Natya Sodh Sansthan, Kolkata
Joshijunu Urfa Gulenar
Front matter
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जोशेजुनू उर्फ गुलेनार
[ नाटक. ]
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पो. उपेन्द्रनाथ राहीकर.
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Sinted 199 Vikram Samvat
Pana जोशे जुनू उर्फ गुलेनार [नाटक] Place लेखक व प्रकाशक- पो० भट्ट उपेन्द्र शर्मा राहीकर कांकरोली ( मेवाड) सर्वाधिकार सुरक्षित]] दीपोत्सव १९९१ वै० प्रति १०००} {मूल्य - परशुराम सेवाराम एण्ड के० प्रोप्राईटर- श्री महेश भिन्टिङ्ग मेस नाथद्वारा (मेवाड) N.S.S. Date 24.5.88 Acc. No. 1१९४|११ Item Noi 3/4/48 old Don. by A's' Mehta पो० भट्ट उपेन्द्र शर्मा राहीकर कांकरोली (मेवाड).
दो वाचा नाजरोन उ स परवर दिगारके करिश्मों का हजार शुक्र हे कि जिसने इन नाचीज खाक के पुतलों में क्या २ नोयाब करिएगें बख्शे हैं उसी के नूरे- नजर आजएक नयावो अपनी शानो शौकत का निराला नाटक शौकीनों के दिल खुशकरने को लिख कर पेश किया जाता है, इस नाटक में सिर्फ तीन बिनायेहस्तीहै (अव्वल)हस्तियोजुन कहांतक संगदिली मका- री जल्लादी करजाताह (दायम)असमत लब्जका हरूफ व हरु- फ पूरार वो साथ२ दामने असमत क्याशहहै दिखलाया गयो है(सायम्)औरतखुदमुख्तार रहनेपर कहांतक जनूनो वहशी होजातो लिहाजा दस्तबदस्ता इल्तमास है कि नाजरीन वगार इस नाटक को पढकर इस खाकसार को ममनून फरमायें, चूकि ये नाटक मेरे लिखनेका कलम अव्वलहीहै इसी वाइस इसमें बहुतसी गलतियां जहूर में आयेगी मगर उसपर ख. याल न फरमा मुझे इस अखाडे का जदोद पट्टा होने के वायस माफ करेंगे वादहु पहलवानी करिश्मों के हथखंडे मालूम होजानेपर तो ये पट्टा नायाब करिश्मे पेशेनजर करेगा उम्मी- द हैकि इस जदोद किताब नवीस को गलतियों से आगाह वो मदद शायकीन फरमायेंगे तो आयंदा बहुत ही नायाव खुश- नुमा नजारा पेश किया जावेगा। लेखक।
पात्र!
मर्द :
(१) बादशाह (हिंदुस्तान का हिन्दृ बादशाह)
(२) शाहजादा (बादशाह का इकलोता लडका)
(३) वीर दा वजीर यानी (१) हिंदका (२) वसेरको)
(४) सिपहसालार (दो (२) फोहिंदी) (२) फौजयसरेका)
(५) पग्दि (शाहजादे का दोस्तमसखरा)
(६) डाकृ (गह जर्ना करनेवाले)
(७) सिपाही (अर दली छडीदार)
(८) थानेदार (शहर कोतवाल)
(९) फौज (सिपाही हवालदार सुवेदार) वगैरह
स्त्री
(३) चन्द्रकला (शाहजादा हिंदकी आधी व्याही स्त्री)
(२) गुलनार (बसरेकी गजकुमारी सल्तनतकी विधाना)
(३) मोहिनी (गुलेनार की छाटी यहन निम्फ हक्कदार)
(४) नाग (माहिनी की प्राण प्यारी सहेली)
('.) सहली (, दीगर साथिन)
(6) परियां (गमिगगं)
(७) गुलचमन (अपट्टडेट फेशनेबल लेडी)
अंक पला (परदा पहिला) (सीन शाही महल का बाहरी हिम्सा) (दो परियों का दोनों तरफ से नाचते गाते हुए आन्म) -गाना ममालिक सादिक तंगे सरजो सब संसार ! नृ गफार तृ जग्वार तृ ही जग का पालनहार ॥ ६ ॥ परवरदिगार गमगुमार अय दातार निमदिन पलछिन, नेग नजर निगार। कोई कहे ग्होम कोई कहे कगेम हरदम तेरी, महरे नजर फुहार ॥ ॥ सर ताज महागज तेरी रहमत से हम रहते हैं गुलजार। Cड धडि पल पल छिन छिन निसदिन हरदम शुक्रगुजार ॥ ऐ॥ (शाह मादी गुलेनारका छोटोबहिन मोहनी व सहेलो नारा के साथ आना. गुलेनार का खुद तख्तनशीं होना, परियोंका गाते रहना और गाते गाते चलेजाना) (गुलेनार) क्यों मोहनी तुम मुझसे रञ्ज क्यों रहती हो? क्या तुम्हें मेरी काररवाइयें पसंद नहीं है?
(मोहिनी)आहा! आपने बहुत ही अच्छा खयाल फरमाया,
क्योंकि ववजह सुहबते असर चंद हरकतें आपकी शाम ये-
शाही वो वालदेन मरहमा के नेकनामो में धब्बा लगा हीं
हैं लिहाजा इस पर गौर फरमाना अम्रजरूरी है उम्मीद है
मेरी तकरीर आप बखूबी समझ गई होंगा।
(गुलेनार) मोहिनी, क्या आज तृ नशे में है?
(मोहिनी) क्यों क्या तकरीर में कोई कलाम झुठा है ?
देखिये म मौर भाप खून के एक ही कतरे के दो नर है और
वालदेन के सल्तनत के दोनों हो हकदार है मगर कई दफाक
कहने पर भी हिम्मा तकसीम में होले हा हो रहे हैं तकनी.
म क्यों नहीं किया जाता?
(गुलेनार) अगर मेरी राह और कहना मानेगी तो हि.
स्मा पायेगी।
(मोहिनी) एसी बातों से तृ पछतायेगी।
(गुलेनार) छोटा ये दिमाग ।
(मोदिनी) क्या हिस्मा छोड लाग।
(गुले०) तृ मगरूर है।
(मोहि०) एसा वकना फज़ल है।
(गुले) में तुझसे यडी हूँ।
(माहि०) सिर्फ उम्र के लिहाज से।
(गुले०) मोहनी जघान रोक ।
(मोहि०) क्यों जघान तो बोलने के लिये ही है
(गुले०) मुझे मेरी दृषिस अजीज है।
(मोहिनी) मगर इज्जत शाही मी तो कोई चीज है।
(गुले०) तृ पागल दीवानी है।
(मादि०) तृ बदी की निशानी हैं।
(गुले०) अभी जवानी की बहार है। [६]
(मोहि०) बाज आ येकार स्याह कारहे। (गुले०) मोहिनी अपनो जवां को ताला दे। माहि.) तभी जिस्मानी शोक काकूमें ले । (गुले.) तृ अपने लिबे कोटा बोरही है। (मोदि०) पहातो तेरे कारों पर रोरहो है। (गुले०) मेरे मामने एसी डिटाई (माहि०) इसकदर बेईमानी और उगाई (गुले०) देख पायेगी (माहि०) जैसा करेगा पैसा पायेगी (गुले०) इस तरह बात करने वाले की सजा क्या जानती (मोहि०) हां अच्छी तरह जानती हूँ कल्ल या वृन (गुले०) नो अच्छी तरह सोचले (माहि.) मोचलिया बन्दी एसी गीदड मकयों से डर- ने वाली नहीं है (ब) सर का बदला पद और नेक का बदला नेक है। खदा यात् ले ले जान सिर्फ एक है। (गुले०) बस होचुका हटजा मेरे सामने से। (माहि.) ले जानाई जो दिल में हो कर गुजर । [गुलेनार तख्त से नीचे गुस्से में पकती हुई आती है] (गुले०) आह गजब-गुइनाखी को भोहद्द हुआ करती है मेरे सामने इस कदर गुश्ताखाना जवाब-और-मगर सोचती है तो यह आम्ती का सांप है अब वरदाश्त नहीं होसकता बस ! मुंह बन्द करना ही होगा-यो है सिर्फ वृन । (नारा) हाय २ बानू किसकी शामत आई जो उसके की बारी आई। (गुले०) ( खुदसे) (मेरोबात इसने सुनली? खैर ) तारा क्या तू अभीतक यहीं है। [७]
(तोरा) हां बानू लेकिन आपने खुनका फरमाया यह फि-
करा समझ में न आया।
(गुले०)तारा चंदवागियों ने बगावत की है, उसीकी सजा
(जाती है जाते २ ठहर मोहिनी के साथ तेरा भी
खातमा करना होगा।)
(तारा) अफसोस ! दुनिया कितनी खुदगर्ज सौदाई है ।
बहनों बहनों में कज अदाई है गुलेनार जोशेजुनू में
दीवाना साथ २ संग दिल है। और मोहिनी संधी
और रहम दिल है वो इसे नेकीकी राह बतलाती है
और यह उस बेचारी के खून की प्यासी है। इस
वक्त मुझे भी नेकी का साथ देना जरूरी है मोहिनी
को गुलेनार से खबरदार रखना जरूरीहै (जाती है)
[परदा १ला खत्म
.
[4]
अंक १ ला परदा २रा (सीन मोहिनी का महल) -- ( मोहिनी का सहेलियों के साथ आना सहेलियों का गाना) गाना- आसमां का चांद ये परदे जमीं पर आगया, आलम में शोहरा हुस्न है लाखों के दिलपर भागया ॥ देखने वालों का मजमा दर पे तेरे है हजूम, मुर्दे को जिंदा कर दिया बिसमिल भी चंगा होगया अय खुदाई वज्म तू अब तो बुत्तों पर रहम कर, नक्ष खुदा जो दिलमें था आंखों में भी समागया । तेरो सूरत पे सदके जाते हैं परियां वो हर, उस मुसब्बिर का जमीं पर यकता नमूना आगया। (मोहिनी) तारा आज तू किस खयाल में किस हाल में है। (तारा) बानू न पूछो न पूछो जनून हो गया अरमानों का खून हो गया। (मोहिनी) खैर तो है ! क्या बबाल आया या कोई खौफनाक ख्वाब आया। (तारा) नहीं प्यारी नहीं तराना ख्वाब नहीं जोशेजुनू में एक मासूम की कुरवानी है। अजीज़ों की बदगुमानी है। इसीसे परेशानी है। (मोहिनी) क्यों बक रही है दीवानी होरही है क्या जिन स- वार है क्या हाल है? [२] १ (तारा) बान हाशियार होजाइये चर्च का चक्कर आपको निगलने के लिए शैतानकी तरह मुंह फेलाये आरहा है सम्हल जाइये। (मोहि) आज तुझ क्या होगया होशगमोश है कुछ समझ में नहीं आता साफ़ क्यान कर इतनी क्यों बेहोश है (तारा) गुलेनार पर जुन का जोश है बजाय देने हिस्से के तेरे ख न कर देने का गैप है। (मोहि०) मैं नहीं समझती कि तेरे दिल में क्यों मलाल आया क्या वहन बहन का वन ! (ताग) चार कार्ड अता है । (उदर कर नहीं मेगख़याल गलत - सैर सुनिये किमा कह जान बचाना चाहिये जुल्म से रिहाई पाना चाहिये। (माहि क्या मच करता ताग ना फिर कोई बचने का बाग. क्या करना चाहिये , कहां जाना चाहिये, कुसूर क्या है? (नाग) अजा बहुत ही बड़ा कुखर है क्योंकि आप निम्क हिम्मेदार है। (मोहिक) यस इतना ही- नो ले में जाकरम्से से तलाव द आता हूं। (नाग) लेकिन दूसरा भी इस के साथ माथ जोड़ा है - उनकी हवानों की दुनियां में तृ पक गड़ा दे । (माहि०) अगर मातो में भी नहीं डरती! मुझे गह गस्त पर गर जान से भी जाना पडे पक की तो बात क्या लाखों भा उस पर हच (तारा) नहीं प्यारी वन नाजुक है जान बचाना करी है ; इन्तकाय लेने की जरूरत पूरी ई। १० - मगर .
