Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Jankiharnam

Mahakavi,kumardas · 2012/10

PDF Proofread

Front matter

New
+
AANAPAPramod
PRASA
Among
Pran
AN
स्वगीय पति ममोहन ध्यास

निवेदन महाकवि कालिदास कृत रघुवंश को प्रसिद्धि सारे भारत में हो चुकी थी। मेघदूत, अभिज्ञान शाकुन्तल और रघुवंश-इन तीनों महान् कृतियों की रचना कर कालिदास ने अपने लिए अमरस्व अर्जित कर लिया था। रपवंश के ममान उच्च काव्य की रचना करना परवर्ती कवियों की महत्वाकांक्षा बन गयी थी। अनेक प्रयत्न हुए परन्तु उन प्रयलों में किसी को भी सफलता नहीं मिल सकी। अनेक उत्कृष्ट काव्यों को रचना हुई जिनमें कवियों ने अपनी प्रतिमा, कौशल और क्षमता का परिचय दिया । परन्तु कालिदास को ऊंचाई, माधुर्य, सोप्ठव, कलात्मकता और वैभव एवं ऐश्वयं तक पहुंचना किसी के लिए भी सम्भव न हो सका । रघुवंश को विजय दुन्दुमी श्रीलंका के आकार में भी ध्वनित, प्रतिध्वनित हुई । महाकवि कुमारदास के कानों तक मो रघुवंश को चुनौती पहुंची । उन्होंने दर्पमरे स्वर में कहा- "रघुवंश के रहते जानकाहरण केवल दो व्यक्ति कर सकते थे या तो कवि कुमारदास या रावण।" यह गर्वोक्ति कवि कुमारदास ने की थी अथवा नहीं इसके सम्बन्ध में कोई भी प्रमाण नहीं मिलता। परन्तु यह गर्वोक्ति सारे देश में फैल गयी-जन-जन का कण्ठहार बन गयो । जानकीहरणम् की रचना रघुवंश को सामने रख कर ही की गयी। जानकोहरणम् की रचना ने कवि कुमारदास को भी अमरत्व प्रदान कर दिया। इसको उत्कृष्टता के सम्बन्ध में किसी को भी सन्देह न था। यह बात दूसरी है कि जानकीहरणम् को रघुवंश को समकक्षता नहीं प्राप्त हो सकी, परन्तु यह मी सत्य है कि इस रचना की महत्ता सव को स्वीकार करनी पड़ी। जानकोहरणम् की काव्यात्मक उत्कृष्टता के कारण ही यह लोकोक्ति चल पड़ी जिसे कुमारदास कृत समझा जाता है- जानकी हरणं कर्तु, रघुवंशे स्थिते सति । कविः कुमारदासश्च, रावणश्च यदि क्षमः॥ फिर काल-देवता ने जानकोहरणम् को अपना ग्रास बना लिया । लगा उसका लोप हो • गया। शाङ्गंधर पद्धति, सुभाषितावली और औचित्य विचार चर्चा में इम ग्रंथ का चर्चा भर आया। परन्तु सम्पूर्ण ग्रंथ का पता न था। इधर-उधर जो उद्धरण अथवा संकेत मिलते थे उनसे जानकी- हरणम् का नाम भर चला आता था। पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध मे अनेक विदेशी तथा भारतीय विद्वानों ने शोध एवं अनुसंधान करके अनेक ग्रंथों की हस्तलिपियों को प्राप्त किया। जानकीहरणम् भी इसी क्रम में सिंहली विद्वान् श्री के० धर्माराम स्थविर के हाथ लगा। इस प्रकार इसके पुनरुद्धार का क्रम आरम्म हुआ। और, अब आदरणीय पण्डित व्रजमोहन व्यास की कृपा से यह अनुपम प्रय अपने संपूर्ण रूप में, भाषानुवाद के साथ, हमे प्राप्त हो रहा है। महाकवि कुमारदास कृत सपूर्ण जानकीहरणम् का नागराक्षरों में यह सानुवाद प्रकाशन एक ऐतिहासिक घटना है । इस युगान्तरकारी, अद्भुत ग्रंथ को इस प्रकार मंजोकर और उसका हिन्दी मे रोचक, लालित्यपूर्ण, निर्दोष अनुवाद करके परलोकवासी पण्डित ब्रजमोहन व्यास ने संस्कृत और हिन्दी साहित्य के प्रेमियों को उपकृत किया है। इस ग्रंथ के प्रकाशन से संस्कृत साहित्य के इतिहास की एक टूटी शृंखला जुड़ेगी और अनेक नवीन तथ्यों पर प्रकाश पड़ेगा। लंकानिवासी महाकवि कुमारदास कौन थे? उन्होने जानकोहरणम् की रचना कव . और किन परिस्थितियों में की? क्या वस्तुतः उन्होंने कालिदास कृत रघुवंश का प्रत्याख्यान करने के लिए ही जानकीहरणम् की रचना की ? इन सारी बातों पर आदरणीय पण्डित ब्रजमोहन व्यास ने विशद् विवरण प्रस्तुत किया है। जानकीहरणम् के केवल दस सर्ग प्राप्त थे। फिर पन्द्रह सर्ग प्राप्त हुए। अन्त में बीसों सर्ग प्राप्त हो गए। इस प्रकाशन में सम्पूर्ण ग्रंथ प्रथम बार देखने को मिलेगा। इसका सारा श्रेय श्री व्यास जी को है। उन्होंने जिस अध्यवसाय और परिश्रम से इस ग्रंथ के सर्गों को संग्रहीत और संपादित किया, वह एक लोमहर्पक कथा है जिसका कुछ आभास व्यास जी ने अपनी भूमिका में दे दिया है। वास्तविक बात यह है कि यद्यपि इस महान् ग्रंथ की चर्चा तो हमारे संस्कृत साहित्य के इतिहास मे यत्र-तत्र मिलती थी, परन्तु यह ग्रंथ प्राप्त न था। १८९१ ई० मे विद्यालंकार कालेज, पलिय गोड, केलानिया, लंका, के प्रिन्सिपल श्री के० धर्माराम स्थविर ने इस महाकाव्य के चौदह सर्गों और पन्द्रहवें सर्ग के प्रारम्भिक वाईस श्लोकों का शब्द प्रति शब्द अनुवाद सहित सिंहल लिपि मे संपादन किया और वह सत्य समुच्चय प्रेस, पेलिय गोड, कोलम्बो से प्रकाशित हुआ। जयपुर शिक्षा- दिमाग के अध्यक्ष पं० हरिदास शास्त्री ने इसे नागराक्षरों में रूपान्तरित किया। १८९३ ई० में संस्कृत कालेज, जयपुर, के अध्यक्ष ने इसे कलकता से प्रकाशित किया। इस संस्करण में कुल चौदह सर्ग और पन्द्रहवें श्लोक के प्रारम्मिंक बाईस श्लोक थे। इस सर्ग के वाकी श्लोकों को व्यास जी ने डॉ० राधवन की कृपा से प्राप्त किया। अन्त मे, श्री सी. आर. स्वामीनाथन् के शोध प्रवन्ध से लेकर पांच और सगों को भी जोड़ा गया और सम्पूर्ण ग्रंथ तैयार हो गया। इसके अनुवाद का कार्य वस्तुतः बहुत कठिन था । परन्तु वयोवृद्ध व्यास जी ने कठिनाइयों की चिन्ता न की। उन्होंने अनेक विद्वानों की सहायता प्राप्त की और अनेक दुरूह अंशों को भी बोधगम्य यना दिया। आदरणीय व्यास जी के इस दुष्कर कार्य ने अनेक विद्वानों को विस्मित कर दिया। पदय व्यास जी ने प्रायः असम्भव को संभव कर दिया। यमकों के अनुवाद के सम्बन्ध मे व्यास जी ने अनेक विद्वानों को सहायता ली, मुख्यतः पण्डित सरस्वतीप्रसाद चतुर्वेदी, अध्यक्ष संस्कृत विभाग, प्रयाग विश्वविद्यालय तया पण्डित रामकुवर मालवीय, अध्यक्ष साहित्य विमाग, वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय, से। यया : घटय ध्यास जी, प्रथम ३ पृष्ठों का मर्य ( ९ श्लोकों का ) मयाफर्यचित् सींचतान कर भेज रहा हूँ। जैसा कि मैंने निवेदन किया था कि पुराने महाकाथ्यों के यमक पर सगों का पुनरप्यपन के पावरा कार्य में भिाना चाहिये। अय समयाभाव के कारण, मैं उन अपेक्षित महाकाव्यों को पा नहीं सका हूँ, नारय होगा। केवल अपनी ओर से मापापञ्षी फर जो कुछ निकला, वही भेज रहा हूँ। -स० प्र० चतुर्वेदी श्री रामकुवेर मालवीय का पत्र ॥धीः॥ थीमन्तो माननीपा पारा महोरयाः, साररमामा विसरान्तुतराम् ! भारतरत्रारयोगिहे मपि सम्प्रति राजति। पारपरपमुगामाता रिमनेघ महोतसे॥१॥ 1 (७) कृतं मया भवत्कार्य महासागरलपनम् । यया हनुमता सम्यक रामकार्य महोत्कटम् ॥२॥ अस्य कार्यस्य निष्पत्त्यं न मम प्रार्थनं वरम् । किमनाराधितश्चन्द्रः करवं न समीक्षते ॥३॥ शिवरात्रिदिनान्तं त्वत् पार्श्व प्राप्स्यति निश्चितम् । कूटश्लोकार्य संख्यानं न्यासोकृतमिवस्थितम् ॥४॥ यद्वा होलिकान्तं तत् प्राप्स्यत्येव त्वदन्तिकम्। भवतामुत्सवायव तथा च प्रभविष्यति ॥५॥ श्रीमद्रामकुबेरस्य मालवीयस्य फोविद ! एषैव प्रार्थनालिस्ते पदपने विराजताम् ॥६॥ व्यास जी का उत्तर कमलापीरुपतिप्ठताम् एषा खलु निखिलशास्त्रकलावगाहगभीरबुद्धेः, वाराणसेयसंस्कृतविश्वविद्यालय साहित्य विभागाध्यक्षस्य तत्र भवतः यमककुलंघूमकेतोः श्री मद्रामकुबेरमालवीयस्य चरणकमलाम्याम् प्रजमोहनण्यासस्य अवमिनतलोलेन शिरसा, साभारनयिता प्रणामसन्ततिः। तत्रभवता प्रेषितेन षड्श्लोकविभूषितेन अरविन्दबन्धुसन्निभेन पत्रेण प्रफुल्लीकृतं मे हृदयारविन्दम् । तिरोहितञ्च संशयसंसृततिमिरान्धत्वम् । तत्क्षणमेव काश्यादाकाशमार्गपोपनीता, साहित्पशास्त्र-कलकलनिनादिनी तत्रभवतां स्वरलहरी सहसा पुनरुक्तव मे कर्णविवरे प्राविशत् । कः रामके शास्त्रं शासति शासितरि च यमकानाम् । अयमाचरत्यविनयं संशयभीतेषु व्यासचरणेषु॥ इत्यं साहसोत्साहसम्पृक्तां वाणी थुत्वा उत्फुल्लमनसा सहसा मपोक्तम् "शिवरात्रि दिनान्ते होलिकान्ते वा" यदा तत्रभवतः फूटश्लोक-सल्यानं मागमिष्यति तदान विस्मपविस्फारितायतलोचनाः सर्वे पण्डितमानिनः प्रपाभिभूता कययिष्यन्ति । कोप्येष वुद्धिनिकपः खलु रामभद्रः यो नामशेषानिव नः करोति । अद्यास्तमेतु भुवि पण्डितराजशब्दः साहित्यवितजनाः यमकाश्च यान्तु ॥ तत्रभवतामानन्दसन्दोहनिष्यन्दिपत्रमस्माकञ्च आभारजापनमभयमपि प्रास्ताविकायां प्रकाशयिष्यते । प्रयागे महाशिवरात्रौ । व्यास जी ने जिस लगन और धैर्य के साथ, जिस कौशल और योग्यता के साय इस ग्रंय की पाण्डुलिपि तैयार की और इसके परिशिष्टों का चयन करके इसको पूर्णत्व प्रदान किया उसके लिए हम उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। वस्तुतः मापानुवाद का ही नहीं, उसके संपादन का भी श्रेय श्रद्धेय श्री प्रजमोहन व्यास जी को ही है। परिशिष्ट मे व्यास जी ने चरित्रकोग, स्थानकोश, धर्माराम स्थविर की भूमिका, टामस की टिप्पणी, वार्नेट की टिप्पणी, वार्नेट द्वारा उद्धृत सोलहवा सर्ग, जानकीहरण के कुछ पाठ, राइज डेविड्स की टिप्पणी, जानकीहरण में प्रयुक्त छंद, सगों में प्रयुक्त छंद, छदों को श्लोक संस्था, महाकाव्य का विवरण, यमकों के लक्षण, यमक एवं शब्द चित्र, यमक एवं शब्द चित्र (सारिणी) तथा राक्षसों का वंश-वृक्ष--इन सोलह अध्यायों में सहायक साहित्य भी दे दिया है। इससे मूलग्रंथ के विभन्न पक्षों पर सम्यक् प्रकाश तपड़ता है। जानकीहरणम् के काव्य सौष्ठव पर श्री कमलेशदत्त त्रिपाठी का एक संक्षिप्त निबन्ध भी दे दिया गया है। इसके लिए व्यास जी ने अपने जीवन काल में ही आदेश दिया था। व्यास जी का देहावसान ७८ वर्ष की उम्र में गत २५ मार्च १९६३ को हो गया। जीवन के अन्तिम क्षण तक वह पूर्णतया स्वस्थ थे। यकायक कठोर काल ने उनको हमारे बीच से उठा लिया। परन्तु उनका मनोहारी, सशक्त, जीवन्त व्यक्तित्व हमारी आखों के सामने है। अब भी उनकी मधुर वाणी कानों में गूंज रही है। काश कि यह प्रथ व्यास जी के जीवन काल में ही प्रकाशित हो गया होता! स्वर्गीय डा० वासुदेवशरण अग्रवाल जी ने इस ग्रंथ विशद भूमिका लिखने की इच्छा प्रकट की थी। परन्तु अपनी यह इच्छा वह पूरी न कर सके। असमय ही वह गोलोकवासी हो गए। उनकी भूमिका प्रस्तुत ग्रंथ में सम्मिलित नहीं हो सकी, इसका हमे बहुत दुख है। दुःख है कि जानकीहरणम् की पाण्डुलिपि का संपादन करने में मुझे न तो श्री व्यास जी की सहायता मिल सकी, न डा. वासुदेवशरण अग्रवाल की । इन दोनों महानुभावों की सर्वथा अप्रत्याशित परलोक यात्रा से साहित्य जगत् को जो क्षति पहुँची है उसकी पूर्ति कैसे हो सकेगी ? संपादन सम्बन्धी जी मो त्रुटियाँ रह गयी हैं, उनके लिए व्यक्तिगत रूप से मैं ही उत्तरदायी हूँ । अगर इन दोनों आचार्यों की सहायता और निर्देशन से मैं लामान्वित हो पाता तो निश्चय ही यह ग्रंथ और भी अधिक सुचारु रूप से प्रकाशित हो पाता। जानकोहरणम् को जनता के सामने प्रस्तुत करने मे हमे अतीव हर्ष का अनुभव हो रहा है। अभी तक जिस ग्रंथ को लुप्तप्राय माना जाता था, वही अव अपने सपूर्ण रूप में, हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित हो रहा है, सचमुच यह आनन्द का विषय है । कुमारदास कृत यह ग्रंथ कितना महत्वपूर्ण और महान् है इसके सम्बन्ध में हमें कुछ नहीं कहना है। जानकीहरणम् की महत्ता स्वयंसिद्ध है । हमें गर्व है कि हम इस अनुपम ग्रंथ का इतना पूर्ण और प्रामाणिक सानुवाद संस्करण इस रूप में प्रकाशित कर सके । विज्ञ क्षेत्रों में यह अवश्य ही अभिनन्दित होगा, ऐसा हमारा विश्वास है। -श्रीकृष्ण दास प्रस्तावना संस्कृत-वाड्मय का समीक्षा-शास्त्र एक परिपक्व एवं परिनिष्ठित शास्त्र है। समीक्षात्मक वाङमय, सर्जनात्मक वाडमय की महत्ता का परिचायक होता है । संस्कृत काव्य-वाहमय में ऐसे अनेक रत्न हैं जिनको ईदृकता (गुण) और इयत्ता (परिमाण), इन दोनों दृष्टियों से विद्वानों ने मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। एवमेव भरत से लेकर पण्डितराज जगन्नाय तक की विशाल कालावधि में साहित्य-मर्मज्ञों के समीक्षा-अन्य भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। संस्कृत की इस दीर्घकालीन समीक्षा- परम्परा का यह शुभ परिणाम हुआ कि प्रसिद्ध कवियों के विषय में समीक्षा का परिनिष्ठ्यूत तत्व, अत्यल्प शब्दावली में, निहित किया जा सका है, जिससे उन कवियों की प्रमुख विशेषताओं की झलक हमें मिलती है। कालिदासस्य, भारवेरर्थगौरवम् दंडिनः पद-लालित्यं माप सन्ति त्रपांगुणाः । उपमा इस लघुतम दलोक में चार प्रसिद्ध कवियों के काव्य-सौष्ठव को खोल कर रख दिया गया है। विशाल कान्य-साहित्य और समीक्षा-अन्यों के सूक्ष्म अध्ययन से जिस निर्णय पर हम पहुंचते है, यह इस सुमापित मे मानों निचोड़ दिया गया है । साहित्य-पारखियों को यह सुविदित है कि कविकुल गुरु कालिदाम की सर्वश्रेष्ठता के विषय में 'अनामिका सार्यवती बभूय' इस समीक्षात्मक सुमापित ने कितने अल्प शब्दों में, कितने प्रभावशाली ढंग से, कितनी बड़ी बात कह डाली है। इसी कोटि का एक कवित्वपूर्ण समीक्षा सुमापित निम्नलिखित है : जानकोहरणं कतुं, रघुवंशे स्थिते सति। कविः कुमारदासोदा, रावणोवा यदि क्षमः॥ अर्थात् रघुवंशी रामचन्द्र के रहते रावण ही जानको-हरण कर सकता था, वैसे ही रघुवंश महाकाव्य के रहते कवि कुमारदास ही जानकोहरण महाकाव्य की रचना कर सकते थे। इस सुमापित में यह भी समेत मिलता है कि काश्मीर से लेकर लंका तक के विस्तीर्ण भारतवर्ष के संस्कृत कवियों को एक दृष्टि में रस कर परमने से कालिदास एवं कुमारदाम-ये दोनों महाकवि उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत में एक दूसरे के समकक्ष प्रतिनिधि कवि माने जाते थे। इस परस्पर-नुलना को अधिक कवित्वमय तया रोचक बनाने के लिये उत्तरकालीन कल्पना प्रतिमा ने इम जनयुनि को जन्म दिया कि कालिदास एवं कुमारदार, न केवल समकालीन पे अपितु परस्पर-मित्र मी पे तया संसा दीपवामी घुमारदास ने कालिदास के वियोग में जीवन को निरर्थक सममा । एवं कमले कमलोलत्तिः भूपते न तु दृश्यते' कुमारदाग के इस लोकार्य को मालिदाम ही पूरा कर सके थे। 'बाले तय मुहामोजे, दृष्टमिम्मीषदयम्'। रपर्व-प्रतिस्पर्षी जानकोहरप के रपयिता सुमारदाम का मग तेरहवी शतानी के मंति-जगत् में सर्वविद्युत पा । तमी तो उन्हप को मूमि-मुस्तावनी में राजार का परिनिदिष्ट फ्लोर (जानकीहरणं पम्...म. को ) कुमारदास की ( १० ) प्रशंसा में उधृत किया गया है । दशम गताब्दी के प्रसिद्ध नाटककार और समीक्षक राजशेखर ने अपनी काव्य-मीमांसा में कुमारदास के जन्मान्ध होने का निर्देश किया है, जो उत्कृष्ट कवित्व को प्रमाणित करने के लिये एक 'कवि समय' सा हो गया है। किन्तु महाकाल के प्रवाह के चपेटे मे जानकोहरण महाकाव्य भी आया तथा विस्मृति के गर्भ मे विलीन हो गया। संस्कृत वाझमय में पूर्वविश्रुत किन्तु पश्चात् विस्मृत ऐसे अनेक ग्रन्थ-रत्न हैं जिनका उद्धार आधुनिक काल में हुआ है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र, अश्वघोप के महाकाव्य, मास के तेरह नाटक, इसी प्रकार मध्य युग की कालावधि मे लुप्त गये थे; किन्तु पुनरुपलब्ध होने पर आज उनकी अभूतपूर्व प्रसिद्धि है। संयोग की बात है कि उपर्युक्त ग्रन्थ-रत्नों का उद्धार आर्यावर्त (अर्थात् सामान्यतः उत्तर भारत) में नहीं, अपितु दक्षिण भारत में या भारत के बाहर हुआ, क्योंकि वही उनकी पाण्डुलिपियां सर्वप्रथम पायी गयी थीं। इसी प्रकार जानकोहरण का भी शब्दानुवाद-सहित मूल सर्वप्रथम सिंहली लिपि में प्राप्त हुआ था। खण्ड-खण्ड कर अवशिष्ट ग्रन्थांश भी अब उपलब्ध हो गया है। बीस सर्गों का यह महाकाव्य हिन्दी- अनुवाद तथा अनेक परिशिष्टों के साथ प्रथम वार प्रकाशित हो रहा है। इस प्रकाशन की पृष्ठभूमि बहुश्रुत अनुवादक श्रद्धेय ब्रजमोहन व्यास जी की साहित्यिक लगन है। व्यास जी प्रयाग नगर की सांस्कृतिक विमूति के विशिष्ट प्रतिनिधि थे। आज वे हमारे बीच में नहीं है । उनका पार्थिव शरीर यश्च शरीर मे परिवर्तित हो गया है । किन्तु जिन्हें उनका साक्षात् दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है वे समी सशपथ मुक्त कंठ से कहेंगे कि उनकी सुन्दर गौरवर्ण देह, शुभ्र तथा स्वच्छ परिधान, मुच्छ-सुशोभित भव्य मुखमंडल, ताम्बूल रंजित अघर, दृढ़ किन्तु कोमल स्वास्थ्य-सूचक अंग-यष्टि, एक पौरप-युक्त 'पुमान्' के सर्वथा अनुरूप थे। साथ ही निनादिनी मधुर वाणी, शुद्ध उच्चारण-प्रक्रिया, मुखाग्ररूप मे उत्तमोत्तम गद्यपद्यमय काव्यांशों की उद्धरण-क्षमता, संस्कृत-साहित्य से अगाध प्रेम, अद्भुत एव परिष्कृत श्लोक-पाठ-शैली, उनकी साहित्य-मर्मज्ञता एवं विद्या-व्यासग की परिचायिका थी। इसके अतिरिक्त हृदय की उदारता, वदान्यता, कलाप्रियता, साधुवृत्ति, सविनय माधुर्य, निश्चल व्यवहार तथा विनोदप्रियता-उनके मनोहारी व्यक्तित्व की उच्चता का स्पष्ट मान कराती थी। संक्षेप में वे प्रयाग नगर के, विशेषतः अहियापुर मुहल्ला के, बाह्य एव आन्तर दोनों रूपों में, सच्चे प्रतीक थे। प्रयाग नगर को उन्होंने अनेक पुस्तकों के रूप में साहित्यिक निधि प्रदान की है। प्रयाग-संग्रहालय उनकी कर्मठता तथा दूरदर्शिता का अद्भुत प्रमाण है। किन्तु जीवन के विविय क्षेत्रों मे ( वकील, प्रशासक, सार्वजनिक कार्यकर्ता आदि के रूप में ) सफलता प्राप्त करने के बाद ७५ वर्ष की उम्र मे इस महाकाव्य का हिन्दी अनुवाद करने की उनकी तैयारी एक आश्चर्यावह उपक्रम था,इसमें सन्देह नही । भारवि-माप की कवि-परम्परा की अलंकृत एवं अधिकांशतः कृत्रिम कार्यशैली मे लिखे गये जानकोहरण का मुहावरेदार, स्थानीय पुट-युक्त ठेठ हिन्दी में रूपान्तर करना उन्ही के लिये शक्य था। अपनी धुन में उन्होंने चित्रबन्ध वाले अठारहवें सर्ग के अनुवाद में काफी मायापच्ची की और कराई, किन्तु बाद में वे तमी इस कार्य से विरत हुए, जब उन्हे यह विश्वास हो गया कि एकाक्षर, द्वयाक्षर, आदि विचित्र श्लोकों की रचना में स्वयं रचयिता भी अभिप्रेतार्य के पूर्वज्ञान का आग्रह नहीं करता, बल्कि उसे अपने विद्वान् पाठकों के व्याख्या-कौशल पर छोड़ देता है। संस्कृत भाषा की लोच तथा मनमाना अर्थ व्यक्त करने के सामर्थ्य की कसौटी के रूप मे यह चित्रबन्ध-काव्य-निर्माण-परम्परा उरा युग में चल पड़ी थी और भारवि, माघ आदि महाकवियों की होड़ मे कुमारदास ने भी इस परम्परा को अधिक प्रश्रय दिया। अतः अठारहवें सर्ग के अनुवाद में रचयिता के अभिप्रेत अर्थ के व्यक्त करने में सम्पूर्ण सफलता का दावा न कर उसे अनुवादक के वैदुष्य, व्याकरण विषयक प्रतिमा और व्याख्या-नपुण्य का उदाहरण मानना चाहिये । व्याकरण की उणादि-प्रक्रिया के अनुसार संस्कृत भाषा कामधेनु के समान है जिससे.

कोई भी निपुण दोग्या अभिप्रेत अर्थ निकल सकता है । भाषा अर्थवती है, अर्थ-ग्राहक मिलना
चाहिये। अस्तु।
प्रस्तुत प्रकाशन गे मूल ग्रन्थ को उत्कृष्टता, विशद अनुवाद शैली और कलात्मक मुद्रण कला
आदि सभी विषयों में मणिकान्चन-संयोग से हिन्दी वाहमय को श्रीवृद्धि होगी, यह सन्देहातीत है।
स्वर्गीय व्यास जी का यह मरणोत्तर प्रकाशित ग्रन्थ उनको साहित्यिक अभिरुचि और वाग्विदग्धता फी
पुण्यस्मृति का अन्तिम प्रतीक है।
--सरस्वतीप्रसाद चतुर्वेदी
विजया दशमी}

सांमनस्यम्
ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः ।
अन्यो अन्यस्मै वा वदन्त एत सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोभि ।।
--अथर्ववेद, काण्ड ३, सूक्त ३०॥
त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये !

भूमिका सत्कविरसनाशी निस्तुपतरशब्दशालिपाकेन । तृप्तो दयिताधरमपि नाद्रियते का सुधा दासी । सुकवि के जिह्वारूपी सूप से पछोर कर भूसी निकाले हुए चावल के पके हुए मात से तृप्त साहित्यिक, प्रेयसी के अपर का आदर नहीं करते, सुधा की कौन गिनती? वह तो दासी के समान है। अपने गुरुदेव, संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित, संस्कृत साहित्य के मयु-लोलुप मुंग, आचार्य बालकृष्ण भट्ट की प्रेरणा एवं प्रोत्साहन से मुझे संस्कृत साहित्य में अनुराग हुआ 1 मैंने इसका सवि- स्तर वर्णन, अपनी पुस्तक 'पण्डित बालकृष्ण भट्ट के संस्मरण' में किया है । मेरे पिताश्री पूज्यपाद डाक्टर जयकृष्ण व्यास, भट्ट जी के अभिन्न मित्र थे । वे संस्कृत साहित्य के बड़े प्रेमी थे। माप का 'शिशुपाल वध' उनका प्रिय काव्य था। माप के श्लोकों के अर्थ लगाने का प्रयास , वे पहिले विना टीका देखे हुए करते थे और जब इस प्रकार श्लोक का अर्थ नही ही निकलता था तब वे टीका की सहायता लेते थे। माघ की ओर मेरा यह पक्षपात, और बिना टीका के श्लोकों की गुत्थी सुलझाने की पृष्टता उन्ही से प्राप्त मेरी पैतृक सम्पत्ति है । मेरे पितामह, मनसा और कर्मणा पवित्र, ऋषितुल्य, पण्डित लक्ष्मीनारायण व्यास नगर के एका वयोवृद्ध, लब्धप्रतिष्ठ वैद्य थे। वे संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे। उनको मेघा-शक्ति इतनी प्रसर थी कि वैद्यक के कई ग्रन्थ उन्हें आद्योपान्त कण्ठस्थ थे। मेरे प्रपितामह, पण्डित सतीप्रसाद जी व्यास संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित और पुरयर वैयाकरण थे। वे नित्य गंगा-स्नान के लिये पैदल जाते थे। जाते समय ये आरम्म से अन्त तक पाणिनि की अष्टाध्यायी का पाठ करते थे और लौटते समय अन्त से आरम्भ तक उलटा पाठ करते थे। जैसा लड़के 'सौ पूरे निन्यानवे, अशानवे, सत्तानवे,' का पाठ करते हैं । उनमें संस्कृत के शुद्ध उच्चारण एवं व्याकरण से परिसुद्ध, पाराप्रवाह मापण करने की अपूर्व प्रतिमा पी। बतलाने के लिये भी पे अशुद्ध शब्द का प्रयोग नहीं करते थे। कहते थे कि जो मैं कह रहा है वही गुद्ध है। इसके अतिरिक्त सब अल है । बत्तीस वर्ष की उम्र में उनका देहान्त हो गया। अपनी यंशावली का पोड़ा विस्तार से वर्णन करने के कई कारण हैं । एकतो, मनुप्प जव स्वयं धनहीन होता है तो वह अपने मपम पूर्वजों की दुहाई देता है। यद्यपि अंग्रेजी की एक कहावत है कि "What is to thc dumb whosc forefathers were cloqueat and what is to the blind whose forefathers could sce ?' 'गंगे को इसरो क्या लाम यदि उनके पूर्वज व्याख्यान वाचस्पति थे और अ कोइससे क्या साम कि उसके पूर्व-गुरुषों को दृष्टि बड़ो तीन थी !' परन्तु वात कुछ ऐमो ही है । उत्तराधिकारी अपनी पतुरुन सम्पत्ति से यश्चित हो माना है परन्तु तम्बनिन गौरव एवं कल्याणकरी सम्पत्ति मे बिपि मी उगे यश्चित नहीं कर मरने । दूसरे चव उगको गन्तान, उत्माह के कारण अपनी पति मे अधिक कोई काम कर बैटना है, तो उमरे गुरुदेव एवं शिवासी पूर्वत्र यास्मन्य गे प्रेरिल होर उगरेपी भा मंठसे हैं जिसरे पारण उमको गापना मकर हो जाती है। - .

कालिदास ने शाकुन्तल में कहा भी है : सिध्यन्ति कर्मसु महत्स्वपि यनियोज्याः सम्भावनागुणमवेहि तमीश्वराणाम् । किंवाऽभविष्यवरुणस्तमसा बिभत्ता तं चेत्सहसकिरणो परि नारिष्यत् ॥--शाकुन्तल ७,४ । बड़े कामों में लगा मनुष्य यदि सफल होता है तो उसका कारण बड़े लोगों का सम्मान- प्रदान है। यदि ऐसा न होता तो मला अरुण में इतनी शक्ति कहाँ थी जो वह अन्धकार को दूर कर सकता, यदि सूर्य उसे आगे-आगे न कर देता और पीछे से उसे शक्ति प्रदान न करता रहता। न कुछ हम हंस के सोखे हैं, न कुछ हम रो के सीखे हैं। जो कुछ थोड़ा सा सीखे हैं, बस उनके हो के सोखे हैं। -बार । यद्यपि में साहित्य प्रेमी था और मैंने काव्य और नाटकों का यथाशक्ति अध्ययन भी किया था, परन्तु जानकीहरण से अनभिज्ञ था। केवल उसका नाम मात्र सुना था। जब मैंने राजशेखर की काव्य- मीमांसा में यह श्लोक पढ़ा: जानकीहरणं कर्तुं रघुवंशे स्थिते सति । कविः कुमारदासश्च रावणश्च यदि क्षमः ॥ तो, इस सुन्दर श्लेपयुक्त श्लोक को पढ़ कर मेरा जी फड़क उठा, और मैंने निश्चय किया कि इस काव्य को मैं अवश्य पढ़गा । परन्तु पुस्तक सरलता से उपलब्ध न थी, यद्यपि बाद में पता चला कि प्रयाग विश्व-विद्यामल के पुस्तकालय में वह थी। मैंने उतावली में बम्बई से नन्दरगिकर द्वारा सम्पादित, एक प्रति तुरन्त मंगवा ली। उसको उलट-पुलट कर देख ही रहा था कि सहसा मेरी दृष्टि इस श्लोक पर पड़ी- विरामः शर्वर्या हिमचिरवाप्तोस्तशिखरं, किमद्यापि स्वापस्तव मुकुलिताम्भोयह दृशः । इतीवायं भानुः प्रमदयनपर्यंतसरसों, करेणातान्त्रेण प्रहरति विवोधाय तरुणः ॥-जानकीहरण ३,७८ । श्लोक सरल या। बिना किसी प्रयास के हृदय में घर कर गया। प्रमात का वर्णन है। सरसी अलसाई हुई प्रमद बन तक फैली हुई है। उसके कमल रूपी नेत्र मुदे हैं। इतने में तरुण सूर्य का उदय हो रहा है। वह अपने आताम्र करों (श्लेपः हाय-रश्मि) से सरसी को थपकियाँ देता हुआ यह कह कर जगा रहा है कि 'रात बीत गई, शीत-रश्मि चन्द्र अस्ताचल पर चले गये। अरी मुकुलित-कमल-नयने ! तू अभी तक सो रही है। जल्दी उठ।' सम्पूर्ण संस्कृत साहित्य में सूर्योदय- वर्णन के श्लोकों में यह एक अनुपम रत्न है । इस श्लोक को पढ़ कर जानकोहरण को ओर मेरा आकृष्ट होना स्वामाविक ही था। फिर तो मैंने दसो सर्गों का कोना-कोना छान डाला। उनमे मुझे बहुत पूछ-ताछ के बाद पता चला कि यह महाकाव्य वीस ही रागों में समाप्त हो गया है। मद्रास विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष डाक्टर पी. रापवन ने लिसा कि "जानकीहरण बीस सर्ग में ही पूरा हो गया है, २५ में नहीं।" एक दूसरे पत्र में उन्होंने यह भी लिसा कि- "In the discussions about the colophon in the Calcutta cdition you might have noted that it has been pointed out that there is another reading इति पञ्चदशः सर्गः। 20th canto gives a perfect conclusion to the whole themc of the Kavya and there is hardly any matter Icft forfurther cantos. Beyond this colophon reproduced in the Calcutta Edn. from Dharmarama and his Sanna there is no such thing as an expression mentioning the work going up to 25 cantos." कलकत्ते से सम्पादित प्रति में कोलोफन' के सम्बन्ध में जो चर्चा की गई है उसमें आपने देखा होगा, कि यह बतलाया गया है कि उसमे 'इति पञ्चदशः सर्गः' ऐसा एक दूसरा पाठ भेद है: २०वें सर्ग मे कथा की पूर्ण रूप से समाप्ति होती है और आगे के सर्गों में कहने के लिये कुछ बच नहीं रहता। इस 'कोलोफन' के अतिरिक्त जो पाराम और उनके सन्न से उदृत किया गया है, काव्य के २५ सर्ग तक जाने का कोई संकेत नहीं है ।" बीसवें सर्ग के अन्तिम तीन श्लोकों में राम के राज्याभिषेक का वर्णन है जिससे स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है कि कथा समाप्त हो गई। अब केवल दो बातें बच रहीं। पं० हरिदास शास्त्री के कलकत्ता वाले सन् १८९३ के संस्करण में एक से लेकर चौदह सर्ग और १५वें सर्ग के आरम्भ के २२ श्लोक हैं। इसके आगे ने श्लोष कहाँ हैं ? दूसरी बात यह कि महाकाव्य २० सों में समाप्त होता है तो इसके अन्तिम पांच सर्ग कहां हैं और कैसे उपलब्ध हो सकते हैं ? मुल्ला की दौड़ मसजिद तक । स्वजन श्रीकृष्णदास के सुझाव पर मैंने तुरन्त अपने आदरणीय मिय डा. महादेव साहा को कलकते पत्र लिखा । उन्होंने बताया कि "जानकीहरण की एक पोथी Govt. Oriental Mss. Library ( Madras) और दूसरी School of Oriental & African Study, Finsbury Circus, London E.C. 2. में है । दूसरी के बारे में Bulletin of School of Oriental Studies, Vol. IV pp. 285-293 पर L. D. Barnett का एक लेग्य है । इसमें सोलहवें सर्ग से रोमन लिपि मे ८३ श्लोक दिये गये है।" जिस सक्रियता के माथ डा. महादेव साहा ने मेरी सहायता की उसका आभार प्रकट करना उनकी सहायता की अवहेलना होगी । ऐसा लगता था जैसे उन्हें 'जानकी-हरण' की चिंता मुझ से और रावण दोनों से अधिक हो। न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवमव भूय एवाभिवर्षते ॥ वार्नेट के दिये हुए सोलहवें सर्ग के ८३ श्लोकों को प्रतिलिपि करा ली । जानकीहरण के इस सोलहवें सर्ग पर मैं मुग्ध हो गया। इसमे लका मे सन्ध्या और रावण के रात्रि केलि का वर्णन है । पुष्पिताग्रा छन्द में होने के कारण श्लोकों का गति-सौंदर्य इतना आकर्षक है कि उसके अधिकांश श्लोक मुझे कण्ठस्थ हो गये।

अव प्रश्न केवल तीन सों (१७-२०) और १५वें के २२वें श्लोक के बाद के श्लोकों का रह गया। डाक्टर राघवन् ने लिखा। "The Madras mss. containing 20 cantos do have the verses of canto 15 beyond verse 22 where Calcutta edition stops......Sri C. R. Swaminathan has cdited as a rescarch scholar working under me the unpublished cantos of Kumardasa's Janakiharana for his M. Litt. degree. The edition which jhas a critical introduction and a translation has been accepted for publicaton by the University." मद्रास की हस्तलिखित प्रति, जिसमें २० सर्ग हैं उसमें १५वें सर्ग के २२वें श्लोक के, जहाँ कलकत्ते से सम्पादित प्रति रुक जाती है, आगे के श्लोक हैं ।...श्री सी० आर० स्वामीनाथन ने, मेरी देख-रेख में शोधकार्य करते हुए, एम. लिट. डिग्री के लिये, कुमारदास के जानकोहरण के उन सर्गों का सम्पादन किया है, जिनका अमी तक सम्पादन नहीं हुआ था। उसमें विवेचनात्मक भूमिका और अनुवाद भी है जो प्रकाशनार्थ विश्वविद्यालय द्वारा स्वीकृत हो चुका है। डाक्टर राघवन् ने १५वें सर्ग के २२वें श्लोक के आगे के श्लोकों की एक प्रतिलिपि भी मेरे पास भेज दी। उसका आभार 'न शक्यते वयितु तदा गिरा । स्वयं तदन्तः करणेन गृह्यते'। एक शब्द श्री स्वामीनाथन जी के लिये। मैंने उनका शोधकार्य बड़े ध्यान से पढा है । उनकी लगन एवं विद्वता सराहनीय है। उन्हें केवल इतना ही आशीर्वाद दूंगा कि : "वितरतु त्ययि भद्रं भूयसे मंगलाय !' अब संक्षेप में जानकीहरण के परिचय और उसके रचयिता कवि कुमारदास के जीवन-वृत्त सम्बन्ध में निवेदन करना चाहता हूं- पुष्परम्पच्यं गत्यादिभिरपि सुभमेश्चारुहंसेन मां बे- निर्यान्ती मन्त्रमूर्ति जपति मयि मति न्यस्य मम्येय भवतः । तत्प्राप्ते वत्सरान्ते शिरसि करमतो यस्य कस्यापि पत्ते सोऽपि श्लोकानकाण्डे रमपति सचिरान्कौतुकं दृश्यमस्या । -नंषधीय परिते, १४.९० । “जो साधक मुझ सुन्दर हंसवाहिनी, मत्रमूर्ति को सुकोमल एवं मनोहर पुष्प, गन्ध, धूपादि पोडपोपचार से, मेरे मे चित लगाकर, मुझे ही भक्ति के साथ जपता है, वह वर्ष के बीतने पर यदि किमी भी व्यक्ति के सिर पर हाय रख दे तो वह सहमा ललित श्लोकों की रचना करने लगेगा। इमका चमत्कार देखने योग्य है।" मानकोहरण महाकाव्य का 'उदार' एक अनूठो ऐतिहासिक घटना है । यदि माहित्यिक उंग से कहा जाय तो वह 'उलार' कुछ इस प्रकार होगा: समुद्र की जलराशि में निमग्न गूर्य के उदय का यर्णन है- ( १८ ) विततपयुवरत्रातुल्यरूपमयूखं: कलश इव गरीयान् दिग्भिराकृप्यमाणः । कृतचपलविहंगालापकोलाहलाभि- जलनिधिजलमध्यादेश उत्तार्यतेऽर्कः ॥ समुद्र के भीतर से सूर्य निकलना ही चाहता है। उसकी रश्मियां बाहर निकली हैं। चारो ओर पक्षिगण चहचहा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे दिगाङ्गनायें, कोलाहल करती हुई, मोटी मोटी रस्सियों से, सूर्य को, डूबे हुए कलश की भाँति बाहर निकाल रही हैं । कुछ इसी प्रकार बड़ी खोज और लगन से विद्वानों ने जानकीहरण को अन्धकार के गर्त से बाहर निकाला। पर यह कलश छिन्न-भिन्न हो चुका था और उसके टुकड़े इतस्ततः समय समय पर मिले। विद्वानों ने बड़ी सावधानी से उप टुकड़ों को जोड़ कर एक कलश तैयार किया। फिर भी वह अपूर्ण ही रहा । अव पहिली वार सम्पूर्ण कलश (महाकाव्य) रंग-चुंग कर आपके सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। श्री एफ० डब्ल्यू० टामस, जिन्होंने जानकोहरण के सम्बन्ध में बड़ी छान-बीन की है, लिसते "इस काव्य को, बहुत थोड़े लोग जानते हैं। इसका इतिहास विलक्षण है। इसकी कोई भी हस्तलिखित प्रति अमी तक नहीं मिली है। भारत में इसके अस्तित्व के चिह्न केवल इतने हैं कि उसके कुछ श्लोक संस्कृत के दो कविता संग्रहों में पाये जाते हैं। एक तो 'शाङ्गघर पति' और 'सुभाषितावली' में और दूसरे क्षेमेन्द्र के 'औचित्य विचार पर्चा' में । और इस काव्य के प्रणेता का नाम राजशेखर के एक प्रख्यात इलोक में कालिदास के साथ लिया गया है- जानकोहणं कर्तुं रघुवंशे स्थिते सति कपिः कुमारदासश्च रायणश्च यदि समः। सिंहलीय वाहमय ने इस काव्य के पहिले चौदह सर्ग और पन्द्रहवें सर्ग के अंश का सम्म (सिंहली में शब्दशः अनुवाद) सुरक्षित रखा है जिसमें श्लोकों के प्रत्येक पाब्द को टीका दी गई है, जिससे शब्दों को यथास्थान बैठा कर एक ग्रंय तैयार किया गया है जो मूल ग्रन्थ से अधिक मिल नहीं हो सकता। इसके पुननिर्माण का प्रथम प्रयास एक सिंहलीय पण्डित ने जेम्स डी अलविस के लिये किया या । उन्होंने अपनी पुस्तक "सीलोन के संस्कृत पालि एवं सिंहलीय साहित्यिक पंगों की पर्णनात्मक सूची" में पृष्ठ १९१-१९२ पर उदाहरणार्य, ऐसे दश इलोकों को दिया है जो प्रकाश में आए हैं। परन्तु जितने भी सर्ग बचे हुए हैं उनके उद्धार के लिये, हम के० धर्माराम स्थविर के आमारी हैं । सन् १८९१ में इस विद्वान् ने सीलोन के पेलियगोड में रान संयुक्त मूल ग्रंप का अपनी उत्कृष्ट भूमिका सहित प्रकाशन किया है । यह गृति आद्योपान्त सिंहलीय लिपि में है। मन् १८९३ में एक संस्करण कलकत्ते से नागरी लिपि में छपा जिसका संकलन, थोड़ी-थोड़ी टिप्पणियों के साथ जयपुर राज्य के शिक्षा विभाग के भूतपूर्व संचालपा, स्वर्गीय पण्डित हरिदास शास्त्री, एप. ए. ने किया। इरो उनके निधन के बाद, जयपुर के संस्कृत भालेज के अध्या, श्री कालीपद पदाप्याप ने प्रकाशित किया। इससी (जो स्वतंत्र पुननिर्माण का मूल्य नही रगता) गमालोचना प्रोफेगर राव टेविम ने १८८४ के इग जनरल पृष्ठ ६२३-२४ पर को है। धर्माराम गंस्करण पा उल्लेग 'मोरिपंटलिस्ट के जिद ४, पृष्ठ ७८ पर है और प्रोफेसर मंन ने 'विपना ओरियंटल जर्नल, जिल्द ७, १८९३, पृष्ठ २२६-२३२, पर इस काव्य की मीमांसा करने में उसका उपयोग किया है।" मैंने प्रस्तुत अनुवाद के लिये निम्न स्थानों से मूल पाठ लिये हैं : (१) सर्ग १ से १० सर्ग तक-श्री गोपाल रघुनाथ नन्दरगिकर के संस्करण से जिसे उन्होंने जानकोहरण को चार हस्तलिखित प्रतियों तथा एक खंडित प्रति से संशुद्ध कर १९०७ मे प्रकाशित किया था। (२) सर्ग ११ से १५वें सर्ग के २२वें श्लोक तक पं० हरिदास शास्त्री द्वारा सम्पादित 'जानकी. हरण' से। (३) १५वें सर्ग के २३वें श्लोक से उस सर्ग के अन्त तक, जिसे डाक्टर वी० राघवन ने मद्रास की हस्तलिखित पोथी से प्रतिलिप करा कर भेजी। (४) सर्ग १६ से २० सर्ग तक श्री सी० आर० स्वामीनाथन को 'योसिस' से। उपर्युक्त चारो ही विद्वानों ने बड़ी लगन और परिश्रम से जानकोहरण के बिखरे हुए अंशों को जोड़ बटोर कर खड़ा कर दिया है। यह मुझ जैसे अल्पन एवं बहुपंधी व्यक्ति के बूते की बात न थी। कुमारदास के जीवन-वृत्त के सम्बन्ध में विद्वानों ने बड़ी छानबीन की है। परन्तु वे किसी निश्चित परिणाम पर नहीं पहुंच सके। कुमारदास के सम्बन्ध में अनेक किम्वदन्तियां प्रचलित हैं जिनके आधार पर लोग उन्हें कालिदास का समकालीन कह देते हैं । जनश्रुति का महत्व सीमित होता है। उनकी नीव पर ऐतिहासिक प्रासाद का निर्माण करना भूल होगी। उसके लिये अधिक ठोस नीव को आवश्यकता होती है । इन जनश्रुतियों के अनुसार कुमारदास सिंहल के नरेश और कालिदास के मित्र ये। सिंहल नरेश कवि भी थे। एक गणिका के यहाँ आया जाता करते थे। एक दिन उन्होंने उसके सोने के कमरे की दीवार पर यह लिस दिया : कमलात् कमलोत्पत्तिः यूयते न च दृश्यते । 'कमल में कमल की उत्पत्ति होती है, ऐसा सुना तो गया है, परन्तु किसी ने देखा नहीं !' कुमारदास ने गणिका से यह भी कहा कि जो कोई भी इसको पूर्ति कर देगा उसको बहुत साधन इनाम मे दूंगा । संयोगवश कालिदास भी उसी गणिका के यहां गये थे। उन्होंने उसकी पूर्ति इम प्रकार कर दी- बाले तव मुलाम्भोजे दृष्टमिन्दीवरद्वयम् ॥ 'हे वाले! तुम्हारे मुख कमल पर मैंने दो इन्दीवर (मास) देखे हैं।' गणिका ने कालिदाम का वध कर दिया और राजा से यह कह कर कि वह उसकी पूर्ति की हुई है, इनाम मांगा । राजा को जब सही बात मालूम हो गई तब उन्होंने उस गणिरा को तो प्राण-दण्ड दिया ही, स्वयं अपनी रानियों के साथ कालिदास की चिता पर जल गये। यह कया अनेक परिवर्तित रूपों में प्रनलित है । यह सुनने ही में इतनी असामान्य है कि इसको कोई महत्व नहीं दिया जा सकता। इस गुत्पी को सुलझाने के लिये अन्य साधनों का आथप सेना होगा। सर्वप्रथम इम महा. काम्प के अन्त में चार पुणिमायें हैं जिनमे रवि के सम्बन्ध में बहुत कुछ प्रगा पड़ता है। एक इस प्रकार है:

२० ॥ नित्यं सदगुणभक्तिरिन्द्रियदमश्रीसंपतः संयतः शस्त्रद्योतित मूनिमुक्तहृदयोऽभोसंगतः संगतः । विद्वानस्य कवेः पितार्यहृदयं घोमानितो मानितः लंकेश्वर्यभुजा कुमारमणिरित्यासन्नयः सन्नयः ॥ दूसरी पुप्पिका इस प्रकार है : ये नारिप्रकृति निराकृतवता सम्मानितो मानितः यस्य स्वांगमभिनतो रिमुभृशं नाशेऽमितः शेमितः । श्रीमेघोऽस्य कवेरसौ किल बृहद्धामातुलो मातुलः दृष्टस्त्रासजड द्विपामधिगतत्रासेनया सेनया ॥ . तीसरी पुष्पिका इस प्रकार है : श्रीमानेकः शरण्यः परिभवविवदाया जनानां जनानां रूपेणानुप्रयातो दिवमति सुभगं रज्जयन्तं जयन्तम् । भाता तन्मातुरन्यः शशिधवलयशः कारणानां रणानां फर्तापुत्रोऽप्रबोधिर्जनशिरसि लसद् भासुराज्ञः सुराज्ञः ॥ चौथी पुष्पिका इस प्रकार है : आदायनं दशायां स्थितमपि तदहस्रस्तनाय्यां स्तनाय्यां तुष्टे तस्मिन् मतानामरिहतपितृके पारयन्ती रयन्ती । आत्मापत्याविशेष पुपुषतुरहतप्रेम दान्तो मदान्तौ मत्सानाष्ट्यास फाट्यं व्यरनयदसुरद्विमहायं महार्यम् । इन चारों पुष्पिकाओं में से किसी में भी कवि का नाम नहीं है। इनके केवल इतना ही पता चलता है कि- पहिली पुष्पिका:-कवि के पिता का नाम मानित था, वे बड़े विद्वान् और वीर योद्धा थे और लंकाधिपति कुमारमणि के सेनानी थे । दूसरी पुष्पिका :--कवि के एक मामा का नाम मेघ था और वे बड़े शूरवीर थे। तीसरी पुष्पिकाः :-कवि के एक दूसरे मामा का नाग अग्रबोपि था। वे भी बड़े शूरवीर थे। चौपी पुष्पिका :-इन दोनों ही मामाओ ने दुधमुंहे कवि को पैदा होने के समय से ही लाड़-प्यार से अपने पुत्र की मांति पाला क्योंकि कवि के पिता लड़ाई में मारे गये थे और कवि जन्म से ही व्याधि. प्रस्त पे। जव कवि बड़े हुए तो उन्होंने अपने मामाओ की सहायता से इस काव्य की रचना की जिसमें राक्षसों के शत्रु (राम) का यशगान है । इन पुणिकाओं से स्पष्ट है कि कवि कुमारदास लफाधिपति नहीं थे, बल्कि लंका के राजा कृमारमणि कोधित एक वीर एवं विद्यानुरागीवंश में पैदा हुए थे। व्याधि-ग्रस्त होने के कारण रणक्षेत्र में मजाकर ये साहित्य-क्षेत्र में रम गये। राजसर का पहना है कि कुमारदारा जन्मान्य पे :

समय ( २१ "मप्रतिभस्य पदार्यसायंः परोक्ष इव, प्रतिभावतः पुनरपश्यतोऽपि प्रत्यक्ष इव । यतो मेघाविरुद्रकुमारदासादयो जात्यन्धा कवयः श्रूयन्ते।" -राजशेखर, कान्य मीमांसा, चतुर्थोऽध्यायः, पदवाक्य विवेकः । अर्यात् जिसमें प्रतिभा नहीं है, उसके लिये प्रत्यक्ष दीखते हुए भी अनेक पदार्थ परोक्ष से मालूम होते हैं। (इसके विपरीत) प्रतिभावान व्यक्ति के लिये अनेक अप्रत्यक्ष पदार्थ भी प्रत्यक्ष से प्रतीत होते हैं । जैसे मेधाविरुद्र, कुमारदास आदि कवि जन्म से अन्ये थे, ऐसा सुना जाता है। 'श्रूयन्ते' मे यह ध्वनि निकलती है कि कुमारदास, राजशेखर से बहुत पहिले के हैं; राजशेखर का समय है ९०० ई० । जानकीहरण के श्लोक अनेक ग्रन्थों मे, जिनका निर्माण काल प्रायः निश्चित है, उद्धृत किये गये। हैं। इससे भी कुमारदास के समय-निर्धारण मे सहायता मिलेगी। इस अनुक्रम को हम ऊपर से लिखते हैं: ग्रन्थ नाम प्रणेता पदचन्द्रिका राय मुकुटमणि शार्ङ्गधर पद्धति १३६३ ई० सूक्ति मुक्तावली जल्हण १२५८ ई. सदुक्ति कर्णामृत थीपरदास १२०५ ई० टीका सर्वस्व सर्वानन्द ११५९ ई० सुभाषितावली वल्लमदेव टीका सर्वस्व से पहिले को काव्यानुशासन हेमचन्द्र १०८९-११७३ कामधेनु सुभूतिचन्द्र १०१०-१०६२ शृंगारप्रकाश भोज सरस्वतीकण्ठामरण १०१०-१०५५ काव्य मीमांसा राजशेखर ९०० ई० छन्दोचिति ज्ञानाश्रयी माधव वर्मन (द्वितीय) ७०० ई. लगमग इनके अतिरिक्त कुछ व्याकरण-ग्रंथ भी हैं जिनके सूत्रों मे जानकोहरण मे प्रयुक्त शब्दों का उल्लेख है जैसे वर्द्धमान के गणरत्न महोदधि एवं उज्ज्वल दत्त की उणादि सूत्र वृत्ति। इसके अनुसार एक प्रकार से यह तो निश्चित है कि कुमारदास का समय ७०० ई० से पहले का है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्वान् प्राध्यापक डा० वासुदेवशरण अग्रवाल का कहना है कि कुमारदास के समय का सब से जोरदार प्रमाण जानकीहरण के पहिले सर्ग के १७वें से लेकर २०वें श्लोक मे ही मिल जाता है । १७वें श्लोक 'कटाह' पर आधिपत्य, १८वें में 'काञ्ची' का सार्थवाहों के जमघट का केन्द्र होना, १८वें में यवनों के राजा 'यावनेन्द्र' की पराजय और २०३ मे तुर्कों के राजा (तुरुष्क) के पतन का वर्णन है। अब इस पर ध्यान से विचार कीजिये । 'कटाह' तो मलय द्वीप का केटा है। भारतीय इतिहासवेत्ता इसको, आठवी शताब्दी के हरिमद्र सूरि से लेकर सोमदेव के कया सरित सागर तक के ग्रंथों से जानते हैं । जानकोहरण के १७वें श्लोक मे 'कटाह' के राजा को पराजय का उल्लेख एक तत्कालीन घटना पर आधारित है, जिसमे एक भारतीय राजा ने कटाह के नृपति को बुरी तरह परास्त किया था। उसके आगे वाले २०वें श्लोक से यह ध्वनि निकलती है वह मारतीय राजा जिसने कटाह के नृपति को हराया था, काञ्ची नरेश था। यहां पर हमें पल्लवों के इतिहास से सहायता मिलती है। पल्लव महेन्द्र वर्मा (६१०-६४० } - ( २२ ) ई०) के पुत्र एवं उत्तराधिकारी पल्लव नरसिंह वर्मन प्रथम (६४०-६६८) ई०) जो महामल्ल भी कहलाताथा, पल्लव वंश का सबसे अधिक तेजस्वी शासक था। ईसा की सातवीं शताब्दी में दक्षिण भारत के मद्रास से २० मील पर समुद्र के किनारे मामल्लपुर नाम का एक कसबा था। इस कस्बे पर मामल्ल वंश के राजा राज्य करते थे। नरसिंह वर्मन प्रथम ने, जिसका विरुद महामल्ल था, इस कसबे की नीव रखी थी। इसी से इसका नाम मामल्लपुरम् पड़ा। विदेशी विद्वानों ने इसके भिन्न-भिन्न नामकरण किये हैं। डा० बेविंगटन का कहना है शिलालेखों के आधार पर यह महामल्लइपुर कहलाता था। इसके अन्य नाम मी प्रचलित थे जैसे मवलीपुरम्, महावल्लिपुर इत्यादि । पर रेवेरेण्ड डब्ल्यू टेलर ने इसका नाम 'मामल्लपुरम्' निश्चित कर दिया और इसी नाम को प्रायः सब विद्वानोंने मान लिया। पल्लव नरसिंह वर्मन प्रथम के राज्य काल में काञ्ची जगद्विख्यात राजधानी हो गई थी जहाँ अनेका देशों के व्यापारी क्रय-विक्रय के हेतु एकत्र होते थे । (काञ्चीगुणाकर्षितसर्वलोका -जानकीहरण, १-१८) । पल्लवों की महत्ता एवं उनका दबदबा अपनी चरम सीमा पर था । उसी समय महामल्ल नरसिंह वर्मन प्रथम, ने महावंश के अनुसार लगातार दो आक्रमण लंका को जीतने के लिये किए और सम्भवतः इण्डोनीसिया के द्वीपों पर भी आक्रमण किया (देखिये-- एक्सपेन्शन आय पल्लव रूल इन फ़ावर इण्डिया, पृष्ठ ५)। यदि इसे आधार मान लिया जाय और मेरी समझ में इसे न मानने का कोई कारण नहीं दिखलाई पड़ता, तो कुमारदास के समय को निश्चित करने के लिये एक दृढ़ आधार मिल जाता है । काव्य के पहिले सर्ग के १९वें श्लोक में जो यावनेन्द्र आया है वह इतना स्पष्ट नहीं है। मेरी समझ मे इस घटना का रहस्य दण्डिन के वशकुमार चरित के आख्यान में प्रतिविम्बित है जिसमें वे बंगाल की साड़ी में जल सेनाध्यक्ष रमेश की पराजय का वर्णन करते हैं। 'रमेशु' एक सीरियन नाम है। वहुत सम्भव है कि कुमारदास जिन्हें काञ्ची के हाल-चाल की जानकारी थी, इस घटना को जानते थे । और वहां रहने के कारण दण्डिन भी उससे परिचित ये 1ऐसा लगता है कि 'तुरुप्क' का तात्पर्य उत्तर-पश्चिम भारत के वोगर तुर्को से है जिनका वर्णन वाण ने भी हर्षचरित में किया है- (उच्छ्वास, ७, पृ० २१४, उत्सा। ) इस आधार पर कुमारदास का समय सातवीं शताब्दी के पूर्वाधं में होना चाहिये । इस प्रमाण पर आधारित कुमारदास के समय का विरोध न तो जानकोहरण की शैली के विकास से होता है जो भारवि और माप के बीच की सीढ़ी है और न अग्रबोधि के वंशानुक्रम से जिन्हे कवि का मातुल कहा गया है, और जिस नाम के कई राजकुमार कहे गये हैं । परन्तु इसके पहिले कि कुमारदास को भारवि और माप के बीच में निश्चित रूप से रखा जाय, भारवि का समय ठीक तरह से निश्चित होना पाहिये। वह अभी तक सन्दिग्य है। उनका समय जो अब तक बताया गया है उसकी पुष्टि किसी प्रकार के अभिलेख अयया अन्य ऐसे आधार पर नहीं हुई जो सर्वमान्य हो। पुमारदास के समय की ओर इंगित करने वाला एक दलोक और है और यह जानकोहरण के २०३ गर्ग या ३६यां लोक है। इसमें प्रतिनः का प्रयोग किया गया है। प्रतिनः से मावि या तात्पर्य है शंवों की शाया, महाप्रतिन से । जानकीहरण में दीवों की इस मध्यकालीन वासा का प्रयोग संस्थत साहित्य मे सबसे पुराना प्रयोग है। इससे महावत दावा, तथा कुमारदास मे गमय-निर्धारण पर महाव्रत यत्व पुछ प्रकार पड़ सकता है । यह मोशन-बीन का विषय है कि दीयों को इस महायतिन मारा की जानरारी यापमह को पीपा नहीं ।

