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Patto Ki Biradrai

Madukar Mani · 2011/03

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पत्तों की विरादरी

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पत्तों की बिरादरी मणि मधुकर

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कृष्णा सोबती के लिए

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दूर, बहुत दूर- चौंककर देखता है भूरा ऊंट भूरे टीलों के पार वहाँ से, अनगिनत गांवों के उजड़ने की आवाज़ आती है और टूट-टूटकर गिरते हैं पत्ते सूखी हवा में सैकड़ों सदियों का नीला अंधेरा खरोंचते हुए ! -अम्जंदान वल्द चम्मरदान

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तम्बुओं के तिरपाल फडफडाती हुई हवा वेचनी से घुमेरी लगा रही थी। उसके संग-संग रेत । अंधेरे और सुन्न-गुन्न सन्नाटे मे जैसे कोई सह. सड़ाक् सोंटियां बरसा रहा हो, ऐसी आवाज । आडे-तिरछे टीवों और विरों में उलझी हुई रात की रहस्यमयी आकृतियां उम आवाज से अस्त- व्यस्त हो उठती थीं। । आसमान में चौतरफ गट्ठा-गट्ठा धूल-धंवासा पसरा हुआ । उमकी एक तह में मरा-बुझा-सा आधा चाँद, मानो किसी ने पीतल की दरांती शून्य में उछाल दो हो ! अचानक जाने किस दूह की आड़ में एक काली कोचरी बोलने लगी। अपसगुन और आतंक की डोर तानती हई कलमही तान, अपने अन्तिम मिरे पर चौख की तरह चिरती हुई.."चिरं कर दूर-दूर रेंग जाती हुई। फिर वह चुप हो गयी। और, उसकी चुप्पी के इर्द-गिर्द सांय-साय का घना-सा घेरा बनता चला गया । तम्बुओं के खूटे और रस्से हिलाती हुई हया उस, धेरे में फेरी लगाने लगी। संगुली से कान का मैल खुरचते-खुरचते शुवो सहसा तन झटककर उठा । बोरे का 'फटा-चिंथरा टुकड़ा उसने कन्धे पर डाला और लम्बे- लम्बे डग भरता, हुमा सूखी झाड़ियों की खोखल में घुस गया। खोखल अच्छी-खांसी थी। वह न केवल उसमें पूरा समा जाता था, बल्कि आराम से हाय-पांव फैलाकर सो सकता था। आसपास घूहो के बिल, पास के कटील तिनके. चरमरे.पत्त.वेजडे की टटी हई डाल का - एक ढूंट''शुबो उम ढूंठ का सिरहाना बना लेता था और ऊपर कोहनी माइकर विसराम-भाव से पड़ जाता था। कम्फ मे तीन बड़े तम्बू थे । एक पुसपा बाई का, दूसरा इग्यारसीलाल का, तीसरा ठीकेदार बछराज का । कुछ छाजन-छपरे थे, कुछ सिरकियां थीं, कुछ कच्ची ईटों के 'टम्परेली' कोठे थे, कुछ खींफ-आकड़ों के छत्तर और टप्पले थे सवमें ठंसाठस लोग भरे हुए थे। अपना-अपना ठोर-ठांव बन गया था। अपनी-अपनी जगह-जुगाड़ निकल आयी थी। लेकिन कम्फ में तो आये दिन दुरभिक्ख से बेहाल लोग भरती होते जाते थे और अब खुल्ला अक्कास ही उनका डेरा-बसेरा बनकर बाकी रह गया था। कहीं किसी छप्पर में तो सिर घुसाने तक के लिए सूराख नही मिलता था। शुवो भी देर मे आनेवालों में था। उमे तो और भी ज्यास्ती परेशानी का सामना करना पड़ा था। भरती ही नहीं मिल रही थी। ठीकेदार ने उम देखते ही इत्ती जोर से हाथ हिलाया इनकारी में, कि सब-कुछ डांवाडोल होने लगा। "अब यहाँ पग रखने को भी जगह नहीं । मेरे सिर पर चढ़ोगे क्या ? जाओ, जाओ, रास्ता नापो।" बछराज ने उसे पीछे धकियाया और कम्फ के फाटक पर सांकल वढ़ाने लगा। शुवो के पांव जम गये । घटना पर मनों बोझ लटक गया। वह कहां जाये ? पीछे की डगरी में कट गया है, आगे के छोर का अता-पता नहीं। कन-किने दिन-गत घुलाकर वह यहां तक आन पाया है । भूका-पियासा और बिल्कुल बदहाल । लौटने की सगनी नही है । "बोल दिया ना, फूटो यहां से । बहरे हो क्या ?" बछराज ने उसे घड़का, “ऊंट की तरह थोबड़ा उठाये क्या देख रहे हो ?" । १० पत्तों की विरादरी

वह पीछे हटा नहीं । हट नहीं पाया। वह गड़ गया या सूटे-सा।
उसके भेजे में सबकुछ उलट-पुलट होने लगा था।
35.1
"धया जिकरा है ? क्यों चीख रहे हो, बच्छू ?" लाल-लाले आँखों
वाली एक औरत बगल के तम्बू से बाहर निकल आयी।
धुंधर पडे हुए बेतरतीब वाल । मूजी-सूजी नाक और उसमें टिमकी-
सी नथली । वायो कनपटी पर एक गाढी लकीर । तनी हुई भौहें और
उनके नीचे धूप की चोध को मुश्किल से वरदाश्त करती हुई कंजो-कचरी
पुतलियां । तर-तर पलक झपकाते हुए उस डरावनी औरत ने शुबो को
।
घूरकर देखा।
"ये देखो, पुसपा बाई. इस भले माणस का मुआयना करो। जाता
नहीं । खये की तरह पड़ा हुआ है, भूरख ।"
शुबो के बुत मे कोई हरकत नही हुई।
"क्यो रे ! तेरे वाप का घर है ये?" औरत कमर पर दोनो हाय
रखकर चिल्लायो, "भाग जा, चुपचाप'''नहीं तो ऐसी खबर लूंगी कि
सारी हेकडी भूल जायेगा।"
"अहाँ.. " शुवो ने मुंह खोलने की कोशिश की, किन्तु जवान ठेठ
तक सूख गयी।
"किस जगह में आया है ये?" पुमपा बाई ने टोकेदार मे पूछा ।
"गूगा है क्या ? जवाब दे, शगुरे ।" बछराज ने शुवो को डांटा।
"उम्मरकोट ।"
"खास उम्मरकोट गे" पुसपा वाई की आंखें सिकुड गयी और
ऊपर से नीचे तक उसकी पडताल करने लगी।
"नही, उम्मरकोट के पास एक ढाणी है. फतियाँवाली।" शुत्रो ने
हकलाते-हिचकते कहा !
"फतियांवाली!" ठीकेदार चौका।
"हो।" शुवो ने अपनी बात साफ करने के लिए कुछ साहस जुटाया,
"पखेस्तान है उधर ।"

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रास्ता तो बना ही दिया है । उस रास्ते पर चढ़ते हुए सुबो ने नरमाई से सवाल किया, "तुम्हारी रुघचन्न से मिन्तराई थी क्या?" ठीकेदार ने कोई उत्तर नहीं दिया। कुछ पल बीते। फिर उसने तनिक फाटक खोलकर शुबो को एकदम अन्दर खीच लिया और आहिस्ता से बोला, "ठीक है, ठीक है, तुम भी रहो कम्फ में । लेकिन अभी वे-बोले उस तरफ चले जाओ और उन लोगों मे घुलमिल जाओ। पुसपा वाई को मैं बाद में बतला दूंगा। " । उस रोज से शुवो कम्फ का आदमी हो गया। कम्फ इंदस्तान की सिरकार ने लगा रखा था । अकाल दुरभिक्ख के कारण वैघरवार हुए लोगो की मदद के लिए । ऐसे नौ-दस कम्फ और थे, उस इलाके में-शुवो को यहां भरती होने के बाद उनका पता चला। लेकिन सब जगह धक्कमपेल और मारामारी चल रही थी। नयी भरती एकदम रोक दी गयी थी। शुयो की तगदीर अच्छी थी कि बछराज ने उसे कम्फ में डाल लिया। यह छतना कम्फ कहलाता था। बीच मे तल्ली का मैदान । चारो ओर टोले, पेड़ और थूहर-सरकण्डे का जगल-झाड । वहाँ से जैसलमेर तक सड़क मनायी जा रही थी। कम्फवालो को उस पर काम में लगा दिया गया था। मजूरी के रूप में मिलता था, नाज-पानी । दोनो जून के लिए हरेक को डेढ़ सेर आटा, एक प्याज, मिरच-लूण और तीन बरे पानी सबने अपने-अपने ढंग से गिरस्ती जमा ली थी। पत्थर रोपकर चूल्हे बना लिये थे। घास-फूस-लकड़ियाँ इधर-उधर से बटोरकर आग जलायी जाती थी और जिसको जसी सहूलियत होती थी, रोटी-बाटियां मांडकर पका ली जाती थीं। ज्यादातर, बाटियो । धीमी-धीमी आंच में पकने के बाद उगमा सुवाद ऐसा करारा हो जाता था कि साग-चटनी की भी जरूरत नहीं। ।

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मां को आसमान से वरसती हुई आग के हवाले कर वे दोनों अन्ध- मन्द आगे बढ गये । सन्निपात के मरीजों की तरह होश-हवास गंवाये। आकुल-बाकुल । सीव-सरहद तक पहुंचे तो उन्हें फोज की चौकियां नजर आयी। वे जानते थे, मिपाही लोग वहोत गुस्सेबाज होते हैं—चाहे घे इंदस्तान के हो या पखेस्तान के। बात-बात बन्दूक दागकर मिनस जात को भून डालते हैं। बीच में कांटेदार वाढ थो। उमे लांघने को तजवीज में उन्होंने दो दिन काट दिये, टीलो में दुवके-दुबके । जरा उचककर चलने की तैयारी करते थे कि कोई-न-कोई फौजी चेहरा दीठ में आ जाता था। वाऊ थककर निढाल हो चुके थे। रात के वखत शुबो ने हिम्मत को और वाऊ को चलने के लिए कहा, किन्तु वह सिर्फ कसमसाकर रह गये । किसी तरह काफी जोर बांधकर उठे, दो कदम चले और गिर पड़े। शुबो के पास समय नहीं था। चौकियां सो रही थी। उसने वाऊ को पीठ पर लाद लिया और टीलो की आड मे रेंगता-रेंगता सीमा पार करने लगा। जरा-सा खडका होता और वह पिरथी से चिपककर दम साध लेता । एक दफा गोली चली कही, धमाका हुआ। उमकी साम रक गयी हलक में। लेकिन, कुछ क्षण की चुप्पी के बाद वह फिर घुटनों के बल घिसटने लगा, वालू पर बाऊ को टांगे हुए ! जब अंधेरा छंटने लगा और शुवो को अन्दाजा हो गया कि वह सीव और चौकियों को पीछे दूर छोड आया है तो उमने वाऊ को नीचे उतारा। लुढ़क गये। - 1 4 वह रेत में होते हुए शुवो ने अपने आप पर एक निगाह डाली । उसके रोम-रोम में पीड़ा और जलन हो रही थी । भरूंट और थूहर के चालाक काटों ने मौका पाकर उसके तन को घेतरह छीलकर रख दिया था। वे खुली 1 । - छाती, पिण्डलियों और बांहो के रोओं में गुच्छागुच्छ लड़ियां बनाकर लटके हुए थे। उनके बीच न रगत के धारे बहते हुए सूख-चिपक गये थे। चमड़ी जगह-जगह लिथड़ गयी थी और मांस की लाल चिधियों चमक नही थी। rक वन्वत आता है, जब तुम अपने खून के असली रंग को देखते हो. उम रंग के साथ कितने झरने, कितने उन्मत्त वेग जुड़े हुए होते हैं और वे तुम्हें कहां तक ले जाते हैं. सोचो, पहचानकर देखो...' घोर यकावट और अन्दर चीखती हुई निःशब्द उदासी में शुवो को अज्जैदान का यह दुहा याद आया। उसमें एकाएक उजाले की एक नवीर विच गयी, जैसे तेज चमकते हुए नश्तर की धार हो। वह धार मई-गल घावों को नरन्त रेतकर काट फेंकती है । दर्द होता है. ब. बारगी, किन्तु हिम्मत रखो जुटाकर, तो यह अहमाम भी होना है कि अन मब कुछ ठीक हो जायेगा--- "वह आवाज, जो तुम्हे जीने के लिए, हरेपन को तलाशने के लिए ह-रहकर पुकारती है. यहां से आती है ? कहाँ पैदा होती है ? न हवा मे. न पानी में, न मिट्टी में वह नो मिरफ तुम्हारी नमों में ही जनम लनी, प्रादान जब तक जिया, मौत के खिलाफ और उन तमाम लोगों के खिलाफ.---जो आदमी की औकात को नष्ट करने के लिए हत्यारों की हाट में दलाली करते है, लता रहा । उमने रेगिस्तान के कण-कण में पका जीवन की एक-rक मौम को सुना और उन्हें नये अरथ नक पहुंचाया । गुवो ने विननी ही बार बाऊ मे अर्जदान के समर- मोन्टे मुन थे और उनके माध्यम से दुनिया को समझने की कोशिश की बी। यह भी बताया था वाऊ ने कि भाटी गजा ने अपने गढ़ के दरवाजे के ठीक सामने लकड़ियों का दर लगवाया था, अज्जैदान मे लिए चिता चिनवायी थी और उसे जिन्दा ही जलाकर भून डाला था। लेकिन अज्जंदान तो जलने-जलते भी हंस रहा था, दूहे गा रहा था- . - १६. पत्तों को विरादरी खूब ऊंची आवाज मे । तर भाटी राजा ने गुस्से और अपमान से तिल- मिलाकर एक पत्थर उठा लिया था और बड़े फूहड़ ढंग से चिती की तरफ फेंक मारा था। पत्थर अज्जदान को नही लगा। माटी राजा का निशाना चूक गया, क्योकि अज्जदान की आवाज बन्द कर सके, यह निशाना साधने को सामरय उसमे नही पो। आखिर वह कायर, वह फर, वह नामरद लौट गया अपने गढ में। छुप गया 'अम्मल' के नशे .और रानियों के लहंगो की मांद मे ! अज्जैदान चारण की कविताई, जो रेत की रम्मतों और दुखियारे • जन-जन के कण्ठो में बसी हुई थी, सैकड़ों बरसों से-एक तेज-तीक्ष्ण 'आंख' थी। सुबो के पास और कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन वाऊ से, दूसरे लोगों से सुन-सुनकर उसने धीरे-धीरे वह 'आंख' अपने भीतर जगा ली थी ! कम से कम, उसे यह तो भरोसा या ही कि उस आंख की रोशनी से वह जब-तब मोडा-सा उजास ले सकता है। अन्नदान के सुमरन ने शुबो को आहत अवस्था को शीतल लेप से ढंक दिया । बाम कुछ देर सोकर विसराम ले लें तो वह उन्हे लेकर आगे चलेगा, उसने सोचा और नाखूनों से नोंच-बीनकर काटे निकालने लगा। धोतिये की किनारो फाड़कर उसने वाऊ के बायें घुटने पर बांध . दी। वहां पर कोई रगड़ खाकर चाम उतर गयी थी और घाव बन गया था। '. "अब कोई खतरा नहीं, बाऊ! चौकीवालों को तो हम बहोत पीछे छोड़ आये हैं।" तभी उसे मुरचिया की एक टहनी दिखलायो दी। सूखी, काली टहनी । पौधा कभी का मुरझाकर मर चुका था। स्यात उसकी जड़ों में । कुछ जान हो! शुवो ने तेजी से मुरचिपा की जड़ें खोद डाली। जड़ें एक- दम अकड़ी हुई थीं और छुने-भर से कट-कटा टूट रही थी, लेकिन-फिर भी ढाई-तीन अंगुल का एक टुकड़ा शुचो को मिल गया। वह कुछ नरम था। इसमें गीलापन होगा जरूर। शुबो को हल्की-सी तसल्ली हुई... । ।

बाक की तो जीभ एकदम हलक में चिपक गयी है, बोल ही नहीं पा रहे हैं, कित्ते रोज हो गये उन्हें पानी पिये हुए ! "वाऊ हो ! यह मुरचिया की गण्ठी मिल गयी है, देखो ! इसे मुंह में रख लो, आस्ते-आस्ते थोड़ी तो तरावट आयेगी ही।" उसने वाऊ को हिलाया-डुलाया । वह हड्डियों की बंधी हुई गठरी की तरह मोघे पड़े थे, निश्चल । "चाऊ-हो !" शुवो ने उनके कान के पास हांक दी ताकि आवाज से उन्हें चेत हो । फिर उसने उनके मुंह में मुरचिया की जड़ डालने का यत्न किया । दांत जुड़े हुए थे, बुरी तरह ! सुबो ने जोर लगाकर उन्हें खोलना चाहा, पर जबड़े तो इतनी मख्नी मे खिचे हुए थे कि 'और, तभी शुवो को पता चला कि वाऊ की तो सांस ही बन्द है। उनका ममूचा शरीर अकड गया है और उसमें कही कोई हरकत नहीं है। गुवो नही जानता था कि वाऊ तो उसकी पीठ पर टंगे-टंगे ही, एक गाढ़ी तन्द्रा में, चुपचाप खत्म हो गये थे। आंम्बों में एक उन्माद, एक भाप, एक पल-पल बढ़ता हुआ ज्वर लिये वह वाऊ को घूरता रहा । फिर उनके चोड़े वक्ष पर माथा टेककर फफक- फफक रोने लगा। गुबो, चौबीस बरस का शुबो, दूसरी बार रोया था इस तरह । पहली वार' 'म्हाजन के कारिन्दे उसके घर की कच्ची अंगनाई में खड़ा नीम का पेड़ काट रहे थे, कुल्हाड़ों से और शुबो उस अपने बहुत सगे गाछ के तने से लिपटकर सुबक रहा था। वह रो रहा था, लेकिन उसकी आंखों में आंसू नही थे तव । सिर्फ एक भूकम्प था, जो भीतर से भकझोर रहा था। फिर वाऊ ने अपनी विवशता भरी बांहो में लपेटकर उसे अलग कर दिया था, वहाँ से दूर ले गये थे। आंमू आज भी नहीं थे शुबो की आंखों में । उसका बदन एक अज्ञात १८ पत्तों को विरादरी - . । .

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धूल को मुट्टियों में भर-भरकर फेंकता हुआ अन्धड़ । उसकी अति-परिचित सनसनी के सिवा कहीं कोई आवाज नहीं । कम्फ मसान की तरह शान्त था। चन्दरमा डूब चुका था। अंधेरा जितना बाहर था, उतना ही शुबो के अन्तस में भी। वह कहाँ आ गया है ? सुबह से शाम तक खटना सड़क पर, जानवरों की तरह हांके जाना, होंठ सीकर सव-कुछ सहना और बदले में दो जून टिक्कड़-पानी हासिल कर लेना। सिरफ इतना ही नहीं, कोई एक आवदार कोना था उसके अन्तर में, रह-रहकर चमकता- कौंधता हुआ उस पर अब कालिख जमने लगी है, झर-झरकर । वह महसूस करता है. लेकिन, उस कालिख से कैसे बचा जा सकता है ! किसी के पैरों की आहट हुई। फिर वह आहट खोखल के समीप आकर रुक गयी। "तुम्हारा यह घोंसला अच्छा है।" वह सुवटी थी। इधर, कुछेक रोज से उसने शुबो के साथ मेल- मिलाप बढ़ा लिया था। अक्सर आते-जाते बतियाने के लिए रोक लेती थी। शुबो चुप चित्त पड़ा रहा। कुछ भी कहना व्यर्थ लगा उसे । "तुम्हारे पास लेट जाऊँ ?" सुवटी ने पूछा और उसके उत्तर की प्रतीक्षा किये विना सीधी पसर गयी। "तुम इतनी रात को कहां चक्कर लगा रही हो?" "इग्यारसीलाल के पास गयी थी। शुबो की आंखों के आगे चेचक के दानों और पिचके हुए मुरझाये मालोवाला एक निर्लज्ज, खूखार चेहरा तैर गया । "वह तो बहुत खतरनाक है।" उसने धीमे-से कहा। "हां, है तो । सारे कम्फवालों को थरथरी आती है उसके नाम से।" "उसने कल जमाल को मुरगा बना दिया था।" "मुरगा-बुरगा तो वह बनाता ही रहता है किसी-न-किसी को। उसे मजा आता है । लेकिन आज उसने मुझे बुलाया था।" २०/ पत्तों की विरादरी सुवटी के स्वर में तनिक गवं था। "क्यों, कुछ डांट-डपट करने के लिए !" "वध्वाहा वो मुझे क्या डौटेगा ! "साथ सुलाने के लिए बुलाया था।" - शुबो सहसा गूंगा हो गया। "शशुरे मैं दम नही कुच्छ 'जव तक पड़ा रहा मेरे ऊपर, कांपता रहा और पोपलिये मुंह से लार गिराता रहा मुझ पर। देखो "अभी तक, यहाँ मेरी गर्दन पर''उसका यूक चिपका हुआ है।" "तुम्हें नहीं जाना था, उसके पास ।" "क्यों ?" सुवटी अचम्भे में यी, "अब देखना, वो कैसे लिपर-लिपर करता फिरेगा, मेरी छाया के पीछे-पीछे जो औरत उसके तम्बू मे हो आती है, उसकी हैसियत बढ जाती है कम्फ मे I."बुढऊ मान रखना जानता है। उसने मुझे बेसन के दो लड्डु, भी दिये । एक तो मैं उसी वखत सा गयी । दूसरा, बंधा हुआ है पल्लू में। तुम खाओगे ?" "नही।" सुवटी ने अपनी एक बांह में शुवो को लपेट तिया, "तुम भी मुझे अच्छे लगते हो!" शुबो विचिन स्थिति में पड़ गया । दांतों के बीच में रेत की किच- किच किरकिरी रड़कने लगी। उसने मुंह फेरकर थूक दिया। "तुम कभी किसी औरत के साय सोये हो ?” सुवटी की बांह कस गयी। फिर दूसरा सवाल फेंककर वह हंस पडी, "तुम्हारी इच्छ्या नही होती है ?", "नहीं।" "इस वखत भी नहीं है ?" उसने शुबो के गले पर चिकोटी भरी। "नहीं।" "अगर मेरी इच्छ्या हो तो?" "तुम"'तो'"अभी वहां से होकर आ रही हो न, वो इग्यारसीलाल के तम्बू . ? " "वहाँ तो उसका मन बहलाने के लिए गयी थी, अपना नहीं।" "मेरा जी ठीक नहीं है।" शुबो का कण्ठ भर्रा गया, "जिद मत करो।" सुवटी कुछ क्षण सोचती रही, फिर बोली, "अच्छा-अच्छा, नहीं करूंगी। लेकिन मुझे एक बात का डर है । वो यह कि.. इग्यारसीलाल तुम्हें कहीं कम्फ से निकाल न दे !" "क्यों ? मैंने ऐसा क्या किया है ? मैं तो अपना काम करता हूँ-" शुबो अस्त-व्यस्त हो उठा। काम-वाम की किसको परवा है ? जिसके साथ जवान लुगाई हो, इग्यारसीलाल उसी को इस कम्फ में रखता है। 'तुम अकेले हो । तुमको खामखां क्यों टिक्कड़ डालेगा वो? उसको क्या फायदा ?" शुबो सोच मे पड गया, "तुमसे कुछ कहा है उसने ?" सुवटी ने उसे दिलासा की थपकी-सी दी, "घबराओ मत । सुपारस कर दूंगी तुम्हारो। मैंने खुस्म कर दिया है उसे । 'रोज कोई-न-कोई औरत होती है उसके तम्बू में-~लेकिन आज बोला वो मुझसे ''सुवटी, तुमने मुझे तिरपत कर दिया." "मुझसे यह सब मत कहो।" शुबो घृणा और ग्लानि से भर उठा। "ठीक है, नही कहूँगी । बहुत भले बन रहे हो, तुम ! लेकिन भलाई- सिधाई कुछ काम नही आती है दुनिया मे।" "ऐसा क्यों सोचतो हो ?" "इसलिए सोचती हूँ कि लुगाई की जात हूँ। मैं तो खुद ही बुराई - hoc "औरत होना 'बुराई है ?" "है । एक दिन तुम भी समझ जाओगे । भलाई-वलाई की बात तो लोग स्यान बघारने के लिए करते हैं, बस । भलाई क्या होती है, बताओ? बुराई ही है, सब जगह । एक अच्छी लगनेवाली बुराई और । २२ / पत्तों को बिरादरी - दूजी, खराव बुराई । जो मन को बार-बार सोचती है, मज्जा देती है- वह सुन्दर बुराई । और, जिससे इसका उल्टा होता है, खराब दुराई। ... मैं किसी के लिए सुन्दर, किसी के लिए खराव बुराई हूँ। उसी में सुख ढूंढती हूँ, सन्तोप खोजती हूँ मैं "जो बुरा है । जिसे सब लोग चाहते हैं, अलबत्त हंकारता कोई नहीं है।" "आदमी अपने लिए ही जीता है फिर तो?" "हां, अपने लिए । दूसरों के लिए जीने की बात एक गन्दी बाई "तुमने अज्जदान कविया का नाम सुना है ?" "सुना है । अव्वल दरजे का चुगद था वो । उसी ने तो हम लोगों में से कइयों का माया सराव कर रखा है. सोचो, पुसपा बाई में ऐसा क्या है जो वह पूरे कम्फ पर राज करती है और मुझमें उसके मुकाबले क्या कमी है ? यही कि उसने अपने औरत शरीर को बड़ी चालाकी से भुना लिया है । बुराई को बदिया इस्तेमाल से सम्पूरण बना लिया है। और मैं--सड़क पर पत्थर कूटती, सुरखी विछाती अपने को बरवाद कर रही हूँ। लेकिन "हमेशा ऐसी नही रहूंगी मैं-" मुवटी तमककर उठी और घाघरा झटकारती हुई चली गयी। शुबो उसे पीछे से एकटक देखता रहा । सुवटी इतनी वेचन क्यों है ? कभी-कभी होता है कि महत्त्व पाने की या वैसी ही कोई आकांक्षा, मीठी खुजली की तरह यकायक फूट पड़ती है। वह खुजली गहरी-गहरी होकर तन को सदा वेचन किये रहती है। किन्तु, उसे सुरचते रहने से आनन्द भी तो मिलता है । इसलिए, उससे मुक्ति का छुटकारा पाने का भाव जाता रहता है। -क्या मैं सुवटी को सही-सही समझने के लिए ऐसा सोच रहा ?.."कि अपने किसी विचार की राख से उसको दंकने की उतावली दरसा रहा हूँ?

-
शुवो ने पलकें मूंद लीं । कुछ गोल, कुछ चौकोर धब्वे ऊंघते हुए आये
और उस किसी मन्त्र-शक्ति में घेरकर खींचते हुए दूर-दूर ले गये ::
एक टोला । जाना-पहचाना सा । धुन्ध । कुछ अस्पष्ट ध्वनियां।
मानो घुरालिया, सरनाई, राय गिड़गड़ी, सुरिन्दा 'सारे वाद्य एक
संग एकाएक बजने लगे हों। सुरों का, ताल का कोहरा । बाऊ, उस टीले
पर लेटे हुए थे। शुबो को देखकर खड़े हुए, तुरन्त और उसके साथ चलने
.
लगे।
आगे, फिर दूसरा टोला । वहां मां बैठी हुई थी।
शुवो रुक गया। उसके पैरों को कील दिया किसी ने
"माँ, तुम औरत जात हो?" शुबो ने प्रश्न किया।
"हाँ और मैं तुम्हारी माँ भी हूँ।" जवाब मिला । माँ की ओर से।
"लेकिन तुम एक सुन्दर बुराई हो ?” उसने जोर मे चीग्वकर कहा।
माँ ने बाऊ की ओर देखा और
मुस्करा
दी
माँ ने पेड़ों की ओर देखा और मुस्करा दी।
मां ने आकाश की ओर देखा और मुस्करा दी।
माँ ने चारों तरफ के कोहरे को देखा और कोहरे में खो गयी।...
२४ / पत्तों को विरादरी

नींद में कई रपटनों और खन्दको से गुजरते हुए अचानक शुवो एक अनन्त दलदल में फंस गया। उसमे से न निकल पाने की असहायता मे वह एक- दम पसीना-पसीना हो गया। फिर हकवकाकर जागा और कई क्षणों तक शून्य में टंगा हुआ, सपने से बाहर आने के लिए पलकें झपकाता रहा। धीरे-धीरे चेतना संयत होने लगी। सामने पीपल का दरख्त नजर आया। सूखे पत्तो का एक रेला उसकी तरफ बढ़ता हुआ आया और खोखल के निकट टिक गया, नन्ही-सी मेंड बनाकर । मन्द-मन्द कांपता हुआ। -हवा आयेगी और ये पत्ते फिर आगे उड जायेंगे। शुबो ने करवट बदली । एक न समझ मे आनेवाली उदासी उसमे काई की भांति पसरी हुई थी। एक भरा-पूरा दरस्त होता है और उसमें पत्ते रहते हैं । पत्ते क्या होते हैं, दरख्त के लिए? दरख्त एक दाणी है, एक गांव है और पत्ते उसके वाशिन्दे होते हैं । साथ बोलते हुए, एक-सा जीवन जीते हुए"वे एक ही विरादरी के अनेक लोग ! लेकिन भतुओं की मार से जब पेड उजड़ने लगता है तो पत्ते मूषन्मूखकर गिरने और विखरने लगते हैं। अपने गांव-घर को छोड़- कर, दुःख-दन्य के बोझ को ढोते हुए, वे पत्ते "जाने कहाँ-कहाँ तक रेलों में बहते-उड़ते चले जाते हैं । "यही है पत्तों को अपनी बिरादरी ! जव हरे थे, तब साथ । और, अब सूख गये हैं.."अपने गाछ, अपनी जड़ों, अपनी शाखानों से विछुड़ गये हैं तो भी साथ । यह क्या चीज है जो ।

- इनको इस तरह बाँधे हुए रखती है ? शुबो बोरे के बिछावन पर बैठकर कम्फ के वासियों को देखने लगा। पत्ते, सिर्फ पत्ते होते हैं. वे कहीं भी चले जायें! चाहे हरे हों या मूखे, उनके भीतर फैले हुए रग-रेशे तो बराबर एक-से होते हैं । वही उनके जीवन को बुनते हैं और गाढ़ेपन के साथ सारे सम्बन्धों को जोड़ते हैं। फिर, उन्हें कोन बाँट सकता है, कोन अलग-अलग कर सकता है ? उत्तेजना-भरी आवाजों के कई देले सिर पर आकर गिरे तो शुवो चेहरा मलता हुआ उठा । बोरे को समेटकर वह खोखल की ओट से निकला। पुसपा बाई के तम्बू के आगे छोटी-सी भीड़ लगी हुई थी। शुवो टीले की ढलान से उत्तरकर उधर चल पड़ा। हाजरी का वखत भी हो ही गया था। किन्तु नजदीक जाने पर जब उसने पुसपा वाई की रीस भरी फुफकार सुनी तो ठिठक गया। पांव जाम हो गये। वहीं से उसने देखा कि पुसपा बाई हाथ में सन का कोड़ा लिये हुए हुए हथिनी की तरह चिंधाड़ रही है, फनफना रही है और घम-धमक चक्कर काटती हुई एक मरियल- से बूढ़े की बुरी तरह धुनाई कर रही है। "सब सूअर के बच्चे, हराम का खाते हैं यहां !" पुसपा बाई के हाथ में लहराता हुआ कोड़ा भीड़ की तरफ उछला, सनसनाया तो खल- बली मच गयी। लोग-लुगाई गिरते-पड़ते इधर-उधर भाग छूटे। इग्यारसीलाल ने भी नसवार सूंघकर तडातड़ तीन-चार-पांच छींकें झाड़ दी, फिर गुस्सा कर बोला, "जाओ, सब लोग ठीकेदार को हाजरी दो। तुम्हारी भी अब लीद निकालनी होगी।" "तुम क्यों परेशान होते हो ! कहो तो हम अभी तुम्हारे तम्बू में लीद कर आयें । तुम्हें लीद का बहोत शौक है, दिन भर बैठे देखते रहना ।" सिराम ने चिढ़कर धीमे से कहा । हद्दी ने उसे डांटा, "चोप्प, खोपड़ी तुड़वाओगे अपनी !" मार खाते हुए बूढ़े का चेहरा सपाट था । कोई खिंचाव नहीं-न २६/ पत्तों की बिरादरी पीडा का, न विकार का । निचला होंठ कट गया था और नंगी पीठ पर खून छलछला आया था। जब थक जाने पर पुसपा बाई ने कोड़ा जमीन “पर पटक दिया तो बूढा लड्खड़ाता हुआ उठा और कोड़े को लेकर तम्बू में चला गया। "अरे, कुत्ते ! अन्दर क्या कर रहा है ?" एक चौड़े मूढ़े पर अपनी 'लद्धड काया को लुढकाकर पुसपा वाई चिल्लायी, "वामी का तेल ला, जल्दी।" बूढा तुरन्त तेल की शीशी लेकर तम्बू से निकला। रिबन खोलकर पुसपा बाई ने अपने बाल पीछे फैला दिये । दो-एक ‘यार गर्दन हिलायी, कन्धे उचकाये, कनपटियों को सहलाया और फिर आंखें बन्द कर पड़ गयो । बूढा हथेली मे तेल लेकर, अंगुलियों के पोरों से उसके बालो मे चुपड़ने लगा-उसी तरह तटस्थ, निराग्रह और 'निर्जीव। "जानते हो, पुसपा वाई क्यो इतनी विफरी हुई थी ?" सुवटी ने सड़क 'पर कंकड़ियां जमाते हुए शुवो के पास आकर कहा, "बदरू मियां मे माल गिरा दिया था।" "वदरू मियां--" सुवो ने मुंह वा दिया। "वही, जिसकी चमडी उधेड़ी जा रही थी. “यो बूढा-" "और--माल क्या?..." "भिस्की बोलते हैं उसे, भिस्की। बाड़मेर से आती है पुसपा बाई के लिए । रोज एक बोतली चाहिए उसको । दिन-रात पीती है और 'मस्ताई छोटती है।" "भिस्की क्या-दारू ही है। नाम इंगरेजी रख दिया है।" ज्यानको काकी ने सुवटी की बात आगे बढ़ायो, "बेचारे बदरू मियां की मुसीबत है । कुछ भी करो और मरो।"

- "पीने का पानी भी पुसपा बाई भिस्की की बोतली में ही रखती है। बदरू मियां ने यह सोचकर कि रात का वासी पानी पड़ा होगा, एक आधी भरी हुई बोतली बाहर उलट दी। उसमें भिस्की थी । पुसपा बाई की निगाह पड़ गयी । उसने धुनाई कर डाली बूढ़े की।" फुलकी ने घटना का ब्यौरा दिया। वह उस समय उधर से इंधन लेकर आ रही थी। "पुसपा वाई गालियां बक रही थी, कोड़ा फटकार रही थी और हम सब ऐसे खड़े थे जैसे, सांप सूंघ गया हो-" "तो. 'तुम वोले क्यों नही कुछ !" सुवटी ने शुबो की तरफ उपहास- भरी दृष्टि से देखा, "तुम्हारी भी वही गत होती- "सुनते हैं, बदरू मियाँ बहुत पुगना चाकर है पुसपा वाई का । हर- दम हर जगह सेवा-टहल के लिए उसके साथ रहता आया है।" ज्यानकी काकी वोली। "इग्यारसीलाल पुसपा बाई की फम्मली को जानता है ।" सुवटी ने अपना ज्ञान प्रकट किया। "फम्मली क्या ?" "फम्मली का मतलव.."बाल-बच्चे और_" "जा-जा, ऐसी कटखनी औरत के बच्चे होंगे !" ज्यानकी काकी टीको झिड़क दिया, "वो तो पैदा होते ही खा जायेगी उनको... : कच्चा ही चबा जायेगी।" "मुझे तो इग्यारसीलाल ने बताया था कि उसे पुसपा बाई की मली के बारे में सब-कुछ मालूम है- "तू इग्यारसीलाल के पास गयी थी ?" ज्यानकी काकी नेत्यौरियाँ चढ़ाकर सुवटी की ओर देखा। "हाँ ।” सुवटी गरवीली हंसी में विखर गयी। "कब?" "रात को।" "तभी सुब्ब से रानी बनी मटक रही है तू ।" " २८/ पत्तों की विरादरी "नहीं तो क्या तू मटकेगी ! तेरे तो दिन गये । अव वठके माला जपा कर ।" सुवटी ने ज्यानको काकी का मजाक उड़ाया। "ज्यादा घमण्ड मत कर।" इस वार फुलको से बोले बिना नहीं रहा गया। "तू भी कर ले थोडा-सा ।" सुवटी दीठता पर उतर आयी। "मुझे जरूरत नहीं।" "मन-मन भावे, मूंडी हिलावे। गयी तो थी तू भी एक बार इग्यारसीलाल के पास । लेकिन, दुवारा उसने तुम्हारी तरफ मुड़कर देखा ही नहीं।" "देखती हूँ, तुम्हारी कब तक कदर करेगा वो।" फुलकी का चेहरा लाल हो उठा ! शर्म और अपमान से । "मुझे तो आज फिर बुलाया है उसने।" सुवटी ने ऐलान किया और तसले में सुरखी भरकर दूसरी ओर चली गयी। "दो दिन की हल्दी है । कब तक नखरे करेगी !" ज्यानकी काकी ने कहा। "सुवटी तुम्हारी सगी बहण है न !" शुवो ने फुलकी से पूछा। फुलकी ने कोई जवाब नहीं दिया। पत्यर तोड़ती रही। ज्यानको काकी बोली, "फुलकी से तीन साल छोटी है, सुवटी। मां तो सुवटी की जलम देकर ही चल बसी। बाप पिछली लड़ाई में मारा गया । फोज को राशन पहुंचाता पा, गोली लग गयी । फुलकी का च्या हुआ था, पर इसका मोट्यार इसे छोड़कर लाहौर चला गया। कोई बोलता था, वहाँ कुली है।"अब ये दो बणे ही बची हैं अपने कुनबे में।" उसी समय इग्यारसीलाल ने पीछे से आकर शुवो की खोपड़ी पर डण्डा वजाया; "इन जनानियों के लहंगे से चिपका हुआ यहां क्या कर रहा है तू ? चल, उधर चल !" शुबो वहां से नहीं हटा । सीधा तनकर खड़ा हो गया ! उद्धत ! "आँखें फाड़-फाड़कर क्या देख रहा है ? मुझे खा जायेगा क्या ?" इग्यारसीलाल के वेदांत मुंह से थूक के छोटे उछले । फिर उसने ज्यानकी काकी के कूल्हों पर दो बार डण्डे से कोंचा, "मुटियाकर मस्तानी हो गयी too " शुबो ने लपककर इग्यारसीलाल के हाथ से डण्डा छीन लिया । घुटना अड़ाकर उसने डण्डे को तोड़ डाला और उसके दोनों टुकड़े परे फेंक दिये । यह सब पलापल में हो गया। इग्यारसीलाल चीखा, "कमीने!" शुबो ने उसका हाथ पकड़ लिया, "तुम्हारे बुढ़ापे का लिहाज कर तुम्हें छोड़ रहा हूँ, आज ! .. लेकिन आइन्दा अगर किसी औरत की बेइज्जती की तो गरदन तोड़कर रख दूंगा, समझे।" इग्यारसीलाल सहम गया। उसके पीले पड़े हुए मुंह से बोल न फूटे । किन्तु तभी चार-छह जने उसके हिमायती बनकर आगे आये और शुबो पर टूट पड़े। "स्साला, मालिक को धमकाता है ! "टुक्कड़खोर की यह हिम्मत-" शुवो बांहों से सिर ढांपकर बैठ गया। उसने कोई प्रतिवाद नहीं किया । एक आदमी हथौड़ा लेकर शुवो की ओर दौड़ा। वह एक बार में ही उसका सिर खोल डालता, किन्तु तभी गज्जी और सिराम बीच • में पड़ गये । बीच-बचाव किया। इग्यारसीलाल तम्बू में लौट गया। मार-पीट हो चुकने पर शुबो लँगड़ाता हुआ एक पेड़ की छांह में जाकर लेट गया। ज्यानकी काकी ने चोरी-छिपे एक निगाह उस पर डाली। एक सिसकी उसके गले तक आयी । सिर झुकाकर उसने आँखें पोंछ लीं। ३०/ पत्तों को बिरादरी मैंने क्या गलत किया? कम्फ के ये लोग मेरे दुश्मन क्यों हो गये ?.."मुझ पर हाथ उठाते हुए उन्हें जरा भी भान हुआ कि वे अपना ही तिरस्कार कर रहे हैं ? स्यात अपने को बेच देने का मतलब है- अपने भले-बुरे के ज्ञान को भी पोंटकर मार डालना" "शुबो 1" सामने ठोकेदार खडा था, बछराज ! "तुमने यह अच्छा नहीं किया।" 'लेकिन, मैंने कुरा क्या किया?" सुबो ने होंठ खोले । ममूहों से बहता हुआ सून मुंह में भर गया था। उसने एक लाल-लाल कुल्ला थूक दिया और फिर उसे रेत से ढंक दिया। "तुम्हे सब रखना चाहिए।" बछराज सोचता हुआ बोला, "कम्फ से निकाल दिये गये तो कहाँ जाओगे तुम? जान के लाले पड़ जायेंगे । मैं" तुम्हारे गुस्से को समझता हूं, लेकिन अभी तो, बर्दास करना पडेगा। और कोई चारा नहीं।" बछराज की हमदर्दी ने सुवो को गहरे तक भिगो दिया। वह कृतज्ञता और साथ ही, लज्जा से भर उठा । सिर्फ इतना ही कह पाया, "मैं माफी । चाहता हूं।" "तुमने कोई जुर्म नहीं किया है जो माफी मांगो—" बछराज की माँखें खाली थी। एकदम खाली आंखें, जो दूसरो को उदास कर देती हैं । "खर, आज का मामला तो मैं संभाल लूंगा, लेकिन..." वाक्य पूरा किये बिना ही बछराज लोट पड़ा। सांझी घिर थाने पर, जब शुबो पानी की टंकियों के पास उकडू बैठा सूरज की लाली का लीला-रास देख रहा था तो किसी ने उसके कन्ये पर हाथ रखा। शुवो मुड़ा । फिर चौंक गया। वही बूढ़ा था, सवेरेवाला "जिस पर पुसपा बाई कोड़ा चला रही