(मोहि०) अच्छा तो बतला उस का गम्ता । (नाग) बस छोडद उम से वास्ता । (मोहि०) मा होनो मुमकिन नहीं बद्दनसे दुश्मनी, हरगि. ज नहीं। (ताग) मोहिनी तृ नादान है-तुझे होप नहीं जवानी का जोश नहीं। (माहि०) नहीं मुझे से जोशों से नफरत है- ( ताग) मेरा कहना मान वरना पछतायेगी हाथ मलते र- ह जायगी। (मोहि०) परवाह नहीं जो तकदीर में होगा सामने आयगा। (ताग) अच्छा मैंभी तेरे साथ है किस्मतका चक्कर भी देखेंगे। किम तरह फिरता है चक्कर तकदीर का भी देखलो । व्युटिफुल फैसो में कितनी कज़ अदाई है देख लो ॥ (मोहि०) जो कुछ होगा देखा जायगा। ( ताग) अच्छा चलिये वक्त होगया। (माहि०) बेशक-चलो दस बजगया। (जाती हैं) (परदा २ रा खन्म) [११]
( अंक १)
[ परदा ३ रा ]
स्थान (गुलेनार का कमरा)
(गुलेनार का गुस्से में बैठे हुगे नज़र आना)
(गुले०) कौन है बाहर
(सिपाही का आना)
(सिपा०) हुक्म सरकार
(गुले०) सिपहसालार जुल्मी बेग को बुला लाओ
(सिपा०) जो हुक्म (जामा हे जुल्मोवेग का आना)
(जुल्मी०) इकवाला युलंद क्या हुक ग्ने याद फरमाया
(गुले०) हां कार बारी है और तन्हारी मददकी दरकार पू.
ग है क्या तुम मदद दागं दगा तो न करोगे।
(जुन्मी०) बन्दा हर तरह हाजिर है फरमाइये क्या इरशाद है
(गुले०) मुझे यकान दिलाना होगा कि दगा न होगा
(जुल्मा०) ताबेदार दगा न करेगा परदा फाश न होने देगा
बंदा इम तेग की कसम ग्ब ताई यकीन दिलाता है
(गुले,) बन यकीन होगया मलाल जो था योगया -अच्छा
देखा एक काम निहायत पाशादह और जोखिम
का है । अगर जगभी ज़ाहिर हुआना लागल
ही बिगड जायगा।
(जुल्मी०) फरमाइये मी क्या साजिश है जिसकी इस फदर दिवश है (गुले०) हां तुमने एक मरतया ज़िक्र किया था क्या वाकई तुम मुझे चाहते हो प्यार करते हो ? (जुल्मी०) हाय इसका जवाब देने की ज़वां में नाकत नहीं दै. दिल से पूछ लीजिये (गुले०) बेशक मैं जानती है-मगर चांद ठोकरें जो इस में बहुतही ज़बरदस्त पदतर उनकामफाई दरकार, (जुल्मी०) बतलाइये वो कौनसा मीतका निवाला है, जो कर- नाटे राहजनी (गुले०) बस तुम वहीं समझेगमा सिर्फ एक ही है और वह हमादिनी (जुल्मी०) या परवर दिगार क्या भालो मन्तों में भी आमाल भरे रहते है (गुले०) बस तुम यहींपर भूलने हो तमाम मग्ने जो नजर आती है एकमां नहीं हानी । अव मंद वही है जो (शैर) दिलकी पहचान लेते कयामा देखकर खतका मज भांपलेनेलिकामादेखकर (जुल्मी०) नहीं २ जे सार ह मार होनहीं सकता जो फल है वा बार हो नहीं सकता (गुले०) (ग्वदसे भर ये ने फिसला जाता है काबू मे बाहर नाना मिपद से) अर्जा नहीं काटा तो सम्ले का भी असर नहीं (जुमा गरजयाट से कायम छ दृमरी हो सज़ा दाजातीतो बहतर था F
(गुले०) महीं २ सांपको खिलाना सहल.-मगर उसको
मु.
दिकल है-अगर तुम मुझे यार करते हो तो ये
काम तुम्हें करना ही होगा
(जुल्मी०) नेर तुम्हारे खातिर ये भी मही
(गुले०) तो बस चलो काम पूरा करो देख। सूरत देखकर
रहम न आजाये
(जुल्मी०) नहीं-जो मर्द है वो कौल से कभी नहीं फिरते
जो करना है वह कर गुजरते है मरते २
(गुले०) बस तो जाओ
खुदा हाफिज-(दानां जाते हैं)
[परदा ३रा खत्म
अंक १ ला
परदा ४ था
(मीन-मकान सिपहसालार)
(सिपहसालार का अफसोस करना)
(जुल्मी) या खुदा क्या ऐसे म्खूब मुरत नाज़नियों के दिल
भी पत्थर होते हैं? अपनी हिग्स में क्या क्या
खौफनाक काम कर गुज़रते हैं के ग्बुदा की पनाह -
जोशे जुन में - भाई २ बेटा थाप वहन २ यहांतक
कि मा खद बेटे की दुशमन हो जाती है। क्यों ?
इमलिये महज इसीलिये कि जिन्दगी माथ माराम
के बमर हो बस । मगर अगर सोचा जाय तो आज
कल के ज़माने में इन्सान की उम्र ज्यादा से ज्यादा
सौ बरस है अगर इनमें से रातों को निकाल लीजावें
तो पचास ही रह इनमें २ यरस बिमारी के गये
तो २५ ही रहे , इनमें भी १२ बरस लड़कपन खेल.
कद के निकाल दो तो सिर्फ १३ ही रहते हैं। इन
नंद दिनों के लिये इन्सान ओश में भाकर कितने
बडे २ पाप कर उलता है कि बस खुदा ही और
करे । और जो ये तो हुई जोश को बात । अब हम
गुलामों का क्या .फर्ज है बस यहीकि हुक्म
कैसा भी हो भांचे गंद कर के तामील करना । इस
।
पेट पापो पर खुद को मार बुरा भला कुछ भी
सोचने नहीं देतान तामाल हुक्म हो नजर
आता हे स्या करें गुलामी जो ठहरी
नौकरी लेक थी औकात अपनी .
जो जारिया पेट का था वो होगई जान अपनी।
अगर घत्री ने अपने दानों हाथ जोडलाहे का जवान
सेरे बारह वजा खामोश होगई । इसी तरह ये.
चारी माहिती वार हातही चन्द मांसे लेते हुये ह.
मेशा के लिये मोजायगी । [जारसे आवाज देता है
अरे बाहर कोन है।
(मिपा०)हुजर क्या हुम ह ।
(जुला) जल्लादया।
(सिपा. जी हर बार हाजिर है।
(जुल्मी बुल्लाओ।
(जल्लाद आते )
(जल्लाद हमलोग हाजिर हैं।
(जुल्मा० का तुम लोगों का एक काम करना
. मगर
दयो बात काशीनामांदिया और नाग को पोशीदा
नीर जाल में लेजाकर साल करो और उसकी
ग्ववर आकरदा ।
(जल्ला०)जो हुकम हुर
(जाने)
(जुल्मो० टहरो देवा कहीं बात न बल जाय गज जाहिर न
हो जाये।
(जल्ला) र बेफिकर हें काल के बाद अर्ज किया जावेगा।
(जुल्मी० शाबाश म नुमलोगों से मसीही उम्मीदहै । (जाना)
( पग्दाथा चन्म )
अंक १ ला
[ परदा ५ वा ]
।
[ स्थान ] जनाना बाग ।
(चन्द्रकला राजकुमारी का सहेलियों के साथ नजर मामा )
(चन्द्र०) सखियों तलों की कलियां खिलकर कैसी मालुम
होती है।
महे०) बेशक हुजूर की फुलवारी खिल उठी ।
(सहेली) खुशबू से तर हो उठी।
(सहेली) मगर बेहोशी का आलम है ।
(सहेली) होश कराने पाला चाहिये।
(सहेली) इस गुल की खुशबू लेनेवाला ।
( सब) बुलबुल चाहिए ।
(सहेलो) प्याराक्यारीबाग की खिलती कली तुमभी तो हो।
सब खुशनुमा गुलों में खुशबू प्यारी तुमभी तो हो ।
(चन्द्र०) गरी
लोगों को नशा आगया।
(सहेली) नहीं प्यारी जवाना का होप आगया।
(सहेली) फुलपागे फल गई ।
(सहेली) बुलबुल
को फंसाना चाहिये।
(सहेली) फंस आयतो नखरे के दाने देना चाहिये।
(सहेली) जव घुगे पर होतो नैनों के तीरों से घायल करना
चाहिये -
[१७]
(सहे.) जब बिसमिल होजाय तो गले का हार बनाना चा.
हिये।
चन्द्र०) अरीओहरामादियों आज तुमने क्यामयारक्साहै
(सहे०) अपनी गनू को प्यारा घुला रहा है
(चन्द्र०) यहां ले आव मुझे नबनाव-न सताओ नहीं तो श.
रारत घेो दृगी ज्याद सताओगी तो ईश्वर कसम
में रोगी-
(सहे.) २ यारी मजाक ही से ससगई स्वफा होगई।
(गाना)
मन मोहम छला एसा लोवे मन चाहता
(सहे.) दिलदार सा मन सारसा गलहारसा जो दिलवर
हो दिल चा०
मन माहन०
(चन्द्र) जाओ २ मोहे न मनाओ दातें न बनाओ मरीजायो
(सहे०) कौन गीले रसीले से प्यारी नैनी से नयना मिलाओ
(चन्द्र०) यही नैना मिलाने वाली भरी चल र. माल
वडी वानं बनानेवाली अरी चल बन चल
(सहे. प्यारी दुलारी जाऊबलिहारी जायनकी शोभानिगला
सुन्दर लटकदार चञ्चल मटकदार बांकी अदाओं
से निहार ना।
(चन्द्र) सखियों अब ज्यादह छेडोगी तो म तुम्हें मजादगी
(सहे.) यानी हमें छोडकर प्यारे से नेहा लगाओगी.
मनमोहन
(१८)
(सहे.) प्यारी अकेले ही वस्ल को मजो न लेलेना.
(संह०) हां प्यारी हम लोगों की भी याद रखना.
(सहे०) यहार आई कफस म मिला बुलबुल को पैमाना
हुई रुखसार कद्दावर हुदन पे शानी है मस्ताना.
(चन्द्र०) चल हट ले में जाती हूं तुम सब पकती रहो,
(जाती है)
(सब०) हाय प्यारी तो खफा होगई रूस गई.
(सबका जाना)
(परदा ५वा खत्म)
अंक १ ला
( परदा
छट्टा )
( सीन खेमागाह पेश खेमा)
( शाहजादाहिन्दका अपने सन्द मुसाहिवों के हमराह दूल्हा
के लिवास में आना ) ( शमिश गराका सहरा गाना )
(शाह) सिपहसालार मेरे शादीसे इनकार करनेपर भी मुझे
क्यों दृल्हा बनाकर मेरे ऊपर जन किया जाता है।
(सिप०) क्या हुजूर जलसा शादी भी काई जुर्म है जो हुजू-
र ऐसा फरमाते हैं।
(शाह) बेशक जबकि इनकार करदिया गया तो फिर शा.
दी करना ज्वाइतो वो जनके सिवा और क्या कहा
जासकता है।
(मिप०) शाहजादा साहब आप भूलते हैं जशन शादी को-
ई जब या जुर्म नहीं येतो सिर्फ बालदेन की इवि-
शके साथ २ दुनिया की नियामतों की पहली सी.
ढी है और आराम का तरीका विहिश्त है।
(शाह०) नहीं मुझे ऐसी विहिश्त की जरुरत नहीं अब्बाजान
मुझपर जब कर रहे हैं।
(सप०) तो क्या हुजूर इसके खिलाफ हैं?
