Central Institute For Higher Tibetan Studies, Sarnath
Itibuttak
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इतिवृत्तक
[ मृल पालि का अविकल हिन्दी अनुवाद ]
अनुवादक
भिक्षु धर्मरक्षित
प्रकाशक
महाबोधि सभा,
सारनाथ, बनारस
प्रथम संस्करण
]
बुन्द्राब्द २४१६
[
मूल्य ॥
प्रकाशक
भिक्षु एम० संघरत्न
मंत्री,
महाबोधि सभा, सारनाथ, बनारस
प्रथम-संस्करण
बुद्धाब्द २४९९
सन् १९५६
मुद्रक
याज्ञवल्क्य
ममता प्रेस, कबीरचौरा, बनारस
समर्वगा
जो बचपन से ही बुद्धमूर्ति की महिमा सुनाया करते थे,
जिन्हें तथागत की परनिर्वाण-भूमि बहुत प्यारी
श्री, जो अपने अनुज को भिक्षु-रूप में
देखकर आनन्द-विभोर हो उठते थे और
जिन्होंने माता-पिता को भाग्यशाली
कहते हुए अपनी आँखें सदा
के लिये मूंद ली थीं,
उन्हीं अग्रज श्री
तपसी सिंह
की स्मृति
में
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'अप्पमादेन सम्पादेथ' श्रामुख नाम 'इतिवृत्तक' प्रिपिटक के अन्तर्गत सुत्तन्त पिटक के खुदक निकाय का चौथा ग्रन्थ है, जिसका शाब्दिक अर्थ है - ऐसा कहा गया । मैंने पहले सोचा था कि इसका हिन्दी-करण करके 'बुद्धने ऐसा कहा' अथवा 'बुद्धवानी' नाम रख दें, किन्तु शाद में इस विचार को छोड़ दिया और परम्परागत नाम को ही रखना पसन्द किया। श्री जस्टिन हटले मूर एम. ए., पी. एच. डी. ने कोलम्बिया विश्वविद्यालय की ओर से सन् १९०८ में प्रकाशित अपने 'इतिवृत्तक' के अनुवाद-ग्रन्थ का नाम बुद्धवाणी (Sayings of Buddha) ही रखा है। शैली इस ग्रन्थ में चार निपात हैं, जिनमें पहला, दूसरा और तीसरा क्रमशः ३, २ और ५ वर्गों में बंटे हुए हैं। चौथे निपात में वर्ग-विमा- जन नहीं है। इतिवुत्सक के निपात अंगुसर निकाय की भाँति बर्षित विषय की बढ़ती संख्या के क्रम से रखे हुए सुत्तों वाले हैं । इस ग्रन्थ में आये हुए रुन सुत्तों की संख्या ११२ है। इस ग्रन्थ में भगवान् की छोटी-छोटी उक्तियों का संग्रह है, जो 'वुतं' हनं भगवता, वुत्तमरहताति मे सुतं' ( = भगवान् ने यह कहा, महत् ने यह कहा-ऐसा मैंने सुना) से प्रारम्ब होता है और अन्त में । 'अयम्पि प्रत्यो वुत्तो भगवता इति मे सुतन्ति' (= यह भी बात भगवान् द्वारा कही गई-ऐसा मैंने सुना) वाक्य के साथ सूत्र समाप्त होते हैं। ऐसा जान पड़ता है कि मानो इन उक्तियों की सच्चाई को प्रगट करने के लिए बार-बार विश्वास दिलाया गया है कि ये भगवान् बुद्ध द्वारा ही कही गई हैं। यह गद्य-पद्य-मय ग्रन्थ बड़ा ही सुन्दर और हृदयग्राही है । इसकी शैशी एवं विषयों का क्रम ऐसा है, जो याद करने वालों तथा भाणवार क्रम से पाठ करने वालों के लिए बड़ा उपयोगी है। पहले परिच्छेद ( = निपात ) में एक-एक बातों का वर्णन है, दूसरे में दो-दो, तीसरे में तीन-तीन और चौथे में चार-चार । उदाहरण-स्वरूप पहले परिच्छेद में कहा गया है:- "ऐसा मैंने सुना, भगवान् ने यह कहा- 'भिक्षुत्रो ! एक बात को छोड़ो। मैं तुम्हारे अनागामी होने का जामिन होता हूँ। किस एक बात को ? भिक्षुओ! लोभ-इस एक बात को छोड़ो। मैं तुम्हारे अनागामी होने का जामिन होता हूँ।" भगवान् ने यह बात कही। वहाँ यह इस प्रकार कहा जाता है. "जिस लोभ से लोभी होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस लोभ को योगी लोग भली प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़कर फिर कभी इस संसार में नहीं पाते।" यह भी बात भगवान् ने कही। ऐसा मैंने सुना । दूसरे परिच्छेद में :- "भिक्षुमो ! दो बातों से युक्त व्यकि खाये को बाखने के समान नरक में पड़ता है। किन दो ? बुरे शीख और बुरी दृष्टि ।"....
३ तीसरे परिच्छेद में :- "भिक्षुप्रो! ये तीन पाप के मूल हैं। कौन तीन ? लोभ पाप का मून है, द्वष पाप का मूल है, मोह पाप का मूल है। भिक्षुश्रो ! ये तीन पाप के "अपने भीतर उत्पन्न लोभ, द्वेष और मोह पाप-चित्तवाले व्यक्ति की वैसे ही हिंसा करते हैं, जैसे कि केले के वृक्ष की उसका फल ।" हैं।"... चौथे परिच्छेद में :- - "भिक्षुओ ! ये चार अल्प, सुलभ और निर्दोष हैं। कौन चार ? मिक्षुषो! पांचकूल (= मार्ग श्रादि में गिरे हुए वन-खण्डों को सीकर बनाया हुआ) चीवर, भिवा माँग कर खाना, वृक्ष-मूल (-पेड़ों के नीचे रहना), पूतिमूत्र (= गो-मूत्र) भिषुप्रो ! जब भिक्षु अल्प और सुलम से सन्तुष्ट होता है, तो उसका यह एक श्रामण्य-अंग होता है-ऐसा मैं कहता हूँ।".... "जो निर्दोष, अल्प और सुलभ से सन्तुष्ट है, शयन-श्रासन, चीवर और खाने-पीने के लिए जिसे चित्त में परेशानी नहीं है, जो दिशाओं में नहीं टकराता (अर्थात् सन्तुष्ट होता है ), तो श्रमण-भाव के अनुरूप जो धर्म बतलाये गये हैं, वे उस सन्तुष्ट अप्रमादी भिक्षु को प्राप्त होते हैं।" इस प्रकार परिच्छेदों में वर्णित एक-एक, दो-दो, तीन-तीन और चार- चार बातों का तारतम्य अपने-अपने स्थान पर बना रहता है और भागक अथवा याद करने वाला व्यक्ति मजे में उनका पाठ करता चला जाता है। प्राचीन काल में सम्पूर्ण त्रिपिटक भाणक-परम्परा से कंठस्थ किया जाता था और भाणक-परम्परा के कारण ही वह भिक्षुओं को कंठस्थ रहा। संगीतिकारक महास्थविरों ने भाणकों की सुविधा के अनु- सार ही इस पूरे ग्रन्थ को इस प्रकार के परिच्छेदों (= निपातों) में विभक्त किया। आज हम जो भी सोचें या कहें, किन्तु इस वर्गीकरण का एक विशेष महत्व है। इसीलिये तो अंगुत्तर-निकाय-जैसे बड़े अन्य को भी 'इतिवुत्तक' की ही भाँति ग्यारह निपातों में विभक्त किया गया है। समानता 'इतिवृत्तक' में आये हुए अनेक सूत्र अंगुत्तर निकाय, संयुत्त निकाय, धम्मपद और पुग्गलपम्मत्ति में मिलते हैं। यथाः- इतिवृत्तक अंगुत्तर निकाय 1. पसाद सुत्त ३.५.१ [ तीन अग्रप्रसाद] पसाद सुत्त ४.४.४ २. अत्तारि मुत्त ४.२ [चार सुलभ चीज़े] चत्तारि सुत्त ४.३.७ ३. तण्डा सुस्त ५.६ तृष्णा से ही चक्कर ] तरहा सुत्त ४.१.२. ४.सम्पन्न सुत्त ४.१२ [शील से युक्त होकर विहरो सम्पन्न सुरः ।...२ ५. लोक सुत्त ४.१३ 'बुद्ध' तथागत क्यों कहलाते हैं ? लोक सुन४.३.३, ६चर सुत्त ४.११ निर्वाण कौन पाता है ?] ७. पुरिम सुत्त ४.१० पार गया व्यक्ति] पुरिम मुस ४.०.३ ८. कुहना सुक्तः ४.९ वे बुद्ध को चाहने वाले हैं] कुहना मुक्त ४.३.६ ९. ग्रहा सुत्त ४.७ माता-पिता ही ब्रह्मा है] ब्रहा मुत्त ३ ४.५ १०. इन्द्रिय सुत्त ३.२.३ [ तीन इन्द्रियों ] मेव मुध ३.४.५ १. दान सुत्त ३.५.६ [ धर्मदान श्रेष्ठ है] दान सुरा २.३.२.१ १२. धम्म सुत ३,५.१० विद्य बाह्मण कौन है ?] तेविज मुक्त ३.१.८ १३. सान सुत्त ४.३ [पाश्रवों काय कैसे?] सेम्ब मुस ..४.५ और ४.२.३ इतिवुसक संयुत्त निकाय १४. मूलधातु मुस ३... [पाप की जड़ पुरिस सुत्त ३.१.२ १५. अद्धा सुत्त ३.२.४ [ तीन काल ] भद्धा सुत्त १.२.१८ १६. अबुटिक सुत्त ३.३.६ तीन प्रकार के व्यक्ति ] इस्पत्य सुत्त ३.३.४ इतिवृत्तक धम्मपद १७. धम्म मुत्स ३.५.१० [विद्य ब्राह्मण कौन है ? गाथा ४२३ १८. तयहा सुत्त ४.६ [तृष्णा से ही चक्कर] गाथा ३५२ इतिवृत्तक पुग्गलपञ्बत्ति १९. सोल सुत्त ४.५ [ग्नका दर्शन भी लाभदायक है] चतुक्क निदेसो ४.२३ अंगुचर निकाय के कतिपय सूत्र तो अक्षरशः इतिवुराक से मिलते हैं, किन्तु अन्य ग्रन्यों के सूत्रों एवं गाथाओं के कुछ अंश मात्र ही । त्रिपिटक में स्थान ऊपर मैंने लिखा है कि यह खुदक निकाय का चौथा ग्रन्थ है, किन्तु जो लोग त्रिपिटक से परिचित नहीं हैं, उन्हें समझने में कठिनाई होगी। भगवान बद्ध के सम्पूर्ण उपदेशों के संकलन का नाम 'त्रिपिटक' ( तिपि- टक) है । त्रिपिटक का अर्थ है नीन पिटारी अथवा नीन मंजूपा । भगवान् बुद्ध के परिनिर्वाया के पश्चात् जब राजगृह में प्रथम संगीति हुई, तब संगीति-कारक महत् भिक्षुओं ने सम्पूर्ण बुद्ध-वचन का संगायन कर उन्हें तीन भागों में विभक्त कर दिया और उनका नाम त्रिपिटक रखा। त्रिपिटक में से तीन पिटक हैं--मुत्त-पिटक, विनय-पिटक और अभिधम्म- पिटक । इनमें सुश-पिटक दीघ-निकाय, मज्झिम-निकाय, संयुत्त निकाय, भंगुत्तर निकाय और बुद्धक निकाय-इन पाँच निकायों में विभक्त है। सुक निकाय में पन्द्रह अन्ध सम्मिलित है--बुहकपाठ, धम्मपद, उदाम, ६ इतिवुत्तक, सुत्तनिपात, विमानवत्थु, पेतवत्यु, थेरगाथा, थेरीगाथा, जातक, निद्देस, पटिसम्भिदामग्ग, अपदान, बुद्धवंस और चरियापिटक । विनय-पिटक में पाँच ग्रंथ हैं -पाराजिका, पाचित्तिय, महावमा, चुल्लवया और परिवार । अभिधम्म-पिटक में सात ग्रन्थ हैं-धम्मसंगणी, विभंग, धातुकथा, पुमालपमसि, कथावस्थु, यमक और पट्टान । इस तरह इतिवृत्तक त्रिपिटक के सुत्त-पिटक के खुइक-निकाय के पन्द्रह ग्रन्थों में से एक है। महत्व इस ग्रन्थ का पालि बौद्ध साहित्य में अपना एक महत्वपूर्ण स्थान है । इसकी वर्णन शैली अपनी विशिष्टता के कारण ही बौद्ध धर्म के नव अंगों में से एक मानी जाती है। सम्पूर्ण त्रिपिटक अंगों के स्वरूप से नव भागों में विभक्त किया जाता है, जिसे 'नवांग बुद्ध वचन' कहते हैं । यह त्रिपिटक का प्राचीन वर्गीकरण है। भगवान् बुद्ध के समय में यही वर्गीकरण प्रचलित था। भगवान् ने स्वयं मज्झिम निकाय के अल- गडूपम सुरा ( २२) में कहा है-“यहाँ भिभो ! कोई-कोई मोघ पुरुष सुत, गेय, व्याकरण, गाथा, उदान, इतिवृत्तक, जातक, अद्भुत धर्म और वैदल्य को धारण करते हैं। वे उन धर्मों को धारण करते हुए भी उनके अर्थ को प्रज्ञा से परखते नहीं हैं।" 'इसिवुत्त' ने भगवान् की विशेष एवं लघु उक्तियों के लिए ही नवांग में महत्वपूर्ण स्थान पाया है। इसके सूत्र तथा उक्तियाँ बड़ी सुन्दर और मार्मिक हैं। इनमें नोभ, द्वेष, मोह, क्रोध, मान, शीख, मैत्री, समाधि, प्रज्ञा, निर्वाण आदि के विषय में जो बुद्ध-वचन संग्रहीत हैं, वे व्यक्ति को ऊपर उठाने वाले तथा मुक्ति की ओर ले जाने वाले हैं। जैसे, भगवान् लोभ के विषय में कहते हैं:- "भिक्षुशो! एक बात को छोड़ो। मैं तुम्हारे अनागामी होने का जामिन होता हूं। किस एक बात को ? भिक्षुश्रो ! लोभ-इस एक बात को छोड़ो। महाकारुणिक भगवान् ने स्वयं अपने को जामिन बना कर कैसे मार्मिक वचन कहे हैं ! इसी प्रकार इस ग्रन्थ में आये हुए सभी सुत्त तथागत की अनुपम शिक्षा से पूर्ण हैं। कुछ दिनों पूर्व मैंने जिज्ञासुओं के बार-बार के आग्रह पर इतिवृत्तक के अविकल अनुवाद को 'धर्मदूत' में प्रकाशित किया था, किन्तु उसके पश्चात् भी लोगों का प्राग्रह बना रहा कि इसे ग्रन्थ-रूप में प्रकाशित किया जाय । यह उनके आग्रह का परिणाम है। मैंने ग्रन्थ में सुत्तों की संख्या तो दी है, किन्तु शीर्षक विषयानुसार रख दिये हैं, जिससे पाठक को अरुचि न उत्पन्न हो । अन्त में पारिभाषिक एवं गम्भीर शब्दों की बोधिनी भी दे दी है। सारनाथ, बनारस कार्तिक पूर्णिमा -भिक्षु धर्मरक्षित बुद्धान्द २४३६
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विषय-सूची पहला परिच्छेद पहला वर्ग पृष्ठ १ १ २--द्वेष ३-मोह .... ४ क्रोध Hon- अमरव २ .... .... ६. घमण्ड ३ - ३ ३ -सबका त्याग -अभिमान का त्याग -लोम का त्याग -द्वेष का त्याग . दुसरा वर्ग --- १ -मोह का त्याग २--क्रोध का त्याग ३ --प्रमरख का त्याग ४-सबसे बड़ा ढक्कन ५-सबसे बड़ा बन्धन ६ - उचित मनन ६ ... ...
२ ट .... ७-श्रच्छी मिताई ८-संघ की फट ९. सघ का मेल -१०-बुरा चित्त "" ... ... तीसरा वर्ग १-पवित्र चित्त २-पुण्य सुख का ही नाम है ३-पुण्य-कार्य में देर न करना ४-हड्डियों का कंकाल ५-झठ बोलना .... .... १ ६-बॉटकर खाना ... ७---मैत्री-भावना .... --- दूसरा परिच्छेद पहला वर्ग . . ... -इन्द्रिय-संयम २-इन्द्रिय-संयम ३--सन्ताप देने वाली बातें ४-हर्षित करने वाली बातें ५--बुरा शील ६ -मला शील -सकोच 4-बहकाने के लिये नहीं ९-लाभ-सत्कार के लिये नहीं १०-संवेग से मुक्ति ...
३ दूसरा वर्ग पृष्ठ ... १९ ... ... ४ २० ... .... १-दो वितर्क २-दो प्रकार के उप देश ३- -अच्छे-बुरे के अगुआ -बुद्ध की स्पृहा ५-लज्जा और संकोच से लोक का पालन ६-निर्वाण ७-दो प्रकार का निर्वाया -एकान्तवास करना ९-गुणां से युक्त होकर विहरना ५०-सोने वाले उठो! ११-ये नरकगामी हैं १२-दो मिथ्या धारणायें २२ .... ... २३ .... २५ तीसरा परिच्छेद पहला वर्ग - २८ .--. -पाप की जड़ २-तीन धातुयें ३-तीन वेदनायें ४-तीन वेदनायें ५---तीन खोजें ६-तांन खोजें ७-तीन श्राश्रव २९ .. Mammu ३० पृष्ठ ... ९-तीन तृष्णाय -मार के राज्य से बाहर निकलना दूसरा वर्ग ... B.. ३२ ३२ ३३ ... ३३ ३३ ३३ ३ १-पुण्य के तीन साधन २-तीन चक्षु ३-तीन इन्द्रियाँ ४-तीन काल ५-तीन दुराचार ६-तीन सदाचार ७-तीन पवित्रताएँ ८-मौन-भाव 8-मार के बन्धन से मुक्त -समुद्र के पार जाना तीसरा वर्ग १-मिथ्या धारणा से नरक २-सम्यक दृष्टि से स्वर्ग ३-निस्तार ४-निर्वाण शान्ततर है ५-तीन प्रकार के पुत्र ६-तीन प्रकार के व्यक्ति ७-शील-पालन से सुख ८-शरीर नाशवान् 8-स्वभाव के अनुसार ही मेल-जोल १०-तीन हानिकर बातें ३५ ... ... है ... ....
५ चौथा वर्ग पृष्ठ ... ४२ ... .... ४७ ... है ! ३-अकुशल वितर्क २-नरक में पड़ते देखा है ! ३-देव-वाणियाँ ४-च्युत होने के लक्षण ५-बहुजन के हितैषी ६-अशुभ-भावना ७-धार्मिक के लक्षगा ८-अल्छे-बुरे वितर्क ९-ये भीतरी शत्रु १०-देवदत्त नारकीय है ! पाँचवाँ वर्ग १-तीन अग्रप्रसाद २-लोहे का सप्त गोला खाना उत्तम है! ३-वह मुमसे दूर ही है ! ४-तीन अग्नियाँ ५. चक्कर रुक गया ! ६-काम की उत्पत्तियाँ ७- संसार पार हो गये हैं ! ८-उत्तम पुरुष कौन है ? ९-धर्मदान श्रेष्ठ है १०-अविध ब्राह्मण कौन है ? चौथा परिच्छेद १-युद्ध अमुत्सर वैद्य है २-बार सुलभ चीज ... ... ... ... .... .... RAF .. ... ....
६
पृष्ठ
....
६०
...
....
1-प्राश्रवों का क्षय कैसे
१-वे ही असली श्रमण हैं ?
५-उनका दर्जन भी लाभदायक है....
६-तृष्णा से ही यह चक्कर
७-माता-पिता ही ब्रह्मा हैं।
८-परस्पर सहयोग से मुक्ति
8-वे बुद्ध को चाहने वाले हैं
-पार गया व्यक्ति
११-निर्वाण कौन पाता है ?
१२-शील से युक्त होकर विहरो
१३-बुद्ध तथागत क्यों कहलाते हैं?....
...
....
...
....
....
....
इतिवृत्तक
पहला निपात
पहला
वर्ग
१. राग
ऐसा मैंने सुना, भगवान् ने यह कहा-भिक्षुओ! एक बात को
छोड़ो। मैं तुम्हारे अनागामी' होने का जामिन होता हूँ किस एक
बात को ? भिक्षुओ ! लोम---इस एक बात को छोड़ो। मैं तुम्हारे अना-
गामी होने का जामिन होता हूँ।
भगवान् ने यह बात कही। वहाँ यह इस प्रकार कहा जाता है.
"जिस लोभ से लोभी होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस
लोम को योगी लोग भजी प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़कर
फिर कभी इस ससार में नहीं पाते।"
यह भी वास भगवान ने कही। ऐसा मैंने सुना ।
-
२. द्वेष
...भिक्षुभो ! एक बात को छोड़ो । मैं तुम्हारे अनागामी होने का
!
