Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
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ॐ
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अथववेदीय प्रमोपनिषद्
की
भाषाटीका
सरल मध्यदेशी हिन्दी भाषामें
कोलात्व्य नगरनिवासी पंचोली यमुनाशंकर
नागर ब्राह्मण
ने
अनुवादकर प्रकाशितकिया
सोई
सर्वजनीके हितार्थ
पहली बार
स्थानलरखनऊमें
थामान्मुन्यगी नवलकिशोरजीके
महायवालयमे
मुदित भया
सन् १८८४ ई.
ناوها
ॐ
अथववेदीय प्रमोपनिषद्
की
भाषाटीका
सरल मध्यदेशी हिन्दी भाषामें
कोलाव्य नगरनिवासी पंचोली यमुनाशंकर
नागर ब्राह्मण
+
अनुवादकर प्रकाशितकिया
सोई
सर्वजनीके हितार्थ
पहली बार
स्थानलखनऊमें
श्रामान्मुन्शी नवलकिशोरजीके
महायन्सालय में
मुदित भया
सन् १८८४ ई.
अनुक्रमणिका
(१)- भूमिका
(२)-विज्ञापन
(३)-विनय
(४)-मूलमन्त्र पुष्टाक्षरों में
(५)-भाषामें भावार्थ सहित मूल पुरु
प्रक्षरार्थके
""इस चिन्हानरमें मूलके पद
इस चिन्हान्तरमें मूलपदके
उपक्षरार्य
[ ] इस चिन्हान्तरमें मानन्द गिरा
काका अनुवाद
( ) इस चिन्हान्तरमें पर्याय पाब्द
इस चिन्दानरमें अर्थयोजना
श्लोक
श्लोकार्पन प्रवक्ष्यामि पडन गंथकोटिमिः
ब्रह्म सत्यजगन्मिथ्या जीयोचव नापरः।।
इति
• ॥ॐ॥
॥तत्सद्सनमः॥
॥ एकमेवाहिनीयम्ब्रह्म
पृथ
॥ अथर्ववेदीय प्रमोपनिपद् ॥
॥ इस उपनिपविये कधी पादिक छ ।
ऋपियोंने शिष्यभावसे पृथक् २ मुमकिये हैं भर
निन्होके उत्तर पिप्पलादनामक प्राचार्यने दिय है।
एनदर्य इस उपानेपदका नाम प्रमोपनिषद् कह
तेहैं। तिसकी भाषारीका किंचित् श्रीपांकराचार्यजी
के भाष्य अरु पानन्दगिरा टीका गुरु पंडित पीना.
म्वरजीके अनुवादके पापायपर श्रीगुरु मन्त मा-
हात्मा अरु सात्मनिटोंकी रुपारुप बसको पायके
गुरु शिष्यके सम्वादद्यारा कहताहौं ।
॥ इस मेरे कहने में जो कुछ दोष होय तिन
को सर्व पारधाजन क्षमाकर मुधारलेवें।।
॥२॥ ॥भूमिका।। پروندم ॥3॥ ॥ भामेका॥ ॥अथर्ववेद के मन्त्रोंसे पृर्थात परिमित। (संव्याव)मक्षरवाले जे वेदके वाक्य हैं जिनको मन्त्र कहते हैं तिनकरके वोधित जो अर्यहै तिनका विस्तार करके-[प्रर्थात् पृथर्वणवेदमें ब्रह्मादेया- नामित्यादि वल्लादेवताओंकों इत्यादि मन्नोंसे ही प्रात्मतत्त्वका निर्णय किया होनेमे। अरु निम ही अ. थर्वणवेदविये इस उपनिषद्प ब्राह्मणभागसे पुनः तिस ही प्रात्मतत्वका कयनहै सो पुनरुक्तिदोष है। यह प्रापका चित्तधिप होतीहै मी नहीं क्योंकि मन्नोंकरके संक्षेपमात्र कंथन किया जी पात्मतत्व निस हीका यहां इम ब्राह्मणभागवारके सविस्तर प्रा- एकी उपासना प्रादिक माधनोंसहित होनेसे कथ- नहै एतदर्य पुनरुक्तिदोष है नहीं। इसपकार कहने हुए आचार्य इस वासभागकों प्रकट करते हैं । यहां यह विशेषहै कि मंवरुपजो विगहै सोपिरा उपराची इस प्रमाणामे पर अपर भेदसे दो प्र- गारकीहै। तिनमें शिक्षामादि छ मंगोसहित जो शरवेदादि नालोकरके पिख्यान विद्या सो कम्मरुप र उपासनाप होदेसे विद्याहै जिनपिपे जो दूसरी उपासनारूपहै सो हितीय पृरु नृतीय इन A ناونيه-۳ ॥भूमिका ॥३॥ दोनों प्रमोत्करके प्रतिपादन कोजायगी। गुरु पृ. थमा जो कर्मरूपाहै सो कर्मकांडविषे वर्णन कि- याहै एतदर्थ यहां उमका वर्णन नहीं करने ।- रु कर्मरूप अरु उपासनारुप जो विद्यादै तिनके फल अनित्यादि दोपकरके युक्त हैं ताने मुमुक्षकों तिनसे वैराग्यार्थ प्रथम पृष्मविषे स्पष्ट करते हैं। • अरु प्रथमकही जे पर अपर दो विद्या तिनविये दूसरी जो परविद्याहै सो उसको कहते हैं । पथ पर रायया तदक्षरमधिगम्यत! अव जिससे सो अ- क्षर जानिये सी पर विद्याहै। इसप्रकार प्रारंभका रके समन मुंडक उपनिषदसे प्रतिपादन कियाहै। नसविषे भी !"यथा सुदीपात् पावकाहिस्कुलिङ्गा सहस्रशः प्रभवन्ने स्वरुपा: जैसे प्रज्वलित अग्नि से सहस्त्रावधि चिंगारियां प्रकटहोती हैं। इत्यादि। दोनो मन्त्रोंकरके उक्त जी अपृर्थ है तिसके विस्तारा- र्थ चतुर्थ पृथ्महै। गुरु "प्रणयो धनुः! मों- कार धनुपहै। इस मन्त्राधिपे जो उक्त पृथहै ति सको स्पएकरनेके अर्थ पंचम उपुरु षष्ट प्रमहैं। इसीलिसे यह प्रमउपनिषद्प नाह्मण आत्मपु- तपादक मन्त्रीका विस्तारसे मनुवादकरनेवालाहै। एतदर्थ ही इसके विषय पर प्रयोजनादिक भ- नवन्ध नहीं ही कहेहैं एतदर्थ यहां पुनः नहीं कह ते। ऐसे जानना] अनुबादमे यह प्रमोपनिषद ॥४॥ ॥भूमिका।। रुप चाहा- अपरिमित प्रस्तरवासा जो वेदका वाक्य तिसकों बालकहते हैं। प्रारंभकरते हैं । अरु इस उपनिषद् पिये ऋपियों के प्रम गुरु उत्तररु. पजो पारख्यायिकाहै सो विद्याकी स्तुत्यर्य है। गुरु सो ब्रह्मविद्या कि जिसकरके अक्षरब्रह्मकी प्राप्ति होतीहै, सो मागेकहेहुए प्रकारसे सम्बत्सर (एक- वर्ष) पर्यन्त ब्रह्मचर्यसे गुरुकुलविषे वास पुरु नप प्रादिक साधनोंकरके युक्त जो अधिकारी। निनकरके ग्रहण करने अरु पिप्पलादपादिक सर्वज्ञ मुनिश्वरीके नल्य जो प्राचार्य लिनकरके। कहने योग्यहै जिसकिसकरके नहीं। गेसी विद्या की स्तुति करते हैं। गुरु ब्रह्मचर्यादि। पर्यात्। || इस ऋषियोकी पारख्यायिकाका पूर्वकल्प विषे विद्यमान साधनों के स्वरूपसे वृाचर्य गुरु नप प्रादिक साधनोका विधानम्प अन्य प्रयो- जनहै ऐसे कहते हैं ] पृथति वेदमे कस्यान्तरमे- दनहीं सर्च कस्यों में वेद एक ही है ताने इस स- नातन पारख्यायिकासे । ब्रह्मचादि साधनोकी सूचनासे तिनके करनेको योग्यता सिद्ध होती है इति भूमिका ॥ हरिः ॐ तत् सत् बह्मा ॥
الراشد و ॥प्रमोपनिषद॥ ॥प्रथ॥ ॥ प्रथमप्रम।।. ॥ॐ सुकेशाच भारद्वाजः, पौव्यश्च । सत्यकामः, सौर्यायणी च गार्यः .फौपा ॥ल्पश्चापदलायनो, भार्गवो वैदर्भिः,कव- न्धी कात्यायनस्ते, हैते व्रह्मपरा ब्रह्मनि.. गटाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष हवै. तत्स- ॥ वक्ष्यतीति ने ह समित्यागयो भगवन्ने ॥पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ २ ॥ प्रथ॥ ॥प्रमोपनिषद्गत प्रथम प्रक्ष्म भापाटीका॥ ॥प्रारभ्यते। ॥१॥ॐ॥ श्रीगुरुरुवाच । हे सौम्य हे प्रि- यदर्शन अव सावधान होके प्रस्मउपनिषद्कों भी श्रवाकरो । “सुकेपा च भारद्वाजः"। भारहाजर का पुत्र सुकेा नामवाला मुनि । पुरु ।“व्य- थ सत्यकामः"। शिवि ऋषिका पुत्र सत्यकामा नामवाला मुनि । अरु ।“सौ-यणी च गार्य. सूर्यके पुत्र सौर्यमुनि निसका पुत्र सौर्यायएी सो गर्गगोलविषे उत्पन्नभया नाते गार्य नामनाला मु. नि । अरु ।"कौपाल्पश्चावलायनोअश्वल कौसल्या नामवाला मुनि । अरु ।"भार्गयो । का युव ناونیش ॥६॥ ॥ष्मोपनिषद् वैदर्भिः"विदर्भदेशाका रहनेवाला भृगुके गोत्रविषे उत्पन्न भया ताते भार्गव नामवाला मुनि । अरु ।“क- वन्धी कात्यायन: कत्यके पुत्र कात्यायनऋषि- रुप प्रपितामह (पडदादे) वाला कवन्धीनामकांमु. नि।"ते हैते" यह विख्यात छ मुनिश्रर सोरे "ब्रह्मपरा"ब्रह्मपर। अर्थात् अपरखा (प्रा- एोपासना) विषे तत्परहोनेकरके पापभयेहैं ताते वहामर हैं। अथवा अपरखा जे छयो पेगोसहि- त अगादिवेदरूप अपराविद्या तिसविषे निस्मात भये ताने बापरहैं । गरु- "ब्रह्मनिष्ठाः"व- हानिष्ट हैं । अर्थात् - ऋगादिवेदकरके प्रतिपाद्यर जे यज्ञरुप ब्रह्म जिसके अनुष्ठानविषे निष्टावाले। होनेकरके ब्रह्मनिष्टहैं। सो-“परब्रह्मान्वेषमा परवलकों खोजतेहुए-जो नित्यवस्तु जाननेयो- ग्यहै सो क्याहै जिसकी प्राप्त्यर्थ हम अपनी इ- च्छाके अनुसार यन्नकरेंगे। इस अभियायसे । परबलकों उपन्वेषएाकरते हुए। अरु तिसके। जाननेक अर्थ । एष हदै तत्सर्व वक्ष्यनीति" यह प्राचार्य निश्चयकरके सो सर्व कहेगा ऐसे विचारके "तेह ममित्यायो भगवन्तं पिप्यलाद- मुपसन्मा:" चे सर्व समित्वाणिहुए पूजावान् । निप्पलादमुनिके समीप जाते हुए अर्थात सु- योगासादि छो मुनि समिधाटि लेके [यह پشت او بود प्रथम पुश्मः॥ समिधाका जो ग्रहरणहै सो यथायोग्य दानुनकाष्ठर भादिक आचार्यके उपयोगी सामग्रीके गृहणार्थी है (क्यों कि प्राचार्याय प्रियं धनमाहत्य इत्या. दि श्रुतियों के प्रमाणहैअरु सके काटरूपजोस- मिधहै सो भी अग्निहोत्रादि कोविषे ऋषियों? को उपयोगी होते हैं नाते उनके ग्रहणार्थ भी वि- धिहै। परन्तु मुमुक्षुकों प्राचार्यके उपयोगी पदा- र्थरुप भेट हाथमें लेकर पारणहोना योग्यहै यह अभिप्रायहै ]. सर्वकरके पूजनीय भगवान् पिप्प- लादमुनिरुप प्राचार्यके समीप जातेभये । अर्थात आचार्यको उपयोगी प्रियवस्तु सो भेटार्थ हाथ- मैले समीपजाय भेट उनके शो रख उनके च. रण ग्रहणकरके हे भावन्मुमुक्षुवै पाराम प्रपरो!} मैं मुमुक्षु आपकी शरणही ताते। मुझको ब्रह्मविद्याका उपदेशकरो। इत्यादि प्रकार सविनय स्वाभिष्ट वचनके उझारण पूर्वक साही ग पृपामरूप उपसत्ति (नुषा,सेवा) को करते भये ॥ १॥ ॐ तत्सत् ॥ २॥हे सौम्य पूवोक प्रकार जब वे छत्री मुनिय पिप्पलादरूप प्राचार्यकी पारणभये तव । तान्ह स ऋषिरुवाच"निनको सो ऋषि स्पष्ट कह- ताभयाअर्थात तिनके समीपनाये छो मुनि ॥प्रमोपनिषद॥ andit ॥नान् ह म ऋषिरुवाच भूय एवन.॥ ॥पसा ब्रह्मचर्ये या बड्या संवत्सरं संवत्स्य-॥ ॥थ यथाकामं प्रध्मान् एच्छथ यदि विज्ञा-11 ॥स्यामः सर्व ह वो वक्ष्याम इति ॥२॥ तिनकों सो प्राचार्य पिप्पलादमुनि स्पष्ट कहता भयान्। पिप्पलादउवाच।“भूय एव तपसा व- ह्मचर्येण श्रड्या संवत्सरं संवत्स्यथ"फेरभी तपसे ब्रह्मचर्यसे अहासे संवत्सरपर्यन्त सम्यक वास करो-यद्यपि तुम सर्व तपस्वी ही हौ तथा पि यहां फेर भी विशेषकरके नियताहारादिरूप तपसे अरु इन्द्रियोके संयमरूप ब्रह्मचर्यसे अरु प्रास्तिकभावकी चुहिरूप श्रद्धासे प्रादरवान हुए। एकवर्षके कालपर्यन्त सम्यकपकार गुरुकी सेवादि ये तत्परसाए निवासकरो। निसके अनन्तर।“यया कामं प्रहमान पृच्छथ" जैसी इच्छाहोय (तिस केप्रनुमार प्रमोको पूछो जिसको जैसी इन्छा होय सो अपनी इन्छाके मृनुसार जिस विषयकी जिज्ञासाहोय तिसविषयके सम्बन्धी प्रस्मोको पूछो "यदि विज्ञास्यामः सर्च ह दो वक्ष्याम इति"। जय जानने होगे तुमारे सर्व स्पष्ट कहेगें। यदि हम निस तुमकरके मूखीहुयी वस्तु को जाननेहोंगे नद तुम्हारे पूछेहरा वस्तु ओंकों स्पष्ट कहेंगे [यहां ..
॥प्रथमपूक्ष्म॥१॥ डा ॥अथ कवन्धी कात्यायन उपेत्य प-1॥ प्रच्छ । भगवन् कुत्तो हवा इमाः प्रजाः॥ ॥प्रजायन्त इति ॥ ३ ॥ यदि, पाब्दका पर्यायरुप जो जव, प्राब्द है सो पा चार्यकी निरभिमानताके लरवावनेके अर्थ है कुछ प्रज्ञान गुरु संपायके अर्थ नहीं। यह सर्व प्रश्तो- के निर्णयते वोधित है ॥ २ ॥ ३॥ हे सौम्य उत्ताप्रकार पिणपदमुनि की प्राज्ञा नुसार कौशल्य प्रादि छोनियोंने ७- ह्मचर्यादि साधन पूर्वक निवासकिया-"पृथ कवन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ"एकवर्षपी. छे कात्यायनका प्रपौत्र कवन्धी समीपजायके पू- छनाभया अर्थात् जब कवर्षपर्यत ब्रह्माच- र्य कररहे तव तिसके पश्चात् कात्यायन ऋषिका पड़पौत्र (पड़पोता) कबन्धी नामवालामुनि अपने प्राचार्य पिप्पलादमुनि निनके समीप जाय प्रणा- मकर प्रस्मकरताभया जो "भगवन् कुत्तो हवा इमाः प्रजाः प्रजायन्न इति" है भगवन् यह प्रसिद्ध प्रजा किस कारण से उपजे हैं। है भगवना यह प्रसिद वाह्मणादि पजा किस कारणासे उपज तीहै-॥क्ष्म [ये छनो मुनिश्वर परखाके जान- فروشد. در J- प्रमोपनिषद्। नेकी जिज्ञासावान्दुए पिप्पलादमुनिरूप आचार्य- के समीप गये इसप्रकारसे आरंभकियेहुए इस परपलकी जिज्ञासाके प्रकरणाविषे प्रजापनिजत। यजाकी सृष्टिको विषयकरनेवाले प्रस्म अरु उत्तर का कधन प्रसंगतहै ॥ उत्तर ॥ हे सौम्य यह शंका चित्नमें विचारके ही प्रभउत्तररूप श्रुतिका तात्पर्य कहते हैं। यहां यह भावहै कि निषाम- सौ विरजो उल्लालोक इति!निसकों यह निर्म- ल ब्रह्मलोक होता है। इस प्रकार उपासनाके समु- चयकरके युक्त कर्मके कार्य ब्रह्मलोकको गुरुर थोत्तरे इति व उत्तरायणसे इसपका र जिस ब्रह्मलोककी गतिरूप देवयानमार्गको साभ गे इस ही प्रथम पुस्मविषे कथन किया होनेसे यह पर्थ बनताहै। गुरु यह उपासनाकरके। युक्त जो कर्मका कयनहै सो केवल काँका उ- पलक्षएा है, इसप्रकार भी जानना क्यों कि केव- ल कर्मके कार्य इन्द्रलोकको अरु तिस इन्दुलीक की गतिरूप पित्यानमार्गकों भी नेपामे वैष । उललोक तिनकों ही यह वृह्मलोक (चन्द- मंडलस्य इन्दलोक) होता है। गुरु पूजाकामा दक्षिणं पुतिपयन्त रति पूजाकी कामनाबाले द. क्षिणायनमार्गको पावतेहै। इस प्रकार पागे इस 'थम मविप ही कथन कियाहोनेसे ॥ पुरु ययन وطن اورم- ॥प्रथममध्मः॥ वि परब्रह्मकी जिज्ञासाके अवसरविधे यह कपन भी उसंगत ही है तथापि केवल कर्मके कार्यसे। अरु उपासनारूप कर्मके कार्यसे जो विरक्त है कि- सकों ही तहा अधिकारहै एतदर्थ निस कर्भडपा सनाके फलसे वैराग्यार्थ यह कहते हैं । यद्यपि प्रहमसे सृष्टि प्रतीतहोती है तथापि निस सृष्टिके। कथनविये प्रयोजनके अभावसे सृष्टिके कथनर के मिस (बहाना) करके परखयकी चियाका फल ही यहां कहते हैं एतदर्थ मिश्रित अरु अमिन वितरूप जो अपरह्माकी विद्या अरु कर्मयह दो है तिनका जो कार्य है अरु जो गति , सो सापक रके कहने योग्यहै । निस अर्थवाला यह पमहै| ऐसा जानना योग्य है ॥२॥ ४॥हे सौम्य उक्तप्रकार जब कयन्धीमुनिने सटिके विषयमें अपने प्राचार्य पिप्पलादमुनि ते प्रमकिया तबतस्मै स होवाच तिस केपृर्थ सो स्पष्ट कहते भये उस प्रक्ष्मकरने वाले फवन्धीनाममुनिको सो सर्वज्ञ प्राचार्य पिप्पलादमुनि शिध्यकी काके निवारणार्थ क हते भये । पिपलादउवाच ॥ हे कवन्धीन--15. जाकामो वै प्रजापतिःस तपोतप्यत"५ प्रजापति (ब्रह्मा) सो पूजाकरने की कामनावालाहमा तप ॥१२॥ پین و جنین ۱۴ ॥पृष्मोपनिषद्। ॥तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै पूजा- पतिः सतपोतप्यत स तपस्तत्वा स ॥ ॥मिथुनमुत्पादयते । रयिञ्च प्राणश्वेत्येतो ॥मे चुहुधा प्रजा करिष्यत इति ॥ ४ ॥ को तमताभया-प्रपनी पूजाकों सूजनेकी का मनावाला प्रजापति बलदेव सो मैं सर्वात्मा अरु जगत्को मैं सूजों ऐसे ज्ञानवाला अरु ज्ञान कर्मके समुच्चयकों करनेवाला अरु पूर्वकल्प सम्बन्धी हिरण्यगर्भकी भावनाकरके युक्त अरु इसकल्प की प्रादिन हिरण्यगर्भरूपसे सुखको प्रानभया गुरु अपनि सूजीहुई स्थावरजंगमरुप पूजाका। पति हुया पश्चात् पूजाकी कामनावालाहुमा अरु जन्मान्तरविषे भावनाकिये गुरु श्रुतिविषे पुका- शितकिये उपूर्थकों चिपयकरनेवाले शानरुप तप को तस्य ज्ञानमयं तपः! तपताभया, अर्थात चित्तादिकोंसे तिसके संरकारकों जगायके उत्पन्न करताभया अर्थात् [नहीं प्रथम सूर्य उगुरु चन्द्र माकी उत्पत्तिसे तिनके भावकों पायके तिसके। पश्चात् चंदमा अरु सूर्य इन दोनोकरके साधने योग्य जो संवत्सर तिस संवत्सरके भायको पाय के पश्चात् ऐसे ही निस संवत्सरके अवयवरुप। दक्षण अरु उत्तर दो अयन पुरु मास पस दिन پاونها प्रथमप्रमः॥ ॥१३॥ रात्र उनके भावको पायके तिसके पश्चात् अय- ग प्रादिकोंके कमसे साधनेयोग्य बीही यवादि अन्नभावकों अरु रेतभावकों पायो पात् तिस रेतसे प्रजाको उत्पन्नकरों ऐसे विचारके] तपरतवा"। सोनपको तपिके-सो प्रजापति उक्तपुकार श्रुतिउक्त अर्थ ज्ञानरूप तपको तपि के प्रांत विचारकेन्। स मिथुनमुत्पादयन्ने - यिन्च प्राणञ्चेनि"। सो रयि अरु पाया इन सेनों को उतान्न करताभया-प्रजापति दृष्टिके साधन रुप रयिक अर्थात् [यहा धनके वाची रयि पा- ब्दकरके भोज्य पदार्थोके समूहको लमकरायके अरु उन भोज्य पदार्थोकों चन्दमाके किरण केस मृतकरके युक्तहोनेसे निसहारा चन्द्रमाको लक्ष्यका रतेहैं इस अभिप्रायसे कहते हैं ] -मन्त्ररूप चन्यू मा अरु अन्नके भोता पारण [अर्थात् । प्रहंदै- श्वानरोभूत्वा प्राणिनी देहमाश्रिता पाएगापान समा युक्तो पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ! मैं वैश्वानर (जठर- ग्नि) रूपहोके पारियों के देहति आश्रयकों पाया हौं अरु प्राण अपानवायुकरके युक्त मा चार- कारके सत्रकों पचावताही इस गीतास्मृतिके वा- वय प्रमाणसे अग्निकों पाएके सम्बन्धसे पाए शब्दकरके भी अग्निरुप भोक्ताही लक्ष्यकरयाहै इस अभिप्रायसे यहां कहतेहैं। अर्थात् प्रारूप پیشین اروند ॥२४॥ प्रथम पृष्ठमाश ॥ प्रादित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्दमा ॥रयिर्वा एतत्सर्वं यत्मू-चामूनच्च नस्मा- न्सूतिरेव रयिः ॥ ५ ॥ प्रग्नि सूर्य इन दोनोंकों उत्पन्नकरता भया । ॥ क्या विचार करताभया ॥3॥ हे सौम्य यह विचारले कि ।“ऐतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यतइनि यह दोनों मेरी बहुतप्रकारको पुजा करेंगे ऐसे अर्थात् यह दोनो उपन्न (चन्दमा) अरु निस- का भोक्ता अग्नि (सूर्य) सो मेरी इच्छाके अनु सार अनेक प्रकारकी, प्रजाकों करेंगे ऐसे चि न्तनकरके ब्रह्मांडकी प्रति [अग्नि (सूर्य) अरु अन्न (चन्दमा) को ब्रह्मांडके अन्तरगत । होनेकरके ब्रह्मांडकी उत्पत्निके अनन्तर उनकी उत्पत्ति होनी है इस अभिप्रायसे यहां कहते हैं। उत्पत्तिके कमसे सूर्य अरु चन्द्रमा की पूजा- पनि मृजत्ताभया ॥ ५. है सौम्य तिन दोनों में । "प्रादित्यो ह वै पायो रयिरेव चन्दमा" सूर्य निश्चयकरके प्र- सिद्ध पापा (अरु) अन्न ही चन्द्रमा है। अर्थात् प्रजापति से प्रह्मांडान्तर्गत प्रकटकिये जे सूर्य। भरु चन्द निनदोनों में सूर्यजो है सो निश्पकसे شرای-10 ॥१५॥ । ॥चतुर्थप्रमen लोकमें मिट् प्राणरूपहुआ अन्नका भोक्ता अ. ग्निहै अरु निश्चयंकरके अन्नरूप चंदमाहै । पर न्तु यह एक भोक्तारुप रु एक पन्नः भोग्य रूप सो दोनों एक ही प्रजापतिहै ।मु०॥ चन्द्र प्ररू सूर्य इन दोगोंकी जब प्रजापतिभावसे एकताहै तब एकको भोक्ता पना पुरु दूसरेको भोग्यप- ना यह विषमभेद कैसे बनेगा ॥उ०॥यह जो एक ही प्रजापतिके विषेभोग्य भोक्तास्प विषम भेद है सो गौण मुख्य भावका किया है। अर्थात निस एक ही प्रजापतिको कियाक्तिके मा- श्रया गोएाभाव कह्नकी इच्छासे उपन्न (भोग्य) पनाहै अरु. (ज्ञानपूक्तिके प्राश्रय) प्रधान भाव के कहने की इच्छासे भोक्ता पनाहै यह भेद प्र०॥ यह भेद कैसे है ॥उ.||"रयिर्वा ए- नत्सर्च यन्मूर्तचा मूर्तच्च तस्मान्मूतिरेवरयिः५॥ जो मूर्त अरु अमूर्त है सो सर्व यह अन्नहीहै। अर्थात् जो स्यूल मृरु मूक्ष्मरूप मूर्त सह समूत जगत है सो सर्व यह अन्त्र (भोग्य)रूप ही है। पु०॥ मूर्तरुप अन्न अरु अमूर्तरुप भीका। इन दोनों को भी जव अन्नमयता (चन्दुरुपता) ही है तब रयिरेवचन्द्रमा पन्त दी चन्दमाई ऐसा जो पूर्व वेदने कहा सो कैसे बनेगा। उ० हे सौम्ब जब मूर्त (अन्न) अरु प्रमूर्न (भोक्ता عناوي-14 ॥६॥ पृथ्मोपनिषद् "पृथादित्य उदयन्यत्याची दिशं प्र-।। ॥विशति तेन प्रांच्यान् प्राएावमिषु॥ सनिधत। यहिए यत्प्रतीची यदु-॥ दीची यदेधो यदूर्द्ध यदनरा दिपणे य-॥ सर्व प्रकापायति नेन सर्वान् पाएान्॥ ॥रश्मिषु सन्निधते ॥ ६॥ यह दोनो विभागकरके गौण मप्ररु प्रधानभांव- से कहनेकों इच्छितहोय नव अमूर्जरूप (भोक्ता) माणसे मूर्तरुप (भोग्य) व्यकों भुक्त होनेसे। मनों ही मुन्नपना है] ताते एथक किये अमू- से जो अन्न मूर्त (मूल) मूर्तिहै सोई अन्न पहै। क्यों कि अमूर्त सूक्ष्म पाणरूप भोक्ताकर के भोगाभाहै ताने ॥ ५ ॥ .६॥हे सौस्य नाते अमूर्त भी पाए भोक्ता जो प्रलहै निस सर्परुपही है। पु०॥ कैसे सो सर्व रुपहै ॥ उ•"प्रथादित्य उदयन्यत्माची दिश प्रविशति" अव सूर्य उदयहुम्मा जो पूर्व दिपण केपर्थ प्रवेशाकरताहै। तिसकरके उस पूर्वदिशा को अपने प्रकापफरके व्याकरताहै- नेन पाच्यान् पाएान् रपिमयु सन्निधले" तिससे पूर्व रिपाके अन्तर्गत मानिकेताई किरणोवि لی اونه ، ." "पृथमप्रक्ष्मः॥ ॥१॥ प्रवेशाकरताहै। -निस पनि व्यापिसे पूर्वदिषण के अन्तर्गत सर्व प्राणाधारियोंकों अपने प्रकाश रुप व्यापक किरणोंरिघे प्राप्नहोनेसे प्रवेशकरता है। अर्थात अपनारुप करता है। जैसे ही-- दक्षिणं यत्यतीची यदुदीची यदधो पदू? यद- नरादिपो"जो दक्षिादिपाके पूर्थ, जो मश्चिम दिशाके अर्थ,जो उत्तरदिशाके अर्थ, जो अघो,जो अई, जो वीचकी दिपाके अर्थ -जो पूर्वदिशाके अर्थ प्रवेशाकरताहै सो तैसेही दक्षिण पश्चिम उजर नीचे ऊपर मध्यकी अर्थात अनि पान दि कोएकी दिशाम्रोके अर्थ प्रवेशाकरताहै। पर रु-“यत्सर्व प्रकापायति"जो सर्वको प्रकार नाहै जो अन्य सर्व जगतकों प्रकापाता है। "तेनं सान् प्राएगान रस्मिघु सन्निधत्तेनिस से सर्व प्राणियोकों किरगोविये प्रवेशकरता। -निस अपने प्रकापाकी व्याप्तिसे सर्वदिशाविषे| स्थत सर्व प्राणियोंकों किरणोंविषे प्रवेशकरता वा धारता है । ६.. ७॥ हे सौम्य ।“स एप वैश्वानरो विश्वरूप, सोयह चैन्धानर रिश्वरूप है। अर्थात् सो यह भोका प्राण चैश्वानर समिा विश्वरूप है। म -- "ग्नि रुदयते पाए अरु मुग्निरूप . پخت ونشد ۱۸ १९॥ प्रमोपनिषद ॥स एष वैश्वानरी विश्वरूपः पागो- ॥ग्निरुदयते । तदेतद्दचाभ्युक्तम् ॥७॥ ॥ विश्वरूपं हरिएणं जातवेदसं परा- गयएज्योतिरेकं तपन्नम् ॥ उदय होता है। जो वैश्वानर विश्वरूपहै सो विश्व का उप्रात्माहोनेसे प्राण गुरु अग्निरूपहै अरु सोई भोक्ता दिन दिनविधे सर्वदिशाको अपनारुप उप- पनि प्रकारारुप करताना उदय होताहै। अरु तिदेतत्वाभ्युक्तम् " सो यह ऋचाने भी कहाहै - सी यह कथनीय वस्तु भागेके अष्टम वाक्यमय वेदके मंत्ररूप ऋचाने भी कहाहै। ८॥हे सौम्य ।“विश्वरूपं हरिण जातवेदर्स परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम्" (सर्वरुप किरण वाला ज्ञानवान पाश्यय ज्योति अद्वितीय एक नापके करनेवाले अर्यात सर्वरुप किरणोयाला ज्ञान्वान् सर्वप्राणका प्राश्रय अरु सो सर्वप्रा गियोंका चक्षुरुपज्योनि दैत अरु तापक्रिया के करनेवाले अपने प्रात्मरुप सूर्यको प्रह्मवेत्ता पंडित जानते भये ॥ १०॥ कौन यह है कि जिस को प्रह्मवेत्ता पंडित जानने भये ॥ ३० ॥ "संह- खरपिमः शतधा वर्नमानः"अनेक किरपोदार لاولی. ۱۹ पथमप्रमा ॥सहस्सरपिमः पातधा वर्तमानःपाण: ॥जानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ४ ॥ ॥संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्पायने द-॥ पक्षिाञ्चोजरज्वानोवै नदिष्टापूले कृत- ॥मित्युपासते ते चान्दमसमेव लोकमभि ॥जयते ॥ अरु समेकप्रकारकरके पर्तमान प्रान् उप- नेकप्रकार प्राणियोंके भेवकरके पर्ततामा रु-"प्रजानामुदयत्पेष सूर्या"। पूजामोंके मध्य उदितहोताहै यह सूयं है --पुजा(पाग- धारि) यौके मध्य चैतन्यरुपनाकरके उदित (ए. कट) होता है जिसको ब्रह्मवेत्ता पंडित यह सूर्य है ऐसा तिसको जानते भये ॥ 7 ॥ हे सौम्य जो यह अन्तरुप मूर्तिमय च- न्दमाहै अरु अन्नका भोता अमूर्तमय प्राण प सूर्य है सो यह एक हीजोडा सर्वरूप है। मरु यह दोनो मेरी बहुतसे प्रकारको प्रमाको करेंगे। प्र०॥ कैसे करेंगे ॥उ.॥ चन्दुमारूप अन्न अरु सूर्य्यरुपप्राएको संवन्सर प्रादिक दारा प्र- जाकी उत्पत्तिका कर्तृत्वपनाहै सोई यहां चेदभ- गवान् कहते हैं । “संवत्सरो वै प्रजापतिः।।
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॥२०॥ ॥प्रमोपनिषद॥
मनासर ही पुजापतिहै। अर्थात् संवत्सरुप
जो काल है सोई प्रजापतिहै। क्यों कि संवत्सर
को तिस प्रजापति करके निर्वाह किया है नाता
अरु जिसकरके चन्दमा अरु सूर्य इन दोनोसे
निर्वाह करनेयोग्य जो तिथि दिवस रात्रिोका
ममुदायरुप जे संवत्सरहै सो उन चन्द्र गुरु।
सूर्यसे उपपयक होनेसे सोईरुप है। जिसकर
के सो संवत्सर भी वो युंगलरूप ही है। ऐसे
यहां कहते है । "तस्पायने दक्षिणचोतरच
निसके दक्षिण अरू उत्तररुप दो प्रयन (मागे
हैं। अर्थात् निस संवत्सररूप पुजापतिके द.
क्षिण अरु उत्तर यह दोनों प्रसिद्ध छ. छः।
मासस्प उप्रयन (मार्ग) है। उपुर जिस दक्षिा।
अरू उत्तर मार्गकरके सूर्यजी है सो कमसे के.
