Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shriadashavaikalikam

Suri, Shrianandsagar · 2011/10

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इदं पुस्तक भावनगर्यो मेष्ठि-देवचन्द-लालभाई-जैनपुरतकोखारसंस्थाया अवैतनिककार्यवाइक-मोतीघर मगनमाई चोकसी इत्यनेन महोदयमुद्रणालये, दाणापीठमुद्रणमन्दिरे शा. गुलाबपद लल्लुभाई-द्वारा मुद्रापितम् । अस्प पुनर्मुद्रणाघाः मऽधिकारा एतभाण्डागारकार्यवाहकरायचीकताः । All Rights reserved by the Trustoos of the Fund Printed By Gulabohand Lallubhū S'ha at the 21 thodaya Printing Press" Dana Peetha, Bhritnagar (Saurishtra) Published for Sheth Devchand Lalbhai Jain Pustakoddhar Fund, at Sheth Devchand Lalbhai Jain Boarding House For (S'ni Ratna Sāgar Jain Boarding ) Badekhăn chakla, Copi-purā, Surat, by the Hon Managing Trustee Motichand Maganbhai Chokasi.

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GA
श्रेष्ठी देवचन्द लालभाई जह्वेरी
जन्म १९०९ वैक्रमाव्दे
निर्याणम् १९६२ वैक्रमाव्दे
कार्तिक शुक्ल कादश्यां (देवदीपावली-सोमवासरे) पौषकृष्णतृतीयायाम(मकरसंक्रान्ति-मंदवासरे)।
The Late Sheth Devchand Lalbhai Javeri,
Born 22nd Nov. 1852A. D.Surat,
Died 13011 Janurry 1906 A, D Bombay
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€49
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Sheth Devchand Lülbhai Jaina Pustakodhāra Fund Series: No 103
Das Vaikalik Sutra
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S'ri Sayyambhavsuri
Commentry by
Shree Bhawvirhank Suri
Abridged by
Shree Sumatí Sadhu Suri
Vikrama Samvat 2010 ]
Price Rs. 3-0-0
See Feye
€49.
[ Christian Era 1954
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" " " " " " " " " The Board of Trustees: સસ્થાનું ટ્રસ્ટીમંડળ- I Nemchand Gulabchand Devchand Zaveri ૧ શ્રી નેમચ૮ ગુલાબચદ દેવચંદ ઝવેરી 2 Talakchand Motichand २ તલકચંદ મેતીચંદ " 3 Babubhal Premchand 3 બાબુભાઈ પ્રેમચંદ 4 Amichand Zaverchand ४ અમીચંદ ઝવેરચંદ 5 Keshrchand Hirachand ५ કેશરીચઇ હીરાચર 6 Motichand Maganbhai Chokasi મોતીચંદ મગનભાઈ ચોકસી Hon, Managing Trustee. એન. મેનેજીગ ટી विषयसूची विषम पृष्ठार विषय ठार | विषय पछार प्रकाशकीय-धतव्यः ५-९ परि०१ धीदशवकालिकगतस्त्रगाथा परि०५ विशिष्टनाम्नाम- सम्पादीकय-निवेदनम् नामकारादिक्रमः २२३-२३६ कारादि २४०-२४१ अध्ययनानुभम परि०२ 'अन्या ' इत्यादि २३७ परि०६ दर्शितातिविशेदा. विषयानुकम परि०३ साक्षिप्रस्थानाम- हरणानि ૨૪૨ शुद्धिपत्रकम् कारादि २३७-२३८ परि०७ लघुपरयन्तर्गना परि०४ साक्षिपाठाम ध्याकरणसिदि २४२ लघुवृत्त्युपेत दशधैकालिकम् कारादि २३९-२४० परि०८ लघुकृत्त्यातर्गता म्यापार २४३ णमो सिजभवस्स श्रेष्ठि-देवचन्द लालभाई-जैनपुस्तकोद्वारे ग्रन्थाः १०३ । श्रीसुमति(साधुसूरिविरचित लघुवृत्तिसहित- दशवैकालिकसूत्रना अंगे प्रकाशकीय-वक्तव्य ------- श्रमण भगवान महावीर महाराजना पंचम गणधर श्रीसुधर्मास्वामीनी पाटे चरमकेवली श्रीजम्बूस्वामी यया, तेमना पट्टधर श्रीप्रमवस्वामी थया अने तेमने पोतानी पाटे श्रीशय्यं भवसरिने स्थाप्या. तेओश्रीए पोताना पुत्र मनकने दीक्षा आपी अने तेनु छ महिनानुं आयुष्य जोतां तेना उद्धार माटे श्रीदशवकालिकनी रचना करी. ते आ श्रीदशवकालिक उपर नियुक्ति वगेरे छे. अने तेनी उपर भवविरहाकित आचार्य भगवान् श्रीहरिभद्रसूरीश्वर महाराजे शिष्यवोधिनी नामनी टीका रची हती. ते टीका उपरथी एकला ज श्रीदशवकालिकमूळ उपरनी वृत्तिनो श्रीसुमतिसाधुसूरिए उद्धार कर्यो. ए वात लघुटीफाना अन्त्यपत्रमा जणावी छे. एटले आ ग्रन्थ श्रीसुमतिसाधुसूरिनी रचेली लघुवृत्ति सहितनो श्रीदशवकालिकसूत्रनो छे.

पन्यकाप वा अन्यनु भवधिरहादित श्रीहरिभद्रसूरीश्वरमहारानी इतिने अनुसरवापणु जणाव्यु छे, पण वेओथीए आ अन्य क्यारे रच्यो तेनो स्पष्ट उद्देश्य नथी, परंतु या प्राथना छेडे घे पुष्पिकाओ आपी छे ते उपरथी एक पात चोक्षस थाय छ के-आ मन्य सं १५१६ पहेला ययेलले छे बळी "जैन माहित्यको इतिहाम" २५२ मा जणाव्या प्रमाणे-संवत १९८८ मा पत्तनमा वापक शि० सुमतिसूरिनी रचेली श्रीदशवकालिकटीका ताडपत्र पर लगाइ ५५ बहुत, बागममदिराना संस्थापक आगमवाचनाना दाता, अनेक प्रन्थना प्रणेता, आगमोद्धारक गुरुदेव श्रीआनन्द- मागरसूरीश्वरजी महाराने आ सस्थानो प्रादुर्भाव को हतो अने तथी आ सस्थाए-श्रेछि देवचन्द लालभाई जैनपुस्तकोद्धार फडे अनुक्रमे आगमो विगैरेना १०२ प्रन्यो आ7 मुधी बहार पाड्या छे, तेवी रीते आ पन्थ १०३ नबरमा यहार पाडे छे. प. पू आगमोद्धारक गुरुदेव श्रीनी इच्छा अवचूरि वगैरे लघु टोकाओ आपालोपयोगी बहार पाडवानी हती, तेथी आ सस्थाए ठे कार्य पण प्रारंभ्यु अने तेवा प्रन्योमा श्रा प्रन्थनी प्रेसकॉपी प. पू गुरुदेवश्रीनी सेवा करनार पू गुणसागरजी महारान पासेथी मेळवी अने सपादन करवाने माटे मुनि श्रीकचनविजयजी तथा मुनि श्रीक्षेमकरसागरजी महाराजने विनति करी अने तेओश्रीए अमारी विनतिने प्यानमा लई गुरुदेवश्रीना पट्टधर श्रुतस्थविर, विद्याव्यासगी, आचार्यमहाराज श्रीमाणिक्यसागर सरीवरती पासे एक पखवन प्रूफ नोवडावषापूर्वक आ अन्यनु सपादन फयु छे. अने आ प्रथिने शणगारवा माटे लघु अने विषयानुक्रम अने सूत्रादि अकारारिकम पगेरे आठ परिशिष्टो आप्या छे मा श्रीदशकालिकसूत्र सयधमा सपादकीय निवेदन पणु मननीय है रातो देना साहित्य अंगे कईक विवरण अत्रे आपरामा आवे छे.

श्रीदशवकालिकसूत्रनी गणना ( बीजा ) मूल सूत्रमा थाय छे. श्रीदशवैकालिकसूत्रना कर्ता श्रीशय्यंभवसरि ( सुधर्मा- स्वामीना शिष्य जंबूस्वामीना शिष्य प्रभवस्वामीना शिष्य ) छे. श्रीदशवैकालिकसूत्र प्राकृतमां श्लो. ७००. प्रमाण छ. तेमने पोताना पुत्र मनकना ढूंका आयुष्यने जाणीने तेना माटे आ सूत्र बनाव्यु. तेमां साधुना आचारना विषयोनो संग्रह छे. आ सूत्रमा दश अध्ययन छे. तेमां पण चार अध्ययनो तो जरुर साधुए भणवां ज जोइए. श्रीदशवैकालिकसूत्रना अंते ' रतिवाक्या' अने ' विविक्तचर्या ' नामनी वे चूलिका छे. ते महाविदेह क्षेत्रमा विचरता सीमंधरस्वामीए आपेली छे, जे साधु मुनिमहाराजाओने संयममा स्थिर करे छे. 'श्रीदशवकालिक सूत्र' उपर मद्रयाहु स्वामीनी नियुक्ति गा. ४४५ श्लोक ५५० प्रमाण छे. वळी भाष्य पण छे. श्रीदशवकालिकसूत्र उपर ७००० लोकप्रमाण चूर्णि छे. श्रीऋपमदेवजी केशरीमलजीनी पेढी-रतलाम तरफयी प्रकाशित थयेली छे. तेना कर्ता जिनदासगणिमहत्तर छे. आचार्य श्रीआनन्दसागरसूरीश्वरजी संशोधित छे. श्रीदशवैकालिकसूत्र वृहवृत्ति आचार्य श्रीहरिभद्रसूरिजीए ७५५०, ६८५० (श्लोकसंख्या भिन्न जाणवामा आवी छे.) श्लोकप्रमाण टीका रची छे ते मूल, नियुक्ति ने भाष्य उपरनी छे. ते समग्र वृत्ति साथे आज फंड तरफथी प्रकाशित थयेली छे. ते आचार्य श्रीआनन्दसागरसूरिजी संशोधित छे. श्रीदशवकालिकसूत्र उपर श्रीतिलकाचार्ये संवत् १३४६ मा ७००० श्लोकप्रमाण वृत्ति रची छे. ते पाटण वगेरे स्थळे छे. वृत्ति अप्रसिद्ध छे. सं. १६९१ मा उपाध्याय श्रीसमयसुंदरजीए ' शब्दार्थवृत्ति' नामनी टीका रची छे. श्रीजिनयशःसूरि ग्रंथमालामां छपाई छे. श्लोकप्रमाण ३०३३ प्रमाणनी छे. श्रीदशकालिकासूत्र उपर 'लघुवृत्ति' २६०० (३६००) श्लोकप्रमाणनी - 'सुमतिसूरि 'ए रची छे, जे आ प्रकाशित करी रहा छीए चली एक लघुत्ति अचलगध्छीय विनयहरगणीए सवत् १५७२ मां २१०६ लोकप्रमाण रची छे ते अप्रसिद्ध छे अने ते खभातमा ताडपत्रीय उपर श्रीशांतिनाथनी ज्ञानभडारमा छ श्रीदशवकालिकसूत्र उपर त्रण अवचूरिओ छे तेमा पहेली शांतिदेवकृत छे ते पाटणना ज्ञानमहारमा छे. वली पीजी १८०० श्लोकप्रमाणनी छे ते पाटण, खमात अने पूनाना ज्ञानभडारोमा छे त्रीजी १५०० शोकप्रमाणनी छे ते लींबढीना झानभहारमा छे कर्तानी माहिती मळी नथी ऋणे अप्रसिद्ध छे श्रीदशवकालिकदीपिका श्रीमाणिक्यशेखरसूरिकृत मोटी छे, जे अमदावादना शानभडारमा छे ने अप्रसिद्ध छे थीदशवकालिकसूत्रनो टम्बो (बालावबोध ) गु अनुवाद, हिन्दी अनुवाद तथा जर्मन इग्लीश अनुवाद पण छे आ सूत्रनु मूछ तथा नियुक्ति श्रीवर्धमानजैनागममविरमा पालिताणामा शिलारूढ थयेल छ अने सुरतमा श्रीवर्धमानजैनताम्रपत्रागममदिरमा एकलु मूळ ताम्रपत्रारूद करवामा श्राव्यु छ विनती-सशोधक मुनिवर्याने आगम पचागीना अप्रगट प्रथोनु सशोधन करवा फड तरफथी विनती करीए छीए अने जेओश्री पासे अप्रगट आगम पचागीना प्रथोनी प्रेसकॉपीओ अथवा प्रवो होय तो तेना नामो जणाववा विनवीए छीए जेथी फड तरफथी प्रकाशित करवा योग्य प्रबंध करीए. भा प्रन्यना प्रकाशनमा जेवा जेवा रूपे जेओ जेमोश्रीए अमने सहाय करी छे वे बदल धमो दूरटीओ आ फड वरफथी तेओनीनो आभार मानीए छीए. अने विद्वानोने ए प्रार्थना फरीए छीए के अमारा प्रकाशनमां अमने योग्य संपादन वगेरेनी मदद करे. तेमज आ ग्रन्थना अभिलापीओ अमारा प्रकाशित करेला प्रन्यनो उपयोग करे. वि. सं. २०१० भादरवा शुद १ लि० भवदीय ( महावीर जन्म वांचन महिमादिन) मोतीचंद मगनभाई चोकसी वगेरे ता. २९ ओगष्ट १९५४, मुंबई संस्थाना दूस्टीओ ता. क.-आ ग्रंथ घणा समयथी प्रेसमा चालु इतो अने प्रसिद्ध याय ते दरम्यान उपरोक फंदना एक मुरपी टूरटी शेठ साकेरचंद खुशालचंद झवेरी स्वर्गवास पाम्या छे तेनी दीलगीरी साये नॉप लेगाम आयेथे अने वेमनी नाली पढेली जग्याए श्रीकेशरीचंद हीराचंदने नीमवामां आव्या छे. जे मुजय दृस्टी मंगळनां नामोमां फेरफार करवामां माग्यो छे (पा. ४).

" णमो सिरिदसकालियमुत्तकारगस्स मणगपियरस्स श्रीसुमतिसाघुसूरिविरचित लघुवृत्तिसहित श्रीदशवैकालिकसूत्रना अंगे सम्पादकीय-निवेदन "सिजंभवं गणहरं जिणपडिमादसणेण पडिबुद्धं । मणगपिअरं दसकालिअस्स निज्जूहग वन्दे ।। श्रीदेवगुरुप्रतापे संपादित करेल श्रीदशवकालिकसूत्र विद्वजनोना करकमलमां सादर उपस्थित करतां प्रन्थ, वृत्ति अने संपादन संबंधी कईक जणावाय छे. जेम समुद्र तरवा माटे पार उतरवाना मार्गना जाणवापणुं अने पार ऊतरवाना प्रयत्ननी-विनी अरूर छे, तेम आ जैनशासन भवममुद्रथी पार उतारवा माटे संलम वे मार्गर्नु सहकारीपणु स्वीकारे छे. वे वे मार्ग ज्ञान अने क्रिया. अर्थात् एकलुं ज्ञान पण नकामु माने छ अने एकली क्रिया पण नकामी माने छे. ज्ञानीनी निधार क्रिया करनारो अगर क्रियावाळो ज्ञानी एम बन्ने माने छे. एटलुंज नहि पण शान करतां किया उपर सापेक्ष रीते वधु भार मूके छे. क्रिया वगरना शाननी कंईज कीमत आंकी नथी. अर्थात् विरतिनी जरूरियात मानी छे. आथी ज गृहस्थपणामां केवली थयेलाने पण देवता वेष अंगीकार कर्या पछी धंदन करे छे. आ ॥ कारणथी लिंगनी महत्ता नफी थाय छे. परंतु विरतिने मेळववा, टकाववा अने यथोत्तर सफल बनायवा ज्ञाननी पण जरूर छे, केमके संयम-जयणाना पालन माटे बोधनी जरूर, ते बोध आगमोद्वारा मेळववानो अने ते मेळववा मनुष्यपणुं आदि जोइए. तेवो मनुष्य भव पण प्राप्त थया छतां आर्य क्षेत्र आदि मळवू जोइए. अने ते पण मळी गया छतां दीर्घ आयुष्य जोइए. जो ते न होय तो मळेलां साधनो ने अनुकूल संयोगोमां पण ते साधी शकतो नथी. आधी दीर्घ आयुष्य पण जोइए. जो दीर्घ आयुष्य न होग तो झुं थाय ? ते वात आ सूत्रना रचनाना प्रसंगमांची समजवा मळे छे. एटलं ज नहि पण ते हेतुथी ज आ सूबनी रगना करवानी जरूर पड़ी. भगवान् प्रभवस्वामीए पोतानी पाटे अर्थात् शासन चलायवाने माटे योग्यने माटे उपयोग मूस्यो. कोई तेयो न मळ्यायी ते उपयोग अन्ते राजगृहीमा यज्ञ करता शय्यमव भट्ट उपर जईने ठयो. एपी 'अहो कष्टं' आदि माधुद्वारा यामां बोलावायु. शांभवे तलवारद्वारा गुरुने पूछयु. गुरुए तत्त्व तो यात्थंभ नीचे बनाव्यु. स्यां श्रीगांतिनाथजीनी प्रतिमा देवी, पोध पानी, आचार्यश्री. प्रभवस्वामी पासे दीक्षा लीधी. त्यारे रुदन करती तेगनी पत्नीने लोको पूछे छे के कंइ ? तेना जगानमा मनाई। गं. तेज गर्भना पूर्णकाले जन्मेला पुत्रने 'मनक' नामथी बोलावायो. छोकगनी रगतमा 'नवापो' शब्दयी बार पासे गोलो ते वार शय्यंभवसूरिने याहिरभूमिए भन्यो. पछी दीक्षा आपी. तेने आ भवना संबंचथी भवनमुद्रयो पार उतारता आयुष्य माटे उपयोग मूक्यो. त्यां तो सागर ने गागरतुं आंत जोयु. अल्प ज आयुष्य (छ महिनानुं आयुष्य) ! झुं कर ? भरमागर तरवा शात्रमागर जोग. त्यां तो आयुष्यनी गागर छे. शुं कर्तुं ? आयी शास्त्रमागरनुं मंथन फरी गागरमां माय तेवी सागरनरणी गागर(दरावकालिक)नी रचना करी-मनकना हित माटे. अर्थात् हे प्रभु! भवसमुद्रथी तारनार तारा आगमो छे. ते कारणथी थानी रचना थई एम नियुक्तिमा (२०नि० गा० १५) जणाव्युं छे. मनक मुनि तेने भण्या अने छ महिने काळ पण करी गया (नि. गा० ३७१), आँसु पाव्या, अमण भगवंतोए पूज्यु-आ गुं१ घधी वात जणावी ( नि० गा० ३७१). अमने कहा होत तो वैयायच करत. महानुभावो ! ते तरत शी रीते १ माटे नथी को. गागर आयुष्यकाळाना काळ कर्या वार, ज्यारे गागरने सागरमा मेळवा मांडी त्यारे श्रमण भगवंतोए विनति करी. पाथी ते गागर रहेवा दीधी (नि० गा० ३५१). ते आ श्रोदशवकालिक शायनना छेड़ा सुधी रहेवानुं छे. पीस्ताळीश आगममा भूळ घार गणाव्यां तेमा आनो पण एक नंबर आवे छे. शाख-आ शास्त्रमा दश अध्ययनो छे अने तेनी पर वे चूलिकाओ पण छे. अस्वाध्यायनो काल छोडीने मणवान होवाथी अने नि० गा० १५ ना आधारे विकाले आ सूत्रनी स्थापना अने दश अध्ययनना प्रमाण उपरथी दशवकालिक-दशकालिक कहेवाय छे. श्रा श्रीदनकालिकना अंगे नीचे प्रमाणे साहित्य उपलब्ध छे-- दशवकालिक मूल शय्यमवरि लोक ७०० दशवकालिक पूर्णि श्लोक ७००० नियुक्ति भद्रबाहुस्वामी ४४० वृत्ति हरिभद्रसूरि १ जुओ थीभागमपुरुष भने मुनिराज श्रीअमयसागरजीनी रचली श्रीमागमपुरुष रहस्यनी पुस्तिका " ७००० श्लोक ३५०० दशवैकालिक लघुवृत्ति सुमतिसूरि दशवैकालिक शब्दार्थवृत्ति समयसुंदर श्लोक ३०३३ अवचूरि शान्तदेव नियुक्त्यवचूरि अवचूरि १८०० वृत्तिदीपिका माणिक्यशेखर १२०० आनी उपर नियुक्ति, भाष्य, चूर्णि छे अने टीकाओ तो घणी छे. तेमां नियुक्ति, भाष्य अने मूळ सहितनी व्याख्यावाळी टीका भवविरहरिनी छे. तेनुं अने चूर्णितुं संपादन आगमोद्धारकश्रीए करेलुं छे. दशवकालिक मूळ उपर नानी टीकाओ, अवचूरि अने टबाओ वगेरे तो घणाए छे. लघुटीका-'वंदनप्रतिक्रमणावचूरि 'ना उपोद्घातमां अमे ए वात जणावी छे के-अवचूरिकार महाराज मूळने मुख्य करीने व्याख्या करता होय छे. एटले मूळ उपरनी जे व्याख्या छे तेने आधारे व्याख्या होय छे. तेवी रीते आ लघुवृत्तिमां पण वृत्तिकार महाराजे पृ. २२० मां का छे के. " दशकालिकानुयोगात्, सूत्रव्याख्या पृथक्कृता। हरिभद्राचार्यकृतान्मोहाद्भच्याऽथवा मया ॥ ३ ॥ श्रीमद्बोधक शिष्येण, श्रीमत्सुमतिसूरिणा । विद्वद्भिस्तत्र नोद्वेगो, मयि कार्यों मनागपि ॥ ४ ॥ आ वे श्लोकवडे पोतानुं श्रीहरिभद्रसूरिनी वृत्तिने अनुसरवापणुं जणाव्युं छे. तेमज पृ. १ मां- " जयति विजितान्यतेजाः सुरासुराधीशसेवितः श्रीमान् । विमलस्त्रासविरहितस्त्रिलोकचिन्तामणिर्वीरः ।। १ ।। - एम कडं छे अने पू. २२०मा कयुं छे के- " महत्तराया याकिन्या, धर्मपुत्रेण चिन्तिता । आचार्यहरिभद्रेण, टीकेयं शिष्यबोधिनी ॥१॥ दशवकालिके टीका विधाय यत् पुण्यमर्जितं तेन ! मात्सर्यदुःखविरहाद् गुणानुरागी भवतु लोकः॥ २ ॥" आ प्रण गाथाओ श्रीहरिभद्ररि महाराजनी वृत्तिमांधी लीधेली छे एम जणाय छे, कारण के याकिनीमहत्तरासुनूए पोतानी टीकानी शरुआत करतो जणावेल एक तथा पूर्ण करवा जणावेला ते वे श्लोको छे. अर्थात् अवक्रिकार महाराजे श्रीमान् हरिभद्रसूरिनी वृत्तिमांची नियुक्ति अने भाष्यनी वृत्तिने छोडीने तेमज केटलोक चर्चा करायेलो विषय छोडीने पाकीनी बधी वृत्ति ने रूपेज लीधी देखाय छे. तेमां पाठभेदरूपे के पाठान्तररूपे कई सास विशेष देखातुं नधी. नामो-टीकाकार महाराजे ते ते पृष्ठोमा अध्ययनोनां नामो नीचे प्रमाणे जणाव्यां छे- अध्ययनोनां नामो- पृ. ४ द्रुमपुष्पिका ४, १२ धामण्यपूर्विका १०८, १८१, १८८ १९, २१, २२, ५०, ५१५} पढ्जीवनिकायिका १२, १११ क्षुल्लिकाचारकथा पिण्डेषणा नाम पृ.

पृ० पृ० ९७, ११८ महाचारकथा १५७, १८७ विनयसमाधिः ११८, १३७ वाक्यशुद्धिः १८७ सभिक्षुः १३७, १५७ आचारप्रणिधिः २०९ विविक्तचर्या विषय-मोक्ष जवाने माटे संयमनी जरूर अने संयम काया वगर रही शकतो नथी, तेथी काया टोववा माटे आहारनी जरूर पडे ते वात जणावतां धर्ममा स्थिर रहेलानी देवता प्रशंसा करे छे एम जणावी अहिंसा, संयम ने तपरूप धर्भने जणावी, तेमाथी संयमने मुख्य राखीने व्याख्या करी छे. अने संयमने माटे कायानो निर्वाह करवा भ्रमरनी उपमा आपी. आगल चालतां साधुप' के, होय ते जणावी, साधुपणाना निर्वाह माटे गोचरी, भक्ष्याभक्ष्य अने हेयोपादेय वगेरेनो सामान्य आचार जणाव्यो. संयम लीधेलो छजीवनिकायने न जाणतो होय तो संयम टकी शकतुं नथी. तेथी छत्रीवनिकाय जाणवी जोईए, एम जणावी कायाना निर्वाह माटे पिंड(आहार) केवा प्रकारनो लेवो ते जणाव्यु. आगळ सामान्यथी आचार जणाव्यो हतो तेथी हवे विशेषरूपे आचार जणावी, बोलवानो वहेवार केवो करवो ते जणान्यु. आवी रीते आगल आचारमा तैयार थयेलाए आचार पालवो जोईए एम उपदेश आप्यो, आचारमा तैयार थयेलो विनयवाळो होय तेथी विनय जणावी, भिक्षुक केवा प्रकारनो होय ते जणावी ' श्रीदशबैकालिक 'ना दशे अध्ययनोनी पूर्णाहुति करी छे. वळी- सीदाता साधुने स्थिर करवो अने विविक्तचर्या एटले छूटो छूटो आचार जणाववारूप वे चूलाओ जणावी छे.

५ गुणसागरजी ' श्रीदशवैकालिक'मा दश अध्ययनो छे. पापमा अध्ययनमा बे उद्देशा अने नवमा अध्ययनमा पार महेशा छे, दश अध्ययनो पछी वे घूला छे. आ 'दशवकालिक 'मो सूनो २२, गाथाओ ५१५ अने प्रक्षिप्त १ गाथा छे. ए. पू. सारक गुरुदेव श्रीनी ए इच्छा हती के-विबनोने माटे तो पाडित्यभयो ग्रन्थो घणा छपाया छे, तेथी मंदमतिवाळाना योघ माटे अवचूरि जेवा प्रन्यो छपाय तो सारु. ए हेतुए अनेक अवचूरिओनी कोपी पोते शोधीने वैयार की हती अने वीजाओने पण सलाह आपी हती. ए भावना अनुसार दै. ला. ज. पु. फडे ते कार्य पण शरू कर्यु छ अने महाराज पासेयी ते प्रेसकोपीओ मेळवी, अने एनु सपादन फरवा माटे ते सस्थाए अमोने विनति करी ते मुजब आ प्रन्थ अमोए है सपादित को छे था लघुत्तिमा मूळ अने तेनी वृत्ति एम अपायु छे. प्रस्तुत प्रन्थमा अ १नी त्रीजी गाथानी वृत्तिनो फेटलोक भाग प्रेस कोपीमा लेखकदोषथी रही जवा पामेल जे बहुश्रुत गीतार्थपुरदर आगमोद्धारकश्रीजीना मूठ हस्ताक्षरोमा (ब्लोक वनावीने) पापवामा आवेल छे. जे सुज्ञ पाठकजनोने आल्हाददायी निवढशे. शरूआतमा अध्ययनोनो अनुक्रम, अने विषयानुक्रम पण श्रापवामा आव्या छे तेमज शुद्धिपत्रक पण अपायुछे वृत्ति सपूर्ण यया पछी परिशिष्टो आपवामां आवेला छे. वे या प्रमाणे-(१) सूत्र अने गायानो अकारादि, (२) अन्य वगेरे, (३) साक्षिपन्योना नामो, (४) साक्षिपाठोना प्रतीको, (५) विशिष्ट नामो, (६) देखाडेला अने भलामण करेला उदाहरणोना नामो, (७) व्याकरणना निर्देशो अने (८) न्यायो. एम आठ परिशिष्टो आपी ग्रन्थ पूर्ण कर्यो छे गोल काउसमा मूलु आमा छे. चोपडा काउसमा मूकेलं प्रतमा छे तेवु ने तेवु थे. ३६९ मी गाथानी बृहत् अने लघुवृत्तिमा व्याख्या करी नथी. पृ. ५० पर चोथा अध्ययनमां एक प्रक्षिप्त गाथा छे. आ सूत्रना आठमा अध्ययननी १९ मी गाथानी वृत्तिमां ' उपाश्रय 'नो उल्लेख छे. तथा अ० ५ उ. १ गा. १८, २१ अने आठमा अध्ययननी २३ मी गाथानी वृत्तिमा 'धर्मलाभ' शब्दनो उल्लेख छे.' आ वृत्तिकारे पोतानुं नाम पृ. २२० मां जणावतां सुबोधकना शिष्य सुमतिसूरि एयु कयुं छे, पण कोई कारणसर सुमति- साधु एवं तेमना माटे रूढ थयुं होय एम देखाय छे. ग्रन्थकार महाराज आ लघुटीका करतां पोतानुं डहापण नथी करता पण पूर्वपुरुषोना फरमावेलानुं अनुकरण करे छे, एम पृ. २२०-२२१मा जणावे छे. कर्त्तानो संवत् मळतो होय तेम लागतुं नथी, परंतु वे पुष्पिकाओ पृ. २२१मां आपेली छे. तेमां एक सं. १५१६ नी अने एक सं. १६६२ नी छे. तेथी एम तो कहेवाय ज के १५१६ पहेलां आ संकलना करी छे. १५१६नी प्रत ' श्रीजैन आनंद पुस्तकालय' सुरतमा अत्यारे विद्यमान छे. ते प्रत एकली ज वृत्तिवाळी छे. तेमां मूळ नथी. अमालं आ संपादन कार्य प. पू. तारक देवसूरतपागच्छसमाचारीसंरक्षक आगमोद्धारक आचार्यदेव श्रीआनन्दसागर- सूरीश्वरजी महाराजना अनन्यपट्टधर, विद्याव्यासंगी, श्रुतस्थविर, शान्तमूर्ति आचार्य माहाराज श्रीमाणिक्यसागरसूरीश्वरजीनी अमीदृष्टिना आधारे थयुं छे. अने एक वखत प्रूफ जोइ आपवानी पण उदारता करी छे. अमे अमोने मळेली साधन-सामग्री अने अमारी बुद्धि प्रमाणे आ ग्रन्थ- संपादन कयुं छे, छतां कोई जग्याए तेवी क्षति १. कहारयणकोसमां देवद्रव्यना अधिकारमा ये माईनी कयामां पृ. १०५नी पांचमी पंकिमो पण 'धम्मलाम' शब्द छे. ।

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श्रीसुमतिसाधुसूत्रितवृत्त्युपेतं श्रीदशकालिकसूत्रम् अध्ययनानि १०, चूलिके २, उद्देशकाः ६, सूत्राणि २१, गाथाः ५१५, प्रक्षिप्तगाथा १, पृष्ठानि २४४ । अध्ययनानुक्रमः सूत्रम् मध्ययनम् उद्देशकः आपृष्ठम् ४. दुमपुफिया (द्रुमपुष्पिका ) समणपुब्विया ( श्रामण्यपूर्विका ) खुडियायारकहा (क्षुल्लकाचारकथा) छज्जीवणिया ( षड्जीवनिकायिका ) orm . १८. १-१५ १-५८५, ६-१६%D११ १७-३१%१५ ३२-५९-२८. प्र.१ ६०-१५९-१०० १६०-२०९:५० २१०-२७७-६८ ८२ पिण्डेसणा (पिण्डेपणा) १६ " :११७ धम्मत्यकामज्झयण ( महाचारकया) . थापृष्ठम् अध्ययनम् उदेशका सवकसुद्धी (वाक्यशुबि) आयारपणिही (आचारप्रणिधि:) विनयसमाही ( विनयधमाधि ) गाया २७८-३३४-५७ ३३५-३९८८६० . ८ . . ९ १ . ९ २ " " . ३ " १ . ४ " ४१६-१३८-२३ ४३९-४५३-१५ ४५४-१६०७७ ४६१-४८१-२१ १८२-४९९-१८ १८० १८७ . TV watml . . समिक्सू (सभिक्षुः) रइवा ( रविवाक्या) विविधपरिया ( विविक्तधर्या) . २०९ . २२० an श्रीदशवैकालिकलघुवृत्चेविषयानुक्रमः पंकिः गाथा विषयः ४ ७ .अत्यागिनिर्वचनम्.. ८ त्यागिनिर्वचनम् १-४ ९ मनस्संयमाभ्यन्तरोपायः पृष्ठ ५-८ ५ १०-१२ ६ १ विषयः अ० १ द्रुमपुष्पिका मङ्गलं, शालोपक्रमन्च १ धर्मखरूपम् ' २ मधुकरोपमा ३-४ मधुकरोपनयः ५ साधुवानिर्देश २ वणिकथा २ १०-११ ८ ३ ३ ९-१० ४ ११ अ०२ श्रामण्यपूर्विका द्वितीयाध्ययनोपक्रमः संकल्पसंयममाहात्म्यम् सनस्संयमवायोपाय: अगन्धननागदृष्टान्तेन मनोनिग्रहोपदेशः ८ रथनेमिकथोपक्रम ए १२-१५ रथनेमि प्रति राजीमत्याः हिवशिक्षा ( ११० १६ भोगविनिवृत्तिनिर्देशः नियतानियतश्रुतविभाग: .2 ४ ११-१३ अश्रमणव्याख्या १ पंकिः गाथा विषयः 'मुयं मे०' पदव्याश्या पृछं पक्तिः (२०१०-१२ १८ ९ विषय. अ०३ शुष्टकाचारकथा तृतीयाम्ययनोपक्रमः २७ संयमिनामनापरिवकथनोपक्रमः १८-२५ अनाररितत्रिपप्राशतीनामोल्लेखा १२ १२ ६-१२ १४ {१६ २६ साधूनामनापरितपरिहारोपदेशः . २७ साघुस्वरूपम् २८ साधुचर्या २९ साधूनां ध्येयम् ३०-३१ वापारपरिपालनफलम् एकान्तक्षणिकवादापोहा २१ गुणवच्छिष्यप्रशंसा धर्मदेशकाईतानिर्यधनम् गणधरास्मागमसिद्धिा, अनानिसिद्धमत. निरासश्च २१ १२-१४ गुरुकुळवासमद्दचा '२२ विनयप्रशंसा २२ १ षड्जीवनिकायकथनोपक्रमः (२२ १२३ षड्जीवनिकायस्वरूपं वभेदप्रभेदाबा२३ १२७ १२ पर्यन्तम ५-७ ९-१२ १८ अ० ४ पद्जीवनिकायिका चतुर्याप्ययनोपक्रमा पंक्तिः २-१२ ७-१२ ४० ९-१२ १२९ 1४१ - सू० १२ पृष्ठं पंति: गाथाहा विषयः पृष्ठं विषयः गाथाङ्क: जीवनिकायशस्त्रनिर्वचनम् २४ १०-१४ ३८ सू० ११ अप्फाययतना २५ १-३ सू० १२ तेजस्काययतना सू० २ षड्जीवनिकायवधविरतिस्वरूपम् २८ १-४ सू० १३ वायुकाययतना ३ प्रथममहाव्रतस्वरूपम् २९ ११-१३ सू० १४ वनस्पतिकाययतना .४१ ४ द्वितीयमहाव्रतस्वरूपम् ५-८ सू० १५ सकाययतना ४३ सू० ५ तृतीयमहाव्रतस्वरूपम् ३२ ३२-४० अयतनापरिहारोपदेशः (४४ सू० ६ चतुर्थमहाव्रतस्वरूपम् ३३ २-४ (४५ सू० ७ पश्चममहावतस्वरूपम् १२ ४१-४४ संयमस्य शानमूलकत्वोपदेशः .४६ सू०८-९ पष्ठव्रतस्वरूपम् ३४ १०-१३ ४६-५६ जीवाजीवपरिझानस्य यथोचरं यावत् महाव्रतवर्णनोपसंहारः सू०१० पृथ्वीफाययतना ३-१३ मोक्षाख्यफळप्रापफत्व निर्देशः (४८ ८३७ 1४९ २-९ ६-१३ १-१४ १-७ पठं पति: गाथा गापा विषयः ५७-५९ भामण्यफलप्राश्यप्राप्तिहेतुवर्णनं उप- संहार पूछ पंक्ति १००१-१० विषय. २१७-२१९ प्रथमस्थान हिमारवरूपम् २२०-२२१ द्वितीयस्थानगपावादस्वरूपम् २२२-२२३ तृतीयस्थागासादानस्वरूपम् २२४-२२५ चतुर्यस्यानागास्वरूपम् २२६-२२० पंचमस्थानपरिसदस्यरूपम् १०१ १-८ १०५ पिण्डेपणा, उ०१-२ पम्पयनोपक्रमा ६०-६१ गोपरचर्याविधेठपकमा ९ 1५१ १२-१३ 1५२ १०३३-१४ ११०४ ६२-२०९ सममेऽप्ययने गोपरपयोविधिः अ०६ महाचारकथा पहाण्ययनोपक्रमा २१०-२१४ सावाधारकयनोपकमा ९७ २३१-२३४ पठस्थानरात्रिभोजनस्वरूपम् ।१०५ 1१०५ १-१३ २३५-२४० पृथ्वीकायापकायारम्मवर्णनम् १०६ ६-१३ २४१-२४४ तेजरकायारम्भवर्णनम् २४५-२९८ वायुकायारम्भयर्णनम् १०८ ५-१२ २४९-२५४ वनस्पतिकायारम्भवर्णनम् साध्यापारस्वरूपे स्थानाधासक. ९८ {९९ २५९-२६० गृहिभाजनत्यागोपदेशः ११११ १९९२ १९९९ २६२-२६४ पर्यवत्यागोपदेशः {११३ १ विषयः पृष्ठं विषयः पंकिः | गाथाङ्क: गाथाङ्कः पृष्ठ पंक्तिः २५५-२.५८ अकल्पस्वरूपम् ११० ५-१३ अ०७ वाक्यशुद्धिः १३६ १-४ सप्तमाध्ययनोपक्रमः ११.८ २७८-२८१ भाषाभेदाः, हेयोपादेयविभागः (११८ ११२ ११२ ७-१३ २८२-२८४ मृपाभापास्वरूपम् १२० २-१२ २८५-२८७ वय॑भाषास्वरूपम् १२१ ३-७ २६५-२६८ गृहिगृहनिषद्यात्यागोपदेशः ११ ८-१३ २८८-२९७ वाग्विधिनिषेधौ १२२ ११४ 1१२३ १.१४ १०-१३ २९८-३०२ हेयोपादेयवचनानि १२४ १-७ १२५ १-१० २७३-२७५ शरीरविभूषात्यागोपदेशः १.१५ ११-१३ १२६ ८-१२ १-८ ३०३-३१२ वचनप्रकारा: १२७ १-१४ २.७६-२७७ आचारपरिपालनाफलवर्णनम् ११७ १२८० १-१२ - २६९-२७२ स्नानवर्जनोपदेशः {१२ {१२५ १११५ {१९ विषया छ १२९ पंकिगाथा पंकि पृष्ठं १५७ ३१३-३११ माषाप्रकारा! ९ विषय अ० ८ आचारप्रणिधि। अष्ठमाण्ययनोपक्रमा आधारप्रणिधिकथनप्रतिज्ञा ३१५-३१७ सावधभाषा {१३० १२९ ११-१३ ६-८ ३१८-३१९ वपनविपिः ३३६-३४६ पदपाययतना ३२०-३२३ सावधानवयभाषाविचार: ३४७-३५० सूक्ष्माष्टकयतना 1१३२ १-१३ ३५१-३६२ विविधाचारमर्यादा ६१३४ ४-१३ ३६३-३७४ महत्वोपदेशः १३५ ११-१२ ] ३७५-३८४ गुर्षाविधिनयस्य भाषायाः १४१ २-१४ १४२ १-२ १४३ १४५ ३२५-३२६ पपनप्रकार: २२७-२२१ अवधारण्यादिरूपाया १४७ भावापरते स्वरूपम् ३३२-३३४ भापायिवेकः उपसंहारम्प 1१३६ पंक्तिः पंक्तिः। गाथाङ्क: विषय: अ० ९, उ०२ ४१६-४१७ विनयमहिमा पृष्ठं १७३ १तः १६५ १३ 1१६६ गाथाडः विषयः पृष्ठ ३८५-३९४ अकरणीयनिषेधः, ब्रह्मचर्य- (१५३ रक्षोपदेशः, विषयतृष्णावारणम्। १५५ ३९५-३९८ निष्क्रमणश्रद्धारक्षोपदेशः, १५५ आचारफलकथनम् १५७ अ०९ विनयसमाधिः, उ०१ १६५ नवमाध्ययनोपक्रमः १२ तः or {१६७ १-४ १५७ ९-१३ ३९९ विनयभावस्य दुरन्तता १५७ १५४ ४००-४०८ गुर्वाशातनाया विविधोपमा- १५९ मिविरसतानिरूपणम् १६२ ४१८-४१९ अविनीतदोषाः 1१६७ ४२०-४२१ विनीताविनीतदृष्टान्तः १६७ ४२२-४२४ दृष्टान्वोपनयेन विनीता. विनीतशिष्ययोः लामहानि- प्रदर्शनम् । १६८ ४२५-४२६ देवोपमया विनयाविनयफलम् १६९ ४२७-४३१ लौकिकविनयनिदर्शनेन लोको.१७० तरविनयफलस्वरूपम् ४-११ ११वः १-१४ ८वः ४०९-४१५ गुरुविनयोपदेशः {१७१ १ (१६० पृष्ठं पंक्ति विषया ४३२-४३५ विनयप्रकारा पृष्ठं ११८२ १८३ ११७२ १ १८० 1१८१ १३६-४३८ विनीतायिनीवयोः फलमुप- संहारब अ०९३०३ ४३९-४४५ आचार्य विनयस्य महिमा, सुभगाचारविधिश्व ४४६-४५३ सुमगाचारमर्यादा १ विषयः ६-१३ [ सू. १५, विनयसमाधिभेदाः गा. ४५५) सू. १८, शुससमाधिभेदाः २-१२ गा. ४५६ सू. १९, तपासमाधिभेदाः गा. ४५७ सू. २०, माघारसमाधिभेदाः गा. ४५८-अध्ययनोपसंहारच ८वा ४६० २०१०, समिक्षु दशमाध्ययनोपक्रमः ४६१-५८१सममेऽभ्ययने सयमावा- वर्णनम् १७७ .१८० १८७ २-४ अ०९उ०४ स्, १६, समाधिस्थानकथनोपक्रमा, गा. ४५४ समाधिस्थानभेदाच 1१८२ १ पंक्तिः ९तः विषय: गाथाक २ १३०२ पृष्ठ पंक्तिः| गाथा विषयः प्रथमचूला, रतिवाक्या २०९ ५००-५०३ अनुमोतःप्रति श्रोतसो. २१० २१२ हेयोपादेयता प्रथमचूलिकोपक्रमः १९६ ११-१२ ५०४-५०८ साध्वाचारमर्यादा २१३ संयमशिथिलमनसः रोधाय (१९७ ११तः २१५ स्थानाष्टादशकस्वरूपम् ५०९-५१५ कामासजनसूत्रानुगामिवानु- ४८२-४८९ स्थानाष्टादशकविवेचनम् , २०३ ४-१३ भ्रष्टशीलताफलनिर्देशः १२०४ प्रेक्षाऽऽचारपरिपालनफलादि- (२१७ १२२० निर्देश: १-२ ४९०-४९५ स्थानाष्टादशकविवेचनं, २०५ ८तः २२० हारिभद्रीयकृतिप्रशस्तिः संयसरत्यरत्योः स्वरूपं फलश्च ।२०७ ४९६-४९९ स्थानाष्टादशकवर्णनं, ६-१२ (२०८ २२१ लघुटीकाप्रशस्तिः मनःस्थिरीकरणोपायः १२०९ प्रत्यन्तरप्रशस्तिः ६२२१ १०-१२ द्वितीयचूला-विविक्तचा २२० १२२२ द्वितीयचूलिकोपक्रमः २०१ ११-१२ से भिक्खू शुद्धिपत्रकम् पृछाः पतिः अशुद्धिः शुद्धि पृष्ठाः पछिः अशुद्धिः १२ श्रुत १० सिद्धगति २० १ ०मक्रवाया ०मक्खाया ४ दृष्टोऽसो २८ ८ एतदेवो पन्यस्यति एतदेवोपन्यस्यति ९९ ३ ०प्रतिपत्ति प्रतिपति १०७ ९ येपछी ८ मीत्येद् मीत्येवद् १२३ गोत्रेण २ सेऽभिखू १२ ०कखणो ४ पूर्ववत् ॥ व्याख्यातं पूर्ववत् ।। ४ दोप्रसङ्गा व्याख्यातं षड्जीवनिकाया- १६१ ९ वा भुजलो- ध्ययनम् । अधुना १ वर्चयत् ६० तचित्त इति ९ चळईचा चालत्ता सिद्धा० ८ वशिष्टो वशिष्ठो० ११ पुनर्वा ७८ ६ सुजोगरे स्स उनोअगरे ततः शुद्धिः सिद्धिगति रष्टोऽसौ शृणुत ० षष्ठी गोत्रेण- विषक्षणो दोषप्रसका वा-भुजनो वर्तयेत् ०वत्ती सिद्ध्या० तु वाकू तवे ६ ०प्त इति

-
॥ अहम् ॥
श्रेष्ठि देवचन्द्रलालभाई-जैन-पुस्तकोद्धार-ग्रन्थाके-
भगवच्छय्यंभवश्रुतकेवलिनियूदं
श्रीमत्सुमतिसाघुसूरिणा भवविरहाकितहट्टीकोद्धृतवृत्युपेतं
श्रीदशवकालिकम्।
ऐं नमः ॥ जयति विजितान्यतेजाः सुरासुराधीशसेवितः श्रीमान् । विमलखासविरहितत्रिलोकचिंतामणिवीरः ॥ १॥
इहार्थतस्त( तोऽहं )त्प्रणीतस्य सूत्रतो गणधरोपनिवद्धपूर्वगतोद्धृतस्य शारीरमानसातिकटुकदुःखसन्तानविनाशहेतोः दश.
वैकालिकाभिधानस्य शास्त्रस्यातिसूक्ष्ममहार्थगोचरस्य व्याख्या प्रस्तूयते, तत्र प्रस्तुतार्थप्रतिपादनार्थमेव धर्मस्य नमस्कार.
द्वारेणापविनविनायकोपशांतये भगवान् शय्यंभवाचार्यो भावमंगलमाह-
धम्मो मंगलमुकिट्ठ, अहिंसा संजमो तवो। देवावि तं नमसंति, जस्स धम्मे सया मणो ॥१॥
जहा दुमस्स पुप्फेसु, भमरो आवियइ रसं । न य पुप्फं किलामेइ, सो य पीणेइ. अप्पयं ॥ २॥

एमेए समणा मुत्ता, जे लोए संति साहुणो। विहंगमा व पुप्फेसु, दाणभत्तेसणे रया ॥ ३ ॥ वयं च वित्तिं लब्भामो, न य कोइ उवहम्मइ । अहागडेसु रीयंते, पुप्फेसु भमरा जहा ॥ ४ ॥ महुगारसमा बुद्धा, जे भवंति अणिस्तिया । नाणापिंडरया दंता, तेण वुच्चंति साहुणो ॥ ५ ॥ त्ति वेमि । पढमं दुमपुस्फियज्झयणं समत्तं ॥१॥ 'धम्मो मंगल'मित्यादि,मगायत हितमनेनेति मगलं, 'उत्कृष्टं प्रधान, न हिंमा अहिंसा-प्राणातिपातविरतिरित्यर्थः, दुर्गतिप्रसुतान् जीवान् धारयतीति धर्मः, म मङ्गलं, 'संयमः' आश्रवद्वारोपरमः, तापयत्यनेकमवोपासमष्टप्रकार कम्मति 'तप: अनशनादि, 'देवाऽपि तं नमसंतिति (देवा अपि तं नमस्यन्ति ) यस्य किं ?-धर्म 'सदा सर्वकालं 'मन' अन्तःकरणमिति ॥१॥ 'जहा दुमस्मेति 'या-येन प्रकारेण द्रुमस्य पुप्पेषु अमर:-चतुरिन्द्रियः, किं ?-आपि- पति, कं १, रमं मकरदमिति 'न च' नैव पुष्पं 'क्लामयति पीडयति, 'सच' भ्रमरः 'मीणाति' तर्पयत्यात्मान- मिति ॥२॥ 'एमेए' इत्यादि, 'एवं' अनेनैव प्रकारेण एते ये परिश्रमन्तो दृश्यन्ते, श्राम्यन्तीति श्रमणाः तपस्यन्तीत्यर्थः, ते च तापमादयो भवत्पत आह-'मुक्ताः

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M 'नानापिडरता' नाना-अनेकप्रकाराभिग्रहविशेषात् प्रतिगृहमपाल्पग्रहणाच पिण्डः-आहारादिपिण्डः, नाना चासो पिण्डश्च अन्तग्रान्तादिर्वा तस्मिन् रता:-अनुद्वेगवन्तः, 'दांता' इन्द्रियदमेन दान्ता इति पदेऽसौ वाक्यशेपो द्रष्टव्यः, ईर्यादिसमिताच, तथार्थोऽयं यथा भ्रमरोपमया एपणाममिती यतन्ते, तथा ईर्यादिष्यपि त्रमस्थावरभूतहितं यनन्ते, साभाविक-पारमार्थिक, घ साधव इति, पाठान्तर पा, 'तेनोच्यन्ते साधव' इति येन कारणेन मधुकरसमाना उक्तन्यायेनममरतुल्याः ॥५॥ इतिः परिममाप्ती, प्रवीमीति न स्वमनीषिकया, किन्तु तीर्थकरगणधरोपदेशेनेति ।। द्रुमपुष्पिकाध्ययनं समाप्तम् १॥ उपाख्यातं दुमपुष्पिकाम्ययनम् , अधुना श्रामण्यपूर्विकाख्यमारम्यते, अस्यैवममिसम्बन्धः इहानन्तराध्ययने धर्मप्रशंसोक्ता, सा चेहैव जिनशासन इति, इह तु तदम्पुपगमे सति मा भूदभिनवप्रवजितस्यावृतेः संमोह इत्यतो धृतिमता भवितव्यमित्येतदुपते, अनेन सम्बन्धेनायातमिदमत्राध्ययनम्- कहन्नु कुजा सामन्नं, जो कामे न निवारए। पए पए विसीयंतो, संकप्पस्स वसं गओ ॥६॥ 'कहण्णु' इति कथं नु कुर्यात् श्रामण्यं-श्रमणमा यः कामान् न निवारयति, 'क' केन प्रकारेण, नुः क्षेपे, यथा कथं नु स राजा ? यो न रक्षति ग्रजां, कथं नु स वैयाकरणो योऽपशब्दं प्रयुक्त , एवं कथ नु कुर्यात् श्रामण्य-भ्रमण- मारं यः कामान् न निवारयति , कारणमाह-'पदे पदे विपीदन सङ्कल्पस्य वशङ्गतः कामानिवारणेन्द्रियाद्यपराध.

पैदापेक्षया पदे पदे विपीदनात् सङ्कल्पस्य वशं गतत्वाद् , अप्रशस्ताध्यवसायः सङ्कल्प इति सूत्रसमासार्थ इति ॥ ६॥ न केवलमयमधिकृतसूत्रोक्त एव श्रामण्याकरणाद् अश्रमणः, किन्त्वाजीविकादिभयप्रवजितः सक्लिष्टचित्तो द्रव्यक्रियां कुर्वन्नप्य- श्रमण एव-अयोग्य एव, कथं १, यत आह सूत्रकार:- वत्थगंधमलंकारं, इत्थीओ सयणाणि य । अच्छंदा जे न भुंजंति, न से चाइत्ति वुच्चइ ॥ ७ ॥ 'वत्थगंधमलंकारं' इति वस्त्रगन्धमलङ्काराणि, तत्र वस्त्राणि-चीनांशुकादीनि, गन्धाः-कोष्ठपुटादयः, अलङ्काराः- कटकादयः, अनुस्वारोऽलाक्षणिकः, स्त्रियोऽनेकप्रकाराः, शयनानि-पर्यादीनि, चशब्दादासनादिपरिग्रहः, एतानि वस्त्रादीनि किं ? अच्छन्दाः-अस्ववशा ये केचन 'न भुञ्जते' न सेवन्ते, किं बहुवचनोद्देशेऽप्येकवचननिर्देशः १, विचित्रत्वात् सूत्रगते. विपर्ययश्च भवत्येवेतिकृत्वा आह-नासो त्यागीत्युच्यते, सुबन्धुवत् (दश० चू० पृ० ८१ ) नासौ श्रमण इति ।। ७ ।। यथा चोच्यते तथाऽभिधातुकाम आह- जे य कंते पिए भोए, लद्धे विपिट्ठिकुव्वइ । साहीणे चयई भोए, से हु चाइत्ति वुच्चई ॥ ८॥ 'जे य कंते पिए' इति-य एव कान्तान्-कमनीयान् शोभनानित्यर्थः, प्रियान्-इष्टान् , भोगान्-शब्दादिविषयान् , लब्धान्-प्राप्तान , उपनतानितियावत् , 'विपिडिकुव्वई'त्ति विविध-अनेकैः प्रकारैः श्रुतभावनादिभिः पृष्ठतः करोति, परि- त्यजतीत्यर्थः, स च न बन्धेन बद्धः प्रोपितो वा, किन्तु स्वाधीन-अपरायचः, स्वाधीनानेव परित्यजति भोगान् पुनस्त्याग- E ग्रहणं प्रतिसमयं त्यागपरिणामवृद्धिसंपूचनार्थ, मोगग्रहणं तु मम्पूर्णमोगग्रहणायं स्यक्तोपननभोगपंचना था, ततक्ष ईदृशः, हुशब्दस्यावधारणार्थत्वात् म एव त्यागीत्युच्यते, भरतादिवद्, इति ॥ ८॥ समाइ पेहाइ परिवयंतो, सिया मणो निस्सरई वहिद्धा । न सा महं नो वि अहंपि तीसे, इच्चेव ताओ विणइज रागं ॥ ९ ॥ 'समाह पेहाइ इति, तस्यां त्यागिनः समया-आत्मपरतुल्पत्या प्रेक्षते अनयेति प्रेक्षा-दृष्टिस्तया प्रेक्षया-दृष्ट्या परि-समन्तात् व्रजतो-गुरुपदशादिना संयमयोगेषु वर्तमानस्येत्यर्थः, स्यात्-कदाचिदचिन्त्यत्वात् कर्ममतेर्मनो निःस. रति पहिर्धा भुक्तभोगिनः पूर्वक्रीडितस्मरणादिना अभुक्तमोगिनश्च कुतूहलादिना मन:-अन्तःकरणं निस्मरति-निर्गच्छति बहिर्घा-संयमयोगादहिरित्यर्थः, तदा प्रशस्ताघ्यवसायनासौ अशुभमङ्कल्पः परिस्थगनीया, केनालम्बनेनेति ? यस्यां रागः सम्पन्नस्तां प्रति चिन्तनीयं 'न सा मम, नाप्य तस्याः पृथकर्मफलभुजो हि प्राणिन इति, वं ततस्तस्याः मकाशाद् व्यपनयेत राग, तत्वदर्शिनो हि म निवर्तन एवेति ॥ अग्रोदाहरण (१०१)- यथैको वणिकपुत्रः मञ्जातपरमवैराग्यो विचिन्त्य संमारामारतां नवे पयसि पर्तमानो विदाग यौवनश्रिया ममलता स्त्रियं प्रमज्यामग्रहीत् । म च कैविद्वासरः समतिक्रान्तः विधिना पिहिताप्रणिधान इदं समृद्घोषयामास-"न सा महं नोऽपि अहंपि तीसे" तेन च पठना समचिन्ति-यथा मा मम अहमपि तस्याः, यतोऽमावत्यन्तं ममानुरक्ता, ततः कथमहं तां प्राणात्ययेऽपि परित्यजामीति सम्प्रचार्य चेतसि गुरूणां किंवदतीमात्मीयामनिवेद्य गृहीतपात्रापकरण एव गतस्तं ग्राम

यत्रासावास्ते, प्राप्तस्य तं ग्रामं जलानयनाय वहिामवाप्यामत्रान्तरे तस्यासौ प्रियतमा समायाता, विलोकितोऽसौ तया,
तत्र दृष्टमात्रः प्रत्यभिज्ञातः, न च तेन सा प्रत्यभिज्ञाता, कृते च वन्दने परिपृष्टाऽसौ, यथा-भद्रे ! जानासि त्वममुकस्य
वणिजः सुता, सा च तस्मिन् प्रबजिते समाकर्णितधर्मा सञ्जातपरमवैराग्या संयोगानां दुःखबहुलतां परिकल्पयन्ती प्रव्रजि-
तुकामा परिचिन्तितवती-यादृशान्यस्य चिह्नानि समवलोक्यन्ते तादृशो विषयोन्मुखमस्य चेतः समभिलक्ष्यते, ततश्च विपया-
सक्तयोरावयोरवश्यं भविष्यति दुर्गतिपातः, तदयमात्मा च, ततो मया परिरक्षणीय इति सम्प्रधार्य तं प्रति जगाद-भो साधो !
सा मातापितृभिरन्यस्मै दत्ता, तत् श्रुत्वाऽसौ समचिन्तयत् , यथा-सत्यमहं भगवद्भिः साधुभिः पाठितो-"न सा महं नोऽवि
अहंपि तीसे," इति परिमावयन् परमसंवेगं गतः, तां जगाद-भद्रे ! तस्याः कारणेन जन्मान्तरकोटिभिरपि दुरापं भगवता-
माचार्याणां पादपद्म विहाय विषयाभिलाषी समागतोऽहं तत्पार्श्वे, दुष्टं चेष्टितमत इतः स्थानादेव व्रजाम्यहं गुरूणामन्तिके,
ततः सा तं प्रत्यवादीद-मुने ! शोभनमुक्तवानसि, यतः असारा विषयाभिलापाः, करिकलभश्रवणमिव चञ्चलमायुः, प्रति-
क्षणध्वंसी देहः, अकृतधर्माणां ध्रुवो नरकपात इत्यादि तमनुशिष्य, कथयित्वा चात्मानं, सञ्जातवैराग्यं तं प्रेपयामास गुरूणा-
मन्तिके, स्थिरीभूतश्च कृतवान् प्रव्रज्या, एवमात्मा सन्धारणीयो यथा तेनेति ॥ ९॥ एवं तावदान्तरो मनोनिग्रहविधिरुक्तो,
न चायं वाह्यमन्तरेण कतुं शक्यते, अतस्तद्विधानार्थमाह-
आयावयाहि चय सोगमल्लं, कामे कमाही कमियं खु दुक्खं
छिंदाहि दोसं विणएज्ज रागं, एवं सुही होहिसि संपराए ॥ १० ॥

'आयाघयाहीति संयमगेहान्मनमोऽनिर्गमार्थमातापय-आतापनां कुरु, एकग्रहणे तजातीयग्रहणमिति न्यायात यथानुरूपमूनोदरतादेपि विधिः, अनेनात्मममुत्थदोपपरिहारमाह-तथा त्यज सौकुमाय-परित्यज सुकुमारत्वं, अनेन तूमयममुत्थदोपपरिहारमाह, तथाहि-सौकुमार्यात् कामेच्छा प्रवर्तते योषितां च प्रार्थनीयो भवति, एवमुभयासेग्नेन कामान कम-उल्लंघय, यतस्तैः कान्तः कान्तमेव दुःवं भवतीति शेषः, खुशब्दोऽवधारणे, कामनिवन्धनत्वाद् दुःखस्य, अधुना अनन्तरं कामक्रमणविधिमाह-छिद्धि द्वेष-व्यपनय रागं सम्पगलानवलेन विपाकालोचनादिना, एवं कृते फलमाह-एवं- अनेन प्रकारेण वर्तमानः कि-'सुखमस्यास्तीति सुखी भविष्यसि, क ?, संपराये-संमारे यावदपवर्ग न प्राप्स्यसि तावत् सुखी भविष्यमि, संपराये-परीपहोपसर्गपशाम इत्यन्यः॥१०॥ किंच-संयमगेहान्मनस एवानिर्गमार्थमिदं चिन्तयेत्- पक्खंदे जलियं जोइं, धूमकेउं दुरासयं । नेच्छंति वंतयं भोत्तुं, कुले जाया अगंधणे ॥ ११ ॥ 'पग्वंदे 'त्यादि, प्रस्कन्दन्ति-अध्यवस्यन्ति ज्वलितं-चालामालाकुलं, न मुभरादिरूपं, के ? ज्योतिपं-अमिं - धूमकेत-धूमघजं नोलकादिरूपं, दुराशयं-दुःखेनामाधने-अभिभूयत इति दुरासदस्त, दुरमिममित्यर्थः, चन्दलोपात, 'न चेच्छन्ति वान्तं भोक्तुं' परित्यक्तमत्तुं, विषमिति गम्यते, के ?, नागा इति गम्यते, एवं किंविशिष्टाः १, कुले जाता:-समुत्पन्ना अगन्धने, नागानां हि मेदद्वयं-गन्धना अगन्धनाथ, तत्र गन्धना नाम डमिए मंतेहिं आयष्टिया तं विसं वणमुहाओ आवियन्ति, अगन्धणा उण अवि मरणमझवसन्ति न य वंतमावियंति, उपसंहारस्त्वेवं भावनीयः-यदि तावत् निर्यश्चोऽप्यभिमानमात्राद् अपि जीवितं परित्यजन्ति, न च वान्तं भुञ्जते, तत्कथमहं जिनवचनामिझो विपाकदारुणान् . विषयान् वान्तानपि भोक्ष्य इति ॥ अस्मिन्नेवार्थे द्वितीयमुदाहरणं (६० २)- • जया किल अरिहनेमी पव्वइओ, तया रहनेमी तस्स जेट्ठभाऊओ रायमई उवयरइ, जइ नाम एसा ममं इच्छिजा, सावि भयवई निबिनकामभोगा, नायं च तीए-जहा एसो मज्झं अज्झोववन्नो, अन्नया य तीए महुघयसंजुत्ता पेजा पीया, रहनेमी आगओ, मयणफलं मुहे काऊण तीए वंत, भणियं च-एयं पेजं पियाहि, तेण भणियं-कहं वंतं पिजह ? तीए मणियं-जइ न पिजइ तओ अहंपि अरिद्वनेमिसामिणा वंता कहं पिबिउमिच्छसि ?, तथा ह्यधिकृतार्थसंवाद्यवाह- धिरत्थु ते जसोकामी, जो तं जीवियकारणाः । वंतं इच्छसि आवेडं, सेयं ते मरणं भवे ॥ १२ ॥ 'धिरत्थु' इत्यादि, तत्र राजीमती किलैवमुक्तवती-'धिगस्तु' धिक्शब्दः कुत्सायां, अस्तु-भवतु ते-तव पौरुषस्येति गम्यते, हे यश कामिन्-कीर्त्यमिलापिन् !, सास्यं क्षत्रियामन्त्रणं, अथवा अकारप्रश्लेपादयशाकामिन् !, धिगस्तु-भवतु तव, यस्त्वं जीवितकारणात् ' असंयमजीवितहेतोर्वान्तमिच्छस्यापातुं-परित्यक्तां भगवताऽभिलपसि भोक्तुमिति, अतः अतिक्रान्तमर्यादस्य 'श्रेयस्ते मरणं भवेत् ' शोभनतरं तव मरणं, न पुनरिदं अकार्यासेवनमिति । ततो धम्मो से कहिओ, सम्बुद्धो, पवइओ य, रायमईवि तं बोहिऊण पवइया, अन्नया कयाइ सो रहनेमी बारवईए भिक्खं हिंडिऊण सामिसगासमा गच्छंतो वासबद्दलएण अब्भाहओ एगं गुहं पविट्ठो, रायमई वि सामिणो वंदणयाए गया, वंदित्ता पउिस्सयमागच्छंतीए अंतरा वरिसिएण तिता अयाणंती तमेव गुहमणुपविट्ठा, वत्थाणि य पविसारियाणि, ताहे तीए अंगपञ्चंगाणि दिवाणि, सोन रहनेमी तीए अज्झोववन्नो, दिट्ठो य णाए, इंगियागारकुसलाए णाओ असोहणो मावो एयस्स, ततो सा तमिदमवोचत्- अहं च भोगरायस्स, तं चऽसि अंधगवहिणो । मा कुले गंधणा होमो, संजमं निहुओ चर ॥१३॥ 'अहं चेति अह च भोगराज्ञः-उग्रसेनस्य दुहितेतिगम्यते, त्वं च असि-भवसि अंधककृष्णे-समुद्र विजयस्य, मुत इति गम्यते, अतो मा एकैकप्रधानकुले आवां गन्धनो भूव, जह न सप्पतुल्लाई होमोत्ति मणिय होइ, अतः संयम निभृतथर-सर्वदुःखनिवारणं क्रियाकलापमम्याक्षिप्तः कुर्विति ॥ १३ ॥ किं प- जइ तं काहिसि भावं, जा जा दिच्छसि नारीओ । वायाविद्धन्य हडो, आट्ठिअप्पा भविस्तासि ॥१४॥ 'जह समिति, यदि त्वं फरिप्पसि भावं-अभिप्रायं प्रार्थनमित्यर्थः, क ?-या या द्रक्ष्यसि नारी:-स्त्रियः, तासु एताः शोमनाः शोमनतराः सेवामि-कामपामीत्येवंभूतं मावं यदि करिष्यसि, ततो पायुनाऽऽविद्ध इव हतो-वातप्रेरित इवारदालो वनस्पतिविशेषोऽस्थितात्मा भविष्यसि, सकलदुःखक्षयनियन्धनेषु संयमगुणेष्वपद्धमूलत्वात् संसारसागरे प्रमादपवनप्रेरित इतश्वेवश्च पर्यटिप्पसि- तीसे सो वयणं सोचा, संजयाइ सुभासियं । अंकुसेण जहा नागो, धम्मे संपडिवाइओ ॥ १५ ॥ 'सीसे सो घयण'मिति तस्या-राजीमत्या असौ-रथनेमिर्वचनमनन्तरोदितं श्रुत्वा-आकये किंविशिष्टाया- स्तस्याः संपताया:-प्रमजिताया इत्यर्थः, किंविशिष्ट वचनं -सुभाषित-संवेगनिबन्धन, अंकुशेन यथा नागो- इस्ती एवं धम्म सम्प्रतिपादिवो-धमें स्थापित इत्यर्थः । ।

- एवं करंति संबुद्धा, पंडिया पविअक्खणा । विणिअदति भोगेसु, जहा से पुरिसुत्तमो ॥ १६ ॥ त्ति बेमि । सामन्नपुत्वियं नामज्झयणं समत्तं २ ॥ 'एवं करंती'ति एवं कुर्वते संयुद्धा:-बुद्धिमन्तो बुद्धाः, सम्यग्दर्शनसाहचर्येण दर्शनैकीमावेन वा बुद्धाः संबुद्धा- विदितविपयस्वभावाः, सम्यग्दृष्टय इत्यर्थः, त एवं विशेष्यन्ते पण्डिताः प्रविचक्षणाः, तत्र पण्डिताः प्रविवक्षया सूत्रपण्डिताः सम्यग्ज्ञानवन्तः प्रविचक्षणाश्चरणपरिणामवन्तः, अन्ये तु व्याचक्षते संबुद्धाः सामान्येन बुद्धिमन्तः, पण्डिता- वान्तभोगासेवनदोषज्ञाः, प्रविचक्षणा-अवधभीरवः, किं कुर्वन्ति ?-विनिवर्तन्ते भोगेभ्यो विविध-अनेकैः प्रकारैरनादि- भवाभ्यासवलेन कदर्यमाना अपि मोहोदयेन निवर्तन्ते भोगेभ्यो-विषयेभ्यो, यथा क इत्यत्राह-यथा असौ पुरुषोत्तमो रथनेमिः। आह-कथं तस्य पुरुषोत्तमत्वं ? यो हि प्रवजितोऽपि विपयाभिलापीति ?, उच्यते, तथाऽभिलापेऽप्यप्रवृत्तेः, कापुरुषस्त्वभिलापानुरूपं चेष्टत एवेति । अपरस्त्वाह-दशवैकालिकं नियतश्रुतमेव, यत उक्तं-" नायज्झयणाहरणा इसिभासियमो पइन्नगसुया य । एए होति अनियया निययं पुण सेसमुस्सणं ॥१॥" तत् कथमभिनवोत्पन्नमिदमुदाहरणं युज्यत इति ?, उच्यते, एवंभूतार्थस्यैव नियतश्रुतभावाद् उस्सन्नग्रहणाचादोपः, प्रायो नियतं, न तु सर्वथा नियतमेवेत्यर्थः । ब्रवीमीति न स्वमनीपिकया, किन्तु तीर्थकरगणधरोपदेशेनेति ।। दशवैकालिकश्रुतस्कंधे द्वितीयमध्ययनं टिप्पितमिति । Sayeser- व्याख्यातं श्रामण्यपूर्षिकाख्यमध्ययन, इदानी क्षुल्लिकाचारकथाख्यातमारभ्यते, अस्य चायममिसम्बन्धः- इहानन्तराध्ययने धर्माम्युपगमे सति मा भूदमिनप्रवरितस्याधृतेः समोह इत्यतो धृतिमता भवितव्यमित्युक्तं, इह तु सा धृतिराचारे कार्या, न त्वनाचारे, अयमेवात्मसयमोपाय इत्येतदुच्यते, उक्त च-" तस्यात्मा संयतो यो हि, सदाचारे रतः सदा । स एव धृतिमान् धर्मस्तस्यैव हि जिनोदितः ॥ १॥" इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिति- संजमे सुट्ठिअप्पाणं, विप्पमुक्काण ताइणं । तेसिमेयमणाइन्नं, निग्गंथाण महेसिणं ॥ १७ ॥ संयमे-उक्तस्वरूपे शोभनेन प्रकारेणागमनीत्या स्थित आत्मा येषां ते तथा तेपा, त एव विशेष्यन्ते-विविधैः अनेकैः प्रकारः प्रकण-भावसार मुक्तास्तेपा, त एव विशेष्यन्ते-रक्षन्ति आत्मानं पर उमयं चेति वातास, आत्मानं प्रत्येकवुद्धाः, पर तीर्थकराः स्वतीर्णत्वात् , उभय स्थविरा इति, तेपामिदं वक्ष्यमाणलक्षणमनाचरितं-अकल्प्य केषामित्याह-निग्रंथानां- साधूनामिति, अभिधानमेवन, महान्तश्च ते अपयश्च महर्षयो-यतय इत्यर्थः, तेपा इह च पूर्वपूर्वभाव एवोत्तरोत्तरमावो नियमतो हेतुहेतुमदावेन वेदितव्यो, यत एव सयमे सुस्थितात्मानोऽत एवं विप्रमुक्ताः, संयमसुस्थितात्मत्वनिबन्धनत्वा- द्विप्रमुक्ता, एवं शेपेषपि मावनीय, अन्ये तु पश्चानुपा हेतुहेतुमद्भावं वर्णपन्ति, यत एव महर्षयः, अत एव निर्ग्रन्थाः, | एवं शेषेष्वपि भावनीयमिति सूत्रार्थः ॥ १७॥ साम्प्रतं यदनाचरितं तदाह- उद्देसियं कीयगडं, नियागमभिहडाणि य । राइभत्ते सिणाणे य, गंधमल्ले अ वीयणे ॥१८॥ 'उदेसियामिति उद्देशनं-साध्वाधाश्रित्य दानारम्मस्येत्युद्देशा, उद्देशे भवमौदेशिकं १, क्रयण क्रीतं, सामादिनि मित्तमिति गम्यते, तेन कृतं-निर्वचितं क्रीतकृतं २, नियागमित्यामन्त्रितस्य पिण्डस्य ग्रहणं नित्यं न त्वनामन्त्रितस्य ३, अभिहडाणीति स्वग्रामादेः साधुनिमित्चमभिमुखमानीतमभ्याहृतं, बहुवचनं स्वग्रामपरग्रामनिशीथादिभेदख्यापनार्थ ४, रात्रिभक्तं-रात्रिभोजनं दिवसगृहीतदिवसभुक्तादिचतुर्भङ्गलक्षणं ५, स्नानं च-देशसर्वभेदमिन्नं, देशस्नानमधिष्ठान. शौचातिरेकेणाक्षिपक्षमप्रक्षालनमपि, सर्वस्नानं तु. प्रतीतं ६, तथा गन्धमाल्यवीजनं च गन्धग्रहणात् कोष्ठपुटादिपरिग्रहः, माल्यग्रहणाच्च ग्रथितवेष्टिमादेर्माल्यस्य, वीजन तालवृन्तादिना धर्मे ७-८-९ इदमनाचरितं; दोपाश्चौद्देशिकादिष्वारम्भ- प्रवर्तनादयः स्वधिया वाच्या इति ॥ १८ ॥ इदं चानाचरितमिति- सन्निही गिहिमत्तेय, रायपिंडे किमिच्छए । संवाहणा दंतपहोअणा य, संपुच्छणा देहपलोअणाय ॥१९॥ 'सन्निहीं सूत्रं, सन्निधीयते अनेन आत्मा दुर्गताविति सन्निधिः-घृतगुडादीनां सञ्चयक्रिया १०, गृहमानं च- गृहस्थमाजनं च ११, तथा राजपिण्डो-नृपाहारः, कः किमिच्छतीत्येवं यो दीयते स किमिच्छकः, राजपिण्डोऽन्यो वा सामान्येन १२, तथा सम्बाधनं-अस्थिमांसत्वग्रोमसुखतया चतुर्विधं मद्दनं १३, दन्तप्रधावनं च-अंगुल्यादिना दन्तक्षालनं १४, तथा सम्प्रश्न:-सावद्यो गृहस्थविषयो रादार्थ कीदृशो वाऽहमित्यादिरूपः १५, देहप्रलोकनं च- आदर्शादौ अनाचरितं १६, दोषाश्च सन्निधिप्रभृतिषु परिग्रहप्राणातिपातादयः स्वधियैव वाच्या इति ॥ १९ ॥ किंच- अट्ठावए अ नालीए, छत्तस्स य धारणट्ठाए । तेगिच्छं पाहणा पाए, समारंभं च जोइणो ॥ २० ॥ । 'अट्ठावए' इति, अष्टापदं चेत्यष्टापदं-धूतं, - अर्थपदं वा-गृहस्थमधिकृत्यु निमिचादिविषयमनाचरित १७, तथा - 'नालिका चेति चूतविशेषलपणा यत्र मा भूकमयाऽन्यथा पाशपातनमिति नालिकया पात्यन्त इति, यं चानाचरिता १८, अष्टापदेन मामान्यतो द्यूतग्रहणे मत्यप्याभिनिवेशनिबन्धनत्वेन नालिकाया प्राधान्यरूपापनार्थ नालिकाग्रहणं, अशापदन. विशेषपक्षे चोमयोरिति । छत्रस्य च-लोकप्रसिद्धस्य धारणमात्मानं पर वा प्रत्यनायेति, आगादग्लानाबालंबन सज्वानाचरितं, प्राकनशैल्या चात्रानुस्वारलोपोझारनझारलोपौ च द्रष्टव्यो, तथाश्रुतिप्रामाण्यादिति १९ । 'तेगिच्छति चिकित्साया भावकित्स्य-व्याधिप्रतिक्रियारूपमनाचरितं २०, उपानही पादयोरनाचरिते, पादयोरिति मामिप्रायक न वापरकल्पपरिहारार्थे उपग्रहधारणेन २१, तथा समारंभणं समारंभच, ज्योतिपा-अग्नेरनाचरितमिति २२, दोपास्त्वष्टापदादीनां प्रसिद्धा एव क्षुण्णा एवेति ॥ २० ॥ किंच- सिज्झायरपिंडं च, आसंदीपलियंकए । गिहंतरनिसिजा य, गायस्सुबट्टणाणि य ॥ २१ ॥ 'सिवायर 'इत्यादि, शय्यातरपिंडवानाचरितः, शय्या-वमतिस्तया तरति संसारमिति मय्यातर:-माधुवमतिदाता तस्पिटः २३, आमन्दकपर्य कायनाचरितौ एतौ च लोकप्रसिद्धाश्च २४-२५, सधा गृहान्तरनिपद्यानाचारिता गृहमेव गृहान्तर गृहयो; अपान्तरालं तत्रोपवेशनं, चन्दात् पाटकादिपरिग्रहः २६, तथा गानस्प-कायस्योद्वर्तनानि चाना. चरितानि, उद्वर्तनानि-पापनयनलक्षणानि, चशन्दात्तदन्यसंस्कारपरिग्रह इति २७ ॥ २१ ।। तथा- गिहिणो वेयावडियं, जा य आजीववत्तिया । तत्तानिव्वुडभोइचं, आउरस्सरणाणि य ॥ २२ ॥ गिहिणोति गहिणो-गृहस्थस्य वैयारयमिति ध्यावृत्तमावो वैयाशय, गृहस्थं प्रत्यन्नादिसंपादनमित्यर्थः, एतदना- -- - चरितमिति २८, तथा चाजीववृत्तिता-जातिकुलगणकर्मशिल्पानामाजीवनं आजीवस्तेन वृत्तिस्तद्भाव आजीवत्तिता, जात्याद्याजीवनेनान्नयाचनेत्यर्थः, इयं चानाचरिता २९, तथा तप्तानिवृत्तभोजित्वं-तप्तं च तदनिवृत्तं वप्तानिवृत्त अत्रिदंडोवृत्तं चेति विग्रहः, उदकमिति विशेषणान्यथानुपपत्त्या गम्यते, तद्भोजित्वं मिश्रसचित्तोदकमोजित्वमित्यर्थः, इदं चानाचरितं ३०, आतुरस्मरणानि च-क्षुधाद्यातुराणां पूर्वोपभुक्तस्मरणानि चानाचरितानि आतुरगरणानि वा दोषातुरा- श्रयदानानीति ३१ ॥ २२ ॥ किश्व- मूलए सिंगवेरे य, उच्छुखंडे अनिव्वुडे । कंदे मूले अ संञ्चित्ते, फले बीए य आमए ॥ २३ ॥ मूलएत्ति मूलको-लोकप्रतीतः, शृङ्गबेरं च आर्द्रकं च तथा इक्षुखण्डं च लोकप्रतीतं, अनितग्रहणं सर्वत्राभिसम्बध्यते, अनिवृत-अपरिणतमनाचरितमिति, इक्षुखण्डं चापरिणतं द्विपर्वान्तं यद्वर्तते ३२-३३-३४, तथा कन्दो-बजकन्दादिः ३५, मूलं च-सट्टामूलादि सचित्तमनाचरितं ३६, फलं-त्रपुष्यादि ३७, पीज-तिलादि ३८, आमकं-सचित्तमना- 'चरितमिति ॥ २३ ॥ किञ्च- सोवच्चले सिंघवे लोणे, रोमालोणे य आमए । सामुद्दे पंसुखारे य, कालालोणे अ आमए ॥२४॥ 'सोवचले 'ति, सोवर्चलं ३९, सैन्धवं ४०, लवणं ४१, रुमालवणं च ४२, आमकं, आमकमिति सचित्त मनाचरितं, सामुद्र-समुद्रलवणमेव ४३, पांशुक्षार-ऊपरलवणं ४४, कृष्णलवणं च सैन्धवलवणपर्वतेकदेशजं ४५, आमकमनाचरितमिति ।। २४ ।। किञ्च- ५ धूवणे ति वमणे य, वत्थीकम्म विरेअणे । अंजणे दंतवणे य, गायान्भंगविभूसणे ॥ २५ ॥ 'पूषणे 'त्ति धूपनमिति-आत्मवस्त्रयोरनाचरितमिति, मातशैक्याऽनागतव्याधिनिवृत्तये धूमपानमिति अन्ये व्याचक्षते ४६, धमनं च मदनफलादिना ४७, यस्तिकर्म पुटकेनाधिष्ठाने स्नेहदान ४८, विरेचनं दन्त्यादिना ४९, तथा अंजनं-रसाअनादि ५०, दंतकाष्ठं च प्रतीत ५१, गात्राम्यगस्तैलादिना ५२, विपणं गात्राणामेवेति ५३ । ॥ २५ ॥ क्रियायत्रमाह- सव्वमेयमणाइन्नं, निगंथाण महेसिणं । संजमंमि य जुवाणं, लहुभूयविहारिणं ॥ २६ ॥ 'मन्यमेयंति' मर्वमेतद्-औदेशिकादि यदनन्तरमुक्तमिदमनाचरितं, केषामित्याह-निर्गन्धानां महर्षीणां गाधूना- मित्यर्थः, त एवं विशेष्यन्ते-संयमे, चनन्दाचपसि च, युक्तानां-अभियुक्ताना, लघुभूतविहारिणां लघुभूतो-वायुस्ततश्च वायुभूतो प्रतिबद्धतया विहारो येपो ते लघुभूतविहारिणस्तेपा, निगमनक्रियापदमेतदिति ।। २६ ॥ किमिति अनाचरितं १, यतम्ते एवम्भूता मवन्तीत्याह- पंचासवपरिन्नाया, तिगुत्ता छसु संजया । पंचनिग्गहणा धीरा, निग्गंथा उज्जुदसिणो ॥ २७ ॥ 'पंगासवेत्यादि पंचाश्रा-हिमादयः परिज्ञाता द्विविधया परिक्षया-ज्ञपरिचया प्रत्याख्यानपरिज्ञया च परि-मम- न्तान शाता यैस्ते पंचाश्रवपरिझाताः, यतत्रैवम्भूता अत एव त्रिगुप्ता मनोवाकायगुप्तिभिः गुप्ता, पटसु संयता:-पट्म -

-
जीवनिकायेषु पृथिव्यादिषु मामस्त्येन यता, पंच निग्रहणा इति निगृह्णन्तीति निग्रहणाः पंचानां निग्रहणाः, पंचानामि-
न्द्रियाणां, धीरा-बुद्धिमन्तः, स्थिरा वा, निर्ग्रन्थाः-साधवः, ऋजुदर्शिनः इति अजुः-मोक्षं प्रति ऋजुत्वान् संयमस्तं
पश्यन्त्युपादेयतयेति ऋजुदर्शिनः-संयमप्रतिवद्धा इति ।। २७॥ ते च अजुदर्शिनः कालमधिकृत्य यथाशक्त्या एतत् कुर्वन्ति-
आयावयंति गिम्हेसु, हेमंतेसु अवाउडा । वासासु पडिसंलीणा, संजया सुसमाहिया ॥ २८ ॥
'आयावयन्ति' आतापयन्तीत्यूर्धस्थानादिना आतापनां कुर्वन्ति ग्रीष्मेष्विति-उष्णकालेपु, हेमन्तेपु-शीतकालेषु
अप्रावृता इति-प्रावरणरहितास्तिष्ठन्ति, तथा वर्षासु-वर्षाकालेषु प्रतिसंलीना इत्येकाश्रयस्था भवन्ति, संयता:-साघवः
सुसमाहिता-ज्ञानदर्शनादिषु यत्नपराः, ग्रीष्मादिषु बहुवचनं प्रतिवर्पकरणज्ञापनार्थमिति ॥ २८ ॥ किञ्च-
परीसहरिऊदंता, धूअमोहा जिइंदिया । सव्वदुक्खप्पहीणट्ठा, पक्कमति महसिणो ॥ २९ ॥
'परीसहे 'तिमार्गाच्यवननिर्जराथ परिषोढव्याः परीपहाः (तत्वा० अ०९,८)-क्षुत्पिपासादयः, त एवं रिपवस्तुल्य-
धर्मत्वात् परीपहरिपवः, ते दान्ता-उपशमं नीता यस्ते परीपहरिपुदान्ताः, धूतमोहा-विक्षिप्तमोहा इत्यर्थः मोदः-अज्ञानं,
जितेन्द्रियाः-शब्दादिषु रागद्वेषरहिता इत्यर्थः, एवम्भूताः सर्वदुःग्वप्रक्षयार्थ-शारीरमानसाशेषदुःखप्रक्षयनिमिचं
प्रक्रामन्ति-प्रवर्तन्ते महर्षयः-साधव इति ॥ २९ ॥ इदानीमेतेषां फलमाह-
दुक्कराई करिताणं, दुस्सहाई सहेत्तु अ। केइत्थ देवलोएसु, केइ सिझंति नीरया ॥ ३०॥

. 'दुपरा पनि एवं दुष्कराणि कत्ता औदेशिकादित्यागादीनि, तशा दुस्सहानि सहित्वा आतापनादीनि, केचनान देवलोकेषु सौधर्मादिष, गच्छन्तीति गपशेषा, व्या फेचन सिद्धयन्ति तेनैव मवेन सिद्धि प्राप्नुवन्ति, वर्तमाननिदेशः यवस्य त्रिकालविषयत्यापनाः, नीरजस्मा इत्यष्टविधकर्मविप्रमुक्ता, न त्वेकन्द्रिया व कर्मयुक्ता एवेति ॥ ३० ॥ ये मारिधानुष्ठानतो देवलोका गच्छन्ति तेऽपि तत युता आर्यदेशेषु मुकूले जन्मावाप्य श्री सिद्धान्त्येवेत्यत आह- खवित्ता पुषकम्माई, संजमेण तवेण य । सिद्धिमग्गमणुप्पत्ता, ताइणो परिनिव्वुड ॥ ३१ ।। त्ति मि । खुडियायारकहज्झयणं तइयं ३ ॥ 'खवित्तेति तदेवं देवलोकायुत्या क्षपयित्वा पूर्वकर्माणि मावशेषामि, केनेत्याइ-संयमेन उक्तस्वरूपेण तपसा प, एवं प्रयाण सिद्धिमार्ग-मम्यग्दर्शनादिलक्षणमनुप्रासाः सन्तस्त्रातारः आत्मादीनां परिनिन्ति-सिद्धि प्राप्नुवन्ति, अन्ये तु पठन्ति-परिनिव्युडत्ति, तत्रापि प्राकृतल्या छान्दगत्वाद्वाऽयमेव पाठो ज्यायानिति ॥३१॥ धीमीनि पूर्ववदिति। तृतीयं शुष्टकाचाराध्ययनं समाप्तम् ३ ॥

इदानीं षड्जीवनिकायिकाख्यमारभ्यते अस्य चायममिसम्बन्धः, इहानन्तराध्ययने साधुना धृतिराचारे कार्या, न त्वनाचारे, अयमेव चात्मसंयमोपाय इत्युक्तं, इह पुनः स आचारः पड्जीवनिकायगोचरः प्राय इत्येतदुच्यते, उक्तं च-" छसु जीवनिकाएसं जे बुहे संजए सया। से चेव होइ विनेए, परमत्थेण संजए ॥१॥" इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिद- मध्ययनमिति, तदाह- सुयं मे आउसंतेणं भगवया एवमक्खायं, इह खल्लु छज्जीवणियानामज्झयणं, समणेणं भगवया महावीरेणं कासवेणं पवेइया सुयक्खाया सुपन्नत्ता, सेयं मे अहिजिउं अज्झयणं धम्मपन्नत्ती, कयरा खलु सा छज्जीवणियानामज्झयणं समणेणं भगवता महावीरेणं कासवेणं पवेइया सुयक्खाया सुपन्नत्ता सेयं मे आहिजिउं अज्झयणं धम्मपन्नत्ती ? । इमा खलु सा छज्जीवणिया नामज्झयणं समणेणं भगवया महावीरेणं कासवेणं पवेड्या सुयक्खाया.सुपन्नत्ता, सेयं मे अहिजिउं अज्झयणं धम्मपन्नत्ती, तंजहा-पुढविकाइया,आउकाइया,तेउकाइया,वाउकाइया, वणस्सइकाइया, तसकाइया, पुढवी चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता, अन्नत्थ सत्थपरिणएणं, आऊ चित्त- मंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्य सत्थपरिणएणं, तेऊ चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नस्थ सत्यपरिणएणं, वाऊ चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्य सत्य. परिणएणं, वणस्सई चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्य सत्यपरिणएणं, तंजहा- अग्गवीया, मूलधीया, पोरवीया खंधषीया, बीयरुहा, संमुच्छिमा तणलया, वणस्सइकाइया सवीया चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसना अन्नस्थ सस्थपरिणएणं। से जे पुण इमे अणेगे वहवे तसा पाणा, तंजहा-अंडया, पोयया, जराउया, रसया, संसेइमा, संमुच्छिमा, उम्भिया, उक्वाइया, जेसिं केसिंचि पाणाणं अभिकंतं, पडिकंतं, संकुचियं, पसारियं, रुयं, भंतं, तसियं, पलाइयं, आगइगइविन्नाया जे य कीडपयंगा जाय कुंथुपिपीलिया सव्वे येइंदिया सव्वे तेइंदिया सब्बे चउरिंदिया सवे पंचिंदिया सव्वे तिरिक्खजोणिया सव्वे नेरइया सवे मणुआ सव्ये पाणा परमाहम्मिआ। एसो खल्लु छट्ठो जीवनिकाओ तसकाउचि पवुच्चइ । सूत्रं १ । 'सुयं मे' इत्यादि, शुयते तदिति श्रुतं-प्रतिविशिष्टता प्रतिपादनफलं वाग्योगमा, भगवता निसटमात्मीय- श्रवणकोटरप्रविष्टं पायोपशमिकमावपरिणामाविर्मावकारण श्रुतमित्युच्यते, श्रुतमवतमवगतमिति पर्यापा, मपेत्यात्म परामर्शा, आयुरस्यास्तीत्यायुप्मस्तिस्यामन्त्रणं हे आयुष्मन् !, का मेवमाह ?-गौतमः सुधर्मस्वामी था, जंन्- स्वामिनमिति, तेनेति भुवनभर्तुः परामर्शः, भगः समग्रैश्वर्यादिः, सोऽस्यास्तीति भगवान् , तेन भगवता वर्द्धमान- स्वामिनेत्यर्थः, एवमिति प्रकारवचनः शब्दः, आख्यांतमिति केवलज्ञानेनोपलभ्यावेदित, किमत आह-इह खलु षड्जीवनिकायिकानामाध्ययनमस्तीति वाक्यशेषः, इद तु लोके प्रवचने वा, खलु शब्दान्नान्यतीर्थकत प्रवचनेषु षड. जीवनिकायिकेति पूर्ववन्नामेत्यभिधानं अध्ययनमिति पूर्ववदेव, इह च श्रुतं मयेत्यनेनात्मपरामर्शेनैकान्तक्षणमगा- पोहमाह-तत्थंभूतार्थानुपपत्तेरिति, उक्तं च-"एगंतखणियपक्खे गहणं चिय सबहा न अत्याणं । अणुसरणसासणाई कुतो य तेलोग(क)सिद्धाई ? ॥१॥" तथा आयुष्मन्निति च प्रधानगुणनिष्पन्नेनामन्त्रणवचसा गुणवते शिष्यायागमरहस्यं देयं नागुणवते इत्याह, तदनुकंपाप्रवृत्तेरिति, उक्तं च-" आमे घडे निहितं, जहा जलं तं घडं विणासेइ । इय सिद्धतरहस्सं, अप्पाहारं विणासेइ ॥ १॥" आयुश्च प्रधानो गुणः, सति तस्मिन्नव्यवच्छित्तिभावान्, 'तेन भगवता एवमाख्यात'मित्यनेन स्वमनीपिकानिरासाच्छास्त्रपारतंत्र्यप्रदर्शनेन न ह्यसर्वज्ञेनानात्मवतान्यतस्तथाभूतात् सम्यगनिश्चित्य लोके धर्मदेशना कार्ये- त्येतदाह विपर्ययसंभवादिति, उक्तं च-" सावजणवजाणं वयणाणं जो न जाणइ विसेसं । वुत्तुंपि तस्स न खमं किमंग पुण देसणं काउं? ॥ १॥ किं एचो पावयरं सम्म अणहिगयधम्मसमावो । अन्नं कुदेसणाए, कट्टयरागम्मि पाडेइ ॥ २॥ अथवा अन्यथा व्याख्यायते यत्रैकदेश:-आउसंतेणंति. भगवत एव विशेषणं, आयुष्मता भगवता, चिरजीविनेत्यर्थः, मंगलवचनं चैतद्, अथवा जीवता साक्षादेव, अनेन च गणवरपरंपरागमस्य जीवन विमुक्तानादिसिद्धव थापोहमाह- देहायभावेन तथाविधप्रयत्नाभावादिति, उक्तं च-" वयणं न कायजोगाभावे ण य सो अणाइसिद्धस्स । गहणंमि य नो पुढोसत्ता अन्नत्थ सत्यपरिणएणं, वाऊ चित्तमंतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्य सत्य- परिणएणं, वणस्सई चिचमतमक्खाया अणेगजीवा पुढोसत्ता अन्नत्य सस्थपरिणएणं, तंजहा- अग्गवीया, मूलवीया, पोरवीया खंधवीया, बीयरुहा, समुच्छिमा तणलया, वणस्सइकाइया सबीया चित्तमंतमक्खाया अणेगजीया पुढोसचा अन्नत्थ सस्थपरिणएणं। से जे पुण इमे अणेगे बहवे तसा पाणा, तंजहा-अंडया, पोयया, जराउया, रसया, संसेइमा, संमुच्छिमा, उम्भिया, उववाइया, जेसि केसिंचि पाणाणं अभिकंतं, पडिकंत, संकुचियं, पसारियं, रुयं, भंतं, तसियं, पलाइयं, आगइगइविन्नाया जे य कीडपयंगा जाय कुंथुपिपीलिया सव्वे वेइंदिया सव्वे तेइंदिया सम्वे चउरिदिया सवे पंचिंदिया सवे तिरिक्खजोणिया सव्वे नेरइया सव्वे मणुआ सवे पाणा परमाहम्मिआ। एसो खल्लु छट्ठो जीवनिकाओ तसकाउचि पवुच्चइ । सूत्रं १ । 'सुयं मे' इत्यादि, शुयते तदिति श्रुतं-प्रतिविशिष्टार्थप्रतिपादनफलं वाग्योगमात्रं, भगवता निसृष्टमात्मीय- श्रवणकोटरप्रविष्टं धायोपशमिकमारपरिणामारिविकारणं श्रुतमित्युच्यते, श्रुतमवतमवगतमिति पर्यापाः, मयेत्यात्म परामर्शः, आपुरस्पास्तीत्यायुप्मास्तस्यामन्त्रणं हे आयुष्मन् ।, कः कमेवमाह १-गौतमः सुधर्मस्वामी वा, जन्:

