Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Nityanand Smaran

Maharaj, Surya Muniji · 2011/09

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Sess स्व दानवीर धम-प्रेमी निहालचन्दजी सा. 298 श्रीमान् शा मोतीचन्दजी निहालचन्दजी भटेवड़ की ओर से स्व, दानवीर धर्म-प्रेमी श्री निहाल- चन्दजी के स्मणार्थ ५०० प्रतिया।

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किंचित्-वक्तव्य
यह अंकित करते हुए हृदय मानस में अतीव
हर्पोत्पन्न हो रहा है कि जब से श्रीमज्जैनाचार्य,
जगत् वंद्य, परम पूज्य श्री श्री १००८ श्री धर्मदास
जी महाराज के सम्प्रदायस्थ दक्षिण भारतोद्धारक
प्र० मुनि श्री ताराचन्द्रजी म०सा०, शास्त्रज्ञ,व्या
वा० पं० मुनि श्री कृष्णलालजी म. सा. जैन जगत्
के सुप्रसिद्ध वला व्या० वा० पं० मुनिश्री सौभाग्य
मुनिजी म० ला०, सरल स्वभावी, श्रात्मार्थी मुनि
श्री बच्छराजजी म. सा. प्रभृति ठाणे १४ का
चातुर्मास सम्बत् १६६५ का बैंगलोर शहर में
हुआ था। तय ही से वहां के स्थानापन्न लोगों की

पर यकर अमिहापापी कि पम्प मुनिरागों के चातुर्मास के उपसर में आई मी पेसी पाप- पुस्तक प्रकाशित की शाप जिससे कि पापातु- मांस विरकास पर्यंत विस्मरथीए बना रहे और सीप्सित पर्ष प्रमिअपित गरेपप को सम्मुख रखकर कतिपप घामाद में मुनिपरों के निकर गपस्थित होपतर मम्मन्पी रमापति हेतु सामा सम्पयना (पार्थना) की। फल साप काय कला-गोविद कविरमपं. मुनि श्री पुर्यमुनिजी म. सा. एशिष्य म्या- रपानी भी मार मुनिजी म. सा. में संमा करके जम-ममुद्याप त्रामा निस्पर स्मरर' मामक पुस्तक प्रकर बीपी।सीप्रतिपोलायो दाप समाप्त हो जाने से पुनः धेष प्रयोग मांग माम तथा पुस्तमपशेप में कारण

[ग]
द्वितीय संस्करण के लिये फिर से उपल मुनिश्रीजी
फो प्रार्थना पूर्वक कहा गया। महाराज श्री के पास
"नित्यनन्द स्मरण" का मेटर विद्यमान था। उसी
मेटर को हमने महाराज श्री से प्राप्त कर लोगों की
अत्यावश्यकता की पूर्ति करने के लिये उसे पुस्तक
रुप में प्रकाशित किया है।
महाराज श्री एवं द्रव्य दाता महाशय तमी
अपने भरसक प्रयत्न को सार्थक समभंगेजव कि
लोग इस पुस्तक का मनन, चिंतन तथा स्वाध्याय
कर लाभानुभव प्राप्त करेंगे।
इस पुस्तक के अन्तर्हित (अन्दर ) अनेक
स्तोत्र, ईश स्तुति एवं उपदेशी भजनों का समावेश
किया गया है। यह मुमुक्षु जनों को अपवर्ग सौख्य
प्राप्त करवाने में भक्ति-रूप रामबाण औषधि
(चिकित्सा ) की सफलता प्राप्त करावेगी। यह

[प] भपने हग की एक अनुपम ही पुस्तक है। प्राण एवं भाकियन-समास में यही पुस्तक मलि मार्ग की मेरिका तथा समान प्रदान में अपूर्ण सदापिका बगी। मेसावि कारण पुस्तक में किती प्रकार की प्रथम रह गई होवो पाठक गय उसे राख कर पचात् पठन करने सपित करण्ठायें। बिनयावमत घिमीव- मन्त्री-भी धर्मदास जैम मित्र मरण, रताम

*श्रीमद्धर्मदास जित्सूरिश्वरेभ्यो नमः ।
(जता २०)
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नित्य नंद स्मरण
श्री परमेष्ठि महामन्त्री
१ णमो अरिहंताणं।
२ णमो सिद्धाणं।
३ णमो पायरियाणं।
४ णमो उज्झाया।
५ णमो लोए सव्व साहूणं ।

(२)
थानुपूर्वी का फल
भानुपूर्वी गाजो जोप,
बहमासी तपनो फल होय ।
सन्देहमीं मम करो विगार,
निर्मल मम जपिये मवकार ।।
या पन पर भान विवेक,
दिन विन प्रस्पे गणिये एक।
शुद्ध मन घरके मरिजन गणे,
पांच से सागर को पाप हुने ।
अाभ कर्म के हरम को,
मन्त्र पड़ो नबकार ।
पापी द्वावण अग में,
देस जियो तत्वसार ॥१॥

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(१२) २ ४ २ T c Clticle २ ad ३ ५ २ ~~~ +++ ४ ५ १ c २ २० . CICICID -clalc c ५ २१ ३ ५ २] १ ૨ २ ३ २ २ A <><>< c ~~~ CIc - c 10 ( १३ ) चौवीस तीर्थंकरों के नाम. १ श्री ऋषभदेव स्वामी, २ श्री अजितनाथ स्वामी, ३ श्री संभवनाथ स्वामी, ४ श्रीश्रमिनंदन स्वामी, ५ श्री सुमतिनाथ स्वामी, ६ श्री पद्मप्रभु स्वामी, ७ श्री सुपार्श्वनाथ स्वामी, ८ श्री चन्दा प्रभु स्वामी, ६ श्री सुविधिनाथ स्वामी, १० श्री शीतलनाथ स्वामी, ११ श्री श्रेयांसनाथ स्वामी, १२ श्री वासुपूज्य स्वामी, १३ श्री विमलनाथ स्वामी, १४ श्री अनंतनाथ स्वामी, १५ श्री धर्म- नाथ स्वामी, १६ श्री शांतिनाथ स्वामी, १७ श्री कुन्थुनाथ स्वामी, १८ श्री अरहनाथ स्वामी, १६ श्री मल्लिनाथ स्वामी, २० श्री मुनिसुव्रत स्वामी, २१ श्री नमिनाथ स्वामी, २२ श्री नेमनाथ स्वामी, २३ श्री पार्श्वनाथ स्वामी, २४ श्री महावीर स्वामी. ग्यारह गणधरों के नाम. १ इन्द्रभूतिजी ३ वायुभूतिजी ५ सुधर्मा स्वामी २ अग्निभूतिजी ४ व्यक्तजी ६ मंडिपुत्रजी

७ मीर्यपुषसी
११ ममासणी
प्राम्पिसजी १. मेताजी
पीस विरमानों के नाम
१भी सीमम्पर स्वामी श्री युगमापर
स्वामी, ३ मी पा स्मामी, ४ भी मुबाए स्मामी,
५ भी बात स्वामी भी म्पयप्रभु स्वामी, .
अपमानन स्वामी ८ मी प्रमतवीर्य स्वामी, ६
श्री मुरमभु स्वामी, १.मी पिणखमम स्वामी
२१ भी पापर स्वामी १२ भी पम्यानम स्वामी
१३ श्री चन्द्रशाम्बामी "मी मुजंग स्वामी
१५धीवर स्यामी १६ धीमेममम स्वामी १७
भी बीरसेन स्मामी १५ भी महामस्थामी १५
धीरेयशस स्वामी श्री प्रशिक्षवीर्य स्वामी।
सोलहसतियों के नाम
जामी
सीता
जमवी स्पन्दमबासा
कोशम्पा
मुगावी
७पीपदी
२ सुन्दरी

( १५ )
१४ सुलसा
१० चेलणा
१२ सुभद्रा
११ प्रभावती १३ दमयंती
१५ शिवा
१६ पद्मावती
चतुर्विंश तीर्थंकर के नाम.
॥ हरिगीतिका ।।
श्री श्रादिनाथ अजीत संभवनाथ अभिनन्दन
गुणी । श्रीसुमति पद्म सुपाचं जिन शशिसुविधि
शीतल दिनमणी॥श्रेयांस वासुपूज्य निर्मल विमल
जिनवर जगपती। स्वामी अनंत सु धर्म शांती
सौख्य सवको दे श्रती ॥१॥ तिहुँ लोक पूजित
कुंथु जिन राजे श्रर जग में प्रभो। श्री मल्लिजिन
यश ख्याति जग भगवान मुनि सुबत विभो ।।
नमि नेमि पारस वीर यों चौवीस जिन कीरति
भणी। 'मुनि सूर्य' कहैं तिहुं काल भज सवभावना
हो मन तणी ॥२॥

पीस विरमान के नाम पीर पन्द॥ श्री सीमपर युगपए मुबात लयास अपमामम । मनंत पुरममु विशाल बनपर शिव मुम कारम सन्द्रानन || चन्द्रमा मुनग ईबर ममि बीरसेन महामद जिमन्द। बस और अजितदीप मह पीस शिमेश मशोषुनकर था ग्यारह गषधर के नाम ॥ इरिगीति॥ श्री इन्द्र भगमी पापुभूति प्पल सापक गुल- पदी । स्वामी मुधर्मा मशि मौर्य पुनि प्रक्षेपित गणपती॥ माता प्रथम मेता मुमि राजे सदा मुख भारती । परमास पवारगमपी मुममिये मित सम्मति

( १७ )
सोलह सतियों के नाम.
॥ हरिगीतिका ॥
ब्राह्मी सु चन्दनवालिका राजीमती पुनि द्रौ-
पदी । चूड़ा सुभद्रा सुदरी सुलसा शिवा सीता
सती । दमयंति कौशल्या मृगा पद्मावती परमा-
वती । कुन्तादि पोडश भगवती ध्याश्रो सदा
चढ़ती रती ।। ५॥
१. श्री जिननामगर्मिततीर्थंकरस्तोत्रं
१। २४
श्रीनाभिसूनो जिन सार्वभौम
वृषभध्वज त्वन्नतये ममेहा
षद्जीवरक्षा पर देहि देवी-
भर्चितं स्वं पदमाशु वीर

। १८)
२१२३
श्रीमवमापा पपपन्ति पापा
अवाप्त पेषाजित मां सुपारर्ष
जिनगिना रोगततिर्षिनीना
तषामिधानादपि पारमाप
०२२
ससारपारोऽसमि मेऽप माने
भवत्पदी संमव पपयामि
वस्याः सपर्य ते मबमोहमाना
प्रमगर्मगे सति मैमिमाष
मियोनि मैमा प्रमिमन्दनेन
नंदपममी पूजयामि
चपा परिऽपि भूपे समाना
नमेकर्य से मयि सा ममाथ

( १६ ) ५।२० श्रीखंडवत्तापहरा शिवश्री सुखाय गीस्ते सुमते प्रजासु महस्तुते सुव्रत देव तीव्र- तिरस्क्रियाकृत्तमसोऽपि तात ६।१६ पद्मप्रभाक्षिद्वयमहसाम- झर मुदेते स्थिरपक्ष्मवल्लि प्रभो प्रभाते भुवि दिप्य माना भजद्यमीत्वं जिन मल्लिनाथ ७।१८ श्रीमान् सुपार्थोपि हि नेस्त मां श्र- सुमत्सुखं देश न याचकार पारंगता वल्लरीप वग्रंजनं चार पति पुनाति पातक

(२०)
पर प्रमालोईर मेम शंक
द्रयस्मि सम कमि घु
प्रषासा मुंगति मात्पर्यना
मला सुपणे त्वयि युनाथ
भीरंगनाते मुषिधे सवाया
पिण्वीकरोति
विरपैकपंपोसि
मृगांकमाना
पिनोपि कोकानपि शांतिनाथ
मुघायगीरी
भीगीवस लो सितमोहपोष
शीलाव्य पाचे जिमराम शर्म
तप सम्प रदि संदपाना
सर्य ममवे स्थयि पर्ममाप

(२१)
११ । १४
श्रीवत्सिनि श्रीहृदि तावके श्री
श्रेयांस सक्का नितरामहोत्र
यां मे निजां देहि वदान्य दीनं
समीक्ष्य वीराग्रिम मामनंत
१२।१३
वाग् वासुपूज्या गमिकी श्रुतिश्री
सुखं कर्षति भवताभ्य सावि
पूर्णा ममाशा विमलाध नाम
ज्ययासमं लीन शिरो न तोऽल

(२९) २ अप श्री पैसठ यन्त्र उदारमय श्री पौषीस जिन स्तोत्र ११२१ मादिनाथ जगमाप, भर- मार्य वया ममि अजित जितमोरारि पारेषा हरमिबाई लोधी २४/२५0, गोतिष वितिया। अमतं मतदेवेंद महममिगन्धमम् २ समत सुनते नौमि मेपास एखदायबिमा भिमता चार, धर्म पम जिनम् ॥ मक्तिमा जिमेरी र बाहर जगदगुरु। ॐ गोवर्स व सपा परमेय सम्म बगदाम बम्ब मम ममाम्पई। सुमति दीरमाईस्प संभापि पपिमियो जिमवामिा पेच पस्य निर्मितः । पूज्पते पय पुot मंदिरे सब ॥ तहे मोरिस्पार्श भीविसति सीसमा। पुद्रोपनपरोगावि मरपन्ते म्माधियानाः ॥

(२३) " || मालिनी-छन्द ॥ भवति सुखमनेकं तस्य यो मानवस्य, विमलमतिरनिंद्यं स्तोत्रमेतद्वितन्द्रः । पठति परमभक्त्या प्रातरुत्थाय शश्वत्, मुनिरभिकृतभक्तिः मेघराजो वभाण ॥८॥ aoradowan ३. पैंसठ यंत्र चौवीस जिन । २३६ १५१६४ श्रादौ नेमिजिनं नौमि संभवं १४२२२१२' सुविधि तथा। धर्मनाथं महा- ७/१३.१६॥२५देव शांति शांतिकरं सदा ॥ १८२४ ५ ६ १२१ १॥ अनंतं सुव्रतं भक्त्या ०११२७२३, ४ । नेमिनाथं जिनोत्तमं । अजितं जितकंदर्प चन्द्रं चन्द्रसमप्रभं ॥२॥ श्रादिनाथं तथा देवं सुपार्श्व विमलं जिनं । मल्लिनाथं गुणोपेतं धनुपां पञ्चविंशतिम् ॥३॥ अरनाथं महावीरं सुमतिं च जगद्गुरुम् । श्री पद्मप्रभनामानं घासुपूज्यं सुरैर्नतं ॥४॥ शीतलं शीतलं लोके श्रेयांसं श्रेयसे - सदा । मुना व पामेयं विभामिनबन पिमुम् .५: जिमार्मा नाममिया पंचपष्ठिसमुनषा। मोर्य राजते यशव सौप मिरत पस्मिर एहे महामपत्या पंमोऽयं पूज्यते पुधै। भूतप्रेत पिशापारेर मय नमविपते ॥७॥ माधिनी. सफागुणनिपाने यंत्रमे नियम, पियरम कोरो पीमा ध्येयरूप। अपतिसगुरो भी सरिराजम्य शिष्यो परवि सुसमिपा मोईनाश्मीनिवास १ जिन परकम् शिरपी। तमो प्राता परमरिपूजेग जगतमें। चमो सितापातेअघि सिभि विमान दुपारम् । एमो प्राचार्या सकसgat मुक्ति सवरम् । पीसो आमे एमगुरु सदाचार पुतमो १०

( २५)
उवमायाणं च प्रकृति ज पचीसो गुण निधं ।
णमो लोए सम्वोज्वल चरण साहूणमनघम् ॥
सहस्रद्वे कोटी जगतमधि साधू जगन है।
तथोत्कृष्टासाधू नव सहस कोडान प्रणम् ॥२॥
नमः सम्यक् दृष्टय विमलतर शानाय सततम् ।
तपश्चारित्रद्वादशत्रिदशमेदैर्गुणि गणैः ।।
युजे सिद्धबातोऽत्र च परभवेस्याच्छिवकरः ।
स मे हार्द दुःख हरतु नितरां पूर्णकृपया ||३||
नमो ॐ ह्रीं अई ऋषभ अजितं संभवजिनं ।
अभिनन्द खामी प्रणव सुमतिं पद्म प्रभवै ।।
सुपार्श्व श्रीचन्द्रप्रभ, सुविधि वा शीतलप्रभुं ।
श्रेयांसं वास्पूज्यं विमलमनतं धर्मप्रणम् ॥४॥
नमः शान्ति कुंथु अरमलि मुनीसुव्रत विभुं ।
नमि नेमि पार्श्व चरण युगलं नौमि सततम् ।।
महावीरं चंदे परम पद दानैक सुविधं ।
जिनेन्द्राऽहो रात्रं ददतु कुशल मे समयजा ॥५॥

५ अपम स्तोत्रम् पेलोपलोककुमकसितमस्पीक- करपद्यम समर्मभिवणाधिनाथम् । मस्या मसापमरिकफरनार्य, मोमो ममा अपमनाथममायनापम् ॥१॥ पत्रपरिणामिदमसुममान- पानभिर्ष वितरणे सताद्रिमापम् । भारापपलमुर जितादिनार्थ मा मोजमा पमनापमनापनापम् ॥ मौभाम्पमाग्पकमलाकमलापमामा निद्राममारुतिमिरस्तनिवाधिमाधम । लामा स्मरापमधिमायतनामना भो मोसमा अपभनापममापनापम् ।। चिपुरमवररुचिपापयामिपिता- पप्रतापभरमप्रविषाधिमाधम् । मिस्प ममप्यमुपयाम्मिनसापिमार्य मी मा समा मुषममायममाधनाथम् ।

( २७ )
६ श्रीपार्श्वजिनस्तोत्रम्.
नमद्देवनागेन्द्रमन्दारमाला-
मरन्दच्छटाधौतपादारविन्दम् ।
परानन्दसन्दर्भलक्ष्मीसनाथ,
स्तुवे देवचिन्तामणि पार्श्वनाथम् ॥१॥
तमोराशिवित्रासने वासरेशं,
हतक्लेशलेशं श्रियां सन्निवेशम् ।
क्रमालीनपनावतीप्राणनाथ,
स्तुवे देवचिन्तामणि पार्श्वनाथम् ॥२॥
नवश्रीनिवासं नवाम्भोजनलं,
नतानां वधीदानदाने सलीलम् ।
त्रिलोकस्य पूज्यं त्रिलोकस्य नाथ,
स्तुवे देवचिन्तामणिं पार्श्वनाथम् ॥३॥
हतव्याधिवेतालमूतादिदोष,
वृताशेषपुण्यावलीपुण्यपोषम् ।
मुखश्रीपराभूतदोषाधिनाथ,
स्तुवे देवचिन्तामणि पार्श्वनाथम् ॥४॥

(२८)
नृपस्यासेमस्प परोऽवतंस,
अमामो ममोमालसे राजासम् ।
प्रमाषप्रभाषाहिनीमिन्धुमाये
स्तुमे पेवचिन्तामवि पारपेमापम् ।।
कली भानिमी करमाशोपमाम,
जगपालमे सन्त सापभामम् ।
घिर मेदपारस्थित विश्वनाथ
म्नु पचिन्तामसिं पारमाणम् ॥
७ यमक पन्ध-भी पारनाम स्तोत्रम् ।
म.
परसवरसंपरसपरम मपदमपरमपदमपर।
सममासममाप्सममासममा गमर्मगममंगमर्मगमम
॥१॥दरमबर्मदरमंदरम गतरंगरंगवरेगवर।
गरसगरगासगरसं गधरमपरमपरमपरे।
रमुबारमुरारमुपारमुपा समिसमिमेसमि-
समिम । विविविधितविदितविदितं ममममते-

( २६) - नमतेनमते ॥३॥ यतनायतनायतनायतना, नयमा- नयमानयमानयमा । क्षणलक्षएलक्षणलक्षाल, क्षरदक्षरदक्षरदक्षग्द॥॥प्रमदाप्रमदाममदाप्रसदा, नकरानकरानकरानकराानवमानवमानवमानवमा, नसदानसदानसदानसदा ॥५॥ तरसातरसातरसा. तरसा, दयनोदयनोदयनोदयनो। फदमंकदम- फदमंकदम, विभवाविभवाविभवाविभवा ॥६॥ इति पार्श्वजिनेश्वर ते स्तवनं, रचितं खचितं यमकैः सुघनं । परिरंजितदक्षनरप्रकरं कुरुतां शिवसुंदर- सौख्यभर ॥ ७॥ ८. श्री ऋषभस्तोत्रम् । ॥ त्रोटक छन्द ॥ - सुखकारणमुत्तमभं ऋपभ, ऋषभांकितपाद- पयोजयुगं । युगमानभुजं नृपनाभिभव, भवसागर- तारणपोत निभं ॥ १॥ निभभूधरभेदनजम्भरिपुं रिपुरोगरणादिकभीतिहरं । हरमुत्कटमारतिर-

(३०)
सरण करणेन्दुकसातमसं सकल । २॥ कर
कांचनदेहरषि विरं चिरसमितपापविना
कर । परपारविनिर्मितकोकम मवतुत्पगुरो
पकपसमास १ मापानिशीतलांतरस
रसमागुसरमितसजिम । जसमीपनकोपमित्र
सगतो समतो पिकमाधिवमे सतत सतः
पादिचतुभिपतर्पत
नमम । नममोत्तरपयनविदितफल सपसमम
तीनमनापयर्न ।। पादुशिविधितिबारि-
पो पपमाननमेखन वारहितं । शिवहेतुसु-
परितमाषशव पबमनुस्तनमानपर ।।
परपीसमससदत्वगुलं
शशिम शमिम । गमिमरिफर मरमाय मुग-पुर
सम्पमा ममामि जिन I
सपसप्तम
देवमनो
गुणभूमिकला-

(३१) है. श्रीपार्श्वनाशस्तोत्रम् । || तोटक वृत्त । -- रणनिजितमारवलं सवलं, बलवस्त्रसमान- शरीर विभं । विभवं भगवंतमिमेंद्रगतं, गतदुर्मति दुर्गति दूरतर ॥१॥ तरणाय भवांबुनिधौ तरणिं, तरणींदुसमद्युतिसौम्यकलं । कलकल्पित कल्पतरुं गुणिनं, गुणिनंदिकर करणैरजितं ॥ २ ॥ जितपञ्चमकालविलासफलं, फलवत्तरपादपयोज- नुतिं । नुतिसंस्तुतितत्परनाकपति, पतिताखिल- भव्यसमुन्नतिदं ॥३॥ नतिदं कमठस्य शठस्य फलं, कलमावमुपेयुष ईतिहर । हरधातृहरिभ्रममेद- बुध, बुधलक्षितलक्षणलक्षपर॥ ४॥ परमात्मजल- प्रतिबिंबतुला, तुलितं यतियोगिगणैरमलं । मल- शालिनि भालनतो विमुखं मुखदीप्तितिरस्कृत पूर्णविधुं ॥५॥ विधुरेपि जनस्मृतिसौख्यकर, फरणत्रयशुद्धिविशुद्धहृदं । हृदयंगमसंगमरग- धर, धरणेन्द्रसदाश्रितलोकभर ॥६॥ भरतांतर- पश्चिमि काशिपुरे पुरा तहस्यममेषु पर। धामोधमिनंद मिर्माप्रपर,परिपरिकम्मिशिनाभि पर्ति ॥७॥ 159 १. श्रीधीर जिनस्तोत्रम् । महामम्परामाभितं देवरे महीनापसिगाव पुर्व पवित्रम् । पपाामित पापियर विकास स्मुरे भीजिम पमानम् पहि- रेवेन्द्रयोगीन्द्रमा सुभाशालि संगमवाये परे एपमा पासामरं एखसम्मार्गपा बिचल सुरे मीजिम वर्षमामम् २६ श्रमसोतसामचारिश- बीम रागेगमम्मोहसम्तापदीमम् । वामन निर्मूवमापापिवार्म रिकारे श्रीसिप- भामम् रामस्वादपायोपिसर्गसतं सवा फममर्मप्रपापमुक्तम। प्रखरापतापेन मास्वस्स- मान त्रिका तुरे प्रीजिन वर्षमामम् ॥ ममो रारिकस्पासपर्ने विश्वास विदीपोतरारिप्रजाति ( ३३) कृपालुम् । गभीरं विशालैर्गुणैर्वर्धमानं त्रिकालं स्तुवे श्रीजिनं वर्धमानम् ॥५॥ जगजीवसन्दोह जीवादि- भूतं,भवभ्रान्तिरिक्तं नमन्नाकिभूतम् । लसत्स्वर्गि- निर्वाणलक्ष्मीनिदान, त्रिकालं स्तुवे श्रीजिनं वर्ध- मानम् ॥६॥ इत्थं भक्तिवशेन मुग्धमतिना श्रीवर्ध- मानः स्तुतः, प्रोद्यद्देहपवित्रकांतिकलितः सश्री- कशोभायुतः। याचे नैव कलत्रपुत्रविभवं नो काम भोगश्रियं किन्त्वेकं परमोत्तमं शिवपदं श्रीवाल- चन्द्रार्चितम् ॥७॥ . ११. प्रथमस्वरमयं प्रथमजिनस्तोत्रम् । सकलकमलदलकरपदनयन ! प्रहतमदनमद! भवभयहरण ! सततममरनरनतपदकमल ! जय जय गतमद ! मदकलगमन ! ॥१॥ श्रमलकनक- नगवर ! गतरमण ! क्षतजननमरण ! शमरस- सदन! श्रमणकमलवनतपन! गतभव ! भवभयम. पहर मम जनमहन ! ॥२॥ अभयद! भवदरजल- भरपवन ! सलमइमपनदानासपर! मत मद ! सम्परपरपन जगदमहरअप तर समए ! AM तरसारसहपएममकर का कसमपागमन ! बरषा प्रथप परमपदमपार अपाम्पस पनमनपररप! सनशा परम पपररम! ममकबरपरकरहरमा पापहा! परमतकरगजससहमममा फर परससहमानग! रपययम् । शरत्येवं प्रयम- स्वरेय सरसामीरापनमा समस्या मिना स्तुतिपय मीतो युगादिप्रभुषाम् । मेर गसप्प विश्वसनतामाता गुपस्थानक, पु प्रपमें भिमरत सपदि यप मिय पवाद । प्रथमो १२ अप भी बीतरागाएका मिसम्म जिनपतिमि ममहर मा एम पाम विपरम्यान सुमार।

(३५)
शरणयं कारुण्यं अचलशिव श्रदं मुनिवर,
अनन्तं श्रव्याध परमपदसाक्ष जिनवरं ॥१॥
हितं सर्व सत्त्व सुगुणगुणराजं जगपति,
विधि ब्रह्म रम्यं विदित सब योगं मगपतिं ।
अनेक एकवा हरन सब रोगं प्रभु तुमे,
सदा शक्ति व्यक्ति परम सुख रक्ति विभुतुमे ||२||
जगत्वा जेष्ट जयति जग श्रेष्ठ जुगगुरु,
महावीर वीरं सकल मति भासं भयहरं ।
महा भाग्यं भोग्यं भगतजन पालं गत दर,
महामोक्षं सोपं रहित रज पंकं जयकरं ॥३॥
गुणधीप धीशं रटत सब नामं मुनिजनं,
महामुक्तं गुप्तं कटत सब क्लेशं भ्रमचनं ।
महावुद्धं सिद्ध चढत सुख श्रेणि दम युत,
महा कीर्ति स्फुर्त घटत दुख श्रेणी समयुत ॥४॥

पेपवा सररमपावधीरिसी पुतन्त्रतत्पमीरिती
१३ श्रीपार्थ स्तोत्र
परिपाएदेवता भीपायमापसेषिता ।
ममाषमासिता गुसोहरामपर्पिता ॥१॥ परिणाम
गोपविताएममिभुतिः विवेबुसिवापर
मुपपुरप सपतिः ॥२॥ पयोमयसमएस
गतापमार्गमएरली दिगंगनागमपिता मपग्रता
स्पिपीपिता स्वदीपपरामा चारकर्म
कुतर्फववर्णिता मपम्तमेत्य पिता परे अपीच
पाशराप्रपास्तमानमत्सपायवीयपाबमलिया
प्रचएरपापपंक्तितजना मबन्ति पूरा गुमानि
मेपमानता लदीपदामधीरता वार्षिसम्मे
पेषता किमस्ति कामपेनु का पमेण्तरपसेपकार
७० गुणा मिसोम सताकलापमेशर्मवापसव
मम्पमिभमा मपरीरमममा गुमाए
मुखाकर सतां ममरण सभा अकारि एमपीपर
पेमपिता निर्मा

(३७) ॥ वसन्ततिलका ॥ इत्यष्टकं गुणवतो गुणमालिकाभि- स्सम्यक् प्रयोगरुचिर रचितं चिरायः श्रीमन् मुनेविमलशीलभृतो गुणेन्दो- भव्याधितं भवतु भव्यतराय भूमौ ॥१०॥ १४. अथ श्रीनेमिजिनस्तोत्रम् । मानेनानूमानेननोनमुन्नामिमाननम् । नेमिना- मानमममं मुनीनामिनमानुम ॥१॥ नानामानामनि- नाना ममानानामनामिनाम् । नामिनेनामिना मोमे नेमिनाम्ने नमोनमः ॥२॥ माननोन्नामिनं नाम ननामिस्न ममानने। ननु नेमिममी मेना मोमा- नामनमन्निनाः॥३॥ मिन्नमन्मनमामानि मानिनी- माननोन्मना । नानानामी मनन्नेमि मनोमनिम- मानिनाम् ॥ ४ ॥ मनो मुन्निननं नूनमुन्नमन्माननो ननम् । नुन्नमेनोमुनानेमिनाम्नानमामनु ॥५॥ नोन- मुनमानमानेन मुनीनानेममाननम्। मीनानमिनसम्ने मिमनूनामामिमीममाम् ॥ ६॥ मुमीनमेनोमीमा मिमान मेमिमामिमम् । मेमिमामानमामामा ममो (1) मामममु नमः मेमीममनमममिममममनं मि मानमम । मेमिनाम्मोनमाम्मान 1 ८ इति स्तुति प पुरतः पठम्ति भी मेमिनो म्यानयुग्मसियाम। भी पर्वमानोदपणालिन म्यु सिरियाणा परिमोगयोग्यास मामानूमममी मम । १५ चतुर्विशति तीर्थफर स्तोत्र । भगमममस्प पिजयो पलो मारि पपिपी। सुपिपेमजितो पत्तो पचियपस्ति सुतारका।। पसममस्प कुमुमो पता नपामा च परिषी। मारो बासुपस्पस्प पत्तमएशास्ति परिक्षी || गोमुपोपमस्पाम्ति बराबरीमुरीप्रति सभ्य महायतस्तपाजितबमा मता ॥३॥ त्रिमुख समषम्पास्ति दुरितारिमपक्षिसी एम्पामिमम्बम भ्यास्ति यह मायक कालिके 1॥ समतेस्तुपुर- ।

-- ( ३६ ) श्वास्ति महाकाल्यस्ति यक्षिणी ॥ श्री सुपाश्व- स्य मातङ्गः शांताख्या यक्षिणी शुभा ॥५॥ पण्मुखो- 'विमलस्यास्ति विदिताख्यास्ति यक्षिणी श्रीअनन्तस्य पातालश्चांकुशा यक्षिणीवरा ॥ ६॥ ब्रह्मा सुशीत- लस्यास्ति हशोका यक्षिणी मता ॥ श्रेयांसस्य प्रभोर्यक्षेद् मानवी यक्षिणी तथा ॥ ६॥ धर्मस्य किन्नरो यक्षः कंदर्पा यक्षिणी मता ॥ शान्तेर्गरुडो यक्षोस्ति निर्वाणी यक्षिणीवरा ॥ ८॥ कुंथोर्गन्धर्व- यनोस्ति बलानाम्न्यस्ति यक्षिणी ॥ अरस्य यक्षो यक्षेद् च धारिणी यक्षिणी शुभा ॥ ६॥ नमे कुटि यक्षोस्ति गन्धारी यक्षिणीतथा । यक्षो वीरस्य मातंगः, सुरीसिद्धायिका मता ॥ १० ॥ मल्ले. कुबेरयक्षोस्ति यक्षिणीधरणप्रिया। पार्श्वः श्री पार्श्वनाथस्य सुरी पद्मावती तथा ॥ ११ ॥ नेमेो- मेघ यक्षोस्ति त्वं विकाशे विकाशती। श्री वरुणो सुव्रतस्यापि नरदत्ताथ यक्षिणी ॥१२॥ माया बीज- स्थायिनां च परमेष्ठि स्वरूपिणां । अर्हतां तत्क्रमात् स्तोत्रं कृतं सागर साधुना ॥ १३ ॥ इति श्री चततिशति तीर्थकर स्तोत्रं समाप्तम ॥

पामेसिनमस्कारे सारे मपपदारमक, प्राम
सिग्राम मुख मुहपरम्पर भमो पापर
१६ श्रीपरमेष्ठिरक्षास्तोत्रम्
रकाको पन पंजराम म्मराम्म।१॥
मरिहमास शिर शिरसिस्थित है
पागं अगरवातियायिमी ममो समग्रमा
मापुध हस्तपोममोहोर सम्म
माहम मोचके पादपो रामे। एसा पंथ ममुकाये
शिलापत्रमयी मले सम्पापप्पवास के
वमो पत्रमा पनि मंगला सम्मेसिबार
गंगारवानिया : माह पई पार्ट
हपा मगलं वोपरिपनमर्प पिपार्म परपरे
में महाममावा र अनोपद्रवमाशिनी ।
पग्मेसिपवारता कपिताः पूर्वपरिमिः ।
पस्येवं कुरु त परमेसिपी सदा । तर
नश्याम पापियधिभापिकवायम

- (४१) १७चतुर्विशति स्तोत्रम् प्रथमं ऋपमं देवं, द्वितीयं चैवाजिताख्यक । तृतीयं संभवं नत्वा तुर्य चैवाभिनंदनं ॥ १५ सुमतिं- पंचमचैव पष्ठं पद्म प्रकीर्तितम् । सप्तमोस्तु सुपा- चःस्यादष्टमो मतः चन्द्रप्रभः ॥२॥ नवमःपुष्प- दन्तश्च दशमश्शीतलस्तथा । श्रेयांश्चैकादशश्चैव वासुपूज्यस्तु द्वादशः ॥ ३ ॥ विमलो त्रिदशञ्चैवा- नंतश्च हि चतुर्दशः । धर्मपञ्चदशश्चैव शांतिनाथस्तु पोडशः ॥ ४॥ सप्तदशमः कुंथुनाथः ह्यरोऽष्टादशम- स्तथा। मल्लिनाथश्चोनार्वशो, विंशमस्तु मुनिसुव्रतः ॥ ५॥ श्रीनमिश्चैकविंशश्व, द्वाविंशो नेमिनाथकः । पार्श्वनाथस्त्रयोविंशो, वर्द्धमानस्तुर्यविंशतिः ॥६॥ ऋपभादिश्चतुर्विंश, तीर्थङ्करा उदाहृताः । स्मरणा- त्सर्वपापेभ्यो, मुच्यते नात्र संशयः ॥ ७॥ य इदं पठते नित्य, त्रिकालश्च जिनोत्तमः । इहैव लभते सौख्यमन्ते निर्वाणमामुयात् ॥ ८॥ इति श्रीरामचन्द्र विरचितायां ऋपभादिचतुर्विंशति- तीर्थराएकं सम्पूर्णम ।। मि० ज्ये०१३ सं० १९२६

(४२)
१८ भीपारजिनाष्टकम्
ठौर
मुरदामषमत्पमुनीन्द्रमा मतमप्यजनापति
दोपहरम् । हरम्परहारियणप्रकर करणेभनि
पपनमिहमिमम ॥१॥ निमपापपपंक्तिविभागण
गासिंदपपानलमीतिहरम् रहारविपुगपत
कीर्तिकर करुणोदधिमतरूपपरम् ॥२॥ पर
वामिपपिनपावयुग पुगषायुर्ग कमलापणम् ।
पुगपम्मममीन्पापियामपरं परमातपति जितकर्म
रिपुम् ॥ ३॥ रिपुमिप्रसमाशपमहम तमउत्कर
बारकथारूगिरम् । गिरिराजमाहीपरपीरगुरु गुरु
गशिपिचितमपनम् ।। पमयम्ममदुम्म
मुबरमतं मतिकोशिकमपरसमसमणि मणि
पाश्चमम्प्पससारण रमसम्पर्ष गतजन्मदरम्
५५ पम्भाववियाजिनधर्मगर गहनापत्तिका
भमग्म मरकाम्युमिपानपयोपिमुनि मुनिमापक
मासितकल्पनरम नरमाईममोपत

(१३)
रजताद्विमनोविशुज कुलम । कुलवारिधिचन्द्रमन-
न्नकल कलधौननिभं जिनपार्श्वविभुम् ॥ ७ ॥
विभुसौख्यकरं भवभीतिहरं हरहारकतोधरणेन्द्र-
वरम् । वरपोतनिभं भववारिनिधी निधिवत् मुसद
जिनपस्तवनम् ॥ ८ ॥ श्रीवामयो जिनाधीश
शिवपद्यादिति स्तुतः। पाठकार्योत्तमाम्भोधिगुरूणा
सुप्रसादतः ॥ ६ ॥
१६. श्रीचन्द्रप्रभस्तोत्रम्
चन्द्रप्रम प्रभाधीश चन्द्रशेखर चन्द्रभूः ।
चन्द्रलक्ष्मीक चन्द्राक्ष चन्द्रवीज नमोऽस्तु ते ॥२॥
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चन्द्रप्रभः ह्रीं श्रीं कुरु कुरु स्वाहा।
इष्टसिद्धि महासिद्धि तुष्टि पुष्टि करोद्भव ॥२॥
द्वादश सहन जपतो चाञ्छितार्थफलप्रदः ।
गृहीतत्रिसन्ध्यजपत सर्वाधिव्याधिनाशक ॥३॥
मुरासुरेन्द्रमहित श्रीपाण्डू च नृपसुत.।
श्रीचन्द्रप्रम तीर्थश चन्द्रोज्ज्वलां कुरु कुरु ॥४॥
श्रीचन्द्रप्रमविद्येयं स्मृता सद्यफलानृता ।
भवाधिव्याधिविध्वमदायिनी मे वरभटा ॥५॥