थी--बदरू मियां।
"शुबो नाम है तुम्हारा ?"
गुबो ने हामी भरी।
"पखेस्तान से ईदस्तान क्यों चले आये ?"
"पता नहीं।
"पता नहीं ? अजीब आदमी हो !"
"सचमुच मुझे मालूम नहीं कि पखेस्तान और ईदस्तान कहां से
शुरू और कहाँ पर खत्तम होते हैं।'
"यह तुमने मेरे दिल की बात कही । लेकिन मैं जिन्ना से नाराज
"जिन्ना कौन? उससे नाराजगी के क्या माने !"
"अब, यार''तुम इस स्यासत के पड़पंच को क्या जानो। यहां से
उठो, तुम्हें पुसपा बाई ने याद किया है।"
शुबो सिहर उठा, "नहीं, मैं नहीं जाऊंगा।"
"डरते हो ?"
बदरू मियां के जख्मी होंठों पर मुस्कराहट खिच गयो ।
"डरता तो नहीं हूँ मैं।"
"फिर?"
"नफरत है मुझे-
"तो अपनी नफरत को बदरू मियां की नफरत से जोड़ दो।"
"तुम्हारे मन में भी नफरत है ?"
"है, और इतनी ज्यादा है कि पुसपा बाई तो क्या अल्ला ताला से
भी मैं रत्ती भर भय नहीं खाता हूँ। मार खा लेता हूँ, वास कर लेता
लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि डरता हूं किसी से !" बदरू मियां
ने दाढ़ी के सफेद बालों की रस्सियां वट डाली, "तुम भगवान को मानते
हो?"
"नहीं।"
३२/ पत्तों की विरादरी

"सच कह रहे हो?" "हां, सरासर।" "तब डटे रहो। कोई वाल तक नहीं उखाड़ सकेगा तुम्हारा। बमल में भगदान-अगवान कुछ होता नहीं, लेकिन बिसवास करने लगो तो मन कमजोर हो जाता है। इसलिए सदा पीट ही रखो उधर ।" उसने भेदक दृष्टि से देखते हुए दांत किटकिटाये, "यह सब ज्यादा दिन चलनेवाला नही । एक दिन आयेगा, जब इन सबको नगन करके चौराहों पर बाधा लटकाया जायेगा। इस पुसपा बाई को, इग्यारसीलाल को और उस अम्पी के बच्चे को-" "अम्पी कोन?" "कौन-क्या, वही जंतपालसिंघ, उसी की तो रखल-रांड है यह पुसपा वाई । एम्मेले वनने के सपने देख रही है, चुडैल । और वो जंतपालसिंघ बैठा है दिल्ली मे, नेम से रोज सात मनीस्टरों के जांघिये सूंघता है।" "इग्यारसीलाल भी कुछ लगता है पुमपा बाई का ?" "एक जमाना था, जब बज्जार में गाहक लेके आता था यह, इम जगत रण्डी के लिए । आज बडा ब्यौपारी बन गया है. महतारी का भडवा!" यह बार-बार पिटकर सिटपिटानेवाला बूढा बदरू मियां नहीं कोई और है ! शुवो ने उसकी ओर प्रशमा के भाव से देखा । उसे लगा, यह एक खरा-खरा आदमी है यहां, जिसमे बतलावण हो सकती है दुस- दर्द में। "इग्यारसीलाल ने पुसपा वाई से शिकात को है तुम्हारी। लेकिन बछराज ने वात घुमा-फिरा दी है । "अब जो कुछ भी तुमसे पूछे-कहे पुंसपा बाई, तुम वस हा-हाँ करते जाना । और कुछ बोलना ही मत, नही तो ठीकेदार झूठा पड़ जायेगा । उसने तो तुम्हें बचाने के लिए ही दो वातें गढ़ी हैं । सभी के काम आता है वह । सुन ले शुबो, बछरोजे होरा' 1 -- है, हीरा ! लेकिन पता नहीं, कौन-सा धुन है जो उसे अन्दर-ही-अन्दर खाये चला जा रहा है। उसकी छाती पर कोई भारी बोझ है.." तम्बू में लालटेन जल रही थी । धुएं से उसका कांच मैला पड़ चुका था। मन्द-सा कटा-फटा उजाला । पुसपा बाई मलवार-कुरती पहने, उजाले की उसी जाजम पर मूड़ा डाले बैठी हुई थी। "इतनी देर कहाँ धूल खाते रहे, मौलाना ! बर्डी-सी धारदार आवाज । कण्टनली से नहीं. मानो एक गन्दी बदबूदार गली से बाहर निकलती हुई। बदरू मियां लालटेन की वत्ती ठीक करने में लग गया। "अब इम लालटेन के क्यों अंगुली कर रहे हो ? बाहर जाके मरो।" बदरू चुपचाप चला गया। शुबो का दिल धक र-धकर कर रहा था। इच्छा तो हुई कि वह भी बदरू के पीछे-पीछे बाहर निकल जाये, पर पांव नहीं उठे। • 'केसर-कस्तूरी पी है तुमने ?" पुसपा बाई का सवाल भाले की नोंक की तरह उसके माथे पर आकर लगा । उसने इनकार में मिर हिलाया। "अाज पीकर देखो ! गजसिंहपुर के परधान ने पीपी भरकर भेजी है मेरे लिए । सिक्ख है वो। खूब मुस्टण्डा है । और-मुझे बहुत चाहता है। एक बार अपने साथ दौरे पर ले गया था मुझे । गंगानगर का पूरा इलाका धुमाकर दिखलाया । राजनीती भी अच्छी करता है । कहता है---पुनपा बाई, तुम किसी तरह भादरा से कांगरेस पाल्टी का टिकट एक बार जुगाड़ लो, एम्मेले बनाकर भेजने का जिम्मा मेरा। स्योर जीत है । यही नहीं, वो तो मुझे फिर मन्त्री बनाने के वास्ते भी पैसा और जोड़-तोड़ लगाने के लिए तैयार है।" पुसपा बाई ने अपने मामने दो लोटे रखे और उनमें फेसर-कस्तूरी ३४ / पत्तों को बिरादरी . की पीपी उंडेलने लगी। "मैं दारू नहीं पीता हूँ।" सुवो मिनमिनाया। "दारू नहीं पीते हो! तो क्या खाक कुश्ती लडते हो । बछराज तो बतला रहा था, तुमने बड़ी पहलवानी की है और उम्मरकोट के आसपास के दो-तीन डाको में भी तुम्हारा हाय रहा है-" शुबी चकरा गया । व्यर्थ ही उसके मत्थे यह झूठ क्यो मढ़ा जा रहा है ? उसने तो कभी ऐसा कुछ नही किया फिर-मुंह खोलने की देकली के साथ ही उमे वदरू मियां की चेतावनी का ध्यान आया और वह अन्यमनस्क-सा मुंडी डालकर खड़ा रहा। "तुमने इग्यारसीलाल का हाय मरोड़ा था ?" पुसपा बाई ने गट-गट एक लोटा खाली कर दिया और अपने होठ चूसे । "हाँ ।" उसे याद आयी बदरू को वात, हा-हाँ करते रहना ! "तुमने उसे जान से मारने की धमकी दी थी ?" एक पल के लिए हिचकिचाया, फिर वह बोला, "हाँ।" "तुम किसी का खून कर सकते हो?" माया भाय-भाय करने लगा था, लेकिन शुवो ने कहा, "हाँ ।" "बहोत अच्छे । मुझे तो राजनीती मे ऐसे ही आदमी की जरूरत पी। तुम वहादुर हो। मेरे साथ रहोगे तो ऊनती करते ही चले जाओगे। कैम्प में "मरद कोई नही, सब चूहे हैं। नाज साते हैं और मीगणी करते शुवों को घबराहट होने लगी, "अब में जाऊं?" "आज रात को उम्मरकोट से कुछ लोग आयेंगे यहाँ "तुम वही के रहनेवाले हो न?" "तो उनकी कुछ मदद करना तुम । "कैम्प में रात को पहरेदारी का काम भी ठीक नहीं चल रहा है । सहक पर हाड़-तोड़ मेहनत के धन्धे में हटाकर मैं तुम्हें पहरे का जिम्मा सौंपना चाहती हूँ। आठ-दस जनों

का एक जत्था बना लो और चौकसी रखा करो। मैं तुम्हें परखेंगी,
समझे ! बदरू तो सठिया गया है अव । उससे कुछ होता-हवाता नहीं।
आज ही उस हरामी ने दारू की पूरी बोतल मिट्टी में मिला दी अहमक
है, वैकूफ !"
शुवो हैरत से पुसपा बाई को देख रहा था । अब भय की थरथरी
मिट चुकी थी, लेकिन एक तनातनी थी बदन में-जगह-जगह टिठकी
हुई।
"तुम मेरा हुक्म मानो । फिर तुम्हारा हुक्म कैम्पवाले मानेंगे।"
और यह सब इग्यारसीलाल से न कहना। मैं उस पर भी निगरानी
रखती हूँ।"
तम्बू के बाहर से खंखारता हुया बछराज आया, अन्दर
से । उसने
स्थिति को भांपनेवाली दृष्टि से पहले शुबो, फिर पुसपा बाई को देखा।
"यह तो काम का आदमी है, बछराज !" पुसपा बाई की आवाज
नशे में तर थी।
"मैंने कहा था--" बछराज ने कहा, फिर शुवो की ओर हाथ
हिलाया, “तुम जाओ।"
"हाँ, बाहर बैठो । 'कहीं, इधर-उधर न निकल जाना । मु
तुम्हारी जरूरत पड़ेगी।" पुसपा बाई ने भद्दे ढंग से मूढ़े के नीचे टां
पसार दी।
तभी अकड़ता-ऐंठता-सा इग्यारसीलाल भीतर आया। वे तीनों
बैठ गये । तम्बू से निकलते-निकलते शुवो ने देखा कि पुसपा बाई ने केर
कस्तूरी से भरा हुआ लोटा इग्यारसीलाल के सिर पर उड़ेल दिया।
हँसने लगा, हिनहिन करता हुआ। पुसपा बाई गाने लगी-
अंगिया के निबुवा न तोड़ो सैंया, न मरोड़ो वैया...
"वदरू, वदरू मियाँ !" पुसपा वाई ने गाते-गाते ताली वजायी
धुंघरू निकालकर लाओ, बक्शे में से। मैं नाचूंगी, मैं इस मुज
नाचूंगी।..."
३६/ पत्तों की विरादरी

मन्दर के इस हंगामे से कुछ परे हटकर शुवो एक सिल पर बैठ गया
और कम्फ को हलचल में अपने को उलझाने लगा।
चूल्हों मे जलती हुई माग । वाटियों और भांडों के इर्द-गिर्द रचा-
वसा शोर । वानो और किस्सों की गूंज । झिगुरों की झिन् झिन्-भिन्
और उसमे जागता हुआ कोई अव्यक्त रहस्य ।
"यही अन्धी जिनगी है, अव शेप ! "पत्तो का रेला जहाँ थम गया
है, एक उखडी-उखडी वस्ती बन गयी है--"
आसमान और मन, यदि फट जाये तो कोई भी पंवन्द लगाने की
जुगत करो, लगता नहीं है । शुबो का मन फटा जा रहा या...
अंधेरे मे दो छायाएं आयी और तम्बू से कुछ फासले पर ठहर गयी।
एक बडी, दूसरी छोटी छाया ।
"अन्दर क्या धमसान मच रहा है, बप्पा ।" छोटी छाया ने पूछा।
" परिये बज रहे हैं ।" बड़ी छाया का खिन्न उत्तर ।
"मुझे भी लाकर दो न घुघरिये " यच्चा मचल पडा ।
"हट्ट, उसने सुन लिया तो खाल खीच डालेगी।" बाप ने डराया ।
"हाँ, बप्पा । दो कोडे से मारती है।"
"सुवै बदरू मियां को चमडी उधेडकर रख दो और अब
रही है, नचनी ।" स्वर में घृणा की नोक उठ आयी।
"वो नवनी नहीं, भूतनो है । उसके बाल किते काले, डरावने है,
.
नाच
वप्पा!"
"बदरू उधर बैठा है स्यात ।" वडी छाया धीरे-धीरे शुवो की तरफ
बढी । पास आकर पुकारा, "बदरू मियां, कैसे हो?"
"वदरू भीतर है तम्बू में।"
"कौन हो ? • शुवो !"
"हां, हद्दी।"
"यहाँ मत बैठा करो, शुवो ! कभी वो देख लेगी तो जान लेकर
छोडेगी।"

से बुलाया "यह छोरा तुम्हारा है ? "हां, यह-वाशिया है।" "बाशिया, इधर आओ।" शुवो ने लाड़ "बदरू मुझे गुड़ की डली देता है।' शुवो हतप्रभ हुआ। उसके पास वाशिया को देने के लिए कुछ नहीं था। लेकिन, बाशिया पहले तो हद्दी के पीछे छुप गया, फिर तेजी से भाग- कर अन्धकार में गुम हो गया । - ३८/ पत्तों की बिरादरी दो-ढाई पहर रात घुलते-बीतते टीलो के पार ऊंटो की बिलबिलाट सुनामी दी । फिर चन्दरमा के हल्के उजास मे वे एक कतार में परगट हुए और भण्डारे की तरफ चले गये। पहले इग्यारसीलाल तम्बू से निकला और तेज कदमो से उधर घसा गया । उसके पीछे-पीछे पुसपा वाई, वदरू मियां का कन्धा थामे डह-रह दहती और झूमती हुई। शुवो, जो अभी तक अधसोया-अधजागा यह सब देख रहा था, आधे ममलता-मिचमिचाता खड़ा हो गया । "मैं खुद हिसाब करूंगी। मुझे वहाँ "लेकर चलो !" पुसपा बाई को मावाज में लड़खड़ाहट थी, चेतना में नहीं । "इग्यारसीलाल "स्साला चोट्टा है । मुझे उस पर कत्तई विश्वास नहीं।" वह वक रही थी। होक-होक्-होक् ! उसने तनिक मकर मदरू की बांह पर के कर दी। फिर उसी तरह डगमगाती हुई चल पड़ी। वदरू ने शुबो को देखा तो वोला, "तुम भी आ जाओ !" "हां आ जाओ, पहलवान ! उम्मरकोटवाले आ गये हैं।" पुसपा बाई ने कहा । नयनो से दुर्गन्ध छोड़ते हुए, वार-वार । शुबो उन दोनों के पीछे हो लिया। माकाश में एक छोटा-सा तारा, तेजी से पूंछ चमकाता टुप्पा भागा और चोर की तरह अचानक गुम हो गया। कम्फ चुप था, लेकिन शुयो सोच रहा था और उसे लग रहा था, फेरा। जैसे मोच की दुनिया में ढेर-मी आवाजें बन गयी हैं। वे आवाजें किसी को सुनायी न दें, इसके लिए चेष्टा करते हुए शुबो ने गर्दन झटकाकर अपने रूग्वह-सुकाखड़ वालों में हाथ देर तक ऊँटों पर अनाज के बोरे लादे जाते रहे। कई जने उनके साथ आये थे । वे वासी उतावली में लदाई निपटाते रहे । शुबो और वदरू भण्डारे से बोरे निकाल कर बाहर रख रहे थे । इग्यारसीलाल और पुसपा बाई उनकी गिनती करने के लिए ऊँटों की कतार के बराबर जा खड़े हुए थे। "यह नाज 'दुसरे कम्फ में जायेगा?" गुबी ने एक क्षण के लिए कमर मीधी करते हुए और गहरी सांस लेते हुए, बदरू से पूछा । वदरू ने एक बोरे को घसीटकर ठांव पर लगाया। फिर हाथ मलते हुए बोला, "आस्ते बात करो, प्रास्ते ! "इस नाज को तो पुसपा बाई ने वेच दिया है, उधर वालों के हाथ । इग्यारसी- लाल की भी इसमें हिस्सेदारी है : 'सब कैम्पों में यही हो रहा है ।" एक ठिगने कद का आदमी ऊंटों के बीच ने निकलकर महसा प्रगट हुआ। पुमपा बाई ने कहा, "अब और नहीं, बस ।" "टीक्क है।" वह कनपटी खुजलाता हुआ बोला । “हिमाब चुकता कर दो।" इग्यारसीलाल भी लपकता हुआ आ गया। फिर कुछ फुसफुसाहटें । कुछ झिकझिक । कुछ रोष । कुछ सन्धिवाचक प्रलाप । और खामोशी । और लेन-देन । और दुआ-सलाम । ऊँट पगथड़े बजाते हुए चल पड़े। "सावधानी में जाना..." पुसपा वाई ने पीछे से कहा । "इन्तजाम करके आये हैं। कोई खत्तरा नहीं।" ठिगना आदमी हंसा। "फिर भी 'सचेत रहना अच्छा है।" "हाँ-हाँ।" ठिगना दौड़कर ऊँटों की पंगत में ओझल हो गया। चन्दरमा का चांदना ढीला-ढीला सा होकर गर्द में उलझा हुमा ४० / पत्तों की विरादरी

पा। काल में पहरा देनेवाले की लाठी दूर-पार ठक-ठा दर रही थी।
"शुवो !"पुसपा बाई ने पुकारा, "तुम्हें मैने कर कम्पको चौतारी
पर लगा दिया है। अच्छी तरह डिउटी बजाना, हांप।"
"सन्हा।" भुवो का गला फंस गया।
"कुछ भी नुकसान हो गया तो तुम्हारे जिम्मे पड़ेगा।"
वे तीनों तम्बुओ की तरफ लौट गये।
। टेढी.
शुवो अकेला गर्द-भरं चांदने मे गड़ा रहा।
ऊँट टीलो की ओट मे अदृश्य हो गये थे, किन्तु उनके पगभडो का
शोर धीमे-धीमे उछलता हुआ पास आ जाता था।
एक हिलोर उठकर पर आयो और शुबो अस्थिर हो उठा। रात,
चांदना, धूल और उनके बीच कुण्डली मारकर बैठी हुई उदासी । उसने
अपने आपको उस पुतले की भांति अनुभव किया, जिसे चिथडो में सपेट.
कर, कौओ को डराने के लिए, खेत में गडा कर दिया जाता
भेदी लकड़ियों से वने हाय-पैर, काली हांडी का मिर और उगमे जड़े हुए
दो भद्दे सूराख-आंखें ।
वह दौड़ने लगा । उमकी घबराहट उसके सग-संग दौडने लगी।
अस्तवल की सांकल तोडकर निकल आये घोडे की तरह वह भीतर ही-
भीतर हिनहिना रहा था। एक अनयक हिनहिनाहट ।
कम्फ की
हद मे निकल कर शुवो उस रास्ते पर आ गया, जिधर से
होकर अभी ऊँट गुजरे थे।
तभी वह ऑये मुंह गिर पड़ा। आंख-नाक-कान रेत मे धंसमस हो
गये । वह तुरन्त अपने को झडकारता-फटकारता हुआ उठा । भौहों को
सिकोड़कर उसने आजू-बाजू देखा । एक स्याह टूह पर उसको घधकती
हुई पुतलियां थिर हो गयौं । फिर वह उस दूह पर ऐसे चढ़ गया,
मानो
किसी ने उसे हवा में ऊपर उछाल दिया हो।

. थोड़ी देर की जांच-पड़ताल के बाद शुवो को मालूम हो गया वह टूह अनाज के दो वोरों का है । वे किसी ऊँट पर से गिर गये, ये और स्यात जल्दबाजी में उन लोगों के ध्यान में आये नहीं। शुवो ने कान लगाकर, सांस थामकर सुना । ऊँट अब तक काफी दूर जा चुके थे। पगथड़ों का वजना बन्द हो गया था। वह कुछ पल उन वोरों को घूरता रहा । उसे विश्वास नहीं भा रहा था कि जो दृश्य सामने है, वह सच है- -एकदम ठोस ! एक खयाल आया कि पुसपा बाई को खबर कर दे, लेकिन अगले ही क्षण अन्दर से जोरदार इनकार का स्वर उफन पड़ा। नहीं, इन बोरों पर न पुसपा बाई का हक है, न उम्मरकोटवालों का । ये बोरे तो कम्फ के लिए भेजे थे सिरकार ने । टीले की अव-ऊंचाई मे बोरों को लुढ़काते हुए वह ठेठ तल्ली में ले आया । बहुत जोर लगाना पड़ा। हंफनी चालू हो गयी। कुछ सुस्ताया शुवो, फिर नाप-जोखकर बड़ा-सा गड्ढा खोदने में जुट गया। एक मोटी लकड़ी का कुदाल की तरह इस्तेमाल करते हुए, वह जमीन की परतें छांट रहा था-कभी हथेलियों से, कभी अंगुलियों और नखों से। गड्ढा तयार हुआ तो वह इधर-उधर से आक-फोग और घासफूस बटोर लाया, धोड़े-ने पत्थर भी। दोनों बोरे गड्ढे में लुढ़काकर पत्थरों की चौहद्दी बनायी। फिर रेत डाली। फिर घास की तह । फिर, और गाढ़ी- गाढ़ी रेत । सव-कुछ ठीक-ठाक जमाकर, और काम समाप्त कर जब उसने इत्मीनान की भरी-पूरी सांस ली और दूर-दराज नजर उटायी तो पो फट रही थी। वह तेज चाल से कम्फ की ओर लौट पड़ा । कुछ सोचता हुमा। कुछ खोया-खोया। लेकिन एक खुशफल रोमांच और नये-नये से जागरण में न्हाता हुआ। ४२ / पत्तों को बिरादरी मौ-डेढ़ सौ डग के बाद गुदो ने पलटकर देखा । नहीं, टीलों के बीच बने उस गड्ढे का किसी को पता नहीं चलता था। ऊपर, अच्छी तरह रेत पाट दी गयो यो, बरोबर-बरोबर । मामूली शक को भी गुंजाइश नही थी। पसीने से भीगा भीगा शुवो भण्डारे की कच्ची दीवाल पर टांगें लटका- फर बैठ गया। हवा की सनसनीखेज, मीठी ठण्ड रगों में रमने लगी। पल भर के लिए पलको में नीद लहरायो, फिर उड गयी। वह सोना नहीं चाहता था, इस समय । बरसो बाद, उसकी इच्छा पंख फैलाकर लहर-लहर लहरने लगी। धोतिये के कमरबन्द की गोठ से उसने धुरा- लिया निकाला और वजाने लगा-टिंटिकटिंउटिकटिउटिज... एक गहरी-गहरी लय, एक उजली-धनी इसी, एक अकूत अपनापे की गन्ध ! उन्होंने सुबो को घेर लिया। वे सब थे, उसके चारों ओर। हद्दी, जमाल, सिराम, गज्जी, ज्यानकी, फुलकी, गोदारी, सुवटी" सब के सब । सुबह हो रही थी। शुबी भव गाने लगा। केसरिया बालम । वह जैसे नशे में था। मत्त । चकित-से वे उमे देख रहे थे, चीन्ह रहे थे। यह चीन्हना, तमाम अन्धकार के बावजूद, अपने मे जो कुछ भावदार और साबुत था, उसे पाने का एक यल था । बदरू भी वहां आ गया। उसने मुग्ध भाय से कहा, "गला अच्छा पाया है इसने !" नीली-पीली किरनों की धूप चमचमाती हुई उतरने लगी। उसमे एक भिन्न किस्म की चहक थी, रेतरहित और मीठी । अपने तम्बू के तिरपाल की एक फड़कती हुई दरार से बछराज ने उस प की कोमलता को और पुरालिये की धुन में गहरी होती हुई सुन्दरता को टूटी-टूटी नजरों से देखा । एक लम्बी सांस लेकर उसने मुंह फेर लिया। दरख्तो और कच्ची छाजनों पर एक सुनहला छिड़काव-सा हो गया था। चेहरे पर चकरायेपन को थामे-थाने गज्जी सहसा झनझना-सा उठा। फिर उसके मन की वह झंकार कम्फ में दौड़ गयी। उसने शुबो के कन्धे पर हाथ रख दिया। तभी ने इग्यारसीलाल आता हुआ दिखाकी दिया । एक हाथ मुड़कर कमर में फँमा हुआ, दूसन कलाई तक खाली लोटे के मुंह में घुसा हुआ। वह हाजत-फरागत से लौट रहा था। शुबो के आसपास खड़े लोगों में एकाएक घबराहट फैल गयी। उनके चेहरे एक-एक कर उजड़ने लगे । वे चुपचाप वहां से खिसक लिये । "ये इत्ता हल्ला क्यों मचा रखा है ?'' पानी के कोठे पर आकर ग्यारसीलाल ने लोटा परे फेंक दिया। वदरू ने लपककर लोटा उठा लिया और फिर वहीं जमीन पर बैठकर उसे रेत से मांजने लगा। शुबो का नशा टूटा, लेकिन पूरी तरह नहीं। उसके कब्जे में अनाज के दो बोरे थे । निर्फ उमी को पता था कि वह अब खाने बाजरे का मालिक है । किसी लाट-बच्चे की भी परवा नहीं उसको। "क्या है ?'' शुबो की ताड़ती हुई दृष्टि ऊपर उठी । "सुबै-सुवै क्यों बोका फाड़ रहे हो !" इग्यारसीलाल के फुफकारते हए होंठ व्यंग्य मे टेढ़े हो गये, “कैम्प की रोटियां पचती नहीं हैं क्या ?" "तुम फिर भिड़ना चाहते हो मुझसे ?" शुबो की आँखों में बछियों की-सी धार तड़प उठी। इग्यारसीलाल ने पानी से हाथ धोये । बोला, "होश में रहो, को में । यह तुम्हारे बाप की जागीर नहीं है, बच्चू !" ४४ / पत्तों की बिरादरी शुबो के तन मे अंगारे उछलने लगे, किन्तु उसके कुछ कहने से पहले ही इग्यारसीलाल तेज-तेज कदमो से पुसपा बाई के तम्बू की ओर बढ़ गया। कम्फ की और कुछ न देखने का मिस करती हुई भी सब-कुछ देख रही थी। अपने गले के काले धागे में भूलते हुए ताम्बे के दाने को अंगुलियो में पकडे-पकडे शुत्रो उकम-उमइते गुस्ने पर काबू पाने को चैप्टा करता "टट्ट की औलाद है, स्साला । ठोकर ने मानेगा, बात से नहीं।" वह बड़वडाया। घोडी देर बाद वदरू मियां के जरिये शुवो को बुलाहट पडी । वह गया। स्यात पुसपा बाई आज उसके साथ भी कोडे मे पैश आयेगी, उसने सोचा और होंठ काट लिये। तम्बू जाने कैसी बुरी-सी गन्ध में भभक रहा था। शुवो के नथुने सुलगने लगे। फिर सामने पडी, वासी-बुसे चेहरेवाली वह यलयली औरत । सिर पर फफूंद की तरह छितराये हुए बाल । सीधी, उठग-लग नाक और उसके छेद मे जडी हुई मली नयनी । आँखो के निचले मास मैं स्याह धम्बो का चिपचिपा छितराव और "शुवो का जो मितलाने लगा। H "तुम गा रहे थे?" "रात-भर जागने से थक गये होगे, अब जाकर सो जाओ।" पुसपा बाई ने उसे घूरते हुए कहा। "मैं थका नहीं हूँ।" "और कैम्पवालों के सामने ऐसे-वैसे मत बोला करो। तुम्हें तो मजे का काम दे दिया गया है, अच्छी तरह रहो।" इग्यारसीलाल अचानक उचक पड़ा, "इसको वोलने तक का शकर नहीं।" . शुवो ने खदेड़ती हुई निगाह से इग्यारसीलाल को देखा। वह लाल- पीला होकर उकडू वैठा था। घुटने थपकता हुआ तमतमाकर वोला, "तुम उधर से आये हो । तुम्हें अपनी हैसियत का पता होना चाहिए।" "तुम अपनी चिन्ता करो।" शुवो को ताव आ गया। "जवान लड़ाते हो ! पुलीस को खवर हो गयी तो मारे जानोगे। तुम उनके जासूस हो, जासूस !" कुछ भी होऊ, लेकिन तुम पक्क चोर हो । कम्फ से अनाज की चोरी करते हो और उधर भिजवाते हो।" "आगे एक लफज भी वोला तो टेंटुआ तोड़ दूंगा तेरा।" इग्यारसी- लाल आपे से बाहर हो गया। "आओ, तोड़कर देखो!" "कुच्छ नही, कुच्छ नहीं, भई !" पुसपा वाई ने टोका, “इग्यारसी, तुम अभी जाओ । खामखां फटे पड़ रहे हो।" इग्यारसीलाल तुरन्त चला गया, पैर धमकाता हुआ। चोट खाये हुए जानवर-सा । पुसपा बाई ने शुवो को तोलती दृष्टि से देखकर कहा, "तुम्हें इस तरह नाराज होने की जरूरत नहीं।" "नार्राज तो वो ही हो रहा था।" उसी समय बछराज ने तम्बू के अन्दर झांका। पुसपा बाई उबल पड़ी, “यहाँ कोई तमाश्शा हो रहा है क्या ? बार-बार यह आना-जाना क्या लगा रखा है, तुम लोगों ने ?" वछराज तत्काल पलटकर चल दिया। "मेरे सिर में तो हथौड़े चल रहे हैं इस वक्त ।" पुसपा बाई ने माया पकड़ लिया, "नींद न आने से कनपटियां दरद करने लगती हैं।" "मैं जाऊं?" ४६ / पत्तों की बिरादरी " पुसपा वाई कराहती हुई पसर गयी माची पर। बदरू तेल की शीशी लेकर सिरहाने आ खडा हआ और मालिश करने लगा। "वात यह है कि तुम जरा सावधानी में रहो। मैंने तो बछराज के कहने पर तुम्हें यहाँ रख लिया है, लेकिन ऊपर राज मे किसी ने शिकायत कर दी तो युग होगा । तुम दूसरे मुल्क के हो-" पुसपा बाई की आंखें बन्द थी । शुबो में सहन नहीं हुआ। बोला, "मुलुक-उलुक में नहीं जानता-- "नही जानते तो जानना होगा।"पुमपा बाई की आवाज मे कड़ापन आ गया, "मैंने रहम दिखलाया है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि तुम जो मन मे माये बकने लगो।" "ठीक है, तुम अपना रहम अपने पास रखो और तेल लगवाती रहो।" शुवो दनदनाता हुआ बाहर निकल गया । खुले में आकर उसने गहरी, साफ सांस ली और उस घिन को झाड- कर फेंक दिया, जो तम्बू में घुसते ही उसके अन्दर-बाहर मंडराने लग गयी थी। कम्फ में कानाफूसी थी। एक दवी-दवी उत्तेजना । वेचनी। शुवो सीधा चौके में गया । हद्दी ने उसके निकट आकर पूछा, "मारा उमने ?" "हाय उठाके तो देखे मुझ पर ! स्साली इतराती है !" शुवो गरज पड़ा। "अपनी पीठ करता इधर ! शेखी मत वधारो, पुसपा बाई का कोड़ा किसी को बसंसता नहीं।" किसी ने कहा। शुबो ने सीजकर एक फेरा लगा दिया, "लो देख लो, मेरी पीठ, अच्छी तरह देख लो!"

"होस्यार, होस्यार हो !" तभी बछराज की हाँक सुनायी दी। सड़क के काम पर ले जाने से पहले वह इसी तरह जोर से कम्फ में आवाज लगाता था। सब उसकी तरफ पलट पड़े। जल्दी-जल्दी । "चलो, चलो, जल्दी करो।" बछराज कम्फवालों की टुकड़ियाँ बना रहा था। धूप में तेजी भर चुकी थी और, धूल की तीखी गन्ध भी। लेसुए के पेड़ पर एक कौआ चीख रहा था । शुबो ने उसकी तरफ कंकर फेंका। वह बेतरह कांव-काव करता हुआ कम्फ पर मंडराने लगा। बाटियों की पोटली खोलते हुए शुबो को 'अपना' बाजरा याद आया, वो दो वोरे । उसने जल्दी-जल्दी निवाले लूंसकर पोटली रख दी और चल पड़ा। कम्फ खाली हो चुका था। सड़क का काम काफी दूर तक चला गया था । उधर ने आवाजें आ रही थीं, छोटे-छोटे गुच्छों में । "शुवो! वह मुड़ा। बदरू था। नजदीक आकर वह इधर-उधर ताकने लगा। "इग्यारसीलाल से बचके रहना । वो अपनी वन्दूक साफ कर रहा है । सनकी है, और अन्वल दर्जे का हरामी ! जाने क्या कर डाले-" शुबो हमा । वदरू तेजी से दूसरी तरफ निकल गया, सकपकाया हुआ। ४० पत्तों की विरादरी कीकर का एक अंजर-पजर पेड़ था। उस पर चढ़कर देखने से शुबो को निजू नाज का भण्डारा' माफ नजर आता था, एक छोटी टेकडी की शक्ल में। दूर से देखकर ही शुवो ने मन में तसल्ली कर ली। पास जाकर टोह लेना ठीक नहीं, किसी को शक हो सकता है। करारे-केटीले कीकर पर पांव लटकाकर बैठे-बैठे शुबो की आँखों मे फिर मद-उन्माद छाने लगा। रगों में कमायचा की डबडवाती हुई लय तरंगाने लगी। टॉग हिला हिलाकर, पुट्ठों पर हथेलियो से ताल देता हुआ, यह एक अद्भुत आनन्द में रम गया।"नाज के उन दो बोरों ने शुरो की दुनिया में हलचल खडी कर दी थी। वह खुश था, और एक ठेट किरसाण की तरह यह सोचकर कि जब तक 'नाज' है, तब तक 'आज' है-अपनी खुशी को वर्तमान में पुख्ता बना रहा था। उसके स्वभाव का असली रंग लौट आया या साहस, सिरफ साहस ! फतियाँ- वाली ढाणी के बाशिन्दों के सामने शुवो की यही पहचान थी। लेकिन- दुरभिक्ख ! बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना और दाने-दाने के लिए बिलखना-भटकना । मनुष्यों और मवेशियों की लाशों के बियावान में उतरते-डूबते हुए वे दिन और रात । मृत्यु, और मृत्यु से भी ज्यादा उसका नंगा भय । इस भय ने शुदो को एकदम निहत्या बना दिया था । वह कुछ । - . नहीं कर सकता था, पल-पल मरते और नष्ट होते जाने के सिवाय । अकाल की डरावनी छायाओं से घिरा हुआ शुबो निरन्तर एक अबूझ जड़ता और कायरता के कीच में धंसता चला गया। उम्मीद उससे विछुड़ गयी थी। प्राण किसी पिलपिले पैदे में जा टिके थे। कम्फ में आकर शुवो अपनी उन ढाणियों-बस्तियों पर अफसोस करना भूल गया, जो अव उजाड़ हो गयी थीं। असल में, वही लोग तो अव यहाँ थे। उसकी विरादरी के लोग। लेकिन, खोये-खोये से । चिन्तामों में डूवे । आशंकाओं में लटके । उनके बीच शुवो ने स्वयं को सुरक्षित महसूस किया। लगा, एक नयी ढाणी बस गयी है । किन्तु उस उदास ढाणी के पास अपना कुछ नहीं था। कहने या झूठमूठ जताने-भर के लिए भी नहीं।" मां कहती थी, अनाज के दानों में बड़ा ताप, बड़ा उजास होता है। शुवो आज उसी ताप और उजाले की शक्ति का अनुभव कर रहा था। एक निडर निगाह उसने 'टेकड़ी' पर डाली और पेड़ पर से उतरने लगा। तने पर लिपटते-रपटते उसने निस्च किया कि अब कैसी भी काली-भकराली आफत-बांधी आये, वह वहाद्दरी से डटेगा और जमकर मुकाबला करेगा। मुलुक ! जहाँ तक भूरी-भुरभुरी रेत है, वहां तक उसका मुलुक है और रहेगा। किसी की खाली-पीली भवकी से शुवो नहीं डरेगा। कोला- यत तक उसकी रिश्तेदारी है । और, जोधपुर के पास बिलाड़ा गाम में उसके मामा रहते हैं। उन लोगों का कौन-सा मुलुक है ? कभी मोलाकात हुई तो वह उनसे जरूर पूछेगा। शुवो हाहाहः हँसने लगा। मुझे मुलुक का डर दिखलाकर धौंस जमाना चाहते हैं, इग्यारसीलाल और पुसपा बाई ! ऐसे गये-गुजगें का तो सच में ही कोई मुलुक नहीं होता है। वो हर चीज को हड़प जाते हैं । फल को, फूल को, पत्तों को, जड़ों को और मिट्टी को भी। सव तरफ उनका जवड़ा तना हुआ है और पैने दाँत किट-किट कर रहे हैं। ५०) पत्तों की विरादरी

" पाबूजी को!" पौधे से बाधाज मानो।
" हो !" शुबो के मुंह से निकला । वह हारका सा
चेहरे पर भगोये का दान मारे हुए एक नम्पन्नांग मिनय सुबो
वीपीठ पर सढ़ाया।
"मुझे जानते हो?"
"नहीं।" गुवो ने सिर हिलाया।
"मैं-हरलो ! समझ गये।"
शुवो कुछ नहीं समझ पाया, लेकिन सामोश रहा।
"तुम्हारा कम्फ यहां से कित्ती दूर है ?"
"नजदीक ही है।
हरलो ने घोतिये की गांठ से एक पुडिया निकालकर पोली। उसमे
मम्मल था।।।
"कोकर पर क्यों चढ़े ये?"
"ऐसे ही।"
"मस्ती मार रहे थे !" हरलो मुस्कराया । उसने अफीम की टुकड़ी
तोड़कर खुराक बनायो । एक खुराक यो की ओर आगे यार योला, "लो,
और भी मस्ती करो।"
अरसे से शुवो ने अम्मल नहीं चसा था । उसका सुवाद सक भूरा गया
था वह । पराक लेकर उसने जीभ की मांटी में रख सी। फिर हरलो री
पूछा, "तुम कम्फ में भरती के लिए मामे हो?"
"नहीं।"
"तो फिर?"
"मुझे फरफ में जरूरी काम है।"
हरलो कीकर मे लगकर खड़ा हो गया और अपनी हथेली माने
लगा।
"कोनसे कम में?"
शुवो के सवाल को टारने दृाहली ने कहा, "इस्पारणीया,
.
.