कुत इत्याह-अध्ययनं धर्मप्रज्ञप्तिः, "निमित्तकारणहेतुषु सर्वामां प्रायोदर्शन मिति वचनात् , " हेतौ प्रथमा" अध्ययन- त्वाद, अध्यात्मानयनात् चेतसो विशुद्धथापादनादित्यर्थः, एतदेव कुत ?, इत्याह-धर्मप्रज्ञप्तेः प्रज्ञानं प्रज्ञप्तिः धर्मस्य प्रज्ञप्तिः धर्मप्रज्ञप्तिस्ततो धर्मप्रज्ञप्तेः कारणात् चेतसो विशुद्ध्यापादनं, चेतोविशुद्ध्यापादनाच श्रेय आत्मनोऽध्येतुमिति, अन्ये तु व्याचक्षते-अध्ययनं धर्मप्रज्ञप्तिरिति, पूर्वोपन्यस्ताध्ययनस्यैवोपादेयतया अनुवादमात्रमेतदिति । शिष्यः पृच्छति-कतरा खलु इत्यादि सूत्रमुक्तार्थमेव, अनेनैतदर्शयति-विहायाभिमानं संविग्नेन शिष्येण सर्वकार्येष्वेव गुरुः प्रष्टव्य इति । आचार्य आह-इमा खल्वित्यादिमत्रमुक्तार्थमेव, अनेनाप्येतदर्शयति गुणवते शिष्याय गुरुणाऽप्युपदेशो दातव्य एवेति । तंजहा-पुढविकाइया इत्यादि, अत्र तद्यथेत्युदाहरणोपन्यासार्थः, पृथिवी-काठिन्यलक्षणा प्रतीता सैव काय:- शरीरं येषां ते पृथिवीकायाः पृथिवीकाया एव पृथिवीकायिकाः, स्वार्थिक कप्रत्ययः । आपो-द्रयाः प्रतीतास्ता एवं काय:- शरीरं येषां ते अप्काया अप्काया एव अप्कायिकाः, तेज:-उष्णलक्षणं प्रतीतं तदेव काय:-शरीरं येपां ने तेजस्कायाः तेजस्काया एव तेजस्कायिकाः, वायुश्चलनधर्मा प्रतीत एव स एव काय:-शरीरं येषां ते वायुकाया वायुकाया एवं वायु- कायिकाः, वनस्पतिः-लतादिरूपः प्रतीतः स एव कायः-शरीरं येषां ते वनसतिकायाः वनस्पतिकाया एव वनस्पतिकायिकाः, एवं त्रसनशीलानसा प्रतीताः त एत्र कायाः-शरीराणि येषां ते त्रसकायास्त्रमकाया एव त्रसकायिकाः, इह च सर्वभूता- धारत्वात् पृथिव्याः प्रथमं पृथिवीकायिकानामभिधानं, तदनन्तरं तत्प्रतिष्ठितत्वादप्कायिकानां, तदनन्तरमप्रतिपक्षत्वा- तेजस्कायिकानां, तदनन्तरं तेजस उपटम्मकत्वाद् वायुकायिकानां, तदनन्तरं वायोः, शाखाप्रचलनादिगम्यत्वाद् वनस्पति- - हेऊ सत्थं अनागमो का जु?॥१॥" अथवा आपसंतेणंति, गुरुम्लमावसता, अनेन च शिष्येण गुरुपरणसेविना मदा माध्यमित्येतदाह, प्रामादिशद्धिमद्भाशय, उच-" नाणस्म होइ भागी, घिरतरतो दयणे परिते या धना पाव कहाए, गुरुकुलपासं न मुंचति ॥ १ ॥" अथवा आउसंतेणं-आमृत्रता मगवत्पादारविन्दयुगलमुत्तमागेन, अनेन च विनयपति- पत्तेर्गरीयस्त्वमाद, विनयस्य मोक्षम्लत्यात्, उक्तं च-"मूलं संमारस्स उ होति कमाया अणतपतस्म। विणओ ठाणपउनो दुक्खविमुक्खस्स मोक्खस्म ॥१॥" कृतं प्रसंगेन, प्रमुच्यते- अत्र खलु पजीवनिकायिकानामाध्ययनमस्तीत्युक्त, अत्राह-पजीवनिकायिका केन प्रविदिता प्ररूपिता वा? इति उच्यते, तेनैव भगवता, पत आह-समणेणमित्यादि, सा च तेन श्रमणेन-महातपस्विना भगयता-समग्रेश्वर्या- दियुक्तेन महावीरेण-कपायादिशजयान्महापौर, उक्तं घ-"रिदारयति यत्कर्म, वपसा च विराजते । तपोवीण युक्तय, वस्माद्वीर इति स्मृतः ॥ १॥" महावासी वीरव महावीरस्तेन महावीरेण, अग्राह-पजीवनिकापिका फेन प्रविदिता परूपिता वा ?, इति उच्यते, तेनैव भगवता, यत आह-समणेणमित्यादि, काश्यपेनेति काश्यपगोत्रेण प्ररिदिता नान्यतः कृतविदाकर्ण्य ज्ञाता, कि तर्हि ? स्वयमेव केवलालोकन प्रकर्षण विदिता-ज्ञानेत्यर्थः, स्याख्यातेति मदेवमनुष्या- सुराया पर्पदि सुन्नु आख्याता-साख्याता, सुप्रज्ञतेति, यथैवाख्याता तथैव सुम्छ सहमपरिहारासेवनेन प्रोण सम्पमासेवि- तेत्ययः अनेकार्थत्वाद्धातूनां "सपिरासेपनार्थः," तो चैम्भूता पड्जीवनिकायिका श्रेयो मेऽध्येतुमिति, श्रेया-पध्ये हितं, में इति आत्मनिर्देशा, छान्दसत्वासामान्यनारमनिर्देश इत्यन्ये, तश्च श्रेय आरमनोऽध्येतुमिति पठितुं श्रोतुं मावपित, कुंत इत्याह-अध्ययनं धर्मप्रज्ञप्तिः, "निमित्तकारणहेतुषु सर्वामां प्रायोदर्शन मिति वचनात् , " हेतौ प्रथमा" अध्ययन- त्वाद, अध्यात्मानयनात् चेतसो विशुद्धयापादनादित्यर्थः, एतदेव कुत ?, इत्याह-धर्मप्रज्ञप्तेः प्रज्ञपनं प्रज्ञप्तिः धर्मस्य प्रज्ञप्तिः धर्मप्रज्ञप्तिस्ततो धर्मप्रज्ञप्तेः कारणात् चेतसो विशुद्ध्यापादनं, चेतोविशुद्ध्यापादनाच श्रेय आत्मनोऽध्येतुमिति, अन्ये तु व्याचक्षते-अध्ययनं धर्मप्रज्ञप्तिरिति, पूर्वोपन्यस्ताध्ययनस्यैवोपादेयतया अनुवादमात्रमेतदिति । शिष्यः पृच्छति-कतरा खलु इत्यादि सूत्रमुक्तार्थमेव, अनेनैतदर्शयति-विहायाभिमानं संविग्नेन शिष्येण सर्वकार्येष्वेव गुरुः प्रष्टव्य इति । आचार्य आह-इमा खल्वित्यादिसूत्रमुक्तार्थमेव, अनेनाप्येतदर्शयति गुणवते शिष्याय गुरुणाऽप्युपदेशो दातव्य एवेति । तंजहा-पुढविकाइया इत्यादि, अत्र तद्यथेत्युदाहरणोपन्यासार्थः, पृथिवी-काठिन्यलक्षणा प्रतीता सैव कायः- शरीरं येषां ते पृथिवीकायाः पृथिवीकाया एव पृथिवीकायिकाः, स्वार्थिक कप्रत्ययः । आपो-द्रवाः प्रतीतास्ता एव काय:- शरीरं येषां ते अप्काया अप्काया एव अप्कायिकाः, तेज:-उष्णलक्षणं प्रतीतं तदेव कायः-शरीरं येषां ते तेजस्कायाः तेजस्काया एव तेजस्कायिकाः, वायुश्चलनधर्मा प्रतीत एव स एव कायः-शरीरं येषां ते वायुकाया वायुकाया एव वायु- कायिकाः, वनस्पतिः-लतादिरूपः प्रतीतः स एव कायः-शरीरं येषां ते वनस्पतिकायाः वनस्पतिकाया एव वनस्पतिकायिकाः, एवं त्रसनशीलास्त्रसाः प्रतीताः त एव कायाः-शरीराणि येषां ते त्रसकायास्त्रसकाया एव त्रसकायिकाः, इह च सर्वभूता- धारत्वात् पृथिव्याः प्रथमं पृथिवीकायिकानामभिवानं, तदनन्तरं तत्प्रतिष्ठितत्वादकायिकानां, तदनन्तरमप्रतिपक्षत्वा- 'चेजस्कायिकानां, तदनन्तरं तेजस उपष्टम्मकत्वाद् वायुकायिकानां, तदनन्तरं बायोः, शाखाप्रचलनादिगम्यत्वाद् वनस्पति- हेऊ सत्यं अत्तागमो का ? ॥१॥" अथवा आवसंतेणंति, गुरुमूलमाषमता, अनेन च शिष्येण गुरुपरणसविना मदा मान्यमित्येतदाह, ज्ञानादिवृद्धिमद्भावाद्, उक्तं च-" नाणस्म होइ मागी, घिरतरतो दंगणे चरिते य । धन्ना याव म्हाए, गुरुकुलवासं न मुंवंति ।।१।। अथवा आउसंतेण-आमृशता मगवत्पादारविन्दयुगलमुत्तमागेन, अनेन च विनयप्रति पत्तेर्गरीयस्त्वमाह, विनयस्य मोक्षम्लत्याद, उक्तं च--"मूलं संमारस्सउ होंति कमाया अणंतपतस्मा विणो ठाणउत्तो दुक्खविमुक्खस्स मोक्खस्म ॥१॥" कृतं प्रसंगेन, प्रकृतमुच्यते-- अब खलु पजीवनिकायिकानामाध्ययनमस्तीत्युक्त, अत्राह-पड्जीवनिकापिका केन प्रत्रिदिवा प्ररूपिता का? इति उच्यते, तेनैव भगवता, येत आह-समणेणमित्यादि, सा च तेन श्रमणेन-महातपस्विना भगवता-समग्रेवर्या- दियुक्तेन महावीरेण-कपायादिशाजयान्महापीरः उक्तं घ-"विदारयति यत्कर्म, तपमा च विराजते । तपोगीण युक्तथ, तस्माद्वीर इति स्मृतः ॥ १ ॥" महावासो वीरव महावीरस्तेन महावीरेण, अत्राह-पजीवनिकायिका कन प्रविदिता परूपिता वा ?, इति उच्यते, तेनैव भगवता, यत आह-समणेणमित्यादि, काश्यपेनेति काश्यपगोत्रेण प्रविदिता नान्यतः कुतविदाकर्ण्य ज्ञाता, किं तर्हि । स्वयमेव केवलालोकेन प्रकण विदिता-ज्ञावत्या, स्वाख्यातेति सदेवमनुष्या- सुरायां पर्पदि सुष्ठ आख्याता-साख्याता, सुप्रज्ञप्तति, यधवाख्याता तथैव सुख सहमपरिहारासेवनेन प्रोण सम्यगासेवि- तेत्यर्थः अनेकार्थत्वाद्वातूनां "ज्ञपिरासेवनार्यः," तां चैम्भूता पड्जीवनिकायिका श्रेयो मेऽध्येतुमिति, श्रेयः-पध्य हितं, में इति आत्मनिर्देशः, छान्दमत्तात्सामान्यनारमनिर्देश इत्यन्ये, ततय श्रेय आत्मनोऽध्येतुमिति पठितुं श्रोतुं मावयितुं, भवति, यथा कृष्णा मृद् उदकस्य पाण्डुमृदश्च परस्परं स्पर्शगन्धादिभिः, यदा 'कृष्णमृदा कलुपितमुदकं भवति तदाऽसौ कृष्ण- मृदुदकस्य पाण्डुमृदश्च शस्त्रं भवति एवं च परिणतायां पृथिव्यामुच्चारादिकरणेऽपि नास्ति तदतिपात इत्यहिंसकत्योपपत्तेः सम्भवी साधुधर्म इति । एवमापश्चित्तवत्य आख्याताः, तेजश्चित्तवदाख्यातं, वायुश्चित्तवानाख्यातः, वनस्पति श्चित्तवानाख्यातः, इत्याद्यपि 'द्रष्टव्यम् । इदानीं वनस्पतिजीवविशेषप्रतिपादनायाह-' तंजहा अग्गवीया' इत्यादि, तद् यथा उपन्यामार्थः, अग्रं वीज येषां ते अग्रवीजा-कोरण्टकादयः, एवं मूलं वीजं येपा ते मूलवीजा:-उत्पलकन्दादयः, पर्व वीजं येषां ते पर्ववीजा:-इक्ष्वादयः, स्कन्धो वीजं येषां ते स्कन्धबीजा:-शल्लक्यादयः, बीजाद् रोहन्तीति बीज. रुहा:-शाल्यादयः, संमूर्च्छन्तीति संमूर्छिमा:-प्रसिद्धबीजाभावेन पृथिवीवर्षादिसमुद्भवास्ते तथाविधास्तृणादयः, न चैते न संभवन्ति; दग्धभूमावपि संभवात् , तथा तृणलतावनस्पतिकायिका इति, अत्र तृणलताग्रहण स्वगतानेकभेदसंदर्शनार्थ, वनस्पतिकायिकग्रहणं सूक्ष्मवादरायनेकवनस्पतिमेदसग्रहार्थ, एतेन। पृथिव्यादीनामपि - स्वगता भेदाः पृथिवीशर्करादयः, तथाऽवश्यायमिहिकादयः, अङ्गारवालादयः, झञ्झामण्डलिंकादयो भेदाः सूचिता इति सवीजाश्चित्तवन्तः 'आख्याता:'- कथिता' इति । एते ह्यनन्तरोदिता वनस्पतिविशेषाः सवीजा:-स्वस्वनिवन्धनाश्चित्तवन्त:-आत्मवन्त आख्याता:-कथिताः। एते. चानेकजीवा इत्यादि 'ध्रुवगण्डिका पूर्ववत् ॥ इदानीं साधिकार एतदेवाह-' से जे पुण इमे' सेशन्दोऽथशब्दार्थः, असावप्युपन्यासार्थः, "'अथ प्रक्रियाप्रश्नानन्तर्यमङ्गलोपन्यासप्रतिवचनसमुच्चयेष्वि "ति वचनात् , अथ ये पुनरमी-बालारी- नामपि प्रसिद्धा अनेके-द्वीन्द्रियादिभेदेन यहव एकैकस्यां जातौ त्रसा' प्राणिनः त्रस्यन्तीति बसाः, प्राणा-उच्छ्वासादय 4 फायिकाना, तदनन्तर च वनस्पतेखसोपग्राहक्त्वाव प्रसकायिकानामिति । विप्रतिपत्तिनिरामा पुनराह-पुती चित्त मंतमाग्वाया पृथिवी-उक्तलक्षणा चित्त-जीवलक्षणं तदस्या अस्तीति चित्तपती-मनीवेत्या, पाठान्तरं वा 'पुदवी चित्तमत्तमग्याया,' अत्र मात्रशब्दः स्तोकानी यथा “सर्पपत्रिमागमात्र"मिति, ततचित्तमात्रा-स्तोगचित्तेत्य: तथा व प्रपलमोहोदयात् सर्वजपन्यं चैतन्यमै केन्द्रियाणा उदधि द्वीन्द्रियादीनामिति, आख्याता पोन कथिता, ५ घानेकजीवा-अनेके जीवा यस्यां मा अनेकजीवा, न पुनरेकजीमा, पया चैदिकानां "पृथिवी देवते" त्येवमादियननप्रामा ण्यादिति । अनेकजीवापि कैविदेकभूतारमापेक्षेयष्यत एर, पपाहुरेक-"एक एव हि भूतात्मा, भूते भूते व्यवस्थितः । एकधा पहुधा चैर, दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥ १॥" अत आह-पुदो सत्ता-पृथक सामा:-प्राणिनो (प्रात्मानो) यस्या सा पृथक्सश्वा, बगुलासम्म्येयमागमागावगाहनपा पारमार्थिकानेकजीवसमाश्रिदेति मानः आह-पर जोरपिंडरूपा जी ततस्तस्थामचारादिकरणेन नियमतस्तदतिपावादहिंसकत्यानुपपत्तिरित्यसंमवी माधुधर्म इत्याह-अन्यत्र शत्रपरिण. तापा:-अबपरिणतां पृषिक्षी विहायान्या चित्रपाल्पावत्या, अप किं पृथिव्या शत्रं 1,-"दा सस्थग्गिविर्मनेहविल. खारलोगमाईयं । मावो उ दुप्पउत्तो धाया काओ अविरई य ॥१॥ किंची सकायसत्य, किंची परकाय तदुमयं किंची। एप तु दवसत्यं मावे अस्संजमो सत्यं ॥ २॥" घावनवरगनोरखननादिः, एतानि स्वपरव्यापादकत्चारकर्मपन्धनिबन्धनत्वात् सत्रमिति, ता किंचित् सकायलं यथा कृष्णा मन्त्रीलादिमृदा शङ्ख, एवं गन्धरमस्पर्श मेदेऽपि शत्रपोजना कार्या, तपा किंचित् परकायेऽपि परकायशस यथा पृथ्वी अप्नेबाप्रभृतीनामन्तेजाप्रभूतयो या पृथिव्यातदुमयं किंचिदिति किंचिषमयशस्त्रं कृतत्रसभेदानाह-जे य इत्यादि, ये च कीटपतङ्गा इत्यत्र कीटा:-कमयः, "एकग्रहणे तज्जातीयग्रहण"मिति द्वीन्द्रियाः-शंखा- दयोऽपि गृह्यन्ते, पतङ्गाः-शलभाः, अत्रापि पूर्ववच्चतुरिन्द्रिया भ्रमरादयोऽपि गृह्यन्त इति, तथा याश्च कुन्थुपिपीलिका इत्यनेन त्रीन्द्रियाः सर्वे एव गृह्यन्ते, अत एवाह-सर्वे द्वीन्द्रियाः-कृम्यादयः सर्वे त्रीन्द्रियाः-कुन्थ्वादयः, सर्वे चतुरि- न्द्रियाः-पतङ्गादयः, आह-ये च कीटपतङ्गा इत्यादावुद्देशव्यत्ययः किमर्थं ?, उच्यते, "विचित्रा सूत्रगतिरतन्त्रः क्रम" इति ज्ञापनार्थ, सर्वे पञ्चेन्द्रियाः सामान्यतो, विशेषतः पुनः सर्वे तिर्यग्योनयो-गवादयः, सर्वे नारका-रत्नप्रभानारकादि- भेदृभिन्नाः, सर्वे मनुजाः-कर्मभूमिजादयः, सर्वे देवा-भवनवास्यादयः, सर्वशब्दश्चात्र परिशेपभेदानां त्रसत्वख्याप- नार्थः, सर्व एव एते वसाः, न त्वेकेन्द्रिया इव प्रसाः स्थावराश्चेति, उक्तं च-" पृथिव्यम्बुवनस्पतयः स्थावराः, तेजोवायू द्वीन्द्रियादयश्च त्रसाः" (तत्त्वा० अ० २, सू. १३-१४) इति, सर्वे प्राणिनः परमधर्माण इति, सर्वे एते प्राणिनो- द्वीन्द्रियादयः पृथिव्यादयश्च परमधर्माण इति, अत्र परम-सुखं तद्धर्माणः सुखधाणा, सुखाभिलापिण इत्यर्थः, यतश्चैवमतो दुःखोत्पादपरिजिहीर्पया एतेषां पण्णां जीवनिकायानां नैव स्वयं दण्डं समारमेतेतियोगः । पठं जीवनिकायं निगमयन्नाह-एष खलु अनन्तरोदितः कीटादिः, पष्ठोजीवनिकायः' पृथिव्यादिपञ्चकायापेक्षया षष्ठत्वमस्य, त्रसकाय इति प्रोच्यते-प्रकर्षणोच्यते सर्वेरेव तीर्थकरगणधरैरिति । १ । इचेसिं छण्हं जीवनिकायाणं नेव सयं दंडं समारंभिज्जा, नेवन्नेहिं दंडं समारंभाविज्जा, दंड समारंभंतेऽवि अन्ने न समणुजाणेज्जा, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं न एषां विद्यन्त इति प्राणिनः, तद्यथा-अण्डजा इत्यादि, एप ग्बलु पाठो जीवनिकायस्नसकायः प्रोच्यत इति योगा, तत्राण्डाजाता अण्डजा:-पक्षिगृहिकोलिका(किला)दया, पोता एव जायन्ते पोतजाः, ते च हस्तिवल्गुलीचर्मजलौकाप्रभृतयः, जरायुवेष्टिता जायन्त इति जरायुजा:-गोमहिप्यजाविकमनुष्यादयः, रमाजाता रसजा:-तक्रारनालदधितीमनादिषु पायु. कम्पाकवयोऽतिसूक्ष्मा भवन्ति, संस्वेदाआता इति संस्वेदजा:-मत्कुणयकादयः, संमूर्छनाजाताः संमूर्च्छनजा:-बलमपि- पीलिकामक्षिकाशालूरा(कादयः, उन्लेदाअन्म येषां ते उद्भेदजा:-पतङ्गाखञ्जरीटपारिष्ठपादयः, उपपाताजाताः उपपाते भवा उपपातजाः, उपपातेन वामगा औपपातिका-देवा नारकाय, एतेपामेव लक्षणमाह-येपा केपाश्चित् सामान्येनैव प्राणिनां- जीवानामभिकान्तं भवतीति वाक्यशेपः, अभिक्रमणममिक्रान्तं, प्रज्ञापकं प्रत्यभिमुखं क्रमणमित्यर्थः, एवं प्रतिक्रमणं प्रतिफ्रान्त-प्रतापात् प्रतीपं क्रमणमिति मारः, सननं सचितं-गावमोचकरणं, प्रसारणं प्रसारितं-गात्रवि ततकरणं, रसणं मन-शन्दकरण, भ्रमण भ्रान्तमितश्वेतश्च गमनं, मनं त्रस्तं-दुःखोद्वेजनं, पलायनं पलायितं-कृतविनाशनं, तथा आगते:-कृतश्चिातस्य गतेव-कृतचित् कचिदेर, विनाया इति ज्ञातारः । आह-अभिक्रान्तप्रतिक्रान्ताभ्यां नागतिगत्योः कश्चिद्भेद इति, किमर्थ मैदैनामिधानं ?, उच्यते, विज्ञानविशेषख्यापनार्थ, एतदुक्तं भवति-य एवं जानन्ति । यथा वयममिक्रमामः प्रतिक्रमामो वा व एव प्रमाः, न तु वृत्ति प्रत्यमिक्रमणवन्तोऽपि वल्लयादय इति । आह-एवमपि दीद्रियादीनामप्रसवप्रसंगः, अमिक्रमणप्रतिक्रमणमावेऽप्येवंविधज्ञानामावाद ?, नैवदेवं, हेतुसंड्याऽवगवेवुद्धिपूर्वकमेव छायात उष्णमुष्णादा छायां प्रति तेषां अभिक्रमणादिमागाद्, न चैवं पल्लयादीनाममिक्रमणादि, ओघसंत्रया प्रवृत्तेरिति । अधि- F परसाक्षिकी गर्दा-जुगुप्सोच्यते, आत्मानमतीतदण्डकारिणमश्लाघ्यं व्युत्सृजामीति, विविधार्थो विशेपार्थो वा- विशब्दः, उच्छरो भृशार्थः सृजामि-त्यजामि, ततश्च विविधं विशेषेण वा भृशं त्यजामि व्युत्सृजामि, आह- यद्येवमतीतदण्डप्रति- क्रमणमात्रमस्यैदम्पर्य न प्रत्युत्पन्नसंवरणमनागतप्रत्याख्यानं चेति, नैतदेवं, न करोमीत्यादिना तदुभयसिद्धेरिति । २ । अयं चात्मप्रतिप्रत्य) दण्डः, सामान्य विशेषरूप इति, सामान्येनोक्तलक्षण एव; स तु. विशेषतः पञ्चमहाव्रतरूपतया अङ्गीकर्तव्य इति महावतान्याह- पढमे भंते ! महत्वए पाणाइवायाओ. वेरमणं, सवं भंते पाणाइवायं पञ्चक्खामि, से सुहुमं वा बायरं वा, तसं वा थावरं वा, नेव सयं पाणे अइवाएज्जा नेवऽन्नेहि पाणे अइवायाविज्जा, पाणे" अइवायंते वि' अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं न करेमि न कारवमि करतंपिं अन्नं न 'समणुजाणामि तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि! पढमे भंते ! महत्वए उवटुिंओमि सवाओ पाणाइवायाओ वेरमणं. १ ।सू०३। पढमे भंते ! इति; सूत्रक्रमप्रामाण्यात् प्राणातिपातविरमण- प्रथमं तस्मिन् प्रथमे भदन्तेति गुरोरामन्त्रण, महावत' इति, महत्व तव्रतं च महाव्रतं, महत्वमणुव्रतापेक्षया महाव्रते प्राणातिपाताद्विरमणं इति, प्राणा-इन्द्रियादयः, पामतिपातः प्राणातिपातः-जीवस्य महादुःखोत्पादनं, न तु जीवातिपात एव, तस्माद्विरमणं नाम सम्यग्ज्ञानश्रद्धानपूर्वक करेमि न कारवेमि करताप अन्नं न समणुजापामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । सू०२ । 'एतेपो ष्णा जीवनिकायाना'मिति, " सुपांसुपो भवन्ती "ति सप्तम्यर्थे षष्ठी, एतेषु पदसु जीवनिकायेषु अनन्त- रोदितस्वरूपेषु नैव 'स्वयं' आत्मना' 'दषडं' सहनपरितापनादिलक्षणं, समारभेत-प्रवर्तयेत्। तथा नैवान्यैः । प्रेष्यादिभिर्दण्डमुक्तलक्षणः समारंभयेत्-कारयेदित्यथा, दण्ड समारभमाणानप्यन्यान्। प्राणिनो न समनुजान ॥ नीयात्-नानुमोदयेदिवि विधायकं भगवद्वचनं यतथैवमतो यावजीवमित्यादि थावव्युत्सृजामीत्येयमिदं सम्पन प्रतिपद्यतेत्यैदम्पयं, पदार्थस्तु जीवनं जीवो, यावजीव-आप्राणोपरमादित्यर्थः, फिमित्याह-त्रिविधं त्रिविधेनेति तिस्रो- विधा:-विधानानि कृतादिरूपाणि यस्येति त्रिविधो, दण्ड इति गम्यते, तंत्रिविधेन करणेनेति, एतदेयोपन्यस्यति मनसा' चचसा कायेन एतेषां स्वरूप प्रसिद्धमेव, अस्य च करणस्य कर्म उक्तलक्षणो दण्डः, सं वस्तुतो निराकार्यतया सूत्रेणैवो. पन्यस्यबाद, तत्वता न करोमि स्वयं न कारयाम्यन्यः, कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामीति, तस्य भदन्त । । प्रतिकमामि इति तस्येत्यधिकृतो दण्डा, योऽसौ निकालपियो दण्डस्तस्य संरन्धिनमतीतमवपर्य प्रतिक्रमामि, न वर्तमान- मनागतं या, अतीतस्यैव प्रतिक्रमणात् , प्रत्युत्पन्नस्य संवरणाद् अनामवस्य प्रत्याख्यानादिति, मदन्तेति गुरोरामन्त्रण, मदन्त ! भवान्त ! मयान्त ! इति साधारणा श्रुतिः, एतब गुरुसाक्षियेव व्रतप्रतिपतिः साध्वीति झापनार्थ, प्रतिक्रमामीति' भताद्दण्डानिवर्वेऽहमित्युक्तं भवति, तसाच निवृचिर्यचदनुमतेर्निरमणमिति, तथा निन्दामि गरिहामीति आत्मसाक्षिकी निन्दा कोहा वा लोहा वा, भया वा हासा वा, नेव सयं मुसं वएज्जा, नेवन्नहिं मुसं वायाविजा, मुसं वयंतेवि अन्ने न समणुजाणामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं, न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । दोच्चे भंते ! महत्वए उवढिओमि सवाओ मुसावायाओ वेरमणं २ । सू० ४ । 'अहावरे' इति, अथापरस्मिन् द्वितीये भदन्त ! महाव्रते मृषावादाद्विरमणं, सर्वं भदन्त मृपावादं प्रत्या- ख्यामीति पूर्ववत् , तद्यथा-क्रोधाद्वा लोभाद्वा इत्यनेनाद्यन्तग्रहणात् मानमायापरिग्रहः, भयाद्वा हास्याद्वा इत्यनेन प्रेमद्वेपकलहाभ्याख्यानादिपरिग्रहः, नेव सयं सुसं वइज्जत्ति, नैवं स्वयं मृपा वदामि, नैवान्यैर्मृषा वादयामि, मृपा वदतोऽ- प्यन्यान्न समनुजानामीत्येतद् यावजीवमित्यादि च भावार्थमधिकृत्य पूर्ववत् । ४ । उक्तं द्वितीयं महाव्रतं, अधुना तीयमाह- अहावरे तच्चे भंते ! महबए आदिन्नादाणाओ वेरमणं, सवं भंते ! अदिन्नादाणं पञ्चक्खामि, से गामे वा नगरे वा रन्ने वा अप्पं वा बहुं वा अणुं वा थूलं वा चित्तमंतं वा अचित्तमंतं वा, नेव सयं अदिन्नं गिण्हेज्जा नेवन्नेहिं अदिन्नं गेण्हावेज्जा अदिन्नं गिण्हतेऽवि अन्ने न समणुजाणामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं, वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न सर्वथा निवर्तनं, भगवतीक्तमिति वाक्यशेषः, यतश्चैवमत उपादेयमेतदिति विनिश्चित्य 'सर्व मदन्त पाणातिपातं प्रत्याख्यामीति सर्व-निरवशेष, न तु परिस्थूरमेय, भदन्तेति गुमिन्त्रण पाणातिपातमिति पूर्ववत्, प्रत्याख्यामीति- प्रतिशब्दः प्रतिपधे, आडाभिमुख्ये, ख्या प्रकथने, प्रतीपमभिमुख रूपापनं प्राणातिपातस्य करोमि प्रत्याख्यामीति, अथा प्रत्याचक्षे-सवृतात्मा साम्प्रतमनागतप्रतिषेधस्यादरेणाभिधानं करोमीत्यर्थः, अनेन बतार्थपरिज्ञानादिगुणयुक्त उपस्थापनाई इत्येतदाह-उक्त च-" पढिए० ॥ १ ॥” इत्यादि, तदेतद्विशेषेणामिधिरसुराह-से सुगुमं वेत्यादि, मशद्रो मागधदेशीप्रसिद्धः अथशब्दार्थः, म चोपन्यासे, तद्यथा- सूक्ष्म वा यादरं वा त्रसं वा स्थावरं वा, अत्र सूक्ष्मोऽल्पः परिगृयते, न तु सूक्ष्मनामकर्मोदयात् सूक्ष्मः, तस्य कायेन व्यापादनासम्भवात् , बादरोऽपि स्थूरः, स चैकैको द्विधा-त्रमः स्थाररथ, सक्ष्मत्रसः कुन्थ्वादिः, स्थावरो-नस्पत्यादिः, बादरखमो गादिः, स्थावरः पृथिव्यादिः, एतान्, 'नेव सयं पाणे अतिवाएन 'त्ति नै स्वयं प्राणिनो व्यतिपातयामि, नैवान्यैः प्राणिनोऽतिपातयामि, प्राणिनोऽतिपातयतोऽप्य- न्यान्न समनुजानामि यावजीवमित्यादि पूर्ववत् , बतप्रतिप्रचिं निगमयनाइ-प्रथमे भदन्त ! म. उप-सामीप्येन तत्परिणामापच्या स्थितः, इत आरम्य सर्वस्मात्प्राणातिपाताद्विरमणमिति, भदन्त । अनेन चादिमध्यावसानेषु गुरुमना- पृच्छय न किंचित्कर्तव्यं, कृतं च तस्मै निवेदनीयमेवं तदाराधितं भवति, एतदेवाह-सर्वमात्माणातिपाताद्विरमण- मिति, महायते उपस्थितोऽस्मि सर्वस्मात्प्राणातिपाताद्विरमणमिति । ३ । उक्तं च प्रथमं महाव्रतं, इदानी द्वितीयमाह- अहावरे दोच्चे भंते ! महत्वए मुसावायाओ वेरमणं, सवं भंते ! मुसावायं पञ्चक्खामि, से कोहा वा लोहा वा, भया वा हासा वा, नेव सयं मुसं वएज्जा, नेवन्नोहि मुसं वायाविजा, मुसं वयंतेवि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएण, न करेमि न कारवेमि करंतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । दोच्चे भंते ! महत्वए उवढिओमि सबाओ मुसावायाओ वेरमणं २ । सू० ४ । 'अहावरे' इति, अथापरस्मिन् द्वितीये भदन्त ! महाव्रते मृपावादाद्विरमणं, सर्वं भदन्त मृपावादं प्रत्या- ख्यामीति पूर्ववत् , तद्यथा-क्रोधाद्वा लोभाद्वा इत्यनेनाद्यन्तग्रहणात् मानमायापरिग्रहः, भयाद्वा हास्यादा इत्यनेन प्रेमद्वेषकलहाभ्याख्यानादिपरिग्रहः, नेव सयं मुसं वइज्जत्ति, नैव स्वयं मृषा वदामि, नैवान्यैर्मृपा वादयामि, मृपा वदतोऽ- प्यन्यान समनुजानामीत्येतद् यावजीवमित्यादि च भावार्थमधिकृत्य पूर्ववत् । ४ । उक्तं द्वितीयं महाव्रतं, अधुना तृतीयमाह- अहावरे तच्चे भंते ! महत्वए अदिन्नादाणाओ वेरमणं, सवं भंते ! अदिन्नादाणं पञ्चक्खामि, से गामे वा नगरे वा रन्ने वा अप्पं वा बहुं वा अणुं वा थूलं वा चित्तमंतं वा अचित्तमंतं वा, नेव सयं आदिन्नं गिण्हेजा नेवन्नेहिं अदिन्नं गेण्हावेज्जा आदिन्नं गिण्हतेऽवि अन्ने न समणुजाणामि, "ती" निविद्धं तिविहेणं मणेणं, वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न , समणुजाणमि, तस्स भंते'! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं। वोसिरामि । तच्चे भंते !' महवए उवढिओमि सबाओ अदिन्नादाणाओ वेरमण ३। सू० ५' । अथापरस्मिन् तृतीये मदन्त ! महाव्रते अदत्तादानाद्विरमणं, सर्व मदन्त ! अदत्तादानं प्रत्याख्यामीति पूर्वर, तपधा- ग्रामे वा नगरे वा अरण्ये वा इत्यनेन क्षेत्रपरिग्रहः प्रसिद्धान्येतानि, तया अल्प या बहु वा अणु या स्थूलं पा, चित्रा' अचिचवद्वा इत्यनेन तु द्रव्यपरिग्रहः, तत्र अल्पं मूल्यत एरण्डकाष्ठादि पहु-वनादि, अणु-प्रमाणतो वनादि, स्थूलमेरण्ड- काष्ठादि, एतञ्च चित्तयद्वा अचित्तपढेति चेतनाचेतनमित्यर्थः, 'नेव सयं अदिग्नं गेण्हेन'चि, नैव स्वयमदतं गृहामि नैवान्यैरदत्तं ग्राहयामि, अदचं गृहतोऽप्यन्पान्न । समनुजानामीत्येद्यारजीवमित्यादि- च भावार्थमधिकृत्य पूर्ववत् । ५ । उक्तं वतीय, महाव्रतमिदानी चतुर्थमाह- अहावरे चउत्थे भंते ! महयए मेहुणाओ वेरमण, सर्व भंते! मेहुणं पञ्चक्खामि से दिवं वा माणुसंवा तिरिक्खजोणियं वा, नेव सयं मेहुणं सेविजा, नेवन्नेहिं मेहुणं सेवाविजा, मेहुणं सेवतेऽवि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए तिविहं तिविहेण मणेण वायाए कारणं; न करेमि न कारवेमि करतंपि. अन्नं न समणुजाणामि), तस्स भंते. पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणा वोसिरामि। चउत्थे भंते ! महत्वए उवढिओमि सबाओं मेहुणाओं वेरमणं ४ । सू० ६ । अहावरे इत्यादि, अथापरस्मिन् चतुर्थे भदन्त ! महाव्रते मैथुनाविरमणं, सर्व भदन्त ! मैथुनं प्रत्याख्यामीति पूर्ववत् ; तद्यथा-दैवं वा मानुषं वा तैर्यग्योनं वा, अनेन द्रव्यपरिग्रहः, 'नेव सयं मेहुणं सेवेजा' नैव स्वयं मैथुन सेवे, न चान्यैमैथुनं सेवयामि, मैथुन सेवमानानप्यन्यान्न समनुजानामीत्येतद्यावजीवमित्यादि च भावार्थमधिकृत्य पूर्ववत् । ६ । उक्तं चतुर्थे महाव्रतं, इदांनी पञ्चममाह- अहावरे पंचमे भंते ! महत्वएः परिग्गहाओ वेरमणं, सवं भंते ! परिग्गहं पञ्चक्खामि, से. अप्पं वा बहुं वा, अणुं वा थूलं वा, चित्तमंतं वा आचित्तमंतं वा, नेव सयं परिंग्गहं परिगेण्हिज्जा, नेवन्नहि परिग्गहं परिगिण्हाविजा परिंग्गहं परिगिण्हंतेवि अन्ने न संमणुजाणेज्जा; जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेण वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि. अप्पाणं वोसिरामि। पंचमे भंते ! महत्वए उवट्ठि- ओमि सवाओं परिग्गहाओ वेरमणं ५। सू०७ । अहावरे इत्यादि, अथापरस्मिन् पञ्चमे भदन्त ! महावते परिग्रहाद्विरमणं, सर्व भदन्त ! परिग्रहं प्रत्याख्यामीतिः 1 समणुजाणमि, तस्स भते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । तच्चे भंते ! महत्वए उवढिओमि' सबाओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं ३ । सू०५। अथापरस्मिन् तृतीये मदन्त ! महावते अदत्तादानाद्विरमण, सर्व मदन्त ! अदत्तादान प्रत्याख्यामीति पूर्ववत् । तपधा-- ग्रामे वा नगरे वा अरण्ये का इत्यनेम थेत्रपरिग्रह प्रसिद्धान्येतानि, उपा अस्पधा पहु वा अणु वा स्यूल पा, चिता अचित्तवद्वा इत्यनेन तु द्रव्यपरिग्रहः, तत्र अस्प मूल्यत एरण्डाष्ठादि पहु-वनादि, अणु-प्रमाणतो बनादि, स्थूलमेरण्ड- काष्ठादि, एतच चित्तवदा अचित्तववेति वेतनाचेतनमित्यर्थः, 'नेव सयं अदिनं गेहेज 'ति, नैव स्वयमदन गृहामि नैवान्यरदत्तं ग्राहयामि, अदत्तं गृहतोऽप्यन्यान्न समनुजानामीत्येद्यारसीवमित्यादि च भावार्थमधिकृत्य पूर्ववत् । ५ । उक्तं तृतीय, महाव्रतमिदानी चतुर्थमाह- अहावरे चउत्थे। भंते ! महबए मेहुणाओ रमणं, सर्व भंते मेहुणं पञ्चक्खामि से दिवं वा माणुस वा तिरिक्खजोणियं वा, नेव सय मेहुणं सेविजा, नेवन्नेहि मेहुणं सेवाविजा, मेहुर्ण सेवतेऽवि अन्ने न समणुजाणामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेण मणेण वायाए कारण न करेमि' न कारवेमि करतपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भते । पटिकमामिा निंदामि गरिहामि अप्पाणं ! वोसिरामि । चउत्थे भंते ! महबए उवढिओमि सवाओ मेहुणाओं वेरमणं ४ । सूः ६ । अहावरे इत्यादि, अथापरस्मिन् चतुर्थे भदन्त ! महाव्रते मैथुनाविरमणं, सर्व भदन्त ! मैथुनं प्रत्याख्यामीति पूर्ववत् । तद्यथा-दैवं वा मानुषं वा तैर्यग्योनं वा, अनेन द्रव्यपरिग्रहः, 'नेव सयं मेहुणं सेवेज्जा' नैव स्वयं मैथुन सेवे, ना चान्यमैथुन सेवयामि, मैथुन सेवमानानप्यन्यान्न समनुजानामीत्येतद्यावजीवमित्यादि च भावार्थमधिकृत्य पूर्ववत् । ६ । उक्तं चतुर्थं महाव्रतं, इदानीं पञ्चममाह-- अहावरे पंचमे भंते ! महबए परिग्गहाओ वेरमणं, सवं भंते ! परिंग्गहं पच्चक्खामि, से अप्पं वा बहुँ.वा, अणुं वा थूलं वा, चित्तमंतं वा अचिंत्तमंतं वा, नेव सयं परिंग्गहं परिगेण्हिज्जा, नेवन्नेहि परिग्गहं परिगिहाविज्जा परिग्गहं परिगिण्हंतेविं अन्ने न समणुजाणेज्जा; जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेण वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतपि अन्नं न समणुजाणामि,. तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि। पंचमे भंते ! महत्वए उवाट्ठिः ओमि सवाओं परिग्गहाओ वेरमणं ५। सू०७ । अहावरे इत्यादि, अथापरस्मिन् पञ्चमेः भदन्त ! महाव्रते परिग्रहाद्विरमण सर्व मदन्त ! परिग्रहं प्रत्याख्यामीति पूर्ववत्, तद्यथा-अल्पं वेत्यादि अवयवध्याग्ख्याऽपि पूर्ववदेव, 'नेय सयं परिग्गहं परिगेपहेना' नैर स्वयं परिप्रह परिगृहामि, नैवान्यैः परिग्रहं परिग्राहयामि, परिग्रहं परिगृह्णतोऽप्यन्यान ममनुजानामीत्येतद्यावजीवमित्यादि च मावार्थ- मधिकृत्य पूर्ववत् । ७ । उक्त पञ्चमं महाव्रतमधुना पठं बतमाह- अहावरे छटे भंते ! वए राईभोयणाओ वेरमणं, सवं भंते ! राईभोयणं पञ्चक्खामि, से असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा, नेव सयं राई भुजिजा, नेवन्नेहिं राई भुंजाविजा, राई भुंजतेवि अन्ने न समणुजाणामि जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । छठे भंते ! वए उवढिओमि सवाओ राईभोयणाओ वेरमणं ६ । सू० ८ । इच्चेझ्याई पंच महत्वयाई राइभोयणरमणछट्ठाई अत्तहियट्ठयाए उवसंपजित्ताणं विहरामि ।सू०९। अहायरे इत्यादि, अथापरस्मिन् षष्ठे आते रात्रिभोजनाद्विरमण, सर्व मदन्त ! रात्रिमोजनं प्रत्याख्यामीति पूर्ववत्, तयथा-अशनं वा पानं वा खायं वा स्वायं वा, अश्यत इति अशनं-औदनादि, पीयत इति पानं-मुद्वीकापानमित्यादि, खाद्यत इति खाद्य-सर्जूरादि, स्वाधव इति स्वायं-तापूलादि, 'नेव सयं राई मुंजिजा' नैव स्वयं रात्रौ भुजे, नैवान्यै रात्री मोजयामि, रात्री मुआनानप्यन्यान्नैव समनुजानामीत्येतद्यावजीवमित्यादि च भावार्थमधिकृत्य पूर्ववत् । एतच्च - रात्रिभोजनविरमणं प्रथमचरमतीर्थकरतीर्थयोः ऋजुजडवक्रजडपुरुषापेक्षया मूलगुणत्वख्यापनार्थ पंचममहाव्रतोपरि पठितं, मध्यमतीर्थकरतीर्थेषु पुनः ऋजुप्रज्ञपुरुषापेक्षयोत्तरगुणवर्ग इति । ८ । समस्त व्रताभ्युपगमख्यापनायाह-'इचेयाइं पंचमह- व्वयाई' इत्यादि, इत्येतानि अनन्तरोदितानि पञ्च महाव्रतानि रात्रिभोजनविरमणपष्ठानि, किमित्याह-आत्महितार्थे आत्म- हितो-मोक्षस्तदर्थ, अनेनान्याथ तत्त्वतो बताभावमाह तदभिलापानुमत्या हिंसादावनुमत्यादिभावात् , उपसम्पद्य-सामीप्ये- नाङ्गीकृत्यत्रतानि 'विहरामि' सुसाधुविहारेण, तदभावेऽङ्गीकृतानामपि व्रतानामभावात् , दोपाश्च हिंसादिकर्तृणामल्पायु- जिह्वाच्छेददारियपण्डकदुःखितत्वादयो वाच्या इति । ९ । उक्तचारित्रधर्मः, साम्प्रतं यतनाया अवसरः, तथा चाह- से भिक्खू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिया वा राओवा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा, से पुढविं वा भित्तं वा सिलं वा लेलं वा, ससरक्खं वा कायं ससरक्खं वा वत्थं, हत्थेण वा, पाएण वा, कटेण वा, किलिंचेण वा अंगुलियाए वा सिलागाए वा, सिलागहत्थेण वा न आलिहिज्जा, न विलिहिज्जा, न घट्टिज्जा, न भिंदिज्जा, अन्नं न आलिहाविजा, न विलिहाविज्जा, न घटाविजा, न भिंदाविज्जा, अन्नं आलिहंतं वा विलिहंतं वा घट्टतं वा भिदंतं वा न. समणुजाणेज्जा, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । सू० १०॥ से भिक्खू वा इत्यादि, से इति निर्देशे स योऽसौ महाग्रतयुक्तो, मिथुर्वा भिक्षुकी वा'-आरम्मत्यागाधर्मकायपालनाय मिक्षणशीलो भिक्षुः, एवं भिक्षुक्यपि, पुरुषोत्तमो धर्म इति मिथुर्विशेष्यते, तद्विशेषणानि च मिथुक्पा अपि द्रष्टव्यानी- त्याह-सयतविरतप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा' तत्र सामस्त्येन यता संपता-सप्तदशप्रकारसंपमोपेतो विविधमनेकपा द्वादशविधे तपसि रखो पिरतः प्रतिहतप्रत्याख्यानपापकम्मति प्रतिहत-स्थितिहासतो ग्रंथिमेदेन प्रत्याख्यात-हेस्वभावतः पुनर्वसमावेन पाप कर्म-ज्ञानावरणादि येन स तथाविषः, दिया या रानी का एको वा परिषद्गतो वा सुप्तो घा जाग्रद्वा, राम्रो सुप्तो दिवा जाग्रत्, फारणिक एका, शेषकालं परिपद्तः, इदं वक्ष्यमाण न कुर्यात् । ' से पुढवि वा इत्यादि तद्यथा-पृथिवीं वा मित्ति वाशिलो वा लेष्टुर लोप्ट) या, तब पृथिवी-लोयादिरहिता, मितिः-नदीती, शिला- विशाला पापाणः, लेटः(लोटः) प्रमिद्धा, सह रजसा-अरण्यपांशुलक्षणेन वर्तते इति माजस्क या 'काय' कायमिति देहं, मरजस्क' या वस्त्र-पोलपट्टकादि, एकग्रहणात्तातीपग्रहणमिति पात्रादिपरिग्रहः, एतत्किमित्याह-हस्तेन वा पादेन वा काप्टेन या किलिओनं पा-क्षुद्रकाठरूपेण अगुल्या वा शलाकया या-अयशलाकादिरूपया' शलाकाहस्नेन वा-शलाका सपातरूपेण नालिहितेति नालिखे न विलिखेद न पट्टयेन् न मिन्यात, तश्रेषद् सदाऽऽलेखन, निरन्तरमनेकशी वा है विलि(ले)खनं, घट्टनं-चालनं, भेदो-विदारणं, एतत् स्वयं न'कुर्याद, तथाऽन्यमन्येन'वा नालेखयेत्, न घट्टयेन भेदयेत् , तथाऽन्यं स्वत एव आलिखन्तं वा विलिखन्तं वा घट्टयन्तं वा भिन्दन्तं वा न समनुजानीयादित्यादि पूर्ववत् । १० । तथा- से भिक्खू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से उदगं वा ओसं वा हिमं वा महियं वा करगं वा हरतणुगं वा सुद्धोदगं वा उदउल्लं वा कायं उदउल्लं वा वत्थं ससिणिद्धं वा कायं ससिणिद्धं वा वत्थं न आमुसिज्जा न संफुसिज्जा न आवीलिज्जा न पवीलिज्जा न अक्खोडिजा न पक्खोडिज्जा न आयाविज्जा न पयाविज्जा अन्नं न आमुसाविज्जा न संफुसाविज्जा न आवीला- विजा न पवीलाविज्जा न अक्खोडाविज्जा न पक्खोडाविजा न आयाविज्जा न पयाविज्जा अन्नं आमुसंतं वा संफुसंतं वा आवीलंतं वा पवीलंतं वा अक्खोडंतं वा पकखोडंतं वा आयावंतं वा पयावंतं वा न समणुजाणेजा जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणणं वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं ४ न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । सू०१०। से भियर वा इत्यादि से इति निर्देश म योऽसौ महाप्रतयुक्तो, मिनर्वा भिक्षुकी वा'-आरम्भत्यागाधर्मकायपालनाय मिनीलो भिक्षुः, एवं भिक्षुक्यपि, पुरुषोतमो धर्म इति भिक्षुर्विशेष्यते, तद्विशेषणानि च भिक्षुक्या अपि द्रटन्यानी- स्याह-संयतविरतपतिहतमस्याल्यातपापकर्मा' सामस्त्येन पतः संपत:-सप्तदशप्रकारसंयमोपेतो विविधमनेकधा द्वादविध उपसि रतो विरता, प्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मेति, प्रतिहत-स्थितिहामतो ग्रंथिमेदेन प्रत्याख्यात-हेत्वमावत: पुसमावेन पाप कर्म-मानावरणादि येन म तथाविधा, दिया या राम्रो वा एको वा परिषद्गतो या सुप्तो था जाना, रात्री मुप्तो दिवा जाप्रद, कारणिक एका, शेषकाले परिषद्गतः, इदं वक्ष्यमाणं न कुर्यात् । ' से पुढपि घा इस्पादि, तपथा-पृथिवीं वा मित्ति या हिलो वा ले (लोट) वा, तर पृथिवी-लोष्टादिरहिता, मितिः-नदीती, शिला- पिशाला पाणः, लेटः(लोटः) प्रमिदा, मह रजसा-अरण्पपांशुलक्षणेन वर्तते' इति सरजस् या 'कार्य' कायमिति देई, मरजाक या वसं-चोलपकादि, एकग्रहणाचजातीयग्रहणमिति पात्रादिपरिग्रहः, एतक्किमित्याह-हस्तेन या पादेन वा काप्टेन या फिलिओन पा-क्षुद्रकाप्टरूपेण अहुल्या या शलाकया वा-अाशलाकादिरूपया' शलाकाहस्तेन या-शलाका संपातरूपेण नासितिति' मालिग न विलिखे न पट्टयेत् न मिन्यात् , तोपत् सदाऽऽलेखन, निरन्तरमनेकशी वा विलि(ले)खनं, घट्टनं-चालनं, मेदो-विदारणं, एतत् वयं न कुर्याद, तथाऽन्यमन्येन वा नालेखयेत्, न घट्टयेन भेदयेत् , तथाऽन्यं स्वत एव आलिखन्तं वा विलिखन्तं वा घट्टयन्तं वा भिन्दन्तं वा न समनुजानीयादित्यादि पूर्ववत् । १० । तथा- से भिक्खू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से उदगं वा ओसं वा हिमं वा महियं वा करगं वा हरतणुगं वा सुद्धोदगं वा उदउल्लं वा कायं उदउल्लं वा वत्थं ससिणिद्धं वा कार्य ससिणिद्धं वा वत्थं न आमुसिज्जा न संफुसिज्जा न आवीलिज्जा न पवीलिज्जा न अक्खोडिज्जा न पक्खोडिज्जा न आयाविज्जा न पयाविजा अन्नं न आमुसाविजा न संफुसाविज्जा न आवीला- विज्जा न पवीलाविज्जा न अक्खोडाविज्जा न पक्खोडाविज्जा न आयाविजा न पयाविजा अन्नं आमुसंतं वा संफुसंतं वा आवीलंतं वा पवीलंतं वा अक्खोडतं वा पकखोडतं वा आयावंतं वा पयावंतं वा न समणुजाणेजा जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणणं वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नंः न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं ४ न कारवेमि करतपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । सू० १०॥ । सेभिक्खू वा इत्यादि, से इति निर्देशे स योऽसौ महाव्रतयुक्तो, 'मिक्षुर्वा भिक्षुकी वा'-आरम्भत्यागाद्धर्मकायपालनाय मिक्षणशीलो भिक्षुः, एवं भिक्षुक्यपि, पुरुषोचमो धर्म इति मिक्षुपिशेष्यते, तद्विशेषणानि च मिक्षुक्या अपि द्रष्टव्यानी- त्याह-संपतविरतप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा' व सामस्त्येन यतः संपत:-सप्तदशप्रकारसंयमोपेतो"विविधमने कंधा द्वादशविधे तपसि रतो पिरतः, प्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मेति, प्रतिहत-स्थितिहासतो ग्रंथिमेदेन प्रत्याख्यातं हेत्वमावत: पुनर्भक्ष्यमावेन पापं कर्म-ज्ञानावरणादि येन स तथाविधा, दिवा वा रात्रौ वा एको चा परिपगतो या सुसो : योजाग्रद्वा, रात्रौ सुप्तो दिवा जाग्रन्, कारणिक एका, शेषकालं परिपगतः, इदं वक्ष्यमाण न कुर्यात् । 'से पुढवि वा' इत्यादि, तपा-पृथिवीं वा मित्ति वा शिला वा लेष्टु( लोप्ट) वा, तत्र पृथिवी-लोयादिरहिता, मितिः-नदीतटी, शिलान विशाल पापाणः, लेष्टुः लोएर) प्रमिंदा, मह रजसा-अरण्यपांशुलक्षणेन वर्तते इति सरजस्या काय कायमिति: देई, मरजस्क पावलं-चोलपट्टकादि, एकग्रहणातजातीपंग्रहणमिति पात्रादिपरिग्रहा, एतत्किमित्याह-हस्तेन वा पादेन वारकाप्टेन या किलिओन पा-क्षुद्रकाप्टरूपेण अगुल्या या शलाकया वा-याशलाकादिरूपया शलाकाहस्तेन वा-शलाका संघातरूपेण नालिहिवेति नालिखेद न विलिखेत् न पट्टयेत् न मिन्यात् , तत्रेपन सकाऽऽलेखन, निरन्तरमनेशो वा . .

न पक्खोडिज्जा न आयाविज्जा न पयाविज्जा अन्नं न आमुसाविज्जा न संफुसाविज्जा न आवीला- विजा न पवीलाविज्जा न अक्खोडाविज्जा न पक्खोडाविज्जा न आयाविज्जा न पयाविज्जा अन्नं आमुसंतं वा संफुसंतं वा आवीलंतं वा पवीलंतं वा अक्खोडतं वा पकखोडतं वा आयावतं वा पयावंतं वा न समणुजाणेजा जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणणं वायाए कायेणं न करोमि न कारपेमिकरंतपि अन्नं न विलि(ले)खनं, घट्टनं-चालनं, भेदो-विदारणं, एतत् स्वयं न'कुर्यात् , तथाऽन्यमन्येन वा नालेखयेत् , न घट्टयेन्न भेदयेत् , तथाऽन्यं स्वत एव आलिखन्तं वा विलिखन्तं वा घट्टयन्तं वा भिन्दन्तं वा न समनुजानीयादित्यादि पूर्ववत् । १० । तथा- से भिक्खू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से उदगं वा ओसं वा हिमं वा महियं वा करगं वा हरतणुगं वा सुद्धोदगं वा उदउल्लं वा कायं उदउल्लं वा वत्थं ससिणिद्धं वा कार्य ससिणिद्धं वा वत्थं न आमुसिज्जा न संफुसिज्जा न आवीलिजा न पवीलिज्जा न अक्खोडिज्जा समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं Farm कुर्यात्तथा वोसिरामि । सू०११। से भिकर पा इत्यादि पावजागरमाणे चत्ति पविदेव, से उदगं घेत्यादि, तद्यथा-उदकं या अवश्यायं या हिमं वा महिला वा करकं वा हरतनुं वा शुद्धोदकं वा, तत्रोद-शिरापानीयं, अवश्याया-हा, हिमं-स्त्यानोदकं, महिका- धूमरिका, करका-कठिनोदकम्पा, हरतनुसंवमुद्भिद्य तृणाग्रादिपु मति, शुद्धोदक-अन्तरिक्षोदकं, तथोदकाई या कार्य उदकाई वा यज्ञ, उदकाता पेह गलदिन्दतुपाराधनन्तरोदितोदकभेदमन्मियता, तथा मन्निग्धं या कार्य, सस्निग्धं या परां, अग्र स्नेहनं स्निग्धमिति, मह स्निग्धेन वर्चत इति मस्निग्धः, सस्निग्धता चेह पिन्दरहितानन्तरोदितोदकभेदसन्मिश्रता, एतत्रिमित्याह-' नामसेज'नि-नामृषेद् न संस्पृशेन नापीडयेन प्रपीडयेत् नास्फोटयेत् न प्रस्फोटयेत् नानापयेत् न प्रतापयत्, तर महीपना स्पर्शनमामर्पणं अतोऽन्यत्संस्पर्शनं, एव सकदीपदा पीडनमापीडनं अतोऽन्यत्प्रपीडन, एवं मदीपदास्फोटनमाम्फोटनमतोऽन्यत्तस्फोटनं, ए मदीपदा तापनमानापन विपरीत प्रतापनं, एतत् स्वयं न कुर्यात् , नयामन्यमन्येन या नामर्पयेत् न संस्पर्शयेत् नापीडवेत् न प्रपीडयेत् नास्फोटयेत् न प्रस्फोटयेत् नातापयेत् न प्रतापयेत् । तथान्यं सत् एवामपन्तं वा संस्पृशन्तं वा आपीडयन्तं वा प्रपीडयन्तं या आस्फोटयन्ता प्रस्फोटयन्तं वा आतापयन्तं का प्रतापयन्त वा न ममनुबानीयादित्यादि पूसंवत् । ११ । से भिक्खू वा भिक्षुणी या संजयविरयपडिहयपघाखायपावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से अगणिं वा इंगालं वा मुम्मुरं वा अचिं वा जालं वा अलायं वा सुद्धागणिं वा उकं वा न उंजेजा न घटेजा न उज्जालेज्जा न निवावेज्जा अन्नं न उंजावेजा न घडावेजा न उजालावेज्जा न निवावेज्जा अन्नं उंजंतं वा घटुंतं वा उज्जालंतं वा निवावंतं वा न समणुजाणेजा जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । सू० १२। से भिक्खू वा इत्यादि, यावजागरमाणे वत्ति पूर्ववदेव, ‘से अगणिं वा' इत्यादि, तद्यथा-अग्निं वा अङ्गारं वा मुर्मुरं वा अर्चि ज्वालां वा अलातं वा शुद्धाग्निं वा उल्कां वा, इहायस्पिण्डानुगतोऽग्निः, ज्वालारहितोऽङ्गारः, विरलाग्निकणं भस मुर्मुरः, मूलाग्निविच्छिन्ना ज्वाला अर्चिः, प्रतिबद्धा ज्वाला, अलात-उल्मुकं, निरिन्धन:-शुद्धोऽग्निः, उल्का-गगनाग्निः, एतत् किमित्याह-'न उंजिजा' नोसिञ्चयेत्, न घट्टयेत्, नोज्यालायेत् , न निर्वापयेत् , तत्रोञ्जनं- उत्सेचनं, घट्टनं-सजातीयादिना चालनं, उज्वालनं-व्यजनादिमिः वृद्ध्यापादनं, निर्वापणं-विध्यापनं, एतत् स्वयं न कुर्यात्तथाऽन्यमन्येन वा नोत्सेचयेदित्यादि, तथाऽन्यं स्वत उत्सिञ्चयन्तं वा घट्टयन्तं वा उज्यालयन्तं वा निर्वापयन्तं वा योसिरामि । सू० ११ । से भिक्खू वा इत्यादि यावजागरमाणे वत्ति पूर्ववदेव, से उदगं वेत्यादि, तद्यथा-उदकं वा अवश्याय वा हिमं वा महिकां या करकं वा हरतर्नु वा शुद्धोदकं वा, वोदकं-शिरापानीयं, अश्शाया-हा, हिमं-स्त्यानोदकं, महिका- धूमरिका, करका-कठिनोदकरूपा, हरतनु मुद्भिय तृणाग्रादिषु भवति, शुद्धोदक-अन्तरिक्षोदक, तथोदकाद्रं या कार्य उदका वा वस्त्रं, उदकाता चेह गलद्विन्दुतुपाराधनन्तरोदितोदकभेदमन्मिश्रता, तथा सस्निग्धं पा कापं, सस्निग्धं वा उखें, अा स्नेहनं स्निग्धमिति, सह स्निग्धेन वर्तत इति सस्निग्धः, सस्निग्धता पेइ चिन्दरहितानन्तरोदितोदकभेदसन्मियता, रतत्किमित्याह-' नामसेज 'त्ति-नामृपेत् न संस्पृशेत् नापीडयेन प्रपीडयेत् नास्फोटयेत् न प्रस्फोटयेत् नातापयेत् न तापयेत्, तत्र सकीपदा स्पर्शनमामर्पणं अतोऽन्यत्संस्पर्शनं, एव सकरीपदा पीडनमापीडनं अतोऽन्यत्प्रपीडनं, एवं कदीपदास्फोटनमास्फोटनमतोऽन्यत्प्रस्फोटनं, एवं सकतीपदा तापनमातापन विपरीत प्रतापन, एतत् स्वयं न कुर्यात् , थाऽन्यमन्येन वा नामर्पयेत् न संस्पर्शयेत् नापीडयेत् न प्रपीडयेत् नास्फोटयेत् न प्रस्फोटयेत् नातापयेत् न प्रतापयेत् , थाऽन्यं स्वत एवामपन्तं वा संस्पृशन्तं वा आपीडयन्तं वा प्रपीडयन्त वा आस्फोटपन्त चा प्रस्फोटयन्तं वा आतापयन्त प्रतापयन्तं वा न ममनुजानीपादित्यादि पूर्ववत् । ११ । से भिक्खू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिया वा राओ वा एमिः किमित्याह-आत्मनो वा कार्य-स्वदेहमित्यर्थः, बाह्यं वा पुद्गलं-उष्णोदनादि, एतत् किमित्याह-'नं फुमेजा' इत्यादि, न फूत्कुर्यात् न व्यजेत् , तत्र फूत्करणं-मुखेन धमनं, व्यजनं चमरादिना वायुकरणम् , एतत् स्वयं न कुर्यात् , तथाऽन्यमन्येन वा न फूत्कारयेत् न व्याजयेत् , तथाऽन्यं स्वत फुत्कुर्वन्तं वा व्यजन्तं वा न समनुजानीयादित्यादि पूर्ववत् । १३ । से भिक्खूवा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से बीएसु वा बीयपइटेसु वा रूढेसु वा रूढपइट्ठसु वा जाएसु वा जायपइट्टेसु वा हरिएसु वा हरियपइढेसु वा छिन्नेसु वा छिन्नपइटेसु वा सञ्चित्तेसु वा सञ्चित्तकोलपडिनिस्सिएसु वा न गच्छेज्जा न चिट्ठिज्जा न निसीइज्जा न तुहिजा अन्न न गच्छाविजा न चिट्ठाविज्जा न निसीयाविज्जा न तुयहाविज्जा अन्नं गच्छंतं वा चिटुंतं वा निसीयतं वा तुयद्वंतं वा न समणुजाणेजा जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कायेणं न करेमि न कारवेमि करंतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । सू० १४ । से भिक्खू वा 'इत्यादि यावज्जागरमाणे वत्ति पूर्ववदेव, ‘से वीएसु वे 'त्यादि, तद्यथा-चीजेषु चा न समनुजानीयादित्यादि पूर्ववत् । १२ । से मिक्खू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिया वा राओ वा एगओ पा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से सिएण वा विहुणेण वा तालियंटेण वा पत्तेण षा पत्तभंगेण वा साहाए वा साहाभंगेण वा पिहुणेण वा पिहुणहत्येण वा चेलेण वा चेलकन्नेण वा हरयेण वा मुहेण वा अप्पणो वा कायं वाहिरं वावि पोग्गलं न फुमिजा न वीएज्जा अन्नं न कुमाविजा न वीयाविजा अन्नं फुमंतं वा वीयंत वा न समणुजाणेजा जावजीवाए तिविहं तिवि- हेणं मणेणं वायाए कायेणं न करेमि न काखेमि करतंपि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते ! पडिममामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि । सू० १३ । 'मे भिकर पा' इत्यादि यावजागरमाणे वत्ति पूर्ववदेव से सिएण वे 'त्यादि, उद्यथा-सितेन वा विधुवनेन का तालान्तेन वा पत्रेण वा शाखपा वा शाखामट्वेन वा पेहुणेन वा पेहुणहस्तेन या पेलेन वा पेलकर्णेन वा इस्तेन वा पुगेन या, इस मिन-चामरं, विधुवन-यजन, वालपन्त-तदेव मध्यग्रहणच्छिद्रं निपुटं, पत्र-पपिनीपत्रादि, शाखा-प्रवडालं शासामह-तदेखक, पेडणं-मप्रादिपिच्छ, पेडणहस्तका तत्समूहा, येल-पलं, येलकर्ण:-तदेकदेशा, इस्तवन्य-प्रतात, -

पडिलहिय २ पमाजिय २ एगंतमवणेजा नो णं संघायमावज्जेज्जा । सू० १५ ।
सेऽभिक्खू वा इत्यादि यावजागरमाणे वत्ति पूर्ववत्, स कोटं वा पतङ्गं वा कुन्थु वा पिपीलिकां वा, किमित्याह-
हस्ते वा पादे वा बाहो वा ऊरुणि वा उदरे वा शिरसि वा वस्ने वा पात्रे वा रजोहरणे वा कंवले वा गोच्छे वा उन्दके
वा दण्डके वा पीठके वा फलके वा शय्यायां वा संस्तारके वा अन्यतरस्मिन् वा तथाप्रकारे साधुक्रियोपयोगिन्यु
पकरणजाते कीटादिरूपं त्रसं कथञ्चिदापतितं सन्तं संयत एव सन् प्रयत्नेन वा प्रत्युपेक्ष्य प्रत्युपेक्ष्य-पौनःपुन्येन सम्यक् ,
प्रमृज्य प्रमृज्य-पौनःपुन्येनैव सम्यक, किमित्याह-एकान्ते-तस्यानुपघातके स्थाने अपनयेत्-परित्यजेत् , ' नैनं त्रसं
संघातमापादयेत् , नैनं त्रसं संघात-परस्परगात्रसंस्पर्शपीडारूपमापादयेत्-प्रापयेत्, अनेन परितापनादिप्रतिषेध उक्तो
वेदितव्यः, एकग्रहणे तजातीयग्रहणादन्यकारणानुमतिप्रतिषेधश्च, शेपमत्र प्रकटार्थमेव, नवरमुन्दकं-स्थंडिलं, शय्या-
संस्तारिका वसतिर्वा । १५ । इत्युक्ता यतना, गतश्चतुर्थोऽर्थाधिकारः ।
अजयं चरमाणो य(उ), पाणभूयाइं हिंसइ । बंधई पावयं कम्म, तं से होइ कडुयंफलं ॥३२॥
अजयं चिट्ठमाणो य, पाणभूयाइं हिंसइ । बंधई पावयं कम्म, तं से होइ कडुयंफलं ॥ ३३॥
अजयं आसमाणो य, पाणभूया० । बंधई०, तं से० ॥ ३४ ॥
अजयं सयमाणो य, पाण। बंधई०, तं से हो० ॥ ३५॥

से भिक्खू बीजप्रतिष्ठितेषु वा रूढेषु वा रूढप्रतिष्ठितेषु वा जातेषु वा जातप्रतिष्ठितेषु वा हरितेषु वा हरितप्रतिष्ठितेषु वा छिमेषु वा छिमप्रतिष्ठितेषु वा सचित्तेपु वा सचित्तकोलप्रतिनिश्रितेपु वा, इह वीज-शाल्यादि, तत्प्रतिष्ठितमासन(हार)- अपनादि पृयते, एवं मत्र वेदितव्यं, रूढानि-स्फुटितबीजानि, तत्प्रतिष्ठितानि, जातानि-स्तम्बीभूतानि, हरितानि- दुर्वादीनि, छियानि-प्रहरणविशेपपरश्चादिभिक्षात् पृथक स्थापितानि, आण्यपरिणतानि तदङ्गानि गृह्यन्ते सचित्तानि- अण्डकानि कोलो-पुणस्तत्प्रतिनिधितानि-तदुपरिवर्तीनि दा दोनि गृह्यन्ते, एनेषु फिमित्याह-न गच्छेजा-न गच्छेन न तिष्ठेत् न निषीदेत् न त्वग्वयेत् , तत्र गमनमन्यतोऽन्यत्र, स्थानमेकत्रैर, निपीदन-उपवेशनं, त्यवर्तनं-स्वपन, एतत् स्वपं न कुर्यात् , तथाऽन्यमेतेषु न गमयेत् न स्थापयेत् न निपीदयेत् न त्वम्वत्र्तयेत्-न स्थापयेत् , तथान्यं स्वत एव गच्छन्त वा तिष्ठन्त वा निपीदन्तं वा स्वपन्तं वा न समनुजानीयादिति पूर्ववत् । १४ । वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिआ वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से कीडं वा पयंगं वा कुंथु वा पिपीलियं वा हत्यसि वा पायंसि वा वाईसि वा ऊरुसि वा उदरंसि वा सीसंसि वा वत्थंसि वा पडिग्गहसि वा कंबलंसि वा पायपुंछणंसि वा रयहरणंसि वा गोच्छगंसि वा उंडगंसि वा दंडगंसि वा पीढगंसि वा फलगंसि वा सेजंसि वा संथारगसि वा अन्नयरंसि वा तहप्पगारे उवगरणजाए तओ संजयामेव

पडिलेहिय २ पमान्जिय २ एगतमवणेज्जा नो णं संघायमावज्जेज्जा । सू० १५ ।
सेऽभिक्ख् वा इत्यादि यावजागरमाणे वत्ति पूर्ववत्, स कीटं वा पतङ्गं वा कुन्थु वा पिपीलिकां वा, किमित्याह-
हस्ते वा पादे वा वाहो वा ऊरुणि वा उदरे वा शिरसि वा वस्त्रे वा पात्रे वा रजोहरणे वा कंबले वा गोच्छे वा उन्दके
वा दण्डके वा पीठके वा फलके वा शय्यायां वा संस्तारके वा अन्यतरस्मिन् वा तथाप्रकारे साधुक्रियोपयोगिन्यु
पकरणजाते कीटादिरूपं असं कथञ्चिदापतितं सन्तं संयत एव सन् प्रयत्नेन वा प्रत्युपेक्ष्य प्रत्युपेक्ष्य-पौनःपुन्येन सम्यक,
प्रमृज्य प्रमृज्य-पौनःपुन्येनैव सम्यक्, किमित्याह-एकान्ते-तस्यानुपघातके स्थाने अपनयेत्-परित्यजेत् , 'नैनं त्रसं
संघातमापादयेत् , नैनं त्रसं संघात-परस्परगात्रसंस्पर्शपीडारूपमापादयेत्-प्रापयेत्, अनेन परितापनादिप्रतिषेध उक्तो
वेदितव्यः, एकग्रहणे तजातीयग्रहणादन्यकारणानुमतिप्रतिपेधश्च, शेपमत्र प्रकटार्थमेव, नवरमुन्दकं-स्थंडिलं, शय्या-
संस्तारिका वसतिर्वा । १५ । इत्युक्ता यतना, गतश्चतुर्थोऽर्थाधिकारः ।
अजयं चरमाणो य(उ), पाणभूयाइं हिंसइ । बंधई पावयं कम्म, तं से होइ कडुयंफलं ॥३२॥
अजयं चिट्ठमाणो य, पाणभूयाई हिंसइ । बंधई पावयं कम्म, तं से होइ कडुयंफलं ॥३३॥
अजयं आसमाणो य, पाणभूया। बंधई०, तं से० ॥ ३४ ॥
अजयं सयमाणो य, पाण० । बंधई०, तं से हो० ॥ ३५ ॥

बीजप्रतिष्टिनेषु वा रूढेपु पा रूप्रतिष्ठितेषु वा जातेपु मा जातप्रतिष्ठितेपु वा हरितेषु वा हरितप्रतिष्ठितेषु पा छिनषु वा छिनप्रतिष्ठितेषु वा सचिनेषु । मचित्तकोलप्रतिनिश्रितेपु या, इह पीज-शाल्यादि, तत्प्रतिष्ठितमासन(हार). शयनादि पद्यते, एप मात्र वेदितव्यं, रूढानि-स्फुटितबीजानि, तत्प्रतिष्ठितानि, जातानि-स्तम्बीभूतानि, हरितानि- दादानि, छिनानि-ग्रहरणपिशेपपरचादिभिक्षात् पृथक स्थापितानि, आर्द्राण्यपरिणतानि तदङ्गानि गृह्यन्ते मचित्तानि- अण्डकानि कोला-घुणस्तत्प्रतिनिश्रितानि-तदुपरिवर्तीनि दार्वादीनि गृह्यन्ते, एतेषु किमित्याह-न गच्छेझा-न गच्छेन् न तिष्ठेन् न निपीदत् न त्ववित्तयेत् , तत्र गमनमन्यतोऽन्यत्र, स्थानमेकौर, निपीदन-उपवेशनं, त्यापर्तनं-सपनं, एतत् वय न कुर्यात् , तथाऽन्यमेतपु न गमयत् न स्थापयेत् न निपीदयेत् न त्यपर्तयेव-न सापयेत् , तथान्यं स्वत एव गच्छन्न वा तिष्ठन्त पानिपोदन्त या स्वपन्तं वा न समनुजानीयादिति पूर्ववत् । १४ । मे भिरपू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चक्खायपावकम्मे दिआ वा राओ वा एगओ वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा से कीडं वा पयंगं वा कुंथु वा पिपीलियं वा हत्थंसि वा पायंसि वा बाहुँसि वा ऊरुसि वा उदरंसि वा सीसंसि वा वत्थंसि वा पडिग्गहसि वा कंवलंसि वा पायपुंछणसि वा रयहरणंसि वा गोच्छगसि वा उंडगसि वा दंडगंसि वा पीढगंसि वा फलगंसि वा सेजसि वा संथारगसि वा अन्नयरसि वा तहप्पगारे उवगरणजाए तओ संजयामेर

पडिलेहिय २ पमाजिय २ एगंतमवणेजा नो णं संघायमावज्जेज्जा । सू० १५ ।
सेऽभिक्खू वा इत्यादि यावजागरमाणे वत्ति पूर्ववत्, स कीटं वा पतङ्ग वा कुन्थु वा पिपीलिकां वा, किमित्याह-
हस्ते वा पादे वा बाहौ वा ऊरुणि वा उदरे वा शिरसि वा वस्त्रे वा पात्रे वा रजोहरणे वा कंवले वा गोच्छे वा उन्दके
वा दण्डके वा पीठके ना फलके वा शय्यायां वा संस्तारके वा अन्यतरस्मिन् वा तथाप्रकारे साधुक्रियोपयोगिन्यु
पकरणजाते कीटादिरूपं त्रसं कथञ्चिदापतितं सन्त संयत एव सन् प्रयत्नेन वा प्रत्युपेक्ष्य प्रत्युपेक्ष्य-पौनःपुन्येन सम्यक् ,
प्रमृज्य प्रमृज्य-पौनःपुन्येनैव सम्यक, किमित्याह-एकान्ते-तस्यानुपघातके स्थाने अपनयेत-परित्यजेत् , 'नैनं त्रसं
संघातमापादयेत् , नैनं त्रसं संघात-परस्परगात्रसंस्पर्शपीडारूपमापादयेत्-प्रापयेत्, अनेन परितापनादिप्रतिषेध उक्तो
वेदितव्यः, एकग्रहणे तजातीयग्रहणादन्यकारणानुमतिप्रतिषेधश्च, शेपमत्र प्रकटार्थमेव, नवरमुन्दकं-स्थंडिलं, शय्या-
संस्तारिका वसतिर्वा । १५ । इत्युक्ता यतना, गतश्चतुर्थोऽर्थाधिकारः ।
अजयं चरमाणो य(उ), पाणभूयाइं हिंसइ । बंधई पावयं कम्म, तं से होइ कडुयंफलं ॥३२॥
अजयं चिट्ठमाणो य, पाणभूयाइं हिंसइ । बंधई पावयं कम्म,
से होइ कडुयंफलं ॥ ३३ ॥
अजयं आसमाणो य, पाणभूया०। बंधई०, तं से० ॥ ३४ ॥
अजयं सयमाणो य, पाण० । बंधई०, तं से हो० ॥ ३५ ॥

। अजयं भुंजमाणो य, पाणभू० । बंधई०, तं से० ॥ ३६ ।। अजय भासमाणो य, पाणभू० । बंधई०, तं से० ॥ ३७ ॥ कहं चरे ? कहं चिट्टे?, कहमासे ? कहं सए ? । कहं भुजंतो भासंतो, पावं कम्मं न बंधइ ? ॥ ३८ ॥ जयं चरे जयं चिट्टे, जयमासे जयं सए । जयं भुजंतो भासंतो, पावं कम्मं न वंधइ ॥ ३९ ॥ सबभूयप्पभूयस्स, सम्मं भूयाई पासओ । पिहियासवस्स दंतस्स, पावं कम्मं न बंधइ ॥ ४० ॥ मांप्रत उपदेशारख्या पश्चम उच्यते-अजयमित्यादि अयतं चरनयतं गच्छन्-इर्यासमितिमुलंध्य, किमित्याइ-प्राणि । भूतानि हिनस्ति', प्राणिनो-दीन्द्रियादयो भूतानि-एकेन्द्रियास्तानि हिनस्ति-प्रमादानाभोगाम्यां व्यापादयतीतिमायः, तानि च हिंमन् 'पघ्नाति पापं कर्म' अकुशलपरिणामादादत्त क्लिष्ट ज्ञानावरणीयादि. 'तत् से भवति कटुकफलं' तत्-पाईं फर्म, से तस्यायतचारिणो मवति, कटुकफलमिति अनुस्वारोऽलामणिका अशुभफलं भवति, मोहादिहेतुतया विषाकदारुण मित्यर्थः ॥ ३२ ॥ एवमयतं तिष्ठन् ऊर्ध्वस्थानेनासमाहितो इस्तपादादि विक्षिपन् , शेपं पूर्ववत् ॥ ३३ ॥ एवमयतमासीनो- निषण्णतयाऽनुपयुक्त आकृचनादिभावेन, शेष पवित् ।। ३४ ॥ एवमयतं सपन्-असमाहितो दिवा प्रामशरपादिना(या)। शेष पूर्ववत् ॥ ३५ ॥ एवमयत मुआनो-निष्प्रयोजन प्रणीत काकशृगालमधितादिना(वा), शेष पूर्ववत् ॥३६॥ एवमयत भाषमाणो, गृहस्थमापया निमन्तरमापादिना(वा), शेषं पूर्ववत् ॥ २७॥ बाह-ययेवं पापकर्मपन्धस्ततः 'कहं चरे' इत्यादि कथं केन प्रकारेण चरेव ?, कथं तिष्ठेव ?, कथमासीत !, कथं स्वपेव १, कथं भुञ्जानो मापमाणः पाप कर्म न बध्नातीति ? ॥ ३८ ॥ आचार्य आह-'जयं चरे' इत्यादि, यत-चरेत् सूत्रोपदेशेन ईर्यादिममितः, यतः तिष्ठेव समाहिती हस्तपादाद्यविक्षेपेण, यतमासीत उपयुक्तमाकुश्चनाधकरणेन, यतं स्वपेत्-समाहितो रात्रौ प्रकामशय्यादिपरिहारेण, या सुञ्जानः-सप्रयोजनमप्रणीतं प्रतरसिंहभक्षितादिना, एवं यतं भापमाणः साधुभाषया मृदु कालप्राप्तं च, पापं कर्म-क्लिष्टं अकुशलानुबन्धि ज्ञानावरणादि न बध्नाति-नादत्ते, निराश्रवत्वाद्विहितानुष्ठानपरत्वादिति ॥ ३९ ॥ किं च-सव्व- भूय' इत्यादि, सर्वभूतेप्यात्मभूता-सर्वभूतात्मभूतो य आत्मवत् सर्वभूतानि पश्यतीत्यर्थः, तस्यैवं सम्यग्-वीतरागोक्तेन विधिना भूतानि-पृथिव्यादीनि पश्यतः सतः पिहिताश्रवस्य-स्थगितप्राणातिपाताद्याश्रवस्य दान्तस्य-इन्द्रियनोइन्द्रियदमेन पापं कर्म न बधाति, तस्य पापकर्मवन्धो न भवतीत्यर्थः ।। ४० ।। एवं सति सर्वभूतदयावतः पापकर्मबन्धो न भवति, ततश्च सर्वात्मना दयायामेव यतितव्यं, अलं ज्ञानाम्यासेनापि( नेति ) मा भूदव्युत्पनविनेयमतिविभ्रमः इति तदपोहायाह- पढमं नाणं तओ दया, एवं चिट्ठइ सवसंजए। अन्नाणी किं काही?, किंवा नाही छेयपावगं? ॥४१॥ सुच्चा जाणइ कल्लाणं, सुच्चा जाणइ पावगं । उभयपि जाणइ सुच्चा, जं छेयं तं समायरे ॥४२॥ जो जीवेवि न याणेइ, अजीवेवि न याणेइ। जीवाजीवे अयाणतो, कह सो नाहीइ संयमं? ॥४३॥ जो जीववि बियाणेइ, अजीवे.वि वियाणेइ । जीवाजीवे. वियाणतो, सो हु नाहीइ संयमं ॥४४॥ --

'पढम नाणमिति, प्रथम-आदौ ज्ञान-जीवस्वरूपसंरक्षणोपायफलविषयं 'तता तथाविधज्ञानममनन्तरं दया-संयमा,
तदेकान्तोपादेयतया मावतस्तत्प्रवृत्तेः, एवं-अनेन प्रकारेण मानपूर्वकक्रियाप्रतिपत्तिरूपेण तिष्ठति-आस्ते, मर्वसंयतः-
सर्वप्रबजितः, यः पुनरज्ञानी-साध्योपायफलपरिज्ञानविकलः म किं करिष्यति ?, मत्रान्धतुल्यत्वात् प्रवृत्तिनिवृत्तिः ।
निमिचामावात् , किंवा कुर्वन् ज्ञास्यति छेकं-निपुणं हित कालोचितं, पापकं वा-अतो विपरीतमिति, उतच तत्करणं
मावतोऽकरणमेव, समग्रनिमित्तामात् , अन्धप्रदीप्तपलायनघुणाक्षरकरणवत्, अत एवान्यत्राप्युक्तं-"गीवत्थो य
विहारो० ॥१॥" इत्यादि, अतो ज्ञानाम्यासः कार्यः ॥ ४१ ॥ तथा चाह-'सुच्चा०' इति श्रुत्वा-आकर्ण्य तत्साधन-
स्वरूपविपाक जानाति-युद्धरते कल्याणं-कल्यो-मोक्षस्तमणति-नयतीति कल्याण-दयाख्यं संयमस्वरूपं, श्रुत्वा
जानाति पापं-पापकर्म असंयमस्वरूपं, उभयमपि-संयमासंयमस्वरूपं श्रावकोपयोगि जानाति श्रुत्वा, नाश्रुत्वा,
यतवैवमत इत्यं विनाय यच्छेक-निपुणं हितं कालोचितं, तत् समाचरेत्-तत्कुर्यादित्यर्थः ॥ ४२ ॥ उक्तमेवार्थ
स्पष्टपन्नाह-'जो जीये 'त्यादि, यो जीवानपि पृथिवीकायिकादिभेदभिन्नान् न जानाति 'अजीवानपि ' संयमो.
पघातिनो मयहिरण्यादीन् न जानाति, एवं जीवाजीवानजानन् कथमसौ ज्ञास्यति संयमं? तद्विपयं वद्विपया-
ज्ञानादिति भावः ॥४३॥ ततश्च 'जो जीवे' त्यादि, यो जीवानपि विजानाति अजीवानपि विजानाति,
जीवाजीयान् विजानन् स एव ज्ञास्यति संयममिति ॥४४॥ प्रतिपादितः पञ्चम उपदेशार्थाधिकारः ।
जया जीवमजीवे अ, दोऽवि एए विआणइ । तया गई बहुविहं, सव्वजीवाण जाणइ ॥ ४५ ॥

जया गइ बहुविहं, सबजीवाण जाणइ । तया पुन्नं च पावं च, बंध मुक्वं च जाणइ ॥ ४६ ॥
जया पुन्नं च पावं च, बंधं मुक्खं च जाणइ। तया निविदए भोए, जे दिव्वे जे य माणुसे॥४७॥
जया निविंदए भोए, जे दिवे जे य माणुसे । तया चयइ संजोगं, सभितरवाहिरं ॥४८॥
जया चयइ संयोगं, सब्भितरवाहिरं । तया मुंडे भवित्ता णं, पवइए अणगारियं ॥ ४९ ॥
जया मुंडे भवित्ता णं, पवइए अणगारियं । तया संवरमुकिलु, धम्मं फासे अणुत्तरं ॥ ५० ॥
जया संवरमुकिलु, धम्मं फासे अणुत्तरं । तया धुणइ कम्मरयं, अबोहिकलुसंकडं ॥ ५१ ॥
जया धुणइ कम्मरयं, अबोहिकलसंकडं। तया सवत्तगं नाणं, दंसणं चाभिगच्छइ ॥ ५२ ।।
जया सवत्तगं नाणं, दंसणं चाभिगच्छइ । तया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केवली ॥ ५३ ॥
जया लोगमलोगं च, जिणो जाणइ केवली। तया जोगे निलंभित्ता, सेलेसिं पडिवज्जइ ॥ ५४॥
जया जोगे निलंभित्ता, सेलेसिं पडिवज्जइ ।तया कम्म खवित्ता णं, सिद्धिं गच्छइ नीरओ ॥ ५५॥
जया कम्म खवित्ता णं, सिद्धिं गच्छइ नीरओ। तया लोगमत्थयत्थो, सिद्धो हवइ सासओ॥ ५६ ॥

