Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Kabimandal

Babu Ramkrishan · 2011/03

PDF Proofread

Front matter

शरद जोशी
जन्म 21 मई 1931, उज्जैन (म० प्र०)
शिक्षण यहाँ वहाँ, पता नहीं कहाँ-कहाँ । अन्त मे होल्कर
महाविद्यालय इन्दौर से बी०ए।
शुरू में कहानियां, फिर जुडी पत्रकारिता, व्यग्य लेखन,
भोपाल मे सरकारी नौकरी कुछ सालो और अब पिछले पन्द्रह वर्षो
से स्वतन्त्र लेखन।
पहली किताव-'परिक्रमा'। फिर 'किसी बहाने', 'जीप पर
सवार इल्लियाँ,' 'तिलस्म', 'रहा किनारे बैठ', 'दूसरी सतह' और
'पिछले दिनो' ।
.
नाटको का चस्का । 'अधो का हाथो' और 'एक था गधा उर्फ
अलादाद खा' नाटको के प्रदर्शन सर्वत्र हुए ।
फिलहाल ववई में रहते है।

श्री गोकुलेशो जयति कविमण्डल की समरयापूत्ति। मिती माघसु०८ बार बुध सम्बत १९५३ तेरहवां अधिवेसन। पाचो बान झरिगे। बाबू रामकण वर्मा सपादक भारतजीवन काशी। बड़े बड़े वीरन को विकल विहाल करै विश्वामित्र जैसे जाके मोह-पास परिगे। जाके मान-गजन प्रमंजन प्रभाव आगे बज्रधारी वासव के गौरव उखरिगे ॥ जौन मीनकेतु जू के चोखे चारु चोपभरे चोजवारे बान चन्दभाल चित्त अरिंगे पैनी धार पेखि मृगनैनी के विलोचन की वीर पंचवान जू के पॉचो बान झरिगे ॥१॥ काशीनिवासी पगित भि वेनी कवि जो। आयो रितुराज पै न आयो वृजराज काहे ( २ ) वागन में कदम अनार अंघ फरिगे। वेनी द्विज कैलिया कुहूकै लगी चारों ओर वोरन के वृन्द भौन भौनन पसरिगेरित विहार कीधों काहू लै अनोखी नारि को मो वि. योग में समस्त ज्ञान हरिंगे । कीधों पान हर फेरि के मसम कीन्हे कीधों पंचवान जू के पॉचो०॥१॥ काशीनिवासी हमचद नी वलभीय । गान करि थाकी सुरनारि अप्सरा प्रवीन विविधि प्रपंच हम भली मॉति करिगे। मेटि को सके है मरजाद रामदामन की सकल हमारे ज अखर्व गर्व गरिगे॥भभरि मुनीस- पद परे हम पाहि वोलि परम कृपाल वे ह- मारे पर ढरिगे । देवरिषि सामुहे जू सहित सहाय हम हारिंगे हमारे आज पाचौ०॥ गये वीति आली री निजामा के तिहुन जाम नभ में ननत्र ये सकल मद परिगे। कौन से छली के फद परिगे छवीले छैल र- । ( ३ )- सिक समाजनि मे कहा आज रिंगे । कौन हेत आये ना हमारे प्रानप्यारे सखी चौदस के चन्द्रमा हूँ अस्तगिरि दरिगे। उदै गिरि माहि भयो अरुन प्रकाश चास पच- बान हूँ के अब पाचौ० ॥१॥ काशीनिवासी बाबू माधवदास जी। भरिगे सु पाटल सुगन्ध ते दिगंत सबै फूले कचनार चारु पंकज पसरिगे । परिगे सु काननं हमारे कोकिला के घोल कंत के वि- नाही ये बसत अंत करिगे ॥ दरिगे हमारे जान कान्ह कूवरी पैहाय माधव के मासहूं की माधुरी विसरिगे। जरिगे पलास रास कैधों खास पीके देस कैधों पंचवान के स पांचो०॥ ला बनारस सरायमोह निवासी मुकुन्दहाल जो । घोरे सहकार फूले टेसू कचनार कंज कु- जत विहग गुजि भौर भीर भरिगे । विरह विशष वस आवते विदेसी घर हिलि मिलि निज निज नारि सग थरिंगे ॥ अजहूँ न आये -- ( ४ ) हाय निठुर मुकुन्दलाल मन वच काय सोति फन्दन मे परिगे। कैधों वहि देस बेस सि. सिर वतास वह्यो याते थकि मार रह्यो पा०॥ पटनानिवासी बाबू पानाननाम्न जी। परे हैं अहोस कोऊ कोऊ टक एक पेखें कोऊ लगे संग घूमै ऐसे प्रेम भरिगे । कोऊ अति दूर भागे देखिवो चहे है नाहि वजर गिर की भॉति हीय महा डरिगे ॥ कोऊ है कराह रहे आह की उसासें लेत दसा या मु- सील आजप्यारी नैन करिगे।मारन सुमो- हन बसीकर उचाट तंत्र एकै सग पंचवान पाचौ वान० ॥१॥ •ना मारकडे सातजी उपनाम चिरजीव कति उडत पराग कहूँ पौन मे दिखात नहीं फूले ना सुमन वृक्ष आतप ते जरिगे । गुजत न भौर विना पाये मकरन्द त्योंही कोकिल न बोले विना आनंद उजरिंगे॥ कठिन अवर्षन ते भयो ना वसत जाते आये नहि कत दि. कोपागजनि.

के पा०॥ रजीव विसरिंगे । जल के विहीन सूखि पंकज शरीर धारी प्यारे पचवान जू थीमतो चन्द्र कसा वाई दी। बैठे हैं गुपाललाल प्यारी वर चालन में करत कलोल महा मोदमन भरिगे। ताही समै आती राधिका को दूरही ते देखि सौ- तिन के सकल गुमान गुन गरिगे ॥ चंदकला सारस से तिरछी चितौनि वारे नैन अनि- यारे नैक पाकी और ढरिगे । नेह नहे ना- यक के ऊपर ततच्छन ही तीच्छन मनोभव के पाँचौवान॥१॥ लखनऊनिवासी नाला हनुमानप्रसाद जी। फरिगे के कोकिल के कंठ वहि देस सखी कारिका करैया काफपाली कुल मरिगे। बन उपवन बाग वाटिका उजरिंगे धों ग्रीपम में ज्वाल की जलाकन तेजरिगे। कहै हनु- मान कत परिगे अपर फद के बसत ऐला- -वर्त जानि जिय डरिंगे। करिके प्रपच पंच वान के प्रसून चाप पनच उतरि गे के पॉ०॥ श्रीगोस्वामो किशोरीलाल जी पाग। कैधों वाहि देस पैन आज रितुराज धायो कैधों मलयाचल समीर कहूँ अरिगे । केधों भृत भाजे मुख माधवीलता तें मोरि कैंधों फुल्ल पूरित पलास पुज जरिंगे ॥ कंधों वीर वालम विदेस विसराने नेह कैधों वालजाल में जके से जाइ परिगे । कैधों कोकिलान आन देस को पयान कीनो कैधों पंचवान जू के पाचो वान० ॥१॥ आकर्पन मोहन वसीकर उचाटन त्यो मा. रन मजेजे मानिनी के पेखि डरिगे । ताप उनमाद आदि तंभन विसोपन त्यों संमोहन सुदरी सुलक्षन पैदरिगे। करना कमल आम केतकी अशोक ओक नख तें सिखानि लों निहारि हारि टरिगे । मान खरसान प्रेम पानिप महान खान जानि पचवान जू के पा०॥

अजमेरनिवासी किशोरीलाल जी रावत । आये नाहिं कन्त या वसन्त छिति छाये माहि जानी ना विदेस उर कौन भ्रम भरिगे। पी पी के पुकारिवे की वानि धौ विसार दई कैचों दइमारे री पपैया वित मरिगे॥ भूलि गे निकुंजन में गुजन 'भ्रमर कैधों लुज है प्रभंजन के पुज कुंज परिगे। कुसुम कमान गयो दृटि धों किसोरी आली कैधों पंचवान जू के पॉचौ०॥१॥ गयानिवासो प गिरधारीलाल जी शर्मा । ऊँचे स्वर बोलिवे की दौरि गैल डोलिवे की अचरा न डारिवे की पूरन निकरिगे । गिरधारीलाल त्यों अमन्द हॉस हॅसिवे की खेलन में वसिवे की छन में विसरिगे। पर- म प्रभान पगी प्रगटे तरुनताई तन मन पर कछु औरै रङ्ग भरिगे। पाचौवान वीर पंच वान जू के लागे भाज तेरे अङ्ग अङ्ग से वे पा०॥ ।

(८)
रोवा मगज मिय मेवानामविनो।
उन्नत उरोजन की आभा अविलोकि गज
डारे कुम्म धूर पकि पीरेवल परिगे। चिबुक
निहार आम झूलत अचैन डार दन्त दुति
हेरि ही अनारन विहरिगे। मिश्रश्यामसेवक
कपोल गोल पेखि प्रभा टपकै मधूक लगे कज
कीच गरिगे । प्यारी न कमान नेन वानन
की सान देखि पैन पंचवान ज़ के पाचो०॥
कैधों पतझार धन वागन न होत उते
फूलहि न फूल के दवागिन मे जरिगे । गुं.
जत न भौर-भीर कैधों कज पुंजन में कुंजन
मे कोकिलादि कूकत न मरिंगे ॥प्यारे श्याम
सेवक न आये अबहूँ लों हाय छाय रह्यो ही
रे दुख पारे अग परिगे। टूटी मानमंजन
कमान नई कैधो दई कैधों पचवान जू के पा०॥
बाबू शिवनदनसहाय जो (जजी बाकीपुर)
आये रितुवंत छविवत कन्त आये नाहिं
सिव सौह सोच सोच प्रान गरे अरिगे। नेह
.
।

(
सब गरिगे धों गेहही विसरिगे धों सौतिन
चलॉक कोऊ फद पीय परिगे ॥ वोरे आम
झरिगे बहार सब हरिगे धों, फूल फुलवारी
वह देस के उजरिंगे। कोकिलान मरिगे धों
मधुपान जरिंगधों कीधो पंचवान जू के पा०॥
गयानिवासी विखनाथ जी
वाय विधि तीन कैघो वहत न पीन वहाँ
कैधों रसलीन है रसालन में जरिगे। कैधों
कचनार मौलसिरी न अनार फूले कैधो मौर
भीर वहाँ झोरन विसरिगे॥विश्वनाथ आली
जहाँ प्राननाथ बसै वहाँ कैधों ससि उगै नाहिं
कोकिला न ररिगे।मन अनुमान कैधों टूटि
गो कमान रोदै कैधो पंचवान जू के पाचो०॥
गयानिवासी प शशिमान जी।
प्रगट्यो बसन्त वन वेलिन बिहग बाग
सुन्दर तडाग जलजात पात भरिगे । ससि
गुजरन
भौंर भीर करै सौरभित
पोन चहुंओर मे बगरिगे ॥ देवता न बोले
M
भाल तापे

हिय वेध्यो बहु धार वान तान तान कान लो अनेक श्रम करिगे। परना प्रवेश भो महेश हृदै रच काम पचवान जू के जऊ पाचो० ॥ दरभगा राज्यमान्यवरप सिवप्रमाटनो कबीबर । भाखै देव देवपति रावरेनुसासन कों पाइ के उपाइ भरि कोटि कला करिगे। ज्ञान रूप नारद सरूप सुद्ध हेरि फेरि फेरि हिये हारि मानि श्रानि आनिअरिंगे॥नीके शिव मानसछ निवासिनी सुकेसिनी के संयुतं वसत सवै सङ्ग सखा टरिगे । कौनहूँ प्रपञ्च रञ्च चले ना समाधि पश्चवान के निसान वान पाँचा० ॥१॥ जौनपुर निवासो पण्डित मीताराम को सर्मा । कंधों वहि देश काम चरचान जाने कोऊ कैधों वहि देश दुखदाई काम जरिगे। कैधों वहि देशन नपुंसक वसे हे सर्व कैौ विक. राल जाड परते ठिठुरिगे ॥ आवत न काहे सी सीताराम जू विदेशी घरे गये परदेश कैधों ग्यान गुन हरिगे। कैधौं वहि देश पंचवान कोप्रवेश नाहीं कैधौं पंचवान जू के पॉचो०॥ लाना मलदास जो कसबे पैंतेपुर जिला सीतापुर । पञ्चवान को पठान हाथ लै कमान वान इन्द्र की सलाह मान आपु सोंह करिगे । नारद को ध्यान भंज चित्त अनुमान ठान पॉचो शर मार तान मोघ तीन परिंगे ॥ काम घवरान कंपमान खिसियान महा छूटो न मुनीश ध्यान सबै स्थान दरिगे । मङ्गल लजाइ के विदेह मुनिपाद गहे जागिये कृ- पाल मेरे पॉचो०॥१॥ जिला सीतापर मौजे जैपारपुर बाबू पनिकहसिह जी। जानि विरहिनि यहु वधिक वसंत बीर बधिवो विचारयो तौलो भाग मो उपरिगे। हुकुम दियो हो कोकिलान कैल भृगन्न को इन सवहूं के तो गरूर भले ढारिंगे ॥ भने अनिरुद्ध त्यहि औंसर में प्रानप्यारो' आय- ५ ( १२ ) गयो ग्रह दुख द्वंद वृन्द टरिंगे । सान सों चढ़ायो जो कमान पर नान तान लागी नहिँ मेरे ऑचो पाँचो० ॥१॥ बाबू भगवतीचरण सकता जिता शाहाबाद । करिवे को ना ध्यान सभु को अनग चल्यो लोगन की सुद्धि अरु वुद्धिहूँ विसरिगे। काम ते अधीर सब हगे छिन एक माँहि ज्ञानिन मुनीन ज्ञान अकुर निकारिगे।आइ सिव पाहँ यत्न करिके थक्यों है जब भोग दुखदाई काम लाजन ते गरिगे। नैनन उ- घारि के विलोक्यो त्रिपुरारी जवै भापत न- चीन तचे पाँचो० ॥१॥ श्री सगशीलालकवि कप तेपुर । बोलि पिक पातकी पठाये है न प्यारो वेगि कारी उतै कोकिलो दई के मारे मरिगे। गाय तान मधप संजोग ना सुनावे जाय मेरो जान मालती बियोग वन्हि वरिंगे ॥ सोचे वाल वेठी हेत जगली अनागम को ऐसे में समीर सर हून उर अरिंगे । कैधों मेरो नेह होन अङ्गन उमङ्ग कीन कैधों पंचवान जू के पॉचो० ॥१॥ प. महावीरप्रसाद शर्मा बैद्य कोट जिल्ला मिरजापुर। तारक असुर भुजदण्ड परिवण्ड भयो देखि परचण्ड ताहि देव वृन्द डरिगे । शङ्कर सुवन हेतु बोलि झपकेतु वेगि महावीर वि. नती विशाल सबै करिगे ॥ सुनते सशङ्क मार पर उपकार जानि आपुहि मृतक मानि शंभुपै डगरिगे । रुद्र को सरूप अवलोकि भीत ग्रस्त तहीं कम्पित शरीरभूमि पॉचो०॥ प द्वारिकाप्रसाद पाठक बाकीपुर । केधो वहि देस जित जाय छाय कन्त रहे आये ना वसन्त वनवागसब जरिगे । कैंधो भये मूक कूक कोकिला करत नाहिं कैधों हा पपीहा सब देस वाहि मरिंगे ॥ कैंधो अ- नुराग सो अलाप नहि फाग कोऊ कैंधो उन त्रिविध समीर मौन धरिंगे । कैंधो प- ३ ( १४ ) श्चवान को कमान गयो दृट कैंधो विरहिनि मारिवे में पॉचो० ॥१॥ जिला दरमहा निवासी बाबू बीमिलनाय मा । पञ्चमी वसन्त आज लागतहीं एरवीर टेसू ऋतुनायक के झन्डा से फहरिगे। केकी कोकिलान कुल कूके लगे कुञ्जन में ललित. पतानहूँ लतानद्रुम परिगे ॥ माधवी अशोक का मालती चमेली वेली विश्वनाथ अम्ब मार भोर भीर भरिगे । टरिगे हिमत अंत डरिंग सिसिर सीत ढरिंगे वसंत बन पाँचो०॥ दूसरी समस्यापूर्ति । बगखो बसन्त है। काशीनिवासी पण्डित विज बेनी कवि जी। तरुपति झारन में कदम अनारन में आ- मन की डारन में सरस लसन्त है । घेनी- द्विज सरिता तड़ागन मे पागन मे क्यारिन मे कुसुमकलीन किलकन्त है ॥ ऊधो यह ऊधम चिताय दीजो मोहन पैकरत वृथाही ए ( १५ ) वियोगिन को अन्त है । बेलिन में वृज में नलिन मे केलिन में हाटन हवेलिन में वगरयो बसन्त है ॥१॥ काशी निवासी पगिड़त केदारनाथ जी। अवनि अकासन मै कुसुम परासन में पं. कज परागन में लालिमा लसन्त है । आ- मन के चौरन में भौरन के फौरन मै वागन में बेलिमें वहार सरसन्त है ॥ गयो परदेस घर आयो ना केदारनाथ बिरह ग़मीर पीर वाढत अनन्त है । कोऊ नाहिं मोकहूँ बतावै वीर ऐसो ठाम जहाँ वजमारो नाहिं वगरथो वसन्त है ॥१॥ जिला बनारस सरायमोहा निवासी मुकुन्दलाल जी । प्रफुलित पाटल पलास पदुमन पुंज प. मरे पराग पारिजात पलुहन्त है । मधुकर माते मडरात मालती मरन्द कहत मकुन्द चारु चन्द्रमा लसन्त है ॥ साधि पञ्चवान काम कान लों कमान तानि कोइल कुंकाति कचनार विगसन्त है । वौरे सहकार वन वि- रही बयार वही बालम विहीन विप व०॥ बाबू पजोयासिह जो मधुवन जिला पाजमगट । पादप को पुज पूरि गयो पारे पातन सो पाटल प्रसून हूँ परागन पगन्त है । कुहूँ कुहूँ कैलिया कदम्बन पै कूकै लगी कुञ्ज कुञ्ज काम की कलाहूँ प्रकटन्त है ॥ एहो हरि- औध कुन्द का कचनारन मैं वगर वजारन विनोद वगरन्त है। ठौर ठौर झोरन लग्यो है भौंर झौरवारो वागन मे बौरवारो व०॥ पटनानिवासी बाबू पत्तनलाल जी। श्रीसिधि जहाँ पै होहु शुभ अस्थान महा सर्व उपमा के योग प्यारे प्रनमन्त है। रा- उर कुशल छेम सदा नीक चाहिये जू मम था कुशल जो भयो ना प्रान अन्त है ॥ मिले ना सुसील समाचार दिन ढेर भये जीव घ- घराय अतिनैन तरसन्त है । सिगरयो वरयो है गात सिसिर हिमन्त कन्त विगरयो व- च्योहू चहै वगरयो० ॥१॥ कूकनि सुकोकिल की वोलनि मधुर चैन अलि की अवलि अलकावलि दिमन्त है । अतर फुलेलन की महक सुसील चारु सी- तल सुगन्ध पोन सुख सरसन्त है ॥सुखमा सुबाग गाल देतहैं गुलाब सोभा लाल ओ. ढ़नी है सारी पीरी विलसन्त है । मनौ सो कसम्भ औ पलास सरसो है खिले प्यारी तन प्यारे आज चगरयो०॥२॥ कोपागजनि.मा.मारकडेनानजो उपनाम चिरजीवकदि। रूपन में रह में रवाज में रसीलनु के सीलनु सरोरुह को मौरम रसन्त है । प्रीत में प्रतीत में सुरीत में रँगीलनु के डीलनु समूहन को साहस लसन्त है ॥ कवि चि- रजीव केलि कौतुक कुतूहल में कामना क- लित कीन्हे काम हरसत है । बानक मैं बुद्धि ( १८ ) मैं विमोहनी वधूटिन में विविधि विनोद लीन्हे वगरयो०॥१॥ पातन को झरिवो औ फूलिवो सुफूलन को तरु को स्वभाव ये सदा को सरसन्त है । त्याही मत्त होय होय गूजियो ओ बोलिवोहू भोर कोकिलान में खमावही लसन्त हे ॥ ईश ते विमुख हैकै जीव चिरजीव आज रच्यो लोक धन्ध जोये दीसत दिगन्त है। कामी पुरुषों को ये है झगरो जहान बीच सॉच में न कहूँ प्यारे वगरयो० ॥२॥ श्रीमती चन्द्रकमा बाई दी। पीतम ने जावन की विरियाँ तुह्मारै अगै दृढता दिखाय कीनी शपथ अनन्त है । ला- गत वसन्त यहॉ शसय रहित अहाँ तादिन ते तूहू नितवासर गनन्त है ॥ चन्दकला चैतमाम सारो ही वितीत भयो आये ना गुपाल मन तचत अत्यन्त है । ताको हेत ( १ ) आन तो न चितम चढ़त कळू मेरे जानि आली हॉन बगरयो०॥१॥ श्रीगोखामी किशोरीलाल जी पारा । सालन में तरुन तमालन रसालन मे लोनी लता जालन मे लपटि लसन्त है । गेंदा गुलदाउदी गुलाब कचनारन मे दाडिम की डारन में गरकि गसन्त हे ॥ तालन म- रालन मे भौर भीर भालन मे पिकन पराग पौन हू मे सरसन्त है । वाग वन बीथिन विहार बाटिकामे वेस बनक बनाये बीरव०॥ हरखि हियेमे हनै पुलकि प्रसून पुंज पॉचो बान तान मीनकेतन दुरन्त है । कुहू कुहूँ कोइल कसाइन करत कोपि मधुप अलाप दाप धीरज नसन्त है ॥ चन्दन ते चाँदनी तें चन्द अरविन्दन ते तृविधि समीरन ते दाहत दिगन्त है । वारि वन्हि बिरह वि- साल बड़वानल सी विरही विदारै वीरब०॥