आदमी है।" "तुम्हारा कैसे ?" "वो धन्धे में मेरे साथ है।" "मेरी तो ठन गयी है उससे ।" शुबो भवें सिकोड़कर बोला। "क्यों ? क्या हुआ ?" "यों तो कुच्छ नहीं-वस, हेकड़ी छांट रहा था मुझ पर कि मैंने डांट- कर चेता दिया।" "मजाक मत करो।" "इसमें मजाक क्या ?" "इग्यारसीलाल को डपटने का हौसला तुम नहीं कर सकते।" "ऐसा दान्ना है क्या वो? खा जायेगा मुझे ?" "हां, खा जायेगा।" हरलो ने सिर हिलाया, "इधर''मेरी भी खटपट चल रही है उससे । अच्छा, यह वताओ, अनाज-वनाज है आज- कल कम्फ में?" शुबो चौंकते-चौंकते थिर हो गया। उसने हरलो को गौर से देखा सन्देह हुआ। बोला, "मुझे मालूम नहीं।" "छुपा रहे हो मुझसे ?" "नहीं, छुपाना क्या ?" "देखो, पछताओगे।" "क्यों ?" ''मुझसे झूठ बोलनेवाले को सजा मिलती है।" शुबो तन गया, "कौन देता है सजा ? तुम ?" "हां, मैं ।" हरलो ने कमरपेटी खोलकर कटार निकाल ली। उस आंखों में लड़ाकूपन चमक उठा। "यह चाकू-छुरी रहने दो। मैंने भी पट्टा खेला है।" "तो एक बार मेरे साथ भी खेल लो।' "छोड़ो। मुझे अभी कम्फ में लौटना है।" - ५२ / पत्तों की बिरादरी

बेकार साबित हो गयी है । सण्टा करीब दो-हाथ लम्बाथा और हननी तेजी
"ऐसे कैसे लोट जाओगे ?" हरलो रास्ता रोककर आगे पड़ गया,
"तुम्हें मुझसे पट्टा खेलना पडेगा।"
"अकडो मत।"
"चुप वे, हरामी!"
"गाली देते हो?"
"देता हूँ। झांट उखाड़ लो मेरो।"
सामने खुली कटार थी। हरलो था। हवा के झपाटे थे। शुबो ने
महसूस किया, यही वह क्षण है-जुल्लम और जबरदस्ती को कुचल
देने का क्षण। उसने तेजी से खीप की लचीली, बेंत जैसी ताडियाँ तोड़-
कर मुट्ठी में भर ली, "रुको, तुम्हारे साथ पट्टा खेलना ही होगा।"
हरलो कटखने ढंग मे मुस्कराया, ' खीप में खेलोगे?"
"हाँ, पट्टा कहां से पायेगा अब"
खींप की ताडियों को गूंघकर शुबो ने एक जोरदार सण्टा बना
लिया। हरलो गुम्म-सम्म, उसे अपनी नुकीली नजरो मे छीलने की ऐंठ
दरसाता रहा।
"तैयार हो ?" शुबो ने पूछा।
"हां, वार करो?" कटार पर हरलो की पकड सरून पड गयी।
"लो !" शुबो ने सडाक से हरलो के चेहरे और गर्दन को नापता
हुआ सप्टा जड दिया।
हरलो उछला, पोछे हटा। फिर उमने निशाना साधकर छलांग
लगायी और शुबो की बांह पर कटार मे सीधा वार किया। शुवो बच
निकला, किन्तु उसका सप्टा सड-सडाक्-सड-सटाक् हवा मे गरजता
रहा । उसने हरलो को पीठ, छाती और पिण्डलियो को धुन डाला । हरतो
चकरा गया । एकदम उसे लगा कि सीप के सण्टे के सामने उसकी क्यार
।

से लहरा था कि हरलो को कटार चलाने का अवसर ही नहीं दे रहा था। तभी शुबो ने हरलो के चेहरे पर हमला किया। माथे और कनपटी पर लहू चमकाता हुआ सण्टा शून्य में सनसना गया। हरलो ने एक वांह से मुंह ढंक लिया । तिलमिलाते हुए उसने झाग उगला, “सूअर की औलाद, अब तो मैं तुम्हें जान से मार डालूंगा । तुमने मेरी आंख फोड़ डाली है।" "मैंने तो पहले ही मना किया था।" शुबो हांफता हुआ बोला। "ऐसी की तैसी ।" आस्तीन से भौंह का खून पोंछकर हरलो एका- एक लपका, चीते की तरह । दाँत किटकिटाता और हुमकार भरता हुा । शुबो के मण्टे को उसने बीच से काट डाला । फिर कटार घुमा- कर आगे बढ़ा, किन्तु शुवो बचाव के लिए वैठ गया। बैठे-बैठे ही उसने हरलो के घुटनों पर टंगड़ी लगा दी। बिल्कुल अंटाचित्त, हरलो उलझ- कर गिर पड़ा । कटार पर मुट्ठी की पकड़ ढीली हुई। और, उसी समय शुवो ने उसकी कलाई को पांव से दवाकर चीथ दिया। हरलो के होंठों से चीख निकल गयी। कटार छूटकर अलग जा पड़ी। हरलो उसे उठाने के लिए मुड़ा, किन्तु तभी शुवो ने एक तगड़ी ठोकर उसकी ढड्डी पर जड़ दी, जबड़े बज उठे और वह रेत में लुढ़क गया । "मुझे वखस दो।" हरलो पीड़ा-भरे स्वर में गिड़गिड़ाया । शुबो उसकी पीठ पर सवार था, तेज-तेज सांसों में हचमचाता हुआ। हरलो के ढाठे के कपड़े को झकझोरते उसने पूछा, "तुम क्या धन्धा करते हो?" "मैं हरलो हूँ।" "यह तो मुझे मालूम है।" "हरलो डाकू का नाम तुमने नहीं सुना ?" "तुम डाका डालते हो?" "आंहाँ-हां, जित्ते कम्फ हैं यहाँ, सब घबराते हैं मुझसे "मौका हाथ लगते ही मैं उनका नाज-पात लूट लेता हूँ।" ५४ / पत्तों को विरादरी

"फिर तो टोली होगी तुम्हारी ?"
।
"हां, ग्यारह जने हैं हम।"
"ऊँट भी हैं ?"
"सबके पास।"
"इग्यारसीलाल से तुम्हारा क्या नाता है ?"
"यो ब्यौपारी है, लेकिन बहोत पत्तरनाक ! उसकी भी टोली है।"
"कम्फ के नाज का ब्यौपार करता है वो?"
"वो तो पुसपा बाई करती है, इग्यारसीलाल सिरफ हिस्सेदार है।
लेकिन उसका अपना धन्धा है-इलायची, लौंग, सुपारी और सोने-चांदी
का । इंदोस्तान में कई जगह से माल लेकर उसके लोग यहां आते हैं ।
- हमारे साथ सौदा तय होता है और फिर हम उसे पसेस्तान में छाछरो से
आगे तक पहुंचा देते हैं।"
"अच्छा !" शुवो हैरत में पड़ गया।
"लेकिन-इधर इग्यारसीलाल ने हमारे साथ हिसाब-किताब बन्द
कर दिया है। कोई और पाल्टी पकड़ ली है उसने । लालची कुत्ता है,
स्साला!"
"उस पाल्टी के बारे के बता सकते हो चुछ
"उम्मरकोट की है।"
"तुमसे ज्यादा जोरावर है ?"
"हो । उनके पास चालीस ऊंट और इत्ते ही सवार हैं।"
सुबो की आँखो के भागे, रात का बोरों को लदाईवाला दृश्य
घूम गया।
"तुम हमारे कम्फ को तो नहीं लूटोगे ?"
हरलो चुप रहा।
"उस पर आंख लगायी तो वहोत बुरा हाल होगा, समझ लेना।"
"तुम हमारे संग क्यों नहीं मा जाते हो?" हरलो ने धीमेसे कहा,
"मैं तुम्हारे लिए कंट का इन्तजाम कर दूंगा।"
.

शुवो ने हरलो को छोड़ दिया। किन्तु उसने लपककर कटार उठा ली;.
धार को पोंछा और धोतिये की मांट में घुसेड़ लिया।
"तुम काफी तगड़े हो । कम्फ में तुम्हारा क्या काम ! वहाँ रहके तो
सड़ जाओगे।" हरलो उठा और मुंह में भर गयी रेत को निकालने के
लिए थू-थू करता रहा।
"कम्फ में मैं अपने लोगों के बीच हूं।"
"सव दो कौड़ी के हैं। मेरे साथ पटेगी तुम्हारी।"
"नहीं पटेगी।"
"मसखरी खूब कर लेते हो तुम ! अच्छा, कटार मुझे दे दो।"
"एक हथियार तो मेरे पास भी रहना ही चाहिए।"
"मेरी टोली में आ जामोगे तो हथियारों की कमी नहीं रहेगी।
कटार वापस कर दो।"
"नहीं।"
"यह तो ज्यादती है।"
"इस ज्यादती के लिए तुम खुद ही जिम्मेदार हो।"
"अव मिलाप कर लो।"
शुबो ने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। पांव-पंजों से रेत
उछालता हुआ वह चल पड़ा। थोड़ी दूर जाकर वह मुड़ा।
"हो-हरलो, हमारे कम्फ में कोई खुरापात रचने की जुगत मत
बिठाना 'सुन लो, ऐसी वेभाव की मार पड़ेगी कि सारी राग-जकड़ी
भूल जाओगे। मैं तुम्हें सचेत किये देता हूँ।"
हरलो ने शुबो को कोई जवाब नहीं दिया । अंगोछे का ढाठा दुवारा
लगाकर वह धीमे कदमों से टीवों में ओझल हो गया।
कम्फ से लौटकर शुवो ने यों ही एक लम्वा चक्कर लगाया,
फिर
पानी के कोठे पर रुककर पानी पीने लगा । करारी पियास लगी थी।
पानी की ठंडी धार अन्दर उतर गयी तो सारा कुछ शीतल-शीतल हो गया।
कोठे की आड़ में छांह बन गयी थी। शुवो वहीं लेट गया। नींद
५६ / पत्तों की विरादरी

के जाले घेरने लगे। पलकों पर सैकड़ो पावे जमा होकर नीलो धुन्ध में
खो गये।
"शुवो ! सो रहे हो क्या ?"
एक गेरुई चट्टान को फिसलपट्टी बनाकर मौज से फिसलते हुए शुवो
'ने बदरू की आवाज सुनी।
भटके मे आंख खुली और एकाएक उसके कुछ पल्ले न पड़ा।
शाम को धूप बदरू मियां की दाढी में फंसी हुई थी। सूखी पत्तल
जैसा उसका चेहरा, सावधानी से अपनी झुरियो और मिकुड़नों को संभाले
हुए पा । आँखों की पुतलियो पर मोम की-सी पर्त पडी हुई थी।
"मैंने तुम्हें जगा दिया।"
घदरू ने सुबो की आँखों में लाल डोरियां देखकर अफसोस और
संकोच से कहा।
"माज तो खूब मोद भायी।" सुबो मुस्कराया ।
"इग्यारसीलाल याद कर रहा है तुम्हें।"
"क्यों?"
"पता नहीं।"
"तम्बू में बुलाकर गोली मारेगा ?"
"बन्दूक तो उसने फिर खूटी पर टांग दी है।"
"अच्छा! खर, चलो।"
बेमन से स्वयं को धकेलता हुआ शुचो तम्बू तक गया । इग्यारसीलाल
दुआरे पर ही खड़ा था । शुवो को देखकर वह अजीब ढंग से हिलने लगा,
मानो बगलों में बरं घुस गये हों।
"अन्दर आओ।" उसने कहा और फूली-फूली आँखों को मिच-मिच
करने लगा।
शुवो उसके पीछे-पीछे भीतर गया।

.
साफ-सुथरा तम्बू । पुसपा बाई 'वाले' से अलग और इत्तर की भीनी,
मोहक गन्ध में सराबोर । शुबो को मुढ़े पर बैठने के लिए कहकर
इग्यारसीलाल गद्दे पर पसर गया । इस गद्दे, इस विस्तर के बारे में
सुवटी ने उसे बतलाया था। लेटे-लेटे करवट बदलो तो एकदम उछलता
है-~-ऐसा लगता है, मानो पवन-हिंडोला !
"कोई खास बात नही थी।" इग्यारसीलाल झंपने लगा और फिर
उस भैप को परगट न होने देने की जिद में विचित्र-सा हो गया, "मैंने
सोचा, तुम्हारे साथ सुलह कर ली जाये।"
"तुमसे मेरी कोई लाग नहीं ।"
"यही तो मैं कहता हूँ । लेकिन तुम पुसपा बाई के जंजाल में मत
पड़ जाना।"
"मुझे क्या लेना-देना है !"
"फिर भी मैं तुम्हें होस्यार कर देना ठीक समझता हूँ। अपने
मतलब के लिए वो लोगों को गांठनी रहती है, लेकिन बदले में देती कुछ
नहीं।"
"तुम्हें तो ऐसा नहीं कहना चाहिए।"
"क्यों नहीं ? मैंने ही सबसे ज्यादा झेला है।"
"तुम लोगों की माया तुम जानो।"
"मैंने हरलो के साथ तुम्हारी लड़ाई देखी थी।"
"ओह !' शुबो को ताज्जुब हुआ, "तुम उधर क्यों गये थे?"
"तुम्हें खत्तम करने के लिए।"
"बन्दूक लेकर ?" शुवो ने ताना लगाया ।
"हाँ । मैं बहुत गुस्से में था। ''तुम्हें उस तरफ जाते देखकर मैंने
पीछा किया।"
"फिर छोड़ क्यों दिया मुझे ?"
“मैंने देखा कि तुम हरलो के साथ उलझे हुए हो । मुझे विसवास
था कि हरलो तुम्हें सूत डालेगा, मसल देगा कीड़े की तरह, लेकिन
५८ पत्तों की बिरादरी

उल्टा हो गया।"
"तुम्हें बुरा लगा?"
"नही । मेरे मन का भाव बदल गया।"हरलो बहोत गन्दा
कमीना ! उसे तुमने खूब सबक सिखाया।"
"लड़ने की मेरी इच्छा नही थी।" एकाएक शुवो निस्तेज होकर
ऊबने लगा।
"तुम बल-बूते वाले हो और निडर भी । कम्फ की पहरेदारी करो
और आनन्द से रहो । हमारा-तुम्हारा कोई झगड़ा नही ।"
हवा ने तम्बू को जोर से फडफडाया। एक रहस्यमयी हुकार-सी
हुई । शुवो ने एक लम्बी सांस ली, "मुझे तो सब कुछ अजीब लग रहा
। एक जिन्दगी तो आदमी खुद जीता है, अपने आप, अपने ढंग से ।
लेकिन---उसी जिन्दगी को, कुछ घटनाएं दूसरे ढग से जीने लगती
हैं.और वही ठीक मान ली जाती है।..."

सड़क का काम अब खनम होने को आया था। सारे कम्फ सड़क की रेख के किनारे-किनारे लगाये गये थे और उन्होंने अपने-अपने हिस्से को पार लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लूओं की सनसनी इन दिनों बढ़ गयी थी । जब्बर झफोड़े चल रहे थे। बालू भड़भूजे के भाड़ की तरह भभकती रहती थी। विना पगरखी के जमीन पर पाँव टेकना कठिन था। रेत के टूह रात में भी तपते रहते थे। राज का असवार पुसपा बाई के पास आया, पुरजी पर नयी 'इसकीम' लेकर । तल्लाब की खुदाई के लिए। पानी की उन गांव-ढाणियों में बारहों महीने किल्लत रहती थी। कहीं-कहीं तो आठ-नौ बस्तियों के बीच एक ही कुआँ या जोहड़ था। बूंद-बूंद किफायत से बरतकर किसी तरह काम चलाया जाता था। इस लिए, इस बार सरकार ने फैसला किया कि जब तक अकाल है, तल्लाब बनवा डालो लोगों से । बरखा होगी तो सव भर जायेंगे और पानी का संकट मिटेगा । पक्के तल्लाब में दो-ढाई साल तक भी पानी टिक जाता था। पुसपा बाई ने 'इसकीम' पर हां भर दी और असवार लौट गया। लेकिन --उसी रोज साँझ पड़े समंचार आया कि छह कोस पर का एक कम्फ लूट लिया, हरलो की टोली ने । सुना गया कि एक आदमी ने सामना करने की कोशिश की थी, उसे फूस के ढेर पर डालकर जिन्दा जला दिया गया। ६० पत्तों की विरादरी इस सम्बर से चौतरफ की हवा में भय भर गया। पुसपा बाई अपने में ऐसे उछलने लगी, मानो सारे बदन मे लाल चींटियां चिपट गयी हों और जमीन में हर जगह सांपों के बिल नजर आने लगे हों। तुरन्त हालत पर विचार करने के लिए मण्डली जमा हुई । भुवो पर कम्फ को चौकसी और देखभाल का जिम्मा पा, अतः उसे भी बुलाया गया। इग्यारसीलाल और बछराज मौजूद थे ही। "क्या करना चाहिए ?" पुसपा बाई की आवाज में आज दारू की नहीं, स्यापे और सन्नाटे की मारक गन्ध थी। "मभीत होने से तो कुछ होगा नहीं, सोच लो !" सुवों ने ठक् मे अपनी लाठी नीचे रख दी। यह लाठी हाल ही मे हद्दी ने बनाकर दी थी। फिर ज्यानको काकी ने उस पर ताम्बे के कड़े तार कस दिये थे। "उपाय करना पड़ेगा।" इग्यारसीलाल ने दुवके-दुबके बहा। वह सहमा हुआ था। "कोई बतला रहा था कि आजकल वो''इघर हो चक्कर लगा रहा है।" पुसपा बाई की चिन्ता फैलने लगी, "मेरा खयाल है, उम्मरकोट- वालो के कुछ भादमी हम यहां बुला लें । वे हमारे साथ रहेगे और सब संभाल लेंगे।" "इसकी कोई जरूरत नहीं।" बछराज ने टोका । उसका स्वर हमेशा की तरह निःसंग और उचाट था, "हमारे कम्फ मे जान पर सेल जानेवाले लोग हैं । हरलो के छक्के छुड़ा देंगे वे।" "सच्ची बात है.।" गुबो ने सराहना से बछराज की तरफ देखा। "थाना भी आजकल खाली पड़ा है।" पुसपा बाई ने उसी तरह मुरझाये हुए कहा, "नया थानेदार आयेगा तो कुछ बन्दोबस्त होगा।" "फिर भी, वहाँ इत्तला भिजवा देना ठीक रहेगा।" इग्यारसीपार हर से उबरने की चेष्टा कर रहा था।

"हां-हां, मैं भिजवा दूंगी। लेकिन-जितने कैम्प हैं, सब जगह यही
हालत है।"
"दो-एक रोज में और अनाज आने की भी गुंजायश है।" इग्यारसीलाल
का सुर ढलककर मन्द हो गया।
"भण्डारे की रखवाली ठीक से करनी होगी।" बछराज देर से जरदे-
चूने की चुटकी बना रहा था और इतनी बेपरवाई से भरा था कि
इग्यारसीलाल को उसके हाव-भाव अखर गये।
"रखवाली किससे ?" शुबो ने सिर ऊपर किया, "हरलो मे या
उम्मरकोटवालों से?"
किसी ने कोई जवाब नहीं दिया । बछराज ने चुटकी मुंह में दवा
ली। थोड़ी देर बाद इग्यारसीलाल बोला, "शुबो, तुम चाहो तो हिस्से-
दार बन सकते हो।"
"मुझे कोई उजर नहीं।" पुसपा बाई ने तिरछे-तिरछे उसे धूरकर
देखा।
"हिस्सा-विस्सा नहीं चाहिए मुझे । और, मैं होता कौन हूँ हिस्सा लेने
वाला ?"
"तुम्हें तो खुश्श होना चाहिए कि यहाँ से अनाज उम्मरकोट जाता
है।" पुसपा बाई ने नरमाई में डोर पकड़ी।
"इसमें खुश्श होने के लिए क्या है ?" शुवो भड़क उठा।
"तुम उम्मरकोट के हो-'
"तो---इससे क्या हुआ ? उम्मरकोट में हीरे बरसते हैं ?"
"वो पाकिस्तान में है---तुम्हारे मुल्क में।"
"फालतू का लफड़ा खड़ा मत करो, पुसपा बाई ! किसी मां के यार
ने पखेस्तान बना दिया, किसी ने ईदस्तान । सिरफिरे स्साले। उनके
बनाने से होता क्या है ? मुझे तो उन्होंने नहीं बनाया ? तुम्हें भी नहीं।
सो, हमें मुलुकों में बाँटकर अलग करनेवाले वो घसियारे'''कौन होते
हैं ?"
६२ / पत्तों को विरादरी

"यह बात तुम्हारी समझ में नहीं आयेगी।" "कसे नहीं आयेगी, कोई समझाये तो ! कुंदनी के पिस्सू बीच में फौज डालके बैठ गये हैं और राजा बन गये हैं, वस । बसत आने दो, उन्हें भी इसका फल भोगना पडेगा।' शुवो उठ गया। तम्बू के दुआर पर पलटकर उसने चेताया, "एक बात कानी का मैल निकाल के सुन लो। इस वार, कम्फ का अनाज उम्मर-शुमरकोट गया तो कत्तल हो जायेगा।" "धीरे वोलो।" इग्यारसीलाल ने भिचे कण्ठ मे घुडकने की कोगिश की, "तुम तो मतलव वमकने लगते हो।" "बमके नही तो क्या करे आदमी, बताओ ! कैसा जाल-जंजाल है शशुरा'कम्फ में भरती होगे, कुल तीन बीसी लोग, लेकिन कागदों में चिपका रखे हैं दो सौ से ज्यादा । मुझे मालूम नहीं है क्या ? अनाज तो बचेगा ही, बस, उसका सौदा कर रकम ऐंठ ली जाती है । यह फरजी-धरजी कारवाई अच्छी नहीं है, ध्यान कर लो।" लाठी कांख में दवाये वह बाहर चला गया । गरमी की चेतरह मार से कम्फ के लोग एकदम टूटे-लटके पड़े थे और इधर-उधर सिर डाले समय काट रहे थे। एक छपरे में औरतों ना हो-हल्लाहो रहा था। आपस मे धसमस-धकेल करती हुई वे अन्दर-बाहर भाग रही थीं और रह-रहकर ओढनी मे पसीना पोंछ रही थी। छपरे के भीतर किसी स्त्री की चीख उभरी और समूचे माहौल को छोलती हुई लोप हो गयी। 'तव, सिसकियों उमड पडौं। शुबो ने घबराकर उधर देखा और फिर दौड पड़ा। "कहाँ जा रहे हो ?" ज्यानको काकी ने वीच मे ही टोक दिया। "वो"कोन चीस रही है ?"

"जमाल की बीनणी।"
"बीमार है क्या? कैसी तकलीफ..."
"बच्चा होनेवाला है उसे । 'तुम मरदो में जाकर बैठो। मैं उसी के
पास जा रही हूं।"
ज्यानकी काकी तेजी से उस छपरे की ओर चली गयी।
आतंक और पसीने से लथपथ जमाल एक दरख्त के तले पड़ा था।
शुबो ने उसकी पीठ पर बांह रखी तो वह बावले-सा एकटक देखने लगा।
एकाध बार उसने बोलने का यत्न किया, पर हकलाकर रह गया और
ठुड्डी के बाल मुट्ठी में भरकर खींचने लगा।
"घबराओ मत, जमाल !” शुवो को अपना स्वर अटपटा लगा,
"अब तो तुम वाप बननेवाले हो।"
जमाल ने उसके कन्धे पर गर्दन डाल दी।
-
स्त्री की चीख लम्बी-लम्बी कराहटों में बदल गयी थी। शुबो की दीठ उसी
के छपरे के आसपास भटक रही थी। गला सूखकर तड़कने लगा था, पर
वह जमाल की गर्दन में हाथ डाले हुए था और इस तरह अपनी वेचैनी
को छुपाने का प्रयास कर रहा था।
माथे पर ओढ़नी का पल्लू रगड़ती हुई फुलकी छपरे से बाहर
निकली। उसने आजू-बाजू किसी को खोजती हुई निगाह डाली, फिर
जमाल की तरफ दौड़ पड़ी।
"उच्छव करो, उच्छव !" वह चिल्लायो, "लड़का हुआ है।"
उसने जमाल को घसीटकर खड़ा किया और चकरी की तरह उसके
चौगिर्द घूमने लगी। फिर फुलकी ने उसकी पीठ पर कई धौल जड़ दिये
और भाग खड़ी हुई।
जमाल हसने लगा, लेकिन शर्म में गड़ा-गड़ा।
फुलकी ने कांसी की थाली उठायी और उसे काठ की डोई से बजाने
६४ / पत्तों को विरादरी

1. । लगी। उमस और ताप के वातावरण में उसकी झनझनाहट, उसकी लहर-लहर लहराती हुई गूंज बहुत ठण्डी, बहुत भेली लगी। :: थाली के इस तरह वजने का अरय साफ था। "किसके लड़का हुआ है ?" बछराज ने पूछा । गज्जी ने पूछा। हद्दी ने पूछा । वदरू ने पूछा । सिराम ने पूछा। फूलकी फांसी की झनझनाती हुई थाली को चारो ओर घुमाकर, कमी हवा में उछालकर, कभी सिर पर ओढ़कर बार-बार चिल्लाती रही, “जमाल के छोरा हुआ है मई, छोरा । खूब गोरा । जैसे दूध का होरा।" गज्जी ने जमाल को छेड़ा, "अहे-अहे, छोरा हुआ है जमाल के। अब वो लंगूर का नाच दिखलायेगा नाचकर। देखना, भई ! सब लोग देखना। इसके छोरे को भी बुला लो । आखिर वो भी तो देखे अपने बाप का करतब।" "और, छोरे की अम्मा को भी !" कहकर सिराम ने कूकडूक की वांग लगायी और उस बांग के साथ ही सब ओर घनी-पनी हंसी फल-फूट गयी। "जा वालणजोगे, नाकटूटे ! हर वखत तग करता रहता है।" फूलकी ने सिराम पर नाराजगी परगट की । फिर शुबो से बोली, "गोर- मेन्ट स्साब, एक अरज सुनो मेरी।" "मैं गोरमेन्ट नहीं हूँ।" शुबो को यह सम्बोधन नहीं भाया । "न हो तो न सही। लेकिन इतना कहे देती हूँ कि आज कम्फ मे गुड़ बॅटेगा, गुड़। बछराज से बात कर लो, हो।" "हाँ-हाँ, गुड़ बटेगा और अभी बंटेगा।" बछराज ने जवाब दिया और चावियों का गुच्छा हिलाता हुआ भण्डारे की तरफ चल दिया। पुसपा बाई ने बदरू से पूछा, "यह क्या उतपात मचा हुआ है शुवो ने सुन लिया । हंसकर दोला, "यह सारा उपद्दर जमाल के छोरे ने किया है, पुसपा बाई !" 7" .

"अहाँ, जमाल तो सीधा-सादा है वेचारा, उसकी वीनणी ने ही यह कारस्तानी की है ।" औरतों के झुण्ड में से गोदारी ने छींटा कस दिया। पुसपा बाई ने नथुने फड़काये, भौंहें हिलायीं, कूल्हों पर हाथ रखे, "कुछ जलने की-सी वू रही है । अरे बदरू, निखटू ! देखना, किसी ने नम्बू में तो बीड़ी का टोटा नहीं फेंक दिया । अन्बल दर्जे के उजड्ड, गवार भर गये हैं यहाँ ! टूट गया शाम का झुटपुटा । आसमान से झरती हुई रेत । और, पच्छिम में बल खाते हुए किरणों के गोहरे और सांप । एक साँप लम्बा होने लगा, तो चार-पांच हाथ से भी ज्यादा बड़ा हो गया, फिर बीच में से और स्याह धुएँ में खो गया। आकाश पर मे निगाहें हटाकर शुबो ने नजदीक देखा तो, गोदारी। एक अलाव में खदबदाती हुई हँडिया। आग की लपलपाती हुई आंच । गोदारी इंडिया में कड़छी हिला रही थी। "क्या पक रहा है ?" शुवो ने हंडिया को विस्मय से देखा। "दलिया। 'आज गुड़ मिलेगा न, मीठा दलिया बनेगा।" "लपमीवाला या रावड़ीवाला ?" "राबडीवाला।" "वाटियाँ तोड़ते-तोड़ते दांत घिस गये हैं, सच्ची !" "अपना आटा दे देना । तुम्हारे लिए भी बना दूंगी।" गोदारी-हृद्दी की लुगाई थी। यानी, वाशिया की माँ। उसके बारे में मशहूर था कि वह औरतों पर झाड़-फूंक करती है। शुवो ने छड़ दिया, "जग पुसपा बाई पर अपना मन्तर मारो न, गोदारी !" "दिल्लगी मत करो।" "शर्त लगा लो, उस पर जरूर किसी भूतनी की छाया है।" "वो तो खुद ही भूतनी है, उसे किसी की छाया क्या चढ़ेगी।" ६६ / पत्तों की विरादरी

गोदारी हंसने लगी।
एक लकडी चिटखकर दूर जा पड़ी। शुवो ने उसे उठाकर फिर
अलाव में डाल दिया।
।
वछराज का गुड बांटना चालू हो गया था। पत्थर से भेलियां तोड़-तोड़-
कर उसने वरावर के डले बना लिये थे और अव मोलियां भर रहा था।
"सवको, एक-एक डला । ज्यास्ती नही।"
"मैं तो दो हले लूंगी।" फूलको मचल पडी।
"नहीं, पांती में दुर्भात नहीं।" बछराज ने सिर हिलाया।
"इसे मेरे हिस्से का डला दे देना।" जमाल बोला।
"वाह, जमाल, वाह ! वाह, दाता !" सब ठहाके लगाने लगे।
जमाल मॅप गया और उसका सिर अपने ही अन्दर घुसने लगा।
"तुम अपना डला क्यों दोगे, फूलकी को ?" बछराज ने दो डले एक
साथ लेकर फूलकी के माथे पर टनकाये। फिर उन्हें उसकी झोली में
डाल दिया। वह बछेडी की तरह मस्त मुस्कराती, कूदती-फांदती चली
गयी।
बड़ों को निपटाने के बाद बछराज ने वच्ची को बुलाया और ऐलान
किया, "तुम लोगों को दो-दो हले !" फिर राज-भरे ढंग से आवाज
नीची कर बोला, "और-जो अपने बाप को गाली देकर सुनायेगा, उसे
तीन डले।"
बच्चे हंस पड़े और फटाफट उनके होठों पर अपने पिताओं के नाम
फड़कने लगे।
उसी रात, सुबो जव गोदारी का बनाया हुमा मीठा दलिया डाटकर कम्फ
का चक्कर मार रहा था तो उसे ऊंट की विलविलाहट सुनायी दी।

सिरफ एक बार । पहले तो लगा कि भ्रम है, लेकिन फिर कानों की
असावधानी पर विश्वास नहीं हुआ। फाटक की भीत पर खड़ा होकर
वह दूर-दूर तक निगाहें फेंटने लगा।
टीलों के पार टोले थे। सनसनीखेज अँधेरा था। गुर्राती हुई हवा
थी।
एक आकृति कम्फ की बाड़ लांघकर बाहर निकली और तेजी से
दक्खिन दिशा में गुम हो गयी।
शुबो भीत से उतरकर उस ओर बढ़ा, लेकिन आगे थूहर-सरकण्डे
का घुपाघुप्प वन था । अन्धकार में आंखें फाड़-फाड़कर देखते रहने के
बावजूद उसे कुछ नजर नहीं आया।
आशंका और ऊभचूभ से भरा वह लौट आया।
कम्फ सोने जा रहा था । स्त्रियां वच्चों को थपक रही थीं। उन्हें झीडिये
और लक्खी बिणजारे की कहानियां सुना रही थीं। मरद हुक्कों की नाल,
तम्बाकू
के ताव और वातों के उलझाव में
मशगूल
थे
शुबो ने गज्जी का हाथ थामा । अलग ले जाकर कहा, "तुम भण्डारे
जाकर सो जाओ।"
"खास बात है क्या ?"
"हां । सुनो, एकदम्म घोड़े मत बेच देना । कोई माहट हो तो ध्यान
रखना।"
फिर उसने ज्यानको काकी से पूछा, "सुवटी कहां है ?"
"होगी यहीं कहीं, और क्या।"
"मुझे तो नजर नहीं आयी।"
"इग्यारसीलाल के तम्बू में होगी।" फूलकी ने अनुमान लगाया।
"इस टेम?"
"हाँ, कभी-कभी उस मरे को जल्दी लग जाती है।"
,
६८/ पत्तों की बिरादरी

.
शुबो की नसें गरमा गयी । आज इग्यारसीलाल से भी निपट लेना
चाहिए । कम्फ की औरतों को तो अब कोई इज्जत-आवरू ही नहीं रही।
तुरन्त उसे यह भी ख्याल आया कि सुवटी तो उसके पास अपनी मरजी
से जाती है। हो, सुवटी को रोकना काफी कठिन होगा, लेकिन वह उसे
समझायेगा।
फिर भी शुवो लाठी ठकठकाता हुआ इग्यारसीलाल के तम्बू के पास
जाकर ठिठक गया।
तम्बू में अन्धकार था । चुप्पी थी, गाढी । तनिक भी आवाज नहीं।
शुवो ने खूटे पर लाठी पटकी । एक बार, दो बार, तीन वार ।
"कौन है ?"
इग्यारसीलाल का आलस में उलझा हुआ स्वर भर्राया।
"मैं हूँ-शुयो।"
"बोलो।"
"अन्दर और कौन है ?"
"म्यों ?" इग्यारसीलाल झुंझला उठा।
"जानना जरूरी है।"
"क्या बकते हो!"
"यो भन्नाओ मत।"
"तुम्हें क्या मतलब ?"
"मतलब है। सुवटी है क्या?"
"नहीं।"
"सच बोल रहे हो?"
"झूठ क्यों कहूंगा? डरता हूँ किसी से ?"
"एक बार और जांच कर लो।"
"तलाशी लोगे क्या? ले लो। भरोसा न हो तो खुद अन्दर आकर
देख लो।"
शुवो सोच में गुंथा-गुंथा वहां से हट गया।

बछराज ने अपनी खाट तम्बू के वाहर डाल रखी थी। पाटी पर उसका सिर टेढा होकर लटक रहा था। तभी पाये चरमराये । आह भरते हुए उसने करवट बदली। "तब्बत ठीक नहीं है क्या ?" 'नहीं, बम-ऐसे हो..." शुबो को बछराज की आवाज बहुत कमजोर और सूखी लगी। उसने पास जाकर हाथ छुआ। वह बेतरह तप रहा था। 'अहे-रे, तुम्हें तो बोक्खार है।" "अच्छा !" बछराज ने ऐसे कहा, मानो उसे विश्वास न आ रहा हो। "कोई दवा-उवा ली है ?" "ले लूंगा।" "शाम तक तो ठीक थे तुम ।" "हाँ । थोड़ी ही देर पहले माथे में दर्द उठा।" "चा-पत्ती है तुम्हारे पास ?" "होगी, किसी डिब्बे में।" "ज्यानको काकी को बोल देता हूँ। वह ढूंढकर बना देगी।" "नहीं, इच्छा नहीं।" "चा ने आराम मिलेगा, सच्ची।" "सुब्ब तक वैसे ही हालत संभल जायेगी।" बछराज ने उसांस भरी, "यह जो तन है. कभी-कभी मन से खिलवाड़ करता है।" "तुम सदा इसी तरह की बातें करते हो।" "गलत कह रहा हूं क्या ? शरीर बड़ा शंतान होता है। जब वह देखता है कि आदमी मन के काबू में होता जा रहा है, तो कोई-न- कोई गड़बड़ी पैदा कर देता है । नव झख मारकर सिरफ शरीर के बारे में ही सोचना पड़ता है।" "तुमने ऊंट की बोली सुनी थी, कुछ देर पहले ?" ७० / पत्तों की चिरावरी