.. एक बात और विचारणीय है । वह है सूर्यास्त और सूर्योदय का वर्णन । कुमारदास सूर्यास्त का वर्णन तो जगह जगह पर विस्तार से किया है, पर सूर्योदय का अत्यन्त अल्प। जैसे तीसरे सर्ग में श्लोक ६३-६८ मे सूर्यास्त और ६९-७५ में रात्रि का, ८वें सर्ग मे ५५-९६ तक; १६३ सर्ग मे १-२७ तक बड़ा सुन्दर सूर्यास्त का वर्णन है। सूर्योदय का वर्णन केवल तीसरे सर्ग के २५वें श्लोक में है, यद्यपि यह श्लोक संस्कृत साहित्य का अनमोल रत्न है । वाणमट्ट ने भी हर्षचरित मे सूर्यास्त का वर्णन विस्तार से चार स्थानों में किया है। इन दोनों कवियों मे सूर्यास्त का पक्षपात समय-साम्य की ओर निर्देश करता हो तो कोई आश्चर्य नहीं । इन सब बातों पर ध्यानपूर्वक विचार करने से ये निष्कर्ष निकलते हैं १. कुमारदास की जन्मभूमि सिंहल द्वीप थी। २. यह सिंहल के राजा नहीं थे । ३. सिंहल के इतिहास में यदि किसी राजा का नाम कवि के नाम से मिलता-जुलता था तो वह कुमार घातुसेन का था। परन्तु वे कुमारदास से पृथक व्यक्ति थे । ४. कवि के पिता का नाम मानित और दोमामाओं का नाम मेघ और अग्रवोघि था और दोनों ही शूरवीर और संस्कृत-प्रणयी थे। इन्ही की सहायता से कुमारदास ने जानकोहरण की रचना की। ५. कुमारदास का समय सातवीं शताब्दी का पूवार्य लगभग ६२० ई. के है। तो, यह है कि कवि कुमारदास का संक्षिप्त जीवन-वृत्त । इस प्रकार कुमारदास कृत सम्पूर्ण जानकीहरण मुझे उपलब्ध हो गया । मैंने इसकी चर्चा अपने परम आदरणीय मित्र श्री श्रीकृष्णदास जी से की। दास जी की प्रतिमा चौमुखी है। उनका हृदय साहित्य से ओतप्रोत है । वे जान कोहरण के स्फुट श्लोक मुझ से सुनकर पहिले ही प्रमा- वित हो चुके थे। उन्होंने मुझसे अनुरोध किया कि मैं सम्पूर्ण ग्रन्य का अनुवाद करूँ। मैंने बिना सोचे समझे स्वीकार कर लिया। यदि मैंने जानकोहरण के निम्नलिखित श्लोक को पढ़ लिया होता तो संस्कृत की इतनी कम पूंजी होते हुए, पचहत्तर वर्ष की उम्र में, इस काम में हाथ न लगाता- 1 वाक्ये धर्मतो मूद विधिसभ्यप्पशक्तिष्ठस्तपः स्वदेहवहनेऽपि सः । कोदग् विपास्पति ॥ -जानकीहरणम्, १०-१९ । लेकिन मुंह बैरी हो चुका था । अनुवाद तो करना ही या। यदि मुझे प्रयाग विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष और संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित, मेरे आदरणीय मित्र पण्डित सरस्वतीप्रसाद चतुर्वेदी, पण्डित रामकुवेर मालवीय एवं पण्डित कमलेशदत्त त्रिपाठी एम० ए०, व्याकरणाचार्य, धर्मशास्त्राचार्य की सहायता न मिली होती, तो क्लिप्ट श्लोकों का अनुवाद मेरे अकेले के बूते की बात न थी। इन तीनो विद्वानों का आभार में किन शब्दो में व्यक्त करूं? इस ग्रथ का अनुवाद करा लेने का सम्पूर्ण श्रेय श्री श्रीकृष्णदास जी को है। यदि वे मुझे निरन्तर बढ़ावा न देते रहते तो सम्मव था मैं बीच ही में हाथ डाल कर बैठ जाता। श्री श्रीकृष्णदास जी कविवर स्वर्गीय ठाकुर गोपाल पारण सिंह जी के शब्दों में कहते रहते थे: . करते जामो जो करना है- आपो आती है आने दो,

( २४ )
लहरों को भय दिखलाने दो,
हिमखण्डों को टकराने दो,
नाविक ! न रोकना नाव कभी-
सागर के पार उतरना है ।
करते जाओ जो करना है ।
इस तरह अनुवाद पूरा हुआ और प्रेस के लिए पाण्डुलिपि तैयार हुई।
मैं 'माया' प्रेस एवं मित्र प्रकाशन के स्वामी श्री आलोक मित्र के साहस एवं दूरदर्शिता की
प्रशंसा किये विना नहीं रह सकता । संस्कृत साहित्य में कितने अनमोल रत्न भरे पड़े हैं, इसकी
जानकारी जनसाधारण की कौन कहे, शिक्षित समाज तक को भी थोड़ी ही है । मुझे पता चला है कि
श्री आलोक मित्र अन्य महत्वपूर्ण एवं अलभ्य ग्रथों का भी अनुवाद करा रहे हैं। उनको अनेकानेक
साधुवाद।
-अनुवादक

जानकीहरणम् का काव्य-सौष्ठव धी कमलेशदत्त त्रिपाठी कालिदास के बाद संस्कृत कविता का एक दूसरा युग ही आरम्भ हुआ। उसका कलेवर ही नहीं, उसकी. अन्त.प्रकृति में भी परिवर्तन आया । भारवि ने उस युग का आरम्भ किया। कालिदास की रससिद्ध लेखनी का स्थान आलंकारिक चमत्कार और अजित वैदुप्य के प्रदर्शन ने ले लिया। संस्कृत महाकाव्यों की रचना मे यह परिवर्तन मारवि से आरम्भ होकर अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित होता रहा। माघ, भट्टि, हर्प आदि समस्त उल्लेखनीय कवियों की रचनापद्धति की एकात्मकता, उनकी रचनाओं में आलंकारिक चमत्कार-सृष्टि, पाण्डित्य-प्रदर्शन और वर्णनों की विवरणात्मकता मे देखी जा सकती है। स्वयं कुमारदास भी इसी युग की उपलब्धि हैं। राजशेखर ने बड़े ही प्रभावशाली शब्दों में कुमारदास की काव्य-प्रतिमा का संस्तव किया। वाल्मीकि एवं कालिदास जैसे महान् कवियों ने रामकथा को अपनी कविता का आश्रय बनाया था, फिर उसी कथा का आश्रय लेकर अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा कर पाने मे सामान्य प्रतिमा का कवि कमी समर्थ नहीं हो सकता था । कुमारदास को काव्य की कथावस्तु ही नही मिली थी, संस्कृत महाकाव्य की सुप्रतिष्ठित परम्परा भी विरासत में मिली थी। इसके कुछ लाभ थे, तो कुछ कठिनाई मी थी। एक ओर वाल्मीकि की व्यापक कवि दृष्टि और अद्भुत सर्जनात्मक प्रतिमा थी, जिसने समूचे युग का अवतार अपनी रचना में कर दिया, दूसरी ओर कालिदास की कलादृष्टि थी, जिसने स्वयं कविता को सविलास कर दिया; शृगार को सज्जित कर दिया। कालिदास कविता के चरमपरिपाकविन्दु के पर्याय बन गये । फिर भारवि ने महाकाव्य की एक नयी पद्धति का ही मूत्रपात किया। इस सारी परम्परा के भार को संभालते हुए अपने विशिष्ट और स्वतंत्र व्यक्तित्व की सृष्टि कर पाना ही कठिन बात थी। कुमारदास ने इस स्वरूप को प्राप्त किया । जानकोहरण की कविता नि सन्देह रघुवंश की अपेक्षा प्रयत्नसृष्ट और कृत्रिम है । किन्तु किरातार्जुनीय के समान ही आलंकारिकता तथा पाण्डित्यभार के प्रति साग्रह हो कर भी बहुशः नवीन, सरस और आकर्षक है । संस्कृत की उत्तरकालीन कविता का उवाऊपन और मौलिकता की कमी यद्यपि भारवि से आरम्भ हुई और सारी परम्परा में कही-न-कही बनी रही, फिर भी कुमारदास में ऐसे स्थल भरे पड़े हैं, जहां कवि को मौलिक प्रतिभा है और सहृदय के हृदयावर्जन की अद्भुत क्षमता भी है। भारवि के काव्यपय का सजग रूप से अनुगमन करते हुए कुमारदास ने नगर, नायक- नायिका, उद्यानकीड़ा, जलक्रीड़ा, रतोत्सव, पानगोष्ठी, सचिवमंत्रणा, दूलसप्रेपण, युद्ध आदि का परम्परानिष्ट वर्णन किया, किन्तु वे हमेशा सावधान रहे कि ये वर्णन अनुचित रूप से लम्बे न हो जाय। इस अंश में कुमारदास कालिदास का अनुगमन अधिक करते हैं। कालिदास ने वर्णन-प्रपंच के लोम में कथा के सूत्र को कभी विच्छिन्न नहीं किया, उन्होंने वर्णनीय का सूची-सरीखा विवरण कमी नही प्रस्तुत किया, अपितु उनको सन्तुलित काव्यदृष्टि ने कथा और वर्णन, चरित्राकन और क्लात्मक परिष्कार के सुकुमार सन्तुलन को सर्वया बनाये रखा। कुमारदास ने प्राय' यह बात ध्यान में रखी है कि वर्णन को विवरणात्मकता और अनपेक्षित विस्तार काव्य के कथावस्तु तोड़ नदे। कुमारदास का कवि व्यक्तित्व कथा के उपस्थापन, काव्यपरम्परा के अनुगमन और काव्यपद्धति एवं शरदरांहति के प्रयोग में उतना ही उमरा, जितना वर्णनों में प्रयुक्त नवीन कल्पनाओं में। उत्तरवर्ती संस्कृत कवियों ने जीवन के अंकन, जीवनदर्शन के संप्रेषण और कलात्मक सन्तुलन के प्रति अपने को अत्यन्त सावधान नहीं रखा। उदाहरणार्य व्यास और वाल्मीकि ने जिस व्यापक पृष्ठ- भूमि में और जैसी अकृत्रिम मंगिमा से अपनी रचनाओं में जीवन की सृष्टि कर दी और एक जीवन- दृष्टि मी प्रदान की; या कालिदास ने जिस तरह जीवन का परिपक्व सौन्दर्य-बोध परिष्कृततम कलापद्धति के माध्यम से व्यक्त किया, संस्कृत के उत्तरकालीन महाकवि से वसी आशा नहीं की जा सकती । किन्तु उत्तरकालीन कवियों ने वर्णन विधि मे कुछ-न-कुछ नवीन कल्पना जोड़ने की सतत चेष्टा की। इस दृष्टि से कुमारदास के काव्य मे निःसन्देह ऐसे वर्णन स्थल हैं, जो उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को प्रस्तुत करते हैं। वर्णनों में उन्हें कदाचित् सर्वाधिक सफलता प्रकृति-विर्णन में मिली। संस्कृत के कवि ने अपने को अपने चारो ओर के प्राकृतिक परिवेश से गहराई से जोड़े रखा है। इसलिए उसके लिए प्रकृति जड़ दृश्यावली मात्र नहीं है, वह तो सर्वथा चेतन और उसकी भावनाओं की सहमोक्त्री एवं सहानु-भवित्री है । कुमारदास की दृष्टि भी ऐसी है, किन्तु प्रकृति के प्रति उनकी दृष्टि में एक अनूठी कल्पना-प्रवणता भी है । इसका सुन्दरतम उदाहरण जानकीहरण के पोडश सर्ग में चन्द्रोदय का वर्णन है- अरुणकरदृढावकृष्टरश्मि- प्रशमितफन्धरभुग्नचारुधोणाः । दिवसकरहया गिरीन्द्रभित्ते- जघनपतद्रयनेमयोऽवतेः॥ अरुण ने (अस्ताचल की ढलान पर) बड़ी दृढ़ता से रास खीची, इससे सूर्य के रथ के घोड़ों के कन्ये झुक गये और सुन्दर नथुने तिरछे हो गये, रथनेमि उनकी जांघों से सट गयी। इस तरह वे अस्ताचल से उतर गये। वर्णन की चित्रात्मकता नवीन उत्प्रेक्षाओं और समासोक्तियों में अत्यन्त प्रभावशाली रूप में व्यक्त हुई है। अनूठी कल्पनाओं ने प्रकृति के उपादानों में मानवीय कार्य व्यापारों के मार्मिक दर्शन कराये हैं। द्रुतमपसरत ति भानुरस्तं सरसिरहेषु दलार्गलाः पतन्ति । भ्रमरफुलमिति बुयन्निवालिः पणितकलं विचचार दीपिकायाम् ॥ सति दिवसपरिक्षयस्य योगे निपतितसद्वयसस्तमोभिभूताः । विनमितचलमस्तफा बभूवः समुपहता जरसेव पक्षगुल्माः॥ 'जल्दी निकल भागो, सूर्यास्त हो गया, कमलों पर उनकी पंखुड़ी रूपी अगला बन्द हो रही है-यह पेतावनी भ्रमर-समूह को सुनाता-सा मुंग सरसी पर इधर-उधर चक्कर लगाने लगा। दिन के अवसान पर वृक्षों के कुंजों ने, जैसे बुढ़ापे के कारण अपने हिलते हुए मस्तकों को मका दिया पार अन्धकार से आधान्त उन पर पटिगण या बैठे।

( २७ ) आकाश में चन्द्रमा उठता गया। उसकी अरुणाई धीरे-धीरे कम होती गयी, लगा कि प्राची दिशा ने स्फटिक-चपक की मदिरा धीरे धीरे पीली हो- उदयमरुणिमा परित्यजन्त प्रक्सिजतिस्म दाशांकमच्छबिम्बम् । चषकममलमिन्दुदिदमुखेन स्फटिकमयं मधुनीव पीयमाने।। कुमारदास को वैसी ही सफलता ऋतुओं के वर्णन में भी मिली है। वसन्त, शरद् और वर्षा के मनोहारी चित्र उन्होंने खीचे है। ऋतुएं अपनी सारी समृद्धियों में उपस्थित हुई हैं। कदाचित् इसीलिए सुमापितसंग्रहकारों ने उनके ऐसे श्लोकों को प्राय: संग्रहीत किया है। एकादश सर्ग में वर्षा-वर्णन उनके ऋतु-वर्णनों का सुन्दर प्रतिनिधि है- भुवनतापनधर्मजयोत्सवः समुचितः परिनत्यत बहिणः। इति जघान यया समयस्तडि कनकदण्डशतर्घनदुन्दुभिम्॥ 'समस्त लोक को सतप्त करने वाले ग्रीष्म पर विजय का उत्सव छाया है, नाचो, मयूरो नाचो।'--मानो यह कहते हुए समय ने विजलियों रूपी सैकड़ों कनकदण्डों से वादल रूपी नगाड़े वजा दिये। मुरजनादगभीरमनोहरैः प्रमुदितेन पयोपरनिःस्वनः। उपरिवष्टिभयादिव तानितः। प्रचलपिच्छचयो विशदभ्रवा॥ बादलों के, मृदंग के समान, हृदयहारी गंमोरनाद से आह्लादित, चमकीली मों वाले मयूरों ने वृष्टि के भय से अपने ऊपर हिलती हुई पूंछ के समूह को तान दिया। मुहरदापयोदमतंगज- श्रवण चामरभावमपेतया। गगनसागरशंलवपुःधिया प्रचरितं प्रमदेन बलाकया। मतवाले वालों को पात, जो मागररूपी आफाश के शंख की भांति धवल यो और जो बार-बार उमड़ते हाथी के समान, बादलों के कानों के चंवर सी दौखती थी, घूमने लगी। प्रकृति के मूड ही नहीं, तीस पो को भी कुमारदास ने देखा है- ( २८ ) जलधियारि निपीतवतो .भृशं वनमुचो रुधिरस्रवलोहिताः। अतिभरस्फुटितोदरनिर्गता बमु रिवान्नलता दिदि विद्युतः। समुद्र का जल अत्यधिक पी जाने के कारण बोझ से फट गए पेट से बाहर निकल पड़ी, खून बहने से लाल, अंतड़ियों सरीखी विजलियां आकाश में फैल गयीं। अपनी उत्कृष्ट वर्णन-शक्ति और सन्तुलित दृष्टि के कारण कुमारदास निःसन्देह अत्यन्त महान कवि होते, यदि उन्होंने चित्रकाव्य का मोह न किया होता। अलंकारों के इस मोह के कारण वास्तविक कविता की सृष्टि में वाधा पड़ी। भारवि ने जिस परम्परा का आरम्भ किया, उसे ही आगे बढ़ाते हुए कुमारदास ने भी एकाक्षर, यक्षर श्लोकों की रचना की। यमकों के मोह ने कल्पनाप्रवणता पर अकुश लगाये । पादयमका, आदियमक, आद्यन्तयमक, निरन्तरानुप्रास, यक्षरानुप्रास, अर्थप्रतिलोम, प्रतिलोम, गोमूयिका, मुरजवन्ध, सर्वतोभद्र आदि को प्रस्तुत करने वाले श्लोकों की रचना से अपने पाण्डित्य और अधिकार की धाक जमाने वाले उत्तरकालीन अन्य समी कवियों की भांति कुमारदास ने भी ऐसी रचनाएँ की। इस दौद्धिक कलावाजी और बाजीगरी से एक बार वह विस्मयविस्फारित प्रशंसा-दृष्टि के अधिकारी तो हो सकते हैं, किन्तु यहां वे हमे आन्दोलित कर सहज श्रद्धावनति को कहां प्राप्त कर पाते हैं ? उनको रससिद्धि और कल्पनाप्रवणता स्वयं विजडित हो जाती है। अपने वर्णनप्रसर, कल्पनाप्नवण और रससिद्ध तथा रूढ़िग्रस्त, अलंकार- विजडित पाण्डित्यजन्य दोनों ही रूपों में उपस्थित हो कर कुमारदास एक और कालिदास के अनुवर्तन में श्रद्धा के अधिकारी बनते हैं, तो दूसरी ओर भारवि से भी एक कदम आगे रख कर हमे विस्मित करते हैं, किन्तु सुकुमार कवि मार्ग से हटने के दोपभागी भी बनते हैं। कुमारदास ने एक ओर कलात्मक काव्य की ऊंचाइयों को भी छुआ है, पर दूसरी ओर उनकी कविता ने परम्पराओं को भग्न कर या उनसे आगे बढकर अपनी बिलकुल नयी राहें नही बनायी। वे निश्चय ही कालिदास की कोटि में नहीं आ सकते, किन्तु उत्तरवर्ती भारवि, माप और श्रीहर्ष जैसे महान् कवियों के साथ उनकी गणना अपरिहार्य रहेगी।

विषय सूची सर्ग पृष्ठ संख्या १ १८ ४७ ६० ७१ ९२ प्रथमः सर्गः राजा दशरय की कया द्वितीयः सर्गः राजा दशरय की प्रणय केलि तृतीयः सर्गः पुग्येष्टि यज्ञ चतुर्थः सर्गः राम-जन्म और बाल-लीला, पञ्चमः सर्गः राम द्वारा विश्वामित्र के आश्रम की रक्षा पष्ठः सर्गः मिथिला में राम और लक्षमण सप्तमः सर्गः राम द्वारा धनुष भंग और राम-सीता विवाह अष्टमः सर्गः राम-सीता का शृंगार-वर्णन नवमः सर्गः राम का अयोध्या आगमन दामः सर्गः राम का वनगमन, सीताहरण एकादशः सर्गः रावण-जटायु युद्ध, शृष्यमूक पर्वत पर राम का प्रवास द्वादशः सर्गः सीता कीसोज के लिए वानरों का अभियान प्रयोदशः सर्गः हनुमान् द्वारा सोता को खोज, लंकादहन चतुर्दशः सर्गः सेतुबन्ध और राम को सेना का लंका-प्रवेश पञ्चदशः सर्गः मंगद-रावण संवाद पोडशः सर्गः रावण को विलास-लीला सप्तदशः सर्गः राम-रावण युस अप्टादशः सर्गः इन्द्रजित-लक्ष्मण युद्ध एकोनविंशस्सर्गः रावण-वध, मन्दोदरी-विलाप, सीता-राम मिलन, सीता की अग्नि-परीक्षा वितितमस्सर्ग: राम-जानकी-लक्ष्मण का आयोध्या आगमन, राम का राज्याभिषेक १२२ १३८ १५६ १६७ १७७ १९२ २०५ २१९ २२७ २४१ २५३ परिशिष्ट २६९ २९७ १. चरित्र कोश २. स्यान कोश ३. धर्माराम स्थविर की भूमिका ४. टामस को टिप्पणी ५. यानेंट की टिप्पणी ६. बार्नेट द्वारा उपत मोलहवां गर्ग ७. जानकीहरण के कुछ पाठ ८. राइस पिड्म को टिप्पणी ९. जानकीहरण में प्रयुक्त र ३२३ ३२६

३३९
( ३० )
सों में प्रयुक्त छंद
११. छंदों की श्लोक संख्या
१२. महाकाव्य का विवरण
१३. यमकों के लक्षण
१४. पमक एवं शब्द-चित्र
१५. यमक एवं शब्द चित्र (सारिणी)
१६. राक्षसों का वंश-वृक्ष
३४२
३४५
३५७

प्रथम: सर्ग: आसीदवन्यामतिभोगभारादिवोऽवतीर्णा नगरीव दिव्या। क्षत्रानलस्थानशमी समृद्ध्या पुरामयोध्येति पुरी परार्ध्या ॥१॥ यत्सौधशृङ्गाग्रसरोजरागरत्नप्रभाविच्छरितः शशाङ्कः । पौराङ्गना वक्त्रकृतावमानो जगाम रोषादिव लोहितत्वम् ॥२॥ कृत्वापि सर्वस्य मुदं समृद्ध्या हर्षाय नाभूदभिसारिकाणाम् । निशासु या काञ्चनतोरणस्थरत्नांशुभिभिन्नतमिस्रराशि ॥३॥ चीनांशुकैरभ्रलिहामुदग्रशृङ्गाग्रभागोपहितैगृहाणाम्। विटङ्ककोटिस्खलितेन्द्रसृष्टनिर्मोकपरिव वभासे ॥४॥ दिदृक्षुरन्तःसरसीमलङ्घचं यत्खातहंसः समुदीक्ष्य वप्रम् । सस्मार नूनं दृढक्रौञ्चकुञ्ज-भागच्छिदो भार्गवमार्गणस्य ॥५॥ या १. अयोध्या नाम की एक नगरी थी जो अतिशय समृद्धि कारण नगरो में श्रेष्ठ थी। ऐसा लगता था जैसे यह नगरी स्वर्ग में रही हो और अपनी समृद्धि के बोझ के कारण पृथिवी पर चली माई पोर जो उस शमी वृक्ष की भांति लगती थी जिसके भीतर क्षत्रिय कुल की अग्नि सनिहित हो। २. जहाँ प्रासादों के शिखर पर रखे हुए सुर्वण कलशों पर खचित मरिणयों की प्रभा ने चन्द्रमा को योंही छाप लिया था, वह पौर जनों की सुन्दरी स्त्रियों के मुख-लावण्य रो अपमानित हो कर मोघ के मारे लाल हो गयी। ३. यद्यपि अपनी समृद्धि से उस नगरी ने सब लोगों को प्रसन्न कर दिया था, परन्तु अभि- सारिकामों को कोई हर्प नहीं हुआ। क्योकि रात्रि के समय सुवर्ण के तोरणो पर जड़ी हुई मरिणयों की प्रभा अन्धकार के समूह को छिन्न-भिन्न कर देती थी। ४. वादलों को छूते हुए नगरी के प्रासाद अतीव शोभायमान हो रहे थे। इन प्रासादों के शृंगों पर चीन के बने हुए शुभ्र वस्त्र से मढ़ी हुई कबूतरों को 'कायुक' ( कबूतरी के रहने का वक्स) रखा हुपा था । ऐसा लगता था जैसे इन कायुको से टकराने के कारण चंद्रमा की ऊपरी पाल उधर कर इन कावुको में चपक गई हो। ५. नगरी के बाहर (जल से भरी) खाई में तैरते हुए हम ने भीतर के तालाव को देमने की इच्छा की, परन्तु उसकी चहारदीवारी इतनी सुदृढ़ थी कि वह हम भीतर न पुग सका । तब उसने परशुराम के वाण का स्मरण दिया जिसने फोन पर्वत की हद गुफामों को पाट डाला था।

जानकीहरणम् स्वबिम्बमालोक्य ततं गृहाणामादर्शभित्तौ कृतवन्ध्यधाताः । रथ्यासु यस्यां रदिनः प्रमाणश्चक्रुर्मदामोदमरिद्विपानाम् ॥६॥ लग्नकभागं सितहय॑शङ्गे विकृष्य मन्देन समीरणेन । दोर्षीकृतं बालमृणालशुभं करोति यत्र ध्वजकृत्यमभ्रम् ॥७॥ प्रवालशीर्पा वदनं सुवर्ण मुक्तामयागावयवा वहन्त्यः । यस्यां युवत्यो विहिता विधात्रा रत्नैरिवापुर्वपुपः प्रकर्षम् ।।८।। आलिङ्ग्य तुङ्गं वड़भीविटकं विश्राणितात्मध्वनि पुष्करेषु । यत्सौधकान्तेरिख संविभागं वन्ने सितं शारदमभ्रवृन्दम् ॥६॥ आसन्नजीमूतघटासु यस्यां विद्युनिभा काञ्चनपिञ्जरासु । मुहुः पताकासु तता विवृत्तिस्ततान तोपं शिखिनामुदग्रम् ॥१६॥ ६. घरों के दर्पण की तरह चिकनी दीवारों पर अपना प्रतिविम्व देख कर हाथियों ने उन्हें असली हाथी समझ कर उन पर प्रहार किया, पर वह निष्फल रहा । उन प्रतिद्वंदी हाथियों में मद का प्रभाव देख कर उन्हें निश्चित हो गया कि वे असली नहीं हैं। ७. एक शुभ प्रामाद के शृंग के एक भाग पर लगा हुमा ताजे श्वेत कमल के समान सफेद बादल का टुकड़ा मन्द समीर के कारण लम्बायमान हो कर ध्वजा का काम करता था। ८. प्रजापति की बनाई हुई वहाँ की सुन्दरवदना युवतियां जिनके सिर सुन्दर फेशपाश से सुसज्जित थे पोर जो पूर्णतया स्वस्थ और नौरोग थीं, उनका शरीर लावण्य-रत्नों के सहा था। टिप्पणी-रत्नों से तुलना करने के कारण इस श्लोक में कुछ शायद ऐसे हैं जो रत्नों पर लागू होते हैं, जैसे 'प्रपालशीर्षा'-प्रवाल मणि से विभूषित ! 'वदनं सुवर्ण' =सुवर्ण की सरह बमफ्ता चेहरा । 'मुक्तामयाजावयया' =जो सम्पूर्ण अंगों पर मोती के नाभरण पहिने पो। १. पारद् ऋतु के बादलों का समूह यहाँ के प्रासादों के सब रो कं यमरों को मालिंगन कर यहाँ पर रंग हुए नगाड़ों को ध्वनित करते हुए उन प्रासादों के सौंदर्य के एक मुराग्जिा अंग लगते । १०. वहाँ पास में फैले हुए बादलों के माहम्बर के सनिमाट, बिजली के समान प्रभावान्, निरन्तर पहराते हुए झो मयूरों को मतीर माहादित करते हैं।

प्रथमः सर्गः यत्र क्षतोद्वंहिततामसानि रक्ताश्मनीलोपलतोरणानि । क्रोधप्रमोदौ विदधुविभाभिर्नारीजनस्य भ्रमतो निशासु ॥११॥ तत्राभवत्पङ्क्तिरथाभिधानो भर्ता भुवो भानुनिभः प्रभावैः । क्षत्रान्वयैर्बिभ्रदलथ्यमन्यक्ष्मानाथमानं जयमानमोजः ॥१२॥ अखण्डमानो मनुजेश्वराणां मान्यो गुणज्ञो गुणजैमनोज्ञैः । दिशो यशोभिः शरदभ्रशुभ्रश्चकार राजा रजतावदाताः ॥१३॥ जिगीपुरभ्यस्तसमस्तशास्त्रज्ञानोपरुद्धन्द्रियवाजिवेगः । अाजावजय्यानजनन्दनोऽन्तः स पड्द्विपः पूर्वमसौ विजिग्ये ॥१४॥ बलिप्रतापापहविक्रमेण त्रैलोक्यदुर्लयसुदर्शनेन । नानन्तभोगायिणापि तेने तेनालसत्वं पुरुषोत्तमेन ॥१५॥ ११. जहाँ लाल और श्वेत पत्थरों के बने हुए तोरण कभी अंधेरा और कभी उजाला बिखेरते रहते हैं, तदनुसार रात मे घूमने वाली अभिसारिकायो के हृदय मे वे प्रसन्नता और क्रोध उत्पन्न करते रहते हैं। १२. वहां पृथ्वी के स्वामी, सूर्य के समान तेजस्वी, जिनका नाम दशरथ या, रहते थे । उनका अपराजित शौर्य ऐसा था कि दूसरे के राज्यो को अपना समझना उनके लिये स्वाभाविक था, क्योकि उनकी सदा विजय ही होती थी। १३. निष्कलङ्क चरित्र वाले, राजाओं से सम्मानित, गुरणपाही महाराज दशरथ ने अपने गुणो से उत्पन्न, शरद ऋतु के समान स्वच्छ और सुन्दर या-बाहुल्य से चारो दिशामों को चांदी के समान जगमगा दिया। १४. दिग्विजय के इच्छुक, अज के पुत्र (महाराज दशरथ) ने समस्त शास्त्रों के निरन्तर अभ्यास से उत्पन्न ज्ञान से इन्द्रिय रूपी घोड़ो के वेग का निग्रह कर सब के पहिले अपने भीतर स्थित उन छहों शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य) को विजय किया जिनका लड़ाई के मैदान में जीतना असम्भव था । टिप्पणी--(१) व्यजेष्ट पड्वर्गमरस्त नीतो-भट्टिकाम्प १-२। (२) कृतारि-षड्वर्ग जयेन' -भारवि १-९ (३) "कामः क्रोषस्तया लोभो हर्षो मानो मदस्तया । षड्वर्ग मुत्सुजेदेनमस्मिन् व्यस्ते सुखो नुपः।" कामन्दक नीतिशास्त्र-१-५५ । १५. मनन्त सुख भोगते हुए पुरुपो में श्रेष्ठ दशरथ में तनिक भी पालस्य छू नहीं गया था। उनमें कर एवं उपहारों से जनित कप्ट के निवारण करने की शक्ति थी और उनके मस्तित्व की अवहेलना प्रलोक्य में कोई भी नहीं कर सकता था। टिप्पणी -इस श्लोक में कुछ शब्दों में श्लप है जो विष्णु और दशरय दोनों हो पर लागू होता है, बलि राजा बलि कर एवं उपहार । सुदर्शन चक देखने में सुन्दर । अनन्त भोगापिणा-अनन्त-सर्पशायी अनन्त सुस का भोगने वाला ।

जानकीहरणम् दण्डस्ततस्तस्य भुवं जिगीपोः कम्पं वितन्वन् विहिताङ्गमदः । तापैकहेतुन्निदशाधिपस्य दिशं ज्वरस्तीव्र इवाविवेश ॥१६॥ समुद्रमुल्लङ्घ्य गतस्तदीयस्तेजोभिधानो गुरुरग्निराशिः । नितान्तसन्तापितपूर्वकाष्ठ: प्रोत्स्वेदयामास नृपं कटाहे ॥१७॥ भुजङ्गसंप्रार्थितसेव्यवेला काचीगुणाकर्षित सार्थलोका। दिग्दक्षिणा कर्कशयलभोग्या वेश्येव भुक्ता नवरेण तेन ॥१८॥ विनिर्जितोऽप्यस्य शरेण घातं लब्ध्वासुरासुप्रघसायुधस्य । आत्मानमन्यैरसमानमानं मेने मनस्वी युधि यावनेन्द्रः ॥१६॥ तेजश्छलेनाथ हुताशनेन श्रीवासरम्यं प्रदहन् तुरुष्कम् । धूपैरिवासक्तगतैर्यशोभिराशीयमन्तं सुरभीचकार ॥२०॥ १६. तव दिग्विजय की इच्छा से उनकी सेना विपक्षियों को उत्तप्त करती, उनके शरीरों में पोपकपी पैदा करती, और उनके अंगों को तोड़ती हुई, ज्वर की भांति पूर्व दिशा की और बढ़ी। १७. पूर्व दिशा को भुलसाती हुई उनके तेज की अग्निराशि के समुद्र पार करने पर 'कटाह' प्रदेश के राजा को पसीना छूटने लगा। १८. मनुष्यों में श्रेष्ठ (दशरथ) ने दक्षिण दिशा का वेश्या के समान भोग किया। (वह दक्षिण दिशा) जिससे उन्होंने तलवार के जोर से खिराज वसूल किया, जहाँ काञ्ची नगरी में उसकी विभूति से प्राकृष्ट होकर सौदागरों का जमाव रहता था और जिसका दशासन बड़ा कठिन था। टिप्पणी-वेश्या के संदर्भ में :-(१) 'भुनंगसम्प्रापितसेय्यवेला' =भुजंगः-विटः, सम्प्रापिता-याचिता, सेय्ययेला=रति समयः यस्पा सा=जहाँ कामुक लोग रति-समय के निश्चित करने की प्रार्थना करते थे। (२) "काञ्ची गुण मेखला दामभिः माफपिताः सायंलोका पनयन्तो यया सा= निराको मेसला के सौंदर्य से पनो लोग मंडराते रहते थे" (३) 'ककंशयत्नभोग्या'जो परजोरी गोग करने के योग्य पी। १६. राक्षसों के प्राग्गों को पदी निर्दयता से नारा फरने वाले उनके शास्त्रों से पायल होकर हार जाने पर भी उरा मानी पापनेन्द्र ने अपने स्वाभिमाग को मौरों गे बढ़कर गगमा। २०. पपनी सेवापी पग्नि से सक्ष्मी सम्पन्न तुर्कों के राजा पो जलाते हुए ये मागे यो पौर उनपा मगम्भी गुगंपिग म पीये यूटे हुए देशों को मुरभित करवा जाता पा।

प्रथमः सर्गः परेपुवात्यापरिहितोऽस्य क्रोधाभिधानो युधि चित्रभानुः । आताम्रनेत्रच्युतवारिवषैरानायि शान्ति रिपुकामिनीनाम् ॥२१॥ तस्यैकबाणाशनभग्नशत्रोरालोकभूमौ चरणारविन्दे। प्रासेदतुः सर्वनरेन्द्रमौलिरत्नप्रभालक्तकमण्डनानि ॥२२॥ लोकस्तदीये भुवि हारगौरे कीर्तिप्रताने प्रवृजम्भमाणे । अभिन्नकोशं कुमुदं निरीक्ष्य मुमोचचन्द्रोदय शङ्कितानि ॥२३॥ समस्तसामन्तनृपोत्तमाङ्गान्यध्यास्य तस्योन्नतवृत्तितेजः । जज्वाल चूडागतपद्मरागरागच्छटाविस्फुरणच्छलेन ॥२४॥ नरेन्द्र चन्द्रस्य यशोवितानज्योत्स्ना महीमण्डल मण्डनस्य । तस्यारिनारी नयनेन्दुकान्तविष्यन्दहेतुर्भुवनं ततान ॥२५॥ माता भवित्री भवतुल्यधाम्न इन्द्रद्विषद्भत निपूदनस्य । तेनोपयेमे समयं विदित्वा वह्नः समक्षां विधिवद्विधेया ॥२६॥ २१. दशरथ की क्रोधाग्नि शत्रुओं के बाणों की वर्षा से भभक उठी, परन्तु उन्हीं शत्रुमों की स्त्रियों ने जिनको प्रांखें (पतिशोक से) रोते-रोते लाल हो गई थीं, अपने आसुओं की झड़ी से उस अग्नि को शान्त कर दिया। २२. केवल एक ही बाण से शत्रुओ को पराजित करने वाले दशरय के चरणों पर सभा मण्डप में राजसमूह ने सर नवाया। उस समय ऐसा लगता था जैसे उन राजाओं के मुकुट मे जड़े हुए रत्नो की प्रभा ने दशरथ के कमल के समान सुन्दर चरणो को महावर से अलकृत कर दिया हो। २३. पृथ्वी पर उनके यश की शुभ्र प्रभा फैली हुई देखकर लोगों को यह शंका हुई कि कहीं चन्द्रोदय तो नहीं हो गया । परन्तु यह देखकर कि कुमुद तो अभी नहीं फूला उनकी शङ्का दूर हो गई। २४. उनका उन्नतिशील तेज समस्त नृप मण्डल के सिर पर व्याप्त होकर उन नृपों के मुकुट के रत्नों की प्रभा से दहकता हुअा लगता था । २५. सम्पूर्ण पृथ्वी मण्डल के अलङ्कार स्वरूप, राजाओं में चन्द्रमा के समान, उनके विस्तृत यश की चांदनी के कारण शत्रुओ की स्त्रियों की इन्दुकान्त मणि के सदृश आँखों से पानी बहने लगा। २६. उचित समय देखकर दशरथ ने विधिवत् अग्नि के सामने एक ऐसी राजकन्या से विवाह किया जो विनयशीला थी और जो इन्द्र के शत्रु (मेघनाद) के भाई (रावण) को मारने वाले एवं ईश्वर के तुल्य तेजस्वी (राम) की माता होगी।

जानकीहरणम् , महेन्द्रकल्पस्य महाय देव्याः स्फुरन्मयूखा सरणिर्नखानाम् । पादद्वयान्ते जितपद्मकोशे मुक्तेव मुक्ताविततिविरेजे ॥२७॥ लीला गतेरत्र निसर्गसिद्धा मत्तो न दन्ती मुपितो न हंसः । इतीव जङ्घायुगलं तदीयं चक्रे तुलाकोट्यधिरोहणानि ॥२८॥ दृष्टौ हतं मन्मथबाणपातैः शक्यं विधातुं न निमोल्य चक्षुः । ऊरू विधात्रा नु कृतौ कथं तावित्यास तस्यां सुमतेवितर्कः ॥२६॥ तथा हृतं तस्य तया पृथुत्वं यथाऽभवन्मध्यमतिक्षयिष्णु । इतीव बद्धा रशनागुणेन श्रोणी पुनर्वृद्धिनिषेधहेतोः ॥३०॥ अस्योदरस्य प्रतितुल्यशोभं नास्तीति धात्रा भुवनत्रयेऽपि । संख्यानरेखा इव संप्रयुक्तास्तिस्रो विरेजुर्बलयः सुदत्याः ॥३१॥ वय.प्रकर्षादुपचीयमानस्तनद्वयस्योद्वहनश्रमेण । अत्यन्तकाश्यं वनजायताक्ष्या मध्यं जगामेति ममैष तकः ॥३२॥ २७. इन्द्र के समान दशरथ की रानी (कौशल्या) के कमल को लजाने वाले दोनों पैरों के अन्त में नखों की पंक्ति से जो प्रभा निकल रही थी वह ऐसी लगती थी जैसे उनके पूजन के हेतु किसी ने बहुत से मोती विखेर दिये हों। २८. उसको (कौशल्या की) दोनों जो जैसे तराजू के किनारों पर लटकती हुई यह सिद्ध कर रही थीं कि वह न तो हाथी और न हंस से चुराई गई हैं, उनकी बल्कि वह चाल स्वाभाविक है। २६. बुद्धिमान लोग इस चक्कर में थे कि पाखिर ब्रह्मा ने इनकी ( कौशल्या की) जांघों को बनाया तो कैसे बनाया । क्योंकि यदि वे प्रांत्र खोलकर बनाते तो उनकी यांखे कामदेव के वाण से विद्ध हो जाती । और, फिर आंख मूंद कर वे मना ही कैसे सकते थे ? ३०. ऐसा लगता था जैसे उनकी (कौशल्या को) मतीव पतली कमर मोटी न होने पावे, इसलिये उसे करधनी रो बांध दिया गया हो। टिप्पणी-गुण, वृद्धि, निषेध के प्रयोग को देखिये । ३१. उस सुन्दर दांतों वाली (कोशल्या) के पेट के सौन्दर्य के अनुरूप तीनों भुवनों में कोई भी नहीं है । उनकी घिवली ऐसी शोभायमान थी जैसे (प्रत्येक भुवन में ढूंढ़ने पर निराश होकर) ब्रह्मा ने गणना की तीन रेखाएं बना दी हों ३२. मेरा तो ऐसा सपं है कि कमल की पंखुरी के समान दीर्घ नेत्र वाली फौगल्या की कमर पोवन ये. उत्कर्ष से भरे दोनों स्तनों के भार होने के परिश्रम से अत्यन्त पतली हो गई। टिप्पणी-"यापान मारोदनथमेग"--रघुवंश-२-१८। (कालिदास) प्रथमः सर्गः ७ अरालकेश्या अलके विधात्रा विधीयमाने चलतूलिकानात् । च्युतस्य विन्दोरसितस्य मार्गरेखेव रेजे नवरोमराजी ॥३३॥ नायं शशी तत्प्रतितुल्यमन्यद्यस्मान्न विश्लेपयति द्वयं नौ । इति स्म तर्कादिव पश्यतस्तौ तस्या मुखेन्दु कुचचक्रवाकौ ॥३४॥ निर्जिग्यतुर्बालमृणालनालं सच्छिद्रवृत्तं यदि दीर्घसूत्रम् । सुश्लिष्टसन्धी शुभविग्रहौ तौ तन्व्या भुजौ कि किल तत्र चित्रम् ॥३५॥ कान्तिप्रकर्प दशनच्छदेन सन्ध्याघने बद्धपदं हरन्त्याः । तस्या गृहोद्यानसरोगतस्य हस्तस्थ एवाम्बुरुहस्य रागः ॥३६॥ आसीदयं चन्द्रमसो विशेषस्तद्वक्त्रचन्द्रस्य च भासुरस्य । विति पूर्वः सकलं कुरङ्गं तस्यैव नेत्रद्वितयं द्वितीयः ॥३७॥ कान्तिश्रिया निर्जितपद्मरागं मनोज्ञगन्धं द्वयमेव शस्तम् । नवप्रबुद्धं जलजं जलेषु स्थलेषु तस्या वदनारविन्दम् ॥३८॥ ३३. उसकी (कौशल्या की) नाभि के ऊपर नये रोंये की लकीर ऐसी सुन्दर लगती थी जैसे उसके घूघर वाले वालों के बनाते समय, हाथ कप जाने के कारण, विधाता की तूलिका के अग्रभाग से एक बूंद कृष्णराग ने पेट पर गिर कर लकीर खींच दी हो। टिप्पणी 'भित्वा निराफामदरालकेश्या-रघुवंश-६-८१ । (कालिदास) ३४. चक्रवाक मिथुन के समान कौशल्या के दोनों उन्नत स्तनो ने उसके मुखचंद्र को और देखकर सोचा कि वह चन्द्रमा नहीं है बल्कि उसी की तरह कोई दूसरी चीज है, क्योंकि वह हम दोनों का विछोह नहीं कराती। ३५. उसके दोनों बाहुओं के प्रत्येक जोड़ सुन्दर और अवयव पुष्ट और कमनीय थे। उन्होंने नये कमल नाल को जो पोपले और तन्तु जाल से भरे थे जीत लिया तो इसमें कौन पाश्चर्य है? ३६. उसके होठो ने संध्याकालीन बादलों की लालिमा छीन ली थी और अन्तःपुर के सरोवर में फूले हुए लाल कमल को अरुणाई उसके हथेलियों में आ गई थी। ३७. कौशल्या के मुखचन्द्र में मौर चन्द्रमा में केवल एक ही अन्तर था। चन्द्रमा मे कुरंग के सब अवयव अङ्कित थे! परन्तु कौशल्या के मुखचन्द्र में उस कुरङ्ग को केवल दो पाखें यों। ३८. पृथ्वी पर दो ही वस्तुओं की प्रशंसा की गई है जिन्होंने अपनी कान्ति से माणिक्य को जीत लिया है और जिसमे बड़ी लुभावनी सुगंध है। एक तो जल में सद्यः प्रफुल्लित कमल, दूसरे स्थल पर कोशल्या का मुखारविन्द ।

जानकीहरणम् इन्दीवरस्यान्तरमेतदस्या नेत्रोत्पलस्यापि यतो हिमांशोः । त्विषोऽपि नैकं सहते मुखाख्यमाक्रम्य तस्थावपरं शशाङ्कम् ॥३६॥ युग्मं भ्रुवोश्चञ्चलजिह्मपक्ष्मसम्पर्कभीत्यासितलोचनायाः । प्रोन्नम्य दूरोत्सरणं विधित्सुर्मध्ये न तस्थाविति मे वितर्कः ॥३०॥ तत्केशपाशाजितात्मवहभारस्य वासः शिखिनो वनेषु। चक्रे जनस्य स्पृशतीतिशङ्कां चेतस्तिरश्चामपि जातु लन्नाम् ॥४१॥ अन्यापि कन्या जितसिद्ध कन्या तादृागुणा तस्य बभूव देवी । दोपोऽपि यस्या भुवनत्रयस्य वभूव रक्षोभयनाशहेतुः ॥४२॥ सुमंन्त्रसूतस्य सूमित्रयाग्नौ पाणिग्रहं लम्भितया द्विजेन । पुण्यं भवान्या भवहस्तसक्तहस्ताम्बुजाया वपुराललम्वे ॥४३॥ तासु प्रजानामधिपः प्रजार्थी देवीसु चारित्रकुलोन्नतासु । अदृष्टपुत्राननवन्ध्यदृष्टिश्चिन्ताऽऽहृतात्मैव निनाय कालम् ॥३४॥ ३६. नील कमल में और कोशल्या की उत्पल के सघश कजरारी प्रांखों में इतना ही तो मन्तर था कि नील कमल चन्द्रमा की रश्मियों को नहीं सह सकता, परन्तु कौशल्या के नेत्रो. त्पल उसके मुखचन्द्र को छापे हुए थे । ४०. मैं समझता हूं कि कौशल्या की दोनों भौहें उसकी कजरारी प्रांखों की चंचल और कुटिल वरोनियों के सम्पर्क में आने से भयभीत होकर दूर ही दूर रहने की इच्छा से कमान की तरह होकर केवल बीच के सहारे टिकी थीं। ४१. "ऐसा लगता है कि पशु पक्षियों को भी लज्जा का अनुभव होता है । यह सन्देह उन्हें तब हुप्रा जब उन्होंने देखा कि मयूर नगर छोड़ कर वन में रहने लगे क्योंकि कौशल्या के केशकलाप ने उनके पूंछों को सौंदर्य में हरा दिया था। ४२. एक दूसरी रामकन्या (कैकेयी) भी थी जो सिद्धों की कन्यानों से भी अधिक सुन्दरी थी, जो माल्या के समान गुणवती थी मोर जिसके अवगुण ने तीनों लोकों को राक्षसों के भय से मुक्त कर दिया, (ऐसी राजकन्या) दशरप की रानी हुई। ४३. मग्नि के सामने ग्राहाण के द्वारा, सुमत्र जिसके सारथी हैं ऐसे दशरथ के पाणिग्रहण से गुमित्रा में पवित्र शरीर की ऐसी शोमा हुई जैसे कमल के समान हाथ वाली पार्वती की गोमा शिव के पारिणग्रहण करने पर हुई थी। ४४. पनी प्रजा के स्वामी, सन्तति की कामना करने वाले, दशरय की मांगों की ज्योति निष्पत हो गई, क्योंकि चरित्रवान् कुल में उत्पन्न उनकी रानियों के फोई पुत्र न पा; पौर इगो चिन्ता में ये अपना समय काटने सगे।

प्रथमः सर्गः स्वरक्षितव्यं गहनं हिमस्य नगस्य गोप्ता श्वगणिप्रचारैः । विशोधितं कुञ्जभुवः कदाचित् तस्मै जगत्याः प्रभवे जगाद ॥४५॥ विधेयचित्तश्चलितव्यधेषु हलायुधाभः स कुतुहलेन । अन्येधुरन्यायनिवृत्तवृत्तिभृगेन्द्रगामी मृगयां जगाम ॥४६॥ पुत्रीकृतानीश्वरया शिशुत्वे स्नेहेन नप्तीनिव बालवृक्षान् । यश्चित्रपुष्पाभरणाभिरम्यानुत्संगदेशेन चिरं बभार ॥४७॥ वातेन कृष्टे पटले धनानां धातुप्रतानाः प्रतरन्ति दृष्टाः । यस्य त्वचामुद्धरणाभिशङ्कां मुग्धाय गन्धर्ववधूजनाय ॥४८॥ यः कृष्यमाणेषु मृगेषु नागैर्दरीमुखादर्घविनिर्गताङ्गैः। प्रसारितास्य स्वयमेव सत्वान ग्रासीकरोतीव वितत्य जिह्वाम्॥४६॥ नागाङ्गनारत्नमरीचिजालध्वस्तान्धकारप्रकरस्य यस्य। निकुञ्जपद्माकरपद्मखण्डैविदन्ति रात्रिन्दिवसंविभागम् ॥५०॥ ४५. एक दिन जंगल के रक्षक ने पाकर जगत् के स्वामी दशरथ से कहा कि हिमाच्छादित पहाड़ की कुञ्जो (शिकारगाहो) को जो उसकी देख-रेख में हैं, कुत्तो को साथ लिये परिचारकों ने धूम घूम कर साफ़ कर दिया है । ४६. दूसरे ही दिन दशरथ, जिनकी कान्ति वलराम के सदृश है, जो अन्याय से सदा विमुख रहते हैं और जिनकी चाल सिंह की तरह है, भागते हुए जानवरों को मारने की ठान कर बड़े कुतूहल से आखेट के लिए चले। ४७. उन छोटे छोटे वृक्षों को हिमालय वहुत दिनो से अपनी गोद में बड़े स्नेह से पौत्र की तरह पाल रहा यर । इन वृक्षों को पार्वती ने अपने पुन की तरह माना था और वे इस समय रंगविरगे पुष्पों से लदे हुए लहलहा रहे थे । टिप्पणी-'पुत्री कृतोऽसौ वृषभध्वजेन'-रघुवंश २-३६ । (कालिदास) ४८. तेज हवा के कारण पहाड़ से हिम हट गया और उसकी धातुमयी भूमि दिखलाई पड़ने लगी। इससे भोली भाली गन्धर्व-वधुओं को यह शंका हुई कि वही हिमालय की साल तो नही उघड़ गई। ४६. गुफ़ानों से अपना आधा शरीर निकालकर जब अजगर मृगों को पकड़ कर खीच रहे ये तो ऐसा लगता था जैसे पहाड़ स्वयं अपना मुंह खोल, जीभ लपलपाते हुए जानवरो को ग्रास बनाकर निगल रहा हो। ५०. हिमालय के निकुञ्जों में, नागपनियों की मणियों की प्रभा से अन्धकार नष्ट हो जाने के कारण, रात और दिन का विभाजन, इन निकुञ्जों में स्थित तड़ागो मे कमलों के फूलने से ही जाना जाता था। २ जानकीहरणम् धातुप्रभालोहितपक्षयुग्मः श्रीमद्गुहालंकृतचारुपृष्ठः । दिव्यस्य यश्चन्द्रकिणो बिभर्ति रूपश्रियं भासुरचन्द्रकान्तः ॥५१॥ तस्य क्वणनिर्भररेणुविद्धतिविधूतागरुपादपान्ते । अधिज्यधन्वा धनद प्रभावश्चचार मैनाकगुरोनिकुळे ॥५२॥ तूणीरतस्तूर्णमिषु विकृष्य संधाय चापे चपलेतरात्मा । रङ्गत्तुरङ्गः क्वचिदाशु धन्वी मार्ग मृगाणां पुरतः स्म रुन्धे ॥५३॥ उत्कर्णमुत्पुच्छयमानमासे विदर्शिताभ्याहतकन्दुकोत्थम् । पारिप्लवाक्षं मृगशाववृन्दमीषन्निपातन शरेण राजा ॥५४॥ मध्यं त्वमुतुङ्गवलः करेण मा पीडयस्व प्रसभं ममेंति । विवक्षुणेवाभिमुखं विकृष्टचापेन नेमे मनुवंशकेतोः ॥५५॥ खमुत्पपातैणवरो नृपेण विद्धोऽपि पूर्वाहितवेगवृत्या । स्वर्लोकमन्तःकरणस्य यातुः प्रोत्यानुयात्रामिव कर्तुकामः ॥५६॥ ५१. वह पर्वत जिसके दोनों पोर के ढलवान धातुओं की प्रभा से लाल मालूम पड़ते थे, जिसके ऊपर का पृष्ठ भाग सुन्दर गुफाओं से अलंकृत और चन्द्रमा की तरह स्वच्छ था, स्कन्द के मयूर के समान शोभायमान हुप्रा। ५२. तब कुवेर के समान परानमी दशरथ अपने धनुष पर प्रत्यंचा चढा कर उसको टङ्कारते हुए मैनाक के गुरु (हिमालय) के उन निकुंजों मे घूमते लगे जिनमें झरनों की फुहार से पाई अगर वृक्ष की फुनगियां हवा में झूम रही थी। ५३. दौड़ते हुए घोड़े पर धनुप लिये हुए स्थिर बुद्धि दशरथ ने फुरती से तरकश से वाण निकाल, अपने धनुप पर साध कर मृगो के मार्ग को तुरन्त रोक दिया। ५४. जब शिकारियों ने उन्हें एक मृगशावकों के झुंड को जो गेंद फेंकने से कान मौर पूंछ उठाकर उठ खड़ा हुआ था और जिसकी प्रॉसें पानी में तैरती मालूम पड़ती थी, दिखलाया, तब राजा (दगरथ) ने एक हलका सा तीर फेंक कर उन्हें चौकन्ना कर दिया और वे भाग सड़े हुए। ५५. मनुवरा के यशस्वी राजा दशरथ ने जब अपने पाप को जोर के सोंचा तो उसके दोनों सिरे उनके मुस के सामने जैसे यह कहने की इच्छा से भुक गये कि, "तुम मपनी याहु के प्रचण्ड बस से वरखम मेरी कमर को पीड़ित न करो।" ५६. प्रपने मुंह का सरदार मृग, ऊंची-ऊंची छलांग मारते हुए जब मनुष्यों में श्रेष्ठ, दारय याए रो यिद हमा तव उसका प्राण शरीर से निकल कर स्वर्ग की भोर चला । उस समय ऐसा मगता पा से मृग का शरीर, जिसमें छलांग लेते ही गति मा गुगी पी, अपने प्राण के मोहवता उस पीपा कर रहा हो।

प्रथमः सर्गः ११ अन्योन्यवक्त्रापितपल्लवानग्रासं नृवीरस्य कुरङ्गयुग्मम् । प्रियातुनीतौ मुशमिष्टचाटुचेष्टस्य घाताभिरति निरासे ॥५७॥ ऋज्वागता तस्य मुहुर्मूगाणां पङ्क्तिः शरेण ग्रथितेव रेजे। मुक्तेन पूर्वस्य मुखे परेषां दृष्टेन सद्यः सममन्तरेषु ॥५८॥ आघावतस्तेन धनुर्धरेण मध्येललाटं महिपस्य मुक्तः । अस्कन्नवेगो दृढदेहभेदे लागूलसारत्वमियाय बाणः ॥५६! स द्वीपिनोऽथ द्विपराजगामी हन्तुं तुरङ्गं रचितक्रमस्य । जघान देहं प्रतिबिन्दु वाणैरेकेन दुर्लक्ष्यभुजः क्षणेन ॥६०॥ तस्मिन्नृपे पाटयति प्रसह्य शस्त्रेण गण्डं भिषजीव भीमम् । तदीयनादप्रतिनिस्वनेन त्रासादिवाद्रिद्मशमुन्न नाद ॥६१॥ ५७. हरिण के जोड़े को एक दूसरे के मुख में घास के कोमल अग्रभाग को प्रेम से देते हुए देखकर, नरों मे वीर, दशरथ को, जो स्वभावतः प्रेमियों के अनन्य प्रणय मे दत्तचित रहते थे, जानवरों को मारने से विरक्ति हो गई। ५८. हरिणों का एक झुंड रह-रहकर एक सीधी पंक्ति में आ जाता था। सबके प्रागे नेता के मुख में जब दशरथ ने बाण मारा तो वह एक के बाद दूसरे को छेदता हुआ क्षणभर में निकल गया । वह बाण मृगों के बीच-बीच में समान अन्तर पर चमक जाता था। तब ऐसा लगता था जैसे वे सब हरिण एक सूत्र में पिरो दिये गये हों। ५६. धनुर्धारी दशरथ ने, जिनके बाण का वेग अनिवार्य था, दौड़ते जंगली भैसे के मस्तक के बीचो-बीच एक ऐसा वारण मारा जो कि उस भैसे के दृढ चमड़े के कटे हुए स्थान पर पूंछ की तरह लगता था। ६०. हाथी के समान मस्त चाल वाले, जिनकी भुजाय बाण चलाने के समय दिखलाई.नहीं देती थी, ऐसे दशरथ ने, उनसे घोड़े पर आक्रमण करने के हेतु छपकन्त तेंदुये के प्रत्येक कृष्णविन्दु को क्षण भर में वारणों से बेघ दिया। ६१. जब राजा दशरथ शल्य-चिकत्सक की भांति एक भीमकाय गडे को शस्त्र से बलपूर्वक दो टुकड़े कर रहे थे उस समय के मार्तनाद को प्रतिध्वनि से ऐसा लगता था जैसे पहाड़ डर के मारे भयानक मातंनाद कर रहा है। टिप्पणी-तटीयमान्दितमातसाधो गृहानिबद्ध प्रतिशब्द दीर्घम्' -रघुवंश २-२८। (कालिदास) जानकीहरणम् युद्धायु यूथादभितो निवृत्तं कोडं मुहुः क्रोधविमुक्तनादम् । शरस्य लक्ष्यं शरजन्मतुल्यश्चकार चक्रीकृतचापदण्डः ॥६२॥ एवं मृगव्यश्रमसेवितः सन् विश्रामहेतोः स विहाय वाहम् । समीरणानसितवेतसाग्नं वीरस्सरस्तीरमलञ्चकार ॥६३।। सुगन्धिसौगन्धिकगन्धहृद्यः सरोऽनिलः सारसनादकी। आधुतराजीवरजीवितानैरङ्गं पिशङ्गं नृपतेश्चकार ॥६४॥ अथास्तकूटाहतमुग्ररागं समुल्लसद्दीधितिविस्फुलिङ्गम् । स्पृष्टं घनेन क्वचिदास लोहखण्डवृहत्तप्तमिवार्कविम्बम् ॥६५॥ बिम्बं पतङ्गस्य बबन्ध दृष्टिं दृष्टं प्रतीच्यामवनीश्वरेण । भित्तौ विनीलत्विपि लम्बमानमेकं यथा काञ्चनतालवृन्तम् ॥६६॥ राजा रजन्यामधिशय्य तस्मिन् शिलातलं शीतलमिन्दुपादैः । खेदं विनिन्ये मृदुभिः समीरैरासारसारैगिरिनिराणाम् ॥६७॥ ६२. एक जंगली सुअर मोर्चा लेने के लिये, क्रोध से बार-बार दहाड़ता हुआ अपने मुंड से बाहर निकल पाया । तब कातिकेय के समान दशरथ ने जिनका धनुष जोर से खीचने के कारण गोलाकार हो गया था, उस सुपर को अपने वाण का निशाना बना लिया। ६३. इस प्रकार उस वीर ने पाट के परिश्रम से थककर, अपने घोड़े को छोड़, पाराम करने के लिये एक सरोवर के तट को जिसमें बेंत के पेड़ के अग्रभाग हवा से हिल रहे थे, अलंकृत किया। ६४. गरोवर पो हवा जो गुगंधिक (इअफ़रोग) को दुकान की सुगन्धि की भांति हृदय. प्राहिणी पी पौर जो सारस यी योती मो आकृष्ट कर रही थी, उस यायु ने नील फमल से पराग उड़ाकर राजा के शरीर को पिङ्गल पणं कर दिया। ६५. उस रागय चमचमाता हुमा मूर्य का विम्य, अस्ताचल के शृंग गे टकराने के कारण रश्मि रूपी चिनगारियो छिटपाता हुमा, जो कहीं-कहीं वादलों से दिन हो गई थीं, एक दहकते हुए सोहे बड़े गोले के समान लगता था। ६६. पृथ्वी के स्वामी दरार, पश्चिम दिशा में मूयं मे विम्ब को देखकर निहारते ही रह गये । यह विम्य काली दीवार पर सटकते हुए एक सुनहले साल के परो की तरह सगनापा। ६७. राजा ने उस मील के रिनारे पन्द्र किरणों से शीतप एक परपर की पट्टान पर सोफर पहाट झरनोपी पुहार से टटी, गन्द-मन्द हया से अपने श्रम योपूर रिया ।