वल कर्मिए अरु उपासनाकरके युक्त कर्मकरने
याले जनोके पावने योग्य लोकको पावनक
राहा जाताहै ॥ पृ०॥ सो कैसे है । उति-
ये वै तर्दिष्टापूत्ते वातमित्युपासते" जो ऐसे।
निश्चयकर निस इए अरु पूर्तरुप कृत (कर्म)
को उपासते हैं। अर्यात् केवलकर्मी अरु कर्मर
उपासनाके समुच्चय सेवनकरनेवाले जनहैं जिन
में बालपादिको विने जो जन इसपकार निश्चय
करके तिन रष्ट अंक पूर्न अति [अग्निहोत्र,
پی اوچی- آم पृथमपूष्मा॥ ॥२॥ तप, (रुच्छचान्द्रायणादि)सत्यभाषएा देव तोकार पाराधन अतिथिपूजन अरु वैश्वदेवरुप जो क- मह तिनकों अथवा पंच यज्ञरूप नित्यकर्मकी। इष्टा कहते हैं गुरु वापी, कूप,तडाग, अरु देवाल- य, अन्नदान, उपृरु देवतापोंक निमित्त प्रारामा- दिक वनवावने, इत्यादि जो कर्म हैं सो पूर्त है 74 इत्यादि जे कर्महे तिसकी ही उपासते (यथा- विधि करते हैं प्रचात (नहींकरनेयोग्य) निस को नहीं । ते चान्दुमसमेव लोकमभिजयने। सो चन्द्रमाविषे भये लोकों ही पाचते हैं। - र्थात् जो पुरुष निषिद्ध कौकों त्यागके इष्टापूर्ती रुप कर्मकों उपासते हैं सो चन्दमंडलविये उभय रुप पूजापत्तिके पंपामय भोज्य (अन्न ) रुप लो कोंकी ही पावते हैं क्यों कि चन्दमाविषे भयेलोको को कर्मरूपत्व होने से । अरु ।" एव पुनरावर्तन्ते सो युनः प्रारत्ति होते है। अर्थात् जो पुरुष इटा पूतादि कर्मकरके चन्दलोकको पावतेहैं सोई पु- रुष अपने पुण्यकका भीगोंहारा क्षयहोने से। पुनः जन्म मरणरुप पावृत्तिको ही पावते हैं उनका प्रावागमन नहीं छूटता।"तस्मादेते ऋषयः प्रजा कामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते" ताने यह ऋषि अरु प्रनाकामा दक्षिणायनसे पावते है। अर्थात् चन्द लोककों प्रामभये पुनः दूसलोक विषे पानते हैं।
॥२२॥ مریم اوشیدم ॥प्रमोपनिषद॥ ॥त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेते मृषयः॥ आपूजाकामा दक्षिण प्रतिपद्यने एष ह वै॥ ॥रयिर्यः पितृयाण: ॥ ६ ॥ ताते यह स्वर्गके इटा मृर्थात् चन्दलोकके दुष्टा क्यों कि चन्दलोककों भी रचर्गत्वहै। ऋषि गुरु प्रजादी कामनावाले ग्रहस्थ सो कहेप्रकार उपन्न मय पूजापतिरुप चन्द्रमाको कर्मोका फलरूपहोने करके इष्ट गुरू पूर्तरुपकर्मसे निर्वाह करते हैं। एतदर्थ अपने पूएयकर्मरूप ही दक्षिणायनमार्ग से उपलक्षित (लखायेद्गुए) चन्दलोकको पावने हैं। पुरु ।“एम ह वै रयिर्यः पिझ्याण" यह पित्यान निश्चयकरके प्रसिद्ध उपन्नहै। प्रति यह जो पितृयानकरके खक्षित चन्दमाहै सो नि- श्रयकरके प्रसिद्ध अन्न ही है । २०॥ई सौम्य ।"थोत्तरे। तपसा व्रह्मच- पेशा हया विद्यया" ।अव उत्तरमार्गकरके। तपकरके ब्रह्मचर्यकरके भड़ाकरके विद्याकरके अर्थात् दक्षिणायनसे इतर जो उत्तरायनमार्गति- सदिये जो चखनेवाले पुरुषहैं सो तप (पाएाया- मादि) करके, अरु शमदमादि लक्षएारूप उस- चर्यकरके, अरु विश्वाससक्षगरूप श्रद्धाकरके।
پرشین اسفند ۲۳ ॥प्रथमपुमः१॥ ॥२३॥ ॥ उपयोत्तरेण तपमा ब्रह्मचर्येगा। ॥श्रड्या विद्ययात्मानमन्विष्यादित्यम-1 ॥भिजयन्ते ॥ गुरु विद्याकरके , अर्थात् प्रजापतिके तादात्म्यको विषयकरनेवाली अहमग्रे उपासना तिसकरके "शात्मानमन्विप्यादित्यमभिजयन्ले"ात्मा- को जानके उपादित्यकों पावते हैं। उपृथति सम- स्न स्थावर जंगमके पात्मा अरु पाणरूप सूय्यै को प्रहपस्मि भावसे जानके प्राणमय सर्वर पन्नके भोक्ता सूर्यलोको पावना है । "मित पाएनामायतन मेतदमृतमभयमेतत् परायएंगे यह ही प्रायोका प्राश्रयहै (अरु) यह ही पु- विनाशिहै (परु ) यह ही अभयहै (अरु)यहही परमगतिहै। पृर्थात् यह ही जगदात्मा सूर्यो। सर्व पापोका समष्टिरुप आश्रयहै अरु पह ही पिनापिहै ताहीतें भयरहित अभयहै यह। चन्दुमावत् वृद्धि क्षयके भयवाला नहीं। उपरु यह केवल उपासनावाले पर्याद पञ्चाग्निविद्या पृरु वैश्वानर आदि विद्याकी रीतिसे पृथवा पाल एग सूर्य प्रादिकोंकी गृहमये उपासना करनेवाले। अरु कर्मउपासनाके समुच्चय सेवनकरनेवाले पु- रुषोंकी परम गतिहै क्यों कि । एतस्मान्न पुनगव- ॥२४॥ ॥ध्मोपनिषद् ॥ एतद पाणानामायतनमेतदमृतम-॥ ॥भयमेतत् परायणमेनस्मान्नं पुनरावन-॥ न्त इत्येष निरोधस्तदेयश्लोकः॥१०॥ नन्न। इससे पुनरावृत्तिकों पावते नहीं अर्थात् जैसे उपासनासे रहित केवल कर्म करनेवाले पु- रुप चन्दलोकको पायके फेर इसलोकधिये उपा- चते है, तैसे उपासनाके करनेवाले किंवा समुच्चय के करनेवाले सूर्यलोककों पायके पुनरावृत्तिकों पावते नहीं । अरु ।“इत्येप निरोधः। ऐसे यह निरोधहै। पृर्थात् तिस उपासनासे रहित होने करके सूर्य्य (उत्तरायण) से रोकेहुए केवल। वर्मकरनेवाले प्रविहान पुरुष पात्मा पुरु पान एण्मय संवत्तररुप सूर्यको पावते नहीं जाते। इसप्रकार सोई यह संवत्सर अविहानोका प्र. नावृत्ति में निरोधहै । अरु ।"तदेय श्लोकः"- तिसविषे यह श्लोक है। उपर्थात् इस कहेहुए म र्थविषे यह अग्रिम एकांदपावा याक्यमय श्लोक रुप चेदका मन्त्र प्रमाणाहै ॥ १० ॥ ९९ ॥ हे सौम्य । पञ्चपाद"पंच पादहै। अथात् इस संवत्सररुप सूर्यके पांचऋतु पादों (चरएणे) वत् पांचपादहैं [ दो दो मासके ऋतु mutne ॥प्रथमप्रक्ष्मः॥ ॥२५॥ ॥पंचपादं पितरं हादप्राकृति दिव।। ॥याहुः परे अई पुरीषिणम् ॥ यद्यपि छ हैं तथापि यहां जो श्रुतिने पांचवानु क- हीहै सो हेमन्त पुरु पिपिरकी एकरूपता होने- से कहीहै]निन ऋतुरुप पोचपादोंकरके यह । सूर्य जैसे चरणोंसे पुरुप से पताहै ताते इ. सकों पांचपादवाला कहते हैं। गुरु "पितरं"। पिताहै। जिसको पांचपादवालाकहते हैं तिसर संवत्सररुप सूर्यको प्रमादि सर्वका जनकपना। होनेसे इसकों पितर कहते हैं । अरु ।“ग्दा कृति" बारह अवयववालाहै। जो पंचपादवा- ला सर्वका पिता संवन्तररूप सूर्य्यहै जिसके द्वा- दपामासात्मक घटऋतुरूप - सवयच नाते इस- को हादशा कति कहते हैं अथवा हादपामासोंकर के इस संवत्सररुप सूर्यके प्रक्यवीभावका क- रताहोताहै एतदर्थ हादपामासमय घनुरुप इसके अवयवभावमें करनाहै नाते इसको हा. दारूति कहते हैं । अरु परे प्र. पुरीपिणम्। पर ऊचे स्थान विधे जलवालाहै भाकामारुप पन्तरिक्षलोकसे पर ग्रह ऊंचेस्थान तीसरे वर्ग- विषे स्थितहै तानें इसको परे अर्वे करके कहाहै। पृह जलयालाहै। अर्थात् मादित्यानायनेसृष्टि ।
५२६॥ प्रमोपानपद्॥ गप्रथेमे उपन्य उ परे विचक्षणं॥ ॥सचक्रे षहर माहुरपितमितिः॥११॥ इस स्मृति के प्रमाणसे । अरु सूर्य जब बहात तप नाहै नप जलकों वर्षनाहै यह प्रसिद्ध प्रत्यक्ष य. लाए है नाते सूर्य जलवालाहै ऐसे कालकेवेत्ता कहते हैं । अरु । "उपुयेसे अन्य उपरे विचक्षणं । पर यह मन्यतो निस निपुण (सर्वस) को।। “सपचके पडर माहुरर्पितमिति"सान चक्रवि प अर्पितहै ऐसा कहतेहैं। पुर्यात् सात अश्वरूप अगवा (सप्न ग्रहरूप अपव (क्यों कि सूर्यकेसाथ श्मएकरनेवाले होनेसे प्ररु पद ऋतुवाले हा- दपामास इस निरन्तर गतिवाले कालरुप चक्र- चिपे जैसे रथकी नामिविये अरा अर्पितहोतेहैं है, से, यह सर्व जगत् अर्पित है ऐसा कहते हैं । हे। सौम्प जन संवत्सररुपसूर्य अपम पक्षविषे पांचर पाद गुरु हादसा मारुतिवासाहै उपरु जब दूसरेप- सविषे सप्त अवरुप गुरु पद्ऋतुवाला ऐसाक हाहै [तहां पर भावहै कि प्रथम पक्षविये ऋतुओं के पादपनेकी कल्पनासे गुरु हादपामासोंके उप- वयवपनेकी कल्पनासे सूर्य्यरुपकरके संवत्हररुप कालात्मा ही कहा। उपर दूसरे पसलिये हेमन सम् शिशिर इन दोनो ऋतुकों (कि जिनकों पंच ॥२७॥ rfnaire प्रथम प्रध्मः॥ ॥मासी वै प्रजापतिस्तस्य कृष्लपक्ष आएव रयिएक्लः पास्तस्मादेते ऋषयः ॥पल इष्टिं कुर्व नीतर इतरस्मिन् ॥१२॥ पादनके वर्णनमें एकरूप कहाहै) भिलकरके षट् ऋतुओंकों रथयक्रगत अनेक वक्रकाष्ठक परेपनेकी. कल्पनासे संवत्सरकों चक्रवत्। भमणरुप गुणके योगसे चक्रपनेकी कल्पना करके अरु कालके मरव्यभावसे सर्वका प्रा- श्रय होनेकरके भी सोई संवत्सररुप काल ही। कहाहै । ताते इन कहेहए दोनोमसमें जो भेद है सो भी गुणके अरु कस्यनाके भेदसे भेदहै कुछ कालरूप धकिा भेदनहीं ] एतदर्थ सर्वप्रका- रसे संवत्सरमय कालरुप अरु चन्द्र सूर्य्यरुपन हुआ भी प्रजापति ही जगतका कारण है ॥११॥ १२॥हे मौम्य जिस संवत्सरविषे यह विश्व स्थितहै। अर्थात- [संवत्सरकों भी मास अरु दिन रात्ररूप अपयर्वोवालाहुए विना प्रौषधी प्रादिकोंकी जनकाताका प्रभावहै अरु पूर्व। "इसकों पिता करके कहाहै नाते अब उससेवन सरकी मास आदिक रुपताकों कहतेहैं] -सोई, अर्थात जोमासादि अवयवोंवालापौषधीकापिता ॥२०॥ ॥प्रमोपनिषद् संवत्सरनामवाला प्रजापति अपने मंवयवरुप मासविधे समस्त पूर्ण होताहै। ताने-मासो वै प्रजापतिः" मास ही प्रजापनिहैमासजो है सो अन्न अरु अन्नका भोका इन उमयरु- पवाला संवासररूपवाला, प्रजापति ही है। न- स्य रुक्ष्मपक्ष एवं रयिः"तिसका समापन ही अन्न है अर्थात् भोग्य भोक्ता उभयरु पवाला जो मासहै निस मासरूप प्रजापतिका ए- कभाग जो कमपक्षहै सोई अनरुप बन्दमाहै। अरुनाशलः प्राणा:"1 पक्ष प्राणहै। अर्थात् रूक्ष्मपक्षसे इतर दूसराभाग जो माल पक्षहै सो पाए अरु अग्निमय भोका सूर्य्यहै। "नस्मात् एते ऋषयः एल इष्टिं कुर्वन्ति"lim ने यह ऋपिलोग यज्ञकों शक्लपक्षविषे करते हैं एतदर्थ-जिसकरके पालमक्षरूप मागको सूर्य रुपही देखतेहैं अरु जिसकरके एलपक्षरुप प्रागसे भिन्न जो सध्मपक्षरुप पन्नहै तिसकों वे नहीं देखते । ताने ऐसे देखनेवाले जे पिलो गहें सो अपने ए-यज्ञकों कृष्णपक्षविषे करते। हुए भी एलपक्षविये ही करते हैं। उपरुन।" तर इतरस्मिन् १२॥ इतर तरवि करते है। -प्राणके दृष्टासे जे अन्य ऋषिलोग, सो तो। एलपक्षकों सत्मिा प्रारूपं देवते नहीं किंतु پشم ولد ۲۹ ॥प्रथमप्रमः॥ यहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेवर ॥प्राणो रानिरेव रथिः पाणी वा एते ॥ ॥स्कन्दन्ति ॥ प्रारुपसे नदेखनेरुप कमपक्षके भावकों प्राप्त भये लपक्षकों ही देखते हैं वे ऋषि पने इष्ट यज्ञकों परल्लपक्षविषे करतेहुए भी । तिससे सन्य कृस्मयक्षरिये ही करते हैं ॥ १३॥ १३॥ हे सौम्य वारहवें मन्नसे कहा जो मास- रुप प्रजापति सो भी अपने अवयवरुप दिन। अरु रात्रिविषे ही पूर्णहोताहै एतदर्थ सो।" होरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरव प्राणो रात्रिरेव रथि "दिनरनि निश्चय प्रजापति तिसका दिवस ही प्राणहै (अरु) रात्रि ही अन्नहै। अर्थात दिनरा विरुप जो एक प्रजापतिहै जिसका भी दिवस है। सोई प्राए अरु अग्निरुप उनका भोक्ता सूर्य अरु रात्रि जो है सोई अन्वरूप भोग्य चन्दमाहै। गुरु-"पाए वा एते प्रस्कन्दनि ये दिधा रत्यार संयुज्यन्ते। जो दिवसमें मैथुनको करते हैं सो दिवसरूप पाणकों खोचते हैं जो पुरुष अपनी अश्विकताले वासये दिवसमें प्रतिकी कारण ची तिसके साथ मैथुनकर्मकों करतेहैं सो पुरुमा ॥३॥ معاون درهم ॥प्रमोपनिषद् ॥ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्य- ॥मेव नद्यदानी रत्या संयुज्यने.॥ २३॥ - दिवसरुप पाएको रचोचते हैं । हे सौम्य जब यह ऐसेहै नब दिनमें मैयुनकर्म करने योग्य नहीं इसपकार जो दिवसमें मैथुनका निषेधकहाहै सो प्रासंगिक कहाहै । अरु ब्रह्मचर्य्यमेव नद्यदात्रो रत्या संयुज्यन्ते" जो रात्रिविषे मैथुनकों करते हैं सो वह्मचर्यही है जो विवेकी पुरुषहैं सो ऋतु- कालमें भी रात्रिके समय ही अपनी स्त्रीके साथ मैथूनकर्मकों करते हैं सो उनका ब्रह्मचर्य ही है। सो, श्रेष्ठ है नाते तुकालमें रात्रिविषे ही स्त्रीसे संयोगकरने योग्यहै ॥ है सौम्य यह ऋतुगमनकी विधि जो कही है सो भी प्रासंगिक ही कही है। रुपब जो प्रसंग पूर्वसे चलाहै निसकों श्रवणकरो। यह जो दिवस रात्रिकप प्रजापति कहाहै सो व्रीहि kधान्य) पदादि उपन्त्ररूपसे स्थित भयाहै॥ १३॥ १४ ॥हे सौम्य इस कहप्रकार क्रमकरके दिन विरुप प्रजापति अनधिये परिसमान होता है । एतदर्थ । “अन्नं वै प्रजापतिः"। अन्न भी प्रजापः तिहै। पु०॥ है भगवन् निस भन्नकों प्रजोत्पदनप नासैसे है । उ० ॥ "नतो ह वै तनः। ताते تولید او . प्रथमप्रक्ष्मः१॥ ॥३१॥ ॥अन्नं ब्रै प्रजापतिस्तती ह वै तदेत-॥ ॥स्तस्मादिमा: प्रजाः प्रजायन्त इति ॥४॥ प्रसिह ही रेत होताहै। अर्थात् भोजनकियाजो मन नहै निस अन्नसे सर्वलोकविरव्यात मनुष्यका वीज- रूप रेत (वीर्य) होताहै-[ यहां पुरुषके वीर्यकार चाची रेत पाब्दहै सो स्त्रीके रजरुप श्रोएिनके भी ग्रहणार्थमें है। क्यों कि वीर्यरुपताकरके दोनोंकों तुल्यत्वहै ताने] सो प्रजाका कारण है-"तस्मा- दिमाः प्रजाः पुजायन्न इति"तिससे यह पूजार उत्पन्नहीतीहैपृर्थात् निस अन्नके परिणाम रेत से यह मनुष्यादि प्रजा भली प्रकारसे उत्पन्न होतीहै ॥ १४ ॥ हे सौम्य हे कवन्धीन् नैने जो प्र. मकियाथा कि कुत्तो ह वा इमाः पजाः प्रजायः न! किससे यह प्रजा उत्पन्न होती है । सो उक्त- प्रकार दिनरात्रिपर्यन्न चंद्रसूर्यसूप दोनो उप्रादि- कके कमसे अन्वरूप रेनहारा सर्व प्रजा उपजे है ऐसा श्रुतिने निर्णय कियाहै ॥ १४ ॥ २५॥हे सौम्य जब श्रुतिके सिद्धानसे उन क्तप्रकारहै तब ।“जोह तत्प्रजापनिवृतं चरनि जो प्रसिद्ध तिस प्रजापतिले रतकों करता है। अर्थात् श्रुति सिद्धान्त प्रमाण जो प्रसिद्ध गृहस्थ مرغن اولدهم ॥३॥ प्रमोपनिपद्॥ नये ह तत्पूजापतितंचरन्ति ॥ . ॥ मिथुनमुत्पादयन्ते । नेषामेवैष वह्म-॥ लोको येषां तपो ब्रह्मचर्य येपु सत्यं ॥ ॥प्रतिष्ठितम् ॥ १५ ॥ . सो निस ऋतुकालविये कि श्रुतिशास्त्राचार्योने नियम कियाहै, स्त्रीसहगमनरूप प्रजापतिनामक व्रत तिसकों करतेहैं - । “ने मिथुनमुत्पादयन्ने । सो दोकों उपजावते हैं। अर्थात् जो पुरुष 3- तलंक्षणवाले प्रजापतिके वृतकों करते हैं से पुत्र अरु पुत्रीरूप जोडेकों उपजावते हैं। यह उनको रए फल है । अरु चन्द्रमंडसरूप ब्रह्मलोक उन- को पहर फलहै ॥०॥ हे भगवन् जय केवल • ऋतुकालमें भार्यागमनरुप प्रजापतितके उपा- चरामात्रसे ही चन्द्रमंडलरूप अदृष्ट फलकी प्रा- निहोनीहै तब इसवतवाले जी मूर्व पुरुषहैं कि मोतपादिक नहीं जानते तिनकों भी उक्त फल की प्राप्तिहोगी ॥ उ•॥ हे सौम्य तपादि साधन रहित केवल यथाविधि ऋतकालमें भार्यागमन मात्र प्रजापतिततके करनेसे चन्द्रलोकरुप ग्रह्म- लोयाकी प्राप्ति नहीं किन्नु ।“ सेनामेधैप वृहमलो को येषां तपो वृनचर्य येषु सत्यं प्रतिषितम्। जिनको तप वृह्मचर्य है अरु निनधिषे सत्य اثر اوت ۳۳ ॥प्रस्मोपानषदा ከl तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न । ॥येषु जिलमनृतं न मायाचेति ॥१६॥ इति प्रमोपनिपत प्रथम प्रध्मः१॥ वनना है निनकों ही यह ब्रह्मलोकहै। पृर्थात् । जिनपुरुषों की इछादि तप,वारहवर्षतक पहुए वेदको समाप्तिरुप स्नातक वृतादि , पुरु ऋतुका लधिषे अरु अन्यकालविधे मैथुनका असमान पाचरणरूप ब्रह्मचर्यहै। अरु जिनविषे मिथ्या भाषका त्यागरूप सत्य पृव्यभिचारतासे वन- नाहै। अर्थात् जो ग्रहस्थ पुरुष यथासमय ल. छचान्द्रायणादि चनरुप नयको करने हैं अरू पर स्त्री गमनके त्याग पूर्वक केवल ऋतुकालमें ही स्वभार्यागमनरूप ब्रह्मचर्यको करने सरु जि- नधिये पृसत्य भापका त्यागरुय सत्य निरन्तर वर्तताहै। ऐसेजे इशापू दिधर्माचरणपूर्वक प्र- जापनिवृतरूप दक्षिाएन सारके चलनेवाले। पुरुषहै तिन ही को यह चन्दमंडलविषे पित्यान- रूप ब्रह्मलोककी पालिस्य पदस फल है ॥ १५ ॥ २६॥ हे सौम्य च और श्रवणकरो जो पड़ द है अर्थात् चन्द्रमाके वह्मलोकवत् मससहित अरु वृद्विक्षयादिक दोषकरके युक्त नहीं शुरु کناریوم ॥३४॥ पक्ष्मोपनिषद॥ सूर्यकरके उपलक्षित उत्तरायणरूप याहाका जान त्मभाव, पर्थात सो सर्वका भोक्ता प्रजापत्ति पा- एमैं हौं ऐसाभाषहै यह निनकाहै ॥ प्र०॥ हेभ- गवन् यह किनकाहै ॥ उ०॥ हे सौम्य ।“न येषु जिह्ममवृतं नमाया च" जिनविये कुटिलभाव अरु सत्य नहीं पुनः माया नहीं पृर्थात् जैसे ग्रहस्प पुरुषों की अनेक विरुद्ध व्यवहारिक प्रयो जनवाला होनेसे कुटिलभाव अयस्यहोनाहै नैसे जिन पुरुषोंविषे कुटिलभावनहीं । अरु जैसे गृह स्थपुरुषकों क्रिडा (रमण) हास्यादि व्यहयारके समय असत्यभाषण नियधकरने योग्य नहीं। निसे जिन पुरुषोंचिये क्रिडामादिक व्यवहारके - भावसे सो तन्निमित्तक असत्य भी नहीं प्ररु जिन पुरुपोंविषे गृहस्थोवत् माया अर्थात् कपट प्रथा चा असत्यादि दीपोंवत् अन्य दोष नहीं। हे सौ- म्य इसप्रकार जिन ब्रह्मचारी वानप्रस्थ गुरु सं- न्यासीरुपन[ यहां संन्यासी पदकरके परमहंसोते इतर जे कुरोचक पहुदकादिहैं जिन्होंका ग्रहा है। क्यों कि उन परमहंसोंको बसलोकसे भी अपीघ.. वैराग्यहै नाते] अधिकारियों विये क्रिडादि मि- मिनों के प्रभावसे प्रसत्यादि दीप नहीं-नेपा मसौ विरजो ग्रहह्मलोकों" तिनका यह निर्मल बह्मलोकहैत जिन पुरुषोंमें किडा.दि
طرح اویه کم
प्रथम प्रमः॥ ॥१५॥
निमित्तके अभावसे असत्यादि दोपोंक भी अभाव
है तिन पुरुषोंका निर्मल साधनों के अनुसार यह
रजनमादि दोपरहित निर्मल वललोकहै। "इति"
ऐसीयह प्राणादिकोंकी उपासना सहित इटापू
नादिकर्म करनेवाले की उजरायणरुप गति है।
अरु पूर्व कहा जो चन्दलोकरूपी ब्रह्मलोक की।
प्राति सो केवल कर्मके करनेवाले जनोकी दसि-
गायन गतिहै ॥ १६ ॥
इति प्रमोपनिषद्त पुथम प्रमः॥
॥भाषा टीका
समामा
॥हरिः॥
पतन सन्वय॥
॥९॥
چوہدری ارشد ۳۶ ॥प्रमोपनिषद्।। ॥अथ प्रथमोपनिषद्गत हितीय पध्मः॥ ॥ अथ हैनं भार्गचो वैदभिः पप्र-॥ ॥च्छं भगवन् कत्येव देवाः प्रजा विधारना आयने कतर एतत् प्रकाशयने कः पुन-॥ ॥रयां वरिष्ठ इति ॥ १॥ १७ ॥ ॥अथ प्रमोपनिषहंत द्वितीयं प्रम। ॥भाषाटीका प्रारभ्यते ॥ हे सौभ्य [अब यहांसे अन्य हितीय गुरु वृत्तीय इन दो परमोंका कहेहुणे पृथमय- मसे जो सम्वन्धहै सो कहते हैं। प्रथम प्रमवि- घे प्राणको भोक्ता अरु प्रजापति कहाहै नहीं पाणकों ने श्रेष्ठापना भोक्तापना प्रजापतित्व पना कहा तिनादिगुणोंके निर्धारणार्थ यह दि. तीय प्रध्महै क्यों कि "कुत्ता विश्वस्य सत्यति भोक्ता जो है सो विश्वका श्रेष्ठ पतिहै। ऐसा इस द्वितीय प्रहमके ११में वाक्यसे कहाहै, अरु "एपोग्निस्तपति यह अग्निरूपमा तप- ताहै। यह इस हितीय प्रहमके पांचवें वाक्यसे। प्रारंभकरिके "प्रराव रथनाभौ पाणे सर्च प्रतिधित ! रथकी नाभिविषे पुरानोवत् पाए। विपेसर्व यह स्थितहै। इस पष्टवाक्यसे उपर 'प्रजापतिश्चरसि गर्ने बमेव प्रतिजायसे! - پیشاوند द्वितीय पध्मः॥ जापतिरूप नहीगर्भविषे विचरताहै अरु माता पित ताके तुल्यहन्या जन्मताहै। इस सामवाक्यसे पाणको प्रजापति ग्रादि प्रतियादन कियाहै ताने माएका पूजापत्तिवपना पुरू सनका भोकाम- ना निश्चयकरने योग्य ही है। उपरु यह प्रजाप- निपनेका अरु भोक्तामनेका जो कथन है सो। पाणके अन्य गुणोका उपलक्षणहै। यहां यह भावहै कि प्रथम प्रमधिषे कहीगई जे कर्म उ- पासनाकी गति लिसके श्रवपासे वैरायपील भये पुरुषकों भी चित्रकी एकम्गूना (अनियों- का निरोध) भये विना प्रागे प्रात्मतत्त्वकी। श्रवणकी सिद्धताहै नाते उनपुरुपोके अर्थ पाएकी उपासनाके स्त्रिये अब हितीय उपरुन- तीय इन दोनों प्रक्ष्मोका प्रारंभहै । तिनमें भी पाएपके जेष्ठ श्रेष्ठत्वपने अरु भोक्तापने गुरु प्रजापति प्रादि गुणों के निर्णयार्थ द्वितीयपमहै। अरु निस पागकी उत्पत्यादिकोंके निर्णयपूर्वक निसकी उपासनाके विधानार्थ तृतीयपमहै यह भी जानना] १॥हे सौम्य प्रथम पध्मविधे। प्राणोजा सजापतिः ऐसा कहाहै । ताते प्रव उस पागका भोक्तापना गुरु प्रजापतिपना यह दोनो इस ही। शारीरविषे निश्वयकरनेकों योग्यहै इस पथके پیشب هم 3 ३eu ॥प्रमोपनिषद्॥ जतायनेके पूर्व इस दितीय प्रमका प्रारंभकर हैं।“अथ हैनं भार्गवी वैदर्भिः प्रपच्छ"। उप- ननर इसकी निश्चयकरके विदर्भदेशाका निवान सी भार्गव प्रसिद्ध पूछताभया अर्थात् कबंधी मुनिके प्रहन समानहोनेके पश्चात् इस सर्वज्ञ। पिप्पलादमुनिको उनकेवाक्यमें निश्चय पूर्वका विदर्भदेशका निवासी भार्गवनामवालामुनि सर्व में प्रसिद्धजे प्राण तिसविषयक प्रध्मकरताभया कि ।"भगवन् कत्येव देवाः प्रजां विधारयने" हे भगवन् कितने ही देवता प्रजाकी विपोष- करो धारणकरेहैं। पृर्थान् हे भगवन या- काशादि पांच भूत रु चक्षुरादि पांच ज्ञानेंद्रि- यां अरु वागादि पांच कमेन्द्रिया अरु मन प्र. रु.प्राए यह सनदशतत्वात्मक लिंगाभिमानि- त्येकतत्वके मिलके शादश देवता तिनविणे। कितने देवता इन सिररूप प्रजाकों-[ यहां प्रजा शब्दकार्थ शरीरही महाकरने योग्यहै जीवर नहीं क्यों कि जीवको प्राधारित्वपनाहै पत्तदः र्भ प्राण इन्दियाकरके जीव धारणकरनेयोग्य नहीं तातें यहां प्राएकरके धारणाकरनेयोग्य शरीररुप प्रजाही है] -धारतेहैं । उपहाकतर एनत् प्रकाशयने"1कितने रसको प्रकाशक रते हैं। प्रर्थात् ज्ञानेंद्रिय अरु कर्मेंद्रियकरने پرش اولد-۳۹ पक्षा ॥हितीयप्रमः॥ नस्मै स होवाचाकापो हवा एष। "देवो वायुरग्निरापः पृथिदी वाङ्मनक्षम क्षुः श्रोत्रच्च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति ।। ॥वयमेनहाणामवष्टभ्य विधारयाम ॥२२॥ पृथक् २भावकों प्रामभये जे देवता तिनके मध्य कौनसे देवता इस अपने माहात्म्यके प्रकटकर- नेरुप पुकापकों करते हैं अर्थात “पार्कपचती- निपाकको पचताहै। तदवत् अवकाशके देने प्रादिक अरु अवलोकनमादिक जो भाकामादि भूनोंका गुरु इन्द्रियरुप देवतापोकांजो अपना सपना माहात्म्यहै निसकों लोकोंविषे प्रकरकर- निरुप प्रकापकों कौनसे देवता करते है] पर “कः पुनरेयां वरिष्ठ इति" पुनः इनके मध्य ।। निस कौन है--फेर इन कार्य करारूप पूर्वोक्त सनदा देवतामोंकेमध्य प्रतिपाय कीर्निवाला गुरु श्रेष्ठ देव कौन है ॥ ९ ॥ १७ ॥ . २॥हे सौम्य उक्त प्रकार जर पिप्पलादमुनि से प्रहमकिया तव ।"तस्मै स होवाच"निसकों सो स्पष्ट कहनेभये अर्थात् तिस प्रमका भार्गवमुनिके पृर्थ सो पिप्पलादनामामुनिश्वर प्राचार्य प्रसिद्ध कहने भये कि है भार्गवा"प्रा.