"सुनी तो थी। लेकिन, बहुत धीमे। यहां पड़े-पड़े यों ही उधर
ध्यान चला गया।"
"मैं तो सोच रहा था कि वह मेरा वहम था।"
"ऊँट की बिलविलाहट हमें धोखा कैसे दे सकती है ? उसे तो पहचान
ही लेंगे।"
"मैं पहरे पर हूं। तकलीफ बढ़े और जरूरत पड़े तो आवाज दे देना
मुझे।"
"तकलीफ बढकर जायेगी कहाँ ? रहेगी तो शरीर के अन्दर हो।"
चछराज फीकी-सी हंसी हंसा।
' "पानी लाकर दूं?"
"नही । खाट के नीचे लोटही भरकर रख ली है।"
.
....
.
-

बछराज की बीमारी वढ़ती चली गयी । आठों पहर बुखार बना रहता था। शरीर निचुड़ने लगा। आंखों की चमक मुरझा गयी। हाथ-पांव वेसकत हो गये । दिन-भर वह तम्बू में पड़ा रहता था और जाने क्या- क्या बड़बड़ करता जाता था। वैसे तो सड़क का ठेका उसी के नाम था और इसीलिए वह ठेकेदार कहलाता था, लेकिन हुक्म चलता था पुसपा वाई का। बछराज का ज्वर न टूटते देखकर पुसपा बाई ने एक रोज सिराम को बुलाया और सड़क के काम की देखभाल उसके सपुरद कर दी। गज्जी और जमाल दिन में भण्डारे की निगरानी रखते थे। रात की पहरेदारी शुवो और हद्दी के पास थी। जब गप्पे लड़ाने का मन होता था तो बदरू भी मालकिन की आंख वचाकर उनसे आ मिलता था। अकाल का असर घोर होने लगा था। ठट्ठ के ठट्ठ लोग मारे-मारे भटक रहे थे और उन्हें किसी कम्फ में भरती नहीं मिलती थी। तल्लाव की इसकीम मिल जाने से पुसपा बाई के पर लग गये थे और वह बहुत खुश नजर आती थी। शुवो ने उसकी इस खुशी का फायदा उठाते हुए कुछ छूट ले ली और जब-तब कम्फ में नये लोगों को लेने लगा। कम्फ बड़ा होता गया। पुसपा वाई को पता चला तो वह थोड़ी भनभनायो, फिर कुछ सोचकर मौन साध गयी। रात भर की नींद लेकर शुवो अपने 'खोखल' में वेधड़क सो रहा था। ७२ / प्रत्तों की बिरादरी

.
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"
तेज-तेज खर्राटों से झाड़ियों में हलचल पैदा करता हुआ।
सुवटी गुपचुप अन्दर घुसी। तिनका लेकर उसको पगलियों में
चलाया । गुदगुदी मची तो शुबो कुनमुनाया।
"मोहो-हो, तुम्हारे खरटि तो तोप के गोलों को भी मात दे रहे हैं।"
"जा-जा, तंग मत कर । सोने दे।"
"इत्ता सो-सोके मैसे हो गये हो तुम
"सारी रात जागना पडता है।"
"हां-हां, ज्यादा रौब मत झाड़ो।"
"सड़क से छुट्टी हो गयी तेरी !"
"नही ।"
"तो माख वचाके आयी है, कामचोर।"
"कुछ भी कहो । "एक सलाह करनी है तुमसे ।" सुवटी घुटने
मोड़कर बैठ गयो, “हरलो से मिले हो न तुम
"तुम कैसे जानती हो उसे ?" शुबो सतर्क हुआ ।
"कौन नहीं जानता? सवकी ह-आतमा कांपती है उससे ।"
"अच्छा ! फिर तो स्यात मेरे आतमा-वातमा नहीं है।"
"हरसो मुझे बुलाता रहता है, मौलाकात के लिए।"
"बाहा-रे, तुम्हारी तो तरक्की हो गयी। किस बखत जातो हो ?"
"रात को।"
"मेरी पहरेदारी को चकमा देकर?"
सुवटी शरारत से हंसने लगी।
"ओहो "एक दफा मैंने तुम्हें ही देखा था क्या? तव.."
"तुमने पीछा किया था ?"
"हाँ । और, इग्यारसीलाल से भी पूछने गया था।"
"उसे अव में नहीं धराती हूँ।"
"सुवटी, तुम ये लफेड़े न करो अब । किसी एक का साथ पकड़ लो।"
"उसी की तलाश में हूँ। तुमने "हरलो को धोखा क्यों दिया,

शुबो ?"
"धोखा?"
"हां । उसने तो तुम्हें अपना मिन्तर बनाया था। भायला मानक
अपनी कटार तक दे दी तुम्हें और तुम 'पलट गये।"
"यह सब हरलो ने कहा है तुमसे ?" शुवो ने ठहाका लगाया
"बढ़िया किस्सा गढ़ लिया है उसने । मान गये, पूरा उस्ताज है !"
“गलत है ?"
"एकदम्म । देखो सुवटी, कम्फ के बाहर एक रोज हरलो से मेर
जान-पहचान हुई । वह वेवात गुस्साने लगा मुझ पर । फिर उसने मुई
पट्टा खेलने का न्योता दिया । मैं नहीं चाहता था, लेकिन उसने मजबू
कर दिया। पट्ट में वह हार गया।"
"तुमसे ?"
"हां-हाँ । पूछ लेना उससे।"
"रहने दो। वड़म मत मारो। हरलो को आज तक हराया।
किसी ने ?"
"तो"उसकी ताकत ठीक-से जांच ली है तुमने !" शुबो ने व्यंग
किया ।
"तुम उससे वैर मत मोल लो।"
"जा-जा, बड़ी आयी हरलो की झण्डी लेकर।"
"ठीक कहती हूँ, शुबो ? हरलो के साथ हेलमेल रखने से तुम्हें बहोर
फायदा होगा।
"मुझे क्या फायदा लेना है।"
“यह तो गुलामोंवाली बात हुई।"
"मैं गुलाम हूँ ?"
"और नहीं तो क्या मालिक हो किसी के ? पुसपा बाई और इग्यारसी
लाल का दिया खाते हो।"
"यह पाठ तुम्हें हरलो ने पढ़ाया है ?"
७४/ पत्तों को विरादरी

"हरलो को बोलने का हक है । वह अपनी टोली का सिरेदार है।
उसी का हुक्म चलता है वहाँ ।"
"वह तो है सिरेदार और मैं-गुलाम "शुयो ने होंठ चबाये ।
"सोच लो।"
"तुम क्या सिरेदारनी बननेवाली हो?"
"जलन हो रही है ?"
"मुझे क्यों होगी? इग्यारसीलाल को हो सकती है।"
"उस खूसट की घरचा छोडो।"
"और-हरलो के क्या हालचाल हैं ? इधर किते डाके डाले हैं
उसने ?"
"मौके की ताक में रहता है वो तो । आखिर टोली के भरण-पोस
का जिम्मा उसी का तो है।"वह तुम्हे भी टोलीदार बना सकता है।"
"फिर हरलो की नहीं चल पायेगी टोली में। और-तुम्हें मेरी
सिरेदारती बनना पड़ेगा।"
"मंजूर है ।" सुवटी ने शुबो की चाह मे चिकोटी काटी।
"अच्छा, यहोत हो गया । अब तुम काम पर जाओ और मुझे तनिक
देर आँख मींच लेने दो।" सुबो ने एक तगडी जमुहाई ली।
"वो "एक बात कहनी थी। हरलो कटार मांग रहा था अपनी।"
"कटारे पर अब उसका हक नही है !"
"क्यों?"
"मैंने छीनकर हासिल की है।"
"दे दो न ! उसने मंगवायी है।"
"जा-जा, खुशामद करने से कोई लाभ नहीं।"
मोदनी के पल्लू को अंगी मे खोसती हुई सुवटी उठ खड़ी हुई।
फिर अनमनी-सी चल दी।

" कुछ देर तक शुवो वैठा रहा, वहीं-अपनी हथेलियों को घूरता हुआ। आड़ी-तिरछी रेखाओं का जाल । मां बतलाती थी, यह जाल नहीं, पालकी है । तगदीर इसी पालकी में चढ़कर आती है। कम्फ के फाटक पर, जहाँ दो काटीदार कंकेड़ काटकर रोपे हुए थे, बदरू किसी से तेज-तेज बतिया रहा था । शुवो को देखकर उसने हाथ से झाला दिया, “यहाँ आयो।" "क्या है ?" शुवो की नसों में अभी भी आलस तैर रहा था, इस- लिए स्वर में चिड़चिड़ाहट आ गयी। "दो जनी हैं-~-माँ-बेटी । भरती मांगती हैं।" "कर लो भरती। पूछना किससे है !" "पुसपा बाई नर्राज होगी।" "वदरू मियाँ, तुम्हें पुसपा बाई को ही चिन्ता लगी रहती है। शुबो बोला, “इन्हें कम्फ में जगह दे दो। मैं देख लूंगा।" "क्या किस्सा है ?" अचानक इग्यारसीलाल टपक पड़ा। "दो जनानियां हैं । भरती के लिए आयी हैं।" नाक खुरचते हुए इग्यारसीलाल ने जनानियों की पड़ताल की। एक औरत, करीब चालीस बरस की। दूसरी, अठारह-उन्नीस की छोकरी ! लार टपकाती हुई उसकी मैली दृष्टि लड़की पर जम गयी। "बड़ी मुशकिल है । आखिर किस-किमको भरती करें ? खैर, इन दोनों को तो रख लो।" हाजरी-बही में औरत का नाम चढ़ाया गया, अचली और लड़की का जुगनी। खानापूरी कर इग्यारसीलाल ने आंख का गीड निकाला और उमे अंगुली पर लगाकर ताकते हुए बोला, "नेम-कायदे से रहना होगा, यहाँ । मेरे कहने में चलोगी तो दोनों की सुख से कट जायेगी।" अचली और जुगनी के पास सामान के रूप में केवल एक चींटा था, सन की दरी का । बेतरतीब ढंग से लपेटा हुआ और मूंज की रस्सी से जकड़ा हुआ । बदरू के कहे मुताविक उन्होंने उसे एक छाजन के पास ७६ / पत्तों को विरादरी . रख दिया। सुबो अपनी बाटियों की पोटली उठा लाया। उनके सामने खोलकर रखता हुमा बोला, "भूक लगी होगी, सा-पी लो पहले। • यहाँ से तुम्हें आटा मिलेगा । वह बाद में काम आ जायेगा।" "तुम कहाँ के हो ?" जुगनी ने पूछा। "उधर, वो क्या कहते हैं ये लोग""पखेस्तान से आया हूँ।" भी वही से !" अचली ने गर्दन हिलायी। "कौन-सी गांव-ढाणी?" "मीरपुर के पाम बुरहाली ढाणी।" "मैं एक बार मीरपुर गया था, खास मीरपुर के बज्जार में । जुआर बेचने के वास्ते ।" "इधर के मिनख कैसे हैं ? "मिनस तो न इधर के बुरे है, न उधर के। लेकिन, क्या बतायें- सरकारू टांग सब जगह अडी हुई है।" "हां, उसी की वजह से सारा झंझट है।" जुगनी बोली। इसकी आंखें कित्ती सुन्दर, कित्ती काली और उजली है । शुवो जुगनी को देखकर एक कोमल विस्मय से भर उठा । कानों पर छितराये हुए पंखड़ियों से बाल । माथे पर मंण डालकर गुंथी हुई दो सुथरी पट्टियां । उनीदी-सी वरोनियां । जुगनी हथेली पर वाटी तोडकर छोटे-छोटे कौर बना रही थी। सुवो को उसका चेहरा अपनी मां से मिलता-जुलता और वसा ही ममतालु लगा। 24 रात के पहले पहर के निपटते-बीतते शुबो कम्फ से निकल पडा, चुपके से । हर दूसरे-तीसरे रोज वह अपनी उस 'टैकडी' पर निगाह डाल आता था। बड़ा बल मिलता था मन को । अन्दर ही अन्दर कुछ खुलने और फैलने लगता था। पिछली दफा उसे लगा था कि टेकड़ी पर से काफी । . कुछ देर तक शुबो बैठा रहा, वहीं-अपनी हथेलियों को घूरता हुमा । आड़ी-तिरछी रेखाओं का जाल । मां बतलाती थी, यह जाल नहीं, पालकी है । तगदीर इसी पालकी में चढ़कर आती है। कम्फ के फाटक पर, जहाँ दो कांटीदार कंकेड़ काटकर रोपे हुए थे, बदरू किसी से तेज-तेज बतिया रहा था । शुवो को देखकर उसने हाथ से झाला दिया, “यहाँ आयो।" "क्या है ?" शुबो की नसों में अभी भी आलस तैर रहा था, इस- लिए स्वर में चिड़चिड़ाहट आ गयी। "दो जनी हैं-~-माँ-बेटी । भरती मांगती हैं।" "कर लो भरती । पूछना किससे है ! "पुसपा बाई नर्राज होगी। " "बदरू मियां, तुम्हें पुसपा बाई की ही चिन्ता लगी रहती है।" शुवो वोला, "इन्हें कम्फ में जगह दे दो। मैं देख लूंगा।" "क्या किस्सा है ?'' अचानक इग्यारसीलाल टपक पड़ा। "दो जनानियां हैं। भरती के लिए आयी हैं।" नाक खुरचते हुए इग्यारसीलाल ने जनानियों की पड़ताल की। एक औरत, करीब चालीस वरस की। दूसरी, अठारह-उन्नीस की छोकरी ! लार टपकाती हुई उसकी मैली दृष्टि लड़की पर जम गयी। "बड़ी मुशकिल है । आखिर किस-किमको भरती करें ? खैर, इन दोनों को तो रख लो।" हाजरी-बही में औरत का नाम चढ़ाया गया, अचली और लड़की का जुगनी। खानापूरी कर इग्यारसीलाल ने आंख का गीड निकाला और उसे अंगुली पर लगाकर ताकते हुए बोला, "नेम-कायदे से रहना होगा, यहां । मेरे कहने में चलोगी तो दोनों की सुख से कट जायेगी।" अचली और जुगनी के पास सामान के रूप में केवल एक बीटा था, सन की दरी का। वेतरतीब ढंग से लपेटा हुआ और मूंज की रस्सी से जकड़ा हुआ। वदरू के कहे मुताबिक उन्होंने उसे एक छाजन के पास ७६ / पत्तों को विरादरी

.
.
रख दिया।
सुयो अपनी याटियों की पोटगी उठा लामा |
नगर,
रखता हुआ बोला, "भूक लगी होगी, पानी तो नहीं । ' line
आटा मिलेगा । वह बाद में पाग मा जागेगा।"
"तुम कहाँ के हो ?" गुगली गे पूछा ।
"उधर, वो क्या कहते हैं ये लोग"नगरमाग भागा।
"हम भी वही में ।" अगली ने गलागी ।
"कौन-मी गांव-नाणी"
"मीसुर के पाग युरहानी वाणी।"
"मैं एक बार मीरपुर गया था, माग गीर. परमार भुमार
वेचने के वास्ते।"
"इधर के मिनम्र कंग है?"
"मिनन्त टोन घर के है, न था। दिन, साधना ...
सरकार टोग भव बगह बड़ी ही है।"
"हां, सी की बरह मे माग हट" ती वा।
टमकी वाहिनी मृन्दर,दिमी बी र सीमा मला
को देन्द्रका कोमल दिन्न शार्टी का समाय
पंगहि काला र यह trgathan
दी-बहिनीलबारी
वनः बाकी मीमा बदर मतका
वसईदनमा
बद्र मोदी पनि
सारी अन्दाबार
की कीrant at

धूल उड़ गयी है । आज वहां जाकर उसने फिर जमावट कर दी। कम्फ में वापस आया तो ज्यानकी काकी की आवाज कानों के पड़दे हिला रही थी। किसी ने ईंधन चुरा लिया था उसका । वह विफर गयी । थी। "वा-वाह काकी, बहोत बढ़िया ! बोलती जाओ। गालियां दे-देकर मारी भड़ास निकाल लो। कसर बाकी न रहे ।" खेजड़े के खोके कुतरते हुए गज्जी ने मुंह मटकाया। "सत्यानाश हो तेरा !" ज्यानकी काकी अब उसी से उलझ पड़ी। झुबो ने तत्काल फैसला सुनाने के अन्दाज में कहा कि हो न हो, यह कारस्तानी गज्जी की ही है। तभी तो वह इतना मटक रहा है। उसके लिए यही दण्ड है कि वह हफ्ते-भर तक ज्यानको काकी के लिए इंधन वटोरकर लाये। ज्यानकी काकी शुबो की तरफ मुड़ी, "गज्जी मेरा ईंधन क्यों चुरायेगा भला !" गज्जी ने रोनी-सी सूरत बना ली तो काकी का चेहरा एकदम ढीला पड़ गया, "मैंने तुमसे तो कुछ कहा नहीं, गज्जी !" "सत्यानाश तो कर ही दिया !" गज्जी मुस्कराकर बोला, "लेकिन काकी, अब ईधन की जरूरत ही नहीं । खेजड़ों पर मीठे-मीठे खोके लदे पड़े हैं, जी भरकर खाओ और ऊपर से एक मुट्ठी दाना चवा लो। बस, पेट की छुट्टी !" "तुम्हें इस तरह की उल्टी-सीधी सूझती रहती है, हरदम ।" ज्यानकी काकी ने गज्जी का कान उमेठ दिया। उसी समय अचली आ गयी । शुवो ने उसको ज्यानको काकी से मिलवाया । ज्यानकी काकी तमाम रीस-खीज भूलकर उससे वतियाने लगी। गज्जी तुड़त फुड़त गायव हो गया, वहाँ से । शुवो को पता था, इन दिनों उसकी फूलकी से खूब पट रही थी। दोनों भण्डारे के पीछे छुपकर । ७८ / पत्तों की विरादरी खुसर-फुसर करते रहते थे। वह उधर नहीं गया और कम्फ की हद में इधर-उधर चक्कर लगाता रहा । "शुनो !" एक जगह पीछे से पुकार पड़ो, “मैं तुम्हें ही ढूँढ रही हूँ कब । अगले ही पल आवाज पहचान में मा गयो। जुगनी थी। अंधेरे को गम्फी के बावजूद शुवो ने उसे निःसंकोच चीन्ह लिया। जुगनी असंयत-सी लग रही थी । घबराई हुई । उत्तेजित। "क्या हुआ, जुगनी " शुवो के स्वर में वह सारी कोमलता उमड़ पड़ी, जिसे उसने कैसे-कैसे रन्दों के बीच कुचले जाने मे बचाकर रख छोड़ा था। "वो आदमी "आया या अभी ।" जुगनी सन्न थी । हकला रही थी। "कौन?" "योजो इग्यारसीलाल है। मुझे अपने तम्बू में बुलाकर गया है।" शुबी के रगत मे एक लपट उठी और फिर, वह लपट ही रह गयी, शुबो नहीं। "मैं उस कुत्ते की टांगें चीर के रख दूंगा।" वह तेजी से मुड़ा । जुगनी ने उसका हाथ थाम लिया, "नही, "नही, गुस्सा मत करो।" वह मीठा और सोधा स्पर्श शुबो के अन्दर घुलता चला गया। लपट उसकी शीतलता में लुप्त हो गयी। "मैंने तुम्हारी तरह दुनिया का सामना नहीं किया है, वो ! लेकिन-जानती हूं कि जिन्दा रहने के लिए जिन्दगी को किस तरह रौंदना पड़ता है ।" जुगनी ने उसका हाथ छोड़ दिया और अन्धकार की तहों के पार ताकने लगी, "इग्यारसीलाल अकेला नही है, उस जैसों की पलटन बहुत बड़ी है, बहुत खूखार। रीस-रीस करके तो हम अपने को - -- ही नष्ट करेंगे। असल में, जरूरत है समझदार होने की और फिर रणः छेडने की। नहीं, जुगनी विचलित नहीं थी। शुबो का अनुमान सही नहीं था। लेकिन, वह भीतर-ही-भीतर सीज अवश्य रही थी। उसकी भाप, उसकी गरमाहट का अहसास शुबो को हुआ और वह दंग रह गया। चीजों के बारे में वह इस ढंग से नहीं सोचता था, हालांकि एक वेसनी, एक वेक़रारी उसे हरदम मथती रहती थी कि टक्कर ली जाये, मुकावला किया जाये और जो अदृश्य दीवार है दहशत की, उसे तोड़कर ढहा दिया जाये! "उन्होंने हमें सिरफ पेट समझ लिया है यानी समूचे तन में केवल पेट ! रोटी देकर वे महसान जताते हैं कि हम तुम्हारा पेट भरते हैं।" शुबो ने कहा। "पेट के अलावा और भी बहुत कुछ है, हमारे पास । घड़, बाजू, दिमाग, पांव और इन सबको जोड़नेवाली ताकत ! अज्जदान कहता शुवो ने रोमांचित होकर जुगनी को बीच में ठहरा दिया, "तुम्हें भी अज्जैदान अच्छा लगता है ?" "हाँ।" उसने स्वीकार किया, "वह हमारे खून को, हमारे रंग को, बार-बार असलियत की ओर ले जाता है।" शुबो कुछ कहने ही जा रहा था कि सुवटी आयी । तनी हुई । वेचैन । "वो नयी छोकरी यहीं पर है ?" उसने ढिठाई से पूछा। जुगनी सकपका गयी। वह ऐसे बरताव के लिए तैयार नहीं थी। "तुम मेरे बारे में पूछ रही हो?" सुवटी ने उसकी तरफ न देखकर शुवो से कहा, "वो इग्यारसीलाल तड़प रहा है, इस परी के लिए।" शुवो को फिर क्रोध आ गया, "तुम्हें क्या पड़ी है ! ८०/ पत्तों की विरादरी

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"उसने मुझे ही तो भेजा है। अब"इसको लेकर जाऊँगी तो दान्ना
परसन्न होगा।"
"तुमते मन भर गया उसका?" शुवो तल्स हो उठा।
"भर ही गया होगा।"
"जुगनी नहीं जायेगी । बोल देना इग्यारसीलाल से, अपने पर लगाम
लगाकर रहे, नहीं तो किसी दिन यही पसलियो बिखर जायेंगी उसको !"
“तुम यह धमकी इग्यारसीलाल को दे रहे हो?"
"हाँ-हां, अब बर्दास नही होगा यह।"
"यह बर्दास करने की नहीं, मज्जे करने की बात है।"
"चपर-चपर मत कर ज्यादा।"
"तो"आज की रात यह छोकरी तुम्हारे पास रहेगी?"
सुवटी के व्यंग्य ने सुबो को सुलगा दिया, "मार खाओगी तुम..."
"हाथ उठाओगे मुझ पर?"
"देखो, सुवटी ! जवान मत लड़ाओ।"
"लगता है, छोकरी ने तुम्हारा मरम बेघ दिया है।"
"और तुम्हें भी हरलो का वडा घमण्ड हो गया है।"
"याद रखना, शुबो ! वही एक दिन तुम्हारी स्यान झाड़ेगा-"
"तुमने तो अपनी स्पान सड़वा ली उससे !"
पिच्-पिच् ! सुवटी ने अंधेरे में दो बार यूका, "तुम्हारा वोरिया-
विस्तर गोल नहीं किया तो मैं सुवटी नहीं । देखती हूँ, कैसे कम्फ में
रहते हो!"
। घबड़-धवट पार पटकती हुई सुवटी चली गयी। लेकिन, उसकी
विपली फुफकार वहीं टंगी रह गयी, हवा की हिलती-डुलती बलगनी
पर । शुवो को अपनी रीस और कटुता पर खेद होने लगा। उसने धीमेत
से कहा, "मैं कभी-कभी ऐसे ही आपा सो वैठता हूँ।"
"किसी के भड़काने से भड़कना ठीक नहीं। ऐसा कोप हमें कमजोर
बना देता है।" जुगनी का स्वर स्थिर, नम और भरोसा देनेवाला था।

-
पुसपा बाई के तेलिया-मैलिया चेहरे पर आंसू ढरक रहे थे और वह नाक
सुड़कती हुई बुदबुदा रही थी, "अच्छा हुआ, उसे सवक मिल गया.
लेकिन मेरा तो भाग उजाड़ गया वो-
बदरू परेशान-सा तम्बू का कचरा बुहार रहा था।
हलफलाहट में वह वेवजह झाड़ पीटने-फटकारने लगता था ।
एक और व्यक्ति तम्बू में बैठा हुआ था। ठुड्डी रगड़ता, मिनमिनाता,
लम्बी-लम्बी आहें भरता । वह दिल्ली से आया था । पुसपा बाई के
रोने-धोने से घबराकर वह गर्दन उचकाने और नथुनों में खू-खू की
आवाज पैदा करने का यल करता था, फिर जैसे स्वयं पर शरमाने लगता
था।
"धीरज रखो-" उसने कहा और लाल पड़ गया।
"क्या रखू ?" पुसपा बाई ने उसे घुड़कती निगाहों से देखा, "मैं तो
राख हो गयी। अब क्या करूंगी, कहाँ जाऊँगी में क्या हमेशा यहीं
सड़ती रहूंगी-
शुवो भण्डारे की चाबियां लेकर आया था। दुआर पर थम गया।
"सुना तुमने ? बरवाद हो गयी मैं तो."
पुसपा
बाई की आवाज
शुको को देखते ही मानो चक्करघिन्नी पर चढ़ गयी।
शुवो कुछ समझ नहीं पाया। उसने पहले बदरू को, फिर उस व्यक्ति
को देखा, जो पुसपा बाई के लिए बुरी खवर लेकर आया था।
कुछ देर बाद पुसपा बाई ने खुद ही सारा हाल-बेहाल सुना दिया ।
८२ / पत्तों की विरादरी

. - तपालसिंग का खून हो गया था। कुछ लोग उसकी कोठी में घुस गये। जतपालसिंग नहा रहा था। उन्होने नहानघर का दरवाजा तोड़ दिया और पिस्तौल से जंतपालसिंग को भून डाला। "वो नकसली-उकसली लोग थे । अच्छा हुआ । नेता बनके अकड़ता फिरता था, मेरा जैतपालसिंग ! हकूमत सिर मे बोलने लगी थी। मुझसे बोला, अभी तुम कैम्प में जाके रहो और कुछ कमाई-धमाई कर लो, फिर पोलटिकिस करना । अरे, मुझे सब मालूम है, उसको कोई और मिल गयी थी। वही भोपालवाली बेगम साईवा.""रांड होगी, और क्या ! उसी के खूखने में घुसा होगा। लेकिन कर कुछ नही सकता था, मेरा जैतपालसिंग। बस, औरत के ऊपर पत्यर की तरह पड़ जाता था। अच्छा हुमा, मर गया। उसे ऐसी ही मौत ठीक थी-" पुसपा बाई रो रही थी, हंस रही थी, नाक सिनक रही थी, आँखें नचा रही थी, तालियां बजा रही थी । एकाएक उसने खबर लाने वाले की तरफ देखा, "वौ बेहार वाला एम्पी जिन्दा है क्या, या उसकी भी राम- नाम-सत्त हो गयी ?" "कोन हीरानन्द ?" "हाँ-ही, वो ही हीरानन्द-खीरानन्द, जो नकली वाल चढाता है खोपड़ी पर।" "पोड़ा लड़खड़ाके चलते हैं ?" "हा-हाँ, वो लंगड़ा हो।" "वो तो मिनिस्टर होनेवाले हैं। उनकी फोटुएँ आजकल खूब अख- वारों में छप रही हैं।" "बहुत चालाक-चंटे है, बुढऊ ! मैं तो जानती थी, एक दिन जरूर कुरसी पायेगा।" "प्राइम्मिनिश्टर की मेहरबानी है उन पर ।" "तो मैं अब उसी को पटाऊंगी। वो तो वैसे भी मुझे सूत्र मात्रा है। और,मि कौन-सी संत्ती-सुहागन हूं कि अंतपालसिंग के पौधे पहि . ।

फोड़ डालूंगी। उसने मुझे दिया क्या ? बस, एक रहसल मकान मेरे नाम लिम्ब दिया। बाकी तो सारी जायदात-दौलत अपने वीवी-बच्चों के लिए ही करके गया है।" बाद में, सुबो को बदरू से भी कुछ किस्सा मालूम हुआ। "लगता है, पुसपा वाई अब कम्फ छोड़ जायेगी।" शुवो ने शंका परगट की। "कभी नहीं। कम्फ में ही तो उसके प्रान अटके हुए हैं । दोनों हाथों से बटोर रही है । तुम्हें या किसी को भी, पता नहीं लगने देती वो।" बदरू ने कहा, "जैतपालमिंग की सुपारस और कांगरेस पाल्टी के एक बड़े नेता को तगड़ी घूस देने के बाद यह कम्फ मिला है, पुसपा बाई को। सब जानते हैं, यहां के कम्फ सोना उगलते हैं । जब तक अकाल रहेगा, और सरकार की मदद मिलेगी, वह यहीं अड्डा जमायेगी।" "लेकिन उसने खुद कहा था कि वह किसी हीरानन्द- "हीरानन्द-खीरानन्द भी खाली हाथ थोड़े ही पट जायेगा। उसकी गांठ नोटों से गरम करनी होगी। विस्तर को भी गरमाई देनी पड़ेगी, लेकिन वह अव पुमपा वाई पर राजी नहीं होगा । किसी और ईश्तरी का बन्दोबस्त करना होगा। 'वो सब पुमपा बाई यहीं से कर लेगी। जब तक खजाना भरा रहता है, नागिन उस पर कुंडली मारे बैठी रहती है।" 'अरे ओ बदरू, कहां दफन हो गया अपनी महतारी का खसम !" पुसपा बाई की चिल्लाहट सुनायी दी। वदरू बिल्कुल पीला पड़ गया और तुरन्त मुट्ठी में दाढ़ी पकड़े तम्बू की तरफ भागने लगा। - खाली वाल्टी कलाई में फंसाये अचली बछराज के तम्बू से निकली। २४ पत्तों की बिरादरी

फिर बछराज के खांसने और कराहने की आवाज सुनायी दी । गुबो ने
अचली से पूछा, "वो अब कैसा है ?"
"रोग-दोख की मुझे ज्यादा जानकारी नहीं।" अचली वेहद उदास
और वुझी हुई थी, "तेकिन-कल बदरू ने देखके कहा था कि स्यात
पीलिया है। शरीर हल्दी के माफक जरद पड़ गया है।"
अचली पानी के कोठे पर चली गयी। सिराम ने पास पाकर कहा,
"कैसी नेक औरत है । बहुत सेवा करती है बछराज की।"
"हाँ ! बीमारी में तो घरवाले तक छिटक जाते हैं।" शुवो बोला।
"हे-ह शुवो !" सिराम कानाफूसी के स्वर मे बोला, "इग्यारसीलाल
और सुवटी.."उघर साथ-साथ गये हैं।" उसने कम्फ के
की ओर इशारा किया।
""क्यों, तम्बू काफी नहीं है क्या ?" शुवो में फिर कडवाहट उभर
वाहर एक टीवे
7
पायी।
"वो बात नहीं है। सवेरे से हरलो उस तरफ चक्कर लगा रहा
है । स्यात उससे मिलने गये हैं।"
"हरलो ही था ? ठीक से देखा था तुमने ?"
"हाँ, उसे तो अच्छी तरह पहचानता हूँ ।"
"सुवटी अब इग्यारसीलाल और हरलो में मेल करा रही है क्या ?"
"भण्डारे में नया नाज आने की जानकारी भी हरलो को जरूर मिल
गयी होगी?"
."इतना तो सुवटी ने यता ही दिया होगा।"
"धो "उधर रोज जाती है।"
"उस पर रोक लगानी होगी।" सुबो फिकर में पड़ गया।
"चींटी के पंख निकल आये हैं।"
"अगर ज्यानको काकी उसे समझाये तो-"

फोड़ डालूंगी। उसने मुझे दिया क्या ? बस, एक रद्दखल मकान मेरे नाम लिख दिया। बाकी तो सारी जायदात-दौलत अपने बीवी-बच्चों के लिए ही करके गया है।" बाद में, गुवो को बदरू से भी कुछ किस्सा मालूम हुआ। "लगता है, पुसपा बाई अब कम्फ छोड़ जायेगी।" शुवो ने शंका परगट की। "कभी नहीं । कम्फ में ही तो उसके प्रान अटके हुए हैं। दोनों हाथों से बटोर रही है । तुम्हें या किसी को भी, पता नहीं लगने देती वो।" बदह ने कहा, "जैतपालसिंग की सुपारस और कांगरेस पाल्टी के एक बड़े नेता को तगड़ी घूस देने के बाद यह कम्फ मिला है, पुसपा बाई को। सब जानते हैं, यहां के कम्फ सोना उगलते हैं । जब तक अकाल रहेगा, और सरकार की मदद मिलेगी, वह यहीं अड्डा जमायेगी।" "लेकिन उसने खुद कहा था कि वह किसी हीरानन्द-" "हीरानन्द-खीरानन्द भी खाली हाथ थोड़े ही पट जायेगा। उसकी गांठ नोटों से गरम करनी होगी। विस्तर को भी गरमाई देनी पड़ेगी, लेकिन वह अब पुसपा वाई पर राजी नहीं होगा । किसी और ईश्तरी का बन्दोवस्त करना होगा।"वो सब पुसपा बाई यहीं से कर लेगी । जव तक खजाना भरा रहता है, नागिन उस पर कुंडली मारे वैठी रहती है।" ''अरे ओ बदरू, कहां दफन हो गया अपनी महतारी का खसम !" पुसपा वाई की चिल्लाहट सुनायी दी। वदरू बिल्कुल पीला पड़ गया और तुरन्त मुट्ठी में दाढ़ी पकड़े तम्बू की तरफ भागने लगा। खाली बाल्टी कलाई में फंसाये अचली बछराज के तम्बू से निकली। ८४/पत्तों की विरादरी

फिर बछराज के सांसने और कराहने की आवाज सुनायी दी। सुबो ने
अचली से पूछा, "वो अब कैसा है ?"
"रोग-दोख की मुझे ज्यादा जानकारी नहीं।" अचलो येहद उदास
और युझी हुई थी, "लेकिन-कल बदरू ने देसके कहा था कि स्यात
पीलिया है । शरीर हल्दी के माफक जरद पड़ गया है।"
अबली पानी के कोठे पर चली गयी। सिराम ने पास पाकर पाहा,
"कसी नेक औरत है । बहुत सेवा करती है बछराज की ।"
"हाँ ! बीमारी में तो घरवाले तक छिटक जाते हैं ।" शुवो मोला ।
"हे-ह शुवो !" सिराम कानाफूसी के म्बर मे बोला, "इग्यारसीलाल
"और सुवटी "उघर साथ-साय गये हैं।" उसने कम्फ के बाहर एक टीये
की ओर इशारा किया।
"मों, तम्बू काफी नहीं है क्या ?" शुयो में फिर फहवाहट उमर
1
आयी।
"वो बात नहीं है । "सबेरे से हरलो उस तरफ चक्कर लगा रहा
। स्यात उससे मिलने गये हैं।"
"हरलो ही था ? ठीक से देखा था तुमने ?"
-"हाँ, उसे तो अच्छी तरह पहचानता हूँ।"
! "सुवटी अव इग्यारसीलाल और हरली में मेल करा रही है क्या ?"
"भण्डारे मे नया नाज माने की जानकारी मी हरलो को जरूर मिस
गयी होगी ?"
"इतना तो सुवटी ने बता ही दिया होगा।"
"वो""घर रोज जाती है।"
"उस पर रोक लगानी होगी।" शुवो फिकर में पड़ गया।
"चोटी के पंस निकल आये हैं।"
"यगर ज्यानको काकी उसे समझातो'

"वो किसी के समझाने-बुझाने से टिकनेवाली नहीं, उसके माथे में
हालो का सोरूर भर गया है।" सिराम रुककर बोला, "इग्यारसीलाल
के पास जो बन्दूक है, उसका इन्तजाम भी होना चाहिए।"
"कैसा-क्या इन्तजाम ?"
"वो कभी भी हमारे खेलाफ खड़ी हो सकती है। तुम कहो तो उसे
ठिकाने लगा हूँ?"
"तुम बन्दूक चलाना जानते हो?"
"कसे नहीं जानूंगा ? जनम से वावरिया-जात हूं। शिकार करके
पेट पालता रहा हूं।"
"अभी अच्छा मौका है।" शुबो फुसफुसाया ।
"इग्यारसीलाल गया हुआ है। मैं उसकी वन्दूक पार कर देता हूँ।"
"हाँ। और, घासफूस में लपेटकर किसी ठीक जगह पर छुपा
देना।"
'अच्छा।" सिराम ने चारों ओर देखा, सेंध मारनेवाली नजर से
बोला, "बाद में कोई गड़बड़ हो तो तुम पलेट लेना।"
"फिकर मत करो।"
पुसपा बाई अपने तम्बू से निकली। पीछे-पीछे बदरू । वे तल्लाव की
खुदाई के लिए ठौर-ठांव तय करने जा रहे थे। जल्दी ही काम शुरू
करना था।
पानी के कोठे से बाल्टी भरकर लौटती हुई अचली का चेहरा धुला.
धुला साफ था। काली झाइयां मिट गयी थी। शुवो के निकट से गुजरते
हुए बोली, 'सुवटी को समझा देना, शुबो ! वो मेरी छोरी को तंग कर
रही है । मुझे किसी रोज़ गुस्सा आ गया तो चुटला पकड़ के गला टीप
दूंगी।"
"जुगनी को कुछ कहती है वो ?"
२६/ पत्तों को विरादरी