प्रथमः सर्गः पत्यौ पृथिव्या मृगयाभिलापाज्जागर्यया नीतवति त्रियामाम् । क्वापि प्रपेदे मृगलाञ्छनेन त्रासादिवादाय निजं कुरङ्गम् ॥६८॥ आरुह्य शृङ्ग मृगयाविहारे रागी विवस्वानुदयाचलस्य । पत्ये पृथिव्या रचयाम्बभूव मृगानिव प्रस्फुरता करेण ॥६६॥ प्रभुः प्रजानामथ स प्रभाते हरिप्रभावो हरिमाररोह । सज्जीकृतं सज्जनगीतकीर्तिबंद्धायुधो बन्धुरवर्मजालम् ॥७॥ कश्चिन्मृगं मागंणगोचरेऽसौ दृष्ट्वा विकृष्टायतचापदण्डः । शरं मुमुक्षुः शरभोरुवेगं तमन्वयादन्वयकेतुभूतः ॥७॥ विलय मार्ग नृपमार्गणानां रेखायमाणो गगने रयेण । मृगोत्तमोऽसौ तमसातटस्थं वनं तपस्यद्भवनं प्रपेदे ॥७२॥ धनुःसहायोऽश्मवति प्रदेशे विहाय वाहं सहसा नृवीरः । चचार पद्भ्यां गहने तरूणामसौ धने तत्पददत्तदृष्टिः ॥७३॥ ६८. जब पृथ्वीपति ( दशरथ ) मृगों का आखेट करने के लिये रात को जागते रहे तो चन्द्रमा, जैसे डर के मारे, अपने हिरण को लेकर कही चल दिया। (अर्थात् चन्द्रास्त हुआ)। ६६. (जव सूर्योदय हुआ) तब प्रभावान् सूर्य उदयाचल के शृंग पर चढकर अपनी प्रस्फुरित किरणों से जैसे शिकार खेलाने के लिये हरिणों को खदेड़ने लगे । (जैसा हांका वाले करते हैं।) ७०. तब प्रातःकाल इन्द्र के समान प्रभावशाली, प्रजा के स्वामी, जिनका सज्जन लोग यशो- गान करते हैं, जिरहबस्तर पहिन अस्त्र-शस्त्रों से लैस होकर सजे हुए घोड़े पर चढ़े। टिप्पणी-'अय प्रजानामधिपप्रभाते-रघुवंश-२-१०। (कालिदास) ७१, अपने वंश के सिरमौर दशरथ ने अपने निशाने के भीतर आये हुए मृग को देखकर शरम (एक कल्पित अष्टपाद मृग) के समान तेज वारण को छोड़ने की इच्छा से धनुष को खीचते हुए उसका पीछा किया। ७२. वह मृग श्रेष्ठ इतना द्रुतगामी था कि अपनी चौकड़ी से प्राकारा में एक लकीर सी खीचता हुआ राजा (दशरथ) के याण के निशाने से बाहर निकलकर तमसा नदी के तट पर स्थित एक माश्रम में जो तपस्वियो का स्थान था, घुस गया। ७३. तव पुरुषवीर दशरथ (उबड़ खाबड़) पथरीली जमीन देखकर फुर्ती से घोड़े से उतर, केवल धनुप लिये उसके पैर के चिह्नों को देखते हुए, वृक्षों से भरे हुए उस धने वन मे पैदल ही चलने लगे।

१४ जानकीहरणम् तटेऽपि तस्या घटपूरणस्य श्रुत्वा रवं हितनादशङ्की । शरं शरण्योऽपि मुमोच वाले मुनेस्तनूजे मनुवंशकेतुः ॥७४॥ पुत्रो मुनेः पत्रिविभिन्नमर्मा शरानुसारेण नृपं प्रयातम् । नेवाम्बुदिग्धेन विलापनाम्ना वाणेन भूयो हृदि तं जधान ॥७५।। त्वया त्वनाथस्य विचक्षुषः कि भग्नोऽयमालम्बनदण्ड एकः । वने जरावेशजड़ीकृतस्य गुरुद्वयस्य व्रतजीणमूर्तेः ॥७॥ एकं त्वया साधयताऽपि लक्ष्यं नीतं विनाशं त्रितयं निरागः । मच्चक्षुषा कल्पितदृष्टिकृत्यौ वृद्धौ वने मे पितरावहं च ॥७७|| वनेषु वासो मृगयूथमध्ये क्रिया च वृद्धान्धजनस्य पोषः । वृत्तिश्च वन्यं फलमेषु दोपः संभावितः को मयि घातहेतुः ॥७८॥ ७४. मनुवंश के वेतु (दारथ) ने नदी के तट पर पड़ा भरने की गड़गड़ाहट को हॉपी की आवाज़ समझ कर, साधुओं को शरण देने वाले होते हुए भी, मुनि के बालक पुत्र पर बाण छोड़ दिया। टिप्परगी-'वधायवध्यस्य शरं शरण्य:--रघुवंश-२-३० । (कालिदास) ७५. मुनिपुन के ममं भाग दशरथ के परदार वारण से विदीर्ण हो गये। और जब वे प्रयुत्ता तीर के मार्ग से उस ओर जाने लगे तव आहत बालक के आंसुमो से सिक्त, विलापरूपी वाण ने उनके हृदय पर आपात किया। ७६. जो अंधे हैं, जिनका चित्त वुढाई के कारण डांवाडोल रहता है और तपस्या करते करते जिनका शरीर जीर्ण हो गया है, ऐसे निस्सहाय, धन में माता पिता के केपल एक अवलम्ब मुझे मापने क्यों भग्न कर दिया ? ७७. आपने एक ही निशाने से तीन निरपराध व्यक्तियों की जान ली। मेरे वृद्ध माता पिता की और मेरी, जिसकी प्रांखों ही के द्वारा वे इस वन में देखते थे। टिप्पणी-'एकेन खल वाणेन मर्मण्यभिहिते मयि । द्वावन्धौ निहतो युद्धौ माता जनयिता च मे। -अयोध्याकाण्ड -६३-४०। (वाल्मीफि) मैं मृगों के झुंड के बीच इस वन में रहता हूँ । मेरा काम केवल अपने वृद्ध और माधे माता पिता का भरण-पोषण है। हमारे भोजन का सहारा केवल ये वन के पल हैं। इनमे क्या दोप था जिसमें मापने मेरे विनाश का कारण देखा? टिप्पणी- परस्यय यत्कलाजिनवाससः। को पपेन गमार्यो स्यात् किं यास्यापकृतं मया ।। -अयोध्याकाण्ड-६३-२९ । (पाल्मीकि) -जहाभार प्रथमः सर्गः १५ व्रती विनाथो विगतापराधः स्मर्तव्यदृष्टेः पितुरन्धयष्टिः । इत्येषु किं निष्करुणेन कश्चिदवध्यभावे गणितो न हेतुः ॥७॥ तरुत्वचोऽयं कठिना वसानो वनेषु शीतोष्णनिपीतसारः। अस्वादुवन्याशनजीर्णशक्तिः पात्रं कृपायास्तव वध्यभूतः ।।८०॥ जीर्णो जतुन्यासनिरुद्धरन्ध्रः कुम्भश्च मौञ्जी तरुवल्कलश्च । एतेषु यन्मां विनिहित्य गम्यं तद्गृह्यतामस्तु भवान्कृतार्थः ॥८१॥ साधुः कृपामन्थर मक्षि शत्रौ प्रीत्यर्थसम्मीलित मादधाति । नीचस्तु निष्कारणवैरशीलस्तत्पूर्व संपादित दर्शनेऽपि ॥८२॥ स्वं हेतवे हेतिबलोपनीतस्मयः किमप्युन्नतवृत्ति कस्मै । नीचस्य निष्ठामधिकर्म गच्छन् कुलं कलङ्कः कलुपीकरोपि ॥८३॥ मैवं भवानेनमदुष्टभावं जुगुप्सतां स्माक्षतसाधुवृत्तम् । इतीव वाचो निगृहीतकण्ठैः प्राणैररुध्यन्त महर्पिसूनोः ॥८४|| ७६. मैं एक तपस्वी हूँ, नितान्त निस्सहाय और निर्दोष ! मैं ही, स्मृतिमायावशेप दृष्टि पाले अन्धे माता पिता की लकड़ी (सहारा) हूँ। पाप कितने निर्दयी हैं ! क्या मापने इन सम मे न मारने का कोई कारण नहीं देखा? ८०. पेड़ की फड़ी छाल मेरा क्सन है । वन में कभी ठढा कभी गरम पानी पीने को मिलता है । वन में पैदा हुए निस्वाद पत्तो को खाते साते मैं गतिहीन हो गया हैं। ऐमी परि- स्थिति में मैं प्रापको दया का पात्र या। पर मैं पाप ही के हाथों मारा गया ! ८१. एक पुराना पड़ा जिसके छिद्र लाह से बंद किये गये है, पेड़ की छाल का बना वसन पोर मूंज की मेसला यही मेरी सम्पत्ति है । मुझे मार कर केवल इतना ही माप पा सकते हैं। इन्हे लेकर पाप कृतार्थ हों।। ८२. साधु पुरुष, शत्रु को देख कर मानन्द अनुभव करने के हेतु पारा बंद कर लेता है और फिर प्रेम से धीरे-धीरे माशों को सोलता बन्द करता है । परन्तु नीच, चाहे उसके सर्वप्रथम ही दर्शन क्यो न किये जाप, महारण और ठानता है । ६. पपने शास्त्रों के बस पर फूले हुए, माने कर्मानुमार गौच कर्म में निष्ठा कर तुम गयों मपने पनि मनीय ऊचे पुल को फल से यमुपित कर रहे हो ? ८४. 'पाप ऐसे पविच्छिन साघुपति याने पोर जिसमें दुष्टता पा नितान्त प्रभाव है, ऐसे व्यक्तिको निन्दा न करें!'ऐगा सगता या शिपिपुत्र के कण्ठ में पटरे हुए प्राण ने उपक गनों से उसी याणी यो रोक दिया।

१६ जानकीहरणम् भोज्याः सुतश्चारुभुजद्वयेन घटं गृहीत्वा घटितारिनाशः । वाष्पायमाणो बहुमानपात्रं यमप्रभावो यमिनां ददर्श ॥८५॥ पापं विधायापि विधातृतुल्ये सत्यापयामास सतां पुरोगः । ततो यति घातयतो न सद्यः क्रोधानलेनास्य ददाह देहम् ॥८६॥ दयानुयातस्तनयस्य नाशं श्रुत्वा महर्पिर्मुहुरात शोकः । दिदेश देशस्तुत सद्गुणाय विशन् वशी विश्वभुजं स शापम् ।।८७॥ वनजकुसुमधारिणीमलयां हरिनखपातविदारितोरुगण्डाम्। श्रियमिव नृपतिर्मंगव्यभूमि चिरमनुभूय गृहोन्मुखो बभूव ॥८८॥ अथ स विपमपादगोपितार्थ जगदुपयोगवियुक्त भूरिधातुम् । घहुतुहिननिपातदोषदुष्टं गिरिमसृजत्कुकवेरिव प्रबन्यम् ।।८६॥ १५. भोजकन्या (इन्दुमती) के पुत्र, यमराज के सदृश बलवान् , शत्रुनों के नाश करने वाले, दशरथ ने, अपनी आंखों में आंसू भरे हुए, अपने दोनों सुन्दर हाथों में घड़ा लेकर उस असीम मान के पाम और जितेन्द्रिय ऋपि को देखा। ८६. विधाता के समान, साधुओं में अग्रगण्य दशरथ ने पाप कर्म करने पर भी सत्य बात कह दी । अतः तपस्वी के मारने वाले के शरीर को उरा ऋपि ने क्रोध से तत्काल भस्म नहीं कर दिया। ८७. दयायान् और जितेन्द्रिय उस महर्षि ने अपने पुत्र का विनाश सुनकर हृदय में बार-बार उभड़ते हुए पोक को घर में कर लिया और दारप को, जिनका गुण संसार में गाया जाता था, एक विश्व को निगल जाने वाला भयङ्कर शाप दिया । ८८. उरा मृगया भूमि में जो वन्य पुष्पों से लहलहा रही थी और जिसमें हापियों के विशाल मस्तक को सिंह ने विदार दिया था, राजा (दशरय) ने लक्ष्मी देवी की भांति बहुत दिनों मानन्द उठाकर अपने घर की मोर प्रस्थान किया। टिप्पणी लक्ष्मी के सम्बन्ध में-'बनजकुसुमानि' -कमलामि । 'हरि विष्ण, 'गई ललाट । ५६. तय बुकवि के प्रबन्ध के समान उस पयंत को, जिरामे गणियां पास-पास फी दुर्गम पहाड़ियों से मारण पहुँच के बाहर थी, जिसके पानुषों की उपयोगिता से संसार पश्चिन पा प्रौर जो बहुत यर्फ पड़ने के कारण त्याग्य थी, उन्होंने छोड़ दिया। टिप्पणी गुरुपि के रादर्भ में-'विपम पार गोपिता'=म्यूनापिर अक्षरों के कारण निममा सार रामा में नहीं माता । 'जगदुपयोग पियुक्तभूरिपा=जिनमें पातुओं हा प्रयोग, महाविपों के प्रयोग से भिन्न है। 'तुहिन'='तु' हिम. अधिक प्रयोग से पित।

प्रथमः सर्गः १७ सपदि दिशि निबद्ध भूरिघोपं परमविनीतमनोज्ञनागवृन्दम् । जलधिमिव नृपःपुरं स्वकीयं मणिगणमण्डितकान्तमाससाद ॥१०॥ इति प्रथमः सर्गः ६०. चतुर्दिक व्यापी जयघोष से निनादित, खूब सिखाये हुए हाथियों से परिपूर्ण, ढेर की ढेर मरिणयों से अलंकृत होने के कारण सुन्दर, समुद्र के समान, अपनी राजधानी में राजा दशरथ अविलम्ब पहुंच गये । टिप्पणी-समुद्र के संदर्भ में- 'दिशिनिबद्ध भूरिघोप' जिसको लहरों का गर्जन चतुर्दिक सुनाई पड़ता था । 'परमविनीत मनोज्ञ नागवृन्द"=दिव्य पक्षियों से लाये हुए सुन्दर सर्प समूह से परिपूर्ण। 'मणिगणकान्त'=विभिन्न प्रकार के रत्नों से विभूषित। प्रथम सर्ग समाप्त द्वितीयः सर्ग: रावणेन रणे भग्ना देवा दावाग्नितेजसा । द्रष्टुं जगत्पति जग्मुः पुरस्कृतपुरन्दराः ॥१॥ निजदेहभराक्रान्तनागनिश्विासरंहसा । गतागतपयोराशि पातालतलमास्थितम् ॥२॥ आसीनं भोगिनि त्रस्तमौलिमाल्यविभूपणम् । तत्क्षणत्यक्तनिद्रातिवद्धरागायतेक्षणम् ॥३॥ भुजङ्गपृथुकारूढ़मातङ्गमकराश्रयम् । युद्धमम्भोनिविच्छेदे पश्यन्त' नृपलीलया ॥४॥ भोगिभोगासनक्षोभो माभूदिति सुदूरतः । भक्त्यानतशरीरेण सेव्यमानं गरुत्मता ॥५॥ १. युद्ध में दावानल के समान रावण से पराजित होकर देवता लोग इन्द्र को प्रागे कर जगत के पति (विष्णु) से मिलने गये। टिप्पणी--तस्मिन्विप्रकृताः काले तरकेण दियौकसः । तुरास्वाहं पुरोधाय धाम स्वायंभुवं ययुः ॥ -कुमार सम्भव, २-१ (कालिदास) २. जो उस समय समुद्र के नीचे स्थित थे, जिस समुद्र में उनके पारीर पे बोझ से दबे हुए शेष नाग के उभर कर जोर से सांस लेने से ज्वार भाटा माता था। ३. जो ओपनाग पर बैठे हुए थे, जिनके सर रो माला का मलकार सरक गया पा पौर जिनकी बड़ी-बड़ी मासें तत्क्षण उठने के मालस्य के कारण साल पी। ४. जो राजापों के स्वाभाविक कौतूहल से समुद्र के एक भाग को मोर देख रहे थे जहाँ बरे-बड़े सपों के बच्चों ने युद्ध में भारी-भारी पड़ियालों के निवास स्थान पर पावा कर छार लिया था। ५. जिनमी रोशा के लिये भक्ति से रार नीचा किये, गरद दूर पर इसलिये गढ़े पे कि उनके मारान में, जो रोपनाम का था, कोई हलचन न हो। टिप्पणी-१-८ लोक 'पुलक' है। पहिले श्लोक के 'गगत्पति द्रष्टुं जामः' के साथ भावय होगा। 'दाम्या पाममिति प्रोक्तं निमिः श्लोस्तविपरम् । हाताप चतुभिः स्यात् तवं कुलकं स्मृतम् ॥'

द्वतीयः सर्गः १९ अकरश्मिभयेनेव पातालतलमास्थितम् । लक्ष्मीमुखतुपारांशी प्रीत्या व्यापारितेक्षणम् ॥६॥ स्वमुखे संचरदृष्टेरङ्कविन्यस्तपाणिना। स्पृशन्तं पादपद्मेन पद्माया नाभिमण्डलम् ॥७॥ सव्यापसव्यभागस्थपाञ्चजन्यसुदर्शनम् । तटद्वयस्थचन्द्रार्कविन्ध्यशैलमिवोच्छ्रितम् ॥८॥ पुरुपं पुरुहूताद्या नत्वा गीर्वाणसंहतिः । सनातन स्कन्नशक्तिरूचे नुतियुतां गिरम् ।।६।। समुद्रमथने यस्य भ्रमन्मन्दरखण्डिताः। तारा इव दिशो वव : प्रदीप्ताङ्गदकोटयः ॥१०॥ येन दुरवीर्येण सागराम्बरचन्द्रमाः । शङ्ख पातालपालानां यशःपिण्डमिवोधृतम् ॥११॥ यमंशद्वयसंसक्तचन्द्रादित्याङ्गदश्रियम् । नेमुस्त्रिविक्रमे देवास्ताराहारानवक्षसम् ॥१२॥ ६. जैसे सूर्य की उपण रस्मियो से डर कर, जो पाताल के निचले भाग में विश्राम कर रहे थे और जो बड़े चाव से लक्ष्मी के चन्द्रमा के समान मुख की मोर निहार रहे थे। ७. उनके मुख की ओर निहारती हुई लक्ष्मी के नाभि मण्डल को उनकी गोद मे पड़े हुए अपने कमल के सदृश पैर से जो सहला रहे थे। ८. जिनके उन्नत शारीर के दायें वायें पाञ्चजन्य शंख मोर सुदर्शन चक रसा हुमा ऐसा लगता था जैसे विन्ध्य पर्वत के दोनों तट पर सूर्य और चन्द्र हों। ६. तब क्षीण-शक्ति इन्द्रादिक देवताओं का वह समूह नतमस्तक होकर उस सनातन पुरुप (विष्णु) से प्रशंगायुक्त वाणी बोला। १०. समुद्र मंथन के समय जिसके यमकते हुए बाजूवन्द के मारे मन्दर पर्वत के चरकर साने से टूट कर दिशामों में तारागण की मांति विखर गये। ११. जिन्होंने अपनी दुनिवार वीरता से समुद्र को मयकर चन्द्रमा को निकाला जो सागर के समान माकाश में, पाताल में रक्षकों के पुखीमूत यश के समान था । टेप्पणी-समुद्र-मंपन के समय ये चीजें निकली पौ :-लक्ष्मीः कौस्तुम पारिजातक गुरा धन्वन्तरिश्चन्द्रमा, गावः कामनुपाः सुरेश्वर गनो रम्भादिदेयांगनाः । अश्वः सप्रमुखो पिपं हरिपनुः दासोन्मृतं पाम्म, रलानीह पतुर्दश प्रतिरिनं कुर्पः सवा मंगलम् ॥ १२. देवतामों ने विविएम (विष्णु) को, जिनके वाहुबन्ध (बावन्द) कन्या रानिपट स्थित, गूर्य और चन्द्र के समान दमक रहे थे, और जिनका पक्ष गारों की बनी हुई गाना से मदिन था, भुषार प्रणाम रिया।

२० जानकीहरणम् . मन्यवातभ्रमन्मेघनक्षत्रादित्यमण्डलम् । पुरा निर्मथितं येन व्योमापि सह सिन्धुना ॥१३॥ नाभिपद्मस्पृशौ भीमौ येन मायाशयालुना। पाणिभिः पाटितौ कामं कोटवन्मधुकैटभौ ॥१४॥ सर्व लोकत्रयं यश्च संहृत्य शयनं गतः । दृश्यते सलिलस्कन्धः सान्द्रीभूत इवोदधौ ॥१५।। तस्मै स्मरणमात्रेण तुभ्यं सद्यस्तमोनुदे । नमः सत्त्वमधिश्रित्य त्रैलोक्यं परिरक्षते ॥१६॥ स्थितिनिर्माणसंहारभेदयोगेन भेदितः। विधा ते समभूद्योगः स्पृष्टसत्त्वरजस्तमाः ॥१७॥ कुक्षौ तव परिश्रम्य पश्यन्विश्वं विशां पतिः । विवेद त्वां विदामग्रयस्त्रैलोक्यभरसासहिम् ॥१८॥ एवं भक्त्या जगन्नेता नुतो नाकस्य भोक्तृभिः । हरिभरि हितं वाक्यं जगाद गदनाशनः ।।१६।। १३. जिन्होंने प्राचीन समय में आकाश को भी जिसमें सूर्य, नक्षत्र मण्डल और मेष तेजी से घूम रहे थे, मथ डाला था। १४. माया में निद्रालु, जिन्होंने पराक्रमी मधु और कैटभ दैत्यों को, इच्छानुसार अपने हाथों से छिम-मिल कर डाला जब उन राक्षसों ने उनके नाभिकमल को पकड़ने की चेष्टा की। १५. तीनों लोको का विनाश कर सो गये थे मौर उस समय समुद्र में जमे हुए एक यदाकार जल सण्ड के सहा दिखाई पड़ते थे। १६. भापको जो केवल स्मरण मात्र से तुरन्त अन्धकार को दूर करते हैं और जो अपने सतोगुण में तीनों लोकों की रक्षा करते हैं, नमस्कार है। १७. जीवन, निर्माण पौर संहार के विभाजन के अनुसार, पापका योग भी, उनके अनुकूल, सत्य, रजस मोर तमस में विभाजित है। १८. पापके उदर में बड़े परिषग से रहकर बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, संसार के स्वामी ने इस विश्व को देखकर समझ लिया कि माप लोक्य का भार वाहन मारने में समर्थ है। १६. स्वर्ग में रमण करने वाले देवतामों रो 'भक्तिपूर्वक प्रशंसित होकर, कष्ट फो निवारण करने यासे, संसार के स्वामी हरि ने उन देवतामों से हित मोर मनोहर वचन बोले ।

द्वितीयः सर्गः २१ प्रवलारिबलप्राणविक्रियाहेतुहेतयः । किन्नु स्कन्नौजसो जाता देवा दैवक्षता इव ॥२०॥ हरेानारुणा शोकक्षामा नेत्रपरम्परा । विभति कि परिम्लानरक्तोत्पलवनश्रियम् ॥२१॥ पाशपाणिरसाविष्टविग्रहो वनगोचरः । वीरोऽपि वरुणः केन क्षुद्रः पाशीव पीडितः ॥२२॥ किमयं शोकसन्तापैर्मातरिश्वा कृशोऽपि सन् । भूरिभिजिनिःश्वासैः पुनरेवोपचीयते ॥२३॥ संपध्रुव परावृत्तिरेवं विधिनिवन्धना । शोकविश्वभुजा सोऽयं दह्यते दहनोऽपि सन् ॥२४॥ सम्प्राप्तजडिमा भानुस्तीव्रतापश्च चन्द्रमाः। किमेतौ वहती देवी धामव्यत्ययविप्लवम् ॥२५॥ २०. ये देवता लोग, जिनके शस्त्रों का काम बलवान् शत्रुओं को सेना का विनाश करना है क्यों निस्तेज हो गये हैं ? जैसे भाग्य के मारे हों। २१. इन्द्र की प्रांखों की लड़ी जो शोक से सूख गई है और चिन्ता के कारण लाल हो गई है क्यो उस वनलक्ष्मी के सदृश हो गई है जिसके लाल कमल मुरझा गये हैं। २२. किसने इन वरुण देव को, जो बड़े शूरवीर हैं, जो अपने हाथों में ऐसा पारा लिये रहते हैं जो उनकी इच्छानुसार अनेक रूप धारण करता है मौर जिनका निवास जल में है, किसने एक बहेलिये की तरह पीड़ित कर दिया है। टिप्परगी-बहेलिये के संदर्भ में-"पाल मणिः जिनके हाय में चिड़ियों के फंसाने का जाल है। 'इष्टविह जिसको चिड़िया का फंसाना अभीष्ट है। 'बनगोचर:=पन में फिरने वाला। २३. पवनदेव जिनका वदन घरहरा है, शोक मोर सन्ताप से बराबर उमर-उभर कर श्वास लेने के कारण कैसे फूल गये हैं। २४. विधि का कुछ ऐसा विधान है कि सम्पत्ति का उलट फेर लगा रहता है । ये अग्निदेव जिनमें जला डालने की शक्ति है, विश्व को खा जाने वाले सन्ताप से स्वयं जल रहे हैं। २५. मूर्य वरफ के समान ठंडे हो गये हैं मोर पन्द्रदेव भयङ्कर गरम हो गये हैं । रेसे इन दोनों देवतामों का सहज स्वभाव उलट गया है !

२२ जानकीहरणम् शुचैव सगदः सोऽहं भूयः किं धृतयाऽनया। इति त्यक्ता गदा नूनं मित्रेण गिरिधन्वनः ॥२६॥ लाघवं केन कीनाशे कृतं सायुधवाहने । रक्षके महिपस्यैवं दण्डहस्ते शिशाविव ॥२७॥ कल्पानिल इवावार्यःस्कन्दो दैन्यं किमास्थितः । प्रेरकः शिखिनो भीमः शक्त्या पातिततारकः ॥२८॥. आहत्य हृतसर्वास्त्रा भ्रूधनुर्मात्रधारिणी। कटाक्षशरशेषेयं चण्डी केन कृता रणे ॥२६॥ प्रमथानामधीशस्य माथकस्यासुरद्विषाम् । कूटस्थोऽपि मदः शोषवैकृतं किं नु सेवते ॥३०॥ २६. 'मैं तो सगद (शोकयुक्त) हो गया हूँ तो मैं अब क्यों गदा धारण करू" मालूम होता है अवश्य ही यह सोचकर गिरिधन्वा (इन्द्र) के मित्र कुबेर ने अपनी गदा का परित्याग कर दिया है। २७. यमराज को जो पास्त्र और वाहन से युक्त हैं, जो हाँथ में दंड लिये हुए हैं, और जो अपने भैसे के रक्षक हैं, उनको किसने शिशु से समान तुच्छ समझ लिया है । २८. अपने मयूर को प्रेरणा देने वाले, भयङ्कर वीर, अपने पराक्रम से तारकासुर को पराजित करने वाले प्रलय के समय वहने वाले वायु के समान दुनिवार, ये स्कन्द क्यों दीन हो गये हैं। प्यानपरायणाः ॥ २६. किसने चण्डिका देवी को युद्ध में परास्त कर इनके सव अस्त्र छीन लिये हैं और अब इनके पास केवल इनके भोहो का धनुष और कटाक्षों के वारा वच रहे हैं । ३०. शिव गणों के स्वामी असुरों के शत्रुओं के नेता इन गणेश के मस्तक पर से बहने वाला मद क्यों सूख कर विकृत हो गया है । टिप्पणी- -प्रमयाः शिवगणाः। नानास्पधरा ये 2 जटा चन्द्राघमण्डिताः । ते सर्व सकलेश्वयंपुश्ता संसारविमुखाः सर्वे यतयो योगतत्पराः । सिंहव्याशादिसारूप्या अणिमाविसमायुताः ॥ अपरे कामिनः शम्भोः मुनर्मसचियाः स्मृताः । विचित्ररूपाभरणा जटाचन्द्रार्पमण्डिताः ॥ आकाशमार्ग गच्छन्तमन गच्छन्ति नित्याः । प्यानस्पं परिचर्यन्ति सलिलादिभिरीश्वरम् ॥ नानाशात्रधराः शम्भोगणास्तु प्रमपाः स्मृताः । यपरे गायनास्तालमृदंगपणयादिभिः ।। नृत्यन्ति पापं कुर्वन्तो गायन्ति मपुरस्वरम् । पत्रिशतकोटपश्चंते हरस्य सफलागणाः॥ कालिका पुराण द्वितीयः सर्गः २३ ५ वक्त्रश्वासाग्निपिङ्गाङ्गकर्कोटावद्धकन्धरः । नागशोणितदिग्वास्यस्ताक्ष्यों राजशुकायते ॥३१॥ साग्निजिह्वातडिज्जालनद्धा चास्य फणावली। कि नुम्लायति वर्षान्ते घनश्रेणीव वासुकेः ॥३२॥ पृष्टवन्तमिति प्रष्ठः प्राज्ञः प्राञ्जलिरव्ययम् । धिपणो धिपणागम्यं जगाद जगदीश्वरम् ॥३३॥ त्वया विज्ञातमेवेदं सर्वज्ञ पुनरुच्यते। असौहित्यं हि मृत्यानां स्वामिनि स्वातिजल्पने ॥३४॥ मानिनामग्रणीरस्ति पुलस्तिसुतसम्भवः । दर्पोद्धृतजगद्रक्षो रक्षोनाथो दशाननः ॥३५॥ सं महौजा जगन्नाशफलाय फलसाधनः। निर्विकारश्चिरं चोरी चचार च महत्तपः ॥३६॥ ३१. ये गरुड़ जिनका मुख सों के रुधिर से सिक्त रहता है, पालतू राजशुक के समान पालतू लग रहे हैं । इनकी गर्दन को कर्कोटक नाग ने, जिसका शरीर अग्नि के समान फुफकार से पीला पड़ गया है, बांध लिया है। ३२. वासुकी, फणों की पंक्ति, जिनमें मग्नि के समान लपलपाती जिह्वा, जो बिजली के जाल से परिवेष्टित सी लगती है, क्यों वर्षा के अन्त की मेघमाला के समान मुरमाई हुई मालूम पड़ती है। ३३. जव मनश्वरमौर ज्ञान द्वारा समझे जाने वाले जगदीश्वर ने सब देवतामो के सम्बन्ध में इस प्रकार पूछताछ की तब देवतामो के अगुमा, बुदिमान बृहस्पति जी हाथ जोड़कर बोले। ३४. है रावं ! मापने हमारे हृदय की बात तो जान ही ली है तयागि मैं फिर से उरो कहता हूँ। क्योकि स्वामी से अपने दुःस की गाया पहने मे भृत्य की कभी तृष्टि नहीं होती। ३५. पुसस्त्य के पुत्र (विसवा) से उत्पन्न, घमन्टियों में सब से मागे बढ़ा हमा, राक्षसों के स्वामी, रावण ने अपने दर्प से विश्व की शान्ति भंग कर दी है। ३६. उग महाबली ( रापण ) ने पीर धारण कर जगत के नाम करने का मनोरय मिद करने के लिए एकापचित होकर बहुत रात तक पोर तप पिया।

२४ जानकीहरणम् मातङ्गमकरक्रूरदन्तोल्लिखितवक्षसा । तेनवतयताहारं तपस्तप्तमुदन्वति ॥३७॥ तत्तपस्तोपितस्तस्मै चतुराय चतुर्मुखः। वरं वीराय विश्वेशः प्रादाज्जेतुं जगद्वयम् ॥३८॥ स कदाचिद्र टन्नागं नगं नाकौकसामरिः । हारगौरं हरस्थानं पटुनादं व्यपाटयत् ॥३६॥ . स्फुरन्नगशिरस्त्यक्तैरुन्नदनदनिरैः । स्पृष्टे पूणि झङ्कारं घोरमातन्वति क्षणात् ॥४०॥ वाजिनः प्रग्रहाकृष्टखलीनावक्रकन्धरान् । एकतो जवयत्यतिपातभीत्यार्कसारथौ ॥४१॥ घूर्णमानमहाशैलतटभ्रष्टे मुहुर्मुहुः । मत्तस्येवोत्तरीये स्वस्थानं त्यजति निझरे ॥४२॥ ३७. समुद्र के भीतर भीमकाय जलजन्तुमों ने पने दांतों से उसका वक्ष क्षत-विक्षत कर दिया। फिर भी उसने ग्रत से अपने भोजन का संयमन कर वह तपस्या की। ३८. तब संसार के स्वामी, चतुर्मुख ब्रह्मा जी ने उसकी तपस्या से सन्तुष्ट होकर उस चतुर वीर को दोनों लोकों के विजय करने का पर दिया। ३६. एक समय स्वर्ग के रहने वाले देवतामों के पात्र (रावण) ने शिव के निवास स्थान (साश) को जो हार के समान शुभ्र है और जहाँ हाथी चिच्चाहते रहते हैं, भयङ्कर गर्जन करते हुए चीर डाला। ४०. जिस समय हिलते हुए पर्वत से हहराती हुई बड़े पैग से पिरती नदियों के प्रपात से छू जाने के कारण सूर्य भयङ्कर झंकृत हो उठा था। टिप्पणी-शिशुपाल थप-४-६६ को टोफा करते हुए मल्लिनाप नद' और 'नदो' का भेद इस प्रकार बताते हैं :-'प्राश्नोतसो नः प्रत्यक प्रोतसोनदाः। नर्मदा पिनेरपाहुः॥' ४१. पर सूर्य के सारथी ने इस डर से कि कहीं पर्वत गिर न पड़े, एक पोर भाग रहा था, रास को ऐसी जोर से तीचा कि पोड़ों की गर्दन टेदी हो गई। ४२. जर पराभी के हे मी तरह, मरने परागार सहाड़ाते हुए, भारी भरकम पर्यत से अपना स्थान छोड़ रहे थे।

द्वितीयः सर्गः २५ गौरीभयपरिष्वङ्गस्पर्शलब्धमहोत्सवे । संक्रुद्धधूर्जटिक्रोधप्रतिलोमप्रवर्तिनि ॥४३॥ कपालनयच्छिद्रं जटावदफणावति। संकोचितफणाचक्र विशत्युत्त्रासविह्वले ॥४४॥ परित्रस्ते गोपयति कृकवाकुध्वजे सति । कार्तस्वरमयं मेष मातुरुत्सङ्गसङ्गिनि ॥४५॥ उत्पश्यति चिरं धीरं क्रोघरोधातंचेतसि । भर्तुभ्रूभागभङ्गस्य प्रादुर्भावं ककुद्मनि ॥४६॥ रूढमूलमिव श्वेतैरघोलग्न जङ्गमैः। प्रौढपुष्पमिवाग्रस्थस्फुरनक्षत्रमण्डलैः ॥४७॥ चरणेत रणत्सिहकुलाकुलगुहामुखम् । गिरि गौरीपतिः कुञ्ज-गुज सिन्धुं न्यपीड़यत् ॥४८॥ धराधरभराक्रान्ते वाही बहुभिराननैः । दिक्षु दीर्घप्रतिक्रोशो रावणेन कृतो रवः ॥४६॥ ४३. (कैलारा के हिलने से) पार्वती डर के मारे सद्कर से लपट गई इससे उन्हें बड़ा मानन्द माया और कोषयुक्त शिव के रोप की विपरीत प्रवस्या हो गई। टिप्पणी-योगाग्नि दम्पदेहा सा पुनर्जाता हिमालये । शंखेन्द कुन्द धवला ततो गोरी तु सा स्मृता ।। तुलना कीजिये "समुदिपन्यः पृथियो भृतावरे" माघ-१-५० । ४. उनके जटाजूट में लपटा हुमा सर्प भयभीत होकर अपने फणों को समेटता हुमा उनके मस्तक की प्रांस के छिद्र में घुमने लगा। ४५. भयभीत मयूरप्यज कातिकेय जो अपनी माता के गोद में बैठे हुए ये अपने सुवर्ण के बने. हुए मेढ़े को छिपाने लगे। ४६. जय (शिव का) वृषभ, जिसका चित्त रोप के रोक सेने से झुग्ध हो गया था, अपने स्वामी की भृकुटी तन जाने के परिणाम को बहुत देर से प्यानपूर्वक देग रहा पा। ४७-४८. तव गौरीपति ने उस पर्वत को पैर से दवाया, जिसके सन में श्वेत मां, उसके जह घुमे हुए लगते थे, जिसके सर में ऊपर पमपमाता हुमा नक्षत्र-मण्डन मिले हुए फूलों के गमान लगता था और जिगके निकुजो रो पनपन निनाद करती हुई नदिया यह रही पी। ४६. जर पर्वत के भार से रावण के वाहनों में भरयपिक पीड़ा होने लगी तो यह अपने पनेक मुगो से इतनी जोर से गरगा कि दिशा दूर तक प्रविम्मनित हो उठी। केसमान ४ २६ जानकीष्ठरणम् स शिरच्छेदवणचक्ररपूजयत् । नीलकुट्टिमविन्यस्तैमण्डलैरिव कौमुमैः ॥५०॥ आज्ञापयितुमेतस्य 'राक्षसस्य दिशो दश । वक्त्राणि पङ्क्तिसंख्यानि पुनः सृष्टानि शूलिना॥५१॥ तमःस्थानं तमासाद्य बालिशं कुलिशं रणे । अजहादज धाम स्वं वैकुण्ठस्य विकुण्ठितम् ॥५२॥ तमद्याप्यनवद्येन वसुना वासवः स्वयम् । अजय्यं पूजयत्येकवीरं वैरस्य शान्तये ॥५३॥ वलिं वजाय पौलोमी सस्मितं विगतादरा । कुर्वतो कुरुते शक्रं वीणासन्नमिताननम् ॥५४॥ यक्षनाथो दिशस्तस्मै केवलं धनदो धनम् । सर्वस्वहरणप्रीतो रावणस्तु धनेश्वरः ॥५५॥ ५०. तब उसने अपने कटे हुए सरों के गोलाकार घावों से शिव की पूजा की। (उस समय) ऐसा लगता था जैसे नील वर्ण चिकने फर्श पर कुंकुम से बहुत से मण्डल बना दिये गये हों। ५१, तव त्रिशूल पर शिव ने उस राक्षस (रावण) के दस सिर, दसों दिशाओं में हुकुम चलाने के लिये पुनः पैदा कर दिये । ५२. हे अज! (विष्णु) अन्धकार के केन्द्र उस मूखं रावण से युद्ध में भिड़ कर इन्द्र के वज ने अपने तेज को छोड़ दिया। (अर्थात् निस्तेज हो गया)। ५३. मजेय और अद्वितीय वीर उस रावण की शत्रुता को शान्त करने के लिये स्वयं इन्द्र उसे भव भी धन देकर पूजते हैं। टिप्पणी-दलेप--यमुम्पन पानी । ५४. शची जिनके हृदय से (अपने पति के प्रति मादर निकला गया है वे उस वक्ष (भीषण राक्षस) को मुराफरा कर नैवेद्य अर्पण करती है, जिससे इन्द्र का सर लज्जा से मत हो गया है। ५५. यशो के स्वामी (कुवेर) अपना पन (रावण को) दे डालने के कारण केवल पगद (धन के देने वाले) रह गये हैं। परन्तु रावण उनके धन के अपहरण करने की प्रसन्नता से धनेश्वर (धन का स्वागी) हो गया है । टिप्परपो-दोप-पनर-कुर का नाम= धन का देने कासा ।

द्वितीयः सर्गः धम्यं कर्म परित्यज्य प्रीणाति पिशित प्रियम् । प्रेतराजोऽप्यभिप्रेतभक्ष्यदानेन दानवम् ॥५६॥ दूरतः सेवते भानुरादित्यमणितोरणात् । च्युते तन्मन्दिरद्वारदाहभीतो हुताशने ॥५७॥ निवृत्ततत्सरःपद्मस्वापकारणतेजसा। बोधनीयं किलाशेषमिन्दुना कौमुदं वनम् ॥५८॥ यथा न कज्जलस्पर्शचित्रवैवर्ण्यसंभवः । तथा ज्वलितुमादिष्टो दीपकृत्यो वृषाकपिः ॥५६॥ लब्धसेवावकाशः सन् सेवते तं समीरणः । रतिक्लमयुमद्दे हैं तरङ्गान्तरगोचरः ॥६॥ पातालहृदयान्तःस्थ पद्मरागं पयोनिधिः । अग्नमांसमिवोद्धृत्य ददाति पिशिताशिने ॥६१।। काले कालाभ्रगर्भऽपि निर्मदा नर्मदादयः । नन्दयन्ति सदा नद्यो वचैर्वज्रायुधद्विषम् ॥६२॥ ५६. प्रेतों के राजा यम भी अपना कामघाम छोड़कर, मांस के बने स्वादु व्यंजन, उस मामिपप्रिय दानव को देकर उसे प्रसन्न करने में लगे रहते हैं। ५७. इस डर से कि कहीं (उनकी पांच से) उसके (रावण के) महल के दर्वाने जल न जाय सूर्य देव उसके मादित्य मणि से जड़े हुए तोरण से बहुत दूर होकर उराकी मेवा करते हैं । ५८. चन्द्रमा ने अपनी प्रभा से उसके सरोवर के कमलों को नहीं सुलाया (रावण के डर से उन्हें खिले रहने दिया) । (भव तो) उसका काम केवल वन के कुमुदों को फुलाना ही रह गया। ५६. अग्निदेव को जिनसे दीपक का काम लिया जाता था, यह प्रादेश मिला कि उनमे पुपां का जल (धुमां) न निकले जिससे वहाँ के चित्रों के वदरग हो जाने की मम्मावना हो । ६०. तरङ्गों के भीतर रहने वाला वायु, उसको (रावण की) सेवा करने का मौका पाकर रति से पलान्त उसके शरीर की परिचर्या करता है। ६१. पाताल के पन्तस्तल में रखी हुई मरिणयों को निकालकर समुद्र, उस मांसमक्षी राक्षस को इस प्रकार देता है जैसे वह अपने हृदय का मांस दे रहा हो। ६२. शाले-काले यादलों से व्याप्त वर्षा ऋतु मे भी नर्मदा मादि पान्न नदियां उस वयपाणि (इन्द्र) के पात्रु (रावरण) को मणि (वय) देकर सदा प्रसन्न करती रहती है। टिप्पणी -सेप-पय-रकाशास्त्र-मणि।

२८ जानकीहरणम् प्रियाजनपरिष्वङ्गप्रीति कर्तुं निरन्तराम् । निशि ज्ञातमनोवृत्तिस्तमुपैति हिमागमः ॥६३॥ तस्योद्यानवनं विश्वं दिवः प्रवसता सता । सर्वतुषु निजैः पुष्पैर्भूयते मधुनाऽधुना ॥६॥ दुराराध्यस्वभावस्य समालम्ब्य सिषेविषाम् । जलक्रीडादिनं तस्य ग्रीष्मश्चिरमुदीक्षते ॥६५॥ त्रासकण्ठग्रहव्यग्नांस्तस्मिन्निच्छति मानिनः । धीरं गर्जन्ति लङ्कायामकाले वारिदा अपि ॥६६॥ अभ्रान्ता वीजयत्यष्टहस्तपर्याय संपदा । इति चण्डीमभिप्रेप्सुः कतुं चामरधारिणीम् ॥६॥ स्तब्धकर्णो नमत्येनं श्रवणाक्षेपमारुतैः । भूभक्तिकुसुमक्षेपदोषभीतो गणाधिपः॥६८॥ स्मरश्च संसदं तस्य विशति सस्तवाससा । प्रतीहार्या स्मिताकूतविभ्रमैः कठिनागमः ॥६६॥ ६३. जाड़े की ऋतु ने जैसे उसके (रावण के) मन की बात जान ली हो, वह रात्रि में उपस्थित हो जाती है ताकि वह (रावण) अपने प्रेमियों के मालिङ्गन का भानन्द निरन्तर उठाता रहे। ६४. यद्यपि वसन्त ऋतु स्वर्ग में रहता है फिर भी अब वह उसके पन के सब उद्यानों को हर ऋतु में पुष्पों से विभूषित रखता है। ६५. प्रीष्म ऋतु उस रावण की, जिसका स्वभाव ऐसा है कि वह बड़ी कठिनता से प्रसन्न किया जा सके, सेवा करने की इच्छा से उसके जलकीड़ा की बाट बहुत पहिले से जोहता रहता है। ६६. जब यह (रावण) इच्छा करता है अभिमानी गदनी सगने के भय से पर्रा जाय तब बादल भी डर के मारे कुसमय ही धीरे-धीरे गड़गड़ाने लगता है। ६७. यह समझ कर कि चंडी अपने पाठों हापो के सबालन की कुशलता से निरन्तर पंसा हांकती रहेगी, यह (रावण) उसे पंखा झलने वाली बनाने की इच्छा करता है। ६८. गणो के स्वामी (गणेश) इस डर से कि कहीं उनके कान हिलाने से निकली हुई हवा से पृथ्वी पर सजाये पुष्प तितर-वितर न हो जाये, (वे) अपने कानों को निश्चल फर उमे प्रणाम करते हैं। ६६. जब प्रतिहारी कामदेव के प्रागमन यी मुचना, मुमफराते हुए इटला कर देनी है, तय यह (कामदेव) अपने वस्त्रों को उतार कर उसके (रावण के) महल में प्रवेश करता है।

द्वितीयः सर्गः शुद्धान्तमन्तःशुद्धः सन् स्त्रीजनस्य तदाज्ञया । लोलोपदेश दानैकव्यग्रो विशति मन्मथः ॥७०॥ त्वयि रक्षाकृति स्वर्गसद्मनामपि दैवते । कथं नक्तंचरेणैवं दिवस्त्रासो वितन्यते ॥७१॥ भ्रातरि द्विषतो वाहुभग्नौजसि विडोजसि । भोगिभोगे चिरं तावत्केयं देवस्य शायिका ॥७२॥ आत्मस्वनुगुणं दैवं दृष्ट्या मन्यामहे तव । न हि त्वं दैवहीनस्य जनस्य तु सुदर्शनः ॥७३॥ इत्यं वाचस्पतौ वाचं व्याहृत्य विरते क्षणम् । स्वर्गे च स्वप्रतिजल्पस्पृहानिःस्पन्दवर्तिनि ॥७॥ कुक्षिस्थनिःशेषलोकत्रयभारोतहोऽप्यहम् । विधाय मानुषीकुक्षिवासं शोकक्षयाय वः ॥७॥ भूत्वा राम इति ख्यातःकुर्या भर्तुः सुरद्विषाम् । एकवाणकृताशेपशिरच्छेदपराभवम् ॥७६॥ ७०. तव अपने अंतःकरण को शुद्ध कर, स्त्रियों को काम लीला के उपदेग देने के लिये उत्सुक (वह) कामदेव उसकी माशा से प्रतःपुर में जाता है। ७१. हे भगवन् ! जव माप स्वर्ग में रहने वालों के रक्षक हैं तब कैसे इस निशाचर ने स्वर्ग में इतना मातद फैला रसा है ! ७२. भाप तो इन्द्र के भाई हैं । जय इन्द्र ने अपने बाहुबल से शत्रुपों की शक्ति को मप्ट कर दिया तव माप क्यों ऐसी परिस्थिति में देर से शेपशैय्या पर मलसाये हुए सेटे हैं ! ७३. भापमा दर्शन हो जाने से हम समझते हैं कि देव हम सोगों के पनुयूस है। क्योंकि भाग्यहीन पुरुष को मापका दान सरलता से नहीं होता। ७४. रा प्रभार स्वर्ग में बृहस्पति अपना पथन समाप्त पर प्रत्युत्तर पाने की सालमा गे क्षणभर विना हिसे-टुले सुप हो गये। ७५-७६. यपि मैं अपने उदर में तीनों लोगों का सम्पूर्ण भार यहन पर रहा। (फिर भी) में मरयसोर में एक स्त्री के गर्भ मे जन्म मेकर और राम के नाम में विम्यात होपर उस, देवतापों के पत्र रागों के स्वामी (रायण) के गिरों को एक ही माण मे काट पर उगे पराजित कर दंगा।

जानकीहरणम् इत्युदारमुदाहृत्य वचो वाचामगोचरः। तत्याज वेदविद्वेद्यो वर्षातल्पं वृषानुजः ॥७७॥ चिरशयनगुरुं स्वभोगभारं भुजगपतिः शनवितत्य खेदात् । शिथिलितफणपङ्क्तिमुक्तदीर्घश्वसितविधूतमहार्णवोऽवतस्थे ॥७८॥ भूमिस्पर्शभपादुपेत्य तरसा लक्ष्म्या करेणोद्धृतं व्यालम्बैकपटान्तमङ्गशिखरे क्षिप्त्वोत्तरीयं ततः । निद्रामन्थरताम्रलोचनयुगो लीलालसन्न्यासया गत्या निर्जितवारणेन्द्रगमनः कापि प्रतस्थे हरिः ॥७९॥ इति द्वितीयः सर्गः । ७७. ऐसे उदार वचन कहकर इन्द्र के छोटे भाई (विष्णु) ने जो वेद को जानने वाले हैं, जो वर्णनातीत हैं और जो जानने के योग्य हैं, अपनी जल शैय्या को छोड़ दिया। ..७८. तव सपंराज ने अपने विस्तृत शरीर को, जो विष्णु के देर तक सोने के कारण गरमाय गया था, थकान के कारण धीरे-धीरे फैलाया और अपने शिथिलित फणों की पंक्ति के दीर्घनिश्वास से उस महासागर को क्षुब्ध करता हुमा वही पड़ा रहा । ७६. अपने उत्तरीय को जिसका एक छोर लटक रहा था और जमीन पर लपर जाने के डर से लक्ष्मी ने दौड़कर अपने हाथों से उठा लिया था, अपने कंधों पर डाल कर, विष्णु, जिन्होंने अपनी चाल से गजराज को हरा दिया था और जिनकी दोनों पाखें सोने के कारण लाल और अलसाई हुई यों, उठकर मस्त चाल से कहीं चले गये। 'द्वितीय सर्ग समाप्त तृतीयः सर्ग: अथ श्रियः प्राणसमस्य तस्य ज्ञात्वा विविक्षामिव मत्यंघाम । पूर्वावतीर्णः सुमनःसमृद्धया सम्यग्वसन्तो भुवनं ततान ॥१॥ भ्रान्त्वा विवस्वानथ दक्षिणाशामालम्ब्य सर्वत्र करप्रसारी। ऋत्विक ततो निःस्व इव प्रतस्थे वसूपलब्धो धनदस्य वासः ॥२॥ वृक्षा मनोज्ञद्युति चम्पकाख्या रूपं वितेनुर्नवकुड्मलाढ्याः । न्यस्ता वसन्तस्य वनस्थलीभिः सहस्रदीपा इव दीपवृक्षाः ॥३॥ सम्पिण्डितात्मावयवा उदीयुः पद्मा नवाः कण्टकितोवंदण्डाः । अन्तर्जलावासविरुढशीतत्रस्ता वसन्तातपकाम्ययेव ॥४॥ कर्णे कृतो दीर्घविलोचनानामालोलदृष्टिद्युतिभिन्नरागः । बालोऽप्यशोकप्रभवः प्रवालः कान्ति प्रपेदे परिणामगम्याम् ॥५॥ १. जैसे वसन्त यह जान गया हो कि लक्ष्मी को प्राण से अधिक प्रिय, भगवान् की इच्छा मनुष्य के चोले में प्रवेश करने की इच्छा है, तब उसने पहिले ही से पाकर पृथ्वी को पुप्पों के सौंदर्य से भर दिया। २. भव सूर्य अपनी किरणों को सब मोर बिखेर कर दक्षिण दिशा में गया और वहाँ एक दरिद्र पुरोहित (ऋत्विक) की भांति कुवेर के घर (उत्तर में) रश्मि लेने के हेतु पहुंचा। टिप्पणी-इलेपः-(१) दक्षिणाशा दक्षिण दिशा दक्षिणा मिलने की आशा। (२) कर. प्रसारी किरणों को विखेरने वाला हाय फैलाने वाला । (३) यसपलब्ध- रश्मि लेने के लिये-धन पाने के लिये। ३. नई कलियों से लदे हुए मनोहर चम्पक वृक्ष ऐसे लगते थे जैसे वसन्त की यनस्थली ने हजारो वत्तियो के दीपक वृदा लगा दिये हों। ४. कंटक से भरी हुई, सड़ी नाल के ऊपर अपनी पंसाड़ियों को समेटे हुए नय कमल ऐगा उठ सड़ा हुमा जैसे जल के भीतर रहने के कारण गीत से भयभीत होकर वमन्ना की गरमाहट पाने की इच्छा से बाहर निपल माया हो। ५. बड़ी-बड़ी प्रांतों वाली स्त्रियों के कान में सोंगी हुई अशोक की पत्तियां यपि ना पी, उनमें उन स्त्रियो की घअन मांगों की प्रभा से पोड़ी पत्तियों का सा रंग मा गया।

३२ जानकीहरणम् प्रादुर्वभूवुर्नवकुड्मलानि स्फुरन्ति कान्त्या करवीरजानि । प्रवासिनां शोणितपाटलानि तीरीफलानीव मनोभवस्य ॥६॥ वन्ध्योऽपि सालक्तकपादधातं लब्ध्वा रणन्लूपुरमङ्गनानाम् । उद्भूतरोमांश्च इवातिहर्षात् पुष्पाङ कुरैरास नवैरशोकः ॥७॥ महीध्रमूर्बिभ्रमरेन्द्रनीलैविभक्तशोभः शिखिकण्ठनीलैः। गृहीतभास्वन्मुकुटानुकारस्ततान कान्तिं नवर्णिकारः ॥८॥ वासन्तिकस्यांशुचयेन भानोहेमन्तमालोक्य हतप्रभातम् । सरोरुहामुद्धृतकण्टकेन प्रीत्येव रम्यं जहसे वनेन ॥६॥ समीरणानतितमञ्जरीके चूते निसर्गेण निषक्तभावाः । पुष्पावतंसेपु पदं न चक्रुर्दीप्तेष्विवाशोकवनेषु भृङ्गाः ॥१०॥ विनिद्रपुष्पाभरणः पलाशः समुल्लसत्कुन्दलतावनद्धः। उद्भूतभस्मा मधुनेव रेजे राशीकृतो मन्मथदावह्निः ॥११॥ : ६. करवीर की नई-नई रक्त वणं कलियां ऐसी फूट निकली जैसे वे पथिकों के मन में स्थित मनोभव (कामदेव) के तीखे बाण निकल रहे हों। ७. अशोक वृक्ष यद्यपि वोझ या फिर भी मारे प्रसन्नता के उसके तने से नये नये अकुंर फूट निकले जैसे उसे रोमाञ्च हो माया हो, जब उन्हें सुन्दरी युवतियों ने महावर रो रञ्जित पोर नूपुरों से झडकृत पैरों से मारा। पर्वत के शिसर पर एक नया करिकार का वृक्ष प्रपना सौंदर्य बिखेर रहा था। उसकी प्रभा इन्द्रनीलमणि के समान भौरों से विभक्त हो गई थी और उस पर नीले कण्ठ वाले मयूर, चमचमाते मुकुट का मनुकरण कर रहे थे। ६. कमलों के वन ने जब यह देखा कि उसके दात्रु, हेमन्त के प्रभाव को वसन्त के गूर्य की रश्मियों ने नष्ट कर दिया तो वह प्रेम से दिल सोल कर हंसने लगा औरो उसका कोटा निकल गया हो। १० भयरे जो स्वभाव से मान के वृक्षों पर जिनकी मजरी हया से नाच रही थी, मंडरा रहे थे, उन्होंने मशोक के वन में पैर नहीं रमा जहाँ उनके (अगोफ यो) सर पर फूल ऐगे राने थे से उसमें भाग लगी हो। ११ तिन हुए पुषों से पिपिा पलाश का वृक्ष निगमें पुणोंगे महलहाती पुद गया सापटी हुई पी, ऐगा पमपमा उठा बोयरान्त ने मामदेय पो जलाने पाली पनि दररो भम्म वो उपेढ़ते हा पुरेद दिया हो ।

तृतीयः सर्गः ३३ वसन्तदीप्तातप खेदितानां महीरुहां वातचलाः प्रवालाः । जिह्वा यथा विद्रुमभङ्गताम्रा निष्कासिता रेजुरतिश्रमेण ॥१२॥ प्रालेयकालप्रियविप्रयोग-ग्लानेव रात्रिः क्षयमाससाद । जगाम मन्दं दिवसो वसन्तरातपत्रान्त इव क्रमेण ॥१३॥ ततः स्मरस्याहवधामकल्पं क्षोणीपतिभ्रान्तशिलीमुखाङ्कम् । उद्यानमासेवत रक्तदीप्ति संतानभास्वत्करवीरकीर्णम् ॥१४॥ रम्याणि रामानुगतो विहङ्गपक्षानिलानतितपल्लवानि । उद्भ्रान्तमृङ्गाणि लतागृहाणि सम्भावयामास रहोविहारैः ॥१५॥ त्वमप्रमादं कुरु नूपुराञौ भर क्षणं काश्चि नितम्बभारम् । इतीव तस्मिन्विहरन्नपस्त्रीकक्ष्यातुलाकोटिपुटैनिनेदे ॥१६॥ १२. वसन्त की झुलसाती हुई गरमी से खिन्न, और हवा सञ्चालित वृक्षों के नव प्ररोह ऐसे शोभायमान हुए जैसे बड़े श्रम से उन्होंने अपनी, टूटे हुए मूंगे के समान ताम्रवर्ण जिह्वा बाहर निकाल दी हो। १३. अपने प्रियतम हेमन्त से विछोह हो जाने से रानि जैसे म्लान हो जाने के कारण क्षय होने लगी और दिन भी वसन्त की कड़ी धूप से जैसे थक कर क्रमशः मन्द गति से चलने लगा। १४. तब पृथ्वी के स्वामी (दशरय) उस उद्यान में चले गये जिसमें भ्रमण करते हए भोरे झुंड के झुंड विचर रहे थे, जहां फूले हुए रक्त वर्ण करवीर के वृक्ष कतार को कतार लगे थे और जो (उद्यान) कामदेव की समर भूमि की तरह लग रहा था। टिप्पपी 1-इलेपः माहव धाम के सम्बन्ध में (१) भ्रान्त=भ्रमण करते हुए चलते हुए। (२) शिलीमुखाः --भ्रमर=याण (३) भास्वत् करवीर = फूले हुए करवीर- वृक्षचमकते हुए हायों के धीर । (४) रखतदीप्ति ताम्रवर्ण इपिर से चमकते १५. स्त्रियों के साथ वे (दसरय) उन सताकुञ्जों में एकान्त विहार करने लगे जहाँ भोरे उड़ रहे थे और जहाँ पक्षियों के पंसो के फड़फड़ाने से निकली हुई वा से पेड़ों की मन्ही डालियो नाच रही थीं। १६. उग सतागृह मे विहार करती हुई स्त्रियों के नपुर पौर करपनी यह कह कर एफ. दूसरे गा मजाक उड़ा रहे ये--'हे नपुर, तुम पैरों में खनिय भी प्रमाद न बरना (भर्पात् मच्छी तरह वजना) । पार्य मेसने ! नुम उरा नितम्बों के बोझरो पण भरको लिये उठाये रहना ।

३४ जानकीहरणम् चिक्षेप वाला मुहुरधरष्टि पत्यावनङ्गक्षतधैर्यवृत्तिः । दूरस्थपुष्पस्तवकावभङ्गव्याजेन संदर्शितवाहुमूला ॥१७॥ पत्या परस्या नु विधीयमाने विनासवत्याश्चरणान्तरागे । अन्यत्र युक्तोऽपि बबन्ध रागं लाक्षारसस्तत्प्रतिपक्षनेने ॥१८॥ पातुं सुदत्या वदनारविन्दमादाय दृष्टो ललनाभिरीशः । अपुष्परेणु व्यथितेऽपि तस्याश्चिक्षेप नेने मुखगन्धवाहम् ॥१६॥ पुष्पावभङ्गे निजहस्तकान्त्या विन्यस्तरागं कठिनं पलाशम् । प्रवालकृत्ये विनियोजयन्ती भर्ना परा सस्मितमालिलिङ्गे ॥२०॥ १७. किसी बाला ने जिसका मन कामदेव ने पञ्चल कर दिया था, बहुत ऊँचे पर फूले हुए पुप्पो के गुच्छे को तोड़ने के बहाने अपने कंधे को उपार दिया और अपने पति की मोर बार-बार तिरछी चितवन से देखने लगी। पथा-कयाचिदायिकृत बाहु मूलया सरप्रसूना ग्यपदिश्य सादरम् । -किरातार्जुनीयम्-८-१८ (भारपिः) जय देय कहते है- मा पोशामयेद् माला तदणी पिशका मता। पन्चपञ्चायका प्रोटा भये या सतः परम् ।। १८. जब एक हावभाव पारने वाली स्त्री के पति ( सरप) उसके पैरों में महापर लगा रहे पे सो उस महावर ने अपनी ससाई को उसकी मौत के माखों में उतार दिया। भावा-बार के इस हस्य से उस स्त्री को सोत की भा हाल होगी। १६. राजा ने एक सुन्दर दातों यानी स्त्री का मुरापान करने के लिए उसके गुस्सारमिन्द को उठाया यो, पर फिमन्य समनाएं देस रही थी अतः वह अपने मुरा की सुरक्षित सांग उगी पातों में गो ममी तर पुषों के पराग सान्त गहीवी, केवम पककर ए गये। विशेष-मानसरोहण की पर हस्तलिखित प्रति के हाशिये पर सिता है- र पुन पानमुम्पते देखिये-"पपो मिसामरित स्पोषिताम्मानिए गोषणाम्याम् ।"-रपुर्व २-१९। () २०. राती नर अनि माता गगराणा नारे पर तो दीपीको मरीरि दिनों की मसाई पगार में पागप गो (A) मुगाकर रा निरा!