( २०) गयानिवासो प गिरधारीलाल जी शर्मा। झरि गये भूप के गुमान किधौ पत्र पुज गुढे मुनि वृन्द किधौं भौर रसवन्त है । गि- रधारीलाल है विदेह के प्रताप फैलो कै वि. ! देह के प्रताप फैलो दरसन्त है ॥ कठिन । पिनाक किधौं प्रवल वियोग दिसै रामवाहु बलके वियोगिनि के कन्त है। चमकै जवा- हिरात कैधों है सुमन मजु भ्राजै धनुयज्ञ कैधों वगरयो० ॥१॥ विथुरी अलक लोल डोलत भैवर भीर झलके सुहाग फलि किंसुफ अनत है । गि- रधारीलाल लाल नैन नवपल्लव हे भरत प्र. खेद मकरन्द सरसन्त हे ॥ चलत उसॉस मंज मलय समीर तित्र पूरित परागन सु- गन्ध रसवन्त है । दृटी मरकत माल गिरे पत्र पुल पेतु योर घलवीर पर य० ॥२॥ कोकिला की कुरुनि बिराजे तान तायफे ज्योति दीपत अनत है। की सुमन मा ( २१ ) फैलत है इतर की लपट मलय पौन अमल फरस स्वेत चन्द्रिका लसंत है ॥ गिरिधारी लाल जू कविन्द भोर मौज पावै लहि लहि द्रव्य मकरद रसवंत है। भूपति कन्हैयालाल तेरे दरवार वीच बारहो महीना रहे वग०॥ बाबू शिवनदनसहाय जी (जजी बाकीपुर) युगल कपोल खिले लाला औ गुलाब सोई वापे तिल छवि भोर छौना छविवत है। अतसी के फूल देत नासा देखो दोऊ कर पल्लव सु पल्लव लसंत है। कचुकी कुसभी लरौ कुसुम सो फूल जानो वानी सुख- दानी सिव कोकिल कलन्त है। सारी पीत- धारी सोहै सरसों किारी सोई प्यारी तुव छवि माहिं वगन्यो० ॥१॥ श्री.ठा. महेवरक्षकमसिइजो तालु केटार रामपुर मथुरा। गुलम चमेलिन पे बेला आदि वेलिन पै महल हवेलिन पै सुभग लसन्त है । दासी दास चेलिन पै अवला नवेलिन पै अश्व गज से बहार - ।

11 ( २२ ) जेलिन पै शोभित निरन्त है॥नारि अलबे- लिन पैयूथ औ अकेलिन पै कंठमाल सेलिन पै आभा सरसंत है । सीस औ हथेलिन पे भापत महेश्वर जू पंचमी वसंत पाइ व०॥ बाबू दामोदरसहाय सिंह रन पुरा छपरा। दामोदर दर में दरीन में दरीचिन में दम्प- ति में दुति में दुरित में दुरन्त है । रस मे रसिक में रसाल में रसीलिन मे रागन से रंगन मे रगन रसन्त है। फूलन मे फल में फलक मे फरसर में फहर फहारन में फवन फवन्त है । बसुधा में वन में बितान मे व. गीचन में वारिन में वारुनी में० ॥१॥ गयामिवामी विखनाथ जी चन्द सम आनन अमन्द हास कर कन्द कुन्तल अनन्द सों मलन्द सरसंत है। किं. सुक नखावली लता है वाहुमावली त्यों वायु सुखदावली त्रिविधि स्वास तन्त है ॥ पीत वास सरसो सुमन भास होत अति वैसी ( २३ ) स्वर रास कोकिलान दरसन्त है। विश्वनाथ वदत विमल वृन्दावन वीच वासुदेव वपुष मे वगरयो बसत है ॥१॥ गया निवासी कवि बासुदेव जी कलिका कलित कुंज ललित प्रसून फूले चलित वितान कैसी वंजुल लसत है। मजुल मलिन्द मकरद छाकि माते पुनि मलयज पान मंद मद सरसंत है।ठौर ठौर कोकिल ! कलापन रचत सोर वासुदेव चंद सो चकोर तरसत है । अन्त होन चाहे मेरो कत नही आयो हाय मैन वलवंत सङ्ग वग०॥ गयानिवासी प शशिभाल जी। चहकन लागी चिरियान चित चाव चढ़े चंचरीक चहूँओर घूमै हरसंत है। ससिभाल सुन्दर समीर सौरभित चले गैल गैल फैल रहो आनद अनन्त है। लहकै हमारो मन प्यारे के बिहीन आली देखि देखि मत्त सह कामिनीन कन्त है। विथित वियोग विरहा-

( २४ )
गि मे दहत देह तापे हिय वेधिवे को ब०॥
पटनानिवासी प. गोवईननाथपाठक उपनाम नग कवि।
मंदिर वसती ओ सिंहासन वसती वीर
चंदवा वसंती पिछवाई हु लसत है । बसन
वसन्ती अरु भूपन वसन्ती सबे अग में ब-
सन्ती दुति उठत अनन्त है ॥ करति समाज
तेऊ सखिन वसंती वनी रागिनी वसत गाय
गाय हरखत है । उड़वत अबीर लै मूठिन
वसन्त रङ्ग कवि नग सगरयो ये बगरयो०॥
कानोडनिवासी कवि राव नवम्न जी।
नित्त नित्त सुख अनुकूल नरनारिन को
मन उनमत्त सोक सकल नसन्त है । वसन
वसंती रङ्ग ललित लपेटा आदि सारी आदि
त्योंही वनितान के सुहत है । नवल भनत
अङ्ग मद मद लागेसीत वृच्छन पै मिष्ट वेन
कोकिला पढ़त है। गावत गवैया वृन्द फूले
वृच्छ आमन के जित अवलोको तितै व.
गरयो वसत है ॥१॥

( २५ ) दरभगा राज्य मान्यवरप सिवप्रसादको कबीखरा मनहरन छन्द। तरु सहकारन मै और कचनारन मै वि. टप अनारन मै नारन में गत है। सहर अगा- रन मै आपगा-कगारन मै अखिल अखारन मे खारन खिलंत है ॥ श्रीशिव सुकवि पिक पंचम उचारन मै विपिन विहारन मै जारन रमंत है। हारन पहारन मै दीसै द्वार द्वारन मे बार बार वारन मै बग० ॥१॥ वेसुमार सेन को उतारि सिंधु पार जाइ सिखर सुवेल बसो रघुकुल-कंत है । उत्तर दिसा में बंदरन के मुखारविन्द शिव कवि देखि मंद-उदरी कहत है ॥ कुसमय कौन उतपात होन चाहत है प्रफुलित पाटल प- लास दरसंत है । कन्त सरसंत यह समयो हिमंत है न सिसिर को अंत है न ब० ॥१॥ जानपुर निवासो पण्डित सीताराम जी धर्मा । वागन में बन मे बगीचन में वीथिन में -

कूलन कछारन
( २६ )
वेलिन में अजय बहार विलसंत है। चारो
ओर हाटन में वाटन में घाटन में केलि रस
हाटन को ठाट दरसन्त है। नदी नद घा-
में
में नारन पहारन में
मोद सरसत है। जहां देखो तहा सीताराम
साजे साज आज सिगरो जहान वीच वग०॥
श्रीमा• कु. श्रीमान् नाल धितोकीनाथसिह जो भुवनेश ।
वजुल बगीचन मै घर वौर वीचिन में
वैन मे विहंगन विशेष विलसंत है। बिधु के
विभासन में बारिज विकासन में बेलन के
बासन में बीर बिरमन्त है। विदित विभा-
वरी में बावरी में भुवनेश बाल घल्लरी में वेश
वातन बहन्त है। वनन में वीथिन में व्योम
में बनस्पति मे वारिधि में वसुधा में वग०॥
विमल विलोचन में वक्रित विलोकनि में
वपु में वनक में घरण विरमन्त है । विधु से
विभासित वदन वनितान वीच विविध वि.
पान भुवनेश विलसन्त है ।वाजू में विजा-

।
१
( २७ )
यठ मे बेदन में बंदिन में बॉक विछुवा में
बेस विभव वहन्त है। ब्रज मैं ब्रजेस मे वि.
दित ब्रज बारन में विपिन बिहारन मैं व०॥
लाला मालदास जो कसबे पैतेपुर जिला सीतापुर ।
वाग फुलवारिन पेमहल अटारिन पै अ.
श्व भूमिधारिन पै देसी घरसत है । गली
खत क्यारिन पै भामिनी दुलारिन पै गोटा
चीर सारिन पै राजत निरत है। अब निम्न
डारिन पै वृद्ध ज्वान वारिन पै यूथप अवारिन
पै अधिक लसत है ।गुणी औ अनारिन पै
बैरी हितकारिन पै मगल भू चारिन पे व०॥
जिला सीतापुर मौजे जैपारपुर वाचू पनिरुहसिह जी।
पावस पियारो सुखदायक हमारो यातें
हरी हरी लतन के कुंज क्या लसत है । कवों
घन देके अधियारी झपि आव मोर शोर को
मचावे मोद अति सरसत है ॥ अनिरुद्ध
श्रावत करन पतिझार लाग्यो यह उदासीन

( २८ ) रूप ही ते दरसंत है। ही को हाल कहीं तो. सों नीको नहिं लागे मोहिं जौन चहुंओरन में बगस्यो० ॥१॥ बा. जनदनसहाय जी शिला पारा प्रखतियारपुर । कल कचनार कज पुंज को बिलोकि 'व्रज' सुन्दर मलिन्द हिय अति हुलसंत है । सर- सो प्रसून सुचि सौरभ गुलाब केसू किशुक पलास फूले कोकिल कलत है। मल्लिका सु मंजु मोतिया त्यो मालती हूँ वेली सेवती स- मूह सु चमेली विकसत है।आली तरसत हिय होत विन कंत हाय पेख चारु चमन में व०॥ बाबू भगवतीचरण सकला जिला शाहाबाद । आवत वसत देखि सुन री पियारी सखि घाग औ बगीचा चहुँओर छवित है। ऐसो सुखकाल पीव जावन विदेस कहै सुनि सुनि बात मेरी गात तो दहत है ॥ हारी हों व- झाय ताहि कहाँ री नवीन सौह मेरे कहे नाहि कछु मानत सुकत है। सब तो उछाह

( २६ )
भरे घर में अनन्द करें मोको दुख देन हेत व०॥
गयानिवासी रामनाल भैया गयावास ।
चन्द चमकीले चारु चाँदनी चटक दारु
व्योम स्वच्छ भारु शुभकारु दरसन्त है । म-
जर रसाल धारु मौलसिरी उजिआरु तरवर
डारुलता भूमि परसन्त है ॥ रामलाल भने
हाल विरही विहाल अति मदन कराल सर-
जाल बरसन्त है । ऐसी समै कन्त सोरी
रूसै मतिवंत कोन देख लो दिगंतन लौँ व०॥
श्री जगन्नीलालकवि कमवे चैतेपुर ।
वारिज में वारि में वयारि मे विहगन ब-
सुन्धरा में वसु मे वहार विलसन्त है । ब्यो-
महू में वन्हि में विभाकरी विमाकर में घि-
भव-विभाकर विमल विकसन्त है ॥ बानी
बारवधु में विबुध वुध-वृन्दन में विद्या में
विवाद मे विनोद बरसन्त है । विथिन मे
विपिन वगीचन में चेलिन में ब्रज में न.
वेलिन में बगरथो०॥१॥

( ३० ) परिभृत पिक मे पलास पारिजात हू मे पोन में पराग परिमल परसन्त है। माधवी में मधु में मधूक में मधुप हू मे मधुवन माधव मे मोद मधुरन्त है ॥ जल में जलधि मे जलधि जात ज्योतिन में जगली जगत जीव जा. लन जगन्त है । वेला चेलियान मे नवेलि- यान बागन में वाटिकान वीथिन मे ब० ॥२॥ दरभङ्गा श्रीशिवप्रसाद जी कबिखर के पुत्र दवीसरन कवि। कलित कपासन मैं पुहुप पलासन मैं व- सन सुवासन मैं दूनो दरसन्त है । देवी कुज कुजन में भोर भीर गुज्जन मैं मंजु कल क- अन मैं पुज परसन्त है ॥ कामसर चापन मैं पश्चम अलापन मैं कोकिल कलापन में कैसो किलकन्त है। वारन वयारन मैं बनि- तान-तानन में बनन मैं वागन मैं ब०॥१॥ अम्बर अटम्बर मैं अपर पितम्बर में अ- वनि अडम्बर मैं पेखु परसन्त है । सुमन सु.

( ३१ ) गन्धन में अलिमद अन्धन मैं किंसुक के कन्धन में सुख सरसन्त है ॥ रिपुल बिह- गन में वारि की तरङ्गन में वाम की उम- गन में देख दरसन्त है। वीथिन बजारन में जारन उजारन मैं वनन में वागन मैं व०॥२॥ पनिनोछद परकीया पोषिलपतिका । न सरदै हिमन्त है । न सिसिरै लसन्त है । दुखद तोर कन्त है । न बगरो वसन्त है ॥ सतप्रसाद जी सिकन्दरपुर कुर्था जि ना गया। आयो नन्दलाल लिये गोपिन निकुञ्ज माहिँ ठौर ठौर घेलिन पै भ्रमर लसन्त है । आम कचनार अरु मालती सोहायमान चम्पा औं चमेलिन की कलियॉखिलत है। जूही औ अनारहूँ के फूल फुले भॉति भॉति क्यारिन कछारन की शोभा सरसन्त है । सन्त कहे केलि करें वाटिका में नन्दलाल सद सखियान जहां बगरयो०॥१॥ ।

प. महावीरप्रमाद शर्मा वैश्य कोट जिन्ना मिरजापुर। नगर नगर भूमि त्गर डगर आज कैसो करतूहल वहार दरसन्त है । चातक सुकीर पिक मुखर वियोगी उर देत हैं दरारे जोगी सान हुलसन्त है ॥ नाना भॉति फुले तर सुबर सुगन्धवारे त्रिविधि चयारि वह मोद सरसन्त है। वागन तड़ागन परागन वो रा- गन में जहाँ अवलोको तहाँ २० ॥१॥ प. द्वारिकाप्रमाद पाठक बाकोपुर । मजरी रसाल तरु झोरन पै दौर दौर ओरे भॉति कोकिला पपीहा किलकन्त है। कुजन मे और भाति गुजन करत भौंर ओरे कछु डोर लता विकसन्त है । लहकि पलास औरे सेमर के डाढि गये नारि नर इत उत वहकि किरन्त है । बाग धन वेलिन में वाट ओ हवेलिन में वनिता नवेलिन में घ०॥१॥ जिन्ना दरमहा निधासो वान श्रीविश्वनाथ मा। वरन कुसुम्म नव सुमन सरीखो लसे गुलफ गुलाबकलिका सी छबिवन्त है । अॅ- गुली अनूप कचनार की कलीकी ऐसी मो- तिया कलीन नख अवली गसन्त है ॥ गु- जत दुरेफन से जेहर झनक जाहि तरवा ललित दुति कम विकसन्त है। सुखमा अ- नन्त विश्वनाथ दरसन्त खूब अम्ब--पग वाग वर वगरयो वसन्त है ॥ १॥ विध्यक्षेत्र पगडा भगवानद स दूबे कवि । चन मे बनज में विशेपि वन वेलिन में नवल नवेलिन में अति सुखवत है । वाग में बगर में वितान तान रंगन में अगन में अधिक अनूप दरसंत है। भगवान भाग में सोहाग अनुराग हू में जागत जगतजोति जोस जसवंत है। जीव में जमीन में जवा- हिर सु जोवन में जालिम जुलुमदार वग०॥ ताल में लतान कोकिलान में आमहू में सुधर सुछवि दरसत है । सर- में तमाल ( ३४ ) सों में सर में समाज राजकाज हूँ में साज हू मे रमक रसायन लसंत है।भगवान भो- डर मे भूमि भव्य भावना में भामिनी में भोग में सु भूरि विलमंत है। वन में वनज में बनाव वन वेलिन में महल हवेलिन में वगरयो बसन्त है ॥२॥ इति श्री गोकुलेशो जयति। कविमण्डल की समस्यापूर्ति मितीफाल्गुण ब०८ बार बुध सं० १६५३ चौदहवां अधिवेशन मन्त्र पटि लाल पै गुलाल जब डायो है। बाबू रामकृष्ण वर्मा सपादक भारतमोयन काशी। होरी खेलिवे को साज साजि वृजराज याज ग्वाल बाल लेके इत गेल को पधारयो है। उत वृषभानुजा सखीन सङ्ग ले के मन- मोहनै हराऊँ यही हिय में विचारयो है ॥ ज्योंही बलबीर मूठ तानी राधिका पै त्योंही राधे आधे नेन पेखि अङ्गन सम्हारयो है। छायो अनुराग फाग खेलियो भुलायो मन मन पढ़ि लाल पे गुलाल जब डारयो है ॥

( २ )
कायोनिवासी पण्डित दिन देनी कवि जी
इत ते गोपाल ग्वाल बाल ले उताल धाये
उत ते किशोरी आनि चट ललकारयौ है ।
वेनी द्विज इत पिचकारी रंगवारी चलें उत
ते नवेली कोटि कुकुमा प्रहारयो है । हो-
डाहोडी दलन दुहूँ में परी वॉकी वर हिम्मत
हिये ते कोऊ नेकहू न हास्यौ है । बावरो
सो तवही बनायो आनि राधिका ने मत्र०॥
काशीनिवासी जचद जी वसीय ।
होरी खेलिवे को निज
जूथ
ले किसोरी
आज आइ नन्दगाम माहिं लाल ललकारयो
है।सुनते गुविन्द सँग ले के ग्वाल वाल द्वद
आइ रग जङ्ग माहि सुजस वगारयो है ॥
ताही समै आई श्रीकुमारिका सखीन सग
परम प्रताप पुंज आपनो पसास्यौ है। लीन्हो
है तुरत ही लिखाय फाग-जैतपत्र मत्र० ॥
फागो मिवामी पगिडत केदारनाथ जी।।
घोर घहरान डंफ मंजुल मृदगन की ढो-
।।
.

