Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Poojavali
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छ * जिनश्चरायनमः * छ
॥ पूजावली ॥
जिसको
श्रीमान सेठजी श्री “केशरीसिंहजी"
साढ्य की थाइानुसार प्रका-
शित कराकर।
॥ रतलाम में॥
॥ श्री जैन "प्रभाकर-यन्त्राशय" मेस में छपी।
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वीर संवत् २४३६ विक्रम संवत् ? ए३५ का
सन् 2000
पहिली पार २०००) (निहरापन)
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88 प्रस्तावना . विदित होकि इस पंचमकाल में भविक लोगोंके क- ल्याण कारक कैयक साधन पूर्वाचार्यों ने नियत किये हैं उसमें से तीन बात मुख्य निरधार करने में आई है अन्न. दान,जलदान,प्रियवाक्य प्रदान-अर्थात् ज्ञानदान करना ये तीन साधन सारनूत है सो शानदान का निर्वाह पाठ शालाके विना होना मुश्किल है ऐसा विचार कर श्री स्वर्गवासी चांदमलजी की संकल्पित पाठशालाश्री अनन्त उपमा योग्य श्री यशमुनिजी महाराज की प्रेरणासे श्री जिनदत्त पाठशाला नामसे श्रीमान् केशरीसिंहजी साहब की आज्ञा से इस वर्ष में खोलने में आई है इस पाठ-. शाला के विद्यार्थीयों के लाभार्थ यह “पूजावली" नाम' पुस्तक कैयक पुस्तकोंसे शुद्धकराकर "श्रीजैन प्रनाकर:- प्रेस में" छपाकर प्रसिद्धकी यह पुस्तक विद्यार्थीयों को अमूल्य देनेमें आवेगी-व और साहबों को अगर जरुरत पडेगी तो उनको ऊपर टाइटल के लिखी कीम्मत से वी. पी. घारा भेजने में आवेगाडाकव्यव भलग पडेगा.! संशोधकः- 'भापका क्रपाभिलाषी:- परिमत "विष्णुप्रशाद शर्मा” रतलाम. पचा:--श्री जंगम युगप्रधान-श्री जिनदत्त पाठशाला. रतलाम (मावा) -- ॥श्री॥ ॥ अथ अनुक्रमणिका ॥ विषय. सं० मङ्गलाचरणम्".. '५८ पांखडीगाथा अष्टप्रकारी पूजा १३ निमकतार पूजा २२ पुष्पमाला पहिरावण पूजा :२३ छुटा. पुष्प पूजा श्री यशोविजयजी कृत ननपद पूजा.२४ श्री दादाजी..महा• पूजा":".४३ श्री दादाजीकी अष्टप्रकारी अष्टमी स्तुतिः "६४ श्री शत्रुजय स्तवनः १२.....श्री पार्श्वजिन स्तवन: ६५. १३. श्री महावीरजिन स्तवनः "६६ १४. श्री शंखेश्वर पार्श्व ६८ १५ श्री सीमंधर जिन स्त. ६४ १६ श्रीराणकपर स्त... श्री गौतमाष्टक १८.श्री दादाजीका प्रभाती ॥ श्त्यनुक्रमणिका समाता ॥ श्री चीतरागायनमः॥ ॥ अथ श्रीस्नात्रपूजाप्रारभ्यते ॥ ॥ अथ मङ्गलाचरा णमो अरिहंताणं । णमो सिझाएं। णमो आयरियाणं । जयपुर णमो उवजायाण । णमो लोए सबसाइणं । एसो पंच णमुक्कारो। सब पाव पणासपो। मंगलाणं च सवेसि। पढमं हवाई मंगलम् । ॥ पांखमी गाथा ॥ चौतीसें अतिशय जुर्ज, वचनातिशय संजुत्त । सो परमेश्वर देखि नवि, सिंहासण संपत्त ॥१॥ ॥ ढाल॥ सिंहासण वैठा जग जाण । देखीनवियण गुण मणि खाण ॥ जे दीये तुफ निम्मल जाण ।। लहिये परम महोदय गण ॥ कुसुमांजलि मेलोयादि २ ॥ स्नानपूजा ॥ जिणन्दा ॥ तोरा चरण कमल चौवीस पूजोरे चौवीस सोनागी चौवीस वेरागी चौवीस जिएंदा।। कुसुमांजलि मेलो आदि जिणंदा । ॐ-हीं परमात्मने अनन्तानन्ताऽज्ञानसक्ने जन्म जरा मत्यु निवारणाय श्रीमजिनेंन्साय (यह पढ- कर नगवंतके चरणमें टीकी दीजे) ॥ गाथा ॥ जो निजगुण पजाव रम्यो, तलु यनुन्नव एगत्त। सुह पुग्गल आरोपतां, ज्योतिलुरंग निरत्त । ॥ढाल॥ जो निज आतम गुण आनंदी, पुग्गल संगै जेह अफंदी। जे परमेश्वर निज पद लीन, पूजो प्राणमो नव्य अदीन ॥ कुसुमांजलि मेलो शांतिजिणंदा।। तोरा चरण कमल चौबीस पूजोरे चौवीस सोनागी चौवीस वेरागी चौवीस जिणंदा कुसुमांजलि मेलो शान्ति जिणंदा । ऊँ ॥ गोमांटीकीदीजे। ॥ गाया निम्मल नाण पयाल कर । निम्मल गुण संपन्न । निम्मल धम्मु वएस कर । सो परमप्या धन्न । ॥ ढाद ॥ लोकालोक प्रकाशक नाणी । नविजन तारण
॥ स्नात्रपूजा ॥
३
जेहनी वाणी । परमानंद तणी निसाणी तसु
जगते मुझमति ठहराणी। कुसुमांजलि मेलो नेमि
जिणंदा । तोरा चरण कमल चौवीस पूजोरे चौवीस
सोनागी चौवीस वेरागी चौवीस जिएंदा ऊँ ॥
॥ गांथा ॥
जे सिमा सिद्धान्तिते । सिकिस्सन्ति अनंत । जसु
थालंबन वविय मन । सो सेवो अरिहंत ।
॥ढाद॥
शिव सुख करण जेहं त्रिकाले । सम परिणामे
जगत निहाले ॥ उत्तम साधूनों मार्ग दिखाले,
इन्सादिक जसु चरण पखाले ॥ कुसुमांजलि मेलो
पाच जिणंदा तोरा चरण कमल चौवीस पूजारे
चोवीस सोनागीचौबीस रागीचोंबीस जिणंदा
कुसुमांजलि मेलो पार्श्व जिणंदा, ॐ--हीं ॥
॥ गाथा ॥
सम्मदिही देसंजय । साहु साहुणी सार ।आचा-
रंज. उबजाय मुणि। जो निम्मल थाधार ॥
॥ ढात ॥
चोविद संघे जे मन धान्यो। मोक्षतणो कारण
निरधान्यो। विविद कुसुम वर जाति गहेवी। तसु
चरणे प्रणमन्त वेयी, कुसुमांजलि मेसो वीर
४ ॥ स्नात्रपूजा ॥ जिणंदा तोरा चरण कमल चौवीस पूजोर बावीस सोनागी चौवीस वेरागी चौबीस जिणंदा कुसुमां जलि मेलो वीर जिएंदा ॥ ऊँ ॥ चमरलीजे । ॥ इति पांखमी गाथा ॥ ॥ वस्तु॥ सयल जिनवर सयल जिनवर न मिय मनरंग । कल्लाणक विह संठ विच करिय सुधम्म सुप वित्त सुंदर ॥ सय इक सत्तरि तित्थंकर । इक समे वि- हरंत महियल । चवण समै श्कवीस जिण। ज- न्म समै एकवीस । नत्तिय नावे पूजिया । करो संघ सुजगीस ॥१॥ ॥ इक दिन अचिराहुलरावती-ए-देशी ॥ जवतीजे ससकित गुण रम्या। जिन नक्ति प्रमुख गुण परिणम्या । तजि इन्द्रिय सुख आसंसना करि थानक बीसनी सेवना। अतिराग प्रशस्त प्रजावता। मन नावना एहवी लावता। सवि जीव करूं शासन रसी । इसी नाव दया मन उल्लली । लहि परिणाम एहवुनढुं । निपजावी जिनपद निरमबुं । आऊ बंध विचै इक नव करी। श्रद्धा संवेगथी थिरधरी । तिहांथी चविय लहै नर नव उदार । जरते तिम ऐरवतेज सार । महा विदेद विजय प्रधान । मज खएमे अवतरे जिन निधान ॥
५
॥ स्नात्रपूजा ॥
॥ ढाल
पुण्ये सुपना देखे ॥ मनमे हर्ष विशेषे गजवर
उज्जल सुन्दर । निर्मल वृषन मनोहर निर्नय
: केसरी सिंह । लक्ष्मी अतिहि अविद अनुपमा
फूलनी माल । निर्मल शशि
सुकमाल । तेज तरण
अति दीपै । इम्ड ध्वजा जगजी पै । पूरण कलश
पंकूर । पदम सरोवर पूर । इग्यारमें रयणायर देखे।
माताजी गुण सायर । बारमें जुवन विमान । तेरमें
रल निधान । अग्नि शिखा निधूम । देखे माताजी
अनुपम । हरखी रायने नासे। राजाथर्थ प्रकाशे।
'जगपति जिनवर सुख कर । होसे पुत्र मनोहर ।
इन्सादिक जतु नमस्ये। सकल मनोरथ फलस्ये ।
॥ वस्तु॥
पुण्यउदय पुण्य उदय ऊपनाजिणनाह, माता तव
- रयणी समैं देखि सुपन हरखंत जागिय । सुपन कही
निज कंतने सुपन थरथ सांजली सोजागिय त्रिनु-
वन तिलक महा गुणी । होस्ये पुत्र निधान जा
दिक जसु पाय नमी करस्ये सिख निधान ॥
॥ ढाल चन्जा-उबालानी ॥
सोहम पति आसन कंपियो । देई अवधे मन
आणं दियो । मुकं आतम निर्मल करण काज ।
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.
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६ ॥ नानपूजा ॥ नवजल तारण प्रगट्यो जिहाज। नव अमवी पारग सत्थ वाह । केवल नाणा हगुण अगाह शिव,साधन गुण अंकुर जेह । कारण उलट्यो आषाढ मेह । हरखे विकसे तव रोमराय । वलयादिकमां निजतनु न माय सिंहासनथी उठ्यो सुरिंद । प्रणमन्तो जिण आनन्द कन्द । सग अझपय पमुहा आवि तत्थ । करि अञ्जलि प्रण मिय मत्थ सत्य । मुख नाखे ऐखिण आज सार । त्रिय लोय पहुदीठो उदार । रे रेनि सुणोसुर लोय देव । विषयानल तापित तुम समेव । तसु शांति करण जलधर समान । मिथ्या. विष चूरण गरुम्वान । ते देव सकल तारण समत्थ । प्रग- ट्यो तस प्रणमी यहुवो सनत्थ । श्म जम्पी शक स्तव करेवी । तव देव देवी हरखे सुणे वि, गावे तव रंजा गीत गान । सुरलोक हवो मंगल निधान । नर खेत्रे आरजवंश गम। जिनराज वधै सुर हर्ष धाम। पिता माता धरे जहन अलेष। जिन शासन मंगल अति विशेष । सुरपति देवादिक हर्षसंग । संयम थरथी जनने उमंग । शुजवेला लगने तीर्थनाथ । जनम्या इन्सादिक हर्ष साथ । सुखपाम्या त्रिजुवन सर्व जीव । बधाई वधाईथईअतीव ॥ (तीनप्रददि- गादेकर यहां चैत्य वंदन करणा धूप खेवना)। ॥ ढान॥ श्रीतीर्थ पतिनो कलश मजन गाश्यै सुखकार॥ :
॥ स्नात्रपूजा ॥ नर खेत्त समन उद विहंमन नविक मन आधार। सिहा राव राणा हर्ष उठव. यथो जग जयकार • दिशि कुमरि अवधि विशेष जाणी लयो हर्प अपार। निय अमर.अमरी संग कुमरी गावती गुण छंद ॥ जिन जननी पासे आवी पोहति गहकती आणंद हे माय तें जिन राज जायो शचिवधायो रम्ह अम्ह जम्ह निर्मल करण कारण करिस सुश्य कम्म -तिक्षा नूमि शोधन दीप दर्पण वाय विजण धार । तिहां करिय कदली गेह जिनवर जननी मज्जन कार । वर राखमी जिन पाणी वांधी दिये श्म थासीस, जुग कोमाकोमी चिरंजीवो धर्मदायक ईश।। ॥ ढाल कवीसानी॥ जग नायकजी विजुवन जन हित करए । परमा- तमंजीचिदानन्दघन सारए । जिन रयणीजी दशदिस नजलता धरे।शुन लगनेजी ज्योतिषचक- ते संचरे। जिन जनम्याजी जिन अवसर मातां घरे तिण अवसरजी शासन पिण थरहरे ॥ ॥ त्रोटक.॥ थर हरे आसनन्ध चिंते कवण अंवसर एवएयो। जिन जन्म उच्व काल जाणी अतिहिानन्द ऊप नोनिज सिकसम्पत्ति हेतु जिनवर जाणिनगतेऊम योगविकसंत वदन प्रमोद वधतेदेव नायक गहगहो।
॥सापूजा ॥ तबसुरपतिजी घंटानाद करावए ॥ सुरलोलेजी घोषणा पद दिरावए । नरखेत्रेजी जिनवर जन्म कुलो अ।तसुजगवंतेजी सुरपति मन्दर गिरग।। ॥त्रोटक ॥ गच्ने मन्दिर शिखर ऊपर नयन जीवन जिनतणो। जिनजन्म उच्चव करण कारण आवज्यो सवि सुरगणो । तुम शुरू समकित थास्ये निर्मल देवाधिदेव निहालतां ॥ आपणा पातिक सर्व जास्ये नाथ चरण पखालतां ।। ॥ ढाल॥ श्म सांजलजी सुरवर कोमी बहुमिली। जिन वन्दन जीमन्दरगिरि साहमी चली॥सोहमपतिजी जिन जननी घर आविया। जिन माताजी वन्दी स्वामी वधाविया ॥ ॥त्रोटक। बधाविया जिनपर हर्ष बढुलै धन्यहुं कृत पुण्य ॥ त्रैलोक्य नायक देव दीगो मुज समो कुण अ न्यए। है जगत जननी पुत्र तुमचो मेरु मजन वर- करी उच्छंग तुमचे वलिय थापिस आत्मा पुण्ये नरी
॥ मात्रपूजा ॥
.