साम्प्रतं धर्मफलमाह-'जया 'इत्यादि यदा-यस्मिन् काले जीवान् अजीवांश्च द्वावप्पेतो विजानाति-विविध जानाति तदा-तस्मिन् काले गति-नरमगत्यादिरूपां पहुविधां-स्वपरमतभेदनानेकप्रकारां तां सर्यजीवानां जानाति यथावस्थितजीवाजीरपरिज्ञानमन्तरेण गतिपरिज्ञानामावात् ॥ ४५ ॥ उत्तरोत्तरी फलपृद्धिमाह-यदा गतिं पहुविधां स्वपर- गतभेदेनानेकप्रकार सर्वजीयानां जानाति. तदा पुण्यं च पापं घ-पविधगतिनियन्धनं, तथा पन्ध-जीपफर्मयोग- सुखदुःखलक्षणं, मोक्षं-तद्वियोगस्वरूपावस्थानलक्षणं जानाति ॥४६|| 'जया'इत्यादि, यदा पुण्यं च पापंप पन्धं मोक्षं च जानाति तदा निर्विन्ते-मोहामावात् सम्यविचारपत्यसारदुःखरूपतया भोगान्-शन्दादीन् यान् दिव्यान यांश्च मानुपान्, शेपास्तु वस्तुतो भोगा एय न भवन्ति ॥ ४७ ।। 'जया' इत्यादि, यदा निर्यिन्ते भोगान् यान् दिव्यान् यांश्च मानुपान् तदा त्यजति संयोग-संपन्ध, द्रव्यतो भावतः साभ्यन्तरयाह्य-क्रोधादिहिरण्यादिमम्बन्धमित्यर्थः ॥१८। 'जया' इत्यादि, यदा त्यजति संयोगं साभ्यन्तरयाधं तदा मुण्डो भूत्वा द्रव्यतो भारतश्च प्रव्रजति-प्राण बजत्यपवर्ग प्रत्यनगार द्रव्यतो भावतश्चाविद्यमानागारमितिभावः ।। ४९ ॥ 'जया' इत्यादि, यदा मुण्डो भूत्वा प्रमजस्य. नगारितां तदा संघरमुफिट्ठति प्राकृतशैल्या उत्कृष्टमंवर धर्म-मर्वप्राणातिपानादिविनिवृत्तिरूपं चारित्रधर्ममित्यर्थी, स्पृश त्यनुत्तर-सम्यगासेत इत्यर्थः ॥ ५० ॥ 'जया' इत्यादि, यदोत्कृष्टसवरं धर्म स्पृशत्यनुतरं तदा धुनोति-अनेकार्थ. तया पातयति कर्मरजः-कमैवात्मरञ्जनाद्रज ब रजः, किंविशिष्टमित्याह-अवोधिकलुपत अयोधिकलुपेण मिध्याटि नोपात्तमित्यर्थः ॥ ५१ ॥ 'जया' इत्यादि, यदा धुनोति कर्मरजः अबोषिकलपकवं तदा सर्वत्रगं ज्ञानं अशेष परिपयं . दर्शनं चाशेपदृश्यविषयम् अधिगच्छत्यावरणाभावादाधिक्येन प्राप्नोतीत्यर्थः ॥५२॥ 'जया' इत्यादि, यदा सर्वत्रगं ज्ञानं दर्शनं चाधिगच्छति तदा लोकं-चतुर्दशरज्वात्मकं अलोकं चानन्तं जिनो जानाति केवली, लोकालोको च सर्व नान्यतर- मेवेत्यर्थः ॥ ५३ ॥ 'जया' इत्यादि, यदा लोकमलोकं च जिनो जानाति केवली तदोचितसमयेन योगान् निरुद्धथ मनो- योगादीन् शैलेशी प्रतिपद्यते, भवोपग्राहिकाँशक्षयाय ॥ ५४ ।। 'जया' इत्यादि, यदा योगानिरुद्धय शैलेशी प्रति. IN पद्यते भवोपग्राहिकाँशक्षयाय, तदा कर्म क्षपयित्वा भवोपग्राह्यपि सिद्धिं गच्छति लोकान्तक्षेत्ररूपां नीरजा:-सकल कर्मरजोविप्रमुक्तः ॥ ५५ ॥ 'जया' इत्यादि,-यदा कर्म क्षपयित्वा सिद्धिं गच्छति नीरजास्तदा लोकमस्तकस्थः त्रैलोक्यो. परिवर्ती सिद्धो भवति 'शाश्वतः कर्मवीजाभावात् अनुत्पचिधर्मेति भावः ॥ ५६ ॥ उक्तो धर्मफलाख्यः षष्ठोऽधिकारः। सुहसायगस्स समणस्स, सायाउलगस्स निगामसाइस्स । उच्छोलणापहोअस्स, दुलहा सुगई तारिसगस्स ॥ ५७ ॥ तवोगुणपहाणस्स, उज्जुमइ खंतिसंयमरयस्त । परीसहे जिणंतस्स, सुलहा सुगई तारिसगस्स ॥ ५८ ॥ पंच्छावि ते पयाया, खिप्पं गच्छति अमरभवणाइं। १ नैषा गाथा विवृता । in- जेसि पिओ तवो संजमो य, खंती अचंभचेरं च ॥ (प्र०१)। इच्चेयं छजीवाणयं, सम्मदिठ्ठी सया जए । दुल्लहं लभित्तु सामन्नं, कम्मुणा न विराहिज्जासि ॥ ५९॥ तिमि इति छज्जीवणियाताम चउत्थं अज्झयणं समत्तं ॥४॥ साम्प्रतमिदं धर्मफलं यस्य दुर्लभं तमभिधित्सुराह-'सुहसायगस्से'त्ति मुखास्वादकस्य-अभिष्वङ्गेण प्राप्तसुखोपभोक्तः श्रमणस्य-द्रव्यमवजितस्य सावाकुलस्य माविसुखार्थ व्याक्षिप्तचित्तम्प निकामशायिनः-पुत्रार्थवेलामप्युल्लंध्य शयानस्योच्छो. लनाप्रधाविनः उच्छोलनयोदकायतनया प्रकर्पण धावति-पादादिशुद्धिं करोति यः स तथाविधस्वस्य, किमित्याह-दुर्लभा- दुष्प्रापा सुगति:-सिद्धिपदपर्यवसाना तादृशस्य भगवदाज्ञालोपकारिण इति गाथार्थः ॥५४॥ इदानीं धर्मफलं यस्य सुलभ तमाह-'तवोगुण' इत्यादि, तपोगुणप्रधानस्य-पष्ठाटमादितपोगुण(धन)वतः प्राजुमतेर्मार्गप्रत्तबुद्धेः क्षान्तिसंयम- रतस्प-क्षान्तिप्रधानसयमासेविन इत्यर्थः। परीपहान्-क्षुत्पिपासादीन् जयतः-अभिभवतः सुलभा सुगति:-उक्तलक्षणा तादृशस्य भगवदाज्ञाकारिण इति गाथार्थः ।। ५८॥ महार्या पड्जीवनिकायिकेति विधिनोपसंहरबाह-'इच्छेय' मित्यादि, इत्येतां पड्जीवनिकायिकामधिकताम्ययनप्रतिपादितार्थरूपां न विराधयेदितियोगः । सम्यग्दृष्टि:-जीवस्तवनद्धानवान् । सदा यतः-सर्वकालं प्रयत्नपरः सन्, किमित्याह-'दुर्लभ लम्वा श्रामण्यं ' दुष्प्राप्यं प्राप्य श्रमणभावं-पट्जीव- 5:45 निकायसंरक्षणैकरूपं कर्मणा मनोवाकायक्रियया प्रमादेन न विराधयेत्-न खण्डयेत् , अप्रमत्तस्य तु द्रव्यविराधना यद्यपि कथंचिद्भवति, तथाप्यसावविराधक एवेत्यर्थः । एतेन " जले जीवाः, स्थले जीवा, आकाशे जीवमालिनि । जीव- मालाकुले लोके, कथं भिक्षुरहिंसकः ? ॥१॥" इत्येतत्प्रत्युक्तं, तथा सूक्ष्माणां विराधनाभावाच ।। ५९ ॥ ब्रवीमि इति पूर्ववत् ॥ व्याख्यातं षड्जीवनिकायाध्ययनम् । इति चतुर्थ, षड्जीवनिकायाध्ययनं समाप्तम् ४ ॥ अधुना पिण्डैषणाख्यमारभ्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययने साधोराचारः पड्जीवनिकायगोचरः प्रायः इत्येतदुक्तं, । इह तु धर्मकाये स्वस्थे सति असौ सम्यक् पाल्यते, स चाहारमन्तरेण प्रायः स्वस्थो न भवति, स च सावद्येतर- भेद इत्यनवद्यो ग्राह्य इत्येतदुच्यते, उक्तं च-" से संजए समक्खाए, निरवजाहारि जे विऊ । धम्मकायट्ठिए सम्म, सुहजोगाण साहए ॥ १॥" इत्यनेनाभिसम्बन्धेनायातमिदमध्ययनमिति, तचेदं- संपत्ते भिक्खकालमि, असंभंतो अमुच्छिओ। इमेण कमजोगेण, भत्तपाणं गवेसए ॥ ६० ॥ से गामे वा नगरे वा, गोयरग्गगओ मुणी। चरे मंदमणुविग्गो, अबक्खित्तेण चेयसा ॥६१ ॥ 'संपत्ते'-गाहा, सम्प्राप्ते-शोभनेन प्रकारेण स्वाध्यायकरणादिना प्राप्तेःभिक्षाकाले-भिक्षासमये, अनेनासम्प्राप्ते भक्त- पानैपणाप्रतिषेधमाह । अलाभाचाखण्डनास्यां दृष्टादृष्टविरोधात् ,, असम्भ्रान्तः-अनाकुलो यथावदुपयोगादि कृत्वा, नान्यथे-

| त्यर्थः । अमूञ्छिता-पिण्डे शब्दादिपु वा अगृद्धो, विहितानुष्ठानमितिकत्वा, न तु पिण्डादावेवासक्त इति । अनेन वक्ष्य-
माणलक्षणेन क्रमयोगेन परिपाटीव्यापारेण भक्तपानं यतियोग्यमोदनारनालादि गवेपयेदिति-अन्वेषयेदिति सूत्रार्थः ।
॥६० ॥ यत्र यथा गवेपयेत्तदाह-'से गामे'त्यादि, स इत्यसम्भ्रान्तोऽमूञ्छितो ग्रामे वा नगरे घा, उपलक्षणत्वात्
कटादौ वा गोचराग्रगत इति गोरिव चरणं गोचरः-उत्तममध्यमाधमकुलेवरक्तद्विष्टस्य भिक्षाटनमग्र:-प्रधानोऽभ्याहृता.
धाकर्मादिपरित्यागेन तद्गतः-तद्वर्ती मुनि:-मावसाधुः चरेत्-गच्छेत् मन्दं-शनैःशनैर्न द्रुतमित्यर्थः । अनुद्विग्ना-प्रशान्ता
परीपहादिभ्योऽविम्यत् अव्याक्षिप्तेन घेतसा-अन्तःकरणेन एपणोपयुक्तेनेति स्त्रार्थः ॥ ६१ ॥
पुरओ जुगमायाए, पेहमाणो महिं चरे। वजंतो वीयहरियाई, पाणे अ दगमट्टियं ॥ ६२ ॥
ओवायं विसमं खाणुं, विजलं परिवजए । संकमेण न गच्छिज्जा, विजमाणे परकमे ॥ ६३ ॥
पवडते व से तत्थ, पक्खलते व संजए। हिंसेज पाणभूयाई, तसे अदुव थावरे ॥ ६४ ॥
तम्हा तेण न गच्छिज्जा, संजए सुसमाहिए। सइ अन्नेण मग्गेण, जयमेव परकमे ॥६५॥
इंगालं छारियं रासिं, तुसरासिं च गोमयं । ससरक्खेहिं पाएहि, संजओ तं नइक्कमे ॥ ६६ ॥
न चरेज वासे वासंते, महिआए वा पडंतिए। महावाए व वायंते, तिरिच्छसंपाइमेसु वा ॥१७॥

यथा चरेत्तथैवाह-'पुरओ जुग'त्ति पुरतो-अग्रतो युगमात्रया-शरीरप्रमाणया शकटोर्द्धिसंस्थितया दृष्टयेति वाक्य- शेपः । प्रेक्षमाणा-प्रकर्पण पश्यन् महीं-भुवं चरेद्-यायात्, न शेषदिगुपयोगेनेति गम्यते । न प्रेक्षमाण एव, अपि तु वर्जयन्-परिहरन् वीजहरितानि, अनेनानेकभेदस्य वनस्पतेः परिहारमाह । तथा प्राणिनो-द्वीन्द्रियादींस्तथोदकं- अप्कायं मृत्तिकां च-पृथिवीकायं, चशब्दात्तेजोवायुपरिग्रहः ।। ६२ ॥ उक्तः संयमविराधनापरिहारः । अधुनाऽऽत्मसंयम. विराधनापरिहारमाह-ओवाय'मिति, अवपातं-गर्तादिरूपं, विपमं-निम्नोन्नतं, स्थाणु-ऊर्चकाष्ठं, विजलं-विगतजलं कर्दमं परिवर्जयेत्-एतत् सर्व परिहरेत् , तथा सङ्कमेण-जलग परिहाराय पापाणकाठरचितेन न गच्छेतू , आत्मसंयम. विराधनासम्भवात् । अपवादमाह-विद्यमाने पराक्रमे-अन्यमार्ग इत्यर्थः । असति तु तस्मिन् प्रयोजनमाश्रित्य यतनया गच्छेदिति सूत्रार्थः ॥६३।। अवपातादौ दोपमाह-'पवडते व' इति, प्रपतन् वाऽसौ तत्र अवपातादौ प्रस्खलन् वा संयत:- साधुः हिंस्याद्-व्यापादयेत्, प्राणिभूतानि प्राणिनो-द्वीन्द्रियादयः, भूतानि-एकेन्द्रियाः, एतदेवाह-वसानथवा स्थावरान् , प्रपातेनात्मानं चेत्येवमुभयविराधनेति ॥ ६४ ॥ यतश्चैवं 'तम्हा' इति, तस्मात् तेन-अवपातादिमार्गेण न गच्छेत्संयतः सुसमाहितो, भगवदाज्ञावर्तीत्यर्थः । सत्यन्येनेति, अन्यस्मिन् समादौ, मार्गेणेति मार्गे छान्दसत्वात् सप्तम्यर्थे तृतीया, असति त्वन्यस्मिन् मार्गे तेनैवावपातादिना यतमेव पराक्रमेत्, यतमिति क्रियाविशेषणं, यतमात्मसंयम- विराधनापरिहारेण यायादिति ॥६५॥ अत्रैव विशेषतः पृथ्वीकाययतनामाह-'इंगालं'ति आङ्गारमित्यनाराणामय मा. ङ्गारस्तमागारं राशि, एवं क्षारराशिं तुषराशिं च गोमयराशिं च, राशिशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । सरजस्काभ्यां पन्यां-मपित्तपृथिवीरजोगुण्डिताम्यां पादाम्यां संयतः साधुस्तमनन्तरोदितं गतिं नातिक्रमेत्, मा भृत् पृथ्वीरजो, विराधनेति ॥ ६६ ।। अत्रैवाप्कायादियतनामाह-'न चरेन'त्ति न चरेद्व वर्षति, मिक्षार्थ प्रविष्टो वर्षणे तु प्रच्छन्ने तिष्ठेत् । तथा महिकायां चा पतन्त्यां, सा च प्रायो गर्भमासेषु पतति, महायाते वा वाति सति, तदुत्सावरजोविरा- धनादोपाल, तिर्यक संपतन्तीति तिर्यसंपाता:-पतगादयः तेषु वा सत्सु, कचिदप्यशनिरूपेण न चरेदिति ।। ६७ ॥ न चरिज वेससामंते, बंभचेरवसाणु(ण)ए। बंभयारिस्स दंतस्स, हुज्जा तत्थ विसुत्तिआ ॥ ६ ॥ अणायणे चरंतस्स, संसग्गीए अभिक्खणं । हुज वयाणं पीला, सामन्नंमि अ संसओ ॥ ६९ ॥ तम्हा एयं वियाणित्ता, दोसं दुग्गइववणं। वजए वेससामंतं, मुणी एगंतमस्सिए ॥ ७० ॥ उक्ता प्रथमवतयतना। सांप्रतं चतुर्थववयतनोच्यते-'न चरिले 'ति 'न चरेद्वेश्यासामन्ते' न गच्छेद् गणिका- गृहममीपे, किंविशिष्ट इत्याह-ब्रह्मचर्यवशानयने (नये) ब्रह्मचर्य-मैथुनविरतिरूपं वशमानयति-आत्मायतं करोति दर्शनाक्षेपादिनेति मनचर्यवशानयनं तस्मिन् , दोपमाह-व्रामचारिणः साधोः, 'दान्तस्य' इन्द्रियनोइन्द्रियदमाभ्यां भवेत् 'तत्र' वेश्यासामन्ते 'विश्नोतसिका' तद्रूपसंदर्शन स्मरणेनापध्यानफचवरनिरोधतो मानश्रद्धाजलोज्झनेन संयमशस्यशोषणफला चित्तविक्रियेति ॥६८॥ एप मकचरणदोपो वेश्यामामन्तसङ्गत उक्तः। साम्प्रतमिहान्यन चासचरण- दोपमाह-'अणायणे 'त्ति अनायतने-अस्थाने वेश्यासामन्तादौ चरतो गच्छता, संसर्गेण सम्बन्धेनाभीक्ष्णं-पुनः .

पुनः, किमित्याह-भवेद् व्रतानां--प्राणातिपातविरत्यादीनां पीडा, तदाक्षिप्तचेतसो भावविराधना भवति, श्रामण्ये च श्रमणभावे च द्रव्यतो रजोहरणादिसंधारणरूपे भूयो भावव्रतप्रधानहेतौ संशयः, कदाचिदुनिष्कामत्येवेत्यर्थः। तथा च वृद्धसंप्रदाय:-"वेसादिगयभावस्स मेहुणं पीडिअइ, अणुवओगेण एसणाऽरक्खणे(करणे) य हिंसा, पडुप्पायणे अन्नपुच्छण- अवलवणासचवयणं अणनुन्नायनेसाइदसणे अदत्तादाणं, ममत्तकरणे परिग्गहो, एवं सवनयपीडा, दवसामन्ने पुण' संसओ उन्निक्खमणेणत्ति" सूत्रार्थः ॥ ६९ ॥ निगमय नाह-'तम्हे'त्ति, यस्मादेवं तस्मादेतद्विज्ञाय दोषमनन्तरोदितं दुर्गतिवर्धनं वर्जयेद्वेश्यासामन्त, सुनिरेकान्तं मोक्षमार्गमाश्रित इति ।। ७०. ॥ आह-प्रथमव्रतविराधनानन्तरं चतुर्थवतविराधनोप- न्यासः किमर्थ ?, उच्यते-प्राधान्यख्यापनार्थ, अन्यव्रतविराधनाहेतुत्वेन प्राधान्यं, तच्च लेशतो दर्शितमेवेति । अत्रैव विशेषमाह- साणं सूइयं गावं(वि), दित्तं गोणं हयं गयं । संडिब्भं कलहं जुझं, दूरओ परिवज्जए ॥ ७१ ॥ अणुन्नए नावणए, अप्पहिढे अणाउले । इंदियाणि जहाभागं, दमइत्ता मुणी चरे ॥७२॥ दवदवस्त न गच्छिज्जा,भासमाणो अ गोयरे। हसंतो नाभिगाच्छज्जा,कुलं उच्चावयं सया ॥७३॥ आलोयं थिग्गलं दारं, संधि दग़भवणाणि य । चरंतो न विनिज्झाए, संकट्ठाणं विवजए ॥७४॥ रन्नो गिहबईणं च, रहस्लारक्खियाण य । संकिलेसकर ठाणं, दूरओ परिवज्जए ॥ ७५॥ 8 زعا पडिकुटकुलं न पविसे, मामगं परिवजए । अचियत्तकुलं न पविसे, चियत्तं पविसे कुलं ॥७६ ॥ साणीपावारपिहियं, अप्पणा नावपंगुरे। कवाडं नो पणुल्लिज्जा, उग्गहसि अजाइया ॥७७॥ 'साणं "ति श्वानं लोकप्रतीतं, सूतां गां-अभिनवप्रभूतां, दृप्त-दर्षित, किमित्याह-गोणं हयं गज, गौः-चलीवर्दी, हया-अधा, गजो-हस्ती, तथा 'संडिम्भ' पालक्रीडास्थान, कलह-सवाक्प्रतिवद्धं, युद्ध-खड्गादिभिः, एतद्दूरतो- रेण परिवर्जयेत्, आत्मसंयमविराधनासम्मवात् , वस्तगोप्रभृतिम्य आत्मनिराधना, डिम्भस्थाने वन्दनाद्यागमनपतन. मण्डनप्रलुठनादिना संयमविराधना, सर्वत्र चात्मपात्रभेदादिनोमयविराधनेति सूत्रार्थः ॥ ७१ ॥ अत्रैव विधिमाह- • अणुनए 'त्ति अनुन्नतो-द्रव्यतो मावतश्व, द्रव्यतो नाकाशदर्शी मावतो न जात्याघभिमानवान् , नावनतो-द्रव्यभावा- भ्यामेव, द्रव्यानवनतोऽनीचकायो मावानवनतोऽलब्ध्यादिनाऽदीना, अमहट:-प्रहमन् , अनाकुल:-क्रोधादिरहितः, इन्द्रियाणि-स्पर्शनादीनि, यथाभाग-ययाविषयं, दमयित्वा-इटानिष्टेषु स्पर्शादिषु रागद्वेपरहितो मुनि:-साधुश्चरेत्- गच्छेत् , विपर्यये तु-प्रभूतदोपप्रसद्गाद, तथाहि-द्रव्योन्नतो लोकहास्यो, भावोन्नत ईयाँ न रक्षति, द्रव्यापनतो यक इति सम्भाव्यते, मावावनतः क्षुद्रमच इति, प्रहृष्टो योपिदर्शनाद्रक्त इति लक्ष्यते, आकुल एवमेव, अदान्तः प्रव्रज्या नाईति ॥ ७२ ॥ किं प-'दयदयस्सति द्रुतं द्रुतं-सरितमित्यर्थः, न गच्छेद् भापमाणो वा गोचरे न गच्छेत् , तथा हमसाभिगच्छेत्, कुलमुच्चावचं सदा, उच्च-द्रव्यमाश्मेदाद् द्विविधं-द्रव्योचं धवलगृहवासि, भावोचं जात्यादियुक्तं, एवमवचमपि द्रव्यतः कुटीरकवासि, भावतो जात्यादिहीनमिति। दोपा उमयविराधनालोकोपघातादय इति ॥७३॥ अत्रैव विधि- माह-'आलोयं थिग्गल'मिति, आ(अव)लोकं-निर्युहकादिरूपं, थिग्गलं-चितं द्वारादि, संधि-चितं क्षत्रं, उदकभव. नानि-पानीयगृहाणि चरन् मिक्षार्थ न विनिज्झाइत्ति-विनिध्यायेत्-विशेषेण पश्येत् , शङ्कास्थानमेतदवलोकादि, अतो विवर्जयेत्, तथा च नष्टादौ तत्राशङ्कोपजायत इति ॥ ७४ ॥ किं च-"रनो गिहे'त्यादि राज्ञा-चक्रवादेः, गृहपतीनां-श्रेष्ठिप्रभृतीनां रहस्यस्थानानि वर्जयेदिति योगः। आरक्षकाणां च-दण्डनायकादीनां, रहास्थान-गुडा- पवरकमन्त्रगृहादि सङ्क्लेशकरं-असदिच्छाप्रवृत्त्या मन्त्रभेदे वा कर्षणादिनेति दूरतः परिवर्जयेदिति ॥ ७५ ॥ 'पडि. कुट्टकुलं 'ति, प्रतिकुष्टकुलं द्विविधं-इत्वरं यावत्कथिकं च, इत्वरं सूतकयुक्तं, यावत्कथिकं-अभोज्यं एतन्न प्रविशेद , शासन- लघुत्वप्रसङ्गात् । मामकं यत्राह गृहपतिर्मा मम कश्चिद् गृहमागच्छेद , एतत् वर्जयेत् मण्डनादिप्रसङ्गात् । अचिअ- त्तकुलं-अप्रीतिकुलं यत्र प्रविशद्भिः साधुभिरप्रीतिरुत्पद्यते, न च निवारयन्ति कुतथिनिमित्तान्तरात् , एतदपि न प्रविशेत् , तत्सक्लेशनिमित्तत्वप्रसङ्गात् । चियत्तंति एतद्विपरीतं अचिअत्तविपरीतं प्रविशेत् कुलं, तदनुग्रहप्रसङ्गादिति ॥ ७६ ॥ किंच-'साणीपावारपिहिय'मिति शाणी-अतसीवल्कजा पटी, प्रावारः-प्रतीतः, कम्बलायुपलक्षणमेतत् , एवमादिभिः पिहित-स्थगितं, गृहमिति वाक्यशेषः । आत्मना-स्वयं, नापवृणुयात्-नोद्घाटयेदित्यर्थः । अलौकिक- त्वेन तदन्तर्गतभुजिक्रियादिकारिणां प्रद्वेषप्रसङ्गात् । तथा कपाटं द्वारस्थगनं न प्रेरयेत्-नोद्घाटयेत् पूर्वोक्तदोपग्रसङ्गात्, किमविशेषतो ? नेत्याह-अवग्रहमयाचित्वा-आगाढप्रयोजनेऽननुज्ञाप्यावगह-विधिना धर्मलाभमकृत्वेति ।। ७७ ॥ - गोयरग्गपविट्ठो अ, वच्चमुत्तं न धारए । ओगासं फासुअं नचा, अणुन्नविअ वोसिरे ॥७॥ विधिशेषमाह-'गोपरग्ग 'ति-गोचरामप्रविष्टस्तु वर्ची मूत्रं पा न धारयेत्, अवकाशं प्रानुकं ज्ञात्वा- अनुज्ञाप्य व्युत्गृजेविति। अस्य पिपयो वृद्धमम्प्रदायादवसेया, स नायं-"पुवमेव साहुणा सन्नाकाइयोरओगं फाऊण गोपरे पविमिययं, कहिंचि(वि)न कओ कए या पुणो होगा गाहे यशमुत्तं न धारेयचं, जो मुत्तनिरोहे चासुपाओ हवा, यद्यनिरोहे य जीविओपाओ, अयोहणा अ आयविराहणा, जओ भगियं-"सहत्य संजमं संजमाउ अप्पाणमा रक्सिजा। पुषा अध्यायाओ पुणो विसोही न याविरई ॥१॥" ( ओघनि० ४७) अओ संघाडि(उ)यस सयभायणाणि समपिय पडिस्मए पाणयं गहाय समाभूमीए विहिणा योसिरेजा," वित्थरओ जहा ओहनिज्जुत्तीए ॥ ७८ ॥ णीअदुवारं तमसं, फुट्ठगं परिवजए । अचक्खुविसओ जरथ, पाणा दुप्पडिलेहंगा ॥७९॥ जत्य पुप्फाई चीयाई, विप्पइन्नाई कुट्ठए । अहुणोवलितं उल्लं, दणं परिवजए एलगं दारगं साणं, वच्छगं वावि कुट्ठए । उल्टुधिआ न पविसे, विउहिताण व संजए ॥ ८१॥ पहा 'नीयदुपारं 'ति नीयद्वार-नीपनिर्गमप्रवेशं, तमसमिति-नगोवन्त कोष्ठक-अपवरक परियर्जयेत् , न सत्र मिक्षा परिगृह्णीयान, सामान्यापेक्षया, म एवंविधो भवतीत्याह-अचक्षुर्विषयो यन, न पापो व्यापारी पत्रेत्यर्थः । अत्र दोपमाह-माणिनो दुष्प्रत्युप्रेक्षणीया भवन्ति, ईशुदिन भवतीति प्रार्थः ॥ ७९ ॥ किंच-'जस्धे 'ति, पत्र पुष्पाणि-जातिपुष्पादीनि, बीजानि-शालिवीजादीनि; विप्रकीर्णानि-अनेकधा- विक्षिप्तानि परिहर्तुमशक्यानीत्यर्थः । कोष्ठके कोष्ठकद्वारे वा, तथाऽधुनोपलिप्त-साम्प्रतोपलिप्त, आर्द्रकं-अशुष्कं, कोष्ठकमन्यद्वा दृष्ट्वा परिवर्जयेत्, दूरत एव, न तु तत्र धर्मलाभं कुर्यात् , संयमात्मविराधनापत्तेरिति ।। ८० ॥ किंच-' एलगं 'ति, एडकं-मेपं, दारक-चालं, श्वानं-मण्डलं, वत्सकं वापि-क्षुद्रवृपभलक्षणं कोष्ठके उल्लङ्घ्य पद्भ्याम् न प्रविशेत् , व्यूह्य वा-प्रेर्य वेत्यर्थः । संयता-साधुः, आत्मसंयमविराधनादोपालाघवाचेति ॥ ८१ ॥ असंसत्तं पलोइज्जा, नाइदूरा बलोअए । उप्फुल्लं न. विनिज़्झाए, निअहिज्ज अयंपिरो ॥ ८२ ॥ अइभूमिं न गच्छेज्जा, गोअरग्गगओ मुणी। कुलस्स भूमि जाणित्ता, मिश्र भूमि परकमे ।। ८३ ॥ तत्थेव पडिलोहज्जा, भूमिभागं विअक्खणो। सिणाणस्स य बच्चस्स,संलोगं परिवज्जए ॥८४ ॥ दगमडिअआयाणे, बीआणि हरिआणि अ। परिवज्जतो चिट्ठिज्जा, सबिदिअसमाहिए ।। ८५ ॥ इहैव विशेषमाह-'असंसत्तं 'ति असंसक्तं प्रलोकयेत्न योपिद्दष्टेदृष्टिं मीलयेदित्यर्थः, रागोत्पत्तिलोकोपघातदोषात् । तथा 'नातिदूरं प्रलोकयेत्' दायकस्यागमनमात्रदेशं प्रलोकयेत् , परतचौरादिशङ्कादोपः। तथोडलं-विकसितलोचनं न निज्झाए इति-न निरीक्षेत, गृहपरिच्छदमप्यदृष्टकल्याण इति लाययोत्पत्तेः। तथा निवर्तेत गृहादलब्धेऽपि सति, अज़ल्पन्-दीनवचनमनुचारयनिति ॥. ८२ ॥ तथा. 'अइभूमि. ने ति अतिभूमि न गच्छेदू,. अननुज्ञातां गृहस्थैः, - यथान्ये भिक्षाचरा न यान्तीत्यर्थः । गोचराग्रगतो मुनिः, अनेनान्यदा तद्गमनासम्ममाह-किंतर्हि १ कुलस्य भूमि- उत्तमादिरूपामास्था ज्ञात्वा मितां भूमि तैरनुजाता पराक्रमेत्, यत्रपामग्रीतिर्न जायत इति ।। ८३ ॥ विधिशेषमाह- 'तत्थेव'चि तत्रैव-तस्यामेव मितायां भूमौ प्रत्युपेक्षेत स्त्रोक्तेन विधिना भूमिभाग-उचितं भूमिप्रदेश, विचक्षणो- विद्वान् , अनेन केवलागीतार्थस्य मिक्षाटनप्रतिषेधमाह । तत्र च तिष्ठन् स्नानस्य तथा वर्चसः-विष्ठायाः संलोकं परिवर्जयेद्, एतदुक्तं भवति-स्नानभूमिकायिकादिभूमिसंदर्शनं परिहरेत् , प्राचनलापरप्रसगाव, अप्राप्तस्त्रीदर्शनाच । रागादिमावादिति ॥ ८४ ॥ किंच-'दग'त्ति उदकमृत्तिकादानं-आदीयतेऽनेनेत्यादानो-मार्गः, उदकमृत्तिकान- पनमार्गमित्यर्थः । यीजानि-शारयादीनि 'हरितानि च' दादीनि, चशन्दादन्यानि च सचेतनानि परिवर्जयन्, तिष्ठदनन्तरोदिते देशे सर्वेन्द्रियसमाहिता, शब्दादिभिरण्या(नाक्षिात इति ॥ ८५ ॥ तत्थ से चिट्ठमाणस्स, आहरे पाणभोअणं । अकप्पिन गेण्हिज्जा, पडिगाहिज कप्पिरं ॥८६॥ आहारती सिआ तत्थ, पडिसाडिज भोअणं । दितिअंपडिआइक्वे, न मेकप्पइ तारिसं ॥ ८७॥ संमद्दमाणी पाणाणि, वीआणि हरिआणि य । असंजमकरि नच्चा, तारिसिं परिवजए ॥ ८८ ॥ 'तत्थ से 'त्ति, तत्र कुलोचितया भूमौ से-तस्य साधोस्तिष्ठतः सतः, आहरेदू-आनयेत् पानभोजनं, गृहीति गम्यते । तत्राय विधि:-अकल्पिक-अनेपणीयं न गृहीपात्, प्रतिगृह्णीयात् फल्पिक-एपणीयं, एवधार्षापममपि कल्पिकग्रहणं, द्रव्यतः शोभनमशोभनमपि एतदविशेषेण ग्राथमिति दर्शनार्थ साक्षादुक्तमिति ॥ ८६ ॥ 'आहरंति चि, आहरन्ती-आनयन्ती भिक्षामगारीति गम्यते, स्यात्तत्र कदाचित्तदेकदेशं परिशादयेत्-इतश्चेतक विक्षिपेत् भोजन वा पानं वा, ततः किमित्याह-ददतीं प्रत्याचक्षीत-प्रतिधयेत् । तामगारी, लियो हि प्रायो मिक्षा ददतीति नीग्रहणं, कथं प्रत्याचक्षीतेत्याह-न मे-मम कल्पते तादृशं परिशाटनावद, समयोक्तदोपप्रसजगत् , दोपांच भावं ज्ञात्वा कथयेत् मधु- विन्दूदाहरणादिनेति ॥ ८७ ॥ किंच-'सम्महे'ति, संमईयन्ती पद्भ्याम् समाझामन्ती, कानित्याह-माणिनो- द्वीन्द्रियादीन्, बीजानि-शालिवीजादीनि, हरितानि-दुर्वादीनि, असंयमकरी-साधुनिमित्तमसंयमकरणशीला ज्ञात्वा तादृशीं परिवर्जयेत्, ददतीं प्रत्याचक्षीतेति ॥ ८८ ॥ साहड्डु निक्खिवित्ता णं, सचित्तं घट्टिआणि अ । तहेव समणट्ठाए, उदगं संपणुलिआ ॥ ८९ ॥ ओगाहइत्ता चलइत्ता, आहरे पाणभोअणं। दिति पडिआइक्खे, न मे कप्पड़ तारिसं ॥ १० ॥ पुरेकम्मेण हत्थेण, दबीए भाअणेण वा। दिति पडिआइक्खे, न मे कप्पड़ तारिसं ॥ ९१ ॥ एवं उदउल्ले ससिणिद्धे, ससरक्खे महिआउसे । हरिआले हिंगुलए, मणोसिला अंजणे लोणे॥ गेरुअवन्निअसेडिअसोरद्विअपिटुकुक्कुसकए. य । उक्किट्ठमसंसद्धे, संसढे चेव योद्धव्ये ॥ ९३ ।।

साइटुचि, संहृत्यायस्मिन् माजने ददाति, "वं फासुगमवि क्जर, वस्थ फासुए फासुयं साहरह, फासुए अफासुयं साहर, यफासुए फासुयं साहरइ, अफासए अफामुपं माइरह ४, तत्य ज फासुए फासुयं साहरइ, तत्थवि थेवे थे। साहरइ, थेवे बहुं साहरइ, बहुए थे साहरह, बहुए पहुयं साहरइ ४" एवमादि यथा पिण्डनियुक्तौ । तथा निक्षिप्य भाजन- गतमदेयं पद्जीवनिकायिकेषु ददाति तथा सचित्तं-अलातपुप्पादि घयित्वा-संचाल्य च ददाति । तथैव श्रमणार्थ- प्रजितनिमितमुदकं संप्रणय माजनस्थं प्रेर्य ददाति ॥ ८९|| तथा ओगाहइत्ता-अवगाह-उदकमेवात्मनोऽभि. मुखमाछप्प ददाति । तथा चालयित्वा उदकमेव ददाति, उदके नियमादनन्तवनस्पतिरिति प्राधान्यख्यापनार्थ सचित्र पदायित्वेत्युक्तेऽपि मेदेनोपादानं अस्ति चायं न्याया-"यदुत सामान्यग्रहणेऽपि प्राधान्यख्यापनार्थ भेदेनोपादानं, यथा- मामणा आयाता वशिष्टोऽप्याया" इति, वतश्योदकं चालयित्वा आहरेद् आनीय दद्यादित्यर्थः । किं तदित्याह-पानभोजनं- ओदनारनालादि । तदित्यम्भूतां ददती प्रत्याचक्षीत-निराकुर्यात् न मम कल्पते तादृशमिति पूर्ववदेवेति सूत्रद्वयार्थः ॥१०॥ 'पुरेकम्मे 'ति, पुरः कर्मणा हस्तेन-साधुनिमित्तं प्राकृतजलोज्झनव्यापारेण, तथा दा-डोर- सदृशया, माजनेन वा-कांस्यमाजनादिना ददती प्रत्याचक्षीत-प्रतिषेधयेत्, न मम कल्पते तादृशमिति पूर्ववदेव इति स्वार्थः ॥ ९१ ॥ एवं, एवं-उदकाट्टैण, इस्तेन-करेण, उदकाद्रों नाम गलदुदकविन्दुयुक्तः । एवं सस्निग्धेन इस्तेन, सस्निग्धो नाम ईपदुदकयुक्तः, एवं सरजस्केन इस्तेन-सरजस्को नाम पृथिवीरजोगुण्डिता । एवं मृद्गतेन इस्तेन, मृद्गतो नाम कई मयुक्ताा एवं उपादिपपि योज्यं । एतावन्त्येव एतानि स्त्राणि नवरमूपा-पांशुक्षारः, हरिताल- हिगुलकमनःशिला-पार्थिवाः वर्णकभेदाः, अञ्जनं-रसाजनादि, लवणं-सामुद्रादि ॥ ९२ ॥ तथा 'गेरुयत्ति, गैरु(रि)को धातुः, वर्णिका पीतमृत्तिका, सेटिका-खटिका, श्वेतिका-शुक्लमृत्तिका, सौराष्ट्रिका-तुपरिका, पिष्टं-आम- तण्डुलक्षोदा, कुक्कुसार-प्रतीता, कृतेनेत्येभिः कृतेन, हस्तेनेति गम्यते । तथा उत्कृष्ट इत्युत्कृष्टशब्देन कालिङ्गालावुत्रपुप- फलादीनां शस्त्रकृतानि श्लक्ष्णखण्डानि भण्यन्ते । चिश्चिणि कादि-पत्रसमुदायो वा उदुखलख(क)ण्डित इति, तथाऽसंसृष्टो- व्यञ्जनादिनाऽलिप्ता, संसृष्टश्चैव व्यञ्जनादिलिप्तो बोद्धव्यो हस्त इति । विधि पुनरत्रोचं स्वयमेव वक्ष्यतीति ॥ ९३ ।। असंसटेण हत्थेण, दुव्वीए भायणेण वा । दिज्जमाणं न इच्छिज्जा, पच्छाकम्मं जहिं भवे ॥१४॥ संसटेण य हत्थेण, दव्वीए भायणेण वा । दिज्जमाणं पडिच्छिज्जा, जं तत्थेसणिअंभवे ॥१५॥ आह च-असंसद्धेणत्ति, असंसृष्टेन हस्तेनानादिभिरलिप्तेन दा भाजनेन वा दीयमानं नेच्छेत् , किं सामान्येन , नेत्याह-पश्चात्कर्म यत्र भवति दध्यादौ, शुष्कमण्डकादिवत् तदन्यदोषरहितं गृह्णीयादिति ॥ ९४ ॥ 'संसट्टेणे 'ति संसृष्टेन हस्तेनान्नादिलिप्तेन, तथा दा भाजनेन वा दीयमानं प्रतीच्छेतू-गृहीयात् , किं सामान्येन ?, नेत्याह-यत् तत्रैषणीयं भवति तदन्यदोपरहितमित्यर्थः । इह च वृद्धसम्प्रदाय:-" संसढे हत्थे संसढे मत्ते सावसैसे दवे, संसट्टे हत्थे संसट्टे मत्ते निरवसेसे दवे, एवं अट्ठभंगा, एत्थ पढमो मंगो सव्वुत्तमो, अन्नेसुवि जत्थ सावसेसं दवं तत्थ घेप्पड़, न इयरेसु, पच्छाकम्मदोसाओ"त्ति ॥ ९५ ॥ किंच- दुण्हं तु भुंजमाणाणं, एगो तत्थ निमंतए। दिजमाणं न इच्छिज्जा, छंद से पडिलेहए ॥ ९६ ।। दुण्हं तु भुंजमाणाणं, दोवितस्थनिमंतए। दिजमाणं पडिच्छिज्जा, जं तत्थेसणिअंभवे ॥ ९७ ॥ गुग्विणीए उवपणत्थं, विविहं पाणभोअणं । मुंजमाणं विवजिजा, भुत्तसेसं पडिच्छए ॥ ९८ ॥ सिआ असमणट्ठाए, गुठ्विणी कालमासिणी।उद्विआ वा निसीइजा, निसन्ना वा पुणुट्ठए॥ ९९ ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिी दितिअं पडिआइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १० ॥ थणगं पिज्जेमाणी, दारगं वा कुमारिओं। तं निक्खिवित्तु रोअंतं, आहरे पाणभोअणं ॥ १०१ ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिा दितिअंपडिआइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १०२॥ जंभवे भत्तपाणं तु, कप्पाकप्पमि संकि। दितिअं पडिआइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १०३ ॥ 'पोण्हं तुति, द्वयोर्मुसतोः पालनां कुर्वतो, एकस्य वस्तुनो नायकयोरित्यर्थः । एकस्तत्र निमन्त्रयेत्-तदान प्रत्यामन्त्रयेत, तदीयमानं नेच्छेदुत्सर्गतः, अपितु छन्द-अभिप्राय, से-तस्य द्वितीयस्य प्रत्युपेक्षेत नेत्रवक्त्रविकारैः, किमस्येदमिष्टं दीयमानं न वेति, इएं चेत् गृहीयान, न मैनेति । एवं भुजानयोः-अम्यवहारायोद्यतयोरपि योजनीयं । यती "भुजि-पालने अभ्यवहारे च" वर्तत इति ॥ ९६ ॥ वथा 'दुण्हं तु द्वयोस्तु पूर्ववद् भुञ्जतो आनयोर्वा द्वावपि तत्रा.

मि(ति)प्रसादेन निमन्त्रयेयातां, तत्रायं विधिः-दीयमानं प्रतीच्छेत्-गृह्णीयात् यत् तत्रैषणीयं भवेदिति, तदन्य- दोपरहितमिति ॥ ९७ ॥ विशेपमाह-'गुब्बिणीए'त्ति, गुविण्या-गर्मवत्या, उपन्यस्तं-उपकल्पितं, किं तदित्याह- विविधं-अनेकप्रकारं, पानभोजनं-द्राक्षापानखण्डखाद्य कादि, तत्र भुज्यमानं तया विवज्य, मा भूत्तस्या अल्पत्वेनाभिला- पानिवृत्या गर्भपातादिदोप इति । भुक्तशेष-भुक्तोद्धरितं प्रतीच्छेत् यत्र तस्या निवृत्तोऽमिलाप इति ॥ ९८ ॥ किंच- 'सिया येत्ति स्याच-कदाचिच्च श्रमणार्थ-साधुनिमित्तं गुम्विणी पूर्वोक्ता कालमासवर्तिनी-गर्भाधानान्नवममास- वर्तिनीत्यर्थः । उत्थिता वा यथा कथञ्चित् निषीदेन्निषण्णा वा ददामीति साधुनिमित्त, निपण्णा वा स्वव्यापारेण पुनरु: त्तिष्ठेत् ददामीति साधुनिमित्तमेवेति ।। ९९ ॥ 'तं भवे' इति, तद् भवेद् भक्तपानं तु तथानिपीदनोत्थानाभ्यां दीयमानं संयतानामकल्पिकं, इह च " स्थविरकल्पिकानामनिपीदनोत्थानाभ्यां यथावस्थिततया दीयमानं कल्पिकं, जिनकल्पिकानां तु आपन्नसत्त्वया प्रथमदिवसादारभ्य सर्वथा दीयमानमकल्पिकमेवे"ति सम्प्रदायः। यतश्चैवमतो ददती प्रत्याचक्षीत न मम कल्पते तादृशमित्येतत्पूर्ववदेवेति ॥ १०० ॥ किश्व-धणगंति, स्तनं(न्यं) पाययन्ती, किमित्याह-दारकं कुमारिकां वा, वाशब्दस्य व्यवहितः सम्बन्धः, अत एव नपुंसकं वा, तद्दारकादि निक्षिप्य रुदन् भूम्यादौ आहरेत् पानभोजनं, अनायं वृद्धसम्प्रदायः " गच्छवासी जइ थणजीवी पिवंतो निक्खितो तो न गिण्हइ, रोवउ वा मा वा, अह अन्नपि आहारेइ तो जइ न रोवइ तो गिण्हइ, अह रोवइ तो न गेण्हइ, अह अपियंतो निक्खित्तो थणजीवी रोवइ तो न गेण्हति, अह ण रोवति तो गेण्डति, गच्छनिग्गया पुण जाव थणजीवी ताव रोवउ मा वा पियंतो वा अपियंतो वा

न गिव्हंति, जाहे अन्नपि आहारेउमाढचो हवद नाई जा पियंत रोपउ वा मा वा न गेहनि, अह अपियंतो तो जह
रोगह तो परिहरति, अरोपिए गिण्हंति, सीसो आह-को तस्य दोसोत्थि', आयरिया मणति-तस्म निक्खिपमाणस्म सरेहि
हत्थेहि घेप्पमाणस्म अविरतणेण परितावणादोमा मआराइ वा महरिज"त्ति ॥१०१।। 'तं भवे भत्तपाण'ति, तइये-
तपानं तु अनन्तरादित संयतानामकल्पिकं । यतवमतो दवती प्रत्याचक्षीत न मम कल्पते तामिति
॥१०२॥ किं च पहुनोक्तेन, उपदेशमस्वमाद-'जं भवेत्ति यत् भवेद् भक्तपानं तु कल्पाकल्पयो:-कल्पनीयाकरपनीय.
धर्मविषय इत्यर्थः । किम् , अक्षित-न निमः किमिदमृद्गमादिदोपयूक्तं किंवा नेत्येवमाशङ्कास्पदीभूत, वदित्यम्भूतमसति ।
फल्पनीयनिश्चये ददती प्रत्याचक्षीत न मम फल्पते तादृशमिति ॥ १०३ ॥
दगवारेण पिहि, नीसाए पीढएण वा । लोढेण वावि लेवेण, सिलेसेणवि केणइ ॥१०४॥
तंचउभिदिआदिज्जा, समणट्ठाए व दावए। दितिअंपडिआइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं॥१०५।।
किच-'दगवारेण पिहिय'ति दकचारेण उदककुम्भेन पिहितं-स्थगित माजनस्थं, तथा नीसाएनि पेपण्या,
पीठकेन-काष्ठपीठादिना, लोन चापि शिलापुत्रकण, वथा लेपेन-मृल्लेपादिना, श्लेषण केनचितुसियादिनेति ॥१०॥
'त पति तच उम्भिदितुं, स्थगित लिप्तं सत् उद्भिद्य दद्यात् अमणा दायकः, नारमावर्थ, तदित्यम्भूतं ददती
प्रत्याचक्षीत न मम कल्पवे नारशमिति ॥ १०५॥

असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा। जं जाणिज्ज सुणिज्जा वा, दाणट्ठा पगडं इमं ॥ १०६ ॥ तारिसं भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिक्षं। दितिअं पडिआइक्खे, न मे कप्पड़ तारिसं ॥१०७॥ असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा। जं ज़ाणिज्ज सुणिज्जा वा, पुण्णट्ठा पगडं इमं ॥ १०८ ॥ तं भवे भत्तपाणंतु, संजयाण अकप्पि। दितिसं पडिआइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १०९ ।। असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा। जंजाणिज्ज सुणिज्जा वा, वणिमट्ठा पगडं इमं ॥ ११०॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पि। दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १११ ।। असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा। जं जाणिज्ज सुणिज्जा वा, समणट्ठा पगडं इमं ॥ ११२॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पि। दितियं पडिआइखे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ ११३ ॥ किञ्च-'असणं'ति, अशनं पानकं वापि खाद्यं स्वाय, तद्यथा-ओदनआरनालादिलड्डुकहरीतक्यादि, यजानीया. दामन्त्रणादिना,' शृणुयाद्वान्यतो यथा दानार्थ प्रकृतमिदं, दानार्थ प्रकृतं नाम साधुवादनिमित्तं यो ददाति अव्यापार. पापण्डिम्यो [वा] देशान्तरादेरागतो वणिकप्रभृतिरिति सूत्रार्थः ॥ १०६ ॥ 'तारिसंति, तादृशं भक्तपानं दानार्थ प्रतच्यापार संयतानामकल्पिक। यतवमतो ववती प्रत्याचक्षीत न मम कल्पते तादशामिति ॥१०७॥ 'असणं'ति, एवं पुण्यार्थ प्रकृतमिदं, पुष्पार्थ प्रकृतं नाम साधुवादानलोकरणेन यत्पुण्या कृतमिति ॥ १०८ ॥ एवं पनीपकार्थ चनीपा:-कृष्णाः॥११०॥ एवं श्रमणार्थमिति, श्रमणा-निग्रंथाः, शाक्पादयः॥११२॥ अस्य निषेधः पूर्ववत् ॥११३॥ उद्देसि कीअगडं, पूइकम्मं च आहडं । अज्झोयर पामिञ्चं, मीसजायं विवजए ॥ ११ ॥ शिक्ष-'उद्देसिति-उद्दिश्य तमौदेशिकं-उद्दिष्टकत कर्मादिभेदं, फीतकृतं-द्रव्यभावक्रयक्रीतमेदं, पूतिकर्म च गम्माप्पमानाधारुर्माश्यवसमिश्रलक्षण, आहतं स्वग्रामाहतादि, तथाऽध्यवपूरक-सार्थमूलाद्रहणप्रक्षेपरूपं, प्रामित्यं- सापर्यच्छिय दानलक्षणं, मिश्रजातं च-आदित एव गृहिसंयतमिश्रोपस्कृतरूपं वर्जयेदिति ॥ ११४ ॥ उग्गमं से अ पुच्छिज्जा, कस्सट्टा फेण वा कडं । सुच्चा निस्संकि सुद्धं, पडिगाहिज संजए ॥११५॥ संथपण्यपोहायोपायमाह-'उग्गमंति-उद्गम-तत्मरतिरूपं, 'से' तस्य शदिवस्य अशनादेः पृच्छेत् तत्स्वामिनं कर्मकर गा, पघा फस्यार्थमेतत् ? केन वा कृतमेतदिति, श्रुत्वा तद्वचो न मादर्थ, किं त्वन्यार्थमित्येवम्भूतं निःशङ्कितं शुद्ध महजुत्वादिमागत्या प्रतिगृह्णीयात् संयतः। विपर्ययग्रहणे दोषादिति ।। ११५॥ असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा । पुप्फेसु हुज उम्मीसं, बीएसु हरिएसु वा ॥ ११६ ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिझं । दिति पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ ११७ ॥ असणं पाणगं वा वि,खाइमं साइमं तहा । उदगंमि हुज निक्खितं, उत्तिंगपणगेसु वा ॥ ११८ ॥ , तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिअं । दिति पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ ११९ ॥ असणं पाणगं वावि, खाइमं साइमं तहा। तेउम्मि हुज निक्खिन, तं च संघट्टिआ दए ॥ १२० ॥ तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिअं । दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १२१ ॥ एवं उस्तकिआ ओसकिआ, उज्जालिया पज्जालिआ निवाविआ। उस्सिचिया निस्सिचिया, उवत्तिया ओयारिया दए ॥ १२२ ।। तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाणं अकप्पिअं। दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १२३ ॥ तथा 'असणं'ति-अशनं पानकं वापि खायं स्वायं तथा, पुष्पैः-जातिपाटलादिभिः भवेदुन्मियं वीजई रि- तैवेति ॥ ११६ ॥ 'तं भवे'त्ति-तादृशं भक्तपानं तु संयतानामकल्पिकं, यतश्चैवमतो ददती प्रत्याचक्षीत न मम कल्पते तादृशमिति सूत्रार्थः ।।११७॥ तथा 'असणं'ति सूत्रं, अशनं पानकं वापि खाद्यं स्वाद्यं तथा, उदके भवेनिक्षिप्तमुत्तिङ्गपनकेषु वा कीटिकानगरोलिपु वेत्यर्थः । उदकनिक्षिसं द्विविधं-अनन्तरं परम्परं च, अनन्तरं नवनीत- पोग्गलियमादि, परंपरं जलघडोपरिमापणत्यं दधिमादि, एवं उत्तिंगपणगेसु मावनीयमिति ॥ ११८ ॥ 'तं भवेत्ति सूत्रं, तद्भवेद् भक्तपानं तु संयतानामकल्पिकं, यतश्चैवमतो वदती प्रत्याचक्षीत न मम कल्पते, तादृशमिति सूत्रार्थः

। ..गति मूत्र, अशनं पानकं वापि ग्वायं स्वायं तथा, तेजसि भयेन्निक्षिप्त, तेजसीत्यनौ नेज-
। स्काय इत्यर्थः । तब सत्य, यावद् मिक्षा ददामि तावत् तापातिशयेन मा भादनियत इत्यपोश दद्यादिति ॥ १२०॥
'तं भवेति-तद्भवेद् भक्तपानं तु संपतानामकल्पिक, अदो वक्ती प्रत्यारक्षीत न मम कल्पते तादृशमिति
॥१२१॥ एवमुस्सफिय'त्ति-यावद् मिक्षा ददामि सावन्मा भूद्विष्यास्यतीत्युत्मिच्य दद्यात् एवं ओसफिया-अमर्या-
तिदाहमयादुर कान्युत्सायेंत्यर्थः, एवं 'उजालिया पझालिया' उज्वाल्प-अविध्यात सकदिन्धनप्रक्षेपेण, प्रजाल्प-पुन:
पुना, एवं निव्वाविया-निर्वाप्य दाहमयादेवेति मावा, एवमुस्सिचिया निस्सिचिया-उत्सिच्य-अतिभृतादुज्झनमयेन
ततो वा दानार्थ तीमनादि, निपिच्य-उद्माजनारहितं द्रव्यमन्यत्र भाजने तेन दद्यात् , उद्धर्चनमयेन वा तदा(भाई).
हितदकेन निपिच्प, एवं ओवत्तिया-ओवारिया, 'अपवर्य-तेनैवाग्निनिक्षिप्तेन माजनेतान्येन वा दद्यात्, वया
'अवतार्य' दाहमयादानार्थं वा दद्यात् । सचदन्यच्च साधुनिमित्तयोगे न कल्पते ॥१२२॥ तं भये' सूत्रं पूर्वपद ।। १२३ ।।
हुज कटुं सिलं वावि, इद्दालं वावि एगया। ठवियं संकमट्ठाए, तं च होज चलाचलं ।। १२४ ॥
ण तेण भिक्खू गच्छिज्जा, दिट्ठो तत्थ असंजमो। गंभीरं झुसिरं चेव, सविंदिअसमाहिए ॥१२५॥
निस्सेणि फलगं पीढं, उस्सवित्ता णमारहे । मंचं कीलं च पासायं, समणट्ठा एव दावए ॥१२६।।
दुरूहमाणी पवडिज्जा, हत्थं पायं व लूसए। पुढविजीवे विहि सिजा, जेझ तन्निस्सिा जगे॥१२७॥

एयारिसे महादोसे, जाणिऊण महेसिणो। तम्हा मालोहडं भिवावं, न पडिगिण्हति संजया ॥१२॥ गोचराधिकार एवं गोनाप्रविष्टाय होवत्ति, भवेत् काठं शिलां वापि इालं पारि, एका-एकस्मिन् काले प्राडादौ स्थापितं सङ्कमार्थ तग भयेगलागलं-प्रालिछित, न प भवेन स्थिरमेवेनि प्रायः ॥ १२५ ॥ नणं' ति सूत्रं, न तेन काष्ठादिना भिक्षुर्गचात् किमित्या दृष्टस्तवासंघमः, नगलने प्रागुमर्दनमा मा गम्भीर- अप्रकाश, शुपिरं-चगान्तःनाररहिनं, सन्द्रिगसमाहितः-प्रदादिर रागामान परिहिति ॥ १२॥ किन- 'निस्सेणीति सूत्रं, निःश्रेणि फलकं पीठं उस्मभित्ता-उपयोगः, आरोदे, मां कीनर नोस्या, कमारोहेदित्याह-प्रासाद, श्रमणार्थ-गाधुनिमितं, वागतो-दाना पारोहेन , एकदमाजमिनि ॥१२६।। नदीमा- 'दुरूहमाणित्ति, आरोहन्ती प्रपतेत्, प्रपतन्ती न हस्तांना पागा लूपये- मत पाडो, नया प्रधिवीजीवान् विर्तिस्यात् कामिनास्थान नया गानि न नमिशिगानि जगन्नि-पानिनम्नांगिादिति ।। १२७ ।। 'एयारिमत्ति-इदृशान् अनन्नरोदिनमान महायोपान मालामहर्षयः-मानी, गगा दोगनागिनी मम्मामाला- हृतां-मालोपनीनी भिक्षान प्रनिगदन्ति संगना। पाठान्तरं याशिमाला पहनामिनि, मंदी युवानमिनि ।।१२८॥ कंदं मूलं पलंबं वा, आमं छिन्नं व सन्निरं । तुंबाग सिंगवेरं च, आमगं परिवबाद ॥ १२९ ।। तहेर सत्तुचुपणाई, कोलण्णाई आपणे । सालि माणिों पूर्ण, अन्नं वापि तहाविद् ॥ १३० ।। - ।

॥ ११९ ।। तथा 'असणति रात्रं, अशनं पानकं पापि पा स्पा ता, तेजसि भपेसिक्षिा, रोजसीप्यमाने.
स्काय इस्पर्थः । तय सम्वृष, पाव मिशा ददामि तायन सापातिशयेन गा भगवर्निगत स्यगोदा पानिति ॥ १२०॥
सं भवेत्ति-सभषेद् भक्तपानं तु संपतानामकल्पिक, अतो ववती प्रस्थापक्षी न मम फरपते तादृशमिति
॥१२१ ।। एषमुस्सपिपत्ति-पाय मिर्धा ददामि मायनमा भूद्विापारपतीत्यतिगमग दधानएओसमिया-अयम-
विवाहमयादुरमुकात्पुत्सार्येत्यर्थी, एवं 'आलिया पमालिया' उजयारप-अविध्यार सकदिन्धनप्रक्षेपेण, प्रज्वारग-पुना
पुना, एवं निमाविया-निर्याप्य वाहमयादेवेति भावा, एवमुस्सिगिणा निस्सिगिया-उत्सिग-अविनादुजानगयेग
ततो पर दाना वीगनादि, निपिच्य-तवभाजनारहितं द्रष्पमन्यत्र भाजने सेन दया, उनमयेन या नदा(भाई).
रितमदकेन निपिच्प, एवं ओपत्तिया-ओषारिगा, 'अपवर्य-तेनानिनिधिमेन गागनेनान्येन पा दद्याद, तथा
'अवता' दाहगपादानार्थ पा दद्यात् । यत्तदन्या साधुनिमिण्योगे न फरपते ॥१२२ ।। 'सं भषे' तं पूर्ववत् ।। १२३५
हुज कटुं सिलं पावि, इटालं यानि एगया। ठवियं संकमद्वार, तं च होज चलाचलं ॥ १२४ ॥
ण तेण भिक्खू गच्छिन्ना, दिट्ठो तत्थ असंजमो। गंभीरं झुसिरं चेव, सविंदिअसमाहिए ॥१२५॥
निस्सेणिं फलगं पीढं, उस्सवित्ता णमारुहे । मंचं कीलं च पासायं, समणट्ठा एव दावए ॥१२६।।
दुरूहमाणी पवडिजा, हत्थं पायं व लूसप । पुनधिजीवे विहिसिजा,जेश तन्निस्सिा जगे॥१२७॥

एयारिसे महादोते, जाणिऊण महेसिणो। तम्हा मालोहडं भिक्खं, न पडिगिण्हति संजया ॥१२८॥
गोचराधिकार एवं गोचरप्रविष्टस्य होजत्ति, भवेत् काष्ठं शिलां वापि इसालं वापि, एकदा-एकस्मिन् काले
प्रावृडादौ स्थापितं सङ्कमार्थ तच भवेचलाचलं-अप्रतिष्ठितं, न च भवेत् स्थिरमेवेति सूत्रार्थः ॥ १२४ ॥ 'न तेणं'
ति सूत्रं, न तेन काष्ठादिना भिक्षुर्गच्छेत् , किमित्याह-दृष्टस्तत्रासंयमः, तञ्चलने प्राण्युपमर्दसम्भवात् । तथा गम्भीरं-
अप्रकाशं, शुषिरं-चैान्तःसाररहितं, सर्बेन्द्रियसमाहितः-शब्दादिपु रागद्वेषावगच्छन् परिहरेदिति ॥ १२५।। किञ्च-
'निस्सेणीति सूत्रं, निःश्रेणिं फलकं पीठं उस्सवित्ता-उत्सृत्योधं कृत्वेत्यर्थः, आरोहेत्, मञ्चं कीलकं चोत्सृत्य,
कमारोहेदित्याह-प्रासाद, श्रमणार्थ-साधुनिमित्तं, दायको-दाता आरोहे , एतदप्यग्राह्यमिति ॥१२६।। अत्रैव दोषमाह-
'दुरूहमाणि'त्ति, आरोहन्ती प्रपतेत्, प्रपतन्ती च हस्तं वा पादं वा लूपयेत्-स्वकं स्वत एव खण्डयेत् , तथा
पृथिवीजीवान् विहिंस्यात् कथञ्चित्तत्रस्थान् तथा यानि च तनिश्रितानि जगन्ति-प्राणिनस्तांथ हिंस्यादिति ॥ १२७॥
'एयारिसे'त्ति-इदृशान् अनन्तरोदितरूपान् महादोषान ज्ञात्वा महर्षयः-साधवो,यस्माद् दोपकारिणी तस्माद् मालाप-
हृतां-मालोपनीतां भिक्षांन प्रतिगृह्णन्ति संयताः। पाठान्तरं वा हंदि मालापहृतामिति, हंदीत्युपदर्शनमिति ॥१२८॥
कंद मूलं पलंबं का, आमं छिन्नं व सन्निरं। तुंवागं सिंगबेरं च, आमगं परिवज्जए ॥ १२९ ॥
तहेव सत्तुचुण्णाई, कोलचुण्णाई आवणे । सक्कुलि फाणि पूअं, अन्नं वावि तहाविहं ॥ १३० ॥

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M - एयारिसे महादोसे, जाणिऊण महतिणो । तम्हा मालोहडं भिक्खं, न पडिगिण्हति संजया ॥१२॥ गोचराधिकार एवं गोचरप्रविष्टस्य होज्जत्ति, भवेत् काष्ठं शिलां वापि इालं नापि, एकदा-एकस्मिन् काले प्राबडादौ स्थापितं सलमार्थं तच भवेचलानलं-अप्रतिष्ठिन, न न भवेन् स्थिरमैवेति पूवार्थः ॥ १२४ । 'न तेणं ति सूत्रं, न तेन काष्ठादिना भिक्षुर्गच्छेत् , किमित्याह-दृष्टस्तत्रासंयमा, बालने प्रायुपमर्दगम्भवान् । तथा गम्भीरं- अप्रकाशं, शुपिरं-चैवान्ताताररहितं, सन्द्रिगसमाहितः-शब्दादिप रागद्वेषावगन्छन् परिहरेदिनि ।। १२५।। किन 'निस्सेणी'ति सूत्र, निःश्रेणि फलकं पीठं उस्मवित्ता-उत्सत्यो कृत्येत्यर्थः, आरोहेत, मां कीलकं चोत्गृत्य, कमारोहेदित्याह-प्रासाद, श्रमणार्थ-साधुनिमित्तं, यायको-दाता भारोहेन् , एतदप्यमाामिति ॥१२६।। और दोपमाद- 'दुरूहमाणि'त्ति, आरोहन्ती प्रपतेत्, प्रपतन्ती न हस्तं वा पादं वा लूप पेत्-पकं मान एव सण्डयेन , नया पृथिवीजीवान् विहिस्यात् कवभिनत्रस्थान् तथा यानि न तनिश्रिनानि जगन्ति-प्राणिनस्तान हिमादिति ।। १२७॥ 'एयारिसे'त्ति-हदृशान् अनन्तरोदितरूपान् महायोपान वाया महर्षयः-साधनो, यसमाद दोपकारिणी तस्माद मालाप. हृतां-मालोपनीवां भिक्षांन प्रतिगृतान्ति संयनाः। पाठान्तरं या इंदिमालापहनामिनि, हंदीत्युपदर्गनमिति ।।१२८॥ कंदं मूलं पलंवं वा, आमं छिन्नं व सन्निरं । तुंबाग सिंगवेरं च, आमग परिवजए ॥ १२९ ॥ तहेव सत्तुचुण्णाई, कोलचुण्णाई आवणे । सक्कुलिं फाणि पूअं, अनं बावितहाविहं ।। १३० ॥

॥ ११९ ॥ तथा 'असण'ति मूत्र, अशनं पानकं चापि खाद्य स्वायं तथा, तेजसि भनिक्षिप्तं, तेजसीत्यनौ तेज-
स्काय इत्यर्थः । तच मध्य, यावद् मिक्षां ददामि तावत् तापातिशयेन मा भूद्धर्तिप्यत इत्यपोझ दद्यादिति ॥ १२० ॥
'तं भवेत्ति-तद्भवेद् भक्तपानं तु सयतानामकल्पिकं, अतो ददती प्रत्याचक्षीत न मम कल्पते तादृशमिति
॥१२१ । एवमुस्सक्रिय'त्ति-पावद् मिक्षां ददामि तावन्मा भूद्विध्यास्पतीत्युत्मिच्य दद्याद्, एवं ओसकिया-अवमा-
तिदाहमयादुल्नुकान्पुरमार्येत्यर्थः, एत्र 'उजालिया पालिया' उज्वाल्य-अर्द्धविघ्यातं सकदिन्धनप्रक्षेपेण, प्रज्वाल्प-पुन:
पुना, एव निन्याविया-निर्वाप्य दाहमयादेवेति भावः, एवमुस्सिचिया निस्सिचिया-उत्सिच्य-अतिभृतादुज्सनमयेन
ततो या दानार्थ तीमनादि, निपिच्य-तत्माजनाद्रहितं द्रव्पमन्यत्र भाजने तेन दद्यात् , उद्वर्तनभयेन वा तदा(आर्द्र).
हितमुदकन निपिच्प, एवं ओवत्तिया-ओवारिया, 'अपवर्त्य-तेनैवाग्निनिक्षिप्तेन भाजनेतान्येन या दद्यात् , तथा
'अवतार्य' दाहमयाहानार्थ वा दद्यात् । तत्तदन्पच साधुनिमित्तयोगे न कल्पते ॥ १२२॥ तं भवे' सूत्रं पूर्वपत् ।। १२३ ।।
हुज कटुं सिलं वापि, इटालं वावि एगया। ठवियं संकमट्ठाए, तं च होज चलाचलं ।। १२४ ॥
ण तेण भिक्खू गच्छिज्जा, दिट्ठो तत्थ असंजमो। गंभीरं झुसिरं चेक, सर्विदिअसमाहिए ॥१२५॥
निस्सेणिं फलगं पीढं, उस्सवित्ता मारुहे । मंचं कीलं च पासायं, समणट्ठा एव दावए ॥१२६।।
दुरुहमाणी पवडिजा, हत्थं पायं व लूसए।पुढविजीवे विहिसिना, जे अ तन्निस्सिआ जगे॥१२७॥

न मम कल्पते तादृशमिति ॥ १३३ ॥ उक्तोऽशनविधिः । साम्प्रतं पानविधिमाह- तहेवुच्चावयं पाणं, अदुवा वारधोअणं । संसेइमं चाउलोदगं, अहुणाधो विवजए ॥ १३४ ॥ जं जाणेज चिराधोय,मईए दंसणेण वा। पडिपुच्छिऊण सुच्चा वा, जं च निस्संकिअंभवे ॥ १३५ ॥ अजीवं परिणयं नच्चा, पडिगाहिज्ज संजए । अह संकियं भविज्जा, आसाइत्ताण रोयए ।। १३६ ॥ थोवमासायणट्ठाए, हत्थगंमि दलाहि मे । मा मे अञ्चविलं पूअं, नालं तण्हं विणित्तए॥ १३७ ॥ संच अञ्चविलं पूर्व, नालं तिण्हं विणित्तए । दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १३८ ॥ च होज्ज अकामेण, विमणेणं पडिच्छिअं। तं अप्पणा न पिवे, नोऽवि अन्नस्स दावए ॥ १३९ ।। विकमित्ता, अचित्तं पडिलोहिआ । जयं परिविज्जा, परिठ्ठप्प पडिक्कमे ॥ १० ॥ 'त्ति-तथैव यथा अशनमुच्चावचं तथा पानं, उचं-वर्णाद्युपेतं द्राक्षापानादि, अवचं-वर्णादिहीनं दि, अथवा वारकधावनं-गुडघटधावनादीत्यर्थः । संस्वेदजं-पिष्टोदकादि, एतदशनवदुत्सर्गापवादाम्यां वाक्यशेषः । तन्दुलोदकं त्वढिकरकं(व्रीहिदकं) अधुनाधौतमपरिणतं विवर्जयेदिति ।। १३४ ।। अत्रैव : वधिमाह- जं जाणेजत्ति सूत्रं, तन्दुलोदकं जानीयात्-विन्यात् , चिरधोतं, कथं जानीयादित्याह-मत्या दर्शनेन विकायमाणं पसढं, रएणं परिफासि। दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १३१ ॥ बहुअट्टि पुग्गलं,अणिमिसं वा बहुकंटयं । अच्छिअं तिंदुअं विल्लं, उच्छुखंड व सिंघलि ॥ १३२ ॥ अप्पे सिआ भोअणज्जाए, वहुउज्झियधम्मिअं। देतिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं॥ १३३ ॥ प्रतिगेघाधिकार एवाह-मूलं'ति-कन्द-फरणादिलक्षणं, मूलं-पिण्डादिन्दारिकादिरूपं, प्रलम्बा-तालफलादि. आम टिप्नं च सन्निर-मग्निरमिति पत्रशाकं तुम्पाकं त्वग्मिचान्तवाद्री वा तुलसीमित्यन्ये,शृगयेरं च-आर्द्र, आमकं परिवर्जयेदिति ।। १२९ ॥ तहेवत्ति-तथैव सक्तुचूर्णान् , कोलचूर्णान-पदरसक्तून आपणे-वीधयां, तथा शकुलिं: तिलपर्पटिका, फाणितं-द्रवगुडं, पूर्व-कणिकादिमयं, अन्यद्वा तथाविधं मोदकादि॥१३० ॥ किमित्याह-'विकायेत्ति विकायमाण-विक्रीयमाणमापण इति वर्तते । मसधमनेकदिनस्थापनेन प्रकटमत एव रजसा पार्थिवेन परिस्पष्ट-व्याप्त, तदिन्यम्भूत तु वदती प्रत्याचक्षीत न मम फल्पते तादृशमिति सूत्रद्वपार्थः ॥ १३१ ॥ किश्च-यहुट्टियं पोग्गल. मिति-पहस्थिर्फ पुद्गलं-मासं, अनिमिपं घा मत्स्यं वा पहुकण्टक, अयं किल कालाघपेक्षया ग्रहणे प्रतिपेषः । अन्ये स्वमिदपति-"वनस्पत्पधिकारात्याविषफलामिषाने एते "इति । तथा चाह-अस्थिक-अस्थिकपक्षफलं, तियुकंत्ति-तेन्दु फीफलं, पिवं भुखण्डं च प्रतीते, शाल्मलि या वल्लादिफलं, वाशब्दस्य व्यवहितः सम्बन्ध इति ॥ १३२ ॥ अश्रेष दोपमाह-'अपेत्ति अल्पं स्यात्, भोजनजातमत्र तथा पाहन्झनधर्मफमेतपत अतो ददती प्रत्याचक्षीत .

न मम कल्पते तादृशमिति ॥ १३३ ॥ उक्तोऽशनविधिः । साम्प्रतं पानविधिमाह- तहेवुच्चावयं पाणं, अदुवा वारधोअणं । संसेइमं चाउलोदगं, अहुणाधोअं विवज्जए ॥ १३४ ॥ जं जाणेज चिराधोयं,मईए दसणेण वा। पडिपुच्छिऊण सुच्चा वा, जं च निस्संकिअंभवे ॥ १३५ ॥ अजीव परिणयं नचा, पडिगाहिज संजए । अह संकियं भविज्जा, आसाइत्ताण रोयए। १३६ ॥ थोवमासायणढाए, हत्थगंमि दलाहि मे । मा मे अचंबिलं पूअं, नालं तण्हं विणित्तए ॥ १३७ ॥ तं च अञ्चविलं पूयं, नालं तिण्हं विणित्तए । दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १३८ ॥ तं च होज्ज अकामेण, विमणेणं पडिच्छिअं। तं अप्पणा न पिवे, नोऽवि अन्नस्स दावए ॥ १३९ ।। एगंतमवक्कमित्ता, अचित्तं पडिलोहिआ। जयं परिढविज्जा, परिठ्ठप्प पडिकमे ॥ १४० ॥ 'तहेव'त्ति-तथैव यथा अशनमुच्चावचं तथा पानं, उच्च-वर्णाद्युपेतं द्राक्षापानादि, अवचं-वर्णादिहीनं पूत्यारनालादि, अथवा वारकधावनं-गुडघटधावनादीत्यर्थः। संस्वेदज-पिष्टोदकादि, एतदशनवदुत्सर्गापवादाभ्यां गृह्णीयादिति वाक्यशेषः । तन्दुलोदकं त्वढिकरकं(ब्रीहिदकं) अधुनाधौतमपरिणतं विवर्जयेदिति ।। १३४ ।। अत्रैव विधिमाह-'जं जाणेजत्ति सूत्रं, तन्दुलोदकं जानीयात्-विन्यात् , चिरधोतं, कथं जानीयादित्याह-मत्या दर्शनेन विकायमाणं पसढं, रएणं परिफासि। दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १३१ ।। बहुअट्टिअं पुग्गलं,अणिमिसं वा बहुकंटयं । अच्छिअंतिदुअं विल्लं, उच्छुखंडं व सिंबलिं ॥ १३२ ॥ अप्पे सिआ भोअणज्जाए, वहुउज्झियधम्मिअं। देतिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं॥ १३३ ॥ प्रतिपेघाधिकार एवाह-'कंदमूलं'ति-कन्द-सूरणादिलक्षणं, मूलं-पिण्डादिवृन्दारिकादिरूपं, प्रलम्यं वा-तालफलादि, आम छिन्नं च सन्निरं-मनिरमिति पत्रशाकं तुम्बाकं स्वग्मिान्तर्वाद्री वा तुलसीमित्यन्ये,शृङ्गबेरं च-आर्द्रकं, आमकं परिवर्जयेदिति ॥ १२९ ॥ तहेव'त्ति-तथैव सक्तुचूर्णान, फोलचूर्णान-चदरसक्तून आपणे-वीथ्यो, तथा शुष्कुलिं- तिलपर्पटिका, फाणितं-द्रयगुडं, पूर्य-कणिकादिमयं, अन्यद्वा तथाविधं मोदकादि ।। १३० ॥ किमित्याह-विकाये'त्ति विक्रायमाणं-विक्रीयमाणमापण इति वर्तते । प्रसघमनेकदिनस्थापनेन प्रकटमत एव रजसा पार्थिवेन परिस्पृष्ट-व्याप्त, तदित्यम्भूतं तु ददतीं प्रत्याचक्षीत न मम कल्पते तादृशमिति सूत्रद्वयार्थः ।। १३१ ।। किश्व-पहुअद्वियं पोग्गल. मिति-यहस्थिकं पुद्गलं-मांस, अनिमिषं घा मत्स्य वा बहुकण्टकं, अयं किल कालाद्यपेक्षया ग्रहणे प्रतिषेधः । अन्ये स्वमिदधति-"वनस्पत्यधिकारात्तथाविधफलामिधाने एते "इति । तथा चाह-अस्थिक-अस्थिकक्षफलं, तिंदुकंत्ति-तेन्दु- कीफलं, रिखं राखण्डं च प्रतीते, शाल्मलिं वा वल्लादिफलं, वाशब्दस्य व्यवहितः सम्बन्ध इति ॥ १३२ ॥ अत्रैव दोपमाह-'अपेत्ति, अल्पं स्यात्, भोजनजातमत्र तथा यहझनधर्मकमेतद्यतथैवं अतो.ददती प्रत्पाचक्षीत

एगतमवक्कमित्ता
,
अचित्तं
पडिलहिआ
।
जयं
परिविज्जा
,
परिठ्ठप्प
पडिकमे
॥
१४०
॥
'
तहेव'त्ति
-
तथैव
यथा
अशनमुच्चावचं
तथा
पानं
,
उच्च
-
वर्णाद्युपेतं
द्राक्षापानादि
,
अवचं
-
वर्णादिहीनं
पूत्यारनालादि
,
अथवा
वारकधावनं
-
गुडघटधावनादीत्यर्थः
।
संस्वेदजं
-
पिष्टोदकादि
,
एतदशनवदुत्सर्गापवादाभ्यां
विधिमाह
-
'
जं
जाणेज'त्ति
सूत्रं
,
तन्दुलोदकं
जानीयात्
-
विन्यात्
,
चिरौतं
,
कथं
जानीयादित्याह
-
मत्या
दर्शनेन
गृह्णीयादिति
वाक्यशेषः
।
तन्दुलोदकं
त्वढिकरकं
(
व्रीहिदकं
)
अधुनाधौतमपरिणतं
विवर्जयेदिति
॥
१३४
।।
अत्रैव
प
न मम कल्पते तादृशमिति ॥ १३३ ॥ उक्तोऽशनविधिः । साम्प्रतं पानविधिमाह-
तहेवुच्चावयं पाणं, अदुवा वारधोअणं । संसेइमं चाउलोदगं, अहुणाधोअं विवज्जए ॥ १३४ ॥
जं जाणेज्ज चिराधोयं,मईए सणेण वा। पडिपुच्छिऊण सुच्चा वा, जं च निस्संकिअंभवे ॥ १३५ ॥
अजीवं परिणयं नच्चा, पडिगाहिज्ज संजए । अह संकियं भविज्जा, आसाइत्ताण रोयए ॥ १३६ ॥
थोवमासायणढाए, हत्थगंमि दलाहि मे । मा मे अच्चबिलं पूअं, नालं तण्हं विणित्तए॥ १३७ ॥
तं च अच्चविलं प्रयं, नालं तिण्हं विणित्तए । दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥१३८ ॥
तं च होज्ज अकामेण, विमणेणं पडिच्छि। तं अप्पणा न पिबे, नोऽवि अन्नस्स दावए ॥ १३९॥

ग, मन्या-तवाहणादिकर्मअया, दर्शनेन पा-वर्णादिपरिणतस्त्रानुसारेण, पा चशम्दा:, तदप्येवम्भूतं कियती घेलाऽरप धौतम्यति पृष्ट्वा गृहस्थ, श्रुत्वा वा महती वैलेति श्रुत्वा च प्रतिवचन, यति, यदेवं निाशकितं भाति, निरषयव प्रशान्ततपा तन्दुलोदक तत् प्रतिगृह्णीयादिति । विशेषः पिण्डनियुक्तायुक्त इति ॥ १३५ ।। उष्णोदशादिविधिमार-'अजीपति सूत्र, उष्णोदक अनीव परिणतं ज्ञास्या त्रिदण्डपरिवर्चनादिरूप मत्या दर्शनेन वेत्यादि वमन, तदयाभूत प्रतिगृलीपात् सयतः, चतुर्धरसमपूत्यादि दहोपकारक मत्यादिना ज्ञात्वेत्यर्थः। अथ शङ्कितं भवेत् प्रत्यादिमावन तत आस्वाय रोचयेद्विनिश्चय कुर्यादिति ॥ १३६ ॥ तचैव-धोवत्ति-स्तोकमास्वादनार्थ प्रथम तारदस्ते देहि मे, पदि माधुपायोग्य ततो ग्रहीये, मा मेऽत्यम्ल पूति नाल तडपनोदाय, ततः किमनेनानुपयोगिना ? इति पार्थः ॥ १३७ ॥ पाप्यादित ष सत्मायुप्रायोग्य पेत् गृपत एष, नो चेदप्राय, अत आह-तं चेति गतार्थ चेति ।। १३८ ॥ 'तप होने ति, तात्यम्लादि भवेदकामेन उपरोधशीलतया विमनस्केन-अन्यचित्तेन प्रतीनिछतं- गीत तयारमना कायापकारकमनामोगधर्मश्रद्धया न पियेनाप्यन्पेभ्यो दापयेत्, रत्नाधिकेनापि सय दानस्य प्रविषयमापनार्थ दापनग्रहण । इह च " सदस्य सजम सजमाओ अप्पाणमेव" त्यादि मावनेति ॥१३९|| अस्यैव विधिमाह- 'पगन्तति-एकान्त असभ्य-गत्वा अपित्तं दग्पदेशादि प्रत्युपेक्ष्य चक्षुपा प्रमृज्य च रजोहरणेन स्थण्डिलमिति मापते पर प्रसारित प्रतिष्ठापपेत्, विधिना त्रि: पान पस्जेन, प्रतिष्ठाप्प बसविमागता प्रतिमामेत् पापपि । एतच पहिरागतनिपमकरणमिद प्रतिक्रमण अवहिरपि प्रतिष्ठाप्य प्रतिक्रमणनिपमापनार्थमिति ॥ १४०॥ ।

सिआ य गोयरग्गगओ,इच्छिज्जा परिभुत्तुअं(भुजिउं)। कुट्टगं भित्ति मूलं वा,पडिलेहित्ताण फासुअं॥ अणुन्नवित्तु मेहावी, परिच्छन्नंमि संवुडे । हत्थगं संपमज्जित्ता, तत्थ भुंजिज्ज संजए ॥१४२ ॥ तत्थ से भुंजमाणस्स, अट्ठिअं कंटओ सिआ। तणकटुसकरं वावि, अन्नं वावि तहाविहं ॥ १४३ ॥ तं उक्खिवित्तु न निक्खिवे, आसएण न छड्डए । हत्थेण तं गहेऊण, एगंतमवक्कमे ॥ १४४ ॥ एगंतमवकमित्ता, अचित्तं पडिलेहिआ । जयं परिढविजा, परिठ्ठप्प पडिक्कमे ॥ १४५ ॥ एवमन्नपानग्रहणविधिमभिधाय भोजनविधिमाह-'सिआ यत्ति-स्यात्-कदाचित् गोचराग्रगतो-ग्रामान्तरं भिक्षा प्रविष्ट इच्छेत्, परिभोक्तुं पानादिपिपासायभिभूतः सन् , तत्र साधुवसत्यमावे कोष्ठकं-शून्यं चट्टमठादि भित्तिमूलं वा- कुडथैकदेशादि प्रत्युपेक्ष्य-चक्षुषा प्रमृज्य च रजोहरणेन प्रासुकं-बीजादिरहितं चेति ॥ १४१ ॥ तत्र 'अणुनवित्तु'त्ति- अनुज्ञाप्य सागारिकपरिहारतो विश्रमणव्याजेन तत्स्वामिनमवग्रहं मेधावी-साधुः प्रतिच्छन्ने तत्र कोष्ठकादौ संवृत्तः- उपयुक्तः सन् साधुरीर्याप्रतिक्रमणं कृत्वा तदनु हस्तकं-मुखवस्त्रिकारूपमादायेति वाक्यशेषः। संप्रमृज्य विधिना तेन काय तत्र भुञ्जीत संयतो रागद्वेपावपाकत्येति सूत्रार्थः ॥१४२॥ 'तत्यत्ति-तत्र कोष्ठकादौ से-तस्य साधोः भुञ्जानस्यास्थि कण्टको वा स्यात्, कथञ्चित् गृहीणां प्रमाददोपात् , कारणगृहीते पुद्गल एवेत्यन्ये । तृणं काष्ठं शर्करं चापि स्यात् , उचितभोजने अन्यद्वापि तथाविधं वदरकर्कटादीतिः ॥ १४३ ॥ 'तं उक्खिवित्तु' इति, तदस्थीत्युक्षिप्य हस्तेन यत्र । वा, मला-तग्राणादिकर्मजया, दर्शनेन वा-वर्णादिपरिणतत्रानुसारेण, वा पसन्दा:, तदप्येवम्भूतं कियती बेलाप धौतस्यनि पृष्ट्या गृहस्थ, थुत्या वा महती वेलेति श्रुत्वा च प्रतिवचनं, यति, यदेवं निशकितं भगति, निरयणव प्रशान्ततया तन्दुलोदक तत् प्रतिगृह्णीयादिति । विशेष पिण्डनियुक्तायुक्त इति ॥ १३५ ॥ उष्णोदविविधिमा-'अनीय'ति सूत्र, उष्णोदक अजीव परिणतं ज्ञात्वा त्रिदण्डपरिवर्तनादिरूपं मत्या दर्शनेन वेत्यादि वत्त, वयम्भूत प्रतिगृलीयात् संयतः, पतुर्थरसमपूणादि देहोपकारक मत्यादिना ज्ञात्वेत्यर्थः । अथ शङ्कितं भवेत् प्रत्यादिमावन तत आस्वाच रोचपेद्विनिश्यं कुर्यादिति ॥ १३६ ॥ तचैव-'यो'त्ति-स्तोकमास्वादनाथ प्रधर्म ताउदस्ते देहि मे, यदि माधुपायोग्यं ततो ग्रहीये, मा मेऽत्यम्लं पूति नालं तूडपनोदाय, ततः किमनेनानुपयोगिना ? इति पार्थः ।। १३७ ॥ प्रास्त्रादित व सरमाधुमायोग्य घेत् गृह्यत एव, नो चेदप्राय, अत आह-तं चेति गतार्थ वेति ॥ १३८ ॥ तं प हो ति, तश्चात्यम्लादि मोदकामेन उपरोघशीलत्या विमानस्फेन-अन्यचितेन प्रतीच्छित- । गृहीत तवामना कायापकारकमनामोमपर्मश्रद्धया न पिवेनाप्यन्येभ्यो दापयेत्, रत्नाधिकेनापि संयं दानस्य प्रतिषशापना दापनग्रहणं 1 रह च " सदस्य संजमं संजमाओ अप्पाणमेवे" त्यादि भावनेति ॥१३९॥ अस्यैव विधिमाह- 'एगन्तति एधान्त अवमाम्य-गत्वा अचित्तं दग्धदेशादि मत्युपेक्ष्य चक्षुपा प्रमृज्य प रजोहरणेन स्थण्डिलमिति गम्पते पर-प्रसार प्रतिष्ठापयेत्, विधिना त्रिः पाक्यपून पुन्टजेन , प्रतिष्ठाप्प घमतिमागता प्रतिमामेत् ईगायिका । एतय गरिरागनियमकरणसिद्ध प्रतिकमणं अपहिरपि प्रतिष्ठाप्य प्रतिक्रयणनिपमशापनार्थ मिति ॥ १४ ॥ - सिआ य गोयरग्गगओ,इच्छिज्जा परिभुत्तुअं(भुजिउं)। कुट्ठगं भित्ति मूलं वा,पडिलेहित्ताण फासुअं॥ अणुन्नवित्तु मेहावी, परिच्छन्नंमि संवुडे । हत्थगं संपमजित्ता, तत्थ अॅजिज्ज संजए ॥१४२ ॥ तत्थ से भुंजमाणस्त, अट्ठिअं कंटओ सिआ। तणकटुसकरं वावि, अन्नं वावि तहाविहं ॥ १४३ ॥ तं उक्खिवित्तु न निक्खिवे, आसएण न छड्डए । हत्थेण तं गहेऊण, एगंतमवकमे ॥ १४४ ॥ एर्गतमवक्कमित्ता, अचित्तं पडिलेहिआ। जयं परिढविज्जा, परिटुप्प पडिक्कमे ॥ १४५ ॥ एवमन्नपानग्रहणविधिमभिधाय भोजनविधिमाह-'सिआ यत्ति-स्यात्-कदाचित् गोचराग्रगतो-ग्रामान्तरं भिक्षा प्रविष्ट इच्छेत्, परिभोक्तुं पानादिपिपासायभिभूतः सन् , तत्र साधुवसत्यभावे कोष्ठक-शून्यं चमठादि भित्तिमूलं वा- कुडथैकदेशादि प्रत्युपेक्ष्य-चक्षुषा प्रमृज्य च रजोहरणेन प्रासुकं-बीजादिरहितं चेति ॥ १४१॥ तत्र 'अणुनवित्तु'त्ति- अनुज्ञाप्य सागारिकपरिहारतो विश्रमणव्याजेन तत्स्वामिनमवग्रहं मेधावी-साधुः प्रतिच्छन्ने तत्र कोष्ठकादौ संवृत्तः- उपयुक्तः सन् साधुरीर्याप्रतिक्रमणं कृत्वा तदनु हस्तकं-मुखवस्त्रिकारूपमादायेति वाक्यशेषः। संप्रमृज्य विधिना तेन काय तत्र भुञ्जीत संयतो रागद्वेपावपाकत्येति सूत्रार्थः ॥१४२॥ 'तत्थ'त्ति-तत्र कोष्ठकादौ से-तस्य साधोः भुञ्जानस्यास्थि कण्टको वा स्यात्, कथञ्चित् गृहीणां प्रमाददोपा , कारणगृहीते पुद्गल एवेत्यन्ये । तृणं काष्ठं शर्करं चापि स्यात् , उचितभोजने अन्यद्वापि तथाविधं बदरकर्कटादीति ॥ १४३ ।। 'तं उक्विवित्तु' इति, तदस्थीत्युस्क्षिप्य हस्तेन यत्र । - कचिन निक्षिपेत् , तथा आस्पेन-मुखेन नोझेत्, माभूद्विराधनेति, अपि तु हस्तेन गृहीत्वा तदस्थ्यादि एकान्तमवक्रामे. दिति ।। १४४ ॥ 'एगंते'ति-एकान्तमवक्रम्याचित्तं प्रत्युपेक्ष्य यतं प्रतिष्ठापयेत् , प्रतिष्ठाप्य प्रतिक्षामयेदिति माता वदेवेति ॥ १४५॥ सिआ य भिक्खू इच्छिजा, सिजमागम्म भुत्तुअं। सपिंडपायमागम्म, उंडुयं पडिलेहिआ ॥१४६॥ विणएणं पविसित्ता, सगासे गुरुणो मुणी । इरियावहियमायाय, आगओ य पडिक्कमे ॥१४॥ आभोइचाण नीसेस, अईआरं जहकमं । गमणागमणे चेव, भत्तपाणे व संजए ॥१४८॥ उज्जुप्पन्नो अणुविग्गो, अवक्खित्वेण चेअसा । आलोए गुरुतगासे, जं जहा गहिरं भवे ॥१४९॥ न सम्ममालोइयं हुजा, पुर्वि पच्छा व जं कडं। पुणो पडिकमे तस्स, वोसट्टो चिंतए इमं ॥१५॥ अहो जिणेहिं असावजा, वित्ती साहूण देसिआ। मुक्खसाहणहेउस्स, साहुदेहस्सधारणा॥१५१॥ नमुकारेण पारित्ता, करित्ता जिणसंथवं । सज्झायं पढवित्ता गं, वीसमेज खणं मुणी ॥१५॥ चीसमंतो इमं चित्ते, हियमटुं लाभमविओ। जइ मेअणुग्गई कुजा, साहू टूजामि तारिओural %3D साहवो तो चिअत्तेणं, निमंतिज जहक्कम । जइ तत्थ केइ इच्छिज्जा, तेहिं सद्धिं तु मुंजए ॥१५४॥ अह कोई न इच्छिज्जा, तओ अॅजिज्ज एग(क)ओ। आलोए भायणे साहू, जयं अप्परिसाडियं ॥१५५॥ वसतिमधिकृत्य भोजनविधिमाह-'सिआ यत्ति, स्यात्कदाचित् तद् द्रव्यं कारणामावे सति भिक्षुरिच्छेदिति शय्यां-वसतिमागम्य परिभोकुं, तत्रायं विधिः-सह पिण्डपातेन-विशुद्धसमुदानेनागम्य, वसतिमिति गम्यते, तत्र बहिरेवोन्दुकं-स्थानं प्रत्युपेक्ष्य विधिना तत्रस्थः पिण्डपातं विशोधयेदिति सूत्रार्थः ॥ १४६ ॥ तत ऊर्ध्व 'विणएणं'त्ति विशोध्य पिण्डं वहिः 'विनयेन' नैपेधिकी नमः क्षमाश्रमणेभ्योऽञ्जलिकरणलक्षणेन प्रविश्य, वसतिमिति गम्यते, सकाशे गुरोः-मुनिर्गुरुसमीप इत्यर्थः। ईर्यापथिकीमादाय 'इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहियाए' इत्यादि सूत्रं पठित्वा, आगतश्च गुरुसमीपं प्रतिक्रामेत्-कायोत्सर्ग कुर्यादिति ॥ १४७ ॥ 'आभोहत्ताण'त्ति-तत्र कायोत्सर्गे आभोग- यित्वा-ज्ञात्वा निःशेषमतिचारं यथाक्रमं परिपाट्या, क्वेत्याह-गमनागमनयोश्चैव-गमने-गच्छत आगमने- आगच्छतो योऽतिचारः, तथा भक्तपानयोश्च-भक्ते पाने च योऽतिचारस्तं संयतः-साधुः कायोत्सर्गस्थो हृदये स्थापयेदिति ॥ १४८॥ विधिनोत्सारिते चैतस्मिन् 'उज्जुप्पन्नोति-ऋजुप्रज्ञः-अकुटिलमतिः सर्वत्र, अनुद्विग्न:- क्षुधादिजयात् प्रशान्ता, अव्याक्षिप्तेन चेतसा, अन्यत्रोपयोगमगच्छतेत्यर्थः, आलोचयेत् गुरुसकाशे-गुरोनिवेदये- दितिभावः । यदशनादि यथा-येन प्रकारेण हस्तप्रदा(धाव)नादिना गृहीतं भवेदिति सूत्रार्थः ॥ १४९ ॥ तदनु च न