लन की धमक धमार धूम पारयो है । छूटें पिचकारी मानो महत मघा के वुद केशर कमोरी भरि रग अङ्ग ढारयो है ॥ माच्यो स्याम स्यामा सङ्ग कठिन केदार फागु व्योम ब्रजमडल गुलाबी रंग धारयो है। हारयो तवे मोहन कुमारी-पभान जू तें मंत्र० ॥१॥ छबीले कवि -- बनारस । होरी कौन खेलत को गावत धमार काहि ऊधम सुहाति काहि धीरज न धान्यो है। सुकवि छवीले कहूं अविर अटाले परयो के- शर कहूं है कहूं पिचका पवायो है । मुकट कहूं है कहूं बॉसुरी परी है ऐसी मौहर मजा लों ग्वाल गोल पै बगायो है। पडिगो ज- वाल ब्रजमडल में चाल वह मंत्र० ॥१॥ काशीनिवासी बाबू माधवदास जी। खेलन को होरी गोरी ले ले रोरी मोरी सन कीरति-किसोरी नंदगाँव पे पुकायो है।

धाये नदलाल ग्वाल वाल सखा सह लीने धूंधर गुलाल की मचाय रंग पायो है॥ध- मकि धसी है धाय ललिता किसोरी संग फेट गहि माधव कों पकरि पछान्यो है। देखि छवि वाल की विवस विकाने हाल मंत्र०॥ जिला बनारम सरायमोहन निवामी मुकुन्दमान नो । फाग की चढाई ठानि जाई वृषभान जू की आई खेलभूमि मन लिवो विचान्यो है । सखन वराय धाय पहुँचि मकुन्द जू पै भौंहन अमेठि दृग कोर तें निहायो है। कब भरि पिचुकी चलावीत भरति कब लखि न परत चपला सुभाव धान्यो है ॥ लकुट मकुट पट घाँसुरी की भूली सुधि मंत्र० ॥१॥ पटनानिवासी बाबू आये स्याम स्यामा भौन होरी के बुलाव माहिं काहू ने पखारयो पॉव काहू चौर ढायो है। काहू पान बीरी लोंग इतर इलायची ले कनक परात साजि फर्स प्रानि धान्यो है । पत्तमलाल जी।

सकल सुसील भई खातिर अनेक भॉति किंतु
महामाद होत तबही निहायो है । कढिके
सहेटन तें चतुर सखी सों प्यारी मत्र०॥
कोऊ गहि वॉह लोनी कोऊ पट छीन
लीनी सील को मुकुट कोऊ हेसि के उठायो
है। कोऊ मुग्ली ले भजी कोऊ लकुटी लै
खमी कोऊ उरमाल तारि मोतिन विखायो
है। कोऊ सरावार करि रङ्गन सो कोनी तह
अजब धमार धूम अबही निहायो है। की-
रतिकिसोरी गोरी सखिन ससील सैन मंत्र०॥
कोपागामि हा मारकडेनामजी पनाम चिरजोषकदिन
होरी रची ब्रज में किशोरी सब गोपन की
जामें नन्दलाल जाय ऊधम उभाया है।
काहू को सु अक लाय अबिर लपेट्यो मुख
काहू को सुरग डारि कंचकी विगायो है ॥
भूलि गई सारी धमाचौकडी गुपाल जू की
जब चिरजीवी सबै साहस सह्मायो है । झुड
मे झमकिवाल प्रतिहि उताल चाल मन०॥

। मुगुध व्याकुल भई हे सब कान्ह के जैसे ते वाल फाग मे अपानी जब छवि को बगायो है। हाथ पिचकारी रही झोरी में अवीर रही गोरी रही भौचक न हिम्मत पसायो है ॥ लहर चढे ना अब काहू को सु चिरजीव राध जव कढि के अपानो रग ढायो है भये से प्यारे जहाँ के तहॉई रहे मत्र० ॥२॥ श्रीमतो चन्द्र कला बार दी। गावत हो बाँसुरी बजावत हो नीकी भॉति नाचत नचावतें मनोज मद मायो है। दौरि दौरि डारत अबीर ग्वाल बालन पै नेह लद्यो सवही के इक सों निहायो है ॥ चंदकला देखो अब और भॉति दीखत है तन की सु- रति ना सनेह विसतायो है। इक टक रा- धिका के मुख को निहारत है मत्र० ॥१॥ प्रयोध्यानिवामी कविराज छिगम जी। आई घरें ऊधम धमारि खेलि तू तो भले नगर नगर झोर झगर बगायो ह। लछि- राम वै तो भरे मदन भरोर मन मरम न खाले यों भरम हिय हाया है।जटित अ- गूठी विगुनीन के छलान सग मण्डित भू- ठीन यो अतक अवतान्यो । चकचौध लाली की प्रभा पे परतंत्र चाल मंत्र० ॥१॥ विक्सोहें लोचन कपोल तिरचौहे भौहें नव सिख रूप को तरङ्ग अवतायो है।ल- छिराम काकपक्ष कुडल करन वेस गर वन- माल पर चमक सॅवायो है। आनंद अभंग रंग चौदहो भुवन चारु मधुवन अधम धमारि पर वायो है । सोगुनी प्रकासे सोभा बदन मदन बाल मंत्र०॥१॥ नवननिषामो माला हनुमागप्रमाद जी। छाडि बाल गोल परयो गोपिन की गोल आपे पिचकी चलेगो गारी गैयो हिय हान्यो है। ओढि लीनी चूनरी अजाइ लीन्ही अं- जन हू हाहा खाइ छूट्यो पद पदुम निहायो है। मूठ तु वा मूठ में मूठीकरन सीखा कहा हनूमान रूप जस त्रै जग उजायो है। जग मनमोहन की मोहनी सुमोही वीर मत्र०॥ श्रीगोस्वामो किशारीनाम जी पाग । रतन अमोल विन-मोल मन मोहन को लीनो लली नेक जब घूघट को टायो है। विवस बिके से छैल छकित लिखे से लसे कुमकि किशोरी कुकुमा ले जब मान्यो है ॥ चमकि चितौत चहुँ चतुर चली ना चाल प्यारी पिचकारी ले सुरग जब धान्यो है । लाल करि दीन्हो वाल नख ते सिखा लो मैन मन्त्र पढि लाल॥१॥ मन मेरनिवामो किशोरीलाल जी रावत । माच्यो व्रज फाग ओ धमार राग नाच्यो नभ राच्यो रङ्ग रातो रूप सुदर सवायो है । आइ नदलाल गाइ गारी ग्वाल बाल सङ्ग कीरतिकुमारी द्वार अविर वगायो है ॥ कढ़ि वृषभानुजा उताली भोन भीतर तें आरती उतारि ताप तन मन वायो है। रहिगो

चकित ठाढ़ा चित्र सो किशोरी मोह मत्र० ॥
रोवा मगा मिथसेवक्षनाम कविनो।
पान देत मन ऐचि पानि कर लीन्हो
प्यारी अंतर सुवास ब्रज अन्तर पसायो है।
केसर लगाय गात कम्पित कटीलो कियो
अंजन स ऑजि आनि उर भै निकायो है।
बल दृग वीर श्यामसेवक सुप्रेम बॉध्यो बेंदी
जरी जन जिय जाटू फेर पायो हे। मोहरन
वस भूल्यो ख्याल जुत मुसकान बेन मत्र०॥
बलदेवनगर जिला सीतापुर निवासी हिज बनदेव कवि ।
आवत इते तू अनुराग भरी वागन में
मिलिवे को फाग व्योत विसद विचारो है।
जादू भरे नैनवां नशीले द्विजबलदेव लूटी
लट व्याली बेग विप सों वगारयो है ।ति-
लहू तुलत ना तिरीके ताकि ताने कहा त्योर
ते तिहारे मीनकेतु तीर तान्यो है । छाय
दीन्हो मोहिनी सी मोहि मन लीन्ही चाल
मंत्र पढि लाल पै गुलाल० ॥१॥

(१०)
दामापुर निवासी हिजगग कवि।
आई वरसाने सों सलोनी नदगाव ओर
फाग की वहार में विनोदही विचायो है।
द्विज गण गहि के गोविन्द को गरूरवारी
सारी जरतारी रत्न साज सिर धान्यो है ॥
वनिता बिरचि वेस लाई प्रानप्यारी पास
सुखमा बिलोकि कै मनोज हिय हान्यो है।
मंद मुसुकाय विधुवदनी चसीकरन मत्र०॥
पटनानिवासी प. गोवईननाथपाठक सपनाम नग कवि ।
देखो सखी कैसी आजु ब्रज मे मची है
फागु जाकी छवि देखि मद मैन गर्व हास्यो
है । इत नंदलाला उत नव ब्रजबाला दुहूँ
पिचका सुहेत रंग केशर को गायो है ।।
खेलन की सौज सजि थालन धस्यौ है बहु
कुकुमा अबीर हरि तीय पर माखो है। नग
जू विवस भये गारिन की नारिन ने मंत्र॥
जामपूर निवासो पण्डित मीताराम जी शर्मा ।
आज धूम होरी को मच्यो है वरसाने बीच

साजे ग्वाल वाल नंदलाल ले पधाग्यो है। इते वृषभान की दुलारी लिये गोपिन को उतै सधे छैलन समूह ललकाग्यो है ॥ श्रा- नद उमंग के तरङ्ग में हिलोरें लेत औचक ही धाय बलवीर को पछाग्यो है। सीताराम विकल विहाल से भये हैं कोऊ मंत्र० ॥१॥ झाला मलदास जी कासवे पैसेपर जिला मीमापुर। आनन द्विजेन्द्र तापे श्यामता विभास भयो चखअरविन्द नख दोपधो निहायो है। छूटि गिरी बंसी पिचकारी इक ओर गिरी मुकुट मयूर मो तिरीको न सम्हाग्यो है ॥ कोन खले फाग राग रंग को विवक करे तीर धों अमोघ प्यारी ताकि के पवायो है। चित्र पुत्रि रूप ठाढे मङ्गल निहारी भोन मत्र०॥ वाजत मृदग डफ परम उमग चित्त ला- जत अनड्ग रूप मोहनी संवाखो है। फाग की उमग संग ग्वाल चाल लाल रंग उड़त गुलाल नभ लाल रंग धाग्यो है ।। प्यारी पै ( १२ ) गुलाल छोड़ो कहो हाहा हॉहॉ लाल भान्यो नाहि मङ्गल जू बहुरि पवाग्यो है। भूलि गये राग रङ्ग अङ्ग कुम्हिलाय गयो मंत्र॥१॥ जिता सीतापूर मौजे जेपारपुर वावू पनिरूसित जो। शोभित समाज होली तट में बहारदार जूह प्रति खेल एक एकन सचायो है। पिच. कारी रग भरी चलें भरि जोर भली कंकु- मादि उडे मोद अति उदगायो है। अनि- रुद्ध विविधि प्रकार के सु वजे वाजे तामें तुम चातुरी की चरचा प्रचाग्यो है। जानि में गई थी तबै वश करै हेत राधे मत्र०॥ जिम्ला दरमहा निवामो बाबू योनिश्वनाथ झा । सीखी दे जतन मत्र वसि करिव को कान्ह लोक कुलकान बीर सकल विसायो है। आज बरसाने में रंगीली फाग की थी धूम कीनी में प्रयोग भली औसर विचाप्यो है । मेरी करतूत मोही उलट लगी री हाय विश्वनाथ प्यारो बड़ो भारी होन हाग्यो है। विवस गई मायो है सु मूढ है मुखचन्द मुसकौहै लखि मंत्र॥१॥ मि पर गोस्वामी साधीगिर स्कूल प्रामपुर । डायो है अवीर के असीर प्रेम फन्द कियो कैसो खेल खेलिबो नवेली उर धारयो है। धाखो है न धीर धीर श्याम नेकु तादिन ते जा दिन ते फगुआ मचाइ रंग मारयो है ।। मनो मंद मुसकाय प्यारी नैनहू नचाय भूरि भाव ते निहास्यो है । हाखो है री हाथ मे तिहारे मन हाथन ते मंत्र पढि लाल पे० ॥१॥ प.महावीरप्रसाद शर्मा बंध कोट जिला मिरलापुर । सुंदरि सरूपवारीवारी बृजनारी बीर सारी गूढदर्शी कळू आगम बिचान्यो है । छाजत छबीली चटकीली रतिहू ते धनी ताही ठाम भाई जहाँ राजे प्रानप्यायो है ॥ फाग के वहाने चित आने चातुरी की चाल करि छल छंद सो प्रपंच अनुसायो है। लीन्ही विल- माय ख्याल पल में गोपालवाल मंत्र॥१॥ ।

(१४) मु मूर्यनारायनसान वकीत सर्कार कोद जिला मिर्जापुर पाग लागे गुच्छे हैं गुलाव श्रीगोविन्द जू के तंत्र रीति मानो वसीकरन सुधारयो है। पीले खोर तिलक अरुन युग भौंह बीच सो ज. गाइ जंत्र जनु मोहनी सवारयो है। लाग्यो तिय ऊपर ना उलटि उन्ही के आगे ललित उपरना पै छिटकी सो पारयो है । ललिता ललकि ललकारि चलिहारी इति मत्र० ॥१॥ थी जगमोलालकवि कमबे पैतेपुर । रङ्ग भरी सिगरी सयानी बरसाने रग रा- गनि उमगि फाग सुदर सॅवारयो है । चोप भरे जंगली लला जू तिहि काल निज गोल ते निकसि टोल वालन पधारयो है ॥ छीनि एक सों चट कनक पिचकारी करि चेटक सों छरकि छबीली रंग मारयो है। भूलो च- पलापन कटाक्ष कोरही को बाल मत्र०॥ निमन्त कवि वेई बृजचद जापें वारिये अनेक रग या ( १५ ) बसंत वासर में विरह पधारयो है। कवि ह- निवंत हाय हायल रहत यामे तव ते अनेक जंत्र तंत्र करि हारयो है ॥ मदन महाउत उत्तंग अंग और ढंग बन वाग राग तान गान ललकारयो है। ये अलि विलोकि वृज. वाल की अनोखी हाल सन० ॥१॥ विध्यध पगडा भगवानदास दुवे कधि । वाग के धगर अनुराग भरी खेली फाग धमक धमारि धूम धुंधर यगारयो है। ल- पकि झपकि के झमक झुकि झूाम झूमि घूमि धूमि रंग के उमंग अंग धान्यो हे॥ भगवान बूझे सौह खाती अनखाती ताती काहे नैन राती करि दृगन पसारयो है। होहूं देखि छकित विचित्र वा चरित्र वीर मत्र०॥ ऊधम करनहार छैल छरकीलो छेकि छो- करी कहूं की बा अनारश धान्यो है। घोरि घोरि केशरि अबीर मलि गालन में हालन में ख्याल चोप चौगुनी बगायो है ॥ मग.