॥ढाल ॥'
सुर नायकजी जिन निजकर कमलै उव्या ॥ पांच
रूपेजी अतिशय महिमायें स्तव्या॥नाटक विधिजी
तव बत्तीस आगल वहै । सुर कोमीजी जिन दर
शण ने जमदै ॥
॥त्रोटक ॥
सुर कोम कोमी नाचती वलि नाथ शुचि गुण
गावती ॥ अपसरा कोमी हाथ जोमी हाव भाव दि
खावती ॥ जय जयो तूं जिनराय जगगुरु एम दे था
सीस ए ॥ अह्म त्राण शरण आधार जीवन एक तूं
जगदीश ए॥
॥ढान॥
सुर गिरिवरजी पांडुक बनमें चिहुं दिसे । गिरि
सिलपरजी सिंहासन सासय वसे॥तिहां आणीजी
शकें जिन खोले ग्रह्या । चउसजी तिहां सुरपति
श्रावी रह्या॥
॥ त्रोटक ॥
श्राविया सुरपति सर्व जगतै कलश श्रेणी वणाव ए॥
सिद्धार्थ पमुदा तीर्थ ऊपधि सर्ववस्तु अणाव ए ॥
अञ्जय पतितिहां हुकम कीनो देव कोमा कोमीने॥
जिन मजनारथ नीर ल्यायो सबै सुर कर जोमिने ॥
१७
॥ स्वात्रपूजा ॥
॥ ढाल॥
( शान्तिने कारणे इन्द्र कलशा नरै.)
आत्म साधन रसी देवकोनी हसी । उद्ध
सीने धसी खीरसागर दिशी । पजसदह यादि
दहगंग पमुहा नई । तोर्थ जल यसललेवा नणी
ते गई । जाती अस्कलश करि सहस अगेत्तरा
बत्र चामर सिंहालणे शुजतरा । उपगरण पुप्फ
चंगेरी पसुहा लवे । आगमे नासिया तेम आ
जिये। तीर्थ जल नरिय करि कलश करि देवता।
गावतां तावतां धन उन्नतिरता। तिरिय नर अम
रले हर्ष उपजायतां । धन्य अह्म शक्ति शुचि नक्ति
इस नावतां । सनकित वीज निज आत्म आरो
पतां । कलश पाणी लिस शक्ति जल सींचतां । मेरु
सिहरो वरे सर्व श्राव्या बही। शक उचंग जिन
देखि सन गहगहीं।
|| गाथा
हो देवा अणा। कालो अदिउ पुव्यो। तिलोय
तारणो। तिलोय बंधु । सिच्चत्त मोह विद्धंसणो।आ
णाई तिएहा विणासणो । देवाहि देवो दिच्चो
हियय कामेहिं ।
॥ दान॥
एम पनणंत वण जुवन जो ईश्वरा । देव वैमा
॥ खात्रपूजा ॥
णिया नत्ति धम्मायरा। केवि कप्पहिया केवि मित्ता
पुगा केई वर रमण वयणेण अइ उचगा ॥
॥ वस्तु ॥
तत्यु अच्चुय तत्यु अच्चुय इन्छ आदेश । कर
जोमी सब देवगण । लेई कलश आदेश पामिय ।
अद्भुत रूप स्वरूप जुय । कवण एह पुवंत सामी
य ॥ इन्द्र कहे जगतारणो । पारग अम्ह परमेश ।
नायक दायक धर्म निधि । करिये तसु अनिपेस ॥
॥ढाल॥
(तीर्थ कमलवर उदक नरीने पुष्कर सागर श्रावे)
ए-देशी-
पूर्ण कलश शुचि उदकनी धारा। जिनवर अंगे
न्हामें। आतम निर्मल लाव करंता वधते शुक्ल परि
पामें। अच्युतादिक सुरपति मज्जन लोकपाल लो
कान्त ।। सामानिक इन्डाणी पमुहा श्म अभिषेक
करत ।। पू० ॥ ॥ १॥ तव ईशान सुरिंदो सकं पन्न
सायो
॥ तुम्ह अंके महनाहो।
खिणमित्तं अम्ह अप्पेह ॥ ॥तासकिंदो पत्नण॥
सादम्मि वलम्मि बहुलाहो थाणा वं तेणं
गिएहर होश कयत्यानो ॥३॥ कलशढाले ।
॥ ढाद॥
सोहम सुरपति वृपन रूप.कर॥ न्हवण करे अनु
णेश् करिसु सुपा
.
१२
॥ स्नात्रपूजा॥
अंगे॥ करिय विलेपन पुष्पमाल ठवी ।वराचरण
अनंगे॥सो॥ तव सुरवर बहु जय जय रव करै।
निश्चे धरि आणन्द ॥मोदमारगसारथ पति पाम्यो।
नाजस्यूं दिव भव फंद॥ सो॥कोमवत्तीस सोवन
जवारी। वाजतै वरनाद । सुरपति संघ अमर श्रीप्र-
नुने॥जननीने सुप्रसाद।सोणाणा थापी एमपयंपे
अम्ह निस्तरिया आज ॥ पुत्र तुमारो धणी हमारो
तारण तरण जिहाज ॥सो मात जतन करि रा-
खज्यो एहनें । तुम सुत हम आधार ॥ सुरपति
नक्ति सहित नन्दीश्वर। करै जिन जक्ति उदार ॥
सो॥ नियनिय कप्प गया सहुनिजर ॥ कहतां
प्रनु गुणसार। दिदा केवल ज्ञान कट्याणक । श्च्छा
चित्तमकार ॥सो॥खरतरगच्छ जिन आणा रंगी।
राजसागर उवजाय॥ज्ञान धर्म दीपचंद सुपाठक।
सुगुरु तणे सुपसाय।सोण देवचंद निज नक्तं गायो
जन्म महोच्चब बंद ॥ बोधबीज अंकुरो उबस्यो ।
संघ सकल आणंद ॥ सो ॥ इति स्नात्रपूजा ॥
सम्पूर्ण ॥
॥राग-बिलावल ॥
श्म पूजा लगतें करो॥आतम हितकाज तजीय
विन्नाव निज नावना। रमतां शिवराज ॥श्मण॥१॥
काल अनंते जे हुवा ॥ होस्ये जेह जिणंद ॥ संपई
श्रीमंदर प्रतु ॥ केवल नाण दिणंद ॥ श्म ॥२॥
॥ स्नात्रपूजा ॥ १३ जन्म महोच्य श्ण परे ॥ श्रावक रुचिवंत । विरचै जिनप्रतिमा तणो॥ अनुमोदन खंत ।। श्मण ॥३॥ देवचंद जिनपूजना ॥ करतां नवनो पार ॥ जिन पनिमा जिन सारखी । कही सूत्र मजार ॥ श्म॥ ॥४॥इति स्नात्रपूजा विधिः । ॥अथ अप्रकारी पुजा लिख्यते । ॥दोहा॥ गंगामागधदीरनिधि,ओपध मिश्रितासार ॥ कुसुम वासित शुचिजले, करो जिनस्नात्र उदार ॥२॥ ॥ढान॥ मणि कनकादिक अडविध करि नरि कलश सकार । शुनरु चिजे जिनवर नमें तसुनाई उरितप्र चार । मेरु शिखर जिम सुरवर जिन वर न्हावण अमान । करतां वरतां निजगुण समकित वृद्धि निधान ॥२॥ ॥वंद॥ हर्ष जरि अप्सरा वृन्द थावे ॥ स्नात्र करि एम थसीस नावे ॥ जिहां लगे सुर गिरी जंबुदीयो। थमतणा नाथ जीवोतु जीवो ॥ ३ ॥ ॥ श्लोक ॥ विमल केवल नासन नास्करं जगति जंतु महो २४ ॥ ॥ स्नात्रपूजा ॥ दय कारणं ॥ जिनवरं बहुमान जलौघतः शुचिमनः स्नपयामि विशुद्धये॥॥ॐ न्हीं परमात्मने अनंतानं त ज्ञानशक्तये जन्म जग़मृत्यु निवारणाय । श्रीम- जिनेन्द्राय जलं यजामहे स्वाहा ॥२॥इतिजलपूजा। ॥ अथ चन्दन-पूजा॥ दोहा॥वावना चंदन कुमकुमा।मृगमद ने घनसार ।। जिनतनु लेपै तसुटले । मोह संताप विकार ॥१॥ ॥ ढान॥ सकलात्मताप निवारण तारण सहु जवि चित्त । परम अनीहा अरिहा तनु चरचो जवि नित्त ॥१॥ निजरूपें उपयोगी धारी जिनगुणगेह । नाव चंदन सुह नावथी टालै उरित अह ॥२॥ चाल । जिन तनु चरचतां सकल नाकी । कहै कुग्रह उष्ण- ता आज थाकी। सफल अनिमेषत आजह्मांकी। जव्यता अह्म तणी आज पाकी ॥३॥ ॥ श्लोक। सकल मोह तिमिर विनासनं । परम शीतल नाव युतं जिनं ॥ विनय कुंकुंम चंदन दर्शने । सहज तत्व विकाश कृतेचये ॥ १॥ ॐ ह्रीं परमाण अनन्ता ज्ञान जन्म जरा निवाण श्री मजिने चंदनं यजा महे स्वाहाः इति यह कहकर चंदन चढावे ॥ स्नानपूजा ॥ ॥ अथ नवअंगि नाव पूजा। ॥दोहा॥ पर उपगारी चरणकंज अनंत सक्तिस्वय मेव । श्याथी प्रथम पूजीये आतम अनुजव सेव ॥१॥ जानु पूजा दूसरी समाधि चुमिका जान । आतम साधन ज्ञानले शुद्ध दशा पहिचान ।। ३॥ करपूजा जिनराजकी दियो संवच्चरी दान । तेकर मुफ म स्तक उबुं पहुंचे पद निरवाण ।। ३ ।। जुजवल सक्ती जानके पूजाकरूं चितलाय । रागादि मल हा यके आतम गुण दरसाय ॥३॥ सिरपूजा महारा जकी लोक सिरोमणि लाव। चजगतिगमन मिटा यके पंचमगति संजाय॥५॥लिलवट पूजा सार है तिलक विधिविश्राम । वदन कमल वाणि सुणे प्रग टे निज गुण धाम ।। ६॥ कंठ पूजा है सातमी वच नातिसय वृन्द । सप्तनेद पंयतीसश्रुत अनुभव रस नोकन्द ॥ ७॥ हृदय कमल की पूजना सदा वसि चित मांहि । गुनविवेक जागेसदा ज्ञान कला घट वाय ॥॥नाजी मंगल पूजके पोमश दलको नाव। मन मधुकर मोहिरह्यो । यानंदघन चित लाय ।। इति चन्दन पूजा समाप्तम् ।
नव्व ॥३॥ चाल || जग
१६
॥ स्नात्रपूजा ॥
॥ अथतृतीय पुष्प पूजा ॥
॥दोहा॥
शतपत्री वरमोगरा । चंपक जाइ गुलाव ॥ केत
की दमणी बोलसिरि । पूजो जिननरि बाब ।।२।।
॥ ढाल ॥
अमल अखंमित विकसित सुत्नसुमन घन जा
ति । लाखीणोटोमरठवी अंगीरची वहुतांति ॥गुण
कुसमें निजातम मंमित करवाजव्य । गुण रागी
जमत्यागी
पुष्य चढावो
धणी पूजतां विविध फूले । सुर वराते गिणे क्षण
अमूले ॥ खन्तिधर मानवा जिन पद पूजे । तसुत
णा पाप सन्ताप धूजे ॥३॥
॥ श्लोक ॥
विकच निर्मल शुझमनोरमैर्विशद चेतन नाव
समुन्नवै । सुपरिणाम प्रसून घनैनवै ॥ परम तत्त्व
मयंहियजामहे ॥ १॥ ओं हृीं परमात्मने पुष्पं
यजामहे स्वाहा ॥ इति पुष्प पूजा ॥
॥ अथ धूपपूजा ॥
॥ दोहा॥
कृष्णागरु मृगमद तगर, अंवर तुरकलोलान ।
मेल सुगंध घनसारघन, करो जिनने धूपदान ॥१॥
