Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Preet Ganga
Front matter
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प्रीत
गंगा
भण्डार
मुरारीलाल डालमियों
स्टेशन राई, बीकानेर
मुरारीलाल डालमिया
२२७/२ ए जे सी बोस रोड
कोलकाता-७०० ०२०
दूरभाष २४७८१०८
'प्रीत गगा'
मुरारीलाल डालमिया
प्रकाशकाल गणेश चतुर्थी २२वा अगस्त २००१
प्रथम सस्करण सख्या, १०००
प्रकाशक 'अर्चना
५५ जमनालाल बजाज स्ट्रीट
कोलकाता-७०० ००७
दूरभाष २३८ २५३२
मुद्रक आकाश इण्टरप्राईजेज प्रा० लि.
२६५ बी रवीन्द्र सरणी कोलकाता-७०० ००७
दूरभाष २३३ ६१७८
मूल्य १००/- (सौ रुपये)
'PREET GANGA'(A Literary Book of Hindi poetry) by Murarsial Dalma,
Published by 'ARCHANA' 55, Jamunalal Bajaj Street Kolkata 700 007
Year ended 2001 Ist edition 1000 copies printed
Rs 10000
मेरी जीवन-वाटिका के दो सुमन
अलका चौधरी
एव
अल्पना ड्रोलिया
को
सस्नेह
समर्पित
मुरारीलाल डालमिया
।
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सूची अ) पृष्ठ ९ भूमिका उपस्थापन आत्मनेपद कल्याणमल लोढा मुरारीलाल डालमिया पृष्ठ १३ (मुक्तक पृष्ठ १७ १७ १८ १) प्रीत गगा मे नहाकर २) प्रेम का प्रतिरूप है यह ३) माली बैठा देख रहा था ४) मैं बैठी हूँ पलक पॉवडे आज १८ ५) अब तो बाते करो प्रेम की १९ ६) धन्य हो गया मेरा जीवन १९ ७) कुछ अपने भी लगे पराये २० ८) सम्बन्ध नही बनते खुद ही २० ९) पल छिन का यह साथ तुम्हारा २१ १०) याद तुम्हे भी होगा वह दिन २१ ११) कल रात तुम्हारी याद २२ १२) बहुत सहज है अश्रु बहाना २२ १३) बहुत सहज है पाँव फिसलना २३ १४) बहुत जी लिया इस जीवन को २३ १५) बहुत सहज सम्बन्ध बनाना २४ १६) कितनी रात अभी बाकी है २४ १७) कब मेने चाहा था कोई २५ १८) बन्द पडे है द्वार हृदय के २५ १९) सहज शीतल जल हृदय मेरा २६ २०) कवि मर जाता लेकिन कविता २६ २१) ध्यान लगाकर चलनेवाला २७ २२) थाल हाथ मे लिए पुजारी २७ २३) नयनो की माषा पढना २८ प्रीत-गगा २४) कल फिर याद तुमारी आयी २८ २५) सावन में रिमझिम रिमझिम २९ २६) तुम बिन कसे दिन पीते हैं २९ २७) मैंने देया हर प्राणी को प्यार ३० २८) मैंने गीतों में पीड़ा को ३० २९) मैं पयहारा मुझे दिशा या ३१ ३०) मौत मेरे द्वार पर तुम ययों ३१ ३१) विप का हो या अमृत वा घट ३२ ३२) आज किसी की मौत हो गयी ३२ ३३) प्रेम मिले प्रेम का विरतार ३३ ३४) साकिया कुछ अदय से ३३ ३५) मुझको तुम्हारे प्यार ने जीना ३४ ३६) जीवन पथ पर चलते चलते ३४ ३७) चुपके चुपके तुम मेरे आँगन २५ ३८) रपर्श तुम्हारा जीने का ३५ ३९) तुला हुआ है द्वार उदय ३६ ४०) जनम जनम के साथी मीत ३६ ४१) साथ साथ चलना तो एक ३७ ४२) आज तुम्हे मैं हरी दूय से ३७ ४३) गगाजल से सुबह नहाना ३८ ४४) टूटे जो सम्बन्ध जोडना ३८ ४५) तुम से क्या सम्बन्ध बनाया ३९ ४६) जिन्दगी का पात्र खाली हो ३९ ४७) हो गयी जयान आज ४८) मुझे मिल गयी छाँय तुम्हारे ४९) मदिरा पीकर जीने का ५०) अमृत की गागर छलकाऊँ ५१) साकी मेरी मै उसका ४२ ५२) प्यार करो प्यार उमग ५३) प्रेम एक गीत है बस ४३ ५४) चन्द्रवदन पर अलके नाचे ४३ ५५) बगिया मे फूलो को खिलते ५६) शीश लगा लूँ अजुरि भरकर ४४ ४० ४० ४१ ४१ ४२ प्रीत-गगा ५७) आँसू अनेक किस्म के होते ४५ ५८) जाने पहचाने अनजाने ५९) हर पल हर क्षण सूना सूना ४६ ६०) जीवन एक जुआ है जी भर ४६ ६१) अन्तिम वेला मे मुझको तुम ६२) सुबह शाम पूजा वन्दन करता ४७ ६३) चाँद चाँदनी कभी नहीं ६४) प्रेम का नाता अमिय मकरन्द ६५) जव निगोडे नयन नयनो से ४९ ६६) उनके आने पे रात हो जाय ६७) हर सन्ध्या हर रात सुहानी ५० ६८) हमने दुनिया मे सबको ५० ६९) कुछ सम्बन्ध सुहाने लगते ५१ ७०) प्रेम का आधार होता है ५१ ७१) प्रेम का सम्बन्ध ही सम्बन्ध ५२ ७२) बन्द हो गया द्वार प्रेम का ७३) कुछ सम्बन्ध निराले होते ५३ ७४) कुछ लोग मिले थे राहो मे ७५) पैसा है मृग मरीचिका सब ५४ ७६) मैंने वच्चन का मन देखा ७७) कल तुम मिली राह पर ५५ ७८) तुम तो अपलक देख रही ७९) मुझको अपनी पीडा दे दो ५६ ८०) नही प्यार की कोई सीमा ५६ ८१) एक तुम्ही थे जीवन पथ ५७ ८२) कब तक मुझसे दूर रहोगी ५७ ८३) चन्दनी हवा चली सिहर ८४) तुम ने गाया मुझे लगा ५८ ८५) प्रेम भरी इस गागर से मैं ८६) ध्यान लगाकर चलनेवाला ८७) लगी प्यास की आग बुझान ६० ८८) चाँद अमर है सूर्य अमर है ६० ८९) मै हूँ अमृत का घट पीआ ६१ ९०) तुमको खोकर ऐसा लगता ६१ प्रीत-गगा ।
९१) गध प्यार की फैल गयी ९२) प्रेम सुवासित हो जाता ९३) आज न जाने क्यो मेरा ९४) एक बार यदि तुम मिल ९५) मेरा तन मन प्यारा प्यारा ९६) प्रीत प्यार मे बाहुपाश मे ९७) तुमने मुझको बहुत सताया ९८) एक नयन मे अश्रु तुम्हार ९९) आशीर्वाद मुझे तुम दे दो १००) शायद म इस योग्य नहीं १०१) कही पढ़ा था भीख न १०२) तुम चाहे जितनी पीडा दो १०३) स्पर्श हमारे प्रथम मिलन १०४) बहुत सहज है गॉठ लगना १०५) बहुत कठिन यह तत्व १०६) सोना चाँदी हीरा पन्ना १०७) तुम शीतल जल की १०८) तुमने मुझे उढायी चादर १०९) मैंने बिन सोये काटी हैं ११०) तुम लगती शाश्वत १११) भूल गये हम गाँधी और ११२) भारतदेश महान हमारा ૬૨ ६२ ६३ ६३ ६४ ६४ ६५ ६५ ૬૬ ૬૬ ६७ ६७ ६८ ६८ ६९ ६९ go ७० ७१ ७१ ७२ ७२ (गीत) १) प्राण प्रिये तुम अपना मुझे ७३ २) बीती बाते याद करे मन ७४ ३) तुम नयनो मे काजल जरा ७५ ४) गीतो की बरसात करूँ तुम ७६ ५) सोयी पीर जगी जाती है ६) गीतो की सरिता को अविरल ७८ ७) याद तुम्हारी आ जाती है ७९ ८) स्पर्श! मुझे स्पर्श में मत ढूंढो ८० ७७ प्रीत-गगा भूमिका उपस्थापन श्री मुरारीलाल डालमिया से मेरा परिचय ओर सम्बन्ध गत चार दशको से भी अधिक है। मुझे वे दिन आज भी स्मरण ह जब बगीय हिन्दी परिष्द मे सध्या के समय साहित्य काव्य चर्चा किया करते थे और उस समय स्व० आचाय ललिताप्रसादजी सुकुल के सान्निध्य में श्री डालमिया अपनी कविताएँ सुनाया करते थे। तत्पश्चात भी उनसे सम्पर्क बराबर बना रहा और गत दशका स लक पर प्रात चक्रमण के समय भी यदाकदा वे अपनी कविताएँ सुनाते थे। उनका प्रथम काव्य अथ शाश्वत एक प्रणाम उन्होने अपनी पत्नी स्वर्गीया सत्यमामा को समर्पित किया। इस अथ मे वे कवि का स्व कथ्य था 'आपको गीतो के भावो मे मेरे मन की पीडा के दर्शन होगे। वह अमाव, वह पावन स्मृति वह पीडा ही उनकी रचनात्मक प्रतिमा को नवीन आयाम देती है। उनका दूसरा काव्य ग्रथ प्रीत गगा है जिसमे अन्तत वही पीडा वही स्मृति कवि सजोता है। भारतीय मान्यता हे 'सुखहि दुखत्यनु घनान्धचारे दिव दीप दर्शनम् सारे दुख मे सुख की अनुभूति शोभायमान होती है जैसे धनीभूत अधकार मे दीपक का प्रकाश। इस अनुभूति के अतराल में जहाँ एक ओर जिजीविका और जिज्ञासा है वह दूसरी ओर सरकारजनित स्मृति व कल्पना जो मानस की गहराइयो मे एक स्पन्दन अनुस्यूत करती है और अतीत को पुन प्रीत-गगा वर्तमान के चैतन्य से परिपूर्ण कर एकाग्रता और सर्वाथता का साधन बनती है। प्रसिद्ध मनोविज्ञानिक फिटजाफ काफ्रा ने अपने प्रसिद्ध ग्रथ दि ताओ आफ फिजिक्स में कहा है जीवन के किसी मोड पर जब किसी विकट सघर्ष की स्थिति नही आती, तब तक व्यक्ति आत्मोन्मुखी नही होता। यही रचनाकार की रचनात्मक सक्रियता है और सृजन की क्षमता विवेक के साथ अपनी कामनाओ की जिजीविषा की पूर्ण उपलब्धिा जीवन के सारे दुख सताप परिताप अतस की पीडा वन कर हमे कसौटी पर कसते ह ओर किसी असाधारण क्षण मे चेतना को गति सम्पन्न कर मनोविदलता से मुक्त करते है और न जाने किस अज्ञात क्षण में वह असाधारण क्षण कलातीत बन जाता है। मेरी धारणा है कि कवि कर्म केवल अनुकरणमात्र नहीं है वह तो अनाविल सृजन प्रक्रिया है जिसकी प्रस्तुति अनुभूति (प्रेरक तत्त्व) स्व रवेद्य स्थिति(अभिव्यक्ति) और उद्वेलन (कल्पना स्मृति की घनीभूत अवस्था) मे ही सम्भव है। कवि चर्चा का सम्बन्ध सम्पूर्ण व्यक्तित्व से हे कवि की मानसिकता उसके भावो के सवेग उद्वेलन और चेतना प्रकर्ष मे अपने को स्थापित करती है। कल्पना मानस चक्षु है, इसमे चेतन-अवचतन आर अचतन के मध्य सीमा रेखा खीचना या अन्तर रेखाकित करना सम्भव नही क्योकि उसमे नैरन्तर्य रहता है। सवेग अर्थात सविग्न ससार के मोलिक सुखो से निर्लिप्त उदासीन। वह अन्तर का उत्साह हे 'सवेग परम ही धर्मे धर्म फलोचित यही सम्पर्क वेग है आतरीक उत्साहो या भाव सत्य से मगल मार्ग मे लगाना। महाकवि पत ने इसी भाव सत्य को स्पष्ट किया है। कहाँ नही है स्नेह सास का बधन सब के उर मे। यह स्नेह का सनातन सम्बन्ध शिवेतर हाकर सान्दर्य की सृष्टि करता है। चित्तै काग्रम भवधानम -यही चित्त का अवधान है अथवा अन्त प्रज्ञा (विजन)। इसी स्थिति मे वर्डसवर्थ ने कहा था ' To me the meanest flower that blows can give me thoughts that are for often too deep in tears' १० प्रीत-गगा
