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Sajjanchitt Ballabh Kavya Sanskrit

Jainy, Mehar Chand Das · 2009/11

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सज्जनचित्तबल्लम
काव्यसंस्कृत
मनिमल्लियेणाचार्य रचित
टीकावा भाषा छन्दसहित
पण्डिन मेहरचन्ददास जैनी सुनपन नगर।
निवासीने प्रथमपदच्छेद-संस्कृनटीका-य
चय-भाषाटीकाकर फिर प्रतिनीक अनुक
लभाषा छन्दबनाये
सौपुस्तक अमनसिंहनैनीसुनपनिवासीनेडिननी
आज्ञानुसार पनि शुद्धनासेइनस्वार यंदालदिल्लीम
सुद्रितकराई-सं
इस पुस्तककीसरकारमें रजिरी करईगई
प्रथमबारसयी ५००
मान्यजिलमारित

निवेदन
सकलगुण अवास पण्डित मेहरचन्दों
दास जैनी सुनपननगर निवासी दी
काकार वा भाषां छन्द रचितने अप
नी परमदयालुतासे हक कापीराइट
इस पुसक टीकावा भाषाछन्द सहि
तकामुक अमनसिंहजैनीकोदेदिया
है और इस पुस्तक की सरकारी कानू
नके मूनिब सरकार में रजिस्टरी होग
ई है. अबकोई साहब इसके मापने
का परिश्रमनकरें जिससुस्तक परमे
रीमोहरनहोगी वह चोरीलीजानी।
जायगी
आपकालपापात्र
अमनसिंहजैनी,

ग्निापन
सन्जन चित्तवल्लभ काव्य संस्कृतमलिगा
चार्यकृतजोधर्मनीति अर्थानमुनि उपदेश
क विषयका रेसीमली गेनिसै सम्पूरगा कि
याई मानोसमुद्रकोलघु पाबमें मदियाहै जिस
को पण्डिनमेहरचंददाम सुनपतनगरनिवासी
निपदच्छद-संस्कृतटीका-अन्वय-भापाटीका.
कर अतिम्लालसंस्कात अनुकलभाषाछंदवना
कर इसपञ्चका अर्थप्रकाशनीनामारोकामे
ग्रन्थ भनिशोभित कर दिया निसको सुन्दरताद
रखने पर जान होती है सो पुस्तक जिनपठमवक
श्रमनसिंहर्जनीसुनपत नगर निवासीनै जिनमत्त
उन्ननिदाअल्पाभ्यासीजन लाभार्थबड़ा परिश्रम!
करमुद्रितकरायाहै मोल्यजिल्दहिन । महम
लडाक इसके सिवायहे। निम्बस्थानासमिलमती,
(दिन्नीकश्मीरीदरवाज़ा-अमनसिंहज्ञानदीमा
(सुनपन में- पण्डितमेहरचंद दास नैनी

विज्ञापन
भूधरजैनशनकभाषा
अतिउत्तमग्रन्थहैं इसमें भौतिश्के अर्थहकहिं
संसार अवस्थाकाकथन कहिं शुरु शिक्षाकाव
रोन कहिषरकर्म की प्रशंसाकहिंसामाविषनकी
निन्दाकहिंसस्यकतानचारित्रतादिककी भलाड़ी
कहिंक्रोधमानमायालोभहिंसादिककीबुराई कवि
नेजिसप्रयोजनके अंगको लिखाहैउस्काराचि
चामचकर दिखाया है जिसजैनशतक कोमैने।
बालबोधहेत शब्दार्थवासरलार्थीकासैसो
मितकरगदपछापेमैं अतिसुन्दर कागजपरश्व
द्वितासे मुद्रितकरायाहै मोल्य जिल्दसहित।
महसूल डाक जिम्मेख़रीदारहै जिल्दके
मोल्यमें जिल्दमुफतदईजायगी नीचे लिखे
स्थानों से मिलेगी- देहलीमें अमनसिंहबज़ी
नवीसकशमीरी दरवाजा । सनपतमें पण्डित
मेहरचन्ददासजैनी-जिनधर्मपालकधमानसिना

सज्जनचित्तवल्लभकाशुद्धाशुद्धपत्र
पृष्टापछि अशुद्ध पनि लसुद्धाशन
२२/इम पुननि पुनर्निर्वे
२७ नाम्नाः नाना
८२ जायेन जायन् २०२० दुर्गन्ध दुर्गन्ध
१०/१ सता सदा नयाग्यानि माग्न्यानि
२०४ सम्यक् सम्यक २६ ईयन्मेवनई पन्सेदन
९२२ जानना त्यागना २० पाय पापं
२१ अनेन अनुन ३१/३ स्वीमी स्वीभी
मन्यसे मन्यसे ३४४ मित्वा विदा
२३/२ द्रव्यागा द्रव्योपार्ज ३/२६/ त्वं
जनचिननचित्त ३६ ममान स्पर्ण
२५/१४ पत्रः पशुः ६२९/ नान्या तान्येव
२७/१० द्याय द्याय ६२२ सित्वा विवा
शय्या शय्यो ३६/२९/ पार परि
२८३ स्थाइल वण्डल ३०/२४/ अविरान प्रविगत
भूमि भूमिः ३१२० सर्वन सर्वज्ञ
१८/१२/वरणीयुधिररणीषु३७२१ पस्से धर्म
२८/९४ याववनशूचना पालमसे लभसे
१४९८ गाष्टा गोरी १०८ बपने चयनं
समदम कसमवन
४२२२/नाहत चाहत
REC
१५ शाणित गणितमा

एष्टायलि अशुद्ध शुद्ध राष्टपनि अशुद्ध मुद्ध
५८/१८ भनितुं भनित
जोनहिं ६०/४ विश्वास विश्वास
डारनवी ता तां
४१३
ते
रधानला ६०५ पुमर्थ घुम)
चन देन
ता
मनिहोना चनं
४११७ मोहगाहामोहपाश ०६ शीर्ष शीर्व
[४१ / बारामय आराध
४४/१८ सिवा बिवा ६०/१९ विश्वास विश्वास
४७/५ वलीला दलीय
ता
|| माझ्या माझया २० प्रामाषिप्रामीषि
५४/२२ कल कुल ६९/६ हुदना तुरतः
मोमो
५५९२ रूपरन्ता रूपान्त ६३/१६ माकुरु माकुरू
रङ्ग रङ्ग ६४/१०/मल्लिये मल्लिषे
५५/२४ ईलायै ईप्सायै ६४/२० दुर्जसन दुर्जरा
५५/१० जलयानजलयान ६ तीन नाने
त्वं त्वं
इति॥
-

श्रीजिनायनमः
भूमिका
दो विन्दुग्रीजनयद कमल प्रीनिरीनिमनधार।
सुखदायकदुरवनयकरन असरणजनआधार।
विहज्जन चरणाम्बुजरन-अमनसिंहजैनमुनपनन
नरनिवासीधर्मप्रेरक कवि कोबिदजनोंकी सेवाम
निवेदनकरना है कि इसपन्धमकालविपेवनबाडा
पुरुषहजोयारुतवासंस्कृत विद्याकज्ञानाहीं यजानजी
निॉकेलाभार्थधर्मकीउन्ननिमें अपनाकालव्यतीनकर
कि धानंद माननेहींसाइसकालमधर्मस्नेहीसकलगु
गनिवासश्री९०१पण्डितमिहरचंद्रदासजनीमनपन
निवासीने ममप्रार्थनार्थ अतिअनुग्रहकर श्रीसन्जा
नचित्तवल्लभसंस्कनकाव्य मुनिवरश्रीमल्टिपेगा।
चार्यक्रनकाजोपचीस लोकसादलविकीडिनछ
दमैं मुनिउपदेशक अनिउत्तमग्रन्योरीकाकियाहै।
जिसकाकमये प्रथम पदच्छंद पुनःसंस्कन ये
काजिसमें शब्दरकाढसम्पय्यायगढरकवाहे पु
निःसंस्कत्तसेंअन्दयकिया फिरमायावानिकम अर्थ
किराह फिर मातम्लोककासाचादमयनुवादकरय
र्यप्रकाशिकानामधराहे प्रास्तानिक ३६४७
में पूर्णकियाजहाँनकमराविचारह इसउनमर्गतिकी
टीका अवलोकिसीविद्वान्नेनडीरतोसे गुरगीजनों,
कोकोयकोटीधन्यवाददग्रार्थनाह कियह उनमीका

Jeet
सर्वछोटेबकामियहोसंसार में प्रसिद्धही ।
इसग्रंथकोटीकाकीसमस्या
अङ्क समस्या प्रयोजन
म अव्ययः
२ - पूर्वकालिक अव्ययः
३ भ- भविष्यतकालिक अव्ययः
कि क्रिया
५ . कि-वि कियाविशेषण
लकीरोवामे कसेविभक्ति
जाननासोमयमाससप्तमी
पर्यनजैसाधकलेवानसे
जानना।
१ लकीरके वाहने अंकसे विभक्ति
केवचनजाननासोसकसेतीन
नकसारेखासामानना
कवि

श्रीजिनायनमः मूल नत्वा वीरजिनं जगचय गुरुम्नु ति थियोवानभा पुष्यषु क्षय नीति वारण निवहं संसार दुवा पहं। वक्ष्येभव्य जनपवाधजन नं ग्रन्यं समासादह । नाम्नासन नचित्तवनभमिमं शृण्वन्तु म लोजनाः॥२॥ टिीका महावीरं नमस्कृन्यागुरुनवागी सरस्वती। सनाचिन पियस्यमाकिरोम्यर्यप्रकाशिका पदच्छंदः नत्वा वीरजिनं जंगवयगुरू मुक्तिधियों वनभ पुष्येषु क्षयनीनिवाण निव समान्दचाप, . S विक्ष्ये भव्यजनयबोधजननं ग्रन्थ समासान अहं नाम्ना सज्जनचितवनमें इमं ऋण्व न्तु सन्तः जनाः ॥१॥ संस्कृत टीका नित्वा प्रणम्य [वीरजिनं] श्रीमहावीर स्वा मिनमन्त्य तीर्थेश्वरं जगत्त्रयगुरूं] उध्योम ध्यवर्निनां जगनां हितोपदेशक मुनिश्रियः मोक्षलक्ष्म्याः वल्लभं] प्रियवरं-भर्तारं पुष्ये क्षयनीतिवारण निवहंकामस्य शोषण नापनो चाटनमोहन वशीकरणरूपानां प वशाराणां नाशाय ब्रह्मचर्य्यवाणस्यधार कंसंसारदःखापहजगतोजन्ममरणजरा दिजाना चतुर्युगनिषूनवानां कष्टानां निवार कवियो कथयिष्ये भिव्यजनप्रबोधजनन) मोक्षगामिना पुरुषार ज्ञानपग्रिन्थं शा व समासान संक्षिप्तान अहीमल्लिषरणाचा मे: [नान्नाः] अभिधेयेन [सज्जनचित्तब लसत्पुरुषाणो मनसा प्रियं अथवा सज्ज नचितवल्लभ नामानं दिन] वक्ष्यमाणं शृण्वन्तु करण विषयी भूतं कुर्वन्तु ॥१॥ अन्वयः २ यहम्मत्रिपेगाचार्य उर्मग्रन्थं वन्य किक चावीरजिनं नाला कयम्भूतं वाजिनं। जगवयगुरूं (पुनः करस्मन) ममिश्रिया वल्लभ र सुनः कयम्भूतं पृप्यत्तय नीति. वाण निवहं ( पुनःकयाभूत संसार दावा पहं (कथम्भृतं ग्रन्यं भव्यजननाधन ननं (पुनः नाम्नासज्जनचिनवन्तम स्मात् । समासात मन्ताजनाः शृगवन्नु भावार्टीका मैं मल्लियेणाचार्य महावीर स्वामी नीन । गतकै गुरु मुनिश्चीको भार कामदेव के णा पण रसायन उच्चाटन ३ मोहन वशीकर १रण ५ रूप पांचवाग के नाशकरणको मान्न वाग के धरणहारे जगत के दुस्वंहारको नम स्कारकरके इस सज्जनक्ति वालम नाम। ग्रन्थको जो भव्यजनों को जानका देने चान्ना है। कहूँगा सन्नजन सुनी। ॥१॥ भाषाचन्द छप्यय श्रीमनवीर जिनेश विजग गुरु मुक्ति रमणिवर 'पुष्पवारगनयन धगे।