* जिन शब्दों के साथ १,२ आदि अंक मुद्रित हैं, उनको व्याख्या
'बोधिनी' में की गई है। कृपया अन्य के अन्तिम भाग में देखें।
( २ )
जामिन होता हूँ। किस एक बात को ! भिक्षुभो ! द्वेष-इस एक बात
को छोड़ो।
"जिस द्वेष से बुरे मनवाले होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं,
उस द्वेष को योगी लोग भली प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़
कर फिर कभी इस संसार में नहीं पाते".......
३. मोह
भिक्षुश्रो ! एक बात को छोड़ो। मैं तुम्हारे अनागामी होने का
जामिन होता हूँ। किस एक बात को ? भिक्षुनो! मोह-इस एक बात
को छोड़ो। ..
"जिस मोह से मूढ़ होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस मोह
को योगी लोग भली प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़कर फिर
कभी इस संसार में नहीं आते।".......
४. क्रोध
भिक्षुश्रो ! एक बात को छोड़ो।...किस एक बात को
भिक्षुश्रो ! क्रोध-इस एक बात को छोड़ो
"जिस क्रोध से क्रोधी होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस
क्रोध को योगी लोग भली प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़कर
फिर कभी इस संसार में नहीं आते।"....
५ अमरख
भिक्षुओ! एक बात को छोड़ो। .. किस एक बात को?
भिक्षुभो ! म्रप (= भामर्ष, माख, अमरख)--इस एक बात को
छोड़ो।...
"जिस अमरख से अमरखी होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं,
.......
( ३ ) - ६ . उस अमरख को योगी लोग भली प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़कर फिर कभी इस संसार में नहीं पाते।" घमंड भिक्षुओ! एक बात को छोड़ो।....किस एक बात को? भिक्षुओ! मान( = धमण्ड)-इस एक बात को छोड़ो।... "जिस मान से मत्त होका प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस मान को योगी लोग भला प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़कर फिर कभी इस संसार में नहीं आते।" ७ सब का त्याग भिक्षुश्रो ! सभी ( अच्छी बुरी बातों) को भली प्रकार न जानते हुए, उनसे मन को न हटाते हुए, उन्हें न छोड़ते हुए (कोई भी आदमी) दुःख को खत्म करने में समर्थ नहीं है। भिक्षुप्रो ! सभी ( अच्छी-बुरी बातों) को भली प्रकार जानते हुए, उनसे मन को हटाते हुए, उन्हें छोड़ते हुए ही ( कोई भी आदमी) दुःख को खत्म करने में समर्थ हो सकता है।... "जो सबको सब प्रकार से जानकर सभी बातों में राग नहीं करता है, वही सबको जानते हुए सारे दुःख का अतिक्रमण कर गया है।" ८. अभिमान का त्याग भिक्षुप्रो ! मान को भलो प्रकार न जानते हुए, उससे मन को न उसे न त्यागते हुए ( कोई भी प्रादी ) दुःख को खत्म करने में समर्थ नहीं है । भिक्षुओ! मान को भली प्रकार जानते हुए, उससे मन को हटाते हुए, उसे छोड़ते हुए हो ( कोई भी श्रादमी) दुःख को खाम करने में समर्थ हो सकता है।... हटाते हुए, ( ४ ) "मान से युक्त, मान से बंधे हुए यह प्राणी संसार में लगा हुआ है । जो मान को नहीं छोड़ते हैं वे पुनः संसार में आते हैं किन्तु जो मान को छोड़, मान को खत्म कर विमुक्त हो गए हैं, वे मान के बन्धन को तोड़ने वाले सारे दुःख का अतिक्रमण कर गये हैं।" ६. लोभ का त्याग भिक्षुओ ! लोभ को भली प्रकार न जानते हुए, उससे मन को न हटाते उसे न त्यागते हुए ( कोई भी श्रादमी) दुःख को खत्म करने में समर्थ नहीं है। भिक्षुश्रो ! लोभ को भली प्रकार जानते हुए, उससे मन को हराते हुए, उसे छोड़ते हुए ही ( कोई भी आदमी) दुःख को खत्म करने में समर्थ हो सकता है।... "जिस लोभ से लोभी होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस लोभ को योगी लोग भली प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़ कर फिर कभी इस संसार में नहीं पाते ।' । -- " १०. द्वेष का त्याग भिक्षुश्री ! द्वेष को भली प्रकार न जानते हुए, उससे मन को न हटाते उसे न छोड़ते हुए, कोई भी आदमी) दुःख को स्वरम करने में समर्थ नहीं है। भिक्षुओ! द्वप को भली प्रकार जानते हुए, उससे चित्त को हटाते हुए, उसे छोड़ते हुए ही ( कोई भी श्रादी) दुःख को खत्म करने में समर्थ हो सकता है । "जिस द्वेष से बुरे मनवाला होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस देष को योगी लोग भली प्रकार जानकर छोड़ देते है। ये उसे छोड़कर फिर कभी इस संसार में नहीं पाते।"
~
दूसरा वर्ग
।
१. मोह का त्याग
भिक्षुत्रो ! मोह को भली प्रकार न जानते हुए, उससे मन को न
हटाते उसे न छोड़ते हुए ( कोई भी आदमी ) दुःख को खत्म करने
में समर्थ नहीं है । भिक्षुओ ! मोह को भली प्रकार जानते हुए, उससे
चित्त को हटाते हुए, उसे छोड़ते हुए. हो ( कोई भी आदमी) दुःख
को
खस्म करने में समर्थ हो सकता है।....
"जिस मोह से मूढ़ होकर प्राणो दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस मोह
को योगी लोग भली प्रकार जान कर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़ कर
फिर कभी इस लोक में नहीं आते।"
२. क्रोध का त्याग
।
भिक्षुश्रो ! क्रोध को भली प्रकार न जानते हुए, उससे चित्त को न
हटाते हुए, उसे न छोड़ते हुए ( कोई भी श्रादी) दुःख को खत्म करने
में समर्थ नहीं है । भिक्षुश्रो ! क्रोध को भली प्रकार जानते उससे
चित्त को हटाते हुए, उसे छोड़ते हुए ही ( कोई भी आदमी ) दुःख को
खत्म करने में समर्थ हो सकता है।....
"जिस क्रोध से क्रोधी होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस
क्रोध को योगी लोग भली प्रकार जानकर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़कर
फिर कभी इस संसार में नहीं पाते।"
३. अमरख का त्याग
भिक्षुओ! अमरख (= माख) को भली प्रफार न जानते
उससे मन को न हटाते हुए, उसे न छोड़ते हुए (कोई भी आदमी दुःख)
( ६ है । ! को खत्म करने में समर्थ नहीं है । भिक्षुओ! अमरख को भली प्रकार जानते हुए, उससे मन को हटाते हुए, उसे त्यागते हुए ही ( कोई भी व्यक्ति) दुःख को खत्म करने में समर्थ हो सकता "जिस अमरख से अमरखी होकर प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं, उस अमरख को योगी लोग भली प्रकार जान कर छोड़ देते हैं। वे उसे छोड़ कर फिर कभी इस संसार में नहीं आते।" ४ सबसे बड़ा ढक्कन भिक्षुश्रो ! मैं दूसरे एक भी (ऐसे ) ढक्कन को नहीं देखता कि जिस ढक्कन से ढंके हुए प्राणी चिरकाल तक दौड़ते और चक्कर काटते हैं, जो कि भिक्षुत्रो ! यह अविद्या का ढक्कन है। भिक्षुश्रो ! अविद्या के ढक्कन से ढंके हुए प्राणी चिरकाल तक दौड़ते और चक्कर काटते हैं।.... "दूसरा एक भी धर्म ऐसा नहीं है जिससे कि ढके दिन चक्कर काटते हैं, जैसा कि मोह से ढंके हुए। जो मोह को छोड़, ( अविद्या रूपी) अन्धकार के समूह को नाश कर दिये हैं, वे फिर चक्कर नहीं काटते, (क्योंकि उसका) हेतु ही नहीं है।" ५ सबसे बड़ा बन्धन भिक्षुत्रो ! मैं दूसरे एक भी ऐसे बन्धन को नहीं देखता कि जिस बन्धन से बँधे हुए प्राणी चिरकाल तक दौड़ते और चक्कर काटते है, जो कि भितुश्रो ! यह तृष्णा का बन्धन है । भिक्षुषो! तृष्णा के बन्धन से ही बंधे हुए प्राणी चिरकाल तक दौड़ते और चक्कर काटते हैं।... "तृष्णा की दोस्ती वाला पुरुष चिरकाल से चक्कर काट रहा उत्पन्न होता और मरता है । वह संसार का अतिक्रमण नहीं कर पाता। तृष्णा दुःख को पैदा करने वाली है-इस प्रकार इसके दोषों को जानकर भिक्षु तृष्णा- रहित, श्रासक्ति को छोड़, स्मृतिमान हो विचरण करे।" हुए प्राणी रातों ! है ( ७ ) ६. उचित मनन भिक्षुत्रो ! अर्हत्व को न प्राप्त हुए शैक्ष्य' भिक्षु के लिए, जोकि सर्वोत्तम कल्याण ( = अर्हत्व ) की कामना करते विहरता है, भीतरी अंग के तौर पर दूसरे एक अंग को भी ऐसा अधिक लाभ दायक नहीं देखता, जैसा कि भिक्षुओ! यह उचित-मनन करना है। भिक्षओ ! उचित-मनन करते पाप को छोड़ता है, पुण्य को बढ़ाता है। ... "शैक्ष्य भिक्षु को उत्तम अर्थ (= अर्हत्व) की प्राप्ति के लिए उचित-मनन के समान अधिक लाभदायक दूसरा कोई धर्म नहीं है । उचित रूप से प्रयत्न करते भिक्षु दुःख-क्षय (= निर्वाण) को प्राप्त कर लेता है।" ७ अच्छी मिताई भिक्षुओ ! अहत्त्व को न प्राप्त हुए शैक्ष्य भिक्षु के लिए, जो कि सर्वोत्तम कल्याण (= अहस्व ) की कामना करते विहरता है, बाहरी अंग के तौर पर दूसरे एक अंग को भी ऐसा अधिक लाभदायक नहीं देखता जैसा कि भिक्षुओ! अच्छी मिताई । भिक्षुओ! अच्छी मिताई वाला भिक्षु पाप को छोड़ता है, पुण्य को बढ़ाता है।... "जो भिक्षु अच्छी मिताई वाला; आज्ञाकारी, गौरवयुक्त, मित्रों की बात मानने वाला, ज्ञान और स्मृति से युक्त होता है, वह क्रमशः सब बम्धनों को नाश कर देता है।" . ८. संघ की फूट भिक्षुओ ! लोक में एक बात पैदा होती हुई बहुत-से लोगों के अहित, दुःख और अनर्थ के लिए पैदा होती है, उससे देव-मनुष्यों को प्रहित होता है, दुःख मिलता है। कौन-सी एक बात ! संघ की फूट । भिक्षुत्रो ! ।
( ८ ) संघ की फूट होने पर परस्पर झगड़े होते हैं, परस्पर डांटना और गाली देनी होती है तथा परस्पर बिलगाव करने होते हैं। ऐसा होने पर अ- श्रद्धालु लोग श्रद्धा नहीं करते और श्रद्धालु लोगों में से भी किसी-किसी का मन फिर जाता है।" "संघ की फूट कराने वाला कल्प-भर नरक में रहने वाला होता है। फूट डालने में लीन, अधार्मिक व्यक्ति निर्वाण के प्राप्ति से बंचित होता है। वह मिलकर रहने वाले संघ को फोड़कर कल्प भर नरक में पकता है।" 8. संघ का मेल भिक्षुश्रो ! लोक में एक बात पैदा होती हुई बहुत से लोगों के हित सुख और अर्थ के लिए पैदा होती है उससे देव मनुष्यों की भलाई होती सुख मिलता है । कौन-सी एक बात ? संघ का मेल । भिक्षुभो ! संघ के मिलकर रहने पर न परस्पर झगड़े होते हैं, न परस्पर डांटना और गाली देनी होती है तथा न परस्पर बिलगाव होता है। ऐसा होने पर अश्रद्धालु लोग श्रद्धा करते हैं और श्रद्धालुओं की श्रद्धा बढ़ती है।" "संघ का मिलकर रहना सुखदायक है। मेल बढ़ाने वाला, मेख करने में लीन, धार्मिक व्यक्ति निर्वाण से बंचित नहीं होता । वह संघ को मिलाकर कल्प भर स्वर्ग में आनन्द करता है।" १०. बुरा चित्त भिक्षुओ ! मैं यहां किसी बुरे चित्तवाले व्यक्ति के चिस को अपने चित्त से समझ कर ऐसा जानता हूँ -यदि यह व्यक्ति इस समय मरेगा तो खाये हुए को रखने के समान नरक में उत्पन्न होगा। सो किस कारण ? मिक्षुश्रो इसका चित्त बुरा है। भिक्षुओ! इसका चिरा बुरा होने के कारण इस प्रकार कोई प्राणी शरीर छूटने पर""नरक में पैसा होता है....
(६) "किसी व्यक्ति को बुरे चित्तवाला जानकर भगवान् बुद्ध ने भिक्षुओं के पास यह बात कही-यदि यह व्यक्ति इस समय मरेगा तो नरक में पैदा होगा, क्योंकि इसका चित्त बुरा है। जैसे किसी चीज को लाकर डाल दे, ऐसे ही यह नरक में उत्पन्न होगा। प्राणी चित्त बुरा होने के के कारण दुर्गति को प्राप्त होते हैं।" तीसरा वर्ग १. पवित्र चित्त भिक्षुत्रो ! मैं यहाँ किसी पवित्र चित्त वाले व्यक्ति के चित्त को अपने चित्त से समझ कर ऐसा जानता हूँ - यदि यह व्यक्ति इस समय मरेगा, तो लाये हुये को रखने के समान स्वर्ग में पैदा होगा। सो किस कारण ? भिक्षुश्रो ! इसका चित्त पवित्र है । भिक्षुत्रो ! चित्त पवित्र होने के कारण इस प्रकार कोई-कोई प्राणी शरीर छूटने पर....स्वर्ग लोक में पैदा होते हैं। .. "किसी व्यक्ति को पवित्र चित्तवाला जानकर भगवान् बुद्ध ने भिक्षुओं के पास यह बात कही ... यदि यह व्यक्ति इस समय मरेगा तो स्वर्ग में पैदा होगा, क्योंकि इसका चित्त पवित्र है। जैसे किसी चीज को लाकर डाल दे, ऐसे ही यह स्वर्ग में पैदा होगा। प्राणो पवित्र चित्त होने के कारण सुगति को प्राप्त होते हैं।" २. पुण्य सुख का ही नाम है भिक्षुषो! पुण्यों से मत डरो । भिक्षुश्रो ! यह पुण्य इष्ट, कान्त, प्रिय, मनाप सुख का ही नाम है। भिक्षुओ! मैं बहुत दिनों तक किए हुए पुण्यों के इष्ट, कान्त, प्रिय, मनाप फल को बहुत दिनों तक भोगने को जानता हूँ। सात वर्षों तक मैत्री-चित्त की भावना करके सात संवर्त' ( १० - पाने वाला, प्रलय) और विवर्त ( = सृष्टि) कल्पों तक इस लोक में नहीं लौटा । भिक्षुओ ! संवर्त ( प्रलय) होने वाले कल्प में आभास्वर' (ब्रह्मलोक ) में होता था और वितर्क (सृष्टि ) होने वाले कल्प में शून्य ब्रह्म-विमान में पैदा होता था। भिक्षुओ! वहां मैं ब्रह्मा, महाब्रह्मा, अभिभू, अजित, सर्वदृष्टा, वशवर्ती होता था। भिक्षुप्रो मैं छत्तीस बार देवेन्द्र शक्र हुआ था। सैकड़ों बार धार्मिक, धर्मराजा; चारों ओर विजय जनपदों में शान्ति स्थापित करने वाला और सात रत्नों से युक्त चक्रवर्ती राजा हुआ था । प्रादेशिक राज्य की कौन बात ? भिक्षुओ ! मुझे यह विचार हुआ-यह मेरे किस कर्म का फल है, कि कर्म का विपाक है' जिससे कि मैं इस समय ऐसा तपस्वी और ऐसा प्रतापी हूँ ? तब भिक्षुश्रो ! मुझे यह विचार हुआ यह मेरे तीन कर्मों का फल है, तीन कर्मों का विपाक है,.....जैसे कि दान का, (इन्द्रिय-) दमन का संयम का ।.... "श्रेष्ठ सुखदायक पुण्य को करे। दान दे, समाचरण करे और मैत्री-चित्त की भावना करे । इन तीनों सुखदायक धर्मों की भावना करके बुद्धिमान ब्यक्ति दुःख रहित सुखलोक [ ब्रह्मलोक ] में पैदा होता है।" ३. पुण्य-कार्य में देर न करना भिक्षुओ! एक बात की भावना करने पर, बढ़ाने पर, वह इस लोक और परलोक दोनों के लिए हितकारक होती है। कौन-सी एक बात? पुण्य करने में प्रमाद न करना । भिक्षुओ! इस एक बात की भावना करने पर, बढ़ाने पर, यह इस लोक और परलोक दोनों के लिये हित- कारक होती है।... "बुद्धिमान लोग पुण्य करने में प्रमाद न करने की प्रशंसा करते हैं। प्रमाद न करने वाला बुद्धिमान व्यक्ति दोनों हितों को प्राप्त करता है, जो %3D १२. कि इस लोक का हित है और जो कि परलोक का हित है। दोनों हितों की प्राप्ति से धीर व्यक्ति 'पण्डित' [ = बुद्धिमान ] कहा जाता है।" ४. हड्डियों का कंकाल भिक्षुओ ! कल्प भर आवागमन के चक्कर में पड़े रहनेवाले एक व्यक्ति की हड्डियों का कंकाल, हड्डियों का समूह, हड्डियों का ढेर इतना ऊँचा होगा जितना कि यह वैपुल्य पहाड़ है, यदि कोई उन्हें जमा करनेवाला हो और वह जमा की हुई नष्ट न हों ।”. "यदि एक कल्प भर एक आदमी की हड्डियां जमा की जाय, तो उनका ढेर पहाड़ के समान हो जाय । महर्षि ने ऐसा कहा है। (और वह भी ढेर) राजगृह के समीप स्थित गृध्रकूट ( पहाड़) के उत्तरवाले वैपुल्य पहाड़ के समान ऊँचा हो जाय । जब श्रादमी भली प्रकार ज्ञान से दुःख से मुक्ति और दुःख की शान्ति की ओर ले जानेवाले आर्य अष्टांगिक मार्ग:-( इनचार ) आर्य सत्यों को देखता है, तब वह अधिक से अधिक सात बार जन्म ले, सांसारिक सब बन्धनों के खत्म होने से का अन्त करनेवाला होता है।" ५. झूठ बोलना भिक्षुत्रो ! जो व्यक्ति एक बात का उल्लंघन कर गया है उसके लिए मैं कोई भी कार्य ऐसा नहीं देखता जो कि वह न कर सके। कौन एक बात ? नो कि भिक्षुओ ! जानबूझ कर झूठ बोलना है।... "एक बात का उल्लंघन कर जो झूठ बोलता है, उस परलोक के चिन्तन रहित पुरुष के लिए कोई पाप ऐसा नहीं है, जो वह न कर सके।" ६ बाँट कर खाना मिनुभो ! यदि प्रायी बाँटकर खाने के फल को ऐसा माने, जैसा ( १२ ) कि मैं जानता हूँ, तो बिना दिए न खायें और उनके चित्त को कंजूसी का मैल न पकड़े । जो उनका अन्तिम कौर हो, उसे भी बिना बांटे न खायें, यदि उनको लेनेवाले हों चूँकि भितुओ ! प्राणी बॉट कर खाने के फल को ऐसा नहीं जानते हैं, जैसा कि मैं जानता हूँ, इसलिए बिना दिये खाते हैं और कंजूसी का मैल उनके चित्त को पकड़े रहता है ।... "यदि प्राणी ऐसा जाने, जैसा कि महर्षि ने बाँटकर खाने के फल को बतलाया है, तो वे कंजूसी के मैल को हटाकर पवित्र मन से समय पर पार्यो को दान दें, जिन्हें कि देने में महाफल होता है। बहुत से दान देने योग्य लोगों को अन्न और दान देकर यहाँ मनुष्य-योनि से च्युत होकर दाता स्वर्ग को जाते हैं। वे स्वर्ग में जाकर वहां इच्छानुरूप प्रान- न्द करते हैं । बाँटकर के खाने के फल को कंजूसी-रहित लोग प्राप्त करते हैं।" ७ मैत्री-भावना भिक्षुप्रो ! जो कोई अच्छी गति प्राप्त कराने वाले पुण्य-कर्म हैं, वे सब मैत्री-चेतोविमुक्ति के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं उतरते, बल्कि मैत्री-चेतोविमुक्ति ही उनसे बढ़कर प्रकाशित होती, दमकती और चमकती है । भिक्षुओ! जैसे जो कुछ तारों का प्रकाश है, वह सब चन्द्रमा के प्रकाश के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं उतरता, बल्कि चन्द्रमा का प्रकाश ही उनसे बढ़कर प्रकाशित होता, दमकता और चमकता है। इसी प्रकार भिक्षुश्रो ! जो कोई अच्छी गति प्राप्त करानेवाले पुण्य-कर्म हैं, वे सब मैत्री-चेतोविमुक्ति के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं उतरते, बल्कि मैत्री-चेतोविमुक्ति हा उनसे बढ़कर प्रकाशित होती, दमकती और चम- कती है। भिक्षुओ ! जैसे वर्षा के पिछले महिने में शरद ऋतु में बादल- रहित विशुद्ध आकाश में चढ़ता हुआ सूर्य श्राकाश में फैले हुये सारे अन्ध- कार को नाश प्रकाशित होता, दमकना, और चमकता है। इसी प्रकार ( १३ ) भिक्षुत्रो ! जो कोई अच्छी गति प्राप्त कराने वाले पुण्य-कर्म हैं, वे सब मैत्री-चेतोविमुक्ति के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं उतरते, बल्कि मैत्री-चेतोविमुक्ति ही उनसे बढ़कर प्रकाशित होती, दमकती और चम- की है। भिक्षुओ ! जैसे रात के बीतने पर उषाकाल में शुक्रतारा प्रकाशित होता, दमकता और चमकता है। इसी प्रकार भिक्षुप्रो जो कोई अच्छी गति प्राप्त कराने वाले पुण्य कर्म हैं, वे सब मैत्री-चेंतोविमुक्ति के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं उतरते, बल्कि मैत्री-चेतोविमुक्ति हो उनसे बढ़कर प्रकाशित होती, दमकती और चमकती है। "जो स्मृतिमान अप्रमाण मैत्री की भावना करता है, उससे संयोजन निर्वाण को देखते हुए दुर्बल होते हैं । वह यदि एक भी प्राणी से शुद्ध- चित्त से मैत्री करता है, तो उसी से यह पुण्यवान् होता है और यदि सब प्राणियों पर मन से अनुकम्पा करता है तो वह आर्य बहुत पुण्य कमाता है। जो राजर्षि प्राणियों से भरे पृथ्वी को जीतकर दान देते हुए विचरण किए और अश्वमेध, पुरुपमेध सम्मापास, वाजपेय और निरर्गल ( = सर्वमेध ) को किये, वे मैत्री-चित्त की भावना करने के सोलहवें भाग के बराबर भी ( फल का) अनुभव नहीं किये । जैसे कि चन्द्रमा के प्रकाश के समक्ष सब तारा-समूह । जो न हनन करता न हिंसा करता है और न बरबाद करता है तथा सभी प्राणियों से मैत्री करता है, उसे किसी से भी दुश्मनी नहीं होती।" , दूसरा निकात पहला वर्ग वह दुःख , १. इन्द्रिय संयम भिक्षुप्रो ! दो बातों से युक्त भिक्षु इसी जन्म में दुःख, पीडा, परेशानी और सन्ताप के साथ बिहरता है तथा शरीर छूटने पर उसकी दुर्गति जाननी चाहिये । किन दो ? इन्द्रियों में संयम न करना और भोजन करने में मात्रा न जानना ।.. "जिस भिक्ष के चक्षु, स्रोत, घ्राण, जिह्वा, काय ओर मन-इतने द्वार गुप्त नहीं हैं, भोजन करने में मात्रा नहीं जाननेवाला और इन्द्रियों में असंयमी है, पूर्वक शारीरिक दुःख तथा चैतसिक दुःख को प्राप्त होता है उस प्रकार का ( भिक्षु ) जलते हुये काया और जलते हुये चित्त से दुःखपूर्वक विहरता है। २. इन्द्रिय संयम भिक्षुओ ! दो बातों से युक्त भिक्षु इसी जन्म में सुग्य, पीड़ा-रहित, परेशानी रहित और सन्ताप रहित विहरता है तथा शरीर छूटने पर.... उसकी सुगति जाननी चाहिए । किन दो ? इन्द्रियों में संयम करना और भोजन करने में मात्रा जानना ।... "जिस भिक्ष के चक्षु, स्रोत, घ्राण, जिह्वा, काय और मन-इन के द्वार भली प्रकार गुप्त हैं, भोजन करने में मात्रा जानने वाला और इन्द्रियों में संयमी है। वह सुख पूर्वक शारीरिक सुख तथा चैतसिक सुख को प्राप्त होता है । उस प्रकार का [भिक्ष ] न जलती हुई काया और न जलते हुए चित्त से सुखपूर्वक विहरता है।"
( १५ ) ३. संताप देनेवाली बातें भिक्षुश्रो ! दो बातें संताप पैदा करने वाली हैं । कौन दो १ भिक्षुश्रो! यहाँ कोई उत्तम कार्य न किया, पुण्य न किया। भय की रक्षा न किया, और पाप कर्म किया हुआ होता है, वह मैंने उत्तम कार्य नहीं किया' सोच संताप करता है, मैंने पाप किया' सोच संताप करता है। भिक्षुश्री ! ये दो बातें संताप पैदा करने वाली हैं "शारीरिक, वाचिक अथवा मानसिक तथा दूसरे भी बुरे कहलाने वाले दुष्कर्म को करके, पुण्य कर्म को न कर, बहुत पाप-कर्म कर, शरीर छूटने पर वह दुर्बुद्धि नरक में उत्पन्न होता है।" ४. हर्षित करने वाली बातें भिक्षुओ! दो बातें संताप नहीं पैदा करने वाली हैं। कौन दो ? भिक्षुश्रो! यहाँ कोई उत्तम कार्य किया हुआ, पुण्य किया, भय की रक्षा किया और पाप-व.म नहीं किया हुआ होता है, वह 'मैंने उत्तम कार्य किया' सोच संताप नहीं करता है भिक्षुओं ये दो बातें संताप नहीं पैदा करने वाली हैं।... "शारीरिक, बाचिक अथवा मानसिक तथा दूसरे भी बुरे कह- लाने वाले दुष्कर्म को छोड़ करके, पाप कर्म को न कर, बहुत पुण्य कर्म कर, शरीर छूटने पर वह बुद्धिमान स्वर्ग में उत्पन्न होता है।" ५. बुरा शील भिक्षुश्रो ! दो बातों से युक्त व्यक्ति लाये हुए को डालने के समान नरक में पढ़ता है। किन दो ? बुरे शील और बुरी दृष्टि [ धारणा] से ।...