अज्ञेय ने भी ऐसा ही कहा
'कहा तो सहज पीछे लोट देखेगे नही
पर नकारो के सहारे कव चला जीवन
स्मरण को पाथेय बनने दो
कभी तो अनुभूति उमडेगी पावन का साद्रधन भी वन।
यह प्रसगोल्लेख श्री डालमिया की रचनात्मक प्रक्रिया को समझने मे
सहायक होगी। 'प्रीत गगा' 'शाश्वत एक प्रणाम' का ही विस्तार है स्मरण
या पाथेय अनुभूति का साद्रघन वन उमडना। इस कृति मे कविताओ के
साथ साथ रेखाचित्र है जिनसे काव्य का मर्म शब्द विधान रगो मे प्रतिध्वनित
अथवा उद्घाटित होकर अर्थवत्ता सार्थक करता है। इस प्रथ की कविताएँ
मुक्तक मे रची गयी है। मुक्तक अर्थात् भावो की अभिव्यक्ति की मुक्तता
अर्थात अपने आप मे जो सम्पूर्ण या अन्य निरपेक्ष हो। ऐसी छन्द रचना ही
मुक्तक है जो अनियद्ध हो 'मुक्तकमन्येननालिगित तस्य सज्ञायाकन् पुन
'एकेन छन्दसा वाक्यार्थ समाप्तो मुक्तकम । प्रीत गगा की प्रत्येक कविता
अनिलिगत है-अपने मे पूर्ण, फिर भी समग्र दृष्टि से उसमे तारतम्य और
क्रमवद्धता है क्योकि इस कृति की अन्तभूमि मे कवि के जीवन की प्रत्यक्ष
छाया उद्भासित होती है। कुछ काव्योचरण इसे स्पष्ट करेगे-
मुझको बहुत भले लगत है रग विरगे फूल चमन मे
बहुत सहज है वाग लगाना उसे सजाना बहुत कठिन है।
पुन
"हर पल हर क्षण सूना सूना लगता है।
घर आगन मुझको वीराना लगता है।।
भीगी भीगी पलके नयन उनीदे से।
एकाकीपन भी अव अच्छा लगता है।
प्रीत-गगा
११
टूटे जो सम्बन्ध जोडना बहुत कठिन है।
मिल जाये मनमीत छोडना यहुत कठिन है।।
वडे यतन से फूलो को माली चुनता है।
फूलो के सग फूल तोडना बहुत कठिन है।'
जीवन के अज्ञात बीहडो पर जव कोई सगी साथी मिलता है तब इस
दुर्गम पथ को पार करना भी सकल्प बनता है। जीवन की यह अनुभूति
विरह मे अतिशय होकर इस पीडा को सार्थक आर सटीक करती है
जिसका उल्लेख मने ऊपर किया है। इसी से वेदना भरे गीत ही मधुरतम
होते है। श्री डालमिया का कथन है-
'तुम ने गाया मुझे लगा ज्यो मिली कठ को वाणी
मिली राम को सीता, शिव को पार्वती कल्याणी
सॉस साँस मे तुम्ही यसी हो तुम्ही प्यार का सागर
मेरे ऑसू गीत तुम्हारे इनकी प्रीत पुरानी।
इन पक्तियो को पढकर मुझे वचन की कविता याद आ गई 'तुम गा
दो मेरा गान अमर हो जाये। तुम छू दो मेरा प्राण अमर हो जाये।'
प्रीत गगा मे अखड और अव्याहत प्रेम की सरिता प्रवहमान है। कवि
का मानस ऊर्जा मे अवगाहन करता है कभी व्यक्तिगत स्तर पर कभी
प्रकृति के सदर्भ मे तो कभी विम्यो का आधार ग्रहण कर व्यापक स्तर
पर उसका यही भाव सत्य है ऐसे शोक गीत ही सृजक की अतरग भावभूमि
को उर्वर बनाते हैं और जीवन से साक्षात्कार करते है। कविता मूलत
बोद्धिक स्तर पर प्रभवविष्णुता नहीं करती न आवेश मे उसमे आकुलता
व्याकुलता ही सवेग का उत्थान हे अभिनिवेशा मे श्री मुरारीलाल की इस
कृति का स्वागत करता हूँ ओर यह कामना भी कि प्रीत की यह गगा भविष्य
मे गगासागर बनेगी।
श्री कृष्णा जन्माष्टमी
कल्याणमल लोढा
दिनाक २०५७
१२
प्रीत-गगा
आत्मनेपद बीस वर्ष की युवावस्था मे अर्थात् पचास के दशक मे 'वगीय हिन्दी परिषद मे एक श्रोता के रूप मे प्रवेश एव कविता पठन पाठन एव लेखन में रुचि। जीवन के अनेक खट्टे मीठे अनुभव एव सन् १९९४ मे अकस्मात् मेरी अर्धागिनी की स्वर्गवास जनित परिस्थितियो ने मेरी प्रथम काव्य पुस्तक 'शाश्वत एक प्रणाम के रूप मे काव्य जगत मे, मेरी उपस्थिति दर्ज कराई। सच तो यह है कि आज भी हिन्दी भाषा एव साहित्य का मुझे विशेष ज्ञान नहीं है। हाँ, पाच दशक से मेरा, हिन्दी के प्रति अगाध लगाव एव रुचि रही है। मैने हमेशा प्रेम गीत लिखे हैं लिखता हूँ एव लिखता रहूँगा। यह भी मानता हूँ कि जीवन मे यदि प्रेम नही तो कुछ भी नहीं। प्रेम को मे जिन्दगी का मधुरतम छन्द मानता हूँ- प्रेम का नाता अमिय मकरन्द है दो हृदय का यह अमर अनुबन्ध है प्रेम मे जो खो गया, वह तर गया जिन्दगी का यह मधुरतम छन्द है।' मेरी प्रथम काव्य पुस्तक शाश्वत एक प्रणाम जिसका लोकार्पण मेरे अन्तरग मित्र एव मनीषी, कवि आचार्य विष्णुकान्त शास्त्री के करकमलो से प्रीत-गगा १३ सम्पन्न होना एव उनका आशीर्वाद प्राप्त करना में अपने जीवन की एक उपलब्धि मानता हूँ। शाश्वत एक प्रणाम के प्रकाशन के याद मेरे अनेक कवि मित्र बन्धु बान्धव एव अन्य लोगो ने शुभकामनाये प्रेपित की तो ऐसा लगा कि मेरा जीवन धन्य हो गया। पत्नी के देहान्त के पश्चात, अकेला रह गया तो मेरी पीडा मेरी 'सगिनी बन गयी। मे विधुर नही रहा एव प्रीत गगा का जन्म हुआ- 'कब मने चाहा था कोई दुख में मेरा साथ निभाये कर चाहा एकान्त क्षणो मे कोई प्रिय की याद दिलाये लेकिन दुनियावालो तुमसे एक निवेदन करता हूँ मे मेरी पीडा मेरी सगिनि इसे न कोई ठेस लगाये। प्रीत गगा मे नहाता रहा हूँ। अपार सुख मिला। जीवन मे प्राणीमात्र को सुख की अनुभूति हो यही कामना है। 'प्रीत गगा मे आपको प्रेम, प्रेम जनित सुख दुख जीवन के कुछ कटु अनुभव एव प्रेम के प्रति मेरे मन के सीधे सादे भाव मिलेगे। आज मे अपने जीवन के उस दौर से गुजर रहा हूँ जहाँ पहुँच कर मनुष्यमात्र मे एक प्रकार की विरक्ति का भाव पैदा हो जाता है और मनुष्य मृत्यु को जीवन के शाश्वत सत्य के रूप मे ग्रहण करता है। इस मुक्तक के द्वारा आप मेरे हृदय की भावनाओ को बखूबी समझ सकेगे- अन्तिम बेला मे मुझको तुम करुणा से नहला देना कल्पवृक्ष की शीतल छाया मे तन को सहला देना अमर वेल की सतरगी चादर तो मुझको भली लगे सभी मित्र परिवार जनो से गगाजल पिलवा देना। पचास वर्षो मे लिखा गया था 'शाश्वत एक प्रणाम और मात्र दो वर्षो मे लिखा गया है यह काव्य सग्रह प्रीत गगा | मुझे स्वय भी आश्चर्य होता है इस चमत्कार पर। दो साल की अवधि मे कुछ गीत भी लिखे लेकिन यह 'प्रीत गगा तो मुक्तक प्रधान है जिसे मैंने मात्र ४० दिवसो मे रची है। १४ प्रीत-गगा कभी कभी ऐसा भी लगता है कि 'प्रीत गगा के गीत एव मुक्तक मैने नही लिखे बल्कि किसी अदृश्य शक्ति ने लिखवाये है चाहे वह मेरी स्वर्गीया पत्नी ही हो। यह तो एक सुखद सयोग ही है कि आचार्य कल्याणमल लोढा ने, जिनसे मेरा आज पाँच दशक से सम्बन्ध है, इस मुक्तक प्रधान काव्य संग्रह प्रीत गगा' की भूमिका लिखकर मुझे गारव प्रदान किया है। मै विशेष रूप से आमारी हूँ अपने मित्र एव हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार श्री गोपालदास 'नीरज एव कविवर श्री भारतभूपण का जिन्होने आशीर्वाद देकर मुझे प्रोत्साहित किया है। गीतो के चयन से लेकर, प्रकाशन तक के परिश्रम एव सहयोग के लिए मे विशेषरूप से आभारी हूँ श्री नथमलजी केडिया (प्रधान मत्री एव सस्थापक अर्चना ) का राजस्थानी रामायण रचयिता श्री अम्यू शर्मा एव कविवर श्री श्यामसुन्दर बगडिया का तथा समय समय पर सुझाव एव सम्पादन में सहयोग देने के लिये आदरणीय विद्वान श्री रेवतीलाल शाह का। अर्चना ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया है जिससे म अनेक वर्षों से जुडा हुआ हूँ| यह एक ऐसी सस्था है जिसने विगत दो दशको मे अनेक कवि एव कवयित्रियो को मच एव प्रचार दिया है। अर्चना मेरी अपनी है, इसे म सादर प्रणाम ही निवेदन कर सकता हूँ। आशा है मेरी यह प्रीत गगा आप सभी सुधी पाठको को अच्छी लगेगी एव इसमे स्नान करके आपका मन प्रफुल्ल होगा। मैं यह 'प्रीत गगा अपनी पुष्प वाटिका के दोनो सुमनो-अपनी पुत्रियो अलका चौधरी एव अल्पना ड्रोलिया को सस्नेह समर्पित करता हूँ-इस मुक्तक के माध्यम से प्रेम का प्रतिरूप है यह प्रीत गगा भावनाओ का मिलन स्थल, प्रीत डूब जाओ स्वच्छ तन मन प्राण कर लो प्रेम का हरिद्वार है यह प्रीत गगा। - गगा मुरारीलाल डालमिया प्रीत-- -गगा १५
N
मैने अनगिन गीत लिखे है अव मुक्तक' की वारी आयी
भॉति भॉति के फूल सजाये अब केशर मेरे मन भायी