پراوندم ॥४०॥ मोपनिपद। काशो हवा एप देवो वायुरनिरापः एथियी वाइ मनश्चक्षुः श्रीपञ्च। प्रकाश प्रसिद्ध यह देव है। वायु, अग्नि,जस,पथिवी. चाक,मन,चक्षु.श्रोत्र (यह। देव है); अर्थात् अका प्रसिद्ध यह देवहै [ यहां यह देय ऐसाजो कहाहै सो पागेकहनेके कथन प्रादि व्यवहारकी सिमर्थ प्रस चेतनपनेकी य- हचेतन है इस} संभावनाकेमर्थ यहां देव वि- शेषणहै। अरूदेव, इस पदसे जो अभिमानी का कथनहै सोतो प्राकापूपदिकोंके उभिमानी देवतामा गृहएार्थहै अन्य देवतापोंके ग्रह- र्थ नहीं। नाते यहां देव | इस विशेषणका था- युशादिकोंसे भी सम्बन्धहै] वायु देवहै, अग्नि देव है,जलं देवहै, पृथिवी देवहै, वापी उपनक्ष- करके पांच कमेदिया देव हैं, मन उपलक्षार करके निचतुष्टयापक पुनःकरण देव है, चस गुरु श्रोत्र इनउपलक्षणकरके पांच ज्ञानेनिया यह देव हैं। अर्थात् पारीरको प्रारंभकरनेवालेय प्राकामादि पांच भूत अरु चाएगी अरु मन अरु चक्षु सरु श्रोत्र इत्यादि सर्व ज्ञानेन्द्रियां अरु कर्मेंद्रियां अरु अन्नः करणरुस देव, पारीरको धारण करते हैं, जिन देवतानोंके मध्य पांचकमें- दिया अरु पांचज्ञानेन्दियाम जो देवहैं सो र पने माहात्म्यकों प्रकटकरभरूप (दनि श्रवणादि پس اوپشده ام ॥४॥ ॥हितीय प्रमा॥ रूप) कार्यकों करतेहैं। अरु कार्यरूपदेव अरु करणरूपदेव पृर्थात [ देहाकारसे परिणमकोंपा- पभये जे पाकामादि पंच महाभूत सो कार्यरूप देवता हैं गुरु ज्ञानेन्द्रियाँ अरु कर्मेदिया यह करणरुप देवहै ।"ने प्रकापयाभिवदन्ति" सो देव प्रकाप्रकरके कहने भये पर्थात् सो देव अपने माहात्म्यकों प्रकाशकरिके अपनेविषे श्रेष्ठत्वका अभिमानकरके परस्पर ईर्षाकोंकरते हुए कहतेभये ॥ पृ०॥ क्या कहते भये ॥3॥ "वयमेनहाणमवष्टभ्य विधारयामर्श हम्। इस शरीरकों अशिथिलकरके स्पष्ट धारने है। Kऐसे कहते भये) अर्थात् जैसे प्रासाद (बड़े- ग्रह) को स्पेभ धारते हैं तैसे हम इस कार्य कारणात्मक संघातरुप पारीरकों शिथिलकिये चिना.ही स्पष्ट धारतेहैं, इसप्रकार अपने विषे महत्वपनेका अभिमानकरके इन्द्रियरुप देवताय परस्पर कहते भये ॥२॥ १७ ॥ हे सौम्य इन्द्रियोंका परस्पर अरु प्रारणका जो संवाद सपागको मर्वमें ज्येष्ठ श्रेष्ठपना यह छांदोग्य उपनिषद्के चतुर्थ प्रपाठकमें एक भारख्यायिका रुपसे सविस्तर कहाहै ॥ ३॥हे सौम्य उक्त कार साभिमानहूये - ॥४२॥ اون پشم-۳۴ ॥प्रमोपनिषद् गतान् वरिएःप्राणा उचाचामा । मोहमापद्यथाऽहमेवैतत् पञ्चधा॥. आत्मानं प्रविभज्यैनवायामवष्टभ्य वि-11 ॥धारयामीति ॥ ३॥ १६ ॥ 1 पनेर श्रेष्ठत्वके अर्थ ईपापूर्वक परस्परमें वि वादकरते जे देवता । “तान् वरिष्ठः प्राणा उ- वाच"निनको मुख्य प्राण कहताभया iN पर्थात् तिन असत्य प्रभिमानकरनेवाले ई- द्रियारूप देवोंकों सर्वमें मुख्यदेव जो प्राण से कहताभया कि-"मा मोहमापद्यथा मोह को मत प्रापहो- विवेकताके वशभये इस असत्य अभिमानकों मतकरो। देखो- हमेवैतत् पञ्चधात्मानं प्रविभज्य"! मैं ही इस अपनेयापकों पांच प्रकारसे विभागकरके -मैं ही इस अपने पापकों, अपानादि भेदसे पो चप्रकारहोयकेन्।"एताणामवसभ्य विधारया मीति" इस पारीरकों अपियिलकरके स्पष्ट धारताही इस कार्यकारणात्मक संघातरूप शरीरको सिथिल न करके स्पष्ट धारजाहौ।। नाने तुम व्यर्थ अभिमान मतकरीं ॥३॥१६॥ ४॥हे सौम्य प्रकार जब प्राणने सर्व।
پشاوندی۳
॥हितीयप्रमः॥
तिथदधाना बभूवुः सोभिमा-॥
॥नादूर्द्धमुन्क्रमत इव तस्मिन्नुन्क्रामत्यथे।
नरे सर्व एवोक्रामने तस्मिथ्श्व प्रति ॥
॥ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते तद्यथा मक्षिा
॥का मधुकरराजानमुत्क्रामन्नं सएिवो-
क्रामने तस्मिथ्श्व प्रतिष्ठमाने सर्बा।
एव प्रानिष्ठन्न एवं वाङ्मनश्चक्षुः श्री।
॥त्रञ्च ते प्रीताः प्राणां स्तुन्वन्ति ॥४॥णा
इन्द्रियोंसे कहा तव ।“ते श्रद्दधाना बभूवुः
चे अश्रद्धावान् होतेभये पृर्थात् सो इन्दि
यरूप देवता विचारकरनेभये कि जो यह प्राण
कहता है कि मैं पाचप्रकारहीयके इस पारीरकों
धारताही सो असंभव है। इस प्रकार पाणकेचा
क्यमें अविश्वासवानहोतेभये नवन।“सोऽभि-
मानादूईमुन्क्रमन इव"।सो उपभिमानसे ऊंचे,
गमनकरनेहए वत् अर्थात्सो प्राण तिन इन्दियरु-
प देवतोंके सपनेवाक्यमें विश्वासको देख उपा-
प अभिमानसे उचेकों जानेहुएवात होताभया।
अर्थात् रोष (क्रोध)सहित इन्दियोकी अपेक्षा
से रहित हुन्या इस संघातरुप शरीरको त्यागना
भया। हे सौम्य उक्तपुकार इस शरीरसे प्राणके।
निकसजानेसे जो वृत्तान्तहुया तिसकों व वेद
پینا ولدهم ॥ध्मोपनिषद॥ दृष्टान्तसे स्पष्ट करहै । तस्मिन्नुत्क्रामस्यथेतरे। सर्व एवोत्क्रामने तस्मिथ्य प्रतिष्ठमाने सर्वर एव प्रातिष्ठने"निसके निकसनेसे पीछे उपन्य सर्व ही जातभये पुनःतिमके स्थितहुए सर्वही स्थितहोनेभये अर्थात् निस प्राणाके पीरसे निक सने पीछे और सर्व चक्षुरादि इंद्रिया भी जातेभये। गुरु पुनः तिस पागाके तूमी (चुप) होके बैठने से सर्व ही नूमींहोके पैरते भये ॥रान्त।"य- था मक्षिका मधुकरराजानमुन्क्रामन्ने सळ एचो- क्रामने" जैसे मक्षिका मधुवारराजाके निक- सि जानेसे सर्व ही निकल जाते हैं। प्रति जैसे मधु (सहत) की मरची अपने राजा मग्वीक। निकल जानेसे सर्य ही उस स्थानको त्यागके निक लजातीहैं। मृरु । तस्मिश्च प्रतिसमाने सा एव प्रातिष्ठन्न"।निसके स्थित हुये सर्व ही स्थित होते हैं । अर्थात् निस मधुकरराजा मरवीके स्थि तहुए अन्य सर्व मरवी स्थितहोती हैं। हे सौम्य जैसे यह उक्त दृष्टान्तहै । “एवं वाइनश्चक्षु. श्रोत्र व ने प्रीताः पाणं स्तुन्वनि "ऐसे वाणी (कमै दियां) मन, चक्षु पुरु श्रोत्र, (ज्ञानेन्द्रिया) सोपी निसे प्राणकी स्तुति करते भये अर्यात् उक्त दृष्टा नप्रमाण वाएी मन चक्षु मादि सर्व इन्द्रियारूप) देव पाणके माहात्म्पकों जान तिसविये प्रतीतवान 4 عددهم पहिलीयप्रमाण ५५म एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य्य एपपः॥ ॥र्जन्यो मघवानेष धायुरेष एथिवीरग ॥यिर्देवःसदसच्चा मृतञ्चयत् ॥५॥२१॥ होय अपने प्रसत्य महत्वके अभिमानको त्या ग प्रसन्नतापूर्वक प्राणकी स्तुति करतेभये ५॥हे सौम्य इन्दियां कहतीहै कि ।“पयो ग्निस्तपत्येष सूर्य एप पर्जन्यो"। यह अग्नि हुमा तपताहै यह सूर्य है यह मेघहै। अर्थात यह प्राण पग्निरूयहुमा तपताहै, नैसे यह सून >रुपमा प्रकाशाताहै, तैसे यह मेघरूपहुआ वर्षाकरताहै। गुरुना मघवानेय वायुरेथ एन थिवी रयिदेवः सदसञ्चामृतंचयता यह इन्द्र है ,यह वायुहै, यह पृथिवी है, यह चन्द्रदेव है.स न असत्, अरु अमृतजो है,(सो सर्व प्राणही है। यह इन्होयके प्रजाका पालन करताहै , 59रु.। असुर राक्षसोका नाप करताहै, सह यह प्रावह (उड़ायके ले जानेवाला) गुरु प्रवाह (वेगसेच लनेवाला) आदिक सात सगोंके भेदसे भेदेवा लाहुमा वायु मेघ अरु नक्षवादिकोंको भृमा वत्ताहै, अरु यह पृथिवीरुपहोके सर्वको धार- ताहै। अरु यह देव चन्दमाहोयके औषधि پرشنوند ۳۹ प्रमोपनिषद्। ॥परा इव रथनाभौ ग्राणे सर्वे ॥ प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजुषि सामानिम यशः क्षत्रं वाच ॥६॥ २२ ॥ प्रादिकोंका पोपणकरताहै। हे सौम्य विशेष क्याकहिये सत् कहिये सूक्ष्म अमूर्त अरुः सत् कहिये स्यूल मूर्त अरु देवतायोकी स्थि- तिका कारणाभूत जे अमृत है सोभी पाया ही है।५ ६॥हे सौम्य पुनः इन्द्रियारूप देवता विचा रकरते भये कि । “परा इव रथनाभौ प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम्"। (रथकी नाभिविषे अरान् यत् पा- पाविषे सर्व स्थित है। पर्यात् जैसे रयके चक्र (पहिया) के मध्यकाष्ठकों रयनाभि कहते हैं। निसधिपे मरा (रवडीलकडीयो) स्थित होती है। से इस उपनिषद्के पष्ठ पृष्मके ! पापाच्छ- हा वं वायुज्योतिः इत्यादि। प्रागसे श्रद्धा । पाका वायु नेज इत्यादिकोंकों सृजनाभया इस चतुर्थवाक्य प्रमाण श्रद्धा सादिले नामपर्यन सर्चका संघातरुप पारीर अपनि स्थितिकालमें। प्राणाविषे स्थित हैं। सर सेही ऋची या जसि सामानि यश सवं ब्रह्म च ऋग्वेन द यजुर्वेद सामवेद अरु यज्ञ क्षत्रिय अरुवा بین برنج- م ॥४७॥ ॥हितीय पृष्मः। 'प्रजापनिश्वरसि गर्भ त्वमेव प्रति-॥ ॥जायसे तुभ्यं प्रागः प्रजातिवमा चली। ॥हरन्ति यः प्राण प्रतितिष्ठसि ॥७॥२३॥ - लापान जैसे श्रद्धा सादिक कला प्राणवि. पे स्थित हैं, नेसे ऋग् यजु साम यह नीन वेदके तीन प्रकारके मन्त्र, अरु तिन मन्त्रों करके साधने। योग्य अश्वमेधादि यज्ञ, अरु सर्वके पालनकर्ता अरु डंडके दाता क्षत्रिय जाति राजा,प्ररु यज्ञादि क वैदिक कौके कानों में मुरव्य अधिकारी। सर्वोत्तम ब्राह्मणाजाति, यह सर्व प्राणके आश्रय होनेसे प्राण ही हैं ॥ ६ ॥ २२ ॥ .७ ॥ हे सौम्य दो मन्त्रसे कहे प्रकार विचार- के सर्व इन्दियां प्राणकी स्तुति करतीभयी । पूजा- पतिश्चरसि गर्भ त्वमेव प्रतिज्ञायसे"जो पूजापा निहै सोनूं ही है गर्भविपे विचरताहै अरु सदृश हुया जन्मताहै। अर्थात् कहतीभयो कि हे प्राण जो सर्वका प्रजापतिहै सोभितूंहीहै,अरु पिताके गर्भमें वीर्य रूपसे गुरु मानाके गर्भविषे पुत्ररूपसे जो विचरताहै अरु मो मातापिताके ही सराहुभा जन्मताहै सो तूं ही जन्मताहै, अर्थात हे प्राण तु, रको सर्वरुप प्रजापतिहोनेसे नेए मातापितापना ४॥ میل۔ م ॥पृस्मोपनिषद्॥ ॥देवानामसि वन्हितमः पिटणा पूथ-॥ ॥मा स्नधा। ऋषिएाचरितं सत्यमथ-।। वाङ्गिरसामसि ॥ ॥ २४ ॥ प्रथम ही सिद्धहै, एतदर्थ तूं सर्व देह अरु सर्वदेः हवालोके प्राकारोंसे काहुमा एक प्रांएमपस वत्मिाहै । अरु-"तुभ्यं प्राणः पूजास्तिमा वर्ती । हरन्ति यः प्राणैः प्रतितिष्ठसिहप्राय यह। पजातो तेरेपर्य बलि देते हैं जो प्रायोकेसाथ सर्व शरीरोंप्रति स्थितहैहे प्राण यह मनुष्यादि सर्व प्र. जा सो चक्षुरादिहारा रूपादि विषयरुप बलिदान। कर तेरे ही अर्थ देते हैं, कों कि जोतूं चक्षुरा दि इन्द्रियों साथ मिलके अरु उन सर्वको अपने साश्रय धारकें. सर्वका भोक्ताहुमा सर्वशीरोंवि. पे स्थित है, एतदर्थ सर्व तेरे ही पृर्थ चलिदान (कर देते हैं। इति सिद्दम् ॥ ७ ॥ २१ ॥ ॥हे सौम्य पुनः इन्द्रिया कहती हैं कि हे पा- प !"देवानामसि पन्हितमःपिए प्रथमा स्वधा। देवतापोंके मध्य वन्हितमहै पिलियोंकी प्रयम स्वधा अति रम्दादि देवतापोंके मध्य नं.च- न्हितम, कहिये प्रतिपयकरके बनकिये व्यको पात्रकरनेवालाहै। गुरु पितरोंके नान्दीमुरवश्राद्ध پاشناوی ۴۶ ॥हितीय प्रमः॥ ॥४॥ त्रिपे (जो कि भकार्यमें होता है जो स्वधारूपए- नहै सो देवतापोंके निमित्त हवनव्य देनेसे - थम होताहै एतदर्थ पित्तयोकं उपुर्य प्रथम जो स्व- धा सो नूंहै। अर्थात् पितृयोकै अर्थ रखधान्नका पाप्रकरनेवाला तूं है। सरु पिणाचरितं स- त्यमथर्वाङ्गिरसामसि" इन्दियोका अंगिरसरूप अथर्वण नामवाले (भये) ऋषियों (इन्दियों) का चरित सत्य (नूं ही है।) अर्थात चक्षुरादि इन्दिर यरूप प्रेगिरसप्रय नामचाले हुए भी उन ऋषियोंका [अर्थात "ऋप,जो धातुहै सो गति (ज्ञान) रुप'र्थविये वर्तनाहै। एतदर्थ ऋषिप- दका ज्ञानके जनक चसुरादिक इन्दियरूपपर्य है। परू इन्दियरूप प्राएाके सुभावहुए अंगोंकेरस- का शोषणहोता. देखनेसे उन.इन्दियरूप पाणों को अङ्गिरसपनाहै । अरु पाएो वा अथर्वा - लिश्रुति प्राण वा पृथर्वा है। इस श्रुतिके प्रमा एगसे निन इन्द्रियोंकों अथर्वापनाहै। यद्यपि मु- ख्यपागका अथापना श्रुतिने कहाहै, तथापि चक्षुरादि इन्द्रियों की भी उस मुरव्यपाएपके पसरुः म होनेसे अथर्वपदका प्रयवनि यह बहुत.. पनाहै, इति भावः] चरित अरु देह धारणादिक विपे उपकारकरनेरूप सत्य तूं ही है। ॥३४॥ रामः रामः रामः रामः रामः रामःएमः रामः रामः।
پرشن رو نشده ॥प्रमोपनिषद॥ ॥ इन्दस्व प्राण तेजसा रुदोसि परि।। ॥रक्षिता । वमनरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ।। ज्योतिधाम्पतिः ॥ ॥ ३५ ॥ .. ६॥हे सौम्य पुनः इन्द्रियों कहती भयी कि "इन्दुस्त्वं पाए तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता"। हे पाए। इन्दतं है, रुद्नहै, रक्षाकरनेवाला है। अर्थात् हे प्राण वीर्य (सामर्थ्य ) करके इन्दु (परमेश्वर) तूंहै, पृथवा हे पाए अपने सामर्थ्यकरके सर्व देवतामोंका अधिपति इन्दु न है} अरु संहारकरनेके सामर्थ्य से जगतका हराकरनेवाला रुद तूं ही है, गुरु स्थितिकाल विये सौम्यरुपमा जगत्का पालक-विमुभी नहीहै। अरु ।"वमन्तरिक्षेचरसि सूर्यस्त्वं । ज्योतिपाम्पतिःहान अन्तरिक्षविपे विचरता है (अरु) ज्योतियोका पति सूर्य्य तूं ही है। उन्नरिक्षादिमाकाशविषे निरन्तर विचरनेवा- सा तूं ही है। अरु उदय उपरु. पस्त होनेवाले सर्व ज्योनिगगोंका अधिपति सूर्य तूं ही है। इति सिद्धम् ॥ ६ ॥ २५ ॥ ५०॥हे सौम्य पुनः इन्दियां कहती भयो कि।हे.प्राए । “यदा त्वमभिवर्षस्पर्थमाः पापा شرف الف ॥हितीय पृष्मः॥ ॥५१॥ यदा त्वमभिवर्षस्ययेमाः पाएं। ते प्रजाः प्रानन्दरुपातिष्ठन्ति कामाया-॥ गन्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥ २६ ॥ ने प्रजाः"। जव न वर्षताहै तब यह पूजा पा- एगकी (चेष्टाकरेहै) अर्थात् जब तूं मेघहोयके वर्याकरताहै तव अन्नपायके यह पूजा पाए। की चेष्टाकों करेहै। अथवा । “यदा त्वमभिवर्य- स्यथेमाः प्रजाः"हे प्राण तेरी यह प्रजा तेरे। अन्नसे वृद्धिको पायिहुइ पुरु नेरी वर्षाके देखने माग्रसे ही“पानन्दरूपा तिष्ठन्ति कामायान्न भविष्यतीति १."पानन्दरूप स्थितहै ययष्ट पन्नहोगा। आनन्दको प्राप्त भयि स्थित है,क्यों कि ययेष्ट (इच्छाके अनुसार) अन्नहोगा । ऐ सा तिस वर्षाके देखनेवाली प्रजाका अभिप्राय है ॥ इति सिद्दम् ॥ १० ॥ २६ ॥ २९॥हे सौम्य पुनः इन्द्रियां कहतीभयो कि "वात्यस्वं प्राणोकपिरता विश्वस्य सत्पतिः। हे पाए खात्य तूं है एकपिदुमा भोक्ता तू है। प्रात् हे प्राण पतस्माज्जायते पाहा: तुरु को प्रथम उत्पन्नहोनेसे तुमसे पूर्व तेरा संस्कार करनेवाला अन्य कोई नहीं ताते नूं संस्काररहित شنونده ام ॥५२॥ ॥प्रमोपनिषद् वात्यस्त्वं प्राणैक ऋषिरता वि।। ॥श्वस्य सत्पतिः। वयमाद्यस्यदातार॥ ॥पिता त्वं मातरिश्वनः॥ २९ ॥ २७ ॥ वात्य (प्रसंस्कारी) है गुरु (जो ऐसाकहे कि। जिससे पाए उत्पत्तभया सोई उसका संस्कारक रनेवालाहै सो बने नहीं, क्योंकि जिस प्रात्मासे प्राण उत्पन्नभयाहै सो सक्रिय है } सस् ।“ए; कऋषिरता एकर्पिहुशा भोक्ता तू है पर्था त एकर्षिनामवाला अग्निरुपमा सर्व हरिया दिकोका भोक्ता तूं है। अरु ।“विश्वस्य सत्पतिः। विश्वका सत्य पति है अर्थात सम्पूर्ण जग- तका प्रत्यक्ष विद्यमान पति तूं है । पृथवा विषय का श्रेष्ठपति तू है । गुरु ।“ययमाद्यस्यदातार हम् भक्षणके दाता है। अर्थात् हम् कर्मी उपा सकलोक तेरे भक्षके योग्य हविषा (हवनकर- नेयोग्य वस्त) के दाता हैं । 39रु ।"पिता त्वं मा- तरि पवनः ११" है वायो हूँ पिताहै। प्रति हे अन्तरिक्षमें चलनेवाले वायु (पाए) तू हमारा पिनाहै। पृथवा तूं मायुका पिताहै, एतदर्यता कों सर्व जगतका पितत्य सिई: क्यो कि नूं उपा. कापरुपमा वायुम्पादि अस्मदादिकोंका जनक है ताते ॥ १९ ॥ २५ ॥ •.
شو او په د ॥हितीयपम:॥ गया ने ननूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे। ॥या चक्षुपिया च मनसि सन्नता शिवीग ॥ तां कुरुमोत्क्रमीः ॥ १२ ॥ २८ ॥ १२॥ हे सौम्य पुनः इन्द्रियां कहती हैं कि पीपकहनेकरके क्याहै। हे पारण !“माते तन- वर्वाचि प्रतिष्ठिता। जो तेरी ननू पाणी धिये स्थि- तहै। अर्थात जो तेरी पानरूपमूर्ति वक्ता। (कहनेवाली) होनेसे वक्त्वरूप चेष्टा करतीहुई चारुप स्थानचिये स्थित है। अरु "या श्रोने या चक्षुपि"जो श्रोत्रविषे जोवनुपियें जो तेरी च्यानरूप] मूर्ति श्रोता होनेसे श्रवएरुप चेहाको करतीहुई लोवविये स्थित है । अरु जो मेरी [पाणरूप] मूर्ति दशाहोनेसे दनिरुपचेठा कों करती हुई चक्षुधिपे स्थितहै। परु “याच मनसि सन्ता" पुनः जो मनधिपे (स्थित है। नि- सको प्रानकर फेर जो तेरी [समानरूप] मूर्ति मन्नाहोनेसे सैकस्पादिव्यापारको करतीहुई मन विये स्थितहै निसकों तं पान्नकर। अरु "शिवा- तां कुरुमोकुमी" निकसनेसे अमगध मनिकरे नूं अपने निकलजानेसे इनभ्यानोको प्रमॅगन (नि कम्बे) मतकर मिस्तचक्षु सध्यानतम्रो सोपानःसावाक ससमानस्तन्मन प्रतिश्रुते ॥२२ شین او نشده ॥हितीयपध्मः॥ ॥५५॥ ऐश्वर्यरूपा क्षत्रियोंकी लक्ष्मी, यह दोनों सदमी योंकरके, अरु नेरी स्थितिरुप निमित्तवाली उप- पति जिस बुद्धिके होनेसे इस संघातरूप पारीर विपे तरी स्थिति रहै ऐसी बुद्धिको हमारे अर्थ दे ॥ हे सौम्य इस द्वितीयपुस्मकरके निर्धारकिये प्राणके गुए। संक्षेपमात्रसे प्रतिपादन कियेहैं। इस रीतिसे सर्वरुपजो प्राणहै सो चाक माहि इन्द्रियोंकरके स्तुतिकरनेद्वारा प्रकट भयो जो 3 सकी महिमा निस महिमावालाहै अरु साई प्रजापतिहै। इति निश्चितम् ॥ १३ ॥ ॥ ॥इति प्रमोपनिपङ्गत हितीयपस्मः॥ भाषा टीका समामा हरिः तन् सत् ब्रह्म ५२॥
پرشن اشوک ॥पध्मोपनिषद॥ प्रथमोपनिषद्नन वृत्तीय प्रमः॥ ॥अथ हैन कौसल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ भगवन् कुत एष प्राए जा. यते कथमायात्यस्मिन्छरीरे प्रात्मा ॥नं वा विभज्य कथं प्रातिष्ठते केनो- क्रमते कथंबाह्यमभिधत कयम- ॥ध्यात्ममिति ॥१॥ ३० ॥ ॥अथ प्रक्ष्मोपनिषद्गत वृत्तीय प्रम भाषा- टीका प्रारभ्यते॥ हे सौम्य पूर्वोक्तपुकार इन्द्रियोकरके। किहुई स्तुतिहारा प्राएका प्रजापतिपना अरु भोलापना प्रादिक गोके समुदायका निर्धा- रकरिने, प्रव प्राएकी उत्पतिपादिकोंका नि- एर्णय करतेहुए तिसकी उपासनाके विधानार्थ इस हत्तीय प्रमका प्रारंभकरते हैं । १॥ हे सौम्य । “पृथ हैन कौसल्यश्वाश्व-- लायनो पप्रच्छ"तिसकेप्रनन्नर इसको स्प: श्वलका पुत्र कोसत्य नामवालामुनि पूछताभ- या अर्थात् कबन्धीमुनि उपरु भार्गवमुनिके दो प्रमोहारा प्राणके प्रजापतित्व मादिगुणोंके निर्धारहोनेके अनन्तर, इस पिप्पलादमुनिश्वर रुप प्राचार्यकों अश्वलमुनिका पुत्र कोसल्य خون شده ، د 0 वित्तीय प्रमः॥ ॥५॥ नामवालामुनि पृमकरताभया कि । भगवन् । कुत एष प्राएो जायते" हे भगवत् यह पाया किससे उपजताहै। अर्थात् है भगवन हे सर्वज्ञ यह प्राएकि जिसकी महिमा प्रापने दो मुहमा के उत्तरकरके निर्धारित किया, सी किसकारण: से उपजताहै। पुरु-रुपमाणत्यस्मिन्छी- "कैसे इस पारीरविमे उपाषताहै। पृर्थात् उपजाभया किसप्रकार इस पारीरविषे सावताहै, मर्थात् पाणकों शारीरधारणका निमित्त कौनहै। अरु- "मात्मानं वा विभज्य कथं प्रातिमते ६ अपने पापका विभागकरके कैसे स्थितहोताहै। --एक अपनेयापकों कईएक विभागकरके। किसपकारसे स्थितहोताहै । इप्रस केनोक्रम "किसकरके निकसताहै-किस रत्तिवि- पोषकरके इस पारीरसे, निकसताहै। अरु किवाल मभिधमायको कैसे भारताहै। चायजो अधिभूत अरु पृधिदैव निसकों। कैसे धारताहै, अर्थात् पियादि पांचवृत्तिभेद गलेपाका सूर्य रु. एथिवीप्रादि पांचभूत प्रधिदैव अरु चारादि पांच इन्दियां अधि- भूतरूप बाहा हैं निसकों यह प्राण कैसे धार- नाहै। अरु-"कथमध्यात्ममिनि"Yध्या- तमको कैसे धारताहै-अध्यात्मकों किप्त प्रकार ॥५॥ ॥ध्मोपनिषद्॥ nancy गतस्मै स होवाचाति-पृहमान -॥ गच्छसि बलिष्टोऽसि तस्मात्तेन्हं ॥ ॥वीमीति ॥ २॥ ३१॥ धाराकरताहै [पाणादिरूप अन्तरवर्ति जो पा एएकी पांचत्तियाहैं सी पाएका मृध्यात्मरुप यह मागेकहेंगें]॥ १ ॥ ३० ॥ ॥हे सौम्य उतप्रकार जब कौसल्यनाम- वाले मुनिने अपने प्राचार्यसे प्रक्ष्मकिया तब "तस्मै स होवाच"निसकों सो स्पष्ट कहता. भया उपर्थात तिस पृष्मकरता शिष्यको सो सर्वज्ञ पिप्पलादनाम मुनीश्वर स्पष्ट कहत्ताभया कि-"प्रति प्रक्ष्मान् पृच्छसि"अति पृष्टमों को पूछताहै। हे पृष्मकरतामों में कुपालं हूं। मृति श्रेष्ट प्रमोंकों करताहै, क्यों कि प्रथम तो पाए ही दुर्विज्ञेय (दुखसे जानने योग्य) है। एतदर्थ उसविषयक जैसे कठिन प्रमहोय नैसे ही करने योग्य हैं, एतदर्थ तूं अति प्रमोंकों पू छताहै । गुरु-"वलिष्टोसीति । ह्मनिष्ठहै। एतदर्थ ही तूं ब्रह्मवेत्ताहै। तस्मान्ने हंव वीमि:" ताने मैं कहताहो-एतदर्थ मैं तेरे ऊपर प्रसन्न भयाही निसकारणसे जो ने प्रम من اندوه पहनीयमः॥ ॥ ॥प्रात्मनः एष प्राण जायते या गथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततै म-॥ नोलतेनायात्यस्मिन्छरीरे ॥ ३॥ ३२ ॥ • कियेहैं जिनका उत्तर में रेअर्थ कहताह रिस- की श्रवण कर ॥ २ ॥ ३९ ॥ ३॥ पिप्पलादउवाच॥"पात्मनःएप प्रा- हो जायते"मात्मासे यह प्राए उपजता है। हे सौम्य, सब प्रमकरनेवाले कौसल्यनाममुनि को पिप्पलादमुनि कहतेभये कि हे कौसल्यशि- प्राएगे मनः श्रुभ्रो वक्षरात परतः परः। एतस्मा ज्जायने प्राण जो प्राण मन प्रादि उपाधि रहित सदा शुद्ध कार्य कारणसे परे प्रक्षर सत्य परमा मासे यह सर्वमें श्रेष्ठ प्राण उपजताहै। प्रय कैसे उपजताहै ॥ उ०॥"ययैषा पुरुषे छायैत- मन्नेतदात। जैसे पुरुषविषे छाया नैसे नि- सविषे यह समर्पण कियाहै हे सौम्य जैसे म- स्तक हस्तपादादि अवयवसमुदायसूप पुरुष नि- मित्तसे नैमित्तिकी यह छाया उपजती है । जैसे ही तिस ब्रह्मरुप सत्य अक्षर पुरुषविषे यह प्राए- नामकरके छायास्थानीय मिथ्यारूप वाला नाव। समर्पित है । अरु मनोक्रनेतायात्यस्मिन्धीरे .
॥६॥ प्रमोमनिषद् Trutance यथा सम्नाडेवाधिकतान्विनियु-॥ ॥ एतान् ग्रामानेतान ग्रामानधिनिष्ठा ॥स्त्येवमेवेष प्राः इतरान प्रान्॥ ॥पृथक् पृथगेव सन्निधने॥४॥३३॥ ३"मनकरके किये कर्मनिमित्तसे इस पारीर विषेसावताहै- देहविषे जो प्रावताहै सो छा- यावत् मनके संकल्प इच्छादि वृत्तियोंकरके किये जे कर्मतिन कर्मरूप निमित्तसे इस पारीरविषेर सावताहै !"पुण्येन पुण्यं लोक नयति? पुण्य से पुण्यलोकको लेजाताहै। यह इस ही प्रलके सातवें वाक्यसे कहेंगें। पुरु-निदेव सक्तः सह कर्मणेति । भासतमा निस ही कों सहितक मके पावताहै। अर्थात् यह कर्मकरनेवाले कर्मी पुरुपका मन जिस फलविषे भासतहोताहै तब तिस शासक्तनाकरके चे पुरुष तिस हीकों कि जिस चिये उपासक्त, सर्मकरके पावतेहैं । इस अहदा- रएयके छठे अध्यायकी श्रुतिविषे शरीरोंका गृह एककिरके ही साध्यहै ऐसा कहाहै ॥३॥१२॥ ४॥हे सौम्प पिप्पलादमुनि कहताभयाकि हे कौसल्य प्रब इष्टानयूवक श्रवणकरो।"यथा सम्राउपाधिक्षतान्थिनियुक्त" जैसे चक्रवर्ती پشتون اون لا पतृतीयपूक्ष्मः॥ ॥६॥ राजा निश्चयकरके अधिकारीयोंकों योजनाकर- नाहै; अर्थात् जैसे कोरएक चक्रवर्ती राजा अपने राज्यके निबन्धमें कार्याध्यक्षताके योग्य पुरुषों को निश्चयकरके तव उन प्रधिकारी पुरुषों को देशाविभागसे योजनाकरनाहै गुरु कहता है कि-"एतान् ग्रामानेतान् ग्रामानधितिष्ठव। तुम एनने ग्रामके अरु तुम एतने गामके धिपतिहोयके स्थित होउ-हे कार्याध्यताके। योग्य पुरुषो मेरी प्राज्ञासे तुम एतने ग्रामों के मंडल देशकै अरु तुम एतने ग्रामके मंडल देश के अधिपतिहोयके देशोंका रक्षएा पालन सा- वधानीसे करते रहो ॥ हे सौम्य इत्येवमे- वैष प्राणः इत्तरान पाएगान् एथक स्थगेव सन्नि धने" ऐसे ही यह पाए। इतर प्राणोंकों पृथक पृथक ही योजनाकरताहै-इस कहेहरा दशा- तके प्रमाण ही, यह जो मुख्य प्राण है सो चक्षुरा- दिइन्द्रियरुप अन्य प्राणोंकों नेत्रादि यथायोग्य- स्थानधिषे दानादि क्रियाकरनेके पर्थ भिन्न २ पृर्थात् एकका काम दूसरा न करे इसपकारसे योजना करनाभया। पर अपने अपानादिभेद रूप इतर पाएगोंकों गुदादि स्थानोचिये मलत्या. गादि क्रियाके अर्थ योजना करताहै।।३॥ राम राम राम राम राम राम रामः रामः॥
॥३२॥ پیشن، میشد प्रमोपनिषद् पायपस्थापानं चक्षुःश्रोत्रेमुख। नासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्ठने म-॥ ॥ध्ये तु समानः। एष ह्यूनतमन्नं । समन्नयति तस्मादेताः समार्चिषो। भवन्ति ॥ ५॥ ४ ॥ ५॥हे सौम्य अव मुख्य प्राण अपने - पानादि भेदरूप पांच वायुकों जिस कार्यके अर्थ जिन २ स्थानीविषे नियुक्त करताहै निस को श्रवणकरी ।"पायुपस्थे पान" (गुदा (अस्)लिंगविषे पानको पृर्थात् जो गुरा हारा मलको अरु लिंगहारा मूत्रको त्यागकर निरुप क्रियाकाकर्ता अपनाही भेदरुप पान नामवाला वायु तिसकों गुदा अरु लिंगविषे। उक्त कार्य करने के उपर्थ नियुक्त करताभया । गुरुन् । चक्षुः श्रोत्रे मुरवनासिकाभ्यां प्राण स्वयं प्रातिष्ठते"चक्ष गुरु) श्रोत्र मुरव (प. रु) नासिकाविषे प्राण प्राप स्थित होताहै - निस ही प्रकार दर्शनादि ज्ञानरुप क्रियाका कर्ता हुमा, चक्षु श्रोत्रके कहनेसे ज्ञानेन्दियों मुख प्ररु नासिकासे पावागमन करताहुया चक्रवर्ती राजास्थानीय स्वयं (पाप) पाएर स्थितहोताहै। रु.-1 मध्ये तु समानः فرارسیده ۲۳ मतृतीय प्रश्नः३॥ ॥६॥ मध्यविशेगो समान (पायुहै) उपना भेद स- मान वायु तिसको प्राण प्रपान के मध्य नाभि रुपरथानविषे नियुक्तकरताहै। अरु-1 एषः ह्येतद्धतमन्नं समन्मयनि" यह ही इस भुक्त अन्नको खेजाताहै। यह ही वायु भोजन किये सन्नादिकोका रस जो उदविघे होताहै निस. को सर्व नाड़ियों पृत्ति एथक सम (जिसका तिसकों) लेजाताहै एतदर्थ इसकों समाननाम- से कहते हैं। गुरु-तस्मादेताः सप्ताचियो भवन्ति" ताने इतनी सात ज्वालाबाला होता है, |--तिसकारणसे यह समाननामवाला वायुही इस मुरवहारसे उदरकुंडविचे हवन किये अन्ना दिकोंके रसादिकोंकों प्रत्येक नाडियोप्रति सम पहुंचावताहै, एतदर्थ भोजन किये पन्नादिकोके रसरूप समिधावाले जराग्निरूप हेतुसे हृदय- रूपदेपासे यह सातसंख्यावाले मस्तकगत दी। नेत्र, दो कर्णके.दो नासिकाके, एक मुखका,इन सातोहार सम्बन्धी ज्ञानरूप ज्वालावालाहै ना इसको सिमाचिस सात अर्चीवाला कहते हैं ॥ अभियाय यह है कि प्राणकरके ही दनि श्र पण अरू रूपादि विषयों का प्रकापा होताहै॥५॥ ६॥ हे सौम्य पिप्पलाद्नुनि कहतेभये कि پخش زنده ॥६॥ प्रमोपनिषद॥ : ॥ढदि होष अात्मा। प्रचैतदेक॥ ॥शतं नाडीनां ताषां शतं पातमेकैक-॥ ॥स्यो हासप्रति सप्तनिःप्रतिशारखानाडी। ॥सहस्त्राणि भवन्याषु व्यानश्वरनि॥६॥ हे कौसल्य । हृदि होप प्रात्मा हृदयविषे ही यह प्रात्माहे अर्थात् कमलाकार हृदयनाम- करके विख्यात जो मांस पिंड तदन्तरगत जे ह. दयाकाश तिसविधे, यह प्रात्माकरके सहित। लिंग (जीव) प्रात्मा वताहै। प्रपत्र- नदेकशते नाडीन" यहां यह नाडीयोंकी (सं. रख्या) एक प्रधिक एकसौ है (१०१) यहां । इस हृदयविये मुरव्य नाडीयां संरख्या (गिनती) करके एकऊपर एक सौ होती हैं। उप्रर--ना- सां पात पातमकैकस्यो" तिनके मध्य एक- एकविषे सौ सौ भेदहैं। -तिन प्रत्येक मुरव्य । नाडीविषे सौ सौ: भेद हैं । अरु "हासप्रति- सप्ततिः प्रतिपारवानाही सहस्त्राणि भवनि। प्रतिपारवारूपनाडीके (भेद) वहन्तर बहत्तर हजार होतेहैं-पुनः भी पृथक् पृथक् प्रतिशत वारुप नाडीके भेदरुप बहतर बहत्तर हजार नाही यो होती है। अर्थात् सुपुम्गानामवाली एका मुख्य नाड़ीरुप मूल (पीड़) की स्कंधारवार پر اونده؟ पतीयपमा ॥५॥ (सर्वसे पुष्ट शारवा) रुप सौ १० संरयावासी मुरव्य नाड़ी हैं तिन प्रत्येककी शाश्वारूप जो सौ सौ नाडीया हैं, तिन एक एककी उपपावारूप नाड़ीयोंकी सं. रव्या चहत्तर चहत्तरहजारहोती है। ताने सर्वमिसके वहत्तर करोडनाडीहै [॥ हे सौम्य अय इनको पुनः श्रवएकरो][उक्त नाडीयोंकी संख्याका जो वानहै। सो रक्षरुपसे है, तहाँ हदयकमलदेपासे जो निकली हुइ नाडीयांहैं तिनके मध्य जो सुषुम्णानामवाली मु, रव्यनाडीहै सो मूल (पीड) के स्थानापन्य है, 'उग्ररु निसकी दया नाड़ीयां स्कंध (पुष्ट पारवा) रूप हैं। गुरु उन स्कंधरुप दया नाडीयोंमेंसे प्रत्येककी। नव नव स्थूलपारवाहै। एतदर्थ इसप्रकारहोनेसे ए- क मूलकी सुषुमणानामवासी नाडीको छोड़के स्यू- लपारंवारुप नवे नाड़ीयां उ१रु दपा स्कंधरुप पारवा यह सर्व मिसके एकसौ १०० संरख्याकीहोती हैं। निन सौ नाड़ीयोंके मध्य एक एक नाडीकी। शारवारुप सौ सौ नाडीयां औरहैं। इसप्रकार हो- नसे एक सुषुमण मुरण नाडीहै उगुरु सौ स्कंधरुप नाहीयांहैं। पुरु तिनकी पावारुप दपाहजारना- पीयोहैं । तिन दशाहजार नाड़ीयों में से प्रत्येकनाड़ी योंकी उपपावारूप यहत्तर यहत्तरहजार ७२०००१ नाडीयांहैं। हे सौम्य इसपुकारहोनेसे यहत्तरहजार ७२...सरव्याकों दपहजारसंरव्यासे गुणाकरनेसे پشتو شد ۶۹ . पुश्मोपनिषद् एक मूलकी सुपुमणांनाडीको छोडके बहतरकरोड़ ७२००००००० नाडीयां होती हैं इति ।।"पासुव्या- नश्वरति निसविषे व्यानवायु विचरताहै। तिन सर्व नाडीयोंधिषे एक व्याननामवालावायु विचरताहै। एतदर्थ इस प्राणके भेद वायुकों स- पारीरविष व्याप्नहोनेसे व्याननामकरके कहते हैं। हे सौम्य जैसे सूचिम्पसे किरण,सर्वशोरकों निकलतीहैं जैसे प्रारीरविषे हृदयकमलसे सर्वपोर कों गमनकरनेवाली जो नाडीयां तिनके सम्बन्धसे सर्वदेहमें व्यापहोके व्यानवायुवतताहै। पृरु कै. धादिक जोजो पारीरकी संधि के स्थान पृरुर मर्म स्थानहैं तिन तिनविषे चिोपकरके वर्तताहै। पुरु च्यानजोहै सो पाएा अरु अपानरुप लिके मध्य उनके उप्रभावकालमें उद्भूतत्तिरूपहै । अरु यह य- राक्रमवाले पुरुषके कमौका कर्ता होताहै॥६॥३५ हे सौम्य प्रथम जो कौसल्यमुनिने प्रलकियारहाकि "प्रात्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रातिष्ठते"! मुरव्यप्रा- ए उपुमनेउपाय विभागकरके किसपकारसे स्थित होताहै. तिसका उत्तर चौथे, पांच में,छठे, इन तीन वाक्योंसे पिप्पलादमुनिने कहा सो तेरे पर्थ कहा। . ७॥हे सौम्य मृय उदानवायुके स्थान को कहने हुए, कौसल्यमुनिके केनोक्रमत ! किसकरके ।
قناد سے ہو . ॥तीयपध्मः॥ ॥६॥ ॥अथैकयोई उदानःपुण्येन पुण्यं ॥ लोकं नयति पापेन पापप्नुभाभ्यामेव ॥ मनुष्यलोकम् ॥७॥ ३६ ॥ पारीरसे) निकलताहै। इस चतुर्थ प्रश्नका उत्तर कहते हैं। पिप्पलादउवाच ।। हे कौसल्य । अथैका योई उदान"। एक ऊंचे उदानहै। पृर्थात् उन। एक अधिक सौ १०१ नाडीयोंके मध्य ऊंचे मूईनी ब्रह्मरंध्रस्थानधिषे जानेवाली सुपुरा नामवाली मु. ख्यनाड़ी निस एकनाड़ीसे विशोपहुया ऊपरकों ब- ह्मरंध्रपर्यंत जातामा अरु समानहुमा पैरसेलेके माथे पर्यंत वर्तमानमा उदानवायु चिचरताहै ।। गुरु-। पुएपेन पुण्य लोकं नयति-पापेन पापं । पुण्यसे पुण्य लोकको पापकरताहै पापसे पापकों सो उदानवायु वेदपास्त्राविषे विधानकिये जे पु. एयरुपकर्म निनके करनेसे फर्तापुरुषकों देवतादि- कों के स्थानरुप पुण्य (स्वर्ग) लोकको प्राप्त करता है। उपरु तिन पुण्यकर्मसे विपरीत वेदशास्वकरके प्रति हित जे पापकर्म तिनके कर्ता पुरुषकों पशु पक्षि, धान पाकरादियोनिरुप पापमय नरकको प्राप्त कर ताहै। सह-1"उभाभ्यामेव मनुष्य सोग दोनो से ही मनुष्यलोकफों (पाकरताहै) पुण्य पुरु। पाप दोनोंके समुच्चयसे मनुष्य सोक (पारीर)कों। .