जिन ब्रह्मवाणकर।जगदुरखनाशनहा रबारबहसीस निवाकर । सज्जन चितवल्लभसुकाव्य यह भव्यबोध कर । मैंरचेसुनौतुमसन्तजन मल्लि घरणसुनिकहन इस तसुभर्यलेय भाषाविषेछन्दमिहरचन्दरचनतिम १ ॥सूलम्॥ रात्रिश्चन्द्रममा बिनानिवहै। भातिपद्माकरी यहन्यंडि तलोकवर्जितसभा दन्तीवदन्त विना पुष्यंगन्धविवर्जितं स्टन पतिःस्त्रीचेहनहन्मुनि श्वारिने गविनानभानिसततं यद्यया सो शास्त्रवान् ॥२॥ पदच्छेदः बिः चन्द्रममा विना अननिवहै नो भानि पद्माकरः यदन पण्डिन लोकवर्जिनसभा दन्ती व दन्त विना पर्ष गन्धविवर्जित पनिः स्त्री चदह नदन मुनिः चारिवेणं बिना नै भौति सनतं यपि असो शासवान संस्कृत टीका रिवि निशा चन्द्रममा चंद्रा विना निषधे -रहिता अन्ननिवहः कमलममहः ना न [भानि प्रकाशन-शोभना पद्माकरः सर: यहनों यथा पगिडन लोक वर्जिनमा विहज्जनः रहिनासदःदिन्नी हस्ती वतु ल्येदिन्तीग्दनीबिना निषेध पुष्पा कममं । गिन्धविवर्जितं] मौरभरहित मनपनिः इन भवी-विधवा स्त्री नारी चापुनःनिहत नया मिनिः यतिः (इही अस्मिन्नाके चारिणी प्राचारेणाविनाहिनःनिभानि: नशामन। सननं निरन्तरं यद्यपि यदि चायमीअयं शास्ववान भागमचिन ॥२॥ अन्वयः। यहत् चन्द्रममा विनाविनः अन्ननियह" विना पद्माकरः पुनः] पनि नोक यर्जिन सभा [पुनः दन्तं विनादन्नी पुनः गन्धविका र्जिनं पुष्प (पुनः) मृतपनिःस्वीः उद माभानि तहान चारिवण धिना सततं मुनिः नाभाति यद्यप्पसौ शास्ववान भवन इनिशपाश भाचार्टीका जैसें चौदके बिनारान और कमलसमूह के वि ना सर और पण्डिन लोक बिनासभा औरदा तोके बिना हाथी और गंधके बिना पुष्य और पनिके बिना स्वीकी शोभा नहीहै तैसे यहांचा रिखके बिनासुनीको शोभा नहीं है यद्यपि यह पण्डितक्या नहीं ॥२॥ भाषाछन्द मत्तगयन्द चन्द्रबिनाज़िमरैननसोहतपासमूह बिनासर जैसे। पण्डितलाकविहीनस भानहिंसोहत दन्त बिनागजवैसैगंध बिनाजिमपुष्पनसोहन स्वामिबिनावि धवातियतैसैं । पण्डित शाखविपन्न मुनीश्वर चारितहीननसोहन ऐसे २॥ मूलम् किंववन्यजनेन भोमनिरसावेत वताजायते।क्ष्वेडेनच्युतपनगोग नविषःकिंजानवान् भूनले मूल किंतपसःक्षमेन्द्रियजयःसत्यसदा चारना। रागादीश्वविभर्तिचेनसय 1 तिलिंगीभवन केवलम ॥३॥ पदच्छेदः कि ववन्यजनेन भोः मुनिः अमी गनावना जायन वडनच्युन पन्नगः गतविपः जानवान् भूनने। मूने कि नपसः क्षमा इन्द्रियजयेः सत्य मेदाचारता । गगारीने च विभौन चैन न स यनि लिङ्गी भवेन केवलम् ॥३॥ संम्छनटीका कि निषेधावसत्यननन वसनन्यागेनाभी उत्तमसम्बोधने मुनिः) यतिः अमौप्रियाए झानावना एनावन्मावण जायते भवनि.वडेन कन्सुलिकया चिन रहिनः पिनगः मर्पः गनविषः रहिनगरलः[किनिषेधे जानवान भूनवान् भूनलेवाटे मूल कारण कि पणे तपसः नपनस्यानमा सहिष्णु नाईड न्द्रिजयः स्पर्श रस घाण चमः श्रोत्रा पञ्चेन्द्रियाणी म्वविषयेभ्यो दम निगधः सन्य] अन्नन्य मिदाचारनामचरण त्वं रागादीन गगः पीनिः यादि शब्देन पः काधमानमाया लोभादयापिनाया ३ पुनःविमान पप्रियनिाचेनीयदि लिङ्गी वे शधारी भिवेत जाये केवलम् एकम् ॥ अन्वयः भोयते इतिशेषः एतावना वस्वन्यजनेन । असो किम्मुनिर्जायने क्ष्वेडेनच्युतपन्नगः भू तले कि गतविषोजानवान् । नपतो मूलंकिम्। क्षमन्द्रियजयः। सत्यं सदाचारता। चेन रागादीन् विभनिसः यतिन केवलं लिङ्गी भवेन ॥३॥ भाषाटीका भो यति क्यायह इसवखकेही न्यागनेसेस नि होजाता है केंचलीके छोड़ने से क्या पृथ्वी पर सांप निर्विष होजाताहै नपका मूल क्या है क्षमा इन्द्रियों का जीतना सत्य बोलना श्रेष्ठ पाचरण पालना और जोरागादिक की बढ़ा या तो वह यतिनही है केवल लिङ्गी अर्थान देशधारीही है ॥३॥ भाषाछन्द भोयति केवल वस्त्र उतारनौं यह। क्या मुनिहीबनजावे।काँचलिछा हुनसौंधरणीपर सर्पकहाविषवर्जि 74- --- 14 तधावे। मृल कहातपडन्द्रियजीतनमन्य क्षनाशुभचारितगावे। रागदपजुपुष्टक रेनव नाहियत्ती परलिंगवनावै ॥ ३ ॥ मूलम देहेनिर्ममतागुगैविनयतानिन्यं प्रतास्यासता चारित्रोचलता महोपशमतासंसानिर्वगता। अन्तरवाहपरिग्महत्यजनताध- मीज्ञतामाधुता।माधामाधुजनः स्थलक्षणमिदंसंसारविशेषणम पदच्छेदः देहे निर्ममता गुरी विनयता निन्यं कना- स्यासता चारित्रो ज्वलता महोपशमता मं सारनिर्वगता अन्तरवाहापरिपत्यजनना धर्मज्ञाना माधुता साधासाधुजनम्य लक्ष णम् इदम् संसार विक्षेपणम् ॥४॥ संस्कृतटीका (देहे शरीरे निर्ममनाममन्वपरित्यागः गुग। हितोपदेशक विनयता नमुना निन्यं ९ १ MAAMIR - सक्षा भताभ्यासत्ता] चारुद्रस्यभूयोचिन्तनं [चारित्रोचलता] आचारस्यनिर्मलत्ती महो पशमता] क्रोधमानमायालोमादीनांकषाया- नासयंमकारेणोपशमनस संसारनिर्वग तापञ्चपरावर्तनरूपसंसारेचतुर्युगतिधू- ब्दवजन्ममरण जरादि दुःखेभ्योभीतिः । न्तरवाह्यपरियहत्यजनता] अन्तरवर्तिनो- चतुर्दशधामिथ्यात्ववेदरागद्वेषहास्यरत्य रति शोक भय जुगुप्सा क्रोध मान माया लोभानां वहिःस्था दशधा क्षेत्र वास्तु हिर ण्य सुवर्णधनधान्यदासी दास कुष्य भा- ण्डानाञ्चैवच्चतुर्विशतिधापरिमाणात्या गः [ धर्मज्ञता] धर्मस्यवस्तुस्वभावस्य उत्तमक्षमामाईवार्जव सत्य शौच संयमतप त्यागा किचनब्रह्मचर्याणादशधाम स्यवाज्ञाटत्त्वं । साधुता] सुनेर्चम्मत्वं सा- घो हेयते साधुजनस्य मुनिलोकस्यल- क्षण! चिन्हं (इदम्] पूर्वोक्तं [संसारविक्षेप गं] जगतोनाशकम्॥ ॥४॥ अन्वयः भोसाधोसाधुजनस्येदंवक्ष्यमाणलक्षणं संसा- रविक्षेपणमस्ति इतिशेषः [इदंकिम् ] निर्ममता कम्मिनाद विनयता । कम्मि न्] गुग कनाभ्यामना कदानिन्यं चाचा चलता। महोपशमना मंमानिर्वगना अ. न्तर वाह्यपरिग्रहन्यजनता धर्मजना माधु- भापाटीका भोमाधुसाधुजनके ये लक्षण मंसार के नाम करण दारे हैं कौन हैं सोहिय है पागर में अपनायतन मानना गुरुजनों की विनयक रना सदाशास्त्र का अभ्यास करना चाग्निको. मल नलगावना कोधमान मायालाभादिक- पायों को उपशान्न करना संसार म डरना मि थ्यात्त्व : वेद २ गग ३दप ४ हास्य ५२ ति ६ अति शोक ८ भयई जुगुप्मा कोध ११ मान १२ माया १३ लोभ २४ भ न्तरङ्ग के और क्षेत्र : वास्तु २ हिरण्य ३ सुवर्ण ४ धन ५ धान्य ६ दानी दा स: कुप्य भाण्ड २ बाहर के गम. चौबीस प्रकार के पागमह का त्याग करना धर्मनाम वस्तु के चाव का है नथा उत्तम!' क्षमा १ माईव २ आर्जव र सत्य ४ शा. च ५ संयम ई पत्याग आकिम्बन ब्रह्मचर्य १० रूप दश प्रकार है तिस- काजानना और साधुपना ४ भाषाकन्द देहबिममतापरित्याग गुरुजन मैनतिशा स्त्र अभ्यासा । चारित उज्वलता अधिकीश मताभव भ्रान्ति थकीनितवासा । अन्तर बाहर त्याग परिग्रहसाधुपना अरुधर्मवि लासा । भोमुनिलक्षणसांधुन का यह सं- स्मृतिनाशैन कायम फाँसा ॥४॥ किन्दीक्षाग्रहणेनतयदिधनाको शाभक्चेतसि । किंगार्हस्थम नेनवेशधरणेनासुन्दरम्मन्यसे। द्रव्योपार्जनचित्तमेवकथयत्य भ्यन्तरस्थाङ्गना नोचेदर्थपरि महमहमतिर्मिक्षोनसम्पद्यत ५ पदच्छेदः किम् दीक्षामहणेन ने यदि धनाका क्षा भवेत् चेतसि किम् गार्हस्थम् अनेन वैशधरणे mes कि दि न अनुन्दरम मन्यसे द्रव्यापार्जन चितम् सेवक- थनि अभ्यन्तरस्याङ्गनाम् नोंचेत् अयं पीरबह सहमतिः मिझोन सम्पद्यते ॥५॥ संस्कृत टीका किन निषेधे- किमपिनादीदागरणेनामंन्यमा धारणेन-पुत्रकालवग्रहादीनांन्यागेनानानवाय दिाचताधनाकामा द्रव्यम्यवान्छा भवनास्यात् तिमिामनमिाकिमा प्रणेवित:वा गार्हस्थ सहवास अनेनापूक्तेिन मनामधनादाटत्वाव पहिर्वस्वादीनान्तमगेना वेशधारणेन 1 नानप भवनेन असुन्दरम्) अनेटमामन्यसाजानान्नि शेट्रव्योपार्जनचितम् धनादीनामाहर्टमनः गवानि व्ययेनकियति वदति [अभ्यन्तरस्याङ्ग नामा न्तिरवर्तनी स्त्रियांनोचेत अन्यया अर्थपरिग्रहग्रह मितिः अर्थधनंतदेवपरिग्रहः अर्थपरिग्रह-तम्या होमहणंतस्यमति वुद्धि भिदोमुनानसम्पद्यतन जायते ५० अन्वयः भोमियो यदि तेचेतसिघनाक्षाकां भवेत नाह इतिशेषः दीसायहणेन किं अनेन वेश धरणेन किम् गार्हस्थमसुन्दरंमन्यसे द्रव्यो पार्जनचित्तमेवाभ्यन्तरस्थाइ-नांकथयति नों चेदर्थपरिग्रहमहमतिर्नसम्पद्यते ॥५॥ भाषादीका भो भिक्षुक जोतेरै चित्त मैं धन की चाहतेहै। तौ दीक्षा लेने से क्या अर्थात कुछ भी नहीं इस मुनि के वैशबनानेसै क्या गस्थपने कोबुरा जानें है द्रव्यके उपार्जन का चिंत्तहीमनोवत नी नारी को बतलाता है नहीं तौ धनरूयपरिय हके ग्रहण करनेकीमति उत्पन्न नहीं होती ५ भाषाकन्द जो धन की रुचि है उर अन्तरसंयम धारण मार न जाने । ऐस अपावन वेश बनावन सै। घर बार बुरा किम माने । द्रव्य उपार्जन चित्त निरन्तर अन्तर कामनि चाह बरवान । नातर हे मुनि अर्थ परिग्रह लेन कि बुद्धि कदापिन ठान॥॥ मूलम्॥ योषा पाण्डुक गोविवर्जितपदे भ - भ संतिष्टभिटोसदा । भुन्दाहार मकारितं परहन्लब्धयथासम्भ वम् । पडधावश्यकसलिया. सुनिरोधमानुगगंवहन । मा योगिभिरामभावनपरिनत्र- यालङ्कृतः पदच्छेदः योषा पाण्डुक गोविवर्जिनपद मंत्तिष्ठ भिक्षा मदा भुत्वा आहारम् अकारितम् परग्रहे लब्धम गया सम्भवं षड्धा आवश्यकमल्कियाम निग्नः मानुरागम् वहन् माई योगिभिः आत्मभावनपरः रित्नत्रयालङ्कतः॥६॥ अन्वयः योषा] नारी पाण्डुकानपुंसकम्गाः पश्यतःच अर्जिता रहितः पदेास्थाने सन्निष्ट उपविशगिभ- वामिलो याचकामदा निरन्तरम्भुका स्वादिन्या [आहारम् अशनम् आकारितम् स्वप्रेग्णाविना अन्येनस्वेच्छयाकृतदत्तमा परमंदा अन्यम्यागारे [लब्धम्! प्रामम । ययामम्भवयन पकांगा सम्भवनीयम् पड्धा घट् प्रकाग[आवश्यक सन्नियासु] सामायिकच्चतुर्विशति तीर्थकरस्ता वनवन्दना प्रतिक्रमण प्रत्यारव्यानकायोत्सर्गाः घटप्रकाराः आवश्यक क्रियाः तण्वसन्किया। अष्टाचरणानितासु [ निरतः] लग्नःधर्मानुरा गं! उत्तमक्षमादि घुपूर्वोक्तेषुदशधाधर्मेषुारा गोरुचिं वहन् धारयन् ।साईयोगिभिः] मु- निभिःसह आत्मभावनपरः चेतनस्वभावली नारनवयालंकृतः सम्यग्दर्शन ज्ञान चरित्र स्वरूपै स्त्रिभीरत्नैर्भूषितः॥६॥ अन्वयः भोभिक्षोत्वंसदायोषा पाण्डुकगो विवर्जितष- दे सन्तिष्ठ किंकृत्वा परगृहे यथासम्भवमका रितमाहारंलब्धभुत्वा कथम्भूतःसन् घड़ाव- श्यक मन्क्रियासुनिरतःपुनः धर्मानुरागंवहन पुनःयोगिभिःसाई आत्मभावनपरः पुनःरनव्या भाषाटीका हेमुनि पराराघरविनाक्नवारा मोजनको जोदैव योगसेजैसातेसातुमको मिलजावैखाकर सामायि क १ चौवीस तीर्थकरस्तवनवंदना३ प्रति क्रमण ४ प्रत्याख्यान ५ का योमर्ग छह आवश्यक रूपमन्झियायों में लौन हवा दालनाधर्ममें गगधारना आ त्मभाव में लगा हवा ग्नत्रयकर भूपिन भनि जनों की साय नारी नपुंसक प रहित म्यानमें निष्ट ॥६॥ भायाछन्द नारिनपुंसक पगड विवर्जिन थान विप निततिष्टभिरवारी । लेकर भुक्तकारि तजोपरगह मिला विधिक अनुमान । पालअवश्यक पद सुक्रियास्त धम्मधुर न्धरही अनगारी साधुनमाथ समागम आनमलान त्रिरत्न विभूषण धारी ॥६॥ दुर्गन्धंवदनंवर्मलभृतम्भिक्षा ट्रेनाड़ोजनं। शय्यास्थगिडल मिथुप्रनिदिन कटवाननेकपटं। राड मुण्डिनमईदग्ध शवक्त्वं है श्यतेभाजनैः। साधोद्याव्यवलाज नस्य भवतो गोष्ठी कयं रोचते ॥७ पदच्छेटः दुर्गन्धं वदनं घः मन्नभूत भिचाटनान ।