खुशबू चन्दन की भी महकी गध प्यार की सर्वोत्तम है
फैलाओ तुम गध प्यार की कर लो सव से प्रेम सगायी।
१६
प्रीत-गगा
प्रीत गगा मे नहाकर, तुम मलिन तन प्राण धो लो
प्रीत गगा मे नहाकर, मुदित हो मन द्वार खोलो
स्वय को कर दो समर्पित, मिलन के इस मधुर क्षण मे
प्रेम पथ पर जो चले, तुम भी उन्ही के साथ हो लो।
(२)
प्रेम का प्रतिरूप है यह प्रीत गगा
भावनाओ का मिलन स्थल, प्रीत गगा
डूब जाओ, स्वच्छ तन मन प्राण कर लो
प्रेम का हरिद्वार है यह प्रीत गगा।
प्रीत-गगा
१७
माली वैठा देख रहा था, बगिया मे कुछ फूल खिल गये
कुछ कलियाँ तो चटक रही थी, कुछ कलियो के अधर हिल गये
भंवरो को भी खवर हो गयी, गूंज उठी गुजन शहनाई
प्रेम अमर है फूल भ्रमर का, सुवह मिले हर शाम मिल गये।
(४)
मैं बैठी हूँ पलक पाँवडे आज विछाकर, तुम आ जाओ
मैं बैठी हूँ गीत तुम्हारे आज सजाकर तुम आ जाओ
चाँद सितारे पथ पर ज्योति विखेर रहे हैं
मैं बैठी हूँ इन नयनो मे दीप जलाकर तुम आ जाओ।
१८
प्रीत-गगा
(५
)
अब तो बाते करो प्रेम की, मीत मिल गया, रात हो गयी
प्रीत पल गयी, नयन मिल गये, अमृत की बरसात हो गयी
हरसिगार के फूल खिल गये, खुशबू फैल गयी चन्दन की
फूलो से सुख सेज सजेगी, नन्दन वन से बात हो गयी।
C
TOSTE
(६)
जा
धन्य हो गया मेरा जीवन सु मुखी तुम्हारा प्यार मिल गया
माली बैठा देख रहा था बगिया का हर फूल खिल गया
गली गली मे शोर मच गया यह डोली किसकी आयी है
देख तुम्हारा रूप मनोहर पत्थर का भी हृदय हिल गया।
प्रीत-गगा
१९
(७
)
कुछ अपने भी लगे पराये, अनजाने अपने लगते है
कुछ सम्बन्ध बनाये जाते , कुछ सम्बन्ध स्वय बनते हैं
पथ पर अनगिन लोग मिले,
कुछ
बिछड गये थे
कुछ ऑसू वरवस ढल जाते, कुछ ऑसू पीने पड़ते है।
कुछ साथ चले
सम्बन्ध नही बनते खुद ही सम्बन्ध बनाये जाते है
जीवन पथ पर जो साथ चले वो गले लगाये जाते हैं
क्या पाप पुण्य क्या भला बुरा, इसकी परिभाषा बहुत कठिन
मन्दिर मस्जिद, मदिरालय मे अदाज लगाये जाते है।
२०
प्रीत-गगा
पल छिन का यह साथ तुम्हारा, मुझे लगा अमृत की धारा
प्रथम मिलन, वह आत्म समर्पण, कितना रसमय मिलन हमारा
आज मुझे एकान्त क्षणो मे, बहुत सताती याद तुम्हारी
कभी कभी ऐसा लगता है, शायद तुमने मुझे पुकारा।
--
---
(१०)
याद तुम्हे भी होगा वह दिन, हम तुम पहली बार मिले थे
आम्रकुञ्ज की घनी छाँव मे, कैसे बारम्बार मिले थे
एक दूसरे के दीवाने नयन नयन से उलझ गये जव
अमृत की बरसात हो गयी, जीने के आधार मिले थे।
प्रीत-गगा
२१
(११)
कल रात तुम्हारी याद आई, मै रोया सारी रात प्रिये
तन की ज्वाला को भडका दे, यह कैसी है बरसात प्रिये
अपनो ने मुझको तुकराया, लेकिन गैरो ने प्यार दिया
तुम आ जाती यदि एक वार, कह देता मन की बात प्रिये।
(१२)
वहुत सहज है अश्रु वहाना ऑसू पीना बहुत कठिन है
बहुत सहज है प्रीत लगाना प्रीत निमाना बहुत कठिन है
मुझको बहुत भले लगते है रग विरगे फूल चमन मे
बहुत सहज है याग लगाना याग सजाना बहुत कठिन है।
२२
प्रीत-गगा
(१३)
बहुत सहज है पाँव फिसलना बचकर चलना बहुत कठिन है
बहुत सहज पाकर खो देना, खोकर पाना बहुत कठिन है
दुनिया के इस रग-मच पर, आना-जाना लगा रहेगा
बहुत सहज मदिरालय जाना जाकर आना बहुत कठिन है।
12041
ल
(१४)-टे
.
बहुत जी लिया इस जीवन को, थोडा सा जीवन बाकी है
अनगिन विप के चूंट पी लिये, अन्तिम विष पीना बाकी है
नही यहाँ कोई घर अपना नही मिली ऑचल की छाया
अर्थी लोग सजाये बैठे कुछ सॉसे अब भी बाकी है।
प्रीत-गंगा
२३
(१५)
बहुत सहज सम्बन्ध बनाना, किन्तु निमाना बहुत कठिन है
बहुत मिलेगे राही पथ पर, साथ निभाना बहुत कठिन है
सुख के साथी बहुत मिलेगे, दुख मे कोई साथ न देता
बहुत सहज है अमृत पीना, विष का पीना बहुत कठिन है।
(१६)
कितनी रात अभी बाकी है, कितनी बात अभी बाकी है
कितने सावन बीत गये कितनी बरसात अभी बाकी है
क्या वाकी है वीत गया क्या यह जीवन घट तो रीता है
शह पर शह खाता आया हूँ लेकिन मात अभी बाकी है
प्रीत-गगा
२४
(१७)
कय मैने चाहा था कोई दु ख में मेरा साथ निभाये
कर चाहा एकान्त क्षणो मे, कोई प्रिय की याद दिलाये
लेकिन दुनियावालो तुमसे एक निवेदन करता हूँ मैं
मेरी पीडा, मेरी सगिनि, इसे न कोई ठेस लगाये।
.
.
(१८)
चन्द पडेद्वार इदय के प्राणप्रिये अपोलो
मन की पीला, प्पया कथा अनकही आज तक योलो
प्यर्थ शोधना इरा जीवन में यया पोया गया पाया
साताये जो मन की पीठा, उस पर प्यार उठेलो।
प्रीत-गगा
(१९)
सहज शीतल जल हृदय मेरा, नहा लो
गीत मेरे प्रीत के
स्वर-गुनगुना
लो
यह धरा तो एक माया जाल है वस
तुम हृदय से मोह का पर्दा हटा लो।
(२०)
कवि मर जाता लेकिन कविता सदा सुहागिन होती
बुझ जाता है दीप, मगर हर वर्ष दिवाली होती
दुनियावालो वात पते की कहता हूँ मैं सुन लो
कोई अपना नही यहाँ पर नाहक दुनिया रोती।
२६
प्रीत-गगा
(२१)
ध्यान लगाकर चलनेवाला मॅजिल पा जाता है
मोहजाल मे फँसा हुआ, पगपग पर रुक जाता है
पथ पर मायाजाल बिछा हे, दलदल भी पाओगे
जिसका मन गगा जल होता, पार उतर जाता है।
--
(२२)
थाल हाथ मे लिए पुजारी मन्दिर में जाता है
दुआ मांगने कोई मुाना मस्जिद में जाता है
सब की अपनी-अपनी उपती, अपना-अपना राग
पीने याला दर्द भुलाने गदिरालय जाता है|
प्रीत-गंगा
(२३)
नयनो की भाषा पढना आसान नही है
आशा और निराशा का अवसान नही है
प्रेम अमर है, पूजा और समर्पण मेरा
जो न समझ पाये वह तो इन्सान नही है।
(२४)
कल फिर याद तुम्हारी आयी रोया सारी रात
कुछ स्मृतियो मे कुछ गीतो मे खोया सारी रात
अब तो पीडा लगे सुहानी, एकाकीपन भला लगे
तुमने जो भी प्यार दिया था, ढोया सारी रात।
प्रीत-गगा
*
-- (२५) सावन मे रिमझिम रिमझिम बरसात सुहानी लगती चाँद चाँदनी के साये मे रात सुहानी लगती चाँदी जैसा रूप तुम्हारा, चन्दन-जैसी काया पिया मिलन की बेला मे हर बात सुहानी लगती। -- - Jam- -- (२६) तुम विन कैसे दिन बीते है, क्या बतलाऊँ अपने कैसे हुए पराये, क्या बतलाऊँ मन की पीडा कोई भी तो समझ न पाता अपनो ने ही मुझे रुलाया क्या बतलाऊँ। प्रीत-गगा २९
(२७)
मैने देखा हर प्राणी को प्यार चाहिए
पुष्प चाहिए और पुष्प का हार चाहिए
गीतो की सौगन्ध, वात मन की कहता हूँ
विश्व कुटम्ब लगे, ऐसा ससार चाहिए।
(२८)
.
मैंने गीतो मे पीडा को अपनाया है
तन को, मन को और स्वय को दुलराया है
सच कहता हूँ प्राण प्रिये तेरी सुधियो ने
कभी रुलाया और कभी मन सहलाया है।
प्रीत-गगा
१
(२९) मै पथहारा, मुझे दिशा का ज्ञान नही है भले-बुरे की भी कोई पहचान नही है मिले अगर आदर्श पुरुष, म शीश झुका हूँ मन्दिर मे भी पत्थर है, भगवान नहीं है। Som.J- भण्डार . -(३०) कानेर मौत मेरे द्वार पर तुम क्यो खडी हो मै अमर हूँ पाप के घट भर गये, उनको उठा लो, मै अमर हूँ प्रेम के मै गीत लिखता, प्रेम का मै हूँ पुजारी प्रेम तो मरता नही है लौट जाओ मै अमर हूँ। प्रीत-गगा ३१
(३१)
विष का हो या अमृत का घट, मुझको फर्क नही पड़ता है
जीवन दुःखमय हो या सुखमय मुझको फर्क नहीं पड़ता है
साथ किसी ने दिया नहीं तो, एक अकेला चलता आया
पीडा हो या प्रेम तुम्हारा, अब तो फर्क नहीं पड़ता है।
(३२)
आज किसी की मौत हो गयी उसका खेल तमाम हो गया
अर्थी लोग उठाने आये, राम सत्य सतनाम हो गया
चिता जल गयी कहा किसी ने, वडा भला था मुक्ति मिल गयी
मने देखा वह तो कवि था अमर हो गया नाम हो गया।
३२
प्रीत-गगा
(३३)
प्रेम मिले प्रेम का विस्तार कीजिये
प्रेम मिले प्रेम को स्वीकार कीजिये
सूना न हो यह पथ सदा चहकता रहे
प्रेम का यह रास्ता गुलजार कीजिये।
E
(३४)
-
साकिया कुछ अदब से महफिल मे आना
भूल कर भी तुम न चूंघट को उठाना
मयकदे मे गम के मारे आ गये है
होश कुछ बाकी बचे, इतना पिलाना।
प्रीत-गगा
३३
(३५)
मुझको तुम्हारे प्यार ने जीना सिया दिया
हँसना सिखा दिया, कभी रोना सिया दिया
सुनते हैं युरी चीज है कम्यस्त आशिकी
दीवानगी इतनी पढी, पीना सिया दिया।
(३६)
जीवन पथ पर चलते चलते बिछड गये हम
जाने तुमने क्या कह डाला, बिखर गये हम
आँसू नयनो में भर आये नींद न आयी
खडी द्वार पर मौत देख कर सिहर गये हमा
३४
प्रीत-गगा
(३७)
चुपके-चुपके तुम मेरे आँगन मे आना
जी भरकर अमृत पीना, कुछ मुझे पिलाना
व्यथित हृदय को शान्ति मिलेगी, प्रीति पलेगी
गीत लिखूगा प्रीत प्यार के, सस्वर गाना।
.
