंत्रः । इय दुरुक्त परिवाधमाना वणे पवित्र पुनती म आगात् । प्राणापानाभ्यां बलमादधाना स्वसा देवी सुभगा मेखलेयम् । ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात् स उश्रेयान्भवति जायमानः। तं धीरातः काय उन्नयंति स्वाध्यो मनसा देवयंत इति वा । तत आचाराद्यज्ञोपवीतसहितभांडाप्टतयं ब्राह्मणेभ्यो दृत्त्वा तत्सदद्यामुक- गोत्रः स्वकीयोपनयनकर्मविषयकसत्संस्कारप्राप्त्यर्थे इदं भांडाटतयं सयज्ञोपवीतं सदक्षिणं यथानामेति । ततो यज्ञोपवीतं परिदधाति माण- देनेपर कुमार कहे कि 'ॐ ब्रह्मचर्यमागाम' फिर आचार्य ॐ ब्रह्मचर्यसानि ऐसा उचारण कर आचार्यके आज्ञा देने उपरान्त 'ॐ ब्रह्मचर्यसानि - ऐसा कुमार कहे। तत्पश्चाव कुमारको आचार्य आगे लिसे 'ॐ येनेन्द्राय बृहस्पति- वासः पर्यधादमृतं तेन त्या परिदधाम्यायुपे दीर्घायुत्वाय पलाय वर्चसे ' इस मन्त्रसे वस्त्र (कोपीन) पहराये । फिर कुमारको दो आचमन करावे । इसके अनन्तर तीन लड ( लपेट ) वाली और प्रवरके अनुसार ग्रन्यिवाली मुंजकी मेखला आचार्य कुमारके बांध देवे । तब कुमार आगे लिखे मन्त्रोंको उच्चारण करे।'ॐ ये दुरुक्तं परिवाधमाना वर्ण पवित्रं पुनती न आगार । प्राणापाना- स्यां वलमादधानां स्वसा देवी सुभगा, मेखलेयम् । ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगास उ श्रेयान् भवति जायमानः । तं धीरामः कवय उन्नयंति स्वाथ्यो मनसा देवयंतः। अनन्तर परस्परानुसार यज्ञोपवीतयुक्त तथा दक्षिणासहित. चोवीस पात्र कुमारसे आगे लिखे संकल्प द्वारा ब्राह्मणोंको प्रदान करावे। संकल्पः । अवामुकगोत्रः स्वकीयोपनयनकर्मविषयकसत्संस्कारप्राप्त्यर्थ 4 दशकर्मपद्धतिः। वकः। ॐ यज्ञोपवीतमिति मंत्रस्य परमेष्ठी ऋषिलिंगोक्ता देवता छंदो यज्ञोपवीतपरिधाने विनियोगः। ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं पतेर्यत्सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमय्यं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलम स्तु तेजः। इति मंत्रेण । तत ऐणेयमजिनं तूष्णी परिधत्ते । ततो माल वककेशपरिमितपालाशदंडमाचार्यस्तूणी तस्मै प्रयच्छति। तं च यो में दंड इति प्रजापतिपिर्दडो देवता यजुर्दडग्रहणे विनियोगः । ॐ यो मे दंडः परापतदेहायसोऽधिभूम्याम् । तमहं पुनरादद आयुषे ब्रह्मणे ब्रह्म- वर्चसाय । इति मंत्रेण माणवको गृह्णाति । तत आचायों वारिणा स्वम- जलिं पूरयित्वा कुमारस्यांजलिं तेनेवांजलिजलेन पूरयति । ॐ आपो हिष्टा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे । * यो वः इदं भाण्डाटनयं सयज्ञोपवीतं सदक्षिणं यथानामगोत्रेन्यो ब्राह्मणेभ्यः यथांशेन जिज्य दास्ये ॐ तत्सत् । तदनन्तर आचार्य कुमारको यज्ञोपवीत धारण करावे और कुमार आगे लिखे ' ॐ यज्ञोपवीतमिनि मन्त्रस्य परमेष्टिषि- लिङ्गोक्ता देवता त्रिष्टुप् छन्दो यज्ञोपवीतपरिधाने विनियोगः' इस मन्त्रसे यज्ञो- पवीतधारणका विनियोग छोडे फिर आगे लिखे 'ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्र प्रजापतेर्यत् सहर्ज पुरस्तात् । आयुष्यमयं प्रतिमुंच शुनं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः। इस मन्त्रसे यज्ञोपवीत धारण करना चाहिये । अनन्तर आचार्य कुमा- रको चुपचाप मृगचर्म प्रदान करे और कुमार उसको धारण कर ले । फिर कुमारके केशतक प्रमाणवाले पालाश (बाक) के दंडको आचार्य चुपचाप कुमारके निमित्त देवे । उसको लेकर कुमार आगे लिखे 'यो मे दण्ड इति प्रजापतिपिदंडो देवता यजुदंडग्रहणे विनियोगः। इस मन्त्रमे विनियोग छोडे। पश्चात् आगे लिखे 'ॐ यो मे दंडः परापतदेहायसोऽधिभूत्यां तमहं पुनरादद आयुषे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय ' इम मंत्रसे दण्डको ग्रहण करे । फिर आचार्य प्रथम अपनी अंजली जलसे भरकर पुनः उसी जलसे आगे लिखे मन्त्र द्वारा कुमारकी अंजली भर देवे । ॐ मापो हिला मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। हे भाषादीकासहिता। शिवत्तमो रसस्तस्य भाजयतेहनः । उशतीरिव मातरः। तस्माऽ अरं गमाम यो यस्य क्षयाय जिन्वथा आपो जनयथाचनः इतिऋम्भिः ततः सूर्यमुदीक्षस्वति आचार्यप्रेपानंतरं ॐ तचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्च- स्त् पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत शृणुयाम शरदः शतं प्रत्र- वाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् इत्य- नेनादित्यं पश्यति । अथ कुमारस्य दक्षिणां सहृदयं दक्षिणहस्तेन -स्पृशत्याचार्यः । ॐ मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु । मम वाचमेकमनाजुपस्व बृहस्पतिस्त्वा नियुनक्त मह्यं इति - मंत्रेण । ततः कुमारस्य दक्षिणहस्तं गृहीत्वा तं पृच्छति को नामासि श्रीअमुकशाहं भोः इति कुमार आह । कस्य ब्रह्मचार्यसीत्याचार्यः भवत इति कुमार आह । गुनराचार्यों भापते ॐ इंद्रस्य ब्रह्मचार्यस्य- रणाय चक्षसे । ॐ यो वः शिवतमो रसस्तस्य नानयतेह नः । उशतीरिख मातरः। ॐ तस्मा ऽभरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्यथ। आगो जनयथा च नः। फिर नीचे लिखे मन्त्रसे आचार्य कुमारको सूर्यका दर्शन करनेकी आज्ञा देवे । ॐ तचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुकमुच्चरत् पश्येम शरदः शतं जीवेम शरद शतर शृणुयाम शरदः शतं प्रत्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भृयश्च शरदः शतात् । कुमार वह अञ्जली इन मन्त्री सहित सूर्यके सन्मुख छोड देवे। तदनन्तर कुमारके दाहिने कन्धेकी तरफ अपना दाहिना हाथ अलकर आचार्य कुंमारके हृदयको सर्श करे और फिर आगे लिसे' ॐ मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते अस्तु । मम वाचमेकमनाजुपस्व बृहस्पतिस्त्वा नियु- नक्त मह्यम् । ' इस मन्त्रको उच्चारण करे । फिर कुमारके शाहिने हाथको पक- डकर आचार्य पूछे'को नामाति तब ' श्रीअमुकशर्माहं जोः। ऐसा कुमार कहे। 'कस्य ब्रह्मचार्यसि । ऐसा आचार्य कहे, तब 'अवतः' ऐसा कुमार कहे। फिर पुनरि आचार्य कहे 'ॐ इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्यनिराचार्यस्तवाह- - - दशकमपदतिः। पिराचार्यस्तवाहमाचार्यः श्रीअमुकशर्मन् । अथ माणवकं पूर्वादिदिक्षु प्रदक्षिणमुपस्थानं कारयति । अथाचार्यों माणवकं परिददाति तब आचार्यस्य मंत्रपाठः। ॐ प्रजापतये त्वा प्राच्यां ॐ देवाय त्वा सवित्रे परिददामि इति दक्षिणस्यां ॐ स्त्वोषधीभ्य परिददामि इति प्रतीच्यां ॐ द्यावापृथिवीभ्यां त्वा ददामि इति उदीच्यां ॐ विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः परिददामि ॐ सर्वेभ्यस्त्वा भूतेभ्यः परिददाम्यरिष्टये इत्यूर्ध्वम् । ततोऽग्निं णीकृत्य आचार्य दक्षिणदिशि उपविशति माणवकः । ततः पुष्पचंदन तांबूलवासांस्यादाय ततः ॐ अद्यकर्तव्योपनयनहोमकमणि कृताकृता- माचार्यः श्रीअमुकशर्मन् ' इसके उपरान्त कुमारके हाथ जुडवाकर पूर्वादि 'दिशाओंमें प्रदक्षिणपूर्वक सूर्यके सन्मुख खडा करावे । फिर आचार्य कुमारको भूतोंके अर्थ सौंपे और वह आचार्य यह मन्त्र पाठ करे ॐ प्रजापतये त्वा परिददामीति प्राच्याम् । ॐ देवाय वा सवित्रे परिददामि इति दक्षिणस्याम् । ॐ अद्भ्यस्त्वोषधीयः परिददामि इति प्रती- च्याम् । ॐ यावापृथिवीश्यां त्वा परिददामि इति उदीच्याम् । ॐ विश्वाय- स्त्वा देवेन्यः परिददामि इत्ययः । ॐ सर्वेश्यस्त्वा भूतेश्यः परिददाम्यरिष्टये इत्यर्द्धम् । तदनन्तर अनिकी मदक्षिणा करके आचार्य के दक्षिणकी ओर कुमारको बैठना चाहिये फिर पुष्प, चन्दन, ताम्बूल तथा वस्त्रादि वरणकी सामग्री हाथमें लेकर आगे लिखे'ॐ अद्य कर्तव्योपनयनहोमकर्मणि कृता- १ इसका तात्पर्य यह है कि आचार्य प्रजापतये' इत्यादि मंत्रसे हाथ जोडे हुए बालकको पूर्वादि दिशामें उपस्थान करावे। मंत्रोंको आचार्य स्वयं पडे। (प्रजापतये वा)मंत्रको पढता हुआ पूर्वाभिमुख वालकको उपस्थान करावे । (देवायत्वा) से दक्षिणाभिमुख ( अद्यस्त्वा) से पश्रिमाभिमुख (द्यावापृथिव्या) से उत्तरामि- मुख (विशेभ्यस्त्वा ) मे नीचेकी दिशाको देखता हुआ (ॐ सर्वेभ्यस्त्वा)से ऊपरको दिशामें उपस्थान करावे । t भापाटीकासहिता। वेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशाणं ब्राह्मणमेभिः पुष्पचंदन- तांबूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे इति ब्रह्माणं वृणुयात् । ॐ वृतोऽ- स्मीति वचनम् । पुष्पचंदनतांबूलवस्त्राण्यादाय अद्य कर्तव्योपनयन- कर्माण होतृत्वकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकमणि ब्राह्मणमेभिः पुष्पचंदन- तांबूलवासोभितृत्वेन त्वामहं वृणे इति होतारं वृणुयात् ॐ स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ॐ यथाविहितं कर्म कुर्वित्याचार्येणोक्ते ॐ करवाणीति ब्राह्मणो वदेत् । ततोऽग्रेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागग्रान् कुशानास्तीर्य ब्राह्मणमग्निप्रदक्षिणं कारयित्वास्मिन्कमणि त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय भवानीति तेनोक्ते तदुपरि ब्राह्मणमुदङ्मुखमुपवेश्य ततः प्रणीतापानं पुरतः कृत्वावारिणा परिपूर्य कुशैराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलो- क्यामेरुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् ततः परिस्तरणम् । बर्हिपश्चतुर्थभा- कृतावेक्षणरूपबमकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेनिः पुष्पचन्दन- ताम्बूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे०' इस संकल्पसे ब्रह्माका वरण करना चाहिये । तब 'ॐ वृतोऽस्मीति' ब्रह्मा कहे । फिर पुष्प, चन्दन, तांबूल, वनादि सामग्री आगे लिखे हुए 'अब कर्तव्योपनयनकर्माण होतृत्वकर्म कर्तु- ममुरुगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमोनिः पुष्पचन्दनताबम्लवासोनिहीतृत्वेन त्वामहं वृणे' इस वास्यसे ब्रह्माको प्रदान करे । तब ब्रह्मा उस सामग्रीको 'स्वस्ति' ऐसा कहकर ग्रहण करे । अनन्तर 'ॐ यथाविहितं कर्म कुरु' ऐसा यजमानके कहनेपर 'ॐ करवाणि ऐसा ब्रह्मा कहे । फिर अनिके दक्षिणकी ओर शुद्ध आसन स्थापन पूर्वक उसको ऊपर पूर्वको अग्रताग करके कुशा विजये और फिर ब्रह्मासे अनिकी प्रदक्षिणा कराकर इस यज्ञोपवीतकर्ममें आप मेरे ब्रह्मा हुए ऐसा कहे। तब वह ब्राह्मण मैं ब्रह्मा होता हूं' ऐसा कहे फिर ब्रह्माको उत्तरानिमुखसे उस आसन पर बैठाल देना चाहिये। फिर प्रणीतापात्रको आगे रखकर जलसे भरदेवे और उसको कुशाओंसे ठक देवे अनन्तर ब्रह्माका मुख देखकर अभिके उत्तरकी ओर प्रणीतापात्रको दशकर्मपद्धतिः। गमादायानेयादीशानांतं ब्रह्मणोऽग्निपर्यंत नैर्ऋत्याद्रायव्यांत प्रणीतापर्यंतं ततोऽमेरुरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनाम पवित्रार्थ सायमनंतर्गर्भ कुशपत्रदयं प्रोक्षणीपात्रं र्जनाथै कुशाः उपयमनकुशाः समिस्तित्रः सुवः आज्यं चाशदुत्तराचार्यमुष्टिशतद्वयावच्छिन्नामतंडुलपूर्णपात्रं शानां पूर्वपूर्वदिशि क्रमेणासादनीयम् । ततः पवित्रे छित्वा सपवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे : अनामिकांगष्टाभ्यां गृहीतपवित्राभ्यां तजलं किंचित्रिरुत्क्षिप्य तोदकेन प्रोक्षणी त्रिरभिषिच्य प्रोक्षणीजलेनासादितवस्तुसेक्नं रख देना चाहिये । फिर परिस्तरण करे मुहभिर अथवा सौ कुश ग्रहण करके उसके चार भाग करे । उनमें पहला भाग अग्निकोनसे ईशान दिशातक, दूसरा भाग ब्रह्माके आसनसे अमितक, तीसरा भाग नैत्यकोनसे वायुकोनतक और चौथा भाग अभिसे प्रणीतापात्र तक बिछा देना चाहिये । फिर अमिसे उत्तरको ओर पश्चिमको पवित्र छेदनके अर्थ तीन कुशा स्थापन करे। पवित्र बनानेके निमित्त अयमागसहित तथा बीचके पत्तेसे रहित अर्थात् जिसके भीतर अन्य कुशन होऐसे दो कुशपत्र रक्खे । फिर प्रोक्षणीपात्र,आज्यस्थाली, पांच संमार्जन कुशा, तीनसे तेरहतक अर्थात् तीन अथवा तेरह उपयमनकुशा, प्रादेशमात्र (बिलस्तार)टाककी तीन समिधा, युवा, वृत और दो सौछप्पन मुट्ठी चावलोंसे भरा हुआ पूर्णपात्र, इन सब वस्तुओंको पवित्र छेदनकी कुशाओंसे आगे आने रखता जाय फिर पवित्र छेदनकी कुशाभोसे पवित्र छेदन करे। अनन्तर पवित्रोंको हाथमें लेकर प्रणीताके जलको प्रोक्षणीपात्रमें तीन बार सेचन करे। फिर दाहिने हाथकी अनामिका और अंगुष्ट इन दो अंगुलियोंसे पवित्रोंको ग्रहण करके उसके जलको तीन वार ऊपरकीओर फेके फिर प्रणीताके जलसे प्रोक्षणीको तीत बार सेचन करे। अनन्तर पवित्रोंको लेकर प्रोक्षणकि जलसे पूर्व स्थापित सा यस्तुओंको मेचन करके उस मोक्षणीपात्रको आणि और प्रणीनापा - -- भाषाटीकासहितां । निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणोपात्रं निध्यात् । आज्यस्थाल्यामाज्यनिर्वापः अधिश्रयणं ततः कुशं प्रज्वाल्याज्योपारे प्रदक्षिणं भ्रामयित्वा वह्रो तत्प्रक्षिप्य मुवं निः परितप्य संमार्जनकुशानामोरंतरतो मूलैबा- प्रतः सुवं संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिः प्रताप्य दक्षिणतो निध्यात् । तत आज्यमग्रेवतार्य विः प्रोक्षणीवदुत्पूयावक्ष्य सत्यप- द्रव्ये तन्निरसनं कृत्वा पुनः प्रोक्षण्युत्पवनं तत उत्थायोपयमनकुशान्वाम- हस्ते कृत्वा प्रजापति मनसाध्यात्वा तूष्णीं घृतातास्तिनः समिधः प्रशि- पेत् । उपविश्य सपवित्रप्रोक्षण्युदकेन प्रदक्षिणक्रमेणाग्निं पर्युक्ष्य प्रणी- 'तापात्रे पवित्र निधाय पातितदक्षिणजानुब्रह्मणान्वारब्धः समिद्धतमेऽग्नो 'सुवेणान्याहुतीर्जुहोति तब तत्तदाहुत्यनंतर मुवावस्थितघृतशेपस्य प्रोक्ष- रख देना चाहिये । तब आज्यस्थालीमें घृत डालकर उसको अग्निपर चढादेवे । फिर एक कुशा बालकर उसको वृतके चारों तरफ घुमाय वेदीको अग्निमें डाल देवे। तत्पश्चात् सुवेको अनिमें तीन बार तपाकर संमार्जन कुशाओंके भनागसे सुवेके भीतर और मूलनागसे बाहर शुद्ध करे। फिर प्रणीतापात्रके जलसे बुरेको सेचन करे और उसको तीन बार तपाकर दक्षिणकी ओर रख देना चाहिये । तदुपरान्त उस वृतको अम्रिसे उतारकर प्रोक्षणीकी नाई तीन वार पवित्रोंसे उछाले और फिर देखे कि उसमें मक्खी इत्यादि कोई अपवित्र वस्तु तो नहीं पडी है यदि पडी हो तो उसको निकालकर फेंक देना चाहिये। फिर प्रोक्षणीके जलको पवित्रोंसे तीन बार उछाले और फिर खडा होकर अज- मान उन उपयमन कुशाओंको बायें हाथमे लेकर मनमें प्रजापतिका ध्यान करता हुआ वृनमें निजोकर तीनों समिधाओंको स्वाहा शब्दके साथ अमिमें चुपचाप डाल देवे। फिर आसनपर बैठकर पवित्र सहित प्रोक्षणीका जल हायमें लेकर दक्षिण क्रमसे वेदोके चारों ओर सेचन करे। फिर उन पवित्रोंको प्रणीतापात्रमें रख देना चाहिये । अनन्तर दाहिनी जानु नदाय और ब्रह्मासे मिलकर प्रज्वलित अनिमें वेकेद्वारा नीचे लिखे मन्त्रोंसे घृतकी आहुति देवे प्रत्येक आहुतिके अनंतर दशकमपद्धतिः । णीपात्रे प्रक्षेपः । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति ॐ इंद्राय स्वाहा इदर्मिद्राय० । इत्याचारो। ॐ अनये नये । सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागौ। ॐ भूः इदमग्नये *भुवः स्वाहा इदं वायवे० । अस्वःस्वाहा इदं एता महाव्याहृतयः। त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान देवस्य, यासिसीष्टाः । यजिष्टो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा नेपासि स्मत् स्वाहा इदमग्रीवरुणाभ्यां । ॐस त्वन्नो अग्नेऽवमो नेदिष्टो अस्या उपसो व्युष्टौ । अव यवनो वरुण५ रराणो मृडीकर सुहवो न एधि स्वाहा इदमनीवरुणाभ्यां । ॐ स्थनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्वमया असि । अयानो यज्ञं ..... धेहि भेषज स्वाहा इदमग्नये।ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञिया पाशा वितता महांतः । तेभिन्नों अब सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंतु मरुतः स्वाः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुज्यः सुवेमें शेष रहे घृतको प्रोक्षणीपात्रमें डालताजाय मन्त्र यथा। ॐ प्रजापतये स्वाहा । इदं प्रजापतये ।इति मनसा।ॐ इन्द्राय त्याहा इदमिन्दाय इत्याघारौ।ॐ अनये स्वाहा इदममये । ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागौ । ॐ y: स्वाहा० इदममयेॐ भुवः स्याहा इदं वायवे। ॐ स्वःस्वाहा इदं सूर्याय० ॥ एता महाव्याहृतयः। ॐ त्वन्नो अग्रे वरुणास्य विद्वान् देवस्य हेढो अब यासि- सहिः । यनिष्ठो वाहितमः शोशुचानो विश्वा देपा ५ सि प्रमुमुग्ध्यस्मद् स्वाहा । इदमग्रीवरुणायाम् । ॐ सत्त्वान्नो अग्नेऽवमो भयोती नेदिष्ठो अस्या उपसो व्युष्टौ । अव यक्ष्वनो वरुण रराणो वीहि मृडीकर सुहयो न पधि स्वाहा इद- मग्नीवरुणायाम् । ॐ अयाथामेस्यनानिशस्तिपाश्च सत्वमित्त्वमया आति अयानो यज्ञं वहास्ययानो धेहि भेषज स्वाहा इदममये । ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महांतः। तेमिनों अब सवितोत विष्णुर्विशे 'मुचंतु मला स्वकीः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वत्यो देवायो जापाटीकासहिता। तभ्यश्च ॐदुत्तमं वरुण पाशमस्मदयाधम विमध्यम श्रथाय। अथावयमादित्य व्रतेतवानागसोअदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय। एताः सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । ॐ अग्रये स्विष्टकृते स्वाहा इदम- प्रये स्विष्टकृते । इति स्विएकृद्धोमः। ततः संस्रवप्राशनम् आचमनंच। ततो ब्रह्मणे दाक्षिणादानम् । ॐ अद्यतस्मित्रपनयनहोमकर्मणि कृता- कृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्टार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेवतममुकगोत्राया- मुकशर्मणेब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रदेइति दक्षिणां दद्यात्। ॐ स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततो ब्रह्मग्रंथिविमोकः । ततः ॐ सुमि- त्रिया न आप ओपधयः संतु इति पवित्राभ्यां जलमानीय तेन शिरः संमृज्य ॐदुर्मित्रियास्तस्मे संतु योऽस्मान् देष्टि यं च वयं दिप्मः इत्य- श्यान्यां प्रणीतान्युजाकरणम् । ततः स्तरणक्रमेण वर्हिरुत्थाप्य घृते- मरुद्रयः वन्यश्च ० । ॐ उदुत्तमं यरुण पाशमस्मदवाघमं विमध्यम् अथाय। अथा वयमादित्य बते तमनागसोअदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय० । एता मर्य- पायश्चित्तसंज्ञकाः। प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजाइति मनसा । इतिप्राजापत्यम् । ॐ अमये स्विष्टरुते स्वाहा इदममये स्विष्टकते न मम । इति स्विष्टकद्धोमः । फिर घृतमिश्रित प्रोक्षणीप के जलका आचमन करे और फिर शुद्ध जलसे आचमन करे । अनन्तर दक्षिणासहित पूर्णपातको आगे लिसे एतस्मिन्नुपनयनहोमकमणि कतारुतावेक्षणरूपवनकर्मप्रतिक्षार्थमिदं पूर्णपानं प्रजापतिदेवतममुकगोत्रायामुकरामणे ब्राह्मणाय ब्रह्मगे दक्षिणां तुल्यमहं सम्प्रददे ' इस मन्त्रसे दान करके ब्रह्माके निमित्त देवे और ब्रह्मा उसको 'ॐ स्वस्ति ' कहकर लेवे। फिर ब्रहामन्यिको खोल देये तिनके पश्चात् 'ॐ आप ओषधयः सन्तु ऐसा कहकर पवित्रोंसे जल ग्रहण पूर्वक अपने मस्तकपर सेचन करे। फिर 'ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्देष्टि यं च वयं द्विष्मः ' यह मन्त्र उच्चारण करके ईशानकोनमें प्रीताको उलटा कर ॐ अब . । . . दशकमपद्धातः। नाभिघार्य हस्तेनैव जुहुयात्।ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्वा मनसस्पत इमं देव यज्ञः स्वाहा वाते धाः स्वाहा । इति आचार्यः कुमारस्यानुशासनं करोति । ॐ ब्रह्मचार्यसीत्याचार्य असानीति ब्रह्मचारी। ॐ अपदोशान इत्याचार्यः ॐ अशानीति आह । ॐ कर्म कुर्वित्याचार्यः ॐ करवाणीति माणवकः । ॐ दिवा सुषुप्स्व इत्याचार्यः न स्वपानीति कुमारः । ॐ वाचं. इत्याचार्यः ॐ अच्छानीति कुमारः। ॐ समिधमाधेहीत्याचार्यः आदधानीति माणवकः। ॐ अपोशानेत्याचार्यःॐअशानीति कुमारः अथानरुत्तरतः नायाचार्य समीक्ष्यमाणायाचार्यः । स्वयमपि समीक्षितायास्मै देना चाहिये । तदनन्तर परिस्तरणके क्रमानुसार अर्थात् जिस क्रमसे कुथ' बिछाये थे उसी क्रमसे उनको उठाकर घृतमें चोर हाथसेही आगे लिखे ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित मनसत्सत इमं देव यज्ञ स्वाहा वाते धाः स्वाहा इस मन्त्र द्वारा अनिमें डाल देवे । फिर आचार्य आगे लिखे वाक्योंसे कुमारको शिक्षा करे। अर्थात् 'ॐ ब्रह्मचार्यसि ' ऐसा आचार्य कहे। ॐ अशानिऐसा ब्रह्मचारी कहे। 'ॐ अपोशान ' ऐसा आचार्य कहे। 'ॐ अशानि ' ऐसा ब्रह्मचारी कहे । 'ॐ कर्म कुरु । ऐसा आचार्य कहे। 'ॐ कग्वाणि ' ऐसा कुमार कहे । 'ॐ मा दिवा सुपुप्स्व - ऐसा आचार्य कहे। 'न स्वपानि' ऐसा कुमार कहे। 'ॐ वाचं यच्छ । ऐसा आचार्य को ।'ॐ यच्छानि ' ऐसा कुमार कहे। 'ॐ समिधमाधेहि ऐसा आचार्य कहे। ॐ आदधानि · ऐसा कुमार कहे । ॐ अपोशान ऐसा आचार्य कहे।'ॐ अशानि ऐमा कुमार कहे। इसके उपरान्त अधिक उत्तरकी ओर पश्चिमको मुख किये आचार्यके चरणोंको पकडकर और उनके मुखको देखता हुआ और आचार्यनी कुमारके मुखको देखता हुआ अपने - समीप बैठे हुए कुमारके निमित्त स्वयं बाजाको बन्द कर लपके उपस्थित - ' .