कचिन निक्षिपेन, तथा आस्पेन-मुखेन नोज्क्षेत्, मा भूद्विराधनेति, अपितु हस्तेन गृहीत्वा तदस्थ्यादि एकान्तमवक्रामे-
दिति ॥ १४४ ॥ 'एगंते'ति-एकान्तमवक्रम्पाचित्तं प्रत्युपेक्ष्य यतं प्रतिष्ठापयेत्, प्रतिष्ठाप्य प्रतिफ्रामयेदिति
भावार्थः पूर्ववदेवेति ।। १४५ ॥
सिआ य भिक्खू इच्छिज्जा, सिजमागम्म भुत्तु। सपिंडपायमागम्म, उंडुयं पडिलेहिआ ॥१४६॥
विणएणं पविसित्ता, सगासे गुरुणो मुणी । इरियावहियमायाय, आगओ य पडिकमे ॥१४७॥
आभोइताण नीसेस, अईआरं जहकम । गमणागमणे चेव, भत्तपाणे व संजए ॥१४॥
उज्जुप्पन्नो अणुविग्गो, अवविखत्तेण चेअसा । आलोए गुरुसगासे, जं जहा गहिअं भवे ॥१४९॥
न सम्ममालोइयं हुजा, पुर्वि पच्छा व जं कडं। पुणो पडिकमे तस्स, वोसट्ठो चिंतए इमं ॥१५०॥
अहो जिणेहिं असावज्जा, वित्ती साहूण देसिआ। मुक्खसाहणउस्स, साहुदेहस्सधारणा॥१५॥
नमुकारेण पारित्ता, करिता जिणसंथवं । सज्झायं पट्टवित्ता णं, वीसमेज खणं मुणी ॥१५२॥
वीसमंतो इमं चित्ते, हियमद्वं लाभमदिओ। जइ मे अणुग्गहं कुन्जा, साहू छजामि तारिओ ॥१५३॥

साहवो तो चिअत्तेणं, निमंतिज जहक्कमं । जइ तत्थ केइ इच्छिज्जा, तेहिं सद्धिं तु भुंजए ॥१५४॥ अह कोई न इच्छिज्जा, तओ जिज्ज एग(क)ओ। आलोए भायणे साहू, जयं अप्परिसाडियं ॥१५५॥ वसतिमधिकृत्य भोजनविधिमाह-'सिआ यत्ति, स्यात्कदाचित् तद् द्रव्यं कारणामा सति भिक्षुरिच्छेदिति शय्यां-वसतिमागम्य परिभोकुं, तत्रायं विधिः-सह पिण्डपातेन-विशुद्धसमुदानेनागम्य, वसतिमिति गम्यते, तत्र वहिरेवोन्दुकं-स्थानं प्रत्युपेक्ष्य विधिना तत्रस्थः पिण्डपातं विशोधयेदिति सूत्रार्थः ॥ १४६ ॥ तत ऊर्च 'विणएणं'त्ति विशोध्य पिण्डं वहिः 'विनयेन' नैपेधिकी नमः क्षमाश्रमणेभ्योऽञ्जलिकरणलक्षणेन प्रविश्य, वसतिमिति गम्यते, सकाशे गुरोः-मुनिर्गुरुसमीप इत्यर्थः। ईर्यापथिकीमादाय 'इच्छामि पडिकमिउं हरियावहियाए' इत्यादि सूत्रं पठित्वा, आगतश्च गुरुसमीपं प्रतिक्रामेत्-कायोत्सर्ग कुर्यादिति ॥ १४७ ॥ 'आभोइत्ताण'त्ति-तत्र कायोत्सर्गे आभोग- यित्वा-ज्ञात्वा निःशेषमतिचारं यथाक्रमं परिपाट्या, क्वेत्याह-गमनागमनयोश्चैव-गमने-गच्छत आगमने- आगच्छतो योऽतिवारः, तथा भक्तपानयोश्च-भक्त पाने च योऽतिचारस्तं संयतः-साधुः कायोत्सर्गस्थो हृदये स्थापयेदिति ॥ १४८ ॥ विधिनोत्सारिते चैतस्मिन् 'उज्जुप्पन्नो'त्ति-ऋजुप्रज्ञः-अकुटिलमतिः सर्वत्र, अनुद्विग्नः- क्षुधादिजयात् प्रशान्तः, अव्याक्षिप्तेन चेतसा, अन्यत्रोपयोगमगच्छतेत्यर्थः, आलोचयेत् गुरुसकाशे-गुरोनिवेदये- दितिभावः । यदशनादि यथा-येन प्रकारेण हस्तप्रदा(धाव)नादिना गृहीतं भवेदिति सूत्रार्थः ॥ १४९ ॥ तदनु च न कपिन निधिपे , तथा आस्पेन-मरोन नोझेत्, माद्विराधनेति, अपि तु हस्तेन गृहीत्वा तदस्थ्यादि एकान्तमयकामे. दिति ॥ १५ ॥ 'गंतेति-एकान्तमयक्रम्मानित्तं प्रत्युपेक्ष्य यतं प्रतिष्ठापपेत्, प्रतिष्ठाप्य प्रतिफामपेदिति माता पूर्वदेवेति ॥ १४५ ॥ सिआ य भिक्खू इच्छिजा, सिजमागम्म भुत्नुअं। सपिंडपायमागम्म, उंडुयं पडिलेहिआ ॥१४६॥ विणएणं पपिसिचा, सगासे गुरुणो मुणी । इरियावहियमायाय, आगओ य पडिकमे ॥१४७॥ आभोइचाण नीसेस, अईआरं जहकमं । गमणागमणे चेव, भत्तपाणे व संजए ॥१४८॥ उज्जुप्पलो अशुधिग्गो, अक्सित्तेण चेअसा। आलोए गुरुतगासे, जं जहा गहिअं भवे ॥१४९॥ न सम्ममालोइयं हुजा, पुर्वि पच्छा व जं कई। पुणो पडिकमे तस्स, वोसट्ठो चिंतए इमं ॥१५॥ अहो जिणेहिं असावजा, वित्ती साहूण देसिआ। मुक्खसाहणहेउस्स, साहुदेहस्स धारणा ॥१५१॥ नमुकारेण पारित्ता, करिता जिणसंधवं । सम्झायं पढवित्ता णं, वीसमेज खणं मुणी ॥१५२।। वीसमंतो इमं चित्ते, हियमढें लाभमविओ। जद मे अणुग्गई कुजा, साहू गुजामि तारिओ ॥१५३॥ १ त् साधुस्ततो भुञ्जीत एकको-रागादिरहित इति । कथं भुजीतेत्यत्राह-आलोके भाजने मक्षिका- प्रकाशप्रधाने भाजन इत्यर्थः । साधुः-प्रबजितः यतं-प्रयत्नेन तत्रोपयुक्तं, अपरिशाट-हस्तमुखाम्यां ते।। १५५ ॥ गराव कडुअंव कसायं, अविलं व महुरंलवणंवा । एअलद्धमन्नत्थ पउत्तं, महुघयंव भुजिज्ज संजए । अरसं विरसं वावि, सूइअं वा असूइथे। उल्लं वा जइवा सुकं, मंथुकुम्मासभोअणं ॥ १५७ ॥ उप्पण्णं नाइहीलिज्जा, अप्पं वा बहुफासुअं । मुहालद्धं मुहाजीबी, भुजिज्जा दोसवजिअं ॥१५८॥ दुल्लहाउ मुहादाई, मुहाजीवी वि दुल्लहा। मुहादाई मुहाजीवी, दोवि गच्छांत सुग्गइं॥१५९॥तिवेमि॥ पिंडेसणाए पढमो उद्देसो समत्तो ५-१ ॥ भोज्यमधिकृत्य विशेपमाह-'तित्तगं वत्ति-तिक्तकं वा एलुकवालुकादि, कटुकं वाऽऽकतीमनादि, कपायं बल्लादि, आम्लं तक्रारनालादि, मधुरं क्षीरमध्यादिकं, लवणं वा प्रकृतिक्षारं तथाविधशाकादिलवणोत्कटं वान्यत् , एतत् तिक्तकादि लब्धं-आगमोक्तेन विधिना प्राप्त अन्यायं "अक्षोपाङ्गन्यायेन" परमार्थतो मोक्षार्थ प्रयुक्तं तत् माधकमिति कृत्वा मधुकृत मिव भुञ्जीत संयतः, न वर्णाद्यर्थ । अथवा मधुघृतमिव " नो वामाओ हणुयाओ दाहिणं हणुयं संचारेज"त्ति ।। १५६ ॥ किञ्च-'अरसं 'ति अरसं-अप्राप्तरसं हिग्वादिभिरसंस्कृतमित्यर्थः, विरसं वा-विगतरसमतिपुराणौदनादि, सुचितं- BAM . 'मम 'त्ति-न सम्पगालोषितं मयेत् सुक्ष्मं अज्ञानान् अनामोगेनाननुस्मरणाद्वा, पूर्व पश्चाद्वा पत्कृतं, पुराकर्म पघाफम्म स्पः । पुनरालोगनोतरकालं प्रतिक्षामेत् , तस्य-सूक्ष्मातिचारस्य 'इच्छामि पडिक्कमिउं गोयरचरियाए' इत्यादि एप पठिन्वा व्युत्माट:-कायोत्सर्गस्थः, चिन्तयेदिद-वक्ष्यमाणलक्षणमिति ॥ १५० ॥ 'अहो जिणेहिं' 'अहो' पिस्मरे, जिन:-जीर्य करः, असायद्या-अपापा, वृत्तिः-वर्चना, साधूनां दर्शिता देशिता वा मोक्ष मापनईनो-मम्पगदर्शनज्ञाननारित्रसाधनस्य साधुदेहस्य धारणाय-संधारणार्थमिति ।। १५१ ।। ततश्च 'नमोकारे। 'नि-नमस्कारेण पारयित्या 'नमो अरिहंताणमित्यनेन, कृत्वा जिनसंस्तवं " लोगसुजोगरे" इत्यादिरूपं, अ(त)तो गरिन प्रस्थापितम्ततः साध्या प्रस्थाप्य मण्डल्युपजीयरुस्तमेव कुर्यात् यापदन्ये आगच्छन्ति, यः पुनस्तदन्यः चपकाति: मोऽपि प्रस्थाप्य विश्राम्पेत् क्षणं-स्तोककालं मुनिरिति ॥१५२५ 'वीरसमंतोत्ति-विधाम्यन्निदं चिन्तयेत् परिंगतेन तमा, हित-कल्पाप्राकमर्थ-पक्ष्यमाणलक्षणं, किंविशिष्टः सन् १ भावलामेन-निर्जरादिनार्थोऽस्येति, लामाषिका, पदि मे-ममानुग्रहं : माधवः प्रामुफपिण्डग्रहणेन ततः स्यामहं तारितो मयममुद्रादिति ॥ १५३ ॥ एवं मशिन्रयोचितरेलायो भामार्यमामन्त्रयेन् , यदि गृहाति सोमन, नो पेद्वक्तव्योऽमो भगवन् । देहि कम्योऽप्यतो यदातष्प, बतो पदि दहाति गुन्दर, अय मगति समेव प्रयच्छ' अत्रान्तरे 'साहवो'त्ति-साधूस्ततो गुनुिज्ञातः सन् "घिअत्तेणं'ति । मनाप्रनिपानेन निमन्त्रपेत् यथाशमं ययारत्नाषिकनया, "प्रदणौचित्यापेक्ष्या गालादिक्रमेणे"त्पन्ये। यदि तत्र केपन । धर्मराया रडेयुः-अम्पुरगाछैपा, तवस्ती मा भुजीतोचित विभागदानेनेनि ॥ १५४ ॥ अह कोई ति अथ कश्चिन्नेच्छेत् साधुस्ततो भुञ्जीत एकको-रागादिरहित इति । कथं भुञ्जीतेत्यत्राह-आलोके भाजने मक्षिका- द्यपोहाय प्रकाशप्रधाने भाजन इत्यर्थः । साधुः-प्रवजितः यतं-प्रयत्नेन तत्रोपयुक्तं, अपरिशाट-हस्तमुखाम्यां अनुज्झन्निति ॥ १५५ ॥ तित्तगंव कडुअंव कसायं, अविलं व महुरं लवणंवा। एअलद्धमन्नत्थ पउत्तं, महुघयंवभुजिज्ज संजए । । अरसं विरसं वावि, सूइअं वा असूइअं। उल्लं वा जइबा सुकं, मंथुकुम्मासभोअणं ॥ १५७ ॥ उप्पण्णं नाइहीलिज्जा, अप्पं वा बहुफासुअं। मुहालद्धं मुहाजीवी, भुजिज्जा दोसवजिअं ॥१५८॥ दुल्लहाउ मुहादाई, मुहाजीवी वि दुल्लहा। मुहादाई मुहाजीवी, दोवि गच्छति सुग्गइं॥१५९॥तिबेमि॥ पिंडेसणाए पढमो उद्देसो लमत्तो ५-१ ॥ भोज्यमधिकृत्य विशेपमाह-'तित्तगं वत्ति-तिक्तकं वा एलुकवालुकादि, कटुकं वाऽऽकतीमनादि, कपायं वल्लादि, आम्लं तक्रारनालादि, मधुरं क्षीरमध्नादिकं, लवणं वा प्रकृतिक्षारं तथाविधशाकादिलवणोत्कटं यान्यत्, एतत् तिक्तकादि लन्ध-आगमोक्तेन विधिना प्राप्त अन्याथं "अक्षोपानन्यायेन" परमार्थतो मोक्षार्थ प्रयुक्तं तन् मायकमिति कृत्वा मधुत मिव भुञ्जीत संयतः, न वर्णाद्यर्थ । अथवा मधुघृतमिव " नो यामाओ हणुयायो दाहिणं हणुयं संचारेज"ति ।। १५६ ।। किञ्च-'अरसं'ति अरसं-अप्राप्तरसं हिवादिभिरसंस्कृतमित्यर्थः, विरसं वा-विगतरसमतिपुराणौदनादि, सूचितं- 'मम 'ति-न मम्पगालोचित भयेत् सूक्ष्म अज्ञानात् अनाभोगेनाननुस्मरणादा, पूर्व पश्चाद्वा यत्कृतं, पुरस्कर्म पयामर्म गस्त्यर्थः । पुनरालोचनोचरकाल प्रतिकामेत् , तस्य-सूक्ष्मातिचारस्य 'इच्छामि पडिकमिउं गोयरधरियाए' इत्यादि पुत्र पठित्वा व्युत्सृष्टा-कायोत्सर्गस्था, चिन्तयेदि-वक्ष्यमाणलक्षणमिति ॥ १५० ॥ · अहो जिणेहिं' 'अहो' पिस्मये, जिन:-तीर्थकरः, असाघया-अपापा, वृत्तिा-वर्चना, साधूनां दर्शिता देशिता वा मोक्षः गाधनहेनो-मम्पगदर्शनशानचारित्रसाधनस्य साधुदेहस्य धारणाय-संधारणामिति ।। १५१ ।। ततश्च 'नमोकारे। 'नि-नमस्कारेण पारपित्या 'नमो अरिहताण'मित्यनेन, कृत्वा जिनसंस्तवं " लोगस्सुअोगरे" इत्यादिरूपं, अ(त)तो गदिन पूर्व प्रस्थापितस्ततः स्वाध्याय प्रस्थाप्य मण्डल्युपजीयकस्तमेर कुर्थात् यापदन्ये आगच्छन्ति, यः पुनस्तदन्यः धपकादिः मोऽपि प्रस्थाप्य विश्राम्पेत् क्षणं-स्तोककालं मुनिरिति ॥१५२।। 'वीरसमंतोत्ति-विभाम्यन्निदं चिन्तयेत् परिणतेन शेतमा, हित-पल्याणप्रापकमध-पक्ष्यमाणलक्षणं, किंविशिष्टः सन् ? भावलामेन-निर्जरादिनार्थोऽस्येति, लामाषिक', पदि मे-ममानुग्रह कुर्युः माधवः प्रासुरुपिण्डग्रहणेन ततः स्यामहं तारितो भवसमुद्रादिति ॥ १५३ ।। एवं समियोचितवेलापा मापार्यमामन्त्रयेत् , यदि गृहाति शोमनं, नो पेद्वक्तव्योऽमो भगवन् । देहि केभ्योऽप्यतो यदातव्यं, ततो पदि दावि गुन्दरं, अथ भगति-'समेव प्रयच्छ' अत्रान्तरे 'साहवोत्ति-साधूस्ततो गुर्पनुजासः सन् 'चिअत्तेणं'त्ति मन प्रणिधानेन निमन्प्रपेत् पयाममं यथारत्नाधिकतया, "ग्रहणौचित्यापेक्षपा यालादिकमेणे"त्पन्थे । यदि तत्र फेधन धर्मान्धरा इच्छेपुः-अभ्युपगच्छेपा, ततस्तो मा भुशीतोपितसंविभागदानेनेति ॥ १५ ॥ अह कोईत्ति अथ -- कश्चिन्नेच्छेत् साधुस्ततो भुशीत एकको-रागादिरहित इनि । कथं भुजीनेत्यवाह-आलोके भाजने गधिका- द्यपोहाय प्रकाशनधाने भाजन इत्यर्थः । साधुः-प्रमनितः यत-प्रयत्नेन तमोपयुक्त, अपरिशाद-हसतमुखाम्या अनुज्झन्निति ।। १५५ ॥ तित्तगंव कडुअंव कसायं, अंबिलं व महुरं लवणं वा । एअलद्धमन्नस्थ पउत्तं, महुययं व भुजिज्ज संजए । अरसं विरसं वावि, सूइअं वा असूइअं। उल्लं वा जइवा सुकं, मंथुकुम्मासभाअणं ॥ १५७ ।। उप्पण्णं नाइहीलिज्जा, अप्पं वा बहुफासुअं । मुहालद्धं मुहाजीबी, भुंजिना दोसवनि ॥१५॥ दुल्लहाउ मुहादाई, मुहाजीवी वि दुलहा। मुहादाई मुहाजीची, दोवि गच्छति सुग्गइं॥१५९॥तिवेमि।। पिंडेसणार पडमो उद्देसो समत्तो ५-१ ॥ भोज्यमधिकृत्य विशेषमाह-'तित्तगं यत्ति-निता या एकगालाति, कटुक नाईकनीनानि, कपायं महादि, आम्लं तकारनालादि, मधुरं शीरममादिकं, लगणं ना प्ररुनिसार नाशिषमा कादिलपोत्कटं नान्गन , पलत् निकादि लब्ध-आगमोक्तेन विधिना प्राप्त अन्याय "गोगहन्यायेन" परमानो मोडायं प्रयुफ नत् गामिनि कयामत मिव भुञ्जीत संयतः, न वर्णाय । अथना गपगमिन " नो वामानोपानी दाहिदणुपं मंगारे"गि १५ ॥ किश्च-'आरसं 'ति अरसं-अमाप्तरसं हिनादिमिर संस्कनमित्या, विरम गा-विगतममणिपुरानौदनादि, नितं- - पप्रनादिप अमित पा-हित या, "कथपिता अपयिया या दव "मित्यन्पे । आर्द्र-प्रचुरण्यअनं, यदि या गुणे-गोपना, सिदिरपा-मागुल्मापमोजन माणु-पदरपूर्णादि, कुस्मापा:-सिमापाः, "यामापा" इति । पिदिति ॥ १५ ॥ योजनं लिमित्यार- उत्पत्ति सं, उसन-विपिना प्राप्त, नातिहीलयेत्-मर्वया न निन्दः १. रामाश्मेशन नामिति बिपनेन । पर या अमारप्रायमिति । वासदस्य पहिता सम्बन्धः, किंविशिष्ट गरिया-सर-प्रगलागु निमित्यः । अन्ये तु मारने-" असं का, पाशब्दाद्विरमादिया, पहु प्रासुकं-गया पारिति, अपि ले मारपेट-पोयेह लोका ममानुपकारिणा प्रान्ति तदेव शोमनमिति, पाधा लन्ध- संपरा प्राम. मुहालीगी-पा प्रनिदानजीसी, "जात्यापनाजीक "इत्यन्पे, मुजीत दोपर्जित- पंपोमिति ॥ १५८ ॥ एतापमपि दर्शपति-'दुलहत्ति-दुर्नमा एर मुपादाना, तथाविधभागयतयत् । Pura मा नपारिगेडम, अमीता फरमाह-उपादातारो भाजीनिय द्वारयेतो गच्छतः मुगति- farmficामिएननार, कदानित दवनोहगुमानुपसत्यागमपरम्परपा, प्रपीमीति यत् । সব সাবলীল ২)-ঋষি যদি মনাষি মপি ময়দা-বধি মীলায়নি । यो नागणे निरगिरपामि नेनो-पाद मदीया तिन नेनोम-ए ये ना प्रदानेन तस्मे पापा ने नार मोनादिमिका पनि निकालिपि काले एकता प्रापिरियार मागरताप प्राध्यामात IGHERARANASINIVsh art" तेऽन्यत्रोपययुः, अत्रान्तरे प्रातरेव स्नातुं परिव्राजकस्तडागमुपजगाम, दृष्टश्च तेन सरःसमीपवर्तिन्यां जाल्पामसौ तुरंगमः, प्रत्यभिज्ञातथापि सोऽयमश्वः, योऽस्माकमुपकारिणो भागवतस्य तस्करैरपहृतः, ततस्तेन गत्वा स्वमावासं अग्रे गृहपति- पुरुषाणामुक्तं-यथा मम स्नातुमितः सरसि गतस्य जाल्पां धौतवासो विस्मृतं, ततस्तैः पुमान् प्रहितः, तेन च तत्र गतेन दृष्टोऽसो वाजी समानीतश्च, कथितो गृहपतये, ततस्तेन समचिन्ति-अपि व्याजेन वतिना ममोपकारः कृतस्तत्कथमहं निर्व्याजदानफलं विहाय प्रत्युपकारेण दानप्रवृत्तिं विदधामीति संप्रधार्य गदितोऽसौ परिव्राजका-भद्र ! बज त्यमिदानी, न कृतोपकारिणे भवते तप्ति विधास्यामि, यसादुपकारिणि विहितं दानं निष्फलं उपजायत इति, एप मुघादायीति । मुधाजीविन्युदाहरणमुच्यते(६०४)-कश्चिन्नरपतिरनित्यतां विलोक्य प्रियाणामपि पुत्रकलत्रमित्रपौत्रादीनां समुपजात- वैराग्यो धर्माधर्मपरीक्षा चक्रे, को वा अनिसृष्टं भुक्ते ? ततस्तं परीक्षयामीति संप्रधार्य पुरुषानामुधिकयादिदेश यथा राजा मोदकान् प्रयच्छति, समागत्य परिगृह्यतामिति । समाकर्योद्घोषणामुपजग्मुः कार्पटिकप्रभृतयोमर्थनो जनाः, पृष्टाश्च ते भूभुजा- केन भवन्तो जीवन्ति ?, तत्रैकेनोक्तं-अहं तावत् मुखेन । अपरेण गदितं-अहं पादाम्यां, अपरेणोक्तं-अई हस्ताभ्यां, अन्येन निवेदितं-अहं लोकानुग्रहणेन, क्षुल्लकसाधुनोक्तं-अहं मुधिकयेति, ततस्तां नरपतिः पुनरपि जगाद-कथमेवेति । ततः प्रथमो जगाद-अहं तावत्कथको जनानां विस्तार्य रामायणादिकयां कथयामि तेन मुखेन जीवामीति । द्वितीयः प्राह-अहं हि लेखवाहको घटिकामध्ये योजनं लंघयामि, तेन पादाम्यां जीवामि । तृतीयः प्राद-अहं हि लेखकः, अतो हस्ताभ्यां जीवामि । भिक्षुकेणोक्तम्-अहं प्रवजितः अतो लोकाणामनुग्रहेण निर्वहणं । पुनः क्षुल्लकसाधुनोक्तं, प्रबजितोऽहं जन्मजरा.

मागासष्याप्युपद्राशतोपदन दारिगदौम्पिकलयात कलुपितमिष्टवियोगानिष्टसंयोगःग्वजनितशतरकायं क्षुधापि । पागामाता मनमहससाल दन्पचिंताजरादिभिः धणमप्यमुक्तसमीपं संसार विलोक्य, ततो निर्विणः प्रतिपयामुं शारीर मानमानस्ताव जलपिविलपनरोतुं मौमाग्यसौनन्यौदार्योपकारकरणपदिष्टं चानविज्ञानजनक पिजितममस्तराजन्यचक्रराज- मादक प्राममपादित मुखातिश्यसदोह मोवालदायकं जैनधर्म, ततो मुधिया यथोपलब्धेनाहारजातेन जीवामीति । नित्राप दापितमहा एष धम्मा मर्वासमोशमाधक इति निविस्य, विशेषणाचार्यममीपे धर्ममाकर्ण्य प्रतियुद्धो राज्ये सुतं मस्याप्य प्रपाममौ नरपनिरग्रहीन । एष सधानीतीति ।। १५९ ॥ ॥ इति पिण्ठपणाध्ययनस्य प्रथमोद्देशकः ५-१॥ पहिगाह सलिहिता णं, लेवमायाए संजए । दुगंधं वा सुगंधं वा, सर्व भुंजे न छहुए ॥ १६०॥ पिपरणापा मधमोद्देशक एस प्रकान्नोपयोगि यत्रोक्तं तद् द्वितीये समुपदर्शयमाह-'पहिरगति-प्रतिग्रह- पाजन, मलिप-प्रशिया नितपर्व करपा, कपमित्याह--लेपमादपा-अलेपं संलिप, संयता-गाः, दुर्गन्धि था शुगनिया मोउन जातं, गन्यप्रदणं रसागुलशगं, म-निरवशेष मुनीत-प्रश्नीया, नोउमेत-गोत्यजेत् विशिपि, मान्यापारा, अन्य सा- या plean गोनोमि । प्रनिनिय पारिया नया मा भूपिने प्रत्यार्पप गरीपापानाप सापोः व्यापयोपन्याम निप्रहसम्यो मालिक पुरेशाको

• विचित्रा चःसूत्रगतिरिति ॥ १६०॥
सेज्जा निसीहियाए, समावन्नो य गोअरे । अयावयट्ठा भुच्चा णं, जइ तेणं न संथरे ॥ १६१ ॥
तओ कारणमुप्पण्णे,. भत्तपाणं गवेसए । विहिणा पुवउत्तेणं, इमेणं उत्तरेण यः ॥ १६२ ॥
विधिविशेषमाह- सेज 'त्ति शय्यायां-बसतो नैपेधिक्या-स्वाध्यायभूमौ शय्यैव वा असमञ्जसनिपेधान्नैपेधिकी
तस्यां समापन्नो वा गोचरे, क्षपकादिः, छात्र(छन्न)मठादौ च, अयावदर्थ भुक्त्या न यावदर्थ अपरिसमाप्तमित्यर्थः ।
णमिति. वाक्यालङ्कारे । यदि तेन-भुक्तेन, न संस्तरेत न यापयितुं समर्थः, क्षपको विषमवेलापत्तनस्थो. ग्लानो वा
भवति ।। १६१ ॥ 'तओ'त्ति ततः कारणे-वेदनादौ उत्पन्ने पुष्टालम्बनः सन् भक्तपानं गवेपयेत्-अन्येपयेत्
अन्यथा सकृद्भुक्तमेव यतीनामिति । विधिना पूर्वोक्तेन “संप्राप्ते भिक्षाफाल" इत्यादिना, अनेन च वक्ष्यमाणलक्षणेनो-
त्तरेण चेति ।।१६२ ।।
कालेण निक्खसे भिक्खू, कालेण य पडिकमे । अकालं च विवजित्ता, काले कालं समायरे ॥१६३॥
अकाले चरसी:भिक्खू, कालं न पडिलेहसि। अप्पाणं च किलामेसि, संनिवेसं च गरिहसि ॥१६॥
सइकाले चरे भिक्खू, कुजा पुरिसकारिअं । अलाभुत्ति न सोइज्जा, तवृत्ति अहिआलए ॥ १६५ ॥

- मरणरोगमायुपद्रवोपन दारिगदौग्यिालयात कलुपितमिष्टवियोमानिष्टसंयोगदुःख जनित हशतरकार्य क्षुधापि. पागामालेममइससहल देन्पचिंताजरादिभिः धणमप्यमुक्तसमीपं संसार विलोक्य, ततो निर्विष्णः प्रतिपया शारीर. मानगानमा जलधिरिलपनरोतुं गौभाग्यमोजन्यौदार्योपकारकरणपटिष्टं धानविज्ञानजनक विजितममस्तराजन्यमराज- मादक पगाराममपादितावानिशपसदोई मोशफलदायकं जैनधम्म, ततो मुघिकपा यथोपलब्धेनाहारजातेन जीवामीति । निमाप तापितमहो एष धामी गर्वासमोशमापक इति निविस्य, विशेषेणाचार्यममीपे धर्ममाकर्ण्य प्रतिपुदो राज्ये सुत मस्याण प्रमापाममौ नापतिरप्रदीन् । एष सुधाजीनीति ॥ १५९ ॥ ॥ इति पिण्डेपणाध्ययनस्य प्रथमोडेशमा ५-१ ।। । पडिगई संलिहिता णं, लेगमायाए संजए । दुगंधं वा सुगंधं वा, सर्प भुंजे न छाप ।। १६० ।। गिरणा धमोदेशक पर प्रशालोपयोगि यसो त द्वितीये ममुपदर्शयनाद-पडिग्गति प्रतिप्रदं-- पावन, मंहिता-प्रमिया निवप करया, कथमित्पा:--खेपमर्यादया अलेपं संलिप, संपत्ता-पायु, दुर्गन्धि या गुगलिया भोजनात, गन्धग्रहण रमापुरलयमं, स-निरपोपं भुनोत-अभीयात् , नोग्नेत-नोरराजे किमिदपि, मागमति अनाप गरीययापनापसायो व्यापयोगाALIनि मालिक परेशानी मायामा रा, प्रत्यया स्या- नो नो पनि लिए पात्या मता।

Sand विचित्रा च सूत्रगतिरिति ॥ १६॥ सेज्जा निसीहियाए, समावन्नो य गोअरे । अयावयट्ठा भुच्चा णं, जइ तेणं न संथरे ॥ १६१ ॥ तओ कारणमुप्पण्णे, भत्तपाणं गवेसए । विहिणा पुवउत्तेणं, इमेणं उत्तरेण यः ॥ १६२ ।। विधिविशेषमाह- सेन 'त्तिं शय्यायां-वसती नैपेधिक्यां-स्वाध्यायभूमौ शय्यैव वा असमञ्जसनिषेधान्नैपेधिकी तस्या, समापन्नो वा गोचरे, क्षपकादिः, छात्र(छन्न)मठादौ च, अयावदर्थ सुक्या न यावदर्थ अपरिसमाप्तमित्यर्थः ।। णमिति वाक्यालङ्कारे । यदि तेन-मुक्तेन, न संस्तरेत न यापयितुं , समर्थः, क्षपको विषमवेलापत्तनस्थो ग्लानो वा भवति ।। १६१ ॥ 'तओ 'त्ति ततः कारणे-वेदनादौ उत्पन्ने पुष्टालम्बनः सन् भक्तपानं, गवेपयेत्-अन्वेषयेत् अन्यथा सकृद्भुक्तमेव यतीनामिति । विधिना पूर्वोक्तेन “संप्राप्ते मिक्षाकाल" इत्यादिना, अनेन च वक्ष्यमाणलक्षणेनो- त्तरेण'चेति ॥ १६२ ।। कालेण निक्खसे भिक्खू, कालेण य पडिक्रमे । अकालं च विवर्जित्ता, काले कालं समायरे ॥१६३॥ अकाले चरसी:भिक्खू, कालं न पडिलेहसि। अप्पाणं च किलामेसि, संनिवेसं च गरिहसि ॥१६॥ सइकाले चरे भिक्खू, कुजा पुरिसकारिअं । अलाभुत्ति न सोइजा, तवृत्ति अहिआलए ॥ १६५ ॥ । - मध्याप्यपद्रपशनोएट्रन दारिगदौर्भाग्यलक्ष्यात कलुपिनमिष्टवियोगानिष्टसंयोगदुःख जनितकशवरकार्य क्षुधापिः । पामाशाप्रमहससाल दन्यचिंताजरादिभिः षणमयमुक्तसमीप ससार विलोक्य, ततो निर्विणः प्रतिपया शारीर मानमानकाख नलपिविरुघनरोतु सौमाग्पसौजन्यौदार्योपकारकरणपटिष्ट ज्ञानविज्ञानजनकं विजितममस्तराजन्यचक्रराज. मपादक समसपादित ग्वातिश्पसदोह मोशरूलदायक जैनधम्म, ततो मुधिकया यथोपलब्धेनाहारजातेन जीवामीति । निशम्प नदापितमहो एष धर्मः सर्वदुरखमोशमापक इति निविस्य, विशेषेणाचार्यममीपे धमाकर्प प्रतिपुदो राज्ये सुतं गस्थाप्य प्रमनपाममो नस्पतिरग्रहीन । एष मुधाजीनीति ॥ १५९ ॥ ॥ इति पिपदेपणाध्ययनस्य प्रथमोद्देशकः ५-१॥ पडिग्गद सलिहिता णं, लेगमायाए संजए । दुगंधं वा सुगंधं वा, सर्व भुंजे न छड्डए ॥ १६० ।। पिण्डेरणाया प्रथमोद्देशक एव प्रान्तोपयोगि यघोक्तं तद् द्वितीये ममुपदर्शयमाह-'पडिग्गहंति-अतिमहं-- मात्रन, मंलिहा-प्रदेशिनपा निरवय कस्वा, कथमित्याह--लेपमर्यादया अलेपं संलिप, संपत्ता-सापा, दुर्गन्धि था' सुगन्धि वा भोजनातं, गन्यग्रहणं रमापुरलक्षणं, सर्व-निरवशेष मुशीत-अन्नीयात् , नोग्शेत्-नोरसुजेन विभिदपि, पामसंयमपिनेति। प्रत्यार्पण गरीपासपणापनाय प्रायोः व्यस्पयोपन्यास प्रतिप्रशम्दो मालिक परेशानी मायामा श, अन्यथै स्यान्- या गुणनिया गई मनोन नो । प्रमिला लेपपरिया गया।

विचित्रा च सूत्रगतिरिति ।। १६०.॥ सेज्जा निसीहियाए, समावन्नो य गोअरे । अयावयट्ठा भुच्चा णं, जड़ तेणं न संथरे ।। १६१ ॥ तओ कारणमुप्पण्णे, भत्तपाणं गवेसए । विहिणा पुवउत्तेणं, इमेणं उत्तरेण यः ॥ १६२ ।। विधिविशेषमाह-' सेन 'त्ति शय्याया-बसतो नैपेधिक्या-स्वाध्यायभूमौ शय्यय या असमञ्जसनिषेधान्नधिको तस्या, समापनो वा गोचरे, क्षपकादिः, छात्र(छन्न)मठादौ च, अयावदर्थ सुत्या न याद अपरिसमारामित्यर्थः । णमिति वाक्यालङ्कारे । यदि तेन-मुक्तेन, न संस्तरेत न यापयितुं समर्थः, आपको विषमवेलापत्तनस्थो ग्लानो वा भवति ।। १६१ ॥ तओ 'त्ति ततः कारणे-वेदनादौ उत्पन्ने पुष्टालम्बनः सन् भक्तपानं गवेषयेत्-अन्येपयेव अन्यथा सद्भुक्तमेव यतीनामिति । विधिना पूर्वोक्तेन "संप्राप्ते मिक्षा काल" इत्यादिना, अनेन च वक्ष्यमाणलक्षणेनो- त्तरेण चेति ।। १६२ ॥ कालेण निक्खमे भिक्खू, कालेण य पडिक्कमे । अकालं च विवजित्ता, काले कालं समायरे ॥१३३॥ अकाले चरसी भिक्खू, कालं न पडिलेहसि। अप्पागं च किलामेसि, संनिवेसं च गरिहसि ॥१६४॥ सइकाले चरे भिक्खू, कुजा पुरिसकारिअं । अलाभुत्ति न सोइजा, तयुत्ति अहिआसप ॥ १५ ॥ .

तहेवुच्चावया पाणा, भत्तट्ठाए समागया। तं उज्जुअं न गच्छिज्जा, जयमेव परकमे ॥१६६॥ गोयरग्गपविट्ठो अ, न निसीए(इ)न कत्थई। कहं च न पबंधिजा, चिट्ठित्ता ण व संजए ॥१६७॥ अग्गलं फलिहं दारं, कवाडं वावि संजए। अवलंविआ न चिटेज्जा, गोयरग्गगओ मुणी ॥१६८॥ समणं माहणं वावि, किविणं वा वणीमगं । उवसंकमंतं भत्तट्ठा, पाणट्ठाए व संजए ॥१६९॥ तमइकमित्तु न पविसे, नवि चिट्टे चक्खुगोयरे। एगंतमवकमित्ता, तत्थ चिट्ठिज संजए ॥१७॥ वणीमगरस वा तस्स, दायगस्सुभयस्स वा । अप्पत्ति सिआ हुजा, लहुत्तं पश्यणस्स वा ॥१७१॥ पडिसेहिए व दिने वा, तओ तम्मि नियत्तिए । उपसंकमिज भत्तट्ठा, पाणट्ठाए व संजए ॥१७२॥ फालेणत्ति, यो पस्मिन् पामादायुचित्तो भिषाकालस्तेन फरणभूतेन निष्कामेत्, भिक्षुर्मती प्रजेत् पमतेभिः थापे, कालेन चोचितेनैव पावता स्वाध्यायादि निप्पयते तावता प्रतिप्रामेत्-नियत, मणियं च-"खितं कालो भायण विनि वि पहुप्पंति हिंडउ'चि अदुभंगा", अकाल व पर्जयित्वा येन स्वाध्यापादि न संभाव्यते, स सवकाला समपास्य | काले कालं समाघरेदिति सर्वयोगोपसहाय निगमन, मिशावेलायां भिक्षा समाचरेत् , स्वाध्यादिषेलापा स्वाध्यायादी: नीति । उक्तं च-"जोगो जोगो जिणसासणमि दुक्सक्खया पजते । अमोलममाहाए प्रायत्तो होर फाययो ॥ १॥"

- (ओघ०नि० गा० २७७ )॥१६३ ।। अकालचरणे दोपमाह-अकालेत्ति, अकालचारी कश्चित्माधुरलब्धभक्षः केनचित्माधुना 'प्राप्ता भिक्षा न वे'त्यमिहितः सन्नेवं यात्-कुतोऽत्र स्थाण्डिलसनिवेशे भिक्षा ?, स तेनोक्तः-अकाले चरसि भिक्षो! प्रमादात् स्वाध्यायलोभाद्वा, कालं न प्रत्युपेक्षसे, किमयं भिक्षाकालो न वेति, अकालचरणेनात्मानं च लामयसि (ग्लपयसि) दीर्घाटनन्यूनोदरतामावेन, सन्निवेसं च गर्हसि भगवदाज्ञालोपतो दैन्यं प्रतिपद्येति । यस्मादयं दोपः सम्भाव्यने तस्मादकालाटनं न कुर्यादिति ॥ १६४ ॥ आह च-सइत्ति, सति-विद्यमाने भिक्षाकाले-भिक्षाममये चरेत् भिक्षुः । अन्ये तु व्याचक्षते-स्मृतिकाल एव मिक्षाकालोऽभिधीयते, संस्मर्यन्ते यत्र भिक्षुकाः स स्मृतिकालः तस्मिन् चरेत् भिक्षुः- मिक्षार्थ यायात् , कुर्यात् पुरुपकारं, जावले सति वीर्याचारं न ला येत्, तत्र चालामे सति भिक्षाया अलाभ इति न च शोचयेत्, वीर्याचाराराधनस्य निष्पनत्वात् , तदर्थं च भिक्षाटनं नाहारार्थमेवातो न शोचयेत् , अपि तु तप इत्यधि. सहेत, अनशनन्यूनोदरतालक्षणं तपो भविष्यतीति सम्यग् विचिन्तयेदिति ॥ १६५ ॥ उक्ता कालगतना । अधुना क्षेत्र- यतनामाह-तहेवत्ति, तथैवोचावचाः-शोमनाशोमनभेदेन नानाप्रकाराःमाणिनो भक्तार्थं समागताः बलिप्रामृतिका- दिष्वागता भवन्ति, तहजुगं-नेपामभिमुखं न गच्छेत्, तत्सन्त्रासनेनान्तरायाधिकरणादिदोपात्, किन्तु यतमेव पराक्रामेत् , तदुद्वेगमनुत्पादयन्निति ॥ १६६ ।। किंच-गोयरग्गत्ति, गोचराग्रप्रविष्टस्तु भिक्षार्थ प्रविष्ट इत्यर्थः । न निपीदेत्-नोपविशेत् , कचित्-गृहदेवकुलादौ संयमोपघातादिप्रसङ्गात् , कथां च-धर्मकथादिरूपां न प्रवध्नीयात्- प्रवन्धेन न कुर्याद् , अनेनैकव्याकरणैकज्ञातानुज्ञामाह, अत एवाह-स्थित्वा कालपरिग्रहेण संयत इति, अनेपणाद्वैपादि- ८ तहेवुचावया पाणा, भत्तट्ठाए समागया। तं उज्जुअं न गच्छिजा, जयमेव परकमे ॥१६६॥ गोयरग्गपविट्ठो अ, न निसीए(इ)ज कत्थई । कहं च न पबंधिज्जा, चिट्ठित्ता ण व संजए ॥१६७॥ अग्गलं फलिहं दारं, कवाडं वावि संजए। अवलंविआ न चिडेजा, गोयरग्गगओ मुणी ॥१६॥ समणं माहणं वावि, किविणं वा वणीमगं । उवसंकमंतं भत्तट्ठा, पाणट्ठाए व संजए ॥१६९॥ तमइकमित्तु न पविसे, नवि चिट्टे चक्खुगोयरे। एगंतमवकमित्ता, तत्थ चिट्ठिज संजए ॥१७०॥ वणीमगरस वा तस्स, दायगस्सुभयस्स वा । अप्पत्ति सिआ हुज्जा, लहुत्तं पवयणस्स वा ॥१७१।। पडिसेहिए व दिन्ने वा, तओ तम्मि नियचिए । उवसंकमिज भत्तट्ठा, पाणट्ठाए व संजए ॥१७२॥ फालेणत्ति, यो यस्मिन् पामादावृचित्तो मिथाकालस्तेन करणभूतेन निष्कामेत्, भिक्षुती प्रजेत् चमतेभिः यापै, कालेन चोचितेनैव यावता स्वाध्यायादि निप्पद्यते तावता प्रतिमामेत्-निवर्तेत, मणियं च-"खित्त कालो मायण तिलिपि पहप्पंति हिंडउ'चि अमंगा", अकालं च पर्जपित्या येन स्वाध्यायादि न संमाव्यते, स खल्यकालः तमपास्य फाले कालं समापरेदिति सर्वयोगोपसहाय निगमन, मिशालायां मिक्षा समाचरेत् , स्वाध्यादिवेलागा साध्यायादी: नीति । उक्तं च-" जोगो जोगो निणसासणमि दुक्खया पजते । अनोभमाहाए प्रसवतो हो कायशे ॥ १॥"

(ओघ० नि० गा०२७७)।। १६३॥ अकालचरणे दोपमाह-अकालेत्ति, अकालचारी कश्चित्साधुरलन्धभक्षः केनचित्साधुना 'प्राप्ता भिक्षा न वे'त्यभिहितः सन्नेवं यात्-कुतोऽत्र स्थण्डिलसन्निवेशे भिक्षा ?, स तेनोक्तः-अकाले चरसि भिक्षो! प्रमादात् स्वाध्यायलोभाद्वा, कालं न प्रत्युपेक्षसे, किमयं भिक्षाकालो न वेति, अकाल चरणेनात्मानं च लामयसि (ग्लपयसि) दीर्घाटनन्यूनोदरताभावेन, सन्निवेसं च गर्हसि भगवदाज्ञालोपतो दैन्यं प्रतिपद्येति । यस्मादयं दोपः सम्भाव्यते तस्मादकालाटनं न कुर्यादिति ।। १६४ ॥ आह च-सत्ति, सति-विद्यमाने भिक्षाकाले-भिक्षासमये चरेत् भिक्षुः । अन्ये तु व्याचक्षते-स्मृतिकाल एव भिक्षाकालोऽभिधीयते, संस्मर्यन्ते यत्र भिक्षुकाः स स्मृतिकालः तस्मिन् चरेत् भिक्षु:- मिक्षार्थ यायाव , कुर्यात् पुम्पकारं, जहावले सति वीर्याचारं न लायेत् , तत्र चालामे मति भिक्षाया अलाभ इति न च शोचयेत् , वीर्याचाराराधनस्य निष्पनत्वात् , तदर्थ च भिक्षाटनं नाहारार्थमेवातो न शोचयेत् , अपि तु तप इत्यधि. सहेत, अनशनन्यूनोदरतालक्षणं तपो भविष्यतीति सम्यग् विचिन्तयेदिति ॥ १६५ ॥ उक्ता कालयतना । अधुना क्षेत्र यतनामाह-तहेवत्ति, तथैवोचावचाः-शोमनाशोभनदेन नानाप्रकाराः माणिनो भक्तार्थ समागताः बलिप्राभृतिका- दिष्वागता भवन्ति, तहजुगं-तेषामभिमुखं न गच्छेत् , तत्सन्त्रासनेनान्तरायाधिकरणादिदोपात्, किन्तु यतमेव पराक्रामेत् , तदुद्वेगमनुत्पादयन्निति ॥ १६६ ॥ किंच-गोयरग्गत्ति, गोचराग्रप्रविष्टस्तु भिक्षार्थ प्रविष्ट इत्यर्थः । न निपीदेत्-नोपविशेत् , कचित्-गृहदेवकुलादौ संयमोपघातादिप्रसाद , कथां च-धर्मकथादिरूषां न प्रवघ्नीयात्- प्रवन्धेन न कुर्याद्, अनेनैकव्याकरणकनातानुज्ञामाह, अत एवाह-स्थित्या कालपरिग्रहेण संयत इति, अनेपणाद्वैपादि-

दोपप्रसद्गादिति सूत्रार्थः ॥ १६७ ॥ उक्ता क्षेत्रपतना । द्रव्ययतनामाह-अग्गलमिति, अर्गलां-गोपुरकपाटादिसम्बन्धिनी
फलक-पाटकादिस्थगनं, द्वारं शाखामयं, कपाटं द्वारयन्त्र, वापि संयतोऽवलम्ब्य न तिष्ठेल्लाघवविराधनादोपात् ।
गोचराग्रगतो-मिक्षाप्रविष्टः, संयतो यतिः मुनिपर्यायौ, तदुपदेशाधिकाराददुष्टावेवेति ॥ १६८ ॥ उक्ता द्रव्ययतना ।
भावयतनामाह-समणंति, श्रमणं-निर्ग्रन्धादिरूपं, ब्राह्मणं-पिम्वर्ण, वापि कृपणं या पिण्डोलक, बनीपक-दरिद्र
चतुर्णामन्यतममुपसङ्कामन्तं-सामीप्येन गच्छन्तं वा गतं वा भक्तार्थ पानार्थ वा संयतः-साधुरिति ॥ १६९ ॥ तम-
इफमित्तत्ति, -श्रमणादिमविक्रम्योलङ्य न प्रविशेत्, दीयमाने च समुदाने वेभ्यो न तिष्ठेचक्षुर्गोचरे, कस्तत्र विधि-
रित्याह-एकान्तमवक्रम्प तत्र तिठेत्संयत इति ॥ १७० ।। अन्यथैतद्दोपा इत्याह-वणीमगरसत्ति, बनीपकस्य वा
तस्येत्येतत् श्रमणाापलक्षणं, दातुर्वा उभयोर्वा अप्रीतिः कदाचित्स्यात्-अहो अलौकिकाततेपामिति लघुत्वं
प्रवचनस्प वाऽन्तरायदोपवेति तस्मात्रैव कुर्यात् ।। १७१ ।। किंतु-पडिसेहिए वेति, प्रतिपिद्धे वा दत्ते वा ततः स्थानात्
तस्मिन् वनीपकादौ निवर्तिते सति उपसङ्ग्रामेत् भक्तार्थ पानार्थ वापि संयत इति ॥ १७२ ।।
उप्पलं पउमं वावि, कुमु वा मगदंति। अन्नं वा पुप्फसञ्चित्तं, तं च संलुचिआदए ॥ १७३॥
तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिरं । दिति पडिआइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १७ ॥
उप्पलं पउमं वावि. कुमुवा मगदंतिश्री अन्नं वा पुप्फसच्चित्तं, तं च संमद्दिआ दए ॥ १७५ ॥

तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिअं । दितिअं पडियाइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १७६ ॥ सालुयं वा विरालियं,कुमुअंउप्पलनालि।मुणालिअंसासवनालिअं,उच्छुखंडं अनिव्वुडं ॥१७७॥ तरुणगं वा पवालं, रुक्खस्स तणगस्स वा । अन्नस्स वा वि हरिअस्स, आमगं परिवज्जए ॥१७८॥ तरुणिगं वा छिवाडि, आमिअं भज्जिअं सइं । दितिअं पडिआइक्खे, न मेकप्पइ तारिसं ॥१७९॥ तहा कोलमणुस्सिन्नं, वेल्लुअं कासवनालिअं। तिलपप्पडगं नीम, आमगं परिवज्जए ॥ १८० ॥ तहेव चाउलं पिटुं, विअडं वा तत्तऽनिव्वुडं । तिलपिट्ठपइपिन्नागं, आमगं परिवज्जए ॥ १८१ ॥ कविटुं माउलिंगं च, मूलगं मूलगत्तिअं । आमं असत्थपरिणयं, मणसावि न पत्थए ॥ १८२ ॥ तहेव फलमंथूणि, बीअमंथूणि जाणिआ। बिहेलगं पियालं च, आमगं परिवज्जए ॥ १८३ ॥ परपीडाप्रतिषेधाधिकारादिदमाह-उप्पलंति, उत्पलं-नीलोत्पलादि, पद्म-अरविन्दं, कुमुदं वा गर्दमकं वा मगदन्तिकां मेत्तिकां, मल्लिकामित्यन्ये, तथाऽन्यद्वा पुष्पं सचित्तं-शाल्मलीपुष्पादि, तच-संलुञ्य-अपनीय छित्वा दद्यादिति ।। १७३॥ तारिसंति, तादृशं भक्तपानं तु संयतानामकल्पिकं, यतश्चैवं अतो ददती प्रत्याचक्षीत न मम कल्पते तादृशमिति ॥ १७४ ॥ एवं तच संमृद्य दद्यात्, संमर्दनं नाम पूर्वच्छिन्नानामेवापरिणतानां मर्दनम् , शेष

दोपप्रसङ्गादिति सूत्रार्थः ।। १६७ ।। उक्ता क्षेत्रयदना । द्रव्ययतनामाह-अग्गलमिति, अर्गलां-गोपुरकपाटादिसम्बन्धिनी
फलक-पाटकादिस्थगनं, द्वार शाखामयं, कपाटं द्वारयन्त्र, वापि संयतोऽवलम्ब्य न तिष्ठेल्लाघवविराधनादोपात् ।
गोचराग्रगतो-मिक्षाप्रविष्टः, संयतो यतिः मुनिपर्यायौ, तदुपदेशाधिकाराददुष्टावेवेति ॥ १६८॥ उक्ता द्रव्ययवना ।
मावयतनामाह-समणति, श्रमण-निर्गन्धादिरूपं, ब्राह्मणं-धिम्वर्ण, वापि कृपणं वा पिण्डोलक, वनीपक-दरिद्रं
चतुर्णामन्यतममुपसङ्क्रामन्तं-सामीप्येन गच्छन्तं वा गतं वा भक्तार्थ पानार्थ चा संयत:-साधुरिति ।। १६९ ॥ तम-
इकमित्तुत्ति, -प्रमणादिमतिक्रम्पोछ य न प्रविशेत, दीयमाने च समुदाने वेभ्यो न तिष्ठेचक्षुर्गोचरे, कस्तत्र विधि-
रित्याह-एकान्तमवक्रम्य तत्र तिष्ठेत्संयत इति ॥ १७० ॥ अन्यथैतदोषा इत्याह-वणीमगरसत्ति, वनीपकस्य वा
तस्येत्येतत् श्रमगाापलक्षणं, दातुर्वा उभयोर्वा अप्रीतिः कदाचित्स्यात्-अहो अलौकिकाततेपामिति लघुत्वं
प्रवचनस्य वाऽन्तरापदोपवेति तस्मात्रैव कुर्यात् ॥१७१ ॥ किंतु-पडिसेहिए वेति, प्रतिपिद्धे वा दत्ते वा ततः स्थानात्
तस्मिन् वनीपकादो निवर्तिते सति उपसङ्क्रामेत् भक्तार्थ पानार्थ वापि संयत इति ।। १७२ ।।
उप्पलं पउमं वावि, कुमुअं वा मगदंतिअं। अन्नं वा पुप्फसच्चित्तं, तं च संलुचिआदए ॥ १७३॥
तं भवे भत्तपाणं तु, संजयाण अकप्पिरं । दिति पडिआइक्खे, न मे कप्पइ तारिसं ॥ १७४ ॥
उप्पलं पउमं वावि, कुमुअंवा मगदंति। अन्नं वा पुप्फसच्चित्तं, तं च संमद्दिआ दए ॥ १७५ ॥

स यवादिचूर्णान् ज्ञात्वा प्रवचनतः विभीतकं-विभीतकफलं, मियालं-प्रियालफलं च आमं-अपरिणतं परिवर्जयेदित्यर्थः।।१८३॥ समुआणं चरे भिक्खू, कुलमुच्चावयं सया । नीयं कुलमइकम्म, ऊसढं नाभिधारए ॥ १८४ ।। अदीणो वित्तिमेसिज्जा, न विसीइज्ज पंडिए । अमुच्छिओ भोअणंमि, मायण्णे एसणारए ॥ १८५॥ वहुं परघरे अस्थि, विविहं खाइमसाइमं । न तत्थ पंडिओ कुप्पे, इच्छा दिज्ज परो न वा ॥ १८६ ॥ सयणासणवत्थं वा, भत्तं पाणं व संजए। अदितस्स न कुप्पिज्जा, पञ्चक्खेवि अ दीसओ ॥ १८७॥ विधिमाह-समुयाणंति, समुदानं भावभैक्ष्यमाश्रित्य चरेत्-गच्छेत् भिक्षुः । केत्याह-कुलसुच्चावचं सदा, अ- गर्हितत्वे सति विभवापेक्षया प्रधानमप्रधानं च, यथा परिपाट्येव चरेत्-गच्छेत् सदा-सनकालं, नीचं कुलमतिक्रम्य | विभवापेक्षया प्रभूततरलाभार्थ उत्सृतं-ऋद्धिमत् कुलं, नाभिधारयेत्-न यायात्, अभिष्वङ्गलोकलाववादिप्रसङ्गादिति ॥ १८४ ॥ किंच-अदीणोत्ति, अदीनो-द्रव्यदैन्यमङ्गीकृत्याम्लानवदनः, वृत्ति-वर्त्तनं एपयेत्-गवेषयेत् , न विपीदेत्- अलाभे सति विपादं न कुर्यात् , पण्डितः-साधुः, अमूर्छितः-अगृद्धो भोजने, लामे मति मात्राज्ञ आहारमात्रां प्रति एपणारत:-उद्गमोत्पादनैपणापक्षपातीति ॥ १८५ ॥ एवं च परिभावयेद-बहुंति, बहु-प्रमाणतः प्रभूतं परगृहे- असंयतादिगृहेऽस्ति विविध-अनेकप्रकारं खाद्यं स्वाद्यं, एतच्चाशनायु पलक्षणं, न तत्र पण्डितः कुप्येत्-सदपि न ददातीति न रोपं कुर्यात् , किंतु-इच्छया दद्यात्परो न वेति, इच्छा परस्य, न तनान्यत् किश्चिदपि चिन्तयेत् , सत्रदयेऽपि तुल्यम् । आह 'एतत्पूर्वमप्युक्तमेव, "संमद्दमाणी पाणाणि, वीपाणि हरियाणि य," इत्यत्र, उच्यते-उक्तं नाम मामान्यन, विशेषाऽमिधानाददोपः ॥ १७५-१७६ ॥ तथा सालुयंति, शालूकं-उत्पलकन्द, घिरालिका-पलाशकन्द. रूपा, पर्यवलिप्रतिपर्ववल्लिप्रतिपर्वकन्दमित्यन्ये । कुमुदोत्पलनालौ प्रतीतो, तथा मृणालिकां-पद्मिनीकन्दोत्थाम् , सर्पपनालिका-सिद्धार्थकमञ्जरी, तक्षुखंडमनिर्ध-सचित्तं, एतच्चानितग्रहणं सर्वत्रामिसम्बध्यते इति ॥ १७७ ।। किंव-तरुणगंति, तरुणकं या प्रवालं-पत्र, वृक्षस्य-चिश्चिणिकादेः, तृपस्य वा-मपुरतृणादेः, अन्यस्य वापि हारितस्यार्यकादेः, आमक-अपरिणतं परिवर्जयेदिति ॥ १७८ ॥ वधा तमणियं वचि, तरुणां वा असंजाता वा छियाडिमिति मुद्गादिफलिं, आमामसिद्धां सचेतना, तथा भनिता, सकृत्-एकवारं, ददती प्रत्याचक्षीत न मम फल्पते तादृशं भोजनमिति ।।१७९ ॥ तहा कोलंति, तथा कोलं-बदरं अश्विनं-वह्वयुदकयोगेनानापादितविकारान्तरं, तथा वेलुक मकरिलं, कासवनालिका थीपर्णीफलं, अस्विन्नमिति सर्वत्र योज्यम् । तथा तिलपर्पटकं-पिटतिलमयं, नीम-नीमफलं, आम परिवर्जयेदिति ॥ १८० ॥ तहेवत्ति, तथैव तान्दुलं पिष्टं-लोष्ठ(द)मित्यर्थः, विकटं वा- शुद्धोदके, तथा तप्तनिवृतं कथितं सच्छीतीभूतं, तप्तानिवृतं वा-अप्रवृत्रिदण्डं, तिलपिष्ठ-तिललोट( ) पूतिपिसाग- सिद्धार्थ कसलं, आमं परिवर्जयेदिति ॥ १८१ ॥ कविट्ठत्ति, कपित्थं-कपित्थफलं, मातुलिङ्गं वा-बीजपूरकं, मूलकं मपत्रजालकं, मूल कर्तृकां-मूलकन्दचकली, आमां अपकाममखएरिणता स्वकायशस्खादिनाऽविश्वस्तां अनन्तकायिकत्वात् गुरुवाण्यापनार्थमुभयम् । मनसापि न प्रार्थयेदिति ॥१८२॥ तहेवत्ति, तथैव फलमन्धून्-पदरपूर्णान, पीजमधून्- जाणंतु ता इमे समणा, आययट्ठी अयं मुणी । संतुट्ठो सेवए पंतं, लूहवित्ती सुतोसओ ॥ १९३॥ पूअणट्ठा जसोकामी, माणसम्माणकामए। बहुं पसवई पावं, मायासल्लं च कुवइ ॥ १९४ ॥ स्वपक्षस्तेयप्रतिषेधमाह-सियत्ति, स्यात्-कदाचित् एकका-कश्चिदत्यन्तजघन्यो लब्ध्वोत्कृष्टमाहारं लोभेन- अभिष्वङ्गेण विनिमूहते-अहमेव भोक्ष्य इत्यन्तप्रान्तादिनाऽऽच्छादयति । किमित्यत आह-मा मम इदं भोजनजातं दर्शितं सदृष्ट्वा आचार्यादिः स्वयमादद्यादात्मनैव गृहीयादिति ॥ १९० ।। अस्य दोपमाह-अत्तत्ति, आत्मार्थ एव [जघन्यो] गुरु:-[पाप]प्रधानो यस्य स आत्मार्थगुरुः, लुब्धः सन् क्षुद्रभोजने बहु-प्रभूतं पापं प्रकरोति-मायया दारिद्य- कर्मेत्यर्थः । अयं परलोकदोपः। इहलोकदोपमाह-दुस्तोषश्च भवति-येन केनचिदाहारेणास्य क्षुद्रसत्वस्य तुष्टिः कर्तुं न शक्यते । अत एव निर्वाणं च न गच्छति-इहलोके च धृतिं न लमते, अनन्तसंसारिकत्वाद्वा मोक्षं न गच्छतीति ॥१९१॥ एवं यः प्रत्यक्षमपहरति स उक्तः, अधुना यः परोक्षमपहरति स उच्यते-सियत्ति, स्यादेको लब्ध्वेति पूर्ववत् , विविधं- अनेकप्रकारं पान भोजनं तत्र भिक्षाचर्यागत एव भद्रकं भद्रकं-घृतपूर्णादि भुक्त्वा विवर्ण-विगतवर्ण आम्लखलादि, विरसं-विगतरसं-शीतोदनादि आहरेद-आनयेदिति ॥ १९२ ॥ स किमर्थमेवं कुर्यादित्याह-जाणंतुत्ति, जानन्तु मां तावत् इमे श्रमणा:-शेषसाधवः यथा आयतार्थी-मोक्षार्थी अयं मुनिः-साधुः सन्तुष्टो-लामालाभयोः समः सेवते प्रान्तं-असारं, रूक्षवृत्ति-संयमवृत्तिः, सुतोष्या-येन केनचित्तोपं नीयत इति ॥१९३।। एतदेव किमर्थमेवं कुर्यादित्याह- पूयणत्ति. पूजार्थमेवं कुर्वतः स्वपक्षपरपक्षाभ्यां सामान्येन पूजा भविष्यतीति, यशस्कामी-अहो अयमिति प्रवादार्थी

सामायिकवापनादिति । १८६ ॥ एतदेव विशेषेणाइ-सयणत्ति, शयनासनवलं चेत्येकवद्भावः। भक्तं पानक या
सयतोऽददतो न कुप्येव तत्स्वामिनः, प्रत्यक्षेऽपि च दृश्यमाने शयनासनादाविति ॥ १८७॥
इत्थिों पुरितं वावि, डहरं वा महल्लगं । वंदमाणं न जाइब्जा, नो अणं फरुसं वए ॥१८८ ।।
जे न वंदे न से कुप्पे, वंदिओ न समुक्कसे। एवमन्नेसमाणस्त सामपणमणुचिट्ठइ ॥१८९ ॥
किंच-इत्थियंति, स्त्रियं वा पुरुष वा, अपिशब्दात् तथाविधं नपुंमकं वा डहरं-तरुणं, महल्लकं वा-वृद्धं वा,
वाशब्दान्मध्यम घा, वन्दमानं सन्तं मद्रकोऽयमिति न याचयेत्, विपरिणामदोषात् , अन्नाद्यभावेन याचितादाने, न
चैनं परुपंगात्-पथा ते वन्दनमित्यादिरिति । पाठान्तरं वा-'वन्दमानो न याचेत ललिव्याकरणेन' शेषं पूर्ववदिति ॥१८॥
तथा-जेन वंदेत्ति, यो न वन्दते कश्विद् गृहस्थादिन से तस्मै कुप्येत् । तथा वन्दितः केनचिन्नृपादिना न समुत्कर्पेत् ।
एवं-उक्तेन प्रकारेण अन्वेपमाणस्य-मगवदाजामनुपालयता, श्रामण्यमनुतिष्ठति अखण्डितमिति प्रार्थः ॥ १८९॥
सिआ एगइओ लड़े, लोभेण विणिगृहइ । मामेयं दाइयं संतं, दणं सयमायए ॥ १९० ॥
अत्तट्ठागुरुओ लुद्धो, पहुं पावं पकुवइ । दुत्तोसओ अ सो होइ, निवाणं च न गच्छइ ॥ १९१ ॥
सिआ एगइओ लटुं, विविहं पाणभोअणं । भद्गं भद्दगं भुच्चा, विवन्नं विरसमाहरे ॥ १९२ ॥

जाणंतु ता इमे समणा, आययट्ठी अयं मुणी। संतुट्ठो सेवए पंतं, लूहवित्ती सुतोसओ ॥ १९३ ॥ पूअणट्ठा जसोकामी, माणसम्माणकामए। वहुं पसवई पावं, मायासलं च कुवइ ॥ १९४ ॥ स्वपक्षस्तेयप्रतिपेधमाह-सियत्ति, स्यात्-कदाचित् एकका-कश्चिदत्यन्तजघन्यो लब्ध्वोत्कृष्टमाहारं लोभेन- अभिष्वङ्गेण विनिमूहते-अहमेव भोक्ष्य इत्यन्तप्रान्तादिनाऽऽच्छादयति । किमित्यत आह-मा मम इदं भोजनजातं दर्शितं सद्दृष्ट्वा आचार्यादिः स्वयमादद्यादात्मनैव गृहीयादिति ॥ १९० ।। अस्य दोपमाह-अत्तत्ति, आत्मार्थ एव [जघन्यो] गुरु:-[पाप]प्रधानो यस्य स आत्मार्थगुरुः, लुब्धः सन् क्षुद्रभोजने बहु-प्रभूतं पापं प्रकरोति-मायया द्रारिय- कर्मेत्यर्थः । अयं परलोकदोपः। इहलोकदोपमाह-दुस्तोपश्च भवति-येन केनचिदाहारेणास्य क्षुद्रसत्वस्य तुष्टिः कर्तुं न शक्यते । अत एव निर्वाणं च न गच्छति-इहलोके च धृतिं न लमते, अनन्तसंसारिकत्वाद्वा मोक्षं न गच्छतीति ॥१९॥ एवं यः प्रत्यक्षमपहरति स उक्तः, अधुना यः परोक्षमपहरति स उच्यते-सियत्ति, स्यादेको लब्ध्वेति पूर्ववत् , विविधं- अनेकप्रकारं पान भोजनं तत्र भिक्षाचर्यागत एव भद्रकं भद्रकं-घृतपूर्णादि मुवा विवर्ण-विगतवर्ण आम्लखलादि, विरसं-विगतरसं-शीतोदनादि आहरेदू-आनवेदिति ॥ १९२ ॥ स किमर्थमेवं कुर्यादित्याह-जाणंतुत्ति, जानन्तु मां तावत् इमे अमणाः-शेपसाधवः यथा आयतार्थी-मोक्षार्थी अयं मुनिः-साधुः सन्तुष्टो-लामालाभयोः समः सेवते प्रान्तं-असारं, रूक्षवृत्तिः-संयमवृत्तिः, सुतोष्या-येन केनचित्तोपं नीयत इति ॥१९३॥ एतदेव किमर्थमेवं कुर्यादित्याह- पूयणट्ठत्ति, पूजार्थमेवं कुर्वतः स्वपक्षपरपक्षाम्यां सामान्येन पूजा भविष्यतीति, यशस्कामी-अहो अपमिति प्रबादार्थी - - पा, मानसन्मानकामका एवं कुर्यात् । तत्र वन्दनाभ्युत्थानलाभनिमितो मानो, वखपात्रादिलामनिमिचश्य सन्मान इति । म चैवम्भूतो पहु-अतिप्रचुर प्रधानसक्लेशयोगात् मसूते-निवर्तयति पाप, तद्गुरुत्वादेव सम्यगनालोचयन् मायाशल्यं च-मावशस्य च करोतीति । १९४ ॥ सुरं वा मेरगंवा वि, अन्नं वा मजगं रसं । ससक्खं न पिये भिक्खू, जसं सारक्खमप्पणो ॥१९५॥ पियए एगओ तेणो, न मे कोइ विआणइ । तरत पस्सह दोसाई, निअर्डि च सुणेह मे ॥ १९६ ॥ वाई सुंडिआ तस्स, मायामोसं च भिक्खुणो । अयसोअ अनिवाणं, सययं च असाहुआ ॥ १९७ ॥ निच्चुबिगो जहा तेणो, अत्तकम्मेहिं दुम्मई । तारिसो मरणंतेऽवि, न आराहेइ संवरं ॥ १९८ ॥ आयरिए नाराहेइ, समणे आवि तारिसे। गिहत्थावि ण गरिहंति, जेण जाणंति तारिसं ॥ १९९ ॥ । एवं तु अगुणप्पेही, गुणाणं च विवजए । तारिसो मरणंतेऽवि, ण आराहेति संवरं ॥ २०० ।। प्रतिषेधान्तरमाह-सुरं थे ति, सुरी वा-पिष्टादिनिध्पन्ना, मेरकं चापि-प्रसन्माल्या, सुराप्रायोग्यद्रव्यनिष्पन्नमन्यं वा, मयरसं-सीधादिरूपं, ससाक्षिक-मदापरित्यागमाधिकालिप्रतिपिद्धं न पिवेत् भिक्षुः, अनेनात्यन्तिक एव तत्पति. पेधः, सदासाधिभावात् । किमिति न पिवेदित्याह-यशः संरक्षमारमना, यशशब्देन संयमोऽभिधीयते । अन्ये तु ग्लानाप-

वादविपयं एतद सूत्रमल्पसागारिकविधानेन व्याचक्षत इति ॥ १९५॥ अत्रैव दोपमाह-पियएत्ति, पिरत्येको-धर्मसहाय-
विप्रमुक्त एकान्तस्थितो वा स्तेनः-चौरोऽसौ भगवददत्तग्रहणात् अन्योपदेशयाचनाद्वा न मां कश्चिज्जानाति विभावयन्
तस्येत्थंभूतस्य पश्यत दोषानैहिकान् पारलौकिकांच निकृति च-मायारूपां शृणुत ममेति ॥ १९६ ॥ बड्डइत्ति, वर्धते
शौण्डिका-तदत्यन्ताभिष्वङ्गरूपा तस्य मायामृपावादं चेत्येकवद्भावः, प्रत्युपलब्धापलापेन बर्द्धते तस्य भिक्षोः,
इदं च भवपरम्पराहेतुरनुबन्धदोपाद, तथाऽयशश्च स्वपक्षपरपक्षयोः, तथा अतृप्तिदुःखं-अनिर्वाणं, तदलामे सततं चा-
साधुता लोके व्यवहारतश्चरणपरिणामवाधनेन परमार्थत इति ॥ १९७॥ निच्चुग्विगोत्ति, स इत्थंभूतो नित्योद्विग्नः-सदा
अप्रशान्तो यथा स्तेन:-चौरः आत्मकर्मभिः-स्वदुश्चरितैः दुर्मतिः-दुर्बुद्धिस्तादृशः-क्लिष्टचित्तो(सत्त्वो) मरणान्तेऽपि-
चरमकालेऽपि नाराधयति संवरं-चारित्रं, सदैवाकुशलवुद्धथा तद्वीजाभावादिति ॥ १९८॥ तथा आयरिएत्ति आचा-
र्यान् नाराधयत्यशुद्धभावत्वात् श्रमणांश्चापि तादृशो नाराधयत्यशुद्धमावत्वादेव, गृहस्था अप्येनं दुष्टशीलं गर्हन्ति-
कुत्सन्ति । किमिति ?, येन जानन्ति तादृशं-दुष्टशीलमिति ॥१९९।। एवं तु त्ति, एवं तु उक्तेन प्रकारेण अगुणप्रेक्षी-
अगुणान्-प्रमादादीन् प्रेक्षते तच्छीलच य इत्यर्थः । तथा गुणानां चाममादादीनां स्वगतानामनासेवनेन परगतानां
च प्रद्वेषेण विवर्जकः-त्यागी, तादृशः-क्लिष्टचित्तो मरणान्तेऽपि नाराधयति संवरं-चारित्रमिति गाथार्थः ॥ २०० ॥
तवं कुवइ मेहावी, पणीअं वज्जए रसं । मज्जप्पमायविरओ, तवस्ती अइउकसो ॥ २०१ ॥
तस्स पस्सह कल्लाणं, अणेगसाहुएइअं । विउलं अस्थसंजुत्तं, कित्तइस्सं सुणेह मे ॥ २०२ ॥

एवं तु सगुणप्पेही, अगुणाणं च विवजए । तारिसो मरणंतेऽवि, आराहेइ संघरं ॥ २०३ ॥
आयरिए आराहेइ, समणे आवि तारिसे। गिहत्थावि ण(एणं) पूयंति, जेण जाणंति तारिस ॥२०४॥
यतरमत एतदोपपरिहारेण-तयंति, तपः प्रकरोति मेधावी-मर्यादावर्ची, प्रणीतं-स्निग्धं वर्जयति रसं-
पृतादिक, न केवलमेतरकरोति अपि तु मगममावपिरतो, नास्ति लिष्टमयानामकृत्यमित्येवं प्रतिषेधः । तपस्थी-साधुः
अत्युत्कपी-अहं तपस्यीत्युत्कारहिन इति स्वार्थः ॥ २०९ ॥ तस्सत्ति, तस्पेत्यभूतस्य पश्यत फल्याणं-गुण-
मम्पद्रूपं संपमम् । किं विशिष्टमित्याह-अनेकसाधुपूजितं पूजितमिति-सेवितमाचरितं, पिपुलं-विस्तीर्ण विपुलमोक्षायह-
यात् । अर्थसंयुक्त-तुच्छतादिपरिहारेण निरुपमसुखरूपमोक्षमाधनत्वात् , कीर्तयिष्ये अहं शृणुन मे-ममेति ॥ २० ॥
एवं तु, एवं तु-उक्तेन प्रकारेण स-साधुर्गुणप्रेक्षी-गुणान्-अप्रमादादीन प्रेक्षते तच्छीलय य इत्यर्थः, तथा अगुणानां
च-प्रमादादीनां सगवानामनासेयनेन परगतानां चाननुमत्या विवर्जफा-त्यागी, ताशा-शुद्धपनो मरणान्तेऽपि-
मरण( परम )कालेऽपि आराधपति संवरं-चारित्रं सदैव कुशलयुद्धसा तबीजपोपणादिति । २०३ ।। आपरियएत्ति,
आचार्यान् आराधयति, शुद्धमायस्वात् । श्रमणांथापि ताशा समाराधपति, शुदमारत्वादेय, गृहस्था अप्येनं-
शुद्धतं पूजयन्ति, किमिति १ येन जानन्ति ताशं-शुद्धवृत्तमिति ।। २०४ ॥
तवतेणे वयतेणे, स्वतणे अ जे नरे। आयारभावतेणे अ, कुबई देवकिविसं ॥ २०५॥

लभ्रूणवि देवत्तं, उववन्नो देवकिविसे । तत्थावि से न याणाइ, किं मे किच्चा इमं फलं ? ॥ २०६ ॥ तत्तोवि से चइत्ताणं, लब्भिही एलमूअगं। नरयं तिरिक्खजोणिं वा, बोही जत्थ सुदुल्लहा ॥ २०७।। एअंच दोसं दणं, नायपुत्तेण भासिअं । अणुमायांप मेहावी, मायामोसं विवज्जए ॥ २०८ ॥ स्तेनाधिकार एवेदमाह-तवत्ति, तपस्तेनो वास्तेनो रूपस्तेनश्च यो नरः कश्चिद् आचारभावस्तेनश्च [नामक्षपकरूपश्च] पालयन्नपि क्रियां तथामावदोषात् करोति देवकिल्यिषं कर्म निवर्तयतीत्यर्थः, तत्र तपस्तेनो नाम क्षपकरूपकल्पः कश्चित् केनचित् पृष्टः, त्वमसौ क्षपक इति ?, पूजाद्यर्थमाह-अहं, अथवा वक्ति-माधव एव क्षपकास्तूष्णीं वाऽऽस्ते, एवं वास्तेनो धर्मकथकादितुल्यरूपः कश्चित्केनचित्पृष्ट इति । एवं रूपस्तेनो राजपुत्रादेस्तुल्यरूपः । एवमाचारस्तेनो विशिष्टाचारवर्ति- तुल्यरूप इति । भावस्तेनस्तु परोत्प्रेक्षितं कथश्चित्केनचित् श्रुत्वा स्वयमनुत्प्रेक्षितमपि मयैतत्प्रपञ्चेन चर्चितमित्याहेति ॥२०५॥ अयं चेत्थंभूतः, लणवित्ति, लब्ध्यापि देवत्वं तथाविधक्रियापालनवशेनोपपन्नो देवकिल्बिपे-देवकिल्लिपिका ये, तत्राप्यसौ न जानाति विशुद्धावध्यभावात् , किं मम कृत्वेदं फलं-किल्लिपिकदेवत्वमिति ॥ २०६॥ अस्यैव दोपान्तर- माह-तत्तोत्ति, ततोऽपि देवलोकादसौ च्युत्वा लप्स्यते एलमूकतां-अजमापानुकारित्वं मानुपत्वे, तथा नरकं तिर्य- ग्योनि वा पारम्पर्येण लप्स्यते, बोधिर्यत्र सुदुर्लभः-सकलसम्पन्निवन्धना यत्र जिनधर्मप्राप्तिर्दुरापा । इह च प्राप्नोत्येलमूकतामिति वाच्ये असद्भावप्राप्तिख्यापनाय लप्स्यत इति भविष्यत्कालनिर्देश इति ।। २०७।। प्रकृतमुपसंहरति- एयं चेति, एनं दो-अनन्तरोदितं मत्यपि श्रामण्ये किल्विपिकत्वादिप्राप्तिरूपं दृष्ट्वा आगमतो ज्ञातपुत्रेण-मगवता घद्धमानेन भापितं-उक्तं अणुमायमपि-स्तोकमात्रमपि, किमुत प्रस्नं १ मेधावी-मर्यादावर्ची, मायामृपावाद- अनन्तरोदितं विवर्जयेत्परिवजयेदिति ॥ २०८।। सिक्खिऊण भिक्खेसणसोहिं, संजयाण युद्धाण सगासे । तत्थ भिक्खु सुप्पणिहिइंदिप, तिबलजगुणवं विहरिजासि ॥ २०९ ॥ तिमि । ॥ पंचमं पिंडेसणानामज्झयणं समत्तं ।। अध्ययनार्थमुपसंहरनाह-सिविग्यऊणत्ति, शिक्षयित्वाऽधीत्य भिक्षेपणाशुदि-पिण्डमार्गणाशुद्विमुद्गमादिरूपा, कैम्यः मकाशादित्याह-संयतेभ्यः-साधुम्यः, बुद्धेभ्योऽवगततत्वेभ्यो गीताम्यो न द्रव्यमाघुम्यः महाशान् । ततः किमित्याह-तत्र मिक्षेपणायां भिक्षुः-माधुः सुप्रणिहितेन्द्रियः-श्रोत्रादिमिर्गाहें तदुपयुक्तस्तीवलन:-उत्कृष्टसंपम: सन् , अनेन प्रकारेण गुणवान् विहरेत्-सामाचारीपालनं कुर्यात्, यीमीति पूर्ववदिति ॥ २०९ ।। ॥ इति पिण्डेपणाध्ययने द्वितीय उद्देशका समाप्तः, समाप्तं च पिण्डैपणाध्ययनम् ५ ॥

व्याख्यातं पिण्डैषणाध्ययन, अधुना महाचारकथाख्यमारभ्यते, अस्य चायममिसम्बन्धः-इहानन्तराध्ययने साधोभिक्षाविशोधिरुक्ता, इह तु गोचरप्रविष्टेन सता स्वाचारं पृष्टेन तद्विदाऽपि न महाजनसमक्षं तत्रैव विस्तरतः कथयि- तव्य इति, अपि त्वालये गुरवो वा कथयन्तीति वक्तव्यमित्येतदुच्यते, उक्तं च-" गोयरग्गपविट्ठो उ, न निसीएज कत्थइ कहं च न पबंधेजा चिट्ठिता ण व संजए ॥ १॥" इत्यनेनाभिसम्बन्धेनायातमिदमध्ययनमिति, तचेदं- नाणदंसणसंपन्नं, संजमे अ तवे रयं । गणिमागमसंपन्नं, उज्जाणम्मि समोसढं ॥ २१० ॥ रायाणो रायमच्चाय, माहणा अदुव खत्तिआ। पुच्छंति निहुअप्पाणो, कहं भेआयारगोयरो? ॥२११॥ तेसिं सो निहुओ दंतो, सवभूअसुहावहो । सिक्खाए सुसमाउत्तो, आयक्खइ विअक्खणो ॥२१२॥ हंदि धम्मत्थकामाणं, निग्गंथाणं सुणेह मे । आयारगोअरं भीम, सयलं दुरहिट्ठिअं ॥ २१३ ॥ नन्नत्थ एरिसं वुत्तं, जं लोए परमदुच्चरं । विज्लट्ठाणभाइस्स, न भूअं न भविस्सइ ॥ २१४ ॥ नाणदंसणसंपन्नमित्यादि, ज्ञानदर्शनसंपन्नं ज्ञान-श्रुतज्ञानादि दर्शनं-क्षायोपशमिकादि ताभ्यां संपन्न-युक्तं संयमे- पश्चावविरमणादौ तपसि च-अनशनादौ रतं-आसक्तं, गणोऽस्यास्तीति गणी तं गणिनं-आचार्य, आगमसंपन्नं- विशिष्टश्रुतधर, बबागमत्वेन प्राधान्यख्यापनार्थमेतत् । उद्याने-कचित्साधुप्रायोग्ये समवसृतं-स्थितं धर्मदेशनाथ वा प्रवृत्तमिति ॥ २१० ॥ तत्किमित्याह-रायाणोत्ति, राजानः-नरपतयः, राजामात्याश्च-मन्त्रिणः, ब्राह्मणाः प्रतीताः, ९ अदुयत्ति तथा क्षत्रियाः श्रेष्यादयः पृच्छन्ति निभृतात्माना-असम्भ्रान्ता रनिताअलयः, फर्थ भे-मरतामापार- गोचरः-क्रियाकलापः स्थित इति ॥ २११ ॥ तेसिति, तेभ्यो राजादिम्पः, असौ गणी निभृतोऽमम्मान्ता उनिवधर्म- फायस्थित्या दान्त इन्द्रियनोइन्द्रियदमाम्यां सर्वभूतसुरपायहः-प्राणिहित इत्यर्थः । शिक्षपा-ग्रहणासेवनामपपा, सुसमायुक्तः-सुष्टु-एकीमावेन युक्तः, आख्याति-कथयति विचक्षण:-पण्डित इति ॥ २१२॥ हंदि धम्मात्य, इन्दी. त्युपप्रदर्शने, तमेनं घर्थिकामानामिति, धर्म:-चारित्रधर्मादिस्तस्यार्थ:-प्रयोजनं मोवस्तं फामपन्ति-च्छिन्तीति निशु- दविहितानुष्ठानकरणेनेति धर्मार्थकामा-अमक्षवस्तेषां निर्घन्धाना-पायाम्पन्तरग्रन्धरहितानां शृणुत मम ममीपात्, आचारगोचरं-क्रियाकलापं भीम-कर्मशवपेक्षया रौद्रं सकलं-संपूर्ण दुरधिष्ठ(ठितं)-क्षुद्रमर्दुराश्रयमिति ॥२१३ ।। इहानन्तरयो निग्रन्यानामाचारगोचरकथनोपन्यासः कृतः, माम्प्रदमस्यैवार्थतो गुरुनामाह-नग्नत्यत्ति, न अन्यत्र- फपिलादिमते ईदृशं उक्तमाचारगोचर वस्तु यल्लोके-प्राणिलोके परमदुथरं-अत्यन्तदुष्करमित्यर्थः । ईशंप विपुल. स्थानभाजिना-विपुलस्थानं-विपुलमोक्षहेतुत्वाद संयमस्थानं तगजते-सेवते तन्छीलय या तस्य, न भूतं न मरिष्यतीति अन्यत्र जिनमतादिति ॥ २१४ ॥ सखुड्डगविअत्ताणं, धाहिआणं च जे गुणा । अखंडफुडिआ कायवा, तं सुणेह जहा तहा ॥२१५॥ दस अट्ठ य ठाणाई, जाई वालोऽवरज्झइ । तत्य अन्नयरे ठाणे, निग्गंयत्ताउ भस्सइ ॥ २१६ ॥ एतदेष संभावयन्नाह-ससुहगति, सह क्षुल:-द्रव्यमावपालये धन्ते ते व्यक्ता-द्रम्पमावादास्तेषां सक्षुष्ठक-

व्यक्तानां, सबालवृद्धानामित्यर्थः, व्याधिमतां चशब्दादव्याधिमतां च, सरुजानां नीरुजानां चेतिमावः। जे ये गुणा वक्ष्य-
माणलक्षणास्तेऽखण्डास्फुटिताः कर्त्तव्याः, अखण्डा देशविराधनापरित्यागेन अस्फुटिताः सर्वविराधनापरित्यागेन, तत्
श्रृणुत यथा कर्त्तव्यास्तथेति ॥ २१५॥ ते चागुणपरिहारेणाखण्डास्फुटिता भवन्तीत्यगुणास्तावदुच्यन्ते-दसेत्ति-दशाटौ च
स्थानानि-असंयमस्थानानि वक्ष्यमाणलक्षणानि यान्याश्रित्य वाल:-अज्ञोऽपराध्यति तत्सेवनयाऽपराधमामोति । कथम-
पराध्यतीत्याह-तत्रान्यतरे स्थाने वर्तमानः प्रमादेन निर्ग्रथत्वात्-निर्ग्रन्थभावाद् भ्रश्यति निश्चयनयेनापैति बाल
इति ॥ २१६॥
कानि पुनस्तानि स्थानानि? इत्याह-"वयछकं कायछकं, अकप्पो गिहिभायणं । पलियंकनिसजा य, सिणाणं सोहवजणं ॥"
(दश नि० २७० ) ॥ वयछक्कन्ति, व्रतपट्क-प्राणातिपातनिवृत्त्यादीनि रात्रिभोजनविरतिषष्ठानि षइव्रतानि, कायषट्कं-
पृथिव्यादयः षड्जीवनिकायाः, अकल्पा-शिक्षकस्थापनाकल्पादिक्ष्यमाणः, गृहिभाजनं-गृहस्थभाजनं गृहस्थसम्बन्धि
कांस्यमाजनादि प्रतीतं, पर्यङ्क:-शयनीयकविशेषः प्रतीतः, निषद्या च-गृहे एकानेकरूपा, स्नानं-देशसर्वभेदभिन्नं,
शोभावर्जनं-विभूपापरित्यागः, वर्जनमिति च प्रत्येकमभिसम्बध्यते शोभावर्जनं स्नानवर्जनमित्यादीति ॥ २७० ॥
तस्थिमं पढमं ठाणं, महावीरेण देसि । अहिंसा निउणा दिट्ठा, सव्वभूएसु संजमो ॥ २१७ ॥
जावंति लोए पाणा, तसा अदुव थावरा । ते जाणमजाणं वा, न हणे णोवि घायए ॥ २१८ ॥

सचे जीवा वि इच्छंति, जीविडं न मरिजिउं । तम्हा पाणवहं घोरं, निग्गंथा वजयंति णं ॥ २१९ ।।
गुणा अष्टादशम स्थानेष्वरवण्डास्फुटिता कर्तव्पाः, तत्र विधिमाह-तत्यिमन्ति, तत्राधादविधे स्थानगणे अवपद के
वाऽनासेवनाद्वारेणेद-वक्ष्यमाणलक्षणं प्रथम स्थान महावीरेण-भगवता अपश्चिमतीर्थकरेण देशित-कधितं, यदुताहिसेति।
इयं च सामान्यतः प्रभूतैर्देशितेत्याह-निपुणा-आधाधिपरिभोगतः कृतकारितादिपरिहारेण यक्ष्मा, नागमद्वारेण देगि.
ता अपि तु दृशा-साक्षाद्धर्मसाधन(क)त्वेनोपलब्धा, किमितीयमेव निपुणेत्याह-पतोऽस्पामेव महागीरदेमिठायां सर्वभूतेषु-
सर्वभूतविषयः संयमो, नान्पत्र उद्दिश्यकृतादिमोगविधानादिति ॥ २१७ ॥ एतदेव स्पष्टपमाह-जावंतित्ति, यतो हि
भागवत्याज्ञा-यावन्तः केचन लोके प्राणिननसा-दीन्द्रियादयः, अथवा स्थायरा-पृथिव्यादयः, तान् जानन्
रागाधमिभूतो व्यापादनबुख्याज्जानन्या प्रमादपारतन्त्र्येण न हन्यात्स्वयं नापि घातयेत् अन्पैः, एकग्रहणे तआतीय.
ग्रहणात् घ्नतोऽपि अन्यान समनुजानीयात् अतो निपुणा दृष्टेति ।। २१८ ॥ अहिंसर कथं माघीत्येवदाह-सव्येति, सर्वे
जीवा अपि दुःखितादिभेदमित्रा इच्छन्ति जीवितुं, न मतुं प्राणवालमत्वाद् । यस्मादेवं तस्मात्माणयधं घोरं-रौद्र
दुःखहेतुत्वा निग्रन्थाः-साघवो वर्जयन्ति मारतः । णमिति वाक्यालशरे इति ॥ २१९ ।।
अप्पणट्ठा परट्ठा वा, कोहा वा जइ वा भया। हिंसगं न मुसं यूआ, नो वि अन्नं वयावए ॥२२०॥
मुसावाओ उ लोगम्मि,सब्बसाहूहि गरिहिओ।अविस्सासो अभूआणं, तम्हा मोसं विवजए ॥२२॥

उक्तः प्रथमस्थानविधिः, अधुना द्वितीयस्थानविधिमाह-अप्पणट्टत्ति, आत्मार्थ-आत्मनिमित्तं अग्लान एव ग्लानोह ममानेन कार्यमित्यादि, परार्थं वा-परनिमित्तं वा एवमेव, तथा क्रोधाद्वा त्वं दास इत्यादि, एकग्रहणे तजातीयग्रहणमिति मानाद् वा, अबहुश्रुत एवाहं बहुश्रुत एवमादि, मायातो भिक्षाटनपरिजिहीर्षया पादपीडा ममेत्यादि, लोमात् शोमनतरान्नलाभे सति प्रान्तस्यैपणीयत्वेऽपि अनेपणीयमिदमित्यादि, यदिवा भयात्किञ्चिद्वितथं कृत्वा प्रायश्चित्तभयान्न कृतमित्यादि, एवं हासादिष्वपि वाच्यं । अत एवाह-हिंसकं-परपीडाकारि सर्वमेव न मृषा ब्रूयात् स्वयं, नाप्यन्यं वादयेत् , एकग्रहणे तजातीयग्रहणात् बुवतोऽप्यन्यान्न समनुजानीयादिति ॥ २२०॥ किमित्येतदित्याह-मुसावाउत्ति, मृपावादो हि लोके सर्वस्मिन्नेव सर्वसाधुभिर्गर्हितो-निन्दितः, सर्वव्रतापकारित्वात , प्रतिज्ञातापालनात् अविश्वासश्च-अविश्वसनीयश्च भूतानां मृषावादी भवति, यस्मादेवं तस्मात् मृषावाद वर्जयेदिति ॥ २२१ ॥ चित्तमंतमचित्तं वा, अप्पं वा जइ वा बहुं । दंतसोहणमित्तंपि, उग्गहांस अजाइया ॥ २२२ ॥ तं अप्पणा न गिण्हंति, नोवि गिण्हावए परं। अन्नं वा गिण्हमाणपि, नाणुजाणंति संजया॥२२३॥ उक्तो द्वितीयस्थानो विधिः । साम्प्रतं तृतीयस्थानविधिमाह-चित्तमंतंत्ति, चित्तवत्-द्विपदादि वा अचित्तवद्वा- हिरण्यादि, अल्पं वा-मूल्यतः प्रमाणतच, यदि वा बहु-मूल्यप्रमाणाभ्यामेव, किं बहुना ? दन्तशोधनमात्रमपि तथाविधं तृणादि अवग्रहे यस्य तत्तमयाचित्वा न गृह्णन्ति साधवः कदाचनेति ।। २२२ ॥ एतदेवाह-समिति, तचित्तवदादि आत्मना न गृह्णन्ति विरतत्वान्नापि ग्राहयन्ति परं विरतत्वादेव, तथाऽन्यं वा गृह्णन्तमपि स्वयमेव न अनु- जानन्ति-नानुमन्यन्त संयता इति ।। २२३ ।। अवंभचरिअं घोरं, पमायं दुरहिट्ठिअं । नायरंति मुणी लोए, भेआययणवजिणो ॥ २२४ ॥ मूलमेयमहम्मस्स, महादोससमुस्सयं । तम्हा मेहुणसंसर्ग, निग्गंथा वजयांत णं ॥ २२५ ॥ उक्तः तृतीयस्थानविधिः,चतुर्थस्थानविधिमाह-अपंभत्ति,अनमचर्य प्रतीतं,घोरं-ौद्रं रौद्रानुष्ठानहेतुत्वाद, प्रमाद- प्रमादयत् सर्वप्रमादमूलत्वात् , दुरधिष्ठितं-दुराश्रयं दुस्सेवं विदितजिनवचनेनानन्तसंमारहेतुत्वाव, पतश्चैवमतो नाचरन्ति- नासेवन्ते मुनयो लोके-मनुष्यलोके किं विशिष्टा ? इत्याह-भेदायतनवर्जिन:-मेद:-चारित्रभेदः तदायतनं-तत्स्थानमिद- मेवोक्तन्यापात्तद्वर्जिनः चारित्राविचारमीरव इति ।। २२४ ॥ एतदेव निगमयति-मूलमेपत्ति, मूलं-बीजमेतदधर्मस्य पाप- स्येति पारलौकिकोऽपायः। महादोपसमुच्छ्यं-महतां दोपाणां चौर्यप्रवृत्यादीनां समुच्छ्रयं-महातदिति ऐहिकोऽपायः । यस्मादेवं तस्मान्मैथुनसंमगं इति प्राकृतत्याद् मैथुनसंमर्ग-मैथुनमम्पन्यं योपिदालापायपि निर्ग्रन्या वर्जयन्ति, णमिति । वाक्यालकार इति ।। २२५॥ विडमुठभेइमं लोणं, तिल्लं सप्पिं च फाणिअं । न ते संनिहिमिच्छंति, नायपुत्तवओरया ॥ २२६ ॥ लोहस्सेस अणुप्फासे, मन्ने अन्नयरामवि । जे सिआ सन्निहिं कामे, गिही पवइए न से ॥ २२७॥ जंपि वस्थं वा पायं वा, कंवलं पायपुंछणं । तंपि संजमलजट्ठा, धारंति परिहरंति अ ।। २२८ ॥