. "बुरे शील और बुरी दृष्टि इन दो बातों से जो पुरुष युक्त होता , वह दुबुद्धि शरीर छूटने पर नरक में पैदा होता है।" ६. भला शील भिक्षुश्रो ! दो बातों से युक्त से लाये हुये को डालने के समान स्वर्ग में पैदा होता है। किन दो! भले शील और भली दृष्टि से ।... "भले शील और भली दृष्टि-इन दो बातों से जो पुरुष युक्त होता है; वह बुद्धिमान शरीर छूटने पर स्वर्ग में पैदा होता है।" ७. संकोच भिक्षुप्रो अ-परिश्रमी और अ-संकोची भिक्षु संबोधि (= परम ज्ञान निर्वाण और सर्वोत्तम कल्याण की प्राप्ति के लिए अयोग्य है। भिक्षुओ परिश्रमी और संकोची भिक्षु संबोधि, निर्वाण और सर्वोत्तम कल्याण की प्राप्ति के लिए योग्य है।... "जो अ-परिश्रमी, अ-संकोची, आलसी, प्रयत्न-रहित, मानसिक तथा शारीरिक आलस्य की अधिकता से युक्त, निर्लज और पुण्य कर्मों को करने में श्रादर नहीं करने वाला है, उस प्रकार का भिक्ष उत्तम सम्बोधि की प्राप्ति के लिए अयोग्य है । और जो स्मृतिवान्, ज्ञानी, ध्यानी, परि- श्रमी, संकोची तथा प्रमाद नहीं करने वाला है, वह जन्म और बुढ़ापे के बन्धन को यहीं काट कर सर्वोत्तम सम्बोधि ( = ज्ञान) को पा लेता है।" ८. बहकाने के लिए नहीं भिक्षु श्रो! यह ब्रह्मचर्य लोगों को बहकाने- लोगों में बड़ा कहलवाने और लाभ, सत्कार तथा प्रशंसा पाने के लिए नहीं रहा जाता कि 'खोरा ( १७ ) मुझे ऐसा जानें । बल्कि भिक्षुओ! यह ब्रह्मचर्य संयम और त्याग के लिए रहा नाता है।... "उन भगवान् ने बतलाया है कि उपद्रव-रहित, निर्वाण को पहुँचाने वाला यह ब्रह्मचर्य संयम और त्याग के लिए है। यह मार्ग महान् महर्षियों द्वारा चलाया गया है । भगवान् बुद्ध के बतलाने के अनुसार जो-जो लोग इस मार्ग पर चलते हैं, वे शास्ता (= बुद्ध ) की भाज्ञा का पालन करने वाले दुःख का अन्त कर डालेंगे।" 8 लाभ-सत्कार के लिए नहीं भिक्षुश्रो ! यह ब्रह्मचर्य लोगों को बहकाने, लोगों में बड़ा कहलवाने और लाभ, सत्कार तथा प्रशंसा पाने के लिए नहीं रहा जाता कि 'लोग मुझे ऐसा जानें।' बल्कि भिक्षुओ! यह ब्रह्मचर्य अभिज्ञा: और परिज्ञा के लिये रहा जाता है।... "उन भगवान् ने बतलाया है कि उपद्रव-रहित, निर्वाण को पहुंचाने वाला यह ब्रह्मचर्य अभिज्ञा और परिज्ञा के लिए है । यह मार्ग महान महर्षियों द्वारा चला गया है । भगवान् बुद्ध के बतलाने के अनुसार जो-जो जोग इस मार्ग पर चलते हैं, वे शास्ता की आज्ञा का पालन करने वाले दुःख का अन्त कर डालेंगे।" १०. संवेग से मुक्ति भिक्षुभो ! दो बातों से युक्त भिक्ष इसी जन्म में अधिक सुख सौम- नस्य के साथ विहरता है और आश्रवों१२ (=चित्त-मलों ) के क्षय के लिए उचित रूप से प्रयत्न करता है। किन दो ! संवेग पैदा होनेवाली बातों में संवेग करने और संवेग के लिए उचित रूप से प्रयत्न -- करने से ।...
( १८ ) "परिश्रमी चतुर, बुद्धिमान भिक्षु ज्ञान से भली प्रकार देखकर संवेग पैदा होनेवाली बातों में संवेग करे। इस प्रकार विहरने वाला, परिश्रमी, शान्त और चंचलता-रहित ( भिक्ष ) चित्त की समाधि ( = एकाग्रता) में लगे हुये दुःख के क्षय को प्राप्त कर लेता है।" दूसरा वर्ग १. दो वितक दुःख नहीं देने- भिक्षुत्रो ! तथागत अर्हत् सम्यक सम्बुद्ध को प्रायः दो वितर्क हुआ करते हैं। कल्याण करने का वितर्क और एकान्त-चिन्तन का वितर्क । भिक्षुओ ! तथागत किसी को दुःख नहीं देनेवाले हैं, किसी को दुःख न देने में ही लगे रहते हैं, इसलिए भिक्षुओ! किसी को वाले तथागत को प्रायः यही वितर्क हुआ करता है-'मैं इस ईया ( चाल-ढाल ) से किसी भी चेतन या जड़ को पीड़ा नहीं दे रहा हूँ। भिक्षुत्रो ! तथागत एकान्त-चिन्तन वाले हैं, एकान्त-चिन्तन में लगे रहते हैं, इसलिये भिक्षुप्रो ! एकान्त चिन्तन वाले और एकान्त- चिन्तन में लगे रहनेवाले तथागत को प्रायः यही वितर्क हुआ करता है--- 'जो बुराइयां थी, वह सब दूर हो गई।' इसलिए भिक्षुश्रो। तुम लोग भी किसी को दुःख नहीं देनेवाले और किसी को दुःश्व न देने में ही लगे विहरो। भिक्षुश्रो ! तब किसी को दुख न देने में लगे हुए बिहरनेवाले तुम लोगों को प्रायः यही वितर्क हुश्रा करेगा-'हम लोग इस ईर्या मे किसी भी चेतन या जड़ को पीड़ा नहीं दे रहे हैं।' भिक्षुश्रो! एकान्त-चिन्तन वाले और एकान्त चिन्तन में लगे विहरो । मिक्षुश्रो ! तब एकान्त-चिन्तन वाले और एकान्त चिन्तन में ( ५९ ) - लगे हुये विहरने वाले तुम लोगों को प्रायः यही वितर्क हुआ करेगा- 'क्या बुराई है ? क्या दूर नहीं हुआ ? किसे छोड़ ?... "न सहे जाने लायक को सहने वाले, (मोह रूपी) अन्धकार को दूर करनेवाले, ( भव-सागर से) पार हो गये महर्षि, जिन्होंने पाने लायक को पा लिया है. अपने को वश में कर लिया है, जो श्राश्रव-रहित हैं, विषमता को तर गये हैं, तृष्णा के नाश से विमुक्त हो गये हैं, जो मुनि हैं और अन्तिम शरीर धारण करते हैं, जिन्होंने अभिमान को छोड़ दिया है, जिन्हें मैं बुढ़ापे को पार किया हुश्रा कहता हूं, उन भगवान् बुद्ध को दो वितर्क हुश्रा करते हैं । पहला कल्याण में लगने का वितर्क और दूसरा चिन्तन का वितर्क । पथरीले पहाड़ की चोटी पर खड़ा (पुरुष) जैले चारों ओर जनता को देखे, उसी तरह सर्वत्र नेत्र वाले महाप्रज्ञावान शोक-रहित भगवान् बुद्ध धर्म रूपी महल पर चढ़कर शोक-निमग्न,जन्म जरा से पीड़ित जनता को देखते हैं।" २. दो प्रकार के उपदेश भिक्षुत्रो ! पर्याय से तथागत अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध के उपदेश दो प्रकार के होते हैं। कौन से दो ? 'पाप को बुराई के तौर से देखो' यह पहले प्रकार का उपदेश है। 'पाप को बुराई के तौर से देखकर उससे निर्वेद करो, विरक्त होमो, विमुक्त होओ' यह दूसरे प्रकार का उपदेश है। भिक्षु भो ! पर्याय से तथागत अर्हत् सम्यक सम्बुद्ध के उपदेश दो प्रकार के होते हैं। "सब प्राणियों पर अनुकम्पा करनेवाले तथागत बुद्ध के उपदेश पर्याय से दो प्रकार के कहे गये हैं। एक बुराई को देखो और दूसरा उससे विरक्त चित्त बाल्ने होकर दुःख का अन्त करोगे।" - ( २० ) कर ३ अच्छे-बुरे के अगुआ भिक्षुत्रो ! बुरे कामों को करने के लिये अविद्या अगुआ है, जिसके अनुगामी निर्लजता और असंकोच हैं । भिक्षु भो ! भले कामों को करने के लिए विद्या अगुया है, जिसके अनुगामी लज्जा और संकोच हैं।... "इस लोक तथा परलोक में जो कोई दुर्गतियाँ हैं, सभी अविद्या के कारण हैं । इच्छा और लोभ से उत्पन्न हैं, जब श्रादमी बुरी नियत वाला निर्लज्ज और पुण्य करने में आदर करनेवाला नहीं होता है, तब वह पाप कमाता है और उससे नरक जाता है। इसलिए भिक्षराग, लोभ और अविद्या को छोड़ विद्या उत्पन्न सब दुर्गतियों से जाय।" ४. बुद्ध की स्पृहा मिक्षुश्रो ! वे प्राणी बिल्कुल ही वंचित हैं, जो कि आर्य प्रज्ञा से वंचित हैं । वे इसी जन्म में दुःख, पीड़ा, परेशानी और संताप के साथ विहरते हैं तथा शरीर छूटने पर उनके लिए दुर्गति जाननी चाहिये। भिक्षुश्रो वे प्राणी बंचित नहीं हैं, जो कि आर्य प्रज्ञा से वंचित नहीं हैं। वे इसी जन्म में बिना पीड़ा, परेशानी और संताप के, सुख-पूर्वक विहरते हैं तथा शरीर छूटने पर उनके लिए सुगति जाननी चाहिये ।... "देवताओं सहित सारे लोक को देखो, प्रज्ञा से बंचित, नाम और रूप में प्राशक्त हो 'यही सत्य है' समझता है। जो यह राग आदि को नष्ट करने वाली प्रज्ञा है, वही श्रेष्ठ है, जो कि बार-बार जन्म लेने के खात्मा को भली प्रकार जानती है। देवता और मनुष्य उन स्मृतिमान सथा प्रज्ञावान बुद्धों को स्पृहा करते हैं, जो कि अन्तिम शरीर धारण करने वाले हैं।"
( २१ ) ५. लजा और संकोच से लोक का पालन भिक्षुषो! दो परिशुद्ध बातें लोक का पालन करती हैं। कौन-सी दो ? लज्जा और संकोच । भिक्षुओ यदि वे दोनों परिशुद्ध बातें लोक का पालन न करें तो यहाँ माता, मौसी, मामी, गुरुवाइनि या बड़ों की स्त्री का भेद न जान पड़े, लोक में उसी प्रकार मर्यादा न रहे, जैसे की बकरी-भेड़, मुर्गी-सूअर, कुत्त-गीदड़। चूंकि भिक्षु श्रो! ये दो का पालन करती हैं, इसलिए माता, मौसी, मामी, गुरुवाइनि या बड़ों की स्त्री का भेद जान पड़ता है। "जिनमें लज्जा और संकोच बिल्कुल नहीं है, वे परिशुद्ध बातों से रहित व्यक्ति जन्म और मृत्यु में पड़े रहते हैं। किन्तु जिनमें लज्जा और संकोच भली भाँति बने हैं, जो ब्रह्मचर्य का भली प्रकार पालन करने वाले हैं, वे शान्त व्यक्ति फिर जन्म नहीं लेते।" परिशुद्ध बातें लोक ६. निर्वाण भिक्षुश्रो ! (निर्वाण ) अज्ञात, अभूत, अकृत और असंस्कृत है। यदि भिक्षु भो ! यह अजोत, अभूत, प्रकृत, और असंस्कृत न होता, तो जात, भूत, कृत, संस्कृत का निस्तार नहीं दिखाई देता।... "( यह शरीर ) जात, भूत, उत्पन्न, कृत, संस्कृत, अ-ध्रुव, बुढ़ापा और मृत्यु से पीड़ित, रोंगों का घर, (क्षण-) भंगुर तथा आहार और मृष्णा से होने वाला है, उसमें प्रेम करना ठीक नहीं। उसका निस्तार (= निर्वाण ) शान्त है, वह तर्क से नहीं जाना जा सकता, वह ध्रुव, अजात, न उत्पन्न होने वाला तथा शोक और राग रहित है, सभी दुःखों का वहां निरोध हो जाता है, वह संस्कारों की शान्ति एवं (परम) सुख ( २२ ) ७. दो प्रकार का निर्वाण भिक्षुओ ! निर्वाण धातु दो प्रकार की है। कौन-सी दो ? (1) सोपादिशेष निर्वाण धातु और (२) अनुपादिशेष निर्वाण-धातु । भिक्षुत्रो ! क्या है सोपादिशेष निर्वाण-धातु ? यहाँ भिक्षत्रो ! भिक्षु अर्हत् , क्षीणाश्रव ( श्राश्रव रहित), ब्रह्मचर्यपूर्ण, कृतकृत्य, उतरे-भार, अपने मतलब को प्राप्त, सांसारिक बन्धनों से रहित और भली प्रकार से रहित और भली प्रकार जानकर विमुक्त हो गया होता है, उसकी पांचों इन्द्रियाँ होती ही हैं, जिनके शान्त न होने से प्रिय-अप्रिय का अनुभव करता है, और सुख-दुःख भोगता है, किन्तु उसके जो राग का क्षय होना है, द्वष का क्षय होना है और मोह का क्षय होना है, भिक्षुत्रो ! इसे ही सोपाधिशेष निर्वाण धातु कहते हैं । भिक्षुओ ! क्या है अनुपादिशेष निर्वाण-धातु ? यहाँ भिक्षुओ ! भिक्षु ! अहर्त. ......भली प्रकार जानकर विमुक्त हो गया होता है, भिक्षुश्रो उसके सभी अनुभव यहां ही अनभिनन्दनीय और शान्त हो जायेंगे। भिक्षुत्रो ! इसे अनुपादिशेष निर्वाण-धातु कहते हैं । भिक्षुत्रो ! यह दो प्रकार की निर्वाण-धातु हैं।... अनासक्त और चक्षुमान भगवान् बुद्ध ने निर्वाण-धातु को इन दो प्रकार का बताया है । एक धातु का नाम सोपादिशेप है, जो इसी शरीर में बार-बार लाने वाली तृष्णा के क्षय के बाद प्राप्त होती है, और दूसरी अनुपादिशेष है, जो शरीर छूटने पर प्राप्त होती है, और जिसके प्राप्त होने पर उत्पति बिल्कुल ही रुक जाती है । जो विमुक्त-चित्त महत् संसार में बार-बर लाने वाली तृष्या के क्षय के बाद असंस्कृत पद को जान लेते हैं वे धर्म के सार को पा, निर्वाण में लग्न हुये सब प्रकार की उत्पशि को त्याग देते हैं।"
८. एकान्तबास करना भिक्षुओ! एकान्तवास करते एकान्तवास में लगे, भीतरी चित्त को शान्त करने में जुटे, सदा ध्यान में लगे, विपश्यना से युक्त और एकान्त स्थान में अधिक रहने वाले होकर विहरो । भिक्षुत्रो ! एकान्तवास करने वाले, एकान्तवास में लगे, भीतरी चित्त को शान्त करने में जुटे, सदा ध्यान में लगे, विपश्यना से युक्त और एकान्त स्थान में अधिक रहनेवाले होकर विहरते हुए (भिक्षु) के लिए दो फलों में से कोई एक फल जानना चाहिये-इसी जन्म में अहत्व की प्राप्ति (= आज्ञा ) या क्लेशों के होने पर अनागामी-भाव ।.... "जो शान्त-चित्त ज्ञानी. स्मृतिमान ओर ध्यानी हैं, काम-भोगों में अनासक्त हो भली प्रकार धर्म को देखते हैं, जो प्रमाद नहीं करनेवाले तथा प्रमाद करने में भय खाने वाले हैं, वे मार्ग से च्युत होने के योग्य नहीं हैं, वे तो निर्वाण के निकट ही पहुँच गये हैं।" 8 गुणों से युक्त होकर विहरना भिक्षुभो ! शिक्षाओं के गुण से युक्त, उत्तम प्रज्ञा, विमुक्तिसार और श्रेष्ठ स्मृति के साथ विहारो । भिक्षुओ ! शिक्षाओं के गुणों से युका, उत्तम प्रज्ञा, विमुक्ति-सार और श्रेष्ठ स्मृति के साथ विहरने वाले के लिये दो फलों में से कोई एक फल जानना चाहिये-इसी जन्म में अहत्व की प्राप्ति या क्लेशों के रहने पर अनागामी-भाव । ... "जो अशंचय ( = अहंत्) है, जिसे कुछ भी त्यागने को शेष महीं है, जो उत्तम प्रज्ञा पा लिया है, जो जन्म के खत्म होने को देखने वाला है, और जो अभिमान रहित है, उस अन्तिम शरीरधारी मुनि को बुढ़ापा पार कर गया कहता हूँ । इसलिए भिक्षुओ ! सदा ध्यान में लीन, ( २४ ) एकाग्र, परिश्रमी और जन्म के खत्म होने को देखने वाले होकर सेना- सहित मार को पछाड़, जन्म और मृत्यु को पार कर जाओ।" १० सोने वाले उठो! “भिक्षुश्रो ! भिक्षु जागरणशील हो, स्मृति और ज्ञान से युक्त, एकाग्र और प्रमुदित, प्रसन्न और पुण्य कर्मों को करने के लिए समय जानने वाला होकर विहरे । भिक्षु भो ! जागरणशील हो, स्मृति और ज्ञान से युक्त, एकाग्र, प्रमुदित, प्रसन्न और पुण्य कर्मों को करने के लिए समय जानकर विहरने वाले भिक्षु के लिए दो फलों में से कोई एक फल जानना चाहिए-इसी जन्म में अहत्व की प्राप्ति या क्लेशों के रहने पर अनागामी-भाव ।... "जागने वाले इसे सुनें और जो सोये हैं वे उठे। सोने से जागना श्रेष्ठ है, जागने वाले के लिए भय नहीं। जो जागरगाशील, स्मृतिमान, संप्रज्ञ, एकाग्र, प्रमुदित और प्रसन्न (ब्यक्ति) है, वह समयानुसार भली प्रकार धर्म का विचार करते हुए समाधिस्थ हो ( अविधा रूपी) अन्धकार को नष्ट कर देता है। इसलिए जागरणशील बनो । परिश्रमी, ज्ञानी और ध्यान-प्राप्त भिक्षु जन्म और बुढ़ापा के बन्धन को काट कर यही सर्वोत्तम ज्ञान को प्राप्त कर लेता है।" ११. ये नरकगामी हैं। मिक्षुश्रो ! इन दो बातों को न छोड़ने वाले नरकगामी है। किन दो ? जो अब्रह्मचारी होते हुए भी अपने को ब्रह्मचारी कहता है और जो परिपूर्ण और परिशुद्ध रूप से ब्रह्मचर्य पालन करने वाले को में अब्रह्मचारी होने का दोष लगाता है। भिक्षो! इन दो बातों को न छोड़ने वाले नरकगामी हैं।....