.
"वेबात झगडा करती है । ताने-माने लगाती है।"
"ऐसी ही यादत है उसकी ।"
"मेरी आदत तो और भी ज्यादा सराब है-"
"मैं निपट लूंगा। तुम कोई टण्टा सड़ा मत करना।"
घास के एक पूले को कांख में दवाये सिराम भण्डारे की तरफ चला
गया । शुबो ने तनिक चंन की सांस ली, किन्तु हरलो को लेकर उसकी
परेशानी निकल नही रही थी। उसे सन्देह था कि इन्ही दिनों मे हरलो
की टोली नये नाज को हथियाने की चेष्टा कर सकती है। पुसपा वाई
और इग्यारसीलाल भी उसकी समझ से बाहर होते जा रहे थे।
सिराम ने पास भाकर हल्के से संखार दिया, फिर मुस्कराया।
"चलो, जरा भण्डारे की हालत देख लें।" शुवो ने कहा ।
भण्डारे की चौहद्दी कही-कही से दरफ गयी थी। शुवो ने सुर्जी का
गारा बना डाला और दरारों में भरने लगा। सिराम पिछवाड़े में लीक
खींचकर खाई खोदने लगा। दरारें ठीक कर शुबो भी उसके सग जुप
गया।
सारे दिन वे धमा-धम्म कस्सी चलाते और माटी निकालते रहे । खूब
चौड़ी और लम्बी खाई बना डाली। उसे लांघकर तत्काल भण्डारे तक
• नहीं पहुंचा जा सकता था । साई से गज भर के फासले पर उन्होंने बाड़
लगा दी और परकोटा-सा बना दिया।
"अब जावता हो गया।" शुवो को इतमीनान आया । सिराम अभी
भी बाड़ की मेडं में उलझा हुआ था।
।
.
"इग्यारसीलाल लोटा नहीं ?" पुसपा बाई बदरू से पूछ रही थी।
"नही ।" उसने गर्द झटकायी और फिर इस तरह खड़ा हो गया,
मानो उसे कोलो से जड़ दिया गया हो।
"वह जहां जाता है, अटक जाता है ।" पुसपा वाई खोज उठी। कुछ

क्षण कम्फ की छप्पर-छाजनों को एकटक ताकती रही। फिर वोली, "कित्ते जने यहां आ गये हैं। दूसरे कम्फ भी तो हैं, वहां क्यों नहीं जाते? निकम्मे हैं सव। करते कुछ नहीं खाते हैं और हगते हैं।" टहलते-टहलते उसने टांगें चौड़ी की मोर भड़ाका मारकर बदबू फेंक दी, "धत्त तेरी, पेट में चाय भर गयी है। कुछ हजम होता नहीं। बड़ा- धड़ गोले फूटने लगते हैं।" रात को वछराज के तम्बू में लालटेन टिमटिम कर रही थी। शुवो उसके हालचाल पूछने के लिए अन्दर जाना चाहता था, किन्तु तभी उसने मचली की घिगियाहट सुनी और वह चकित-सा बाहर ही रुक गया। "मुझे माफ कर दो।" वह कह रही थी, "मैंने बहुत बुरा किया तुम्हारे साथ, उसी का फल भोग रही हूँ आज ।" "तुमने तो"जो भी तुम्हारे सम्भक में पाया, उसे वरवाद कर दिया। औरत की देह में डाकणी हो तुम !" बछराज हांफता हुमा वुदबुदाया। "रुको मत, और गालियां दो मुझे, तुम्हारे मन का बोझ उतर जायेगा।" "इतनी आसानी से उतर जायेगा बोझ? मैंने उसे जिनगी भर ढोया । मेरे अन्दर धंस गया है वह।" "मैं नहीं जानती थी, तुमसे"इस तरह--यहां मोलाकात हो जायेगी।" "वो “छोरी किसकी है ?" "तुम्हारी । सच कहती हूं।" "क्या सबूत है ?" "यकीन करो मुझ पर । सौगन्ध ले लो।" "तू स्साली कुतिया, सांच बोलेगी कभी ? मूर और फरेव की सड़ांध में सड़ चुकी है तू । कितनी बार, कितनी तरह से झूठ बोलती रही है १८/पत्तों को विरादरी

सामन ।
1
"मैं अन्धी हो गयी थी। मेरी मत्ति भरम गयी।"
"अब कितनी आंखें लेकर आयी है कम्फ में? सबसे पहले तुमने
मुझे चूसकर फेंका, फिर दोने को। उसे मार क्यो डाला तुमने ?"
"वो मुझसे मुंह फेरकर "दूसरी औरत के पास जाने लगा था।"
"तू
भी तो मुझे धोका देकर चली गयी थी उसके पास । मैंने तो
गर्दन नहीं तोडी तुम्हारी!"
"तुम्हारे भीतर दया थी।"
"रोड भाग निकली दीने के साथ । लेकिन उसके साथ भी निभा न
सकी। दरांती से चीर डाला यार को।" खाट की ईस पर मुक्के मारता
हुआ बछराज जैसे अपने-आपसे बातें कर रहा था ।
अचली चुप रही।
"जेल-बैल नहीं हुई तुझे ।"
कोतवाली में बन्द कर दिया था उन्होंने । लेकिन, दो-तीन रोज
बाद एक सिपाही का दिल आ गया मुझ पर। उसने वहाँ से निकालकर
मुझे अपने घर में बिठा लिया।"
गोरी चमड़ी मे भरमा गया वैचारा! उसकी भी दुग्गत ही
की होगी तुमने !"
1"यो बहोत सराव पास पीटने लगा मुझे । और फिर, रण्डी कहने
-
लगा।"
"रण्डी तो तू थी ही । उसका व्योहार गलत नहीं था।"
"कैसे-कैसे लोग पकड़के लाने लगा वो और हुकम देता था, करो
इनके साय।"
"तेरी भूक तब अन्छी तरह मिट गयी होगी।"
"मैंने सिपाही को जहर दे दिया।"
"ओह, तेरा सरवनास हो!" बछराज के मुंह से निकला।
कुछ क्षण खामोशी रही।

"भागते-भागते थक गयी हूँ मैं । पुलीस का डर लगा रहता है। गनी की चिन्ता वेचन किये रहती है।" "इंदस्तान बचाव के लिए आयी है ?" "यही समझो। अकाल ने भी बदहाल कर दिया था। "तुमने' खेस्तान क्यों छोड़ दिया?" "क्या करता वहाँ ? तुमने दगा किया तो घरवार फीका लगने लगा। धीरे-धीरे औरत जात से ही घिरणा हो गयी।" "मुझे पता लगा था कि तुम औरतों को इस-उस पार वेचने-खरीदने का धन्धा करने लगे हो। "हां, बदले की भावना तीखी हो उठी थी। कई दिनों तक यही धन्धा किया, लेकिन मन विल्कुल अकेला और अनाथ होता गया। एक दिन खुद को धिक्कारते हुए सब तज दिया।" "इस कम्फ में कैसे..." "इग्यारसीलाल की वजह से। औरतोंवाले धन्धे में उससे जान- पहचान हुई थी। यहां भी उसने साथ रहने के लिए कहा। जो कुछ मुनायी दे रहा था, वह शुवो के लिए अविश्वसनीय था। नसों में प्रवल कम्प मच गया । सिर में घुमेरी उठने लगी तो वह अंधेरे के मजीठिया परदे में हाथ-पांव मारता हुआ वहां से परे हट गया। लगा, मानो किसी ने आंखों और कानों में आग की मेखें ठोंक दी हों। न कुछ सूझ रहा था, न कुछ सुनायी पड़ रहा था। वह एक दूह पर पसर गया। रपतः-रफ्तः विचार तलफलाने लगे। दलदल में जनम और दलदल में मौत ! हरियाली की खोन करते-करते, आदमी काई के घेरे में जा फंसता है, उसने सोचा । फिसलन और वदवून से भरी काई सूखती है, सिकुड़ती है, लेकिन एक बार अपनी लपेट में लेने के वाद किमी को मुकत नहीं करती है। फिर, तन और मन दोनों के लिए, कीचड़ में ही जीने और रमने के सिवा दूजा चारा ही क्या रह जाता है ! ९०/ पत्तों को विरादरी

।
माची पर अपलेटी होकर पुसपा वाई इग्यारसीलाल से मशवरा कर रही
थी। बदरू उसके पांव चांप रहा था और कट-कट कटके निकाल रहा था।
'तल्लाबवाली इस्कीम से अच्छा नफा होगा।" इग्यारसीलाल ने
और बातों के बीच में तान छेड़ी।
"नफा जाने कब होगा, नुकसान तो हो ही गया है ।" पुसपा बाई
'चोली, "इस्कीम आते ही जतपालसिंग को काल हर ले गया । और, अव
-
हरलो भी-"
"यो तंग नहीं करेगा हमें।"
"बात पक्की कर ली है ?"
"हाँ । उम्मरकोटवालो को मीठा जवाब देना पडेगा।"
"हरतो-अकेला ही सारा सौदा चाहता है ?"
"नकद रकम देगा ?"
"हाँ । जवान दे रहा था।"
"तब हमें क्या एतराज है !
"शुबी गड़बड़ करेगा।"
"वो कौन होता है, दखल देनेवाला-"
"लेकिन परेशानी तो पैदा कर ही सकता है।"
"तो सोचो, क्या किया.जा सकता है !"
"नया थानेदार आ गया है।"
"अच्छा.!-वैसे: हरलो से भी बात कर देखो।"
"तल्लाव की खुदाई मिनख को बलि मांगती है, पुसपा बाई।"
इग्यारसीलाल ने वात बदली, "नही देंगे तो सारा काम चौपट हो सकता
"मैंने भी सुना तो है।"
"परबन्ध करना होगा।"

अचानक भण्डारे के पास हाका फूट पड़ा, "पकड़ो, पकड़ो !"
पूरा कम्फ, जो अलाव और तम्बाकू और सोरठों के संग रस ले रहा
था, हड़बड़ाकर पाँव-पांव दौड़ पड़ा।
ज्यानकी काकी ने भण्डारे के पिछवाड़े किसी की चुटलिया पकड़
रखी थी और चीख रही थी, “आज तेरी लुगदी निकालकर दम लूंगी,
रांड ! बोल, क्या कर रही थी यहां ?"
"छोड़ दो ! काकी, मुझे छोड़ दो।" सुवटी तड़फड़ाती हुई रो रही
थी।
"देख क्या रही है फूलकी, मार कमीनी के दो जूते ! इस पर बड़ा
मद छा गया है जोवन का।"
फूलकी ने वाकई फटाफट जूने चला दिये । सुवटी बिलविला उठी,
"होय-होय, मार डाला रे !"
ज्यानकी काकी उसे मरी हुई भेड़ की तरह घसीटने लगी।
गज्जी ने कहा, "हो क्या गया । छोड़ दो, काकी !"
काकी ने पलटकर उसी के कुहनी चला दी, "तू पंचात में मत पड़ ।
शुवो कहां है ? उसको बुलाके ला । वही न्याव करेगा।"
"मामला क्या है ?" शुवो आ गया, "क्या विगाड़ कर दिया सुवटी
ने ?"
"पूछ इसी कुलक्खणी से !" काकी बिफर पड़ी।
सुवटी ढां-ढाँ रोये चली जा रही थी।
फूलकी ने मूंज की जेवड़ी लाकर उसके हाथ बांध दिये, "तू वहोत
मस्तानी हो गयी है, भैण !" उसने हिकारत से कहा और झोंटा पकड़-
कर खींच दिया सुवटी का । वह हाय-हाय कर उठी।
"चुप हो जा।" काकी ने डपट दिया, "नहीं तो और मार खायेगी।"
सुवटी सिकुड़कर सुबकने लगी।
घटना का पूरा ब्योरा फूलकी ने दिया । दिसा-मैदान के बाद ज्यानकी
काकी और फूलकी व म्फ में लौट रही थी। भण्डारे के पिछवाड़े
६२/ पत्तों की विरादरी

उन्होंने तीन जनों को सुसफुस करते हुए देखा । सुवटी की आवाज पहचान में आ गयी । वह कह रही थी~जल्दी-जल्दी वाड़ तोड दो और पाई को माटो मे बूर दो । यह भण्डारा तो मेरा खूब देसा हुआ है । इसको मैं अकेली ही लूट सकती हूँ। हरलो खामखों हिचक रहा है। तभी ज्यानकी काकी ने हिम्मत की और हांक दी, "सुवटी !" लपककर उसने सुवटी के बाल पकड़ लिये, "अर-हो, तू तो अब डकत " चन गयी है! " फूलको मदद के लिए चिल्लाने लगी । कम्फ के लोगों को आते देस- कर सुवटी के साथ के दोनों जने भाग छूटे । लेकिन, सुवटी की शामत आ गयी । उस पर थप्पड-मुक्के बरसने लगे। "मुवटी, तुमने यह अच्छा नही किया ।" सिराम बोला, "जिस पाली में साती है, उसी में छेद करने की सोचती है ! "हरलो पट्टी पढ़ा रहा है ।" गोदारी ने कहा, "तमी वो हरदम उसी के गुण बखानती रहती है।" "काकी, अब इसे तुम्हीं संभालियो !" शुयो चोला । सुवटी के इस पतन पर उसे ताजुब था और दुःख "तू क्यों चिन्ता करता है ? इस लाडो को सारी मस्ती झाड़कर +aram ज्यानकी नहीं।" भी।

भोर होकर बोला, "मुझे अपना हाथ दो !" जुगनी मन्त्रमुग्ध-सी उसके निकट खिसक आयी । शुको उसकी महत { मन हो उठा । दोनों ही के होंठ बड़ी आतुरता से एक-दूसरे को पाने के लिए बढ़े और लीन हो गये । वह एक सहज प्रवाह था, उसे रोका नहीं जा सकता था और रोकने की सोचकर कदाचित् वे ग्लानि से भर उठते और अपने आपको माफ न कर पाते। सभी होंठ एक-से नहीं होते हैं ! शुवो ने वह कोमल अन्तर महसूस किया। यह उमड़कर चूमना ! यह स्वाद"जुगनी झनझनाकर उत्तेजना की धारा में विकल हो उठी। पिछले साल, अचली के पास 'ठहरे हुए' एक आदमी ने उसे जबरन दवोच लिया था और देर तक उसके होंठों को गोंद की गुठली बनाकर चूसता रहा था । वह चिपचिपाहट, वह घिन आज धुल गयी। "जुगनी !" सामने अचली खड़ी थी, "यहां क्या कर रही है तू ? मैंने तेरी खोज में सारा कम्फ छान मारा।" "ऐसा क्या कारज आ पड़ा मुझसे !" मां की धधकती हुई आंखों फा ताप जुगनी ने महसूस किया, लेकिन उसने उपेक्षा दरसायी। "शुवो, तू मेरी छोरी को विगाड़ रहा है । यह ठीक नहीं।" "मैं अपना बिगाड़-सुधार समझती हूँ। तुम्हारी सलाह की जरूरत नहीं पड़ेगी।" "बहेस मत कर ।" अचली चिड़चिड़ा उठी, "कम्फ में पुलीस भायी "पुलीस ?" शुवो चौंक गया। "हां, राज को शक हो गया है कि कम्फ में पोस्तान के जासूस रहरे हैं।" अचली की आंखों में दहशत थी। ६६/ पत्तों की बिरादरी ..? "तू सच बोल रही है " जुगनी को विश्वास न पा रहा था। "जा, सुद जाके देख ले।" अचली बदहवास-मी घाघरे का घेर मसलती हुई चली गयी। "अब ?" जुगनी अस्थिर हो उठी। "धवराओ मत । मुझे लगता है, किसी ने रपोट भेजकर पुलीस को खुलवाया है । हो सकता है, यह सब मुझे फांसने के लिए किया गया हो!" "मैं भी यही सोच रही थी।" "अच्छा, वो उस तरफ"वो जो रोहिडे और लेसुए के गाछ हैं, मैं उनमें छिपकर यह मेला देखता हूँ। तुम चुपचाप जाओ यहां से और जरा सिगम को उधर भेज देना।" शुबी बिना विलम्ब किये टीले की ढलान में डुबकी लगा गया। कम्फ में तनाव था। नया थानेदार, चौदह सिपाहियो को टुकड़ी साय लेकर आया था और इग्यारसीलाल के तम्बू में विराजमान था । कम्फ के वासी किसी-न-किसी बहाने से उसके आसपास मंडरा रहे थे कि असल वात का पता लगे । पुलीस के अचानक आ टपकने में वे अस्त-व्यस्त हो उठे थे। फाटक पर पुलीम के घोडे हिनहिना रहे थे और धरती को घुरो से खूद रहे थे ! सिपाही उनको जोन उतारना चाहते थे किन्तु यानेदार ने मना कर दिया, "जल्दी ही लौटना है । मुझे यक्त गंवाना पसन्द नहीं।" पुसपा बाई ने कहा चढ़वा दिया था और हिदायतें वधार रही थी। । मेहमानों के लिए हलवा बनेगा । पूड़ियां तनी जायेंगी। पापड सिकेंगे। जुगनी सिराम को ढूंढ रही थी और कम्फ की हलचलों पर भी निगाह रमे हुए यो । मन के इन्द्र' को व्यक्त कर पाना कठिन था- उसके लिए ही नहीं, औरों के लिए भी । गज्जी गुस्से में कुल्हाड़ी लेकर

लकड़ियों के एक ग8 पर पिल पड़ा था और चीर-चीरकर ढेर लगा
रहा था । ज्यानकी काकी चक्की पीस रही थी। रह-रहकर हत्यै पर से
उसकी मुठिया पकड़ छूट जाती थी। हद्दी को पुसपा बाई ने घोड़ों की
खिलाई-पिलाई पर लगा दिया था। वह उनके थोबड़ों के आगे जोर-जोर
से कुण्डे पटक रहा था।
इग्यारसीलाल उठकर पुसपा बाई के पास गया । वह एक डिब्बे को हिला-
खनकाकर काजू
निकाल रही थी, थाली में ।
"यह थानेदार तो बड़ा बकवकिया है।"
"टुकड़ा डाल दिया ?" पुसपा बाई ने पूछा ।
"हाँ, लेकिन लालच देखो इसका-इत्ते सिपाही घेरकर ले माया
है। सबके हाथ में कुछ-न-कुछ तो देना ही पड़ेगा।"
"काफी रकम चली जायेगी। शुबो पर नजर रखना।"
"इत्ता खरचा तो होगा ही, कुछेक और लोगों को भी पकड़ा देना
चाहिए, पुसपा वाई !"
"नहीं, अभी नहीं । कम्फ में वलवा हो सकता है । कोई मुझे बतला
रहा था कि एक किसी कम्फ को तो वहां के रहनेवालों ने ही लूद
लिया। हमें होशियारी बरतनी होगी।"
.
जुगनी ने हद्दी को इग्यारसीलाल के डेरे से निकलते हुए देखा । जब वह
सिराम से शुबो के लिए पूछताछ करने लगा तो जुगनी नजदीक गयी।
बोली, “वो उस तरफ है।" फिर सिराम को इशारा किया, "तुम्हें
बुलाया है।"
"छुपना ठीक नहीं।" हद्दी बोला, “थानेदार वड़ा मजाकिया है,
किसी का कुछ विगाड़ेगा नहीं।"
६८/ पत्तों की बिरादरी

"कुछ कह रहा था ?" जुगनी सशंकित थी। "हो, बोलता था-मेरे लिए इंटस्तान-पस्तान बराबर है। सब भाई-चारे के साथ रहो, कोई टण्टा खडा मत करो।" "पुलीसिये शुरू मे ऐसी ही चिकनी-चुपडी बातें करते हैं, बाद में बदल जाते हैं।" "हाँ. वो तो किसी तरह कामना चाहते हैं।" सिराम बोला। "सिपाहियों को भी उसने कहा कि कम्फ मे किसी को तंग मत करना, नही तो खाल खीच डालूंगा।" हद्दी जो सुन चुका था, वही उगल रहा था। "शुवो की शिकात हुई है क्या ?" जुगनी ने पूछा। "शुवो की क्यों शिकात होगी पुलीस में ?" हद्दी हडबडाया। "कर दी होगी किसी ने ।" "थानेदार ने तो कुछ नहीं कहा अभी तक ।" ..."तुम जाओ, यहाँ..." जुगनी ने सिराम की तरफ भौहें हिलायो। वह सावधान-सा चला गया। जुगनी ने हद्दी से कहा, "धानेदार के बह- कावे में न आना । तुम भोले हो। जान लो यह हलवा-पूड़ी जिमके खरचे पर बन रही हैं, यानेदार उसी की डोर पर नाचेगा।" "लेकिन शुबो की "इग्यारसीलाल और पुसपा वाई के साथ सटपट तो है नहीं। उन्होंने उसको भण्डारे को रखवाली का काम सौंप रखा है।" "वे अन्दर से खिलाप हैं।" "क्यों ?" "सुबो ने कम्फ में भरती बढा दी। वो लोग ऐसा नही चाहते हैं। पहले से ज्यादा नाम:रोज निकल जाता है । और भी बातें हैं।" "हो, एक बार शुवो मुझसे भी कह रहा था कि पुसपा बाई तो नाज को बचाने की फिकर में रहती है, जिससे उसका सौदा कर रकम गांठ सके।" मोहममेहरलोकी भी कोई चाल लगती है।" ry

"लेकिन-हो सकता है, थानेदार हमारा साथ दे।"
"तुम क्या दोगे उसे घूस में ?"
'घूम-फूम कहाँ से आयेगी?" हट्टी हतप्रभ हुआ।
"तो उम्मेद छोड़ दो। बुलानेवालों ने उसकी जेव गरम कर दी
-
हद्दी ऊपर-नीचे होंठ चुबलाता हुआ सोचता रहा ।
"जाओ, तुम भी गुवो के साथ सलाह कर आओ। लेकिन, जल्दी
लौटना।" कहकर जुगनी ने इधर-उधर देखा फिर ज्यानको काकी के
माथ नाज की पिमाई के लिा बैठ गयी।
एक गिरज-गिद्ध अपने काले-डरावने पंखों को फड़फड़ाता हुआ ऊपर से
निकला और सरकण्डों के झुण्ड की ओर चला गया। वहीं एक ढूह पर
बैटने से पहले वह देर तक उड़ान मारता रहा, फिर उसके पंजे आकड़े
को टहनी में चिपक गये । टहनी झूलकर रेत से लग गयी।
-
सात चिकने रंगीन पत्थर इकट्ठ कर बाशिया सगुन ले रहा था । यह
विद्या उमने गोदारी में सीखी थी। जब विपदा आय, पत्थरों की बात
सुनो । वह उन्हें हवा में उछाल रहा था । पत्थर अक्काम की वानी पकड़
लेते हैं और भविम-काल का हाल-हवाल बता देते हैं ।
कम्फ में चक्कर काटने हा एक सिपाही की कमरपेटी में कई छोटी-
छोटी थैलियां लटक नही थी। वह उन्हें हिलाला, कमर मटकाता, धुएं के
छल्ले बनाता ऐंठ रहा था ।
"हरामखोर, कमे कल्हे भिट्टा न्हा है ।" ज्यानको काकी ने पीतल
की नथ को अंगुली में घुमाया-फिराया, "मुंह में क्या डाल रखा है
इसने ?"
१०० / पत्तों की विरादरी

"सिकरेट है।" जुगनी चोली, "सफेत कागद को बीड़ी होती है
यह।"
''पुलीसिये ऐसे ही नखरेवाज होते हैं।"
गोदारी लगभग दोडतो हुई आयी, "घटराज की हालत उखड़
गमी है।"
तभी पुस्पा बाई और इग्यारसीलाल लपकते हुए-से बछराज के तम्बू
में चले गये। उनके पीछे-पीछे मोटे मकई-सा थानेदार । बरदी-टोपी,
औजार-पाती, बन्दूक-फन्दूक को मुशकिल से संभालते हुए।
थोड़ी देर में वहां कम्फवालों की भी भीड लग गयी।
"वो "पछराज के डेरे पर क्या खेला हो रहा है ?" गज्जी ने कुल्हाड़ी
चलाना रोककर फूलको से पूछा।
फूलकी देर से मुंह फुलाये कम्फ में फेरी लगा रही थी। दो-चार बार
उसने गज्जी से मोठे-मीठे वतियाना चाहा था, पर उल्टे झिडकी माने
को मिली । गज्जी को न मालूम क्या गुस्सा आ रहा था कि भचाभच्च
लकड़ियां चीर-फाहकर फेंके जा रहा था।
फूलकी ने नाक चढ़ा ली । जवाब नहीं दिया।
""हुलिया को हंडिया क्यों बना रखा है तूने ?"
इत्ता योछा मत बोला।"
"मेरा मगज ठीक नहीं है।"
"कभी रहता भी है ?" जुगनी बोली, "बछराज की तवंत बिगड़
गयी है।"
१ . "बाड़मेर से वैद की दवाई मगायौ थीन-"
"असर नहीं हुआ इसका
"शुवो को देखा कहीं ?" गज्जी के प्रश्न में गहरी व्यग्रता थी।
"नहीं।"

"पो किन' यूं ही चूंचियां उालती रपड़ रही है तू ?" वह भन्ना
उठा।
"मेरी चूंचियां बुरी लगती हैं तुम्हें ?" फूलकी ने तमककर कहा,
"मोला लगते ही तो तू वहीं हाथ मारता है।"
"दिमाक मत चाट मेरा।"
"वा-वाह रे, दिमाकवाले !"
'लाड़ में ज्यादा लगने लगी है तु ?"
"मुझे नहीं चाहिए तेरा लाड़-वाड़ । इना ठस्का ! ऊंह ! भत्तेरे
मिलेंगे जिनगी में।'
'मैं कब कहता हूं कि तुम्हें कमी रहेगी । सुवटी को भी तो भत्तेरे
मिल गये है।'
नाम मत ले उसका।"
क्यों न लूं ? तेरी ही भण है।"
"आग भर दूंगी मै तेरे और उसके मुंह में।"
जुगनी ने आकर टोका, "किस बात पे झगड़ा हो रहा है ?"
फूलको रोनी-रोनी हो गयी, "पहले वोलता था, तुझमे नात्ता
करूंगा । अब कहता है, भत्तेरे यार मिल जायेंगे, पकड़ ले किसी का
हाथ !"
"मैंने हाथ पकड़ने के लिए नहीं कहा।" गज्जी ने सफाई दी।
"नो, क्या-क्या कहा था तुमने, फिर वोलकर बताओ। मरद को
बात और टिड्डे की बान । चित भी मेरी, पट भी मेरी।"
"इसमे लड़ा मत कर, गज्जी !"जुगनी ने फूलकी का पक्ख लिया ।
उसी समय उसने सिगम को अपनी तरफ आते हुए देखा ।
"शुवो वहाँ तो नहीं है ।” सिराम का चेहरा चिन्ता में सूख रहा था।
"नहीं है ? वहीं के लिए ही उसने कहा था, मुझमे ।"
"मैं तो और भी दूर-दूर तक देख माया।"
पांवों के निशान भी नहीं मिले ?"
.
१०२/ पत्तों को विरादरी

: "निशान तो ये रेत पर ! लेकिन-~का मादागा नहा हुआ। "कहां गया होगा वो ?" "सत्तरा भांप के किसी और जगा चला गया हो स्यात-" "शुबो इस तरह डरनेवाला नहीं है।" . 6 "हाय रे, बच्छू ! अरे, तू चला गया रे, बच्छू !" अवली का हाहाकार समूचे कम्फ में थरथरा उठा। बछराज के तम्बू के सामने सड़ी हुई औरतें फफक-फफककर रोने लगीं। जमाल आंखें पोंटता हुआ बाहर आया, "प्रान छोड़ दिये उसने..." जमाल को वीनणी गोद में बच्चा संभाले आंसू गिराने लगी। उसके बच्चे के जनम पर बछराज ने कम्फ भर मे गुड-भेली वांटी थी। बाद में जमाल को बुलाकर नगद दो रुपये भी दिये थे। कहा था, मेरी तरफ से जच्चा को दे देना चाहिए । जच्चा रानी का मान सवको रखना चाहिए। ज्यानकी काकी रुंधे गले से बोली, "अचली ने वेम्मारी में बहोत सेवा की। बछराज का गू-मूत तक साफ करती थी। ईशर फल देगा उसको...॥ जार-जार रोती हुई और दांतों से ओढनी चवाती हुई अचली तम्बू से निकली और जमीन पर गिरकर तडफने लगी। जुगनी ने पास जाकर संभालना चाहा तो वह चीख मारकर वह गयो, "अरे-रे-हो, अब मैं क्या करूं, मैं तो कहीं की न रही-" "क्यों इत्ता फल मचा रही हो?" जुगनी से सहन नहीं हुआ। "अरें दुरभागण, एक चार जाके तो देख ले उसे । तेरा बाप था वो-"अचलो विपूरने लगी। "जबसे होश संभाला है, जने-चने के लिए तुमसे यही सुनती आयी हूं-यह तेरा बाप है, वह तेरा वाप है, इमको बापू मान, उसको बापू . ..

बोल ! गिनना ही भूल गयी मैं तो, जाने कित्ते वाप हो गये मेरे।" "मेरे जले पर नमक छिड़क रही है तू?" अचली ने आह भरी और सुर्ख, धायल आंखों से बेटी को देखा, "जा, जाके वहां एक दफे उसका चेहरा देख ले। तूने मेरी कोख से जनम लिया है। तेरी मां मै । मैं कह रही हूँ, वो तेरा वाप था। जुगनी, और सव तो शरीर साझीदार थे। जब तक रस मिला, साथ रहे। लेकिन मुझ जैसी कल- मुखी के साथ व्याह तो बछराज ने ही किया था, सुहाग तो उसी ने दिया था मुझे । तेरे आगे हाथ जोड़ती हूँ, तू अपने बाप को देख ले। आज के बाद वो चेहरा नजर नहीं आयेगा-" जुगनी जाने क्या सोचकर तम्बू की तरफ चल पड़ी, धीमे-धीमे । और, वहां तक पहुंचने से पहले ही उसके मुंह से रुलाई फूट पड़ी। उसके भीतर एक नन्ही-सी बच्ची हाथ फैलाकर चीत्कार करने लगी, "बापू-ओ- वापूरे हो...' १०४ / पत्तों की बिरादरी

सूरज ढल रहा था। थानेदार मैदान में आकर चिल्लाया, "इग्यारसी-
लाल !"
इग्यारसीलाल भागता-पड़ता आया ।
"भोजन तैयार हो गया?"
"हलवा पक चुका है । वस, पूड़ियां बन रही हैं।" उत्तर पुसपा वाई
ने दिया।
"जो भी तयार हो, सिपाहियो को झटपट खिला दो, तुरन्त । फिर,
सारा को भी तो जलाना-निपटाना है। शाम से पहले यह सब हो जाना
चाहिए।"
"लाश की चिन्ता न करें, यानेदारजी..."
पुसपा बाई ने कुछ और
भी कहना चाहा, पर थानेदार ने बीच मे ही बात लपक ली, "मुझे
मौत-वौत बहुत खराब लगती है।"
बछराज कई दिनों से बीमार या। पीलिया हो गया था ।"
इग्यारसीलाल बोला।
पानेदार ने हाप मले, "मैं तो यह सोचके याया था यहाँ कि चलो,
संस-सपाटा रहेगा, सफरी हो जायेगी, लेकिन-" उसने बदरू के कन्धे
पर अंगूठा नचाया, "क्या नाम है तेरा ?"
वर,
.
..
"अच्छा, बदरू ! गला तर करने के लिए क्या है यहाँ ?"
भिस्की ले आऊँ?".बदरू ने हरते-डरते पुसपा बाई की तरफ

देवा । उसने हां में सिर हिलाया। बोतली खोल दी गयी। थानेदार उसे हाथ में उठाये मांची पर बैठ गया। - "खूब धूमा हूं मैं । आबू की पहाड़ियों में । कोटा के जंगलों में- उमने कई घुट गटागट लिये और भौंडे ढंग से मुस्कराया, “एक दफा पुलीस के जलमे में जैपुर गया तो वहाँ चांदपोलवाली जरीना वेगम मर मिटी मुझ पर । आमेर की झील में मैंने ऐसा तैरना सीखा कि हफ्ते भर तक नैरता ही रहा। दोस्त निहोरे निकाल-निकालकर थक गये- अब बस करो, बाहर आ जाओ, ठण्ड लग जायेगी। मैंने किसी की न मुनी । आलथी-पालथी मारकर झील के मझ में पड़ गया।" "अघोरी जोगियों की तरह !" इग्यारसीलाल खुशामद में हँसा । "ठीक कहा तुमने । जरीना बेगम को पता चला तो वो पगला गयी। कोठे के मुजरे को बीच में छोड़कर आमेर पहुंची और झील के किनारे खड़े होकर मुझे दुहाइयाँ देने लगी। आखिर में उसने धमकी दी कि अगर तुम नुरन्त बाहर नहीं नकले तो मैं यहीं चट्टान से सिर फोड़कर मर जाऊंगी। मेरा कलेजा बैठने लगा। अगर जरीना बेगम मर गयी तो जैपुर उजड़ जायेगा । मैं नैरता हुआ किनारे आ लगा और उस गुलबदनी ने मुझे छाती में लगा लिया। छाती से, क्या समझे ?" उसने बदरू की खोपड़ी तबले की तरह वजा दी। वह सिटपिटा । गया। "जरीना बेगम किसी को अपने लहंगे की किनारी तक नहीं छूने देती थी। राजा-महाराजा तरसते थे। लेकिन मुझ पर तो वो कुरबान हो गयी। कहती थी-मरद हो तो ऐमा, सूरमा हो तो ऐसा, जो जिद पर अड़ा रहे और सिर्फ अपनी प्यारी की बात माने । आहाँ-हां, तो यह भिस्की-फिस्की मुलतान की लगती है । एकदम्म नसों में कशीदा वुनने लगी है।" "मुलतान की ही है।" पुसपा वाई वोली, “पसन्द आयी न ?" "पसन्द तो आयी, लेकिन मुलतान का माल यहाँ कोन लाया?" सवाल १०६ / पत्तों की विरादरी फेंककर थानेदार ने आंखें चलायीं। पुंसपा वाई और इंग्यारसीलाल के चेहरों का रंग फीका पड़ गया। "मैं सब समझता हूँ। मुझसे कुछ छुपा नहीं।" थानेदार ने होंठ चाटे। बछराज के तम्बू से औरतों और बच्चों के रोने की आवाजें आ रही थीं। सिपाही एक पंगत बनाकर खाने के लिए बैठ गये थे थानेदार का बखान चलता रहा । सूरमाई के कारनामों से ठसाठस । पुसपा बाई एक कटोरे में उसके लिए भी हलवा ले आयी। वह लीद करते खच्चर की तरह टांगें चौड़ी कर खड़ा हो गया और होंठों से चिप- चिप चिप करता हुआ गरम-गरम हलवा हडफने लगा। नाक को कभी हथेली, तो कभी आस्तीन से पोछते-झिझोड़ते उसने कटोरा साली कर दिया और जोर से बोला, "अभी तो शुरू किया है। देखना, दस फटोरे हलवा भकोस लूंगा तब छोटी-सी डकार आयेगी। मेंहदी खो पहलवान से होड जीत चुका हूँ मैं। वो खीर का मामला या। चार सेर खीर के बाद स्साला कान पकडकर तौबा-तौवा करने लगा।" सांझ सिमटने लगी। कम्फ मे मनहूसियत छायी हुई थी। जमाल ने पुसपा बाई से पूछा, "हाश के कफन का क्या होगा ?" पुसपा बाई ने धीमेन्मे इग्यारसीलाल को हिदायत दी, "वछराज के तम्बू में खाट के नीचे एक वक्सा पडा है । उसका ताला तोह लो। कोई कपड़ा-लत्ता जरूर मिल जायेगा।" । जमाल और इग्यारसीलाल जाने लगे तो थानेदार कुत्ते को भांति कान फड़फड़ाकर गुर्राया, "क्या माजरा है ?" "कुछ नहीं।" पुसपा याई खिसिमा गयो, "कफन के इन्तजाम के चारे में--". "वो ताला-वाला तोड़ने की क्या बात थी ?"