भाषाटीकासहिता। शंखतूर्यादि शब्दइष्टांशक सावित्रीमन्वाह तत्र प्रथमावृत्तौ ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । ॐ पुनरद्वयं अत्र तु सहपाठो विशेषः । अथ माणवक आचार्यदाक्षि- पदिशि अग्निपश्चिमोपविष्टो घृताक्तशुष्कनिषिद्धतरेंधनेन जुहुयात् । ततः ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु । ॐ यथा त्वमग्ने सुश्रवा असि । ॐ एवं मार सुश्रवः सोश्रवसं कुरु । ॐ यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि । ॐ एवमई मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् । ततः प्रदक्षिणमग्निं वारिणा पर्युष्य उत्थाय स्वप्रादेशमितां घृताक्तपलाशस- मिधमादाय ॐ अग्नये समिधमाहार्प बृहते जातवेदसे यथा त्वमग्ने समिधा समध्यस एवमहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिब्रह्मवर्च- होनेपर गायत्रीका उपदेश करे अर्थात् आचार्य आगे लिखेॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ' इस मन्त्रको कुमारके दाहिने कानमें तीन बार उपदेश करे। फिर कुमार -आचार्यके दक्षि- णकी ओर पश्चिममें बैठा हुआ घृतसे निगोकर सूखे और शुद्ध ईंधनसे आगे लिखे 'ॐ अमे सुश्रवः सुश्रव सं मां कुरु । ॐ यथा त्वमने सुश्रवः सुश्रवा असि स्वाहा । ॐ एवं मा५ सुश्रवः सौश्रवसं कुरु स्वाहा । ॐ यथा त्वममे देवानां यज्ञस्य निधिपा असि स्वाहा । ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासं स्वाहा'इन मन्त्रोंसे होम करे। फिर जल हाथमें लेकर अग्निके चारों ओर सेचन करे। फिर उठकर प्रादेशप्रमाण समिधाको ग्रहणपूर्वक धृतमें भिगोकर आगे लिखे 'ॐ अनये समिधमाहापं बृहते जातवेदसे यथा त्वमये समिधा समिध्यस १ यहां तीन बार कहनेका तात्पर्य यह है कि मंत्रके तीन भाग करके उपदेश करे किन्तु इस पद्धतिकारके मतानुसार मंत्रका एक सायही उपदेश करें यह विशेष है। २ यहां यह प्रतीत होता है कि आगे लिखे हुए पांच मंत्र तो वेदीसे इधर उधर गिरी हुई जो समिधा तथा आदि इत्यादि है उसको पुनार अग्निमें एकत्रित है और शेप समिधाधानके अर्थात् समिधाको घृतमें भिगोकर आहुति देनेके दशकर्मपदतिः। सेन समिधे जीवपुत्रो ममाचयों तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भूया. स्वाहा इति मंत्रेण जुहुयात् । समिदंतरद्वयं जुहुयात् । ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु । ॐ त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवासि। ॐ एवं मां सुश्रवः सोश्रवसं कुरु। त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि । ॐ एवमहं मनुष्याणां निधिपो भूयासम् । ततः प्रदक्षिणमाग्नं पर्युक्ष्य तूष्णी पाणी प्रतप्य प्रतिमंत्रांतेऽवमृशति । ॐ तनूपा अग्रेऽसि तन्वं मे पाहि। ॐ आ- युर्दा अग्नेस्यायुमें देहि । ॐ वक़दा अग्रोस वर्षों मे देहि । ॐ आने यन्मे तन्वा उनं तन्म आपृण । ॐ मेधां मे देवः सविता आदधातु । ॐ मेघामश्विनौ देवावाधत्तां पुष्करखनौ । ततः सर्वगात्रादिषु दक्षिण- । एवमहमायुपा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिब्रह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममाचार्यो मेधाज्यहमसान्यनिराकरिष्णुयशस्वी ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भूयासर स्वाहा' इन मन्त्रोंसे आहुति देवे । तत्पश्चात् इसी प्रकार और इसी मन्त्रसे पृथक् पृथक् दो समिधाओंकी आहुति देवे। फिर उन्हीं पाँच मन्त्रोंसे अमिको एकत्रित करे (अथवा होम करे)।'ॐ अग्ने सुश्रवः सुभवसं मां कुरु स्वाहा। ॐ यथा त्वमने सुश्रवः सुश्रवा असि स्वाहा । ॐ एवं मां सुश्रवः सोश्रवसं कुरु स्वाहा । ॐ यथात्वमने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि स्वाहा । ॐ एवमहं मनु- प्याणां वेदस्य निधिपो भूयासं स्वाहा ।' तदनन्तर हाथमें जल लेकर अनिके चारों ओर सेचन करे । तदनन्तर चुपचाप दोनों हाथोंको अनिमें तपाकर आगे लिखे हुए प्रत्येक मंत्रके साथ अपने मुखको स्पर्श करे । 'ॐ तनूपा अग्रेसि तन्वं मे पाहि । ॐ आयुर्दा मे अनेस्यायुर्मे देहि । ॐ वक़दा अमेमि वर्गों मे देहि । ॐ अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपण । ॐ मेघां देवः सविता आद. धातु । ॐ मेघां मे देवी सरस्वती आदधातु । ॐ मेधां मेऽश्विनी देवावाधनां पुष्करमजी' फिर दाहिने हाथको तपाकर सब शरीरको सर्श करे । उन सब नापाटीकासहिता । पाणिनास्पर्शःअत्र प्रत्येक मंत्रः।*अंगानिचमआप्यायतां इति सर्वगा- बालंभने । ॐवाक्च मआप्यायतामितिमुखालंभने। ॐ प्राणश्चम आ- प्यायतामिति नासिकयोः। ॐ चक्षुश्चम आप्यायतामिति चक्षुपोः । ॐ श्रोत्रं चमआप्यायतामिति श्रोत्रयोग यशोबलं चमआप्यायतामिति मंत्रपाठमात्रम् । ततो दक्षिणकरानामिकाग्रगृहीतभस्मना ललाटे ग्रीवायां दक्षिणबाहुमूले हदिच न्यायुपं कुर्यात् । तत्र यथासंख्येन मंत्रचतुष्टयम्। ॐव्यायुपं जमदने इति ललाटेॐकश्यपस्यध्यायुपं इतिग्रीवायाम् । ॐ यद्देवेषु व्यायुपम् इति दक्षिणबाहुमूले । ॐ तन्नो अस्तु न्यायुपम् इति हदि । ततो व्यस्तपाणिभ्यां पृथिवीं स्पृशन्नभिवादनं कुर्यात् । तत्र प्रकारः ॐ अमुकगोत्रोऽहममुकायरोऽहममुकशाई भो वैश्वानर त्वाम- अंगोंके स्पर्श करनेका मन्त्र आगे लिखा है 'ॐ अंगानि च म आप्यायताम् । यह मन्त्र उच्चारण करके सब शरीरको स्पर्श करे । ॐ वाक् च म आप्याय- ताम् । यह मन्त्र उच्चारण करके मुखको स्पर्श करे। ॐ प्राणश्च म आप्याय- ताम् । यह मन्त्र उच्चारण करके नासिकाको स्पर्श करे। ॐ चक्षुश्च म आप्या- यताम् । यह मन्त्र उच्चारण करके नेत्रोंका स्पर्श करे । ॐ श्रोतृञ्च म आप्या- यताम् । ऐसा उच्चारण करके कानोंको स्पर्श करे। ॐ यशो बलञ्च म भाप्या- यताम् । इस मन्त्रका केवल उच्चारणही कर लेना चाहिये । तदनन्तर दाहिने हाथकी अनामिका अंगुली द्वारा सुबेमें लगाई हुई होमीप भस्मको गले में दक्षिण बाहुमूल और हृदयमें व्यायुप करे। उन चारों मन्त्रोंको क्रमानुसार लिखते हैं । अर्थाद ॐ न्यायुपं जमदमे ऐसा कहकर ललाटमें, ॐ कश्यपस्य व्यायुपं ऐसा उच्चारण करके गलेमें, ॐ यद्देवेषु व्यायुपं यह पढकर दक्षिण- बाहुमलमें और ॐ तन्नो अस्तु व्यायुपं ऐसा बोलकर हृदय में उस त्रुवेकी भस्मको लगाना चाहिये। फिर बायें हाथके ऊपर दाहिने हायको रखकर पृथ्वीको स्पर्श करता हुआ आगे लिखे वाक्यका उच्चारणपूर्वक अनिके निमित्त प्रणाम करे। 'ॐ अमुकगोत्रममुक्पवरोऽहममुकशर्मा शो वैश्वानर त्वामान- दशकर्मपातः। भिवादये । ततोऽनेनैव क्रमेण संबोध्य वरुणमभिवाघाचार्य वादयेत् । ततः आयुष्मान भव सौम्येत्याचार्यों ब्रूयात् । ततो पात्रमादाय प्रथमं मातुः सकाशात् ॐ भवति भिक्षा मे प्रार्थनानंतरं तद्वत्तां चादायाचार्याय निवेदयेत् तथैव भिक्षांतरं याचेत तत आचार्येण मुंश्वेत्यनुज्ञातो भिक्षा स्वीकुर्यात् ।ततः घृतपूर्णमुवेण ब्रह्मचारिदक्षिणकरस्पृष्टेनाचार्यः पूर्णाहुतिं दद्यात् ॐ मूर्धानं दिवो अरति पृथिव्या वैश्वानरमृत आजातमनिम् । संम्राजमातिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयंत देवाः स्वाहा इदममये । ततः सुवेण भस्मानीय दक्षिणानामिकायगृहीतभस्मना ॐव्यायुषं जम- दग्नेः इति ललाटे । ॐ कश्यपस्य न्यायुपं इति ग्रीवायाम् । ॐ यद्देवे- वादये' फिर इसी क्रमानुसार 'अमुकगोत्रोहऽममुकपवरोऽहममुकशर्माहं भो वरुण त्वामभिवादये 'फिर 'अमुकगोत्रोऽहऽममुकावरोहममुकशर्माहं भो गुरो त्वामभिवादये तिस पीछे 'आयुष्मान् भव सौम्य ' ऐसा कहकर आचार्य कुमारको आशीर्वाद देवे । अनन्तर भिक्षापात्र हाथमें लेकर ब्रह्मचारी । प्रथम अपनी मातासे निक्षा मांगनेको जावे और 'ॐ भवति भिक्षा देहि । ऐसा कहकर शिक्षा मांगे फिर मांगनेके पीछे मिली हुई शिक्षाको गुरु ( आचार्य ) के अर्थ, निवेदन करे । फिर इसी प्रकार और भिक्षा माँगनी चाहिये तब पीछे आचार्यके 'मुंव । 'ऐसी आज्ञा देने पर कुमार शिक्षाको ग्रहण करे । तदुपरांत फल, पुष्प, चन्दन और घृत इन सब वस्तुओंसे जुवेको परिपूर्ण कर उसमें ब्रह्मचारीके दाहिने हाथका स्पर्श कराय आचार्य आगे लिखे 'ॐ मृर्द्धानं दिवो अतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आजातमनिम् । कवि सम्राजमतिथि जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः स्वाहा इदं माये' इस मन्त्रसे पूर्णाहुति देवे । फिर खुवेसे वेदीकी भस्म ग्रहण- पूर्वक उसको दाहिने हाथकी अनामिका ' द्वारा लेकर आयुष करे अर्थात् 'ॐ व्यायुषं जमदग्नेः' यह कहकर माथेमें 'ॐ कश्यपस्य यायुष' - .

भाषाटाकासाहता। धुत्र्यायुषम् इति दक्षिणबाहुमूले । ॐ तम्रो अस्तु व्यायुपं इति हदि इतित्र्यायुषं कुर्यात् । कुमारपक्षे तन्त्रो इत्यस्य स्थाने तत्ते इति विशेषः । अथ क्षारलवणमधुमासादिनिवृत्तिः उद्धतजलनानदंडकृष्णाजिनधारण- वृक्षारोहणविषमभूमिलंघननमस्त्रीनिरीक्षणस्त्रीसंभोगव्यसनव्यावृत्तिरूपा ब्रह्मचारिणो नियमाः। तदिने ब्रह्मचारी वाग्यतोऽह शेषं स्थित एव गम- येत् । ततः सायंसंध्यां कृत्वा तस्मिन्नेवाली पूर्ववत्पर्युक्षणपरिसमूहने कृत्वा वाचं विसृजेत् । परिसमूहनाते शुष्कनिपिद्धतरेंधनस्यानो प्रक्षेपः। ततः संध्यामुपास्य प्रतिदिनं सार्यपातरपि ब्रह्मचारिणाकर्तव्या ॥ इत्युपनयनसंस्कारः॥ यह उच्चारण कर गलेमें, 'ॐ यद्देवेषु व्यायुपं ' बोलकर दक्षिणबाहुगलमें और 'ॐ तन्नो अस्तु व्यायुपं ऐसा उच्चारण करके हृदयमें उस, अस्मको 'लगाना चाहिये । किन्तु जव कुमारके न्यायुष करे अर्थात् ब्रुवेकी भस्म लगावे तो 'तन्नो अस्तु' के स्थानमें 'तत्तं अस्तु' उच्चारण करना चाहिये। फिर आगे लिखे वाक्योंसे ब्रह्मचारीको उपदेश करे । अर्थात् सारी वस्तु लवण, मधु (मद्य), मांस इनकी निवृत्ति करे अर्थात् इनको भोजन नहीं करना चाहिये । नम होकर ( बिलकुल नन होकर ) जलमें स्नान नहीं करे, दंड और कृष्णाजिन (काले मृगका चर्म ) धारण करे, वृक्षपर चढना, ऊँची नीची भूमिको कूदना, नगी स्नीको देखना, स्त्रीके संग मैथुन करना, व्यसन अर्थात जुए (चौसर, तास इत्यादि) में असक्त होना इत्यादि दुष्कको त्याग देनाही ब्रह्म- चारीके नियम कहे गये हैं । उस यज्ञोपवीतके दिन ब्रह्मचारी मिथ्या भापणादि त्यागपूर्वक चुपचाप यज्ञोपवीतकर्मसे बचे हुए दिनको बितावे । फिर सायंका- लकी संध्या कर उसी वेदिकाकी अनिमें पूर्वत जलद्वारा चारों ओर वेदीका सेचन करे। फिर पूर्वोक्त पाँच मन्त्रोंके द्वारा अमिको एकत्रित करके वाणीको उच्चारण करे अर्थात् यह उपरोक्त कार्य करके तब फिर बातचीत कर सकता है। तिसके उपरान्त अनिके एकत्रित करनेपर शुद्ध अथच सूखी समिधा - ।

. । दशकर्मपद्धतिः। अथ वेदारंभः। तत्र कृतनित्यक्रिय आचार्यः कुशहस्तमात्रपरिमिता भूमि मुझ तान्कुशानेशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य युवमलेन रोत्तरतःप्रागग्रप्रादेशमा त्रिरुल्लिख्य मृदमुद्धृत्य जलेनाभ्युक्ष्य कांस्येनाग्निमानीयाभिमुखमुपसमाधाय चंदनतांबूलवस्त्राण्यादाय ॐ अद्यकर्तव्यवेदारंभहोमकमणि कृताकृता- वेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्त्तममुकगोत्रममुकशर्माण ब्राह्मणमाभः पुष्पचंदनता बूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे इति ब्राह्मणं वृणुयात् । ॐ वृतोऽस्मी ति प्रतिवचनं यथाविहितं कर्म कुर्वित्याचार्यः ॐ करवाणीति तेनोक्ते ग्रहणपूर्वक घृतमें भिजोकर पूर्ववत् अनिमें होम करे । इसी नियमसेब्रह्मचारी- को प्रतिदिन करना चाहिये। इति श्रीकान्यकुब्जवंशावतंसमुरादावादानवासि-स्वगीयमिश्रमुखानन्दसरिसनु- पण्डित-कन्हैयालालमिश्रकृतभाषाटीकायामुपनयनसंस्कारः समाप्तः । अब वेदारंभसंस्कार लिखा जाता है। तहां नित्य कृत्यको समाप्त करके आचार्य एक हाथकी बराबर शुद्ध भृमिमें वेदी बनाकर उसको लीन कुशाओंसे शुद्ध कर उन कुशाओंको ईशानकोनमें डाल देवे । फिर गोबरसे उस वेदीको लीपकर वेके मूलसे उत्तर उत्तरको पूर्वकी ओर अग्रभागवाली प्रादेशप्रमाण तीन रेखा बँचे और रेखा बचनेके क्रमानुसार अनामिका और अंगुष्ठ द्वारा उन रेखाओंमेंसे मिट्टी उठाकर ईशान कोनेमें फेंक देवे। फिर जलद्वारा वेदीको सेचन कर कांसोके पानमें अग्नि लाय अपने समीर स्थापन करे । अनन्तर पुष्प, चन्दन, ताम्बूल, वस्त्र लेकर आगे लिखे हुए संकल्पसे ब्रह्माका वरण करे । 'ॐ अद्य कर्तव्यवेदारम्भहोमकर्मणि कृतास्तावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशाणं बाह्मणमभिः पुष्पचन्दनताम्बृलवासोनिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे तब ब्रह्मा 'ॐ वृतोऽस्मि' कहकर उस दक्षिणाको ले लेवे । फिर 'ॐ यथाविहितं कर्म कुरु ' ऐसा आचार्य कहे । तब ॐ करवाणि' . - भाषाटीकासहिता। अनेदक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागग्रान्कुशानास्तीर्य ब्रह्माण- मनिप्रदाक्षिणक्रमेण भ्रामयित्वा अस्मिन्कणि त्वं मे ब्रह्मा भवेत्याभ- धाय ॐ भवानीति तेनोक्त ब्रह्माणमुदङ्मुखं तत्रोपवेश्य प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशेराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याने- रुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् । ततः परिस्तरणं बर्हि पश्चतुर्थभागमादाय आग्न्येय्यादीशानांतं ब्रह्मणोऽग्निपर्यंत नेत्याद्वायव्यांतम् अग्नितः प्रणी- तापर्यतम् । ततोऽग्रेरुत्तरतः पश्चिमदिशि पवित्रच्छेदनार्थ कुशवयं पवित्रकरणाथै सायमनंतर्गर्भ कुशपत्रद्वयं प्रोक्षणीपात्रमाज्यस्थाली संमा- जनकुशाः उपयमनकुशाः समिधतिस्त्रः सुवः आज्यं पूर्णपात्रं पवित्र- च्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वादशि क्रमेणासादनीयम् । ततः पवित्रच्छेदनकुशः ऐसा बहाके कहनेपर अनिके दक्षिणकी ओर शुद्ध आसन बिछावे और उस आसनपर पूर्वाय कुशाओंको विछाय ब्रह्माको अगिकी प्रदक्षिणा कराय 'अस्मिन्कमणि त्वं मे ब्रह्मा अब ' ऐसा कहे तब ब्रह्माके 'ॐ भवानि ऐसा कहनेपर उसको उत्तर मुख करके उस आसनपर बैठाल देवे । फिर प्रणीता- पात्रको आगे रक्खे और उसको जलसे भरकर कुशाओंदारा आच्छादन कर देवे । पश्चात् ब्रह्माके मुखको देखकर अमिक उत्तरकी और कुशाओंके ऊपर रख देवे । तदनन्तर परिस्तरण करना चाहिये । मुहावर अथवा सौ कुशाओं- को लेकर उसके चार भाग करे । पहला भाग अमिकोनसे लेकर ईशान कोनतक, दूसरा भाग ब्रह्मासे अग्नि (वेदी) तक, तीसरा भाग नैतसे वायुकोनतक और चौथा भाग आग्नेसे प्रतिपात्रतक बिछा देना चाहिये। फिर अमिके उत्तरसे पश्चिम दिशामें पवित्र छेदनके लिये तीन कुशा रक्खे और पवित्र बनानेके लिये अपनागसहित तथा बिचले पत्तेसे रहित दो कुशपत्र रक्से । अनन्तर प्रोक्षणापात्र, आज्यस्थाली, पांच संमार्जन कुशा, तीनसे तेरहतक उपयमन कुशा, तनि समिधा, सुवा, वृत, पूर्णपात्र इन सब वस्तुओंको पवित्र च्छेदन कुशाओंसे क्रमशः पूर्वपूर्वकी ओर रखता . ६२ दशकमपतिः। पवित्रे छित्त्वा सपवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिःप्रोक्षणीपात्रे मनामिकांगुष्ठाभ्यामुत्तराये पवित्र गृहीत्वा त्रिरुत्पवनं ततः वामहस्ते गृहीत्वा दक्षिणहस्तानामिकांगुष्ठाभ्यां त्रिरुद्दिगनम् । प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीपात्रमभ्युक्ष्य प्रोक्षणीजलेन . पिच्यामिप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । माज्यं निरूप्याधिश्रयणम् । ततः कुशं प्रज्वाल्याज्यस्याग्नेश्वोपरि क्षिण भ्रामयित्वा अग्नौ तत्प्रक्षेपाततत्रिः सुवप्रतपनं संमार्जनकुशानाम: रंतरतो मुलेबाह्यतः सुवं संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनस्त्रिः प्रतप्य दक्षिणतो निदध्यात् । ततः आज्यमनिप्रदक्षिणं भ्रामयित्वाऽवतार्याने निध्यात् । ततः आज्ये प्रोक्षणीवदुत्पवनं अवेक्ष्य सत्य- जाय। फिर पवित्र च्छेदन के कुशाओंसे पवित्रोंको छेदन करे। पीछे पवित्र हाथमें लेकर प्रणीताके जलको प्रोक्षणीपात्रमें डाले । पश्चात् अनामिका तथा अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंसे पवित्रोंको ग्रहण कर तीन बार प्रोक्षणीपात्रका जल ऊपरको उछाले । फिर प्रोक्षणीपात्रको बायें हाथमें लेकर दाहिने हाथकी अनामिका और अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंसे पवित्रको पकडकर तीन बार प्रोक्षणीके जलसे ऊपरको सेचन करे अनन्तर प्रणीताके जलसे प्रोक्षणीपात्रको सेचन कर प्रोक्षणीके जलसे पूर्व स्थापित सब वस्तुओंको सेचन करे। फिर प्रोक्षणीपात्रको प्रणीता और अमिके बीचमें रख देवे फिर आज्यस्थालामें घृत डालकर अग्निपर रख देवे । पश्चात एक कुशको वाल लेवे और उसको दक्षिण क्रमसे घृत तथा अनिके ऊपर घुमाकर अग्निमें डालदेवे । फिर सुवेको अभिमें तनि वार तपावेऔर समार्जनकुशाआके अग्रतागसे नतिर और मलभागसे बाहर उस सुवेकोशुद्ध करे। अनन्तर प्रणीताके जलसे उस सुवेको और पुन- वार तीन वार तपाकर अनिके दक्षिणकी ओर रख देवे । फिर घृतको अभिसे उतारे और अग्निके चारों तरफ धुमाकर अपने आगे रख लेबे अनन्तर पवित्रोंसे घृतको प्रोक्षणीपात्रकी नाई तीन वार उछाले और देखे यदि उसमें भापाटीकासहिता। पदव्ये निरसनं ततः प्रोक्षण्युत्पवनं तत उत्थायोपयमनकुशानादाय प्रजापति मनसा ध्यात्वा तूष्णीमग्नौ घृताक्ताः समिधस्तिस्रः क्षिपेत् । तत उपविश्य सपवित्रप्रोक्षण्युदकेन प्रदक्षिणक्रमेणाग्नेि पर्युक्ष्य प्रणीतापात्रे पवित्रे निघाय ब्रह्मणान्वारब्धः पातितदक्षिणजानुः समिद्धतमेऽनो जुहु- यात् । तत्र प्रथमाहुतिचतुष्टयेन वावस्थितहुतशेपघृतस्य प्रोक्षणीपाने प्रक्षेपः।प्रजापतये स्वाहा इई प्रजापतये । इति मनसा । ॐ इंद्राय स्वाहा इदमिंद्राय० । इत्याघारौ । ॐ अग्नये स्वाहा इदमनये । ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागो । ततः माकृतोऽनन्या- रब्धकर्तृको होमः । ॐ अंतरिक्षाय स्वाहा इदमंतरिक्षाय ॐ वायवे मक्खी इत्यादि कोई अपवित्र वस्तु पडी हो तो उसको निकालकर फेंक देखें। 'फिर पवित्रोंसे प्रोक्षणीपात्रके जलको तीन वार उछाले इसके पीछे खडा होजाय और बांये हाथमें उपयमनकुशाओंको लेकर मनसे प्रजापतिका ध्यान करता हुआ चुपचाप घृतसे शिजोई हुई तीनों समिधाऑको स्वाहा शब्दके साथ आपमें डाल देवे । फिर आसनपर बैठकर पवित्रोंको सहित पोक्षणीके जलको हाथमें लेकर दक्षिण क्रमसे अनिके चारों ओर सेचन करे और पवित्रोंकोप्रणीतापात्रमें रख देवे । अनन्तर ब्रह्माके साथ एकत्रित हो दाहिनी जानुको नवाय जलती हुई अनिमें होम करे । प्रथम चार आहुति देनेके समय जो सुबेमें घृतादि शेष रहे उसको प्रोक्षणीपात्रमें डाल देवे । आहुतिके मन्त्र आगे लिखे हैं (उपरोक्त चार आहुतियोंमें पहली दो आहुति आधार और दूसरी दो आहुति आज्यनाग कहलाती हैं। आधारकी पहली आहुति मानसिक अर्थात मनसे मन्त्र बोलकर दी जाती है।) ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये इति मनसा । ॐ इन्द्राय स्वाहा इदमिन्द्राय० । इत्याधारी। ॐ अनये स्वाहा इद- माये । ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागो । ततः प्राकृतोज- बारम्धकर्तको होमः। ॐ अन्तरिक्षाय स्वाहा इदमन्तारिक्षाप। ॐ वापये - . . ६४ दशकर्मपवतिः स्वाहा इदं वायवे 1ॐ ब्रह्मणे स्वाहा इदं स्वाहा इदं छंदोभ्या पता: सामान्याहुतयः। इदं प्रजापतये । इति भनसा । ॐ देवेभ्यः स्वाहा ॐऋषिभ्यः स्वाहा इदं ऋषिभ्यः । ॐ श्रद्धाये य० । ॐ मेधाय स्वाहा इदं मेघायॐ सदसस्पतये । ॐ अनुमतये स्वाहा इदमनुमतये |.. र्तृको होमः तत्तदाहुत्यनंतरं युवावस्थितहुतशेषघृतस्य प्रक्षेपः । ॐ भूः स्वाहा इदमनये । ॐ भुवः स्वाहा इदं ॐ स्वःस्वाहा इदं सूर्याय० । एता महान्याहतयः। ॐ वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो अब यासिसीष्ठाः । यजिष्टो शोशुचानो विश्वा द्वेपारस प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमनीवरुणाभ्यां ॐस त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्टो अस्या उषसो व्युष्टौ । अब यक्ष्यनो वरुण रराणो वीहि मृडीकर सुहवो न एधि स्वाहा इदमग्री- स्वाहा इदं वायवेः । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा इदं ब्रह्मणे । ॐ छन्दोत्यः स्वाहा इदं छन्दोग्यो । एताः सामान्याहुतयः । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजा- पतये । इति मनसा । ॐ देवेन्यः स्वाहा इदं देवत्यो । ॐ ऋषियः स्वाहा इदं ऋषियोः । ॐ श्रद्धायै स्वाहा इदं श्रद्धायैः। ॐ मेधाये स्वाहा इदं मेधाय 01 ॐ सदसस्पतये स्वाहा इदं सदसस्पतये । ॐ अनुमतये स्वाहा इदमनुमतये । ततोन्वारब्धकत्तृको होमः। (आहुतियोंके अननर में शेप रहे घृतादिको प्रोक्षणीपात्रमें डालते जाना चाहिये) ॐ भूः स्वाहा इद- ममय 01ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे । ॐ स्वःस्वाहा इदं सूर्यायः । एता: महान्याहृतयः । ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य । विद्वान देवस्य हेडो अब पासि- सीधाः । यनिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषाशसि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा - मनीवरुणायाम् । ॐ स त्वन्नो अग्नेऽवमो भवोती नदिला * उषसो न्युष्टौ । अव यव नो वरुणर राणो वीहि मृडीकर सुहको न पनि १ भाषाटीकासहिता।' पाया। अयाश्चास्यनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्वमया असि । मानो यज्ञ वहास्ययानो धेहि भेपज स्वाहा इदमनये । ॐ येते ।सरण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महांतः । तेभिर्नो अद्य बतीत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे ष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भवः स्वकेंभ्यश्च० ॐ उदुत्तमं वरुण शमस्मदवाधर्म विमध्यमश्रथाय।अथा वयमादित्य वते तवानाग- अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय । इति सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । * अनये स्विष्टकृते स्वाहा इदमग्नये स्विष्टकृते । इति स्विष्टकृद्धोमः। ततः संस्रवप्राशनम् । तत आचम्यॐ अद्य कृतैतवेदारंभहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठाथै इदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेवतममुकगो- वायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे इति दक्षिणां स्वाहा । इदमनीवरुणायाम् । ॐ अयाश्वानेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्व- मित्वमया असि । अयानो यज्ञ बहास्ययानो धेहि क्षेपज स्वाहा इद- मनये. । ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महांतः । तेभिनों अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेन्यो देवत्यो मरुद्भ्यः स्वयश्च० । ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्म- दवाधम विमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय । इति सर्वप्रायश्चित्तसंज्ञकाः। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । ॐ अपये स्विष्टकते स्वाहा इद- मप्रये स्विष्टकते । इसके उपरान्त प्रोक्षणीपात्रके वृतमिश्रित जलका प्राशन करना चाहिये और फिर शुद्ध जलसे आचमन करे अनन्तर आगे लिखे संकल्प- को उच्चारणपूर्वक पूर्णपात्रका दान करके ब्रह्माको देवे । 'ॐ अद्य कृतैतद्दे- गारंगहोमकर्मणि कताकतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थ इदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेयत- ममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुज्यमहं सम्प्रददे ' तब ब्रह्मा 5 दशकर्मपद्धतिः। दद्यात् । अस्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततो ब्रह्मग्रंथिविमोक त्रियान आप ओषधयः संतु इति पवित्राभ्यां शिरः संमृज्य ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै संतु योऽस्मान्दृष्टि यंच इति मंत्रेण ऐशान्यां प्रणीतां न्युजीकुर्यात् । तत घृतेनाभिधार्य क्रमेण इस्तेनैव जुहुयात् । ॐ देवा गातुविदो वित्वा गातुमित मनसस्पत इमं देव यज्ञर स्वाहा वाते धाः स्वाहा बहिहोमः । ततः काश्मीरगमनम् । तत इष्टांशके वेदारंभ गुरुः येत् तत्र कमः। ॐ भूर्भुवःस्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धियो यो नः प्रचोदयात् ॐ इति प्रणवांतं पठित्वा पंक्ति नमस्कार कारयित्वा ॐ समिधाम दुवस्यतघृतेोधयतां तिथिम् । जुहोतन। ॐ सुसमिद्धाय शोचिपे। इति कंडिकतिरं वा फकिकांवापाठ- उसको 'ॐ स्वस्ति ' ऐसा कहकर ग्रहण करे। फिर ब्रह्मपंथिको खोल देना चाहिये । तत्पश्चात् आगे लिखे 'ॐ सुमित्रिपा न आप ओषधयः सन्तु ' इस मन्त्रद्वारा पवित्रोंसे प्रणीतापात्रका जल लेकर अपने मस्तकपर मार्जन करे । तदुपरान्त आगे लिखे 'ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्वेष्टि यञ्च क्यं द्विष्मः' इस मन्त्र द्वारा प्रणीतापात्रको ईशानकोनमें उलट देवे। फिर पूर्व विद्याई हुई कुशाओंको ग्रहणपूर्वक घृतमें बोरकर आगे लिसे ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्वा गातुमित मनसस्पत इदं देव यज्ञः स्वाहा पाते धाः स्वाहा इस मन्त्रसे अमिमें होम कर देवे। इसके पीछे विद्याध्ययनके निमित्त ब्रह्मचारीको काश्मीर (अथवा काशी) भेजदेना चाहिये । फिर लपके उपास्थित होनेपर गुरु ब्रह्मचारीको वेदाध्ययन कराना आरंज करावे उसक कम यह है।'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि पिय यो नः प्रचोदयात् ॐ' इस प्रकार प्रणवान्त गायत्री पदाकर नमस्कार करावे और फिर आगे लिखे हुए 'ॐ सुसमिधा अनि दुवस्यत घृतेर्बोधयतां तिथि अस्मिन्हव्याजुहोतन । ॐ समिद्धाय शोचिये' इस मन्त्रको उचारण कराये ।