( २५ ) - "असत्यवादी नरक में जाता है और वह भी जो कि करके 'नहीं किया' कहता है। दोनों ही प्रकार के नीच कर्म करने वाले मनुष्य मर कर समान होते हैं । कंठ में काषाय (वन) डाले कितने ही पापी असं- यमी हैं, जो पापी ( अपने ) पाप कर्मों से नरक में उत्पन्न होते हैं । असंयमी दुराचारी हो राष्ट्र का पिण्ड (= देश का अन्न) खाने से अग्नि- शिखा के समान तल लोहे का गोला खाना उत्तम है।" १२. दो मिथ्या धारणायें वाले ( भिक्षुश्रो ! दो मिथ्या धारणाओं में पड़े देवता और मनुष्यों में कोई- कोई चिपट जाते हैं , कोई-कोई दौड़ लगाते हैं और कोई-कोई आँख = प्रज्ञावान ) देखते हैं । भिक्षुत्रो ! कैसे कोई-कोई चिपट जाते हैं ? भिक्षुश्रो ! देवता और मनुष्य भव में रमने वाले हैं, भव में रत हैं, भव में प्रमुदित हैं, भव निरोध का उपदेश देते समय उनका चित्त नहीं दौड़ता है, नहीं प्रसन्न होता है, नहीं ठहरता है, नहीं लगता है। इस प्रकार भिक्षुप्रो ! कोई-कोई चिपट जाते हैं। भिक्षुभो ! कैसे कोई-कोई दौड़ लगाते हैं १ कोई-कोई भव से ही घृणा, लज्जा जिगुप्सा करते हुये विभव ( = उच्छेद चाहते हैं। चूंकि यह प्रारमा शरीर छूटने पर....उच्छिन्न हो जाती है, विनष्ट हो जाती है, मृत्यु के बाद नहीं रहती है, यही शान्त है, यही प्रणीत ( = उत्तम) है, यही यथार्थ है। भिक्षुश्रो ! इस प्रकार कोई-कोई दौड़ लगाते हैं। भिक्षुओ ! कैसे कोई-कोई आँख वाले देखते हैं ? यहाँ भिक्षु भूत = पस्कन्ध )१३ को भूत के तौर पर देखता है, भूत को भूत के तौरपर देखकर भूत के निर्वेद, विराग और निरोध के लिए लगा होता है । भितो! इस प्रकार आँख वाले देखते हैं।.... "जो भूत को भत के तौर पर देख, भत का अतिक्रमण कर भव- तृष्णा के क्षय हो जाने पर निर्वाण पा लेते हैं, वे छोटी-बड़ी वस्तुओं में वितृष्ण, भूत जानने वाले भिक्षु भूत के नष्ट होने पर फिर जन्म नहीं लेते।"
तीसरा निपात
पहला वर्ग
१. पाप की जड़
भिक्षुषो ये तीन पाप के मूल हैं। कौन तीन ? लोभ पाप का
मुल है, द्वप पाप का मूल है, मोह पाप का मूल है । भिक्षुओ ! ये
तीन पाप के
मूल
“अपने भीतर उत्पन्न लोभ, द्वष और मोह पाप चित्त वाले
व्यक्ति की वैसे ही हिंसा करते हैं जैसे कि केले के वृक्ष की उसका
हैं
1....
फल
२. तीन धातुय
भिक्षुओ ! ये तीन धातुयें हैं। कौन तीन ? रूप-धातु, अरूप-धातु
और निरोध-धातु ! भिक्षुओ ! ये तीन धातुयें हैं ।....
"रूप धातु को जानकर, अरूपों में अनासक्त हो, जो निरोध (
निर्वाण) को पा सभी क्लेशों से मुक्त हो गये हैं, वे लोग मृत्यु
को
खत्म कर दिये हैं। अनाश्रव सम्यक् सम्बुद्ध काया से सांसारिक आसक्ति-
रहित निर्वाण का स्पर्शकर, आशक्ति-त्याग को भली प्रकार साक्षात् कर
शोक और राग-रहित पद (निर्माण) का उपदेश देते हैं।'
"
( २८ ) ३. तीन वेदनायें । और भिक्षुत्रो ! ये तीन वेदनायें । = अनुभव ) हैं। कौन तीन ? सुख वेदना, दुःख वेदना और अदुःख-असुख वेदना। भिक्षुओ! ये तीन वेदनायें हैं।.... "एकाग्र-चित्त, संप्रज्ञ और स्मृतिमान बुद्ध का शिष्य वेदना और वेदना की उत्पत्ति को जानता है और जहां यह शान्त हो जाती हैं, उनके विनाश के मार्ग को भी जानता है। वेदनाओं के विनाश के बाद तृष्णा-रहित हो भिक्षु परिनिर्वाण को पा लेता है। ४. तीन वेदनायें भिक्षुओ! ये तीन वेदनायें हैं। कौन तीन ? सुख वेदना, दुःख वेदना अदुःख-असुख वेदना । भिक्षु भो ! सुख-वेदना को दुःख के तौर पर देखना चाहिये । दुःख-वेदना को शल्य ( = काँटा) के तौर पर देखना चाहिये ।अदुःख-असुख-वेद ना को अनित्य के तौर पर देखना चाहिये भिक्षुश्रो! जब भितु सुख-वेदना को दुःख के तौर पर देख लेता है, दुःस्व- वेदना को शल्य के तौर पर देख लेता है, अदुःख-असुख-वेदना को अनित्य के तौर पर देख लेता है, तो भिक्षुश्रो ! उस भिक्षु को आर्य समदर्शी कहते हैं, उसने तृष्णा को काट दिया, सांसारिक बन्धन को उलट दिया, अच्छी तरह अभिमान को त्याग कर दुःख का अन्त कर दिया ।.... "जिसने सुख को दुःख के तौर पर, दुःख को शल्य के तौर पर और शान्त अदुःख-सुख को अनित्य के तौर पर देख लिया है, वह उनसे मुक्त होने के कारण समदर्शी भिक्षु है। उस अभिज्ञा-प्राप्त शान्त मुनि ने सांसारिक सभी बन्धनों को लाँध दिया है।"
( २६ ) ५. तीन खोजें । भिक्षुत्रो ! ये तीन खोज हैं। कौन तीन ? काम-भोग की खोज, उत्पत्ति की खोज और ब्रह्मचर्य की खोज । भिक्षुओ! ये तीन खोज हैं।... "एकाप्र-चित्त, संप्रज्ञ और स्मृतिमान शिष्य खोज और खोज की उत्पत्ति को जानता है और जहां यह शान्त हो जाती हैं, उनके विनाश के मार्ग को भी जानता है। खोजों के विनाश के बाद तृष्णा-रहित हो भिक्षु परिनिर्वाण को पा लेता है।" ६. तीन खोजें भिक्षुश्रो ! ये तीन खोज हैं। कौन तीन ? काम-भोग को खोज उत्पत्ति की खोज और ब्रह्मचर्य की खोज । ... "काम-भोग की खोज, उत्पत्ति की खोज और ब्रह्मचर्य की खोज के साथ-इन्हें ही सत्य मानना मिथ्या धारणाओं को उत्पन्न करना है, किन्तु जो सब प्रकार के राग से रहित है और तृष्णा के नाश से विमुक्त हो गया है, उसने खोजों को त्याग दिया है और उसकी मिथ्या धारणायें भी नष्ट हो गई हैं । खोजों के खत्म हो जाने पर भिक्षु तृष्णा और सन्देह- रहित हो जाता है।" ७. तीन आश्रव भिक्षुत्रो ! ये तीन आश्रव ( =चित्त-मल) हैं। कौन तीन ? काम आश्रव, भव पाश्रव और अविद्या-श्राश्रव ।... "एकाप्र-चित्त, संप्रज्ञ और स्मृतिमान बुद्ध का शिष्य आश्रवों और. आश्रवों की उत्पत्ति को जानता है और जहां यह शान्त हो जाते हैं, उनके विनाश के मार्ग को भी जानता है। श्राश्रकों के विनाश के बाद तृष्णा- रहित हो भिक्षु परिनिर्वाण को पा लेता है।" ८. तोन 'आश्रव भिक्षुप्रो ! ये तीन आश्रव हैं। कौन तीन ? काम- आश्रव,............ "जिसका काम-आश्रव क्षीण हो गया है और अविद्या दूर हो गई है । भव-आश्रव क्षीण हो गया है तथा सांसारिक असक्तियों से मुक्त हो गया है, वह सेना-सहित मार को जीत कर अन्तिम शरीर धारण कर 8. तीन तृष्णायें भिक्षुत्रो ! ये तीन तृष्णायें हैं। कौन तीन ? काम-तृप्मा, भत्र- तृष्णा और विभव तृष्णा ।... "जो तृष्णा के बन्धन में बंधे और छोटी-बड़ी चीजों में श्रापक्त हैं, वे लोग मार के बन्धन में बँधे हैं, वे कल्याण को नहीं प्राप्त हुये हैं। जन्म और मृत्यु में पड़े हुये वे लोग चक्कर काटा करते हैं। जो तृष्णा को त्याग, छोटी-बड़ी चीजों में वितृष्ण हैं, वे पात्रों के क्षय को प्राप्त हो लोक को पार कर लिये हैं।" १०. मार के राज्य से बाहर निकलना भिक्षुश्रो ! तीन बातों से युक्त भिक्षु मार के राज्य को अतिक्रमण कर सूर्य के समान चमकता है । किन तीन ? भिक्षु भो ! यहां भिक्षु अशैषय शील-स्कन्ध से युक्त होता है, और अशैक्ष्य प्रज्ञा-स्कन्ध से युक्त होता है।...
( ३ ) "जिसने शील, समाधि और प्रज्ञा की भली प्रकार भावना की है, वह मार के राज्य को अतिक्रमण कर सूर्य के समान चम- कता है।" दूसरा वर्ग १. पुण्य के तीन साधन भिक्षुत्रो ! ये तीन पुण्यक्रिया-वस्तुयें हैं। कौन तीन ? दानमय- पुण्यक्रिया-वस्तु, शीलमय-पुण्यक्रिया-वस्तु और भावनामय-पुण्यक्रिया- वस्तु ।... "श्रेष्ठ सुखदायक पुण्य को करे । दान दे, सम-आचरण करे और मैत्री-चित्त की भावना करे। इन तीनों सुखदायक धर्मों की भावना करके बुद्धिमान व्यक्ति दुःख रहित सुख-लोक ( = ब्रह्मलोक) में पैद होता है।" २. तीन चक्षु भिक्षुओ ! ये तीन चक्षु हैं। कौन तीन ! मांस-चक्षु दिव्य-चक्षु और प्रज्ञा-चक्षु । ... "मांस-चक्षु, दिव्य-चक्षु और सर्वोत्तम प्रज्ञा-चक्षु-इन तीन चक्षुत्रों को पुरुषोत्तम ( =बुद्ध ) ने कहा है। मांस-चक्षु की उत्पत्ति से ही दिव्य-चक्षु उत्पन्न होता है। जब ज्ञान उत्पन्न होता है, तब सर्वश्रेष्ठ प्रज्ञा-चक्ष उत्पन्न हो जाता है, जिस चक्षु की प्राप्ति से सारे से छूट जाता है।" ३. तीन इन्द्रियाँ भिक्षुत्रो ! ये तीन इन्द्रियाँ हैं। कौन तीन ? अनज्ञात-आज्ञास्यामि ( ३२ ) = न जाने को जान गा )-इंद्रिय, प्राज्ञा (=जानने वाली)-इंद्रिय और प्राज्ञातावी ( = जानी हुई )-इंद्रिय ( = महत-ज्ञान)।... "सीधे मार्ग पर चलने वाले, अभ्यास शील शैषय को महत्-मार्ग में प्रथम ज्ञान होता है, उसके बाद अर्हत्व-ज्ञान और तत्पश्चात् महत्व- फल से (प्रज्ञा-) विमुक्ति का ज्ञान होता है-"सांसारिक-बन्धनों के चय के बाद मुझे न कुपित होने वाली विमुक्ति प्राप्त हो गई।" वह इंद्रिय-युक्त, शान्त और शान्ति-पद में लीन सेना सहित मार को जीतकर अन्तिम शरीर धारण कर रहा है।" ४. तीन काल भिक्षुनो ! ये तीन काल ( = अध्व) हैं। कौन तीन ? अतीत काल, भविष्यत् काल और वर्तमान काल ।... "प्राणी कथाशीली हैं और वे कथा में ही स्थित हैं। वे कथा को न जानकर मृत्यु के बन्धन में पड़ जाते हैं। जो कथा को जानकर कहने वाले (= श्रात्मा) को नहीं ग्रहण करता और मन से सर्वोत्तम शांन्ति-पद विमोच को स्पर्श कर लिया है, वह निर्वाण प्राप्त है, शान्त होकर शान्ति- पद में लीन है। भली प्रकार सोच-विचार कर सेवन करनेवाला धर्म में स्थिरता-प्राप्त विद्वान् फिर जन्म नहीं ग्रहण करता।" ५. तीन दुराचार भिक्षुओ! ये तीन दुराचार ( = दुश्चरित्र ) हैं। कौन तीन ? शारीरिक दुराचार, वाचिक दुराचार और मानसिक । दुराचार ।... "शारीरिक, वाचिक और मानसिक दुराचारों को तथा दूसरे जो दोष हैं उन्हें भी करके, पुण्य-कर्म को न कर, बहुत पाप करके, मूर्ख व्यक्ति शरीर छूटने पर नरक में पैदा होता है।"
( ३३ )
वाचिक सदाचार,
-
६. तीन सदाचार
भिक्षुओ! ये तीन सदाचार हैं। कौन तोन ? शारीरिक सदाचार,
और मानसिक सदाचार । ...
"शारीरिक, वाचिक और मानसिक दुराचारों को तथा दूसरे जो दोष
हैं उन्हें भी छोड़ करके, पाप कर्म को न कर, बहुत पुण्य करके प्रज्ञावान्
व्यक्ति शरीर छूटने पर स्वर्ग में पैदा होता है।"
७. तीन पवित्रतायें
भिक्षुओ ! ये तीन पवित्रतायें हैं ! कौन तीन ? शारीरिक पवित्रता,
वाचिक पवित्रता और मानसिक पवित्रता ।...
"जो शारीरिक, वाचिक, और मानसिक पवित्रता से युक्त अनाव
= चित्त-मल-रहित ) है, उस पवित्रता से युक्त व्यक्ति को सर्वत्यागी
कहते हैं।'
८. मौन-भाव
भिक्षुओ ! ये तीन मौन-भाव ( मौनेय) हैं। कौन तीन !
शारीरिक मौन-भाव, वाचिक मौन-भाव और मानसिक मौन-भाव ।...
