Sanmati Library, Jaipur
Suktamuktavali
Front matter
(8)
कदापिनहीं मिल सकती इसलियेमोक्षजाने
को इच्छा रखने वालों कोविषयोंका संसर्ग कदा-
पि नहीं करना चाहिये।
मालिनी ।
असजदोजतदेवाचाय पट्टोत्याद्रि-
युलारण विजयसिंहाचार्य पदारोवन्दे।
मधुकर समता यस्तन सोमप्रमेण
अचि सुनि पनन्नासक्ति मुक्तक्लीयम्।
कक्तिछन्द ।
जैन-वस- सर हंस दिशाम्बर,सोनपतो जजितदेव
प्रति मारज
तकि पद वादीमद अंजन, प्रगटे विजयसेनझाचारज।।
कि पट्टभए सोमप्रभ, तिन ए अन्थोक्योहितकारजा
(१००)
जाके पदत सुनतअवधारत, हैं सुपुरुषअनारज॥n
जान्वयाची- (पः) जी (अजितदेवाचायपही
दयाद्रिद्युमीरणविजयसिंहाचायपादारीख
दे मप्यु कर समत्तामझभजत ) जजितदेव
आचार्य के पट्टरूपी उदयाचल पर सूर्य के
समान विजयसिंह आचार्य के चस्पी
कमलों में असरको समता करता था, तेन
भोन पनन्ना सोमप्रसेग) उस सोमप्रभ
आचार्यने ( इयमसोक्त मुक्तावली) यह
सोत मुक्ता वली (उत्तम वचन रूपजातियों
की माला) (व्यरचि) बनाई।
इन्द्रवजा ।
सोमप्रभाचार्य प्रभावलोके वस्तु प्रकाश
कुरुते यथाशु।
तधाम गुच्चे रूपदेशलेश: शुभोत्सवज्ञान
१३ भान जी भीमामा दही मिला
(१०१) गुरण स्तनोति ॥१०॥ अन्वयार्थी- (यथा)जैसे (लोके)लोक में (सोमप्रमा)चन्द्रमाकोप्रभा(च) और (आचार्य प्रभा)प्राचार्यों को प्रभावा प्रोतभा . आशुवस्तु प्रकाश कुरुते) शोध वस्तुका प्रकाश करती है, (तथा) उसी तरह (प्रयम् उपदेशलेशः) यह थोडासा उपदेश(उच्चैः शुभोलावज्ञानगुणान् ) उत्कृष्ट कल्या- रण, आनन्द और ज्ञानादि गुणों को (त- नोति) बढ़ाता है। इस श्लोक में ग्रन्थ कत्ता ने अपना सोमप्रसाचाये जास व्यक्त किया है।
(१०) क पद्यानुवाद का परिचय दोहा । ॥१॥ नास सूक्तिमुक्तावली, द्वाविंशतिनाथकार। शतलोक परनान सब, इति (?) अन्धविस्तार कुँवर पाल बानालो, भिन्न जुगल इकोचत्त । तिनीहं अन्य भाषाकियो, बहुविविछन्द कवित सोलह सौ इक्यानवे, रितु औषम वैशाख । सोमवार एकादशो, कोरलछन्नसित याक होत आमोसनमा चाये विरीचता सिन्दूरप्रकार- पर पयोया सूक्तिमुक्तावली ॥२॥ ॥३॥ भाषाछन्दानुवाद सहिता समाप्ता ।
No text on this page.
श्रीसोमप्रभाचार्यविरचित सूक्तमुक्तावली . भाषापद्यानुवाद और अर्थसहित । धर्माधिकार। छप्पय। शार्दूलविक्रीडित । सिन्दूरप्रकरस्तपःकरिशिरकोडे कषायाटवी- दावार्चिनिचयः प्रबोधदिवसप्रारम्भसूर्योदयः। मुक्तिस्त्रीकुचकुम्भकुङ्कुमरसः श्रेयस्तरोः पल्लव- ., प्रोल्लासः क्रमयोर्नखद्युतिभरः पार्थप्रभोः पातु वः॥१॥ शोभित तपगजराज, सीससिंदूर पूरछवि । बोधदिवस-आरंभ, करण-कारण उदोत रवि ।। मंगलतरुपल्लव, कषायकांतारहुतासन । बहुगुणरतनिधान, मुक्तिकमलाकमलासन ॥ इहिविधि अनेक उपमासहित, अरुण चरण संतापहर। शिवराय पार्श्वनखज्योतिभर, नमत 'वनारसि' जोर कर ॥१॥ अन्वयार्थों-(तपाकरिशिरकोडे) तपरूपी 'हाथीके पस्तकके मध्यभागमें (सिन्दूरप्रकरः) सिन्दूरके पुंजके समान ।
- (कषायाटवीदावाचिनिचयः) कषायरूपी वनको जलानेवाले दावानलके समान, (प्रबोधदिवसप्रारम्भसूर्योदयः) ज्ञानरूपी दिवसके प्रारम्भके सूर्योदयके समान, (मुक्तिस्त्रीकुचकुम्भकुड मरसः) मुक्तिरूपी स्त्रीके कुचकुम्भोंपर लगे हुए केशरके रसके समान और (श्रेयस्तरोः) कल्याणरूपी वृक्षकी (पल्लवप्रोल्लासः) निकलती हुई नई कोंपलोंके समान (पार्थपभोः) श्रीपार्श्वनाथके भगवानके (क्रमयोः) दोनों चरणोंके (नखद्युतिभरः) नखोंकी कान्तिका समूह, (व:) तुम्हारी (पातु) रक्षा करो। भावार्थ-पार्श्वनाथ भगवानके चरणोंके लाल और चमकते हुए नख सम्पूर्ण भव्यजीवोंका कल्याण करें। सन्तः सन्तु मम प्रसन्नमनसो वाचां विचारोवताः सुतेऽम्भः कमलानि तत्परिमल वाता वितन्वन्ति यत्।। किं वाभ्यर्थनयानया यदि गुणोऽस्त्यासां ततस्ते स्वयं कारः प्रथने न चेदय यशम्प्रत्यर्थिना तेन किम् ॥२॥ दोधकान्तबेसरीछन्द। जैसे कमल सरोवर वासै । परिमल तालु पवन परकास। त्यों कवि भाषहि अक्षर जोर । संत सुजस प्रगटहिं चहुँओर ॥ जो गुणवन्त रसाल कवि, तौ जग महिमा होय । जो कवि अक्षर गुणरहित, तौ आदरै न कोय ॥२॥ अन्वयार्थों (मम) मेरे (वाचां ) वचनोंके (विचारो- धताः) विचार करनेमें उद्यत हुए (सन्तः) सज्जन पुरुष (प्रसन्नमनसः) प्रसन्न चित्त (सन्तु) होओ। (यत् ) क्योंकि (कमलानि) कमलोंको (सूते) उत्पन्न तो करता है (अम्भः) .
जल और, (तत्परिमल) उनकी सुगन्धिको (वितन्वन्ति ) चारों ओर फैलाता है (वाताः) वायु । (वा) अथवा (अनया) इस (अभ्यर्थनया) प्रार्थनासे (किम् ) क्या ! अर्थात् 'इस अन्थको देखनेवाले सज्जन प्रसन्न होवें' मेरी इस प्रार्थनासे कुछ लाभ नहीं। क्योंकि (यदि) यदि (आसाम्) इस वाणीमें (गुणः) गुण (अस्ति) हैं, (ततः) तो (ते) वे सज्जन पुरुष (प्रथने) उन गुणोंके प्रसिद्ध करनेमें (स्वयं) अपने आप (कारः) कर्ता हो जायेंगे। अर्थात् वे स्वय उनको प्रसिद्ध करेंगे। (अथ) और यदि (न चेत् ) मेरे इन वचनोंमें अर्थात् इस ग्रन्थमें गुण नहीं है, तो (वेन) उस (यशम्मत्यर्थिना) गुणोके अभावरूप अपयशसे (किम् ) क्या लाभ है ? भावार्थ-जिस तरह कमलोंको उत्पन्न तो करता है जल, परन्तु उनके सौरभको सब ओर फैलाता है वायु । इसी तरह यद्यपि इस ग्रन्थको बनाता हूं मै, परन्तु इसका प्रचार करेंगे सज्जन पुरुप ही । इस लिये वे मुझपर प्रसन्न होवें । परन्तु एक तरहसे इसके लिये उनसे प्रार्थना करनेकी आवश्यकता नही दीखती है। क्योंकि यदि इस ग्रन्थमें गुण होंगे, तो वे खयं उन्हें प्रकाशित करेंगे और यदि नही हैं-दोष ही दोष है, तो इसके प्रचार करनेसे जो अपयश होगा, उससे क्या लाभ ? इन्द्रवज्रा। त्रिवर्गसंसाधनमन्तरेण पशोरिवायुविफलं नरस्य । तत्रापि धर्म प्रवरं वदन्ति न तं विनायभवतोऽर्धकांमौ ।।
४ दोधकान्तवेसरीछन्द। सुपुरुष तीन पदारथ साधर्हि । धर्म विशेष जानि आराधहिं । , धरम प्रधान कह सब कोय । अर्थ काम धर्महित होय ॥ धर्म करत संसारसुख, धर्म करत निर्वान । धर्मपंथसाधन विना, नर तिर्यंच समान ॥३॥ अन्वयार्थों-(नरस्य) नरस्य) मनुष्यका (आयुः) जीवन (त्रिवर्गसंसाधनम् ) धर्म अर्थ और कामके सेवन करनेके (अन्तरेण) विना (पशोः इव ) पशुओंकी तरह (विफलम्) निष्फल है। (तत्र अपि) और उन तीनोंमें भी (धर्मम् ) धर्मको (प्रवरं ) प्रधान (वदन्ति) कहते हैं। (यत् ) क्योंकि (तं) उसके (विना) विना (अर्थकामौ) अर्थ और काम (न) नही (भवतः) हो सकते हैं। भावार्थ-धर्म करना, अर्थ (धन) कमाना, और कामसेवन (पांचों इंद्रियोंके विषयोंका सेवन) करना, इन तीनोंका यथा- योग्य साधन करना चाहिये। इनके साधनके विना मनुष्यका जीवन पशुओंके समान व्यर्थ जाता है। इन तीनोंमें भी धर्म साधन करना सबसे मुख्य है। उसे अवश्य ही करना चाहिये। क्योंकि अर्थ और काम धर्मपालन करनेहीसे होते हैं। . यः प्राप्य दुष्प्रापमिदं नरत्वं धर्म न यत्नेन करोति मूढः। क्लेशप्रबन्धेन स लब्धमन्धौ चिन्तामणिं पातयति प्रमादात्।। कवित्त (३१ मात्रा)। जैसे पुरुष कोउ धन कारणं, हींड़त दीपदीप चढ़ि यान । आवत हाथ रतनचिन्तामणि, डारत जलधि जानि पाषान ॥
५ तैसे भ्रमत भ्रमत भवसागर, पावत नरशरीर परधान । धर्मयत्न नहि करत 'वनारसि', खोवत वादि जनम अशान ॥४॥ अन्वयार्थों-(यः) जो (मूढः) मूर्खपुरुष (दुष्प्रापम्) अति कठिनतासे प्राप्त होने योग्य (इदम् ) इस (नरत्वम्) मनुष्य जन्मको (प्राप्य) प्राकर (यत्नेन) प्रयत्नपूर्वक (धर्मम्) धर्मसेवन (न) नही (करोति) करता है, (सः) वह (क्लेशप्रबन्धेन) वडे क्लेश और कठिनतासे (लब्धं ) पाये हुए (चिन्तामणि) चिन्तामणि रतको (प्रमादात्) प्रमादसे (अब्धौ) समुद्र में (पातयति) फेंक देता है। भावार्थ-जैसे कोई एक कीमती रत्नको समुद्र में फेंक देता है, उसी प्रकारसे अनादि कालसे भ्रमण करते करते कठिनाईसे पाये हुए मनुष्य जन्मको मूर्ख पुरुष विषयादिकोंके सेवनमें खो देते है-धर्मका सेवन नही करते है। मन्दाक्रान्ता । स्वर्णस्थाले क्षिपति स रजः पादशौचं विधत्ते पीयूपेण प्रवरकरिणं वाहयत्यैन्धभारम् । चिन्तारनं विकिरति कराद्वायसोड्डायनार्थ ' यो दुष्प्रापं गमयति मुधा मर्त्यजन्म प्रमत्तः ॥५॥ मतगयन्द (सवैया)। ज्यों मतिहीन विवेक विना नर, साजि मतंगज ईधन दोवै। कंचनभाजन धूल भरै शठ, मूढ़ सुधारससों पग धोवै॥ १व्यर्थ ।
६. वाहित काग उड़ावन कारण, डार महामणि मूरख त्यों यह दुर्लभ देह 'वनारसि', पाय अज्ञान अकारथ खोवै॥५॥ अन्वयार्थी-(यः) जो (प्रमत्तः) प्रमादी वा मूर्ख पुरुष (दुष्पापम् ) कठिनतासे प्राप्त होनेवाले (मर्त्य जन्म) मनुष्यजन्मको (मुधा) व्यर्थ ही (गमयति) खोता है (सः) वह पुरुष मानों (स्वर्णस्थाले) सुवर्णके थालमें (रजः) धूल (क्षिपति) रखता है, (पीयूषेण) अमृतसे (पादशौचम्) पाद प्रक्षालन (विधचे) करता है-अर्थात् पैर धोता है, (प्रवरकरिणम् ) श्रेष्ठ हाथीपर (एधभारम् ) ईधनका बोझा (वाहयति) ढोता है और (वायसोड्डायनार्थम् ) कौवेके उड़ानेके लिये (चिन्तारतम्) चिन्तामाणि रलको (करात्) हाथसे (विकिरति) फेंकता है। भावार्थ-मनुष्यजन्मको व्यर्थ खोनेवाला मनुष्य उक्त कार्य करनेवालोके समान मूर्ख है। इसलिये उसको धर्मसेवन करके सफल करना चाहिये। शार्दूलविक्रीडित। ते धत्तूरतरं वपन्ति भवने प्रोन्मूल्य कल्पगुमं चिन्तारत्नमपास्य काचशकलं स्वीकुर्वते ते जडाः। विकीय द्विरदं गिरीन्द्रसदृशं क्रीणन्ति ते रासभ ये लब्धं परिहत्य धर्ममधमा धावन्ति भोगाशया॥६ कवित्त (३१ माना) ज्यों जरमूर उखारि कल्पतरु, बोवत कनकको खेत। ज्यों गजराज वेच गिरिवर सम, कूर कुबुद्धि मोल खैर लेत ॥ १ धतूरेका। २ गर्दभ (गधा)। ,
जैसे छांडि रतन चिन्तामणि, मूरख काचखंड मन देत ।
तैसे धर्म विसार वनारसि', धावत अधम विषयसुखहेत ॥६॥
अन्वयार्थों-(ये) जो (अधमाः) नीच पुरुष (लब्धम् )
प्राप्त हुए (धर्मम् ) धर्मको (परिहत्य) छोड़कर (भोगाशया)
भोगोपभोगोंके सेवन करनेकी आशा करनेसे (धावन्ति ) दौड़ते
हैं-भटकते है, (ते) वे (कल्पद्रुमम् ) कल्पवृक्षको (प्रोन्मूल्य)
उखाड कर (भवने) अपने घरमें (धतूरतरुम् ) धत्तूरके
वृक्षको (वपन्ति) बोते हैं, (ते) वे (जडाः) मूर्ख (चिन्तारत्नम्)
चिन्तामणि रनको (अपास्य) छोड़कर (काचशकलम् )
काचके टुकड़ेको (खीकुर्वते) स्वीकार करते है। और (ते) वे
(गिरीन्द्रसदृशम् ) सुमेरु पर्वतके समान (द्विरदम् ) हाथीको
(विक्रीय) बेचकर (रासभम् ) गदहेको (क्रीणन्ति) खरीदते है।
भावार्थ-जो पुरुप किसी तीव्र शुभ कर्मके उदय और
अशुभ कर्मके क्षयोपशमादिकसे प्राप्त हुए जैनधर्मको छोड़ देते हैं
अथवा उसके सेवनकरनेमें शिथिलता करते है, उन्हें ऊपर
कहे हुए काम करनेवाले मूखोंके समान समझना चाहिये ।
-
शिखरिणी।
अपारे संसारे कथमपि समासाद्य नृभवं
. न धर्म या कुर्याद्विषयसुखतृष्णातरलितः।
ब्रुडन्पारावारे प्रवरमपहाय प्रवहणं
स मुख्यो मूर्खाणामुपलमुपलब्धुं प्रयतते ॥७॥
८ सोरठा। ज्यों जल बूढ़त कोय, वाहन तज पाहन गहै। त्यों नर मूरख होय, धर्म छांडि सेवत विषय ॥ ७॥ अन्वयार्थी-(यः) जो (विषयमुखतृष्णातरलितः) विषयोंके सेवन करनेसे प्राप्त हुए सुखकी तृष्णामें मम हुआ जीव (अपारे) (संसारे) इस अपार ससारमें (कथं अपि) किसी तरहसे (नृभवम् ) मनुष्यजन्मको (समासाद्य) पाकर (धर्मम्) धर्मसेवन (न) नही (कुर्यात्) करता है, (सः) वह (मूर्खाणाम्) मूखों में (मुख्यः) मुख्य अर्थात् अतिशय मूर्ख (पारावारे) समुद्रमें (बुडन् ) डूबते समय (प्रवरम् ) श्रेष्ठ (प्रवहणम् ) जहाजको (अपहाय) छोड़कर (उपलम् ) पाषाणके (उपलब्धुम्) पकड़नेके लिये (प्रयतते) प्रयत्न करता है। भावार्थ--जो धर्मको छोड़कर विषयसेवनमें लीन होता' है, वह उस मूर्खके समान है, जो समुद्रमें डूबता हुआ भी जहाजको छोड़कर पाषाण पकड़नेका प्रयत्न करता है। द्वार गाथा। शार्दूलविक्रीडित । भक्ति तीर्थकरे गुरौ जिनमते संधे च हिंसानृत- स्तेयाब्रह्मपरिग्रहव्युपरमं क्रोधाधरीणां जयम् । सौजन्यं गुणिसङ्गमिन्द्रियदमं दानं तपोभावनां वैराग्यं च कुरुष्व निवृतिपदे यद्यस्ति गन्तुं मनः ॥८ छप्पय। जिन पूजहु गुरु नमहु, जैनमतवैन बखानहु । संघभक्ति आदरहु, जीवहिंसान विधानहु ।
or झूठ अदत्त कुशील, त्यागि परिग्रह परमानहु । क्रोध मान छल लोभ जीत, सज्जनता ठानहु ॥ गुणिसंग करहु इन्द्रिय दमड, देहु दान तप भावजुत । - गहि मन विराग इहिविधि चहहु, जो जगम जीवनमुकत ॥८॥ अन्वयार्थी हे आत्मन् (यदि) यदि (मनः) तेरा मन (नि:तिपदे) मोक्षमें (गन्तुं अस्ति) जाना चाहता है, तो तू (तीर्थकरे) तीर्थकरमें, (गुरौ) गुरुमें, (जिनमते ) जिन- मतमे, और (संघ) मुनि अर्जिका श्रावक और श्राविका इनके समूहरूप संघमें, (भक्तिं कुरुष्व) भक्ति कर (च) और (हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहन्युपरमम् ) हिसा झूठ चोरी अब्रह्म और परिग्रहका त्याग, (कोषाधरीणाम् ) क्रोध मान माया लोभ- रूप शत्रुओंका (जयम् ) विजय, (सौजन्यम् ) सुजनता, (गुणिसङ्गम् ) गुणीपुरुषोंकी सङ्गति, (इन्द्रियदमम्) इन्द्रियोंका दमन, (दानम् ) दान, (तपोभावनां) तपोभावना और (वैराग्यम् ) वैराग्य अर्थात् ससारदेह भोगसे उदासीनता (कुरुष्व) कर। भावार्थ-यदि मोक्ष जानेकी इच्छा हो, तो ऊपर लिखे कार्य करना चाहिये। पूजाधिकार । पापं लुम्पति दुर्गति दलयति व्यापादयत्यापदं पुण्यं संचिनुते श्रियं वितनुते पुष्णाति नीरोगताम् । सौभाग्यं विदधाति पल्लवयति प्रीति प्रसूते यशः स्वर्ग यच्छति निर्वृति च रचयत्यर्चाहतां निर्मिता ॥९॥ --- १० 'कवित्त (३१ मात्रा)। लोपै दुरित हरै दुख संकट, आपै रोगरहित नित देह । पुण्यमॅडार भरै जस प्रगटे, मुकति पंथसों करै सनेह ॥ रचै सुहाग देय शोभा जग, परभव पँहुचावत सुरगेह । कुगतिबंध दलमलहि बनारसि, वीतरागपूजाफल एह ॥९॥ अन्वयार्थों--(अर्हताम्) श्रीवीतराग सर्वज्ञदेवकी (निर्मिता) की हुई (अर्चा) पूजा (पापम् ) पापका (लुम्पति) लोप कर देती है, (दुर्गतिम् ) नरकादिक दुर्गतियोंको (दलयति) नष्ट कर देती है, (आपदम् ) आपदाओंका (व्यापादयति ) दलन करती है, (पुण्यम् ) पुण्यको (संचिनुते) संचित करती है, (श्रियम् ) लक्ष्मीको (वितनुते) बढाती है, (नीरोगताम्) नीरोगताको (पुष्णाति) पुष्ट करती है, (सौभाग्यम् ) सौभा- ग्यको (विदधाति) अटल रखती है, (ग्रीतिम्) प्रीतिको - ( पल्लवयति ) पल्लवित करती है, (यशः) कीर्तिको (प्रसूते) उत्पन्न करती है, (वर्गम् ) खर्गको (यच्छति) देती है (च) और (नितिम्) मोक्षको (रचयति) रचती है अर्थात् मोक्ष- प्राप्त कर देती है। भावार्थ-अरहंतदेवकी पूजा करनेसे अशुभ कर्मोका उपशम होता है और शुभ कमौका उदय तथा वृद्धि होती है। 1 - स्वर्गस्तस्य गृहाङ्गणं सहचरी साम्राज्यलक्ष्मी शुभा सौभाग्यादिगुणावलिविलसति स्वैरं वपुर्वेश्मनि । १.देव। .