(४४) ९० श्री गौतमस्तोत्रम् । ॐ ममलिजगतुरिस्यामिमएमवे । ममममम्पिमासिफ्परोहणायेम्बमूतये ॥१॥ पाळमोमं मगवतो गौतमस्थ ममस्पता। पशीमपन्ति लोफ्पसंपदो विगताप IRI तप सियम्य पुराम्य पादावुधरमाकहा। पिपर्ति करपणावीप कामितानि उनूमताम् ॥३॥ भीगीतमातील महा ममस्प तपकीर्तनाद । मुपर्यापुप्पो पृथिधीमुचिमोसि मरमिरं ॥४॥ प्रतिशतगंपाम्ना मगवान् मास्करी निर्य। प्रति सौम्पतया चाम्दीमहोते मीमांतता पिजिन्य मसारमाया बीज मोहमहीपते । नाम्याम्मुक्तिरामधीमायकम्पत्यमापता छादशांगी विधा वेधा मीनापमरपंरितः। भगगयपुगयनपुगप नेपा मापाहतोऽसि ॥७॥ नम म्याहा पनिम्यातिम्मिरकारी सस्पिपे। नागालम गो-यागीशाय मगममे॥

(४५ ) इति श्रीगौतमस्तो मन्वन्ते स्मरतोन्वहं । श्रीजिनप्रभसूरेस्त्व भव सर्वार्थसिद्धये ॥६॥ २१. श्रीपरमात्मस्तोत्र । ॥ भुजगप्रयात ॥ शिरं शुद्धबुद्धं परं विश्वनाथं, न देवं न वन्धुं न कर्म न कर्ता । न अगं न संगं न इच्छा न कामं, चिदानन्दरूपं नमो वीतराग ॥ १॥ न बन्धो न मोनो न रागादि लोकं, न योग न भोगं न व्याधिन शोकं । न क्रोधं न मान न माया न लोभ, चिदा० ॥२॥ न हस्ती न पादौ न घागां न जिह्वा, न बनुन कर्ण न वस्त्रं न निद्रा। न स्वेद न खेदं न वर्णन मुद्रा, चिदा० ॥ ३ ॥ न जन्म न मृत्युन मोदं न चिन्ता, न तु तृट् न भीतं न कार्य न तुंदा। न स्वामी न भृत्यो न देवो न मो, चिदा० ॥ ४ ॥ त्रिदंडे त्रिखंडे हरे विश्वव्यापं, हृषीकेश विध्वस कर्मारिजाल । न पुण्यं न पाप न श्रमान प्राणं,

पिरार्म म र म लिबास मूदो,
औरम मेद म मर्विन मोहोमा म मुक्त
मोई म तम्या, चिदा पाप मार
भन्त ममन्या सम्पमत्रमरीम भम्या।
- गुर्षो न शिप्पो म प्रायोमरीन, विदा
KALONोस यस
तम्य रूपं । पम्पो लिमियम परमामे विरा
सारिश्रमिक
भारमारामगुलाकर गुणनिषितम्परसाकरा।
समें भूगगवागते समतामाता त्वया सगे।
लोपाधिपतिमपलमनसाप्पायन्ति पोगीला
जोतं हरियण्इपहर भीमाय भूएम्पुरत
२२ भी घन्टाकर्ण स्तोत्रम् ।
*मपराक महावीर सम्पामिनिमायका।
विस्फोरकार्य प्रान ruru महापला।"

(८७) यत्र त्वं तिष्टसि देव लिसितोऽनरपंक्तिमिः । रोगास्तन प्रणश्यति वातपित्तकफोदय ॥२॥ यत्र राजमयं नास्ति यांति फर्णा जपानगत् । शाकिनी भृत वैताल राक्षसाः प्रभवंति न ॥ ३ ॥ नाकाले मरणं तस्य न च सपण दश्यते । अग्निचौरभयं नास्ति ॐ ह्रीं श्रीं घण्टाकर्णी नमोस्तु ते ठः ठः ठ. स्वाहा ॥४॥ Drorcom २३. श्री पार्श्वनाथ स्तोत्रम् । ॥ प्रोट | प्रणमामि सदा प्रभुपाश्चेजिनं, जिननायक दायक सौख्यधनम् । धनचारुमनोहरदेहधर, धरणीपतिनित्यसुसेवकरम् ॥ १ ॥ करुणारस रजित भव्यफणी, फणिसप्त सुशोभित मौलिमणिः। मणिकंचनरूपत्रिकोटघट, घटिता सुर किन्नर पावतटं ॥ २ ॥ तटिनीपतिघोपगभीरस्वर, शरणागतविश्वश्रशेपनरं नग्नारिनमस्कृत ।

पठाइटहेलिकर्म हठातपस, पलपाम पर
मदा यस कुरुमै निमनायमाप्रनिती
मलिमी मम मीस वन रजुवा प्रभु पानि
()
नित्यग्दा पभापती गामतीत सदा
तेत्रिप गोप पया कम कमठासुर पाम्प मुझे
पारस PHA SAATHIमपन समरिक
भापतरी सममें । मममरमा निक्षम,
समता गुम समय परम परमार्म निधार
सुधर्म ।
सिमित
मुपमधाम्पकर करणापरी
परममिरिकर परमापर।
परतर मपसमतोमर्य
भषमता प्रभुपारपशिम शिर्ष ७४

(४६)
२४. भक्तामरस्तोत्रम् ।
भक्तामरप्रणतमौलिमणिप्रभाणा-
मुद्योतकं दलितपापतमोविनानम् ।
सम्यक्प्रणम्य जिनपादयुगं युगादा-
वालस्वन सवजले पतता जनानाम् ॥१॥
यः संस्तुत सकलवाड्मयतत्त्वबोधा-
दुद्भूतवुद्धिपटुमिः सुरलोकनाथैः ।
स्तोत्रैर्जगत्रितयचित्तहरेरुदारै.
स्तोप्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥२॥
बुद्धया विनापि विवुधार्चितगादपीठ !
स्तोतुं समुद्यतमतिविंगतत्रपोऽहम् ।
वालं विहाय जलसंस्थित मिन्दुविम्ब-
मन्यः क इच्छति जना सहसा ग्रहीतुम् ॥३॥
घक्तुं गुणान्गुणसमुद्र शशाककान्तान्
कस्ते क्षमः सुरगुरुप्रतिमोऽपि वुद्धया ।
कल्पान्तकालपवनोद्धतनकचक्रं
को वा तरीतुमलमम्वुनिधि भुजाभ्याम् ॥४॥

४) निस्य वा पमारती गायतमीत पदासत वेन्द्रिय गोप पपा कमळं कमठासुर मारय मा हटं। ठोक्षिक रासप, बसपाम बरमा पागल सजाय पम पमा मयन, भव्यतरी समन । मममत्वमा परमिसम, ममता गुज समय परम परमार्थ विचार सवा यस पुशरमे जिमनापप्रतापनिजी माखिनी मज मी तमं नुता प्रभु पारजिन सपर्म ॥३॥ पुनश्मिभित॥ एममधाम्पकर करणापर परमसियिकर वापरं । अपसेमालोनप मपमा मभुपारमिर्म शिप पतिर

(५१)
दूरे सहस्रकिरणः कुरुते प्रभव
पद्माकरेपु जलजानि विकासभाजि ॥६॥
नात्यद्भुत भुवनभूपण भूतनाथ
भूतैर्गुणभुवि भवन्तमभिष्टुवन्तः ।
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा
भूत्याश्रितं य इह नात्मसम करोति ॥१०॥
दृष्ट्वा भवन्तमनिमेपविलोकनीयं
नान्यत्र तोपमुपयाति जनस्य चनु ।
पीत्वा पयः शशिकरद्युतिदुग्धसिन्धोः
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत् ॥११॥
शान्तरागरुचिभि परमाणुभिस्त्वं
निर्मापितत्रिभुवनैकललामभूत ।
तावन्त एव खलु तेप्यणवः पृथिव्यां
यत्ते समानमपर न हि रूपमस्ति ॥१२॥
वक्त्रं क्व ते सुरनरोरगनेत्रहारि
नि शेपनिर्जितजगन्त्रितयोपमानम् ।
विम्बं कलङ्कमलिनं क्व निशाकरस्य
यद्वासरे भवति पागडुपलाशकल्पम् ॥१३॥

मोऽहं तथापि तब भक्तिमयाम्मुमीरा ! कतुं सर्व पिगतशफ्सिरपि प्रवृतः। मीस्यात्मपीर्यमपिचाप मृगी मृगेन्द्रम् नाम्येति कि निशियोः परिपासमार्चम मरपमुत भुसषा परिहासयाम स्वयक्तिरेख मुकरीकुरते बसान्माम् । पत्कोकिला किल मपी मधुर विरोति समारतकनिकानिहरेको स्थात्मस्तमेन मममम्ततिसधिपर्व पार्प पवारमयमुपैति शरीरमामाम् । माहाम्तलोकमसिनीलमरोपमाय मायभिन्न मिग शायरमम्पकारम् ॥ मरपति माप तप संस्तवम मयेद- मारभ्यते तमुधिपापि तब प्रमावात् । तो हरिम्पत्ति सता मलिमीरमेष मुहाफलपुतिमुपैति ननूप पिता प्रास्ता सप स्तमममतासमतदीप पालकथापि सगा पुरितानि इम्ति ।

(५३) विभ्राजते तव मुसान्जमनल्पकान्ति, विद्योतयजगद पूर्वशशांकविम्यम् ॥२८॥ किं शर्वरीपु शशिनाहनि विवस्वना वा युष्मन्मुखेन्दुदलितेपु नमस्सु नाथ । निप्पन्नशालिवनशालिनि जीवलोके कार्य कियजलधरैर्जलमारनमै ॥२६॥ मानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं नैवं तथा हरिहरादिपु नायकेपु । तेज. स्फुरन्मणिपु यानि यया महत्त्वं नैवं तु काचशकले किरणाकुलेऽपि ॥२० मन्ये वरं हरिहरादय एव दृष्टा दृऐपु येपु हृदयं त्वयि तोपमेति । किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य. कश्चिन्मनो हरति नाथ भवान्तरेऽपि ।।२ स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान् नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता । सर्वा दिशो दधति भानिसहस्ररश्मि प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशुजालम् ।।२ स्थामाममन्दि मुनप परम पुर्मास- माविस्पवर्षमम तमसा पुरस्तात् । स्वामेष सम्यगुपसम्म जपन्ति मृत्यु माम्पा शिव शिवपदस्य मुभीन्द्र पम्पा 14 म्यामम्पप पिमुमसिम्स्यमसंयमा मक्षासमीरमनम्तमनसाकेतुम् । योगीको विक्तियोगमनेकमेचे पानस्यरूपममसं प्रपदम्ति सम्त ॥२४॥ पुरमपमेप विपुपार्षितपुरियोमाद- व शंकरोऽसि मुपनापणकरत्पात् । पातामि पीर शिवमार्गसिपेपिपानात प्पफा स्वमप मगापुम्पोचमोऽसि ॥२५॥ सुर्य नमामिभुपमानिहाय माप तुगम सिनितनामसमृपक्षा। सुभ्य अमरिमगत परमेश्वराय तुम्प ममो जिन मपारमियोपचार २१ को पिम्मपन्धि पदिमाम गुरोप- मधित नियावा मुनीश।

(५५)
दोपैरुपात्तविविधाश्रयजातगर्वैः
स्वप्नान्तरेऽपिन कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥२७॥
उच्चैरशोकतरुसंश्रितमुन्मयूख-
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम् ।
स्पष्टोलसत्किरणमस्ततमोवितानं
विम्यं रवेरिव पयोधरपार्श्ववति ॥२८॥
सिंहासने मणिमयूखशिखाविचित्रे
विभ्राजते तव वपुः कनकावदातम् ।
विम्वं वियद्विलसदशुलतावितानं
तुड्गोदयाद्रिशिरसीव सहस्ररश्मे ॥२६॥
कुन्दावदातचलचामरचारुशोभम्
विभ्राजते तव वपुः कलधौतकान्तम् ।
उद्यच्छशाङ्कशुचिनिर्भरवारिधार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥३०॥
छत्रत्रयं तव विभाति शशाङ्ककान्त-
मुच्चैः स्थितं स्थगितभानुकरप्रतापम् ।
मुक्ताफलप्रकरजालविवृद्धशोभम्
प्रख्यापयत्त्रिजगत' परमेश्वरत्वम् ॥३२॥

गमारताररबपरित दिग्निमाग- म्सोक्यतोकसुमसंगमभूतिया। मर्मराजजयपोपपपोपकासम् से मिर्पमति से पासा प्रबादी तय मदारसुम्परनमेहसुपारिजात- सनामकारिकममोतरपिकया। मेधावपिगुराममंदमम्मपाता दिग्पा दिया पतति ते पपसा ति॥ सम्भरमभावलपमूरिधिमा निमोस्ते खोकपपतिमता पुतिमाधिपंवी। प्रोपरिपाकरमिरंतरभूरिसम्पा पीप्या जयपपि निशामपि सोमसोम्परा म्पप गममार्गविभाए। मरामनामकधमकरित्रलोक्पा! तिपय निभात पिशवास- मागम्पमापपरिखामगुरी पोम्पा ॥३॥ अभिप्रहमनपरापुञ्जमाती पयुमममममावशिवामिगमी।

( ५७ )
पादौ पदानि तघ यत्र जिनेन्द्र धत्तः
पद्मानि तत्र विवुधाः परिकल्पयंति ॥३६॥
इत्थं यथा तव विभूतिरभूजिनेन्द्र
धर्मोपदेशनविधौ न तथा परस्य ।
यादृक्प्रभा दिनकृतः प्रतान्धकारा
ताहक्कुतो ग्रहगणस्य विकाशिनोऽपि ॥३७॥
श्च्योतन्मदाविलविलोलकपोलमूल-
मत्तभ्रमभ्रमरनादविवृद्धकोपम् ।
ऐरावताभमिभमुद्धतमापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम् ॥३८॥
भिन्नेभकुम्भगलदुज्ज्वलशोणितात-
मुक्ताफलप्रकरभूपितभूमिभागः ।
बद्धक्रमः क्रमगतं हरिणाधिपोऽपि
नाफामति क्रमयुगाचलसंथितं ते ॥३६॥
कल्पान्तकालपवनोद्धतवहिनकल्पं
दावानलं ज्वलितमुज्ज्वलमुत्स्फुलिङ्गम् ।
विश्वं जिघत्सुमिष सम्मुखमापतन्तं
त्वन्नामकीर्तनजलं शमयत्यशेपम् ॥४०॥

रफ्तेपया समदकोकिसकएठनीर्स कोपोयतं फणिममुत्फपमापतम्तम् भाकामति क्रमयुगेख निरसणा- रूपनाममागबममी दिपस्म पुंसा परगन्तुगमतिमीममार- माजी वम पसरतामपि भूपतीनाम् । उपरिपाकरमपन शिक्षापवियम् अकीर्तनाचम इपमा भिवामुपति कुम्ताप्रमिभगजयोपितरारियाह- बेगापतारसरबारपोपमीमे । युब जय पिडित पुजेपीमपता- मत्वपापपग्मनाभपिसो समन्वे u अम्भोनिधी भितमीपषमापार- पाठीमपाटमपयोल्पामारवाग्मी । सत्ताइशिकाररिपतपामपामा-- माम विहाय भवन स्मरबाट मयंतिsvar ( ५६ ) उद्भूतभीपणजलोदरभारभुग्ना. शोच्यां दशामुपगताश्चुतजीविताशाः । त्वत्पादपङ्कजरजोऽमृतदिग्धदेहा. मां भवन्ति मकरध्वजतुल्यरूपा ॥४॥ प्रापादकण्ठमुरुशृंखलवेष्टितागा- गाढं वृहन्निगडकोटिनिघृष्टजंघा । त्वन्नाममंत्रमनिशं मनुजाः स्मरन्तः सद्यः स्वयं विगतवंधभया भवन्ति ॥४६॥ मत्तद्विपेन्द्रमृगराजदवानलाहि- संग्रामवारिधिमहोदरवन्धनोत्थम् । तस्याशु नाशमुपयाति भयं भियेव यस्तावकं स्तवमिमं मतिमानधीते ॥४७॥ स्तोत्रस तव जिनेन्द्र गुणैर्निवद्धां भक्त्या मया रुचिरवर्णविचित्रपुष्पाम् । धत्ते जनो य इह कराठगतामजस्रं तं मानतुंगमवशा समुपैति लक्ष्मी, ॥४॥ - २५ पारवेनाय स्वामी बद। शिनि मंगलमुकरं पर्मक मिकर्ड विश्षा प्रगर्ट चार मर्ट। मवरेसु समीर मीस शरीर मर गुरु धीर गमीर : जगति अग शासपुमति हरण सर पर सुरु करणं । मी पारणे जिने मित मार्गेन नमत सई त मई १॥ देह पुतिमा सुमगा कार विश्वापार गुष भार । शिव एमसी रफ्तं पग चिरफ्त संकट मुक्त गुप पुफ्त । कमठेपम दसम गजगति बसम विपक्ष कमल भीषिमल। पी पारी बिने मित मागेम्स ममत सुरत मन ॥ महिमा दिन कार मम निस्तार निर्मितसार दावार । मतिमय मेतार गत मार भतार पातारं ॥rमें असरवमें दुर्मति इसन संमति मपर्म गुरु मदन । श्री पार मिनेन्द्र नित नागें ममत सुन कत भद्रं ॥३॥ पाम थी जप निर्मस पल जिभरत सिनमो शिष मममा परे सफर पिदार मुफ़्ट विहार सुखकार पागणी भर रम्प अगस्यगम् (६१) रम्यारम्य शहरम् । श्रीपाश्र्य जिनेन्द्र निन नागेन्द्र नमत सुरेंद्र कृत भई ॥४॥ २६. छंद त्रिभंगी शान्तिनाथ का। गजपुर अवतारं, शान्ति कुमार, शिवदातार, सुखकारं । निरुपम प्राकारं, रुचिगवार, जगदा. धार, जितमारं ॥२॥ कृत रिसहारं, महिमापार, विगत विकार, जगसारं। परहित समारं, गुन विस्तार, जग निस्तारं, शिवधारं ॥२॥ श्री शान्ति जिनेश, जगत महेश, विगत फलेश,भद्रेशं । भविक- मल दिनेशं, मति महिसैप,मदनमहेशं, परमेश।।३।। जनकुमदनिशेश, रुचिरादेश, धर्मधरेश, चक्रेशं भवजल पोतेश, महिमनगेशं, निरुपमवेश, तीयेशं ॥४॥ वर रूप श्रमानं, श्ररितमभानं, निरुपम शानं, गतमानं । गुन गणउत्थानं, मुक्ति वितानं, लोक निदानं, संधानं ॥५॥ भवि तारन स्थानं, कृपा निधानं, जगत प्रधान, मतिमानं । प्रगटित कल्यानं

पर महिमाम शिषपपवार्म मगजान ॥ मी
भवशाल जितकनिकास कीर्वि विशाल मिमप
गति विमित मगल परिकुलकालं यधन रस
पग्माम । - मुनि जनज मृणाल मप मपठ
शिषडर माले सुकमाल । मवि पर रखा
चिमुयन पालं पान विश्वास गुनमा -1
२७ श्री पार्थनाप।
(मिमी)
शिमसुखपातार विश्वापार सौम्याका
नेतार जितमदनविकार करुणागार वरिपुपार
नेता सलममिस्तार परमोदार स्तपनापार
मातार। गुणपागमा कीर्तिसार यसमा
धातार भामवासक्त तोपितमातं हम
रियुक्त सुम्यक्तं । मदमत्सरमुक्तं तारस सर्व
विषयविरफ्त शिवरतम्। अम्पाहवमद्रं धैर्यगिरीम्
पमा ममुद्रं सम्मुद्र। मुख मिर्जित पन्ध्र प्रदत

(६३) सुरेन्द्र महामुनीन्द्र निस्तन्द्रं ॥२॥ सुखदायि- स्मरणंदु खितशरणं वन्दितचरणं विगतमदम् । कृतदानोद्धरणं कलिमलहरणं विमलीकरणं ॥ प्रकटीकृतविनर दर्शितसुनय सुगुणमयम् । अगणितगुण- निचयं मुनिजनहृदयं पार्श्वजिनं जयक्षपित- भयम् ॥ प्रवरपदम् प्रवचननिलयं २८ अथ ऋषभदेव छन्द । ( मायकाल का) परम अलक्षहि प्रय जग चक्षुहि, संघसुपक्षहि अक्षवते । प्रभु अवियोगी श्रादि वियोगी, स्वय मुपयोगी संघ कृते ॥ ऋपभ निरञ्जन सव दुख मञ्जन, हे मनरञ्जन सुध चित्ते । जय जय हो अमराधिप वन्दन, कर्मनिकन्दन नाभिस्ते ॥१॥ मुरुदेवीनन्दन अनिंद हि-कंदन है ढिगचन्द हिमन्द दुते । तनकनकाचलचम्पक लीकल दीप-

शिकादसम्मानपते निरमता प्रकर्ष की,
परमात वितात मापते। जयपद पर
विव िम रिक्ति पादत पर सुरम्पमिते।
जुन सुम संचन पधित बम्पन पण प्रतम
स्यसम्पयिते सहि अपशि दी पुनम सो
ममपर्गदि म्यगपते ।
अर्गम पस
बामि केवल राग पिराग पिरोभरते ।
भतिशय लापक व्यक्त महायफ मुक्ति प्रयापक
मुक्ति पते मव भम जाल कपस लिसतकात,
मृणाल पम्ताल पतेममय निरजरबोट पलाटव
पाप निरन्तर प्रौट भन्यूट बते। सिरहिय या
पिचिपाह भकरण पवित्र मा पते दम
महिमा म्प अनूपगते मतिहार ग्यो जिमपम
गुहार मामा बीपन मीन मूलहि धर्म
मुजीवम पाम्पते। यह भव सागर भागरते
गदि सारद मापमु पाए तुम मिप रूप
कपाल अनूप शरसागत सिर सम्परुन त्रयः
प्रमु गुम्ष मागर पार मवारिवि (मुज पारम

(६५) 1 पारगते । निम पदहीन अपंग निरन्तर चढे गिरि अद्ग उतंगनते ॥ इमहिज हो बुद्धि हीन अधीन, यह यतकीन क्षमा कुरुते ॥ ७ ॥ ॥ इति ऋषभदेव छन्द ॥ २६. साधु गुण । । इन्द गिभगी॥ गहे सुशानं, धरत ही ध्यान,मरदत मानं, वह भारी । दुर्मतिसे दूरा, संजमसूरा, कथे न कूडा, श्रणगारी ॥ परहरिया प्रेमा, निर्मलनेमा, हिरदे हेमा, शुभचारी । तपस्या तन तावे, अघ उडावे, धन २ साधू गुणधारी ॥ ॥ सुख सेजां सूली, धन है धूली, अनमूली, उर लोमलता। नो कल्पनिहारी, उग्रविहारी, कीधा भारी, मोक्षमता । सम साकर टाकर कंचन काकर ठाकर चाकर एकसारी ॥त. ॥२॥ दिल नहिं दभा, थिर मन थम्भा, अधिक अचम्मा, गुणगेह व्रत पाले धम्भा, रमे निरंभा भल

पल मम्मा मग जर अमय भारमा, पया मिरमा,
हेलम्मा भक्षपारीवाराम फारम सारस,
मिपम पिटाख भातम तारण आप अपे। गरी
मर मारे म्यूमा हारे मई निषारे ताप पे ।
दुश्मम प्रठवाडष मनको मारख तप तवारी
मेवारी जीते मनमोपा म विरोपण
र विरोपा देताली। साईरेसाद र सम्मा
गमेन नावं रंगरखी : पर विपपाद पंचममा
भई पार्य प्रारीत म्यापारी,
मारी मारी पस्तु पिबारी मेता है। प्रेमापक
पामे पायक बीजायक देवाधर्म पीर
मनी पर भाये मसीपर परे मुनीश्वर श्रीपारी।
तक परकापा मिपा माया प्ररियस
दाया करी। मम म्याग मठारे, ममता मारे
बायन पारे संत मी सा पति बास, निचरे
याधिक रगरीत.लोमा
सिवगा हर अहगार करेम काम र विधा।
प्रपा महिमी मेल न मेरी मममम मा

(६७) सदा ॥ तज हॉसि तमासा, वेष विलासा, उरकी श्राशा सव छारी |त०॥८॥ सतवीस सुरगा, गुण- जलगंगा, ओपम अगा, शशि जैसा। भल वाणी भाखे, दोप न दाखे, रात न राखे मनरेपा ॥ साधू गुण सांचा, वंद्या वाचा, जग में जाचा, सब सारी ।। त० ॥ ६ ॥ ३०. शारदाष्टक । ॥ छन्द मुजग प्रयात ॥ जिनादेश जाता जिनेन्द्रा विख्याता, विशुद्धा प्रवुद्धा नमोलोकमाता, दुराचार दु:हरा संकरानी, नमो देवि वागीश्वरी जैनवानी ॥ १॥ सुधी धर्म संसाधिनी धर्मशाला, मुधातापनि शिनी मेघ- माला, महामोहविध्वंसिनी मोक्षदानी, नमो देवि वागीश्वरी जैनवानी ॥२॥ अखै वृक्ष शाखा व्यती- तामिलाषा, कथा संस्कृता प्राकृता देश भाषा, चि- दानन्द भूपाल की राजधानी, नमो० ॥३॥ समा- -

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पणट्ट कमट्ट अट्ट गुण, युक्त मुक्त संसार । पायो पद
(६६)
स्वामी, अमिन शक्ति भाडार || सेवा० ॥१॥ कर
परमिष्ठ तास पद, वन्दो बारम्बार ॥से०॥२॥ सिद्ध
प्रभु का स्मरण जग में, सफल सिद्ध दातार ।
मन वांच्छित पूरण सुर-नर मम, चिंता चूरण
हार ॥ से० ॥ ३ ॥ जपे जाप योगीश रात दिन,
ध्यावे हृदय मझार ॥ तीर्थदर -प्रणमें उनको,
जव होवे अणगार ॥ से० ॥४॥ सूर्योदय के समय
भक्तियुत, स्थिरचित्त दृढ़ता धार। जपे 'सिद्ध'
यह जाप तास घर होवे ऋद्धि अपार ।। से० ॥५॥
सिद्धस्तुति पढ़े भाव से, प्रति दिन जो नरनार।
सो दिव शिव सुख पावे निश्चय, बना रहे सरदार
॥ से० ॥६॥ माधव मुनि कहे सकल संघ में, यढ़े
हमेशा प्यार। विद्या विनय विवेक समन्वित, पाये
प्रचुर प्रधार ।। से० ॥७॥

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अक्षरणे शरणे तू राखे। तुम नामे सङ्कट विकट
टले । विडिया व्हाला पाय मिले या नट विठ
लम्पट दूरे नाशे तुझ नामें चोर चुगल त्रासे । रण
राऊल जयतुज नाम थकी, सघले आगल तुझ सेव
(७१)
तणे । घडवडियां तु अाधार कहो, समरथ साहब
मैं अाज लह्यो ॥७॥ दुखिया ने सुख दायक दाखे,
थकी ॥ ६ ॥ यक्ष राक्षस किन्न सवि उरगा, करि
केशरी दावानल विहगा। वध वन्धन भय सघला
जावे, ते एक मने तुजने ध्यावे ॥ १०॥ भूत प्रेत
पिशाच छली न शके, जगदीश तवामिध जाप
थके । मोटा जोटिंग रहे दुरे, दैत्यादिकना तुं मद
चूरे ॥११॥ डायणि सायणि जाय हटकी, भगवन्त
धाय तुज भजन थकी। कपटी तुज नाम लियां कंपे
दुरजन मुख थी जी जी जंपे ॥१२॥ मानी मछराला
मुंह मोड़े तेपण अागलथी कर जोड़े। दुर मुख
दुष्टादिक तूहि दमे, तुज नामे म्होटा मलेच्छ नमे
॥१३॥ तुज नामे माने नृप सवला, तुज जश उज्जल
जिम चन्द्र कला । तुज नामे पामे रिद्धि घणी, जय

(५२) जय जयदीपरमिगत भली ॥ वितामसि काम समी पामे सिगप रस पाक र बामे । मनपर का मामे, पुन दारिपर पि। .१५॥ मिन र धनपत करे, तुम्यो कोबर मगर मरे । पर पुषसा परिवार भो, ते सा मदिमा गुमनाम तो।मासिक मोती रत अस्पा सोल पर पासपर मया। बसि ग्य मरंग मेप भी तुम मा अविरो मलारी विमामपि साकिबली- बोरवण मममी पम पम चित्र पाहमो मबगे, मिमराग सदा तुम ज्योति जगेग ठाकुर सब पर रपे पाती पलको माथि फरो। महाराविक सामासी जाये मारग बज अपार पाये॥१० मा भूरण मति दिन गली मशाम निमिरवत आप रही। सुग सुम- सपी शामा पाए, पमित पर पामी माप २० बस शासि वपन पीड़ा मासे पुरषस मुगदीन पर्स प्रासे। गर गुमरजी सरसा, तुममा - (७३) रोग समे सघला ॥ २१ ॥ गहिला गूंगा बहिराय जिके, तुज ध्याने गत दुख जायनिके। तनु कांति कला सुविशेष वधे, तुज स्मरण से नवनिधि सधे ॥२२॥ करि केशरी अहिरण बंधसया, जल जलण जलोदर अष्ट भया । गंगण पमुहा सव जायटली, तुज नामे पामे रग रली ।। २३ ॥ ॐ ह्रीं अहं श्रीं पार्श्वनमो, नमि उण जपंता दुष्टदमो। चिंतामणी मन्त्र जिके ध्यावे, तिण घर दिन दिन दोलत थावे ॥२४॥ त्रिकरण शुद्ध जे श्राराधे, तस जस कीर्ति जगमा यांधे। वलि कामित काम सवे साधे, स- मिहित चिंतामणी तुज लाधे ॥ २५ ॥ मद मच्छर मन थी दूर नजे, भगवन्त भलीपरे जेह भजे । तस घर कमला किल्लोल करे, वलिराज्य रमणी बहु लीसवरे ॥२६॥ भय वारक तारक तं प्राता, सज्जन मनगति मतिनो दाता। मात तात सहोदर तूं खामी, शिव दायक नायक हित कामी ॥ २७ ॥ करुणा कर ठाकुर तं म्हारो, निशिवासर नाम जपूं दागे। सेवक बूं परम कृपा करजो, बालेश्वर (५२) जय अगदीपर विगत पणी ।।१४। पितामणि काम समी पामे हयगय रय पापक तुस मामे । मनपर अफगई भाप मन पारिदर कपि। .१४॥ निषम ने ई पनवम्त करे, तुल्पो कोठार भंडार मरे । पर पुत्र कहर परिवार पपोते सा महिमा तुमनाम तसो । १६॥ माणिक मोती रत अन्या सोपन भूपरा या सुपर पापा । पति पर रण भवरंग बेप पक्षों तुम मामें मदिरहे ई मपारी विकमा मरि साकिराके पली- पोरगा मनपी पम पम विद्रमा केहमो मागे जिनपद सदा तुम स्पोति जगे बाग ठाकुर सब पर रपे पावंशी पण को मषि फरके। सूदारादि सानासी माये मारण तुम सपा सप पाये ॥ १० मा मूरत मे मति दिन वही महान तिमिर दस झाप रही। तुम सुम- रख भी गामा पाए,पंडित पर पामी पूनाए ॥२० बस बासि सपन पीड़ा मासे दुरवस मुख दीन पर्ण बासे। गर गुपए पुरषीके मरक्षा, तुम जाये (७३) रोग समे सघला ॥ २१ ॥ गहिला गूंगा बहिराय जिके, तुज ध्याने गत दुख जायतिके । तनु कांति कला सुविशेष वधे, तुज स्मरण से नवनिधि सधे ॥२२॥ करि केशरी अहिरण बंधसया, जल जलण जलोदर अष्ट भया । गंगण पमुहा सब जायटली, तुज नामे पामे रंग रली ॥ २३॥ ॐ ह्रीं श्रई श्रीं पार्श्वनमो, नमि उण जपंता दुष्टदमो। चिंतामणी मन्त्र जिके ध्याचे, तिण घर दिन दिन दोलत थावे ॥२४॥ त्रिकरण शुद्ध जे आराधे, तस जस कीर्ति जगमा बांधे। वलि कामिन काम सवे साधे, स- मिहित चिंतामणी तुज लाधे ॥ २५ ॥ मद मच्छर मन थी दुर तजे, भगवन्त भलीपरे जेह भजे । तस घर कमला किल्लोल करे, वलिराज्य रमणी बहु लीलवरे ॥२६॥ भय वारक तारक तुं त्रासा, सज्जन मनगति मतिनो दाता। मात तात सहोदर तूं खामी, शिव दायक नायक हित कामी ॥ २७ ॥ करुणा कर ठाकुर तूं म्हारो, निशिवासर नाम जपूं तहारो। सेवक छं परम कृपा करजो, बालेश्वर - पधित फल देम्पो २ मिनराम सदा अप- कारी तुम धरति भनि मोरमगारी । मुगनि महे- समापू गजे, विमुषन ठकुराई गुना ॥२६॥ इम भाव मझे जिनवर गापो, पामा सुत देखी पर सुख पायो । रबि शशि मुनि संवम्बर रंगे, अप- देय सूरमो सुण संगे ॥ ३.। सप पुरुषावाणी पाप्रभो, सकसा ममिडिव दोदिमिमो। पुप प रुचि विजपाय मुदा तव सम्पिमपी सुबमाप पदा ॥१॥ -- ३३ पैमठिया पत्र। २/18 भी मैमीश्वर सम्मक साम १४२२१२८ सुषिषि धर्मशान्ति अमिराम। अनन्त सुमसममिनाप सु- १०२४९ ग्राम, भी बिमवर मुम को ३३४ करणाम । भबिठमाय चन्दाममु पीर भाभार सुपारी गमीर । विमा-

(७५)
माथ विमल जग जान, श्री जिनवर मुज करो
कल्यान ॥२॥ मल्लिनाथ जिन मंगलरूप, पञ्चीस
धनुष सुन्दर स्वरूप । श्री अरनाथ नमूं वर्धमान,
श्री जिनवर मुज करो कल्यान ॥ ३॥ सुमति पद्म
प्रभु अवतंस, वासुपूज्य शीतल श्रेयांस। कुन्थु
पार्श्व अभिनन्दन भान, श्री जिनवर मुज करो
कल्यान ॥ ४ ॥ इण पर जिनवर सम्भारिये, दुख
दारिद्र विन निवारिये। पञ्चीसे पेसठ परमान,
श्री जिनवर मुज करो कल्यान ॥ ५॥ इम भणता
दुख नावे कदा, जो निज पासे राखे सदा। धरिये
पंच तणुं मन ध्यान, श्रीजिनवर मुज करो कल्यान
॥६॥ जिनवर नामे गंच्छित मिले, मनवांच्छित
सहु प्राशा फले। धर्मसिंह मुनि फहे नाम निधान,
श्री जिनवर मुज करो कल्यान ।।७।।

२४ पैसठ पत्र उदार जिन पत्र ।
रठ मेमी मम्मष मुविधि पम शांति जिम देवा।
अनन्त सुप्रठ ममि प्रजित शशि प्रादेय असेषा ।
सुपारचे विमल श्रीमसि पनुप तन है पममीण।
भर पीर सुमति मुपन बासपाप है नगरीया ।
शीतसारा भीकम्पु शिम पारस प्रमिनबन विभो ।
सउ मंत्र पीवीस सिम सूर्प सुमर मुणकर प्रमोः
३५ पैंसठ यन्त्र मप जिन स्तुति ।
२४.१०
२३
रथ२०३३४
३२११६१२१.
६।२२५१५
धर्म बद्र मिन अपम पीर पुपु प्रभु प्रती।
अनंत सुपाम भी धमति पापपुमोमित काती।

(७७) नेमी मुनि सुव्रत विमल पद्म अभिनन्दन वन्दी । संभव नमिजिन मल्लि वासुपूज्य तिहुँ जग चन्दौ। मीतल सुविधी अजित जिन भावन पच्चिस भाइये। अर श्रेयांश चौवीस जिन पैसठ यंत्र युत ध्याइये ।। ३६. पार्श्वनाथ छंद। सकल सार सुरतरु जग जाणं, जग जस वास जगत प्रमाणं । सकल देव शिर मुकुट सुचंग, नमो नमो जिनपति मनरग ॥१॥ त्रिभगी। जिनपति मनरंग, अकल अभंगं, तेज तुरंग नीलंग। सुर- शोभा संग, दग्ध अनंगं, शीश भुजंग, चतुरंग ॥ ॥२॥ बहु पुण्य प्रसंगं, नित उछरंगं, नवनव रंग, मरदंग । कीरति जलगग, देश दुरंगं, सुरनर संगं, सारंगं ॥ ३॥ सारंगा चक्र, परम पवित्रं, रुचिर चरित्रं, जीवित्रं । जगजीवन मंत्र, पंकजपत्रं, निर्मल नेत्रं, सावित्रं ॥४॥ सावित्रा वरणं, मुकुटा भरणं, त्रिभुवन शरणं, आचरणं । सुरअर्चित चरणां, (७८) पारिब हर शिषमुसार, महाधरण ५॥ जय बिमयर र नागत गर्म मात्रामन्म, महा मारा विश्वे प्रयवर्स पामर पत्र शीस भर पाधि गोममवर मास्तर, जन- मन मरां, उपरणं सुसमगति करपा भप- माहरणं परसाबरण भाइर। मापरता पालं माफ ममानं नित भूपास, पणिपाल । मएम रागिमात देष दयास विजय चास सक- मास रासगार रसाल, महके मा, रति विशाल भूपाला Rपु धर्मवगास समा वाम मोरकरास भयरात निमुवम रपवास, का दुकास मापिकास, पुरवास। महागुपपार, मविकापार, अगदावार निरिए तुम सिरप विचारी भरय हमारी पारी मारी भवपारी। तुम पम पा, प्रबरम पाऊँ, समब परेभष सुखकारी ॥ ११॥ मानमरस पूरे संकट रे मंगत मा सुषिशास । दिपदम गाये, प्रामन पाचे मार साये तमका