तृतीयः सर्गः ३५ स्निग्धद्विजालीरुचिरं प्रियशश्यामद्युतिश्चारुतमालकान्ता । विपि गन्धाहृतमृङ्गचक्रं सन्माधवीमण्डपमेतदास्यम् ॥२१॥ मध्येललाटं तिलकस्य वृत्तिरोठद्युति ति च पाटलेयम् । पुन्नागसंयोगविभूषितायाश्चेतश्च ते यातमशोकभावम् ॥२२॥ कि कौतुकेन श्रमकारिणा ते सृज त्वमुद्यानविहाररागम् । बाले त्वमस्योपवनस्य लक्ष्मीरित्येवमूचे ललना सखीभिः ॥२३॥ प्रियण कणे विनिवेशितस्य तन्व्या नवाशोकदलस्य रागः । आनीलया नेत्ररुचा निरस्तस्तस्या जगामेव विपक्षचक्षुः ॥२४॥ २१. तुम्हारे अतीव रुचिर केश मन्तभाग, प्रियंगुलता के समान श्यामल तुम्हारा लावण्य, सुन्दर दन्तपंक्ति-युक्त तुम्हारा मुखड़ा जिसका सुरभि-निश्वसन कामीजनों को अपनी और प्राकृष्ट करता है-~-इन सब के कारण तुम माधवी लता के एक ललित निकुञ्ज के समान लगती हो। टिप्पणी-भाषयी लता मण्डप के संदर्भ में-(१) चारतमालकान्ता=तमाल में लपटने के कारण सुग्दर । (२) स्निग्पद्विजालोपचिरं पक्षियों के समूह के कारण मनोहर (३) प्रियंगुश्यामद्युति=प्रियंगु लता के संसर्ग से श्याम कान्ति (४) गन्धाहृत गचक्र जिसकी सुगंध भूगों के समूह को आकृष्ट करती है ।। २२. तुम्हारे माथे के बीचोबीच तिलक का चिह्न है । तुम्हारे अघरो पर ललाई सोह रही है और तुम्हारा हृदय पुरुप श्रेष्ठ (दशरथ) के संयोग से विभूपित होने के कारण शोक- रहित हो गया है। २३. "हे बाले ! खेल कूद में परिश्रम करने से तुम्हें क्या लाभ ? उद्यान में विहार करने की अभिलापा छोड़ दो । तुम तो स्वयं उपवन को लक्ष्मी हो ।" ऐसा उसकी सुन्दरी ससियों ने उससे कहा। टिप्पणी -इस पाला के सौंदर्य वर्णन में कवि ने श्लोक २१-२२ में 'प्रियंगुलता', 'माधवी', 'मण्डप', 'पाटल', 'पुमाग' एवं अशोक का प्रयोग किया है । यह कह कर २३ श्लोक में उस याला को 'उपवनस्य लक्ष्मी' कहते हैं। २४. भगोन की एक योमल पत्ती जिसे उसके प्रियतम ने उस कोमलाङ्गी के कान में सोस दिया था उसका रंग उसके मानील नेत्रो रो तिरस्कृत होकर उसकी सौत की मांसों में चला गया। टिप्पणी-यही भाव इस सर्ग के १८ य दलोक का भी है ।

जानकीहरणम् हारिप्रलापोऽय निधिर्गुणानां निधाय चक्षुर्मदमन्दपातम् । पर्यन्तभूमी निकटोपयातामुवाच वाचं प्रतिहाररक्षीम् ॥२५॥ कुर्वन्ति लोभेन विलोकयन्त्यः कुरङ्गनेत्रा विलसत्प्रसूनम् । शुभाभिरेनं नयनप्रभाभिः शारत्विषं पुष्पतरं तरुण्यः ।।२६।। विभाति भृङ्गीसरणी सरन्ती गन्धाहृता चम्पककुड्मलाग्ने । अन्तं प्रदीपस्य निपेवमाणा धूमावली कज्जलरेखिणीव ॥२७॥ विलोकयाक्षणोः शितिकान्तिजालैरुदन्यया वारिविगाहितायाः । रक्तोत्पलं तनिकटप्ररूढमिन्दीवरत्वं गमितं हरिण्याः ॥२८॥ सञ्छादिते पद्मरजोवितानैः परिभ्रमन् वारिणि राजहंसः । स्ववत्मरेखाभिरसौ विभज्य प्रयच्छतीवाब्जवनं खगेभ्यः ॥२६॥ इयत्प्रमाणोऽपि सरंःप्रदेशस्तव प्रसादेन ममास्तु भोग्यः । इत्येष सन्दर्शयतीव मदगुहँसाय शोपाय विसारितांसः ॥३०॥ २५. तब मनोहारी वचन बोलने वाले, गुणों के भाण्डार (दशरथ) प्रसन्नता से प्रास पास की भूमि पर मधुर दृष्टिपात करते हुये, उस स्थान की देख रेस करने वाली परिचारिका से, जो उनके निकट चली पा रही थी, वोले । (उससे भी सौजन्यवश दो-दो चाते की, यह भाव है।) २६. हरिणी की सी आँखों वाली युवतियों ने इस फूल से लदे हुए वृक्ष को अपनी सुन्दर माखों की ज्योति से बड़े चाव से देखकर रंग-बिरंगा कर दिया। २७. पम्मा की कलियों की सुगंध से प्राकृप्ट हो कर उसके ऊपर एक अविच्छिन्न पंक्ति में मंडराती हुई भ्रमरों को परम्परा ऐसी शोभायमान हुई जैसे प्रदीप की लौ के ऊपर घूमती हुई मअल रेसा युक्त धुंए की पंक्ति । २० देगो जब पानी पीने की इच्छा से वह हरिणी पानी (झील) में मुसी तो उसकी मासी को नीली प्रभाजाल पड़ने से पास में उगे हुए साल कमल (रक्तोत्सल) नीले फमत (इन्दीवर) से लगने सगे। २६. कमल-पराग के जाल से डरे हुए जल पर तैरता हुपा यह राजहंस प्रपनी मार्ग-रेशा से कमसों के समूह का विभाजन पर जैसे पक्षियों को दे रहा हो। .३०. यह गद्गु (एक जन पक्षी विशेष) अपने पंगों को गुगाने में निये पैला पार जगे हग को दिशाला रहा हो कि 'सरोवर का इतना भाग हमारे उपभोग के लिये, पृपया पोद्दीजिये।

. नृवीयः सर्गः पद्मः सितोऽयं पवनावधूतैनिधीतरागो नु तरङ्गलेशैः । सम्भावितो नु द्रुहिणेन तावत् कृतादिकर्मापि न यावकेन ॥३१॥ ततः सलील सलिलं विभिन्दन्नेवं वदन्नव वराङ्गनाभिः । वृतो वृपेन्द्रोपमखेलगामी स दीपिका दीर्घभुजो जगाहे ॥३२॥ तस्योरसि क्षत्रकुलैककेतोस्तरङ्गदोपा कमलाकरेण । न्यस्ता मुहुः पङ्कजरेणुपङ्क्तिः सौवर्ण सूत्रश्रियमाततान ॥३३॥ पद्माकरो वारि विगाहमानं कामीव रामाजनमूरुदनम् । वीचीकरानेण नितम्बभागे व्यास्फालयामास शनैः सशब्दम् ॥३४|| तस्यावगाहे वनिताजनस्य दूरीकृतः पीननितम्बचकैः । लब्धप्रवेशस्तनुपूदरेषु स्तनैरुदासेऽथ सरस्तरङ्गः ॥३॥ क्रीडापरिक्षोभरयेण तासामुत्सारिते पङ्कजरेणुजाले । कुसुम्भरक्तादिव कनुकात्तत् कृष्टं वभासेऽम्बुरुहाकराम्भः ॥३६॥ ३१. यह कमल क्या इस कारण सफ़ेद हो गया है कि इसके रंग को वायु-सञ्चालित लहरियों के जलकरणों ने घो"डाला है । अथवा वया ब्रह्मा ने इसको अपनी सय से पहिलो कृति होते हुए भी उसका लाक्षा-रस से पादर नहीं किया। ३२. इस प्रकार वातचीत करते हुए, एक श्रेष्ठ बैल के समान खेलते हुए चलने वाले, दीर्घ वाहु, दारथ, वराङ्गनामों से घिरे हुए, खेलते-कूदते, पानी को चीरते हुए उस सरोवर में पैठे। ३३. फमलों के भाण्डार उस सरोवर ने, अपने तरंग रूपी हायों से, क्षत्रिय कुल के एक मात्र केतु, दशरय के वक्षस्थल पर, कमलों के पराग की एक पक्ति बीच दी जो सोने की डोरी के लावण्य का रह रह कर विस्तार कर रही पो। ३४. कमलों से भरा वह सरोवर, जांध तक जस में पुसी हुई युवतियों के नितम्य भाग को, सहरियों को मंगुलियों से, कामी पुरप की तरह शब्द भरता हुया, धीरे-धीरे थपथपा रहा था। ३५. जय गुपतियां जल में घुमी तो उनां गांगल नितम्ब के गरु मे गदेडी हुई एक लहर उन पुतियों पतले उदर मे पहुँच गई पर यहाँ मे भी स्तनों ने उसे बाहर उकेल ३६. फमलों का परागजात उनकी (युवठियों की) श्रीहा से पालोहित होने के कारण यहत दुग्ध हो गया। नप फमतों से भरा हुमा उस सरोवर का जल ऐसा पमरने सगा जैगे यह उनकी (मुवतियों की) मुम्बी कम्युकी मे निमोड कर निकाला गया हो।

२८ जानकीहरणम् रामाभिरुत्कण्टकदण्डमग्ने सम्भावितं न छिदया सरोजम् । इन्दीवराणामुदहारि पतिर्दीप्ता मृदुष्वेव जनस्य शक्तिः ॥३७॥ वालापरिष्वङ्गसुखाय पत्युरन्तर्जलावारितमूर्ति यातुः। . विघ्नाय वैमल्यमपां बभूव व्यर्थःप्रसादो हि जलाशयानाम् ॥३८॥ भृङ्गा निलीनेन सरोजखण्डे योषिद्वितीयेन नराधिपेन । उत्सारिता वकुमिवापरासां कर्णान्तमीयुनिहितावतंसम् ॥३६॥ तृपेण केलीकलहेऽपरस्याश्छिन्नच्युतस्याम्बुजिनीपलाशे । हारस्य वीचीकणिकाः समीपे पूर्वस्थिताः संवरणान्यभूवन् ।।४।। क्रीडाविमर्दे वलयस्य भिन्नभ्रष्टस्य चिक्षेप विकृस्य खण्डम् । स्वच्छे जले बालमृणालभङ्गशङ्काहृतः शङ्खमयस्य हंसः ॥४१॥ ३७. सामने फूले हुए कमल को, जिसके नाल में कांटे थे, उसे तोड़कर उसका मादर नहीं किया। (परन्तु) उन्होंने नील कमल की पंक्ति उसाड़ डाली (क्योकि उनमें कांटा नहीं था)। मनुष्य की क्रूर शक्ति का उपयोग निर्बल ही पर होता है । ३८. एक बाला के आलिङ्गन का सुख उठाने के लिये, जल के भीतर डुबकी लगा कर अपने दारीर को छिपाये हुए तेरने में निर्मल जल ने पति के सामने विघ्न उपस्थित कर दिया । जलाशय की स्वच्छता भी कभी-कभी व्यर्थ हो जाती है । विशेष-- (~-जल की निर्मलता के कारण जल के भीतर उनका शरीर दिखलाई पड़ता पा, अतः छिप कर आलिंगन करने जाना म्यपं हो गया। यह भाव है। ३६. एक युवती के साथ छिपे हुए राजा से भगाये हुए भङ्ग एक दूसरी युवती के गहने से विभूषित कान के पास जैसे कुछ कहने चले गये। विशेष—यह कहने के लिये कि राजा एक दूसरी युवती के स्थान अमुक साथ में छिपे हैं। यह भाव है। जल-विहार के समय, लपटा-झपटी में राजा से फिसी युवती का (मोती का) हार टूट फर कमल दल पर विखर गया । उस दल पर पहिले ही से, समीप में पड़े हुए, लहरियों के जलविन्दुषों ने उसे (हार को) अपने में दिया लिया। विशेष-जलपिन्दुओं के साथ जो स्वयं मोती के समान थे, मिलजुल जाने से यह पता नहीं चलता था कि कौन जसविन्दु है और कौन मोती है। यह भाव है। ४१. जल-पीड़ा में परस्पर संपर्ष के कारण एक युवती का संसों से बना कंफण जल में गिर पड़ा । हंस ने उसे स्वच्छ जल में पड़ा हुमा छोटे कमल के टुकड़े की का से भींच कर निकाल लिया पौर फिर फेंक दिया। - विशेष-जब यह देख लिया कि यह कमल का टुकड़ा नहीं है तो उसे तुरन्त फेर दिया। यह माव है। . ..

तृतीयः सर्गः रोघोलतामण्डपयातकान्तासम्भोगतः सर्पति काश्चिनादे । ररक्ष राजानमय व्यलीकादुवासमुक्तः कलहंसनादः ॥४२॥ निरुद्धहासस्फुरिताघरोष्ठः सद्यः समाविष्कृतरोमहर्पः। जलावमसप्रमदोपगूढेरुद्धासकस्तस्य बभूव गण्डः ॥४३॥ फुल्लं यदीदं कमलं किमेवमत्रैव नीलोत्पलयोविकासः । इत्यात्तशङ्को वदनं सुदत्या हंसः सिपेवे न सरस्तरन्त्याः ॥४४॥ सुगन्धिनिश्वासगुणावकृष्टं मुखे पतन्तं करपल्लवन। दुरिमन्त-सलिलप्रवेशात् तत्याज काचिद् भ्रमरीसमूहम् ।।४५।। मत्स्येन 'चीनांशुकपृष्ठलक्ष्यकाञ्चीमणिग्रासकुतूहलेन । आघ्राय मुक्तोपनितम्वमेका संत्रासभुसभु चिरं चकम्पे ॥४६॥ तत्याज नो सव्यपदेशमन्या व्युदस्तवासाः सलिलं नृपेण । स्थानप्रयुक्तः कपटप्रयोगः कचिद्विपतहिंजनं भुनक्ति ॥४७॥ ४२. क्रीडा-सर के तट पर गई हुई रमपी के साथ सम्भोग के समय, मेखला की मन- भनाहट से डरे हुए हंस के कलरव ने दशरय को भप्रिय बात के कप्ट से रक्षा की। मर्यात् सम्भोग का भेद न खुल पाया। ४३. हंसी रोकने के कारण फड़कते हुए मोठ मोर सहसा रोमाञ्च हो माने से उनके (एशरय के) चेहरे ने स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने जल के भीतर एक युवती का गाइ मालिङ्गन किया है। ४४. "यदि यह श्वेत कमल है तो इसमें दो नीलोत्पल षयों सिते हैं"-इस प्रकार जव हंस. की शंका का समाधान हो गया तो वह सुन्दर दातों वाली, तैरती हुई युवती के फेर में नहीं पड़ा। ४५. एक लड़की जब अपने सुकोमल हापों से, उसके सुरमिनिश्वसन से भाकृष्ट होकर नमरियों के एक मुड को को उसके मुख पर टूटा पड़ता था, नहीं भगा सको तो उसने गहरे पानी के भीतर पैठ कर उनसे अपना पिंड छोड़ाया। ४६. एक दूसरी स्त्री जिसकी भौहें हर से संकुचित हो गई थी, बहुत देर तक कांपती रही, जब एक मछली, उसकी चीन के रेशमी कपड़े की बनी हुई कुरती के भीतर से दिसताई पड़ने वाले गहने को साने के लिये भाई मोर उसके नितम्बों के पास मूप- सांप कर चली गई। ४७. जब राजा ने एक स्त्री को नान कर दिया तब वह बहाने से जन के बाहर नहीं निकली। ठीक समय पर किया गया बहाना, माई हुई विपत्ति से मनुष्य की रक्षा करता है। - ४० जानकीहरणम हृतान्तरीया हृदयेश्वरेण बोडोपतप्ता पयसः प्रसादात् । व्यर्थप्रणामाश्रुनिपातवृत्तिः काचिज्जलं सम्भ्रमयाञ्चकार ॥४८॥ सामि प्रवुद्धस्य कुशेशयस्य कोशे मुखन्यासविरुद्धदृष्टिम् । स्प्रष्टुप्रयेते कलहंसशावं निःशब्दमुत्खण्डित वीचिकाचित् ॥४६॥ सक्षोभितोदामसरस्तरङ्गक्षिप्ता किलैका नृपति कुचाभ्याम् । आहत्य धृष्टत्वकृतापवादव्यपायरम्यं मुहुराललम्वे ॥५०॥ अन्या पुराणं निजमेव वीचिविक्षालिताङ्गेथिपतेः पृधिव्याः । पदं नखस्य स्फुटकुडकुमाकं दृष्टा परं संशयमाललम्वे ॥५१॥ कि राजहंसस्य शशाङ्कविम्बच्छायामुपश्चञ्चुरियं प्रवालैः । बद्धा नु गन्धोज्ज्वलकेशराग्रच्छेदेषु दिग्धा नु सरोजकान्त्या ॥५२॥ मृङ्गोऽयमिन्दीवरमध्यपातसञ्चारितैस्तदद्युतिरञ्जितो नु । निधाय वायं निजपक्षशोभामादत्त नु स्वादुमतः परागम् ॥५३॥ ४८. एक दूसरी वाला जिसे उससे हृदयेश्वर ने नग्न कर दिया था, वह जल के पारदर्शक होने के कारण लक्षा से घबरा कर इधर-उधर जल में चक्कर काटने लगी, जब रोने पर भी उन्होंने उसके अनुनय विनय को नहीं माना। ४६. एक हंस के बच्चे को जो एक अधखिले कमल में चोंच हुवो देने के कारण बाहर नहीं देख सकता था, एक रमणी ने चुपके-चुपके लहरियों को चीरते हुए पकड़ना चाहा। ५०. क्षुब्ध होने कारण एक दीर्घ तरंग से आगे केली जाकर, एक स्त्री ने अवश्य ही राजा को अपने स्तनों से धक्का दे दिया । उसका यह व्यापार इस कारण और सुखद हो गया ययोकि ऐसी परिस्थिति में उस पर पृष्टता का दोप नहीं लगाया जा सकता था। ५१. पृथ्योपति (दारय) के शरीर पर, जो लहरों से घुलकर स्वच्छ हो गया था, अपने ही किये हुए पुराने नसक्षतों को जिनमें कुंकुम लक्षित था, देख कर एक स्त्री को बड़ी शंस हुई। ५२. पन्द्रबिम्ब की पोरी करने वाले (पर्यात् पन्द्रविम्य के समान उपल ) इरा राजहंग पी चोच पया प्रयाल रो यधी हुई है ? अपवा गुगंधित फेसर वृदा के प्रमाग के पे टुगले कगस यो कान्ति रो सपेटे हुए हैं ? ५३. गया यह भृमा नीमकमतों पर मंडराते हुए बैटकर उनी फान्ति मे रंग गया है ? पपराराने उन्हें अपने पगें की गोमा देफर उगके बदले में उनसे स्वादिष्ट पराग से निपा है?

यः सर्गः पद्मा पदं पद्मवने विभिन्नवीकणाद्रुतयावकाङ्कम् । चक्रे चिरं चारुतया नु लोभादित्यास कासामपि तत्र तर्कः ॥५४॥ यातो नु भृङ्गः पतितः पुरास्मिन् वीजत्वमेवं नु विरिञ्चिसृष्टिः । विपाकनीलद्युति पद्मवीजं कोशादुदस्येति कयाचिदूचे ॥५५॥ प्रियोऽपरस्या गलितान्तरीये व्यापारयामास दृशौ नितम्बे । तद्धस्तवन्त्रच्युतवारिधारा नालं बभूवास्य मुखारविन्दे ।।५६।। सायं समादाय निकामपीतसुप्तद्विरेफ मुकुलं सरोजम्। काचित्करास्फालित दीर्घदण्डा भतुर्भुवः कूजयति स्म कणे ॥५७।। सा पद्मिनी पद्मविलोचनेभ्यो याते पतङ्गे विससर्ज मृङ्गान् । समुच्छसत्कौमुदगन्धलुब्धान् स्थूलानिवोढाञ्जनवाप्पबिन्दून ॥५८।। नूनं पती स्थावरजङ्गमानां पर्यायविश्रामपरार्थतन्यौ । एकन मज्जत्यधिवारि सिन्धोरन्यो जहौ तत्कमलाकराम्भः ॥५६॥ ५४. "क्या कमल वन के सौंदर्य से प्रलुब्ध होकर लक्ष्मी उसमे अपना चरण बहुत देर तक रखे थी? जिस कारण उनके महावर का रंग लहरियो की फुहार से पुल कर उनमे (कगलों मे) मा गया ?" इस सम्बन्ध में ऐसा तक कुछ स्त्रियों का था। ५५. किसी (भोली-भाली) स्त्री ने गहरे नीले रंग के कमलगट्टे (बीज) को भीतर से निकाल कर कहा "क्या यह कोई शृङ्ग है जो पहिले किसी समय इसमें गिर गया पा पौर बीज हो गया? अथवा ब्रह्मा की सृष्टि इसी रूप में हुई थी।" ५६. प्रिय राजा ने अपनी आंसों को एक दूसरी रमणी के नितम्व की मोर फेरा जिस पर से वस्त्र सरक गया था। उस स्त्री के यंत्रवत हाथ से फेंकी हुई धारा राजा के कमल सहा मुख मे कमल नाल के समान हो गई। ५७. एक स्त्री, सन्ध्या के समय, एक लम्बे नाल-दण्ड में लगे हुए कमल को तोड़ कर जिसपी वली के भीतर, मृङ्ग उसके रस को मनमाना पीकर सो रहे थे, उसे हाप में लेकर पृथ्वी के स्वामी (दारय) के कान में कुछ कहने लगी। ५८ गर्ग के चले जाने पर (मर्थात् गूर्यास्त होने पर) सरगी के कमल रूपो नेत्रों से, पिलते हुए कुमुद ये मुगन्ध से प्रनुन्ध होकर भोरे ऐसे निकलने लगे औगे गयोगा के नेत्रों से याज्जल मिश्रित प्रविन्दु निकल रहे हों। ५६. स्थापर और सङ्गम गृष्टि मात्र के स्वाभियों ने एक दूसरे को विधाम देने के लिये पवश्य ही एक पविन्धिान पात्रम बना रगा है । (देगो) जब गूर्य, गमुद्र में पता है (पर्थात् जब मूरिन होता है) तर उगके स्थान पर चन्द्रमा समतों से भरे सरोवर पोपोहता है । (पर्धा पन्नोदय होता है।)

४२ जानकीहरणम. सरोजिनी तत्परिभुक्तमुक्ता मूर्छातुरेव स्तिमिता विरेजे। निद्राहृताम्भोजनिमीलिताक्षी रुग्णं मृणालीवलयं दधाना ॥६०॥ कृतोपकारस्य निधाय जग्मुद्वयं द्वयोरम्बुरहाकरस्य । मृगावलीष्वखनमायताक्ष्यः पोषु दन्तच्छदयावकं च ॥६१॥ सरः सहसं सह कामिनीभिविहाय तुल्यो वृषवाहनस्य । विभूषितो लम्भितभूपजानिरध्यास्त सौधं वसुधाधिनाथः ॥६२॥ आकुष्टदृष्टिगगनस्य लक्ष्म्या लक्ष्मीभुजा वासरसन्धिभाजः । काचित्कुचानम्रतनुर्बभासे वाला सवालव्यजनैकपाणिः ॥६३॥ सकुङ्कुमस्त्रीकुचमण्डलद्युतिः प्रवासिनां चेतसि चिन्तयातुरे । निधाय तापं तपनः पतत्यसौ विलोलवीचावपरान्तसागरे ॥६४॥ इयं तनुर्वासरसन्धिचारिणी जगत्सृजो विद्रुमभंगलोहिनी । समं विधत्ते मुकुलं सरोरुहैहिरण्य बाहोरपि हस्तपङ्कजम् ॥६५॥ ६०. जब राजा ने केलि के अनन्तर सरसी का परित्याग किया तो वह सरसी जिसकी कलाइयों में मृणालतन्तुमों का घुमावदार कड़ा पड़ा था और जिसकी कमल रूपी प्रांखें नींद से भारी हो गई यौं, चुपचाप पड़ी हुई ऐसी शोभायमान हो रही थी जैसे वह मूर्छा में हो। ६१. तब वे बड़ी-बड़ी मांखों वाली रमणियो, वहाँ दो चीजें देकर चली गई । उपकार करने वाले सरोवर के भृङ्ग समूह को अपनी मांखों का मज्जल, और कमलों को अपने होठों पर लगे, लाल रंग । ६२. पृथ्वी के स्वामी (दशरथ) जिनकी पत्नी प्राभरणों से मलयत थीं, और जो स्वयं शिव के समान थे, उस सरोवर को मपनी प्रमदानों सहित अपने महल में रहने लगे। ६३. एक कामिनी से जिसके हाप में पाल का बना पंखा था, जो सन्ध्याकालीन प्राकाश - के सौंदर्य को निहार रही थी पौर जिसका घरीर फुचों के भार से नत था, उससे लक्ष्मीवान, (दशरथ) बोले। ६४. (देसो) यह मूर्य जो स्त्रियों के, केमर से रचित गोल स्तन फे सदा शोभापमान है, परदेसियों के चित में तपन छोड़ कर, तरङ्गों रो मान्दोलित पश्चिमी रामुद्रान्त में एप रहा है। ६५. यह देखो संसार का सजन करने वाला (सूर्य), जिसको सोने की तरह समा. माती हुई रस्मियो, सन्ध्या में फैल रही हैं मोर जो फूटे हग मूंगे के राम लाल है, ऐसागरीरपारी यह पूर्य, कमल (की पंखुड़ियों) की सरह, अपने कमल मे रामान हाप (रूपों की पंगुलियों को) सिकोर रहा है।

तृतीयः सर्गः ४३ अयं प्रमाणं पयसः पयोनिधौ निमज्य संदर्शयतीव भानुमान् । करेण वीचीवलयस्य मस्तके विभाव्यमानस्फुरिनारकोटिना ॥६६॥ विकीर्ण सन्ध्यारुणितं शतक्रतोदिशः प्रदेशादभिनिष्पतत्तमः । पतङ्गतेजः परिताप लोहितं जगत्क्रमेण व्रजतीव निर्वृतिम् ॥६७॥ हिमांशु विम्बे पुरुहूतदिङ्मुखेस्मितश्रियं विभ्रति कोमलद्युतौ । विसृज्यमानं तमसा नभस्तलं जहाति निर्मोकमिवाञ्जनत्विपा ॥६८॥ प्रथैवमस्यावसरे वचःश्रियः समीक्ष्य निष्ठामुपनीतमास्थया । अपाययन्त प्रमदा मदालसाःस्खलगिरास्तं मधुलम्भितादराः ॥६६॥ प्रियोपनीतं पिबतोऽधिवासितं नृपस्य गण्डूपमधु प्रकामतः । बभूव दन्तच्छदपल्लवस्तदा निपीतपानावसरोपदंशकः ॥७०॥ प्रियेण वध्वा मधुलासितोत्पलं विपक्षगोत्रण निगद्य लम्भितम्। अपीतमप्यक्षि विधाय रागवत् ततान सद्यः श्रमवारि गण्डयोः ॥७॥ ६६. (देखो) यह सूर्य, तरङ्गों के कंकण पहिने हुए समुद्र में दूर कर, उसके मस्तक के ऊपर स्पष्टतया छिटकी हुई मपनी किरणों के प्रप्रभाग से यह दिखला रहा है कि जल की इतनी गहराई है। ६७. पश्चिम दिशा जिसका मन्धकार दूर हो गया था भौर जो सन्ध्या की मामा फैल जाने से लाल हो गई थी वह, सूर्य के सेज से सन्तापित जगत को जैसे प्रमशः मोस की मोर से जा रही हो। ६८. जव कोमत कान्ति वाले पन्द्रविम्ब ने पश्चिम दिशा के मुस पर मपना मुसकराता हमा सौंदर्य प्रदान किया तव माकार ने अपने ऊपर से चमरते हुए कज्वस के मावरण को केंचुली की तरह छोड़ दिया। ६०. उनके (राजा के) उत्तम कपन के बाद जब युवतियो ने समझ लिया कि इस समय उनकी (राजा को) मनोवृत्ति बहुत अच्छी है (मर्यात् उनकी तबीयत मो है) सब काम के मद से पसराायी मोर उसके पारण करुक कर बोलने वाली, राजा के प्रति पादर युक्त उन युवतियों ने एक परिचारिता की लाई हा मदिरा को उन्हें पिलाया। ७०. जय रामा प्रपनी प्रिया के मुंह से मुंह में मुंह सगा कर उराशी दी हुई गुवासित मदिरा जी भर पी रहे थे, तब उसके किसलय के समान मोटों ने उस प्रयगर पर राजारे या कर पिये होने पर भी, उशेरस दम्प का सामरिया । ७१. अब प्रियतम (राना) ने एक तरुणी को उसरी सोत का नाम मेकर समतों में मुपारित मदिरा दी तो पापि उपने नहीं पी फिर भी उसकी प्रति तुरल मान होगपौर उरीपनपटी पीने से भर गई। (इर्पा पोर सामान के गा) जानकीहरणम् त्विषा मुखेन्दोर्मुकुलत्वमम्बुजे करेण नीते सति शर्वरीकृतः । प्रियेक्षणप्य प्रतिबिम्बमाचरत् सरोजकृत्यं मधुभाजि भाजने ॥७२॥ यियासुना पङ्कजगर्भसौरभं मुखं तदीयं प्रतिविम्बमूर्तिना। समन्मथेनेव तरिङ्गतासवे मुहुश्चकम्पे चपके हिमांशुना ॥७३॥ विलासवत्यो मदघूर्णलोचना निरूपयन्त्यः शुचिरूप्यभाजने । स्थितस्य मुग्धा मधुनो न जज्ञिरे स्वरूपमिन्दुप्रतिरूपगापितम् ॥७४॥ विधूय मानादपि पूर्वमासवः प्रवृद्धवामत्वमनन्यसाधितम् । स्मर नु तासां हृदये विलोचने ववन्ध रागनु मुखे नुसौरभम् ॥७५॥ इति प्रबन्धाहितपानकातरं प्रियाङ्गतल्पे शयितं निशात्यये । व्यवोधयन्मङ्गलवन्ति वन्दिनो विधाय वाक्यानि विधातृतेजसम् ॥७६॥ जहिहि शयनमुद्गमस्य कालः समुपनमत्यनुरक्तमण्डलस्य । भुवनशिरसि कोर्णपादघान्नो भवत इव क्षततामसस्य भानोः ॥७७॥ ७२. जब मदिरा के प्याले में पड़े हुए कमल ने चन्द्र के समान मुख वाली स्त्रियों की मुख- श्री एवं चन्द्र की रश्मियो के कारण अपनी पंखुड़ियों को बन्द कर लिया तो चषक में उसकी प्रिया की आँखों के प्रतिविम्ब ने कमल का काम कर दिया। ७३. चन्द्रमा का प्रतिविम्ब, हलकी उफनाती हुई मदिरा से भरे चपक में कुछ ऐसा काप उठता था जैसे वह काम-विह्वल होकर उस सुन्दरी के धमलगर्भ के समान सुवासित मुख में घुसना चाहता हो। ७४. इठलाती हुई भोली-भाली युवतियां, जिनकी प्रांखें मद से घूम रही थी और चांदी के चपक के भीतर ध्यान से देख रही थीं, ये मदिरा के रंग को, चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब से छिप जाने के कारण पहिचान नहीं सकी। ७५. अभिमानिनी होते हुए भी, अन्य स्त्रियों मे पढ़ी-पढी, उस स्त्री की युटिलता को दूर कर मदिरा ने अवश्य ही उसके हृदय में काम, प्रांतों में ललाई भौर मुग में सौरम फा सभार किया। ७६. रात्रि चीतने पर पारगों ने मालापरणों से, प्रजापति के समान तेजस्वी गजा को जो, मदिरा के निरनर पान से पराक्त होकर अपनी प्रिया की गोद रूपी दाम्या पर सो रहे थे, जगापा। ७७. "पृपया पस्या को पोदिये, देगिये गर्य, जिनका मण्डल रत. पणं है, जो पाने रियों को प्रभा बाहर पिटमा रहे हैं और जिन्होंने अन्धकार का नाश कर दिया है, उगरा पापी तरह प्यो पर उटने का समय निकट पहुंच रहा है।"

तृतीयः सर्गः ४५ विरामः शर्वर्या हिमरुचिरवाप्ठोऽस्तशिखरं किमद्यापि स्वापस्तव मुकुलिताम्भोरुहद्दशः । इतीवायं भानुः प्रमदवनपर्यन्तसरसी करेणाताम्रण प्रहरति विवोधाय तरुणः ॥७८ । समुत्तिइन्त्येते निगडकृतझङ्कारमपरं शनैराकर्पन्तः करटतटलीनालिविततीः । निरस्यन्तो हेलाविधुतपृथुकर्णान्तपवन- द्विपास्ते दन्तानस्थितकरमुदस्याननतटम् ॥७॥ पादेनकेन तिष्ठन् पटुपटहरवैर्वोधितस्ते मयूरः पश्चात्पक्षण साधं चिरशयनगुरुं पादमन्यं वितत्य । उत्फुल्लोद्भुतपक्षच्युतहिमकणिकावृष्टिरावासयष्ट्यां । दृष्ट्वा मार्तण्डधामोदयमुदितमुदोज्जृम्भते ताण्डवार्थी ॥८॥ "रात्रि समाप्त हो चुकी, चन्द्रदेव प्रस्ताचल को चले गये। हे मुकुलित कमलाक्षी ! तू क्या अब तक सो रही है !" यह कह कर क्रीडोद्यान तक फैली हुई सरसो को जगाने के लिये यह तरुण सूर्य अपने माताम्रकरों से यपकियां दे रहा विशेष-दलेप-कर-हाँप रश्मि । ७६. देखिये; यह मापके हाथी, मपनी अद्वितीय झन्कार करती हुई जंजीरों को धीरे-धीरे खींच रहे हैं, अपनी कनपटी पर बैठी हुई मक्खियों के समूह को, इतमीनान से, अपने स्यूल कानों के अग्रभाग के फटफटाने से निकली हुई हवा से उठाते हुए, मोर अपने मुंह के किनारों से निकले हुए दांतों के मप्रभाग पर जिनके मुंह पर पड़े थे, उनको ऊपर करते हुए, उठ रहे हैं। ६०. . अपने मह पर एक टांग पर पैठा हुमा यह मापा मयूर, जो देर तक सोने के कारण गरुपाय गया था, उमने नगाड़े की गम्भीर ध्वनि मे जाग कर, दूसरे पैर को, अपनी पंप के साथ फैला कर, अपने फड़फड़ाते हुए पंगो से हिमरणो की पुहार गिगता हमा, मूर्य की उदयपी से हर्पोत्पुल्त, ताय नृत्य करने पौ दन्या से सट राहा ०५ जानकीहरणम् पूर्वाद्रौ सूर्यपादे चरति विसृजता चन्द्रपादावदातं तल्पं तेनानुचक्रे मलयतहरसामोदितांसद्वयेन । उन्निद्रश्वेतपद्मप्रकरपरिकरच्छन्नवोचीविताना- दुद्यन्मन्दं सरस्तः सलिलगुरुवृहत्पक्षतिमल्लिकाक्षः ॥८१॥ इति तृतीयः सर्गः ८१. जब सूर्य अपनी प्रमा पूर्व के पर्वत पर विखेर रहे थे, तब राजा दशरय, जिनके कंधे मलय (नन्दन वन) क वृक्षों के रस से सुरभित थे, अपनी चांदनी के समान उज्ज्वल शय्या से उठते हुए ऐसे लगते थे जैसे मल्लिकाक्ष हंस, जिसके बड़े-बड़े डेनों के नीचे के कुहर पानी कारण भारी पड़ गये थे, वह धीरे-धीरे सरोवर के भीतर से, उठ रहा है, जिस सरोवर के चारों ओर फैले हुए लहरों के वितान को फूले हुए श्वेत कमल की परम्परा ने छिन्न-भिन्न कर दिया । तृतीय सगं समाप्त चतुर्थः सर्ग: अथ स प्रविम्भिते शुचौ विधुरश्चेतसि पुत्रकाम्यया । सुबहुद्विजसात्कृताखिलद्रविणः स्तोममयष्ट भूपतिः ॥१॥ वहुशो विफले तदध्वरे सति पुत्रीयमनन्तरं ऋतुम् । निखर्तयदृष्यशृङ्ग इत्यभिधानप्रथितस्तपोनिधिः ॥२॥ उदियाय ततोऽस्य कश्चन श्रितचामीकरभाजनं चरुम् । परिगृह्य रुचा परिज्वलन ज्वलतो रोहितवाजिनः पुमान् ॥३॥ प्रविवेश विशाम्पतिश्चलं चतुरंशीकृततेजसात्मना। प्रविधातुमरातितापितत्रिदशाश्रुस्रववृष्ट्यवग्रहम् ॥४॥ दयिताभिरनन्ततेजसा मुनिनासौ परिकल्पलम्भितः । अशितः प्रविभज्य भूपतेस्तिसभिर्गर्भमवीभवच्चरु: ॥५॥ सुतयोर्भवतः स्म वालिजिभरतौ कोशलकेकयेन्द्रयोः । यमजौ यमतुल्यतेजसौ सुषुवाते समये सुमित्रया ॥६॥ १. तब चिन्ता-उद्विग्नचित्त पृथ्वीपति (दशरथ) ने पुत्र की कामना से, प्रज्ज्वलित मग्नि के सामने, अपने अखण्ड धन से बहुत से ब्राह्मणों का सत्कार कर भनेकों यज्ञ किये। २. जब बहुत से यज्ञ करने पर भी राजा विफल हो गये तब, अपने नाम से सुप्रसिद्ध तपस्या के भाण्डार ऋष्यशृङ्ग ने पुष्टि यज्ञ किया। ३. (तब) प्रभा से देदीप्यमान एक पुरुष उस धधकती हुई मग्नि के भीतर से सुवर्ण पात्र में 'चर' लिये हुए निकला । विशेष-'च हव्याम । ४. तब देवताओं के स्वामी (दशरथ) जिनके तेज को उनकी पारमा ने चार भागों में विभक्त कर दिया था, शत्रुमों से संतप्त देवतामों के बहते हुए मासुमों के सुखाने के हेतु उस घरु (हव्याप्त का बर्तन) में प्रविष्ट हुए। ५. उस मसीम बलपारी तपस्वी द्वारा नियमित उस चरु को जब भूपति की तीनों रानियों ने विमक्त कर साया तो उस चरु ने तीनों के भीतर गर्म उत्पन्न कर दिया। ६. कोसलाधिपति मोर केकय राज की पुत्रियों (कौशल्या और कैकेयी) से क्रमानुसार बलि के जीतने वाले (राम) मोर भरत पैदा हुए और समय से सुमित्रा ने यमराज के समान तेजस्वी पुड़ौरा पुत्र (मामए मोर शनम्न) पैदा किये।

४८ - जानकीहरणम् प्रथ दिव्यमुनिप्रवर्तितनसवानन्तरजातकर्मणाम् । रुरुचे चरुजन्मनां दशा तनुसंदिशतदन्तकुड्मला ॥७॥ न स राम इह व यात इत्यनुयुक्तो वनिताभिरग्रतः । निजहस्तपुटावृताननो विदधेऽलीकनिलीनमर्भकः ॥८॥ मुखमाहृतधूलि गण्डयोः करघृष्टाञ्जनदानमस्य तत् । विवभौ सुरदन्तिनो यथा वदनं दन्तचतुष्टयोज्ज्वलम् ॥६॥ कतरस्तव तात उच्यतामिति धात्रीवचनप्रचोदितः । रुचिरेण करेण निर्दिशन् जगदीशं प्रमदेन' सन्दधौ ॥१०॥ अयि दर्शय तत्किमुन्दुराद् भवतो पात्तमिति प्रचोदितः । प्रविदर्शयति स्म शिक्षया नवकं दन्तचतुष्टयं शिशुः ॥११॥ इतरेऽपि सरोजशीतलैमुंदुभिः साञ्जनराजिभिः करैः । शयने समवायन् पितुचरणी मातृजतेन 'चोदिताः ॥१२॥ . ७. प्रसव के अनन्तर जय स्वर्ग के ऋषि ने उनका जातकर्म संस्कार कर दिया तब चार से उत्पन्न उन चारों वालको का शरीर छोटे-छोटे दांतों के निकल' पाने पर बड़ा शोभायमान हुआ। ८. 'राम यहां नहीं हैं । कहाँ चले गये' ऐसा जब स्त्रियां (खेलवाड़ में) कहने लगी तो उनके सामने ही उस बालक (राम) ने बहाने से हाथों से अपना मुंह ढक लिया जैसे वहाँ हैही नहीं। ६. धूल से भरा हुआ उनका शरीर जिसमें चार दांत झलक रहे थे, और हाथों की रगड़ से काजल से पुते हुए दोनों गाल से वे (राम) उज्ज्वल चार दांत वाले ऐरावत की तरह शोभायमान लगते थे। १०. 'बतायो हे पुत्र, इन दोनों में कौन तुम्हारा पिता है, इस तरह से धाप से पूछे जाने पर वह (राम) जगदीश की ओर सुन्दर हाय से इशारा कर, बड़े हर्ष से उनसे जाकर लिपट गया। ११. "मरे, बतामो तो तुमने चूहे से क्या लिया है ?" ऐसा पूछे जाने पर पहिले ही से सिखाया-पढ़ाया वह वच्चा (राम) प्रपना नये-नये चार दांत दिखा देता था। १२. अपनी मातानो से सिखाये जाने पर और दूसरे बच्चे भी (लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) पाय्या पर लेटे हुए पिता के पैर, कज्जल से शोभायमान, मुलायम हाथों से दबाने सगते थे।

चतुर्थः सर्गः शयनोयगतस्य भूपतेः शिशव: क्रोडनिवेशवाञ्छया । निशि वर्धितमातृसंपदं कलहं कोमलजल्पितं दधुः ॥१३॥ क्रमशश्चरुजन्मनो वपुःपरिवृद्धिर्महिता महीयसः । प्रतिवासरमायुषः क्षयस्त्रिदशारेरपि तुल्यमासतुः ॥१४॥ घनुपि प्रतिलब्धपाटवे नृपतेरन्यतरेारात्मजे । भवनं भुवनस्य शासितुः प्रतिपेदे मुषितक्रतुर्मुनिः ॥१५॥ स्वकिरीटमणिप्रभाम्बुभिः प्रथमक्षालितपादपङ्कजम् । नृपतिः समबीभवन्मुनि पुनरुक्तैरिव पाद्यवारिभिः ॥१६॥ कुशलं परिपृच्छ्य सर्वगं मुनिरध्यासितरत्नविष्टरः । उपविष्टमसौ भुवस्तले विरतं राजमुनि जगौ गिरम् ॥१७॥ स्वजनादपि लब्धवैशसे नृपतित्वे शठमृत्यसंपदि । प्रियवादिरिपावपि स्थितो नृप दिष्ट्या कुशलेन वर्तसे ॥१८॥ १३. रात्रि के समय, सोने के हेतु शय्या पर पड़े हुए, भूपति के वक्ष पर लेटने के लिये, वे बच्चे, बड़ी प्यारी बोलियों से आपस मे लड़ते-झगड़ते थे, जिससे उनकी माताओं का वात्सल्य स्नेह उमड़ पड़ता था। १४. घर से उत्पन्न उस ऐश्वर्यशाली (राम) की अभिलपित शरीरोत्कर्ष दिन पर दिन बढता जाता था और उसी प्रकार देवताओं के शत्रु (रावण) की मायु प्रति दिन घटती जाती थी। १५. जब महाराज के पुत्र धनुविद्या मे पारङ्गत हो गये तो एक दिन उस भुवन के शासन- कर्ता (दशरथ) के घर पर एक तपस्वी माये जिनका यज्ञ विध्वंस कर दिया गया था। (मर्थात् जिनका यज्ञ राक्षसों ने विध्वंस कर दिया था।) १६. राजा ने ऋषि के चरणकमलों पर मत होने के समय, पहिले पपने मुकुट से निकलती हुई किरण रूपी जल से उन चरणों का प्रक्षालन किया, फिर उन्हें धोने के लिये पर्थ्य का जल समर्पित किया। जैसे पुनरुक्ति की भौति एक ही काम दोहारा दिया गया हो। १७. जब मणियों के भासन पर बैठे हुए मुनि से भूमि पर बैठे हुए रामपि (दसरप) चारो मोर का कुशल वृत्तान्त पूछ कर चुप हो गये, तब (प्रागन्तुक) मुनि राजा से योले। १८. हे राजन्, माप वैरो भाग्यवान् हैं कि यद्यपि भाप के राज्य में मपने ही सम्बन्धियों से पात या भय बना रहता है, जो बदमाश नौकरी से मरा है पोर जहाँ शत्रु भी मिठबोलने हैं, यहाँ भाप बड़ी कुशलता से पामन कर रहे हैं।

५० जानकीरहणम h द्विपतो भवबन्ध भेदिना दहतश्चेतसि योगवह्निना। न जहाति विपत्तिरद्य नः परसंपत्तिपु निःस्पृहानपि ॥१६॥ अनुयान्ति समन्ततो मखे निपतच्छोणितवृष्टयो दिशः । पवनाहतवृतविच्युतप्रसवाः किशुनकाननश्रियः ॥२०॥ मृपतामपि नस्तपस्यतां धृतवैकङ्कतसाधनस्रुचाम् स्फुरदचिपि देवतामुखे हुतमद्यश्व उदस्यतेरिभिः ॥२१॥ सदसः समयेषु वृत्तये विधिनाहूत हुतांशभाजिनः । युधि तं जहि पश्यतोहरं गुरुणा रामशरेण राक्षसम् ॥२२॥ क्षमते न जनं त्वपितं यमिनामिन्द्ररिपुस्तु हिसितुम् । शशिनं मृगशत्रुराश्रितं न मृगं प्रार्थयते हि जातुचित् ॥२३॥ उरगा इव धर्मपीडिताः क्रतुशत्रुव्यथितास्तपस्विनः । उपयान्त्युपतापनाशनं विपुलं त्वद्भुजचन्दनद्रुमम् ॥२४॥ १६. यद्यपि हम लोगों ने योग की अग्नि से, जो संसार के वन्धनों को तोड़ने वाली है, मन में रहने वाले सभों को (काम-क्रोध इत्यादि को) जला डाला है और यद्यपि दूसरों की सम्पत्ति के प्रति हम उदासीन हैं, फिर भी संसारिक दुस प्राजकल हमें नहीं छोड़ता। २०. या के चारों ओर रघिर-वृष्टि होने से दिशायें, किंशुक वन के समान लगती हैं जहाँ हवा के झपेटे से डालियो से गिरे हुए पुष्प विखरे पड़े हों। २१. (भव ऐसी परिस्थिति मा गई है कि) चाहे प्राज पाहे फल, यह होने ही वाला है है कि हम तपस्वी लोग, जो हाथ में निकंकत (पतारा) की लकड़ी के बने हुए गुवा रो, प्रज्वलित पग्नि में हय्य डालते हैं, उगे शत्रु लोग निकाल कर फेंक देंगे। २२. कृपया राम के तीरो वाणों से युद्ध मे उस राक्षस को मार कर उन मुनियों का पल्याण कीजिये जो या में नियमानुमार बुलाये जाते है पौर जिनके दाते यह राक्षम उनसे या का माग पुरा ले जाता है। उग इन्द्र ये पत्र (गरण) में यह समता नही है कि यह पापको परण में पाये हुए गंपनी ऋपियों का नाश फर मम । मृगों का प (सिंह), उस मृग के मारो गो फभी भी या नहीं करता जिसने अपने को पन्द्रमा को पपित गर दिया है। २४. या पापों (राधागो) से पीडित सपती गोग आपसी दीपभूधामों की पारण में ऐगे पाने मे पर गेम्पषित गर्ने, तपन पो पारा मरने पामे पन्दन में मामे. नागो।।

चतुर्थः सर्गः 45036 वयमकंकुलैककाश्रया न परं भूपतिमाश्रयामहे । न हि जातु पतन्ति पल्वले जलदा वारिधिपानलम्पटाः ॥२५॥ त्वदणुप्रियमाश्रयामहे न परस्मादतिविस्तराण्यपि । पयसः कणमेव चातको जलदादति बहूनि नान्यतः ॥२६॥ नृपताविति वेदितापदा मुनिना जोपमभूयत क्षणम् । महतां न " कदाचिदर्थना गुरुनिबन्धविनष्टसौष्ठवा ॥२७॥ परिपूततनुर्द्विजाशिफा शुभया त्वत्प्रियताऽवृतः स्वयम् । पृथुकः पृथुकीतिरर्पितो भवति श्वः समराय यास्यति ॥२८॥ इति वस्तुमवस्तुकाक्षिणे स मुदाऽस्मै समुदाहृतप्रियः । शरणं शरणार्थिनेददावृषये विश्वभुजो नरेश्वरः ॥२६॥ चलिते च सुतं तपस्यति प्रथमाहूतम मस्यया । उपनीय चिराय वजितं स्वयमद्धं प्रियमाददे वचः ॥३०॥ . २५. हम लोग, जिनका सूर्यवंश ही केवल आश्रय है, किसी दूसरे नृपति की शरण नहीं लेते । समुद्र के जल पीने के इच्छुक बादल, कभी गया पर नहीं गिरते । २६. हम लोग आप ही की कृपा का प्रासरा करेंगे चाहे वह अणु ही के समान छोटी वयों न हो, पर किसी दूसरे से बहुत बड़ी कृपा हमें स्वीकार नहीं है । चातक, बादल ही से जल लेता है चाहे वह करण भर ही क्यों न हो; पर अन्यत्र कहीं से बहुत अधिक जल मिले भी तो वह नहीं लेता। विशेष-देखिये- "याचा मोघा वरमधिगुणे नाथमे लब्यकामा"-मेघदूत १-६ (कालिदास) २७. अपने कप्ट को नृपति से इतना निवेदन कर मुनि ( विश्वामित्र ) क्षण भर के लिए चुप हो गये । महान् व्यक्ति से अपना अभिलपित बहुत भी कहा जा कर अपना सौष्ठव नही खोता। २८. 'कल मेरा यशस्वी पुत्र ब्रह्मणों के प्राशीर्वाद से शरीर पवित्र कर और आपके स्नेह का भाजन होकर, आपको अपित हो युद्ध के लिये जायगा।' २६. बड़ी प्रसन्नता से इतनी बात कहकर नृपति ने उन ऋपि ( विश्वामित्र ) को जो उस स्थान (महल) में नहीं ठहरना चाहते थे, यज्ञशाला में ठहराया। ३०. जव मुनि तपस्या के हेतु चलने के लिये उद्यत हुए तो राजा ने अपने पुत्र (राम) को जिमे उन्होने मुनि को प्रणाम करने के लिये बुलाया था, अपनी गोद मे, जिसका वह यहुत दिनो से अनभ्यस्त था, बैठा कर प्रिय वचन बोले।

५२ जानकीहरणम् समवेदि यतस्त्वदर्थिना कथितं यदुरितक्रमं त्वया । अवधूय ततस्तदापदं चिनु बाणेन कुलोचितं यशः ॥३१॥ अविजित्य जयैषिणां सदा न भुवः शक्यतयाऽनुरक्षितुम् । ननु दिग्जयसंभृतो महाविभवोऽयं भवतः प्रसंगतः ॥३२॥ भुवनानि विति कश्चन स्वजनानेव परः प्रयलतः । इतरस्तनुमेव केवलं प्रभुरन्यो भरणेऽपि नात्मनः ॥३३।। इति पक्षचतुष्टये स्थिते रघवः पूर्वमुदस्य मानिनः । क्षपयन्ति यशः क्रमागतं न हि पक्षान्तरसंपरिग्रहात् ॥३४॥ जनमन्यहितप्रवर्तनं स्वयमेवाभिसरन्ति सम्पदः। नियतं निजकृत्य लम्पटः पुरुषः स्वार्थत एव हीयते ॥३५॥ पुरुषस्य कृतं भुजद्वयं प्रविधातुं द्वयमेव वेधसा । सुहृदामुदयं विद्विपामवलेपप्रतिघातमेव च ॥३६॥ ३१. तुम्हें ले जाने की इच्छा से पाए हुए मुनि ने तुम्हें उस कठिनता से होने वाले कार्य को बता दिया है। प्रतः तुम उनका सङ्कट दूर कर, वाणो के बल अपने कुल के उपयुक्त यश का अर्जन करो। ३२. चूंकि जय की इच्छा करने वाले के लिये, पृथ्वी की हर समय रक्षा करना बिना दिग्विजय के सम्भव नहीं है, अतः महाशक्ति के सञ्चय करने का यह अवसरमा गया है। ३३. कोई मुवन मर गा पासन करता है । कोई अपने ही युटुम्ब का भरण पोषण बड़े यल से कर पाता है। कोई फेवल अपने तन ही का पालन करने में समर्थ होता है और कोई मपना पेट भी नहीं भर पाता। ३४. इन पारों भवरपामों में रघुकुल के स्यानिमानी राजे पहिली अवस्था को छोड़कर पन्य चीन अवस्थामों को प्रगीकार कर कभी भी अपनी यंग-परम्परा से पाये हुए या को कनुपित न करेंगे। १५. को दूसरे का हित करने में प्रवृत्त रहता है, उसके पारा सम्पदामें स्वयं पाती है। (परतु) जो पुरुष अपने ही सा-सापन में ल रहता है उसका स्वायं भी गिठ नहीं होता। ३६. ब्रह्मा ने मनुष्य के दो हाप, दो नामों के करने के लिये पनाये है। एक माने मित्रोंराम ५३ चतुर्थः सर्गः शरणोपगतं न पाति यो न भिनत्ति द्विपतां समुन्नतिम् । न स बाहुरसाधनक्षमो नरवृक्षप्रभवः प्ररोहकः ॥३७॥ . परिकृत्यजडो यशोजने जठरैकप्रवणो निरुत्सुकः । पशुरेव वुधैनिगद्यते यवसग्रासनिवृत्तमानसः ॥३८॥ न पशुः पुरुषाकृतियतो नृगुणभ्रष्टतया न पूरुषः । विरतव्रतपौरुषस्पृहः किमु कोऽपि द्रुहिणेन निर्मितः ॥३६॥ अकृतद्विषदुन्नतिच्छिदः श्रितसंरक्षणवन्ध्यकर्मणः । पुरुषस्य निरर्थकः करः किल कण्डूयनमात्रसार्थकः ॥४०॥ अशने रसनानि देहिनां कृतयोगानि मुखेषु भूरिशः । न न सन्ति तदेषु दुर्लभं प्रभु यत्स्यादभयं प्रजल्पितुम् ॥४१॥ तव जीवितसंशयेष्वपि न परित्याज्यमिदं कुलव्रतम् । सुलभं प्रतिजन्म जीवितं हृदयं धर्मरतं हि दुर्लभम् ॥४२॥ . ३७. जो शरण मे आये हुए की रक्षा नहीं करता और शत्रुओं की बढ़ती को नहीं काटता वह निकम्मी वाहु नहीं है। वह मनुष्यरूपी वृक्ष की एक छोटी टहनी मात्र है। ३८. दूसरे के प्रति अपने कर्तव्य को निवाहने मे चेष्टाहीन, यश कमाने में उदासीन और केवल अपना पेट भरने में तत्पर, ऐसे मनुष्य को बुद्धिमान् लोग पशु कहते हैं । अन्तर केवल इतना ही है कि घास खाने से उसने अपना मन हटा लिया है । ३६. वह जानवर नहीं है क्योकि उसकी शक्ल आदमी की सी है, और वह भादमी नही नही है क्योकि उसमें भादमी के गुण नहीं हैं । तो क्या ब्रह्मा ने कोई ऐसा जीव बनाया है जिसमें न तो धर्म की मोर रुचि है मौर न पुरुषार्थ की आकांक्षा है । ४०. जो शत्रुओं की उन्नति को नहीं रोक सकता और जो शरणार्थियों की रक्षा करने में असमर्थ है, ऐसे पुरुप का हाय तो केवल (शरीर) खुजलाने का साधन मात्र है ! ४१. ऐसा नहीं है कि प्राणियों के मुंह का स्वाद बढ़ाने के लिये बनाये हुए अवलेह न हों (अवश्य हैं)। परन्तु इन सब पदार्थों में वह अत्यन्त दुर्लभ है जिससे अभय देने वाले शब्द मुख से निकलें। ४२. तुम्हारी मृत्यु की प्राशंका भी हो तो तुम्हें अपने कुल ग्रत को न छोड़ना चाहिये, क्योंकि प्रत्येक वार जन्म लेने पर जीवन तो सुलभ है, पर ऐसा हृदय दुलंम है तो अपने कर्तव्य में रत हो ।

४ जानकीहरणम् विरतः शवतामभिव्रजत्यभिपेकोत्सवदुन्दुभिः क्षणात् ।। इतिपातिनि जीविते कथं सुखमालम्ब्य सृजन्ति सत्पथम् ॥४३॥ यशसि व्रज यत्नमुज्झितस्वसुखप्रीतिरुपैहि वा तपः । अधिगम्यमसारमस्थिरं विषयास्वादसुख पशोरपि ॥४४॥ यशसा सुकृतेन संग्रहो नियतं धर्ममुपाजितो यशः । अनुगच्छ तदेक संग्रहादुभयं लभ्यमितीह सत्पथम् ॥४५॥ ननु तावदिहैव सज्जनप्रतिरक्षाविधिगम्यमक्षयम् । फलमिन्दुकरोपरञ्जितप्रहसत्कौमुद कोमलं यशः ॥४६॥ प्रयतः प्रतिपद्य तत्तपोवनमुग्रं त्वमुदग्रविक्रमः । सहसा सह कौशिकेन तं यमिनां कृन्त निवर्हकं युधि ॥४७॥ पितुरित्थमनाकुलं वचस्तदुपश्रुत्य ननाम पादयोः । सह सिद्धवनं यियासुना समरायावरजेन राघवः ॥४८॥ ४३. यह देखते हुए कि एक राजा, राज्याभिषेक के उत्सव पर बजाये हुए नगाड़े की आवाज के समाप्त होते ही क्षण भर मे मर जाता है और केवल उसका शव बच रहता है, तो फिर लोग क्यों ऐसे सासारिक सुख के लिये सन्मार्ग को छोड़ देते हैं । ४४. अपने शरीर को सुख देने की प्रवृत्ति छोड़ कर यश प्राप्त करने का यत्न करो, नही तो तपस्या करो। विषय भोग का सुख साररहित और अस्थिर होता है । वह तो पशुओं को भी प्राप्त है। ४५. फेवल यश से सदाचार का संग्रह नहीं होता । धर्म के अनुष्ठान से यश अवश्य ही होता है। इसी एक ने संग्रह से दोनों ही प्राप्त होते हैं। प्रतः सन्मार्ग का अनुसरण करो। ४६. चन्द्रमा की किरणों से अनुरक्षित फूले हुए कमल के समान कोमल यश, सज्जनों की रसा करने से निश्चय ही इसी लोक में मिलता है। ४७. विश्वामित्र के साप उस उग्र तपोवन में पहुँच कर तपस्वियों को सताने वाले राक्षरा को युद्ध में मपने प्रचण्ड पराक्रम से तुरन्त काट डालो। ४८. इग प्रकार अपने की धीर वाणी सुन कर रघुकुन में उत्पन्न राम, अपने छोटे भाई जो के हेतु सिदवन मे जाने के लिये उत्सुक थे, पिता के चरणों में मस्तप - के साय, नवाया।

चतुर्थः सर्गः तमसि स्फुरदंशुमद्युतिप्रहते संसदि सौखरात्रिकः। यतये निरयीयतत्सुतौ नृपतिर्मन्त्र पवित्रदंशितौ ॥४६॥. अनुजग्मतुरश्रुवपिणो हृदयैः पौरजनस्य राघवौ । मुनिमेनमनाकुलातुरैरनुयातावशिवैकचिन्तया ॥५०॥ यमिनः पथि चैतिहासिकादुपशृण्वन् विविधाश्रयाः कथाः । क्लमथं न विवेद राघवो बलयाऽनोतवलः स विद्यया ॥५१॥ अथ वनमृतः सुहृद्रुहो विषयो यः स्नपनेन विश्रुतः । नृवरो निजगाद तत्पुरं पिशिताशीनिहतं निरीक्ष्य सः ॥५२॥ न भुनक्ति पुरा पुरश्रियं परितः कीर्णकरङ्कसङ्करा । अवमग्नशिर कपालविवरप्रोद्गतशाद्वला मही ॥५३॥ फणिभिः प्रतिविम्बमातरः शितिभिर्भान्ति शिरोऽवलम्बिभिः । रचितैरिव वेणिवन्धनविरहादस्य पुरस्य शासितुः ॥५४॥ ४६. तव नृपति ने विश्वामित्र से यज्ञशाला मे, जिसका अन्धकार सूर्य की किरणो के छिटकने से दूर हो गया था, सुखपूर्वक रात्रि व्यतीय होने का हालचाल पूछ कर अपने दोनो पुत्रों को जो मंत्रपूत वस्त्रों को पहिने थे, ऋषि के साथ जाने का आदेश दे दिया । ५०. रघु के दोनो वंगज, केवल मुनि को आपत्तियों पर विचार करते हुए विश्वामित्र के पीछे- पीछे चले । पौरजन, जिनकी आँखों से प्रांमू गिर रहे थे, और जो शान्त और व्याकुलता से रहित थे, उनके पीछे चले। ५१. इतिहास के ज्ञाता, उस संयमी ऋपि से नाना प्रकार की कथाओं को सुनते हुए, रघु के वंशज (राम) को, जिनमें 'यला' विद्या के प्रभाव से बल का सञ्चार हो गया था, मागं में कोई थकान नहीं मालूम पड़ी। ५२. तव पुरपों में श्रेष्ठ, विश्वामित्र उम नगर को, जो मित्र के मारने वाले वयधारी इन्द्र के स्नान करने से प्रसिद्ध हो गया था मौर जिसे मांसभक्षी राशमों ने विनष्ट कर डाला था, देख कर बोले। ५३. इम नगर की भूमि ने जहाँ नरकपाल का पूर चारो भोर विसरा पड़ा है, जहाँ जमीन के भीतर घसी हुई खोपड़ियों में मांसों के गढ़े के भीतर से घाम उग माई है, इग नगर के गोदयं को चौपट कर दिया है। ५४. इन मात्रिकामी की मूर्तियां जिनके सिर पोत सर्प नटक रहे हैं ऐगी लगती हैं ये उन्होंने नगर के शासक के वियोग से एक चोटी बाप सी हो।