संसारः सुतरः शिवं करतलकोडे लुठत्यञ्जसा यः श्रद्धाभरभाजनं जिनपतेः पूजां विधत्ते जनः ॥१०॥ देवलोक ताको घर-ऑगन, राजरिद्ध सेवे तसु पाय । ताके तन सौभाग्यआदिगुन, केलि विलास करें नित आय ॥ सो नर तुरत तिरै भवसागर, निर्मल होय मोक्षपद पाय । द्रव्य-भाव-विधिसहित बनारसि, जो जिनवर पूजे मन लाय १० अन्वयार्थों-(यः) जो (जनः) मनुष्य (जिनपतेः) जिनेन्द्रदेवकी (श्रद्धाभरभाजनम् ) अत्यन्त श्रद्धापूर्वक (पूजाम्) पूजा (विधत्ते) करता है, (तस्स) उसको (वर्गः) खर्ग (गृहाङ्गणम् ) घरका आगन है और (साम्राज्यलक्ष्मीः) राज्यसम्पदा (शुभा) अच्छी (सहचरी) सखी है, (बपुर्वेश्मनि) उसके शरीररूपीघरमें (सौभाग्यादिगुणावलिः) सौभाग्य आदिक गुणों के समूह (खैरम्) खतंत्रता पूर्वक (विलसति) विलास करते है, (संसारः) परिममणरूप ससार (सुतरः) उसके लिये सुतर है-अर्थात् वह उसके पार सहज ही हो सकता है । और (शिवम् ) मुक्ति तो (अञ्जसा) शीघ्र ही (करतलकोडे) उसकी हथेलीपर आकर (लुठति) लोटती है। भावार्थ-जिनेन्द्रदेवकी पूजा करनेवालेको खर्गादिक सम्पदाएं सहज ही मिल सकती है। शिखरिणी। कदाचिन्नातङ्कः कुपित इव पश्यत्यभिमुख विदूरे दारिद्यं चकितमिव नश्यत्यनुदिनम् ।
१२ विरक्ता कान्तेव त्यजति कुगतिः सङ्गमुदयो न मुञ्चत्यभ्यर्ण सुहृदिव जिनाची रचयतः ॥११॥ ज्यौं नर रहै रिसाय कोप करि, त्यो चिन्ता भय विमुख बखान । ज्यौं कायर शंकै रिपु देखत, त्यौं दरिद्र भाजे भय मान ॥ ज्यौं कुनारि परिहर षंढपति, त्यौं दुर्गति छंडै पहिचान। हितु ज्यौं विभौ तजै नहिं संगत, सो सब जिनपूजाफल जान ११ अन्वयार्थों-(जिनार्चाम् ) जिनेन्द्रदेवकी पूजा (रचयतः) करनेवाले पुरुषके (अभिमुखम् ) साम्हने (आतङ्कः) रोग (कु- पित इव) क्रोधित हुए मनुष्यके समान (कदाचित् ) कभी (न) नहीं (पश्यति) देखता, (दारियम् ) दरिद्रता (चकितम् इव) डरे हुएके समान (अनुदिनम् ) प्रतिदिन (विदूरे) दूर ही रहती है, (कुगतिः) दुर्गति (विरक्ता) रूठी हुई (कान्ता इव) स्त्रीके समान (त्यजति) छोड़ देती है, और (उदयः) भाग्योदय अर्थात् विभूति (सुहृत् इव) सच्चेमित्रके समान (अभ्यर्णम् ) निरन्तर अर्थात् किसी भी क्षणमें (सङ्गम् ) साथ (न) नहीं (मुञ्चति) छोड़ती। भावार्थ-जिनेन्द्रकी पूजा करनेवाले पुरुषको दुर्गति रोग दारिद्र आदि दूरसे ही छोड़ जाते है और विभूति ऐश्वर्य आदिक निरन्तर साथ रहते है। शार्दूलविक्रीडित । यः पुष्पैर्जिनमर्चति स्मितसुरस्त्रीलोचनैः सोऽय॑ते यस्तं वन्दत एकशखिजगता सोऽहर्निशं वन्द्यते । १ नपुंसकपतिको ।
१३ यस्तं स्तौति परत्र वृत्रदमनस्तोमेन स स्तूयते यस्तं ध्यायति क्लुप्तकर्मनिधनःस ध्यायते योगिभिः॥१२॥ जो जिनेंद्र पूजे फूलनसों, सुरनैनन पूजा तिस होय । वंदै भावसहित जो जिनवर, वंदनीक त्रिभुवनमें सोय ॥ जो जिन सुजस करै जन ताकी, महिमा इन्द्र करें सुरलोय । जो जिन ध्यान करत वानारसि, ध्यावें मुनि ताके गुण जोय॥१२॥ अन्वयार्थों-(यः) जो (जिनम् ) जिनेन्द्रदेवको (पुष्पैः) पुष्पोंसे (अर्चति) पूजता है, (सः) वह पुरुष (सितसुरस्त्री- लोचनैः ) मुसकुराती हुई देवांगनाओंके नेत्रोंद्वारा (अर्यते) पूजा जाता है, (यः) जो (तम् ) उनकी (एकशः) एकवार (वन्दते) बन्दना करता है, (स.) वह पुरुष (त्रिजगता) तीनों लोकोंके द्वारा (अहर्निशम् ) रातदिन (वन्द्यते) वन्दना किया जाता है, (यः) जो पुरुष (तम् ) उनकी (स्तौति ) स्तुति करता है (सः) वह (परत्र) परलोकमें (स्त्रदमनस्तोमेन) इन्द्रोंके समूहद्वारा अर्थात् सौ इन्द्रोंके द्वारा (स्तूयते) स्तुति किया जाता है और (यः) जो (तम् ) जिनेन्द्रदेवका (ध्यायति) ध्यान करता है, (सः) वह (क्लृप्तकर्मनिधनः) समस्त कर्मोंसे रहित होता हुआ (योगिभिः) योगियोंद्वारा (ध्यायते) चिन्तवन किया जाता हैं। भावार्थ-जिनेन्द्रदेवकी पूजा वन्दना ध्यानादिक करनेवाला पुरुष इन्द्रादिकोंद्वारा पूजा बन्दा और ध्याया जाता है।
1 -- गुरु अधिकार। वंशस्थविलम् । अवद्यमुक्त पथि यः प्रवर्त्तते प्रवर्त्तयत्यन्यजनं च निस्पृहः। स सेवितव्यः स्वहितैषिणा गुरुः स्वयं तरस्तारयितुं क्षमः परम् ॥ १३ ॥ अडिल्ल छन्द । पापपंथ परिहरहि, धरहिं शुभपंथ पग । पर-उपगार निमित्त, वखानहि मोक्षमग ॥ सदा अवांछित चित्त, जु तारन तरन जग । ऐसे गुरुको सेवत, भागहिं करम ठग ॥ १३ ॥ अन्वयार्थों-(यः) जो (अवधमुक्ते).पापरहित (पथि) मार्गमें (प्रवर्चते) खयं प्रवर्त्तता है (च) और (निस्पृहः सन्') निस्पृह होकर अर्थात् विना किसी आशाके (अन्यजनम् ) दूसरे मनुप्योंको (प्रवर्त्तयति) प्रवर्तन कराता है, इसी प्रकार जो (स्वयं तरन् ) संसाररूपी समुद्रसे आप तरता हुआ (परम् ) दूसरोंको (तारयितुम् ) तारनेके लिये (क्षमः) समर्थ है, (सः) वह (गुरुः) सद्गुरु (खहितैषिणा) जो अपना भला चाहते है, उनके द्वारा (सेवितव्यः) सेवन करनेके योग्य है। भावार्थ--आत्मकल्याण करनेवाले प्राणियोंको ऐसे गुरुका सेवन करना चाहिये कि, जो मोक्षमार्गमें खयं चले और दूसरोंको चलावै । तथा संसाररूपी समुद्रसे आप तरै और दूसरोंको तारै। - " मालिनी। विदलयति-कुबोधं बोधयत्यागमार्थ सुगतिकुगतिमार्गों पुण्यपापे व्यनक्ति । '
१५
अवगमयति कृत्याकृत्यभेदं गुरुयो
भवजलनिधिपोतस्तं विना नास्ति कश्चित् ॥१४॥
हरिगीतिका छन्द।
मिथ्यात-दलन सिद्धांत साधन, मुकतिमारग जानिये ।
करनी अकरनी सुगति दुर्गति, पुण्य पाप पखानिये ॥
संसारसागरतरनतारन, गुरु जहाज विशेखिये।
जगमाहिं गुरुसम कह बनारसि, और कोउ न देखिये ॥ १४ ॥
अन्वयाधी-(यः) जो (कुबोधम् ) मिथ्याज्ञानको
(विदलयति) दलन करता है, (आगमार्थम् ) सिद्धान्त
शासोंके अर्थको (बोधयत्ति) प्रकाशित करता है, (सुगतिकुग-
तिमार्गों) खर्गादिक सुगति और नरकादिक दुर्गतिके मार्गरूप
(पुण्यपापे) पुण्य और पापको (व्यनक्ति) प्रकट करता है,
और (कृत्याकृत्यभेदम् ) कृत्य अकृत्य अर्थात् करनेयोग्य और
न करनेयोग्य कार्यके भेदको (अवगमयति) बतलाता है (
(विना) उसके बिना (कश्चित् ) और कोई ( भवजलनिधि-
पोतः) ससाररूपी समुद्रसे पार उतारनेके लिये जहाज (न
अस्ति) नहीं है।
शिसरिणी।
पिता माता भ्राता प्रियसहचरी सूनुनिवहः
सुहृत्स्वामी माद्यत्करिभटरथाश्वं परिकरः।
निमज्जन्तं जन्तुं नरककुहरे रक्षितुमलं
गुरोर्धर्माधर्मप्रकटनपरात्कोऽपि न परः ॥१५॥
4 मत्तगयन्द। मात पिता सुत बन्धु सखीजन, मीत हितू सुख कामिनि पीके। सेवक साज मतंगज बाज, महादल राज रथी रथ नीके ॥ दुर्गति जाय दुखी विललाय, परैलिर आय अकेलहि जीके। पंथ कुपंथ गुरू समझावत, और सगे सब खारथहीके ॥ १५ ॥ अन्वयार्थी-(नरककुहरे) नरकरूपी कुहरमें (निमज- न्तम् ) डूबते हुए (जन्तुम् ) प्राणीको (धर्माधर्मप्रकटनपरात्.) धर्म अधर्मके प्रगट करनेमें तत्पर ऐसे (गुरोः) गुरुसे (परः) भिन्न अर्थात् गुरुको छोड़कर अन्य (पिता. माता भ्राता प्रिय- सहचरी सनिवहः सुहृत्स्वामी माद्यत्करिभटस्थाश्वं परिकरः) पिता, माता, भाई, प्यारी सहचरी अर्थात् स्त्री, पुत्र, मित्र, स्वामी, मदोन्मत्त हाथी, योद्धा, रथ, घोड़े, और परिकार आदि (क: अपि) कोई भी (रक्षितुम् ) रक्षा करनेको (अलम् । समर्थ (न) नहीं हैं। भावार्थ-नरकमें पड़ते हुए प्राणीको धर्म और अधर्मका खरूप समझा कर गुरु ही रक्षा कर सकते है और कोई नहीं । " - शार्दूलविक्रीडित । किं ध्यानेन भवत्यशेषविषयत्यागैस्तपोभिः कृतं पूर्ण भावनयालमिन्द्रियजयैः पर्याप्तमाप्त किं त्वे भवनाशनं कुरु गुरुप्रीत्या गुरोः शासन सर्वे येन विना विनाथवलवत्स्वार्थाय नालं गुणाः॥१६ वस्तु छन्द । ध्यान धारन ध्यान धारन, विषैसुखत्याग । करुनारस आदरन, भूमिसैन इन्द्रीनिरोधन ॥ .
व्रत संजम दान तप, भगति भाव सिद्धांतसाधन । ये सब काम न आवहीं, ज्या विन नायक सैन । शिवसुखहेतु बनारसी, कर प्रतीत गुरुवैन ॥ १६ ॥ अन्वयार्थी-(ध्यानेन) ध्यान करनेसे (किम् भवति) क्या होता है? (अशेषविपयत्यागैः किं भवति) समस्त विपयोके त्यागसे क्या होता है-उससे कुछ सिद्धि नहीं, (तपोभिः किं कृतम् भवति ) तप करनेसे क्या होता है ? (भावनया कि पूर्णम् ) भावनाओंमे भी क्या पूग पडता है ! और इसी प्रकार (इन्द्रियजयः अलम्) इन्द्रियोको जीतनेसे क्या? और (आप्तागमः पर्याप्तम् ) सर्वज्ञ प्रणीत आगमके अध्ययनसे क्या ? अर्थात् केवल इनसे कुछ लाभ नहीं है (किन्तु ) किंतु (एक) एक (भवनागनं) ससारके नाश करनेवाली (गुरोः शासनं) गुरुकी आज्ञाको (गुरुप्रीत्या) गाढ भक्तिसे (कुरु) पालन करो; (येन विना) जिसके विना (विनाथवलवत् ) विना खामीकी सेनाके समान (सर्व गुणाः) पूर्वोक्त ध्यानादिक समस्त- गुण (वार्थाय ) अपने अपने फलकी सिद्ध करनेके लिये (नालम् ) समर्थ नहीं है। भावार्थ-जैसे नायकके विना सेना जय प्राप्त नही कर सकती, उसीप्रकार गुरुपरम्परासे प्राप्त किये विना ध्यानादिक सिद्धिके दाता नहीं होते। जिनमताधिकार । शिसरिणी। न देवं नादेवं न शुभगुरुमेनं न कुगुरु न धर्म नाधर्म न गुणपरिणद्धं न विगुणम् । K4 २ १८ न कृत्यं नाकृत्यं न हितमहितं नापि निपुणं विलोकन्ते लोका जिनवचनचक्षुविरहिताः ॥ १७ ॥ कुंडलिया उन्द। देव अदेव नहीं लखें, सुगुरु कुगुरु नहिं सूझ । धर्म अधर्म गर्ने नहीं, कर्म अकर्म न बूझ ॥ कर्म अकर्म न बूझ, गुण र औगुण नहिं जानहिं । हित अनहित नहिं सधे, निपुणमूरख नहिं मानहिं । कहत वनारसि ज्ञानदृष्टि, नहिं अंध अवेवहि । जैनवचनहगहीन, लखें नहिं देव अदेवहि ॥ १७॥ अन्वयार्थी--(जिनवचनचक्षुविरहिताः) जिनेन्द्रदेवके बचनरूपी चक्षुओंसे रहित (लोकाः) लोग (न) न (देवम्) देवको (विलोकन्ते) देखते हैं (न अदेवम् ) न अदेवको, (न एनं शुभगुरुम् ) न इन श्रेष्ठ गुरुको देखते है (न कुगुरुम्) न कुगुरुको, (न धर्मम् ) न धर्मको देखते हैं (न अधर्मम् ) न अधर्मको, (न गुणपरिणद्धम् ) न गुणी देखते है (न विगुणम्) न निर्गुणको, (न कृत्यम् ) न करनेयोग्य देखते है (न अकृत्यम्) न करनेके अयोग्य, (न हितम्) नहित देखते हैं, (न अहितम्) न अहित (अपि) और (न निपुणम् ) न निपुणको देखते हैं, न नूखको। भावार्थ-जो जिनमत धारण नहीं करते हैं, वे अपना हिताहित कुछ भी नहीं जान सकते। शार्दूलविक्रीडित । मानुष्यं विफलं वदन्ति हृदयं व्यर्थ वृथा श्रोत्रयो- निर्माणं गुणदोषभेदकलनां तेषामसंभाविनीम् ।
दुर्वार नरकान्धकूपपतनं मुक्तिं वुधा दुर्लभां
सार्वज्ञः समयो दयारसमयो येपां नकर्णातिथिः।।
कवित्त।
नाको मनुज-जनम सब निष्फल, मन निष्फल निष्फल जुग कान।
गुण अर दोष विचार भेटविधि, ताहि महा दुर्लभ है ज्ञान ॥
नाको सुगम नरक दुख संकट, अगमपंथ पदवी निर्वान ।
जिनमतवचन दयारसगर्भित, जे न मुनत सिद्धांतवखान ॥ १८ ॥
अन्वयार्थी-(येपाम् ) जिन पुरुषोके (दयारसमयः)
दयारूपी रससे पूरित (सार्वज्ञः) सर्वज्ञदेवका कहा हुआ
(समयः) शास्त्र (कर्णातिथिः) कर्णगोचर (न) नहीं हुआ
है, (बुधाः) पण्डितलोग (तेपाम् ) उनका (मानुप्यम् )
मनुष्यजन्म (विफलम् ) निष्फल (बदन्ति ) कहते है, (तेपाम्)
उनके (हृदयम् ) हृदयको (व्यर्थम् ) व्यर्थ (वदन्ति ) बतलाते
है, (श्रोत्रयोः निर्माणम् ) उनके कर्णोके वननेको (वृथा)
व्यर्थ कहते है, (गुणदोपभेदकलनाम् ) उनके गुण और दोपोंके
भंट करनेका विचार (असम्भाविनीम् ) असम्भव है । उनका
(नरकान्धकृपपतनम् ) नरकरूपी अन्धकूपमें पडना (दुर्वारम् )
रुक नहीं सकता और उन्हें (मुक्तिम् ) मोक्ष (दुर्लभाम्) अत्यन्त
दुर्लभ है।
पीयूपं विपवज्जलं ज्वलनवत्तेजस्तमःस्तोमव-
न्मित्रं शात्रववत्स्रज भुजगवञ्चिन्तामार्ण लोष्ठवत् ।
ज्योत्स्ना ग्रीष्मजघर्मवत्स मनुते कारुण्यपण्यापणं
जैनेन्द्रं मतमन्यदर्शनसमं यो दुर्मतिर्मन्यते ॥१९॥
२० पट्पद। अमृतको विष कहैं, नीरको पावक मानहिं । तेज तिमिरसम गिनहि, मित्रको शत्रु वखानहिं ॥ पहुपमाल कहिं नाग, रतन पत्थर सम तुल्लाहिं। चंद्रकिरण आतपखरूप, इहि भांति जु भुल्लाहि ॥ करुणानिधान अमलान गुन, प्रगट वनारसि जैनमत । परमत समान जो मन धरत, सो अजान मूरख अपत ॥ १९ ॥ अन्वयार्थी-(यः) जो (दुर्मतिः) मूर्ख पुरुष (कारुण्यपण्यापणम् ) करुणाके निधान (जैनेन्द्रम् मतम् ) जिनमतको (अन्यदर्शनसमम् ) अन्यमतोंके समान ( मन्यते) मानता है, (सः) वह पुरुष (पीयूषम् ) अमृतको (विपवत् ) विषके समान (मनुते ) मानता है, (जलम् ) जलको (ज्वल- नवत् ) अग्निके समान, (तेजः) तेजको (तम स्तोमवत् ) अन्धकारके समूहके समान, (मित्रम् ) मित्रको (शात्रववत् ) शत्रुके समान, (स्रजम् ) मालाको (भुजगवत् ) सर्पके समान, (चिन्तामणिम् ) चिन्तामणि रत्नको (लोष्ठवत) मिट्टीके ढेलेके समान और (ज्योत्स्नाम् ) चन्द्रमाकी चांदनीको (ग्रीष्मजधर्मवत्) ग्रीष्मऋतुकी धूपके समान (मनुते ) मानता है । - धर्म जागरयत्यघं विघटयत्युत्थापयत्युत्पथं भिन्ते मत्सरमुच्छिनत्ति कुनयं मनाति मिथ्यामतिम् । वैराग्यं वितनोति पुष्यति कृपां मुष्णाति तृष्णां च य- तज्जैन मतमर्चति प्रथयति ध्यायत्यधीते कृती ॥ २०॥ , मरहटा छन्द। शुभधर्म विकाशै, पाप विनाशै कुपथ उथप्पनहार । मिथ्यामत संडे, कुनय विहंडे, मंडै दया अपार ॥ तृष्णा मद मारे, राग विडार, यह जिनआगम सार। जो पूर्जे ध्याव, पढ़े पढावे, सो जगमाहि उदार ॥ २० ॥ अन्वयार्थी-(यत् ) जो (धर्मम् ) धर्मको (जागर- यति) जगाता है, अर्थात् आत्मधर्मका प्रकाश करता है, (अघम् ) पापको (विघटयति ) विनाश करता है, (उत्पथम्) खोटेमार्गको (उत्थापयति) उठाता है, (मत्सरम्) ईर्षाको (भिन्ते ) खंड खड करता है, (कुनयम् ) मिथ्या एकान्त नयको (उच्छिनत्ति ) उखाडकर फेंकता है, (मिथ्यामतिम् ) मिथ्या- ज्ञानको (मनाति) मिटाता है, (वैराग्यम् ) वैराग्यको (वितनोति) बढ़ाता है, (कृपाम् ) दयाको (पुप्णाति) पुष्ट करता है (च) और (तृष्णाम् ) तृष्णाको (मुप्णाति ) चुराता है, (तत् जैनं मतम् ) उस जैनमतको (कृती) चतुर पुरुष (अर्चति) पूजते हैं, (प्रथयति) प्रसिद्ध करते है, (ध्यायति) ध्याते है, और (अधीते) पढ़ते है। संघाधिकार । रत्नानामिव रोहणक्षितिधरः खं तारकाणामिव स्वर्गः कल्पमहीरुहामिव सरः पङ्केरुहाणामिव । पाधोधिः पयसामिवेन्दुमहसां स्थानं गुणानामसा- वित्यालोच्य विरच्यतां भगवतः संघस्य पूजाविधिः॥
२२' कवित्त (३१ मात्रा)। जैसे नभमंडल तारागण, रोहनशिखर रतनकी खान । ज्यों सुरलोक भूरि कलपद्रुम, ज्यो सरवर अंबुजवन जान ।। ज्यों समुद्र पूरन जलमंडित, ज्यो शशिछविसमूह सुखदान ! तैसै संघ सकल गुणमन्दिर, सेवहु भावभगति मन आन ॥२१॥ अन्वयार्थी-(रत्नानां रोहणक्षितिधरः इव) जैसे रोहण- पर्वत रनोंका स्थान है, (तारकाणां खं इव) जैसे आकाश तारा- गणोंका स्थान है, (कल्पमहीरुहाणां स्वर्गः इव) जैसे स्वर्ग कल्पवृक्षोंका स्थान है, (पङ्केरुहाणाम् सरः इव) जैसे तालाव कमलोका स्थान है, और (पयसां पाथोधिः इव) जैसे समुद्र पानीका स्थान है, उसीप्रकारसे (असौ) यह चार प्रकारका संघ (इन्दुमहसां गुणानां) चन्द्रमाके समान उज्ज्वल गुणोका (स्थान) स्थान है; (इत्यालोच्य) ऐसा विचार करके (भगवतः संघस्य) ऐश्वर्यशाली संघकी (पूजाविधिः) पूजा विधि (विरच्यते) की जाती है। यः संसारनिरासलालसमतिर्मुक्त्यर्थमुत्तिष्ठते यं तीर्थ कथयन्ति पावनतया येनास्ति नान्यः समः। यस्मै स्वर्गपतिनमस्यति सतां यस्माच्छुभं जायते स्फूर्तिर्यस्य परा वसन्ति च गुणा यस्मिन्स संघोऽय॑ताम् जो संसार-भोग-आशा तज, ठानत मुकति पंथकी दौर। जाकी सेव करत सुख उपजत, जिहि समान उत्तम नहिं और ॥ इन्द्रादिक जाके पद वंदत, जो जंगम तीरथ शुचि ठौर । जाम नित निवास गुन मंडन, सो श्रीसंघ जगत शिरमौर॥२२॥ A २३ अन्वयार्थों-(यः) जो (संसारनिरासलालसमतिः सन् ) जन्ममरणरूप ससारके नाश करनेकी लालसा करता हुआ (मुक्त्यर्थम् ) मोक्ष जानेके लिये ( उत्तिष्ठते) उद्यत होता है, उसे (सः संघः अर्च्यताम् ) वह सघ पूजना चाहिये (यम् ) जिसको (पावनतया) पवित्रताके कारण (तीर्थस्) तीर्थ अर्थात् ससारसे तिरनेका कारण (कथयन्ति) कहते है, (येन ) जिसके (समः) समान (अन्यः) और (न अस्ति) कुछ नहीं है, (यसै) जिसके लिये (स्वर्गपतिः) इन्द्र भी (नमस्सति ) नमस्कार करता है, (यसात् ) जिससे (सताम् ) सज्जनोंका (शुभम् ) कल्याण (जायते) होता है, (यस्य) जिसकी (परा) उत्कृष्ट (स्फूर्तिः) दीप्ति है, (च) और (यसिन् ) जिसमे (गुणाः) अनेक गुण (वसन्ति) निवास करते है। लक्ष्मीस्तं स्वयमभ्युपैति रभसात्कीर्तिस्तमालिङ्गति प्रीतिस्तं भजते मतिः प्रयतते तं लन्धुमुत्कण्ठया। स्वाश्रीस्तं परिरन्धुमिच्छति मुहुर्मुक्तिस्तमालोकते यः संघं गुणसंघकेलिसदनं श्रेयोरुचिः सेवते ॥ २३ ॥ ताको आय मिलै सुखसंपति, कीरति रहै तिहूं जग छाय । जिनसों प्रीति वटै ताके घट, दिन दिन धर्मबुद्धि अधिकाय ॥ छिनछिन ताहि लखै शिवसुन्दरि, सुरगसंपदा मिलै सुभाय । घानारसि गुनरासि संघकी, जो नर भगति करै मन लाय ॥२३॥ अन्वयार्थी-(यः) जो (श्रेयोरुचिः) अपना कल्याण २४ स चाहनेवाला पुरुष (गुणसंधकेलिसदनम् ) गुणसमुदायके कीड़ा करनेके स्थानभूत (संघम् ) संघका (सेवते) सेवन करता है, (तम्) उस पुरुषके समीप (लक्ष्मीः) लक्ष्मी (स्वयम्) अपने आप (अभ्युपैति ) आकर उपस्थित हो जाती है, (कीतिः) * कीर्ति (तम्) उस पुरुषको (रभसात्) बड़ी शीघ्रतासे (आलिङ्गति) आलिंगन करती है, (प्रीतिः) प्रीति (तम् ) उसका (भजते) 'सेवन करती है, (मतिः) बुद्धि (तम् ) उसके (लब्धुम् उत्कण्ठया) मिलनेकी उत्कंठासे (प्रयतते) प्रयत्न करती है, (स्वः श्रीः) वर्गकी लक्ष्मी (तम् परिधुम् ) उससे रमण करनेकी (इच्छति) इच्छा करती है और (मुक्तिः) मुक्ति (तम् ) उसको (मुहुः) वारंवार (आलोकते) देखती है। यद्भक्तेः फलमहदादिपदवीमुख्यं कृषः सस्यव- ञ्चक्रित्वत्रिदशेन्द्रतादि तृणवत्प्रासनिक गीयते । शक्तिं यन्महिमस्तुतौ न दधते वाचोऽपि वाचस्पतेः संघः सोऽघहरः पुनातु चरणन्यासैः सतां मन्दिरम् ॥ जाने भजत मुकतिपदपावत, इन्द्रादिक पद गिनत न कोय । ज्यों कृषि करत धानफल उपजत, सहज पँयार घास भुस होय॥ जाके गुन जस जंपन कारन, सुरगुरु थकित होत मदखोय । सो श्रीसंघ पुनीत वनारसि, दुरित-हरन विचरत भुविलोया॥२४॥ अन्वयाथी-(कृपेः सस्थवत् ) जैसे खेतीका मुख्य फल धान्य वा अनाज होना है, उसी तरह ( यद्भक्तेः फलम् ) संघकी भक्ति करनेका फल (अहंदादिपदवीमुख्यम्) अरहंत सिद्ध आदिक मुख्य मुख्य पदवियोंका प्राप्त होना है। (चक्रित्वत्रिद- २५ शेन्द्रतादि) चक्रवर्ती इन्द्र आदिक पदविया (तृणवत्) भूसाके समान (प्रासनिकम् ) प्रासगिक (गीयते) गिनी जाती है। ( यन्महिमस्तुतौ) और जिसकी महिमाकी स्तुति करने में (वाचस्पतेः) वृहस्पतिके (वाचः अपि) वचन भी (शक्तिम् ) शक्ति (न) नहीं (दधते) रखते है, (सः) ऐसा (अघहरः) पापका नाश करनेवाला (संघ) सघ (सताम् ) सज्जनोंके. (मन्दिरम् ) घरोंको (चरणन्यासः) अपने चरणोंसे (पुनातु) पवित्र करो। भावार्थ-खेती करनेका मुख्य फल धान्य उत्पन्न होना है, धान्यके साथ धास भूसा आदिक तो खय उत्पन्न हो जाते है, इसी तरह संघकी भक्ति करनेसे अरहंतादि पदविया मिलती है। रही इन्द्र चक्रवर्ती आदिककी पदवियां सो प्रसगानुसार खयं मिल जाती है। अभिप्राय यह कि-सघकी भक्ति करनेवाला इन्द्र चक्रवर्ती आदिके सुख भोगता हुआ मोक्षको प्राप्त होता है। अहिंसा अधिकार । क्रीडाभूः सुकृतस्य दुष्कृतरजःसंहारवाल्या भवो- दन्वन्नौर्व्यसनाग्निमेघपटली संकेतदूती श्रियाम् । निःश्रेणिस्त्रिदिवौकसः प्रियसखी मुक्तेः कुगत्यर्गला सत्त्वेषु क्रियतां कृपैव भवतु क्लेशरशैषैः परैः ॥ २५ ॥ घनाक्षरी। सुकृतकी खान इन्द्रपुरीकी नसैनी जान, पापरजखंडनको पौनरासि पेखिए। .