भोजनम् शव्यास्थण्डल भूमिष प्रदिदिनम् कच्चा न ते कपट मुण्डे मागडत अददग्ध गयवत बम हश्यते भीः जनः साधो अद्या पि अवलाजनस्य भवतः गोष्टी कथम् गवते ॥७॥ संस्कृत टीका दुर्गन्धा असौरमविदनम् सुखम् विषः] शरीरममिलभूतम्] रजसालिममा भिक्षा उनात् अईनायगमनात भोजनम् अशा नम् शय्या शयनम्[स्थण्डिलभूमिषु] कठिन वरीषुप्रितिदिनानित्यं किट्या नितम्बलानव किर्पटम् कौपीनम् [मुण्डं] शिमण्डितमूकेशरहितम् [अईदग्ध] यावचा अईलष्टमृतकेन तुल्यम् त्वम्] मध्यम पुरुस्यैक वचन वाचिनः सर्वनाम्नी जाच्या हश्यतेप्रतीक्ष्यतेजिनालोकः। (सायो सुने अद्यापि अद्यपर्यन्नमपि । सबलाजनस्यानारीलोकस्याभवन तव गाशावचनालापासकथम् केन प्रकार रगारीचतेकान्यते ॥७॥ अल्वयः भी साधीभवतः अवापि अवलाजनस्य टी कथंरोचने नेवदनम् दुर्गन्धम् वपुःमल भृतम् भोजनम्भिनाटनात स्थगिडल भूमि प्रतिदिनं शय्या कट्या कपटेन मुगडम् मुण्डिनम् पुनः जनः स्वमईदग्ध शववत् दृश्यते ॥७॥ भाषा टीका भी साधु नेरे मुख से नौ दुर्गन्ध आनी और शरीर रजसे मलीन होरहाहै और भीख माँ गकर भोजन करताहै और कठोर कंकरीनी भूमिपर नित्य सोताहै कदिमें कोपीन नक भी नही है नागों की दृष्टिम अाधेनन हुंचे मृतक समान दृष्ट पड़ता है अब लीभीनी जनों की साथ बचनालाप करने की नरामन कैसे लुभानाहै ॥७॥ भाषाछन्द श्रावत गन्धबुरीमुख अरुधूसर अङ्गभिछाकरवाना। भूमिकटोरविय नितसोवननाकाटमें कोपीनप्रमानाम, गिडतमुण्ड पागलोकनभईजनमत, अङ्ग:समाना।नारिनकमंग भोमनि अपि चाहत क्यों कर बान बनाना ॥७॥ अहंशोणित भुक्रसम्भव मिदम् दोस्थिमज्जाकुलम् । वा माक्षि कपत्रसविनमहोचीकृत सर्वतः नोचेकाकवादि भिवपुर हो। जायेतभक्ष्यंधवा दृष्टाद्यापिश रीरसनिक निर्वगतानालिते। पदच्छेदः मोणित शक संभवम् इदम् मैदोस्थि मज्जाकलने वाद्ये मानिकपब सन्निभने अही चम्मावतसर्वतः नौचेत काक वकादिभिः वपुः अहो जायेत् भक्ष्यम् व इष्टाध्यापि शरीर सशनि केयम् निर्वगतान अस्तिते । संस्कृत टीका [अङ्गम् शरीरमशोणि कसम्भवम्] रक्तवीर्याभ्यांजातम् दिदीसन्सुखीभूत [ मेदोस्थिमज्जाकुलमा वसा काकसा स्थि सारे तमूविाय वहि माक्षिकपत्र मन्निभम्मतिकायाः पंतसमुन्यम [अंडी) आय चिाहनम् चम्मरणाविष्टितम। सर्वतः समन्तत:निचित: नान्यथा काक वकादिभिः वायमचनाकादिभिः मामति मिर्जन्नुभिःविपुः शरीरम् अहा शोका जाये ताभवेत भिक्ष्यमा भोजुयोग्यमानानिनि नम्[दृष्टावीक्ष्य अद्यापि इदानीमपि गरीर, सद्यनिदिहागारे कथम किमर्थमानिवंगना संसारे भ्रममान भीनिति त्वामानास्निान विद्यते ॥८॥ अन्वयः अहो इदमझाम् दृष्ट्वा अद्यापि शरीरमान ने निवेगतानास्ति कथम्भूतसङ्गम गागिन शुक्र सम्भवम् पुनः मेोस्थिमज्जाकुलम नः वायसर्वतः मानिकपत्रमविभम पुनः च मीदतम नेवेत काकवकादिभिः उदं वपुः भत्यं जायेत ॥८॥ भाषाटीका यह शरीर लोह औरवायसे उत्पन्न भयाहै हाड मांसमन्नादि अपावन वस्तुसे भराई वा हिरसे मावीक पंख समान चामफेन्नपेटन में सब बोड़से लिपटाहवाहै नहीती कागबगला दिक जन्तुवोंका खाजा होजावै यह देखकरमी जो तुझको शरीररूप घरमै विरकता नहीहै तो बड़ा आश्चर्य वाशीकहै ॥८ भाषाछन्द शोणित बीरजमा उपजीयहदेह अपावन बस्तमरीहै। बाहिरमाक्षिकपंख समा नजुचामलपेटनसीमुथरीहै । नातरवा यस और बकादिक भुन्जत संशयकोन करीहै । यौलख अद्यपि तैवह विस्मय देह विषममतानहरीहै ॥८॥ दुर्गन्धनवभिपःप्रवहति हारैरि. सन्तता नदृष्ट्या पिचयस्य चेतसि पुननिर्वगतानास्तिचेत् । तस्यान्य विवस्तुकीदृशमहोतत्कारणक ध्यता। श्रीखण्डादिभिरड संस्क तिरियं व्याख्याति दुर्गन्धतामा पदच्छेदः दुर्गन्ध नवनिः वः प्रवहति द्वारैः इदै सना नम नेन् दृष्टा अपि च यस्य चैनसि निः निर्व