न सो परिग्गहो वुत्तो, नायपुत्तेण ताइणा। मुच्छा परिग्गहो वुत्तो, इअ वुत्तं महेसिणा ॥ २२९ ॥ सव्वत्थुवाहणा बुद्धा, संरक्षणपरिग्गहे । अविअप्पणोऽवि देहमि, नायरंति ममाइयं ॥ २३० ॥ प्रतिपादितश्चतुर्थस्थानविधिः, इदानीं पञ्चमस्थानविधिमाह-विडमुत्ति, विडं-गोमूत्रादिपक्कं, उनेद्यं-सामुद्रादि यद्वा विडं-पासुकं उद्भेद्यमप्रासुकमपि, एवं द्विप्रकारं लवणं, तथा तैलं सपिश्च फाणितं, तत्र तैलं प्रतीतं, सर्पि:-घृतं, फाणितं- द्रवगुडः, एतल्लवणादि एवं प्रकारमन्यच न ते साधवः संनिधिमिच्छन्ति-पर्युपितं स्थापयन्ति, ज्ञातपुत्रवचोरता:- भगवद्वर्द्धमानवचसि निस्सङ्गताप्रतिपादनपरे रताः-सक्ता इति ।। २२६॥ संनिधिदोपमाह-लोहस्सेत्ति, लोभस्य-चारित्र- विघ्नकारिणश्चतुर्थकपायस्यैषोऽनुस्पर्शः-एपोऽनुमावो यदुत एतत् सन्निधिकरणमिति, यतथैवमतो[ऽहं]-मन्ये मन्यन्ते प्राकृ- तशैल्या एकवचनं, एवमाहुः तीर्थकरगणधराः, अन्यतरामपि-स्तोकामपि यः स्यात्, यः कदाचित्सन्निधिं कामयते- सेवते गृहीति-गृहस्थोऽसौ भावतः प्रव्रजितो नेति, दुर्गतिनिमित्तानुष्ठानप्रवृत्तेः, सन्निधीयते नरकादिष्यात्माऽनयेति, सनिधिरिति शब्दार्थात् प्रव्रजितस्य च दुर्गतिगमनाभावादिति ।। २२७ ।। आह-यद्येवं वस्त्रादि धारयतां कथं साधुनामसनि. धिरित्यत्राह-जंपित्ति, यदप्यागमोक्तं, वस्त्रं वा-चोलपट्टकादि, पात्रं वा-अलावुकादि, कम्बलं-वर्षाकल्पादि, पादपुञ्छनं- रजोहरणं, तदपि संयमलज्जार्थमिति, संयमार्थं पात्रादि, तद्व्यतिरेकेण पुरुपमात्रेण गृहस्थभाजने सति संयमपालनाभावाद , लजार्थ वस्त्रं, तद्व्यतिरेकेणाङ्गनादौ विशिष्टश्रुतपरिणत्यादिरहितस्य निर्लजतोपपत्तेः, अथवा संयम एव लज्जा संयमलजा मट यतमादि धारयन्ति. पालम्बनविधानेन परिहरंति च-परिभुजते च मूर्छारहिता इति ।। २२८ ॥

यतवैवमता-न सोनि, मासौ निामिप्यास्य ववधारणादिलयपः परिग्रह उनको बन्धहेत्त्तमान, कन, सात- पुत्रेण-ज्ञात-उदारवप्रिया सिदार्थम्तत्पुत्रेण घर्धमानेन, प्राग्रा-स्वपरपरिवागममथेन, अपितु मुच्छा-अमत्स्सपि वस्त्रादिभिष्वाः परिग्रह उरको पन्धहेतुत्वात् , अर्थतम्तीर्थकरेण, ततोऽजधार्य इत्येवमुको मर्पिणा-गपघरेण रो शरयंभवेनेति ।। २२९ ।। आह-बनायमाउमापिन्यपि मूळ कथं वनादिमावे माधूनां न मरिष्पति ?, उन्यने, मम्पम्पोधेन तबीजभूतायोघोपपाताद, आइ प-सम्यत्यत्ति, मांत्र-उनिने क्षेत्रे फाले प उपधिनागमोकेन वनादिना महापि युद्धा-यथावद्विदितवस्तुतावा माधवः, संरक्षणपरिग्रह इति-संघमाय पणा जीवनिझापानां वनादिपरिग्रहे मत्पपि नाचरन्ति ममत्वमिति योगः। किंचानेन?, ते हि भगवन्ता, अप्पात्मनोऽपि देह इति-प्रात्मनो धर्मकायेऽपि विशिटप्रति पन्धसंगति न कुर्वन्ति, ममत्वमात्मीयामिमानं वस्तुनचारपोधात् , निष्ठत नावदनगन्, ननय देहयदारिग्रह एनेवि ॥२३०॥ अहो निचं तवोकम्म, सवयुद्धहिं वपिणअं । जाव लजासमा वित्ती, एगभत्तं च भोअणं ॥ २३१ ।। संतिमे सुहुमा पाणा, तसा अदुव थावरा । जाइं राओ अपासंतो, कहमेसणि चरे? ॥२३२॥ उदउल्लं बीअसंसचं, पाणा निवडिया महि । दिआ ताई विवजिजा, राओ तत्थ कई परे ? ॥२३३॥ एअंच दोसं दणं, नायपुचेण भासिअं । समाहारं न भुंजंति, निग्गंधा राइभोअणं ।। २३५ ।। उक्तः पञ्चमस्थानविधिः, अधुना पष्ठमधिकृत्याह-अहोति, अहो नित्यं तपःकम्र्मेति, अहो-पिरमये नित्यं नाम- अपायाभावेन तदन्यगुणवृद्धिसम्भवादप्रतिपात्येव तपःकर्म-तपोऽनुष्ठानं, सर्ववुद्धः-सर्वतीर्थकरैर्वणितं-देशितं, किंविशिष्ट- मित्याह-यावल्लज्जासमा वृत्तिः-लजा-संयमः तत्समा-सदृशी तुल्या संयमाविरोधिनीत्यर्थः, वर्त्तनं वृत्तिः-देहपालना, एकभक्तं च भोजनं-एकं भक्तं द्रव्यतो भावतश्च यस्मिन् भोजने तत्तथा, द्रव्यत एक-एकसंख्यानुगं, भावत एकं- कर्मवन्धाभावादद्वितीय, तदिवस एव रागादिरहितस्यान्यथा भावतः एकत्वाभावादिति ॥ २३१ ॥ रात्रिभोजने प्राणाति- पातसम्भवेन कर्मवन्धसद्वितीयतां दर्शयति-संति मेत्ति, सन्त्येते-प्रत्यक्षोपलभ्यमानस्वरूपाः सूक्ष्मा:-श्लक्ष्णाः, प्राणिनो- जीवास्त्रसा-द्वीन्द्रियादयः, अथवा स्थावरा:-पृथिव्यादयो यान् प्राणिनो रात्रावपश्यन् चक्षुपा कथमेपणीयं-सत्त्वानु- परोधेन चरिष्यति-भोक्ष्यते च, असम्भव एव रात्रावेपणीयचरणस्येति ॥२३२।। एवं रात्रिभोजने दोपमभिधायाधुना ग्रहण- गतमाह-उदउल्लंति, उदका-पूर्ववदेकग्रहणे तज्जातीयग्रहणात् सस्निग्धादिपरिग्रहः । तथा बीजसंसक्तं-चीजैः संसक्तं- मिश्रमोदनादीति गम्यते । अथवा वीजानि पृथग्भूतान्येव संसक्तं चारनालाद्यपरेणेति । तथा प्राणिनः संपातिमप्रभृतयो निपतिता मयां-पृथिव्यां सम्भवन्ति । ननु दिवाप्येतत्सम्भवत्येव ?, सत्यं, किंतु परलोकभीरुश्चक्षुपा पश्यन् दिवा तान्युद- कार्द्रादीनि विवर्जयेत् , रात्रौ तु तत्र कथं चरेत् संयमानुपरोधेन ? असम्भव एव शुद्धचरणस्येति ॥२३३॥ उपसंहरन्नाह-एवं चत्ति, एतदनन्तरोदितं प्राणिहिंसारूपं चशव्दादन्यं चात्मविराधनादिलक्षणं च दोषं दृष्ट्वा मतिचक्षुपा ज्ञातपुत्रेण भगवता भाषितं-उक्तं, सर्वाहारं-चतुर्विधमप्यशनादिलक्षणमाश्रित्य न भुञ्जन्ते निर्ग्रन्थाः-साधवो रात्रिभोजनमिति ॥२३४॥ पुढविकायं न हिंसंति, मणसा वयसा कायसा। तिविहेणं करणजोएणं, संजया सुसमाहिआ॥२३५।।

- -- । पुढविकायं विहिंसंतो, हिंसई उ तयस्सिए । तसे अ विविहे पाणे, चक्खुसे अ अचखुसे ।।२३६॥ तम्हा एअं विआणित्ता, दोसं दुग्गइवढणं । पुदविकायसमारंभ, जावजीवाइ वजए ।। २३७ ।। आउकार्यन हिंसंति, मणसा वयसा कायसा।तिविहेण करणजोएण, संजया सुसमाहिआ ॥२३८॥ आउकायं विहिंसंतो, हिंसई उ तयस्सिए । तसे अ विविहे पाणे, चक्खुसे अ अचक्खुसे ॥२३९॥ तम्हा एअंविआणित्ता, दोसं दुग्गइवखणं । आउकायसमारंभ, जावजीवाइ वजए ॥ २४० ॥ उक्तं व्रतषट्क, अधुना कायपटुकमुच्यते, तर पृथिवीकायमधिकृत्याह-पुढवित्ति, पृथिवीकार्य न हिंसन्पालेखना- दिना प्रकारेण मनसा घाचा कार्यन, उपलक्षणमेवदत एवाह-विविधन करणयोगेन-मनःप्रभृतिभिः करणादिरूपेण, के न हिंसन्तीस्याह-संयता:-साधया, सुसमाहिता-उद्युक्ता इति ।। २३५ ।। अत्रैव हिंसादोपमाह-पुढवित्ति, पृथिवी. कायं हिंसन्नालेखा(खना)दिना प्रकारेण हिनस्त्येव तुरवधारणार्थो व्यापादयत्येव तदाश्रितान्-पृथिव्यायाश्रितान् सांश्च विविधान् प्राणिनो-द्वींद्रियादीन् चशन्दात् स्थावरांश्वाप्कायादीन्, तांश्च चाक्षुपानचाक्षुषांश्च-चक्षुरिन्द्रिय प्रायानग्रासाश्चेति ॥ २३६ ॥ यस्मादेवं तम्हत्ति, तस्मादेवं विज्ञाय दोपं तत्तदाश्रितजीवहिंसादिलक्षणं दुर्गतिवर्धन- संसारवर्धन पृथिवीकायसमारम्भमालेखनादि यावनीवमेव वर्जयेदिति ॥ २३७ ॥ उक्तः सप्तमस्थानविधिः, अधुनाs. एमस्थानविधिमधिकृत्योच्यते-आउकायंतीत्यादि, सूत्रत्रयमकायामिलापेन ज्ञेयं ततवायम युक्त एव ॥ २३८-२४० ॥

जायते न इच्छंति, पावगं जलइत्तए । तिक्खमन्नयरं सत्थं, सवओवि दुरासयं ॥ २४१ ॥ पाईणं पडिणं वावि, उ8 अणुदिसामवि । अहे दाहिणओ वावि, दहे उत्तरओवि अ ॥ २४२ ॥ भूयाणमेसमाघाओ, हववाहो न संसओ। तं पईवपयावट्ठा, संजया किंचि नारभे ॥ २४३ ॥ तम्हा एअं विआणित्ता, दोसं दुग्गइवढणं । तेउकायसमारंभ, जावजीवाइ वज्जए ॥ २४४ ॥ साम्प्रतं नवमस्थानविधिमाह-जायतेयंति-जाततेजा:-अमिः तं जाततेजसं नेच्छन्ति, मनःप्रभृतिभिरपि पापकं- पाप एव पापकस्तं, प्रभूतसन्चापकारित्वेनाशुभमित्यर्थः । किं नेच्छन्तोत्याह-ज्वालयितुं-उत्पादयितुं वृद्धिं वा नेतुं, किं- विशिष्टमित्याह-तीक्ष्णं-छेदकरणात्मकं, अन्यतरशस्त्रं-सर्वशस्त्रं, एकधारादिशस्त्रव्यवच्छेदेन सर्वतोधारशस्त्रक पमिति मावः । अत एव सर्वतोऽपि दुराश्रयं सर्वतोधारत्वेनानाश्रणीयमिति ।। २४१ ॥ एतदेव स्पष्टयन्नाह-पाईणंति, प्राच्या प्रतीच्यां वापि-पूर्वायां पश्चिमायां चेत्यर्थः। ऊर्ध्वमनुदिक्ष्यपि "सुपां सुपो भवन्ती"ति, सप्तम्यर्थेष ठी, विदिश्वपीत्यर्थः,। अधो दक्षिणतश्चापि दहति-दाह्यं भस्मीकरोति, उत्तरतोऽपि च, सर्वासु दिक्षु विदिक्षु च दहतीति ।। २४२ ॥ यतश्चैवमतः भूयाणंति, भूतानां स्थावरादीनां एप आघातः आवातहेतुत्वादाघातः, हव्यवाहः-अग्निः न संशय इत्येवमेवैतद् आघात एवेतिभावः । येनैवं तेन तं हव्यवाहं प्रदीपप्रतापनार्थ-आलोकशीतापनोदार्थ संयता:-साधवः किञ्चित्सङ्घटनादिनाऽपि नारभन्ते, संयतत्वापगमनप्रसङ्गादिति ॥ २४३ ॥ यस्मादेवं तम्हत्ति व्याख्या पूर्ववत् ।। २४४ ॥

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आणिलस्स समारंभ, बुद्धा मन्नंति तारिसं । सावजबहुलं चेअं, नेअं ताईहि सेविअं ॥ २४५ ॥
तालिअंटेण पत्तेण, साहाविहुअणेण वा । न ते वीइउमिच्छंति, वेआवेऊण वा परं ॥ २४६ ।।
जंपि वत्थं व पायं वा, कंवलं पायपुंछणं । न ते वायमुईरंति, जयं परिहरंति अ ॥ २४७ ॥
तम्हा एअं विआणित्ता, दोसं दुग्गइवहणं । वाउकायसमारंभ, जावजीवाइ वजए ॥ २४८ ॥
उक्तो नवमस्थान विधिः, साम्प्रतं दशममाश्रित्याह-अणिलस्स-अनिलस्य-बायोः समारम्भ-तालवृन्तादिभिः
करणं युद्धा-तीर्थकरा मन्यन्ते-जानन्ति तादृशं-जाततेजःसमारम्भमर्श, सायद्यपहुलं-पापभूपिष्ठं चैतमितिकत्वा
सर्वकालमेघ नैनं घातृभिः-सुसाधुभिः सेवितं-आचरितं, मन्यन्ते युद्धा एवेति ॥ २४५ ॥ एतदेव स्पष्टपति-तालियं.
टेणंति, तालपृन्तेन पत्रेण शाखा विधूननेन वेत्यमीषा स्वरूपं यथा पड्जीयनिकायिकाां, न ते माघयो पीजितु.
मिच्छन्त्यात्मानमात्मना, नापि वीजयन्ति परात्मानं तालवृन्तादिभिरेव, नापि वीजयन्तं परमनुमन्यन्त इति ॥ २४६ ॥
उपकरणातद्विराधनेत्येतत्परिहरनाह-जंपित्ति, यदपि वस्त्रं वा पात्रं या फम्पलं घा पायपुञ्छनममीषा स्वरूप पूर्वोक्तं
धर्मोपकरणं यत्तेनापि न ते पातमुदीरयन्त्यपि, अयतप्रत्युपेक्षणादिक्रियया, किंतु यतं परिहरन्ति, परिमोग.
परिहारेण धारणाया परिहारेण चेति ॥ २४७ ॥ यत एवायं सुमाधुर्वजितोऽनिलममारम्मः, तम्हत्ति पवित् ।। २४८ ॥
वणस्सई न हिंसंति, मणसा वयसा कायसा। तिविहेण करणजोएणं, संजया सुसमाहिआ ॥२४९॥

वणस्सइं विहिंसंतो, हिंसई अ तयस्सिए । तसे अ विबिहे पाणे, चक्खुसे अ अचक्खुसे ॥ २५० ॥ तम्हा एअं विआणित्ता, दोसं दुग्गइवडणं । वणस्सइसमारंभ, जावजीवाइ बज्जए ॥ २५१ ॥ तसकायं न हिंसंति, मणसा वयसा कायसा । तिविहेण करणजोएणं, संजया सुसमाहिआ ॥२५२॥ तसकायं विहिंसंतो, हिंसई उ तयस्सिए । तसे अ विविहे पाणे, चक्खुसे अ अचक्खुले ॥ २५३ ॥ तम्हा एअं विआणित्ता, दोसं दुग्गइवडणं । तसकायसमारंभ, जावजीवाइ बज्जए ॥ २५४ ॥ उक्तो दशमस्थानविधिः, इदानीं एकादशमाश्रित्योच्यत इति । वणस्सई इत्यादि सूत्रप्रयं वनस्पत्यभिलापेन ज्ञेयं, ततश्चायमप्युक्त एव ॥ २४९-२५१ ॥ द्वादशस्थाननिधिरुच्यते-तसकायमिति, सकायं-द्वीन्द्रियादिरूप न हिंसन्त्या- रम्भप्रवृत्यादिना प्रकारेण, मनसा वाचा कायेन-तदहितचिन्तनादिना, विविधन करणयोगेन-मनःप्रभृतिभिः काणादिना प्रकारेण, संयता:-साधवः, सुसमाहिता-उद्युक्ता इति ॥ २५२ ॥ तत्र हिंसादिदोषमाह-त्रसकायं विहिंसन्नारम्भप्रवृत्यादिना प्रकारेण हिनस्त्येव तुरवधारणार्थे व्यापादयत्येव तदाश्रितान्-त्रसाश्रितान् वसांश्च विविधान् प्राणिनस्तदन्यद्वीन्द्रियादीन् , चशब्दात् स्थावरांश्च पृथिव्यादीन् , चाक्षुपानचाक्षुपांश्च-चक्षुरिन्द्रियग्राह्यान- ग्राखांश्चेति सूत्रार्थः ॥ २५३ ॥ यस्मादेवं तम्हत्ति, तस्मादेतं विज्ञाय दोपं-तदाश्रितजीवहिंसालक्षणं दुर्गतिवर्धनं- संसारवर्धनं त्रसकायसमारम्भं तेन तेन विधिना यावज्जीवमेव वर्जयेदिति ॥ २५४ ।।

जाणि(ई) चत्तारि अभुजाई, इसिणाऽऽहारमाइणि । ताई तु विवजतो, संजमं अणुपालए ॥२५५।। पिंडं सिजं च वत्थं च, चउत्थं पायमेव य । अकप्पिरं न इच्छिजा, पडिगाहिज कप्पिरं ॥२५६॥ जे निआगं ममायंति, कीअमुद्देसिआइडं । यहं ते समणुजाणंति, इअ उत्तं महेसिणा ॥ २५७ ॥ तम्हा असणपाणाई, कीअमुद्देसिआहडं । वजयंति ठिअप्पाणो, निग्गंथा धम्मजीविणो ॥ २५८ ॥ उक्तो द्वादशस्थानविधिः, प्रतिपादितं कायफ्टकम् , एतत्प्रतिपादनादुका मूलगुणाः, अघुनैठदुनिभूतोनरगुणावगरः, ते । चाकल्पादयः पछत्तरगुणाः, यथोक्तं-" अकप्पो गिहिभापणं"ति, नत्राकल्पो द्विविधा-शिशास्थापनाकमा अकल्पस्थापना. फल्पश्च । तत्र शिक्षकस्थापनाकल्पोऽनधीतपिण्डनियुक्तयादिनाऽऽनीतमप्याहारादि न कल्पत इति, उक्तं न-"अणहीया खलु जेणं पिंडेसणसेजपत्यपाएमा । तेणाणियाणि जाणो कप्पंति न पिंडमाईणि ॥ १ ॥ उउपदमिण प्रणला वामानासे उ दोषि णो सेहा। दिक्खिअंती पाय ठरणाफप्पो इमो होह ॥२॥" प्रकल्पस्थापनाकल्प राह-जाणित्ति, पानि पत्यारि अभोज्यानि-संयमापकारित्वेनाकल्पनीयानि, नापीणां-माधूनामाहारादीन्याहारसमतियसपात्राणि तानि विधिना विवर्जयन् संयम-मप्तदशप्रकार अनुपालयेत् तदत्यागे संयमामावादिति ॥ २५५ ।। एतदेव स्पष्टपति-पिवंति, पिण्डं शय्यां च वन्नं च चतुर्थ पानमेव च, एतत्स्वरूपं प्रफटार्थ, अकल्पिक नेच्छमतिगृह्णीयाकल्पिक-यथोचितः मिति ॥ २५६ ॥ अमरिषक दोपमाह-जेति, ये कंचन द्रव्यसाधादयो द्रव्यलिङ्गधारिणो नियागंति नित्यमामन्प्रितपिण्ड ममायंतीति परिगृह्णन्ति, तथा क्रीतमौद्देशिकाहृतमेतानि यथा क्षुल्लकाचारकथायाम् । वधं-सस्थावरादिधातं ते-द्रव्यसाध्वादयः समनुजानन्ति दात्प्रवृत्त्यनुमोदनेनेत्युक्तं महर्षिणा-बर्द्धमानेनेति ॥ २५७ ॥ यस्मादेवं तम्हत्ति, तस्मादशनपानादि चतुर्विधमपि यथोदितं क्रीतमौद्देशिकमाहृतं वर्जयन्ति स्थितात्मानो-महासत्त्वाः निर्ग्रन्थाः- साधवो धर्मजीविनः-संयमैकजीविन इति ॥ २५८ ।। कंसेसु कंसपाएसु, कुंडमोएसु वा पुणो । भुंजतो असणपाणाई, आयारा परिभस्लइ ॥ २५९ ॥ सीओदगसमारंभे, मत्तधोअणछड्डणे । जाइं छिप्पंति भूआई, दिवो तत्थ असंजमो ॥ २६० ॥ पच्छाकम्म पुरेकम्मं, सिआ तत्थ न कप्पइ । एणमटुं न भुजंति, निग्गंथा गिहिभायणे ॥२६१ ॥ उक्तोऽकल्पस्तदभिधानात् त्रयोदशस्थानविधिः, इदानीं चतुर्दशस्थानविधिमाह-कंसेत्ति, कांसेघु-करोटकादिपु, कांस्य- पात्रेषु-तिलकादिषु, कुण्डमोदेषु-हस्तिपादाकारेषु मृन्मयादिषु, भुञ्जानोऽशनपानादि तदन्यदोपरहितमपि, आचारात्- श्रमणसम्बन्धिनः, परिभ्रश्यति-अपैतीति ।। २५९॥ कथमित्याह-सीओदगत्ति, अनन्तरोद्दिष्टभाजनेषु श्रमणा भोक्ष्यन्ते भुक्तं वैभिरिति शीतोदकेन धावनं कुर्वन्ति । तदाह-शीतोदकसमारम्भे-सचेतनोदकेन माजनधावनारम्भे तत्मात्रक- धावनोज्झने-कुण्डमोदादिषु क्षालनजलत्यागे यानि क्षप्यन्ते-हिंस्यन्ते भूतानि-अप्कायादीनि, सोऽत्र-गृहिभाजनभोजने दृष्टः-उपलब्धः, केवलज्ञानभास्वता असंयमस्तस्य भोक्तुरिति ।। २६० ॥ किंच पच्छाकम्मंति, पश्चात्कर्म पुरस्कर्म । स्यात्तत्र-कदाचिद् भवेद् गृहिभाजनभोजने, पश्चारकर्मपुराकर्ममारस्तूतपरित्येके । अन्ये तु भुञ्जन्तु तावत्माधयो वयं तु पश्चानोक्ष्यामहे इति पश्चात्कर्म, व्यत्ययेन तु पुरस्कर्मेति व्याचक्षते । एतय न कल्पने धर्मचारिणां, यत एवमेतदर्थ- पश्चात्कादिपरिहारार्थ न भुञ्जन्ते निर्ग्रन्थाः, केत्याह-गृहिमानने यनन्तरोदिन इति ।। २६१ ॥ आसंदीपलिअंकेसु, मंचमासालएसु वा । अणायरिअमजाणं, आसइत्तु सइत्तु वा ॥ २६२ ॥ नासंदीपलिअंकेसु, न निसिजा न पीढए । निग्गंथाऽपडिलेहाए, बुद्धवुत्तमहिट्ठगा ॥ २६३ ॥ गंभीरविजया एए, पाणा दुप्पडिलेहंगा । आसंदी पलिअंको अ, एअमटुं विवजिआ ॥ २६४ ॥ उक्तो गृहिभाजनदोपस्तदभिधानाच्चतुर्दशस्थानविधिः, इदानीं पश्चदशस्थानपिधिमाह-आसंदीति, आसन्दीपर्यको प्रतीतो तयोरासन्दीपर्ययोः, मश्चाशालकयोच मनःप्रतीतः, आशालकस्तु-अवष्टम्मममन्वित आसनविशेषा, एतयोरना. चरितमनासेपितमार्याणां-माधूनामासितुं-उपवेष्टुं स्वप्तुं वा-निद्रातिवाहनं वा कर्तु, शुपिरादिदोपादिति ॥ २६२ ॥ /- अत्रैवापवादमाह-नासदित्ति, नासन्दीपर्ययोः प्रतीतयोर्न निपद्यायां-एकादिकल्परूपायो, न पीठफे-वेत्रकाष्ठमयादी : निर्ग्रन्थाः-माघः, अप्रत्युपेक्ष्य-चक्षुरादिना न निपीदनादि कुर्वन्ति इति यास्यशेषः, नमत्राभिमुम्बध्यते, न कुर्वन्तीति, किपिशिशा निर्यन्याः १, इत्याह-बुद्दोकाधिष्ठातार:-तीर्थकरोक्तानुष्ठानपरा इत्यर्थः, इह पाप्रत्युपेक्षितासन्धादौ निपीद नादिनिषेधात् धर्मकथादौ राजकुलादिषु प्रत्युपेक्षितेषु निपीदनादिविधिमाह विशेषणान्यथानुपपत्तेरिति ॥ २६३ ॥ औष H दोपमाह-गंभीरत्ति, गम्भीरविजया, गम्भीरं-अग्रकाशं, विजयः-आश्रयः अप्रकाशाश्रया, एते-प्राणिनामासन्धादयः, एवं च प्राणिनो दुष्प्रत्युपेक्षणीया एतेषु भवन्ति, पीज्यन्ते च एतदुपवेशनादिना, आसन्दः पर्यश्च, चशब्दात् मञ्चादयः चैतदर्थ विवर्जिताः साधुमिरिति ॥ २६४ ।। गोअरग्गपविट्ठस्स, निसिज्जा जस्स कप्पइ। इलेरिसमणायारं, आवजइ अबोहियं ॥ २६५ ॥ विवत्ती बंभचेरस्त, पाणाणं च बहे बहो । वणीमगपडिग्घाओ, पडिकोहो अगारिणं ।। २६६ ॥ अगुत्ती बंभचेरस्स, इत्थीओ बाबि संकणं । कुसीलबड्डणं ठाणं, दूरओ परिवजए ॥ २६७ ॥ तिहमन्नयरागस्त, निसिज्जा जस्स कप्पई । जराए अभिभूअस्स, वाहिअस्त तवस्तिणो ॥२६८॥ उक्तः पर्यङ्कस्थानविधिः, तदभिधानात्पञ्चदशस्थानम् , इदानीं पोडशस्थानमधिकृत्याह-गोयरग्गति, गोचराग्र- प्रविष्टस्य-भिक्षाप्रविष्टम्येत्यर्थः, निघद्या यस्य कल्पते, गृह एव निपीदनं यः ममाचरति साधुरितिभावः, स खलु एनमी- दृशं वक्ष्यमाणलक्षणं अनाचारमापद्यते-प्रामोति, अबोधिकं-मिथ्यात्यफलमिति ।। २६ ॥ अनाचारमाह-विवत्तित्ति, विपत्तिमचर्यस्य-आज्ञाखण्डनादोपतः साधुसमाचरणस्य, प्राणिनां च वधे वधो भवति, तथा सम्बन्धादाधाकर्मा- दिकरणेन, बनीपकप्रतीधातस्तदाक्षेपणादित्साभिधानादिना, प्रतिक्रोधश्चागारिणां तत्स्वजनानां च स्यात् तदाऽऽक्षेप- दर्शनेनेति ॥ २६६ ॥ तथा अगुत्तित्ति, अगुप्तिर्ब्रह्मचर्यस्य तदिन्द्रियाद्यवलोकनेन, स्त्रीतश्चापि शङ्का भवति एतत्प्र- ललोचनदर्शनादिना अनुभूतगुणायाः, कुशीलवर्धन स्थान-तदुक्तेन प्रकारेणासंयमवृद्धिकारकं, दतः परिवर्जयेत्- परित्यजेदिति ॥२६७।। सूत्रेणैवापवादमाह-तिण्हति, त्रयाणां वक्ष्यमाणलक्षणानां अन्यतरस्य एकस्य निपद्या गोचर प्रविष्टस्य गृहे यस्य कल्पते औचित्येन, तस्य तदासेपने न दोष इति पाक्यशेषः, कस्य पुनः कल्पत इत्याह-जरयाऽभि. भूतस्यात्यन्तयुद्धस्य, व्याधिमतः-अत्यन्तमशक्तस्य, तपस्विनो-विप्रकष्टक्षपस्य, एते न भिक्षाटनं न कार्यन्त एर, आत्मलन्धिकाद्यपेक्षया तु सूत्रविषयः, न चैतेषां प्राय उक्तदोषाः मम्मचन्ति, परिहरन्ति च वनीपप्रतिपातादीति ॥ २६८ ।। वाहिओ वा अरोगी वा, सिणाणं जो उ पत्थए । चुकंतो होइ आयारो, जढो हवइ संजमो ॥२६९॥ संतिमे सुहुमा पाणा, घसासु भिलुगासु अ। जे अ भिक्खू सिणायंतो, विअडेणुप्पलावए ॥२७॥ तम्हा ते न सिणायंति, सीएण उसिणेण वा । जावजीवं वयं घोरं, असिणाणमहिट्ठगा ॥ २७१ ॥ सिणाणं अदुवा कक्कं, लुद्धं पउमगाणि अ । गायस्सुवणट्ठाए, नायरंति कयाइवि ॥ २७२ ।। उक्तो निपधास्थानविधिः, तदभिधानास्पोडशस्थान, साम्प्रतं सप्तदशस्थानमाह-वाहिओ येति, व्याधिमान्-व्याधि- ग्रस्तः, अरोगी वा-रोगविप्रभुक्तो वा, स्नान-अङ्गप्रक्षालनं, यस्तु प्रार्थयते-सेरत इत्यर्थः, तेनेत्यम्भूतेन व्युत्क्रान्तो भवति आचारो-बाह्यतपोरूपः, अस्नानपरीपहानतिमहनात् , जढा-परित्यक्तो मवति, संयमः-प्राणिनां रक्षणादिकोऽका. यादिविराधनादिति ॥२६८॥ प्रासुकस्नानेन कथं संयमपरित्याग इत्याह-संतिमे, सन्त्येते प्रत्यशोग्लम्पमानरूपाः, सूक्ष्मा:-श्लक्ष्णाः, प्राणिनो-द्वीन्द्रियादयः, घसासु-शुपिरभूमिपु, भिलुकासु च-तथाविधभूमिराजीपु च, यांस्तु भिक्षुः स्नपयन् स्नानजलोज्झनक्रियया विकृतेन-प्रासुकोदकेनोत्प्लावयति, तथा च तद्विराधनातः संयमपरित्याग इति ॥२७॥ निगमयन्नाह-तम्हत्ति, यस्मादेवमुक्तदोपप्रसङ्गस्तस्मात्ते साधवो न स्नान्ति शीतोदकेनोष्णोदकेन वा प्रासुकेना- पासुकेन वेत्यर्थः । किविशिष्टास्त इत्याह-यावज्जीवं-आजन्म, व्रतं घोरं-दुरनुचरमस्नानमाश्रित्य अधिष्ठातार:-अस्यैव कर्तार इति ॥ २७१ ॥ किं च-सिणाणन्ति, स्नानं पूर्वोक्तं, अथवा कल्क-चन्दनादि, लोभ्रं-गन्धद्रव्यं, पद्मकानि च-कुछमकेसराणि, चशब्दादन्यचैवंविधं गानस्योद्वर्त्तनाथ-उद्वर्तननिमित्तं नाचरन्ति कदाचिदपि-यावजीवमिति भावसाधव इति ॥ २७२ ॥ नगिणस्स वावि मुंडस्स, दोहरोमनहसिणो। मेहुणा उवसंतस्त, किं विभूसाइ कारिअं? ॥२७३॥ विभूसावत्तिअं भिक्खू, कम्मं बंधइ चिक्कणं । संसारसागरे घोरे, जेणं पडइ दुरुतरे ॥ २७४ ॥ विभूसावत्तिअं चेअं, बुद्धा मन्नति तारिसं । सावज्जवहुलं चेअं, नेयं ताईहिं सेविअं ॥ २७५ ॥ उक्तोऽस्नानविधिः, तदभिधानात्सप्तदशं स्थानं, साम्प्रतमष्टादशं शोभावर्जनास्थानमुच्यते-शोभायां नास्ति दोपः, अलङ्गतचापि धर्ममाचरेदि "त्यादिवचनात् पराभिप्रायमात्रमाशङ्कयाह-नगिणत्ति-नग्नस्यापि-कुचेलवतोऽपि उपचार- नग्नस्य निरुपचरितस्य नग्नस्य वा जिनकल्पिकस्येति सामान्यविषयमेव मूत्रं, मुण्डस्य-द्रव्यभावाभ्यां, दीर्घरोमनखवतः- ॐ दीर्घरोमवतः कशादिपु, दीर्घनखयतो इस्तादौ जिनकल्पिकस्य, इतरस्य तु प्रमाणयुक्ता एव नखा मन्ति यथाऽन्यसाधूनां शरीरेषु तमस्यपि न लगन्ति । मैथुनादुपशान्नस्योपरतस्य किं विभूपया-राहया प्रयोजन (कार्य) , न किञ्चिदिति ।। २७३ ॥ इत्थं प्रयोजनाभावमभिधायापायमाह-विभूतत्ति, विभूपाप्रत्ययं-विभूषानिमित्तं भिक्षु:-माधुः कर्म पध्नाति चिकणं-दारुणं संसारसागरे घोरे-रौद्रे येन कर्मणा पतति दुरुत्तरे-अकुशलानुबंधतोऽत्यन्तदीर्घ इति ॥ २७४ ॥ एवं बाह्यरिभूपापायमभिधाय मङ्कपविभूपापायमाह-विभूसावत्ति, विभूपाप्रत्ययं-विभूपानिमित्तं चेत एवं च यदि मम विभूषा सम्पयत इति, तत्प्रवृत्यङ्गं चित्तमित्यर्थः, बुद्धाः-तीर्थकरा मन्यन्ते-जानन्ति तादृशं रौद्र- कर्मपन्धहेतुभूतं विभूपाक्रियामहित ( मदृशं ) सायद्यपहुलं चैतदासध्यानानुगत घेतः, नैतदित्थम्भूतं ग्रातृभिरात्मा- रामैरायः साधुभिः सेवितमाचरितं. कुशलचिचत्वानेपामिति ॥ २७५ ।। खवंति अप्पाणममोहदंसिणो, तवे रया संजमअजवे गुणे । धुणंति पाबाई पुरेकडाई, नवाइं पावाई न ते करंति ॥ २७६ ॥ सओवसंता अममा अकिंचणा, सविजविजाणुगया जसंसिणो । उउप्पसन्ने विमलेव चंदिमा, सिद्धिं विमाणाई उति ताइणो ॥ २७७ ॥ तिमि । छटुं धम्मत्थकामज्झयणं समत्तं ६॥

उक्तः-शोभावर्जनस्थानविधिस्तदभिधानादष्टादशं पदं, तदभिधानाचोत्तरगुणाः, माम्प्रतमुक्तफलप्रदर्शनेनोपसंहरबाह-
खवंतित्ति, क्षपयन्त्यात्मानं तेन तेन चित्तयोगेनानुपशान्तं 'शमयोजनेन जीवं, किंविशिष्टा इत्याह-अमोहदर्शिन:-
अमोहं ये पश्यन्ति, यथावत्पश्यन्ति य इत्यर्थः, त एव विशेष्यन्ते-तपसि-अनशनादिलक्षणे रताः-सक्ताः, किंविशिष्टे
तपसीत्याह-संयमार्जवगुणे प्राकृतत्वादेकारः संयमार्जवे गुणौ यस्य तपसस्तस्मिन् , संयमऋजुभावप्रधाने शुद्ध इत्यर्थः, ते
एवंभूता धुन्वन्ति-कम्पयन्ति अपनयन्ति, पापानि पुराकृतानि-जन्मान्तरोपात्तानि, नवानि-प्रत्यग्राणि पापानि न ते
साधनः कुर्वन्ति, तथा अप्रमत्तत्वादिति ॥ २७६ ॥ किं च सओवसंतत्ति, सदोपशान्ताः-सर्वकालमेव क्रोधरहिताः
अममाः-सर्वत्र ममत्वशून्याः, अकिञ्चना-हिरण्यादिमिथ्यात्वादिद्रव्यमावकिश्चनविनिर्मुक्ताः, स्वा-आत्मीया विद्या
स्वविद्या-परलोकोपकारिणी केवलश्रुतरूपा तया स्वविद्यया विद्यया अनुगता-युक्ताः, न पुनः परविद्यया इहलोकोप-
कारिण्येति, त एव विशेष्यन्ते-यशस्विनः-शुद्धपारलौकिकयशोवन्तः, त एवंभूता ऋतौ प्रसन्ने-परिणते शरत्कालादी
विमल इव चन्द्रमाः-चन्द्रमा इव विमलाः, इत्येवंकल्पास्ते भावमलरहिताः सिद्धि-निर्वृत्ति तथा 'सावशेषकर्माणो विमा-
नानि-सौधर्मावतंसकादीन्युपयान्ति-सामीप्येन गच्छन्ति त्रातार:-स्वपरापेक्षया साधव इति ॥२७७॥ ब्रवीमीति पूर्ववदेव ॥
दशवैकालिकश्रुतस्कन्धषष्ठाध्ययनव्याख्या समाप्तेति ॥ ६ ॥

व्याख्यातं महाचारकथाध्ययनं, इदानीं वाक्यशुद्धयाग्व्यमध्ययनमारभ्यते, अस्प चायमभिसम्पन्धः इहानन्त- । राध्ययन गोचरप्रविष्टन सता साचार पृष्टेन तदिदाऽपि न महाजनसमक्ष तत्रैव विस्तरतः कथयितव्यमिति, अपि त्वालये गुरवो वा कथन्यतीति वक्तव्यमित्येतदुक्त, इह त्वालयगतेनापि तेन गुरुणा वा पचनदोपगुणाभिज्ञेन निरपद्यरचमा कथयितव्यमित्येतदुच्यत, उक्तं च-"माजिणपजाण"मिति अनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनमिति, तवेदम्- चउण्हं खलु भासाणं, परिसंखाय पन्नवं । दुण्हं तु विणयं सिक्खे, दो न भासिज सहसो ॥२७८॥ जाअ सच्चा अवत्तवा, सच्चामोसा अजामुसा ।जा अबुद्धेहिं णाइपणा, नतं भासिज पन्नवं ॥२७९॥ असचमोसं सञ्चं च, अणवजमककसं । समुप्पेहमसंदिलं, गिरं भासिज पन्नवं ॥ २८० ॥ एअंच अट्ठमन्नं वा, जंतु नामेइ सासयं । स भासं सचमोसंपि, तंपि धीरो विवजए ॥ २८१ ॥ चउपहंति, चतसृणां, खलुशब्दोऽनधारणे, चतसृणामेव, नातोऽन्या मापा विद्यत इति । भापाणां-सत्यादीनां परि- सइख्याय-सः प्रकारैत्विा, स्वरूपमिति वाक्यशेपः। प्रज्ञावान-प्राज्ञो बुद्धिमान माधुः, किमित्याह-द्वाभ्यां सस्यासत्या- मृपाम्या, तरवधारणे द्वाभ्यामेव आम्यां विनयं-शुप्रयोगं पिनीयतेऽनेन कर्मेतिकत्वा शिक्षेत-जानीयात् , द्वे-असत्या- मत्यामृपेन भाषेत सईश:-मः प्रकारैरिति ।। २७८ ॥ पिनयमेवाह-जा य सच्चत्ति, या व सत्या पदार्थतवमगीकृत्य अवक्तव्या-अनुञ्चारणीया मायद्यत्वेन-अमुत्र स्थिता पल्लोरिति कौशिकमापार , सत्यामृषा वा यथा-दश दारका जाता

इत्येवंलक्षणा, मृषा च संपूर्णैव, चशब्दस्य व्यवहितः सम्बन्धः, या च बुद्धः-तीर्थकरगणधरैरनाचरिता असत्यामृपा-
आमन्त्रण्याज्ञापन्यादिलक्षणा अविधिपूर्वकं स्वरादिना प्रकारेण, न तां भापेत, नेत्थंभूतां वाचमुदाहरेत् प्रज्ञावान-बुद्धिमान्
साधुरिति सूत्रार्थः ।। २७९ ॥ यथाभूता अवाच्या भाषा तथाभूतोक्ता, साम्प्रतं यथाभूता वाच्या तथाभूतामाह-असच-
मोसन्ति, असत्यामृपामुक्तलक्षणां, सत्यां चोक्तलक्षणामेव, इयं च सावद्यापि सकर्कशापि भवत्यत आह-असावद्यां-
अपापां, अकर्कशामतिशयोक्त्या ह्यमत्सरपूर्वा, संप्रेक्ष्य-स्वपरोपकारिणीति वुद्ध्या आलोच्यासंदिग्धां-स्पष्टामक्षेपेण प्रति-
पत्तिहेतुं, गिरं-वाचं, भाषेत-ब्रूयात् , प्रज्ञावान् बुद्धिमान् साधुरिति ॥ २८० ॥ साम्प्रतं सत्यासत्यामृपाप्रतिषेधार्थमाह-
एयं चत्ति, एतं चार्थमनन्तरप्रतिपिद्धं सावध कर्कशविषयमन्यं वा, एवंजातीयं प्राकृतशैल्या यस्तु नामयति शाश्वतं, य एव
कश्चिदर्थो नामयति-अननुगुणं करोति, शाश्वतं-मोक्षं, तमाश्रित्य स साधुः पूर्वोक्तभापाभापकत्वेनाधिकृतो भापां सत्या-
मृपामपि पूर्वोक्तां, अपिशब्दात् सत्यापि या तथाभूता तामपि धीरो-युद्धिमान् विवर्जयेत्-न व्यादिति भावः । आह-
सत्यामृपाभापाया ओघत एव प्रतिषेधात्तथाविधसत्यायाश्च सावद्यत्वेन गतार्थं सूत्रमिति, उच्यते, मोक्षपीडाकर सूक्ष्ममप्यर्थ
अङ्गीकृत्यान्यतरभाषाभाषणमपि न कर्त्तव्यमित्यतिशयप्रदर्शनपरमेतददुष्टमेवेति ॥ २८१ ॥
वितहपि तहामुत्ति, जं गिरं भासए नरो। तम्हा सो पुट्ठो पावेणं, किं पुणं जो मुसं वए ॥२८२॥
तम्हा गच्छामो वक्खामो, अमुगंवा णे भविस्सइ।अहंवा गं करिस्लामि, एसो वाणं करिस्तइ॥२८३॥

एवमाइ उ जा भासा, एसकालमि सकिया । संपयाईअमटे वा, तंपि धीरो विवजए ॥ २८४ ॥
माम्प्रत मृपामापासम्क्षणार्थ आह-पितापि, विनध-अतथ्य तधामूपि-कश्चित्तरम्परूपमपि यस्तु, अपिशन्द-
स्य व्यवहित. मम्बन्ध, एतदुक्त भाति-पुरुषनपथपस्थितरनिताद्यप्योकत्ये या गिर भाषते नरः, हय स्री आगच्छवि
गायति चेत्यादिरूपा, तस्माद्वापणादयम्भूतात्पूर्वमेवासी यता मापणामिपन्धिकाल स्पृष्टः पापेन-पद्धः फर्मणा,
किं पुनर्यो मृपा वक्ति ?, भूतापघातिनीं वाच म सुतरां वाध्य( वक्ष्य )त इति ॥२८२ ॥ तहत्ति, यस्माद्वितथं तथामूर्यपि
उम्त्वगीकृत्य भाषमाणा पक्ष्यत तस्माद्गमिष्याम एव च इतोऽन्यत्र, वक्ष्याम एव श्वस्तत्तदोपनिमित्तमिति, अमुकं या नः
कार्य त्रमत्यादि भविष्यत्येव, अह चेद लोचादि करिष्यामि निपमेन, एप पा माधुरस्माकं विश्रामगादि करिष्यत्येवेति
॥ २८३ । एकमाइ उ इति, एचमाद्या तु या मापा, आदिशब्दात् पुस्तकं ते दास्याम्मवेत्यवमादिपरिग्रहः, एष्यत्काले-
भविष्यकालविषया, बहुविमत्वान्मुहूर्तादीनां शङ्किता-किमिदमित्यमेव भविष्यत्युतान्ययेत्यनिश्चितगोचरा, तथा
साम्प्रतातीनार्थपोरपि या शक्षिता, माम्प्रताथै स्त्रीपुरुषाविनिश्चरे एप पुरुष इति, अतीतार्थेऽप्येवमेव पलीपर्दतवयाद्यनिधये
सदात्र गौरस्माभिष्ट इति । याप्येवभूता मापा शकिता तामपि धोरो विवर्जयेत् , तत्थामावनियामावेन व्यभिचारतो
मृपात्वोपपोधिनतोऽगमनादौ गृहस्थमध्ये लापवादिप्रमाद , सर्वमेव सायमर वक्तव्यमिति ॥ २८४ ॥ किं च-
अईअंमि अ कालंमि, पच्चुप्पण्णमणागए । जमद्रं तु न जाणिज्जा, एवमेअंति नो यए ॥ २८५ ॥

अईयांम अ कालंमि, पच्चुप्पण्णमणागए । जत्थ संका भवे तं तु, एवमेति नो वए ॥ २८६ ।। अईयमि अ कालंमि, पच्चुप्पण्णमणागए। निस्संकिअं भवे जं तु, एवमेअं तु निदिसे ॥ २८७ ।। अईअंमि इति, अतीते च काले तथा प्रत्युत्पन्ने-वर्तमाने अनागते च यमर्थं तु न जानीयात्सम्यगेव- मयमिति, तमङ्गीकृत्यैवमेतदिति न ब्रूयादिति, अयमज्ञातभापणप्रतिषेधः ॥ २८५ ॥ तथा-अईयम्मि-अतीते न काले प्रत्युत्पन्नेऽनागते यत्रार्थे शङ्का भवेदिति तमप्यर्थमाश्रित्यैवमेतदिति न ब्रूयादिति, अयमपि विशेषतः शतिभाषण- प्रतिषेधः ।। २८६ ॥ अईयंमि, अतीते च काले प्रत्युत्पन्ने अनागते निःशङ्कितं भवेत्, यदर्थजातं तुशब्दात अनवद्यं, तदेवमेतदिति निर्दिशेत्, अन्ये पठन्ति-स्तोकस्तोकमिति, तत्र परिमितया वाचा निर्दिशेदिति ॥ २८७ ॥ तहेव फरुसा भासा, गुरुभूओवघाइणी। सच्चावि सा न वत्तवा, जओ पावस्स आगमो॥ २८८ ॥ तहेव काणं काणत्ति, पंडगं पंडगत्ति वा । वाहिअं वावि रोगित्ति, तेणं चोरत्ति नो वए ॥ २८९ ।। एएणऽन्नेण अद्वेणं, परो जेणुवहम्मइ । आयारभावदोसन्नू, न तं भासिज्ज पन्नवं ॥ २९० ॥ तहेव होले गोलित्ति, साणे वा वसुलित्ति अ । दमए दुहए बावि, नेवं भासिज पन्नवं ॥ २९१ ॥ अजिए पजिए वावि, अम्मो माउसिअत्ति अ। पिउस्सिए भायणिज्जत्ति, धूए णतुणिअत्ति अ॥ २९२ ॥ MARWAR हले हीलत्ति अन्नित्ति, भट्टे सामिणि गोमिणि।होले गोले वसुलिति, इथिों नेवमालवे ॥ २९३ ।। नामधिजेण णं वृआ, इत्थीयुत्तेण वा पुणो जिहारिहमभिगिज्झ, आलविज लविज वा ॥ २९४ ॥ अजए पजए वावि, वप्पो चुल्लपिउत्ति अ । माउलो भाइणिजत्ति, पुचे णनुणिअत्ति अ॥ २९५ ॥ हे भो हलित्ति अन्नित्ति, भट्टे सामिअ गोमिअ । होल गोल वसुलित्ति, पुरिसं नेवमालवे ॥ २९६ ।। नामधिज्जेण णं यूआ, पुरिसगुत्तेण वा पुणो । जहारिहमभिगिज्झ, आलविज लविज वा ॥ २९७ ॥ तहेवति, तथैव, पम्पा भाषा-निष्ठुरा माधुमावस्नेहरहिता गुरुभूतोपघातिनी-महाभूतोपघातवती, यथा भवति तथा कविकस्यचित् कुलपुत्रत्वेन प्रतीतस्त दासमित्यभिदधता, सर्वथा सत्यापि सा वाद्यार्थातधाभावमङ्गीकृत्य न यरूपा, यतो पस्या मापायाः सकाशात्पापस्यागमः-अकुशलबन्धो भवति ॥ २८८ ॥ तहेवत्ति, तथैवेति पूर्ववत्, काणं-मिनाथं काण इति, तथा पण्डक-नपुंसकं पण्डक इति वा, व्याधिमन्तं वापि रोगीति, स्तेनं-चौर चौर इति नो देव , अप्रीतिलसानास्थिररोगद्धिविराधनादिदोपप्रसङ्गादिति ॥ २८९ ॥ एएणं ति, एतेनान्येन वाऽर्धेनोक्तन । मता परो येनोपहन्यते, येन केनचित्प्रकारेण । आचारभावदोपको यतिन वं मापेत प्रभावान् उमर्थमिति ॥ २९० ।। तहेष ति, तर, होले गोले इति श्वा या वसुल इति, द्रमको दुर्भगश्चापि नैयं भाषेत प्रज्ञापान, रह होलादिश- दास्तपदेशप्रसिदितो नेप्लुर्यादिवाना अतावप्रतिषेध इति ॥ २९ ॥ एवं स्त्रीपुरुपयोः सामान्येन भाषणप्रतिषेध कस्वा अधुना स्त्रियमधिकृत्याह-अज्जिएत्ति, आर्यि(जि)के प्रार्यि(जि)के वापि अम्ब मातृष्वस इति च पितृष्वसः भागि. नेयीति, दुहिता नप्त इति च, एतानि रुयामन्त्रणवचनानि वर्तन्ते, तत्र मातुः पितुर्गा माता आर्थिका, तस्या अपि या अन्या माता सा प्रार्थिका, शेपाभिधानानि प्रकटार्थानि एवेति सत्रार्थः ॥ २९२ ॥ किंच-हले हलेत्ति, हले इत्येवं अन्ने इत्येवं तथा भट्टै स्वामिनि गोमिनि, तथा हले गोले वसुले इत्येतान्यपि नानादेशापेक्षया रुयामन्त्रणवचनानि गौरवकुत्सादिगर्माणि वर्तन्ते, यतश्चैषमतः सियं नैव हो(ह)लादिशब्दैरालपेदिति, दोपारमालपनं कुर्वतः समागहीतत्प्र- उपप्रवचनलाघवादय इति ॥ २९३ ॥ यदि नैवमालपेत् कथं तर्हि आलपेदित्याह-नामधिजेणन्ति, नामधेयेनेति- नाम्नैव नागधेयेनैनां ब्रूयात् , स्त्रियं फचित्कारणे, यथा देवदते ! इत्येवमादि, नामास्मरणादौ गोत्रेण वा पुन यात् स्त्रियं, यथा काश्यपगोत्रे । इत्येवमादि, यधार्ह-यथायोग्यं चयोदेशैश्वर्याधपेक्षया अभिगृथ-गुणदोपानालोच्यालपेल्ल. पेद्वा, ईपत्सकहा लपनं आलपन, लपनमतोऽन्यथा, तत्र वयोगद्धा मध्यदेशे ईश्वरा धर्मप्रिया, अन्यत्रोच्यते धर्मशीले इत्यादि, अन्यथा च यथा न लोकोपघात इति ॥ २९४ ॥ उक्तः खियमधिकृत्यालपनप्रतिषेधो विधिश, साम्प्रतं पुरुषमधि- कृत्याह-अज्जए पजएत्ति, आर्यकः प्रार्यकशापि वप्पाचुलपितेति च, तथा मातुल भागिनेयेति, पुत्र नप्त इति च, इह भावार्थः खियामिव द्रष्टव्यः, नवरं चुल्लयप्पा-पितृव्योऽभिधीयत इति ॥ २९५ ॥ किंच-हे भो इलित्ति, अन्नेत्ति म स्वामिन् गोमिन् होल गोल वसुलित्ति पुरुष नैवमालपेदित्यनापि भावार्थः पूर्ववदेवेति ॥ २९६ ॥ यदि नैवमालपेत्कथं सलिपेदित्याह-नामधिजेणं ति पूर्ववदेव, नवरं पुरुषामिलापेन योजना कार्येति ।। २९७ ।।

परिवदिआण पाणाण, एम इत्थी अय पुम । जाव ण न विजाणिजा, ताव जाइत्ति आलवे ॥ २९८ ॥ तहेर माणुस पसु, पक्वि गाघि सरीसव । थूले पमेडले वझे, पाइ(य)मित्ति अ नो वए ॥ २९९ ॥ परिवृत्ति ण यूआ, यूआ उवचिअत्ति अ । सजाए पीणिए वावि, महाकायत्ति आलवे ॥ ३०॥ तहेर गाओ दुज्झाओ, दम्मा गोरगत्ति अ । वाहिमा रहजोगित्ति, नेवं भासिज पन्नवं ॥ ३०१ ॥ अवं गवित्ति ण यूआ, घेणु रसदयचि अ । रहस्से महल्लए वावि, वए संवहाणचि अ ॥ ३०२ ।। उमा पुरुषमप्याश्रियालपनप्रतिषेधो विधिध, अधुना पञ्चेन्द्रिपतिगत वाग्विधिमाह-पबिंदियाणंति, पश्चेन्द्रियाणां माणिनां गादीनां कनिदिप्राटदशापस्थितानामेपा नी गौरय पुमान् बलीवदः, यायदेतद्विशेषेण न घिजानीया. पान् मार्गप्रश्नादौ प्रयोजने उत्पन्ने सति जातिमाश्रित्यालपेत्, अस्माद् गोरूपजातात् कियट्रेणेत्येवमादि, अन्यथा लिङ्गव्यत्ययमम्मपान मृपावादापत्तिा, गोपालादीनामपि विपरिणाम इत्येवमादयो दोपा इति, आक्षेपपरिहारौ तु वृद्धविय- रणादरसेपो, नश्छेद "जा सिंगवथए दोमो वा पीर पुढवाईए नपुसगचेऽवि, परिसिरियनिदेसो पयर, जहा पत्थरो महिया काओ उरमा मुम्मो नाला वाओ पाउली अंबो अपिलिया, फिमिओ जलूगा मकोडओ कीउिया ममरओ मच्छिया एषमादि, पापरिओ पाह-जगरसमशेण पबहारमषेण य एव पयहाति न इस्थ दोसो, पपिदिएम पुण ण एपमगीरीरात गोपालादीवि प मदिधम्मिति विपरिणामसमपाशी, पुछियतामापारिकाणे पा गुणसभवादिति " ॥ २९८ ॥ किंच- -

तहेवत्ति, तथैव यथैवोक्तं प्राक, मानुष्यं-आर्यादिक, पशु-अजादिकं, पक्षिणं वापि-हंसादिकं, सरीसृपं अज-
गरादिकं, स्थूल:-अत्यन्तमांसलोऽयं मनुष्यादिः, तथा प्रमेदुरः-प्रकर्पण मेदासम्पन्नः तथा वध्यो-व्यापादनीयः पाक्य
इति च नो वदेत्, पाक्यः-पाकप्रायोग्यः, कालप्राप्त इत्यन्ये, नो वदेत्-न ब्रूयात् तदप्रीतितव्यापरयाशङ्कादिदोप-
प्रसङ्गादिति ॥ २९९ ॥ कारणे पुनरुत्पन्ने एवं वदेदित्याह-परिवूढत्ति, परिवृद्ध इति एनं-स्थूलं मनुष्यादि ब्रूयात् , तथा
ब्रूयादुपचित इति च, संजातः प्रीणितश्चापि सस्निग्धः महाकाय इति चालपेत् परिश्रद्धं, पलोपचितं परिहरेदित्यादाविति
॥ ३०० ॥ किंच-तहेवत्ति, तथैव यथैव गावो दोया-दोहार्हा-दोहसमय आसां वर्त्तत्त इत्यर्थः, दम्या-दमनीया
गोरथका इति च, गोरथकाः कल्होडकास्तथा वाह्याः सामान्येन ये कचित्तानाश्रित्य रथयोग्या इति च नैवं भाषेत
प्रज्ञावान साधुः, अधिकरणलाघवादिदोषादिति ॥ ३०१॥ प्रयोजने तु फचिदेवं मापेतेत्याह-जुवं गति, युवा गौरिति
दम्यो गौर्युवेति ब्रूयात्, धेनु-गां रसदेति च ब्रूयाद, रसदा गौरिति, तथा इस्वं महलकं वापि गोरथकं इस्वं चाह्य
महल्लकं वदेत्, संवहनमिति च रथयोग्यं संवहनं वदेत् । कचिदिगुफ्लक्षणादौ प्रयोजन इति ॥ ३०२ ।।
तहेव गंतुमुज्जाणं, पवयाणि वणाणि अ । रुक्खा महल्ल पेहाए, नेवं भासिज्ज पन्नवं ॥ ३०३ ॥
अलं पासायखंभाणं, तोरणाण गिहाण अ । फलिहऽग्गलनावाणं, अलं उदगदोणिणं ॥ ३०४ ॥
पीढए चंगवेरे(रा) अ, नंगले मइयं सिआ। जंतलट्ठी व नाभी वा, गडिआ व अलं सिआ ॥ ३०५ ॥

आसणं सपणं जाणं, हुजा वा किंचुवस्सए । भूओवघाइणि भासं, नेवं भासिज पन्नवं ॥ ३०६ ॥
तहेव गंतुमुजाणं, पदयाणि वणाणि अ । रुक्खा महल्ल पेहाए, एवं भासिज्ज पनवं ।। ३०७ ॥
जाइमंता इमे रुस्खा, दीहवद्दा महालया । पजायसाला विडिमा, वए दरिसणित्ति अ ॥ ३०८ ।।
तहा फलाई पकाई, पायखजाई नो वए। वेलोइयाई टालाई, वेहिमाइ ति नो वए ॥ ३०९ ॥
असंघडा इमे अंया, बहुनिवडिमाफला । वइज बहुसंभूआ, भूअरूवत्ति वा पुणो ॥ ३१० ॥
तदेवोसहिओ पकाओ, नीलिआओ छवीइ । लाइमा भजिमाउत्ति, पिहुखजत्ति नो वए ॥ ३११ ॥
(वि)रूढा बहुसंभूआ, थिरा ओसढावि अ । गम्भिआओ पसूआओ, संसाराउत्ति आलवे ॥ ३१२ ॥
तदेय गंतुमिति, तथैवेति पूपित, गत्या उद्यान-जनक्रीडास्थान तथा पर्वतान् प्रतीवान् तथा धनानि च, तत्र
पृक्षान्महतो-माप्रमाणान् प्रेक्ष्य-पटना नैवं भाषेत प्रज्ञावान-माधुरिति ॥ ३०३ ॥ कथमित्याह-अलमिति,
अलं-पप्तिा एने या प्रामास्तम्भयोः, अकस्तम्मा प्रासादा, स्तम्मस्तु स्तम्म एव, तयोरलं, तथा तोरणानां-
नगरतोरणारीना गहाणी -कुटीरकादीनाममिति पोगा, तथा परिपार्गलानावा वा तत्र नगरद्वारे परिधः, गोपुर-
पारादित अर्गला, नौः प्रतीता, आमा अतं एते वृक्षा, तपोषकद्रोणीनामलं, उदकद्रोण्योरइजलपारिका इति ॥३०॥

तथा पीढए इति, पीठकायालमेते वृक्षाः, पीठकं प्रतीतं तदर्थ, “सुपां सुपो भवन्ती"ति चतुर्थ्यथ प्रथमा, एवं सर्वत्र योजनीयं, तथा चंगवेरा येत्ति चंगवेरा-काष्ठपात्री वथा नङ्गालेत्ति नांगलं-हलं, तथा अलं मयिकाय स्यात् , मयिक-उप्तवीजाच्छादनं, तथा यन्त्रयष्टये वा, यंत्रयष्टिः प्रसिद्धा, नामये वा, नाभिः-शकटरथाङ्गं गण्डिकायै वाऽलं स्युरेते वृक्षा इति, नैवं भाषेत प्रज्ञावानिति वर्तते, गण्डिका सुवर्णकाराणामधिकरणी स्थापनी भवतीति ॥३०५॥ तथा आसणंति, आसनं-आसन्दकादि, शयन-पर्यवादि, यानं-युग्यादि, भवेद्वा किंचिदुपाश्रये-वसतावन्यद्वा द्वारपात्राद्येतेषु वृशेष्विति, भूतोपघातिनी- सत्त्वपीडाकारिणी भाषां नैव भाषेत प्रज्ञावान् साधुरिति, दोपाचात्र तद्वनस्वामी व्यन्तरादिः कुप्येत् , सलक्षणो वा वृक्ष इत्यभिगृह्णीयात् , अनियमितभापिणो लाघवं चेत्येवमादयो योज्याः ॥ ३०६ ॥ अत्रैव विधिमाह-तहेवत्ति, वस्तुतः पूर्ववदेव, नवरमेवं भाषेत ॥ ३०७ ॥ जाहमंतत्ति, जातिमन्तः-उत्तमजातीया अशोकादयोऽनेकप्रकारा वा एते-उप- लभ्यमानस्वरूपा वृक्षा दीर्घवृत्ता महालया:-दीर्घा नालिकेरिप्रभृतयो, वृत्ता नन्दिवृक्षादयो, महालया वटादयः, प्रजात- शाखा-उत्पन्नडाला, विटपिना-प्रशाखावन्तो वदेदर्शनीया इति, एते च प्रयोजने उत्पन्ने विश्रमणतदासन्नमार्गकथनादौ वदेन्नान्यदेति ॥३०८॥ तहा फलाई पक्काइत्ति, तथा फलानि-आम्रफलादीनि पक्कानि-पाकप्राप्तानि, तथा पाकखा- द्यानि-बद्धास्थीनि ग प्रक्षेपकोद्रवपलालादिना विपाच्य भक्षणयोग्यानीति नो वदेत्, तथा वेलोचितानि-पाकाति- शयतो ग्रहणकालोचितानि, अतः परं कालं न विपहन्तीत्यर्थः, टालानि-अवद्धास्थीनि कोमलानीति यदुक्तं भवति, तथा द्वैधिकानीति-पेशीसम्पादनेन द्वैधीमावकरणयोग्यानि वेति नो वदेत्, दोपाः पुनरत्रात ऊर्च नाश एवामीपां, न शोभनानि

आसणं सयणं जाणं, हुजा वा किचुवस्सए । भूओवघाइणिं भासं, नेवं भासिज पन्नवं ॥ ३०६ ॥
तहेव गंतुमुजाणं, पवयाणि वणाणि अ। रुक्खा महल्ल पेहाए, एवं भासिज्ज पन्नवं ॥ ३०७ ॥
जाइमंता इमे रुक्खा, दीहवहा महालया । पजायसाला विडिमा, वए दरिसणित्ति अ ॥ ३०८ ।।
तहा फलाई पक्काइं, पायखजाइं नो वए। वेलोइयाई टालाई, वेहिमाइ ति नो वए ॥ ३०९ ॥
असंथडा इमे अंबा, बहुनिवडिमाफला । वइज्ज बहुसंभूआ, भूअरूवत्ति वा पुणो ॥ ३१० ॥
तहेवोसहिओ पक्काओ, नीलिआओ छवीइ । लाइमा भजिमाउत्ति, पिहुखजति नो वए ॥ ३११ ॥
(वि)रूढा बहुसंभूआ, थिरा ओसदावि अ । गम्भिआओ पसूआओ, संसाराउत्ति आलवे ॥ ३१२ ॥
तहेव गंतुमिति, तथैवेति पूर्ववत् , गत्वा उद्यान-जनक्रीडास्थानं तथा पर्वतान् प्रतीतान् तथा वनानि च, तत्र
वृक्षान्महतो-महाप्रमाणान् प्रेक्ष्य-दृष्ट्वा नैवं भाषेत प्रज्ञावान-साधुरिति ॥ ३०३ ॥ कथमित्याह-अलमिति,
अलं-पर्याप्ता एते वृक्षाः प्रासादस्तम्भयोः, अत्रैकस्तम्मा प्रासादा, स्तम्भस्तु स्तम्म एव, तयोरलं, तथा तोरणानां-
नगरतोरणादीनां गृहाणां च-कुटीरकादीनामलमिति योगा, तथा परिघार्गलानावां वा तत्र नगरद्वारे परिधः, गोपुर-
कपाटादिषु अर्गला, नौः प्रतीता, आसां असं एते वृधा, तथोदकद्रोणीनामलं, उदकद्रोण्योरहट्टजलधारिका इति ॥३०॥

तथा पीढए इति, पीठकायालमेते वृक्षाः, पीठकं प्रतीतं तदर्थ, "सुपा सुपो भवन्ती"ति चतुर्थ्यथ प्रथमा, एवं सर्वत्र योजनीयं, तथा चंगबेरा येत्ति चंगवेरा-काठपात्री तथा नङ्गलेत्ति नांगलं-हलं, तथा अलं मयिकाय स्यात् , मयिक-उप्तबीजाच्छादनं, तथा यन्त्रयष्टये वा, यंत्रयष्टिः प्रसिद्धा, नामये वा, नाभिः-शकटरथाङ्गं गण्डिकायै वाऽलं स्युरेते पृक्षा इति, नैवं भाषेत प्रज्ञावानिति वर्त्तते, गण्डिका सुवर्णकाराणामधिकरणी स्थापनी भवतीति ॥३०५॥ तथा आसणंति, आसनं-आसन्दकादि, शयनं-पर्यकादि, यानं-युग्यादि, भवेद्वा किंचिदुपाश्रये-वसतावन्यद्वा द्वारपात्रायेतेषु वृक्षेविति, भूतोपघातिनी- सत्त्वपीडाकारिणी भाषां नैव भाषेत प्रज्ञावान् साधुरिति, दोपाधान तद्वनस्वामी व्यन्तरादिः कुप्येत् , सलक्षणो वा वृक्ष इत्यमिगृह्णीयात् , अनियमितमापिणो लाघवं चेत्येवमादयो योज्याः ॥ ३०६ ॥ अत्रैव विधिमाह-तहेवत्ति, वस्तुतः पूर्ववदेव, नवरमेवं भाषेत ॥ ३०७ ॥ जाइमंतत्ति, जातिमन्तः-उत्तमजातीया अशोकादयोऽनेकप्रकारा वा एते-उप- लम्यमानस्वरूपा वृक्षा दीर्घवृत्ता महालयाः-दीर्घा नालिकेरिप्रभृतयो, वृत्ता नन्दिवृक्षादयो, महालया वटादयः, प्रजात- शाखा-उत्पन्नडाला, विटपिन:-प्रशाखावन्तो वदेदर्शनीया इति, एते च प्रयोजने उत्पन्ने विश्रमणतदासनमार्गकथनादौ वदेन्नान्यदेति ॥३०८॥ तहा फलाइं पक्काइत्ति, तथा फलानि-आम्रफलादीनि पकानि-पाकप्राप्तानि, तथा पाकखा- द्यानि-बद्धास्थीनि गप्रिक्षेपकोद्रवपलालादिना विपाच्य मक्षणयोग्यानीति नो वदेत्, तथा वेलोचितानि-पाकाति- शयतो ग्रहणकालोचितानि, अतः परं कालं न विपहन्तीत्यर्थः, टालानि-अवद्धास्थीनि कोमलानीति यदुक्तं भवति, तथा द्वैधिकानीति-पेशीसम्पादनेन द्वैधीमावकरणयोग्यानि वेति नो वदेत्, दोषाः पुनरत्रात ऊर्च नाश एवामीपा, न शोमनानि

आसणं सयणं जाणं, हुजा या किंचुवस्सए । भूगोषघाइणिं भासं, नेवं भासिज पन्तयं ॥ ३०६ ॥
तहेव गंतुमुजाणं, पदयाणि पणाणि अ । रुपखा महाल पेहाए, एवं भासिज पक्षवं ।। ३०७ ।।
जाइमंता इमे रुपया, दीवहा महालया। पजायसाला विडिमा, पए दरिसणित्ति अ ॥ ३०८ ।।
तहा फलाई पकाई, पायखजाई नो वए । पेलोइयाई टालाई, हिमाइ चि नो वए ॥ ३०९ ॥
असंधडा इमे अंघा, पहुनि डिमाफला । पइज पहुसंभूआ, भूअरूपत्ति या पुणो ॥ ३१० ।।
तहेवोसहिओ पकाओ, नीलिआओ छपीइ । लाइमा भजिजमाउत्ति, पिहुखजत्ति नोपए ॥ ३१९ ॥
(वि)रूठा पहुसंभूआ, थिरा ओसढापि । गम्भिआओ पसूआओ, संसाराउति आलये ॥ ३१२ ॥
तहेष गंतुमिनि, तपेयेति पूर्वयन् , गत्या उन्यान-जनमोरास्थानं मया पर्वतान् प्रतीतान् सगा वनानि प, तर
वृक्षान्महतो-महाप्रमाणान् प्रेक्ष्य-रष्ट्या नैयं भाषेत प्रज्ञापान-गाधुरिति ॥ ३०३ ।। फपगिरयाह-अलमिणि,
असं-पर्याप्ता एने था। प्रासावस्तम्भयो, अप्रैकस्तम्मा प्रासादा, स्तम्मस्तु स्वम्म एप, गगोरलं, ना तोरणानां-
नगरतोरणादीनां गृहाणांप-गुटीरकादीनामलमिति योगा, या परिपालानापा पाका नगरवारे परिपा, गोपुर-
कपाटादिए अर्गला,नौ प्रतीवा, आगो असं एते पक्षा, तपोषकद्रोणीनामल, उदफनोपोजलधारिका रवि ॥३०॥

वाग्विधिप्रतिषेधाधिकारेऽनुवर्चमाने 'इदमपरमाह-तहेवत्ति, तथैव संखडिं ज्ञात्वा संखण्डयन्ते प्राणिनामायूंपि यस्यां प्रकरणक्रियायां सा संखडी तां ज्ञात्वा, करणीयेति पित्रादिनिमित्तं कृत्यैवैपेति नो वदेत् , मिथ्यात्वोपबृंहणदोपात्, तथा स्तेनकं वापि वध्य इति नो वदेत् , तदनुमतत्वेन निश्चयादिदोपप्रसङ्गात् , सुतीर्था इंति च, चशब्दाद् दुस्ती इति वा आपगा-नद्या, केनचित्पृष्टः सन्नो वदेव , अधिकरणविघातादिदोपप्रसङ्गादिति ॥३१३॥ प्रयोजने पुनरेवं वदेदित्याह- संखडिंति, संखडि संखडिं यात्, साधुकथनादौ संकीर्णा संखडिरित्येवमादि, पणितार्थ इति स्तेनकं वदेत्, शैक्षकादिककर्मविपाकदर्शनादौ, पणितेनार्थोऽस्येति पणितार्थः, पणद्यूतप्रयोजन इत्यर्थः। तथा बहुसमानि तीर्थानि आप- गाना-नदीनां व्यागृणीयात्साध्वादिविषय इति ॥ ३१४॥ तहा नईओ पुण्णाओ, कायतिजत्ति नो वए। नावाहि तारिमाउत्ति, पाणिपिज्जत्ति नो वए ॥ ३१५ ॥ बहुवाहडा अगाहा, बहुसलिल्लुप्पिलोदगा । बहुवित्थ त्थडोदगा आवि, एवं भासिज्ज पन्नवं ॥ ३१६ ॥ तहेव सावजं जोगं, परस्सट्ठा अ निट्ठिअं । कीरमाणंति वा नच्चा, सावजं न लवे मुणी ॥ ३१७ ॥ वाग्विधिप्रतिषेधाधिकार एव इदमाह-तहा नईउत्ति, तथा नद्यः पूर्णा-भृता इति नो वदेत् , प्रवृत्तश्रवणनिवर्तना. दिदोषात् , तथा कायतरणीयाः-शरीरतरणयोग्या इत्येवं नो वदेत्, साधुवचनतोऽविघ्नमिति प्रवर्त्तनादिदोषप्रसाद, तथा नौभिः-द्रोणीभिस्तरणीयाः-तरणयोग्या इत्येवं नो वदेत् , अन्यथा विघ्नशङ्कया तत्प्रवर्तनात् , तथा प्राणिपेयाः-तटस्थ- ।

या प्रकारान्तरमोगेनेत्यमार्ग गृहिप्रश्चाधिकरणादप इति ।। ३.९॥ प्रयोजने पुनर्मार्गदर्शनादौ चैवं पदेदित्याह- असंपत्ति, असमर्था एते आग्राः, अतिमारेण न सक्नुपन्ति फलानि धारयितुमित्यर्थः, आम्रग्रहणं प्रधानधोपलक्षणं, एतेन पकार्य उता, नया पहुनिसितफला:-पहनि निषितानि-पक्षास्थीनि फलानि येषु ते तपा, अनेन पाकखाद्यार्थ उक्तः, पदे पटुनि-संभूतानि-पाकातिशपतो ग्रहणकालोमितानि फलानि येषु ते तथाविधाः, अनेन वेलोचितार्थ उता, सथा भूतरूपा इति वा पुन देतानि रूपाणि-प्रवद्धास्थीनि कोमलफलरूपाणि येषु ते तथा, अनेन टालाद्यर्थ उपलयित इति ॥ ३१ ॥ तहत्ति, तथैवोषधयः-शाल्यादिलक्षणाः पफा इति तथा नीलाइछ्यय इति, पछचना कादिफललथणाः, व्या लपनपत्यो-लग्नयोग्याः, भर्जनयत्य इति-मर्जनपोग्या, पृथुफभक्ष्या इति नो पवेत् पुरुभक्षणयोग्पा, नो पदेदिति मर्ष सम्मघ्यते, पृथुका अर्द्धपकशारयादिषु क्रियन्ते, अभिधानदोषाः पूर्ववनिति ॥३११॥ प्रपोजने पुनर्मार्गदर्शनादायेवमालपेदित्याह-रूवत्ति, रूढा-प्रादुर्भूताः, पहुसंम्ता-निप्पलमापा, स्थिरा-निप्पना, उत्गृप्ता इति वा-उपपातेभ्यो निर्गता बा, तथा गभिता-अनिर्गतशीपेशा प्रसूता-निर्गतशीर्षकाः, संसारा-संजारा. तण्डुलादिमारा इत्येवमालपेत् , पकापर्ययोजना स्वधिया कार्येति ॥ ३१२ ॥ तहेव संसर्डि नया, किचं कजति नो वए। तेणगं वावि वज्झिचि, सुतिस्थित्ति अ आवगा ॥ ३१३ ।। संसडि खंखडिं यूआ, पणिअटुं ति तेणगं । बहुसमाणि तित्याणि, आवगाणं विआगरे ॥ ३१४ ।।

वर्जयेन्मुनिरनुमत्यादिदोषप्रसङ्गात्, निरवयं तु न वर्जयेत् , यथा-सुकृतमिति सुष्टु कृतं वैयावृत्त्यमनेन, सुपकमिति-सुष्टु पक्वं ब्रह्मचर्य साधोः, सुच्छिन्नमिति-सुष्टु छिन्नं स्नेहबन्धनमनेन, सुहृतमिति सुष्टु हृतं शिक्षकोपकरणमुपसर्गे, सुमृत इति-सुष्ठु मृतः पण्डितमरणेन साधुरिति, अत्रापि सुशब्दोऽनुवर्तते, सुनिष्ठितं-सुष्ठु निष्ठितं कर्माप्रमत्तसंयतस्य, सुल- हृत्ति-सुष्टु सुन्दरा साधुक्रियेत्येवमादिरिति ॥ ३१८ ॥ उक्तानुक्तापवादविधिमाह-पयत्तत्ति, प्रयत्नपकमिति वा प्रयत्न- पक्कमेतद, पक्वं सहस्रपाकादि ग्लानादिप्रयोजने एवमालपेत्, तथा प्रयत्नच्छिन्नमिति वा-प्रयत्नच्छिन्नमेतच्छिन्न-व्रणा- (वना)दि साधुनिवेदनादावेवमालपेव, तथा प्रयत्नलष्टेति चेति प्रयत्नसुन्दरा कन्या दीक्षिता सती सम्यक् पालनीयेति, कर्महेतुकमिति सर्वमेव वा कृतादि कर्मनिमित्तमालपेदिति योगः, तथा गाढप्रहारमिति वा कश्चन गाढमालपेत्- गाढप्रहारं ब्रूयात् , कचित्प्रयोजने, एवं हि तदप्रीत्यादयो दोपाः परिहृता भवन्ति इति ॥ ३१९ ।। सव्वुक्कसं परग्धं वा, अउलं नत्थि एरिसं । अविकिअमवत्तवं, अचिअत्तं चेव नो वए ॥ ३२० ॥ सबमेअं वइस्लामि, सबमेअंति नो वए । अणुवीइ सवं सवत्थ, एवं भासिज्ज पन्नवं ॥ ३२१ ॥ सुक्की वा सुविक्की, अकिजं किज्जमेव वा । इमं गिण्ह इमं मुंच, पणीयं नो विआगरे ॥ ३२२ ॥ अप्पग्घे वा महग्धे वा, कए वा विक्कएवि वा । पणिअढे समुप्पन्ने, अणवज्जं विआगरे ॥ ३२३ ॥ अवचिद् व्यवहारे प्रक्रान्ते पृटो वा अपृष्टो वा नैवं वदेदित्याह-सवुकसंति, एतन्मध्ये इदं सर्वोत्कृष्टं-स्वभावेन प्राणिपेया नो वदेदिति, वर प्रवृत्तनिवर्चनादिदोपादिति ॥ ३१५ ॥ प्रयोजने तु साधुमार्गकथनादावेव मापेवेत्याह- पहुयाहरेति, पहुधा भृता प्रापो मृता इत्पर्यः, तथा अगाहा इति पहगावाः प्रायोगम्भीराः, तथा पहुसलिलोत्पी- लोदका प्रतिश्रोतोवाहितापरमरित इत्पर्यः, तया पहुविस्तीर्णोदकाश्च-स्वतीरप्लावनप्रवृत्तजलाय, एवं मापेत प्रज्ञान साधुः, न त तदाऽऽगतपृष्टो न वेदम्पहमिति घ्यान् , प्रत्यक्षमूपारादित्वेन तत्पदेपादिदोपप्रसङ्गादिति ॥ ३१६ ॥ वाग्विधिः प्रतिपधाधिकार एवेदमाह-तहेवत्ति, तथैव साथ-सपापं, योग-व्यापार अधिकरणं समादिविषयं परस्यार्थाय-पर- निमि निष्ठित-निप्पन तथा क्रियमाणं वा वर्चमानं वाशन्दा मविष्यत्काले माविनं वा ज्ञात्वा सावचं नालपेत् सपापं न पान्मुनिा-सापुरिति ॥ ३१७ ॥ सुकडित्ति सुपफिनि, सुच्छिन्ने सुहडे मडे । सुनिट्ठिए सुलट्ठिचि, सावजं वजए मुणी ॥ ३१८ ॥ पपचपत्ति व पकमालवे, पयचच्छिन्नत्ति व छिन्नमालवे। पयत्तलट्ठिति व कम्मदेउअं, पहारगाढचि व गाढमालवे ॥ ३१९ ॥ वन निष्ठितं नैवं पात् इत्याह-सुकरिचि, मुष्ठ कृतं सुकृतं समादि, सुपझमिति, सुष्छु पक्कं सहस्रपाकादि, सुच्छि. समिति-सुष्ट छिषं तदनादि, मुहतमिति-मुष्ठ र क्षुद्रस्य वित्तमिति, समृत इति-मुष्ठु मृतः प्रत्यनीक इति, अत्रापि मुसदोऽनुगते, सुनिष्ठितमिति मुनु निष्ठित विचामिमानिनो विचं, सुलद्विति-सुष्टु सुन्दरा कन्या इति, सावधमालपनं

बहवे इमे असाहू, लोए वुच्चंति साहुणो। न लवे असाहु साहुत्ति, साहुं साहुत्ति आलवे ॥ ३२५ ॥
नाणदसणसंपन्नं, संजमे अ तवे रयं । एवं गुणसमाउत्तं, संजय साहुमालवे ॥ ३२६ ॥
किंच-तहेवत्ति, तथैवासंयतं-गृहस्थं धीरो-यतिः, आस्वेहैव, एहीतोऽत्र, कुरु वेदं-संचयादीति, तथा शेष्व
निद्रया, तिष्ठोप्रस्थानेन ब्रज ग्राममिति नैवं भाषेत प्रज्ञावान-साधुरिति ॥ ३२४ ।। बहवेत्ति, वहव एते-उपलभ्य-
मानस्वरूपा आजीविकादयः असाधवो निर्वाणसाधकयोगापेक्षया लोके तु प्राणिलोके प्राणिसंधात उच्यन्ते साधवः
सामान्येन, तत्र नालपेत् असाधु माधुं मृपावादप्रसङ्गात् , अपि तु साधु साधुमित्यालपेत् , न तु तमपि नालपेद , उपबृंहणाति.
चारदोपप्रसङ्गादिति ॥३२५॥ किंविशिष्टं साधु साधुमित्यालपेदित्याह-नाणत्ति, ज्ञानदर्शनसंपन्नं-समृद्धं, संयमे तपसि
च रतं यथाशच्या एवं गुणसमायुक्तं संयतं साधुमालपेत् , न तु द्रव्यलिङ्गधारिणमपीति ॥ ३२६ ॥
देवाणं मणुआणं च, तिरिआणं च बुग्गहे । अमुगाणं जओ होउ, मा वा होउ त्ति नो वए ॥ ३२७ ॥
वाओ वुटुंच सीउण्हं, खेमं धायं सिवति वा। कया णु हुज्ज एयाणि ?, मावा होउत्तिनो वए । ३२८ ॥
तहेव मेहं व नहं व माणवं, न देवदेवत्ति गिरं वइज्जा।
समुच्छिए उन्नए वा पओए, वइज्ज वा वुट्ठ बलाहयत्ति ॥ ३२९ ॥

सुन्दरमित्यर्थः, पराध चोचमा वा महाघ फ्रीतमिति भाषः, अतुलं-नास्तीदृशमन्यत्रापि क्वचित् , अविकिपति-असं-
स्कृतं सुलममीदृशमन्यत्रापि, अवक्तव्यमित्यनन्तगुणमेतदेव अघियत्तं वा-अप्रीतिकरं चैतदिति नो वदेद् , अधिकरणा.
न्तरायादिदोपप्रसङ्गादिति ॥ ३२० ॥ किंच-सचमेयमिति, सर्वमेतद्वस्यामीति केनचित्कस्यचित्संदिष्टे सर्वमेतत् त्वया
वक्तव्यमिति, मर्वमेतद्वक्ष्यामीति नो वदेव, सर्वस तथास्वरव्यञ्जनायुपेतस्य वस्तुमशक्यत्वात् , तथा सर्वमेतदिति
नो वदेत्, कस्यचित्संदेशं प्रयच्छन् , सर्वमेतदित्येवं वक्तव्यमिति नो वदेव, सर्वस्प तथास्वरच्यञ्जनाथुपेतस्य वस्तुमशक्य-
खात्, असंभवाभिधाने मृपावादः, यतश्चैवमतोऽनुचिन्त्यालोच्य सर्व वाच्यं सर्वेषु कार्येषु यथाऽसंभवायभिधानादिना
मृपावादो न भवत्येवं भाषेत प्रज्ञावान् माधुरिति ॥ ३२१ ॥ किंच-मुक्कीय वत्ति, सुकीतं चेति केनचिन् किश्चित्
क्रीतं दर्शितं सत् सुक्रीतमिति नव्यागृणीयादिवि योगः, तथा सुविक्रीतमिति किश्चित्केन विद्विक्रीतं दृष्ट्वा पृथः सन् सुवि-
क्रीतमिति न घ्यागृणीयात् , तथा केनचित्क्रीते पृष्टः, अकेयं-क्रयाईमेव न भवतीति न व्यागृणीयात् , तथैवमेव फ्रेयमेव
वा-क्रयाईमिति, तथेदं-गुडादि गृह्णीयादा(गृहाणा )गामिनि काले महाघ भविष्यतीति, तथेदं मुश्च घृताद्यागामिनि
काले समय मरिष्यतीति कृत्वा पणितं-पण्यं नैव व्यागृणीयात् , अप्रीत्यधिकरणादिदोषप्रमङ्गादिति ।। ३२२ ॥ अत्रैव
विधिमाह-अप्पग्घे वत्ति, अल्पाचे वा महाघे वा, कस्मिनित्याह-कये वा विक्रयेऽपि वा पणितार्थे-पण्यवस्तुनि
ममुत्पन्ने केनवित्पृष्टः समनवयं-अपापं व्यागृणीयात् यथा नाधिकारोध तपस्विना, व्यापारामावादिति ॥ ३२३ ॥
तहेवासंजयं धीरो, आस एहि कोहि वा । सय चिट्ठ वयाहित्ति, नेवं भासिज्ज पन्नवं ॥ ३२४ ॥

तहेवत्ति, तथैव सावद्यानुमोदिनी गी:-वाक् यथा सुष्ठु हतो ग्राम इति, तथाऽवधारिणी-इदमित्यमेवेति, संशयकारिणी वा, या च परोपघातिनी यथा-मांसमदोपाय, से इति तामेवंभूतां, क्रोधाल्लोभाद्भयाद्वासाद्वा, मानप्रेमादीनामुपलक्षण- मेतन्मानवा-पुमान् साधुन हसन्नपि गिरं वदेत् , प्रभूतकर्मवन्धहेतुत्वादिति ॥ ३३१ ॥ सवक्कसुद्धिं समुपेहिआ मुणी, गिरं च दुटुं परिवज्जए सया । मिअं अदुटुं अणुवीइ भासए, सयाण मज्जे लहई पसंसणं ॥ ३३२ ॥ भासाइ दोसे अ गुणे अ जाणीआ, तीसे अदुढे परिवज्जए सया। छसु संजए सामणिए सया जए, वइज्ज बुद्धे हिअमाणुलोमिअं ॥ ३३३ ॥ परिक्खभासी सुसमाहिइंदि इंदिए, चउकसायावगए अणिस्सिए । से निद्भुणे धुन्नमलं पुरेकडं, आराहए लोगमिणं तहा परं ॥ ३३४ ॥ तिमि ॥ इति सवक्कसुद्धीअज्झयणं समत्तं ७॥ वाक्यशुद्धिफलमाह-सवकत्ति, मद्वाक्यशुद्धि स्ववाक्यशुद्धि वा सवाक्य शुद्धि वा, सतीं शोभनी, स्यां आत्मीयां, स इति वक्ता, वाक्यशुद्धिं संप्रेक्ष्य-सम्यग्दृष्ट्वा मुनिः-साधुः, गिरं तु दुष्टां-यथोक्तलक्षणां परिवर्जयेत्सदा, किंतु मितं अंतलिक्खत्ति णं वूआ, गुज्झाणुचरित्ति अ । रिद्धिमंतं नरं दिस्त, रिद्धिमंतांत आलवे ॥ ३३० ॥ तहेव सावजणुमोअणी गिरा, ओहारिणी जा य परोवघाइणी। से कोह लोह भय हास माणवो, न हासमाणोऽवि गिरं वइजा ॥३३॥ किंच-देवाणंति, देवानां-देवासुराणां, मनुजानां च-नरेन्द्रादीनां, तिरश्चां च-महिपादीनां विग्रहे-सखामे सत्यमुकानां देवादीनां जयो भवतु मा वा भवतु इति च नो वदेत्, अधिकरणतत्स्वाम्यादिद्वेपदोपप्रसंगादिति ।। ३२७ ॥ किं च-वाओत्ति, वातो-मलयमारुतादि, पृष्टं वा प्रवर्पणं, शीतोष्णं प्रतीतं, क्षेम-राजविवरशून्यं, धात- मुमिक्षं, शिवमिति चोपसर्गरहितं कदा न भवेयुरेतानि वातादीनि मा भवेयुरिति, धर्माद्यमिभूतो नो वदेद्, अधिकरणादि. दोपप्रसङ्गाव, वातादिपु सत्सु सचपीडापनेस्तद्वचनतस्तथाऽमवनेऽध्याध्यानमावादिति ।। ३२८ ॥ तहेवत्ति, तथा मेघं वा नभो मानवं वाश्रित्य नो देवदेवत्ति गिरं वदेत् , मेघमुन्नतं दृष्ट्वा 'उन्नतो देव' इति नो वदेव , एवं नमः-आकाशं मानवं-गजानं देवमिति नो वदेव मिथ्यावादलापवादिप्रसाद, कथं तर्हि वदेत् ? इत्याह मेघमुन्नतं दृष्ट्वा सम्मूर्छित उन्नतो वा पयोद इति, पदेद्वा वृटो बलाहक इति ॥ ३२९ ॥ नभ आश्रित्याह-अंतलिम्वनि, इह नभोऽन्तरिक्षमिति याद , गुह्यानुचरितमिति रा सुरसेवितमित्ययः, एवं किल मेघोऽप्येतदुमयशन्दवाच्य एव, तथा ऋद्धिमन्त-संपदुपेतं नरें रना, किमित्याह-ऋद्धिमन्तमिति ऋद्धिमानयमित्येवमालपेत् व्यवहारतो मृपावादादिपरिहारार्थम् ॥ ३३० ॥.किंच- .