. . २६ भवदुखपावक बुझाइवेको मेघमाला, कमला मिलाइवेको दूती ज्यों विशेखिए । सुगति वधूसों प्रीति पालिवेको आलीसम, कुगतिके द्वार दृढ़ आगलसी देखिए । ऐसी दया कीजै चित तिहूँलोकप्राणीहित, और करतूत काहू लेखेमें न लेखिए ॥ २५ ॥ अन्वयार्थी-जो (सुकृतस्य) पुण्यके (क्रीडाभूः) क्रीड़ा करनेका स्थान है, (दुष्कृतरजःसंहारवात्या) पापरूपी घूलके उड़ानेके लिये ऑधी है, (भवोदन्वन्नौः) ससाररूपी समुद्रसे तिरनेके लिये नौका है, (व्यसनाग्निमेघपटली) व्यसनरूपी अग्निके वुझानेके लिये मेघमाला है, (श्रियाम् ) सम्पदा- रूपी स्त्रियोंसे मिलाप करानेवाली (सङ्केतदूती) संकेत दूती है, (त्रिदिवौकसः निःश्रेणिः) वर्गके चढनेके लिये नसैनी है, (मुक्तेः प्रियसखी) मुक्तिकी प्यारी सखी है और (कुगत्यर्गला) नरकादिक दुर्गतियोंके रोकनेके लिये अर्गल है, (सत्त्वेषु) प्राणियोंपर ऐसी (कृपा एव) एक दया ही (क्रि- यताम् ) करनी चाहिये (परैः) और (अशेषैः) सारे (क्लेशैः) क्लेशोंसे (भवतु ) क्य होता है ? भाव यह कि, दया ही प्रधान धर्म है। विना दयाके अन्य व्रतादि क्लेशमात्र है। -- शिखरिणी। यदि मावा तोये तरति तरणिर्ययुदयते प्रतीच्या सप्ताचियदि भजति शैत्यं कथमपि ।
२७ यदि मापीठं स्यादुपरि सकलस्यापि जगतः प्रसूते. सत्त्वानां तदपि न वधः क्वापि सुकृतम् ॥ अमानक छन्द। जो पश्चिम रवि उगै, तिरे पापान जल। जो उलटै भुवि लोक, होय शीतल अनल ॥ जो मेरू डगमगे, सिद्धकहँ होय मल । तव ह हिंसा करत, न उपजत पुण्यफल ॥ २६ ॥ अन्वयार्थी-(यदि) यदि (तोये) जलमें (ग्रावा) पाषाण (तरति) तिर जावै, (यदि) यदि (तरणिः) सूर्य (प्रतीच्याम् ) पश्चिमदिशामें (उदयते) उदय हो जाय, (यदि) यदि (सप्ताचिः) अग्नि (कथम् अपि) किसी तरह (शैत्यम्) शीतल (भजति) हो जाय, (यदि ) यदि (क्ष्मापीठम्) पृथ्वीतल (सकलस्स) समस्त (जगतः अपि) जगतके भी (उपरि) ऊपर (स्यात् ) हो जाय, अर्थात् पृथ्वी लौट जाय (तदपि) तौ भी (सत्त्वानाम् ) प्राणियोंका (वधः) वध करना (क अपि) किसी भी विषयमें (सुकृतम् ) पुण्य (न प्रमते) उत्पन्न नहीं कर सकता । भावार्थ-ससारके सारे विरुद्ध कार्य भले ही हो जॉय, परंतु हिंसासे पुण्य उत्पन्न नही हो सकता । मालिनी। स कमलवनमग्नेर्वासरं भास्वदस्ता- दमृतमुरगवात्साधुवादं विवादात् ।
२८ - रुगपगममजीर्णाज्जीवितं कालकूटा- दभिलपति वधायः प्राणिनां धर्ममिच्छेत् ।। २७ ॥ घनाक्षरी छन्द। अगनिमें जेसे अरविंद न विलोकियत, सूर अथवत जैसे वासर न मानिए । सांपके वदन जैसे अमृत न उपजत, कालकूट खाए जैसे जीवन न जानिए । कलह करत नहिं पाइए सुजस जैसे, वाढत रसांस रोग नाश न वखानिए। प्राणीवधमाहि तैसें धर्मकी निशानी नाहि, याहीतै बनारसी विवेक मन आनिए ॥ २७ ॥ अन्वयार्थी-(यः) जो पुरुष (प्राणिनाम् ) प्राणियोंके (वधात् ) घातकरनेसे (धर्मम् ) धर्मकी (इच्छेत् ) इच्छा करता है, (सः) वह पुरुष (अग्नेः) अग्निसे (कमलवनम् ) कमलके वनके उत्पन्न होनेकी, (भाखदस्तात् ) सूर्यके अस्त होनेसे (वासरम् ) प्रभात होनेकी, (उरगवक्रात ) सर्पके मुखसे (अमृतम् ) अमृतकी, (विवादात् ) विवादसे :(साधुवादम्) अच्छे और यशखी वचनोंकी, (अजीर्णात् ) अजीर्ण अर्थात् अपचसे (रुगपगमम् ) रोग दूर होनेकी और (कालकूटात् ) विषसे (जीवितम् ) जीवित रहनेकी (अभिलपति) अभिलाषा करता है। , , शार्दूलविक्रीडित । आयुर्दीर्घतरं वपुर्वरतरं गोत्रं गरीयस्तरं वित्तं भूरितरं बलं बहुतरं स्वामित्वमुच्चैस्तरम् । 1
२९
आरोग्यं विगतान्तरं त्रिजगति श्लाध्यत्वमल्पेतर
संसाराम्बुनिधिं करोति सुतरं चेतः कृपान्तरम् ॥
कवित्त (३१ मात्रा)।
दीरघ आयु नाम कुल उत्तम, गुण संपति आनंदनिवास ।
उन्नति विभव सुगम भवसागर, तीन भुवन महिमा परकास ॥
भुजवलवंत अनंतरूप छवि, रोगरहित नित भोगविलास ।
जिनके चित्त दयाल तिन्हींके, सव सुख होहिं वनारसिदास ॥
अन्वयार्थी-(कृपान्तरम् ) दयासे भीगा हुआ (चेतः)
चित्त (आयुः) आयुको (दीर्घतरम् करोति) बढ़ाता है,
(वपुः) शरीरको (वरतरम् ) श्रेष्ठ (करोति) करता है,
(गोत्रम् ) गोत्रको (गरीयस्तरम् ) उत्तम (करोति) करता है,
(वित्तम् ) धनको (भूरितरम् करोति) वहुत करता है, (बलम्)
बलको (बहुतरम् करोति) वढ़ाता है, (स्वामित्वम् ) खामीपनेको
(उच्चैस्तरम् करोति) ऊचा करता है अर्थात् खामित्वका ऊंचा
पद देता है, (आरोग्यम् ) नीरोगताको (विगतान्तरम् करोति)
व्यवधानरहित करता है, अर्थात् हमेशा निरोगता रहती है,
(त्रिजगति) तीनो जगतमें (अल्पेतरम् ) बहुत (श्लाध्यत्वम्)
प्रशंसा (करोति) करता है और (संसाराम्बुनिधिम् ) ससाररूपी
समुद्रको (सुतरम् ) सहजरीतिसे तिरने योग्य (करोति)
करता है।
सत्यवचन अधिकार।
विश्वासायतनं विपत्तिदलनं देवैः कृताराधनं
मुक्तेः पथ्यदनं जलाग्निशमनं व्याघोरगस्तम्भनम्
३० श्रेयःसंवननं समृद्धिजननं सौजन्यसंजीवन कीतः केलिवन प्रभावभवनं सत्यं वचः पावनम् ॥२९॥ पट्पद। गुणनिवास विश्वास वास, दारिददुखखंडन । देवराधन योग, मुकतिमारग, मुखमडन ॥ सुयशकेलि-आराम, धाम सजन मनरजन । नागवाघवशकरन, नीर-पावक-भयभंजन ॥ महिमा निधान सम्पतिसदन, मंगल मीत पुनीत मग । सुखरासि बनारसिदास भन, सत्यवचन जयवंत जग ॥ २९ ॥ अन्वयाथी-(सत्यम् वचः) सत्यवचन (विश्वासायतनम्) विश्वासका घर है, (विपत्तिदलनम्) विपत्तियोंको दूर करनेवाला है, (देवैः कृताराधनम् ) देवोंसे भी पूजित है, (मुक्तेः पथि अदनम् ) मुक्तिके मार्गमे कलेवा है, (जलाग्निशमनम् ) जल और अग्मिको शान्त करनेवाला है, (व्याघोरगस्तम्भनम् ) सिंह सादिकोंको स्तंभन करनेवाला है, (श्रेयःसंवननम् ) कल्याणोंको वश करनेवाला है, (समृद्धिजननम् ) ऋद्धियोंको उत्पन्न करनेवाला है, (सौजन्यसंजीवनम् ) सुजनताको जीवन देनेवाला है, (कीर्तेः केलिवनम्) कीर्तिके क्रीड़ा करनेका बगीचा है, (प्रभावभवनम्) प्रभावका मन्दिर है और (पावनम् ) पवित्र है । शिखरिणी। यशो यस्माद्भस्मीभवति वनवह्वेरिव वनं निदानं दुःखानां यदवनिरुहाणां जलमिव । न यत्र स्याच्छायाऽतप इव तपासंयमकथा कथंचित्तन्मिथ्यावचनमभिधत्ते न मतिमान् ॥३०॥ -
३१
.
कवित्त (३१ मात्रा)।
जो भसंत करै निज कीरति, ज्यों वनअग्नि दहै वन सोय ।
जाके सँग अनेक दुख उपजत, बढ़े वृक्ष ज्यो सींचत तोय ॥
जाम धरमकथा नहिं सुनियत, ज्यौं रविवीच छांहि नहिं होय ।
सो मिथ्यात्व वचन वानारसि, गहत न ताहि विचक्षण कोय ३०
अन्वयार्थों-(यसात् ) जिस मिथ्यावचनसे (वनवहेः)
दावानल अग्निसे (वनम् इव) वनके समान (यशः) यश
(भसीभवति) भस्म हो जाता है, (यत्) जो (अवनिरुहाणाम्)
वृक्षोंको (जलम् इव) जलके समान (दुःखानाम् ) दुःखोंका
(निदानम्) कारण है, अर्थात् जिस तरह जलसे वृक्ष उत्पन्न होते
है, उसी तरह झूठसे दुःख होते है (यत्र) और जिसमें (आतपे)
धूपमें (छाया इव) छायाके समान (तपः संयमकथा) तप
सयम आदिकी कथा (न) नही (स्यात्) हो सकती, (तन्मि-
थ्यावचनम् ) ऐसे मिथ्यावचनको (मतिमान् ) बुद्धिमान् पुरुष
(कथंचित् ) किसी तरह (न अभिधत्ते) धारण नहीं करते,
अर्थात् बुद्धिमान् झूठ नहीं बोलते ।
वंशस्थविलम् ।
असत्यमप्रत्ययमूलकारणं कुवासनासझ समृद्धिवारणम् ।
विपनिदानं परवञ्चनोर्जितं कृतापराधं कृतिभिर्विवर्जितम् ।।
रोड़क छन्द ।
कुमति कुरीत निवास, प्रीत परतीत निवारन ।
रिद्धिसिद्धिसुखहरन, विपत-दारिद-दुखकारन ॥
३२ परवंचन उतपत्ति, सहज अपराध कुलच्छन । सो यह मिथ्यावचन, नाहिं आदरत विचच्छन ॥३१॥ अन्वयार्थी-(अप्रत्ययमूलकारणम् ) अविश्वासका मूल- कारण, (कुवासनासम) बुरी वासनाओंका घर, (समृद्धिवारणम्) सम्पत्तिका रोकनेवाला, (विपभिदानम् ) विपत्तियोंका कारण, (परवञ्चनोर्जितम् ) दूसरोंको ठगनेके लिये किया जानेवाला, और (कृतापराधम्) अनेक अपराधोंका करानेवाला (असत्यम्) मिथ्यावचन (कृतिभिः) धर्मात्मा पुरुषोंके द्वारा (विवर्जितम्) वर्जित है। अर्थात् ऐसे वचनको धर्मात्मा कभी नहीं बोलते - शार्दूलविक्रीडित। तस्याग्निर्जलमर्णवः स्थलमरिमित्रं सुराः किङ्कराः कान्तारं नगरं गिरिरॅहमहिौल्यं मृगारिमंगः । पातालं विलमस्त्रमुत्पलदलं व्यालः शृगालो विषं पीयूषं विषमं समं च वचनं सत्याञ्चितं वक्ति यः॥३२॥ घनाक्षरी। पावकतै जल होय वारिधते थल होय, शस्त्रत कमल होय ग्राम होय बनते। कूप विवर होय पर्वतत घर होय, वासवते दास होय हितू दुरजनते ।। सिंघते कुरंग होय व्याल स्यालअङ्ग होय, विषते पियूपं होय माला अहिफनतें । विषमते सम होय संकट न व्याप कोय, एते गुन होंय सत्यवादीके दरसते ॥ ३२॥ अन्वयाथी-(यः) जो पुरुष (सत्याश्चितम् ), सत्य - (वचनम् ) वचन (वक्ति) बोलता है, (तस्य) उसको (अग्निः) अग्नि (जलम् ) जल ( 'भवति') हो जाती है और (अर्णवः समुद्र (स्थलम् ) स्थल हो जाता है । (अरिः) शत्रु (मित्रम्) मित्र, (सुराः) देवता (किङ्कराः) किकर, (कान्तारम् ) वर्ग (नगरम् ) नगर, (गिरिः) पर्वत (गृहम् ) घर, (अहिः). सर्प (माल्यम् ) माला, (मृगारिः) सिंह (मृगः) हरिण, (पातालम् ) पाताल (बिलम् ) विल, (अस्त्रम् ) शस्त्र (उत्पलदलम् ) कमलके दल, (व्याला) दुष्ट हाथी (शृगालः) शृगाल, (विषम् ) विष (पीयूपम् ) अमृत (च) और (विपमम्) विषम (समम् ) सम हो जाते हैं । भावार्थ-सत्य बोलनेवालेको जितने दुःख देनेवाले पदार्थ है, वे सब सुख देनेवाले हो जाते है। अदत्तादान अधिकार । मालिनी। तमभिलपति सिद्धिस्तं वृणीते समृद्धि- स्तमभिसरति कीतिर्मुश्चते तं भवातिः। स्पृहयति सुगतिस्तं नेक्षते दुर्गतिस्तं परिहरति विपत्तं यो न गृह्णात्यदत्तम् ॥ ३३ ॥ रोड़क छन्द । ताहि रिद्धि अनुसरे, सिद्धि अभिलाप धरै मन । विपति संग परिहरे, जगत विस्तरै सुजस धन ॥ भवभारति तिहिं तजै, कुगति बंछै न एक छन । सो सुरसम्पति लहै, गहै नहिं जो अदत्त धन ॥ ३३ ॥ ३ + अन्वयाथों-(यः) जो पुरुष (अदत्तम् ) विना दी हुई वस्तु (न गृह्णाति) ग्रहण नहीं करता है, (सिद्धिः) सिद्धि (तम्) उस पुरुषकी (अभिलपति) अभिलाषा करती है, (समृद्धिः) समृद्धि (तम्) उसको (वृणीते) स्वीकार करती है, (कीर्तिः) कीर्ति (तम् अभिसरति) गुप्तरूपसे उसके समीप आती है, (भवातिः) ससारके दुःख (तम् ) उसको (मुञ्चते) छोड़ जाते हैं, (सुगतिः) वर्गादिक उत्तम गति (तम् ) उसकी (स्पृहयति) स्पहा करती है, (दुर्गतिः) नरकादिक दुर्गति (तम् ) उसको (न ईक्षते) देखती ही नहीं है और (विपत् ) विपत्ति (तम् ) उसको (परिहरति) छोड़ देती है। - - शिखरिणी। अदत्तं नादत्ते कृतसुकृतकामः किमपि यः शुभश्रेणिस्तस्मिन्वसति कलहंसीव कमले। विपत्तस्माद्दूरं ब्रजति रजनीवाम्बरमणे- विनीतं विद्येव त्रिदिवशिवलक्ष्मीर्भजति तम् ॥३४॥ कवित्त (३१ मात्रा)। ताको मिलै देवपद शिवपद, ज्यों विद्याधन लहै विनीत । तामै आय रहैं शुभ सम्पति, ज्यौं कलहंस कमलसों मीत ॥ ताहि विलोक दुरै दुख दारिद, ज्यौ रवि आगम रैन विदीत । जो अदत्त धन तजत बनारसि, पुण्यवंत सो पुरुष पुनीत ॥३४॥ अन्वयार्थी-(यः) जो (कृतसुकृतकामः) पुण्योपार्जनकी इच्छा करनेवाला पुरुष (किमपि ) कुछ भी (अदत्तम् ), विना 1 ३५ . दी हुई वस्तु (न आदत्ते ) ग्रहण नही करता (तसिन्) उसमें,- (कमले) कमलमें (कलहंसी इव) सुन्दर हंसिनीके समान (शुभश्रेणिः) शुभ सम्पतियां (वसति) निवास करती है, (तसात् ) उससे (अम्बरमणेः) सूर्यसे (रजनी इव) रात्रिके समान (विपत् ) विपत्तियां (दूरम् ) दूर (व्रजति) भागती है, (तम्) और उस (विनीतम्) नम्रीभूत पुरुषको (विद्या इव ) विद्याके समान (त्रिदिवशिवलक्ष्मीः) खर्ग और मोक्षकी लक्ष्मी (भजति) प्राप्त होती है। भावार्थ-जिस तरह कमलमें हंसिनी रहती है, उसतरह चोरीके त्यागीके सारी सम्पत्तियां रहती है। जिस तरह सूर्यसे रात भागती है, उस तरह चोरीके त्यागीसे विपत्तियां दूर भागती है और जिस तरह विनयवान् पुरुषको विद्या शीघ्र प्राप्त होती है, उसी तरह अचौर्यवतीको खर्ग और मोक्षकी लक्ष्मी प्राप्त होती है। शार्दूलविक्रीडित । यन्निर्वतितकीर्तिधर्मनिधनं सर्वागसां साधनं प्रोन्मीलधबन्धनं विरचितक्लिष्टाशयोद्धोधनम् । दौर्गत्यैकनिबन्धनं कृतसुगत्याश्लेषसंरोधनं प्रोत्सर्पत्प्रधनं जिघृक्षति न तद्धीमानदत्तं धनम् ३५ जो कीरति गोपहि, धरम विलोपहि, करहि महाअपराध । जो शुभगति तोरहि, दुरगति लोरहि, जोरहि युद्ध उपाध ॥ जो संकट आनहि, दुर्गति ठानहि, वधवंधनको गेह । सव औगुणमंडित, गहै न पंडित, धन अदत्तसो येह ॥ ३५ ॥ मरहटा छन्द।
my । अन्वयार्थी-(यत् ) जो विना दिया हुआ धन (निर्व- ततकीर्तिधर्मनिधनम् ) पूर्वोपार्जित कीर्ति और धर्मका नाश करनेवाला है, (सर्वागसाम् ) समस्त पापोंका (साधनम् ) कारण है, (प्रोन्मीलद्वधबन्धनम् ) वधबंधनको प्रगट रूपसे करनेवाला है, (विरचितक्लिष्टाशयोद्धोधनम् ) अनेक क्लेशों- को देनेवाला है, (दौर्गत्येकनिवन्धनम् ) दुर्गतियोंका मुख्य कारण है, (कृतसुगत्याश्लेषसंरोधनम् ) सुगतियोंको दृढ़ता- पूर्वक रोकनेवाला है, और जो (प्रोत्सर्पत्प्रधनम् ) युद्ध कराने- वाला है, (तत्) ऐसे (अदत्तम् ) विना दिये हुए (धनम् ) धनको (धीमान् ) बुद्धिमान् । पुरुष (न जिघृक्षति) ग्रहण करनेकी इच्छा कभी नही करते है। N + - हरिणी। परजनमनःपीडाक्रीडावनं वधभावना- भवनमवनिव्यापिव्यापल्लताघनमण्डलम् । कुगतिगमने मार्गः स्वर्गापवर्गपुरार्गलं नियतमनुपादेयं स्तेयं नृणां हितकाविणाम् ।। ३६ ॥ कवित्त (३१ मात्रा)। जो परजन-संताप-केलिवन, जो वध बंध कुबुद्धि निवास । जो जग विपतिबेलघनमंडल, जो दुर्गति-मारग-परकास ॥ जो सुरलोकद्वार दृढ आगल, जो अपहरण मुक्तिसुखवास । सो अदत्त धन तजत साधु जन, निजहितहेत वनारसिदास ॥३६॥ अन्वयार्थी-(परजनमनःपीडाक्रीडावनम् ) जो दूस- रोंकी मानसिक पीड़ाकी क्रीड़ास्थान है, (वधभावनाभव- । - - ३७ नम् ) हिसा करनेकी भावनाओंका घर है, ( अवनिव्यापि- व्यापल्लताधनमण्डलम् ) समस्त भूमडलपर फैलनेवाली विपत्ति- रूप लताओंके लिये मेघमंडल है, (कुगतिगमने) कुगतिमें जानेके लिये (मार्गः) मार्ग है, (स्वर्गापवर्गपुरार्गलम् ) और खर्ग और मोक्षके मार्गको रोकनेके लिये अर्गल है ऐसा (स्तेयम् ) चौर्यकर्म (हितकाक्षिणाम् ) अपना कल्याण चाहनेवाले (नृणाम् ) मनुष्योंको (नियतम् ) अवश्य ही (अनु- पादेयम् ) छोड़ देने योग्य है। शीलाधिकार। शार्दूलविक्रीडित । दत्तस्तेन जगत्यकीर्तिपटहो गोत्रे मषीकूर्चक- श्चारित्रस्य जलाञ्जलिर्गुणगणारामस्य दावानलः । संकेतः सकलापदां शिवपुरद्वारे कपाटो दृढः शीलं येन निजं विलुप्तमखिलं त्रैलोक्यचिन्तामणिः ३७ कवित्त ( ३१ मात्रा)। सो अपयशको डंक बजावत, लावत कुल कलंक परधान । सो चारितको देत जलांजुलि, गुन-वनको दावानल दान ॥ सो शिवपथ किवार बनावत, आपति-विपति मिलनको थान । चिन्तामणिसमान जग जोनर, शील रतन निज करत मलान ३७ अन्वयार्थों-(येन) जिस पुरुषने (त्रैलोक्यचिन्ताम- णिः) तीनों लोकोंकी वस्तुओंको प्राप्त करा देनेवाले चिन्तामणि रत्नके समान (निजम् ) अपना (अखिलम् ) समस्त (शीलम् ) शीलवत (विलुप्तम् ) खो दिया (तेन) उसने (जगति) ३८ संसारमें (अकीर्तिपटहः) अपयशका डंका (दत्तः) वजा दिया, (गोत्रे) गोत्रमें (मपीकूर्चकः) स्याहीका धब्बा अर्थात् कलंक लगा लिया, (चारित्रस्य) चारित्रको (जलाञ्जलिः) जलांजलि दे दी, (गुणगणारामस्य) अनेक गुणोंके बगीचे (दावा- नलः) दावानल अग्मि लगा दी, (सकलापदाम् ) समस्त विप- त्तियोंको आनेके लिये ( सङ्केतः) सकेत स्थान बना दिया और (शिवपुरद्वारे) मोक्षरूपी नगरके दरवाजेमें (दृढः ) मजबूत (कपाट:) किवाड़ लगा दिये । हरति कुलकलङ्क लुम्पते पापपङ्घ सुकृतमुपचिनोति श्लाध्यतामातनोति । नमयति सुरवर्ग हन्ति दुर्गोपसर्ग रचयति शुचि शीलं स्वर्गमोक्षी सलीलम् ॥ ३८॥ रोडक छन्द। कुल कलंक दलमलहि, पाप मल पंक पखारहि। दारुन संकट हरहि, जगत महिमा विस्तारहि ॥ सुरग मुकति पद रचहि, सुकृत संचहि करुणारसि । सुरगन बंदहि चरन, शीलगुण कहत बनारसि ॥ ३८ ॥ अन्वयार्थी-(शुचि) पवित्र (शीलम् ) शीलवत (कुल- कलङ्कम् ) कुलमें लगे हुए कलंकोंको (हरति) हरण कर लेता है, (पापपङ्कम् ) पापरूपी कीचड़का (लुम्पते) लोप कर देता है, (सुकृतम्) पुण्य (उपचिनोति) संचय करता है, (श्लाघ्य- ताम् ) महिमा (आतनोति) बढाता है, (सुरवर्गम् ) देवता- ओंके समूहसे अपने प्रति (नमयति) नमस्कार कराता है, ३९ (दुर्गोपसर्गम् ) घोर सकटोंका (हन्ति) नाश करता है और (स्वर्गमोक्षौ) खर्ग और मोक्षकी (सलीलम्) लीलामात्रमें (रचयति) रचना कर देता है। शार्दूलविक्रीडित । व्याघ्रव्यालजलानलादिविपदस्तेषां व्रजन्ति क्षयं कल्याणानि समुल्लसन्ति विबुधाः सान्निध्यमध्यासते। कीर्तिः स्फूर्तिमियति यात्युपचयं धर्मः प्रणश्यत्यघं स्वनिर्वाणसुखानि संनिदधते ये शीलमाबिभ्रते ॥ ३९ ॥ मत्तगयन्द। ताहि न वाघ भुजंगमको भय, पानि न वोरै न पावक जालै । ताके समीप रहे सुर किन्नर, सो शुभ रीत करै अघ टाले । तासु विवेक व घट अतर, सो सुरके शिवके सुख भाले। ताकी सुकीरति होय तिहूँ जग, जो नर शील अखंडित पालै॥३९॥ अन्वयार्थी-(ये) जो पुरुष (शीलम् ) शीलव्रतको (आविधते) धारण करते है, (तेषाम् ) उनकी (व्याघ्रव्याल- जलानलादिविपदः) व्याघ्र सर्प जल अग्नि आदिकसे होनेवाली विपत्तिया (क्षयम् ) नष्ट (व्रजन्ति ) हो जाती है, (कल्या- गानि) उनके आनन्दमंगल (समुल्लसन्ति) सदा वने रहते है, (विबुधाः) देवता उनके (सान्निध्यम् ) समीप ही (अध्यासते) रहते है, (कीर्तिः) कीर्ति (स्फूर्तिम् इयत्ति) स्फुरायमान रहती है, (धर्मः) धर्म (उपचयम् याति) बढ़ता ही जाता है, (अघम् ) पापोंका (प्रणश्यति ) नाश हो जाता ४० है, और (खनिर्वाणसुखानि) स्वर्ग तथा मोक्षके सुख (संनि- दधते) अति समीप आ उपस्थित हो जाते हैं। . तोयत्यग्निरपि सजत्यहिरपि व्याघ्रोऽपि सारङ्गति व्यालोपि भवति पर्वतोऽप्युपलति श्वेडोऽपि पीयूपति । विनोऽप्युत्सवति प्रियत्यरिरपि क्रीडातडागत्यपां- नाथोऽपि स्वगृहत्यटव्यपि नृणां शीलप्रभावाद्भुवम् ४० छप्पय। अग्नि नीरसम होय, मालसम होय भुजंगम । नाहर मृगसम होय, कुटिल गज होय तुरंगम ॥ विष पियूपसम होय, शिखर पाषानखंड मितु । विधन उलट आनंद, होय रिपु पलट होय हितु ॥ लीलातलाव सम उदधिजल, गृहसमान अटवी विकट । इहि विधि अनेक दुख होहिं सुख, शीलवंत नरके निकट ॥ ४० ॥ अन्वयार्थी--(शीलप्रभावात्) शीलवतके प्रभावसे (ध्रुवम्) निश्चयसे (नृणाम् ) मनुष्योंको (अग्निः अपि) अग्नि भी (तोयति) जलके समान हो जाती है, (अहिः अपि) सर्प भी (संतति) मालाके समान हो जाता है, (व्याघ्रः अपि) व्याघ्र भी सारगति) हरिणके समान हो जाता है, (व्याल: अपि) दुष्ट हिसकपशु भी (श्वति) कुत्तेके समान हो जाता है, (पर्वतः अपि) पर्वत भी (उपलति) पाषाणके समान हो जाता है, (क्ष्वेडर अपि) विष भी (पीयूपति) अमृतके समान हो जाता है, (विशः अपि) विन भी (उत्सवति) उत्सवके समान हो जाते है, अरिः अपि) शत्रु भी (प्रियति) मित्रके .
४१ समान हो जाता है, (अपां नाथः अपि) समुद्र भी (क्रीडा- तडागति) क्रीडा करनेके सरोवरके समान हो जाता है और (अटवी अपि) वन भी (स्वगृहति) अपने घरके समान हो जाता है। परिग्रहाधिकार । कालुप्यं जनयन् जडस्य रचयन्धर्मद्रुमोन्मूलनं क्लिश्चन्नीतिकृपाक्षमाकमलिनी लोभाम्बुधिं वर्धयन् मर्यादातटमुद्रुजन्छुभमनोहंसप्रवासं दिश- किं न क्लेशकरः परिग्रहनदीपूरः प्रवृद्धिं गतः ॥४१॥ कवित्त (३१ मात्रा)। अंतर मलिन होय निज जीवन, विनसै धर्मतरोवरमूल । किलसै दयानीतिनलिनीवन, धेरै लोभ सागर तन थूल ॥ उटै वाद मरजाद मिटै सब, सुजन हंस नहिं पावहिं कूल । बढ़त पूर पूरै दुस सकट, यह परिग्रह सरितासम तूल ॥४१॥ अन्वयार्थी-(जडस) मूखौंको वा जलको (कालुण्यम्) कलुषित (जनयन् ) करता हुआ, (धर्मद्रुमोन्मूलनम् रचयन् ) धर्मरूपी वृक्षको मूलसे उखाडता हुआ, (नीतिकृपाक्षमाकमलि- नीम् ) नीति कृपा क्षमारूपी कमलिनियोंको (क्लिश्नन् ) क्लेश पहुंचाता हुआ, (लोभाम्बुधिम् ) लोभरूपी समुद्रको (वर्द्धयन्) बढ़ाता हुआ, (मर्यादातटम्) मर्यादारूपी किनारेको (उद्बुजन्) उखाडता हुआ, (शुभमनोहंसप्रवासम् ) सज्जनरूपी हंसोंको प्रवास करनेका (दिशन् ) उपदेश देता हुआ अर्थात् उन्हें उड़ाता हुआ और (प्रवृद्धिम् गतः) नित्य बढ़ता हुआ जो ४२ (परिग्रहनदीपूरः) परिप्रहरूपी नदीका पूर है, सो (किम् ) क्या (क्लेशकरः) क्लेशोंका करनेवाला (न) नहीं है। भावार्थ-जैसे नदीका पूर अनेक दुःखोंको देनेवाला है, उसी तरह परिग्रह भी अनेक दुःखोंका देनेवाला है। मालिनी। कलहकलभविन्ध्यः कोपगृध्रश्मशानं व्यसनभुजगरन्ध्र द्वेषदस्युप्रदोषः। सुकृतवनदवाग्निर्दिवाम्भोदवायु- नयनलिनतुषारोऽत्यर्थमर्थानुरागः ॥ ४२ ॥ मनहरण। कलह गयन्द उपजाइवेको विधगिरि, कोप गीधके अघाइवेको समशान है। संकट भुजंगके निवास करिवेको विल, वैरभाव चोरको महानिशा समान है ।। कोमल सुगुन धन खंडवेको महा पौन, पुण्यवन दाहिवेको दावानलदान है। नीत नय नीरज नसाइवेको हिमरासि, ऐसो परिग्रहराग दुखको निधान है ॥ ४२ ॥ अन्वयाथों-(अत्यर्थम् अर्थानुरागः) परिग्रहमें अत्यन्त अनुराग करना (कलहकलभविन्ध्यः) कलह रूपी हाथीको उत्पन्न करनेके लिये विन्ध्याचल पर्वत है, (कोपगृध्रश्मशानम् ) क्रोधरूपी गीधके लिये श्मशानभूमि है, (व्यसनभुजगरन्ध्रम्) धूतादिक व्यसनरूपी सोक निवास करनेके लिये विल है, ४३ . (द्वेपदस्युप्रदोपः) द्वेपरूपी चोरके लिये रात्रि है, (सुकृतवन- दवामिः) पुण्यरूपी वनको जलाने के लिये दावानल है, (मार्द- वाम्भोदवायुः) मार्दवरूपी वादलोंको उड़ानेके लिये वायु है, और (नयनलिनतुपारः) नीतिरूपी कमलको नष्ट करनेके लिये तुपार है। शार्दूलविक्रीडित । प्रत्यर्थी प्रशमस्य मित्रमधृतेर्मोहस्य विश्रामभूः पापानां खनिरापदां पदमसध्यानस्य लीलावनम् । व्याक्षेपस्य निधिर्मदस्य सचिवः शोकस्य हेतुः कले। केलीवेश्म परिग्रहः परिहतेयॊग्यो विविक्तात्मनाम् ॥४॥ प्रशमको अहितू अधीरजको वाल-हितू, महामोहराजाकी प्रसिद्ध राजधानी है। भ्रमको निधान दुरध्यानको विलासवन, विपतको थान अभिमानकी निशानी है । दुरितको खेत रोग सोग उतपत्ति हेत, कलहनिकेत दुरगतिको निदानी है। ऐसो परिग्रहभोग सवनको त्याग जोग, आतम-गवेपी लोग याही भांति जानी है ॥४३॥ अन्वयार्थी-जो (प्रशमस्य) प्रशम अर्थात् शान्त परि- णामोंका (प्रत्यर्थी) शत्रु है, (अधृतेः) अधैर्यका (मित्रम् ) मित्र है, (मोहस्स) मोहके (विश्रामभूः) विश्राम करनेका स्थान है, (पापानाम् ) पापोंकी (खनिः) खानि है, (आपदाम्) आपत्तियोंका (पदम्) स्थान है, (असद्ध्यानस्य) आर्त रौद्रादिक खोटे ध्यानोंके (लीलावनम्) क्रीड़ा करनेका वन है, (व्याक्षेपस्य) कलहका (निधिः) खजाना है, (मदस्य) अभिमान अथवा उन्मत्तताका (सचिवः) मन्त्री है, (शोकस्स) शोकका (हेतुः) कारण है और (कलेः) कलियुगके (केलीवेश्म) क्रीड़ा करनेका घर है, ऐसा (परिग्रहः) परिग्रह (विविक्तात्म- नाम् ) आत्माको अन्वेषण करनेवाले मनुष्योंको (परिहतेः) छोड़ देनेके (योग्यः) योग्य है। भावार्थ-आत्माका कल्याण करनेवाले मनुष्योंको परिग्रह छोड़ देना ही उचित है। - वह्निस्तृप्यति नेन्धनैरिह यथा नाम्भोभिरम्भोनिधि- स्तद्वल्लोभघनो घनैरपि धनैर्जन्तुर्न संतुष्यति । म त्वेवं मनुते विमुच्य विभवं निःशेषमन्यं भवं यात्यात्मा तदहं मुधैव विदधाम्येनांसि भूयांसि किम्४४ छप्पया ज्यौं नहिं अग्नि अघाय, पाय ईधन अनेक विधि । ज्यों सरिता घन नीर, तृपत नहिं होय नीरनिधि । त्यौं असंख धन बढ़त, मूढ़ संतोष न मानहिं । पाप करत नहिं डरत, बंधकारन मन आनहिं ॥ परतछ विलोक जन्मन मरन, अथिररूप संसारक्रम। समुझै न आप परताप गुन, प्रगट वनारसि मोह भ्रम ॥४४॥ अन्वयार्थों-(यथा) जैसे (इह ) इस लोकमें (इन्धनैः) ईधनसे (वह्निः) अमि (न तृप्यति) तृप्त नहीं होती, (अम्भो- भिः) जलसे (अम्भोनिधिः) समुद्र (न) तृप्त नहीं होता, ४५ (तद्वत् ) उसीतरह (लोभधनः) अत्यन्त लोभी (जन्तुः ) प्राणी (घनः अपि धनैः) अधिकसे अधिक धन होनेपर भी (ने सन्तुष्यति) सन्तुष्ट नहीं होता है (तु) और (आत्मा) मेरा यह आत्मा (निःशेपम् ) यहाकी सारी (विभवम् ) विभूतिको (विमुच्य ) छोडकर (अन्यम्) दूसरे (भवम् ) भवमें (याति) चला जाता है (तत् ) इसलिये (अहम् ) मै (मुधा एव ) व्यर्थ ही (भूयांसि ) अनेक घोर (एनांसि) पापोंको (किम् ) क्यों (विदधामि ) करता हूं। (एवम् न मनुते ) ऐसा कभी विचार भी नहीं करता है। क्रोधाधिकार। यो मित्रं मधुनो विकारकरणे संत्राससंपादने सर्पस्य प्रतिविम्बमझदहने सप्तार्चिपः सोदरः । चैतन्यस्य निपूदने विपतरोः सब्रह्मचारी चिरं सक्रोधः कुशलाभिलापकुशलनिर्मूलमुन्मूल्यताम् ॥४५॥ गीता छन्द । जो सुजन-चित्त-विकार कारन, मनहु मदिरापान । जो भरम भय चिन्ता वढावत, असित सर्प समान ॥ जो जंतुजीवनहरन विपतल, तनदहन-दव-दान । सो कोपरास विनास भविजन, लहहु शिव सुखथान ॥ ४५ अन्वयार्थी-(यः) जो क्रोध (विकारकरणे) चित्तके विकार करनेमें (मधुनः) मद्यका (मित्रम् ) मित्र है, (संत्रा- ससम्पादने) भय उत्पन्न करनेमें (सर्पस प्रतिविम्बम् ) सर्पका प्रतिविम्ब है, (अगदहने) शरीरके जलानेमें (सप्तार्चिपः) अग्निका (सोदरः) भाई है, (चैतन्यस्य निषदने) और चैतन्य शक्तिको नष्ट करनेके लिये (विपतरोः) विषवृक्षका (चिरम् सब्रह्मचारी) चिरकालका साथी है, (सः क्रोधः) ऐसा जो क्रोध है सो (कुशलामिलापकुशलै) आत्माको कुशल रखने में चतुर पुरुषोंको (निर्मूलम् ) जड़से (उन्मूल्यताम् ) उखाड़ डालना चाहिये अर्थात् क्रोध बिलकुल नहीं करना चाहिये । - हरिणी। फलति कलितश्रेयाश्रेणीप्रसूनपरम्परः प्रशमपयसा सिक्तो मुक्तिं तपश्चरणद्रुमः । यदि पुनरसौ प्रत्यासत्तिं प्रकोपहविर्भुजो भजति लभते भस्मीभावं तदा विफलोदयः॥४६॥ कवित्त (३१ मात्रा)। जब मुनि कोइ वोइ तप तरुवर, उपशम जल सींचत चित खेत । उदित जान साखा गुण पल्लव, मंगल पहुप मुकतिफलहेत ॥ तव तिहि कोप दवानल उपजत, महामोह दल पवन समेत । सो भसंत करत छिन अंतर, दाहत विरखसहित मुनिचेत ॥४६॥ अन्वयार्थी-(प्रशमपयसा) शान्त परिणामरूपी जल- से (सिक्तः) सींचा हुआ (तपश्चरणद्गुमः) तपश्चरणरूपी वृक्ष (कलितश्रेय श्रेणीप्रसूनपरम्परः) अनेक कल्याणरूपी -पुष्पों- की परम्परासे सुशोभित होता है और (मुक्तिम् फलति) मोक्षरूपी फलको फलता है । (यदि ) यदि (पुनः असौ) यह वृक्ष (प्रकोपहविर्भुजः) क्रोधरूपी अग्निसे (प्रत्यासत्ति) सम्बन्धको (भजति) प्राप्त होता है, (तदा) तो (विफलो- - ४७ दयः 'सन्' ) विना फल दिये ही (भसीभावम् लभते ) भस्म हो जाता है। . शार्दूलविक्रीडित । संतापं तनुते भिनत्ति विनयं सौहार्दमुत्सादय- युद्वेगं जनयत्यवद्यवचनं सूते विधत्ते कलिम् । कीर्ति कृन्तति दुर्मतिं वितरति व्याहन्ति पुण्योदयं दत्ते यः कुगति स हातुमुचितो रोषः सदोषः सताम् ४७ वस्तु छन्द। कलह मंडन कलह मंडन करन उद्वेग । यशखंडन हित हरन, दुखविलापसंतापसाधन ॥ दुरवैन समुच्चरन, धरम पुण्य मारग विराधन । विनय दमन दुरगति गमन, कुमति रमन गुणलोप । ये सव लक्षण जान मुनि, तजाहिं ततक्षण कोप ॥४७॥ अन्वयार्थों-(यः) जो क्रोध (सन्तापम् ) संतापको (तनुते) बढाता है, (विनयम् ) विनयको (मिनत्ति) नष्ट कर देता है, (सौहार्दम् ) मित्रताको (उत्सादयति) उखाड़ कर फेंक देता है, (उद्वेगम् ) उद्वेगको (जनयति) उत्पन्न करता है, (अवद्यवचनम् ) मिथ्या वचनोंको (सूते) उत्पन्न करता है, (कलिम्) कलह (विधत्ते ) करता है, (कीर्तिम् ) कीर्तिको (कुन्तति) काट डालता है, (दुर्मतिम्) कुबुद्धिको (वितरति ) देता है, (पुण्योदयम् ) पुण्योदयको (व्याहन्ति) नाश करता है, (कुगतिम्) कुगतिको (दत्ते) देता है और (सदोषः) अनेक दोषोंसे भरा हुआ है, (स रोषः) ऐसा ४८ जो क्रोध है सो (सताम् ) सज्जन पुरुषोंको (हातुम् उचितः छोडने ही योग्य है। । यो धर्म दहति दुमं दव इवोन्मशाति नीति लतां दन्तीवेन्दुकलां विधुतुद इव क्लिभाति कीर्तिं नृणाम् । स्वार्थ वायुरिवाम्बुदं विघटयत्युल्लासयत्यापदं तृष्णां धर्म इवोचितः कृतकृपालोपः स कोपः कथम् ४८ छपप्य। कोप धरम धन दहै, अग्नि जिम विरख विनासहि । कोप सुजस आवरहि, राहु जिम चंद गरासहि ॥ कोप नीति दलमलहि, नाग जिम लता विहंडहि । कोप काज सव हरहि, पवन जिम जलधर खंडहि ॥ संचरत कोप दुख ऊपज, बदै तृषां जिम धूपमह । करुणा विलोप गुण गोप जुत, कोप निषेध महंत-कह ॥४८॥ अन्वयार्थी-(या) जो क्रोध (दुमम् दव इव) वृक्षको दावानल अनिके समान (नृणाम् ) मनुष्योंके (धर्मम् ) धर्मको (दहति ) जला देता है, (लताम् दन्ती इव) लताको हाथीके समान (नीतिम्) नीतिको (उन्मनाति) उखाड़ कर फेंक देता है, (इन्दुकलाम विधुतुदः इव) चन्द्रमाकी कलाको राहुके समान (कीर्तिम् ) कीर्तिको (क्लिश्नाति) ढक लेता है, (अम्बु- दम् वायुः इव ) वादलको वायुके समान (स्वार्थम्) अपने खार्थको (विघटयति ) नष्ट कर देता है, (तृष्णाम् धर्मः इव) , प्यासको धूपके समान (आपदम्) आपत्तियोंको (उल्लासयति) उत्तेजित करता है, और (कृतकृपालोपः) करुणाका सर्वथा - ४९ लोप कर देता है (सः कोपा) ऐसा क्रोध करना (कथम्) किस प्रकार (उचितः) उचित हो सकता है ? मानाधिकार । मन्दाक्रान्ता। यस्मादाविर्भवति विततिर्दुस्तरापन्नदीनां यस्मिशिष्टाभिरुचितगुणग्रामनामापि नास्ति । यश्च च्याप्तं वहति वधधीधूम्यया क्रोधदावं तं मानाद्रि परिहर दुरारोहमौचित्यवृत्तेः । ४९ ॥ कवित्त (मात्रा ३१)। जाते निकसि विपति सरिता सब, जगमैं फैल रही चहुँ ओर । जाके दिग गुणग्राम नाम नहि, माया कुमतिगुफा अति घोर ॥ जहँ वधवुद्धि धूमरेखा सम, उदित कोप दावानल जोर । सो अमिमान पहार पटंतर, तजत ताहि सर्वशकिशोर ॥ ४९ ॥ अन्वयाथों-(यसात्) जिस अहंकाररूपी पर्वतसे (दुस्तरापनदीनाम् ) विकराल आपत्तिरूप नदियोंके (विततिः) समूह (आविर्भवति) निकलते है, (यसिन् ) जिस पर्वतमें (शिष्टाभिरुचितगुणग्रामनाम अपि) शिष्ट पुरुषोंके धारण करनेयोग्य गुणरूपी प्रामका नाम भी (नास्ति) नहीं है, (च) और (या) जो (वयधीधूम्यया) हिंसा करनेके, परिणाम- रूप धूमके साथ (व्यासम्) चारों ओर फैले हुए (क्रोधदानम्) क्रोधरूपी दावानलको (वहति) धारण करता है, (तम्) उस (दुरारोहम्) कठिनतासे चढ़ने योग्य (मानाद्रिम्) ४ ५० अहंकाररूपी पर्वतको (औचित्यवृत्तेः) उचित वृत्तिसे अर्थात् समुचित्त कार्यों और आचरणोंके द्वारा (परिहर ) छोड़ दे। शिखरिणी शमालानं भञ्जन्विमलमतिनाडी विघटय- किरन्दुर्वाक्पांशूत्करमगणयन्नागमणिम् । श्रमन्त्रुया स्वैरं विनयवनवीथीं विदलयन् जनः के नानर्थ जनयति मदान्धो द्विप इव ॥५०॥ रोड़क छन्द। भंजहिं उपशम थंभ, सुमति जंजीर विहडहिं। कुवचन रज संग्रहहिं, विनयवनपंकति खंडहि ॥ जगमें फिरहिं स्वछन्द, वेद अंकुश नहिं मानहिं । गज ज्यौं नर मदअन्ध, सहज सव अनरथ ठानहि ॥५०॥ अन्वयाथों-(शमालानम्) शान्ततारूप आलानको (भञ्जन्) उखाड़ता हुआ, (विमलमतिनाडीम् ) निर्मल बुद्धि- रूपी संकलको (विघटयन् ) तोड़ता हुआ, (दुवाक्पांशूत्करम्) दुष्ट वचनरूपी धूलिसमूहको (किरन् ) उड़ाता हुआ, (आगम- सृणिम् ) शास्त्ररूपी अंकुशको (अगणयन् ) नही मानता हुआ, (उाम् ) संसारमें (खैरम् ) खच्छन्द (भ्रमन्) फिरता हुआ, (विनयवनवीथीम् ) विनयरूपी निकुंजोंको (विदलयन्) कुचलता हुआ, (मदान्धः) अहंकारसे अन्धा (जन:) मनुष्य (मदान्धः) मदोन्मत्त (द्विप इव) हाथीके समान (कम् अनर्थम्) कौन कौनसे अनर्थ (न जनयति) नहीं करता। अर्थात् ऐसा कोई उपद्रव नहीं है, जिसे 'अभिमानी न कर डाले।