गतो न अस्ति तम्य अन्यन भुवि वरू
कीदृशम यही नम्कारणम कथ्पनाम श्री
दण्डादिभिः अङ्ग मस्कृतिः इयम व्याख्या-
ति दुर्गन्धनाम ॥
संस्कृतीका
[दुर्गन्धमाअसीरममा नवमिःोगकान दनिः
संरत्याप्रमाणे:विएशरीरममिवाना भवनि
हारे] चिंद्रः इदं मन्सुरी भूत मन्नानी निरन
तितो पूर्वोकालावीन्याचामन वनाम।
मनसि जिनाबानिदंगना वैराग्यमानान्तिः
नविद्यतेचिनायदि तिन्यास्वंदृष्ट्वाए निर्वगाता
मकारिणः पुरुषस्य अन्यनाइनरत भवि]
पथिव्यामविस्त पदार्थः कीदृशाम किनाम,
घेयम् केनतुल्यवाही आश्चर्यानत्कार
तस्यहेतु कथ्यता प्रोच्यना श्रीखण्डरादिभिः
कश्मीर चन्दनादिभिः पूड-संस्कृति में शरीर
स्य भङ्गारः यापूर्वोक संस्कातेः पूर्वोक्ता
अङ्ग-संस्थतिःविारव्याने प्रकीकरोतिदुर्ग
न्यताम् असौरभम् ॥
रदं वपुः दुर्गन्धं नवहारैः सननं मवहति नही

वापि यस्य चेतसिचेत् निर्वगतानास्ति बहोत स्य भुवि अन्यत कीदृशंवस्त तत्कारणम् भ पनि इनिशेषः कथ्यताम् उच्यती श्रीखण्डा दिभि रियंसंस्कृतिः दुर्गन्धतारव्यानि ॥६॥ भाषाटीका यह शरीर दुर्गन्धवान है नवद्वारोंसे निरन्तर फिरेहै तिसको देखकभी जिसके चित्तमैं यदि विरागता नहीं है नौकहिये एथ्वीपर औरकी नसीवस्त तिसकें वैराग्यकी कारण है यह चन्दनादिक का संस्कार दुर्गन्धताको मघट करताहै ॥६॥ भाषाछन्द देहबुरीदुर्गन्ध भारीयह नौमलबार वहैं नितया । ताहि बिलोकनही बिराग। अहोचितमें इमपूछतता । कौनअपाव नवस्तथरापरहो विरतीचितमैं लरखजास कैसर आदि सुगंधित वस्तुलहैं दुर्गन्धा स्पर्शततातूं ॥६॥ वीणांभावबिलासविचमगतिह लानुरागमना ।म्मागास्वविषयक्ष F ५ amerammamine 1-3 कि पक्कफलवत्सुम्वादबत्त्यानन पत्सवनमात्रतापिमरण पुमानायक निभाः। तस्मादिविपाहिवार रत्वदृप्तामृत्यव ॥१॥ पदच्छेदः स्त्रीणां भावविलास विभ्रमगतिं दृष्टा अनुगगं मनाक मागाः त्वं विपक्ष पत्र फलवन मुन्ना दवन्त्यः तदा ईयत्मेवनमावतः आणि मग सा प्रयच्छन्तिभोः तस्मात् दृष्टि विवाहिवत पर हर त्वं दूरतः मृत्यवे ॥२॥ संस्कृत टीका [स्त्रीणां नारीणां भाव विलास विभागात अङ्गोपाङ्गकृत चेष्टां। दृष्टा ] बौक्ष्य अनुग ग] मोहं. (मागाः] मागच्छ [विध टक्षय व फलवत् ] हालाहलम्य नरोः परिणतन- फले न तुल्यं । सुस्वादवन्त्यः] मनोजरमेन युक्ताः [ तदा ] तस्मिनकाले । ईपत्सेव निमात्रतः } किञ्चिद्भोगनादेव । मरणं! नाशं [ पुंसां ] नराणां [ प्रयच्छन्ति । ददति । भोः । सम्बोधन [ तम्मान P4 ततोहेतोः। दृष्टिविपाहिवत् दृष्टीविषयस्या स दृष्टि विषः सरावाहिः दृष्टिविपाहिःसर्य विशेषः तेनतुल्या परिहर] परित्यन [दूरतः। दूराव [ मृत्यवे जीवनाय ॥१०॥ भोयते स्त्रीणाम्भाव विसम विलास गतिं दृष्ट्या त्वंमनागयि अनुरागंभागाः कथम्भूताः स्त्रियः विष दक्षपक्क फलवत् सुचादवन्त्यः पुनःई पत्सेवनामावतोपि पुंसां मरणं प्रयच्छन्ति त- स्मात् दृष्टि विषाहिवत् त्वं मृत्यवे दूरतो प- रिहर ॥ भाषाटीका भोयति स्त्रियों की भावं विलास विभ्रमग- तिको देख तूटुंक भी अनुराग मत कर ये स्त्री जन विपक्ष के पक्के फलवत् श्रेष्ठ खादु वाली हैं और तनक से सेवनमात्रसैपुर रुषों को मृत्यु देती हैं भावार्थ जैसे विषके दक्ष का पक्का फल खाने मैं तौ मीठा होता. परन्तु थोडासा खासभी प्राण जाते हैं सही स्वीजनभीमोगकालमैंअच्छीलगती हैं परन्तुअ- न्तमैंनस्कादिदुर्गतिकोपहोंचाती हैतोइसलियेटोष्टीवप जातिकै सप्पसमानतइनको दूरसहान्यागदे भापाकन्द देव त्रिया जनकी गति विभम और विनासन दो अनुरागी । है विषयवतने फल पक नमा न सुस्वादनमैरसपागी । फिन्धित सेवनमन- र याकरमृत्युलहै दुख पायधभागी नामुनि रहित नजकामन दृष्टिवियाहिसमान विरागी यद्यद्वातितत्तदेववपुपेदनम् पुर्यत्वया । साई नैतितापित जड़मतेमित्रादयायान्तिकिम । ण्य पाप मितिद्धयञ्चभवतःएए. नुयातीहते । तस्मान्माम्मश्याम नागपिभवान्मोहंशरीरादिषु ॥२९॥ कि यद् यद् वान्छति नद नद राव वपुषे दनं सुपुष्ट त्वया मा नाति तथा अपि जडमते मित्रादयः यान्ति किम पुण्य पाप wront Pra कि इति द्वयं च भवतः एष्टे अनुयाति इह तेन स्मात् मास्म कथाः मनाक् अपि भवान् मोह प्रारीरादिषु ॥११॥ संस्कृत टीका यंघद्] यानि यानि भोज्य वस्त्रादीनिवस्तूनि [ वाञ्छति] आकांक्षति वपुषे] शरीरायादत्तं त्यतं सुपुष्टं ] वलदायित्वया भवता सा ईसह नैतिानगच्छतिातथापिातदपितितव जामतेमन्दबुद्धमिवादयामिवंसखा आदिशब्देन कलबबांधवप्रभृतयः यान्तिागच्छन्तिकिमानिये धेन गच्छन्तिइतिभावः पुण्यापूजादानादिशुभकृत्या पापंाहिंसाभूषादिपञ्चपापरूपमशुभकृत्याझ्या इन्दाभक्तगतवाटष्टा पश्चाताअनुयातिाअनुगच्छतिति इहाअस्सिन्लोकानातवातस्मातानताहेतोः[मास्म- कथाःमाकुरुामनागपि अल्पमपिाभवानात्वामोहो स्नेहंरागंवा शरीरादिषु।शरीरंवयु आदिशब्दनमित्रक लवधनधान्यादयः११ अन्वयः हेजडमते इदं शरीरं यद्यद् वस्तु भक्तःवा न्छति त्वया तत्तदेव वपुषे सुपुष्टं वस्तु दत्त तथापि तद् शरीरं तेसाई नैति ददा मित्रा- दयः किंवलिदानपुण्यं पापन्तद्वयंभवतः एए अनुयानि तन्नान शादिषु भवान माग पिसोहं नामनाया: १ 'भाषाटीका हजडमनि जोजो वस्तु मांगी मोमो पुष्ट वस्तुन्न शगर कोदईनाभीयहगतरानाथ नदीमा तो मित्रादिदा कम जोंगे ने पुण्य पाप हीदोनोंय. हां तेरे पीछे चलेंगे इसलिये टुकभी शगेदिक में मोह मतकर ॥१॥ भाषाकन्द जो कुछ माँगत वस्तुमु पोषक नृतनका निनदेन अज्ञानी । ती पणयह तवसंगनजावहिमिवन्न की फिर कौन कहानी । पुण्यम पापचले नव यी हुनुइन दोवन का अगवानी । योलम्बो डशरीरममृतिनमरहमोहमहा दुग्वस्वाना ।। मूलम् शोचन्तेन मृतंकदापि वनिता द्यस्तिगेहधनं नचन्नास्तिमद न्तिजीवनधियास्मृन्वा पुनः- त्यह कृत्वातदहन क्रिया निन -

१-१ स अ कि
निजब्यापारचिन्ताकुलाः तन्नामा
पिचविस्मरन्तिकतिमि सम्वत्सरैः
योषिता:१२
पदच्छेदः
शोचन्त में मृत कदापि वनिता यदि अस्ति
गेहे धन तह चेतन अलि सदन्ति
अ. पू-कि
नधिया स्मृत्वा पुनः प्रत्यहं कृत्वा तद्दहन
किया निज निज व्यापार चिन्ताकुलाः लेना
आय च विस्मरन्ति कतिभिः संवत्सरैः
योषिताः१२
संस्कृत टीका
निशोचन्ते। नशोककुर्वन्ति मतं त्यक्त पाणी
[कदापि कस्मिन्कालेपि वनिताः]लियाया।
दिचेत् [अस्तिावर्ततोगह आगाराधनाविताता
दापूर्वोक्तधनानास्तिानमवत्तिारुदन्तिाशोकालिशः
सन्त्यः अनुपातं विमोचयत्ति जीवनधिया प्राणानोरक्ष
णबुद्ध्या एवंमाभूत्यदस्माकं प्राणाः नश्पयुःस्मृत्त्वा
विचित्यपुनःअभीक्ष्णं प्रत्यहं प्रतिदिनं नित्यंशत्यादि।
चायतद्दहन कियातस्यमृतक शरीरस्थानीसंस्कार विधान