पान भौरी करिडारी मति गोरिन की थोरी
वैस वारी हारी प्रभुता पसायो है। निकरि
सु गोल तें दवरि दावि मूठि तानि मंत्र० ॥
गयानिधासो प गिरधारीलाल जी शर्मा।
ऊधम धमार जानि धधाक के धायो इतै
मेरी और आय ख्याल औरई विचायो है।
ले लेतो इज्जत हमारी वह कारो दई नि-
पट अनारी गेंद तानि तानि मायो है ॥
गिरधारी कहिवे सुनै की है कहानी कौन
तैहू दूर हुती हाल तेरोऊ निहायो है। बची
तवई में जव फेट गहि फुरती से मंत्र० ॥
श्री ठा. मखरवकमसिहजी तालुकेदार रामपुर मथुरा ।
कंज कुम्हिलाने खज कानन पराने जात
मीन वारि वूड़े से हरिन हेरि हान्यो है । झ-
लक हॅसीली दत पलक नसीले नैन अलक
कशीली व्याली विष सों बगायो है ॥ ल-
कुट मकुट कहीं वासुरी विसारि दीन्हो पीत
पट पांवरी महेश्वर सिहान्यो है। ठोरही ठगे
से रहे तरुनी तिरीचे ताकि मत्र. ॥१॥

( १७ ) दूसरी समस्यापूर्ती। धुंधर गुलाल की। बाबू रामकृष्णव संपादक भारतजीवन कायी। प्यारे वलवीर आज तरनितनूजा तीर फाग चत आये भीर लीन्हे सङ्ग ग्वाल की। त्योही वृषभान की किशोरी मन होरी ठानि मोरी ले अबीर गोल वॉधी बृजवाल की । देखते ललकि जुग धाये भरिंग उमंग भेटन के हत या अनूठी बलि चाल की। दोऊ परवीन मनभाई करिवे के हेत छाई नभ माहि लाल धूधर गलाल की ॥ १ ॥ काधीनिवासी पति विज बैनी कविजी। श्राज बरसाने में मचायो फाग बंसीधर सङ्ग ले उमङ्ग सोहठीली गोल ग्वाल की। वेनी द्विज लखते लड़ती वृषसूरज की दोरी साथ सखियां सजीली ले मोहाल की । लागी होन होरीवरजोरी दुहुँ ओरिन ते व. नत बने ना छवि राधिका गोपाल की।उन (१८) वरसाय रङ्ग सरिता बहाय दीन्ही इनहूं म. चाय दीन्ही धुंधर गुलाल की ॥१॥ काशी निवामी पण्डित केदारनाथ जी। आजु नंदलाल ते डरो ना कोऊ काहू भॉति मार पिचकारी ते बचावो दृग ख्याल की ॥ छोनि लीजै हाथीन ते डफ ललकारि धाय कीजे नाहिं संक हुरहारन के जाल की ॥ होरी के खलेया बलदाऊ जू के भैया ताहि क्रीट सिर पारिबेनी वॉधि दाजै भाल की। छीनि के पितवर उढ़ावो ओढनी केदार गहो गिरधारी धसि धूधर गुलाल की ॥१॥ छील कवि-बनारस । कीरति-कुंवरि बरसाने की गुमानभरी आई गोल विरचि वरावर के बाल की ।सु कवि छवीले इतै गोकुल के ग्वालन गोपाल साजि धाये छवि दम्पति रसाल की ॥ देखि देखि देव नभमडल ते फूल झरे आज होरी खेलत जुगल नवचाल की । गमक गवयन की धूमधा निदंगन की धमक धमार सु की धुंधर गुलाल की ॥१॥ कायोनिवासीचद जो बलभीय। सोरह सहस निज जूथ ले कुमारिकारी आई जहाँ ठाढ़ी रंगमंडली गोपाल की। महापद्म पद्म कच्छ मकर मुकुंद आदि वारि श्रीमुकुद' पर कीरति रसाल की। अति अ. नुराग रंग वरसन लागी फेरि लागी तहाँ चातुरी न कोऊ ग्वाल बाल की।नागर न- वल रिझवार को रिझाइ धाइ करी मनभाई छाई धूधर० ॥ १ ॥ लिहा बनारस घरायमोहन निवासी मुकुन्दहाल जी । साजि के धमार नटनागर मुकुन्दलाल चले वरसाने संगलिये भीर ग्वाल की।की- रतिकिशोरी उत फाग की बहार करि खे. लन पधारी जुत्थ जोरि वृजवाल की ॥ मन अभिलाख लाख हॉकि होरी होन लागी को कवि वखानै घलि सोभा तेहि काल की।

( २० ) रंगन ते लालमई भूमि, वीच कीच भई दसो दिस छाइ रही धूंधर० ॥१॥ पटनानिवासी बाजू पत्तनलाल जी। ' रई पिचका के वीर नीर के समान करें वाजन मृदग चग धुनि धनमाल की।झॉझ बजे सोई मनो झिल्ली झनकार करै जुगनू सी जोति होत वुक्का के उछाल की॥ दमकि रही है 'घनस्याम घनस्याम पाहिं दुति दामिनी सी राधा अगन रसाल की। बरखा बहार आज होरी में सुसील देखु धूम धुरवा की भॉति धुंधर० ॥१॥ कीरति-किसोरी इतै संग में सहेलिन के जोरि उतै मण्डली गुपाल ग्वाल बाल की। डारत है रंग दोऊ दोऊ पै उमंगभरे कहा कहीं वीर सोभा कुंकुमा उछाल की। देखते धने है छवि चलिकै सुसील देखु याही तो समैया अहै आनंद विसाल की । भूपन पर 1- -- ( २१ ) न धूरि भूरि रंगन की कीच भई अवनि अकास छाई धूधर० ॥१॥ कोपागजनिःसा मारकडेलालजी उपनाम चिरजीवकषि। वाजत मृदङ्ग झॉझ डफ औ तमूरे रूरे गावत उमंग भरी जहें ग्वाल बाल की। उड़त अवीर ओ कवीर हूँ सुनाई देत गृह गृह गॉव गॉव सुखमा रसाल की ॥ ब्रज की चलावै कौन कवि चिरजीव भाप सारे जग माहि आज सोभा लालोलाल की। महि ते अकाश लों करोरों बने भूधर से जहाँ देखो तहाँ दीसै धूधर० ॥ १॥ रंग भयो रोग पिचकारी दुख भारी भई सरस सुगंध भयो सामा उर साल की। गान भयो गजब सुवाजन बलाय भयो खेल भयो सेल्ह और होरी कला काल की ॥ विना प्रानप्योर के स कवि चिरजीव भापे भोडर कनायें भई कनिका जवाल की। पीर देन ( २२ ) लागी ये अवीर की उड़नि बीर धीरज छो- डावै लग्यो धुंधर० ॥१॥ श्रीमती चन्द्रकला बाई दी। आवत हैं तेरे धाम होरी खलिवे को स्याम लीने सग चारयो ओर पक्ति ग्वाल बाल की। उड़त अबीर औ मची है कीच केसर की आवत अवाज वाद्य गावन धमाल की ॥ चंदकला प्यारी तू विसारि सुधि वैठी कहा वेगि साजि सौंज सबै फगुवा बिसाल की। आयगे समीप चलि सनमुख दोरि देखि छाई आसमान माहि धूधर० ॥ १ ॥ प्रयोध्यानिवासी कविराज लछिराम ली। वीना बेन बाँसुरी सितार त्यों सितारधीन सॉरगी सिगार सुर सीमा करताल की। के- सरि कपूर चारु चदन गुलाव नीर अतर अरगजा ते नहरै विसाल की ॥ लछिराम जुगलकिसोर श्याम घन विज्जु धनक म- गति गोपी ग्वाल वाल की।कारी पीरी यूर ( २३ ) घटा व्रज देस बरसत मानो नौरंग तरंग पर धुंधर,गुलाल की ॥१॥ रेला रेल रंग त्यों अचीरन की झेलामेल मेलामेल केशरि तरंगन के ख्याल की । ल- छिराम धूम धाम गमक मृदंगन की संगमी झमक झोके करतल ताल की। दम्पति की फागु अनुरागन सलज सौहें झनकार वनक सहेलिन के जाल की। अरुन घटा लों वर- साने की बगर कैसी धमक धमारि पर धू०॥ सममिवामी माना हनुमामप्रसाद जी। आजु स्यामा स्याम फागु रच्यो मच्यो रग रागवाजे करताल डफभीर गोपी ग्वाल की।नाचें जुरे चाँचर में चले पिचकारी चहूं मार कुमकुम अविरन भर ताल की। हनू- मान देवदार देखें नोखी सोभा ब्रज फागु मागें गोपी गहे फेट नंदलाल की। धूम धु- धुकीन की धमारन की धधकन धाई अध- धूधर० ऊरध लों

( २४ )
श्रीगोस्वामी किशोरीलाल जी पारा ।
पूरित पयोद पिचकारी लगै कारी, हेलि-
हनत हिये में जब प्यारी गोप ग्वाल की।
केशर कुसुभ रग धारनि धरातल में वरसि
विराजे चपलासी हंस चाल की ॥ डपट द-
रेर डफ गरजि जतावैजोर तरल तरग सोण
कैसी घनी घाल की। ग्वाल नंदलाल की
चली ना नेक चाल देखि धमक धमार धूम
धूधर गुलाल की ॥१॥
पजमेरनिवामो किशोरीलाल जी रावत ।
रस बरसाने बरसाने वनितान बनि भीर
अनुराग बात ठानी फाग ख्याल की। परत
अवीर चारु चिलकत चीर जुरी द्वार वृषभा-
नुजा
के भीर ग्वाल बाल की। बजत मृदंग
झांझ गावत धमारवर मधुर किशोरी धुनि
होत डफ ताल की । देत न दिखाई कछु
ऊपै उड़ि छाई नभ लाल लाल भूधर सी
धूधर गुलाल की ॥१॥

( २५) दासापुर बलदेवनगर विज वनदेव कवि। निरखि निहाल करि आँगुरी गड़ाय गाल छीनि लीन्ही बॉसुरी विहसि नंदलाल की। बाजने विजे के वजवायो अपमानसुता बलदेव चारुता चखन चुभी चाल की ॥ चमके चहूँ- घा चारु मदन मयंक मुख छनदा सी छावैल- गी छाव जाग जाल की। सखिया सयानी सग घट के कनक रंग धसिके धमारिधरि धू० ॥ दासापुरनिवासी हिजगग कवि । आये ग्वाल बालन लै सॉवरे उतै सों इतै आई अलबेली साज सारीरलजाल की। चारौ और चमके चपल चित्त चोपचढी मानो चन्द- वृन्द चचला हैं चारु चाल की ॥ द्विजगगता. कि के तिरीछे त्योर तीर तानि मास्यो प्रान- प्यारी पिचकारी मुदमाल की। दीन्हो छाप छरछिटान मे छबीलेलाल वाल के वदन धूम० पटनानिवासी प. गोवईननाथपाठकसपनाम मग कादि । आजु ब्रजबीच सखी देखे किन केल फाग ( २६ ) एकओर सखा जूथ येकै व्रनवाल की गावत धमार डफ गोमुख बजाय चीन बाँसुरी मृदंग चंग जोर धुनि ताल की॥ रंगवारिधार पिच- कारी कीचलत मार इतहि तेसुप्यारी की उत ते गुपाल की। कविनगसूरनभनेक हूँ दिखात नहि असी ले उडाइ करी धूंधर० ॥ दरमहाशिवप्रसाद जो कविखर के पुत्र देवीसरनो कवि । लंका में निसंका वीर वका केसरीकिसोर फागु रची मानो रामचद जयकार की । वीरन के तन तें न रुधिर फुहारे चलेंमानो पिचकारी लाल रंगन बहार की॥ देवी कवि दैवी बीर घर ललकार कीन धूम धाम मानो मची धमक धमार की। धधकै धनजय की धधरिन चारो- ओर अंधाधुध फैली मनो धुंधर गुलाल०॥१॥ दामना पस्विमसाजी कविखरके सिष्य रिलास कवि। आज बनमालीसग ग्वाल लिये ताली देत प्यारी प्यारी करत डिठाई वृजवाल की। धाय धाय मारै पीचकारी रगभारी भारीयारीयारी ( २७ ) नजर निहारत निहाल की ॥ सारी सुकुमारी नारी गारी देतन्यारीन्यारी हारी हारी करत पुकारी गोप जाल की। कवि हरिलाल पाली छाई सुखदाई गन गोकुल की गली गली घू०॥ जामपुर निवासो पण्डित मीताराम जी शर्मा । माची आज होरी की वहार ब्रजमडल में उठत धमार पै मृदंग डफ ताल की। उते, वृषभान की किशोरी लिये गोरी इतै ग्वा- लन की मण्डली जुरी है नन्दलाल की। है रही घलाचली चहुँघा पिचकारिन की गो. पिन को ग्बाल गोपी ग्वालहिं निहाल की । सीताराम चारो ओर सरस सुगंधसनी मद मंद छाय रही धुंधर० ॥१॥ साला मतदास जी कसवे पैतेपुर जिला सीतापुर । गोपिन की सारी जरतारी लाल लाल भई लाल भई आभा मोर मुकुट बिसाल की। वाजे भये लाल लाल आनन गोपाल ग्वाल गोपिकाति चंद्रभा ते लाल के मिसाल की।

(२८) व्योम भूमि लाल रंग छाइ रहो दशो ओर लालही लखाइ परे शोभा मुक्त माल की। भाखै दास मगल जू प्यारी प्यारे फाग जानि ऐसी करि दीन्ही देखो धुंधर० ॥१॥ निसा मोतापुर मोजे जेपारपुर बाबू पनिहासिनी। कालिंदी के तट महि होरी के निकट इमि छाई अरुणाई मनो फरस प्रवाल की ॥ तामै सव विहसि विहसि केलि करि रहे कहे नहिं वनत है छवि वहि हाल की ॥ साथ मेरे चले तो दिखाय लाऊँ अनिरुद्ध जीवन को लाभ लेवै लखे लिखे भाल की । वृषभानुलली नॅदलाल पगे रंगन में दुहुन समाज मध्य धुंधर० ॥१॥ जिला दरभङ्गा निवासी बाबू श्रीविखनाथ झा । काहे सोचती है अरी कर पे कपोल दीने बात सुन मेरी तज चिन्ता दुख जाल की। खेलन धमार नन्दलाल सजि धाय रचै प्यारी जू अलीन जुत्थ आई जोऊ काल की॥

( २६ ) तूह चल तूह चल पाई हूँ बुलावै चीर पूरी कर कामना लगी जो बहु साल की । अङ्क भरि लेरी विश्वनाथ मुख चूमि आज बंसी- वट तट धूरि धूधर० ॥१॥ मि पर गोस्वामी साधोगिर स्कूल जानपुर । अति छवि देत एक ओर भीर ग्वालन की एक ओर ठाढी हे जमाति जुरी वाल की। वाजे डफ ढोल ओ मृदङ्ग बीन चग सग धूम मची फाग की न चूकै गति ताल की। उडत गुलाल वृज लोग सब लाल भये लाल में लता वो वृक्ष लाले रथ पालकी ॥ महल मकान आसमानहूँ मे जानि परै चहूँ ओर जोर छाई धुंधर० ॥१॥ प. महावीरप्रसाद शर्मा बैद्य कोट जिला मिरजापुर। नागर नवेली अलबेली वृषभानजा जू संयत सहेली चली मत्त गज चाल की। उतै ग्वाल बाल सखा सग में धमार लीन्हे आवें प्रेम छाके छैल गावें गति ताल की॥होत - घगमेल माच्यो फाग सानुराग बीर दौडि दौड़ि आली गहें फेट नदलाल की। गोरी मुख रोरी मलें झोरिन्ह अबीर झोके सारे ब्रज भूमि छाई धूधर० ॥१॥ मुः मूर्य नारायनलान वकोल सर्कार को जिला मिर्जापुर लली ज चली है अली सोलह सहस ले के पाँचई हजार लै जमी जमाति लाल की। चीरनि अबीरनि चलाइ सतवीरनि सों रेंगी तसवीरनि सों गति वाला बाल की ॥ अव. नि अकाश रग अरुन अरु न दिस्यो लाल भयो सूर्य गावें कीरति गुपाल की । श्याम घन घूघुरु पुकार ते पंकरि जात ओर छोर छाई धरा धूधर० ॥१॥ थी जगशीलासकषि कम पैसेपुर । होरी खीलवे को चलि आई ब्रज गोरी सग कीरति किशोरी छवि छीनति मराल की। लीने कर झोरी रोरी केसरि कमोरी लाल सोहै साथ जगली समाज ग्वाल बाल की ॥

होतही जुराजुरी अवीर.मूठि छुटें लगी ल लगी मोटें चहुँ कोद मोद माल की। हेरि रङ्ग ख्यालन निहाल मन होत ऐसी लालन मचाई धूम धूधर० ॥१॥ खेले फाग आज ब्रजराज ब्रजमण्डल में राजे धूम रागन मृदग बीन ताल की । गावत धमारे पिचकारे रंग ढारै कुंकुमानि कुच मार करें कीरति कमाल की ॥ मीडि मुख जङ्गली अवीर चीरि चोली चीर एके लेत छरकि सुधाई गरि गाल की।लाल ल- तिकान भ्रम गहत तमाल बाल बगरी वि. साल ऐसी धूंधर० ॥१॥ सत साद जी सिकन्दरपुर कुर्था जिला गया। आजु चल देखों सखी कालिन्दी-तटान पहें नन्दलाल संग जहें भीर ग्वाल बाल की। धारे हैं अनेक रंग सारी सखियान सच, मारें पिचकारी भरि ओर मन्दलाल की ॥ कोई राग गावें कोई नैन सर मारें कोई अबिर उड़ाव गावे जस वृजपाल की । सत कहै सझे नहि सूर्य को प्रकाश तहां, छाई मेघमाल नाई धूधर० ॥१॥ रीवानिवासी कविवर नरहरिबशोय बजेम कधि । कर ते लकुट लीन्हो मोलि ते मकुट छीनि गर ते वृजेश लर बर वनमाल की। मारि पिचकारिन धमारि धुनि गारिन दै वारि दीन्ह्यो मजु लता मदन मसाल की। चलत न छल छद नदगाउ ग्वालन की अवलोकि ऊधम अनद आल वाल की जालसों पकरि के हूँ बीच वृजवालन के लाल पै करति बाल धूधर० ॥ १॥ विध्यक्षत्रपगड़ा श्रीभगवामदत दुवे कवि । आवो साजि गोरी भोरी नवल किशोरी सबै सांवरे के सग फागु रचों इह चाल की। लकुट मुकुट कटि काछनी सु पीतपट छोनि लेहों लपकि लपेटि वनमाल की ॥ भगवान घोरि बोरि केशरि सु घर जोरि अबिर लगाइ राखों सुखमा विशाल की। भाल की मरोरन चलेगो लाल गाल कीने उधुम मचाइ डारों धूधर० ॥ १ ॥ आवै जुरि ग्वाल करै भयो मन ख्याल हाल दै दै डफ ताल औ वजावै बहु गाल की। घोरि कर केसरि स बोरि पिचकारिन मे अविर उड़ाइ गारी गावै बहु चाल की । भगवान की सौ आन मोहि वृषभान जू की नेक ना डरोंगी भोहि मोरनि गोपाल की। अधा धुन्ध धूम धाम धूरि सो छपाइ छैल उधम मचाइ डारो धुंधर० ॥२॥ गयानिवासो प गिरधारीलाल जी शर्मा। उडि गये धीरज पखेरू गिरधारी वीर चिंता धूम छाई है विशाल ज्वाल माल की। प्रान मृग चंचल हे अनत चलन चाहे पाय जलविदु सी न पतियां गुपाल ( ३४ ). की ॥ विरही वदना रण्य दहि जैहै लगे अव लू बन लहर तान फागुन कराल की। उफ ध्वनि प्रवल प्रभंजन झकोर सग प्र- गटो ये दावानल धूधर० ॥१॥ कविराज छिराम भो के शिष्य इनिमन्स कधि मोद भरे खेलत बसत सग स्यामा स्याम अंतर लपेटी फेटी अंग नव-चाल की । कवि हनिमन्त कत कामनटनागर पेमारी पिचुकारी न संभारी उर माल की ॥ दोऊ छकि रहे रस रंग में अनङ्ग जू के अतिहीं हुलास आस पुरी भरि भाल की । ऊधम ध. मारि में कुमारि सुकुमारि आजु रङ्ग भरी भूमि धूम धूंधर ॥ १॥ श्री ठा. महेश्वरवकससि इजी तालुकेदार रामपुर मथुरा। राजत रसिक रोन हरे रंग मदिर में जागे जहाँ जगमग जोति रलजाल की। आई प्राणप्यारी दामिनी सी दुरि दोऊ तित माधुरी हॅसनि मतवाली मुदमाल की॥ हेरि कै महेश्वर परम अनुराग भरो चारु चारु- ताई ते चमक चोपचाल की। एक को छि- पायो छलिया ने छतिया के तरे एकन पै कीन्ही धाय धुंधर० ॥१॥ इति

सूचना।
समस्त कविजन से सविनय प्रार्थना
है कि कविता के तुकान्त में तथा बीच
में भी स्त्रीलिङ्ग और पुल्लिङ्ग का विशेष
ध्यान रखें। ऐसा न करने से वह कवि-
ता भोंड़ी और अशुद्ध होती है। उक्ति भी
जहां तक हो अच्छी होनी चाहिये।
रामकृष्णवर्मा
सेक्रेटरी
-~-

5
-
-श्री गोकुलेशो जयति।
कविमण्डल
की
समस्यापूर्ति
। मिती फाल्गुण सु०८ धार गुरु सं० १६५३
पन्द्रहवां अधिवेशन
सराहों तम तोफों में।
वाबू रामकृष्ण वर्मा समादक भारतलोवन काशी।
-भावे जोन मन में करी सो तुम स्यानी
अही मोहि कहा परी तोहि वार धार रोको
में । जैसी कमनीय कोटि रति सी तू राजे
तैसी कान्हर में कोटि काम सुखमा बिलो-
को मे।बैठी रहो कुल को गुमान हिये ठानि
तोहि बावरी बुझाऊँ समझाऊँ सो कहो को
में । पीर बलवीर देखि धीरज सँभारै जन
जग में पतिव्रता सराहों तव तोको मैं ॥m
।