जानकीहरणम् भुवि भोगनिभं विलोकयंस्तुटुमो हारमहार्य वेपथुः । हरिहस्तहतस्य दन्तिनः कररन्ध्र निमृतं निलीयते ॥५५॥ प्रतिमा विशदेन लूतिकापटलेनावृतदृष्टिरीक्ष्यते । रुदितैरिव पुष्पितेक्षणा विपुलत्रासकृतैरनेकशः ॥५६॥ श्लथभित्तिविरूढभूरहस्थिरमूलाग्रविनिर्गमक्षतम् । स्फुटतीव मुंश शुचातुरं हृदयं तद्गृहचित्रयोषिताम् ॥५७॥ नकुलः परिजीणंवैबुधप्रतिविम्बाननमध्यरन्ध्रतः । परिकर्पयति क्रुधा यथा स्फुरितं तद्रसनं सरीसृपम् ॥५८० इति जल्पति तत्र राक्षसी पुरतः प्रादुरभूभिदेलिमा। मकराकरपायिधामभिः क्षयतक्षाकृतिरुपविग्रहा ॥५॥ नवकृत्तविलासिनीकरप्रसवोत्तंसविभूषितानना । नृशिरस्ततिमेखलागुणस्फुरणपरकटुक्वणत्कटिः ॥६॥ . ५५. पृथ्वी पर पड़ी हुई एक माला को जो सर्प के समान लगती थी, देख कर, एक चूहा, निरन्तर भय हो पर-थर कांपता हुमा, सिंह के थपेड़ों से मारे हुए एक हाथी को सूंड के के छिद्र में चुपके से छिप गया। ५६. एक मूर्ति की प्रांखें मकड़ी के विशाल जाले से ढक जाने से ऐसी दिखाई पड़ती पों, से घोर भय के कारण वे निरन्तर रोने से फूल गई हों। ५७. उस महल की जर्जर दीवारों पर उगे हुए पेड़ों की मजबूत जड़ों के बाहर निकल पाने से ऐमा लगता था जैसे उस पर चित्रित स्त्रियों के हृदय (जिनको फोड़ कर जड़ें याहर निकल माई थो) महान् शोक से विदीर्ण हो गए हों। ५८. एक नेवला, चौकीदार की प्रति जीर्ण मूर्ति के मुस के छिद्र से, उसकी जीभ को लपलपाता सोप गमझ कर प्रोध से सींच रहा था। ५६. मुनि यह कही रहे थे कि वहाँ एक विकराल चेहरे वाली राक्षसी, जिसमा यस स्वरूप, समृद्र पी जाने वाले ऋषि (भगस्त्य ) ने नष्ट कर दिया था, सामने माकर सदी हो गई। १०. निमका मेहरा पिलागिनी स्त्रियों की नई फटी हुई अंगुलियों के बने हुए गहनों गे विभूषित या पौर को फमर में गरगुण्ड की पक्ति से बनी हुई फरपनी पहिने थी, जिसके हिनने गे भपपुर राम्द होता था।

चतुर्यः सर्गः ५७ स परितः स्फुरदन्त्रपाश्यया परिणद्धाकुलकेशसन्ततिः । घनशोणितपङ्ककुंकुमप्रविलिप्तस्तनकुम्भभीषणा ॥६॥ इति तामतिभीमदर्शनामभिवोक्ष्योभयतस्तपोधनम् । धनुषोरवनीभुजः सुतौ सपदि न्यस्तशरावतिष्ठताम् ॥६२॥ वसिष्ठतनूजपातितक्षितिपस्वर्वसतिप्रदो मुनिः । घृणिनो नृपतेः कृतस्मयस्तनयं वीक्ष्य जगाविदं वचः ॥६३॥ इति सार्वजनीनसम्पदः प्रलयं देशवरस्य कुवंतीम् । न निहत्य शरेण सूरिभिस्त्वमधर्मी ध्रुवमेप गीयसे ॥६४॥ शतमन्युरवर्णवृत्तये न वधः स्त्रैण इति प्रचिन्तयन् । निजधान विरोचनात्मजां कुलिशेन त्रिदिवस्य शान्तये ॥६५॥ वनितावपुपि द्विपज्जने पुरुषाकारविशेपितेऽपि वा। न हि भद्रकरं शरीरिणां प्रहृताहें करुणावलम्बनम् ॥६६॥ ६१. कुम्भ के समान अपने बड़े-बड़े स्तनों पर गाढे रुधिर को कुंकुम के समान पोतने से बीभत्स लगती वह राक्षसी अपने लहराते हुए बालों को सव मोर लयराती हुई तड़ियों से बांधे हुई थी। ६२. इस प्रकार प्रत्यन्त भयावनी राक्षसी को देख कर पृथ्वी के स्वामी (दशरप) के दोनों पुत्र तुरन्त अपने अपने धनुषों पर वारण चढ़ा कर उस तपस्वी (विश्वामित्र) के दोनों ओर सड़े हो गये । ६३. जब विश्वामित्र ने, जिन्होंने वसिष्ठ के पुत्रों से तिरस्कृत राजा (विराकु) को स्वर्ग में रहने का पद दिया था, दयावान् राजा (दसरप) के पुत्र (राम) की मोर देखा तो मुसकरा कर ये वचन वोले । ६४. ऐसे येष्ठ देश में, जिसकी समृदि सम्पूर्ण जनता को इष्ट है, इतना प्रलय मचाती हुई इस राक्षसी को अपने पापों से यदि तुम न मार डालोगे, तो बुद्धिमान् सोग सुम्हें मवश्य मपी कहेंगे। ६५. यह विचार कर कि स्त्री का पप धारो वर्णों की रक्षा के प्रतिकूल नहीं है, इन्द्र ने स्वर्ग में शक्ति के हेतु विरोचन की पुत्री को वय से मार गला पा। ६६. ऐसे पत्र पर दया करना चो मार गलने पा पात्र है, चाहे उसका शरीर स्त्री हो भयवा पुरुष का, प्राणियों के लिये कल्याणकारी है।

जानकीहरणम् .. युवतेरपि साधवः सुखे जगतो लुप्तवतश्विरस्थितिम् । तुलयन्ति न राम विक्रमं द्विपतीतापमगुण्यवृत्तिभिः ॥६७॥ अपि वित्थ इदं धनुमृतोर्भवतोः पौरुपरोषवृत्तयोः । न भजन्ति यशःश्रियं रणेऽभ्युदिते हन्त तपोधनद्विषः ॥६८॥ न विरोचनजन्मनोरिदं युवयोरायुधयुद्धतन्त्रयोः । द्विजवृद्धनिपेवणक्षमं महतोः श्रौत्रमलं विराजते ॥६६॥ इति मुनिचोदितोहदिसुकेतुसुतामिषुणा, रघुपतिरक्षिणोदशनिपातपटुध्वनिना। स्फुटितकुचान्तरस्रवदसृक्नुतिनः करणात् प्रथममपाययुस्तदसवो नु शरो नु बहिः ॥७०॥ . ऋपिरिति विघ्नघातविधिसञ्जितसद्यशसं तनुजमयो जयद्दशरथस्य सुरास्त्रगणैः । असुरनिशाचरक्षतजपानपरैविकस- लसितहुताशनद्युतिपिशङ्गितदिग्वदनैः ॥७१॥ ६७. हे राम ! विश्व की शान्ति के लिए, तुम यदि ऐसी स्त्री को दुःख पहुंचाते हो अथवा उसके अधिक समय तक जीवित रहने को लोप कर देते हो ( अर्थात् उसे मार डालते हो) तो साधु पुरुप, तुम्हारे इस वीरता के काम की तुलना अनुचित कामों से न करेंगे । ६८. क्या तुम यह जानते हो कि जब तुम लोग, जिनका पौरुप एवं रोप विख्यात है, धनुप लेकर युद्ध के लिये उठोगे तब इन तपस्वियों के शत्रुओं को यशश्री नहीं प्राप्त हो सकेगी। ६६. यह विजय उन लोगों को नही प्राप्त होगी जो विरोचन की सन्तान हैं। यह तो तुम्हे ही प्राप्त होगी, जिन्होंने वेद का अध्ययन किया है, जो शस्त्र और युद्ध विद्या में पारङ्गत हैं और जो ब्राह्मण और वृद्ध की सेवा करने में समर्थ हैं। ७०. इस प्रकार ऋषि से उत्साहित किये जाने पर रघुपति ने सुकेतु की पुत्री की छाती में एक वारण मारा, जिसकी ध्वनि वज्रपात के सदृश थी। उसके स्तनों के बीच में फटे हुए दरार से बहते हुए रुधिर के साथ पहिले उसकी प्राणवायु निकली या वाण पहिले निकला? यह कहना सम्भव न था। (वाण के लगते ही तुरन्त उसके प्राण निकल गये, यह भाव है।) विशेष-नर्दटकाः ='यदि भवतो न जो भजजला गुरु नदटकम् । ७१. दशरथ के पुन राम, जिन्होंने इस प्रकार यज्ञों को विघ्न रहित करके उज्ज्वल यश प्राप्त किया था, उन्हें विश्वामित्र ने वह देवास्त्र समूह प्रदान किया जो मसुरों मोर निशाचरों का रुधिर पीने के लिये सदा प्रस्तुत रहते थे और जिन्होंने अपनी धधकती मोर लप- लपाती भग्नि की प्रभा से दिशामों को पिशग कर दिया था। विशेष-नदंटक छन्द चतुथः सर्गः ५९ वदनविनिर्गतज्वलितवह्निशिखावितते- रुपगतवन्ति राममथ तानि ततानि रुचा। शशधरखण्डकोणकुटिलस्फुतकोटिखरं दशनचतुष्टयं पृथु दधन्ति वहिः प्रसृतम् ॥७२॥ रक्षोहव्यहविर्भुजं स हि तथा संधूप्य शस्त्रेन्धनैः प्रत्युद्गम्य सुदूरमेव हरिणैरन्चीयमानो बहिः । छेदाय प्रसृतैरसेकिमलताजालप्रबालश्रियः कूजत्कोकिलमाश्रमस्य निकटं सायं प्रपेदे मुनिः ॥७३॥ इति चतुर्थः सर्गः ७२. तदनन्तर मुख से निकल कर लपलपाती हुई अग्नि-शिखा के समान, मुंड-के-मुंड पस्यों की पंक्ति, जिनकी प्रभा से चार दांत प्रदर्शित हो गये थे, और जो अर्घ चन्द्र के किनारों के समान स्वच्छ और भयङ्कर पैने थे, बाहर निकल कर, राम के पास आ गये। विशेप-नर्दटक छन्द । ७३. राक्षस लोग जिसके हव्य थे, ऐसी मग्नि को, शास्त्र रूपी इंधन से, जिनका वध करने के हेतु माविर्भाव हुआ था, प्रज्ज्वलित कर, सन्ध्या समय मुनि विश्वामित्र, हरिणों के साथ, जो बहुत दूर तक उनके पीछे-पीछे गये थे, माश्रम के निकट पहुंचे, जो बिना जल से सीची हुई लतामों के मंखुवों से मण्डित था मौर जहाँ कोयल कूक रही थी। विशेष-शार्दूलविक्रीडित छन्द=' ="सूर्याश्वयदि मः सनी सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ।" चतुर्थ सर्ग समाप्त पञ्चमः सर्ग: ततस्ततं तापसकन्यकाजनप्रसिक्तसंवधितवृक्षमण्डलैः । सहस्रशस्तानितसामनिस्वनप्रवतिताखण्डशिखण्डिताण्डवम् ॥ १ ॥ विहङ्गपानाय महीरुहां तले निवेशिताम्भः परिपूर्णभाजनम् । विशोपणार्थाहितपुण्यवल्कलप्रताननम्रीकृतवृक्षमस्तकम् ॥२॥ कृतासु नीवारविभागवृत्तिषु स्वकीयमंशं मृदुहस्तसंपुटैः । हरभिरालोहितगण्डमण्डलैः प्लवङ्गमैः सेवितशैलकन्दरम् ॥ ३ ॥ स्वमङ्कमारुह्य सुखं परिष्वपत् कुरङ्गशावप्रतिबोधशङ्कया । चिरोपवेशव्यथितेऽपिविग्रहे सुनिश्चिलासीनजरत्तपोधनम् ॥ ४ ॥ हिरण्यरेतः शरणानि सर्वतः प्रवृत्तपुण्याहुतिधूमधूसरम् । बृहल्लतातानमृतः फलेनहेरघस्तरोरासितशायितातिथि ॥ ५ ॥ १. तब कौशिक (विश्वामित्र) ने उस तपोवन में प्रवेश किया जो तपस्वियों की कन्यामों के पाले-पोसे वृक्षों से भरा था और जहाँ निरन्तर अनन्त 'साम' के गानों और उनकी तानों से प्रेरित हो झुंड के झुंड मयूर ताण्डव नृत्य कर रहे थे। विशेष 1-इस सर्ग फे पहिले नौ श्लोकों में तपोयन का वर्णन है । इन नौ श्लोकों का विषय पव, "कौशिक ने तपोषन में प्रवेश किया," दसवें श्लोक में है। इसे कुलक कहते हैं। २. जहाँ वृक्षों के नीचे, पक्षियों के पीने के लिये जल से भरे पान रसे थे भौर जहाँ, सूखने के लिये फैलाये हुए, वल्कल के चीरों से वृक्षों की हालियों के अग्रभाग भुक गये.पे। ३. जहाँ पर्वतों की कन्दरामों में लाल-साल मुंह वाले बन्दरों का मुंड, साने के लिये, मुलायम हायों से, अपने हिस्से पा 'नीवार' उठा सा कर, रहता था। ४. जहाँ तपस्यी लोग, इस शंका से कि फहीं, उनकी गोद में सुसरो सोये हुए, मृगछौने जाग न उठे, विना हिलेहुले बैठे थे, यद्यपि देर तक ऐसे बैठे रहने से उनका सरीर दुसने लगापा। ५. पो सब पोर अग्निकुण्डों में पड़ती हुई पवित्र माहुतियों से निकले हुए धुएँ रो पूरारित हो पहा पा पोर जहाँ मोटो मोटो सतामों से परिवेष्टित एवं पतों रो सदेहए वृक्षों के नीमे मतिरियों के मासन और बिस्तरे रो थे।

पञ्चमः सर्गः तपस्विवर्गस्य वधूपु वह्नये वितन्वतीपु प्रकृतां वलिक्रियाम् । मृगाङ्गनाभिः परिलिह्य जिह्वया विनोदितत्याजितरोदितच्छिशु ॥ ६॥ बलिक्रियातानितलाजकपणे समेतकीट प्रतिघातशङ्कया। कुशस्य मुष्ट्या शनकैस्तपस्विभिः प्रमृज्यमानानलमन्दिरोदरम् ॥ ७ ॥ महीरहभ्रष्टविहङ्गपोतिकासुखोपवेशाय तपस्विसूनुभिः । इपीकतूलेन विधाय मार्दवं कचित्समासजितनीड़पञ्जरम् ॥ ८॥ सवारिमृत्स्नापरिपूर्णखातकप्रजन्यमानांकुरबीजमेकतः । प्रहृष्टसारङ्गकिशोरवलितप्रकीर्णपुजीकृतशुष्यदिडगुदि समीरणैराहुतिगन्धपावनैवितानितोदामशिखण्डि निस्वनम् । तपोवनं तत्तपसामधिश्रियः कुमारयुग्मेन विवेश कौशिकः ॥१०॥ विधित्सुरिष्टि नृपतेरतन्द्रितः सुतं ततो वैबुधलौकिकीमृषिः । समादिदेश प्रकृताय कर्मणे चिराय तद्रक्षणरूप्यमाइतः ॥११॥ ॥६॥ ६. जहाँ तपस्वियों की स्त्रियां अग्नि में माहुति डाल रही थी और जहाँ हरिणियां छोनों को चाट कर प्यार कर रही थी, परन्तु फिर छोड़ देने के कारण जिन छोनों की मांखों से आंसू निकल रहे थे। जहाँ तपस्वी लोग अग्निकुंड के गर्भ को कुश की मूंठ से हलके हलके इस हेतु बटोर रहे थे कि माहुति के लिये फैलाये हुए लाजा को ले जाने के लिये एकम छोटे-छोटे कीड़े कही मर न जायें। ८. जहाँ पेड़ से गिरे हुए चिड़िया के बच्चे के सुख से बैठने के लिये, तपस्वियों के चालकों ने एक घोसले के प्राकार का पिंजड़ा बना कर उसमें वेत का मुलायम छिलका विद्या दिया। ६. जहाँ एक पोर मच्छी मिट्टी पोर पानी से भरी हुई गया में वीज मंकुरा रहे थे और दूसरी भोर सूखने के लिये एकत्र किये गये इदगुदी के फलों को प्रफुल्लित मृग-शावक चौकड़ी भर कर विसेर रहे थे। १०. ऐसे तपोवन में जहाँ मस्त मयूरों की मावार, हयन के गंप से पवित्र वायु रो सञ्चालित होने के कारण दूर तक फैल रही थी, सप के भाण्डार, कौशिक ने दोनों सुमारो के साय प्रवेश किया। ११. तब एक स्वगिक यज्ञ के जो बहुत दिनों से स्थगित यो, करने की इच्छा से मादरणीय विश्वामित्र ने उसके संराए का भार राजा के पुत्र, पालस्य रहित राम पो सोपा जिनका शरीर यतों की रक्षा करने मे दमकने सगा पा। 1 १२ जानकीहरणम् तममिमिन्धन्तमधिक्रतु भ्रमन् रिरक्षिपुः सन् परितो रिपोरसौ। क्षमाभुजः सज्यसरासनः सुतो हुतो जगादावरजं वनश्रिया ॥१२॥ विभति नीवारवदम्बुजाकरश्रिया परीतं सततं तपोजुषाम् । अखातमाहावमनुत्रिमं परं सदाफलं शस्यमिदं तपोवनम् ॥१३॥ सवेदवेदाङ्गविदो यमव्ययं । विदन्ति यत्लेन पदं तपस्विनः । स लोककृत्यानि विचिन्त्य कानिचित् तपस्यति स्मेह पुमान् पुरातनः ॥१४॥ सुदर्शनच्छिन्न समाहृतेन्धनं द्विजेन पक्षव्यजनेन वीजितम् । त्रिनेत्रमूर्त्यन्तरमादिपूरुषो जुहाव हव्यैरिह ..हव्यवाहनम् ॥१५॥ तपस्यति स्वामिनि शत्रुनाशने समित्कुशच्छेदनमात्रतत्परः । सुसंयतो नाभिननन्द नन्दकः सुरारिवक्षःक्षतजासवं तदा ॥१६॥ गदा रणदुन्दुभिभैरवंरणं तदा समभ्येत्य भयं वितन्वति । शिरस्यपध्वस्तशिरस्त्रजालके निमज्य मज्जां न जघास विद्विषाम् ॥१७॥ १२. तब पृथ्वीपति (दशरथ) के पुत्र (राम) धनुप को चढा कर यज्ञ की रक्षा करने की इच्छा से अग्निकुण्ड के चारों ओर घूमते हुए अपने छोटे भाई (लक्ष्मण) से, जिनका मन वन की शोभा को देखने में लगा था, वोते । १३. तपस्वियों के इस तपोवन में, कमलों के सौंदर्य से व्याप्त एक सरोवर और (पशुओं के पानी पीने के लिये जल पात्र है और वहां नीवार (एक प्रकार का चावल) की तरह विना बोई हुई सेती होती है । १४. वेद मोर वेदाङ्ग के ज्ञाता तपस्वी लोग, जिस पुराण पुरुष को बड़ी सापना से मयि- नाशी जान सके हैं, उसने (पुराण पुरुष ने) सोक की हितकामना से इसी स्थान पर तपस्या की है। १५. यहाँ पर मादि पुरुप ने सुदर्शन चक्र से काटी हुई इंधन को लकड़ी लाफर मोर गरड़ के पंखों के हांकने से प्रज्ज्वलित किये हुए शिव के एक रूप, मग्नि, को हत्य प्रपित पिया या। १६ जब दामो ( राक्षसों ) के नाश करने वाले स्वामी (विष्णु) तपस्या कर रहे थे तो 'नन्दम' (उनका राङ्ग) सुगंपत होकर मुरा और गमिधा ही काटने में तत्पर रहना पा पौर राव उरो देवताप्रो के शत्रुओं के गिरे हुए पक्ष से यहती हुई घिर रूपी मदिरा में कोई मानन्द नहीं रह गया था। उरा रामय पुन्तुभियों के पोर नाद के कारण भएदूर रणभूमि में पहुंप कर भय उप. जाति हुई उनसी (विष्णु की)गा, गपों के सिर पर कर शिरस्त्राणों को टुकारे गरणी, उनके गग्गा पा पान नहीं करती थी।

पञ्चमः सर्गः नवं स्वकोशाहृतवारिधारया वनं तरूणामनुगृहृता रणे। 'न पाचजन्येन जनस्य तेनिरे भियो विशुष्काशनिभैरवैरवैः ॥१८॥ सलीलमुद्दण्ड सरोज विष्टरे निपद्य पादेन पुरोऽवलम्बिना । परिस्पृशन्त्या चलवीचिमस्तकं तदा किलागायि कलं न पद्मया ॥१६॥ फणावतामुद्धरणेषु वारिधिप्रवाहसिक्तावुदयाचलस्थितः। वितत्य पक्षावधिपः पतत्रिणां व्यशोपयन्न प्रतिसूर्यमायतम् ॥२०॥ विहारमारण्यकमिष्टवस्तुदं विहाय वल्केन समं वितूस्तयन् । इतः किल क्रोधपराहतो हरिः पुरा प्रतस्थे वलिबन्धसिद्धये ॥२१॥ ततः प्रहत्येव गुणस्य सम्पदा हिरण्यगर्भस्य विवूहिसया । निपेव्यते श्वापदसंपदा पदं तपस्विनामृद्धमिदं शमावहम् ।।२२॥ प्रगृह्य पुच्छे शिशवस्तपस्विनां मसीपयःसेककृतानिवासितान् । यदङ्गविन्दून् गणयन्ति चापलाद्विलोकयद्वीपिनमेनमग्रतः ॥२३॥ १८. पाञ्चजन्य शंख ने अपने छिद्र से निकलती हुई जल की धार से (मीच कर) उस नये वन को अनुगृहीत कर, शुष्क विद्युत की कड़क के समान भपनी भीपण घ्वनि से, युद्ध में लोगों के हृदय में भय नहीं उत्पन्न किया। १६. उस समय ऊँचे नाल वाले कमल के मामन पर बैठ कर (मरस्वती) सामने लटकते हुए अपने पैरों से, लहराती हुई तरङ्गों के मस्तक को सेलवाड़ से छूती हुई अपना ललित गायन नहीं करती थीं। २०. उदय गिरि पर बैठे हुए, पक्षिराज गरुड़, समुद्र से फग वाले सो को निकालने के कारण, जल प्रवाह से भीगे हुए अपने विशाल पंखों को धूप में नहीं सुसाते थे। २१. प्राचीन समय मे, मनोवाञ्छित फल देने वाले इस वन के विहार को घोड़, वस्पल का चौर पहिन पोर कधे से बालों को भार कर, पोध से भरे हुए हरि, इसी स्थान रो वलि यो बांधने के लिये गये थे। २२. उस समय से हिंगम जन्तुषों का समूह, जैसे ब्रह्मा के गुणों के उत्कर्ष रो प्रभावित होरर, हिंसा की प्रवृति छोड़, तपस्वियो के इस शान्ति देने वाले, समृर प्रदेश में रह रहे है। २३. (हे सदमए) यह मामने देगो, ताम्बियों के बालक मानता मे एक दुये को पूंछ गे पार कर सके परीर के पाले पन्नों को, जो स्याही में गिरने में बने हा मगले थे, गिन रहे हैं।

६४ .. जानकीहरणम् इमौ हरि संहृतरोपङ्कितौ नितान्ततप्तौ तपनस्य दीप्तिभिः । तलं गजस्य स्रुतगण्डसंपदः फणातपत्रं फणिनश्च वाञ्छतः ॥२४॥ तथा गिरं व्याहरतैव रोदसी वितत्य :याते पवनेन रहसः । विधूनयत्तद्विपिनं द्विषद्वलं ध्वजैरुपालक्ष्यत काकलाञ्छनैः ॥२५॥ सरोपरक्षः प्रतिविम्बविग्रह कृपाणपत्रे शरदम्बरत्विपि। विगृह्णतां जीवितपानलिप्सया स्थितः समास्थाप्य यमो यथा बभौ ॥२६॥ असंख्यगृह्या अपि तत्र सैनिकाः पिशाचरक्षस्ततिभिनिरन्तरम् । कृतान्धकार रथचक्ररेभिर्जगुर्जगत्सत्त्वरजस्तमोमयम् ॥२७॥ चकार लक्ष्यं प्रथमो बलोत्तरो नभः श्रितं तत्पदिको बलं द्विषाम् । तति क्षितिस्थामनुजो जघान च द्रवत्तुरङ्गामतिदन्तवद्विभुम् ॥२८॥ बन २४. वह देखो, एक सिंह और मेंढक, सूर्य को जलती हुई किरणों से खूब तपे हुए, अपनी अपनी क्रूरता और भय को रोक कर, सिंह तो, माथे से मद बहते हुए हाथी के नीचे और मेंढक सर्प के फन के साये मे जाने की इच्छा कर रहे हैं । २५. ज्योंही वे (राम) इस प्रकार कह रहे थे, उन्होंने देखा कि ग्राकारा और पृथ्वी पर फैली हुई शत्रुषों की एक सेना जिसकी पताकाओं पर कोवे अङ्गित ये, वायु के वेग से झकझोरते हुए पागे बढ़ रही है । २६. पोध से भरा एक राक्षस जिसके शरीर का प्रतिविम्ब, शरद ऋतु के आकाश की तरह शुभ्र, उसकी तलवार को फल पर पड़ रहा था, यम के समान, जीवन के रक्तपान करने की इच्छा से, वहाँ डट कर बैठा है। २७. वहाँ असंख्य पिशाचों और राक्षसों को भीड़ से तथा उनके रयों के पहियों की धूल से उत्पन्न मन्धकार से, जगत, सत्व, रजस और तमस युक्त हो गया। विशेष--इलेष-"असंख्य गृहपा अपि"=गिनती में असंख्य होते हुए भी=सांख्य मत के अनुयायो न होते हुए भो । (राक्षसों के यतमान होने से 'सत्य' । पहियों को धूल उड़ने से 'रजस' और उससे जनित अल्पकार से 'तमस इन तीनों से जगत को सृष्टि-यह साक्ष्य का मत है।) २८ शत्रुपों की सेना जो माकारा में थी, उसे तो मति बलवान् और पैदल चलने वाले राम ने अपना लक्ष्य बनाया और उनके छोटे भाई ( सक्षमण) ने, पृथ्वी पर जो रोना पी, जिसमें घोड़े बड़ी तेजी से दौड़ रहे पे पौर जिनके सेनापनियों के बड़े-बड़े दांत थे, उन पर वार किया।

श्वमः सर्गा युधि द्विपा रामशरण दारिताः कृतत्वराघोरणमुक्तकन्धराः । यतो धरण्यामनुकृष्टवारिदं दिवः पतन्तो रुरुजुः स्वसैनिकान् ॥२६॥ शरासने वमनि लक्ष्यभेदने परैरुपालक्ष्यत नेषुसन्ततिः । ऋतेऽपि हेतोरिव दीर्णवक्षसो निपेतुरस्य प्रघने सुरद्विपः ॥३०॥ यथा गुणस्य ध्वनयः समुद्ययुनिपातशब्देन समं युधि द्विषाम् । तथास्य योद्धधनुपो विनिर्गता जवे विशेष विदधुः शिलीमुखाः ॥३१॥ सुरारिहस्तच्युतशस्त्रजालकान्यलब्धलक्ष्याणि चिरं नभस्तले । विशुष्कपत्रप्रतिमानि तच्छरप्रतानवातोपहतानि प्रभञ्जनेनाहितपक्षतिध्वनि प्रसर्पतां राजसुतस्य पत्रिणाम् । ऋभुद्विषस्ते प्रतिलोममाहृतैः शरैनिजैरेव दृढं निजन्निरे ॥३३॥ क्षतं पृपत्केन पतत्रिणां पथः पतलं तत्तनयस्य भूमृतः। निपातखेदादशिवे भुवस्तले भियेव तूर्णं जहुरन्तराऽसवः ॥३४॥ वभ्रमः ॥३२॥ २६. रणक्षेत्र में राम के वारण से मारे हुए हाथी बड़े वेग से भागे, जिसके कारण उनके कंधों पर बैठे हुए महावत गिर गये मोर वे मरे हुए हायी अपने साय यादलों को घसी. टते हुए जब माकाश से पृथ्वी पर गिरे तो उन्होंने अपने ही सैनिकों को कुचल डाला। ३०. राम के बागों की कतार इतनी तेजी से निकलती थी कि शनुमों को वह न तो धर्नुप पर दिसाई पड़ती थी और न (घनुप से निकल कर) मार्ग ही मे मोर न लक्ष्य के भेदने हो पर । ऐसा लगता था जैसे युद्ध में, देवतापो के शत्रु, जिनके वक्ष विदीर्ण हो गये थे वे पृथ्वी पर गिर कर विना कारण ही मर गये। ३१. युद्ध मे ही इस वीर (राम) के घनुप की प्रत्यञ्चा का निर्पोप पौर दामों के गिरने का शब्द मिल कर जितना ही बढ़ता जाता था, उतनी ही उनके ( रामके ) घनुप में निकले हुए वारणों की गति बढ़ती जाती थी। ३२. देवतामों के दामों के हाप से चलाया हुमा वाणों का समूह ठीक निशाना न लगाने के कारण, मपनी ही हवा के भोंके से तितर-बितर होकर माझाग में मूगी पत्तियो की तरह बड़ी देर तक इधर उधर घूमता रहता था। ३३. उस राजपुत्र (राम) के याण, जिनमे पर लगे हुए थे, चलने के समय यही प्यनि करते पे मोर उनमे बड़े वेग से वायु निरनती थी । उग वायु रे भोटे मे देवतामों के सामों के बारण, सट कर उन्हीं को बेतहागा मार रहे थे। ३४. (पृथ्वीपति दारय) के पुत्र के गणों मे मेना के दिन-मिल होने पर राक्षगों के प्रतः- प्राण, रोना मो छोड़ कर घरों के मागं ही में इस भय केमेर मे तुरन्न निरन गये कि यहाँ ये दम ममंगलकारी गृप्यो पर न गिर पर्ट।

६६ जानकीहरणम शितांकुशन्यांसविधूतमस्तकाः शिरःसमीपे विनिविष्टवाहवः । ध्रुवं नदन्तो युधि तं प्रहारिणं भयादयाचन्त यथाऽरिदन्तिनः ॥३५॥ द्विपं करीरीयुगमूलखण्डितप्रशीर्णदन्तं समदेन पश्यता । मृधावतारव्यथितेन चेतसि क्षणं विचक्रे निकटेन दन्तिना ॥३६॥ करी करं यातमुदप्रविग्रहः परं प्रहर्तुं प्रतिहृत्य रंहसा । शरेणभित्वा निखिले निकीलिते शशाक मोक्तुन भुजस्य मण्डले ॥३७॥ निकालिते रामशरेण वेगिना दृढं विभिद्योरुयुगं कुरङ्गमे । कृतेऽपि दोपे भयमूढवृत्तिना हयेन कश्चिद्विचचाल नासनात् ॥३८॥ रिपोरपूर्णेन्दुमुखेन कश्चन स्थिरासनः पत्रियुगेन राक्षसः। निकृत्तयोरप्यधिजानु पादयोः पपात वेगेन यतो न वाजिनः ॥३६॥ वधाय धावन्नभिशत्रुविद्विषः शरेण कृत्तच्युतमस्तकोपरः । हृतायुरप्यादिकृतेन कानिचित्पदानि वेगेन जगाम राक्षसः ॥४०॥ ३५. शत्रुओं के हाथी, जिनका सिर तेज अंकुश के प्रहार से भता गया था, अपने दोनों अगले पैर मस्तक के समीप लाकर भय से चिग्धाड़ने लगे जैसे वे युद्ध में प्रहार करने वाले से (न मारने की) याचना कर रहे हों। ३६. निकट में खड़े हुए एक हाथी ने, जो युद्ध में आने के कारण व्यथित था, एक दूसरे हाथी को जिसके दांत जड़ पर टूट जाने से हिल रहे थे, बड़े गर्व से देस कर क्षण भर में अपना इरादा बदल दिया। ३७. एक भारी-भरकम हाथी ने अपने मुंह को, जिसे उसने शत्रु को मारने के लिये मागे वढाया था, बड़े वेग से गोच लिया। पर एक वारण के लगने से सम्पूर्ण गर्दन में रिपिट' (दृढ़ता से घंसना) हो जाने के कारण उसे वह छुड़ा न सका। ३८ जब राम का प्रति वेगगामी वारण एक सवार की जांघों को घेदता हुआ घोड़े के पेट में दृढता से पंस गया । यद्यति घोड़ा भय के मारे विचकता रहा पर (उगके साथ एकजुट हो जाने के कारण) मवार अपने प्रागन मे नहीं हटा । ३६ एक राक्षग घोड़े पर ऐमी हरता मे पागन जमा कर बैठा था कि यद्यपि पा (गम) मे दो वाणो मे, जिनके प्रप्रभाग मधंगन्द्र के समान थे, उमरे दोनों पैर घुटने में नापे मे पट गये थे, फिर भी वह पोड़े की तीय गति में पारण नीचे नहीं गिरा। ४०. १ (राम) गो मारने के लिये दौड़ते हुए एम दूगरे रासग का गिर राग ये याण माद गिगया । यपि उगरा प्राणान्त हो गया था, फिर भी (पूर्व प्रेग्नि) गति के सारण पर गई पग मागे या गया।

नश्चमः सर्गः ६७ जवेन कश्चिज्जवनाम्बुदोपमं क्षणं सिताभैः कृतकणंचामरम् । निपत्य कुम्भे तरसा द्विधा गतैर्विहायसा वाहयति स्म दन्तिनम् ॥४१॥ पृषत्कभिन्नोदररन्ध्रनिर्गतं स्वमन्त्रमुत्कृत्य खुराप्रपातनैः । दिशिक्षिपन्तं युधि वेगधारयाऽपरो भुवं वायतिस्म वाजिनम् ॥४२॥ निकृत्य सौमित्ररथाङ्गधारयाऽपवणितं स्वं तरसा क्षपाचरः । क्रुधायुधीकृत्य भुजं महीभुजः सुतं जधान ध्वनिकम्पितस्थलः ॥४३॥ न्यमन्नदन रथाङ्गमीरितं परेण शत्रोरुपदण्डमस्तकम् । तमेव दण्डं परशुं विधाय तं शिरस्यरातिनिजघान सस्वनः ॥४४॥ स्वपाणियत्रच्युतशस्त्रसादितं विधाय वृन्दं बहुधा सुरद्विषाम् । रणाय कोशादसिमीशितुः सुतश्चकर्ष कृष्णं विवरादिवोरगम् ॥४५॥ परस्य सौमित्रिकृपाणपाटितद्विधाभव हमृतो निकीलयन् । शरेण पावें नृहरिः समग्रतां व्यधत्त रोपेण नु लीलया नु सः ॥४६॥ ४१. तेजी से भागते हुए, बादल के समान, एक राक्षस फुर्ती से हाथी के मस्तक पर चढ़ कर, बादलों को चीरता हुमा ऐसा लगता था जैसे उसके दोनों ओर वर चल रहे हों। ४२ एक दूसरा राक्षस प्राकाश मे अपना घोड़ा भगाये लिये जा रहा था। वाण से विदीर्ण किये हुए उस घोड़े के उदर के छिद्र से अंतडियां निकल पड़ी थी जिन्हें वह अपने टाप के अग्रभाग के झटके से, अपनो द्रुतगति से रणभूमि मे चारो ओर फेंक रहा था। ४३. अपने गजेंग से पहाड़ को कंपा देने वाले एक निशाचर के हाय को जब लक्ष्मण के तीमे चक्र ने काट कर बलपूर्वक दूर फक दिया तो उस निशाचर ने प्रोप में अपने उस हाथ को मायुध की तरह प्रयोग कर, पृथ्वीपति के पुत्र (राम) को मारा । ४. जय राम का फेंका हुमा चक्र एक राक्षस की गदा के उपरी भाग में भाषा म गया तक गरज कर उस राक्षम ने उससे (गदा से) फरमे का काम लेकर उनके सिर पर मारा। ४५. जय राजपुत्र देवनामों के शत्रुमों के समूह को अपने हाप में लिये हुए यंत्र से शस्त्रों मे द्वारा भनेक प्रकार से मार चुके तब उन्होंने, युद्ध के लिये म्यान मे तलवार सींची मे बिल से मोई वाले माप वो गीचे। ४६. सदमण की तलवार मे दो टुकड़े किये हुए एक राग के शरीर को पुरुष मिह (राम) ने तीर मे भेद कर दोनों टुकड़ो को कोष मे पयवा गेलवाड़ में समूपा कर दिया।

६८ जानकीहरणम् करं रणाय प्रतिहत्य धावति द्विपे निजघ्ने तनयेन भूभुजः । बहुनि खण्डानि विधित्सुनाऽसिना समेत्य सम्पिण्डित एव तत्करः ॥४७॥ कृपाणकृत्तस्य दृढोरुयन्त्रितं न पश्चिमाई :निपपात सादिनः । तुरङ्गवल्गादृढकृष्टमूष्टिना परेण भागेन. च. लम्वितं पुरः ॥४८॥ परेण खङ्गेज्नुपपात पातिते सुरारिरुत्तानविसृष्टविग्रहः । अपि व्यपाये सति सत्त्वमानयोद्विषे न दित्सन्निव पृछमाहवे ॥४६॥ निमग्नखङ्गे जठरे सुरद्विपः परिक्षरच्छोणितसिक्तमूर्तयः । परस्परस्य प्रसभं समुच्छ्वसत्प्रहारवातेन पुनर्विशोषिताः ॥५०॥ ततस्ततासृक्लवलोहिताम्बरः श्रियं जयस्थामुपयन्तुमुद्यतः । प्रथेप्सपानाशनतृप्तचेतसश्चकार राजन्यवरश्चिरं द्विजान ॥५१॥ ततो मरुत्पावकशस्त्रनिर्वतप्रदग्धमारीचसुबाहुविग्रहः । वलं बलीयानवलीकृतं भिया ततं दिगन्तं स निनाय नायक: ॥५२॥ ४७. जब एक हाथी अपने सूंड को सिकोड़ कर युद्ध करने के लिये दौड़ा पा रहा था पृथ्वीपति के पुत्र (राम) ने उसको टुकड़े-टुकड़े कर डालने की इच्छा से उसके निकट पाकर, अपनी तलवार से, उस सूड सिकोड़े हुए हाथी पर वार किया । ४८. यद्यपि एक घुड़सवार का नीचे का घड़ तलवार से कट गया था परन्तु अपनी जांघों में (घोड़े को) कस कर बैठने के कारण वह नीचे नहीं गिरा । और घोड़े की लगाम को मुट्ठी से कस कर थामे रहने से उसका ऊपरी धड़ सामने लटकता रह गया। ४६. राम ने देवतामों के एक शत्रु (राक्षस) को मार गिराया तो वह उतान (=यक्ष कार पौर पीठ नीचे) गिरा । यद्यपि उसके प्राण और उसका दर्प नष्ट हो गया था फिर भी ऐगा लगता था जैसे युद्ध में वह शत्रु को पीठ नहीं दिखलाना चाहता था। ५०. देवतामों के शत्रुओं ( राक्षसों ) के पेट में तलवार के धुम जाने से उसमें से बहते हुए रुधिर से उनके शरीर भीग गये थे। पर प्रहार-पर-प्रहार करने से जोर-जोर सांस लेने से उसकी हवा से वह रुधिर मूरा गया । ५१. तब उस क्षत्रिय श्रेष्ठ (राम) ने, जिसके कपड़े रुधिर के छीटों रो रक्तवणं हो गये थे, विजय लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिये, उद्यत होकर, गिद्धों को, बहुत दिनों याद, जीभर फर मांस भोजन पोर रुधिर पान मे तृप्त किया। ५२. सब उस बनवान् नेता (राम) ने मारीच और गुवाद से शरीर को वायव्य पौर माग्नेय परत्रों रो छिन्न-भिन्न और दा करने में पञ्चात्, भप गे नियंत मेगा को दिगापों में पन्त तर गदेड दिया।

पञ्चमः सर्गः रणे दधानो हृदयं दयाहृतं सलोलमायम्य धनुर्धनुर्धरः । पराङ्मुखानां शनकैः शिलीमुखाद्विषद्विपानां जघने जघान सः॥५३॥ भृशं न सेहे ' युधि युधि राममाशुगप्रतानशुष्काशनिपातभीषणम् । युगान्ततिग्मद्युतितेजसं द्विपो बलीयसो भ्रातृबलान्वितं बलम् ॥५४॥ स्थित्वा गुणे महति तत्क्षणलब्धमोक्षाः सुश्लिष्टयुक्तिसफलाननसम्पदस्ते। शाक्या इवास्य विशिखा रिपुसैनिकेभ्यश्चक्रुस्सिविष्टपसभागमनोपदेशम् ॥५५॥ हुतभुजि निधनाख्ये शत्रुहव्यानि हुत्वा परिणयति जयश्रीवीरकन्यां नृवीरे। समरपटहकोपे तत्र नृतं कबन्धर्वहलरुधिरपङ्कस्फारिसिन्दूरलेपैः ॥५६॥ मध्येनिकृत्तरजनीचरपूर्वकायाश्छेदैः स्थिता भुवि निपत्य भयं वितेनुः। रक्षःसु युद्धविमुखेषु विभिद्य भूमीम त्थिता इव पुनः समराय दैत्याः ॥५७॥ - ५३. तब उस धर्नु घर ने, जिसका हृदय युद्ध में दयार्द्र हो जाता था, घनुप को रोक कर शत्रुनों के हाथियों को जंघा को, जिन्होने बाणों से मुंह फेर लिया था, प्रेम से धीरे-धीरे थपथपाया। ५४. अपने भाई (लक्ष्मण) के बल से समन्वित, शुष्क विद्युत के गिरने के समान भयङ्कर, प्रलयकालीन झुलसाने वाली सूर्य की प्रसर रश्मियो के समान प्रचण्ड राम के पर- समूह को बलवान शत्रुओं (राक्षसों) की सेना युद्ध में बिलकुल न सह सकी। ५५. लम्बी प्रत्यञ्चा पर चढ़ कर फुर्ती से छोड़े हुए, बडी योग्यता से प्रयुक्त होने के कारण, सफलता से श्रीसम्पन्न जिनके अग्रभाग हैं, ऐसे (राम के) तीसे बाग, बौद्ध भिक्षुओं की भांति, शत्रु के सैनिकों को इन्द्र की सभा में जाने का उपदेश दे रहे थे। विशेप 1-शावया इय:-गणे महति आनन्द, शान्ति इत्यादि गुणों से सम्बन्धित । 'तत्क्षण लन्ध- मोक्षः' =उसी क्षण मोक्ष की प्राप्ति । 'मुश्लिष्ट युक्ति सफलाननसंपद' = गम्भीर योगाभ्यास से जिनका मुख देदीप्यमान हो रहा था। 'विशिखा' =जिन्होंने चोटी कटया दो पो । 'रिपु सैनिकाः' =भार के सायो। ५६. विनारा नामक अग्नि में दात्रुनों को माहुति देकर उस पुरुषवीर ने जब विनयधी की वीर कन्या के साथ विवाह किया तब रण के नगाड़े बज रहे थे, कबन्ध जिनके शरीर पर, सिन्दूर की तरह रुधिर के कीचड़ का लेप मूब पुता था, न च रहे ५७. वीन मे कटे हुए निगाघरों के पृथ्वी पर पड़े हुए टुकड़े दिल दहला रहे थे। ऐगा लगता था जैसे युट मे भागे हुए राक्षस पृथ्वी को फोड कर माघे याहर निकले हुए, युर करने के लिये फिर बाहर निकल रहे हैं।

७० जानकीहरणम् रामायुधव्यथितराक्षसरक्तधारास्पर्शेन लोहितरचो मुहुरम्बुवाहाः । गौरीपतिप्रणतिसम्भ्रमलाभवन्ध्यां सन्ध्यामकालघटितां गगने वितेनुः ॥५८॥ संक्रीड़द्रथतुरगद्विपाभ्रवृन्दव्युत्क्रान्ती विरतपृषत्कपातवृष्टि । निस्त्रिंशस्फुरिततडिद्वियुक्तमाप व्यक्तार्कद्युति शरदीव तन्नभः श्रीः ॥५६॥ रक्षोवसापिशितपूरितकुक्षिरन्ध्रः काकुत्स्थवाणहतहस्तिमुखाधिरूढ़ः । पर्यन्तलसरुधिराणि मृदुप्रणादस्तुण्डानि वायसगणो रदने ममाज ॥६०॥ राजात्मजौ मुनिसुताक्षिभिराहिताध्यौं प्रत्युद्गतौ मृगकुलैरुटजानि गत्वा । आवर्जिते विदधतुः शिरसी सुवाह्वोर्वाणवजेन गुरुणी गुरुपादमूले ॥६१॥ इति पञ्चमः सर्गः। ५८. राम के शस्त्रों से वध किये गये राक्षसों के रुधिर के स्पर्श से रक्त वर्ण, जल से भरे मेघों ने, असमय आकाश में रह-रह कर संध्या का विस्तार किया, जो गौरी-पति शिव की अर्चना के लाभ से विहीन थी। विषेश-बावल के लाल होने से पूजकों ने सन्ध्या के भ्रम से शिव को प्रणाम किया। पर उन्हें उसका कोई लाभ नहीं हुआ, यह भाव है। छन्द-वसन्त तिलक । ५६. मेघों के सदा खेलवाड़ करते रथों, घोड़े मोर हाथियों के निकल जाने से, एवं वृष्टिपात के सदृश वाणो का चलना बन्द हो जाने से, पौर विजली की चमक की तरह चलती हुई तलवार से मुक्त हो जाने पर, प्रकाश में ऐसे सौंदर्य का सञ्चार हुमा जैसा सूर्य की चमक से शरद्कालीन नभ में होता है । ६०. धीरे-धीरे काय-कांच करता हुमा, कौयों का एक झुंड, काकुत्स्थ थे वंशज (राग) के वारणों से मारे गये हाधियों के सर पर बैठ कर, अपने उदर के गड़े को राक्षसों के मांस पोर मया से भर, अपने टोंट के अनमाग पर लगे हुए फघिर को, हाथियों के दांतों पर रगड़ कर माफ कर रहा था। ६१. दोनों राजपुत्र (राम और पौर लक्ष्मण) ने जिन्हें तपस्विकन्यायें (हतिरेक से महते हुए) मथुपारामों से मय दे रही पी मौर जिनका मृगों का मुंड पीपा मार रहा पा, मुनि के कुटियों में जागर, सुबाहु मोर मारीच के बाणों से सगे हुए पावों से मतगत मरतयों को गुरुनरणों में नवाया। पौधों में समाप्त पष्ठः सर्गः उच्चचाल ततः स्रष्टा जगदंशस्य मैथिलम् । अनुग्रहीतुमग्रण्यं गृहिणामाहितन्तुम् ॥१॥ विभ्रत्सन्ध्याविधिस्नानसंवर्धितरुचो जटाः । ज्वाला इव तपोवह्नः शालिशूकानपिङ्गलाः ॥२॥ तेजसातपसो दीप्त: स्निग्धश्च करुणागुणात् । समं सन्दर्शितादित्यचन्द्रोदय इवाणवः ॥३॥ शिरः प्रदेशलम्बिन्या कुर्वन रुद्राक्षमालया। फलिता इव तीर्थाभ्मः सेकपुष्टया जटालताः ॥४॥ अरण्यदेवताभिः प्रयुक्तबलिमङ्गलः । व्रती निरगमत् सत्रान्मेघाबध्न इव ज्वलन् ॥५॥ १. संसार के एक अंश का सजन करने वाले (विश्वामित्र) अपने पाश्रम से, गृहस्थों के प्राणी, मिथिलाधिपति (जनक), जिन्होंने हाल ही में एक यज्ञ भारम्भ किया था, को अनुगृहीत करने के लिये उठ कर चले। २. सिर पर जटाजूट धारण किये हुए, सन्ध्यावन्दन के हेतु विधिवत नित्यस्नान से जिनकी कान्ति बढ गई थी और चावल के पौधों के भप्रभाग के सदृश पिङ्गलवर्ण वाले, तपस्या की मलि को लपक के समान (वे विश्वामित्र, याला से निकले। विषेश-लोक २ से ५ तक कलापक' है। हर श्लोक के साथ "स सवाग्निरगमन्" ( वे यज- भाला से निकले) पढ़ने से अन्वय होगा। कलापक की प्यास्या देखिपे २-२। ३. तपस्या की प्रभा से दमस्ते हुए, करुणा के कारण स्निग्ध, समुद्र मे मूर्य मौर चन्द्र के एक साप उदय होने के समान । ४. सिर से सकटती हुई रुदाक्ष की माला के गम्पकं से ऐमा लगता था जैगे तोपं के जन से सिञ्चित उनकी जटा रूपी लता में फल लगे हों। ५. वह तपस्वी जिसे वन देवनामों ने मंगल बलि अर्पित की थी यानाला मे ऐसे निस्ता मे दमकता हुमा मूयं बादत से निकलता है ।

७२ जानकीहरणम निनाय हरिणवातं स्वयं यत्नेन वर्द्धितम् । प्रस्थितं सह संरुध्य वाष्पापूरितलोचनौ ॥६॥ गमनव्याहृतारम्भप्रणामेषु महर्षिभिः । प्राणिभिः शिरसि स्पृष्टौ हव्यधूमसुगन्धिभिः ॥७॥ वैखानसवधूहस्तलम्भितार्यकृताशिषौ । तौ द्रष्टुकामौ मेदिन्या ईश्वरस्य सुतौ धनुः ॥८॥ ततश्चिरपरित्यक्तं गौतमस्य तमोनुदः। विवेश विश्वभुग्धानो धाम वर्त्मवशादशी ॥६॥ स्थपुटासु कुटीरस्य निकटाङ्गनभूमिषु । . . प्ररूढदर्भसन्दर्भघासनासोद्यतद्विपम् ॥१०॥ कचिदुद्दे हिकाऽऽलीढजीर्णवल्कलमन्यतः । आरण्यतुटुमच्छिन्नशीर्णकृष्णमृगाजिनम् ॥११॥ ६. अपने यत्नों से पाले-पोसे, पीछे-पीछे चलते हुए मृगों के झुंड को रोक कर, हर्षातिरेक से आँखों में आंसू भरे राम और लक्ष्मण को साथ लेकर (विश्वामित्र) चल पड़े। विषेश-श्लोक ६ से ८ तफ 'विशेषक है। "विशेषक' को व्याख्या देखिये, २-२ । ७. प्रस्थान की चर्चा के प्रारम्भ में जब दोनों भाइयों ने गुरुजनों को प्रणाम किया तो उन लोगों ने हम्य मे सुगंधित अपने हाथों से उनके सिर को स्पर्श किया । ८. जव आश्रमवासियों की पत्नियों ने पृथ्वीपति के उन दोनों पुत्रों को अध्यं प्रदान किया तो उन्होंने उनको पाशीर्वाद दिया। ६. तब जितेन्द्रिय मुनि ( विश्वामित्र ) अग्नि के समान तेजस्वी, मन्धकार को नाग करने वाले, गौतम के प्रायम में गये, जो रास्ते ही में था मोर जो बहुत दिनों से गाली पड़ा पा। १०. जहाँ फुटी के निकट, मांगन में उगी हुई घास को पाने के लिये हाथी उपत थे। विषेश-१० से १३ श्लोक सक'कुलक' में आथम वर्णन है। पुसककोप्याल्या देविये, २-२ । ११. जीवनम के पुराने वस्त्रों को दीमको मेगा साला पा और कृष्ण मृग के गर्म निगरो अगली पूहों ने कुतर माना पा, पर होकर सूरा गये थे।

पष्टः सर्गः ७३ तलस्थितजरत्कुम्भमुखान्निर्गच्छताऽहिना । आवजितपयस्तिम्यद् वृक्षमूलमिव क्वचित् ॥१२॥ । क्वचिद्विष्णुप्रतिच्छन्दः कुक्षिस्थविवराननात् । नकुलैरन्त्रवत्कृष्टवेष्टमानसरीसृपम् ॥१३॥ तस्मिन्निजपदस्पर्शत्याजितग्रावविग्रहम् । पप्रच्छ स्त्रीमयं तेजो रामः शापस्य सम्भवम् ॥१४॥ निगद्यासौ सुनासीरं व्रीड़ा नम्रीकृतानना । न्यवीवददनुक्त्वैव यौवनाविनयं पुरा ॥१५॥ ययौ रामोऽथ तं देशं मरुतामास वेगिनाम् । पुरुहूत हतभ्रूणच्छेदेभ्यो यत्र संभवः ॥१६॥ प्रतीत्या लधिताध्वानस्ते तोरणमणित्विषा । इति चेतोहरा राममभिव्यातेनिरे गिरः ॥१७॥ मत्तमातङ्गसंदानदामनिर्दलितत्वचः । अजय्यत्वं वदन्तीव यस्य पर्यन्तभूरुहः ॥१८॥ - १२. कही वृक्षों की जड़ें, धी जो पृथ्वी पर पड़े हुए घड़े के पानी से जैसे भीग गई हों, जव उसके मोहढे से निकलते हुए सांप ने उसे लुढका दिया । १३. कही विष्णु की मूर्ति के पेट के गढ़े से, उस में गुड़री मार कर बैठे हुए सर्प को अंतही की तरह, नेवले सींच रहे थे। १४. पाश्रम में राम ने उस कान्तिमयी स्त्री से, जिसने उनके चरणस्पर्श से पत्थर के पारीर को छोड़ दिया था, शाप का कारण पूछा। १५. "पूर्व समय में इन्द्र" कह कर लज्जा से मुख नीचा किये हुए, विना और कुछ कहे उसने अपनी यौवनावस्या में अपने पतन की बात कह डाली। १६. तब राम उम प्रदेश में गये जहाँ इन्द्र ने गर्म के टुकड़े-टुकड़े कर डाले घे पोर उनसे वेगशाली मरतों का जन्म हुमा था । १७. अपने भनुभव एवं तोरण द्वारो पर जड़ी हुई मरिणयो को प्रभा से मार्ग को पार कर वे राम से मनोहारी वचन बोले। १८. नगर के पर्यन्त भाग पर लगे हुए वृक्षों के ववले, उनमें ( वृक्षों में ) बंधे हापियों की रस्सी से उघड़ जाने से, जैगे नगर के पत्रेय होने का विज्ञापन कर रहे थे।

७४ 'जानकीहरणम् ताराबजस्पृशो . याति पिधानत्वं निशाकरः । यत्र प्राकारचक्रस्य । नभोमध्यस्थमण्डलः ॥१६॥ मध्ये कुवलयाक्रान्तमहापद्मविभूषणः । अवतीर्णघनालिश्रीयंत्खातः सागरायते ॥२०॥ वप्राजगरभोगेन वेष्टमानः समन्ततः। पिण्डीभूत इव प्रासाधनो यद्गृहसंचयः ।।२१॥ यद्गोपुरविटङ्कामचन्द्रकान्तमणिस्रवम् । रसयन्ति स्यदधान्ताः शीतदीधितिवाजिनः ॥२२॥ विटङ्कभुजसंप्राप्त सहस्रकरमूर्तिना। विग्रहेण यदावाससन्तानो भार्गवायते ॥२३॥ यद्दे वगृहशृङ्गस्थपद्मरागप्रभाऽहतम् । व्योममध्यं प्रपद्यापि विम्बं वालायते रवेः ॥२४॥ हर्म्यशृङ्गषु नि तध्वान्ता यत्र मणित्विषः । ज्योत्स्तःकृष्ण इति ज्ञानं जने रुन्धन्ति पक्षयोः ॥२५॥ १६. जहाँ आकाश के बीच मे स्थित चन्द्र मण्डल, तारागणों को छूटी हुई, नगर की गोला- कार चहारदीवारी के लिये ढक्कन बन गया था । २०. नगर को परिखा जो श्वेत और नील कमलों से विभूषित थी और जो बीच में मंडराते हुए मुंड के मुंड भ्रमरों से सुशोभित थी, समुद्र के समान लगती थी। २१. अजगर के समान प्राचीर को परिधि के भीतर घने बने हुए मकानों का समूह ऐसा लगता था जैसे वह, भय के कारण एक स्थान पर एकत्र हो गया हो। २२. चन्द्रमा के घोड़े, अपनी तेज चाल के कारण थक कर, नगर के फाटकों पर कबूतर की छतरियों से लटकते चन्द्रकान्त मरिण से रसते हुए जल को चाटते हैं। २३. हायो के समान लगने वानी, कबूतरों की छतरियों के कारण, सूर्य के समान मकानों षी परम्परा शुक्र के सहस लगती थी। २४. यति सूर्य का विम्ब माकाश के मध्य में मा गया था (अर्थात् यद्यपि यह तरुण मूर्य था) पर देवालयों के शृंगों पर लगे हुए, फमल के रंग के हीरों भी चमक से हार कर वह वाल मूर्य लगता था। २५. जहाँ मकान की मीनारों पर लगे हुए रत्नों की भमा के कारण, अन्धकार दूर हो जाने से लोगों को यह पता नहीं चल पाता पाकिसुरल पक्ष है या कृष्ण पदा ।

पष्ठः सर्गः यत्र वातायनासन्नवारमुख्यामुखेन्दवः । रथ्यासंचारिणो यूनः स्खलयन्ति पदे पदे ॥२६॥ श्रुत्वा यत्सोधपृष्ठेषु विमानशिखिनिस्वनम् । याति शैथिल्यमुष्णाशुहयभोगीन्द्रवन्धनम् ॥२७॥ सोपानरत्ननिभिन्नतमश्च्छेदेन दशिताः । ग्लायन्ति यत्र न सरश्चक्रवाका निशास्वपि ॥२८॥ यस्य हऱ्यासमासन्नतिग्मदीधितिवाजिनः । मन्दं व्रजन्ति सङ्गीतवीणाऽवर्जितचेतसः ॥२९॥ पौरसन्दोहभोगस्य श्रिया वनमृतः पुरीम् । अधो विधत्ते धामेदं मैथिलस्य पुरं परम् ॥३०॥ इति व्याहरतैवाथ तेन स्थानं महीयसः । पुरमृद्ध क्रतुपतेनिन्याते नेतुरात्मजौ ॥३१॥ कृतपाद्यो भुवोभत्तुः स व्रती प्रमदाश्रुभिः । विष्टरं परिजग्राह सिंहचर्मोत्तरच्छदम् ॥३२॥ २६. जहाँ राजपथ की खिड़कियों पर बैठी हुई, प्रमुख. चन्द्रमुखी वेश्यामों के कारण, रात में मैलानी युवा पुरुष पग-पग पर ठोकर खाते थे। २७ राजमहल की छत पर चलते हुए मयूरों की वाणी सुनकर मूर्य के घोड़ों की विशिष्ट सों पी रास ढीली पड़ जाती थी। २८. जहां मीढ़ियों पर जड़े हुए रत्नों की प्रभा में सरोवर में रहने वाला परवा दिसलाई पड़ जाता या पौर रात्रि में भी मन्धकार दूर हो जाने के कारण उमरी उदागी दूर हो जाती पी (वह समझना या कि दिन हो गया, मब चाई से भेंट होगी, यह भाव है)। २६. ही मूर्य के पोहे महनों के निकट पहुँन कर, गायन पोर वीणा के स्वर से मारप्ट हो धीमे-धीमे चलने लगते थे। ३०. मिपिलाधिपति का यह नगर पौरजनों के मानन्द की प्रचुर मामी की थी के कारण इन्द्रपुरी को नीचा दिगाता था। ३१. इस प्रकार रह कर ये (विश्वामित्र), (रामानों के) नेता (गरप) दोनों पुत्रों को, सा करने में प्रमुग महारमा (ना) के गर म्पान पर से गये। ३२. योनि (अनर) मे पारायं मेरर, यह पनी (विवामित्र) नेत्रों में पानन के पागू भर पर, एक आमन पर गिमके ऊपर मिहापमं पा, ।