(३८)
स्पर्श तुम्हारा, जीने का आधार बन गया
प्यास बुझी तन मन की अमृत धार बन गया
प्राण प्रिये, यह जीवन मेरा धन्य हो गया
काशी, मथुरा वृन्दावन, हरिद्वार बन गया।
प्रीत-गगा
(३९)
खुला हुआ है द्वार उदय का, तुम आ जाना
कर लेना विश्राम दो घडी, तुम आ जाना
मेरे अन्तर की पीड़ा को प्रीति मिलेगी
मुक्ति मिलेगी इस जीवन को, तुम आ जाना।
(४०)
जनम जनम के साथी मीत मनोहर हो तुम
गगाजल हो मधु से भरा सरोवर हो तुम
मुक्त शशि का हास, जल निधि की तरगे
गौरीशकर की अद्वितीय धरोहर हो तुम।
३६
प्रीत-गगा
(४१)
साथ साथ चलना तो एक बहाना था
मै उसकी थी, वह मेरा दीवाना था
आत्म समर्पण की वेला मे, हमदोनो ने
कभी किए जो वादे, उन्हे निभाना था।
(४२)
आज तुम्हे मै हरी दूब से नहलाऊँगा
सोने की करधनी प्यार से पहनाऊँगा
माथे पर चन्दन का टीका, नथ हल्की सी
पहनाऊँ, फिर तन को मन को सहलाऊँगा।
प्रीत-गगा
३७
(४३)
गगाजल से सुबह नहाना अच्छा लगता
मन्दिर मे फल फूल चढाना अच्छा लगता
किन्तु शाम होते ही मदिरालय चल देता
साकी का वह जाम पिलाना अच्छा लगता।
(४४)
टूटे जो सम्बन्ध, जोडना बहुत कठिन है
मिल जाये मन मीत, छोडना बहुत कठिन है
बड़े जतन से फूलो को माली चुनता है
फूलो के सग शूल तोडना बहुत कठिन है।
८
प्रीत-गगा
(४५)
तुम से क्या सम्बन्ध बनाया, तुम क्या जानो
मीत बनाया, गले लगाया, तुम क्या जानो
अब तो लगता प्यार धरा से खत्म हो गया
कैसे दिल का दर्द भुलाया, तुम क्या जानो।
--
---
--
Com
-
(४६)
जिन्दगी का पात्र खाली हो गया
कुछ
नही बाकी बचा सब खो गया
मर्म-भेदी पीर मन को सालती
प्रेम जाने किस गली मे खो गया है
प्रीत-गगा
३
(४७)
हो गयी जवान आज अधखिली कली
छोटे-से आँगन मे प्यार में पली
भँवरो ने देखा, वेहाल हो गये
गुनगुनाने लग गये, मच गयी खलबली।
(४८)
मुझे मिल गयी छाँव तुम्हारे आँचल की
वडी सुहानी लगती सरगम पायल की
लेप करो यदि हल्दी चन्दन प्रेम का
मरहम पट्टी कर देता है घायल की।
४०
प्रीत--
-गगा
.
(४९)
मदिरा पीकर जीने का अभ्यस्त हो गया
विना तुम्हारे प्राणप्रिये पथ अष्ट हो गया
अनगिन इच्छाओ ने मुझको घेर लिया है
पास बुला लो, इस जीवन से पस्त हो गया।
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(५१) ...
बीकाको
अमृत की गागर छलकाऊँ, आओ तो
माथे चन्दन तिलक लगाऊँ आओ तो
रूप तुम्हारा, एक नई दुलहन लगता
चित्र बनाऊँ, चूंघट जरा हटाओ तो।
प्रीत-गगा
४१
(५१)
साकी मेरी, मै उसका दीवाना था
मदिरालय जाना तो एक बहाना था
साकी ने जब जाम पिलाया हाथो से
अमृत रस था, उसको मुझे पिलाना था।
(५२)
प्यार करो प्यार तो उमग है तरग है
गीत है सगीत है मस्ती भरा अनग है
जिसने इसे पा लिया निहाल हो गया
चढ गया तो चढ गया यह अजीव रग है।
४२
प्रीत-गगा
प्रेम एक गीत है, बस गुन गुनाइये
प्रेम पूजा है इसे सबको बताइये
प्रेम अमृत धार है, मिल जाय तो कही
पीजिये खुद भी इसे, सबको पिलाइये।
---
--
--
-
Prem.
(५४)
चन्द्रवदन पर अलके नाचे इतराये
पवन झकोरे आये आँचल उड जाये
प्राणो मे हलचल स्पन्दन कुछ अजव व्यथा
नयन नयन से मिले परस्पर झुक जाये।
प्रीत-गगा
४३
--
बगिया मे फूलो को खिलते देखा होगा
पत्थर दिल को यहाँ पिघलते देखा होगा
जिसने प्याला पिया प्रेम का, खुशनसीव वो
मन्दिर मे प्रतिमा को सजते देखा होगा।
(५६)
शीश लगा लूँ अजुरि भरकर प्यार मुझे दो
मीत बना लूं जीने का आधार मुझे दो
स्नेह तुम्हारा सम्बल मेरा और प्रेरणा
देव बना लूँ पूजा का अधिकार मुझे दो।
४४
प्रीत-गगा
(५७)
ऑसू अनेक किस्म के होते है दोस्तो
आँसू खुशी के गम के भी होते है दोस्तो
सूखे हुए ऑसू अगर तुम देखना चाहो
देखो किसी गरीब की ऑखो मे दोस्तो।
(५८)
जाने पहचाने अनजाने लगते
पैसे से अव नाते रिश्ते बनते
पैसा ही सब कुछ, पैसा परमेश्वर
पैसे के पीछे दीवाने लगते।
प्रीत-गगा
४५
(५९) हर पल हर क्षण सूना सूना लगता है घर-आँगन मुझको वीराना लगता है भीगी भीगी पलके, नयन उनीदे से एकाकीपन भी अब अच्छा लगता है। (६०) जीवन एक जुआ है जी भर खेलो जीत कभी तो कभी हार भी ले लो विष का पान करो अमृत भी पीओ फूलो के सग काँटो को भी झेलो। ४६ प्रीत- -गगा
(६१)
अन्तिम बेला मे मुझको तुम, करुणा से नहला देना
कल्पवृक्ष की शीतल छाया मे तन को सहला देना
अमर वेल की सतरगी चादर तो मुझको भली लगे
सभी मित्र, परिवार जनो से गगाजल पिलवा देना।
--
4----
(६२)
सुबह शाम पूजा वन्दन करता हूँ
वाणी का मन से अर्चन करता हूँ
गीतो मे जो स्वय मुखर हो जाती
उस पीडा का अभिनन्दन करता हूँ।
प्रीत-गगा
। (६३) चाँद-चाँदनी कभी नहीं मिलते है पत्थर दिल क्या कभी कही हिलते है छन्दबद्ध गीतो के साये मे ही भावो के नूतन अकुर खिलते है। 1 (६४) प्रेम का नाता अमिय, मकरन्द दो हृदय का यह अमर अनुवन- प्रेम मे जो खो गया वह तर जिन्दगी का यह मधुरतम छन्द ४८ प्रीत-
(६५)
जब निगोडे नयन, नयनो से उलझते
प्रीत की गागर छलकती -तन महकते
प्यार देता प्रेरणा कुछ दर्द देता
जय मिले दोनो, निराले गीत बनते।
उनके आने पे रात हो जाये
विजली चमके बरसात हो जाये
मेरे पहलू मे सकून मिले उनको
आँखो-आखों मे यात हो जाये।
प्रीत-गगा
४९
(६७)
हर सन्ध्या हर रात सुहानी लगती
सावन मे बरसात सुहानी लगती
पिया मिलन मे जीत हार बेमानी
कभी कभी तो मात सुहानी लगती।
(६८)
हमने दुनिया मे सबको अपनाया
साये को भी हमने गले लगाया
प्रेम तपस्या और साधना पूजा
गीतो मे भी पूजा, शीश लगाया।
५०
प्रीत-गगा
कुछ सम्बन्ध सुहाने लगते है
कुछ अपने वेगाने लगते है
यह दुनिया तो एक अजूबा है
मुझको सव दीवाने लगते है।
(७०)
प्रेम का आधार होता है
प्रेम का विस्तार होता है
प्रेम मे दुविधा नहीं होती
दो हदय का प्यार होता है।
प्रीत-गगा
(७१)
प्रेम का सम्बन्ध ही सम्बन्ध है
जो समझ पाता नही, मतिमन्द है
प्रेम मीरा ने किया, विप पी लिया
प्रेम अमृत है, अमर अनुबन्ध है।
PRATA
(७२)
वन्द हो गया द्वार प्रेम का, क्या बतलाऊँ
मर्माहत तन प्राण हो गये क्या बतलाऊँ
प्राण प्रिये तुम मेरी मर्मव्यथा मत पूछो
ममता मृत्युदश बन गयी, क्या बतलाऊँ।
प्रीत-गगा
(७३)
कुछ सम्बन्ध निराले होते हैं
कुछ अनुवन्ध अजाने होते है
मदिरालय मे पीनेवालो के
कुछ अन्दाज सुहाने होते हैं।
-
(७४)
कुछ लोग मिले थे राहो में
हो गये समर्पित याहों में
अन्तिम वेला में जय देया
सब लोग बैंधे थे पाहों में।
प्रीत-गगा
(७५)
पैसा है मृग-मरीचिका, सब दौड रहे हैं
पेसे के लिए प्रियजनो को छोड रहे हैं
अव आदमी को आदमी अच्छा नहीं लगता
सम्बन्ध जो मधुर थे कभी, तोड रहे है।
(७६)
मैंने वच्चन का मन देखा भली लगी उसकी मधुशाला
नीरज की पाती भी देखी मुझे लगा अमृत का प्याला
यह दुनिया कितनी विशाल है मैं क्या जानें इसकी महिमा
एक अकेला चलता आया प्रेम नाम की जपता माला!
५४
प्रीत-गगा
(७७)
कल तुम मिली राह पर मुझको, जैसे कोई प्रीत पुरानी
मान सरोवर, स्वर्ग धरा पर, या फिर कोई नयी कहानी
मैंने जब आँसू ढलकाये, नयन तुम्हारे भी भर आये
सुख दुःख सब कह डाले मैंने, तुम चुप, निकली चतुर सयानी।
-
--
(७८)
तुम तो अपलक देख रही थी, अपनी पीडा दर्द छिपाया
नयनो से अमृत वरसा कर, मेरे तन मन को नहलाया
लेकिन वह दिन दूर नहीं है, जब तुम मन की व्यथा कहोगी
प्रीत प्रेम की बात करोगी, जब भी मैने तुम्हे बुलाया!
प्रीत-गगा
-न
(७९)
मुझको अपनी पीडा दे दो, अपना प्यार तुम्हे दे दूंगा
पलको के कुछ आँसू दे दो, मन का हार तुम्हे दे दूंगा
सुख दुख जीवन के दो पहलू, सदा रहे है सदा रहेगे
मेरे गीतो को स्वर दे दो, अमर सुहाग तुम्हे दे दूंगा।
(८०)
नही प्यार की कोई सीमा यह असीम है प्यार अमर है
साथ भीत का सदा सुहाना आत्म समर्पण प्रीत अमर है
इसका तो सम्बन्ध हृदय से तन का कोई काम नही है
तुम लगती हो राधा, मीरा इन दोनो का प्रेम अमर है।
प्रीत-गगा
(८१)
एक तुम्ही थे जीवन पथ पर जिसने मेरा साथ निभाया
जीने का आधार मिल गया, तुम ने तो वस गले लगाया
तुम क्या जानो, कैसा सुख मिलता है जय मै तुम्हे निहारूँ
तन का मन का ताप मिट गया, तुम ने तो बस हाथ दवाया।
---
B.JAME
(८२)
कब तक मुझ से दूर रहोगी कब तक अनु न बहने दोर्ग
तुम मेरी शाश्वत कविता हो मन की बात न कहने दोगी
तुम क्या जानो प्रेम दिवाना पत्थर को भी पिघला देता
ऐसी औषध तुम्हे पिलाऊँ तुम अमृत घट बनी रहोगी।
प्रीत-गगा
५७
(८३)
चन्दनी हवा चली, सिहर गयी कली-कली
गध प्रेम की उडी, निखर गयी गली-गली
अब तो बात फैल गयी प्यार की, बहार की
तृप्ति मिली नयनो को, प्रीत की बगिया खिली।
(८४)
तुम ने गाया मुझे लगा ज्यो मिली कठ को वाणी
मिली राम को सीता, शिव को पार्वती कल्याणी
साँस साँस मे तुम्ही बसी हो, तुम्ही प्यार का सागर
गीत तुम्हारे इनकी प्रीत पुरानी।
मेरे ऑसू
प्रीत-गगा
.