कायोनिवासो पण्डित हिम बेनी कविजी।
आये जोन जोम ते इहॉ हो फाग खेलन
को लालन तिहारोजोम सोतो ना बिलोको
मैं । बेनी द्विज भरि के कमोरिन उछाल्यो
रंग अगन अगेज के अकेली बार रोको में।
अव क्यों पिछौ, पाय हटि के चले हौ भाजि
हनन लगी हैं। जो अदा सो नैन नोको मैं।
ग्वालन की ओट ते चलावत कहा हो चोट
सौहैं आव सॉवरे सराहों ॥१॥
अपर
एरे घननाद मोहि जानत नहीं तू दुष्ट
बेधिहाँ सरीर तेरो तीखे बान नोको में ।
वेनीद्विज वल कै हरायो जो पुरन्दर को आजु
सोतिहारे चाहि बल को विलोको में लखन
सरोख ललकार देत घार बार वार तो ति-
हारे को हजार घार रोको में। दुरि दुरि क-
रत कहा है युद्ध मोसों सठ सोह आव सु.
भट सराहों तव० ॥१॥

"
कागोमियामो हमघट जी की।
जूथ निज मुख्य साजि प्रथमहिं बेगि जाइ
नन्दग्राम गैल गैल रणनि सो रोको में को-
तुकी अनूप स्याम रसिक सुजानराय तिन
की ढिठाई का जोलों अवलोको में । वर-
सत निद्धि तौलों आवै तू सखिन संग मोहे
मरजाद मति नैनन विलोको मैं । आज
फाग केलि में करे जो करामाति कोक एरी
तपसालिनी सराहों०॥१॥
लिला बनारस सरायमोहन निवासी मुकुन्दास की।
फाग खलिवे को है घमण्ड लाल ग्वालन
के चंचल सुभाव घटेकाहट विलोको में।
छल करि आवत चुराइ पिचुकारी पद रंग
मारि भाजत कहाँ लो रिसि रोको में यहि
मन आवै गहि पावों जो मुकुन्दलाल भोंडर
गुलाल झोरी एक सग झोको में । कीरति
किसोरी कान लागि ललिता सो कही कौनौ
घात गहु री सराहों ॥१॥

माझामिषासो श्रीलाल श्यामगिपेन्द्र शाही जी ।
चंचल चपल वायुहू ते घेग तेरो मन प-
रम प्रचंड अव कहाँ लगि रोको मै । चक्षु
श्रोत जिह्वा घाण चर्म सह पाचन को स्वाद
गन्ध रूप प्रिय पर्स देइ पोखो मैं ॥ होत
नहिं तृप्त तऊ भोगही को चाहै सदा स्याम
भने
ज्ञान
के
गदा ते तोहि ठोको में । गुरु
उपदेस सुनि सन्तन सभा में बैठि सेवक
कहाउ तें सराहों ॥१॥
पटनानिवासी पाबू पत्तमलाल जी।
तू जो समुझावै भॉति भॉतिन बुझावै
मोहि रोवै जिन प्यारी आँसु कोन भॉति
रोको मैं। कहा जानि बूझि के सुसील सखी
आप तई आपनेई गातन विरह आग झोको
में जव ते निहारयो मनमोहन अनूप रूप
और की भई हों और पापही विलोको में।
काहू भाँति लाय जो मिलाय छिनहूँ दे सके
आपनी वखानों औ सराहों ॥१॥

-
कबहूँ रहेगी नाहिं पत या पतिव्रत की
साहस समेत पुनि पुनि ताल ठोको मैं।ला-
खन कुलीनिन सुसीलिन की ऑखिन सों
बाहर कढ़ात दसा नित अवलोको मैं | जैहैं
छिनहीं में मन आपनो परानो होय उरझि
सु रूप जाल विधि नैन नोको में ॥ लखि
प्रतिमा ही यह मोहन सुसील जू की प्रति-
मा न होय जो सराहों०॥१॥
प्रपर
आवै कढ़ि सामुहें जो साहसी हिये की
अहै पिचका चलावै कौन भॉति अवलोको मैं
काहे ना लगावे हे गुलाल नंदलाल गाल दुरि
दुरि जाय रहै सखियान थोको मैं ॥ होरी
की खिलार जो तू सत्यही सुसील प्यारी चा-
हिये रुकै ना यों सकोच लाज रोको में।
स्पाम जू के पाछे जिती वातन वनावे तासु
चौथहू दिखावै जो सराहों० ॥३॥

$ कोपागजनिः मा'मारकडेलालजी,उपनाम चिरजीवक थि। कहा होत धाम छोड़े कहा होत गाम छोडे कहा होत बाम छोड़े जाको सदासोको मैं। मन ते विसारै विपै देह ते सम्हारै काज चित ते विचारै ईस सावसी हूँ वोको मैं ।। चेलो सो बखानै गुरु कवि चिरजीव भाषे तोको ये विरागी होत कैसे करि रोको मैं ॥ होय के गृहस्थ जो विराग उर धारै शुद्ध येरे नर वावरे सराहों ॥१॥ श्रीमती चन्द्रकला बाई दी। नीर लेन जाऊँ मैं जवेरी जमुना के तीर हरि के निहारिवे को देवन को ढोको में। काहू द्यौस भागन से मोहि मिाले जाय कहीं लागे दोरि नेन तयै नीठि नीठि रोको मै॥ चंदकला वोलों ना चवायनि की चाल देखि खोलों नाहि चूँघट धिकार देत मोको में । काहू भॉति दॉव देखि करिकै ल्यावै हाँ गुपाल को सराहों ॥१॥ भुलाव कोई

~
पखनऊनिवासी लाना हनुमानप्रमादमी।
सदा सद छीर नीर यतन सों पान करु
मुकुत अलखे पहै काकरीन रोको में । छाड़े
सर संबुकी विवाद वक भेकन तें मान मान-
सर में भुलानो ताते टोको मैत्रिविध स.
मीर अमरैया जहँ माधो बसें देवन की मं-
डली कमडली विलोको मैं । हनूमान मन
हंस ऐसे ठौर बसिवे की राखे अभिलाख
जो सराहों तब० ॥१॥
योगीस्वामो किशोरीलाल जी पारा।
कोपि करीपाल व्यग बोल्यो ब्रजराज ज
सों तेरी कहा ? धीर लोकपालन को रोको
मैं। कालकल्प कुलिस कठोर करी कंस जू
को विवुध विदारे अंकुशा जो नेक भोंको
में। सुंडादड फेंकि मारतंड गहि डारै दौरि
दिग्गज पछाडै छुटिजो पै झूमि झोको में।
घडे घडे धीरन की भाँति याहु मारे जब
धीर चलवान में सराहो ॥ १ ॥

प्रपर
-
-
जात मथुरा को तुम जात निरमोहिन की
जाहु जू भलेही तुझै जात के न टोको में।
मोहि के मिताई की सचाई जो दिखाई लाल
ताकी ये सफाई पै सवाई माल ठोको में ।
लीन्हो वरजोरी जो लट्र के मीत मेरो मन
ताके फेर देवे को सुजान तोहि रोको में।
जाहु
जो हिये तें रोम रोम नेन बैनन तें
रीझि रोम रोम तें सराहो तव० ॥१॥
अजमेरनिवामो किशोरीलाल जी रावत ।
सग ग्वाल बाल लै उडावत गुलाल रंग
अम्बर सुरंग नीको ढङ्ग अवलोको में । दुरि
दुरि दूर दूरि दौरत उछाह भरे दाव परे इत
उत राह अब रोकों में ॥ देहो फॉसि हॉस
ही के फॉस झट लेहो गहि नेकहु लगत
घात नैनन की नोको में | ओट ते मुरारि
कहा चोट पिचकारी करै सौह आव तनक
सराहों तब० ॥१॥

आदर बढ़ावै मान-चादर उढावै जस चादर चढ़ावे कविजनन विलोको मैं । ऐसे ही भरोसे पर बाँधि बॉधि जोसे वर मोसे महा मूरख की व्याकुलता रोको मैं ॥ तोऊ ध्यान आवेजव धीरज नसावें सव नीर झर लावें इन नैनन की नोको में।यातें बलबीर वेगि हीय ते भुलाउँ हरिचंद पदमाकरे स- राहों तव तोको में ॥२॥ कानपुर निवासी प शमिमाप्रादजी पिवेदी। आये फाग खेलिवे को बीर बलवीर इतै चोरि रंग दोरि के अधीर भूरि झोको मैं। ललित लगाइ मुख रोरी घरजोरी करि गये कादि वढि के रुके न नेक रोको मैं ॥ कित धों पराने चाहिं जाने जात कैसी कराँ देखि ना परति ग्वाल गोल अवलोको मैं। वनिता बनाइ के सहाइ ले कैधाइ वेगि जाइ गहि लाउरी सराहो० ॥१॥ माविलमोर अर्थात गॅद पार्थ में है।

।
रोषां ममगा मिथ सेवखश्याम कवि जो
पाधि अलि गोल प्यारी टेरि कही मोहन
सों खलो खुलि फाग मनमानी नहि रोको में।
ठाढे कहा दूरही ते हेरत उमाहभरे झेलहु
अवीर भोरी झिलि तिमि झोको में॥आज
श्यामसेवक जो काल सी ढिठाई करि अ.
तर लगावो वदि वीर पीठ ठोको में। मारि
पिचकारी नेक डारि जा गुलाल मोपे आइ
इत सॉवरे सराहो० ॥१॥
बाबू शिवनदनसहाय जी (जजी बाकीपुर)
करि लै अपानो बस नैन दिन रैन हाहा
एडिन लो घूघट को घालि कहा रोको मैं।
मारि लै गुमान तान होले कुलवान पर र-
हैगी न सान को तीन ताल ठोको में ॥
कान बसी तान परै बावरी बने ना जो पे
विधि विनवे ना काहि विधि अवलोको में।
देखि रसखान जौँ निबाहै कुलकान ऐसी
सिव की है आन री सराहों ॥ १ ॥

M
दासापुर बसदेवनगर विज बमदेव कवि।
द्विज बलदेव की बिने को तो विचार बेगि
वीर वावरी सी चन्द बदन बिलोको में ।
प्रेम में अधीर फूले आवत ब्रजेन्द्र इत उत
गोल ग्वालन के रोष करि रोको मैं ॥ धरि
के धरा पै लाज काज को गयन्द-गति भाष
तू हिये के हाल झखकेतु झोको मैं । हरि
ले हिये की पीर भरि लै निसंक अंक करि
ले मनोरथ सराहों० ॥१॥
श्री.ठा. मखरवकससिहजी तालु केदार रामपुर मथुरा
- कंचनकलित पिचकारिन तरङ्ग रह झो-
रिन अवीर झरि झपित के झोको में। वा-
जने विजे के वजवाय दे महेश्वर सों विवस
ब्रजेन्द्र श्रीविलोचन पिलोको मैं ॥ सखिन
बधाई दे धरा पै धारि धन्य धुनि धुरित
धाक के धमारि धार रोको में । ग्वालन के
गोल में गुलाल नदलाल गाल लाय दे री
ललकि सराहों ॥१॥

( १२ ) टासापुरनिवासी रिजमग कवि। मीन मृगकज खज चखन पे वारि डारों द्विज गङ्गा चाल पै, गयन्द-गति रोको में। प्रेम के प्रदेश वसि लाज को न लावै लेस मनहि रमावै झॉपि मखकेतु झोंको में । हॅसि हाव भावन सों चार चित चावन सों करि दे कलान ते कही जे केलि कोको मैं। सॉवरे सों सकुल सनेह साजि सेन करि मारे नैन सर सो सराहो ॥१॥ बाबू विहारीसिह उपनाम रभराज कवि छपरा । पैवेद लगाऊं आसमान मे कहत है री सूखे नदी नाव को चलाऊँ नहि रोको में। भनत बिहारी फिरि सात परदे मे जाय निज गुन गौरव देखाय ताहि छोको मे ॥ तेरी बुद्धि यारी देखि सारदा विचारी झखे सोहूँ को गुमान सान याते तोहि टोको में। चंचल चतुर छरकायल छबीली चाल वाको यदि लावो त सराहों॥१॥ -

(१३)
पटनानिवासी प. गोवईनमाथपाठसपनाम मग कवि।
जो तू खल होरी बचि चतुर चलाक अहे
स्याम सग खेल नेक दृढता विलोकों में।
पडित प्रवीन जिय मानत है आपुन को तोहू
सोप्रवीन प्रौढ सखा वाहि थोको मैं। कहॉ लों
करेंगी छल छंदन प्रवध वीर विस्था बड़ाई
करै मैन-मद झोको मैं । भने नग जाय ब-
लवीर के अवीर मुख माडि करि आवे हॉ
सराहों तव०॥१॥
राज्यमानप शिवप्रसाद जी कबोखर के पुत्र देवीसरनजी कवि
वीर विचले की पीर हैन नेक मोको चलो
और जो भई तो भलो पायो यह मोको में।
फेरि उठि वैठिहैं न इनको हमारे सोच ल-
खन ललाहू भूमि परे अवलोको में ॥ बंदर
विदित दसकंधर सों बार बार कहत प्रचारि
करों एक अरजो को में। वीरवर नीठि करि
तेरी मूठि सही पर मेरी भूठि सहैगो स.
राहों तब० ॥१॥

( १४ )
अपर
हारि जैहों जानकी जुरंच विचलावे फिर
राघव प्रतिज्ञा करि आजु पग रोपो मैं। बल
करि हारे इन्द्रजीत आदि वीर सबै बोलो
तबै देखि दसकंधर प्रकोपो मैं ॥ मानत'न
संक है हमारी गढलङ्क हु में रंक बल अ.
धिक निसंक अवलोको मैं । आवत उतल्लू
चलि भागै मति मल्ल पग रोपही रहेगो जो
सराहों तब०॥१॥
जौनपुर निवासो पण्डित पीताराम जी अर्मा ।
वीर हुरिहारन की भीर मे अहीर बन्यो
आयो यदुवीर आज ताहि किन टोको में।
घोरि लै गुलाव आव रंग पिचकारिन में
जोरि लै सखीन की जमाति तब रोको में।
धेसि कै धमारि के गवेयन भगावो मारि मिलि
सव नारि अखियानि अवलोको मैंग्वालन
की गोल में गुलाल घोरि लालन के गालन
लगाय दे सराहों०॥ १॥

.
( १५ )
श्रीमा कु. श्रीमान् लाल त्रिलोकीनाथसिहजो भुवनेश ।
आज वृजराज पै रचोगी अनुराग फाग
जानि तोहि गुनवन्त तेरी पीठि ठोकों में।
मारि पिचकारिन सो करिहौँ महान कीच
ताही बीच आय जैहोज्योंही अवलोकों में।
भुवनेस धसियो धमारि की सु धूधरि में
वीर बलवीर पै अबीर जब झोकों में । ग्वा-
लन के गोल तें गुपालै गहि लाय कै मिला-
वे बलि मोकों जो सराहों तब० ॥ ॥
साता मामदास तो कसबे पैतेपुर जिला सीतापुर ।
विषयी विलास में विमूढ़ लो प्रमत्तचित्त
एरे मन चार बार याते तोहि टोको मैं ।
अंत यमराज के दुआर दण्ड पावै नीच सो
न सुधि तोकों हाय नित्यही विठोको मैं ॥
छोडि जगजाल को पसार ध्याउ सीताराम
मगल उवार को उपाय अवलोको मैं। चेतु
रे हमारी सीख मानि त्यागि दुष्ट भाव जानों
ज्ञानवान औ सराहों.॥१॥

जिता मोतापर मौजे जेपारपुर वावू पनिक इसिह जो। जाहि मिलिये की अभिलाख केते द्योसन ते अवलों मिल्यो न बीते वासर हे सोको में। तासु हेत कहों तोसों अनिरुद्ध समुझाय नेह उमगात याको कौन विधि रोको मैं ॥ करि के उपाय कछु लावै वा सहेट तीर नै- नन लो जब ब्रजराज अवलोको में। चातुर प्रवीन जानि हिय में सखीन मध्य धन्यवाद देकर सराहो० ॥१॥ शोमती महारानो साहवा प्रतापगट अवध । सिय मुखचंद त्यागो दूजो चन्द मन्द कहाँ कौन गुण जानि समता मे अवलोको में। मुख अक्लङ्कीस कलङ्की तू प्रसिद्ध जग काहि समुझाऊँ किसै वाको जाय रोकों में। दिवा दुतिहीन घन समय मलीन खीन रामप्रिया जानै तोहि जन सव लोको मैं। लालिमा गुलाल सों लखात जैसे । तैसी दरसावो जू सराहों० ॥१॥ लली मुख

।
( १७ )
वसन्तपुरनिवासी पं० यमुनाप्रसाद पोझा।
तजि गृहकाज लाज लोकिक सबैई तजि
होत वदनामी नाथ कोने विधि रोको मैं।
जेते जग पापी व्है सेवक दुज देवन को
फिरत निहाल हाय खात फिरों झोकों में ॥
केवट अजात गिद्ध गनिका अजामिल लों
तारयो तिय गौतम त्यो आय द्वार रोको मैं ।
सबै अपनायो खल केते अपनायो यमुना
को अपनावो जो सराहों ॥१॥
श्री जगनीलालकबि कसबे पैतेपुर ।
जो लगि इतै गॅभीर भीर ग्वाल वालन मे
मजल गुलाल लाल झोरी झेलि झोको मैं।
केशरि कलित पिचकारी धार वारन ते ज-
इली बिहारी की गलीन गेरि रोको मैं ॥
तौलगि उतेजोफाग खेलियो तिहारो ख्यात
आज रंग मेलिवो सो राधिके विलोको में।
आनन अवीर वलवीर मेलि आवै वीर कोरी
कढि आवै जो सराहों० ॥१॥

श्रीगोवर्धननाथसित रतनपुरा छपरा।
ऐरे नर मूढ़ तू फस्यो है जग जाल मॉह
काल को नख्याल यातें बार बार टोको में।
गोवर्द्धन धन धाम धरनी न ऐहै काम वाम
दास संगी है विचार करि रोको मैं ॥ कर
सतसङ्ग हरिकथा बारता मे नेह सतपथ
गामी होइ नाम कर लोको मैं । भाग बुरे
कामन से छोड़ बदकार संग सुजन कहाव
तू सराहों० ॥ १॥
विध्यक्षेत्रपा श्रीभगवानदम दुवे ।
बकि ले री गारी ते बिचारि गैल आपने
को हम तो पराइ नारि कसे कर रोको में ।
डारिले रे केशरि पवारिले अबीग्न के मारि
लै रे मुठी लै गुलाल काह टोको में भग-
वान की सों ऐहो पनि वरसाने मॉह जा-
निहों सपूत पूत सानदार नोको में । मारि
मारि वाँसन विदारि डारि गातन को ऐहो
वचि सॉवरे सराहों० ॥ १॥