(२०)
(सिप०) हुजूर शाह) वेशक बिलकुल इतफाक नहीं है। सिप०) नो हुजूर बादशाह सलामत से क्या अर्ज करदिया मावे? शाह०) नहीं भव उनको मालुम करने की जरुरत नहीं। बराये खुदा शादी से इनकार न करें वरना यह समझा जायगा कि हुजूर वालदेन के अरमानों का कल ही करते हैं। (शाह०) नहीं में इसम जरा भी चुन करूंगा, मगर हां तुम लोग यहांपर मेरे लौट आने को इन्तजारी करो जब तक में वापस न आ जाऊं, कदम न बढ़ाना, समझे ! (जाना) (सिप०) अफसोस शहजादे को भी कैसा जुनू सवार है जो शादी से इनकार है। (सिप०) जी सरकार मालूम नहीं क्या खयाल है ! (दुसरा) अजी जवानी का आलम ठहरा किसी बुलबुल का साया पड गण होगा। (सिप०) अरे चुप- शाहन्शाह तशरीफ फरमा होते हैं - (भदशाह का आना) (याद०) तुम सब यहां क्यों अटके ? शाहजादा किधर- गया! (सय चुप रहते हैं) -क्यों बोलो क्यों- चुप हो? (२१)
(सिप०) हुजूर शाहजादा साहय हम लोगों को यहां पर
ठहरा कर कहीं तशरीफ ले गये हैं और इन्तजार
करने का हुक्म फरमा गये हैं।
(बाद०) (क्या वह भाग गया! -क्यों ?
(सिप०) जहांपनाह हम लोग बेकुसूर है।
(बाद०) हां मुझे मालूम हो गयो सोचा हुमा बाक हो
गया-खुदा ऐसी औलाद से तो बे भोलाद ही
रहने देता तो वहतर होता भजप सफतुल
हषास लडका है अच्छा तुमलोग वापस जाओ।
(बादशाह का सबके हमराह जाना)
(सीन ६ वां खत्म)
(२२)
( अंक १ ला) [ परदो ७ वां ] [ सोन जंगल का रास्ता ] [चंडल मसखरे का शाहजादे की तलाश में आना मोर गैठकर भंग अमल लेना ] (वं०) मंमोला मगनरह चोला जढा भंग का गोला अमल दसपांच तोला वीमें धाला पीकर प्रम ने बोलो यारे मोला ( पीताहै । ) यारों कसम ईश्वर की इस जनूनी शाहजादे से तो में अजीज भागया तलाश करते २ पैरों में छाले आगये मग- र अबतक उसका पता न मिला आज तीन दिन से बरोबर माग२ फिरताह न खाने का ठिकानो . पीनेका ठिकाना किधर जाऊँ कहां इद अरे प शाहजाद मिलजा क्यों इस विचारे गरीब मुर्गे को बेमौत मुम्त खुदागन को जिन्दा ही भेज ने पर तुला हुआ है किधर छिपाहै निकला भाई जरा इस गरीब पर रहम कर म तेरे पैर पडताह जरा तरस खाजा-(एक देहाती का आना देखकर) रे ओ दहियर चन्डल लगी जंगल की हवा गया (२३)
दुमका हिलाना भूल जरा बतातो इधर से कोई
दीवाना शाही लिवास में जाते हुए तेरी नजर
आया 81.
(देहाती) हमका जामी तौन एक गौरा २ असरहा तो वैहा
अस भागत जाता उरी कैत तौन जाता रहा
काहेतू काहेता खोजत है रे-
(७०) अबेओ उल्लू की दुम फाख्ता जरा इधर आ तेरे
नाक पर एक बड़ा हाथी है उसे निकाल द
[ नाक पकड़ मरोडकर भागजाता है। ]
दे०) अरे रे मोर नाक का ऐंठ दिहिस-रहा हम देखित
है मोर ससुर वा कौने कैती जउवे मछरी अस
भूज सेवेत वही मोर नाऊ । (जाता है)
( परदा ७ वां खत्म । )
(२४)
(२५)
( परदा ७ खत्म)
अंक ला परदा ८ वां स्थान (माहिना का महन्ल)
(मोहिनी वो तारा का सोते नजर आना जल्लाका पाशा द
तौर दाखिल होना)
.
जमादार) सो रही हैं (जल्लादोंरे) वादार का भी मटका
हुआ तो जाग जायेगी (दया जवन निकाल मोहिनी
पी साग कोसुंधा कर बेहोश कर देता है। बहन हो
शियारी से कामअंजाम देना
(ज०१) हाय हुज़र एमी भोली सूरत पर किसतरह हाथ
उटेगा?
(ज०२) येशक भाई मिसाले चांद है
खुदा
की कुदरत मुम
धिर की ग्वी का एक नमूना है। शाने खुदा ह ।
भी रहो - अगर हम लोग पसी यातों पर गोर
करने लगें तो नौकरी क्या स्याक हो सकेगी-
(ज०१) घलरे बेहदे क्या पसे खुदा के नमूने को नेस्त कर
ने के लिये ये हाथ है । इन हाथों से तो खूनी कल
होता है
(ज०२) माई इसे तो खुदा ने दिमाग अक्ल रेहम कुछ नहीं
(ज०३) चुप
(ज०३) बस २ रहने भी दो ! बडे दीमाग रहम वाले आये
नौकरी छोड घर में बैठना तब रहम दिलो काम
में लाना इस समय तो तामिल हुक्म की करनी
पडेगी।
(२६)
(ज) चलो ! मसे हुक्मों पर लानत भेजताह !
(50) क्यों कराम ! या कहा हुक्म पर लानत है ?
(ज)
वेशक
हुनुर ये हाथ गनिमों के लिये हैं न किसी
भोली भाली सूरतों के कत्ल के लिये ।
(अ० ज०) अगर नोकरी अजीज है तो तुमको हुक्म तामिल में
नकरीर करना वाइसे सजा है . समझे।
(ज०१) हा समझता हूं अगर व समन नौकरी अजाव करना
होगा नो बंदा ऐसी नौकरी से इस्तीफा दाखिल कर
ता
है
(जज०) हां गुस्तागी- रहीम इसे गिरफतार करलो
(ज०२) हुजूर स्याक सार इस हुबम की नामिल करने से
मजबूर है।
ज०ज०) क्या तुझ पर इस शेतानका साया पड गया?
(ज.२) हुजूर वंदे से तो शेतान भी खौफ ग्वाता है ? शेतान
की साया तो उम पर समझना चाहिये जो बगेर
किमी वजह एक बेकुमर को काल कग रहा है
(ज०ज० चुप रह : मालायक ! गुस्ताखासे पेश आना निकल
तुझे भी नौकरी से अलग किया !!
(ज०२) बहुत बहतर बंद भीमसी नौकरी से नफरत करता
हैं - जाता है)
(ज) प.चंद गंजा हरती रस खुदाई फरिहम्न को क्यों
तकलाफ देता है वोह रहम दिल है उसे खुदा ने
रहम दिया है और एक न है जिसे रहम लजसे
सख्त दुशमनी है।
(ज० ज०) चुप सौदाई ! चलन भी दफान होना सजाई से
(२७) बुजदिलों से तामिल हुक्म हो सकती है ? (१०१) पय दुनिया के कचरे ! सुन बंदा तो जाता है मग र याद रख खुदा का कहर तुझ पर भी वरपा होने घाला है- (जाना) (ज) वर देखा जायगा मुहम्मद स्वतं... ! मुम दोनों इन का पाशीदातीर लेजा कल करः .. समझे। (दोनो जल्लादों का बेहोश मोहिना व ताग को ले. आना- परदे का ट्रांसफर होना मान जंगल जल्लादों का मय ताग माहिनी के दाखिल होना मोहिनी का होश में आना) मो०] (सान्जुय से चारों तरफ देख कर) तुम कौन हो शैतानों ! और मुझ म क्या चाहने हो ? [अ०] बहुक्म सिपहसालार हमलोग तुम दोनों को वास्ते कल यहां लाये है गदन प्रकाओ! (मो०) क्यों मैंने क्या कसूर किया जो काल का हुक्म यस खुदा को पाद करो और हुआ? (ज०) इस बहन से हमे सरोकार नाहि लडकी तू तयार दो !! (मो०) प्यारे मुहम्मद देखो तुम भी तो भौलाद वाले हो खुदा ने तुम्हे सीना सिने में मुहब्बत और बल्सा है। इसलिये मुझ पर रहम करो ! मुझे छोड रहम (ज०) लडको तू मुझे बुजदिल बना रही है रहम हमारी कवायद में तो रहम लग्ज भी नहीं बस भरने पर (२८) (मो०) (ज) तयार हो! क्या कहा ! तो क्या कोई बचने का चारा नहीं ? नहीं बिलकुल नहीं ! (जल्लादोंसे) बजीर तलबार खींचो दोनों जल्लादों का तलवार उंटा फल को- आमाद होना) (मोर रहम रहन प्यारे मुहम्मद रहम !!! यो पर वर्गन गार दरपरदे का आहिस्ता गिरना - शाहजादे को गाने हुम आना ] ॥ गाना ॥ भगवान तेरी कुदरत के हैं शाही दरबार । लाजवाघ नक्षों के हम सय है शुक्र गुजार । तुही गम गुसार तुही जरनिगार तुही मदद गार । तेरी मेहर निगाहों के हम नादिम सरजम हार । [शैर] एक कतरा आव से इन्सान पैदा कर दिया ॥ ना बीज पुनले बाक को शाहों का मर वर कर दिया दर वेश से वदतर को तृने शाहों का सरताज किया लाखों के सर के ताज को दर २ का मारा कर दिया २ सरकार गरीव निघाज तेरे मोहताज तेरी कदमों पर सर लोखों वार निसार महरवान- योह में कह गया ! किधर जारहा था किधर मटक गया किस स्थान पर फस गया !हे भगवान! कहीं रास्ता ही मन नहीं आता!!! 4
(२०)
[चीख को आवाज प! ये आवाज कहां से आई !
कितनी दर्दनाक सुनाई पडती है क्या कत्ल होक्या? या
ईश्वर ! (जोताहै ) ( परदा का फटना )
मोहिनी वो तारा पांव जंजीर बेहोश दो जल्लादों का वार
करने पर आमादा शाहजादे को पिस्तोल से पार करना दोनों
जल्लादों को गिरना शाहजादे का मोहिनी के पास जाकर है
उस में दखना टेबला ] |
(अंक १ ला स्वस्म)
[३०]
(अंक २ रा )( परदा १) स्थान- जंगल वही
[ शाहजादा. मोहिनी ! ताग का आपस में बात करना
[शाह क्यों वानू आपने अपने राज से अब तक म
आगाह न किया कया कुछ हर्ज समझा?
(तारा) नहीं हर्ज तो कुछ नहीं है वात यह है कि हम
सहेली अपना हाल जाहिर करने से पहले हुन
के दाल से आगाह चोहता।
[शाह०] आह ! मुझ वेवतन का हाल हो क्या है !!---
॥ गाना ॥
न पूछो हमें हम कहां के वसर है।
कहां आशियां और किस जगह समर है ॥
न हम किसी के न कोई हमारा ।
हम बेवतन है उजडे शहर है ॥
न पूछो हम हैं सदमें उठाये ।
कहां घर हमारा कहां हम भुलाये ॥
गरिकचकर ने भेजा यहां पर।
र के वने वसर है।
चमन हम वो है जो सवाने चपेटा।
फल, हम वा है जो डाली से टूटा
इन्सान वो है जो किस्मत का हेटा।
जीता अब तक इलाहो मेहर है ।
[नजम] मेरा हाल क्या है में एक गुम राह व वतन अजी
- [३] जोसविछुडा हुआ गरिदिश का चपेटा किसमतका हेटो एकबशर हूं- हाय अफसोस !!! तारा ऐ मेरे महबान ! मुझसे कुसूर हुआ जो आपको तकलीफ दी ! माफ कीजिये ! अगर हम लोगों के। ऐसा मालूम होता कि हुजुर को तक लीफ इस कदर होगी तो हरगिज इस तरह की व द नमोजी न हातो- खैर आप के शादियाना लि- वास से ऐसा जाहिर होता है कि हुजर जलसाये शादी से फगर होकर आये हैं इस की गवाही आ पके पैरों को मेंट दी है द्वा] शावाश खुव पहचाना वह जो वस्ले जाम था जहर सर सोम था इसी वजह दिल घबराया वहां से भा ग आया मगर (ग्वुद से) हैं ! मुझे इस जान से स- ख्त नफरत थी लेकिन इसमिनाले चांद का नूग- नी चहग देखते ही सव्रफरार हुआ दिल बे वग हुआ शक्ल बेशक मोहिनी है !!! ताग] वाह वाह क्या ही भोले बने जाते है खुद राज जा नते - वाह वलिहारी। शाह) [अचम्भे से क्या कहा में इनसे वाकिय ह क्या खूब अगर मेरी पनी विसमत होतो तो में अपने को तकदीर वाला समझना तारा०] क्या आपने अभी हमारी प्यागे का नाम जबां से नहीं निकाला? नाम लेते जाते हैं और भोलेर भी बनते जाते हैं हमें बनाते हैं बाह] तुम क्या कह रही हो : मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया!