॥ स्नात्रपूजा ॥ २७ ॥ ढाल॥ धूपघटी जिम महमद तिम दहै पातक वृन्द । अरति अनादिनी जावे पाये मन आनन्द ॥१॥ जेजिन पूजै धूपै जव कूपै फिरतैद । नावेपावै ध्रुव घर आवे सुक्ख अछेद ॥५॥ चाल ॥ जिनमहे वासनां धूपपूरै । मित्त पुगंधता जाई दूरै ॥ धूप जिम सहज उर्द्धगति स्वजावै। कारिका उच्चगति नाव पावै ॥३॥ ॥ श्लोक ॥ सकलकर्म महेंधन दाहनं विमल संवर लाव सुधूपनं ।। अशुन पुजल संगविवर्जितं । जिनपतेः पुरतोस्तु सुहर्पितः ॥ १॥ ॐ ह्रीं परमात्मने धूपं यजामहे स्वाहा ॥ ४॥ इति धूपपूजा ॥ धूप अगर बत्ती खेवे। ॥ अथ दीपपूजा ॥ ॥ दोहा॥ मणिमय रजत ताम्रना, पात्र करी घृतपूर । वाती सूत्र कसूवनी, करो प्रदीप सनूर ॥१॥ ॥ ढान॥ मंगलदीप चधाओ गाओ। जिन-गुणगीत।दीप तणी जिम आलिका मालिका मंगलनीत । दीप - १० ॥ स्नात्रपूजा ॥ तणी शुन्न ज्योति योति जिनमुख चंद ॥ निरखि हरखो नविजन जिम लहो पूर्णानन्द । । चाल । जिन गृहे दीपमाला प्रकाशें । तेहवी तिमिर अशान नाशैं। निजघटै ज्ञान ज्योति विकाशै ।तेह थी जगतणा नावनासै॥३॥ ॥ श्लोक ॥ नविक निर्मल बोधविकाशकं । जिन गृहे शुज दीपक दीपनं । सुगुण राग विशुद्ध समन्वितं । दधतु नाव विकाश कृतेर्जनाः॥१॥ ॐ हीं परमा त्मने ॥ दीपं यजामहे स्वाहा ॥ इति दीप पूजा ॥ मंगल दीप चढावे ॥ ॥ अथ अदत पूजा ॥ ॥ दोहा ॥ अक्षत अक्षत पूरसं । जे जिन ागे सार । स्वस्तिक रचतां विस्तरै, निजगुण नर विस्तार॥१॥ ॥ ढान॥ उज्जल अमल अखएिमत मएिमत अक्त चंग। पूंजत्रय करी स्वस्तिक आस्तिक नावै रंग ॥ निज सत्ताने सन्मुख उनमुख नावै जेह । ज्ञानादिक गुण गावै नावै स्वस्तिक एह ॥२॥ चाल । स्व- स्तिक पूरतां जिनप आगें । स्वस्ति श्रीन कल्याण
॥स्लात्रपूजा॥
जागे । जन्म जरा मरणादि अशुन्न नागें । नित्य
शिव शर्म रहै तासु आगै ॥३॥
॥श्लोकः॥
सकल मंगल केलि निकेतनं परममंगल जावम
यं जिनं ॥श्रयति जव्य जना इति दर्शयन् दधतु
नाथ पुरोक्त स्वस्तिकं ॥ १ ॥ओही परमात्मने।
अदतं यजामहे स्वाहा ।। इति अक्षत पूजा।अखंग
चावल चढावें।
॥अथ नैवेद्य पूजा ।।
दोहा॥
सरस सुचीपकवान बहु । शालि दालि घृत पूर॥
धरो नैवेद्य जिन आगले । क्षुधा दोष तसु दूर ॥१॥
॥ढान॥
लपनश्री बरघेवर मधुतर मोतीचूर। सिंहकेसरि
या सेविया दालिया मोदक पूर । साकर घाख सिं
घोमा जक्ति व्यंजन घृत सद्य । करो नैवेद्य जिन
आगलै । जिम मिले सुख अनवद्य ॥२॥ चाल ।
ढोवतां नोज्य परत्नाव त्यागे । जंपिजना निज गुण
नोज्य मांगे ॥थानणी अह्म तणी सरूपलोज्य.।
थापज्यो तातजी जगत पूज्य ॥३॥
॥स्नात्रपूजा ॥ श्लोकः ॥ सकस पुगलसंगविवर्जितं । सहज चेतन नाववि सासकं । सरसनोजननव्य निवेदनात् परम निर्वृति जावमहंस्पृहे ॥ १ ॥ ओंझी परमात्मने ॥ नैवेद्यं यजामहे स्वाहा ॥ इति नैवेद्य पूजा नैवेद्य मिठाई पक्कान्न चढावे। ॥ अथ फलपूजा ॥ दोहा॥ पक्क विजोरुं जिनकरे, उवतां शिवपद देई । सरस मधुर रस फल गिणे, श्ह जिन नेटकरई॥१॥ ॥ ढाद ॥ श्रीफल कदली सुरंग नारंगी आंवा सार। अंजी र जंवीर दामिम करणा खट्वीज सफार ॥१॥ मधुर सुस्वादित उत्तम लोक आणंदित जेह । वरण गन्धादिक रमणीक बहुफल ढोवे तेह॥२॥ चालण फलचर पूजतां जगत खामी। मनुज गति वेहले सफल पामी। सकल मनुध्येय गतिजेद रंग। ध्या वतां फलसमाप्ति प्रसंगै ॥३॥ ॥ श्लोकः ॥ कटुक कर्म विपाक विनाशनं । सरस पक्वफलं ब्रज ढोकनं । वहति मोक्ष फलस्य प्रनोः पुरः ॥ स्नानपूजा कुरुत सिफ फलाय महाजनाः॥१॥ ॐ हीं पर मात्मने फलं यजामहे स्वाहा । इति फलपूजा ॥ श्रीफल सुपारी नीलाफल प्रमुख चढावे । ॥ अथ अर्ध्य पूजा ॥ ॥ दोहा ॥ श्म श्रमविध जिनपूजना, विरचैजे थिरचित्त । मानव नव सफलो करै, बाधै समकित वित्त ॥ ॥ढान॥ अगणित गुणमणि आगर नागर वंदितपाय । श्रुतधारी उपकारी श्रीज्ञान सायर उवजाय ॥१॥ तासु चरण कंज सेवक मधुकर पद लयलीन । श्री- जिन पूजा गाई जिन वाणी रसपीन ॥२॥ चालक ॥ संवत गुण युग अचल इन्दु । हर्ष जरि गाश्यो श्री- जिनेन्दु । तासु फल सुकृतथी सकल प्राणी । लहे झान उद्योत धन शिव निशाणी ॥३॥ ॥श्लोकः॥ इति जिनवरवृन्दं भक्तितः पूजयन्ति । सकल गुण निधानं देवचन्डः स्तुवन्ति । प्रति दिवस मनंतं त- त्वमुन्नासयंति परम सहज रूपं मोक्ष सौख्यं श्रय- न्ति ॥ १ ॥ ॐ हीं परमात्मने अयं यजामहे- स्वाहा ! चारें खूणे धार दीजे ॥ इति अर्घ्यपूजा ॥
श्श ॥ स्नात्रपूजा ॥ ॥ अथ वस्त्र पूजा ॥ ( वस्त्र लेके खमारहै ॥ और यह श्लोक पढे ) शको यथा जिनपतेः सुरशैल चूला ॥ सिंहासनो परिमिता स्नपना वसाने ॥ दध्यक्षतैः कुसुम चंदन गन्धधूपैः कृत्वार्चनं तु विदधाति सुवस्त्र पूजां॥१॥ तहत् श्रावक वर्ग एप विधिना लंकार वस्त्रादिकं पू जा तीर्थ कृतां करोति सततं शक्त्या तिजक्त्याह तः॥ नीरागस्य निरंजनस्य विजिता राते स्त्रिलोकी पतेः स्वस्यान्यस्य जनस्य निर्वृतिकृते क्लेशदया कां दया ॥ ॐ ह्रीं परमात्मने । वस्त्रेण यजामहे स्वा हा ॥ वस्त्रचढावे इति अष्ट प्रकारी पूजा ॥ ॥अथ निमक उतारण पूजा ॥ अहपमिनग्गापसरं। पयाहिणं मुणिवयं करिऊणं, पमश्सलूणत्तण लज्जियंच ॥ खूणंदू अवहरंति॥१॥ पिरकेविणुं मुह जिनवरह । दीदर नयणसलूण ॥ न्हावश्गुरुमबहजरिय। जलणपश्स्स लणं ॥२॥ खूणउतारिद जिणवरह । तिन्निपयाहिणिदेव ॥ तमतम शब्द करंतिये । विजाविजजलेण ॥३॥ जंजेण विज्जवथुई । जलेण तंतहश् अत्थसदस्स॥ जिण रूबा मबरेण वि । फुट्टइ खूणं तमतमस्स ॥॥. ए गाथा कही खूण अग्निशरण करै । पीछे लूण पाणी लेई॥मुखें ए गाथा कहे। सव्व वि मुणवई जल ॥
॥रात्रपूजा॥ विजल ॥ तंतह नममा पास। यह विकयंतस्स नि म्मल ॥ निग्गुण बुझिपयास ॥ ५॥ जलण अणे विणु जलणहिपास । जरविकयजल नावही पास तिनि पयाहिणि दिनियपास । जिम जिय वुट्टै नव इह पास ॥ ६ ॥ जल निर्मल कर कमलेहि लेविणु। सुरव नावहि मुणिवई सेवएं। पनणई जिणवर नुह पश्सरणं भय तुदृश् लाई सि कि गमणं ॥ ७॥ एकही लूण उतारी जल सरण कीजै ॥ इति सूण उतारण पूजा ॥ ॥अथ पुष्पमाला पहिरावण पूजा ॥ उन्नय पयय जत्तस्स नियगणे संवियं कुणं तस्स जिण पासै जमिय जणस्त । पिछतुह हुयवेह पमणं ॥ १ ॥ सद्यो जिणप्पजावो सरिसा सरिसेसु जेण अपासेजमस्स जमणं नसं कमणं ॥२॥ अञ्चंत दुःकरंपिहू हुयवह निवमेण जमैण कयं थाणा सव्वनूणं ।न कया सुकयत्न मूलमिणं ॥३॥ यह कहकर माला चढावै॥ ॥ अथ बुट्टा पुष्पपूजा ॥ जवणेव मंगलेवो जिणाण मुहमालि संवलिया तित पवत्तण समई। तियसे विमुक्का कुसुम वुही ॥ १ ॥ ए कही पुष्प प्रजुआगे उछालीजे ॥ रचन्ती सबन्नूण २४ ॥ स्नात्रपूजा॥ ॥नोरकी आरती ॥ जयजय आरति शान्ति तुमारी । तोरा चरण कम लकी में जाऊं बलिहारी ॥ विश्वसेन अचिराजी केनन्दा, शान्तिनाथमुख पूनमचन्दा ॥ जय० ॥१॥ चालिस धनुष सौवन मयकाया ॥ मृगलांउन प्रनु चरण सुहाया ॥ जय० ॥२॥चक्रवर्ति সন্তু पांचमा सोहे सोलमां जिणवर जग सहु मोहे ॥जय॥३॥ मंगल आरती भोरहिं कीजै, जनम जनम को लावो लीजे ॥ जय० ॥४॥ करजोझी सेवक गुण गावे, सोनरनारी अमर पद पावे ॥ जय० ॥५॥इति आरती सम्पूर्णा ॥ श्रीमद्यशोविजयजी नपाध्याय कृत वमी नवपद पूजा ॥ दोहा॥ परम मंत्र प्रणमी करी। तासधरी उरध्यान ॥. अरिहंत पद पूजाकरो। निज सक्ति प्रमाण॥१॥ ॥ काव्य, उपजातिवृत्तम् ॥ उप्पन्नसन्नाणं महोमयाणं,सप्पामिहेरासण संठिया णं ॥ सदसणाणंदिय सजणाणं, नमो नमो होउ सया जिणाणं ॥१॥ तुजंगप्रयातवृत्तम् ॥नमोनंत संतप्रमोद प्रधानं प्रधा नाय जव्यात्मने. भाखताय ॥ यथा जेहनाध्यानथी ॥स्नानपूजा ॥ सौख्यजाजा, सदासिक चक्राय श्रीपालराजा ॥ २ ॥ कन्या कर्म अममर्मचकचूर, जेणें भला भव्य ! नवपद ध्यानेन तेणें ॥ करि पूजना नव्य नावे त्रिकालें, सदा वासियों थातमा तेण कालें। ३॥ जिके तीर्थकर कर्म जदये करीने, दिये देश ना जव्यने हित धरीने ॥ सदा आठ महापामि हेर समेता, सुरेशे नरेश स्तव्या ब्रह्मपृता ॥४॥ कया घातिया कर्म चारे अलग्गा, भवोपग्रही चार जे विलग्गा ॥ जगत् पंच कल्याणके सौख्य पामे , नमो तेह तीर्थकरा मोक्षगामे ॥ ५॥ ॥ ढाल ॥ देशी जहालानि तीर्थपति अरिहा न{ धर्म धुरंधर धीरोजी ॥ देशना अमृत वरसतां, निजविरजवम वीरोजी।। उसालो ॥बरअखय निर्मल ज्ञाननासन, सर्वनाव प्रकाशता । निजशुद्ध श्रद्धा आत्मनावे, चरण गिर ता वासता ॥ जिन नाम कर्म अनाव अतिशय प्रातिदारज शोचता, जगजंतु करुणावन्त नगवन्त नविक जनने योजता॥२॥ प्रथमपूजा ॥ ॥ढाल ॥ ॥श्री पालना रासनी देशी ॥ बीजेनर बरस्थानक तप करो जेणे बाध्युं जिन .