( १९ )
देहों धन लाखन वकसि छन माह तोहि
देतहि रहोंगीन कदापि कर रोको मैं । जं.
वन ते मत्रन ते घसीकर तंत्रन ते आले उप-
चार की पसारता न टोको मैं ॥ भगवान
गावो औ वजावो नाचो बहु वार छिन छल
छाओ छरा छोहरि के झोको मैं ।मान-मद
माती माननी के ये मजेज मान मोचन के
सॉवरे सराहों तब० ॥१॥
गयानिवासो 4 गिरधारीलाल जी शर्मा।
वनद घनेरे घूमै संग ना ननद सासु घोर
चोर सोर सुनि कैसे धरि रोको मैं । गिर-
धारी तापै द्वार सामुहे लगाय राखे कदम
रसाल रम्भा अमित असोको मैं याते डर
लागे जौलों आवै प्राणपति नाहि नित गुण
गायहाँ तिहारो अवलोको मैं । तौलों मीत
पाहरू हमारई डगर भरि रात पहरा दै जा
सराहों ॥१॥

( २० ) दूसरी समस्यापूर्ती। लाल को नचाज मैं काशीनिवासी पगित हिन वेनी कवि जी। होहु ना अधीर भीर देखि कै अहीरन की धीर जो धरौ तो अवै सवही वचाऊँ मैं । वेनीद्विज छायकै गुलाल की गॅभीर धुध ग- रव गुमानी गोल ग्वाल को लचाऊँ मैं ॥ लाऊँ धरि धसिफै गोपाल मै धमारिन ते ऊ- धम अनेक चहुंओरन मचाऊं मैं । बेटी - पभान की कहाऊँना कहूं जो आज वनिता बनाय नाहिँ लाल को नचाऊँ मैं ॥१॥ काशी निवासी पगिडत केदारनाथ जी। कालि की कहाँ का दसा तरनितनूजा तीर आँचकही मोहन मिल्योरी सून ठाऊँ मैं । चीथि डारयो कंचुकी विथोरि डायो हीर हार हारी करि विनती कितेक परिपाऊँ में ॥ कीन्ही मनभाई नहिं मान्योरी केदार ताको चूनरी चटक चारु ओढनी ओढ़ाऊँ ( २१ ) में । तोपे बृपभान की कुमारी हो सही री वीर जोपे गाल गुलचा दैलाल को न० ॥१॥ काशीनिवासो बाबू माधवदासजी। ग्वाल बाल सन लेके आयो है मचायो धम लाज भरी गारी देत कहाँ लॉ बचाऊँ मैं । कालही सहेलिन की जोरि कै जमात आली होहो करि धाऊँ लाल धुंधर मचाऊँ मैं तेरी सोह माधव कोपकरि पछारूँआज तो मैं वृषभानु की जु सानहीं पचाऊँ मैं । देखि लीजै ख्याल वाल हालही हमारो अब मलिके गुलाल गाल लाल को नचाऊँ में ॥१॥ काशीनिवासी जचद जी बलमीय । मुख्य ब्रज अङ्गनानि माहि अग्नि की कु- मारि राधिका सहचरीन जगमैं कहाऊँ मैं। परम विरागनी ना नाम धरवाऊ नहि गो- कुल के चन्द्रमा की पदरज पाऊँ मैं ॥रा. वरी सपथ एहो स्वामिनी सुखद सु. जस मयङ्क माहिं कालिमा लगाऊँ में । करिके निज ( २२ ) विमोहि सकल ग्वाल वाल ग्वाल-बालिका बनाइ जो न लाल को नग में ॥१॥ जिला बनारम मरायमोहन निवामी मुकुन्दलाल जो । एहो राधानागरी प्रसिद्ध गुन रूपवारी कान्हे गहि ल्याऊँ तव ललिता कहाऊँ मैं। पीतपट बाँसुरी मकुट वनमाल छोरि नख- सिख रङ्ग गरि होरी में छकाऊं मैं ॥ चोटी करि ऑजि दृग भूपन ते भूषितन चूनरी पि- न्हाइ नई कामिनी बनाऊं में घूघट कढ़ाय कर भावना बताय गति ताथईथई मुकुन्दलाल०॥ पटनानिवासो बाबू पत्तनलाल जो। सत्य के सुसील सखी तोहि कहि देती आज तो न वृषभान जू की तनया कहाऊ मैं । कीरति नसाऊ कुल कीरतिकिसोरी नाममुख बरसाने नाहिं कबहूं दिखाऊ मैं ॥ जो न भरि फागुन के धूमन धमारन को वदलो चुकाऊहीय क. सक मिटाऊ में। बोरिवोरि रङ्गन सोंगालन गुलाल मीजि लाख लाख नाच नन्दलाल०॥

अपर
।
सकल सुसील सखी साजहु समाज साज
समाचार आज अति सुन्दर सुनाऊ मैं ।
मान को रह्यो जो वृषभान तनया को गर्भ
तामें प्रेम पुत्र भयो आनंद मनाऊ में ॥
पाग पायजामें जाम चीरे औ पटू के आदि
मोतिन की माल क्रीट
कुडल लुटाऊ
में
नथ पहिराइ मॉग सेंदुर लगाइ सारी ओ-
ढ़नी सजाइ नाच लाल को नचाऊं मैं ॥२॥
सिहोर काठियावाड निवासी विगोविन्दगोलाभाई ।
रङ्गको रचाइ अति कीच को मचाइ महा
गेल में गुलाल केरि धुन्धर मचाऊं मैं । गो-
विन्द वा समे धाइ सखिया समेत पुनि कान्ह
को पकरि निज पोरिन में लाऊ मे ॥ चूनरी
उढ़ाइ सिर कंचुकी धराइ उर घाघरी पि-
न्हाइ दृग काजर लगाऊ मैं । राधिका क-
हत ऐसे औंसर कों पाऊँ कबै घूघूरू बधाइ
पाय लाल को नचाऊ में ॥१॥

( २४ )
नि०कविमा मारकडेलालनी सपनाम चिरजीव कादि।
नाक मे भयो है दम हम ब्रजवालन को
कहा लौँ अपाने हिये क्रोध को पचाऊँ मैं।
निकले न पावै कोऊ. होरी मे हमारे ग्राम
जासो कहो तासो यह वात को सचाऊ मैं ।
याही उर आवै कान्ह ऊधम पै चिरजीव
एकहू मुलाहिजो न नन्द को बचाऊँ मैं।
गरे विच डोरी डाल चन्दर कलन्दर लों हा-
थन ताल दै दे लाल० ॥१॥
पे
अपर
॥
यह हतभागिनी को चेन वही चर्नन
में जाको उर सेवै सभु तो ढिग बताऊँ मै।
यह वाम दुखिनी को सूरत हराम सारी
राम विन भूतल मे तेरे को
सुनाऊ
में
रावन सो जानकी कहत चिरजीव भाप
कोटिन कलेस ह पें और को न ध्याऊ में।
आपनो अनूप रूप माल चिवे को नहीं
द्वार द्वार यामन दलाल को नचाऊमें ॥२॥

( २५ ) श्रीमती चन्द्रकला बाई बंदी। चालो वेग सकल समाज लेय फगुवो को गोकुल के ओकन में रंगहि रचाऊँ मैं ऐ है वनमाली आली होरी खेलिवे के काज पकरि तहाही तिन्है खव ललचाऊँ मैं। चंद कला अंजन अजाय भाल टीको लाय च- निता वनाय नाहिं मन में कचाऊँ मै । आ- नन पै अमल गुलाल मलवाय आज गारी खाय, वालन पै लाल को० ॥१॥ लखनऊनिवासी लाला हनुमानप्रसाद जी । फागुन को दिवस अदोस कोस आनंद के अवुद रंग राग चाचर मचाऊं मै। दोऊ दिसि हेलाहेली अविर गुलाल धुंध स्यामै धरि लेऊ मान गोपन लचाऊं मेहनूमान राधा कहै गोपिन सों हँसि हॅसि मन में रच्यो है आज प्रगट रचाऊं मै । पूरव प- चाऊं रूप अवला सचाऊं लखो छाड़ों तव दे दे ताल लाल को० ॥१॥ क ( २६ ) थीगोस्वामी किशोरीलाल जी,पारा । वीर रसराज आज आवत समाज साज कैसे अङ्गराग फाग खेलि के वचाऊं में। जाऊं पिचकारिन धमारिन की गारिन में लाऊं धरि धूम धुधुकीन की मचाऊं में ॥ नैन ऑजि आँजन धराऊंचीर चोली चारु मॉग पूरि वाके भालवेंदी हू रचाऊँ मैं। क- सक मिटावो चीर चोरी को किसोरी सबै दैदे करतारी नाच लाल को० ॥१॥ भिपर। 'कोऊ कहै धसि के धमार धुधुकैयन में छैल छलिया को अवै ह्याई घेरि लाऊ में । कोऊ कहै छीनि पटपीत वनमाल वेनु कस- कहिये।की मैन मसक मिटाऊं मैं॥ कोऊ कहै सॉवरी वनाऊँ सखी सॉवरे को मॉग भरि वेदीभाल भूपन सजाऊ में। कोऊ कहे ग्वालन, के गालन गुलाल घाल ख्याल करि श्राजु नंदलाल को० ॥२॥ ।

( २७ ) अजमेरनियासी योकिशोरीलाल नी रावत । घालन गुलाल औ उड़ावन अवीर देरी लावन दै भीर वाको धीरज भजाऊं मै । ले हों छीनि जोरी के कमोरी झोरी वीर सवै अवै ही किशोरी घृपभान की कहाऊ मैं । पहराय धूमवारो घाँघरो सजाय अंग सुंदर सु ऑगी वर अंगना चनाऊँ मैं ॥ रंग भरी चूनरी उढाय लाल नीको नाच वीच अगना मे नन्दलाल को०॥१॥ कानपरनिवासी प ललितापाद जी विवेदी। मारि पिचकारी दैदेतारी वलिहारी कहि संग वृजनारी भारी धुंधर मचाऊं मैं। ललित भुजान सों जकरि के पकरि घेरि सब गोल ग्वालन को रग में रचाऊं में । धाऊं नहि लाऊंगर बनिता वनाऊं अति हिय हरपाऊं निज वल को संचाऊं में । गाऊ में धमारि ढोल डफ को घजाऊं कहि होरी होरी खोरी खोरी लाल०॥१॥"

( २८ )
रीवा मऊगा मित्रसेवकश्याम कवि को।
गावत फिरत गारी गैल गैल गोकुल में
लीन्हे पिचकारी हाथ हाल नित पाऊं मैं।
वृज वनितान को पकार बरजोरी कर ऊधम
अनेकन कहाँ लों गुनगाऊँ में ॥ आवें इत
फाग में तो कौतुक लखाऊ वीर सबै श्याम
सेवक सो कसर चुकाऊं में खेलन न आऊं
ना कहाऊ वृषभानसुता जो न गहि आज
नंदलाल को ॥१॥
बाबू शिवनदनसहाय जी (नजी वाकीपुर)
होरी के दिनान जोपै करी वरजोरी कान्ह
भई कहा हानि देख सॉचई सुनाऊं में। प-
करि लियाऊ बरसाने वीसवीसे काल्ह वद-
लो चुकाऊ उर आनद बढ़ाऊ मैं ॥ सपथ
कराऊं सिव मुरली छिनाऊं तिमि मोतिन भ-
राऊ माँग नागरी वनाऊ में। सारी पहिना.
ऊ सुठि कचुकी कसाऊंपुनि दे दै करताली
आली लाल को० ॥१॥

( २६ )
दामापुर बलदेवनगर हिज बलदेव कधि।
द्विज वलदेव'आज ऐसी मन आवत है
वृन्दावन खास रासमण्डल मचावो में । त्यो
र तानि सौतिन को ताय तन तापन ते सान
सरसाय मान लीकहि लचावो मैं ॥ पूरि अ-
मिला सब हीरे के हवालन को भाखि रुचि
राखि रूरे रङ्गन रचावो में। बार बार लाय
उर चूमि मुख-चन्द चारुनैनन निहाल करि
लाल को०॥१॥
श्री ठा. महेश्वरवकससि इजी तालुकेदार रामपुर मथुग।
धुंधर धमारिन में पीच पिचकारिन में
गोपन सौ गैल अन आपनो बचावाँ मैं ।
डारि कै अवीर वलवीर पै महेश्वर जू गोरी
साथ लेकै रङ्ग रोरी को रचावों में ॥ वाजने
विज के वजवाय वृषभानसुता जीति फाग
लेहाँ रीति खेल की खचावों में । भाल में
रचाय वेदी ऑगुरी गडाय गाल बाँह गल
माल करि लाल को नचावों मैं ॥१॥

,
दासापुरनिवासी विजगग कवि।
सखिन के सद्ग में सिँगार साजि पोड़स
हूँ उरज उतङ्ग रग रोरी को रचावों में।
चन्द सम आनन दसनदुति द्विजगद्ग दा-
मिनी के मध्य रेख मीसिका मचावों में ॥
भृकुटी कमान तानि कैवर कटाच्छ नैन
हेरि तन सौतन कोतापन ते तावो में। चाल
मतवाली चलि माल धारि मुक्तन की जाल
के अनग नन्दलाल को० ॥१॥
पटनानिवासी प० गोवईननाथपाठक उपनाम नग कवि ।
भलेही कह्यो तू करै चतुर प्रवीन वाहि
सैकरन वारनि ते मूरख धनाऊ में । जैसो
ही कहति हम तेसोही करत नातो मान
करि वातन में पावन पराऊ में ॥ सौगध
खिलाऊँ अरु हाहा कोटि भांतिन को छाडों
नाहिं एको पल सामुहें विठाऊ मैं । कवि
नग सॉची कहीं नैनन की कोरन पै भौंहन
मरोरन पै लाल०॥१॥

, - ३.१ बाबू बिहारीसिह उपनाम रमराज कवि छपरा । प्रेमी कहवावत विहारी हम मान लीनी जांचि जांचि हारी कहो कहाँ लोजचाऊ मैं। ठग वटमार चोर लम्पट लवार ताकी सेखी सान भारी वात केतिक पचाऊं में ॥ विनय सुनायहारी बहुत बोलायहारी नांको नाक के दोप बहुत बचाऊ में। देखेगी पसार आँख रहेगी न मन मॉख एको दो घरी मे वीर लाल फो० ॥१॥ राज्यमानप. शिवप्रसाद जी कबोखर के पुत्र देवीसरनजी कवि ऊधम मचाऊ धुधुकीन दै धमारि गाऊं गोल ग्वाल वालन ते पकीर लिआऊं में। नथ पहिराऊ सिर ओढ़नी ओढ़ाऊ फेरि घूघट कढाऊंपग पैजनी पिन्हाऊ में ॥ वंदन लगाऊं भाल विंदुली दिवाऊ मंजु कज कर पायन में मिंहदी रचाऊ में । लली जूति- हारी सोह आयसु जु पाऊआजु गालन गु; लाल लाइलाल० ॥१॥ TA

.
थी जगतीलालकबि कसवे पैतेपुर।
राधे वृज की नवेलिनै लै गई ठानि यह
कान्ह
पै विसपि फाग केलिने रचा में।
झेलि पिचकारिनै अवीर मुख मंजु मेलि जं.
गली गुलाल लाल घूधरि मचाऊ मैं छर-
कि छवीलो नटवर गहि गोल निज विरचि
छवीली काम कोरि ललचाज में। वीर वृष-
मान की किशोरी न कहाऊ जो पै आज
होरी खेलत न लाल को० ॥१॥
प्रपर
आज रङ्ग धुंधरि गुलाल की मचाऊ भूरि
भीर में गंभीर पिचकारी भरि लाज मैं ।
गाऊ मै धमारि धरि लाऊ वलवारहि अवी-
र मुख लाऊ सोभ सौगुनी बनाऊ में ॥ पि-
रेचि नवल सुदरीन लौं लला को वलि जंगली
कलानि आपनी को दिखराऊ में। तो सही
सुजान में ललित ललिता हों जो पै फाग
खलिवे में प्यारी लाल० ॥२॥

जिला दरभङ्गा निघासो बाधू श्रीविश्वनाथ मा ।
कसर सधाऊं आज चीर हरिवे की वीर
रहियो सचेत रूपवलके वनाऊं मैं । जानि
बलदाऊ बिश्वनाथ आ मिलै गो गहि भट
पट पीत छोरि चूदरि पिन्हाऊं मैं ॥ कोऊ
दृग ऑजि कोउ वेसरि दै बेदी कोउ घूघुर
वैधाय ब्रजराज पैलेजाऊँ में । तारी बज-
वाऊ प्यारी नन्द जसुदा हूँ ते न ललिता
कहा जो ना लाल को नचाऊँ मैं ॥ १ ॥
जिला भागलपुर श्रीमनमोहन कति ।
सेंदुर सलोनी रचि विरचि सुबेदी चारु
मृगमद भाल,लरै मोतिका सजाऊँ मैं । तङ्ग
कसि कंचुकी उतना जोम जौवन की रङ्ग उ-
महत अचि अञ्चल दुराऊँ मैं ॥ मोहन जू
आरसी के आंगन अनूप धसि छवि बंग-
राउँ छैल छाँह दरसा में । चाय भरे ने-
सुक तवाय मुसुकाय वार वार तरसाय हिये
लाल को नचाऊ में ॥१॥

( ३६ ) विध्यक्षत्रप डा यीभगवानदत दुधे । ल्याऊँ गहि गोल ते अमोल गोल गाल वारो गुलचा लगाऊं करो भाई मनचाऊँ में । घेसरि पेन्हाइ औ गुदाइ वार मोती डारि सारी पहिराइ हार कंचुकी सजाऊँ मैं ॥भ- गवान होरी को सर्वाङ्ग साजि गोरी सवै अविर लगाइ जाइ जसुदा देखाऊँ मैं । हाट बाट घाटन गली में द्वार गाउँ गाउँ यों मचाऊ नन्दलार गयानिवासो प. अधव हमारो मन हाय कहां जाऊ कहां गिरधारीलाल कहाँ मुद कछाय वनमाल पहिरा दैके माखन चखाऊँ फे। मैया कहवाज मैं। कहा पियावों कहां लडुआ के •गि for-Gent Ldake -

श्री गोकुलेशो जयति।
कबिमण्डल
की
समस्यापूर्ति
मिती,चैत ३०८ वार शुक सं० १९५३
सोरहवां अधिवेशन
खसखाने मे।
गोकुलनरेश गोस्वामो यो१.८ महाराज काहैयालाल जी।
ललित लतान ते वयारि छूटी मन्द मन्द
महल मनोज मोज द्वार दरीखाने में। .
तर गुलाव स्वच्छ सेज पै सुपेदी ठीक बी-
जना दुलत रसरङ्ग सरसाने में ॥ हौद भरे
सीतल फुहारन ते पवार छूटें प्रीतम प्रिया
के सह अदर जनाने में । खेल खेल जुगल
किशोर हृदै खोलि खोलि खूब खसोहि
खिली खासे खसखाने में ॥१॥