"शारीरिक, वाचिक और मानसिक मौनता से युक्त अनाव मुनि
पापों को नहाकर बहा दिया करते हैं।"
8. मार के बन्धन से मुक्त
भिक्षश्रो ! जिस किसी का राग, द्वाप और मोह दूर नहीं हुआ है,
भिक्षुओ! इसे कहते हैं कि मार के बन्धन मे बँधा है, मार के जाल मे फंसा
है और पापी मार के इच्छानुरूप करने योग्य है। भिक्षुश्रो ! जिस किसी
का राग, द्वाप और मोह दूर हो गया है, भिक्षुश्रो ! इसे कहते हैं कि
३
( ३४ वह मार के बन्धन से बंधा नहीं है, मार के जाल में फंसा नहीं है और पापी मार के इच्छानुरूप करने योग्य नहीं है।... "जिसका राग, द्वेष और अविद्या दूर हो गई है, उस वैर-माव तथा भय से रहित, श्रेष्ठ, तथागत भगवान् बुद्ध को सर्वस्यागी कहते हैं।" १०. समुद्र के पार जाना भिक्षुश्रो ! जिस किसी भिक्षु, या भिक्षुणी का राग, द्वेष और मोह दूर नहीं हुआ है, भिक्षु भो इसे कहते हैं कि वह लहर, तरंग, भंवर, मगर और राक्षस-सहित समुद्र को नहीं पार किया । भिक्षुत्रो ! जिस किसी भिक्षु यो भिक्षुणी का राग, द्वष और मोह दूर हो गया है, भिक्षु श्रो! इसे कहते हैं कि वह लहर, तरंग; भवर, मगर और राक्षस- सहित समुद्र को तैर गया, पार कर लिया, वह ब्राह्मण (किनारे भाकर) भूमि पर खड़ा हो गया।... "जिसका राग, द्वष और अविद्या दूर हो गई है, वह मगर, राक्षस और लहर सहित इस दुस्तर समुद्र को पार कर गया। वह सांसारिक आसक्ति-रहित, मृत्यु-त्यागी, बन्धन-मुक्त व्यक्ति फिर जन्म लेने के दूर कर दिया। वह क्लेशों के अस्त हो जाने से अतुलनीय हो गया । उसने बना दिया-ऐसा मैं कहता हूँ ।” तीसरा वर्ग को मृत्युराज को १. मिथ्या धारणा से नरक भिक्षुत्रो ! मैंने देखा है कि जो प्राणी शारीरिक, वाचिक और मान- सिक दुराचार से युक्त, आर्यों-की निन्दा करने वाले, मिथ्या धारणा वाले ( ३५ ) और मिथ्या धारणा से किये जाने वाले कामों को करने में लगे थे, वे शरीर छूटने पर....नरक में पैदा हुए । भिक्षुओ ! इसे मैं दूसरे श्रमण या ब्राह्मण से सुनकर नहीं कहता हूँ....किन्तु भिक्षुश्रो ! जिसे मैंने स्वयं जाना है, स्वयं देखा है, स्वयं विदित किया है, उसे ही मैं कहता हूँ।.... "इस छोटे से जीवन में मूर्ख, अल्पश्रुत और पुण्य न करने वाला व्यक्ति मिथ्या मन करके, मिथ्या वचन बोलकर तथा शरीर से भी मिथ्या काम करके शरीर छूटने पर नरक में पैदा होता है।" २. सम्यक् दृष्टि से स्वर्ग भिक्षुत्रो ! मैंने देखा है कि जो प्राणी शारीरिक, वाचिक और मान- सिक सदाचार से युक्त, आर्यों की निन्दा न करने वाले, सम्यक् दृष्टिवाले और सम्यक् दृष्टि से किये जाने वाले कामों को करने में लगे थे, वे शरीर छूटने पर स्वर्ग में पैदा हुए। भिक्षुश्रो ! इसे मैं दूसरे श्रमण या ब्राह्मण से सुनकर नहीं कहता हूँ,...किन्तु भिक्षुयो ! जिसे मैंने स्वयं जाना है, स्वयं देखा है, स्वय विदित किया है, उसे हा मैं कहता हूँ।.... "इस छोटे से जीवन में प्रज्ञावान् , बहुश्रुत और पुण्य करने वाला व्यक्ति सम्यक् मन करके, सम्यक् वचन को बोलकर तथा शरीर से भी सम्यक् काम करके शरीर छूटने पर स्वर्ग में पैदा होता है।" ३. निस्तार भिक्षुप्रो ! ये तीन निस्तर-धातुयें हैं। कौन तीन ? कामों का निस्तरण नष्क्रम्य है, रूपों का निस्तरण प्रारुप्य है और जो कुछ भूत, संस्कृत, प्रतीत्य-समुत्पन्न ( = कार्य-कारण से उत्पन्न) है, उसका निस्तरण निरोध है।..... ।
( ३६ ) "कामों के निस्तरण और रूपों के अतिक्रमण को जान कर परिश्रमी ( भिक्षु ) सदा सभी संस्कारों के शमन ( = निर्वाण ) को पा लेता है । वह उनसे मुक्त होने के कारण समदर्शी भिक्षु है। उस अाभज्ञा. प्राप्त शान्त मुनि ने सांसारिक सभी बन्धनों को लाँघ दिया है।" ४. निर्वाण शान्ततर है भिक्षुओ ! रूपों से अरूप शान्ततर हैं और अरूपों से निरोध ( = निर्वाण) शान्ततर हैं ।.... "जो रूप लोक में उत्पन्न प्राणी हैं और जो अरूप लोक में रहने वाले हैं, वे निर्वाण को न प्राप्त हो फिर जन्म लेते हैं। जो रूप-लोकों को त्याग, अरूप-लोक में स्थिर न हो, निर्वाण प्राप्त कर लेते हैं, वे लोग मृत्यु को खत्म कर दिये हैं । अनाव सम्यक् सम्बुद्ध काया से सांसारिक श्रासक्ति-रहित निर्वाण का स्पर्श कर, श्रासक्ति-त्याग को भली प्रकार साक्षात् कर शोक और राग-रहित पद (निर्वाणा) का उपदेश देते हैं।" ५. तीन प्रकार के पुत्र भिक्षुश्रो ! संसार में तीन प्रकार के पुत्र विद्यमान हैं। कौन तीन ? अतिजात, अनुजात और अवजात । भिक्षुओ ! कैसे अतिजात पुत्र होता है ? यहाँ भिक्षुश्रो ! पुत्र के माता-पिता बुद्ध, धर्म और सब की शरण गए होते हैं, जीवहिंसा चोरी, व्यभिचार, असत्य भाषण और सुरा-मेरय = शराब ) नशीली चीजों के सेवन से विरत नहीं होते हैं, दुराचारी और पापी होते हैं, किन्तु उनका पुत्र बुद्ध, धर्म और संघ की शरण गया होता है, जीव हिंसा, चोरी, व्यभिचार, असत्य-भाषण और सुरा- मेरय-नशीली चीजों के सेवन से विरत होता है, सदाचारी और पुण्यात्मा होता है। इस प्रकार भिक्षुओ ! अतिज़ात पुत्र होता है।"
भिशो ! कैसे अनुजात पुत्र होता है ? यहाँ भिक्षुओ ! पुत्र के माता- पिता बुड, धर्म और संघ की शरण गये होते हैं, जीवहिंसा, चोरी, व्यभिचार, असत्य-भाषण और सुरा-मेरय-नशीली चीजों के सेवन से विरत होते हैं, सदाचारी और पुण्यात्मा होते हैं और उनका पुत्र भी बुद्ध, धर्म और संघ की शरण गया होता है ...सदाचारी और पुण्यात्मा होता है। प्रकार भिक्षुश्रो ! अनुजात पुत्र होना है। ... भिक्षुत्रो ! कैसे अवजात पुत्र होता है ? यहाँ भिक्षुओ! पुत्रके माता- पिता बुद्ध, धर्म और संघ की शरण गा होते हैं,....सदाचारी और पुण्यात्मा होते हैं, किन्तु उनका पुत्र बुद, धर्म और संघ की शरण गया नहीं होता है,....दुराचारी और पापी होता है। इस प्रकार भिक्षुप्रो ! अवजात पुत्र होता है ।... "बुद्धिमान् अतिजात और अनुजात पुत्र की कामना करते हैं, किन्तु अवजात पुत्र को कामना नहीं करते, जो कि कुल का विनाश करने वाला होता है। इतने पुत्र संसार में हैं। जो उपासक श्रद्धा, शील से युक्त, उदार और कंजू नी से रहित होते हैं, वे घने बादल से मुक्त चन्द्रमा की भाँति सभाओं में सुशोभित होते हैं।" । , ६ तीन प्रकार के व्यक्ति मिचो ! संसार में तीन प्रकार के व्यक्ति हैं। कौन तीन ? अवृष्टि- सम, प्रदेश-वी और सर्वत्र-वर्षी । कैसे भिक्षुश्रो ! व्यक्ति अवृष्टि-सम होता है ? यहाँ भिक्षुओ! एक व्यक्ति किसी भी श्रमण, बामण, निधन, पथिक, भिखारी और याचक को अन्न, पेय, बत्र, यान, मालागन्ध, आलेप, शय्या, भावान और प्रदीप देने वाला नहीं होता है । इस प्रकार भिक्षुओ ! व्यक्ति अवृष्टि-सम होता है।
( ३८ ) कैसे भिक्षुओ! व्यक्ति प्रदेश-वर्षी होता है ? यहाँ भिक्षुनो ! एक ग्यक्ति किसी-किसी श्रमण, ब्राह्मण .. और याचक को अन्न, पेय, और प्रदीप देने वाला होता है। इस प्रकार मिलो ! व्यक्ति प्रदेश वर्षी होता है। कैसे भिक्षुओ ! व्यक्ति सर्वत्र-वर्षी होता है ? यहाँ भिक्षुओ ! एक न्यक्ति सभी श्रमण, ब्राह्मण और याचकों को देने वाला होता है। इस प्रकार भिक्षुश्रो ! व्यक्ति सर्वत्र वर्षी होता है । ... "जो श्रमण ब्राह्मण, निर्धन, पथिक और याचकों को पाकर श्रन्न, पेय और भोजन नहीं बाँटता है, वह प्रवृष्टि-सम है। उसे (बुद्धिमान् लोग) अधमपुरुष कहते हैं। जो किसी-किसी को नहीं देता है और किसी-किसी को देता है, वह प्रदेश-वर्षी है-ऐसा बुद्धिमान लोग कहते हैं। जो पुरुष भिक्षा देने की वाणी बोलनेवाला होता है, सब प्राणियों पर अनुकम्पा करनेवाला होता है, प्रसन्न मन से बिखेरता है 'दो-दो' कहता है; जैसे कि बादल गड़गड़ाते और गरजते हुए बरसता है तथा पानी से ऊँची-ऊँची भूमि को भर देता है, इसी प्रकार यहाँ कोई पैसा व्यक्ति होता है, वह धर्म-पूर्वक परिश्रम से प्राप्त धन को जुटाकर भिवारी लोगों को अच्छी तरह अन्न और पेय से तृप्त करता है।" ७. शील-पालन से सुख भिक्षुश्रो ! तीन सुखों को चाहने वाला बुद्धिमान् व्यक्ति शील का पालन करे। कौन तीन ? 'मेरी प्रशंसा हो' ऐसा चाहने वाला बुद्धिमान व्यक्ति शील का पालन करे। 'मुझे भोग प्राप्त हों' ऐसा चाहने वाला बुद्धिमान् व्यक्ति शील का पालन करे। 'शरीर छूटने पर स्वर्ग-लोक में पैदा होऊँ ऐसा चाहनेवाला बुद्धिमान् व्यक्ति शील का पालन करे। "प्रशंसा, धन-लाभ और परलोक में स्वर्ग में प्रानन्द, इन तीन सुखों को चाहने वाला बुद्धिमान् शोल का पालन करें। यदि पाप न करते हुए भी ( पाप ) करनेवाले का साथ करता है, तो वह पाप-कर्म में सन्देहात्मक होता है, उसके लिये निन्दा लागू होती है। जो जैसी मैत्री करता है और जैसा साथ करता है, वह भी वैसा ही होता है, क्योंकि उसका साथ ही वैसा है। अच्छा व्यक्ति भी बुरे का साथ और लगाव रखते हुए वैसे ही बिगड़ जाता है जैसे कि विष से बुझे हुए बाणों के समूह में विष से नहीं बुझा हुआ बाण भी विष-युक्त हो जाता है। इसलिये बुद्धिमान् लगने के भय से बुरे मित्र का साथ न करे। जैसे सड़ी हुई मछली को जो कोई पुरुष कुश की नोक पर बाँधता है, तो कुश भी दुर्गन्धि बहाते हैं, ऐसा ही मूर्तों का साथ है। और, जो कोई पुरुष पलास में तगर को बाँधता है, तो उसकी पत्तियाँ भी सुगन्धि बहाती हैं, ऐसा ही बुद्धिमान् का साथ है। इसलिये पलास की पत्तियों में बाँधने के समान अपने फल को जानकर बुद्धिमान् दुर्जन का साथ न करें, केवल सत्पुरुष का साथ करे । दुर्जन नरक में ले जाते हैं और सत्पुरुष स्वर्ग पहुँचाते हैं।" ८, शरीर नाशवान है भिक्षुओ ! यह शरीर नष्ट होनेवाला है, विज्ञान विनाश होनेवाला है और सभी सांसारिक आसक्तियां अनित्य, दुःख और परिवर्तनशील हैं।.... “शरीर को नष्ट होनेवाला, विज्ञान को विनाश होनेवाला और जन्म,मृत्यु में पड़े सांसारिक भासक्तियाँ को भय के तौर पर देखकर परम शांति को पा, भावितात्मा लोग समय की राह देखते हैं।" ६. स्वभाव के अनुसार ही मेल-जोल भिक्षुश्री ! प्राणी स्वभाव के अनुसार दूसरे प्राणियों के साथ हिलते- मिलते हैं। नीच विचार के प्राणी नीच विचार के प्राणियों के साथ हिलते-मिलते हैं। उच्च विचार के प्राणी उच्च विचार के प्राणियों के साथ (४. ) हिलते-मिलते हैं। भिक्षुओ ! प्राचीन काल में भी प्राणी स्वभाव के अनु' सार दूसरे प्राणियों के साथ हिले-मिले ...भिक्षुओ! भविष्य काल में भी प्राणी स्वभाव के अनुसार दूसरे प्राणियों के साथ हिलेंगे-मिन्नेगे........! भिक्षुओ! इस समय वर्तमान काल में भी प्राणी स्वभाव के अनुसार दूसरे प्राणियों के साथ हिलते मिलते हैं।.... "संसर्ग से क्लेश उत्पन्न होता है। अ-संसर्ग से दूर हो जाता है। थोड़े लकड़ी के बेड़े पर बैठकर जैसे महासमुद्र में डूब जाय, ऐसे ही बालसी के साथ से अच्छा श्रादी भी बरबाद हो जाता है । इसलिए आलसी और अनुत्साही व्यक्ति को छोड़ दे। एकान्त-सेवी, आर्य, संयमी भ्यानी और नित्य उद्योग में लगे रहने वाले बुद्धिमान् के साथ रहे।" १०. तीन हानिकर बातें भिक्षुश्रो ! ये तीन बातें शैक्ष्य भिक्षु की हानि के लिए हैं। कौन तीन? भिक्षुओ! शैक्ष्य भिक्षु काम-धन्धे में ही विचरण करनेवाला, काम-धन्धे में रत और काम-धन्धे में विचरण करने में लगा हुआ होता है; बातचीत करने में ही विचरण करनेवाला, बातचीत में रत और बातचीत में विच- रण करने में लगा हुआ होता है; निद्रा में ही विचरण करनेवाला, निद्रा में रत और निद्रा में विचरण करने में लगा हुआ होता है। भिक्षुओ ! ये तीन बातें शैक्ष्य भिक्षु की हानि के लिए हैं । भिक्षुत्रो ! ये तीन बातें शैक्ष्य भिक्षु की अपरिहानि के लिए हैं। कौन तीन ? भिक्षुओ! शैक्ष्य भिक्षु न काम-धन्धे में विचरण करने वाला .. , न बातचीत करने में ही विचरण करनेवाला.., न निद्रा में ही विचरण करनेवाला... होता है। भिक्षुश्रो ! ये तीन बार्ते शैक्य भिक्षु की अपरिहानि के लिए है।.... ।
( ४१ ) "काम-धन्धे में लगा, गप्पी, निद्रालु और चंचल-वैसा भिक्षु उत्तम सम्बोधि ( = ज्ञान ) को प्राप्त करने के लिए अयोग्य है। इसलिए थोड़े काम-धन्धेवाला, कम सोने वाला और चंचलता-रहित हो। वैसा भिक्षु उत्तम सम्बोधि को प्राप्त करने के लिए योग्य है।" चौथा वर्ग १. अकुशल वितर्क भिक्षुषो! ये तीन अकुशल वितर्क हैं। कौन तीन ? निन्दित न होने का वितर्क, लाभ-सत्कार-प्रशंसा का वितर्क और दूसरों की दया का वितर्क । .... "जो निन्दित होने और लाम-सत्कार तथा गौरव प्राप्त करने के वितर्क से युक्त होता है, अमात्यों से समबेदना रखना है, वह संयोजनों ( = सांसारिक बन्धनों) के क्षय से दूर है। जो पुत्र-पशु को छोड़, विवाह कराने से दूर और संग्रह-त्यागी है, वैसा भिक्षु उत्तम सम्बोधि को प्राप्त करने के योग्य है।" २. नरक में पड़ते देखा है ! भिक्षुश्री ! मैंने सत्कार में पड़े, दबे हुए चित्त वाले प्राणियों को शरीर छूटने पर नरक में उत्पन्न हुआ देखा है । भिक्षुभो ! मैंने असरकार में पड़े, दबे हुए चित्त वाले प्राणियों को शरीर छूटने पर नरक में उत्पन्न हुभा देखा है । भिक्षुश्रो ! मैंने सत्कार और असत्कार दोनों में पड़े, दबे चिन्तवाले प्राणियों को शरीर छुटने पर नरक में उत्पन्न हुश्रा देखा । भिक्षुओ! इमे मैं दूसरे श्रमण या ब्राह्मण से सुनकर नहीं कहता !