॥ स्नात्रपूजा ॥ नाम । चौसठ इन्पूजित जे जिन, कीजे तास प्रणामरे । नविका सिद्धचक्र पदवंदो, जिम चिर कालेनंदोरे ॥ नवि। उपझम रसनो कंदोरे | जण रत्नत्रय नो वृन्दोरे ॥न ॥ सर्वे सुरनर इन्दोरे । न । सि० ॥१॥ ए आंकणी ॥ जेड्नेहोय कल्या एक दिवसे नरके पिण उजवालुं | सकल अधिक गुण अतिशयधारी, ते जिन नमि अघ टालुरे।ना सिं०॥ ५ ॥जे तिहुनाण समग्ग उपन्ना लोग करम दक्षीण जाणी॥ लेइ दिदा शिक्षा दिये जनने, ते नमिये जिननाणारे । नसि ॥३॥ महागोप महा माहण कहिये निर्यामक सत्यवाह । उपमा एहवी जेहने बाजे, ते जिन नमियें उत्साहरे । न। सि० ॥४॥ आठ महा प्राति हारज जसु बाजे, पांत्रीस गुणयुत वाणी । जे प्रतिवोध करै जगजनने ते जिन नमियें प्राणीरे । न ॥ सि ।। ॥ ढाल ॥ अरिहन्त पद ध्यातो थको दबहगुण पकायेरे । नेदच्छेद करी आतमा अरिहंत रूप थायेरे ॥१॥ वीरजिनेश्वर उपदिशे, सांजलजो चित्त लाहाबा- तमध्याने आतमा ऋछिमिलै सत्नी आरे ॥२॥ वी॥ओं ही परमाण. अनं झानशक्त जन्म मृत्युनिवाण श्रीमत्सिद्धचक्राय. पंचामृतं-- चंदनं पुष्प-धुपं-दीपं अतं-नैवेद्यं-फलं-वस्त्रं वासंयजा N ॥ स्नात्रपूजा ॥ महे स्वाहा ॥ इति अरिहन्त पदपूजा सम्पूर्स ॥ ॥हितीय सिझपद पूजा प्रारंजः॥ दोहा- टूजी पूजा सिद्धकी, कीजे दिल खुशी याल । अशुज कर्म दूरे टले, फले मनोरथ माल।। • ॥ काव्यं-इन्ड बनावृत्तम् ॥ सिधाण माणंद रमालयाणं, नमो नमोऽणं त चल क्याणं ॥ समग्ग कम्म क्खयकारगाणं, जम्मं जरा मुक्ख निवारगाणम् ॥ ॥ जुजंगप्रयातवृत्तम् ॥ करी उ कर्म दये पार पाम्या, जरा जन्म मर णादि जय जेणें वाम्या ॥ निरावरण जे आत्मरूपै प्रसिहा, यथा पार पामी सदा सिद्ध बुद्धा॥ १ ॥ बिनागोनदहावगाहात्मदेशा, रह्या झानमयजा तिवर्णादिलेशा, सदानंद सौख्याश्रिता ज्योतिरूपा, अनावाध अपुनर्नवादि स्वरूपा ॥२॥ ॥ ढाल ॥ उबालानी देशी ॥ सकल करममल क्षयकरी, पूरण शुद्ध स्वरूपो जी ॥ अव्यावाध अनुतामयी, आतम संपत्ति लूपोजी ॥२॥ उबालो ॥ जेह नूप आतम, सह ज संपत्ति, शक्ति व्यक्तिपणे करी ॥ स्वभव्यक्षेत्र स्वकालनावे, गुण अनंता आदरी ॥ स्वजाव गुण पर्याय परणित सिकि साधन पर जणी ॥ मुनिराज २ ॥ स्नात्रपूजा ॥ मानसर हँस समवम, नमो सिद्ध महा गुणी ॥२॥ ॥ पूजा ॥ ढाल ॥ श्रीपालना राशनी देशी ॥ समयपयेसंतर अण फरसी, चरमतिनाग विशेष ॥ अवगाहन लही जे शिव पहोंता, सिद्ध नमो ते अशेष रे ॥ न० ॥ सि० ॥ ६ ॥ पूर्व प्रयोगने गति परिणामें, बंधन बेद असंग ॥ समय एक ऊर्धगति जेहनी, ते सिद्ध प्रणमों रंगरे ॥ नम्॥ सि ॥ ७ ॥ निर्मल सिक शिलानी ऊपर, जोयण एक लोकंत ॥ सादि अनंत तिहां स्थिति जेहनी, ते सिक प्रणमो संतरे ॥ना सि.॥७॥ जाणे पण न सके कही पुरगुण, प्रकृ ति तिम गुण जास ॥ उपमाविण नाणी नवमाहे, ते सिक दीयो जबास रे ॥ ज | सि ॥ ५ ॥ ज्योतिशु ज्योति मिली जस अनुपम, विरमी सकल उपाधि ॥ आतमराम रमापति समरो, ते सिकि सहज समाधिरे ॥ ज० ॥ सि ॥ १० ॥ ॥ ढाल॥ रूपातीत स्वन्नाव जे, केवल दंसणनाणी रे ॥ते ध्याता निज आतमा, होये सिझगुण खाणी रे ॥ वी॥३॥ ऊँ झी इति सिद्ध पद पूजा ॥ ॥ तृतीय आचार्य्यपद पूजाप्रारंजः॥
॥ स्नात्रपूजा ॥ ॥ दोहा॥ हिव आचारज पदतणी पूजा करो विशेष ॥ मोह तिमिर दूरे हरे, सूजे नाव अशेष ॥ १ ॥ ॥ काव्य,स्वजा वृत्तम् । सुरीणपुरी कय कुग्ग हाणं, नमो नमो सूरसमप्पहाणं । सद्देसणादाण समायराणं । अखंग उत्तीस गुणायराणं ॥ जुजंगप्रयातबत्तम् ॥ नमुं सूरिराजा सदातत्त्वताजा, जिनेंडागमें प्रौढ साम्राज्यनाजा ॥ पवर्ग वर्गित गुणे शोजमाना, पंचाचारने पालवे सावधाना ॥१॥ नविप्राणीने देशना देशकाले, सदा अप्रमत्ता पथासूत्र आले ॥जिक शासनाधार दिग्दतिकल्पा, जगत्ते चिरंजीव जोशुद्धजल्पा ॥२॥ ॥ ढाल उद्धालानी देशी ॥ आचारिज मुनिपति गुणी, गुणवत्तीशे धामो जी। चिदानंद रस स्वादता, परनावे निकामो जी ॥१॥ उल्लालो ॥ निकाम निर्मल शुद्ध चिदघन, साध्य निज निरधारथी। वरझान दर्शन चरण वीरज, साधनाव्यापारथी ॥ नविजीव बोधक तत्व शोधक, सयलगुण संपति धरा । संवर समाधी गत उपाधी, छविध तप गुण आदरा ॥५॥ ॥ ढाल श्रीपालना राशनी देशी ॥ पांच आचार जे सुधा ३० ॥ स्नात्रपूजा॥ पाले, मारग नापे सांचो । ते आचारज नमिये नेह सुं, प्रेम करीने जांचो रे॥ नवि०॥ सि० ॥ ११ ॥ वर उत्रीश गुणे करी सोहे, युग प्रधान जग मोहे। जग मोहे न रहे खिण कोहे, सूरि नमुं ते जोहे ॥न॥सि॥१॥ नित अप्रमत्त धर्म जवएसे. नहिं विकथा न कषाय । जेहने ते अचारिज नमिये अकलुष अमल अमाय रे॥भ ॥ सि ॥ १३ ॥ जे दिये सारण वारण चोयण, पमिचोयण वली जनने। पटधारी गब थंन आचारिज, ते मान्या मुनि मनने रे ॥ न०॥ सि ॥ १४ ॥ अत्थमिदं जिन सूरज केवल वंदीजे जगदीवो। जुवन पदारथ प्रगट न पटु ते, आचारज चिरजीवोरे ॥ ज० ॥ सि० ॥१५॥ ॥ ढान॥ ध्याता आचारिज जला, महामंत्रशुन ध्यानी रे ।। पंच प्रस्थाने आतमा,आचारज होय प्राणी रे॥वी० ॥४॥ ऊँझी० इति आचार्यपद पूजा ।। ॥चतुर्थ उपाध्याय पद पूजा प्रारंजः।। ॥ दोहा॥ गुण अनेक जग जेहना । सुन्दर शोजित गात्र ।। उबकाया पद अरचिये। अनुभव रसनो पात्र ॥१॥ काव्यं, इंजवजावृत्तम् । सुतत्थ वित्थारण तप्पराणं , || . ॥ स्लानपूजा ॥ ३१ नमो नमो वायगकुंजराणं । गणस्स संधारण साय राणं, सबप्पणा वझिय मछराणं ॥ भुजंगप्रयातवृत्तम् । नहीं सूरि पिण सूरि गुण ने सुहाया, नमुं वाचका त्यक्तमदमोह माया । वलि छादशांगादि सूत्रार्थदाने, जिके सावधाने निरुका निमाने ॥१॥ घरे पंचने वर्गवर्गित गुणौघा, प्रचा दिछिपोछेदने तुल्य सिंघा । गुणी गवसंधारणे स्यंजपूता, उपाध्यायते वंदिये चित् प्रभूता ॥२॥ ॥ ढाल ॥ उद्धालानी देशी॥ खतिजुश्रा मुत्तिजुश्रा, अजव मद्दव जुत्ताजी ॥ सच्चं सोय अकिंचणा, तव संयम गुण रत्ताजी ॥ २॥ ॥ उहालो॥जे रम्या ब्रह्म सुगुप्तिगुप्ता, सुमति सुमता शुनधरा ॥ स्याहादवाद तत्वसाधक, आत्मपर विनंजनकरा जवनीरुसाधन धीरशासन, वहन धोरी मुनिवरा । सिद्धांत वायण दान समरथ, नमो पापकपदधरा ॥२॥ ॥ पूजा ॥ ढाल ॥ श्रीपालना राशनी देशी॥छादश अंग सजाय करे जे, पारग धारग तास । सूत्र अर्थ विस्तार रसिक ते, नमो उबकाय जलासरे ॥ ज०॥ सि ॥ १६ ॥ अर्थ सूत्रने दान विनागे, आचारज उवकाय । नव एये जेलहे शिव संपद, नमिये ते सुपसायरे ॥ज ३२ ॥ स्नात्रपूजा॥ ॥ सि० ॥ १७ ॥ मूरख शिष्य निपजाये जे प्रनु, पाहण पक्षव आणे । ते उवकाय सकल जन पूजित, सूत्र अरथ सवि जाणे रे ॥न | सि ॥ ॥ २७॥ राज कुँवर सरिखा गणचिंतक, आचारिज पद योग । जे जवकाय सदा ते नमतां, नावे जव जय सोगरे ॥ न॥सि॥ रए ॥ वावना चंदन रस समवयणे, अहित ताप सविटाले । ते नवकाय नमीजे जे वली, जिन शासन अजुवालेरे ॥ न० ॥ ॥ सि ॥२०॥ ॥ ढाल॥ तपसिकाये रत सदा, द्वादश अंगनो ध्याता रे । उपाध्याय ते आतमा, जगबंधव जगत्राता रे ॥वीन ॥ तु० ॥५॥ऊण झी इति उपाध्यायपद पूजा ॥ ॥ पंचम साधूपद पूजा प्रारंजः ॥ ॥ दोहा॥ मोक्ष मार्ग साधन जणी। सावधान यथा जेह । ते मुनीवर पद वंदतां । निर्मल थाहे देह ॥ १॥ काव्यं, इंजवज्रावृत्तम् ॥ साहूण संसाहिब संज माणं, नमो नमोसुक्ष दयादमाणं । तिगुत्ति गुत्ताण समाहियाणं, मुणीण माणंद पयहियाण ॥ तुजंगप्रयात वृत्तम् । करे सेवना सूरिवायग गणी नी, कहूं वर्णना तेहनीशी मुणिनी । समेता सदा ॥ स्नात्रपूजा.॥ ३३ पंचसुमति त्रिगुप्ता, त्रिगुप्ते नहीं काम जोगेषु लिप्ता ॥ १॥ वली बाह्य अत्यंतरे ग्रंथ. टाली, होय मुक्तिने योग्य चारित्र पाली ।शुजष्टांग योगे रमेचित्त वाली, नमुं साधुने तेह निज पाप टाली . ॥ ॥ ॥ ढाल ॥ उद्धालानि॥ सकल विषय वियवारीने, निकामी निस्संगीजी। नवदवताप समावता, आतमसाधन रंगीजी॥१॥ उल्लालो ॥ जे रम्या शुद्ध स्वरूप रमणे, देह निर्मम निर्मदा । काउसग्ग मुजाधार आसन , ध्यान श्रन्यासी सदा । तप तेज दीपे कर्म की नैवठीपे परजणी।मुनिराज करुणासिंधु त्रिभुवन, बंधु प्रणमुं हित नणी ॥२॥ ॥ ढाल ॥ श्रीपालना राशनी देशी ॥ • जिम तरुफूले नमरो वैसे, पीमा तसुन उपावे । लेश रस आतम संतोषे,तिम मुनि गोचरी जाये रे ॥न सि ॥ २१॥ पांच ईडीने जे नित जीपे, पटकाया प्रतिपाल । संयम सत्तर प्रकार याराधे वंदू दीन दयालरे ॥ ज० ॥.सि ॥ २२. ॥ अढार सहस शीलंगना धोरी, अचल. आचार चरित्र । मुनि महंत जयणायुत वंदी, कीजे जनम पवित्ररे ॥ ज०॥ सि० ॥ ५३ ।। नवविध ब्रह्मगुप्ति जे पाले, वाहरविह तप सूरा ॥ एहवा. मुनि नमिये जोप्रग
३४
॥ स्नात्रपूजा ॥
टे, पूरवपुण्य अंकूरारे ॥०॥ सि० ॥४॥ सोना
तणी परे परीक्षा दीसे, दिन दिन चढते वान ।।
संजमखप करता मुनि नमिये, देशकाल अनुमा
नेरे । भण्॥सि ॥ २५ ॥
॥ढान॥
अप्रमत्तजे नित रहे, नवि हरये नवि सोचेरे ।।
साधु सुधाते आतमा, शुं मुझे शुं लोचैरे। वी०१६ ।
इतिसाधूपद पूजा समाप्ताः ।
षष्ठी सम्यक्त्व दर्शन पद पूजा प्रारंजः।
॥ दोहा॥
जिनवर जाषित सुधनय, तत्व तणी परतीत ।
तेसम्यग् दरशन सदा, आदरीये सुनरीत ॥१॥
॥ काव्यं ॥ इन्द्रवज्रावृत्तं ॥ जिणुत्त तत्ते रुश् लक्ख
णस्स, नमो नमो निर्मल दंसणस्स । मित्त
नासा समुग्गमस्स मूलस्स सकर्म महामस्स
तुजंगप्रयातवृत्तम् । विपर्या सहो वासना रूपमिथ्या,
टलै जे अनादि अबैजे कुपथ्या । जिनोक्ते दुश्सह
जथी शुधध्यानं, कहिये दर्शनं तेह परमं निधानं।।
विना जेहथी ज्ञान महान रूपं, चरित्रं विचित्रं
नवारण्य कूपं ॥ प्रकृति सातने उपसमें क्षय तेह
होवै, तिहां आप रूपे सदा आप जोवै॥२॥