कागोनिवासी पण्डित दिन वैनी कवि जी। आये हो कहाँ ते झकझोरे'घाम ग्रीपम के पथिक हवास है तुम्हारो ना ठिकाने में। चलत न कोऊ ऐसी जेठ की जलन माहि वेनी द्विज आप सावटोहीया जमाने मे ।। ताते मानि मेरी खैर जान की चहौ तो चलो हासिल नहीं है देह नाहक जलाने में। सी- तल सुगधन सो सीतल करौ ज छाती दि. वस वितावो वसि मेरे खसखाने में ॥२॥ काशीनिवासी जचद जी बलभीय । प्रकृत परा को जिन धारण किये है गति तिनकी रहति निजानन्द के निसाने मे । ईस वस तेऊ पै कहावत है नित्य मुक्त परम सुजान वृजचद गुन गाने मे॥आत्म अन्त- रात्म सूत्र आत्म परमात्म रूप पकृत परेस काहि देखत अपाने में। अपरा अधीन घोर घाम को बिलोकत ही जाइ कै लुकात जनाने खसखान मे ॥३॥ - है

काशीनिवासी
बाबू
माधवदासजी।
हरे हरे कुंजन के पुज मे वहारदार वग-
ला बुलंद बेस वानक बनाने में । छूटे.जल-
जत्र झार झरना से झरें नीर त्रिविध स.
मीर लगै दूर ते सहाने में ॥ माधव जू ग-
जरा गुलाब को गले मे मेलि गुलापास पास
धरे फूल गुलोंदाने मे । गाने मे बजाने मे
रिझाने में प्रवीन प्यारी जेठ की वहार लेत
। घेठि खसखाने मे ॥४॥
काशी निवासी पण्डित केदारनाथ जी।
लागी वहै कठिन कृसान सी चारि तीखी
- ग्रीषम प्रताप छायो पुज तहखाने में । आ-
कर प्रभाकर के भौन ते कट्यो ना जाय
जिय धवरात है दिनस सरसाने मे॥ऑवा
सो अगार लाग्यो तपन केदार तिन चैन ना
परत गिरि-कंदरा लुकाने मे। फहरै फुहारे
नीर होजन हजार भरे तोऊ ज्वाल माल की
जलाका खसखाने में ॥५॥

जिला बनारम सरायमोहन निवासी बा मुकुन्दलाल जी ।
तत्व ज्ञान जोग धोती नेती प्रत्याहार उधो
संजमादि आसन मुकुन्द गुनगाने में । प्र.
रणव विचार प्राणायाम को विधान ध्यान
राख्यो न लगाय थोरो बचन बनाने में ।
भावत न एको उपदेस येहि प्रीत माहि जाके
तन बीती सोइ जानत जमाने में । भये
विपरीत तनु दाहत सुधांसु हमें त्रिविध स.
मीर लूह लागै खसखाने मे ॥ ६ ॥
श्रीकविराज गुलाबरायजी बुदी।
जागि उठीवाल के वियोगागि अङ्गन
में वाढत है दूनी निशिवासर विताने में।
शिशिर विशेष शीतहू में ना रुकत क्यों?
ताप सी चढ़त चारु चदन चढ़ाने में । सु
कवि गुलाव वारि छिरके पसेव चलें बढत
विशाल सास वर्फ वारि पाने में मरी मरी
भापि सो वयार विजना की रोके वरी घरी
वोले वैठी खासे खसखाने में ॥ ७ ॥

( ५ )
श्रीमती चन्द्रकला वाई दी।.
ग्रीषम के घाम की भयंकर भरावभरी बह-
न वयार लागी जेठ मास आने मे । ताही
समै चंदन में चंद्रक मिलाय चारु अगन
लगाय मिलि नेह सरसाने में ॥ चंदकला
सब ठॉ सिचाय कै गुलाव नीर सखियाँ अ-
पार खरी वीजना चलाने मे। रहत हमेस
जहाँ माघ की सी राति भई राधे श्याम
सोक्त रसाल खसखाने मे ॥८॥
अजमेरनिवामो थोकिशोरीलाल जी रावत ।
जाके मद छाके नैन वाँके अविलोकि लला
भूलिगे छलान हिय प्रेम सरसाने मे।भाज
सोई सुंदरि किशोरी मैन मुंदरि सी सोहै
मनि मंदिर सुगंधित सुहाने में ॥ श्राई हों
उताली चेगि ये हो वनमाली चलि देखिये
वहाली वा गुलाब के विताने में। खोलि के
खजाने खूब खूवी खुसवोयन के बैठी बीच
दोयन के नीके खसखाने में ॥६॥

यी जगमीनान कवि कसवे पतेपुर । आवत निदाघ व्याल विलन लुकान लागे व्यालन विशाल लव सरन समाने में। लगे होजन फुहारै लगे ढारै मजु जङ्गली उ. सीरन व्यजन सुखसाने में लागे चोवा च- दन कपूरन लिपाने गेह केवरा गुलाव आय लागे छिरकाने मे। पकज प्रयंकन पटीर पक अंक लाय लागे कोमलाही जन राजे ख. सखाने मे ॥ १० ॥ को मिकवि 1. AT मारकडेलालजी सपनाम चिरजीव कवि । पखन की हवा हमै लूये सी लगत अङ्ग रंग है कुरग सीरे वागन के जाने में। के- वडे की टही सींची मही सी जनात तृप्त झुलसे सरीर ये गुलाब के नहाने में ॥ बिना प्रानप्यारे के सुकवि चिरजीव भाप ताप सी चढ़े है हमै चन्दन लगाने मे । सीतल सु पाटी प्यारी आग सी जरावे अन आँच सो लगे है हमै खासे खसखाने मे ॥ ११ ॥ ।

अपर
है
स्वच्छ है मकान अरु भरयो है सुगध जामें
सिकन न दीसे जहाँ चाँदनी विछाने में।
पालन मे पालन सी सुन्दर गिजा हे सजी
आसव अंगूरी जहाँ बोतल सिहीने में ॥
जेठ की दुपाहरी मैं कवि चिरजीव भाषै
होय जो किवाड वन्द दासिहू के भाने मे ।
जीवन को सारो फल पल में मिले है प्यारे
मिले जो नवोढा कहूँ खासे खप्त० ॥ १२ ॥
पटनानिवामो बाबू पत्तनलाल जो।
ग्रीपम को भीपम उताप ना गढावे नेकु
दुख ना पहार के से दिन के विताने मे । धूप
की कडाई घोर लक की चलाई तन स्वेद
अधिकाई नाहि आव दरसाने में । तिन्है
तो सुसील सदा मोद औ प्रमोद अहै वेई
जग जोग भागमान पद पाने में । लेपि तन
चदन कपूर प्रानप्यारी सग विविध विनोद
करै वैठि खसखाने में ॥ १३॥

अपर
जधव सुसील तू हो चतुर प्रवीन महा
मेरी बुद्धि जोग नाहि तोहि समझाने में ।
नेकु तो विचारो हिये अबला विचारी यह
कोन भॉति जोग अहें जोग के कमाने में।
सीत की न भीत सही आतप उताप कवों
सुख सो विताई सदा स्याम के जमाने में।
वागन में कुंजन में तरनि-तनूजातीर रितु
अनुसार तोशखाने खसखाने मे ॥ १४ ॥
श्री ठा. महे खरच कमसिहजी तालुकेदार रामपुर मथुरा
- लेती नाहि जीवन को लाभ हालही के
भाखि माखि कै न पेहै मोद मन अनुमाने
मे । इत विरहागि उत ग्रीषम तपत महा
प्रीति करु सकुल संयोग सुखसाने में ॥ सौंह
करि हित की महेश्वर सिखावत है पाछे प-
छितैहै तीर सौतन के ताने मे। बीती जात
जोवन-वहार वृजराजै मिलु खजनदृगी तू
उर खोलि खसखाने में ॥१५॥

दासापुर दम्नदेवनगर हिज दमदेव कवि।
मान करि कवलो मरेंगी बिरहागि धीच
पाइहै संयोग सुख कैसे के रिसाने में। भूले
भति वावरी विचारि बलदेव कहै त्योर तानि
लीन्हो कस सौतन के ताने मैं ॥ चीतीजात
जोवन वहार ऋतु ग्रीपम यों प्रेम सिन्धु उर
के तरङ्ग जिय जाने में । ख्याल कै बिने को
बेगि मिल वृजराज जू सों खंजनदृगी तू उर
खोलि खसखाने मैं ॥१६॥
गयानिवासो प गिरधारीलाल जी शर्मा।
न द्रुम नवेली जित तित 8 नवेली आई
माखन दही ले सिर लाखन वहाने में।ति-
क्षन तरनि तेज सहत बैसाख वारी तपित
समीर झेलि सूनी गैल जाने में ॥ गिरधारी
गूजरी को तऊना गुपाल मिल्यो बदित स-
हेट कुज कानन महाने में । भई मतवाली
भूमि गिरी धूमि मणिहीन व्याली सी न
पावै चैन खाली खसखाने में ॥१७॥

कवित गे अन्याय धूप घोर कलिकाल ये कराल रितु ग्रीपम है तरुण दिनेश ये अकाल परे जाने में । तपि पन्थी धर्म कैसे चले भौति भॉति विपति तपित पौन आने में ॥ गिर- धारी दावानल दिसै दिनवारी छुधा सींचिये सहाय अम्बु सरस वचाने में । करुणा मलै- ज में लपटि जग वेगि अव राखौ राम अ. पनी निगाह खसखाने में ॥ १८॥ मम मा अपर सोचत अवधवासी पूरित दृगाम्बु पुंज कहत उसॉस भरे सोक सरसाने में । हाय केक नन्दनी पै बजर परै न काहे बन जो पठाई मन्थरा के बहकाने में ॥ गिरधारी- लाल सुकुमारि सिय सङ्ग दोऊ दई का करेंगे काल ग्रीषम के आने में । भानु कृत भार वे उजार में सहेगे कैसे जौन रहे सोबत अमोल खसखाने में ॥ १६ ॥ ८-

सखनमनिवासी लाला हनुमानप्रसाद भी।
मीन की अवाई अनभाई भई सीत हारी
पीत दिन दिन वाढी सीर नीर पाने में। नेकु
नेकु विजन वयार हूरुचन लागी चन्दन च-
हल चाह अगन लगाने में ॥ हनुमान चैत
चञ्चरीको चित्त मत्त जागी अभिलाख सब
के गुलाव कलियान में । खूब खुसो खुस
मुखी लै खुसी से सोवै खस के अतर छिर-
काइ खसखाने में ॥ २० ॥
रोवा मजगड निवासी मिथ सेवकश्याम कबि नो ।
मौज देनवारे है वरफ जल हौज भरे
सीरी है सुमन सेज तकिया सिराने में। पंखे
चलें चहुँघा वितान सौह तामरस बढ़त प्र-
मोद खुसवोय के खजाने में ॥ पूरित गुलाब
आव धरी है सुराही खच्छ छाके श्यामसेवक
विलास मनमाने में । छूटि रहे सुन्दर फुहारे
चहुंओर खूब लूटिरहे दोऊ सुख आज ख-
सखाने में ॥ २१ ॥

।
( १२ )
जिला भागलपुर पलमनगर निवासी मनमोहन कवि ।
गुजरत कोकिल कदम्ब भीर भौरन के
सुमन पर प्रीति सरसाने में । चमकीले चंद ।
की चहुँघा चारु तैसी फवी चाँदनी चखन ||
चोखे वज्जुल बिताने में ॥ तीर सो लगौहैं |
सीरो सौरभ समीर धीर चन्दन कपूर धूर
केसर लगाने में । अतन उताप गात मो-
हन जगात दूनो सहि नहिं जात सुनो खा-
से खसखाने में ॥२२॥
पपर
में
रंचक ललाई नहिं रंचक ललाई लगे
ओठ गोल अमल कपोल दरसाने में । छुटि
परे केसर उरोज पै मसकि रहे कचुकी क-
सोटी चोटी चारु उरझाने में ॥ लोचन के
कोचन ते कारी कढ़ि मोहन जू आवत ना
वार वावरी ते सरमाने में । अह अरसाने
रतिरस बरसाने श्रम सीकर जुठाने वसि-
खासे खसखाने में ॥ २३ ॥

| लीने
सुभ
( १३ )
पटनानिवासी प. गोवईननाथपाठक पनाम नग कादि ।
आजु रितु ग्रीषम को लेत सुख दोऊ
मिलि मैन-रस चेन मन मोद सरसाने में ।
सखिन समूह सुठि सेवा हित ठाढी अहें
मौर चौर बीजना डुलाने में ॥
कोऊ पान काऊ लोग इतर इलाची देत
कोऊ जो प्रवीन सो लगी है तान गाने मे।
कवि नग याही विधि विलसे विहारीलाल
प्यारी सग सेज खूब खासे खसखाने मे ॥२४॥
अपर
एरी वीर पीरन की गनना गनाऊ काह
दह्यो जात देह मम ग्रीपम के आने में ।
एक तो रितूही उष्ण दूजे जोर ज्वानी हुस्न
ताजे विरहाग्नि वाज आवे ना जराने में ।
चौथे री पपीहा पिक कूके हूक देवे हीय
पॉचे पंचवान कटि वॉध्यो है सताने में।
साँची मैं कहत तोसो विनु बृजराज नग
सीतल के है है गात खासेखसखाने मे॥२५॥

जिला सीतापुर मौजे नैपारपुर बाबू अनिरुवसिह जो।
चारो ओर गमला जमाय वेश फूलन
के
रह
मशगूल
योस
इतर लगाने में । गहगे
प्रसून परयक पे गुलावन के वेलन चमेलिन
कतार रखवाने में कहे अनिरुद्ध छिरकाय
अर्क केवरान विहसि विहसि करें भाव मन
माने में । ग्रीपम की तपन विसाती नहि
अङ्गन में दपति विहार करें खूब खसखाने मे॥
जौनपूर मिवासो पगिड़त मीताराम जी भर्मा ।
सीतल सुगंधन सों महल लिपाय राखो
फूलन मॅवारी सेज उज्वल बिताने मे । परे
दर परदा मुलायम दरीचिन में उडत कपूर
धूर अतर खजाने में ॥ छूटत फुहारे बडे
भारे खुशवोइ वारे केते उपचार नहि श्रावत
वखाने में। सीताराम तामे प्रानप्यारो अरु
प्रानप्यारी कर मनमाने दोऊ बठि ख-
सखाने में ॥ २७॥

( १५ ) विध्यतंत्रपण्डा थीभगवानदत दुवे । रेतन बिछाइ कीनी चहल पहल बाल अतर गुलाब औ उसीर नीर साने मे । च- न्दन पलंग मंजु चमक चंदोदन के चौसर चमेली चारु चतुर सयाने में भगवान रा- वरे सो मिलिवे की चोप भरी चमकि रही है जोति जोबन खजाने में । मन सुखसाने में मनोज लपटाने भरी नव रॅग बहार परी खासे खसखाने में ॥ २८॥ अपर ग्रीषम में भीषम बयारि तन जारै दौरि मारै भानुकिरन निगाह परसाने में। जल. चर विकल बेहाल परे थल चर हलचल हद्द के दिशान दरसाने मे ॥ ऐसी समै गौन कौन करत सु भगवान काकोदर कोश में मृगेन्द्र सुखमाने में । तर तहखाने मे उसीर रस साने तऊ लागत लपट लुह खासे खस०॥ । -

साना मालदास जी कसबे पैतेपुर जिला सीतापुर ।
श्याम श्याम रटत सदाही प्रेममानी आलि
कुजन मिलाप करो गाड के बहाने में। नीर
मिस पूषण कुमारि तट घाट वाट दरसत
धाइ जाइ सॉझ धेनु लाने मे ॥ मगल च-
ढायो त्योर ताकति तिरीछे नेन एती रिस
ठानी क्यों अवीर बरसाने मे । चलौ खेलो
फागु रागु
रोचन
वढाइ
गावो ग्रीषम वसत
नाहि पैठौ खसखाने में ॥३०॥
बाबू विहारोसिह उपनाम रसराज कवि छपरा ।
वनन में वागन में सरिता तडागन मे नद
मे नदीश में दिखात आसमाने में । भनत
विहारी चाँदनी में चन्दमण्डल मे चहक
चिरैया चचरीक अलसाने मे ॥ चीथिन मे
वृज में विनोद वनितान तामें अवनी अवास
मे सुबास रसखाने में । चन्दन कपूरधूर के-
वडा गुलावन में ग्रीपम' के झार दरसात
खसखाने मे ॥३१॥

अपर
विजन डुलावो अलवेली खड़ी आस पास
अतर लगावे नववाला शौक साने में। पन्नन
के पानदान लिये एक वीरा देती एक लगी
चन्दन कपूर वगराने में ॥ जलयंत्र जालन
ते छूटत फुहारे भारे चौदिसि सुमन जाल
सोहे लहराने में । वीणा लै प्रवीना कोऊ
वैठ के सुनावे गान पौढे है विहारी प्रान-
प्यारी खसखाने में ॥ ३२ ॥
मिर्जापुर गोस्वामी माधोगिर स्कूल जामपुर ।
देखत भभूक लूक लपक दुपहरी में झझक
झकोर झझा झोंक पोन आन मे । दीन्ही
भरवाय जल केवडा फुहारन में झर सो ल-
गाई सुखदाई थोक थाने मे ॥ भॉति भॉति
सुमन सुगधवारे सेज पारे सीरी सी चयारि
देत वीजन चलाने मे । ग्रीपम में कत पर-
जंक लै मयकमुखी पौढी सो इकत द्वै नि-
सक खसखाने में ॥ ३३ ॥

(१६) यानिवासी कविराजकछिराम जी । प्रयो जालिमला जेठ ज्वालि या अतंक वृज चहल नौल नहरें गुलाब नीर धन- चन्दन सुगंध सरसाने में। पावड़े सुमन सार बरफ. सुमन सेज संगम सरोजहार बगर परमानद फहरै फुहारे हीर होजन समौज विताने मेमसावन फुही लों सनमाने में। वीर लछि पति रहस खसखाने में ॥३४॥ रैन दिन पपर तो बरफ के विसाल बाग मंदिर सालार बिजन बिलास बरसाने मै । त्यों पखा प्रतर गुलाब नीर केवरा के लहरें र हौज परमाने मै ॥ लछिराम अमल हीनि आवरन मंद चन्द्रक चुनीन ग्रीपम तरमा लखाने में । किरतिकिसोरी प्रभा चन्द्र किसोर वृज बरसत बगर बहार अरगजात्र सग नवल में ॥ ३५ ॥ खसखाने - ( १६ ) दूसरी समस्यापूर्ती। मन्दिर गुलाब के गोकुन्न नरेश गोम्बामो श्रो। १०८ महाराज कन्हैयालाल जी। फूल हैं कली हैं वृक्ष ललित लता हैं सब विमल कलिंदिजा के कूल दरसाव के।पीत कुद झालो है निवारो राधा बेलि जुही ठौर ठौर चित्रित विचित्रित बनाव के ॥ कौन है तिवारी गोख जारी है झरोखा झिरी द्वार रावटी के तहखाने है हिसाव के।खडी खड तीसरे सुराधिका निहारे छवि चलिये गुपाल लाल मन्दिर गुलाब के ॥१॥ धाबू रामकृष्ण मर्मा सपादक भारतजोवन काशी। जुगलकिसोर मुखसखमा अथार पेखि चख चकचौधि जात मंजु महताव के । फवनि गुलाल औ मुकेसन की वेस लसै मात होत विसद विछौना किमखाव के ॥ एरी । चल वीर बड़े नैनन सुफल करु लुटत लुनाई के खजाने बे-हिसाव के केलि-सुख संपति सफेलि रग रेलि झलि राधिका-गोविन्द पौढे मं०॥