( ७६ )
"प्पय ॥
सकल स्वरूप उदार मार सम्पति सुखदायक ।
रोग शोक मंताप पाप सब
दूर
निावरक॥
चहुँ दिशि प्राण अखण्ड तपे जिम तेज दिनन्दो।
नमें अपसरा क्रोड जस गावे सुर इन्दो ॥
तेविसमो जिनवर मलो अधिक अधिक मगल निलो।
मुनि मेघराज इम विनये प्रभु पार्श्वनाथ त्रिभुवनतिलो ॥
३७. नवकार महिमा का सवैया ।
जग में सरजीवन जड़ी, पंच नवकार मत्र,
वार वार जपिये, क्षण न भुलाईये । सोवत उठत
मुख, जोवत प्रदेश मांही, रण में भुजंग सिंह,
देखी न डराईये ॥ सङ्कट न पड़े भूत व्यंतर कोई
नहीं छले; जले न अगन, भवोदधि तिर जाइये।
कहत है विनोदीलाल, तांको कहां स्वर्ग जिन
ने नवकार मन्त्र, मन वीच ध्याइये ॥॥ हिंसा के
फरैया, मुख झूठ के वोलेया; परधन के हरैया,
दूर

करुपा म कपू फिया है। रैमी सया, मधु-
पान के पिभैया। ऊपरी साम* मरैया, कठोर
प्रति दिया है।
मसौपा पराम रमैया
कम मूसरे मवैया सामे और पाप किया है।
तेतिरजात विभ, एक में बिनोरीलास, जिनमे
नषकार मंत्र मत काम लिया।२ को
बलदेवता, भूत प्रेत भमुरम को कोरके वसतरी
मुरी vषपात को। कोटपल गापये को,
फोरममायोकोपकमायको कोर
उपार को। कोर पसारेको कोउ
पक्ष मरवे को,
कोबल मारपे, पोप पनि
पारोका बिनोदीलास जपता में तीनों
भासा मेरे तो भर पस मन्त्र नपकार को
कोरोपनी रुपैया में मोर पणी कोर
कमोहिपेनीशम मार।कोर रतन
मालकोटरा मोतीसास, कोरके पस्तु सार,
प्रम्प प्रपाराकोरके तो पन पान कोटर
तो येत पासा बोरदापी पोड़ा, कोटके

(८१) परिवार है। कहत है विनोदीलाल जपता में तीनों काल, मेरे तो अखूट धन, मन्त्र नवकार है ॥४॥ अरिहन्तजी के जपे से, श्रष्ट कर्म को नाश होय, सिद्धजी के जपे से, अरूपी पद पाइये । श्राचारज जी के जपे से, श्रातम स्वरूप दीसे, उपाध्याय जप्यां सेती, ऊँची गत जाइये ॥ सर्व साधुजी के जपे, शिव मारग बताय देत, इह लोक परलोक, अति सुख पाइये, कहत है विनोदीलाल, जपता मैं तीनों काल नवकार मन्त्र जपे सदा सुख पाइये ॥५॥ ३८. वीस विहरमानों के नाम । || वीर छन्द ॥ श्री सीमंधर युग वाहु सुबाहु, सुजात स्वयं- प्रभु रुपमानन । अनन्त सुरप्रभु विशाल वज्रधर, शिव सुखकारन चन्द्रानन ॥ चन्द्रवाटु भुयंग ईश्वर नमि, वीरसेन महाभद्र जिणंद । देवजस और अजित वीर्य, यह वीस जिनेश भजो सुख- कन्द॥ ,

३६. ग्यारह गपपरों के माम ।
परिवार
श्री इन्द्र पनि पायुमवी, म्गत माया गुरुपवी ।
स्वामी सुपर्मा महित मौर्य पुनि *पित गबपती ।
मम्ता मचा मेवार्यमुमि, पवे सदा सुख भारती।
परमास एकापरा गती दीमे सपा मुगसम्मवी।।
४. सोबह सतियों के नाम ।
॥रिता
पासीसचन्दनवामिष राजीमती पुनि द्रौपदी ।
पूरा मुमदा सुन्दरी सुतसा शिवा सीता सती।
इमर्गति पयल्पा मृगा पभापती परमापती।
हेवादिपोरयमगरवी प्यानोपदापरवीप्ती|

(८३)
४१. चार शरणा॥
प्रह उठीने समरिये, हो भवियण मंगलिक
शरणा चार । आपदा मिट संपदाहुवे हो भवियरस
दोलतनां दातार ॥ १ ॥ हृदय मां राखीये हो
भवियण मंगलिक शरणां चार ॥ टेक || अरिहन्त
सिद्ध साधु तणा, हो० केवली भापित धर्म । ए
शरणां नित ध्यावतां, हो० तुटे श्राठों कर्म ।। ह०
॥२॥ वाटे घाटे चालतां, हो० रात दिवस ममार।
गाम नगर पुर विचरतां, हो विघ्न निवारण हार
॥ हृ०॥ ३॥ ए चारों सुख कारिया, हो०ए चारो
जयकार ए चारों उत्तम कह्या, हो० ए चारों हित
कार ॥ हु०॥४॥ डायण सायण भूतड़ा, हो.
सिंह चित्रा ने सूर । धैरी दुशमन चोरटा, हो.
रहे ते सघला दूर ॥ हृ. ॥ ५ ॥ राखो शरणारी
आसता, हो० नेडो नहीं श्रावे रोग । अानन्द
वरते इण नामथी, हो० व्हाला तणो संयोग ॥ ह.
॥६॥ सुख साता वरते घणी, हो. जे ध्यावे नरे

(1) पार । पर मव माता व जीषने, हो० पद वो मापार I0. मन चितित मनोरप फले, हो.परते करोड़ कस्पाद । यर मम से व्यापतो, रोनिमय पद मिरमाण सरीमो सरपो मही, रो० व सरीखो नहीं नाम । र सरीको मित्र महीं होगाम मगर पुर ठाम IC म शिप तप भावना हो. जग में तत्व सार। रोमारामा माप, हाफ पामो मोष दुपार:०१० मोर कीपी है पुगतसं, हो. पायी सेवेकामा अपि चीपमतमी म भो. सुबमोपाट गोपाला॥१॥ ४२. सिमवाणी। भी मिनपाची प्रति खदानी पतित पावन माम विरबानमुपायाभपमा भापक दायर नाम। परम ज्योति सुपावन कारावर पुरापबान । मीरा सुमति पारिधी ऊमति (८५) विदारिणी पाप निवारिणी जान । लत चोरासी टालूनी फेरे देई पद निर्वाण ॥ श्री० ॥२।। बुडवा- यासी अज्ञान कारण तार्या आसी ज्ञान प्राण परा- याचे नको घेऊं करुणा मनामधि प्रान ॥श्री०॥३॥ जिनवाणी उर श्रानी प्राणी श्रधम गये शिव थान । चम्पक मुनि जिनवाणी महिमा होतन एक जवान ॥ श्री० ॥४॥ ......... rocoti.ant..... ४३. चौवीस जिन स्तवन । राग-प्रभाती। प्रात ऊउ चौवीस जिनन्द को स्मरण कीजे भाव धरी ॥ प्रात०॥ टेर ॥ रिखव अजित सम्भव अभिनन्दन, सुमति कुमति सव दूर हरी । पन सुपास चन्दा प्रभु ध्यायो, पुष्पदन्त हण्या कर्म अरी ॥ प्रा० ॥१॥ शीतल जिन श्रेयास घासुपूज्य, विमल विमल बुद्धि देत खरी । अनंत धर्म श्री शांति जिनेश्वर, हरियो रोग असाध्य मरी ॥ प्रा०

इम्यु भरा मस्सि मुनि सुमतजी, नमी मेम
शिवरमणी परी। पावनाप मान मिनेश्वर,
केवल यो मप भोपहरी । प्रा० ।। तुम सम
नहीं कोई तारक पूजो, इम मिश्च मम मारिभरी।
विलोकरिन करे जिम तिम करिने मुक्ति णे
प्रमु मेहरमरी मा० rea
४५ नेमीनाय स्तवन ।
एम-समाती।
मांवरियो साहिब मारो दबाकर ममु
तेरो। मषसागर में पामिभ मरम्पो, आप तो
रो निषेरोविरा भए करम मुश निपर पकायो
दियो मानक धम पेरो। साहिब महेर मगरकर
मोपर, बेगो भार विमेरो।प्रबोपती
की पॉसी गालो सालो मप मब फेरो। सेवग में
साहिप प्रपोजे, मुगत महल में रो। सां॥
२॥ मोसोईसराय म समझे तोकरम ऐरो।

(८७) अविचल सुख चाह हुवे तो ले सरणो जिनकेरो ।। सां०॥ ३ जग में नाम चिंतामणि तेरो सो में काज्यो हेरो। रत्नचन्द कहे निन उठ जिन को लीजे नाम सवेरो ॥ सां०॥४॥ ४५. नेमीनाथ स्तवन । तर्न-उपरोक्ता सांवरियो साहिव सुखदायक सुनजो अरज हमारी । जग सागर काराग्रह सरखो तिन सेती मोय तारी ॥टेर॥ जनमत नयन कमल दल निरखी हरखी है महतारी। पिता परम सुख पायो प्रभु को सूरत मोहनगारी ॥ सां०॥१॥ जोवन वय में जोर दिखायो किस्मय हुए मुरारी । सव जन मिल के व्याह रचावो मोह दशा मन धारी ।। सां०॥२॥ व्याह विरध में जीव छुड़ाये तारी राजुल नारी। सहस पुरषसु संजम लेकर आप रहें ब्रह्मचारी ॥ सां॥३॥ प्रजन साम्बकंवर को तारी पाठ कृष्ण

(८)
फी मारी। पन पम मेमजिनपर साहिब परिप
पांच उपारी स. सदस प्रमेक पुरुष
निस्तारे पहुंचा मुक्त मजारी । रमपम को भर
मो माईमाम हमारी पारी सा० ॥५
४६ महावीर स्तषन ।
तमामीचा
महावीर स्वामी मे समपलक पाक में पड़ी
पड़ी। वर्षमान म्थामी मे सम पलक पलक मे
पड़ी घड़ी म टेर । सिदारप पर सुपर मारी
त्रिशला रूपे मारा सिरी । पर्वा स्वर्ग पकी पवि
पापा स्वांतर से क्षबर पड़ी |म०|| मधुमास
गुज सरम रजनी पूर्व मतरी। सनम थपो
मुग्पति मिज़ कर में से चास्मा प्रमु मेलगिरी ।।
म ॥२५ मप सुर इन्द्र प्रसप मिस मोहर
पिनती मलरी। पररा भगुम्टे मे पामो
महावीर तव माम परी ॥ म.मर गोषम

( ६ )
सुन्दर सुख भोगव परिहरी प्रभु राज सिरी। संजम
ले तप कठण करम हण केवल ले शिवनारवरी ।।
म०॥४॥ महावीर मन माहें जपतां भांजत अलगा
करम श्ररी । कुशलचन्द कहे शिवपुर दीजे जन्म
मरण दुख दूर हरी ।। म० ॥५॥
४७. उपदेशी पद ।
मर्ज-उपरोक।
रे चेतन पोते तूं पापी परना छिद्र चितारे ।
निर्मल होय करम करदम से निज गुण अंबु नितारे
॥टेर॥ सम्यक् दृष्टि नाम धरावे सेवे पाप अठारे ।
नरक निगोद थकी किम छूटे जो पर हियो न ठारे
गरे॥१॥ जिम तिम करने शाभा श्रापणी या जग
मांही दिखारे । प्रकट कहाय धर्म को धोरी अंतर
भर्यो विकारे ॥रे ॥२॥ परमेश्वर साखी घट घट
को जाकी शरम न धारे । पचसी कुंभी पाक नरक
में अन्तर छल न निवारे ॥ रे० ॥३॥ परनिंदा अग
पिंड भरीजे श्रागम साख संभारे । विनयचन्द कर
श्रातम निन्दा भव भव दुकृत टारे । रे० ॥४॥

(१०)
3८ भी पीर जिन स्तुति ।
मुरति मन मोहम कचनकोमा काय,
माग्य मन्तम मिशला देवी माय || मग मायक
लपम मात हाथ ननु माम दिन दिम पुसवामक
स्थामी भी मान ॥१सुरमर पर किपर पंरित
पद भरवि कामित मर पूरण भमिमष सुरता
कम्य । मबियस मे तारे प्रवरसम मिस दीय,
चोपीस जिनपर पर विमषा पीस ॥ २ ॥ परये
करि पागम माम्या धीमगषम्त,गसपर से प्या
गुणनिधि शाम प्रमैन । सुरगुरु पिस मरिमा का
र सके पोत समई सुमदायक मन सुप सा
मिशाल ॥३ सियापिका देवी पारे पियन विशेष
सह मंण्ट रे पूरे भास प्ररोप । भनिती कर
गाड़ी मेये सुग्नर एप जपे गुरुगण हम भीजिम
लाभ सुम्पि४ ॥

(६१) , ४४. विमलनाथजी का स्तवन । घर आंगण सुरतरु फल्योजी, कौन कनक फल खाय । गयवर बांध्यो वारणेजी, खर किम श्रावे दाय ॥१॥ विमल जिन म्हारी तुमसुंजी प्रेम, सुर सकलंकितशुं मिल्याजी, हियड़े ही से केम वि ॥ २॥ मन गमता मेवालहीजी, कुण खड खावा जाय । आदर साहिव नो लही जी, कुण ल्ये रांक- मनाय ॥वि०॥३॥ रत्न छते कुण काचनेजी, अलके पसारे हाथ । कुण सुरतरु थी ऊठनेजी, चावल घाले वाथ ।। वि०॥४॥ देव अवर जो हु करूँजी, तो प्रभु तुमची श्राण । श्री जिनराज भयो भवेंजी, तुं हिज देव प्रमाण || वि०॥५॥ ५०. चवदह स्वप्त । दशवॉ वर्ग थकी चव्याजी चौवीसवाँ जिनराय ! चवदह सुपना देखियाजी त्रिशला देवी माय !! जिनन्द माय दीठा सुपना सार । टेर ।

(१२)
पहिले गयबर देसिशेमी सग दस प्रथपर।
पूजे पुपम रेखियोगी चोरी पोस्रो सर जि.
तीजे सिंह सुमोमी करतो मुल बगास।
पीये सामी देषवाजीराजील विमाप्त त्रि
पप बालसा नपीजी मोरी थी सुबास ।
पर धम्न मासिमोडी प्रमीय मरे प्राकाराशि
दिनार कगो तमस्जी किरवा मोफ ममास।
फरफती देवी पयासी ऊपी प्रति मसयस जि
कुंभ कलश रवमा अस्पोजी उरकमयो सुविधाल।
कमाइमा को संसात्रीमपस्मा रसामाजि
पण मगवर अस माशी मना करी सुसोमाप।
दय वी रंग में रमेशी देख्या माये दाय । मि.
तीर समुद्र पारो विशाजी जेना मीठो नीर ।
बनसो पानी मोमी कठिन पायपो पीरनि.
मोस्या उग झाका रेवपा देष बिमाम ।
परेबी कौतुक करेमी भावा असमान मि.
रमा की राशी निगमसजी पासप्य पदार)
स्थमो रेग्यो तेरमोगी रिपरे हर्ष मपार नि.

(६३)
ज्वाला देखी दीपतीजी श्रगन शिखा वहु तेज।
इतने जाग्या पदमनीजी धरता स्वप्ना से हेज ॥जिक
गजगति चाल्या मलकताजी श्राया राजन् पास।
भद्रासन श्रासन दियोजी राय पूछे हुल्लास |जि०
कहो किन कारण आवियाजीकहो थारामननी वात।
चवदे स्वप्ना देखियाजी अर्थ कहो साक्षात् ॥जिए
स्वप्ना सुनीराय हर्षियाजी कीनो स्वप्न विचार।
तीर्थकर चक्रवरत हुसीजी तीन लोक अाधार जित
प्रभाते पंडित तेडियाजी कीनो स्वप्न विचार ।
तीर्थङ्कर चक्रवर्ती हुसीजी तीन लोक करतार जिय
पंडित ने बहु धन दियोजी वस्तर ने फूल माल ।
गर्मवास पूरा थया जद जनम्या पुण्यवंत वालाजिर
चोसठ इन्द्र श्रावियाजी छप्पन दिशा फवार ।
अशुचि कर्म निवारनेजी गावे मंगलाचार जिर
प्रतिविम्ब घर में धोजी माताजी ने विश्वाश ।
शक इन्द्र लीधा हाथ मेंजी पञ्च रूप प्रकाश जिर
मेरु शिखर न्हवरावियाजी तेहनो बहु विस्तार ।
इन्द्रादिक सुर नाचियाजी नाची अपसरा नार॥जि

मटाई महोत्सव सुरफरेजी दीप बमीनार जाय।
गुण गाये प्रमुखी तसाची रिपहरप म माप जि.
परमात सुपमो मो मरोजी मत मामन्द पाय।
गेगोक
कम सब सामाजि
रखेसी मराम
५१ बीर प्रभु के दय स्पप्न ।
शासन नायक समरियेरे सात मगपम्त भी
माम दो मविजन । राम बोडीने संडम
भारपरि लाल चोवीमा अगमावदो भपियन
। १० सुपना वीरखी परिपारेहासार।
पहले पिशाच पमारियोरे सास जीस्पा मोरणी
कर दो म.। बर्मा में राम रेक कर, दिपोरेसास
कर्म किया परपर दो म०।२॥ सफेवापत
मी रेसियारे खास स्मन सरेशान हो, म.।
रात दिवस धर्म प्यावारे सात पायो यस
पान दो म० ॥३॥ विविध प्रसारमा पचिपारे
साल म्पपने वीमर जाम म.। प्रभुमी

(६५) देशनारे लाल, समझा हित ान हो, भ० ॥४॥ दोय माला रतना तणीरे लाल, स्वपने चोथे वि-- लोय हो, भ० । साधु वलि श्रावक तणारे लाल, धर्म प्ररूप्या दोय हो, भ०॥५॥ उज्जवल वरण गाया तणारे लाल स्वपने पांच में धार हो, भ० । साधु साधवी श्रावक श्राविकारे लाल, तीरथ थाप्या चार हो, भ० ॥६॥ पद्म सरोवर कमला छाइयोरे लाल, सपनो छट्टो अखेव हो, भ०। चारों जातरा देवी देवतारे लाल, सारे प्रभुजीरी सेव हो, भ० । ॥ ७ ॥ भुजाकरी समुद्र तिर गया रे लाल, सातमें , सपने विचार हो, भ० । संसारसमुद्र तिर गयारे उतर्या पहले पार हो, भ० ॥८॥ उगतो सूरज दीठो आटमेरे, ऊजलो अति असमान हो, भ० । प्रभुजी ने भाई ऊपनोरे लाल,निर्मल केवल ज्ञान हो, म० ॥९॥ मानुखोत्तर श्रातांविटियोरे लाल, सपने नवमें जान हो, भ० प्रभुजीरो तीन लोक मेरे लाल, जस फैल्यो असमान हो, भ० ॥१०॥ मेरु पर्वतनी चूलिकारे लाल, तापे सिंहासन ठाय हो, भ० ।

समोसरप में विराजियारे शाल,सांसपना मांय
हो म० ॥११॥ मुगति मंदिर में विराजियारे सास
मगबम्त भी पईमान हो, मरिशरामचमाजी
एम को रेसास, सूप मगमती प्रमानहो, मा१२।
५२ शान्तिनापजी को स्तवन ।
प्रातः ह भी शांति नियांव को स्मरण की
बड़ी पड़ी। संकट कोट करे मब संवित जो
प्पाचे मन भाष परी । मात..१॥ जनमत पाव
गत पुस उषीपो, गसीयो रोग भसाम्प मरी।
पर घट अन्तर मानन्ध प्रगरियो इसस्पोरिलो
पंपरी । मात०२॥ मापद तर विपम मय
भांजे जसे पेमत मृग हरी। एक चितपय
गुर प्याना मगर परिचय परम सिरी ।। प्रात..
॥३॥ पपे यिरलाप मरम के बाद परमार्थ पर
पवन करी । भवर रेव पर लरोपे श्री मित्र

(१७) मंदिर केल फली ॥प्रात० ॥४॥ प्रभु तुम नाम जग्यो घट अन्तर तो शुकरिये करम अरी। रतनचन्द शीतलता व्यापी, पापी लाय कपाय टली ॥ प्रात. ॥५॥ ५३. नेमनाथ स्तवन । तर्ज उपरोक्त । श्री नेमीश्वर साहिया प्रभु थे मुज सांचा देव। अवर देव सहु कारमा ज्यारी सुपने न वंळू सेव॥ १॥ जिनेश्वर नाथ हमारो रे, प्रभु मोने लागे प्या- रोरे ॥ टेर ॥ इण भव कीधी प्रीतड़ी प्रभु लीजो श्राप निभाय। करुणासागर साहिवा थारा नाम थी श्रानन्द थाय ॥जि०॥२॥ वैरागियां शिर सेहरो प्रभु यादव कुल सिनगार । भर जोवन में जुगत से प्रभु त्यागी राजुलनार ॥ जि० ॥ ३ ॥ सूरत सुन्दर सोमती प्रभु दीठां श्रावे दाय । सेव कियां साहिव तणी म्हारे कमी रही नहीं काय ॥जि०॥४॥ वाणि

(12)
"
जोगन परपती प्रमु, सुन न सके कोई कामुम
हरीले पदीय प्रभु थारी फिरने म भाषे पूछ।
जिला कालो सरसो जगत को प्रमु ते में दोनो
घोड़। सांया सरसो यागे जियो अब तो माको
कोर मजि.६॥रानी गुरु होनहीं प्रमुकाता
मास उमाम । Raौषमीरी चिमती अब
पूगेइमारी प्राणजिला समत पठारे पावले
प्रभु पी सेर चौमास | काती सुद पवम दिने
प्रमु पाकीपी भरपास सि.
५४ अषभदेव सावन ।
मिनन्द मित सरसो यारोरे मोह मनपार
रतारोरे। टेर। प्रम मम मापने प्रमुबारात
परमी पाप । मुख मागी संसारना पक्षे संगमरी
पितलाप ।
जितपस्या कीपी पावरी प्रमु
संगम पारी सुमार। अन्त समे भवराम करी
पाचा मारय मिट रिमाम जि.॥२॥सीस

(६६) सागर श्राऊखो पाया, भोगविया अति सुख । तिहाथी चविने ऊपना माता मरुदेवीनी कॅख ॥ जि॥३॥ लख चोरासी पूर्व को आयू पाया नाभी- नन्द । मोच्छव करवा कारणे कांई आया सुरनर वृन्द ॥ जि०॥४॥ वीस लाख पूर्घ लगे प्रभु कंवर पदे रहा श्राप । प्रेसठ पूर्व राज भोगवी पछे त्या- ग्या अठारा पाप |जि०॥॥ चार सेंस संग संजम लियो प्रभु ध्यायो निर्मल ध्यान। हजार वर्ष छमस्त रह्या पीछे ऊपनो केवल ज्ञान ।। जि०॥६॥ लाख पूरव दीक्षा पालने प्रभु दस सेंस मुनि परिवार । अनशन करे छे दिन में प्रभु कर गया खेवापार ।। जि०॥७॥ अनन्त सुस्रा में विराजिया प्रभु तोड्या श्राद्धं कर्म । इह भव जीव तारण भणी ज्यारा प्रकट कियो जिन धर्म ॥ जि०॥८॥ काल अनन्त मेला रह्या म्हारी पूरव प्रीत निमाव । मनरा मनोरथ पूरवो म्हांने आपरी ठौर वताव ॥ जि० ॥६॥ खूब- चन्द कहे आपको म्हांने पूरो है विश्वास । गुण गाया साल वेपने खाचरोद सेर चौमास ॥जिला

पामे
५५. महावीर स्वामी का पंव।
भीसियारय श्रृंगार निरासादेवी पुतमा
पापार । योमे सुपर सोवन वाम गरम मारो
भीषर्षमाम तुम मामे सदिय संपदा, तुम
मम पादित मुदा । तुम मामे बहिये सम्मान पर
म्हारोमी वर्षमान ||शा दुर्गम दुरी विकरात
नम मामे मा तत्काल तुम मामे दिनरस्पार
यरब तुम्हारो भी वर्धमान तुम मामे मारे
मापदा भूत प्रेतातरमही कदा रोगशोकर्षिता
मापिसारा शरस तुम्हारो श्री वर्षमान प्रहा-
विक पीड़ा मवि रे माम तुम्हारो उबरे।
धर्मसिंह मुनिवर माव प्रभाम, गरम तुम्हारो भी
पमाम मथ
१६ श्रीमदरस्वामी की स्तुति ।
त्रिभुवम सादिक भरण सुतीने मदीने
पर। दर्शन राजे मपा परी परम सुपीओ

( १०१ ) राज ॥१॥ म्हारी वीनतडी अवधारो साहिब श्री मंदर जिनराज टेर॥ श्राप घसो महाविदेह क्षेत्र में, हूं इण भरत मझार । मिलणो किण विध होवे साहिब, यो छे सवल विचार ॥ म्हांने०।२॥ भरत विचाले पर्वत आडो नामे छे वैताड । पचीस जोजन ऊँचो प्रमुजी पचास जोजन विस्तार ॥ म्हां ॥ ३॥ गंगा सिंधु दोनुं नदियां, प्राडी छे किरतार। सेंस अट्ठावीस दूजी नदियां, ये विहुँनो परिवार ॥ म्हां ॥४॥ तिण श्रागे वलि पर्वत श्राडो, चूल हेमवय नाम । एक सेंसने वा- धन जोजन, वारह कला अभिराम ॥ म्हां० ॥ ५ ॥ क्षेत्र हेमवय श्राडो छे प्रभू, युगल्या केरो वास । इक्कीस से ने पांच जोजन पांचकला सुविलास ॥म्हां०॥६॥ रोईता और रोईतंसा, नदियां महा- असराल । छप्पन सेंसवलि सामिल नदियां,श्राऊँ केम कृपाल | म्हां० ॥ ७ ॥ महाहेम चलि पर्वत आडो, मोटो अति विस्तार । चार सेंस दोसे दश जोजन, दशकला सुविचार ।। म्हां॥८॥ आठ सेंस -

(१०२)
मेपारसे पनि एकपीस जोमस तास । कसा एक
पनि ऊपर जामोदेव देहरिबास । मह-10
हरिकम्ता हरिससितामामे, नदियो परत।
बीणी मदिर्या सामिप्रभु सेस बारा एकसय
॥ म्ह०. निपेर पर्वत माडो प्रभु बोवन
पर विस्तार | सासे सेंस मत पाठ बिपालिस,
पोयस मनुहार
मिषति पुग
स्यारो बहरामनाम । तेह विपेर पर्वत पर
माणे पहोलो सुन बाम : महा०॥ १२॥ सीता
मामे मदी करेरी सब नदियों में सिरबार । पांच
लास पलि मामिल मदिप ऊपर पतीस हजार।
मो० ॥१३सामगोजन मेपर्वतमाम पुररीम
सार। गमताति माग्ग बीच में किम मा
किरतार महामगिरी पहारा पर्वत
हम उमप्पा जाय। मसाल बन मारग बीच में
लाग कम पाय । मो०१५ बम भर पर्वत
बहना बीच में नदियां पा पार । यि विध
भारे सुगम्पा पाहय मारग विपमी भारम्हां.

(१०३ ) ॥१६॥ दूर थकी अवधारो साहिव, या म्हारी पर- दास । मनवांछित सुख संपतिदाता पूरो म्हारी श्रास ॥ म्हां॥१७॥ किहां मुज दक्षिण भरत किहां घलि विजे पुखलावति सार। मिलवो किण विध होवे साहिब, यो छे सबल विचार ॥ म्हां ॥१८॥ तुम ही साहिब तुम श्रलवे सार, वसिया हिरदा- मझार । भव दुख भंजन अलख निरजन करुणा- रस भंडार ।। म्हां ॥ १६॥ समत अठारे घरष इक्यासी पोष वदी शुभ मास। बीज ने बुधवार अनोपम श्री जिन वचन विलास ॥ म्हां० ॥ २० ।। खरतर गच्छे हरषचन्दजी, स्वरूपचन्द गुरुराय । अमरचन्द कर जोड़ वीनवे, तारो गरीव निवाज आम्हां०॥२१॥ ५७. श्री मरुदेवी स्तवन । इण नालंदा पाडा में प्रभुजी चौदह किया चौ. मासाजी ॥टेर॥ मगध देश के माय विराजे, सुंदर नगरी सोहेजी । राजगृह राजा श्रेणिकरी, देखता मन मोहेजी पर भापक नोक पसे पनमन्ता, जिम मारगना रागीवी। परपर माहे सोमो कपो, म्पोति जगामग बागीपी HORI अड़ाव गेला जोर विराने हार मोस्यो नम खरिपाती। वस्तर पहिरे भारी मौसा गेया रतमा जडिमामी ॥३॥ पन पी मालम्पी पारे दोनों पात विरोखोगी। फिर २ पीर प्रामा पापिरिण उपकार प्ररो रेयाजी: इ०४॥वीन पाट रामा मेरिका, समकिन भारी लगतामी। जिन मारग तोष दीपायो बीर तसा दुषा मगतासीar ॥ पीपर मोदी समकिन पामी घेतला पटरावीजी। महा- मतीसी संजम स्वीपो धीर सिमन्द पहावीगी। ० ॥॥ भमय पवाजी महा गुणवम्ता, मन्त्रीनी दुध मार्गमी। संशम क्षेइमे स्वर्ग पहुंचा, मा एकापतारीखी। इ० तेषीस पेरा रामा भेणिकना पांचा अनुप विमामोसी। बस पोता देष लोपांचा पप जासी निर्धादोजीrailent नेवीस गपी रामा भमिकरी तपकर ही गासी ( १०५) जी। मोटी सतियां मुगत पहुंची, काट फरमनी जालीजी ॥ ३० ॥६॥ जंवू स्वामी इण नगरी हुश्रा, पाठ अन्तेवर परणीजी। वाल ब्रह्मचारी भली विचारी, निर्मल कीधी करणीजी ॥ इ० ॥ १० ॥ गौभद्र सेट हुश्राइन नगरी, सेठे संजम लीधो जी । वीर सरीखा सतगुरु मिलिया, जनम मरण से बीनोजी ॥ ३० ॥११॥ सालिभद्र सेठ हुश्रा इण नगरी, बलि वाणियो धन्नोजी । वैन सुभद्रा संजम लीधो, मुगत जावणरो मन्नोजी ॥ इ० ॥१२॥ महा- सतक श्रावक इण गामे हुश्रा, श्रावक पडिमा धारीजी। करणी करने कर्म खपाया, हुश्रा एका- पतारीजी ॥ ३० ॥१३।। सेठ सुदर्शन सेठो श्रावक, वीर वन्दन ने चाल्योजी। गेला मांही अर्जुन मिलियो, न रह्यो किननो पाल्योजी ।। इ० ॥ १४ ॥ अर्जुन माली लारे हो, वीर जिनन्द ने मेट्याजी। माली ने दीराई दीक्षा, दुख नगरीनो मेट्याजी ॥ इ०॥१५॥ मेघकवर श्रेणिकनो बेटो, लीधो संजम भारीजी। व्यावच निमित्ते फरदी काया, की दो

(१०)
मेमारी सारोजी ०१॥ भेणिक रामा समकित
पारी कीपो धर्म रोतोसी। एक पर में दोम
वीपैकर पायो ने पनि पोतोजी रत्तम
पुरपई भाई उपमा भाषा मे पति सापोली।
भगवता की सेवा बीपी पर मानव मन भायो
मी १८ सायवनायक वीरय पाप्पा, सा.
सता तुम पापानी। अपरायपम्प को पास
पापा मुगति महिल सिपापाजीमार संपत
भठारे गुण पाहीस नागोर सेर पोमासोगी।
एम्प जयमतजीग परसाद पीपी मोड सातो
जी।
५८ सापु बन्दना।
मागी मे बन्धका नित मित दी मात
गते सारे माती। मीच गति में मही जाये
पाच मयि भरपूररे मासी ॥ मोटा हे पंचमहा
मन पार पकापा का मठिसोमाणी । भ्रमर
मिषा मुमि समती सेष पोप बयोबीस घसरे

( १०७) प्राणी ॥सा॥२॥ ऋद्धि संपदा मुनि कारमी जाणी, दीनी संसार ने पूठरे प्राणी । ए पुरुपारी सेवा करतां, श्राठों करम जावे टूटरे प्राणी ॥ सा०॥३॥ एक एक मुनिवर रसना त्यागी, एक एक ज्ञान का भंडाररे प्राणी।एक एक मुनिवर व्यावचिया वैरागी, पहना गुणनो न आवे पाररे प्राणी सा॥४॥ गुण सत्तावीश करने दीपे, जीत्या परिपह वावीसरे प्राणी । वावन तो अनाचारज टाले, तेहने नमा म्हारो शीपरे प्राणी ।। सा०॥५॥ जहाज समान ते सन्त मुनिश्वर, भव्य जीव बैठे श्रायरे प्राणी । पर उपकारी मुनि दाम न मांगे, देवे मुगति पहुंचाय रे प्राणी ॥सामा६॥ ए शरणे प्राणी सातारे पामे, पावे ते लील विसालरे प्राणी। जन्म जरा और मरण मिटावे, पावे न फिर गर्भावासरे प्राणी ।। सा० ।। ७ ।। एक वचन जो सद्गुरु केरो, राखे हदय मायरे प्राणी । नर्फ निगोद में ते नहीं जावे, एम कहे जिनरायरे प्राणी ॥ सा०॥८॥ प्रभाते उठी ने उत्तम प्राणी, सुने साधारो व्याख्यानरे प्राणी।

(106)
९ पुरुषारी सेपाकरता पाषेप्रमर विमानरे प्रासी
। सारा संपत भठारे थप प्रगतीसे, घुसी गाम
योमासरे प्रासी। मुनि भासकरनी इसी पर
मणे । उसम साधा को दासरे प्राणी सा-१०॥
भग
५६. पड़ी साघु पन्वना ।
ममु
भर्मत घोषीशी भापमादिक महावीर।
मार्य क्षेत्रमा पारसी धर्म की सीर १३ महा भत्त
पनीनर शूर पीर मे पीर वीर्य प्रवर्वागी पहों
प्या भवन तीर ॥२॥ भी सीमेवर प्रमुख अपम्प
तीपर मीस ये माई मीपमा अपवम्ता सम
दीपक सोन सित्तर सत्ता परे जगीरा ।
पम्प मोटा प्रमुजी जेहने ममाषु मारो शीश
यही दोप कोरी करारोड़। मुनि दोप
सहस कोड़ी गहा मब सहम करोगा।
विचरे विधा में मोटा तपस्सी मोर। मारेकरी
पम्प, गो भवभी कोर ॥६.बोबी मिनमा,

(१०६) सघला ए गणधार । चउदेसे ने वावन, ते प्ररणमुं सुखकार ॥७॥ जिन शासन नायक, धन्य श्री वीर जिनन्द । गौतमादिक गणधर, वर्ताव्यो आनन्द ॥८॥ श्री ऋषभदेवना, भरतादिक सोपूत । वैराग्य मन पाणी, संयम लियो अद्भूत ॥६॥ केवल उपा. यो, करी करणी करतूत । जिनमत दिपावी, सघला मोक्ष पहंत ॥ १०॥ श्री भरतेश्वरना, हुवा पाटोधर पाठ । आदित्य जशादिक, पहोत्या, शिव- पुर वाट ॥ ११॥ श्री जिन अन्तरना, हुवा पाट असंख्य । मुनि मुक्ति पहोत्या, टाली फर्म नो बंक ॥१२॥ धन कम्पिल मुनिवर, नेमि नमुंश्रण- गार । जेणे तत्क्षण त्यागो, सहस्र रमणी परिवार ॥१३॥ मुनि हरिकेशी पली, चित्त मुनिश्वर सार । शुद्ध संयम पाली, पाम्या भवनो पार ॥१४॥ वली ईक्षुकार राजा घर कमलावती नार।भग्गूने जस्सा सेहना दोय कुमार ॥१५॥ छये छत्ति ऋद्धि छांडी, लीधो संयम भार । इण अल्प काल में, पाम्या मोक्ष द्वार ॥१६॥ वली संयति राजा, हिरण अहिड़े माय। मुमियर गर्यमाली प्राययो मारग ठाप ॥१७॥ चारित्र बामे मेट्या गुममा पार । सी राम पीश्वर पर्याकरी चिन माय १८ वली पये पापी राय मणी अति छोड़।पये मुक्ति पहाँस्या फलमे शोभा छोराय भषसर्प- णीमा पाठ राम गया मोह। बसमन मुनिवर गया पंच में देवलोक । २०वारण मनराजा, धीर पांचाधरी मान । पवेद हटायो यो काय मे प्रभपदान ॥२॥ करकी प्रमुख पयारे प्रत्येक योघ । मुनि मुक्ति पाया जोत्या में महा शोध । २२ ॥ पम्प मोटा मुमियर भगा पुत्र जगीरा । मुनिषर प्रमाबी जीत्या राग मे रीत। २॥ ॥ पली ममुन्द्र पाल मुमि राजमती हे मेम। देशी मे गौतम पाम्या शिवपुर सम ॥ २४ ॥ विजय मोष मुनि जय पोप पली जामा भी गर्गा- बा पोम्पा निर्वाह । २५ भीतराम- यना शिनवर करया र मनमप्पा म मा पीना पसीपमम्पासी ।