[३०]
(अंक २ रा )( परदा १) स्थान- जंगल वही
[ शाहजादा. मोहिनी ! साग का आपस में गात करना
[शाह.. क्यों वानू आपने अपने राज से अब तक मः।
आगाह न किया कया कुछ हर्ज समझा?
(नाग) नहीं हर्ज तो कुछ नहीं है वात यह कि हम
सहेली अपना हाल जाहिर करने से पहले हुन
केटाल से आगाह बोहतई।
शाह आह ! मुझ वेवतन का हाल ही क्या है !
॥ गाना ॥
न पूछो हमें हम कहां के वसर हैं।
कहां आशियां और किस अगह समर है ॥
न हम किसी के न कोई हमाग।
हम बेवतन है उजडे शहर है ॥
न पछी बम हैं सदमें उठाये ।
कदां घर हमारा कहां हम भुलाये ।।
गरिकचकर ने मेजा यहां पर।
र 7 के वक्षं वसर हे ॥
चम्न हम वो हैं जो सवाने चपेटा।
फल, हम वा है जो डाली से टूटा ॥
इन्सान वो है जो किस्मत का हेटा!
जीना अब तक इलाहो मेघर है।
[नजम] मेरा हाल क्या है में एक गुम राह व वतन अजी
- [३]] जोसंविछुडा हुआ गरिदिश का चपेटा किसमतका हेटो एकबशर हूं हाय अफसोस !!! तारा] ए मेरे महबान ! मुझ से कुसूर हुआ जो आपको तकलीफ दी. माफ कीजिये ! अगर हम लोगों के। ऐसा मालूम होता कि हुजुर को तक लीफ इस कदर होगी तो हरगिज इस तरह की व द नमोजी न हातो-खेर आप के शादियाना लि- वास से ऐसा जाहिर होता है कि हुज़र जलसाये शादी से फगर होकर आये हैं इस की गवाही आ पके पैरों को भेट दी है शा] शाबाश ग्वृय पहचाना वह जो वस्ले जाम था जहर सर साम था इसी वजह दिल घबराया वीं से भा ग आया मगर (ग्वुद से) हैं ! मुझे इस जान से स- ख्त नफरत थी लेकिन इममिनाले चांद का नूग. नी चहग देखते ही मव्रफरार हुआ दिल बेकार हुअाशक्त बेशक मोहिनी है !!! नाग] वाह वाह क्या ही भोले बने जाते हैं खुद राज जा नते - वाह वलिहारी। शाह) अिचम्भे से क्या कहा में इनसे वाकिय ह क्या खूब अगर मेरी पसी विसमत होतो तो में अपने को तकदीर वाला समझना [नारा०] क्या आपने अभी हमार्ग प्यागे का नाम जबां से नहीं निकाला? नाम लेते जाते हैं और भोलेर भी बनते जाते हैं में बनाते हैं। शाह०] तुम क्या कह रही हो : मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया।
[३०]
(अंक २ रा )( परदा १) स्थान- जंगल वही
[ शाहजादा. मोहिनी ! साग का आपस में गात करना
[शाह.. क्यों वानू आपने अपने राज से अव नक म
आगाह न किया कया कुछ हर्ज समझा?
(तारा) नहीं हई तो कुछ नहीं है वात यह कि हम
महेली अपना हाल जाहिर करने से पहले हुन
के दाल से आगाह बोहता।
[शाद०] आह ! मुझ वेवतन का हाल हो क्या है -
॥ गाना।
न पूछो हमें हम कहां के वसर हैं !
कहां आशियां और किस जगह समर है॥
न हम किसी के न कोई हमारा।
हम बेवतन है उजडे शहर है ॥
न पूछो हम हैं सदमें उठाये ।
कहां घर हमारा कहां हम भुलाये ।।
गरिक वकर ने मेजा यहां पर।
ना के वक्षं वसर है ।
चमन हम वो हैं जो सवाने चपेटा।
फल, हम वो है जो डाली से टूटा ।
इन्सान वो है जो किस्मत का हेटा।
जीता अब तक इलाहो मेहर है
[नजम मेरा हाल क्या में एक गुम राह व वतन अजी
॥
[३] जोसबिछुडा हुआ गरिदिश का चपेटा किसमतका हेटो एकबशर हं-हाय अफसोस !!! तारा रे मेरे महरबान ! मुझ से कुसूर हुआ जो आपको तकलीफ दी! माफ कीजिये ! अगर हम लोगों के। ऐसा मालूम होता कि हुजुर को तक लीफ इस कदर होगी तो हरगिज इस तरह की व द नमोजी न हातो- खैर आप के शादियाना लि- वास से ऐसा जाहिर होता है कि हुजर जलसाये शादी से फगर होकर आये हैं इस की गवाही आ पके पैरों को मेंट दी है- शा) शाबाश वृय पहचाना वह जो वस्ले जाम था जहर सर साम था इसी वजह दिल घबराया वहीं से भा ग आया मगर (ग्वुद से) हैं ! मुझे इस जान से स- ख्त नफरत थी लेकिन इममिनाले चांद का नूग. नी चहग देखते ही सव्रफरार हुआ दिल बेकार हुआ शक्ल बेशक मोहिनी है !! नाग] वाह वाह क्या हो भोले बने जाते हैं खुद राज जा नते - वाह वलिहारी। शाह) [अचम्भे से क्या कहा में इनसे वाकिय ह क्या खूब अगर मेरी प.मी विसमत होतो तो में अपने को तकदीर वाला समझग नारा०] क्या आपने अभी हमारी प्यागे का नाम जबां से नहीं निकाला? नाम लेते जाते हैं और भोलेर भी बनते जाते हैं हमें बनाते हैं। शाह०] तुम क्या कह रही हो : मेरी समझ में कुछ भी नहीं आया।
(३२)
(तारा) क्या अभी आपने मोहिनी का नाम नहीं लिया ?
(शाह) [आह हा! अलसमझा अच्छा इस हुरेल का बाम
भी मोहिनी है ? ] भला अपने नाम से तो वाकिब की
जिये !!
(तारा) मेरा नाम वहो जो चांद के साथ रहना चाहिये।
(शाह) याहया माप तारा हैं ? पर तुम हो बहुत चालोक !!
(तारा) भए जनाय मैंने आपका क्या कुमर किया जोमुझे
गाली दे डाली ?
(शाह) रस खामोश हो जाओ मुझे अबन बनाओ चाला
की नखिलाओ!
(माहि) तारा तू बडो खराब है ! चल यहां से !!
(ताग) हाय २ अब लोग गालियों को दो तरफा फय्याग
छुटा ! खुदा स्वैर करे.!
(शाह), ताग तुह्मारी गनी यया घर जाना चाहती है?
तो मुझे पता बताइये दोनोंको वहां पहुचा दियाजाये
(तारा) नहीं२ इनका कहिं ठिकाना नहीं अब ता इनकी
कब भी यहीं बनेगी !!
(मोहि०) चलना सजाई अच्छतान मिलाई क्या बना सौदा
(तारा) हाय प्यात! मुझे क्यों कुसूर वार ठहराती हो !! खुद
क्यों अलग होती जाती हो!! चोचले दिखाता हो
(मोहि०) हराम जादी ! तू ऐसे बाज न आयेगी. ले इनाम !!!
(मारती है ।)
(ताग) हाय ! में मर गई !! भर पाई सता - अरेरे मेरी
पोट है या धाबी की सिला?
(मसखरा चंडल का आना शाहजादे को देखकर वो मारा
(३३) वटा भागता फिरता है आधाग। बस एक मोटा जमकर मकार की मगरूरी किये देताह पीबाग) पास आकर- (मस०) क्यों जनाय दो मोटे जमां भेजे में से धुन फरोर करहू ?- मोहिनी का गुस्से से तारा की तरफ देखना ताग का अफसोस जाहिर करना शाहजाई का समझ लेना) शाह] आप इस पर नाराज म छो-ये बछा शमीम मेरा लंगुटिया है । भौर पीर है.- (मसखरे से) क्यों रे चंडलन यहां भी आकृता (मस०) क्यों, दोस्त है ! यो कोलंह का गयता ? मैं तो तंग कनमें भी आ धमकृगा और वहां भी अगर तो दो सोटे जमाकर तुझे यात करना सिखाऊंगा' समझा? (मोदिनी को देखकर) और तृ भाग पर वहां क्वों आया और इन शैतान की खालाओं को कहीं पाया? (शाह०) चुप रिजाला यकता है ? मनवाला. कर यहां से मुंह काला! (मसा) (सता है ) अरे बाबा तो ये बला कहां से मोल ली ? तूने जिससे पीछा छुडाया वही फिर सामने स खामोश रहा आया- (शाह०) अये फजूल धपता ही रहेगा या एतलब पर भी आयेगा? (मस०) भाड में जाये तेग मतलब यहाँ तो पेट में हिरन चौकडी भर रहे हैं भूस्त्र के मारे हम मर रहेह
.
सोन रोज से बराबर दौडते चले आ रहे है। आंखों
में छाले और पैरों खड़े पउगये तब कहीं आज
जाकर इस स्वधीस का दीद पाया ।
(शा०) चुप धेनोमबहशी लो तेरा लोटा दे, में पानी लेभाऊ
(मस०) ना बोब। ऐसी टगाई कहीं दूसरी जगह करना ।
चौये इस तरह नहीं उगा सकते !!मोर मांला
ओर लोटा सोटा गोटा-इन में कुछ ये तो वो
है ठोर। उसके पास यचं न कठोटा !
शाहः] अबे मक्त के लिये इता है या देख !
(तल्यार निकालना]
(मस: अरर ! अबे स्टवार को ग्यान कर ! ये ले !!
( लोटादता है)
(शाह) हा अघ मधेि आये चोवों का मेजा ठीक करने का
मनाला यही है।
(मस) जा व लोटा दे दिया तो हिलेरो दिखामे लगा,
घरमा ( सोटा तामना)
(शा१०) कयों फिर पागल पन मघार : निकाले तलपार ?
(४१) ना ना बाया मजे लगना ! जा यहां से
दकान हो (शाहजाद का जाना ) देवा, दोस्ती
हा तो दम भरता है और घात २ में घंटा तलवार
निकालता है, मुझे उस वक्त गुम्मा तो आया मगर
इस तरफ पीगया. जिस तरह आज कल के नवसिखं
जटिलमन दोस्तोंमें शगव को वोतल समेत हटक
के अंदर उतार लेत है अगर गुस्ला मुह में
आजाना तो आप लोग भी दखने की इमी डंडे
-
(
,
से उसकी खोपटी का भुगता कर डालता-अगर
डाकु आवे तो फिर यारों के हाथ की सफाई
दत्रमा-
[ डाकृओं का आमा मसखरे को कांपना तारा मोहिनी
का घेहोश होना]
[डाकृ०कयों मियां तीसमारा ! लो हम लोग आगये,
आइये हाथ सफाई दिखाई धे-
[मस०] है ! ऐं ! में मैं !! कुछ नहीं कहता था मुझे छोडमी
इस गरीब मुर्गे को जिवह न करो अगर आपको
नोगवाग गुजरता है तो ये मुर्गा अपनी कुकडू
कृबाद करता।
डाक चुप मुरदार- आज तेरा कोमा निकाला जायगा।
[मस०] अरे बाबा खुदा के वास्ते रहम करो में अपनी
बीबी का इकलौता शोदर में मर जाऊंगा मो
भोली भाली जोरू परेशान होगी ! [गेनाई
[डाकृ०] [इंसताहे ] चुप अगर तू भर गया तो तेरी जोक
समशेगी कि घर का कचरा साफ हुआ-[उाफू से
इसे हलाक करदो-
[मस०] अरे नहीं २ तुम मेरे पैर पडो मुझे छोडदो !!