आपाटीकासहिता। 'पेत् । ततः सप्रणवं स्वस्ति वाचयित्वा उत्थाय फलपुष्पसमन्वितब्रह्म- वारिदक्षिणकरस्पृष्टेन घृतपूर्णेन पूर्णाहुतिं दद्यात् ॐ मूर्दानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आजातमग्निम् । कविः संम्राजमतिथि जनानामासना पात्रं जनयंत देवाः । इति पूर्णाहुतिः। तत उपविश्य सुवेण भस्मानीय दक्षिणानामिकागृहीतभस्मना व्यायुपं जमदग्नरिति ललाटे ॐ कश्यपस्य न्यायुपमिति ग्रीवायां ॐ यद्देवेषु व्यायुपं इति दक्षिणवाहुमूले तन्नो अस्तुन्यायुपमिति हृदि । अनेनेव क्रमेण ब्रह्म- चारिललाटादावपि तत्र तत्ते इति विशेषः। इति वेदारंभः॥ अनन्तर — ॐ सुसमिद्धाय शोचिपे ' इस कण्डिका अथवा अन्य किसी कंडि. काको वा किसी शासकी फक्किकाको पढावे फिर प्रणव ॐ का उच्चारण करा देवे । और पीछे स्वस्तिवाचन करावे । तदनन्तर उठकर सुवेमें फल पुष्प तथा वृत भरकर ब्रह्मचारीका हाथ स्पर्श कराय आगे लिखे 'ॐ मूर्धानं दियो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आजातमनिम् कविः संम्राजमतिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयंत देवाः' इस मन्त्रले पूर्णाहुति करानी चाहिये । पश्चात् आसनपर बैठकर वेसे होमकी भस्म ले दक्षिण हाथकी अनामिका अँगुली द्वारा फिर उस सुवेसे भस्म लेकर 'ॐ व्यायुपं जमदनेः ऐसा कहकर माथेमें 'ॐ कश्य- पस्य व्यायुपं यह उच्चारण करके गलेमें 'ॐ यद्देवेषु व्यायुपं ' यह कहकर दक्षिणबाहुमूलमें और ॐ तन्नो अस्तु व्यायुप' ऐसा कहकर हृदयमें लगानी चाहिये । और फिर इसी क्रमसे ब्रह्मचारीके व्यायुप करे अर्थात् जस्म लगावे किन्तु जब ब्रह्मचारीके लगावे तो 'तन्नो अस्तु' के स्थानमें 'तत्ते अस्तु' उच्चारण करे। इति श्रीकान्यकुजवंशावतंसमुगढाबादनिवासि-स्वर्गीयमिश्रमुखानंदसूरिखनु- पण्डित-कन्हैयालालमिश्रकृतभाषाटीकायांचेदारम्भसंस्कारः समाप्तः ।

1 दशकर्मपद्धतिः। ' अथ समावर्तनम्। तत्र शुभे दिने प्रहीभूय आचार्य स्वास्यामीति कुमार पते तत्र नाहीत्याचार्यः ततो ब्रह्मचारिण उपविष्टे कृतस्नानादिराचार्य कुशेर्हस्तमात्रां भूमि परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य सुवमूलेनोत्तरोत्तरकमेण उल्लेखनक्रमेणोद्धृत्य जलेनाभ्युक्ष्य कांस्येनानिमानीय प्रत्यङ्मुखं ध्यात् । ततः पुप्पचंदननांबूलवासांस्यादाय अ अद्यामुकस्य समावर्तनहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुक- शाणं ब्राह्मणमेभिः पुप्पचंदनतांबूलवासोभिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे वृतोऽस्मीति प्रतिवचनं यथाविहितं कर्म कुर्वित्यभिधाय ॐकरवाणीति . अब समावर्तन संस्कार लिखा जाता है। किसी शुज दिनमें नम्र होकर ब्रह्म- चारी आचार्यसे प्रार्थना करे कि ' में स्नान करुंगा' तब आचार्य ब्रह्मचारीसे कहे कि नाहि अर्थात् स्नान कर । फिर आचार्यके दाहिनी ओर समीपमें ब्रह्मचारीके बैठ जानेपर जो कि स्नानादि नित्यकर्मसे निश्चिन्त हो चुका है ऐसा आचार्य शुद्ध भूमिमें इस प्रमाण वेदी रचकर उसको तीन कुशाओंसे शुद्ध कर उन कुशाओंको ईशानकोनमें डाल देना चाहिये । फिर गोबरसे वेदीको लीपकर युके मूलसे क्रमशः उत्तर उत्तरकी ओरको तीन रेखा बैंचकर रेखा खंचनेके क्रमानुसार मिट्टी उठाकर जलसे सेचनपूर्वक कांसीके पात्रमें भनि लाप उत्तराभिमुख स्थापित करे पीछे पुष्प, चन्दन, ताम्बूल और वा लेकर आगेलिसे'ॐ अद्यानुकत्य कयतनावनिह मेकर्माण रहतापेक्ष- गरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोनममुक्शर्माण ब्राह्मणमोभिः पुष्पचन्दनताम्बुलवा- सोनिब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे इस संकल्पद्वारा ब्रह्माका दरण करे । तब नशा वृतोऽस्मि 'ऐसा उच्चारण करके उस सामग्रीको लेवे । फिर ' यथाविहित कर्म कुरु' ऐसा आचार्य कहे । अनन्तर 'ॐ करवाणि ' ऐसा ब्रह्माके कहने - आपाटीकासहिता। तेनोक्ते अनर्दक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागवान् कुशानास्ती- याऽस्मिन्कर्मणि त्वं में ब्रह्मा भवेत्यभिधाय ॐ भवानीति तेनोक्ते ब्राह्मणमुदङ्मुखं तत्रोपवेश्य ततः प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य कुशेराच्छाद्य ब्रह्मणो मुखमवलोक्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरि निद- ध्यात् । ततः परिस्तरणं बर्हि पश्चतुर्थभागमादायानेयादीशान्यांत ब्रह्मणोऽग्निपर्यंत नेत्याद्वायव्यांतं आग्नितः प्रणीतापर्यतं ततोऽनरुत्तरतः पश्चिमादिशि पवित्रच्छेदनाथ कुशवयं पवित्रकरणाथ सायमनंतर्गर्भ कुशपत्रद्वयं प्रोक्षणीपात्रं आज्यस्थाली संमार्जनार्थ कुशा उपयमनकुशाः समिधतिनः खुब आज्यं पूर्वपूर्वदिशि क्रमेणासादनीयम् । ततः पवित्र- च्छेदनकुशः पवित्र छित्त्वा सपवित्रकरण प्रणीतोदकं निः प्रोक्षिणीपात्रे पर अनिके दक्षिणकी ओर शुद्ध आसन बिछाय उसके ऊपर पूर्वको जिनका अयभाग हो ऐसे कुशा बिछाकर इस समावर्तनसंस्कारमें आप मेरे अला हूनिये ऐसा कहकर ब्रह्माके - ॐ भवानि ' कहनेपर उसको उत्तरमुख करके उस आसनपर बैठाल देना चाहिये। फिर प्रणीतापात्रको आगे रखकर जलसे परिपूर्ण करे और उसको कुशाओंसे ढककर ब्रह्माके मुसको देख अमिके उत्तरकी ओर कुशाऑपर रख देवे । फिर परिस्तरण करना चाहिये । मुहीर अथवा सो कुशा लेकर उसके चार भाग करे। पहला भाग अनिकोनसे ईशानको मतक, दूसरा भाग ब्रह्मासे अग्नि (वेदी) तक, तीसरा भाग नैतकोनसे 'वायुकोनतक और चौथा भाग अमिसे प्रणीतापर्यन्त विछा देना चाहिये । फिर अनिके उत्तर पश्चिमदिशामें पवित्र छेदनके लिये तीन कुशा रक्खे और पवित्र बनाने के निमित्त अग्रताग सहित तथा वीचके पत्तेसे रहित अर्थात् जिसके भीतर अन्य कुशपत्र न हो, ऐसे दो कुशपत्र रक्खें। फिर प्रोक्षणीपात्र, आज्यस्थाली, पांच संमार्जन कुशा, तीनसे तेरह तक उपयमनकुशा, तीन समिधा, युवा और घृत इन सब वस्तुओंको पूर्वपूर्वकी तरफ रखता जावे । तत्पश्चात् पवित्र छेदनकी कुशाओंसे पवित्रोंको छेदन करे और पवित्रयुक्त दशकमपदाता निधायानामिकांगुष्ठाभ्यां पवित्रे गृहीत्वा निरुत्पूय प्रोक्षणीपात्रं णादायाऽनामिकांगुष्टगृहीतपवित्राभ्यां तजलं किंचित्रिः तोदकेन प्रोक्षणीमभ्युत्य प्रोक्षणीजलेन निप्रणीतयोमध्ये प्रोक्षणीपात्रं निदध्यात् । तत निर्वाप. अधिश्रयणम् । ततस्तृणं प्रज्वाल्याज्यस्याग्रश्च.... भ्रामयित्वा वही तत् प्रक्षिप्य मुवे त्रिःप्रतप्य.. मूर्बाह्यतः सवं संमृज्यप्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य पुनः प्रतप्य स्वस्य णतोनियात् ततआज्यमान प्रदक्षिणंभ्रामयित्वावतार्य त्रि. वदुत्पूयावेक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निरसनं कृत्वा पुनः पूर्ववत्प्रोक्षण्युत्पवनं हायसे प्रणीतापानका जल लेकर प्रोक्षणीम तीन बार रक्खे । फिर और अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंसे पवित्रोंको ग्रहण करके प्रोक्षणीके जलको तीन वार उछाले। पश्चात् प्रोक्षणीपात्रको बायें हाथमें उठाकर दाहिने हाथकी अना- मिका ओर अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंसे पवित्रोंको ग्रहण पूर्वक प्रोक्षणीके जलको तीन बार फेंकें। प्रणीताके जलसे प्रोक्षणीको सेचन करे । फिर प्रोक्षणीके जल- द्वारा पूर्वस्थापित वस्तुओंको सेचन कर मोक्षणीपात्रको अनि और प्रणीताके चीचमें रख दे। इसके पीछे आज्यस्थालीमें घृतको रक्खे और फिर उस आज्यस्थालीको उठाकर वेदीकी अमिमें स्थापन करे। फिर एक कुशा बाल लेवे और उसको वृत तथा अग्निके चारों तरफ घुमाकर अनिमें ही डालदेवे । अनन्तर सुवेको अमिसे तीन बार तपाकर संमार्जनकुशाओंके अयभागसे भीतर ओर मूलभागसे बाहर शुद्ध कर प्रणीतापात्रके जलसे सेचन करे और फिर दूसरी बार तपाकर वेदीके दाहिनी तरफ रख देवे । घृतको अग्रिसे उतार लेवे, और उसको अग्निके चारों तरफ घुमाता हुआ आगे रखकर प्रोक्षर्णाकी गाई पवित्रामे तीन वार उछाले और देखे यदि उसमें मक्खी इत्यादि कोई पडाहो तो उमको निकालर बाहर फेंक देवे । फिर पूर्ववत् मोक्षणीके जता.

भाषाटीकासहिता। ७३ स्त्यायोपयमनकुशान्वामहस्ते कृत्वा प्रजापात मनसा ध्यात्वा तूप्णी- को घृताक्ताः समिधस्तिवः क्षिपेत् तत उपविश्य सपवित्रप्रोक्ष- प्युदकेन प्रदक्षिणक्रमेणानि पर्युक्ष्य प्रणीतापात्रे पवित्रे निधाय पाति- सदक्षिणजानुः समिद्धतमेऽनो ब्रह्मणान्वारन्धः येणाज्याहुतीर्जुहुयात् । भत्र प्रथमाहुतिचतुष्टये प्रत्याहुत्यनंतरं स्रुवावस्थितहुतशेपतस्य प्रोक्षणीपाचे प्रक्षेपः ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा। *इंद्राय स्वाहा इदमिंद्रायः । इत्याचारों । ॐ अग्नये स्वाहा इद- ममये । ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागो। ततोऽन- न्वारब्धकर्तृकहोमः । ॐ अंतरिक्षाय स्वाहा इदमंतरिक्षाय० । अवा- यवे स्वाहा इदं वायवे । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा इदं ब्रह्मणे ।ॐ छंदोभ्यः पवित्रोंसे उछाले और फिर खडा होकर उपयमन कुशाओंको यायें हाथमें ले मनसे अनापतिका ध्यान करता हुआ चुपचाप तीनों समिधाओंको घृतमे बोरकर स्वाहा शब्दके साथ अमिमें डाल देवे। फिर पीछे आसनपर बैठकर पवित्रसहित प्रोक्षणीके जलको दाहिने हाथमें लेकर दक्षिणकमसे अनिके चारों ओर सेचन करे फिर पवित्रोंको प्रणीतापानमें रस देवे । पश्चात् दाहिनी जानुको नवायकर ब्रह्मासे एकत्रित हो प्रज्वलित अप्रिमें झुके द्वारा घृतकी आहुति देवे । पहली चार आहुतियोंमें प्रत्येक आहुतिके अनन्तर खुवेमें शेप रहे हुए वृतको प्रोक्ष- णीपात्रमें डालनाजाय ( यहाँका शेष विवरण पीछे कई वार लिखा जाचुका है यहाँ देख लेना) आहुतिके मन्त्र निम्न लिखित हैं। 'ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये न मम । इति मनसा । ॐ इन्द्राय स्वाहा इदमिदाय न मम । इत्या- पारी । ॐ अनये स्वाहा इदममये। ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्या- ज्यभागी । ( इनसे आगेकी आहुतियांनी ब्रह्मासे युक्त होकरही दीजाती हैं) ॐ अन्तरिक्षाय स्वाहा इदमन्तरिक्षाय० । ॐ वायवे स्वाहा इदं यापवे. * ब्रमणे स्वाहा इदं ब्रह्मणे० । ॐ छन्दोत्यः स्वाहा इदं छन्दोत्यः । - ७२ दशकर्मपद्धतिः। स्वाहा इदं छंदोभ्यः। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये। मनसा । ॐ देवेभ्यः स्वाहा इदं देवेभ्यः। ॐ ऋषिभ्यः ऋषिभ्यो । ॐ श्रद्धायै स्वाहा इदं श्रद्धायैः । ॐ मेधाये इदं मेधाय० । ॐ सदसस्पतये स्वाहा इदं सदसस्पतये । मतये स्वाहा इद मनुमतये । ततो ब्रह्मणान्वारन्धो जुहुयात् । हुतिदशतये तत्तदाहुत्यनंतरं वावस्थितान्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः ॐ भूः स्वाहा इदमनये । ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे। स्वाहा इदं सूर्यायः । एता महाव्याहृतयः । ॐ त्वन्नो अग्ने विद्वान देवस्य हेडो अब यासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वह्नितमः विश्वा द्वेषासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमनीवरुणाभ्यां । ॐ त्वन्न अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्ठो अस्या उपसो व्युष्टौ । अव यक्ष्वनो वरुण रराणो वीहि मृडीकर सुहवो न एधि स्वाहा इदमग्रीवरुणाभ्यां । ॐअयाश्चामेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्वमया असि । अयानो यज्ञ ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । ॐ देवेश्यः स्वाहा इदं देवेन्यः । ॐ ऋषियः स्वाहा इदं पित्यः । ॐ श्रद्धायै स्वाहा इदं श्रद्धायैः । ॐ मेधायै स्वाहा इदं मेधायैः। ॐ सदसस्पतयेस्वाहा इदं सदसस- तये । ॐ अनुमतये स्वाहा इदमनुमतये। फिर ब्रह्मासे मिलकरही होम करे। यहां दश आहुतियोंमें प्रत्येक आहुतिके पीछे युवेमें शेष रहे घृतको प्रोक्षणीपात्रमें डालता जाय।'ॐ भूः स्वाहा इदममये० ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे । ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय० । एता महान्याहृतयः । ॐ त्वनो अग्रे वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो अव यासिमीठाः । यजियो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा देपासे प्रमुमुग्भ्यस्मत्स्वाहा इदमनीवरुणायामः । ॐ स वनो अग्रेड- वमो भयोता नेदिष्ठो अस्या उपसो व्युष्टौ । अव यक्ष्व नो वरुणः रराणो वीहि मृडीकर सुहबो न एपि स्वाहा इदमग्रीवरुणायाम् । ॐ अयाचामेस्पनभित- स्तिपाय सत्वामित्वमया आस । अयानो यज्ञं वहास्पयानो धेहि भेषज् स्वाहा .

भाषाटीकासहिता। अहास्ययानो धेहि भेषजर स्वाहा इदमनये । * ये ते शतं वरुण "ये सहस्त्रं यज्ञियाः पाशा वितता महांतः। तेभिनों अद्य सवितोत विष्णु- वि मुंचंतु मरुतः स्वर्णाः स्वाहा । इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्व- भ्यो देवेभ्योमरुद्भयःस्वभ्यश्च । ॐउदुत्तमं वरुण पाशमस्मदव- धमं विमध्यम प्रथाय । अया वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये त्याम स्वाहा इदं वरुणाय । इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा इदमग्नये स्विष्टकृते । इति स्विष्टकृत् । ततः संस्रव- प्राशनम् । तत आचम्य । अद्य कृतेतत्समावर्तनहोमकर्माणि कृताव- तावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेवतममुकगोवाया- मुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे । इति दक्षिणां दद्यात् । ॐ स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ततो ब्रह्मग्रंथिविमोकः । ततः इदमनये । ॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा पितता महांतः। तेनि! अद्य सवितोत्त विष्णुर्विश्वे मुञ्चतु मरुतः स्वाः स्वाहा इदं वरुणाय सविने विष्णवे विश्वयो देवत्यो मरुद्भयः स्वायश्च० । ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्म- देवाधर्म विमध्यम श्रयाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय । इति सर्वप्रायश्चित्तम् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । इति प्राजापत्यम् । ॐ अनये स्विष्टकृते स्वाहा इदमनये स्विष्टकृतेः । इति स्विष्टकृत् । फिर प्रोक्षणीपात्रके घृतमिश्रित जलका पारा करे और इसके पश्चात् शुद्ध जलसे आचमन कर लेना चाहिये। अनन्तर आगे लिखे 'ॐ अद्य कृततत्समावर्त्तनहोमकणि कताकतायेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रति- टार्थमिदं पूर्णपात्र प्रजापतिदेवतममुकमोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे दक्षिणा तुभ्यमहं संप्रददे' इस संकल्पको उच्चारणपूर्वक पूर्णपात्रका दान करके ब्रह्माके निमित्त देना चाहिये। तब उसको ब्रह्मा ॐ स्वस्ति' ऐसा बोलकर ग्रहण करे -- - दशकर्मपद्धतिः। पवित्राभ्यां प्रणीताजलेन ॐ सुमित्रिया न आप ओषधयस्संत। मंत्रेण शिरः संमृन्य । ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै संतु योऽस्मान. वयं द्विष्मः । इति मंत्रणेशान्यां प्रणीतान्युजीकरणम् : मेण बहिरानीय घृतेनाभिधार्य हस्तेनैव जुहुयात् । ॐ देवा गातुं वित्वा गातुमित मनसस्पत इमं देव यज्ञर स्वाहा व्वाते स्वाहा । इति वाहिहोमः ततो ब्रह्मणान्वारब्धकर्तृकं कर्म। मोपविष्टो ब्रह्मचारी परिसमूहनं कुर्यात् । तत्र तरेंधनेन पंचाहुतीर्हस्तेनैव जुहुयात् । ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसं मा कुरु । ॐ यथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा आसि । ॐ एवं मां सुश्रवः सोश्रवसं कुरु । ॐ यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि । ॐ एवमई तत्पश्चात् ब्रह्मगांठको खोल देनाचाहिये । अनन्तर पवित्रोंद्वारा प्रणीताके जलको ग्रहण करके आगे लिखे 'ॐ सुमिनिया न आप ओषधयः सन्तु ' इस मन्त्रसे अपने शिरमें मार्जन करे। फिर आगे लिखे 'ॐ दुर्मियास्तस्मै संतु योऽस्मान् द्वेष्टि यञ्च वयं द्विप्मः' इस मन्त्रसे प्रणीतापात्रको ईशानकोनमें उलट देवे । तदनन्तर परिस्तरणक क्रमानुसार अर्थात् जिस कमसे कुश बिछाये थे उसी क्रममे उन कुशीको उठालेवे और उनको घृतमें बोरकर आगे लिखे 'ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्वा गातुमित मनसस्पत इमं देव यज्ञः स्वाहा वाते था: स्वाहा।' इस मन्त्र द्वारा हाथसेही अनिमें होम कर देवे | फिर ब्रह्मासे मिलकर आगेका कर्म करना चाहिये । ब्रह्मचारी अनिके पश्चिमकी तरफको बैठा हुआ अनिका परिसमूहनं पश्चात् पवित्र और सूखे इंधनकी पांच समिधा लेवे और उनको वृतमें बोरकर आगे लिखे पांच पृथक् पृथक् मन्त्रोंसे आहुति देवे । ॐ अमे सुश्रवः सुश्रव सं मां कुरु । ॐ यथा लमने सुभाः सुभवा आमि । ॐ एवं मां सुश्रुवः सौश्रवसं कुरु। ॐ यथावमने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि। १ वेदीके इधर उधर जो होर्माय द्रव्य अर्थात् होमके समय साकल्यादि छित- राकर गिर पड़ते हैं उन सबको फिर इक कर देनेका नामही परिसमूहन हैं।