پیاویش ده" ॥६॥ ॥प्रमोपनिषद्। प्राप्तकरताहै ॥७॥ है सौम्य सुषुमणानार्डविये रु सर्वदेहविषे ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त उदानवायुव्याप्नहोय के वर्तनाहै सो स्थूल शरीरसे लिंग (सूक्ष्म)पारीरके निकलने में अग्रसरहै, सो उपासनाके अनुसार उन- म मध्यम अधम लोकोंविषे प्रापकरताहै, उपर्थात् पणच देवयान पञ्चाग्नि प्रादिकोकी उपासनावाले उपासकको प्रहारन्धके द्वारा सर्वोत्तम ब्रह्मलोककों। प्रासकरताहै। अरु सूर्य अग्नि सादिकोंके उपासक को चनु वागादिहारसे सूर्य अग्नि प्रादिकोंके रच- गोदि मध्यमलोकको प्राप्तकरताहै। अरु वेदपावर से विरुद्ध निपि भूत प्रेतादिकोंके उपासकोंकों गुदा लिंग नरव केशादि अपवित्र मागाँसे पशु पक्षिश्चा- न शकर चांडास्त्रादि पापमय नरकरूपयोनियोंकों प्रासकरताहै। अरु पाप पुण्य दोनोके सम गुरु प्रधानतासे करनेवालेकों मनुष्यलोकके नाई प्राप्त करताहै। पृर्थात् पुण्य प्रधानहोय उपरु पाप सा- मान्यहोय नव सो श्रेष्ट कुलमे धन विद्या संतति प्रा- रोग्यता सादिकोंफरके सम्पन्नहोताहै अरु जोपाप प्रधानहोय पुरु पुण्य सामान्यहोय तो सो पुरुष कु. स विद्या धन संतति आरोग्यतादि सुखकरके रहित होताहै । प्रात् जिसके पुण्य प्रधिक पृरु पाप। योहे होते हैं जिन पुरुपोंकों इस मनुष्यलोकपिणे हीर सुरव अधिक अरु दूरव थोडा होताहै। अरु जिनके Hindi प्रस्मोपनिषद्॥ ॥श्रादित्यो ह वै वाह्यःयाणा उदयः।। त्वेषानं चाक्षुषं पाएामनुग्रहानः ।। ॥पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्या-॥ यानमवष्टभ्यान्तरा यदाकापाःस समान ॥नोवायुव्यानः ॥ ८ ॥ ३७ ॥ पाप अधिक उपरु पुण्य थोडा होताहै निसकों दुः ख बहुत अरु सुरख थोड़ा होताहै, नाते पुरुषकों इसलोक परलोकमें सुरखकी प्राप्तिके अर्थ शास्त्र विहित पुण्यकर्म ही करना उचित है , अरु पुण्य पापके समानहोनेसे दुःश्वसुरक्नों की भी समान प्राप्ति होतीहै। अभिप्राय यहहै कि मनुष्यदेहकी प्राप्ति पापपुण्य दोनोसे ही होतीहै। अरु जिन्होंने ज्ञानाथ ग्निकरके पाप पुण्य दोनोको निर्मूलकियाहै सो। मोक्षहोताहै इति सिद्धम् ॥ ७ ॥ २६ ॥ हे सौम्य उक्तप्रकार कोसत्यमुनिके चतुर्थ प्रमका उत्तर कहके, अब अधिभूत अरु अधि- देखरूप बााकों यह प्राण कैसे धारणकरेहै,यह पे चम प्रमका अरु अध्यात्मकों कैसेधारणकोहै। इस पष्ट प्रमका उत्तर पिप्पलादमुनिने कदाहै तिर को श्रवणकरे ॥ पिप्पलाद उवाच ॥ हे गोमती अर्थात हे प्रमकरतानोमे कुशल,मैं कही गो सुन 19011 प्रमोपनिषद्॥ "प्रादित्यो ह वै बाह्यःप्राण उदयत्येप होनं चाच प्राणमनुग्रहानः" प्रादित्य ही प्रसिहवाह्य- का प्राणहै यह ऊईको जाताहै यह इस चक्षुविषे स्थिन प्राणको अनुग्रहकरताहुया वर्तताहै। अर्या यह जो प्रकट सूर्यहै सोई बाहर समष्टिका प्राणहै। पर यह सूर्य्यरुप प्राण उदयमा उचेकोजाताहे (जैसे नाभिसे उदयमा प्राण ऊंचेको जाताहै नैसे, पर यह सूर्यरूप प्राण इस चक्षु इन्दियविधेस्थि- त व्यष्टिप्राणको अपने प्रकापसे अनुग्रहकरताहुः सा अर्थात् रूपविषयके ज्ञानविपे चक्षुके प्रकार कों करताहुपा वर्तताहै। पुरु- एथिव्यां या। देवता सैषा पुरुषस्यापान मवष्टभ्य"। एपिचार विषेजो देवताहै सो इस पुरुषकी अपानरनिकों। प्राकर्षणकरके वर्तताहै।-तैसे ही पृथिवी विषेश अभिमानी जो प्रसिद्ध अग्नि देवताहै सो यह पुरुषकी अपाननामवाली प्राणवृत्तिकों प्राकर्षण हारा स्ववशकरके निचेहीकों रवींचनरुप अनुग्रह को कर्तादुपा चन्ताहै। यदि ऐसान होय तोश- र भारीहोनेसे-गिरपडेगा । पृथवा अवकाशास- हित (चल) मैदान में ऊपरकों जायसो तो होगा नहीं, यह अग्निझूम पृथिवीका ही अनुग्रह है । प्रर्यात वाह्यका जो समष्टि अपानवायु मा निदेवनारुप घिदी मो पुरुपकी जो अधोगामी تولد-۶ नृतीयपुरमा ॥७१ पाएकी अपाननामनी वृति तिसको आकर्षण करतीहुई पारीरको अपने साकर्षण में रखवेद इस ही हेतुसे यह शरीर भारोहमा भी गिरता नहीं : र ऊपरको भी जाता नहीं यह ही वार अपानका। अनुग्रहहै । अरु ।“अन्तरा यदाकाशलमानों रायुज्यानः" जो मध्यमें साकाादै सो वायुस- मावरूपहै व्यानके अर्थ (अनुग्रहकरता है, यह जो स्वर्ग (सूर्य) अरू एथिवीके मध्य में प्रांकापा है ,निसविषे स्पिन जो चायुहै हिसको मन्त्रस्यपुरुष चन, माकांपानामसे कहते हैं। [मन्ना-कोन्तीति मन्न पुकारतेहैं इस वाक्यविषे जैसे मञ्चशब्द। करके मंचकों ही ग्रहण न करके मच्चस्थ पुरुष पुर कारते हैं, ऐसा लक्षासे ग्रहणहोताहै। तैसे ही यहां साकाण शब्दसे केवल पाकापाही का ग्रह- एन करके निस भ्राकाराविषे स्थित वायुको लक्ष से ग्रहण करते हैं ] अरु सो वायुसमानरुपहै, अन्तर समानवायुके अर्थ अनुग्रहकरताहुया वन- नाहै सो काहेसे को अन्तर समानवायु पाए। पुरुष अपानके मध्यमें स्थित हैं, मुरु बाह्य समानवायु सर्यरुप पाए अरु एपित्रीरुप पान इनके मध्य में स्थितहै, ताने अन्नर समाननायु अरु बाहा स. मानवार्यु इन दोनोको अन्तर वाद्य पागोमपानके मध्धारियंतहीनेसे समताहै. ताने समरि समान ॥७२॥ چون او در प्रमोपनिषद्॥ ॥जो ह वै उदानस्नम्मादुपशान्त-॥ ॥नेजः। युनर्भवमिन्द्रियैमनसि सम्प-॥ ॥द्यमानैः॥ ॥ ३ ॥ वायु व्यष्टि समानवायुपर अनुग्रह करता है । गुरु, सामान्यरूपसे जो बाह्यका वायुहै सो बायका व्यानवा युहे मो प्रन्तरके व्यानधायुकेपर्थ उपनुग्रह करताहै । क्यो कि व्याप्लिकी समताहै। अर्थात् अन्तरका व्यान वायु पारीरके अन्तर नखसिरखपर्यन्तं व्यापहै पुरु.॥ वाह्यका व्यानवायु चिराडात्माके अन्तर द्यो(बालो. क) से पानात पर्यन्त व्याप्त है । नाले व्यापिकी सम- नासे वाह्यका समष्टि व्यानयायु. अन्तरके व्यष्टि । व्पानवायुपर अनुग्रह करताहुमा वनताहै॥८॥ • ॥हे सौम्य पुनः पिप्पलादमुनि कहने भये। कि हे नौसख्य । तेजो ह वै उदानस्तस्मादुपण तत्तेजः" प्रसिद्ध तेज ही उदानरूपहे ताते तेजसे रहित होताहै। अर्थात् जो बाह्यका स्पष्ट सामान्य तेजहै सो वाहका समष्टि उदानरूपहै । अभिप्राय यह है की यायका सामान्य तेजहै लो अपने पुका शकरके शरीरस्य उदानवायुके मृर्थ अनुग्रह कर नाहै। हे सौम्य- (इसप्रकार मूर्यादिपसे मु- ख्य पाएको प्राण गुपान समान उदान व्यान ناونو سره पतृतीयप्रमः॥ ॥७३॥ इनके अर्थ अनुग्रहकरनेके कथनसे अध्यात्मरुप प्राणादि वृत्तियोंके अनुग्रहका कर्तापना कहा । पुरु सूर्य अग्नि प्राकाश सामान्यवायु अरु सामान्य नज- यह क्रमसे बाह्यके प्राणादिरूपहुसा-मुख्य प्राए सूर्य्यादि अधिदैवरुप चाहकों धारतास प्रकार कहा । अरु निस सूर्यादिरूपसे जो स्थिति सोई निसका धारणहै । गुरु प्राण अपांनादिको के उपनुगृहसे चक्षुरादिकोंके अनुग्रहसे निसहारा मुरव्यप्राणकों, उन चक्षुरादि अधिभूतरखरूप बाह्यरूप का धारणकर्त्तापनाकहा.। रुस पास्तचक्षुः सोपानःसा वाक स व्यानस्तच्छो नं स समानस्तन्मनः स उदानः स वायुरिति र श्रुत्यन्तरे !- सो प्राण सोच सो उपपान सो पाएगी सो व्यान सो श्रोत्र सो समान सोमन सो उरान सो यायुस श्रुतिकरके चक्षुरा- दिकों को प्राणादि स्वरुपताके कथनसे अरु च- क्षुरादिकोंके अनुग्रहकर्ता पनेके कहनेसे रसुरा- दिरूप अध्यात्मका धारणकापना मूरव्य पाण- को कहा । इस रीतिसे यहां पर्यन्न बाह्यको कैसे धारण करताहै गुरु अध्यात्मकों किसरीनिसेधा राकरताहै, इन पंचम उपरु षष्ट दोनो प्रमो- का उजर कहा, यह जानना]-जिप्तकरके ते ज स्वभावचाला अरु शरीरसे लिगको बाहर - 13 मोपनिषद॥ arretter यञ्चिन्नतेनैष प्राणमायाति प्राण-॥ ॥तेजसायुक्तोः। सहात्मना यया सङ्क-॥ पिन लोकं नयति ॥ १० ॥ ३९ ॥ निकलनेरूपसियाका करनेवाला उदानवायु भी। वारके नेजके पनुगृहकों पायाहुन्या ही शरीरवि पे वर्तताहै, निम ही कारणसे जय जीवके जीवनेक हेतु धार्म (पारब्ध) के उपरामभये वाह्यक तेजन रूप उदानके उपन्तर उदानवायुके निमित्तके, अ. नुग्रहके प्रभावसे लौकिक-पुरुष स्वाभाविकोज से रहित होताहै। तब उमसमय उसपुरुषकों की मावाला मरनके योग्य जानना । पुरु। नर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पद्यमानःशमनविप। प्रवेशकों पाशमयी इन्द्रियोके साथ अन्य पारीर को 'पावता मो.मरनेपाला जादिकीके सा- नभये. पीछे मनविपे प्रामभयी'जे वागादि इंदिन या 'चामनसि सम्पद्यते । तिनके साथ अध्या सकेवाभया. अन्य पारीरकी पावताहै ॥६॥३८॥ १०॥हे सम्र है कौसल्यायश्चित्तस्तेनैप पाए मायातिराद जिसमें विकावालादाताहै तिसका रके प्राणकी पात्रता है। प्रति , यह जीन। जिम पशुपक्षि प्रादिक पारीरंगें चित्तकरके युज شان اویشد ۵ । - तृतीयप्रमः॥ ॥७॥ होताहै, अर्थात् जिन पारीरोंमें चिल संकस्यादि। चेतना धनचाला होताहै, तिन पाणेरोमें मरण कालदिये उस चित्तके संकल्पसे इन्दियोंकेसाथमि लके मुरव्य प्रवृत्तिको पावताहै, अर्शन मर- कालविप इन्द्रियोंकीतिके क्षीणभये यह जीव। मुख्य प्रागतिरुपसे ही स्थितहोताहै। तब इसके शाति सम्बन्धिकेलोग परस्परमें कहते हैं कि भीतो यह जीवताहै। गुरु-प्राणास्तेजसायुक्त सहात्मना यथा सकस्सितं लोकं नयनि"पागात नेजकरके युक्तहुश्रा सहिन प्रात्माके असा निश्चय कियाहै तेसे लोकको पावना --सो प्राण जय बाह्यके नेजररूप उदानवायुतं श्पनुग्रहको प्राप्तभ- योजे अन्तर,उदानत्ति जो उन्क्रमहाप्रधान है। निसकरके युक्तहुशा शरीरके अधिपति जीवात्मा- (साभासलिंग) के साथ नादालयभावकों पायता है, तब तिस तादातम्यताकरके भोक्तारुपभया। पाए। उक्त प्रकार उदानवृत्तिसे ही युक्तहुपा लिस हो भोत्ताकों कि जिसके तादात्म्यसे आपभोक्ता भयाहै, पुण्य पापरुप खकर्मके वासे जैसा इरा जीवात्माका अभिप्रायहै से ही लोकको सम्पर करताहै ॥ १० ॥ ३९ ॥ ११॥हे सौम्य [उक्तप्रकार करके व्यष्टि ।
وی اونچه-وه ॥१६॥ ॥प्रस्मोपनिषद्॥ ॥य एवं विहान प्राणं वेद।नहास्य॥ ॥प्रजा हीयतेऽमृतो भवति नदेष ॥ ॥श्लोकः॥ १२ ॥ समष्टि पाएके स्वरूप स्थानादिकोंका निर्णयकरके अब तिसकी उपासनाका विधान करतेहैं। यहां यह पृर्थहै कि- अात्मासे प्राण उपजताहै सोम- नकेकिये धर्म अधर्मसे शरीरकेअर्थ उपनुग्रहकर नाहै। अरु आपके पांचप्रकार विभागकरके पायु (गुदा) पुरु उपस्थ (लिंग) इन स्थानोंरिये . पने ही भेद अपानवायुको स्थापनकरेहै। अरु चक्षु श्रोत्र मुख नाशिकारुप स्थाननिये स्वस्वरूप प्राणको ही स्थापित करेहै। गुरु नाभिरूपस्थान: विपे अपने समानरुप भेदकों स्यापनकर है। अरु नाड़ियोंके समुहरूप स्थानविषे अपने भेद व्यानरुपकों स्थापितकरेहै। अरु सुषुम्णनाडी रुप स्थानपिपे अपने भेद उदानवायुकों स्थापित करेहै । अरु पाए। उपपान समान व्यान अरु उदान, इनके अनुग्रह कर्ना बाारुप सूर्य ए- थिविदेवता प्राकामा वायु पर जरुपसे उप- धिदैवकों धारणकरेहै। अरु सूर्यादिकोंके अनुः गहसे प्राणादि रत्तिरुप अध्यात्मको पुरुच वाक श्रोत्र मन अरु त्वचारूप अरु चक्षुरादि ری اورمیه-وه ॥७६॥ ॥पुस्मोपनिषद् ॥य एवं विहान प्राए वेद।नहास्य॥ ॥प्रजा हीयते मृतो भवति नदेष ॥ ॥श्लोकः॥ ११ ॥ ४० ॥ समष्टि पाएके स्वरुप स्थानादिकाका निर्णयकरके प्रबतिसकी उपासनाका विधान करते हैं। यहां यह पर्थ है कि- प्रात्मासे प्राण उपजताहै सो म. नोकिये धर्म अधर्मसे शरीरकेयर्थ पृनुग्रहकर- नाहै। अरु आपके पांचप्रकार विभागकरके पाय (गुदा) गुरु उपस्थ (लिंग) इन स्थानोचिये १. पने ही भेद अपानवायुको स्थापनकरहै। गुरु: चक्षु श्रोत्र मुख नापिकारूप स्थानविपे स्वस्वरूप प्राणाको ही स्थापितकरेहै । अरु नाभिरूपस्थान विपे अपने समानरुप भेदकों स्यापनकर है।। अरु नाड़ियोंके समुहरूप स्थानविषे अपने भेद व्यानरुपकों स्थापितकरेहै। अरु सुषुमगनाडी रुप स्थानयिपे अपने भेद उदानवायुको स्यापिन करेहै। अरु प्राण प्रपान समान व्मान पृरु उदान, इनके अनुग्रह कर्ना बाह्यरुप सूर्य ए. थिविदेवता कामा वायु गुरू तेज रूपसे उप- धिदैवकों धारणकरेहै। अरु सूर्यादिकोंके अनु गहसे प्रागादि तिरुप अध्यात्मकों परचम याक श्रोत्र मन अरु त्वचारूप अरु चक्षुरादि ॥७६॥ ॥प्रमोपनिषद॥ आय.एवं विहान प्राणं वेद ।नहास्य। ॥प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेष ॥ ॥श्लोकः॥ १२ ॥ समष्टि पाएके स्वरूप स्थानादिकोका निर्णयकरके प्रय तिसकी उपासनाका विधान करते हैं। यहां यह अर्थहै कि- प्रात्मासे प्राण उपजताहै सो म- नकेकिये धर्म अधर्मसे शरीरकेपर्थ उपनुग्रहकर नाहै। अरु अापके पांचप्रकार विभागकरके पायु (गुदा) अरू उपस्प (लिंग) इन स्थानोंदिये उप- पने ही भेद अपानवायुको स्थापनकरहै। शुरु चक्षु श्रोष मुख नापिकारुप स्थानविपे स्वस्वरूप प्रागको ही स्थापितकरेहै। पुरु नाभिरुपस्थान विपे अपने समानरूप भेदकों स्यापनकरेहै। अरु नाड़ियोंके समुहरूप स्थानचिपे अपने भेद व्यानरुपकों स्थापितकरेहै । अरु सुपुमणानारी रुप स्थानयिपे अपने भेद उदानवायुकों स्थापित करेहै । अरु प्राए मृपान समान व्यान गुरु, उदान, इनके अनुग्रह कर्जा बाह्यरूप सूर्य्य ए- चिविदेवता नाकामा वायु गुरु तेजरुपसे उप- धिदैवकों धारणकरेहै। अरु सूर्यादिकोंके अनु गृहसे प्राएदि रत्तिरुप अध्यात्मकों परचम चार श्रोत्र मन अरु त्वचारूप अरु चक्षुरादि rint वतीय पमः॥ ॥७॥ इन्द्रियोंकरके ग्रहणकरने योग्य रूपादि विषयरूप धिभूतकों धारणकरहै। गुरु सोई पाएा उदा नरतिसे भोक्ताकरके युक्तहमा भोक्ता (जीवात्मा) को देह त्यागातर लोकान्तर किंवा देहानरप्रतिम ले जाताहै ॥ है सौम्य सोई प्राण सर्वमें ज्येष्ठ श्रेष्ठ है, सोई प्रजापतिहै, सोई पन्नका भोक्ताहै। इ- सप्रकार उत्पत्यादि उक्त विशेषणोंकरके युक्त। पाणकों जानताहै सो अग्रिमकाहे फलकोंपावत है ] ॥ हे सौम्य हे कौसत्य । “य एवं विहान् ।। माणं वेद"जो विद्वान ऐसे पाएको जानना है अर्थात जो कोई ब्राह्मणादि विहान् कहेप्रकार उत्पद्यादि विपोषणकरके युक्त मुरव्य पाएको जानता है अर्थात् उपासताहै निसको इसलोक परलोक सम्बन्धि जो फल प्राप्नहोताहै सो वेद। भगवान् कहते हैं-"न हास्य पूजा हीयतेऽमृतो. भवति नदेयसीको भवति" इसकी प्रजा उच्छी दकों पावतीनहीं। गुरु मरणाधर्मसेरहित होता है। निसधिये यह श्लोक (मन्त्र) है इस विहान की किजो प्राणका सम्यक् उपासकहै, पुत्र पौत्रादिरूप प्रजा उसकी विद्यमानता, चिना- पाको पावती नहीं। पुरु पारीरके पतनभय। यह प्रायोपासकपुरुप मुख्य प्राए (सूत्रात्मा तो साथ सन्युज्यता(प्रभेदता) को पाय मरण ॥१८॥ اثر او تدوی प्रमोपनिषद॥ ॥उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्व-॥ ॥वैव पञ्चधा प्रध्यात्मवैव प्रा-॥ ॥णस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञाया- ॥मृतमश्नुते ॥ १२ ॥ ४२ ॥ ॥रति प्रमोपनिषद्गत तृतीय प्रमः३॥ धर्म रहित उपमरहोताहै-[यह जो प्राणकेसाथ एकतारुप अमृतभावहै सो पाणके सकाम उपा- सकको अन्तमें होताहै। अरु निष्काम उपासक को चित्तकी एकाग्रता अरु शुद्विारा प्रात्मज्ञा नहोय मूख्य अमृतत्वकी प्रापिहोनीहै ] -Y इस ही अर्थविषे यह अगिमवाक्यरुप मनन प्र माए है ॥ इति सिद्धम् ॥ ११ ॥ ४० ॥ १२॥हे सौम्य हे कौसल्य।"उत्पत्तिमायति स्थानं विभुत्त्वञ्चैव पन्चधा पृध्यात्मञ्चैव प्राए- स्य" प्राएकी उत्पत्तिकों प्रागमनको स्थानको अरु पांचप्रकारसे स्वामित्वभावकोंअरु मृ- ध्यात्मको। अर्थात् प्राणकी परमात्मासे उत्य- लिकों अरु मनके किये कसे इस पारीरविषे मागमनको अरू गुदा उपस्थादि स्थानोविधे।। स्थितिको अरु चक्रयतिराजावन् पालिके। पांचभेदके पांच प्रकारसे स्थापनरुप रवामित्व
پاینده
॥रतीयप्रमः३॥ 8.
को। अरु सूर्यादिरूपसे स्थितिरूप वाद्यकों
अरु प्रागादिवृत्तिरुपकी चक्षुरादिकोंके आकार
से स्थिनिरूप प्रनर अध्यात्मकों "विज्ञायामत-
मनुने विज्ञायामृतमश्नुते । जानके प्रमरणभा
वकों पावताहे हे सौम्य इसप्रकार प्राएको सम्य
कप्रकार जानके उपासनाकरनेवाला विहान् प्राण
केसाथ अभेदनासे ऐक्यभावरूप अमृतकों पाव-
नाहै। जानके अमृतकों पावताहै,। यहां जो
दिवारकथन है सो तृतीयपध्मकी समात्यर्थ sy.
यवा अपरविद्यासम्बन्धि प्रमोंकी समाश्यर्थ कित
वा उपपरवलकी उपासनाविद्याकी समाप्तिके
र्थ है ॥ इति सिहम् ॥ १३ ॥ ११ ॥ॐ
॥इति प्रमोपनिषद्ल तृतीय प्रमः।
॥भाषा टीका
पूर्वाई की।
समाप्ता॥
पहरिः॥
แt
॥तत् सत्वह्म।
॥३॥
॥८॥ ॥श्मोपनिषद्॥ । उपथ चतुर्थ पृष्म प्रारभ्यते॥ ॥अथ हैनं सौर्यायको गाये-घ-॥ ॥प्रच्छ। भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि॥ खपन्ति कान्यस्मिन जागति कार॥ एष देवः स्वप्नात् पश्यनि कस्यैतत् ॥ सुखं भवति कस्मिन्नु सबै सम्पत्ति-॥ पष्ठिता भवन्तीति॥१॥ ४२ ॥ ॥अथ प्रमोपनिषद्गत चतुर्थप्रथम भाषा टीका ॥ प्रारभ्यते॥ १॥हे सौम्य प्रथम प्रमकरके कहे प्रकार कर्म उपासनादी, परिणाम. गतिको श्रवणकरते निनसे वैराग्यवान्हुभा । अरु हितीय रत्तीय पु- मकरके कहीगई जे प्रापाकी उपासना निसकरके चित्तकी एकाग्रता अरु शुद्धिवालाहमा अरु इस ही करके विवेकादि साधन चतुष्टय करके सम्पन्न जो उत्तमाधिकारीकों पराविद्या (ब्रह्मविद्या)कि जिसकरके अक्षरब्रह्मकी प्राप्ति होतीहै जिसके श्श्र वार्थ चतुर्थ पंचम प्ररु पष्ठ इन तीनो प्रमों का प्रारंभ करते हैं। ॥ हे सौम्य । पृथ हैन सौायणो गाय पप्रच्छ" iनिसके पश्चात् इसकों सौर्यमुनिका पुत्र गाय॑नामामुनि पृस्मकरताभया अर्थात्।
خاوند اه ॥चतुर्थप्रमः॥ ॥९॥ कौसल्यनाम मुनिके समाधानहोने के पश्चात् सौ- र्यमुनिका पुत्र गार्यनामवालामुनि इस उत्तरदा- ना सर्वज्ञ अपने प्राचार्य पिप्पलादमुनिकों पूछः ताभया ॥ यहां पृभिप्राय यह है कि पूर्वके पृथ- महिनीय, परु नृतीय, इन तीनों प्रमोंसे संसार रूप व्याकृत पुर्यात् कार्यमय जगन्के अन्तर गत साध्य साधनमय ,पर्थात् कर्म उपासना पृरु तिनके फलमय, प्रनित्य सर्व प्रारूप अपरखाकी विद्यके विषयकों समापकरके. प्रय प्रसाधनरुप प्रमाणोंकीप्रतिसे रहिन। पर्थात् उपप्रमेय मनका उपुगोचर इन्द्रियोंका। पृविषय अर्थात् कार्यभावरहित शिव पान अधिकारी उपृक्षर सत्य परविद्याकरके गम्य वाहर भीतर जन्मा पुरुपनामवाला परवल- की विद्याका विषयरुप जो वस्तु सो कहनेकेर योग्यहै । एतदर्य पूणिम ४.५-६-श्न तीन प्रमोंका प्रारंभ करते हैं । हे सौम्य [ इस प्रकार सामान्यरित्या प्रागेकहनेके तीनों प्रस्मोंका सम्ब धकहके . उपव केयल चतुर्थपुमके ही सम्बन्ध कों कहते हैं ] तहां-यिया सुदीमान पावकाहि सुकुलिङ्गाः सहस्रपाः प्रभवन्ने स्वरुपाः । नया. राद्विविधा सौम्य भावा: प्रजायन्ते तत्र चैवापिय नि"जैसे प्रज्यस्ति अग्निसे प्रग्निके चयन پینا شدمم 11 caii ॥प्रमोपनिषद॥ चिनंगारी अनेकप्रकारकी सहस्त्रावधि निकलती हैं। हे सौम्य तैसे ही पृक्षर (परब्रह्म) से सुने कप्रकारके पदार्थ, उपजते हैं गुरु तहां ही ली- न होते हैं। इसप्रकार मुंडक उपनिषदके द्वितीय मुंडककी प्रथम श्रुनिमें कहाहै। कौनसे वो।। सर्व भाव हैं जो प्रक्षरब्रह्मसे उपजते हैं। वा कि- सप्रकार वे भाव विभागको पायके तहां ही लीन होते है । अरु किस लक्षणवाला वो अक्षरब्रह्मा है। इस पृथके श्रवणकरने की इच्छासे प्रवा गार्ग्यनामामुनि प्रमोंकों प्रकट करता भया । गार्ग्य उवाच ।“भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि। रचयन्ति कान्यस्मिन् जाग्रति कतर एप देवः स्व- मान् पश्यति"हे भगवन् पुरुषविषे कौन सोवत्ताहै (अरु) कौन इसदिषे जागताहै पुरु जो राह देव चपोकों देखता है सो कोन है। भगवन् इस मस्तक हाथ पांव प्रादि अंगोंवाले शरीररुप पुरुषविषे कौनसे करण अर्थात् मन स्पादि अन्तःकरण अरु चक्षुरादि वाहाकराम इनमेंसे कौनसे करा Yपने व्यापारसे उपराम रूप निद्राको करते हैं। प्ररु कौनसे करण इस पुरुषविये अपने व्यापारके करनेरुप जागरण फों करतेहैं। उपर कार्य अरु करारुप देव ताम्पों के मध्य जो यह देव स्वप्नोकों देखताहै।
من ۹۳ , ॥चतुर्थप्रलः॥ १३॥ सो कौन है। अभिप्राय यह है कि जागतके देख नेसे निवृत्तभवे पुरुपको स्वशारीरके भीतर जोजा गत् चात् ही दर्शनादि हैं निसको स्वप्न कहते हैं, सो निसका क्या कार्य देह अरुपाएग) रुप देवसे मिर्वाहकरने हैं अथवा करण (मनपादि) रूप किसी भी देवसे निर्वाह करते हैं। उपरुन "क- स्यैतत् सुरवं भवति"यह सुरव किसको हो- नाहै-जागन अरु स्वपके व्यापारके निरत्तह ए प्रसन्न अरु विषयके प्रभावमात्र से ही देख नयोग्य मरु विनापारहित प्रत्माका स्वरुपभू त जो यह सुख है सो किसको होता है । अरु- "कास्मन्नु सर्ने सम्पतिहिता भवन्ति। किस- विपे वह सर्व लीनहोतेहैं जिसकास्त्रविषेज- गत रवपके व्यापारसे निवृत्तभये सर्वजीव जैसे मधुविमे रस. अथात् जैसे मधुकर मक्षिकाके उदरविषे सर्व रस तहत, अरु समुद्र में प्रवेपर- को प्रापभयी नदीयोवन, किसविषे एकताको पापहोके विवेचनके अयोग्यहुये लीन होने हैं। मर्थात् [इस चतुर्य पृष्मविषे अक्षर(परमा- न्मा) के स्वरुपकों ही श्रवणकरनेकी इच्छाहोने- से तिसके निरणयहोनेके अर्थ "कानि स्वपनि। कौन सोचताहे-इत्यादि पांचप्रकारके पावा तर पृस्मवाला जो पुलहै सो जागृदादि पव- .
پیشرو شد بیمه nen ॥प्रस्मोपनिषद्॥ स्थाके मिस अवस्थामोंके धर्मीविशेषके निर्णया है- उपन्यथा विचारनेसे उन जागदादि अव- स्था सोको पातमाके धर्म होनेको शंकाके होनेसे। तिस प्रात्मा निर्विपोप भावके निर्णायकी पति द्धिहैं। नहां प्रथम प्रष्मकरके जागनका धर्मीपू: क्यों कि स्वप्नावस्था में जिसके व्यापारकी। नितिके होनेसे जागत नहीं है सो निस जागृतका धर्मो है इसप्रकार निश्चयकरनेकों प्राक्य है तात। -- अरु दिनीय प्रस्मकरके तीनों ही प्रवस्थाविषे शरीरका रक्षणहीना किसके धर्मसे है, यह पक्ष्म किया-वों कि जागते हुए उपरु व्यापारोंसे निवृत्त भये पाणकों ही पारीरका रक्षकहोने का संभव है नाते ।। अरु तृतीयपमकरके स्वपके धर्माके अर्थ प्रक्ष्म किया ॥ अरु चतुर्थप्रधमकरके सुपुः लिका धर्मी पूछा । क्यों किर्सिरवमहमस्वामिति मैं सुरख जैसेहोय तैसे, सोप्राथा इसप्रकारके। सुप्तिसे जागनभये पुरुषको स्मरणके होनेसे सु. खके सुयुपकेसाथ सम्वन्धहै ऐसा जानाजाना है। ताते । प्ररु सुषुप्ति एवस्थाविपे प्रकापमानजी मंगलीनिर्देपावत् प्रकट सुख है सो.मैं| सुखसे सोपाथा, इस स्मरणका मूलभूत है। उप- पात् जागतभये जो सुषुप्तिके सुरवका स्मरा है सो सुपुषिके आनन्दके साश्रयहै ताते सुपुस्तिका यह..
پی او شد. همه । चतुर्थ प्रमः॥ ॥५॥ मुरव जागृत भये सुरखकी स्मृतिका मूलभूत है।ए- तदर्थ चतुर्यप्रक्ष्मसे सुपुतिका धर्मी पूश । अरु पंचम प्रत्मकरके तीनोअवस्याकरके रहित अरु ।, तीनों ही अवस्थाके स्थितिकी “भूमा"भूमीरुप तुरीय नामवाला पृथवा तुरीयरूप प्रक्षर पूछा यहाँ "तस्मिन् काले निस कालविये इस प. कार प्रारंभ कियेहुए पंचम पक्ष्भकरके यद्यपि नुरीय पदके अर्थ ही पुस्म है सुषुप्तिके उप्रर्थ नहीं तथापि संसारदाविपे सर्व उपाधिसे रहित जो वरीय अवस्थाहै तिसके प्रभावभयेसे किसि। नकिसी उपायसे ही उस तुरीयपदका देखाव- ना होताहै नाते, उस सुषुप्तिवाले पुरुषवत् ज्ञा. नकहुए भी, अर्थात् जैसे सुषुपियवस्थावाले। को सुखरुपका प्रकट ज्ञानहोना है, जिसकेहोते- हुए भी तहां (सुषुप्लिमें) पुन्यउपाधियोसे र- हित होनेकरके नहीं ही सर्वउपाधियोंके विवेक के करनेसे तुरीयपदका देखना सुगमहोताहै। ताते तिस सुपुतिकालविये तुरीयपदके पर्य। सर्वक लयका कथन है । गुरु यहा सुषुपिप- वस्थाविपे सर्वप्रकारके लयके देवावनेका उप- भावहै, ताते भेदज्ञानरूप विवेकके प्रभावमा नसे मधुविपे रस अरु समुवि नदियांवत यह दोनों दृष्टानहै अर्थात् मधुविषे रसकों।
॥पुमोपनिषद्॥ पर समुद्रपिपे नदियोंकों यह विवेक नहीं रहता जो हम अमुक वृक्षके रस अरु प्रमुक नदीका जल है। इस अभियायसे (विवेचन के अयोग्य ऐसा भाष्यमें कहा है। एतदर्थ पूर्व विवेकके प्रयोग्यगुरा यीछे लीनहोते हैं। जैसे जलमें। डूबता पृथम दर्शन के अयोग्यहुए पीछे डूब- ताहै तेसे ॥ इत्यर्थः॥ शंका ॥ इस पंचम स- मकरके भी प्रविद्याकी वासनासे विवेचतक रनेको अयोग्यहुपा सुयुनिके धर्माके अर्थ हो प्रश्म कियाहोगा ॥ समाधान ॥ यह पांका क. रने योग्य नहीं, क्यों किस परेऽक्षरे प्रात्यनि सम्प्रतिष्ठते सो परमात्मारूप अक्षरविषे वय को पावतेहैं इसप्रकार पागे इस ही प्रामकेन- वमवाक्यले अन्नविधे कहेंगे नाते। उपरु सु- युझिमें अज्ञानविषे ही लयहोताहै ताते । अरु "एष हि दृष्टा यह ही दृष्टाहै इत्यादि इस। एमके नवमचाववकी आदिमें कहे ज्ञान। विषे प्रतिविम्बित्त भोक्ता जीवके भी अक्षरविषे लयकाकथनहै ताते । रु पच्शय छा. या रहित अर्थात् प्रज्ञान रहित्त, यह इसही प्रहमके दमाम वाक्यविपे प्रज्ञानके अभावका कथन है ताते । एतदर्थ स-[कस्मिन्मुस- बैं प्रतिष्ठित्ताभवन्ति ! किसविषे सर्व लया ناوبشده चतुर्थप्रमा॥ ॥७॥ होते हैं। पंचम प्रक्ष्मकरके तुरीयरूप प्रक्षर ही । छाहै। इति भावः ॥ का॥ कार्यकारणसे । व्यतिरिक्त (जुदा) किसी एक लयके उपाधारसे। सामान्यरीनिकरके जानेहुए (किसविपे लय होता है। ऐसा वियोपार्थ प्रम उक्तहै । अरू यहां जिस- करके उसंलयके प्राधारका सामान्यपनेकरिके शान नहीं भयाहै नंब निसके विपरवरूपके उप- र्थ प्रध्म कैसे घदेगा किन्नु न घटेगा। उपरु जो। ऐसा कहो कि लयको प्राधारसहित होनेकरके। सामान्यपनेसे सि लयके माधारका ज्ञान भयाः । सो कहना चने नहीं, क्यों कि तिस तिस कार्य घटादिकोंका उपादान मृत्तिकादि अचेतनोंकों ही निन घटादिकोंके साधारहोनेकरिके तिन मृत्तिका दिकोंसें एथक चेतनरूप प्राधारकी प्रसिद्धिहे ।। एतदर्थ यहां वादी शंकाकरताहै] कि-जैसे त्या- गकिये दात्रि (दरांति धान्यपादिक काटनेकापा र)पादि करगोचन, अपनेर व्यापारसे निवृत्त भये इन्द्रियादि करण पृथक् ही अपने प्रात्म (कारण) स्वरुपविषे स्थित होते हैं, ऐसा मानना। युक्तहै, एतदर्य यहां सुषुप्तिकों प्रापहोके पुरुपोंके करणों (रन्दियों) का किसी भी विपे एकनाभा- के प्रापिकी प्रापकाकी प्राप्ति कहाँसे होगी, कि- नु न होगी ॥ समाधान ॥ हे वादी पृष्मकरनेवासे ॥२॥ ॥प्रस्मोपनिषद॥ की यह शंकान् कि किसविषे सर्व लयहोते है, -ज्युक्त हीहै, क्यों कि जितकरके जाग्रतविषेसं. घातरुपभये करण इन्द्रियादि) तो अपने स्वा- मी (संघाताभिमानी) के पर्थ होते हैं ताते परत- न्त्र हैं। पुरु एतदर्थही सुषुप्पिविर्षे भी एकबहु- ए करणों (इन्दियों) का परतन्त्र भावसे ही कि- सी नकिसी वस्तुविये मिलनां युक्त ही है एनर्थ पापीकाके अनुसारही यह प्रमहै। उपर्थात् १ न्तःकरणाविषे विद्यमान जे पीका निसके उपनुसा र वाएगीकरके कहा यह प्रमहै। सरु --यहां लयरूप विशोषएाकरके युत्ता जो सोपाधिमात्मा तविषयक प्रक्ष्म नहीं, किन्तु जैसे काक (को) करके उपससित देवदत्तका ग्रह, तैसे सर्वके। लयम्प उपलक्षणकरके लक्षित जे शुद्ध पा- त्मा नहिपयक प्रमहै। इस तात्पर्यसे कहते हैं। यहांतो कार्य गुरु कारएका संघानहै सो सुपुर ति अरु प्रलयकालमें जिसविपे लीन होताहै। सिकोनु स्यादिति सो को नहै। इसप्रकार जा. नने कीइच्छा वालेका-"कस्मिन्नु सबै सम्पत्ति हिता भवनीति किसविये सर्व भलीपुकार लीनहोताहै-जो यह प्रक्ष्महै सो कानुसा. र युक्त ही है ॥ २ रामः रामः रामः रामः रामः रामः रामः रामः एम - ॥
تراود- ۰۹ चतुथेप्रमा en तस्मै स होवाच । यथा गार्य। मिरीचयोर्कस्यास्तं गच्छन्तःसा ए-॥ तस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताःपुनः ॥पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै नासर्व । ॥परे देवे मनस्येकीभवति। तेन तोष। ॥पुरुषो न पटणेति न पश्यति न जिप्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवंदते नादने ॥नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपि- तीत्याचक्षते ॥ २॥हे सौम्य उक्तप्रकार जव प्रस्मकीयानबा "तस्मै स होवाच तिसकैम्पूर्थ सो स्पष्ट कह नाभया प्रर्थात् तिस गाग्र्यमुनि नामवाले उप- पने शिष्यके अर्थ सो पिप्पलादमुनिनामवाले। सर्वज्ञ प्राचार्य कहतेभये किन“यथा गार्य म- रीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छन्तः सर्वा एतसिस्तेजोम- एडलाकीभवन्ति," हे गार्य जैसे सूर्यके सर्व किरण अस्तहुए इस तेजोमंडलविषे एकत्र होने हैं- हे गार्य जी ने प्रथम कियाहै जिसका उत्तर सावधानतासे श्रवणकर। जैसे सूर्यके स- र्व किरण अस्तताको प्रापहुए इस तेजोमंडलवि- पे एकताको पावते हैं। अरु-"ताः पुनः पुनः रुदयतः प्रचरनि"। सो पुनः पुनः उदयकोपाये ॥मीपनिषदा हुए फैलतेहै-सो तिसही सूर्य्यक किरण वारं- वार उदयताको पाएहरा सर्वयोरकों फैलते हैं। "एवं ह वै तत् सई पर देवे मनस्येकी भवन्ति । एसे प्रमिह यह सर्व परम देव मनविषे एकत्र होते हैं। जिसप्रकार यह दृष्टान्तहै, सपकार । यह प्रसिद्ध जो विषय प्ररू इन्द्रियादिकोंका सम्: ह अरु चक्षुरादि देवताओंकों,मनके साधीन हो नेसे परमात्कष्ट देव (पृकापावान् ) जो मनहै ति सविषे, जैसे तेजोमय मंडल (सूर्य)विषे किर- एगोकी एकताहोती है जैसे, स्वप्नकालमें एकता को प्रामहोते हैं। अरु जागनकी इच्छावाले पुरु पके विषय अरु इन्द्रियादि,- जैसे सूर्यमण्ड- लसे निकलेहुए किरण अपने प्रकापाकर्तव्यरु: प व्यापारको करते हैं तैसे, - मनसं निकसेद्गुए। अपने व्यापारकों करते हैं। अरु जिसकरकी वनकालमें शब्दादि विषयोंके ज्ञानके साधक जे श्रोग्रादि इन्द्रियां सो मनविषे एकताको प्रा. पहुएषत् अपने करात्वरुप व्यापारसे निहत्त होते हैं। तेन तोष पुरुपो,न परोति,न पश्यति,न जिघ्रति.न रसयतेन स्प्रपाते,ना- भिघदते,नादत्ते, नानन्दयते, न विसजते,नया यते, खपितीत्याचक्षते २" तिससे स्वप्रकाल विप यह पुरुष, अवएकरतानहीं, देखतामहीं - پی او پیاو . चतुर्थप्रेक्ष्मः॥ ॥६ गंधलेना नहीं, रसकास्वाद लेना नहीं, स्पर्शकरतार नहीं,योलता नहीं,ग्रहणकरतानहीं ,प्रानन्दकों पा चना नहीं ,मलमूत्रको त्यागंता नहीं, चलता नहीं। किन्तु) सोवता है ऐसा कहते हैं,निसकरके तिस स्वप्नकालादिघे यह बह्मदतादि नामवाला पा रीररुप पुरुप,सुनता नहीं, देखनानहीं, गंघलेता नहीं, रसादिकीका स्वाद लेता नहीं,स्पर्प करता। नहीं, कुछ भी चोलतानहीं, कुछ भी लेता नहीं। विषयजन्य ज्यानन्दको पापहोता नहीं,मलमूनादि कोंको त्यागता नहीं, कहींकों भी चलना नहीं, कि तु उसकी सोचता है ऐसा कहते हैं ॥ ३ ॥४॥ हे सौम्प यहां पर्यन्त ! पतस्मिन् पुरुषे कानि स्व- पनि इस पारीरविषे कौनसोवताहै इस प्रथः मप्रमका उत्तर कहा ॥ ३॥ हे सौम्य अब कान्यस्मिन् जाग्रति ।। इस पारीरनामक पुरविषे कौन जागताहै। यह जोशार्दीमुनिका हितीय पक्ष्महै जिसका उत्तर जोपिप्पलादाचार्यने कहा तिसकों भी श्रवण करो। पिप्पलाद.उवाच ॥ हे गार्य ।"प्राणाग्न- य एवैतस्मिन् पुरे जागति" इस पुरविष प्रा- गरुप अग्नि ही जागते हैं। उपर्यात् चक्षुरादि सर्व करणोंको सोये (मनधिषे एकत्र हुए।
پشاوند-۶ त्यीयपनीयःप्राणः॥ ॥६॥ ॥प्रमोपनिषद् ॥पाएाग्नय एवैतस्मिन् पुरेजा-॥ ॥गति। गार्हपत्यो हवा एषोऽपानी॥ व्यानोन्वाहा-पचनो यहार्हपत्या-॥ इस नव किम्बा दश किम्वा एकादपा द्वारवाले दिहरूप पुरविणे प्राएादि नामवाले पांच वायुही। अग्निवत्, अग्निहै सोई जागते हैं । हे सौम्या प्रव-प्राणोंकों प्रग्निकी समता कहते हैं तिसर को श्रवणकरों ॥"गार्हपत्यो ह वा एयोपानी यह प्रसिद्ध अपानहै सो गार्हपत्याग्निहै - र्थात् यह जो प्रसिद्ध अपानवायुहै सोई गार्हप- त्पनामवाला अग्निहै । प्र०॥ किसपकारहै। उ०॥“गार्हपत्यात्पएगीयते" गार्हपत्य नाम- वाले पग्नि, से निकलते हैं। हे सौम्य जैसे अन्य प्रग्निके रचनेवाले गार्हपत्य नामवाले अ- ग्निसे, नित्यके प्रग्निहोबके कालसे प्रन्या- ग्निहोत्रके कालविषे तिस गार्हपत्य प्रग्निसे उY. न्य प्राहवनीय नामवाला अग्नि निकालते हैं। नसे जिसर्करके सुपुनिअवस्थाको प्रानभये पुन रुपके, गार्हपत्याग्निभावसे कहा जो प्रपानना मवायु निसके भीतरजानेसे पाहावायु निराय .