. जानकीहरणम् - स्तुत्या सुतीवलं सो जगादोत्साहयन्मुनिः । प्रभोजत एवाग्ने निःस्पृहेण प्रभोरपि ॥३३॥ यो धर्मस्य धृतः सप्तनन्तुभिः सगरादिभिः । तन्तुः स एव सम्राजा सम्यगालम्बितस्त्वया ॥३४॥ अपि सत्यां विससायामविस्रस्तां तव श्रियम् । विक्रमस्य वदन्तीव सत्रसंभारसम्पदः ॥३५॥ कृतवेलाव्यतिक्रान्तिस्त्वरासकोचिताम्बरा। साभिसारव ते कीतिर्दूरमाक्रामदाशया ॥३६॥ कच्चित्स्वार्थे क्रतुरयं स्वय॑स्तव फलस्पृहाम् । विनैव प्रथते कच्चिन्निःस्वम्प्रति वदान्यता ॥३७॥ आदाय करमाढ्यभ्यः कीकटेष्वपि वर्षसि । प्रपीय वारि सिन्धुभ्यः स्थलेष्विव घनाघनः ॥३८॥ ३३. विश्वामित्र, जिनके हृदय में किसी प्रकार का लालच नहीं था, विधिवत् यज्ञ करने वाले (जनक) को उत्साहित करते, उनसे स्तुति के वचन बोले । ३४. सगरादि, आपके पूर्वजों ने, जो यज्ञों के द्वारा धर्माचरण के सूत्र का वरावर अवलम्बन किया था, उसी को सम्राट ने (मापने) उपयुक्तरीति से ग्रहण किया ३५. यद्यपि आप युद्ध हो गये हैं पर पापके यज्ञों की अभिवृद्धि का प्रोज, जैसे कह रहा है कि मापके पराक्रम का वैभव बूढ़ा नहीं हुआ है। ३६. भापकी कीति ने, जिसकी तीव्र गति से पाकाग छोटा पड़ गया है और जो ममुद्र तट को पार कर गई है, पभिसारिका की तरह लम्ले-सम्वे डा बढ़ाते हुए दिगन्त के पार पली गई है। ३७. यह स्वर्ग में से जाने वाला यन माप स्वार्थ के लिये कर रहे हैं या बिना किसी मालप के, गरीबों के प्रति उदारता से कर रहे हैं। ३८. ( पाशा करता हूँ कि) पनी सगों से कर लेकर पार उरो गरीयों को दो है। बी परगने पाना मेप गारियों से पानी सेकर पृथ्वी पर बरगाता है। विपेदाप्रमानामेव भूरपयं सतायो यतिमाहीत । सहस पुप भरपष्ट मारसहि सं रविः॥ रघुवंश -१-१८ ।

पष्टः सर्ग ७७ नवे वयसि राज्यार्थ प्रविधाय जरां गतान् । कच्चित्पुष्णासि ते मृत्यान सादरं समयेऽशमे ॥३९॥ त्वद्विक्रमेण वैधव्यं प्रापिता रिपुयोपितः । वालप्राणार्थिनीः कच्चित्सम्यग्रक्षसि बन्धुवत् ॥४०॥ द्वयेनादौ त्रिवर्गस्य कच्चित्साम्यं गतश्चिरम् । धर्मोऽद्य वयसो वृद्धया सह संवद्धते तव ॥४१॥ इति प्रश्नावकाशस्य विरामे रामलक्ष्मणौ । मुनेविवेद वैदेहो द्रष्टुकामौ निजं धनुः ॥४२॥ एकमुद्रेचितं तस्य भ्रूचापमनुजीविभिः । चापस्यानयने हेतुः क्षणमास क्षमापतेः ॥४३।। ३६. (मैं आशा करता हूँ कि) वे नौकर जो अपनी युवावस्था में राज्य की सेवा में अगुवा थे, वे जब बूढे होकर काम करने के योग्य नही रह जाते, उस समय आप उनका पादर से भरण-पोषण करते है। ४०. (मैं प्राशा करता हूँ कि) आप अपने शत्रुओं की स्त्रियों की, जो आपके पराक्रम से विधवा हो गई हैं और जो अपने बच्चों की रक्षा के लिये आपसे प्रार्थना करती हैं, उनकी अपने परिवार की भांति माप रक्षा करते हैं। ४१. (मैं माया करता हूं कि ) पहिले की भांति जैसे प्रापका धर्म, त्रिवर्ग के अन्य दो वर्गों (मर्थात् अर्थ और काम) से समता रखता था वैसे भव भी मापकी मायु की वृद्धि के साप-साप उस समता की वृद्धि हो रही है। कच्चिदयं च धर्म च कामं च नयतांवर । विभग्य काले काला सर्वान् भरत सेवसे ॥ अयोध्याकाण्ड, १००-६३ । विषेश-शास्त्र कहता है “पयिं कामाः समभेय सेध्याः । यस्त्वेक सेव्यः स नरो जपन्यः" पर्म, अपं और काम का समता से व्यवहार करना चाहिये । जो मनुष्य केवल एक को सेवा करता है यह जपन्य है। ४२. दम प्रसार जय मुनि पूध गुफे तर विदेहाधिपति को मालूम हुमा कि राम मौर सक्ष्मण उनरा पनुप देखना चाहते हैं । ४३. सर पृप्योपति (जनक) के वन एमर के लिये एक भौर को पोड़ा उठा देनेमे उनके नौकर सोग धनुष को उठा लाये।

जानकीहरणम् ८ वरवक्वेन्दु बिम्बत्विडग्रासगृध्रु परं ग्रहम् ।। सीताविवाहसंयोगसुखरोधार्गलान्तरम् . ॥४४॥ अहिर्बुध्रपरित्यागतीव्रशोकभरादिव । मध्ये लोहसमुद्गस्य निःशब्दंशयितं चिरम् ॥४५॥ अमाईवमतिस्तब्धं गुणेनापि न नामितम् । ईशेन दर्शितस्नेहं नीचं जनमिवाग्रहम् ॥४६॥ चक्रीचकार कर्णान्तावतंसितनखद्युतिः । तद्दाशरथिरादाय सीताक्रयधनं ततस्त्रासकरो नादश्चापभङ्गसमुद्भवः। दिश: ससर्प रामस्य यशोवोपडिण्डिमः ॥४८॥ क्षेत्र भूमिर्गुणस्यासौ सीतया सहिता वृता । वप्रैः फलवती सद्य: प्रचकम्पेऽखिला पुरी ॥४६॥ धनुः ॥४७॥ ४४. जो वर (राम) के मुखचन्द्र के विम्ब से निकली हुई प्रभा को कवलित करने के लिये लालापित भयानक ग्रह है, अथवा सीता के विवाह सम्बन्ध से उत्पन सुख के यन्द करने के लिये कोई दूसरी कुडी है। विशेष -लोक ४३ से ४७ तक 'कलापक' है। "तदनुः दागरपिः घक्री प्रकार" से अन्यम होगा। ४५. जो पर से परित्यक्त होने के कारण महादुःस रो व्यथित होकर लोहे के कोप में बहुत काल से चुपचाप पड़ा था। ४६. जो कठोर, बड़ा मजबूत, प्रत्यक्षा से भी न भुगने वाला, शिव को बहुत प्यारा, नोप मी भानि नापार में पाने वाला पा। ४७. दारय पं. पुष (गम) ने, जिनके गगों को प्रमा उनसे कान पा पलद्वार बन गई थी (पान रामगोपने फे. मारणा, यह भाव है) उस धनुष मो को मीता के पग मा मूल्य पा, पन में ममान मुरादिया। ४६. पनुप फेटूट जागे गे ऐसा भयानर द दिशामों में गूंज गया अंगे यह राम में पानी पोपमा मग्ने याना नगाटा। ४गुणों भोर भूमि, गुरग फन ने पानी, गौना गहिल प्रापीर मे पिरी पर गपूर्ण गरी उटी।

पष्टः सर्गः ७९ रोमोद्भदापदेशेन हपमंकुरितं हृदि। सिञ्चन्नस्रस्रवेण स्म मुनिमाह महीपतिः ॥५०॥ प्रौढेऽपि वयसि प्रायो रूणद्धि तपसि स्पृहाम् । यच्चापभङ्गदेयं मे प्राणं सीमन्तिनीधनम् ॥५१॥ तद्रामस्य गतं दास्यं विक्रमायलम्भितम् । अस्य ह्रस्वद्वितीये मे न्यस्ता विद्ध्यूमिलामपि ॥५२॥ शोकाख्यमस्य वैदेह्या विवाहपरिलम्बजम् । हृच्छल्यमस्तुकारेण तपस्यन् निचकपं सः ॥५३॥ अथ दूतास्थितः प्रायाद्राजद्वय मनोरथः । अयोध्यामन्यराजन्यप्रीतिप्रशमनो रथः ॥५४॥ यन्नासीद्रघुपतिरूपनिर्जितोऽसौ वैलदयक्षतकृतसम्मदावसादः । लालाट्यज्वलनरयेण भूतभर्ना नौरात्म्य हृदयभुवः शिवाय सृष्टम् ॥५५॥ ५०. पृथ्वीपति (जनक) जिनके हृदय में, मथु से सिञ्चित, हर्ष, अंकुरा कर रोमाञ्च के बहाने निकल पड़ा था, मुनि से घोले । ५१. धनुप के तोड़ने के कारण स्त्रीरूपी धन के देने का ऋण जो हो गया है वह वृद्धावस्था मे भी प्रायः तपस्या करने की इच्छा को रोकता है । ५२. विक्रम के द्वारा सरीदने से जो मेरे उपर ऋण पा वह मय राम के पाम दासता से लिये चला गया । पय पाप यह जाने कि मैं उर्मिला को इनके छोटे भाई (लक्ष्मण) को देता हूँ। ५३. तपस्या में निष्ठा रखने वाले मुनि (विश्वामित्र) ने, सीता के विवाह में देर होने के कारण जो जनक के हृदय में शोकरपी भाला नुम रहा था उगे मानी स्वीनि देकर निकाल दिया। ५४. सब एक रप दोनों राजामो (जगर मोर दारण) के मनोरयों के लिये हा, उन गर. पुत्रों के साप जो ( सीता की प्रीति के) गान्ति स्पवरपा के दूर थे, पयोप्या भेगा ५५. राम के पौदयं में परागित, रामदेव के हर्षोन्मार या, सम्मा पापा रो जो नाम नहीं हुमा उगा पारण यह था किसों के स्वामी (सर) ने उसे (मामदेव मो) अपने मस्तक की अग्नि पी ग्याना मे उगरी पारमा वा पिना पर दिया था। गया।

जानकीहरणाम् पीनांसो नियतमुरस्तटो विशाल: क्षामं तद्व्यथयति मध्यमं शरीरं । घाति स्वयमनुचिन्त्य लम्बबाहुस्तम्भाभ्यां दृढमिव यन्त्रितोऽस्य देहः ॥५६॥ नेवान्ताधरकरपल्लवप्रभाभिस्तेनोष्णद्युतिकरकुंकुमानुलिप्तः । व्याकोशारुणवनजप्रभाविशेषो निर्जित्याहित इव पादयोरधस्तात् ॥५७॥ ज्ञानं विलोचनमिति प्रथिते तदीये नेत्रे उभे विमलवृत्तिगुणस्वभावे । एकं तयोः श्रुतिपथस्य समीपमानं यातं प्रपन्नमखिलश्रुतिपारमन्यत् ॥५८॥ इत्यं वराश्रयकथेषु जनेषु सीता नम्रण घमंसलिलास्पदगण्ड लेखा। तस्थौ मुखेन शशिनिर्मलदन्तकान्तिज्योत्स्नानिषिक्तदशनच्छदपल्लवेन ॥५६॥ इति पठः सर्गः। ५६ उनके (राम के) कंघे मासल थे और वक्ष विशाल था, उनका कटिप्रदेश पतला पा, प्रतः उनके शरीर को अवश्य कष्ट होता होगा, ऐसा स्वयं ब्रह्मा ने विचार कर उनके शरीर को लम्बी भुजाओं के स्तम्भों से दृढता से बांध दिया। ५७. अपनी तिरछी आँखों, अधरों और पल्लव के सदृश हाथों की फान्ति से, सूर्य की किरणों की मरुणाई से व्याप्त प्रफुल्ल कमलो की प्रभा को उन्होने (राम ने) पराजित कर, जैसे अपने पैर के तलुमों के नीचे रख लिया हो । ५८. निर्मल, गुण और स्वभाव से युक्त, उनकी दो प्रसिद्ध प्रांग थी। एक दृष्टि पर पौर दूसरी शान चक्षु । उन दोनों में से पहिली (हप्टिचक्षु) तो केवल कान तक पहुंचती थी, पर दूसरी समस्त वेदो के पार तक जाती थी। ५६. जव इस प्रकार लोग राम से सम्बन्धित कपायों का बखान कर रहे थे तय, सीता जिनके. गालों पर गर्मी के कारण, पसीने की रेसा खिंच गई पी और जिनके पन्द्रमा के समान उग्वल दांतों मी प्रभा से उसके पल्लव सहा मोठ व्याप्त थे, नम्रता से अपना मुरानीपा दिये, सड़ी थी। उठा सगं समाप्त ।

सप्तमः सर्गः ततो धरित्रीतनया गरीयः सा शासनं प्राप्य गुरोरलंध्यम् । स्थपत्यशुद्धान्तजनैः परीता जगाम कर्तुं प्रतिनो नमस्याम् ॥१॥ सुखेन नत्वा गज कुम्भपीनस्तनावकृष्टा चरणौ महर्षेः । तमेव भूयो भरमुद्वहन्ती समुन्ननाम प्रतिपद्य यत्नम् ॥२॥ सत्यं यदस्याः प्रविभाव्यरागो दृष्टिप्रवेकः खलु कृष्णवर्मा । स्नेहेरितं तद्धनदोपमस्य धैर्येन्धनं तेन ददाह भत्तु: ॥३॥ विन्यस्तपीनस्तनहेमकुम्भा स्वेदाम्बुभिस्तद्धृदयोपकार्या । मनोभुवस्तत्प्रथमप्रवेशे सिक्तापि नो तत्र रजः शशाम ॥४॥ तुष्टो नु भङ्गादविपन्नधाम्नः शैवस्य चापस्य सुबाहुशत्रुम् । स्मरस्तमालिङ्गय तया प्रयुक्तश्चक्रे विहस्तं नु विशालदृष्टया ॥५॥ १. तब वह धरती की पुत्री (सोता) अपने पिता की सारगभित एवं अलद्रघनीय प्राज्ञा से महल के अन्तःपुर में रहने वाली परिचारिकामों के माथ, व्रती (विश्वामित्र) को प्रणाम करने के हेतु गई। २. हाथी के कुम्भ के समान, मासल स्तनों वाली सीता ने पहिले बड़ी सरलता से मुक कर महपि को प्रणाम किया और फिर ( स्तनों के बोझ के कारण ) प्रयास से उठी। सीता की मोहक, तिरछी चितबनें, जिनमें प्रेम छलछला रहा था, सचमुच साक्षात् पग्नि थीं । मतः सीता ने स्नेह से उनका प्रयोग कर, कुवेर के समान राम के धैर्यरूपी इंधन को जला डाला। (मर्थात्) उनमें फिर धैर्य न रह गया। ४. कामदेव के प्रथम प्रवेश के समय सीता के हृदयरूपी रंगमहल के सामने जो कामोद्वेग का रज पड़ा था और जिसके द्वार पर सुवरणं कुम्भ ये समान दो मासल स्तन रखे थे, उग रजपा सीता के स्वेद से नीचे जाने पर भी शमन नहींहुमा । विशेष--उपफा = "सोपोस्त्री राजसदनमुपकार्योपकारिका ।" इत्यमरः । शिव के तेज सम्पन्न धनुष के तोड़ने वाले, मुबाहु के सत्रु गम वा मालिङ्गन कर क्या कामदेव सन्तुष्ट हुमा मथवा बड़े-बड़े नेत्रो पाली से प्रेरित होरर उसने उन्हें काबू कर दिया।

२ जानकीहरणम विधातृमुख्यैरपि दृश्यरूपं रूपं निरूप्यानिरीक्षितेन । एवं स गुण्यो गणयाम्बभूव भूम्ना मनस्वी मनसैव तस्याः ॥६॥ प्रसीद मैवं परिभूदखण्डं ताराधियं ते वदनामृतांशुः । इति प्रियायाः पतितेव पादे ताराततिर्दीप्रनखच्छलेन ॥७॥ कृष्ट्वा नितान्तंकृशवृत्तिमध्यंमास्म च्छिनच्छोणिरिति प्रचिन्त्य । गुरू तदूरुद्वयशातकुम्भस्तम्भद्वयेनेव धृता विधात्रा ॥८॥ तदस्तु मोमं कठिनं प्रकृत्या तनोति- तापं स्तनयोदयं यत् । मध्यस्थमप्येतदनिन्द्यवृत्तेर्वलित्रयं मांदहतीति चित्रम् ॥९॥ स्तनौ तु कुम्भप्रतिमौ सुदत्या निःशेषवक्षस्तटबद्धबिम्बौ । पिण्डी न पीनौ नवयौवनस्य न्यस्तौ शरीरादतिरिक्तवन्तौ ॥१०॥ विभाति तन्व्या नवरोमराजि: शरीरजन्मानलधूमरेखा । अन्योन्यवाधिस्तनमण्डलस्य मध्यस्य धात्रा विहितेव सीमा ॥११॥ ६. ब्रह्मादिक देवता जिसके रूप को बड़े चाव से देखते थे, ऐसी सीता के रूप को एक तिरछी चितवन से देख कर गुणवान् और मनस्वी राम ने अपने विशाल मन मे सीता के सम्बन्ध में इस प्रकार सोचा। मेरी प्रिया के चमकते हुए देनस ऐसे लगते है जैसे तारानो की पंक्ति उसके पैरों पड़ कर यह कह रही हो कि "प्रसन्न होगापो, अपने मुखचन्द्र से समूणं नक्षत्र-मण्डल के स्वामी (चन्द्रमा) को लज्जित न करो"। उसकी (सोता की) स्वाभाविक पतली कमर थी, कसने पर कहीं उसके भारी नितम्ब कमर से अलग न हो जाय, यह विचार कर ब्रह्मा ने जैसे उन्हें (नितम्बों को) सहारा देने के लिये दो सुनहली टेक लगा दी हो । C. सीता के दोनों स्तन जो स्वभाव से ही कड़े और उप्ण है, मेरे हृदय में दाह का विस्तार फरते हैं, सो तो ठीक ही है, परन्तु इस निन्य सीता की बीप मे स्थित वियती, गुममें दाह उत्पन्न करती है, यह प्रावर्प है। १०, पया इस सुन्दर दातो पाली (सीता)फे सम्पूर्ण यक्ष को परे हुए दोनों स्तन, दो कुम्भ की प्रतिमाएं है मपया पढ़ती जपानी के दो मांस-पिंड है जो मनिरिक्त होने में नागा मना रण दिये गये हैं। ११. उग गुरुमारानी गीता का एक दूसरे से राटे हुए स्तनों के शीप में, मामाग्नि के पार पोरेगा मगान नये रोगों की समीर है, यह गे ग्रहह्मा दाग दोनों रखनों में भीपकी निर्धारित गीमा हो। . .

नमः सर्गा यात्यङ्गदोऽप्येष विवृद्धदीप्तिरनङ्गदत्वं न्यसनेन यत्र । 'तथाहि शक्तिर्मदनस्य दाने चारुप्रकोष्ठस्य भुजद्वयस्य ॥१२॥ वक्वेन्दुलीलामनुयातुमस्याः कलान्तराणि प्रतिपद्य चन्द्रः । पूर्णोऽपि साधर्म्यविशेषशून्यः क्रमेण शोकादिव याति हानिम् ॥१३॥ मृगाङ्गनानां नयनानि पूर्व विधाय नीलानि च नीरजानि । कृतप्रयोगेण पुनर्विघात्रा सृष्टं नु नेत्रद्वयमायताक्ष्याः॥१४॥ अन्वेति कान्त्या कमनीयमस्या युग्मं ध्रुवोरायतनम्रलेखम् । रोपेण कृत्तस्य हरेण मध्ये च्छेदद्वयं मन्मथकार्मुकस्य ॥१५॥ असर्पतामापतितालकान्तपर्यन्तकान्ति श्रुतिमूलमस्याः। ध्रुवौ नु वक्तुं तरलत्वमक्ष्णोद्ध्युग्मकौटिल्यमिमे नु दृष्टी ॥१६॥ तन्व्या मनोज्ञस्वरनैपुणेन विनिजितो रोपविलोहिताक्षः । प्रसक्त चिन्ताऽहितमन्यपुष्टः शोकेन काष्ण्यं वहतीति मन्ये ॥१७॥ १२. वह चमचमाता हुमा वाजूवद (अङ्गद) भी उसके हाथ में पड़ कर कामोद्दीपन करता है क्योकि उसके दोनों भुजामों के प्रकोष्ठ (अग्रभाग) इतने सुन्दर हैं कि वे स्वय कामो- द्दीपन करते हैं। शेष-अङ्गद और अनङ्गव में चमत्कार है । १३. इसके (सीता के) मुखचन्द्र की यिरकन की नकल करने लिये, चन्द्रमा, प्रमशः बढ़ता था, परन्तु सम्पूर्णता को प्राप्त करने पर भी जब उसमें सीता के मुख के समान सौंदर्य नहीं पाया तो, जैसे सोक के कारण वह धीरे-धीरे क्षीण होने लगा । १४. पहिले हरिणियों की प्राखो और नील कमल को बना कर जब विधाता का हाथ मूव मंज गया तव फिर उन्होने, बड़े-बड़े नेत्रों वाली सीता की दोनों प्रांतों को बनाया । १५. सीता की लम्बी एवं कोनों पर नुकीती भौर मुकी हुई भौहें, कामदेव के धनुष के टुकड़ों दो का अनुकरण करनी थी, जिसे ( जिस धनुष को) पोषयुक्त शिव ने बीच से काट डालाथा। १६. यया इसकी (सीता की) भौहें कान को जड़ तक, जिसरी प्रभा लटरते हुए सटो के भप्रभाग तक पिसर रही हैं, मोसो की नचलता बताने के लिये पहुँच गई है। अपवा उसकी यही बड़ी और ही मोही की मुटिलता की शिकायत करने यहां तक पहुंच १७. ऐमा लगता है कि कोमलाङ्गी (मीता) की मपुर बोनीरो हार कर कोपल की भाग पोप रो माल हो गई है मोर उससारीर निरन्तर चिन्ता से पाला पड़ गया है।

जानकीहरणम पुष्पायुधः स्वात्मनि शस्त्रपातान् कुर्वीत सीताऽकृति वीक्ष्य रत्नम् । चित्रीयते तन्न यदात्मयोनेस्तीमा मयि व्यापृतिरायुधानाम् ॥१८॥ सति स्म तस्यातिगुरुप्रत चेतस्यथ प्राह मुनि नरेन्द्रः । प्रणम्य शुद्धान्तमुपैति पादौ तीर्थादनूनौ भवतः स्नुपेति ॥१९॥ कलत्रभारेण कुचद्वयस्य स्थाना तथा मन्थरविक्रमायाः । आसीत् स तस्या गतिमन्थरत्वेसी राजपुत्रोऽपि त्रितीयहेतुः ॥२०॥ अनुव्रजन्तं परिवारवर्ग प्रयाहरन्ती किल नाम किञ्चित् । तिर्यग्विवृत्ताननचन्द्रबिम्वा रामं जघानार्द्धनिरीक्षतेन ॥२१॥ तस्यां गतायां सह राघवाभ्यां भर्ता भुवः संयमिनं ततस्तम् । द्रष्टुं निनाय स्वयमृद्धिसारं सत्रस्य विप्रेरकृशं ततस्य ॥२२॥ दूरोऽपि देहेन वियोगवह्नः प्रवद्धिताधिः स्फुटतीति भीतः । तद्रक्षणायैव कृतप्रयत्नो मुमोच तस्या हृदयं न रामः ॥२३॥ १८. सीता जैसे रत्न को देस कर पुष्पायुध (कामदेव) ठीक ही अपने ऊपर माण छोड़ता है (अर्थात् स्वयं कामासक्त हो जाता है) और इसमें भी कोई माश्वयं नहीं कि यह मारम- योनि (कामदेव) मुझ पर भी वाणों का तीव्र प्राघात करता है। १६. जव इस प्रकार के गम्भीर सर्क राम के मन में उठ रहे थे उस समय राजा (जनक) मुनि से बोले-"यह भापकी यहू, भापो परणों को जो तीर्थ से कम नहीं हैं, प्रणाम कर मन्तःपुर में जायगी।" २०. दोनों पुचों के भार से दये कटि एवं नितम्ब उसके (सीता के) मन्पर गति से पसने के कारण ये ही, राजपुत्र (राम) भी तीसरे कारण हो गये। २१. अपने पीछे पालते हुए परियार यगं से कुछ कहती हुई (महने के बहाने से, यह भाय है) अपने गुपचन्द्र को पोड़ा पीये मोड़ कर (सीता ने) अपनी तिरछी चितवन रो राम पर प्रहार किया। २२. जय शीना पली गई राप म्योपति (जनर) राम मौर सम्मण के सहित उस संगमी मुनि को यहां ले गये जहाँ ग्राहाण सोग विधिपूर्वक, समृदगाती पग निरन्तर फर रहे थे। २३. नहीं वियोग की अग्नि, मनोपगा के मारण फूट न निकले निपे उगी रहा पलिये राप्रपाल राम, यति गरीर से दूर थे, पर उन्होंने गीता के एएस मोही पोरा सप्तमः सर्गः याते च रामे नयनाभिरामे दृष्ट्वा दिशः किं फलमस्ति शून्याः । इतीव पद्मायतलोचनाया विलोचने नेत्रजलं रुरोप ॥२४॥ , कृतेऽपि .पाणिग्रहणे ममेयं जाता परत्राहितरागवृत्तिः । बालेति तस्या वलयं कृशायाः ससर्ज रोपेण यथा करानम् ॥२५॥ सन्तापवह्निर्हदि सन्नताङ्ग्याः कामाहितः खेदविलोहितेन । नेत्रद्वयेनेव बहिः प्रवृत्तज्वालावलिः संविविदे सखीभिः ॥२६॥ याता नु सा तानवमङ्गजाग्नितप्तेचिरं तबृदये निवासात् । उत स्वकीये हृदि तं निविष्टमूढवा तनुत्वं श्रमजं गता नु ॥२७॥ दूरेऽपि रामः परिकल्पवृत्त्या कि दृप्यतेऽस्मिन्नथ वा स्थितेऽपि । कि मे प्रवासःप्रतिभाति पापादित्यास तस्या विविधो विकल्पः ॥२८॥ मृदुप्रवालास्तरणेऽपि तन्वी शिलातलेनैव धृति सिपेवे । असक्तवाद्रे शरतल्पमध्ये सा पुष्पकेतोरिव वर्तमाना ॥२६॥ २४. जब नयनों को पालाद पहुँचाने वाले राम ही चले गये (मर्यात सामने नहीं है) तो फिर सूनी दिशामों ही को देखने से क्या लाभ, ऐसा समझ कर आंसुमों ने माकर उम कमल- नयनी की दृष्टि को रोक दिया। १५. यद्यपि मैंने इस बाला का पाणिग्रहण किया है फिर भी इसका प्रेम दूसरे (राम को) पोर है (मर्यात् राम से प्रेम करती है) ऐगा समझ कर, जैसे गोप से, कंकरण उसकी फ्लाई से मरकः गया। २६. रासियों ने मुकी हुई मीता की गोक-सन्तप्त लाल-सात दोनों पांगो से यह जान लिया कि कामदेव से प्रेरित उसके (सीता के) हृदय में जो पोकाग्नि है, उमत्री सिसा जैगे बाहर निकली पड़ती हैं। २७. क्या यह (सीता) कामाग्नि से सन्न राम के हृदय में बहुत दिनों सर रहने के कारण दुवती हो गई है या राम को अपने हृदय में रखने के श्रम में यह दुबती हो गई . २८. दूर होते हुए भी, राम परा कल्पना मात्र से मेरे हृदय में शिपाई देते हैं। प्रयवा मरे हृदय में राम के रहते, मेरे पाप के कारण, मुझे ऐमा लगता है कि मुभगे दूर है, इम प्रभारी पनेर भावनायें, उगये (गी के) मा में उठगी थी। २९. उमरोमसाजीको शिलापट्ट पर, मुनापम गई पत्तियों के वियाका पर, पैन नहीं पाता पा जैसे यह मामदेव से रक्त मे सीपी हुई रकबीर में पो हो।

८६ जानकीहरणम् तुषाररश्मेरुदयेऽपि तस्या नेत्रोत्पलं नो मुकुलीवभूव । चन्द्रे मुखच्छद्मनि दीर्घकालमभ्यासतो नु प्रियचिन्तया नु ॥३०॥ सशीकरं गर्भदलं कदल्या न्यस्तं नताङ्ग्या हृदये सखीभिः । ववन्ध भिन्नस्फटिकावदातं पुष्पेषुबाणवणपट्टशोभाम् ॥३१॥ कस्यापि दृष्ट्या मयि यद्विरागः स्वपादसेवाभिरतेऽपि तत्किम् । इतीव शैथिल्पमतानि तस्या युग्मेन सन्नूपुरयोरमन्दम् ॥३२॥ सखीसमीपेऽपि सखेदवृत्तिश्चन्द्रातपैरप्यनुतापभाजा । देहेन वैदेह सुता निनाय दिनानि दीना कतिचित्कथञ्चित् ॥३३॥ सार्धं द्विजैः पावनसोमपान निधूतपाप्मन्यथ सत्रनाथे। मखस्य कोटि प्रकृतस्य मुख्य क्षितिक्षितामीयुषि वीतविनम् ॥३४॥ जनाधिनाथः पुरुहूतकल्पः समनशक्तिः सुतयुग्ममन्यत् । ततः समादाय सुमन्त्रसूतः पुरं प्रपेदे जनकस्य राज्ञः॥३५॥ ३०. उसके कमल नेत्र, शीतरश्मि चन्द्रमा के उदय होने पर भी नहीं मुंदे । इसका कारण या तो, छद्म से उसकी मुखाकृति लेने वाले, चन्द्रमा की ओर, अभ्यासवश देर तक देखना हो, या अपने प्रिय (राम) का निरन्तर चिन्तन हो । ३१ ओस से लिप्त, फटे हुए स्फटिक के समान उज्ज्वल, केले के भीतरी भाग का पत्ता, उस नवागी के हृदय पर लपेटने से ऐसा शोभायमान हुआ जैसे कामदेव के वाण के घाव पर पट्टी बँधी हो। ३२. 'यद्यपि हम निरन्तर उसके (सीता के) चरणो की सेवा में लगी रहती हैं फिर भी, क्या किसी दूसरे पर प्रांत राग जाने से हमारी ओर इसकी उदासीनता है, यह सोच कर उसके दोनों नूपुरों में बड़ी शिथिलता प्रागई। ३३. सखियों के साथ रहने पर भी, खेद के कारण दीन, विदेहराज की पुत्री ने, जिसके शरीर. में चाँदनी से जलन होती थी, थोड़े दिन किसी न किसी तरह काटा । ३४. जब उस सत्र के अधिष्ठाता और राजारों में अग्रगण्यं महाराज जनक ने जिनके पाप, पवित्र सोम के पीने से नष्ट हो गये थे, ब्राह्मणों के साथ उस यज्ञ को बिना किसी विघ्न के समाप्त किया। विषेश- यह और आगे वाला श्लोक मिला कर पढ़ने से अन्यय होता है। इसे 'युग्म' कहते हैं। 'युग्म' को व्याख्या देखिये-२-२। ३५. इन्द्र के समान, सम्पूर्ण शक्तियों के धारण करने वाले, जनों के स्वामी (महाराज दशरथ) सुमन सारथी के साथ अपने दोनों पुत्रों को लेकर जनक के नगर में गमे।

सप्तमः सर्गः क्षत्रस्य नक्षत्रमदोपदुष्टं वैवाहिकं वाहितशत्रुवीरः । पुरोहितेनाभिहितं निशम्य संपादयामास विधि विधिज्ञः ॥३६॥ स्नातद्विजारूढमदद्विपेन्द्रस्कन्धस्थकार्तस्वरकुम्भपंक्तया। नृपस्य धिष्ण्यं प्रकृते समन्तादच्छेदवत्पावनतीर्थतोये ॥३७॥ । रथ्योभयान्ताहितशातकुम्भकुम्भस्थपकेरुहगन्धविद्धे । तिरोदधाने गगनं सुगन्धौ कर्पूरकृष्णागरुसारधूपे ॥३८॥ चरत्सुवन्द्यानननिःसृतेषु नरेन्द्रसूनोजयघोषणेषु । प्रध्मातशङ्खध्वनिहितेषु ध्वनत्सु तूर्येषु च मङ्गलाय ॥३६॥ लाजा जलं दर्भमिति प्रसक्तमाविष्कृतादंडितशीघ्रनादे। आहूय सम्पादयतोऽपि मृत्यान् प्रत्युवजत्याकुलमृत्यवर्गे ॥४०॥ ३६. क्षत्रियों के लिये निर्दोप, वैवाहिक मुहूर्त, पुरोहितो से पूछ कर, शत्रुओं के वीरो को दमन करने वाले (महाराज दशरथ) ने, जो वैवाहिक पद्धति के पूर्ण ज्ञाता थे, विधिवत कृत्यों का सम्पादन किया। ३७. जब हाथी पर सवार और स्नान से पवित्र ब्राह्मणों ने, राजमहल का कोना, मत्त हाथियों के कंधों पर पंक्ति के पंक्ति र गोने के कलशों में भरे हुए तीयों के पवित्र जल से, विना किसी स्थान को छोड़े, अच्छी तरह अभिषिक्त कर दिया। . विशेष-३७ में श्लोक से ४५वें श्लोक तक 'कुलक' हैं। कुलक-'द्वाम्या युग्ममिति प्रोक्तं, मिभिः श्लोक यिशेषरम् । कलापकं चतुभिः स्यात् तदूवं कुलकं स्मृतम् ॥ इन नौ श्लोकों में विवाह की भीड़-भाड़ एवं व्यवस्था का वर्णन है। ३८. जहा गड़को के दोनो छोर पर स्थापित, सुवर्ण कलमों पर रखे हुए कमलो को सुगध से मिल कर, कपूर भौर कालागुरु धूप के मुगंधित धूएँ से, गगन पाच्छादित हो गया था। ३६. जहाँ श्रेष्ठ पारणों के मुख से निकली हुई राजपुत्र ( राम ) की जय घोषणा गंज रही थी और उनके मङ्गल के हेतु बजाये हुए रातो के नाद से तुरही थी पनि प्रचण्ः हो गई पी। ४०. जहसायं सम्पादन करने पर भी भरपोमो धुलारर 'माया, जाप दर्भा मापो' गेगी माशा देते हुए और माल भृश्यवर्ग भी उन्ही पानामों को जन्दी-जल्दी तीर स्वर में दोहराते हुए हारड़ी में इधर-उधर दौड़ रहे थे।

८८ . जानकीहरणम् ज्ञातुं मुहुर्यामघटी-जलस्य वृत्तिं प्रयुक्ते नृपदासवृन्दे । धावत्युरोधात निपातिताध्वमार्गस्थ लोकेऽपि गतागताभ्याम् ॥४१॥ आसन्नभूतो महितो मुहूर्तः किं स्थीयते तावदिति प्रगल्भम् । वृद्धेषु वंशद्वितयस्य धीरं स्नानाय सद्यस्त्वरयत्सु रामम् ॥४२॥ उच्चै तान्यस्वरमुच्चरत्सु समं समाविष्कृतमङ्गलेषु। आपूरिताशेषककुम्मुखेषु पटुप्रसक्तं पटहध्वनेषु ॥४३॥ वेत्रण वेत्रग्रहणाधिकारे जने च तत्रानुपयोगवन्ति । दिक्षुवृन्दानि निरस्यमाने मुखेन हुङ्कारकृता नितान्तम् ॥४४॥ हुकार मात्रप्रथितैरमस्तिर्यक्कराग्रस्य विकम्पितेन । निवारयन्तो मुखरं जनौघं माशाब्दिका वेश्मनि तत्र चेरुः ॥४५॥ केचिद्विधातुं विधिमुद्यतेभ्यः क्रियासु दक्षाः कुशलेतरेभ्यः । प्राच्छिद्य वैवाहिककर्मयोग्य वस्तुनि भृत्या विदधुर्विधानम् ॥४६॥ ४१. जहाँ नृप के दासों का समूह, जल पड़ी से समय जानने के लिए बार-बार भेजे जाने पर दौड़ कर प्रा-जा रहा था, जिसके कारण उनके वक्ष से भिड़ने से मार्ग में खड़े दर्शक लोग गिर पड़ते थे। . ४२. "मङ्गल मुहूर्त निकट मारहा है, फिर क्यो देर कर रहे हो?"ऐसा कह कर दोनो कुलों के गुरुजन, तुरन्त स्नान करने के लिये जल्दी मचा रहे थे। ४३. जहां बड़े बड़े नगाड़ों की ध्वनि जिससे सम्पूर्ण दिशायें व्याप्त हो रही थीं और मंगल मंत्रो की ध्वनि स्पष्टतया सुनाई पड़ती थी, चारो ओर होते हुए तुमुलनाद को प्रतिशान्त कर रही थी। ४४. और जहां अधिकारयुक्त, दण्डधारीवर्ग बिना दण्ड का प्रयोग किये नेवल अपने मुख के हुंकार से दर्शकों की भीड़ को भगा रहे थे। ४५. महत के भीतर वै अधिकारी जिनका काम शोर-गुल रोकने का था, फेवल हुंकार मान रो अपना प्रोष जताते हुए मोर अंगुलियों से, गोर मचाती हुई जगता की भीड़ को रोपाते हुए घूम रहे थे। • ४६. बुध कार्य-बुन्न भृत्य, उन भृत्यों से जो शाम करने में तो उधत थे पर मूर्ख थे, वैवाहिक कर्मों के योग्य सामग्री को लेकर स्वयं कार्य सम्पादन करने लगे।

सप्तमः सर्गः शच्या विवाहस्य विधानमाद्यं नामान्तरेण प्रथितं विधिज्ञः । पर्यस्य चित्तानि तथा सुताया नृपस्य तत्रैव जनस्ततान ॥४७॥ स्नानस्य रत्लाभरणेन दीप्तमाकल्पमन्ते विधिवद्विधाय । ययौ वधूर्वेदविदा कृताचं वेद्या उपान्तं विधुरा स्मरेण ॥४८॥ अथवोपनिन्ये नयकोविदेन महेन्द्रसख्यास्तनुजेन तन्वी। लज्जाविधेया विधवेतराभिविभूपितासी विभुनन्दनाय ॥४॥ समाददे सम्मभिन्नधैर्यः पाणिं फणीन्द्राङ्गगुरुप्रकोष्ठः। तस्याः कुमारः सुकुमारसन्,ि वामेतरं वामविलोचनायाः ॥५०॥ प्राज्यं ततः प्राज्ञतरेण हव्यमावजितं वर्जितदुष्कृतेन । विधातृधाम्ना विधिवत्कृशानी सदिन्धने शीलधनेन तेन ॥५१॥ वेद्यामनंसीदनवद्यवृत्तिस्तन्वी ततो वेदविदा प्रयुक्ता। प्रदक्षणीकृत्य विवाहसाक्षीकृतं कृशानुं सह राघवेण ॥५२॥ ४७ कर्मकाण्डी लोगों ने .िवाह के भारम्भ में जो विस्पात शची का विधान है, उनमें नाम यदस कर, मोर प्रपना चित्त भी तदनुसार उमके अनुकूल कर, उसके स्थान पर नृप फी सुता (सीता) के नाम से फरय मा विस्तार किया। ४८. पवित्र स्नान के मनन्तर, मूल्यवान् पौर महकीले यल, जिनमें रत्नों के भरण पम- चमा रहे थे, पहिन कर बाम विहता बहू (मीता), वेदी को घोर पर गई, जहाँ येर के जानने वाले पुरोहितों ने पहिले ही रो मप्यं दान पर रमा या। ४६. सब इन की ससी (पहल्या) के पुत्र भ्यरहारसुगन, गतानार, सोमारपती स्त्रियों रे दारा सगाई हुई, लग्ना से युक्त उम पोमनाङ्गी (मीता) को वीर पुत्र (राग) के पास से गये। ५०. सुमार (राम) ने, जिनका पैर्य, हर्षातिरेक से छूट गया पा पोर निरा सोप्ट, गां- रात्री तरह रागा पा उग गुन्दर नेत्रों पोर मुरुमार गपि पानी, गोमा दाहिना हाय पाहा। विदोप-प्रकोष्ठकलाई से लेकर टिहनी तर हाप का भाग-kore arm | सन्धि परन के मोरा ११. सर मुस्मिार. निमार गालि के समान तेवगन और मामीन मिना पन हमें रात्र (राम) में परिपन गे पुनः पग्नि में पनेरु पारित मी। ५२. तर पेशी र जानने वाले पुरोहितो गेणि रोरा, उग FIT प्रारी सोमनाली (मास) ने एक बार (राम) माप, सिह की माशी, सी पर प्राग्यमान, पोरmम गित ૧૨ ९० जानकीहरणम् गण्डस्य विम्बं दुहितुर्धरित्र्याधर्माम्भसां विन्दुरलचकार । चेतःस्थकन्दर्पकृशानुना वा तस्योष्मणा वा परमार्थवह्नः ॥५३॥ चकार चक्राङ्कतलेन पाणौ करेण भाभिनिपीड्यमाने । शीत्कारमाकुञ्चितदीर्घदृष्टिः स्पर्शन वह्नः किल नाम सीता ॥५४॥ व्यापारितावाङ्मयपारगेण द्विजेन तेन द्विजराजवक्त्रा । बाला कृशानी कृशगात्रयष्टिर्भावानभिज्ञाथजुहाव लाजान् ॥५५॥ पत्युः करस्पर्शकृते कृशाङ्गया हर्षेः सखीभिः प्रतिभाव्यमाने । आचारधूमागमलब्धजन्मान्यभूणि तत्संवृतये बभूवुः ॥५६॥ कृत्वानमस्यामनुपूर्वमुक्तो भत्तु वो विप्रवरेण रामः । समेतजानिर्जनकस्य राज्ञो वन्दिस्तुतस्यांघ्रियुगं ववन्दे ॥५७॥ पश्यन्सुतं पाशभृतो दधानं गङ्गाकरासक्तकरस्य कान्तिम् । तस्थौ नृपः स्तब्धविशालदृष्टिरश्रुतवाक्षालितपक्ष्मरेखः ॥५८॥ ५३. धरती की पुत्री (सीता) के मुखविम्ब को पसीने की बूंदो ने शोभायमान कर दिया । सम्भव है यह पसीना उसके हृदय में स्थित कामाग्नि के कारण हो अथवा (वेदी पर प्रज्ज्वलित) पवित्र अग्नि की गर्मी के कारण हो । ५४. जब उसके पति (राम) ने विष्णु के चक्र से अङ्कित अपने हाथ से, उसके हाथ को धीरे से पकड़ा तो जैसे अग्नि के स्पर्श से सीता ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को सिकोड़ कर सीत्कार किया। तब विद्यानों में पारङ्गत, ब्राह्मण (शतानन्द) से प्रादेश पाकर, उस चन्द्रवदना, सुकुमाराङ्गी, कामोद्वेग से अनभिज्ञ वाला (सीता) ने अग्नि मे लाजा विसेरी। ५६. जर पति के हाथ के छू जाने से उत्पन्न, उस कोमलाङ्गी के हर्ष को सखियों ने जान लिया तो यज्ञ के धुएं से जनित आँसुमो ने उस हर्ष को छिपा लिया । ५७. विप्रवर (सतानन्द) के कहने पर, अपनी पत्नी के साथ राम ने, पृथ्यी के स्वामी (दशरथ) को प्रणाम कर फिर क्रमानुसार, चारणो से वन्दित जनक के चरणों की वन्दना की। ५८ गला का हाप पकड़े हुए शिव के समान, मान्तिमान अपने पुत्र को देर पर राजा दशरप अपने विशाल नेत्रो में एक टक देखते रह गये और उनकी मासो से यहते हुए मासुपों से उनकी पलकें भीग गई।

सप्तमः सर्गः ९१ ततः रत्नासनस्थामथ पौरमुख्या वाप्पप्रकाशप्रणयाः प्रणेमु. । भर्तुः सुतामेत्य वरञ्चतस्याः कक्षान्तरे दत्तसितातपत्रम् ॥५६॥ नीत्वा विवाहोत्सवसम्मृतेन सुखेन रामः कतिचिद्दिनानि । कदाचित्समयाववोधदृप्तेन विद्धो हृदि मन्मथेन ॥६०॥ गौरीमिवाचारगुणेन गुरू करे गृहीत्वा करभोपमोरूम् । सतल्पभूभागमनल्पशोभं भवप्रभावो भवनं विवेश ॥६१।। भुवि विरचितमग्ने तल्पमालोक्य भीति स्पृशति मनसि बाला साश्रुपातस्थितां ताम् । नृपतिभवनरलस्तम्भमालिङ्गय दोभ्या रघुपतिरुपगुह्य प्रापयद्भमिशय्याम् ॥६२॥ इति सप्तमः सर्गः। ५६. राजमहल में रत्नजटित सिंहासन पर अपने पति के साथ श्वत छाते के नीचे बैठी हुई राजपुत्री के पास आकर, अपने आंसुओं से प्रेम जताते हुए प्रमुख नागरिकों ने दोनों को प्रणाम किया। ६०. विवाहोत्सवो में कुछ दिन आनन्द से व्यतीत करने के बाद कामदेव ने अवमर देख कर, राम के हृदय में बड़ी तीव्रता से आपात किया। ६१. शिव के समान तेजस्वी राम,पार्वती के समान अपने सदाचरणों मे गम्भीर, हाथी के बच्चे के समान जांघ वाली सीता का हाथ पकड़ कर राजमहल में गये जो मच्छी तरह सजा हुअा था और जहां स्थान-स्थान पर पर्यक विछे हुए थे। ६२. सामने जमीन पर एक सजा-सजाया पर्यडू देख कर रघुपति राम, मन में डरी हुई मौर राजप्रासाद के रत्नजटित स्तम्म से सटी एवं आँखों मे अश्रुधारा वहाती हुई खड़ी उस बाला (सीता) को पमं के पास लाये। . सातवां सगं समाप्त।

अष्टमः सर्गः आचरन्नथ स योपितो हठं सा च वामचरिताऽनुरागिणः । अप्यनीप्सितविधानचेष्टितौ तेनतुः सपदि संमदं मिथः ॥१॥ कामिना समुपगुह्य बालिका सप्रयत्नमुतवेशिताऽप्यसौ । वाञ्छति स्म समुदतुमङ्कतः साध्वसेन चपला मुहुर्मुहुः ॥२॥ राघवेण परिरभ्य पृष्ठतः सस्पृहं निगदिते मनोरथे । वीड़यावनतवक्त्रपङ्कजा धीरमस्मयत चारुहासिनी ॥३॥ अङ्गलीषु परिगृह्य राघवे वेधवत्युरसि रागिभिर्नखैः । सस्मितं विबलिताङ्गलिर्बलादात्मनः करमुदास मानिनी ॥४॥ किन्नु वक्ति कुपितेति वेदितुं कामिना निधुवने सविग्रहम् । याचितैनमभिकोपजिशितप्रेरितेक्षणकटु व्यलोकयत् ॥५॥ तब वह ( राम ) अपनी पत्नी से जबरदस्ती करने लगे और वह ( सीता ) भी अपने ऊपर मासक्त पति की इच्छा के विरुद्ध करने लगी। इस प्रकार दोनों ही के एक दूसरे की इच्छा के प्रतिकूल आचरण से, तुरन्त दोनों के आनन्द का विस्तार होने लगा। कामासक्त ( राम) ने उस बाला का आलिङ्गन कर बड़ी तरकीब से उसे अपनी गोद में बिठा लिया, तब यह डर से कांपती हुई, बार-बार गोद से उठने का प्रयत्न करती थी। जय राघव, पीछे से उसका आलिङ्गन कर, बड़े अनुनय से अपना मनोरय कहने लगे तब वह सुहासिनी अपने कमल सदृश मुख को लज्जा से नीचा कर मुसकराने लगी। जब राम उसको अंगुलियों को पकड़ कर, अपनी प्यार भरी अंगुलियों से उसके उरोजों को सहलाने लगे, तो उस मानिनी ने मुसकरा कर बलपूर्वक उनकी मंगुलियों को मरोड़ कर अपनी अंगुलियों को छुड़ा लिया। 'शुद्ध होकर वह क्या कहेगी यह जानने के लिये राम ने जय रामारीर रतिमा पाग्रह किया तो उसने गुस्से रो पासों को तिरछी कर उन्हें ( राम को ) कटुता से अष्टमः सर्गः १३ निगमेः। पुष्पकेतुहृतधैर्यवन्धनं तस्य भावमवगम्य सावकाशमथ कुर्वतीः सखीः संरुरोध वसनान्तसङ्गिनीः ॥६॥ इच्छति स्म विरहं न कामिनी सङ्गमं न मृशमाकुली कृता । विप्रयोगसमये मनोभुवा लज्जया नृपसुतस्य सन्निधौ ॥७॥ तस्य हस्तमवला व्यपोहितुं मेखलागुणसमीपसङ्गिनम् । मन्दशक्तिररति न्यवेदयल्लोलनेत्रगलितेन वारिणा ॥८॥ तत्र राजदुहितुर्वलाक्रियामाचरत्युदितलोचनाम्भसः । आगमिष्यदनुचिन्त्य खण्डनं भीतवदभृशमकम्पताधरम् ॥६॥ न स्पृशामि रशनागुणं पुननिर्दयं भुजयुगेन पीडितः । इत्युवाच नृपसूनुरथिनी सा ततान परिरम्भमस्फुटम् ॥१०॥ अन्तरीयहरणे कृतत्वरं राघवन्तमपयान्तमङ्गना। तत्पटान्तपरिधानरक्षिता संरुरोध परिरभ्य पृष्ठतः ॥११॥ जब उसने (सीता ने) उनके मनके भाव को जान लिया और यह देख लिया कि कामदेव ने उनके धैर्य के बांध को तोड दिया है (अर्थात् वह अब किसी तरह न मानेंगे) तो उसने (सीता ने) अवसर देने लिये वहां से खिसकती हुई सखियों को उनके वस्त्रों के छोर को खीच कर रोका। राजपुत्र से अलग रहने पर वह कामदेव से बहुत पीड़ित हो जाती थी और उनके सामने वह लज्जा से बहुत घबरा उठती थी। इस प्रकार वह काम की इच्छा रखने वाली न तो उनसे वियोग ही की और न संयोग ही को इन्छा करती थी। करधनी की डोरी के पास महराते हुए उनके (राम के) हाथ को हटाने में अशक्त उस अबला ने अपने विलोल नेत्रों से निकलते हुए अश्रु से अपनी अनिच्छा प्रकट की। 'मेखला प्रणय लोलतांगतं, हस्तमस्य शिथिलं रुरोपसा -कुमारसम्भव ८-१४, कालिदास । जब उस राजपुत्री के साथ वे (राम) इस प्रकार जबरदस्ती कर रहे थे तो अघरो के काटे जाने की सन्निकट चिन्ता से उसके प्रांखो में आंसू आ गये और वह डरी हुई सी थर-थर कांपने लगी। १०. 'यदि तुम हमे अपने दोनों हाथों से कसकर पालिङ्गन करोगी तो हम फिर करधनी की डोरी को न छुएंगे,'जब राजपुन ने ऐसा कहा तो उसने अथिनी की भांति हलके से उन्हे मालिङ्गन किया। ११. जब फुरती से उसके अधोवस्त्र को उतार कर राघव चले तो गोल-मोल अङ्ग वाली सीता ने अपनी मोढनी की छोर से अपने को ढंक लिया और राम को पीछे से लिपट कर उन्हें मागे बढ़ने से रोक दिया। ६.

१४ जानकीहरणम् अंशुकस्य निशि रक्षणाकुला हस्तयुग्मधृतनीविबन्धना । अप्रमादकृतिविघ्नमन्तरा स्वापमाप शयने पराङ्मुखी ॥१२॥ यद्ररक्ष दृढवलवन्धनैः स्वापकालमवगम्य भर्तरि । तत्प्रमृष्टवति संगतस्मृतिः सा रोद मुपितेव सस्वरम् ॥१३॥ यत्लगम्यमथ मैथिलीमुखं सोऽनुभूय नहि तृप्तिमाययौ । आननेन परिघट्य बोधितं राजहंस इव पाकुड्मलम् ॥१४॥ प्रेमवेगढदंशपीडितं यत्तदीयमधरोष्ठपल्लवम् । तद्दयार्द्रहृदयः शनैःपिबन् स क्षणेन विनिनाय वेदनाम् ॥१५॥ ग्राहितं नृपतिशक्रसूनुना स्वाधरं विविधचाटुचेष्टितैः । पानजितमदन्तवीक्षितं भूय एव सृजति स्म मातिनी ॥१६॥ स्वं नितम्बमपवाहितांशुक कामिनी रहसि पश्यति प्रिये । प्रार्थनामपि विनैव पल्लवस्निग्धरागमधुरं स्वयं ददौ ॥१७॥ १२. रामिं के समय, अपने वस्त्र की रक्षा के लिये आकुल, दोनों हाथों से कटिबन्ध को पकड़ कर, राम के चतुर चालो मे बिना कोई विघ्न डाले, वह शय्या पर अपना मुंह पीछे कर सोई। १३. जब राम ने जाना कि अब वह सो गई तो, जिस चीज वी सीता ने अपने वस्त्र के दृढ़ बन्धनों से रक्षा की थी उसे उसके पति ने मसला । तब वह सजग हो, चिल्ला कर रोने लगी, जैसे उसे किसी ने लूट लिया हो। १४, तव मिथिलाधिपति की पुत्री (सीता) के, यत्न से प्राप्ठ, मुख का रसास्वादन कर उन्हे तृष्टि नहीं हुई। जैसे राजहंस को अपनी चोंच से खोदने के कारण उस्फुल्ल कमल से तृप्ति नहीं होती। १५. कामोद्वेग से जोर से काटने के कारण पीड़ित, उसके नव पल्लव के सदृश पोठों की वेदना को, दयाद्रं हृदय, राम ने धीरे-धीरे चूरा कर, हर लिया। १६. राजाग्रो मे इन्द्र के समान (राम ने) मीठी-मीठी बातों एवं चेप्टामों से अपने निचले प्रोठ को उसके (सीता के मुंह में पकड़ा दिया। पर उस मानिनी ने बिना उसका प्रास्वादन विप और बिना अपने दांत से काटे, तुरन्त छोड़ दिया। १७. जब पोरी गे, प्रिय राम, उसके नितम्बों को, जिरा पर में, उन्होंने वस्त्र हटा दिया था, देख रहे थे, तब उस यामिनी'ने विना मांगे, स्वयं, नवपरसव के सहा निकने मोर गुलाबी अपर को उन्हें दे दिया 1 ( जिसमे वह नितम्ब को न देर राम, यह भाव है।) .

अष्टमः सर्गः ९५ सा मदेन मदनेन लज्जया साध्वसेन च विमिश्रचेष्टिता । पाययौ सपदि तादृशी दशां या न वक्तुमपि शक्यविभ्रमा ॥१८॥ वर्जनाय सुरतस्य भामिनी वाञ्छति स्म पटुचाटुचेष्टितम् । यत्तदेव समजायत स्वयं योपितो निधुवनस्य वृद्धये ॥१६॥ अश्रुणा सुरतखेदमात्मनः सम्मदश्च पुलकेन कामिनी। व्याजहार ननु लज्जया गिरा नव्यनृत्यकुशलेव भर्तरि ॥२०॥ यद्यदास तरसाऽभियोजितं योपितो रतिषु खेदवृत्तये । तत्तदेव मृदुसाधितं पुनः कामिनाऽपनयति स्म तच्छ्रमम् ॥२१॥ केशपाशमथ बन्धुमुद्यता मैथिली निधुवनेन विश्लथम् । वाहुमूलगतलोचने प्रिये लज्जयाऽवनति स्म सस्मितम् ॥२२॥ इत्यनङ्गशिखिना हते हृदि क्ष्माधिपस्य दुहितुनिविष्टया । लज्जया कतिपयेषु तानवं वासरेपु गलितेषु शिश्रिये ॥२३॥ १८. गर्व, कामासक्ति, लज्जा एवं भय इन भावों के सम्मिश्रण से उसकी (सीता की) चेष्टाएं, तुरन्त ऐसी अवस्था पर पहुंच गई और उनका व्यवहार उसके लिये इतना स्वाभाविक हो गया कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। १६. चतुर एवं मीठी वातचीत और चेष्टानों की इच्छा जो वह (सीता) संभोग से बचने के लिये करती थी (मर्थात् मीठी-मीठी बातों में लगाये रहती थी) उनका परिणाम उसके कामोद्दीपन करने मे हुआ। २०. उस कामविह्वला स्त्री ने, रति से उत्पन्न थकान को आंसूत्रों से और मदनोन्माद को रोमाञ्च से अपने पति पर प्रकट किया । भावो के प्रदर्शन मे चतुर की भांति उसने लज्जा से शब्दों के द्वारा कुछ नहीं कहा । २१. संभोग में जब-जब वे (राम) जत्दी के मारे जबरदस्ती करते थे तब तब उसे (सीता को) खेद होता था। परन्तु वही बात जब वे काम प्रेरित होकर मुलायमियत से करते थे तब उसका श्रम दूर हो जाता था। २२. रति के कारण जब उसके बाल का जूडा ढीला हो गया तो वह उसे बांधने लगी । तव राम की ओर देखने के कारण, लग्जा से सिर झुका कर वह मुसकराने लगी। २३. जब इस प्रकार उसके हृदय पर कामदेव का आपात हुआ तो पृथ्वी को पुत्री (सीता) के हृदय से, कुछ ही दिनो के वाद, लज्जा धीरे-धीरे जाने लगी।

जानकीरहणम् सर्वरीपु विरलीकृतत्रपा निद्रया किल हृता नृपात्मजा। नोविबन्धमतीत्य संस्थितं हस्तमस्य न बलादपाहरत् ॥२४॥ । निद्रिता प्रतिभयं भयानकस्वप्नदर्शनकृतं प्रपद्य सा। राघवं कुचघटावुरःस्थले सन्निधाय परिषस्वजे दृढम् ॥२५॥ ज्ञातमन्मथरसा मदातुरे कामिनीक्षिपति नीविबन्धनम् । सा जहार करयुग्ममंशुकादञ्जलिं किल भयेन कुर्वती ॥२६॥ सम्मताऽपि भुवनस्य मेधया राघवे निधुवनोपदेशिनि । व्याजहार गुणितस्य विस्मृतिं भूरिशस्तदुपदेशवांछया ॥२७॥ स्वेदविन्दुनिचिताननासिका धूतहस्तलतिका सशीत्कृतिः । सोढमन्मथरसा नृपात्मजा राघवस्य न बभूव तृप्तये ॥२८॥ चोदयत्यवनिपालनन्दने शिक्षितुं युवतिकृत्यनैपुणम् । देहजन्मशरखण्डितत्रपा सा ययौ रहसि कर्मकर्तृताम् ॥२६॥ २४. रात्रि में लज्जा कम हो जाने के कारण वह राजपुत्री निद्रा से अभिभूत हो गई मौर नीवीवन्ध के नीचे पड़े हुए उनके ( राम के ) हाय को उसने बलपूर्वक नहीं हटाया। २५. निद्रावस्था में भयानक स्वप्न देखने के कारण भयभीत होकर उसने अपने कुम्भ के समान स्तनों को राम के वक्ष से सटा कर उनको जोर से लिपटा लिया। २६. जव काम से विह्वल, राम उमके कटिबंध को खोलने लगे तो सीता ने, जो कामदेय के मानन्द को जान चुकी थी, हर के बहाने से अपने दोनों हाथों की अंजुली बना कर माने वस्त्र को छोड़ दिया। २७. रति के उपायों के विविध उपदेश, जय राग उरी दे रहे थे तो यपि वह सीय बुद्धि के लिये भवन में विख्यात थी, पर उन्हें यार-बार सुनने की चाव से कह देवी पी कि यह यताई हुई यातों को मूल गयी। २८. यद्यपि रति के मानन्द को पहन करने से उग राजपुत्री मी नागिफा के प्रप्रभाग पर पसीने की यूंदें मा गई, गुफोमल हाग कापायमान हो गये भौर पर सीवार परने सगी, पर रापप पा जी नहीं मरा । २९, जप राम उगे (पेगे समय में) मुनियों को था परना चाहिये, पराकी गिधा दे रहे थे तो पह (सीता), निगमी सग्ना पामय मागणी गे पूर-पूर हो गई थी, एलान में स्यय मिक्षिामन गई।

भष्टमः सर्गः यजगाद मदनेन पीड़िता तत्सहासरसमूचिपि प्रिये । सस्मितं बलितदेहशोभिनी 'तत्तदस्फुटमुवाच लज्जिता ॥३०॥ रत्नतल्पनिकटस्थिते शुके सङ्गतौ हृदि निधाय भाषितम् । निःसहास्मि विसृजेति जल्पति वीड़िता परिजघान पञ्जरम् ॥३१॥ रामवक्त्रगलितैः श्रमाम्बुभिश्छिद्रितं कुचयुगस्य कुङ्कुमम् । सा निरीक्ष्य हसिते सखीजने सम्मुखाद्यपजगाम सस्मितम् ॥३२॥ स्वानुवृत्तिविधिबन्ध्यमीय॑या चोदितोद्यत इवाथ लज्जितम् । मैथिलस्य दुहितुर्मनोभवश्चेतसो निरवशेषमाक्षिपत् ॥३३॥ दीर्घिकाजलतरङ्गनिर्धतत्यक्तपुष्पमयमण्डनौ क्वचित् । चादरम्यमितरेतराश्रयास्तेनतुः प्रमदकानने मृजाः ॥३४॥ चाटुमात्रकरणप्रयोजनस्तुल्यरागमपि स योपितश्चरणपङ्कजद्वये यावकं न्यपातयत् । तरुणपल्लवप्रभे ॥३५॥ ३०. जय हँसी-हेंसी मे उसके पति ने उन वातो को कह दिया जिन्हें उसने (सीता ने) काम की विह्वलता में कहा था तो उसने अपने सुन्दर शरीर को मोड़ कर मुसकराते हुए लज्जा से फिर उन्हें धीरे धीरे दोहरा दिया। ३१. रति के समय जो उसने कहा उसे हृदयस्थ कर जब रत्नजटित शम्या के निकट बैठे शुक ने कहा, "मै अशक्त हूँ, मुझे छोड़ दीजिये" तो लज्जित होकर उसने पिंजड़े पर हाथ मारा। ३२. श्रम के कारण राम के चेहरे से निकले हुए पसीने से, सीता के स्तनों पर लगे हुए कुंकुम लेप को पुछा हुआ देख कर जब सखियां हंसी तो वह मुसकराती हुई उनके सामने से हट गई। जैसे ईर्ष्या से प्रेरित होकर कामदेव ने मिथिलाधिपति की कन्या के चित्त से लज्जा को, जिसके कारण उसके अनुरूप प्राचरण में बाधा पड़ती थी, जड़ से उखाड़ कर फक दिया। ३४. कभी-कभी प्रमद वन में सरोवर के जल की लहरियों से गिराये हुए पुष्पो के गहनो को छोड़, वे दोनों एक दूसरे का सहारा लेकर मीठी एवं मनोहर बातें करते हुए स्नान करते थे। ३५. केवल प्रसन्न करने के प्रयोजन से वे पत्नी के चरण कमल में महावर लगाते थे क्योकि वे तो स्वभाव ही से उसी ढंग के नवपल्लव की तरह लाल थे। -३३. .