निज निज व्यापानचिन्ना कुलाः दन्तकालय दचिताः तन्नापित कर भयान पिविस्मन्दि नदिधानानमः कियद भिः संवत्सर वय अमिता नाय र अचयः अर्याद गधनमरिन नदि नित्ताः पानं कपिन पाचन्ने चेहद नाति पुनः भन्यजीवधि- या मतस्मृत्वादन्ति तहदनकियां शवास बिन्धिनोजनाः निज निजव्यापर चिन्ता कुन्नाभ वन्ति योधित्ताश्यतिभिःवत्सरे नन्नामापि मि स्मगन्त १२ भाषा टोला जो घर मैं धन है तोन्नी भी सरे पतिका शोक नहीं करती है और जो धन नहीं है तो अपनेनी बने की इच्छा धारण कर भनिदिन मरे पतिको स्मरण करके रोता है उसकी दंध किया होने पर ग्यंधी जन अपने अपने काया मैचिन्ता तुर होनाते हैं कुछ वर्षयतीत होने पर अव- लानन उसका नाम भीपालनाती हैं भापाकन्द Ary । जोधर मैं धन होन कदापिकरैंतिय सोचम- रेवलमा की। जोनहि होधनता नितरोवत धारहिये अभिल्लाप जिवाकी । दधकियेप रसर्व कुटुंबिनस्वार्थलमैं ममता तजताकी केतिक वर्षगए अवलाजन मूलँहिनामनले सुधिवाकी ९२ अष्टाविंशतिभेदमात्मनिपुरासरी प्यसाधोन्नतं साक्षीहत्य जिनान् सुरूतपिकियत्कालंत्वयापालितं भक्तुंवाञ्छसिशीतवातविहतोभूत्त्वा धुनातदटतं दारिदोपहतःस्ववान्त मशनमुळेसुधाषिकिम् १३॥ पदच्छेदः अष्टाविंशतिभेदं आत्मनि पुरा सरोष्य साधो बत सादीकृत्य जिनान् गुरून् अपि किय- त्काल त्वया पालित भक्तुं वान्छसि शी- तिवात विहितः भूत्वाअधुनातव्रत दारि- कि -१ पू- अ म ठोपडतः स्ववान्त अशन सुधानः अपि किम् ॥१३॥ संस्कृत टीका (अष्टाविंशतिभेद अएनिधिका वितिर्भवाः काराःयस्य तद् प्रकारा नाह अहिंसा मयंक अचार्य ३ ब्रह्मचर्य ४ अपरिग्रहः ५ एवं पञ्चमहाव्रतानि ईय्या १ भाषा २ एपणा आदाननिक्षेपणं ४ प्रतिष्ठापनंगपञ्चसमि नयास्पर्शनं १रसनं रघ्राणेश्चनः योत्रं पञ्चेद्रियाणि तेषां स्वस्व विषयभ्यावलात्कारेण व्यावर्तनमिति पञ्चेन्द्रियविजयःघड़ावश्यका स्त पूर्वमेवषटमकाव्यस्य टीकायांकथिताः भूमीशयन ? स्नानत्यजन र दन्तधावनत्यागः३ वस्त्रत्यजनं ४ केशलोचनं उद्दण्डमहारः ६ ल्पभोजनं तदपि दिने एकयार मेव.७(आत्म नि) स्वस्मिन् (पुरा) पूर्वस्मिन् काले(सराप्य धृत्वा साधो मुने व्रतं । पूर्वोक्त मष्टाविंश तिभेदं नियम ( सादीकृत्य सादान दृष्टीन छत्त्वा ( जिनान् केवलिनः ( गुरून जे नयतीन् ( अपि) निर्धारण कियन्मालं ।