(१११ ) राख्यो गोतम स्नेह । महावीर समीपे पंच महा- व्रत लेह ॥२७॥ तप कठिन करीने, मोसी पापणी देह । गया अच्युत देव लोके चवीलेशे भवछेह ॥ २८॥ वली ऋषभदत्त मुनि, शेठ सुदर्शन सार। शिवराज ऋपीश्वर धन्य गांग्या अणगार ॥ २६ ॥ शुद्ध संयम पाली, पाम्या केवल सार । ए चारों मुनिवर पहोंच्या मोक्ष मझार ॥ ३० ॥ भगवन्तनी माता, धन धन सती देवा नन्दा । वली सती जयती, छोड़ दिया घर फन्दा ॥३१॥ सती मुक्ति पहोत्या, वली ते वीरनी नन्द । महासती सुदर्शना घणी सतियां ना वृन्द ॥ ३२ ॥ वली कार्तिक शेठे, पडिमा घही शूरवीर । जीम्यो मोरा ऊपर, तापस वलती खीर ॥३३॥ पछी चारित्रलीधो, मन्त्री एक सहस्र आठवीर । मरी हुवा शकेंद्र, चवी लेसे भवतीर ॥३४॥ वली राय उदाई, दियो भाणेज ने राज । पछी चारित्र लेइने, सार्या श्रातम काज ॥ ॥ ३५ ॥ गंगदत्त मुनि आनन्द, तारण तीरण री जहाज । कुशल मुनि रुहो दियो घणा ने साज ।

( ११२)
३॥ पम्प सुमन मुमिबर सर्णनुमति पर
गार । धारामिक मे, गया देवसोकममार।
३७० वषी मुफ्ति डासे पनी सिहोमुमिबरसार।
वीमा पस मुनिवर मगमतीमा भपिकार ।।
भेणिक ना पेटा मोटा मुनिवर मेय। वजी पाठ
अम्ररी भारयो मन संवेग १४ बीर पेमत
नाने पी तपमी नेग। गश मिमप विमाने
पषी लेसी शिव बेग : ४०॥भम पापों पुत्तर
ताजी पत्तीपी नार। तेमी मामे मिकल्पा, पुरप
पक हजार ४॥ सुमारे सम्पाती, एक साम
शिप्प सार । पंधशत स सेलकमीपोपम मार
10२ मवे महम अठाई पमा जीप में वार।
पुसर गिरी सुपर किपो पादोप गमम संपार।
भागधिक दुई कीपो सेवा पारा
मोटा मुनियर नाम लिया मिस्तार: WIपम्प
जिमाल मुनियर ओप पमपासापागपामयम
पवनो मोश मास भारा मीमतिमाप
मा ६ मित्र महापाल प्रमुख मुनियपास मुति

( ११३ ) सिधाया, महोटी पदवी पाय ॥४६॥ वली जित- शत्रु राजा सुबुद्धि नामे परधान । पोते चारित्र लेईने, पाम्या मोक्ष निधान ॥४७॥ धन तेतली मुनिवर, दियो छः काय ने अभयदान । पोटिला प्रतिवोध्या पास्या केवल शान ॥४८॥ धन पांचों पांडव, तजी द्रौपदी नार । स्थिवरनी पासे, लीधो संयम भार ॥४६॥ श्री नेमिचन्दन को एहवो अभि- ग्रह कीध । मास मास खमण तप, शचुंजय जई सिद्ध ॥५०॥ धर्म घोषतणा शिष्य, धर्म रुची अण- गार । किडियोंनी करुणा, श्राणी दयारस सार । ५१ ॥ कडुवा तुंबानो, कीधो सघलो आहार । स- र्वार्थ सिद्ध पहोंच्या, चवि लेशे भवपार ॥ ५२॥ चली पुंडरीक राजा, कुंडरिक इगियो जाण । पोते चारित्र लेईने, न घाली धर्ममा हात ॥५३॥ सर्वार्थ सिद्ध पहोंच्या, चवी लेशे निर्वाण । श्री शाता सूत्र मां जिनवर कर्या वखाण ॥५४॥ गौतमादिक कुंवर सगा अठारे भ्रात । सर्व अन्धक विष्णु सुत, धारणी ज्यांरी मात ॥ ५५ ॥ तजी आठ अन्तेउर,

( १९)
काडोक्षानी बात। पारिमामे पीभी मुक्ति
मो साय ॥५५ श्री अनेक सेनाशिक की सहो-
पर भाप । बमुरेममा मममम, पेपकी पारी मार
Anu मरिनपुर मगरी माम पहा बार।
पर वधिमा सामसी मैमिनी पापी
बत्तीस पचीस प्रदेसर मिकलिया कटकाप।
मस पर समावा मेंध्या भी मिनी पाप
करीब पारवा मन में सप्प साय। एक
सथाt मुक्ति विधमा जापापसी पाठक
सारण प्रमुख समुख मुमिराय । वसी मरममा
ररि गया मुक्ति गा माय बरेचमा भएन
पन पन पम गज सुबमात । पेमति सुन्दर
कप्त पन्त पय पासपीमि समीप पोम्पो
मोर अंगास । मिनी पद्रिमा गपा मसाल मा
कालदेखी मोमिन कोप्पो
मस्त
पालारमाबीय मिरविणामसयस
मुमि मयर म एडी मेठी मममी माला परिपर
सदमे मुक्ति गया तलात न गाती

( ११५) मयाली, उवयालादिक साध । सांव ने प्रद्युमन, अनारूढ़ साधु अगाध ॥६६॥ वली सच नेमी दृढ़- नेमी, करणी कीधी वाघ । दशे मुगति पहोंच्या, जिनवर वचन आराध ॥६७॥ धन्य अर्जुन माली, कीयो कदाग्रह दूर । वीर पैबन ले इने, सत्यवादी हुवा शूर ॥ ६८ ॥ करी छट छट पारणा क्षमा करी भरपूर । छः मास मांही कर्म किया चकचूर ॥६६॥ कुवर अइमुत्ते दीठा गौतम स्वाम। सुणी वीरनी वाणी, कीधो उत्तम काम ॥ ७० ॥ चारित्र लेइने पहोंच्या शिवपुर ठाम । धुर आदि मकाई, अन्त अलक्ष मुनि नाम ।। ७१ ॥ वली कृष्णरायनी, अग्र महिषी पाठ । पुत्र वधू दोई संच्या पुण्यना ठाठ ॥७२॥ यादव कुल सतियां, टाली दुःख की घाट । पहोंची शिवपुर में ए छे सूत्र नो पाठ ॥७३॥ श्रे- णिकनी राण्यां, काली श्रादिक दश जाण । दशे पुत्र वियोगे, सांमली वीरनी वाण ॥ ७४ ॥ चन्दन बाला पै, संजम लेई हुवा जाण । तप करी देह झोशी, पहोंची है निर्वाण ॥ ७५॥ नन्दादिक तेरे,

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(११७) काट्यो देहनो फस ॥८६॥ संयम श्राराधी देव- लोकमां जाई वश | महा विदेह क्षेत्र मां मोक्ष जासे लेई जश ॥७॥ बलभदना नंदन,निपढादिक हुया वार तजी पचास अन्तेउरी, त्याग दियो संसार |८८॥ सहुनेमि समीपे, चार महाव्रत लीध सर्वार्थ सिद्ध पहोंच्या, दोशे विदेह में सिद्ध ॥८६ घनो ने शालिमद्र, मुनीश्वरों नी जोड़। नारीनां बंधन तत्क्षण नाख्या तो ॥१०॥ घर कुटुम्ब कवीलो, धन कञ्चननी कोद। मास मास प्रमण तप, टालेश भवनी खोड ॥६॥ श्री सुधर्म स्वामी नां शिष्य, धन धन जम्नु स्वामी । तजी पाठ अंते. उरी मात पिता धन घाम ॥२॥ प्रभवादिक तारी, पहोंच्या शिवपुर ठाम सूत्र प्रवर्ती, जग में राख्यो नाम ॥६३॥ धन ढंढण मुनिवर, कृष्णराय ना नन्द । शुद्ध श्रमिग्रह पाली, टाल दियो भव- फन्द ।। ६४ ॥ घली खन्धक ऋषि की, देह उतारी खाल । परीपह सही ने भव फेरादिया टाल ॥५॥ वली खन्धक ऋपिना, हुधा पांच से शिष्य। घाणी -

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सतियां गई जमारोजीन ॥१०६॥ चोवीस जिनना साधु साध्वी सार । गया मोक्ष देवलोके हृदये राखो धार ॥१०७॥ अठाई दीपमां, गरड़ा तपस्वी याल । शुद्ध पञ्च महाव्रत धारी, नमो नमो निकाल ॥ १०८ ॥ण साधु सतियोंना लीजे नित्य प्रति नाम । शुद्ध मन से ध्यावो, एह तरण नो ठाम ।। । ९०६।। इन साधु सतियों ले, राखो उज्जल भाव । हम कहे ऋषि जमलजीए हीज तरणना दाव ।। संवत अठारे वरस सातो शिरदार । गढ़ झालोर मांही, ए कयो अधिकार ।। १११ ।। 29 ६०. श्री गौतम रासा। ॥दोहा॥ गुण गाऊँ गौतम तणा, भंडार। यड़ा शिष्य भगवन्तरा, जाने सब संसार ॥ १ ॥ प्रतिवूझ्या प्रभुजी कने, गौतम गणधर खाम । संजम पाली सिध हुआ लीजे नित प्रति नाम ॥२॥ 07 लब्धि तणा

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( १२१ ) सेवा कीधी दिनने रातजी, पूछा कीधी जोड़ी दोई हाथजी, जांरो कह्यो कठालग जातजी, ज्यारे वीर दियो माथे हाथजी ॥श्री गौतम०॥३॥ प्रथम संघ- यण संस्थान छे स्वामी गुण गहिरा भरपूर । ब्रह्म- चर्य में बस रहा वलि तपस्या घोर करूरजी, कायर पुरुष कंपी जावे दूरजी, दीपती तपस्या करे कर्म चूरजी, रह्या वीररे हुकम हजूरजी, म्हारी वन्दना उगते सूरजी। श्री गौतम० ॥ ४ ॥ श्रमिग्रह कीघो श्राकरोजी सूत्र भगवती माय । चार ज्ञान चवदे पूरव भण्या वलि तेजू लेश्या पिण्ड मायजी। दपटी राखी क्षम्यां मन मायजी, दियो ध्यानसु चित्त लगायजी, ऊँकड़ बठा सीस नमायजी वीर से अलगान नेड़ा थायजी जारी करणी में कमियन कांयजी॥ श्री गौतम०॥५॥ पूछथा जद कीधी घणीजी श्राणी मन श्रानंद, श्रद्धा में संशय ऊपनो उपनो कौतुहल उरंगजी, चांदे श्री वीर जिनन्दजी, पूछया देश प्रदेशनां स्कन्दजी, अनन्त ज्ञानी त्रिशलाना नन्दजी, मेल

(१२२)
दि सत्र संपो संपणी अनि सेवे मुरबराल
पी तागबीप विराजे पन्दजीवी गीतमा
म मगवती में पक्षियाची प्रम बत्तीस गार।
मा उपोप में पक्षिणा पूषा कीभी पहले पारणी
गीतम क्षियो हिरवा में भारती सारी दुविरामही
पारसी मसाजीकियो उपकारी, पर
पुरपारी तिवारी जी गीतमा
मूति मन पितरे मने क्यों मारपोजल बाग
और पापा ममु रखने बुखापा भी पर्षमावली
मन पापित वेदानजी गौतम कमा सम्मुख
भानगी पीर दियो भाइर सम्मामयी मौतम गुण
रखमारी सामग्री तिमिर्मस पारी पामजी
गिनती मारपर वामीमी गोठमा बारे
मारे गोषमागी महा कासनी प्रीत । भागे
भापी मेला मा पनि सोद बदमी पतगी।
मोहनीम में बीज जीतनी बारी भाई
मीती पणे मोर मायरो विचमी भी
पीतमनामी ममावरे माप दोर्य

( १२३) बरावर होय । वीर वचन श्रवणे करी तव हर्पित हिवड़ो होयजी। गुरु मोटा मिलिया मोयजी, म्हारे कमिय रही नहीं कोयजी, राग द्वेप खपाया दोयजी, मोहणी कर्म ने दीधोखोयजी॥श्रीगौतम० ॥१०॥ स्वयं मुख वीरवखाणियाजीगौतम ने तिण- चार । चरचा वादी तूं अति घणो हेतु युक्ति अनेक प्रकारजी। पाखण्ड्य रो जीतण हारजी, वीजा साधु सहु थारी लारजी, हुश्रा हियड़े हरप अपारजी, तीर्थनाथ निकाल दियो तारजी ॥ श्री गौतम०॥११॥ काति घदी अमावस्याजी मुगति गया वर्धमान । इन्द्र भूति ने ऊपनो तद निर्मल केवल झानजी। धर्म दिपायो नगर पुर ठामजी, सिद्ध फीधा श्रातम कामथी, रिपि रायचन्द किया गुण प्रामजी, धन २ गौतम स्वामजी ॥श्री गौतम०॥१२॥ प्रसाद पूज्य जयमलजी तणोजी यह कीघो श्र- भ्यास । समत अठारे चोतीस में नवमी शुद भादव मासजी । यों कीधी गौतमरो रासजी, सुण्या होवे जीव हुल्लासजी, जीव पामें अविचल

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( १२५ ) सुमेरुगिरि पै इन्द्र चौसठ मिल महोत्सव कीनो। अनन्त चली अरिहन्त वीर प्रभु नामज दीनो । यरप बहुत्तरनो श्राउखो पाया सुखकारी । तीस घरप प्रभु कंचर पदे रह्या श्रमिग्रह धारी ।। ज्यारी मात पितासुरगति लयाए पीछे लीनो- संजम भार। तपस्या कीधी निर्मली साढ़ी वारे वरप मझार ॥३॥ नव चौमासी तप कियो एक कियो छमासी। पांच दिन ऊणा अभिग्रह छमास विमासी ॥ एक २ मासी तप कियो प्रभु द्वादश विरिया। घहत्तर पक्ष दो दो मास छ विरिया करिया ॥ दोय अढ़ाई तीन दो ए डेढ २ मासी दोय । भद्र महाभद्र शिवभद्र तप तप्या इम सोला दिन होय४ भिक्षुनी पडिमा श्रष्ट भगतनी द्वादश कीनी । दोसे ने • गुणतीस छटम तप गिनती लीनी ॥ ग्यारह वर्ष के मास पचीस दिन तपस्या केरा। ग्यारह मास उगणीस दिवस पारणा भलेरा ॥

(११)
इसपिप स्थामीजीवपरियोए पटपमोवसमान
तीस परष महा विधारिया ते प्रथम वर्षमान 14
प्रथम मस्पि जो पम्पापिष्ठ बम्पा दोय कहिये ।
विशाल पाथियो गांव पेठ मिस प्रावण दिये ।
पतुरंश मातम्या पारे मिपिता मखिये।
महिमपुर में गोप मा मिस पदवीस गविये ।
पमानजी एक मायस्थी एक भनारस साप।
बरम बीमामोपावापुरी अठे पाहमा मिरवाया
मुमिवर बारा सेंस सेंस बत्तीस मारा।
पकला गुणसठ सेममावक तीन लास भाषिका।
अधिक मटार मेंस पारे गणपती माता।
गौतम स्वामी बाशिय सवी बम्वन पाहा।
ग्यारे बसानी मात मोप प्रमुपांचा मिरपाय।
शामन पर स्वामिनोविस सेंसर्प प्रमाबा
पूरप पारी तीन मोरा सो अवधिामी।
मन पर्यष पाचमी ज्ञान सातमी देपस पानी।
कियापिना भार सातसी मुनिवर कहिपे ।
पारी बार सीमान मित्र मित्र बी बीये:

( १२७ ) एकाएक संजम लियोए एकाएक निरवाण । चौसठ वर्ष लग चालियो दर्शन केवल ज्ञान 1॥ बारह नर बल वृषभ वृषभ दश एक हयवर । बारह हय इक महिष महिपपांचसौ इक गयवर ॥ पांचसौ गज हरि एक सेंस दो हरि श्रष्टापद । दशलाख बलदेव दोय वासुदेव दो चक्रिपद ।। ऋोड़ चक्रि इक सुर गिणाए कोड सुरा इक इन्द । इन्द्र अनन्तान हि नमें चटि प्रांगुली अग्रजिनंद॥९ आप तणा प्रभु गुण अनन्त को पारन पावे। लब्धि प्रभावे क्रोड़ काय शिर क्रोड़ वनावे ॥ शिर शिर कोड़ा कोड़ वदन मुख फोड़ सुवानी । जिह्वा जिह्वा से क्रोड़ क्रोड़ गुण करे सुशानी ॥ कोड़ा कोड़ सागर लगे करे ज्ञान गुण सार । श्राप तणाप्रभुगुण अनन्त कहतांआवेन पार ॥१०॥ चवदह राजू लोक भरे वालू का कणिया । सर्व जीव की रोम राय नहिं जावे गिणिया ।। इक इक वालू गुण करे गुण अनन्त श्रनन्ता । पूज्य प्रशादे ऋषि लालचन्द कहे नहीं श्रावे अता॥

(१२)
संवत अठारह पासटप माप्त भगसिर ।
स्यामपुरे गुए गाबिया पम्प भी पीर जिन।।
६२ मोच स्न वर्णन ।
शिवपुर नगर महामो र गौतम स्वामी
पूछाकरी पिनपकरी शीरा ममाय प्रमुजी । भकि
बस स्थानक में सुग्यो रुपाकर मोय यताप, प्रमु
जी शि०२० माठ कर्म प्रसगा करपा, सास्या
भातम काम प्रमुजी। व्या सप्तारमा दुमा पाकी,
रमा किय ठाम प्रमुजी । शि• वीर को
गर्ष लोक में मुपित गिता तिव अम हो गीतम।
स्वर्ग छाईम ऊपरे तियरा दे पाय नाम हो, गो
तम शिकलाम पैतालीश मोसम लांबी में
पहली बास दो गौतम । भाठ पोशन साड़ी मीय
में परदे माथी पंससं बाप हो गौतम : शि०.
॥ उम्पस हार मोस्यो नो गो पूम, सयक्षाय
रो गीतम। निण सुमपिकीम्ससी उमर पत्र

( १२६ ) ने संठाण हो गौतम ।। शि० ॥ ५॥ अर्जुन सोना में दीपती, घटारी, मठारी जाण हो,गौतम । स्फटिक विचाले निर्मली, सुहाली अधिक घखाण हो, गौ- तम ॥ शि०॥६॥ शिला उल्लंघन ऊँचा गया, श्रधर रहा सिद्धराज हो, गौतम । अलोकहुँ जाई अड्या सारथा छे श्रातम काज हो, गौतम ॥ शि० ॥ ७ ॥ जठे जन्म नहीं मरणो नहीं, नही जरा, नहीं रोग हो, गौतम । वैरी नहीं, मन्त्री नहीं, नहीं संयोग, वियोग हो, गौतम ।। शि० ॥८॥ भूख नहीं तिरषा नहीं, नहीं हर्ष नहीं शोग हो, गौतम। कर्म नहीं काया नहीं, नहीं विषय रस भोग हो, गौतम ॥ शि० ॥ ६ ॥ शब्द रूप गंध रस नहीं, नहीं स्पर्श, नहीं वेद हो. गौतम । वोले नहीं चाले नहीं, मूल न कोई खेद हो, गौतम ।। शि० ॥१०॥ गाम नगर तिहां नहीं, नहीं वस्ती नाही उजाड़ हो, गौतम । काल तिहां वरते नहीं, रात दिवस तिथि वार हो गौतम ।। शि० ॥११।। राजा नहीं परजा नहीं, नहीं ठाकर नहीं दास हो, गौतम । मुगति में गुरु चेला - (१३०) मही मही लोग पहाई नास दो गौतम ॥ शि०॥ १२ ममन्त सुरक्षा में झली रमा प्ररूपी ज्योति प्रकाश हो गौतम । सपलारा सुख शास्पता, स- पला प्रवियल पास हो गीतम शिनाश अनंता सिर मुगत गया पक्ष भनम्ता माय गौतम । भागे जागो सम्पेमाही ज्योत में ज्योत समायो गौतम । शि.।१४या पान कर सहित के कषल दर्शन पास हो गीतम । तायक समकित दीपता करेयन होप उदास हो गौतम । शि•• १॥ सिर स्वरूप कोई मोक्षसे भाणे मन बैराग । गौतम । शिषग्मणी पेगी बरे, नप को सुख प्रयाग दो गौतम । शि०१॥ ६३ पन्ना मुनि स्तवन । मेणिक पछे पीरजी माने 'चम मुनिएर साप । रम में तब परम भोगे अधिक पत्रो

( १३१ )
अनगारा ॥ ॥ धन्ना मुनि धन मानव भव पायो,
श्रीमुख यूं फरमायो ॥ टेर ॥ श्रेणिक राजा श्रात्म-
हित काजा, धन्नामुनि पे आवे । शीश नमावें मुख
गुण गावें, जोतां तृप्ति न थावे ॥ धन्ना० ॥२॥ नार
बत्तीसी अप्सरा सरखी, धन्न बत्तीसे क्रोड़ो।
संसार ने पूठ दीवी मुनिवरजी, शिवपुर सामा
दोड़ो ॥धन्ना०॥३॥ निरंतर तप बेले बेले, पारणो
उज्झित आहारो । समण वणि मग कोई न घन्छे
किम तुम कण्ठ उतारे। धन्ना० ॥४॥ वार ईकीस
जल माही धोई, ते अन्न खाई जल पीयो। ऐसो
तपसुणी उर कंपे, धन धन थांरो जीयो ॥धना॥
॥ चउदह हजार मुनीश्वर मांही, अापने वीर
वखाण्या । दर्शन आपको पुण्यवन्त पावे, मैं पिण
श्राज पिछाण्या ॥धन्ना०॥६॥ नव मासे संजम
पाली, सर्वार्थ सिद्ध जावे। रामचन्द्र कहे ऐसे
मुनिजी, क्यों नहीं मुक्ति सिधावे ॥ धना० ॥७॥

(१२)
६४ श्री विजयकपर और विजयापारीकी
मीरी।
भी विषयकपर और विसपारी मारी।
मर गोषम में पास्यो शीश ममता मारी टेरा
ये कायदेशीर कसंबी मामा मगरी।
गोपागबगीचा शहर सोमा सगरी:
ये पधा मामा सेठ रास, पबरी ।
भी विजयकर के पर्म करणारी सगरी।
पुण्पबन्त मिली है विजयाकवरी मारी भरणारा
साले करके सिझार पिक पे आती।
गरणा परिर्या है प धूपर पमझाती ।
वासम से मुम्बर प्रम परी चलाती ।
कामी की चादी पार घर घर्रावी
दिल करणेश विजयवर सुम प्यारी प्रमाण
म्पों मदन दीपन हो ऐमी माता करती।
मे रुण परका स्याग लिया मुमिपर पी।
सुन
वोखी मयमा भरती।
पो

( १३३ ) शुक्ल पक्ष का त्याग लिया नहीं डरती ॥ करे वैन भाई ज्यों मिल पाता इकतारी ॥भ०॥३॥ श्री विमल केवली वस्नान इनका कीधा । जिनदास सुश्रावक सुनकर पाया सीधा ॥ कर भाव मुनि का दर्शन हिरदा भीजा। अरु खूब हुवा मन खुश के अमृत पीधा ।। तव मात पिता ने सुनी बात हुई जहारी भ०॥४॥ यो सकल जव जाण्यो कंवर कंवरी को। घर प्रच्छन्न पणे में शील पाल रजनी को। जाने जन धंद सव फंद जान सब फीको। ले करके आशा पंथ लियो मुनिजी को॥ जाने शुद्ध पाल के शील पातमातारी ।भ०॥५ ६५. देवकी राणी का झूरणा । तर्ज-धीरा चालो वीरज का वासी० । इम झरे देवकी राणी, यातो पुत्र विना विल खाणीरे ॥टेर ॥ म्हें तो सातों नन्दण जाया, पिरण

(१४)
पकर गोद सिमापारे १०१० पर पासो नहीं
पायो नही मधुर हासरियो गायोरे पण
यूनानी माठि दमाई झमर पिण मावि पाईरे
Hruनी गक्षणा कपडा पहिगपा, नी मगस्पा'
टोपीमियायारे मागतान लगायो
मस्मिान करीमै निमायोरे Eom गास
दाममादीचा पलि पर जमकीपारे ।
६. नई स्तन पप पान करायगे ठामे माडि
ममायारे 10 मतो कमिया माहिउठापो,
महिं अंगुली पकर पलापारे: पू की
नाह गयो म गुर गुस्पा पारसामोरे
म िमुख पे गा दीपा महिरप पारखा
जीपा ॥१०॥ महिपाही भवरा मंगाया,
मा गसिपा गैर पसायारे॥॥१९म्हेंतोसम्म
सपा नरेन्या गया मिर्फसम्म प्रमेम्पारे।
१० ॥१॥ में प्रमागरा पुरयन पीपा सिपी
सुत विचाक्षीपारे । गलेशाप महर
१ धरती धाम माम् मा मुरती रे॥om

(१३५) पग चन्दन किसन पधारे, माजी ने उदास निहारे रे। इ० ॥ १५ ॥ कहे अमीरिख किम दुख पावो, माताजी मुझे फरमावोरे ॥ ३० ॥१६॥ ६६. श्री आदेश्वर का आह्वान । सज-धीरा चालो वीरज का वामी । श्रावो २ हमारे घर स्वामी, श्रादेश्वर अन्त- र्यामी हो ॥ टेर ॥ कोई हस्ति सिनगारी लावे, इणरी गले घूघर माल पहिरावे हो ॥ श्रा० ॥ १ ॥ प्रभु दया करीने गज लीजे, असवारी कीजे हो ॥ श्रा० ॥ २॥ कोई अश्व अनोपम लावे, रतना में साज सजावे हो ॥ श्रा० ॥ ३॥ प्रभु घुड़ले श्राप विराजो, प्रभु पग पाला नवि छाजो हो ॥श्रा०॥४॥ कोई लावे रथ सुकपाला, प्रभु लीजे दीन दयाला हो ॥ श्रा०॥५॥ प्रभु चरण कमल सु- कमालो, प्रभु पग पाला नवि चालो ॥ श्रा०॥६॥ कोई लावे कन्या सिनगारी, प्रभु सोहे जोड़ मुम्दागदो मा. कोई लापे पास मर मोती कोई पार पिताम्बर पोतीमा। कोई सार्ष माम पुणता प्रभु पहरो प्रति सुष माला हो AIOR इम पिप२ पस्तु सापे, पिष माहार फाईन पहिराव टोमा १ ॥प्रमु पर२ प्रांगण मापे पिल देन २ फिर जाये॥मा-॥१९॥ मोलामर मे न जाण, मुमि मारग माहि पिकासे हो। मा०॥ १२० भागे सिम सीधी रक्षा नही मांगी पर २ मिपाकोमा०१॥ प्रमु वारसार हमारेसा को माहार बिनोसा प्रमा॥१४॥ प्रभु माहार बिना पुख पार्क दम तुमने साप सुनायो|मार ममु भम्तराम ग्राहो मम राग पनवि भायो: प्रा. १६. एक पगप माहारमा पापा पर्वतमाग- पुर मापा दोभा को अमीरव गांग भारी परिपपोशपुरस पाहारोहोमार ( १३७ ) ६७. प्रभु वीर जन्माधिकार । को हारे सुधर्मा पति निजमन चिंतचे हरणगमेपी बुलाओरे । स्वामीजी को जनम भयो है जिन मुख जोवा जानोरे ॥ स्वा०॥टेर। जांन विमाण बनाय मनोहर घटसुं घोप बजाभोरे ॥ स्वा० ॥१॥ हुकम कीने वेग मुकलाओ धनसु भण्डार भरायोरे । स्वा० ॥ २॥ श्राई २ दशा छपनकंधारी हरप हरण गुण गाोरे ॥ स्वा० ॥ ३ ॥ चार श्रागुल प्रभु नालो छेदी वज्र हीरा से खाड चुरापोरे ॥ स्वा०॥ ॥ स्नान एक ने मंजन दूजो मधुर२ गुण गामोरे स्वा०1शा संपत सहित निरख मुख माता चरखे शीश नमायोरे ॥ स्वा० ॥ ६॥ अपछरा सर्च लगी एक ओले निरनहरख सुख पाश्रोरे ॥ स्वा०॥७॥ इतने सुधर्मापति इन्द्र पधार्या आई ने शीस नमा. थोरे ॥ स्वा० ॥८॥ भय मत पानो माता रत्नकूण धारणी में सुरपति थारा गुण गाोरे ॥स्वा०॥॥ एक इन्द्र हाथे लई चाल्या, एक तो छत्र धराभोर

(116)
। स्था०।१ । एक घाभागेबईचाबो वा
यंवर गुरामोरे ।। स्मा० ॥ १५ मे शिखर पर
महोत्सव कीपो इम्झाएया हर्ष पपाभोरे ॥ स्मा.
६८ राजमती।
उपसेन की लाली २ मेमजी भमन गिरनार
पड़ी। मवी राजमती २ प्रमुजी बम्बम गिरमार
वड़ी। टेर। मारग में माता हाजी मे मी:-
ईमारी नवरंग प : ToR देव गुफा देखी
पठी तिमषार पीर मीषो यो रानुलनार ॥
१०॥२ । मवालो रुप देखी रया रहमेम संसम
उस पार्योंतासु मन प्रेम। ये मापनका
साहस धीर शियम स्तनयो छोड़ो मत पीर :
०॥४॥ पमम माहार पम्मी कोयम्पनि साधे
कागा कुत्ता गोरोपबाशा पिविष पचन कई
जम ठाय देवर मे गजमती सममाप I TOIRA

(१३६) J ६६. तर्ज-काईरे जवार करूं रसिया। कांइरे प्रभाव कहूं गुरु को,भाव कहंगो प्रभाव कहूगो, गुरुजीरा चरणां में लपट रहंगो ॥ टेर । कहोजी गुरुजी थाने किण रिध सेऊं, ज्ञान दियो जिणरो काइ देऊ ॥१॥ एक वचन गुरुदेवजी थांरा, ऊपर वारूँ पदारथ सारा ॥२॥ बड़ी वस्तु जितरी जग माही, तुम उपकार तुले कोई नांही॥३॥ शानी- पुरुपां ज्ञान सगयो गुरु विना शान कठा सू श्रायो ॥ ४ ॥ जो जग में गुरु श्राप न होता किण विध अाज हिताहित जोता ।। ५॥ जो जग में गुरु न होता कठिण करम मलने कुण धोता॥६॥जो. जग में गुरु आप न होता, टाल तो कौन गजवर गोता ॥ ७ ।। गुरु सेव्यां पशु पुरुष कहावे, पत्थर सो पारस पद पावे ॥८॥ जग रूठां गुरु श्राप उधारो, तुम रूठा नहीं राखन हारो॥ ६॥ किरपा कर दुविधा सब टारी 'अमृत' तो गुरु की बलि-- हारी ॥१०॥ - ७० वर्ष-वीग खग्गा समारोप माइयो । मनि लागे पम्प गुरु प्यारा जो दिव शिपमा सतागजी ॥ठेर । गुर बाम प्यान का परिपा गुण मिनय विवेकी मरियाजी ॥१॥ गुरु ममा मोहन गार्ग म्हाम बागे सूरत प्यारीजी गुरु रवि सम्पदा स्पागी निय शिवरमपी हामीणी। पर पाप तिरे परतारे सय जीवोकाज सुमारे की... गुरुतरी किरपा कीजो माने साधी समपित दीमोजी ॥५॥ ७१ तई-सेखन दो मनगोर । देसम दीवार सहेसी देसम दीवार। पम्हारा समकित रातार सदमी रेशम रे पीबार रेस्पाग मनोपम पम पिराजे, समा की मिसार । प्रक्षमारी भाक्ष भाचारी, मिन पासम सिणगार १। उपरेश क्म है अमर रिराती सुमरमार। पाथरी-मर गावम

( २४१ )
घारा, मान तणा भण्डार ॥२॥ धर्म थकी डिगताने
राखे, भाखे वचन विचार। चाखे समता रस
गुण दरिया, हरिया पाप अठार ॥ ३॥ रजो हरण
राखे रक्षा हित मुखपत्ति मुख सुखकार । दुक्कर
तप धारक गुण युक्ता, पटकाया प्रतिपाल ॥ ४ ॥
तुम चरणों में चित्त वस्यो है, उपकारी अनगार।
मोहन मुद्रा पे बलिहारी, जावां वारंवार ॥५॥
७२. तर्ज-तावडा धीमोसो पड़जा।
परम गुरु लागे मोय प्यारा रे, जिनमत का
गृङ्गार गुरुजी है मोहनगारा ॥ टेर ॥ चन्दा जैसा
शीतल गुरुजी, सागर सम गंभीर । सूरज जैसा
गुरु प्रतापी, निर्मल गंगा नीर ॥१॥ खंधक जैसा
क्षमावान गुरु, गौतम सा गुनवान । धन्ना जैसा
घोर तपोधन पारस सा पुण्यवान ॥२॥ केशी
जैसा हो उपदेशी, युक्ति कला भंडार । झानी
ध्यानी गुरु गुणवन्ता, जिन सासण सिणगार ॥३॥

तारण तिरस गहाज सरीमा सुरासिंह समान । पाबरी मद गासन पाले पीर विषपान । करत सग कीर्ति करमापरी एफजीम मारी। पन जाति कलश प्रापरो पतसममी पारी ७३ -कममी पाल की। मिन पर्म का मएडा दुनिया में फाराया प्यारे मतगुरु में अहिंसा का रंका प्रासम में बजयापा मेरे सतगुरु मे ॥ टेर | मिप्यास्य महातम दूर किया और सस्य पदार्थ परसाये। फिर सस्प का जसपा पर युग में प्रकटापा प्यारे सतगुर मे ॥ मिप्याम्प तिमिर की सब जग में पनपोर पठाएँ घाई थी। शिम शासन पुग्म यहाँ पर मी पम- काया प्यारे सतगुर मे १२. पाशयरी के भम सारा में मविसम जो मरमाये । रेसपरेण किमारे पर पहुंचापा प्यारे सतगुरु मे. पण देशगया गुरदेव नग भारत के कोने कोने में। मिमपानी का प्यावा दुनिया में पिसयापा प्यारे सतगुर में ( १४३) ७४. तर्ज-रसिया। म्हारा सतगुरु दीन दयाल कृपाकर वेगा श्राइजोजी, गाम गाम में जिनवानी को मेह वर्षा- इजोजी घणा करी उपकार जगत में,जस थे पाइ- जोजी ॥२॥ हेतु न्याय दे पाखण्डी को, दूर भगा- इजोजी । करडा काठा वचन सुनी के,मत रीसाइ. जोजी ॥ २ ॥ ज्ञान ध्यान की फुलवारी थे, खूब लगाइजोजी । त्याग और वैराग तणी थे, ज्योति जगाइजोजी ॥३॥ दर्शन प्यास घसी दिल माही वेग मिटाइजोजी । मुमित म्हारी फुलवारी को, शीघ्र सिंचाइजोजी ॥४॥ सुमति सयानी दिल जानी को, गले लगाइजोजी । कुमति के जंजाला मायने, मत बिलमाइजोजी ॥५॥ ७५. तज-तावडा धीमो तो पड़जा। सुगुरु म्हारी विनती सुन लीजो२ महर नजर कर सहर हमारो पावन तो कीजो॥टेर।। फुलवारी

(१४४)
ममगे मजेमरे पास ज्यों जलपार। रात दिपस
म्य पसिया मम में सतगुरु का दीदार ।।
उपकारी मोटका सरे धर्म तक्षा रातार
वर्ग दिगयनो मरे पीमती पारंबार ।। गांव
गांव को गट देखने मतना विसमायो। म्हामे
भी पे याद गममे गुरमी मर माइजोश पोरा
दर्शन रोस्सामीलोबम विकमामा । पापी सुम
मम पास हमाग भनहर हर्षायामाद
बीमती माहिम है मतमा विसपागो। पात
से करके पिहार हमारे सीपा ये प्रारमो॥
७६ नम-धीरा पाला विर का वासी।
मतगुठ सा चंगा प्राजो मारमोर्ग
विगामोजी टेग| मिष्पा मत दूर हटामो सम
बिलकी म्पात जगालोगी। जिनवानी सूप
मुनासो मा मे पर्म बतायो जी।२। जिन
यापम जोर दिपारमा ऊमत्या में पंप सगामोजी

(१४५) ॥३॥ गुरु देश विदेश जाइजो, थे जस ले म्हारे ग्राइजो जी॥४। पेसमता रस गम खाइजो, गुरु कभी मति रीसाइजोजी ॥ ५॥ म्हारी वीनती वेगा श्राइनो, गुरु अव ना तुम तरसाइजोजी ॥६॥ . ७७. तर्ज-हा सगीजी ने पेड़ा भावे । हा गुरु मुझ सहर पधारो, भव जीवारा काज सुधारो, तिरण तारण की जहाज राज भरलो हुकारो रे ॥टेर॥ मोह ममता को दूर हटा दी, जैन धर्म की ज्योति जगादी, चारों दिशा में फैल रहो है सुयश तुम्हारो रे ॥१॥ श्राप तिरो श्रोरों ने ताओ, ऐसो विरद लगे मोय प्यारो, खटकाया प्रतिपाल अरज म्हारी अवधारो रे ॥२॥ गांवों गांव शान फुलवारी, सींची वचनामृत झर झारी, पाखण्डी मद गाल श्रद्धा को कियो सुधारो रे ।। || नर नारी दर्शन का प्यासा, तन मन से कर रहे हैं आसा, जलदी फर मंजूर हमोरो मान