प्रेम भरी इस गागर से मैं आज तुम्हे नहलाऊँगा
जितनी निकट रहोगी मेरे, उतना मन सहलाऊँगा
जीवन की बस चाह यही है, सदा तुम्हारे साथ रहूँ
अमर करूँगा प्यार हमारा, ताज महल बनवाऊँगा।
सा
(८६)
ध्यान लगाकर चलनेवाला मजिल पा जाता है
मोह जाल मे फँसा हुआ कब आगे बढ पाता है
पथ पर माया जाल विछा है, दलदल भी पाओगे
जिसका मन गगा जल होता पार उतर जाता है।
प्रीत-गगा
५९
(८७)
लगी प्यास की आग बुझाने, शम्मा पर परवाने आये
तन की मन की प्यास मिटाने, मदिरालय दीवाने आये
कब अधरो की प्यास बुझी है, यह सारी दुनिया प्यासी है
धरती की भी प्यास अनवुझी, अम्बर ने मधु घट बरसाये।
(८८)
चाँद अमर है, सूर्य अमर धरा अमर आकाश अमर है
मन्दिर में भगवान अमर है, मस्जिद का अल्लाह अमर है
प्रीत अमर है प्यार अमर है, नारी का पृगार अमर है
मनुज मात्र परिधान बदलता, जनम अमर है मृत्यु अमर है।
६०
प्रीत-गगा
(८९) मैं हूँ अमृत का घट पीओ और पिलाओ मै हूँ यमुना का तट, तुम बाँसुरी बजाओ सच कहता हूँ, तुमको राधा मिल जायेगी एक बार तुम श्याम नाम का दीप जलाओ। Risamund (९०) तुमको खोकर ऐसा लगता, खो दी मैने दौलत सारी यह कैसी है किस्मत मेरी, मैंने तो हर बाजी हारी बिन साथी के, विना प्रेम के, जीने में कुछ मजा नही है मुझे अकेला छोड गयी क्यो, तुम निकली पगलायी नारी। प्रीत- -गगा ६१
(९१)
गध प्यार की फैल गयी, उन्मुक्त हवाओ मे
प्रेम हो गया मुखरित चचल मस्त निगाहो मे
उनका हर अदाज निराला, साथ लगे सतरगा
स्नेह रागिनी लगी गूंजने दशो दिशाओ मे।
(९२)
प्रेम सुवासित हो जाता मकरद भरी पखुरियो से
बगिया महक उठा करती है फूला से कुछ कलियो से
कोई भी तो प्रेम कथा का जिक्र नहीं करता है
लेकिन गीत मिलन के गूंजे रात अटारी गलियो से।
દુર
प्रीत-गगा
(९३)
आज न जाने क्यो मेरा मन, कुछ हलका हलका लगता है
दुआ किसी ने मांगी होगी, मेरा अन्तरमन कहता है
यह भी हो सकता है उनको, मेरी याद सताती होगी
या फिर हृदय तोडने का पछतावा ऑसू बन बहता है।
Soni---
(९४)
एक बार यदि तुम मिल जाती, चलते चलते राहो मे
शायद तुमको भर लेता मैं, अपनी पायन वाहो मे
नयन नयन से बाते होती द्वार प्रीत के खुल जाते
कुछ जादू टोना हो जाता, चचल चपल निगाहों में।
प्रीत-गगा
(९५) भेरा तन मन प्यासा प्यासा, प्यारा तुमारी भी बाकी है मृत्यु द्वार पर य एए हम, अन्तिम मिलन अभी बाकी है एक साथ विष पी जाये एम, एक नया इतिहास रचेगे अनगिन गीत लिये, कुछ गाये, अमर गीत तियना बाकी है। (९६) प्रीत प्यार मे याहुपाश मे, तन का जलना, मन का जल- बहुत सुहाना लगता होगा, अधरो का अधरो पर पलन फिर भी प्यास अधूरी रहती व्याकुलता बढ जाती होग सच कहना क्या हृदय तुम्हारा सह पायेगी ऐसी छलन- ६४ प्रीत-गंग
(९७)
तुमने मुझको वहुत सताया, आज न तुमको सोने दूंगा
खुशियो से झोली भर दूंगा, आँचल नही भिगोने दूंगा
आँसू हैं अनमोल तुम्हारे, दुनियावाले समझ न पाते
मैं चुपके चुपके से लूँगा, लेकिन तुम्हे न रोने दूंगा।
-
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(९८)
एक नयन मे अश्रु तुम्हारे, दूजे मे शीतल जल धारा
कुछ भी समझ नहीं पाता मैं, यह कैसा है रूप तुम्हारा
ममता की प्रतिमा बनती हो और कभी रणचण्डी काली
मैं करता हूँ आत्म समपर्ण, तुम जीती मैं सब कुछ हारा।
प्रीत-गगा
६५
(९९)
आशीर्वाद मुझे तुम दे दो, सारे पुण्य तुम्हे दे दूंगा
कुछ अपनी पीडा भी दे दो, खुशियो से झोली भर दूंगा
खुशबू चन्दन की फैलेगी, महक उठेगी गध प्यार की
तुम अपना पावन मन दे दो, पुष्पित नन्दन वन दे दूंगा।
(१००)
शायद मै इस योग्य नही था आशीर्वाद नहीं ले पाया
मैंने अनगिन पाप किये है एक पुण्य भी नहीं कमाया
झोली मे कुछ भी दे देती, पाकर तृप्ति मुझे मिल जाती
अब जाने कब शान्ति मिलेगी, मैंने जीवन व्यर्थ गॅवाया।
દદ
प्रीत-गगा
(१०१)
कही पढ़ा था भीख न माँगो, इससे तो अच्छा मर जाना
साधु भीख न माँगेगा तो, कैसे जीयेगा विन खाना
क्या घट जाता यदि झोली मे, मुट्ठी भर चावल दे देती
आशीर्वाद तुम्हे मिल जाता, पा जाती अनमोल खजाना।
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(१०२)
तुम चाहे जितनी पीडा दो, आशीर्वाद हृदय से दूंगा
मेरा मन पावन जल धारा, तन मन के सव ताप हरूँगा
नीलकठ मैं गोरीशकर अमृत भी विप भी पी लूँगा
लेकिन तुम्हे वचन देता हूँ तुमको तो बस अमृत दूंगा।
प्रीत-गगा
६७
(१०३)
स्पर्श हमारे प्रथम मिलन का और तुम्हारा आत्म समर्पण
अधरो की वह प्यास तुम्हारी, नयनो का वह मौन निमत्रण
सच कहता हूँ प्राण प्रिये, वै मादक क्षण, वह मिलन यामिनी
मिलन पर्व वह कितना पावन, जैसे राधा का वृन्दावन!
(१०४)
बहुत सहज है गाँठ लगना, गाँठ खोलना बहुत कठिन है
बहुत सहज है झूठ बोलना, सत्य बोलना बहुत कठिन है
मैने देखा इस दुनिया मे पाप कही तो पुण्य कही है
वहुत सहज है पाप जोडना, पुण्य जोडना बहुत कठिन है।
६८
प्रीत-गगा
(१०५)
बहुत कठिन यह तत्व समझाना, तुम किस के हो कौन तुम्हारा
कहो कहाँ से आये हो तुम, और कहाँ गन्तव्य तुम्हारा
मुट्ठी बाँध यहाँ आये थे, खाली हाथ पडे गा जाना
हर प्राणी से प्रेम करो तुम, प्रेम अमर, यह अमृत धारा।
--
--
3-
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RISHAN
(१०६)
सोना चाँदी, हीरा पन्ना, मुझको लगता गोरख धधा
पैसे ने क्या जाल विछाया, बना दिया मानव को अधा
प्रेम धरा से मिट जायेगा, यदि तुम फिर अवतार न लोगे
हे राधा के श्याम सलोने, धरती पर लावो शिव गगा।
प्रीत-गगा
६९
(१०७)
तुम शीतल जल की धारा हो, मै जी भर कर स्नान करूँगा
तुम मधुरस की गागर हा मे अधरा से मधु पान करूँगा
तुम बन जाओ प्रीत दिवानी, जे से राधा मीराबाई
पाप पुण्य सब तुम्हे समर्पित, अर्पित तन मन-प्राण करूँगा।
(१०८)
तुमने मुझे उढायी चादर, वह तो कितनी स्नेह भरी थी
भवसागर भी पार कराया वह तो अद्भुत एक तरी थी
सुखद सुहानी नीद आ गयी, लगी प्रेम की वारिस होने
पाप धुल गये मन की बगिया नन्दन वन सम हरी हरी थी।
प्रीत-गगा
७०
(१०९)
मैने विन सोये काटी है, तुम क्या जानो कितनी राते
फिर भी कथा अधुरी ही है, अब तो पूर्ण करो सब बाते
प्यास कभी क्या मिट पायी है, आशा भी है एक छलावा
अव तो ले लो शरण तुम्हारी, तोड चुका सव रिश्ते नाते।
SR.
(११०)
तुम लगती शाश्वत कविता सी, मै हूँ शाश्वत छन्द तुम्हारा
साथ रहे हम साथ रहेगे, अमर प्रेम अनुबन्ध हमारा
मुझको पीडा मिली धरा पर, तुम प्रतिमा हो प्रीत प्रेम की
प्रेम मुझे यदि कुछ दे दोगी, मिल जायेगा मुझे किनारा।
प्रीत-गगा
७१
(१११)
भूल गये हम गाँधी और सुभाष को
भारत के गौरवशाली इतिहास को
नेताओ। शोपण समाज का वन्द करो
अर्जित कर लो जन भन के विश्वास को।
(११२)
भारतदेश मान एमारा नारा
एम मारतवासी, या देशागारा
या भूमि है रान्तों की, रणवीरों की
मागभूगि हित गरना धर्म rमारा !
२
प्रीत-गा
प्राण प्रिये तुम अपना मुझे बनाओ तो
.
मन पुलकित हो जाये, तन का ताप मिटे
हर सन्ध्या, हर रात सुहानी वन जाये
शरद चाँदनी की शीतलता प्राणो को
नव उमग दे नयी कहानी वन जाये
अधरो की अनबुझी पिपासा शान्त करूँ
मेरी बाहो के घेरे मे आओ तो
प्राण प्रिये तुम अपना मुझे बनाओ तो।
मैं बन्धन से मुक्त धरा का प्राणी हूँ
मादकता यौवन की, शीतल जल धारा
तिमिर हरण करनेवाला दीपक हूँ म
नील गगन का वासी एकल ध्रुवतारा
तुम मेरे गीतो का अमृत पान करो
वची खुची अधरो से मुझे पिलाओ तो
प्राण प्रिये तुम अप
मुझे बनाओ तो।
सपने मुखरित हो, तारो से माँग भरूँ
हाथो मे हलके से कँगन पहनाऊँ
काजल नयनो मे पॉवो मे पायलिया
अनछूयी ये देह तुम्हारी सहलाऊँ
तुम मेरे ऑगन की पावन तुलसी हो
मन के गङ्गाजल मे स्नान कराओ तो
प्राण प्रिये तुम अपना मुझे बनाओ तो।
प्रीत-गगा
७३
बीती वाते याद करे, मन बहलाये।
याद करे वह प्रथम मिलन, स्वर्णिम पल क्षण
आत्म समर्पण तृप्ति परस्पर आलिङ्गन
नयनो से नयनो का मिलना, झुक जाना
अधरो से अधरो का अभिनव अभिनन्दन
साथ साथ जीने की मरने की कसमे
एकबार फिर प्राण प्रिये तन दुलराये
वीती वाते याद करे, मन बहलाये।
याद मुझे है ऑचल की शीतल छाया
शरद चाँदनी के साये मे प्रणय कथा
सुबह सवेरे मिलन जनित सुख नयनो मे
प्राणो मे हलचल स्पन्दन कुछ अजब व्यथा
रूप तुम्हारा जादू जैसा अमृत घट
सञ्चित सुधियो को हौले से दुलराये
वीती वाते याद करे मन बहलाये।
याद करे वह मॉग-सितारो से शोभित
नथ का अधरो को छू लेना, खिल जाना
पाँवो मे पायल का झनक झनक वजना
नूपुर से निसृत ध्वनि से स्वर मिल जाना
गीत मिलन के अनगिन हमने गाये थे
आज उन्हे स्वर दे सस्वर मिल कर गाये
बीती वाते याद करे मन बहलाये।
७४
प्रीत-गगा
तुम नयनो मे काजल जरा लगाओ तो।
खिल खिल जाये रूप नयन मे प्रीत पले
दूर कही लहरो मे हलचल मच जाये
तृप्ति मिले प्राणो को, मन के फूल खिले
गीतो मे भावो के अकुर खिल जाये
हर पल हर क्षण सुखद सुहाना बन जाये
अमर करो गीतो को सस्वर गाओ तो
तुम नयनो मे काजल जरा लगाओ तो।
देखी कितनी बार तुम्हारे नयनो मे
मिलने की अभिलाषा वेगवती सरिता
सागर की लहरो की चचलता देखी
इन्द्रधनुप सी सतरगी शाश्वत कविता
वाणी का सगीत सुरीला बन जाये
मेरे गीतो के सरगम पर गाओ तो
तुम नयनो मे काजल जरा लगाओ तो।
सन्ध्या के सुरमयी क्षितिज के द्वार खुले
गीले केशो को हौले से छिटकाओ
हर राही को मजिल का पथ मिल जाये
दिव्य ज्योति नयनो से पथ पर फैलाओ
कोई नही पराया इस ससार मे
मन गगा मे सब को स्नान कराओ तो
तुम नयनो मे काजल जरा लगाओ तो।
प्रीत-गगा
७५
गीतो की बरसात करूँ, तुम गाओ तो।
फूल विखे तुम जिस पथ पर पाँव धरो
नयन विछाऊँ, नया नीड निर्माण करूँ
बाहो मे भर लूँ, ऊरोज प्रकम्पित हो
तृप्ति मिले तन मन को अर्पित प्राण करूँ
द्वार हृदय के खोलूँ, पीडा व्यथा कहूँ
खुलकर मन की बात कहूँ, तुम आओ तो
गीतो की बरसात करूँ, तुम गाओ तो!