Hri. चतुर्थ प्रमः४॥ nku रण होताहै जिसकारणसे मेघोमैंसे निकसे चन्द्र मावत् । अपानवायुसे निकसेहुएवत् मुख गुरु नासिकारुप हारसे बाहर (ऊपर) को चलताहै। एतदर्थ अपानवायु गार्हपत्य अग्निके स्थानाप- है। पृस-“पाहवनीयः प्राध्या। पाहवनीय है। जैसे गाई पत्याग्निसे निकस- नेवाला पाहवनीय अग्निहै, वैसे ही अपांना वायुसे निकसने वाला प्राणवायुहै, एनर्थ प्राण वायु आहवनीय नामवाले अग्नि स्थानापन्न है। प्रत्-"व्यानोन्विाहार्यपचनो व्यान दक्षि गणाग्निहै। व्यानवायुहै सो हृदयरूपदेपासे द- सिपवाजुके छिदहारा निकलताहै इस ही करके सो दक्षिादिशाका सम्बन्धीहै एतदर्थ वो दक्षि- गाग्निके स्थानापन्नहै ॥ ३ ॥ ४४ ॥ ४॥हे सौम्प अब यहां इस चतुर्थवाक्य करके अग्निहोत्रके हवनका कर्ता ऋत्विकरूप होता कहते हैं । पिप्पलाद उवाच ॥ हैगार्य "यदुनासनिलम्सावतावादुनी समं नयतीति समानः। इन उचास गुरु निश्वासरुप उपा हुतकों सम प्रमुत्त करताहै सो समानहैप्रति जिस करके उच्चास गुरु निवास यह दोनो। पाहुत्तिहैं । क्यों कि पग्निहोत्रकी दो पाहुति نے ارشد ॥४॥ ॥प्रमोपनिषद॥ ॥यास निश्वासावतावाहुत्ती ॥ समे नयतीति ससमानः। मनोहवाच. यजमान इष्टफलमेवोदानः स एनं य. ॥जमानमहरहर्वह्म गमयति॥४॥४५॥ वत् सर्वदा दोनोकी संख्याकी समताहै। उपरु तिसकरके यह दोनो पाहुतिरुपहैं। अरु जो इन उच्छ्रास प्ररु निवासरूप पाहुनिकों उप- ग्निहोत्रके हवनकर्ता होता वत् , पारीरकी स्थि निके निमित्त समभावसे जो वायु प्रदत्त करता है, तिसकरके सो वायु दोनों साहतिका पूवर्त क होनेसे पूर्वोक्तिके अनुसार अग्निस्थानापन्न हुम्भार भी होतारूपहै,- [पका !"पाएनय! इस वाक्यसे सर्व प्राणों की अग्नित्व कहाहै, तव यहां समानवायुकों होताकरके कैसे कहते हैं । समाधान ॥ हे सौम्प यद्यपि !"पागानय एवै- तस्मिन् पुरे जागति ! पांच प्राणरूप अग्नि ही इस पुरविषे जागते हैं। इस तीसरे वाक्यविधे। समानवायुको भी अग्निरथानापन्न कहाहै सो सत्याहै, तथापि जैसे अग्निहोत्रविपे हवन कर्ता ब्राह्मण दोनों पाटुनिसको आह्वनी य नामवाले अनिकेप्रति समभावसे हवन कर ताहै, तैसे- यह समानवायु उच्चास सुरु ।
चितुर्थमः॥ गया निश्वासरुप दोनो पाहुतिनीको शरीरकी स्थितिर रहनेकेपर्य समताकरके प्रसन्न करें, पतदर्थमा हुनिका प्रवर्तकहोनेसे निस समानवायुकों होता। नामसे कहतेहैं। गुरुः समानवायुको होतापनेके सिह भये जो अग्निपनेका कथनहै तिसका.छ- त्रीवाले जाते हैं, इसवाक्यसे जिसकेपास छत्रीहै। निसका अरु निससे भिन्न दूसरेका दोनोका ग्रह- होताहै । तैसे ही अग्निरूप अरु. तिससेभीन्न होतारूप दोनोके गहएविषे यह लाक्षणिक प्र. र्थहैं ] -॥पः॥ यह होनारूपवायु कौनसाहै।। उ०॥ सो होतासूप समान नामवाला वायुहै।। [तीनो अवस्थाम्पोसे रहित अरु तीनों अवस्थामें वर्तमान उच्चास गुरु निश्वासरुप प्राणेकी उन ग्निहोबके अवयवरुपताके सम्पादनका उपासना रुप प्रयोजन नहीं, क्यों कि यहां निर्विोष पात्र माका प्रसंगहै ताते । अरु यहां निस प्रागकी वि. धिका अभावहै नाते। किन्तु इन्द्रियां सोवेंहैं । अरु प्राण जागे, ऐसा कहाँहै। नाते यहां लंपद के शोधनरुप ज्ञानकी स्तुति हीहै ] एतदर्थ वि हान् (कर्मउपासनाके समुञ्चय करनेवाले) का खप भी अग्निहोत्रका हवन ही है। नाते विहान। कर्मसे रहित नही एसा माननायोग्यहै। अर "मनो हवाच यजमानः"मन प्रसिद्ध यजमान ।
بازدید ۹۶ ॥६॥ ॥प्रमोपनिषद॥ है। खप्पविये पंचप्रारुप निके जागतेहुए पाहरके करएको पुरु विपयोंकों लयकरके। अग्निहोत्रका फलजो स्वर्ग तहत् , सुषुप्तिकाल विषे ब्रह्मके पर्थ जानेकों इच्छाकरताहुमा मन यजमानवत् पसिह जागताहै। पुर्यात् सोमन जैसे यजमान यज्ञकी सर्वसामग्री में प्रधानहोना है तैसे, कार्य अरु करणीविषे प्रधानहोनेकरके व्यवहारकरनेसे ; गुरु जैसे यजमान स्वर्गार्य। प्रस्थानपावताहै तैसे, ब्रह्मरुप वर्गके नाई पु- स्मानको पायाहोनेसे यजमानहै। ऐसाजानना। प्रष्ट फलमेचोदान। उदान यज्ञकार फलहीहै- उदानवायुजो उत्क्रपगमें प्रधानहै। सो यज्ञका फलहीहै। काहे कि यज्ञके फलकी प्राप्ति उदानवायुरुप निमित्तवाली है ताते। [Y- र्थ यह है कि यजमानकों मरणके उपनन्तर उदा- नवायुरूप निमित्तयारले यज्ञादिकोंके फलकी प्राप्ति है ताते उस उदानवायुको यज्ञोंके फलका निमि- त्तकारएण्होनेसे, अरु काराविषे कार्यके भारोम होनेसे उदानवायुकों इष्टफलकरके कहाहै ।। उदानवायुकों यज्ञका फलपना कैसे है । Tour “स एने यजमानमहरहर्बह्म गमयति । सो इस यजमानकों दिनदिनविषे उसके उपर्थ प्रापकरता है। तो उदानवायु इस मन नामवाले यजमानकों चतुर्थ प्रमः॥ ॥७ ॥अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभ-॥ ॥वति यदृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुत-॥ ॥मेवार्थमनुष्टणोति देता दिगनरैश्च॥ ॥प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति ॥ ॥चादृष्टञ्च श्रुतचाश्रुतञ्चानुभूत-11 ॥चानुभूतञ्च सर्वपश्यति सर्वःपश्यति॥ ॥५॥४६॥ स्वपत्तिरूपसे भी चलायमानकरके नित्य नि त्य सुपुतिकालविषे अक्षर ब्रह्मरुप स्वर्गके नाई ही पापकरेहै। अर्थात् [ यद्यपि दिनदिनविषे जो ब्रह्माकी प्रापिहोतीहै सो यज्ञका फल नहीं । काहेते कि यज्ञसे रहित पुरुपकी भी तिस सुघु पिविषे उस ब्रह्माकी प्राप्तिहोतीहै ताते। तथापि बलकों ही सर्वयज्ञोका फलपनाहै, ताते सुपुन पितराहारकरके तिस ब्रह्मके पापक उदानवायु को टफलकी प्रापकताहै, यह भावहै एत- दर्थ उदानवायु यज्ञके फलके स्थानापन्न है। इति सिद्धम् ॥ ४ ॥ ४५ ॥ ५ का!"गार्हपत्यो ह वा एपोपानो यह अपानवायु गार्हपत्य नामवाला अग्निहै। यहां से प्रारंभकरके "मनो ह वाघ यजमान!
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॥९॥.. ॥प्रश्मोपनिषद
मनरूपं ही प्रसिद्ध यजमानहै। इस श्रुतिपर्यन ।
जो कहाहै निसकरके विद्वान् कर्मी नहीं होता।
इसप्रकार विहानकी स्तुतिकियाहै. ऐसा तुमने क
हा सो प्रस्तु । परन्तु इसप्रकार नहीं निहीत्रा.
दि कर्मीकी प्रतीतिसे उदानवायुकों यज्ञके फल
स्थानापन्न कहाहै.निसकरकेतो इस यज्ञका फल
पना नहीहै, क्यों कि नहीं कर्मकी प्रप्रतीति है।
नाते ॥ समाधान ॥ यहां यह भावहै कि, श्रो.
वादि इन्द्रियां स्वमविषे सोवें (उपरामहोवें) हैं।
अरु प्रागाही जागते हैं, इस रचरुपवाली वि-
घारूप विहताहै निस विद्दताकी यहा स्तुतिका
रतेहैं। उपरु इस उक्तविद्याकों जागरण जो
है सो श्रोत्रादि बाह्य इन्दियोंका धर्म है अरु
शरीरका रक्षा करना पाएका धर्म है ताते।
इनमें प्रात्माकाधर्म कोई नहीं इसप्रकारक।
त्वंपदके, विवेकरूपहोनेसे उक्त विद्याकरके पुन
क्त विहानकी स्तुतिकरनेकी योग्यताका संभव
है। पृरु एतदर्थ ही पाएका जो जारहाहै
सो विहान् पृरु प्रविझन् दोनोंकों समानही
नव विहानको त्यागके विहानकी ही स्तु-
तिकैसे है, ऐसी जो रही शंका निसका भी -
भाव भया, क्यों कि अविहानको उक्त विद्याकी
विवेकका प्रभावहै नाते , विद्वानकी ही स्तुति है।
॥चतुर्थ पृष्मः॥ ॥ हे सौम्य इसप्रकार विहानकों श्रोत्रादि इन्द्रियरुप करणों के उपरामकालसे प्रारंभकरिके यावत् प- बल सुमुमिसे उत्थानको प्राप्त होताहै तावत्यर्यनर सर्व यज्ञके फलके अनुभव होनेसे पृविहानौवन नर्थके हेतु नहीं। इस प्रकार यहां विहनाकी स्तुनिकरते हैं। पुरु जिसकरके केवल विहानके ही श्रोत्रादि इन्द्रियां सोवे हैं, अथवा पाएरुपयों च अग्नि जागनेहैं, पृथवा जागत पर स्वप्नविषे मन अपनी स्वतंत्रताको अनुभवकरताहुमानि- त्य नित्य सुषुप्लिको प्रापहोताहै ऐसा नहीं जाने। विहानके ही इन्दियादि उपरामादि होतेहै इस प्रकारका विधानकरना योग्य नहीं, किन्तु सर्व प्राणाधारियोंकों क्रमसे जागत स्वप्न पुरु सुषुः नि यह नीनों अवस्थाधिषे जो गमनहै सो समा- न ही है। एतदर्थ यह विहानकी स्तुति ही संभ- वेहै ॥ हे सौम्य पूर्वजो गाार्यमुनिने तीसरा प्र. म कियाथाकी "कतर एष देवः स्वमान् पश्य- निकौनसा यह देव स्वप्नोंकों देवताहै। तिस- का उत्तर पिप्पलादमुनि कहतेहैं कि हे गार्य । "पुत्रैष देवः स्वप्रे महीमानमनुभवति । यही यह देव स्वप्रविषे महीमाको उपनुभव करहै। मर्यात प्रथन श्रोत्रादि इन्द्रियों के उपराम भये अरु देहकी रक्षार्थ प्राणादि पांचवापुके तागने । بین اونه ॥१०॥ प्रमोपतिपद्॥ हुए सुपुपिकी प्राप्पिसे पूर्व इस सन्धिमें यह देवर जैसे सूर्य अपनी किराको उपनेविषे लयकर ताई नैसे, अपने स्वरूपधिषे लय कियेहैं चक्षुरा- दिकरण जिसने इसप्रकार हुमा खप्परिये विषय अरु विषयीरूप अनेक वस्तुपोंको यात्म (अपने) भावकी प्रापिरुप महिमाकों अनुभव करताहै ।। का ॥ महिमाके अनुभवकरनेविषे अनुभव कर्नाको करण जो है सो मनहै एतदर्थ सो मन स्वतन्वहोनेसे कैसे अनुभव करताहै ॥ समाधान। हे सौम्यक्षेत्र प्रात्मरूप जो देव है सो स्वतन्त्र हुप्रा भी महिमाका अनुभव करताहै यह दोप नहीं है। क्यों कि क्षेत्रज्ञका जो स्वतन्त्रपनाहै सो मन- रुप उपाधिका कियाहै। गुरु परमार्थसेतो स्वयं क्षेत्र न सोवताहै न जागताहै नाते तिसक्षेत्रज्ञ का जो जागना उमरु सोवनाहै सो मनरुप उपाधि कातही है ॥ तथाच "सधीः स्वप्नो भूत्वा ध्यायती वेत्यादि बुद्धिसहितहुमा , आत्मा, स्वरूपहो के ध्यायतेहुएव होताहै इत्यादि वृहदारण्य- क उपनिषद् विधे कहाहै । एतदर्थ देव पाध्दकर के उक्त मनको विभूतके अनुभव करनेविपे रच- तन्यपनेका वचन युक्त ही है ॥ हे सौम्य कईए कवादी कहते हैं कि क्षेत्रज्ञको चपकालाविये मनरुप उपाधिकरके सहित रातिस क्षेवनको Hindi चतुर्थमा ॥१०॥ स्वयंन्योतिपने की प्रतिपादक श्रुति वाधको पाय- तीही, सावने नहीं। क्यों कि उन चादी पुरुषोंकों श्रुत्यर्थक प्रज्ञानसे भयी भानिहै । अरु जि. ससे मन पादिक उपाधिकरके जन्य जो स्वयं ज्योतिपने ग्रादिकाव्यवहार है सो भी मोक्षपर्यन्त सर्व विद्या (उपविद्वान् का विषय ही है।। क्योंकि यित्र वा अन्यदिव स्यांजालान्योन्याय- . श्येन्माने संसर्गस्त्वस्य भवति? जहाँ वा अन्य वदहोय नहीं अन्य पुस्यको देरव अरु इस 1. मात्माको विपयोंसे सम्बन्धहोता है। गुरु मित्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्ताकेन कं पश्येदि- त्यादिश्रुतिभ्यः जहा तो इस (पुरुष) को स- व प्रात्माहीं होता भया नहीं किसकरके किस- की देखे। इत्यादिक इहदारण्य उपनिषद्केर टि अध्यायकी श्रुतिसे सिद्धहै नाते जो पा. काहै सो मंद प्रसवेत्ताओंकी ही करीहुयीहै या थार्थ एकात्मवेत्ताकी नहीं, ऐका ॥ हे भध- वन् जैसा प्राप कहते ही नैसा होनेसे!"अवार्य पुरुपः वयंज्योति" यहां यह पुरुप खयंन्यो- निहै। इस श्रुतिविपे पत्र यहां ऐसा जो विपोषाहै सो व्यर्थ होयेगा । समाधान है। सौम्प हे चादी यह तुम्करके पल्पही कहते हैं। निमंकरके !"यएपोन्तर्दृदय पाका तस्मिन्छेने- . ५१०२॥ ॥पृष्मोपनिषद् नि? जो यह अनर हृदयविधे आकाश तिसवि घे (मामा) रहना है। इस श्रुतिकरके सन्नरहद यके परिच्छेदके भये अवस्थकरके पात्माकाव- यज्योतिपना बाधकों पावेगा । अरु जो कहे कि यद्यपि यह उक्त दोष होगा, यह पापका कहना सत्य ही है, तथापि खपविषे यात्माकों केवल (मनके प्रभाव युक्त) पनेसे स्वयज्योति होनेक रके निस आत्माका साधा वोज (प्रतिबन्धक) दूरभया अरु [ उपवशेष रहा जो प्रात्मा निसका बोध सुषुप्तिविषे होगा यह तेरा अभिप्रायहै सो कहना बने नहीं। क्यो कि वहां (सुषुप्तिविये)भी पुरीननियोते नि पुरीतति नामवाली नाड़ीविपे रहताहै। इस युनिकरके पुरीतति नामवाली नाड़ियोका सम्बन्ध रहताहै नाते ॥ अरु.जो सा कहे कि वहां स्वपमें भी पुरुषकों, स्वयंन्यो नि होनेसे जब साधे दोजके दूरहीनेका अभिप्रा य मिथ्याहीहै । तब !"पत्राय पुरुषः स्वयंज्यो. निर्भवति यहां यह पुरुष स्वयज्योति होता है। यह कहना कैसे बनेगा। गुरु जो कहो कि अन्य प्रारखान्तर रहनेसे यह श्रुति अन्य श्रुतिकी अपे क्षासे रहतीहै सो भी बने नहीं। क्यों कि सर्वशु- नियोंके अर्थकी जो एकनाहै सोई इच्छित नाते । म सर्व वेदात्तपास्त्रोंका पुर्यरूप एकही झात्मा شن اداری سوم ॥चतुर्थ पृष्मः॥ ॥१०॥ पाचार्यकरके जनावनेकी उग्ररु जिज्ञासुयोंकरके जाननेकों इच्छितहै। एतदर्थ श्रुनिकों यथार्थतत्व की प्रकाशक होनेकस्के खप्नविधे यात्माके खयं। ज्योति पनेका संभव, कर्नेकों युक्तहै । ऐसे वादी- ने कहा ॥ तब सिद्धान्ति कहेहैं कि है वादी जबतूं इसप्रकार जानताहै तब अपने सर्व अभिमान को त्यागके इस वृहदारण्यकी श्रुतिका अर्थ श्रवणकर, क्यों कि अभिमानके होने तो सौवर्ष पर्यन्त भी अपनेकों पंडितमानने वाले पुरुषोंकर के श्रुतिका अर्थ जाननेकों शक्य नहीं ॥ ताते। यहां श्रुतिका यह उपर्थहै कि जैसे हृदयाका विषे अरु पुरीति नामवाली नाडियों विषे स्वपः को पासहुए पात्माका उन स्थान पर जिनके धर्म से सम्बन्धका भावहैं, ताने उपात्मा उ. न्होंकरके (चन्द्शावा म्पाय प्रमाण) विवेचनका रके देखाचनेकों शक्य होताहै। एनदी भास्माका स्वयज्योतिपना चाधकों पावतानहीं। इसमकार। विद्या अरु काम पृरु कर्मरूप निमित्तोंसे उद्ध वताको प्रापभयी जो वासना तिस वासनावाले म नाविषे कमरूप निमित्तवाली वासनामय प्राविधान से उपन्यकों उपन्यवस्तुवत् देखनेवाले, गुरु सम ल कार्य प्ररु करासे विवेचन कियेहुएइप्टाकों उपयरुप वासनासे स्थक होनेकरके तिसकास्वयं २०४॥ من رو میشد به ॥पृहमोपनिषद् ज्योतिपना, नित्य गर्वित नैयायिकोंसे भी निवारण करनेकों शक्य नहीं। ताते करणोंके मनविपेली- नहुए गुरु मनके उपुलीनहुए मनोमय देव स्व पोकों देवताहै। यह प्राचार्य (पिप्पलाद)ने। श्रेष्ठ कहाहै ॥ पृ०॥ हे प्रभो कैसे महिमाकों नुभवकरताहै ॥ 3 ॥ सौम्य । म दृष्टं दृष्टमनुः पश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थ मनुश्रुगोनि"। जिसको दिरनाहै (निसदों) देवेहएवत् मानना है (गुरु)। सुने प्रर्थको पीछेसुनेहुएवन् मानना पूर्थात् निल मित्र वा पुत्रादि कोकों पूर्व देवताभयाहै नि: नकी वासनाकरको युभया, पुत्र या मित्रादिको. की नासनासे उत्पन्न हुए दृष्टवस्तुको पुत्र अरु । मित्रवत् पविद्याकरके देखेहुएवत् मानताहै। ति सही प्रकार जो अर्थ सुनाहै निस ही सुने अर्थकों निसकी वासनावा पीछे सुनेहुएवात् मानता है। रु-"देपादिगन्नरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्र. त्यनुभवति"। देशसे उपुरु दिपानरसे वारंवार उपनुमकियेकों उपनुभवकरताहै नदीकेनट। प्रादि अन्य देशोंसे अरु पूर्वादि अन्य दिशामोसे वारंवार अनुभव किया जो वस्तु निनकों पृविधान करके अपनेकदिनोविषे पर्तमान पुनेकस्वप्रविधे उनुभवकारताहै। शुरु-1“दृष्टचादृष्टञ्च श्रुत- चाशुतश्चानुभूतन्चानुभूतञ्च सर्च पप्यति सर्च پیشین امید पचतुर्य पृष्मः॥ ॥१०॥ पश्यति"। देखे अरु न देखे, सुने गुरु न सुने। अनुभवकिये गुरु न पृनुभवकिये सर्नकों देख- ताहै सन या देवताहे-तैसे ही अन्य जनावियो दिखे उपरू इस जन्प्रधिषे न देखे वस्तुकों परू नैसे. ही अन्य जन्मधिपे सुने अरु इस जन्मपि न सुने वरनुको सुरु से ही अन्य जन्मविपे मनकर ही अनुभवकिले मृर इस जन्मविषे केवल मनसेन अनुभवकिये अर्थात् जलादि सत्यरुप रु मरी- चिजल उपादिक प्रसत्यरूप, किन्तु बहुत कहनेले. थाहै, इन सर्व वस्तुको जो देवताहै सो सर्व मन- की वासनारूप उपाधिधालाहमा देखनाहै । इस फार सर्व करणारूप मनोमयदेव वनोको रेरचन है ॥ रतिसिद्धम् ॥ ५ ॥ ४७ ॥ हे सौम्य ऽपय गार्यमुनिका जो चतुर्थ प्रमहै कि . यह सुरव किसको होताहै , जिसका तर जो पिप्पलादमुनिने फहाहै तिसदों भी मवरण करो ॥ पिप्पलाद उवाच ॥ हे ार्य स यदा तेज साभिभूतो भवति"1सो जिसकालविप नेजया रले पराभव होताहै। पर्याद सोमनरूपदेव जिस कासधिचिन्तानामवाले सूर्यके तेजकरके नाडी रूप सय्याविपे सर्वमोरसे पराभयकों प्राप्त होताहै। पर्याद .यासनाके उबले हाररुप स्वपभोगके।
॥९०६॥ प्रमापनिषद॥ Tr-kind ॥म यदा तेजप्ताभिभूतो भवति ॥ ॥सत्रैप देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ दैत- ॥स्मिन्छरीरे एतत्सुखं भवनि ॥६॥७॥ - दाता जे कर्म तिनके तिरस्कारकरके युक्त होताहै त व इन्द्रियों सहित मनके वासनारुप किरए हृदय विषे लीन होते हैं। तब मन वनके अग्निवत् सा- मान्यज्ञान , पृर्थात् चैतन्य, रुपताकरके सम्पूर्ण शरीरविषे व्याप्नहोके स्थित होताहै , तव सुपुषिकों। प्राप्त होताहै , नव- ।“प्रत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यति यहां यह देव स्वप्नोको नहीं देखना-~निस कालविये मननामवाला देव स्वप्नोंकों देखना नहीं, कयों कि देखनेक जे हारहैं सो तेजकरके निरोधकों गावते हैं । अरु-"पृथ नदैतस्मिन्धरीरे एनत् । मुखं भवति"। पीछे तय इस पारीरविपे यह सुख होताहै। अर्थात् जो याधरहित सामान्यरूपसे । शारीरविसे व्यापक प्रसन्न ज्ञानरुप स्वरुपसुखहै सो यह है ॥ ६॥ १७ ॥ ७॥हे सौम्य [क प्रकार इस पश्चाक्य करने यानन्दमयकोषाशब्दका वाच्य उपस्पष्ट गुरु मनर सादिकों को बासनावाला ज्ञान, सुपुतिका धर्मी, इसप्रकार गार्ग्यमुनिके कस्यैतत् सुखं भवति هن او شهر चितुर्थमा ॥स यथा सोम्य वयांसि वासो वृक्ष। ॥सम्प्रतिष्ठन्ने । एवं ह वै नासर्च पर शा.) आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥७॥४॥ किसको यह सुरव होता है। इस चतुर्थ प्रस्मका उत्तर पिप्पलाद मुनिने कहा ॥ पृय इस सातवें वायकरके गार्ग्यमुनिके कस्मिन्नु सर्बे सम्पतिष्टिना भवन्तीति इस पंचम यक्ष्मका उजर, विवेककी सुगमतासे तुरीय वरुपको विवेचनकरके कहते हैं ] ॥ इसकासविषे भविद्या अरु काम पुरु कर्मरूप कारणसे भयेजे कार्य पुरु करए। सो निवृत्तहोते हैं । पर तिनके। निवृत्तहुए उपाधियोंसे विपरीन भासमान जो प्रातमा स्वरूप मो भदेत एक शिव (सुस्वरूप) शान होना है, एतदर्थ इस ही सुपुति चस्माकों एथिवी श्रादिक भून पृरु प्रविधारचित निनकी मात्राके विवेकक- रिके अक्षर प्राविषे प्रवेपासे देखाचनेकों दृष्टान्तक हतेहैं । “स यथा सोम्य वांसि चासो वृक्ष सम्पति- रन्ते" हे सौम्य जैसे पक्षी यासार्थ वक्षकेताई जा निहैं । अर्थात् पक्षी जो हैं सो निवासकरनेके अर्थ क्षप्रति जानेहैं। जैसे यह दृष्टान्तहै - "एवं ह वैध तत्सर्व पर प्रात्मनि सम्पतिष्ठने"ऐसे प्रसिद्ध सो सर्व परमात्माविये जाताहै-इस ही प्रकार प्रसिद्ध सो जो भागे कह सर्व जगत् प्रविनापीक्षप। 41 پی ایدی ۱۰۰ ॥२०॥ प्रथमोपनिषद॥ पाटथिवीच एथिचीमाना नापश्चा- ॥पोमात्रा च तेजश्व तेजोमाता च वायु-।। ॥ध्य वायुमावा चाकाशवाकापा मामाचा ॥चाव द्रव्यञ्च भोवब्ध श्रोतव्यन्द घ्रा- गञ्च प्रातव्यच्च रस रसवितव्यन्न ख. कच म्पयिनयन्च वा च काव्यश्च । गहनौचादानव्यन्बोपम्यश्वानन्दयितव्यच ॥ गयासुश्च विसर्जयितव्य पादौ च गन्या ॥च मनश्चमलव्यच बुद्धिा बोधव्वाचा. आहारवाहङ्कलव्य शिवम चेनवितव्य- गच्च नेजश्व विद्योतयिन्यन्त्र पाराय। ॥चिधारयितव्यञ्च ।। र परमात्मादिपे लय होताहै ॥७॥४८॥ ॥ हे भगवन् जो सर्व जगत् परमात्मावि- जाताहै सो कोन है ।उ.॥हे सौम्य इसको भी श्रवणकरो ।“थिवी च पृथिदीमालाचा. पश्चापोमाता च तेजश्न जोमात्रा च घायुश्व वायुमात्रा चाकापाश्चाकापामाला"थिवी अरु पथिदीकी मात्रा (गन्ध) । पुनः जल पुरु जलकी मात्रा (रस)। पुनः तेज अरु नेजकी। मामा (रुप) । पुनः घायु अर वायुकी माता پیر امینی و در चतुर्थ पध्म:॥ ॥१० (स्पा)। पुनः उपाकाश अरु प्राकापाकी माला (पाद)। अर्थान् गंधादि जनमांत्रारुप उपपं. चीकृत पंच महाभूत सूक्ष्म । अरु एथिव्यादिप चीकत महाभूत स्थूल । गुरु-चक्षुश्च दृष्ट- व्यञ्च श्रोताच श्रोनच्यच्च प्रागञ्च प्रातव्य- च रसश्व रसयितव्यच्च त्वक च स्पायित- व्यञ्च वाकच वक्तव्यच हस्तोचादातव्यच्ची- पस्थश्वानन्दयितव्यच्च पायुश्व विसर्जयितव्यय पादौ च गंतव्यच्च"चक्षु अरु देखनेयोग्यच- स्तु , श्रोत्र पुरु सुननयोग्य वस्तु , पुनः प्राग १रु गंधलेनेयोग्यवस्तु, पुनः रसना अरु रसलेने यी- ग्य वस्तु पुनः त्वचा उग्ररु स्पर्णकरनेयोग्य वस्तु। चाचा गुरु बोलनेयोग्य वस्तु , पुनः दो हाथ ग्रह लेने देने योग्य वस्तु • पुनः उपस्थ (लिंग) अरु प्रानन्ददेनेयोग्य वस्तु , पुनः पायु (गुदा) पुरुष त्यागनेयोग्यवस्तु पुनः दो पाद गुरु चलनेयो। ग्य वस्तु पृर्थात् यहा ज्ञानेन्द्रियां अरु कर्मेन्दियों यायकरण अरु तिनके विपय कहै । अरु "म- नश्च मन्तव्यञ्च चुद्धिश्च वोधव्यम्बाहङ्कारश्वाह इतव्यच चित्तञ्च चेतायनव्यञ्च नेजश्च विद्यो नायित्नच्यच्च प्राणश्व विधारपितव्यच -"मन परु मननकरनेयोग्य वस्तु , पुनः बुद्दि अरु माना नेयोग्य वस्तु , पुनः अहंकार अरु अहंकरने योग्य अप्रमोपनिषद॥ ImmineK वस्तु, पुनः चित्त अरुचिंतनकरनेयोग्य वस्तु पुनः प्रकाश १३ प्रकारानेयोग्य वस्तु, पुनः प्राण - रु धारणकरनेयोग्यवलु अर्थात् उक्त मन अरु मननकरनेयोग्पवस्तुरूप निसका विषय,अरु नि- श्वयमात्मकरूपा युद्धि मह जाननेयोग्य वस्तुरूप तिसका विषय, १० पाभिमानात्मक उपनःकरण कम अहंकार अरु अभिमानकरनेयोग्ययनुरूप तिसका विषय, सस वेतनासत्यात्मक अन्तःक- रणरुप चित्त मरु चिन्तनकरनेयोग्यवस्तुरूप सका विषय, गुरु त्वचाइन्द्रियसे भिन्न प्रकाशयुक चर्मरुप तेज पृरु निससे प्रकापाकरनेयोग्य सोई तेजकाहपषस्तु निसका विषय । उपरु जिसकोंसू. त्रात्मा कहते हैं ऐसाजो प्राण सो गुरु निस प्राण सूत्रातमाफरके धारकरनेयोग्य सर्व कार्यकरण- का संघानरूप यह पर अर्थात् अपनेसे इतर के अहोनेकरके मिश्रितहुमा नामरूपात्मक जगत् निसका उपाधिभूत इतना ही सर्वहै ॥ ruven हे सौम्य यह जो सुरुको कहा इस सर्वसे पर जो जगतका कर्ता ,मात्मस्वरूपहै सो मूर्यके मर्यात् जलादिगत सूर्य के प्रतिविम्व भादिकोवन भोकापने अरु कापने करके इसलिये प्रवेशकों पाया निदर्थ “ष हि दृष्टास्टर श्रोता घ्राता رویاه गचतुर्थमः॥ ॥एष हि द्रष्टा स्पष्टा श्रोता घ्राता। ॥रसयिता मना बोहा का विज्ञानात्मा ॥पुरुषः। स परेग्क्षरे अात्मनि सम्पत्ति- ॥ठने॥६॥ ५० ॥ रसयिता मन्ना घोड़ा का विज्ञानात्मा पुरुषः। यह ही देखनेवाला स्पर्शकरनेवाला सुननेवाला स्वादकालेनेवाला मननकरनेवाला जाननेवाला। करनेवाला उपर विज्ञानात्मा पुरुषहै। उपर्थात् । जिसकरके जानते हैं ऐसा जो करणरुप बुद्धिम्पादि- क विज्ञानहै सोयह नहीं, किन्तु यह तो जो जानता है ऐसा कर्ता अरु कारकरूप विज्ञान है तिस विज्ञान नरूप स्वभाववालाहै अर्थात् विज्ञातावभावपासाहै। एनदर्थ विज्ञानात्माकहतेहै । अरु निस दीको कार्य Yरु फरणके संघातरुप उक्त उपाधियोंविषे पूर्ण होनेसे पुरुषकहते हैं । “स परेक्षिरे सात्मनि सम्पः निष्ठने" सो अक्षररूप परमात्माविषे सीन होता है। सो पुरुप जैसे जलादि साधारके शोषण्हुए सूर्या दिकोंके प्रतिविम्ब सूर्यादिकोंविषे प्रवेपाको पावते है| से ही प्रसररूप परमात्माविषे लीन होताहै। आहे.मोम्म प्रव तिस जीवात्मा अरु पर- मात्माकी अभेदताके जाननेवालेनों जो व्रलय ॥११॥ عناوین۔ 11۴ प्रमोपनिषद॥ ॥परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै॥ निदच्छायमशरीरमलोहितं शुभमक्षरं। वेदयते यस्तु सोम्य। स सर्दशः सव। ॥भवति नदेषश्लोकः॥ २०॥ ५९॥ प्राप्तिरुप फल होताहै सो कहते हैं। “यस्तु सोम्य । है सौम्य, जोस यो ह वै|-कोई कहीं सर्व एषणासे रहितहमा- "दच्छायमसारीरमली- हितं पुउधमक्षरं वेदयते"निस पृछाय अपारी र प्रलोहित शुद्ध अक्षरकों जानता है अर्थात तिस पृज्ञानरहित अरु पारीररहित अरु लोहिता- दि गणरहित-पात प्रज्ञानादि तीन विशोषण से रहित कहनेसे कारण १रु सूक्ष्म अरु स्यूल। इन तीनों प्रारीरोंका निषेधहै .तिसकरके प्रचस्थाती- नोंका भी निषेधहोताहै, तिस निषेधसे पात्माका. जो तीनों अवस्थासे रहित पनाहै तिसका अनुवाद करतेहैं] - प्ररु नामरूपादि सर्व उपाधिके पारीरसे रहित, गुरु रक्तादि व्यवत् रक्तादि सर्वगुण रहित है। हे सौभ्य जिसकरके ऐसाहै इसहीसे शुद्धहै पृरु सर्व विशोषएगोसे रहित है ताते उपक्षर, सत्य पुरुष नामचाला प्राणरहित मनका अविषय शिवरूप मा न बाहर भीतरकी कल्पनासे रहित अजन्मा,-को जानताहै- "परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते सर सो पर्ने پشاوندی ۱۴ ॥चतुर्थप्रमः॥ ॥१३॥ ॥विज्ञानात्मा सह देवैश्व सबैःप्राण ॥भूतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत । तदक्षरं वेद-॥ ॥यते यस्तु सौम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवावि- विपीति॥ ११॥ २॥. ॥निश्री प्रमोपनिषदि चतुर्थ प्रक्ष्मःसमाप्त:] रम प्रक्षरको ही प्राप्त होता है सो पुरुष परवना रुप अक्षरकों ही पावताहै ब्रह्मविौवभपति! परु जो सर्वकात्यागीहुया जानताहै-1स सयंत सर्वोभवति तदेयम्वोकः०"सो सर्वज्ञहै सर्वर होताहै लिसविषे यह श्लोक (प्रमा) हैसो। ज्ञानवान सर्वस होताहै। अर्थात् निस अक्षरके जाननेवालेसे प्रज्ञात कुछ भी संभवता नहीं। का । सर्वात्मभावकों ज्ञानकरके जन्यताके होनेसे निस सात्मभावका अनित्यपना होना है। समाधान ।। पूर्व विद्याकरके असर्वज्ञथा प- श्वात प्राचार्यके उपदेशसे चियाकरके प्रविद्या के प्रभावभये सर्वरुपहोताहै उपजता नहीं, 9- रुतिस ही पृर्थविषे यह प्रग्रिम (पागे) कहने का वाक्यरुप श्लोक (वेदकामंत्र प्रमाणहै॥१०॥ १॥ हे सौम्य पिप्पलादमुनि कहते हैं कि सो म्य"हे प्रियदशन हे गार्य"सह देवैश्व सबै بنا شدم ॥१४॥ ॥प्रमोपनिषद॥ पाए, भूतानि सम्पत्तिष्ठनि यत्न" सर्व देवतामों। करके (सहित) रन्द्रिय (गुरु) भूत जिसविषे प्रवे. पशकों पावतेहैं। पृथति समस्त अपने अधिष्ठाता दे. वताप्रोकरके सहित चक्षुरादि इन्द्रिय उपरु एथिव्या दि भून जिस प्रक्षरविषे प्रवेशकों पावतेहै। तद- क्षरं यस्तुतिस उपृक्षरकों जो "विज्ञानात्मा जीव अर्थात् तिस सर्वके उपाश्रयरुप अक्षर कों जो उक्त उपृर्थका जिज्ञासु (ग्राहक)जीवात्मा विदयते जानताहै। “स सर्वज्ञः सर्वमेवा विवेशे नि" सो सर्वज्ञहुत्या सर्वकेताई ही प्रवेशकों पाय ताहै पर्थात् सर्वज्ञ सर्वात्मा ही होताहै ॥ १९ ॥५॥ ॥ इति प्रमोपनिषद्गत चतुर्थ पुक्ष्म ॥ भाषा टीका॥ ॥समाना॥ पहरि॥ ॥ॐn पनर सन् बर।।