तहेवत्ति, तथैव सायद्यानुमोदिनी गीः-चाक् यथा सुष्टु हतो ग्राम इति, तथाऽवधारिणी-इदमित्थमेवेति, संशयकारिणी वा, या च परोपघातिनी यथा-मांसमदोपाय, से इति तामेवंभूतां, क्रोधाल्लोभाद्भयाद्वासाद्वा, मानप्रेमादीनामुपलक्षण- मेतन्मानवः-पुमान् साधुन हसन्नपि गिरं वदेत् , प्रभूतकर्मवन्धहेतुत्वादिति ॥ ३३१ ॥ सवकसुद्धिं समुपहिआ मुणी, गिरं च दुटुं परिवजए सया। मिअं अदुटुं अणुवीइ भासए, सयाण मज्जे लहई पसंसणं ॥ ३३२ ॥ भासाइ दोसे अ गुणे अ जाणीआ, तीसे अदुटे परिवज्जए सया। छसु संजए सामणिए सया जए, वइज्ज बुद्धे हिअमाणुलोमिअं ॥ ३३३ ॥ परिक्खभासी सुसमाहिइंदिए, चउक्कसायावगए अणिस्सिए । से निद्भुणे धुन्नमलं पुरेकडं, आराहए लोगमिणं तहा परं ॥ ३३४ ॥ त्तिबेमि ॥ इति सबकसुद्धीअज्झयणं समत्तं ७॥ वाक्यशुद्धिफलमाह-सवकत्ति, सद्वाक्य शुद्धि स्ववाक्यशुद्धि वा सवाक्य शुद्धिं वा, सतीं शोभनी, स्वां आत्मीयां, स इति वक्ता, वाक्यशुद्धिं संप्रेक्ष्य-सम्यग्दृष्ट्वा मुनिः-साधुः, गिरं तु दुष्टां-यथोक्तलक्षणां परिवर्जयेत्सदा, किंतु मितं अंतलिक्खत्ति ण चूआ, गुज्झाणुचरित्ति अरिद्धिमंतं नरं दिस्त, रिद्धिमतांत आलवे ॥ ३०॥ तहेव सावजणुमोअणी गिरा, ओहारिणी जा य परोवघाइणी । से कोह लोह भय हास माणवो, न हासमाणोऽवि गिरं वइजा ॥३३१॥ किंच-देवाणति, देवानां-देवासुराणा, मनुजानां च-नरेन्द्रादीना, तिरश्यां च-महिपादीना विग्रह-समामे मरयमुकानां देवादीनां जयो भवतु मा वा भवतु इति च नो वदेत्, अधिकरणवत्स्वाम्पादिदेपदोपप्रसगादिति ।। ३२७ ॥ किं न-वाओत्ति, वातो-मलयमारुतादिा, पृष्ट का प्रवर्पण, शीतोष्ण प्रतीत, क्षेम-रानविदरशून्य, धात- मुमिक्ष, शिवमिति चोपसर्गरहित कदा न भवेयुरेतानि वातादीनि मा भवपरिति, धर्माद्यभिभूतो नो पदद्, अधिकरणादि दोपप्रमशाद, वातादिषु सत्सु मचपीडापचेस्तवचनतस्तथाऽभवनऽध्यार्तध्यानभावादिति ।। ३२८ ॥ तहेवत्ति, तयर मेघ वा नभो मानव याश्रित्य नो देवदेवत्ति गिर वदत् , मघमुन्नव दृष्ट्वा 'उन्नतो दव' इति नो पदत् , एव नम:-आकाश माना-राजान दयमिति नो वदत् मिथ्यावादलापररादिप्रसगाव, कथ नहिं वदत् । इत्याह मेघमुन्नत दृष्ट्वा मम्मूर्छित उन्नतो वा पयोद इति, वदवा पृष्टो बलाहरु इति ॥ ३२९ ॥ नम आश्रित्याह-अतलिम्वत्ति, इह नमोऽन्तरिक्षमिति यात्, गुयानुचरितमिति वा सुरसरितमित्यर्थ , एस किल मयोऽप्येतदुभयशन्दवाच्य एव, तथा ऋद्धिमन्तं-सपदुपेत नर इना, किमित्याह-द्विमन्तमिति अद्धिमानयमित्यवमालपेत् व्यवहारतो मृपावादादिपरिहारार्थम् ॥ ३३० ॥ किंच- तहेवत्ति, तथैव सावद्यानुमोदिनी गी:-वाक् यथा सुष्ठु हतो ग्राम इति, तथाऽवधारिणी-इदमित्यमेवेति, संशयकारिणी वा, या च परोपघातिनी यथा-मांसमदोपाय, से इति तामेवंभूतां, क्रोधाल्लोभायाद्वासाद्वा, मानप्रेमादीनामुपलक्षण- मेतन्मानवः-पुमान् साधुन हसन्नपि गिरं वदेत् , प्रभूतकर्मबन्धहेतुत्वादिति ॥ ३३१ ॥ सवकसुद्धिं समुपहिआ मुणी, गिरं च दुटुं परिवज्जए सया। मिअं अदुटुं अणुवीइ भासए, सयाण मज्जे लहई पसंसणं ॥ ३३२ ॥ भासाइ दोसे अ गुणे अ जाणीआ, तीसे अदुढे परिवज्जए सया। छसु संजए सामणिए सया जए, वइज्ज बुद्धे हिअमाणुलोमिअं॥ ३३३ ॥ परिक्खभासी सुसमाहिइंदिए, चउक्कसायावगए अणिस्सिए । से निद्भुणे धुन्नमलं पुरेकडं, आराहए लोगमिणं तहा परं ॥ ३३४ ॥ त्तिवेमि ॥ इति सवक्कसुद्धीअज्झयणं समत्तं ७॥ वाक्यशुद्धिफलमाह-सवत्ति, मद्वाक्यशुद्धि स्ववाक्यशुद्धिं वा सवाक्यशुद्धि वा, मतीं शोमनी, स्वां आत्मीयां, स इति वक्ता, वाक्यशुद्धिं संप्रेक्ष्य-मम्यग्दृष्ट्वा मुनिः-साधुः, गिरं तु दुष्टां-यथोक्तलक्षणां परिवर्जयेत्सदा, किंतु मितं 17 सरतः परिमाणतच, अदुष्ट-देशकालोपपन्नादि अनुविचिन्त्य-पर्यालोच्य मापमाणः मन् सतां-माधूनां मध्ये लमते, प्रशंसन-प्राप्नोति प्रशंसामिति ।। ३३२ ।। यतश्चैवमतः-मासाएति, भापाया उक्तलक्षणाया दोषांश्च गुणांथ ज्ञात्या- यथावदवेत्य तस्याश्च दुष्टाया भाषाया परिवर्जको-विवर्जका सदा, एवम्भूतः सन् पजीवनिकायेषु संयतस्तथा श्रामण्ये-श्रमणमावे चरणपरिणामगमें चेष्टिते सदा यता-सर्वकालमुयुक्तः मन् पदेत् बुद्धो हितानुलोम-हित परिणाम मुन्दरं अनुलोम-मनोहारीति ॥ ३३३ ।। उपमहरमाह-परिषखत्ति, परीक्ष्यमापी-आलोचितवक्ता तथा सुसमाहि ।। तेन्द्रियः-सुप्रणिहितेन्द्रिय इत्यर्थः, अपगतचतुष्कपाय:-क्रोधादिनिरोधकति भावः,अनिश्रितो-द्रव्यमावनियारहितः, प्रतिपन्धविमुक्त इति हृदयं, स इत्थंभूतो निघूय-प्रस्फोटा धूम्नमलं-पापमलं, पुराकृत-जन्मान्तरकत, किमित्याह आराधयति-प्रगुणीकरोति लोकमेनं-मनुष्यलोकं वाक्संयतस्वेन, तथा परमिति-परलोकमाराधयति निर्माणलोके, पथा- सम्भवमन्तरं पारम्पर्येण चेत्यर्थः ॥ ३३४ ॥ ब्रवीमीति पूर्ववदेवेति ॥ इति श्रीसुमतिसाघुविरचितायां दशकालिफटीकार्या सप्तमस्य वाक्यशुद्धयध्यपनस्य व्याख्यानं समाप्तम् ७॥

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व्याख्यातं वाक्यशुद्ध्यध्ययन, इदानीमाचारप्रणिध्याख्यमारम्यते, अस्य चायमभिसम्बन्धः । इहानन्तराध्ययने
साधुना वचनदोपगुणाभिज्ञेन निरवद्यवचसा वक्तव्यमित्येतदभिहितं, इह तु तन्निरवयं वच आचारे प्रणिहितस्य भवतीति तत्र
यत्नवता भवितव्यमित्येतदुच्यते उक्तं च-" पणिहाणरहियस्सेह निरवजपि भासियं । सावजतुल्लं विन्नेयं, अज्झत्थेणेह
संवुडं ॥ १॥" इत्यनेनाभिसम्बन्धेनायातमिदमध्ययनमिति, तद्यथा-
आयारप्पणिहिं लड़े, जहा कायव भिक्खुणा। तं भे उदाहरिस्सामि, आणुपुत्विं सुणेह मे ॥३३५॥
आचारमित्यादि, आचारप्रणिधिमुक्तस्वरूपां लब्ध्वा-प्राप्य यथा-येन प्रकारेण कर्त्तव्यं विहितानुष्ठानं
भिक्षुणा-साधुना, तं प्रकारं भे-भवद्भ्य उदाहरिष्यामि-कथयिष्याम्यानुपूर्व्या-परिपाट्या शृणुत ममेति गौतमा.
दयः स्वशिष्यानाहुरिति ।। ३३५ ॥ तं प्रकारमाह-
पुढवीदगअगणिमारुअ, तणरुक्खस्सबीयगा। तसा अ पाणा जीवत्ति इइ वुत्तं महेसिणा ॥ ३३६ ॥
तेसिं अच्छणजोएण, निच्चं होअवयं सिआ । मणसा कायवक्केणं, एवं हवइ संजए ।। ३३७ ॥
पुढविं भित्ति सिलं लेलं, नेव भिंदे न संलिहे । तिविहेण करणजोएणं, संजए सुसमाहिए ॥३३८।।
सुद्धपुढवीं न निसीए, ससरक्खंमि अ आसणे। पमजित्तु निसीइज्जा, जाइत्ता जस्स उग्गहं ॥३३९॥

"- सीओदगं न सेविजा, सिलावुटुं हिमाणि । उसिणोदगं तत्तफासुअं, पडिगाहिज्ज संजए ॥३४०॥ । उदउल्लं अप्पणो कार्य, नेव पुंछे न संलिहे । समुप्पेह तहाभूअं, नो णं संघट्टए मुणी ॥ ३४१॥ । इंगालं अगणिं अचिं, अलायं वा सजोइन उंजिजा न घटिज्जा, नो णं निवावए मुणी ॥३४२।। तालिअंटेण पत्तेण, साहाए विहुणेण वा । न वीइजऽप्पणो कार्य, वाहिरं वावि पुग्गलं ॥ ३४३ ॥ तणरुक्खं न छिंदिज्जा, फलं मूलं च कस्सई । आमगं विविहं वीअं, मणसावि ण पत्थए ॥३४४ ॥ गहणेसु न चिट्ठिज्जा, वीएसु हरिएसु वा । उदगंमि तहा निच्च, उचिंगपणगेसु वा ॥ ३४५ ॥ तसे पाणे न हिंसिजा, वाया अदुव कम्मणा। उवरओ सबभूएसु, पासेज विविहं जगं ॥ ३४६ ॥ पुढवित्ति, पृथिव्युदकाग्निवायपस्तुणवृक्षसयोजा एते पश्चैकेन्द्रियकायाः पूषित , प्रसाश्च प्राणिनो द्वीन्द्रियादयो जीया इत्युक्तं महर्षिणा-यमानेन गौतमेन वेति ॥ ३३६ ॥ यतश्चैवमतः-तेसित्ति, तेषां-पृथिव्यादीनां अक्षण : योगेन-अहिंसाव्यापारेण नित्यं भवितव्यं वर्तितव्यं स्याद्भिक्षुणा मनसा कायेन वाक्येनैभिः करणैरित्यर्थः, एवं वर्तमानोऽहिंसकः सन् भवति संयतो, नान्य(था) इति ॥ ३३७ ॥ एवं सामान्येन पड्डीवनिकायाहिंसायां सयतत्वमभिधायाधुना तद्गतविधीविधानतो विशेषणाह-पुढविचि, पृथिवीं शुद्धा भित्ति-वटी शिला पापाणात्मिका - -- -- .

लेष्टु-इटालखण्डं नैव भिन्द्यात् नः संलिखेत्, । तत्र मेदनं-द्वैधीभावोत्पादनं संलेखनं ईपल्लेखन:त्रिविधेन,करण- योगेन न करोति मनसेत्यादिना संयतः-साधुः, सुसमाहितः शुद्धभाव इति ।। ३३८ ॥ तथा सुद्धत्ति, शुद्धपृथिव्यां अशस्त्रोपहतायामनन्तरितायां न निषीदेव , तथा सरजस्के-पृथिवीरजोगुण्डिते वा आसने-पीठकादौ न निपीदेत , निपीदनग्रहणात् स्थानत्वग्वर्तनपरिग्रहः, अचेतनायां तु प्रमृज्य ता रजोहरणेन निषीदेत् , ज्ञात्वेत्यचेतना ज्ञात्वा याचयित्वा- ऽवग्रहमिति, यस्य सम्बन्धिनी पृथिवी तमवग्रहमनुन्नाप्येत्यर्थः ॥३३९ ।। उक्तः पृथिवीकायविधिः, अधुना अप्कायविधिमाह- सीओदगत्ति; शीतोदकं-पृथिव्युद्भवं सच्चित्तोदकं न सेवेत, तथाःशिलावृष्टं हिमानि च न सेवेत, अत्र शिलाग्रहणेन फरकाः परिगृह्यते, घृष्टं वर्षण, हिमं प्रतीतं प्राय उत्तरापथे भवति, यद्येवं कथमयं वर्त्ततेत्याह-उष्णोदकं-कथितोदकं तप्त प्रासुकं-तप्तं सत् प्रासुकं त्रिदण्डोद्वृत्तं, नोष्णोदकमात्रं परिगृह्णीयात्, वृत्त्यर्थं संयतः-साधुः, एतच सौवीराद्युपलक्षणमिति ॥३४०॥ तथा उदउल्लंति; नदीमुत्तीर्णः भिक्षाप्रविष्टो वा वृष्टिहतः उदका-उदकविन्दुचितमात्मनः कायं-शरीरं सस्निग्धं वा नैव पुञ्छयेद्वस्त्रवणादिभिः, न संलिखेत् पाणिना-हस्तेन, अपि तु संप्रेक्ष्य-निरीक्ष्य तथाभूतमुदकार्दादिरूपं नैव काय संघदयेन्मुनिर्मनागपि न संस्पृशेदिति ॥ ३४१ ॥ उक्तोऽष्कायविधिः, तेजाकायविधिमाह-इंगालिंति, अङ्गारं- ज्वालारहितं, अग्निमयापिण्डानुगं, अर्चि-छिन्नज्वाला; अलात-उल्मुकं वा सज्योतिः साग्निकमित्यर्थः, किमित्याह-नो- सिञ्चयेन्न घट्टयेत्, तत्रोञ्जनमुत्सेचनं प्रदीपादेः, घट्टन-मिथश्चालन; तथा नैनमग्निःनिर्वापयेत्-अभावमापादयेन्मुनि:- साधुरितिः ॥ ३४२ ॥ प्रतिपादितस्तेजःकायविधिः, वायुकायविधिमाह-तालियंटेणंति, तालवृन्तेन-व्यजनविशेषेण,

पग्रेण-पधिनीपत्रादिना, शाखया-वृक्षडालरूपया विधूवनेन वा-व्यजनेन वा, झिमित्याह-न वीजयेदात्मनः कार्य-
स्वशरीरमित्यर्थः, वायं वापि पुद्गलं-उष्णोदकादीति ॥ ३४३ ॥ प्रतिपादितो वायुकायविधिः, वनस्पतिविधिमाह-तणत्ति,
वणवृक्षमित्येकवद्भावः, तृणानि-दर्मादीनि वृक्षा-कदम्बकादया, एतान छिन्यात्, फलं मूलकं वा कस्यचिदृक्षादेन
छिन्द्यात् तथा आम-अशस्रोपहतं विविधं-अनेकप्रकारं पीजं मनसापि न मार्थयेत्, किं पुनरनीयादिति ॥ ३४४ ॥
तथा गहणेसु, गहनेपु-वननिकुओषु च न तिष्ठेत्, सञ्चट्टनादिदोषप्रसझाव , नया पीजेपु-प्रमारितशाल्यादिपु, हरितेपु
वा-र्वादिषु न तिष्ठेव , उदके तथा नित्यं अत्रोदकं-अनन्तवनस्पतिविशेषः, यथोक्तं-"उदए अवए पण" इत्यादि,
उदकमेवान्ये, तत्र नियमतो वनस्पतिमावात् , उत्तिपनकयोर्ग न तिष्ठेन् , तत्रोत्तिगः-मर्पच्छादिः पनक:-उल्लिनस्प.
तिरिति ।।३४५।। उक्तो वनस्पतिविधिः, प्रमविधिमाइ-तसत्ति, प्रमप्राणिनो-द्वीन्द्रियादीन् न हिंस्यात्, कथमित्याह-
वाचा अथवा कर्मणा-कायेन, मनसस्तदन्तर्गतत्यादग्रहणं, अपि चोपरतः सर्वभूतेषु निक्षिप्तदण्डः सन् पश्येद्विविध
जगत्-कर्मपरतन्त्र नरकादिगतिरूपं निदायेति ।। ३४६ ।।
अट्ठ सुहुमाइं पेहाए, जाई जाणित्तु संजए । दयाहिगारी भूएसु, आस चिट्ट सएहि वा ॥३४७ ॥
कयराई(णि) अट्ठ सुहुमाई?जाई पुच्छिज संजए।इमाई ताई मेहावी,आइक्खिव पिअक्खणो 1३४८॥
सिणेहं पुष्फसुहुमं च, पाणुतिंगं तहेव य । पणगं चीअहरिअंच, अंडसुहुमं च अट्ठमं ॥ ३४९ ॥

एवमेआणि जाणिजा(त्ता),सवभावेण संजए । अप्पमत्तो जए निच्चं, सबिंदिअसमाहिए ॥ ३५० ।। उक्तः स्थूलविधिः, अथ सूक्ष्मविधिमाह-अट्ठत्ति, अष्टौ सूक्ष्माणि वक्ष्यमाणानि प्रेक्ष्योपयोगतः आसीत तिष्ठेत् शयीत वेति योगः, किंविशिष्टानीत्याह-यानि ज्ञात्वा संयतो ज्ञपरिज्ञया प्रत्याख्यानपरिक्षया च दयाधिकारी भूतेषु भवति, अन्यथा दयाधिकार्येव नेति, तानि प्रेक्ष्य तद्रहित एवासनादीनि कुर्यात् , अन्यथा तेषां विराधनेन सातिचारतेति ॥ ३४७ ॥ आह-कयराणित्ति, कतराणि तान्यष्टौ सूक्ष्माणि यानि दयाधिकारित्वाभावमयात् पृच्छेत्संयतः, ? अनेन दयाधिकारिण एवैवंविधेषु यत्नमाह, स ह्यवश्यं तदुपकारकाण्यपकारकाणि च पृच्छति, तत्रैव भावप्रतिबन्धादिति, अमूनि तान्यनन्तरं वक्ष्यमाणानि मेधावी आचक्षीत विचक्षण इति, अनेनाप्येतदेवाह-मर्यादावर्तिना तज्ज्ञेन तत्प्ररू- पणा कार्या, एवं हि श्रोतस्तत्रोपादेयबुद्धिर्भवति, अन्यथा विपर्यय इति ॥ ३४८ ॥ सिणेहंति, स्नेहमिति स्नेहसूक्ष्म- अवश्यायहिममहिकाकरकहरतनुरूपं, पुष्पसूक्ष्मं चेति वटोदुम्बराणां पुष्पाणि, तानि तद्वर्णानि सूक्ष्माणीति न लक्ष्यन्ते, प्राणीति, प्राणिसूक्ष्ममनुद्धरिः कुन्थुः, स हि चलन् विभाव्यते, न स्थितः, सूक्ष्मत्वात् , उत्तिंगं तथैव चेति, उत्तिंगसूक्ष्म- कीटिकानगरं, तत्र कीटिका अन्ये च सूक्ष्मसत्वा भवन्ति, तथा पनकमिति, पनकसूक्ष्म प्रायः प्राइट्काले भूमिकाष्ठादिपु पञ्चवर्णस्तद्रव्यलीनः पनक इति, तथा चीज़सूक्ष्म-शाल्यादिवीजस्य मुखमूले कणिका, या लोके तुपमुखमित्युच्यते, हरितं चेति हरितसूक्ष्म, तच्चाऽत्यन्ताभिनवोद्भिनं पृथिवीसमानवर्णमेवेति, अण्डसूक्ष्मं चाष्टममिति एतच मक्षिकाकीटिका- गृहकोकिलाब्राह्मणीककलासाद्यण्डकमिति ॥ ३४९ ॥ एवमेआणित्ति, एवमुक्तेन प्रकारेण एतानि सूक्ष्माणि ज्ञात्वा सत्रादेशेन सर्वभावेन-शस्यनुरूपेण सरूपसंरक्षणादिना संयतः-साधुः, किमित्याह-अप्रमत्तो-निद्रादिप्रमादरहितो पतेत मनोवाकायः संरक्षण प्रति, नित्यं-सर्वकालं सर्वेन्द्रियसमाहितः-शब्दादिषु रागद्वेषौ अगच्छनिति ॥ ३५० ॥ धुवं च पडिलेहिजा, जोगसा पायकंबलं । सिज्जमुच्चारभूमिं च, संथारं अदुवाऽऽसणं ॥ ३५१ ॥ उच्चारं पासवणं, खेलं सिंघाणजल्लिअं । फासुअं पडिलेहिता, परिट्ठाविज संजए ।। ३५२ ॥ पविसित्तु परागारं, पाणट्ठा भोअणस्स का । जयं चिट्टे मिश्र भासे, न य रूवेसु मणं करे ॥ ३५३ ॥ वहुं सुणेइ कन्नेहि, वहुं अच्छीहिं पिच्छइ । न य दि8 सुझं सर्व, भिक्खू अक्खाउमरिहइ ।। ३५४ ॥ सुअं वा जइ वा दिटुं, न लविजोवघाइअं । न य केणइ उवाएणं, गिहिजोगं समायरे ॥ ३५५ ॥ निट्ठाणं रसनिज्जूढं, भदगं पावगंति वा । पुट्ठो वावि अपुट्ठो वा, लाभालाभं न निद्दिसे ॥ ३५६ ॥ न य भोअणमि गिद्धो, चरे उंछं अयंपिरो । अफासुझं न भुजिजा, कीअमुद्देसिआइडं ॥ ३५७ ॥ संनिहिं च न कुविज्जा, अणुमायपि संजए । मुहाजीवी असंबद्धे, हविज. जगनिस्सिए ॥ ३५८ ॥ लहवित्ती सुसंतुटे, अप्पिच्छे सुहरे सिआ। आसुरत्तं न गच्छिन्जासुच्चा णं जिणसासणं. ३५९ ।।

m कन्नसुक्खेहि सद्देहि, पेम्मं नाभिनिवेसए । दारुणं कक्कसं फासं, कारण अहिआसए ॥ ३६० ॥ खुहं पिवासं दुस्सिनं, सीउण्हं अरइं भयं । अहिआसे अवहिओ, देहदुक्खं महाफलं ॥ ३६१ ॥ अत्यंगमि आइच्चे, पुरत्था अ अणुग्गए । आहारमइयं सवं, मणसावि ण पत्थए ॥ ३६२ ॥ तथा धुवंति, तथा ध्रुवं च-नित्यं च यो यस्य काल उक्तोऽनागतः परिभोगे च तस्मिस्तत्प्रत्युपेक्षेत सिद्धान्त- विधिना योगे सति सामर्थे अन्यूनातिरिक्तं, किं तदित्याह-पात्रकम्बलं-पात्रग्रहणादलावुदारुमयादिपरिग्रहः, कम्बलग्रह- णादूर्णास्त्रमयपरिग्रहः, तथा.शय्यां-वसतिं द्विकालं त्रिकालं च, उच्चारभुवं च-अनापातवदादि स्थंडिलं तथा संस्तारकं- तृणमयादिरूपं, अथवाऽऽसनं-अपवादगृहीतं पीठकादि प्रत्युपेक्षेतेति ॥ ३५१ ॥ तथा उच्चारंति, उच्चारं प्रश्रवणं श्लेष्म सिंघानं जल्लमिति प्रतीतानि, एतानि प्रासुकं प्रत्युपेक्ष्य स्थण्डिलमिति वाक्यशेषः, परिष्ठापयेदुत्सृजेत्संयत इति ।। ३५२ ॥ उपाश्रयस्थानविधिरुक्तः, गोचरप्रवेशमधिकृत्याह-पविसित्तुत्ति, प्रविश्य परागारं-परगृहं, पानार्थ भोजनस्य वा ग्लानादेः औषधार्थ वा यतं-गवाक्षाद्यनवलोकयस्तिष्ठेदुचितदेशे, मितं यतनया भाषेतागमनप्रयोज- नादि, न रूपेषु-दातृकान्तादिषु मनः कुर्यादेवम्भूतान्येतानीति न मनो निवेशयेत् , रूपग्रहणं रसायुपलक्षणमिति ॥ ३५३ ।। गोचरादिगन एव केनचित्तथाविधं पृष्टः एवं ब्रूयादित्याह-बहुंति, अथवोपदेशाधिकार एव सामान्येनाह- बहुंति, बहु-अनेकप्रकारं शोभनाशोभनं शृणोति कर्णाभ्यां, शब्दजातमिति गम्यते, तथा बहु-अनेकप्रकारमेव F - om शोमनाशोमनभेदेनाक्षिभ्यां पश्यति, रूपजातमिति गम्यते, एवं न च दृष्टं श्रुतं सर्व स्वपरोभयाहितमपि श्रुता ते पत्नी रुदतीत्येवमादि भिक्षुराख्यातुमर्हति, चारित्रोपपातित्वात् , अईति च स्वपरोभयहित दृष्टि( दृष्ट )स्ते राजानमुप- शामयन् शिष्य इत्येवमादीति ॥ ३५४ ॥ एतदेव स्पष्टयन्नाह-सुयंति, श्रुतं वा अन्यतो यदि वा दृष्टं स्वयमेव न लपेन्न मापेत, औपघातिक-उपपातेन निर्वृत्तं वक्तलं वा, यथा-चौरस्त्वमित्यादि। अतोऽन्यल्लपेदपीति गम्यते, तथा न च केनचिदुपायेन सूक्ष्मयापि भगथा गृहियोग-गृहिमम्बन्ध नद्रालग्रहणादिरूपं गृहिव्यापार वा-प्रा(आ)रमरूपं समाचरेत्-कुर्यादिति ॥ ३५५ ॥ किंच-निहाणंति, निष्ठानं-सर्वगुणोपेतं संभृतमन्नं रसनिढमेतद्विपरीतं कदशनं, एतदाश्रित्पाद्यं भद्रकं द्वितीयं पापकमिति वा, पृटो वापि परेण कीहग्लन्धमित्यपृष्टो वा स्वयमेव लाभालाभं निष्ठा. नादैर्न निर्दिशेद्, अब माधु लन्धमसाधु वा शोभनमिदं अपरमशोमनं वेति ॥ ३५६ ॥ किंच-न येति, न च भोजने गृद्धः सन्निशिष्टवस्तुलामायेश्वरादिपु कुलेषु मुखमगलिकया चरेत्, अपितु उन्; भावतो-ज्ञाताज्ञातमजल्पनशीलो धर्मलाममााभिधायी चरेत् , तत्राप्यप्रासुकं-सचित्तं सन्मिश्रादि कथंचिद्गृहीतमपि न मुझीत, तथा प्रोतभौधेशिका. हृतं प्रासुकमपि न भुञ्जीत, एतद्विशोभ्यविशोधिकोटयुपलक्षणमिति ॥ ३५७ ।। संनिहिं चेति, सन्निधिं च प्रानिरूपित स्वरूपां न कुर्यादणुमानमपि-स्तोकमात्रमपि, संयतः साधुः, तथा मुधाजीवीति पूर्ववत् , असम्बद्धः पधिनीपत्रोदक पद्गृहस्थैः, एवंभूतः सन् भवेत् जगनिप्रितवराचरसंरक्षणप्रतिबद्ध इति ॥३५८॥ किंच-लूहत्ति, रूक्षे-वल्लचनकादि मिईत्तिरस्येवि लक्षाचिः, सुसन्तुष्टो येन वा तेन वा सन्तोपगामी, अल्पेच्छो न्यूनोदरतया आहारपरित्यागी, सुभरः

स्यादल्पेच्छत्वादेव दुर्भिक्षादाविति फलं, प्रत्येकं वा स्यादिति क्रियायोगः, रूक्षवृत्तिः स्यादित्यादि, तथा आसुरत्वं-
क्रोधभावं न गच्छेत् क्वचित् स्वपक्षादौ श्रुत्वा जिनशासनं-क्रोधविपाकप्रतिपादकं वीतरागवचनं, जहा-" चाहिं ठाणेहिं
जीवा आसुरत्ताए कम्मं पकरिंति, तंजहा-कोहसीलयाए पाहुडसीलयाए जहा ठाणे जाव जंणं मए एस पुरिसे अण्णाणी
मिच्छादिट्ठी अक्कोसइ हणइ वा तं ण मे एस किंचि अवरज्झइत्ति, किं तु मम एयाणि वेयणिजाणि कम्माणि अवरज्झंतित्ति
सम्ममहियासमाणस्स निजरा एव भविस्सइ " त्ति ॥ ३५९ ॥ तथा कन्नत्ति, कर्णसौख्यहेतवः-कर्णसौख्याः शब्दा-
वेणुवीणादिसम्बन्धिनः तेषु प्रेम-रागं नाभिनिवेशयेत्-न कुर्यादित्यर्थः, तथा दारुणमनिष्टं कर्कशं-कठिनं स्पर्श-
मुपनतं सन्तं कायेनाधिसहेत् , न तत्र द्वेपं कुर्याद , इत्यनेनाद्यन्तयो रागद्वेषनिराकरणेन सर्वेन्द्रियविपयेषु रागद्वेपप्रतिषेधो
वेदितव्य इति ॥ ३६० ॥ किंच-खुहंत्ति, क्षुध-बुभुक्षां, पिपासां-तृपं, दुःशय्यां-विषमभूम्यादिरूपां, शीतोष्णं-
प्रतीतं, अरर्ति-मोहनीयोद्भवां, भयं-व्याघ्रादिसमुत्थमतिसहेदेतत्सर्वमेव अव्यथितोऽदीनमनाः सन् , देहे दुःखं
महाफलं संचिन्त्येति वाक्यशेषः, तथा च शरीरे सत्येतहुःखं, शरीरं चाऽसारं, सम्यगतिसद्यमानं च मोक्षफलमेवेदमिति
॥३६१ ॥ किंच-अत्थंति, अस्तं गते आदित्य-अस्तपर्वतं प्राप्ते अदर्शनीभूते वा पुरस्तात् चानुद्गते-प्रत्यूपस्यनुदित
इत्यर्थः, आहारात्मकं सर्व-निरवशेषमाहारजातं मनसापि न प्रार्थयेत् किमङ्ग पुनर्वाचा कर्मणा वेति ॥ ३६२ ।।
अतितिणे अचवले, अप्पभासी मिआसणे । हविज्ज उअरे दंते, थोवं लड़े न खिसए ॥ ३६३ ॥
न बाहिरं परिभवे, अत्ताणं न समुक्कसे । सुअलाभे न मजिज्जा, जच्चा तवस्सिबुद्धीए ॥ ३६४ ॥

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से जाणमजाणं वा, कटु आहम्मि पयं । संवरे खिप्पमप्पाणं, बीअंतं न समायरे ॥ ३६५ ॥
अणायारं परकम्म, व गूहे न निण्हवे । सुई सया वियडभावे, असंसते जिइंदिए ॥ ३६६ ॥
अमोहं वयणं कुजा,आयरियस्स महप्पणो । तं परिगिज्झ वायाए, कम्मुणा उववायए ।। ३६७॥
अधुवं जीवियं नञ्चा, सिद्धिमग्गं वियाणिया। विणियाट्टज भोगेसु, आउं परिमिअप्पणो ॥ ३६८ ।।
चलं थामं च पेहाए, सद्धामारुग्गमप्पणो । खितं कालं च विन्नाय, तहप्पाणं निजुंजए ॥ ३६९ ॥
जरा जाव न पीडेई, वाही जाव न वहुई। जाविदिआ न हायंति, ताव धम्म समायरे ॥ ३७० ॥
कोहं माणं च मायं च, लोभं च पाववडणं । वमे चत्तारि दोसे उ, इच्छंतो हिअमप्पणो ॥ ३७१ ॥
कोहो पाइं पणासेइ,माणो विणयनासणो।माया मित्ताई(णि) नासेइ,लोभो सबविणासणो ॥३७२॥
उसमेण हणे कोहं, माणं मद्दवया जिणे। मायं चऽजवभावेण, लोभं संतोसओ जिणे ॥ ३७३ ॥
कोहो य माणो य अणिग्गहीया, माया य लोभो य पवद्वमाणा ।
चत्तारि एए कसिणा कसाया, सिंचति मूलाई पुणब्भवस्स ॥ ३७४ ॥

दिवाप्यलभ्यमानेऽप्याहारे किमित्याह-अतितिणेत्ति, अतिन्तिनो. भवेत् , अतिन्तिनो नामालाभेऽपि नेपद्यत्किञ्चन- भापी, तथा अचपलो भवेत्-सर्वत्र स्थिर इत्यर्थः, तथा अल्पभाषी-कारणे परिमितवक्ता, तथा मिताशन:-मितभोक्ता भवेदित्येवंभूतो भवेत् , तथोदरेदान्तो येन वा तेन वा वृत्तिशीलः, तथा स्तोकं लब्ध्वा न खिसयेत्-देयं दातार या न हेलयेदिति. ॥ ३६३ ॥ मदवर्जनार्थमाह-न वाहिरंति, न बाह्यमात्मनोऽन्यं परिभवेत्तथाऽऽत्मानं न समुत्कर्पयेत्, सामान्येनेत्थंभूतोऽहमिति, श्रुतलाभाभ्यां न मायेत, पण्डितो लब्धिमानहं इत्येवं तथा जात्या तपस्त्वेन बुद्ध्या वा न मातेति वर्त्तते, जातिसम्पन्नः तपस्वी बुद्धिमान् अहमित्येवं, उपलक्षणं चैतत्कुलबलरूपाणां, कुलसम्पन्नो बलसम्पन्नोऽहं, रूपसम्पन्नोऽहमित्येवं न मायेदिति ॥ ३६४ ॥ ओघत आमोगानाभोगसेवितार्थमाह-सेति, स-साधुः जानन्नजानन्या- आभोगतोऽनाभोगतश्चेत्यर्थः, कृत्वा आधार्मिकं पदं कथञ्चिद्रागद्वेषाम्यां मूलोत्तरगुणविराधनमिति भावः, संवरेत्क्षि- प्रमात्मानं भावतो निवृत्या(निवर्त्या )लोचनादिना प्रकारेण, तथा द्वितीयं पुनस्तन समाचरेदनुवन्धदोपादिति ॥३६५॥ एतदेवाह-अणायारं ति, अनाचार-सावधयोग पराक्रम्य-आसेव्य गुरुसकाशे आलोचयन्न निगृहेत-न निनुवीत, तत्र गृहनं-किञ्चित्कथनं, निद्व-एकान्तापलापः, किंविशिष्टः सन्नित्याह-शुचिः-अकलुपमतिः सदा विकटभाव:-प्रकट- भावः, असंसक्तः-अप्रतिबद्धः कचिजितेन्द्रियो-जितेन्द्रियप्रमादः सन्निति ॥ ३६६ ॥ तथा-अमोहंति, अमोघं- अवन्ध्यं वचनमिदं कुर्वित्यादिरूपं कुर्यादित्येवमित्यभ्युपगमेन, केपामित्याह-आचार्याणां महात्मनां श्रुतादिभिर्गुणैः, तत्परिगृह्य वाचा एवमित्यभ्युपगमेन कर्मणोपपादयेत्-क्रियया सम्पादयेदिति ॥ ३६७ ॥ तथा अधुवंति, अधुवं- -- अनित्यं मरणाशति जीवितं सर्वभावनिबन्धनं ज्ञात्वा, तथा सिद्धिमार्ग-मम्यग्नानदर्शननारिवलक्षणं पिज्ञाय विनि- वर्तेत भोगेभ्यो पन्धकहेतुभ्यः, तथाऽध्रुवमप्यायुः परिमितं संवत्सरशतादिमानन विशायात्मनो रिनिपत भोगेम्य इति ॥३६८|| पलं थामंति, (यलं-शारीरिकं स्थाम-इस्तादिविशेषोत्यं पेहाए प्रेक्ष्य श्रद्धामारोग्यं आत्मना, क्षेत्रं "निक्ख. छपाणथंडिल्ले"त्यादि १३ गुणोपेतं वित्रायात्मनः (कालं-पौवनादिश्योरूपे) नियोजयेद में ॥ ३६९ ॥ वृहलघुकृत्योर. व्याख्याता अन्यकतेति) उपदेशाधिकारे प्रक्रान्ते इदमेव ममर्थपनाह-जाति, जरा-वयोहानिलक्षणा यायप्त पीडयति, व्याधिः-क्रियासामर्थ्यशत्रुर्यायन यर्द्धते, यायदिन्द्रियाणि-क्रियामामोरकारीणि थोप्रादीनि न हीयन्ते ताय- दत्रान्तरे प्रस्ताव इविकृत्वा धर्म समापरेषारित्रधर्ममिति ।। ३७० ॥ उपायमाह-कोहंति, मोघं मानं च मायां च, लोभं च पापयर्धन, सर्व एते पापहेतव इति पापवर्द्धनव्यपदेशः, यतथैवमतो घमेचतुरो दोपान् एतानेव क्रोधादीन हितमिच्छन्नात्मनः, एतदमने हि सर्वसम्पदिति ॥ ३७१ ॥ अवमने विह लोके एापायमाह-कोहपि, प्रोपा-प्रीति प्रणाशयति, क्रोधान्यवचनतस्तदुच्छेददर्शनात् , मानो-विनयनाशनः, अवलेपेन पूर्वतया वदकरणोपलन्धः, माया- मित्राणि नाशयति, कौटिल्यवर्तिनस्त्यागदर्शनात् , लोभा-सर्वविनाशनः, तस्वतत्रयाणामपि तद्भावमावित्वादिति ॥ ३७९ ॥ यत एवमता-उवसमेणंति, उपशमेन-धान्तिरूपेण हन्पात्मोघं; उदयनिरोधोदयप्राप्ताफलीकरणेन, एवं मानं मार्दवेन-अनुत्स(च्छ्रिोतवया जयेत्, उदयनिरोधादिनैव, मायां चार्जयभावेनाशठतया जयेदयनिरोधादिनन, एवं लोभं सन्तोपतः निस्पृहत्त्वेन जपेत्तदयनिरोधोदयप्राप्ताफलीफरणेनेति ॥ ३७३ ।। क्रोधादीनामेव परलोकापाय.

माह-कोहत्ति, क्रोधश्च मानश्वानिगृहीती-उच्छृङ्खलौ, माया च लोभश्च विवर्धमानौ-वृद्धि गच्छन्ती, चत्वार
एते क्रोधादयः कृत्स्नाः-सम्पूर्णाः, कृष्णा वा-क्लिष्टाः कपायाः सिञ्चन्त्यशुभभावजलेन मूलानि तथाविधकर्म-
रूपाणि पुनर्भवस्य-पुनर्जन्मतरोरिति ।। ३७४ ॥
रायणिएसु विणयं पउंजे, धुवसीलयं समयं न हावइज्जा ।
कुम्मुव अल्लीणपलीणगुत्तो, परकमिज्जा तवसंजमंमि ॥ ३७५ ॥
निदं च न बहु मन्निज्जा, सप्पहासं विवज्जए। मिहो कहाहिं न रमे, सज्झायमि रओ सया ।। ३७६ ॥
जोगं च समणधम्ममि, मुंजे अणलसो धुवं । जुत्तो य समणधम्ममि, अटुं लहइ अणुत्तरं ॥ ३७७ ॥
इहलोगपारत्तहिअं, जेणं गच्छइ सुग्गइं । बहुस्सुयं पज्जुवासिज्जा, पुच्छिज्जत्थविणिच्छयं ॥ ३७८ ॥
हत्थं पायं च कायं च, पणिहाय जिइंदिए । अल्लीणगुत्तो निसिए, सगासे गुरुणो मुणी ॥ ३७९ ॥
न पक्खओ न पुरओ, नेव किच्चाण पिटुओ।न य ऊरुं समासिज्जा, चिट्ठिजा गुरुणंतिए ॥ ३८० ॥
अपुच्छिओ न भासिज्जा, भासमाणस्स अंतरा। पिट्ठिमंसं न खाइज्जा, मायामोसं विवज्जए ॥ ३८१ ॥
अप्पत्तियं जेण सिया, आसु कुप्पिज वा परो। सवसोतं न भासिज्जा, भासं अहियगामिणि ॥ ३८२ ॥

दिलृ मिअं असंदिद्धं, पडिपुन्नं विजिअं । अयंपिरमणुविग्गं, भासं निसिर अत्तवं ॥ ३८३ ॥ आयारपन्नत्तिधरं, दिढिवायमहिजगं। वायविक्खलिअं नच्चा, न तं उवहसे मुणी ॥ ३८४ ॥ यत एवमतः कपायनिग्रहार्थमिदं कुर्यादित्याह-रायणिएचि, रत्नाधिकेपु-चिरदीक्षितादिपु विनयं-अभ्युत्थानादिरूपं प्रयुञ्जीत, तथा धुवशीलता-अष्टादशशीलाइसहस्रपालनरूपां, सततं-अनवरतं यथाशक्या न हापयेत्, तथा कृम्म इव-कच्छप इन आलीनमलीनगुप्तः अलोपाङ्गानि मम्यक्संयम्येत्यर्थः, पराक्रमेत-प्रवत तपःसंयमे-तप.. प्रधाने संयमे इति ॥ ३७५ ।। किं च-निदं चेति, निद्रां च न यहु मन्येत न प्रकामशायी स्यात् , सपहासं च-अतीव. प्रहासरूपं विवर्जयेत् ,मिधाकधासु-राहस्पिकीपु न रमेत, स्वाध्याये-पाचनादौ रतः सदा, एवंभूतो भवेदिति ॥३७६॥ तथा-जोगं चेति, योगं च त्रिविध-मनोवाकायव्यापार श्रमणधर्मे-क्षान्त्यादिलक्षणे युञ्जीत अनलस:-उत्साहवान् , धुर्व-कालाद्यौचित्येन नित्यं सम्पूर्ण सर्वत्र प्रधानोपमर्जनभावेन वा, अनुप्रेक्षाकाले मनोयोग, अध्ययनकाले वाग्योग प्रत्युपेक्षणाझाले काययोगमिति, फलमाह-युक्त एवं व्यापृतः श्रमणधर्मे दशविधे अर्थ लमते-प्रामोत्यनुत्तरं भावार्थ झानादिरूपमिनि ॥ ३७७ ॥ एतदेवाइ-इहलोएति, इहलोकपरत्रहितमिहाकुशलप्रवृत्तिदुःखनिरोधेन परत्र कुशलानु- पन्धतः, उमयलोकहितमित्यर्थः, येनार्धन ज्ञानादिना करणभूतेन गच्छति सुगति, पारम्पर्येण सिद्धिमित्यर्थः, उपदेशा. धिकारे उक्तव्यतिकरसाधनोपायमाह-पहुश्रुतं-आगमवृद्ध पर्युपासीत-सेवेत, सेवमानश्च पृच्छेदर्थविनिश्चयमपाय- रक्षक कल्याणावहं वार्थावितथमावमिति ॥ ३७८ ॥ पर्युपासीनव-इत्थंति, इस्तं पादं च कायं च प्रणिधायेति संयम्य जितेन्द्रियो निभृतो भूत्वा आलीनगुप्तो निपीदेत् , ईपल्लीन उपयुक्त इत्यर्थः, सकाशे गुरोर्मुनिरिति ॥३७९॥ किं च-न पक्खउत्ति, न पक्षतः-पार्श्वतः, न पुरतो-ऽग्रतो नैव कृत्यानामाचार्याणां पृष्ठतो मार्गतो निषीदेदिति वर्तते, यथासंख्यमविनयवन्दमानान्तरायादर्शनादिदोपप्रसङ्गात् , न चोरं समाश्रित्योरोरुपय॒रं कृत्वा तिठेगुर्वन्तिके, अविनयादिदोप्रसङ्गादिति ॥ ३८० ॥ उक्तः कायप्रणिधिर्वाक्प्रणिधिमाह-अपुच्छिउत्ति, अपृष्टो निष्कारणं न भाषेत, भाषमाणस्य चान्तरेण न भाषेत, नेदमित्थं किं तद्देवमिति, तथा पृष्ठिमांसं परोक्षदोपकीर्तनरूपं न खादेत् न भाषेत, मायामृषां-मायाप्रधानां मृपावाचं विवर्जयेदिति ॥ ३८१ ॥ किंच-अप्पत्तियन्ति, अप्रीतिर्येन स्यादिति प्राकृतशैल्या येनेति-यया भाषया भाषितया अनीतिमात्रं भवेत् , तथा आशु-शीघ्रं, कुप्येद्वा परो रोपकार्य दर्शयेत् , सर्वशः-सर्वावस्थासु तामित्थंभूतां न भाषेत भाषां, अहितगामिनीमुभयलोकविरुद्धामिति ॥ ३८२ ॥ भाषणोपायमाह-दिडंति, दृष्टां-दृष्टार्थ- विषयां मितां-स्वरूपप्रयोजनाम्यामसंदिग्धां-निःशंकितां प्रतिपूर्णा स्वरादिभिर्व्यक्तां-अलल्लां जितां परिजि(चि)ता. मजल्पनशीला नोचैर्लग्नविलग्नामनुद्विग्नां-नोद्वेगकारिणीमेवंभूतां भाषां निसृजेत् ब्रूयादात्मवान् सचेतन इति ॥ ३८३ ॥ प्रस्तुतोपदेशाधिकार एवेदमाह-आयारेति, आचारप्रज्ञप्तिधरमिति आचारधरः स्त्रीलिङ्गादीनि जानाति प्रज्ञप्ति धरस्तान्येव सविशेपाणीत्येवंभूतं, तथा दृष्टिवादमधीयानं प्रकृतिप्रत्ययलोपागमवर्णविकारादिवेदिनं वाग्विस्खलितं ज्ञात्वा विविधमनेकैः प्रकारः लिंगभेदादिभिः स्खलितं विज्ञाय न तमाचारादिधरमुपहसेन्मुनिः, अहो नु खल्याचारादि. धरस्य वाचि कौशलमित्येवं, इह च दृष्टिवादमधीयानमित्युक्तमत इदं गम्यते नाधीतदृष्टिवादं, तस्य ज्ञानाप्रमादातिशयतः स्खलनाऽसम्मवात् , यद्येवंभूतस्यापि स्खलितं मम्मवति न चैनमित्युपहसेदित्युपदेशस्ततोऽन्यस्य सुतरां सम्भवति, नामो हसितव्य इति ।। ३८४ ॥ नक्खत्तं सुमिणं जोग, निमित्तं मंतभेसनं । गिहिणो तं न आइक्खे, भूयाहिगरणं पयं ।। ३८५ ।। अन्नटुं पगडं लयणं, भइन्ज सयणासणं । उच्चारभूमिसंपन्नं, इत्थीपसुविवजियं ॥ ३८६ ॥ विवित्ता य भवे सिज्जा, नारीणं न लवे कहं । गिहिसंयवं न कुजा, कुजा साहूहि संथवं ॥ ३८७ ॥ जहा कुक्कुडपोअस्स, निच्चं कुललओ भयं । एवं खु बंभयारिस्स, इत्थीविग्गहओ भयं ॥ ३८८ ॥ चित्तभिर्ति न निज्झाए, नारिं वा सुअलंकिअं । भक्खरंपिव दणं, दिहि पडिसमाहरे ।। ३८९ ।। हत्थपायपडिच्छिन्नं, कण्णनासविगप्पिअं । अवि वाससयं नारिं, वंभचारी विवजए ॥ ३९० ॥ विभूसा इस्थिसंसग्गो, पणीअं रसभोअणं । नरस्सऽत्तगवेसिस्स, विसं तालउडं जहा ॥ ३९१ ।। अंगपञ्चंगसंठाणं, चारुल्लविअपेहिअं। इत्थीणं तं न निज्झाए, कामरागविवडणं ॥ ३९२ ॥ विसएसु मान्नेसु, पेमं नाभिनिवेसए। अणिचं तेसिं विनाय, परिणामं पुग्गलाण उ ॥ ३९३ ॥ पोग्गलाणं परीणाम, तेसिं नया जहा तहा । विणीअतण्हो विहरे, सीईभूएण अप्पणा ॥ ३९४ ।।

किंच-नक्खत्तंति, गृहिणा पृष्टः सन् नक्षत्रं-अश्विन्यादि, स्वप्नं-शुभाशुभफलमनुभूतादि योग-वशीकरणादि निमित्तमतीतादि मन्त्रं-वृश्चिकमन्त्रादि भेषजं-अतीसाराद्यौपधं, गृहिणां-असंयतानां तदेतन्नाचक्षीत, किंविशिष्ट- मित्याह-भूताधिकरणं पदमिति भूतानि-एकेन्द्रियादीनि संघट्टनादिनाऽधिक्रियन्तेऽस्मिन्निति, ततश्च तदप्रीतिपरिहारार्थ- मित्येवं ब्रूयात्-अनधिकारोऽत्र तपस्विनामिति ॥ ३८५ ॥ किंच अन्नद्वंति, अन्यार्थ प्रकृतं न साधुनिमित्तमेव निवर्तितं, लयनं-स्थानं वसतिरूपं भजेत्-सेवेत, शयनासनमित्यन्यार्थ प्रकृतं संस्तारकपीठकादि सेवेतेत्यर्थः, एतदेव विशेष्यते- उच्चारभूमिसम्पन्नं-उच्चारप्रश्रवणादिभूमियुक्तं, तद्रहिते असकृत्तदर्थ निर्गमनादिदोपात्तथा स्त्रीपशुविवर्जितमिति, एकग्रहणे तजातीयग्रहणात् स्त्रीपशुपण्डकविवर्जितं रूपा(रूया)यालोकनादिरहितमिति ॥ ३८६ ॥ तदित्थंभूतं लयन सेव. मानस्य धर्मकथाविधिमाह-विवित्ता यत्ति, विविक्ता च तदन्यसाधुभिर्विवर्जिता, चशब्दात्तथाविधभुजङ्गप्रायैकपुरुष- संयुक्ता भवेच्छय्या-वसत्यादि ततो नारीणां-स्त्रीणां न कथयेत्कथां, शङ्कादिदोपप्रसङ्गादौचित्यं विज्ञाय पुरुषाणां तु कथयेत् , अविविक्तायां नारीणामपीति, तथा गृहिसंस्तवं-गृहिपरिचयं न कुर्यात्तत्स्नेहादिदोपसम्भवात् , कुर्यात्सा- धुभिः सह संस्तवं-परिचयं, कल्याणमित्रयोगेन कुशलपक्षवृद्धिभावत इति ॥ ३८७ ॥ कथंचिढहिसंस्तवभावेऽपि स्त्री- संस्तवो न कर्त्तव्य एवेत्यत्र कारणमाह-जहत्ति, यथा कुर्कुटपोतस्य-कुर्कुटशिशोनित्यं-सर्वकालं कुललतो मार्जाराद्भयं एवं ब्रह्मचारिणः साघोः स्त्रीविग्रहात्-त्रीशरीराद् भयं, विग्रहग्रहणं मृतविग्रहादपि भयख्यापनार्थमिति ॥ ३८८ ।। यत- चैवमतः-चित्तभित्तिति, चित्रभित्ति-चित्रगतां स्त्रियं न निरीक्षेत न पश्येत् , नारी वा सचेतनामेव स्वलकृतां, उपलक्षणमेतदनलष्कृतां च न निरीदेव, कथंनिदर्शनयोगेऽपि भास्करमियादित्यमित्र दृष्ट्वा दृष्टिं प्रतिममाहरेत्- द्रागेव निवर्तयेदिति ॥ ३८९ ॥ किंबहुना ! हत्यत्ति, हस्तपादप्रतिच्छिन्ना-प्रतिन्छिनहस्तपादा कर्णनासाविकृत्ता. मिति-पित्तकर्णनासामपि वर्षशतिका नारी, एवं वृद्धामपि किमाई पुनस्तरुणी?, तां तु मुतसमेव, ब्राह्मचारी-चारि- प्रधनो महाधन इव तस्करान्वियर्जयेदिति ॥ ३९० ॥ अपिच-विभूमेति, विभूषा-सादिरादा, स्त्रीसंसर्गः-येन केनचित्प्रकारेण स्रीसम्बन्धः, प्रणीतरसभोजनं-गलस्नेहरमाभ्यवहार, एतामेव विभूपादि नरस्यात्मगयेपिणा- आत्महितान्वेपणपरस्य विषं तालपुटं यथा-तालमात्रव्यापनिकरपिकल्पमहितमिति ॥ ३९१ ।। किंच-अंगपचंगेति, अनमत्यद्गसंस्थानमिति, अगानि-शिरप्रभृतीनि प्रत्यगानि-नयनादीनि एतेषां संस्थान-विन्यासविशेष, तथा घाम- शोमन लपितपेक्षितं-लपितं-जल्पितं प्रेक्षित-निरीक्षितं स्त्रीणां मम्बन्धि, उदङ्गप्रत्ययसंस्थानादि न निरीक्षेत-न परन् , कृत इत्याह-कामरागवि नमिति, एतद्वि निरीक्ष्यमाणं मोहदोपान्मैथुनाभिलापं वर्धयति, अत एवास्य प्रार स्त्रीणां निरीक्षणप्रतिषेधात् गतार्थतायामपि प्राधान्यख्यापनार्थो भेदेनोपन्यास इति ॥ ३९२॥ किंच-विमएसुत्ति, विषयेषु- शन्दादिपु, मनोज्ञेपु-इन्द्रियानुकूलपु, प्रेम-राग नाभिनिवेशयेत्-न कुर्यात् , एवममनोत्रेषु द्वेष, आह-उक्तमेवेदं प्राय "कन्नमोक्खेहीत्यादौ" (गा.३६०) किमर्थ पुनरुपन्याम इति ?, उच्यते-कारणविशेषामिधानेन विशेषोपलम्मामिति, आह च-अनित्यमेव-परिणामानित्यतया तेपा-पुद्गलानां, तुशब्दात् शन्दादिविषयमम्बन्धिनामितियोगः, विज्ञाय-अवेत्य जिनवचनानुसारेण, किमित्याह-परिणाम-पर्यायान्तरापचिलक्षणं, ते हि मनोमा अपि क्षणादमनोयतया परिणमन्ति,

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उत्तम-प्रधान प्राप्त इत्यर्थः, तामेय प्रवामप्रतिपतितया प्रवर्धमानामनुपालयेयत्नान, श्वेत्याह-गुणेषु-मूलगुणादिलधणेषु आचार्पसंमतेपु-तीर्थकरादिपहुमते, अन्ये तु यदाविशेषणमित्येतद्वयानने. नाना प्रदामनुगालगुणेष, किंभूता- आचार्यगम्मता, न तु स्वाग्रहकलरिवामिति ॥३९५|| आनारप्रणिधिकलमाइ-नां चिमति, सपोदमननादिरूपं साधु लोरप्रतीतं संयमयोग प-पृथिव्यादिविषपं संपमव्यापार व स्वाध्यायारियोग १-पापनादिव्यागार सवा-गर्व. कालमधिष्ठाता-तपाप्रभृतीनां कर्तेत्यर्थः, रह च तपोऽमिधानापाहणेऽपि शापयोगस्य प्राधान्यख्यापनार्य मेदेना भिधानमिति । स एवंभूतः शूर इय-विक्रान्तमट इस सेनगा-चतुरमरूपमा इन्द्रियागादिसेनपा निरुद्धः गन् समाप्तायुधा-संपूर्णतपाप्रभृतिखड्गापायुधा, अलं-अत्यर्थमात्मनो मरति, संरक्षणाय असं च परेपा निवा(सकारणायेति ।। ३९६ ॥ एतदेव स्पष्टयमाह-सज्झायति, स्वाध्याय एवं गध्यान साध्यागतद्वयानं तर रतस्य-मामक्तस्प प्रातु:-सपरोमयप्राणशीलस्य अपापमावस्य-लम्स्यायपेक्षारहिततया शुदमिमस्य तपमि-अनशनादौ यथाशरस्या, रतस्य विशुद्धयते अपैति, पदस्प माघोर्मल-कर्ममलं पुराकृतं जन्मान्तरोपास, शान्तमाह-समीरित-प्रेरित, रूय. मलमिव ज्योतिषा-अग्निनेति ॥ ३९७ ।। ततश्र-से तारिसति, स तारश अनन्तरोदितगुणयुक्तः माधुर्युःपसहा- }} परीपहजेता, जितेन्द्रियः-पराजितश्रोपेन्द्रियादिर, श्रुतेन युक्तो-रियावानिस्पा, अममा-मग ममत्याहिता, । अकिञ्चनो-द्रव्यमावकिश्चनरहिता, विराजते-बोमते, फर्भधने-मानावरणीयादिकर्ममेये अपगते गति, निदर्शनमाह- कृत्स्नानपुटापगमे व चन्द्रमा इति यथा कस्ने अमपुटे कुम्णे या अपगते सति चन्द्रमा विराजते शरदि, सदभावपग.

. तकर्मघनः समासादितकेवलालोको विराजते ॥ ३९८ ॥ ब्रवीमीति पूर्ववत् ॥ इत्याचारप्रणिध्याख्यमष्टममध्ययनं समाप्तम् ॥ व्याख्यातमाचारप्रणिध्यध्ययनम् ।। अधुना विनयसमाध्याख्यमारभ्यते--अस्य चायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरा- ध्ययने निरखा वच आचारे प्रणिहितस्य भवतीति, तत्र यत्नवता, भवितव्यमित्येतदुक्तं, इह त्याचारप्रणिहितो यथोचित. विनयसंपन्न एव भवतीत्येतदुच्यते । उक्तं च-" आयारपणिहाणमि, से सम्मं वट्टई बुहे । णाणाईण विणीए जे, मुक्खट्ठा निविगिच्छए ॥ १॥" इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनमिति~ 'यंभा क कोहा व मयप्पमाया, गुरुस्सगांसे विणयं न सिक्खे ( तिट्ठइ)। सोचेव उ तस्स अभूइभावो, फलं व कीअस्स वहाय 'होइ ॥ ३९९ ॥ धंभा वेत्यादि स्तम्भाद्वा मानाद्वा-जात्यादिनिमित्तात् : क्रोधाद्वा--अक्षान्तिलक्षणात् , मायाप्रमादादिति, मायातो-निकृतिरूपायाः प्रमादात्-निद्रादेः सकाशात् किमित्याह-गुरोः सकाशे-आचार्यादेः समीपे विनयमासेवना- शिक्षादिमेदमिन्नं न शिक्षते-नोपादत्ते तत्र स्तम्भात् कथमहं जात्यादिमान् जात्यादिहीनसकाशे शिक्षामीति, एवं क्रोधात्क- चिद्वितयकरणचोदितो रोपाद्वेति मायातः: शूलं मे बाधत.. इत्यादिव्याजेन, प्रसादात्।प्रक्रान्तोचितमनवबुद्धयमानो निद्रादि- व्यासङ्गेना स्तम्भादिक्रमोपन्यासचेत्यमेवामीषां विनयविनहेतुतामाश्रित्य प्राधान्यख्यापनार्थः तदेवं स्तम्मादियो, गुरोः सकाशे INE १४ उत्तम-प्रधान प्राप्त इत्यर्थः, तामेव प्रक्षामप्रतिपवितया प्रवर्धमानामनुपालयेपत्तन, त्याह-गुणेषु-मूलगुणादिलक्षणेषु आचार्यसंमतेपु-तीर्थंकरादिबहुमतेप, अन्ये तु श्रद्धाविशेषणमित्येतद्याचश्ते. तानेर श्रदामनुरालहणेषु, किंभूता- आनार्यमम्मती, न तु स्वाग्रहफलतितामिति ॥३९५।। आचारप्रणिधिकलमाह-नां निमंति, तपक्षेदमनशनादिरूपं साधु लोक्प्रतीतं संयमयोगं च-पृथिव्यादिविषय संपमव्यापारं च स्वाध्यायादियोगं प-याचनादिव्यागरं सदा-गर्व. कालमधिष्ठाता-तपःप्रमृतीनां कर्तेत्यर्थः, ह प तपोऽभिधानाचाहणेऽपि यायायोगस्य प्राधान्यख्यापनार्थ मेदेना भिधानमिति । स एवंभूतः शूर इय-विक्रान्तमट व सेनगा-चतुरहरूपया इन्द्रिय कायादिसेनया निरुद्धः मन् समाप्तायुधः-संपूर्णतपःप्रभृतिखनाघायुधः, अलं-अत्यर्थमात्मनो मपति, संरक्षणायै असं च परेपा निया(सकारणायेति ॥ ३९६ ॥ एतदेव स्पष्टयनाह-सज्झायचि, स्वाध्याय एव सध्यानं स्वाध्यागसयानं तत्र रतस्य-मामतस्प मातु:-स्वपरोमयप्राणशीलस्य अपापमावस्य-लन्यायपेक्षारहिततया शुद्धनित्तस्प तपमि-अनशनादौ यथाशक्त्या, रतस्य विशुध्यते अपैति, यदस्य माघोर्मलं-कर्ममलं पुराकृतं-जन्मान्तरोपानं, दृष्टान्तमाह-ममीरित-प्रेरित, रूप्प. मलमिर ज्योतिपा-अग्निनेति ॥ ३९७ ॥ ततश्च-से तारिसेति, म ताश अनन्तरादितगुणयुक्तः माधुईवसहः- परीपहजेता. जितेन्द्रियः पराजितश्रोत्रेन्द्रियादिः, श्रुतेन युक्तो-विद्यावामित्यर्थः, अममा-मत्र ममस्वरहिता, अकिश्चनो-द्रव्यमावकिननरहितः, विराजते-गोमते, कर्मधन-धानावरणीयादिकर्ममेपे अपगते सति, निदर्शनमाह- कृत्स्नाभ्रपुरापगमे इव चन्द्रमा इति यथा कुत्स्ने अम्रपुटे करणे वा अपगते सति चन्द्रमा विराजते शरदि, तद्वदसापपग- क तकर्मघनः समासादितकेवलालोको विराजते ॥ ३९८ ॥ बीमीति पूर्ववत् ॥ इत्याचारप्रणिध्याख्यमष्टममध्ययनं समाप्तम् ॥ व्याख्यातमाचारप्रणिध्यध्ययनम् ।। अधुना विनयसमाध्याख्यमारभ्यते--अस्य, चायमाभिसम्बन्धः-इहानन्तरा- ध्ययने निरवयं वचः आचारे प्रणिहितस्य भवतीति, तत्र यत्लवता भवितव्यमित्येतदुक्तं, इह त्वाचारप्रणिहितो यथोचित. विनयसंपन्न एव भवतीत्येतदुच्यते । उक्तं च-" आयारपणिहाणमि, से सम्मं वट्टई बुहे । णाणाईणं विणीए जे, मुक्खट्ठा निबिगिच्छए ॥ १॥" इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनमिति- "थंभा क कोहा व मयप्पमाया, गुरुस्सगांसे विणयं न सिक्खे (तिट्ठइ)। सो चेव उ तस्स' अभूइभावो, फलं व कीअस्स वहाय "होइ ॥ ३९९ ॥ थंभा वेत्यादि, स्तम्भाद्वा मानाद्वा- जात्यादिनिमित्तात् क्रोधाद्वा-अक्षान्तिलक्षणात् , मायाप्रमादादिति, मायातो-निकृतिरूपाया प्रमादाद-निद्रादेः सकाशात् किमित्याह-गुरोः सकाशे-आचार्यादेः समीपे विनयमासेवना- . शिक्षादिभेदमिन्नं न शिक्षते-नोपादत्ते, तत्र स्तम्भात्, कथमहं जात्यादिमान् जात्यादिहीनसकाशे शिक्षामीति, एवं क्रोधारक- चिद्वितथकरणचोदितो रोपाद्वेति, मायातः 'शूलं मे बाधत इत्यादिव्याजेना प्रमादात्। प्रक्रान्तोचितमनवबुद्ध्यमानो निद्रादि- ग्यासङ्गेना स्तम्भादिक्रमोपन्यासक्षेत्थमेवामीषां विनयविघ्नहेतुतामाश्रित्य प्राधान्यख्यापनार्थः। तदेवं स्तम्भादिश्यो गुरोः सकाशे उत्तम प्रधान प्राप्त इत्यया, तामेघ श्रद्धामप्रतिपवितया प्रवर्धमानामनुपालयेद्यन्नन, क्वेत्याह-गुणेषु-मूलगुणादिलक्षणे आचार्यसंमतेपु-तीर्थकरादिनहुमतेप, अन्ये तु श्रद्धाविशेषणमित्येतदयाचते. नामेर यामनुपालगुणेष, किंभूता- आचार्यसम्मतो, न तु स्वाग्रहकलङ्कितामिति ॥३९५॥ आचारप्रणिधिकलमाह-तरं चिमति, तपोवमनशनादिरूपं साधु लोकप्रतीवं संपमपोगं घ-पृथिव्यादिविषयं संयमव्यापार च स्वाध्यायादियोग प-याचनादिव्यापार सदा-मई. कालमधिष्ठाता-तपाप्रमृतीनां कर्तेत्यर्थः, ह च तपोऽभिधानाचाहणेऽपि स्वागायोगस्य प्राधान्यख्यापनार्थ मेदेना भिधानमिति । स एवंभूता गर इव-विप्रान्तमट व सेनया-चतुरहरूपया इन्द्रियरूपापादिसेनया निरुद्धः मन् समाप्तायुधः-संपूर्णतपाप्रभृतिखड्गाधायुधा, अलं-अत्यर्थमात्मनो मरति, संरक्षणायै अतं न परेषां निवा(राकोरणायेति ॥ ३९६ ॥ एतदेव स्पष्टपमाह-सज्झायत्ति, स्वाध्याय एव मन्यानं साध्यायसयानं तत्र रतस्य-आमतस्य प्रातुः-स्वपरोभयत्राणशीलस्य अपापभावस्प-लण्याद्यपेक्षारहिततया शुवितस्य तपसि-अनशनादी यथाशक्पा, रतस्य विशुद्धयते अपैति, यदस्य सापोर्मलं-कर्ममले पुराकृतं-जन्मान्तरोपा, दृष्टान्तमाह-ममीरित-प्रेरितं, रूप्य. मलमिव ज्योतिपा-अग्निनेति ॥ ३९७ ।। ततश्र-से तारिसत्ति, स ताश अमन्नरोदितगुणयुक्तः मापूर्वग्वसहा- परीपहजेता, जितेन्द्रियः-पराजितश्रोत्रेन्द्रियादिः, श्रुतेन युक्तो-विधागनित्यर्थः, अममः-मत्र ममत्वरहिता, अकिश्चनो-द्रव्यमावकिश्चनरहितः, विराजते शोभते, फम्र्मघने-मानावरणीगादिर्ममेघे अपगते मति, निदर्शनमाह- कृत्स्नाभ्रपुटापगमे स चन्द्रमा इति यथा करस्ने अमपुटे कृष्णे वा अपगवे सति चन्द्रमा विराजते सादि, नादसापपग- तकर्मघनः समासादितकेवलालोको विराजते.॥ ३९८ ॥ ब्रवीमीति पूर्ववत् ।। इत्याचारप्रपिाध्याख्यमष्टममध्ययनं समाप्तम् ॥ व्याख्यातमाचारप्रणिध्यध्ययनम् । अधुना विनयसमाध्याख्यमारभ्यते--अस्य वायमभिसम्बन्धः-इहानन्तरा- ध्ययने निरवयं वच-आचारे प्रणिहितस्य भवतीति, तत्र यलवता भवितव्यमित्येतदुक्तं, इह त्वाचारप्रणिहितो यथोचित. विनयसंपन्न एव ,भवतीत्येतदुच्यते ।, उक्तं च-" आयारपणिहाणमि, से सम्मं वट्टई बुहे । णाणाईणं विणीए जे, मुक्खट्ठा निबिगिच्छए ॥ १ ॥” इत्यनेन सम्बन्धेनायातमिदमध्ययनमिति- "थंभा क कोहा वःमयप्पमाया, गुरुस्सगांसे विणयं न सिक्खे (तिट्ठा )। सो चेव उ तस्स अभूइभावो, 'फलं व कीअस्स वहाय "होइ ॥ ३९९ ॥ थंभा वेत्यादि स्तम्भाद्वा मानाद्वा जात्यादिनिमित्तात् । क्रोधाद्वा-अक्षान्तिलक्षणात् , मायाप्रमादादिति, मायातो-निकृतिरूपाया प्रमादाव-निद्रादेः सकाशात् किमित्याह-गुरोः सकाशे-आचार्यादेः समीपे विनयमासेवना- । शिक्षादिभेदभिन्नं न शिक्षते-नोपादत्ते, तत्र स्तम्भात्ः कथमहं जात्यादिमान् जात्यादिहीनसकाशे शिक्षामीति, एवं क्रोधात्क- चिद्वितथकरणचोदितो रोपावति,मायातः: शूलं मे बाधतः' इत्यादिव्याजेन, प्रसादावाप्रक्रान्तोचितमनवबुद्ध्यमानो निद्रादि- व्यासङ्गेना स्तम्भादिक्रमोपन्यासश्चेत्यमेवामीषां विनयविघ्नहेतुतामाश्रित्य प्राधान्यख्यापनार्थः, तदेवं स्तम्भादिभ्यो गुरोः सकाशे N का the

विनय न शिक्षते, अन्ये तु पठन्ति-गुरो सकाशे विनये न तिति-विनयेन वर्चते, विनय नासेक्त इत्यर्थः । इह व
स एव तु स्तमादिविनशिक्षाविनतस्तस्य जडमते, अभूतिभाव इति-अभ्तेर्मावोऽभूतिमावा, असपद्भाव इत्या,
किमित्याह-यघाय भवति-गुणलक्षणमावाणविनाशाय मवति, दृष्टान्तमाइ-फलमिव कीचकस्य-कीचको वशस्तस्य
। यथा फल वधाय भवति, सति तस्मिस्तस्य विनाशाचदिति ।। ३९९ ॥
जे आवि मदित्ति गुरु विइत्ता, डहरे इमे अप्पसुअति नचा ।
हीलति मिच्छं पडिवजमाणा, करति आसायण ते गुरूण ॥ ४०० ॥
पयईइ मदावि हवति पगे, डहरावि अ जे सुअबुद्धोववेआ।
आयारमतो गुणसुविअप्पा, जे हीलिआ सिहिरिव भास कुजा ॥ ४०१ ॥
जे आवि नाग डहति नचा, आसायए से अहिआय होइ ।
एवायरिअपि हु हीलयतो, निअच्छई जाइपह खु मंदो ॥ ४०२ ॥
आसीविसो वावि पर सुरुट्ठो, किं जीवनासाउ पर नु कुजा ? ।
आयरिअपाया पुण अप्पसन्ना, अवोहिआसायण नत्थि मुक्खो ॥ ४०३ ॥

जो पावगं जलिअमवक्कमिजा, आसीविसं वावि हु कोवइज्जा । जो वा विसं खायइ जीविअट्ठी, एसोवमाऽऽसायणया गुरूणं ॥ ४०४ ॥ सिया हु से पावय नो डहिज्जा, आसीविसो वा कुविओ न भक्खे । सिया विसं हालहलं न मारे, न यावि मुक्खो गुरुहीलणाए ॥ ४०५ ॥ जो पव्वयं सिरसा भेत्तुमिच्छे, सुत्तं व सिंह पडिबोहइज्जा। जो वा दए सत्तिअग्गे पहारं, एसोवमाऽऽसायणया गुरूणं ॥ ४०६ ॥ सिया हु सीसेण गिरिपि भिंदे, सिया हु सीहो कुविओ न भक्खे । सिया न भिंदेज व सत्तिअग्गं, न यावि मुक्खो गुरुहीलणाए ॥ ४०७ ॥ आयरियपाया पुण अप्पसन्ना, अबोहिआसायण नत्थि मुक्खो । तम्हा अणावाहसुहाभिकंखी, गुरुप्पसायाभिमुहो रमिज्जा ॥ ४०८ ॥ किंच-जे यावित्ति, ये चापि केचन द्रव्यसाधवोऽगम्भीराः, किमित्याह-मन्द इति गुरुं विदित्वा-क्षयोपशम- वैचिया- तन्त्रयुत्पालोचनाऽममर्थः मत्प्रशानिकल इति स्वमाचार्य ज्ञावा। तथा कारणान्तरस्थापितमप्राप्तषयमं:उह रोऽयं-अप्राप्तवपाः खल्लयं, तथा अस्पयुत इत्यनघोतागम इति ,विज्ञाय, मिमित्याह-हीलयन्ति-सूयया असूयया वा खिमयन्ति, स्यया अतिप्रशः त्वं, वयोवृद्धो बहुचत इति, अश्यया तु मन्दप्रस्त्वमित्याद्यभिदधति, मिथ्यात्वं प्रति पद्यमाना इति, गुरुन हीलनीय इति तत्चमन्यथाऽवगच्छन्तः कुर्वन्त्याशातनां-लघुतापादनरूपां ते-द्रव्यसाधवः गुरुणां-आचार्याणां, तत्स्थापनाया अपहुमानेन) एकगुर्वाशातनायर्या मपामाशातनेति पहुवचनं, अक्षया कुर्वन्त्याशातना स्वमम्यग्दर्शनादिमावापहामरूपा ते गुरूणां सम्बन्धिनी, सनिमिचत्वादिति ॥ ४०॥ अतोनन कार्या हीलनेत्याह- पगईएत्ति, प्रकृत्या-समावेन कर्मवेनियाद मन्दा अपि-सदुद्धिरहिता अपि भवन्त्येके केवन वयोवृद्धा अपि, तथा बहरा अपि च-अपरिणता अपि च वरमा अन्ये अमन्दा भवन्तीति वाक्यशेषः, किंविशिष्टा इत्याह-ये श्रुतवुयुप. पेतास्तदा सरप्रशावन्तः, श्रुतेन पुद्धिमावेन वा माविनी इचिमाथित्य अल्पश्रुता इति; सर्वथा आचारवन्त:-ज्ञानाधा- पारसमन्विता! गुणसुस्थितात्मानः-गुणेषु-संग्रहोपग्रहादिपु मुष्ठु-मावसारं स्थिता आरमार येषां ते तथाविधाः, न हीलनीयाः, ये हीलिताः-खिमिठाः शिवीव-अग्निरिवेन्धनसख्यातं भस्मसात्कुयुः वानादिगुण सङ्घातमपनयेयुरिति ॥४१॥ विशेपेण डहरहीलनादोपमाह-जे यावित्ति, यश्चापि कविदज्ञो नाग-सर्प, डहर इति-पाल इति, ज्ञात्या- विशाय आशातयत्ति-कलिनादिना फदर्थयति स-कदर्यमानो नागः से-तस्य कर्थकस्य-अहिताप भवति, मक्षणेन प्राणनामनाउ, एप' सान्तोऽयमर्थोपनया-एवमाचार्यमपि धारणतोऽपरिणतमेव स्थापित हीलयन् निर्गच्छति जातिपन्थानं-द्वीन्द्रियादिजातिमार्ग मन्दा-अज्ञा, संसारे परिभ्रमतीति ।। ४०२ ।। अनवा दृष्टान्तदान्तिकयोर्मह- दन्तरमित्येतदाह-आसीत्ति, आशीविपश्चापि-सप्पोऽपिःपरं.सुरुष्टः,सन्- सुक्रुद्धः सन् किं जीवितनाशात्-मृत्योः परं नु कुर्यात् ? न किञ्चिदंपीत्यर्थः, आचार्यपादाः पुनरप्रसन्ना हीलनया अनुग्रहेऽप्रवृत्ताः, किं कुर्वन्तीत्याह-अबोधि- निमित्तहेतुत्वेन मिथ्यात्वसंहति, तदाशातनया मिथ्यात्वबन्धात् , यतश्चैवमतश्चाशातनया गुरोर्नास्ति मोक्षः, अवोधि- सन्तानसम्बन्धेनानन्तसंसोरिकत्वादिति ॥ ४०३॥ किंच-जो पावगत्ति, यः पावकं-अग्निं ज्वलितं सन्तं अपकामेत्- अवष्टभ्य तिष्ठति, आशीविपं वापि हि-भुजङ्गमं वापि हि कोपयेत्-रोपं ग्राहयेत् , यो वा विपं खादति जीवि- तार्थी-जीवितुकामः एपोपमा अपायप्राप्ति प्रति । एतदुपमान, आशातनया. कृतया गुरूणां सम्बन्धिन्या, तद्वदपायो भवतीति ।। ४०४ ॥ अत्र विशेषमाह-सिया हुत्ति, स्यात्-कदाचिन्मन्त्रादिप्रतिबन्धाद् असौ पावका-अग्निः न दहेत्-न भस्मसात्कुर्याद , आशीविपो वा भुजङ्गो-वा कुपितो वा न भक्षयेत्-न खादयेत् , तथा स्यात्-कदाचि. न्मन्त्रादिप्रतिबन्धादेव विष हालाहलं-अतिरौद्रं न मारयेत्-न प्राणांस्त्याजयेत् , एवमेतत् कदाचिद्भवति, न चापि मोक्षो: गुरुहीलनया-गुरोरागातनया कृतया भवतीति ॥ ४०५ ॥ जो पश्वयंति, यः पर्वतं शिरसा-उत्तमाङ्गेन भेत्तुमिच्छेत् , ‘सुप्तं वा सिंहं गिरिगुहायां वाः प्रतिबोधयेत्, यो वा : ददाति शक्त्यग्रे प्रहरणविशेषाग्रे महारं हस्तेन, एपोपमाऽऽशातनया गुरूणामिति पूर्ववदिति ॥.४०६ ।। अत्र विशेपमाह-सिया हुत्ति, स्यात्-कदाचित्कश्चिद्वासु. देवादिः प्रमावातिशयात्-शिरसा उत्तमाङ्गेन गिरिमपि-पर्वतमपि भिन्द्यात्, स्यान्मन्त्रादिसामर्थ्यासिहा कुपितो

नमधयेत्, रुपादेयतानुग्रहादैन मिन्याता शम्यग्रे प्रहारे दत्तेऽपि, एवमेतत्कदाचिद्रपति, न पाणि मोक्षो गुरु-
हीलनया-गुरोराशातनपा भातीनि ॥ ४०७ ॥ एवं पावकाघाशावना अत्या गुर्वाशातना महतीत्यतिशयप्रदर्शनार्थमाह-
आयरिअषि-आचार्यपादाः पुनरप्रसप्पा इत्यादि पूद्धि पूपिन् । यस्मादेयं तस्मानापासुपाभिकारक्षी-
मोधगुखामिलापी माधुर्मुरुप्रसायाभिमुप्पा-प्राचार्यादिनमादे उद्युक्तः सन् रमेत-वर्गतेति ॥ ४०८ ॥
जहाऽऽहि अग्गी जलणं नमसे, नाणाहुईमंतपयाभिसित्तं ।
एवायरियं उपचिट्ठइजा, अणंतनाणोगओ वि संतो॥ ४०९ ॥
जस्संतिए धम्मपयाई सिक्खे, तस्संतिए वेणइ पउर्छ ।
सकारए सिरसा पसलीओ, कायग्गिरा भो मणसा अनिच्च ॥ ११०॥
लजा दया संजम घंभचेरं, कल्याणभागिस्स विसोहिठाणं ।
जे मे गुरु सययमणुसासयंति, तेऽहं गुरू सययं पूजयामि ॥ ४११ ।।
जहा निसंते तवणचिमाली, पभासई केवल भारहं तु ।
एवायरिओ सुयसीलवुद्धिए, चिरायई सुरमञ्झे व इंदो ॥ ४१२॥

जहा ससी कोमुइजोगजुत्तो, नक्खत्ततारागणपरिवुडप्पा । खे सोहई विमले अब्भमुक्के, एवं गणी सोहइ भिक्खुमज्झे ॥ ४१३ ॥ महागरा आयरिया महेसी, समाहिजोगेसुयसीलबुद्धिए। संपाविउकामे अणुत्तराई, आराहए तोसइ धम्मकामी ॥ ४१४ ॥ सुच्चाण मेहावी सुभासियाइं, सुस्सूसए आयरियऽप्पमत्तो । आराहइत्ताण गुणे अणेगे, से पावई सिद्धिमणुत्तरं ॥ ४१५॥ ति वेमि ॥ इइ विणयसमाहीए पढमो उद्देसो समत्तो ९-१॥ केन प्रकारेणेत्याह-जहाऽऽहिअग्गित्ति-यथाऽऽहिताग्निः-कृतावसथादिमिणो ज्वलनं-अग्नि नमस्थति, किंविशिष्टमित्याह-नानाहुतिमन्त्रपदाभिषिक्तमाहुतयो-घृतप्रक्षेपादिलक्षणा मन्त्रपदानि-अग्नये स्वाहा इत्येवमादीनि तैरभिषिक्तं-दीक्षासंस्कृतमित्यर्थः, एवं-अग्निमिवाचार्यमुपतिठेत्-विनयेन सेवेत,किंविशिष्ट इत्याह-अनन्तज्ञानोपगतो. ऽपीति-अनन्तं स्वपरपर्यायापेक्षया वस्तु ज्ञायते येन तदनन्तज्ञानं तदुपगतोऽपि सन् , किमङ्ग पुनरन्य इति ।। ४०९ ॥ एतदेव स्पष्टयति-जस्सत्ति, यस्यान्तिके-यस्य समीपे धर्मपदानि-धर्मफलानि सिद्धान्तपदानि शिक्षेत-आदद्यात् तस्यान्तिके- तत्समीपे, रिमित्याह-वैनायिकं प्रयुञ्जीत-विनय एव वैनयिकं तत्कृर्यादितिमावा, कथमित्याह-सत्कारयेदभ्युत्थानादिना पूर्वोक्तेन युक्ता शिरसा-उत्तमाङ्गेन प्रालिा-प्रोद्गताञ्जलिः मन् कायेन-देहेन गिरा-वाचा मस्तकेन वन्दे इत्यादिरूपया मो इति शिष्यामन्त्रण मनमा च-भावप्रतिवन्धरूपेण नित्यं सदैव मत्सारयेत्, न तु सूत्रग्रहणकाल एक, कुशलानुबन्ध- व्याच्छेदप्रसङ्गादिति ॥ ४१० ॥ एव प:मनसि कुर्यादित्याह-लवा दयेत्ति, लज्जा-अपवादमपरूपा दया-अनुकम्पा सयमः-पृथिव्यादिजीवविषयः, ब्रह्मचर्य-विशुद्धतपोऽनुष्ठान, एतस्छादि विपक्षव्याच्या कुशलपक्षप्रवर्तकत्वेन कल्याण भागिनो-मोक्षमागिनो जीवस्य विशोधिस्थानं-कर्ममलापनयनस्यानं वर्तते, अनेन ये मां गुरव-आचार्याः सततं- अनवरत अनुशासयन्ति-कल्याणयोग्यतां नपन्ति, तानहमेवभूतान गुरुन् सततं पूजयामि, न,तेभ्योऽन्यः पूजाई इति ।। ४१९ ॥ इतथैते पूज्या इत्पाह-जहत्ति, यथा निशान्ते-राव्यवसाने दिवस इत्यर्थः, तपन्नचिौली-सूर्यः प्रभास यति-उद्योतयति फेवलं-मम्पूर्ण भारत-भरतक्षेनं तुशब्दादन्यच क्रमेण, एवमसिलीवाचार्यः श्रुतेन-आगमेन, शीलेन-परद्रोहविरतिरूपेण युद्ध्या च-स्वाभाविक्पा युक्तः सन् प्रकाशपति जीवादिमावानिति। पवं च वर्तमानः सुसाधु- भिः परिवृत्तो विराजते सुरमध्य इय-सामानिकादिमध्यगत इव इन्द्र इति ॥ ४१२ ॥ जहति, यथा शशी-चन्द्रः, फौमुदीयोगयुक्त:-कार्तिकपौर्णिमास्यामुदित इत्यर्थः, स एव विशेष्यते-नक्षत्रतारागणपरिवृतात्मा-नक्षत्रादिभिर्युक्त इति मावा, खे-आकाशे शोभते, किंविशिष्टे खे ।, विमले अभ्रमुक्ते-अभ्रमुक्तमेवात्यन्त विमल भवतीति ख्यापनार्थमेतत् , एवं चन्द्र इव गणी-माचार्या, शोभते मिश्रुमध्ये-साधुमध्ये, अतोऽयं महत्त्वात्स्म्य इति ॥ ४१३ ॥ किंच-महागरा । आयरिएत्ति, महाकरा ज्ञानादिमावरत्नापेक्षया आचार्या:महैषिणो-मोक्षैषिणः, कथं महैपिण इत्याह-समाधियोग- श्रुतशीलवुद्विभिः समाधियोगैः-ध्यानविशेषैः श्रुतेन-द्वादशाङ्गाभ्यासेन शीलेन-परद्रोहविरतिरूपेण बुद्ध्या च औत्पत्तिक्यादिरूपया, अन्ये तु व्याचक्षते-समाधियोगश्रुतशीलवुद्धीनां महाकरा इति। तानेवभूतानाचार्यान् संप्राप्तुकामो- अनुत्तराणि ज्ञानादीन्याराधयेद्विनयकरणेन, न सकदेव, अपि तु तोपयेत्-असकृत्करणेन तोपं ग्राहयेत् धर्मकामो- निर्जरार्थी, न तु ज्ञानादिफलापेक्षयेति ॥ ४१४॥ सोचाणंति, श्रुत्वा मेधावी सुभाषितानि-गुर्वाराधनफलाभिधायीनि, 'किमित्याह-सुश्रूषयेत्सदाऽऽचार्यानप्रमत्तो-निद्रादिविरहितस्तदाज्ञां कुर्वीतेत्यर्थः, य एवं गुरुसुश्रूषापरः स आराध्य गुणाननेकान् ज्ञानादीन् प्रामोति सिद्धिमनुत्तरां,मुक्तिमित्यर्थः, अनन्तरं सुकुलादिपरम्परया वा॥४१५।। ब्रवीमीति पूर्ववत्॥ इति विनयसमाधावुक्तः प्रथम उद्देशकः ९-१॥ विनाधिकारवानेव द्वितीय उच्यते, तंत्रेदमांदिसूत्रं- मूलाउ खंधप्पभवो दुमस्स, खंधाउ पच्छा समुर्विति साहा । साहप्पसाहा विरुहति पत्ता, तओ सि पुप्फ च फलं रसो य.॥ ४१६ ॥ एवं धम्मस्स-विणओ, मूलं परमो से सुक्खो। जेण.कित्तिं सुयं सिग्घ, नीसेसं वाभिगच्छइ॥४१७॥ मूलाउ इति, मूलादादिप्रबन्धात् स्कन्धप्रभवः-स्थुडोत्पादा, कस्येत्याह-द्रुमस्य-वृक्षस्य, ततः-स्कन्धात्सका. and mmmm तत्समीपे, झिमित्याह-पैनयिक प्रयुभीत-रिनय एव पैनयिकं तस्कृर्यादितिमावः, कथमित्याह-सत्कारयेदम्पत्थानादिना पूर्वोक्तेन युक्ता शिरमा-उत्चमाङ्गेन मालिा-प्रोद्गताअलिः मन् कायेन-देहेन गिरा-वाचा मस्तकेन वन्दे इत्यादिरूपया मोति शिष्यामन्त्रणं मनमा च-मावप्रतिबन्धरूपेण नित्यं सदैव मत्कारयेत्, न तु सूत्रग्रहणकाल एम, कुशलानुबन्ध व्यवच्छेदप्रसङ्गादिति ॥ ४१० ॥ एवं च मनमि कुर्यादित्याह-लन्ना दयेत्ति, लना-अपवादमपरूपा दया-अनुकम्पा संयमः पृषिष्यादिजीवविषयः, प्रामचर्य-विशुद्धतपोऽनुष्ठान, एतलमादि विपक्षव्याश्या कुशलपक्षप्रवर्तकत्वेन कल्याण. भागिनो-मोक्षमागिनो जीपस्प विशोधिस्थानं-कर्ममलापनयनस्यानं वर्तते, अनेन ये मां गुरव-आचार्याः सततं- अनमरत अनुशासयन्ति-कल्याणयोग्यता नयन्ति, तानहमेभ्तान गुरुन् सततं पूजयामि, न तेभ्योऽन्यः पूजाई इति ॥ १९ ॥ इतौते पूज्या इत्याइ-जहनि, यथा निशान्ते-राज्यवमाने दिवस इत्यर्थः, तपनचिौली-सूर्यः प्रभास. पति-उद्योतयति फेवल-सम्पूर्ण भारतं-भरतक्षेत्रं तुशब्दादन्यच क्रमेण, एवमनिर्मालीवाचार्यः श्रुतेन-आगमेन, शीलेन-परद्रोहविरतिरूपेण युद्धया घ-स्वाभाविक्या युक्तः सन् प्रकाशयति जीवादिमावानिति । पवं च वर्तमाना सुमाधु. मिः परिश्तो विराजते सुरमध्य इय-सामानिकादिमध्यगत इस इन्द्र इति ॥ ११२ ।। जहचि, यथा शशी-चन्द्रा, फौमुदीयोगयुक्ता-कार्चिकपौर्णिमास्यामुदित इत्यर्थः, म एव विशेष्यते-नक्षत्रतारागणपरिश्तात्मा-नक्षत्रादिभिर्युक्त इति मावा, खे-आकाशे शोभते, किंविशिष्टे खे, विमले अभ्रमुक्ते-अप्रमुक्तमेवात्यन्त विमलं भवतीति ख्यापनार्थमेतत् , एवं चन्द्र इस गणी-आपापी, शोभते भिक्षुमध्ये-साघुमध्ये अतोऽया महत्वात्पूग्य इति ॥ ४१३ ॥ किंच-महागरा आयरिएत्ति, महाकरा ज्ञानादिभावरत्नापेक्षया आचार्या महैषिणो-मोक्षैषिणः, कथं महैषिण इत्याह-समाधियोग- श्रुतशीलवुद्धिभिः ‘समाधियोरौः-ध्यानविशेषैः श्रुतेन-द्वादशाङ्गाभ्यासेन शीलेन-परद्रोहविरतिरूपेण बुझ्या :च औत्पत्तिक्यादिरूपया, अन्ये तु व्याचक्षते-समाधियोगश्रुतशीलवुद्धीनां महाकरा इति। तानेवभूतानाचार्यान् संप्राप्तुकामो- ऽनुत्तराणि ज्ञानादीन्याराधयेद्विनयकरणेन, न सकदेव, अपि तु तोपयेत्-असकृत्करणेन तोपं ग्राहयेत् धर्मकामो- निर्जरार्थी, न तु ज्ञानादिफलापेक्षयेति ॥ ४१४॥ सोचाणंति, श्रुत्वा मेधावी सुभाषितानि-गुर्वाराधनफलामिधायीनि, 'किमित्याह-सुश्रूषयेत्सदाऽऽचार्यानप्रमत्तो-निद्रादिविरहितस्तदाज्ञां कुर्वीतेत्यर्थः, य एवं गुरुसुश्रूपापरः स आराध्य गुणाननेकान् ज्ञानादीन् प्रामोतिसिद्धिमनुत्तरां, मुक्तिमित्यर्थः, अनन्तरं सुकुलादिपरम्परया वा॥४१५॥ ब्रवीमीति पूर्ववत्॥ इति विनयसमाधावुक्तः प्रथम उद्देशकः ९-१॥ विनयांधिकारवानेव द्वितीय उच्यते, तंत्रेदमांदिसनं- मूलाउ खंधप्पभवो दुमस्त, खंधाउ पच्छा समुविति साहा । साहप्पसाहा विरुहति पत्ता, तओ सि पुप्फ च फलं रसो य॥ ४१६ ॥ एवं धम्मस्स विणओ, मूलं परमो से मुक्खो:। जेण कित्तिं सुयं सिग्घ, नीसेसंचाभिगच्छइ॥४१७॥ मूलाउःइति, मूलादादिप्रवन्धात् स्कन्धप्रभवः-स्थुडोत्पादा, कस्येत्याह-द्रुमस्य-वृक्षस्य, तत:-स्कन्धात्सका. AAR वममीपे किमित्याह-पैनयिकं प्रयुञ्जीत-रिनय एव वैनयिक तरकृयर्यादितिभाषा, कथमित्याह-सत्कारयेदम्पत्यानादिना पूर्वोक्तेन युक्ता शिरसा-उत्तमाङ्गेन माझलिा-प्रोद्गताअलि मन् कायेन-देहेन गिरा-वाचा मस्तकेन वन्दे इत्यादिरूपया मोइति शिष्यामन्त्रणं मनमा च-भावप्रतिरन्धरूपेण नित्यं-सदैव मत्कारयेत्, न तु स्त्रग्रहणकाल एच, कुशलानुबन्ध. ज्याच्छेदप्रसङ्गादिति ॥ ४१० ॥ एवं चमनसि कुर्यादित्याह-लना दयेत्ति, लजा-अपवादमयरूपा दिया-अनुकम्पा संगमा-पृथिव्यादिजीवविषयः, प्रामचर्य-विशुद्धतपोऽनुष्ठान, एतलआदि विपक्षव्याच्या कुशलपक्षप्रवर्तकत्वेन कल्याण भागिनो-मोषमागिनो जीवस्य विशोधिस्थानं कर्ममलापनगमस्थानं वर्तते, अनेन, ये मां गुरव-आचार्याः सततं- अनवरतं अनुशासयन्ति-कल्याणयोग्यतां नयन्ति, तानहमे भूतान गुरून सततं पूजयामि, न,तेभ्योऽन्यः पूजाई इति 1॥ ४१९ ॥ इवौवे पूज्या इत्याह-जहति, पथा निशान्ते-राज्यवमाने दिवम इत्या, तपन्नचिौली-सूर्यः प्रभास. यति-उद्योतयति फेवलं-सम्पूर्ण भारत-भरतक्षेत्रं तुशब्दादन्यच क्रमेण, एक्मनिर्मालीवाचार्यः श्रुतेन-आगमेन, शीलेन-परद्रोहविरतिरूपेण युद्ध्या च-स्वाभाविक्पा,युक्तः सन्.प्रकाशपति जीवादिमावानिति। एवं च वर्तमाना सुसाधु- मिः परिवतो विराजते सुरमध्य इव-सामानिकादिमध्यगत इव इन्द्र इति ॥ १२ ॥ जहचि, यथा शशी चन्द्रा, कौमुदीयोगयुक्त:-कार्तिकपौर्णिमास्यामुदित इस्यर्थः, स एव विशेष्यते-नक्षत्रतारागणपरिवृतात्मा-नक्षत्रादिभिर्युक्त इति माया, खे-पाकाशे शोभते, किंपिशिष्टे से, विमले अनमुक्ते-अभ्रमुक्तमेवात्यन्त विमलं भातीति ख्यापनार्थमेतत् , एवं पन्द्र इव गणी-भाचार्य शोभते भिक्षुमध्ये साधुमध्ये अतोऽयं महयात्पूज्य इति ॥ १३ ॥ किंच-महागरा भणनादिलक्षणेनापि अपिशब्दस्य व्यवहितः सम्बन्धा, चोदित उक्तः, कुप्यति-रुष्यति नरः । अत्र निदर्शनमाह-दिव्यां- अमानुपी, असौ-नरः श्रियं-लक्ष्मी आगच्छन्ती-आत्मनो भवन्तीं दण्डेन-काष्ठमयेन प्रतिषेधयति-निवारयति । एतदुक्तं भवति-विनयः संपदो निमित्तं, तत्र स्खलितं यदि कश्चिचोदयति स गुणः तत्रापि रोपकरणेन वस्तुतः संपदो निषेधः । उदाहरणं चात्र दशारादयः कुरूपागतश्रीप्रार्थनाप्रणयभङ्गकारिणस्तद्रहितास्तदभङ्गकारी च तद्युक्तः कृष्ण इति ॥ ४१९ ॥ तहेव अविणीयप्पा, उववज्झा हया गया । दीसंति दुहमेहंता, आभिओगमुवट्ठिया ॥ ४२० ॥ तहेव सुविणीयप्पा, उववज्झा हया गया । दीसंति सुहमेहंता, इडिं पत्ता महायसा ॥ ४२१ ॥ अविनयदोपोपदर्शनार्थमेवाह-तहेवत्ति, तथैवेति-तथैवैते अविनीतात्मानो-विनयरहिता अनात्मज्ञाः, उपवा- थानां-राजादिवल्लभानामेते कर्मकरा इत्वौपवाह्याः, हयाः-अश्वाः, गजा:-हस्तिनः, उपलक्षणमेतन्महिपकादीनामिति । एते किमित्याह-दृश्यन्ते-उपलभ्यन्ते, एव मन्दुरादौ अविनयदोषेणोभयलोकवर्त्तिना यवसादिवोढारः, दुःख-संक्लेशलक्षणं एधमाना-अनेकार्थत्वादनुभवन्त आभियोग्यं-कर्मकरभावं उपस्थिताः-प्राप्ता इति ॥ ४२०॥ एतेष्वेव विनयगुणमाह- तहेवत्ति, तथैव एते सुविनीतात्मानो-विनयवन्त आत्मज्ञा औपवाह्या-राजादीनां हया गजा इति पूर्ववत् । एते किमित्याह-दृश्यन्ते-उपलभ्यन्ते, एव सुखं-आह्लादलक्षणं, एधमाना-अनुभवन्तः शुद्धि प्राप्ता इति विशिष्टभूपणालय- भोजनादिभावतः प्राप्तड़यो महायशसो-विख्यातसद्गुणा इति ।। ४२१ ॥