॥ स्नानपूजा ॥ ॥ ढाल ॥ उसालानी देसी॥ सम्बग्ग दर्शन गुण नमो, तत्वप्रतीत खरूपीजी। जसु निरधार खनाव ठे,चेतन गुणजे अरूपीजी ॥१॥ उल्लालो ॥जे अनूप श्रद्धा धर्म प्रगटे, सयल पर ईहा टले । निज शुद्ध श्रद्धा भाव प्रगटे अनु नव, करुणा ऊबले । बहुमान परिणिति वस्तुतत्वे, अहव सुर कारण पणे। निज साध्यदृष्टैसर्व कर णी, तत्वता संपति गिणे ॥२॥ ॥ पूजा ढाल ॥. श्रीपालना राशनी देशी ॥ शुद्ध देव गुरुधर्म परी का. सहहणा परिणाम । जेह पामीजे तेह नमीजै. सम्यक्दर्शन नाम रे॥ न ॥ सि ॥ २६ ॥ मल उपशम दय उपशम जेहथी, जे होय त्रिविध श्र नंग । सम्यक् दर्शन तेह नमीजे, जिनधर्मे दृढरंग रे॥॥सि ॥७॥ पांच बार उपशम लही जै, दय उपशमिय असंख । एकवार दायकते स मकित, दर्शन नमियें असंख रे॥न ॥ सि ॥ ॥ २७॥ जेविण नाण प्रमाण न होवे, चारित्रतरु नवि फलियो । सुखनिर्वाणन जे विण लहिये, सम कित दर्शन वलियो रे ॥ जणा सिंग ॥ शए । समस बोले जे अलंकरी ज्ञान चारित्रनुमूल । समकित द शन ते नितप्रण, शिवपंथनुं अनुकूलरे। लणसि०३० ३६ ॥ स्नात्रपूजा ॥ ॥ढान॥ समसंवेगादिक गुणा, क्षय उपशम जे आवरे। दर्श न तेहिज आतमा, शुंहोय नाम धरावे रे ॥ ॥ वी र० ॥ ॥ इति सम्यक् दर्शनपदपूजा॥ सप्तम सम्यक् ज्ञान पद पूजा ॥दोहा॥ सप्तमपद श्रीज्ञाननो । सिद्ध चक्र तप मांहि । आराधीजे शुजमने। दिन दिन यधिक उगाह ॥१॥ ॥काव्याअवज्रावृत्तम्। अन्नाणसंमोह तमोहरस्स । नमो नमो नाण दिवायरस्स । पंचप्पयारस्सुवगा रगस्स । सत्ताण सव्वत्थ पयासगस्स ॥ ॥ तुजंगप्रयातवृत्तम्। होय जेहथी ज्ञान शुरु प्र वोधे, यथा वर्ण नासे विचित्रा विवोधे। तेणें जाणि ये वस्तु पटव्यत्नावा, न होवेविता ( वाद )नि जेबास्वन्नावा ॥१॥ होय पंचमत्यादि सुझान जेदै, गुरूपासती योग्यता ते न वेदै। वली झेय हेया ऊ पादेय रूपै, लहे चित्तमां जेम ध्याने प्रदिपै ॥२॥ ॥ ढाल ॥ नहालानी ॥ देशी ।। जव्य नमो गुण झानने, स्वपर प्रकाशक नावैजी। परयाय धर्म अनंतता जेदानेद स्वजावेजी ॥ जण ॥१॥ उझालो । जेमोख्य परणति सकल डायक, , " . ॥ स्नात्रपूजा ॥ ३७ बोध वास विलासता । मति आदि पंच प्रकार नि मल, सिक साधन लंठता । स्याहाद संगी तत्त्व रंगी, प्रथम भेद अनेदता । सविकल्पने अवि कल्प वस्तु, सकल संशय दता ॥२॥ ॥ पूजा-॥ ढाल ॥ श्रीपालना रासनी देशो। नक्ष अनदन जेविण लहियै, पेय अपेय विचार । कृत्य अकृत्य न जेविण लहिये, ज्ञान ते सकल आधाररे ॥ ज० ॥ सि ॥ ३१ ॥ प्रथम शान ने पीठे अहिंसा, श्री सिकाते नाख्युं । ज्ञानने वंदो शान मनिंदो, ज्ञानीये शिव सुख चाख्युरे ॥ ज० ॥ सि ॥ ३२ ॥ सकल क्रिया नु मूल जे श्रद्धा, तेदन मूल जे कहिये । तेह झान नित नित वंदीजे ते विण कहो किम रहिये रे ॥ ज० ॥ सि ॥३३॥ पांच शान मांहि जेह सदा गम, स्वपर प्रकाशक तेह । दीपक परें वित्तुवन उपकारी, वली जिम रवि शशि मेहरे ॥ ज० ॥ सि ॥ ३० ॥ लोक ऊरध अध तिर्यग् ज्योतिष, वैमानिकनें सिद्धि। लोक अलोक प्रगट सवीजेद थी, ते ज्ञान मुज शुद्धि रे॥०॥ सि ॥ ३५ ॥ ॥ ढाल ॥ झानावर्णी जे कर्म , दय उपशम तसु डायै रे। तो होय एहिज आतमा, ज्ञान अयोधतां जाय ३ज ॥ स्नात्रपूजा ॥ रे । वी॥॥ऊँझी इति सम्यक् ज्ञान पद पूजा । ॥अष्टम चारित्र पद पूजा प्रारंजः ॥ ॥ दोहा।। अष्टम पद चारित्रनो। पूजो धरी उमेद । पूजत अनुभव रस मिले, पातिक होय उठेद ॥१॥ ॥ काव्यं ॥ इंजवज्रावृत्तम् ॥ आराहिया खंमीअस कीअस्स, नमो नमो संजम वीरियस्स ॥ सज्जा वणा संग विवद्वियस्स निवाण दाणा समुज्जयस्स ॥ जुजंगप्रयातवृत्तम् ॥ वली झानफल ते धरिये सुरं गे, निरासंसताहाररोधप्रसंगे । जवांवोध संता रणे यान तुल्यं । धरूं तेह चारित्र अप्राप्त मूल्यं ॥ १॥ होय जास महिमा थकी रंक राजा, वली छाद शांगी भणी होय ताजा । वली पापरूपोपि निः पाप थाये, थइ सिक ते कर्मने पार जाये ॥२॥ ॥ ढाल ॥ नहालानी देशी॥ चारित्रगुण वली वली नमो, तत्त्वरमण जसमूलो जी । पर रमणीय पणुं टले, सकल सिद्ध अनुकूलो जी ॥ चा ॥ १ ॥ उबालो । प्रतिकूल आश्रव त्याग संयम, तत्त्व थिरता दमम । शुचि परमखंती मुनि दशमेपद, पंचसंवर उपच। सामायिकादिक जेद धर्में, यथा ख्याते पूर्णता । अकषाय अकलुष अमल उज्जत, काम कश्मल चूर्णता ॥
३७ ॥ स्नानपूजा ॥ ॥ ढाल श्रीपालनारासनी देशी ॥ देशविरतिने सर्व विरतिजे । ग्रहीयतिने अनि राम । ते चारित्र जगत जयवंतो।कीजै तास प्रणा म रे । न ॥ सि ॥१॥ तृणपरै जेपट्खम सुख मी। चक्रवर्ति पिण वरियो। ते चारित्र अखय सुख कारण । ते में मन मांहि धरियोनिमासि ॥ २ ॥ हुआ रंकपणे जे श्रादरि । पूजित इंस नरिंद । अशरण सरण चरण ते बंदू । वरि ज्ञान आनंदरे॥॥सि॥३॥ वारमास परजाइंजेहनें। अनुत्तर सुख थतिक्रमिई । शुक्ल सुक्ल अजिजा त्यते ऊपरि। ते चारित्रने नमीईरे॥नासिया चयते आठ करमनो संचय । रिक्त करै जे तेह । चारित्र नाम निरुक्तै नाख्यु । तेवंडं गुण गेहरे ॥ज०॥ सि० ॥५॥ ॥ढान॥ जाणि चारित्र ते आतमा। निज स्वन्नाव मांहि रमतो रे । लेश्या शुझ अलंकरयो । मोहवनें नवि जमतो रे॥ वी तुमे ॥ ६ ॥ ऊझी प०॥ इति आग्मी श्रीचारित्रपद पूजा ॥ ॥ नवमी तप पद पूजा प्रारंजः ॥ ॥ दोहा ॥ करमकाष्ठ प्रतिजालवा। परतिख अगनि समान।
Yo ॥ स्नात्रपूजा ॥ ते तप पद पूजो सदा । निरमल धरिय ध्यान ॥ १॥ काव्यं॥इन्द्रवज्रावृत्तम् । कम्मडुमोन्मूलन कुंजरस्स। नमोतिव तवोयरस्स । अणेग लद्धीण निबंधणस्सा फुस्सज्ज अत्थाणय साहणस्स ।।७ ॥श्य नवपय सिद्धिं लकि विजा समिकं । पयमिय सरवग्गं झी तिरेहा समग्गं । दिसिवय सुरसारं खोणि पीढा वयारं । तिजय विजयचकं सिद्ध चक्रं नमामि॥१॥ त्रिकालक पणे कर्मकषाय टाले । निकाचित पणे बांधिया तेहवालै । कह्यो तेह तप बाह्य अत्यंतर पुजेदै । क्षमा युक्ति निर्हेत ान छेदै ॥ ए॥ होय जास महिमाथकी लब्ध सिद्धि, अवांजकपणे कर्म आवरण शुद्धि । तपो तेह तप जे महानंदहे ते हो सिद्धि । सीमंतनी निज संकेत श्म नव पद ध्यावे। परम आनंद पावे, नव नव शिव जावे, देव नरनवज पावे॥झान विमल गुण गावे सिद्धचक्र प्रनावे, सब दुरति समावे, विश्व जयकारपावे ॥४॥ ॥ ढाल ॥ नहालानि देशी ॥ श्वारोधन तप नमो, बाह्य अत्यंतर नेदे जी॥ आतम सत्ता एकता, पर परणित उबेदे जी ॥२॥ जबालो ॥ उबेद कर्म अनादी संतति जे सिंझपणो वरे ॥ सुनयोगसंग आहार टाली नाव श्रक्रियता करे ॥ अंतर मुहूरत तत्त्व साधे, सर्व संवरता करी॥ निजआत्मसत्ता प्रगट जावें, करोतप गुण श्रादरी।। स ॥ स्नात्रपूजा॥ ४१ ॥ढाल. श्म नवपद गुणमंमलं, चननिक्षेप प्रमाणे जी॥ सात नये जे शादरे सम्यक्झाने जाणे जी। उल्ला लो॥ निर्धार सेती गुणे गुणणो, कर जे वहुमान ए॥जम करण हा तत्त्व रमणे, थाये निर्मलध्या न ए ॥ श्म शुझसत्ता भलो चेतन, सकल सिद्धिथ नुसरे ॥ अक्ष्य अनंत महंत चिदघन, परम आनं दतावरे ॥ कलश ॥ श्म सयल सुखकर गुणपुरंदर, सिहचक पदावती॥ सवि लद्धि विजा सिद्धिम दिर, नविक पूजो मन रली ॥ अवकाय वर श्रीरा जसागर, ज्ञान धर्म सुराजता ॥ गुरु दीपचंद सु चरण सेवक, देवचंद सुशो नता ॥ १॥ || पूजा ॥ ढाल॥ श्रीपालना रासनी देशी ॥ जाणंता त्रिहूं झाने संयुत, ते नवमुगति जिणंद ॥ जेह आदरे कर्मख पेवा, ते तप सुरतरु कंदरे ॥ ज० ॥ सि॥४१॥ कर्म निकाचित पणि क्षय जाई, क्षमा सहित जे करतां ॥ ते तप नमिये तेह दीपावे, जिन शा- सन उजमंतारे ॥ न० ॥ सि॥४२॥श्रामोसही पमुहा बहु लद्धि, होवे जास प्रजावे॥ अष्टमहासि निव.निधि प्रगटे, नमिये ते तप जावे रे॥जय ॥ सि ॥ ४३ ॥ फल शिवसुख महोटुं सुर नरवर, , ४२ ॥ स्नात्रपूजा ।। संपति जेहD फूल ॥ ते तप सुरतरु सरीपो वंदूं, श ममकरंद अमूल रे॥जणासि० ॥४४ सर्व मंगल मां हिपहिलो मंगल, वरणवियो जे ग्रंथ॥ ते तप पद त्रि करण नित नमीये वर सहाय सिवपंथ रे ॥ न सि० ॥ ४५ ॥ श्म नव पद थुणतो तिहां लीनो, हुउँ तन्मय श्रीपाल ॥ सुजस विलास चोथे खमे, एह ग्यारमी ढाल रे ॥न ॥ सि०४६ ॥ ॥ढान॥ चारोधन संवरी, परणित समता योगेरे ॥ तप ते एहिज आतमा वरते निजगुण नोगे रे॥ वी० ॥ ॥ २०आगम नो आगम तणो, भाव ते जाणो सां चोरे॥ आतम भावें थिर हुवो, पर नावे मत राचो रे ॥ वी० ॥ ११॥ अष्ट सकल समृद्धिनी घटमांहि झकिदाखी रे॥तिम नवपद शछि जाण जो, आ तमराम साखी रे॥वि॥१॥योगअसंख्य जिन कह्या, नवपद मुख्यते जाणो रे ॥ एह तणे अविलं बने, आतमध्यान प्रमाणो रे ॥वी ॥ १३॥ ढाल बारमी एहवी, चोथे खेमे पूरी रे॥ वाणी वाचक जस तणी, कोश्नय रही अधूरी रे ॥ वी० ॥ १५ ॥ ऊंन्हीं परमात्मने अनं० झान जन्मजराण श्री मसिचक्राय वासं-पंचामृतं-चंदनं-पुष्यं-धूपं- दीपं--अक्षतं-नैवेद्यं-फलं-वस्त्रं यजामहे ॥शति तप पद पूजा ॥
धृत मिश्री
॥ नानपूजा ।।
४३
इति श्री देवचंदजी यशविजयजी महोपाध्याय
कृत सिझचक्र महात्म नवपदजीकी धमी पूजा संग
अथ नवपद पूजादिक सर्व पूजाथों में जो सामग्री
अवश्य चाहिये सो सबके याददास्ती खातर कई
चीजों के नाम लिखते है.( पंचामृत) दूध दही
शुद्धजल केसर सुगंधचंदन कपूर कस्तू
शै अंवर रोली मोली छुट्टाफूल फूलोंकी माला
फूलोंका चंया धूप चावल प्रमुख नव जातके धान
नब प्रकार के नेवैद्य नव प्रकार के फल (ए) प्रका
रके पक्कवस्तु मिश्री पतासा उला वदाम सुपारी
प्रमुख अंगलुहणा खातर सपेद वस्त्र पदावणी
खातर उत्तम रेशमी प्रमुख वस्त्र वासक्षेप गुलाव
जल अत्तर इत्यादिक और नव नालीके कलस
(ए) रकेवी परात सतला भारती मंगलदीप जग
वान के अंगी समोसरण इत्यादिक सवचीज पह
ली नीक कर के रक्खे इससे पूजा में विघ्न न होय
शहां संक्षेप विधि कही विसेप विधि गुरुके मुखसे
जाण लेणी ॥ इति ॥
अथ दादा गुरु महाराज की पूजा
श्रथ पहली थापना स्थापन करके आवाहन का
श्लोक पढ़े काव्य ।। सकल गुण गरिष्टान् सत्तपो
निर्वरिष्टान् शम दम यमपुष्टांश्चारुचारित्रनिष्टान ।
निखिख जगति पीवे दर्शितात्मप्रजावान् मुनिपकु
४४ ॥ स्नात्रपूजा ॥ शल सूरिनचाफ्याम्यत्र पीवे ॥१॥ॐ ह्रीं श्रीं श्री जिनदत्त श्री जिन कुशल श्री जिन चंडसूरिगुरौं अत्रावतराक्तर स्वाहा ॥ ॥ ॐ ह्रीं श्रीं श्रीजिन दत्त लूरिगुरौ अत्रतिष्ट २ . ठः ठः स्वाहा इति प्रतिष्ठापनं ॥ ॐ ह्रीं श्रीं श्रीजिनदत्तसूरिंगुरौअत्र ममसंनिहितोत्सव वषट् इति संनिधीकरणं ॥ अथ जलका कलश लेके स्नात्रीया सुच होके खमा रहे । प्रथम जल पूजा ॥ दोहा ।। ईश्वर जग चिंतामणी कर परमेष्टिध्यान। गणधर पद गुण वर्णना पूजन करो सुजाण ॥ सौ धर्मा मुनिपति प्रगटवीर जिने श्वर पाट । मिथ्या मत तम हरण• नव्य दिखायण वाट ॥२॥ सुस्थितसुप्रतिवद्ध गुरुसू रिमंत्रको जाप कोटिकीयो जबध्यानधर कोटिकगढ सुयाय ॥३॥ दश पूर्वी श्रुत केवली भये वज्रधरस्वाम । तादिन तें गुरु ग को वजशाख जयो नाम ॥ ४ ॥ चंद्र सूरि नये चंअसम अतहि बुद्धि निधान । चंकुली सब जगत में पसयो बहु विज्ञान ॥ ५॥ वर्धमान के पाट पद सूरिजिनश्वर नाश, चैत्य वाशि कू जीत कर सुविहित पक्ष प्रकाश ॥ ६ ॥ अणहि लपुर पाटणसना लोक मिले तिहां लद । खरतर विरुद सुधानिधिलन राजसमदा ॥ ७ ॥अजय देव सूरि नये नव अंगटीका कार । थंजण पारस प्रगट कर कुष्ट मिटा वनहार॥७॥ श्री जिनववन અપ ॥ स्नात्रपूजा ॥ सूरिगुरु रचनाशास्त्र अनेक ।प्रतिवोधे श्रावकबहुत साके पट्ट विशेष ॥ ए॥ हुँवरु श्रावग वाघमी अगरे हज्जार । जैन दया धर्मी किये वरते जैजैकार ॥१॥ दादा नाम विख्यात जस सुर नर सेवग जास। दत्त सूरि गुरु पूजतां आनंद हर्प उदास ।। ११ ॥ दिल्ली में पतसाहने हुकम उठाया शीश मणिधारी जिन चंद गुरु पूजो विसवावीस ॥ १५ ॥ ताके पट्ट परंपरा श्री जिन कुशल सूरिंद । अकवर कू परचा दीया दादा श्री जिन चंद ॥ १३ ॥ ऐसे दादा चार्य पूजो चित्त लगाय। जल चंदन कुसुमादि कर ध्वज सौगंध चढाय ॥ २५ ॥ चाल || दादा चिरंजीवो एदेशी ॥ गुरुराज तणी पूजन कर नविसृखकर नि लसी लछी घणी। एआँकणी।गुरुदत्त सुरिंद जग सुखकारी, गुरु सेवगने सानिधकारी, गुरुचरण क मलनी बलिहारी, ॥ गुण ॥ १ ॥ संरत इग्यारे वार शशि, वत्तीसे जनम्यां शुन्नदिवसी, श्रावग कुल मॅबमने हुलसी ॥गु० ॥२॥जसुवाग्गसापि तुनाम चणे, वाहमदे माता ईर्ष घणे, इकतालीसे दीक्षा पजणे ॥ गुण ॥३॥गुणं इत्तरे वक्षन पाट धरी, गुरुमाय चीजनो जाप करी, गुरु जगमे प्रग ट्या तरणतरी ॥ गु०॥ ४॥ मणि धारी जिन चंद उपगारी, जिनदत्त सूरिंदके परधारी, नये दादा दूजासुख कारी ॥ गु०॥५॥ राशल पितु देख्दण .