باشد गपंचम पृष्मः॥ ॥अथ प्रथमोपनिषंगत पंचम पृक्ष्मः॥ ॥अथ हैन पौव्यः सत्यकामः पप्रच्छ।स। यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु प्रायणान्त मोकार- मभिध्यायीन कनर्म वाव स तेन लोक। ॥जयतीति ॥ १ ॥ ५३ ॥ 6" . अथ प्रथमोपनिषङ्गत पंचमप्रम भाषाटीका। गप्रारभ्यते। १॥हे सौम्य है प्रियदर्शन [इसप्रकार चतुर्थ प. हमाविषे कहे प्रमाएउत्तमाधिकारीको पदार्थो पो- धनपूर्वक चाक्यार्थके ज्ञानसे प्रक्षरब्रह्मकी प्राप्तिकहके अब इसविषे मध्यमाधिकारी मन्द वैराग्यवाले उग्ररु "ॐ" ऐसे प्रात्माको ध्यानकरनेवाल-प्रिएवोधन ओंकार धनुषहै। इत्यादि मुंडक उपनिषदके मंत्रसे सूचितकिया जो ब्रह्मलोककी प्राप्ति निसहारा क्रमक रके प्रक्षरबाकी प्राप्तिकेमर्थ ॐ कारकी उपासना कहनेकों पंचमप्रमको प्रकट करते हैं ] अब गा- ग्र्यमुनिके प्रहमके निर्णय भये पश्चात् परब्रह्म प्र- रु अपरब्रह्मकी प्राप्तिका साधन होनेकरके ॐ कार की उपासना करने की इच्छासे पंचम प्रमका प्रा- रंभकरते हैं। प्रथ हैन पौव्यः सत्यकामः पप्रच्छ" तिसके पश्चात् इसकों शिविका पुत्र सत्यकाम पू. छनाभया अर्थात् गायमुनिके पश्चात् इस निर्णय سیاوش ۱۶ 1 ॥१२६॥ पप्रमोपनिषद॥ कर्ता पिप्पलामुनिकों शिविऋषिका पुत्र सत्यका- म नामा मुनि पूछताभया ॥ सत्यकाम उवाच ॥ “स यो हवै तद्भगवन्मनुष्येषु" हे भगवन्म- नुष्यों के मध्य सो अद्भुतवत् है सो जो (कोईएक मनुष्य) "प्रायणान्नमोकार मभिध्यायीन"म- रएपर्यन्त ॐ कारकों सन्मुखध्यानकरे पृर्थात जो कोई एक मनुष्य शरीरके पातहोने पर्यन्न इस ॐ कारको सन्मुख होनेकरके चिन्तनकरे। पृर्थात् जो वावके विषयोंसे निवृत्तकिये इन्द्रियों वाला, अरु भक्तिकरके प्रारोपित कियाहै ब्रह्मभाव जिसविषे। ऐसे ॐकारविधे एकाग्रचित्तवाला अरु उच्छेद। (दिनापा)रहित,प्रात्माकार वृत्तिवाला अरु अना त्माकारवृत्तिरुप अन्तराय (विविधान) से रहित हुप्रा जैस वायुकरके रहित स्थानविषे स्थित जोर दीपक निस दीपककी शिखाके समान निश्चल चित्तवासाहोय, अरु सत्यभाषण ब्रह्मचर्य अहिंसा अपरिग्रह (दान न सेना) त्याग (दान देना) स- न्यास (संग्रहका त्यारा) शौच (प्रवित्रता) संतोष निष्कपट भाव इत्यादि अनेक यम नियमसे अनु- ग्रह को पायाहीय, सो पुरुष प्राश्चर्यवर है कि नमं वायस तेन लोकं जयतीति", सो निससे ।। कौनसे लोकको पावताहै। भगवन् सो इस प्रकार यावत्पर्यन्त जीवतरहै तावत्पर्यन्त नियम- - ॥११॥ पंचमपुश्मा॥ तस्मै स होवाच एत है सत्यकाम ॥परञ्चापरञ्च ब्रह्म यदोङ्कारस्तस्माहिहा-॥ नेने नैवायतनेनैकतरमन्वति ॥ २॥ ५४॥ की धारणावाला पुरुष उपासना गुरु को करके। जो पावने योग्य उपनेक लोक निनसे तिस ॐ कारके भिध्यान करनेसे कौनसे लोकको पाच- नाहै ॥ १॥ ५३॥ हे सौम्य इसप्रकार जब सत्यकाममुनिने प्रमकीया तब- "तस्मै स होवाच तिसको सो कहताभया-तिस पृष्भकरनेवाले सत्यकामनाम: क अपने मिष्यप्रति सो पिप्पलादमुनि नामामा- चार्य, स्पष्ट कहता भया [ इस उपासनाकों प्रकार के अभिध्यानरूपहोनेसे दहराकापादिकोंकी उमास. नावत् अपरवल की प्राप्तिका साधनहीं है , अथवा परब्रह्मकी प्राधिका भी साधन है । इसप्रकारसे प्रक्ष्म करनेवाले मिष्यके अभिप्रायके जाननेवाले सर्वज्ञ पिप्पलादमुनि कहतेभये कि यह प्रकार अपर- बह्मके पालम्बन होनेसे जव साध्यानकरिये तब। अपरखाकी प्राधिका साधनहोताहै अरू परवलके मालम्बन होनेसे जव ॐकारका तैसा ध्यानकरिये तबसो कमसे परब्रह्माकी प्राप्तिका साधन होताहै- ॥११॥ ॥पुस्मोपनिषद॥ II- रातदालम्बनंश्रेष्ठमेतदालम्ब परम् । रातदालम्बनं। ज्ञात्वा वसालोके महीयते! ऐसा उत्तर कहते हैं। पिप्पलादउवाच॥ "एतहै सत्यकाम परम्चापर चबा यदोंकारी सत्यकाम यह जो परब्रह्म। परु अपरब्रह्म है सो पोंकार ही हैं। उपर्यान् हे सन त्यकाम यह जो सत्य अक्षरं पुरुष इत्यादि नामोंक रके परखलहै अरु सर्वसे पृथम उत्पन्नभया.पाए। (सूत्रात्मा) नामकरके अपरवलहै सो उभयप्रकार का ॐकारही है। क्योंकि ॐ कारसूप प्रतीक वालाहै नाते ॥पका ॥ ब्रह्म पुरु ॐकारके भेद सेनिनकी एकता कैसे चनें ॥ समाधान ॥ तिनकी एकता पारोपसे वनतीहै। यहा यह भाव है कि इस खत्म अरु ॐकारके एकपृर्थविषे तात्पर्य प सामानाधिकरणसे पोंकारका प्रतीकपना उपदे- श करते हैं । जैसे सालग्रामादि पाषाणविषे विष्णु पादिक बुद्धि करनी तैसे,। जिस पौरविषे प्रौ। रकी बुद्धि करीये सो निसका प्रतीक कहते हैं। य- हो चुलसे इतर जो वर्णात्मक ॐकार तिसविषे ब्रह्मकी बुद्धि करते हैं एतदर्थ ॐ कार ब्रह्मका प्रतीक है। जैसे विस्मुसादिकोंके सालगामादि,] पुरु। जिसकरके सर्व धर्मके भेद सरहित परमात्मा पाब्द पादि प्रमाएोंकरके साक्षात् बोध करनेके प्रयो, ग्यहै, एतदर्थ इन्द्रियोंके अगोचरहोनेसे केवल حید -119 - पंचम पुश्मः॥ ॥२९॥ करणारहित मनसे भी जाननेकों प्रायनहीं,किन्नु जैसे सालग्रामादिविषे प्रारोपित करते है विमु भाव तैसे, भक्तिकरके प्रारोपकिये ब्रह्मभाववाले ॐकारके सम्यक ध्यानकरनेवाले पुरुषकों सी. जानने में प्रावताहै, इसचिषे शास्त्रका प्रमाण है। ताते । अरु इस ही प्रकार प्रपरवल्ल भी जानने में पावताहै। एतदर्थ जो पर उपृरु अपररुप बल है। सो ॐकारहै। इसप्रकारका प्रारोपकरतेहैन. स्माहिहानेलेनैवायतनेनैकातरमन्वेति" inाने ऐसे जाननेवाला इस ध्यानसे ही दोनों में एकोपाव ताहै। एतदर्थ इसप्रकार जाननेवाला विहान् पुरुष इस ॐ कारके ध्यानरूप, पात्माकी प्रापिके साधन रुप साधनके साश्रयसे ही परपा पुरु पुपरव- र इन दोनों में से एककों पावताहै ॥ कि जिसकी प्रा. निकी इच्छासे करताहै ॥ ३ ॥ ५५ ॥ आहे सौम्य जो पुरुष, बलका समीपवर्ति श्रेष्ठ पालम्बन पर्थात उपकार साधक अरु प्रकारमादिक तीन मात्रा वाला जो ॐ कार सो उपासनाकरनेके योग्य है इसप्रकार यद्यपि ओंका रकी पुकारादि समानाके विभागका यथार्थ जानने वाला न होय, किन्तु प्रोकारकी एक प्रका रमात्रा उपासनाकरने योझहै इसप्रकार जानताहै।
لا شد ۱۳۰ ॥ ॥प्रमोपनिषद्॥ ॥स ययेकमात्रमभिध्यायीत सते-॥ निव संवेदित स्तूपमेव जगत्यामभिसम्प-॥ ॥द्यते । तमृचोमनुष्यलोकमुपनयन्ते स ॥ नत्र नपसा बह्मचर्येण अड्या सम्पन्नो। महिमान मनुभवति ॥ ३॥ ५५ ॥ नथापि सो दुर्गतिको प्राप्त होतो नहीं, किन्तु एक- मात्रारुप ही ॐकारके ध्यानके प्रभावसे इसलोक विषे श्रेष्ठ गतिको ही पावताहै। यह इस तृतीय वा- श्यका तात्पर्य है। अब इसके अक्षरार्थकों श्रवणा- करी हे सौम्य । “स योकमात्रमभिध्यायीत स! तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्या मभिसम्पद्यते" सो जव एकमात्रारूपकों ध्यानकरताहै सो तिससे ही भलीपुकार जानताहुम्पा शिघ्र ही जगतविषे पाव- ताहै। पृर्थात् इसप्रकार सो जव एकमात्राके ही विभागका जाननेवाला सर्वदा एकमात्रारुप ओंका- रको ध्यान करताहै सो पुरुष एकमानापनेकरके। युक्त ओकारके ध्यानसे ही तिसमानाके सम्यकर प्रकार बोधवानहुम्पा शिघ्र ही जगन् (पृथिवी) विषे जन्म पावताहै। अरु- "नमृची मनुष्यलो- कमुपनयने"।निसकों मनुष्य पारीरकों ऋग्वेद पापकरेहै-तहां पृथिवी विषे प्रनेकजन्म, नि- नविषे तिस प्रकारके साधकको मनुष्य लोक شناونا۱۳ अपंचत प्रमः॥ ॥१२॥ पनीर) के उपर्थ ही ऋग्वेदरूप स ऋग्वेद इति । श्रुने! प्रकार ऋग्वेदहै। इस श्रुतिसे प्रकार प प्रोकारकी प्रथम मात्राकों ऋग्वेदरूपताहै. प्रकारकी प्रथम एकमावाजो है सो प्रापकरेहै। गुरु- स नत्र तपसा बह्मचर्येण श्रया सम्प- न्नो महिमानमनुभवति ॥रसी तिसविषे तपसे। ब्रह्मचर्यसे श्रद्धासे सम्पन्नहुमा महिमाकों अनुभ व करना है । सो साधक तिस पृथम मात्रारुप ॐ कारके ध्यानसे तिस मनुष्य जन्मविणे हिजोत्तमा पा अरु नपकरके बह्मचर्यकरके गुरु श्रहांक- रके सम्पन्नहुमा महिमा (विभूति ) को पृान् । धन पुत्र क्षेत्र दासादि वैभवकों अनुभव करना है। परन्तु श्रद्धा रहितहमा यथेष्ट उपाचरणकों करता नही। एक देशाके ज्ञानसे रहित जो योगभ्रष्टहै सो कदाचित्त भी दुर्गतिक पाचता नहीं ! ऐसा गीताका प्रमाणहै। ताने पोकारकी एकमात्राके ध्यान करने वाले को कहेहुए फसका असंभवनही इति सिद्धम् ॥ ३ ॥ ५५ ॥ ४ हे सौम्य 1“अथ यदि हिमात्रेण मनसि सम्पद्यते"! पुनः जब दो मात्राकरकेयुक्त मनति- घे पावताहै। अर्थात् पुनः एकमावारूप कान रके उपासकसे इतर जब दोमात्राके विभागका ॥१२२॥ شنونده را ॥पध्मोपनिषद॥ ॥अथ यदि हिमात्रेण मनसि सम्य-11 आयने सोऽन्तरिक्ष यजुभिरुनीयते । स ॥ सोमलोकं स सोमलोको विभूतिमनुभू-॥ ॥य पुनरावर्तते ॥ ४ ॥ ५६ ॥. - D ज्ञाता जो पुरुष दोमानारूपसेयुक्त ॐकारको ध्या नकरताहै, सो स्वमरुप मननकरने योग्य यजुर्वेद मय चन्द्ररूप,दैदावाले मनविषे भलीप्रकार एका ग्रतासे प्रात्मभावको प्रापहोताहै-"सोनिरि- क्ष यजुभिरुन्नीयते । स सोमलोकं" सो यजुर्वेद से अन्तरिक्षलोकवाले चन्दलोकको पापहोता है। सो इसप्रकार यात्मभावकों प्राप्त मरणारहित हुम्पा हिलीयमानारूप यजुर्वेदसे अन्तरिक्षरुप- साधारवाले हितीयलोकरुप चन्दलोककेयर्थ प्रापहोताहै। अर्थात निस हित्तीयमात्राके उपास- क साधककों यजुर्वेद जो है सो चन्द्रलोक सम्ब- न्धी जन्मकों देताहै- “स सोमलोके विभूतिमनु भूय पुनरावर्तते "सो चन्दुलोकविधे विभूति को अनुभवकरके फेर पावताहै--सो उपासक निस चन्दलोकविषे उत्तम पदार्थोकों भोगके पुनः इस मनुष्यलोकविधे (वाझएगदि उत्तमकुलमें) जन्न पावताहै ॥ ४ ॥ ५६ ॥ रामः रामः रामः रामः रामः रामः रामः राम .شرح ارد पंचम पृष्मः॥ ॥१२३॥ यः पुनरेतत्रिमात्रेणैवोमित्येतेनैवाक्ष-॥ परेण परं पुरुषमभिध्यायीत स नेजसि सूर्ये॥ ॥सम्पन्नः। यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यन॥ एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभि-॥ ॥रुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माजीवधनात्य-॥ ॥रात्परं पुरिप्रयं पुरुषमिक्षते नदेतौ श्लोकौ ॥ भवतः ॥ ५ ॥ ५७ ॥ शाहे सौम्य ।“यः पुनरेततिमात्रेपौवोमित्ये- तिनैवाक्षरेण पर पुरुषमभिध्यायीत"। जो पुनः तीनमात्रावाले ॐ इस ही अक्षरसे इस परम पु- रुषकों ध्यानकरताहै। अर्थात् जो पुरुष पुनः। तीनमात्राके विषयकरनेवाले ज्ञानयुक्त ॐ इस प्रकारके इस ही अक्षररूप प्रतीकसे इस ॐकार रूपी सूर्यके अन्तरगत पर पुरुषको ध्यानकरता है-1 स तेजसि सूर्य सम्पन्नः"। सो तेजसपर सूर्यविषे प्रापहोताहै।सो तीसरीमात्रारुपध्या नकरताहुया, मरा हुआ भी निसध्यानमावसे ते- जरुप सूर्याविषे प्रापहोताहै । अरु सो सूर्यसे। चन्दलोकादिकोंविषे गएहुए जैसे फेरपावतेहैं तसे , पुनरावृत्तिको पावतानहीं किन्तु सूर्यविषे प्राप्पाहुया ही होता है। गुरु-- “यथा पादोदर- स्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिमुनी ॥१४॥ ॥प्रस्मोपनिषद॥ (जैसे सर्प त्वचासे छूटजाताहै ऐसे प्रसिद्ध ही सो पापसे मुक्त होताहै-जिसपुकार सर्प अपनी त्व- चासे मुक्तहोताहै, पश्चात् जीएणत्वचासे छूटाहुपा सो सर्प पुनः नवीनहोताहै। हे सौम्य जैसे यह - ष्टान्त है । जैसे ही प्रसिद्ध सो तीनमात्राका ध्यान करनेवाला साधक सर्पकी त्वचास्थानापन्न अप ने अपाड्यादिरूप-पापसे मुक्त होताहै । गुरु-सि सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं"। सो सामसे ऊंचे घन ह्मलोकको पावताहै-जब उप्राझतारुप पाप से मुक्तहोताहै तब पीछे सो साधक तृतीयमात्रा रुप सामवेदकरके ऊंचे हिरण्यगर्भरुपयाके सत्य नामवाले लोक (सत्यलोक) को प्रापहोताहै-॥ सो हिरण्यगर्भ सर्व संसारी जीवोंका प्रात्मरूप है। पुरु जिसकरके सो हिरण्यगर्भ समष्टि लिंगदेह- रुपकरके सर्व भूतोका अन्तरात्माहै जिसका समष्टिलिंगारीररुप.हिरण्यगर्भविषे व्यशिलिंग- देहोंके अभिमानि सर्वजी, मिलेहुए हैं। एतदर्थ सो हिरण्यगर्भ जीवघनरूपहै ॥ वाक्य योजना "स एतस्मान्जीवधनात्परात्परं पुरिपायं पुरुप- मीक्षते"। सो इस पर जीवधनसे पर पूरियोवि घे स्थित पुरुषकों देखनाहै- सो विहान तीसरी मावाको ध्यानकरताहुया इस सर्वसे उतर जी- वधनरुप हिरण्यगर्भसे पर परमात्मानामचालेम معاون شده در ॥पंचम प्रमः॥ ॥१२॥ ॥निलो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता॥ अन्योन्यसता अनविप्रयुक्तता। किया। गवाह्याभ्यन्नरमध्यमासु सम्यक् प्रयुमासु॥ न कम्पने ज्ञः॥६॥ ५ ॥ सर्व प्रारीररुप पुरी पोधिषे स्थित पुरुपको देवता है [यहां इस रीतिसे अन्वयहै। सो विहान् सा. धक अभी इस अपनी जीवनदशाविये ध्यानका रताश्या शरीरावसा के पश्चात् ब्रह्मलोकचों प्रा महोताहै। तहां ब्रह्मलोकविये स्थावर जंगमरूप प्रा गियोंसे पर जो जीवघन नामक हिरण्यगर्भ तिससे पर जो परमात्मापुरुष निसकों अपना । पाप देवताहै ] "तदेनौ श्लोकौ भवतः"तही यह दो मंत्र हैं। तहां यह उक्तम्पूर्थके प्रकापाक रिनेवाले दो मंत्र प्रमाण होते हैं ॥ ५ ॥ ७ ॥ हा है सौम्य !"यःपुनरेतत्रिमात्रेणैवामित्ये इत्यादि इस वालवाक्पके साथ प्रथम (पहिले) मंत्रकी योजना करतेहैं। APो मात्रा मृत्युम- त्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसता अनविपयुक्ताः तीन माना मृत्युगीचर परस्पर सम्बन्धवाली है। अर्थात् नीन संस्था जिनकी ऐसी जो अकार उकार पका र नामवाली ॐकारवी तीनमाबाहै सो मृत्युकर پلان او چشم ۱۲۶ ॥१२॥ ॥प्रमोपनिषद॥ के पाक्रान (व्यान) अर्यात मृत्युको विषयही हैं। अरू परस्पर सम्बन्धवाली है। सो तीनमात्रा विशेष करके एक एक विषय विषे ही योजनां न कियाहों य ऐसा नहीं, किन्तु विपोषकरके एक ही ध्यानका लविषे त्यागकरीभयी जागत वप सुषुप्तिरुप स्था- नके पुभिमानी जे वैश्वानरादिकनसों अभिन्न वि. श्वादिक पुरुषोंके अर्थात् [ वैश्वानरसे अभिन्न वि. श्व जागतका अभिमानी तिसका स्थूलपारीररुपस्था- न । अरु हिरण्यगर्भसे अभिन्न तैजस स्वप्रका - भिमानी लिंगपारीररुप स्थान । अरु 'अव्यक्तसे। अभिन्न प्राज्ञ सुषुप्तिका अभिमानी कारणापारीर' रूपस्थान] प्रकार उकार मकाररूस मावासे, ता- दाम्य (एकरुपता) करके ध्यानरुपजो-"किया सु बाह्याभ्यन्नर मध्यमासु सम्यक प्रयुक्तासुन कं. पते ज्ञः"वाहर भीतर पृरु मध्यकी क्रियाकेर भस्लीप्रकार योजनाकियेहुए ज्ञाना कम्पमान होता नहीं-वाहर भीतर उपरु मध्यकी क्रिया है जिनके सम्यक्ष प्रकार ध्यानके कालविषे योजना किये हुए जब निसके साथ प्रकारादि तीनों मात्रा योजनार कियाहोय तब प्रकारका कहुए विभागका जा- ननेवालाजो योगीहै सो चलायमान उपुर्यात् वि- क्षेपकों पापहोता नहीं, किन्तु स्वरूपमें स्थिर ही र- हताहै। अर्थात् जो चलायमान होता है सो जागन بین خیر ہم पिंचम प्रमः॥ ॥१२७॥ ऋभिरेनं यजुर्भिरतरिक्षं स साम-॥ भिर्यतत्कवयो वेदयने नमोंकारेणैवाय-॥ ॥तनेनान्वेति विहान् यत्तच्छान्नमजरमम-॥ तमभयं परचेति ॥७॥ ५ ॥ पनि प्रमोपनिषदि पंचम प्रमः५॥ खप्न सुषुप्ति विधे होताहै सो सर्व ओंकार ही है... ऐसा जानलिया तव चित्त चंचलनाछोड़ स्वरूपमें निश्चल होताहै जिसकरके उस साधक पुरुषने । स्थूलादि स्थान सहित जागान स्वप्न उपरु सुषुप्ति । पर विश्वादि जो तिनके अभिमानी पुरुष है, सो प्रकारादि तीनमात्रामय ॐकारस्पकरके देखें- है, एतदर्थ इसप्रकार जाननेवाले योगीका चला- यमानहोना संभव नहीं ॥ ६ ॥ ५ ॥ ७॥हे सौम्य जिसकरके सो ऐसा पूर्वोक्त। विहान सर्वका पात्मा ओंकारमयहै निसहेतुसे किसकारणकरके उसका चलायमानहोना होय, किन्तु अपनेसे पृथक् वस्तु के अभावसे किसीक रके भी चलना(विक्षेप)वने नहीं। पृथवा अपने से अष्टथक् निश्चयभये जगविध किस विषय के प्रर्थ विक्षेपवान होगा, किन्तु किसीविभी नहीं। इस अर्थक बोधक प्रथम मंत्रवाहके अब این او شد ۳۰ ॥१२॥ पृथमोपनिषद् सर्व प्रर्थके संग्रहरूप पर्थवाला द्वितीय मंत्र कहते ॥ हे सौम्य ।"ऋम्भिरेते यजुर्भिरन्तरिक्षं स साम- भिर्यतत्कवयो वेदयन्ने सो ऋग्वेदसे इसकों य- जुर्वेदसे उन्तरिक्षकों (अरु) जिसकी विद्वान जानने है ( ऐसे ब्रह्मलोककों) सामवेदसे (पावताहै) पूर्था न सो विद्वान् (जो एकमात्रारुप} कारका उपा- सकहै ऋग्वेदसे इस मनुष्यलोकको पावताहै । अरु (जो दोमात्रांवा दूसरीमात्रारूप ॐकारका उपासकहै सो} यजुर्वेदकरके अन्तरिक्षगत चन्दलोकको पावन नाहै। अरु जिसकों विहान् पुरुष जानते हैं अस्। प्रविहान् नहीं जानते ऐसा जो सत्य नामवाला ब्रह्म लोकहै निसकों (तीन मात्राका वा नीसरीमात्राका उपासक} सामवेदकरके प्रापहोताहै । इस प्रकार विदान् उपासक अपरब्रह्मरुप तीन प्रकारके लोक को (समात्रिक काररूप पालम्बन (साधन) संपावताहै ॥ मरुन "नमोकारवायतनेनान्वे- नि विहान् यत्नच्छान्नमजरममृतमभयं परञ्चेति । जी शान अजर अमर अभयहै तिस पर(प्रा) कों ॐकाररूप ध्यानसे ही पावताहै। पूर्थात् जो प्रक्षर सत्यपुरुष संज्ञक पान विमुक्त अरु जा- गत स्वप सुपुतिपादि भेदरूप सर्व प्रपंचसे रहित है। गुरु (जय अवस्था त्रयरूप सर्व प्रपंचसे रहि- नहै} इस ही करके जरा गुरु मृत्युकरके रहित है।
پیشین او شد ۲۹
पंचम मलः॥
॥१॥
अरु जिस करके जरामादि विकारोंसे रहित है,इ.
सही से अभय है । अरु जव अभय दै नब ही सर्व
से अधिक है, ऐसा जो बिमात्रिक ॐकारका ल.
प रूप } परब्रह्म है तिसकों भी {मतिभावनमती-
क रूप निमाविक } उकारकी (उपासनारूप माल-
म्वन (साधन) से ही प्राप्त होता है | "इति" य-
दाँजो ति , शब्द है सो वारणी की परिसमास्यर्थदै
इति सिहम् ॥७॥ ५६ ॥
.
॥ ति पलोपनिषत पञ्चम समभाषारीका।
॥ समाप्ता ॥
॥ हरिः॥
तत् सत ब्रह्म।
॥५॥
پن اندر ॥२३॥ ॥ प्रमोपनिषद् ॥ अथ पन्नोपनिपगत षष्ठ मनः अंथ हैन सुकेश भारद्वाजः पपच्छ भगवन् हिरण्पनामः कौसल्यो राजपुनो मा- सत्येने प्रश्नमाच्छन । षोडशकलं ॥ भारद्वाज पुरुषं वेत्थ नमहं कुमार म बुवं । नाह मिमं वेद यद्यहमिमम वेदिषं कथं ते॥ ॥ ना वक्ष्यमिति समूलो वा एष परिशुष्यति ॥ योऽनतमभि वदति तस्मान्नाम्य नतं वक्तुं ससीरथ मारुस प्रवब्राज तं त्वा पृच्छा-॥ मि कासौ पुरुष इति ॥ ९॥ ६० ॥ ॥ अथ प्रश्नोपनिषतषष्ठ मलभाषारीका। " मारम्पते ॥ १॥ दे सौम्य : सुषुप्ति कालविषे विज्ञान रूप जीना त्मा सहित सर्व कार्य कारणात्मक जगत् अक्षर रूप पर ब्रह्म विषे लय होता है। इसप्रकार पूर्व चतुर्थ । प्रमविषे कहि माये हैं। निस कथनरूप प्रमाण की सामर्थ से पलप विषे भी निसही अक्षर विषे । यह सर्व जगत् लय होता है । अरु जिस करके का- र्यका कारण विषे तय समवाना नहीं मान जो जिसका कार्य है सोपरिणाम में उसही अपने कारण मि लय होता है अन्य में नहीं, । अरु !" मात्मनः । एप मागोजायते " यह इसही उपनिषद के नतीय ।
پشن اوش۔ اس ॥२३॥ ॥षष्ठ मलाई प्रक्ष के नीसरी श्रुति से कहा है। एतदर्थ जिस ब्रह्मा विषे युद्ध जगत् लय होता है तिसही ब्रह्म सेजगार। का उपजना सिद्ध होता है। सहजगत् काजो मूल। (कारण) है निसके सम्यक् ज्ञानसे परसमुक्ति होती है । अर्थात् [ यद्यपि अहेत आत्माके सम्यक् ज्ञान दुयेही मुक्ति होती है, कारण के ज्ञान से नही, तथापि निस मात्मा को कारणत्व होनेसे तिससे भिन्न कार्य का अभाव है, क्योंकि कारण से भिन्न कार्य की स- ता होनी नहीं, ताते आत्मा के अतिपने का ज्ञान सिद्ध होता है, एतदर्थ निसजगत् के मूल कारण आत्मा के सम्यक् ज्ञान से {चतुर्धा मुक्ति से भिन्न परम मुक्ति होती है !" आत्मा चा मेव एवाया सीन।" एतमेव पुरुष ब्रह्म नतमपश्यन् पत्तानंबा स एतेन प्रज्ञाने नालना समतः समभवत्" "सदेव सौम्मेदमय शासीत!! आचार्यवान पुरुपो मन थसमस्पेनमेवैकं जानथण" ममतस्यैप सेतु!! - "अहं ब्रह्मास्पीति तस्मान्नन्सर्वमभवत्" 1 पद जगन् भथम निश्चय करके एक ही आत्मा यारसो रसही पुरुपकों परिपूर्ण ब्रह्मरूप देवता भपा. ज्ञान ब्रस है। सो इस प्रज्ञान रूप से समरहोनाभया। स्टे सौम्य पहागे एक अहैन सन्ही था। इसम- कार आरंभ करके आचार्यवान् पुरुष जानता है तिसही एक को जानो यह समत कानुहै। में- ॥१३॥ پشن اون چند۳۴ " IN आलोपनिषद् ॥ ब्रह्माहौताते सो सर्वरूप होता भया । इत्यादि नेक श्रुतियों के वाकयों से निश्चय किया है ] यह उपनिषदों का निश्चितार्थ है। अरु सही उपनिष- द के चतुर्थमक्ष विषे !" स सर्वशः सर्बो भवतीति] सो सर्वत्त सर्वरूप होता है। इस प्रकारकहाहै। नाते सो अक्षर ब्रह्मरूप ससुरुष नाम वालाजो (मन समुनों करके जानने योग्य वस्तु दै सो कहा है।। इसप्रकार पूछने योग्य है । अरु तिस सत्पुरुष कों शरीर के भीतर स्थित कहा है तिसकरके , प्रत्यगात्मा के सम्यक ज्ञानार्थ इस षष्ठ प्रश्नका भारम्भ करते हैं । अरु यहां मुकेशा नामवाले शिष्य ने पू. व्यतीत भये अर्थ का पुनः प्रम रूप कथन कि या है, सो ज्ञानकी दुर्लभता की प्रसिहि होने से। तिसकी प्रात्यर्थ पुरुषार्थ विशेष के उत्पादनार्थ है ॥ अव"गता: कलाः पञ्चदश प्रतिछा देवान सर्वे प्रति देवनासु । कर्माणि विज्ञान मयश्च आ त्मा परेच्यये सर्व एकी भवन्ति " पंचदशक ला अपने कारण भाव को मात भई कर्म सस विज्ञानमय (जीवात्मा सो पर अच्चय (अविना. शी) अक्षर ब्रह्म विघे एक (अभेद होते हैं। इसमकार मंडक उपनिपद् के सनीय मुंडक के दू. सरे खंड के में मन्त्र से कहिके पधा नद्यः स्पद मानाः समुद्रेन गचंति नामरूपे विहाय । .