[डाकु०] चुप शरीर [ डाक बांध लेो हैं]-
[दूसरे डाक बेहांश तारो वो मोहिनी को उठा कर
लेजाते हैं। सब चले जाते
। शाहजादा आकर हरत से
देखता है टेवला ]
(परदा १ ला खाम)
वह
(अंक २ रा) (परदारा नकल) + स्थान गुलचमन का मकान + गुलचमन का गाना (दादा) में चंचल छपीली नार राजोवन को कैसे सम्हाल के पडी पाले जवानी के जाल के ॥ मेरा जोवन है सबसे अटोला मेरे चहरे पर इला बेला हुस्न करता है जुल्मों : मेला, इन्हें कसे राव सम्हाल के। मॅचंचला जाऊं घरसे जभी बनठन के लाखों हैं जातेजवानो के सदके मुंए फिरते है हार्थों को मलके, मुझे लाले पडे हैं जोगके (मैचंचल उई अल्ला ! मैं कहां जाऊं किधर छिपृ? मुएं निगोडोंने मे रा बाहर जाना ही बन्द किया ! निधर से निकल मुए आवाज कसते है कोई कहे जाती गजब न ढाओ, कोई कहे अजीज- ग रहम फरमाओ, मुंए अपनी आंखों में घासलेट क्यों नहीं डास लेने ! घर से निकलना हो दुम्वार है कहिये जनाब म क्या कोई घरकी दांडो ? जो मन्दर ही पडी सडा कम्-पर एक मुंया रिजाला पडे उसके आंखों में जालो मर जाये मुझे की नाला मेरे ऊपर कुरवान ही हुआ जाता है, मगर में भी उसे उाट बल्के उन्लू का पट्ठा ही यानाके छोईगी. अरर ! मामने से बद्दी आरहा है ! छिप जाऊं और देख! क्या गुल खिलाता है ! क्या रंग लाता है ! (मिस्टर गडबड का इगलिश लिवासमें एक पैरमें पन्जावी जूता पाने आना) (गड०) धत् तेरे जोर की एसी तेसी हराम जादी ने नाक (३७) या, में दम कर रखा था अजी मियां ज्योंही में लिबास बदल घरसे जानेको नयार हुआ कि शैता- न की खोला वम खोपडी ही पर आकर सवार हो जाती थी कहे. किधिर जातेहो में नहीं जाने गी, क्या में इसके बाप का नौकर था या इसने मुझे खरीद कर लिया है जो में इसके हुकम को माना करू ? जाज इन्जानिवने उसकी सब शेनानी भुलादी जैसे उसने टोकना चाहा चस विगड ही तो पहा, मार नियों के तमाम नशा उतार दिया, घरसे निकाल बाहर किया और ताला बंद कर सिधा गुल चमन प्यागे का दरवाजा ग्वट ग्यटा बस अव उले चुलाताह निकाह पढो गुलर उडोता है अजी जनाब इस जोर से तो वंदा बेजार होगया, या खुदाकी कसम ज्यों ही घर में और रखाकि बस शामत ही आजाती थी कहे किमियां आज दाल नहीं कल नमक नहीं साडीला दो झुम के बनवादो अजी मेरे माफिक बडे आदीयों को भला ऐसा गवार हो सकता था कैसा नहीं वैसी सूरत भी नहीं तो कया आदमीतो यडे ही है दूसरे लोग अगर म कहें तो न सही मगर हमतो दिल हैं रहा फरमायश इसे पूरी कौनकर सकता है अजी अब इन झमेलों में पड़ने से क्या मतलब बेडी ही मुशकिलों स वहतो टली अब प्यारी गुल चमन कमायंगी और ईजानिव कुरसी टेवुल मटन चोप उडायगे। [गुल चमन के दरवाजे पर आवाज देना प्यारी गुलचमन३
[३८]
.
(४०)[साईड देखो मुंआख्न विस मेरी कमाईका भाड खायेगा
व माई न करेगा (सामने आकर) कयाहैमियां कयों
कुत्ते की तरह भून्य रहे हो ?
[गड०] अरी कुत्ते को घरवाली में कबसे तुझे गधे कि मानि
कचिल्ला रामगा तेरे कानों को सुनाई न दिया
[गुल: बस यही सोचकर तो न बोली जव दखाते। तुम्हारी
सूरत नजर आई तब समझा कि पिया गडघड ही
चिल्ला रहे
(गडः
रसी बातों से तो मालूम
होता १ जरूर कुछ
गयर हुआ चाहता है सादा स्वैर करे । लो बीवी
अयसो शादी करोगीमा मैने तुरुद्वारा सब रास्ता
लाफ कर दिया। बीवी को तलाक देदिया
(गुलच०)क्यों २ उस बेचारी ने क्या नुकशान किया जो त
लाश दी पका पकाया खाना अब कहां नपीव होगा
(गड)) क्यों क्या तुम न खिलाओगी?
(गुल०) में क्यों खिलाने लगी क्या में तुम्हारो बीवी हूं ?
(गड०) नहीं पर आमही तो होने वाली हो काजी जी को
बुलाऊ?
(गुल०) क्यों किसलिये क्यो मुझे अवारा समझा है ।
(गर०) अरे तूने दो शादी को इकरार किया था !
(गड) अजी मीयां होश को दया करो में क्या कोई बाजाम
है जो एक से तकरार हुई तो चट : सरा निकाल
कर लिया ?
(गड०) अर्ग क्यों बाद से मुकरती है जूनी समेत आंखों में
घुमी जानी हैं बीबी को भी निकलवा दिया और
अब सफा इन्कार करनी है !
[३० गुल०) चल हट मुंए ढपाली- बम्बई की सफेद गली में पा. ऊडर मले हुए बहुतलो साठ साठ बरसकी कुआं गटे ग्वहारा की तरह सती फिरता है उन्हीं मेंसे किसी को लाकर मोज फगे यहांसे रवाना हो! (गड०) अरे परिवारी मुझे जोरू की जमरत है या मांकी ? गुल०) वो दोनों ही काम पूरी तौर घजा लायेगी खाना तो बेटे के माफिक म्बिलायेगी और पलंग पर गले ल- गायेगी! अरर गवहो गया !! (गउ०) क्या हुआ? (गुल०) मेरा शोदर आगया लो बेटा अब भाग जाओ वरना खोपडी कबाब बन जायगी। (गडक०) एमाई में तेरे पडताह कहीं छिगादें । (गुल) चल हट मुए दफानहो- (गवड) अरे बापरे आगया [भागनाचाहता है (तुरंखांका आना-गडबड को पकड कर) (तु खां) क्यों बे तू कोनहै नकारा जो होना चाहता था पीबाग- (गडबड) गडवड- (तुरे) अरे क्या गडबड किया? (जोर से) (ए कीया-बीवी) खुदा को शान जोरू होतो एसी हो । (गुल) हां मियां आई च्या कहते ही है आवारा? (तु.) यही तो में भी पूछताह- पर जबाब नदारत. खुदा (गुल) मुए तू कौन है नासजाई ? यह कौन है
[४०]
(गड०) अरे क्या भूल गई मेरी होने वाली लुगाई ?
(गुल०) चल मुए पागल कहीं को [शोहरसे] मियां इसे
छोडदो ये पागल मालुम होता है ॥
(तुरे) मेरा भी ख्याल ऐसा हो है ओ पागल यहां क्यो
करने आया था वोल वरना खोपडी का गुदडी
बाजार नाहगा।
(गुल०) प्यारे शोहर इसे मानेदो गंगाहै !
(ग१०) देखो गृगे की बच्ची के.सी बातें बना रही है गोया
मुझे पहचान लो हो नहीं-
गुम० अगे गगेकी वो ही क्या करती है और क्या मुह
से निकल गया
(से) जनाव में गृ गा नहीं ---
(तुरे) अओ तो घतला तु म मकान में क्यों आयाथा ?
गड) सिम्पर हाथ रम्य कर म
(गुल) अनी मियां ये बारा दीवाना टालो यहां से
(ग) अग आदीवाने की ग्वाला क्या कर घोटाला ?
(गुल.७ ) चुपरिजाला- साया करी को गरम मसाला -
(गव०) अच्छा टहर, सभी मिया सुनिये चाहे आप इस
मकागके बापहों या शौहर- परवान
(तुरे०) चुप हगम जादे बाप घमाता है यार्थी को मकार
कहता है मेर। वीपी एक दम भोटो।
(ग३०) अरे ओ भोली के भोले सुनो वाल ये है कि तुम
इस औरत को चाहे पाकदामन कहो चाहे कुछ
कहां पर इसने मुझसे मेरी जारु के घरसे निकाल
(४६)
दे ने बाद मुझ से शादी का वायदा किया है। ना-
(सुरे ०) श्यों वे औरतकी बच्ची ! ये यया मामला है ? सच
बोल बाना खोपडी से भेजाहो अलग कर दुगा !
(गुल०) प्यारेशोहर इसपागल की बातों में अ.गये थे तो
बेवकृक पागल है में एसे गुलफाम को छोड
इस रिजाले से शादी कर मामला कभी कर
सकती हूं ? आपको यया मेरे पा शक है ?
(ग) । पागल की वो मुझे इटा बनाता है ।
(तुर ०) चुपच नायकार (देम्ने वालों की तरफ) मेरोगी-
रूको बदनाम करता डढा पर हाथ देकर मला
ऐमा भोला भाला मिमाले चांद चहल शमा कद
कागे कर सकता है ? (बुदाकी शान) ।
(गुल ) हां मिया में तो तुम्हें अपने बेटा से भी अधिक
चाहता ।
(तु ) और में तुझे अपनी मांसे भी बढ कर समझता हूं
(खुदा की) चल हट चे नाकाग दकान हो यहां
से।
(गुल०) साइडमें देखा कैसा उल्लू बनाया चल जा ये दफान
हो।
(गढ०) हां बाबा औरत ऐसो ही होती है।
॥शेर ॥
चांदनी में खिल जाते हैं चांद के लच्छे लच्छे ।
जरीसो पाकीट 4 विगड जाते हैं अच्छे २ (जाताहै)
(४२) (तुरे०) क्या बोषी. क्या सच मुच ये पागल था ? (गुल०) मियां क्या आपको अमी तक शकही है ? पागल कीसी बातें करता था ? सुना नहीं [तुरे०] हां हां वेशक, खैर इस फिस्सेको दफान करो जरा एक गरमागरम बोसातो दिलामो और एक नमकी. न चटकीला भडकीला 'गाना' तो सुनाओ (खुदा की शान)! गुलचमन को बोसा देना (अर धोरे) आपने तो बोसो क्या लिया मेरे गालको कवोब बना दिया। (तुरे०) बस इसीसे दो खाने का दिल होगया। (तमाश- गिरों की तरफ देखकर) क्यों जनाब है किसी को ईसी,अच्छा-प्यारी माना गाओ। (मुल०) ॥ गोनो। में सइयां मेरा कानों के बाली का मोती ! मैं जाऊ पनियां, संग लागे मारे छोडेन मोद अकेली मोरी जोन । सइयां नादान कुरबान सुगरचलत, झगर करत राखू जैसे पांग का मोती छैल छबीला गबरू अलबेला काकी निराला बांकी शान बोसे दिल वोऊं गरबा लगाऊं लपट गले से सोदी (बालम मरे) (दोनों का मजाक भरी चालसे जाना) (परदा खत्म) (४३) (अंक २ रा परदा ३ रा) स्थान. डाकुओं को मकान -[कोठडी के अन्दर मोहिनी तोग लेटो ह मसतरा सीखयों- के अन्दर दरवाजे पर बैठा है]-एक कू पहरा देता सीन जंगल- (म०)मरदेखुदा ओ मियां आवाव ठहर कर गंगाहै या बेवकूफ (डा०) चुए बे नविकार शामत आगई क्या (म०) अरे वाह २ जिस्मसे तो इन्सोन है मगर दौडा काटने- (डा०) अगे चुप नहीं बैठता क्या धू से खायेगा ? (म०) वाह यार भव तो केचुली बदली पहले काटने दौडे अब शैतानी? डा०) क्यों बे मृअर के बच्चे नहीं मानेगा- (म०) देशक ठीक कहा नजर तो ऐसे ही भा रहे हो- क्या सवाल का जबाव भी कोई भारी जायदाद जो देने से इनकार (डा०) अच्छा सलाम अब चुप हो गया ? (म०) में पृछता कि रजिनी में ही जिन्दगी बरबाद करते रहोगे या आकवत भो सुधारोगे। (छो०) क्या कह सिवाय इसके अब कोई चाराही नहीं रहा अगर कहीं नौकरी तलाश करने जागे तो देखते ही शक्ल साफ जबाब मिलता है कि जगह नहीं फिर क्या करें भाई दिलतो इस कार से वेजार है मगर मजबूरी है।
(४४) (म०) अरे यार! तू भी मुझे पूग अक्ल का जुलाव मालूम होता है ! नौकरी तलाश करने को किस बे कृफने कहा ? (डा०) तो फिर कया करेंगे पैसे वाले तो नहीं जो घर बैठे खाय - तुम मजा करें (म०) इतने दिन लोगों की गरदने हलाक की और फिर भी मोची ही रहे- (डा०) हम तो पिठलग्गु ठहरे यहुन ही थोडा हिसोपाते हैं सो खाने भर के लिये होता है। म०) अगे इन्सोनी हैवान कल करो दृसग क्या खुब अल है अगर मेरी राह में चले तो जिन्दगी भर अरम करे। (डा०) चल ने चकमें औरोंको देमा! या चकमा देकर फगर हुआ चाहता है ? (म०) धत् तेरे अक्ल के हुम में धामा ! जग सोचतो कि इस काल कोठरी से में किस तरह फरार होसम- ता हूं ? सुन कहता कि मेरे कब्जे में एक दफीनो है जिसमें करोड़ों की मालियत है सुना! (डा०) हां हां आये न चालाको पर मालियत ह तो तुझे मुवारक मुझे क्या फिर वही वेहुद। इसगर अग्रे उल अहमक वो दफीन तारा मोहिनी को दिखना] इन का है और मेरे कजे में हैं मैं तुझे देसकता हूं डाकृओं से रिहा कर सकता हूं । (डा) चल हट मुझे यकीन नहीं होता- में कसम से कहता हूं तुझ दिग्वादृगा- में
(डा.) सच ईमान से कहता है ? अच्छा तो बतला।
(म०) बल रहे न अकल के गोबर क्या मेरे पास रखा ह
जो दिखा ?