आनकीहरएम अज्रियुग्ममनुलिम्पतः स्वयं कुंकुमेन तरुणाकरोचिषा । आरुरोह करयुग्ममस्य तत् दूरमेव परिवृद्धवेपथु ॥३६॥ मेखलामधिनितम्बमर्पयंस्तत्र तत्र पुनरादधौ करम् । अत्र किञ्चिदनुपाधित: परं दुर्नहो नु मणिमेखलागुणः ॥३७॥ आचरनथ विलेपनक्रियां पाणिना पुलकितेन सस्पृहम् । सोऽपृशत्कुचयुगं पुनः पुनश्चन्दने सममपि स्थिते सति ॥३८॥ पत्रमानमिततर्जनीशिरःस्पृष्टकर्णलतिकोऽयमर्पयन् । पूर्वमर्धमुकुलीकृतेक्षणं तन्मुखं सुरभिगर्भमन्वभूत् ॥३६॥ आत्मनैव स तदा पुरा कृतं यावकं युवतिदन्तवाससि । उज्जहार मुदितः पुनः पुननिष्पिबन्नधरपानलोलुपः ॥४०॥ चुम्वति प्रियतमे विलोचनं योषितः स्वयमुपाहिताञ्चन् । प्राप रागमविकाशचक्षुपा कर्णगं निजमशोकपल्लवम् ॥४१॥ . ३६. जब वे स्वयं, तरुण सूर्य के समान चमचमाता कुंकुम का लेप उसके दोनों पैर के अंगूठों में लगाते थे तो (कामोद्वैग के कारण) कांपते हुए उनके दोनों हाप बहक कर दूर तक ऊपर चढ जाते थे। ३७. कोई सहारा न होने के कारण, मणि-मेखला का कहीं पर अटकना कठिन है, यह विचार कर वे (राम) उस मेखला को नितम्बों के ऊपर अटकाने के लिये बार-बार प्रमत्त हाथ चहां पर फेरते थे। ३८. अपने पुलकित हायों से चन्दन के लेप से चित्रित करते हुए वे बार-बार बड़े चाव से उसके स्तनों को छूते थे, यद्यपि उन पर चन्दन ठीक तरह से लगा था। ३६. उसके सुगधित मुख, जिसमे प्रांमें प्रघमुंदी थीं, चित्रित करते समय अपनी तनिक मुकी हुई तर्जनी के अग्रभाग से उसके लता के समान कोमल कान को छूते हुए ये उस मुख का अनुभव करते थे। ४०. राय उसके घर पान के लिये उत्सुक राम ने उस युवती के अधरों का बार-बार गुम्बन किया और उसने घर पर अपने ही हाप से पहिले लगाये हुए लाक्षारस को मिटा दिया। ४१. जब उसके पति (राम) ने उगको पासों का, जिसमें उन्होंने स्वयं प्रजन लगाया पा, गुम्बन लिया तब सीता, के निराफी भाग मुंदी पों, कार में पहिनाया हमा मनोक-पिस. सप अपने स्वाभाविक रंग रो पमक उठा ।

अष्टमः सर्गः ९९ पुष्परलविभवैयंथेप्सितं सा विभूपति राजनन्दने । दर्पणं ननु चकाङ्क्ष 'योपितां स्वामिसम्मदफलं हि मण्डनम् ॥४२॥ तामनङ्गकृतचारुविभ्रमां निर्दयं समुपगुह्य चुम्बितुम् । वीक्षितुश्च समकालमप्रभुळकुलो मुहुरिवास राघवः ॥४३॥ प्रार्थिताऽपि न चकार कानिचित् कानिचित् स्वयमपि व्यधत्त सा । अन्वभूधृदयरलविक्रयक्रीतमेनमवला यथेप्सितम् ॥४४॥ येन येन हरति स्म तामसौ तत्तदेव पुनराप योपितः । सज्जनेषु विहितं हि यच्छुभं सद्य एव फलबन्धि जायते ॥४५॥ कर्मणि स्वमुखपद्मविच्युतस्वेदविन्दुहतकान्तवक्षसि । तस्य चक्षुरुपकाञ्चिसञ्चरद्वीक्ष्य वक्षसि मुमोच सा तनुम् ॥४६॥ भतरि प्रणयमौनमास्थिता जल्पयत्यधरदेशनिग्नहैः । नो चकार वचनानि तादृशं निग्रहं चिरमवाप्तुमिच्छया ॥४७॥ ४२. जब राजपुत्र उसे मनमाना, सुन्दर पुष्पों एवं रलों से सजा रहे थे तब उसने दर्पण देखने की इच्छा नहीं की । क्योकि स्त्रियों के शृङ्गार का फल स्वामी को प्रसन्ता ही में होता है। विशेष-प्रियेषु सौभाग्य फलाहि चारता । -कुमारसम्भव ५-१- कालिदास । ४३. जब कामदेव से प्रेरित होकर सीता लुभावने हाव-भाव करती थी और राम उसे इतना कस कर लिपटा लेते थे कि वह उन्ही मे छिप जाती थी तो वह बार-बार जैसे व्याकुल हो जाते थे क्योकि उसको देखना और चुम्बन भी करना, दोनों साथ-साथ एक समय में वे नहीं कर पाते थे। ४४. प्रार्थना करने पर भी वह कुछ बातें नही करती थी भोर कुछ बातों को वह स्वयं (विना प्रार्थना किये) करती थी। अपने हृदय रत्न से उन्हे मोल लेकर, जैसी उसकी इच्छा होती थी उसी प्रकार वह मवला उनका मानन्द उठाती थी। ४५. उन्होने उस पत्नी से वही वही चीजें पायौं जिनसे वे उसे माकृष्ट करते थे। क्योंकि सज्जन के प्रति किया गया शुभ काम तुरन्त फलदायी होता है । ४६. जब उसने देखा कि उनकी (राम को) पाखें उसकी मेखला पर मॅडरा रही हैं तो उसने अपने मुख कमल से गिरे हुए पसीने की बूंदों से अपने पति के वक्ष को भिगोते अपने शरीर को उनके वक्ष पर गिरा दिया। ४७. जव उमके बुलाने के लिये उसके पति उसका मोठ काटते थे तो वह प्रेम के वशीभूत होकर, इस इन्छा से मौन साध लेती थी कि वे देर तक उसके प्रोठ को काटें।

१०० जानकीहरणम बालया हृदि निधाय स स्तनौ दन्तमास्यकमलं प्रसादने । प्राप्तुमिच्छरपि दोपतो विना रोषमाविरकरोन्मुहुर्मुहुः ॥४८॥ अल्पदोषविपयेऽपि जम्पती जग्मतुः प्रणयकोपवक्रताम् । स्नेहजातिरतिवृद्धिमागता जायते सुलभरोपसत्रणा ॥४६॥ अश्रुषु प्रणयकोपवह्निना लोहितत्वमुपनीय पायितः । तत्कटाक्षविशिखो निपातितो धैर्यमस्य निचकर्त सुस्थिरम् ॥५०॥ कोपिता चिरनिवृत्तसंगतिः सुप्तमेत्य परिबोधशङ्किनी । हस्तरुद्धचलकुण्डला धृतश्वासवृत्ति शनकैश्चुचुम्ब सा ॥५१॥ कैतवेन कलहेपु सुप्तया स क्षिपन्वसनमात्तसाध्वसः । चोर इत्युदितहासविभ्रमं सप्रगल्भमवखण्डितोऽधरे ॥५२॥ सङ्गतानि परिहृत्य चारिणौ मानमेत्य कलहं वितेनतुः । अन्ययातनयनी किलोरसा तौ निहत्य कुहचित्परस्परम् ॥५३॥ ४८. जब उन्हें मानन्द देने के लिये, वह वाला अपने स्तनों को उनके वक्ष पर रख देती थी तो उसके दात और मुख पाने की इच्छा से, बिना उसके किसी अपराध के वे बार-बार गुस्सा होते थे। ४६. वे दोनों एक दूसरे से थोड़ी-थोड़ी बात पर प्रणय नोध के तीखेपन का प्रदर्शन करते थे। प्रासक्ति जव बहुत बढ़ जाती है तब क्रोध की चोट स्वाभाविक हो जाती है। ५०. उनकी मोर प्ररित, प्रेमाग्नि से तप्त, उसकी तिरछी चितवन के वाण ने, पशु से मिल कर उनके स्वभाव-सुलभ धैयं को छोड़ा दिया । ५१. बहुत देर से वियोग के कारण युद्ध (सीता ने) सोते हुए राम के पास जाकर, उनके जाग जाने की शंका से, अपने लटकते हुए कुंडल को हाथ से पकड़े, धीरे से श्वास रोक कर, उनका पुम्वन ले लिया। ५२. प्रणय बालह में जब यह बहाना कर सो गई पोर चे(राम) हरते हुए, उसका पस्न उतार रहे थे, तो उगने हंगते हुए उन्हें 'नौर, मह कर उनके (निपले) घोंट यो जोर से काट लिया। ५३. मान मे रट कर, दोनों ही एक दूसरे से अलग पसते थे परन्तु जर माहीं पर दोनों पी पांग मिल जाती भी तो अवश्य ही ये, एक दूसरे को अपने यक्ष से टकरा कर जबर्दस्ती सड़ाई मोम' थे।

एकदारिकदनः स कान्तया सार्धमिद्धरुचि सौधमम्बरम् । आरुरोह परिसंहृतातपं द्रष्टुमर्धशशिमौलिसन्निभः ॥५४॥ वासरस्य विगमे समीरणैर्मन्दत्तितसुगन्धिकुन्तलाम् । सोधपृष्ठमधितस्थुषी वचो जानकोमिदमुवाच राघवः ॥५५॥ सन्निगृह्य करसन्तति क्वचित्प्रस्थितोऽपि रविरेप रागवान् । अस्तमस्तकमधिश्रितः क्षणं पश्यतीव भुवनं समुत्सुकः ॥५६॥ दिङ्मुखादपसरन्तमातपं नष्टतेजसमनुव्रजन्मुहुः । रश्मिभिः समववध्य भानुना कृष्यमाणमिव लक्ष्यते तमः ॥५७॥ अन्तराणि तमसः प्रयच्छति स्रष्टरीक जगती युगक्षये। भूय एव रविमण्डले रुचिर्लीयते जलधिमध्यत्तिनी ॥५८॥ ध्वान्तजालमुपयाति सर्वतः सागरे निहितमण्डलं रविम् । वारिभिः पिहितदण्डमायतं मृङ्गचक्रमिव फुल्लमम्बुजम् ॥५६॥ ५४. एक समय शुत्रुषों के नाश करने वाले, मस्तक पर अर्धचन्द्र से शोभित शकर के समान दीप्तिमान, वह (राम) अपनी प्रिया के साथ, ताप से रहित, शुभ्र आकाश को देखने के लिये, राजमहल के ऊपर चढ़े। ५५. दिन के समाप्त होने पर राघव, सीता से, जो महल के छत पर बैठी यो मौर जिनके सुवासित केश कुन्तल वायु में हलके-हलके लहरा रहे थे, ये वचन बोले। ५६. (देखो) अपने रश्मि समूह को सिकोड़ कर, अस्ताचल के शृङ्ग पर बैठा हुआ यह रक्त- वर्ण मूर्य, यद्यपि कही चला गया, फिर भी ऐसा लगता है जैसे क्षण भर के लिये वह बड़ी उत्सुवना से ससार को देख रहा है । ५७. ऐसा लगता है कि सूर्य के पीछे माते हुए अन्धकार को, दिगामो से धीरे-धीरे हटता हुमा, मूर्य का प्रकाश जिसमे गरमी नष्ट हो गरी है, अपनी रश्मियों में बांध कर बराबर यीचे लिये जा रहा है। ५८. युग के मन्त में जव पृथ्वी समुद्र के बीच में स्थित होकर जल में दूब जाती है और सप्टा मन्यकार के लिये स्थान कर देता है उसी प्रकार मूर्य की प्रभा ममुद्र में बीच में माकर पुनः मूर्य में निमग्न हो रही है । ५६. समुद्र के बीच में स्थित मूर्य के विम्ब को मन्धकार या जाल ऐमा धेरै हुए है जो प्रफुल्ल कमा को, जिममी नास पानी में दिणी है एक बडा मृगनर पारो मोर से धेरे हो।

एकचक्रमिव राजते नभःस्यन्दनस्य रविविम्बमस्तगम् । उत्पतत्यविकले निशाकरे घातुपङ्कपरिदिग्धमण्डलम् ।।६०॥ संहृतात्मकिरणं यथा यथा वृद्धिमुद्वहति मण्डलं क्रमात् । सागराम्भसि तथा तथा रविगौरवादिव शनैनिमज्जति ॥६॥ उन्मुखा दिनकरस्य रश्मयः सागरान्तरितमण्डलश्रियः । भान्ति तोयमभिभूय निर्गता बाडवस्य शिखिनः शिखा इव ॥६२॥ सन्ध्यया च परिरुद्धमग्रतो वासरस्य विगमे धनं तमः । भातिसिन्धुजलभिन्नमेकतः प्रावृषीव सलिलं पयोनिधेः ।।६३।। सन्ध्ययाऽरुणितपत्रसञ्चयं लक्ष्णपल्लवनिरन्तरं वनम् । विन्दतीव परिणामसम्पदं पश्य तत्तमसि 'सर्पति क्रमात् ॥६४॥ अन्धकारनिकरेण सर्वतः कृष्णसर्पमलिनेन सर्पता। रुध्यमानविषयाः समन्ततः संकुचन्ति परिखा नु दिग्भुवः ॥६५॥ . ६०. (इस समय) जब पूर्ण चन्द्रका उदय हो रहा है तो अस्ताचल पर प्रस्त होता हुआ सूर्य का बिम्ब, प्राकाश रूपी रय का एक ऐसा पहिया लगता है जिसका घेरा धातुओं के चूर्ण से लिप्त हो। ६१. अपने किरणों को सिकोड़ कर, जैसे जैसे सूर्य का मण्डल बड़ा होता जाता है, धैसे-वैसे सूर्य जैसे भरी हो कर समुद्र के जल में धीरे-धीरे डूबता जाता है । ६२. सागर के भीतर जिसके मण्डल का सौंदर्य छिप गया है ऐसे मूर्य की (जल के) ऊपर छिटकती हुई किरणें ऐसी लगती हैं जैसे वाडवाग्नि की ज्वाला जल को दया कर बाहर निकल रही हो। ६३. दिन के अन्त में, उपा के प्रकाश के मागे, पीछे हटाया हुमा अन्धकार ऐसा लगता है जैसे वरसात में, नदियों के प्रवाह से एक मोर हटाया हुमा समुद्र का जल । ६४. वह देसो, मन्धकार पे धीरे-धीरे बढ़ने मै, उपा के प्रकार से अनुरन्जित पत्तियों का समूह मोर कोमल पल्लवों से लदा हुमा यन, पवेपन के सौंदर्य को धारण करता है। ६५. मर दिशामों की साइयों की सीमायें, काले सांप की तरह मलिन, गर्वत्र फैले हुए पन्धमार के समूह से बन्द हो कर मंचित हो गई है।

भाति मत्तशिखिकण्ठकव॒रं ध्वान्तजालपरिरुद्धमम्बरम् । अर्कदीपकृततापसंमृतप्रौढकज्जलमलीमसं यथा ॥६६॥ पश्य दीप्तरुचि पूर्वमुदगतं ज्योतिरेतदसितोरगत्विपः । छिद्रमेकमिव विष्णुवर्त्मनो दूरमग्नरविरश्मिभासुरम् ॥६॥ पश्चिमे नभसि भान्ति लोहितास्तारका रविरथस्य वेगिनः । लोहचकहतमेरुमस्तकादुद्गता इव हुताशविप्लुपः ॥६८॥ मीलिता रविभयेन तारका रश्मिधामहतलोहिता इव । उन्मिपन्ति दिनकृत्करात्यये दिङ मुखैकरचनाः समन्तत. ॥६६॥ पूर्ववारिनिधिपृछतः क्रमाद्दर्शयन् हिमरुचिः कलान्तरम् । एकपक्षसुलभकमामसौ वृद्धिमद्य मुहुरेव विन्दति ॥७॥ भृङ्गपटलासितप्रभं पूर्वतः सपदि निर्गतं तमः । यत्करेण जघने हिमांशुना तुद्यमानमिव यातिपश्चिमम् ॥७१॥ पश्य .६६. मत्त मयूर के कण्ठ की तरह रंग-बिरंगा प्राकाश, अन्धकार के जाल से परिवेष्टित हो कर ऐसा लगता था जैसे सूर्य रूपी दीपक की लौ से निकले हुए घने काजल से काला पड़ गया हो। ६७. देखो, यह दमकता हुप्रा प्रकाश (अर्थात् चन्द्रमा) जो पूर्व दिशा में निकल पाया है, ऐसा लगता है जैसे कृष्ण सपं के रंग के समान विष्णु पय (माकाग) में, मू की रश्मियों के बहुत गहरे तक घुम जाने से देदीप्यमान एक छिद्र हो। ६८. पश्चिम के प्राकाश में लाल-लाल तारे ऐसे लगते है जैसे सूर्य के रथ की लोहे की पहिया की टकर से मेरु के शृङ्ग से माग की चिनगारियां निकल रही हो । ६६. सूर्य के भय से जिन्होंने अपनी पांसें बन्द कर ली थी और रवि के तेज से जो लाल हो गई थी वे तारिकायें मव मूर्य की रश्मियों के चले जाने से, दिगा के मुस को सजाने का निश्चय कर, जैसे अपनी मास चारो मोर खोल रही हैं। ७०. यह शीत-रश्मि पन्द्रमा पूर्वी समुद्र के ऊपर अपनी कलामों को प्रमशः दिसाता हमा, एक पक्ष (शुक्ल पक्ष) में उत्तरोत्तर सुतम पूर्णता को मात्र फिर प्राप्त हो गया - ७१. देखो,भृङ्गों के समूह के समान काला, यह मन्धकार जो एकाएक पूर्व मे निकला है वह पभिम की पोर ऐगे वा रहा है जैमे चन्द्रमा पपने बाएँ (इलेप-कर-रगि-हाय) से उसके जपन पर मार कर उसे पाने गदेड़ रहा हो ।

जानकीहरणम् क्षीरवारिनिधिना विवद्धता प्लाव्यमानवदसौ निशाकरः । उत्पपतत्युदयतः शनैः शनैहरिशुभ्रनिजरश्मिसंचयः ॥७२॥ क्षिप्यमाणघनतामसोत्करं दूरमुत्सरति मण्डलं दिशाम् । शीतरश्मि किरणस्य सर्वतो दातुमन्तरमिव प्रसर्पतः ॥७३॥ क्षीयमाणवपुरिन्दुरुद्गमे वर्द्धमानकिरणः समन्ततः । अर्कतप्तगगनानुवन्धिना तेजसेव. परितो विलीयते ॥७४|| बद्धरागमुदितो निशाकरः संत्यजन्दिशमसौ बलिद्विषः । शोकदीन इव पाण्डुरोचिपा काश्यमेति बपुषा मुहुर्मुहुः ॥७५।। पीतमेतदलिवृन्दमेचकं ध्वान्तमेव सकलं हिमत्विपः । स्वच्छविग्रहतया शशाकृतिच्छद्मना बहिरिवास्य लक्ष्यते ।।७६॥ विप्रयुक्तवनितामुखाम्बुजप्रोद्धृतद्युतिचयेन चन्द्रमाः। नूनमेष पुनरात्मण्डलं पूरयत्यसितपक्षकाशितम् ।।७७॥ ७२. दुग्ध के समान जिसका जल स्वच्छ है, ऐसे ऊपर उठते हुए समुद्र से जैसे तैराया जा कर, यह चन्द्रमा, जिसकी रश्मि का समूह श्वेत हार के समान है, उदयाचल से धीरे-धीरे "उठा। ७३. सब ओर फैलती हुई चन्द्रमा की किरणों को स्थान देने के लिये, घने अन्धकार को दूर फेंक कर, दिशामों का घेरा बहुत दूर चला गया है । ७४. उदय होने के समय क्षीणकाय चन्द्रमा ने अपने किरणों को चारो ओर फैलाया तो, परन्तु प्राकाश में अभी तक गरमी वर्तमान होने के कारण, जैसे यह कहीं लोप हो गया। विशेष जानकीहरण को तीन हस्तलिखित प्रतियों में 'गगण' शब्द का प्रयोग पाया जाता है, पर 'गगन' हो शुद्ध है। "फाल्गुने गगने फेने णत्यमिच्छन्ति बर्वराः।" ७५. यह चन्द्रमा जो उदय होने के समय लाल था वह बलि के शत्रु (इन्द्र मथवा विष्णु) की दिशा (मर्थात् पूर्व दिशा) को छोड़ता हुमा जैसे शोक से दीन हो कर, उसकी किरणें पीली पड़ गई हैं मौर वह धीरे-धीरे दुवला होता जा रहा है। ७६. (उदय होने पर) चन्द्रमा ने हमसे समूह की तरह काले मन्धकार को राय का राम पी (कर) अपने (चन्द्रमा के) दारीर के पारदर्गी होने के कारण यह (पन्धकार) सरगोग के रूप में बाहर प्रतीत होता है। ७७. अवश्य ही यह परमा, विरहिणी स्त्रियों के मुख कमल से छीन कर राधित कान्ति रो कृष्ण पक्ष में क्षीण पिये हुए अपने मन को फिर पूरा करता है।

अष्टमः सर्गः १०५ अन्धकारनिकरं करैरिमं भिन्दतः शशधरस्य मण्डले । धूलिपुञ्जइव भाति तामसः क्षोभवेगपतितः शशाकृतिः ॥७८॥ गुल्मलीनमलिकवुर तमः क्रप्टुकाम इव शर्वरीकरः । सर्वतो विटपजालरन्ध्रकैः प्रेरयत्युदयशेखरः करान् ॥७६॥ चन्द्ररश्मिनिहतोऽपि तामसः सुप्तकोकिलकुलेन सञ्चयः । उल्लसत्कुमुदगन्धसम्भूतैः सावशेष इव भाति पट्पदैः ॥८॥ पत्रजाल शतरन्ध्रविच्युतः सामिसिक्त इव भूरुहस्तले । स्थण्डिले निरवशेषमिन्दुना भाति मुक्त इव रश्मिसञ्चयः ॥८१॥ उल्लसत्सु कुमुदेषु षट्पदाः संपतन्ति परितो हिमांशुना । भिद्यमानतमसो नभस्तलाद्विच्युता इव तमिस्रबिन्दवः ॥८२॥ तारका रजतभङ्ग भासुरा लाजका इव विभान्ति तानिताः । दिग्वधूभिरुदयादुदेष्यतो वर्मनि ग्रहपतेः समन्ततः ॥८३॥ ७८. अपनी रश्मियों से मन्धकार के समूह को चूर-चूर करते समय, क्षोभ के वेग से गिरे हुए अन्धकार के टुकड़े, चन्द्रमा के मण्डल पर एकत्र होकर, खरहे की आकृति की तरह दिखाई पड़ते हैं। ७६. रात्रि का उत्पन्न करने वाला, उदयाचल का मुकुट (यह चन्द्रमा) लता मण्डपों में घुसे हुए, भृङ्ग के समान काले अन्धकार को जैसे खीच कर निकालने की इच्छा से, अपनी किरणो को चारो ओर पेड़ों के रन्ध्री में छोड़ रहा है। ८०, यद्यपि चन्द्रमा की किरणो से अन्धकार नष्ट हो गया था फिर भी, सोते हुए कोकिल के परिवार और उत्फुल्ल कौमुद को सुगप से प्राकृप्ट उस पर बैठे हुए भृङ्गों में उसका (मन्धकार का) अवशेष रह गया था। ८१. चन्द्रमा से गिराया हुमा रश्मियों का समूह, पेड़ों के पत्र-जाल के सैकड़ों रत्नों से वृक्ष के नीचे टुकड़े-टुकड़े दिखलाई पड़ता था, परन्तु वैदियों पर तो वह समूचा का समूचा पड़ा हुमा लगता था। ८२. कुमुद के फूलने पर उसके भीतर से भृङ्ग, निकल कर इधर-उपर ऐसे गिरने लगे जैसे चन्द्रमा मे चूर-चूर किये गये अन्धकार की बूंदे माकारा से गिर रही हो । ८३. पांदी के टुकड़ों के समान चमकते हुए तारे ऐसे शोभायमान हैं जैसे उदयाचल से उदय होते हुए ग्रह चन्द्रमा के मार्ग मे दिग्वधुमो ने चारो मोर साजा विमेरा हो।

१०६ जानकीहरणम् मित्रनाशपरिरोदिताश्चिरं मूछिता इव विभान्ति दीपिकाः । सुप्तपद्मविनिमोलितेक्षणा वृद्धशान्तकलहंसकूजिताः ॥४॥ सैकते शशिमरीचिलेपने रोधसोन्दुकरपुञ्जसन्निभम्। राजहंसमसमीक्ष्य कातरा रौति हंसवनिता सगद्गदम् ।।८५॥ तिग्मरश्मिविरहे सरोजिनी लोकमिन्दुकिरणावगुण्ठितम् । नाभिवीक्षितुमिव क्षपागमे मीलयत्यसितवारिजेक्षणम् ॥८६॥ जुम्भमाणचलपत्रसंहतेरन्तरं कुमुदखण्डसम्पदः । संविधातुमिव पद्मसंततिः संकुचत्यनतिद्रवत्तिनी ॥८७॥ ८४. अपने मित्र के नाश के कारण (अर्थात् सूर्य के प्रस्त हो जाने के कारण) बहुत देर से रो चुकने पर, ये सरसिया, जिनकी कमल रूपी भांखें वन्द हो गई है और जिनमें हंस बहुत जोर-जोर चिल्लाने के बाद चुप होगये हैं, मूछित-सी लगती हैं। विशेष -यह श्लोक संवादिनी चूलिका का उदाहरण है। राजशेखर काव्य मीमांसा में कहते हैं सममभिधायाधिकस्योपन्या सश्चूलिका। द्विधा च सा संवादिनी निसंवादिनी च। (चूलिका= तुल्य अयं को फहकर पुनः उसको अपेक्षा विशेष अर्थ का उल्लेख करना चूलिका है। यह दो प्रकार की होती है--संवादिनी और असंवादिनी अर्थात् समान और असमान । यह श्लोक काव्य मीमांसा में इस प्रकार दिया है- अङ्गणे शशिमरीचि लेपने सुप्तमिन्दु करपुञ्ज सग्निभम् । राजहंसमसमीक्ष्य रोति हंस यनिताच गद्गदम् ॥ राजशेखर ने इसी भाव का एक दूसरा उदाहरण दिया है। प्रभा प्रसरहासिनि सोपळे दुर्लक्ष पक्षति पुटो न पियेद जायाम् । मूठ अतिर्मुखर नूपुर नित्यनेन ध्याहारिणीमपि पुरो गृहराज हंसः॥ ८५. चन्द्रमा के किरणों (पांदनी) से लिप्त किनारे की चतुही जमीन पर, चन्द्रकिरणों के समूह के समान शुभ राजहंस को न देख कर, हंसिनी व्याकुल होफर भवरल कंठ रो रही है। ८६. यह सरोजिनी (सरसी जिसमें कमल हों) सूर्य के विरह से (पर्यात् गर्यारत होने पर) अपने नील कमन रूपी मासों को बन्द कर लेती है औगे वह पन्द्रमा मे किरणों से लिपटे हुए संसार को देखना नहीं माती । ८७. निकट में स्थित मामलों का समूह, पत्तियों के समूह के फैलने के कारण पान, भाग में पिरा, सौगुट के सौदर्य को पेलने के लिये स्पान देने के हेतु, गिड़ रहा है। फातरा चन्द्र अष्टमः सर्गः १०७ भाति विभ्रदसितोत्पलप्रभं लक्षणं मृगमयं हिमद्युतिः । श्यामलावदनबिम्बकान्तिभिर्बद्धमध्य इव रूप्यदर्पणः ॥८॥ यौवनोपहित पाण्डुकान्तिना त्वन्मुखेन विजितो निशाकरः । लज्जयेव घनमेघसन्ततौ रुद्धरश्मिनिवहो निलीयते ॥८६॥ अद्वितः शशमयेन लक्ष्मणा कृष्णमेघशकलं निशाकरः । मध्यलग्नमिव मन्दमुद्वहन् निष्पतत्यसितवारिदोदरात् ॥१०॥ उद्धृतद्युतिरिवैप मध्यतो भाति कृष्णमृगलक्षणः शशी । कुन्दगौरदशनावलीमिमां वेधसा रचयितुं तव प्रिये ॥१॥ त्वन्मुखावजितमण्डलश्रियस्तत्कलङ्कममृतद्युतेरयम् । वीक्ष्य शीतकर कान्ततोरणः शोकवाप्पमिव वारि मुञ्चति ॥१२॥ इति सपदि वदन वदान्यवर्यः शयनशिलातलमिन्दुपांदघीतम् । अलसतरगतिर्नरेन्द्रकन्यामनुगमयन्मदमन्यरः प्रपेदे ॥१३॥ ५८. यह चन्द्रमा, जिसमे नील कमल के रंग का हरिण लक्षित है, उस चांदी के दर्पण की तरह लगता है जिसमे (मुख देखने के समय) सांवली स्त्रियो के मुख के विम्ब की कान्ति बीच में बंध गई हो। ८६ यौवन के कारण शुभ्र कान्तिमान तुम्हारे मुख से हार कर यह चन्द्रमा जैसे लज्जासे, धने मेघों के समूह में अपनी रश्मियों की परम्परा को बटोर कर छिप गया है। ६०. सरहे से अङ्कित यह चन्द्रमा काले मेघो के भीतर से धीरे-धीरे निकलता हुमा ऐसा लगता है जैसे ( निकलते समय ) उसमें काले मेघ का एक टुकड़ा वीच में लगा रह गया हो। ६१. हे प्रिये ! यह चन्द्रमा जिसमें कृष्ण मृग का प्राकार बना है, ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे कुन्द के सदृश श्वेत दांत की पंक्ति को बनाने के लिये ब्रह्मा ने चन्द्रमा के मध्य भाग से उसकी कान्ति निकाल ली हो। ६२. तुम्हारे मुस से जिसके मण्डल की कान्ति हार गई है, ऐसे ममृत के समान दीप्तिमान, इस चन्द्रमा के कलक को देख कर, इस चन्द्रकान्त मरिण से बने हुए तोरण से पानी छूट रहा है जैसे वे शोक के प्रोमू हों। ६३. शीघ्रता से इतना मह कर, मधुरभापियों में श्रेष्ठ (राम) मद मे धीरे-धीरे, प्रलगाई हुई चाल रो, पन्द्रकिरणो से स्वच्छ की हुई शयन गिता पर नरेन्द्र वी पुत्री (सोना) के पीछे-पीछे गये।

१०८ जानकीहरणम् अथ सुरतमखे सुखं समाप्ते मदनहुताशनदग्धमानहव्ये । चषकमधुनि सन्निविष्टविम्ब मु खमनयद्दयितासखः . स सोमम् ॥६४|| दुहितुरवनिभत्तुरुन्मयूखं मणिचपकं परिमण्डलं विहाय । प्रियमुखपरिभु क्तधामवाञ्छा करकमलं नयति स्म हेमशुक्तिम् ॥६५॥ नियतमिह पतन्ति दन्तधारा मदन मदोद्धतयोरितीव भीत्या । अधरकिशलये विहाय यूनोर्मधु पिबतोयनान्युयवाप राग. ॥६६॥ मुहुरपि मधुपो विवृद्धतृष्णो न विरमति स्म पिबन् सुगन्धि हृद्यम् । युवतिमुखमसंशयं यतो यत् सरसिरह परमार्थतस्तदेतत् ॥१७॥ अचकमत मधु प्रियामुखेन क्षितिपसुतः प्रणयादसौ वितीर्णम् । अधरमितवतो व्रणस्य दाहात् स्फुटरचितभ्रकुटिर्मधुस्रवेण ॥८॥ इति सपदि निशामतीयतुस्तौ प्रविधुतकौसुमभक्तिसूत्रशेषम् । रतिकलहकचग्रहेण माल्यं विलुलितकेशसमर्पितं दधानौ ॥६६॥ १४. जव रति रूपी यज्ञ, जिसमें कामदेव की अग्नि में, मान की प्राहुति दी जा चुकी थी, सुख- पूर्वक समाप्त हो गया तब अपनी प्रियतमा के प्रिय (राग) मदिरा के प्याले में, जिसमे उनके मुख का प्रतिबिम्ब पड़ रहा था, सोम भर कर सीता के मुख के पास ले गये। ६५. पृथ्वीपति की पुत्री (सीता) ने, इस इच्छा से कि वह अपने प्रिय (राम) के मुंह की जूठी मदिरा पी सके, मरिण के बने हुए प्याले को जिसके गोल किनारे से आभा निकल रही थी छोड़ कर, सुवर्ण के मदिरा पात्र को अपने कर कमल में ले लिया । ६६. काम से उन्मत्त उनके दांतों की तीखी धार अवश्य ही अधरों पर पड़ेगी इस डर से, साल रंग, मदिरा पीने के समय उनके किसलय के समान अधरों को छोड़ कर उनकी प्रांखों में छा गया। ६७. वह मधु लोलुप भृग (राम) की, जिसकी प्यास बहुत बढ़ गई थी, सुवासित होने के कारण हृदय हारी मधु (अधर मधु) के बार-बार पीने पर भी नहीं अघाते थे और पीने से नहीं हटते थे। क्योकि वह उस युवती का मुख था इसमें कोई सन्देह नहीं था पर यथार्थ में वह कमल था। ६८. तब उस पृथ्वीपति के पुत्र (राम) ने, जिनकी भौहें, अपने अधरों में (सीता के लगाये हुए) पाव पर मदिरा लगने से दाह के कारण, संकुचित हो गई थी, प्रेम के वसीयूत हो कर, अपनी प्रिया के मुख से (सीपे अपने मुख में) मदिरा लेना पाहा । ६६. रति के समय छीना-झपटी में पकड़े हुए केश से फूलों के गिर जाने से पौर उसके पे दस सूत्र का सौंदयं बच रहने के कारण, विसरे हुए बालों में (उसी प्रकार) माला धारण किये उन्होंने जल्दी से रात बितायी ।

अष्टमः सर्गः १०९ अथ हृदयङ्गमध्वनितवंशकृतानुगमै- रनुगतवल्लकीमृदुतरक्कणितैर्ललनाः । तमुपसि भिन्नषड्जविषयीकृतमन्द्ररवैः शयितमबोधयन् विविधमङ्गलगीतिपदैः ॥१०॥ हृदय निपीडनोद्धृतपयोधरकुंङ्कमया रतिषु दधानया दशनखण्डितमोष्ठमणिम् । चिरकृतजागरारुणितमन्थरलोचनया शयनममुच्यत प्रियमनु प्रमदोत्तमया ॥१०१॥ इति अष्टमः सर्गः । १००. तब हृदय को सोहावनी लगने वाली वांसुरी की ध्वनि से, जो वीणा की प्रति मधुर झंकार का साथ कर रही थी, और जिसमें पल के मिन्न-भिन्न श्रुतियों की गम्भीर ध्वनि सप्टतया लक्षित थी, तथा विविध प्रकार के मङ्गल गान से प्रात काल स्त्रियों ने सोते हुए उन्हें जगाया। १०१. तव स्त्रियों में श्रेष्ठ (भीता) ने. जिसके स्तनों पर लगा हुमा कुंकुम का लेप हृदय के गाढ़ पालिङ्गन से पुछ गया था, रति के समय दांत से काटे हुए,मणि के समान दीप्तिमान पोठों को धारण करते हुए, मौर जिसकी मांखें रात में देर तक जागने के कारण लाल एवं मन्द हो गई थी, पलंग को अपने पति के पश्चात् छोड़ा। आठयों सगं समाप्त।

नवमः सर्ग: इति प्रवृत्तस्य सुतस्य केषुचिदिगतेषु मासेषु सुखेन भूपतिः । पुरं प्रतस्थे वनितापरिग्रहेनयं सुतानामितरत्समस्य सः ॥१॥ उपेत्य पत्या सह शोकसम्पदा कलत्रभारेण च मन्थरक्रमा । पितुः प्रयाणाभिमुखी भुवः सुता ततान पादावुदबिन्दुभिर्दशोः ।।२।। असावपत्यंगुणपक्ष वत्तिनी मति समालम्ब्य गुणैः पुरस्कृतम् । नगौ ततः साधु गुरुंगरीयसीं गिरं सतीनामुचितव्रताश्रयाम् ॥३॥ परः प्रकर्षों वपुषः समुन्नतिर्गुणस्य तातो नृपतिन्नवं वयः । इति स्म मा मानिनि मानमागमः पतिप्रसादोन्नतयो हि योषितः ॥४॥ स्त्रियो न पुंसामुदयस्य साधनं त एव तद्धामविभूतिहेतवः । तडिद्वियुक्तोऽपि धनः प्रजृम्भते विना न मेघ विलसन्ति विद्युतः ॥५॥ १. जब राम कई दिन इस प्रकार आनन्द में व्यतीत कर चुके बात राजा दशरथ अपने वाकी तीनों पुत्री का भी विवाह कर अपनी राजधानी के लिये चले । २. पृथ्वी की पुत्री (सीता ) अपने पति के साथ, अतिशय शोक एवं श्रोणी के भार के कारण धीरे-धीरे अपने पिता के पास अपने प्रश्रविन्दुओं से उनके पैरों को भिगोते हुए चली। ३. तब उसके पिता , गुण का पक्ष लेने वाली बुद्धि का अवलम्बन कर अपनी गुणवती पुत्री से, पतिव्रता स्त्रियों के कर्तव्य के सम्बन्ध में सारगर्भित वचन बोले। ४. हे मानिनि ! शरीर का अधिक सौष्ठव, गुणों की प्रचुरता, पिता का नृपति होना, युवावस्था, इनके कारण अभिमान न करना । क्योकि पति के प्रसन्न करने ही में पत्नी का गौरव होता है। विशेष-फुले प्रसूतिः प्रयमस्य वेषसस्त्रिलोक सौन्दर्यमिवोदितं वपुः । अमृग्यमश्वर्य मुखं नवं यपः, .. . -कुमारसम्भव, ५-४१-कालिदास । ५. स्त्रियो, पुरुपों के मम्युदय का सापन नहीं होती। बल्कि पुरुष ही उनके तेज और धभव के कारण होते हैं। बिना बिजली के भी बादल गरजता है, परन्तु विना वादल के विजली नही चमकती।

नवमः सर्गः . गतापि भत्रे परिकोपमायतं गिरः कृथा मा परुपार्थदीपनीः । कुलस्त्रियो भर्तृजनस्य भत्सने परं हि मौनं प्रवदन्ति साधनम् ॥६॥ पतिव्रता वश्यमवश्यमङ्गना करोति शीलेन गुणस्पृहं पतिम् । विनष्टचारित्रगुणा गुणैपिणः पराभवं भत्तु रुपैति दुस्तरम् ॥७॥ अलं त्वयि व्याहृतिविस्तरेण मे कुरुष्व तद्यच्चरितं त्वदाभयम् । श्रुति प्रयातं जरसैव जर्जरं सहस्रधेदं हृदयं न दारयेत् ॥८॥ अयं त्वदेकप्रवणो मनोरथो वृथाऽद्य दैवादपि नाम नो भवेत् । इति प्रवक्तुर्जरतो निरासिरे निगृह्य कण्ठं वचनानि मन्युना ॥६॥ उदनभासः शिखया शिखामणे: स्रजा च धम्मिल्लकिरीटदष्टया । प्रमृज्य पादौ जनकस्य जम्पती क्षयादयातामथ लम्भिताशिपौ ॥१०॥ कृतो वियोगेन शुचः समुद्भवः समर्पितः साधुवरेण सम्मदः । मनस्यवस्थाननिमित्तमीशितुः क्षणं विवादानिव तस्य चक्रतुः ॥११॥ पति से बहुत क्रुद्ध होने पर भी उनसे कटु मोर लगते हुए वचन न बोलना। अच्छे कुल की स्त्रियों के लिये चुप रह जाना, पति की भत्र्सना करने का सबसे बड़ा साधन कहा गया है । विशेष --देखिये 'भविप्रकृताऽपिरोषणा तया मास्म प्रतीपं गमः। -माकुन्तल-४-१८,कालिदास पतिव्रता स्त्री, अपने शील से, गुण के इच्छुक पति को, अवश्य ही, अपने वश में कर लेती है परन्तु चरित्र हीन स्त्रियों की, गुणों की इच्छा रखने वाले पति से बड़ी अवहेलना होती है । मुझे और कुछ अधिक विस्तार से तुमसे नहीं कहना है । (केवल इतना ही कहना है. कि) कोई माचरण तुम ऐसा न करना जिसे सुन कर, वृद्धावस्था ही से जर्जर उस हृदय को, जो स्वयं सहस्रो टुकड़े में बँट गया है, चूर चूर कर दे। अब तुम्हारी ही मोर लगी हुई यह अभिलाषा, दैव संयोग से भी, वृथा न हो, ऐसे वचन उस वृद्ध के, शोक से प्रवरुद्ध कण्ठ से निकले। १०. तब वे दोनो अपने मुकुट में लगे हुए श्रेष्ठ मरिण की प्रमा मे एवं किरीट में देशपाग के साय गुयी हुई फूलों की माला से जनक के चरणों वा परिमार्जन कर (मर्थात् प्रणाम कर) और उनका मशीर्वाद रोकर राजमहल से निकने । ११. उस राजा के हृदय में उम ाण (मपनी पुगो के) वियोग मे जनित मोफ भौर उसे एक विशिष्ट साधु पति मिल जाने को प्रसन्नता, ये दोनों भाव उनके मन में स्थान पाने के लिये जैसे परस्पर भगड़ने लगे।

११२ जानकीहरणम हलायुधाभस्य सकालहो रवः पयोधिनिर्घोषगभीरभैरवः । ततः प्रगल्भाहतभेरिसंभवः प्रकाशयामास गति समन्ततः ॥१२॥ गजेन्द्रघण्टाघटितश्च निःस्वनः करेणुकावृहितवृंहितो मुहुः । भयंवितन्वन् भवनेषु पक्षिणां दिशः ससाथ समं समुद्धतः ॥१३॥ समारुरोहाथ रथं महारथः सहेमचित्रं सह राजकन्यया । दिनादिसन्ध्यानुगतां पिशङ्गितां स्वरश्मिदीप्त्येव दिवं दिवाकरः ॥१४॥ शिरःप्रदेशस्थसमुदगपेटिकागृहीतवीणांऽशुक पञ्जरादयः। सवेत्रहस्तैः स्थविरैरधिष्ठिताः स्त्रियोऽप्यनुस्यन्दनमत्यगुर्मुदा ॥१५॥ मदान्धमातङ्गघटाद्रिसंङ्कटे परिक्वणन्ती बलकायनिम्नगा। तरङ्गिता वल्गुतुरङ्गरङ्गितैः पुरः प्रतस्थे पुरुहूततेजसः ॥१६॥ स्वदृष्टिरोधि श्रवणाग्रमारुतैरजो रथोत्यं यदि नाहरिष्यत । विनिर्गताभिर्न पुरो मदस्रुतां घटाभिरद्रक्ष्यत वत्मं दन्तिनाम् ॥१७॥ १२. तव बहुत जोर से पीटे गये नगाड़े की ध्वनि, दुंदुभी का स्वर एवं समुद्र के गम्भीर गर्जन ने, बलराम के समान तेजस्वी उनके प्रस्थान की सूचना दी। १३. तब श्रेष्ठ हाथियों के घंटों की टनटनाहट, हथनियों की बार वार की हुई चिग्धाड़ से तेजी पकड़ कर, महल में चिड़ियों को भयभीत करता हुअा बड़े जोरशोर से सव दिशाओं में फैल गयी। १४. तब महारथी राम, राजकन्या (सीता) सहित, सुवर्ण से चित्रित रथ पर ऐसा चढ़ जैसे प्रातःकाल, उपा से अनुगत सूर्य रंग बिरंगे प्राकाश में चढ़ता है। १५. स्त्रियां भी बंद संदूकों को जिनमें वीणा, रेशमी वस्त्र, पिजड़े इत्यादि रखे थे, अपने सिर पर रख कर, हाथ में बेत लिये हुए वृद्ध भृत्यों की देखरेख में बड़ी प्रसन्नता से रप के पीछे-पीछे चली। १६. इन्द्र के समान तेजस्वी राजा पी, सुन्दर घोड़ों रो अनुरञित तरङ्ग पाली, नदी के समान रोना, पहाड़ के समान मदान्ध हाथियों के समूह से, पलने में रकावट होने के कारण गोर करती हुई राजपानी की मोर पली। १७. यदि रयों पालने से उठी हुई उसकी दृष्टि को रोकने वाली पूलि को मद बहाते हुए हाथियों ने अपने कान के प्रभाग यो फड़फड़ाने से निकली हुई वायु से न उड़ा दिया होता तो उनके समूह को सामने का मार्ग न दिसाई पड़ता।

नवमः सर्गः व्यतीतरथ्येऽथ रथे कपोलयोविलासवत्या लसदंशुजलायोः । पयात तस्याः पुरगृह्यदीर्घिकासमोरणानतितपद्मजं रजः ॥१८॥. वराङ्गना प्रस्तरभेदकोटिभिर्हतस्य चक्र चलनं वरूथिनः । पिघाय यत्तचलनं पथिप्रियं तमाललम्वे वलसन्निधावपि ॥१६॥ रथध्वनिप्रापितसम्मदं गवां कुलं समुत्पुच्छयमानमुन्मुखम् । उदग्रकर्ण परिघावदेकतो ददर्श सीताश्य वनान्तत्तिनी ॥२०॥ विनिद्रपद्या मृदुभिः समीरणैर्विसारयन्तः कलहंसिकागिरः । स्वदेशसीमासरितो विलखिताः शुचं वधूचेतसि साधु संदधुः ॥२१॥ विवृत्तदृष्टा विपयव्यतिक्रमाच्छनैनिमज्जन्त इवावनीतले। स्वजन्मभूमी गिरयोनृपात्मजाकपोलमातेनुरजस्रमश्रुभिः ॥२२॥ द्विपेन्द्रदन्ताहतवन्यशल्लकोकपायगन्धिः पथि तत्र योषिताम् । शनैविधुन्वन्नलकारवल्लरीमुखानि पस्पर्श वनान्तमारुतः ॥२३॥ १८. जब रय थोड़ी दूर चला गया तो नगर के बाहर वाताव में वायु से नाचते हुए कमलों का पराग उस विलासवती (सीता) के किरणों की जाल से चमरते हुए दोनो गालों पर जा गिरा। १६. चलने में, परयर के नोकीले टुकड़ों से जब रप के पहियो मे घचका लगता था तो उस अवसर का लाभ उठाकर वह सुन्दर शरीर वाली (सीता) अपने प्रिय से सेना के सामने ही लिपट जाती थी। २०. जंगल के बीच में सीता ने नील गायों का एक मुड देखा जो रय की ध्वनि से प्रसन्न हो कर, अपनी पूंछ उठाये, सर ऊंचा किये मोर कान सड़े हुए एक मोर भाग रहा था। २१. मरने नगर की सरहद पर नदी को, जिसमें मन्द-मन्द वायु में उत्फुल्ल कमल भूम रहे थे और जहाँ से हसिनियों की बोली का विस्तार हो रहा था, पर बहू (गीता) ने पार किया तो उसका हृदय शोक से भर गया। २२, (रप की गति के कारण) मिन-भिन्न वस्तुमों के प्रम-बम से भागे-पाने के कारण (रस पर से) पोधे मुर कर देखने से उसकी जन्मभूमि के पवंत, (पीधे हटते हटते) पृथ्वी में धीरे-धीरे वितीन होते हुए सगते ऐसा देस कर उसको (गीता की) पौगों से निरन्तर बहते हुए प्रामुमो ने उसके गानों को भिगो दिया। २३. बेष्ठ हाधियों के दांत से तोड़ी हुई जंगली सल्लनी पी पाय गन्य में युक्त, यन के पन्त में बनी हुई वायु ने रास्ते में, परनी (मोगा) के लता के समान पेग के पग्रभाग को पीरे-धीरे हिलाते हुए उमरे (गीता के) मुग मोसा किया।

११४ जानकीहरणा अथ प्रतानः प्रततान तामसो नृपस्य भीमं भयमादिशन्दिशः । क्षिपन् क्षपाया विगमेऽपि संहति प्रसह्य वैरोचनरोचिपा पथि ॥२४॥ अरिष्ट सन्तापविरूपदर्शनास्तमोऽभिभूताः प्रतिकूल मारुताः । अविप्रसन्नानि मुखानि भेजिरे दिशो विनाशोपनता इव क्षणम् ॥२५॥ अथ प्रकाशीभवदनतोदिशं क्षणादुदीचीमवभास्य दीप्तिभिः । बलेन तेजः पुरुषाकृतिश्रिया विभक्तमुत्पातमनु व्यदृश्यत ॥२६॥ ततो दधानः श्रवणावसङ्गिनी विशुष्कपङ्केरहवीजमालिकाम् । विनिद्ररक्तोत्पलशङ्कया ततां विलोचनोपान्त इवालिसन्ततिम् ॥२७॥ विशालवामांसतटावलङ्घिनी समुद्वहन् द्वीपितनुं तनूदरः । परिज्वलंस्तीव्रतपोहुताशनस्फुलिङ्गपातैरिव विन्दुचित्रिताम् ॥२८॥ भुजेऽतिभीमे सशरं शरासनं निधाय वामे निधनावहं द्विपाम् । करेऽपरस्मिन् परदुर्गपारगं परं स विभ्रत्परशुं परासुहा ॥२६॥ . २४. यद्यपि रात्रि नहीं थी, फिर भी एक अन्धकार का समूह, राजा के हृदय में तीय आशंका उत्पन्न करता हुआ, सूर्य के किरण पुञ्ज को सहसा हटा कर, रास्ते में चारों ओर फैल गया। २५. अन्धकार से घिरी हुई, जहाँ प्रतिकूल हवायें चल रही है अनिष्ट मुचक भयहार रूप धारण किये हुए, दिशाभों ने, जैसे विनाश की ओर अग्रसर हो रही हो, उस क्षण, पोर मप्रसन्नता का रूप धारण कर लिया। २६. तय एक तेजपुञ्ज, अपनी दीप्ति से उत्तर दिशा को सहसा प्रकाशमान् करता हुमा, बलवान् पुरुषाकृति से दमदमाता हुया सामने दिखलाई पड़ा। २७. सूखे हुए कमल के बीजों की माला कान में पहिने हुए, जिनके वीज उगकी प्राँसों के निकट ऐसे लगते थे, जैसे मुंदे हुए नील कमल की शंका से एकत्र भृङ्गों को पंक्ति लगी हो । विशेष--२७वें श्लोक से ३१वें श्लोक तक कुलक है । ३१वें श्लोक में "भृगूणां प्रभुः रमेण गिरो जगदे" के साथ प्रत्येक श्लोक का अन्यय होगा। इन पांचों श्लोकों में परशुराम का वर्णन है। 'फुलफ' को व्याल्या २-२ में देखिये । २८. पोप से धधकते हुए, पतले उदर वाले, विशाल याये कन्धे पर तदुये गा धर्म पटकामे हए, जिस पर उसके पिन्दु ऐसे लगते थे जैगे उनके तीन यत एवं तप की अग्गि मी जलती हुई चिनगारियों के गिरने से चित्रित चिह्न बन गये हों। २६. शत्रुपों का नाश करने याले, जिनके भयानयः यि पन्धे पर याण गंगुत मृत्यु गो गाप में से पलने वाला धनुष था पौर दूसरे हाथ में एक उनग फरगा या जो भागों के दुर्ग को भेदने वाला था।

नवमः सर्गः ११५ तपोऽभिधानस्य सितेतराध्वनः शिखा इवादित्यमयुखपिङ्गलाः । जटा विधुन्वन् बलिताः समन्ततः समीरणैरात्मरयेण सम्मृतैः ॥३०॥ प्रभु{गूणां जगदे जगत्सृजः परोऽवतारो ज्वलनं वितन्वता । हसेन धुन्वन्नथ तबलं बली प्ररुध्य रामेण रुपावृता गिरः ॥३॥ न राम रामं युधि जेतुमुद्यमो विधीयतामन्यमिव क्षितिक्षितम् । सरित्तटीपाटन पाटवस्पृशं न गोपतिं प्राप्य विशीयते नगः ॥३२॥ रघोरपत्ये जगतीपतिद्विपो वृथा तव स्थादिह विक्रमनमः । अलं विसारिनसनस्थपाटवो न दन्दशूकप्रभवे विहङ्गमः ॥३३॥ धनुषोऽनुशासितुः शरासने भूधरधन्वनः परम् । इतः प्रवृत्तापि न नूनमागता विपत् त्वदीयश्रवणस्य गोचरम् ॥३४॥ निशम्य तस्यैतदितीरितं वचो जगाद शिष्यः स पुनः पिनाकिनः । परस्य वृद्धिं यशसो वितन्वती वृथा विधित्सन् धनुषो भिदामिदम् ॥३५॥ तव प्रयोगे . ३०. मूर्य की किरणो के समान पिङ्गल वर्ण, तपस्या की मग्नि से निकली हुई धूमिल ज्वाला के सदृश, अपने जटाजूट को अपने ही तेज से निकली हुई वायु से, हिलाते हुए। ३१. तब उस वीर को, जो भृगुवंश के प्रभु थे, जो जगत् के सृजन करने वाले ब्रह्मा के दूसरे अवतार थे और जो राम के वल को हंसी से झकझोर कर जल फैला रहे थे, रोक कर राम प्रोध से भरे वचन बोले। ३२. हे परशुराम ! दशरथ के पुत्र इस राम को अन्य महीपति राजामों की तरह युद्ध में जीतने का प्रयास न करो । नदी के किनारे को ढहाने में चतुर साँड़ पहाड़ को गिराने में समर्थ नहीं होता। ३३. क्षत्रिय राजामों के दानु, भापके विक्रम की परम्परा रघु के वंशज के प्रति निरर्षक होगी। एक पक्षी जिसमें केवल मछली के निगलने की शक्ति होती है वह सर्पराज के सामने नगण्य है। ३४. तुम्हें धनुविद्या सिखलाने पाले शिव के धनुप पर जो यह विपत्ति भाई है उसे मैंने जान बूझ कर किया है । लगता है यह बात तुम्हारे कान तक अवश्य ही नहीं पहुंची। ३५. उनके (गम के) रहे हए इरा वास्य को मुन कर, उग शिव के शिष्य ने राम से, जिनका यस पनुप के तोट्ने रो पड़ रहा पा उमे वृया करने की इच्छा मे फिर यह नहा ।

जानकीहरणम् नवेश्वर स्तब्धतरं धनुर्द्वयं विधाय बन्ध्येतरवाणपातनम् । विशामधीशे किल विश्वकर्मणा पुरन्दराख्याय पुरा व्यतीर्यत ॥३६॥ विसृज्य पूर्व दनुजारये धनुस्तयोरथादायि रथाङ्गधारिणे । धनुस्तथैकं त्रिपुरं दिधिक्षते त्रिलोचनाय त्रिदशाधिपेन तत् ॥३७॥ विवित्सया तद्गतजन्यतेजसो व्यधत्त यलेन तथा मरुत्पतिः । यथाऽहवो हव्यवहोनतेजसोरजय्यशक्त्योरजयोरजायत ।।३८॥ चकार चक्रादि विहाय देवयोयुगं महेष्वासयुगेन संयुगम् । दिशो दशापि प्रतिरुध्य पत्रिभिः समाः सहस्राणि समेतसाहसम ॥३६॥ अथो विकृष्टं मृदुभूतमीश्वरः ससर्ज यच्चापमभेदि तत्त्वया । अगादपीकाय वितीर्णमक्षतं क्रमेण हस्तं मम वैष्णवं धनुः ॥४०॥ गुणावुभावस्य तयोर्जगच्छु ति जहाति नैको दृढ़तेति विश्रुतः । असंशयं ज्येतिनिरूढिमागतः परो ममैव श्रवणान्तगोचरः ॥४१॥ ३६. हे नये राजा (अर्थात् अभी नये नये राजा हुए हो। तुम क्या जानो यह भाव है) प्राचीन समय में विश्वकर्मा ने दो विशिष्ट धनुप, जिनसे निकले हुए वारण कभी विफल नही होते, बनाकर, देवताओं के स्वामी को जिनका नाम पुरन्दर है, प्रदान किया था। ३७. तव देवताओं के स्वामी ने प्रथम धनुप, दनु दानव के शनु, एवं सुदर्शन चक्र के धारण करने वाले विष्णु को दिया और दूसरा, पिनेन भगवान् शिव को जो तीन नगरों को जलाना चाहते थे, दिया । विशेष--तीन नगरों से अभिप्राय मय दानय से बनाये हुए उन सोना, चांदी और लोहे के नगरों से है जिन्हें शिय ने जलाया था। ३८. सब मरतों के स्वामी, इन्द्र ने उसकी शक्ति को जानने की इच्छा से, या मे हम्य फे अधिकारी, सौर उग्रतेज के धारण करने वाले, शिव, के जो दोनों मजेय पौर प्रजन्मा थे, बीच बड़े प्रयत्न से झगड़ा करा दिया। ३६. तब इन दोनो देवतामो ने चक्र और अन्य मस्त्रों का परित्याग कर, दोनो महान् शक्ति वाले धनुपों से बड़े साहरा फे साप दमो दिशाओं को भी रोक कर राहय पपं तक युद्ध किया। ४०. तय शिय ने उग मुलायम धनुप का जिरो तुमने बहुत अधिक खीचने से तोड़ डाला है, परित्याग कर दिया मौर विष्णु का यह मक्षत धनुष जो प्राचीफ फो मिला पा प्रगानुगार मेरे हापों में पाया। ४१.दरा विपणु के धनुष में दो गुण है । एक तो यह रदता के नाम में प्रसिर है। यह जगा को श्रुति (मेष, श्रुति = काग-स्याति) को नहीं छोड़ती और दूसरा इगी विष्यात प्ररपसा जो निश्चय ही भवन हमारे ही मान मे पन्त राम जाती।

नवमः सर्गः ११७ अपाङ्गभागावधि चापपूरणं सुदुष्करं तिष्ठतु विष्णुगोचरम् । गुणं यदि प्रापयसीह जिह्मतां वलोपपन्नेषु ततस्त्वमग्रणीः ॥४२॥ निधाय वाणं धनुपीह पूरिते वधः स्वहस्तेन तवैप सलिया। इतीरयीत्वा तनयस्य भूपतेर्मुमोच हस्ते सशरं शरासनम् ॥४३॥ ततः स शून्यामिव मुष्टिमानयन्नपाङ्गदेशं दशकण्ठसूदनः । बलादविज्ञातविकर्षणश्रमश्चकर्ष गुञ्जद्गुणवन्धनं धनुः ॥४४॥ स तेन मुक्तः किलसायकी दिवः पदं तपस्यद्वपभस्य वाञ्छतः। द्वितीयवर्णस्य निहन्तुरात्मनो विधाय नीशारमथ व्यतिछत ॥४५॥ रिपोरजय्यस्य जयेन मानवैः सभाज्यमानो बहुमानमंत्रणैः। मनोज्ञवासे पथि मैथिलीसखः सुखेन नित्वा कतिचिद्दिनानि सः ॥४६॥ व्यपावृतद्वारमुखेन सन्ततं बलेन भूम्रा विशता कृतध्वनिम्। पुरीमुदन्वन्तमुदननिस्वनं तनुं पिबन्तीमिव कुम्भजन्मनः ॥४७॥ ४२. इसको नेत्र के किनारे तक खींच लेना नितान्त दुप्कर है । उसे विष्णु ही कर सकते हैं । मगर तुम इसकी प्रत्यञ्चा ही को झुका दो तो वीर पुरुषों के तुम अग्रणी समझे जानोगे। ४६. इस धनुष पर वाण चढ़ा कर जब तुम इसे पूरी तरह स्वीच लोगे, तब मेरे हायों से तुम्हारा वध ही तुम्हारा सत्कार होगा। यह कह कर (परशुराम ने) वाण सहित धनुप को राजपुत्र (राम) के हाय में दे दिया। ४४. रावण के मारने वाले राम ने अपनी मुट्टो से उसे मांस के कोने तक खीच कर, जैसे उनकी मुट्ठी माली हो और धनुष के पींचने में उन्हे कोई प्रयाम न मालूम पड़ता हो, • उस घनुप को, जिसकी प्रत्यक्षा मनमना रही थी, जबर्दस्ती सोचा। ४५. तय राम से छोड़ा हुआ वह वाण, तपस्या करने वालों में श्रेष्ठ, क्षत्रिय वर्ण राम के वध की चेष्टा करने वाले और स्वर्ग में जाने के इच्छुक, परशुराम के सामने व्यववान होकर खड़ा हो गया। (अर्थात् उनके स्वर्ग जाने का मार्ग रोक दिया)। सीता के साप, अजेय शत्रु (परशुराम) को जीत कर, जनता के अनेक मानपत्रों से अभिनन्दित, राम ने उस मनोज मार्ग में थोड़े दिन रह कर । विशेषलोक ४६ से ५१ तक 'कुलक' है। ५१ श्लोक में 'तां (पुरी) विवेश' के साप प्रत्येक श्लोक का अन्वय होता है। इन छः श्लोकों में नगर प्रवेश का वर्णन है। ४७. उस नगरी में जिसके धुले हुए फाटकों ने मार्ग गे, कोलाहल करती हुई, बहुत बड़ी सेना, घुम रही थी और जो गरजते हुए समुद को पीते हुए मगस्त्य के शरीर ने समान लगटी थी।