वही दिवस हमारा, 'मा५ मिलियो राश भाग
पपारो रे॥४॥ अब होगा दीवार तुमारा भन्न
पिलोको पारे॥५॥
७. वर्ज-माता सीता के खोले में हनुमत.
मेगा भागदो गुरुवरी मनि तारवारों
जग में जनमें पाप गुरुजी जगत बारा ।।
और । सरगुरु सम हो मा दुपाम सामी गुरु
गतमोरी जान गहरा स्वामी सिन्धु समान ॥१॥
गुरुजी परम पैरागी स्पागी रिवि सम्पदानी मन
से ममता मोह मिवार करते गुरुपर म बिसार,
हम तप पाप्पो दुबर कार ॥२॥हामी गुणसम्ता
गुमरीव १ पुनरा पोरसाजी, परिपन परताप
गये पाप ताप सन्ताप होये मशिन पर भी
साफ रावजी करके पूह महर सार पसार
गोजी पर परोसी मामाचार भानार पासी
सब परमार बीपीगो भाप विहार ॥४॥

( १४७ )
७६. तर्ज-मेरी जमीर सोने की।
अरज है श्राप से मेरी, हमारे क्षेत्र में आना,
विचरते हर जहां जाना, गुरुजी भूल मत जाना
॥टेर ।। लगी है यह लगन दिल में, तुमारे दर्श
करने की । विनय सुनना अरे स्वामी, अधिक ना
श्राप तरसाना ।। १॥ तुम्हारी दिव्य धानी पर
पपीहा हम बने प्यासू । सरस घन स्वाति की बूंदें
श्राय कर श्राप बन जाना ।। २॥ हमारे नयन यह
चकवे, तुमारे को निहारेंगे। गुरु वन चन्द्रमा
चन्द्रिका खूब चमकाना ।। ३॥ रही कुमला मृदु
कलियां हमारे चित्त पंकज की । शान मय सूर्य
किरणों को फैलाकर शीघ्र विकसाना ॥४॥ बगीचा
धर्म का स्वामी, तेरे विन सुष्क होता है। कृपा
कर गुल चमन करना, सुधामय बानी वरसाना
11५॥
F

(१५)
८० ज-मजी पालेकी।
पह विनवी मारी सुन लीगो, मसन
दीजो सत गुरुजी टेर । पुरुषेपमा उपकारी
हो जाऊँ परया की परिहारीम्हे गुरुतमी तो
किरपा फीमो मत पर्यम दीगो सत गुरुमी ॥
गुरुदेष तुम्हारे माने से हार पर्म का सागेगा।
मामम् पी भानन्द होगा मर दर्शन दीजो सस
गुरुरी। २. जमता तुम्हारे वर्गम की दिन रात
गुरुमी प्यासी है। प्रया पूर्ण कर दीजो भरपर्यन
दीनो मतगुरुजी ३ विम माली के फुलपाईयो,
गुरुदेव उनासी जाती है। सीमा मार्ग भीजो
झट पर्शन बीजो सत गुम्बी . पिमती पर
मंजूर को गुरपुर में पगस्पा माप घरो। प्रब
आम की समभी फीसगे मन रमवीगे सत गुरु
जीd
10

( १४६ )
८१. तर्ज-मेरी जमीर सोने की।
गुरुवर ! आपका आना, मुवारिक हो मुवारिक
हो । सुदर्शन आपका पाना, मुबारिक हो मुवारिक
हो ॥ टेर ॥ पधारे महिरवानी कर, अयि गुरु पूज्य
शानीवर, संग सब शिष्य को लाना, मुवारिक हो
मुवारिक हो ॥१॥ देख कर आज का जलवा, खुली
श्रांखें जवानों की, मोद से आज गुन गाना, मुवा-
रिक हो २ ॥२॥ तुमारे दर्श के खातिर तरसती
आंख ये मेरी, तरस पाते को हर्षाना मुवारिक
हो २॥ ३ ॥ गुरुवर श्रापका आना, नगर में रंग
का छाना, मेरा भी आज का गाना, मुवारिक हो२
८२. तर्ज-गवरल ईसरजी कहवे तो हंसकर बोलना
सहियां गावो ए वधाओ, सत गुरु श्राविया
जी ॥ टेर ॥ गुरुवर शान गुणाकर भरिया, श्रातम
तारक दरिया, विचरत २ यहां परवरिया, गुरुजी

शिप्प पा गुनवम्ता संग में तापिपात्री ।। त दिमौकी पी प्रमिलापा जैसे पनबाबा तक प्यासा फस गई भाव हमारी माशा पासा उस गपा है मन पाया मग पारियाजी ॥ २॥ पासो मिस सुल बदिनों सारी मापे मान गुरु पुर पारी लागे मुद्रा मोहन गारी दरकारी पनिहारी मार्ग पारियांशी पूर्ण पुण्य से सत गुरु माया पर पर में प्रामाद परसापा मिश बम पटिो रंग पपायर्या मोका गुपबम्ता महाराज गाविपानी।" मार गुप ८३ वर्ष-सारदा पीमो तो परगरे । भाइ मारा मतगुरुयो मापारे पूर्ण पुराण से पूज्य गुरु का वर्गम मैं पापा:रेर पम्प दिपममाजमारो पबित फल पापा । पम्प घड़ी पम्प भाग्य हमारा पुगपदप मापा . किस देश में किस पेत्र में विम पे पिताया।

-
धर्म ध्यान का प्रेम लगा थाने, कहो कुण पिल-
माया ॥२॥ इतरा दिन तो केइ मिस लेकर काफी
तरसाया। आज दयाल दयाकर म्हां पर, आनन्द
वर्षाया ॥ ३॥ सतगुरु आया शहर में, तन मन
ठुलसाया। मोहनगारा गुरु दर्शन कर, लोचन
विकसाया ॥४॥ केर दिनों की थी अभिलाषा, नीठ
दर्श पाया। अल्प वुद्धि अनुसार आज मै, सत
गुरु गुण गाया ॥ ५ ॥
८४. त-जाली का मोग काढना ।
सखी सहेल्याए, चालोनी गुरु वन्दने । टेर।।
आज शहर में सुगुरु पधास्था सारया वंछित काज
चालोनी गुरु वन्दने ॥१॥ केई दिनों की मेरी यह
श्राशा, पूरण छुई आज चालोनी गुरु चन्दने ॥२॥
भाज हमारे सुर तरु फलियो मिालया मनोरथ
माल चालोनी गुरु वन्दने ॥३॥ वटत घरो घर रंग
घधाई, हर्षी सकल समाज चालोनी गुरु वन्दने ॥
४॥ गुरु सेवा से मोक्ष मिलत है, गुरुजी है धर्म
जहाज चालोनी गुरु धन्वने ॥५॥

(१५२)
८५ वर्म-गवरण ईसरची कामे तोरसकर पोखनाए
पनिहारी सतगुरुग्री धारा धान की हो
मनदोरम्पो मारेल पटा पखान की।
रेशानी स्म पर मत जान मिरवा गुण रतनारी
वाम गातो पामंडियों का माम :१. परिपदा
ठार मुम भागी मापे सिवरही डेयर सारी
पानी भर कर मरनारी मिरमुना मोहमगारी
प्रय गानो मन म्भर विष संप में से सूतर
मिन मिन परमे पायो मानो या में साचो
निस दिन पान प्यान में रापो चिया परण
दुकानरी भोपमाजी परसन यो पूरे सो पाय,
सत्तर देवो हिपे उतार पारी एप को बदन पार
सीमो लोग काम्ब रिपकोहोजी मारपी
प्रो संसार भसार विविप पोख्या पाप प्रहार
सीमो पोर महाप्रत पार|सममप दाम दियो
पटकापने जी मबल वारण विरण महास
सारो निर पर मातम काम गीतमानम ज्यों

( १५३ ) द्विजराज ॥ ६॥ वुध निर्मल थारी श्रुत केवली हो, थाने सुरनर शीश नमावे, पूरण सुरगुरु पारन पावे, किंचित किसनलाल गुण गावे ||७॥ ८६. तर्ज-मोला वुलालो मदीने मुझे। मेरे गुरु ने ज्ञान सुनाया मुझे, मिथ्या नींद से आके जगाया मुझे ॥ टेर ॥ सो रहा था मस्त हो कर मिथ्यात्व खोटे ख्याल में, खो रहा था आत्म धन को मोह माया जाल में, सच्चे गुरु ने आके जगाया मुझे ॥२॥ निक्षेप और नय वाद का निर्दोष गुण निर्णय किया, उतसर्ग अपवाद का सव सत्य रहस्य बता दिया, भर शान का प्याला पिलाया मुझे ॥ २॥ जगत कर्ता है नहीं जगदीश प्यारे देख लो ऐसी बातों का प्रेमी बनाया मुझे ॥३॥ दान देकर दीन पर उपकार करना सीखलो धर्म जाती देश हित कुछ काम करना सीख लो, सम्ची श्रद्धा का तत्व सिखाया मुझे ॥४॥ धर्म हित हिंसा

करना पर्म से प्रतिकल है परम भाईसा पर्म
प्यारा म्पाप से मनुहा है, ऐसे म्याप गुपये
बचाया मुझे.
सज-पनजी भरे पोख।
पाम रंग परसेरे २ मारोपापी मुब सुर
हिषयोहरे ।। रेरपाठ गिजो मन म्यू
गाहो
वाणी भमत परसेरे। मविनीयों की पाली मुस
एव दिया किसेरे॥१. बानी गुग्गी बाग
खुशामो पानी बलीकररसेरे। पार संग की
सुनी परषदा कबित फासेरे ॥२॥ बड़ी मनोहर
पानी पारी सुममा माऊँ पर से है। स्पाती र
ज्यों बालक तरसे त्यो मन नरसेरे ॥३॥ गुरु
मुनधी मरि रसीसो ऐमो प्रसुत भरसेरे। प्रम
कोष मह लोम पपा दूरा मरे ।

( १५५) ८८. तर्ज-तरकारी लेलो मालन नाईरे । म्हारी चन्दना तो मेलो, मै छु श्राविका सुंदर सहर की ॥ टेर ॥ बांध मुखपति करूँ सामायक राखू पूंजनी श्राछी। पडिक्रमणो चे विरिया करती, तो मै श्रारिका साची॥१॥ वास वरत मैं करूँ तपस्या, नहीं करणी में काची। पखी पर्व का पोसा करती, जद ही श्राविका साची ।। २॥ भाणे बैठी भाऊँ भावना, साची दिल में राची। स्थानक जाऊँ बेगी ऊठने, तो मै श्राविका सांची ॥३॥ देवा गुरु की करी ओलखना, धारिया जांची जांची। हिंसा धर्म के संगन जाऊँ, तो मै श्राविका सांची ॥ ४॥ हीगलाल कहे ऐसी श्राविका, भणी गुणी पुस्तक वांची । विनयवन्त गुणवन्त कहावे, सोहि श्राविका साची ॥५॥ - Cat-वाको धीमो को पदश। गुल्मी में पान दियो मारी रे २ मिमिलकर मम्मामा सतरमा तिवारी रेसी पापकी मपुर मनोपर, सबमे पुचकारी र ध्यान में गयो निस दिन पूास एकारी ॥१॥ पाणी भापकी सुगकर मारो, मिट गरे मिपए पिफार विष विपकर परसामो सामी, पति सपा की पार पाट यिरामो म यो मागो सोमो सिंह समाम । मिष्याती मर गातो गुरुजी सरसम्म का मान मुझसे गुष तोकपा समापे में एक विशेष । बमना म्हारी भक्ति माप से अपने गुरु मेरा ० वर्म-बहो धीमो को पाना रे । गुम्मी साता में रदियो हो माप शिबरमा दियदेश में पाहा मार मारमोर| मप मम सरपी स्वर्ग निमरती करपी कीमो। कोष ( १५७ ) मान मद लोभ कपट तज, समता रस पीजो ॥१॥ भवि जीवों ने गाम गाम में, बोध बीजा दीजो । जैन धर्म को खूब दिपाकर, जग में जस लीजो ॥ २॥ कठिण मारग मुनिराज आपको, सुध मन से सहिजो । मच्छरता तज दूर श्राप डर, उत्तम गुण लीजो ॥ ३ ॥ पाट दिपाश्रो गुरुराज को घणा वर्प जीजो। तुम जिसड़ो त्यानी जग मांहे, लाधे नहीं बीजो ॥४॥ कृपा राखजा करुणा सागर, भूल मति जाइजो । जिनवानी का प्याला सतगुरु, जलदी से पाइजो ॥५॥ प्रेम भरी श्रा वीणती सरे, उर में धर लीजो । कृपानाथ करुणा कर स्वामी, दर्शन झट दीजो ॥६॥ ६१. तर्ज-पनजी मुंडे बोल । वेगा अाइजो हो २ गुरुदेव श्राप म्हाने भूल न जाइजो जी ॥ टेर ।। जैन धर्म को प्रेम लगा मत, अध विच में छिटकाइजो हो। विचरत २ वेगा (१५८) माने दाम दिराहोहो ॥धार संपकीर फुलपारी सतगुरु मत कुमसाइजोको जिवधानी की मसी लगाकर सरस यमागोहा॥२॥शन में मसा होय मुमि गुरको पाट दिपागे ॥३॥ पासापरी मद गाल एरण पामे गैनी बनायो गैम परम को मरतो मग में जबर मारोहो ॥४॥हापगोरकर मादी पीमती, प्यान में मेता माग हो । पारा मास में एक बार तो माया रदिगो हो ।।५।। १२ 4-काटोबामारे देवरिया । भासी भासी हो सतगुर पाय भोसरी सम- पार मोखेड़ी ममपार सतगुरु पेहोवारपार टेर काम काम तर पर माती वाणी मुख पुमके भुल पाती गावी मरीयेभार मारी मुसरे गुरु को विहार जिन पचनों की भी में प्यासी प्रबको ममत कौम पिलासी भारी ( १५६ ) उदासी श्राज गुरु विन करसी कौन संभार ॥२॥ गुरु विन सुत्तर कौन सुनासी, भूला ने कुण राह लगासी, गुरु बिन झूठा राग रंग म्हारे सूनो सब संसार ||३॥ सत गुरु ज्ञान ध्यान का रसिया मारे गेम रोम में वसिया, सुन करके अरदास गुरुजी ठहरो फिर दिन चार ॥४॥ देश विदेशां में सतगुरु जाइजो, पाछा वेगा श्राइजो, होसी हर्ष अपार जल्दी मै देखूला दीदार ॥ ५ ॥ - ६३. तर्ज-सिया नवीन । म्हारा सतगुरुजी गुणवन्ता पाछा वेगा श्राद- जोजी, वेगा आइजोजी म्हाने भूल न जाइजोजी ।। टेर ॥ कुमत सखी के कपट मायने, मत विलमाइ जोजी । सुमति सहेली संग सदासुख शांति मना- इजोजी ॥१॥ म्हाने विलखा छोड़ गुरुजी, अलगा न जाइजोजी । साल सम्भाल हमारी लीजो, श्राया रहिजोजी ॥२॥ जिन वानी को अमृत पायो, फेर

(१०)
पिलाइमोसी। मों पापी की मैया, पार मगाइयोसे
शप जोर मे माही विनती, पुनवा मागो
श्री सारा सम्तों के साप गुम्मी जसदी पारखोजी
III गोम गाम में जैम पर्म को लूप विपाइमोगी।
सुनजो स्मामीनाय भाव में जसले प्रागोजी
#. -मरी मंसीर सोने की।
गुरुती भापका जाना में पात पार प्राबेगा,
भाम का माप बिन प्रसमा गुरुमी कुल पवावेगा
गरेता पका प्रेम से रेपो मीप से कुम अगा
बेगा । अनुपम मात्मा ममुमच का गोकुन रस
पिलायेगा ।। । मुमेपासरा तेरा इसी संसार
मागर में। पड़ी है मगर में मैया तेरे पिन कुम
पायेगा ॥२॥रमिक परकाम भासिद तुमारी
विष्य पानी पर भाप दिमबीरकी पानी कीन
दमागे मुनागा ॥ तुमारी ममता समता

। दूर हटानो, प्रभु चणे चित्त नुगाया, ( १६१) क्षमा दम शील संयमता। दिव्य गुण श्रापके स्वामी, सदा शिक्षा सिखावेगा ॥४॥ पियारे पूज्य गुरुवरजी, सदा आनन्द में रहना । दर्श फिर आप का होगा, जवी आनन्द आवेगा ॥५॥ C.. ६५, सद्गुरु स्तुति । कव्वाली । धन्य धन्य भाग हमारे, यहां सद्गुरु पधारे टेर।। देखो मुनी की करनी, मुख से न जाय वरनी, जिन नाम सदा उच्चारे ॥ यहां 1111 श्रावो तुम सांज सबेरी, मत ना लगावोग, अवसर को मत चुकारे ।। यहां 10 दुर्गुण को सिद्ध होय काज तेरे ॥ यहां (१२) ६६ गुरु षन्यन । उम्-नारिया बारिखा वारिपारे । बन्दना पम्पमा यम्ममा रे, शामी गुरुजी मे मारी पन्दना पटेरा मनमा कयास्पानड भाये मचा पदको ठाबमारे बा.१- गुरुजी दुखाया तदत्त पारो कर मोड़ी में पोलमारे २॥ गुरजी पपापा ग्मोखी रहनो पधारो पधारो इम कवनोरे ॥ बा० ॥ बिनय मूल जिन धर्म माल्यो मा भषगुव दर मिवारमारे बा• In रत्नापि को शीव यो मामे गुरु परम शिर भारमारेबानी.॥५॥ ६७ गुरु पनि पिर्मती। भूख मत मापोशी गुरु मा । पिप्सर मत जापोजी गुरु महनि । म्हें भरस कर पाने । भूस० । रेर ।। सत गुरु मम मिया पिच गरिया प्रकट करके पामे । यो मुम से अपराप बने तो ( १६३ ) करम दोष गुरु म्हांने ॥ भूल० ॥१॥ भवसागर यह जल से भरियो, जीव तरण नहीं जाने। जीरण नाव जोजरी डूबे, पार करो गुरु म्हाने । मूल० ।। २॥ मै चाकर चूक पड़ी तो, गुरु अवगुण नहिं माने । मैं बालक गुन्हा किया बहुतेरा, पिता विरुद इम जाने ॥ भूल० ॥३॥ मेरी दौड़ जिहां लग लागे, नमस्कार चरणों में। मेरंदास कर जोड़ वीनवे, धन धन हैं सन्ताने ॥ भूल० ॥४॥ १८. गुरु दर्शन विनंती। तर्ज-ख्याल की। गुरुदेव हमारा, थाकां दर्शन की म्हारेभावना । सुणो सखी सहेल्यां, तन धन चारु रे करसू वधा. वणा ॥ टेर ॥ तीन लोक को द्रव्य ही सारो, करूँ मेट तो थोड़ो। दर्शन करके करूँ विनन्ती, फ्यूं दर्शन दियो मोड़ोजी । गुरु० ॥१॥ मात पिता सुत मित्र रु स्वामी, खड़े खड़े सब झांके, समरथ

(१५)
नहीं कोई मर साबमा पह पर गुरु रामेगी
गुरु० अन्पत्य राती में मैब दिये और, भ.
पम्प
को
पूम्य पमाये । पाता असी खम्म सुपारी
भर पक्ति में बायेगी। गुरु। भव भग
में
मुम सद्गुर सेषा दीजो पर प्रमुा" । मुनिराम
कहे गुरुवरीन पीसो सुतराम सागजी गुरु ॥
श्रीमान् पूज्य श्री पम्पासालमी महाराविरचित
भजन-संग्रह
६६ पंच परमेष्टि स्तुति ।
प्रभात कठ पच परमेरी ममूलारी।
जिन नाम से समार जाय दिनमाही तेरी रख
मरिहस्त रेष गुण मति साप तो गिरी।
सुन पापी मापकी हमारा पित लिपादरी प्र!
सकमार्य सिरर गुण भए वो परी।
सब शर्म नो शिप परी परी प्रम. २३

( १६५)
प्राचार्य उपाध्याय परम पूज्य तो सिरी ।
छत्तीस और पचीस गुण ज्ञान की झरी । प्र० ३॥
सत्तावीस
साधु गुण
गंग नीर तो भरी।
गुण एकसो ने पाठ जाय पापतोडिए अरी प्र.४॥
प्राणनाथ पंच प्रभु तोड़िये अरी।
दो शान करूँ पार दया धर्म श्रादरी ॥ प्र०५॥
भव पार सिंधु तारिये प्रभु मुन कर ग्रही ।
कर जोड़ फरे अरज चम्पालाल पग परी ॥प्र० ६॥
१००. प्रभु स्तुति ।
तर्ज-इन्द्र सभा ।
प्रह उठी मैं सदा नमूं प्रभु पंच परमेष्टि नाम ।
इन कर्मों के लिये नहीं
नहीं मुझे श्राराम ॥१॥
दिल लगा है आपसे प्रभु नहीं और से काम ।
अरजी मेरी लीजिये प्रभु लगे नहीं कछु दाम ॥२॥
लख चोरासी जोन में प्रभु बड़ा विकट है ठाम ।
फिरते फिरते मै थका प्रभु मिला नहीं विधाम ॥३॥

मनोभार मापको मेंबईपास परमामला
मुझकोबीविये प्रभुपा पर निर्वास
मोप गरीबकी बीमतीममुसुमिपे रुपानपात
११)
मारकर्म को तो वो प्रमु गरखे प्रात्यो ससाम ।
माप तिरे सेसार से प्रमुगम समी एक पात्र
सुम देवा दुख मेग्वा ममें पही तुमारी बाप
१०१ पथ परमेष्टी स्तुति ।
मपम प्रापमा प्रेम पी कर परिगत रेषमा
पाम में पढ़। सकल मला सामी को हरा
भर नापजी भाप या शरण तब
मिस माना अधिक अन्तर राजु मागता।
कर्म पाम को पास तोड़पा प्रार!ीमो संप
पोरणा: । अनूप जान से माचा भोपता,
पर माथजी भाप सम्पवा दिस में स्पा
पामाजीसरे तमिलति मपपरे।

।
सकल धर्मना धोरी स्वाम रे, अरर ! तोदिया
कोध काम रे ॥ ४ ॥ श्रमण सर्वनी सेव में सजूं,
सुध मने भला भाव श्री भजू । गुण निधि गुरु
जान श्रापजो, श्ररर ! कर्मनां कष्ट कापजो ॥ ५ ॥
सरस्वती मया शुद्ध दो गिरा, दिल न थाणस्यो
दोप माहरा । चम्पकलाल नी गहन वीनती, शरण
सद्य दो निर्मली मती ॥६॥
१०२ भजन उपदेशी ।
वीतराग की वानी सुन लो, मिटे पापग्रो
सहीजी। मिटे पाप० ॥टेर॥ मनुष्य जन्म पायो त
पाणी, मान गुरु की कहीजी । तूं मान० ॥१॥ अव
के अवसर क्यों नहीं चेते, फेर जन्मश्रो नहीं जी।
फेर जन्म ॥२॥ रात दिवस तूं धंधे लागो, गयो
जनम सर्व वहीजी। गयो जनम० ॥३॥ दुर्गुण को
तूं त्यागज करजो, याहि अकल तने दईजी। याहिक
॥४॥ चम्पक मुनि सुन बैन सुधाकर, मोद भविक
उर भईजी। मोद०॥५॥

(१५८)
१०३ शांतिनाथ मसु की स्तुति ।
साता करसोजी, महापमा शांतिनापजी ।
रेर । सर्प सिर पिमान से बनी, हमियपुर
में पापा । साता करदी सारा जगत में माताजी
सुख पाया हो। म. ॥१॥ वीन लोक में हर्ष मों
सब गावे मालापार। तीपंकर परवी पे पास
गुम अपरंपार हो ॥ म० ॥२॥ मनाथ मुनि
माप कसीमे तुम नाथम के नाप । पारों वीरव
शरण भागो मोड़ी पोनों हायो ।म।।"
सब सुनो तुम देमे पाले सेपक मुमरे माम!
भव पार उतागे मागर से पामरो काम हो
II IIगुरु हमारे रामनिममी पाबेषम्पालाल
पाप मोड़ कर पीनती परदो मुझे मिहालको
Cor

(१६४)
१०४. वीर स्तुति ।
मर्ज पनजी मूढे वोज ।
मनड़ो मोहोजी, महावीर स्वामी मुज दर्शन
दीजोजी ॥ टेर ॥ दशवॉ सुरगथी चवि पाया,
वहोत्र वर्ष स्थिति पायाजी। पूरवली पुण्याई योगे,
नाथ कहायाजी ॥ मन० ॥१॥ सिद्धारथ राजाजी के
नन्दन, त्रिशला राणी जायाजी । तीन लोक में रूप
अनूपम, अधिको पायाजी ॥ मन० ॥२॥ तीर्थकर
पदवी से श्राया, ज्ञान घणेरो लायाजी। भविजीवां
का काज सुधारी, मुगत सिघायाजी ॥ मन० ॥३॥
जो नर मन में ध्यावे सो तो सुख अनंता पावेजी
जन्म जराने मरण मिटावे, गर्म न पावेजी मन
॥४॥ गुरु हमारा रामरतनजो, दियो पाप छिट-
काईजी। चोट लगी निज नाम धणी की मुज
हिरदे खटकी जी ॥ मन० ॥ ५॥

(१७०)
१०५, भजन उपवेशी।
इन मेना मुसाफिर मा तो पाविर पहा
से होपगाराबासपक्षावोमपा निकार
भाई वानी हाय। पुडापे का दुम्स तसा
कई कहानप बावजी || स मां
इन्ही सब तेरी मीना का गोर। बीबी
समरपी में तेरे दिल में पोका मोरजी।
धन... साईनाम की गलबनी,मेकीकी
वसवार । मारपदी को
त्यमो फिर उतरी
मष पारशी, सुम.॥३॥ सुख
का तो पोको उम्मकी भाषारित माहित
रासलो तुम हमारे पासणीमुन.rn
सौम मुमी में पुरानी की समा कसेजे जान।
गुरु हमारा रामरमममी करेगावी बाममी।
सम.॥
बाम
जीने

( १७१ )
१०६. उपदेशी।
न-सांवलिया रग फेटा वाला तो पर जादू डारू रे ।
सतगुरु केरी पाणी सुन्नने, हिरदे शानज
लागो रे। हिरदे शानज लागो, उठो भव जीवां
जागो ॥टेर॥ घोर संसार असार इसी में, दुख को
है नहीं थागो रे। जो सुख चाहो जीने का तो,
प्रभु से अरजी मांगो रे, प्रभु० सत०॥१॥ वीतराग
की वाणी जिनसे, धोवो दिल को दागो रे। चोर
करम इन्द्रिया संग लागी, इनसे अलगा भागोरे,
इनसे० ॥ स० ॥२॥ मात पिता और सासु सुसरा
रमण्या जम्वु धागोरे । सुनी यात सब चोर पान
परभवो लारा लागोरे ॥पर० स०॥३॥ आरो पांचवो
सुत्तर इनमैं योहि समुंदर थागोरे । गुरु हमारा
रामरतनजी, भर्म अंधियारो भागोरे । भर्म स०
॥

(१२)
१०७ पच परमेष्ठी।
सुनो पर परमेष्ठी देव, सिमन मोरेसारी
वीडोरे । अब कर मैं तुम्हारी सेव सिम मोरे
तारीरीजोरे टेरा वापिदेष परिम्स जिवंद
मोहे नारी दीजोरे । भी सिख पड़ा मगकम्त जि
मंद मोहे तारीबीगोरे सुमोमाबारय उप-
समाय जिम्म मोहे तारी मोरे । मुमि उपदेश
भी करे साप्म जिमम्द मोहे सारी दीगोरे।२।
नो फस्पो मोहमी माप निमम मोहे 'तारी
रीडोरे । ससारमा जागी डास मिमन्द मोरेवारी
दीजोरे । पिकपिट में मति मम्द सिमान
मोहे तारी पीजोरे। सममपो नही में फम्म जि-
मम्प मोरे तारी दीजोरे करणिकविसाय
चिमन मोहे तारी दीजारे। भवान तिमिर मिर
माप जिमन मोहेवारीदीओरे ॥१॥

( १७३ ) १०८. धन विषे। सज-नाव में नदिया इनी नाय । दुनियां धन में भूली जाय, कहा कहूं कछु कहा न जायरे टेर।चोरी जारी करे लवाड़ी,मन में राजी थाय । हिंसा करे पर प्राण की रे, धन लेवन की चहायरे ॥ दु०॥१॥ बेटा बेटी बेच देरे, न गिणे न्याय अन्याय । यातो मारे जीवतारे, धन से अन- रथ थायरे ॥ दु०॥२॥ सत हारे मत विगड़े रे, जातिसु भ्रष्ट होजाय । धर्म शर्म सगपण तजेरे, झूटा सोगन खायरे ॥ दु० ॥ ३॥ धूल खाय धन कारणे रे, सन्त महन्त कईराय। झूटा कई झगड़ा करे रे, लडे राज में जायरे ॥दु०॥४॥ चम्पक मुनि ऐसो कहे रे दीजे ममत हटाय । ऐसा अचम्भा हो रहा रे, मरने भूत जो थायरे ॥ दु० ॥५॥ Asa १.६ मज़न उपदेशी । ठिन मोरा पम्प सम्त निम कौम पता मेरे ॥रेर । शाम की रीत किपा र मात परायो नाम । सोम लाम और पाप में पूरार पाप को काम । संत दोदो तीन पर में मारी तो पर मिपा से प्रेम । ती बाड़ी मात्र सरकी तम दिया बरतने म ।। संतनाश मांजा चिलम या भग समान् मह मांस को प्रातार । जोगी नहीं सो भोगी पूराहता कानी पारसित. राम गुर और गौच गुर फिर जगत गुरु कोवाप । राधी घोडा राये पर में पैरे रेस में जाय । सेत गुरकी पिबाम किया से होप तुरत निस्तार । पम्पक मुमि पोको सबसे मरमर को मतभार संत- S ( १७५) ११०. उपदेशी। सर्ज-प्रभु नाम सुमर सुख धाम | वाणी सुन लीजो रे, चतुर नर वाणी सुन लीजो। थाने देवे सतगुरु उपदेश धरम को लावो थे लीजो ॥ टेर ॥ मुनि सुनावे ज्ञान चतुर अब आलस मत कीजो। बड़ी कठिन से जोग मिल्यो जरा इनमें चित दीजो ॥ था०-॥१॥ लग्यो अनादी फाम मती तुम पाप माहि भीजो । प्राण पराय का मत लूटो जरा दया कीजो ॥ था० ॥२॥ उत्तम नर भव पाय मती तुम पाप विषय माहि रीजो। सुख दुःख अनन्तो समता रस पीजो ॥था० ॥ ३॥ चम्पक मुनि उपदेश श्रवण कर वात हृदय धीजो जिनवाणी अमृत रस पीजे अघ्र पंकज हरीजो ॥ था० ॥४॥ अल्प और

१११ भजन उपदेशी।
हरिसी गश्मी।
मे तन पोपचारे यांको मत कोई करा गुमान
सीहर पकी मिमका
कपन परम शरीर।
मागम पेये साक्षी तमको धोती गया भमीराये
१॥ अम्तेवर रम्मा जिसीरे रमपी कप विशेष ।
गहिया कपड़ा पर जहा मोमा सुतर देखा।
पे० ॥२० मीतर दार भो मांस पिर, जिसमें
मरी पुर्णप । परमडियो चामहोयपि मति मूतो
मति मम । ये.॥३॥वोप पातु से बनी है
रको बाम लगाप । म प की पही कोपली
गप ही परमाय प्रयेाकार रंग सुरंग रे
ता रूपा सिंगार । मा मामा करता पहारेरमें
भरत भिंगार ॥ ये समोरापीरे मष
पूरब को सोच । माती प्रापन औन पारे मन में
कर मानाय । ये• तुम से पगईरीरे
तिम से दो तिप रप । हास पफ पीसमीरे
मुष परम्पो वा भूप ॥ ये

( १७७ )
११२. भजन उपदेशी।
सर्ज-माद ।
हो थाने जाणो जाणो जाणो जरूरी दिल में
करलो विचार ॥ टेर ॥ वाप का बाप दादा गया,
अब थांकी कहीं पाश । एक दिन यहां से चाल-
णोरे, रहणो नहिं थिर वासरे ॥ था०॥ १॥ देख
रहे हो आप प्रांखों से, आया सोही जाय । कात
वैरी तो किनने न छोड़े, सब दुनियां ने खायरे ॥
था०॥२॥ म्हारो म्हारो करतां गया सब अव
जनम्यां छो भाप । शक्ती ऊमर थारी घटती जावे
तोही न आवे धाप || था० ॥३॥ भन्तिम वेलां सा
रोवेगा, थे भी रोवोगा खास । धन दौलत ने
कुटुम्ब कबीता, कोई न रहें तुम पास ॥ था० ॥१॥
संवत गुन्नीसे चहोतरेरे, रामपुरे सेखे काल।
रामरतनजी गुरु प्रसादे, गायो चम्पालान ॥ था.
॥५॥

(१७८)
११५ स्तषन उपपेशी।
मारे जागोरे २ यो मोह में कुल देसी भागे
मेरेर पासपो पेशागवायो जोस्न में निवा
बापरे । फिरे मटकतो पर २ भने शरम न पाये
है।मामात पिता में काम कबीसा धन
पीमत परिवागरे। चोर बोरगपा मोरम
पर जमारोबारा प्रापोरापो गई जपानी
पम्पा जोर बटामोरे। मन की मन में ह गई
मूगश फिर पतापोरे बासग संपत्ति में
पाची कापा तो जिसपर मेमाचीरे । गुरुमारा
रामरतमणी समता राची रे सा.
११४ पंच परमेष्ठी स्तुति ।
पबिगुस्मी बागबानी।
मम मोहम पच परमेष्ठी समदं जग पपीजी।
भामंड माम बाते पुन पनि महिमा पपीजी ।

( १७६)
टेर ॥ शुक्ल ध्यान से तोड़ी कर्म श्ररिहन्त पद पा-
मियाजी । उपनो केवल दर्शन शान, होगये लोक
श्रलोकनां जान । अतिशय चोतीस महागुणवान,
पैतीस वाणी अमृतमान । तीरथ थाप्या श्रीजी,
चार परम सोभावणीजी ॥०॥१॥ श्री श्री सिद्ध
कर्म कर अन्त विराज्या मोक्ष में जी। मेट्या जनम
मरणरा दुक्ख, पाया घणा अनन्ता सुक्ख । रोगरु
शोक तृषा नहीं भूख, झानी माख गया खुद मुक्ख।
जाने नमन करी अरिहन्त लेवे दीक्षा भणीजी ॥
श्रा०॥२॥ तीजे श्राचारज गुणवान छत्तीसों अती
मलाजी। समकित ज्ञान देत हैं भारी, सुणी ने
ख्नुशी होय नरनारी । दीनो वोध बीज सुखकारी,
माने वचन सभी संसारी। चारों तीरथ में शिर-
दार सोहे हीराकणीजी ॥ श्रा० ॥३|| श्री श्री उपा-
ध्यायजी, माता सूत्र सिद्धातकाजी। आगम पूरव
और उपंग, मिलके सीखे साधु सव संग। अमृत
वाणी वरषे रग, सुनके पाखंडी हो दंग। भवि
जीवां के चित जेम रतन चिंतामणीजी ॥श्रा॥४॥

(१)
प्ररण साधु शिरोमनी सन्त मुमिपर पांचौसी।
परराम बाम पारिम सार, माया पुरमन विषष
धिकार । तापा समभाई भरमार दीमा मर पा
वसी गार । मनहो हो मारोमुनी पापी मामी
तपीजी । मासुम मन से प्यार नमन कर
पर पोचली। पा सब सम्पति नूर जा
रोग शोक पुत दूर । दुश्मन दोष र मसि
सिटि मिले भरपूर | अग तारख भी सरकार अप
जीवम डीजीप्रभा सारी पपी में ये साप
पदारप मानमोजी । ऐमो मही को जो गाप
पर मम मे उमगे माप । मिरवाये सारा शोक
सन्ताप दूरा पाये सबही पाप । गुरु रामरतन
शिप कहे पिये गुपीजी.भा.
११५ बाबपी उपदेगी।
तबार्गे से करत मुहम्मत महावाजको पाव
मतात हो। कैसे प्रधा रोय तुमारा नारद

( १८१ )
दिखलाते हो ॥ टेर ॥ औरों की तुम गरदन काटो
अपनी खैर मनाते हो। इब्राहीम और इस्माइल
पर जरा न ध्यान लगाते हो ॥ यकीन थी उनको
मालिक की तुम तो बात बनाते हो ॥ करी जान
कुरवान बेटे की हजरत श्राप सुनाते हो। दुम्बा
जिन्दा होगया वहां पर तुम तो मार के खाते हो
॥ कै० ॥१॥ श्रादम ने पकड़ी थी हिरनी देख नबी
को चिल्लाती। हजरत बच्चे हैं जंगल में मुझे
छुड़ादो दुख पाती ॥ किया कौल थाने का छोड़दी
गई बच्चे को संग लाती । रोरो बच्चे दूध पिये कहें
अम्मा तूं क्यों घबराती। नबी साहब ने छुड़ादी
हिरनी तुम तो मार के लाते हो ॥ कै० ॥२॥ वारी
घारस बहुत खजाना
को
जुल्म किया शैतान ने उनका मुल्क माल सब फना
किया।
बहुत
बीमारी बढ़ादी तन पर कीडे पड़ते
नीचे मियां । चुन चुन के ऊन रखे जिस्म में सव
कीड़ों को बचा लिया । नाम रहीमा बीबी हाजिर
थी ऐसे तुम बतलाते हो ॥ कै० ॥ ३ ॥ खुद का
नबी अइय्युब
दुःख दिया।

(१८२)
गोस्त दिपा काट मची महोमद फागता वरपाई।
यो मांगे गोल खुदा मेकराम अमर फरमाई।
ऐमा जामकर रहम रखो कुल मालम उनी पन
वाई । जान किसी की मत सूटो तुम मुराग
हो माईस फैस के भूठी दुनिया में माइक
जान जताते हो
११६ श्री महावीर प्रसु स्तवन ।
तमाछ।
महाबीर स्वामी प्रस्तावामी शिषगत गामी
पुगेमारी प्राण । मण, शिरमामी दुर्मतिमामी
मुमति मुम्वामी से हमारी मारेर। पूरब
म पंच्या पगरे सेम्पा घिषप विकार। मातम
पोष महीअषपाम्पा गर्षमदितगंगा बोध्या
म मारी मिर्मती मारी बिच में भारी प्रो
उमारी धारा म.१ भायोभापमे प्रामरेरे
गवानी मात्र । ममता मपसल पार उतारो

( १८३ ) गिरवा गरीब निवाजरे। यह छे अरज हमारी लीजो स्वीकारी, छो उपकारी, पूरो हमारी प्राश || म० ॥ २॥ वीर प्रभु मुज हार हियाना श्रातमना अाधार । तुम चरणांबुज वासना केरी, अन्तर हुस अपार रे। छो विश्वाधारी, सूरत प्यारी, लीजो उगारी, पूरो हमारी प्राश ॥ म०॥३॥ जन्मो जन्म हूं दास तुम्हारो, व्हाला प्रभु विसवास । चम्पकलालजी मुनि परतापे,अरजी कालीदास रे। कीधी कोड़ अपारी, चित्त विचारी, ल्यो अव- धारी, पूरो हमारी प्राश ॥ म० ॥४॥ ११७. जिनवाणी। सर्ज-मांद। जिनराजनी वाणी, छे गुण खानी, मोक्ष नि- शाणी, सुणिये चित्त लगाय । वाणी सुधा समाणी शिव सुख दानी जगमां गवाणी, सुनिये चित्त लगाय ॥ टेर ॥ श्रधम फौज निवारण कारण शस्त्र

(१७)
परी प्रयकार। मपाल तरपा भवियनों में पेम
तसो मापारे । ऐई दिख में मानी शान पिहानी
भी मिनवासी सुमिये जि.॥॥पकनिकाची
अनेक गुपोंर्नु पर्सन फेम राय को जिहादी
कोई कहे पब गुषमी गपती म पापरे । महोमब
प्रासी उमट पानी पीरनी पासी, सुमिये ॥लि.
॥ २॥ दीर्थ पपी संसार में ज्यामा मोरेपार ।
साप निवारण भी जिनकेरी पासी प्रमुख पार
रे।कही केवल बानी पात पुरामी अन्तर पानी
सुमिपे• जि.सम्म पुपारख मा र
ठारत पारण विषय विकार । सुमता पाप समत
पुलावें पाये सप सयकाररे। पपी भई हमारी
पूरण मारी ६ हितकारी सुनिये: जि.।
पाणी तथा गुरु पर्सन करपा मुनि पम्पक पित
पामा गुरु परापुर सेप मतापेरपरकामी-
पास रे। मुंबई मगर ममारी होम अपारी पार
पारी मुनिये मि•u

(२८५)
रे,
११८. विनय
सर्ज-माढ ॥
मेरी अरजी लेना, चित्त में देना, सुनिये श्री
महाराज दया दिल में धरना, भव दुख हरना,
सुनिये श्री महाराज ॥ टेर ॥ मोह अनादि नींद में
वहुत हुवो हैरान । खान पान में मगन होके
किया कछुन विचार रे मोह लोभ वता के फन्दे
फंसाना, चित्त में देना, सुनिये श्री महा० ॥ १ ॥
सुमति घचन मान के, श्रायो आपके द्वार । अधम
उधारण अन्तर्जामी मेरी सुनिये पुकार रे। मोह
प्रवल वल, तिनको हटाना, चित्त में देना, सुनि०
॥२॥ चिन्तामणी श्री पार्सजीरे, चिंता चूरण हार,
केसरीचन्द कहे लाज मेरी रखिये करिये विचार
रे। हैं जैन प्रकाशक तेरे शरणा, चित्त में देना,
सुनिये श्री महाराज ॥ ३ ॥

(११)
११६. ईश मार्थना।
भी शासनेण स्वामी,दो संप सहाई । दीने
वपाल दमको मुख ति समंदारेर ।
दयानु या नहीं भम्प देव पवा। तासे रेप
सेपा तानुमसे ली लगाई मी कोई बार
मारता रे गहिको शिक्षा पहारे। हूं पाप से
ग्यारे बुद्धि रेशमीपण शीय
मावं तुमको सुरेश प्पा । पामेमा ममा
हिरे में पान पाई। भी वेरा जो पान
प्पा मो स्वर्ग मोर पाये। भाषागमन मिरा
गति पानी में बाई.श्री.॥ अप वाप
मिठामो परमार पंवारो। प्रभास तिहारो
सीमा है माथ भाई भीगा भी सह में रसाई
प्रतिदिन रे मनाई। पकी एक्पताई को
मित को मिठाई भीम निमास माम सीजे
इतमी मया करीमे। सम्पबरामदीये माप'
बिमय सुमाई ॥ भी.