५१ - शार्दूलविक्रीडित। औचित्याचरणं विलुम्पति पयोवाहं नभस्वानिव प्रध्वंसं विनयं नयत्यहिरिव प्राणस्पृशां जीवितम् । कीर्ति कैरविणीं मतङ्गज इव प्रोन्मूलयत्यञ्जसा मानो नीच इवोपकारनिकरं हन्ति त्रिवर्ग नृणाम् ॥५१॥ करिखा छन्द। मान सव उचित आचार भंजन करे, पवन सचार जिम धन विहंडहि । मान आदर-तनय विनय लोपै सकल, भुजग-विप भीर जिम मरन मंडहि ॥ मानके उदित जगमाहि विनसै सुयश, कुपित मातंग जिम कुमुद खंडहि । मानकी रीति विपरीति करतूति जिम, अधमकी प्रीति नर नीति छंडहि ॥५१॥ अन्वयार्थों-(नभस्वान् पयोवाहम् इव) जैसे वायु बादलको नष्ट कर देता है, उसी तरह (मानः) अभिमान (औ- चित्याचरणम्) समुचित आचरणोंका (विलुम्पति) लोप कर देता है, (प्राणस्पृशाम् ) प्राणियोंके (जीवितम् ) जीवनको (अहिः इव ) जैसे सर्प नष्ट कर देता है, वैसे (विनयम् ) विनयको (अध्वंसम् ) नष्ट (नयति ) कर देता है, (कैरविणीम्) कमलिनीको (मतगज इव ) जैसे मस्त हाथी उखाड़ डालता है वैसे (कीर्तिम् ) कीर्चिको (अञ्जसा ) शीघ्र ही (प्रोन्मूलयति) उखाडकर फेंक देता है, (उपकारनिकरम् ) और उपकारोंके समूहको (नीच इव ) जैसे नीच नष्ट कर देता है-भूल जाता ५२ है, वैसे (नृणाम् ) मनुष्योंके (त्रिवर्गम् ) धर्म, अर्थ और काम इन तीनों पदार्थोंको (हन्ति) नष्ट कर देता है - M वसन्ततिलका। मुष्णाति यः कृतसमस्तसमीहितार्थ संजीवनं विनयजीवितमङ्गभाजाम् । जात्यादिमानविषजं विषमं विकार तं मार्दवामृतरसेन नयस्व शान्तिम् ॥ ५२ ॥ चौपाई (मात्रा १५) मान विषम विष तन संचरै। विनय विनाश वांछित हरै॥ कोमल गुन अम्रत संजोग । विनशै मान विषम विषरोग ॥५२॥ अन्वयाथों-हे भव्यो, (यः)जो (अङ्गभाजाम् ) प्राणि- योंके (कृतसमस्तसमीहितार्थम् ) सारे वांछित पदार्थों के देने- वाले और (संजीवनं) संजीवनखरूप (विनयजीवितम् ) विनय जीवनको (मुष्णाति) चुरा लेता है, (तम्) उस (जात्या- दिमानविषजम् ) जाति, कुल, बल, ऋद्धि, तप, शरीर, ज्ञान और ऐश्वर्यके अभिमान करने रूप विषसे उत्पन्न हुए (विषमम्) विषम (विकारम् ) विकारको (मार्दवामृतरसेन ) मार्दवरूपी अमृत रससे (शान्तिम् ) शान्त (नयख) करो मायाधिकार। मालिनी। कुशलजननवन्ध्यां सत्यसूर्यास्तसन्भ्यां कुगतियुवतिमालां मोहमातङ्गशालाम् ।
५३ शमकमलहिमानीं दुर्यशोराजधानी व्यसनशतसहायां दूरतो मुश्च मायाम् ॥ ५३ ॥ रोड़क उन्द । कुशल जननकों वॉझ, सत्य रविहरन साँझथिति। कुगति युवतिउर माल, मोह कुंजर निवास छिति ॥ शम वारिज हिमराशि, पाप संताप सहायनि । अयश खान जग जान, तजहु माया दुखदायनि ॥ ५३॥ अन्वयार्थी-(कुशलजननवन्ध्याम् ) जो कुशलता के उत्पन्न करनेमें वन्ध्या है, (सत्यसूर्यास्तसन्ध्याम् ) सत्यरूपी सूर्यके अस्त होनेके लिये सन्ध्या है, (कुगतियुवतिमालाम् ) नरकादिक दुर्गतिरूप तरुणीकी वरमाला है, (मोहमातङ्ग- शालाम् ) मोहरूपी हाथीके रहनेके लिये शाला है, (शमकम- लहिमानीम् ) उपगमरूपी कमलोंको नष्ट करनेके लिये हिमकी (तुषारकी) राशि है, (दुर्यशोराजधानीम् ) अपयशकी राजधानी है और (व्यसनशतसहायाम् ) सैकड़ों व्यसनोंको सहायता देने वाली है, ऐसी (मायाम् ) मायाको (दूरतः) दूरसे ही (मुश्च ) छोड दो। उपेन्द्रवज्रा। विधाय मायां विविधैरुपायैः परस्य ये वञ्चनमाचरन्ति । ते वञ्चयन्ति त्रिदिवापवर्गसुखान्महामोहसखाः स्वमेव ५४ . घेसरी छन्द। मोहमगन मायामति संचहि । कर उपाय औरनको बंचहि। अपनी हानि लखें नहिं सोय । सुगति हरें दुर्गति दुख होय ५४ '५४ अन्वयार्थी-(ये) जो पुरुष (विविधैः उपायैः ) नाना प्रकारके उपायोंसे (मायाम् ) कपट (विधाय) करके (परस वञ्चनम् आचरन्ति) दूसरे लोगोंको ठगते हैं, (ते) वे (महा- मोहसखाः) मोहके प्यारे मित्र (स्वम् एव ) अपनेको ही (त्रिदिवापवर्गसुखात् ) खर्ग और मोक्षके सुखसे (वञ्चयन्ति) वंचित रखते हैं । अर्थात् दूसरोंको मायाचारसे ठगनेवाले वास्त- वमें पूछा जाय, तो आपहीको ठगते है । क्योकि उस मायाचारसे वे वर्ग मोक्षादिके सुख नहीं पा सकते है। वंशस्थविलम् । मायामविश्वासविलासमन्दिर दुराशयो यः कुरुते धनाशया। तोऽनर्थसाथै न पतन्तमीक्षते यथा विडालो लगुडं पयः पिबन् ॥ ५५ ॥ पद्धरीछन्द। माया अविसालविलासगेह । जो करहि मूढ जन धन-लनेह । सो कुगतिबंध नहिं लखै एम। तज भय विलाव पय पियतम ५५ अन्वयाथों-(यः) जो (दुराशयः ) खोटे परिणामों- वाला मनुष्य (धनाशया) धनकी इच्छासे (अविश्वासविलास- मन्दिरम् ) अविश्वासके क्रीड़ा करनेकी शालारूप (मायां) मायाको (कुरुते ) करता है, (सः) वह (पतन्तम् ) ऊपरसे पड़ते हुए (अनर्थसार्थम्) अनर्थोके समूहको (न) इसप्रकार नहीं (ईक्ष्यते) देखता है, (यथा) जैसे कि (पयः) दूध (पिवन ) पीता हुआ (विडालः) विलाव (लगुडम् ) ऊपरसे पड़ती हुई लकड़ीको नहीं देखता है। वसन्ततिलका। मुग्धप्रतारणपरायणमुज्जहीते यत्पाटवं कपटलम्पटचित्तवृत्तेः। जीर्यत्युपप्लवमवश्यमिहाप्यकृत्वा नापथ्यभोजनमिवामयमायतौ तत् ॥५६॥ अभानक छन्द। ज्यो रोगी कर कुपथ, बढ़ावै रोग तन । खादलंपटी भयो, कहै मुझ जनम धन ॥ त्यो कपटी कर कपट, मुगधको धन हरहि। करहि कुगतिको बंध, हरप मनमें घरहि ॥ ५६ ॥ अन्वयार्थों-(कपटलम्पटचित्तवृत्तेः) जिनके विचार सदा कपट करनेमे ही तत्पर रहते है, ऐसे कपटी पुरुषोंका (यत्) जो (मुग्धप्रतारणपरायण) भोले पुरुषोके ठगनेमें तत्पर (पाटबं) चातुर्य (उजहीवे) उल्लासित होता है, (तत्) वह कपटचातुर्य (अवश्यं) निश्चय समझो कि, (आयतौ) फलदान कालमें (अपथ्यभोजनं आमयमिव ) जैसे अपथ्य भोजन रोग उत्पन्न किये विना नहीं पचता, उसतरह (इहापि) इसी लोकमें (उपप्लवं अकृत्वा) विना कुछ उपद्रव किये (न जीर्यति) नष्ट नहीं होता है। भावार्थ-जैसे अपथ्य भोजन करनेसे कुछ न कुछ रोग होता ही है, विना रोग हुए अपथ्य भोजन , पचता नहीं; इसी ५६ तरह 'मायावी पुरुषका कपटचातुर्य भी विना कुछ उपद्रवादिक फल दिये नहीं रहता। - लोभाधिकार । शार्दूलविक्रीडित । यहुर्गामटवीमटन्ति विकटं कामन्ति देशान्तरं गाहन्ते गहनं समुद्रमतनुक्लेशां कृषि कुर्वते। सेवन्ते कृपणं पति गजघटासंघट्टदुःसंचरं सर्पन्ति प्रधनं धनान्धितधियस्तल्लोभविस्फूर्जितम् ५७ - मनहरण। सहै घोर संकट समुद्रकी तरंगनिम, कंचित भीत पंथ गाहै वीच बनमैं। ठाने कृषिकर्म जाम शर्मको न लेश कहूं, संकलेशरूप होय जूझ मरै रनमैं ॥ तजै निज धामको विराजि परदेश धावै, सेवै प्रभु कृपण मलीन रहै मनमैं । डोलै धन कारज अनारज मनुज मूद, ऐसी करतूति करै लोभकी लगनमैं ।। ५७ ॥ अन्धयार्थी-(धनान्धितधियः) जिनकी वुद्धि घनसे अधी हो रही है, ऐसे पुरुष ( यत् ) जो (दुर्गाम् ) दुर्गम (अटवीम् ) अटवीमें (अटन्ति) भटकते फिरते हैं, (विकटम् ) विकट (देशा- न्तरम् ) परदेशमें (क्रामति) गमन करते हैं, (गहनम् ) अत्यन्त गहरे (समुद्रम् ) समुद्रका (गाहन्ते) अवगाहन करते हैं, (अ- 'तनुल्लेशाम् ) अत्यन्त क्लेश देनेवाली (कृषिम् ) खेती (कुर्वते) करते हैं, (कृपणम् ) कृपण (पतिम्) खामीकी (सेवन्ते) - -- ५७ सेवा करते हैं, और (गजघटासंघदुःसञ्चरम् ) अनेक हाथियों- के संघहसे जहां चलना मुश्किल होता है ऐसे (प्रधनम् ) घोर युद्धमें (सर्पन्ति) जाकर युद्ध करते हैं; (तत्) सो सब (लोम विस्फूर्जितम् ) लोभके वशीभूत होकर करते है। भावार्थ-लोभके वशीभूत होकर लोग कठिनसे कठिन कार्य तथा अकार्य करते हैं। मूलं मोहविषद्रुमस्य सुकृताम्भोराशिकुम्भोद्भवः क्रोधानेररणिः प्रतापतरणिप्रच्छादने तोयदः। क्रीडासद्मकलेविवेकशशिनः स्वर्भानुरापनदी- सिन्धुः कीर्तिलताकलापकलभो लोभः पराभूयताम् ५८ पूरन प्रताप रवि रोकचेको धाराधर; सुकृत समुद्र सोखवेको कुम्भनंद है। कोप-दव-पावक जननको अरणि दारु, मोह विष भूरुहको महा दृढ कंद है ॥ परम विवेक निशिमणि पासवेको राहु, कीरतिलताकलाप दलन गयंद है। कलहको केलिभौन आपदा नदीको सिंधु, ऐसो लोभ याहूको विपाक दुख द्वंद है ॥ ५८॥ अन्वयार्थी-(मोहविषद्रुमस्य ) जो मोहरूपी विषवृक्षकी (मूलम् ) जड है, (सुकृताम्भोराशिकुम्भोद्भवः) पुण्यरूपी समुद्रके सोखनेके लिये अगस्त्य मुनि है, (क्रोधाः) क्रोधरूपी अमिको बढ़ानेके लिये (अरणिः) लकड़ी है, (प्रतापतरणि- १बादल । २ अगस्त्यमुनि । ३ वृक्ष । ४ चद्रमा।
૧૮
प्रच्छादने) प्रतापरूपी सूर्यको आच्छादन करने के लिये (तोयदः)
बादल है, (कलेः) कलहके (क्रीडास) क्रीड़ा करनेका स्थान
है, (विवेकशशिनः) विवेकरूपी चन्द्रमाके लिये (खर्भानुः)
राहु है, (आपनदीसिन्धुः) विपत्तिरूप नदियोंके आकर मिलने
लिये समुद्र है, और (कीर्तिलताकलापकलभः) कीर्तिरूपी
लताओंके समूहको उखाड़नेके लिये हाथीका वच्चा है; (लोभः)
ऐसा लोभ (पराभूयतास्) तिरस्कार करने योग्य है । अर्थात्
उसे छोड़ देना चाहिये।
वसन्ततिलका।
निःशेषधर्मवनदाहविजृम्भमाणे
दुःखौघभस्मनि विसर्पदकीर्तिधूमे ।
बाद धनेन्धनसमागमदीप्यमाने
लोभानले शलभतां लभते गुणौघः ॥ ५९ ।।
छप्पय ।
परम धरम वन दहै, दुरित अंवर गति धारहि ।
कुयश धूम उद्गरै, भूरि भय भस्म विथारहि ॥
दुख फुलिंग फुकरे, तरल तृष्णा कल काढहि ।
धन ईधन आगम सँजोग, दिन दिन अति बाढहि ॥
लहलहै लोभ पावक प्रवल, पवन मोह उद्धत वहै ।
दज्झहि उदारता आदि वहु, गुण पतंग कवरा' कहै ॥ ५९॥'
अन्वयार्थों-(निःशेषधर्मवनदाहविजृम्भमाणे) जो
समस्त धर्मरूपी वनको जलाती हुई बढती है, (दुःखौघभसनि)
अनेक दुःखोंका समूह ही जिसकी भस्म है, (विसर्पदकीर्तिधूमे)
५९ जिसका अपयशरूपी धूआं चारों ओर फैलता है, और जो (वाढं धनेन्धनसमागमदीप्यमाने) यथेष्ट धनरूपी ईधनके मिलनेसे देदीप्यमान होती है, ऐसी (लोभानले) लोभरूपी अमिमें (गुणौधः ) गुणोंके समूह (शलभताम् लभते ) पतगे हो जाते है । अर्थात् जिसतरह अग्निम गिरकर पतगे जल जाते है, उसीतरह लोभमे पडकर सारे गुण नष्ट हो जाते है। शार्दूलविक्रीडित । जातः कल्पतरुः पुरः सुरगवी तेषां प्रविष्टा गृह चिन्तारतमुपस्थितं करतले प्राप्तो निधिः संनिधिम् । विश्व वश्यमवश्यमेव सुलभाः स्वर्गापवर्गश्रियो ये संतोपमशेपदोपदहनध्वंसाम्बुदं विभ्रते ॥ ६ ॥ कवित्त (३१ मात्रा)। विलसै कामधेनु ताके घर, पूरै कल्पवृक्ष सुखपोप । अखय मॅडार भरे चिंतामणि, तिनको सुलभ सुरग औ मोप ॥ ते नर ववश कर त्रिभुवनको, तिनसों विमुख रहै दुख दोप। सबै निधान सदा तिनके ढिग, जिनके हृदय वसत संतोप ॥ ६०॥ अन्वयार्थी-(येः) जो पुरुप (अशेपदोपदहनध्वंसाम्बु- दम् ) समस्त दोपोको ध्वंस करनेके लिये बादलोके - समान (सन्तोपम् ) संतोषको (विभ्रते) धारण करते है, (तेपाम् ) उनके (पुरः) सन्मुख ही (कल्पतरुः) कल्पवृक्ष (जातः) उत्पन्न होता है, (सुरगवी) कामधेनु (तेपाम् गृहम् प्रविष्टा ) उनके घर प्रवेश करती है, (चिन्तारत्नम् ) चिन्तामणि रत (करतले उपस्थितम् ) उनकी हथेली पर आ उपस्थित होता है, ६० (निधिः) निधि (सन्निधिम् प्राप्तः) उनके सन्निकट ही आ जाती है, (स्वर्गापवर्गश्रियः) खर्ग और मोक्षकी लक्ष्मी (सुलभाः) सहज ही प्राप्त हो जाती है और (विश्वम् ) संसार (अवश्यम् एष वश्यम् ) अवश्य ही उनके वश हो जाता है। सज्जनाधिकार। शिखरिणी। वरं क्षिप्तः पाणिः कुपितफणिनो वऋकुहरे वरं झम्पापातो ज्वलदनलकुण्डे विरचितः। वरं प्रासप्रान्तः सपदि जठरान्तर्विनिहितो न जन्यं दौर्जन्यं तदपि विपदां सझ विदुषा ॥१॥ चौपाई (१६ मात्रा)। वरु अहिवदन हत्थ निज डारहिं । अगनिकुंडमै तन परजारहिं। दारहिं उदर करहिं विष भच्छन। पैदुष्टतान गहहिं विचच्छन६१ अन्वयार्थों-(कुपितफणिनः) क्रोधित हुए सर्पके (वक्रकुहरे) मुखमें (पाणिः क्षिप्तः वरम् ) हाथ डालना अच्छा है, (ज्वलदनलकुण्डे) जलते हुए अग्निकुंडमें (विरचितः झम्पापातः वरम् ) पड़ जाना अच्छा है, और (जठरान्तः सपदि विनिहितः पासप्रान्तः वरम् ) शीघ्र ही विष खा लेना अच्छा है; (तदपि) परन्तु (विदुषा) विद्वानोंको (विपदाम् ) आपत्तियोंका (सम) घर (दौर्जन्यम् ) दौर्जन्य (न जन्यम्) करना अच्छा नहीं है । अर्थात् दुर्जनता नहीं करनी चाहिये ।
६१ बसन्ततिलका। सौजन्यमेव विदधाति यशश्चयं च स्वश्रेयसं च विभवं च भवक्षयं च । दौर्जन्यमावहसि यत्कुमते तदर्थम् धान्येऽनलं क्षिपसि तजलसेकसाध्ये ॥ २॥ मत्तगयन्द (सवैया)। ज्यौं कृषिकार भयो चित वांतुल, सो कृषिकी करनी इम ठाने । बीज वै न कर जल सिंचन, पावकसी फलको थल भाने ॥ त्यो कुमती निज स्वारथके हित, दुर्जनभाव हियेमहँ आने । संपति कारन बंध विदारन, सजनता सुसमूल न जाने ॥ ६२॥ अन्वयायौं-(हे कुमते ) अरे अज्ञानी (सौजन्यम् एव) मुजनता ही (यशश्चयम् ) यगका सम्पादन (च) और (खश्रे- यसम् ) आत्मकल्याण (च) तथा (विभवम् ) विभूति (च) और (भवक्षयम् ) जन्ममरणरूप संसारका नाश (विदधाति) करती है । ( यत् ) यदि तू (तदर्थम् ) यश कल्याण विभूति आदिके लिये (दौर्जन्यम् ) दुर्जनता (आवहसि ) धारण करेगा, (तत्) तो समझना चाहिये कि तू (जलसेकसाध्ये ) जलसे सींचने योग्य (धान्ये) धानोंमें (अनलम् ) अमि (क्षिपसि) डालता है। -- पृथ्वी। वरं विभववन्ध्यता सुजनभावभाजां नृणा- मसाधुचरितार्जिता न. पुनरूर्जिताः संपदः।
६२ . कृशत्वमपि शोभते सहर्जमायतौ सुन्दर विपाकविरसा न तु श्वयथुसंभवा स्थूलता ॥ ६३ ॥ अभानक छन्द। वर दरिद्रता होय, करत सजन कला। दुराचारसौं मिलै, राज सो नहिं भला ॥ ज्यों शरीर कृश सहज, सुशोभा देत है। सूज थूलता बढ़े, मरनको हेत है ।। ६३॥ अन्वयार्थों-(सुजनभावभाजाम् ) सुजनताको धारण करनेवाले अर्थात् सज्जन (नृणाम् ) मनुप्योंको (विभवबन्ध्यता) दरिद्र रहना (वरम् ) अच्छा है (पुनः) परन्तु (असाधुचरि- तार्जिताः) दुर्जनतासे कमाया हुआ (ऊर्जिताः) बहुत (सम्पदः) धन होना (न) अच्छा नहीं है। (आयतौ) दीर्घ शरीरमें (सहजम् ) स्वाभाविक (कृशत्वम् अपि) दुबलापन तो (सुन्दरं) सुन्दर मालूम होता है (तु) परन्तु (विपाकविरसा) जिसका फल बुरा है, ऐसी (श्वयथुसम्भवा) सूजनसे होनेवाली (स्थूलता) स्थूलता (न शोभते) शोभायमान नही होती। भावार्थ-दरिद्र रहना अच्छा है, पर दुर्जनतासे बहुतसा धन कमाकर धनाढ्य होना अच्छी नही । जैसे कि, दुवला रहना अच्छा, परन्तु सूजनसे मौटा हो जाना अच्छा नही । . - शार्दूलविक्रीडित ।। न ब्रूते परदूषणं परगुणं वक्त्यल्पमप्यन्वहं संतोषं वहते परद्धिषु पराबाधासु धत्ते शुचम् ।
ár स्वश्लाघां न करोति नोज्झति नयं नौचित्यमुल्लङ्घय- प्युक्तोऽप्यप्रियमक्षमा न रचयत्येतच्चरित्रं सताम् ॥१४॥ H- पट्पद। नहिं जपें परदोप, अल्प परगुण बहु मानहिं । हृदय धरै संतोष, दीन लखि करुणा ठानहिं ॥ उचित रीत आदरहि, विमल नय नीति न छंडहिं । निज सराहना हरहिं, राम'रचि विषय विहंडहि ॥ मंडहिं न कोप दुरवचन सुन, सहज मधुर धुनि उच्चरहि ॥ कहि कंवरपाल जग जाल बसि, ये चरित्र सजन करहि ॥६४ अन्वयार्थों-(परदूषणम् न ब्रूते) दूसरोंके दोष प्रगट नहीं करते, (अल्पम् अपि परगुणम् अन्वहम् वक्ति) दूसरोंके थोड़ेसे गुणोंको भी रात दिन कहते है, (परर्द्धिषु सन्तोषम् वहते) दूसरोंकी ऋद्धिकी वृद्धि देखकर सन्तोष धारण करते है, (परवाधासु शुचम् धत्ते) दूसरोंके दु.खमें दुःखी होते है, (खश्लाघाम् न करोति ) अपनी प्रशसा नहीं करते, (नयम् न उज्झति) नीति नही छोड़ते, (औचित्यम् न लड्डयति) औचित्यका उल्लंघन नहीं करते अर्थात् उचित कार्य ही करते है, (अप्रियम् उक्तः अपि अक्षमाम् न रचयति) और कोई गाली गलौज आदि दुष्ट वचन कहै, तो भी क्रोधित नहीं होते; (एतत्) ये सब (सताम् ) सज्जनोंके (चरित्रम् ) चरित्र है । अर्थात् जो सज्जन पुरुष होते है, वे उक्त कार्य करते हैं। गुणिसङ्गाधिकार । धर्म ध्वस्तदयो यशश्युतनयो वित्तं प्रमत्तः पुमा- काव्यं निष्प्रतिभस्तपः शमदमैः शून्योऽल्पमेधाश्रुतम् ।
।
६४
.