प्रथम मिलन के वे मादक क्षण याद करे
कभी न वुझनेवाली प्यास हमारी थी
बढती गयी पिपासा जितना प्यार किया
जाने कितनी राते साथ गुजारी थी
जीवन की अन्तिम घडियो मे प्राण प्रिये
सतरगा स्नेहिल आँचल लहराओ तो
गीतो की बरसात करूँ, तुम गाओ तो।
अधरो से अधरो पर अद्भुत चित्र बने
अलसायी यह देह तुम्हारी खिल जाये
मॉग सितारो से भर दूं शृगार करूँ
नयन नयन से उलझे सुलझे मिल जाये
कनक भाल पर शीतल चन्दन लेप करूँ
चन्द्रवदन से घूघट जरा हटाओ तो
गीतो की बरसात करूँ, तुम गाओ तो!
६
प्रीत-गगा
सोयी पीर जगी जाती है, कौन मधुर स्वर मे गाता है।
वन्द करो मधु रस की बाते
अव न रही वे सुखमय राते
छलक उठी नयनो की गगरी
अधिक न और सहा जाता है
सोयी पीर जगी जाती है कौन मधुर स्वर मे गाता है।
हृदय न प्रेयसि प्यार मॉगता
जीवन नही बहार माँगता
छा जाये पतझड धरती पर
क्यो मादक वसन्त आता है
सोयी पीर जगी जाती है कौन मधुर स्वर मे गाता है।
छिटक रही क्यो आज चाँदनी
दमक रही क्यो आज दामिनी
प्रकृति नटी का नर्तन रोको
अन्तर विकल हुआ जाता है
सोयी पीर जगी जाती है, कौन मधुर स्वर में गाता है।
मधुकर आज न गीत सुनाये
कहो वीण से आज न गाये
कवि बैठा एकान्त विरह के
गीत सृजन करता जाता है
सोयी पीर जगी जाती है, कौन मधुर स्वर मे गाता है।
प्रीत-गगा
गीतो की सरिता को अविरल वहने दो।
जीवन पथ पर हमने क्या क्या नहीं किया
विप के घुट पिये, कुछ अमृत पान किया
अँधियारी रातो में भी हम साथ चले
एक दूसरे की वॉहो को थाम लिया
प्यार तुम्हारा जीने का आधार बना
मन की पीडा व्यथा कथा भी कहने दो
गीतो की सरिता को अविरल वहने दो।
साँझ ढले तुम नदी किनारे आ जाना
मिलकर हम तुम मधुर स्वरो मे गायेगे
प्यारा प्यारा मौसम मन की बात करे
अन्तरङ्ग कुछ यात तुम्हे बतायेगे
मुझ से मत पूछना कि कितनी पीडा है
पीडा क्यो है कैसी है, वस सहने दो
गीतो की सरिता को अविरल बहने दो।
चाँद चाँदनी के साये मे प्यार पले
रूप तुम्हारा लगे सुहाना मन भाये
अधरो से अमृत की वारिस होने दो
बोल तुम्हारे मन की पीडा दुलराये
तुम मेरे जीवन की आशा किरण वनो
अर्पित तन मन प्राण हृदय मे रहने दो
गीतो की सरिता को अविरल बहने दो
.
प्रीत-गगा
याद तुम्हारी आ जाती है
व्याकुल तन मन देख चाँदनी
मायाजाल उढा जाती है
याद तुम्हारी आ जाती है
भाल तुम्हारा चन्दन चर्चित
चन्द्रमुखी सा वदन तुम्हारा
नयन तुम्हारे गगा जमुना
अधरो पर अमृत की धारा
प्राण प्रिये वह रूप तुम्हारा
सोयी पीर जगा जाती है
याद तुम्हारी आ जाती है।
हर पल हर क्षण रसमय बाते
आत्म समर्पण की वे राते
हृदय तुम्हारा वहती सरिता
स्नान कराना आते जाते
प्राण प्रिये कैसे बतलाऊँ
वरवस मन अकुला जाती है।
याद तुम्हारी आ जाती है।
स्वर्णिम सपनो मे खो जाते
देखा करते चाँद सितारे
गीत बना कर सस्वर गाना
याद मुझे है नदी किनारे
प्राण प्रिये झकार स्वरो की
कविताओ पर छा जाती है।
याद तुम्हारी आ जाती है।
प्रीत-गगा
७९
स्पर्शा मुझे स्पर्श मे मत ढूँढो
क्योकि
यह एक भावना मात्र है
यह एक अहसास है
एक अनुभूति है
इसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है।
मुझे स्पर्श मे मत ढूँढो
क्योकि
तुम्हे भी इसका अनुमान है
तुम इसमे सम्मिलित हो
तुम इससे प्रभावित हो
इसे अनुभव करते हो।
मुझे स्पर्श मे मत ढूँढो
क्योकि
यह एक भावनात्मक अभिव्यक्ति है
यह एक आकर्षण है
यह एक मनोकामना है
एक आत्म निरीक्षण है।
मुझे स्पर्श
मत ढूँढो
क्योकि
यह जो कुछ भी है इसे वैसे ही रहने दो
इसे कभी भी आत्मसात् करने की कोशिश मत करो
क्योकि
स्पर्श मात्र से ही अहसास जनित
उत्कण्ठा विलुप्त हो जाती है
अनुभूति समाप्त हो जाती है और उसकी जगह
ले लेते हैं अनगिनत रिश्ते नाते।
८०
प्रीत-गगा
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mmam प्रेम-गीतों के रचयिता श्री मुरारीलाल डालमिया के प्रति भावविभोर कुछ अभिव्यक्तियाँ Janatun Sweethereas Summam seart-pa Marameri fura fang: Aangesna Sarees, 9 Elgin Road hollats -00 020 श्री नथमल केडि (साहित्य महोपाध्या भाई मुरारीलाल डालमिया के कवि से मेरा परिचय पाँच दशक पहले हु था जब उसका कवि अपने यौवन की पखुरियाँ खोल रहा था। उस उस के व की कविता मे-“सय कुछ लिख दूँ तेरे नाम/गीतो की यह पावन गगा काशी मः धाम/अधरा पर अकिंत कर दूं जो शाश्वत एक प्रणाम! जैसी पक्तियाँ सुनकर : चमत्कृत सा हो जाता था। तब वे बडे उत्साह से झूम झूम कर कविताओ का प करते थे। अस्तु! पर उसके बाद डालमियाजी की काव्य सरस्वती एकाएक सुषुप्तावस्था यल्कि ज्यादा मोर्जे शब्द होगा-मूर्छितावस्था मे आ गई। बीच बीच मे उ जागरण भी होता था क्योंकि १९८३ ८४ मे वे अर्चना की मासिक काव्य गोष्ठी शरीक होकर कविताएँ सुनाया करते थे और १९८५ मे प्रकाशित 'मधुवर्षिण (अर्चना के कतिपय कवियो के सकलन) में उनकी कविताएँ भी प्रकाशित हुई उसके एक लम्बे अन्तराल के बाद सन १९९९ मे उनकी काव्य पुस्तक 'शाश्व एक प्रणाम हाथ मे आई तो आनन्द व सन्तोष हुआ। इतनी दीर्घ अवधि त कविताओ को अपने मे जीवित रखना बहुत ही जीवट एय लगन का काम लर श्री डालमिया ने शायद अपनी इस लगन को दर्शाने के लिए ही लिखा है-- में की हर किरण को मिले ज्योति कण/इसलिए रात भर दीप जलता रहा। पर इस बीच बहुत कुछ बदल भी चुका था। सुखी एव परितृप्त दाम्पर जीवन के बीच उनकी सहधर्मिनी दिवगत हो गई। माई डालमिया के लिए य अनन यजपात था वे उसके विछोह मे दिगभ्रमित से थे कि न जाने किस नेपर से उनकी काव्य प्रिया का आगमन हो गया। उसने आते ही जेसे इन्हे अप बाहुपाश मे कस लिया। शायद दोनो की आँखे अश्रुपूरित थी एक की अपर जीवन सगिनी के विछोह मे तो दूसरे की योग्य जीवन साथी मिल जाने व आकाक्षा पूर्ति से। तव से डालमियाजी दोनो को एक दूसरी मे देखने लगे- स्पर्श हमारे प्रथम मिलन का और तुम्हारा आत्म समर्पण अधरो की वह प्यास तुम्हारी नयनो का यह मोन निमत्रण सच कहता हूँ प्राण प्रिये वे मादक क्षण यह मिलन थामिनी मिलन पर्व वह कितना पावन जैसे राधा का वृन्दावन। कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने लिखा है-अलौकिक आनन्देर भाग/विधात जाहारे देय/जार वक्षे वेदना अपार/तार नित्य जागरणा कविगुरु की ये पक्तियं कवि डालमिया पर पूरी तौर पर चरितार्थ होती है। इनका कहना है कि प्रीत गगा के मुक्तक इनके द्वारा नहीं लिखे गये बल्कि इनके मानस पर अवतरित हु हैं-अनेक रात्रियो मे 'जार वक्षे वेदना अपार तार नित्य जागरण इन्होने किया है और भी एक बात यह कहते है कि इस काय्य सृजन मे उहोने अपनी सरस्वत का परद हस्त जितना प्रत्यक्ष किया है उतना ही प्रत्यक्ष अपनी दियगता पत्नी/ प्रेयसी के सान्निध्य को किया है। वे 'शाश्वत एक प्रणाम मे कहते भी है- 'प्रेयसी के स्नेह का ऑचल / प्रणय का सगीत बन जाता आसमाँ से बरसता वादल / इस धरा पर गीत बन जाता। गीत की गाथा नही होती गीत का आधार होता है प्रेम की सीमा नही होती, प्रेम का विस्तार होता है।' सचमुच पति पत्नी के प्रणय व्यापार मे कितना आयतन होता है, कितनी गहराई होती है उसके मापने का आज तक कोई पैमाना नही बना है। एक दृष्टान्त दे रहा हूँ उस एक महान व्यक्ति का जिसने आजीवन अघ-श्रद्धा व अघ विश्वास को नकारा उसके विरोध में प्रचार किया पर लोगा ने यह देखकर दातो तले अगुली दवा ली जव उनकी मृत्यु के बाद वसीयतनामा देखा गया तो मालूम हुआ अनेक वर्षो पहले