भाषाटीकासहिता। ष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् । ततः प्रदक्षिणमामि वारिणा श्य उत्थाय घृतातांपादेशमितां समिधमादाय जुहुयात् तत्र मंत्रः। समये समिधमाहापं बृहते जातवेदसे यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यस समहमायुषा मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिब्रह्मवर्चसेन समिधे जीव- वो ममाचार्यों मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुयशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्च- व्यन्नादो भूयासं स्वाहा । ततः समिदंतरद्वयमनेनैव क्रमेण प्रत्येक बुत्ता उपविश्य तेनैव क्रमेण पंचाहुतीर्घताक्तशुष्कानपिद्धतरेंधनेन जुहुयात् । ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रुवसं मा कुरु । ॐ यथा त्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवा असि । ॐ एवं मां सुश्रवः सौश्रवसं कुरु । ॐ यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि । ॐ एवमई मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् । ततः प्रदक्षिणमानं वारिणा पर्युक्ष्य तूप्णी पाणी प्रतप्य मुसं ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् ।' फिर आमिके चारों तरफ जलसेचनपूर्वक खडा हो प्रदेश प्रमाण समिधा धृतमें जिजोकर आगे लिखे ॐ अग्नये समिधमाहाप बृहते जातवेदसे यथा त्वमग्ने समिधा समिध्यस एव- महमायुष्य मेधया वर्चसा प्रजया पशुभिह्मवर्चसेन समिन्धे जीवपुत्रो ममा- चार्यों मेधाव्यहमसायनिराकरिष्णुयशस्वी तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्व्यन्नादो भयासर स्वाहा । इस मन्त्रसे आहुति देवे । तिसके पीछे इसी मन्त्रसे दो समिधाआकों अलग अलग आहुति देवे । फिर आसनमें बैठकर पूर्वकथनानुसार सूखे अथच पवित्र ईंधनकी पांच समिधाओंको बृतमें शिजोकर आगे लिखे । ॐ अमे सुश्रवः सुश्रवसं मां कुरु । ॐ यथा त्वमने सुश्रवः सुश्रवा असि । ॐ एवं मां सुश्रवः सौश्रवसं कुरु । * यथा त्वमग्ने देवानां यज्ञस्य निधिपा असि । ॐ एवमहं मनुष्याणां वेदस्य निधिपो भूयासम् ' इन मन्त्रोंसे आहुति देवे पश्चात दक्षिण कमसे अग्निके चारों ओर जल सेचन करे और फिर अग्रिम चुपचाप हाथोंको तपाकर आगे लिखे प्रत्येक मन्त्रसे मुखको स्पर्श करे।

७६ दशकाता ३ प्रतिमंत्रांतेऽवमृशति । ॐ तनूपा अग्नेसि तन्वं मे पाहि। अनेस्यायुमें देहि । ॐ वादाः अग्नेसि वर्षों मे देहि । ॐ तन्वा ऊनं तन्म आपृण। अमेधां मे देवः सविता आदधातु। मे देवी सरस्वती आदधातु । ॐ मेधांमे अश्विनी देवावाधत्तां स्रजी। तत्र सर्वगात्रादिषु दक्षिणपाणिना स्पर्शः। तत्र प्रत्येक ॐ अंगानि च म आप्यायताम् । इति सर्वगावालंभने । ॐ वाइ आप्यायतामिति मुखालंभने । ॐ प्राणश्व आप्यायतामिति ॐ चक्षुश्च म आप्यायतामिति चक्षुईयस्पर्शः। ॐ श्रोत्रं म आप्यायतामिति श्रोत्रदयस्पर्शः। ॐ यशो बलं च म यतामिति मंत्रपाठमात्रम् । ततो दक्षिणानामिकाग्रगृहीतभस्मना ग्रीवायां दक्षिणबाहुमूले हृदि च न्यायुपं कुर्यात् यथासंख्येन मंत्रचतु- 'ॐ तनूपा अग्नेसि तन्वं मे पाहि । ॐ आर्युदा अमेस्यायुर्मे देहि । ॐ वर्चादा अमेसि वर्षों मे देहि । ॐ अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आपूण। ॐ मेघां मे देवः सविता आदधातु । ॐ मेधां मे देवी सरस्वती आदधातु । ॐ मेधां में अश्विनौ देवावायत्तां पुष्करलजी' अनन्तर आगे लिखा प्रत्येक मन्त्र बोलकर दाहिने हाथसे शरीरके समस्त अंगोंको स्पर्श करे । ' ॐ अङ्गानि च म आप्यायताम् 'यह मन्त्र उच्चारण करके समस्त शरीरको स्पर्श करे । ॐ वाक् च म आप्यायताम् ' यह मन्त्र बोलकर मुखको 'ॐ प्राणश्च म आप्यायताम् ' यह मन्त्र उच्चारण करके नासिकाके दोनों छिद्रोंको 'ॐ चक्षुभ म आप्यायताम् । यह मन्त्र पटकर दोनों नेत्रोंको और 'श्रोतृञ्चम आप्यायताम् । यह मन्त्र उच्चारण करके दोनों कानोंको स्पर्श करे और 'ॐ यशो बलञ्च म आप्यायताम् ' इस मन्त्रका केवलमात्र पाठही कर लेना चाहिये । फिर दाहिने हाथकी अनामिका अंगुलीसे जुवेकी जस्म लेकर माथे गले दक्षिणबाहुमूल। और हृदयमें व्यायुष करे। अर्थात् इन सब स्थानोंमें युवेकी उपरोक्त भस्म लगानी चाहिये । उसके क्रमसे निम्नलिखित चार मन्त्र यह हैं यथा ॐ पास T N ममुकशाहं भी वरुण त्वमभिवादये' इसी प्रकार आचार्यको आभिवादन करे। भापाटीकासहिता। म् । ॐ न्यायुषं जमदग्नेरिति लटाटे । ॐ कश्यपस्य व्यायुपं इति याम् । ॐ यद्देवेषु न्यायुपं इति दक्षिणबाहुमूले । ॐ तत्रो अस्तु शुषं इति हृदि । ततो व्यस्तपाणिभ्यां पृथिवी स्पृशन प्रथमं वैश्वा- संबोध्याभिवादयेत् । तत्रामुकगोत्रोऽहममुकप्रवरोऽहममुकशाहं भो पानर त्वामभिवादये इति प्रकारः। ततस्तथैव वरुणं संवोध्याभिवाद- त्। तथैवाचार्य चाभिवादयेत् । ततः आयुष्मान भव सौम्य इत्याचार्यों यात् । ततोऽग्नेरुत्तरतः प्रागग्रान्कुशानास्तीर्य तदुपरि दक्षिणोत्तरकमे- गासादितवारिपूर्णकलशाष्टतये कलशानांपुरतः प्रागग्रेषु कुशेष स्थित्वा एकस्मादाम्रपल्लवेनोदकं गृहीत्या ॐ येऽप्स्वंतरग्नयः प्रविष्टा गोह्य उप- - जमदनेः' यह मन्त्र उच्चारण करके माथेमें, 'ॐ कश्यपस्य व्यायुप' यह मन्त्र बोलकर कंठमें, ॐ यद्देवेषु व्यायुपं ' यह मन्त्र बोलकर दक्षिणबाहुमूलमें, और ॐ तन्नो अस्तु व्यायुपं यह मन्त्र उच्चारण करके हृदयमें लगानी चाहिये । फिर व्यस्तपाणि अर्थात् बायें हाथके ऊपर दाहिने हाथको पट्ट रखकर भूमिको स्पर्श करताहुआ प्रथम अग्निको सम्बोधन करके प्रणाम करे । उसका क्रम यह है — अमुकगोत्रोऽहममुकभवरोऽहममुकशमाह भो वैश्वानर त्वामभिवादये ' यह अभिवादन करनेकी रीति है । फिर इसी प्रकार वरुणको संबोधन करके प्रणाम करना चाहिये । उसका वाक्य यह है । यथा ' अमुकगोत्रोऽहममुकाबरोऽह- पथा 'अमुकगोत्रोऽहममुकभवरोऽहममुकशर्मा भो आचार्य त्वामजिवादये' अ- भिवादन करनेके अनन्तर आयुष्मान् अव सौम्य' इस प्रकार आचार्य आशीर्वाद देवे । तत्पश्चात अधिक उत्तर पूर्वको अग्रभागवाले कुशाओंको विछाकर दक्षिण उत्तरको जलसे भरकर रखे हुए आठ कलशोंके आगे पूर्वायकुशीको बिछाने और उसपर (ब्रह्मचारी) बैठकर उन आठ कलशोंके बीच एक कलशमेंसे आमके पत्ते द्वारा आगे लिखेॐ येक्वंतरमयः प्रविष्टा गोस उपगोह्यो मयूपो दशकर्मपद्धतिः। गोह्यो मयूषो मनोहास्खलो विरुजस्तनूषे रोचनस्तमिह गृह्णामि । इति मंत्रेणाततस्तेन मामभिषिचामि ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय इत्यात्मानमभिषिंचति । ततो गृह्णामि ॐ येप्स्वंतरग्नयः । इति मंत्रेण * येन श्रियमकृणुतां येनावमृश्यता सुरां येनाक्ष्यावभ्यषिंचता तदश्विना यशः । इति मंत्रेण ततस्तेनैव क्रमेणपुनःॐ येप्स्वंतरमय इत्यनेन तृतीयकलशस्थजलमादाय । ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे । इति मंत्रेणाभिषिच्य तेनैव ॐ येपस्वंतरग्नयः । इति मंत्रेण चतुर्थकलशस्थजलमादाय ॐ यो शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेह नः उशतीरिव मातरः । इति मंत्रेणाभिषि च्य पुनः पंचमकलशस्थंग्जलं येप्स्वंतरग्नय० । इति मंत्रेणतथेवादाया तस्मा अरं गमामवो यस्य क्षयाय जिन्वय आपो जनयथाच नः । मनोहास्खलो विरुजस्तनूपे दुषुरिंद्रियहोतान्चिजहामि यो रोचनस्तमिह गृह्णामि इस मंत्रसे जल लेवे और फिर इस आगे लिखे 'ततस्तेन मामभिषिचामि श्रियै यशसे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसाय । ' मन्त्रसे अपने शरीरमें सेचन करें । फिर दूसरे कलशसे आमके पत्ते द्वारा पूर्वोक्त 'ॐ येवंतरग्नयः' मन्त्रसे जल ग्रहण करे और आगे लिखे 'ॐ येन श्रियमणुतां येनावमृप्यताः सुरां येनाक्ष्या- वायपिंचतां यद्वा तदश्चिना यशः' इस मन्त्रसे अपने रपर सेचन करे। फिर जल ग्रहण करनेके पूर्वोक्त मन्त्रसे आमके पत्तेदारा तीसरे कलशका जल लेकर आगे लिखे 'ॐ आपोहि ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जेदधातनः । महे रणाय चक्षसे इस मन्त्रसे शरीरमें सेचन करे। अनन्तर जल ग्रहणके उसी मन्त्रसे आमके पत्तेदारा चौथे कलशका जल लेकर आगे लिखे'ॐ यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः उशतारिख मातरः 'इस मन्त्रसे अपने शरीरको सेवन करे। फिर जल ग्रह्णके पूर्वोक्त मन्त्रसे आमके पत्तेद्वारा पांचवें कलशका जल लेकर आगे लिखे' ॐ तस्मा अरं गमाम दो यस्य क्षपाप जिन्नप। - ।

भाषाटीकासहिता। ते मंत्रेणाभिषिच्यततोऽवशिष्टकलशत्रितयजलं तथैव ये स्वंतरमयः । ते मंत्रण प्रत्येकं गृहीत्वा तूष्णों प्रत्येकमभिषिंचति । ततो मेखलामो- नं शिरोभागेन ॐ उदुत्तमं वरुणपाशमस्मदवाधम विमध्यम् श्रथाय । ज्या वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम । इति मंत्रेण । दंड- कृष्णानिने तूष्णीं भूमो निधाय अन्यद्वस्त्र परिधायोत्तरीयं च कृत्वाचम्य बद्धांजलिरादित्यमुपतिष्ठेत् ब्रह्मचारी । ॐ उद्यन भ्राजभृष्णुरिंद्रो मरु- दिरस्थात् । प्रातर्यावभिरस्थात् दशसनिरति दशसनि मा कुर्वाविदन्मा गमयोधन भाजभृष्णुरिंद्रो मरुद्भिरस्थादिवा यापभिरस्थाच्छतसनिरसि शतसनि मा कुविदन्मा गमयोधन् भ्राजभृष्णुरिंद्रा मरुद्भिरस्थात्सायं यावभिरस्थात् सहस्रसनिरस सहस्रप्सनि मा कुदिदन्मा गमय । इति मंत्रेण । ततो दधितिलान्वा प्राश्याचम्य जटालोमनखादीइछेदयित्वा आपो जनयथा च नः । इस मन्त्रसे अपने शरीरमें सेचन करे । पश्चात् रोष रहेहुए तीन कलशोंके बीच प्रत्येक कलशमेंसे पूर्वोक्त जल ग्रहणके मन्त्र बारा आमके पचेसे जल लेकर क्रमानुसार अपने शरीरमें चुपचाप सेचन करे । फिर पूँजकी मेखलाको शिरकी ओरसे आगे लिखे 'ॐ उदुत्तमं वरुण पाश- मस्मदवाधर्म विमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसी आदितये स्याम० ' इस मन्त्रको उच्चारण करके निकाल देवे।अनन्तर दण्ड और काली मृगछालाको चुपचाप रख देये। फिर दूसरा वस्त्र और उत्तरीय वस्त्र धारण पर्वक आचमन करे। पश्चात् ब्रह्मचारी हाथ जोडकर आगे लिखे 'ॐ उद्यन्नानाप्णु- रिन्दो मरुनिरस्यात् पार्यावशिरस्थान दशसनिरसि दशसनि माकुर्वाविदन्मा नमयोयन बानगुरिन्द्रो मदिरस्थाइ दिवा यावाभिरस्थाच्छतसनिरसि शत- साने माकुविदन्मागमयोधन भाजनप्युरिन्द्रो मरुदिरस्थात्सायं यावशिरस्था- सहस्रसनिरसि सहस्रसनि माकुळविदन्मागमय' इस मन्त्रकोउच्चारण करता हुआ सूर्यनारायण के सन्मुख खडा होजाय । फिर दही और तिल इन दोनों वस्तुओंको मिलाकर चख लेवे। पीछे आचमन करले। तदनन्तर नाईके द्वारा क्षौर (हना- दरा गावात स्नात्वाचम्य प्रादेशमितोदुंबरकाष्ठेन दंतधावनम् व्यूहध्वः सोमो राजायमागमत् । स मे मुख प्रमायते यशसार च । इति मंत्रेण । ततो दंतकाष्ठं परित्यज्याचम्य + तर स्नात्वा । द्विराचम्य । चंदनकुंकुमादिना नासिकाया ॐ प्राणापानौ मे तर्पय । ॐ चक्षुर्मे तर्पय । ॐ श्रोत्रं मे इति मंत्रेणानुलिपति । ततः पाणी प्रक्षाल्य दक्षिणाभिमुखः वामजानुः कृतापसव्यो द्विगुणभुनकुशवयतिलजलान्यादाय कुशत्रयोपार पितृस्तर्पयेत् । ॐ पितरः शुधवमिति मंत्रेण । ततः कृत्वा आचम्यानुलिप्य जपेत् ॐ सुचक्षा अहमक्षीभ्यां सुवर्चा मुखेन सुश्रुत् कर्णाभ्यां भूयासम् । इति ततोऽहतवासः मत ) कराकर जटा लोम नाखून कटवावे और स्नान कराके आचमन करे फिर प्रादेशप्रमाण गृलरका दैतौन आगे लिखे 'ओमन्नाधाय व्यूहध्वर सोमो रानायमागमत् । स मे मुखं प्रमयते यशसा च भगेन च' इस मन्त्रको उच्चारण करके करनी चाहिये । पश्चात् दतौनको फेंक देवे और कुल्ला करके फिर आचमन करे तिस पीछे सुगन्धित पदार्थोद्वारा शरीरमें उबटन करे। और फिर स्नानपूर्वक दो बार आचमन करे । फिर चन्दन केशर इत्यादि सुगन्धित द्रव्य ग्रहणपूर्वक 'प्राणापानी मे तर्पय ' यह मंत्र बोलकर नासिका और मुखमें लगावे ।'ॐ चक्षुर्म तर्पय ' यह मन्त्र उच्चारण करके नेत्रोंमें, ओर 'श्रीदं मे तर्पय ' यह मन्त्र पढकर कानोंमें लगाना चाहिये । फिर हाथ धोकर दक्षिणी ओरको मुख किये ब्रह्मचारी वामजानुको नवायकर जनेऊको अपसम्प (उल्टा) कर दुहेरे लपेटे हुए तीन कुश तिल और जल लेकर पृथ्वीमें विछाये हुए तीन कुशोंके ऊपर आगे लिखे 'ॐ पितरः शुंभध्वम् ' इस मन्त्रको उचा- रण करके पितरोंका तर्पण करे। फिर यज्ञोपवीत सव्य ( सीधा) करके आप- मन करे । पश्चाद कुछ सुगन्धित द्रव्योंको लेपन कर आगे लिखे सुरक्षा अहमक्षीयां भूयामः सुवर्चा मुखेन सुश्रुत्र कर्णान्यां भूयासम् ' इस मन्त्रका - भाषाटीकासहिता। ८१ । ॐ परिधास्य यशोधास्य दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि च जावामि शरदः पुरुची रायस्पोपमभिसंव्ययिष्ये इति मंत्रेण । तो यज्ञोपवीतपरिधानन् । ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्स- वं पुरस्तात् । आयुष्यमण्यं प्रतिमुंच शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः। ति मंत्रेण द्वितीयग्रहणम् । यज्ञोपवीतमिति प्रजापति–पिर्यजुरुपवीत: . देवता यज्ञोपवीतपरिधाने विनियोगः । यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपतिनोपनह्यामि आचमनं अथोत्तरीयं। * यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेंदाबृहस्पती । यशो भगश्च मा विद्यशो मा प्रतिपद्यताम् । इति मंत्रण । ततः पुष्पमालाग्रहणे मंत्रः ॐ या आहारज्जमदग्निः श्रद्धायै कामायेंद्रियाय ता अहं प्रतिगृह्णामि यशसा च भगेन च । इति मंत्रेण पाठ करना चाहिये । फिर आगे लिखे ॐ परिधास्य यशोधास्य दीर्घा- युत्वाय जरदष्टिरस्मि शतं च जीवामि शरदः पुरुची राययस्पोपमनिसंव्ययिष्ये । इस मन्त्रसे नवीन वस्त्र पहर लेवे। अनन्तर दूसरा यज्ञोपवीत धारण करनेके लिये आगे लिखा ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्ताद । आयुष्य- मध्यं प्रतिमुश्च शुनं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ' यह मन्त्र उच्चा- रण करके यज्ञोपवीतको हाथमें लेवे । फिर दूसरा यज्ञोपवीत धारण करनेके लिये जल हाथमें ले आगे लिखे हुए 'यज्ञोपवीतमिति प्रजापतित्रपि- र्यजुरुपवीतदेवता यज्ञोपवीतदेवता यज्ञोपवीतपरिधाने विनियोगः । वाक्यको उच्चारण करके उसका विनियोग छोडे और फिर आगे लिखे हुए 'ॐ यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि' इस मन्त्रसे (उस) यज्ञोपवीतको धारण कर लेना चाहिये । पश्चात् आचमन करे फिर आगे लिसे हुए 'ॐ यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्रावृस्पती यशो भगस्य मा विदयशो मा प्रतिपद्यताम् ' इस मन्त्रसे उत्तरीयवस्र धारण करे । तत् पश्चात् आगे लिखे 'ॐ या आहरज्जमदमिः श्रद्धाय कामाय येन्द्रियाय ता अहं प्रतिगृह्णामि १ डुपहा । इस - दशकर्मपद्यातः। पुष्पमालाग्रहणम् । ततः पुष्पमालापरिधानम् । ॐ मिंद्रवकार विपुलं पृथु तेन संग्रथिताः सुमनस आवनामि यशा माय इति मंत्रेण पुष्पमालापरिधानम् । अथ सुप्रतिष्ठा । अथोप्णीषेण वेष्टनं । ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगात्स उ श्रेयान् भवति मानः । तं धारासः कवय उन्नयंति स्वाध्यो मनसा - देवयंतः । मंत्रेण । ततः कुंडले परिदधाति । ॐ अलंकरणमसि भूयोलंकरणं. भूयात् । ततोऽजनम् । ॐवृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दाअसि चक्षुमें देहि । तत आदर्श आत्मदर्शनम् । ॐ रोचिष्णुरसि इति मंत्रेण । ततश्छ्वन- हणम् । ॐ बृहस्पते छदिरसि पाप्मनो मामंतहि तेजसो यशमो माम- तधेहि इति मंत्रेण । ततः पद्यामुपानही प्रतिगृह्णाति ॐ प्रतिष्ठे स्थो विश्वतो मापातम् इति मंत्रेण । ततो वेणवदंडधारणम् । ॐ विश्वाभ्यो । - - यशसा च भगेन च' इस मन्त्रसे पुष्पमालाको हाथमें ग्रहण करना चाहिये । और फिर उस पुष्पमालाको आगे लिखे ॐ यशोप्सरसामिन्द्रश्वकार विपुलंपृथु । तेन संमथिताः सुमनस आवधामि यशो मयि ' इस मन्त्रको उच्चारण करके पहर लेना चाहिये । अथ वसुप्रतिष्ठा । तदनन्तर पगडी या टोपी आगे लिखे ॐ युवा सुवासाः परिवीत आगाव स उ श्रेयान भवति जायमानः तं धीरासः काय उन्नयन्ति स्वाध्यो मनसा देवयन्तः इस मन्त्रसे धारण करे। इसके पश्चाद आगे लिखे 'ॐ अलङ्करणमसि भूयोलंकरणं भूयात्' इस मंत्रसे कुण्डल धारण करे । फिर आगे लिखे 'ॐ त्रस्यासि कनीनकार्दा असि चक्षुर्मे दहि' इस मन्त्रसे अंजन धारण करे अर्थात् आंखों में काजल लगावे । फिर आगे लिखेॐ रोचिष्णुरसि' इस मन्त्रसे दर्पनमें मुख देखे । पश्चात् आगे लिखे 'बृहसते छदिरसि पाप्मनो मामन्तघेहि इस मन्त्रसे छतरी धारण करे। फिर आगे लिखे 'ॐ प्रतिष्ठे स्था विश्वमापातम् ' इस मन्त्रसे परमि उपानह ( चर्मपादुका) धारण करे। अनन्तर आगे लिखे दिसायो भाषाटीकासहिता। अभ्यस्परिपाहि सर्वतः इति मंत्रेण ततः स्नातकस्य नियमाः। स्वादिवनृत्यत्यागः न तत्र गमनं क्षेमे सति न रात्री ग्रामांतरगमनं पावेत् न कूपेऽवेक्षणं न वृक्षारोहणं फलबोटन अमार्गेण न गच्छेत् जो न वायात् न संधिशयनम् न विपमभूमिलंघनं अश्लीलं नोपव- व उदितास्तसमये सूर्य नोपपश्येत् जलमध्ये सूर्य आकाशस्थं न पश्येत् देवे वर्षति न गच्छेत् उदके आत्मानं न पश्येत् अजातलोनी प्रमत्तां पुरुपाकृति पढां न गच्छेदित्यादि । तत आचार्याय वरां दक्षि- गां दद्यात् । ततः मूनं दिवो अतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आजात- - नानाट्रायसरिपाहि सर्वतः । इस मन्त्रसे लकडी (लाठी) हाथमें लेवे (तत्पश्चात ब्रह्मचर्य अवस्थापूर्वक विद्याध्ययन कर लेनेपर समावर्तन संस्का- रके द्वारा गृहस्थाश्रममें आये हुए नियम । यथा गाने, बजाने और नाचनेका त्याग करे और न ऐसे स्थानमें जावे । विशेष कार्य उपस्थित हुए विना रातके समय एक गांचसे दूसरे गांवमें न जाय, दौडकर नहीं चले। कुरमें मुँह डाल कर नहीं झांके । वृक्ष पर नहीं चढे । कच्चे फलोंको नहीं तोडे । विना दरवा- जेके घरमें न घुसे अर्थात् दरवाजे के होते हुए छोटी मोटी दीवार लांघकर कभी घरमें नहीं घुसे दरवाजेसेही प्रवेश करे । नम्र (बिलकुल नंगा ) होकर जान नहीं करे । सूर्यके उदय तथा अस्तसमयमें नहीं सोचे। विपमभमि अर्थाद ऊँची नीची पृथ्वीको लांघकर गमन न करे। अश्लीलयचन ( गालीगलौन) नहीं बोले । उदय और अस्त होते हुए सूर्यको नहीं देखे । आकाशस्थ सूर्यको परछाहीको जलके बीचमें न देखे । वर्षा होते हुए समयमें रास्ता तय न करे । जलमें अपने शरीरको नहीं देखे । जिसके रोम न निकले हो, बावली, पुरुषा- इति (जिस स्त्री पुरुषकी नाई दाढी मूछ निकल आई हैं जैसी गिंदिया होजडी ) इनके पास न जाय और न इनकी हाँसी ही उडावे । तदन्तर अपने आचार्यको उत्तम दक्षिणा देवे । फिर आगे लिखे हुए ॥ ॐ मुनि .