( १८७ ) १२०. अरिहंत स्तुति । तर्ज-धना श्री आदि। मनाऊँ मै तो थी अरिहन्त महन्त ॥ टेर ॥ तरु अशोक जांको अपलोकत शोक समुह नशत । सुरकृत वाण वरण के नभ से अचित सुमन घर- पत ॥ म० ॥१॥ अर्धमागधी घाणी जांकी योजन इक पर्यंत । सुनत श्रमर नर पशु हिल मिल के समझ सुवोध लहंत ॥ म० ॥२॥ मुनिमन समसित चमर श्रमर गण, प्रमुदित वै ढारंत । स्फटिक रत्न के सिंहासन पर, त्रिजत पतिराजंत ॥ म० ॥ ३॥ प्रभावलय तम प्रलय करन हित, दिनकर सम दमकंत । पृष्ट भाग रहि प्रभुजी फैसो, प्रबल प्रकाश करत ॥ म०॥४॥ गगन माहिं धन गर्जारव सम दुंदुभी शब्द वजंत । तीन छत्र शिर सोहें तातें, तुं त्रिभुवन को कन्त ॥ म० ॥५॥ तव सुमरे सुख संपत्ति पावे, नरसुर पय प्रणमंत । अष्ट सिद्धि नव निधि घर प्रगटे, तेरो जाप जपंत ॥म०॥६ माधव

(११)
११६ ईश प्रार्थना।
मर-भाटी।
भी शाममेण स्वामी,दो समसहर्षीने
रयानुप्मको सुख ति सम्बाई और।।
पपास्नु पा नहीं प्रम्प पेप पपा। हासे काप
सेया तर तुमसे सौ लगाई। मी०को बार
मारतारे गहिको शिला
पधारे। तूं पाप से
ग्बारे बुद्धिा मीना मल ईश शीर
माप तुमको सुरेश प्या। महमेम्बा मसाले
दिन में पान पाई ॥ श्री राजो साम
ग्पा पोसगै मोत पाये। मावागमन मियो
गति पानी में भाई भी॥ य ताप को
मिरामा परमाव पंचगरो मामासरो विहारो
तीनो माप माई । मीरा भी सा में रसाई
प्रतिविम रे पपाई। ए की पपसाई दो
बिन को मिटा प्रीत निमास जाम सीजे
समी मया करीये। सम्मायामीने माप
रिमय सुनाई। भी ।

(१८७ ) १२०. अरिहंत स्तुति । तर्ज-धना श्री श्रादि ॥ - मनाऊँ मै तो श्री अरिहन्त महन्त ॥टेर ॥ तरु अशोक जांको अघलोकत शोक समुह नशंत । सुरकृत वाण वरण के नम से अचित सुमन वर- पंत ॥ म० ॥१॥ अर्घ मागधी वाणी जाकी योजन इक पर्यत । सुनत श्रमर नर पशु हिल मिल के समझ सुबोध लहंत ॥ म० ॥२॥ मुनिमन समलित चमर श्रमर गण, प्रमुदित वै ढारंत । स्फटिक रत्न के सिंहासन पर, त्रिजत पतिराजंत ॥ म० ॥ ३॥ प्रभावलय तम प्रलय करन हित, दिनकर सम दमकंत । पृष्ट भाग रहि प्रभुजी कैसो, प्रवल प्रकाश करंत ।। म०॥४॥ गगन माहि घन गर्जारव सम दुंदुभी शब्द वजंत । तीन छत्र शिर सोहें ताते, तूं त्रिभुवन को कन्त ॥ म० ॥ ५॥ तव सुमरे सुख संपत्ति पावे, नरसुर पय प्रणमंत । अष्ट सिद्धि नव निधि घर प्रगटे, तेरो जाप जपंत ॥म०॥६ माधव

मुनि रगोड बीनवे विमप सुमो भगवत।
सेबो सिम समाजपकार सिहोरेगा
पनि यि बुधि मपभो भर न सानि
प्रमत्तम.आइति
१२१ सिद्ध स्तुति।
भारराप्राविनाशीभगम प्रगोधर ममत
भवन परिकार । भवमी त्रिभुवन सामी,
अमित शक्ति मंसर से रपमा कमा
मध्यन पुल मुश संसार। पापो पर परमि
तास पद पपी पारंपार ।। से॥२॥ सिय प्रमु को
सुमरख जगमे सात मिर दातार । ममापित
पूरन पुर र समर्षिता धूपबर से
अपेबाप मोगीश रात दिम, पावरम ममार।
पीहर प्रपमें रनको सहोमे अमगार से.
सूर्योदय समप मक्तियुत पिर मित

( १८६) दृढ़ता धार । जप सिद्ध यह जाप तास घर, होवे ऋद्धि अपार ॥ से० ॥५॥ सिद्ध स्तुतिये पढ़े भाव से, प्रतिदिन जे नरनार । सो दिव शिव सुख पावे निश्चय, बना रहे सरदार से०॥६॥ 'माधव' मुनि कहें सकल संघ में बढ़े हमेश पियार । विद्या विनय विवेक समन्वित, पावे प्रचुर प्रचार ॥से०७ १२२. श्री ऋषभदेव स्तुति । तर्ज-कव्वाली। भगवन मरुदेवी के लाल मोक्ष की राह बताने वाले राह बताने वाले, श्रानन्द बढ़ाने वाले भग ॥टेर॥ लीना अवधपुरी में अवतार, जग में छागया श्रानन्दकार। सुरनर बोले जय जयकार, सारे जिन गुण गाने वाले ॥ भ० ॥१॥ जग में था अशान महान, तुमने दिया सृष्टि को ज्ञान । करके मिथ्या- मत का भान, केवल शान उपाने वाले ॥ भ० ॥२॥ तुमने दिया धर्म उपदेश, जिसमें राग द्वेष नहीं

(१.)
हेरा। तुम रोममा विम्शु महेश शिष मारण
दरगाने वाले ॥
मग बीपों पै करुणा
पार तुममे दिया मंग मबकार। जिनसे होगये
मपदाधि पार सातों निमय मा पाक्षे । म.ru
परी कर्म बड़े पहपीय, देते समीपों को पीर।
म्पामत हो रहा अपम अपीर, तुम दो पीर
अपामेपासेम-शति
श्रीमान् मपर परितकविराजममीरिपीसी मत
१२३ भी वीर सुति ।
44-मया सीताराम सीती।
मोहनगारा प्यारा पीरनिन्दादिषसोगी।
सन नायक भी वर्षमान पिरवा गुण स्वमारी
साम । टेर। पुपप पमोता माता मियारेपी
मगपतीजी पारी लिपो भपवार पर पर
पते मैगवाधार सुर नर पोसेबप सपभर मो.
प्रमुबी परम पैरागी भागी सब सिख संपदा

( १६१) जी, जग से ममता मोह निवार धन में कीधो उग्र विहार तन तप धार्यो दुक्कर कार ॥ मो०॥२॥ उग्र- विहारी विचरत देश अनारज में गयाजी उपसर्ग सह्या परिपह धीर, ध्यानी तपसी अचल शरीर, क्षम्या खूव करी महावीर ॥ मो० ॥३॥ द्वादश वर्ष साडा छमास लगे तपस्या करीजी। मध पाचापुर उत्तम स्थान, प्रभुजी पाया केवल ज्ञान, सुरपति कीधो परम कल्यान । मो० ॥४॥ अष्टादश दोषण धर्जित द्वादश गुणकर सोभताजी। पाणी वर्षे अमृत धार, धर्म प्रकाश्यो दोय प्रकार, हरि शचि सूरि सुर हर्ष अपार ॥मो॥५॥ यज्ञ करैया ब्राह्मण एकादश विद्याभण्याजी । शत चुम्मालिस के परि- वार, संशय दीनो नाथ निवार, सघलालीधो संजम भार । मो०॥६॥ अमिमानी मद मर्दन शरण त्राण वालेश्वरूजी। जय जय जयत्रिशला के नंद, अमृत घदे पद अरविंद, दीजो बोध बीज आनंद ।। मो. १७॥ इति ॥

(१२) १२४ भी गौतम स्तुति । 4-NI षेदधी गौतम मन मायन पापन गपपतीनी। माता मपति पापे दिम दिन दोपदी रतीजी। सस्ट विषम होप सब दूर ही भी पापड मुन मरपूर रे। एप्पीमात वात पसुभूति हसन महीगी । मेध्या पीर प्रमु महामाग जाग्पो पूरण भर मनुराग संशप मिटपोयो पराग अर्प- शत परिमारे संगम पारे सुपमविसी । ... प्रमुए शिप्प सुमिनीत राममूठि मसासी। गौतम गोष पवित्र कराया ऊपी सात वाप पर काया पन अपम संपेश महाया दही समचोर साधारसार गोमे प्रवीगी।.॥२॥ पम कमक पुडग मिर्पण तन तेबी मांगी। पप पीर प्रमर तनु कांती पर नाम सिपा सुख शांती द्वारा मह परी हरीभाती। खलपीनापी गुप मामी तप सचम प्रतिनी।। 4. ॥श भाषा उन ( १६३ ) दिप्त महा लिप्त घोर तपसी गुणीजी। घोर उदार घोर ब्रह्मचारी, ममता सोभा तनु परिहारी, सीतल लेण्या महा हितकारी, तेजू लेश्या है, संक्षिप्त लिप्त मोटा जतीजी ।। वं० ॥४॥ मंगलकारण दुःख निवारण कष्ट विदारणाजी । संशय मेटन के हित- कार, पूछया प्रश्न अनेक प्रकार, भरते वरते सुर्ख आधार, अष्ट सिद्धि नोतिघ रिद्धि पंकज पद राजे छतीजी ॥२०॥५॥ ज्यांके नाम मंत्र की महिमा कहत चने नहींजी गौतम गुण मणि है, गुणरास, केवल कमला लील विलास, पूरे मन वांछित सब श्राश, व्यावे ध्यान अमीरिख पायें शिव शाश्वत गतीजी ॥०॥६॥ इति १२५. गौतम स्वामी का स्तवन । गौतम नाम अाधार, हमारे गौतम नाम प्रा- धार । सुख सम्पति दातार, हमारे ॥ टेर ।। वाद करण श्री वीर से पाया घर अहंकार । संशय

( १९४)
रसंगम लियो पंचसया परिपार
।।
मम्मि पनी विपी रचे पूर्ण राधार । निरंतर
पट ९ करे तपस्या पुखरकार ॥॥२॥ तीस
वर्ष मभु मक्ति में करें गडपार। सियपुर
तुम गरके मुक्ति मया अविना ! सम्धि
मधिप मानसी माप सुबमएडार । वापर मन
पंचित सदा पेड़ा बगायो पारमा कामपेनु
पुरतम मधि प्रहर प्रर्ष विचार प्रवाही भी
सम्पये पामें पद भेकार Aucात गीतम
अपमा प्रयापार | सकल विम भय उपसमें
बतें मेगसाचारप्रसमा सत्तरे
अमव मर्म स्वीकार । भारिमा रेको प्रस
पम्म पारंबार ।।
गीति
१२६ मम पार्ष उपदेय ।
मोगी से पार्म फरमाते पुनी में नाग काता
है पपामो रसको मसी से मरे बेशक रामा

( १६५)
है ॥टेर॥ बदन नाजुक विचारों का उसे अम्माने
पाला है, मरे तेरी कचेरी में अरे! धधक्ती
ज्वाला है जो०१॥ अज्ञानी छोड़ दे हठ को सभी
का जीव व्हाला है। तिरेनहीं पाप करनी से मोक्ष
मारग निराला है। जो० ॥२॥ लकद को चीर प्रभु
जी ने नाग नागिन निकाला है, दिया नवकार का
शरणा जड़ा दुर्गति का ताला है। जो० ॥३॥ हुये
धरणेन्द्र महाराजा पद्मावती नाग वाला है, पूरे
पाशा सकल मन की शासन के रक्षपाला है जो
॥ ४॥ मिथ्याती मान मर्दन को अटल घामा के
लाला है। अमीरिन दास चरनों का वचन संचे
में ढाला है। जो० ॥॥ इति ॥
१२७. प्रभु महावीर कीर्तन ।
गमन ।
सौभागी नन्द त्रिशला के, तुही महबूब प्यारा
है।तेरे कदमों के चाकर को, मिला मोटा सहारा
है।टेर।। जहां फानी तर्क करके चले यन में मुनी

(११)
बम है। द्रम्प और माप सुप योगी, कठिन तप
भ्मान पारा है। सी. मनुष्य पान देषों के
परिपामो ससम में। प्रारीतमा भाग
देष सनम मी हारा है। सी० ॥२॥ तोड़ सरीर
कमों की पने सबंध जगमावा । दिया सपरेशा-
मियो को मोप मारण उबारा॥ सौ०॥
गौतम सुधर्माने करी दिल से तेरी लिगमता की
बकसीस पक्ष की उसे दुनिया से तारा है। सी.
॥.. गुम्बा से पूरा मालिक ही रहमत का
दरिया है। निगार महिरपी मिस पे गुमा
सा विचारा॥ मी गुम्हा सो भ्रमी
रिम को पुल्लसो अपने कदमों तक । मला पारे
बुरा तो मी ना प्यारा तुम्हारा सी० :
१२८. प्रसस्तुति ।
कहो माता मग बावा ममु महाबीर पी अप
हो। पर्माता पिता माता प्रमु महावीर की अप

( १६७ ) हो॥टेर । त्रिकालिक द्रव्य त्रैलोकी चराचर जो पदारथ है । सकल दर्शी सकल शाता, प्रभु महा- वीर की जय हो । क० ॥१॥ गरीवों पै दया करके दिया उपदेश तिरने का । अराधे स्वर्ग शिवपाता, प्रभु महावीर की जय हो । क०॥२॥ वीरवाणी सुधासानी करे मिथ्यात्व ग्रहहानी। निजातम बोध की दाता प्रभु महावीर की जय हो || क० ॥ ३ ॥ स्यादवादी अनेकान्ती, वचन अविरुद्ध श्रीजी के ॥ सुने सव भर्म मिट जाता, प्रभु महावीर की जय हो । क० ॥ ४ ॥ अमी चरनों के चाकर को, दया करके दर्श दीजे । रहे श्रानन्द सुखशाता, पभु महावीर की जय हो ॥ क० ॥५॥ १२६. श्री शान्तिनाथ की गजल । तर्ज-माता कोशल्या के लाल । साहिव शांतिनाथ भगवान, शांति वरताने चाले । शांति वरताने वाले आनन्द बढ़ाने वाले ।।

साहिषरेर पिता भी भासेन भूपास प्रमु
मभिरा लाल याला तुम हो जगत सीप रतवास
मिरगी रोग मिटाने पाले । एक मास पुरुष
परिवार प्रमुखी जीना संवम मार । ना सब दिया
गमर्मर जग से ममत हरामै पाक्षे चीमा
कैपस फर्म सपाप सुपपुर पति से तसपाप ।
जिन वचन सुपा बरसाप भुगवी पन्य पतामे
पाने मा० । प्रमुग्री में पीन प्रमाप भग
गहो पाकराप IRपु म सगे साप भरि
को दूर भगाने बाम ॥ मा ॥४॥ममुतुम जगत
पती बिनगर मेरे सकल सुपारोकार। रखिये
सुम सेवक की माग हो मय फम डाने बाजे
॥२॥ पुन मग चिन्ता विपन बिहार ममुखी री
काम सुपार । गहें भविषस रिष भैगर सुम
संपनि परसाने वाले अपता माष सदिय मित
मैप शाताकारी गरेष रिप प्रमुख अधिया
मेष मातम रख मिनाने वाले सा.

( १६१) १३० महावीर प्रभु। कम्वाली। महावीर प्रभु मुझे बचाओ अरजी सुना रहा हैं। निजदास को निभाओ, अरजी सुना रहा हूं। टेर ॥ चारों गती में भटका कर्मों ने खूब पटका । लाचार हो रहा है, अरजी०॥१॥ माता उदर में तकलीफ बहोत पाया। दुख को भुला रहा हूं, अरजी० ॥२॥ पालक पने में खेला,जोबन हुआ है गेला। धन्धे में फंस रहा हूं, अरजी सु०॥३॥ जब की जरा ने घेरा, उस वक्त कौन तेरा। तुम नाम ले रहा हूं, अरजी० ॥ ४॥ कर मेहेर पार करना, लीना है तेरा शरना । गुण तेरा गा रहा हूं, अरजी० ॥५॥ अमृत ने कह सुनाया, लिख के रतन ने गाया। चरणों में आपड़ा हूं, भरजी सुना रहा हं॥६॥ इति ( २००) १३१ भी शान्तिनाप प्रभु की गजल । मामन्दरैया शांति जिनम्द स्वामी। दुख कर हया शांति लिनम स्वामी ॥ ३॥ सर्यि सिर से प्राये का पुरम लाये । मिरगी म्पया हरपा शानि बिमन्द स्वामी ॥१. पर सरकी पे परती बोवरा भासपरवी । नरदेव पर पपा गोति ।।२। सग माग धर्म पारे, Rपुकर्म को विरारे । बस रमा वरपा शासि ॥ धर्मोपदेश रीपा रास्ता बताया सीपा। मबिसार तिरपा प्रतिदो पीस पतुष काबा बर्षमायु पाया। मम पिम सो मैपा शांतिभप भशिव प समाये निफर्ण योग प्यारी । सबकास सरमा शाति. IN प्रसुतपास पाया लिमबीवीपों गापा। हो मुफ्तिया शांति मिनद स्वामी ॥

( २०१) १३२. वीर प्रभु से अर्ज । तर्ग-कव्वाली। शासनपति हो थीजी, सिरताज तुम हमारे । अवगुण भरा है लेकिन, चाकर हैं हम तिहारे ॥ टेरा दोषों पे ध्यान दोगे, तब तो कहां ठिकाना । फरजन्द में होय गलती वालिद उसे सुधारे ॥१॥ हम प्रोगुनों से भारी, खल दुष्ट पापचारी । लेकिन दया तुम्हारी, अघ पुंज सब बिदारे, शासन० ॥२॥ भारत के प्राणियों को, श्राधार आगों का। साधे हैं धर्म अपना, उसके ही सब सहारे ॥शा० ॥३॥ शासन के देव देवी, हो धर्म के सहायक ! दीजे विवेक अपना, हालत को हम सुधारें ॥शा० ॥४॥ सिद्धार्थ नृप दुलारे, त्रिशला के लाल प्यारे। शरणे श्रमी तुम्हारे, कर सिद्ध काज सारे ॥ शा ॥ ५॥ इति Get

१३ श्री पंपठ पनौवीय सिन ।
मारना
सीपीय शिमेश प्रसम् इमेय भा प्रशिप
पलेरा मष भप रण। सप जय जिनेन्द्र वरने
भामम मुम्ब
योनि
वृष मास करणारेर।
शिवायपी मम मामन कम मेमी जिमम समय
म्पामी। सुपिभिरपाल प्रम पर्म पास गांवी
स्याल अम्तयामी । हामी ममम्त मुनि समत
पमा ममि मदन माप पारे शर ॥ अप०१॥
प्ररि अमित जीन राशि प्रमु पुनीत भी अपम
उदीत स पर्म पनि पामी स्वामी सुपारा मुज
पूगे भारा बुमि प्रकाशको बिमा मातीमति
मे मात्र भरि से प्रा गनु पनुष पत्रीय हरित
परया ॥ प्रामाप पीर महावीर बीरहर
पार पो पुग्न शाता समती की माप दो सुमति
माथ मम जोहाय मार्ग पाता। मा पत्रका
मरोड़ा दो मोचमा रातो मरना.

(२०३) - ॥ ३ ॥ वासुपूज्य जाप, शीतल प्रताप, हर विषय ताप, कग्दो शीतल । श्रेयांश देव सब करे सेव, कुंथु कुदेव, कर दर मकल । पारस दयाल, करिये निहाल, अभिनंदन, जिन तारण तरणं ॥ ज०॥४॥ मन्त्रों में मत्र पेंसठ का यन्त्र, तन्त्रों में तंत्र, नित ध्यान धरे। करे सकल सिद्ध, यश रिद्ध घृद्ध, वछित समृद्ध, भंडार भरे । कहें अमीरिख, परचा प्रत्यक्ष, गुरुदेव सीख, हिरदे धरणं ॥ ज०॥५॥ १३४. श्री नेमनाथ प्रभु को हालरियों। सर्ज-चेतन चेतोरे । यावे हालरियो २ मा शिवाटेवीजी नेम कवर नेरे ॥टेर॥ समुद्र विजयजी का नन्दलालजी, शिवा देवीजीरा जायाजी। अपराजित वमान से, सोरि- पुर में पायाजी ॥१॥ आओ मेरे लाला सब जग व्हाला, माता इण पर बोलेरे। कण्ठ लगावे हरप हरष, बेसाड़े स्त्रोलेरे ॥२॥ शिरपर तिलक तम्बोल

(R1)
विगजे माता पुम रमाबेरे। हायेकड़ियां पाप
धूपरिया सब मन भाबेरे :-गामाये मुहर
कामे दो परत पाहे पहिरवा सोरे। रतन
सहित का पालना में अधिका मोरेगा।
घाने मामता नेमकपरजी पमा परहा मिस
मापरे । माता साप हाता पका मूगा परमारे
गा० ॥५प्रामो कंबरी बार परिमा, टोपी
स्तन मसाजी रतम जड़ित का पातमा में 45
अनामी ! गा.पारप परीने शिपायपीसी,
प्रभु मुख वर्गम निरपरे । रमझम रममम फिरे
महिल में षिको हरी ।
गामबी
साड़ी शिवारपीसी प्रमु श्रीमम कारे ।
शामा हाइपरस जलेबी पेपर तामेरेगा
स्तन मड़त का यास योगा प्रमुगी मे पुरसाये
रे। मामल रेशम गादी ऊपर ठ सिमारे।
गा मामा का तोपरी मबरा रेराम और
बटापरे । हरन परीने शिवारेपाली पुत्र विसाध
रेगा००१ राप मोषयों काव ममारित यो

( २०५) हालरियो गावरे । रोग शोग सब दूरा न्हासे नव- निध पावरे ॥ गा० ॥१॥ इति त्रिशला के लाल १३५. स्तुति। तर्ग-टोटी गग्ल । वैशाली नाथ धीर वीर धार के भजो । दयाल भर्म सव तजो। टेर।। चउवर्ण शर्ण धार सकल सिद्धि साधजो । लगा के पलक देख झलक ज्योति में मजो ॥वै०१॥ इक दिल की चश्म खोल तोल धर्म परखजो। निर्वद्य सार धार के सावद्य त्यागजो ॥०२॥ हलदी पतंग, रग ज्यों तन धन विचारजो। जग भोग विषय रोग में कुछ भी नहीं मजो ॥वै०३॥ हिंसा प्रमाद सङ्ग बुरे व्यसन से लजो। उपकार दया धर्म काज सिंह ज्यों गजो ॥वै०४॥ अमृत सांची सीख ठीक दिल में धारजो। जिनवाणी प्रेम से सुनोनिज प्रात्म तारजो ॥वै०५॥

विराजे माता पुन रमापरे। हाये करि पाप
पुपरिपा सम मम मारे 1-1.0 माये मुहर
कामे रो परत पहिदिरखा सोबेरे। रतन
मड़ित का पासना में अधिका मारेगा.
भान मानता मेममरजी पहा परहा सिस
मारे । माता लाये दाता पर {मा पाजावरे
.गा• n४ मानो परमी बार परिना, रोपी
रतन जड़ाऊंगी रतम जड़ित का पालमा में बैठ
मुलामी। गा•ा हरप पर्पने शिवारपीसी
प्रभु मुक्त वर्शम मिररे। रममम रमझम फिरे
महिल में विदो रोमी गा ॥७॥जयी
साली शिवाजीमी ममु के श्रीमम कारे ।
सामामा सरस जलेबी पेपर तावरे गाना
रतन सात का पाल कोखा प्रमुगी मे पुरसाने
रे। मममल रेशम गारी रूपर ह निमारे।
गा। सोना का तोचकरी भंवरा रेराम र
बापरे । दरवपरीने शिवारेगीगी पुष सितारे
रेगानारापोर पो करत अमीरिक यो

( २०७ )
१३७. पानी विषे ।
नर्ज होनी।
मतपीजो २ जल को कोई छाण्या विना ॥टेर॥
पाप घरगो अण छाण्या जल में, असजीव घणा
मीणा मीणा ॥म०॥२॥ झेरी जीव घणा जलमांही,
पिया होय तन रोग घणा । म०॥२॥ व्रत एकादशी
पूजा अरचा, अन छाणे जल निकुल गिना ॥ म०
||३|| मत्स वधिक से पाप अधिक है विष्णु पुराने
श्लोक सुना ॥ म०॥४॥ मूत्र ठाणांगे चार बोला में
जल शुद्धि का कहा गलना ।। म० ॥ ५ ॥ पाप कटे
तन रोग मिटे हैं अमृत वचन सुन धारो सुगना
। म०॥६॥ इति
१३८. श्री भुनि सुव्रत स्तवन ।
तर्ज-सती शिरोमणी श्रजना।
श्री मुनि सुव्रत साहिवा, दीन दयाल देवां
तणां देव के तारण तिरण प्रभु तुम भणी, उज्वल

(२०) १३६ भजन उपदेशी। -मोचन सपा मियांत हमसे पिपायामहीमाता । रे को कभी सत्य बताया नहीं जाता।और। गुसकोप विगत दोष तारक महान है। सदोषी रेप प्पान में लाया नहीं जाता। स• सारमा स- परिमाही मिष्या प्रारंपरी निगुने को अपना सर पे मुकाया नहीं खाता । स.॥२सपए महंसा पिमपमून पर्म पीर सावंसा पर्म पे मन को बगापानी माता सनिभप जनश्रम पन मही बिरुयना । सापप गपोड़हमसे सुनाया नहीं गाना सकतममीरिखबीर कील भगत है। दुनिया में किसी से हराया नहीं गाता - स. ति

( २०७ )
१३७. पानी विषे।
तर्जदोली।
मनपीजो २ जल को कोई छाण्या विना टेर
पाप घणो श्रण छाण्या जल में, प्रमजीव घणा
मीणा मीणा ॥म०॥१॥ मेरी जीव घणा जलमांही,
पिया होय तन रोग घणा ॥म०॥२॥ व्रत एकादशी
पूजा अरचा, श्रन छाणे जल निकुल गिना ॥ म०
॥३॥ मत्स वधिक से पाप अधिक है विष्णु पुराने
श्लोक सुना ॥ म०॥४॥ सूत्र ठाणांगे चार बोला में
जल शुद्धि का कहा गलना ॥ म०॥५॥ पाप कटे
तन गेग मिटे हैं अमृत पचन सुन धारो सुगना
॥ म०॥६॥ इति
१३८. श्री मुनि सुव्रत स्तवन ।
तर्ज-सती शिरोमणी अजना ।
श्री मुनि सुव्रत साहिबा, दीन दयाल देवा
तणां देव के तारण तिरण प्रभु तुम भणी, उज्वल

( २०८)
किपा भरपूर
विच समर निस्य मेव॥ श्री मुनि सुनत
साहिया और ॥ अपराधी प्रमाविमो सनम
जनम गुन्हा
है। मरिया प्राण पा
काय का सेषिपा पाप प्रहार करतो॥मीश
पूरन पाम तम्यता ते प्रमुहिमक्षा तुम विचार
है। अपम ग्यारब विरुष शरन पायो अब
कीमिये भार भी किंपित पुरष परमात्र
से इन भव मोसलियो भी मिन धर्ममिव
नरक निगोर से पहनी भनुमा रो परिवार
भी 10 साघु पषो नहीं संप्रमो मावक मत
महीं किया अगीकार । मावर्या तोम मारा-
पिया तेरपी सिपोभनम संसार के। मी.
अब समकित प्रत भाइयों तदपि पायपक
तरं मर पार के। सम्म पीतप सफसोये इन
पर पिन बार जारी.मित्र मरा
पिप तुम पिता पन पर भी पबमापी माय
सस मुव बिभुवन विम₹ बम्बन बिमपचन्द
पार पजार भी.

(२०६)
१३६. अठारह पाए आलोचना ।
तन-ललित छन्द
परम देवनो देव तूं खरो, धर्म ताहरो में नथी
कों, भरममां भम्यो तूं नत्री गम्यो, करमा फा-
समां हं अति दम्यो ।।१॥ गरीब प्राणीनां प्राण में
हण्या, त्रसथावरो जीव नां गण्या, थरर धूजतो
मोतथी डरी, अरर पहवी घात में करी । २॥ सत्य
सभा जई झूठ योलिया, धर्मी जीवना मर्म खो-
लिया, सद्गुणी सिरे बाल श्रापिया, अरर पापना
बंध थापिया ॥३॥ श्रदत्त दानथी हुँ नविडयो, पर
धन हरी केल में य.र्यो, तस्करों तना तान में चढ्यो
अरर पापना पुंजमां पडयो ॥४॥ रमणी रगमा अङ्ग
राचियो, विषय सुखमा चित माचियो, शियल
भंग नो दोष ना गण्यो, अरर हायरे बाहुरो घरायो
॥५॥ श्रथिर दाममां हूं रयो घड़ी, वात धर्मनी
चितनां चडी, उधत मोहमा हूं पडयो अती, अरर
माहरी शुं थसे गती ॥६॥ करूर भावथी क्रोधने

(२१.)
प्रही समन दुहवी रोपा सी। सर्व संपनी
पंप छोड़ियो तरस तुस्यमी तुघई थपो.
मत्सर मममी में पाकणे ममत भाष में । भती
मर्यो । मद एक पम्पो मानमा मम्मो पिमयमा
कर्पा गौपम्पो मागनवामिग रम्मो
पर करा कास निर्गम्पो। मुख मीही भेछि
बोमवी पर कमरे भूत से मबी : पन हिर
कणी मोती मे मणी मधुर मनोपयो पली।
अधिक प्राशनो भारे मणी भरर कोममे ना
मपमोहनी ॥१०॥ मगम पित्त थी यामनी परे
गम म्वार्थमा पोपिया परे। सरकगेतसा फमर्मा
पम्पो भरर गधीनबी समो॥ १९ ॥ रिस
एची रमा पप मनमा गुर
बी गएय् मेरी
मनमा । प्ररण लड़ी गेपपी मरी भररसमो
धपाभरी १२० मिय अध्यात जातमा
महिपापो कपात पातमा । भर भातमा भा-
नमा पक्रया पर कोयता पा पापो।।
अपना दिया मान प्रम्प प्रपिक परी

( २१६ ) मेल्यू धन्यने । सतगुरु तणो संगना कर्यो, अरर पापनां पुंजमा पड्यो ॥ १४॥ परनी चोहटे चुगली करी, नृप सभा झूठी सायदी भरी। पिथुन धूर्त हुं लाच लालची, पशु पणे रह्यो पापमोपची ॥१५॥ पर पूठे परा दोष दाखिया, जस तणो घणो स्वाद चाखिया। रहस बात तो में करी छती, भव पर- एयमा रुलियो श्रती ॥१६॥ अधम काममां हर्ष में धर्यो, धर्म ध्यान में अमरषे भर्यो। दुर्गुणे रच्यो मोहमां मच्यो, अरर कर्मना नृत्यमा रच्यो ॥१७॥ छल विधा करी कर्थ संचिया, छुटण विदणा लोक पंछिया। पतीत रांकने चेतर्या बहू, अरर पाप है केटला कहूं ॥ १८ ॥ शरीर शोधतो में नवी कर्यो, जड़ प्रसंग थी योनि में फर्यो। शुध विचार तो चित ना चट्यो, मिथ्या शल्य तो मुज ने नड्यो । ॥ १६॥ करम वैरिये बीटियो मने, कर ग्रही कर श्ररजी जीनने । कर ग्रहो प्रभु रांक जानने, दिल दया धरो म्हेर अानने ॥२०॥ तकसिरों घणी को सके गणी, यगस तो गुन्हों जगतनां धणी । रीझ (२१२) करीत तोहि पारने, सास फ्लमो कोशिवास मे ॥२॥ ननुमा मही चन्द्रमा प्रही, चातुर्मास में पपरेसी । बक्षित पपभी मोड़ पे कही पठिष प्रामिप पधिर्म साही ॥ २२ ॥ इति १४. श्री पद्मावती बायोपना। 14-सी दिये गपी परमावती जीपराशि जमा । आमपर्ण मग दोहरी इमला माप-ते मुज मि हामि गुणा ॥१॥ मप ममतापगै अपिल्सनी मान । में जीम विगधिया चोगसीना से मुम ॥ ॥ पास लाल पुष्पी तपा, सातेमप- कापा मान बानताकायना माते बक्षीमायाले मुम ॥३॥पशबात प्रत्येक पमस्पती चौरा सापाला । हरिद्वयादिक बीपमालाव मिबार insthतियच मारपीबार सान प्रकाश। और लाम मनुम्पनी बार साल

( २१३ )
चोरासी ॥ ते०॥शा इह भव परभव सेविया, जेमें
पाप अठार । त्रिविध विविध परहरूँ दुरगति
दातार ॥ ते०॥६॥ हिंसा कीधी जीवनी बोल्या
मृपावाद । दोष अदत्ता दाननां, मैथुन उनमाद ।।
ते० ॥ ७ ॥ परिग्रह मेल्यो कारमो, कीघो क्रोध
विशेष । मान माया लोभ में कर्या वली रागने द्वेष
। ते० ॥ ८॥ क्लेश करी जीव
दुहव्या
दीधा
कूडा
कलंक । निन्दा कीधी पारकी रति श्ररति निशंक
॥ ते॥६॥ चाडी कीधी खाधी चोंमरे कीधो था-
पण मोषो कुगुरु कुदेव कुधर्मनो भलो प्राण्यो
भरोसो ॥ते॥१०॥ खाटकीनां भव में किया कीनी
जीवनी घात । चीड़ी मार भव चरकला मार्या दिन
ने रात ते॥११॥ मच्छि मारभव माछला झाल्या
जल वास । धीवर मील कोली भवे मृग पाडिया
पास ॥ ते० ॥१२।। काजी मुल्ला ने भवे, पदया मंत्र
कठोर । जीव अनेक जिमे फर्या कीधा पाप अघोर
॥ते॥१३॥ कोटचाले भव में किया, आकरा करने
दण्ड । वन्धीवान मराविया कोरडा छंडी दंड ।ते.