दिवगता हुई पत्नी की भस्मी को उन्होने बडे यत्नपूर्वक अपनी तिजोरी में सुरक्षित रखी हुई है और उनकी हिदायत है कि उनकी भस्मी तथा पत्नी की भस्मी को मिलाकर एक साथ गगा में प्रवाहित की जाये। इस महान पुरुप का नाम हैं प० जवाहरलाल नेहरू। बताइये इस भावना को आप किस परिमापा म बाँध कर देखेंगे? फिर यदि कवि डालमिया कहे कि ये मुक्तक या तो मेरी सरस्वती ने लिखे है या पत्नी ने तो हमे उनकी भावना का आदर करना चाहिये। हाँ इस बात का मैं साक्षी हूँ कि इन दिनो वे एकदम इन मुक्तको को ही जीते रहे-इन्ही मे गहरे डुवे रहे निमज्जित रहे! प्रीत गगा के नाम को साथक करनेवाले इनके दो मुक्तको को यहाँ उद्धृत कर में सुधी समाज से निवेदन करना चाहूँगा कि वे प्रीत गगा म पूरी तौर पर अवगाहन करे और तन मन को नयी ऊर्जा से अभिषिक्त करे प्रेम एक गीत है बस गुन गुनाइये प्रेम पूजा है इसे सबको वताइये प्रेम अमृत धार है मिल जाय तो कही पीजिये खुद भी इसे सबको पिलाइये। प्रेम का नाता अमिय मकरन्द हे दो हृदय का यह अमर अनुवन्ध हे प्रेम मे जो खो गया वह तर गया जिन्दगी का यह मधुरतम छन्द है। इति शुभमा श्री मुरारीलालजी डालमिया कोलकाता के काव्य रसिक समाज के पुराने परिचित रघनाकार है। रूमानी घेतना के इनके गीत पुराने मध पर बहुत लोकप्रिय रहे हैं। यही इनकी कविता की मूल सवेदना है जो इनकी परिणत यय में भी यथावत् बनी हुई है। कयिता ही है जो मुरारीलालजी के मन को उम्र और साँझवेला के अवसाद से अप्रमावित बनाये रहती है और ये उल्लसित चित्त से छन्द रचते रहते हैं। सत्तर पीय श्री मुरारीलालजी के ताजा गीतो में एक युपा मन की भावाभिव्यक्ति इनकी जीवन प्रियता को ज्योतित करती है। कविता का बुनियादी अनुशासन डालमियाजी ने आधार्य ललितप्रसाद सुकुल के सान्निध्य में रह कर बडी जागरूकता से अर्जित किया है। इसलिये इनके छन्दों म स्खलन नहीं दिखाई पडता। शिल्प विधान के प्रति ऐसी सजगता केवल उन्ही में दिखाई पड़ती है जिसकी प्राण-नाडी के साथ कपिता जुडी हुई है। श्री मुरारीलालजी डालमिया की सृजनशील यात्रा ऊर्जा-सम्पन्न बनी रहे और मायुक मन बुढाती की उदासी से अप्रमायित रहे यही मन कामना है। डॉ. कृष्णबिहारी मिश्न कोलकाता वरिष्ठ साहित्यकार पहले पाठक की ओर से दशको वाद मुरारी भाई को सुना फिर 'शाश्वत एक प्रणाम पढा और "प्रीत गगा मे गोता लगाने का अयसर भी उन्हाने दिया। भीगता सा कई बार उभरा लगा मैं पिछले क्षण दूसरे शब्द ससार म था! किनारे आकर बैठा तो सोचने लगा-काशा में भी किसी ऐसे ससार मे कुछ दिन रह लिया होता जैसे मुरारीमाई खोये हैं। मैं भी खोया रहता। यूँ खोये रहने मे बनी बहुरगी मन स्थितियो को उन्हाने मापा और छन्द के विशेष शिल्प म ये स्वय को भूले से रहे हैं। स्मृतिया को उजाला भी है उसे अपने साथ पाकर ही- ध्यान लगा कर चलनेवाला मजिल पा जाता है जिसका मन गगा जल होता पार उतर जाता है। इस पार में भी उनफा प्यार मूर्त-अमूर्त में साथ है तो उस पार भी यही है। वे उसे मात्र बाहर से ही नही देखते उसके भीतर को पूरा अपने मे उतारने का यल करते कहते है- 'नयनो की भाषा पढना आसान नहीं है। ऐसे ही क्षणो मे धुधलाया सा बादल बीच मे आ जाता है। उन्ह लगता है जिसे मैं पढ देख रहा था यह सामने नही हैं फहाँ चला गया शायद विछड गया है। "जीयन पथ पर चलते चलते बिछड गए हम पर ऐसे क्षण भी उनकी अन्तरगता के सामने लम्बी उम्र नहीं ले पाते। इस तरह के क्षणो पर ये झीनी झीनी ढाके की मलमल डाल देते हैं- मुझमिल गया छाप तुम्हार आपल का यडी सुहानी लगती सरगम पायल की। प्रकृति और अपने आस पास के उपादानो के सहारे छन्दो की एक लम्बी कतार अपने पाठक के सामने रखते जाते है। इस कतार में एक साधक रूप में अपने प्रेम के साथ ही चारों ओर के कई दृश्य देखते दिखाते हैं- 'यहुत सहज है पॉप फिसलना, यपफर चलना बहुत कठिन है। 'यहुत सहज सम्यन्ध बनाना किन्तु निमाना बहुत कठिन है। सम्बन्धो के निर्यहन म उन्हें क्या क्या सहना पडा। यह मन स्थिति किसे दिखाएँ उसे ही बुलाते कहते हैं- अपने कैसे हुए पराय क्या बतलाऊँ ? व्यक्ति अपने व्यवहारिक रूप मे तो तीन काल जीता ही है। शब्द रूप में भी यह तीनो फाल उसके साथ रहते है। मुरारी माई वीच के काल की छाया ही पकड पाते हैं। शायद इसलिए कि उन्ह यह क्षणभगुर लगता है। ये अतीत के सुखद और पिछोह के क्षणो को सहेजते हुए चलते हैं। ऐसे मे ही उन्हे अपने होने का सामर्थ्य लगता है। ये चीती बातो को याद करते हुए यूँ मन बहलाते हैं। यह भी अकेले नही अपने अतरग के साथ- "सच कहता हूँ प्राणप्रिये ये मादक क्षण यह मिलन यामिनी इसी तरह गीत की बरसात मे भीगते हैं उसी सरिता मे नहाते हुए चलते है। यूँ यात्रा करते हुए जव भी उन्ह छूछू कर गुजरते क्षण टूफते से लगते हैं तब ये अध्यात्म के शब्द उन क्षणा को सुनाते लगते हैं- मनुज मात्र परिधान बदलता जन्म अमर है, मृत्यु अमर है! ऐसे ही किसी क्षण में मृत्यु को सामने देख कर उस से प्रश्न भी कर लेते है और उत्तर भी स्यय दे देते हैं- "मौत मेरे द्वार पर तुम क्यो खडी हो मै अमर हूँ पाप के घट भर गए उनको उठा लो मैं अमर हूँ। शब्द का रचना रूप अपने धारक भय से मुक्त होना सिखाता है। फिर भय प्रलोभनो का हो अथवा मृत्यु का इसी छन्द इसी लय और इसी मापा के साथ शब्द धारक स्यय को भय से मुक्त कर लेते है। यह उनकी उपलब्धि मानी जानी चाहिए। इस पाठक को प्रेम की गगा यानी 'प्रीत गगा म नहा नहा कर किनारे बैठकर लगा कपि बीते क्षणो मे ही सपने देखने म खोया रहा है। इन मे खोया खोया भी छू छू कर गुजरते उन परिदृश्यो को पकड पाता तो शब्द रूप म उनसे उभरा यह ससार पाठक को और बडा लगता! भापा छन्द और लय का एक और रूप उन्हें अपन करीव लगता। छूछू कर गुजरनेयाले क्षणा की छाया भर पकडने म ही कवि को लगा कि ये सजोये को इसी भाषा और इसी छन्द म बाँधने में अपने होने का साथक्य मानते है। यह पाठक उनके रचना ससार के व्यापक होने की कामना करता है और आशा करता है कि हिन्दी क्षेत्र दौडते समय के बीच रचे इस ससार की झलक लेगा। श्री हरीश भादानी कोलकाता वरिष्ठ कवि --- ---- MAN m Com Cus- 'प्रीत गगा' के निमित्त श्री मुरारीलाल डालमिया का काव्य सग्रह 'प्रीत गगा दूसरा काव्य सग्रह है। पहला 'शाश्वत एक प्रणाम १९९९ मे प्रकाशित हुआ था। इस सग्रह मे बहुत सरस और सधे हुए गीत हैं। अत में १२ मुक्तक दिये हुए हैं। सयोग यह बना होगा कि मुक्तको की रचना प्रक्रिया चलती रही होगी अधिक होने पर कवि ने अलग से प्रीत गगा नाम देकर मुक्तकों का सग्रह भी छपवा लिया है। इसमे भी कुछ गीत और कविता अत में दी गई हैं। यह अपने आप में एक आश्चर्य है कि मुरारीलालजी की पत्नी और प्रेयसी एक ही शरीर के दो भावनात्मक रूप हैं। यह और कहीं शायद ही सम्भव हुआ हो। इस अकेली साधना आराधना और समर्पण भावना के लिए कवि प्रशसा का पात्र है! "प्रीत गगा सग्रह मैंने पटा है। प्रीत ही वास्तव मे गगा है। प्रीत नही हो तो गगा केवल पानी भर है। किस मनुष्य का मन किस आयु मे, कितना तरल हो जायगा यह अनिश्चित ही है। मन जितना तरल होगा सवेदना भी उतनी ही बढती जायेगी। कविता सदेदनशीलता की ही लहर है। भीत गगा एक मुक्तक संग्रह है। जीवन के अनेक प्रिय पल कवि प्राणों को विकल कर गये है वही विफलता शब्द देह घर कर पक्तियो में रूपायित हो गई है। प्रेम के विषय में कुछ पक्तियाँ अद्भुत हैं!