par1 कानिचिदिनानिस्त्वया भवता(पालित पोषित (भक्तबोटयितरबाज्छमिका मयसिरशीत वातविहतः शीत वायुभ्यो योडिन (भूत्वा सित्वा अधुना इदानीं (नदवनं। पूर्व कथितं व्रतंत्दारिद्रोपहतः । धनराहित्येनापदग्रस्तः स्ववान्तंबात्म नोवमनं (अशनं भोजनं(मुझे खादति सुधार्नः बुभुक्षयापीडितः किम निषेधे न मुले इतिभावः ॥ २३॥ अन्धयः हे साधो पुरा त्वया जिनान गुरुन् अपिसा तीकृत्य अष्टाविंशतिभेदात्मकंब्रतं आ त्मनि रोप्य क्रियत्कालं पालिने अधुना शीत वात विहतोभूत्वा नव्रतं भई बा ज्छसि दारिद्रोपहनः वधानीपि के स्व वान्तमशनंसत नमुक्ते इति भावः १३ भाषाटीको हे साधुतूनै पहिले कैवलि भगवान और जैन गुरों की साक्ष लेकर अठाइस मूलगुण आयुक्त तिनके नाम अहिंसा १ सत्य २ अचार्य ३ ब्रह्मचर्य ४ अपरिग्रह ५ येपाँचमहान ताई-१ भाषाएषणा आगननिक्षेप Samir --- - ४ प्रनिटापन ५ ये पांच मिनिम्पर्णन रसन २ प्राण ३ चक्षुः यात्र ५ नपाँची । रन्द्रियों का अपन अपन विषयम बनान्कार कर रोकना ये पौच इन्द्रिय विनय छह भाव श्यक तिनका स्वरूप इसग्रंथकी छटी काव्य केरीकामें किया मिशयन वानन्यन नर बन्नधावनत्याग वसज्यजनकेण लोच उद्वराडभाहार अल्पभोजन मोभी एक दिनमें सकवार चनकोआपधारण कि या और कुछ कालला उसको पाला अव शीन और वायुकी वेदनासे विहलहवा उ सको तोड़ना चाहनाहै कादीन दौरेद्री पुरुष भी भरवसे पीड़ित हवा अपनी वमनको आ परवाताहै भावार्थ नहीं रवाना है ॥२३॥ भाषाछन्द आठरुविंशति मूलगुणा नमनै मुनि पूर्वमम बनलीना। देवगुरु जन मारवदियधर के तिक कालजु पालन कीना । गीतरु वायुन दरबसै डर खंडनमे तिसके चितदीनाटी निक्षधातुरन भिकहीं निजछदैनना किम भी, जनकीना ॥३॥ मृलम अन्येषां मरणं भवान गणयन्त्र स्यामरत्वंसदा देहिन् चिन्तय- सीन्द्रिय दिपवशीभूत्वा परिभ्रा स्यसि अधश्चः पुनरागमिष्यनि यमो नज्ञायतेतत्वत स्तस्मादात्म हितंकुरुत्वम चिरादार्मे जिनेन्द्रो दितम् ॥ ॥ १४॥॥ पदच्छेदः न्येषों मैरणे भवान् अगणयन् खस्य अमः रखें सदा दैहिनं चिन्तयसि इन्द्रिय दिपव- शी भूत्वा परिमाम्यसि अद्य श्वः पुनर ओ. गमिष्यति यमः न ज्ञायते तत्वतः तेस्मात आत्महितं कुरु त्वं अचिरात् धर्म जिनेन्द्रोदि ने ॥२४॥ संस्कनटीका [अन्येषां! इतरेषा मरण पाणवियोगाभवा नाव अगणयन् ! अविचारयन्। स्वस्य आन मनः [ अमरत्वासरणाराहित्यं जीवन त्वमि. ति। सदा शश्वतादेहिन्] आत्मनाचिन्तय मि। विचारयसि [इन्द्रिय द्धिपवशीभूत्वा स्य मान सन् घ्राण चक्षुः श्रोत्राणि पञ्चेन्द्रिया णितान्पेषगजः तस्य पादाक्रान्तः सित्वा पार माम्यसि शयत् भ्रमण कराधि पय्याम संसारे इति शेषः गद्य वर्तमान दिने व्यः आगामिनि दिने पुनः वा पक्षान्तंर आगाम ति आयात काल मृत्युः नजायने नादन] म्यने स्वया इतिशेषः तत्वतः निर्णयन तम् ततःकारणात् आत्महित वर साधन कन्या णं कुरु विदधातु अचिरात् शीघ्र धर्म पं जिनेन्दोदितं केवलिना प्रणीतं ॥ ॥ १४ ॥ अन्वयः हे देहिन् भवान् अन्येषां मरण भगणायन न्च स्य सदा अमरत्वं चिन्तयसि इन्द्रिय द्विपय. शीभूत्वा परिभ्राम्यसि तत्त्वतः यमोऽधपुनःश्वः आगमिष्यति इनिन जायते तस्मात् आमाह तं जिनेन्द्रोदितं धर्मत्वं अविरात् कुरु ॥२४॥ भाषा टीका हे आत्मातू औरों के मरने को नहीं गिणना हुवा सदा अपने नई अमर चिन्तहइन्द्रिय पिहाथी कादवाया हुवा ममता फिर है टीकय नहीं जानता कि काल आज या कल अव. श्य आवेगा इसलिये अपना हितकांगमयेनके वली का काहा पसंतूशन धागा कर २४ भाषाछन्द औरनकामरनाअबिचारत तू पना अमरत्व विचारै । इन्द्रियरू पमहागजकावशि भूतभया भवभ्रान्तिनिहारे। आजहि । श्रावतवाकलके दिनकालनेतू यहरचचिता। नौग्रहधर्म जिनेश्वरभाषित भोभवसन्तति बेगनिवारै ॥१४॥ सौरव्य शामिवियागतम वेदानंतपोवारुतं। नोचेत्त्वंकि। मिहैवमेवलभसे लब्धंतदत्राग ताधान्यं किलभते विनायिवप नंलोके कुटुम्बीजनो। देहेकोट कभक्षिततसदृशेमोहं वृथा माकथाः ॥१५॥ पद : सौख्य बान्छसि किम् त्वया गरभवे दान = --- नपः वा कन नाचेनन् किम् उद विएवं नभसे लब्ध नदे अत्र आगन धान्य किम लमत विना ऑप वपन लाके कवी ने नः देहे कीटकभक्षिनेनुसगै भाई या माकृथाः ॥१५॥ संस्कृतीका [मौरख्या भानन्दतांचिान्छसि आकनिमि [किमप्रियान्वया भवता गनभवोपर्व स्मिा, न जन्मनिदानात्यागः तचापध्याहाराम यशास्त्र भेदै श्यवर्धा अथवा राग डेययोः परिहारनपः तपनं नच अनशानावमी दर्य व्रतपरिसंख्यानरम परित्याग वि वक्त शय्यासन कायक्लेश भेदैः पधावा हिरङ्गं प्रायश्चित्त विनय चैया नृत्य स्वाध्या यव्युत्सर्गध्यान भेदैग्न्तरङ्गज्वपड्या एवंददशभेदंीवापतान्त कृतीविहिन [नोचेत]अन्यथाविभवाना किमानिषेधे एवंा इत्य एव निश्चयेनलिभमे रहा सिलिब्ध प्राप्त अनाअस्मिन् लोके आ गतं आयात धान्योशालि किमानियेधे लभने गृह्मानिविना वजनापि निधी रविपनबिनोत्पत्यभूमी गालियना दीनां क्षेपणालोका संसारेकुटुम्बी कृषाणः जनः]पुरुषः देहे! शरीरे।कीटकभक्षितेक्ष सहशे कृमिवादिताइक्षुदण्ड तुल्यामोहं! राग: माकथाः] माकुरुस्व ॥१५॥ अन्वयः हे प्राणिन् त्वं सौख्यं वाञ्छसि किन्त्वयागत भवे दानं वातपः कृतं नोचेत् इहि स्व मेवर किम लमसे यदलब्धं तदत्रागतं लोके कुदु- स्वीजनः किंबपनं विनापि धान्यं लभते कीटक भक्षितेखुसदृशेदेहे दया मोहंमाकथाः ॥१५॥ भाषा टीका हे जीव तू जो सुख की बाञ्छा करता है क्या तूने पूर्व जन्म में दान दिया था वा तप किया था जो नहीं किया तो इस लोक में यह सुख- तुझको कैसे मिलै जैसा पूर्व कियायावसा. यहाँ प्राप्त भया संसार मैं किसाण लोग बिना बास भी कहीं धान्य उठाने हैं कीड़े के खाए- ईख समान इस शरीर मैं तू यथा मोहम त कर ॥॥१३॥ भाषांछन्द लाहत है सुख क्या पिछलेमवदान दिया अरु सयमन्लाना । नाना याभव तमुख प्रापति हनिमडमा पुगकृतवा ना। कीटकक्षिात ईत्वममानगिरीवः पैतज माह प्रवीना ॥ १५॥ आयुष्यं तव निद्रयार्द्धमपरं चा- युरिटभदादही वालत्वेजग्या कियद् व्यसनतायाति देहिन स्था निश्वित्यात्मनि मोहपाश मधुनासंछियवोधासिना मुक्ति श्रीवनितावशीकरण मच्चारित्र माराधय ॥१६॥ पदच्छेदः आयुष्य तवन्द्रिया अदै अपरं च आयदि भेदात् अहो. वानव जग्या किया गमननः योति इनि देहिन संख्या निश्चिन्य आत्मान मोहपाश अधुना मछिद्य बाधामना मुक्ति वनिता वशीकरणनचरित्र आगधय ॥ १६॥ संस्कृत टीका ४२ [आयुष्य जीवनातवा ते निद्या] स्वयेनाज ईएकस्य द्वौ भागौ कृत्वा तयोरेको भागः[आ परं] द्वितीयोभागः [चाइतरे तरयोगाआ युः पाण धारमजीवनं । त्रिभेदात्। विभिभी- गैः। अहो शोके विस्मयेवा [वालले शैशा वे अज्ञानदशायांजरया। वार्धके क्षीण शारी रे।कियत् किञ्चित्ाव्यसनतःा विषयसेव नात् तारुण्ये इतिभावः यानिागच्छतिा इतिारा वादेहिन्]आत्मन् वथा निरर्थकं । निश्चित्य निश्चयंकत्वा दृढ़ीकृत्वा आत्मनि। स्वस्मि न्। मोहपाशं रागर अधुना] इदानींस छिद्या मित्वा वोधासिना] ज्ञानखडेण । मु- क्तिश्रीवनिता वशीकरणसच्चारित्र। मोक्षल क्ष्मीरूपास्त्रियंवशीकारकष्टाचरणं आरा धया रहाण, धारय ॥१६॥ अन्वयः देहिन अहो तव अर्घमायुष्यंनियाभ परंचाई आयुष्यं बालत्वेजरया कियत्व्यस नतः त्रिभेदात् यथा याति अधुना आत्मनि गवं निम्यिन्य बाधामिना गहणणं मांक द्यमुक्ति श्रीनिता वशीकरणमन्त्रि राधय ॥1॥ भाषाटीका हे आत्मा शोक पाविस्मय कास्थान है नंग आयुका आधामागतौनीदमजाना है औरत सरा आधाभागवालपन बुढ़ापा औरतम्गाई मतीनभागहोकर रथाजाताह अवगे आप में निश्चयकरके ज्ञानरूपरखड़म मोहरूए फो- सीको काटकरमोदालतमीपत्नी वशीक रणहारे प्रष्टचारित्रको धारणकर ॥१६॥ भाषाकन्द आयुष अर्द्ध अरे मति मन्दव्यतीतभई तव नींद मंझारी । अत्रिभागवुढ़ाए नशैशव यौवन के वशव्यय दिमाग। आतम में दृढ़धार सुधीपहज्ञान बनी मुहपाश विदारी । मुक्तिनमा रममाव श कारण हो नित सम्यक चान्ति धारी ॥ २६॥ miMMP4 १rammad Tv यत्कालेलधुपात्रमण्डितको भूत्वापरेषांग्रहे। भिक्षार्थभ्रम सेतदाहिमवतोमानापमानेनकि- म् । भिक्षोतामसत्तितःकदश नात् किंतप्यसे हर्निशम्। यार्थकिलसह्यतेमुनिवरवी धाक्षुधाशुद्धवाः॥१७॥ पदच्छेदः यत्काले लघुपात्रमण्डितकरःभूत्वा परेषी रहे, भिक्षार्थ भ्रमसे तदा हि भवतः मानाप- मानेन किम मिक्षो तापसरतितः केदशना- न किम् तप्यसे अहर्निश श्रेयार्थ किल स ह्यते मुनिवरैः वाधा संधाधुद्भवा ॥ १७ ॥ संस्कृतटीका यत्काले यस्मिन् समयालथुपात्र मण्डितक परः लघु पात्रेणमण्डितः करोयस्य सुद्रभाज: न युक्त पाणिः[ भूत्वासित्वा(परेषा अन्येषा- रहे) निवासे । भिक्षार्थी भोजनायाभ्रमसे] गच्छमि भ्रमण करोपिनदानम्मिन काल हिायोग्याभवतः नवामानापमानन नाकार तिरस्कागभ्याकिम किमपिनाभिटो भिवाय।। जीविनातायसत्तितः तपम्चीनामाचरणान: कदशनात् कुन्मितभाजनात् किम कर्य तिव्यसे ग्वेदं प्रामापि अहर्निश दिवारा (या कल्याणाया किला निचयनामहा तेंमयेते मुनिवरः मुनिषु वराःश्रेष्टा तय निश्रेष्टेः वाधा पीडा क्षुधाधुदवा सुधाभा जनेच्छा आदिशब्देन पिपासा दयापि ग्रायाः सुधा आदियैषांते सुधादयः तभ्यः उद्भवती तिसुधाधुन्दवा ॥१७॥ अन्वयः हे भिन्नो यत्काल लघुपात्र मण्डितको त्वा त्वमितिशेषः परपांग्रह भिक्षार्थ भ्रमसन दाहिमवतो मानापमानन किम् अनिशंताप मनितः कदशनात किंतप्यम मुनिवर कि लश्रेयार्थ बुधाधुवा बाधामहांत ॥ १.५ भाषाटीका - है भिक्षुक जिसकालं मैं तू हाथ मैं छोटात पावलेकर मिक्षाके अर्थ औरोंके घरमैफि रता है तिसकालमें तुमको मान और अपमान सैक्या दिनराततापसरति और असेचकमो- जनसैया दुरखीहोता है अपने कल्याणके अ- र्थमहामुनिक्षुधापियासादिजनित वाधाको सहते हैं ॥१७॥ भाषाछन्द जाक्षण मैं लधुपावलियेपरपेहमें भी खजुमांगनजावै। ताक्षणमैं अपमानरु मानकहात्मानुनमीखमंगावै। मोमु- नितापसहोदिनरैनन अपियभोजनसै दुखपावै। मुक्त्यमिलाषिमहामुनिकष्ट सहहिजुभूखरुप्यास दिखावै ॥१७॥ मूलम् एकाकी विहरत्यन स्थितबलीव यथास्वेच्छया। योषामध्यरत स्तथात्वमपिभोत्यवायूथंय ते। तस्मिंदभिलाषतोनभ Remierwoman Househrent . वतः किम्माम्यसिपत्यहीमध्य साधुजनम्यतिसिनकिंवा सदाचारताम् ॥२८॥ पदच्छेदः सकाकी विहरति अनस्थिनवलीवदः यया स्व च्छया याधामध्यरतः तचा त्वं अपि भान्यका आत्मयूयं यते तस्मिन चैन अमिलापता न भवतः किम भाम्यति मन्युह मध्य साधुजनस्य तिष्ठसि नै किन छत्त्वा मदा संस्कृत टीका एकाकी असहायः अद्वितीयः विदर्गत: विचरति अनस्थितवलीचर्दः चन्चलम्यि तिरहित वलिष्टरषभः विजागतिभाषा याययायेनपकारेणास्वेच्छया आत्मनःका मनयायोषामध्यरतः नारोजनेषु दत्तमनाः तथा तेनपकारेणात्वमपि भवानपि भोः उत्तमसंवोधने न्यत्का परित्यज्य आत्मय थास्वगणांयत मनातस्मिन् नागमध्य चत्य चारता ॥९॥ ::

PM
दिअिभिलाषा आकांक्षानानिधेभिवतात
वाकिमाका भ्राम्यसिाममणीकरोषिाप्रत्या
हापतिदिनांमध्येो अन्तरासाधुजनस्यामुनि
लोकस्या तिष्ठसिाउपविशसिाकृत्वा कृत्वा
सदाचारतां सम्यक् चारित्रं ॥१८॥
अन्वयः
भोयते यथा अनस्थितवलीवर्दः योषामध्य
स्तःआत्मयूथत्यत्काएकाकी स्वेच्छया विह
रति तथा त्वमपि विहरसि इतिशेषः यहिम
वतोभिलाषा तस्मिन्न तर्हि इति इतिशेषःप
त्यहं साधुजनस्य मध्ये किंनतिष्ठसि ॥१८॥
भाषाटीका
भोयति जैसैं चञ्चल विजार स्वजातीय स्त्रि-
याँ मरतहुआअपनेयूथ को छोड़कर इच्छा
पूर्वक एकला फिरताहै तैसैंहीतूमीविचरै हैजो
स्त्रियोंमैंनेरी अभिलाषा नहीं हैतीपतिदिन
क्यौंभ्रमता फिरैहैसम्यक्चारित्रकोधारंगक
रसाधुजनोंके मध्यक्यों नहीरहता ॥२८॥

सॉड समान अनस्थित हो विचरजु अम- गस्वछन्द अकेला । लॉडदियानिजमंग- तिको अवलाजनसीकर आफ्नमेन्ना जिानि नमैंअभिलापनहींतवतादिनरैनभ्रमकि- मंगला क्यानन्हमुनिसंगति मेंधर उत्तम चारित पन्यमुहेला ॥१८॥ क्रीतानंभवताभवेत्कदशनंगे घनदारलाध्यते । निमायायद वाप्यतेयतिजनैस्तन्दुज्यतेऽत्पाद रात् । भिटोभाटकसामन्निम तनाः पुष्टिंवथामाश्याः। पूर्णाक दिवसावधीक्षणपिस्थातुंयमा दास्यति ॥ २६॥ पुढच्छद्रः कीतान भवता भवत् कंदशन गेपःतदा घ्यते भिझायो यद अवाप्यमयतिजनः नन्द मुज्यते अति आदगतं भिटो भाटक मुस- निभन्नाः पुष्टिया माया पूर्ण किम दिव सावधाक्षिण अपिम्या यम: दाम्यति ।