दशकमपद्धतिः। मग्निम्। कवि सम्राजमतिथिं जनानामासना पात्रं जनयंत देवा. इति मंत्रेण फलपुष्पसमन्वितघृतपूर्णवेण त्थाय पूर्णाहुतिमाचार्यः कुर्यादिति । तत उपविश्य सुवेण नीय दक्षिणानामिकाग्रगृहीतभस्मना ॐ व्यायुपं जमदरिति ॐ कश्यपस्य व्यायुपमिति ग्रीवायाम् ॐ यद्देवेषु न्यायुषामिति णबाहुमूले ॐ तन्नो अस्तु न्यायुपमिति हृदि इति व्यायुषं अनेनैव क्रमेण कुमारललाटादावपि तत्र तन्नो इत्यस्य स्थाने त विशेपः ततो मूर्धाक्षतादिग्रहणम् । इति श्रीमहामत्तकमहासामंताधिपतिश्रीरामदत्तविरचिता वाजसने- यिनामुपनयनकर्मपद्धतिःसमामा ।। दियो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत आजातमग्रिम् । कविर सम्प्राजमतिथि जनानामामन्ना पात्रं जनयन्त देवाः स्वाहा इस मन्त्रसे फल-पुष्प तथा वृतसे परिपूर्ण स्नुवेको उठाय उसमें बालकका हाथ लगवाय आचार्य पूर्णाहुति करे । फिर आमन पर बैठकर में भस्म ग्रहणपूर्वक दाहिने हाथकी अनामिका अंगुली द्वारा उस येसे भस्म लेकर व्यायुप करे । 'ॐ व्यायुषं जमदग्नेः ऐसा उच्चारण करके माथेमें 'ॐ कश्यपस्य'व्यायुपं ऐसा उच्चारण करके गलेमें 'ॐ यद्देवेषु व्यायुषम् ' ऐसा उच्चारण करके दक्षिणबाहुमूलमें और 'ॐ तन्नो अस्तु व्यायपम् 'ऐसा उच्चारण करके उस जमको हृदयमें लगाना चाहिये । इसी प्रकार यह जस्म कुमारके भी ललाटादि स्थानोंमें लगाने । किन्तु जब कुमारके लगावे तो 'तन्नो अस्तु' के स्थानमें “नत्ते अस्तु ' एसा उच्चारण करना चाहिये। फिर कुमारक मार्थमें तिलक अक्षत लगाकर अभिषकादि करे। इति श्रीमहामत्तकमहासामन्ताधिपतिश्रीरामदत्तविरचिता वाजसनेयिनामुपन- यनर्मपद्धतिर्मुगदापादनिवासि-कात्यायनगोत्रोत्पन्नपण्डित कन्हैया लालमिश्रकृतभाषाटीकामहिता ममाता।

- दशकर्मपद्धतिः। शुचिः शुक्लांबरधरः कृतनित्यक्रियो मातृपूजाभ्युदयिक कृत्या लायां मंडपे प्रत्यङ्मुखः प्राङ्मुखं वरमूर्ध्वजार्नु तिष्ठत स्वस्तिवाचनं कलशगणेशादीनां पूजनं च कृत्वा . प्रजापतिपिह्मा देवता यजुर्वरार्चनेविनियोगः ॐ साधु र्चयिप्यामो भवंतमिाते ब्रूयात् ॐ अर्चयेति वरेणोते . शुद्धमासनं दत्त्वा विष्टरमादाय ॐ विष्टरो विष्टरो विष्टर इत्यनेनीके अविष्टरः प्रतिगृह्यतामिति दाता वदेत् ॐ विष्टरं प्रतिगृह्णाम इत्पमित घाय वरो विष्टरं गृहीत्वा ॐ बमोऽस्मीत्याथर्वणकपिविष्टरो देवताऽ- नुष्टुप्छंदः उपवेशने विनियोगः । अवमोऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूर्यः । इदं तमभितिष्ठामि यो मा कचाभिदासति । इत्यनेनासने धारण किये मातृपूजा और नान्दीमुख श्राद्ध करके, वरके पूजनका समय आनेपर मण्डपमें पश्चिमाभिमुखसे बैठे हुए तथा पूर्वानिमुख और ऊर्ध्वजानु स्थित वरको सम्बोधन करके स्वस्तिवाचन, कलशस्थापन तथा गणेशादिकोंका पूजन करके हाथमें जल ले आगे लिखे हुए 'ॐ साधु भवानास्तामिति प्रजापति पिहादेवता यजुर्वरार्चने विनियोगः' इस वाक्यसे विनियोग छोडे । पिर 'ॐ साधु नानास्तामर्चयिष्यामो भवन्तमिति' इस प्रकार कन्याका पिता कहे । पश्चात् 'ॐ अर्चय ऐसा बरके कहने पर बरके बैठनेको शुद्ध आरन देकर कुराके बनाये विष्टरको हाथमें ले। ॐ विष्टरो विष्टरो विष्टरः' ऐसा' किसी पाधाके कहनेपर 'ॐ विष्टरः प्रतिगृह्यताम् ' इस प्रकार दाता ( कन्याका पिता) कहे फिर 'ॐ विष्टर प्रतिगृह्णामि.' ऐसा कहकर वर विष्टरको ले हाथमें जल ग्रहणपूर्वक आगे लिखे हुएं 'ॐ वोऽस्मात्याथर्वणकपिविष्टरो देवता - नुष्टुप् छन्दः उपवेशने विनियोगः । इस पास्यको उच्चारण करके विनियोग छोडे फिर आगे लिखे हुए 'ॐ वरिस्मि समानानामुद्यतामिव सूर्यः। इर्म तमभितिष्ठामि यो मा कथाभिदासति ' इस मन्त्रको उच्चारणपूर्वक वर माने + 4 आपाटीकासहिता ।। उत्तराप्रविष्टरोपार वर उपविशति । तत्र उपविश्य यजमानः पाद्यमंजलि- नादाय ॐ पाद्य पाद्यं पाद्यमित्यन्येनोक्तेॐ पाद्यं प्रतिगृह्यतामिति दाता वदेत् ॐ पाद्यं प्रतिगृहामि इत्यभिधाय यजमानांजलितोंऽजलिनापा- द्यमादाय वरः विराजो दोहोसीति प्रजापतिऋपिरापो देवता यजुःपादन क्षालने जलग्रहणे विनियोगः ॐ विराजो दोहोसि विराजो दोहमशीय मयि पद्याये विराजो दोहः । इति दक्षिणपादं प्रक्षालयति अनेनैव क्रम- णानेनैव मंत्रेण प्रक्षालनम् । ततः पूर्ववद्विष्टरांतरं गृहीत्वा चरणयोर- धस्तात् उत्तरायं वरः कुर्यात् । ततोदूर्वाक्षतफलपुष्पचंदनयुतापात्रं गृहीत्वा यजमानः ॐ अर्कोऽर्थोऽर्षः इत्यनेनोक्ते ॐ अर्घः प्रतिगृह्यता- मिति दाना वदेत् ॐ अर्घ प्रतिगृह्णामीत्यभिधाय यजमानहस्ताद आसनमें विष्टरका उत्तरकी ओर अमनाग करके उसके ऊपर बैठ जावे । फिर कन्याका पिता आसनमें बैठकर एक पात्रमें जल भर उसको हाथमें लेवे" और 'ॐ पाय पादा पाय ऐसा किसी अन्य पाधाके कहनेपर 'ॐ पायं प्रतिगृह्यताम् ' ऐसा कन्याका पिता कहे। फिर 'ॐ पाद्यं प्रतिगृह्णाणि ' ऐसा कहकर वर यजमानके हाथ से उस जलपानको लेकर आगे लिखे हुए 'ॐ वि- राजो दोहोसाति प्रजापतिक्रपिरापो देवता यजुःपादपक्षाने जलयहणे विनियोगः' इस वाक्यसे विनियोग छोडे । पश्चात् आगे लिखे हुए "ॐ विराजो दोहोति विराजो दोहनशीय गाय पद्यायै विराजो दोहः” इस मंत्रसे दाहिने चरणको घोरे. फिर इसी मंन और इसी रीतिसे बाये चरणको धोवे।अनंतर कन्याकापिता दूसरा विष्टर लेकर वरको देवे और वर उसे उत्तरको अयत्ताग करके अपने आसनके नीचे रख लेवे । फिर दुब अक्षत फल पुष्प चन्दन युक्त अर्यपात्रको कन्याका पिता हाथमे लें' अर्थो अर्को अर्घः ऐसा किसी दूसरे पापाके कहने पर ॐ अर्षः प्रतिगृह्यताम् ' ऐसा कन्याका पिता कहे। 'ॐ अर्घ प्रतिगृह्णामि । वर ऐसा उच्चारण पूर्वक यजमानके हाथ से उस अर्घपात्रको लेकर ईशानकोनमें १ विनियोगके निमित्त और जल लेना चाहिये।

* + भापाटीकासहिता। उत्तराप्रविष्टरोपार वर उपविशति । तत्र उपविश्य यजमानः पाद्यमंजलि- नादाय ॐ पाद्य पाद्यं पाद्यामित्यन्येनोक्ते पाद्य प्रतिगृह्यतामिति दाता व पायं प्रतिगृह्णामि इत्यभिधाय यजमानांजलितोंजलिनापा- द्यमादाय वरः विराजो दोहोसीति प्रजापतिपिरापो देवता यजुःपादन- क्षालने जलग्रहणे विनियोगः 'ॐ विराजो दोहोसि विराजो दोहमशीय माय पद्याये विराजो दोहः । इति दक्षिणपादं प्रक्षालयति अनेनैव क्रम- णानेनेव मंत्रण प्रक्षालनम् । ततः पूर्ववदिष्टरांतरं गृहीत्वा चरणयोरे- धस्तात् उत्तरायं वरः कुर्यात् । ततोदूर्वाक्षतफलपुष्पचंदनयुतापानं गृहीत्वा यजमानः ॐ अपापोऽर्घः इत्यनेनोक्ते अघः प्रतिगृह्यता- मिति दाता वदेत् ॐ अर्थ प्रतिगृहामीत्यभिधाय यजमानदस्ताद आसनमें विष्टरका उत्तरकी ओर अपनाग करके उसके ऊपर बैठ जाये। फिर कन्याका पिता आसनमें बैठकर एक पात्रमें जल जर उसको हाथमें लेवे" और 'ॐ पाय पाद्यं पायं ऐसा किसी अन्य पाधाके कहनेपर 'ॐ पावं प्रतिगृह्यताम् ' ऐसा कन्याका पिता कहे। फिर 'ॐ पाद्यं प्रतिगृहाणि ' ऐसा कहकर बर यजमानके हाथसे उस जलपानको लेकर आगे लिखे हुए 'ॐ वि- राजो दोहोसीति प्रजापतिर्कपिरापो देवता यजुःपादप्रक्षाने जलयहणे विनियोगः' इस वाक्यसे विनियोग छोडे । पश्चात् आगे लिखे हुए "ॐ विराजो दोहोसि विगजो दोहमशीय माय पद्यायै विराजो दोहः" इस मंनसे दाहिने चरणको धोये फिर इसी मंत्र और इसीरीतिसे बाये चरणको धोये। अनंतर कन्याकापिता दूसरा विष्टर लेकर वरको देवे और वर उसे उतरको अमभाग करके अपने आसनके नीचे रख लेवे । फिर दूब अक्षत फल पुप्प वन्दन युक्त अर्यपात्रको कन्याका पिता हाथमें ले 'ॐ अर्को अर्को अर्थः ऐसा किसी दूसरे पाधाके कहनेपर 'ॐ अर्षः प्रतिगृह्यताम् ' ऐसा कन्याका पिता कहे। 'ॐ अब प्रतिगृह्णामि ' वर ऐसा उच्चारण पूर्वक यजमानके हायसे उस अपात्रको लेकर ईशानकोनमें १ विनियोग के निमित्त और जल लेना चाहिये । ' दशक्रमपद्धतिः गृहीत्वा * आप स्थ युष्माभिः सर्वान्कामानवामवानतिशिलब दिकं किंचिद्दला समुद्रं वः प्रहिणोमिस्वां योनिमभिगच्छत टास्माकं वीरा मापरा सेचिमत्पयः इत्यर्षपात्रस्थं जलमैशान्यां दिशि त्यजन् पठति । तत आचमनीयमादाय ॐ आचमनीयमाचमनीयमार मनीयमित्यनेनोक्ते ततो वरः ॐ आचमनीयं प्रतिगृह्णामीत्यभिधान यजमानहस्तादाचमनीयमादाय ॐ आमागन्यझसा सरसृज वर्चसा त. मा कुरु प्रिय प्रजानामधिपतिं पशूनामरिराष्ट्र' तनूनां इत्यनेन सदा- चामेत् इति 'द्विस्तूष्णीं ततो यजमान कांस्यपात्रस्थदधिमधुघृतानि कांस्यपात्रपिहितान्यादाय ॐ मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः इत्यनेनोक्ते ॐ मधुपर्क प्रतिगृह्यतामिति दाता वदेत् ॐ मधुपर्क प्रतिगृह्णामि इति उसके जलको छोडता हुआ आगे. लिखे 'ॐ आपः स्थ, युष्माभिः सर्वान कामानामबानीति शिरस्य क्षतादिक किंचिदत्वा ॐ समुद्र वः पहिणोमि स्वा योनिमभिगच्छत । अरिष्टास्माकं वीरा मापरा सेचिमत्त्यः इस मंत्रका पाठ करे । अर्थात् 'ॐ आपः स्थ उष्मानिः सर्वान्कामानवानवानि ' यह उच्चारण करके मस्तक्मे अक्षत लगावे। फिर आचमनके लिये एक पात्रमें जल भरकर कन्याका पिता हाथमें लेवे और फिर 'ॐ आचमनीयमाचम- नीयमाचमनीयम् ' ऐसा कन्याके पितको कहनेपर वर ॐ आचमनीयम् प्रतिगृह्णामि ' ऐसा कहकर यजमानके हाथसे उस आंचमनीय जलपात्रको लेकर आगे लिखे हुए 'ॐ आमागन्यशसा समज चर्चसा तंमा कुरु प्रिय प्रजानामधिपतिं पशूनामरिष्टिं तंनूनां' इस मन्त्रसे एक बार आचमन करे। फिर दो बार चुपचाप आचमन करे। तदनन्तर कन्याका पिता कासीके पात्र में दही शहत वृत इन तीन वस्तुओंको मिलाकर दूसरे कांसीके पानद्वारा उस पात्रको ढककर हाथमें ले ॐ मधुपर्को मधुपको मधुपर्क ऐसा पाषाके कहनेपर ॐ मधुपर्क प्रतिगृह्यताम् ' ऐसा दाता (यजमान ) कहे । फिर 'ॐ मधुपर्क प्रतिगृहाणि ' इस प्रकार वर कहे । तत्पवाद 'ॐ मित्रस्त .

, पाटीकासहिता। वरो वदेत् ॐ मित्रस्य त्वा चक्षुपा प्रतीक्षे इति यजमानकरस्थमेव निरीक्ष्य ॐ देवस्य त्या सवितुः प्रसवेऽश्विनो_हुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रतिगृहामीत्यनेन मधुपर्क गृहीत्वा वामहस्ते कृत्वानमः झ्यावा- स्थायात्रशने यत्त आविद्धं तत्ते निष्कृतामीत्यनामिकांगुष्ठेन च निः' प्रदक्षिणमालोड्य अनामिकांगुष्ठाभ्यां भूमौ किंचिन्निक्षिपेत् पुनस्तथैव दिः प्रत्येकं क्षिपेत् ततोवरः अयन्मधुन इति कुत्स ऋपिर्मधुपर्को देवता जगती छंदो मधुपर्कपाशने विनियोगः। यन्मधुनो मधव्यं परमर रूपमन्नायं तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण रूपेणान्नाद्येन परमो मध- व्योत्रादोऽसानि इत्यनेनं वारत्रयं मधुपर्कप्राशनम् । प्रतिप्राशने चैत- मंत्रपाठः । ततो मधुपर्कशेपमसंचरदेशे धारयेत् । ततो द्विराचम्य खा चक्षुपा प्रतीक्षे' ऐसा कहकर यजमानके हस्तस्थित मधुपर्कको देख आगे लिखे हुए 'ॐ देवस्य त्या सवितुः प्रसवेऽश्विनो हुत्यां पूष्णो हस्ताभ्यां पति- गृह्णामि ' इस मन्त्रद्वारा कन्याके पिताके हाथसे मधुपर्कको लेकर बायें हाथमें रक्खे । फिर दाहिने हाथकी अनामिका और अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंस आगे लिखे 'ॐ नमः श्यावास्यायानशने यत्त आविद्धं तत्ते निष्कन्तामि । इस मन्त्र द्वारा उन पात्रस्य बत, मधु, दघि इनको तीन बार मिलायें और फिर उसमेंसे यत्किंचित् पृथ्वीमें गिरा देवे । फिर दो बार थोडा थोडा पृथ्वीपर गिरारे अनन्तर हाथमें जल लेकर आगे लिखे 'ॐ यन्मधुन इति कुत्समापि- मधुपर्को देवता जगती छन्दो मधुपर्कप्राशने विनियोगः' इस वाक्यसे विनियोग छोडे । इसके पश्चात आर्गे लिखे हुए 'ॐ यन्मधुनो मधन्यं परम रूपमन्नार्थ तेनाह मधुनो मधव्येन परमेण रूपेणानाव्येन परमो मन्योन्नादोऽमानि ' इस मन्त्रसे तीन बार उस मधुपर्कका प्राशन करे, किन्तु मन्त्रको प्रत्येक प्राशनके समय उच्चारण करना चाहिये। फिर शेष रहे मधुपर्कको किसी एकान्त स्थानमें रख देवे । पश्चाद दो बार आचमन करे । तदनन्तर 'ॐ वाई म आस्येऽस्तु ।

4 दशकमपद्धतिः। ॐ वाङ् म आस्येऽस्तु ॐ नसोम प्राणोस्तु.ॐ अक्ष्यो, चक्षुरस्तु ॐ कर्णयोमें श्रोत्रमस्तु ॐ बाह्रॉमें बलमस्तु ॐ ऊोंमें ओजोस्तु * अरिष्टानि मेंऽगानि तनूस्तन्वा मे सहसतु इत्यास्यादिप्रत्येकं सर्वगा- वाणि स्पृष्ट्वा ॐ गोर्गोगौरित्यनेनाभिहिते यजमानेनं प्रत्युक्ते ततो बरः ॐ माता रुद्राणां दुहिता वसूनार स्वसादित्यानाममृतस्य नाभिः। : अनुवोचं, चिकितुपे जनाय मागामनागामादतिं वधिष्ट मम चामुष्य पाप्मा हतः * उत्सृजत तृणान्यन्विति तृणं छिंद्यात्ततो वेदिकायां तुष- केशशर्करादिरहितायां हस्तमात्रपरिमितायांचतुरस्राभूमि कुशः परिस- मुह्य तान् कुशानेशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य स्पयन वेणं वा प्रागयप्रादेशमात्रमुत्तरोत्तरक्रमेण निरुल्लिख्य उल्लेखनक्रमेणाना यह मन्त्र उच्चारण करके दाहिने हायसे मुखका स्पर्श करे. 'ॐ नसोम प्राणोऽस्तु ' यह मन्त्र उच्चारण करके नासिकाके दोनों छिद्रोंको स्पर्श करें । 'ॐ अक्षणोंमें चक्षुरस्तु यह मन्त्र उच्चारण करके दोनों आसोको स्पर्श करें। 'ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु यह मन्त्र उच्चारण करके दोनों कानोंको सर्श करे। 'ॐ बाह्रोम बलमस्तु । यह मन्त्र उच्चारण करके हाथोंका सर्श करे। ॐ ऊवाम ओजोऽस्तु ' यह मन्त्र उच्चारण करके अँधाओंका स्पर्श करे । अरिष्टानि मेऽझानि तनस्तन्या मे सहसन्तु ' यह मन्त्र उच्चारण पूवक सुखसे आरंग करके समस्त शरीरका स्पश करे। फिर 'ॐ गागा!ः । यजमानके ऐसा कहने पर वर आगे लिखे 'ॐ माता रुद्राणां दुहिताचसुना स्वसादित्याना- ममृतस्य नाधिः । प्रतुवाचं चिकितुषे जनाय, मागामनागामदिति बधिष्ट मम चामुप्प पाप्मा हतः ॐ उत्सृजन ' इसमन्त्रको उच्चारण करके तिनके- को तोडकर डाल देवे। फिर भुस्सी, केश, धरि, कंकडा इत्यादि रहित एक हाथको बराबर बनाई हुई चौकोन वेदीको तीन कुशाओंसे शोधन करे । और फिर उन कुशाओंको ईशानकोनमें डाल देवे । तदनन्नर, गोबरसे वेदीको लीपकर य नामक यज्ञपात्र अथवा सुवेसे पूर्वको अग्र भाग- - नापाटीकासहिता! मिकांगुष्ठाभ्यामुपांशु उद्धृत्य जलेनाभ्युक्ष्य तत्र तूष्णीं कांस्यपात्रस्थं पहिमग्निकोणादानीय प्रत्याइमुखमुपसमाधाय तद्रशाथै किंचिनियुज्य कोतुकागारादरः कन्यामानीय मंडपे उपविश्य ॐ जरां गच्छ परिधत्स्व वासो भवाकृष्टीनामभिशस्तिपा वा शतं जीवाम शरदः सुवर्चा रयि च पुत्राननुसंव्ययस्वायुष्मतीदं परिधस्व वासः इति पठित्वा परिधानवस्त्रं तस्ये ददाति वरः ततः ॐ या अकृतन वयं या अतन्वता याश्च देवी- स्तंतूनभितो ततंथ तास्त्वा देवीर्जरसे संव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः इति पठित्वोत्तरीयं ददाति ततो वरः ॐ परिधास्ये यशोधास्ये दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि शतं च जीवामि शरदः पुरुची रायस्पोप- . वाली दक्षिणसे उत्तर उत्तरकी तरफको, तीन रेखा संचे रेखा सेंचनेके क्रमानुसार दाहिने हाथकी अनामिका तथा अगुष्ठ इन दो अंगुलियों द्वारा (उन रेखाओंसे ) मिट्टी उठाकर ईशानकोनमें फक देवे । फिर जल लेकर रेखाओंपर छिडकना चाहिये । पछि चुपचाप कांसीके पात्रमें अग्नि लेकर अमिकोनके मार्गसे बेदीके समीप आकर अमिको पश्चिमाभिमुख वेदीमें स्थापन करे । फिर उस अग्निकी रक्षाके लिये किसीको नियुक्त कर कौतुकागारसे पर उस कन्याको लाकर मण्डपमें बैठे। अनन्तर आगे लिख हुए ॐ जरां गच्छ परिधत्स्व वासो भवारुटीनामभिशस्तिपा वा शतं जीवाम शरदः सुपर्चा रयिं च पुत्राननुसंव्यस्वायुप्मतीदं परिधत्स्व वासः' इस मन्त्रको उच्चारण करके उस कन्याको पहरनेके वस्त्र प्रदान कर । तत्पश्चात् आगे लिखे 'ॐ या अमतन्न वयं या अतन्वंता याश्च देवीस्तन्तुननितो तथ तास्त्या देवीजरसे संव्ययस्वायुप्मतीद परिधत्स्व यातः' इस मन्त्रका उच्चारण करके, कन्याको उत्तरीय वस्त्र प्रदान करना चाहिये। फिर वर आगे लिखे ॐ परिधास्य दीर्घायुत्वाय जरबटिरश्मिशतश्च जीवामि शरदः पुरुची रायस्तो. पुममिसंन्यपिप्ये इम मन्त्रको उच्चारण करके अपने आपभी अधोवस्त्र .

९२ दशकर्मपद्धतिः। मभिसंव्ययिष्ये इति पठित्वा अधोवस्त्रं वरः द्यावापृथिवी यशसेंद्राबृहस्पती यशो भगश्चमावियोमा इति पठित्वोत्तरीयं परिदधाति वरः ततो वरस्य कन्यायाश्च ततः कन्याप्रदेन परस्परं समंजेथां इति प्रेषणं कन्यावरयोः परस्परममि मुखीकरणं समंजंतु विश्वेदेवाः समापो हृदयानि नो समातरिश्वा सं- धांता समुदेष्ट्री दधातु नौ इति वरः पठति ततः कन्याप्रदकर्टकं ग्रंथिबंध- नम् | बंधन कन्यावरयो। अथ हस्तलेपन शाखोच्चारणम् अथ कन्या दानम् । दाता शंखस्थदूर्वाक्षतंफलपुष्पचंदनजलान्यादायजामातृदक्षिण- करोपरि कन्यादक्षिणकरं निघाय * दाताहं वरुणो राजा द्रव्यमादित्य देवतं वरोसौ विष्णुरूपेण प्रतिगृहात्वयं विधिः इति पठित्वा गोत्रोच्चारणं कुर्यात् । ॐ अद्यामुकमासीयामुकपक्षीयामुकतिथौ अमुकवासरे अमुक- (धोती इत्यादि) धारण करे । तत्पश्चाद आगे लिखे 'ॐ यशसा मा द्यावा- पृथिवी यशसेन्द्राबृहस्पती यशो अगश्च माविदद्यशो मा प्रतिपद्यताम् ' इस मन्त्रको बोलकर वर उत्तरीयवस्त्र धारण करे। फिर वर और कन्या दो दो आचमन करें फिर कन्याका पिता वर और कन्याको परस्पर सन्मुख (आमने सामने ) बैठाकर उन दोनोंको परस्पर एक दूसरेके देखनेकी आज्ञा देवे । उस काल पर आगे लिखे 'ॐ समंजन्तु विश्वेदेवाः समापो हृदयानि नौ संमातरिश्वा संधाता समुद्री दधातु नौ ' इस मन्त्रको पाठ करे। फिर कोई कन्यापक्षीय पाधा अथवा पुरोहित कन्या और वरका प्रन्थिबन्धन (गठजोडा) करे। अनन्तर कन्या और वरके हाथों में हलदी लेपन पूर्वक दोनों पक्षके पुरोहित या पाधा शाखोचार करें । फिर यजमान कन्या दान करे। कन्याका पिता शंखमें दुर्वाक्षत फल पुष्प चंदन तथा जल रखकर जामाताके दाहिने हाथ पर कन्याका दाहिना हाथ रख ॐ दाताहं वरुणो राजा द्रव्यमादित्यदेवनं वरोड- सौ विष्णुरूपेण प्रतिगृह्णात्वयं विधिः यह मन्त्र पाठ पूर्वक गोत्रोच्चारण करे। कन्यादानका संकल्प। यथा अद्यामुमासीयामुकपक्षीयामुकातिथौ अमुक- .

भाषाटीकासहिता । मुकप्रवरस्यामुकंशर्मणः प्रपौवाय अमुकगोत्रस्यामुकप्रवरस्या- शर्मणः पोत्राय अमुकगोत्रस्यामुकप्रवरस्यामुकशर्मणः पुत्राय असु- फगात्रस्यामुकप्रवरस्यामुकशर्मणः प्रपौत्रीम् । अमुकगोत्रस्यामुफपव- रस्यामुकर्मणः पोत्रीम् । अमुकगोत्रस्यामुकप्रवरस्यामुकशर्मणः पुत्रीम् इत्यनेन क्रमेण त्रिरावर्त्य पठनीयम् । अमुकगोत्राय अमुकप्रव- राय अमुकशर्मणे वराय अमुकगोत्रां असुकप्रवरां अमुकनानी इमां कन्यां सालंकारां प्रजापतिदेवत्यां स्वर्गकामः पत्नीत्येन तुभ्यमहं संप्र- ददे ॐ स्वस्तीति प्रतिवचनम् । ॐ योस्त्वा ददातु पृथिवी वा प्रति- गृह्णातु इति वरः पठेत् ततः कन्याप्रदः ॐ अद्य कृतेतत्कन्यादानप्रति- साथै इदं सुवर्णमग्निदेवतं अमुकगोवाय अमुकप्रवराय अमुकशर्मणे वासरे अमुकगोवान्यामुकप्रवरस्यामुकरामणः प्रपौत्राय अमुकौत्रस्यामुकाव- ररस्यामुकशर्मणः पोचाय ।अमुकगोत्रस्यामुकप्रवरयामुकशर्मणः पूार्य अमुक- गोत्रस्यामुकपवरस्यामुकशर्मणः प्रपात्रीम् । अमुकगोत्रस्यामुकप्रपरस्पामुकश- मणः पोचमि । अमुकगोत्रस्यामुपवरस्यामुकशर्मणः-पुत्रीम् । इत्यनेन क्रमेण विरावयं पठनीयम् अमुकगोत्राय अमुकपवराय अमुकशर्मणे वराय अमुक- गोनां अमुकप्रवरां अमुकनाम्नमिमां कन्यों मालंकारां प्रजापतिदेवत्या स्वर्गकामः पत्नीत्वेन तुभ्यमहं सम्प्रददे तब पर 'ॐ स्वस्ति कहकर उस कन्यादानको मण करे। फिर वर आगेलिसे 'ॐ द्यौस्त्वा ददातु पृथिवा त्या भातगृहातु' इस मन्त्रको उच्चारण करे। तत्पश्चात कन्याका पिता आगे लिखा 'ॐ अध तत्कन्यादानप्रतिष्ठार्थमिदं सुर्वणममिदैवतं अमुकगोत्राय अमुम्नवराय १ इम स्थानमें प्रत्येक श्लोकके अन्तमें 'पुत्राय' तक तीनों पीढीके नामोंके अमुक पदकी जगह गोत्र पार वेद शाखा सूनोंके नामांस उधारण करना चाहिये। गोत्रशाखोचारण यहां 'विरावयं पठनी' पदका तात्पर्य यह है कि 'अमुक- गोत्रस्या' से लेकर 'अमुक शमणः पुषीम् ' यहाँवकरा पाठ तीन बार पढकर फिर आगे गाल्पका चारण करना चाहिये। .