या पक्षात्-तदनु समुपयान्ति-आत्मानं प्राप्नुवन्त्युत्पदन्त इत्यर्थः, कास्ता इत्याह-शाग्खास्तगुजाकल्पा, तथा शाग्नाम्या-उक्तलक्षणाम्पः प्रशारगस्तदंशभूता विरोहन्ति-जायन्ते, तथा ताभ्योऽपि पत्राणि-पर्णानि विरोहन्ति । ततस्तदनन्तरं से-तस्य द्रुमस्य पुष्पं फलं प रसव फलगत एवैते क्रमेण मवन्तीति ॥ ४१६ ॥ एवं दृष्टान्तमभिधाय धान्तिमयोजनामाह-एयंति, एवं-दुममूलवत् , धर्मस्य-परमकल्पवृक्षस्य विनयो मूलं-आदिप्रबन्धरूपं परम इत्यूपो रमा से-तस्य फलरमवन्मोक्षा, सन्यादिकल्पानि तु देवलोकगमनसुकूलागमनादीनि, अतो विनया कर्तव्या, किं- विशिष्ट इत्याइ-पेन-विनयेन फीति-सर्वत्र शुमप्रवादरूपां, तथा श्रुतं-अङ्गप्रविष्टादि लाध्य-प्रशंसास्पदीभूतं निःशेपं- संपूर्ण पाधिगच्छति-ग्रामोतीति ।। ४१७ ॥ जे य चण्डे मिए थद्धे, दुनाई नियडी सढे । वुज्झइ से अविणीअप्पा, कटुं सोयगयं जहा ॥४१८॥ विणयंपि जो उवाएणं, चोइओ कुप्पई नरो । दिवं सो सिरिमिजति, दंडेण पडिसेहए ॥ १९ ॥ अग्निपरतो दोपमाह-जे यति, यश चण्डो-रोपणः मृगा-अनो हितमप्युक्तो रुष्यति, वथा स्तन्यो-जात्यादि- मदोन्मयो पुर्वापी-अप्रियवका निकृतिमान-मायोपेतः, शठा-सयमयोगे-बानाहतः, एतेम्पो दोपेभ्यो विनयं न करोतिय उत्पते असो पापः समारस्रोतमा अग्निीतात्मा-मकलकल्याणैकनिमन्धनविनयरहितः, किमिवेत्याह-काठं स्रोतो. गतं-नपादिवानीपवितं यथा तदिति ॥ ४१८॥ किं च विणयंपीति, विनयमुक्तलक्षण प उपायेनापि-एकान्तमृदु- - & तहेव सुविणीयप्पा, देवा जक्खा य गुज्झगा। दीसंति सुहमहंता, इडिं पत्ता महायसा ॥ ४२६ ॥ एतदेव विनयाविनयफलं देवानधिकृत्याह-तहेवत्ति, तथैव यथा नरनार्यः अविनीतात्मानो भवान्तरेऽकृतविनया देवा-पैमानिका ज्योतिष्का यक्षाश्व-व्यन्तराश्च गुह्यका-भवनवासिनः, त एते दृश्यन्ते आगमभावचक्षुषा दुःखमेध- माना:-पराज्ञाकरणपर िदर्शनादिना, आभियोग्यमुपस्थिताः-अभियोग-आज्ञाप्रदानलक्षणोऽस्यास्तीति अभियोगी तद्भाव आभियोग्यं, कर्मकरभावमित्यर्थः, उपस्थिताः-प्राप्ता इति ॥ ४२५ ॥ विनयफलमाह-तहेवत्ति, तथैवेति पूर्ववत् , सुविनी- तात्मानो-जन्मान्तरकृतविनया निरतिचारधर्माराधका इत्यर्थः, देवा यक्षाश्च गुह्यका इति पूर्ववदेव, दृश्यन्ते सुखमेध- माना अर्हत्कल्याणकादिषु ऋद्धिं प्राप्ता इति देवाधिपादिप्राप्तर्द्धयो महायशसो-विख्यातसद्गुणा इति ॥ ४२६ ॥ जे आयरियउवज्झायाणं, सुस्सूसावयणंकरा। तेर्सि सिक्खा पवढंति, जलसित्ताइव पायवा ॥४२७॥ अप्पणट्ठा परट्ठा वा, सिप्पा नेउणियाणि य । गिहिणो उवभोगट्ठा, इहलोगस्स कारणा ॥४२८॥ जेण बन्धं वहं घोरं, परियावं च दारुणं । सिक्खमाणा नियच्छंति, जुत्ता ते ललिइंदिया ॥४२९॥ तेवि तं गुरुं पूयंति, तस्स सिप्पस्स कारणा । सक्कारेंति नमसंति, तुट्टा निद्देसवत्तिणो ॥ ४३०॥ किं पुणो जे सुयग्गाही, अणंतहियकामए । आयरिया जं वए भिक्खू, तम्हा तं नाइवत्तए ॥ ४३१ ।।

तहेव अविणीयप्पा, लोगंमि नरनारिओ । दीसंति दुहमेहंता, छाया विगलितेंदिया ॥ ४२२ ॥
दंडसत्यापरिज्जपणा, असम्भवपणेहि य । कालुणाविवन्नच्छंदा, खुप्पिवासाइपरिगया ॥ १२३ ॥
सहेर मुरिणीयप्पा, लोगसि नरनारिओ ! दीसंति सुइमेहंता, इहिं पत्ता महायसा ॥ ४२४ ॥
एतदेव पिनपापिनयफलं मनु पानधिकृत्पाह-तहेयत्ति, सधैय लिञ्च इव अविनीतात्मान इति पूर्ववत् ।
लोऽस्मिन्-मनुप्पलोके, नरनार्प इति प्रमटा दृश्यन्ते दुम्म्यमेधमाना इति पूर्ववत् , छारा(ना.)-कसघातप्रणाचित.
परीराः, विगन्दितन्द्रिगा:-अपनीतनामिकादीन्द्रिपाः पारदारिमादय इति ॥ ४२२॥ तपादंदनि, दपदा-पदण्डादयः
शाम्राणि-पदादीनि ताम्या परिजी-ममन्तवो दुलभावमापादिताः, तथा असभ्यरचनेश्व-खरकशादिभिः
परितीर्णाः, न एवंभूताः मन्तः मता करणाहेतरगत करणा-दीना व्यापनाच्छन्दसा-परायत्तया अपेतमामिनायाः,
पा-सपा पिपासपा-पा परिगता-याला अशादिनिरोपतोकदानाम्यामिति । एवं इह लोके प्रागपिनयोपाच-
सानुमावत एवंभूताः परलोके तु कुरालाप्रवृत्तः दुःखित। विशपन्त इति । १२३ ॥ निपफलमाह-तहेपति,
नव निीतिपंच सुयिनीतात्मानो सोफेस्मितरनार्य इवि पूरिन् । दृश्यन्ते मुवमेघमानाः शुदि मासा
महापशम इति परिन्, नवरं वाराधिनुपपुरुचना उभयलोकमाइल्पकारिण एव इति ॥ १२४ ॥
तहेब अविणीयप्पा, देवा जक्खा य गुज्झगा । दीसति दुमेहता, आमिझोगमुवटिया ॥ ४२५ ॥

ह तथाऽनेकप्रकारं भिक्षुः-साधुः तस्मात्तदाचार्यवचनं नातिवर्तयत् युक्तत्वात्सर्वमेव सम्पादयेदिति ॥ ४३१ ॥ नीयं सेजं गई ठाणं, नीयं च आसणाणि य । नीयं च पाए वंदेज्जा, नीयं कुज्जा य अंजलिं ॥४३२॥ संघट्टइत्ता काएणं, तहा उवहिणामवि । खमेह अवराह मे, वएज न पुणोत्ति य ॥ ४३३ ॥ दुग्गओ वा पओएणं, चोइओ वहई रहं । एवं दुबुद्धि किच्चाणं, वुत्तो वुत्तो पकुबई ॥ ४३४ ।। कालं छंदोवयारं च, पडिलेहित्ता ण हेउहि । तेण तेण उवाएणं, तं तं संपडिवायए ॥ ४३५ ॥ विनयोपायमाह-नीयंति, नीचां शय्यां-संस्तारकलक्षणामाचार्यशय्यायाः सकाशाद कुर्यादितियोगः, एवं नीचां गतिमाचार्यगतेस्तत्पृष्ठतो नातिरेण नातिद्रुतं यायादित्यर्थः, एवं नीचं स्थानमाचार्यस्थानाधत्राचार्य आस्ते, तस्मानीचतरे स्थाने स्थातव्यमितिभावः। तथा नीचानि-लघुतराणि कदाचित्कारणजाते आसनानि-पीठकानि तस्मिन्नुपविष्टे तदनुज्ञातः सेवेत, नान्यथा, तथा नीचं च-सम्यगवनतोत्तमाङ्गः सन् पादावाचार्यसत्को वन्देत, नावज्ञया तथा कचित्प्रश्नादौ नीचं- नमकायं कुर्याच सम्पादयेचाञ्जलिं, न तु स्थाणुवत्स्तब्ध एवेति ॥ ४३२ ॥ एवं कायविनयमभिधाय वाग्विनयमाह-संघ- इत्ति, संघट्टथ-स्पृष्ट्वा कायेन-देहेन कथश्चित्तथाविधप्रदेशोपविष्टमाचार्य तथोपधिनापि-कल्पादिना कथञ्चित्संघढ्य मिथ्यादुष्कृतपुरस्सरमभिवन्द्य क्षमस्व-सहस्वापराधं-दोषं मे मन्दभाग्यस्यैवं वदेत्-ब्यान्न पुनरिति न चाहमेनं भूयः करिष्यामीति ।। ४३३ ॥ एतच सर्व बुद्धिमान् स्वयमेव करोति, तदन्यस्तु कथमित्याह-दुग्गओविनि, दुगौरिव- M - एवं नारकापोहेन व्यवहारतो येपु सुखदुःखसंभवस्तेषु विनयाविनयफलमुक्तं, अधुना विशेषतो लोकोचरविनयफलमाह- जे आयरियत्ति, ये आचार्योपाध्याययोः-प्रतीतयोः शुश्रूपावचनफरा:-पूजाप्रधानवचनकरणशीलास्तेषां पुण्यमाजां शिक्षा-ग्रहणासेवनालक्षणा भावार्थरूपाः प्रवर्द्धन्ते-वृद्धिमुपयान्ति, दृष्टान्तमाह-जलसिक्ता इव पादपा-पृक्षा इति ॥ ४२७ ॥ एतच मनस्याधाय विनयः कार्य इत्याह-अप्पणत्ति, आत्मार्थ-आत्मनिमित्त, अनेन मे जीविका भविष्य- तीत्येवं, परार्थ वा-परनिमित्तं वा पुत्रमहमेतद्ग्राहयिष्यामीत्येवं, शिल्पानि-कुम्भकारक्रियादीनि नैपुण्यानि च- आलेल्पादिकलालक्षणानि गृहिण:-असंयताः, उपभोगाय-अन्नपानादिभोगाय, शिक्षन्त इति वाक्यशेषः, इह- लोकस्य कारणं-इहलोकनिमिचमिति ॥ ४२८॥ जे णं ति, येन-शिल्पादिना शिक्ष्यमाणेन यन्धं-निगडादिभिः वधं- कपादिमिोरं-रौद्रं परितापं च, दारुणं-एतजनितमनिष्टं निर्भर्त्सनादिवचनजनितं च शिक्षमाणा गुरोः सकाशात नियच्छन्ति-प्राप्नुवन्ति, युक्ता इति-नियुक्ताः शिल्पादिग्रहणे ते ललितेन्द्रिया-गर्भधरा राजपुत्रादय इति ॥ ४२९ ।। तेऽवि तमिति, तेऽपि इत्वर शिल्यादि शिक्षमाणास्तं गुरुं रन्धादिकारकमपि पूजयन्ति सामान्यतो मधुरवचनाभिनन्दनेन तस्य शिल्पस्येत्वरस्य कारणात्, तनिमित्चत्वादिति भावः, तथा सत्कारयन्ति वस्त्रादिना, नमस्यन्ति अअलि- ग्रहणादिना । तुष्टा इत्यमुत इदमवाप्यत इति हटा निर्देशवर्तिन:-आज्ञाकारिण इति ॥ ४३० ॥ यदि वावदेतेऽपित गुरुं पूजपन्ति प्रतः-फि पुणन्ति, किं पुनः यः-साधुः श्रुतग्राही-परमपुरुषप्रणीतागमग्रहणाभिलापी अनन्तहित. कामुको मोक्षं यः कामयत इत्यभिप्रायस्तेन तु सुतरां गुरवः पूजनीया इति, यवतमाचार्या यद्वदन्ति किमपि विणयसमाहीए बीओ उद्देसओ समत्तो ९-२॥ किंच-विवत्तित्ति, विपत्तिरविनीतस्य ज्ञानादिगुणानां, संप्राप्तिर्विनीतस्य च ज्ञानादिगुणानामेव, यस्यैतत्- ज्ञानादिप्रात्यप्राप्तिद्वयं उभयत-उमयाभ्यां विनयाविनयाभ्यां सकाशाद्भवतीत्येवं ज्ञातं-उपादेयं चैतदिति भवति शिक्षा-- ग्रहणासेवनारूपामसावित्थंभूतोऽभिगच्छति-प्राप्नोति, भावत उपादेयपरिज्ञानादिति ॥ ४३६ ॥ एतदेव दृढयन्नविनीत- फलमाह-जे यावित्ति, यश्चापि चण्डः प्रवजितोऽपि यो रोषणः मतिऋद्धिगौरव इति ऋद्धिगौरवमतिगौरवे अभिनिविष्टः पिशुन:-पृष्ठिमांसखादको नरो-नरव्यञ्जनो न भावनरः साहसिक:-अकृत्यकरणपर: हीनप्रेषणो-हीनगुर्वाज्ञापरः अदृष्टधा-सम्यगनुपलब्धश्रुतादिधर्मा विनयेऽकोविदो-विनयविषयेऽपण्डितः असंविभागी-यत्र कचन लामे न संविभागवान् , य इत्थंभूतोऽधमो नैव तस्य मोक्षा, सम्यग्दृष्टेश्चारित्रवत इत्थंविधसंक्लेशाभावादिति ।। ४३७ ॥ विनयफला- भिधानोपसंहरनाह-णिद्देसवत्तित्ति, निर्देशवर्तिनः-आज्ञावर्तिनः पुनर्ये गुरूणां-आचार्यादीनां श्रुतार्थधर्मा इति प्राकृतशैल्या श्रुतधर्मार्था गीतार्था इत्यर्थः, विनये कर्तव्ये कोविदा-विपश्चितः, य इत्थंभूतास्तीर्वा ते महासत्त्वा ओघमेनं-प्रत्यक्षोपलभ्यमानं संसारसमुद्रं दुरुत्तारं तीर्चेव तीर्थ्यो, चरमभवं केवलित्वं च प्राप्येतिभावः, ततः क्षपयित्वा कर्म निरवशेषं मवोपग्राहिसंज्ञित गतिमुत्तमा सिद्धाख्यां गताः-प्राप्ताः ॥४३८॥ इति ब्रवीमीति पूर्ववत् । विनयसमाधी व्याख्यातो द्वितीय उद्देशकः ९-२॥

गलिबलीवईवर प्रतोदेन-आरादण्डलक्षणेन पोदितो-विक्षःसन्याहति-नपति कापि रथं प्रतीतं, पर दुग्गोरिव पुर्वद्विा- अहितावहसदिः शिष्यः कृत्यानां आचार्यादीनां कृत्पानि या तदमिरुचित कार्याणि उक्त उता-पुनः पुनरमिहित इत्यर्या, प्रकरोति-निपादपति प्रयुद्धे पेति ॥ ४३४ ॥ एवं पछतान्यप्पमूनि न भोमनान्पत आह-कालति, कालं-परदादि- लक्षण छन्दस्तदिच्छारूपं उपगारं-आराधनाप्रकार, पसन्दारेशादिपरिणा, एतत्मत्युपेरुप-दावा हेतुमिः-पपानुस्। कारणैः किमित्याह-तेन तेनोपायेन-गृहस्थाश्र्सनादिना तत्तपित्तहरादिरूपमशनादि सम्प्रतिपादयेत, पथा कालेऽपि शरदादौ पिचहरादिमोजनं प्रवातनिवातादिपा शप्पा इन्छानुलोमं वा यचस्प दिवं रोपवे प आराधनाप्रकारोऽनुलोमं भाषणं ग्रन्याम्पासवैयावश्यकरणादि देगे अनुपदेशाानित निष्ठीवनानिमितमिः सेप्माघाधिपं विधाय तदुनितं गम्पाद- येदिति ॥ ४३५॥ विवत्ती अविणीयस्स, संपत्ती विणीयस्स य। जस्सेयं दुहओ नाय, सिक्खं से अभिगच्छइ ॥ ४३६ ॥ जे यावि चंडे मइइतिगारवे, पिसुणे नरे साहसहीणपेसणे। अदिट्ठधम्मे विणए अकोविए, असंविभागी न हु तस्स मोक्खो ॥ ४३७ ॥ निदेसवित्ती पुण जे गुरूणं, सुपत्यधम्मा विणयम्मि कोविया । तरितु ते ओहमिणं दुरुत्तरं, सवितु कम्मं गइमुत्तमं गय ॥ ४३८ ॥ तिमि ॥ ।

मुहुत्तदुक्खा उ हवंति कंटया, अओमया तेऽवि तओ सुउद्धरा । वायादुरुत्ताणि दुरुद्धराणि, वेराणुबंधीीण महन्भयाणि ॥ ४४५ ॥ साम्प्रतं तृतीय आरभ्यते, इह च विनीतः पूज्य इत्युपदर्शयन्नाह-आयरिएत्ति, आचार्य-सूत्रार्थप्रदं तत्स्थानीय वाऽन्यं ज्येष्ठाय, किमित्याह-अग्निमिव-तेजस्कायमित्र आहिताग्निः-ब्राह्मणः सुश्रूपयन्-सम्यक् सेवमानः प्रतिजा- गृयात्तत्तत्कृत्यसम्पादनेनोपचरेत् । आह-यथाऽऽहितानिरित्यादिना प्रागिदमुक्तमेव, सत्यं, किं तु तदाचार्यमेवाङ्गीकृत्य इदं तु रत्नाधिकमप्यधिकृत्योच्यते, वक्ष्यति च-"रायणिएसु विणयमि"त्यादि, प्रतिजागरणोपायमाह-अवलोकितं-निरी- क्षितं इङ्गितमेव च-अन्यथावृत्तिलक्षणं ज्ञात्वा-विज्ञायाचार्यायं यः-साधुः छन्द:-अभिप्रायमाराधयति । यथा शीते पतति प्रावरणावलोकने तदानयने, इङ्गिते वा निष्ठीवनादिलक्षणे शुण्ठ्याद्यानयनेन स पूज्यः स इत्यंभूतः साधुः पूजाह:- कल्याणभागिति ॥ ४३९ ॥ प्रक्रान्ताधिकार एवाह-आयारेत्ति, आचारार्थ-ज्ञानाद्याचारनिमित्त विनयमुक्तलक्षणं प्रयुक्ते-करोति यः सुश्रूपन्-श्रोतुमिच्छन् , किमयं वक्ष्यतीत्येवं, तदनु तेनोक्ते सति परिगृह्य वाक्यमाचाीयं, ततश्च यथोपदिष्टं-यथोक्तमेवाभिकाङ्क्षन् , मायारहितः श्रद्धया कर्तुमिच्छन् सन् विनयं प्रयुङ्क्ते, अतोऽन्ययाकरणेन गुरुं त्विति, आचार्यमेव नाशातयति-न हीलयति यः स पूज्य इति ॥ ४४० ॥ किंच-राइणिएत्ति, रत्नाधिकेपु- ज्ञानादिभावरत्नाम्यधिकेषु विनयं-यथोचितं प्रयुङ्क्ते करोति, तथा डहा अपि च ये बयाश्रुताभ्यां पर्यायज्येष्ठाश्चिर- प्रव्रजितास्तेषु विनयं प्रयुङ्क्ते, एवं नीचत्वे गुणाधिकान् प्रति नीचभावे वर्तते, सत्यवादी-अविरुद्धवक्ता तथा

आयरियं अग्गिमिवाहियग्गी, सुस्सुसमाणो पडिजागरिजा।
आलोइयं इंगियमेव नच्चा, जो छंदमाराहयई स पुजो ॥ ४३९ ॥
आयारमट्ठा विणयं पउले, सुस्सूसमाणो परिगिम्झ वकं ।
जहोवइट्ठ अभिकंखमाणो, गुरुं तु नासाययई स पुजो ॥ ४४०॥
रायणिएसु विणयं पउले, डहरावि य जे परियायजिट्ठा ।
नीयत्तणे वइ सञ्चवाई, उवायवं वककरे स पुजो ॥ ४४१॥
अन्नायउंछं चरई विसुद्धं, जवणट्ठया समुयाणं च निचं ।
अलद्धयं नो परिदेवइजा, लद्धं न विकत्यई स पुजो ॥ ४२ ॥
संथारसेज्जासणभचपाणे, अप्पिच्छया अइलाभेऽवि संते।
जो एवमप्पाणभितोसइजा, संतोसपाहन्नरए स पुजो ॥ ४४३ ॥
सक्का सहेडं आसाइ कंटया, अओमया उच्छहया नरेणं ।
अणासए जो उ सहिज कंटए, वईमए कण्णसरे स पुजो॥ ४४४ ॥

क्रियते, वाग्दुरुक्तानि पुनढुंरुद्धराणि-दुःखेनैवोद्धियन्ते मनोलक्ष्यवेधनात् , वैरानुबन्धीनि-तथाश्रवणप्रद्वेषादिनेह
परन च वैरमनुवघ्नन्ति, अत एव महाभयानि, कुगतिपातादिमयहेतुत्वादिति ॥ ४४५ ॥
समावयंता वयणाभिघाया, कण्णंगया दुम्मणियं जणंति ।
धम्मोत्ति किच्चा परमग्गसूरे, जिइंदिए जो सहई स पुज्जो ॥ ४४६ ॥
अवण्णवायं च परम्मुहस्स, पच्चक्खओ पडिणीयं च भासं।
ओहारिणिं अप्पियकारिणिं च, भासं न भासेज सया स पुज्जो ॥ ४४७ ॥
अलोलुए अकुहए अमाई, अपिसुणे यावि अदीणवित्ती।
नो भावए नोऽविय भावियप्पा, अकोउहल्ले य सया स पुज्जो ॥ ४४८॥
गुणोहि साहू अगुणेहिऽसाहू, गेण्हाहि साहू गुण मुंचऽसाहू ।
वियाणीया अप्पगमप्पएणं, जो रागदोसेहि समोस पुज्जो ॥ ४४९ ॥
तहेव डहरं च महल्लगं वा, इत्थीं पुमं पवड्यं गिहिं वा ।
नो हीलए नोऽवि य खिसएज्जा, थंभं च कोहं च चए स पुज्जो ॥ ४५० ॥

अवपातवान्-वन्दनशीलो निकटवर्ती वा एवं च यो पाक्यकरो-गुरुनिर्देशकरणशीला म पूज्प इति ।। ४४१ ।। किंच- अपणायत्ति, अज्ञातोञ्छ-परिचयाकरणेनाशातः मन् मावोठं गृहस्थोदरितादि चरत्यटित्वाऽनीतं सक्ते, न त शावस्तबहुमतमिति, एतदपि विशुद्ध-उद्गमादिदोपरहित, न तद्विपरीतं, एतदपि यापनार्थ-संयममरोदाहिदेहपालनाय, नान्यथा समुदान च-उचितमिक्षालब्धं च-नित्य-मर्वकालं न तूच्छमप्येकत्रैव पालन्ध कदाचिया, एवंभूवमपि विमा- गतः, अलब्ध्वा-अनासाधन परिदेवयेत्-नखेदं यायात् , यथा मन्दमाग्योऽहं अशोमनो वा अप देश इत्येवं विमागतच लब्ध्वा प्राप्योचित न विकत्यते-न सापां करोति सपुष्पोऽहं शोमनो वा अयं देश इत्येवं म पूज्प इति ।। ४४२ ॥ किंच संधारेति, संस्तारकशय्यामनभक्तपानानि प्रतीतान्येतेष्वल्पेच्छता-अमूर्छया परिभोगा, अतिरिकपरिहरणं चाविलामेऽपि सवि संस्तारकादीनां गृहस्थेभ्यः सकाशात् , य एवमारमानममितोषयति येन वा तेन वा पापयवि सन्तोप- प्राधान्यरत:-सन्तोप एव प्रामान्यमावे रत:-मतः म पूज्य इति ।। ४४३ ॥ इन्द्रियममाधिद्वारेण पतामाह-समित्ति, शक्याः सोदुमाशयेतीदं मे भविष्यतीति प्रत्याशया, के इत्याह फण्टका अपोमया-लोहात्मका उत्सहता नरेण-अर्थोधमिनेत्यर्थः १, तथा च कुर्वन्ति केचिदयोमयकण्टकास्तरणशयनमप्यर्थलिप्मा, न पुनर्वा कण्टकाः मुक्या इति, एवं व्यवस्थिते अनाशया-फलाप्रत्याशया निरीहः सन् यस्तु सहेत फण्टकान् घामपान-खरादिवागारमकान् फर्ण- सरान्-कर्णगामिनः स पूज्य इति ॥ ४४४ ॥ एतदेव स्पष्टयति-महुतेति, मुहूर्तावा-अल्पकालदुःखा भवन्ति कण्टका अयोमया, वेधकाल एवं प्रायो दुःखमावात् , तेऽपि ततः कायात्स्द्धरा:-सुखेनैवोधियन्ते व्रणपरिकर्म च अवधारिणी-अशोभन एवायमित्यादिरूपां, अग्रीतिकारिणीं च-श्रोतुर्पतनिवेदनादिरूपां भाषां-वाचं न भाषेत सदा यः कदाचिदपि नैव ब्रूयात्स पूज्य इति ॥ ४४७ ॥ तथा अलोलुएत्ति, अलोलुपः-आहारार्दिषु अलुब्धः, अकुहक- इन्द्रजालादिकहकरहितः, अमायी-कौटिल्यशून्यः, अपिशुनश्चापि-न छेदभेदकर्ता अदीनवृत्तिः-आहाराबलामेऽपि शुद्धवृत्तिनों भावयेदकुशलभावनया परं, यथा-अमुकपुरतो भवताऽहं वर्णनीयः, नापि च भावितात्मा स्वयमन्यपुरतः स्वगुणवर्णनापरः अकौतुकश्च सदा नटनकादिषु यः स पूज्य इति ॥ ४४८॥ किंच-गुणेहित्ति, गुणैरनन्तरोदितै- विनयादिमिर्युक्तः ,साधुर्भवति, तथा अगुणैरुक्तगुणविपरीतैरसाधुः, एवं सति " गृहाण साधुगुणान् मुञ्चासाधुगुणांचे "ति शोभन उपदेशः, एवमधिकृत्य प्राकृतशैल्या विज्ञापयति-विविधं ज्ञापयत्यात्मानमात्मना यस्तथा रागद्वेषयोः समो न रागवान द्वेषवान्निति स पूज्य इति ॥ ४४९ ।। किंच-तहेवेति, तथैवेति पूर्ववत् डहरं वा महल्लकं वा, वाशब्दान्म- ध्यमं वा, स्त्रियं पुमांसमुपलक्षणत्वान्नपुंसकं वा प्रबजितं गृहिणं वा, वाशब्दात्तदन्यतीथिकं वा, न हीलयति, नापि खिसयति, तत्र सूयया असूयया वा, सकदुष्टाभिधानं हीलनं, तदेवासकृत् खिंसनमिति, हीलनखिसनयोश्च निमित्तभूतं स्तम्भं च मानं च क्रोधं च रोपं च त्यजति यः स पूज्यः, निदानत्यागेन तत्वतः कार्यत्यागादिति।। ४५० ।। जे माणिएत्ति, ये मानिता अभ्युत्थानादिसत्कारैः सततं-अनवरतं शिष्यान् मानयन्ति श्रुतोपदेशं प्रति चोदना. दिभिः, तथा यत्नेन कन्यामिव निवेशयन्ति, यथा “मातापितरौ कन्यां गुणैर्वयसा च संवर्ध्य योग्यभर्तरि स्थापयन्ति एबमाचार्याः शिष्यं सत्रार्थवेदिनं दृष्ट्वा महत्याचार्यपदेऽपि स्थापयन्ति, तानेवंभूतान् गुरून्मानयति, योऽभ्युत्थानादिना जे माणिया सययं माणयति, जण कन्नं च निवेसर्यति । ते माणए माणरिहे तवस्सी, जिइंदिए सच्चरए स पुजो॥ ४५१ ॥ तेसिं गुरूणं गुणसागराणं, सोचाण मेहावि सुभासियाई । चरे मुणी पंचरए तिगुत्तो, चउकसायावगए स पुजो ॥ ४५२ ।। गुरुमिह सययं पडियरिय मुणी, जिणव(म)यनिउणे अभिगमकसले । धुणिय रयमलं पुरेकडं, भासुरमउलं गई वह ॥ ४५३ ॥ त्ति बेमि ।। विणयसमाहीए तइओ उद्देसो समत्तो ९-३॥ किंच-समाययंतेति समापतन्त-एकीमावेनामिमुखं पतन्तः, क इत्याह-पगनाभिघाता:-खरादिश्चनप्रहाराः कर्णगताः सन्तः प्रायोऽनादिभवाम्पासाद्दौर्मनस्य-दुष्टमनोमावं जनपन्ति प्राणिना, पर्वमतान् वचनामिपातान् धर्म इतिकृत्वा मामायिकपरिणामापनो, न समयादिना, परमानशूरः-दानसंग्रामभरापेक्षया प्रधानः शूरः जिते. न्द्रिया मन या सहते न तु तैर्विकारं उपदर्शयति म पूज्य इति ॥ १४६ ॥ तथा अवण्णत्ति, अवर्णयाद-अलापावाद च पराङ्मुखस्य पृष्ठत इत्यर्थः, प्रत्यक्षतश्व-प्रत्यक्षस्य च प्रत्पनीकां अपकारिणी चौरस्त्वमित्यादिरूपा मापां वा ।

खलु ते थेरेहिं भगवंतोहं चत्तारि विणयसमाहिट्ठाणा पन्नत्ता, तंजहा-विणयसमाही, सुयसमाही, तवसमाही, आयारसमाही । सू०१६।-विणए सुए य तवे, आयारे निच्चपडिया। अभिरामयंति अप्पाणं, जे भवंति जिइंदिया ॥ ४५४॥ अथ चतुर्थ उच्यते, तत्र सामान्योक्तविनयविशेषोपदर्शनार्थमिदमाह-सुयं मे इति, श्रुतं मया आयुष्मन् ! तेन भगवता एवमाख्यातमित्येतद् यथा षड्जीवनिकायां (पृ. २०) तथैव द्रष्टव्यं, इह खल्विति, इह-क्षेत्रे प्रवचने वा, खलुशब्दो विशेषणार्थः, न केवलमिह, किं त्वम्यत्राप्यन्यतीर्थकृत्प्रवचनेष्वपि, स्थविरैः-गणधरैभगवद्भिः-परमैश्वर्या- दियुक्तैश्चत्वारि विनयसमाधिस्थानानि-विनयसमाधिभेदरूपाणि प्रज्ञप्तानि-प्ररूपितानि, भगवतः सकाशे श्रुत्वा ग्रन्थत उपरचितानीत्यर्थः, कतराणि खलु तानीत्यादिना प्रश्नः, अमूनि खलु तानीत्यादिना निर्वचनं, तद्यथेत्युदा- हरणोपन्यासार्थः-विनयसमाधिः १ श्रुतसमाधिः २ तपःसमाधिः ३ आचारसमाधिः ४, तत्र समाधानं समाधिः-परमार्थत आत्मनो हितं सुखं स्वास्थ्य, विनये विनयाद्वा समाधिः विनयसमाधिः, एवं शेषेष्वपि शब्दार्थो भावनीयः । १६ । एतदेव लोकेन संगृह्णाति-विणए इत्यादि, विनये-यथोक्तलक्षणे श्रुते-अङ्गादौ तपसि-वाह्यादौ आचारे च-मूलगुणादौ, चशब्दस्य व्यवहित उपन्यासः, नित्यं-सर्वकालं पण्डिताः-सम्यक्परमार्थवेदिनः, किं कुर्वन्तीत्याह-अभिरमयन्त्यने- कार्थत्वादाभिमुख्येन विनयादिषु युञ्जते आत्मानं-जीवं, किमिति ?, अस्योपादेयत्वात् , क एवं कुर्वन्तीत्याह-ये भवन्ति १६ मानान्-िमानयोग्यान् तपस्वी सन्, जितेन्द्रियः सत्यरत इति प्राधान्यख्यापनार्थ विशेषणद्वयं, स पूज्य इति ॥ ४५१ ।। तथा-तेसिं गुरूणंति, तेपां गुरूणामनन्तरोदितानां गुणसागराणां-गुणसमुद्राणां सम्बन्धीनि श्रुत्वा मेधावी सुभापितानि-परलोकोपकारकाणि चरति-आचरति मुनिः-साधुः पञ्चरता-पनमहानतसक्तः त्रिगुप्तो- मनोगुझ्यादिमान् चतुष्कपायापगत इत्यपगतकोषादिकपायो यः स पूज्य इति ॥ ४५२ ॥ प्रस्तुतफलाभिघानेनोप- संहरबाह-गुरुन्ति, गुरुमाचार्यादिरूपमिह-मनुष्यलोके सततं-अनवरतं परिचर्य-विधिनाऽऽराध्य मुनिा-साधुर, किंविशिष्टो मुनिरित्याह-जिनपचन(मत)निपुण:-आगमे प्रवीणः, अभिगमकुशलो-लोकपाघूर्णकादिप्रतिपतिदक्षः, स एवंभूतो विधूय रजोमलं पुराहतं क्षपयित्वाऽष्टप्रकार कर्मेति मावः, किमित्याह-भास्वरां शानतेजोमयत्वादतुलां- अनन्यसदृशीं गति-सिद्धिरूपां व्रजतीति-गच्छति, तदा जन्मान्तरेण वा सुकुलप्रत्यागमनप्रत्ययोत्पादादिना प्रकारेण ॥ ४५३ ॥ अवीमीति पूर्ववत् ॥ इति विनयसमाधायुक्तस्तृतीय उदेशकः ९-३ ॥ सुयं मे आउसं! तेणं भगवया एवमक्खायं-इह खल्ल थेरेहिं भगवंतेहि, चचारि विणय- समाहिवाणा पन्नत्ता । कयरे खलु ते थेरेहिं भगवंतेहिं चत्तारि विणयसमाहिट्ठाणा पन्नचा ?, इमे बुध्यते, तच्चापबुद्धं सत्पुनरधितिष्ठति-यथावत्करोति, न च कुर्वनपि मानमदेन-मानगर्वेण मायति-मदं याति, विनयसमाधौ-विनयसमाधिविषये आयतार्थिकः-मोक्षार्थीति ॥ ४५५ ॥ चउबिहा खल्लु सुयसमाही भवइ, तंजहा-सुयं मे भविस्सइत्ति अज्झाइयव्वं भवइ १, एगग्ग- चिचो भविस्सामित्ति अज्झाइयत्वयं भवइ २, अप्पाणं ठावइस्सामित्ति अज्झाइयवयं भवइ ३, ठिओ परं ठावइस्सामित्ति अज्झाइयवयं भवइ४ चउत्थं पयं भवइ ।सू०१८। भवइ य एत्थ सिलोगो- नाणमेगग्गचित्तो य, ठिओ अ ठावई परं । सुयाणि य अहिजिचा, रयो सुयसमाहिए ॥४५६ ॥ उक्तो विनयसमाधिः, श्रुतसमाधिमाह-चउव्विहा इत्यादि, चतुर्विधः खलु श्रुतसमाधिर्भवति, तद्यथेत्युदा- हरणोपन्यासार्थः । श्रुतं मे आचारादि द्वादशाङ्गं भविष्यतीत्यनया बुद्ध्या अध्येतव्यं भवति, न गौरवायालम्बनेन १, तथा अध्ययनं कुर्वन्नेकाग्रचित्तो भविष्यामि न च विप्लुतचित्त इत्यध्येतव्यं भवति अनेन चालम्बनेन २, तथाऽध्ययनं कुर्वन् विदितधर्मतत्व आत्मानं स्थापयिष्यामि शुद्धधर्म इत्यनेन चालम्बनेनाध्येतव्यं भवति ३, तथा अध्ययनफलात् स्थितः स्वयं धमें परं विनेयं स्थापयिष्यामि तत्रैवेत्यध्येतव्यं भवत्यनेन चालम्बनेनाध्येतव्यं ४ चतुर्थं पदं भवति । १८॥ भवति चात्र श्लोक इति पूर्ववत्, स चायं नाणमिति, ज्ञानमित्यध्ययनपरस्य ज्ञानं भवत्येकाग्रचित्तश्च तत्परतया एकाग्रालम्बनश्च भवति, स्थित इति विवेकाद्धर्मस्थितो भवति, स्थापयति परमिति स्वयं धर्मस्थितत्वादन्यमपि स्थाप- जितेन्द्रिया:-जिवचक्षुरादिमावशत्रवः, त एव परमार्थतः पण्डिता इति प्रदर्शनार्यमेतदिति ॥ ४५४ ॥ चउबिहा खलु विणयसमाही हवइ, तंजहा-अणुसासिज्जतो सुस्सूसइ १, सम्मं संपडि- वज्जइ २, वेयमाराहइ ३, न य भवइ अचसंपग्गहिए ४ चउत्थं पयं भवइ । सू० १७ । भवइ य एत्थ सिलोगो-पेहेइ हियाणुसासणं, सुस्सूसई तं च पुणो अहिट्ठए। न य माणमएण मजई, विणयसमाही आययट्ठिए ॥ १५५॥ विनयसमाधिमनिधित्सुराह-चउविदेत्यादि, चतुर्विधा ग्बल विनपसमाधिपति, सयपेत्युदाहरणोपन्यासाः, अणुसासिनतो इत्यादि, अनुशास्यमानस्तत्र तत्र चोद्यमानः शुश्रूपति-तदनुशासनमर्षितया श्रोतुमिच्छति १, इन्छा. प्रवृत्तिा तत् सम्यक्सम्प्रतिपद्यते, सम्यग्-अविपरीतमनुशासनतर यथाविषयमवयुपते २, म चै विशिष्टप्रतिपत्तेरेव वेदमाराधयति, वेद्यते अनेनेति वेद:-श्रुतमानं तद्यथोक्तानुष्ठानपरक्या सफलीकरोति ३, अत एव विशुदपार्न च भवत्यात्मसंप्रगृहीत:-आत्मा एव सम्यक् प्रकर्पण गृहीतो येनाहं विनीतः सुसाघुरित्येवमादिना स तया, अनात्मो- कर्पप्रधानत्वाद्विनयादेः, न चैवंभूतो भवतीति अमिप्राया, चतुर्थ पदं भवतीत्येतदेव एपक्रमप्रामाण्यादुत्तरोतरगुणापेधया पतुर्थमिति ४।१७। भवति चात्र श्लोकः, अति विनयममाधौ श्लोका-छन्दोविशेषः, स चाय-पेहेइत्ति- प्रार्थयते हितानुशासनं-इच्छति इहलोकपरलोकोपकारिणमाषादिम्प उपदेश, शुभपतीत्पनेकार्थस्यात् यथाविषयमय.

A चिरन्तनं कर्म, नवं च न बनात्येवं युक्तः सदा तपःसमाधावितिः ॥ ४५७ ॥ चउबिहा खलु आयारसमाही भवइ, तंजहा-नो इहलोगट्टयाए आयारमहि?जा १, नो पर- लोगट्ठयाए आयारमहिलैजा २, नो कित्तिवण्णसद्दसिलोगट्टयाए आयारमहिढेजा ३, नन्नत्थ आरहंतेहिं हेऊहिं आयारमहिढेजा ४, चउत्थं पयं भवइ । सू० २० । भवइ य एत्थ सिलोगो- जिणवयणरए अतिंतिणे, पडिपुन्नाययमाययट्ठिए। आयारसमाहिसंवुडे, भवइ य दंते भावसंधए ॥ ४५८ ॥ अभिगम चउरो समाहिओ, सुविसुद्धो सुसमाहियप्पओ। विउलहियं सुहावहं पुणो, कुवइ असो पयखेममप्पणो ॥ ४५९ ॥ जाइ(जरा)मरणाओ मुच्चई, इत्थंथं च चएइ सवसो। सिद्धे वा भवइ सासए, देवे वा अप्परए महड्डिए ॥ ४६० ॥त्ति बमि ॥ ९-४॥ विणयसमाहीणामज्झयणं समत्तं ९॥ ।

पनि, श्रुतानि च नानाप्रकाराण्यधीते, अधीत्य प रत:-सक्तो भवति, श्रुतसमाधाविति ॥ ४५६ ॥ चउविहा खल्लु तवसमाही भवइ, तंजहा-नो इहलोगट्ठयाए तवमहिढेजा १, नो पर- लोगट्ठयाए तवमहिलैजा २, नो कित्तिवपणसद्दसिलोगट्ठयाए तवमहिढेजा ३, नन्नत्य निजरट्ठयाए तवमाहिद्वेजा ४, चउत्यं पयं भवइ । सू० १९ । भवइ य एत्थ सिलोगो-विविहगुणतवारए य निचं, भवइ निरासए निजरट्ठिए । तवसा धुणइ पुराणपावगं, जुत्तो सया तवसमाहिए ॥४५७॥ उक्तः श्रुतममाधिः, तपासमाधिमाह-चउविहा इत्यादि, चतुर्विधः खलु तपासमाधिर्भवति, तद्यथेत्यु- दाहरणोपन्यासार्थः, नेहलोकार्थमिहलोकनिमिचं लन्भ्यादिवाञ्छया तपा-अनशनादिरूपमधितिष्ठेत्-कुर्यात् धर्मि- लयत् १, तथा न परलोकार्य-जन्मान्तरमोगनिमित्तं तमोऽधितिष्ठेद् ब्रह्मदत्तवत् २, एवं न फीर्तिवर्णशब्द- लाघार्थमिति, सर्वदिग्व्यापी साघुवादः कीर्चिः, एकदिग्व्यापी वर्णो, अर्द्धदिग्व्यापी शन्दा, तत्स्थान एव श्लाघा. नैतदयं तपोऽधितिष्ठेद ३, अपि तु नान्यत्र निर्जरार्थमिति, न कर्मनिर्जरामेकां विहाय तपोऽधितिष्ठेद , अकामः सन् यथा फर्मनिस फलं भवति तयाधितिष्टदित्यर्थः ४, चतुर्थ पदं भवति । १९ । मावि चात्र श्लोक इति पूर्ववत् , स चायं- विरिइत्यादि, विविधगुणसपोरतो हि नित्यमनशनाघपेक्षयाऽनेकगुणं यत्तपस्तद्रत एव सदा भवति, निराशो- निष्प्ररपाश इहलोकादिपु, निर्जरार्थिका-कर्मनिर्बरार्थी, स एवंभूतः तपसा विशुद्धेन धुनोति-अपनगवि पुराणपापं- इति श्रीसुमतिसाधुविरचितावचूरौ नवमं विनयसमाधिनाममध्ययनं समाप्तम् ९ ।। व्याख्यातं विनयसमाध्यध्ययनम् ॥ अधुना सभिवाख्यमारभ्यते, अस्य चायममिसम्बन्धः, इहानन्तराध्ययने आचारप्रणिहितो यथोचितविनयसंपन्नो भवतीत्येतदुक्तं, इह त्वेतेष्वेव नवस्वध्ययनार्थेषु यो व्यवस्थितः स सम्यग्मिचरित्ये- तदुच्यते, इत्यनेनामिसम्बन्धेनायातमिदमध्ययनमिति । तच्चेदं- निक्खम्ममाणाइ य बुद्धवयणे, निच्चं चित्तसमाहिओ हवेना । इत्थीण वसं न यावि गच्छे, वंतं नो पडियायइ जे स भिक्खू ॥ ४६१ ॥ पुढविं न खणे न खणावए, सीओदगं न पिए न पियावए । अगणिसत्थं जहा सुनिसियं, तं न जले न जलावए जे स भिक्खू ॥ ४६२॥ अनिलेण न वीए न वीयावए, हरियाणि न छिंदे न छिदावए। बीयाणि सया विवजयंतो, सञ्चित्तं नाहारए जे स भिक्खू ॥ ४६३ ॥ वहणं तसथावराण होइ, पुढवीतणकट्ठनिस्सियाणं ।

उक्त तपःसमाधिः, आचारसमाधिमाह-चउव्विहा इत्यादि, चतुर्विधः खल्वाधारसमाधिर्भवति, वद्यर्थत्युदा- हरणोपन्यासार्थः, नेहलोकार्थमित्यायाचाराभिधानभेदेन पूर्ववत्, पावनान्यवाहतैरर्हत्सम्बन्धिभितुभिरनाश्रवत्वादिमिः आचार-मूलगुणोत्तरगुणमयमधितिष्ठेद, निरीहः सन् यथा मोक्ष एव भवतीति चतुर्थ पदं भवति ।२०। भवति पात्र लोक इति पूर्ववत् , स चाय-जिणवयणरए इत्यादि, जिनवचनरत:-आगमे सक्ता, अतिन्तिनः-न सकृत्किञ्चिदुक्तः सन्नमयया भूयो भूयो वक्ता, प्रतिपूर्णः सूत्रादिना, आयतमायातार्थिका-अत्यन्तं मोक्षार्थी आचारसमाधिसंघृत इत्याचारे या समाधिस्तेन स्थगितावद्वारः सन् भवति घ दान्त-इन्द्रियनोइन्द्रियदमाम्यां भावसन्धको-मावो-मोक्षस्तत्सन्धक आत्मनो मोक्षासभकारीति ॥ ४५८ ॥ सर्वसमाधिफलमाह-अभिगमेति, अभिगम्य-विज्ञायासेव्य च चतुरः समाधी. ननन्तरोदितान्, सुविशुद्धो मनोवाकायः, सुसमाहितात्मा सप्तदशविधे संयमे, स एवंभूतो धर्मराज्यमासाथ विपुलहित- सुखावहं पुनरिति विपुलं-विस्तीर्ण हितं तदात्वे आयत्यां च पथ्यं सुखमावहति-प्रापयति यत्तत् तथाविधं, करोत्यसो साधुः पद-स्थानं, क्षेम-शिवं, आत्मन एव, न त्वन्यस्येति अनेनैकान्तक्षणमङ्गव्यवच्छेदमाहेति ॥ ४५९ ॥ एतदेव स्पष्टयति-जाइ इति, जातिजरामरणात्-जन्मजरामरणात्संसारान्मुच्यते, असौ सुसाधुरित्थस्थं चेति इदंप्रकारमापन- मित्य इत्यं विष्ठतीतीत्यस्य-नारकादिव्यपदेशवीजं वर्णसंस्थानादि तच्च चएइ-त्यजति सर्वशा-सवै प्रकारैरपुनर्ग्रहणवया, । एवं सिद्धो वा कर्मक्षपात् सिद्धो भवति, शाश्वतोऽपुनरागामी सावशेषकर्मा देवो वाल्परता-पामापरिगतकण्ड्यन• कल्परवरहितो महर्दिका-अनुचरवैमानिकादिः ॥ ४६०॥ ब्रवीमीति पूर्ववत् ।। इति विनयसमाधौ चतुर्थ उद्देशकः॥

ततश्च न दोप इति ॥ ४६२ ॥ तथा अनिलेति-अनिलेनानिलहेतुना. चेलकर्णादिनाःन वीजयत्यात्मादिः स्वयं; न
वीजयति परैः, हरितानि-शष्पादीनि न छिनत्ति स्वयं न छेदयति परैः, वीजानि-हरितफलरूपाणि ब्रीद्वादीनि
सदा-सर्वकालं विवर्जयेत् संघट्टनादिक्रियया, सचित्तं नाहारयति यः. कदाचित् अप्यपुष्टालम्बनः सः भिक्षुरिति
॥ ४६३ ।। औदेशिकादिपरिहारेण बसस्थावरपरिहारमाह-वहणमिति, वधनं-हननं त्रसस्थावराणां-द्वीन्द्रियादिपृथि-
व्यादीनां भवति कृतौदेशिके, किंविशिष्टानां ?-पृथिवीतृणकाष्ठनिश्रितानां तथासमारम्भाव्, यस्मादेवं तस्मादौद्दे-
शिकं. कृतादि, अन्यच्च सावयं न भुते, न केवलं एतत् किन्तु नापि पचति स्वयं, न पाचयत्यन्यैः, न पचन्तमनुजा-
नाति यः स भिक्षुरिति ॥ ४६४ ॥रोइत्ति रोचयित्वा-विधिग्रहणभावनाभ्यां प्रियंः कृत्वा, किं तदित्याह-ज्ञातपुत्रवचनं
भगवन्महावीरवचनं आत्मसमान्-आत्मतुल्यान्मन्यते षडपि, कायान्-पृथिव्यादीन्, पञ्च चेति चशब्दोऽपिशब्दार्थः
पश्चापि स्पृशति-सेवते महानतानि, पञ्चाश्रवसंवृतश्च द्रव्यतोऽपि पश्चेन्द्रियसंवृतश्च यः स भिक्षुरिति ॥ ४६५ ॥
चत्तारि वमे सया कसाए, धुवजोगी य हवेज बुद्धवयणे ।
अहणे-निजायरूवरयणे, गिहिजोगं परिवजए जेस भिक्खू ॥ ४६६ ।।
सम्मदिट्ठी सया अमूढे, अस्थि हु नाणे तवेः संजमे य ।
तवसा. धुणइ पुराणपावर्ग,, मणवयकायसुसंवुड़े जे.सःभिक्खू ॥ ४६७ ॥

तम्हा उद्देसि न. भुंजे, नोऽवि पएन पयावए जेोस भिक्खू ।। ४६४ ॥ रोइअ, नायपुत्तवयणे, अप्प(च)समे मन्नेज छप्पि काए । पंच य फासे महत्वयाई, पंचासवसंवरे जे स भिक्खू ॥, ४६५ ॥ किंच-निग्वम्मेति, निष्क्रम्य-द्रव्यमावगृहात , प्रव्रज्यां गृहीत्वेत्यर्थः आशया-वीर्यकरगणधरोपदेशेन योग्यतायो सत्या, निष्क्रम्य किमित्याह-युद्धवचने-अवगततयतीर्थकरगणधरवचने नित्यं-सर्वकालं पित्तसमाहितविनातिप्रसनो भवेत्, प्रवचन एवाभियुक्त इति। गर्भः। व्यतिरेकतः समाधानोपायमाह-स्त्रीणां सर्वासाममत्कार्यनिमन्धनभूतानां यशं- वत्परतन्त्रवा(तदायत्तता)रूपं न चापि गच्छेत्, तद्वशगो हि नियमवो वान्तं प्रत्यापिरति, अतो पुवचननितममा- धानतः सर्वथा स्त्रीवशत्यागात्, अनेनवोपायेन, अन्योपायामम्मवात् , वान्तं-परित्यक्तं मद्विपयजम्पालं नमत्यापियति-न मनागम्यामोगतोऽनाभोगतश्च तत्त्सेवते यः स मिक्षुर्मापभिक्षुरिति ॥ ४६१ ॥ तथा पुढवीति, पृथ्वी-सचेतनादिरूपा न ग्वनति स्वयं, न खानयति परैः, “एकग्रहणे तआतीयग्रहणमि"ति खनन्तमसन्यं नानुजानाठीति, एवं सर्वध वेदितम्प; शीतोवर्क-सचित्तं पानीयं न पियति स्वयं, न पाययति परान्, अग्निः पदजीवघातका, किंवदित्याह-शस्त्रं-बङ्गादि यथा सुनिशितमुज्ज्वालितं तद्वत् , तं न ज्वालयति स्वयं, न ज्यालयवि परेः, य इत्यंभूतः स मिथुरिति, आह-पइजीप- निकायाक्षिा गर्वाभ्यपनेष्वयमर्थोऽमिहितः किमर्थं पुनरुक्त, इति, उम्पते, तदुक्तार्थानुष्ठानपर- एम.मिक्षुरिति ज्ञापनार्थ,

-
ह
मनोवाकायसुसंवृता-तिसृमिर्गुप्तिमिर्गुप्तो यः स भिक्षुरिति ।।४६७॥ किं च-तहेव असणंति, तथैवेति पूर्षिविधाने-
नाशनं पानं च प्रागुक्तस्वरूपं तथा विविधमनेकप्रकारं खाद्यं स्वायं च प्रागुक्तस्वरूपमेव लब्ध्वा-प्राप्य, किमित्याह-
भविष्यत्यर्थः-प्रयोजनमनेन श्वः परश्वो वेति तद्-अशनादि न निघत्ते-न स्थापयति स्वयं, तथा न निधापयति-न
स्थापयत्यन्यैः, स्थापयन्तमन्य नानुजानाति, यः सर्वथा संनिधिपरित्यागवान् स भिक्षुरिति ॥ ४६८ ॥ किंच-तहेवत्ति,
तथैवाशनं पानं च विविधं खायं स्वायं च लब्ध्वेति पूर्ववत्, लब्ध्वा किमित्याह-छन्दित्वा-निमन्त्र्य समान-
धार्मिकान-साधून भुङ्क्ते, स्वात्मतुल्यत्वाद्वात्सल्यसिद्धेः, तथा भुक्त्वा स्वाध्यायरतश्च यः चशब्दो विशेषानुष्ठानपरश्च
यः स भिक्षुरिति ।। ४६९ ॥ भिक्षुलक्षणाधिकार एवाह-न ये त्ति, न च वैग्रहिकी-कलहप्रतिबद्धा कथां कथयति,
सद्वादकथादिष्वपि न च कुप्यति परस्यापि तु निभृतेन्द्रियोऽनुद्धतेन्द्रियः प्रशान्तो-रागादिरहित एवास्ते, तथा
संयमे-पूर्वोक्ते धुवं-सर्वकालं योगेन-कायवाङ्मनःकर्मलक्षणेन युक्तः-योगयुक्तः, प्रतिभेदमौचित्येन प्रवृत्तेः, तथोपशा-
न्तोऽनाकुलः कायचापलादिरहितः, अविहेठकः न क्वचिदुचितेऽनादरवान् , क्रोधादीनां विश्लेषक इत्यन्ये, ये इत्यंभूतः
स भिक्षुरिति ॥ ४७० ॥
जो सहइ हु गामकण्टए, अक्कोसपहारतज्जणाओ य ।
भयभेरवसदसप्पहासे, समसुहदुक्खसहे य जे स भिक्खू ॥ ४७१ ॥

तहेव असणं पाणगं वा, विविहं खाइमसाइमं लभित्ता । होही अट्ठो सुए परे वा, तं न निहे न निहावए जे स भिक्खू ॥ ४६८ ॥ तहेव असणं पाणगं वा, विविहं खाइमसाइमं लभित्ता । छंदिय साहम्मिआण मुझे, भुच्चा सज्झायरए जे स भिक्खू ॥ ४६९ ॥ न य बुग्गहियं कहं कहेज्जा, न य कुप्पे निहुइंदिए पसंते । संजमे धुवं जोगेण जुचे, उवसंते अविहेडए जे स भिक्खू ॥ ४७० ॥ किंच-चचारिति, चतुर। क्रोधादीन् यमति तत्प्रतिपक्षाम्यासेन सदा-सर्वकालं कपायान, ध्रुवयोगी चोचि. वनित्ययोगाश्च भवति, युद्धपचन इति तृतीयायें सप्तमी, तीर्थकरवचनेन करणभूतेन, ध्रुवयोगी भवति, यथागममेवेति मावा, अपनचतुष्पदादिरहितो निर्जातरूपरजतो-निर्गतसुवर्णरूप्य इति भावः, गृहियोग-मूर्छया गृहस्थसम्बन्ध परिवर्जयति सर्व प्रकारैः परित्यजति यः स भिक्षुरिति ॥ ४६६ ॥ तथा-सम्मदिहीति, सम्यग्दृष्टि:-मावसम्य- ग्दर्शनी या सदाऽमूदा-अविप्लुतः सभेवं मन्पवे अस्त्येव धानं हेयोपादेयविषयमतीन्द्रियेष्वपि, तपश्च पायाम्पन्तरकर्म- मलापनयनजलकर संयमच नवकर्मानुपादानरूपः, इत्यं च दृढमावस्तपसा धुनोति पुराणं पापं भावसारतपा प्रवृत्या, एतदेव स्पष्टयति-पडिमंति, प्रतिभां-मासादिरूपां प्रतिपद्य-सविधिमगीकृत्य स्मशाने-पित्वने, न बिभेति-न भयं याति, भैरवभयानि दृष्ट्वा-रौद्रभयहेतूनुपलभ्य वैतालिकादिरूपशब्दादि, विविधगुणतपोरतश्च नित्यं-मूलगुणाद्य- नशनादिसक्तश्च सर्वकालं, न शरीरमभिकाङ्क्षते निःस्पृहतया वार्चमानिकं भावि च, य इत्थंभूतः स भिक्षु. रिति ।। ४७२ ॥ असइंति, न सकदसकृत्सर्वदैवेत्यर्थः, किमित्याह-व्युत्सृष्टत्यक्तदेहः-व्युत्सृष्टो भावप्रतिवन्धामावेन, त्यक्तो-विभूपाकरणेन, देहः-शरीरं येन स तथाविधः, आक्रुष्टो वा ज(य)कारादिना, हतो वा दण्डादिना, लूषितो वा खड्गादिना, भक्षितो वा शृगालादिना, पृथिवीसम:-सर्वसहो मुनिर्भवति, न च रागादिना पीडयते, तथाऽ- निदानो-भाविफलाशंसारहितः, अकुतूहलश्च नटादिपु, य एवंभूतः स भिक्षुरिति ।। ४७३ ॥ भिक्षुस्वरूपाभिधानाधिकार एवाह-अभिभूयत्ति, अभिभूय-पराजित्य, कायेन-शरीरेणापि, न मिक्षुसिद्धान्तनीत्या मनोवाग्म्यामेव, कायेनानमिमवे तच्चतस्तदनभिभवात् , परीषहान-क्षुदादीन् , समुद्धारयत्युत्तारयति, जातिपथात्-संसारमार्गादात्मानं कथमित्याह- विदित्वा-विज्ञाय, जातिमरणं-संसारमूलं महाभयं-महाभयकारणं, ततः-तपसि रतः-सक्तः, किंभूतः ? इत्याह- श्रामण्ये-श्रमणानां सम्बन्धिनि, शुद्ध इति भावा, य एवंभूतः स भिक्षुरिति ॥ ४७४ ॥ हत्थत्ति, हस्तसंयतः पाद- संयत इति, कारणं विना कूर्मवल्लीन आस्ते, कारणे च सम्यग्गच्छति, तथा वाक्संयता-अकुशलवाग्निरोधात् कुशलवागुदी- रणेन संयतेन्द्रियो-निवृत्तविषयप्रसरः अध्यात्मरतः-प्रशस्तध्यानासक्तः, सुसमाहितात्मा ध्यानापादकगुणेषु, तथा. सूत्रार्थं च यथावस्थितं विधिग्रहणशुद्धं विजानाति यः सम्यग्यथाविषयं स भिक्षुरिति ॥ ४७५ ॥ १ - A पडिम पडिवजिया मसाणे, नो भीयए भयभेरवाई,दिस्स । विविहगुणतवोरए य निचं, न सरीरं चाभिकसए जो स भिक्खू ॥ ४७२ ॥ असई वोसट्ठचत्तदेहे, अकुठे व हए लूसिए वा। पुढविसमे मुणी हवेजा, अनियाणे अकोउहलेोजे स भिक्खू ॥ ४७३॥ अभिभूय कायेण परीसहाई, समुद्धरे जाइपहाओ अप्पयं । विइत्तु जाईमरणं महब्भयं, तवे रए सामणिए जे स भिक्खू ॥ ४७४ ॥ हत्थसंजए पायसंजए, वायसंजए संजइंदिए । अज्झप्परए सुसमाहिअप्पा, सुत्तत्यं च वियाणइ जे स.भिक्खू ॥ ४७५.॥ किंच-जो सहइत्ति, यः खल महात्मा सहते सम्यग्ग्रामकण्टकान् प्रामा-इन्द्रियाणि तदुःखहेतवः कण्टकास्तान, स्वरूपता एवाह-आक्रोशान् प्रहारान्तर्जनांश्चेति, तत्राक्रोशा यकारादिमिः, महाराः कशादिभिः, तर्जना अम्पादिमिः, । तथा। भैरवमया-अत्यन्तरौद्रमयजनकाः शन्दा समहासा यस्मिन् स्थान इति गम्यते, तत्तथा तस्मिन्, वैतालादि- कृतार्चनादाट्टहास इत्यर्थः, अत्रोपसर्गेषु सरसु समसुखदुःखसहश्च योऽचलितसामायिकमावस भिक्षुरिति ।। ४७१ ॥

छिदित्तुजाईमरणस्स बंधणं, उवेइ भिक्खू अपुणागमं गई। ४८१ ॥तिवेमि ।। सभिक्खुअज्झयणं दसमं समत्तं १०॥ तथा उवहिंमित्ति, उपधौ-वस्त्रादिलक्षणे अमूच्छितः-तद्विपयमोहत्यागेन अगृद्धः-प्रतिवन्धामावेन, अज्ञातोज्छ चरति भावपरिशुद्ध, स्तोकं स्तोकमित्यर्थः पुलाकनिष्पुलाफा-संयमासारतापादकदोपरहितः, क्रयविक्रयसंनिधिभ्यो विरता-द्रव्यभावभेदभिन्नक्रयविक्रयपर्युषितस्थापनेभ्यो निवृत्तः, सर्वसङ्गापगतश्च योऽपगतद्रव्यमावसङ्गश्च यः, समिक्षु- रिति ॥ ४७६ ॥ किंच-अलोलेति, अलोलो नाम नाप्राप्तप्रार्थनापरो भिक्षुः-साधुन रसेषु गृद्धः, प्राप्तेष्वपि'अप्रतिबद्ध इति मावा, उज्छं चरति भावोञ्छमेवेति पूर्ववत् । नवरं तत्रोपधिमाश्रित्योक्तमिह त्वाहारमित्यपौनरुत्यं । तथा जीवित नाभिकाजते असंयमजीवितं, तथा ऋद्धिं च-आमपापध्यादिरूपा, सत्कार-वस्रादिभिः, पूजनं च-स्तवादिना त्यजति नैतदर्थ एवं यतते स्थितात्मा ज्ञानादिषु, अनिभ इत्यमायो यः स भिक्षुरिति ॥ ४७७ ॥ तथा न परमिति, न परं स्वपक्षविनयव्यतिरिक्तं वदति-अयं कुशीलस्तदप्रीत्यादिदोपप्रसङ्गाद , स्वपक्षविनेयं तु शिक्षाग्रहणवुझ्या वदत्यपि, सर्वथा येनान्यः कश्चित्कुप्यति न तद्ब्रवीति दोपसद्भावेऽपि, किमित्यत आह-ज्ञात्वा प्रत्येकं पुण्यपापं, नान्यसम्बन्धि अन्यस्य भवति अग्निदाहवेदनावद , एवं सत्स्वपि गुणेषु नात्मानं समुत्कर्षति-न स्वगुणैर्गर्वमायाति या स'भिक्षुरिति ॥ ४७८ ॥ मदप्रतिषेधार्थमाह-न जाइमत्तेति, न जातिमत्तो यथाऽहं ब्राह्मणः क्षत्रियो वा, न चापि रूपमत्तो यथाऽहं उवहिम्मि अमुच्छिए अगिद्धे, अन्नायउञ्छ पुलनिप्पुलाए । कयविकायसन्निहिओ विरए, सबसंगावगए य जे स भिक्खू ॥ ४७६ ॥ अलोल भिक्खू न रसेसु गिउझे, उञ्छं चरे जीविय नाभिक । इदि च सकारणपूयणं च, चए ठियप्पा अणिहे जे स भिक्खू ॥ ४७७ ॥ न परं वइजासि अयं कुसीले, जेणऽन्न कुप्पेज न तं वएज्जा । जाणिय पचेयं पुण्णावं, अचाणं न समुक्कसे जे स भिक्खू ॥ ४७८ ॥ न जाइमत्ते न य रुवमत्ते, न लाभमत्ते न सुएण मत्ते । मयाणि सवाणि विवज्जइत्ता, धम्मज्झाणरए जे स भिक्खू ।। ४७९ ।। पवेयए अन्नपयं महामुणी, धम्मे ठिओ ठावयई परं पि । निक्खम्म वजेज कुसीललिझं, न यावि हासंकुहए जे स भिक्खू ॥ ४८० ॥ तं देहवासं असुई असासयं, सया चए निञ्चहियट्टियप्पा ।

छिंदित्तु जाईमरणस्त बंधणं, उवेइ भिक्खू अपुणागमं गई। ४८१ ॥ तिमि ॥ सभिक्खुअज्झयणं दसमं समत्तं १० ॥ तथा उवहिंमित्ति, उपधौ-वस्त्रादिलक्षणे अमूच्छितः-तद्विषयमोहत्यागेन अगृद्धः-प्रतिबन्धाभावेन, अज्ञातोञ्छं चरति भावपरिशुद्धं, स्तोकं स्तोकमित्यर्थः पुलाकनिष्पुलाका-संयमासारतापादकदोषरहितः, क्रयविक्रयसंनिधिभ्यो विरत: द्रव्यमावभेदभिन्नक्रयविक्रयपर्युपितस्थापनेभ्यो निवृत्तः, सर्वसङ्गापगतश्च योऽपगतद्रव्यभावसङ्गच यः, स भिक्षु. रिति ॥ ४७६ ॥ किंच-अलोलेति, अलोलो नाम नाप्राप्तप्रार्थनापरो भिक्षु:-साधुन रसेषु गृद्धः, प्राप्तेष्वपि 'अप्रतिबद्ध इति भावा, उञ्छं चरति भावोञ्छमेवेति पूर्ववत् । नवरं तत्रोपधिमाश्रित्योक्तमिह त्वाहारमित्यपौनरुच्यं । तथा जीवित नाभिकासते असंयमजीवितं, तथा ऋद्धिं च-आमपीपघ्यादिरूपां, सत्कार-वस्रादिभिः, पूजनं च-स्तवादिना त्यजति नैतदर्थ एवं यतते; स्थितात्मा ज्ञानादिषु, अनिभ इत्यमायो यः स भिक्षुरिति ।। ४७७ ॥ तथा न परमिति, न परं स्वपक्षविनेयव्यतिरिक्तं वदति-अयं कुशीलस्तदप्रीत्यादिदोपप्रसङ्गात् , स्वपक्षविनेयं तु शिक्षाग्रहणवुझ्या वदत्यपि, सर्वथा येनान्यः कश्चित्कुप्यति न तद्ब्रवीति दोपसद्भावेऽपि, किमित्यत आह-ज्ञात्वा प्रत्येकं पुण्यपापं, नान्यसम्बन्धि अन्यस भवति अग्निदाहवेदनावद, एवं सत्स्वपि गुणेषु नात्मानं समुत्कर्षति-न स्वगुणैर्गर्वमायाति यः स भिक्षुरिवि ॥ ४७८ ॥ मदप्रतिषेधार्थमाह-न जाइमत्तेति, न जातिमत्तो यथाऽहं ब्राह्मणः क्षत्रियो वा, न चापि रूपमत्तो यथाऽहं रूपवान, आदेपः,न लाभमत्तो यथाऽहं लामा, न श्रुतमत्तो यथाऽहं पण्डिता, अनेन कुलमदादिपरिग्रहः, अत एवाह- मदान् सर्वानपि कुलादिविषयान्विवर्य-परित्यज्य धर्मध्यानरतो-यो यथागमं तत्र सक्तः स भिक्षुरिति ॥ ४७९ ॥ किंच-पवेपए इत्यादि, प्रवेदयति-कथयत्पार्यपदं-शुद्धधर्मपदं परोपकाराय महामुनिः शीलवान ज्ञाता एवंभूत एव वस्तुतो नान्यः, किमित्येतदेवमित्याह-धम्में स्थितः स्थापयति परमपि-श्रोतार, तत्रादेयभावप्रवृत्तेः, तथा निष्कम्य घर्जपति फुशीललिंग-भारम्मादि कुशीलचेष्टितं, तथा न चापि हास्यकुहको-न हास्यकारिकृहकयुक्तो यः स भिक्षुरिति ॥ १८० ॥ भिक्षुमावफलमाह-तं देहेति, तं देहवासमित्येवं प्रत्यक्षोपलम्यमानं चारकरूपं शरीरावासमशुचिं शुक्रशोणितोद्भवत्वादिना, अशाश्वतं प्रतिक्षणपरिणत्या सदा त्यजति ममत्वानुबन्धपरित्यागेन, क इत्याह-नित्यहिते- मोक्षसाधने सम्यग्दर्शनादौ स्थितात्मा-अत्यन्तमुस्थिता, स चैवंभूतश्छिवा जातिमरणस्य संसारस्य पन्धनं-कारण- मुपैति-सामीप्येन गच्छवि भिक्षुा-यतिरपुनरागमा नियां जन्मादिरहितामित्यर्थः, गतिमिति-सिद्धिगतिम् ॥ ४८१ ॥ प्रवीमीति पूर्ववत् ॥ इति व्याख्यातं सभिश्वध्ययनम् १०॥ अधुनौषतण्डे आरम्येते, अनयोश्वायममिसम्बन्ध इहानन्तराध्ययने मिक्षुगुणयुक्त एव भिक्षुरुक्ता, स चैवंभूतोऽपि कदाचि- स्कर्मपरतन्त्रत्वात् कर्मणय फलपश्चात् सीदेव, अतस्तत्स्थिरीकरण कर्तव्यमिति, तदर्थाधिकार एव चूडाद्वयमभिधीयते, तच्चेदं- इह खल्लु भो ! पवइएणं उप्पन्नदुक्खेणं संजमे अरइसमावन्नचित्तेणं ओहाणुप्पेहिणा अणोहाइएणं चेव हयरस्सिगयंकुसपोयपडागाभूआई इमाइं अट्ठारस ठाणाई सम्मं संपडिलहि- अबाई भवंति, तंजहा-हंभो ! दुस्समाए दुप्पजीवी १, लहुसगा इत्तरिआ गिहीणं कामभोगा २, भुज्जो अ साइबहुला मणुस्सा ३, इमे अ मे दुक्खे न चिरकालोवट्ठाई भविस्सई ४, ओम- जणपुरकारे ५, वंतस्स य पडिआयणं ६, अहरगइवासोवसंपया ७, दुल्लहे खलु भो! गिहीणं धम्मे गिहवासमझे वसंताणं ८, आयंके से वहाय होइ ९, संकप्पे से वहाय होइ १०, सोवक्केसे गिहवासे, निरुवक्केसे परिआए ११, बंधे गिहवासे मुक्खे परिआए १२, सावज्जे गिहवासे, अणवज्जे परिआए १३, बहुसाहारणा गिहीणं कामभोगा १४, पत्तेअं पुन्नपावं १५, अणिच्चे खलु भो ! मणुस्साणं जीविए कुसग्गजलबिंदुचंचले १६, बहुं च खल्लु भो ! पावं कम्मं पगडं १७, पावाणं च खलु भो! कडाणं कम्माणं पुर्वि दुच्चिन्नाणं दुप्पडिकंताणं वेइत्ता मुक्खो, नस्थि अवेइत्ता, तवसा वा झोसइत्ता १८ । अट्ठारसमं पयं भवइ । सू० २१ । भवइ अ इत्थ सिलोगो- इह खलु भो पव्वेति, इह खलु भो प्रव्रजितेन इहेति जिनप्रवचने, खलुशब्दोऽवधारणे, स च भिन्नक्रम इति दर्शयिष्यामा, भो इत्यामन्त्रणे, प्रजितेन-माधुना, किंविशिष्टेनेत्याह-उत्पन्नदुःखेन-सातशीतादिशारीरधीनिए. धादिमानसःखेन संयमे-ध्यावणितस्वरूपे अरतिसमापनवितेनोद्वेगगताभिप्रायेण संयमनिर्विष्णमावेनेत्यर्थः, स एच विशेष्यते-अवधावनोत्प्रेक्षिणा-अवधावनं-अपसरणं संयमादुत्-प्राबल्येन प्रेक्षितुं शीलं यस्य स तथाविधस्तेन, उता. वजितुकामेनेति मावः, अनवधावितेनैव-अनुत्लवजितेनैवामूनि वक्ष्यमाणलक्षणान्पष्टादश स्थानानि सम्यग-मार. सारं सुभत्युपेक्षितव्यानि-सुप्वालोचनीयानि भवन्तीति योगः, अवधावितस्य तु प्रत्युपेक्षणं प्रायोऽनर्थकमिति, तान्येव विशेष्यन्ते-हपरहिमगजाङ्कुशपोतपताकाभूतानि-अवखलिनगजाहनषोहिस्थसिउपरतुस्पानि, एतदुक्तं भवति-यथा हयादीनामुन्मार्गप्रवृचिकामानां सम्पादयो नियमनहेतवः तथा एवान्यपि संयमादुन्मार्गप्रतिकामानां मव्यसत्वाना- मिति, यतश्चैवमतः मम्यक प्रत्युपेक्षितव्यानि भवन्ति, खलुशन्दोऽवधारणे, योगात् सम्यगेव संप्रत्यपेक्षितव्यानि एवेत्यर्थः। तथेत्यादि-तयधेत्युदाहरणोपन्यासार्थः, हंभो । दुःपमायां दुष्पजीविन इति, ईमो-शिष्यामन्त्रणे, दुप्पमापां- अधमकालाख्यायां कालदोपादेव दुग्वेन-इच्छेण प्रकर्षणोदारमोगापेक्षया जीवितुं शीला दुपजीविना, प्राणिन इति गम्यते, नरेन्द्रादीनां अपि अनेकदुःखप्रयोगदर्शनात् , उदारमोगरहितेन च विडम्बनाप्रायेण कुगविहेतुना किं गृहाश्रमेणेति मंप्रत्युपेक्षितव्यमिति प्रथम स्थानम् १ । तथा लघव इत्वरा गृहिणां कामभोगाः, दुष्पमायामिति वर्तते, सन्तोऽपि । लघवा-तुच्छा। प्रकृत्यैव तुपमुष्टिवदसाराः इत्वरा-अल्पकाला गृहिणा-गृहस्थानों कामभोगा:-मदनकामप्रधानाः शब्दादयो विषया विपाककटक्य, न देवानामिव विपरीताः, अता कि गृहाश्रमेणेति संप्रत्युपेक्षितव्यमिति द्वितीय 9 स्थानम् २ । तथा भूयश्च स्वातियहुला मनुष्याः दुष्पमायामिति वर्त्तते एव, पुनश्च स्वातियहुला मायाप्रचुरा मनुष्या इति प्राणिनो, न कदाचित् विश्रम्भहेतवोऽमी, तद्रहितानां च कीदृक् सुखं ?, तथा तद्वन्धहेतुत्वेन दारुणतरो बन्ध इति किं गृहाश्रमेणेति, संप्रत्युपेक्षितव्यमिति तृतीय स्थानम् ३ । पाठान्तरं वा तथा-भूयश्च सातबहुला मनुष्याः, भुक्तेष्वपि काममोगेषु पुनरपि सुखाभिलापिण एव मनुष्याः, अतः किं काममोगैः ? इति संप्रत्युपेक्षितव्यमिति तृतीयं स्थानम् ३ । तथा इदं च मे दुःखं न चिरकालोपस्थायि भविष्यति, इदं चानुभ्यमानं मम श्रामण्यमनुपालयतो दुःखं शारीरमानसं कर्मफलं परीपहजनितं न चिरकालमुपस्थातुं शीलं भविष्यति, श्रामण्यपालनेन परीपहनिराकृतेः कर्मनिर्भरणात्, संयमराज्यप्राप्तेः, इतरथा महानरकादौ विपर्ययः, अतः किं गृहाश्रमेणेति संप्रत्युपेक्षितव्यमिति चतुर्थ स्थानम् ४ । तथा ओमजणपुरस्कारमिति न्यूनजनपूजा, प्रबजितो हि धर्मप्रभावाद्राजामात्यादिभिरभ्युत्थानासनाञ्जलि- प्रग्रहादिभिः पूज्यते, उत्प्रव्रजितेन तु न्यूनजनस्यापि स्वव्यसनगुप्तयेऽभ्युत्थानादि कार्य, अधार्मिकराजविषये च वेष्टिप्रयोक्त: खरकर्मणो नियमत एवेदमधर्मफलं, अतः किं गृहाश्रमेणेति संप्रत्युपेक्षितव्यमिति पञ्चमं स्थानं, एवं सर्वत्र क्रिया योजनीया ५। तथा वान्तस्य प्रत्यापानं भुक्तोज्झितपरिभोग इत्यर्थः, अयं च श्वशृगालादिक्षुद्रसत्चाचरितः सतां निन्द्यो व्याधिदुःख- जनका, वान्ताच भोगाः प्रव्रज्याङ्गीकरणेन, एतत्प्रत्यापानमप्येवंभूतमेव चिन्तनीयमिति पष्ठं स्थानम् ६ । नया अधोगति:- नरकतिर्यग्गतिस्तस्यां वसनं अधोगतिवासः, एतन्निमित्तभूतं कर्म गृह्यते, तस्योपसंपत्-सामीप्नागीकरणं यदेतदुत्म वजनं, एवं चिन्तनीयमिति सप्तमं स्थानम् ७। तथा दुर्लभः खलु भो' गृहिणां धर्म इति प्रमादबहुललाद् दुर्लभ एव, - 12 म मो! इत्यामन्त्रणे गृहस्थानां परमनिचिजनको धर्मा, किंविशिष्टानामित्याह-गृहवासमध्ये वसतामित्यत्र गृहसन्देन पाश- कल्पाः पुत्रकलादयो गृहन्ते, तन्मध्ये वसतामनादिभवाम्यासादकारणं स्नेहबन्धन, एतचिन्वनीयमित्यष्टम स्थानम् ८।। तथा आतङ्कस्तस्य पधाय भवति, आतडका-सयोपाती विशूचिकादिरोगासे-तस्य गृहिणो धर्मबन्धुरहितस्य पधाय- विनाशाय भवति, तथा यघवानेकवघहेतुः, एवं चिन्तनीयमिति नवमं स्थानम् ९ । तथा संकल्पः तस्य यधाय भवति, संकल्प:-इष्टानिष्टप्रयोगसंप्रयोगप्राप्तिजो मानस आतक्षस्तस्प गृहिणा, तथा चेष्टायोगान मिथ्याविकल्पाम्या- सेन महादिप्राप्तेर्वधाय मवति इत्येतचिन्तनीयमिति दशम स्थानम् १० । तथा सोपलेशो गृहयास इति सहोपलेशैः सोपक्लेशो गृहिवासो-गृहाश्रमः, उपक्लेशा:-कपिपाशुपारयवाणिज्यायनुष्ठानानुगताः पण्डितजनगर्हिताः शीतोष्णथमादया, घृतलवणचिन्तादयश्वेत्येवं चिन्तनीयमित्येकादशं स्थानं ११। तथा निरुपलेशः पर्याय इति, एमिरेवोपक्लेश रहितः प्रमज्यापर्यायः, अनारमी कुचिन्तापरिवर्जितः लापनीयो विदुपामित्येवं चिन्तनीयमिति द्वादशं स्थानं १२ । तथा पन्धो गृहषासः सदा तद्धत्वनुष्ठानात् , कोशकारकीटकवत् इत्येतचिन्तनीयं इति प्रयोदशं स्थानं १३ । वथा मोक्षः पर्या- योऽनवरतं कर्मनिगडविगमान्मुक्तवदित्येवं चिन्तनीयमिति चतुर्दशं स्थानं १४ । अत एव सायद्यो गृहयास इति सावधः-सपापः प्राणातिपातमृपावादादिप्रवृत्तेरित्येतचिन्तनीयमिति पञ्चदशं स्थानम् १५ । एवमनवद्या पर्याय इत्यपाप इत्यर्थः, अहिंसादिपालनात्मकत्वादेतचिन्तनीयमिति पोडशं स्थानम् १६ । तया पहुसाधारणा गृहिणां कामभोगा इति, बहुसाधारणा:-चौरराजकुलादिसामान्या गृहिणा-गृहस्थानो काममोगाः पूर्ववत्, एतचिन्तनीयमिति सप्तदर्श स्थानम् १७१ तथा प्रत्येकं पुण्यपापमिति, मातापितकलवादिनिमिचमप्यनुष्ठितं पुण्यपापं प्रत्येक प्रत्येक-पृथक पृथह येनानु- ष्ठितं तस्य कर्तुरेवैतदिति भावार्थः । एवमष्टादशं स्थानम् १८ । एतदन्तर्गतो वृद्धाभिमायेण शेषग्रन्यः समस्तोत्र, अन्ये तु व्याचक्षते-सोपक्केशो गृहिवास इत्यादिषु पट्सु स्थानेषु सप्रतिपदेपु स्थानत्रयं गृहाते, एवं न बहुसाधारणा गृहिणी कामभोगा इति चतुर्दशं स्थानं, प्रत्येकं पुण्यपापमिति पशदशमं स्थानं, शेषापयभिधीपन्ने, तयाऽनित्यं नल्पित्यनि. त्यमेव नियमतो भो' इत्यामन्त्रणे मनुष्याणां-पुंसां जीवितमायुः, एतदेव विशेष्यते-कुशाग्रजलविन्दुनालं सोपक्रम- त्वादनेकोपद्रवविषयत्वादत्यन्तासारं, वदलं गृहाश्रमेणेवि संप्रत्युपेक्षितव्यमिति पोडगं स्थान १६ १ गया पहुं च खलु भो! पापं कर्म प्रकृतं बहु च चशब्दात् लिष्टं च खलुशन्दोऽवधारणे, पदं च पापकर्म नारितमोहनीपादि, प्रकन-निनित मति गम्यते, श्रामण्यप्राप्तावप्येवं क्षुद्रबुद्धिप्रपत्तेः, नहि प्रभूतलिष्टकभरदिनानामेवमाला चुदिमाति, अनो न किभिड्दा- श्रमेणेति संप्रत्युपेक्षितव्यमिति सप्तदशं स्थानं १७ । पावाणं चेत्यादि, पापाना ग-अपुण्यापापो नगन्दागुण्यल्पानां न, खलु भोः कृतानां कर्मणां, खलशब्दः कारितानुमनविशेषणाः, मो इति शिष्यामन्त्रो, कनाना-नोशारयोरोपतो निर्चितानां कर्मणां-ज्ञानावरणीपाद्यसातावेदनीयादीनां प्राप्-पूर्वमन्यजन्मसु चुशारितानां-प्रमादकपारमारित- जनितानि, दुरितानि कारणे कार्योपचारान् , दुअरिनहेनि या दुरितानि, हा कारगोपनासद, एवं गुम्परामानानां- मिथ्यादर्शनाविरनिजदुप्पराक्रान्तजनितानि दुम्पराकान्तानि, देतो फलोपगारात, दपराकाननि ना दुपराकालानि, कले हेतूपचाराद , इह च दुअरितानि मद्यपानालीलानृनमापणादीनि, गुणराकान्नानि मन्ननादीनि, नदीप एन.