, , ४६ ॥ स्नात्रपूजा ॥ दे माता, श्रीमाल गोत्र बोधनशाता, दिदी पत शाह सुगुण गाता । गुण ॥६॥ जसु चोथे पाट उ द्योत करि, जिन कुशल सुरिंद अति हर्ष नरी, तेरे से तीसे जनमघरी ॥ गुण ॥ ७॥ जसु जिव्हा जन क जगत्र जीयो, वर जैतसीरी शुजस्वपन लीयो, गुरु बाजेम गोत्र उकार कीयो ॥ गुण ॥७॥ धनसेता लीसे दीक्षा धरी, जिन चंदसूरीश्वर पाटवरी, गुण हत्तरे सूरि मंत्र जाप करी ॥ गुण ॥ ए॥ सेवामे बाव नवीर खरा, जोगणिया चौसठ हुकम धरा, गुरुज गमें केश उपगार करा ॥ गु०॥ १०॥ माणक सूरी श्वर पद गजे, जिन चंदसूरि जगमे गाजे, चये दा दा चोथा सुखकाजे । गुण ॥ ११॥ जिन चांद लगा यो उजियालो, अम्मावस की पूनमवालो, सब श्राव कमिल पूजन चालो ॥ गुण ॥ १५ ॥ जिन अकबर कुं परचादीना, काजीकी टोपी वश कीना, बकरीका नेद कह्या तीना ॥ गुण ॥ १३ ॥ गंधोदक सुरनि सुकलश जरी, प्रदालन सदगुरु चरण परी, या पूजन कविज्ञफिसार करी ॥ गु०॥ १४ ॥ ॥ श्लोक ॥ सुरनदी जल निर्मल धारको, प्रबल पुष्कृत दा घनिवारकों ॥ सकल मंगल वंडित दायको, कुशल सूरि गुरो चरणौ यजे ॥१॥ ॐ हीं श्रीं परम पुरु षाय परम गुरुदेवाय नगवते श्री जिनशासनोदी
॥ मात्रपूजा ॥
H
पकाय श्री जिनदत्तसूरीश्वराय मणिमंमित भा
सस्थल श्रीजिनचं सूरीश्वराय श्रीजिन कुशल
सूरीश्वराय अकबर असुर त्राण प्रतिवोधकायश्री
जिनचन्प्रसूरीश्वराय जलं विर्वपामिस्वाहा ।। १॥
अथ उजी केशर चंदन पूजा।
दोहा-॥ केशर चंदन मृगमदा, कर धनसार मिः
साप । परचा जिनदत्त सूरिका, पूज्यां टूटे पाप ॥१.
चालवीन वाजेकी॥दीन दयाल राजसार २ ।।
॥आंकणी ॥आये नरुअष्ठ नग्र धाम धूम धुंवा
जते निशाण गेरदप रंगहूं-हण्दो॥॥दोणा मुस
समान मुगलपूत फोजमो जमू फोत मोत होगया
हायकारसुं॥हाण्दी ॥२॥दोहा॥सघन विधन
देख थाप हुकम दीन यूं लाओ मेरे पास आस जी
वदान दूं ॥जी॥ दी ॥३॥ दोहा । मृतक पूतमं
त्रसे उगय दीनतुं देखके थचनरंग दासखासकुं
॥ दादी दोहा॥ करतसेवनाव पूर तूरकराज
जुंगेमके अनदा खाण हाजरी जरूंगदाण्दी ||५||
॥दोहा॥ वीज खीजके पमीप्रतिकमणके मुंहा थ
से उगय पात्र ढांक दीन ढूं। ढांदी०॥६॥दोहा।
दामनी अमोल योल सिद्धराज तूं देउवरदान ठगेम
बंधकीन क्यूं || बंदी० ॥ दोहा ।। दत्त नाम
जपत जाप करत नांद फेरमें पशृंगी नाह होम
४त
॥ स्नात्रपूजा ॥
दीनफू ॥ बो दी॥७॥ दोहा ॥ करोगे निहाल
आप पाव पलक, रामछिसार दास चरण गंह
खू ॥ चण् दी०॥ ए॥
॥ श्लोक ॥
मलय चंदन केशर वारिणा, निखिल जाड्य रुजा
तपहारिणा। सकल मंगल वांछित दायकं कुशल
सूरि गुरोश्चरणौयजे ॥ ऊँ न्हीं श्रीं श्रीजिनदत्त सूरि
श्वराय केशर चंदनं निपामिते स्वाहा ॥२॥दोहा।।
चंपा चेनली मालती मरुवा अरु मचकुंद । जोचा
ढेगुरुचरण पर नितघरहोय आनंद ॥२॥ नींद तो
गई वादिलामारी । एदेशी ॥ रागमारू ।। गुरु पर
तिख सर तरु रूप सुगुरु शम दूजो तो नहीं । दूजो
तो नहींरे सुमति जन दूजो तो नहीं गुरु परतिख
सुर तरु रूप सुगुरुने पूजो तो सही ॥ए आंकणी ॥
चितोम नगरी वज्रर्थनमें विद्या पोथीरहीरे ॥सु
दि०॥ हेजी मंत्रजंत्र विद्यासे पूरी गुरु निज हाथ
गृही। गुरुप । गुरुवरण ॥१॥पुर उजेणी महाकाल
के मंदिर थंभ कहीरे॥सुम। हेजी शिद्धसेन दिन
करकी पोथी विद्या सरव लहीरे ॥ सु ॥ वि० ॥
गुरुप ॥२॥ उजेणी व्याख्यान बीचमे श्राविका
रूप गृहीरे । सु।श्रा ॥ हेजी जोगणीयां छलणे
कुं आई सबकुंखील दई। सु | गुण ॥३॥ दीन
होय जोगणीयां चोसठ गुरुकी दाश नरे।सुगुण।
ker
४८
॥ स्नात्रपूजा ॥
गुण । हेजी सातदीया वरदान हरख से पसरथा
सुजस मही। प० । गुण ॥४॥ पुप्पमाल गुरु गुण
की गूंथी चामो चित्त चहीरे ॥ सु। चा । हेजी
कहे रामऋद्धिशार सुजसकी बूंटी आप दई । बूं।
गु०॥ ५॥ श्लोक ॥ कमल चंपक केतकी पुष्पकै
परिमलाहृत् पट्पदबूंदकैः ।। सकल ॥ ॐ न्हीं
श्री श्री जिनदत्ता पुष्पं निर्वामिते स्वाहा ।। ३ ।।
दोहा ।। धूप पूज कर सुगुरुकी, पसरे परमल पूर।
जस सुंगंध जगमें वधे, चढे सवाया नूर ।। राग सो
रग । कुवजाने जादूमारा । ए चाल | अंविका विरु
द वखाणे गुरुतेरो। अंग। तुम युग प्रधान नही
गने ॥ गुण। ए आंकणी । गढ गिरिनार अंबर
श्रावक एसोनियम चित्तगणे। युग प्रधान इस जुग
में कोई देखू जन्म प्रमाणे । गुण अंग ॥१॥ कर उप
वाश तीन दिन वीते प्रगटी अंबाझाने ॥ गुण प्र
गट होय करमे लिख दीना सुवरन अक्षर दाने ।
गुण अंग ॥२॥ या गुण संयुत अक्षर वांचे ताकू
युग वरजाने । गुण। श्रवन मुलक २ मे फिरतां सूरी
शकल पतवाने । गु० अं० ॥ ३॥ श्राया पास तुमारे
सदगुरु कर पसार दिखलाने ॥ गु। वासदेप
उनऊपर माला चेला यांच सुणाणे । गुण अंग ।।
सर्व देवहे दास जिनो के मरुधर कल्प प्रमाणे ।
गु० । युग प्रधान जिनदत्त सूरीश्वर अंवम शीस
५७. ॥ नानपूजा। फुकाने । गुण । अं०।५। उद्योतन सृरिने निज इ थ चोरासी गड गने गुण । सोसव तुमरी सेवा सारे चोरासी गठमाने ॥ गुण अंग॥६॥ जो मि थ्यात्वी तुमकुंन पूजे सो नही तत्व पिगने!गुमना बाहु स्वामी तुम कीर्तन कीनी ग्रंथ प्रमाणे गुण, युग प्रधान परि कीए गंमिका गण धर पद वृत्ति म्याने। कहे रामझद्धिशार गुरु कू पूजा धूप कराने गुण अंजा श्लोक ।। अगर चंदन धूप दशांगजैः प्रसरिताखिल दिनु सुधम्रकैः । शकल मंगारंग ॐ हीं श्रींपरण धूपं निईया मिते स्वाहाः ।। दोहा।दीप पूज कर सुगण नर नितश्मंगल होताउ जियालोजगमें जुगत रहे अखंत जोत।१।चाल ख्या पूजन कीज्योजी नर नारी गुरु महाराज का ॥ हो पूछ। सिंधु देशमें पंच नदी पर साधे पांच पीर।लोर जयर पुरष तिराये एसे गुरु सधीर। पू २॥प्रगटहोयके पांच पीरने सात दीया वरदान । सिंधु देश मे खरतर श्रावग होवेगा धनवान । पूज शसिंधु देश मुलतान नगमे बमा महोब्ब देख । अंबम और गह का श्रावग गुरु से कीना वेष । पू० ३॥ अणहिलपुरपत्तनमे आवो तोमे जाणुं सच्चा । बझे महोठव आगेतूं निधन होगा कच्चापू॥ ४ ॥ पत्तन बीच पधारे दादा सनमुख निर्धन आया॥ गुरु बतलाया क्यूरे अंबन अहंकार फल पाया। पूर्ण लकी।
॥ स्नानपूजा ॥ ॥५॥मनमें कपट कीया अंबमने खरतर महिमा धारी।जहरदीया उन अशनपांनमें गुरु विध जाणी सारी पू०॥ ६॥ नणशाली मुखवर श्रावग से नि विष मुडी मंगाई । जहर उतारा तब लोकों में अंब म निंद्या पाई। पूछ । मरके वितर हुवा वो अंबन रजोहरण हर लीना । नणसाली वितर वचनोसें गोत्र उतारा कीना। पू। सज्जहोय गुरु औघाले के गोत्र बचाया सारा। शद्धिशार महिमा सदगुरु की दीपकका उजयारा। पू० ए। श्लोक। अति सुदि समयै खलु दीपकैः विमल कंचन नाजनसंस्थितैः। सकलऊँन्ही पर दीपनिर्दपामिते स्वाहाः ॥५॥ दोहा ॥ अक्षतपूजा गुरुतणी करो महाशय रंग। क्षती न होये अंगमे जीते रण मे जंग ।।राग श्रासावरी ॥ श्रवधू सो जोगी गुरु मेरा । ए चाल रतन अमोलख पायो सु गुरु शम रतन अमोलख पायो गुरु शंकट सवही मिटायो।सुण ए आंकणी विक्रमपुर नगरी लोकनकू देजा रोग संतायो। च होतउपाय कीया शांतिकका जरा फरक नही आयो सु० रणजोगी जंगम ब्रह्म संन्यासी देवी देव मनायो । फरक नही किनही ने कीना हाहा कार मचायो सु० रश रतन चिंतामणि सरिपो सादिव विक्रमपुर मे आयो । जैनसंघको कष्ट दूरकर जैजैकार वरतायो सुप र महिमा सुण
५३
॥ स्मात्रपूजा ।
माहेश्वर ब्राह्मण सवही शीशनमायो। जिवत दान
करो महाराजा गुरु तव यूं फुरमायो। सु० र जो
तुम समकित वृतळू धारो अवही करदें उपायो।
तहत बचन कर रोग मिटायो श्रानंद हर्प वधायो।
सु० र ५ ।जो कोई श्रावग वृत नही धारयो पुत्री
पुत्र चमायो । साधु पांच से दीदत कीना साधवी
यां समुदायो सुपर०॥ ६ मंत्र कला गुरु छातिशय
धारी एसो धर्म दिपायो । शहिसार पर किरपाकी
नी सांचो श्लम बतलायो सुर०।७।श्लोक। सरल
तएफुलकैरतिनिर्मलै . प्रवर मौक्तिक . पुंजवदु
ज्वलैः। शकल ॐ ह्रीं श्रीं पण् अदातं निपामिते
स्वाहाः ।६। दोहा॥नैवद्य पूजा सातमी करो नविक
चित चाव। गुरु गण अगणित कुण
गिणे
तारण नाव ।। राग कल्याण।तेरी पूजावणी हे रसमे
ए चाला हो गुरु किया असुर कुंक्श से। ए आंकणी
वमनगरी मे आप पधारे सांभेला धसमसमे
ब्राह्मन लोक बमेअजिमानी मिलकर आया सुसमे
हो गुण । महिमा देख सस्या नही गुरुकी नरे
मिथ्यात्वी गुसमे। मृतक गड जिन मंदिर आगे
रखदी सनमुख चसमे। हो गुणश्रावग देख भये
आकुलता कहे गुरु से कसमे। चिंता दूर करी हे संघ
की गल उठ चालीमसमे।हो गुरु। मरी गउकू
जीति कीनी लोक रह्या सब इसमें जाके गाय पमी
गुरु नव
।
।
॥ स्नात्रपृजा॥
५३
रजालय संघजया सव रसमे।होगुण। ४ । ब्राह्मण
पांव एडया सव गुरु के देख तमासा इसमे। हुकम
उठावेंगे शिर उपर तुम शंतति की दिशमे। हो
गुण १५॥ नमस्कार हे चमत्कार कू कीनी पूजा रसमे।
कहे रामद्धिसार गुरु की आनंद मंगल जसमे
हो गुण।६। श्लोक । वहु विधेश्वरुन्निवटकैर्यकैः प्रचुर