(२१) परमापामी मां मोदीपा मेरिपामे दुख परम मेवन वेदना तारन प्रतितीमा ते॥१४॥ जमारमा भव में किया प्रवा निवारकाया तेकी मोतिल पीधिया पाप पिट मण्पाते हरसी मब लोहिया फोम्पा पृथ्वीना पैर। सूर मिबस कीभाधा दीपा बसपचपेट ।। २.१on मानीमा मब रोपिया नाना विपिप समूत पत्र फस फूलना साया पाप प्रताप ॥ते. प्रधापाईपानी म मरिमो अधिको मार । पोमै ऊँट की पम्पा जासी पान लिगार है। ।। श्रीपाना मोता कीता रंग पास । पनि प्रारंभ की पसा भातुबाई पम्पास ते. २ ॥ सपणे रस मुमतो माो मातुभ्यम। मर मांस भासत मक्या जागा मन मे काय ते. ॥२॥नाप बयाई भानुभी अपग पारिओम्पा भारंभ बीपी प्रति पहा पोते पापम सिध्या मे•॥ २२ ॥ रामकर्म कीपावली भमरीमा। मूमनाई बीनगगनी का भोपाटीपा ।।हे.

( २१५ )
॥२३॥ विदल्ली भव उंदरगल्या, गरोली हत्यारी।
मूद मूरख तणे भवे, जूं लीख मै मारी ॥ते॥२४॥
मह जा तणे भवे, मार्या एकेंद्री जीव । ज्वार
चणा गेऊँ सेकिया, पाडता रीव ॥ ते० ॥ २५ ॥
खांडण पीसण गारीनो, श्रारंभ कीधों अनेक ।
रांधण पीसण अग्निनां, पापलाग्या विशेक ॥ ते०
॥२६॥ विकथा चार कीधी चली सेव्या पञ्च प्रमाद।
इष्ट वियोग पडाविया, रोदन विषवाद ॥ते०॥२७॥
साधूने श्रावक तणा, व्रत लेइने भांग्या। मूल ने
उत्तर तणा मुज दूषण लागा ॥ ते० ॥ २८ ॥ सांप
विछी सिंह चीतरा, सकराने समली। हिंसक
जीव तणे भवे, हिंसा कीधी सवली ॥ ते० ॥२६॥
खूवावड दूषण धणां, काचा गर्भ गलाव्या। जे
पानी ढोल्या घणां शील व्रत भंगाव्या ॥ ते०॥३०॥
घोबीनां भवे जे कर्या, जल जीव
सुकाया। धूल
करी जल रेलिया, दान देतां निवार्या । ते॥३२॥
लुवारना जे भव कर्या, घड्या शस्त्र अपार कोस
कुदाला ने पावड़ा, धग २ ती तलवार ॥ ते०॥३२॥

(२११)
गूसरमा भर में कर्या सीता मारा कटाया। पारी
मेमेसा मेखिया, पारे उठी ज्वाहा।
पोरना मपर्ण कृपा पाप मोराया। सरो
वर में गलाविया शिकापाया।
पाधिपायो मबर्ग हा मेख निमाया ।
भोपो रेय प्रधिको शिपोला माप रखापा ।
ते..राधीमो भव बेहड़ी पिर
मिया । पंथी माता धिपा पापे पटा मरिया।
तरी कोठी पावती मिजमोरीपा।
राईलाई शसवे पोते पापयसिप्पा २७॥
अपमन भोपस मेखिया भए एंने पूसे। भार
माप्पा कर प्रारिपा है पाप किम भूले।
३८॥ मा भनेक ममता थको कीषा कम्प
सबंध । विविध २ पोसरी, पोयं प्रतिबंध ते.
रामब प्रमेक ममता परीकीपोरेसनंप।
पिपिपपोसह तेनो प्रतिबंध।...
भप प्रमेक ममता पानिपो परिवार सम
निविप २ पोसतेनो प्रतिबंध

( २१७ ) . इन परे इह परभवे कीधा पाप अखत्र । त्रिविध २ वोसरू, करूं जन्म पवित्र ॥ ते० ॥४२॥ स्वाती ना भव मैं किया, लीला रूख कटाया । छोटा ने पति मोटको, पोते पाप कमाया ॥ ते०॥४३॥ ब्राह्मण रे भव मैं किया, कीधा अणगल स्नान । जोतिष निमित्त भाखतां, लिया वज्र दान ॥ ते० ॥४४॥ बजाजनां भव मैं किया जूना नवि करि बेच्या । कूड़ कपट केलव्या घणा पोते पापज संच्या ॥ते. ॥४५॥ परनारी मैं मोगवी वेश्या ने विधवा । चोरी जारी में करी वोल्या मरम में मोषा ॥ ते०॥४६॥ पुरुष पराया सेषिया घरका ने वली दूजा। कीतोल हांसी ने मस्करी दीधा मरम ने मोषा ॥ ते०॥४७॥ श्रण छाण्यां श्रादण दिया अण पूंजे चुल्हा । अण सोध्या धान श्रोरिया ते किम जाय भूला ॥ ते०॥ Haru जोर करी हिंडे हिंचताभांगी तरुवर डाल । काचा फल फूल चूंटियां फोड़ी सरवर पाल ॥ ते. ॥४॥ भोपा भरडाने भवे कणहता नचाया। चकरा भैसा मुरगावली विना दोष लगाया। ते.

(२१)
१५० म्हापण पोषण में किया बेरा बापा मराया।
भारी से मुख मोपता पदोप लगाया।
सल्या पाम तापिया इमीपन मसलामा । भने-
रिया मीर तमेरिण मसती पाप माया । ते..
५२ ॥ दामी वेश्याने भरे चोरी मारी माई मातों
ही जिप्तम सेपिपा काली कमाई...
असुर मगे में उपमो मुरगी गाय मराई। पंथी
पिंजरे पाटिया करुया नहीं साईIN
बिखम होका बीड़ी पीपी तिरेपा माली।
जीप पास पलिया पवा दोसी परमवारी
मेर मवानी मामिपा माग्न जुमान।
माठ मर में दकारी दिपा रमादाम ते
॥ माती माझा वेसिया भर परसापा।
धनिया पान साबिया पाये पेट भयपाते।
५७ मेक्षपारीरा भर में किया सीधा असमता
माहार। स्मिा में धर्म पतापियो भाई पान
सिगार ०५८ । स्त्री और कहा सापा
अमवीचार रवी पुषीधीमही पनियाबरक

( २१६)
मभार ॥ ते० ॥ ५६ ॥ निंदा कीधी साधुनी, शुद्ध
साधु सताया। कुगुरां संग लागने बहुला दोष
लगाया ॥ ते०॥ ६० ॥ रेरे कर्म कीधा घणा, पाप
कीघा अपार। ये पाप उदय में श्राविया, पीछे
किणरो श्राधार ॥ ते० ॥६|| अरिहन्त सिद्ध साधु
नो, मुज शरणो हजो । भगवन्त सुमरण कीजिये,
सूरज सामो जो जो ॥ ते०॥६२॥ समष्टि जीव
सरदसी, सुणता समता भावे । भारी कर्मी जीवड़ा
सुणता दुस्ख पावे ॥ते०॥६३|| हिवेराणी पद्मावती,
लीधा शरणा चार । सागारी अणसण कर्यो,
जाणपणानो सार ॥ ते०॥ ६४ ॥ राग राडी जे
सुने, यह तीजी ढाल । समय सुन्दर कहे पाप से,
छूटुं ततकाल ॥ ते
मुज०॥६॥
।
१४१. प्रभाती जिन स्तुति ।
जयजिनंद जयजिनंद जयजिनंद देवा ॥रेर ।
विमल चरण विधन हरण गुण समुद्र जेवा ॥१॥

( २२.) मपन कोरिअमर पास इन्द्र करत सेवा । सीम सोकमाई पर रेष महीं एषा ||२|| मात सात प्रात ही महर के करेगा। पीतगण देव पी ए बा । ॥३॥ मात ग्ठ करो प्रमु माम का कलेगा। क्रिसमलाल परमदेव नमो मित्य मेवा ।। म..। १४२ अपम स्तुति। नर्व-ममे मखिम्मीनी । भारभार अधिनाशी दो मुगतीरा पासी सां मसा कोई मेपकली भरपास । मपयन पार तारो भवपारो भाजीपाला कई मापो प्रविषम वास मा.महदेवीरामपपो जगमबम सम्बन शीलरा कोई विथन मिलन रेष। मनमामी गुरुपामी हो शिवगामी सामी माप कोई मुरलर सारे सेवामा पीनराग

(२२१ )
मन रंजण हो दुख भंजन गंजन कामने काई देवन
दुजो कोय । किसन करे कर जोड़ी हो शिरमोड़ी
सायव वन्दना कई शिवसुख दीजो मोय ॥प्रा०३।।
१४३. अरिहन्त स्तुति ।
तर्ज-धीरा चाली ही विरज का वाती।
नमुं २ देव शरिहन्ता, प्रभु शिव रमणी के
कन्ताजी टेर। धन घाति करम सब हन्ता । सब
जानत केवल वन्ताजी ॥ नमुं० ॥१॥ जे चौतिश
अतिशय । सोहंता प्रभु तीन भवन में महंताजी ।।
नमुं०॥२॥ एक जोजन वाणी वापरंता । चारों
तीरथ स्थापन करंताजी ॥ नमुं० ॥३॥ तिलोकरिख
तन मन से नमंता । सेवा दीजो सदाई भगवन्ता
जी ॥ नमुं० ॥४॥ इति

( २२.) मपम कोटिममर पास रद करत सेवा। सीम लोकमाई पर देवमहीं एपा ॥२॥ मात सात भात वहीं मार परेवा । वीतराग रेप वही कर के रेवा ।.३० प्रात उद करो प्रभु माम का हवा। किसनवास परम पममो मिस्प मेवा ।।। १४२. अपम स्तुति । गर्म-मारे परिवा। मारपार भविनाशी भुगीरा बासी सां मलो कई सेषकमी भयास । मनमा पार सतारोरो अबधारी भाजीपाला कई मापो अविसबासमा मरबीरा बनो जगपम्पम सदन ग्रोसरा कोई पिप निकलन देष। ममनामी गुवधामी रो सिवमामी सामी मापरा कोई सुरमर सारे सेवामा रावीतराग

( २२३ )
गच्छ भार धुरंधर धीजे, वरवाणी पीयूए पीजे रे
॥ नि०॥३॥ कहे 'सूर्य' चरण परसीजे, गुनगान
किया श्रय छीजेरे ॥ नि० ॥el
१४६. उपाध्याय स्तुति ।
गर्ज-उपरोक।
बंदू चरण युगल उवझाया, जारा दर्शन से
सुख पाया हो ।टेर।। गुण पचीस अलंकृत भाया,
शुचि गंग तरग सुहाया हो ॥ वं०॥१॥ श्रुत केवली
विरुध धराया, भवि मिथ्या वमन कराया हो ।
वं० ॥ २॥ वरवाचक थविर कहाया, कुत्तियावरण
ओपम ठाया हो ॥०॥३॥ दिगताने साज दिराया
मुनि विन परमाद रहाया हो ॥ वं० ॥ ४ ॥ तिटुं
श्रागम भणे भणाया, 'मुनि सूर्य' जिन्हें शिरनाया
हो॥०॥५॥

( २२२)
१४४ सिट स्तुति।
नम् २ मिस मगबम्सा मप ममप दरोगप-
पम्ताजी परेरा गुणदर्शन पान अनंता मम परम
लर प्ररिहन्ताजीम.१०कर जाम मरप सब
दवा मये अब सिर मईवासी २॥ आरि
पसरणी गुख राजंता लदे शिवमुख बाप अर्पता
जी म॥३॥ मुनि सूर्य सिर प्रवर्मता, मित सुमरे
शिषपुर कम्तासी मति
१५. प्राचार्य स्तुति।
निवनप्राचारर वीई मषियीपन का
सौगरे ॥रेर ॥ माझा गुपचीसों सीजे पनि
भोपमा सुरतरीशनिसबर संपदा पाठ
बबीजेपरसपना बाकीचेरेमि० ॥२॥

(२२५ ) देवी सुनन्द नरिंदा,हुए श्रादी करन मुनिंदा हो ॥ नि० ॥२॥ जस-सेवे पद अरविंदा नित नरगण देव फणिंदा हो नि०॥३॥ 'मुनि सूर्य' ऋषभजिन वन्दा, टले विधन सभी छल छंदा होनि ॥४॥ १४६. समता। समता रसका प्यालारे, पीवे सोही जाने स० टेर॥ थाफ चड़ी कबहु नवि उतरे तीन भुवन सुख मानेरे । पी० ॥१॥ इन सम और नहीं रस जग में इम कहें वेद पुराने रे ॥ पी० ॥२॥ सकल किलेश टले इक पल में जो समता घट आनेरे । पी०॥३॥ चोर चिलायती समता धरीने पायो श्रमर विमाने रे। पी०॥४॥ रतनचन्द समता रस प्रकट्या पावे केवल ज्ञानेरे। पी० ॥शा (२९४) १४७ साघु स्तुति। सा पर पंचम भुमि गुपधारी पारी शान सदा मनकारी टेरानपब्स्पे उपविहारी सम कांचन लोर पिचारी दोरे सपबांधा परिधारी सवार सहित प्रमचारी हो। १.२॥ मममम सतरा पिसारी पंचाभरपूर मिवारीही । प• मुनि अंगम तीर्य उपधारी, पय भ्रमर गोचरी भारी हो ॥ IN गुण साविस मेशरी 'मुनि सूर्य'रेमिहारो। प. १४८. सपम स्तुति। मित मामि भन्दा अग तार सप जिन बन्दाको रेरा ममि तारपरित खा पसोपो विम धर्म जिनाम-

(२५)
देवी मुनन्द नरिंदा,एप अादी करन मुनिंदा हो
|| नि० ॥२॥ जल सेवे पद अरविंदा नित नरगण
देव फणिंटा हो नि०॥३॥ 'मुनि सूर्य ऋपभजिन
चन्दा. टले विधन सभी छल छंदा हो नि० ॥४॥
१४६. समता।
समता रसफा प्यालारे, पीवे सोही जाने स०
घटेर। थाक चड़ी कवटु नवि उतरे तीन भुवन सुख
मानेरे। पी० ॥१॥ इन सम और नहीं रस जग में
इम कहें वेट पुराने रे ॥ पी० ॥२॥ सकल किलेश
टले इक पल में जो समता घट आनेरेपी०॥३॥
चोर चिलायती समता धरीने पायो अमर विमाने
रे॥पी०॥४॥ रतनचन्द समता रस प्रकट्या पावे
केवल मानेरे॥ पी० ॥१॥

(२२६) १५. भी शान्निनाथ स्तुति । बगर हो पनि सारे । शोति सिमेभ्यर साहिबारे शांति तथा दावार अम्वरजामी मम वसोरेमातमनो भापार।। बिमभर सुस मोरी भरवास : टेर ॥ पित पाहे ममुगाकरे मम पाहे मिक्षमा कासमपन चाहे पम निरसपारे परएन दो मिनरास: जि.॥२॥ पलकम विमई माममेर जिम मोरो मम मह। एफसलो किम राभिरे पल कपरमो मेहजि. - ३ भाग करे ईमापारे मवि भूफीमे नि गस । सेपक भासी साहिबारे रीज तास दिलास मजि-दायक मेवी रेसिव मपि मागे मार । कान मरे मित्ररासमोरे ए मोसो उपकार जिथ पहवो जापी जग पत्तीरे परजो विक में प्यार | पोतानो जादी करे मोहम मप अप- कार । जिति (२२७ ) १५१. प्रभु प्रार्थना। तज-देश। मारी नाद तमारे हाथे हरि संभालजोरे। प्यारा पोतानो जाणीने प्रभुपद पालजोरे ॥ टेर ।। पथ्यापथ्य नथी समजातूं, दुख सदैव रहे उम- रातूं । मने हशे शुं थातुं, नाथ निहालजोरे ॥ मा० ॥९॥ अनादि वैद्य श्रापछो सांचा कोई उपाय विपे नहिं काचा । दिवस रह्या छे रांचा, वेलावालजोरे ॥ मा०॥२॥ विश्वेश्वर शुं हजी विसारो, चाजी हाथ छता का हारो। महा मुभारो मारो, नटवर टालजोरे ॥ मा० ॥ ३॥ केशव हरि मारूंशु थासे, घाण चाल्यो | गढ़ घेरा से । लाज तमारी जासे, भूधर भालजोरे ॥ मारी०॥४॥ १५२. जिनेश प्रार्थना। शी कहूं कथनी मारी नाथ, शी कह. हवे शरण दई ल्यो तारी नाथ ॥ टेर ॥ दश दृष्टान्ते (२२८) धुर्सम मय पर पुपप पी पाम्यो। भवनी भूमवपीमा भूपो विषय पकी नपिराम्पोमा. सी-मार्य मम्मिने उत्तम कुसा अन्म पर्या गुम पोगे। साम्प न पाप्यू मा पणामी, अमित भयो र भोगे ।मा• शीरा तन पढता गुर संग मस्पो पन दूर प्रमारन कीपो। इन्द्रिय मुखमा बामपनीने सम्मारग में सीमोना-धी०१ भ्रमण मोगे साधीमे दिन दिन पापातों मिर- पारी। परवी करता या कम्पे मर्म में न निवारी मा.पी.सत्सापन समास थपा पर मधु मिखुर्मा भटक्यो। प्राजकासकरीसमय गुमायो सोभे भयो।माशी-1 सात बात मम ममसरनी पकात पारममावे। मम्सर बल भापो अधिमानी तो सेवक मुरपाय .मा.शी.

( २२६ ) १५३. पूर्णानंदधन प्रभु । राग धन्या श्री। प्रभु मेरे ? तु सब वाते पूरा। परकी प्राश कहा करे प्रीतम? ये किण वाते अधूरा ॥ टेर ।। परवस बसत लहत परतख दुख सब ही वासे सनूरा। निज घर श्राप संभार संपदा मत मन होय सनूरा ॥प्र०॥१॥ परसंग त्याग लाग निजरंगे मानन्द वेली अंकूरा। निज अनुभव रस लागे मीठा ज्यों घेवर में छूरा ।। प्र० ॥२॥ अपने ख्याल पलक में खेले करे शत्रु का चूरा । सहजानन्द अचल सुख पावे धूरे जग जस नूरा ।। प्र० ॥३॥ - १५४. पंच परमेष्ठी लावणी। अष्टपदी। जपो नवकार मंत्र शाता, स्वर्ग अपवर्ग सौख्य दाता ॥ टेर ॥ भीत रुज तन में नहीं आता, रिपु को करन सके धाता ॥ दोहा-कोर केवली गुण

(२३.)
करे तो पिर माथे पार। महा प्रमाधिक मा
परमेष्ठी अपाय २पर । मिटावेजबम मरण
खाता । प्रथम परिवरमामे दोष
मही भादरा गामे । मखित गुप शायद पामे
गिरा गुण परावीसेतामे दोस-सपन योय होड़
केपनी रतय मब मान । कम पातिया बेद
सपाई पापा यस बाम विरोमा बोसा गुण
गाता ।।२। नमो पर भी मिसरा बान
पर्यन कर ससुश। फर्म बम
(पिपसम
सीपा
भा भव भरणपका कीया। दाम्प प्राय
माही एकमाष प्रापोबारा ज्योति स्पमि
कर्मक मिरेसम प्रधिमाशी प्रधिकार। पाम र
गोगदर पाता राममो पर मामारावीचे
सम्पदा अप वरीमे। क्वीसौ गुण मिरपा
सीजे भोपमा सुरवरुपी दी। बोह-रिसमान
पर संप में गीतारप गुरपाम। पपित योग
अपावित पासे धर्म ग्राम मिपाम । सुपथपर
मोह माहि माता राममो पर बोये -

( २३१) ज्झाया, विमल गुण पणवीसे भाया । भारती वके वास ठाया मिथ्या दरशन सल श्रघ ढाया दोहा- भणे भणावे सूत्र सव चरण करणरा धार । डिगता प्राणी धर्म से घिरकर राखण हार । भविक ने बोध वीज दाता ॥ ज०॥५॥ नमो पद पंचम उप- कारी, साधु गुण सप्तविंस धारी । अमल चित स्वच्छ गगवारी, तपोधन घोर ब्रह्मचारी ॥ दोहा- नमो शान दर्शन भणी तप चारित्र उदार । अड सिघ नवनिध मंगल माला पग २ मिले अपार । विघन घन मेटन को वाता॥ ज० ॥६॥ भणे जो भव्य शुद्ध भावे, थोक तस मन वंचित थावे । अचिंती कमला घर आवे, लावणी किशनलाल गावे ॥ दोहा-सार चतुर्दश पूर्ष को मंत्र बड़ो नव- कार । सय मंगल में धूर यह सकल पाप क्षयकार। सिवरतां वरते सुख साता ॥ ज०॥७॥ इति

( २१२)
१५५. गुरुदेव सापन।
पोहा माये ।
सा गुरुदेव दमारारे मीम मोरपि तारण
हारा । कमकामनी बोड़ा सा बम से
पापरे । र यस कविरिया में गगी जान
प्रसार सरिम पागी हाम्को मिकस्पा
पड़ मागी विविध २ माग दिया निम पार
मठागरे भूमरमनिपरे मापायु
विम प्रतिबनभर साप मापा मुडे
अस्पे पर परमपम परीपाजते सारे
Ioपरविम पदी परमका पारी परिमा
ममता मिवारी भविष वारसहित प्रभारी
मगिमी अमिता-पुषी समाव करी सर पारारे।
• संगम सहरा मेरे प्ररामै समातर
परमादम सापे सदा मुगति को मारग पाये
पार पोषम बम रम सम एव पमपारा।
• महम्मत निर्मल पा पानीको

(२३३ ) जीतण वाले चार कषाय किया पेमाले, भाव करन सत्य योग मनो वच तन सम धारारे ॥ १० ॥५॥ संपन नाण दरश चारित्रे, क्षमावन्त वैराग्य पवित्रे कष्ट सहे मरणान्त विचित्रे, वेदनि श्राया समो श्रयासे धन अनगारारे ॥ १० ॥६॥ धरम देव दिनकर जिम गाजे, चतुर संघ में धन जिम गाजे दर्शन दीठां सब दुख भाजे, किशनलाल कहे ऐसा मुनि मम प्राण पियारारे ॥ इ० ॥७॥ इति . १५६. वीर प्रार्थना। सर्ज-काली कमली वाले तुम पर लाखों सलाम । जगपति जगदाधार, सुनलो धीर जिनंद। जिन शासन सिरदार, सुनलो वीर जिनंद ॥ टेर ॥ छठी मूर्ख कपटी व्यमिचारी, किये पाप मै भारीर अगणित अवगुणों का श्रागारी कीजे बेड़ा पार सुन० ज० ॥१॥ झूठे पक्षपात में पड़के, किये सच्चे को झूठा लड़के । हुआ अन्ध निज ऐंट पकड़ के ऐसा में मतवार ॥ सु० ज०॥२॥ तेरा

(२४)
माम परा के मझा मर्म अमर्म में किया मठा।
कोसल सो उस पर पता कैसे रो रबार मु.
सभपनी पया कथा में मारी होम पधा
ग्य जिम्दाहारी । कैसे सकस विस्तारी तारो
तारन हर मुशि पतित पापी मपम चोर
में पाकिर मेरी भोर में । मालगुनीसो पि
प्यार गसोर में सर्प विषप अषमार मु.
१५० पबदा स्वप्न ।
म्हें मुपमा रेम्पो मरजी सुम मागे म्दाय
माहिया पर दीठो मयम गर ममतो मरे पूजे
उपम गुरुपा । वीजे सिंह समासो सरे खोया
देव महंत हो ॥ पुगम माला फल पौष
में बह गयी कम्त । रमिगता सातमो
प्रापमा पर्नगो।मे।इम्म प्राय

( २३५ ) रतना जज्योसरे, दसमें पदम तलाव । रतना- गर इग्यारमोसरे, बारमो देव विमान हो । म्हें. ॥ ३ ॥ रतना रापी तेरमी सरे, चवदमें अगन प्रचण्ड । सिद्धारथ पूछा करेसरे, पूछे श्रीपति पण्ड हो ॥ म्हें० ॥४॥ १५८. भजन उपदेशी। तर्ज-ल्याल में। तुम माल खरीदो त्रिशलानन्दन की खुली दुकानजी ॥ टेर ॥ शास्त्र रूप भरी बहु पेट्यां मुनि- वर बने बजाजी। वजह वजह का माल देखलो कर अपना मन राजी ॥ तुम० ॥१॥ जिनवाणी को गज हैं सांचो जरा फर्क मत जाण । माप माप देवे सतगुरुजी मतकर खींचा तानजी ॥ तु० ॥२॥ जीव दया की मल २ भारी शुध मन मिसरू लीजे। डबल मीण समता तणोसरे चाहे सो कह दीजे जी॥तु० ॥३॥ समता को यंदागल भारी साड़ी ले सन्तोष। ऐसा कर व्यापार जिन्हों से चेतन

पावे मोलजी •I४ी होय मा सोदा
वेपो मही मग का काम । मम पावतो मोस
जापो में नहीं मांगा पामजी •॥५॥ माल
विथोड़ो सिमसे बर्षपूरी नहीं थाले । प्रा
मेगा कोईरचम मापी माम मारे पीजी।
ru मास विकतो हो होप्सी पुनमो मचिमत
बात । भर्वा समाना कविषम सूरे सतगुरु सिर
पर दायनी । तु.॥७॥ गुपीसे बचीमसरे
अम्बाला भीमासा कर मुनि परेण सुनायो
मोचनाबक्ष माजी।।
५६ परम्त्री चिपे काबपी।
पतुर परभारी मत बिरसो २मावरीऐ
अन्री पिशवी को भापोर॥राबव मोरो
गप का सागरको। पाप बरी परक
पईपी पुखपाणे प्रधिको। .. पातकी

( २३७ ) खड को राय पद्भोत्तर, द्रौपदी ने हरतो । कृष्ण नरेश्वर करी खुवारी पुण्य हुयो हलको ॥ च०॥२॥ कीचक राय महा दुख पायो, भीम सुं अधिको। नारी द्रौपदी नेह विचारी, भव २ में भटन्यो । च०॥३॥ परनारी को रग पतंग है, पोढल को झलको । औस वूद जब लगे तावड़ो, ढलक जाय दलको । चा४॥ परनारी से स्नेह किया से, धन जावे घर को । दूजा देखने करे खुवारी, भव धन क्यों भटको॥ च०॥५॥ १६० भाव मुनि वंदना । राग विमास । जूझोरे ! जूमोरे जैनों ! केवा प्रतधारी, केवा प्रतधारी । तेने वन्दना हमारी । जूओरे ! जूओरे जैनो० ॥ टेर ॥ जूओ २ जम्वु स्ववामी, यालावये योघ पामी, तजी राज्य ऋद्धि जेने तजी शाठ नारी, तजी आठ० वन्दना० जू०॥१॥ गज सुक-

(२८)
मास मुनी, पग शिर पर पूनी माग रहा ते
प्यामे । हिग्या म निगारी, तमे पम्पमा भूरा
फोरपामो मंदिर मच रखा मुमि स्पूसि भद्र,
पश्या संग पासता पे चपाम पिकासी पपा
न सिफारी मे यश्ना. ... मती तो
गजुस जेपी मंगो र झोड़ी पेपी पतिव्रत
मारे कम्पा दी ए भारी पी ए कपारी
भने यम्पना० जू० जना सुता सीता परप
नो गरे पीता भगवाव तो ए डिम्या म
सिगारी डिग्पा म क्षिगारी ने पमना ।
मती कलापती नामे पपा मेखपुर गामे कर
निजकाम्या तारपा रेभारी रमाकपारीतेने
पदमा•जू• दुखड़ा
तोरीपादेचे सहा पतो
फ्राम रेचे पण दुसर्यु नोप मिग्याम सिगारी
दिग्पा लिगारी तेमे पदमा• पूजामन्पर
- नगमारी एकाएक भारी जीवित सुपाएं
उप पाम्पा ममपारी पाम्या मपारी मेना.
सुमारे ३०

(२३६)
१६१. भजन उपदेशी।
बांधोमती कर्मचीकरणा भुगतोगा पापो श्राप,
भवियण ॥टेर। पहिला तो जोवन घिर नहीं, दूजो
श्रथिर संसार, भ० । तीजोधन छे कारमो, चोथो
तन नहीं लार, भ० यां० ॥१॥ एकतोअरवी उजाद
में, दूजो विषमी ठौर, भ० । मुनिवर मारग जावतां,
विच में मिलिया चोर, भ० वां० ॥२॥ तन वस्तर
लेता थकां, ऋपिजी कीधो ध्यान, भ० । चोर कहें
कारण कीस्यों, मुनि कहें सुण धर कान, भ० वां०
॥ ३ ॥ तूं बांधे कर्म एकलो, नावे सघलो साथ,
म० । पातिवार कुण राह में, तूतो पूछेनी घर में
वात, भ० वां० ॥४॥ चोर पूछे घर पायने हं बांधू
पापनो पूर, भ० । कुण २ सामिल रहयो थे सांच
फहो तज कूड़, भ० वां० ॥ ५॥ खावण सीर सर
हमें पापनां सीर न कोय, भ० । जो फरसी सो

पापसी पोर मेरे मनि पोय म.toपोर
मायो मुनिवर बने मतो दिपो मुमनाम मा ।
राम करेंसर सामरोसमोन म्णम्यान म.
वो.
११२.अपम मिन पारणा ।
में।
मारी रस सेगसी भादि मिनेसर कियो पा-
रखो गरेरा) पड़ा पसी भाठ सेसी रस मरिया
मीका दान दिपो मेयांश कपरती मारमा
प्रमुबाजी मा.१॥ बजादे हामी सरे
मोया की परखा।किपणे पारको प्राविजिगर
मेरी भूत मे तिरबासीमा परिसिमि
मनो काममा पर पर मंगलवार। पुमिपा वरप
पपाषता मारिमामा तीज स्पीदारीमा ।
साह कादो पिपतपिशारो रोहमारी साम।
बानूराम परगोड़ी शताप्रपमरेष महारामती
मा.u

( २४१ )
१६३. सकुटुम्ब मुनि।
सज-भैरवी।
मुनि को कहिये गृहवासी, जांके भाव कुटुम्ब
गुणरासी हो ॥टेर॥ धीरज तात क्षमा जस जननी
दादी जान दयासी हो ॥ मु० ॥ १ ॥ चारित चाचो
भाव भतीजो काका शुभ किरियासी हो ॥ मु०॥२॥
उद्यम दास विवेक सहोदर वुद्धि कलत्र विभासी
हो ॥ मु० ॥ ३॥ शान सुपुत्र परमारथ पोतो तत्व
रुची वरमासी हो । मु०॥४॥ दान सुदादो मार्दव
मामो पुत्र-वधू समतासी हो ॥ मु० ॥ ५॥ आगम
सुसरो सासू सुमती भावना श्रेष्ठ भुवासी हो ।मु०
॥६॥ संजम सालो वहिन चेतना संघ लगो सुवि-
लासी हो ॥ मु० ॥ ७ ॥ अमर कुटुम्ब किशन ढिग
जिनके ते मुनि शिवपद पासी हो ॥ मु० ॥८॥

(२)
१६४ काया का पद।
4-साएर पीले व बोले ।
कामा पिड काचो राम कामो मत भूस
इसी में राषो कार परत बार न मागे
पस सिम मारकासको माचो। मोरस मतक
सपम कैमोपस किम कर राम्पो सांचोका.
.१ मकड़ीयास दिवाव रेतकी सिम यसबीच
पतासो। पाता गमि होम पट में पर पिष
पदो तमामो मल भूम पर पुगेप की
पारी पुसदापामसभांचो। सुन्दर पदन सोहे
राशि मोपम मुठ मा मत बचिो का ।।।
इनमें रता साहिब उत्तम भी मिमपर में जायो।
मोरासी जीव मोन में मावा या मवमानो।
काou

(२४३) १६५. परस्त्री विषे। नज-होली। 1 हो मत ताको नार विरानी, यातो नरक तणी निसियाणी ॥ टेर || परनारी छे काली नागण के विष बेल समानी। तेज पराक्रम पीलण काजे यह घर मण्डि धाणी । गुण गण वालण छाणी ॥ हो. ॥१॥ रावण राय त्रिखण्ड को नायक सीत हरी घर श्राणी। राम चड्या दल वादल लेकर मार्यों शारगपाणी ॥ कथा श्रागम में प्राणी ॥ हो० ॥२॥ पद्मोतर निज लाज गमाई कीचक नीच लहाणी । मणिरथ मूरो मेण रहा वस अपजस लह्यो अ- शानी ॥ जगमांही प्रकट कहाणी ॥ हो० ॥३॥ गौ ब्राह्मण ने बाल हत्या रिप नार हत्या पलि जाणी। तिण थी पाप अधिक पिण लागे भाख्यो केवल नाणी ॥ के अनंत दुखारी खानी ॥ हो०॥४॥ रतन जतन कर शील अराधो छांडो कुमत पुरानी। मुगत महिलनी सहल अचल सुन, मुगत रमण

(४)
मिसापी। यों वीर जिमए पानी हो।
पठाण विपासी महामदिर में छिपाकपा म
पचासी। शीविला सासम्म प्रकारप पा
पमा क्या राणी ॥ शिपल जप्स तम प्रासी।
१६६ चेतन और कर्म ।
तम ! जो पान अम्पाप्ती । भापती पौधे
भापही बोदे मित्रमसि शक्ति विसी र जो
माप समाये ऐसे भाशा छोड़ पासी। मुर
पर किपर माय संपति ता तुम परफी रासी ।
•॥१मोह चोर सब गुण पाटेरा माश
पलामी । माण की उदास रहेको सो उत्तम
मम्मामी.शमोग सई पर मय परत
पा ही जग में सी। गाने में गुण को संम्
गुणनामा मामीलहीरभाय पण

( २४५) सो तो सवही विनासी । तूं तो भिन्न रूप हैं उनते चिदानन्द अविनासी ॥ चे॥४॥ धन खरचे नर बहुत गुमाने करवत लेवे कासी । तो भी दुख को अन्त न श्रावे जो श्राशा नहिं घासी ॥ चे०॥५॥ सुख जल विषम विपय मृग तृष्णा होत मूढमति प्यासी । विभ्रम भूमि लई पर श्राशी तूं तो सहज विलासी ॥०॥६॥ यांको पिता मोह दुख भ्राता होत विपय रति मासी । भव सुत भरता अविरत प्राणी मिथ्यामति ये सासी ॥०॥७॥ आशा छोड़ रहे जो जोगी सो होवे शिववासी । उनको सुजस बनाने शाता अन्तर दृष्टि प्रकाशी॥ चे०॥८॥ १६७. आध्यात्मिक पद । थाशावरी। कबे निग्रंथ स्वरूप धरूँगा, तप करके मुगत चरुंगा॥टेर ॥ कव ग्रहवास श्राश सब छांडी कद वन में विचरुंगा। वाह्य अभ्यंतर त्याग परिग्रह

(२१)
उमप लिंग सुपरगा।०९ोप एकाएकी
परम उदासी पंचासारवर्षगा। कप पिर गोग
करी पमासम इन्द्रिय बमम करूंगा..IRH
भावम प्यान सीपस अपनो मोद परिसुसरंपा।
स्पापी उपाधि समाधि लगाकर परिपा साम
गा॥॥ गुण हान भेणिपे पर
कर्म फल अरूगा । मानन्द कब विराम
सादिक दिन सुमरे सुमगा। ऐसी
सम्पि पाबे में प्रापहि पाप तरंगा । अमुक्षिक
मतदीयच करत है बारी मां उप में पगा
१६८. मजन उपवेशी।
क्यों भूयो पेतन माम मोदनी पाण में रेप
निर्मल म्परिक मम मातम गम्बत समस
माव पिकास में । निम्पमा से मिधरो रायो
माद निगम में स्पों ॥१. मोदमदिप पस
माप्पादित फम्मो नम की भाश में। सूप