" है- "बछराज के एक बक्से को खोलना है-' "सुन लो, पुसपा बाई ! जव थानेदार सामने बैठा हो तो कानून को अपने हाथ में लेने की गलती नहीं करनी चाहिए। यह उसूल की वात -यहाँ मैं एम्पी और मिनिष्टर को भी घराता नहीं। क्या बिगाड़ लेंगे वो मेरा ?" उसने आंखें निकाली और दांन वजाय, "सब फोकटिये होते हैं । चुनाव का वक्त आता है तो मेरी पतलून में हाथ डालने लगते हैं, चन्दा मांगते हैं । मैं मदद करता हूं उनकी । लेकिन मेरे पास अलादीन का चिराग तो है नहीं, मैं भी जनता से ही वमूलना हूँ। कोई वारिस है बछराज का पर पटक- "नही, उसके आगे-पीछे कोई नहीं ।" पुमपा बाई वुभी-बुझी बोली। "तब तो बछगज की चीजों पर सरकार का कब्जा हो गया, पक्का । बक्ना बोलूंगा तो मैं ही खोलूंगा।" थानेदार ने मुंह गोल-गुम्मा कर आवाज लगायी, ' छत्तूमिंग, नेत्तूसिंग, आशूराम, टेशूलाल, सरपचन्न ।" पाँच सिपाही गिरते-पड़ते आये । हूंठ की तरह अब ड़ते हुए, कर, हाथ उठाकर उन्होंने सलामी दी मरनेवाला तो माटी हो गया अब । हम सबको भी मरना है, एक दिन । लेकिन जब तक जीना है, फरज पूरा करना है। तुम लोग बछराज के डेरे की तलाशी ले लो। सारा सामान थाने ले चलना होगा। अलवत्त, कफन का एक कपड़ा अलग कर देना।" सिपाही फिर जकड़वन्द हुए और पलटकर चले गये। - A कम्फ के पच्छिम में आधे कोस के फासले पर बछराज की चिता लगाने का निश्चय हुआ। जव लाश की टिकटी चलने लगी तो कम्फ बहुन भूतहा-भुतहा और भयावना, लगने लगा। बदरू अरथी के पीछे हो लिया । इग्यारसीलाल ने पीछे से उसके ठोकर लगायी, "अक्कल कुन्द हो गयी है तुम्हारी ? थाने की इतनी बड़ी पाल्टी आयी हुई है और तुम मुरदा . १०८। पत्तों को बिरादरी

1
म
जलान जा रह हा! उसका दखभाल कान करगा।"
यदरू मियां जमीन में गड़ा-गड़ा-सा रुक गया।
सुवटी एक तरफ खडी थी। कुछ रहस्यमय ढंग से इग्यारसीलाल जव
उसके समीप से गुजरा तो वह फुसफुसाकर योली, "शुवो को-"
इग्यारसीलाल चौका । हकवकाकर उसने आसपास देखा । कोई नहीं
था। सुवटी फिर बोली, "अब वेफिकर रहो।"
"अच्छा!" इग्यारमीलाल का तनाव दूर हो गया ।
"चलो, हरलो से मिल लो।"
"कहाँ है ?"
"मेरे पीछे-पीछे आओ।"
चार-छह टीले लांघने के बाद हरलो से भेंट हुई। उसने मिलते ही
इग्यारसीलाल की बांह कसकर पकड ली, "वोलो, अब तो खुश हो?"
स्वर में प्रसन्नता की खनक थी।
"हाँ ! तुमने काटा निकाल दिया। लेकिन यह थानेदार-"
• • "पानेदार को तो मैंने ही वुलवाया है। अपना आदमी
"बड़ी बक-बक कर रहा है।"
"करने दो। आदत है उसको। इन लोगों को भी तो कोई काम
चाहिए। मैंने उससे कम्फ की तलाशी के लिए कह दिया।"
..., "तलाशी लेगा?" इग्यारसीलाल शंकित हो उठा ।
"बस, वह मा गया तो समझो, तलागी हो गयी। राजकाज इसी
तरह चलता है।"
"कितना देना पड़ेगा? बछराज का माल-मलीदा तो उमने अपने
कब्जे में कर ही लिया।"
"वराज के पास था भी क्या ? "तुम खुश करके भेजना पुलीसियों
को । इन लोगों का मुंह भरते रहना चाहिए।"
कम्फ में लौटकर इग्यारसीलाल जोर-शोर से थानेदार की सेवा में
लग गया । सुवटी वहीं रह गयी थी। शुबो का नो टंटा खत्तम हुन,

सोचकर इग्यारमीलाल को फुरहरी-मी आयी, हरलो चालाक है और निपटना जानता है । ऐमा मौका चुना कि किसी को कतई शक नहीं होगा। थानेदार पर बात डालकर छुटकार ले लेंगे। ''इस इलाके में जिन्न का बड़ा कोप है।" इग्याग्मीलाल ने थानेदार के पान वैठक जमाते हुए बात छेड़ी, यह सोचकर कि भूत-प्रेत की चरचा जब चल पड़ती है तो खूब चलती है। "जिन्न ?" थानेदार उछला, मानो किसी ने अंगारे से छू दिया हो, “जिन्न आता है यहाँ ?" "हाँ, अक्सर । परेशान कर रखा है उसने, हम लोगों को।" कैसा जिन्न है ?" थानेदार ने वर्दी के नीचे पसीने के धारे महसूस किये। "कई लोगों ने देखा है। पेड़ की तरह लम्बा है।" चौतरफ के पेड़ों पर थानेदार ने इस तरह निगाह डाली, जैसे उनमें में ही कोई जिन्न हो। "जिन्न का मालूम होता तो मैं यहां आता ही नहीं।" "राज की नौकरी में डिउटी तो बजानी ही पड़ती है।" डिउटी गयी भाड़ में ! उसके लिए अपनी जान खतरे में डालूंगा क्या ?" . पुगने थानेदार को भी एक जिन्न ने ही मंकट में डाल दिया था। ऐसा जोरदार थप्पड़ माग कि बेचारे छह महीने तक मन्नपात में रहे। इने डर गये कि उन्होंने तो यहाँ से बदली ही करवा ली अपनी।" "तुम मुझे डग तो नहीं रहे हो ? थानेदार की जुबान लड़खड़ा रही थी और आंखों की पुतलियां निनिन-बितिर हो उठी थी। "किसी से भी पूछ देखें । मैंने तो वो ही चरचा छेड़ दी थी।" "मै भुगत चुका हूं, खुद । इसलिए, ऐसे मामलों से सावधान रहता ११०/पत्तों को विरादरी हूँ । नापासर में था, तो एक रात को मेरे घर में पत्थर बरसने लगे-" "बदमाशों ने शरारत की होगी-" "उल्लू हो तुम । गुण्डे-बदमास तो थर-थर कांपते थे मुझसे, उनकी क्या मजाल ! बाद में पता चला कि किसी प्रेत का वासा था यहाँ ।" यानेदार धवराकर चुप हो गया । थोड़ी देर तक कोई न बोला। पुसपा बाई आयो । बोली, "तलाशी का काम अभी शुरू करेंगे या सुबह .."हो गयी तलाशी।" थानेदार यहवढाया, "मुझे तो मुसीबत में डाल दिया तुम लोगो ने।" 5. पुमपा बाई ने इग्यारसीलाल की तरफ देखा । वह सिर झुकाये जमीन ताक रहा था। "मुझे तो रात को ही लौटना होगा, कोतवाली मे ।" थानेदार के स्वर में मक्खियां भिनभिना रही थी, 'सिपाहियो का गाना हो गया : "हो । यो सब आराम कर रहे हैं।" पानेदार मरा-मिटा-सा चिल्लाया, "छतसिंग, नेतूसिंह, आशूराम, देशूलाल, सरपधन्न !" सिपाही भागते-भागते, आलस उघडते, कदम-तात बजाते, धूल उहाते आये। . थानेदार बोला, "घोड़े तैयार करो। अभी चलना होगा। रात को हम यहां नहीं ठहरेंगे।" मिपाही मायूस होकर पलट पड़े। उनके लिए कम्फ के दौरे का मतलब था, बढ़िया भोजन और औरत का स्वाद । भोजन मे तो मन तिग्पत हो गया, लेकिन थोरत से तन का तिरपत होना बाकी था। ये लार सुडाने हुए रात का इन्तजार कर रहे थे और तब तक अपने लिए औरत ढूंद-धीन्ह रहे थे। "कमाई-धमाई की चल रही है ?" थानेदार मुद्दे पर भाया । "कुछ साम नहीं।" पुसपा.बाई ने कहा, "कैम्प मे पराफाती लोग हैं । वात-वेबात टांग अड़ाते हैं।" उनसे झगड़ा मोल मत लेना, नहीं तो-खैर, किसी ने ज्यादा न की तो हम ठीक कर देंगे। तुम्हें यह तो मालूम होगा ही कि दनी में मे एक हिस्सा थाने का होता है।" "आमदनी यहां क्या होती है---' "वनो मत, पुसपा बाई ! मैं तो चोर-डकैतों तक से हिस्सा वसूल र लेता हूँ-और 'जैतपालसिंग के साथ तुम्हारे सनमन की बात भी मुझे मालूम है । वो मर गया, लेकिन तुम राजनेत्ती में जरूर जाओगी, मुझे तुम्हारी लिय्याकत पर भरोसा है। हमसे मेल करके रहो । अभी तुम हमें हिस्सा दो, जब मिनिश्टर बन जाओगी तो हम तुम्हें बाक्कायद हिस्सा देंगे। यह लेनदेन तो बना रहेगा।" पुसपा बाई और इग्यारसीलाल ने कुछ देर के लिए अलग बातचीत की। फिर वे थानेदार को लेकर डेरे के अन्दर चले गये। - जब पुसपा बाई के तम्बू से बाहर आया तो थानेदार बहुत प्रसन्न था। बिना झिकझिक के उसने अच्छा-खासा हाथ मार लिया था। लेकिन- नभी उसने हवा के तेज झपाटों का शोर सुना। पेड़ों की डालियां बज रही थीं। थानेदार के लिए अगली सांस लेना कठिन हो गया । उसे लगा अँधेरे की आवाजों में लहराता हुआ' 'जिन्न का थप्पड़, अव आया चेहरे पर पड़ा । उसका जी मिचलाने लगा और फिर उसने होख- करते हा वहीं कै कर दी। सब खाया-पिया उलट दिया। बदरू भागकर पानी लाया। इग्यारसीलाल ने लपककर थानेद पीछे से पकड़ लिया और गिरने से बचाया । मुंह धोने और कुल के बाद थानेदार फटी-फटी आंखों से अन्धकार को घूरने लगा खोले हवा को निगलते हुए बोला, "मु-मुझे मेरे घोड़े तक ले च ११२ / पत्तों की विरादरी दो सिपाहियों ने सहारा देकर और पागड़े पकड़कर थानेदार को घोड़े पर बिठलाया। उसकी हंफनी चढ़ी हुई थी। . सपट्टे देती हुई रेत के बगूले इतनी तेजी से आये कि सहसा उन्होंने उन सबको ढंक दिया। इसी बीच तर-तर-तरह-तर की एकतान आवाज सन्नाटे में गूंजने लगी। "मह"कैसा शोर है ?" यानेदार का बेजान स्वर फूटा। "टेशूलाल का घोड़ा "मूत रहा है, हुजूर !" पास खड़े सिपाही ने उत्तर दिया। "चूतड़ ठोंक दो उस घोड़े के और टेशूलाल के भी । स्साली कैसी अपसगुनी-सी आवाज है !" रागरमों की कडियां खड़काते और टा फटकारते हुए घोडे पल पड़े। "मेरा घोड़ा बीच मे रखो, हरामजादो !" पानेदार की भयमिश्रित डॉट सुनायो दी। फिर पोडों की हिनहिनाहट और सड़बड़-धड़बड़ दूर होती गयी। "सूअर का बच्चा !" पुसपा बाई ने अंधेरे में जोर से यूका। छोटे उछलकर इग्यारसी- लाल को लगे । वह मन मे घिनधिनाता हुआ परे हट गया । बोला, "ये पुलीसिये बड़े कमीने होते हैं !" "सब कुछ ले गया, मां का यार ! कैम्प में मरें-व हम, दिन-रात कष्ट झेलें और मुशकिल से कुछ वचत हो तो ये सरकारी चूहे घट कर जायें !" पुसपा बाई खीज-खिजला उठी । तभी उसने किसी की रुलायी सुनी। विडकर बोली, "इस बेला"यह किसने रोना-धोना मचा रखा है।" "अचली है।" वदरू ने डरते-डरते कठिनाई से होठ खोले । "केसर-कस्तुरी ले आओ। यही पर । यो यूथनी उठाये मुझे क्या देख रहे हो !"

- बदरू तम्बू में गया तो इग्यारसीलाल बोला, "शुंवी की बात थाने- दार पर डालनी होगी। तब कम्फवालों को शक नहीं होगा। हरलो ने यही सुझाया है-" "अच्छा !" केसर-कस्तूरी का पीपा सामने आते ही पुसपा बाई ने लोटा भरा और गटागट पी गयी। नाक सिकोड़कर बोली, "यह बदबू किस चीज की है ? देख तो बदरू !" "वो थानेदारजी ने 'यहीं पर उल्टी की थी।" "कंजर की औलाद, जब मैं यहाँ बैठ रही थी, तभी तुमने क्यों नहीं बताया !" वदरू की खसखसी दाढ़ी पकड़कर पुसपा वाई ने चटाचट चाँटे जड़ दिये । फिर गुस्से में उबलती हुई लातें बरसाने लगी । बदरू औंधे मुंह धूल में गिर गया और निर्जीव-सा पड़ा रहा। "तेरी वजह से तो मेरा जीना मुशकिल हो गया है । पीने का सारा मज्जा किरकिरा कर दिया-' ११४ / पत्तों की बिरादरी । शुबो को 'थानेदार पकड़ ले गया । दूसरे रोज कम्फ में ज्यों ही यह ममंचार फैला, मुर्दनी छा गयी। चेहरे काठ हो गये । जीवन में थकान, उदासी और जर्जरता के छरें खुम गये। और, किसी के पाम जैसे कहने- सुनने के लिए कुछ नहीं बचा। इसी तरह तीन दिन बीत गये । सांझ उतर चुकी थी । ज्यानकी काकी बाटियां सेंकते हुए जुगनी से वतलावन कर रही थी। दोनों के बाहर-भीतर अवसाद, प्रोध और अस- मर्थता का रोम-रोम'चीयता हुआ बोध । "। "पुलीसिये अब शुवो को साबुत नहीं छोड़ेंगे।" ज्यानको काकी ने उसांस भरी,"काना-खोड़ा बना डालेंगे उने कोतवाली में। वो ऐसा ही करते हैं।" "काकी, शुवो तो उधर गया था। "पेड़ो की उस आड में। फिर सिराम और हद्दी मिलने गये तो वहां मिला नही । बचानक कहाँ गुम हो गया वो ? पुलीम तो-" जुगनी धीरे-धीरे बोल रही थी। "तुम्हें पुनीमियों के जाल का पता नहीं। थानेदार ने कुछ सिपा- हियो को निगरानी पर रख छोड़ा होगा। उन्होने जब सुबो को अकेला देखा तो घर-दबोच लिया होगा । जुगनी, बड़े जालिम होते हैं वो-" "काकी, शुबो को पुलीम पकड़कर नहीं ले गयो।" हद्दी नजदीक आकर बैठ गया और फुसफुमाने लगा, "बदरू ने वाशिया को बतलाया है।" बदर और याशिया में खूब पटती थी। याशिया जैव-तब सेलता हुआ

लोटा भरा और गटागट पी गयी। नाक सिकोड़कर बोली, "यह वद ।
वदरू तम्बू में गया तो इग्यारसीलाल वोला,
पर डालनी होगी। तब कम्फवालों को शक नहीं होगा। हरला
। सुझाया है-"
"अच्छा !" केसर-कस्तूरी का पीपा सामने आते ही पुसपा वाई ने
किस चीज की है ? देख तो बदरू!"
"वो थानेदारजी ने ''यहीं पर उल्टी की थी।"
"कंजर की औलाद, जव में यहाँ बैठ रही थी, तभी तुमने क्यों नहीं
बताया !" वदरू की खसखसी दाढ़ी पकड़कर पुसपा वाई ने चटाचर
चांटे जड़ दिये । फिर गुस्से में उबलती हुई लातें वरसाने लगी । बदल
औंधे मुंह धूल में गिर गया और निर्जीव-सा पड़ा रहा ।
"तेरी वजह मे तो मेरा जीना मुशकिल हो गया है । पीने का सा.
मज्जा किरकिरा कर दिया"
११४ / पत्तों की विरादरी

। . शुवो को थानेदार पकड ले गया ! दूसरे रोज कम्फ में ज्यों ही यह ममंचार फैला, मुदनी छा गयो। चेहरे काठ हो गये । जीवन में थकान, उदासी और जर्जरता के छरें सुभ गये । और, किसी के पाम जैसे कहने- सुनने के लिए कुछ नहीं बचा ! इसी तरह तीन दिन बीत गये । सांझ उतर चुकी थी । ज्यानको काकी वाटियां सेंकते हुए जुगनी से बतलावन कर रही थी। दोनों के बाहर-भीतर अवसाद, प्रोध और अस- मर्थता का रोम-रोम'चीयता हुआ वोध । """पुलोसिये अब शुवो को सायुत नही छोडगे।" ज्यानको काकी ने उसासाभरी; "काना-खोड़ा बना डालेंगे उसे कोतवाली मे। वो ऐसा ही करते हैं।" "काकी, शुयो तो उधर गया था। "पेडो की उस आड मे । फिर सिराम और हद्दी मिलने गये तो वहाँ मिला नहीं । अचानक यहां गुम हो गया वो? पुलीम तो-" जुगनी धीरे-धीरे बोल रही थी। "तुम्हें पुनीमियों के जाल का पता नहीं। थानेदार ने कुछ सिपा- हियों को निगरानी पर रख छोडा होगा। उन्होने जब सुयो को अकेला देखा तो धर-दबोच लिया होगा । जुगनी, बड़े जालिम होते हैं यो-" "काकी, शुवो को पुलीस पकडकर नहीं ले गयी।" हद्दी नजदीक आकर बैठ गया और फुसफुसाने लगा, "वदरू ने बाशिया को बतलाया है।" बदरू और याशिया में खूब पटती थी। वाशिया जव-तव गेलता हुआ - .

क . - . पास चला जाता था। और सारे दीन-जहान, धरती-आसमान पूछ-पूछकर उसे हैरान कर डालता था। "बदरू ने कहा है ?" जुगनी चौंक गयी। 'बदरू ग़लत बात नहीं करेगा ।"ज्यानकी काकी बोली। "हां, जब पुलीसियों की टुकड़ी वापस जा रही थी तो वदरू वहीं या। उसने शुबो को वहां नहीं देखा।" शक घर कर गया था मन में । जुगनी एक बार खुद जाकर बदरू, पूछताछ कर आयी । वदरू सहमा हुआ था, किन्तु उसने वुडबुड़ाहट औ हाथ के इशारों से बता दिया कि शुवो को थानेवाले नहीं ले गये। अब गुपचुप खोज शुरू हुई । सिराम, हद्दी, गज्जी और जमाल ही नहीं, कम्फ के कई जने दिसा-मैदान करने और ईंधन वटोरने के बहाने दूर-दूर तक उसे ढूंढ़ आये । इलाके में जो दूसरे कम्फ थे, वहां भी पर लगा लिया गया। अकाल के मारे लोगों के जो गोट-के-गोट, भटव हुए फिरते थे और जिन्हें किसी कम्फ में भरती नहीं मिली थी, उनमें भी पड़ताल का सिलसिला आरम्भ कर दिया गया, हालांकि यह काम काफी मुशकिल था। रोज जगह बदलनेवाले वेसहारा-वेजमीन मिनखों की टोर लेना, गाढ़े अन्धकार में अनिश्चित ढंग से चलते रहने की तरह था। पि भी उस कम्फ के लोगों ने न हिम्मत से किनारा किया था, न उम्मीद से तल्लाव की खुदाई शुरू कर दी गयी थी। कम्फ से कुछ ही फासवे एक बड़े से थले को घेरकर चांक दिया गया और फिर रोज उसमें फावड़ों की धम्माधम्म गूंजने लगी। बछराज का सूना डेरा फिर आवाद हो गया । भुजंग-सी चेचक के दानों से भरे चेहरेवाला एक सिर-मुंडा आदमी उर रहने लग गया था। नाम था-रावता । उसे कभी किस मुस्कराते हुए नहीं देखा था। हरदम ऊमड़ा-सूमड़ा सा वह कम ११/ पत्तों की बिरादरी रहता था और पांवों को इस तरह पीटता था, मानों उन पर चीचई पट गये हों। तल्लाव की इसकीम को पूरा करने का जिम्मा उसी पराया। पुसपा बाई ने उसे ठीकेदार बना दिया था। खुदाई चालू होते ही रावता एक मोटा लट्ठ उठा लेता था और उसे गर्दन के बीच से दोनों कन्धों पर टांगकर मैड़ पर बैठ जाता था । तिनकों से दांत परचते हुए, खंखार-खांसकर देर-सा बलगम थूकते हुए, मुंछड़ होंठों को ढरकाते-चूसते हुए, वह लगातार पनी आँखों से कम्फवालों को छलनी किये रहता था। एक और तब्दीली हो गयी थी। नाज के भण्डारे की देखभाल सुवटी के सपुरद कर दी गयी थी। पावियों का गुच्छा वजाती हुई वह निधडक डोलती फिरती थी। उसके सिर के छोटे-छोटे बाल कानों पर पंखा झलते हुए-से फरं-फरं उडते रहते थे। डूंगर चढ गयी डोमनी, गाव आल-पताल । मुवटी ने भी राग अलापना और घोंस जमाना शुरू कर दिया। चूंकि हरेक के हिस्से के नाज का बंटवारा वही करती थी और कडा हिसाब भी रखती थी, इसलिए कम्फ मे उसका रौब गनगनाने लगा। खुदाई के अलावा, उसने कुछ लोगों को दूसरे खटियल कामी मे जोप-झोंक दिया था। ज्यानकी काकी, फूलकी और जुगनी को न केवल सुबह-शाम समूचे कम्फ की झाड़-बुहारी करनी पड़ती थी, बल्कि सबके लिए इंधन बटोर- कर लाने का बोझा भी उन्हीं पर लाद दिया गया। सुवटी को भण्डारे के पहरे पर से हटा दिया गया। रात की चौकसी भी नये लोगों को सौंप दी गयी। कम्फ में और भरती पर एकदम रोक लगा दी गयी थी। इग्यारसी- लाल लोगों की छंटनी के बहाने ढूंढता रहता था और मौका मिलते ही उन्हें बाहर निकाल फेंकता था। उसकी धमकियों ने सभी को मातंकित - कर रखा था। सुवटी की शिकायतों पर तुरन्त अमल होता था। वह अब इग्यारसीलाल के ही डेरे में बस गयी थी, एक तरह से । लेकिन, दिन में मक्सर हरलो से मिलने चली जाती थी। 3

रोज भी सुवटी डेरे पर नहीं थी। इग्यारसीलाल न
पास भेजा, "बोल देना छोकरी से, इसी बबत आ जाये । होले-हवाले
र तो चेता देना, शाम से पहले-पहले कम्फ छोड़ना होगा । वाहर जाके
खी भटकती फिरेगी तो सारा जोवन झाग हो जायेगा।"
बदरू के पाँव मन-मन भर के हो गये, तल्लाव की तरफ जाते हुए
जुगनी की हालत वह जानता था। शुवो के जाने के वाद से वह ऐसी कुम्ह.
गयी थी कि पहचान में ही नहीं आती थी। आंखें गड्ढों में धंस गयी थीं
और किसी के सामने उठती ही नहीं थीं।
कुछ सोचकर वदरू तल्लाव के किनारे खड़ा हो गया। खुदाई जोरों
पर थी। उसने हाथ हिलाकर अचली को बुलाया।
"क्या है ?"
अचली धूल में सनी हुई सामने खड़ी थी।
वदरू अस्त-व्यस्त हो उठा। एकाएक कुछ कह नहीं पाया। फिर उसके
घरघराते गले से निकला, “वो''इग्यारसीलाल बुला रहा है."
।
तुम्हें ।"
अचली की आँखों में ललास के डोरे उभरे, तने और धुंधला गये
उसने ओढ़नी को झाड़ते हुए धीमे-से कहा, "हुम्म"अच्छा, चलो।"
वह तम्बू में घुसी तो इग्यारसीलाल करीव-करीब नंगा पड़ा
मांची पर। कमर में लुंगी थी, पर वह कमर तक ही उठी हुई
जांघो में हाथ डाले वह कुछ तेल-सा चुपड़ रहा था । अचली उन
के नखरे देखती रह गयी।
"हिमाल की जड़ी-बूटियों का तेल है यह।" इग्यारसीलाल
से उसी तरह पड़ा-पड़ा बोला, "इससे मरदानगी का जोर आ
कहाँ है वो तेरी छोकरी?"
छोकरी! यानी जुगनी । अचली के सामने वदरू का
चेहरा घूम गया । तो, इसने जुगनी को बुलाया था। रीस के
लपलपायी और असहायता से घिरकर ठण्डी हो गयी। उ
११८ / पत्तों की विरादरी

आकार बहुत पुराना या भोर मन के विस कोने से वह जो यो, वहाँ . देरों-ढेर राख जमी थी। "जुगनी की तो गत सराव है।" "मत सराव है ?" इमारनीलाल ने अपनी व्यस्तता के बीच पूछा। "हाँ, माहवारी पर है वो।" "अच्छा? कर से" "कल रात को हो गयी थी। तीन-चार दिन तो लगेंगे ही।" अब इग्यारसीलाल ने अचली को देसा, ठीक से । बालों की काली पट्टियों के बीच गुनगुनाता हुआ-सा माया, तीखी नाक, भरे-भरे गाल और होंठ। "ठीक है, आज तु ही आ जा।" "मुझमे मन भरेगा तुम्हारा'" बदली अपने जूने शरीर में लौट गयी। "तू मन भरेगी तो भरेगा।" इग्यारसीलाल ने कांपते हुए हाथो से अचली को हुआ। यह उसकी गोद में ढह गयी। इसी तरह बार-बार ढहते और मरते जीवन निकल गया सारा, अचली ने सोवा । लेकिन ""जुगनी को बचाना है इस मूत के कोडे से । और, उसने मूत के कीड़े को कसकर अपने में लपेट लिया। उसके हाथ""उसके तमाम अंग यह सब करते-करते मज गये थे। इग्यारमीलाल चकित रह गया। ऐसा मुख तो उसने कभी पिसी औरत से नहीं पाया था। उम्र की ढलान पर ढलकते हुए उसके तन मे नन्हे- नन्हें अंकुर उग आये और वह बेसुघ-सा हो गया। सुवटी वापस आयो तो उसने देखा कि इग्यारसीलाल और अचली आपस में मुंथे हुए सो रहे हैं । इग्यारसीलाल की नाक बज रही थी। गुम्मे में कांपती हुई वह पलट गयो और भण्डारे के पास जावठी। लेकिन--अचली जाग रही थी, अपने शरीर की तनतनाहट को समेटती हुई। इस तनतनाट को यह कभी नहीं समझ पायी। कितने लोग पीछे छूट गये थे, बछराज मर चुका था, लेकिन अचलो-एक

त को अपनी देह में रमाये जी रही थी और
निचोड़कर क्या-क्या देख-जान रही थी !
रोज में ही कम्फ में यह बात फैल गयी कि अचली ने इग्यारसीलाल
रगोशिया बना लिया है और वह हरदम उससे चिपका-लगा रहता
पहले सिराम को, फिर हद्दी, गोदारी और बाशिया को कम्फ
ल देने का मामला सुवटी ने बनाया । पुसपा बाई के कान भरे।
उसकी एक न चली । अचली के कहने से इग्यारसीलाल ने किसी
। कोई नुकसान नहीं होने दिया। सुवटी तमतमा उठी। उसने एक
दन इग्यारसीलाल से कहा, "ऐसा क्या जादू कर दिया है, उस छिनाल
न्तु
.
ने तुझ पर !"
"कर दिया है ।" वह मसूढ़े फैलाते हुए बोला, “उसे जो लटके
झटके आते हैं, वो तुम्हारे पास नहीं।"
सुवटी जल-भुन गयी।
"जमराज की बावड़ी में पांव डाले पड़ा है तू। कुछ तो शरम कर !"
"एक बार अगर अचली के साथ सो ले, तो जमराज भी लट्ट, हो
जाये।" इग्यारसीलाल इना मस्त-मलंग होकर बोला कि सुवटी का रंग
।
उतर गया।
ज्यानकी काकी उधर से गुजर रही थी। उसने उन दोनों की बात
चीत सुन ली। जब सुवटी तिलमिलाती हुई तम्बू से बाहर आयी है
उसने कोंच दिया, "तेरे साथ तो सदा यही बरताव होगा, नकटी !"
"बड़ी आयी ऊंची नाकवाली !" सुवटी ने हाथ नचाया, "तुझे.
मैं एक वेर गरम चिमटों से दगवाऊंगी।"
"दगवा दे, दगवा दे, मुझे परवा नहीं। लेकिन अब तू किसका
चाटेगी? रावता का ?" नफरत से ज्यानको काकी का चेहरा वि
गया।
१२० / पत्तों की बिरावरी
.

५. गोदारी खींचकर ज्यानको काकी को दूर ले गयो, "तू क्यों उसे चिड़ाती है ? उसके सिर पर तो अगन सवार है । है भगवान, कोई ऐसी-वैसी. बात हो गयी तो!" "भट्टी में गया तेरा भगवान !" ज्यानको काकी फिर झल्लापी। गोदारी की इन दिनों अजीव हालत थी। कसे कैसे डर उसे घेरे हुए रहते थे और वह सबको समझाती रहती थी, "श्यान्ती से रहो, श्यान्ती से । यहाँ तो पानी में भाग पड़ी हुई है। पता नहीं, कत्र वश हो जाये ? हे ईशर!" उस रोज तल्लाव को खुदाई में जुते-सपे हद्दीयों ही धीमे-धीमे गुनगुनाने लगाया। गोदारी ने घबराकर उसके कोहनी मारी, "बादले मत यनो। यह क्या बैवखत का वेसुरा राग चने लगे तुम । रावता सुन लेगा तो..' पता नहीं, कब क्या हो जाये !" "क्या हो जायेगा ?" हद्दी नाराजगी से वोला, “हम हंसेंगे गायेंगे भी नहीं क्या ? और, तुमने यह क्या तान छेड रसी है-मजे से रह, कुछ नहीं होगा।" ज्यानको काकी कोलू लग गयी थी। छोक-पर-छींक । दस्त-पर-दस्त । आँखें कोड़ियों की तरह निकल आयो । चार रोज तक बुखार मे तपती रही। सुवटी ने ऐसी साज-संभार की कि उसके हिम्स का नाम देना ही बन्द कर दिया। बोली, "तल्लाव पर काम करेगी तो नाज मिलेगा। वो तो पड़ी-पड़ी ढोंग रचा रही है।" गोदारी सपक-सपक करती हुई ज्यानको काकी के पास गयी, "उठ, खड़ी हो! ल.बू का यया है, लगती ही रहती है । तू मुवटी को कुछ पहने का मौका ही पy देती है। उसने पुसपा बाई से चुगली कर दी तो ?.""पता नहीं, ममा-मरा देखना है अभी, हे रामजी !" रावता मोमाविसयों का छाता तोड़ने पेड़ पर चढ़ा था। छाते में पाद निकालते समय उसने कम्बल ओढ़ रखी और बवाय का काफी जाना किया, लेकिन फिर भी कुछ मोमाक्खियों ने उसे काट खाया । वह घडाम् - .

पर आ गिरा। चोट ऐसी लगी कि मुंह से खून T। कई रोज तकं सूजा-सूजा मुंह लिये वह अपने तम्बू में पड़ा म्फवालों को मालूम था, लेकिन कोई उसके हालचाल पूछने पा । सिर्फ गोदारी ही बार-बार बाशिया को साथ लेकर उसके जाती रही, तबीयत मालूम करने के लिए। 'ज्यादा उसकी लाँग में घुमोगी तो वह तुम्हें पकड़कर अपने विछाव डाल लेगा।" हद्दी ने कुढ़कर कहा । "डाल लेगा तो क्या विगड जायेगा मेरा! इग्यारसीलाल ने भी । डाला है । ''रावता जबरा जालिम है । उसकी आँखें देखी हैं तुमने ? हत्यारा लगता है । ऐमे कुमाणस को परसन्न ही रखना चाहिए। पता नही, कव क्या..." हद्दी हंसने लगा। गोदारी और भी सहम गयी। उसके कलेजे में आशंकाओं के अस्पष्ट-से तार खिचे हुए थे। कोई उन्हें अदृश्य ढंग से टानता रहता था। "तेरी लुगाई के माथे में डर का मकड़ा घुस गया है।" जमाल ने कहा । गोदारी ने सिर झुका लिया। "इमका दिल बहोत कमजोर है।" हद्दी ने गोदारी की वांह को धीरे मे नोंचकर धकियाया, "किम सोच में पड़ी हुई है तू ! जा, काम कर।" - अन्धड़ गेज रफ्तार और रंग बदल लेता था। दिन मे लगता था, रेत नहीं गाड़ी-गाड़ी धूप ही उड़ रही है रान में, रात उड़ती हुई नज़र आती थी, बकरे की खाल का दोवड हुए। उसी उड़ती हुई रैण में कम्फ, एक मोटे-लद्धड़ गठड़े की थरथराता हुआ-सा पड़ा था। १२२ / पत्तों की विरादरी

रावता कनपट्टे और गलमुच्छे सहलाता हुआ पुसपा बाई के तम्बू में
बैठा था। लालटेन को मन्द रोशनी में वह दैत्यनुमा डील-डील विचित्र
परछाई छोड रहा था। तम्बू को छत तक जाते-जाते उस परछाई के सोग
भी उग आये थे और मुंह जब-जब खुलता था, मगरमच्छ के जबड़े-सा
भद्दा और लम्बा हो जाता था।
"तुम कित्ते साल कारा में रहे हो?" बिस्तर पर आलथी-पालपी
मारकर बैठी हुई थी पुसपा बाई । गोद मे दारू की बोतली और एक
कटोरे में भुनी हुई मिरच-मांगरी। वह सी-मी करती जाती थी और गहरे-
गहरे यूंट गटकती जासी थी।
"डाके में पहले माडे चार वरस, फिर दुवारा फंस गया कत्तल में ।
उस वखत फांसी की ही सजा होती, लेकिन हरलो ने जुगत बिठायी और
जेलवालों को चकमा देकर, अन्दर में निकाल लिया मुझे।"
"इसीलिए तुम हरलो को इतना मानते हो?"
"हाँ। वो साथी-सगानियो का ख्याल रखता है। लेकिन, चक हो
जाये तो बखशता नहीं।"
"गुवो वाला काम करके हरलो ने मुझे भी मिसफिकर बना दिया।"
"आज आधी रात तक आयेगा वो।"
"मालूम है।"
"बोला है, नगदी भुगतान करूंगा, पुमपा वाई चिन्ता न करे।'
"चिन्ता तो क्या लेकिन उम्मरकोटवाले नागज हो जायेगे।
अगले हपते उनका आदमी पता लगाने आयेगा।"
"नाज के बारे में?"
"हो ।"मालूम पड जाने पर वो चुप नहीं बैठेगे ।
"यह तो है ही।"
"लालटेन मन्दी कर दो।"
रावता की इच्छा हुई कि कह दे, आज मन नही है । लेकिन पुमग
वाई की करखरी आवाज से डरता था वह, दिल एकदमदनी मला

झन-भिंग-झिग झिगुर बोल रहे थे। हवा और रेत में घुल वर जुलाहे के वेजे की झनझनी बन गया था। फागुम्फी और चुम्माकाटी के वावजूद, रावता बार-बार अपने शरीर से निकल-छूटकर परे-परे भागता रहा । एक ठण्डी चिपचिपाहट पर-हजार जोंके सिलविलाने लगी थीं। "तुम ऐसे क्या पड़े हो ?" पुमपा बाई गरमा रही थी, "भींच डालो, डालो मुझे।" तल्लामेल्ली में रावता के हाय पुसपा बाई की गर्दन तक गये । दोनों नों में तनाव आया। एक पल के लिए जी हुआ कि सचमुच मार डाले ह, पुसपा बाई को-लेकिन तभी उसे अपना-आप निचुड़ता और ढीला पड़ता हुआ महसूस हुआ । नशे और तृप्ति में तपती हुई पुसपा वाई के गीले होंठों पर उसने अपने होंठ रख दिये। रफ्तः-रफ्त: वह एक अदीठ डोलची में फंसा हुआ अन्ध पाताल के तल में उतरने लगा। कम्फ के छपरों-छाजनों पर अंधेरे की गिरफ्त कड़ी होती गयी। नींद के अनहद आलम में अचानक पुसपा वाई के दांत भिच गये । गले और नाक से घिर-घिरी की अटपटी आवाज निकसने लगी। रावता मांची की दावन पर बैठा बीड़ी फूंक रहा था । नाज की लदाई के लिए हरलो के आने तक उसे इसी तरह जागना था। पुसपा वाई, होठों के लटकते कोनों से लार गिराती हुई बेतर कसमसाने लगी। एकाएक वह किसी चीज को पकड़ने के लिए ऊप उछली और फिर घप्प से खाट पर गिर पड़ी। उसको होश आ गया। घूजते-कांपते हुए उसने तम्बू में नि फिरायी। लालटेन कालिख की टोपी ओढ़े भक्-भक् कर रही थी और नंग-धडंग व्यक्ति पायताने टिककर आंखें टिमटिमा रहा था । पुसपा १२४ / पत्तों की बिरादरी को इस दृश्य के साथ जुड़ने में कुछ पल लगे। फिर उसने तकिये पर मुंह रगडकर लार पोरते हुए सहमे स्वर में पुकारा, "रावता":" "क्या बात है, पुसपा बाई!" "तुम अभी तक यही हो?" "हाँ । "तुमने कोई बुरा सपना देखा क्या?" "मेरे पास लेट जाओ। मुझे डर लग रहा है ।" "डरना क्या? तुम तो बहोत बहाद्दर मोरत हो।" "नहीं, नहीं 'मेग क्लेशा धुक-धुक कर रहा है।" उसने रावता के कडिमरा हायों के घेरे में अपना पिलपिला-गिलगिला बदन ढकेल दिया। "हुआ क्या ?" लेटे-लेटे रावता ने ईस से रगडकर बोडी बुझा दी और मुंह मे रोका हुआ धुंआ नयुनो के रास्ते सुरसुरा दिया। "यहाँ रहके तो मैं बरबाद हो जाऊंगी, रावता !" "ऐसा क्यों कह रही हो?" "इतना खराव मपना तो मैंने कभी नहीं देखा।"एक काला भंसा था। जरूर वो सनीचर का मंसा रहा होगा। आदमी की बोली में बोल रहा था। मुझे अपने सौगों पर उठाकर वह उल्लाय की तरफ ले गया। बोला, पुसपा बाई'मैं तुम्हे यही जिन्दा गाईगा। • उसकी पकड इतनी मजबूत थी कि मेरा कुछ बस ही न चला । मैं छटपटाती रही। लेकिन फिर जीने के मोह ने जोर मारा और मैंने अपने को छुड़ा लिया। वहाँ . से तुरन्त भागी मैं..." पुसपा वाई की सांस रुक-सी गयी । वह पमीने से तर-बतर थी। "अगर आँस न खुलती "तो नीद मे ही आज दम घट जाता मेरा।" वह स्वयं को स्वस्य करने की कोशिश करती हुई बोली, "मैं बच्ची थी, तब एक जोतसी मेरी मां के पास आया था। उसने कहा था, तेरी लड़की राज करेगी, यहुत सुख में रहेगो, अच्छे-अच्छे मरदो को भोगेगी, लेकिन इसको सनीचर का खतरा बना रहेगा।" "मैं एक और ही वात सोच रहा था, पुसपा बाई !"