संस्कृतदीका [क्रीताची द्रव्येणग्रहीत भोजन भवतात्वं याभिवेतास्याताकदशन अप्रियभोजनारो पः कोधातदातस्मिन्कालेापलाध्यते। शो भतेप्रतिष्ठायातिामिक्षायां] अर्दनायायद्! श्रावकजनैर्दत्तभोजन अवाप्यते! प्राप्यतेोय तिजनैःा मुनिलोकातदापूर्वोक्त लब्धभोजना [भुज्यताभक्ष्यताअत्यादरात् बहूसत्कारात [भिक्षोयतेोभाटकसहासचिभतनोः तत्स्वा मिनंकिञ्चिद्धनंदत्वा निवासार्थग्रहीतररहे- णतुल्यस्यशरीरस्यापुष्टिी पोषणामावयाः! माकुरुा पूर्णापूर्णतायात किमानिषेधेादि- वसावधौ। हिनानामन्ते आयुषन्ताक्षणासम यंक्षणस्तुनिमेष कियायाश्चतुर्थीभागःकालः [स्थातुं स्थिरीभवितुंयमः। मृत्युादास्यति दासिष्यति ॥ ७ ॥ अन्वयः भोभिक्षोयदिइतिशेषःकदशनंभवता की- तान्नं भवेत्तेदाखूयारोषःलाच्यते भिक्षायां यदवाण्यते यतिजनै तदत्यादरात्भुज्यते टक महामत्रिभननोः यथा पुष्टिं माक्रया: दिक्सावधापूर्णकिम्यमःम्यातुंदाऱ्यांना भाषाटीका हेभिक्षुक यदि अस्वादुभोजनंतगमा देकर लियाहुवाहातीनुमकोकोधमीफंचंभिदा मजा मिलजाताहेमाधुजनउसको अति आदासरवा तेहैं भाईके घरममान शरीरकोरथापुष्टमन करजवआयुकदिनीकी अवधिपूर्ण होजावेगी तबक्याकाल टेरने देगा | भाषाछन्द जो असुहावन भोजन कोत किया तब होय तुरोधभिसोहै । माधुतु आदर में वहि भुंजत जोकुछ आय पिरापत होवे। भिक्षुक भाटक गेह समानन देहकु पुष्ट रथा कर खोवे । पूरण आयुभरा क्षणग कमिना यमराजठरावनको है ॥२६॥ मूल्यम् लब्ध्वार्थ यदिधर्मदानविषये दातुंनयैःशक्यते । दारिद्रोपह तास्तथापिविषयासन्निमुच्च As...

पुदच्छेदः - न्तिये धत्त्वायेचरणं जिनेन्द्र गदिततस्मिन्सदानादरा। तेषी जन्मनिरर्थकंगतमजाकण्देस्त नाकारवत् ॥२०॥ लब्बा अर्थ यदि धर्मदान विषय दातुं न यः शक्यते दारिद्रोपहतो तथापि विषयाश क्ति न मुञ्चन्तिये छत्त्वा ये चरण जिनेन्द्र गदित तस्मिन् सदानादरीः तेषो जन्म निर थक गत अजाकण्डै स्तनाकारवत् ॥२०॥ संस्कृतदीका लब्ध्वा प्राध्याअर्थीवित्तीयदिाचेत् ।ध मदान विषये रखत्यागमध्ये उत्तमक्षमा माईवार्जवसत्त्यशौच संयम तपस्ल्यागा कि ज्चन ब्रह्मचर्याणि एवं दशधाधर्म: दान च औषधाहारांभय विद्या भेदाच्चतुचीदा तुं दासितुं नानिषेधायापुरुषैः शक्य तासमीतेदारिदोपहता द्रव्या भावेन संक्लिष्टाः तथापिातदपिविषयासक्ति वि पयलीनता, रामपरणतिनानि [मुच्च ५३ + - न्ति त्यजन्तिायांयपुरुषाः धन्वा अनाद त्याचरणं चारित्राजिनेन्द्र दिन दोसर्व ज्ञके वन्टिना प्रणीता तस्मिना पूर्वाने चारि वासनामम्मिन्कांना नाहगः मकामह तातेपी पूर्वानपुरुषाणां जन्मा शरीर धा रणी निरर्थको निष्प्रयोजनागत यानं अना कण्ठाछागीगले स्तनाकार वाचूचका क्र. तितुल्यं ॥ २०॥ अन्वयः यदि अर्थलब्ध्वायः धर्मादान विषय दा- नुनशक्यत येदारिदोपहताःतयापि विष या शक्तिं न मुञ्चन्तिये जिनेन्द्रगदितं चरण- चत्वा तस्मिन सटानादरा: वर्तन्ते उनिश पः तेषां जन्य अजाकण्टे स्तनाकारवानि मर्थकं गतं ॥२०॥ भाषाटीका जो नर धन को पाकर धर्म दान में नहीव- गाने हैं औरनिर्धन तो भी विषय वामनाका नहीं छोड़ते हैं और जो भगवत प्रणीनचारि त्रका धारण कर मदा उसमें मन्कार गहिन irani वर्ते हैं जिनका जन्म बकरी के गले मैं चीके आकारवत् व्याजाता है ॥ २० ॥ जोधन पायव दान करै अरु धर्म विषै नहि ताहलगावें। होय दरिद्ध तथापि विघातुर छॉइत नाहि विषै दुख पावै धार हिये जिन भाषित चारित भाव अ- नादरता बिचलावै । जन्म निरर्थअजा गल चूचक के समते भुविभारकहावै। ॥२०॥ मूल्यम् लब्ध्यामानुषजातिमुत्तमकल मरूपंचनीरोगतां बुद्धिधाधनसे चनसुचरणमीमजिनेन्द्रोटिनमा लोभार्थवसुपूर्णहेतुभिरलतो- कायसौख्यायमो। देहिन्देहसु- पोतकं गुणभृतंभक्तुं किमिच्छा पदच्छेदः वा मानुषजानं उत्तमकुलं रूपंच नीरो- स्तिते ॥२१॥ म गता चुद्धिधाधन सवनं सुचरणी न्ट्रोदित लाभाय बसुपूर्णहेतुमिःअव लोकाय सोन्याय भौः दैहिन्ददमुपातक गुणभन भी किम् इच्छा अस्ति ते ॥२१॥ संस्कृत टीका (लब्ध्वा प्राप्यामानुषजातिी नरत्वं उत्तमकुले उत्कृष्ट सजातीयगणोम्पासान्याचा पुनः नीरोगती रोगराहित्यं कुशलती स्वास्यांबुदि. ज्ञानाचीधनसेवनं घी बुद्धिरेवधनं यपानः से वनं पाज्ञ पुरुषैःसतशयपी सुचरणामम्यक चारित्राश्रीमजिनेन्ोदित समवसरणादिवहि विभूतिमिरनन्तज्ञानदर्शनमुखचीर्यभपान्तर इ-पियोनाथेन भगवता केवलिनाप्रणीतल्लामा थीईक्षायै लोभस्तुचतुर्पुकवाये ध्वन्तरंगताच तुर्थकघायः[वसुपूर्णहेतुभिः द्रव्यस्य पूर्ण- तायाः कारणैः अलं) पूर्ण स्नोकाया अल्पाय (सौख्यायाआनन्दायादेहिन् आत्मना देह सुपोतकं शरीररूपसुजलयान[गुणभृतः गुणान् विभतीति गुणमृत् तवागुणःभनंगुण भृतंभिक्तुं छेत्तुं किम् कय इच्छावालाभ तिवर्ततेतितव ॥२१॥ अन्वयः भो देहिन्मानुषजातिमुत्तमकुलं रूपंनीरोगा तांबुद्धिंधीधनसेवनेत्रीसजिनेन्दोदितंसुच रणंचलब्ध्यावसुपूर्णहेतुभिलीभार्थ स्तोकाया सौरव्यायगुणभृतं देहसुपोतकं भक्तुं तेइच्छा अलंकिमस्ति ॥ २१॥ भाषाटीका हेआत्मा मानुषजातिउत्तमकुल रूपनीरोगता बुद्धि पण्डितजनकृतसेवासमवसरण्मादिक वाह्यविभूति और अनन्तज्ञानदर्शनसुखवी- र्यरूपअन्तरंगलक्ष्मीके नायकनीसर्वज्ञकेव ली प्रणीतसम्यक्चारित्रको पाकरलोभके र्थधलकी पूर्णताकेकारणथोडेसुबके लियेगु गोकेभरेहराशरीररूपोष्टपोहणके तोड़ने कोतेरीइच्छाक्याभरपूरी होरहीहै ॥२१॥ भाषाकन्द पाकर मानुषाकुल नज्वल सुन्दररूप नरामय काया । बुद्धि सुधीजलसीद तपादभयो जिन भाषितंचारितपाया

लोभवशीधन सञ्चयकारणभामुख
किञ्चित हेतम्रमाया । आतम् देह
सुपोतगुणाकरनादिविदारणकोचि
तलाया ॥२९॥
मूलम्
बेतालाकृतिमर्द्धदग्धमत्तकं
टाभवन्तंयते। यासानास्तिम-
यत्वयासममहोजल्पन्तितान्त-
त्पुनः राक्षस्योभुवनेभवन्तिव-
नितामामागताभक्षितुं मत्वैव
प्रफ्लाप्यतांमतिभयात्वंतवमा
स्थाःक्षणम् ॥२२॥
पदच्छेदः
वैतालाकृति अर्द्धदग्ध मतकं दृष्ट्वाभवन्तं ये
तैयासीन अति भयं त्वया ममं अही जन्पन्ति
तोः तद पुनः रादास्य भुवन भुन्नि वनिताः
मामे भक्षितु आगताः मत्वा सवं प्रपन्ना-
प्यतां मतिभयात् त्वं नव मास्याःक्षणम
संस्कृत टीका
॥२२॥