، باب۱۳۳ । ॥षठ.पूक्ष्मः॥ ॥१३३॥ तथाविद्वान्नामरूपाहिमुक्त परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ? सव-जैसे नदीयां सर्वपोरसे बहती हुयी अपनेकारण समुद्विये जाय अपने नामरूप को छोड़ (समुद् ही होतीहैं)। तैसे प्रत्यगात्माको सम्यक् अनुभवकरनेवाला विद्वान् (युडिविपिष्टचे जन्य) परात्पर परम दिव्य अक्षर पुरुषको प्राय होताहै। इस मुंडककेही उक्त खंडके में मन्त्र करके दृष्टान्तके कथनप्रमाणसे परखाकी प्राप्ति कहीहै । जाने इन उक्त दोनों मन्त्रीका पृर्थ सविन स्तर कहनेके अर्थ इस षष्ठ प्रमका पारंभकरने है] ॥ हे सौम्य सत्यकामामुनिके प्रक्ष्मके निर्धा- रहोनेकेन्। अथ हैन सुकेपा भारहाजः पप्रच्छ। पश्चात् इसको भारद्वाजका पुत्र सुकेमा पुस्मक रत्ताभयांपूर्थात् सत्यकामा प्रस्म के अनन्तर। इस पिप्पलादमुनिरूप प्राचार्यसे भारद्वाजमुनिका पुत्र सुकेपानामवालामुनि पुमकरताभया । सुके पा उवाच ||--1"भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रामपच्छत हे पूजाके, योग्य कौसलदेशाका हिरण्यनाभ राजपुत्र मेरे समीपप्राय इस प्रकों पूछताभया है सर्व संपायके नापाकरता है भगवन् एक समय, को मलदेशमें उत्पन्नभया ऐसा जो हिरण्यलाभ नाम वाला क्षत्रियजातीय प्रख्यात राजपुत्र मेरेसमीप پشین، منیش و ॥१३४॥ ॥अटमोपनिषद॥ ग्रास इस कथन करने के प्रमको पूछताभया कि "घोडाकलं भारद्वाज पुरुपवेत्य" हे भार- दाज घोडशकलावाले पुरुषको जानता है। भारहाज, सोलह संज्ञाहै जिनकी ऐसी जो कलाई सो , प्रारविषे अवयवोंवदं, जिस अात्मरूप चै- तन्य पुरुषरिये प्रविद्याकरके अध्यारोममात्र, एतदर्थ इस चैतन्य पुरुषकों सोलहकलावालाया- हते हैं निस सोलह कलावाले पुरुषकों तूं जानताहै। हे भगवन् इसप्रकार जब उसने प्रथमकिया तव "तमहं कुमारमन्नुवन् नाहमिमवेदनिसकुमा रकों इसको मैं जानता नहीं-ऐसे कहता भया - र्थात् -- तिस प्रक्ष्मकर्ता राजकुमारकों जिसके वि. ज्ञानार्थ नेरा प्रमहै जिस पुरुषकों मैं जानता नहीं इसप्रकारमैं कहनाभया । परन्तु उक्त प्रकारका क- हनेवालाजो मैं निस मेरेवाक्यमें भी, यह भार- हाजमुनि कहता है कि मैं उस सोलहकलावाले। युरुषकों नहीं जानता सो यह आप जानता होय- के नहीं जानता कहताहै या नजानके, इसप्रका र, अज्ञानके संपायका संभव उस कुमारविषे वि चार तिस राजपुत्रकों मैं पुमकिये पुरुषके विष यमें, अपने अज्ञानका कारण कहता भया कि हे राजकुमार-“यद्यह मिमसवेदिय कथं तेना- वश्यमिति" जव मैं इसको जानता होउं तब .این اولد ۱۳۵ ॥पष्टप्रमः॥ ॥१३५॥ नरे पर्थ कैसे न कहों -जय मैं तुझकरके प्रथ्मकिये पुरुषकों जानताहो तो नुरु सरीखे उत्तमगुणासम्पन्न शिष्यके मृर्थ कैसे न केहूं,किन्तु कहता ही।हे भगः चन् इसप्रकार कहके भी में अपने वाक्यमें उसका अविन्यास ज्ञान विश्वास करायनेके पृर्थ पुनः मैंने कहा कि हे राजकुमार-1“समूलो वा एप परिष्य नि यो नृतमभिवदति" जी अन्त कहताहै यह समूल सूख जाताहै। जो पुरुष ज्ञानीहपा भी अ- पनेसापके विषयों में प्रज्ञानी हों, इसप्रकारका मारोपकरताहुपा उपन्यथा भये पृर्थरुप अनर्थ। (ट) को कहताहै सो अपने धर्मकर्मरुप मूलस हित सूख जाताहै अर्थात् इसलोक परलोकसे भर होताहे-"नस्मान्नाम्यिन्तं वक्तुं"ताने पुनः न कहनेकों योग्य नहीं - एतदर्थ इसप्रकार जब मैं जाननाही तब मैं मूल पुरुषोवन दूर कहनेकों यो- ग्य नहीं हौं । हे भगवन् इसप्रकार जय मैं कहा त- च- । सनूमी रयमारुह्य प्रवनाज"। सो चुप मा रथमें बैठ जाताया- मेरेकहे वाक्यमें विन श्वासको प्राप्तहोय सो राजकुमार प्रस्मसे उपरामहो य रथमें बैठ जहां मायाया नहांकों जाताभया । नाते है भगवन्न त्वा पृच्छामि वासौ पुरुष इनि "निसको तुम्हारेनाई पूछनाहों यह पु रुप कहांहै।-न्यायमे पारणाको साक्षभये अधि, , پر کن و ॥९३६॥ ॥प्रमोपनिषद् ॥नमै स होवाच । इहैवान्तःपारीरे॥ ॥सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताःषोडपाकलाः ॥प्रभवन्तीति ॥ २॥ ६१ ॥ कारी पियके अर्थ जाता गुत्करके विद्या कहने कों योग्य ही है। गुरु सर्वअवस्थाचिपे झूठ कदा- पि कहनेके योग्य नहीं । अरु जाननेके योग्य होनेसे वागवत् मेरे हृदयविषे स्थित, अर्थात् [यावर जाननेकों इच्छित्तवस्तुको जानने नहीं तावत्पर्यन सो वस्तु हृदयविषे वागवत् भासेहै ] -तिस पुरु पको मैं तुम्हारे प्रति पूछताहों कि यह जो जानने योग्य पुरुषहै कि जिसके जाननेके पर्थ राजपुत्र का मुझसे प्रमथा, सो कहावर्तताहै ॥१॥६॥ २॥हे सौम्य उक्तप्रकार जब-सुकेशा मुनिने से अपने वृत्तान्त कहने पूर्वक प्रधमकिया तब-त- स्मैसहोवाच"निसकेमर्थ सो कहते भये-ति स प्रधमकरता सुकेसामुनिके अर्थ सो सर्वज्ञ पिप्प लादमुनीश्वर कहतेभये- “सोम्य यस्मिन्नेवाःपो इपाकला प्रभयनीति"हे सौम्य जिसविषयह सोलह कला उपजती-कि हे प्रियदर्पन जिस पुरुषविषे यह अग्रिम कहनेकी प्राणादि सोलह कला उत्पन्नहोतीहैं, एतदर्थ सोलहकलारूप پرخوندم 183911 पिठ प्रमः॥ ॥स इक्षाचके । कसिमन्नहमुन्क्रान्त। ॥उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन् वा प्रत्ति-॥ ॥प्टिते प्रतिष्ठास्यामीति ॥ ३॥ ६२॥ उपाधियोंसे जो पुरुष निष्कल (कलारहित) है। सो निष्कलहुप्रा भी प्रषिद्यादोपकरके कलावाले। वन देखते हैं, ऐसा जो शुद्ध चैतन्य, पुरुप है- “स पुरुषो इहैवानःपारीरे"। सो पुरुष इसही। शरीरके सन्नरहै सो पुरुष कि जिसके मृर्थ नेरा प्रमहै इस ही प्रारीरचिये {कि जिसविषे । स्थितन्मातूंप्रमकरता है) एक हृदय कमलहै जगत जो (दहरनामवाला) अन्तराकाशदै निस साकापाके मध्य (मुमुखीकरके } जाननेयोग्य है। अन्य देशविप कहीं भी नहीं ॥ २ ॥६९॥ ३॥ हे सौम्य (बसविद्या प्रादि जिसवियाको कहते है निस} विद्यासे तिस, निष्कल,पुरुपकी, विद्यादोषसे प्रारोपित जे कला तिनके अध्यारो पके अपवादके होनेसे सो पुरुष केवल अनुभव: करनेके योग्यहै, एतदर्थ कलापोंकी उत्पत्ति उ. ससों कही है। अरु अत्यन्त भेदरहित प्रत। शुद्ध तत्वविये अध्यारोप फिये विना पाएादि। कलाका प्रनिपारा अरु प्रतिपादनादिक व्यवहार پشاوند مو . ॥१३॥ ॥पस्मोपनिषद॥ करनेकों समर्थ नहीं, एतदर्थ इन कलापोंके उ. त्पत्ति स्थिति सरु लयका अविद्या प्राधीन मा- रोप करते हैं अरु जिसकरके यह कला चैनन्यसे । अभेदकरके ही उत्पन्न हुई स्थितहुई लयहुई सर्व दा देखते हैं। याहीसे कोई एक क्षणिक विज्ञान वादी, मूर्ख भ्रमी पुरुष अग्निके संयोगसेचतवन चैतन्य (विज्ञान) ही घटादिसाकारसे क्षणाक्षण विषे उपजे है, अरु नापाहोताहै, इसपकारमानते हैं। अरु शन्यवादी जो पुरुषहैं तिनको सुपुषिप्रादि । प्रवस्थाविषे तिन रुपादि विषयके गुरु ज्ञानरूप से चैतन्यके अभावहुए सर्व शन्य ही होताहै,ऐसा भ्रमहोताहै ॥ अरु दूसरे न्यायशास्त्र के ज्ञाता ने- यायिक पुरुष जो हैं सो चेतनाके करनेवाला नि- स्य प्रात्माका घटादिकोको विषय करनेवाला चै- तन्य (ज्ञानगुण) अनित्य उपजताहै परु नापा। होनाहै, इसप्रकार कहते हैं ॥ अरु अन्य जे चार- साक मनके पुरुषहैं सो ऐसा कहते हैं कि चैतन्य जिसको कहते हैं सो देहा कारसे मिलेहुए जे पथि- व्यादि वायुपर्यन्त चार भूतहैं जिनका धर्म (संयो गीफल) है ॥ हे सौम्य इन कहेहुए सर्व पुरुपौकों प्राणाटिकला अरु चैतन्यके अभेदकी भ्रान्ति है। परन्तु श्रुतिका सिद्धान्त यह है जो जन्म मरणरूप धर्मसे रहित चैतन्यरूप शात्माही नामरूपादिउपा- پریشر او نشد۔۱۳۹ ॥पष्ट प्रमः॥ धियोंके धाँसे नानाभावकरके गुरु कार्यभाव। करके प्रतीतहोताहै। "सत्यं जानमनन्तं बल! । सत्य ज्ञान प्रनन्तरूप लहै। पर "प्रज्ञानमा- नन्दं बल" । प्रज्ञान प्रानन्दरुप प्रलो। अरु वि ज्ञानघन एवं विज्ञानघन ही है . इत्यादिश्रुति योंके प्रमाणसे ॥ अरु नैसेहुए अर्थात् सणिक विज्ञानवादिना दिकोंके कहप्रमाणहुए, श्रुतिके। सिहानसे विरोधशावताहै एतदर्थ चो सणिकवि- ज्ञानवादी उपादिकोके मत सर्वथा त्यागने हीयोग्य है। ॥ [Yच ज्ञानकालविणे विपयोंका सदाय ही होय इस नियमका प्रभावहै ताने । अरु विषयकाल- विपे ज्ञानके सदायका नियमहै नाते, निस ज्ञान पृरु चिपयका भेदहै। इस प्रकार क्षणिक विज्ञान चादीकै पक्षकों खंडन करतेहुए , अरु अव्यभिचा रनासे ही ज्ञानकी नित्यनाको साधतेहुए नैयायिक सादिकोंके मनको खंडन करते हैं । यहाँ यह पर्थ है। कि घटज्ञानके कालविषे पद के प्रभावका संभव है। निसकरके चिपयोंकों ज्ञानसे व्यभिचारित्वपना है गुरु ज्ञानको तो विपयकालविषे अवस्यहोनेके नियमसे अव्यभिचारित्वपना सिह ही है । गुरु परज्ञानके कालचिपे घटका ज्ञान भी नहीं है, ताते घरके ज्ञानको भी पररुपचिपयसे व्यभिचारित्व- पनाहै। इस संकायों चित्तरिपेल्याय विषयों پرخروشید ॥१४॥ प्रमोपनिषद्॥ का स्वरूपसे ही व्यभिचारित्वपनाकहाहै । पुरु ज्ञान का विषयविशिष्टतारूपमात्रसे ही व्यभिचारहै स्व- रूपसे नहीं यह भेदहै ] -स्वरूपसे अव्यभिचारीप- दार्थोविषे चैतन्यके व्यभिचारहोनेसे जैसे२ जोर जो पदार्थ जानते हैं, तैसे तैसे जाननेयोग्यहोनेसे ही तिसरे पदार्थके चैतन्यका व्यभिचारपनाही है। पांका ॥ कोई एक वस्तु जानतेनहीं परन्नु होनी है। अर्थात् [ उत्पन्नहोयके पीघ्रही नापाहोनहार । सादिक वस्तु, अरु गिरिराहान्तरगत वस्तुको अज्ञात होनेकरके ज्ञानका भी शेयरुपविषयसेय व्यभिचार प्रसिद्धहै] ॥ समाधान ॥ हे सौम्य यह वादीका पोकारुप कथनकैसा है कि, जैसे कोई कहे कि पसंज्ञक विषयकों देखते तो न ही नयापि चक्षुहै। तद्वत , अघटित है - ३१. र्थात् [वादीने कहा कि कोइक वस्तु जानते नहीं परन्तुहोती है, मो बने नहीं क्यों कि निस- वस्तु के अज्ञानके होनेसे तिसके अस्तित्वभाव की प्रसिद्धिहै , प्रर्यात् जिसवस्तुका ज्ञान नहीं अरु सो वस्तु है, ऐसा वस्तुका अस्तित्वभाव ज्ञा नधिना कदापि सिहोता नहीं, नाते नैसा अज्ञा तहुश्या पदार्थ असिह ही है ] एनदर्य घटके जानकालविये कदाचित् पटके अभावसे शेय (विषय)रुप पट ज्ञानसे व्यभिचारकों पायताहै। - شرح اووليام" अयं पक्षमा ५१४१॥ . परन्तु ज्ञानजो है सो कदाचित भी दाभिचारको पा- यतानहीं क्यों कि एक शेय (विषय) प्रभाव हुए भी मृत्य ज्ञेय (विषय) विषे शानका स्वरूप करके सद्भावहै । अरु सुषुपिविषे ज्ञानके न हो- नसे शेय विषय कुछ होताहै, ऐसी प्रतीति कि सीकों भी होती नहीं, एतदर्थ भी ज्ञान, व्यभिचा- रकों पापता नहीं । अरु जो कहै कि सुपुप्पिविषे प्रदर्शनहोनेसे ज्ञानका भी प्रभावहै ताने शेयके व्यभिचारवत् ज्ञानके स्वरूपका भी व्यभिचार ।। सो- [क्या तय सुषुपिविषे तूं ज्ञेयके प्रभारसे ज्ञानका प्रभाव साधताहे वा ज्ञानके प्रदर्शन होनेसे ज्ञानको अभाव साधताहै इनिन दोनोय- क्षोंमें, जव सुषुप्तिरुप शेयकों अंगीकार किया जा व ज्ञानके अदनिकी असिद्धिहै. क्यों कि ज्ञान के प्रभावसे सुपुतिरुप ज्ञेय सिद्ध होता नहीं माने दूसरा पक्ष बनना नहीं यह आगे कहेंगे }-पुरु जोहूं प्रथम पक्षकों कहेगा कि ज्ञेयके अभाचसे ज्ञानका प्रभावहै, तो भी ज्ञेयकों प्रकाश्यरूपहोने, से उसके प्रभावभये तिसके प्रकाशकरुप ज्ञानका अभावहै, इसप्रकार मानताहै, किम्वा ज्ञान पर। ज्ञेय इन दोनोंकी एकताका अभावरूप शानका A प्रभावह ऐसा मानताहै , तहां इन रोगों पक्षों में भी शान अरु शेयता परस्परमें व्याभिचारकहोनेसे به اند ॥१२॥ प्रमोपनिषद॥ प्रथम पक्ष बने नहीं। अरु जो कहे कि प्रकाश्यके ज्ञानरूप रावाही सामर्थ्यवाले प्रकाशका प्रकश्यके अभावहुए. प्रभाव कहतेहैं , नहा प्रकारको प्र- स्यक्ष सिहोनेसे सो भी बने नहीं, घों कि अन्धन कारविषे प्रकाश्य रुपकी अप्रतीनिके हुए तिसके ज्ञानविपे समर्थ चक्षुरूपप्रकाशक अभावकी। कल्पना करनी भी अशक्यहै ताते, प्रथमपक्षा चने नहीं । वरु सुषुप्रिदिप जे शेयका प्रभाव सो अभावरूप ही ज्ञेयहै. तिस शेयके विद्यमान होते, ज्ञान अरु ज्ञेय इन दोनों के तादात्म्यमय एकनाके अभावरूप ज्ञानका अभाव है। यह दूस स.पक्ष भी घनतानहीं, इस अभिप्रायसे.सिंहान्नि कहताहै -ज्वने नहीं । बचों कि शेयके प्रकाश क ज्ञानकों, सूर्यादिकोले मुकापावत् शेयका कपाकात्वहै । पुरु जैसे अपनेकरके प्रकापाने यो.. ग्य जे घादि प्रकाप्य तिनके प्रभाव भये सूर्यादि कोंके प्रकाशके अभावका असंभव तद्वतं, सुयुपिविषे ज्ञानको अभावका असंभवहै । अरु जैसे अन्धकारविपे चक्षसे रुपविषयकी अपनी तिके होनेसे सकि विज्ञानवादीयोंकरके , बस के प्रभावकी कल्पनाकरनेकों भी पाक्य नहीं है, तसे ही सुपुग्निविय ज्ञेयके अभावहए ज्ञान भावकी कल्पनाफरनेकों प्रमाक्य ही है। अरुजो ناونیش۷۳ ॥१ष्ठ प्रमः॥ -[विज्ञानवादिके मतधिये विज्ञानसे भिन्न प्रका- शादिकोका प्रभावहै ताते प्रकापारूप विज्ञानके परिणामके प्रभावहोनेसे प्रकाश्यरूप विज्ञानके। परिणामके संभवकरके व्यभिचारके स्पलका म- भावहै ताते नहीं सुपिधिपे ज्ञान अरु ज्ञेयके इस भावका व्यभिचार नहीं है, इस अभिप्रायसे वादी शंका करताहै। कहे कि क्षणिक विज्ञानवादी। जो है,सो ज्ञेयके प्रभायभये ज्ञानका प्रभाव कम ता ही है, है वादी जव ऐसे ही है, तव ज्ञानके भारका जो कल्पक (वृत्ति) सोई ज्ञेय निस शेय- के अभावका ज्ञान अंगीकार करते हैं या नहीं,यह विज्ञानवादी सौ पूछतेहैं, सो निसका उत्तर फहना योग्यहै । (हे सौम्य) तिन कहेहुए दोनोपसोंमें प्रथम पक्षविषे ज्ञानके अभावकी सिद्धि नहीं, वयों कितिस ही प्रभावके ज्ञानका सद्भावहै जाने सप्रकार कहते हैं, जिस ज्ञेयके अभावके ज्ञान से निस ज्ञानके अभावकों कस्मताहै,लिस ज्ञान का मुभाव किसकरके कस्यताहै। किसी करकेभी कल्पनाकरनेकों प्राय नहीं ॥ अरू हिलीयपसं भी चने नहीं। क्योकि तिस ज्ञेयके भावरूप ज्ञानकों भी ज्ञानके अभावके कल्पक होनेको म संभवहै नाते । अरु अवरय शेयरूप होनेसे तिस के प्रभाव हुए तिसज्ञेयके प्रभावकी कल्पनाका راندم - ११४४॥ प्रमोपनिपद॥ संभषहै नाते , शेयके प्रभावके ज्ञान के अंगीकार कापत युक्त नहीं ॥ अरु जो ऐमाकहे कि ज्ञानकों ज्ञयसे अभिन्नहोनेकरके ज्ञेयके प्रभावहुए ज्ञान का अभापहोवेगा, सोचने नहीं । काहेते कि - भावकों भी ज्ञेयपनेके अंगीकारते । (हे सौम्य)जब विज्ञानवादीयों करके प्रभाव भी जेय अरु नित्य अंगीकार करते हैं, नव निस शेयमे पृभिन्न ज्ञान भी नित्यरूप कल्पना किया ही होगा , मरु तिस। ज्ञानके प्रभावको ज्ञानरूप होनेसे प्रभावपना क. हनेमाग्रही है । अरु परमार्थसे ज्ञानका प्रभावपना उपर अनित्यपना नहीं है। अरु नित्यरूप ज्ञानके नाममान अभावके सारोपविषे हमारी क्या हानिहै। कुछ भी नहीं ॥ अरु जो ऐसाफहं कि अभाव। ज्ञेयरुपहना भी ज्ञानसे भिन्न है, नव इस नेरे क- हनेसे शेयके प्रभावहुए ज्ञानका प्रभाव जो तेरे। मतमें माना है सो सिद्ध नहीं होगा ॥ अरु जी ऐसा कहे कि ज्ञेय वस्तु ज्ञानसे भिन्न है , पुरु ज्ञा- नजो है सो ज्ञेयसे भिन्न नहीं, सो यने नहीं, क्यों कि पशब्दमायके भेदकरके वास्तविक भेदका प. संभवहै नाते । गुरु जब ज्ञेय पुरु ज्ञानकी ए- कता अंगीकार करताहै,तय शेयज्ञानसे भिन्न है। अरु शेयसे भिन्न ज्ञान नहीं, यह जो कथन है सो चह्नि (अग्नि) अग्निसे भिन्न है उपरु प्रग्निसे .
ان ارشد ہم ॥षष्ठ प्रमा॥ ॥१४॥ भिन्न वक्ति नहीं , इस कथनवत् शब्दमात्रही है। एतदर्थ है वादी ज्ञान जोहै सो ज्ञयसे भिन्न ही। सिहहोताहै। गुरु ज्ञानकों शेयसे भिन्न सिहहुए सुषुप्रिविषे ज्ञेयके अभावके होते ज्ञान के प्रभाव का प्रसंभव सिद्ध भया ॥ उपरु जो ऐसाकहे कि सुषुप्तिरिषे ज्ञेयके प्रभावहुए ज्ञानका प्रदर्शनहै| नाने ज्ञानका प्रभावहै, सो भी यने नहीं, क्यों। कि सुषुप्तिरुप ज्ञेयके ज्ञानका अंगीकारहै ताते। वहां ज्ञानका उपदर्शन प्रसिद्ध है । अरु जिसका रके विज्ञानवादीके मताधिषे सुपुप्निमे भी विज्ञान का सनाय अंगीकार करतेहै एतदर्थ ज्ञानका 39- दर्शन संभवता नहीं ॥ अरु जो कदापि ऐसाकहे। कि सुपुतिविषे भी ज्ञानको अपने प्रापर्करके ही अपना शेयपनाहै, सो भी चने नहीं , क्यो कि- भावस्थसधिषे ज्ञान 39रु ज्ञेयका भेद सिद्धहोता है जाने । अरु जिसकरके अभावरूप शेयकों। विषयकरनेयाला जो ज्ञान निसको अभावरूप शेय- से भिन्न होने करके ज्ञेय गुरु ज्ञानका भेद सिहहै ताने सो सिहभयाभेद मृतकके जीलायनेवत् ,पु- नः विपरीत करनेकों सैकडो विज्ञानवादीयोस भी अशक्य । अरु जो विज्ञानयादी ऐसाकहे कि । ज्ञानकों शेयपना हीहै। तो सो भी अन्यज्ञानकरके ही ज्ञेय होगा। अरु सो ज्ञान भी अन्य ज्ञानकर,
نینو - وسم
॥१६॥ ॥ध्मोपनिषद॥
के यहोवेगा, ऐसे तुमारे पक्ष विये अनवस्यादीय
होगा, सो भी चने नहीं क्यों कि सर्ववस्तुके समूह
के विर्भागका संभव हैताने पर जिस पक्षवियेस
र्व वस्तु का समूह अपनेसे भिन्न किसी भी ज्ञानका
ज्ञेय , निस पक्षविपे उक्तं दोपहैं । अरु ऐसे जब
हम मानतेहीय नव हमारे पक्षविये अनवस्या दोप
होय। उपरजिसकरके ऐसे ज्ञानको विषयकरने
वाला ज्ञानरूप तीसराभाग हमोकरके नहीं मानते
है, किन्तुतिस शेयसे भिन्न जो ज्ञान सो ज्ञान ही
है अरु ज्ञानसों भिन्न जो ज्ञेय सो ज्ञेय ही है । ई.
सप्रकार दूसरा विभाग ही हमोकरके माननेहैं।
नाते हमारे पक्षविषे अनवस्थादोय संभवना नहीं
॥ जो विज्ञानवादी ऐसा कहै कि तुमारेमन
विषे जब ज्ञानरूपा पापही पुपनेका वियय
नहीं, नव वरके सर्वज्ञपनेकी हानिहोनी है, सों।
दोष-प्रति जानने योग्य सर्ववस्तुके अंज्ञाः
नके होनेसे ही सर्वज्ञताकी हानि होती है और
कॉरमे नहीं, अरु न्यया प्रमाशंग (खरगोंस
के सींग) आदि अत्यन्त असत्यपदार्थोके अज्ञान
से किसी भी मनधिये सर्वज्ञता नहीं होगी |
यना सर्वशताकी हानि नहीं होगी एतदर्थ हमारेमन
वि निर्स सर्वज्ञताकी हानिरूप दीपकी प्राप्ति नहीं।
(मयोंकि ज्ञानम्वरूपको अपना प्राय जयत पापावि-
میری اولی- م ॥पष्ट प्रमः॥ ॥१४७॥ पाणवत हैं) किनु तिस विज्ञानवादीकों ही उक्त पकी प्रापिहोती है। क्योकि निस विज्ञानवादीकरके ज्ञानकी अवश्य ज्ञेयरुपताका अंगीकार, जाने) प ज्ञानकरके ही अपना ज्ञेयंपना मान्याहै। अझ नि- स अपनेकरके अपने ज्ञेयपनेकों "प्रभावरूप ज्ञेय को विपयकरनेवाले ज्ञानको अभावरूप ज्ञेयसें। भिन्नहोनेकरके, ज्ञेय अरु ज्ञानका अन्यपना सिद्ध है। सो पूर्वके ग्रेयभागविपे दूपितहोनेसे अन्य से यपनेके अंगीकारसे सर्वज्ञताका उपसंभवहै ताते इस अभिप्रायसे सिद्धान्ती कहेहै]-भी निस वि- ज्ञानवादीकों ही होहु । हमको निस मायिक सर्वज्ञ पनेके खंडनविय क्या दोपहै, कुछ भी नहीं । गुरु विज्ञानवादीके मतविपे. ज्ञान, ज्ञेयरुपहै, एतदर्थ ज्ञानके शेयपनेके अंगीकारसे दूसरा पनवस्थारूप दोप भी अवश्य ही होगा । क्योंकि विज्ञानवादी के मताधिपे ज्ञानकों आपसे प्रज्ञेय होनेकरके नवस्थारूपदोप,अनिवार्य है [यहां यह अर्थहै फि चिज्ञानवादीके मतविषे ज्ञानको प्रापकरकेही प्रापका ज्ञेयपना मान्याहै, तिसके असंभवकों" य गुरु ज्ञानका एथपना सिद्धहै" इस उजत पू ग्रंथकेभागविष कथन कियाहोनेसे, परिष नि ज्ञानको अन्यज्ञानके ज्ञेयपनेके होनेसे लिस। नानका भी अन्य ज्ञाता है, जिसका भी अन्य ज्ञाता .
॥१५॥ आमापनिपद॥ Irrito व्यक्तिके भेदसे इस दृष्टानगत प्रथम हेतुकों यहां वर्णनकरतेहैं ] दृष्टान्तविधे काररुप वीजसे। अन्यही बीज रक्षके फलसे प्रावृत्त है। उपर दा टन्निविषे तो अपने कारणका कारणरूप सोई।। पुरुष पारीरके भीतरकिया सुनते हैं। [प्रव। बीजकों सावयवहोनेसे इस दृष्टान्तगत हितीय, हेतुकों वर्णन करते हैं। यहां यह रहस्यहै कि दृष्टान्तविषे यद्यपि कारणरूप वीजके ही वृक्ष - अरु तिसके फल अरु निस फलके अन्तरगत वीजरूपसे परिणामते तिन कारण अरु कार्यरत प वीजकी व्यक्तिभेदके होते भी एकताहै तथापि निसका कारणरुप बीजकों सावयव होनेसे वृक्ष- वत् फलके प्राकारसे परिणामको प्रापभषेप- वयवनसे भिन्न जो अवयवहै, तिनके ही निसफ- लके अन्तरगन चीजरूपसे परिणामतें उन चीजों का भेदकरके फसका अरु निसके अन्तरगत वी- जका आधार उपाधेयभाव होता है । सरु यहाँ। दानिविपे तो पुरुषकों निरवयव होनेसे पारीरका प्ररु पुरुषका प्राधाराधेयभाव बने नहीं] कि. म्वा वीज गुरु रक्ष प्रादिकों को सावयवहोनेसे। उनका परस्पर आधार अरु आधेय भाव वनेहै. गुरु पुरुष निरवयवहै अरु कला अरु पारीर सावयवहैं, एतर्य निनका परस्पर प्राधातधेय شن اوشمار ॥षष्ट प्रक्ष्मः॥ ॥१५॥ भाव बने नहीं। गुरु जब इस हेतुकरके आका- एका भी प्राधारपना शरीरको मृघटिन है ,तब साकापके कारण पुरुपका पाधारपना पारीर को अघटितहीय इसमें क्या कहनाहै , किन्नु । कुछ भी नहीं ॥ ताते हेवादी तैने जो बीजका द- ष्टानं दिया सो दान्तिके समान नहीं, किन्तु वि. यमहै । अरु जो ऐसा कहे कि दृष्टान्नसे च्या पु- योजनहै प्रमाणरूप श्रुतिके वाक्यकरके ही पुरु- पकों परिच्छिन्नपनाहोवेगा। सो भी चेने नहीं क्यों कि वाक्यको कारकताका अभावहै । अरु जिस करके श्रुतिका वचन वस्नुके अन्यथाकरनेविषे। समर्थ होता नहीं, किन्तु जैसा अर्थहीय तैसे पृर्थ के प्रकारानेविषे समर्थ होता है, ताते । इहैवानः पारीरे सोम्य स पुरुषो। सारीरके भीतर सो पुरुप है। यह जो श्रुतिका वचन है सो अंडके भीतर । पाकापाहै , इस वाक्यके अर्थवत् जानना । प्रस ज्ञानका निमित्त होनेसे दर्पन श्रवण मनन पुरु। विज्ञान प्रादिकलिंगोंसे पारीरके भीतर परिच्छिन्न वन् प्रतीत होताहै। एतदर्थ । हे सौम्य शरीरके भी. नर सो पुरुषहै । इसप्रकार कहते हैं। गुरु पुनः प्राकापाका कारण हुमा मृत्तिकाके पात्रसे बदरी- फल वा शरीरकरके परिच्छिन्न पुरुषहैं, इसपका रतो मूख पुरुष भी मनसे भी कहनको इच्छाकरता چین اوشب۱۳۸ --- प्रमोपनिषद है। इस प्रकार प्राप्तभया जो अनवस्था दोष सोनि- वारणकरनेकों अपाक्य ही है ] ॥ अरु जो ऐसा कहै कि तुमारे मतविपे भी यह अनवस्थादोष तु- त्यहीहै--[पूर्थात् हे सिद्धान्ति तुमारे मतविषे भी ज्ञानको अजेयपनेकेहए तिसके व्यवहारकी ससि हि होचेगी। अरु अन्यज्ञानके ज्ञेयपनेके हुए अ नवस्था होगी। इस अभिप्रायसे वादी पकाकर ताहै ]-सो चने नहीं- हमारे मतविषे ज्ञानकों खएकापाहोनेकरके प्रापही करके अपने व्यवहार की सिदिहै ताते , 39रु ज्ञानकेभेदके पैगीकारसे। अनवस्थादोषकी प्राप्ति नहीं है, इस अभिप्रायसे। सिद्दान्ती समाधान करताहै ]-ययोंकि ज्ञानकी। एकताका संभव है ताते । अरु सर्व देशकाल अने रु पुरुषप्रादि अचस्थावाला एक ही ज्ञान, नाम रूपादि उपनेक उपाधियोंके भेदसे : सूर्यादिकोके जलादि उपाधिगत प्रतिविम्बचात् अनेक प्रकार का. भासताहै , एतदर्थ हमारे मतविषे यह अन- वस्था दोप नहीं है । गुरु से ही चैतन्यके नित्य पनेकरके अधिधानपना सिद्धहै जिसके हुए इस श्रुतिधिषे यह घोड़श कलाका भारोप करते हैं। एनन । इस श्रुतिसे मृत्तिकाके पात्रविणे बदरी (वर)के फलवत् इस ही प्रारीरके भीतर परिछि न पुरुयहै सो नित्य कैसे संभवे, अर्थात् संभयता .
اوپه ۱۴۹ ॥षष्ठ प्रमः॥ ॥१४॥ नहीं। सो कथनबने नहीं । क्यों कि सो प्राणादि का लाका कारणहै ताते । अरु जिसकरके पारीरमा करके परिच्छिन्न पाएको श्रहापादिक कला का कारणपना निश्चयकरनेकों पाक्य नहीं है। नदर्थ सो पुरुष ही सर्व कलाका कारणाहै। अरु जिसकरके सो सर्व कलाका कारणहै, नाते पारी रकों कलाका कार्य होनेसे सो पारीर पुरुषकी। कार्य कला तिसका कार्यरूप अपनि उत्यजिसे पूर्व अविद्यमान उपाप शरीर सो अपनेविषे।। अपने कारण के कारण। पुरुषकों मृत्तिकाकेया- चविषे बदरीफलवत् परिच्छिन्नकरनेकों समर्थ होवे नहीं ॥ अरु जो कहे कि जैसे बीजका का र्यक्ष अरु तिसका कार्य प्रामादि फल, सो अपने कारणके कारण बीज को अपने भीतर करनेकरके परिच्छिन्न करता है। जैसे पारीर जो है सो अपने कारणके कारण पुरुषकों भी अप- ने भीतर करनेकरके परिच्छित करताहै। सी कथन वने नहीं । क्यों कि फलका कारण वृक्ष निमकी.उत्पत्तिका कारण जो वीज तिस बीजकीय अरु फलके अन्तरगत वीजकी व्यक्तिकाभेदहै निस भेदकरके, उपरु वीज सावयवहीता है नाते, गुरु पुरुपकी व्यक्तिकी एकताहै ताने अरु पुर पको निरखयवताह ताते, [फल गुरु बीजकी شوش- jer ". १५२॥ ॥मोपनिषद॥ नहीं, नव प्रमाणभूत श्रुति कहनेकों न इच्छाक- रतीहोय , इसमें क्या कहनाहै ॥ ननु यस्मिन्नेता घोडकलाः प्रभवन्नि! जिसविषे यह षोडमा कला उपजतीहै। इसपकार द्वितीय वाक्यवि पुरुपके विपोषणार्थ अध्यारोप कहाहै , पुनःस इक्षाञ्चके सो ईक्षकों करताभया इत्यान दिरूप हत्तीयवाक्यसे जो कलाकी उत्पत्तिकाकथः नसुना है , सो यद्यपि अधिक पूर्थ भी है , तथा- पि कलाकी उत्पत्ति किस क्रमसे होती है, इस पर र्थक जाननेके प्रयोजनसे! स ईक्षाच्चके सो ईक्षाकों करताभया इत्यादिरूप यह प्रधिक पर्थ भी कहते हैं । अरु चेतनपूर्वक ही पागादि कलारूप सृष्टि होतीहै, इस पृर्थके जतावनेकों चेतनके पावित इक्षण (अवलोकन) का कर थनहै । इसप्रकार का समाधानरुप उपोहात पृर्थान् , प्रत्यके ग्रहसे मोरसके मांगनेवाली स्त्रीवत् प्रतिपादन करने योग्य प्रर्थकों मनमें रखके निसके पर्थ अन्य पर्थका जो प्रतिपादन तिसकी उपोहात , कहते हैं ] को कहके उपवास छत्तीयवाक्य के अर्थकों कहते हैं । है सौम्प जो घोड़ा कनावाला पुरुष भारद्वाजके पुत्र सुकेपा नाम मुनिने पूछाया कि । “से ईक्षाध्याकलि लमुक्रान्त उत्तानो भविष्यामि कस्मिन् वा पु- । پیش بند पष्ट पध्मः॥ ॥२५॥ निष्ठने प्रतिष्ठास्यामीनि"सो किसके निकसेहुए मैं निकस्या होगा वा किसके स्थितहुए स्थिनिको पानर होउंगा। ऐसे इलाकों करताहुना अर्यात सो कि स कर्ता विपोषके देहसे निकसेहुए मै निकस्या हो- उगा अरु किसक पारीरविषे स्थितहुए मै स्थिनिकों प्राप्नहोउंगा, इसप्रकार प्राणादिककी सृष्टिके शरीर से बाहर निकसने अरु पारीरके भीतर स्थितहोनेरुन प फलकों । अरु !"पाणाडा! पाणसे श्रद्धाकों रचना भया इत्यादिरूप क्रमादिक्कों [ यहां मादि प्राब्दसे“लोकोविप नामको स्चनाभया"यह माधार उपरु प्राधेयका भेद ग्रहण करते हैं 1.वि- पयकरनेवाल ईक्षा (ज्ञान)कों करताभया। इति सिइम् ॥ ३ ॥ १२ ॥ ४॥हे सौम्य यहां यह सारव्यमनके अनुसा. री वादीयोकी पाकाहै ॥ ननु ॥ आत्मा प्रकर्ता है| अरु प्रधान (प्रकृति) कर्ता हे, एनदर्थ पुरुषके। भोग मोक्षमय अर्थरुप प्रयोजनको अंगीकार कर के प्रधान जोहै, सो महत्तत्वादिरुप प्राकारसे प्रष्ट- न होनाहै नहीं यह पुरुषको स्वतन्त्रता करके ई- क्षणपूर्वक कर्जा पनेका जो वचन है सो अघटिनहै। किम्वा सत्यादि गुएगेकी साम्यावस्था (मिश्रणवस्था, मय प्रमाण प्रतिपादिन प्रधानरूप सष्टिकर्ताके होला ॥२५॥ प्रमोपनिषद्। * ॥स प्राणमस्सृजत प्राएगच्छहा खं। वायुज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियम् । म-॥ नोऽन्नमवावीर्य तपो मन्त्राः कर्म-|| लोका लोकेषुच नामच ॥ ४ ॥६३॥ संते। अथवा परमाणुकारणवादीके मतानुसार ईश्वरेच्छाके अनुवर्ती सृष्टिका कारण परमाणुके होतसते। यात्माकों कापनेके अंगीकारकरनेसे (समीचीन नहीं क्यों कि आत्माकों एक उप-- हितहोनेसे जैसे कुलालरूप कर्जाके दंडचकादि सहकारी साधनवत् , सहकारी साधनका प्रभाव है, ताते हुवादि अनर्थके हेतु जे प्राणादिक सं. सार निसके कपिनेका असंभव है एतदर्य पा. त्माको सृष्टिके कर्तापनेका जो वचनहै सो अध- टितहै। गुरु जिसकरके प्रत्यक्ष चेतनावान बु- हिपूर्वक कार्यका कर्ता पुरुष सो अपने गर्थे । अनर्थकों करता नहीं। एतदर्थ भी (ज्ञानरखरूप मात्माको अनर्थरुप संसारके कपिनेविये प्रत होना संभवे नहीं। एतदर्थ ही पुरुपको भोग मो- क्षमय प्रयोजनसे ईसापूर्वकवत् नियमित क्रम करके वर्तमान अचेतन प्रधानविषे जैसे राजा के सर्च अर्थके करनेवाले मंत्री प्रादिकोविमे यह राजा है, इस भारोपयत् । स ईसाब सो پیشن روند ۵دا . है पष्ट प्रक्ष्मः॥ ॥१५॥ ईशाको करताभया इत्यादिरूप यह चंतनवत् । यारोपहै। [अर्थात, जैसे, बालकविषे पीनरंग। करके युक्तनारूप गुणके योगसे अग्दिादका पु- योगह नदवत् , मुख्य सिगके कर्नाविषे विद्यमान जे नियमित क्रमकरके प्रवर्तमानहोनेरूप गुण निस केयोगसेस इसाच सो इक्षणकों करता भया ऐसा प्रधानविये गोण प्रयोगहै सोई उपचार रु अारोप करतेहैं ] यह सारख्यनादीयोंका कथन । सो यने नहीं। कोंकि आत्माको भोक्तापनेर यत् कपिनेका संभव है जाने। अरु जैसे सारख्या वादीले मतविषे चेतनमात्र अपरिणामी अात्माकर भी भोलापना मानते हैं, निसप्रकार वेदवादी हमारे मनविषे लरूपसे प्रकर्ता हुए आमाकों भी मायारु, प उपाधिका रिया श्रुतिउक्त प्रमाणसे जगन्का कर्नापना पटिनहै। अरु जो सांरव्यवाही ऐसा । कहै कि हमारे मतविपे आत्माकों मन्य महदादिन- वर्क स्वरुपकी प्राप्तिरूप परिणामसे आत्माकी 39- निन्यता, मयुइना, अनेकता के निमित्त जे येतनमा वजे स्वरूपका स्किम निस विकासे पुरुपके रख- कपक्षिही भोकापना निसके होनेसे चेतनमात्री खरूपका विकार (अविवेकसे परिणम )सो दोप के सर्प नहीं। अरु तुमारे घरवादियोंके मारिष मात्माकों सएिका क पनाहोनेसे मात्माका अन्य اوناشد-1 ॥२५॥ ॥प्रमोपनिपद्॥ तत्व सरूपकी प्रापिरुप परिणामही होताहै। ए- तदर्थ प्रात्माको अनित्यता प्रादि सर्वदोपोंकी प्राप्ति हायगी- [पूर्वरूपके परित्यागसे अन्यरूपकी जो प्राप्ति निसको परिणाम कहते हैं। सो परिणाम स- जातीय अन्परूपकी प्राप्ति हुए। अथवा विजातीय अन्यरूपकी प्राप्लिके हुए अनित्यता प्रादि दोषों को। संपादन करता ही है । एतदर्थ भोज्य (भोगनेयोम्य के प्रविवेकरूप:उपाधिका किया प्रात्माका भोला पना मानना योग्यहै.। निसकारणकरके निस भोज्य के प्रविनेकरूप उपाधिसे रचितपना सो निस परि णामके कर्त्तापनेविषे भी तुल्य ही है । इस अभियान यसे भाष्यकाराचार्य मुख्य समाधानकों कहतेहैं। यहां यहभावहे कि परमात्मारूप पुरुषको उपाधि छत्तजो कर्जामनेका संभवहै ताने । अरु भान्नि। करके इस, परमात्मासे भिन्न अपूर्णकाम-जीवोंका संभवहै ताने तिनके पुरुषार्थरुप प्रयोजनका स- टापना निसहीप्रकारके चेतनरूप पुरुपको भी बनना है। एतदर्थ चेतनरूप अधिष्ठानवाने प्रचेतनरूप प्रधानकों सो जीवोके भोगमोसमय पुरुषार्थरुप प. योजनका सजतापना युक्त नहीं] यह हो साव्या वादीयोका कथन सो यने नहीं। क्योंकि हमारेम तविपे वास्तव में सहकारी साधन रदिन उपकर्ता। प्राकाम,गक हैन प्रातारको भी अविद्यारूप فراشها - षष्ट प्रमा६॥ ॥१५॥ सहकारीके पाश्रय नामरूपात्मक उपाधि अरु ३१ नुपाधिके किये भेदका अंगीकारहै, लिसकरले आ. त्माको नामरूप उपाधिका किया ही गन्ध मोक्ष अरु! तिनके साधनरुप शास्त्रोक्त व्यवहारादिक विशेष मानते हैं। गुरु परमार्थ दृष्टिसे अनुपाधिकाकि- या एकही अहितीय शुद्ध अरु सूक्ष्मबुद्धिसे ग्रह- एकरने योग्य, अरु सर्व तर्कयुक्त बुद्धियोंका मः विषय, अभय गुरु पिाव (कल्याण) रूप तत्वमा नतेहैं। निसविषे कापना किंवा मोक्कापना प्रत क्रिया शुरु करकका फल नहीं है। कों कि सर्व प. दायोंकों अहतरूपत्ताहै ताने ॥ हे सौम्य सारख्यवादी नो वेदसे चाहर बोसनेवाले होनेसे पुरुषविधे अविद्या से पारोपित ही कपिना अरु क्रिया कारकका फलहै, ऐसे कल्पिके पुनः निससे भयकों काही. निहुए परमार्थसे ही पुरुषले भोक्तापनेकी इच्छा है। अरु पुरुषसे अन्यतत्व प्रधानको परमार्थवस्तुरूप ही कल्पतेहए । अरु सारव्यवादीयोंसे अन्य जे जै. नादिक सौ नैयायिकोकरके शिक्षाको प्राप्नभयो. दिवालेहुए अपनेमतके खंडनको पावने हैं। पुरु से ही जैनादिकोंसे अन्यजे नैयायिक सी सां- ज्जयादीयोंकरके अपने मतके खंडनको प्रापही नेहैं। सौम्य इसप्रकार परस्पर विरुअर्थकी कल्पनाकरनेसे मांसके अर्थी (श्वान किर्रादि
سیدہ فا
.