-
वस्त्वालोकमलोचनश्चलमना ध्यानं च वाञ्छत्यसौ
यः सङ्गं गुणिनां विमुच्य विमतिः कल्याणमाकासति ।।
मत्तगयन्द (सवैया)।
सो करुणाविन धर्म विचारत, नैन विना लखिवेको उमाहै।
सो दुरनीति धरै यश हेतु, सुधी विन आगमको अवगाहै।
"सोहियशून्य कवित्त करै, समता विन सो तपसौं तन दाहै।
सो थिरता विन ध्यान धरै शठ, जो सतसंग तजै हित चाहै ६५
अन्वयाथी-(यः) जो (विमतिः) मूर्ख पुरुष (गुणि-
नाम् ) गुणवान् पुरुषोंका (सङ्गम् ) साथ (विमुच्य) छोड़कर
(कल्याणम् आकासति) अपना कल्याण करना चाहता है,
(असौ ध्वस्तदयः पुमान् धर्मम् वाञ्छति) वह पुरुष विना
दया किये धर्म करना चाहता है, (च्युतनयः यश: वाञ्छति)
नीतिके विना ही यश फैलाना चाहता है, (प्रमत्तः वित्तम्
वाञ्छति) आलसी होकर धन कमाना चाहता है, (निष्पतिमा
काव्यम् वाञ्छति) विना प्रतिभाके कविता करना चाहता है,
(शमदमैः शून्यः तपः वाञ्छति) इन्द्रियदमन और शान्तताके
विना ही तप करना चाहता है, (अल्पमेधः श्रुतम् वाञ्छति)
थोड़ीसी बुद्धिके द्वारा ही शास्त्रका पारगामी होना चाहता है,
(अलोचनः वस्त्वालोकम् वाञ्छति) नेत्रोंके विना ही वस्तु-
ओंको देखना चाहता है, (च) और (चलमनाः ध्यानम्
वाञ्छति ) चंचलचित्त होकर ध्यान करनेकी इच्छा करता है।
भावार्थ-जैसे दया आदिके विनाधर्मादि नही हो सकते हैं,
उसी प्रकार सज्जनोंकी संगतिके विना कल्याण नहीं हो सकता है।
६५ हरिणी। हरति कुमति भिन्ते मोहं करोति विवेकितां वितरति रतिं सूते नीति तनोति विनीतताम् । प्रथयति यशो धत्ते धर्म व्यपोहति दुर्गतिं जनयति नृणां किं नाभीष्टं गुणोत्तमसंगमः ॥६६॥ घनाक्षरी। कुमति निकंद होय महा मोह मंद होय, जगमगै सुयश विवेक जगै हियेसों। नीतको दिढ़ाव होय विनैको बढ़ाव होय, उपजै उछाह ज्यों प्रधान पद लियेसों । धर्मको प्रकाश होय दुर्गतिको नाश होय, घरतै समाधि ज्यो पियूप रस पियेसौं। तोप परि पूर होय, दोप दृष्टि दूर होय, एते गुन होहिं सतसंगतिके कियेसौ ॥ ६६ ॥ अन्वयार्थी-(गुणोत्तमसगमः) गुणवान् पुरुषोंकी सगति (कुमतिम् हरति) कुबुद्धिका नाश करती है, (मोहम् भिन्ते) मोहको छिन्न भिन्न कर डालती है, (विवेकिताम् करोति) विवेकी बना देती है, (रतिम् वितरति) उत्साह बढाती है, (नीतिम् सूते) नीतिको उत्पन्न करती है, (विनीतताम् तनोति ) नम्रता वा विनयशीलता बढ़ाती है, (यशः प्रथयति) कीर्ति फैलाती है, (धर्मम् धत्ते) धर्म सेवन कराती है, (दुर्गतिम् व्यपोहति) नरकादिक दुर्गतियोंको नष्ट कर देती है, और (नृणाम् किम् अभीष्टम् न जनयति) तथा मनुष्योंको कौन कौनसे इच्छित पदार्थों को नहीं देती ? सभी देती है। ५ भावार्थ-गुणवान् पुरुषोंकी संगति करनेसे सारी इच्छाएं पूर्ण हो सकती हैं। 1 शार्दूलविक्रीडित । लव्धुं बुद्धिकलापमापदमपाकर्तु विहाँ पथि प्राप्तुं कीर्तिमसाधुतां विधुवितुं धर्म समासेवितुम् । रोर्बु पापविपाकमाकलयितुं स्वर्गापवर्गश्रियं चेत्त्वं चित्त समीहसे गुणवता सङ्गं तदङ्गीकुरु ॥ ६७॥ कुंडलिया। 'कोरा' ते मारग गहुँ, जे गुणिजन सेवंत । ज्ञानकला तिनके जगै, ते पावहिं भव अंत ॥ ते पावहिं भव अंत, शांतरस ते चित धारहिं । ते अघ आपद हरहि, धरमकीरति विस्तारहि ॥ होहिं सहज ते पुरुष, गुनी वारिजके भौंरा। ते सुर संपति लहै, गहे ते मारग 'कारा' ॥६७ ॥ अन्वयार्थी- (हे चित्त) हे अन्तःकरण, यदि (त्वम् ) तू (बुद्धिकलापम् लब्धुम् ) नाना प्रकारकी बुद्धि प्राप्त करनेके लिये, (आपदम् अपाकर्त्तम् ) विपत्तियोंको दूर करनेके लिये, (पथि विहर्तुम् ) श्रेष्ठमार्गमें यथेष्ट विहार करनेके लिये, (कीर्तिम् प्राप्सुम् ) यश फैलानेके लिये, (असाधुताम् विधुवि- तुम् ) दुष्टताको दूर करनेके लिये, (धर्मम् समासेवितुम् ) धर्म सेवन करनेके लिये, (पापविपाकम् रोद्धम् ) पापोंके फल दुःखा- दिकोंके रोकनेके लिये और (वर्गापवर्गश्रियम् आकलयितुम् ) खर्ग तथा मोक्षकी लक्ष्मीको बुलानेके लिये (गुणवताम् ) गुणवान् , ६७ पुरुषोंका (सङ्गम् ) साथ (समीहसे चेत् ) चाहता है, तो (तत्) उसे अर्थात् गुणीजनोंकी संगतिको (अङ्गीकुरु) खीकार कर। हारिणी। हिमति महिमाम्भोजे चण्डानिलत्युदयाम्बुदे द्विरदति दयारामे क्षेमक्षमाभृति वज्रति । समिधति कुमत्यग्नौ कन्दत्यनीतिलतासु यः किमभिलपतां श्रेयः श्रेयान्स निर्गुणिसङ्गमः॥१८॥ पट्पद। जो महिमा गुन हनहि, तुहिन जिम वारिज वारहि । जो प्रताप संहरहि, पवन जिम मेघ विडारहि ॥ जो शम दम दलमलहि, द्विरद जिम उपवन खंडहि । जो सुछम छय करहि, वन जिम शिखर विहंडहि ॥ जो कुगति अग्नि ईधनसरिस, कुनयलता दृढ मूल जग । सो दुष्टसंग दुख पुष्ट कर, तजाहिं विचक्षण तासु मग ॥ ६८ ॥ अन्वयार्थी-(यः) जो (महिमाम्भोजे हिमति) महिमारूपी कमलके नाश करनेके लिये हिमके समान है, (उदयाम्वुदे चण्डानिलति) भाग्योदयरूपीमेघके उड़ानेके लिये तीव्र वायुके समान है, (दयारामे द्विरदति) दयारूपी बागके उजाडनेके लिये हाथीके समान है, (क्षेमक्षमाभृति वज्रति) कल्याणरूपी पर्वतके लिये वज्रके समान है, (कुमत्यग्नौ समिधति) कुबुद्धिरूपी अग्निके प्रज्वलित करनेके लिये लकड़ीके समान है और (अनीतिलतामु कन्दति) अन्यायरूपी लताओंके दृढ करनेके लिये जड़ (मूल) के समान है, (स निर्गुणिसङ्गमः) वह निर्गुण मनुष्योंका साथ (श्रेयः अभिलपताम् ) अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषोंको (किम् श्रेयान् ) क्या कल्याणकारी हो सकता है ? कभी नही। भावार्थ-निर्गुण पुरुषोंकी संगतिसे कभी किसी तरहका भी कल्याण नही हो सकता है। इन्द्रियाधिकार। शार्दूलविक्रीडित । आत्मानं कुपथेन निर्गमयितुं यः शूकलाश्वायते कृत्याकृत्यविवेकजीवितहतौ यः कृष्णसर्पयते । यः पुण्यद्रुमखण्डखण्डनविधौ स्फूर्जत्कुठारायते तं लुप्तव्रतमुद्रमिन्द्रियगणं जित्वा शुभंयुर्भव ॥ ६९ ॥ हरिगीतिका। जे जगत जनको कुपथ डारहिं, वक्र शिक्षित तुरगसे। जे हरहिं परम विवेक जीवन, काल-दारुण उरगसे ॥ पुण्यवृक्षकुठार तीखन, लुप्त व्रतमुद्रा करें। ते करन सुभट प्रहार भविजन, तव सुमारग पग धरै ॥ ६९ ॥ अन्वयार्थों-हे आत्मन् (यः) जो इन्द्रियोंका समूह (आत्मानम्) आत्माको (कुपथेन) कुमार्गमें (निर्गमयितुम् ) लेजानेके लिये (शूकलाश्वायते) अशिक्षित घोड़े के समान है, (यः) तथा जो (कृत्याकृत्यविवेकजीवितहतौ) कृत्य और अकृत्यके ज्ञान रूपी जीवनके नाश करनेके लिये (कृष्णसर्पायते) काले सर्पके समान है, (यः)और जो( पुण्यद्रुमखण्डखण्डनविधौ) पुण्यरूपी वृक्षके काटनेके लिये (स्फूर्जत्कुठारायते) तीव्र कुठारके जे ६९ समान है, (तम् ) उस (लुप्तवतम् ) चारित्रको लुप्तकरनेवाले (उद्रम्) वेगशाली (इन्द्रियगणम् ) इन्द्रियोंके समूहको (जित्वा) जीतकर (शुभंयुः भव) मोक्षगामी हो । शिखरिणी। प्रतिष्ठां यन्निष्ठां नयति नयनिष्ठां विघटय- त्यकृत्येप्वाधत्ते मतिमतपसि प्रेम तनुते । विवेकस्योत्सेकं विदलयति दत्ते च विपदं पदं तद्दोपाणां करणनिकुरुम्ब कुरु वशे ॥ ७० ॥ मनहरण। ये ही हैं कुगतिके निदानी दुखदोपदानी, इनहीकी संगतिसों संग-भार वहिये। इनकी मगनतासो विभौको विनाश होय, इनहीकी प्रीतसौ अनीत पंथ गहिये । ये ही तपभावको बिडारे दुराचार धारें, इनहीकी तपत विवेक भूमि दहिये। ये ही इन्द्री सुभट इनहिं जीत सोई साधु, इनको मिलापी सो तो महापापी कहिये ॥ ७० ॥ अन्वयार्थी-('यत्') जो (प्रतिष्ठाम् निष्ठाम् नयति) सारी प्रतिष्ठाको ले लेता है, (नयनिष्ठाम् ) न्यायपरायणताको (विघटयति) नष्ट करता है, (अकृत्येषु) कुकार्योंमें (मतिम्) बुद्धि (आधत्ते) लगाता है, (अतपसि) असयममें (प्रेम) प्रेम (तनुते ) बढ़ाता है, (विवकस्योत्सेकम् ) ज्ञानके उत्साहको (विदलयति) दलन करता है (च) और (विपदम् ) विपत्तियोंको (दत्ते) देता है, (तत्) उस (दोषाणाम् पदम्) अनेक दोषोंके स्थान (करणनिकुरम्बस्) इन्द्रियोंके समूहको हे भाई, तू (वशे) वशमें (कुरु) कर । ८ शार्दूलविक्रीडित । धत्तां मौनमगारमुज्झतु विधिप्रागल्भ्यमभ्यस्यता- मस्त्वन्तर्गणमागमश्रममुपादत्तां तपस्तप्यताम् । श्रेयापुञ्जनिकुञ्जभञ्जनमहावातं न चेदिन्द्रिय- जातं जेतुमवैति भस्मनि हुतं जानीत सर्वं ततः॥१॥ मौनके धरैया गृहत्यागके करैया विधि, रीतके सधैया परनिन्दासौं अपूठे हैं। विद्याके अभ्यासी गिरिकंदराके वासी शुचि, अंगके अचारी हितकारी वैन छूठे हैं । आगमके पाठी मन लाय महा काठी भारी, कष्टके सहनहार रामाइसौं रूठे हैं। इत्यादिक जीव सव कारज करत रीते, इन्द्रिनके जीते विना सरवंग झूठे हैं ॥ ७१ ॥ अन्वयार्थों-(मौनम् धत्ताम् ) भले ही मौन धारण करो, (अगारम् उज्झतु) गृहका त्याग करो (विधिप्रागल्भ्यम् अभ्यस्थताम् ) , विधिविधानमें चतुराईका अभ्यास करो, (अन्तर्गणम् अस्तु ) किसी भी गच्छादिकमें निवास करो, (आगमश्रमम् उपादत्ताम्) आगम पढ़ने में परिश्रम करो, (तपः तप्यताम् ) तप करो; परन्तु यदि (श्रेयःपुजनिकुञ्जभ- ञ्जनमहावातम् इन्द्रियवातम्) कल्याणरूपी निकुंजोंको उखाड़- देनेमें तीन पवनके समान इन्द्रियोंके समूहको (जेतुम् न, अवैति चेत् ) जीतना नही जानते हो, (ततः) तो (सर्वम् मसनि हुतम् जानीत ) वह सब भसमे होम देनेके समान है। भावार्थ-यदि इन्द्रियोंपर विजय नहीं किया है, तो मौन- धारण गृहत्याग आदि सब क्रियाएँ वृथा है। धर्मध्वंसधुरीणमभ्रमरसावारीणमापत्प्रथा- लङ्कर्मीणमशर्मनिर्मितिकलापारीणमेकान्ततः। सर्वानीनमनात्मनीनमनयात्यन्तीनमिष्टे यथा- कामीनं कुपंथाध्वनीनमजयन्नक्षौघमक्षेमभाक् ।। ७२ ।। धर्मतरुभंजनको महा मत्त कुंजरसे, आपदा भंडारके भरनको फरोरी है। सत्यशील रोकवेको प्रौढ़ परदार जैसे, दुर्गतिके मारग चलायवेको धोरी हैं। कुमतिके अधिकारी कुनैपथके विहारी; भद्रभाव ईधन जरायवेकी होरी है। मृपाके सहाई दुरभावनाके भाई ऐसे, विषयाभिलापी जीव अघके अघोरी हैं ॥ ७२ ॥ अन्वयाधी-(धर्मध्वंसधुरीणम् ) धर्मके नाश करनेमे प्रधानभूत, (अभ्रमरसावारीणम्) सत्यज्ञानको आच्छादन फरनेवाले, (आपत्प्रथालंकर्मीणम्) आपत्तियोके विस्तार करनेमे समर्थ, (अशर्मनिर्मितिकलापारीणम् ) दुःखोंके उत्पन्न करनेमे चतुर, (एकान्ततः सन्निीनम् ) सर्वथा समस्त अन्नको भक्षण करनेवाले, (अनात्मनीनम् ) आत्माका अहित करनेवाले, १. कुमतेत्यपि पाठ..