? तुम भी क्या- तिस नहीं. मै सगुन की बात कर रहा था। तल्लाव की खुदाई पहले आदमी की बलि देने का कायदा है । जोहड़ की मिट्टी को का खून न मिले तो वह बदला लेती है. नुकसान पहुंचाती है।" 'अच्छा !" "हमने कोरम-कोर ही खुदाई शुरू कर डाली । कायदे से महूर नही ।' रावता ने पुमपा बाई के फदफदाये हुए पेट और ढीले वक्ष यों ही सहला दिया, “जव ने तल्लाब का काम चला है, मेरी... पनी तबीयत भी गिरी-गिरी-मी रहती है । मुझे तो लगता है कि यह जो वोटा सपना तुम्हें आया है, वह भी उसी वजह से..." "कोई उपाय बने तो करो।" पुमपा बाई निढाल-बेहाल पड़ी रही और एकटक लालटेन की भुकभुकी देखती रही । टीलों के पार ऊंटों की बिलबिलाहट हुई । रावता झपट कर उठा । कपड़े पहने । बोला, "हरलो आ गया है।" "मैं नहीं चल पाऊँगी। लेकिन इग्यारसीलाल को माथ ले जाना।" 'हिसाब भी वही करेगा ?" "नहीं, तुम कन्ना और रकम मुझे लाकर मौपना।" रावता चला गया। पुलपा बाई के कलेजे मे फिर भय हुलने लगा । देह को मानो कोई नीचे-ही-नीचे की ओर खींचे ले जा रहा था । अन्धड़-भरा अन्धकार सुअर की तरह मुड-सुड़-मों-सों कर रहा था । एक सड़ी-मड़ी दुग्गन्ध पुनपा बाई के नथनों में सुलगने लगी। उ पुकारा, "वदरू ! कहाँ दफन हो गया नामाकूल !" निन्दरा के आलम में लडखडाता-डिगता वदरूआया और ऐसे ख गया, मानो अन्धा हो । कुछ क्षण तक वाकई उमे कुछ मृझा नहीं। पुसपा बाई ने उबासी ली। उसके मुंह में कचग-बुगदा-सा भ चिहुँककर उमने बिछावन को देखा, चदरे को उठाकर मूंघा, कि .... १२६ / पत्तों की विरादरी 7 पिच यक दिया। "क्या हालत कर डाली है उसने मेर विस्तर की ! अदर, जल्दी से चदरा बदल । कैसी तो बदबू आती है रावता के पारीर से! पोशाक पर से सन्दूकची उठा। पोवडर का डिब्बा है उसमें । यहाँ हिसदे ऐसी गन्दगी में तो मुझे नीद ही नही आयेगी।" नाज की लदाई के बाद इग्यारसीलाल अपने सम्यू मे लौटा तो परेशान था। उसने झिझोड़कर अचली को जगाया। वह अधनीद में बोली, "दुबारा करोगे क्या? जरा सबर रखा करो। ऐसे जल्दी मचायी सो बुढापे फे हाड़- गोड़ हैं, खिरखिराकर झर जायेंगे।" "धीरे बोल | "सुवटी ने हलो को जाने क्या-क्या कह दिया है। बोलता था, इग्यारसीलाल ! तुमने बड़ी धांधली मचा रखी है।" "तो तुम "डरते हो हरलो से ?" "डर-वर नहीं, लेकिन धन्धे का मवाल है। "लगता है, तुम्हारी यह से सुपटी मुझसे सार पा गयी है।" "इसमें लगना क्या है, साफ दिख रहा है।" "तुम अव"हर यखत इस तम्यू मे मत रहा करो।"जय जरूरत होगी, मैं तुम्हें बुला लूंगा।" 'मुझे नहीं मालूम था, तुम ऐने घिग्यू निकलोगे । मुवटी की, यासिर औकात क्या है तुम्हारे सामने ?" "ौकात-वौकात रहने दो अभी । वह हरलो की चहेती बनी हुई है। रावता बता रहा था, उसको भी बुराई करती है वह हरली के धागे ।.. लेकिन इस समय हरलो की मदद के बिना कम्म चलाना मुमारिल है, क्या गज्जी अपने छपरे में पड़ा करवटें बदल रहा था । फूलकी ने उसकी पीट पर हाथ रखकर पूछा, "तुमने अभी ऊंटों की आवाज सुनी ?" वह गुस्से में वड़वड़ाया, "शुवो क्या गया, सव स्साले निरजीव हो गये हैं । कायरों से भी बदत्तर ! किसी में मुंह खोलने की हिम्मत नहीं।"

दुपहरी की तिडतिडाती दुई तपन में तल्लाब की खुदाई बदस्तूर जारी
थी। झुलसा देनेवाली गरमी ने लोगों के बदन पर अलाइयों और कुंसियों
के गुच्छे उगा दिये थे । वे फावड़ा रोककर या ढोआई का तसला नीचे
रखकर लकडी की इण्डियो से पीठ-पांव सुजलाने लगते थे।
किनारे के ढोक पर मिट्टी फेंकने के बाद सिराम ने सिर ऊपर उठाया
तो उसे दूर आसमान में एक धन्ना नजर आया। उसने गज्जी से पूछा,
"वो देख, उधर "क्या है ?"
"मुझें तो धूल का गुब्बार लगता है । आंधी प्रायेगी।"
"गौर से देखकर बता । बादल तो नही है ?"
"हो सकता है।"
"इस बार भी अगर वरखा नहीं हुई तो दुरभिक्स खा जायेगा हम
लोगों को।"-
"हो, कम्फ में तो कित्ते दिन चलेगा!"
"सिरकार कम्फ तोड़ रही है अब।"
"आजरढाणी का कम्फ तो टूट ही गया । सुनते हैं, वहां झगड़ा हो
गया था।"
: "झगड़ा तो करवाया गया था, जिससे सिरकार को खिलाप रिपोट
भेजी जा सके।"
"सैकड़ों लोग भूके भटकते फिर रहे हैं।"
"हां, बहोत बड़ा कम्फ पा वो । अपने वाले से तिगुना."

"हद्दी बता रहा था कि जो लोग पखेस्तान से आये हैं, सिरकार उनका विरोध करती है और उन्हें भगाना चाहती है।" "इसीलिए जानबूझ के झगड़ा-फसाद करवाते हैं और फिर कार्रवाई करके कम्फ तोड़ देते हैं।" रावता कइयों की खोपड़ी पर लट्ठ ठकठकाता हुआ उनकी ओर आ रहा था। वे जल्दी-जल्दी फावड़े चलाने लगे। तल्लाव का गोल घेरा खोद दिया गया था और अब तल्ली को गहरा किया जा रहा था। उसी समय इग्यारसीलाल और सुवटी कम्फ से आये, तल्लाव पर । पुकार-पुकारकर उन्होंने सब लोगों को इकट्ठा किया । इग्यारसीलाल बोला, "अभी मैंने जरख देखा था, सरकण्डों के जंगल में । तुम संवको चेताने के लिए यहाँ आया हूं।" "ऐसा मोटा-तगड़ा जरख !" सुवटी ने हाथ फैलाये, “सावधान रहना, भई ! खतरे की बात है।" पलक मारते सुरफुरी फैल गयी । जित्ते मुंह, उत्ते वखान । कम्फ- वाले जानते थे कि सरकण्डों के वन-वीहड़ में जरख होते हैं। अब, इग्यारसीलाल और सुवटी के आंखों-देखे हवाल ने उन्हें चौकन्ना वना दिया। इधर, अकाल के कारण जरख-वरख कहीं नजर नहीं आते थे, लेकिन ऐसे मानुमखोर जीवों का क्या भरोसा ! कब कहां से निकल आयें और नुकसान कर डालें, कुच्छ अनुमान नहीं हो सकता है । शाम ढुलने से पहले ही रावता ने काम से छुट्टी कर दी और अपने भय में बन्द-चन्द-से लोग कम्फ में लौट आये। रात को अलावों में खूब धुआं किया गया । जरख धुएं से घबराता है । दूंठ-लक्कड़ सुलगते रहे और धुएँ के घने घोल में अन्धकार भी घुलने- गहराने लगा। दूसरे पहर के मुंदते-मुंदते सन्नाटा छा गया और कम्फ . निन्दरा की तहों में दव गया। , . -- १३० । पत्तों की विरादरी " ... वहे तड़के पुमपा बाई ने हल्ला मचाया,गजरस, जरंप! जागो, जागो !' कम्फ में जागर'और हड़बड़ी फैल गयो। लोग पुतपा बाई के तम्बू की तरफ दोह पड़े। "अरे, यहाँ क्या कर रहे हो ? उधर जाओ, उधर सरप्डों के जंगल में घुस गया है वो । तेजी से भाग रहा था । पता नहीं, क्या या उसके मुंह में !" वह फुदक-फुदककर मापा पीटने लगी। "लालटेन ले लो!" रावता गुर्रामा । "मैंने भी एक छाया-सी देखी थी।"फिर, जरख पहचान में बा गया।" इग्यारनीलाल बतसा रहा या, "मेरे तो प्रान सूख गये। पुमपा बाई ने शोर मचाया तो वह मागा-" पीपे और तसंले पोटे जाने लगे । कुछेक जने सरकण्डों के बन तक भी गये, लेकिन यह सोचकर लोट माये कि फिजूल खतरे में पड़ना ठीक नहीं । सम्भव है, वह किसी जगह दुचककर घात लगाये बैठा हो । साठियां लेकर लोग फम्फ को बाड़ के पास-पास निगरानी करते रहे । ऊपरी सिरे पर पतरां बांधकर और नीचे तक रस्सी से जोडकर एक लम्बे वास को कम्फ के बीचो-बीच गाड़ दिया गया। बच्चे रस्सी हिलाते रहते थे और पतरा बजता रहता था। वैसे भी हर कोई हल्लागुल्ला करने में सगा हुआ था ताकि जरख निकट न आये और यदि आमपास ही हो तो डरकर दूर भाग जाये। "वासिया, मो वासिया!" पुकारती हुई गोदारी बच्चों की टोली में घूम गयी । बाशिया वहां नहीं था। पौ फट रही थी। पूरव में, आसमान पर एक कटा-छंटा टाट का. सा गूदड़ पड़ा हुआ था और कुछेक पंसेरू उधर उड़कर जा रहे थे। "वाशिया कहाँ है ?" थोड़ी ही देर में यह सवाल अनेक होंठों पर फड़फड़ाने लगा। धीरे-धीरे यह सवाल एक अशुभ शून्यता में जड़ होने लगा।धुएं के गदले-गदले गोट निचले छपरों-छाजनों में घुसते चले गये। लोगों की आंखें जलने लगी।

- दुरी तरह खांसने और सिनकने लगे। रते और उनके पसीने से भीगे गन्दे गरीरों से चिपक को सोख देनेवाली कोई मनहूस और भयानक चीज वहां झूलने लगी। अन्धों की तरह, निष्प्राण और ठण्डी और कुछ भी व्यक्त कर पाने में असमर्थ आँखें चेहरों पर थामे, कम्फवाले 'वाशिया को ढूंढ़ते फिर रहे थे जैसे वह नन्हा सुइया हो और सिलाई करते-करते अप्रत्याशित ढंग से गुम हो गया हो। दिन खुलने और धूप चढ़ने पर वागिया की खोज फिर शुरू हुई कम्फ के नजदीक, मारे दह-कोने-आंतरे देख लिये गये । चप्पा-चप्पा छान मारा, किन्तु कहीं कोई सुराग तक नहीं मिला। हद्दी ने मरकण्डों के धारदार छरों की परवाह न की। वह जंगल में दूर तक धंस गया और साँझ पड़े लहूलुहान होकर लौट आया । गोदारी पहले तो बेकल-सी सव ओर 'वाशिया, वाशिया !' पुकारती हुई भागती रही, फिर तोड़कर फेंक दी गयी बेल की तरह जमीन पर गिर पड़ी घण्टों उसी तरह रेत में मुंह डाले रोती रही । अचानक उसके रोदन मानो किसी ने संडासी डालकर कस दिया । वह घुटी-घुटी सांसें लेती बैठ गयी । रिक्त, निरीह, भावहीन दृष्टि से सबको ताकती हुई- जैसे सबसे दूर, अलग और अपरिचित । एक तख्ते पर सिर डाले हद्दी पसरा हुआ था। एक बड़े वो नीचे नींद के दमघोंट धक्के लग रहे थे और कोई कर्कश आवा वेरहमी से पीस रही थी। पुसपा बाई कम्फवालों को दिलासा दे रही थी, "हिम्मत लेना होगा। पूरी चौकसी बरतनी है अब ।" फिर वह यह कहकर अपने तम्बू में चली गयी कि डर के तो रात से ही वेहोश पड़ा है। उसे बुखार चढ़ आया है। व दिल है उसका । दारू-वारू गले में डालूंगी उसके, तब कहीं वापरेगा। एकदम पस्त हो गया है। १३२ / पत्तों को विरादरी रावता ने चार-पांच रोज के लिए तल्लाव की सुदाई रोक दी। बोला, "जरख के उत्पात से निपटना होगा-" "हाँ, यो जब भादमी के रगत का प्यासा हो जाता है तो बड़ा खूखार हो जाता है।" इग्यारसीलाल ने बात में बात मिलायी, "कम्फ के बाहर कोई पाय भी न रखे, इसका ख्याल रखना । जरख बेहद्द चालाक होता दो रोज गुजरे, लेकिन बड़े सराव ढंग से। कम्फ का जीवन आहत और निस्तेज हो चुका था। रात आती थी तो अन्धकार की काली-कठोर आँखें छपरों-छाजनों से चिपक जाती थी और हवा मे अनिष्ट की अनन्त गूंज डोलने लगती थी। तीसरे दिन मलस्सुबह ही एक और दुर्घटना हो गयी। रावता बुरी तरह चीखता हुआ तम्बू से बाहर भाया, "दोड़ो, दौड़ो ! देखो, यहाँ क्या हो गया है !" एक जोरदार चिल्लपों और हलचल और उत्तेजना व्याप गयी । लोग यह देखकर दंग रह गये कि पुसपा बाई और इग्यारसीलाल अपने-अपने तम्बू में जकड़े हुए पड़े हैं । उनके मुंह में कपड़े दूंस दिये गये हैं । हाथ-पांव गठरियों की तरह सिकोडकर बांध दिये गये हैं। बदरू अचेन पड़ा था। हारी-बीमारी से उसका चेहरा वैसे ही पीला पड गया था। अब माथे से खून बह रहा था। उसकी जमकर पिटाई की गयी थी। जल्दी-जल्दी पुसपा बाई और इग्यारसीलाल को खोला गया । जमाल पानी के छोटे देकर बदरू का लगर-नगर खून रोकने की चेष्टा करने लगा । गज्जी ने अपने धोतिये की पट्टी फाड दी, "इमे भिगोकर हल्के से बांध दो और पानी डालते रहो।" इग्यारसीलाल हथेलियो रगडता हुआ फटी-फटी आवाज में रोक "पांच-छह जने थे!"मुझे और पुसपा बाई को तो उन्होंने दिया। बदर ने सामना किया तो..."

व पुसपा वाई के तन में हरकत हुई।
चोर थे, चोर । अर' 'मुझे जरा सामान तो संभालने दो । जान
या ले गये मैं तो लुट गयी-" वह कराह रही थी और तम्बू की
को टटोलती हुई निगाहों से देख रही थी।
बदरू को भी होश आ गया । वह मरा-मरा-सा उठा और डेरे से
कल गया।
-
"तुम लोगों ने क्या मजमा लगा रखा है यहां ! जाओ, काम करो
पना।"
पुसपा बाई की फटकार के साथ डेरा खाली हो गया। वह घुटनों
पर हाथ दबाये उठी और चीजों को उलट-पुलटने लगी । जान से प्यारा
'बक्सा' अपनी जगह पर था, उसका ताला भी सही-सलामत । और कहीं
भी कत्तई छेड़छाड़ नहीं की गयी थी। सिर्फ खाने-पीने के सामान की
पोटलियाँ बनाकर वे ले गये थे। चावल, गेहूँ, दाल, गुड़, विस्कुटों के
डिब्बे...
"मरभृक्खे थे, हरामी !" गाली देने के साथ-साथ पुसपा बाई ने चैन
की साँस ली।
"जब से कम्फ टूटने लगे हैं, भुक्खड़ों की तादात बढ़ गयी है उनमें
लोग चोरी-चपाटियां करने लग गये हैं।" इग्यारसीलाल सूखे होठों
को चप-चप् चुवलाता हुआ बोला ।
"पहरे को कड़ा करना होगा-" रावता इतनी देर बाद आँखों क
मैल निकालते वोला और अन्यमनस्क होकर बाहर देखने लगा ।
से कुछ
"जरख आया, जरख आया।"
अचानक गोदारी ताली-पटका करती, ठुमकती-नाचती हुई
दौड़ने लगी।
"शेर आया, भालू आया, भेड़िया आया।"
१३४ / पत्तों की विरादरी

४
.
कभी ही-हो-ही हमती, कभी मुंह बना-विचकाकर सबको डराती हुई
वह भण्डारे की छत पर जा बैठी और गाने लगी, "जरप सबको सा
जायेगा रे..."
ज्यानको काकी ने सांस भरी, "उसका चित चल गया है।"
"ऐसे मत कर, गोदारी ! बावली हो गयी है क्या ?" फूलकी ने
पुचकारते-फुसलाते हुए कहा । फिर वाशिया को याद कर उसकी आँखें
गीली हो गयी।
"भैहिया पुसपा बाई को खा जायेगा
बाई को खा जायेगा..." गोदारी गाने में मगन पी।
"इसे नीचे उतारो--" हद्दी का स्वर वेहद्द कमजोर था।
"वो तुमको भी खा जायेगा.." गोदारी ने मा दिखलामों।
जमाल और गज्जी ने भीत पर उकसकर बहुत कठिनाई से उसे
पकड़ा और पीचकर उतारने लगे। वह उनके काबू मे नही पा रही थी।
"उसने गज्जी की बोह में दांत गहा दिये।
सिराम ने गोदारी को कसकर थामा और छपरे में ले गया। वह
य-पांव चला रही थी, मुंह से झाग गिरा रही थी, अपने ही सिर के बाल
उवाड़ रही थी, "जरस खा गया अड़गड़बम, चल मेरी टामको टमाकटम !
यो इग्यारसीलाल को भी चट कर जायेगा रे..."
उसकी यह हालत देखकर हद्दी मुंह ढांपकर बैठ गया और सिसकने
लगा।
गज्जी ने इंघे कण्ठ से कहा, "टावर मत बन, हद्दी ।"
"हो तो, होनी पर क्या-फिसका जोर है।" ज्यानको काकी बोली।
"काकी, तू गोदारी को पाके समझा।" गज्जी बोला और हद्दी का
अपने हाथ में लेकर थपकने लगा, "अज्जैदान को याद कर हद्दी!
वो कहता है "भाई, मेरे भाई, कलेजे को ससत बना. ले, पहाड़ होना
""उत्ता ही मजपूत, उत्ता ही अंपा और उत्ता ही निघड़क-निडर बन.'
सामना कर-हर रितु का, गांधी का, बरफ का, दुःख को और अपने है
भीतर के उस भाव का, जो तुम दुरवल बनाता है !"

"अजंदान ठीक कहता है, गज्जी!" हद्दी ने कहा और खड़ा हो गया, "मैं गोदारी को संभालू जरा ! ""वह मां है न, कोख के हाहाकार को रोक नहीं पाती है।" "जा, उसके पास जा तू ही उसे ढारस दिला सकता है।" - झुण्ड-के-झुण्ड लोग, कम्फ के वाहर, टीलों पर पेड़ों तले पड़े थे, भूके- पियासे धक्के खा रहे थे और मौत के मुंह में माकण्ठ फंसे हुए जिनगानी की भोर ताक रहे थे । रावता किसी को अन्दर पांच नहीं रखने देता था। एक रात, सिराम कुछ वाटियां इकट्ठी कर चोरी-छुपे 'बाहर' वांटने चला गया। भूख से तलफते हुए लोग उन वाटियों पर टूट पड़े। बहुत हो- हल्ला मच गया। सुवटी को मालूम पड़ा । उसने उसी वखत सिराम को कम्फ से निकाल दिया। "वो तुम्हें अच्छे लगते हैं तो जाओ, उन्हीं के साथ रहो । अगर आगे से कम्फ के भीतर पैर रखा तो वोटियां नुचवा डालूंगी तुम्हारी, याद रखना !" वह ऐंठती हुई फाटक पर दनदनाती रही । बाद में, रावता ने उससे कहा, "सिराम को तुमने नाहक निकाल दिया । ऐसा कोई कसूर नहीं किया था उसने।" असल में, रावता को सुवटी की अकड़ और हुक्म गांठने की आदत अखरने लगी थी। कई दिनों से वह कुढ़ा हुआ था। "वो वाहर के भिखमंगों को खिलाये-पिलाये और मैं देखती रहूं! सुवटी ने रावता की तरफ कड़ी नजर से देखा, "फिर कम्फ में इत्ता नाज है ही कहाँ ? 'लेकिन तुम ऐसे दयालु कव से हो गये ! पुन्त लूटकर अगला जनम सुफल बनाना चाहते हो?" रावता से यह तानाकशी न सही गयी । बोला, “जवान पर लगाम लगाके रखो कुछ । मुझे इस तरह की वातें अच्छी नहीं लगती हैं।" "नहीं लगती हैं तो वापस चले जाओ, टोली में । तुम्हारी जगह । १३६ / पत्तों की विरादरी कोई दूसरा मा जायेगा । मैं हरलो से बोल दूंगी।" रावता भीतर-ही-भीतर बल खाकर रह गया। गोदारी की हालत बिगड़ती चली गयी। वह अब अपने में ही बन्द रहती थी । वेवात हंसती, कूदती और अटपटी बानी बोलती हुई वह हरदम चकफेरी लगाती रहती थी। इग्यारसीलाल कहता था, गोदारी अगम- ग्यानी हो गयी है । सुवी ने यह डोंडी पीटकर कि वह कुछ भी करती- घरती नहीं, उसका नाज बन्द कर दिया था। हद्दी, ज्यानको काकी, गज्जी और फूलको उसके लिए वाटियो वचाकर रख लेते थे और खिलाने की कोशिश करते थे। गोदारी कभी खा लेती थी, कभी विगल-चबाकर थू-थू थूकने लगती थी और बहुत हुड़दग मचाती थी। रावता की मशा थी कि गोदारी को रस्से से बांधकर रखा जाये। एक बार ऐसा किया भी गया, किन्तु गोदारी ने चीख-चीसकर आसमान सिर पर उठा लिया। हारकर रस्से को खोलना पडा । उसके बाद, वह खुली घूमती थी और रोज गिर-पड़कर अपने शरीर पर नये जखम उगा लेती थी। जगह-जगह कत्यई खुरण्ड चमकते रहते थे और गोदारी उन्हें नखो से खुरचकर रगत निकाल लेती थी। सुवटी ने पुसपा बाई को सुझाया कि गोदारी के हुडदग को देखते हुए उसे कम्फ-वाहर कर देना चाहिए। किन्तु दिन मे, जव सारे लोग तल्लाब की खुदाई के लिए चले जाते थे, पुसपा वाई के एकरस अकेलेपन को गोदारी ने अपनी हरकतों से दिलचस्प बना दिया था। पुसपा वाई ने गोदारी को कम्फ से नहीं निकाला । यह कभी उसे केसर-कस्तूरी पिलाकर नचाती थी, कभी उससे उल्टे-सीधे आसन करवाती थी, कभी बेरहमी से उनके साथ खेलने लगती थी। कपड़े की मुठिया गेंद बनाकर वह चिल- चिलाती हुई धूप में दूर फेंक देती थी और फिर गोदारी को उसे उठा लाने के लिए नंगे पांव दौड़ाती थी । गोदारी को कोई परवा नहीं थी।

। हुई रेत में कूद-फांद करके वह गेंद ले आ
एक दफा पुसपा बाई ने वालू को भिगोकर, उसमें लाल पिसी हु
चें डालकर गोल-गोल लड्डू बनाये और गोदारी को खाने के लिए
।। गोदारी गवल-गवल वेहिचक खा गयी। नाक-मुंह से पानी बहता
हा । आँखें मसलती रही और ही-ही-ही हंसती रही। लेकिन दूसरे
दन गोदारी को दस्त लग गये और वह कम्फ में इधर-उधर हंगकर
गन्दगी फैलाती रही।
उस रोज पुसपा बाई ने गोदारी को नचा-नचाकर थका डाला था।
"नटों को बांदरी हो गयी है तू !" पुसपा वाई ने खिल-खिल करते
गोदारी के सिर के बाल खींच दिये ।
किन्तु तभी एक तगड़ा-सा आदमी तम्बू में आया। लुंगी-वन्यान
पहने हुए । कन्धे पर बन्दुक । पुसपा बाई उसे देखकर तनिक घबरा गयी।
"मैं उम्मरकोट से आया हूं।"
"हाँ-हाँ, मैं पहचानती हूँ।" पुसपा वाई खिसियाने ढंग से मुस्करायी
"हरलो के साथ नाज का सौदा करके तुमने ठीक नहीं किया, पुसपा
बाई!"
"वो ऐसी वात थी-"
"यह तो सरासर धोखा है।"
पुसपा बाई की जीभ तालू से चिपक गयो । तुरन्त कुछ बोलते
वना।
"
"आगे का क्या फैसला है ? जानने आया हूँ।"
"सोचूंगी।"
"मोच लेना। "हरलो मे निपटने में हमें देर नहीं लगेगी।
अगर तुमने गड़बड़ की तो नतीजा अच्छा न होगा
बाहर ऊँट खड़ा था। वह व्यक्ति तेजी से मुड़ा और उस पर
होकर टीलों में गायब हो गया ।
गोदारी हंसने लगी।
१३८ / पत्तों की विरादरी

परे मर चुड़ल !" पुसपा बाई ने उसकी पिटाई कर दी। लात-घूसों से। . महीने तो मुसाफिर होते हैं। बैसाख गया, जेठ भी गुजर गया और अब असाढ निकला जा रहा था। पुसपा बाई और अनाज के इन्तजार में थी। तल्लाव की चिनाई. पकाई के लिए जब सुरखी-चूने के गाड्डे माये थे तो उसने कहलवा दिया पा कि भण्डारा खाली होने लगा है। फिर भी देर हुई तो बदरू मियां को भेजा। यह खबर लाया कि कुछ समय लगेगा अनाज माने में । अभी तो जो है, उसी से काम निकालो। पुसपा बाई ने कम्फ में और एंटनी कर दी । इग्यारसीलाल और रावता हहकाये कुत्तों की तरह काट-काटकर लोगों को भगाने लगे। इस.बीच एक अजीब किस्म की बेम्मारी फैल गयी। बदन में थरथरी होती थी, ताप चढ़ता या, गला रुकता था और फिर पलापल में आदमी खत्तम । चींटी-भुनगों की तरह लोग भरने लगे। टीवों पर लाशें नजर आने लगीं। कौत उठाये, कौन जलाये-दफनाये? चील-कौवो की वन आमी थी। गिद्ध चोंचें लड़ाते रहते थे। मिपारो को हुआ-हुओं जमराज की पुकार लगती थी। 2. भूख का हवाल यह था कि संजडो-पेड़ों की छाल भी उतार- पीसकर सायो जाने लगी । यूहरों के गूदे को इमरत मान लिया गया । पेट भरने के लिए लोग पास-फूस को मसोसकर निगलने लगे। सिराम, गज्जी और फूलकी अब ऐसे ही लोगो मे से थे। मिराम के बाद गज्जी और फूलकी को भी कम्फ से खदेड़ दिया गया था। गज्जी की भवें इन दिनों इस तरह तनी रहती थी मानो वहाँ दो दिन्छु चिपके हुए हों। यह सिराम के साथ फुसफुसाहट कर जाने क्या-क्या बतियाता रहता था।

पुसपा बाई अक्सर रात को चौंककर जाग पड़ती थी। वह जानती थी कि यदि इस वार अनाज के आने में ढील हुई तो कुछ भी हो सकता है। ढील वैसे हो चुकी थी और, पुसपा बाई की व्याकुलता उवलने और खदबदाने लगी थी। 7 सुवटी फसकड़ा मारे पुसपा बाई के सिर में जूंएँ टोह रही थी और अपने नखों पर उनकी पटापट कर रही थी। इस काम में सुवटी को महारत हासिल थी। वह इतनी तेजी से जूंएं बीनती थी कि अचरज होता था। पुमपा बाई को भी बड़ा चैन मिल रहा था। इग्यारसीलाल आया। तम्बू में मकोड़ों ने बिल बना लिया था। अनजाने में वह उस बिल पर जा बैठा। मकोड़े उसके शरीर पर भागम- भाग मचाने लगे। एकाध जगह काट खाया तो वह उछला । पुसपा वाई हंसने लगी। सुवटी बोली, "इस तरह बिदक क्यों रहे हो ? गोदारी का असर आ गया है क्या ?" तभी शक्ल बिगाड़े हुए रावता अन्दर घुसा । उसकी सांस फूल रही थी। किसी तरह किरकिराते कण्ठ से बोला, "हरलो घिर गया है-" "क्या-" सुवटी के हाथ मुन्न पड़ गये । "हुआ क्या?" इग्यारसीलाल ने पूछा। "बेस्सफ के फौजियों ने पूरी टोली को ही रावता का स्वर शुष्क पड़ गया, "अभी एक आदमी समंचार लेके आया है।' "कहाँ पर ? किम जगह ?' " "पखेस्तान की मींव के पास ।" रावता बोला, "जमके लड़ाई है।''बहोत दिनों से वो लोग हरलो के लिए खुनस खाये "इसमें "उम्मरकोटवालों का तो हाथ नहीं ?" पुसपा बाई ने शंका जाहिर की। "क्या मालूम- - A.

रावता ने इग्यारसीलाल की बात काट दो, "नहीं, वो बेस्सफवाले बेस्सफ! यानी बी-एस-एफ, बोर्डर सिक्योरटी फोसं. सीमा सुरक्षा दल-पुसपा बाई गादी चिन्ता मे डूब गयो । उसने अंगुलियां फटकाते हुए कहा, "उसी आदमी को फिर भेजकर पता तो लगवाओ कि आखिर ""हरलो और टोली के दूसरे लोग किस हालत में हैं अब?" "मैंने उसे रवाना तो कर दिया है।" रावता बोला, "वह तो एक- दम्म डरा हुआ था। कहता था, किसी के भी वचने की उम्मेद कम है। बेस्सफवाले भून डालेंगे या पकड़ लेंगे।" सन्नाटा छा गया, तम्बू में। हवा में मौत सरसराने लगी। इग्यारसीलाल ने असहायता से हाथ मटकारे । लस्त और कातर होकर सुवटी रोने लगी। -सिआर हुआ-हुमा कर पहले से ही रो रहे ये मोर बाहर, उनका रोदन जैसे कताई के लिए एक अदीठ परसे पर चढा हुआ था।

हरी उमस थी और हवा कत्तई वन्द । आसमान में पहली बार, एक साथ, बादलों की गूदड़-पांत नजर आ रही थी। किनारों पर धुंधली भूरी और बीच में खूब गाढ़ी स्याह । सूरज दिखलायी नहीं दे रहा था, किन्तु धूप के चौंचे मोम की तरह पिघलते हुए-से कभी-कभी टपक पड़ते थे और थोड़ी देर के लिए रेत पर जम जाते थे। धीरे-धीरे धूप के आकार ओझल होने लगे और आकाश भी बादलों की आड़ में अपना रंग खोने लगा। सांझ के ऐसे वखत में गज्जी एक खेजड़े की छाल खुरच रहा था, वसूले से । बाल विखरे हुए। कमर का चिथड़ा पसीने से तर । छाती और गर्दन गर्द में अटी हुई। सांस मथनी की भाँति देह को झिझोड़ती हुई। आंखें अनिश्चित । बसूले के दस्ते को ठोंकने के बाद उसने ज्यों ही माथे का गीलापन पौंछा और चेहरा ऊपर किया, सामने के आदमी को देखकर चीख पड़ा वह चीख सहसा कुहासे में लिपट गयी । गज्जी की पनियल हा को फिर कुछ नजर नहीं आया। लेकिन, कुछेक क्षणों में ही धुन्ध नि गयी और तव, गज्जी उधर लपकता हुआ चिल्लाया, "शुवो ! शुबै उसका गला भर्रा गया और वह देर तक कुछ बोल नहीं सिरफ शुबो से लिपटकर रोता रहा । लेसुए के तने के पास खड़ा हुआ शुवो पत्थर की तरह चुप "तू कहाँ चला गया था, शुवो? तूने क्यों छोड़ दिया को?" १४२ / पत्तों की विरादरी

।
गज्जी रोते-रोते मिझोड़ने लगा शुबो को मोर तभी, जैने उस पर
बग्जर गिरा। शवो के समूचे तन पर काले-काले दाग थे । गरम लोहे
से डाम देने पर उभरनेवाले दाग ! गुदनों की तरह उन्होंने जिस्म को
वौंध रखा था।
"यह क्या-यह क्या, भुबो !" उसके मुंह में यावाज सूख गयी।
"यह तो भी नही, गज्जी !" शुवो उमे बाहों में लेते हुए
बोला, "चल, कम्फ में चलें।"
"नहीं, शुबो । कम्फ अब वो नही रहा । कित्त ही जन बाहर निकाल
दिये गये हैं-मैं भी..."
"अच्छा !" शुयो सोच में पड़ गया।
फिर गग्जी ने उसे सब कुछ बताया, सब कुछ.""जो भी वह जानता
था। शुवो के लापता होने के बाद की बदरंग घटनाएं ! शुओ सुन रहा
पा और होठ काट रहा था। शुवो सुन रहा था और टीलों पर बुझती हुई
शाम को ताक रहा था। शुवो सुन रहा था और बछराज को, वाशिया
को यादकर आंखें पौंछ रहा था।
"तू बहोत दुबला गया, शुवो !"
"मेरी चरचा छोड, गज्जी ! आ, कम्फ में-"
"वो हमें घुसने नहीं देंगे।"
"चल, चल । ज्यादा सोच में मत पड़ ।" उसने गज्जी की पीठ पर
हाथ रखा। वह हाय, एक मजबूत मिनस का हाथ था।
उस हाय ने पल-भर में गज्जी को गरुड़ बना दिया। वह उड चला,
"हे-ओहद्दी-होऽऽऽ रे-हो-जमाल-ओ-काकी-रेड शुबो आ गयाsss शुबोsss"
कम्फ के फाटक पर यह ठिठक गया।
उसके उछाह ने शुवो को पीछे छोड दिया था।
शुवो आ गया रे-हो
जैसे किसी ने सिंगा फूंक दिया हो, कम्फ के पार-पार शुवो का नाम
गूंज गया।
:

-- -~~ शुबी किधर है ? -बोल तो, कहां है वो? मवाली के इतने धक्के लगे कि कम्फ का फाटक छिटककर दूर जा पड़ा । लोग इस तरह वहाँ बह आय, मानो कोई जवरदस्त धारा उन्हें ठेल लायी हो। उमी ममय एक अस्थि-पजर डोलता हुआ फाटक तक आया । वे तुरत नहीं पहचान पाये और ऊहापोह मे अटके रहे नो गज्जी ने हाथ हिला. कर रहा. "शुबो है ! हो। -~-हाँ-हाँ रे, वा ही तो है। -~~~-शुबो ही है। एक माथ जैसे अंगारे झलझला उठे हो, हवा के किसी तेज झोंके की शह पाकर, वे शुबो के निकट सिमट गये । अपनापे की भरपूर गरमाम लिये । स्यात इससे पहले शुबो कभी उन्हें इतना अपना न लगा था । यह लगना, दुःखों की अनन्त अगन में सुलगकर बाहर निकलना था। शुबो अपनी गीली आँखों में चमक और थरथराती हुई मुस्कराहट में अकथ पीडा की लकीर संभाले कम्फ में घुस गया । और पानी के कोठे के पास एक बड़े-से पत्थर पर वह जा बैठा। उमने एक ठण्डी साँस ली। वह सांस, कुछ-कुछ निगाह थी"उसने कम्फ को एकबारगी देख लिया था। वे टूटने-गिरने को हो आये छान- छपरे । वे ढहने-मिटने की हदों पर रुके हुए लोग ! तू कहाँ था शुबो? -यह तुझे क्या हो गया ? -तू तो विल्कुल ही झिर गया। -तुझे इत्ती बुरी तरह से किसने डाम दिया? क्यों डाम दिया, वता? शुवो खामोशी से शाम को बदली हुई रंगत को, टोलों को और उनके १४४ / पत्तों को विरादरी १ ऊपर घने घने झक आये यादल-बन्धुओं को देखता रहा! जब उसने अपने बारे में कुछ न बताया तो लोग कम्फ और वहाँ के हाल-हवास को लेकर बोलने लगे। एक साप । हरेक को जल्दी थी। हरेक खुद ही सब कुछ बता देना चाहता था। वे आवेग में थे। वे उदास थे। वे भीतर के भय को उगलकर भयमुक्त होने के लिए व्या थे। सुबो जानता था, क्मोकि उसने गज्जी के चेहरे पर पहले ही उस भय और अवसाद को चीन्ह लिया था। "हमने बहोत कष्ट सहे हैं, शुबो!" ज्यानकी काकी बोली, "हम मर रहे हैं...देस, टीलों पर लाश पड़ी हैं और चील-कोवे गोठ मना रहे हैं ! बाहर के लोग भीतर आ रहे थे। कम्फ एकमेक हो गया था। "मैं यही से गया नही, वे लोग मुझे पकड़ ले गये थे।" धुवो मे आहिस्ता-आहिस्ता कहना शुरू किया, "वे मेरी ताक में थे। जब मैं, उपरं"उन पेड़ों के मुरमुटे मे बैठा था तो अचानक उन्होंने मुझ पर मोरा डाल दिया। मेरे मुंह में कपड़ा ठूसकर, हाथ-पांव बांधकर वे मुझे यहाँ से बहोत दूर ले गये।" "वे कोन थे, शुवो ! वे कमीने-" "उन्होंने मुझे एक सोह में डाल दिया। वे मुझे मारला नही चाहते थे, लेकिन हर बसत मौत की तकलीफ में हाले रखकर "मेरे मन को मार डालने की इच्छा रखते थे। लोहा गरमाकर चमड़ी दागते थे, पावों पर नमक युरका देते थे--- "वे कौन हरामी थे, शुयो ! तुम्हें रामदेवजी की सौगन्द, वतामो !" "वे." सुपो की नावाज तात की तरह तन गयी, "हरलो के लोग . 1 अचानक तमाम चेहरों पर धुपां उफन पड़ा और कुछ क्षणों बाद, उस पुएं में से लपटें उठने लगीं।

।
"हम हरलो को कचर डालेंगे। उसकी मां..." आवेश के गलियारों
में गालियाँ सनसनाने लगीं।
"वेस्सफ के सिपाही और हरलो के लोग भिड़ गये आपस में। मुझे
मौका मिला तो मैं किसी तरह छूटकर यहाँ दौड़ आया।"
"वेस्सफ क्या ?" किसी ने प्रश्न किया।
"फौज होती है।" शुवो ने बताया ।
"फिर तो हरलो को दिन में तारे नजर आ गये होंगे।" ज्यानकी
काकी गुस्से में अपने पर काबू नहीं रख पा रही थी।
"मेरा तो ख्याल है कि वहोत वुरी बीती होगी उस पर ।.." शुवो
वोलते-बोलते रुक गया। गोदारी ताली बजाने लगो, "जरख आयेगा,
जरख-जरख ! जरख को मार डालो, जरख को !"
पुसपा वाई के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं।
रावता, इग्यारसीलाल और सुवटी उसके तम्बू में सही-सहमे जान
छुपाने को ठौर तलाश रहे थे । अलबत्ता, बदरू वाहर था। एक पल
मुस्कराता, दूजे पल दहल जाता हुआ।
"इग्यारसीलाल, तुम शुबो को यहां से खदेड़ क्यों नहीं देते हो?"
पुसपा बाई ने करलाते सुर में कहा ।
"मैं नहीं जाऊँगा उसके पास ।'यह काम रावता और सुवटी का
है।" वह पीला पड़ गया और जमीन घूरने लगा।
"वो छूटकर यहां आ कैसे गया ?" सुवटी डरी-डरी-सी उधेड़-बुन
में थी।
"यह तो हरलो से पूछो।" पृसपा बाई ने होंठ विचकाये । ।
"हरलो 'अव इस दुनिया में नहीं है, पुसपा वाई !" रावता का स्वर
सपाट था।
"क्या
-
१४६ / पत्तों की विरादरी