॥१५॥ प्रमोमनिभद्॥
जीवोंवत् परस्पर विरुद्ध क्रुद्ध भये भेदरूप अर्थ
के ही देखनेवाले हुए निसकरके परमार्थतत्वकी
पोरसे दूरसे दूरही रवीचे गयेहैं, ताते यथार्थ
निरुपाधि युद्ध प्रात्मतत्ववोधसे दूरानमुदूरी
दूरसे दूरही चले जाते हैं। एतदर्थ जे मुमुक्षुपुरुष
है सो उनके मतको अनादरपूर्वक त्यागके वेदान
अर्थके तत्वरूप एकताके ज्ञानकों श्रद्धा विश्वा
स पूर्वक आदरदेनेवालेहोंय । इस प्रयोजनके
लिये हमी (वैदवादीयों) करके इन तर्ककरनेवा
ले सांत्यवादीयोंके मतविषे कुछ दोपका दपूनि
देखावते हैं, उनके मतकों खंडनकरनेके तात्पर्यसे
नहीं । नैसे.यहां यह प्रर्थ शास्वान्तरविषेकहाहै,
तयाच!"चिवदन वावनिक्षिप्य विरोधोद्भवका
रणम् । तेःसंरक्षितसबुद्धिःसुखंनि तिवेदवित
वेदवेत्ताजो है, उनवादीयोंसे विवादकोकरता
हुमा चिदाकापाविषे विरोधकी उत्पत्तिकै कारण
'परमार्थसे भेददनि) को छोड़के स्क्षाकोपात
भयो बुद्धिवालाहुम्मा। अर्थात्-[भेद दानकों।
परस्पर वादीयोंसे उक्तदायकरके ग्रस्त होनेसे शन
ईतही निर्देषिहै ऐसे निश्चयवाली युद्धिकरके युक्त
हुमा सर्व.विकल्पसे सात होता? किंवा
Ir'कुछ दोपका दर्शन देवाचतेहैं। जिसहीकों
वर्णन करनेहए, कर्नापने आदिकोंका आरो-
ش شد ۱۵۱ अषष्ठ प्रमा॥ सा पिनपनाही सारख्यवादीयोंकरके भी कहना योग्यहै - सा कहतेहैं तुमारे सारख्यमनविषे भोक्तापने पर कपिनेरूप दोनों विकारों के विलक्षणपनेका अन संभवहै, एतदर्थ पुरुपविये यह कपिनेरूप जा तिसे अन्य जातिरुप भोक्तापनेकरके युक्त विकार कौन है, कि जिसकरके पुरुष भोक्ता ही है क नहीं । अरु प्रधान तो कर्त्ता ही है भोक्ता नहीं, इसका र तुमकरके कल्पना करतेहौ सो कहो । ननु, भो, क्ता अरु चैतन्यमात्र स्वरूपही जो पुरुप है,सोप पने चेतनरूपसे ही विकारकों पावताहै, अन्यनवरून प परिणामसे नहीं। अरु प्रधान तो अन्यन्त्चोंके परिणामसे विकारकों पावताहै, एतदर्थ सो प्रधान, अनेकरूपहै अशुद्धहै अरु जडहै, ताने विलक्षण एक शुद्द अरु नैतन्यरूप पुरुषहै । एनदर्थ उन । होनोंके भिन्नर धर्मरूप कत्तपिने अरु भोजापने- का भी विलक्षणपनाहै, यह सांरव्यवादीने कहा- पुरुपका चैतन्यरूपसे परिणाम जो तेने कहा सो या प्रागन्तुक (उत्पनि नापावाला) है, का नहीं,म हां जो हितीयपक्षकहै तो निस पक्षविये कर्मजन्य कदाचितहोनेवाला भोग पंसिइ होयगा, अरु प- थम पक्षक नो निस पसविषे प्रागनक विलक्ष- एताचाला होनेसे अनित्यता मादिककी प्राप्पिसे पु. रुपका प्रधानसे कुछ विशेष नहीं है । जो شنا میشه ۱۶۰ ॥२६॥ ॥प्रमोपनिषद्। ऐसा कहे कि भोगके अनन्नर युरुपको पुनः उप- पने वरूपसे ही स्थितहोनेसे अनित्यता प्रादिदोप नहींहै, तब प्रधानको भी प्रलयविषे वियोषकेश- भावसे, अपने वरुपकरके ही स्थितिके अंगीकार करनेसे निसका विशेष न होगा। इसप्रकार अव सिद्धान्ति दूषण देते हैं। तब नहीं मिहानि कहेहैं. यह विपोष बने नहीं, क्यों कि भोगकी उत्पत्तिसे पूर्व प्रधान अरु पुरुषके विकारके भेदकों कथनमात्रना ही है ताने।-[संक्षेपसे कयनकिये वाक्पका यहोवा एन करतेहैं -जयकेवल चैतन्यमात्र-पुरुषकों भोग की उत्पत्तिकालविपे भोक्तापनर विपोषहोताहै, अरु ५ जब भोगके निवृत्तभये पश्चात् निस {भोक्तापनास्त प} विसोपसे रहित पुरुप चैतन्यमानहीं होताहै,तब प्रधान भी तैसे ही महत्तवादि पाकारसे परिणाम को याय पश्चात् प्रलयकालविषे तिस (महत्तत्त्वादि प्राकारकों छोडके प्रधानरूपसे स्थितहोताहै, इस तीति चैतन्यरूपसे पुरुषके विकारकी कल्पनाविषे. भी विचार कियेहुए अर्थसे प्रधानका अरु युरुपका कुछ भी विपीय नहीं देखते हैं। एतदर्थ सारव्यवारी यों करके प्रधान पुरु पुरुषका विपोप (विलक्षण गिकार) अर्थात् दोनोंका एथक विलसणारूप: निकारहै, इसप्रकार वाणीमात्रसे ही कहाजाताहै परन्नु सो सिहहोना नहीं पुरुपका चैतन्यरूपसे - این او نشد 14 पष्ठ प्रमः॥ जो परिणामहै सो भागन्तुक अन्यरूप नहीं । इस प्रकार पूर्वोक्त दोनों पक्षोंमेंसे द्वितीय पक्षकोंमा- निके वादीकी काहै]-अरु जो ऐसाकहे कि भो- गकासविपे भी भोगसे पूर्ववत् , चैतन्यमानही पुरु पहै, जिसका कदाचित होनेवाला प्रत्यरूप नहीं, ए- नदर्थ प्रधानसे चिपोप (विलक्षा). है। सो कहा ना पने नहीं। क्यों कि जब इसपकार मानेंगे तब पुरुषकों परमार्यसे भोग होयगा। अरु कर्मसे ज- न्य जो कदाचिन होनेवाला भोग सो अतिहहोगा। -- [इस दोपके निवारणार्थ भागन्तुक परिएमनों मानिके भोगकाल सम्बन्धी विकारमात्र भोगहै। सो भोग पुरुषकों ही होताहै प्रधानकों नहीं ! इस प्रकार भोगके सदावरुप विशेषमासे वादीकी । शंकाहे] - 59रु जो कहे भोगकालपिये चैतन्यमात्र पुरुषका विकार परमार्थरुपही है, तिसकरके सोय भोगकालसम्बन्धी विकारमात्र भोग पुरुधनों ही होताहै, प्रधानकों नहीं। एतदर्थ भोगके सद्भाव अरु सृसद्भावकरके प्रधान अरु पुरुपका विशेष (भेद ) है--[तहां भी क्या भोगकाल सम्बन्धी दिन कारमात्र भोगहै,किंवा भोगकाससम्बन्धी चैतन्य मात्रगत विकारवानपना भोग है , इसप्रकार विका ल्पकारिके, प्रथम पक्षधिषे भोगकाल में प्रधानको भी सुवादिक उपाकारमे विकारवालाहोनेसे भीगा پیناونیشد-۱۲ ॥१३॥ ॥प्रथमोपनिषद॥ होयगा, इसप्रकार सिद्धानी कहते हैं ]-सों बनेन ही क्यों कि इसप्रकारहोनेसे भोगकालविषेष- धानकों भी सुखादि प्राकारसे विकारवानहोनेसे भोक्तापनेकी पापिहोयगी।-अब हितीयपक्षा नुसार वादीकी काहै] अरु ऐसाकहे कि चैतन्यमात्रका ही जो विकार सोई भोक्तापनाहै। तब उस्मतारूप विकारसे असाधारणधर्मवाले। अर्थात् अग्निका प्रसाधारणधर्म उस्मताहै ,तिस धर्मवाले प्रतिपादिकोंके अभोक्तापनेविषे का- रमाका असंभवहोगा, उपृर्थात् अपने असाधार- ण विकाग्वाले निमाविकों को भी भोक्तापने की पानिहागी ।। अरु जो ऐसाकहे कि प्रधान। अरुपुरुष इन दोनोका एककालविभोक्तापना है तो भी बन नहीं । क्यों कि प्रधानकों परमार्थ:- रुपताका प्रभावहै, ताते पुरुपके समान पारमा- र्थिक भोकापना प्रसिद्ध है। अरु दोनोकों भो- काहुए परस्परके पुकापनेविये दोनो प्रकाराने. के गए प्रधानभावके असंभववत् , प्रधान अरु पुरुपका अन्योन्य गुणप्रधानभाव (पोपपोपीभा व)जो पूर्व अंगीकारकियाहै जिसका असंभवहो- गा ॥ अरु-(ननु । भोगजोहै सो सत्वगएपृधा- न चित्तरूपसे परिणामकों प्रापभयी प्रकृति निस- काही धर्महै। क्योंकि तिसचित्तकों प्रकृतिकाविका پیش اونیش ۷۳* ॥षष्ठ प्रमः॥ ॥२६॥ रहोनेका संभव है ताते । मरु.पुरुषकाधर्म नहीं। क्यों कि सो पुरुष अविकारीहै ताते। अंरु निसयु- रुषको भोगके प्रभावका प्रसंगनहीं। क्यों कि ति- स पुरुषको लिसपुकारके चित्तके प्रतिविम्बके तत्त्व (निजरूपता) मात्रसे भोक्तापनेका कथनहोताहै, इसपुकार वादी पकाकरेहै] जो कहे कि भोगरूप धर्मवाले मुरव्य सत्वगुणकरके युक्त जो चित्त निसर विपे पुरुषके चेतनपने के प्रतिविम्वरूपसे निर्विका- ररूपकोभी भोक्तापनाहै। सोभी वने नहीं। क्यों। कि जब इस तेरे कहे प्रकारहै तब पुरुषकों परमा- से सुखदुःखादि भोगरूप अनर्थका प्रभावभया नब निसकरके किसकी निवृत्तिकेमर्थ पुरुषको मोसका साधन शास्त्र रचतेहैं, किन्न किसीके भी निवृत्त्यर्थ नहीं। अरु जो ऐसाकहे कि परमार्थसे यापि पुरुषकों अनर्थका प्रभावहै, तथापि विद्याकरक प्रात्माविषे शोपितजे अनर्थ तिस- की नितिके अर्थ पालकी रचनाहै। नव, परर मार्थसे पुरुष भोक्ता ही है,कर्ता नहीं, अरु पधा न की ही है भोका नहीं, अरु परमार्थ करके पु- रुषसे अन्य वस्तु सनरूप प्रधानहै, इसमकारकी जो यह सारख्यमतवादीयोंकी कल्पना सो, वेदवा व व्यर्थ अरु निष्पयोजनहै। एतदर्थ मुमुक्षयों करके आदर करनेयोग्य नहीं ॥ महजो सारख्य 1॥२६॥ प्रमोपनिषद॥ 14. वादी ऐसाकहे कि तुम चेदवादीयोंके सर्वकी एक नारुप पक्षविषे भी निवारणकरनेयोग्य बन्धका प्रभावहै , ताते पाकी रचना आदिक मोसके साधनकी व्यर्थताहै। सो भी बने नहीं, क्यों कि । प्रात्माकी एकताके निश्चय अनुभववाले पुरुपसे विपरीत जे प्रज्ञानी पुरुष निनके प्रति दोषके स- मादन करनेका प्रभावहै ताने । अरु जिसकरके शास्त्रका आदिक गुरु निसके फलके प्रथों पु. रूपोंविषे शास्त्रकी रचना निष्प्रयोजनहै वा सपुयो. जनहै,इसप्रकारकी सो कल्पना होय । अरु प्रात्मा की एकताके निश्चय कियेहए शास्त्रके कम्पिादि क पुरुष, निस आत्मासे भिन्न नहीं है। गुरु तिन शल्लका भादिकोंके अभावहुए,यह पास्त्रकी रचना सप्रयोजन है ना निष्प्रयोजनहै, ऐसी यह क- ल्पना अघटिनहै-(प्रथया निस एकताके निधयके प्रभावहोनेसे निवारणकरनेयोग्य जे बन्धनादिक निनके सद्भावसे यन्धकी नित्तिके अर्थ यह शा- लकी कल्पना अघटित नहीं} [किंवा अात्माकी एकताके निश्क्षयहुए, निस निक्षयका उत्पादकहो. नसे निस पास्त्रकी प्रयोजनसहितताको अपने नुभवकर मिहोनेसे, जिस श्रात्माकी एकताको निश्वय अनुभववाले पुरुषकरके यह पांका करने। को भी शक्य नहीं, इसप्रकार अब कहते हैं ] पर पष्ट मा ॥१५॥ जिसकरके अात्माकी एकताको माननेवाले तुम रके प्रात्माकी एकताके निश्चयकियेहुए शास्त्ररूप प्रमागका प्रयोजन अंगीकारकिया, एतदर्थ शास्त्र सप्रयोजनहै किंवा अप्रयोजनहै, यह पाका करने को भी अपक्षहै। अरु निस आत्माकी एकताले निश्चय किये हुए कल्पनाका असंभवहै । इस अर्थ को “यात्र त्वस्य सनमात्मैवाभनकेन कं पप्येदि- त्यादि जहां (जिस विज्ञानदशाविपे) तो इसप रुषकों सर्व प्रात्माही होनाभया, नहीं किसकरके किसकों देखे, इत्यादि। यह पास्त्रकहताहै। . रू!"यन हि तमिष भवति तदितरइतरं पप्यति। इत्यादि जहां हैतवत् होताहै तहां अन्य अन्य को देखनाहै। इत्यादिरूप यह रहदारण्यक उप- निपदूरुप प्रास्त्र, अज्ञानीकेविपे पास्त्रकी रचना भादिकके संभवकों कहताहै । अरु ।"अविभक्त विगाविद्ये परापरे! पर अरु अपररुप लिया। अरु उपविण भिमरूपहै इत्यादि शास्त्रके सादि विपेही वि 39रु अविधाका भेद सूचित किया। एतदर्थ वेदानपास्वरूप प्रमाण महाराजाकी युक्ति रुप भुजाकरके रसित इस प्रात्माकी अभेद एकता रूप देपाविषे तार्किकमतके वादरूप पाल करके सुक्त योधका प्रवेश करापि होता नहीं। सौम्य इस प्रकारके कयनकरके ब्रह्माको मृविद्याकृतनाम N .. ॥१९६॥ ॥प्रमोपनिषद्॥ 114 रुप उपाधिकरके रचिन अनेक पाक्ति रु साधन के किये अनेकपनेके सद्भावसे, ब्रह्मकों सूधिशादि कोंके कपिनविषे दंडचक्रादिवत् , साधनका। प्रभावरूपदीष गुरु अपनेआपके पृर्थ अनर्यका कर्नापना प्रादि दोष जो पूर्व सांरव्यमतवादीने का हाथा, जिसका खंडनभया जानना ॥ अरु सांरव्य वादीने जो पूर्व दृष्टान्न कहाथा कि, जैसे राजाके सर्पकार्यके कर्ता कर्याध्यक्ष विषे उपचारसे यह राजाके कार्यका वार्ता राजाहै, इसप्रकार कहते हैं, सो रटान यहां बने नहीं। क्योंकि ! स इसानके सो ईसकी करताभया। इस पुमाएरुपश्रु तिके मुख्य पृर्थका बाघहै. ताते । अरु (यजमा- न पापाणहै} इन्यादि स्थलविणे जहां पाब्दका मुन एण्यार्थ संभव नहीं, नहीं हीं पाब्दकी गोणीरनिकी कल्पनारुप उपचार देखाहै। अरु यहां प्रधानके पक्षविपेतो; अर्थात्- [प्रधानके पक्षविषे केवल इसकी प्रतिपादक शुनिका असंभवरूप दोष है, रिसे नही. किन्न वास्तवसे तो निसकों जगत्काम सापना भी संभवता नहीं, ऐसे अब कहते हैं।यहा यह अर्थ है कि प्रधाननी मुक्तपुरुषकों कोडके या पुरुपोंके प्रति ही प्रति सरु कर्ता कर्म प्रादि. ककी उपेक्षासे वन्ध अरु मोक्ष प्रादि पायदो।। वाच्य भोग मोक्षके अर्थ नियमित प्रवृत्ति संभव پشن و پشد، ور ॥पप्पध्मा। १२६॥ नहीं। इस कथनकरके पुरुषके पर्यश्रीग मोक्ष मय अर्थरूप प्रयोजनको अंगीकारकरके प्रधार न प्रवृत्त होताहै। सपकार जो पूर्व पोकाके । अवसरविषे सौख्यवादीने कहारहा सो खंडन। किया]-अचेतनरूप प्रधानकी मुक्त अरु ब. पुरुषों की अपेक्षासे, गुरु का कर्मदेश ए. रु कालरुप निमिनकी अपेक्षासे पुरुषप्रति । वंध प्ररु मोक्ष प्रादिक फलके अर्थ नियमित प्रवृत्ति बने नहीं । अरु हमों करके उक्त संर्वत ई- श्वरके कर्तापचिपे तो उक्त प्रवृत्ति बनेहै । इस प्रकार वादीके पक्षकों खंडनकरके , अव श्रुतिको व्याख्यानकी कहनेहए ! स पाएमसृजन ! सो पाएको सुजता भया इस वाक्यके तात्पर्यरूप अर्थकों कहते हैं। ईश्वररुप पुरुषकरके एजाय न्, सर्वकार्यविधे अधिकारी ऐसा प्राण सृजाजा ताहै । ऐसे तात्यर्थिकों कहके सब प्रमपूर्व- क अक्षरार्थकों कहतेहैं । पृ०॥ हे भगवन कैसे सजताभया ॥ उ० ॥ स प्राणामसजत। हो प्राणको सजता भया । सो पुरुष, उक्तमका रसे त्रिकालवर्ति वस्तुसोको विषयकरनेवाले। ज्ञानरूप इसपकों करके सर्वके प्राएमय (स- मटियाएरूप) हिरण्यगर्भनामवाले सर्व पारि योंके करण (इन्द्रियों के आधाररूप पन्त-
شدن او نشده
ARE 'प्रमोपनिषद्
रात्माको सृजना भया । अरु प्राणाच्छहारी पा
से श्रद्धास प्राणसे सर्वप्राणियोंकी शुभकर्म
विधे प्रवृत्तिकी कारस्प अहाको सृजना भया।ति-
सके पश्चात् कर्मफलके उपभोग साधनरुप देह
के अधिष्ठान अरु कारारुप पंचीकृत पंचमहाभू-
तोकों सजताभया। नहीं ।“ख यायुज्योतिरायः
थिवीपाका वायु ज्योति जल पृथिवी (कों
सजताभया)inाब्दगुणावाले प्राकामाकों ,अरु
अपनेगा स्पर्ण अरु कारणके गुण पदकरके युः
का रोगुणवाले वायुकों , अरु तैसे ही अपने गए
रुप अरु कारणके गुण पाब्द अरु स्पकरके यु
तीनगुणवाले तेज (पग्नि) कों, भूरे तैसे ही
अपनेगुणा रस पुरु कारणके गुण प्राब्द स्पर्ण
रु रूपकरके युक्त चार-गावाले जसकों , अरु तै-
से ही अपने गुए। गंध अरु कारणके गुण पाब्दस
रूिप रस, इन सर्वके मिलनेकरके पांच गुण वा
सी एथिवीकों सृजना भया । अरु नियम् ।।
मनोलमन्नाहीयेदियोकों मनको मनकी।
अरु वीर्यको (सुजताभया) से ही निनहीं |
पंच भूतोंसे अपंचीकृत अवस्थाविषे ज्ञानके अर्थन
रु कर्मके अर्थ दासरव्यावाले दोपुवारके अर्थात
ज्ञानके अर्थ पांच ज्ञानेन्द्रियकों अरु कर्मके अर्थ
पांच कर्मेन्द्रियकों, अरु तिन इन्द्रियोंके नियामक
پیناوند: ۱۹۹ ॥पस प्रमः॥ દ शरीरविषेस्थित्त संप्रय अरु संकल्प विकल्पादि।। लक्षावाले मनकों सजता भया। अरु इस ही पु- कार प्राणियोंके कार्य अरु कारणको सृजके तिन की स्थितिके पूर्थ ग्रीहि (नंदुस.ध्यान्य) अरुयया आदिरुप अन्नकों सजताभया। निसके पश्चात् उ. समुन्नकों भोजन कियेहुए से, सर्वकर्मविये प्रवृत्ति के साधन वीर्य (वल) को सजनाभया । अरु- “तपो मन्त्रा कर्म लोका लोकेषु च नाम च"न पको मन्दों को लोकको लोकरिये नामकों (मजता भया)-न्तःकरणकी अशुद्धताकरके भया जो। पापाचरण लिन पापोंकरके संकरता (मिश्रभाव), को प्रापभये तिस बलवाले प्राणियों के संकरताके निवारणार्थ चित्तशुद्धिके साधन तपकों सजताभया सरु लिन तपसे श्रुद्दभयेहैं अन्तरके अरु वायके करण जिनोंके ,ऐसे प्राणियों के अर्थ कर्मके साधन नभूत जे ऋग यजु साम अरु अथर्ववेदरुप मंत्रोंसे अग्निहोत्रादिरूप कर्म होता भया । अरु नि- न कमोसे कर्मके फरारूप चतुर्दपायोक होतेभये। शुरू तिनसोकों दिये उत्पन्नभये प्राणियोंका देवदार यज्ञदन विमुदत्त प्रादिरूप नामहोताभया--- ॥ [न नु, ईश्वरके मापनेके कथनसे कलापोंका सत्य- पना अंगीकार करना चाहिये। क्यों कि शुक्तिरजत मादिकरूप प्रारोपविषे सृष्टपने (उत्पन्नहोने के ५ فروش۱ • ॥२१॥ प्रमोपनिषद॥ व्यवहारका अभाचहै नाते, यह आशंकाकरके नेत्रः विषे अंगुलीके धारणा, पुरु नेत्र मर्दन भादिक प्र- यत्नसे उत्पन्न किये दो चन्द्र मशक अरु मक्षिका सादिकोंके पारोपके देखनेले, अरु । पृथ रथा नथयोगान् पथः सजत इति व जागृतके नन्तर, रषकों अरु रथमें जुड़नेवाले अश्वारिकों को अरु मागेको जनाभया, इस पृहदारण्यकी दुनिषिधे उत्पन्न होनेतरले उक्त सपके पदाथकी भमरूपनाके देखनेसे, वरकरके रचित कलानी का सत्यपना मानना चाहिये यह कहना बने नहीं। इस-अभिप्रायसे, अब भाप्पकाराचार्य कहते हैं । य- हो तिमिरपाब्दजो है सो नेत्रविषे अंगलीके धरनेमा दिक निमित्तले ग्रहा है 7-इसरीतिसे यह सो सहकला प्राणियोंकी अविद्या आदि दोपरुप वीज फी अपेक्षासे, निमिरदोपकरको युक्त दहिसे सजेहु- ए दो चन्द माक अरु मक्षिका मादिकोंवत् , अरु सपो दष्टा करकेस्टजेहुए सर्व खपके पदार्थोवत् सः जीहुईहै। पुनः इसप्रकार आत्माके निश्चयार्थ। अध्यारोमकों को अब तिसके अपवादको प्रकट करजेहैंसमुदाविषे नदीयोंवत् तिस ही पुरुष विये अपने नामरूपादि उपाधियोंके भेदको त्या- गके मतिप्रायकरके तीनहोतीहै ॥ ४ ॥ ६३ - ग्रमा पमः रामः रामः रामः रामः रामः रामः रामः من اونها ॥पटपमः॥ ॥२१॥ ॥स यथेमा नद्यः स्पन्दमाना:समुदा-॥ ॥या: समुदप्राप्यास्तंगच्छन्ति भिधेने ताशा नामरूपे समुद् इत्येवं पोच्यते ॥ ५॥हे सौम्य अब उक्त कलापोंके अपवादको भी सविस्तर दृष्टान्तसहित श्रवणकरो ॥ स य- येमा नद्यः स्यन्दमानाः समुदायएगः समुदै प्राण्या- स्तं गच्छति"Rो जैसे यह नदीयां बहतीहुई अरु समुदहै अयन (सात्मभाव) जिनकासी हुई स- मुदकों पायके अस्तताको प्राप्त होती है। सो समु दुरिये नदीके लयका दृष्टान कैसेहै, तहां कहते हैं। जैसे लोकविषे यह नहीयो वहतीहुई अरु समुहै। प्रायन अर्थात् प्रादि अन्नमें प्रात्मभाव) जिन- का ऐसी हुई समुदकों पायके अपने नामरूपके। निरस्काररूप प्रस्तताको पावतीहैं। अरु-"भि- येने तासां नामरूपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते" अरु) जिनके नाम (अरु) रूप नापाको पाचते हैं समुद्र ऐसे ही कहते हैं-अस्तकों पापभयी उन नदीयों के गंगा यमुना गोदावरी अदि सक्षगवाले नाम अरु रूप यह दोनों नापाको पावते हैं। यह तिन नामरुपके नापभये पीछे अवपोषरहा जो जल- रुप वस्तु, सो समुद्र ऐसे कहते हैं । हे सौम्य जिसप्रकार यह दृष्टान है-एवमेवास्य परि اون شراء ॥१७॥ प्रमोपनिषद्॥ गएवमेवास्य परिदृष्टुरिमाः षोडशकलाः॥ ॥पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति | ॥भिद्यते तासी नामरुपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते। ॥स एषोऽकलोमृतो भवति तदेपरलोकः।। दृष्टरिमाः पोडपाकलाः पुरुषायणा: पुरुषं पाप्या- सं गच्छनि"ऐस ही इस परिदृष्टाकी यह पोर- पाकला (सो) पुरुषहै अयन जिनका ऐसीहुई पुरु, पकों पायके अस्तकों पावेहैं। जैसे ही, उक्तल- सवाला प्रसंगविषे पापभया पुरुष जी परिदृष्टा) अर्थात् अपने प्रकामाके कर्ता सूर्यवत् सर्वपोर से स्वरूपभूत रनिका कर्ता, है इस परिदृष्टाकी।। यह पागादि सोसहकलाहैं। सो उक्त सोलहकला, नदीके अयनरूप समुद्रावर पुरुषहै अयन (आ मभावकी प्राप्ति) जिन कलाकी ऐसी हुई पुरु परूप आत्मभावकों पायके अपने नामरुपके निरस्काररूप प्रस्तताको पावतीहै । अरु-भि घेते तासां नामरुपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते"ति सके नामरुप नापाको पावतेहैं, पुरुष ऐसे कहते हैं-तिन कलाके पाएादिक लक्षणवाले नाम रुप नाशकों पायतेहैं । अरु नामरूपके नापभ पीछे जो कि अविनापी तत्व परपोष रहताहै, सो ब्रह्मवेत्ताओंकरके पुरुष ऐसे कहते हैं। जो فن او شد ۱۷۲ ॥यष्ठप्रमः॥ ॥७३॥ पुरुष,गुरुने देखायाहै कलाके रूयका मार्ग जिस- कों, ऐसा हुशा इसरीतिसे जानताहै- स एषोऽ कलोमतो भवति" सो यह प्रकल अमृतहोता हि-सो यह पुरुष, प्रविद्या काम अरु कर्मक रके जन्य जो पाएादिक कला तिनके विद्याकरके नापाभये कलारहित होताहै। अरु जिसकरके अविद्याकृत कलारुप निमिन (उपाधि) का किया। देहसे निकलने आदिकं पाब्दका वाच्य मरणादिक व्यवहाररूम मृत्युहै, ताते उनकलाके नापभये यही पुरुप कसारहित होनेसे ही व्युमन (मरण रहित) होनाहै- “नदेषश्लोकः"निसविषे यह श्लोकहै। -निम ही इस पृर्थविषे यह श्लोक (अग्रिमचा- क्यरुप वेदका मंत्र) प्रमाणहै ॥५॥६॥ ६॥ हे सौम्य "परा इव रथनाभौ" जेसे। रथकी नामिविषे ग्रंरा अर्थात-रथके चक(प- हिया) की नाभि (मध्यका काठ) तिसको रथना- भि कहते हैं, मिस रथनाभिविषे गुरु मार्गको स्पर्श करनेवाली चकरुप नेमी (पूटि )निसविषे लगेहु ए खडे काठ तिसको रथचक्रका परिवार कहते हैं। अरु निन ही को अरा कहते हैं] सो, जैसे रथचक्र कि परिवाररुप उपरा रथके चककी नाभिविषे प्रवे- को प्रानभये तिस रथचक्रके माश्रितहोते हैं। जैसे ॥१७४॥ प्रमोपनिषद्॥ । अराइव रथनाभौ कला यस्मिन्॥ प्रतिष्ठिताः। देयं पुरुष वेद यथामा ॥वो मृत्यु परिव्यथा इति ॥ ६ ॥ ६५ ॥ ही किला यस्मिन् प्रतिष्ठिताकला जिसविये प्राश्रितहै:-प्राणादिकला जिस पुरुषविषे. उत्पत्ति स्थिति अरु लय; इन तीनों कासोचिषे माश्रितहोते है। - वेयं पुरुष वेदांनिस जाननेयोग्य पुरुष को जानना--निस कलाके प्रात्मरूपं जाननेयोग्य सर्वत्र पूर्णहोनेसे अथवा सर्व प्रारीरोरुपी पुरविये र- हनेसे पुरुष तिस पुरुषपदसे लक्ष्य पुरुपकों जैसाहै तसाही जानना ॥ हे शिष्यो-"यथा मा चो मृत्यु परिव्यथा"तुमको मृत्यु पीड़ा मत करो तुमको मृत्यु जो है सो लेपाकों प्राप्त मतिकरो ॥ अर्थात् । जिसकरके तुम क्लेशकों प्राणमये दुःश्वी ही हौ, एतद र्य मैं कहता हौं कि तुमारेको क्लेमा मत प्राप्त हो इ- यभिप्रायः ॥ ६॥ १५ ॥ ७॥ हे सौम्य पिप्पलादनाम मुनीश्वर याचा उक्तरित्या तिन अपने प्रयकरतीपोको उक्त उप- देशकरके पुन: । तान् होवाच" जिनके प्रति कह नेभये-निन प्रपने शिष्योंकों कहतेहुए कि हे पित यदर्शन हमिप्यो "एनापदेवाहमेनत्परं ब्रह्मवेद 140 पिठ प्रमः॥ ॥२७॥ ॥नान होवाचेतावदेवाहमेतत्परं ब्रह्म विद नातः परमस्तीति ॥७॥ ६६ ॥ इतना ही परब्रह्महै इसकों मैं जानता हौं-इतना ही जाननेयोग्य परब्रह्म है इसको मै जानताही अरु-"नातः परमस्तिइति। इससे श्रेष्ठ नहीं है। - इस कहेहुए परमपुरुषसे अन्य प्रत्यन्त श्रेष्ठ जाननेयोग्य कोई नहीं है। हे सौम्य इसपुकार अपने शिष्यों को प्रज्ञान अरु उप्रवपोप रखने। योग्य उपन्य वस्तुके सद्भावकी आशंकाकी निव- लिकेपर्थ गुरु हम कतार्थभये इसप्रकारकी। निश्चयात्मक बुद्धिके जननार्थ पिप्पलादमुनी: श्वररुप सर्वज्ञ प्राचार्यने कहा है ॥ ७ ॥६॥ ॥ हे सौम्य जब पिप्पलादमुनीश्वररुप प्रा. चार्यसे उपदेपाकों पाय निःसंपायभये चे सुकेशा प्रादि श्रोतिष्य प्रापकनार्थ भये,निस मिःसं- शय कृतार्थ कर्जा गुरूके अर्थ वृह्मावियाके प्रति- उपकार (बदला) कुछ नदेवते भये ॥प्र०॥ नव क्या करतेभा उ०॥"ने नमर्चयन निमका पूजनकरते हुए। अर्थात् वे छोशिप्य निस पिप्पलादनामवाले अपने गुरुको दोनो पादों चिये पुष्पांजली अर्पण करनेसे अरु मस्तक साक्षा 2017 144 ॥पा एमः॥ त्यन्त अभयक दाना महुरुरुप पिताके पूजनेकी। योग्यताविप क्या कहताहै । एनदर्थ नमःपरम पिभ्यो नमः परमपिभ्य इति । परमपियों के अर्थ नमस्कार होड, परमपियों के अर्थ नम- स्कार होहु ब्रह्मविद्याके सम्प्रदायके कर्ता परम ऋषियोंके अर्थ नमस्कार होहु ॥ यहां जो हिवार । कथनहे सो यह्मविद्याके आचार्याविये भादार्थहै। मा इति' शब्द उपनिपद्की समानार्थहै। रति- मिदम् ॥ ॥ १७ ॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥ ॥इति प्रमोपनिषद् गत पमपम भापा॥ ठिीका.समा ॥इति प्रमापनिपद मम्पगम्॥ Hair । म नसार वलालम॥ 20221 تیوش-۷ ॥१७॥ मोपनिषद॥ ॥ते तमर्चयन्तस्त्वं हिनःपिना योऽ-॥ ॥स्माकमविायाः परं पारं तारयसीति । ॥नमःपरमऋपिभ्यो नमः परमपिभ्यन्ति। ॥८॥६७ ॥ ॥इतिश्रीप्रमोपनिषङ्गत पाठ प्रक्ष्मः॥ ॥ इति प्रमोपनिषद्॥ 1 व प्रणिपात (दंडवत् ) से पूजनकरते हुा, कहने। भये प्र०॥ क्या कहते भये ॥०॥"वं हि नः। पिना योस्माकं । पापहमारे पिताही । हे गुरो पाप हमारे नित्य उपजर उपमर अभय वृत्यरुप रीरके विद्याकरके जनक होनेसे पिताही गुरु- विद्याया परं पारं नारयसीति"जो अविद्या- से पर पारकेताई नारनेहो-जो पाप ही विपरी- न ज्ञानमय जना जरा मरण रोग अरू दुःखादिरूप मकरादि निनकरके युंक्त जो अविद्यारूप महासागर निससे,पर विद्यारुप दीर्घ नौकाकरके महासागर क पार वन पुनरावृत्तिरुप मोक्ष नामवाले पार कताई हमको पारकरतेहौ, एतदर्थ प्रापका हमा रपति उपन्य (जन्मदायक) पितासे अधिक पिता- पना घटितहै । अरु जब अन्यपिता भी परीरमा वको ही उत्पन्न अरु पालन पोपण करताहै न- यापि लोकरिये अत्यन्त पूजने योग्यहै। तर म 2021 - M ॥पा एमः॥ त्यन्त अभयके दाना मगुरुरूप मिताके पूजने की। योग्यताविषे क्या कहना ॥ एनदर्थ । नमःपरम अधिभ्यो नमः परमपिभ्य इति । परमपियों के अर्थ नमस्कार होहु, परमऋषियों के अर्थ नम- स्कार होहु उह्मविद्याके सम्प्रदायक कर्ना परम ऋषियोंके अर्थ नमस्कार होहु । यहां जो हिवार । कपनहे सो ब्रह्मविद्याके शाचायोचिये भादराई। मा इनि' शन्द उपनिपटुकी समानार्थहै। रति- ॥ १७ ॥ हरिः ॐनत्सत् ॥ ॥इति प्रस्मोपनिषद् गत यापम भाषा। टीका समाधा। ॥इति प्रमोपनिषद् सम्पागम्।। THEITE नसार पसाराम 20221