७२ (अनयात्यन्तीनम् ) खोटी नीतिमें अधिक प्रीति रखनेवाले, (इष्टे यथाकामीनम् ) अपने इष्टपदार्थोंमें खेच्छापूर्वक रहनेवाले और (कुपथाध्वनीनम् ) खोटे मार्गमें चलनेवाले (अक्षौषम् ) इन्द्रियोंके समूहको (अजयन् ) जो पुरुष विजय नहीं करता है, (अक्षेमभाक् ) वह कल्याणका भाजन नहीं हो सकता है। भावार्थ-जो पुरुष इन्द्रियोंको वश नहीं करता है, उसका कभी कल्याण नहीं होता। कमलाधिकार। निम्नं गच्छति निन्नगेव नितरां निद्रेव विष्कम्भते चैतन्यं मदिरेव पुष्यति मदं धूम्येव धत्तेऽन्धताम् । चापल्यं चपलेव चुम्बति दवज्वालेव तृष्णां नय- त्युल्लासं कुलटाङ्गनेव कमला स्वैरं परिभ्राम्यति ॥७३॥ मत्तगयन्द। नीचकी ओर ढरै सरिता जिम, घूम चढावत नींदकी नाई। चंचलता प्रगटै चपला जिम, अंध करै जिम धूमकी झाई॥ तेज करै तिसना व ज्यौ, मद ज्यों मद पोषित मूढ़के ताई। ये करतूति करै कमला जग, डोलत ज्यों कुलटा विन साई ।। अन्वयार्थी—(कमला) यह लक्ष्मी (निम्नगा इव) नदीके समान (नितराम्) निरन्तर (निम्नम् गच्छति) नीचकी ओर ही अर्थात् नीच पुरुषोंके समीप ही जाती है, (निद्रा इव) निद्राके समान (चैतन्यम् विष्कम्भते) चेतनाको लुप्त कर देती है, (मदिरा इत्र) शरावके समान (मदम् पुष्यति) मद वढाती है (धूम्या इव) सधन धूमके समान ७३ (अन्धताम् धत्ते) अन्धा करती है, (चपला इव) विजलीके समान (चापल्यम् चुम्बति) चंचलता प्रगट करती है, (दवज्वाला इव ) दावानल अग्निके समान (तृष्णाम् उल्लासम् नयति) तृष्णा बढ़ाती है और (कुलटागना इव) वेश्या स्त्रीके समान (खैरम् परिभ्राम्यति) खतंत्रता पूर्वक चारों ओर फिरती है। दायादाः स्पृहयन्ति तस्करगणा मुष्णन्ति भूमीभुजो गृहन्ति च्छलमाकलय्य हुतभुग्भस्मीकरोति क्षणात् । अम्भः प्लावयते क्षितो विनिहितं यक्षा हरन्ते हठा- दुर्वृत्तास्तनया नयन्ति निधनं धिग्वह्वधीनं धनम् ॥७४॥ चंधु विरोध करे निशवासर, दंडनको नरवै छल जोवै । पावक दाहत नीर वहावत, है गोट निशाचर दो भूतलरक्षित जक्ष हरे, करकै दुरवृत्ति कुसंतति खोवै। ये उतपात उठे धनके ढिग, दामधनी कहु क्यों सुख सोवै ॥७४॥ अन्वयाथों-(दायादाः स्पृहयन्ति ) भाई वन्धु आदिक कुटुम्बीजन इसके लेनेकी इच्छा करते है, (तस्करगणाः मुष्णन्ति) चोर इसको चुरा ले जाते है, (छलम् आकलप्य भूमीभुजः गृहन्ति) किसी बहानेसे राजा लोग छुड़ा लेते है, (हुतभुक् क्षणात् भसीकरोति) अमि क्षणभरमें जला देती है, (अम्भः प्लावयते) पानी इसको बहा ले जाता है, (क्षितौ विनिहितम् यक्षाः हठात् हरन्ते) पृथिवीमे गढ़े हुए धनको १ राजा। २ चोर।
७४ यक्ष देवता बलात्कार हर लेते है, और (दुर्चत्ताः तनयाः निधनम् नयन्ति) दुराचारी पुत्र नष्ट कर डालते है, इसलिये (बहुधीनम् धनम् धिक) अनेक पुरुषोंके आधीन रहनेवाले इस धनको धिक्कार है। नीचस्यापि चिरं चटूनि रचयन्त्यायान्ति नीचैर्नति शत्रोरप्यगुणात्मनोऽपि विदधत्युच्चैर्गुणोत्कीर्तनम् । निर्वेदं न विदन्ति किश्चिदकृतज्ञस्यापि सेवाक्रमे कष्टं किं न मनस्विनोऽपि मनुजाः कुर्वन्ति वित्तार्थिनः। मनहरण। नीच धनवंत ताहि निरख असीस देय, वह न विलोकै यह चरन गहत है। वह अकृतज्ञ नर यह अज्ञताको घर, वह मद लीन यह दीनता कहत है। वह चित्त कोप ठानै यह वाको प्रभु माने, वाके कुवचन सव यह पै सहत है। ऐसी गति धारै न विचारै कछु गुण दोष, भरथामिलापी जीव अरथ चहत है ॥ ७५ ॥ अन्वयार्थों-(नीचस्य अपि चिरम् चटूनि रचयन्ति) नीच पुरुषोंकी भी चिरकाल तक खुशामद करते रहते है, (शत्रो अपि नीचैः नतिम् आयान्ति) शत्रुको भी सादर नमस्कार करते हैं, (अगुणात्मनः अपि उच्चैः गुणोत्कीर्तनम् विदधति) निर्गुणी मनुष्योंके भी खूब गुण वर्णन करते रहते है, (अकृतस्य अपि सेवाक्रमे किञ्चित् निर्वेदम् न विदन्ति) और कृतघ्न मनुष्यकी सेवा करनेमें भी विरक्त नहीं होते हैं, इस तरह ७५ (मनखिनः अपि वित्तार्थिनः मनुजाः किम् न कुर्वन्ति) मनखी पुरुष भी धनके लिये क्या क्या नही करते हैं ? सब कुछ करते हैं । ('अहो' कष्टम् ) यह बड़े दुःखका विषय है। A लक्ष्मी सर्पति नीचमर्णवपयः सङ्गादिवाम्भोजिनी- संसर्गादिव कण्टकाकुलपदा न वापि धत्ते पदम् । चैतन्यं विषसंनिधेरिव नृणामुज्जासयत्यञ्जसा धर्मस्थाननियोजनेन गुणिभिर्लाह्यं तदस्याः फलम् ॥७॥ नीचहीकी ओरको उमंग चलै कमला सो, पिता सिंधु सलिलखभाव याहि दिया है। रहै न सुथिर है सकंटक चरन याको, बसी कंजमाहि कंज कैसौ पद किया है। जाको मिलै हितसौं अचेत कर डारै ताहि, विषकी बहिन तातै विप कैसौ हियौ है। ऐसी ठगहारी जिन धरमके पंथ डारी, करकै सुकृत तिन याको फल लियौ है ॥ ७६ ॥ अन्वयार्थी-(लक्ष्मीः) यह लक्ष्मी (अर्णवपयःसगाव इव) मानो समुद्रके जलके सम्बन्धसे ही (नीचम् सर्पति) नीचकी ओर गमन करती है, (अम्भोजिनीसंसर्गात् इच) मानो कमलिनीके संसर्गसे ही (कण्टकाकुलपदा) पैरोंमें काटे चुभनेकी तकलीफसे आकुलित होती हुई (कापि पदम् न धत्ते) कही भी स्थिर चरण नही रखती है और (विषसनिधेः इव) विषके सन्निकट रही है इस लिये मानो (नृणाम्) मनुष्योंकी (चैतन्यम्) चैतन्य शक्तिको (अञ्जसा) शीघ्र ही (उज्जासयति) अचेत कर त डालती है। (तत्) इसलिये (गुणिमिः), गुणवान मनुष्योंक (धर्मस्थाननियोजनेन) धर्मकार्योंमें खर्च कर देनेसे ही (अस्सा) इस लक्ष्मीका (फलम् ) फल (ग्राह्यम् ) ग्रहण करना चाहिये भावार्थ-यह लक्ष्मी समुद्रसे उत्पन्न हुई है, इस लिये जलके समान नीचकी ओर ही जाती है, तथा कमलमें रहती है इस लिये पैरोंमें कांटे चुम जानेसे कहीं स्थिर नहीं रहती और विषकी बहिन है, इस लिये मनुष्योंको अचेतन कर देती है, अतएव इसको धर्मकार्यों में लगाकर ही इसके पानेका फल प्राप्त- करना चाहिये। दानाधिकार । चारित्रं चिनुते तनोति विनयं ज्ञानं नयत्युन्नति पुष्णाति प्रशमं तपः प्रवलयत्युल्लासयत्यागमम् । पुण्यं कन्दलयत्य, दलयति स्वर्ग ददाति क्रमा- निर्वाणश्रियमातनोति निहितं पात्रे पवित्रे धनम् ॥ ७७ सवैया (३१ मात्रा)। चरन अखंड ज्ञान अति उज्जल, विनय विवेक प्रशम अमलान । अनघ सुभाव सुकृति गुन संचय, उच्च अमरपद बंध विधान : आगम गम्य रम्य तपकी रुचि, उद्धत मुकतिपंथसोपान ।। ये गुण प्रगट होय तिनके घट, जे नर देहि सुपचाहदानी ७७। अन्वयाथों-(पवित्रे पाने निहितम् धनम्.) पवित्र सत्पात्रको दिया हुआ धन (चारित्रम् चिनुते) चारित्र बद्धात है, (विनयम् तनोति) विनय बढ़ाता है, झिानम् उन्नति नयति ज्ञानकी वृद्धि करता है, (प्रशमम् पुष्णाति) शान्तताको पुष्ट ७७ करता है, (तपः प्रवलयति) तपको प्रबल करता है, (आगमम् उल्लासयति ) शास्त्रको उल्लसित करता है-शास्त्र ज्ञानको वदाता है, (पुण्यम् कन्दलयति) पुण्यकी जड़ जमाता है, (अघम् दलयति) पापोंका नाश करता है (वर्गम् ददाति) वर्गको देता है और (क्रमात् ) क्रमक्रमसे (निर्वाणश्रियम् आतनोति) मोक्षलक्ष्मीको प्राप्त कर देता है। दारियं न तमीक्षते न भजते दौर्भाग्यमालम्बते नाकीतिर्न पराभवोऽभिलपते न व्याधिरास्कन्दति । दैन्यं नाद्रियते दुनोति न दरः किश्नन्ति नैवापदः पाने यो वितरत्यनर्थदलनं दानं निदानं श्रियाम् ॥ ७८ पट्पद। सो दरिद्र दलमलहि, ताहि दुर्भाग न गंजहि । सो न लहै अपमान, सु तो विपदाभय भंजहि ॥ तिहि न कोइ दुख देहि, तासु तन व्याधि न वडा ताहि कुयश परहरहि, सुमुख दीनता न कट्टा सो लहहि उच्चपदजगतमहें, अघ अनरथ नासहि सरव । कहै 'कुंवरपाल' सो धन्य नर, जो सुखेत वोवै दव ॥७॥ अन्वयार्थों-(यः) जो मनुष्य (पात्रे) पात्रके लिये (श्रियाम् निदानम्) लक्ष्मी बढ़नेका कारण और (अनर्थदलनम्) अनर्थोंको दलन करनेवाला (दानम् वितरति) दान देता है, (तम् ) उसको (दारिद्यम् न ईक्षते) दरिद्रता कभी नहीं देखती, (दौर्भाग्यम् न भजते) दुर्भाग्यता कभी उसकी सेवा नहीं करती, (अकीर्तिः न आलम्बते) अपकीर्ति उसका आलम्बन नहीं लेती, (पराभवः न अभिलपते) तिरस्कार उसको नहीं चाहता, (व्याधिः नं आस्कन्दति) आधि व्याधि कभी उसके समीप नही आती, (दैन्यम् न आद्रियते) दीनता भी उसका आदर नहीं करती, (दरः न दुनोति) भय क्षोम पैदा नहीं करता, और (आपदः नैव क्लिश्नन्ति) विपत्तियां उसको कभी क्लेश नहीं देती। - लक्ष्मीः कामयते मतिमंगयते कीर्तिस्तमालोकते प्रीतिश्चुम्बति सेवते सुभगता नीरोगतालिङ्गति । श्रेयः संहतिरभ्युपैति वृणुते स्वर्गोपभोगस्थिति- मुक्तिर्वाञ्छति यः प्रयच्छति पुमान्पुण्यार्थमर्थ निजम् ।। मनहरण । ताहिको सुबुद्धि बरै रमा ताकी चाह करे, चंदन सरूप हो सुयश ताहि चरचै। सहज सुहाग पावै सुरग समीप आवै, बार बार मुकति रमनि ताहि अरचै॥ ताहिके शरीरको अलिंगति अरोगताई, मंगल करै मिताई प्रीत करै परचै। जोई नर हो सुचेत चित्त समता समेत, धरमके हेतको सुखेत धन खरचै ॥ ७९ ॥ अन्वयार्थी-(यः पुमान् ) जो मनुष्य (निजम् अर्थम्) अपना धन (पुण्यार्थम् ) पुन्यकार्योंके लिये (प्रयच्छति) अर्पण कर देता है, (तम् ) उसको (लक्ष्मीः कामयते) लक्ष्मी चाहती है, (मतिः मृगयते) सुबुद्धि ढूढ़ती है, (कीर्ति - ७९ . आलोकते) कीर्ति देखती है, (प्रीतिः चुम्बति) प्रीति उसका चुम्बन करती है, (सुभगता सेवते) सुन्दरता उसकी सेवा करती है, (नीरोगता आलिङ्गति) नीरोगता उसको आलिंगन करती है, (श्रेयासंहतिः अभ्युपैति) कल्याणपरम्परा खयं आकर मिलती है, (स्वर्गोपभोगस्थितिः वृणुते) खर्गके भोगोप- भोगकी सामग्री उसको वयं खीकार करती है, तथा (मुक्तिः वाञ्छति ) मुक्ति उसकी इच्छा करती है। मन्दाक्रान्ता। तस्यासन्ना रतिरनुचरी कीर्तिरुत्कण्ठिता श्रीः स्निग्धा बुद्धिः परिचयपरा चक्रवर्तित्वऋद्धिः। पाणौ प्राधा त्रिदिवकमला कामुकी मुक्तिसंपत् सप्तक्षेत्र्यां वपति विपुलं वित्तवीजं निजं यः ॥ ८०॥ पद्मावती। ताकी रति कीरति दासी सम, सहसा राजरिद्धि घर आवै। सुमति सुता उपजै ताके घट, सो सुरलोक संपदा पावै ॥ ताकी दृष्टि लखै शिव मारग, सो निरबंध भावना भाव। जो नर त्याग कपट कुँवरा' कह, विधिसौं सप्तखेत धन बावै॥८० अन्वयार्थों-(यः) जो पुरुष (निजम् विपुलम् वित्त- वीजम् ) अपना बहुतसा धनरूपी बीज (सप्तक्षेत्र्याम् वपति) सातक्षेत्रोंमें बोता है अर्थात् चैत्य, चैत्यालय, श्रुतज्ञान, मुनि, अर्जिका, श्रावक, और श्राविका इनके उपकारार्थ खर्च करता है; (रतिः तस्य आसन्ना) प्रीति उसके समीप रहती है, (कीर्तिः अनुचरी) कीर्ति उसकी दासी बनी रहती है, (श्रीः उत्कण्ठिता) ८० लक्ष्मी उसके लिये उत्कंठित रहती है, (बुद्धिः स्निग्धा) बुद्धि उससे स्नेह रखती है, (चक्रवर्तित्वऋद्धिः परिचयपरा) चक्रवर्तीकी ऋद्धियां उससे सदा परिचय रखती हैं, (त्रिदिव- कमला पाणौ प्राप्ता) वर्गकी लक्ष्मी उसके हाथमें रहती है, और (मुक्तिसम्पत् कामुकी) मुक्तिरूपी लक्ष्मी उससे रमण करनेकी इच्छा रखती है। तपप्रभावाधिकार। शार्दूलविक्रीडित । यत्पूर्वार्जितकर्मशैलकुलिशं यत्कामदावानल- ज्वालाजालजलं यदुग्रकरणग्रामाहिमन्त्राक्षरम् । यत्प्रत्यूहतमःसमूहदिवसं यल्लब्धिलक्ष्मीलता- मूलं तद्विविधं यथाविधि तपः कुर्वीत वीतस्पृहः ॥८॥ षट्पद। जो पूरवकृत कर्म, पिंडगिरि दलन वनधर । जो मनमथ-दव-ज्वाल, माल संहरन मेघझर ॥ जो प्रचंड इंद्रिय भुजंग, थंभन सुमंत्र वर। जो विभाव संतम सुपुंज, खंडन प्रभात कर ॥ जो लब्धि बेल उपजंत घट, तासु मूल दृढ़तासहित। सो सुतप अंग बहुविध दुविध, करहिं विवुध बांछारहित ॥८१॥ अन्वयार्थों-(यत् )जो तप (पूर्वार्जितकर्मशैलकुलिशम्) पूर्वकालके संचय किये हुए कर्मरूपी पर्वतके लिये वज्रके समान है, ( यत् ) जो (कामदावानलज्वालाजालजलम् ) कामदेव- रूपी दावानलकी ज्वालाओंको शान्त करनेके लिये जल है, (यत्) जो (उग्रकरणग्रामाहिमत्राक्षरम् ) प्रचण्ड इन्द्रियों के समूहरूपी सपको वश करनेके लिये मन्त्रके समान है, (यत्) जो (प्रत्यूहतमःसमूहदिवसम्) विनरूपी अन्धकारके समूहको नाश करनेके लिये दिवसके समान है, (यत् ) और जो (लब्धिलक्ष्मीलतामूलम् ) लब्धिरूपी लताओंका मूल है अर्थात् मूल कारण है (तत् द्विविधम् तपः) ऐसा जो अभ्यन्तर और बाह्यरूप दो प्रकारका तप है; उसको (वीतस्पृहः सन् ) फलकी वाञ्छा न करके (यथाविधि कुर्वीत) विधिपूर्वक करना चाहिये। यस्माद्विघ्नपरम्परा विघटते दास्यं सुराः कुर्वते कामः शाम्यति दाम्यतीन्द्रियगणः कल्याणमुत्सर्पति । उन्मीलन्ति महर्द्धयः कलयति ध्वंसं च यः कर्मणां स्वाधीन त्रिदिवं शिवं च भवति श्लाघ्यं तपस्तन्न किम्।। मनहरण । जाके आदरत महा रिद्धिसौं मिलाप होय, मदन अव्याप होय कर्म वन दाहिए। विधन विनास होय गीरवाण दास होय, ज्ञानको प्रकास होय भौसमुद्र थाहिए ॥ देवपद खेल होय मंगलसों मेल होय, इन्द्रिनिकी जेल होय मोखपंथ गाहिए। जाकी ऐसी महिमा प्रगट कहै 'कॉरपाल, तिहुँलोक तिहुकाल सो तप सराहिए ॥ ८२ ॥ अन्वयाथों-(यसा) जिस तपसे (विघ्नपरम्परा विघटते) विनोंकी परंपरा नष्ट हो जाती है, (सुराः दास्यम् w ८२ कुर्वते ) वर्गनिवासी देव सेवक हो जाते हैं, (कामः शाम्यति) कामदेव शान्त हो जाता है, (इन्द्रियगणः दाम्यति) निखिल इन्द्रियोंका दमन हो जाता है, (कल्याणम् उत्सर्पति) कल्याण बढता रहता है, (महर्द्धयः उन्मीलन्ति) बड़ी बड़ी ऋद्धियां प्राप्त होती हैं, (च) और (यत्) जो (कर्मणाम् ध्वंसम् कलयति) काँका विनाश करता है (च) तथा (त्रिदिवम् शिवम् स्वाधीनं भवति) 'जिसके प्रतापसे' वर्ग और मोक्ष खाधीन हो जाते हैं (तत् तपः किम् न श्लाघ्यम् ) ऐसा तप क्या प्रशंसा करने योग्य नहीं है ? अवश्य है। कान्तारं न यथेतरो ज्वलयितुं दक्षो दवाग्निं विना दावाग्निं न यथापरः शमयितुं शक्को विनाम्भोधरम् । निष्णातः पवनं विना निरसितुं नान्यो यथाम्भोधर कमौंघ तपसा विना किमपरो हन्तुं समर्थस्तथा ॥३॥ मत्तगयन्द। ज्यौं वर कानन दाहनकों, व-पावकसौ नहिं दूसरो दीसै। ज्यौ दवआग बुझै न ततच्छन, जो न अखंडित मेघ वरीसै ॥ ज्यों प्रगटै नहिं जौलग मारुत, तौलग घोर घटा नहिं खीसै ॥ यौं घटमैं तपवन विना दृढ, कर्मकुलाचल और न पीसै॥ ८३ ॥ अन्वयार्थी-(यथा) जैसे (कान्तारम्) वनको (ज्वलयितुम् ) जलानेके लिये (दवाग्निम् विना) दावानल अग्निके विना (इतरः न दक्षः) और कोई समर्थ नहीं है, तथा ('यथा' ) जैसे (दावाग्निम् ) दावानलको (शमयितुम्) ८३ शान्तकरनेके लिये (अम्भोधरम् विना) विना मेधके (अपर: न शक्तः) अन्य कोई शक्तिमान नहीं है, और (यथा) जैसे, (अम्भोधरम् ) मेघको (निरसितुम्) छिन्नभिन्न करनेके लिये (पवनम् विना) वायुके विना (अन्यः न निष्णातः) आर कोई कुशल नहीं है (तथा) उसी प्रकार (कौघम् ) कर्म- समूहको (हन्तुम्) नाश करनेके लिये (विना तपसा) तपके विना (किम् अपरः समर्थः) क्या कोई अन्य समर्थ है ? भावार्थ-कर्म तपसे ही नष्ट हो सकते है । उनके नष्ट करनेके लिये और कोई उपाय नही । स्त्रग्धरा। संतोषस्थूलमूल प्रशमपरिकरस्कन्धबन्धप्रपञ्चः पञ्चाक्षीरोधशाखः स्फुरदभयदलः शीलसंपत्प्रवालः। श्रद्धाम्भःपूरसेकाद्विपुलकुलबलैश्वर्यसौन्दर्यभोग- स्वर्गादिप्राप्तिपुष्पः शिवपदफलदास्यात्तपःपादपोऽयम्॥ पदपद। सुदृढ़ मूल संतोष, प्रशम गुन प्रवल पेड़ धुव । पंचाचार सु शाख, शील संपति प्रवाल हुव ॥ अभय अंग दलपुंज, देवपद् पहुप सुमंडित । सुकृतभाव विस्तार, भार शिव सुफल अखंडित ॥ परतीत धार जल सिंच किय, अति उतंग दिन दिन पुषित । जयवंत जगत यह सुतपतरु, मुनि विहंग सेवहिं सुखित ॥ ८४॥ अन्वयार्थी-(अयं तपः पादयः) यह तपरूपी वृक्ष १. तप कल्पवृक्षइत्यपि पाठ ।
८४
(संतोषस्थूलमूला) जिसमें कि सन्तोषरूपी मोटी जड़ है,
(प्रशमपरिकरस्कन्धवन्धप्रपञ्चः) प्रशम संवेगादिरूप -पींडोंका
फैलाव है, (पञ्चाक्षीरोधशाखः) पांचों इन्द्रियोंका निरोधरूप
शाखासमूह है, (स्फुरदर्भयदलः) अभयादि अंगरूप पत्ते लग रहे
है, (शीलसम्पत्प्रवालः) और शील सम्पत्तिरूपी कोंपले है;
(श्रद्धाम्भःपूरसेकात्) श्रद्धारूपी जलके सीचनेसे (विपुलकुलै-
श्वर्यसौन्दर्यभोगस्वर्गादिप्राप्तिपुष्पः ) उच्चकुल, विपुल ऐश्वर्य,
उत्कृष्ट सौन्दर्य, और नानाप्रकारके भोग युक्त खर्गादिरूप फूल
फूलकर (शिवपदफलदः) मोक्षपदरूप फल फलता है।
.