(डा०) तो फिर कहां है
(म०) अने खवीस ताला खोल और मेरे साथ चळ तो
दिग्बला दु ।
[[0] पर यार बेईमानी तो न करेगो [नाला खोलता है]
[म] खातिर जमा- रख [बाहर निकल चल मे : साथ
(कुछ सोचकर) पर यार तेरा मालिक तो न --
आ जायगा?
डा.] आज का वन तो माया हो चुका कल इसी-
वक्त फिर आवेगा चलो जल्दी निकल चलें
[दोनों का जाना
[साला खुला पोकर तारा मोहनी का निकर जा-
ना-डाक सरदार का आकर हैरत का ना-]
(सीन तीसरा खत्म)
(अंक २ रा परदा ४ था) स्थान शिकार गाह जंगल फसा (तोरा मोहिनी का शक्ल बदले वलिवास फकीरी आना) खुदा ये तूने केसे २ अजल में हमको. दिया है । नहीं है सरवर हमारा कोई नजारा कैसा दिखा. दिया है ॥ कहां वो शाही तख्त दौलत कहां ककोरी, नेरी बदोलन । नजर न आवे कहीं ठिकाना मुफलिस हमको बना दिया है। करिश्मे क्या २ दिखाये तूने थे जो अपने हुग- कमीने खू के प्यासे हुरे सभी है कह २ वरपा करा दिया है थे करने वाले मेरी पामाली फकत् तृमी था.. वहां भी पाली मौत के मूसे रिहा किया, फिर अजलमें हमको फंसादिया है। खुदा ये तूने कैसे २ अजर में , हमको फसा दिया है। [गाते चले जाना] [गुलेनार का बतलाश शिकार आना और गानेपर आशिफ होना (गु०) जनरल जरा देखो तो ऐसा दर्दनाक गाना कौन गाता है?
(४७)
(ज) जो हुक्म-[जाकर वापस हुजूर दो जनाना फकीर
गा रही हैं।
[गु०] जनाना और फकीरी लियोस अच्छा उन्हे यहां
घुला लाओ
[ज०] बहुत बेहेतर जामादो औरतोंके हमारी शखिलहोना
हाजिर
[गु.] दिख र] ए फकारि लिबास नृरानो र इ-तुम्हारा
यहां गुजर क्यों कर हुआ वतन कहां है फकीरी
किस लिये इवनियार को ?
[ता) बानू न पूछो २ अजाज घोगी हुये गरदिश से बेदारी
हुये न कहावन न कोई हमारा है बस सिफ.
शर का महाग
[गु०] अच्छा आप हिन्दू है चेखुश क्या इस गरीब के
गतीव माने को रौनक वरगो-
(10) जी हुजूर आपने हम लोगों पर करम फरमाया है
तो
हम लोग
हुजूर
की
कदुम
वोसी में दिलो जान
से खुश
खुश है।
(गुरु) घेता है तशरीफले चलें वहीं चल कर वाने होगी
(सच जाती है)-
(सीन ४ था खत्म)
(४८) + (अंक २ रा) + (परदा ५ वॉ) स्थान-(गुनार के महल का दग्याजा) [मोहिनी वो तारा का बातचीत करना . (ना.) प्यारी जिस बला खे नजात पाने में इतनी तक- लीफे बग्दादम की वही फिर सामने नजर आई (मो०) सच कहती हो वहन तकदीर के दातान की अज व रफ्तार है- (ता) न घबराओ मगर प्यारी यहां पर तलवार की धार पर चलना है! ई.मा म हो सक हो जाये और हम पहेचान ली जावें इमलिये बहुत खदर दाग ले चलना होगा- (मो०) वेशक २ तुम खातिर जर्मा रखो ! मेरी ताफ कोई एमोगलती न होगी । (ना०) बममा ही चाहिये और हम लोगों को अपने नाम भी बदल देना चाहिये आज से खुशनसीव घो मेरः सोलन याद रखना (मा०) बहुत खूब मगर तृ भी तो जासूसों को चाची बनगई चहरे इस कदर बदल दिये कि अगर खुद बाल देन भी देखे तो छाक भी न पहचाने ! मा०) बस अब चुप रहो कोई आरहा ह [गुलेनार का आना [गु०] क्यों जा तुम लोग सहेलो तो यगई. पर गुमनाम क्या नाम से वाकिफ न कगंगी ? तुम्हारा नाम
(४९)
(तारा) वान नामतो सिर्फ उस पैदा करने वाले का है
लेकिन हमारी सोलो को खुश नसीब व इस जि.
स्म को लोग सांसन कहा करते है।
(गुल०) घेखुश-सा ही प्यारा नाम: खुशनस्टीव आफरी
मेरी भो खुश किसमती ह कि ऐसी दिलग्दुश
सोलियां पाई।
(तारा) यह आप क्या फरमाने लगी? यो कहिये कि हमा
री
खुश
किसमती है जो
हुजूर ने हम लोगों को
खिदमत में
बूल
किया वरमो कहां सरका ताज
और कहाँ पर की फटी हुई गृती !
।। शेर ॥
उम्मीद न थी कांच की हाथ गोहर आगया।
जुगुन की न थी रोशनी भी चांद नजर आगया ।
(गुला) तारीफ रहने दो चलो अंदर चलें। (मत्र का
जाना) ॥
वा खत्म
(५०) अंक २ रा परदा ६ ठा स्थान (महल का बाहरी हिस्सा सडक) (गुलेनार खिडकी में बैठी है शाहजादाका मोहिनीकी तलाश में आहोजारो करते हुए आना) (शा०) हाय प्यारी मोहिनी तू कहां गई ! कौन लेगया !! फ्या मुझ से रूठ गई ? मैंने तेरे साथ कोई बे अदवी नहीं की कि जिससे तू खफा होगई !! (ऊपर देख- कर) अय शोख तू मुझे छोड यहां क्यों भाग आई मोहिनी तू बडी चे मुहब्बत निकली ! (गुल०) इसने मेरा दिल ले लियो मगर मालूम होता है मो. हिनी के दामें उल्फत में गिरफ्तार मालुम होता (सहे०) वजा है-वह उसी का दम भरता है तलाश करता फिरता है। (गुल०) में मोहिनी वनती हु इसे फसाती है और यहां लाती हूं! (शाह०) मोहिमी ! मुझे दिक न कगे साथ न छोडो य- हां आओ मैं तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं । (गुल०) आई प्यारे मेरे लिये इतनी तकलोफ की [आकर] कुसूर टुआ, माफ कीजिये, वंदी हाजिर है महल में तशरीफ ले चले आराम करें (जाती हैं सोसन का आना)। (सो०) चे खुश इस गोहर को कहां पाया ?
(५१)
(शाह०) [साइडमें] हैं ३ ! यह आवाज मेरी सुनी हुई है !!
[गुस०] चुप २ इनकी खिदमत तुम दोनों के सुपुर्द करती
हं किसी तरह की तकलीफ न होने पावे खुश
नसीब कहाँ है ?
(सो०) आरही है [सहेलियों का गाना]
॥ गानो॥
क्या ही मजा हो वस्ल में दिल बेकार हो ।
शोशे में भरा मय हो पहलू में यार हो !!
लयों रखसा के अबरू और गालोंके बोसे.
इनार बार में क्याहो वहार हो ।
काकुल की बलें नागसी दिलयार फांस के,
घस्ले चमन खां में मौसम यहार हो। (क्याही)
तीरे नजर से यार के कलेजे को पार कर ।
के
यार खुद भो निसार हो।
चरम रुखेसार सरापा भी हो जोवन भी।
गुल हो चमन में हिता हो अंगूर हो अनार हो।
सरपस्त गुलेनार येगम को खुशवुम यार मुबारक हो २ ।
(आहिस्ता २ परदे का गिरना)
विसभिल पना
पे
(परदा ६ ठा खत्म)
अंक २ रा तमाम शुद
(अंक ३ रा परदा १. ला-स्थान-दरबार हाल)
(शाह हिन्द मय मुसाहवों के आकर सख्त मशीहोना)
Ex गाना रामिशगरी
मैं तो जाऊसमरिया पंवारना वारना-याग्ना.
प्यारी मुरतिया भोली रतिया मधुर विसुरिया को पारना ।
दाहा-
१०
-
पातम दूर
दृर बिदेश है दरशन तरसें गैन
पीतम के संग दिन रहे हमें सदा है न ।
कहा कम कासे कह कहां जाऊं कैसे मिले।
पीर घढत लारो वारना ३ ॥ मेतो
कागा न निकास पिया पास ले जाय ।
पहले दरस दिखाय के पाछे लीजो खाय ।
काली अन्धेरी अमली सजन बिन ।
हियरा धरोजाये हाग्न। ३।। मेता०
(रामिशगरी का गाते हुए जाना कासिद का आना)
(का०) शाह शाह हिन्द इकबालो युशंद
(शा०) क्यों कासिद शाहमादे की खबर लाया-
(का०) स्वाकसार शाहजादे की तलाश में सिम्त मगरिय
कानपुर, पटना, इलाहाबाद, कलकत्ता, घंगाल.
सफर करता था। दखिन मुटा चकरघरपुर
क्लिासपुर नागपुर चांदा रामेश्वर होता हुआ
(५३) - पश्चिम में समुद्री सफर करता, जरमनी इटली सैबेरिया आस्ट्रिया यूनान विलायत में कोना २ तलाश कियो मगर शाहजादे का पता न पाया, लिहामा हिन्द को वापस हुआ तो इलाका वसरा में पता मालूम हुआ शाहजादी गुलेनार के अपने दामे उल्फत में फसा रखा है शाहजादे को हरचंद समझाने पर भी उन के ख्याले शरीफ में खाक भी म आयो आखीर वैरंग वापस आया अगर लाने को जल्द काररवाई म की गोवेगो तो शाहजादे को जिन्दगी दुष्पार होगी- (बा०) क्या कहा शाहजादे को वसरे में कैदकर लिया है ? (का०) जो सरकार खुदा यदा- (शा०) उसकी इतनी मजाल जेर सल्लमप्त होते हुए अंजाम का होफ नहीं गजब सितम सम्र नहीं होता ओह बसरे की सूरात तो बरबाद कर किले की ईट से ईट न बजादृ तबतक आराम न लूगा सिपह- सालार फौज तयार कर अभी वसरे को कृच करो मेरी सवारी का इन्तजाम करो ! (का०) इकबालो वुलंद गरीव परवर ! (शा०) दरबार बरखास्त ! (अर०) मुसाहबान हाजिरे मित दरशर बहुक्म दरबार यरखास्त गरीब परवर नजर दौलत शाहंशाह हिन्द दामयक वाल हु इकबालह बुल'द ! (शाह को नोना) सीन पहला खत्म
(५४)
(अंक ३ रा परदा २ रा नकल)
॥ स्थान गुलचमन
का कमरा ॥
[१०] (गाना)
है
।
कोई लावो पियाको स्वबरियां,
मेरे बालम की सुनी सेजरियां। कोई०
पिय बिन निस दिन जिया तरसत
दरसन लोभी अखियां रे कासों कहें।
कित जाऊं मोरि गुइयां के से मिलेगी सबरियां । को.