दशकर्मपद्धतिः। वराय दक्षिणांतुभ्यमहं संप्रददे इति दक्षिणां दद्यात् । ॐ स्वस्तीप्रतिवच- नम् । गोमिथुनं वा दद्यात् कोदात्कस्मा अदात्कामोदात्कामायादातु। कामो दाता कामः प्रतिगृहीता कामेतत्ते इति वरः पठेत् ततस्ता पाणी गृहीत्वा ॐ यदेपि मनसा दूरं दिशोनुपवमानो वा हिरण्यपर्णों वैकर्णः स त्वा मन्मनसां करोतु । श्रीअमुकदेवी इति पठनिष्कामति । ततो चेदिदक्षिणस्यां दिशि वारिपूर्णदृढकलशं उ तिष्ठतो मोनिनः पुरुषस्य स्कंधे अभिपेकपर्यंतं धारयेत् । ततः परस्परं समीक्षेथां इति कन्या दप्रैपानंतरं अघोरचक्षुरपतिध्येधि शिवा पशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः वीरसूर्देवकामा स्योना शं नो भवद्विपदे शं चतुष्पदे । सोमः प्रथमो अमुकशर्मणे वराय दक्षिणां तुज्यमहं सम्प्रददे यह संकल्प उच्चारण करके सुवर्ण या गौमिथुन (एक गाय एक बैल) यरको दक्षिणास्वरूप देवे। तप उसको भी वर 'ॐ स्वस्ति । ऐसा कहकर ले लेवे। जिसके अन्तर्गत है. ऐसे संकल्पके पीछे वर 'ॐ स्वस्ति ' उच्चारण करके 'ॐ दोस्त्वा' मन्त्रका पाठ करे। फिर कन्यादान करनेवाला पिता संकल्पपूर्वक अपने सामर्थ्यके अनु- सार सुवर्ण अथवा एक गो और एक बैल वरके निमित्त कन्यादानकी दक्षिणा- में प्रदान करे और वर 'ॐ कोदात्' इत्यादि मन्त्रउच्चारण करके उसको ग्रहण कर लेवे। और आगे लिखे ॐ कोऽदात्मा अदात कामोऽदात् कामायादाद कामो दाता कामो प्रतिग्रहीता कामै तने ' इस मन्त्रको पढे। ओर फिर कन्याके हाथको पकडकर आगे लिखे 'यदेषि मनसा दूरं दिशोनुपवमानो वा हिरण्य- पर्णो वैकर्णः स त्वा मन्महसां करोतु श्रीअमुक देवी' इस मन्त्रको उच्चारण करता करता फिर वेदोके समीप आवे । फिर वेदीको दक्षिण दिशामें जलस गरा हुआ दृहकलश कन्धेपर रखकर चुपचाप एक मनुष्य अभिषेकपर्यन्त खड़ा रहे । पीछे कन्याका पिता तथा वरको आपसमें एक दूसरेके देखनेकी आज्ञा देवे । तब वर आगे लिखे.'ॐ अधोरचक्षुरपतियोधि शिका पशुश्यः सुमनाः सुवर्चा वीसर्देवकामा स्योना शन्नो नव द्विपदे शं चतुष्पदे सामः प्रथमो .

भाषाटीकासहिता। विविदे गंधर्वो विविद उत्तरः। तृतीयोऽग्निटे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः। सोमोददद्वधर्वाय गंधर्वोदददग्नये । रायं च पुत्रांश्चादादग्निर्मामथो इमाम् । सा नः पूपा शिवतमा मे रयसा न उरू उशती विहर । यस्या- मुशंतः प्रहराम शेपं यस्यामुकामा वहयो निविष्टये । इति वरपठितमं- बांते परस्परं निरीक्षणं ततोऽग्निं प्रदक्षिणीकृत्य पश्चादग्नेरहतवस्त्रवेष्टि- ततृणपुलकेकटे वा तदुपरि दक्षिणं चरणं दत्त्वा वधूं दक्षिणतः कृत्वा तामुपवेश्य स्वयमुपविश्य वरः पुप्पचन्दनतांबूलवस्त्राण्यादाय ॐ अद्य कर्तव्यविवाहहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रम- मुकशर्माण ब्राह्मणमेभिः पुप्पचन्दनतांम्बूलवासोभिब्रह्मत्वेन होतृत्वेन विविदे गन्धर्या विविद उत्तरः। तृतीयोमिष्टे पतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजाः सोमोददद् गन्धर्वाय गन्धर्वादददनये रयिं च पुत्रांश्चादादमिर्मह्ममयो इमाम् । सानः पूपा शिव- तमा मे रयसा न ऊरू उशती विहर यस्यामुशंतः प्रहरीम शेपं यस्यामु कामा बहवो निविष्टय इस मन्त्रको उच्चारण करे और तय दोनों जने परस्पर एक दूसरेको देखें। फिर वधू वर अग्रिकी प्रदक्षिणा करे अनिके पश्चिमकी ओर नवीन वस्त्रसे लपेटे हुए चासके पूले या चदाईके ऊपर दाहिने चरणको रख और वधूको वर अपने दाहिनी ओर बैठाकर आपजी बैठे फिर पुप्प, चन्दन, ताम्बूल, वन इन वस्तुओंको हाथमें लेकर : अद्य कर्तव्यविधाहहोमकर्मणि कृतारतारेक्षणस ब्रह्मकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेनिः पुप्पचन्दन- ताम्बूलवासाशिवनत्वेन होतृत्वेन लामहं वृणे ' ऐसा कहकर ब्राह्मणका वरण करे। तब 'ॐ वृतोऽस्मि ' ऐसा ब्राह्मण कहे । फिर 'यथाविहितं कर्म कुरु' ऐसा वरके कहनेपर ॐ करवाणि' ऐसा ब्राह्मण कहे तत्पश्चात् अमिके दक्षिणकी ओर शुद्ध आसन बिछाकर उसपर पूर्वको अवजागयाले कुशा विछाय ब्रह्माको अमिकी प्रदक्षिणाके क्रमानुसार ममीप वुलाय ' त्वं मे ब्रह्मा जव' ऐसा कह उसको उस आसनपर बैठाल देवे फिर 'ॐ अद्य कर्तव्य- विवाहकमणि कताकतावेक्षणरूपाचार्यकर्म कर्तुमगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमेभिः ५ - -- + दशकर्मपद्धतिः। च त्वामहं वृणे इति ब्राह्मणं वृणुयात् । ॐ वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् यथाविहितं कर्म कुरु इति वरेणोक्ते ॐ करवाणीति ब्राह्मणो वदेत् ।। ततोऽग्नेर्दक्षिणतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागंणान् कुझानास्तीर्य ब्रह्माणमनि प्रदक्षिणक्रमेणानीयात्र त्वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय कल्पिता सने उपवेशयेत् । ॐ अद्यं कर्तव्यविवाहकमणि कृताकृतावेक्षणा पाचार्यकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणमभि पुष्पचन्दनताम्बू, लवासोभि आचार्यत्वेन त्वामहं वृणे ॐ वृतोऽस्मीति प्रतिवचनम् ततः प्रणीतापाचं पुरत कृत्वा वारिणापूर्य कुशेराच्छाद्य ब्रह्मणो मुख- मवलोक्य अनरुत्तरत कुशोपरि निध्यात् । ततः पारेस्तरणं बाई पश्चतुर्थभागमादाय आमेयादीशानांतं ब्रह्मणोऽग्निपर्यतं नैर्ऋत्यादाय- व्यांत अग्नितः प्रणीतापर्यंते ततोऽनिरुत्तरत पश्चिमदिशि पवित्रच्छेद दुनाथ कुशय पवित्रकरणार्थ सायमनंतर्गर्भकुशनद्वयं प्रोक्षणीपात्रं आज्यस्थाली संम्माननार्थ कुशवयं उपयमनार्थ वेशीरूपकुशत्रयं समि- पुप्पचंदनताम्बूलनासोनिः आचार्यत्वेन त्वामह वृणे ' इस प्रकार कहकर आचार्यका वरण करे, तब आचार्य ॐ वृतोऽमि ऐसा कहे । फिर प्रणीतापात्रको आमे रखकर जलसे जर देवे और उसको कुशाओंसे टककर ब्रह्माके मुखको देख अभिके उत्तरकी ओर कुशाओपर धर देवे । फिर परि- स्तरण करे अर्थात् मुट्ठीभर वा सो कुश टेकर हाथमे लेकर उमक चार भाग को उनमें पहला भाग अमिकोनसे ईशानकोननक, दूसरा भाग ब्रह्माके आमनसे अप्रितिक, तीसरा भाग नेईनकीनसे वायुकोनतक और चोथा नाग अंनिसे प्रतापर्यन्त बिछा देना चाहिये। अनन्तर अभिसे उत्तरकी तरफ पत्रिमदि- शामें परिन छेदनक लिये तीन कुशानियले आर पवित्र बनाने के लिये अग्रभाग साहित और बीच पनेसे गहित आर्भात जिसके जीतर अन्य कुशपत्र न हों दो कुरापत्र ग्रन्दे । पिर माभासा आज्य भ्याली मंमानन कुंशाओंके लिये तीन कुशा उपयमन लिये तीन कुशा वेणीप ग्रे रक्खे । तीन १ प्रचलित पाच कुशा'२ क्लास ल्पेट चटीकी समान मापार नाकर रवखे। ~ ...

भाषाटीकासहिता। घस्तितः पुष आज्यं षट्पंचाशदुत्तरमुष्टिशतदयावच्छिन्नतंडुलपूर्ण- पावं पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशि क्रमेणासादनीयम् । अथ तस्या- मेव दिशि असाधारणवस्तून्युपकल्पनीयानि । तत्र शमीपालाशमिश्रा लाजाः दृषदुपलं कुमारीत्राता सूर्यः दृढ़पुरुषः अन्यदपि तदुपयुक्त- मालेपनादिद्रव्यम् । ततः पवित्रच्छेदनकुशैः पवित्र छित्त्वा ततः सप- वित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणीपावे निघाय अनामिकांगुष्ठाभ्यां उत्तराये पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुत्पवनं ततः प्रोक्षणीपात्रस्य सव्यहस्ते. करंण अनामिकांगुप्ताभ्यां पवित्र गृहीत्वा विरुदिंगनं प्रणीतोदकेन प्रोक्ष- पीजलेन यथासादितवस्तुसेचनं ततोऽग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपांत्र- निधानम् । आज्यस्थाल्यामाज्यनिर्वापः ततोऽषिश्रयणं ततो ज्वलन- समिधा बुवा आज्य और दो सौ छप्पन मुट्ठी चावलोंसे भरा हुआ पुर्ण पान इन सब वस्तुओंको पवित्रछेदनकी कुश्शाओंसे आगे 'पूर्वपूर्वकी तरफको क्रमसे रसता जाय। इसके उपरान्त उसी दिशामें इन असाधारण वस्तुओंको भी इकही करे वे यह है शमी ( जंडवृक्ष) की लकडियोंसे 'युक्त खीले पत्थर, लडकीका भाई सूप ( छोज ) कोई एक वृद्ध पुरुष तथा औरजी उस विवाहकायके योग्य आलेपनादि द्रव्य रक्खे । फिर-पवित्र हेदनकी कुशा- ओंसें पवित्रको छेदन कर पवित्रसहित प्रणीताके जलको हाथमें देकर तीन बार प्रोक्षणीपात्रमें डाले। फिर दाहिने हायकी अनामिका ओर ,अंगुष्ठ • इन दो. अंगुलियोंसे पवित्रोंके अग्रभागको आगे करके ग्रहण करें। पाद प्रोक्षणी- पात्रका जल तीन वार ऊपरको उछाले और प्रोक्षणीपात्रको बाँये हाथमें रस कर दाहिने हाथकी अनामिका और अंग्रष्ट इन दो अंगुलियोंसे परित्रको ग्रहण कर तीन बार जलको ऊपर (आकाशकी ओर ) सेचन करे। प्रणीता आर प्रोक्षणांके जलसे पूर्वरथापित सब वस्तुओंको सेचन करे तत्पश्चात उस भोक्षणीपात्रको अमि और प्रणीताके बीचमें रख देना चाहिये। फिर आज्य- स्थालीमें घृत डालकर अग्निपर चढा देवे और पीछे एक कुश वालकर प्रदक्षिण- ७ दशकर्मपद्धतिः। गादिना हविर्वेष्टयित्वा प्रदक्षिणक्रमेण वह्नो तत्प्रक्षेपः पर्षमिकरणं तत सुवप्रतपनं कृत्वा सम्मार्जनकुशानामरंतरतो मूलैबर्बाह्यतः एवं संमृज्य प्रणीतोदकेन अभ्युक्ष्य पुनः प्रतप्य युवं दक्षिणतो निदध्यात् । तत आज्यस्यामेरखतारणं तत आज्ये प्रोक्षणीवदुत्पवनं अवेक्ष्य सत्यपदव्ये तन्निरसनं पुनःप्रोक्षायुत्पवनंततः उपयमनकुशानादाय उत्तिष्ठन्प्रजापति मनसाध्वात्वा तूप्णीमग्री घृताक्तास्तिस्रः समिधः क्षिपेत् ततउपविश्य स- प्रवित्रप्रोक्षण्युदकेन प्रदक्षिणक्रमेणामिपर्युक्षणं कृत्वा प्रणीतापात्रे पवित्रे निधाय पातितदक्षिणजानुः कुशेन ब्रह्मणान्वारब्धः समिद्धतमे यो मुवे- जान्याहुतीर्जुहोति । तत्राधारादारभ्य द्वादशाहुतिषु तत्तदाहुत्यनंतरं, सुवावस्थितहुतशेषतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः। प्रजापतये स्वाहा क्रमसे घृतके चारों ओर उसको घुमाता हुआ अभिमें डालदेवे । इसके पीछे पर्यग्निकरण करे अर्थात् सुवेको अमिमें तपाकर संमार्जन कुशाओंके अपनागसे सुवेके भीतर और मूलबागसे बाहर जुवेको शुद्ध कर प्रणीताके जलसे सेजन- पूर्वक फिर दूसरी बार तपावे और तब उसको अनिके दक्षिणकी ओर रख देवे । फिर उस घृतको अग्निसे उतार लेवे तत्पश्चात् आज्यको प्रोक्षणीपात्रकी नाई पवित्रोंसे उछाले और देखे यदि उसमें कोई मक्खी इत्यादि अपवित्र वस्तु पडी हो तो उसको निकालकर फेक देना चाहिये। फिर प्रोक्षणीपात्रके "जलको पवित्रोंसे उछाले तदनन्तर उपयमन,कुशाओंको बाँये हाथमें लेकर खडा हो जाय और पूर्व स्थापित तीन समिधाओंको घृतमें जिज स्वाहा शब्दके साथ मनमें प्रजापतिका ध्यान करके चुपचाप अनिमें डाल देवे। फिर आसनपर बैठकर पवित्रासहित प्राक्षणपित्रिका जल हाथमे लेकर आपके चारों तरफ सेचन करे और फिर पवित्राको प्रणीतापात्र में रख देवे । अनन्तर दाहिनी जानुको नवायकर कुशके द्वारा ब्रह्मासे मिलित हो जलती हुई आनिमें सुनेकी द्वारा घृतकी आहुति देवे । इन आहुतियोंमें आधारआहुतियोंसे लेकर बारह आहुतियों तक युवेमें रहे हुए क्षेत्र घृतको क्षणीपात्रमें डालता जार 2 . भाषाटीकासहिता। इदं प्रजापतये ॥ इति मनसा । ॐ इंद्राय स्वाहा इदर्मिद्रायः । इत्या-' पारो । ॐ अग्नये स्वाहा इदमग्येॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय । इत्याज्यभागों। ॐ भूः स्वाहा इदमग्नये । ॐ भुवः स्वाहा इदं वाय- वे० । ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय० । एतामहाव्याहृतयः । त्वनो अग्ने इति वामदेव ऋपिरनीवरुणो देवतेत्रिष्टुप्छंदो होमे विनियोगः।ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो अब यासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषासि प्रमुमुग्भ्यस्मत्स्वाहा इदमनीवरुणाभ्यां । ॐस वनो अग्नेऽवमो भवोती नेदिष्टो अस्या उपसो व्युष्टो। अब यव नो वरुण रराणो वीहि मृडीकर सुहवो न एधि स्वाहा इदम- ग्रीवरुणाभ्यां अमाश्चाग्ने इति वामदेवऋपिरनिदेवता त्रिष्टुप् छंदः सर्वप्रायश्चित्तहोमे विनियोगः । ॐ अयाश्चानेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्व- मित्वमया अप्ति । अयानो यज्ञं वहास्ययानो धेहि भेपज स्वाहा इद- मनये..। ॐ येते शतं वरुण ये सहस्र यज्ञियाः पाशा वितता महांतः। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । ॐ इन्द्राय स्वाहा इद- मिन्द्राय० । इत्याघारौ। ॐ अग्नये स्वाहा इदमनये । ॐ सोमाय स्वाहा द्दं सोमाय । इत्याज्यभागी। ॐ भूः स्वाहा इदमनये. 1ॐ अवःस्वाहा इदं वायवे. 101 ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय । एता महान्याहृतयः। यत्रो अग्रे इति वामदेवकापिरमीवरुणो देवते विटुप् छन्दों होमे विनियोगः । ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो अब यासिसीष्टाः । यजियो वहितमः शोशुचाने विश्वा देषा-सि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इंदननीयरुणान्याम् । ॐ स त्वन्न अनेऽवमो अवोती नेदिष्ठो अस्या उपसो व्युष्टौ । अब यक्ष्व नो वरुण रराणो वाहि मृढीकर महतो न एधि स्वाहा इदमनीवरुणायाम् • 1 अयाश्वारे इति वामदेव ऋषिरनिर्देवता त्रिष्टुप् छन्दः सर्वप्रायश्चित्तहोमे विनियोगः ॐ अयाश्चास्यननिशस्तिपाच सत्वमित्वमया असि ।अयानो यज्ञं वहास्ययान दशकमपइतिः। 'तेभिनों अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वः स्वाहा इदं वरू- णाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुड्या स्वभ्यश्च । उखु- त्तमं वरुण पाशमस्मवाधम बिमध्यम प्रथाय । अथा व्वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय । एताप्राधि- त्तसंज्ञकाः । ततोऽन्वारब्धं विना प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये। ॐ अपये स्विष्टकृते स्वाहा इदमग्नये स्विष्टकृते. 1ॐ उदकोपरम- र्शनम् । अथ राष्ट्रभृत्यः। ॐऋताषाहतधामामिगंधर्वःसन इदं ब्रह्मा पातु तस्मै स्वाहा वाद इदमृतासाहे ऋतधानेऽनये गंधर्वाय। * ऋतापाहतधामानिर्गधर्वस्तस्योषधयोऽप्सरसो मुदो नाम ताभ्यः स्वाहा इदमोषधीभ्योऽप्सरोभ्यो मुद्भयो० २। सरहितो विश्वसामा धेहि भेषजः स्वाहा इदमनये । * ये ते शतं वरुण ये सहलं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः । तेभिः अद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंचतु मरुतः स्वः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विश्वेन्यो देवेन्यो मरुद्यः स्वयश्च० । ॐ उदुचमं वरुण पाशमस्मदवाधम विमध्यम श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरुणाय० । एता प्रायश्चिचसंज्ञकाः। ततोऽन्वारन्ध विना ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । ॐ अमये स्विष्टकते स्वाहा इद मनये स्विष्टकने । उदकोपस्पर्शनम् । अथ राष्ट्रभृतः । ॐ तापादृतधामा- मिगन्धर्वः स न इदं ब्रह्मक्षत्र पातु तस्मे स्वाहा वाट् इदमृतासाहे धानेऽप्रये गन्धर्वाय० १ । नापाडतधामानिर्गन्धर्षस्तस्योषधयोऽप्सरसो मुदो नाम तात्यः स्वाहा इदमोषधीयोऽप्सरोज्यो. मुद्यो० २। ॐ सरहितो विश्वसामा सूर्यो १ समस्त जातियोंके अन्तमें त्याग वाक्य स्वयं वरकोही उच्चारण करना चाहिये । कारण कि इस होममें यजमान बरही है । इन चोदद्द आहुनियों के पीछे ब्रह्माके अन्वारब्ध किये बिनाही आहुतियें प्रदान करनी रचित है। यहा जिस- जिस- स्थानमें उदवोपस्पर्शन लिखा है वहा वहा दाहिने हाथसे प्रणीताके जलका स्पर्श करना चाहिये। ३ १ भाषाटीकासहिता। १०१ मुय्यों गंधर्वःसन इदं ब्रह्मक्षवं पातु तस्मै स्वाहा वाद इदं सहिताय. विश्वसाने सूर्याय गंधर्वाय०३ ॐ सहितो विश्वसामा सूर्यों गंधर्व- स्तस्य मरीचयोऽप्सरस आयुवो नाम ताभ्यः स्वाहा इदं मरीचिभ्योऽ- 'सरोभ्य आयुभ्यो० ४। ॐ सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चंद्रमा गंधर्वः स न इदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाद इदं सुषुम्णाय सूर्यरश्मये चंद्रमसे गंध- बाय ०५ । ॐ सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चंद्रमा गंधर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसो भेकुरयो नाम ताभ्यः स्वाहा इदं नक्षत्रेभ्योऽप्सरोभ्योभेकुरिभ्यो०६। ॐ इपिरो विश्वव्यचा वातो गंधर्वः सन इदं ब्रह्मक्षनं पातु तस्मै स्वाहा वाट् इदमिपिराय विश्वव्यचसे वाताय गंधर्वाय० ७॥ॐ इपिरो विश्वव्यचा वातो गंधर्वस्तस्यापोऽप्सरस ऊों नाम ताभ्यः स्वाहा इद- मद्भ्योऽप्सरोभ्य उग्भ्य,०८। ॐ भुज्युः सुपणों यज्ञो गंधर्वः स न इदं ब्रह्मक्षवं पातु तस्मै स्वाहा वाट् इदं भुज्यने सुपर्णाय यज्ञाय गंध- वाय० ९ । ॐ भुज्युः सुपर्णो यज्ञो गंधर्वस्तस्य दक्षिणा अप्सरसस्तावा “गन्धर्वः स न इदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् इदं सहिताय विश्वसाम्ने सूर्याय गन्धर्षाय० ३। ॐ सहितो विश्वसामा सूर्यो गन्धर्वस्तस्य मरीचयोऽ- प्सरस आयुयो नाम तायः स्वाहा इदं मरीचिन्योऽप्सरोय आयुग्यो०४। ॐ सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गधः स न इदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् इदं सुपुम्णाय मूरश्मये चन्द्रमसे गन्धर्वाय ० ५॥ ॐ सुपुग्णः सूर्यर- 'रिमञ्चन्द्रमा गन्धर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसो कुरयों नाम तायः स्वाहा इदं -नक्षत्रेभ्योऽप्सरोक्यो भेकरिभ्यो०६। ॐ इपिरो विश्वव्यचा वातो गन्धर्वः स न इदं बलक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाद इदमिषिराय विश्वव्यचसे वाताय गंधर्वाय. ७१ॐ इपिरो विश्वव्यचा वातो गन्र्धवस्तस्यापोऽप्सरस ऊों नाम तात्यः स्वाहा इदमन्योऽप्सरोग्य ऊगर्यो० ८॥ॐ भुज्युः सुपर्णो यज्ञो गन्धर्वः सन इदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् इदं भुज्यवे सुपर्णाय यज्ञायगन्धर्वाय०९। * ज्युः सुपर्णो यज्ञो गन्धर्वस्तस्य दक्षिणा अप्सरसस्तावा नाम तायः स्वाहा + 1 दशकर्मपदतिः। नाम ताभ्यः स्वाहा इदं दक्षिणाभ्योऽप्सरोभ्यः स्तावाम्यो १० ॐ प्रजापतिविश्वकर्मा मनो गंधर्वः स न इदं ब्रह्मक्षवं पातु तस्मै स्वाह वाट् इदं प्रजापतये विश्वकर्मणे मनसे गंधर्वाय १३ । ॐ प्रजापतिर्वि श्वकर्मा मनो गंधर्वस्तस्य ऋक्सामान्यप्सरस एष्टयो नाम ताभ्यःस्वाड़ा इदमुक्सामभ्योऽप्सराभ्य एष्टिभ्यो० १२ । इति राष्ट्रभृतः। अथ जया- होम । ॐ चित्तं च स्वाहा इदं चित्ताय । अचित्तिश्च स्वाहा इद चित्त्ये० । ॐ आकूतं च स्वाहा इदमाकूताय० । ॐ आकूतिश्व स्वाहा इदमाकू] । अविज्ञातं च स्वाहा इदं विज्ञातायॐ विज्ञातिः स्वाहा इदं विज्ञात्यः । ॐ मनश्च स्वाहा इदं मनसे । ॐ शकरीब स्वाहा इदं शकराभ्यो । ॐ दर्शश्व स्वाहा इदं दर्शाय० । ॐ पोर्ण- मासं च स्वाहा इदं पोर्णमासाय ॐ बृहच स्वाहा इदं बृहते। ॐ रथंतरं च स्वाहा इदं रथंतराय । ॐ प्रजापति यानिद्राय वृष्णे इदं दक्षिणायोऽप्मरोन्यः स्तावात्यो०३०1 ॐ प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनो गन्धर्वः स न इदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् इदं प्रजापतये विश्वकर्मणे मनस गन्धर्वाय० ११। ॐ प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनो गर्वस्तस्य ऋक्मामान्यऽप्सरस एष्टयो नाम तात्यः स्वाहा इदमृत्सामन्योऽप्सरोज्य एष्टिायो० १२॥ इति राष्ट्रकृतः । अथ जयाहोमः । ॐ चित्तं च स्वाहा इदं चित्ताय । ॐ चितिथ स्वाहा इदं चित्त्यैः । ॐ आकूत च स्वाहा इदमाकूताय ॐ आकूतिश्च स्वाहा इदमाकूत्यैः । ॐ विज्ञातं च स्वाहा इदं विज्ञातायः । ॐ विज्ञातिध स्वाहा इद विज्ञायैः । ॐ मनश्च स्वाहा इदं मनसे ० । ॐ शक्करभि स्वाहा इदै शक्करीयो०। ॐ दर्शश्व स्वाहा इद दर्शाय० । ॐ पौर्णमासं च स्वाहा इदं पौण- मासाय। ॐ बृहद स्वाहा इदं बृहते. । ॐ रथन्तरञ्च स्वाहा इद रथ- १ राष्ट्रभृत नामक होमकी बारह आहुति, जया होमकी तेरह, अभ्यातान होमको अठारह, पाच और यह सब मिलाकर बासठ आहुतिया विवाह संबंधी होम कहलाता है।