भावनाधिकार ।
शार्दूलविक्रीडित ।
नीरागे तरुणीकटाक्षितमिव त्यागव्यपेतप्रभोः
सेवाकष्टमिवोपरोपणमिवाम्भोजन्मनामश्मनि ।
विष्वग्वर्षमिवोषरक्षितितले दानाहदर्चातपः-
स्वाध्यायाध्ययनादि निष्फलमनुष्ठानं विना भावनाम् ॥
पद्मावती छन्द ।
ज्यों नीराग पुरुषके सन्मुख, पुरकामिनि कटाच्छ कर ऊठी।
ज्यों धनत्यागरहित प्रभु सेवन, ऊसरमैं वरषा जिम छूठी ॥
ज्या शिलमाहि कमलको बोवन, पवन पकर जिम वॉधिए मूठी।
ए करतूति होंय जिम निष्फल, त्यो विनभाव क्रिया सब झूठी८५
अन्वयार्थी-(नीरागे तरुणीकटाक्षितम् इव) जैसे
विरागी पुरुषके सन्मुख तरुण स्त्रीके - कटाक्ष निष्फल हैं,
(त्यागच्यपेतप्रभोः सेवाकष्टम् इव) जैसे-प्रतिफलरूप धन न
- देनेवाले खामीकी सेवा करना कष्टमात्र है अर्थात् व्यर्थ है, (अम्भोजन्मनाम् अश्मनि उपरोपणम् इव) जैसे पापाणमें कमलोंका बीज बोना व्यर्थ है, (ऊपरक्षितितले विष्वग्वर्पम् इव) और जैसै ऊसर भूमिमें वर्षा होना व्यर्थ है, उसीतरह (भावनाम् विना) शुभभावोंके विना अथवा अनित्य अशरण आदि बाहरभा- वनाओंके चिन्तवनके विना (दानादर्चातपः स्वाध्यायाध्यय- नादि अनुष्ठानम् ) दान देना, अरहन्तकी पूजा करना, तप करना, करना और अध्ययन आदिक अनुष्ठान करना निष्फल है। स्वाध्याय सर्व जीप्सति पुण्यमीप्सति दयां धित्सत्यघं भित्सति क्रोधं दित्सति दानशीलतपसां साफल्यमादित्सति । कल्याणोपचयं चिकीर्षति भवाम्भोधेस्तट लिप्सते मुक्तिस्त्री परिरिप्सते यदि जनस्तद्भावयेद्भावनाम्॥८६॥ घनाक्षरी। पूरव करम दहै सरवग्यपद् लहै, गहै पुन्यपंथ फिर पापमै न आवना । फरुनाकी कला जागै कठिन कपाय भागै, लागे दानशील तप सफल सुहावना ॥ पावै भवसिंधु तट खोले मोखदार पट, शर्म साध धर्मकी धराम कर धावना। एते सब काज करे अलखको अंग धरै, चेरी चिदानंदकी अकेली एक भावना ॥ ८६ ॥ अन्वयार्थी-(यदि) यदि (जनः) मनुष्य (भावनाम्) भावनाको (भावयेत् ) भावे अर्थात् आत्मचिन्तवन करे, तो वह ८६ (सर्वम् ज्ञीप्सति) सवको जाननेवाला अर्थात् केवली होता है, (पुण्यम् ईप्सति) पुण्य उपार्जन करता है, (दयाम् धित्सति) दयाका पालन करता है, (अघम् भित्सति) पापोंको नष्ट करता है, (क्रोधम् दित्सति) क्रोधको हरण करता है, (दानशी- लतपसास् साफल्यम् आदित्सति) दानशील तपको सफल करता है, (कल्याणोपचयम् चिकीर्पति) निरन्तर कल्याणोंकी वृद्धि करता रहता है, (भवाम्बोधेः तटम् लिप्सते) संसाररूपी समुद्रके किनारे लग जाता है और (मुक्तिस्त्रीम् परिरिप्सते) मुक्तिरूपी स्त्रीको आलिगन करता है। पृथ्वी। विवेकवनसारिणी प्रशमशर्मसंजीवनी भवार्णवमहातरी मदनदावमेघावलीम् । चलाक्षमृगवागुरां गुरुकषायशैलाशनिं विमुक्तिपथवेसरी भजत भावनां किं परैः ॥ ८७॥ प्रशमके पोपवेको अम्रतकी धारासम, ज्ञानवन सींचवेको नदी नीर भरी है। चंचल करन मृग वांधवेकौं वागुरासी, कामदावानल नासवेकौं मेघझरी है । प्रवल कपायगिरि भंजवेकौं वज्र गदा, भौ-समुद्र तारवेकौं पौढ़ी महा तरी है। मोखपंथ गाहवेकौं वेसरी विलायतकी, ऐसी शुद्ध भावना अखंड धार ढरी है ॥ ८७ ॥ १. अश्वतरी अर्थात् खच्चरी। ३
अन्वयार्थी-भो भव्य हो(विवेकवनसारिणीम् ) विवेक-
रूपी वनके सिंचन करनेके लिये नदीके समान, (प्रशमशर्म-
संजीवनीम् ) प्रशम सुखको जीवित रखनेके लिये सजीवनी
औषधिके समान, (भवार्णवमहातरीम् ) संसाररूपी समुद्रके
तिरनेके लिये बडी नौकाके समान, (मदनदावमेघावलीम् )
कामदेवरूपी दावानलके शान्तकरनेके लिये मेघमण्डलके समान,
(चलाक्षमृगवागुराम्) चंचल इन्द्रियरूपी हरिणोंके वाधनेके
लिये जालके समान, (गुरुकपायशैलाशनिम्) प्रवलकपायरूपी
पर्वतको नष्ट करने के लिये वनके समान और (विमुक्तपथवे-
सरीम् ) मोक्षके मार्गमें लेजानेके लिये नहीं थकनेवाली खच्चरीके
समान जो (भावनाम् ) आत्माकी भावना है, सो (भजत)
चिन्तवन करनी चाहिये । (परः किम् ) अन्यसे क्या प्रयोजन ?
शिपरिणी।
घनं दत्तं वित्तं जिनवचनमभ्यस्तमखिलं
क्रियाकाण्डं चण्डं रचितमवनौ सुप्तमसकृत् ।
तपस्तीनं तसं चरणमपि चीर्ण चिरतरं
न चञ्चित्ते भावस्तुपवपनवत्सर्वमफलम् ॥ ८८ ॥
अभानक छन्द ।
गह पुनीत आचार, जिनागम जोवना।
कर तप संजम दान, भूमिका सोवना ॥
प. करनी सब निफल, होय विन भावना।
ज्यो तुप वोए हाथ, कछु नहिं आवना ॥ ८८ ॥
८८
.
अन्वयार्थों-(धनम् वित्तम् दत्तम् ) बहुतसे धनका
दान दिया, (अखिलम् जिनवचनम् अभ्यस्तम् ) निखिल
जैनशास्त्रोंका अभ्यास किया, (चण्डम् क्रियाकाण्डम् रचितम्)
उग्र चारित्र धारण किया, (अवनौ असकृत् सुप्तम् ) सदा
भूमिपर शयन किया, (तीव्रम् तपः तप्तम् ) तीन तप किया,
और (चिरतरम् चरणम् अपि चीर्णम्) चिरकालपर्यन्त
संयम भी धारण किया; किन्तु (भावः चित्चे न चेत् ) यदि
हृदयमें भाव न हों अर्थात् ये कार्य आत्मचिन्तवनपूर्वक न किये
हों, तो (तुषवपनवत् ) धानके छिलकेके बोनेके समान (सर्वम्
अफलम् ) सब निष्फल है।
विरागाधिकार।
हारिणी।
यदशुभरजः पाथो दृन्द्रियद्विरदानुशं
कुशलकुसुमोद्यानं माद्यन्मनःकपिशृङ्खला ।
विरतिरमणीलीलावेश्मस्मरज्वरभेषजं
शिवपथरथस्तद्वैराग्यं विमृश्य भवाभयः ॥ ८९ ।।
घनाक्षरी।
अशुभता धूर हरवेको नीर-पूर सम,
विमल विरति-कुलबधूको सुहाग है।
उदित मदन जुर नासवेकी जुरांकुश,
अच्छगज थंभनकौं अंकुशको दाग है ।
चंचल कुमन कपि रोकवेकौं लोहफन्द,
कुशल कुसुम उपजायवेकौं याग है
८९
सूधो मोखमारग चलायवेकौं नामी रथ,
ऐसो हितकारी भयभंजन विराग है ॥ ८९ ॥
अन्वयार्थों-(यत्) जो वैराग्य (अशुभरजःपाथः)
अशुभरूपी धूलिको शान्त करनेके लिये जल है, (सेन्द्रिय-
द्विरदावशम्) उन्मत्त इंद्रियरूपी हाथीको वश करनेके लिये
अंकुश है, (कुशलकुसुमोद्यानम्) कल्याणरूपी पुष्पोंके उत्पन्न
होनेके लिये उद्यान (बाग) है, (माद्यन्मनःकपिशङ्खला)
मदोन्मत्त मनरूपी बन्दरके बांधनेके लिये लोहेकी सांकल है,
(विरतिरमणीलीलावेश्म) विरति रूपी सुन्दरस्त्रीके क्रीड़ा
करनेका भवन है, (सरज्वरभेषजम् ) कामदेवरूपी ज्वरके दूर
करनेके लिये औषधि है, और (शिवपदरथः) मोक्षमें जानेके
लिये रथ है, (तत् वैराग्यम् ) ऐसे वैराग्यको (विमृश्य)
चिन्तवन करके हे भव्यो, तुम (अभयः भव) निडर होओ।
वसन्ततिलका।
चण्डानिलः स्फुरितमन्दचयं दवार्चि-
वक्षनज तिमिरमण्डलमर्कविम्बम् ।
वजं महीध्रनिवहं नयते यथान्तं
वैराग्यमेकमपि कर्म तथा समग्रम् ॥१०॥
अभानक छन्द।
ज्यों समीर गंभीर, सघन घन छय करे।
वज्र विदारै शिखर, दिवाकर तम हरै॥
ज्यो दुव पावक पूर, दहै वनकुंजको।
यौं भजे वैराग, करमके पुंजकों ॥९० ॥
९० अन्वयार्थी-(यथा) जैसे (चण्डानिलः) तीत्र पवन (स्फुरितम् अब्दचयम् ) छाये हुए मेघमंडलका (अन्तं नयते) नाश करता है, (यथा) जैसे (दवाचिः) दावानल अमि (वृक्षवजम् ) वृक्षोंके समूहका (अन्तं नयते) नाश करती है, (यथा) जैसे (अर्कविम्बम् ) सूर्यका बिम्ब (तिमिरमण्डलम् ) अंधकारके समूहको (अन्तम् नयते) नाश करता है, (यथा) जैसे (वज्रम् ) वज्र (महीध्रनिवहम् ) पर्वतोंके समूहको (अन्तम् नयते) नाश करता है, (तथा) उसी तरह (एकम् अपि वैराग्यम् ) एक ही वैराग्य (समग्रम् कर्म) समस्त कर्मोंको (अन्तम् नयते) नाश करता है भावार्थ-वैराग्य समस्त कर्मोंका नाश करनेवाला है। - शिखरिणी। नमस्या देवानां चरणवरिवस्या शुभगुरो- स्तपस्या निःसीमक्लमपदमुपास्या गुणवताम् । निषद्यारण्ये स्यात्करणदमविद्या च शिवदा विरागः क्रूरागःक्षपणनिपुणोऽन्तः स्फुरति चेत् ॥ पद्मावती, छन्द।। कीनी तिन सुदेवकी पूजा, तिन गुरुचरनकमल चित लायो। सो वनवास बस्यौ निशवासर, तिन गुनवंत पुरुप यश गायौ । तिन तप लियौ कियौ इन्द्री दम, सो पूरन विद्या पढ़ आयौ । सब अपराध गए ताकौं तजि, जिन वैरागरूप धन पायौ ॥९१॥ अन्वयार्थी-(अन्तः विरागः स्फुरति चेत्) यदि अन्तःकरणमें। वैराग्य स्फुरायमान होता है, तो (देवानाम् -
नमस्या स्यात् ) देवाधिदेवकी पूजा हो सकती है, (शुभगुरोः
चरणवरिवस्था स्यात् ) कल्याण करनेवाले गुरुके चरणकमलोंकी
उपासना हो सकती है, (निःसीमलमपदम् तपस्या सात् )
अत्यन्त क्लेश देनेवाला तप हो सकता है, (गुणवताम् उपासा
सात् ) गुणवान् पुरुषोंकी उपासना हो सकती है, (अरण्ये
निषद्या साव) वनमें योगासन अर्थात् ध्यान हो सकता है,
(शिवदा करणदमविद्या स्यात् ) मोक्षदेनेवाली इन्द्रियों के
दमनकी विद्या (कुशल) आ सकती है और (क्रूरागः क्षपण-
निपुणः) तीव्र पापोंके क्षय करनेकी सामर्थ्य हो सकती है।
मार्दूलविक्रीडित।
भोगान्कृष्णभुजङ्गभोगविपमानराज्यं रजःसंनिभं
वन्धून्बन्धनिवन्धनानि विषयग्रामं विपानोपमम् ।
भूतिं भूतिसहोदरां तृणतुलं स्त्रैणं विदित्वा त्यज-
स्तेष्वासक्तिमनाविलो विलभते मुक्ति विरकः पुमान् ॥
घनाक्षरी छन्द ।
जाको भोग भाव दीसे कारे नागकैसे फन,
राजको समाज दीखे जैसो रजकोप है।
जाको परिवारको बढ़ाव घेराबंध सूझे,
विप सुख सौंजको विचार विपपोप है।
लसै यो विभूति ज्यो भसमको विभूति कहैं,
वनिता विलासमें विलोकै घढ दोप है।
ऐसो जान त्यागे, यह महिमा विरागताकी
ताहीको वैराग सही ताके ढिग मोप है ॥ ९२ ॥
९२ अन्वयार्थी-(विरक्तः पुमान्) विरक्त मनुष्य (भोगान्) संसारके भोगोंको (कृष्णभुजङ्गभोगविपमान् विदित्वा) काले सर्पके फणके समान विषम जानकर, (राज्यम् ) राज्यको. (रजः सन्निभम् ) धूलिके समान जानकर, (बन्धून् ) भाई बगैरह कुटुम्बी जनोंको (वन्धनिवन्धनानि) बंधके कारण जानकर, (विषयग्रामम् ) इन्द्रियोंके विषयोंको (विपानोपमम) विष मिले हुए अन्नके समान जानकर, (भूतिम्) हाथी घोड़े रथा- दिकी विभूतिको ( भूतिसहोदराम् ) भसकी बहिन जानकर और (णम् ) स्त्री सुखको (तृणतुलम् विदित्वा) तृणके समान जानकर (तेषु) उनमें अर्थात् भोगोपभोग राज्य बन्धु विषय विभूति और स्त्रीमें (आसक्तिम् त्यजन्) आसक्ति छोड़ कर (अनाविल: 'सन्') अतिशय शुद्ध होता हुआ (मुक्तिम् विलमते) मोक्षको प्राप्त होता है। उपदेशगाथा। उपेन्द्रवज्रा। जिनेन्द्रपूजा गुरुपर्युपास्तिः सत्त्वानुकम्पा शुभपात्रदानम् । गुणानुरागः श्रुतिरागमस्य नृजन्मवृक्षस्य फलान्यमूनि ९३ कै परमेसुरकी अरचा, विधिसौं गुरुकी उपसर्पन(?)कीजै। दीन विलोक दया धरिए चित, प्रासुक दान सुपत्तहिं दीजै ॥ गाहक हो गुनको गहिए, रुचिसौं जिन आगमको रस पीजै । ए करनी करिए घरमै वस, यौं जगमैं नरभौ फल लीजै ॥९३ ॥ अन्वयार्थों-(जिनेन्द्रपूजा) जिनेन्द्रदेवकी पूजा करना, मत्तगयन्दा ९३ (गुरुपर्युपास्ति) गुरुकी उपासना करना, (सत्चानुकम्पा) प्राणीमात्रमें दया रखना, (शुभपात्रदानम् ) पात्र सुपात्रोंको उत्तम दान देना, (गुणानुरागः) गुणोंमें प्रीति करना, (आगमस्य श्रुतिः) और जैन शास्त्रोंका सुनना, (अमूनि) ये सब (नृजन्मवृक्षस्य फलानि) मनुष्यजन्मरूपी वृक्षके फल है। भावार्थ-जिनेन्द्रपूजा आदिक करनेसे ही मनुष्य जन्म सफल होता है। शिखरिणी। त्रिसन्ध्यं देवाची विरचय चयं प्रापय यशः श्रियः पात्रे वापं जनय नयमार्ग नय मनः ।, स्मरक्रोधाद्यारीन्दलय कलय प्राणिषु दयां जिनो सिद्धान्तं शृणु वृणु जवान्मुक्तिकमलाम् ॥ हरिगीता छन्द। जो करै साध त्रिकाल सुमरन, जास जग जस विस्तरै। जो सुनै परमानहि सुरुचिसौं, नीति मारग पग धरै ॥ जो निरख दीन दया प्रजुंजे, कामक्रोधादिक हरै। जो सुधन सप्त सुखेत खरचै, ताहि शिवसंपति वरै ॥ ९४ ॥ अन्वयार्थी-भो भव्यो, (त्रिसन्ध्यम् ) प्रातःकाल मध्याह्न- काल और सायंकालमें (देवार्चाम् विरचय) देव पूजा करो, (यश:- चयम् प्रापय) यश-समूहको प्राप्त करो, (पात्रे श्रियः वापम् जनय) पात्रोंको दान देकर लक्ष्मीका बीज बोओ, (मनः नय- मार्गस् नय) मनको नीतिमार्गपर लाओ, (. काम क्रोध आदिक शत्रुओंको (दलय) दलन करो 1 दयास् कलय) प्राणियोंमें दया धारण करो, (जिनोक्तम् सिद्धान्तम् शृणु) जिनेन्द्रदेवके कहे हुए शास्त्रोंको सुनो, और (जवाद) शीघ्र ही (मुक्तिकमलाम् ) मुक्तिरूपी लक्ष्मीको (वृणु) सीकार करो। शार्दूलविक्रीडित । कृत्वाहत्पदपूजनं यतिजनं नत्वा विदित्वागमं हित्वा सङ्गमधर्मकर्मठधियां पात्रेषु दत्वा धनम् । गत्वा पद्धतिमुत्तमक्रमजुषां जित्वान्तरारित्रज स्मृत्वा पञ्चनमस्कियां कुरु करक्रोडस्थमिष्टं सुखम् ॥ वस्तु छन्द। देव पुजहिं देव पुजाह, रचर्हि गुरुसेव । परमागमरुचि धरहि, तजहिं दुष्टसंगत ततच्छन । गुणि संगति आदरहि, करहिं त्याग दुर्भच्छ भच्छन । देहि सुपात्रहिं दान नित, ज पंचनवकार। ए करनी जे आचरहि, ते पावै भवपार ॥ ९५ ॥ अन्वयार्थों-हे भव्य ( अर्हत्पदपूजनम् कृत्वा ) अरहंतदेवके चरणकमलोंकी पूजन करके, (यतिजनम् नत्वा) आचार्य उपाध्याय और साधुजनोंको नमस्कार करके, (आगमम् विदित्वा) शासको जानकरके (अधर्मकर्मठधियाम् सङ्गम् हित्वा) निरन्तर अधर्म करनेवाले दुष्ट मनुष्योंकी संगति छोड़ करके, (पात्रेषु धनम् दत्वा) पात्र सुपात्रोंको धन देकरके, (उत्तमकमजुपाम् पद्धतिम् गत्वा) श्रेष्ठ कार्य करनेवाले गुणी मनुप्योंके मार्गानुसार चलकरके, (अन्तरारिव्रजम् जित्वा) कामक्रोधादिक अन्तरंग शत्रुओंको जीतकरके और (पञ्चनम- ९५ स्क्रियाम् स्मृत्वा) णमो अरहताणम्' इत्यादि पंच नमस्कार मंत्रका जप करके (इष्टम् सुखम् ) अपने इष्ट मोक्षादि सुखको (करकोडस्थम् कुरु) हाथमें ले । भावार्थ-अर्हत्पूजनादिक करनेसे इष्ट मोक्षादिकके सुखकी प्राप्ति होती है। हरिणी। प्रसरति यथा कीर्तिर्दिक्षु क्षपाकरसोदरा- भ्युदयजननी याति स्फीतिं यथा गुणसन्ततिः। कलयति यथा वृद्धि धर्मः कुकर्महतिक्षमः कुशलसुलभे न्याय्ये कार्य तथा पथि वर्तनम् ॥ ९६ ॥ दोहा। गुरु अरु धर्म सुथिर रहै, यश प्रताप गंभीर । कुशल वृक्ष जिम लहलहै, तिहिं मारग चल वीर ॥९६ ॥ अन्वयार्थी-(यथा) जैसे (क्षपाकरसोदराकीर्तिः) चन्द्रमाकी चादनीके समान निर्मल कीर्ति (दिक्षु) चारों दिशाओंमें (प्रसरति) फैले, तथा (यथा) जैसे (अभ्युदयजननी गुणसन्ततिः) अनेक कल्याणोंके देनेवाले गुणोंके समूह (स्फीतिम् याति) स्फुरायमान हों,(यथा) और जैसे (कुकर्म- हतिक्षमः धर्मः) समस्त पापोंके नाश करनेवाला धर्म (वृद्धिम् कलयति) वृद्धिको प्राप्त हो; (तथा) उसीतरह (कुशलसुलभे न्याय्ये पथि वर्तनम् कार्यम् ) सुलभतासे कल्याण करनेवाले न्याय्य मार्गमें अपना वर्चाव करना चाहिये।
९६ शिखरिणी। करे श्लाध्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणमनं मुखे सत्या वाणी श्रुतमधिगतं च श्रवणयोः। हृदि स्वच्छा वृत्तिर्विजयि भुजयोः पौरुषमहो विनाप्यैश्वर्येण प्रकृतिमहतां मण्डनमिदम् ॥ ९७ ॥ कवित्त छन्द। - वंदन विनय मुकट सिर ऊपर, सुगुरुवचन कुंडल जुग कान । अंतर शत्रुविजय भुजमंडन, मुकतमाल उर गुन अमलान ॥ त्याग सहज कर कटक विराजत, शोभित सत्य वचन मुख पान । भूषन तजहिं तऊ तन मंडित, यात सन्तपुरुष परधान ॥ ९७ ॥ - अन्वयार्थी-(अहो) आश्चर्य है कि (प्रकृतिमहताम् ) खभावसे ही बड़े सज्जनपुरुषोंके (करे श्लाघ्यस्त्यागः) हाथोंमें प्रशंसनीय दान देना, (शिरसि गुरुपादप्रणमनम्) मस्तकमें निर्ग्रन्थ गुरुके चरणारविन्दको नमस्कार करना, (मुखे सत्या वाणी ) मुखमें सत्यवचन बोलना, (श्रवणयोः अधिगतम् श्रुतम्) कों में प्राप्त हुआ श्रुतज्ञान (हृदि खच्छा वृत्तिः) हृदयमें निर्मल आचरण अथवा निर्मल विचार (च) और (भुजयोः विजयि पौरुषम् ) भुजाओंमें सबको विजय करनेवाला पौरुष (इदम् ) ये सब (ऐश्वर्येण विना) विना ही ऐश्वर्यके (मण्डनम्) भूषण है। भावार्थ-सज्जन पुरुष विना ही ऐश्वर्यके हाथोंमें दान देने रूप कंकण, मस्तकमें गुरूपासनारूप मुकुट, मुखमें सत्यवचनरूपी पान, कानोंमें शास्त्र सुननेरूप कुंडल, हृदयमें स्वच्छ आचरणरूपी ८६ , मुक्तासाला और सुजानों में पौरुष इत्या दिआ अषरण से सदा भूषित रहते हैं। नोट-नीचे लिखे तीन कक्तिोंकेयूल लोक नहीं मिले। घनाक्षरी/ गहें जे सुजनरीत गुणोलौं निबाहै प्रीत, सेवा साथै गुरुको विनैसौं कर जोर कैं। विद्याको विसन प्यपोतयसंग है, दुर्जनको संगातसौं बैठे मुख मारकै॥ तजेलोकनिन्धकाज पूजे देव जिनराज, करेंजे करन यिर उमंग बहोरकै। तेई जोव सुखोटोयतेई मोखरंवा होय, तेईहोय पदम करम फन्द तौरके॥१॥ पर निन्दात्यानाकर अन्नमैं वैराज धर, (७) क्रोधमान मायालोसवारों परोहर रे॥ हिरदे में तोष गहु समतासौं सोरो रहु, धरम को लहु भेद वेदमें न पर रे ॥ करमको वंश रखीय सुकतिको पंजोय, सुकृतिकौ बोजजोय दुर्गति सौ डर रे॥ अरे नर ऐसो होए बार बार कहुँ तोय, नोहें तो सिाधारतू निगोद तेरे प्यररे॥ (कोवत्त ३१ मान्ना) उमाला त्याचा जाग नर चतन,बल संभार मतकरडविलंब इहाँ नसुषलवलेशजगतमाहियोनब विस्व में लगै भाब ॥ तात्तांतर वियच्छहर करविलच्छनिजाच्छ-कदंब गह गुन ग्यानबैठचालित रथ देहु ओखसग सन्सुखवंन ॥३॥ भवाहण्यं मुक्त्वा यदि जिगामकुमुक्तिनगरौं तदानों मा का विषय विषवृक्षेषु वसतिम् । यत छायाप्येषा प्रधयोत सहानाहगोचर- दयं जन्तुर्यस्मात्पदमाप नगन्तुं प्रसवति ॥y इस मूल लोकका पद्यान किलोभीपतिसेन --
No text on this page.