भूतानां कर्मणां वेदयित्वाऽनुभूय, फलमिति वाक्यशेषः, किं ?, मोक्षो भवति-प्रधानपुरुषार्थो मवति, नास्त्यवेद-
पित्या-न मवति अननुभूय, अनेन सफर्मकमोशव्यवच्छेदमाइ-इप्यते च स्वल्पकमोपेतानां कैश्चित्सहकारिनिरोपतस्तत्फला-
दानयादिभिस्तत्, तदपि नास्त्यवेदयित्वा मोक्षः, तथारूपत्वात् कर्मणा, स्वफलादाने फर्मत्वायोगात्, तपसा था
क्षपयित्या-अनशनप्रायश्चित्तादिना या विशिष्टक्षायोपशमिकशुममावरूपेण तपसा प्रलयं नीत्या, इह च वेदनमुदयप्राप्तस्य
पारिषानारधोपक्रमस्य क्रमशा, अन्यानिधन्धनपरिक्लेशेन, तपाक्षपणं तु सम्पगुपक्रमेणानुदीर्णोदीरणदोपक्षपणवत्.,
अन्यनिमितपक्रमेणापरिक्लेशमित्यतस्तपोऽनुष्ठानमेव श्रेय इति, न किनिहायमेणेति संप्रत्युपेक्षितव्यमित्यष्टादशं पदें
भवति-अष्टादशं स्थानं भवति १८ । २१ । भवति पात्र लोका, अति अष्टादशस्थानार्थव्यतिकरे, उक्तानुक्तार्थसंग्रहपर
इस्यया, लोक इति च जातिपरो निर्देशा, सतब श्लोकजातिरनेकमेवा भक्तीति प्रभूत-श्लोकोपन्यासेऽपि न विरोधः-
जया य चयई धम्मं, अणजो भोगकारणा । से तत्य मुच्छिए वाले, आयइं नावबुज्झइ ॥४८२॥
जया ओहाविओ होइ, इंदो वा पडिओ छमं। सबधम्मपरिन्भट्ठो, स पच्छा परितप्पइ ॥ ४८३ ॥
जया अवैदिमो होइ, पच्छा होइ अवंदिमो । देवया व चुआ ठाणा, स पच्छा परितप्पइ ॥४८॥
जया अ पूइमो होइ, पच्छा होइ अपूइमो । राया व रजपन्भट्ठो, स पच्छा परितप्पइ ॥ ४८५॥
जया अ माणिमो होइ, पच्छा होइ अमाणिमो। सिहि छ कब्बडे छूढो,'सपच्छा परितप्प३ ॥४८॥

जया अ थेरओ होई, समइक्कंतजुर्वणो । मच्छुत्व गले गिलित्ता, ‘स पच्छा परितप्पइ ॥ ४८७ ॥ जया अ कुकुडुबस्स, कुतत्तीहिँ विहम्मइ । हत्थी व वंधणे बद्धो, स पच्छा परितप्पइ ॥ ४८८ ॥ पुत्तदारपरीकिन्नो, मोहसताणसंतओ। पंकोसन्नों जहा नागो, स पच्छा परितप्पइ ॥ ४८९ ॥ जया येति-यदा चैवमष्टादशसु व्यावर्त्तनकारणेषु सत्स्वपि जहाति-त्यजति धर्म-चारित्रलक्षणं, अनार्य इत्यनार्य इवा- नोर्यो-म्लेच्छचेष्टितः, किमर्थमित्याह-भोगकारणात्-शब्दादिभोगनिमित्तं स-धर्मत्यागी, तत्र-तेपु भोगेषु मूच्छितो- गृद्धो वालोऽज्ञः, आयंति-आगामिकालं नावबुध्यते-न सम्यगवंगच्छतीति ॥ ४८२ ॥ एतदेव दर्शयति-जया उत्ति, यदाऽवर्धावितोऽपसतो भवति संयमसुखविभूतेः, उत्प्रबजित इत्यर्थः, इन्द्रो वेति-देवराज इव पतितः क्षमा-क्ष्मां गतः, स्वविभवभ्रंशेन भूमौ पतित इतिभावः, क्षमा-भूमिः, सर्वधर्मपरिभ्रष्टः-सर्वधर्मेभ्यः-क्षान्त्यादिभ्यः आसेवितेभ्योऽपि यावत्प्रतिज्ञमननुपालनात् लौकिकेभ्योऽपि वा गौरवादिभ्यः परिभ्रष्टः-सर्वतश्युतः, स पतितो भूत्वा पश्चान्मनागू मोहावसाने परितप्यते, किमिदमकार्य मयानुष्ठितमित्यनुतापं करोंतीति ।। ४८३ ॥ जया येति, यदा च वन्द्यो भवति श्रमणपर्यायस्थो नरेन्द्रादीनां पश्चाद्भवति उन्निष्क्रान्तः सन्नवन्धः तदा देवता इव कांचिदिन्द्रयर्जा स्थानच्युता सती स पश्चात्परि- तप्यते इति एतत्पूर्ववदेवेति ॥ ४८४ ।। जया वेति, यदा च पूज्यो भवति वस्त्रपात्रादिमिः श्रामण्यसामर्थ्याल्लोकानां पश्चाद्भवत्युत्मवजितोऽपूज्यों लोकानांमेव तदा राजेव राज्यपदभ्रष्टो महतो भोगांद्वियुक्तः (विप्रमुक्तः) स पश्चात्प- TISGAR रितप्यत एवेति पूर्ववदेवेति ॥ ४८५॥ तथा जया पेति, यदा च मान्यो भवति अभ्युत्थानाज्ञाकरणादिना माननीप: शीलप्रमावेण पथाद्भवत्यमान्यस्तत्परित्यागेन, तदा श्रेष्ठीव कर्यटे-महाक्षुद्रसन्निवेशे क्षिप्तोऽमात्या सत्परितप्यत, इति, एतत्समानं पूर्वेणेति ॥ ४८६ ॥ जया येति, यदा च स्थविरो भवति स त्यक्तसंयमो वयापरिणामेन, एतद्विशेष- प्रदर्शनायाह-समतिकान्तयौवना, एकान्तस्थपिर इतिभावः, तदा विपाककटुकवादोगानां मत्स्य इव गलं-बडिशं गिलित्वाऽभिगृह तथाविधकर्मलोहकण्टकविद्धः सन् स पश्चात्परितप्यत इत्येतदपि समानं पूर्वेणेति ॥ ४८७॥ एतदेव स्पष्टयति-जया यकुकुडंपस्सेत्यादि, कुक्कुटुम्बस्य-कुत्सितकुटुम्बस्य कुतप्तिभिः कृत्सितचिन्ताभिरात्मनः संतापकारिणी- मिहिन्यते-विषयमोगान् प्रति विघातं नीयते तदा स मुक्कसंयमा सन् परितप्यते पश्चात् , क इव १-यथा हस्ती कुटुम्बवन्धनबद्धः परितप्पते ।। ४८८ ॥ एतदेव स्पष्टयति-पुत्रदारेति, पुत्रदारपरिकीर्णो-विषयसेवनात्पुत्रकलत्रादिमिः सर्वतो विक्षिप्तो मोहसन्तानसन्ततो-दर्शनादिमोहनीयकर्मप्रवाहेण व्याप्तः, क इव-पडायसन्नो यथा नाग:-कर्दमाव- मनो वनगज इव स पश्चात्परितप्यते-हा! हा! किं मयेदं असमञ्जसमनुष्ठितमिति ।। ४८९ ॥ अज आहे गणी हुँतो, भाविअप्पा बहुस्सुओ।जइऽहं रमंतो परिआए, सामन्ने जिणदेसिए ॥४९०॥ देवलोगसमाणो अ, परिआओ महेसिणं । रयाणं अरयाणं च, महानरयसारिसो ॥ ४९१ ॥ अमरोवर्म जाणिअ सुक्खमुत्तम, रयाण परिआइ तहाऽरयाणं ।

निरओवमं जाणिअ दुक्खमुत्तमं, रमिज तम्हा परिआइ पंडिए ॥ ४९२ ।। धम्माउ भटुं सिरिओ अवेयं, जन्नग्गिविज्झामिवऽप्पते। हीलंति णं दुविहिअं कुसीला, दाढहि घोरविसं व नागं ॥ ४९३ ॥ इहेवऽधम्मो अयसो अकित्ती, दुन्नामधिज्जं च पिहुजणंमि । चुअस्स धम्माउ अहम्मसेविणो, संभिन्नवित्तस्स य हिट्ठओ गई ॥ ४९४ ॥ भुंजित्तु भोगाई पसज्झचेअसा, तहाविहं कटु असंजमं बहुं । गई च गच्छे अणभिज्झिअं दुहं, बोही अ से नो सुलहा पुणो पुणो ॥ ४९५॥ कश्चित् सचेतनो नर एवं च परितप्यत इत्याह-अज्जत्ति, अद्य तावदह-अद्य-अस्मिन् दिवसेऽहमित्यात्मनिर्देशे, गणी स्या-आचार्यो भवेयं, भावितात्मा-प्रशस्तआगम(योग)भावनाभिः, बहुश्रुत-उभयलोकहितयहागमयुक्तः, यदि किं स्यादित्याह-यदि अहमरमिष्यं-रतिमकरिष्यं, पर्याये-प्रव्रज्यारूपे, सोऽनेकभेद इत्याह-श्रामण्ये-श्रमणानां सम्बन्धिनि, सोऽपि शाक्यादिभेदभिन्न इत्याह-जिनदेशिते-निर्ग्रन्थसम्बन्धिनीति ॥ ४९० ॥ अवधानोत्प्रेक्षिणः स्थिरीकरणार्थमाह-देवलोकसमाणोत्ति, देवलोकसमानस्तु-देवलोकसदृश एव पर्याय:-प्रवज्यारूपो महर्षीणां- १८ रितप्यत एवेति पूर्ववदेवेति ॥ ४८५॥ तथा जया पेति, यवा घ मान्यो भवति अभ्युत्थानाज्ञाकरणादिना माननीयः शीलप्रभावेण पश्चागवत्यमान्यस्तत्परित्यागेन, तदा श्रेष्ठीव कर्यटे-महाक्षुद्रसग्निवेशे क्षिप्तोऽमात्यः सत्परितप्यत, इति, एतत्समान पूर्वेणेति ॥ ४८६ ।। जया येति, यवा च स्थविरो भवति स त्यक्तसंयमो वयःपरिणामेन, एतद्विशेष- प्रदर्शनायाह-समतिकान्तयौवना, एकान्तस्थविर इतिभावः, तदा विपाफकटुकवादोगानां मत्स्य इव गलं-वदिश गिलित्वाऽमिगृह तथाविधकर्मलोहकण्टकविद्धः सन् स पश्चात्परितप्यत इत्येतदपि समानं पूर्वेणेति ॥ ४८७॥ एतदेव स्पष्टयति-जया य फुकुटुंयस्सेत्यादि, कुक्कुटुम्बस्य-कुत्सितकुटुम्बस्य कृतप्तिमिः-कुत्सितचिन्ताभिरात्मनः संतापकारिणी. मिहिन्यते-विषयमोगान् प्रति विघा नीपते तदा स मुक्तसंयमः सन् परितप्यते पथात्, कब-यथा हस्ती कुटुम्बपन्धनबद्धः परितप्यते ।। ४८८ ॥ एतदेव स्पष्टयति-पुत्रदारेति, पुत्रदारपरिकीर्णो-विषयसेवनात्पुत्रफलप्रादिमिः सर्वतो विक्षिप्तो मोहसन्तानसन्ततो-दर्शनादिमोहनीपकर्मप्रवाहेण व्याप्तः, क इव-पवायसनो यथा नागा-करमाय- मनो वनगज इस स पश्चात्परितप्यते-हा! हा ! किं मयेदं असमञ्जसमनुष्ठितमिति ॥ ४८९ ।। अज्ज आहं गणी हुँतो, भाविअप्पा वहुस्सुओ। जइऽहं रमंतो परिआए, सामन्ने जिणदेसिए ॥४९०॥ देवलोगसमाणो अ, परिआओ महेसिणं । रयाणं अरयाणं च, महानरयसारिसो ॥ ४९१ ॥ अमरोवमं जाणिअ सुक्खमुत्तम, रयाण परिआइ तहाऽरयाणं ।

यदुतायशः-अपराक्रमकृतं न्यूनत्वं, तथाऽकीत्तिरदानपुण्यफलप्रवादरूपा, तथा दुर्नामधेयं च-पुराणः पतित इति
कुत्सितनामधेयं च भवति, केत्याह-पृथग्जने-सामान्यलोकेऽपि, आस्तां विशिष्टलोके, कस्येत्याह-च्युतस्य-धर्मादुत्प्रवजि-
तस्येतिभावः, तथाऽधर्मसेविन:-कलत्रादिनिमित्तं पट्कायोपमईकारिणः, तथा संभिन्नवृत्तस्य चाखण्डनीयखण्डित.
चारित्रस्य च क्लिष्टकर्मबन्धाद् अधस्ताद्गतिः-नरकेपु अवपात (पूपपात) इति ॥४९४ ॥ अस्यैव विशेषापायमाह-भुंजित्तु
ति, स-उत्प्रवजितो भुक्त्वा भोगान्-शब्दादीन् प्रसह्यचेतसा-धर्मनिरपेक्षतया प्रकटेन चित्तेन तथाविधं अज्ञोचितफलं
कृत्वाऽमिनिवासंयम कृष्याद्यारम्भरूपं बहुं-असन्तोपात्प्रभूतं स इत्थंभूतो मृतः सन् गतिं च गच्छत्यनभिध्यातां-
अभिध्याता-इष्टा न तामनिष्टामित्यर्थः, काचित्सुखाऽप्येवंभूता भवत्यत आह-दुःखां-प्रकृत्यैवासुन्दरां दुःखजननी, बोधिश्चा-
स्य जिनधर्मप्राप्तिश्चास्योनिष्क्रान्तस्य न सुलभा पुनः पुना-प्रभूतेष्वपि जन्मसु दुर्लभैव, प्रवचनविराधकत्वादिति ॥ ४९५ ।।
इमस्स ता नेरइअस्स जंतुणो, दुहोवणीअस्स किलेसवत्तिणो ।
पलिओवमं झिज्झइ सागरोवमं, किमंग पुण मज्झ इमं मणोदुहं ? ॥ ४९६ ॥
न मे चिरं दुक्खमिणं भविस्सइ, असासया भोगपिवास जंतुणो ।
न चे सरीरेण इमेणऽविस्सइ, अविस्सई जीविअपज्जवेण मे ॥ ४९७ ॥

सुसाधूना, रतानां-सक्तानां, पर्याप एवेति गम्यते, एतदुक्तं भवति, यथा देवलोके देवाः प्रेक्षणकादिव्याएता अदीनमनसः तिष्ठन्त्येवं सुसाघवोऽपि, ततोऽधिकं भावतः प्रत्युपेक्षणादिक्रियायां व्यापृताः, उपादेयविशेषत्वात्प्रत्युपेधणादेरिति देवलोकसमान एवं पर्यायो महर्षीणां रतानामिति । अरतानां च-मावतः सामाचार्यसक्तानां च, पसन्दात् विषया. मिलापिणां च मयवलिंगविडम्पकानां क्षुद्रसचानां महानरफसदृशो-रौरवादितुल्यस्तत्कारणत्वान्मानसदुःखातिरेकात् तथा विडम्बनाचेति ॥ ४९१ ।। एतदुपसंहारेणैव निगमयमाह-अमर ति, अमरोपमं उक्तन्यायादेवसदृशं ज्ञास्या- विशाय सौख्यमुत्तम-प्रधान प्रशमसौख्यं, केपामित्याह-रतानां पर्याये-सक्तानां सम्यकप्रत्युपेक्षणादिक्रियाव्याये श्रामण्ये, तथा अरतानां पर्याय एव, किमित्याइ-नरकोपम-नरकतुल्पं सात्वा दुःखमुत्तमं-प्रधान, उक्तन्यापात् , यस्मा- देवं रतारतविपाकस्तस्माद्रमेतामक्तिं कुर्यात् , केत्याह-पर्याये उक्तस्वरूपे पंडिता-शास्त्रार्थश इति ॥ ४९२ ॥ पर्याप- व्युतस्यैहिकं दोपमाह-धम्माउ इति, घरि श्रमणधर्माद्रष्टं-च्युतं, श्रियोऽपेतं-तपोलक्ष्म्या अपगतं, यज्ञाग्निमप्रिो. माधनलं विध्यातमिव यागावसानेऽल्पतेजसं, अल्पशब्दोऽभावे, तेजःशून्यं मस्मकल्पमित्यर्थी, हीलयन्ति-कदर्थयन्ति पतिवस्त्वमिति पंपपमारणादिना, एन-उग्निष्क्रान्तं दुर्विहितमुनिष्क्रमणादेव दुष्टानुष्ठापिनं फुशीलास्तरसंयोगो(सङ्गो). चिता लोकार, स एव विशेष्यते-दादुडिअंति, प्राकृतशेरयादुदृतदंष्ट्र-उत्खातदं; घोरपिपमिष-ौद्रविपमित्र नाग- सर्प, यज्ञानिसोपमानं लोकनीत्या प्रधानमावादप्रधानमात्रख्यापनार्थमिति ॥ ४९३ ॥ एवमस्प प्रष्टशीलस्यौपत ऐहिक दोपममिघापैहिकाममिकमाह-इहेवत्ति, इहैव-इहलोक एवाधर्म इति, अपमधर्मः फलेन दर्शयति-

यदुतायशा-अपराक्रमकृतं न्यूनत्वं, तथाऽकीर्तिरदानपुण्यफलप्रवादरूपा, तथा दुर्नामधेयं च-पुराणः पतित इति
कुत्सितनामधेयं च भवति, क्वेत्याह-पृथग्जने-सामान्यलोकेऽपि, आस्तां विशिष्टलोके, कस्येत्याह-च्युतस्य-धर्मादुत्वजि-
तस्येतिभावः, तथाऽधर्मसेविन:-कलत्रादिनिमित्तं पट्कायोपमईकारिणः, तथा संभिन्नवृत्तस्य चाखण्डनीयखण्डित-
चारित्रस्य च क्लिष्टकर्मवन्धाद् अधस्ताद्गतिः-नरकेषु अवपात (पूपपात) इति ॥ ४९४॥ अस्यैव विशेषापायमाह-भुंजित्तु
त्ति, स-उत्प्रव्रजितो भुत्तवा भोगान्-शब्दादीन् प्रसह्यचेतसा-धर्मनिरपेक्षतया प्रकटेन चित्तेन तथाविधं अज्ञोचितफलं
कृत्वाऽभिनिवासंयम कृष्याद्यारम्भरूपं पहुं-असन्तोपात्प्रभूतं स इत्थंभूतो मृतः सन् गतिं च गच्छत्यनभिध्यातां-
अमिध्याता-इष्टा न तामनिष्टामित्यर्थः, काचित्सुखाऽप्येवंभूता भवत्यत आह-दुःखां-प्रकृत्यैवासुन्दरां दुःखजननी, योधिश्चा-
स्य जिनधर्मप्राप्तिथास्योन्निष्क्रान्तस्य न सुलभा पुनः पुना-प्रभूतेष्वपि जन्मसु दुर्लभैव, प्रवचनविराधकत्वादिति ॥ ४९५ ॥
इमस्स ता नेरइअस्स जंतुणो, दुहोवणीअस्स किलेसवत्तिणो।
पलिओवमं झिज्झइ सागरोवर्म, किमंग पुण मज्झ इमं मणोदुहं ? ॥ ४९६ ॥
न मे चिरं दुक्खमिणं भविस्सइ, असासया भोगपिवास जंतुणो ।
न चे सरीरेण इमेणऽविस्सइ, अविस्सई जीविअपज्जवेण मे ॥ ४९७ ॥

जस्सेवमप्पा उ हविज निच्छिओ, चइज देहं न हु धम्मसासणं । तं तारिसं नो पइलंति इंदिआ, उविति(त)वाया व सुदंसणं गिरिं ॥ ४९८ ॥ इच्चव संपस्सिअ बुद्धिमं नरो, आयं उवायं विविहं विआणिआ। काएण वाया अदु माणसेणं, तियुत्तियुत्तो जिणवयणमहिद्विजासि ॥ ४९९ ॥त्ति बेमि॥ । रइवका पढमा चूला समत्ता १॥ यस्मादेवं तस्मादुत्पनदुःखोऽप्येतदनुचिन्त्य नोत्सबजेदित्याह-इमस्सेति, अस्य तावदित्यात्मनिर्देशे, नारकस्य जन्तोः नरकमनुप्राप्तस्येत्यर्थः, दुःखोपनीतस्य-सामीप्येन प्राप्तदुःखस्य, फ्लेशवृत्तरेकान्तक्लेशचेष्टितस्य सतो नरक एव पल्योपमं क्षीयते सागरोपमं च यथाकर्मप्रत्ययं, किमङ्ग पुनर्ममेदं संपमारतिनिष्पन्नं मनोदुःखं तथाविधक्केशधृति- (दोप )रहितं ?, एतत् क्षीयत एव, एतचिन्तनेन नोत्सवजितव्यमिति ॥ ४९६ ॥ विशेषेणैतदेवाह-न मेति, न मम चिरं- प्रभूतकालं दुःखमिदं-संयमारविलक्षणं भविष्यति, किमित्याह-अशाश्वती-प्रायो यौवनकालावस्थायिनी भोगपि- पासा-विषयतृष्णा, जन्तोः-प्राणिनः, अशाश्वतीत्व एव कारणान्तरमाद-न चेच्छरीरेणानेनापयास्यति-न यदि शरीरे- णानेन करणभूतेन पद्धस्यापि सतोऽपयास्यति, तथापि किमाकूलत्वं ?, यतोऽपयास्पत्ति जीवितपर्ययेण-जीवितस्य व्यप- गमेन-मरणेनैवं निश्चितः स्यादिति ॥ ४९७ ॥ अस्यैव फलमाह-जस्सेवत्ति, यस्येति-साधोरेवमुक्तेन प्रकारेणात्मा तु- तुशब्दस्यैवकारार्थत्वादात्मैव भवेनिश्चितो दृढः यः स त्यजेदेहं क्वचिद्विप्न उपस्थिते, न तु धर्मशासन-न पुनर्धर्माज्ञामिति, तंच तादृशं धर्मे निश्चितं न प्रचालयन्ति-संयमस्थानान्न प्रकम्पयन्ति इन्द्रियाणि-चक्षुरादीनि । निदर्शनमाह-उपपात- वाता इव-संपतत्पवना इव सुदर्शनं गिरि-मेरु, एतदुक्तं भवति-यथा मेलं वाता न चालयन्ति, तथा तमपीन्द्रियाणीति ॥ ४९८ ॥ उपसंहरन्नाह-इच्चेवत्ति, इत्येवमध्ययनोक्तं दुष्प्रयोगजीवित्वादि संप्रेक्ष्याऽऽदित आरम्य, यथा यदृष्ट्वा बुद्धिमान्नरः सम्यग्बुद्धयुपेत आयमुपायं विविधं विज्ञाय आय:-सम्यग्ज्ञानादेरुपायस्तत्साधनप्रकारः कालविनयादि- विविधोऽनेकप्रकारस्तं ज्ञात्वा, किमित्याह-कायेन वाचाऽथवा मनसा-त्रिभिरपि करणैर्यथाप्रवृत्तः, त्रिगुप्तिगुप्तः सन् जिनवचनमर्हदुपदेशमधितिष्ठेत् यथाशक्क्या तदुक्तकक्रियापालनपरो भूयाद् भावायसिद्धौ तच्चतो मुक्तिसिद्धेः ॥ ४९९ ॥ ब्रवीमीति पूर्ववत् ॥ समाप्तं रतिवाक्याध्ययनमिति चूला १॥ व्याख्यातं प्रथमचूडाध्ययनम् , अधुना द्वितीयमारम्यते, अस्यौषतः सम्बन्धः प्रतिपादित एव, विशेषतस्त्वनन्तरा- ध्ययने सीदतः स्थिरीकरणमुक्तं, इह तु विविक्तचर्योच्यत इत्ययममिसम्बन्धः- चूलिअं तु पवक्खामि, सुअं केवलिभासि । जं सुणित्तु सुपुण्णाणं, धम्मे उप्पजए मई ॥ ५०० ॥ अणुसोअपट्ठिअवहुजणमि, पडिसोअलद्धलक्खेणं । पडिसोअमेव अप्पा, दायवो होउकामेणं ॥ ५०१ ॥ अणुसोअसुहो लोओ, पडिसोओ आसवो सुविहिआणं । अणुसोओ संसारो, पडिसोओ तस्स उत्तारो ।। ५०२ ॥ तम्हा आयारपरकमेणं, संवरसमाहिवहुलेणं । : चरिआ गुणा अ नियमा, अ हुंति साहूण दट्ठया ॥ ५०३ ॥ चूलियंति, चूडां-प्राग्व्यावर्णितशब्दार्या तुशन्दविशेपिता भावचूडा, प्रवक्ष्यामीति-प्रकणावसरप्राप्ताभिधानलक्षणेन कथयामि, श्रुतं केवलिभापितमिति, इपं हि पूढा श्रुतं-श्रुवमानं वर्चते, कारणे कार्योपचाराद्, एतच्च केयलिभापितं- अनन्तरमेव केवलिना प्ररूपितमिति सफलं विशेषण, एवं च वृद्धवाद:-"कयाचिदार्ययाऽसहिष्णुः कुरगढुकमायः संपवयातु- मासिकादौ उपवासं कारिता, म तदाराधनया मृत एव, ऋपिघातिकाऽहमित्युदिनाऽसौ तीर्थकर पृच्छामीति गुणावर्जित- - देवतया नीता श्रीसीमन्धरस्वामिपादान्तिके, परिपृष्टो भगवान् , अदुष्टचित्ताऽघातिकेत्यभिधाय भगवतेमां चूडां ग्राहितेति," इदमेव विशेष्यते-यां श्रुत्वा-आकर्ण्य सपुण्यानां-कुशलानुवन्धिपुण्ययुक्तानां प्राणिनां, धर्मे-अचिन्त्यचिन्तामणिकल्पे चारित्रधमें उत्पद्यते मतिः-संजायते भावतः श्रद्धा, अनेन चारित्रं चारित्रवीज चोपजायत इत्येतदुक्तं भवति ॥ ५०० ।। एतद्धि प्रतिज्ञासूत्रं, इह चाध्ययने चर्यागुणा अभिधेयास्तत्प्रवृत्तौ मूलपादभूतमिदमाह-अणुसोएत्ति, अनुश्रोतःप्रस्थिते- नदीपूरप्रवाहपतितकाष्ठवद् विषयकुमार्गद्रव्यक्रियानुकूल्येन प्रवृत्ते बहुजने तथाविधाभ्यासात् प्रभूतलोके तथाप्रस्थानेनो- दधिगामिनि, किमित्याह-प्रतिश्रोतोलब्धलक्ष्येण-द्रव्यतस्तस्यामेव नद्यां कथञ्चिदेवतानियोगात् प्रतीपश्रोताप्राप्तलक्ष्येण, भावतस्तु विपयादिवैपरीत्यात्कथञ्चिदवाप्तसंयमलक्ष्येण प्रतिश्रोत एव दुरपाकरणीयमप्यपाकृत्य विषयादि संयमलक्ष्याभि- मुखमेवात्मा-जीवो दातव्यः-प्रवर्तयितव्यो भवितुकामेन-संसारसमुद्रपरिहारेण मुक्ततया मवितुकामेन साधुना, न क्षुद्रजनाचरितान्युदाहरणीकृत्यासन्मार्गप्रवणं चेतोऽपि कर्तव्यमपित्यागमैकप्रवणेनैव भवितव्यमिति, उक्तं च-"निमित्तमासाद्य यदेव किश्चन, स्वधर्ममार्ग विसृजन्ति वालिशाः । तपाश्रुतज्ञानधनास्तु साधबो, न यान्ति कृच्छ्रे परमेऽपि विक्रियाम् ॥१॥ तथा-कपालमादाय विपन्नवाससा, वरं द्विपद्वेश्मसमृद्धिरीक्षिता । विहाय लजां न तु धर्मवैशसे, सुरेन्द्रसार्थेऽपि समाहित मनः ॥ २ ॥ तथा-पापं समाचरति वीतघृणो जघन्यः, प्राप्यापदं सघृण एव विमध्यबुद्धिः। प्राणात्ययेऽपि न तु साधुजन: स्ववृत्तं, वेलां समुद्र इव लवयितुं समर्थः ॥ ३॥" इत्यलं प्रसंगेनेति ॥ ५०१ ॥ अधिकृतमेव स्पष्टयनाह-अणुसोएत्ति, अनुश्रोतःसुखो लोकः उदकनिम्नाभिसर्पणवत् प्रवृत्याऽनुकूलविषयादिसुखो लोकः, कर्मगुरुत्वात्, प्रतिश्रोत एव त- " स्माद्विपरीत आश्रवः-इन्द्रियविजयादिरूपः परमार्थपेशला कायवाड्मनोव्यापारस, आश्रमो वा-व्रतग्रहणादिरूपः सुविहि- तानां-साधूना, उभयलोके फलमाह-अनुश्रोतः संसारः शब्दादिविषयानुकूल्यं ससार एक, कारणे कार्योपचाराद, यथा "विपं मृत्यु, दधि त्रपुपी प्रत्यक्षो ज्वरः," प्रतिश्रोत उक्तलक्षणः, तस्येति पञ्चम्यर्थे पष्ठी " सुपां सुपो मवन्तीति " वचनात् । तस्मात्संसारादुत्तारः उत्तरणमुत्तारो, हेतौ फलोपचारात् , यथा-"आयुघृतं, तन्दुलान्वति पर्जन्य" इति ॥५०२।। तम्हेत्ति, । यसादेतदेवमनन्तरोदित तस्मादाचारपराकमेणेत्याचारे-बानादौ पराक्रमः-प्रवृत्तिवलं यस्य स तथाविध इति, गम- कत्याद्वहुचीहिः, तेनैवभूतेन माधुना संवरसमाधिवहुलेनेति-संवरे-इन्द्रियादिपिपये समाधिः-अनाकुलत्वं याहुलं-प्रभूतं यस्य स तथाविध इति, समास: पूर्ववत् , तेनैवंविधन मताऽप्रतिपाताय विशुद्धये च किमित्याह-वर्या-मिक्षुमावसाधनी पायाऽनियतवासादिरूपा गुणाश्व-मूलोत्तरगुणरूपाः, नियमाश्व-उत्तरगुणानामेव पिण्डविशुद्धयादीनां सकालासेवनानियोगा भवन्ति, साधूनां द्रष्टव्या इति, एते चर्यादयः साधूनां द्रष्टव्या मन्ति, सम्यग्ज्ञानासेग्नप्ररूपणारूपेणेति ।। ५०३ ॥ अनिएअवासो समुआणचारिआ, अन्नायउन्छे पड़रिकया अ । अप्पोवही कलहविवजणा य, विहारचरिआ इसिणं पसत्था ॥ ५०४ ॥ आइन्नओमाणविवजणा अ, ओसन्नदिट्ठाइडभत्तपाणे । संसट्रकप्पेण चरिज भिक्खू, तजायसंसट्ठ जई जइजा ॥ ५०५ ॥ ति अमज्जमंसासि अमच्छरीआ, अभिक्खणं निविगइं गया अ। अभिक्खणं काउस्सग्गकारी, सज्झायजोगे पयओ हविज्जा ॥ ५०६ ॥ ण पडिन्नविजा सयणासणाई, सिजं निसिज्ज तह भत्तपाणं । गामे कुले वा नगरे व देसे, ममत्तभावं न कहिंपि कुज्जा ॥ ५०७ ॥ गिहिणो वेआवडिअं न कुज्जा, अभिवायणवंदणपूअणं वा । असंकिलिट्ठोहिं समं वसिज्जा, मुणी चरित्तस्स जओ न हाणी ॥ ५०८ ॥ चर्यामाह-अनिएएति, अनियतवासो मासकल्पादिना अनिकेतवासो वा-अगृहे-उद्यानादौ वासः, तथा समुदा- नचर्या-अनेकत्र याचितभिक्षाचरणं, अज्ञातोञ्छं-विशुद्धोपकरणग्रहणविषयं, पइरिकया य-विजनैकान्तसेविता च, अल्पो- पधित्वं-अनुल्वणयुक्तस्तोकोपधिसेवित्वं, कलहविवर्जनाच-तथा तद्वासिजनभण्डनविवर्जना, विवर्जनं विवर्जना श्रवणकथा- दिनापि वर्जनमित्यर्थः । विहारचर्या-विहरणस्थितिः, विहरणमर्यादा, इयमेवंभूता ऋषीणां-साधूनां, प्रशस्ता-व्या क्षेपामावादाज्ञापालनेन भावचरणसाधनात्पवित्रेति ॥५०४ ॥ विहारचर्या ऋषीणां प्रशस्तेत्युक्तं, तद्विशेपोपदर्शनायाह-आइ- ण्णेत्ति-आकीर्णमवमानविवर्जना च विहारचर्या ऋषीणां प्रशस्तेति, तत्राकीर्ण-राजकुलसंखड्यादि, अवमानं-स्वपक्षपर- ।

पक्षप्रात्य लोकाबहुमानादि, अस्य विवर्जन, आकीण हस्तपादादिलूपणदोपात्, अवमाने अलामाधाकर्मादिदोपादिति, तथो- । सनष्टाहतं-प्राय उपलब्धमुपनीत, उत्मनशन्दः प्रायो वृत्तौ वर्चते, या "देवा उपसर्व मायं वेयर्ण वैयति", किमित्याह- भक्तपान-ओदनारकालादि, इदं चोत्समदृष्टाहतं, यत्रोपयोगः शुद्धाति, त्रिगृहान्तरादारत इत्यर्थः, "भिक्खगाही एगत्य कुणइ, पीओ अ दोसु उवजोगमिति" वचनाद्, इत्येवम्भूतमुत्सनं दृष्टाहृतं मक्तपानमृषीणां प्रशस्तमिति योगा, तथा संसृष्टः फस्पेन-हस्तमात्रकादिसंसृष्टविधिना चरेनिवरिति उपदेशः, अन्यथा पुरस्कादिदोपात्, संसृष्टमेव विशिनष्टि-तजात संमृष्ट इत्यामगोरसादिसमानजातीयसंसृष्टे हस्तमात्रकादौ यतियतेत-पत्नं कुर्याद, अतआतसंसृष्टे सैसर्जनादिदोपादिति, अने. नाष्टममधनं, तद्यथा-" संसढे हत्थे संसटे मत्ते साबसेसे दहे." इत्यादि, अत्र प्रथमो मङ्गः श्रेयान् , शेपाथ चिन्त्या इत्यादि ॥ ५०५ ।। उपदेशाधिकार एवेदमाह-अमन्नेति, अमद्यमांसाशी भवेदिति योगः, अमद्यपः अमांसाशी च स्यादेते च मद्यमांसे लोफागमप्रतीते एक, उतम पाकेचनाभिदधति-प्रारनालादिपपि संघानाद् ओदनायपि प्राण्यङ्गत्वाच्याज्यमिति, सदसत् अभीपा मयमांसत्वायोगाद, लोकशास्त्रयोरप्रसिद्धत्वात् , संधानप्राण्यगत्वतुल्यत्वचोदना त्वमाधी, अतिप्रसगदोपाद , द्रवत्तीत्वतुल्यतया भूत्रपानमावगमनादिप्रसङ्गात् इत्यलं प्रसङ्गेन । अक्षरगमनिकामाप्रक्रमा, तथा अमत्सरी च-न पासपद्धपी च स्थाव, तया अभीक्ष्णं-पुनः पुनः पुष्टकारणामा निर्विकृतिकश्च-निर्गतविकविपरिभोगच मवेद, अनेन परिमोगोचितविकृतीनामप्यकारणे प्रतिपेघमाह । तथा भीक्ष्णं गमनागमनादिपु, विकृतिपरिमोगेऽपि चान्ये किमित्याह- कायोत्सर्गकारी भवेद् ईस्थितिक्रमणमकृत्वा न किञ्चिदन्यत्र्यात् , तदशुद्धतापत्तेरितिमावः । तथा स्वाध्याययोगे-

वाचनाद्युपचारव्यापार आचाम्लादौ प्रयतोऽतिशययत्नवान्मवेत्तथैव तस्य सफलत्वात् , विपर्यये उन्मादादिदोपप्रसङ्गादिति
॥५०६ ॥ किंच-न पडिण्णवेजत्ति, न प्रतिज्ञापयेन्मासादिकल्पपरिसमाप्तौ गच्छन् भ्योऽप्यागतस्य ममैवैतानि दात-
व्यानीति न प्रतिज्ञा कारयेद् गृहस्थं, किमाश्रित्येत्याह-शयनासने शय्यां निषद्यां तथा भक्तपानमिति, तत्र शयनं-
संस्तारकादि, आसनं-पीठकादि, शय्या-वसतिः, निषया-स्वाध्यायादिभूमिः, तथा-तेन प्रकारेण तत्कालावस्थानोचितेन
भक्तपानं-खण्डखाद्यकद्राक्षापानकादिन प्रतिज्ञापयेत् ,ममत्वदोपात् , सर्वत्र एतन्निषेधमाह-ग्रामे-शालिग्रामादौ, कुले वा-
श्रावककुलादौ, नगरे-साकेतादौ, देशे वा-मध्यदेशादौ ममत्वभावं ममेदमिति, स्नेहमोहं न कचिदुपकरणादिष्वपि कुर्यात्
तन्मूलत्वाद् दुःखादीनामिति ॥ ५०७ ।। उपदेशाधिकार एवाह-गिहिणोत्ति, गृहिणो-गृहस्थस्य वैयावृत्त्य-गृहिमावो-
पकाराय तत्कर्मस्वात्मनो व्यावृत्तभावं न कुर्यात् , स्वपरोभयाश्रेयासमायोजनदोपात्, तथाऽभिवादन-वाङ्नमस्काररूपं,
वन्दनं-कायप्रणामलक्षणं, पूजनं च-वस्त्रादिभिः समभ्यर्चनं वा, गृहिणो न कुर्यादुक्तदोपप्रसङ्गादेव, तथैतदोपपरिहारायैव अ-
संक्लिष्टैः-गृहिवैयावृत्यादिकरणसंक्लेशरहितैः साधुभिः समं वसेन्मुनिश्चारित्रस्य-मूलगुणादिलक्षणस्य यतो-येभ्यः साधु-
भ्यः सकाशान हानिः, संवासतस्तदकृत्यानुमोदनादिनेत्यनागतविपयं चेदं सूत्रं, प्रणयनकाले संक्लिष्टसाध्वमावादिति ॥५०८॥
ण या लभेजा निउणं सहायं, गुणाहि वा गुणओ समं वा।
इकोऽवि पावाई विवजयंतो, विहरिज कामेसु असज्जमाणो ॥ ५०९ ॥

संवच्छर वावि परं यमाणं, वीरं च वासं न तहिं वसिना ।
सुत्तस्स मग्गेण चरिज भिक्खू, सुत्तस्स अस्थो जाह आणवेई ॥ ५१० ॥
जो पुवरत्तावररत्तकाले, संपेहए अप्पगमपगणं ।
किं में कडं किं च मे किच्चसेसं १, कि सकणिज न समायरामि ॥ ५११ ॥
कि मे परो पासइ ? किं च अप्पर १, किं वाऽहं खलिअंन विवजयामि ।
इञ्चेव सम्मं अणुपासमाणो, अणागयं नो पडिबंध कुजा ॥ ५१२ ।।
जस्थेव पासे कइ दुप्पउत्त, कारण वाया अदु माणसेणं
तत्थेव धीरो पडिसाहरिजा, आइन्नओ खिप्पमिव खलीणं ॥ ५९३ ॥
जस्सरिसा जोग जिइंदिअस्स, घिईमओ सम्पुरिसस्स निञ्च ।
तमाहु लोप पडिबुद्धजीवी, सो जीअई संजमजीविएणं ॥ ५१४ ॥

अप्पा खल्लु सययं रक्खिअव्वो, सविदिएहिं सुसमाहिएहि । अरक्खिओ जाइपहं उवेइ, सुरक्खिओ सबदुहाण मुच्चइ ॥ ५१५ ॥त्तिबेमि इइ विवित्तचरिया चूडा समत्ता २ ॥ ॥ इइ दसवेयालियं सुत्तं समत्तं ॥ "असंक्लिष्टः समं वसे"दित्युक्तमत्र विशेषमाह-ण येति, कालदोपान यदि लभेत-न यदि कथञ्चित्प्राप्नुयान्निपुणं- संयमानुष्ठानकुशलं सहायं-परलोकसाधनद्वितीय, किंविशिष्टमित्याह-गुणाधिकं वा-ज्ञानादिगुणोत्कटं वा, गुणतः समं वा-तृतीयार्थे पञ्चमी गुणैस्तुल्यं वा, वाशब्दाद्धीनमपि जात्यकाञ्चनकल्पं विनीतं वा, ततः किमित्याह-एकोऽपि संहननादि- युक्तः पापानि-पापकारणान्यसदनुष्ठानानि विवर्जयन्-विविध-अनेक प्रकारैः सूत्रोक्तः परिहरन्विहरेदुचितविहारेण कामेष्विच्छाकामादिष्वसज्यमानः-सङ्गमगच्छन् , एकोऽपि विहरेत् , न तु पार्श्वस्थादिपापमित्रसङ्गं कुर्यात् , तस्य दुष्टत्वात् , तथा चान्यैरप्युक्तं-" वरं विहत्तुं सह पन्नगर्भवेच्छठात्मभिर्वा रिपुभिः सहोपितुम् । अधर्मयुक्तैश्चपलैरपण्डितैर्न पापमित्रैः सह वर्तितुं क्षमम् ॥ १ ॥ इहैव हन्युर्भुजगा हि रोपिताः, धृवासयश्छिद्रमवेक्ष्य चाऽरयः । असत्प्रवृत्तेन जनेन संगतः, परत्र चैवेह च हन्यते जनः ॥२॥" तथा-" परलोकविरुद्धानि, कुर्वाणं दूरतस्त्यजेत् । आत्मानं योऽभिसंधत्ते, सोऽन्यस्मै स्यात्कथं हितः ? ॥ ३॥" तथा-"ब्रह्महत्या सुरापानं, स्तेयं गुर्वङ्गनागमः। महान्ति पातकान्याहुरेभिश्च सह संगमम् ॥ ४ ॥" इत्यादि ॥ ५०९ ॥ विहारकालमानमाह-संपच्छर ति, संवत्सरं वाप्पा संवरसरशन्देन वर्षासु पातुर्मासिको ज्येष्ठामप्रह, उच्यते, तमपि, अपिशन्दात मासमपि, परं प्रमाणं-वर्षाऋतुबद्धयोरुत्कृष्टमेका निवासकालमानमेठ, द्वितीयं च वर्ष पदस्प. ध्ययहित उपन्यासः, द्वितीय वर्ष व वर्मा परन्दान्मा १ ऋतुपट्टे न तत्र क्षेत्रे घसेत्, यौको वर्षाकल्पो मासकंल्पंथ छतः, अपितु सङ्गदोपाद् द्वितीय तृतीयं च परिहस्य वर्षादिकालं ततस्तत्र वसेदित्पर्षः, सर्वथा, किं पहुना, सर्पग्रेड सूत्रस्य मार्गेण घरेद्रिक्षुरागमादेशेन वत्तेति भावः, तत्रापि नौपत एव यथाश्रुतग्राही स्पाद, अपि तु सूचस्पार्य:- पूर्वापराविरोधिवन्यक्तिपटितः पारमार्थिकोत्सर्गापवादगर्भो यथाऽऽज्ञापयति-नियु) तथा वर्खेत, नान्यथा, यहापपादतो, नित्यवासेऽपि पसतावेव प्रतिमामादि साधूनां संस्तारकगोचरादिपरिवर्तेन, नान्यथा, शुदापवादायोगात् । इत्येवं वन्दनप्रति. क्रमणादिष्वपि तदर्थ प्रत्यूपेषणेन अनुष्ठानेन वत, न तु नथाविघलोकहेर्या व परित्यजेत् , तदाशातनाप्रसादिति ।। ५१० ॥ एवं च विविक्तचर्यावतोऽसीदनगुणोपापमाह-जोति, पा साधुः पूर्वरानापररात्रकाले, रायो प्रथमचरमयोः प्रहरयोरिया, 'संमेक्षते खोपयोगनीत्याऽऽत्मानं कर्मभूत, आत्मनैव करणभूतेन, कथमित्याह-फि मे कृतमिति, छान्दसत्वानृतीया पष्ठी, किं मया कृतं ? शक्यनुरूपं तपश्चरणादियोगस्य, किं च मम, कृत्यशेपं कर्तव्यशेपं उचितं ?, फि शप-वयोs. वस्थानुरूपं वैमावश्यादि न समाधरामि-न करोमि, वदकरणे हि तत्काल नाशयति ॥ ५११ ॥ तया-कि मेचि, किं मम [स्पलितं] परा-स्वपक्षपरपक्षलक्षणः पश्पत्ति, किंयाऽऽत्मा कचिन्मनाक संवेगापमा १, किं याऽहं ओपन एव स्खलित न पियर्जपामीत्येवं सम्यगनुपश्यमनेनैव प्रकारेण स्खलितं धावा सम्यगागमोक्तेन विधिना भूपः पश्येत् अनागतं न । प्रतिवन्ध कुर्यात्-आगामिकालविषयं नासंयमप्रतिवन्धं करोति ॥ ५१२ ॥. कथमित्याह-जत्थेवेति, यत्रैव पश्यत्युक्तव- त्परात्मदर्शनद्वारेण कचित्-संयमस्थानावसरे धम्मोपधिप्रत्युपेक्षणादौ दुष्प्रयुक्तं-दुर्व्यवस्थितमात्मानमिति गम्यते, केने- त्याह..कायेन वाचा अथ मानसेन-मन एव मानसं, करणत्रयेणेत्यर्थः, तत्रैव-तमिन्नेव संयमस्थानावसरे धीरो-धुद्धि- मान् प्रतिसंहरेत्-प्रतिसंहरति य आत्मान, सम्यग्विधि प्रतिपद्यत इत्यर्थः, निदर्शनमाह-आकीर्णो जवादिभिर्गुणैर्जात्योऽश्व इति गम्यते, असाधारणविशेषणात् , तच्चेदं-क्षिप्रमिव-शीघ्रमेव खलिनं-कविकमिव, यथा जात्योऽश्वो नियमितगमननिमित्तं शीघ्र खलिनं प्रतिपद्यते, एवं यो दुष्प्रयोगपरित्यागेन, खलितकल्पं सम्यग्विधि, एतावताउंशेन दृष्टान्त इति ॥ ५१३ ॥ यः पूर्वरात्रेत्यायधिकारोपसंहारायाह-जस्सरिसत्ति, यस्य साधोरीदृशाः स्वहितालोक(च)नप्रवृत्तिरूपा योगा-मनोवाकायव्या- पारा जितेन्द्रियस्य-वशीकृतस्पर्शनादीन्द्रियकलापस्य, धृतिमतः-संयमेसतिकस्य सत्पुरुपस्य-प्रमादजयात् महा. पुरुषस्य नित्यं-सर्वकालं सामायिकप्रतिपत्तेरारभ्यामरणान्तं तमाहुलॊके प्रतिबुद्धजीविनं तमेवंभूतं साधुमाहुः-अमि- दधति विद्वांसो लोके-प्राणिसंघाते प्रतिवुद्धजीविनं-प्रमादनिद्रारहितजीवितशीलं, स एवंगुणयुक्तः सन् जीवति संयम- जीवितेन-कुशलाभिसंधिभावात् सर्वथा संयमप्रधानेन जीवितेनेति ।।५१४॥ शास्त्रमुपसंहरन्नाह-उपदेशसर्वतत्वमाह-अप्पेति, आत्मा खल्विति-खलुशब्दो विशेषणार्थः, शक्तौ:सत्यां परोऽपि, सततं-सर्वकालं रक्षितव्यः-पालनीयः पारलौकिका- पायेभ्यः), कथमित्युपायमाह-सर्वेन्द्रियैः-स्पर्शनादिभिः सुसमाहितेन-निवृत्तविषयच्यापारेणेत्यर्थः, अरक्षणरक्षणयोः फलमाह-अरक्षितः सन् जातिपन्थान: जन्ममार्ग संसारमुपैति-सामीप्येन गच्छति। सुरक्षितः पुनर्यथागममप्रमादेन, 24

सर्वदुग्वेभ्यः-शारीरमानसेम्यो विमुच्यते-विविध-अनेक प्रकारः अपुनर्ग्रहणपरमस्वास्थ्यापादनलक्षणैर्मुच्यते विमुच्यते
॥ ५१५ ॥ इति ब्रवीमीति पूर्ववत् ॥
इति विविक्तचर्यानाम्नी द्वितीयच्ला समासा २ ॥
॥ समासेयं दशवकालिकस्य लघुटीका ॥
महाचराया याकिन्या, धर्मपुत्रेण चिन्तिता । आचार्यहरिभद्रेण, टीकेयं शिष्ययोधिनी ॥१॥
दशकालिके टीकां विधाय यत् पुण्यमर्जितं तेन । मात्सर्यदःखविरहाद् गुणानुरागी मवतु लोकः ॥ २॥
(लघुटीकाप्रणेतॄणां मशस्ति:-)
दशकालिकानुयोगात् , प्रख्याख्या पृथक्कता । हरिभद्राचार्यकृतान्मोहाब्रयाऽथवा मया ॥ ३ ॥
श्रीमद्बोधकशिष्येण, थीमत्सुमतिसूरिणा । विद्वद्भिस्तत्र नोद्वेगो, मयि कार्यों मनागपि ॥ ४ ॥
पस्माद् व्याख्याक्रमा प्रोक्ता, मरिणा भद्रयाहुना । आवश्यकस्य नियुक्ती, व्याख्याक्रमविपश्चिता ॥५॥
सूत्रार्थ: प्रथमो चेपो, नियुक्तिमिश्रितः ततः । सवैाख्यानमैर्युक्तो, मणितव्यस्तृतीयकः ॥ ६ ॥

प्रमादकार्यविक्षेपचेतसां तदयं यया । क्रियया अवबोधार्थ, साधूनां तु पृथक्कृतः॥ ७॥ लब्ध्वा मानुष्यकं जन्म, ज्ञात्वा सर्वविदां मतम् । प्रमादमोहसंमूढा, वैकल्प्यं ये नयन्ति हि ॥ ८ ॥ जन्ममृत्युजराव्याधिरोगशोकायुपद्रुते । संसारसागरे रौद्रे, ते भ्रमन्ति विडम्बिताः ॥९॥ ये पुनर्ज्ञानसम्यत्वचारित्रविहिवादराः । भवाम्बुधिं समुल्लद्ध्य, ते यान्ति पदमव्ययम् ॥ १० ॥ ये भव्यान् प्रतिबोध्य जैनवचनैः स्याद्वादसंभूषितै-निर्वाणाश्रितचेतसो विदधिरे स(साधुमार्गश्रिता)न् । साधूनां विधिना च सरिपदवीमारोपयाश्चक्रिरे, ते श्रीमजिनदेवसूरिचरणा रक्षन्तु सङ्घ सदा ॥ ११ ॥ समाता श्रीदशवैकालिकटीकेति ॥ ग्रंथाग्रं ३५००, मंगलमस्तुलेखकपाठकयोः। संवत् १६६२ वर्षे वैशाखवदि ४ भौमे लिखितं । शुभं भवतु ॥ प्रत्यन्तरे- मूलं दयादानमुखाश्चतस्रः, शाखाः प्रशाखा नियमव्रतानि । पुष्पाणि संपत्प्रकराः फलं तु, मोक्षो भवेद् धर्मसुरद्रुमस्य ॥११॥ इति दशवैकालिकलघुटीका समाप्ता ॥ छ । शुभं भवतु ॥ मंगलमस्तु ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः॥ परमगुरुभ्यो नमः ॥ मंगलमस्तु ॥ संवत् १५१६ वर्षे माष वदि १ गुरौ अद्ये हि श्रीघोघावेलाकूले महाराजाधिराजपातसाहश्रीकुतवदीन- ६.

महिम्मदराज्ये व्यापारी तन्नियुक्तः सं०सोमदत्तपंचकुलप्रतिपत्नौ । श्रीमद्धर्मभृतां वरिष्टतपसा, पूसत्यविशालप्रभूतीनां महात्मनां तेपामध्ययनार्थ पुस्तकमिदमलिखापयत्, द्युम्नेन स्वार्थ तथा परोपकाराय ।। श्रीगणेशाय ।। श्रीवक्रतुठाय ।।] शुभं भवतु ।। श्रीआणंदविमसमरिगुरुभ्यो नमा पं०वीरविमलमणि । - POd इति भगवच्छप्पंभवथुतकेवलिनिई श्रीमत्सुमतिमाधुरिणा भवविरहालितवृहट्टीकोद्धृतकृत्युपेतं श्रीदशवैकालिकं समाप्तम्। श्रेष्ठिदेवचन्द्रलालमाई-जैन-पुस्तकोद्धारे ग्रन्थाङ्कः ॥ Pre- Jhees - श्रीसुमतिसाधुसूरिकृतलघुविवरणोपेत- श्रीदशवैकालिकसूत्रस्थ परिशिष्टानिः । भाद्यांश AIR प्रथम परिशिष्टम् । श्रीदशवैकालिकसूत्रस्य सूत्राणां गाथानांच अकारादिक्रमः सूत्रत्य धाक आद्यांशः सूत्रस्य पृष्ठाः आद्यांशः, गाथायाश्वाहा गाथायाश्चाङ्कः ૮૨ ५९ / अगुत्ती वंभचेरस्स २६७ ११३ / अजयं भासमाणो य २८५ १२० अग्गल फलिह दार १६८ ८४ अजयं भुंजमाणो य २८६ १२१ / अजयं आसमाणो य ३४ ४३ / अजयं सयमाणो य २८७ १२१ अजयं चरमाणो य अजीवं परिणय नश्या ८३ | अजयं चिट्ठमाणो य ४३, ! अज आहे. गणी. हुँतो सूत्रस्य पृष्ठाकः गाथायाश्चांक अइभूमि न गच्छेजा अईमि अ कालंमि अईयंमि य कालंमि ४४. ४३ ७३ m १३६ अकाले चरसी. भिक्खू htion ४२० २०४ th महिम्मदराज्ये व्यापारी तनियुक्तः सं०सोमदत्तनलप्रतिपत्तो ॥ श्रीमदर्मभृतां परिष्टतपमा पू०मत्यविमालमभूनीना महात्मनो तेपामध्यपनार्थ पुस्तकमिदमलिखापयत्, पुम्नेन, सार्थ तथा परोपकाराप॥ [भोगणेशाप ।। धीरमठाय ॥ शुम, भवतु ॥ श्रीआणंदविमलयरिगुरुम्यो नमः पं०वीरविमलगणि । इति भगवच्छप्पभषभुतकेयलिनियूदं श्रीमरमुमतिसाधुशरिणा भवविरहाशितपटीकोनापुर्व श्रीदशवकालिक समाप्तम् । -- येष्ठिदेवचन्द्रलालमाई-जैन-पुस्तकोदारे अन्याय॥ HERE श्रीसुमतिसाधुसरिकृतलघुविवरणोपेत- श्रीदशबैकालिकसूत्रस्य परिशिष्टानि । पृष्ठाकः प्रथम परिशिष्टम् । श्रीदशवैकालिकसूत्रस्य सूत्राणां गाथानां च अकारादिक्रमः आद्याशः सूत्रस्य पृष्ठाह आयांशः सूत्रस्य आद्यांशः गाथायावादः गाथायाश्चादः কালি ন মজা, ८३ ५९ | अगुत्ती चंभचेरस्स २६७ ११३ / अजयं भासमाणो य । अईमि अ कालंमि २८५ १२० / अग्गलं फलिहं दारं १६८ अजय भुंजमाणो य मईयंमि य कालंमि २८६ १२१ १२१ ) अजयं आसमाणो ४३. | अजयं सयमाणो य २८७ १२१ / अजयं चरमाणो य ३२ अजीवं परिणयं नच्चा अकाले चरसी भिक्खू १६४ ८३ | अजयं चिट्ठमाणो. य ४३ अन्ज आई गणी हुंतो सूत्रस्य पृष्ठाकः गाथायाश्चाङ्कः ३७ ३६ १३६ ७३ ४९० २०४ " भादोश आद्यांश पायांश ध्या गाषायाचा गाथायाश्चार गायायाधार अजिए पजिप पाषि २९२ १२१ | अधुर जीवियं नया ३६८ १४६ / अमिभूय कायेण परीसहाई ४७४ १९२ २९५ १२२ | अनिएअवासो समुभाण- यमजर्ममासि यमच्छरीमा ५०६ २१२ अट्ट सुहमार पेहाए ३४७ १४० चारिमा ५०४ २१३ | मरोयम जाणिम अट्ठापप य नालीए २० १३ अनिलेण न पिएन वियापए ४६३ १८७ सुक्यमुचम १९२ २०४ अणायणे घरंतस्स ५४] अन्नट्ठ पगई लयणं ३८६ १५९ | अमोई घयणं कुञा अणायारं परकम्म ३६६ १४६, मन्नायउंछं घरई विसुध ४४२ १७४ अरसं विरसं यायि १५७ यणिलस्स समारंभ २४५ १०८ अपुच्छियो न मासिज्जा ३८१ १४९ | भलं पासायखंभाणं ३०४ १२५ थणुजपनायणप ७२ ५५ अप्पग्घे या महन्ये पा ३२३ १३१ : अलोल मिक्रवू न रसेसु ४७७ १९४ अणुनवित्त मेदायी ७५ | अप्पणट्ठा परट्ठा वा २२० १०० अलोलुए अहए यमाई ४४८ १७७ अणुसोमपट्ठिअयाजणमि ५०१ २१० ४२८ ११९ थषण्णवायं च परम्मुहस्स ४४७ १७७ अणुसोमसुदो लोमो ५०२ २१०| अप्पत्तियं जेण सेया ३८२ १४९ | असा योससचदेवे १७११९२ अतितिणे अपयले ३६३ १४५ अप्पा खलु सययंरक्षियम्यो ५१५ २१७ असचमोसं सचंच २८० ११८ मत्तट्ठा गुरुमो लुखो १९१ ९० अप्पे सिया भोयणजाए १३३ ७२ असणं पाणगं याषि १०६ अस्थगयमि या ३६२ १४३ | अर्थमचरिमं घोरं १०८ मदीणो विधिमेसिजा १८५ अभिगम घउरो समाहिओ ४५९ १८५ " " " MI आयांशः असणं पाणगं वावि असंथडा इमे अंवा असंसट्टेण हत्येण असंस पलोइजा अह' कोइ न इच्छिना अहं च भोगरायरस महावरे चउत्थे भंते! अहावरे छठे भंते! तचे आद्यांशः सूत्रस्य पूछाः आयांशः सद्यस्य छाहः सूत्रस्य छायः गायायायाङ्क: गाथायाधाक्षः गाथायावाक्षः ६७ | अहो निच्चं तवो कम्म २३१ १०४ आयावयादि चय सोगमलं ६८ | अंगपच्चंगसंठाणं ३९२ १५२ आलोयं थिग्गलं दारं ७४ ११८ ६८/ अंतलिक्खति णं बूमा ३३० १३४ आसणं सयणं जाणं ३०६ १२६ १२० ६९ / आइन्नोमाणविवजणा अ ५०५ २१२ | आसंदीपलिकेसु २६२ ११२ ३१० १२६ / आउकायं न हिंसंति २३८ १०६ | आसीविसो वावि परं सुरुट्ठो ४०३ १५८ विहिंसंतो २३९ १०६ आदरंती सिया तत्य ८७ ५९ / आमोइताण नीसेसं १४८ ७६ इच्चेश्याई पंच महधयाई सू०९ ७७ / आयरिए आरादेइ २०४ ९४ इच्चेयं छज्जीवणियं ५९ ५० १० नारादेइ १९९ ९२ इच्चेव संपस्सिम युद्धिम ३२ | मायरियपाया पुण अप्पसना ४०८ १५९ नरो ४९९ २०९ ३४ | मायरियं अग्गिमिवाहियग्गी ४३९ १७४ | इच्चेसिं छण्इं जीवनि- ३१ | आयारपन्नत्तिधरं ३८४ १५० फायाणं सू० २ २७ सू०४ ३० आयारप्पणिहिं लहूं ३३५ १३७ / इस्थिमं पुरिसं चावि १८८ सू०७ ३३ | आयारमट्टा विणयं पउंजे ४४० १७४ इमस्स तानेरइअस्स जंतुणो ४९६ २०७ ७६ / आयावयंति गिम्हेसु २८ इह खलु भो! पधइएणं सू० २१ १९६ सू०६ सू०८ दोच्चे 'पंचमे, अहो जिरोहिं असावजा आद्यांश एटार " " " पृष्ठा সাথায় सूत्रस्य पृष्ठा आचांश ससस्य गाथायाश्चात मायायाचा गाथायावाद इहलोगपारत्तहि ३७८ १४९ | उवदिम्मि अमुच्छिए अगिजे ४७६ १९४ | एवं करति संयुद्धा इहेवऽधम्मो अयसो उवसमेण हणे कोई २७३ १४६ "तु यगुणप्पेही २०० १२ अकित्ती ४२४ २०५/ ए च अट्ठमन्नं या " सगुणप्पेही २०३ गालं अगणि अशि ३४२ १३८ ", दोसं वट्टण २०८ ९५ घम्मस्स विणो छारियं रासि ५२ २३४ १०४ | ओगादाता चलहत्ता उग्गम से भ पुचिछज्जा ६८ एपणऽण अटेणं २९० १२१ | बोधार्य विसमं खाएँ ६३ ५२ उच्चारंपासवर्ण ३५२ १४२ गतमयमिता ७३ | कन्नसुफ्वेदि सदेहि ३६० १४३ उजुप्पनो यणुम्विग्गो ७६ " उदउल्लं थप्पणो कार्य ३४१ १३८| एमेए समणा मुत्ता ७५ कयराणि) अट्ठसुमाई ३४८ १४० २ कपिटुं माउलिंग प बीयसंस २३३ १०४ पयारिसे महादोसे १२८ उदेसिझं कीअगई ६८/एलगं दारगं साणं कदन्नु कुजा सामन्न ६ ४ उद्देसियं कीयगई कह चरे। कई चिट्टे? ३८ ४४ १८ १२। एवमा उ जा मासा ७९ परमेयाणि जाणिजा २८४ १२० | कवं मूलं पलेय या १२९ उप्पणं नारदीलिजा ७१ ३५० १४१ । कसैसु कंसपासु उप्पलं पउमं घावि ८६/एवं उदउल्ले ससिणिद्धे ९२ कालं छोपयार , उस्सलिमा ओसकिमा ११२ ६१ कालेण निफ्लमे मिफ्स् १६३१ " १८२ " " 7 - सूत्रस्य आद्यांशः पृष्ठा सूत्रस्य पृष्ठाङ्कः आद्यांशः, सूत्रस्य आद्यांशः पृष्ठा गाथायावाकः गाथायाचा गाथायावाङ्कः किं पुणो जे सुयग्गाही ४३१ १६९ / गुणेहि साहु अगुणेहिऽसाहु ४४९ १७७ चित्तभित्ति न निज्झाए ३८९ १५२ कि में परो पोसइ किं च गुरुमिह संययं पडियरियं चित्तमंतमचित्तं वा २२२ १८१ अप्पा ५१२ २१६ मुणी ४५३ १७८ | चूलिअं तु पवक्वामि ५०० २१० कोई माणं च मार्य च ३७१ १४६ गुधिणीए उवण्णत्थं जई तं फाहिसि भावं १४ १० कोहो पीई पणालेइ ३७२ १४६ | गेरुअवनिअसे दि जत्थ पुप्फाई बीयाई ८० ५८ कोहो य माणो य अणि- गोअरग्गपविट्ठस्स २६५ ११३ जत्थेव पाले कई दुप्पउत्तं ५१३ २१६ ग्गहीया ३७४ १४६ गोअरग्गपविट्ठो अ ७८ ५८ | जयं चरे जयं चिढे खवंति अप्पाणममोह- १६७ ८४ जया मे कुकुटुंवरस ४८८ २०३ दसिणो २७६ ११६ | चउण्हं खलु भासाणं २७८ ११८ थेरओ होइ ४८७ २०३ खवित्ता पुचकम्माई ३१ १८ / चउचिहा खलु आयार- " पुदमो होई ४८५ २०२ खुहं पिवांसं दुस्सिज ३६१ १४३ समाही सू० २० १८५ माणिमो होइ " ४८६ २०२ गहणेसु न चिट्ठिजा ३४५ १३८ तवसमाही सू०१९ १८४ चंदिमो होइ ४८४ ૨૦૨ गंभीरविजया एए २६४ ११२ .. विणयसमाही १७ १८२ ओहाविओ होइ ४८३ २०२ गिहिणो वेयावडियं ૨૨ १४ " सुयसमाही सू०१८ १८३ कम्म खवित्ता णं गिहिणो घेयावड़ियं न कुज्जा ५०८ २१३ / चत्वारि वमे सया कसाए ४६६ १८९ " " गइ बहुविहं गापायापा जया चयह संयोग " दुमरस पुप्फेसु " ४७ ४७ " भाश पृष्ठ आयोश सूत्रस्य आपोश छार गाचायावाद गापायावा ४७| जस्सेवमप्पा उ इपिज जा सयाह निक्यतो जीवमजी थ ४६ निच्छिओ ४९८ २०८ जाणंतु ता इमे समणा जोगे निरभित्ता " अहा कुकुइपोभस्स ३८८ १५२ जाणि (क)चत्तारि अभुजाई २५५ ११० "घुण कम्मरय २ १ जायतेयं न इच्छति . निधिदए भोए ४८ निसते तयणचिमाली ४१२ १६२ | जावंति लोए पाणा २१८ पु म पाय ध ससीकोमुजोगजुत्तो ४१३ १५२ जिणययणरए मतितिणे "मुढे मषिता दिग्गी जलणं जुषं पविचि पूआ ३०२ १२४ पपई धम्म ५८२ २०२ नमसे ४०१ ११२ जे बाधि मंदिति गुरुविरता ४०० १५८ , लोगमलोग व ५४ 19 ज जाणेज चिराधोयं ७३ | जे आयरियउषज्झायाणं सपसर्ग जाणं ४७ जंपि यत्थं पायं या २२८ १०२ जेण यन्ध घई घोरे ४७ २४७ १०८ | जे न पदेन से कुप्पे जरा जाय न पीडे ३७० १४६ जं भये मचपाणं तु १०३ ६४ नियाग ममाति २५७ ११० अस्संतिक धम्मपया जा मसच्चा अपच्या २७९ ११८ , माणिया सययं सिपणे ४१० १६२ | जाइजरा) मरणास्रो मुचई ४६० १८५ माणयति ४५१ १७८ अस्सैरिसाजोग जिदिअस्स५१४ २१६ | जाइमंता इमे रुक्या ३०८ १२६ य कंते पिए मोर " " संघरमुनिहूँ " . " " " " " "" आयोशः स्वास्थ पठार जात: समस्त पाक: गाभागामात्र गापामामा गाथापाथागः तं भवे भक्तपाणं तु ६७ (तेसिं अच्छणजोपण ३३७ १३७ / दुदं तु मुंभमाणाणं १२३ गुरुणं गुणसागराणं ४५२ २७८ तुकामाणी पयडिजा १२७ सो निहुमो तो २१२ उत्तमा उ मुगादा ११९ थणगं पिज्जेमाणी १०१ ६४ देगलोगसमाणो अ ४९१ २०४ ૨૨૨ ६९ धमाप फोदा पमयप्पमाया ३९९ १५७ पाणं नाणंघ ३२७ १३३ १२३ ६९ / योयमासायणट्ठाप १३७ ७३ घमाउ भट्ट सिरिमो मयेयं ५९३ २०५ १७४ ८६ दगमष्टिमायाणे ८५ धम्मो मंगलमुगिढ़ १ १ १७६ ८७ दगवारेण पिहि १०४ ६६ / घिरत्यु से सोकानी १२ तारिस १०७ ६७ / दवदवस्स न गजिचा ५५ / शुपं च परिलेदिन्ना २५१ २४२ तालिअंटेण पत्चेण २४६ १०८ दस अट्ठय ठापाई ९८ भूषणे ति यमणे य ३४३ १३८ | दंडसत्यापरिजण्णा ४२३ १६८ नयाचं सुमिणं जोगं ३८५ १५२ तिहमनयरागस्स २६८ १२३ दिलु मिमं असंदिचं ३८३ १५० नगिणरस शाति मुंगुस्स तित" व फड व कसायं १५६ ७९ दुराई फरिणं नगरेज ससामंत तीसे सो वयणं सोचा १० दुग्गयो वा पमोपणं ४३४ १७२ न चरेज गासे यासंते तेवितं गुरुं पूयंति ४३० १६९ । गुण्इं तु मुंजमाणाणं ६५ न जाइमचे न य रुपमचे ४७९, १०४ " " " . " " " " भार्यात सूचस्य पृष्ठा याशि सूचस्व पृठार অখছি स्म पृष्ठा गापायाचार गापायाखा गापायाबाट तसकार्य वितिसतो २५३ १०९ | तहेच घाउल पिट्टे ८७) तहेव होले गोलिति २९१ १२१ तसे पाणे नहिसिज्जा ३४६ १२८ उहरं च महालग पा ४५० १७७ तदेवासंजय धीरो ३२४ १३२ तस्स परसा पाहाणं २०२ ९३ फफ्ता भासा २८८ १२१ तदेयुष्याषयं पाणं तहा नईओ पुण्णामो फलमणि ८७ तहेपुच्चायया पाणा , कोलमणुस्सि माणुसं पk २९९ १२४ | तहेयोसहिमो पकामो फलार पकाई मेहं पनप तं अप्पणा न मिति २२३ १०१ तव परिणीयप्पा ४२० माण ३१९ १३३ | तं उक्णियितु न निक्षिपे १४४ ४२२ १५८ समुपुण्णा ॥ च अच्यषिलं पूर्य १३८ ७३ ४२५ १५८ , उम्भिदिा दिज्जा १०५ असणं पाणर्ग था सायउजणुमोमणी दोज कामेण तदेय असणं पाणर्ग या ४६९ १९० . देवयास सुई पार्ण कात्ति २८९ १२१ सायज जोगं गंतुमुरमार्ण भसासयं ४८१ १९५ सुपिणीयप्पा भषे भत्तपार्ण तु १०० ६४ ३०७ १२६ ४२४ १६८ ६४ गाभो दुम्माभो ३०१ १२४ " " " संखमिच्चा " " " " गिए ३१ १३४ . " " " . " " A " " " आगरा: आधांशः आद्यांश: सूत्रस्य पुछार: पछामः रहस्य गापागामा: गापायामाः गाथायाथारः ६७ / तेसिं अच्छणजोपण तं भवे भक्तपाणं तु ३३७ १३७ ९७ दुई तु मुंजमाणाणं गुरुणं गुणसागराणं ४५२ २७८ दुरुहमाणी पयडिजा ११३ ६७ ૧૨૭ ११७ ६८ सो निहुओ दंतो २१२ दुल्लदा उ मुसाबाई ७२ यणगं पित्रेमाणी ૨૦૨ देवलोगसमाणो अ ४२१ २०४ ૨૨૨ ६९ / थंमाघ फोहाघ मयप्पमाया ३९९ १५७ / देवाणं मणुआणं च ३२७ १३३ १२३ ६९ थोघमासायणट्ठाप १३७ घम्माउ भटुं सिरिगो मवेयं ५९३ २०५ ८६ / दगमट्टिमआयाणे ५९ धम्मो मंगलमुषि ८७ दगवारेण पिदिसं १०४ घिरत्यु ते जसोकामी १२ तारिस १०७ ६७ दवदवत्स न गन्छिता ५५ घुयं च पडिलेहिना तालिअंटेण पत्तेण २४६ १०८ दस अट्ट य ठाणाई २१६ धूवणे हि चमणे य ३४३ १३८ | दंडसत्यापरिज्जुण्णा ४२३ १६८ / नकाचं सुमिण जोगं ३८५ २५२ तिण्हमनयरागस्स २६८ ११३ / विढं मिमं असंदिचं ३८३ १५० नगिणस्स याचि मुंडरस २७३ १२५ तिसंग व कडु व कसायं १५६ ७९ | दुकराई करिताणं ३० नचरेजससामंत तीसे सो वयणं सोचा १५ १० / दुग्गो वा पोपणं ४३४ १७१ न चरेज पासे चासंते ५२ तेवि तं गुरुं पूयंति ४३० २६९ दुण्दं तु मुंजमाणाणं न जाइमचे न य रूपमचे १७२ १०५ . " " " आर्याश- सूचस्व पठा आद्योश सूत्रस्य पृष्ठा आधाश सूत्रस्य पृछा गायायाथा गायायाया गाथायाचा नयरथ एरिस वृत्त ९७ , नामधिग्जेण ण या २९४ १२२ , पडिकुट्टकुल न पविसे न परसओ न पुरओ ३८० १५९ २९७ १२२ | पडिग्गह सलिहिता ॥ न पर पामासि अयं कुसीले ४७८ १९४ नासदीपलियकसु २६३ ११२ | पडिम पडिज्जिया मसाणे ४७२ १९२ न पाहिर परिभये ३६४ १०५ | निखम्ममाणार य पडिसेहिए य दिने या १७२ नमुकारेण पारिता युद्धययणे ४६१ १८७ पढम नाण तयो दया न मे चिर दुक्समिण नियुधिग्गो जहा तेणो १९८ ९२ पढमे भते । मधप २९ भविस्सा ४९७ २०७/निट्ठाण रसनिग्नूद ३१६ १४२ | पयत्वपकत्ति व पफमालये ३१९ १३० नप बुग्गहिय कह निद घम बहु मन्निज्जा ३७६ १४९ परिक्सभासी सुसमाहिरदिप ३३४ १३५ पज्जा ४७० १० निदेसपती पुण गुरुण ४३८ १७२ | परिवूढति णं धूआ ३०० १२४ नयमोमणमि गियो ३७ १४२ निस्सेणि फरग पीट ७० | परीसहरिऊदता 1 सम्ममालोय राजा ७६ |नीय सेग्न गइ ठाण ५३२ १७१ | पवडते य से तत्थ ५२ न सो परिग्गहो पुत्तो २२९ १०३ परखदे जरिय जोह ८ पयिसिनु परागार ३५३ १४२ नाणदसणसपनं पद मदाधि हपति एगे ४०१ १५८ | पपेयए अज्जपय महामुणी ४८० १९४ पच्छाकम्म पुरेषम्म २६१ १११ पचासघपरिचाया २७ नाणमेगमाचिचोप पच्छविते पयाया प्र० ४९ । पचिदियाण पाणाण २९८ १२४ मूलए सिंगोरे य पहुं सुणेइ कन्नेहि सूत्रस्य पृष्ठामः आद्यांश: आद्याशः आघांशः सूत्रस्य पृष्ठाकः सनस्य प्रचार गाथायावाङ्क: गाथायाश्चाका गाथायाश्चाङ्गः पाईणं पडिणं चावि २४२ १०७ । चलं थामं च पेहाए ३६९ १४६ २३ ९२ पियए एगओ तेणो बहवे इमे असाह ३२५ १३३ / मूलमेयमहम्मस्स २२५ १०२ पिंड सिज्जं च वत्थं च २५६ ११० बहुअट्ठिअं पुग्गलं १३२ ७२ मूलाउ खंधप्पभवो दुमरस ४१६ १६५ पीढए चंगोरे(रा)अ ३०५ १२५ बहुवाहडा अगाहा ३१६ १२९ रनो गिहवईणं च ७५ पुढविकायं विहिंसंतो २३६ १०६ पहुं परघरे अस्थि ८९ रायणिपसु विणयं पउंजे ३७५ १४९ न हिंसंति ४४१ १७४ ३५४ १४२ २३५ १०५ भासाइ दोसे अ गुणे अ २११ रायाणो रायमच्चा य पुढविं न खणे न खणावर ४६२ १८७ ९७ जाणीआ ३३३ १३५ ४६५ २८८ रोइअ नायपुत्तवयणे पुढवीदगमगणिमारु ३३६ १३७ लज्जा दया संजम बंभचेरं ४११ १६२ पुढविं भित्ति सिलं लेखें ३३८ १३७ पसज्झचेअसा ४९५ २०५ पुत्तदारपरीकिन्नो २४३ १०७ लणवि देव २०६ ४८९ २०३ / भूयाणमेसमाधाओ महागरा आयरिया महेसी ४१४ २६३ लूहवित्ती सुसंतुढे ३५९ १४२ पुरओ जुगमायाप ६२ ५२ पुरेकम्मेण हत्थेण लोहस्सेस अणुप्फासे २२७ १०२ ९१ २ ६१. महुगारसमा बुद्धा प्रमणा जसोकामी ९१ | मुसावामो उ लोगम्मि २२१ १०० वहई सुंडिआ तस्स १९७ ९२ पेहेइ हियाणुसासणं ४५५ १८२ मुहत्तदुक्खा उ हवंति वणस्सईन हिंसंति २४९ १०८ 110 पोग्गलाण परीणाम ३९४ १५२ कंटया ४४५ १७५ विहिसंतो २५० १०९ भुंजित्नु भोगाई - भायांप सूत्रस्य भाद्यांश सूत्रत्य पृष्ठा आद्यांश सूत्रस्य पृष्ठा गापायाचा गाथावाचार गाचायावाद पणीमगरस या तस्स ८४ (वि)कदा यासंमा ३१२ १२६ समणं माइणं वावि परथगपमलंकार ५ | विवती अधिणीयस्स ४३६ १७२ | समाइ पेदार परिष्यतो ६ पय घ विति लम्मामो ४ २| वियची चमचेररस समावयंता धयणाभिघाया ४४६ १७७ पहणं तसपायरार्ण होर ४६४ १८८ | विविता य भये सिज्जा ३८८ १५२ समुआणं चरे मिफ्लू ८९ पामो पुट्ट च सीउपई ३२८ १३३ घिविहगुणतषोरए ४५७ १८४ सम्मविट्ठी सया अमूढे ४६७ १८९ पाहियो वा अरोगी या २६९ ११४ | विसपसु मणुनेसु सयणासणवत्थं चा १८७ पिकायमाणं पसदं ७२ | पीसमंतो इमं चिचे ७६ | सवफसुर्वि समुपेदिका विमुम्मेहम लोणं २२६ १०२ | सरकाले बरे मिष मुणी ३३२ १३५ पिणएवं परिसिता ७६ | समोवसता अममा सघत्युपहिणा बुद्धा २३० १०३ विणए सुप य तये ४५४ १८१ सवमूयप्पभूयस्स ४० ४४ घिणयपि जो उयारणं सका सहेत असा कंटया ४४४ १७४ सम्वमेधे यास्सामि ३२१ पितईपि तहामुन्ति २८२ ११९ | सखुडगयियवाणे २१५ ९८ | सधमेयमणादनं विभूसा हरियससग्गो सज्झापसज्हाणरयस्स पिभूसापत्तिर्म में सम्युकसं परन्छ घा ३२० १३१ ताणो ३९७ १५५ | सके जीया पि इच्छति १०० विभूसावधि मिन २७५ ११५ । सम्रिदीगिहिमते १३ 'सडि सखडि बूमा ३१४ १२८ अकिंचणा २७७ ११६ य सुच्चाल मेदाधी आयांशः समस्त पयः जाशि: पशवः आयातः गागागाना गाथानापारः गाथायामा सीमा म समणट्टाए संघट्टरता कारण ९९ ६५ ] सीखोदगसमारंभ २६० १२ | सिमा एगइमो लहुँ संजमे सुविअप्पाणं २० १५२ सुसं या जइ या दि २३२ १०५ १० / सुफद्धिति सुपशित्ति १९२ ३१८ संतिमे सुटुमा पाणा १३० २७० ११४ / सिपिसऊण मिक्सो. सुगीर्म या सुविामी ३२२ २३१ संथारसेज्जासणमत्तपाणे ४४३ १७४ सणसोहिं २०९ ९६ सुन्ना मागह फटाणं संनिहिं च न कुविज्जा ३५८ १४२ सिज्झायरपिंडं च २१ संपत्ते भिक्सकालंमि ५१ | सिणाणं अतुवा की ૨૭૨ ૨૪ सुभासियाई ४१५ १६३ संमदमाणी पाणाणि ८८ ६० सिणेई पुप्फर्म न ३४९ १४० / सुनपुगी न गिसीए ३३२ १३७ संघच्छरं वाऽघि परं प्रमाण ५१० २१६ सिया य गोयरग्गगयो १४१ ७५ सुर्य में आउर्स पचारि संसटेण य हत्येण सिया य मियू इच्छिता १५६ शिणयसमापिट्टाणा० २० १६ १८० साणं सूइयं गावं ७१ ५५ सिया हु से पापय नो सुर्य में माउसंते साणीपावारपिदियं इदिसा ४०५ १५९ सुरं या मेरगं या पि ९२ सालुयं वा बिरालियं ८७ सिपाहु सीसेण गिरिपि सादर निक्सिविता मिरे ४०७ १५२ से गामे पा नगरे पा सादयो तो चिमशेर्ण सीमोर्गन सेमिना ३४२ १२८ आगमनापा ३६५ १५ ७७ आयांश सूत्रस्य पृष्ठा मायायाधाक सेज्जा निसीहियाए से तारिसे दुपत्रसहे जिइदिए ३९८ १५५ से मिक्स या० से अगणि वा सू०१२ से भिक्खू वा० से उदगं या सू० ११ से भिक्खू पा० से कीडे या सू०१५ ४२ आचान सूत्रस्य पृष्ठा आयांश सूर्यस्य पृष्टा यथायावा गाथायाधा से भिक्खू वा० से त्यसजए पायसंजए ४७५ १९२ पुढविं या सू० १० ३६ | दस्थपायपडिच्छिन्न से भिखू घा० से इत्थ पायं च कार्य च ३७९ २४९ बीएसु या सू० १४ ४१ | हले इलित्ति अन्निति २९३ १२२ से भिषस्तू वा० से इंदि धम्मस्थकामाणं ९७ सिपण वा सू०४० ४० हुज कटुं सिलं या पि १२४ सोवश्चले सिंघवे लोणे २४ १५ है भो इलित्ति अधित्ति २९६ १२२ केचिद् द्वितीयं परिशिष्टम् । 'अन्यः' इत्यादि पृधाका पृष्ठाहः छाय: पृष्ठा ८० ११३, १२१, १२५, १४०, वृद्धविवरणम् २, १२४ ८ अन्यः अन्यथा व्याख्यायते पाठान्तरम् ४,२४,९०, १९९ / वृक्षसंप्रदाय: ५५,५८,३२,६५ २५६, १५८, १६०, १६५, २२ अन्ये ११, १२, १६, १८, २२, १९२, २०१,२१४. (बृहल्लधुवृत्योरव्याख्याता वृद्धाभिप्रायः २०१ २३, ७२,७५, ७८,८०, अपर: अन्यकृतेति) १४८ सम्प्रदाय: ८७, ८८, ९२, । एके २४, ११२ वृद्धवाद २१० तृतीयं परिशिष्टम् । साक्षिग्रन्थानामकारादि प्रन्यः प्रया पाचारप्राप्तिः आचारादि १५१ / आवश्यकनियुक्तिः माचारप्रणिधिः १३७, १५७ आधारादिद्वादशासम् १८३ / इसिमासियमो आवार: आयारपनत्ति १५० । ईरियावधिय पृष्ठाकः प्रन्य: पृष्टाः २२० १२ छारः १८१ प्रन्यः अनादि अन्यत्रापि मन्यैरप्युकं २२७ प्रन्या पृछार प्रन्य. पूछार पृष्ठा पृष्ठा ईपिथिकीम् ७७ जिणसंथयो धम्मपत्ती १९ | पाक्यशुद्धि ११८, १३७ (ओघनिर्युतिः) जिनसंस्तयः धर्मग्रहप्ति. २३ | विनयसमाधिः १५७, १८७ मोहनिन्जुची टाण नमस्कार ७८ शिष्यबोधिनी २२० शुलशचारकथा (तत्या. २० सू०) १७, २७ ममोकारो ७६, ७८ | श्रामण्यपूर्षिका ४,१२ शुद्धिकाधारकथा पराधैकालिकटीका २२० नायज्दयणाहरणा १९पइजीपनिका २१०, १११ (पराकालिकनियुक्तिः) ९९ पामगसुया ११ पाइजीयनिकाया ५१, १८८ दशकालिकम् १,११ पिण्डनियुतिः १२, ७४, १५० | पहजीवनिकायिका १९, २१, पराकालिकानुयोगा २२० पिण्डनियुक्त्यादि खि २२,५०, १०८ दिट्ठियार्य पिण्डेषणा लियं ५१,८२,९७ / समिक्षु ૨૧૦ हरिपाई प्रथमचूडाध्ययनम् २०९ उज्जीपणिया १९,५१ | दुमपुष्पिका महाचारकथा ९७,११८ ४ चतुर्थ परिशिष्टम् । साक्षिपाठानामकारादि पृष्ठाः साक्षिनां प्रतीकम् साक्षिनां प्रतीकम् पृष्ठाक्षः साक्षिनां प्रतीकम् पृष्टाः साक्षिनां प्रतीकम् पृष्ठाः एगंतखणियपक्ने चाहिं ठाणेहिं जीवा० १४५ देवा उस्सन्न सायं अकप्पो गिहिमायणं २१४ ४ कथं नु स राजा नमो अरिहंताणं छसु जीवनिकापसु अणहीया खलु जेणं ७८ ११० कन्नसोक्नेहि गा. २६० २५४ जइ लिंगपञ्चए १२४ नाणस्स होइ मागी अलङ्कतश्चापि धर्ममाच- ૨૨ कपालमादाय विपन्न- जले जीवाः स्थले जीवा ५१ निमित्तमासाद्य यदेव रेत् २११ किञ्चन जइ न सप्पतुल्लाई वाससा २१२ आमे घडे निहित्वं किं एत्तो पावयर २१ जोगो जोगो जिणसा० ८४ नो वामाओ हणुयामो ७९ आयारपणिहाणंमि १५७ किंची सकायसत्य २४ शपिरासेवनार्थः २२ पढिए ३० आयुघृतम् २१२ तन्दुलान्वर्पति पर्जन्यः २१२ / पणिहाणरहियस्सेद खित्वं कालो भायणं १३७ इच्छामि पडिकमि ७७ गच्छवासी जइथणजीवी ६५ तस्यात्मा संयतो १२ | परलोकविरुद्यानि २१७ इदैव हुन्युर्भुजगा हि गीयत्थो य विहारो रोषिताः ६२ ४६ ૨૨૭ पापं समाचरति चीत- तं फासुगमवि वजए उउबद्धमि ण अणला ११० १७९ / तेजोवायुद्धीन्द्रि० २७ गृहाण साधुगुणान् घृणो जघन्यः २११ उदए अवए पणए गोयरग्गपविट्ठो उ १४० पुरुपोत्तमो धर्मः ९७ दधि त्रपुषी प्रत्यक्षो ज्वर। २१२ ३६ एक एव हि भूतात्मा २४ ग्रहणौचित्यापेक्षया ७८ दधं सत्थग्गिवि० ૨૪ पुधमेव साहुणा * ૨૨ ४ साधिना प्रतीकम् पठार पृथक्षर्मफलभुजो पृथिषी देवता पृथिव्यम्वुवन० २७ ब्रह्महत्या सुरापान भिक्खग्गाही एगस्थ २१४ भुजि -पालने अभ्यपहारे विपं मृत्यु च साक्षिा प्रतीकम् प्रहार पाक्षिनां प्रतीक पूर साक्षिना प्रतीकम् मधुकरसमाना विचित्रा सूत्रगतिक २७ | संमहमाणी पाणाणि ८८ मार्गाच्यवननिर्जरार्थ विदरपति यरकर्म २२ संसटे हरये संसट्ठ मूल संसारस्स उ २२ २१२ | संसटे हत्थे संसट्टे मते २१४ रायणिएसु विणयं १७५/ येसादिगयमायरस सावनणषमाण २१ लोगस्स उजोमगरे ७८ सघरय संजम ५८ सापजणपमाण वयछका कायउछ सर्पपत्रिमागमा २४ से संजए समपचाए पयर्णन कायशोगा २१ सपत्यसंजम संजमामो स्पयिरकरिपानाम घरं विद्दत पन्नगर्भये० २२७ समासे मिक्षावाले ८३ पञ्चमं परिशिष्टम् । विशिष्टनाम्नामकारादि नाम पृष्ठा प्रा अरिटुनेमी पृश मंधगणित उपसेनः अश्विन्यादि १०॥ अंघवृष्णिः १० अस्तपर्वत १४५ | आचार्य हरिभवः २२० । कपिलादिमतम् ९८ नाम वार ८ नाम नाम अगन्धना अतीसाराधोपध अपश्धिमतीर्थकर १०० नाम वैदिकः &: २४ १०४ नाम १ २१५ पृष्ठाः नाम नाम पृष्टाकः पृष्ठाकः १८४ मलयमारतादिः कात्तिकपौणिमासी धर्मिलवत् १६४ नायपुत्तो ९५, १०२, १०३, महावीर १००, १८९ शययभवः काश्यपः २२ महावीरो १०४, १८८ १९, १९ शय्यभवाचार्य कासवो मागधदेशी यारवई शालिग्रामादि ३० ૨૦. कूरगडुकः बोधकः शिष्यः (?) २२० मेरुः २०९ / समुद्रविजयः कृष्णः १६७ ब्रह्मदत्तः १८४ रथनेमिः १०, ११ साकेतादि कोमुइ २२० रहनेमी सिद्धार्थः भद्रयाहुः कौमुदी १६४ भरतक्षेत्रम् राजीमती सीमन्धरस्वामी गन्धना भरतादिः ६ रायमई सुदर्शनागिरिः ८० बर्द्धमानस्वामी • २१ ८० भागवतः सुदसणो गिरी वर्द्धमान: जबूस्वामी भारतम् ९६, १०३, १०४ २० सुधर्मस्वामी १६२ १११, १३८ भारह जिनदेवसरिः २२१ भोगराजा १० वशिष्ठ ६२ सुबन्धुः शातपुत्रः ९६, १०३, १०४, भोगराया वीर: १, २५ / सुमतिसूरिः १०५, १८९ मध्यदेशादि वृश्चिकमन्त्रादि २१५ १५३ हरिभद्राचार्यः १६७ वशारादयः १० २१५ १०४ २११ २०९ २०, १३८ गौतमः चेल्लका २०८ २० २२० २२० १०

यष्ठं परिशिष्टम् ।
दर्शितान्यतिदिष्टान्युदाहरणानि
उदाहरणम्
पृष्ठा
उदाहरणम्
पृष्ठाक
उदाहरण
पृष्टाः
सुबन्धुवत् (दश पू.पृ.८१)५ तीसे) दश चू.पृ.८५)६ मधुयिन्दाहरणादि ६१ / धमिलषत्
भरतादिवत्(दश. पृ.८३) | द्वितीयमुदाहरणम् (२) भागवतोदाहरणम् (३) ८० प्रह्मदतवत्
उदाहरणम् (१) (म सा (राजीमतीरथनेमी) मुघाजीविन्युदाहरणम्(४) ८१
मई नोऽवि मदपि (दश च. पृ. ८७) ९.
वशारादयः
१८४
१८४
छार
प्रतीकम्
अथ प्रक्रियाप्रश्ना
अनेकार्थत्वाद्धामा
নিষিদ্ধান্তে
सप्तमं परिशिष्टम् ।
टीकान्तरगता व्याकरणसिद्धि
प्रतीकम्
प्रतीकम्
प्रतिकम्
प्राकृतशेल्या १४,१६,१८,४८, प्राकृतम्
१०२, ११७ | देतौ प्रथमा
१०३, ११९, १५१, १७३, | सुपा सुपो मपन्ति २८, १०७,
१२७, २१२, २२१
२३

अष्टमं परिशिष्टम् ।
टीकान्तरगता न्याया:
३
न्यायः
पृष्ठाः
न्यायः
पृष्ठकाः
मक्षोपानन्यायः
७९
अन्धप्रदीप्तपलायनघुणा-
झरकरणवत्
एकप्रहणे तजातीयग्रहणम्
८,२७, ३६, १००, १८८
न्यायः
पृष्ठाः
सति तस्मिन्नव्यवच्छित्ति-
भावात्
२१
सामान्यग्रहणेऽपि
३
w
इति लघुवृत्त्युपेतस्य श्रीदशवैकालिकसूत्रस्य समाप्तानि परिशिष्टानि
१२

Nasibleblastastallestaste
इति भगवच्छत्यभवथुतकेवलिनि'दं
श्रीमरसुमतिमाधुरिणा भवविरहावितवृहट्टीकोतवृत्युपेतं
श्रीदशवैकालिकं समाप्तम्।
O
इति धेष्ठिदेवचन्द्रलालमाई-जैन-पुस्तकोद्धारे प्रन्या: १०३ ॥
PARDAFASTERESPS,

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Shriadashavaikalikam

Author
Suri, Shrianandsagar
Title
Shriadashavaikalikam
File name
Shriadashavaikalikam
Text
OCR done
Citation
1954
Published
2011/10
Publisher
Bhavnagar, Mahodaya Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
332
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314373
Barcode
99999990312493.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
tUrPsjeqxGZ
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