( ४२ ) हूँ। ... भिक्षुश्रो ! मैंने जो स्वयं जाना है, स्वयं देखा है, स्वयं विदित किया है, उसे ही मैं कहता हूँ।... "सत्कार करने और असत्कार दोनों से जिसकी समाधि विचलित नहीं होता है, जो अप्रमाद के साथ विहरनेवाला है। उस सतत ध्यानी सूक्ष्म दृष्टि से विपश्यना करनेवाले, उपादानों को क्षय किये व्यक्ति को सत्पुरुष कहा जाता है। ३. देव-वाणियाँ भिक्षुओ ! देवताओं में समय-समय पर ये तीन प्रकार की देव- वाणियाँ हुश्रा करती हैं। कौन तीन ? भिक्षुप्रो ! जिस समय भार्यश्रावक केश-दाढ़ी मुड़ाकर काषाय वस्त्रों को पहन घर से बेघर हो प्रवजित होने का विचार करता है, भिक्षुश्रो ! उस रूमय देवताओं में देववाणी होती है-'यह प्रार्यश्रावक मार के साथ संग्राम करने का विचार कर रहा है।' भिक्षुश्रो! यह पहली देववाणी देवताओं में समय-समय पर हुआ . करती है। और फिर, भिक्षुत्रो ! जिस समय आर्यश्रावक सैंतिस ( प्रकार के) "बोधि पाक्षिक” १४ धर्मों की भावना में लगा विहरता है, भिक्षुत्रो ! उस समय देवताओं में देववाणी होती है-'यह ार्यश्रावक मार के साथ संग्राम कर रहा है।' भिक्षुश्रो ! यह दूसरी देववाणी देवताओं में समय-समय पर हुआ करती है।.... और फिर, भिक्षुश्रो ! जिस समय पार्यश्रावक प्राश्रवों के नष्ट हो जाने से अनाव चित्त-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति को इसी शरीर में स्वयं ज्ञान से साक्षात् कर प्राप्त हो विहरता है, भिक्षुओ! उस समय देवताओं में देववार्या होती है-'यह प्रार्यश्रावक संग्राम विजय कर लिया है - और उसी संग्राम-भूमि में विनय कर वास कर रहा है। भिक्षुषो यह तीसरी देववाणी देवताओं में समय-समय पर हुआ करती है। ... "संग्राम-विजयी, महान्, निर्भय सम्यक् सम्बुद्ध के शिष्य को देख- कर देवता भी नमस्कार करते हैं--'हे उत्तम पुरुष ! तुझे नमस्कार है, जो कि तूने दुर्जय को जीत लिया है तू मृत्यु की सेना को जीत निर्वाण प्राप्त हो बे-रोक हो गये हो। अर्हत् को देवता इस प्रकार नमस्कार करते हैं और चूँ कि वह मृत्यु के वश में नहीं जाता, इसलिए देवता उसको नमस्कार करते हैं।” . - ८ ४ देवता के च्युत होने के लक्षण भिक्षुओ ! जब देवता देवलोक से च्युत होने वाला होता है, तब पाँच पूर्व-लक्षण ( = निमित्त) प्रगट होते हैं-(१) मालाएँ कुम्हला जाती हैं, (२) वस्त्र गन्दे हो जाते हैं, (३) काँखों से पसीना चूने लगता है, ४) शरीर में कुरूपता आ जाती है, और ( ५) देवता अपने देव-यासन पर अभिरमण नहीं करता । भिक्षुओ! तब देवता "यह देवपुत्र च्युत होने वाला है" इस प्रकार जानकर तीन बातों से उसे आश्वासन देते हैं- “भो ! यहाँ से अच्छी गति को प्राप्त होओ, अच्छी गति को प्राप्त हो अच्छा लाभ प्राप्त करो, अच्छे लाभ को पा सुप्रतिष्ठित होश्रो।" ऐसा कहने पर एक भिक्षु ने भगवान् से यह कहा - "भन्ते ! देव- तात्रों को अच्छी गति प्राप्त करना क्या कहा जाता है ? भन्ते ! देवताओं को अच्छा लाभ प्राप्त करना क्या कहा जाता है ? भन्ते ! देवताओं को सुप्रतिष्टित होना क्या कहा जाता है ?" भिक्षु ! देवताओं को मनुष्य होकर उत्पन्न होना अच्छी गति प्राप्त करना कहा जाता है। जो कि मनुष्य होकर तथागत द्वारा बतलाए गए ( ४४ ) धर्म-विनय में श्रद्धा प्राप्त करता है, भिन्नुभो ! यह देवताओं को अच्छा लाभ प्राप्त करना कहा जाता है। उसकी वह श्रद्धा चित्त में बैठी, जड़ पकड़ी, प्रतिष्टित, दृढ़ और संसार में किसी भी श्रमण, ब्राह्मण, देवता मार या ब्रह्मा से कम नहीं की जाने वाली होती है, भिक्षु ओ ! यह देव- तात्रों को सुप्रतिष्ठित होना कहा जाता है।" "जब देवता श्रायु के खत्म होने से देवलोक से च्युत होता है, तब देवताओं के आश्वासन के तीन प्रकार के शब्द निकलते हैं-'भो ! यहाँ से अच्छी गति को प्राप्त हो मनुष्यों की सहव्यता (= मनुष्य-योनि) में जाओ और मनुष्य होकर सद्धर्म में अनुत्तर श्रद्धा को प्राप्त करी । तेरी वह श्रद्धा चित्त में पैठी, जड़ पकड़ी और प्रतिष्ठित हो, जीवन-पर्यन्त भली प्रकार बतलाए गए सद्धर्म में कम होने वाली न हो । शारीरिक, वाचिक और मानसिक दुराचरों तथा अन्य जो दूसरे दोष हैं उन्हें छोड़, शरीर, वचन और मन से अप्रमाण परिशुद्ध बहुत पुण्य करके; तत्तश्चात् दान से भोग-सम्पत्ति पाने योग्य बहुत पुण्य कर, अन्य भा लोगों को सद्धर्म और ब्रह्मचर्य में लगाओ।" देवता जब च्युन होने वाले देवता को जानते हैं तब इस प्रकार अनुकम्पा करके आश्वासन देते हैं-'देव ! फिर श्रायो।' ५. बहुजन के हितैषी ये तीन व्यक्ति संसार में उत्पन्न होते हुये बहुत लोगों के हित के लिए, बहुत लोगों के सुख के लिये, लोक पर अनुकम्पा करने के लिए तथा देव और मनुष्यों के हित-सुख के लिए उत्पन्न होते हैं। कौन तीन ? भिक्षुमो ! यहां तथागत अर्हत् सम्यक सम्बुद्ध विद्या और आचरण से सुमत, लोक-विद्, अनुत्तर ( = सर्वोत्तम), पुरुषों को दमन करने के लिए सारथी रूप, देव-मनुष्यों के शास्ता (मार्गोपदेष्टा), बुद्ध और युक्त ( ४५ में चलनेवाला, भगवान् संसार में उत्पन्न होते हैं। वह प्रारम्भ, मध्य और अन्त में कल्याण-कर धर्म का उसके शब्दों और भावों रहित सर्वाश में परिपूर्ण परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रकाशित करते हैं। भिक्षुत्रो! यह पहला ब्यक्ति है, जो संसार में उत्पन्न होते हुए बहुत लोगों के हित के लिए... उत्पन्न होता। और फिर, भिक्षुओ! उसी शास्ता का शिष्य अहत्, क्षीणाश्रय, ब्रह्मचर्यपूर्ण, कृतकृत्य, उतरे-भार, अपने मतलब को प्राप्त, सांसारिक बन्धनों से रहित और भली प्रकार जानकर विमुक्त हो गया होता है । वह श्रारम्भ, मध्य और अन्त में कल्याणकर धर्म...को प्रकाशित करता है। भिक्षुत्रो ! यह दूसरा व्यक्ति है....! और फिर, भिक्षुत्रो ! उसी शास्ता का शिष्य शैच्य, आर्य-मार्ग बहुश्रुन और शील व्रत से युक्त होता है । वह भी श्रारम्भ मध्य और अन्त में कल्याणकर धर्म...को प्रकाशित करता है। भिक्षुओ! या तीसरा व्यक्ति है......... "महर्षि शास्ता संसार में प्रथम ( व्यक्ति) हैं, ( दूसरा) उनका अनुगामी संयमी शिष्य और (तीसरा) आर्य-मार्ग में चलनेवाला, शैचय, बहुश्रुत और शील-व्रत से युक्त (शिष्य) है। ये तीनों देव-मनुष्यों में श्रेष्ठ सूर्य समान हैं। वे धर्मोपदेश देते हुये निर्वाण के द्वार को खोल देते हैं और बहुत लोगों के बन्धन को खोल देते हैं । जो सुगत ( = बुद्ध ) के शासन ( = धर्म) में प्रमाद रहित हो, अनुत्तर सार्थवाह ( = बुद्ध) द्वारा बतलाये गये मार्ग में चलते हैं, वे यहीं दुःख का अन्त कर डालते हैं।" ६. अशुभ-भावना भिक्षुश्रो! काया में अशुमानुपश्यी ( -अशुभ होने का मनन करना) होकर विहरो, तुम्हारे भीतर अनापानसति ( ३ -आश्वास-प्रश्वास । में स्मृति बनाये रखना) सामने सुप्रतिष्ठित हो और सब संस्कारों में अनित्यानुपश्यी ( = अनित्य होने का मनन करना) होकर विहरा। मिक्षुओ ! काया में अशुभानुपश्यी विहरनेवालों को जो सुन्दरता सम्बन्धी राग की श्रासक्ति होती है, वह दूर हो जाती है। आनापानसति के भीतर सामने सुप्रतिष्ठित होने से जो बाहरी दुःखदायी मिथ्या वितर्क होते हैं, वे नहीं होते हैं। सब संस्कारों में अनित्यानुपश्यी होकर विहरने वालों को जो अविद्या होती है, वह दूर हो जाती है, जो विद्या है, वह उत्पन्न होती है। “जो सदा काया में अशुभ का विचार करने वाला है, पानापान में स्मृति बनाये रहनेवाला है और सब संस्कारों के शमन को देखने वाला परिश्रमी ( भिक्षु ) है, वह भिक्षु समदर्शी है, क्योंकि उससे वह मुक्त । उस अभिज्ञा-प्राप्त शान्त मुनि ने मांसारिक सभी बन्धनों को को लाँध दिया है।" है ७. धार्मिक के लक्षण धर्म के अनुसार चलने वाले भिक्षु का बातचीत करने में यह स्वभाव होता है कि वह बातचीत करते हुए धर्म हो कहता है, अधर्म नहीं। वितर्क करते हुये धार्मिक वितर्क हो कहता है अधार्मिक वितर्क नहीं अथवा दोनों को ही छोड़ कर स्मृति और सप्रजन्य ( = ज्ञान ) युक्त उपेक्षक हो विहरता है। "धर्म में बिहरनेवाला, धर्म में रत, धर्म का भी प्रकार विचार करनेवाला, तथा धर्म का स्मरण करने वाला भिक्षु सद्धर्म से च्युत नहीं होता । चलते, खड़े बैठे, या सोये अपने चित्त को शान्त करते हुए (परम) शान्ति को पा ही लेता है" ( ४७ ) ८. अच्छे-बुरे वितक भिक्षुओ! ये तीन अकुशल-वितर्क अन्धकार देनेवाले, विना आँख का बना देने वाले, अज्ञानी बनानेवाले, प्रज्ञा को रोकनेवाले, हानि पहुँचाने वाले और निर्वाण की ओर नहीं ले जानेवाले हैं। कौन तीन ! भिक्षुश्री ! काम-वितर्क ......व्यापाद (= द्रोह)-वितर्क... विहिंसा ( = प्रतिहिंसा ;- वितर्क ।..... भिक्षुओ ! ये तीन कुशल वितर्क न अन्धा करनेवाले, न बिना आँख का बनामेवाले, ज्ञानी बनानेवाले, प्रज्ञा बढ़ानेवाले, हानि न पहुँचानेवाले और निर्वाण की ओर ले जाने वाले हैं। कौन तीन ? भिक्षुओ! नैष्क्रम्य = निष्कामता )-वितर्क...., अ-च्यापाद-वितर्क..., श्र-विहिंसा- वितर्क......... "तीन कुशल वितर्को को करे, तीन अकुशल वितर्कों को छोड़ दे। उठी हुई धूल को जिस प्रकार बृष्टि शान्त कर देती है, उसी प्रकार अकुशल वितर्को और बुरे विचारों को रबा दे। ऐसा करनेवाला व्यक्ति चित्त से वितकों को शान्त कर यहीं शान्तिपद को पा लेता है।" ६. ये भीतरी शत्रु हैं ! भिक्षुत्रो ! ये तीन भीतरी मल, भीतरी शत्रु, भीतरी वैरी, भीतरी हत्यारे और भीतरी खिलाफत करनेवाले हैं। कौन तीन ? भिक्षुश्रो ! बोभ....,द्वेष...., मोह......... "लोभ अनर्थ उत्पन्न करनेवाला है, लोम चित्त को बिगाड़नेवाला अपने भीतर ही उत्पन्न भय को लोग नहीं जान पाते हैं। नोभी हित को नहीं जानता लोभी धर्म को नहीं देखता है । जिस । जिस मनुष्य को लोम अपने वश में कर लेता है, वह उस समय बिल्कुल अन्धा हो जाता ( ४८ ) है। जो लोम को छोड़ कर लुभानेवाली चीजों में लोभ नहीं करता है, उससे लोभ उसी प्रकार दूर हो जाता है, जैसे कि पुरइन के पत्ते से पानी की बूंद। "देष अनर्थ उत्पन्न करनेवाला है, द्वषी चित्त को बिगाड़नेवाला है । अपने ही भीतर उत्पन्न भय को लोग नहीं जान पाते हैं। द्वषी हित को नहीं जानता है, द्वषी कर्म को नहीं देखता है । जिस मनुष्य को द्वष अपने वश में कर लेता है वह उस समय बिल्कुल अन्धा हो जाता है । जो द्वष को छोड़कर दूपित करनेवाली चीजों में द्वष नहीं करता है, उससे द्वष उसी प्रकार दूर हो जाता है, जैसे कि पका हुआ ताड़ का फल भेंटी से। "मोह अनर्थ उत्पन्न करनेवाला है, मोह चित्त को बिगाड़ने वाला है। अपने ही भीतर उत्पन्न भय को लोग नहीं जान पाते हैं। मोहित हित को नहीं जानता है, मोहित धर्म को नहीं देखता है। जिस मनुष्य को मोह अपने वश में कर लेता है, वह उस समय बिल्कुल अन्धा हो जाता है । जो मोह को छोड़ कर मोहित करनेवाली चीजों में मोह नहीं करता है, वह उसी प्रकार मोड़ का नाश कर देता है जैसे कि सूर्य हुए सारे अन्धकार को।" १०. देवदत्त नारकीय है! भिक्षुओ ! तीन बुरी बातों से पछाड़ा गया, उनसे पकड़े गए चिरा- वाला देवदत्त अपाय में पड़नेवाला, नारकीय, कल्पस्थायी और असाध्य है। किन तीन से ? बुरी इच्छा से .. , बुरे मित्रों के साथ से..., और आगे करणीय होने पर भी अल्प-विशेषता की प्राप्ति से बीच में ही प्रयत्न करना छोड़ देने से !.... "मत कोई संसार में बुरी इच्छावाला उत्पन्न हो, उसे ऐसे भी जानो, जैसे बुरी इच्छाबालों की गति होती है। ऐसा मैंने सुना कि देवदत्त उदय होते ।
'पण्डित' प्रसिद्ध था, 'संयमी' माना जाता था, और यश से जाज्वल्य- मान था । वह प्रमादी हो तथागत को पीड़िन कर चार द्वारों वाले भयानक अवोचि-नरक१५ में पड़ा। जो पापकर्म नहीं करनेवाले निर्दोष को दोष लगाता है, तो पाप उसी बुरे चित्तवाले घृणित व्यक्ति को लगता है। जो विष के घड़े से समुद्र का दूपित करना चाहता है, तो वह उससे दूषित नहीं कर सकता, क्योंकि समुद्र बहुत बढ़ा है। ऐसे ही जो तथागत को दोष से पीड़ित करता है, तो उस श्रेष्ठ, शान्तचित्त को दोष लाग नहीं होता। वैसे व्यक्ति की मित्रता करें और उसका साथ करें, जिंसका अनुसरण करनेवाला भिक्षु दुःख का अन्त पा ले ।" पाँचवाँ वर्ग १. तीन अग्रप्रसाद भिक्षुश्रो ! ये तीन अग्र-प्रसाद हैं। कौन तीन ? भिक्षुत्रो! बिना परवाले, दो परवाले, चार पैरवाले, रूपी, अरूपी, संज्ञावान, असंज्ञावान अथवा न संज्ञावाले न असंज्ञावाले जितने भी प्राणी हैं, उनमें तथागत अर्हत् सम्यक् सम्बुद्ध अग्र ( श्रेष्ठ ) कहे जाते हैं। भिक्षुओ ! जो बुद्ध में प्रसन्न हैं, वे अन में प्रसन्न हैं और अग्र में प्रसन्न का फल भी अग्र होता है। भिक्षुओ ! संस्कृत या असंस्कृत जितने भी धर्म हैं, उनमें विराग अग्र कहा जाता है, जोकि यह मद का मर्दन, प्यास का बुझना, आसक्ति का खत्म होना, आवागमन का नष्ट होना, तृष्णा का क्षय, विराग, निरोध और निर्वाण है । भिक्षुओ ! जो विराग-धर्म में प्रसन्न हैं, वे अन में प्रसन्न है और अग्र में प्रसन्न का फल भी अन होता है ( ५० ) भिक्षुत्रो ! जितने संघ या गण हैं, उनमें तथागत का श्रावक संघ अन कहा जाता है जो कि यह चार पुरुष-जोड़े (= १-स्रोतापत्ति-मार्गस्थ, स्त्रोतापत्ति-फलस्थ, २-सकृदागामी मार्गस्थ, सकृदागामी-फलस्थ, ३- अनागामी-मार्गस्थ, अनागामी-फलस्थ, ४-अर्हत्-मार्गस्थ, अईत्-फलस्थ), पाठ पुरुष % पुद्गल ( = पाठ आर्य व्यक्ति) है-यह मावान् का श्रावक संघ है, जो कि अाह्वानीय है, पाहुन बनाने योग्य है, दक्षिणा देने योग्य है, हाथ जोड़ने योग्य है और संसार के लिए अनुपम पुण्य का खेत है। भिक्षुश्रो ! जो संघ में प्रसन्न हैं वे अग्र में प्रसन्न हैं और प्रय में प्रसन्न का फल भी अग्र होता है। भिक्षुषो ये तीन अग्र-प्रसाद हैं।... "जो अग्र में प्रसन्न हैं और अग्र धर्म को जानते हैं। अनुपम दक्षिणा देने योग्य अग्र बुद्ध में प्रसन्न हैं, विराग, शान्ति और सुग्व (-दायक ) अग्र धर्म में प्रसन्न हैं तथा अनुपम पुण्य के खेत अग्र-संघ में प्रसन्न हैं, ( ऐसे) (अन = श्रेष्ठ) में दान देते हुए उनका अग्र पुण्य बढ़ता है। वे अग्र आयु, वर्ण (= रूप), यश, कीर्ति, सुख और बल को प्राप्त होते हैं। अन का दाता, अन धर्मों से युक्त, बुद्धिमान् देवता या मनुष्य हो अग्र को प्राप्त कर प्रमोद करता है sho - २. लोहे का तप्त गोला खाना उत्तम है ! भिक्षुओ! भीख माँगकर खाना सभी पेशाओं में गया-गुजरा भिक्षुप्रो ! संसार में यह डाँटने का तरीका है - हाथ में बर्तन लेकर भीख माँग रहे हो ?' भिक्षुओ ! कुलपुत्र अपनी भलाई चाहनेवाले, अपनी मलाई देखते हुए उसे ही करते हैं। वे राजा की जेल से भागे हुए नहीं हैं , चोरों के हाथ से छूटे हुए नहीं हैं, ऋण के डर से घर छोड़ कर भागे हुए नहीं हैं, भय से भागे हुए नहीं हैं और न तो वह उनका पेशा ही है। बल्कि भिक्षुत्रो ! कुलपुत्र ऐसा सोचकर प्रबजित हुआ है .. "हम लोग हैं , ( ५१ ) जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु, शोक, विलाप, दुःख, दौर्मनस्य और परेशानी में उतरे में पड़े हैं, दुःख में लीन हैं, सम्भव है इस सारे दुःख-समूह का अन्त दिखाई दे।" किन्तु जब वह लोभी, कामभोग में तीव्र रागवाला, दोह चित्तवाला, बुरे संकल्प वाला, स्मृति-रहित, निष्प्रज्ञ, एकाग्रता-रहित, इधर-उधर मन दौड़ाने वाला और इन्द्रियों में असंयमी होता है, जैसे भिक्षुश्रो ! दोनों ओर से जली बीच में गूथ ( = गूह ) लगी मुर्दाघाटी की लकड़ी न गाँव में लकड़ी के काम में आती है और न तो जंगल में ही। वैसा ही भिक्षुश्रो ! मैं इस व्यक्ति को कहता हूँ, वह गृहस्थ-जीवन के भोग-विलास से वंचित हो गया और श्रामण्य को भी नहीं पूर्ण कर रहा है। "गृहस्थ जीवन के भोग-विलास से वंचित हो गया और श्रामण्य को भी नहीं पूर्ण कर रहा है। वह मुर्दाघाटी की लकड़ी की भाँति पतित होते बिखर कर नष्ट हो जाता है । असंबी दुराचारी हो देश का अन्न भवाने से अग्नि-शिखा के समान तप्त लोहे का गोला खाना उत्तम है ३. वह मुझसे दूर ही है भिक्षुत्रो ! यदि कोई भिन्तु मेरी संघाटी के कोनों को पकड़े पैर पर पर रखते पीछे लगा हो, किन्नु वह हो लोभी, कामभोग में नीबराग त्राला, द्रोह चित्तवाला, बुरे संकल्प वाला, स्मृति-रहित, निष्प्रज्ञ, एकाग्रता- रहित, इधर-उधर मन दौड़ाने वाला और इन्द्रियों में असंयमी; तो वह मुझसे दूर ही है और मैं भी उससे । पो किम कारण ? भिक्षुश्रो ! वह भिक्षु धर्म नहीं देखता है, वह धर्म देखते हुए मुझे नहीं देखता है। यदि भिक्षु भो ! सौ योजन पर भी भिक्षु विहार करे और वह हो निर्लोभी, काम- मोग में न तीब रागवाला, न द्रोह चित्त वाला, न बुरे संकल्पवाला, उपस्थित हुई स्मृतिवाला, संप्रज्ञ, एकाग्र, इधर-उबर मन न दौड़ाने वाला ( ५२ ) और इन्द्रियों में संयमी; तो वह मेरे पास ही है और मैं भी उसके । सो किस कारण ? भिक्षुओ ! वह भिक्षु धर्म देखता है, धर्म देखते हुए मुझे देखता है। "यदि कोई बड़ी इच्छावाला, द्रोही, तृष्णा का अनुगामी, अ-शान्त और लोभी तृष्णा-रहित, शान्त और निलोभी (तथागत) के पीछे-पीछे लगा हो, तो भी देखो वह कितना दूर है ! किन्तु जो बुद्धिमान् धर्म का ज्ञान प्राप्त कर, धर्म को जान शान्त जलाशय के समान तृष्णा-रहित, शान्त और निर्लोभी वितृष्ण, शान्त और निर्लोभी (तथागत) के पीछे पीछे लगा हुआ, देखो कितना समीप है !" ४. तीन अग्नियाँ भिक्षुओ ! ये तीन अग्नियाँ हैं। कौन तीन ? रागाग्नि, द्वेषाग्नि और मोहाग्नि ।..... 'रागाग्नि काम-भोगों में आसक्त और मूर्छित लोगों को जलाता है । दोषाग्नि जीवहिंसक द्रोही लोगों को और मोहाग्नि श्रार्यधर्म में श्र-दक्ष मूढ़ों को । इतने अग्नियों को न जानने वाले सत्काय में पड़े नरक, पशु- योनि, असुर (-योनि), और प्रेत्य-विषय (= भूत प्रेत ) को बढ़ाते हैं = बार-बार इन योनियों, में उत्पन्न होते हैं)। वे मार के बन्धन से नहीं छूटते हैं। जो रात-दिन समयक सम्बुद्ध के धर्म में लगे रहते हैं, अशुभ-संज्ञावाले होकर रागाग्नि को शान्त कर देते हैं । द्वेषाग्नि को उत्तम मैत्री (भावना ) से शान्त करते हैं और मोहाग्नि को प्रज्ञा से, जो कि निर्वाण की ओर ले जाने वाली है। वे रातों-दिन सतर्क रहनेवाले चतुर लोग इन्हें श न्त कर सारे दुःखों का नाश कर सब प्रकार से शान्त जाते हैं । आर्य-दर्शी ( = आर्य-सत्यों को देखने वाले ), ज्ञानी, भनी प्रकार जान कर पण्डित हुए, जन्म के क्षय होने को जान फिर जन्म नहीं - - लेते।
. . ५. चक्कर रुक गया। भिक्षुत्रो ! भिक्षु वैसे-वैसे विमर्ष करे, जैसे-जैसे विमर्प करते हुए उसका विज्ञान बाहर ( रूप आदि पालम्बनों में ) एकाग्र और चंचलता-रहित हो आलम्बनों में लगा रहे, श्रासक्तियों में न पड़े, और फिर जन्म, बुढ़ापा, मृत्यु तथा दुःख के उत्पन्न होने की सम्भावना न हो। "सात संगों से रहित, तृष्णा को नष्ट किए हुए भिक्षु का बार-बार जन्म लेने का चक्कर समाप्त हो गया, उसे फिर जन्म नहीं लेना।" ६. काम की उत्पत्तियाँ भिक्षुभो ! ये तीन काम की उत्पत्तियाँ हैं। कौन तीन ? उपस्थित कामवाले, निर्माणरति और परिनिर्मितवशवर्ती ।... "जो उपस्थित काम (-भोग) वाले हैं और जो वशवर्ती देव हैं। निर्मापति देव तथा दूसरे भा जो काम-भोगी हैं, वे उत्पत्ति और मृत्यु से नहीं छूटते । बुद्धिमान् स्वर्गीय या मानुषी जो काम-भोगी हैं, उन सबको छोड़ दे। प्रिय और लुभावने रूपों के रागरूपी स्त्रोत को काटकर जिसे कि लॉधना कठिन है, सारे दुग्वों का नाश कर सब प्रकार से शान्त हो जाते हैं। आर्य-दर्शी, ज्ञानी, भलो प्रकार जानकर पण्डित हुए, जन्म के आय होने को जान फिर जन्म नहीं लेते।" ७ वे संसार पार हो गये हैं! भिक्षुओ! काम-भोग और भव के बन्धन में बंधा, व्यक्ति इस संसार में फिर आने वाला होता है। भितुओ! काम भोग और भव के बन्धन * ये सात संग हैं-तृष्णा, दृष्टि, मान, क्रोध, अविद्या, क्लेश और दुश्चरित्र । +मनुष्यों और चातुर्महाराजिक देवों से चार देवलोकों को उपस्थित- काम कहा जाता ५४ ) से मुक्त व्यक्ति फिर इस संसार में श्रानेवाला नहीं होता है। भिक्षुश्री : कामभोग और भत्र के बन्धन से मुक्त क्षीणाश्रव अर्हत् होता है । "प्राणी काम और भव दोनों के बन्धनों से बंधे संसार में जन्म और मृत्यु के चक्कर में पड़े रहते हैं । जो कामभोगों को त्याग दिये हैं किन्त अाश्रवों का क्षय नहीं किये हैं तथा भव-बन्धन से युक्त हैं, वे 'अनागामी' कहे जाते हैं। और जो सन्देह-रहित हैं फिर जन्म लेनेवाले नहीं हैं तथा जिन्होंने प्राश्रय-क्षय ( निर्वाण ) को प्राप्त कर लिया है, वे ही संसार पार हो गये हैं। । , " ८. उत्तम पुरुष कौन है ? भिक्षुओ ! सुन्दर शीलों से युक्त, अच्छे धर्मों को करनेवाला, उत्तम प्रज्ञावाला भिक्षु इस धर्म-विनय में केवली (= अहंत्) ब्रह्मचर्य-वास किया हुश्रा, उत्तम पुरुष कहा जाता है। कैसे भिक्षुश्री ! भिक्षु सुन्दर शीलों से युक्त होता है ? भिक्षुःश्रा ! यहाँ भिक्षु शीलवान होता है, प्रातिमोक्ष के नियमों का भली प्रकार पालन करनेवाला होना है, प्राचार-गोचर में युक्त हो अल्प-मात्र के दोषों में भी भय देखता शिक्षा-पदों को पालन करने का अभ्यास करता है । भिक्षुओ ! इस प्रकार भिक्षु सुन्दर शीलों से युक्त होता है। कैसे अच्छे धर्मों को पालन करनेवाला होता है ? भिक्षुश्रो ! यहाँ सैंतिस ( प्रकार के । बोधि-पाक्षिक धर्मों की बोधि-पाक्षिक धर्मों की भावना में लगा होता है।... कैसे उत्तम प्रज्ञावाला होता है ? भिक्षु भो ! यहाँ भिष, पाश्रवों के ज्य से अनाव चित्त की विमुक्ति और प्रज्ञा की विमुक्ति को इसी जन्म में स्वयं अभिज्ञा से साक्षात् कर प्राप्त हो विहरता है।....