सपिपिपासुखज्जकैः। शकलऊँन्हीं श्रीं प० नैवे
यंनिर्विपामित स्वाहाः ॥ ७॥ दोहा ॥ फल.पूजा
से फल मिले प्रगटे नवे निधान । चिदिश कौरत
विस्तरे
पूजन करो सुजान ॥१॥ रथ चढ जदुनंदन
श्रावत हे। ए चाल । चालो संघ सव पूजनकू गुरुश
मरयां सनमुख आवत हेरे ॥चा०॥५॥ ए आंक
णी। आनंदपुर पहन को राजा गुरु शोजा सुण पा
वत हेरे ॥ चा ॥ ज्या निज परधान बुलाणे नृप
अरदास सुणावत हेरे ॥ चा० ॥ लान जांण गुरु
नगर पधारे तूपत आय वधावत हेरे । चा ॥राज
कुमर को कुष्ट मिटायो अचरज तुरत दिखावत
॥चा ॥२॥ दश हज्जार कुटंव संग नृप दूं
श्रावग धर्म धरावत हेरे॥चा ॥ दया मूल थाज्ञा
जिनवर की वारे व्रत उचरावत हेरे ।।चा ॥ एसे
च्यार राज समकित धर खरतर संघ वणावत हे।।
चा ॥४॥ कुष्ट जलंधर देण. जगंदर केश्यक
लोक जीवावत हेरे ॥ चा० ॥ ब्राह्मन क्षत्री अरु
पष्ट ॥ स्नात्रपूजा ॥ माहेश्वर ओसवंस पसरावत हेरे ॥ चा॥ ५ ॥ तीस हजार एक लख श्रावग महिमा अधिक रचा वत हेरे ॥ चा॥ कहत रामशफिसार गुरु कू फल पूजा फल पावत हेरे ॥ चा ॥६॥श्लोक ॥ फनस मोचसदाफल कर्कटै सुसुखदै फिलश्रीफल चिर्नटै।। शकल ऊँ न्हीं॥प० ॥ फलं निर्विपामिते स्वाहाः ॥ दोहा॥ वस्त्र अतर गुरु पूजना चोवा चंदन चंपेल। दुस्मन सव सज्जन हुवे करे सुरंगा खेल ॥१॥ मनमो किमहीन वाजे हो कुंथुजिन ! ए चाल।लख मी लीला पावरे सुंदर लखनी लीला पाये जे गुरु वस्त्र चढावरे॥ सुं०॥ सुजन अतर महकावेरे। सुं। पुरजन शीश नमावरे ॥ सुं०॥ ए अंकणी। दरिया वीच जीहाज श्रावग की मुवण खतरे आव। सांचे मन समरे सद गुरु कू मुख की टेंर सुणावेरे॥सुं॥ ॥१॥वाचंताव्याख्यानसूरीश्वर पंषी रूपे यावे। जाय समंद मे जीहाज तिराई फिर पीगजव आवेरे।सुंग ॥शा पूढे संघ अचरज मे जरीया शुरु सव वात सुणावरे ॥सुं॥ एसें दादा दत्त कुशल गुरु परचा प्रगट दिखावेरे ॥ सुं० ॥३॥ बोथर गूजरमल श्राव ग की दादा कुशल तिरावेरे ॥ सुं॥ सुखसूरि गुरु शमय सुंदर की जहाज अलोप दिखावरे ॥सुंग ॥ ॥ ४ ॥ लप ॥ वारेसें ग्यारे दत्तसूरि अजमेर अण सणवावे।उपज्यासौधर्मादेवलोके सीमंधरफुरमावरे।
॥ स्नानपूजा । પથ । सुंग ॥५॥ श्क अवतारी कारजसारीमुक्ति नगर मे जोवरे ॥ सुं० ॥ कुशल सूरि देराउर नगरे जुवनपती सुर थावेरे ॥ सुं॥ ६ ॥ फागण वदि श्रम्मावश सीधा पूनम दरश दिखावरे ॥सुं० ।। मणिधारी दिल्ली मे पूज्यां शंकट सुपने नोवेर । सुं०॥७॥ रथी उठी नहीं देख वादसाह वाही चरण पधरावेरे ॥ सुं०॥ वस्त्र अतर पूजा सदगुर की शद्धिशार मन भोवरे ॥सुं०॥७॥ श्लोक ॥ अ खिल हीर शुचि नवचीरकै प्रवर प्रावरणे खलुगं धतः। शकलण् ॐ हीं॥ श्रीप० ॥ वस्त्रं-चोवा-चंदन- पुष्पसारं-निविपारिते स्वाहाः ॥ दोहा ॥ ध्वज पूजा गुर राज की लहके पवन प्रचार । तीन लोक के शिखर पर पोहचे सो नर नार ॥१॥ चाल । जिन गुण गावत सुरसुंदरी रे। ए चाल । ध्वज पूजन कर हरख नरी रे॥धणातज सोले शिणगार सहेथ्यां।श्री सदगुर के द्वार खरीरे ॥ध ॥ अपठर रूप सुतन सुक लीनी उम २ पग फणकार करीरे ॥ध ॥१॥ गावत मंगल देतप्रदक्षणा।धनश्आनंद आजघरी रे॥धा निर्धन कू लखमी बगसावत पुत्र विना जाके पुत्र करी रे॥धण्शाजो जो परतिप परचा देख्या। सुणो भविक दिल वीच धरी॥ध०॥फतेमस भरगतीया श्रावग पहली शंका जोर करीरे ॥ ध० ॥३॥ पर तिख देखू जव मे जाणूं। प्रगटयां ततत्रिण तरण ५६ ॥ स्नात्रपूजा ॥ तरी रे॥ ध॥ पुष्प माल शिर केशर टीका अधर श्वेत पोशाख करी रे॥धण्॥४॥ मांग २ वर बोले बाणी । फरक वतावो गुरु मेघ करी रे॥ध ॥ फरक जगायो दोय लाख पर । तेरी महिमा नित्त हरी रे ॥ ध० ॥ ५ ॥ गैनचंद गोलेगा • तें। परतिख दीनां दरस फरीरे ॥ ध ॥ विक्रमपुर में धुन तुभारा । चित्र कराबत सुर सुंदरीरे ॥ ध ॥ ६ ॥ थानमन्स लूएयां पर किरपा। लखमी लीला सहज बरीरे । लखमीपति दूगमकी साहिब। हुंमी की तुगताण करीरे ॥ ध० ॥ ७॥ जो उपगार करथा तें मेरा। दींनी सनमुख अमृत जरी रे ॥धणा तेरी कृया से सिद्धि पाईजागे जस अरु नागे जरीरे ॥ ध० ॥ ७॥ नूखा लोजन तिसिया पाणी। जरत हाजरी देव परी रे॥ ध॥ बिमुख बखत पर सहाय हमारे । ऋद्धिशार की गरज सरीरे ॥ ध ॥ ५ ॥ श्लोक ॥ मृतुमधुरध्वनि खिंखणी नादकै ध्वज विधि त्रित विसृतवास कै। शकल शिखरोपरि ध्वजां आरो पयामि स्वाहाः ॥ दोहा ॥ नहारक पदवी मिली, जीते वादी वृंद ।कंठरािजत सरस्वती,जग में श्री जिनचंद ॥राग आसावरी ॥ अथवा ॥ धनाश्री॥ पूजन जग सुखकारी सुगुरु तेरी पूजा तेरे चरण कमल बलिहारी सुसाहसलेम दिल्लीको बादस्या सुण के शोज तिहारी। नट्ट हरायो चरचा करके ॥ लानपूजा-॥ जद्दारक पद धारी ॥ सु॥ १॥ अम्मावशकी पूनम कीनी चंद जगायोनारी।चढके गगन करीहे चरचा सूरज से तप धारी ।। सु० ॥ चौदेसे जगणीस साल मे लखनेउ नगर मकारी।गोरा फिरंगी टोपीवाला दिलमें यह बात विचारी ॥ सु०॥३॥ जैन सितं वर देव जो सच्चा पूरे मनसा हमारी । वाणी निक सी राज्य तुमारा हौवेगा इधकारी ॥ सु० ॥४॥ अंधकी खोली आंख सूरतमें पूजे सब नरनारी कहांलग गुण वरणं मे तेरा तूं ईश्वर जयकारी॥ सु० ॥ ५ ॥ जगणीसे संवत्सर त्रेपन मिगसर मासमकारी । शुक्ल दूज जिन चंद सूरिश्वर ख़र तर गठ आचारी ॥ सु०॥६॥ कुशल सूरि के निजसं तानी देमकीर्ति मनुहारी प्रति बोध्या जिन क्षत्री पांचसे जान सहित अणगारी ॥ सु० ॥ ७॥ देम धाम शाखा जव प्रगटी जगमें आनंदकारी। धर्म शील साधू गुण पूरे कुशल निधान उदारी । सु० ॥ ॥ ७ ॥ या पूजन करतां सुख आनंद यन धन लखनी सारी। कहत रामऋद्धिसार गुरूकी जय । शब्द उचारी।सु० ॥ ॥ ॥ इति श्री लमस्त दादा गुरु पूजा संम्पूर्ण ॥
एज ॥ स्नात्रपूजा ॥ श्रीदादाजीकी अष्टप्रकारी पूजा ॥ . सकल गुणगरिष्ठान् सत्तपोनिर्वरिष्टान् । शम दमयमनुष्टाश्चारुचारित्र निष्टान् । निखिल जगति पीठे दार्शतात्म प्रजावान् । मुनिप कुशलसूरीन् स्वापयाम्यत्र पीठे ॥१॥ ॐ श्री श्री श्री जिन कुंशल सूरि गुरो अत्रावतरावतर स्वाहा ॥ इति आवाहनं ॥ उ झी श्री श्री जिन कुशल सरि गुरो अत्र तिष्ठ २ः वः स्वाहा ॥ इति प्रति ष्ठापनं ॥ ५॥ ॐ ही श्री श्री जिनकुशल सूरिगुरो अत्र मम सन्निहितोजव वषति सन्निधी करणं ॥३॥ अथ अष्टप्रकारी पूजा ॥ (दोहा) गंगाजल तिम नृवलवलि । तीर्थोदक नरपूर । कलशनरी गुरु चरणपर । ढालै तस दुःख दूर ॥१॥ (दाल) देशी सूरती महीनांनी ॥ गंगाजल अति निरमल अमलसुं कमलें पूर । खीरो दधि वरदधि ज्यौं उजाल जल भरपूर । तेह उद- कवलि तीर्थ नीर जरि कलश सनूर । गुरुचरणे जे ढालै टालै दुकृतदूर ॥१॥ ॐ झी श्री. श्रीजिन कुशलसूरिगुरु चरणकमलेन्यः जलं निर्वपामिते स्वाहा ॥ इति जलपूजा:॥ -- ԱԱ ॥ स्नात्रपूजा ॥ चंदन पूजा ॥ वावन्ना चंदन अगर । घस केसर घन सार । चरचे जे गुरु चरणनें । पांमें जै जैकार ॥ १ ॥ (ढाल) मलयागर तिम अगर चंदन वलिकेसर सार । कस्तूरी अतिगंधै पूरी घसं घनसार । :कु- शल सूरि गुरुचरणे चरचै चढतै नाव। सकल रोग तन सोग हरै वलि जमता नाव ॥ ॥ ॐ ही श्री श्री जिन कुशल सूरिगुरुचरणकमलेन्यः चंदनं निर्वपामितेस्वाहा ॥३॥इति चंदन पूजा ॥ पुष्प पूजा॥ केतकि चंपक फूलथी। पूजे जे गुरुपाय । तसु जशसूर उदैहुवै । अपजश तिमिर नसाय ॥१॥ (ढाल) चंपक केतकि मरुयो दमन सेवंती फूल । जाई जूई मोगरो मालती तेम उफूल । कमल गुलाव चंपेली वेली परमलपूर । गुरुचरणे जे ढोवे होवे जश ज्यूं सूर ॥२॥ ॐ ही श्री श्री जिन कुशल सूरिगुरुचरणकमलेच्यः पुष्पं निर्वपामिते स्वाहा॥ इति पुष्पपूजा ॥ अदत पूजा ॥ उजाल ज्यों शशि अंकविण । खमित नहीं .विशाल । श्रदत गुरुचरणे उवे । तसु घर मंगल माल ॥ १ ॥ ( ढाल ) ॥ सरल सुगंधित तंडुल स्वास्तिक ६० ॥ सानपूजा ॥ उजाल जल उत्पन्न । ज्यूबरं मोती छाना हुंती उहालवन्न । जलधोई ससमोई सोई अक्षत नव्य । कुशल बधावे पाये संगलतव्य ॥५॥ ॐ ही श्री श्री जिनकुशल सूरिगुरुचरणकमलेन्यः । अक्षतं निर्वामिते स्वाहा ॥ इति अक्षत पूजा ॥ दीप पूजा॥ कंचन मणिमय रलनी। दीवी कर घृतपूर । वाती मौक्षी सूतधर । करी प्रदीप सुनूर ॥ १ ॥ (ढाल)कंचन घटित जटित गति नानाविध नवरत्न। दीवी अतिभारीगर कीवी अधिदै यत्न । घृतपूरी ससनूरी मौली बाती जोय। दीपकरे गुरु आगे ज्योत उद्योती होय ॥२॥ॐपही श्री श्री जिन कुशल सूरि गुरुचरण कमलेन्यः दी निबंपामिते स्वाहा ।। इति दीपपूजा ॥ थूए पूजा बावन्ना चंदन अगर ! सेवारस घनसार । धूप जे गुरु धूपथी तस घर रिध विस्तार ॥ १॥ (ढाल) अगर चंदन लेवारस मछमीलोमेल । कपूर का- चरी वलि घनसारे मृगमद जेल ।धूप अमंग करी गुरु धौ चढते चित्त । ते नरवित्त सुमारग पामें नव नव नित॥शाऊँन्हीं श्रीश्री जिन कुशल सरिगुरु चरण कालेच्यः धूपं निर्वामिले स्वाहा ॥ इति धूपपूजा॥