भाषाटीकासहिता। १०३ प्रापच्छदुयः पृतनाज्येषु तस्मै विशः समनमंतु सर्वाः स उमः स इहन्यो बभूव स्वाहा इदं प्रजापतये जयानिंद्रायः । इति जयाहोमः । उदको- पस्पर्शनम् । अथाभ्यातानहोमः । ॐ अग्निभूतानामधिपतिः स माव- त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्म- ण्यस्यां देवहूत्यार स्वाहा इदममयेभूतानामाधिपतः । ॐ इंद्रो ज्येष्ठा- नामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिक्षस्यामाशिष्यस्यां पुरोधाया- मस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहून्याय स्वाहा इदमिद्राय ज्येष्ठानामधिपतये । ॐ यमः पृथिव्या अधिपतिःस मावत्वास्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन क्षत्रेस्यामा- शिप्यस्यां पुरोधायामास्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं यमाय पृथिव्या अधिपतये । अत्र प्रणीतोदकस्पर्शः । ॐवायुरंतरिक्षस्याधि- पतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन क्षत्रेस्यामाशिप्यस्यां पुरोधायाम- स्मिन कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं वायवेंतरिक्षस्याधिपतये । ॐ सूर्यों दिवोधिपतिः स मावत्तस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रे स्यामाशि- तरायः । ॐ प्रजापति यानिन्दाय वृष्णो प्रायच्छदुयः पृतना जयेषु तस्मै विशः समनमंतु सर्वाः स उग्रः सह हन्बो बभूव स्वाहा । इदं प्रजापतये जयानिंद्रायः । इति जयाहोमः । उदकोपस्पर्शनम् । अथान्यातानहोमः । ॐ अनिर्भूतानामधि- पतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षनेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्म- ण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदमनये भूतानामधिपतये । ॐ इन्द्रो ज्येष्ठानाम- धिपतिः स मावत्यस्मिन ब्रह्मण्यस्मिन्क्षनेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कम- ण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदमिन्द्राय ज्येष्ठानामधिपतये । ॐ यमः पृथिव्या अधिपतिः स मावत्तस्मिन ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिप्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्म- ण्यस्यां देवहूत्या५स्वाहा इदं यमाय पृथिव्याअधिपतये । अत्र प्रणीतोदकस्पर्शः। ॐ वायुरन्तरिक्षस्याधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षवेत्यामाशिष्यस्यां पुरोधापामस्मिन कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं वायऽतरिक्षस्याधिपतये । ॐ सूर्यो दिवोधिपतिः स मावत्वास्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षवस्थामाशिप्यस्यां पुरोधा- १०४ दशकर्मपदतिम प्यस्या पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्या देवहूत्यार स्वाहा इदं सूर्याय धिपतये।ॐ चंद्रमा नक्षत्राणामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्राण्य- स्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोषायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहत्या- स्वाहा इदं चंद्रमसे नक्षत्राणामधिपतये । ॐ बृहस्पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहुत्या. स्वाहा इदं बृहस्पतये ब्रह्मणोऽधिपतये। ॐ मित्रः सत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामा शिप्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्नाण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं मि- त्राय सत्यानामधिपतये।ॐ वरुणोऽपामधिपतिः स मावत्वस्मिन . ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिप्यस्याम्पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं वरुणायापामधिपतये । ॐ समुद्रः स्रोत्यानाम- धिपतिःस मावत्वस्मिन ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधाया मस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यार स्वाहा इदं समुद्राय स्रोत्यानामधि- यामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं सूर्याय दिवोधिपतये । ॐ चनमा नक्षत्राणामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्पामाशिष्यस्यां पुरो- धायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यार स्वाहा इदं चत्रमसे नक्षत्रा- णामधिपतये । ॐ बृहस्पतिर्ब्रह्मणोधिपतिः स भावत्वस्मिन् ब्रह्मण्य- स्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यों । पुरोधायामास्मन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यार स्वाहा इदं बृहस्पतये ब्रह्मणोऽधिपतये० । ॐ मित्रः सत्यानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्पस्या देवहूत्या स्वाहा इदं मित्राय सत्यानामधिपतये । ॐ वरुणोऽपामधिपतिः मावत्वस्मिन् अह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्या देवहूत्याः स्वाहा इदं वरुणायापामधिपतये । ॐ समुदा सोत्यानामधिपतिः स मावत्यस्मिन् अझण्पास्मन् क्षत्रेस्पामाशिष्पस्यां पुरोषायामस्मिन्कर्मण्पस्पां भापाटीकासहिता। २०५ तपये अन्न साम्राज्यानामधिपतिःसमावत्तस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्थामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदमनाय साम्राज्यानामधिपतये।ॐ सोम ओषधीनामधिपतिःस मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्यारस्वाहा इदं सोमायोषधीनामधिपतये । ॐ सविता प्रसवानामधिपतिःस मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशि ध्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याय स्वाहाइदं सवित्रे प्रस- वानामधिपतये । ॐ रुद्रः पशूनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्य- स्मिन् क्षवेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवदूत्यार स्वाहा इदं रुद्राय पशूनामधिपतये । अत्र प्रणीतोदकस्पर्शः । ॐ वटा रूपाणामधिपतिः स मावत्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरो- घायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या" स्वाहा इदं त्वष्ट्र रूपाणामधिप- तये । ॐ विष्णुः पर्वतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन देवहूत्या स्वाहा इदं समुद्राय स्रोत्यानामधिपतये । ॐ अन्न साम्राज्याना- मधिपतिः स भावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मि- कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदमनाय साम्राज्यानामधिपतये । ॐ सोम ओषधीनामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधा- यामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं सोमायौपीनामधिपतये । ॐ सविता प्रसवानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिप्पत्यां पुरोधायामस्मिन्कमण्यस्यां देवहूत्याः स्वाहा इदं सवित्रे प्रसवानामधिपतये । ॐ रुद्रः पशूनामधिपतिः स मावत्वास्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं रुद्राय पशूनामधिपतये. अत्र प्रणीतोदकस्पर्शः। अथ त्वष्टा रूपाणामधिपतिः समावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मि- क्षस्यामाशिष्यस्यां पुराधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं त्वष्ट्रे रूपाणामधिपतये 1ॐ विष्णुः पर्वतानामधिपतिः स मावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्ष- दशकर्मपतिः। क्षवेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहत्या स्वाहा इदं विष्णवे पर्वतानामधिपतये । ॐ मरुतो गणानामधिपत- यस्ते मावन त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोषाया- मस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं मरुद्भयो गणानामधिप तिभ्यो० । ॐ पितरः पितामहाः परे परे ततास्ततामहा इहमावन स्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्म- ण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं पितृभ्यः पितामहेभ्यः परेभ्यो वरेभ्य: स्ततेभ्यस्ततामहेभ्यो । अत्र प्रणीतोदकोपस्पर्शनम् । इत्यभ्यातान- नामकम् । ॐ अग्निरैतु प्रथमो देवताना सोऽस्यै प्रजा मुंचतु मृत्यु- पाशात् । तदय राजा वरुणोऽनुमन्यतां यथेयर स्त्री पोत्रमपनरोदा- स्वाहा इदमग्नये । ॐ इमामग्नित्रायतां गार्हपत्यः प्रजामस्य नयतु दीर्घमायुः । अशुन्योपस्था जीवसामस्तु माता पत्रमानंदमभिविबुध्य- तामित- स्वाहा इदमग्नये।ॐ स्वस्ति नो अमे दिवा पृथिव्या विश्वा निधेह्ययथा यजत्र । यदस्यां महि दिवि जातं प्रशस्तं तदस्मासु द्रविणं स्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्यार म्वाहा इदं विष्णवे पर्वतानामधिपतये । ॐ मरुतो गणानामधिपतयस्ते मावन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मि- न्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा इदं मरुद्भयो गणानामधिपतियो । ॐ पितरः पितामहाः परे वरे ततास्ततामहा इद मावन्त्व- स्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रेस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्यार स्वाहा इदं पितृयः पितामहेन्यः परेश्यों वरेत्यस्ततत्यस्ततामहेन्यो । अत्र प्रणीतोदकोपस्पर्शनम् । उत्यायाताननामकम् । ॐ अमिरेतु प्रथमो देवताना सोस्य प्रजा मुँचतु मृत्युपाशाद। तदय राँगा वरुणोनुमन्यतां यथेषत्री पौत्रमपन्न' रोदा स्वाहा इदममये । ॐ इमामभिन्नायतां गार्हपत्य श्रनामस्यै नयतु दीर्घमायुः। अन्योपस्था जीवतामस्तु माता पौत्रमानंदमभिविबुध्यतामियर स्वाहा इद माग ॐ स्वस्ति नो अग्रेदिवा पृथिव्या विश्वानि धेायथा यजत्रायदस्यां माह भाषाटीकासहिता। धेहि चित्र स्वाहा इदममये । ॐ सुगंनुपथा प्रविशन्न एहि ज्योति- मद्धेहाजरत्र आयुः । अपेतु मृत्युरमृतं म आगाइवस्वत्तो नो अभयं कृणोतु स्वाहा इदं वैवस्वताय । अनप्रणीतोदकस्पर्शनम् । तत अंतः- पटं ॐ पर मृत्यो अनुपरेहि पंथाःयस्ते अन्य इतरो देवयानात् । चक्षु- मते शृण्वते ते ब्रवीमि मानः प्रजापशरिपो मोतवीरान स्याहा इदै मृत्यवे अत्र प्रणीतोदकोपरपर्शनम् । ततो वधूमग्रतः कृत्या बरोवधूश्च दावपि प्राङ्मुखो स्थिती भवतः ततो वरांजलिपुटोपरि संलगवध्वंजलि- स्थघृताभिधारितवधूभातृदत्तशमीपालशमिश्रेला धूकर्तृको मंत्रपाठ- पूर्वको होमः। तत्र मंत्राः अर्यमणमित्याथर्वण ऋपिरामिदॆवतानुष्टुपछंदो लाजाहोमे विनियोगः । डॉ अर्यमणं देवं कन्या अग्नियमक्षत । तनो अर्यमादेवःप्रेतो मुंतु मापते स्वाहा इदमर्यम्णे देवाय । इदं नायु- दिवि जातं प्रशस्तं तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्र स्वाहा इदममये० सुगंनुपंथां प्रविशन्न एहि ज्योतिष्मद्धे हजरन्न आयुः । अपैतु मृत्युरमृतं म आगावैवस्वतो नो अअपं कणोतु स्वाहा इदं वैवस्वताय । अत्र प्रणीतोदकस्पर्शनम् । अब यहां पधृको परदेगे करके आगे लिखे ॐ परं मृत्योअनुपरेहि पंथां यस्ते अन्य इतरो देवयानात् । चक्षुष्मतेशृण्वते ते ब्रवीमि मानः प्रजार रीरिषो मोतन्वारान्स्वाहा इदं मृत्यवे न मम । इस मन्त्रसे आहुति देवे। फिर प्रणीतापात्रके जलको छु लेवे । अनन्तर वधूको आगे करके वर वधू दोनों जने पूर्वाभिमुस खडे हो जाय। फिर वरकी अंजलीके ऊपर संलम वधको अंजली घासे अभिधारित शमीके पत्तोंसे मिश्रित लाजा ( खोलें) वधूका भाई (छाजके कोनों द्वारा) भरे, तव वधू आगे लिखे 'अर्यमणमित्यथर्वण ऋपिरनिर्देवतानुष्टुप् छन्दो लाजाहोमे विनियोगः' इस वाक्यको बोलकर विनियोग छोडे और फिर वधू अपने हाथमें पहले रक्सी हुई वृतसेचनपूर्वक शमी पलाशमिश्रित खीलोंकी आहुति आगे लिखे 'ॐ अर्यमणं देवं कन्या आनिमयक्षत स नो अर्यमा देवः प्रेतो मुंचतु मापते स्वाहा इदमर्यम्णे देवाय न मम । ॐ इदं नार्युपते लानानावप.

. दशकर्मपदतिः। पबूते लाजानावपतिका आयुष्मानस्तु मे पतिरेधता ज्ञातयो मम स्वाहा इदमनये । ॐ इमां सालाजानावपाम्यग्नो समृद्धिकरणं तव मम तुभ्यं च संवननं तदग्निरनुमन्यतामियर स्वाहा इदमाये । ततो वो कद- क्षिणहस्तं सांगुष्ठं गृह्णाति । ॐ गृभ्णामिते सोभगत्वाय दस्तं मयाफ्त्या जरदष्टियथासाभगोअर्यमा सवितापुरधिमहां त्वादुगाईपत्याय देवास अमोहमस्मि सा त्वर सा त्वमस्य मोअहं सामाहमस्मि ऋक्वंद्यौरईपृ. थिवीवंतावेहि विवहावहै सहरतोदधावहै प्रजांप्रजनयावहे पश्येम पुवार, विद्यावहै बहूंस्ते संतु जरदृष्टयः संप्रियो रोचिष्णू सुमनस्यमानौ पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत- शृणुयाम शरदः शतमिति मंत्रेण । अय वधूमनेरुत्तरतःप्राङ्मुखः पूर्वोपकल्पितं दृपदुपलं दक्षिणपादेनारयति वरः । ॐ आरोहेममश्मानमइमेव त्वर स्थिरा भव। अभितिष्ट पृतन्य- न्तिका आयुष्मानस्तु मे पतिरेधता ज्ञातयो मम स्वाहा । इदमप्रये न मम ॐ इमां लाजानावपाम्यगौ समृद्धिकरणं तव मम तुभ्यं च संवननं तदपिरनु- मन्यतामियर स्वाहा इदममये न ममा इन तीनों मन्त्रोंसे देवे प्रत्येक मन्त्रके अन्तमें खडी हुई वधूके हाथ से तृतीयांश सीलोंकी आहुति खडा हुआ वर डाले, त्याग वास्यभी स्वयं वधूकोही बोलना चाहिये । तत्पश्चात् अंगुष्ठसहित वधू के दाहिने हाथको पकडकर वर आगे लिखे 'ॐ गुणामि ते सौजगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदर्यिथा सः। भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मा त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः। अमो- हमस्मि सा व सा त्वमस्यमो अहं सामाहमस्मि भक्त दोरहं पृथिवी त्वं ताहि विवहावहै सह रेतो दधावहै प्रज प्रजनयावहै पुत्रान्विन्द्यावहे बहंस्ते संतु जरदथ्यः सपियौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौ पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतः शृणुयाम शरदः शतम् । इन चार मन्त्रोंको पाठ करे । तदनन्तर अपिसे उत्तरमें पूर्वाभिमुख खड़ा हुआ वर पहलेसे रक्सी हुई पत्थरकी शिला- पर अपने गाये हाथसे वधूका दाहिना पैर रखवाता हुआ 'ॐ आरोहेममरलाल- ममेव वर स्थिरा भब आमितिष्ठ पतन्यतोववावस्व पृतनापतः । यह भाषाटीकासहिता। विवाघस्त पृतनायतः। इति मंत्रेण आरूढायामेव तस्यां वरो गाथा गायति ॐ सरस्वती प्रेदमव सुभगे वाजिनीवती यां त्वाविश्वस्य भूतस्य प्रजायामस्याग्रतः । यस्या भूतश्समभवद्यस्यां विश्वमिदं जगत् तामद्य गाथांगास्यामियास्त्रीणामुत्तमं यशः। ततोऽग्रेवधूः पश्चाद्वरःप्रणीताब्रह्म- साहितमनिप्रदक्षिणं कुरुतः तत्र वरपठनीयो मंत्रः। ॐ तुभ्यमग्रे पर्य- हवन सूर्या वहतुना सह । पुनः पतिभ्यो जायांदा अग्नेप्रजया सह ततः पश्चादनेः स्थित्वा लाजाहोमसांगुष्ठहस्तग्रहणाइमारोहणगाथागानानि- प्रदक्षिणाः पुनरपि तथैव एतेनेव लाजाहुतयः सांगुष्ठहस्तग्रहणवयम् । गाथागानत्रयं प्रदक्षिणत्रयं संपद्यते । ततोवशिष्टलाजेः कन्याभ्रातृदत्तरं- जलिस्थशूर्पकोणेन वधूर्जुहोति ॐ भगाय स्वाहा इदं भगाय० । मन्त्र पढे फिर वधके सिला पर पैर रक्खे रहतेही वर आगे लिखो 'ॐ सर- स्वती प्रेदमय सुभगे वाजिनीवती । यां त्वा विश्वस्य भृतस्य प्रजायामस्यायत यास्यां भृत समावद्यस्यां विश्वमिदं जगत् । तामद्य गाथा गास्यामि या स्त्रीणा. मुत्तमं यशः' इस गाथाको गावे । गाथा गानके पश्चात् वधू आगे और वार पीछे चलते हुए प्रणीतापात्र तथा ब्रह्माके सहित अमिकी प्रदक्षिणा करे चलता हुआ वर आगे लिखे 'ॐ तुज्यमने पर्यवहन सूर्या बहतुना सह । पुनः पतिभ्यो जायांदा अमे प्रजया सह ' इस मन्त्रको पदता जावे । तिसके पीछे अनिके पश्चिमकी ओर खडे होकर लाजाहोम, अंगुष्ठसहित हस्तग्रहण शिलापर आरोहण, गाथागान और अमिकी प्रदक्षिणा इन सब कामोंको उन उन उक्त मन्त्रोंसे तीसरी चौथी बार भी वैसा वैसाही करे । ऐसा करनेपर लाजाको नौ आहुति हो जाती हैं तथा सांगुष्ठ हस्तग्रहण, गाथागान और प्रद- क्षिणा तीन तीन हो जाती हैं। फिर तीसरी परिक्रमाके अनन्तर कन्याका भाई छागके कोनेसे शेष रहे सब खीलोंको बहनकी अंजलीमें डाल देवे और वधू 'ॐ भगाय स्वाहा इदं भगाय. ' मन्त्र पढकर एकही वारमें आहुति प्रदानपू- दशकर्मपचतिः। चतुर्थ भ्रमणं तूष्णी अग्रे वरः पश्चात् वधूः ततस्तूष्णी परिक्रमणम् । ततो वरः उपविश्य ब्रह्मणान्वारब्धः आज्येन प्राजापत्यं जुयात् । * प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इतिमनसा । अत्र प्रोक्षणीपाने हुतशेषाज्यप्रक्षेपः । तत आलेपनेनोत्तरोत्तरकृतसप्तमंडलेषु सप्तपदाका मणं वरः कारयन् वक्ष्यमाणमंत्रैः । तत्र प्रथमे एकमिषे विष्णुस्त्वां नयतु । द्वितीये दे ऊर्जे विष्णुस्त्वां नयतु। तृतीये त्रीणि रायस्पोषाव विष्णुस्त्वां नयतु । चतुर्थे चत्वारिमायो भवाय विष्णुस्त्वां नयतु । पंचमे पंचपशुभ्यो विष्णुस्त्वां नयतु। पष्ठे पडतुभ्यो विष्णुस्त्वां नयतु । सप्तमे ससे सप्तपदा भव सा मामनुव्रता भव विष्णुस्त्वां नयतु ततोऽग्रे र्वक आगे वर पीछे वधू चलतेहुए विना मन्त्र पढे चुपचाप चौथी परिक्रमा करे । फिर वर बैठ जाय और ब्रह्मासे मिलकर आगे लिखे ॥ ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये न मम " इति मनसा। इस मन्त्रसे प्राजापत्य आहुति देवे । इस आहुतिके देनेपर सुवेमें शेष रहे हुए घृतको प्रोक्षणीपात्रमें डाल देवे। फिर वेदीके उत्तरकी ओर लीपकर उत्तर उत्तरको सात मण्डल बनाने और उन सातोंमें एक एक वार वर वधूका चरण स्पर्श कराता हुआ आगे लिखे हुए मन्त्रोंको उच्चारण करे (प्रथम मण्डलमें चरण स्पर्श करनेका मन्त्र ) एकमिपे विष्णुस्त्वां नयतु ' (दूसरे मंडलका ) ऊर्ने - विष्णुस्त्वां नयतु (तीसरे मण्डलका मन्त्र) त्रीणि रायस्पोषाय विष्णुस्त्वां नयतु ( चौथे मण्डलका मन्त्र )' चत्वारिमायो भवाय विष्णुस्त्वां नयतु' (पाँचवें मंण्ड- लका मन्त्र ) 'पञ्चपशुत्यो विष्णुस्त्वां नयतु (छठे मण्डलका मंत्र ) 'पट्ट- तुझ्यो विष्णुस्त्वां नयतु (सातवें मण्डलका मन्त्र) 'सखे सप्तपदा भव सा मामनुवता भव विष्णुस्त्वां नयतु ' फिर अनिके पश्चिमकी तरफ बैठकर पूर्व १ देशाचार तथा कुलाचारादिके अनुसार सात परिक्रमाभी वेदविरुद्ध नहीं हैं। क्योंकि वदोक्त चारकी बाधक सात नहीं कितु सातके अंतर्गत चारको समझना चाहिये। 1 - भापाटीकासहिता। पश्चादुपविश्य पुरुषस्य स्कंधे स्थितकुंभादाम्रपल्लवेन जलमानीय तेन च वरो वधूमेनां मूर्धन्यभिपिचति ॐ आपः शिवाः शिवतमाः शांताः शांततमास्तास्ते कृण्वंतु भेपजमिति पुनस्तथैवानीतजलेनात्मानम- भिषिंचति । आपो हि या मयोभुवस्ता न उर्ने दधातन । महे रणाय चक्षसे । यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उशतीरिव मातरः। तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्यथ। आपो जनयथा च नः। इति तिमृभिः । अथैनां सूर्यमुदीक्षस्वेति ॐ तच्चक्षुरित्यनेन मंत्रेण वधूः सूर्य पश्यति अस्तमिते सूर्य ध्रुवमुदीक्षवेति पतिप्रेपानंतरं ध्रुवं पश्यति तत्र पठनीयो मंत्रः ॐ ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवोध पो. प्यामपि मयि मा त्वादगृहस्पतिर्मया पत्या प्रजावती संजीव शरदः शतमिति पृष्टा सा यदि न पश्यति तथापि पश्यामीति यात् - स्थापित पुरुपके कंधेपर रखे हुए कलशमसे आमके पत्ते द्वारा जल लेकर वर वधूके शिरमें आगे लिसे' ॐ आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्तत- मास्तास्ते रुण्यंतु भेपनम् ' इस गन्नसे सेचन करे । तत्पश्चात् उसी प्रकार और उसी कलशसे आमके पत्ते द्वारा जल लेकर आगे लिखे 'आपो हि टा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे । यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उशतीरिव मातरः। तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वय । आपो जनयथा च'नः ' इस मन्त्रसे अपने मस्तकमें सेचन करे । तदनन्तर बरके 'सूर्यमुदीक्षस्व ' ऐसा कहनेपर 'ॐ तचक्षुर्द हितं पुरस्ताच्छुकमुच्चरन् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतः शृणुयाम शरदः शतं प्रत्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतम्भ्यश्च शरदः शताद ' इस मन्त्रको पढ़ती हुई वधू सूर्यनारायणका दर्शन करे । यदि रात्रिकालमें विवाह हो तो वरके 'ध्रुव- मुदीक्षस्व ' ऐसा कहनेपर'ॐ ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि धृवधिपोप्या मयि मान्त्वादादहस्पतिर्मया पत्या प्रजावती संजीव शरदः शतम् । इतना मन्त्र ११२ दशकम्पबतिः। ततो वरो वधूदक्षिणांसोपरि इस्तं नीत्वा तस्या स्वयमालभेद मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तं ते मरतु मा वाचमेकमनाजुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनकु मामिति मंत्रण नामभिमंत्रयति वरः। ॐ सुमङ्गलीरियं वधूरिमा समेत पश्यत । सोमा ग्यमस्य दत्त्वा याथास्तं विपरेतन इति मंत्रेण । अय वधूं बलवान कश्चिद्राह्मण उत्थाय प्रागुदरा बानुगुप्तागारे लोहितानडुहचर्माण प्रतिलो मास्तीर्णे उपवेशयेत् वरो वा * इह गावो निषीदंविहाचा इह पूरुषाः इहो सहस्रदक्षिणो यज्ञ इह पूषा निषीदत्विति मंत्रेण अथ स्विष्टकद्धोमः। : ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा इदमनये स्विष्टकृते । बुवावशिष्टाज्यस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः । अयं च होमो ब्रह्मणान्चारब्धकर्तृकः । तत आच पढती हुई वधू ध्रुवतारेका दर्शन करे यदि ध्रुव न दिखाई देवे तोभी परके पूछने पर · देखतीहूँ ' ऐसा ही वधू कहे । तदनन्तर वर वधूके दाहिने कांधे परसे हाथ लेजाकर आगे लिखे 'ॐ मम व्रते ते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचितं ते अस्तु मम वाचमेकमनाजुषस्व प्रजापतिष्ठा नियुनत्तु मह्यम् ' इस मन्त्रको पटकर वधूके हृदयको स्पर्श करे । फिर वधूकी ओर देखता हुआ वर ॐ सुमङ्गलीरियं वधुरिमा समेत पश्यत । सौभाग्यमस्ये दत्त्वा यथास्तं विपरेतन ' इस मन्त्रसे उसको अमिगन्त्रण करे। तत्पश्चात कोई एक बलवान् ब्राह्मण अथवा वर वधूको उठाकर पूर्व तथा उत्तरकी ओरसे आच्छादित गुप्त घरमें लाल रँगके बलका चर्म 'उल्टा बिछा- कर उस पर वधूके आगे लिखा 'ॐ इह गावो निषीदविहाचा इह पूरुषाः । इहीं सहस्रदक्षिणा यज्ञ इह पूषा निदितु यह मन्त्र पटकर बैठाल देवे । इसके उपरान्त स्विष्टम्त् होम कराना चाहिये। होम करनेका मन्त्र यथाः । ॐ अप्रये स्विष्टकृते स्वाहा इदनाय स्विष्टकते न मम । यहा घुमें बचेहुए वृतको प्रोक्षणीपात्रमें गिरारे । यह आहुतिभी १ लाल रंगके वृपभचर्मके स्थान प्राय लार टूल विछा दी जाती हैं। - .