( ५५ ) "जो शरीर, वचन और मन से दुष्कृत नहीं करता है, वैसे लजा शील भिक्षु को सुन्दर शीलों से युक्त कहा जाता है। जिसने सम्बोधि- प्राप्ति की ओर ले जानेवाले धर्मों की भली प्रकार भावना को है, वैसे राग-रहित भिक्षु को अच्छे धर्मों को करनेवाला कहते हैं। जो यहीं अपने दुःखों के क्षय को जान लेता है, वैसे अनाव भिक्षु को उत्तम प्रज्ञा वाला कहते हैं । उन धर्मों से युक्त, निष्पाप, संशय-रहित और सारे लोक में अनासक्त ( भिक्षु ) को सत्यागी कहते हैं ।" ६. धर्मदान श्रेष्ठ Shci भिक्षुओ ! ये दो दान हैं-प्रामिष-दान और धर्म-दान । भिक्षुओ ! इन दोनों में धर्मदान श्रेष्ठ है । भिक्षुत्रो ! ये दो संविभाग ( = बाँटकर उपभोग करना ) हैं-आमिष:संविभाग और धर्म-संविभाग । भिक्षश्रो ! इन दोनों सविभागों में धर्म-संविभाग श्रेष्ठ है। भिक्षुओ ये दो अनुग्रह हैं-श्रामिष-अनुग्रह और धर्म-अनुग्रह । भिक्षुप्रो ! इन दोनों अनुग्रहों में धर्म-अनुग्रह श्रेष्ठ है। "जिस दान को उत्तम और सर्वश्रेष्ठ कहकर भगवान् ने प्रशंसा की है, उसे समय पर अग्र-क्षत्र में प्रसन्न-चित्त हो कौन जाननेवाला बुद्धिमान नहीं देगा ? बुद्ध के धर्म में जो कहते और सुनते हैं, जो प्रमाद नहीं करते, उनका परमार्थ विशुद्ध होता है।" .१०. विद्य ब्राह्मण कौन है ? भिक्षुओ ! मैं धर्म से ही विद्य ब्राह्मण को बतलाता हूँ, न दूसरे को कहने-सुनने मात्र से । भिक्षुप्रो ! कैसे मैं धर्म से हो त्रैविद्य ब्राह्मण को बतलाता हूँ ? यहाँ भिक्षुश्रो ! भिक्षु अनेक प्रकार से पूर्वजन्मों की सौ..., ( ५६ ) बातों को स्मरण करता है । जैसे, एक जन्म, दो...., तीन...., चार...., पाँच..., दस...., बीस...., तीस चालीस पचास...., हजार...., लाख...., अनेक संवर्त ( = प्रलय )-विवर्त ( = सृष्टि) कल्पों ( को जानता है )-"मैं वहाँ था, इस नामवाला, इस गोत्रवाला, इस रंग का, इस आहार ( = भोजन) को खानेवाला, इतनी आयु वाला था। मैंने इस प्रकार के सुख और दुःख का अनुभव किया । सो मैं वहाँ से मरकर वहाँ उत्पन्न हुआ, इस नाम वाला...। सो मैं वहाँ से मरकर यहाँ उत्पन्न हुआ।" इस तरह आकार-प्रकार के साथ वह अनेक जन्मों को स्मरण करता है। यह उसे पहली विद्या मिल गई होती है, अविद्या नष्ट हो गई होती है, विद्या उत्पन्न हो गई होती है । अन्धकार नष्ट हो गया होता है और आलोक उत्पन्न हो गया होता है, क्योंकि वह अप्रमादी, परिश्रमी एवं संयमी होकर विहरने वाला है। . और फिर, भिक्षुश्रो ! भिक्षु शुद्ध और अलौकिक दिव्य चक्षु से मरते, उत्पन्न होते, हीन अवस्था में आये, अच्छी अवस्था में पाए, अच्छे वर्ण (रंग) वाले, बुरे वर्ण वाले, अच्छी गति को प्राप्त, बुरीगति को प्राप्त, अपने-अपने कर्म के अनुसार अवस्था को प्राप्त, प्राणियों को जान लेत है-ये प्राणी शरीर से दुराचरण, वचन से दुराचरण और मन से दुरा- चरण करते हुए साधुपुरुषों की निन्दा करते थे, मिथ्या-दृष्टि ( = बुरे सिद्धान्त) रखते थे। बुरी धारणा के काम करते थे। अब वह मरने के बाद नरक और दुर्गति को प्राप्त हुए हैं और यह दूसरे प्राणी शरीर, वचन और मन से सदाचार करते, साधुजनों की प्रशंसा करते, ठीक धारणावाले, ठीक धारणा के अनुकूल आचरण करते थे; सो अब अच्छी गति और स्वर्ग प्राप्त हुये हैं। इस तरह शुद्ध अलौकिक दिव्य चक्षु से .. जान लेता । यह उसे दूसरी विद्या मिल गई होती है। और फिर, भिक्षुत्रो ! भिक्षु आश्रयों के क्षय से अनाभव चित्त की विमुक्ति और प्रज्ञा की विमुक्ति को इसी जन्म में स्वयं ज्ञान से साक्षात् ..
( ५७ ) कर प्राप्त हो विहरता है। यह उसे तीसरी विद्या मिल गई होती है।... "जो पूर्व जन्म को जानता है, स्वर्ग और नरक को जिसने देख लिया है, जिसका जन्म क्षीण हो चुका है, जिसकी प्रज्ञा पूर्ण हो चुकी है, इन तीनों विद्याओं से 'विद्य ब्राह्मण' होता है। उसे ही मैं त्रैविद्य कहता हूँ, दूसरे को कहने-सुनने मात्र से नहीं।"
चौथा निपात १. बुद्ध अनुत्तर वैद्य हैं भिक्षुश्रो ! मैं ब्राह्मण ( = निष्पाप), याचनीय, सदा खुले हाथ देने वाला, अन्तिम शरीरधारी और अनुत्तर शल्यकर्त्ता ( = ऑपरेशन करने वाला ) वैद्य हूँ। तुम लोग मेरे औरम, मुख से उत्पन्न, धर्मज, धर्म- मिर्मित, धर्म-दायाद ( = उत्तराधिकारी ) पुत्र हो, आमिष-दायाद नहीं। भिक्षुओ ! ये दो दान हैं---श्रामिघ-दान और धर्मदान... ( ३. ५. ६ जैसा)....। आमिष-संविभाग और धर्म-संविभाग ।....आमिष अनुग्रह और धर्म अनुग्रह ........भिक्षुत्रो ! ये दा याग ( = यज्ञ, है-श्रामिष- याग और धर्म-याग। भिक्षुओ! इन दोनों यागों में धर्म-याग श्रेष्ठ है।.... "सब प्राणियों पर अनुकम्पा करनेवाले उदार तथागत ने जो धर्म- याग किया, वैसे देव-मनुष्यों में श्रेष्ठ, संसार को पार किए हुए ( भग- वान् ) को प्राणी नमस्कार करते हैं।" २ चार सुलभ चीजें मिथुनो! ये चार अल्प, सुलभ और निर्दोष हैं। कौन चार ? भिक्षुओ ! पांचकूल चीवर ( = मार्ग प्रादि में गिरे हुये वस्त्र-खण्डों को ( ५६ ) अल्प और सीकर बनाया हुआ चीवर ), भिक्षा माँगकर खाना... , वृक्ष-मूल ( पेड़ों के नीचे रहना ), पूतिमूत्र ( = गो-मूत्र)। भिक्षुत्रो ! अब भिक्षु सुलभ से सन्तुष्ट होता है, तो उसका यह एक श्रामण्य अंग होता है-ऐसा मैं कहता हूँ 1... "जो निदोप, अल्प और सुलभ से सन्तुष्ट है, शयन आसन, चीवर और खाने-पीने के लिए जिसे चित्त में परेशानी नहीं है, जो दिशाओं में नहीं ठकराता ( अर्थात् सन्तुष्ट होता है ), ता श्रमण-भाव के अनुरूप जो धर्म बतलाये गये हैं, वे उस सन्तुष्ट, अप्रमादी भिक्षु को प्राप्त होते हैं।" . ३ आश्रवों का क्षय कैसे ? भिक्षो ! मैं जानने और देखनेवाले के लिए ही श्राश्रवों का क्षय कहता हूँ, न जानने और न देखनेनाले के लिए नहीं। भिक्षुओ ! क्या जानने वाले और क्या देखनेवाले के श्राश्रवों का क्षय होता है ! भिक्षुत्रो ! 'यह दुःख है' जानने और दखनेवाले के आश्रवों का क्षय होता है, 'यह दुःख-समुदय है", 'यह दुःख का निरोध है'... 'यह दुःख-निरोध की श्रोर ले जाने वाला मार्ग है। भिक्षुशो! इस प्रकार जानने और देखने वाले के आश्रवों का क्षय होता है। "सीधे मार्ग पर चलने वाले, अभ्यासशील शैक्ष्य को अर्हत् मार्ग में प्रथम ज्ञान होता है, उसके वाद अहत्वज्ञान और तत्पश्चात् ( प्रज्ञा-) विमुक्ति का उत्तम ज्ञान होता है और सारे बन्धन क्षीण हो गए ऐसा क्लेशों के क्षय होने का ज्ञान उत्पन्न होता है। सभी ग्रन्थियों (= गाँठों) को खोलनेवाला निर्वाण आलसी, मूर्ख और न जाननेवाले द्वारा नहीं पाया जा सकता।"
, ( ६० ) ४. वे ही असली श्रमण हैं भिक्षुओ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण 'यह दुःख है' यथार्थ नहीं जानते हैं, 'यह दुःख-समुदय है' यथार्थ नहीं जानते हैं, 'यह दुःख निरोध है' यथार्थ नहीं जानते हैं, 'यह दुःख-निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग है, यथार्थ नहीं जानते हैं, भिक्षुश्रो ! वे श्रमण या ब्राह्मण श्रमों में श्रमण या ब्राह्मणों में ब्राह्मण नहीं माने जाते हैं और वे आयुष्मान् न तो इसी जन्म में श्रामण्य फल या ब्राह्मण्य-फल को स्वयं ज्ञान से माक्षात् कर, प्राप्त हो विहरते हैं। भिक्षुप्रो ! जो कोई श्रमण या ब्राह्मण 'यह दुःख है' यथार्थ जानते हैं, 'यह दुःख-समुदय है' यथार्थ जानते हैं, 'यह दुःख-निरोध है, यथार्थ जानते हैं, 'यह दुःख निरोधकी ओर ले जाने वाला मार्ग है, यथार्थ जानते हैं, भिक्षुत्रो ! वे श्रमण या ब्राह्मण श्रमणों श्रमण या ब्राह्मणों में ब्राह्मण माने जाते हैं और वे प्रायुष्मान् इसी जन्म में श्रामण्य-फल को स्वयं ज्ञान से साक्षात् कर, प्राप्त हो विहरते हैं। दुःख और दुःख की उत्पत्ति को नहीं जानते, जहाँ दुःख सा- शतः शान्त हो जाता है और दुःख की शान्ति की ओर ले जानेवाले मार्ग को भी नहीं जानते हैं, वे चित्त-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति से वंचित हैं। वे दुःखों का अन्त करने में समर्थ नहीं, वे तो जन्म और बुढ़ापे में हो पड़े रहते हैं। किन्तु जो दु ख और दुःख की उत्पत्ति को जानते हैं, जहाँ दुःख सर्वाशतः शान्त हो जाता है और दुःख की शान्ति की ओर ले जाने वाले मार्ग को भी जानते हैं, वे चित्त-विमुक्ति और प्रज्ञा-विमुक्ति से युक्त है। वे दुःखों का अन्त करने में समर्थ हैं। वे जन्म भार त्रुदापे में नहीं पड़ते।" ५. उनका दर्शन भी लाभदायक है ! भिक्षो! जो भिक्ष शील, समाधि, प्रज्ञा, विमुक्ति और विमुक्ति- ज्ञान-दर्शन से युक्त हैं, उपदेशक, (कर्म और कर्म-फल को) बतलाने वाले में .
( ६५ ) दिखलाने वाले, ग्रहण करने वाले, उत्तेजित करनेवाले, सन्तोष देने वाले और सद्धर्म को अच्छी तरह कहनेवाले हैं, भिक्षुत्रो ! मैं उन भिक्षुओं का दर्शन भी बहुत लाभदायक कहता हूँ। श्रवण भी... , पास जाना भी...., संगति करना भी..., अनुस्मरण करना भी...., और उनका अनुगामी होकर प्रबजित हो जाना भी। सो किस कारण ? भिक्षुत्रो ! वैसे भिक्षुओं के सेवन, साथ और संगति से अपरिपूर्ण शील-स्कन्ध परि- पूर्ण हो जाता है, अपरिपूर्ण समाधि-स्कन्ध..., अपरिपूर्ण प्रज्ञा-स्कन्ध...., अपरिपूर्ण विमुक्ति स्कन्ध...., और अपरिपूर्ण विमुक्ति ज्ञान-दर्शन-स्कन्ध ... । भिक्षुओ ! इस प्रकार के वे भिक्षु शास्ता भी कहे जाते हैं, सार्थ- वाह....रणंजह ( = रागत्यागी) अन्धकार-नाशक. आलोक करने प्रकाश करनेवाले... प्रद्योत करनेवाले..., उल्काधारी प्रमङ्कर प्रायं.... और चक्षुष्मान् भी कहे जाते है। "जानकार, संयमी, धर्मपूर्वक जीवन-यापन करनेवाले आर्यों के लिये यह प्रमोद उत्पन्न करनेवाला होता है। वे प्रभङ्कर, आलोक करनेवाले, धीर, चक्षुष्मान् , राग-त्यागी, सद्धर्म को प्रकाशित करते और कहते हैं। जिनके धर्म को सुनकर अच्छी तरह जान, पण्डित लोग जन्म का क्षय कर फिर जन्म नहीं लेते।" वाले..., ६. तृष्णा से ही चक्कर भिक्षुत्रो ! ये चार तृष्णा की उत्पत्तियाँ हैं, जिसमें कि भिक्ष को तृष्णा उत्पन्न होते हुए उत्पन्न होती है। कौन चार ? भिक्षुत्रो ! भिक्ष को चीवर के लिए तृष्णा उत्पन्न होती है या पिण्ड-पात ( भोजन ) के लिए...., या शयन-श्रासन के लिए..., या लाभ-हानि के ? लिए.... ... "तृष्णा की दोस्तीवाला पुरुष चिरकाल से चक्कर काट रहा है। उत्पन्न होता और मरता है। वह संसार का अतिक्रमण नहीं कर पाता।
( ६२ ) . तृष्णा दुःख को पैदा करनेवाली है- इस प्रकार इसके दोषों को जान कर भिक्षु तृष्णा-रहित, अनासक्ति को छोड़, स्मृतिमान् हो विचरगा करे। ७ माता-पिता ही ब्रह्मा हैं . भिक्षुश्रो ! वे भिक्षश्रो ! वे कुल ब्रह्मा के साथ हैं, जिन पुत्रों के माता-पिता घर में पूजित हैं । भिक्षो! वे कुल पूर्व-देवों के साथ हैं..., कुल पूर्व-प्राचार्यों के साथ हैं..., भिक्षु प्रो ! वे कुल अाह्वानीयों के साथ हैं जिन पुत्रों के माता-पिता घर में पूजित हैं। भिक्षुग्रो ! 'ब्रह्मा' यह माता-पिता का ही नाम है । 'पूर्व-देवता...., 'पूर्व-प्राचार्य .. . 'श्राह्वानीय' यह माता-पिता का ही नाम है । सो किस कारण ? भिक्षुप्रो ! माता- पिता पुत्रों के बहुत उपकारक हैं, पालन-पोषण करनेवाले हैं, इस लोक को ( नाना प्रकार से ) दिखलानेवाले हैं। "माता-पिता (ही) ब्रह्मा, पूर्व-प्राचार्य, श्राह्वनीय और पुत्रों के अनुकम्पक कहे जाते हैं, इसलिए बुद्धिमान् पुरुष को चाहिए कि उनका नमस्कार पूर्ण सत्कार करे । अन्न, पेय, वस्त्र, शयन, उबटन, स्नान और पैरों को धोने से उनकी सेवा रे। बुद्धिमान् पुरुप माता-पिता की उस सेवा से यहाँ भी प्रशंसित होता है और मरने पर स्वर्ग में भी प्रमोद करता है।" ८. परस्पर सहयोग से मुक्ति % 3D ७ भिक्षुत्रो ! वे ब्राह्मण-गृहस्थ ( गृहपनि) तुम्हारे बहुत उपकारक है, जो तुम्हारे लिए चीवर, पिण्डपात ( = भोजन), शयन-प्रामन, भन्लान-प्रत्यय ( = रोगीका पथ्य), भैषज्य ( रोगीका पथ्य), भैषज्य (= दवा) और परिष्कारों ( = काम में आनेवाली वस्तुओं) मे सदा प्रस्तुत रहते हैं । भिक्षुश्री !
( ६३ ) तुम लोग भी ब्राह्मण-गृहस्थों के बहुत उपकारक हो, जो तुम लोग उन्हें प्रारम्भ, मध्य और अन्त में कल्याणकर धर्म का उसके शब्दों और भावों सहित उपदेश करके, सर्वांश में परिपूर्ण परिशुद्ध ब्रह्मचर्य को प्रका- शित करते हो। इस प्रकार भिक्षुत्रो ! परस्पर के सहयोग से संसार- रूपी बाढ़ को पार करने और भली प्रकार दुःख का अन्त करने के लिए ब्रह्मचर्य पालन किया जाता है। "घरबारी ( = गृहस्थ ) और बेघरबारी (प्रजित ) दोनों एक दूसरे के सहारे परम कल्याणकारक सर्वोत्तम सद्धर्म का पालन करते हैं। प्रनजित पीड़ा को दूर करने के लिए गृहस्थों से चीवर, ( = भोजन और भैषज्य ) और शयन-अासन पाते हैं। घरबारी गृहस्थ तथागत के सहारे आर्य-प्रजा के ध्यानी श्रहन्तों का विश्वास करते स्वर्गगामी मार्ग पर चलते धर्म का पालन कर देवलोक में श्रानन्द करते हैं और चाहे हुए को पाकर प्रमोद करते हैं।" ६ वे बुद्ध को चाहने वाले हैं भिक्षुश्रो ! जो कोई भिक्षु धून, क्रोधी, बातूनी, चालाक, घमण्डी एकाग्रता-रहित हैं, भिक्षुओ ! वे भिक्षु मुझे चाहनेवाले नहीं हैं। भिक्षुओ ! वे भिक्षु इस धर्म-विनय से बाहर हैं । भिन्नुभो ! वे भिक्षु इस धर्म-विनय में वृद्धि, विरूढ़ि और विपुल-भाव को नहीं प्राप्त होते हैं। और भिक्षुभो ! जो कोई भिक्षु धर्त नहीं हैं, क्रोधी नहीं हैं, बातूनी नहीं हैं, धीर हैं, और एकाग्र-चित्त वाले हैं, भिन्नुभो ! वे भिक्षु मुझे चाहनेवाले हैं। भिक्षुश्रो ! वे भिक्षु इस धर्भ-विनय से बाहर नहीं हैं, भिक्षुओ ! वे भिक्षु इस धर्म-विनय में वृद्धि, विरूढ़ि और विपुल-भाव को प्राप्त - "जो धर्त, क्रोधी, बातूनी, चालाक, घमण्डी और एकाग्रता-रहित .