वितालाकृति प्रेताकारं अदालतका न ईभस्मीभूतेन शवेन तुल्यादृष्टावक्ष्याभवा तं त्वायतीमायामांरवीणां नातिनविध तेभियाभीतिः। त्वयासमोभवतासाधीशहा। आश्वयैजिल्पन्तिीवचनालापं कुर्वन्तितः लियातदाबचनापुन द्वितीय वारा राशस्या हिंसकाः भुवनोलोकाभवन्तिासन्तिावनिता। नार्य: िमास्वाभागता आयाताः भक्षितांखा दितमत्वा निश्चयीकृत्याएवाइत्या पप लाप्यत्तांधावामृतिभयात् मृत्योभीत त्वं भवान् तत्र तस्मिन् स्थाने यव स्त्रियो भव- न्ति वास्विषु मास्था माविष्ठ क्षण समय, अल्पकालं ॥२२॥ अन्वयः मोयते वेतालाकृतिं अईदाधमृतक भव- न्तं दृष्ट्वायासा भयं नास्ति पुनः त्वासमा हो नजल्यन्तिताःवनिता भुवनेराक्षस्योर न्तिमा भक्षितुं मागता एवंमत्त्वा मृतिभयात् लाध्यतां त्वंतंत्रक्षम मास्थाः ॥ २२ ॥ भाषामेवा AAR भार्यान जिन स्त्रियों को प्रेताकार आंचलन तककीममान तुमको देखकर भय नाहाना गफिरतंगमायवचनान्लापकानी ने नगन्ना क मैगमसी है मंभिक्षण कग्न को आगे में मानकर तमरण के भयमभाग तोमरण- मात्र भीमटर ॥ २॥ भाषाछन्द भी मुनि अर्द्धजले शव तुनिहारतु के अरुभूतसमाना । भातिनही जिन के घट में पुनवोलततोसँगशेकन आ- ना। राक्षसी हैवनिता ममभक्षण कोउ- तरीयह जानसुजाना। भागहियधर: मृत्युतना भयातिष्टन हा दाण एक प्र- माना ॥२२॥ मागास्त्वं युवती रहेघुसततंत्रि चासतीसंशयो। विश्वामेजन वाच्यतीभवतितनश्यतपुमय ह्यतः स्वाध्यायानुरतागुरुक्त- वचनं शीर्षसमागपया स्तिष्ट mat+---- Hom.marwade MANPAamara- त्वविकृति पुनब्रजसिचेचासि त्वमेवक्षयम् ॥२३॥ पदच्छेदः मामाः त्वयुवती ग्रहेषु सततं विश्वासता संशय विश्वास जनवाच्यतामवतितनश्येर पुमर्थ हि। अतः स्वाध्यायानुरतः गुरूकवचन शीर्षे समारे, पयन् तिष्ठत्व विकृति पुनर वसिचन्यासि व स्वायम् ॥२३॥ संस्कृत टीका (मागाः] मागच्छायुवतीग्रहेषुास्त्रीणां निवा- सेषुासत्तानिरन्तराविश्वासता महा प्रत्य- यासंशयःसन्देहः विश्वासाप्रदायां जिन वाच्यतालोकानांकथनीभवति स्यात्तातक नश्येताशयेत् नाशं प्राप्नुयादा पुमर्थ पुरु- पार्थ हिानिश्चयेनाअतः। अस्मात् हेतोःस्वा ध्यायानुरतः] शास्वाभ्यासेऽनुरक्तः। गुरुतव- बना गुरुभिः कथितंवाक्यांशोपी मस्तके [समारोपयन्। धारयना तिष्ठा स्थिरीभवात्वं भवान् विकृति विपरीता पुनरी पक्षान्तरेन जसिागच्छसिाचेत् यदि यासिपालोषित्वमे।

auratomamart वाभवानेवासयोनाशी ॥२३॥ अन्वयः त्वंसततं युवती रहेषु विश्वासती मागाःवि ग्वामे तेजन वाच्यसा संशयन्त्रभवनि पुमर्य हिनश्येत् अत:वं स्वाध्याया नुसता गुरूक वचनं शीर्षे समारोपयलिटचेत पुनर्विक तिं व्रजेत् त्वमेवनयं यासि ॥२३॥ भाषा टीका हे मुनि निरन्तर स्त्रियोंके परमे विश्वासमा तकर विश्वास मैं तेरी ओड्ससन्देह औरलो. ककहावत होगी और पुरुषार्थ नष्ट होगा। इसलिये स्वाध्याय में लीन हवा गुरों के कद- हवे वचनों को मस्तक पर धारकरतिष्ट और जोउलटाचलेगातीतेरी ही हानि होगी ॥२३॥ भाषाछन्द नारिन के घरका विशवास कदापिन चित्त मैं रचलावै । ताहि कियेन- ओइसुसंशय हो पुरुषारथसर्वनशा । होरत पञ्चस्वपाटन में गुरुमाषित विनतुसीसचढ़ावेजो इसके विप- Y रीत चलै मुनि तौ निजनाशकरै दुख पावै॥२३॥ मूलम् .. किंसंस्कारशतेनविदजगतिभोः काश्मीरजंजायते । किन्देहःशु चितांबजेदनुदिनंप्रक्षालनादम्भ सा। संस्कारोनवदन्तवक्रवपुषां माधोत्त्वयायुज्यते। नाकामीकि लमण्डनप्रियइतित्वंसार्थकमा कृथाः॥२४॥ पदच्छेदः किम संस्कारशतेन विटजगति भी काश्मीरज जीयने किम् देह शुचिता वगैत अनुदिन पक्षा संस्कार नखदन्तवक्रवपुषा सा धौ वायुज्यते नै अकामी किल मण्डन पि यः इति व सार्थक माकृथाः ॥ २४॥ संस्कृतटीका किमावितासंस्कारशतेन शृङ्गारस्य श- तकेन । जल धवनादि कियया (विद् ! लनार अम्म Meanwr पुरीपांकाश्मीरनीकुंकुम जायते उन्पद्यने दिहः शंगराशुचिनी पवित्रता जता पाया त, गच्छन अनुदिना तिदिन मसालनान; धावनात् । स्नानात अन्नम्प जलनामंका र: ङ्गारःनिन्बदन्तवा वपुषा कग्ज ग्दन मुरव शरीराणां । माघीयतान्वया भवता युज्यते ! कियत नाकामी नाका मी, कार्मोतिभावः : विपया मक्तः किलो निश्चयेनामण्डनप्रियः। मण्डनंभपणं पियं यस्पसः शङ्गागभिलाधी इतिागवानार्य का अर्थ युक्ता माश्याः मावुतः आत्मान मित्ति शेषः ॥२४॥ अन्वयः भी साधो किं संस्कार शतेन जगति विद काश्नीरनं जायते किन्देहोऽनुदितं अभ मा प्रक्षालनात् शुचितां व्रजन नरवदन्त वक वयुषी संस्कारः त्वया युज्यते बम- ण्डन पियः अकामीन किल इति सार्यक माकृथाः ।। २४॥ भाषाटीका भो मुनि क्या सौ संस्कार से भीजगतमें वि- सकेसर होजाता है क्या शरीर पतिदिन के स्लान से शुद्ध होजाता है। नख दातमु ख शरीरकाश्टंगार जीतूकरता है तौतूमंडन पिय है अकामी नहीं है यह सार्थक नाम मत रखवा ॥२४. भाषाछन्द क्याजगमें विटसंस्कृति सौकर चन्दन केसरवाबनजावै। त्योयहदेहनन्हा नकिये प्रतिवासर के शुचिता दुकंपा वै। संस्कृति दन्तनकी नखकी मुख कीवपुकी यह बातजनावै। हैन अ- कामितुमुण्डन पीतम नायहसार्थक नाम घराबै ॥२४॥ वृत्तविशतिभिश्चतुर्भिरधिकैः संलक्षण नान्वितैर्यथसज्ज नचित्त बल्लभमिमग्री थिय गोवित भुत्वात्मेन्द्रियकुन्न रान्समटतासन्धन्तुनेहुर्जगन् y 1 बिदामाविषयाटवीघुसन मंगा ।। विच्छिनय ॥२५॥ 'पढच्छंदः उत्तः विंशनिभिः चतुभिः अधिकैः महांग न अन्वितः ग्रन्थ मन्जनचित्त वजन उनी मल्लिषण उदितं गुच्चा आत्मन्द्रियकुछगन ममतः झन्धन्तुने दुर्जगन विहान्नः त्रिपया टवीपु सतत मन्सार विच्छिनये ॥२५॥ संस्कृत टीका उत्तैः छन्दोभिः विंशतिभिश्चनुभिधकः चतुर्विंशतिभिः मलक्षणेनाअट कायन- नकर्नव्याकर्तव्य व्यवहारेण अन्वितः युक्त गन्य शासन (सज्जन चितवनमः सज्जनानांसत्पुरुषाणां चित्तस्य मनमा बाड में प्रियं वामन्जन चित्तवलभ मामधयं [इमा पूर्वोक्तं अन्य ग्रामविणेन शाब्द रूपलदस्याः नायेन मनिषभियान चार्येण उदित पवाशित मन्त्रा निशम्य [ आत्मन्द्रियकुजगन सम्य । Mer करण हस्तिनः[समटतः] विचरतः[रुन्ध न्तु] वशीकुर्वन्तु दुर्जरान् दुखेन कष्टेन ज- रा जीर्णतायेषांतान्, कष्टसाध्यान् । विद्धां सः] पण्डिताः [विषयाटवीषु स्पर्श रस गंध वर्णशब्दाः विषयाःतेण्व अटव्यः वनानि तेषु सतता निरन्तरं संसारविच्छि तये] जगतानाशाय ॥२५॥ अन्वयः ये इतिशेषः विद्वांसः तेइमं गन्यं ग्नु वा आत्मेन्द्रिय कुज्जरान् रुधन्तु कथ म्भूतं गन्यं नीमल्लिषणोदितं कैः चतु भिरधिकै विशति भित्तैः कथम्भूतैः स- लक्षणान्वितैः कथम्भूतं गन्थं संजनचि त्तवल्लभं कथाभूतान् आत्मेन्द्रिय कुन्ज- रान् विषयाटवीषु सततं समटतः पुन- जरान् ॥ २५॥. भाषाटीका विद्वान् पुरुष चौबीस श्लोक में श्रीमल्लि षणाचार्य के बनास हवे इस श्रेष्ट ल. क्षण युक्त गन्य को सुनकर अपनी ३- न्द्रिय रूप नायियों को जो विषयमा वी में चारों ओड़ फिन्न हैं और इन सारं के नाश के हत गकी। 79॥ भाषाकन्द बीसरुचारलाकन मैं यह मुत्तमन्दता ण युक्त नवीना । मज्जन चिप्रियःव रकाव्यरचा मलिंपण बड़ा हित कीना। आतम इन्द्रिय दुर्जय कुंजरज विषयाट विम नितलोना । यामुनक वणि आन तिन्ह जगविच्छिति हेत सुधीगुण पी- ना ॥२५॥ टीकाकारकवि कुलंदशवर्णन छन्दछप्पय भारत वर्ष ममार देश पञ्चाव मुक्तिन । मदिल्ली जिला माल जनको आनदकता नाके उत्तर मध्य नगर मुनपत भयभजन !

नामधचार जिनेश भवन भविजनमनरन्न न। तिस नगर माहिममबास है। मिहर- चन्द मम नामवर । हूँ पण्डित मथुरादास- का।लघुभ्राता लघुज्ञानधर ॥॥ चौपाई तीन अल्पबुद्धि अनुसार॥ संस्कृतभाषाछन्दमंझार॥ बाल बोधनी टीकासार। स्वीन पण्डितजनहितकार न्यूनशतकदोसहस्रमंकार क्षेपो अधिकससदाचार. मुलावियोदशिकार्तिकमास चन्दबार दिनकियोपकाश दोहा हैपण्डितजनपतियही एक पार्थनामूलं ॥ देवदोषशुधकीजिये अवगुणगनभूल॥ इति.

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Sajjanchitt Ballabh Kavya Sanskrit

Author
Jainy, Mehar Chand Das
Title
Sajjanchitt Ballabh Kavya Sanskrit
File name
Sajjanchitt Ballabh Kavya Sanskrit
Text
OCR done
Citation
1892
Published
2009/11
Publisher
Delhi, Mukhtar Press
Language
Sanskrit
Pages
78
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Kavya - sangrah
DLI number
344222
Barcode
99999990234100.00
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Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Copyright permitted
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