भाषाटीकासंहिता । ११३ म्य संघवप्राशनम् । अथाचम्य ॐ अद्य कृतेतद्विवाहहोमकर्मप्रतिष्ठार्थ- मिदं पूर्णपात्र प्रजापतिदेवतममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिा तुभ्यमहं संप्रददे इति ब्रह्मणे दक्षिणां दद्यात् । स्वस्तीति प्रतिवचनम् ॐ अधकृतेतद्विवाहहोमकमणि आचार्यकर्मप्रतिष्टार्थ इदं हिरण्यमान- देवतद्रव्यम् यथानामगोत्रायाऽमुकशर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे ततो ब्रह्मग्रंथिविमोकः। ॐ सुमित्रिया न आप ओपध्यः संतु इति पवित्रं गृहीत्वा प्रणीताजलेन शिरः संमृज्य ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै संतु योऽस्मान द्वेष्टि यं च वयं द्विप्मः इत्यैशान्यां प्रणीतां न्युजीकु- योत् । तत आस्तरणकमेण वहिरुत्थाप्याज्येनाभिधार्य हस्तेनैव वाई- होमः । तत्र मंत्रः ॐ देवा गातुविदो गातुं वित्वा गातुमित मनसस्पत ब्रह्मासे मिलकरही दीजातीहै । फिर.आचमन करके संखवप्राशन अर्थात प्रोक्षणीपात्रके जलका प्राशन करना चाहिये । अनन्तर दूसरी बार फिर आर- मन करे और फिर आगे लिखे 'ॐ अघ कतैतविवाह होमकर्म प्रतिष्ठार्थ मिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतममुकगोवायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुज्यमहं संमददे ' इस संकल्पको उच्चारण पूर्वक पूर्णपात्रका दान करके ब्रह्माको दक्षिणा देवे तब ब्रह्मा 'ॐ स्वस्ति ' कहकर उसको ले लेवे । पश्चात आगे लिखे 'ॐ अद्यकतेतद्विवाहहोमकर्माणे आचार्यकर्मप्रतिष्ठार्थ इदं हिरण्यमान- दैवतं द्रव्यं यथानामगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणाय दक्षिणां तुभ्यमहं संप्रददे' इस संकल्पके द्वारा आचार्यको भी सुवर्णमयी दाक्षिणा देवे और फिर ब्रह्मगांठको खोल देना चाहिये । तदुपरान्त आगे लिखे 'ॐ सुमिनिया न आर ओपधयः सन्तु इस मन्त्र द्वारा पवित्रोंसे प्रणीतापात्रका जल लेकर अपने शिरमें मार्जन करे और फिर आगे लिखे 'ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योस्मान्देष्टि यञ्च वयं द्विष्मः' इस मंत्रसे प्रणीतापात्रको ईशानकोनमें उलट देवे । अनन्तर आस्तरणके क्रमा- नुसार अर्थात् जिस क्रमसे बिडायेथे, उसीकमसे कुशाओंको उठाकर और घीमें बोरकर आगे लिखे 'ॐ देवा गाविदो गातुं वित्या गातुमित मनसस्पत इम -- दशकपदतिः। इमं देव यज्ञ स्वाहा व्वाते घाः स्वाहा तत मत्थाय बक्षिणास्तेन सुवस्पृष्टघृतपुष्पफलैः पूर्णाहुतिः। तत्र मंत्रः ॐ मू ने दिवो परति पृथिव्या वैश्वानरमृत आजातममिम् । कविर सम्राजमतिथि जनानामा- सन्ना पात्रं जनयंत देवाः स्वाहा । ततःसुवेणभस्मानीय दक्षिणानामिका अगृहीतभस्मना ॐ त्र्यायुषंजमदरिति ललाटे ॐ कश्यपस्य व्यायुषं इति ग्रीवायां ॐ यद्देवेषु व्यायुषं इति दक्षिणांसे ॐ तनो अस्तु व्यायु- पमिति हृदि । एवं वध्वा अपि कुर्यात् तनो इत्यस्य स्थाने तत्ते इति विशेषः । तत आचारात् शणशंखशमीसुवर्णप्रेरितसिंदूरकरणं वरकर्ट- कम् । ततोऽन्यैरपि प्रतिष्ठितस्त्रीपुरुषैः सिंदूरकरणं ग्राम्यवचनं वरः कुर्यात् ग्राम्याः स्त्रियः । अथ वेदीतो मंडपमागत्य दूर्वाक्षतादिग्रहणं देव यज्ञः स्वाहा वाते धाः स्वाहा' इस मन्त्रसे अमिमें होम कर देवे। इसके पीछे वर उठे और वधूका दाहिना हाथ सुवेमें स्पर्श करावे और फिर सुवेको पुष्प फल घृतसे परिपूर्ण कर आगे लिखे 'ॐ मूर्धान दिवो अरतिं पृथिव्या वैवानरमृत आजातमनिम् । कविर सम्राजमतिथि जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः स्वाहा' इस मन्त्रसे पूर्णाहुति करे। फिर सुवेसे होमकी भस्म लेकर अनामिका अंगुलीके अपनाग द्वारा व्यायुषं करे। उसका क्रम यथा- 'ॐ व्यायुपं जमदग्नेः' इस मन्त्रको उच्चारण करके ललाटमें, 'ॐ कश्यपस्प घ्यायुपम् ' इस मन्त्रको बोलकर गलेमें, 'ॐ यहेवेषु न्यायुपं । पढकर दक्षिण बाहुमूलमें, और 'ॐ तनो अस्तु व्यायुपम् ' इस मन्त्रका पाठ करके उस भस्मको हृदयमें लगाना चाहिये । फिर इसी प्रकार वधूकेभी घ्यायुष करे किन्तु वधूके न्यायुष करते समय । 'तम्रो अस्तु ' के स्थानमें 'तत्ते अस्तु' उच्चारण करना चाहिये, यह विशेष हा अनन्तर देशाचारानुसार सन, शंख,शमी, सुवर्ण प्रेरित सि दूरका लगाना वर करे । फिर अन्यान्य प्रतिष्ठित श्री पुरुपक्षी सिन्दूरको लगावें । पश्चात् वर प्राम्य वचन उच्चारण करे और माम्यकी बियांशी ऐसाही करें। फिर वेदीके निकटसे मण्डपमें आनकर दूर्वाक्षतादि (रूपाणीवार) - - ११५ भाषाटीकासहिता । ततस्विरात्रमक्षारालवणांशिनो अधःशायिनो निवृत्तमैथुनो भवतः प्राङ्मुखो वधूवरो स्थिती भवतः ॥ इति विवाहकर्मपद्धतिः समाप्ता । अथ चतुर्थीकर्म । ततश्चतुर्थ्यामपररात्रे चतुर्थीकम । तच्च गृहाभ्यंतर एव कार्यम् । ततः उद्वर्तनादि कृत्वा युगकाष्ठमुपविश्य स्नात्वा शुद्धवस्त्रं परिधाय गृहं प्रविश्य वधूवरौ प्राङ्मुखौ भवतः। ॐ गणपत्यादिदेवतापूजनं ततः कुशकंडि- कारंभः तक क्रमाजामातृहस्तपरिमितांवेदिकुशेः परिसमुह्य तान् कुशा- नेशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य स्पयन वेण वा प्रागग्रपादेश- मात्रत्रिरुत्तरोत्तरक्रमेणोल्लिख्य उल्लेखनक्रमेणानामिकांगुष्ठाभ्यां मृदमुद्धृत्य ग्रहण करे तत्पश्चात् तीन रात तक वर व खारी चीज लवण इत्यादिको विशेष नहीं खाय, पृथ्वी पर शयन करें, परस्पर मैथुन (संभोग ) न करें और वर वधू दोनों जनेही पूर्वको मुख करके अवस्थित रहें। इति श्रीकान्यकुब्जवंशावतंसमुरादावादनिवासि-स्वर्गीयसुखानन्दमिश्रात्मज-पण्डित- कन्हैयालालमिश्रविरचितभापाटीकासहिता विवाहकर्मपद्धतिः समाप्ता । अव चतुर्थी (चौथी) कर्मका विषय लिखा जाता है। विवाहकी चौथी रातके पिछले प्रहरमें घरके भीतर ही चतुर्थीकर्म करना चाहिये । उस दिन रातके पिछले समयमें उठकर दो पटले पिछावे और उन पर बैठकर वर वधू उपटनके सहित स्नान करें फिर वस्त्र धारणपूर्वक घरमें प्रविष्ठ हो पूर्वकी ओरको मुख करके बैठे। तदुपरान्त गणेशादि देवताओंकी पूजा करके कुराकण्डिकाका आरंभ कराना चाहिये । उसका क्रम । यथा-वरके एक हाय प्रमाण वेदी बनाकर उसको तीन कुशाओंसे शुद्ध कर उन कुशाओंको ईशानकोन- में फेक देव । फिर गोबरसे वेदीको लीपकर स्फ्य नामक यज्ञपात्र वा सुवेके द्वारा पूर्वको अयभागवाली प्रादेश मात्र दक्षिणसे उत्तर वृद्धि अर्थात् उत्तर उचरको तीन रेखा बैचे । पभाव रेखा सैंचनेके क्रमानुसार दाहिने हाथ- दशकर्मपचतिः । जलेनाभ्युक्ष्य तत्र तूष्णीं कांस्यपात्रेणानिमानीय स्वाभिमुख निदष्यात् । ततः पुष्पचंदनतांबूलवस्त्राण्यादाय ॐ अस्या रात्रो कर्तव्यच्नुहोम- कर्मणि कृताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तु होतृकर्मकर्तुममुकगोत्रमयक- शर्माणं ब्राह्मणमभिः पुष्पचंदनादिभिब्रह्मत्वेन होतृत्वेन च त्वामहं वृणे इति ब्राह्मणं वृणुयात् ॥ वृतोऽस्मि इति प्रतिवचनम् । यथाविहितं कर्म कुर्विति वरेणोक्ते ॐ करवाणीति ब्राह्मणो वदेत् । ततोऽनेदेखि णतः शुद्धमासनं दत्त्वा तदुपरि प्रागग्रान कुशानास्तीर्य ब्राह्मणमात्र प्रदक्षिणक्रमणानीय ॐ अत्र वं मे ब्रह्मा भवेत्यभिधाय ॐ भवानीति ब्राह्मणेनोक्ते कल्पितासने उदङ्मुखं ब्राह्मणमुपवेशयेत्। ततः पृथूदकपा- चमग्नरुत्तरतः प्रतिष्टाप्य प्रणीतापात्रं पुरतः कृत्वा वारिणा परिपूर्य की अनामिका और अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंसे मिट्टी उठाकर ईशानकोनमें फेंक देवे । फिर उन रेखाओंको जलसे सेचनपूर्वक काँसीके पात्रमें अमिको लाकर चुपचाप अपने सामने वेदीमें स्थापन करे । अनन्तर पुष्प चन्दन ताम्बूल वस्त्र ग्रहणपूर्वक आगे लिखे 'ॐ अस्यां रात्री कर्तव्यचतुर्थी- होमकर्मणि कृतारुतवेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुं होतकर्म कर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं 'ब्राह्मणमोनिः पुष्पचन्दनादिजिब्रह्मत्वेन होतृत्वेन च त्वामहं वृणे' इस वाक्यसे ब्रह्माका वरण करना चाहिये तब ब्रह्मा 'ॐ वृतोऽस्मि ' ऐसा कहे । अनन्तर यथाविहितं कर्म कुरु ' ऐसा वरके कहने पर ब्राह्मण 'ॐ करवाणि' कहे। फिर अमिके दक्षिणकी ओर शुद्ध आसन प्रदान पूर्वक उसके ऊपर पूर्वको अपनाग करके कुशाओंको पिछावे और ब्रह्माको अप्रिकी प्रदक्षिणाके कमसे निकट बुलाय 'अत्र त्वं मे ब्रह्मा भव' ऐसा कहे, तब 'ॐ भवानि । ऐसा अयाके कहनेपर उस बिछाये हुए आसन पर उत्तरको मुख करके बसाको बैठाल देखे। तत्पमात् एक बडे पाबमें जल भरकर अपिके उचकी ओर रस देवे। फिर प्रणीतापात्रको आमे रसकर उसको जलसे परिपूर्ण र ३ . भाषाटीकासहिता। ब्रह्मणो मुखमवलोक्यामेरुत्तरतः कुशोपरि निदध्यात् । तः परिस्तरणं बर्हिपश्चतुर्थभागमादाय आग्नेयादीशानांतं ब्रह्मणोऽग्नि- पर्यंत त्याद्वायव्यांतं अग्नितः प्रणीतापर्यंतं ततोगेरुत्तरतः पश्चिम- दिशि पवित्रच्छेदनार्थ कुशवयं पवित्रकरणाथै सायमनंतर्गर्भकुशपत्रद्वयं प्रोक्षणीपात्रं आज्यस्थाली संमार्जनार्थ कुशवयं उपयमनाथ वेणीरूप- कुशत्रय समितित्रः सुवः आज्यं षट्पंचाशदुत्तरवरमुष्टिशतद्रयावच्छि- ब्रामतंडुलपूर्णपात्रं एतानि पवित्रच्छेदनकुशानां पूर्वपूर्वदिशि क्रमेणासा- दनीयानि । ततः पवित्रच्छेदनकुशः पवित्रे छित्वा प्रादेशमितपवित्रकरणं ततः सपवित्रकरण प्रणीतोदकं त्रिः प्रोक्षणीपात्रे निधाय अनामिकांगु- धाभ्यामुत्तराये पवित्रे धृत्वा त्रिरुत्पवनं ततः प्रोक्षणीपात्रस्य सव्यहस्त- तथा कुशाओंसे ढक ब्रह्माका मुख देख अनिके उत्तरकी ओर कुशाओं पर रख देवे । इसके पीछे परिस्तरण करना चाहिये । अर्थाद एक मुट्टी कुश लेकर उसके चार भाग करे । पहला भाग अनिकोनसे ईशानकोनतक, दूसरा भाग ब्रह्माके आसनसे अमितक, तीसरा भाग नैर्ऋतकोनसे वायुकोन तक और चौथा भाग अमि (वेदी ) से प्रणीतापात्र तक बिछा देना चाहिये । फिर- अमिसे उत्तरकी तरफ पश्चिम दिशामें पवित्र छेदनके लिये तीन कुशा रक्खे तथा पवित्र बनाने के लिये अग्रभागसहित और जिसके भीतर अन्य कुशपत्र न हो ऐसे हों, ऐसे दो कुशपत्र रक्खे । फिर प्रोक्षणीपात्र, आज्यस्थाली, तीन संमार्जनकुशा, वेणीरूप तीन उपयमन कुशा, तीन समिधा, सुवा, घृत दो सौ छप्पन मुट्ठी चावलोंसे भरा हुआ पूर्णपात्र इन सब चीजोंको पवित्र छेदनकी कुशासे आगे पूर्वपूर्वकी ओर रखता जावे । फिर पवित्र ठेदनकी कुशाओंसे पवित्राको छेदन कर प्रादेश प्रमाण (बलिस भरकी ) पवित्र बनावे । तत्पश्चात पवित्रोंके सहित प्रणीताका जल हाथमें लेकर तीन बार प्रोक्षणीपात्रमें डाले फिर अनामिका और अंगुष्ठ इन दो अंगुलियोंसे पवित्रोंको ग्रहण कर प्रोक्षणीके जलको तीन बार उछाले। अनन्तर प्रोक्षणीपात्रको बायें हाथमें दशकर्मपद्धतिः। करणं पवित्रे गृहीत्वा त्रिरुदिगनं प्रणीतोदकेन प्रोक्षणीमोलणं ततः मोरा णीजलेन यथासादितवस्तुसेचनम् । ततोऽनिप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं निघाय आज्यस्थाल्यामाज्यनिर्वापः ततोऽधिश्रयणं ततो जलपा दिना हविर्वेष्टयित्वा प्रदक्षिणक्रमेण पर्यनिकरणं ततः नुवं प्रतप्य समा- र्जनकुशानामरंतरतो मूलबाह्यतः घुषसंमार्जनं प्रणीतोदकेनाभ्युदया पुनःप्रतप्य मुवं दक्षिणतो निध्यात् ततः आज्यस्यामेरवतारणम् तत आज्ये प्रोक्षणीवदुत्परनं अवेक्ष्य सत्यपद्धव्ये तनिरसनं पुनःपूर्ववत प्रोक्षण्युत्पवनं उपयमनकुशान् वामहस्तेनादाय उत्तिष्ठन् प्रजापति मनसा ध्यात्वा तूप्णीमग्नौ घृताक्ताः समिधस्तिस्रः क्षिपेत् ततः उप- विश्य प्रोक्षणीजलेनानि प्रदक्षिणं पर्युक्ष्य पवित्रं प्रोक्षणीपात्रे धृत्वा ब्रह्म- रख दाहिने हाथसे पवित्रोंको ग्रहण कर प्रोक्षणीका जल तीन बार ऊपरको सेचन करे। फिर प्रणीताके जलसे मोक्षणीको सेचन करना चाहिये । पश्चाद प्रोक्षणीको जलसे पूर्वस्थापन करी हुई वस्तुओंको सेचन करे। पीछे प्रोक्षणी- पात्रको अमि और प्रणीताके वीचमें रख देना चाहिये। फिर आज्यस्थालमि घृत डालकर उसको वेदीकी अमिपर रख देवे और पश्चात् एक कुश बालकर उसे वृतके चारों ओर वुमाता हुआ अमिमें डाल देवे । इसके उपरान्त सुवेको अग्निमें तपाचे और संमार्जन कुशाओंके अपनागसे भीतर और मूलभागसे बाहर शुद्ध करे । फिर उसके प्रणीताके जलसे सेचनपूर्वक दूसरी बार तपाकर दक्षिणकी ओरमें रख देवे । फिर घृत- को अदि परसे उतार लेवे और प्रोक्षणीपात्रकी नाई पवित्रोंसे उस घृतको उछालकर देखे यदि उसमें मक्खी इत्यादि कोई अपवित्र वस्तु पडी हो तो उसको निकालकर फेंक देवे फिर पहलेकी तरह प्रोक्षणीके जलको उछाले पश्चात् उपयमन कुशाओंको बोये हाथमें ग्रहणपूर्वक खडा होकर पूर्व स्थापित तीन समिधाओंको घृतमें मिजोवे और मनमें प्रजापतिका ध्यान करता हुआ स्वाहा शब्दके साथ चुपचाप अभिमें होप कर देखें। फिर आसनपर बैठकर पवित्रोंसहित प्रोक्षणीका जल हाथमें ले कि भाषाटीकासहिता । मावारब्धः पातितदाक्षिणजानुर्जुहुयात् । तत्रापारादारभ्याहुतिचतुष्टये तत्तदाहुत्यनंतरं वावस्थिताज्यं प्रोक्षण्यां क्षिपेत् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । ॐ इंद्राय स्वाहा इदमिद्रायः इत्या- पारो। ॐ अग्रये स्वाहा इदमग्नयेॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाया इत्याज्यभागो। तत आज्याहुतिपंचतये स्थालीपाकाहुतौ च प्रत्याहुत्य- नंतर मुवावस्थितहुतशेषघृतस्य प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः ततोब्रह्मणान्वारब्धं विना ॐ अनये प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्यै पतिनी तनूस्तामस्य नाशय स्वाहा इदमग्नये ॐवायो प्रायश्चित्ते लं देवानां प्रायश्चित्तिरप्ति ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्य प्रजाती तनुस्तामस्यै नाशय स्वाहा इदं वायवे' । ॐ सूर्य प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चितिर से चारों तरफ सेचन करे पीछे उन पवित्रोंको प्रणीतामें रख देवे तदुपरान्त जानुको नवाय ब्रह्मासे मिलकर होम करना चाहिये । पहली चार आहुतियोंके अनन्तर सुवेमें शेष रहे वृतको प्रोक्षणीपाबमें डालता जाय ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । ॐ इन्द्राय स्वाहा इदमिन्द्राय० । इत्याघारौं । ॐ अग्नये स्वाहा इदमन्नये । ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय० । इत्याज्य- भागौ । फिर वृतको पाँच आहुति आगे लिखे (ॐ) मन्त्रोंसे देवे और इन आहुतियोंके अनन्तर सुवमें शेप रहा हुआ घृत प्रोक्षणीपात्रमें डालता जाये । पाँच आहुतियोंके पीछे जो स्थालीपाककी आहुतियां दी जायगी उनमें भी शेष रहै घृतको प्रोक्षणीपात्रमें डालना चाहिये । यह हवन ब्रह्मासे विनाहीं मिले किया जाता है। मन्त्र यथा,-'ॐ अमे प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिसि ब्राह्मणत्त्वानाथकाम उपधावामि यास्यै पतिनी तनूस्वामस्य नाशय स्वाहा । इदमनये न मम । ॐ वायो प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा भाधकाम उपधावामि यास्यै प्रजानी तनूस्तामस्पै नाशय स्वाहा इदं वापवे न मम । ॐ सूर्य प्रायश्चिने त्वं देवानां प्रायश्चित्तरासि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपा- " १२० दशकर्मपद्धतिः। ब्राह्मणस्त्वा नायकाम उपधावामि यास्यै पशुनी तनूस्तामस्वे स्वाहा इदं सूर्याय न० । ॐ चंद्र प्रायश्चित्ते त्वं देवानां ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधावामि यास्यै गृहनी नाझय स्वाहा इदं चंद्रायः । ॐ गंधर्व प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चितिरस ब्राह्मणस्त्वानाथकाम उपधावामि यास्य यशोनी तनूस्तामस्ये नाश्य स्वाहा इदं गंधर्वाय । चरुमभिधार्य ततः स्थालीपाकेन जुहुयात् । अप्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये । इति मनसा । अग्न्याहुतिनवके हुतशेपघृतस्य प्रोक्षणीपाचे प्रक्षेपः। अयं च होमो ब्रह्मणान्वारब्धकर्तृकः ततः आज्यस्थालीपाकाभ्यां स्विष्टकृद्धोमाॐ अनये स्विष्टकृते स्वाहा इदमनये स्विष्टकृते । ततः आज्येन ॐ भूः स्वाहा इदमाये । अभुवः स्वाहाइदं वायवे ॥ ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय । एता महा- व्याहृतयः। ॐ त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अव यासि- सीष्टाः । यजिष्ठो वह्नितमः शोशुचानो विश्वा देषाशसि प्रमुमुग्ध्यस्म धावामि यास्यैपशुनी तनस्तामस्यै नाशय स्वाहा इद सूर्याय न मम ॐ चन्द्र प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चितिरसि बालणस्त्वा नाथकाम उप- धावनि यास्यै गृहनी तनृस्तामस्यै नाशय स्वाहा इदं चन्द्राय न मम । ॐ गन्धर्व प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चितिरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधा- वामि यास्यै यशोनी तनूस्तामस्यै नाशय स्वाहा इदं गन्धर्वाय न मम । फिर चरु ( हलुए) में घृत डालकर उस स्थालीपाकसे होम करना चाहिये । यह होम ब्रह्मासे मिलकर किया जाता है।'ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये। इति मनमा । फिर धूत और हलुएको मिलाकर स्विष्टकट होम करना चाहिये। 'ॐ अनये स्विष्टकने स्वाहा इदमप्रये स्विष्टकते न ममा तत्पश्चात् घृतकी आहुति देवे और सुवेके शेष रहे घृतको प्रोक्षणीपात्रमें मिरावे । ॐ भूः स्वाहा इदमधये नमम । ॐ भुवःस्वाहा इदं वायवे न मम । ॐ स्वःस्वाहा इदं सर्याय न मम । एकार महाव्याहृतयः । ॐ वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडो अव यासिसाक्षा। यजिठो वल्लितमः शोशुचानो विश्वा द्वेषासि प्रमुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा इदसमी- १२॥ भाषाटीकासहिता। स्वाहा इदमनीवरुणाभ्यां नमम। ॐस वनो अमेऽवमो भवोती नेदिष्ठो मस्या उपसो व्युष्ठो । अव यव नो वरुण रराणो ब्वीहि मृडीक" मुहवो न एधि स्वाहा इदमनीवरुणाभ्यां । ॐ अयाश्वानस्यनभि- शस्तिपाश्च सत्वमित्वमया असि । अयानो यज्ञं वहास्ययानो धेड़ि भेषजश् स्वाहा इदमग्नयेॐ ये ते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः- पाशा वितता महांतः । तेभिनों अद्य सवितोत्त विष्णुर्विश्वे मुंचंतु मरुतः स्वाः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भयः स्वभ्यश्च । उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधम विमध्यम श्रथा- य। अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं वरु- पायः । एताः प्रायश्चित्तसंज्ञकाः। ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजाप- तये । इति मनसा । इदं प्राजापत्यम् । ततः संस्रवणाशनम् । ततः आचम्य ॐ अस्यां रात्रौ कृतैतच्चतुर्थीहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणरूप. ब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदेवतममुकगोत्रायाऽमुकशर्मणे वरुणायां न मम । ॐ स त्वन्नो अमेऽवमो भवोती नेदिष्टो अस्या उपसो व्युष्टौ । अव यव नो वरुण रराणो वीहि मृद्दीक सुहवनो न एधि स्वाहा इदममीवरुणायां न मम । ॐ अयाश्चामेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्वमित्व मया असि । अयानो यज्ञ वहास्थयानो धेहि भेपजर स्वाहा इदममये न मम। ॐ येते शतं वरुण ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः। तेभि! अब सवि- तोत विष्णुर्विश्वे मुचन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वग्यश्च न मम । ॐ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधर्म विम- ध्यमः श्रथाय । अथा वयमादित्य व्रते तवानागसो अदितये स्याम स्वाहा इदं । वरुणाय न मम । एताः प्रायश्चित्तसंज्ञकाः । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये न मम । इति मनसा । इदं प्राजापत्यम् । इसके अनन्तर प्रोक्षणीपात्रके जलका प्राशन करने पर आचमन करे । फिर आगे लिखे "ॐ अस्या रात्रौ कतैतन- तुर्थीहोमकणि लताकृतावेक्षणरूपब्रह्मकर्मप्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्र प्रजापतिदै- दशकर्मपद्धतिः। बाहुमूले तत्रो अस्तु न्यायुषं इति हृदये एवं वध्वा अपि न्याय कुर्यात् तत्र तनो इत्यस्य स्थाने तत्ते इति विशेषः । तत भाचार्याय दक्षिणां दद्यात् होत्रे च दक्षिणां दद्यात् भूयसीं दद्यात् ॥ इति चतुर्थी कर्म समाप्तम् ॥ इति दशकर्मपद्धतिः समाप्ता ॥ ॐ यद्देवेषु व्यायुपम् कहकर दक्षिण बाहुमूलों और तनो अस्तु न्यायुषं इस मन्त्रको उच्चारण करके वह भस्म हृदयमें लगानी चाहिये। फिर इसी प्रकार वधुकेभी व्यायुष करे किन्तु वधूके व्यायुष करते समय 'तनो अस्तु' के स्थानमें 'तत्ते अस्तु ' उच्चारण करे। इसके उपरान्त आचार्यको दक्षिणा देवे। होनाको दक्षिणा देवे और भूयसी दक्षिणा (भूर दक्षिणा) देनी चाहिये। . दोहा-श्रीवृजचन्द मुकुन्दको, ध्यान हृदय महँ धार । वरनी पद्धति कर्मकी, निज मतिके अनुसार ॥ भूल चूक जो दाससे, रही होय या माहि । क्षमा करें लखि विज्ञजन, रोष करें मन नाहि ॥ मैं अजान जानत नहीं, गायकी सार। सेवक अपनो जानिक, लीजिय आप सुधार ॥ वसत रामगंगा निकट, नगर मुरादाबाद । भजन करत हरिको तहा, बुध ज्वालापरसाद ॥ तिनको में लघु भात हूँ, नाम कन्हैयालाल । प्रति पदको टीका लिख्यौ, भाषा मंजु रसाल ॥ जगत् विदित महिमा अमित, अवनि अखण्ड प्रताप । खेमराज छाप्यो मुदित, ग्रंथ बम्बई छाप ॥ इति श्रीकान्यकुजवंशावतंसमुरादावादनगरनिवासि भुवनविख्यातस्वर्गीयमित्र- मुखानंदमुरिसनुपाण्डत-ज्वालामसादमिश्रकनिष्टसोदरपण्डित कन्हैया- लालमिश्रविचितभाषानुवादसहिता दशकर्मपद्धतिः समाप्ता। समाप्तोऽय अन्य । . पुस्तक मिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, खेमराज ""श-कल्याण "श्रीवटेवर"

Dash Karm Paddhati

Author
Suri,sukhanand
Title
Dash Karm Paddhati
File name
Dash Karm Paddhati
Text
OCR done
Citation
1838
Published
2012/08
Publisher
Mumbai.,laxmi Venkateshwar Mudranagare
Language
Sanskrit
Pages
128
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405294
Barcode
99999990292380.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
tBhUu05gqSD
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