( २४७ ) तृपणा वश फिरे भटकता इत उत कर विश्वास में ॥ क्यों० ॥२॥ एकादश श्रेणी से चढ़ के पड़े प्रथम गुणरास में। तस्कर विकट मोह अटकावे जाता शिवपुर वास में ॥ क्यों० ॥ ३ ॥ सिंह सम्मुख हो मरे कुरंगी निज सुत रक्षा श्राश में । मरे मोह वश पड़े पतंगी जलता दीप उजास में क्यों०॥४॥ मरदेवी अरु गौतम मुनिवर बसिया मोह निवास में । मोह तज केवल कमला पाई पहुंचे शिव के- लास में ॥ क्यों० ॥५॥ सिंह कभी निज भक्षण तज के धरे राग नहिं घास में । त्यों ज्ञानी नहीं विपय रमण करे गुण खास में ।। क्यों०॥६॥ भ्रमर कमल के पुष्प न छेदे दुख लहें श्वासोश्वास में। कठिन काष्ठ क्षण भर में कोरे हो कर मोह के दास में क्यो०॥७॥ सुगम तोड़नी लोह सांकली दुष्कर मोह विनाश में। धन्य पुरुष जग वन्धन तज के रमते चिढिलास में || क्यों॥८॥ गुन्नीसे चौराणु संवत रही शांति चौमास में । नन्दसूरि मुनि 'सूर्य' कहे यों सिरे शहर मद्रास में ।। क्यों० ॥ भोगवे रमण

( २५८)
१६६ ग प्राप्ति।
वर-मातीमे ।
गौर कर रेपमासी, है पुरान मसजिए
मदिर में ॥रेर । मुसममानों की मसजिद रेसी
दिग्गुमो के मंदिर सारे। मुशारे पुजारी देखे
बड़े २ विसपन वारे गी०१।। एकरारभुसत
मानों की रादा मारे। तार में दो
अपयुर्ग मसा कट माये गौ ॥ २॥ जब
कोसम अगरी भाणे असम छुपा की बाजे।
पेईमान पिमा स्वारपर गगाजली हा गो
॥३॥ मना मपुरा और मदीना पाणी में फिर
भाया । रामचन्द्र को साफकिपा सर रिसमें
वर पापा ।। गौ.॥
१७० देव पूजा निषेप।
प्पान पर देवनानी नहीं प्रौहार मिपूजन
सरका तालिये जिया फरिस्ते किया

( २४६ )
पूजो प्यारी । चकरा मुर्गा घेट काटकर वनी फिरो
हत्यारी ॥ ध्या० ॥१॥ चाहे पूजो काली माई या
पूजो चामुंडा । चाहे स्याने को बुलवाकर बांधो
गले में गंडा ॥ ध्या०॥२॥ वुला २ कर घर में
जोगिया जाहिर पीर मनालो। चाहे पोपजी को
बुलवाकर दुर्गा पाठ करालो ॥ ध्या० ॥ ३ ॥ पुत्र
मिले नां यों करने से सुनो सुशीलानारी। जो
माग में लिखा होगा वही मिलेगा प्यारी ॥ ध्या०
॥४॥
१७१. दो संग में नहीं होता।
छोटी लावणी।
दो एक संग नहीं बने धर्म कृपणाई।
नहीं रहे एक बरतन में दूध खटाई ॥ टेर ॥
मन सुत दारा में लगा मोक्ष कव होवे।
जग कीनी
शत्रुता
भरी नींद कव सोवे॥
तूं जीतन चहें संग्राम मन में कदराई ॥२०॥१॥

(२५० गपिका से पारी किया पहें पन राहन। कर लिया मपका पाम बसत भाजमम मव शिरपरदाराम पहिम क्या भाईमा गीय इंसा कहे कि में भी गुरु कहा। करेंगलोर कि में मी प पर पाऊ। फिर माया में मोत मिसनकीमाही म० १७२. भर्म पैराता। हर सबारमा पर्म म परमारे पर्म के ऊपर हम मापन मर बाग्लारे । रैरहरिमन धर्म मारा गर पार तम बीमा साग। विपत समूह का उमरे कोई पारमारे धर्मग पाना है मर रीमा धर्म का किन्तु स्यागनकीमा । मर- साना मग धर्म मही बारमारे... भी गादिगा दुहारे युभे हुए मीती में पुकारे । भपमे पूगेकी मोर जरा निहारमारे।पा

( २५१ )
शीश हकीकत ने कटवाया निर्भय होकर धर्म
बचाया। पद्मावती के सतपर दृष्टि डारतारे ॥ध०
धर्म पै।
१७३.
तर्ज-गनल, विना निनरान के देखे ।
ज्ञान दुर्लभ है दुनियां में, धरम सब से अमो.
लक है। यही भगवान ने भाखा, धरम सब से
अमोलक है । टेर ॥ रखो तन अपना धन देकर,
बचावो लाज तन देकर । धरम पर वारदो सबको
घरम० ॥ ज्ञा० ॥ १॥ धरम के सामने सव हेच,
राज और पाट दुनियां का । धरम ही सार है जग
में, धरम० ॥ शा० ॥ २॥ धरम के पासते सीता,
किया प्रवेश अगनी में । राम तज राज धन पहुंचे,
धरम० ॥ शा० ॥३॥ धरम के वासते घर जान भी,
जाए तो दे दीजे। समझ लीजे यकी कीजे, घरम०
॥ शा०॥४॥

(५९)
१७४ अनाथा
अमाप दस को गड़बगायो स्वाति यु
संदेशबंधु । दिपी पनर या दिखापो, सस
जाति मधु सरेश भुटेरा विचारे माता पिता
मेघोडा तुमी से नाता पनि जोगा। तापते
नियविमम प्रबहामो स्वाति...
एच पापी पेट की साति, विपर्मी बोहर के
फिरते घर पररापिरेशिमों को समय पठायो स्व.
जाति ORII तुमारे पर में तो फरा महामास
मारको नामा वस म । जुमदो पम को
चापो स्वाति.. मनाप होणे
सनाप पर बनेंगे भारत सास सप्थे।
अमाप भाप्रम मीमापबमायो समावि .
॥४॥

( २५३ )
।
१७५. व्याख्यान के प्रारंभ की स्तुति ।
पीर हेमाचल से निकसी, गुरु गौतम के
श्रुत्कुंड ढरी है। मोह महाचल मेद चली, जग की
नड़ता सब दूर करी है | शान पयोदधि माहिरली
पहुभंग तरंगन से उछरी है । तासु विशारद गंग-
नदी, प्रथमें अञ्जली निज शीश धरी है ॥१॥ ज्ञान-
मुनीर भरी सरिता, सुरधेनु प्रमोद ज्यों क्षीर
निधानी। कर्म की व्याधिहरंत सदा, अजमेल-
हरत शिवाकर मानी। जैन सिद्धांत की ज्योति-
खरी, सुरवृक्ष समान महासुखदानी। लोक अलोक
प्रकाश भये, मुनिराज पखानत है जिनवानी ॥२॥
शोभित देवविषे मघवा, उडुवृन्द विषे शशि मंगल
कारी। भूप समूह विषे भरतेश्वर, केशव योध-
विषे मनुहारी ॥ नागन में धरणेंद्र बड़ो, चमरेन्द्र
असुरन में अधिकारी । यूं जिन शासन संघ विषे
मुनिराज दीपे श्रुतशान भंडारी ॥३॥

(२४) १७६ ममहरा सेरीकी पद परयो साप, मारप गापपूष, अन्तर पवेहै। रीत पारीपक, दोस रे पार, को भगकी कोयल की है। यह मानु र मो, भामियो विचारोगा पूनम को पाना , अमापन मन्रो । पर छोड़ पारसी, मिन मिमान और असर पदे tuीवपण भावी साधी, मुक्ति की निशानी मा, की हामी बाबी, पाप मुखमयाको है।सको भाव विरया मल पीप सोई बहानाब प्रथा मनपाची अशा सार पार, महाबोपार, भवामिल बीचमार, निमकर मामीबादी तो प्रदेणे पर बीतयण पनी इन जिवाप और बो. पसीनी॥ गाथा-सिवाय इयाणे पारपा परप- गपापा । झोरामुपपनमा नमो सवा सम्मति ( २५५ ) द्वाणं ॥१॥ जो देवाणवि देवो, जंदेवा पंजली नम- सन्ति । तं देवा देव महीयं सिरसा वंदे महावीरं ॥२॥ एगोवि नमोकारो, जिपवर घस्सस बद्ध माणस । संसार सागराउ तरह नरं व नारीवा,॥३॥ १७७. व्याख्यान समाप्ति की स्तुति । शासन मंडन स्वामजी, नाम सदा जयकार । त्रिलोकन में तिलक सम, भज प्रशलानन्द कुंधार । मुक्तिवर वर्धमान की जय ॥२॥ जिनवर नाम से होइये, पाप हवन सय क्षय । मोक्षधाम पावे तुरत मिट जाय सब मन भय ॥ कहोजी श्री जैन धर्म की जय ॥२॥ दोहा-दया सुखांनी वेलड़ी, दयासुखारीखान। अनंताजीव मुगते गया, दया तणा फल जाण ॥१॥ हिंसा दुःखनी वेलड़ी, हिंसा दुःखनी खान। अनंता- जीव नरके गया, हिंसा तणा फल जाण ॥२॥ जेती सुणोते ती करो, तो पहुंचो निर्वाण । काइयक हिरदे

(२६)
रावो तो सुणिपारो परिमाण जिन माग
मारी पणो, सरम गारा मेद । तठा होप ने सर
यो मम में मान रमेर II सरो मारणीतराम
को, कामही क्षयनेय आफी मपम्पिति पर
गई सिमो पर उपयशम धर्म पापा पिये
मीर म भानाप । अमृत मोसम पोड़ी एक-
सड़ी कुछ बाप ॥६करो दहाती धर्म कीरीपे
प्रपिकी मोतारुप महावी, आपनो बॉम्पो
वीपंदर गीत घेतोरे मयि प्राविमा ५
मंसार असार । स्पिा कोई दीसे महीं पर
दीपन परिवार । पर्म करो तुम प्राणिपाल
पर्म पकी मुम होय धर्म करता जीप दुधिम
दीठा कोपरल पड़ा बजार में, ए
गरम झिपराप । मुख मारेकरो पर लियो
सहाय ॥ ॥ पीलमकी पर्ममी पप अप बीरे
मटासी शीशी बार की माप पहा में घर
११|| दुखमी भारो पापमो मियाराममो मन।
पोहा में नफो पलो प्रेम पनामाही रतम ॥१५॥

( २५७)
साधु चन्दन वावना, शीतल जांका श्रङ्ग । लहेर
उतारे मिथ्यात की दे दे ज्ञान का रंग ॥१३॥ साधु
बड़े परमारथी, मोटा जिनका मन । भर भर मुष्टी
देत है, धर्म रूपियो धन ॥ १४ ॥ दया रण सिंगो
याजियो, चेतो चेतो नरनार।मोक्ष पुरी में चालणो
धेगा होजो तयार ॥१५॥ इति
१७८. षद्रव्य ।
पद्रव्य ज्यामें कहा यों मिन्न मिन्न, श्रागम
सुणत वखाण । पंचास्तिकाया नव पदारथ, पांच
माख्या ग्यान ।। चारित्र तेरा कया हो जिनवर,
मान दर्शन परधान । जो शास्त्र नित सुणो भवि-
यण, थाण सुध मन ध्यान || चोवीश तीर्थङ्कर
लोक मांही, तिरण तारण जहाज। नव वासु नव
प्रतिघासु देवा, बारे चक्रवर्ती जाण ॥ वलदेव नव
सय हुवा प्रेसठ, घणा गुणारी खान जो शास्त्र
नित सुणो भवियण, श्राण शुद्ध मन ध्यान ॥ २ ॥

भार रेसमा दीमी हो सिमपर, कियो पर उपकार।
पांच मणाव चार सिपा तीन गुहमरा पार ।
पांच पर शिय भाया पापर्म परवानगी
शास मित लो मपिपस, पाप पय मम पान
और भगानी
बर्वनवीन होक
प्रमास पुसत पाप पहाय गो पामपद निर्यादा
देव पिमाविक मोदी पदवीपी पंच परपान ।
मविपक्ष प्राप पर मा
मित मुगा
-
मरा-विपन बमगम र पब भी जैन
परम । मिम ममोपातिकमरेहीमा कम।
पन साधु पर सापपी पन भी मन परम । जिम
समस्या पाहिद ने ट्रे पाठी । करोजी
भी जैम पम की अपः खोजी भीम धर्म की
गया सप गय मन्या सयप भाजप विजय!
अप विसपअप विजय!!!

( २५६ )
१७६. चार शरण ।
श्ररिहंत सरणं पब्वज्जामि | सिद्धा सरणं
पवज्जामि ॥ साहू सरणं पवज्जामि। केवली
पएणतं धम्म सरणं पवज्जामि ॥
१ पहिला शरणा श्रीअरिहंत भगवंत का वे
अरिहंत भगवंत महाराज अठारह दोष रहित,
चारहगुण सहित, चोतीस अतिशय पैतीस वाणी
के गुणकर विराजमान, देवेन्द्र नरेन्द्र के वंदनीय
पूज्यनीय, ऐसे अरिहंत भगवंत का शरणा होना ।
२ दूसरा शरणा श्रीसिद्ध भगवंतजी महाराज
का, वे सिद्ध भगवंतजी महाराज-पाठ कर्म रहित,
आठ गुण सहित अजर, अमर, अविकार, निरंजन
निराकार, उर्ध्वलोक के चरिमांत मोक्षस्थान में
विराजमान ऐसे सिद्ध भगवंत का शरणा होना।
३ तीसरा शरणा साधुजी महाराज का, वे
साधुजी महाराज पंच महानत पाले, पांच इंद्रिय
जीते, चार कपाय टाले, पांच समिति समिता,

(२१.)
सीमाप्ति गुप्ता सवरे प्रकारे संयम पासे पारा
प्रकारे ठप करे, क्यामदोष हितमाहार, मन
पात्र स्थान मोगरे, शांत दाद मादि अमेछ
गा सहित एसे साधुनी मापन का सरका
होना।
४ चौपा शरपा श्रीशिमेश्वर मपवार मदिरा
पयापर्म का पर्मक वो मेद १ अव धर्म सोसार
धोगी भीसिम मणित पापी (शास) और मा
रिम पर्मो मेद अमगारी धर्म हो सापुजी
का भीर मागारी मर्म सो मारा धर्म
रीरिक मानसिक तुम्बा मम्स र मोरे
अमत ममप मुहका पाता है पेसे धर्म का
तरवा सपा कामगा।
- पोदा।बारमा कुम्भारम, और।
इधपोप। जो मम्म प्रापी पादरे तो मरण
प्रविषय परोप॥१॥

( २६१ ) १८०. तीन मनोरथ दोहा-श्रारंभ परिग्रह तजकरी, पच महावत धार ॥ श्रन्त अवसर आलोयणा । करूं संथारो सार॥ पहिला मनोरथ श्रावकजी ऐसा चिन्तवे कि- छः काया का श्रारम्भ और नवप्रकार का वाद्य तथा चौदह प्रकार का श्राभ्यन्तर परिग्रह, यह ससार में रुलाने वाला है। इसका त्याग करूंगा वह दिन मेरा धन्य होगा। २ दूसरा मनोरथ श्रावकजी ऐसा चिन्तवे-कि द्रव्य से मस्तक और भाव से मन को मुंडाकर दश प्रकार के साधु धर्म, पंच महाव्रत पांच स- मिति, तीन गुप्ति का धारक साधु वनूंगा वह दिन मेरा धन्य होगा। ३ तीसरा मनोरथ श्रावकजी ऐसा चिन्तवे कि-श्रालोयणा निन्दना कर निशल्य हो अठारा पाप और चारों श्राहार का त्याग कर संथारा

(२१२)
पूर्ण समाधि मर गा पा दिम मस
दोगा।
पोहा धीम मनोरथ ये कोमोग्याचे नित्य
मम । अफिनसार परते सा पाये शिप एप धम
१८१ पोवा-नियम
मापासचित परिगई। पाइयो बोस
पर कसमे । पारस सपख विशेषणे। बम
दिसि नाम मत.
१ सचिच-जीव सहित पस्तु जैसे कबापाची
चीरी फल फस माशी फनी [मींगा तथा
पटणी भोपमपानी मारि मार को रो पड़ी
हीरो या मर मर राम पिस्या
मेपास्यादि नवगाथा बमबमपरिमार
करे।

(२६३ ) २ दव-द्रव्य, जितने नाम तथा जितने म्वाद पलटे उतने ही अलग २ द्रव्य जानना, जैसे-रोटी, पुडी कड़ाई की पुड़ी बाटी, 'खांखरे सब अलग २ द्रव्य जानना, ऐसे ही सव सम- झना इनकी गिनती तथा धजनका परिमाण करे। ३ विगई-विकारिक वस्तु, जैसे-धी, तेल, दूध, दही, शक्कर, गुड़ तथा तली हुई वस्तु, इन की गिनती व पजन का परिमाण करे। ४ वाहणी-पांव में पहनने की, जैसे पगरखी, बूंट, खड़ाऊ इत्यादि के नगका परिमाण करे। ५ तम्बोल-मुखवास, जैसे पान, सुपारी, लवंग, इलायची, चूरण, खटाई, गोली श्रादि के नगका, वजनका परिमाण करे। ६ वत्थ वस्त्र, सूत के, ऊन के, रेशम के, सण के, पहरने अोढ़नेके नगका परिमाण करे।

इसम-संपने की वस्तु जैसे सूममे की।
मालू (सपकीर-धीपी) अत्तर फुल स्पादि
पसनका परिमायबरे।
८पारस-सपारी, भारत की परता
हाथी, घोड़े और प्रापि २ फिरता गाडी मोर
रेस हारी, साईका प्रावि . तिरतावास
पौर मोग रोगा मादि और पता-गुम्बारा
विमान मादि हमकेमा का परिमावरे।
९ सम-शैम्पा सोनेशिये पतंगबार
माचा कुर्सी, पारी, तकिया, सतरंगी राम,
पराई पर मादिगा परिमासरे।
१० पिलेपन शरीर को सपाने की वस्तु
जैसे-ऐस पीठी दम पर पांच पसी
तपा बाप पोने की पम पम प्रादिमनका
परिमारकरे।
"मदिन
मेधुन सेवाका

( २६५)
त्याग करे, रात की मर्यादा करे । वक्त का तथा
टाइम का परिमाण करे।
१२ दिसि-दिशा गमन करने का, जैसे पूर्व,
दक्षिण, पश्चिम, उत्तर, ऊपर, पहाड़ादि पर,
नीचे, मोहरादि में जाने के कोस की मर्यादा
करे।
१३ न्हाण-स्नान, गरदन ऊपर शिर, को-
हनी नीचे हाथ, घुटने नीचे पांव धोवे सो छोटा
स्नान, शरीर पखाले सो बड़ास्नान इनकी गिनती
का परिमाण करे।
१४ भत्त-भोजन, खाने में जितनी वस्तु
श्रावे उन सभी के वजनका समुचय परिमाण करे,
पीने में पानी श्रावे उसके वजन का परिमाण
करे।
पृथ्वीकाया-मिट्टी, नमक, खड़ी, पांडु, हि-
रमची, काली, पीली मिट्टी, वापरने में आवे जि.
सकी जाति तथा वजन का परिमाण करे
-

१५ प्रपामा पानी, नदी हास्य कमा
परेरा, पड़ा भावि मगच परिमान करे तथा
वापरने पामीपन परिमारे।
१७ उकाम-भगिम, पल्हा निगरी माही
रीवा पीरी चितम स्थायि के भगत परिमाण
करे।
१८ बारा वा,पंसा शमा, फूकसी
भूगली मते पासिंग खादिम का परि
माणको
१५ पनसविनया-हरी सिसोतरी वापर
निये साना पर उसका, तया फर फल मागी
मीगे पाम मारे भादि वनका परिभाष
२० प्रसन्या-दसतेसोप जानकर
रेखकर सरपकर निरपराधी जीव को मारने
'स्वाग को।
-

(२६७)
।
---
२१ अस्सी हथियार, तलवार, बंदूक बरछी
छुरी, कटार, चाकू, वक्की, ऊंखल मूसल, सरोता,
इमामदस्ता कुदाली, पावड़ा, पहार, सुई, कतरणी
इत्यादि के नग का परिमाण करे।
२२ मस्सी-श्याही तथा व्यापार:-
कपड़ा, किराना, सराफी, मणियारी का तथा
दावात, कलम, कागज का परिमाण करे।
२३ कस्सी-कृषि, माला,
वाडी
तथा जमीन खोदने का घर कूश्रा आदि कगने
का तथा आसामी का परिमाण करे।
यों हमेशा २३ नियम धारण करने से, राई
जितना पाप तो
खुला रह जाता है और मेरु जि.
तना पाप रुक जाता है।
खेत,
का,

। २१६)
१६ प्रपामा पानी नही, हालाश, कुमा
परेरा, पहा मादिगका परिमार बरे तम
बापरमे पानीपन का परिमास करे।
१७ वेळकाप-भग्नि पसा सिमी भाई
पीपा, पीरी वितम इस्पादि मग का परिमाण
१८बासापानमा पला बसमा फासी
मगती झते नामित स्मादि म प परि-
माररे।
१० वनस्पविकाश- क्षितोतरी वापरमे.
लिये सामा परेसा या फम फुल भाजी
सीगे, स. मारे भावि मन का परिमाण
२० सापानीसमते जीप मानकर
देशपर पर निरपपपी व को मारने
त्यागकरे।

(२६६ ) नने १ उ०-बारहसो। प्र०-सो वर्षके पक्ष कितने ? उ०-चोबीस सो।।२४०० प्र०-सो घर्ष के श्रठ- वाडिये कितने ? उ०-अडतालीस सो [४८००] प्र०सो वर्षके दिन कितने? उ०-छत्तीस हजार। प्र०-सो वर्ष के पहर कितने ?- उ०-२८८००० । प्र०-सो वर्ष के मुहूर्त कितने ? उ०-१०८०००० । प्र०-सो वर्प की घडिये कितनी उ०-२१ लाख ६० हजार [कच्ची दो घड़ी ४८ मिनटका मुहूर्त ] प्र०-सो वर्ष के श्वाशोश्वास कितने १ उ०-४ अडब ७ करोड ४८ लाख ४० हजार । प्र०-एक वर्ष के श्वाशोश्वास कितने ? उ०-४ क्रोड ७ लाख ४८ हजार ४०० सी।प्र०-एक महिने के श्वाशोश्वास कितने ? उ०-३३ लाख ६५ हजार ७०० सो। प्र०-एक दिन के श्वाशोश्वास कितने ? ०-१ लाख १३ हजार १ सो ६० । एक पहर के श्वाशो- श्वास कितने ? उ०-१४ हजार १ सो पोणे ४ प्र०--एक घडी के श्वाशोश्वास कितने ? उ०-१ हजार ८ सोच्६॥ 1

मगपान महाबीर परमार
श्री गीतमादि साघु और पतीस मार भी
राया झपाराणी और प्रमय ईयर मादिमोह
१८२, धर्मफल प्ररनोतरी
पाता भारि साप्पोके परिपार से पधारे। भेवित
गमपुप मगयाम को ममहारगर हा
गाए जातिकी परपदा विधापरकी गोद गौतम
स्वामी पूधिया प्रभ र जोर १ सुनोगाप
निमुबम, प, पारह पोशामिन कर दी
निपे संपरीक्षोश।२॥
प्रम-सोपपरे संपासर हितमे तर-सो।
मा-भो वर्ष पुरा बिरामे ! --बीस "
पर्पका एक पुग) मल्मो पर्व की अपर जिमी!
पोणे एक वर्षको भयन होते
परिवायन और रायम] -सो वर्ष की
शुत कितनी !-पदसो।[में तक
पोती पसंत, २ मीम, र्पा सप
मत पौर शिशीर ] मसो मास कि

। २७१ )
कर्म का क्षय हो। तेले [अष्टम भक्त] केतपका क्या
फल ? उ०-लाख फोड़ वर्ष के अशुभ कर्म का क्षय
हो । चोला । दशम भक्त] के तप का क्या फल ?
उ०-दशलाख फोड़ वर्ष के अशुभ कर्म का क्षय
हो। पचोला [वारह भक्त] के तप का क्या फल ?
उ०-क्रोडा-फोड़ वर्ष के अशुभ कर्म क्षय हो।
ऐसे सर्व तपका फल दशगुना जानना।
एक प्रतिपूर्ण आठ प्रहरका पौषध करे उसका
क्या फल ? उ०--सत्वाइस सो तितंतर फोड़
सितंत्तर लाख ११ हजार ७ सो७७ पल्योपम और
एक पल्योपम के नवभाग उस में से सात भाग
जितना शुभदेवायुबंध करे। एक पहर की सामा-
यिक करे उसका क्या फल ? उ०-तीन सो ४७
क्रोड २२ लाख २२ हजार दोसे २२ पल, एक पल्य
के : भाग जितना देवायु बांधे। एक मुहर्त ४८
मिनट की सामायिक का क्या फल ? उ०-१२
फ्रोड ५६ लाख २५ हजार हसो२५ पल्योपम, एक
पलका चौथा भाग
पलका
देवायुका बंध करे एक घडी

पोई सम्पहरएि मौकारसी परे उसका
क्या फल
।सो १.पकी भगम मांग
पपकर पवायुपपरे। प्र-एक प्रार
सपका क्या फारस बार पर्प के भयम
कर्मचाप हो। पारसी तपस्या फल!
सम्परागार प्रथम माप होये।
रोपामी पापा फस ! -4 लाख
भयम
प्रपोएकासप पर
स्पा फस!- सासवर्षभराम को जब
रो।एक अमापकल माहार पानीबाना पीना)
वपका क्या फल !-कोर पर्षमयम
में पाप हो। दात पाचमे
मादार वपमा फरको
पर्ष प्रहम कर्म पोमानित तप
स्था फर! -पोडोडर्षअममम आप
से। उपवासमा सवार मोहब
माम कर्म पप रो। [रमा पत्र
ज्या फत! राजार मेष भयम

( २७३ ) का साडी वारहसो उपवास का फल होय, यों हर पक तपकी पहरसी करने से दूणा फल होय । वारवां चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त का सातसो वर्ष को आयुष्य था, सातसो घर्ष के श्वाशोश्वास कितने ! उ०-२८ सो ५२ क्रोड ३८ लाख ८० हजार । ब्रह्म- दत्त मरके सातवीं नरक में तेतीस सागर की स्थिति में गया, एक श्वाशोश्वास पे कितने पल्य का दुख पाया, उ०-११ लाख ५६ हजार ६ सो पचीस, एक पल के तीसरे भाग अधिक नर्क दुख पाया। धनामुनि नव महिने संजम पाला, नव महिने के श्वाशोश्वास कितने, उ०-३ फोड ५ लाख ६१ हजार ७०० सो॥ धन्ना अणगार सर्वार्थ सिद्ध में ३३ सागर का श्रायुष्य पाया तो एक श्वास पे कितना सुख पाये । उ०-१'सो ७ कोड ६२ लाख ६६ हजार से १८ पल एक पल के छटे भाग कुछ कम स्वर्ग सुख पाए ।

। २७२)
संपर करे रसका क्या फल ! -कोर
२५ माघमारसो १२० पस्प वायु का
पोदेरासर मनसेनपकार मंत्र की एक माला
पिमने क्या फला-साजहार
से १७ पतष यमपायुषण परे! भी
एक हपय मन सेपरे रसका स्पा फल
अपम्प जार मकर..सागर के पाप दूर
मेशा तेसोता और पचोखा रे में
किसने उपरातका फल
होने का
देखेका २५, चोखे । १२५, पबोटे ३२५,
ऐसे पोपमास पढ़ाने से असफल पांच
गुषा होप से उपवास का पक्ष ३१२४
समममा।
उपवास पेशा देखा पौम और परोसा इन
की पदरसाकरे सोफिसमा फो। उ०-उपवास
सोपपास भेजेस दरा उपवास, तेश
पास
बी.पपास और पंचोले

( २७३ ) का साडी वारहसो उपचास का फल होय, यों हर एक तपकी पहरसी करने से दूणा फल होय । वारवां चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त का सातसो वर्ष का आयुष्य था, सातसो वर्ष के श्वाशोश्वास कितने ! उ०-२८ सो ५२ फोड ३८ लाख ८० हजार । ब्रह्म- दत्त मरके सातवीं नरक में तेतीस सागर की स्थिति में गया, एक श्वाशोश्वास पे कितने पल्य का दुख पाया, उ०-११ लाख ५६ हजार ६ सो पचीस, एक पल के तीसरे भाग अधिक नर्क दुख पाया। धन्नामुनि नव महिने संजम पाला, नव महिने के श्वाशोश्वास कितने, उ०-३ क्रोड ५ लाख ६१ हजार ७०० सो॥ धन्ना अणगार सर्वार्थ सिद्ध में ३३ सागर का श्रायुष्य पाया तो एक श्वास पे कितना सुख पाये । उ०-१'सो ७ कोड ६२ लाख ६६ हजार ६ से ६८ पल एक पल के छठे भाग कुछ कम स्वर्ग सुख पाए ।

समापसेरे
श्री पंच परमेष्ठी क १०८ गुण
भी परिहत मम के १२ गुण ॥ कवित।।
शमा मोह तम पर पर्व 'पुष्परी वामर
विवाय गावी जोजम विशारी। सिंहासन
रममप प्ठे मामरस सोई
परवीन बापर
मेरी शप्प मारी । 'सो सोकोप मचानाही
भोपामाशामे सब समझे
मर मर मारी।कात यो 'धर्ममुनि' बारे
गुपभारी गुपी, ऐसे प्ररित वायो दमामारी
th
श्री सिदमक गुण ॥ कपित्त॥
पान वर्गमापरपी गए पान मो
विराम व पापा हमी विदारी है। साविक
हो मोर भएप हो 'मापुर, नामकर्म
पप से ममति एलपारीtu पोरम पामा
यारो भगुपए प्रसपमय मे अमवस

( २७५)
धारी है। कहत यों "सूर्य मुनि" आठ गुणधारी
गुणी, ऐसे सिद्ध प्रभु ताको वंदना हमारी है ॥२॥
श्री प्राचार्यजी के ३६ गुण ॥ कवित्त ॥
"पञ्च इन्द्रिजीते धरे 'नवविध ब्रह्मचर्य क्रोध
मान माया लोभ चारों परिहारी हैं। दर्शन चारित्र
शान तप वीर्य 'पञ्चाचार 'पञ्चमहायत पाले तीन
गुप्ति धारी है ॥ ५इरिया भाषा एपणा श्रादानादि
तिम्खेवणा, उच्चार पासादि पंच समिति सुप्यारी
। कहयों 'सूर्यमुनि' धारक छत्तीस गुणी, ऐसे
आचारज ताका वन्दना हमारी है ॥३॥
श्री उपाध्यायजी के २५ गुण ॥ कवित्त ।
'ग्यारह सु अनजान उपाग बारे पखान,
'चरण 'करण सित्तरी के गुणधारी है। चारमूल
चारछेद आवश्यक सूत्र और, पठित चवदे पूर्व
आगम आगारी है ॥ उपदेश सुधावाणी डिगता
को थिर करें, शान दृगदाता भवि जीव हितकारी
है। कहत यों "सूर्य मुनि" धारक पञ्चीस गुणी,
ऐसे उपाध्याय
ताको वन्दना हमारी है॥५॥

( २७५)
मी साजी के २७ गुण ॥ कवित।
पाले पत्र महामत रुपाय सिमारे बार
पंच इन्द्रिजीते ति पोग समपारी है। कर्म
जोग मात्र सो पमा वैराग्यपंत दर्शन
पारिप बाम संपच मंगरी। वमी प्रतिमासे
समरसाम्त कर सोयामागार रोप मिक्षा
निवारी है।कात पों एर्ष मुमि" सतावीस
पारी गुपी पेसे मुमिराम ताको पालना हमारी
मी पुग्देव के गुण ॥ कवित्त ।
पर्म परेशदाता मोष सप मार्ग वा सम
पित रत्ववाता पास के दावारी है। पान रुप
मेर वा माथा मुकर सम हिपाt
बार जप तप मामारी का रस
सम रस्म मंगप सम पम्प मा विषरे कि
से परमारी है। कहत है सर्प मुमि" गुरु
अमेक पारी पेसे गुरराम ताको पदमा हमारी
पो

-
नित्यनन्द-स्मरण का शुद्धि-पत्र
पृष्ठ पक्ति अशुद्धि
२२ १२ घं
२२ १३ युक्तां
१३ ७ शान्ति
२३
१० चन्द्र
१० मोक्ष
२७ १३ मूतादि
४१
७ धर्म
१५ हरिप्यति
ससार
६३
१२ सुभ
६३ १५ चम्पक ली
शुद्धि
घि
भक्त्या
शांति
चन्द्र
मोक्ष
भूतादि
धर्म:
हरिष्यति
संसार
शुद्ध
चम्पकली

( २७१)
भी साधुजी के २७ गुण ॥ कषित ॥
पाने पक्ष 'महामत पाय मिमारे पार
पंच इन्द्रि बीते ति योग समपारी। कर
योग माव सधे मा सुवैराग्यवंत वर्गम
पारिज हाम संपच मारी है। दमी प्रतियाते
सुमरणात पर सह पया के प्रागार दोप मिक्षा
के मिजारी है। कहत यों 'पर्य मुमि" सचालीस
पारी गुणी ऐसे मुमिराज ताको पालना हमारी
मी गुरुदेष के गुण ॥ कपित्त ।
धर्म परेरापाता मोक्ष रूप मार्गपाता सम
पित रस्मदाता रे पावारी है। पाम रूप
मेर राता मापा के मुकुट सम, हिया के
दार अप वप भागारी ॥ कामरस
मम रल मंजुष सम पम्प सत मिरे कि
से मरमारीकात
एर्ष मुनि" गुपयो
प्रमेक पारी पेसे गुरुराम तारो पदना हमारी

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पृष्ठ पंक्ति मावि शुदि ७१ ७२ ८६ १ न्यूना गरे म्यूमाबारे २ उमारी तरवारी ४ पिट पिट १० मामिष वामिप २१ मोटिंग बोरिंगम उसन सनमो ७ दोन २ मिापरक मिवारफ १ नमी ममि २ किस्मय षिस्मप १५ रखापो रचायो ११ भग प्रम ११ भाषा भावंता १७ निरमन मिरमसी ६ मार मतपेपर २५ मररेषी साधन मालेवा पारा सापन EL १२ १२ (ग) १०६ ११३ गया तजी पृष्ठ पंक्ति अशुद्धि शुद्धि १३ साघुजी साधुजी १४ हात हान ११४ ५ घर मुलसां घर ११४ ७ नेमिनी नेमिना ११४ ६ एक संथारे एक मास संथारे ११४ १७ मेठी मेटी ११६ ७ तजी ११६ ११ सर्वार्थ सिद्ध पहुंच्या सर्वार्थ सिद्ध पहुंच्या ११ वीरप वीरपे, ११७ १० टालेश टाले ११६ ३ अठाई अढाई ७ सतियों ले सतियों से १२० ६ वड़ा १२३ १३ कामथी कामजी १२४ ६ भगूरां भरगुप ૨૨૬ १४ इयवीस इकवीस 0 पृष्ठ पक्वि १३४ परमि ७ गिलाए १८ मर प्रसवारी २३ जायो २ घठन १२ अमाशा २ पेसमता १६ मोरा १. मातम ४ मतमान यदि गिलोए मर२ इसरी प्रसवारी सादे पटम जमात तुमे समता मारो मित्र परमातम मवकायाम ठाठ ७ दर दया पर्म पा ५ ससो पेसी जलो प्रमादि विभ्य रचना म्पाप पूर्वकालो पसी (ङ) १६० १६० पृष्ठ पक्ति अशुद्धि शुद्धि पाछा फिर कर पाछा १ पार गुरुजी पार १२ श्रात्मा आत्म ६ लुललुल लुललुल चरणे १२ तेरी तरी पाप तोड़िये पाप तो डरी श्ररी, पान से १८३ १६७ ११ पान १० पाप १३ मिटाश्रो ११ सूरि ४ अराधे ४ संदम ६ उद में ११ कावा जयजय ४ घरने निवारो सुरि श्रराधे संजम उदर में श्राया काया जप जय वरते २०० २०२ २०२ (प) पृष्ठ पंक्ति पशुभि ७ मिपाए १३४ सुचि मिसोए मर२ इसरी मसवारी माणे मासु २४॥ भसमारी १३ मामो ५ पटम १२ समासा २ पेसमता ११ दमोरो १४ भावम ४ मवयान ६ ठाट तुमे समता दमारो मि पर मातम मवका माम ठाठ रहे करे २२ दपा धर्मपा देखलो ऐसी रेखलो प्रमापि पिण्य रमना म्पाप पूर्वक देखलो पसी . करवी

२५३
(छ)
पृष्ठ पंक्ति अशुद्धि शुद्धि
२ हेमाचल हिमाचल
३ श्रुत्कुंड
मुखकुण्ड
५ वासुविशारद, ता शुचिशारद
६ प्रथमें
प्रणमी
८ कर्मकी वेदमुं
८ अनमेल अघमेल
दसहजार हजार
८ तिक्खेवणा, निक्खेवणा
२५३
४
२७५

यदि पृष्ठ पंक्ति भरादि २०२ २०२ १५ स्वामी २०२ १५ पाये २०८ पर सकल पर पाव पम्दत काम २१. । भो अम्बरे २११ २१२ २१॥ मर्थ प्रामिवे चोवरे २१५ २१८ २२२ ४ मामि १ बोमरे १६ सिमे ५ सयेदिया, १५ पाये ८ मिव १४ भवगुणों | गुभिसो ११ मोर इससेहिपा पापे निव RTU -२५ विपमप मोर

(छ)
पृष्ठ पंक्ति
२५३
२५३
अशुद्धि शुद्धि
२ हेमाचल हिमाचल
३ श्रुत्कुंड
मुखकुण्ड
५ वासुविशारद, ता शुविशारद
६ प्रथमें
प्रणमी
८ कर्मकी
वेदजुं
८ अङ्गमेल अघमेल
४ दसहजार
हजार
८ सिक्खेवणा, निक्खेवणा
२५३
२५३
२७०
२७५

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Nityanand Smaran

Author
Maharaj, Surya Muniji
Title
Nityanand Smaran
File name
Nityanand Smaran
Text
OCR done
Citation
1938
Published
2011/09
Publisher
Ratlam, Shri Dharmdas Mitra Mandal
Language
Sanskrit
Pages
308
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314167
Barcode
99999990312308.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
tIXJDTeVdAN
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