॥ स्नानपूजा ।। नैवेद्य पूजा ॥ साल दाल पकवान घन। व्यंजन नव नव भांत। नेवज गुरुआगल उफ। हुधा दोप उपसांत ॥१॥ (ढाल) पेमा मगद सेवश्या लामोतीचूर । खाजा ताजा लापसी दोगनें घृतपूर। पिस्ता दाख बिदाम बुहारा पिंखजूर । गुरुचरणे जे ढोवै चोग लहै लरपूर ॥२॥ ही श्री श्री जिन कुशल सूरिगुरुः चरण कमलेन्या नैवेद्यं निर्बपामिते स्वाहा इति नैवे. घपूजा ॥७॥ फत पूजा श्रीफल सीताफल सदा । फल पुंगीफल लेय । ढोवैजे गुरु चरणपर । तनु उत्तम फल देय ॥१॥ (ढाल ) श्रीफल सीताफल नारंगी दामम दाख। ग्लरवूजा तरचूज जनेरी पाखी साख । करुणा क- वला केला नींबू फनस संफार । गुरु चरणे फल ढोई फल पामै श्रोकार ॥२॥ उन्हीं श्री श्रीजिन कु. शल सूरिगुरुः चरणकमलेच्यः । फलं निर्वपामिते स्वाहा ॥ इति फल पूजा ॥ आर्घ पूजा॥ (अथ कलश) दोहा। श्म जिन कुशल सुरिंदने पूजै अष्ट प्रकार।तसुघर नवनिधि संपजै। पुत्रादिक परिवार॥१॥नद्यारक खरतर गढ़। श्रीजिन लान- ॥ स्नात्रपूजा ॥ सुरिंद॥रत्नराजमुनि भमरपर । सवै पद अरविंद ॥ तासुचरण रजकणसमो।ग्यांन सार बुद्धिमंद ॥ श्री- सदगुरु पूजारची। सोधो कविजन बंद ॥ ३ ॥इति श्री जिनकुशल सुगुरूणां अष्टप्रकारी पूजा । अथ लघु अष्टप्रकारी पूजा लि॥ सुरनदी जल निर्मल धारया ।प्रवल पुष्कृत दाध निवारया। सकल मङ्गल वंबित दायकं । कुशल सूरि- गुरोश्चरणांजये॥१॥उन्हीं श्रीश्रीजिनकुशल सूरिः चरण कमलेच्यो जलं यजामहे स्वाहा ॥ अथ चंदन पूजा ॥ मलय चंदन केशर वारिणा। निखल जाड्यरुजा तप हारिणा । सकल ॥१॥ॐ हीं श्री श्रीजिन कुशल सूरि गुरुः चरणकमलेन्यो चं यजाण् स्वाहा ॥ अथ पुष्प पूजा ॥ कमल केतकि चंपक पुष्पकैः। परिमला हृत षद् पद वृंदकैः ।। सकल ॥३॥ ॐ हीं श्री श्री जिन कुशल सूरि गुरुः॥ ॥ पुष्पं यजाणं स्वाहा ॥३॥ अथ अदत पूजा ॥ सरल तंकुल कैरित निर्मलै। प्रवर मोक्तिक पुंज- वपुज्वलैः। सकल मङ्गलम् ॥ ऊँ न्हीं श्री जिन गुरण चरण अदतं यजामहे स्वाहाः ॥
२३
पूजा ॥
॥ स्नानपूजा ॥
अथ नैवेद्य पूजा ॥
बहुविधैश्चरुनिर्वटकैर्यकैः । प्रवर मोदक पुंज सु
खर्जकैः । सकल मङ्गलः ॥ उन्हीं श्रीजिनकु०
सूरि गुरण चरण नैवेद्यं यजामहे स्वाहाः ॥
अथ दीप पूजा ॥
थति सुदीसमयै खलु दीपकैः । विमल कंचन
भाजन संस्थितैः । सकल मङ्गल ही श्री जिन
सूरि गुर चरण दीपं यजामहे स्वाहाः ॥
अथ धूप
अगर चंदन धूप दशांगजैः। प्रसरिता खिल दिदु
मुधमकैः । सकल मङ्गल। उन्हीं श्री जिन सू०
चरण धूपं यजामहे स्वाहाः ॥
अथ फल पूजा ॥
पनशमोच सदा फलकर्कटैः। सुसुखदैः किल
श्रीफल चिर्नटेः। सकल मङ्गलम् । ॐ हीं श्री
जिन सूप चरण फलं यजामहे स्वाहाः ॥
अथ अर्घ पूजा ॥
जल सुगंध प्रसून सुतंलैश्चरु प्रदीपक धूप
फलादितिः । सकल ॥ ॐ ही श्री श्रीजिन
कुशल सूरि० । अर्धव यजाम् स्वाहा ।। इति ॥
: ६४ ।। स्नात्रपूजा ॥ ॥ मंदिर में दाशन करनेकी विधिः ॥ इच्छामिखमा नमुन्नुणं नवसग्गण जयवीय का उसग के तीन नवकार गीणना-वाद थुई कहना अथ अष्टमीस्तुतिः चवीसे जिनवर, प्रणमुं हुं नितमेव ॥ आठम दिन करियें, चं प्रतुनी सेव ॥ मूरति मन मोहे जाणे पुनिम चंद ।। दीनं पुःख जाये, पामे परमा- नंद ॥१॥ मिलि चोसऊ, पूजे प्रजुजीना पाय॥ इंशाणी अपनर, कर जोमी गुण गाय ॥ नंदीश्वर छी मिलि सुरवरनी कोम || अधाश् महोदव, करता होमा होम॥२॥ शेर्बुजा शिखरें, जाणी लान अपार ॥ चउमासे रहिया, गणधर मुनि परिवार ॥ नवियणने तारे, देई धरम उपदेश ॥ दृध साकरथी पण, वाणी अधिक विशेष ॥३॥ पोसो पमिकमj करियें व्रत पच्चरकाण ॥ आग्स तय करतां, आठ करमनी हाण ॥ आठ मंगल थाये, दिन दिन कोमि कल्याण ॥ जिन सुखसूरि कहे, श्म जीवत जनम प्रमाण ॥इति अष्टमी स्तुति ॥ ॥ शत्रुजय स्तवन ॥ शेजूंजय ऋषनं समोसरया । लला गुण नरयारे । सीधा साधु अनंत । तीरथ ते नमुरे । तीन कल्या. एक तिहां थया । मुगतें गयारे । नेमीसर गिर-
'स्नात्रपूजा ॥
६५
नार | ती॥१॥ अष्टापद एक देहरो। गिरि सेह
रोरे । जरतें जराव्या विंवः ॥ ती० ॥ आबू चौमुख
शतिजलो । त्रिजुवन तिलोरे । विमल वसई वस्तु
पाल ॥ती ॥२॥ समेतशिखर सोहामणो । रली
यामणारे । सीधा तीर्थकर वीश ती० ॥ नयरी
चंपा निरखीये । हीये हरखीरे । सीधा श्री वासु
पूज्य ॥ती० ॥ ३ ॥ पूर्व दिशें पावापुरी। ऋजरीरे
मुक्ति गया महावीर ॥ ती ॥जेशलमेर जुहारीयें
पुःख वारीयरे । अरिहंत विंच अनेक ॥ ती॥॥
बीकानेरज वंदीयें। चिरनंदीयैरे । अरिहंत देहरा
श्रावती ॥ सोरिसरो शखश्वरो । पंचासरोरें।
फलोधी थंभणपाश ॥ ती॥५॥ अंतरीक थंजा-
वरो। यमीजरोरें। जीरावलो जगनाथ । ती॥
त्रैलोक्य दीपक देहरो । जात्रा गरे । राणापुरे
रिसहेस । ती॥६॥श्रीनाजोलाई जादवो। गोगी
स्तबोरे ॥ श्रीवरकाणो पाश ॥ती० ॥ नंदीश्वरनां.
देहरा । वावन नलारे। रुचक कुंगले चार चार॥ती.
॥७॥ शाश्वती अशाश्वती। प्रतिमा उतीरे । स्वर्ग
मृत्यु पाताल ॥ ती० ॥ तीरथ जात्राफल तिहां।
होजोमुज श्हारे। समय सुंदरकहे एम॥ती॥6॥
अथ श्री पार्श्वजिन स्तवन ।
जय २ श्रीजिन राय । जग नन अन्तर जामी।
तारण तरण जिहाज । परमातम परिणामी ॥१॥
६६. ॥ मात्रपूना ॥ परम पुरुष परमेस । परमानंद प्रधान । परम प्रकाश विसेस । निरमल झान निधान ॥२॥ जगपति पा स जिणंद । प्रज्जु तुम हो उपगारी । सुनिये सेवक जान । औसी अरज हमारी ॥३॥ मोह महामद जूनि । में वहुकाल गमायो। निज परजाव विवेक। सुझसुभाव नपायो॥४॥ निरमल चेतन भाव । कर्म कलंकित कीनो। ताकारण गुण ठोडि। पर श्रो गुण चित दीनो ॥ ५ ॥ निज अवगुण सुणिकान। दिलमें रोस नराजं । अठता निज गुणगान । सुः निवैकुं उमाई ॥ ६॥ आश्रव पांचे असुद्धा दिलसे दूर न जावै । कुमति कदाग्रह जोग । समता सुद्ध न आवै ॥ ७ ॥ अव कतु पुण्य संयोग । प्रनु तुझ मुसा देखी। सुफ अध्यातम लीन । नाव असुझ उवेखी ॥ ८॥ निरखि प्रचयि । मनमें आनंद पाऊं । गाऊं तुजगुणग्राम।देव अवर नवि चाहुंगा करुणाकरि प्रजुमुज । आतम निरमल कीजै । सुद्ध दसा प्रगटाय । मोह विकलता बीजै ॥ राजवंश निजपद सेव । प्रजु सेवककुं दीजै। श्री जिन शक्ति पसाय । सुमति बिलाश वरीजै ॥ ११॥ इति श्री पार्श्वजिन स्तवनं ॥४॥ अथ श्रीमहाबीरजिन बंद ॥ सेवो वीरने चित्तमां नित्यधारो।अरिक्रोधनें म- नथी दुरवारो। संतोष वृत्ती धरो चित्तमादि । राग -- ॥स्तात्रपूजा॥ पथी दूर थाओ उछांहि ॥ १॥ पड्या मोहना पा- समां जेह प्राणी। शुद्ध तत्वनी वात तेणें न जाणी मनु जन्म पामी वृथा कां गमोठगे । जैन मार्ग मी जुलाकां नमोगे ॥शाअलोजी अमानी निरागीत- जोगे। सलोनी समानी सरागी जजोजो। हरी ह. रादि अन्यथी शुं रमोछो । नदी गंग मूकी गलीमा पडोगे ॥३॥ केश् देव हायें असि चक्र धारा । केश देव घाले गले रुममाला । केश देव उत्संगै राखे वामा । केश देव साथें रमें बूंद रामा ॥४॥केश्देव जपे ले ई जपमाला । केश्मासनही महाविकराला! के योगिणी जोगिणी जोगरागें। के रुजाणीग- गनो होम मांगे ॥ ५॥ इसा देव देवी तणी आश राखे । तदा मुक्तिनां सुःखने केम चाखे । जदा लो- जना थोकनो पार नाव्यो । यदामधनोविंधुओ म- मानाव्यो॥६॥जेह देवसांपापणीथाश राखे। तेह पिमर्ने मन्नशुं लेथ चाखे।दोन हीननी नीम ते केम नाजे । फुटो ढोस होये कहो केम वाजे ॥ ७॥थरे मूढ नाता जो मोक्ष दाता।अलोनी प्रजूने नजो विश्वख्याता । रत्ल चिंतामणि सारिखो एह साचो। कलंकी काचना मिशुं मत राचो॥७॥ मंद बुद्धी जेह प्राणी कहेछ। सवि धर्म एकत्व चूलो जमठे। . काहां सर्पवाने कीहां मेरु धीरं। कीड़ा कायराने कीहां शूरवीरं ॥ ॥ ॥ कीहां स्वर्णधावं कीहां कुंज- ॥ नात्रपूजा॥ आधार ॥ जि०॥३॥राय ने रंक सरिखा गणेरे। उद्योतें शशि सूर । गंगाजल ते विहु तणारे। ताप करे सवि दूर ॥ जि० ॥ ४॥ सरिखा सहुने तार- वा रे। तिम तुमे दो महाराज । मुजशुं अंतर किम करो रे। बांह ग्रह्यानी लाज ॥ जि० ॥५॥ मुख देखी टीj करे रे । तेनवि होय प्रमाण । मुजरो साने सवि तणो रे । साहिव तेह सुजाण ॥ जि० ॥ ६॥ वृषनलंछन माता सत्यकी रे। नंदन रुकमणी कंत । वाचक जश श्म वीनवे रे । जय नंजन नग वंत ॥ जि.॥७॥ इति ॥ अयश्रीराणकपुरजीतुं स्तवन। श्रीराणपुरो रलीयामपुंरे लाल । श्रीआदीसर देव । मन मोड्युरे । उत्तंग तोरण देहरुंरे ला ॥ नि रखीजें नित्यमेव ॥ म०॥ १॥ अजवीश मंगप चिहुं दिशेरे ला ॥ चउमुख प्रतिमा चार ॥ म ॥ त्रि लुवनदीपक देहरैरे ला ॥ समोवम नहीं संसार ॥ म॥श्री० ॥२॥ देहरी चोराशी दीपतीरे ला॥ मांड्यो अष्टापद मेर ॥ म०॥ नले जुदात्या नोंय- रारे ला ॥ सूतां ऊठी सवेर ॥ ॥ श्री॥३॥ देश जाणीतुं देहरुरे ला॥ मोटो देशमेवाम॥मा लख्ख नवाणुं लगावियारे ला ॥ धन धन्नो पोर- वाम ॥ म० ॥ श्री० ॥ ४ ॥ खरतर वसई खांत- शुरे लाण ॥ निरखंतां सुख थाय ॥ म० ॥ पांच
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