(दोहा) कागा पतिया लिख दऊं पिया पास ले जाय ।
चिरह विथा को जायकं उनकी देय वताय ॥
आवत २ कह गये रहे विदेस न छाय।
जनम २ दासी रहूं जो पिय देय मिलाय ॥ कोई०
(और सितम है हैफ है उफ है आहो जारी है।
दिल तो बेकरार मेरे यार की इन्तजारी है ॥ को
या खुदो प्यारे को इन्तजारी ने दिल कगर कर
दिया सम्र करूंभी तो कहांतक एक नहीं २दिन नहीं
पूरे दो हफ्ते हो चुके अबतक शक्ल न दिखलाई
सन का भी दिवाला निकाल दिया नहीं मालम
सफा हुआ रूस गया ऊंघ गया यो सांप सूंघ गया
कहां गया कुछ पता भी नहीं, उइ भल्ला ! मुहब्बत
कार हुई यो कोई नई गुलदम पयदा होगई ! अरे
हो मुहम्बते थे दाग आजा प्यारे दिल चिराग।
(दि०) क्यों प्यारी किसे बुला रही हो ऐसी चुलबला रही
हो?
(गुल0) चलो हटो भी जले पर नमक लगाने भाये भला
ऐसा भी दगा राह ताकते आंखे पथरागई दिल मे
रा फेरदो!
(दि०) माफ करो प्यारी में तो कदम वोसी में रहा था
रास्ते में सेरा जौहर मिला आवारा तो मिलने का
न रहा चाग इस लिये हो गया नौ दो ग्यारह जक
मह यहां से दफान हुआ तो गारों का गुजर हुआ
कहो कैसी कहा?
(तुरेखांका छिपे हुए खडे होना)
(तुरं०) साइडसे-कहो योगे मेरो पाक दामन बीवी को दे-
सो? कैसी असमत बचा रही है अपने पार से
गाली दिला रही है ? खुदा
को शान०
(गुल०) प्यारे मारो गोली भवारा दिन भर घूमा करता है
इस से मैं पेजार होगई न कहीं कमाने जाता है न
कहीं घूमने जाता है दिन भर मुरगे की तरह वड.
वे में परा रहता है ?
(दि०) प्यारी इसे कहीं दफान करदो म !
(दि०) अजी का मरतबा झटका कहा मुए को सात पु-
श्तों को बकराई मगर नौकरी पर भांहा नहीं ग.
या सो महींगया आज घरमें अनाज नी पकाऊं तो
क्या उसका कलेजा!
(तु०) (साइड में) देखो हरामजादी गाली देरही है में नौकरी पर जोउं और यह यारों के साथ गुल छुरें उडाये और मूना पाकर घरका सामोनले चंपत हो और मीया मोची हो रह जायें ठहरतो जा? (गुल०) मेरी जान अब इस कदर न सताना इन्तजार करते करते सत्र जाता रहा! (दि०) प्यारी में क्या करू ? तेरे शोहर से तो मैं भी आ- जिज आगया मैं आता हूं तो उस हरामजादे को मकान ही पर पाता तो दिल मसोस कर भाग जाता हूँ । (गुल०) इस मुंए से छुटकाग ही नहीं होता प्यारे चलो यहांस भग चलें अच्छा प्यारी फिलहाल में आता हूं कल आउंगा तैयार रहना (जाता है सामने से तुरे स्त्रां आता है और सलावाले कहता है। (दि०) कालेकु सलीम ? (देखकर) अरर ! (कांपता है)। (तु.) (हाथ थाम कर ) क्यों ये मेरी गेर हाजरी में म.. कान में क्या करने आया था? (दि०) में : म? आप ही से तो मिलने आया था? (मगर मेरे से मिलने आया था या मेरी जोरू से? (दि०) नहीं २ आपसे आपके न मिलने से वापस जा रहा था। तु०) हां : बेटा वापिस जा रहा था या जोरू का प्यार ले रहा था ?
(५७) (दि०) अरर! मुहब्बत में पन्चर होगमा अजी या वकते हो किमी भले आदमी को बदनाम करते हो? (तु०) अरे भले आममी के बच्चे! मेरी आंखों में धूल डाल- का चाहता है ? नालायक ! (मारता है दिल चि. राग नुरेस्त्रां को मारता है और खुद जोर से चिल्ला ता है) (दि०)अरे ! दौडो मुझे माग्डाला ! हाय !! मग खून हुआ !!! (गुल०) [ आकर ] अरे क्या है ? [दिल के साथ अपने शोहर को मारती है ] अरे यम करो ! क्यों बेचारे को मारे डालने हो ? (तु.) कम्बख्तों तुम दोनों ने तो मुझे धोयी का गदहा समझा है ! (गुल०) हाय ! हाय ! मीया तुमनेतो गजव हो कर डाला बिचारे को पसलियां तो तोड डाली कहीं रेसा भी पोटा जाता है? दि०) (गेता है) हायरे ! मर गयो कम्बख्तों तुम्हें दो ज- समें भी जगह न मिले । (गुल०) वाह मीयां तुमने तो गजबहो कर डालो रडे खराब हो । (तु०) अरे खराय की जोरू निकल यहां से बदमोनों ने कचूमर करदिया ! (दि०) अरे मीयां क्यों झूठ बोलते हो खुद मारते हो और इलजाम गेरों पर! [रोताहै]
(५८)
(तु०) अबे हरामीपिल्ले गुस्सा दिलाता है। ले ! (मारता
।
(गुल०) अरर ! खुदा के लिये छोडो क्या मारहो डालोगे?
(गुलचमन एक तरफ से दिलचिराम दूसरी तरफ से
तुरेखां को मारते है धमा चोकडी होती है)
(परदा गिरता है)
परदा २ ग खत्म
(५५)
[अंक ३ रा] [स्थोन नजर वाग]
गुलेनार का दाखिल होना] (सहेलियों को अग्ज
करना)
कसी रात
निकली पहचाना
(स०१.) कहिये बान कल
तो
नहीं?
(गुल0) नहीं जो मुझे तो वह अब तक मोहिनी ही समझ
रहे हैं मगर ! सवाल एसे घे हिसाब कर रहे
है कि मुझसे जबाव खाक नहीं देना होता ?
(स०२) तवतो उनको जरूर शक हुआ होगा !
(गुल०) हां कुछ ग्वोपन तो नजर आया मेरे ख्याल से
कुछ शक अरूर ही हो गया मगर क्या करती
खुदा खर करे !
(स०३) अजी कोई भी फिकर सुना दिया होता तुमतो
खुद होशियार हो !
गुल0) यों तो मैंने कई वाते कहीं मगर उनके सवाल के
जवारमें कहीं उलटा न पड जाय इसी लिये टाल
दिया।
(स०१) सवाल क्या थे जरा हम लोग भी तो सुने ?
(गुल०) अरे ! क्या कह ! नोमवहशाना सवालात है समझ
में नहीं आते, कहते हैं मोहिनी तुम जगल से मुझे
छोड कर क्यों भाग आई चंडूल किधर गया यहां
कैसे पहुंची ! वगेर २ वाही नवा ही चकते हैं क्या
(६०) जयाय दंबेचारी मोहिनी तो खुदरा मन को रवाना हो चुकी खुदो जाने ये कषकी बाते वह कर रहे हैं इसो फिझ में परेशान है क्या जवाषर्दू मेरे ज- वोबन पाने से शक बढताही जारहाहै क्या करूं? कुछ समझ नहीं आता! (स०) भजी शक होने का सवय और भी कोई दूसरा है ? आपकी वह दोनों नई सहेलियां शाहनादे से गुल गुल कर बाते करती हैं मेरा शक उन पर भी हो ता है ! (गुल०) बेशक तु सन कहती है हराम जादियां बरगला रही हैं उन्हे जाकर समझतो हूं। (स.) म्बा ये तो हुआ करेगा मगर अभी तक वस्ल भी हासिल हुआ । (गुल०) अजी वस्ल क्या कयामत घरमा दुई कहते हैं ? म राजपूत हूं बगेर शादी इल्तजा वेकार है । (स०) किसी तरह दामें उल्फत में गिरफतार करो। (गुल०) घसा करना फिजूल है चलो समय हो गया शाह जादा मागा होगा। ? (सबका जाना) (परदा ३ रा खत्म)
(६१)
(अंक ३ रा परदा ४ था)
स्थान ननाना महल
(शाहमाद! पलंगसे उठता है सोसन सुशनसीब
बठी है)
(शा०) मुलशनका जो गुळ था स्रोगया बाकीरहा अबतूर है
चश्मों में बिताई कहां कोफर जिनका नूर है ।।
मोहर जो पायो था गेबसे हाय जो जाता रहा ।
माशूक पहलू में जोथा हाथसे जाता रहो ॥
होय ! अफसोध मोहिनी तू किधर गई ?
(खु.) हुजूर घेसी माहोजारी किस लिये ? बेकरारी
किसलिये?
(शा०) कुळलो नहीं, दिल का रोशनदान था मेरा अरमान
था पाया और हादसे खोदिया अब क्या छ
भी तो नहीं।
(प्र०) नहीं नहीं जनाब, पोलिये दिखको गांठ खोलिये
हम लोगों के लायक हम लोग भी जी जान से मदर
में हाजिर है।
(शो०) यह तुम जानती हो कि यह जो मोहिनी अपने
को बतलाती है क्या वाकई में मोहिनी है मुझे
तो शक है यह मोहिनी नहीं बल्के कोई दूसरी होह
(मु०) माप को ख्याल बहुत दुरुस्त है ये मलली मोहिनी
नहीं है यह मोहिनी की बड़ी बहन गुलेनार है।
(६२) (तारा) जनाव (और) कहां तो सर और कहाँ पगें का पंजार कहां चांद मोहिनी कहां शोख गुलेनार (शा०) बेशक यह गुलेनार ही है क्यों कि इसने मेरे सवालों का जवार अब तक नहीं दिया । (बु०) जी हां ये गुलेनार चमन का खारहे ! (शा.) वेशक आवाज़ में फर्क चाल में फर्क आदत में फर्क नजर आता ह (खु.) जनाब खामोप हो जाइये कोई आरहा है (गुलेनार का आना) (गुले०) फरमाइये मिजाज फैमा है ? (शा०) अच्छा है ! जो कुछ होरहा सो भी अच्छा है (गुले८) मेरे सरताज आप गमगीन की रहा करते है (पलंग पर बैठना चाहती हैं। (शा०) [उटका यह क्या वदतमीजी-इतना जुन का जोश है होप फरामोप है मने जो कहा था क्या भृल गई वाद क्यों हुई जाती हो जोश जुन बरवाद ! (गुले०) अजो आप इसने चौकन्ने क्यों होरहे हैं। [गुलेनार के देखने ही सबका जान] मेरे साया दिल लेकर प कदर तक ठीक देना बेयफाई करना क्या आको जवा है चोयले रहने दा वस्ले जमा पियो पिलाओ मजा उठाओ- (शा) वस खबरदार फिासे ऐसी तकगर जवां परनलान में
(६३)
वग्ना अच्छा न होगा।
(गुले०) जनोय मोहिनी पर तो निसार हो फिर चोचले
कयों कर रहे हो?
शा.) चुप वर नमीज ऐसे पाक नामको इस नापाक जब
से निकाल कर नापाक नबता तु कहां राहकी गेम
अनी और कलां वह दयाकी देवी मोहिनी
(नसर) दरगिज नहीं है मोहिनी में जैमी खमलन तुझ में है
द मन रियाजी उसमें है असमत फरोशी तुझ में हैं ।
वर चमन का नूर है और तृ एक बार है !