( २० ) कामोनिवासी पण्डित दिज वेनी कवि जो। ऐसे मधुमास मे तिहारे हेत माधव ज. बॅगले वलन्द है बनाये ला जवाब के । वा- रादरी विमल विलौर की सजी है वर आइने लगाये है मिसाल माहताब के॥ वेनी द्विज मुक्ता मनीनन की कोर कोर झालरे टकी हैं चारो ओर माहराव के । बेस वेस विमल वगीचन ते वीनि बीनि राधे ने रचे हे मजु मदिर गुलाब के ॥३॥ काशीनिवासी जचद जी बलभीय । करीही निवेदना अधीन है लडेतेलाल दीन हम ऐसे जैसे मीन विन आव के । तिन सो कहीही तव सादर सुजानवारी मि- लिहो पियारे अस्त भये आफताव के॥ मेरे जान समय सोहावनो सुहायो वह परम प्र- कास अव भये माहताव के चलै री बुलाई मनभावन तिहारो तोहि सेवा कुंज माहि आज मन्दिर गुलाव के ( २१ ) जिला बनारम सरायमोहा निवासी बा मुकुन्दलाल जी । जब ते रिसाय मुख मोरि रही कान्हर ते तव ते विहाल विलखात उर दाच के। केतो समुझाई मन धीरज न ल्यावे हाय करत न नेक सुधि खाव ओ नहाब के ॥सुमिरि सु- मिरि तव अङ्ग अङ्ग रूप रडू उमग्यो अनंग सहि सकत न ताव के हैं तो वे मुकुन्द पर रस के अधीन ऐसे जोहत हैं वाट बेठि मंदिर०॥ महाराज कुमार थोमान लाल विप्लोकीनाथमिहजो एपनाम भुवनेश स्थान थोपयोध्या जी तोरण गुलाब के गुलाव के वितान ताने परदे गुलावी लगे ऐन आवताव के । सेज गुलाब के धरे हैं गुच्छ फरस विछे हे त्यों गुलावी कमख्वाव के ॥ भ्राजे भुवनेस धारि बसन गुलाबी रंग जटित गु- लावो हीरे भूषण सु फाव के । पानि में गु- लाब गरे गजरे गुलावन के मन्द मन्द जाति चली मंदिर गुलाव के ॥ ६॥ she की गुलाव ( २२ ) थोकपिरान गुनावरायजी दी। लागत वसंत लेय सखियों सयानी सग अधिक उमग भरे अग अति आव के । जुगलकिशोर सिरमोर सव देवन के हिय हरखाय जाय पालक गुलाव के॥बोलें जहाँ कोयल भवर भ्रमैं चारो ओर चोरत हैं चित्त खिले कमल सिताब के फूलन के भूषन स. जाय तन श्यामा श्याम बन बनवाय वैठे मन्दिर गुलाव के ॥ ७॥ श्रीमती चन्द्रकला बाई वृदी। डोलत हैं मौर-पंज गुजरत चारो ओर बोलत हैं कोकिला वचन अति आब के। खोलत हैं कोश जलजात वर चारिन में फू- लत अनेक भाँति फूल दिलदाव के ॥ चद कला वहत सुगंध मंद पान जहाँ बल्ली तरु छाय रहे पल्लव सिताव के । खेलत हैं फाग घनश्याम ले सखान साथ वन बनवाय वेस मन्दिर गुलाब के ॥ ८॥ -

( २३ )
अजमेरनिवामो योकिशोरीलालजी रावत ।
काल्हि केलि कुञ्जन सहेलिन के सङ्ग जाइ
मोही अवलोकत सरूप झलकाव के। नीके
उपचार करे तबतें कितीके तऊ फीके परे
रङ्ग ढङ्ग मुख महताव के ॥ आवें काम एक
न किशोरी तन तापन को नेक न घटावें
चिरकाच गुलाब
के । येरे लाल तेरे ही
वियोग भरी बाल वहै चम्पक-चरी सी परी
मन्दिर गुलाव के ॥६॥
थी जगमीतालकवि कसबे पैतेपुर ।
आज वहि वाल को हवाल पूछिये न लाल
हाल है रह्यो है जिमि मीन बिन आय के।
छोनि सी गई है छवि छलक छिनेक ही में
फीके परे रङ्ग मुख मंजु महताब के ॥ हारी
बूझि जङ्गली कितेक आकुली को हेत मा-
नन तें कढत न आखर जवाव के । ढारे
सतिसॉसन उसासन में ऐहो कान्ह हा हरि
उचारै परी मन्दिर गुलाब के ॥ १० ॥

( २४ )
चिरजोवनामाभिपिता लाना मारकडेलाल कवि कोपागज ।
सारी नील गोरी को भी सॉवरे को पी-
तपट भूपन अनूप अङ्ग अङ्ग लाजवाब के।
लाड़िली को चन्द्रिका लला को सिर मोर-
पच्छ अच्छ अनियारे पै दवाने नेह दाव
के ॥ ये जू प्रान प्यारे चलि लोचन सफल
कीजे कवि चिरजीव ये हैं कारज सबाव के।
डारे गले वॉही अरु ऑनद उमङ्ग भरे राधा
कृष्ण राजें आज मन्दिर
गुलाव
जहाँ हे गुलावन के फूल के वनाये घर
काहू के विनोद हेतु सुखमा हुवाव के । जहाँ
गुलावन
के नीर के करावे आदि सुन्दर
सुगन्धवारे ओसत हिसाव के ॥ और हू
अनेक गृह कवि चिरजीव भाषै जहाँ है सॅ-
वन्ध बाके फूल और आव के । योही वह
धाम जाके स्वामी को गुलाब नाम सवही
कहावे प्यारे मन्दिर गलाब के ॥ १२ ॥
के ॥११॥

चाँदनी गुलावी फूल
( २५ )
पटनानिवासी दाबू पत्तन लाल जी।
क्याही है गुलाबी की सुसील जू बहार
अहा देखि मन फूल जात फूल ज्यों गुलाब
के । पट है गुलाबी छत ढंगे है गुलाबी विछी
धरे है
गुलाब
के ॥ कं.
कन गुलाब के सँवारे हैं सुकर माहिं धारे
उर माहिं हार गजरे गुलाब के । सखिन
सखान हू सजाय के गुलावी साज राज रहे
स्यामा स्याम मन्दिर गुलाव के ॥ १३ ॥
काह कहाँ सोभा कहिजाय ना सुसील
कळू वेगि चलि देखि लेहु धीर पग दाब के।
जोर सों चलोगे तो तुम्हारे पग आहट ही
कारन बनेंगे होन कारज खराव के ॥ अर्धं
हाँ निहारी बाके मुख की उँजारी घारि डारौं
बनवारी आव लाख महताब के । चन्दन
कपूर खस अगन लगाती प्यारी वीजन क-
राती वैठि मन्दिर
गुलाव
के ॥११॥

( २६ )
वीर बहुतेरे गुनी मण्डली जुरे हैं आज
ढोलक सितार वीन तवले रखाव के । गा-
यक अनेक त्यों ही बहु देस देसन के उक्तल
कलिङ्ग अङ्ग बन पनजाव के ॥ रह हैं बजाय
गाय होत है प्रमोद महा देखत ही होत
तन मन विनु ताव के । वेगि चलि देखिले
सुसील सखी चैत समा राजि रहे स्यामा
स्याम मन्दिर गुलाब के ॥ १५ ॥
श्री.ठा. महेनरवकमसिहजो तालु केदार रामपुर मथुरा ।
सुमन सँवारि सेज साजि कै सिंगार सव
कञ्चनलता सी बाल अङ्ग अति आव के ।
लकुट मकुट सीस उर बनमाल डारे आइगे
महेश्वर मनोज मन दाब के ॥ चारो चख
चंचल नसीले नोकदार जुरे लावन चहत
उर दोऊ तौन ताव के । चंद सम आनन
दुचन्द छवि देन लाग्यौ देखि बृजचंद-मुख
मन्दिर गुलाव के ॥ १६ ॥

है.
( २७ )
दामापुर बग्नदेवनगर हिज इनटेव कवि।
सीतल सुपारी दाटी वरफ विछाय तापें
काय दीन्हो फरस फुहारे फेन फाव के ।
बलदेव विसद चितान तान वेली धन प्रा-
वत दवागि नहीं ग्रीषम की दाव के ॥ चंद
सम चौगुनो चटकदार चन्द मुख हेरि
करि हारी होत मन महताब के । सुमन
बगारि गोरी गमनी गयन्द गति गलकाय
गैल गैल मन्दिर गुलाब के ॥ १७ ॥
दासापुरनिवासो हिजगग कवि ।
नैनन निरखि नौल कंज कुम्हिलाने मृग
कानन पराने मीन बासी भये प्राव के ।
मोहनी सी छाय मनमोहनी विहसि मन्द
मोरन लगी है मान मैन महताब के ॥ त-
डित जवाहिरात भूषन लसत अङ्ग द्विजगत
तारे तेज तन कन ताव के । मौज भरी रा-
जत रमा सी रूपरासि मानौ मंजुल म.
यह मुखी मन्दिर गुलाव के ॥ १८ ॥

( २८ )
गयानिवासो गिरधारोमान जी सम्मा।
कटि लखो तबते सराहे नहिँ केहरी को
मुख लखे माने ना स्वरूप महताव के ।
कुच लखो तवते न पूजत महेश्वर को नख
लखे गने ना महत्व आफताच के ॥ गिर-
धारी लाल वीर तेरे दृग चचल को लखे गुन
गुनत ना मृग की खिताव के।तो युग कपो-
लन के आव लखो ता दिन ते रुचे ना गु-
विन्द जू को मन्दिर गुलाव के ॥ १६ ॥
सम मे प्रभा ओ प्रीति सोहत है सबै
ठौर ऐसई वचन है प्रमाणिक किताव के ।
गिरधारीलाल सोय सोचि सोचि आवै हँसी
ह्र कर लहैया वृजराज सो खिताब के । सो
हत न होय हैं जू कूवरी कुजाति ढिग सु.
न्दर कन्हैया मदहारी महताब के । कवहूं
की सोहि सके ऊधव विचारि देखो फूस
झोपरी के संग मन्दिर गुलाव के ॥ २० ॥

( ३६ )
नखनऊनिवासी लाला हनुमानप्रसाद जी ।
परदे फरस गादी दिवार गुलाबी झार
छत में सितारे जगें गुलावी हवाव के । चौ-
दिस गुलाववारी फुहारे हजारे चलें देवसर
सम सद भरे हैं सराव के ॥ सुछबि प्रताप
तेज देखि देवे देवाधिप दलि दलि गये
मद मदन नवाब के । हनूमान सिगरे गुलाबी
ठाठ गोकुलेस सासदरी राजमान मदिर०॥
जिन्नाभागनपुर भानमनगर निवासी मनमोहन कवि ।
खौर करी केसर कपोल कुच गोलन पै
वेसर वहार हार तीखन सु आव के। सौरभ
सरस अग तरफ़ तरंग फैली मैन-मद मो-
हन जू वानी भरे भाव के ॥ घेरि घुघुरारे
वार विथुरि विराजि रहे मुख की मरीचि
बीच वने
महताव के । मोद भरे विविधि
विनोद पीतम के हेसि रसि वाल वसि मे०॥
पटनानिधासीप गोवईननाथपाठक उपनाम गग कवि ।
जैसही स सोहें स्याम नीलमनि आभा

( ३० ) सम तैसही सुस्याम पै प्रकाश महताव के । प्यार कटि कध लसै पीतपट हाटक से प्यारी के बसन लाल रजित सहाव के ॥कौन को वतावै नग वाढ घट काहि कहै भले हैं वि. चारी अहे दोऊ ला जबाव के। विविधि वि. नोद बीर जुगलकिसोर करें जोर के समाज आज मन्दिर गुलाव के ॥ २३ ॥ गयानिवासी रामनाम भैया गयावाल । . मुख-चन्द सोहैं अति मन्द भये हुते चंद हॉस कन्द सोहै हुती चाँदनी सदाव के । मोतीमाल सोहै ये नखतमाल हारे सम केस शनि सोहे अन्धकार भे बिनाव के ॥ राम- लाल कहै मानसाभिलाप लहै हारे रहै विपै ढिग विषयी अजाब के॥ताब भरी गई त्यों अताव परी वाल लखी लानन सवावी बीच मन्दिर गुलाब के ॥ २४ ॥ जिला सीतापुर मौजे जेपारपुर बावभनिरहसिह नो । वेलि चहुँघा ते लगी हरी हरी क्यारिन में ( ३१ ) होज भरे तामें बड़े सीतल सु ाब के । छूटत फुहारे मनो मेघ झरि लावत हैं शीत उपजावत ज्यो देखे माहताब के॥ व्यजन चलत मंद मद वायु अनिरुद्ध तपिवे से होस उडे जात आफताब के। जुही के प्रयङ्क पेस प्यारी प्रान-प्यारे मस्त दोऊ मनभाई करें मन्दिर गुलाब के ॥ २५ ॥ जौनपुर निवासो पगिडत सीताराम जी शर्मा । ग्रीषम की तपनि निवारिवे को वैठी आज सखिन समाज लीन्हे आलम सवाब के। च- न्दन चहल चहूँ चॉदनी चदोवा चिकै जामें खसखाने वने अजब हिसाब के ॥ छूटत फु. हारे भारे भीतर भवन आछे जहाँ जात रं- चक न ताव आफताव के। सीताराम मौज भरी मारुत हिलोरें लेतमालती निकुंजन में के ॥ २६ ॥ काबू छेदनलालात्मजवाबू जगवाथप्रसाद पैंतपुर । बिना ब्रजराज ऊधौ काज न सोहात कोऊ मदिर गुलाब ( ३२ ) देह पियरानी चख मानो विनु आव के। कुंदन को रह कौनु वारिज लजाइ जात मुख पै सियाही जैसी वीच महताव के । बोले लागी केलिया वसंत जानि जारै जीउ तलफत रोन द्यौस मीन बिना आब के। कैसी करों कासों कहाँ पीर निज जगन्नाथ दावा से शरीर लागे मन्दिर गुलाब के ॥२७॥ विध्यक्षत्रप गडा थीभगवानट म दुबे । अतर लिपाय छाय चरफ विछाइ राखी तरफ चहूँघा मंजु फरस सिताब के । चौं- सर चमेली वेली चॉननी चटोमा चद चॉ- दनी चमक चारु चटक सुआव के॥ भगवान रावरे चसक चोप मिलिवे की लखत वे ताव काम वाम वे जवाब के। तन छवि फाय के फवाय राखी सरे सुख लाय मसनद बैठी मन्दिर गुलाब के ॥ २८ ॥ वात को करत बात कहत वनत नाहि गात की सु छवि जस प्रात महताव के ।

. ( ३३ ) ओठ लागे अजन कपोल पीक लीक लागे भाल लाल जावक परेत पग दाव के माल उर वलय सुपीठ लागे भगवान लागे भुज- मूल कान-कुडल सुफाव के आव के चेताव के सिताच मुख गोय लाल सोय रहो धाय जाय मन्दिर गुलाब के ॥ २६ ॥ बाबू शिवनदनसहाय जो (जजी बाकोपुर) आई हाँ पठाई वाकी चलो ना सिताव सिव नातो पछतेहो उदे होत आफताब के। चारों ओर अतर ते तर हैं दिवार तिम तने है चॅदोवा जरवाफ कमखाव के ॥गसन की जिन्स सवै धारि आव ताव वारी गावत सहेली साथ वीना औ रवाव के । करत वेाब सारी छटा महताव वारी जोहति है वाट बैठी मन्दिर गुलाब के ॥३०॥ बाबु विहागेसिह पनाम रसराज कवि छपरा । चौगढ दिवाल वने आले वसरा के चार चल दल उपर नॅचत भृङ्ग छाव के । जरदा के ॥ ३१॥ के छज्जा छत सुन्दर गुलावी वेस वारे दर वने हे सुमन रक्त आव के ॥ फर्श की है फूल अवली सेवती के वक्ष मानो फैली चान्दनी सुघर महताव के । छुटत फुहारे जल जनन ते चारावोर बैठे है विहारी बेस मन्दिर गुलाब चैत चान्दनी में चम्प बरणी उमङ्ग भरि निज दुति दीव्य से लजावें महताव के । मन्द मन्दं चलति गयन्दन की हॉस्य कीन्हे देखत बहार वाग विहंग तलाव के ॥ वीणा बाट सारङ्गी सीतार तवला के सङ्ग सॉमाँ बनी बेस गान तान में सीताब के । झु- मत नवेली अलवेली सङ्ग आस पास बैठे है विहारी आन मन्दिर गुलाब के ॥ ३२ ॥ प्रयोध्यानिवासी कविराज लछिराम जी। भागभरयों वाग वर मिथिलेस नन्दनी को नहरै नदी लौ छवि, छलकत आव के ।

( ३५ ) लछिराम लालित सरोवर सरोज सङ्ग ब- गर वितान फूले फूल फल फाव के ॥ रघु- नाथ लछिमन हीरे सुभ सीरे उदै सौहें गौरि मैथिली वदन महताव के । चम्पक चमेली वनवेलि मोगरा के वने मालती भ. वलिसिरी मन्दिर गुलाव के ॥ ३३ ॥ नवरंग वाग बरसाने के वगर वेस तरुल फवारे अमरावती के फाव के । लछिराम नहर सरोज सर सौरि भित ओज हीरे हो. जनि मनोज महताब के ॥ मन्द मन्द ब- रसैं सुमन मकरन्द भार ग्रीषम तपनि मैं वसन्त श्री हिसाब के । मालाकार मजु मन्त्र मोहन बरन भारै वीर विख मोहन त्यो मन्दिर गुलाब के ॥ ३४ ॥ मिर्जापर गोस्वामी माधोगिर स्कूम्न ज्ञानपुर । सारी है गुलावी जरतारी छवि भारी वारी अतर मो बासी खासी साधो जू गु. लाब के । सेज सजी तैसी पुनि दलन गुला- गुल लपके सुगन्ध गन्ध गमले के। ( ३६ ) वन सौं झरत फुहारे भारे सामुहे गुलाव के ॥ दर ओ दरीचन मे शोभित गुलावे गुलाव ग्रीषम के ताव गये देखत वे-आब भये गोरी गृह केलि मनो मन्दिर गुलाव के ॥३५॥ रीवानिवासी का विवर नरहरिवशोय बजेस कवि । गुंजरत मधुप मरन्द मद मोहित है म- लय मिलित मन्द मारुत अभाव के । फ- हरै फुहारे नौल नहरें वृजेश चलें विजन विमल सीचे सौरभित आव के ॥ प्यासे तुम पथिक मवासे कोन जो गइ ते सासे पन्थ प्रवल मयूप महताव के । मोद मई मंजुल निकुज के निकट आगे मिलि हैं म- जेजदार मन्दिर गुलाव के ॥ ३६ ।। इति ।

No text on this page.

No text on this page.

No text on this page.

Kabimandal

Author
Babu Ramkrishan
Title
Kabimandal
File name
Kabimandal
Text
OCR done
Citation
1955
Published
2011/03
Publisher
Bharat Jeevan Press Kashi
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551344
Barcode
4990010032094.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
tGWCbN42IZQ
Download PDF

Kabimandal