( ६४ ) हैं, वे सम्यक् सम्बुद्ध द्वारा कहे गये धर्म में उन्नति नहीं कर पाते। जो धर्म नहीं हैं, बातूनी नहीं हैं, धीर हैं, क्रोध-रहित है और एकाग्र चित्त वाले हैं, वे सम्यक् सम्बुद्ध द्वारा कहे गये धर्म में उन्नति करते है।” १०. पार गया व्यक्ति जैसे भिक्षुत्रो ! कोई पुरुष बड़े प्रेम और पानन्द से नदी की धार में बहे, तब कोई किनारे खड़ा हुआ आँख वाला आदमी उसे देखकर ऐसा कहे-'हे पुरुष ! भले ही तू प्रेम और श्रानन्द से नदी की धार में बह रहे हो, किन्तु यहाँ नीचे की ओर लहर, भँवर, मगर और राक्षस वाला कुण्ड है, हे पुरुष ! जहाँ तू पहुँचकर मर जानोगे या मरने के समान दुःख पाओगे।' भिक्षुओ ! तब वह पुरुष उस पुरुष को बात सुनकर हार्थों और पैरों से ऊपर की ओर ( = उल्टी धार ) जाने का प्रयत्न करे। भिक्षुत्रो ! बात को समझाने के लिए मैंने यह उपमा कही है । यह अर्थ है-भिक्षुप्रो! 'नदी की धारा' यह छः भीतरी पायतनों ( = चद श्रोत्र, घाण, जिह्वा, काय और मन ) का नाम है । भिक्षुओ ! 'नीचे की ओर कुण्ड' यह पाँच अवर-भागीय संयोजनों ( = सत्काय दृष्टि, विचिकित्सा, शीलव्रत-परामर्श, कामराग और व्यापाद ) का नाम है। भिक्षुओ! 'लहर' यह क्रोध और परेशानी का नाम है। भिक्षुषो! 'भँवर' यह पाँच कामगुणों(= पाँचों इन्द्रियों से सम्बन्धित काम-वासनायें) का नाम है। भिक्षुशो! 'मगर और राक्षस' यह स्त्री का नाम है। भिक्षुश्रो ! 'उल्टी धार' नैष्क्रम्य ( = निष्कामता) का नाम है। भिक्षुश्रो ! हाथों और पैरों से प्रयत्न करना' यह दृढ़ उद्योग का नाम है। भिक्षुभो ! किनारे खड़ा हुआ आँखवाला आदी' यह सथागत प्रत् सम्बुद्ध का नाम है। ।
( ६५ ) "सचेत और मुत-चित्त वाला आगे निर्वाण की कामना करते हुए यदि दुःख के साथ भी काम-भोगों को छोड़ देता है, तो वह (मार्ग-फला की प्राप्ति के साथ ही ) वहाँ विमुक्ति पा लेता है । वह ज्ञानी, ब्रह्मचर्य- हुआ, लोक का अन्त-कर्ता और पार गया हुअा कहा जाता " वास किया ११. निर्वाण कौन पाता है ? मिक्षश्रो ! यदि चलते हुए भी भिक्षुको काम-वितर्क, व्यापाद-वितर्क या विहिंसा-वितर्क उत्पन्न होता है, और भिक्षुओ ! भिक्षु उसे स्वीकार करता है, नहीं छोड़ता है, नहीं हटाता है, नहीं निकालता है, नहीं मिटा देता है, तो भिक्षुओ ! चलते हुए भी ऐसा भिक्षु अ-परिश्रमी,श्र-संकोची, एकदम प्रालसी और उद्योग-रहित कहा जाता है। भिक्षुओ! यदि खड़े हुए भी...., बैठे भी. ..., लेटकर जागते . भी .. भिक्षुश्रो ! यदि चलते हुए भी भिनु को काम-वितर्क, व्यापाद-वितर्क या विहिंसा-वितर्क उत्पन्न होता है और भिक्षुश्रो ! भिक्षु उसे नहीं स्वीकार करता है, छोड़ देता है, हटा देता है, मिटा देता है तो भिक्षुओ ! चलते हुए भी ऐसा भिक्षु परिश्रमी, संकोची, सदा उद्योगशील, और संयमी कहा जाता है। भिक्षुनो ! यदि खड़े हुए भी", बैठे हुए भी..., बोटकर जागते हुए भी..... "जो चलते, खड़े, बैठे अथवा सोये काम-भोग सम्बन्धी बुरे वितर्क करता है, बुरे मार्ग पर चलने वाला मोहित करने वाली चीजों में मर्थित ऐसा भिक्षु उत्तम सम्बोधि को प्राप्त करने के योग्य नहीं। जो चलते, सड़े, बैठे अथवा सोये वितर्क को शान्त कर वितर्क के शमन में लगा रहता है, वैसा भिक्षु उत्तम सम्बोधि को प्राप्त करने के योग्य है।"
१२ शील से युक्त होकर विहरो भिक्षुश्रो ! शील से युक्त होकर विहरो, प्रातिमोत से युक्त हो प्राति- मोच-संयम का भली प्रकार पालन करते विहरो, प्राचार-गोचर से युक्त हो अल्पमात्र के दोषों में भी भय देखते शिक्षा-पदों को पालन करने का अभ्यास करो। भिक्षुओ! शील और प्रातिमोक्ष से युक्त हो, प्रातिमोक्ष- संयम का भली प्रकार पालन करते विहरते, प्राचार-गोचर से युक्त अल्पमात्र के दोषों में भी भय देखते शिक्षा-पदों को पालन करने का अभ्यास करते भिक्षुश्रो ! भागे क्या करणीय है ? भिक्षुभो ! चलते हुए भी भिक्षु का लोभ दूर हो गया होता है, ब्यापाद...., स्स्यान-मृद्ध =मानसिक और शारीरिक प्रालस्य) औद्धत्य (= चंचलता) कोकृत्य (= पड़तावा)...., और विचिकित्सा = सन्देह ) । उद्योग करने में लगा होता है, स्मृति उपस्थित होती है, शरीर पीड़ा-रहित शान्त होता है और चित्त एकाग्रता-प्राप्त होता है, तो भिक्षुओ! चलते मा ऐसा भिक्ष परिश्रमी, संकोची,सदा उद्योशील और सयमी कहा जाता है। भिक्षुओ! यदि खड़े हुए भी · ,बैठे हुए भी,लेटकर जागते “यत्नपूर्वक चले, यत्नपूर्वक खड़ा हो, यत्नपूर्वक बैठे, यत्नपूर्वक लेटे । भिक्षु यलपूर्वक सिकोड़े और यत्नपूर्वक पसारे। ऊपर, नीचे, तिरछे जहाँ तक संसार की गति है, वहाँ तक सभी धर्मों और स्कन्धों की उत्पत्ति और लय को देखनेवाला होकर विहरे । इस प्रकार विहरनेवाले, उद्योगी, शान्त, चंचलता-रहित, सदा स्मृतिमान्, चित्त की उचित शान्ति के अभ्यास करने में लगे हुये वैसे भिक्षु को सदा संयमी (= निर्वाण प्राप्त) कहते हैं। १३. बुद्ध 'तथागत' क्यों कहलाते हैं ? भित्रो ! संसार तथागत से जान लिया गया है, तथागत संसार से प्रजग हैं। भिक्षुओ ! संसार की उत्पत्ति तथागत से जान जी गई है, मी.
( ६७ ) संसार की उत्पत्ति तथागत से दूर हो गई है । भिनुप्रो ! संसार का शान्त होना तथागत से जान लिया गया है, तथागत ने संसार की शान्ति का साक्षात्कार कर लिया है। मित्रो ! संसार के शान्त होने की ओर से जानेवाला मार्ग तथागत से जान लिया गया है, तथागत ने संसार की शान्ति की ओर ले जानेवाले मार्ग की भावना करली है। भिक्षुत्रो ! जो देवताओं के साथ संसार में मार, ब्रह्मा और श्रमण- ब्राह्मणों-सहित देवताओं और मनुष्यों से देखा, सुना, अनुभव किया, नाना गया, प्राप्त किया, खोजा गया और मन से विचार किया गया है, चूंकि वह तथागत से जान लिया गया है, इसलिए "तथागत" कहे बाते हैं। भिक्षुश्रो ! जिस रात तथागत अनुत्तर सम्यक् सम्बोधि (= बुद्धत्व) को प्राप्त करते हैं और जिस रात अनुपादिशेष निर्वाण-धातु से परिनिर्वाण को प्राप्त होते हैं, इसके बीच जो कहते हैं, बोलते हैं, निर्देश करते हैं, वह सब वैसा ही होता है, अन्यथा नहीं, इसलिए 'तथागत' कहे जाते हैं। मिश्रो ! तथागत जैसा कहते हैं, वैसा करने वाले हैं, तथागत जैसा करते हैं, वैसा कहते हैं। इस प्रकार यथावादी तथाकारी और यथाकारी तथावादी हैं, इसलिए 'तथागत' कहे जाते हैं। भिक्षुओ! देवताओं के साथ संसार में मार, ब्रह्मा, श्रमण-ब्राह्मणों सहित देवताओं और मनुर्यो में तथागत अभिभू, अजित,सर्वदृष्टा, वशवर्ती हैं, इसलिए तथागत' कहे जाते हैं।.... "सारे संसार को जानकर, सारे संसार में यथार्थ रूपसे, सारे संसार से अलग, सारे संसार में अनुपम; सबमें अभिभू, धीर, सारी ग्रन्थियों को खोखकर, (जो) निर्भय परम शान्ति निर्वाण को पा लिए हैं, यह धोखानव बुद्ध हैं, निष्पार और संशय-रहित,
( ६८ )
हो उन महान्
सब कर्मों को पयकर सांसारिक प्रासकियोंको नष्ट कर विमुक्त हैं।
यह भगवान् बुद्ध हैं, यह अनुत्तर सिंह हैं,
जिन्होंने देवताओं सहित संसार में ब्रह्मचक्र चल्लाया ।।
देवता और मनुष्य जो ऐसे बुद्ध की शरण गए हैं,
वे
एकत्र
निर्भयको
नमस्कार करते हैं।
"दमन करने वलों में दान्त श्रेष्ठ है, और शमन करनेवालों में
शान्त ऋषि,
करने वालों में मुक्त हुआ अन है, तारने वालों में
तर गया श्रेष्ठ है।
वे
इस प्रकार महान्
निर्भय (तथागत) को नमस्कार करते हैं:
"देवताओं सहित संसार में आप अद्वितीय हैं।"
इसिवुत्तक समाप्त
कोधिनी १. अनागामी-दस संयोजन हैं । पाँच नीचे वाले और पाँच ऊपर वाले । जो व्यक्ति नीचे के पाँच संयोजनों को दूर करके ही मर जाता है, वह शुद्धावास ब्रह्मलोक में पैदा होता है और वहीं ऊपरी पाँच संयोजन स्पराग, अरूपराग, मान, औद्धत्य और अविद्या को दूर कर परिनिर्वाण को प्राप्त हो जाता है। वह फिर कभी इस संसार में लौटकर नहीं पाता । ऐसे ही व्यक्ति को अनागामी कहते हैं । यह ज्ञान-गवेषी अर्थात् शैचयों की तीसरी अवस्था है। इसके पश्चात् ज्ञान-गवेषी 'अहत्व प्राप्त कर हो जाता है। जो व्यक्ति अनागामी होता है, वह फिर कभी व्युत होगा---ऐसा सम्भव नहीं। २. शैक्ष्य-ज्ञान के दृष्टिकोण से मनुष्यों का वर्गीकरण तीन प्रकार का होता है- जो ज्ञान नहीं प्राप्त हैं उन्हें पृथक्जन कहते हैं। (२) जिन्होंने ज्ञान के कुछ अंश को प्राप्त कर लिया है और कुछ अंश प्राप्त करने को शेष हैं, उन्हें शैक्य कहते हैं। वस्तुतः स्नोतापन्न,सकृदागामी और अनागामी का यह नाम है। ३) अर्हस्व-प्राप्त व्यक्ति को अ-शैक्ष्य कहते हैं, क्योंकि उसे संसार में कुछ भी सीखने के लिए शेष नहीं जीवन्मुक्त रहता है। ३. संवर्त--यह एक कप का नाम है। प्रलय होने को ही संवर्त- काप कहते हैं। संसार का प्रलय सात बार अग्नि से होता है। पाठवीं है। ( ७० ) बार पानी से और जब इस तरह चौंसठ बार पूरे हो जाते हैं, तब पैंसठवीं बार वायु से प्रलय होता है । बौद्धधर्म के अनुसार प्रलय अथवा संवर्त- कल्प का यही क्रम सदा रहता ४.विवर्त-संवर्त-कल्प के पश्चात् जब तक प्रलय का ही दृश्य बना रहता है, उसे संवत-स्थायो-कल्प कहते हैं । उसके पश्चात् जब सृष्टि प्रारम्भ होती है, आभास्वर ब्रह्मलोक से च्युत होकर सत्व आने लगते हैं और धीरे-धीरे रसापृथ्वी आदि का निर्माण प्रारम्भ होता है, तो उसे ही विवर्तकाल कहते हैं। सृष्टि-काल का ही यह नाम है। ५. आभास्वर-प्रथम ध्यान को प्राप्त व्यक्ति प्रथम ध्यान की भूमिवाले ब्रह्मलोक में उत्पन्न होते हैं । प्रथम-ध्यान की भूमि वाला ब्रह्म- लोक तीन प्रकार का होता है-परित्ताभ (= अल्प प्रकाश वाला), अप्प- माणाभ (= असीमित प्रकाश वाला) और आभास्वर । आभास्वर ब्रह्मलोक में उत्पन्न ब्रह्मा के शरीर से मशाल से लपट निकलने की भाँति सदा प्रकाश निकलता रहता है, अथवा चारों दिशाओं में फैलता रहता है, इसीलिए उस ब्रह्मलोक को श्राभास्वर कहते हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में वहीं से च्युत होकर सत्व शून्य ब्रह्म-विमान में आते हैं और रसा-पृथ्वी के उत्पन्न होने पर उसका सेवन करते हुए क्रमशः पृथ्वी के निर्माण हो जाने पर उस पर उतरते हैं तथा मानव-जाति की नव-रचना अथवा नया अध्याय प्रारम्भ होता है। ६. वैपुल्य पहाड़-यह पटना जिले में स्थित राजगिरि ( राज- गृह ) के एक प्राचीन पर्वत का नाम है। आज भी इसे राजगिरिवासी विपुलागिरि नाम से पुकारते हैं। ७ आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग-- मध्यम मार्ग को ही भार्य अष्टातिक मार्ग कहते हैं । निर्वाण प्राप्त करने के लिए जो प्रार्य मार्ग है, उसके पाठ = भाग) हैं, इसलिए वह आर्य अष्टाङ्गिक कहा जाता है। वे पाठ अंग ( ।
( ७१ ) अंग ये हैं-(१) सम्यक् दृष्टि (२) सम्यक् संकल्प (३) सम्यक् वाणी (४) सम्यक् कर्मान्त ( ५) सम्यक् आजीविका ( ६ ) सम्यक् व्यायाम (७) सम्यक् स्मृति और (८) सम्यक् समाधि । इन अगों में पहले के दो ज्ञान (प्रज्ञा ) सम्बन्धी हैं, बीच के चार आचार सम्बन्धी (शील) हैं और अन्तिम दो योग ( समाधि ) सम्बन्धी हैं। ८. चार आर्य सत्य-दुःख, दुःख-समुदय, दुख-निरोध और दुःख निरोधगामी प्रतिपद्-इन्हें चार आर्य सत्य कहते हैं । ६. निर्वाण -परम सुख मोक्ष का ही नाम निर्वाण है। राग, द्वेष, मोह का क्षय ही निर्वाण है। यह दो प्रकार का होता है-उपादिशेष निर्वाण तथा अनुपादिशेष निर्वाण । उपादिशेष निर्वाण ल्केशों का नाश कर जीवित रहते ही प्राप्त होता है, जैसा कि भगवान् बुद्ध ने बोधिवृक्ष के नीचे प्राप्त किया था। अनुपादिशेष निर्वाण परिनिर्वाण होने (शरीर छूटने) पर प्राप्त होता है। अर्हत् का पञ्चस्कन्ध छूटना ही अनुपादिशेष निर्धाण है, जैसा कि तथागत ने कुशीनारा में जोड़े शालवृक्षों के नीचे प्राप्त किया था। १०. अभिशा--इसका अर्थ है विशेष ज्ञान । विशेष ज्ञान छः हैं- (१)ऋद्धिविध ज्ञान (२) दिव्य श्रोत्र ज्ञान (३) चेतोपरिय ज्ञान (४) पूर्वनिवास ज्ञान (५) दिव्य चक्षु और ( ६ ) श्राश्रव-क्षय ज्ञान । इन्हें ही 'अभिज्ञा' कहते हैं। किन्तु, ग्रन्थ में इस स्थल पर इनसे तात्पर्य नहीं है, प्रत्युत यहाँ इसका अर्थ है- "स्कन्ध प्रादि बातों को विशेष ज्ञान से ठीक-ठीक जानना।" ११. परिक्षा-त्रिलोकी की सभी बातों को 'यह दुःख है' जानकर उसे छोड़ देना----इस शब्द का अर्थ है १२. श्राधव-कामाश्रव, भवाश्रव, दृष्टाश्रव और अविद्याश्रव---- चार पाश्रव हैं। पाँच कामगुण सम्बन्धी राग कामाश्रव है। रूप और - + ( ७२ ) अरूप भवों में उत्पन्न होने का छन्द-राग, ध्यान की इछा, शाश्वत दृष्टि सहगत उत्पन्न राग, भावों के लिए प्रार्थना भवाश्रव है । पूर्वान्त- अपरान्त वाली बासठ प्रकार की दृष्टियाँ दृष्टाभव है । दुःख, दुःख समुदय, दुःख निरोध और दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा, पूर्वान्त, अपरान्त, पूर्वा ग्रान्त तथा प्रतीत्यसमुत्पाद-इन आठ बातों के अज्ञान को अवि- धाश्रव कहते हैं । ये चारों श्राश्रव अर्हत् में नहीं होते, इसलिए वे श्राश्रव- मुक्त कहे जाते है। १३. पञ्चस्कन्ध-व्यक्ति मानसिक और शारीरिक-इन दो अव- स्थाओं का पुञ्ज है, उन्हें नाम और रूप कहते हैं । जो कुछ सूक्ष्म पुञ्ज है, वह सब नाम है और जो स्थूल है, वह सब रूप। वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान ये नाम की चार अवस्थायें हैं और शेष रूप है। इस प्रकार व्यक्ति की अवस्थाओं के साधारणतः पाँच पुन दीख यहते हैं, उनें ही पञ्चस्कन्ध कहते हैं। १४. बोधि-पाक्षिक धर्म-चार स्मृति प्रस्थान, चार सम्यक प्रधान, चार ऋद्धिपाद, पाँच इन्द्रिय, पाँच बल, सात बोध्या, आर्य अष्टाङ्गिक मार्ग--यही ३७ बोधिपाक्षिक धर्म हैं और वस्तुतः संक्षेप में यही बौद्धधर्म है। १५. अवीचि नरक-इसे ही महा-नरक भी कहते हैं। इसमें सदा आग की लपटें एक समान उठा करती हैं, कमी भी खपटों से पह नरक खाली नहीं होता है, इसीलिए इसे अर्वाचि नरक कहते है। प्रहकथा ( पपञ्च-सूदनी १३०) में कहा गया है कि वह नरक सौ योजन सम्बा और सौ योजन चौड़ा है। इसका धरातल एवं छत सब जौहमय है। इसकी भित्तियों से सदा लपटें उठकर चारों ओर एक जैसी फैखा करती हैं।
( ७३ )
१६. प्रातिमोक्ष-भिक्षु-भिक्षुणियों के परिपालनीय नियमों के संग्रह
का नाम 'प्रातिमोद' है। भिक्षु-प्रातिमोक्ष और भिक्षुणी प्रातिमोक्ष-यह
दो भागों में विभक्त है । भिक्षु-प्रातिमोक्ष में २२७ और भिक्षुणी-प्रातिमोक्ष
में ३१ नियम हैं। प्रत्येक भिक्षु से आशा की जाती है कि वह अपने
लिए निर्दिष्ट इन नियमों का पालन करेगा।
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महाबोधि सभा के अन्य प्रकाशन .... १. मज्झिम निकाय "३. दीघ निकाय ३. विनय पिटक ४. संयुत्त निकाय भाग : भाग २ .. .... ६. उदान 4.. ७. बुद्ध कीर्तन .... ... .... .. 2. बौद्ध शिशु-बोध #. भगवान् हमारे गौतम बुद्ध (कविता) 10. कुशीनगर का इतिहास ११. कुशीनगर दिग्दर्शन १२. महावंसी १३. पूर्णिमा ५४. बोधिद्रुम १५. सरल पालि-शिक्षा १६. धम्मपद १७. बौद्ध-चर्या-पद्धति १८. सुत्तनिपात ११. पालि महाव्याकरण २०. खुदक पाठ २१. तेलकटाह गाथा २२. तथागत का प्रथम उपदेश प्राप्ति स्थान:- महाबोधि पुस्तक-भण्डार, सारनाथ, बनारस । ... . ..." 1) ... B