नरे ग्वशी रहमत है यह तुझ पर खुदो की मार है ।।
दुखा कांच का यह नायाय गोदर है।
दो जख का शैतान तु वन विहिरती जौहर है।
कहां तू अंधेरी मावत को कहां पुनो की चांदनी ।
दाताम कहां तू स्याह फार कमां महाताय रोशन मोहिनी
(गुले०) क्यों में गुस्ताखामा जशशर - मगरूर हस्ती ये
अपभमा
कि बू गुश्नाली कर रहा है?
(शा।) हां जामता हूं मैं एक खुनिया की बदकार और नसे
बात कर रहा हूं:
(गल०) अप मादःन अपनी जबांको रोक मैंने तुझे एक
शोखीम सम्झ दिस दिया था समझ रख औरत
अप प्यार करती है तो जन्नतसे भो पढ कर है।
in में मुयतिला हो जाती है। और जय वस्क
हो जाता है तो शेग्नीं से भी बेहतर खूखार
होती हैं तुमने एक शेरनी पर पार किया है ।
याद रख और अंजाम सोचले उन दोनों हराम
जादियों पर भी शक हे शायद उन्होंने तुझे पर
गलाया हे उन्हीं का तुझ पर शाया है ?
शा०) चुप नाचकार उन बेचारियों ने सेरा क्यो विगाडा
है उनकी शान में अगर तेरी नापाक जबान से
एक लफ्ज भी घर निकाला तो याद रखमा लफ्ज
बाहर निकान के पेशतर तेरे जिस्म पर सरन
होगा।
के कहर
में कौन हू सुन
(गुले०) अय खुदा
(नसर)
और
समझ ?
में वो शैतान हूं जो लाहोल पढादे।
में वोबिजी है जो जमी दस्त करदे ।।
में वो सांप हूं जो उसते ही सुलादे ।
में वो कहर ह जो यसपाहोनेही रुल्लादे॥
में वो मौतह जो रूहका घर करके ।
मैं के मवर ई जो चमन चुर करदे ।।
में वो आफत हूं जो तोवा कहालादे।
में वो आग हूं जो लहजे में जलाद ।।
(शा०)वसम्खामोश ज्यादा न बक हटजो मेरे सामनेसे मारो-
जायगी बद वसलती का मजापायगी-
-
भुन ग मौत के निवाले सुन तुझको जहुन्नुम
ग्मीद न करटू नो सही इस हस्तिये मगरूर
को दर गोर न करद तो सही (जाती है।
दुनियां की उगालजा जो दिलमें आवे कर
गुजर (जाना है।
(परदा ४ था म्वरमा
(अंक ३ ग परदा ५ वां)
स्थान फोजी केम्प]
गुलेनार का पेश खेम - (अन्दर आधाज होना
पटाखा-गुलेनार आकर)
(गुल०) जंग छिड मई हमारे बहादुर सिपाइयों ने जी
तोड कर जंग किया मगर हाय हमारे तकार
में शिकरत ही रही,
मुझे ताज्जुब है कि
जंग छिडते हो मेरी फौज पर इस मगरूर के
फौजी जवानों ने
न मालुम किधर से आकर
इकदम दिया और मुझे शिकस्त
दी में नहीं समझती कि इस जवान ने यहां बैठे
दी बेटे क्यों कर फौज को इत्तला पहुंचाई जो
ऐन वन पर काम आई अब तो मेरे भा व ने
का चारा नहीं किसी की मदद का इशारा नहीं
हरा
॥ शेर ॥
जो दुनियांका काल था मिश्ल मौत था बुलंदी पर
जो शोला आतिश का था कहर था जमी पर ।।
आज वो कम नसीपी से शिकरती में आगया।
फन्दा गलेका मोहिनी का मेरे गले मे बागया ।
(६७)
युग
.
यान् अय क्यों गमगीन होती हो शेर दिल होकर
क्यों थुदिल होती हो जोशेजुनु में दोशते होती
और०) या दो कयामत तक पहलू में रहना यारका।
जिल्लत मुसीबत कहर हर हो यो खुदा की मारका ।
अब क्यों घयगती हो दिलगीर होती हो गोद
रयसो गुनासा में भी साफ होत नई
और जुल्म जुल्मीका उन्नामनी अब देखले।
क्या मोदा नकद इन हाथ मप्रथाले ।
(गुल०) बुश नसीर २ इन्र वन र दाने तुझे ताने कसी
का वक्त दिया है। फिरभी तू मझपर क्यों कहर
घरपा करती है जले को जलाती है।
(शर) घावमें सोचा न था कि तकदीर मेरा सो गया
बाका रहा कहर जा बस होना था सो होगया ।
(वादशाह हिन्द को दाखिल होना)
धार पडलो उकलो यही हैं जालिम खुदा का गुन
४गार ।
(सिपाही गिरफतार करलेते हैं।
क्यों ऐ मगरूर हस्ती अयता हुई हिम्मत रस्तो
बोल २ अग दुनियां के बबाल घोल शाहजादे का
दामें मुहब्बत फलो तवालीफ देना यहां तक कि
उसके करल का इन्तजाम करना सितम ! तुफ है
(६८)
तेरी करतूतपर, तस्तपर, ताजपर, तुझपर, नेगे
जात पर और तेरे इस नूरपर
(गु.) जाशेजुनु का जोश या करदे उस को दर गुजर
फैद में गुल नोर है जो करना होसो कर ] ऊर
[ब नहींर गुलेनार में इन्सान हूँ मेरे जिस्ममें सीना सोनमें
दिल दिलमें खुदा का ख्याल है
जो तु चाहे वह में का
नहीं सकता यहां इन्साफ है जुल्म हो नहीं सकता
स . ( झेर ) फरजंद मिस्ले शर है रोशन है गहे रास्त था
जोशेजुना तुझमें जालिम जुल्म कहर ज्यास्त था
हाजिर खुदा हर जा रहे शंतान को पस्ता नहीं
दर गुजर स जो हो एसी कोई हस्ती नहीं
मय जल्लादो-कत्ल करदो अय इसे धष्ठसे भी गरमन ताडवा
फैसला इसका जा हं यस माहिना पर छोड दो :
( मोहिनीका दाखिल हाकर )
(गुले.) मोहिनी त जिन्दा ह यय खरा २ म क्या देख रही है
(मोह. वही जो खुदा को दिन ।ना मंजूर था रम्य
बहा माहिनी तेरे सामने है। बादशाह से) अय मेरे आक
और - जोशे मुहब्बत से मेरा सांगा हुमा मरमर
बाद) वस तुझी पर छोडना ह अय तुझे स्तियार।
बस मशीर मेरे सर पे हो दुशानी का न हद
राहे खुदा इस ताज पर मंगवान को छोटद।
गुलनार नहींमुझे रहम उरकार नहीं शेर । एक गादग्न
जांबासीकी
जुम्त.
नहीं सता
और तेही मोपस दिलरी शेर है.
असा पुरा होता को भी किस्मतो कर है।
जान जाने में नहरगिज यह गुलनारदरता है.
देखले इस तरह पर पाता नजात हस्ती है।
[पंछ काज निकाळ सीना बाफ कर गिर जाती है और
बन्द सांसे लेकर पम तोर देती है सब लोस देस्टस
अफसोस करते हे परदा गिरता है।
(सीन पवां स्वरम
(७०) अंक ३ (परदा ६) स्थान दरबार लाजपाशी. शादंशा) मेरे बफादार बहादु नुम लोगों की वो वाशिंद गान बसर की मदद से मैंने इस सल्तनत पर काफी फतहपाई और इसी वाइस मेरे ख्याल से इसका अंजाम भी तुम लोगों के रोषस खातिर स्याह यहाँ का इछदार को मिलना जरूरी भम्रो लिहाजा मेरे खयाल में मोहिनी के सिवा और कोई. इस सल्तनत का हार नजर ही गाना ललिये ये ताज (हाथमे लेकर ( सब स. हुजूर के हो दस्त मुवारक ले सकदा का ता. शी हो. (शाहि.) बहुत खुब मैं व खुशी असाम देता ई (ताज- पहनाता है) (स.) सुदा हम लोगों की सर पररत हमारी मलिकाको सापरता:-सलामत रक्से। शाहि.भामम सव.) धामीन || आमीन !!३! (प्रो.) अय मेरे तकदीर के खुदा मेरे युवर्ग सादार सलामत और मेरे आका जो निस्सर माया धाप लोगों ने हातात हकवार को परशा मगर जो इसको असली हकदार होना चाहिये पह पोशीदा हो रहा है याज और लोगों के सामने उस हामारे सरताजको में ताज पररती करूंगी.लिहाना धे ताज हमारे पाका शाहजाद ये हिंद केसर पर .
- (७१) जीनत वहो। (सय ) आमीन आमीन- (ता. इस अल्सये ताजपोशी की मुवारक वादीमे में बिखरे हुये दो दिलोंको एक हो जाने के लिये शाहंशाह से दरखास्त करती हूं। (शा हिं.) बहुत खूब क्या तारो की दरखास्त तुम दोनोको मंजूर है- . - ( दोनों ) कबूल घो मंजूर है- (शाहि.) काजीजी केो वुलाओ. (सि ) जो हुक्म हजुर ( जाना यो काजी के साथ वापस आना) (का.) क्या है. कहिये शादी मंजूर है- तो उन्हे सामने लामो (शा. ) ये हाजिर है. ( दोनों को सामने खड़े कर देता है) ( का.) होथ मिलाकर- तरक्की के जमाने में जोरू से मियां बेजार रहे। मुर्गी के उल्फत में मुर्गा ताहश्र गिरफ्तार रहे ॥ (स) ओमान १ आमीन २ आमीन ३ (प.स.) खुदा हमारे सरताज फरिश्ते खुदोको सलामत रक्खे। चन्द्रकला का दाखिल होना। (चन्द्र.) हम खुशा के दरबार में बन्दो भी कुछ दरखास्त करता है. ( हा.) तुम कौन हो बेटी और क्या चाहतो हो. (चन्द्र.) एक बागियों की सताई हुई कम नसीब औरत को
(७२)
सकदीर का फैसला।
(बाद क्या दरवारम किस गतको फैसला.
। अन्द्र श्राप लोग
है और शहर निघाज हिन्दु में
जबकि मेंहदी
की जाती ह और कंकण वांध
दिया जाता है. 7 से शादी होती है जिसका
कंकम बांधा जाता।
{ बाद ) वेशक--
चन्द्र ) अगर ऐसी हालत में दुलमो दुहिम को छोडकर
भाग जाय तो-
। बार तो दुलहन को चाहिये अपने अजीजों से उसकी
तलाश कगवे.
(ब)
शिममनी से दुलहन गुहा को
अगर खुश
का जाय।
(हिनी ) तो उससे (दोनों हाथ मिलकर ) इस तरह
बदला ले,
पिछडा हुवा हा फिरसे मिलायो युदाने
अध्यल हक आपका दिलाया। सुदाने
M) मोन १ अमीन २ आमीम:
यो सल्तन ) ये जल्सा आज हासना (सब) मुबारक हे २
ये तरतो ताज यफसाना (सथ) मुबारक होर
मजमा ताजपोशाकभखाडा इन्द्रमा हरयम
गीमय वे पैमाना ( सा ) मुबारक है।
ही जलजले दम पर है। हमंशा या खुदा
सारे माहस दोनों। सब ) मुबारक हो ।
)
(७३)
जाना मयका ) मुरली बजाने वाले भारत में फिरसे आजा
मुरलाको तान यकता फिर से जग मुनाजा
फिरके हुये हैं लालां धर्मों के अब जहां पर
कृष्ण वतार मा फिर मोहन का सुर सुनाजा
हम सब नरेद रहमत नजर नेग हो
सबका नहीं है वाली दर्शल जग दिखाजा
मुग्ला बजाने वाल भारत में फिरसे आजा
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पर का आहिस्ते २ गिरना- ( नमाम शुद।
पा० भट उपेन्द्रनाथ गंदीकर नाग हाल कांकरली
समागम
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nama
श्री महेश प्रिंटिंग प्रेस नाथद्वाग । मेवाड ।
इस पुस्तक के मिलने का पता-
पो० उपन्द्रनाथ शर्मा रोहीकर
कांकरोली (मेवाड).
श्री मदेश-मुद्रण-यन्त्रालय" नाथद्वारा.
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पो० उपन्द्रनाथ शर्मा रोहीकर
कांकरोली (मेवाड).
श्रीमद्देश-मुद्रण-यन्त्रालय नाथद्वारा.
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