'हूब जाओ स्वच्छ तन मन प्राण वर लो प्रेम का हरिद्वार है यह प्रीत गगा।" कबीर का 'ढाई आखर भी यही है। हरि का द्वार भी यही है। बहुत स्थानो पर एक सुभापित लिखा मिलेगा 'प्रम ही ईश्वर हैं। कवि के लेखन का मूल प्रेम ही है। 'जिसका मन गगाजल होता पार उतर जाता है। पार उतरने के लिये मन का गगाजल हो जाना आवश्यक है। "प्रेम मे जो खो गया वह तर गया जिन्दगी का यह मधुरतम छद है। 'प्रेम का सम्बन्ध ही सम्बन्ध है जो समझ पाता नहीं मतिमन्द है प्रेम मीरा ने किया विष पी लिया प्रेम अमृत है अमर अनुवन्ध है। प्रेम की अनुभूति कवि को बहुत गहन रूप में हुई है। 'कल फिर याद तुम्हारी आयी रोया सारी रात कुछ स्मृतियो मे कुछ गीतो मे खोया सारी राता' प्रेम के मैं गीत लिखता प्रेम का मैं हूँ पुजारी प्रेम तो मरता नही है लौट जाओ मै अमर हूँ। सासारिक मोहजाल ही है जो मनुष्य को अत तक भटकाता रहता है। कवि कहता है- 'यह धरा तो एक मायाजाल है बस तुम स्वय से मोह का पर्दा हटा लो। यह पर्दा हट जाय तो फिर अच्छा बुरा पाप पुण्य जीव वा सभी को वास्तविकता का सही आभास हो जाता है। मुरारीलालजी कहते है- क्या पाप पुण्य क्या भला बुरा इसकी परिभाषा बहुत कठिन है मन्दिर मस्जिद मदिरालय मे अदाज लगाए जाते है। 'प्रीत गगा के अत मे कुछ गीत भी कवि ने दिये हैं जिनकी सरसता मुक्तको से अलग है- सोई पीर जगी जाती है कौन मधुर स्वरो मे गाता है वद करो मधुरस की बाते अब न रही वे सुखमय रात छलक उठी नयनो की गजरी अधिक न और सहा जाता है। ७ ‘याद तुम्हारी आ जाती है व्याकुल तन मन देख घाँदनी मायाजाल उढा जाती है।' जीवन की सारी समस्याये भावुक मन को बहुत गहरे तक स्पर्श करती ही हैं। इस समय पैसा बहुत बड़ी समस्या है। सम्पूर्ण जन जीवन का केवल यही केन्द्र बन गया है। इस मृग मरीचिका में सभी अर्थ हो गये हैं। मुरारीलालजी लिखते हैं- "पैसा है मृग मरीचिका सव दौड़ रहे हैं पैसे के लिये प्रियजनो को छोड रहे हैं अब आदमी को आदमी अच्छा नहीं लगता सम्बन्ध जो मधुर थे कभी तोड रह हा पैसे से ही अब रिश्ते नाते बनते जाने पहचाने अनजाने लगते पैसा ही माई वाप यहाँ सवको सब पैसे के पीछे दीवाने लगते। भारतवर्ष मे जन्म लकर यहां की माटी मे रम कर भावुक व्यक्ति इस अपनी मातृभूमि के गीत भी गायेगा ही। यह भी प्रेम भावना का ही एक रग है। प्रम से अलग कुछ है ही नहीं। मुरारीलालजी ने भी अपने मुक्तको मे देश को और देश के नेताओ को अपने शब्द सुमन अर्पित किये हैं। भूल गये हम गाधी और सुभाष को भारत के गौरवशाली इतिहास को नेताओ। शोषण समाज का बन्द करो अजित कर लो जन मन के विश्वास को। भारत देश महान हमारा नारा है हम भारतवासी यह देश हमारा है यही भूमि है सन्तो की रणवीरो की मातृभूमि हित मरना धर्म हमारा है! प्रीत गगा मुक्तको का श्रेष्ठ संग्रह है। प्रेम के अनेक रूप विशेष कर वियोग की अनुभूतियाँ अत्यन्त प्रभावशाली हैं। मुरारीलालजी ने अनेक रग और सुगधो के पुष्प घुनघुन कर यह गुलदस्ता बनाया है। कविता प्रेमी समाज इस प्रीत गगा से अपने मन प्राणो को निर्मल करेगा। हिन्दी जगत कवि से और सग्रहा की आशा करेगा। कवि को मेरी बधाई और शुभकामनाएँ। मेरठ श्री भारतभूषण वरिष्ठ कवि एवं साहित्यकार SRHYMNCorreck ALO दो शब्द 'दो शब्द मैं न भी लिखता तो भी श्री मुरारीलाल डालमिया की प्रथम कृति 'शाश्वत एक प्रणाम न तो अचर्चित रहती और न मेरे लिखने से यह चर्चित होगी। कविता केवल विद्वता-उत्कृष्टता, शब्दाडम्बर-अलकार से पाठको को प्रमावित नही करती। उसके गीतो की भाव सहजता, हृदय स्पर्शता अनुभूति गहनता साहित्य सुधी-जनो को विशेष आकृष्ट करती है और करती है इस कारण बार वार पढने-सुनने को आतुर मुझे मालूम है पत्नी वियोग की असह्य पीडा ने उसके मन को व्यथित किया है जो शनै शनै शीतल होकर मन मानस मे हिम पिंड की भाँति जम गई। कालान्तर में वही हिम पीडा भाव उम्मा पाकर कविता के रूप म प्रेम आर विरह की मुख्य द्विधाराओ मे अजस्र भाव से फूट पडी। 'वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान -यह उक्ति बहुत ही सटीक हे श्री मुरारीलाल के सदर्भ मे। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी हमारा कवि स्यय नही काव्य सृजन करता है सम्भवत किसी अलौकिक शक्ति की प्रेरणा से वह सम्मोहन अवस्था में काव्य-कलश के किंचित माव कणो से माँ सरस्वती का अभिपक करता हा कवि का अन्तर्मन व्याकुल है पीडा घनीभूत हो उद्भासित होती है उसके इस गीताश मे-आसुओ से आग अन्तर की बुझाकर आ रहा हूँ। आज मै अपने हृदय का प्यार खोकर आ रहा हूँ। प्रेम की धारा भी स्पष्टतया सह प्रवाहित है- इस रूपहली चाँदनी मे, दो घडी तो पास बैठो। कामना के पुष्प लेकर आ गया तुम पर चढाने। एक युग के बाद मधुकर आ गया फिर गुनगुनाने। गेय गीतो की उत्कृष्ट शैली के लिए कवि का नाम ससम्मान लिया जायेगा। मेरी मान्यता है रचना 'शाश्वत एक प्रणाम काय्य प्रेमिया के बीच लोकप्रिय होगी। कवि मित्र मुरारीलाल को हार्दिक बधाई भविष्य में भी इसी प्रकार के सशक्त विचार उद्गार के काव्य सकलन की अपेक्षा कर सकते हैं। नवम्बर १९९९ श्री श्यामसुन्दर बगडिया कोलकाता सुप्रसिद्ध कवि 'शाश्वत एक प्रणाम' शाश्यत एक प्रणाम करियर मुरारीलाल डालमिया की प्रथम काव्य सग्रह है। मानयीय प्रेम के मार्मिक छन्दा की चिरकन वतमान काल की गध काव्य रचनाएँ कुछ सीमा तक नीरसता का बोध कराती है जो मानव स्वभाव के अनुरूप है। कवि की मुक्तक रचनाएँ छन्दमय नृत्य वन मानो कल्पना के स्तर पर अपने जीयन के यथार्थ अनुभया और सजीव भायो को शब्दों के मोती मे पिरो रही हैं। प्रेम पेदना सौन्दर्य, मृगार अतृप्ति अवसाद और निराशा की सभी प्रवृत्तियाँ इस काव्य सग्रह की विशेषता है जो लौकिक जीयन की झांकी प्रस्तुत कर किसी अलौकिक सत्ता से भी जुडी प्रतीत होती है। यह सत्य है कि ये कयि के लिए नितात वैयक्तिक हैं परन्तु सामाजिक और स्वछन्द से भी अनुप्राणित हैं और साथ ही जीवन में प्रेम की परिभाषा को विस्तार देती हैं। कवि प्रेम की किसी सीमा से बँधा नहीं मानता गीत की कोई गाया नहीं मानता और न ही घाँदनी को मायुक ही समझता है बल्कि उसमें एक विस्तार आधार और अभिसार के अर्थ टूटता है। दो हृदय के प्यार पर विश्वास करता है। कवि युग घेतना के प्रति सजग है यह युग गायक और उसकी कविता युग याणी होती है इसे बखूबी समझता है। सरल रूप से लिखे मुक्तक अपने म गम्भीर अर्थों को छिपाये हुए हैं जो आज की आयश्यकता को देखते हुए प्रेम की निझर सरिता वहाने के साथ साथ आनन्द की वर्षा भी करते हैं। चन्द्र घकोरी घाँदनी घातक, दीपक आँसू दर्द नयन आदि शब्द इस काव्य सग्रह में कई बार प्रयुक्त हुए हैं। सहृदय पाठक अवश्य ही कपि के इस शाश्यत एक प्रणाम म उसकी पवित्रता को पहचानगे। शुभकामना सहिता डॉ० वसुन्धरा मिश्र कोलकाता कवयित्री फयि हमेशा सयेदना के सागर म डुबकी लगा कुछ शब्द निकाल कर ऐसी कथिता का ताना बाना बुनता है जो कभी कभी शव्देतर भावनाआ को भी पकड लेती है। फोई भी कवि या लेखक प्रशसा से या आत्मश्लाघा से फभी वडा नही होता बल्कि आलोचना ही उसके साहित्यिक व्यक्तित्व को निखारती है। मुरारीलालजी डालमिया प्रेम और पीडा के पारम्परिक कवि हैं। उनकी कुछ फयिताओं में गुलाय की सुगन्ध है तो कुछ म नागफनी की धुभन भी है। उनकी फयिताओ की रचनाधर्मिता म यदि आधुनिक कविता के नए मुहापरे भी होते तो उनका मूल्य बढ जाता। असीम शुभकामनाओं सहित श्री मोहनकिशोर दीवान कोलकाता प्रसिद्ध कवि बोलता श्रद्धेय श्री डालमियाजी आपका 'शाश्वत एक प्रणाम' प्रथ जो आपने अपनी स्वर्गीय पत्नी सत्यभामा को समर्पित किया है वह वास्तव में आन्तरिक हृदय के आधार पर अपनी प्रेयसी के प्रति वर्णित की हा यह सच्चे मायने में उसके प्रति श्रद्धाजली है, उसकी आत्मा सदव कविता की गूंज से आनन्द विभोर रहेगी। आपने देश समाज घर की सन्तान एव कवि जगत को अद्वितीय सचित निधि समर्पित की है। आपने लिखा है- 'सबकुछ लिख दूँ तेरे नाम गीतो की यह पावन ग गा काशी मथुरा धाम आप पर भग्वत् की असीम कृपा है वरना इस तरह महान् कार्य सम्पूर्ण नहीं होता। धन्य हे आप एव आपके सहयोगी जिन्होने आपको इस तरह की धरोहर समर्पित करने योग्य बनाया। आशा है आप भविष्य में भी इस तरह का उत्साहिक अथ प्रकाशित करते रहेगे। आप एव आपका अथ प्रणम्य है| सादर स्नेह। श्री नेमचन्द कन्दोई कोलकाता उद्योगपति शाश्वत एक प्रणाम के पश्चात 'प्रीत गगा के प्रकाशन पर मै प्रियवर श्री मुरारीलाल डालमिया को हार्दिक बधाई देता हूँ और आशा करता हूँ कि वे भविष्य मे और भी अच्छी अच्छी कविताओ से हिन्दी जगत मे अपना एक स्थान बनाये। शुभकामनाओ के साथ। कोलकाता श्री गौरीशकर कायाँ समाजसेवी माननीय जुलाई माह मे आप से भेट कर हार्दिक प्रसन्नता हुई। आपकी पुस्तक शाश्वत एक प्रणाम' सही मायने मे प्रेम की तहेदिल से अभिव्यक्ति का अपूर्व सफलन है। पुस्तक मे प्रेम की गहराईयो एव अनबुझ पहलुओ को आपने विलक्षण कल्पना से मूर्त रूप दिया है। पुस्तक के लिए हार्दिक साधुवाद। साभिवादन सहित] कोलकाता श्री सदीप भूतोडिया श्री मुरारीलाल डालमिया उन कवियो मे हैं जिन्होने उद्यम के साथ साहित्य की पूजा की है। उनका काव्य सृजन हर उस व्यक्ति के लिए है जो जीना चाहता है। उनकी कविताएँ गुनगुनाकर कल्पनालोक मे विचरा जा सकता है और यथार्थ को भी उनके गीतो के माध्यम से भोगा जा सकता है। यह मणि काचन सयोग विरल ही होता है। उनका पहला काव्य संग्रह 'शाश्वत एक प्रणाम की सगीतमय प्रस्तुति ने लोगो को विभोर कर दिया था। नयी काव्यमाला प्रीत गगा भी श्रेष्ठता व भावुकता का अपूर्व सगम है। श्री विश्वम्भर नेवर कोलकाता सम्पादक छपते छपते प्रिय श्री मुरारीलालजी नमस्ते। मैं कलकत्ता से दिल्ली चला गया था। कल ही यहाँ लौटा हूँ। कलकत्ता मे आप द्वारा अपनी कविताओ के सग्रह की पुस्तक के लिए कृपया मेरा आमार स्वीकार करे। मैंने कविताएँ पढी है| मन छू लेनेवाली इन कविताओ मे मैं कपि के मन की पवित्रता और भावनाओ की गहराई के दर्शन पाता हूँ। मेरी हार्दिक यधाई। मगलकामनाओ सहित। गान्तोक-७३७ १०३ श्री केदारनाथ साहनी सिक्किम राज्यपाल सिमि आदरणीय श्री मुरारीलालजी शाश्वत एक प्रणाम गीत-समह मिल!! आभारी हूँ कि आपने मेरा स्मरण किया। पुस्तक को आद्योपान्त पढ़ चुका हूँ। मुझे इसकी गीतात्मकता से जुडी सहज माय प्रयणता विशेष भायी। आपका यह दर्शन स्नेह का स्रोत बहता रहे विश्व मे इसलिए प्यार का गीत गाता रहा। मेरे विचारो से पूरी तरह मेल खाता है। आपके ये मधुगीत प्रीत सगीत लिये अमृत की बूंदे बरसाते । इस गीत वल्लरी के प्रकाशन पर मेरी वधाई एव भविष्य की शुभकामनाएँ स्वीकार करे। सादर। कोलकाता सुप्रसिद्ध कवि श्री मिलाप दूगड हरीराम पाटोदिया २६५वी रवीन्द्र सरणी कोलकाता दूरभाष २३३ ६१७८ कर्तृक मुद्रित
श्री मुरारीलाल
डालमियार कविताए आछे
भालवासार गानेर सुर। मूल
हिन्दी कवितार सुललित
कण्ठस्वर तर्जमाय कतटुकुइ
वा प्रतिध्वन्नित करा जाय।
तबु तार धुति मेघेर फाँके
थेके थेके झलसे उठे।
सुभाष मुखोपाध्याय
सुप्रसिद्ध कवि
कोलकाता
कवि की पहली
कृति 'शाश्वत एक प्रणाम
के पश्चात प्रीत गगा की
रचनाये पढकर मुझे ऐसा
लगा कि कवि का अपना एक
मौलिक व्यक्तित्व है। मेरी
शुभकामना है कि भविष्य मे
भी कवि और भी उच्च दर्शन
की भावभूमि पर रचना
करेगा।
कन्हैयालाल सेठिया
सुप्रसिद्ध कवि व साहित्यिक
कोलकाता