"रावता।" "हाँ, वैस्सफ ने पूरी टोली को सत्तम कर हाला- "वेस्सफ के जाल में आ जाने पर कोई धो सकता है, मला !" इग्यारसीलाल ने उसी तरह अपलक जमीन की ओर तारते हुए कहां। "तुम्हारी बन्दूक कहाँ है ?" पुसपा बाई का मुरा भयावह हो उठा। "वो तो "सो गयी।" इग्यारसीलाल बुदबुदाया । "कमे सो गयी ?" "खो गयी।" "यह हाल है तुम्हारा | अब क्या करोगे?" "जाने कैसे..." इग्यारसीलाल का स्वर अस्पष्ट हो गया । यह जैसे चेतना खोने लगा था। पुमपा बाई की आंखो में छरें उछले । "मेरे पास दो वन्दू हैं।" "एक मुझे दे दो।" "तुम चलाना जानती हो?" "नहीं तो क्या--तुम लोगों के भरोरो पर ही बैठी है यहाँ ?" "मैं नली साफ-सूफ कर लेता हूँ।" "ठीक है । भण्डारे की चाबिया-" "मेरे पास हैं।" सुवटी हकलायी। "धर लाओ।" सुवटी ने पापरे के नेफे पर टॅगा हुआ चायियों का गुच्छा सींचकर निकाला और पुसपा बाई को पकड़ा दिया । "रावता, तुम जरा बदरू को भेज दो-शमो के पास । कहला दो, यदि उसने यम्फ में तनिक भी गहबह की तो जान खो देगा अपनी।" फिर पुसपा वाई ने खाट के नीचे से लोहे की जंग-लगी पेटी पिस- कायी और ढयकन उपाडकर चीजें उलटने-पुलटने लगी । एका य मा फाले निकाला और ग्यारसीलाल को देकर बोली, "इसे साठी पर करा लो काम मायेगा।" i । + ! मुवटी इस आस में थी कि उसे भी कुछ मिलेगा, हिफाजत के लिए। लेकिन, पृमपा वाई ने उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया । आंखें मूंदकर वह भीतर बढ़ती हुई कंपकपी को रोकने लगी। हरलो का चेहरा लट्टा की तरह घूमता हुआ सामने आया । खून से सना और घड़-हीन । वह सिमाने लगी "ये नखरे रहने दे !" पुसपा बाई ने डांटा तो सुवटी का हलक बन्द हो गया। "उसी हरलो का तो किया हुआ है यह सव ! मुझसे तो बोला था, शुवो को ठिकाने लगा दिया है। इस काम के रुपये भी ऐंठ लिये थे उसने मुझसे । अव्वल मक्कार था.-.' धूरत और दगाबाज !" इग्यारसीलाल ने हां-में-हां भरी, नफरत उगली और बोला, "किसी को उस पर शक न हो, इसी वास्ते उसने खुद रिपोट भेजकर थानेदार को भी बुला लिया था। उसी दिन ।' "पुलीस आयी तो उसमें भी कित्ता खरचा हुआ !" पुसपा वाई ने पेटी बन्द कर दी और फिर धम्म-धम्मक तम्बू में चक्कर काटने लगी फम्फ में एकाएक शोर वढ़ गया। उसने नथुने फुलाये, “इन हरामी कीड़ों को सबक सिखाना होगा । कसे चिल्ला रहे हैं ! । " शुबो ने दूर से ही बदरू को पहचान लिया । वह अपने को सिकोड़ता- खोलता पास आ रहा था। "कैसे हो, शुबो !" शुबो ने उसे गले लगा लिया, "दस्सा तो तुम देख ही रहे हो।" "मुझे मालूम था । लेकिन मैं इतना डर गया था उस वखत कि तुमसे कुछ कह नहीं पाया।" वदरू अपने में घिरा-घिरा बोला, "वो बहोत नाराज है, शुवो। बुरी तरह फनफना रही है । सावधानी रखना।" "तुम फिकर न करो, वदरू!" गज्जी बोला, "उसकी फनफनाहट - १४८/पत्तों की विरादरी को तोड़ने का टंम आ गया है अब।" "उसने कहलवाया है कि गड़बड़ मी तो बुरा होगा।" सदरू ने गर्दन सटका ली। "मण्डारे की चादियां सुक्टी के पास हैं, शुयो ! साले तोड़ने होंगे। जमाल ने जोर से कहा। "यह कुजी ले लो।" वदरू ने जेब से एक पानी निकालकर दी, "दो-चार बार घुमाने से लगेगी।" फिर वह पुसमा वाई के तम्बू की तरफ लौट पड़ा। हमेशा की तरह सिर मुकाये। खिन्न । खौफ में गडा-गडा । जुगनी उस समय शुवो के सामने आयी, जब भीड़ भण्डारे की तरफ मुह चनी थी। उसने मन्द सुर मे कहा, "शुबो, तुमने मुझे भुला दिया-" "नहीं, जुगनी ।" शुवो के मन मे कोमलता उमड पडी, ' तुम्हे याद फरते हुए तो मैं रोज मौत से लडा हूं। मुझे नहीं पता था, तुमसे फिर कभी मोलाकात होगी !" "मैंने आस नहीं छोड़ी थी। और तुम हारे नहीं। बिल्कुल थके नहीं। तुम जुलम सहके और ज्यादा पुखता हो गये । मैं बहोत खुश्श हूँ, शुबो !" भण्डारे के ताले खुल गये। अन्दर बहुत कम नाज था। फूम याकड मिला थोडा-सा पाजग और जो। ज्यानको काकी ने मुट्ठी-मुट्ठी बांटना शुरू किया। जल्दी ही रामापत्त । बहुतेरों को एक दाना भी नहीं मिला । वह हताश होकर अंगुलियां मरोडने लगी। 1 रात गहरी पड़ रही थी। आसमान की निचली गोलाई में बादल पमरे थे और बीच मे सुले फैलाव में कटा हुमा चदि दहयडी लगा रहा था। उसके फीके उजास में शुयो ने भूखे चेहरों का राखुहा देखा । नही, वह इस तरह भाग को रास नहीं होने देगा। :

an- - . "आओ. सब लोग मेरे पीछे-पीछे आओ! वह करीब-करीब दौड़ता हुआ चलने लगा । और, उसके पीछे पद- चापो का रेला बंध गया। स्त्रियों ने बच्चों के हाथ थाम लिये। सिराम के कन्धे पर वन्दुक थी। उसने कहा, "मैंने इसे खूब संभाल- कर रवा, शुबो ! किसी को हवा तक न लगने दी।' गुबो मुस्कराया। "खाली ही होगी ?" "नहीं, टोटे भी चुराये थे मैन । भर लिये हैं, काछड़े में।" अपनी उसी 'टेकडी' पर जाकर शुबो सका । बीच में एक बार गज्जी ने पूछा था, 'आखिर 'जा कहाँ रहे हैं हम ?" अभी पता चल जायेगा।" शुबो भेद-भरे अन्दाज में हंसा । गुबो जरूर जादू चलायेगा।" ज्यानको काकी ने मसखरी की। “अमल रेत का जादू !" उसने कहा और उस 'जगह' को ढूंढने लगा। काफी टीले उड़-उड़कर इधर-उधर खिसक गये थे। कुछेक क्षणों के लिए तो वह भूलभुलैया में उलझ गया। लेकिन, अन्त में उसने पांव गाड़ दिये । बोला, “यहाँ से खोदो !" रेत हटायी जाने लगी। पत्थर । घास-फूस के झुबे। फिर बकरियों के बालों से बुने हुए बोरों का स्पर्श महसूस हुआ । गड्ढे को चौड़ा कर बोरों को ऊपर खींचा गया। उन्हें जमीन की सतह तक लाते-लाते जमाल के हाथ-कन्धे दुखने लगे गर्द झाड़ते हुए उसने एक बोरे में अंगुली गड़ायी, "शरत लगा ले वाजरा है ! टांके तोड़कर, उधेड़कर, सुलझाकर बोरों के मुंह खोले गये । । डोरे को दांतों से तानते-तानते फूलकी ने अपने ममूढ़े लहूलुहान कर लि बोरे खुलते-खुलते बाजरा छलकने लगा। शुबो ने ज्यानकी क से कहा, "सवका बांट दो !" काकी नाज बांटने लगी । उमे चूल्हे की अगन तक ले जाने की - १५० / पत्तों को बिरादरी किसी मे नहीं थी। लोग टीलों पर उकई बैठ गये, लम्बे पसर गये और कचर-कचर दाने चवाने लगे । माओं ने बच्चों को डॉटना शुरू किया "गिराओ मत । एक-एक कण संभाल के खामो!" "शुवो, ये बोरे यहाँ किसने मुपाये ?" जुगनी ने पूटो। तब शुवो ने सारा परसंग-वितान्त कह सुनाया। "जमीन में दवे रहकर भी इस बाजरे ने मुझे बहोत कुछ दिया है। सबसे पहले मन में जो भरोसा जगा था, वह इस बाजरे के बल पर ही..." हरलो के साय पट्टा खेलनेवाली बात भी उसने बतला दी। "हाँ, मुझं ध्यान है । पहले तुम सहमे-सहमे रहते थे, फिर एकदम्म बदल गये और उन लोगो को आंखें दिखाने लगे।" कहकर ज्यानकी काकी हंसने लगी। "बाजरे में बडी ताकत होती है।" सिराम बोला। जमाल ने 'म्हान लागे घणो सुवाद लीलो वाजरडो' गीत टेर दिया। हथेलियों और घुटनों पर ताल दे-देकर सब लोग-लुगाई उसका साथ देने लगे। "आज तो रगेस्तान मे रम्मत का मजा मा गया।" गज्जी ने होठों से 'चकबम्म-चकधम्म' ढोलक की-सी आवाज निकालते हुए कहा । जैसे कोई बाजीगर कांसी की थाली को जोर से घुमाकर फेंक दे, चन्दरमा बादलो की दरारो मे चक्करघिन्नी घूम रहा था। पुसंपा बाई पानी की तरह दारू पी रही थी। "बदरू ने लालटेन जलाकर रख दी और बाहर जाने लगा। यह चिल्लायी, "जा कहां रहा है, सूअर ! यहीं रह-" फिर उसने डगमगाते स्वर में रावता से पूछा, "वो सब "कहाँ गये "मालूम नहीं। यहाँ से तो दूर चले गये सगते हैं।" रावता ने पोर

फी दिशा में कान लगाया।
"कम्फ तो सुनसान पड़ा है इस बखत ।" सुवटी बोली।
"शुबो बलवा कराये बिना रहेगा नहीं।" इग्यारसीलाल ने कहा,
"वो जरूर कोई तिगड़ी लगा रहा होगा।"
उसी समय बाहर खडखड़ाहट हुई । पुसपा बाई ने चिहुंककर गर्दन
पीछे की। बोतली की दारू पेट और छाती पर गिर गयी। रावता का
हाथ बन्दूक पर कस गया।
"कौन है, कोन है, भई ?" बदरू ने आवाज दी ।
"पानी की टंकी !" आवाज आयी।
फिर वलो की गर्दन में पड़े टिकोरे बजे ।
"पानी आया है ।" बदरू ने कहा, "एक बैलगाडी है।"
"जाओ, कोठे में भरवा दो।" रावता बोला।
-
बदरु चला गया।
"अब यहां रहने से कोई लाभ नहीं । कम्फ तोड देना चाहिए।"
इग्यारसीलाल ने मुझाया।
"आज भण्डारे को भी लूट लिया उन्होने । अब यहाँ हमारी नहीं
चलेगी।" पुसपा बाई की बोली लड़खड़ा रही थी।
"हां, आगे खतरा ही खतरा नजर आता है।"
"तुम गाड़ीवान से बात कर आओ। हमें जल्दी में जल्दी चल देना
चाहिए।"
"यही मैं सोच रहा हूँ।"
"अभी मौका है । वे लोग यहां से दूर गये हुए हैं। उनके लोटने
से पहले ही-" पुमपा बाई ने बोतली मुंह से लगायी और खाली करके
परे फेंक दी।
तत्काल तयारी की जाने लगी । सामान इधर-उधर किया गया।
कुछ उठापटक हुई। पुसपा बाई ने दो बक्सों में जरूरी चीजे भर ली।
एक बक्सा इग्यारसीलाल अपने डेरे से ले आया। फिर वह माडीवान से
१५२ / पत्तों की बिरादरी

बात करने चल दिया। "कोठे का पानी तो एकदम रीत गया होगा।" गाड़ीवान में पूछ रहा था। "हाँ । बस, पैदे में कुछ बचा है।" उसने जवाब दिया। टंकी बैलगाडी मे नीचे उतारकर रख दी गयी थी । इग्यारसीलाल ने उसकी टोटी खोल दी। पानी की धार दग-दग करती हुई रेत में वह चली। "यह क्या कर रहे हो ?" गाडीवान वोला, "मेरे बल इस टकी को इत्ती दूर से ढोकर लाये हैं और तुम इस तरह पानी बेकार दश रहे हो।" "पानी की अब यहाँ जरूरत नही । कम्पवालों को पाने के लिए एक चूंट भी न मिले और वे प्यामे तडफ-तडफकर मरें, मैं तो "यही चाहता इग्यारसीलाल का जबड़ा खिच गया । फिर उमने गाडीवान के पाम जाकर धीमे स्वर में कुछ बाते को। गाड़ीवान हंकारते हुए बोला, 'ठीक है, ठीक है, लेकिन जन्दी बगे-" "जाओ बदरू, बक्मे ले आओ।" इग्यारसीलाल ने कहा और रम्फ के छपर-धाजनों को घर-घूरकर देखने लगा। चन्दरमा के मन्द पीले उजास में वे अजीय सूने और भयावह लग रहे थे। - रू ने सामान लाकर बैलगाडी में रख दिया । पुसपा बाई ने कार ढ़कर अपने बक्सों को अच्छी तरह देखा-भाला और फिर उनसे पीठ काकर बैठ गयी । सामने इग्यारसीलाल और बदरू । - रावता भी गाड़ी में चढने के लिए पांव आगे कर रहा था कि सुवटी बल्लामी, "मेरा क्या होगा, पुसपा बाई ?" "तुम यही रहो।" रावता ने उसकी तरफ यूका, "अपने करमों का ले-भोगी।" नहीं, में भी साप चलूंगी।" वह गिड़गिड़ायी। रावता ने उसे धक्का दिया।

- . मुवटी धूल में जा गिरी। रावता गुस्से में गरजता हुआ उस पर चढ़ बैठा और बन्दुक के कुन्दे को उसके सिर में ठोंकने लगा। ''मुझं मारो मत' 'तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूँ-'' वह घिधियाने लगी। लेकिन, रावता ने एकदम उसका गला टोप दिया । आवाज वन्द हो गयी। वह छटपटायी और शान्त हो गयी। "स्माली बहोत बनती थी। हरलो की रानी ! मेरी शिकात करती रहती थी उसमे--" रावता विक्षिप्त-सा उसके मुंह पर थूकने लगा। "धांय !" तभी उमके कन्धे में आग भर गयी। वह गिर पड़ा। ग्यारसीलाल के कहने पर पुसपा बाई ने बन्दुक दाग दी थी। वह बोला, "इन रावता को भी यहीं खतम करो, पुमपा बाई ! नहीं तो, हमेमा जान का झंझट बना रहेगा।" "चलो. गाड़ीवान !" पुसपा बाई वोली। हांफती हुई। बन्दुक की आवाज़ से बैल पहले ही बुरी तरह विदक उठे थे। इशारा पाते ही दौड़ पड़े। दौड़ते चले गये, वदहांस-सांस । रावता ने कराहते हुए बैलगाड़ी को दूर जाते देखा और सब कुछ ममझ गया। उसके मुंह से निकला, "रण्डी !" फिर उमने बन्दुक को सीधा किया । हाथ जमाया और अनुमान से, बैलगाडी की सीध में गोलियां चलाना शुरू कर दिया। अन्धाधुन्ध । उधर ने भी जवाब मिला । एक गोली रावता की आँख को वेधती हुई खोपड़ी को टण्डा कर गयी। वह रेत में ढह गया । रावता को हरलो की टोली का अच्छा निशानेबाज समझा जाता था, किन्तु आज अनजाने में वह पुमपा बाई से मात खा गया था । बलो ने नास्ता छोड़ दिया था और सू-मं करते हुए वेतहागा भाग रहे थे । गाडीवान के हाथ मे उनका रस्मा छूट गया था। वह महमा हुआ, बक्सों की आड लेकर, गाडी के तल्ले में, चिपका पड़ा था। पल-पल मौत न्योता दे रही थी। १५४ / पत्तों को विरादरी घाय-धुय रुक जाने के बाद, काफी देर तक खामोसी देखकर. गाड़ीवान ने सिर उठाया । सबसे पहले बलों को देखा । राम संभालकर उनकी, पीठ पर हाय फिराने लगा, इस आशंका से कि कही उनके लग-लुग.न. गयी हो । बैल सही-सलामन थे, अलवता डर गये थे। वह आश्वस्त हुआ। उनका जुना ठीक जमाकर उसने गाड़ी का हाल देखना-जानना चाहा कि बदर ने उसकी पीठ पर हाय रखा । "में भी कैसी आफत में फंस गया।" गाड़ीवान बड़बड़ाया, "मुझे चही मना कर देना चाहिए था।" "मना करते तो तुम्हे भी भून दिया जाता--" वदरू मन्दा-सा बोला। वह गाडी में कुछ टटोलता-सा आगे-पीछे हो रहा था।" पुसपा बाई चित्त पड़ी थी। तेज-तेज माम चल रही थी। उसे पुकारने या छूने की हिम्मत बदरू नहीं कर सका। इग्यारसीलाल गाडी में नहीं था। वह स्यात घाय-धाम में मर-सप- कर नीचे लुढ़क गया होगा, वदरू ने सोचा । फिर उमने अधमरे अंधेरे में खें फाड़-फाड़कर पुसपा बाई के एक पैर को धीमे-से हिलाया। उसकी थेलियो में गरम-गाढ़ी चिपचिपाहट लियड गयी। वह घबराकर पीछे ८ गया। पुसपा बाई के होंठ फडक रहे थे और उनमें से अस्पष्ट ध्वनियों नकल रही थी। एक वार बदरू को स्याल आया कि वह पुसपा वाई की सार-संभाल है, उसके जहमों पर पट्टी बाँध दे–लेकिन उसने कुछ नहीं किया और सुन्न-गुन्ल वंठा रहा। "मैं क्यों कुछ कलं, तुम्हारे लिए ?"तुमने तो मुझे जीते-जी ही मुरदा बना डाला था।" यमा कह रहे हो, यदरू ?" गाड़ीवान ने हौले-से पूछा। चंदरू ने कोई उत्तर नहीं दिया। किन्तु थोड़ी देर बाद उसका माया फिर घनधनाने लगा और वह परलाप में डूबता चला गया, "ऐसी ही रात थी वो, सपा बाई ! रावता ने याशिया को गुड़ की डली में अम्मल खिला दिया था, सांझ पड़े ही। वो बेचारा अफीम के नशे में अचेत सो रहा था कि तुम लोगों ने उसे उठा लिया, मुंह पर कपड़ा बांधकर । और तल्लाव के तल्ले में ले जाकर पटक दिया।"उस नादान बच्चे ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा ? तुमने अपने हाथ से उसके गले पर छुरी चलायी थी। सोया हुआ बच्चा चीख भी नहीं पाया। 'तुमने तो अपनी इच्छा पूरी कर ही ली। मिनख की बलि दे दी तल्लाव को। 'मैं सब कुछ छुपकर देख रहा था, लेकिन मुझ जैसे कायर जीव के देखने से क्या ? रावता ने खून के चुल्लू भर-भरकर'''तल्लाब में छिड़क दिये थे। फिर उसने किनारे की मिट्टी में ही बाशिया को दबा दिया। कम्फ के लोग, रोज-रोज मिट्टी खोद- खोदकर उसी किनारे पर डालते रहे । लेकिन, उन्हें कभी सच्चाई का पता नहीं चल सका । पुमपा बाई, तुमने उस रात गवता के माथे पर बाशिया के रगत का टीका लगाया था, उसे ठेकेदार बनाया था। और आज उसी को टण्डा कर दिया गोली मे । बलि देकर, अपसगुन उतारकर, तुम एकदम हँस पड़ी थी। कैमी काली, बिकराल हंसी ! कम्फ में लोटकर तुम लोगों ने झूठमूठ जरख के आने की बात फैलायी। सीधे-सादे गांव- ढाणी के लोगों ने विसवास कर लिया कि बाशिया को जरख ले गया- "ऐसा काण्ड मच जायेगा, मुझे मालूम नहीं था।" गाड़ीवान अटपटा- कर बोल रहा था, "खूब जोरदार लोग निकले ! एक-दूसरे को ही बखेर दिया।" बैल जैसे एक अन्धड़ में से निकलकर मुगती की ओर आये थे। लेकिन, वे अभी भी आशंका से कान फटकारते हुए चल रहे थे । बदरू सुध-बुध खो बैठा था। अपने-आपमे या न जाने किममे, उसकी गरलाती घरघराती हुई बातचीत जारी थी, "बरसों में देखता आ रहा हूँ मैं तुम्हें । जवान होते, नखरे करते और यारों के साथ दगा करते देखा है मैंने तुम्हें । रण्डी थी तुम्हारी माँ ! घटिया, गन्दी, लालची औरत । लेकिन तुम्हें वो चाहती थी। तुमने उमे भी मरवा डाला था गुण्डों से । वह तुमसे कमाई कराना चाहती थी और तुम्हारे खुवाव थे एम्मेले-एम्पी १५६ / पत्तों को बिरादरी

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,
चनने के । पुसपा बाई, मैं सारी लीला देखता रहा और हमेशा चुप रहा ।
किस चीज से दरता रहा मैं ? ययो सूख गयी मेरी जवान, मुंह के भीतर,
और अपनी बात बोल नहीं सको? मैंने यह बीमारी कइयों को लगी'.
दी। गोदारी मेरे पास आती थी, याशिया को लेकर, मैंने उसे भी रोग
लगा दिया अपना । वह तमाम चीजों से डरने लगी। हरेक से कहने
लगी-एमा मत करो, वैसा मत करो..."
'वदरू, ओ बदरू ! तुम भी होदा में नहीं हो क्या ?"
गाडीवान की ऊँची आवाज सुनायी दी। वह चौंका । झल्लाया-सा
बोला, "क्या है ? जो होना था, वह तो हो गया । अब क्यों चिल्ला रहे
हो? मैं तो जानता था, एक दिन गन्द का यह पड़ा जोर से फूटेगा।
तुमने मी धमाका सुन लिया!"
बैलगाड़ी ठहर गयो।
अचकचाकर बदरू ने पुसपा वाई की नाक के आगे हथेली अापी।
सास बन्द यी । नाड़ी देखी। वहां भी हरकत नहीं थी।
"पुसपा बाई तो मर गयी !" उसने नफरत को मुंह में इकट्ठा कर
होंठ विचकाये।
"मैं लाश को अपनी गाड़ी में लेकर नहीं चलूंगा।"
"विल्कुल ठीक कहते हो । मत ले चलो।"
बदरू कूदकर नीचे उतरा। उसने टांगों से पकड़कर पुमपा बाई को
घसीटा और लद्द-से जमीन पर पटक दिया ।
- "कोड़ा लाओ!" पुसपा बाई की पुरानी आवाज, अपनी खूखार गूंज
उसके आसपास लहरा गयो । वह सकपका गया और धूल में पढ़े
सारा के भद्दे आकार को पूरता रहा।
के साथ,

- आधी रात । घिरे-घुमड़े बादलों की नील तलाई में नहाता-तरता हुआ चन्दरमा । हवा थमी हुई थी। बरखा के आसार बन चुके थे। शुबो को अज्जैदान का एक पद याद हो आया । हिवड़े ने ठाडो बख में राखज' 'मन को खूब काबू में रखना रे मिन्तरा, इस किनारे से चले हो तो उस किनारे पहुंचकर दम लेना । बीच धारा में कोई लुभाकर बोल कि उतरो, उतरो, तट आ गया-तो तुम उसकी बातों में न आ जाना ! वे इस सहज-सच्ची बानी को समझते थे। एक साथ बोल पड़े, "इम्बर बग्यो 'अज्जैदान तुम अमर हो गये । तुम्हें न तव कोई मार सका, न अब कोई मार सकेगा! धांय ! कम्फ की दिशा में धमाका हुआ। गोदारी चिल्लाकर भागी, "जरख माया, जरख आया ! मारो, मारो!" हद्दी ने उसे पकड़ा और जबरन पास विठाया। घाय, घाय ! फिर टीले कपपाकर गूंज उठे। "हरलो.-" जुगनी ने कहा, "जरूर हरलो आया है।" "गोली चलाके डराना चाहता है वो हमें?" सिराम बन्दूक संभाल- कर शुबो की तरफ देखने लगा। शुबो चुप था । कुछ समझ नहीं पा रहा था। उसने इस तरह नाक ऊपर उठा रखी थी, मानो हवा को सूंघ रहा हो । "कुछ भी हो। हमें कम्फ में लौटकर देखना चाहिए।" १५८ / पत्तों को विरावरी

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भरी आवाजों का शोर वरसात को झमझमकारों में घुलमिल गया। "तुम मेरे साथ चलोगी?" शुवो ने जुगनी की ओर संकोच से देखते ग. हुए पूछा। उसने सिर झुकाकर हामी भरी। ज्यानको काकी और अचली संग हो ली। "यह हम दोनों की उमर का मेल है। ज्यादातो कट गयी है, बची- खुची जिनगी इस हेलमेल में ही कट जायेगी।" ज्यानको काकी बोली। ठट्ट के ठट्ठ लोग, जो रोजी-रोटी की तलाश में बिखरे हुए थे, अब गाँव-टपरो की तरफ दौडे-दौड़े चले जा रहे थे। शुवो और जुगनी को रास्ते में उनके कई गोट-दल मिले । वहीं मैदान । वही रास्ते । वही रेत । वही पेड़ । और पते, नये होने के लिए अपनी विरादरी में लौट रहे थे। एक गांव । दूसरा गांव । तीसरा गांव । गांव और गांव। शुवो को वे एक से लगे और जुगनी को ऐसे, मानो अपने में अनन्त रहस्य छुपाये हुए हों। :"फुहार कर रही थी। लाल-लाल बहूटियां वालू में रेंग रही थीं। कहीं-कहीं, बाजरे के पौधों पर चढ़ते हुए कुंक की भांति, धूप के चौधे चमक रहे थे। राह में चक्कल मिल गया उन्हें । गले में ढोलक डाले हुए और बगल में पूंगी-पिटारा। ऐसा गजव का कालबेलिया कि सांप को पलक झपकते पकड़कर पिटारी में डाल लेता था। वह भी देस-परदेस भटककर, बब वरखा होने पर अपने इलाके में विचर रहा था। चलते-चलते दो दिन बीत गये। सीव आ गयी। कांटों की बाड़ इंस्टाल पौर पखेस्तान को वॉटनेवाली हुदा एक गांव को बीच में से काटकर रह फुफकारती हुई चली गयी थी । सम्भे गड़े हुए थे । और उमर मुझे हर हरफ बंटवारे का ढिंढोरा पीट रहे थे। साँझ उभर रही थी । शुवो, जुगनी और चक्कल ने उस गांव में ही रात घुल जाने तक इन्तजार करना तय किया । फिर चुपचाप सीव पार कर जायेंगे। गांव में कुछेक जन लोट आये थे और अपने झोपड़ों की मरम्मत करने में लगे थे । गलियों में बर्र भनभना रहे थे । टूटी हुई दीवालों पर आक के फुसके और चिड़ी-कबूतरों के पंख चिपके पड़े थे । एक तिवारी की खूटी पर जन्तर टंगा हुआ था। कोई आयेगा और उसे बजाने के लिए उठायेगा । पास ही कच्ची ईंटों का एक अधगला दर लम्नपस्त पड़ा था। खींप की बुहारी संभाले एक स्त्री तिवारी का चौका माफ कर रही थी। वे तीनों सुस्ताने के लिए चौके की निचली पेड़ी पर बैठ गये । स्त्री ने चक्कल को घूरकर देखा, "सपेरे हो?" "हाँ।" "मेरे घर में अपने सांप-वांप मत छोड़ जाना।" चक्कल हँसने लगा । जुगनी स्त्री को एकटक ताक रही थी। जली हुई चमड़ी। जगह-जगह चौंकाते हुए सुफेद धब्बे । नंगी हड्डियां । "क्या देख रही हो?" औरत के काले होंठों पर मुस्कराहट खिच गयी, "उन्होंने तो जला ही डाला था मुझे। किसी तरह जिन्दा बच गयी। यो समझो कि घर-बार देखना बदा था।" "किसने जला डाला ?" सवाल जुगनी के गले में फंस गया । "उधर पखेस्तान के एक जम्मेंदार के लोगों ने । दुरभिक्ख के कारण मैं रुजगार की खोज में गयी थी वहाँ । जम्मेंदार की बाड़ी में काम करती थी। एक रोज उसकी घरवाली ने मेरी जात पूछी। मैंने कहा--भावी हूँ। वह बिगड़ गयी, बकने लगी-तूने पहले क्यों नहीं बताया, खसम- खाणी ! तूने हमारा धरम भरस्ट कर दिया । जब "जम्मेदार को मालूम पड़ा तो उसने अपने चाकरों से बोल दिया, फेंक दो रांड़ को आग में ! बस, उन्होंने फूस जलाकर मुझे उसमें धकेल दिया। कई बार धकेला और - - १६२ / पत्तों की विरादरी

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निकाला-"
गुवो इस स्त्री की पीड़ा को समझ सकता था। यह उस भयंकर
यातना को अपने पर झेल चुका था। उसने लम्बी सांस भरी।
"तुम्हें भी किसी ने दाग दिया था ?"
स्त्री सुबो की चाम पर पड़े आड़े-तिरछे निशान देख रही थी।
"हाँ। हत ये वो।"
"अक्काल ने हम सब पर अपनी छाप छोड दी है।" फिर औरत ने
जगनी से पूछा, "तुम इसी की लुगाई हो?"
"किधर जामोगे"
"पसेस्तान-"
"पसेस्तान-बसेस्तान कहीं नहीं है। मन का भरम है।" चक्कल बोला।
"मुझे भी समझ नहीं आता है यह बंटवारा-" शुवो ने कहा ।
"हो तो समझ में याये ! सामों का अडंगा है, बस ।"
"गरीब का मुलक तो एक ही है, लेकिन जिसको राजपाट चाहिए,
हकूमत चाहिए, उसने धड़ और पांव बांट लिये हैं।" औरत वोली।
"धड और पांव को बीच से काट डानो तो जिन्दा रह सकता है
कोई ? बोलों, रह पायेगा ?" गुबो को गुत्ता याने लगा।
"जिन्दा कौन है, भई ! मेर मरे हुए की माटीपोट रहे हैं।" चक्कल
ने कहा और पूंगी पर पैर घुमाने लगा।
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सूरज की अन्तिम लताम बुझ रहो यो। हिरमिंच के चरेबीलाई हावा
समेट रहा था।
चक्कल ने भोली में में आटा निकाता।
"इनके मांडे बना दो। ममी को क नम रही है।
फिर उसने चिलम मुलगा ली। दो-चार म्हरे कानव और
.

मुंदी आंखों को तिरमिराता हुआ बोला, "गांजा है। दम लगामओगे?" शुवो ने मुस्कराकर मना किया तो वोला, "ठीक है। यह ओगुण मुझमें ही रहे तो अच्छा है। लोग सांप पकड़ने के लिए मुझे बुलाते हैं टका-पंसा देते हैं, मैं सब गांजे के धुएं में उड़ा देता हूं।" वरसात की वजह से सूखे इंधन का जुगाड़ कठिन था, पर भारत इधर- उधर से बटोर लायी। चक्कल से दियासलाई मांगकर उसने अगन जलायी और माटा गूंथने लगी। रात लवादा डालने लगी तो चक्कल पूंगी में फूंक मारने लगा । सुरध्याणी ख्याल की धुन छेड़ दी। "क्या करते हो ! अभी कोई सांप चला पायेगा।" औरत ने टोका। चक्कल ने धुन तोड़ दी। हंस पड़ा। "कालवेलिये के सामने सांप को क्या विसात !" थप-थप्-थप मांड़ों के पोये जाने की आवाज उभरने लगी। फिर ताजा रोटी के सिकने की महक हवा में भर गयी। पूंगी बज रही थी। उसके बजने में जुआर-बाजरे के सिट्टों का झूमना और बजना सुनायी दे रहा था शुवो और जुगनी को। उन सिट्टों के संसार में ईदस्तान और पखेस्तान के बीच कोई टकराव, कोई अलगाव नहीं था। था तो सिरफ गाढ़ा-गहरा जुड़ाव, हरे-भरे धान का और चूल्हे में सिकती हुई रोटी का! पूंगी की तान एक ऊंचाई पर जगमगाकर रुक गयी। उसके रुकने के छोटे-मे पल में शुवो ने अपनी उदासी और जुगनी ने अपने भीतर की कड़वाहट से विदा ले ली। वह उदासी, वह कड़वाहट जो आदमी से जीने का अरथ छीनना शुरू कर देती है एक-न-एक दिन, और चीजों की शक्लें विगाड़ देती है। स्त्री ने छवड़े में मांडे भरकर रख दिये, तीनों के सामने । अली वावा- से लगनेवाले चक्कल ने फिर झोली में हाथ डाल दिया । प्याज और मिरच निकालकर आगे रख दी। वोला, "खामो, मज्जे से खाओ ! रोटियों की करारी खसबू तो गजब ढा रही है !" १६४ / पत्तों को विरादरी

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. कई गल जुगनी और शुबो ने एक नयी ढाणी बमाने में लगा दिये । बिल्कुल मीव पर, मरहद पर । विभाजन का ऐलान करनेवाले खम्भों का उपहास उडाते हुए। जुगनी ने ईट-गारे से एक कच्चा घर बनाया । सोने-बैठने का छपरा हिन्दुस्तान में और खाने-पकाने की रमोई पाकिस्तान में । वे रोज 'इधर' से 'उधर' जाते थे । खम्भे अपनी जगह पर बड़े थे, । लेकिन बेमानी हो गये थे। धीरे-धीरे ऐसे वहत में घर बन गये । वहीं, सीमा-रेखा पर । नहीं, मैं कहानी में नाटकीयता पैदा करने की कोशिश में नहीं हूँ तुम वहां जाओ, और जाकर देखो कि करला, जेटवाई, सांगड, तीलबसी ढाणियो के आगे ठीक, मरहद की हैसियत को नकारती हुई, एक डाणी बमी हुई है-~~-करीब पचपन-मार घरों की । उसे लोग कहते हैं-शुवो की दाणी ! सरकारी खाता-कागद-पत्रों में भी अव यही नाम दर्ज हो गया है। खैर। पानी की किल्लत तो रहती ही थी बारहों महीने, सो शुवो ने मिलकर ढाणी वालों के मंग एक कुआँ खोद डाला, तीन सौ फुट गहरा । बहुत मीठा पानी निकला । आतमा तिरपत हो गयो जैसे । परन्तु कुएँ को जगत थी 'उधर' और रस्सा पकडकर खीचने के लिए 'गण' चली गयी थी 'उधर' । इधर' से 'उधर' जाये वर्गर पानी की बाल्टी ऊपर तक नहीं आ सकती थी। इसलिए, रोज मिनखों को, बैलों को हिन्दुस्तान-पाकिस्तान जाना-आना पड़ना था । वाह, सुबो की जिद ने कसी तो विवशता पैदा कर दी थी ! भुवो और जुगनी, याह्याखां और शेख मुजीब और इन्दिरा गांधी को नहीं जानते थे। यह न जानना, न जानने के लिए था। - १६६ / पत्तों को विरादरी बांगला देश का प्रता-पता भी उन्हें नहीं मालूम था। लेकिन, एक दिन एकाएक दोनों तरफ की फौजें चद आयीं, वारुद का धुओं हवा में भर गया, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में लडाई शुरू हो गयी और वमों के घड़ाके धड़कने लगे। उस रोज काफी सोज-पडताल करके शुवो घर लौटा। वाणी के सोग उसका इन्तजार कर रहे थे। वह तिन्न था। हाथ हिलाकर बोला, "दो तो दासुरे थे ही, अव तीसरा और बन रहा है-मगलादेस । उसी के लिए यह जुध हो रहा है।" - वह दोपहर का समय था। शुबो कुऐं को सेलियों में मवेशियों के लिए पानी भर रहा या कि कुछ फोजी आये। वे गुस्से में थे। शुवो से भी बेवात तकरार करने लगे। यह उनसे उकताकर वोला, "मगज मत साओ । जाओ, रास्ता नापो अपना! हमारे सामने तो जो कोई इंदस्तान-पसेस्तान का बखान करेगा, स्साले के दूग में भूसा भर देंगे।" "गाली देते हो !" एक सिपाही ने उसका हाथ पकड लिया। "ये जो तुमने उड़दी डाट रखी है फौज की, ये ही मिनसपने के नाम पर सबसे बड़ी गाली है। " शुवो ने झटककर हाय छुड़ा लिया, 'मुझने मत उलझो। जाओ, बना लो भंगलादेस!" फौजियों के लिए यह अपमान असहनीय था। तब तक उनको दुम्जो का सरदार भी आ गया था। उसने, वही-कुएँ को जगत पर सुनेर बन्दूक दाग दी। फिर उसकी लाश मैदान में फेंक दी गयी. इस मुनरो 'साय कि किसी ने चूं-चप्पड़ की तो ऐसी ही दुरगत होगी। ढाणी पर फौज का कब्जा हो गया। पता नहीं, वह किस तरह के फौज थी। उसने अपनी अस्थायी चौकी भी वहाँ बना ली। शुवो की लारा मैदान में पड़ी रही। एक रात, डानी के परे ।

खतरा मोल लेकर लाश को चुरा ले गये और वेनावाज, उसे जुगनी के घर में रख गये। "तुम्हारा यही अन्त होना था, शुबो !" वह उसके ऐंठकर विकृत हो गये चेहरे को स्नेह से सहलाती हुई बोली, "लेकिन "यह अन्त नहीं, शुरुआत है । यह घर, वह कुआं''तुम्हारे दुश्मनों से बदला लेंगे और एक रोज अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे। इन्हें किसी फोज-फांटे की जरूरत महसूस नहीं होगी।" सालों बाद, वही जुगनी उसी मैदान में आज तिल के ताड़ सुखा रही है। बार-बार पसीना पौंछती है। धूप को और खेलते हुए बच्चों को प्यार से देखती है । सहसा मुझे समीप पाकर मीठेपन के साथ मुस्कराती । कहती है, "लो, नये तिल खाओ। ताक़त आयेगी।" ताकत ! यह एक ऐसा शब्द है, जो जुगनी के होंठों पर आकर अकूत उजियार ओढ़ लेता है और रेत के अनन्त विस्तार में अनथक दौड़ है पड़ता है!

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Patto Ki Biradrai

Author
Madukar Mani
Title
Patto Ki Biradrai
File name
Patto Ki Biradrai
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
174
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552182
Barcode
4990010032901.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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