११८ जानकीहरगाम नरेन्द्ररथ्योभयभागचारितप्रसारिकालागरुधूपवासिताम् । ततामनन्तैरुपरत्नतोरणं सपङ्कजाष्टापदकुम्भमण्डलैः ॥४८॥ परिकणत्काञ्चनकिङ्किणीगुणैः सुगन्धिना गन्धवहेन ताडितैः । भ्रभत्पताकानिकरैरुचिपो वितन्वतीमुष्णघृणे: करच्छिदाम् ॥४६॥ मधुनतवातविरावकिङ्किणोरुतेन रम्यं मणितोरणस्रजाम्। चयं दधानामनिलस्य रंहसा धुतं पताकानुकृतानि विभ्रतः ॥५०॥ विवेश तामञ्जलिबद्धसंपदा मुहुर्मुखेन्दोरुदयेन सर्वतः। नरेन्द्र सूनुर्मुकुलानि कल्पयन जनस्य हस्तारुणपङ्कजानि सः ॥५१॥ गुरूनपृष्ट्वैव कुमारमीक्षितुं जवेन वातायनमीयुरङ्गनाः। न ता नसत्यो न च मूड़वृत्तयस्तथाहि वंशस्य रघोविनीतता ॥५२॥ वातायनसन्ततिता विलोलनेत्रैर्वनितामुखाम्बुजैः । तता विनीलोत्पलपत्रसम्पदा सरोजिनी तिर्यगिव व्यवस्थिता ॥५३॥ ४८. जिसमें राजा की सवारी के दोनों ओर फैले हुए कालागरु धूप से सुवासित थी और जहाँ मणि के बने हुए तोरणों के समीप, कमलों से भरे हुए, अनन्त सुवर्ण कलशों के समूह पक्ति के पंक्ति रखे थे। ४६. (जो नगरी) सुगन्धित वायु के थपेड़े से लहराती हुई, और जिस सोने की पटियों की लड़ियां खनखना रही थी ऐसी पताकाओं से तपते हुए सूर्य की रश्मियों को काट रही थी। ५०. जिस नगरी में मणि के बने तोरण, फूल की मालामों के लटकने के कारण बड़े शोभाय- मान थे, जिन पर किङ्किणी के समान भृङ्गों के मंडराने से वे बड़े मनोहारी लगते थे और जो तेज वायु के थपेड़ों से लहराने के कारण, पताका की शोभा का अनुकरण करते थे। ५१. तव राजपुर नगर के भीतर गये। और सब ओर जनता ने तत्क्षण प्रालिबद्ध हो कर उन्हें प्रणाम किया। ऐसा लगता था जैसे जनता के कमल के समान हाय उनके मुखचन्द्र के उदय होने से मुकुलित हो गये हों। ५२. राजकुमार को देखने के लिये स्त्रियां अपने गुरुजनों से बिना पूछे ही झरोसे पर दौड़ गई। ऐसी बात नहीं पी कि वे सती नहीं थी और न यही था कि ये फूहड़ थी। रसु- कुल की शालीनता ही ऐमी थी। भरोसो की पक्ति जो स्त्रियों के कगल के समान मुगों से भरी थी, और जिनकी पार्टी इधर से उधर वरायर घूम रही थी ऐसी शोभायमान हुई अंगे गरमी में कमलों पीएम माड़ी पपारी हो जिस में बहुत सी नीलवर्ण की पत्रियां हों। - नवमः सर्गः ११९ दधौ धुति जालगवाक्षसङ्गिनी नितम्बिनीनां चलप्टिसन्ततिः । ततेव पङ्कहनालजालके परिस्फुरन्ती शफरीपरम्परा ॥५४|| पदं पुरन्ध्रयामविशुष्कयावक समर्पयन्त्यामविलम्विविक्रमम् । वभूव सोपानविमर्दसंभवः स्वराग एवांवितलस्य यावका. ॥५५॥ कयाचिदालोकपथं मुखाकुल समेत्य धर्मस्रुतपत्रलेखया। सखीकपोलाहितगण्डभागया कृतस्तदीयेऽपि मुखे विशेषकः ॥५६॥ प्रसाधनव्यापृतयाऽपि रामया प्रदेशिनीपविकृष्टकर्णया। उपायये वामकरस्थपत्रया रयेण वातायनजालमन्यया ॥५७॥ द्रुतप्रयाणलथकेशबन्धना सघर्मवारिति विभ्रती श्रमातुरोरुद्वयमन्थरापरा ययौ सपल्या परिशङ्कनीयताम् ॥५८।। नितान्तमेकीकृतगण्डभागयोमंशाल्पवातायनयातमन्ययोः । सुभासुरं कुण्डलमेकमेव तद मुखद्वयं मण्डयति स्म रामयो. ॥५६॥ मुखम् । ५४. सुन्दर नितम्ब वाली स्त्रियों की, खिड़की की जाली से लगी हुई चञ्चल आँखों की पंक्ति ऐसी लगती यी जैसे कमल नाल के जाल के पास इधर से उबर फुर्ती से फिरती हुई मछलियों की पांत हो । ५५. एक स्त्री जिसके पैर का महाचर अभी नहीं सूखा था, जब थोड़ी दूर दौड़ी तो उसके निज का रंग सीढ़ियों पर रगड़ साने के कारण, उसके पैर के तलुओ में महावर के समान हो गया। ५६. जब एक स्त्री देखने के रास्ते से भरोसे पर पहुंची तो वहां बहुत से राम का मुख देखने के लिये माकुल थे। तो इसके (पुसमुस कर) देखने के प्रयास में उसके गालों पर की गई चित्रकारी पसीने के कारण उसकी मखी के कपोल पर लग गई। ५७. एक दूसरी स्त्री जो अपने को संवारने में व्यस्त थी अपने को तर्जनी से सोच कर, वा हाथ में पत्री लिये (जिससे वह अपने को संवार रही यो) बड़ी तेजी से झरोरो की जाली की पोर भागी। ५८, एक स्त्री को जिसके बाल का जूड़ा दौड़ कर चलने के कारण तीता पढ़ गया था. मुंरा पर पसीना बहने लगा था और जो जांघों के पक जाने से धीरे-धीरे चल रही थी,देश कर उगली सोन का परने लगी। ५६. एक छोटे से झरोगे से कपोलों को मटा कर देखने के बारण एक ही घमरते हुए कुण्डस ने दोनों स्त्रियों के मुखों को सजा दिया ।

१२० जानकीहरणम् विधाय काचित्प्रथमं तु लन्नया प्रियोपभुक्ताधरमर्धलक्षितम् । प्रयातिदूरं नृपतौ दिक्षिया चकार वातायनवाह्यमाननम् ॥६०॥ प्रतिष्ठदेका कुचयुग्मसंपदा निरध्य वातायनमुन्नतस्तनी । सखीजनो यत्कृशमध्यभागतः पताकिनीमन्तरमाप वीक्षितुम् ॥६१॥ निघाय काचित्तनयं तनूदरी प्रसह्य वातायनदेहनीतले । अकारयत्पङ्कजकोशकोमलं महीभुजे बालकमञ्जलि बलात् ॥६२॥ नृपः सृमित्रातनयो वधूरिति प्रियाजने निर्दिशति स्वयं करैः । तलप्रभापाटलभागभागिनो नखांशुजाला अपि चेरुरम्बरे ॥६३॥ अशक्नुवन् वर्धयितुं नृपात्मजं वधूजनोऽधृष्टतया जयेन तम् । पदं विधत्स्वाविधवाजनोचिते पथीति पल्यै गिरिमाशिपं जगौ ॥६४॥ नरेन्द्रसेना विविशुः समुद्रगाः विवृद्धतोया इव यत्समन्ततः । महार्णवस्येव न तस्य तत्कृतो बभूव पूरश्च न चातिरिक्तता ॥६५॥ . ६०. एक स्त्री पहिले तो अपने मुख को जिसके ओंठ को उसके प्रेमी ने काट लिया था लग्जा से प्राधा छिपाये थी, पर नृप को दूर जाते देख कर उसने अपने सम्पूर्ण मुख को झरोसे के बाहर कर दिया। ६१. एक स्त्री अपने दोनों उठे हुए स्तनों से झरोसे को छेक कर बैठी थी पर उसकी राखी ने उन दोनों स्तनो के बीच के पतले अन्तर से सेना देखने का मार्ग निकाल लिया। ६२. एक पतते उदर वाली स्त्री ने अपने छोटे बच्चे को विशाल झरोसे की छेहरी पर बिठा दिया और राजा को प्रणाम परने के लिये उसके कमल के गर्भ के समान योमल हापों की जबरदस्ती अंजुली वधा दी। ६३. 'ये राजा है, ये मुमित्रा के पुत्र हैं, यह बहू हैं, जब प्रिय ससिर्या अपने हाथों से दिखा रही थी तो उनके नसों से निकली हुई प्रभा, उनकी हथेलियों की लाल ज्योति से मिल पर माकाश में फिरने लगी। ६४. विनयशीलता के कारण, राजकुमार की जयजयकार करने में मसमर्ष, नियों ने उनकी पत्नी को यह पह फर माशीर्वाद दिया कि सुम सौभाग्यवती स्त्रियों के लिये (निर्दिष्ट) उचित मार्ग पर पलो। ६५. रामापी मेगा सब पोर रो, गगर मे भीतर पूसी, जो बाढ़ पी नदियां समुद्र में जानी है । उगमे समुद्र की भांति, यह नगर न तो भर गया भोर म यह उल ही उठा।

नवमः सर्गः १२१ द्विधागतं द्वारमुपेत्य तद्वलं नृपाङ्गनस्योभयभागसंश्रितम् । निवध्यमानाञ्जलि शासिता भुवो दृशानुगृह्णन्स विदेश मन्दिरम् ॥६६॥ देशं युधाजिति जितं तनुजे तपोऽर्थी विन्यस्य केकयपतिविपिनं विविक्षुः । दूतेन तेन तनयं दुहितुर्दिक्षुः कालस्य कस्यचिदयेन्द्रसखं ययाचे ॥ ६७ ॥ अथ स सुधाजिति स्वविषयं सति नीतवति प्रथितगुणे गुणप्रचयलाभरतं भरतम् । इतरसुताहितप्रियशताहततद्विरह- प्रभवशुचोऽनयन्नयशुचिदिवसात् नृपतिः ॥ ६८ ।। इति नवमः सर्गः। ६६. पृथ्वी के शासन करने वाले राजा तब राजमहल के प्राङ्गण के द्वार पर पहुँच कर, जहां पर दो भागों में विभक्त सेना को जो उनके दोनो ओर करबद्ध खडी थी, अपनी दृष्टि से अनुगृहित करते हुए राजमहल में घुमे । ६७. केकय देश के अधिपति (अश्वपति) ने, (याहुबल से) जोते हुए देश को अपने पुत्र युधाजित को सौप कर तप करने के लिये वन में जाने की इच्छा प्रकट की और अपने पुत्र (युधाजित) को अपना दूत बना कर, इन्द्र के ससा (दारय) के पास सपने भाञ्ज को जिसे उन्होंने बहुत दिनों से नहीं देखा था, लिवा लाने के लिये भेजा। जब यशस्वी युधाजित, मर्वगुण सम्पन्न, भरत को अपने देश ले गये तब, अकलुषित नौति वाले, राजा दगरय के, मरत के विरह से जनित योक को, उनके अन्य पुषों ने, उनको प्रसन्नता के लिये, मैकड़ों प्रिय बातें कर दूर कर दिया, तब वे (इयरय मुग पूर्वक) दिन व्यतीत करने लगे। ६८ नवा सर्ग समाप्त।

दशम: सर्गः ततो नयेन जयतो राज्यं राजीवचक्षुषः । तस्य शक्रसमानस्य समानामयुतं ययौ ॥ १ ॥ अथालक्ष्यत तद्दे है काठिन्यरहितत्वचि । पलितं विस्रसावल्लीपुष्पहास इव कचित् ॥ २ ॥ पलितच्छद्मना दोपा सर्वकालसमुन्नते । जरसा शिरसि स्पृष्टे न विषेहे महारथ. ॥ ३ ॥ आरोप्यान्यतरेयुः स्वमङ्कं नाथो भुवो बली । समासीनः समज्यायां ज्यायांसं सुतमन्नवीत् ।। ४ ।। मामियं प्राणनिर्याणवैजयन्ती पुरःसरी । रक्ताक्षवाहनादेशदूती संसेवते जरा ॥ ५॥ तव इन्द्र के समान, कमल नयन, उनको (महाराज दशरथ को) नीति कुशलता से राज्य करते, हजारों वर्ष बीत गये । १. विशेष--पृथिवी शाससस्य पाकशासन तेजसः । किञ्चितन मनूनद्धे शरदांमयतं ययौ।-रघुवंश,१०-१, कालिदास । के पुष्पहास के तब (कालक्रमानुगार) उनके शरीर के ढीले चमड़े पर पुरानी लता समान कही कहीं पर सफेद बाल दिखाई पड़ने लगे। वह महारथी जिसका सर सय काल में उन्नत रहता था, उसे, बुढ़ापा, सफेद वाल के बहाने छुए यह सह्य नहीं था। एक दिन जनसभा मे, उरा कर्तव्यनिष्ठ पृथ्वी के स्वामी ने अपने बड़े लड़ के (राम) को अपनी गोद में विठा कर कहा- ५ यह वृद्धावस्था, जो प्राण में ले जाने की पताया की अग्रणी है पोर जो यमराज मी, जिगये वाहन (भगे) की लास-लाल प्रांखें हैं, उसकी प्राज्ञा का पालन करने की मूती है। मेरे पास पाई है।

दशमः सर्गः १२३ जरसा तात नोङ्गाऽनि स्पृहा कामेषु निविदा । शैथिल्यमुपनीतानि तुल्यमेव शनैः शनैः ॥ ६ ॥ कालेन शिरसि न्यस्तैः श्वेतकेशशिताङ्कशैः । निवर्तन्ते हि कामेभ्यो भद्रा राघवदन्तिनः ॥ ७ ॥ उभे वक्षसि वंश्यानां तिष्ठतो रक्त कर्कशे । यौवने वनिता वल्कसन्ततिधिके च नः ॥ ८॥ न जिष्णुः कृतशस्त्रो यो यश्चाढ्यो यज्ञनिस्पृहः । कामी यश्च जरनेते क्षत्रवंशेपु कत्रयः ॥ ६ ॥ पादशेषेऽपि वैराग्यं न यस्य पुरुपायुपे। कीदृशी लक्ष्यते तस्य जनस्य हृदयालुता ॥१०॥ नातिविस्रसया भिन्ने देहे ना तप्यते तपः । इतरत्र चिरं जीणे तपस्यायां हता गतिः ॥११॥ ६. हे पुत्र ! वृद्धावस्था के कारण हमारे अङ्गों में, कामलिप्सा एवं उसके प्रति (मासक्त होने से) उदासीनता, दोनो ने मिल कर शिथिलता ला दी है। समय पाने पर रघुकुल के हाथी (राजे) सर पर सफेद वालों के तीक्ष्ण अंकुश (के प्राघात) से सांसारिक सुख से मुंह मोड़ लेते हैं । हमारे वंशजों के कड़े वक्ष पर केवल दो ही चीजें रहती हैं । युवावस्था में पत्नी मोर बुढ़ापे मे वल्कल के वस्त्रों की परम्परा । अस्त्रों के रहते जिने विजय करने की अभिलापा न हो, लक्ष्मी सम्पन्न होते हुए जिसे पन करने की इच्छा न हो, वृद्धावस्था मे जिसमें कामवासना हो, ये तीनो क्षत्रिय के लिये कुत्सित कहे गये हैं। १०. मनुष्य की पूरी प्रायु के चौथे भाग में जिसे वैराग्य नहीं होता उसमें किस प्रकार की हृदयालुता होती होगी। ११. मनुष्य सभी तक तपस्या कर सकता है जब तक उसवा गरीर यहुन चुनाणे से पर नहीं हो जाता । इसके प्रतिदूत शरीर के बहुत काल तक जीणं रहने गे सपम्या का मार्ग बन्द हो जाता है।

जानकीहरणम् मन्दशक्तीन्द्रियश्च्योतल्लालाविच्छुरिताधरः । अस्फुटस्मृतिचेष्टाभिबालवतमिवाचरन् ॥१२॥ मृणालवलयच्छेदतन्तुजालसमत्विषः । यौवनोद्दाहभस्मेव दधानः पलितच्छटाः ॥१३॥ जीविते जीर्णवयसः प्रत्याशा मे मुमूर्पतः । तिर्यग्विकम्पितैमों नास्तीति प्रथयन्निव ॥१४॥ दन्तकुन्तशतैरुप्रैर्मृत्योः संकटमाननम् । प्रवेष्टुमिव बिभ्राणः कायसंकोचखवंताम् ॥१५॥ विभ्रदातङ्कनिमांसव्यक्तलक्ष्यसमुद्गमाः । वीचीरिव जरानद्याः पशुकास्थिपरम्पराः ॥१६॥ निर्दन्तत्वादसंस्कारं मोहन्मुष्टिन्धयो यथा । मिथोऽशंसितमस्पष्टं वदन्नम्बूकृतं वचः ॥१७॥ १२. जिसकी इन्द्रियों की शक्ति मन्द पड़ गई है, जिसके अधर यहते हुए लार से लिप्त रहते हैं, जो क्षीण स्मृति-शक्ति के कारण वालकों की तरह आचरण करता है । विशेष-श्लोक १२ से १९ तक 'कुलक' है। १९वें श्लोक के 'तपः कोदक विधास्पति' के साथ प्रत्येक श्लोक का अन्वय होगा। इन आठ श्लोकों में बुढ़ापे का वर्णन है। 'कुलक' की व्याख्या--२-२ । १३. जिनके उलझे हुए कमल नाल के टुकड़ों की जाल की तरह चमकती हुई सफेद बालों की सटें,यौवन जल जाने पर (वची हुई) राख की तरह लगती हैं। १४. "बुढापे से जीणं हो जाने के कारण मेरे मरने का समय पा गया है, मेरे अधिक जीने की कोई पाशा नहीं है" जो यह सब, इधर उधर सर हिलाने से जैसे घोपणा कर रहा हो। १५. परधी के समान सैकड़ों, बड़े-बड़े तीसे दांतों वाले यमराज के मुंह में, जैरो घुगने के लिये, जो शरीर मुफ जाने के कारण नाटा हो गया है। १६. जिसको वीमारी से, मास रहित शरीर हो जाने के कारण उभरी हुई पसलियों मी पंक्ति, वृद्धावस्या रूपी नदी की लहरियों के गम दिालाई पड़ती है। १७. जो दात न रह जाने के कारण, पशुख, मोह से एक दूसरे में लिपटे हुए, परपष्ट और सारसे चिना कुछ पूपे हुए शब्द बोलता रहता है।

दशमः सर्गः १२५ भिन्नभ्रुवमुदस्तानां किञ्चत्कम्पितमस्तकाम्। नम्रो गद्गदितालापामनुनेतुं जरामिव ॥१८॥ वार्धक्ये धर्मतो मूड़ः स्वदेहवहनेऽपि सः । विधित्सन्नप्यशक्तिष्ठस्तपः कीग्विधास्यति ॥१६॥ मनसः यतो यातुस्तपस्यायामरण्ये वसति त्वया । मा जन्यथुप्रवण प्रत्यूहो में विरागिणः ॥२०॥ अनुशिष्टिः प्रकृत्यैव भद्रे भवति कीदृशी। प्रीतये स्नेहकातरस्य निगद्यते ॥२१॥ औदासीन्यं यतः शत्रुरुदासीनश्च मित्रताम् । मित्रं भक्तौ · दृढत्वं च याति तद्वक्तुमर्हसि ॥२२॥ यो येन वाञ्छति ख्याति लोकसंग्रहकामिना । न तस्य निन्दनीयं तच्छत्रुतामप्यनिच्छता ॥२३॥ वृत्तिः शुभकरी साम्नो नये स्वपररञ्जनी । अयःशूलिकतेत्याहुन तां निष्णातबुद्धयः ॥२४॥ १८. जो भौहों को संकुचित कर, आँखों से पानी बहाता हुआ, थोड़ा कांपते हुए मस्तक से, नत हो कर जैसे वृद्धावस्था से अनुनय कर रहा हो। १६. वृद्धावस्था में मनुष्य स्वभावतः मूढ हो जाता है। अपना शरीर ही उठाना दूभर हो जाता है । इच्छा होते हुए भी, शक्ति न होने के कारण वह तप कैसे कर सकेगा । २०. इसलिये तुम मांसू बहा कर, मुझ विरागी के, तपस्या करने के हेतु वन मे रहने के लिये जाने में बाधक न हो। २१. तुम्हारे ऐरो साघु प्रकृति व्यक्ति को हम क्या उपदेश दें ? केवल तुम्हारे स्नेह मे कातर हो कर मपने मन की शान्ति के लिये कहते हैं। २२. जिससे शत्रु उदासीन एवं तटस्थ हो जाता, उदासीन और तटस्थ मित्र हो जाता है और मित्र की भक्ति दृढ हो जाती है, उसे तो बतलाना उचित ही होगा। २३. जो मनुष्य सब लोगो को प्रसन्न करना चाहता है मौर उनको शत्रु नहीं बनाना चाहता, उमे चाहिये कि जिस से कोई मनुष्य स्याति चाहता है उसकी निन्दा न करे। २४. राजनीत में, अपने मोर दूसरे, दोनों को प्रसन्न करने वाले व्यवहार को जिसे साम कहते हैं, कल्याणकारी होता है। युद्धिमान नीतिज्ञ उसे लोहे के मूल की नीति नही यहते।

१२६ जानकीहरगाम जिंघासुभिरपि प्राजैः प्रयोक्तु साम साम्प्रतम् । रञ्जयन्ति मृगान् गीतैविभित्सन्तो मृगाविधः ॥२५॥ साम शाठ्यं जनो वेत्ति दानादत्यन्तवजितम् । तत् सामौशनसं साधु युक्तं दानस्य मात्रया ॥२६॥ मा दा रहितसम्मानं त्यक्त्वा सत्कारसामनी । वित्तं विश्राणितं नीतौ कृतिनो दूषितं विदुः ॥२७॥ शत्रुगृह्यण दुर्ध शत्रु नेता निहन्ति हि। घनेनेव स्फुलिङ्गाचिःप्रावृतं पिण्डमायसम् ॥२८॥ उपजापहृतस्वामिस्नेहसीन्नि पराश्रयम् । मौले वाञ्छति मेदिन्याः पत्युः पातो न संशयः ॥२६॥ इतरोपायदुःसाध्ये चण्डदण्डो महीपतिः । अदुष्टायत्यसौ नीतेरश्नाति विपुलं फलम् ॥३०॥ २५. मारने की इच्छा रखते हुए भी, पुशल नीतिज्ञ साम का प्रयोग करता है । मृगों को मारने की इच्छा करने वाला शिकारी मृगों को गीत वाद्य से रिझा कर फंसाता २६. तोगों को दान देकर शान्त करना अत्यन्त वजित एवं शठता पूर्ण कहा गया है। शुक्राचार्य का कहना है कि वह साम (शान्ति स्थापित करने की नीति) जिसमे थोड़ा सा दान दिया जाय, पच्छा है। २७. प्रसम्मान के साथ दान कभी न देना । राजनीति में नीतिज्ञों ने सत्कार एवं साम को छोड़ कर, दान देना बुरा कहा है। २८. नेतृत्व करने वाला राजा, अपने शत्रु को, उसी के, ऊपर से मिले हुए, मित्रों के द्वारा भारता है । जैने धन (मारी योड़ा) चिनगारियों से घिरे हुए, लोहे के टुपाड़े को पीटता है। २६. जब राजा मे अत्यन्त स्नेहपात्र मंत्री के पानी में (विड) बाते फूंक पर ऐसा कर देता है कि उसको उराका (गनु का) प्राश्रय लेना पड़े (पर्यात् उसे अपनी पोर गिना लेता है) तो राजा का पराग होता है, इसमें सराय नही है । ३०. जप सभी राजनीमिया साधन मसफल हो जाते है तब राणा प्रचण्ड दप्टनीति का व्यवहार करना है और इस नीति मा अनुसरण कर महान् पर या भागी होता दशमः सर्गः २७ . अव्याहति न शक्या गौविना दण्डेन रक्षितुम् । इति प्रत्येति मुग्धोऽपि बल्लवः किमु राजकम् ॥३१॥ क्षोणीपतिः पतत्याशु जराक्रान्त इव ध्रुवम् । त्यक्तदण्डः पदं वाञ्छन्नगृहीतजगत्करः ॥३२॥ इत्थं युक्तिमुपायानां कुर्वाणस्य चतुष्टयीम् । व्रजतीन्दुप्रभागौरं परैरक्षय्यतां यशः ॥३३॥ शूरं पुरुषसारखं नीती पटुमलम्पटम् । सम्यक् संरक्षिताः कोशैर्वर्द्धयन्ति नृपं प्रजाः ॥३४॥ नोच्चैः पदं लम्भनीयो गुण्योऽप्यन्वयजितः । रत्नाढ्यमपि कुर्वीतमूर्धिकः पादमण्डनम् ॥३५॥ मूर्को वर्त्यः कुलीनोऽपि मातङ्ग इव भूभुजा । गुणैः कैरप्यविख्यातो वंशेनैव विभावितः ॥३६॥ ३१. जब एक मूर्ख ग्वाला तक यह जानता है कि बिना डंडे के गौमो की निर्वाध रक्षा नहीं हो सकती तब कितनी अधिक यह (दंडनीति) राजाओं पर लागू होती है। ३२. वह पृथ्वीपति तो दण्डनीति का पाश्रय नही लेता, (अर्थात् सेना को हटा देता है) और लोगों पर कर नहीं लगाता, वह अपने श्रेष्ठ पद की इच्छा रखते हुए भी, निश्चय ही, बुढ़ापे से जर्जर मनुष्य की भांति तुरन्त गिर जाता है। ३३. जो राजा इस तरह से इन चारों प्रकार की नीतियों का व्यवहार करता है उसके चांदनी के समान ऊज्ज्वल यश का शत्रु नाश नहीं कर सकते । ३४. अच्छी तरह से रक्षित प्रजा, वीर पुरुप की शक्ति जानने वाले, राजनीति में चतुर और शुद्ध चरित्र राजा के कोश की अभिवृद्धि करती है। ३५. पाहे मनुष्य गुणी भी हो, पर यदि वह शुद्ध वंश का नही है तो उसे कोई ऊंचा पद न देना चाहिये । कौन ऐमा (मूर्ख) होगा जो पैर के गहने को चाहे वह रत्नो से भरा हुमा क्यों न हो, सर पर चढावेगा। ३६. ऐरो मूमं को, जिसमे और कोई गुण नहीं है, मिवाय इसके कि वह अपने वंश से विम्यात है, कुलीन होते हुए भी राजा को पाहिए कि चाण्डाल की तरह उसका परित्याग कर दे।

१२८ जानकीहरणम् तद्युक्तमुपधाशुद्धमन्वयेन गुणेन च। साचिव्यं लम्भयन् मौलं न प्रमाद्यति भूपतिः ॥३७॥ यस्मिन्कृत्यानुरोधेन सौहृदं वितनोति यः । स तं त्यजति कृत्यान्ते तीर्णतोय इव प्लवम् ॥३८॥ यौ तु निष्कारणामुक्तस्नेहपाशौ सुहृत्तरौ । मृत्युनैव तयोर्भेदो देहजीवितयोरिव ॥३६॥ दण्डद्रविणदुर्गेकसङ्गी रक्षति भूपतिः । आत्मानमेव सततं किमु रक्षत्यसौ जगत् ॥४०॥ इति प्रकृतिवर्गादिनिर्णयेषु नयाश्रयः। क्षपितान्तरर्वहिः शत्रुःशाधि साधु वसुन्धराम् ॥४१॥ इत्यंवादनि राजेन्द्र रामो मौनमधिधितः । ववर्ष हृदयं वाष्पैः शोकेन हृदयाविधा ॥४२॥ ३७. शुद्ध वंश वाला, गुणों से युक्त, उपधा से परिशुद्ध (उपधा=ईमानदारी, राजभक्ति, निस्वार्थता, इन्द्रियनिग्रह, साहस) ऐसे श्रेष्ठ मंत्री को पाकर राजा अपने कर्तव्य में प्रमाद नहीं करता। ३८, जो (राजा) किसी कार्य साधन करने के लिये किसी मित्रता करता है और कार्य हो जाने पर उसे छोड़ देता है वह उस मनुष्य के समान है जो नदी पार कर लेने पर नौका छोड़ देता है। ३६. परन्तु बिना किसी कारण के जिन्होंने मित्रता का बन्धन नहीं तोड़ा है, ऐसे दो श्रेष्ठ सुहृदों की मैत्री, शरीर और प्राण के समान केवल मृत्यु से छूटती है । ४०. वह राजा जिसके पास सेना, धन और दुर्ग हैं वह निल्तर सपनी (मर्थात् अपने राज्य की) रक्षा कर सकता है। ४१. इस प्रकार अपनी प्रजा का वर्गीकरण का निश्चय कर, राजनीति का प्राश्रय लेकर अपने शरीर के भीतर और बाहर के पात्रुनों का दमन कर पृथ्वी का धर्मपूर्वक शासन करो। ४२. जय राजामो के अग्रणी ( महाराज दशरप) यह यह युके तो राम ने, जो तब तक चुपचाप थे, तीन शोक रो सन्तप्त अपने हृदय के उद्गार को प्रामुमो से सीन पर ध्यक्त किया।

दशमः सर्गः १२९ ततो वज्रासने भद्रं स निधाय निधिः श्रियः। निर्भरीकृतसंभारः प्राभिषिक्तो महीपतिः ॥४३॥ रुरुधे पृष्ठसंविष्टग्रन्थिमन्यरयातया । स्मारियित्वा वरौ वीरं राज्यं मन्थरया तया ॥४४॥ आदिदेश ततो वस्तुं वनेषु वनजेक्षणम् । चतुर्दश दशग्रीवशत्रुमिन्द्रसमः समाः॥४५॥ अनिन्द्यजानिनारूढ़ो निर्जगाम रथः पुरः । कृतप्रस्थानसौमित्रिः स्फुरत्केतुरथो पुरः ॥४६॥ अश्रुभिर्हदयं सीता निजमेव न केवलम् । चकारानं जनस्यापि प्रेक्षितस्य वनाध्वनि ॥४७॥ जगन्नेत्राभिरामस्य रामस्य रहितागसः । शक्लस्य त्यागिनं देवं घृणयेवासवो जहुः ॥४८॥ ४३-४४. तव उम लक्ष्मी के भण्डार (महाराज दशरय) ने बड़े ठाट-बाट से प्रायोजन कर राज्या- भिषेक के लिये अपने सुन्दर पुत्र (राम) को सिंहासन पर बैठाया। उस समय, पीठ पर कूबड़ के कारण मंथर गति से चलने वाली मंथरा ने (केकयो को दिये हुए) दो वरों का उस वीर को स्मरण दिला कर राज्यभिषेक को रोक दिया। ४५. लाचार हो कर, इन्द्र के समान पराक्रमी (महाराज दशरथ) ने कमल के समान नेत्र वाले, रावण के शत्रु, अपने पुत्र को वन मे चौदह वर्ष रहने का आदेश दिया। ४६. अपनी निप्पलुप पत्नी (सीता) के साथ, राम, फहराती हुई ध्वजा से युक्त रथ पर जिसमें सामने सुमित्रानन्दन (लक्ष्मण) बैठे थे, चढ़े और रय सामने से भागे बढ़ा। ४७. सीता ने प्रमों से केवल अपना ही हृदय नही सोंचा, पल्कि उन सब लोगों का भी जिन्होने उन्हें वन के मार्ग में जाते हुए देखा । ४८. संसार के नेत्रों को सुम देने वाले, मधुरभाषी, निरपराध, राम का त्याग करने वाले महाराज (दशरप) को उनके प्राए वायु ने जैसे उन पर तरस खाकर छोड़ दिया।

१३० जानकीहरणम् न्यवर्तत परित्यज्य क्षत्ताथ क्षत्रियत्रयम् । अढाश्रु वलितग्रीवं चिरं तेनैव वीक्षितः ॥४६॥ द्वित्राण्येव रथं त्यक्त्वा पदान्याधाय निस्सहा । येयमन्यत्कियदुरमिति पप्रच्छ मैथिली ॥५०॥ रामहस्तस्थशाखााग्रकल्पितातपवारणम् । प्रस्थानमभवत्तस्यास्तदनेसरलक्ष्मणम् ॥५१॥ इक्षुशाकटशालेयक्षेत्रानुत्तरकोशलान् । ययुर्भागीरथीतीरं पश्यन्तः सोत्पलाम्भसः ॥५२॥ अथानासाद्य कालिन्दीमुल्लङ्घ्य सरितं दिवः । भारद्वाजाश्रमं पुण्यं चित्रकूटस्य चाध्वनः ॥५४॥ चिह्न नदनदीदेशैरुक्त्वा वृक्षक्षमाघरैः। राजन्यभोगिने याते राघवोऽपि गुहे गृहम् ॥५४॥ सपल्यौ सरितां पत्युः सुमित्रात्मजघीवरैः । चित्रकूटमकूटज्ञः प्रीतः प्रोत्तारितो ययौ ॥५५॥ ४६. तब सारथी ने उन तीनों क्षत्रियों को रथ पर से उतार दिया। वे तीनों पोमू यहाते हुए पीछे की ओर गर्दन कर (जाते हुए रथ को) देखते रहे और यह सौट गया। ५०. सीता रथ को छोड़ कर दो ही तीन पग चली थी कि अशक्त होने के कारण उन्होंने पूछा कि भव मोर कितनी दूर पलना है ? ५१. उसके (सीता के) मागे लक्ष्मण चल रहे थे । और उसे (सीता को) धूप से बचाने के लिये, दासानों को फुनगियों से यनाये हुए छाते को लगाये पीछे राम चल रहे थे। इस प्रकार सीता चली। ५२. सब वे कमलों से भरे तहाग से सुशोभित, ईस भौर शालि चावल के रोतों से युक्त उत्तर फोसल को देखते हुए भागीरपी के तट पर माये । ५३. विना यमुना को मोर गये सुर सरिता (गङ्गा) को पार कर,पुनीत भारद्वाज प्राथम को देराते हुए, जब गृह उन्हें, नद भौर नदियों के प्रदेशों एवं युक्षों और पहाड़ों के पिन्होंगे चित्रकूट का मार्ग, राज्य भोगने के योग्य, राम को पता कर पर पसा गया पौर पर मलाहों क सहित सामग्ण ने नदियों के पति (ममुद्र) पी दो पत्तियों (मदियों) को पार करा दिया तो सत्य में जानने वाले गम भी प्राप्त हो पर पियूट मो पमे। विपदलोक ५३ से ५५ तरु दिपक्ष है। पिपर="fभिः सोविशेषरम्" दशमः सर्गः १३१ ततः प्रतीक ततः सीतामुखाम्भोजभ्रमरत्वे कृतस्पृहम् । नष्टैकदृष्टिमस्लेण बलिपुष्ठं चकार सः ॥५६॥ संघाटो वीरः केकयवंश्यजः । विभ्रच्छोकद्विगुणितं श्रमं रामाश्रमं ययौ ॥५७॥ राजघो निघृणः कश्चित् संप्राप्त इति साघवे । कथ्यतामिति तद्वाक्यं द्वारि शुश्राव राघवः ॥५८॥ अनुज्ञातोऽनुजस्तेन पर्णशालामथाविशत् । द्वारबन्धातिरिक्तन किञ्चित्तिर्यक्कृतोरसा ॥५६॥ भरतः शोकसन्तप्तो राममादाय पादयोः । आर्येत्युक्त्वा सकृद्दीनः पुनर्नोवाच किश्चन ॥६०॥ ततः श्रुत्वा गुरोरन्तं स दुःखेन हृदिस्पृशा । साभिषेकमिवाश्रेण चक्रे कर्मोंर्वदेहिकम् ॥६१॥ ५६. तब उन्होने (राम ने) सीता के कमल के समान मुख पर अमर के समान लुब्ध कोए की आँख वाण से फोड डाली। ५७. तव ब्रह्मपियों और मंत्रियों को साथ लेकर केकय वंश के वीर (भरत) जिनका श्रम, शोक के कारण दुगना हो गया था, राम के प्राश्रम में भाये । ५८. तब राम ने किसी के कहे गये, ये वाक्य सुने "जाकर उन साधु (राम) से मूचित कर दो कि राजा का मारने वाला एक नृशंस व्यक्ति भापके दरवाज़ पर पाया है।" ५६. तब उनसे अनुमति पाकर राम के छोटे भाई ( भरत ) अपना वक्ष दरवाजे से अधिक चौड़ा होने के कारण, तनिक तिरछे होकर कुटी में घुसे । ६०. शोक से व्यथित भरत ने, राम के चरणों को पकड़ कर केवल एक बार 'माय' कहा और कातर होने के कारण और कुछ न बोल सके। विशेष-दुताभितप्तो भरतो राजपुत्रो महाबलः । उपत्वाति सध्द्दीनं पुनर्नोवाच किञ्चन ॥ --अयोध्याकाण्ड ९९-३९, वाहमोफि। ६१. सब पिता की मृत्यु का समाचार सुन कर राम ने हदय विदारक घोर गे पांमू यहा कर जैसे उनकी अन्येष्टि क्रिया कर दी हो।

१३२ जानकीहरणम् शपमानामथ स्वस्मै कैकेयीं भूतिनिस्पृहाम् । गर्हन्तं भरतं वक्त रामस्तत्र. प्रचक्रमे ॥६२॥ न स्मरामि गुरोराज्ञां ज्ञात्वा जातु विलयिताम् । न सदृक्षां हि नो हन्तुं तातस्य समयं यतः ॥६३॥ समयस्य गुरोरिन्द्रलोकस्थस्य विलचने । बुद्धिश्च निर्विशङ्कवं पुनर्मा जनि तावकी ॥६४॥ पूजनीया च ते देवी पत्युः सत्यानुपालिनी । दूपयिष्यति पूज्येषु पूजावैमुख्यमायतिम् ॥६५॥ स्वयं कृतेन दोपेण येन यो लज्जते गुरुः । तेन तत्सन्निधौ तद्वानन्योऽपि न च निन्द्यताम् ॥६६॥ इति व्याहृत्य नम्राय ददौ दोनाय पादुके । धर्मे मर्माविधि मरो वारि वारीष्यते यथा ॥६७॥ ६२. (निराश होने कारण) अपने अभ्युदय के प्रति कोई इच्छा न होने से जो स्वयं अपने को कोस रही थी, ऐसी कैकेयी को भला-बुरा कहते हुए भरत से राम ने कहना प्रारम्भ किया--- ६३. मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने कभी पिता की प्राज्ञा जान-बूझ कर उसका उल्लंघन किया हो । यह किसी प्रकार उचित नहीं है कि पिता के दिये हुए वचन की अवहेलना मी जाय। ६४. इन्द्रलोक में रहने (अर्थात् मरे हुए) पिता के दिये हुये वचन को निःशंक हो कर तोड़ने का ख्याल अव कदापि न करना चाहिए। विशेप--पिता तो मर गपे, अब उनके पचन को तोड़ने में कोई हानि नहीं है ऐसा न सोचना चाहिए, यह भाव है। ६५. अपने पति के सत्य का पालन करने वाली (कैकेयो) तुम्हारी श्रद्धा का पात्र है । जो पूजनीय है उसकी पूजा से मुंह फेरने मे अमङ्गल होगा। विदोष-'प्रतिवघ्नाति हि श्रेयः पूज्य पूज्य व्यतिक्रमः-रघुवंश-१-६९, कालिदाप्त । ६६. जय स्वयं किमी गुरुगन को अपने किये हुए काम से सग्गा होती है तो उसके गामगे बैगा ही दोपयुक्त काग करने वाले किगी अन्य पुरप गी भी निन्दा ग करनी पाहिये। ६७. इतना गाकर उन्होने याने कातर नतमस्ता भाई को अपनी दोनों पदाऊ देदी जैगे मरगूमिगी मर्मभसीप में पानी मांगने वाले को योई पानी दे दे।

दशमः सर्गः १३३ द्विधाकारमिव ज्यायान् भरतं हृदयं चिरम् । दर्शयन्तं परिष्वङ्गप्राप्तसान्त्वं व्यसर्जयत् ॥६॥ ततस्तं त्यज्यता शैलं विराघो रावणारिणा । दृष्टस्तनूनपादचिर्बभ्रुः पञ्चवटीपथे ॥६६॥ हरन्तमथ वैदेहीं विनिहत्य निशाचरम् । भविष्यदिव संक्षिप्य कथाया वस्त्वदर्शयत् ॥७०॥ पञ्जवट्याश्रमे रम्ये रङ्गत्सारङ्गशावकैः ।' वृतेऽथ ववृते तस्य वासो वासववर्चसः ॥७२॥ अथ रामं वृपस्यन्ती प्रपेदे नैकसीसुता । इव चिन्ता दरिद्रस्य स्थूललक्ष नरेश्वरम् ॥७२॥ चकत नासिकां क्रुद्धः सीताविद्रवणादथ । लक्ष्मणस्तम्मुखाम्भोज कणिकां कृपया समम् ॥७३॥ भ्रातृद्वये तदाहूते क्षुरप्रप्रकरं बलम् । शस्त्रैवयति क्षिप्रमपावरिष्ट राघवी ॥७४॥ ६८. तब बड़े भाई (राम) ने, भरत को प्रालिङ्गन कर उनके बडी देर से द्विधा में पड़े हुए मन को शान्ति देते हुए उन्हें विदा कर दिया। ६६. जब वे (राम) उस पर्वत (प्रस्रवण) को छोड़ कर आगे वढे तो रावण के शनु (राम) ने पञ्चवटी के रास्ते में अग्नि की ज्वाला के समान शरीरधारी विराघ नामक (राक्षस) को देखा। ७०. तब उन्होंने उस निशाचर को जो वैदेही को लिमे जा रहा था, मार कर, आगे होने वाली घटना को संक्षेप में दिखला दिया। ७१. तब वे (राम) जो इन्द्र के समान परानमी थे, पञ्चवटी के एक रमणीक मायम में रहने लगे, जो चीसल के द्रुतगामी बच्चो से भरा था। ७२. जिस प्रकार एक दरिद्र की चिन्ता ( अयं चिन्ता ) दानी राजा के पास जाती है उसी प्रकार काम की भूखी, नकसी की पुत्री, (मूर्पणखा) राम के पास गई। ७३. (उसे देख कर) सीता के भयभीत हो जाने से, उस पर तरस खाकर लक्ष्मण ने उसकी नाक को जो उसके कमल के समान मुख पर छिलके के समान थी, काट डाला । ७४. उसके (मूपरणखा के) गोहार पर माये हुए उसके दोनो भाई (सर और दूपरण)ने पुरे के समाम तीक्ष्ण वाणों को उन पर वर्षा की और उनकी सेना ने राम और लक्ष्मण को तुरन्त घेर लिया ।

१३४ जानकीहरणम् अदीधपत गृध्राणां वातमेकधनुर्धरः । सत्यवतोऽसृजो घारां खरदूषणयोर्युधि ॥७५॥ दम्भाजीवकमुत्तुङ्गजटामण्डितमस्तकम् ।. कञ्चिन्मस्करिणं सीता ददर्शाश्रममागतम् ॥७६॥ मृगव्याहृतराजन्यो वर्णलिङ्गी निशाचरः। उग्ररूपो निजं घोरं रूपं प्रादुरबीभवत् ॥७७॥ दशानामस्य शिरसा मुग्रतेजस्कमाश्रयम् । पश्यन्ती मैथिली भीत्या रूपधेयमकम्पत ॥७८॥ प्रदीपमिव तं द्रष्टुं नात्यासन्नं शशाक सा । असोढमरुतं तेजः परिष्कृतदशाननम् ॥७९॥ . रामारत्नमसौ रामनामाक्रन्ददिदं वचः । जगाद जगदीशस्य क्षेपदुष्टं क्षपाचरः ।।८०॥ ७५. तब अपने व्रत के पक्के, धनुर्घरों में श्रेष्ठ, राम ने खर और दूषण की रुविर धारा को गिद्धों को पिलाया, अर्थात् उन्हें मार डाला और उनके रुधिर को गिद्धों ने खूब छक कर पिया। ७६. तब सीता ने एक भिक्षुक को, जिसका मस्तक लम्बी जटा से परिवेष्टित, मोर दम्भ हो जिसके जीविका या साधन था, प्राश्रम में प्राया हुआ देखा। ७७. उस निशाचर ने, जिसने द्विज का रूप बना रखा था, और जिसने अपनी कपट चाल से राम को भृग के पीछे भन्यत्र भेज दिया था, अपने भयङ्कर रूप को धारण किया । ७६. मैथिली उसके भयङ्कर तेज युक्त रूप को जिसमें दस सिर थे, देस फर भय से घर-घर कांपने लगी। ७६. उसके (रावण के) बहुत निकट मा जाने से, एवं उसके दसों सिरों के चारो पोर भयर प्रकाश होने से, उन देवताओं को न सह सकने वाले (रासस) को प्रदीप के समान न देस राकी। विशेप-'मासोद भारत'; रावण के पक्ष में जो देवताओं को सहन नहीं कर सकता पा। प्रदीप के सम्बन्ध में जो पवन को नहीं सहन कर सकता पा (२) 'तेजः परिपत दशाननं'; रायण के सम्बन्ध में जिस वसो सिर तेज रोध्याप्त थे। प्रदीप के सम्बन्य में जिसको यत्तीको सिसा प्रकार से परियेष्टित पौ। ८०. यह निशापर, राम का नाम नेफर पसपती हुई, म्निनी में रान गीता से, गगार के स्वामी (राम) के प्रति युरे राममहो हुए यह यमन योसा ।

दशमः सर्गः १३५ सारङ्गाक्षि शरस्तस्य केवलं तु खरे खरः । दूपणे दूपणो भद्रे न त्रिलोक्या विभौ रणे ॥१॥ लब्धामया बलनिरीक्षण दोहदेन द्वारे स्थिता निजपुरप्रवरस्य सिद्धाः । दृष्टा मया सुरपुरं व्रजता कटाक्ष- रैरावणद्विपगतेन सहासगर्वम् ।।८२।। अन्यायितोऽहमहमप्यनुवृत्य सेवां निर्जीविको मम हृतं भवनं पिशाचैः। इत्युन्नदन् सुरगणः सह लोकपालैः राजाङ्गने भ्रमति मत्प्रतिहारमेत्य ॥८३॥ स्पष्टोस्पिष्टवृहत्रिविष्टपवलं वाहुं बहुक्षोभित- क्ष्मापातालतलं तलेन दलितश्वेताचलेन्द्रं मम । नो वाञ्छत्युपधानभूतमबले धन्या सुरस्त्रीषु का तल्पेऽनल्पविकल्पजल्पमधुरक्रीडारसे सेवितुम् ॥८॥ ८१. हे मृगनयनी ! उसके (राम के) वारण, युद्ध मे, केवल खर (राक्षस) के लिये सर अर्थात् तीक्ष्ण हैं और दूपण (राक्षस) के लिये दूपए अर्थात् मारने वाले हैं । परन्तु मुझ त्रैलोक्य के स्वामी के लिये वे ऐसे नहीं हैं। ५२. भयभीत सिद्ध लोग, मेरे वल का निरीक्षण करने की प्रबल इच्छा से अपने-अपने घरों के द्वार पर माड़ में खड़े थे, तब मैंने, इन्द्र के हाथी ऐरावत पर चढ़ कर सुरपुर में जाते समय, बड़े गर्व से उनकी ओर घुरणा भरी तिरछी चितवन से देखा था। ८३. "मेरे साथ अन्याय किया गया है, मुझसे बेगार सेवा ली जाती है, अतः मेरी जीविका का कोई सावन नहीं रह गया, मेरे मकान को पिचाशों ने लूट लिया है ।" इस प्रकार का रोना रोते हुए, देवता लोग, लोकपालों के साय, मेरे फाटक पर पाकर महल के प्रांगण में घूमते-फिरते हैं। ८४. हे मवले! (सीते) स्वर्ग की अप्सरामों में कौन ऐमी भाग्यवती है जो मेरे ऐसे व्यक्ति की जिसने देवतामो की सेना को अच्छी तरह से चूर-चूर कर डाला है, जिसने पृथिवी एव पाताल के तल को भकमोर दिया है और जिसने हिमगिरि (केला) को चीर डाला है, ऐसे मेरे पलंग पर जहां, बीड़ा के समय, निर्वाध गति से प्रेमालाप होता रहता है, मेरे बाहमों को तकिया लगाने की इच्छुक न रहती हो, मर्यात् सभी इच्छुक रहती है।

जानकीरहणम् उर्वश्या परिवीजने मधुरं नृत्यं यथा लीलया तन्वन्या जितशारदेन्दुकिरणच्छायोल्लसचामरम् । आसज्य स्वयमङ्गदस्य शिखरे निर्मोकयन्त्या पुनः स्नेहस्विन्नविवेपमानकरया सोऽयं भुजः स्पृश्यते ॥८५॥ एकस्मिन्शयने मया मयसुतामालिङ्गय निद्रालया- मुन्निद्रं शयितेन मच्चरणयोः संवाहनव्यपृता । पादाग्रेण तिलोत्तमा स्तनतटे सस्नेहमापिडिता हर्षावेशसमृपितानि पुलकान्यद्यापि नो मुश्चति ॥८६॥ अक्षान् दीव्यति दानवेन्द्र सुतया साधं स्मरातें मयि- क्रीड़ायनपरिश्रमः पण इति श्रुत्वा गता सह्यताम् । मत्तो मन्मथवस्तुसंहितविधी वृद्धी विवृद्धस्पृहा द्यूतं कारयति प्रयोगचतुरा रम्भोरु रम्भाह्वया ॥८७॥ सर्वस्वर्गवराङ्गनाधृतिहृति प्रेमप्रधानं मयि- त्रैवोक्याधिपतौ निधाय हृदयं याया जगत्पूज्यताम् । नारीमाश्रय संपदेव नयति श्रेयस्करीमुन्नति मान्या मानिनि कस्य धूर्जटिजटाजुष्टा न जह्नोः सुता ॥८८॥ ८५. उर्वशी, जिसने अपने बाजूवंद पहिले हाथ के उपर सरका लिये थे, और बाद मे उतार कर रख दिया था, ऐसा पंखा लेकर, जो पारद् ऋतु के चन्द्र किरणों की छाया से अधिक चमचमाता था, बड़े हावभाव से, नाचती-सी पंसे को झलती हुई कामोद्वैग से पसीने और कंपते हुए हाथ से मेरे बाहु को छू देती है । ८६. तिलोत्तमा, जो मेरे चरणों को उस समय दबाने में व्यस्त थी, जब एक पलंग पर मैं निद्रा मे निमग्न, मय दानव की पुत्री (मन्दोदरी) के आलिङ्गन पाश में जकड़ा हुमा पड़ा था और अपने चरण के अग्रभाग से उसके ( तिलोत्तमा के ) स्तन के किनारे पर कुरेद रहा था । मानन्दातिरेक से जनित उसका यह पुलक अब तक उसे नहीं छोड़ता। हे कदली के समान जाप वाली सीते! (एक दिन) जय मैं मन्दोदरी के साथ जुमा सेल रहा था तो इस वाजी को सुन कर कि (जीतने वाले को) सम्भोग का थम उठाना पड़ेगा रम्भा को सहन न हो सका। यह मुझ पर बहुत कामासत्ता थी भोर मामकेलि के साधनो मे बड़ी चतुर एवं जुमा सेलने में दक्षा थी, उसने मेरे साथ जुमा खेला । ८५. मेरे मै, जिसने स्वर्ग की सभी सुन्दर परीर पाली स्त्रियों का धैर्य हर लिया है, भोर जो तीनों लोक का स्वामी है, अपने प्रेम-प्रधान हृदय को सगा कर, सम्पूर्ण जगत् को बन्दः गीया बनो। स्मियो की मङ्गलकारिणी समुन्ननि उनके मात्रयदाता के उत्सर्ग पर निर्भर रहती है । हे मानिनि ! फोन ऐसा है जो गदर के जटाजूट फा मात्रय सेगे पाली, जन्ह की पुत्री (गङ्गर) का मान नहीं करता? ८७.

दशमः सर्गः १३७ हस्तौ पल्लवकोमलौ करयुगेनादाय वासः शनै- रन्येन व्यपनीय पाणियुगलेनामृश्य काञ्चयास्पदम् । मय्यालिङ्गति वाहुभिः सुबहुभिः शेविलक्षस्मित- ज्योत्स्नासेकमनोहराधरपुटं वक्त्रं स्वयं दास्यसि ॥८९॥ इत्युक्त्वाऽदाय रक्षःपतिरवनिसुतामुत्प्लुतो मीनजालै- श्चित्रं व्योमाम्बुराशि घनपवनरयास्फालगुञ्जद्धनोमिम् । पोतेनेव प्रकम्पध्वनिनिवहमसौ बिभ्रता पुष्पक्षण स्फूर्जत्सीतेन यात्रामनुपहतजवव्यापिनीमाललम्बे ॥१०॥ इति दशमः सर्गः। ८६. जब तुम्हारे नव पल्लव के समान सुकोमल हायों को अपने दो हाथों से पकड़ कर और दूसरे दो हाथों से तुम्हारे वस्त्र धीरे-धीरे उतार कर, अपने और सब हाथों से तुम्हारे कटि प्रदेश को छुऊँगा और तुम्हें आलिङ्गन करूंगा तो तुम स्वयं अपना मुख, जिसमें मुस्कराने की प्राभा के विखर जाने से मनोहर, अपर पुट हैं, (चुम्बन के लिये) मुझे दे दोगी। ६०. इतना कह कर, राक्षसों का स्वामी (रावण), पृथिवी की पुत्री (सीता) को उठा कर, मछलियों को जाल की तरह चित्रित, समुद्र रूपी माकाश में उड़ गया जहां तेज वायु के पपेड़ों से लहरों के समान बादत की पक्ति, गरज रही थी। और उसे (सीता को) जहाज के समान, पुष्पक विमान में बिठा कर, जिस में कोपती हुई ध्वनि की हिलोरें भनझना रही थी, बडी तेज़ और अवाधगति से यात्रा करने लगा। दसवा सर्ग समाप्त ।

एकादशः सर्गः प्रथ विकम्पितपक्षसमीरणप्रसभनतितदीधितिमालिना। विदिततद्गमनेन जटायुना सरभसं समराय समुत्प्लुतम् ॥१॥ जनकराजसुतामपकर्पतः सुररिपोः पथि गृध्रसमागमः । अवनिमित्तमवेकयदस्य तं नृपवधूहरणप्रभवं वधम् ॥२॥ पतगपक्षपराहतनत्तितस्वभवनोदरमध्यपरिच्युतः । उभयभित्तिविताड़ितमस्तक रिचरमकम्पत विश्रवसः सुतः ।।३।। विहगनाथवितीर्णपराभव प्रभवकोपविकम्पितचेतसा । सपदि पङ्क्तिमुखेन समाददे शरवितानकृतावरणो रणः ॥४॥ क्षणमतिष्ठदुपाहितमण्डलस्थितिमनोहरविग्रहबन्धुरः । विपुलपक्षपुटद्वयकल्पितप्रहरणावरणः स विहङ्गमः ॥५॥ १. जब सीता के अपहरण का हाल पता चला तो जटायु, जिसके फड़फड़ाते हुए पंखों की हवा से उसकी शारीरिक शक्ति सहसा (उसके चारो मोर) नाचती हुई मालाकार हो गई थी, युद्ध के लिए उछल पड़ा। २. राजा जनक की.पुत्री के अपहरण करने वाले, देवताओं के शत्रु (रावरण) के मार्ग में, धराज (जस) के आगमन ने, (जैसे) राजघु (सीता) के हरण करने से अन्ति, उसके वध की अमङ्गल-सूचक घोपणा की । ३. विश्रवा का पुत्र (रावण) जटायु के प्राक्रमण से झौड़िया कर अपने रथ के मध्य भाग में गिर पड़ा और (अपने) मस्तक के दोनों मोर प्राघात से, देर तक कांपता रहा। ४. विहङ्गों के स्वामी, (जटायु) से पराभूत होने से, जिसका हृदय मारे गुस्से मे कांप रहा था, ऐसे रावण ने, फुर्ती से, अपने शरीर को वाणों के वितान से हेप कर, अपने मुसों की पक्ति से युद्ध किया । क्षण भर के लिये, वह जटायु, निराका पारीर, मण्डल के बीच में स्थित होने से मनोग एय गुन्दर लगता था, दोनों भारी पंखों के सम्पुट समारत प्रपने को साकार कर एकादशः सर्गः पथि विहङ्गनिशाचरशासिनोः प्रवक्ते घृतिसंहरणो रणः । विधुतपक्षधनुर्गुणसंहति ध्वनिनिनादितभूघरकन्दरः ॥६॥ प्रथ खगेश्वरपक्षसमीरणप्रवलवेगनिवत्तितपातितैः । अपि निजैरतिवेगिमिरायुधैदृढमहन्यत संयति रावणः ॥७॥ प्रतिदिगन्तरदृष्टतनुः समं दशमुखं परितः स विहङ्गमः । नभसि मण्डलयन्नतिरंहसा स्ववपुपा परिवेपमिवादघे ॥८॥ गगनसागरभोगधराङ्गना विसलता हरिपादसरोरुहः । पतगपक्षसमीरणरंहसा सुरसरिद् विससर्प दिशो दश Hell खगपतिनिजपक्षसमूहितो पहितवारिदरुद्धशो मुहुः । शिरसि चञ्चुमदृष्टसमागमो दशमुखस्य सवेगमपातयत् ॥१०॥ शिरसि तं प्रणिहत्य स मुष्टिना भुवि निपातयति स्म निशाचरः । द्विजपतिः पुनरेव स वेगवानुपरि कन्दुकवद् ददृशे रिपोः ॥११॥ मार्ग में विहङ्गराज (जटायु) और राक्षसराज ( रावण ) के बीच, धैर्य वाला युद्ध हुा । (जटायु के) पंस और (रावण के) धनुष को प्रत्यञ्चा से निकले हुए सम्मिलित निर्घोप से पर्वत की गुफायें प्रतिध्वनित हो गई। तव रावण ने अपने ही द्रुतगामी बाणों से, जिन्हें जटायु के पंख से, वेग से निकले हुए वायु ने लौटा कर गिरा दिया था, युद्ध में बड़ी दृढ़ता से प्रापात किया। जटायु ने, जिसका शरीर, समान रूप से दिशानो के अन्त तक, दिखलाई नहीं पड़ता था, रावण के चारो ओर, आकाश में बड़े वेग से, चक्कर काटते हुए, अपने शरीर का घेरा डाल दिया। प्राकाशरूपी सागर का उपभोग करने वाली स्त्री, जो शङ्कर के चरण कमल की नाल थी, ऐसी सुर-नदी, जटायु के पंखों से निकली हुई हवा से दशों दिशाओं में सरक गई। १०. तब जटायु अपने पंखों के सिकोड़ने से बादलो को समेट कर मदृश्य हो गया । और इस प्रकार महष्ट होने से पास माकर, रावण के सिर पर, बार-बार चोच से, बड़े वेग से मापात करने लगा। ११. तब निशाचर (रावण) ने उसे (जटायु को) चूंसा मार कर पृथ्वी पर गिरा दिया। परन्तु वह पुर्तीला पतिराज, फिर पत्र के सिर पर गेंद की तरह दिखलाई पड़ा। ७. ६.

१४० जानकीहरणम् नख शिखाशितकुन्तनिपातनस्फुटितरनपिशङ्गितदिङमुखम् । रिपुशिरश्चरणेन रणे रणन्मुकुटकोटि जघान विहङ्गमः ॥१२॥ अथ स कुन्तमुखेन शकुन्तपं तमभयः समरे समदारयत् । द्विजवरोऽपि ततो नखरैः खरैरपघनं घनमस्य जघान सः॥१३॥ हृदि समर्पितकुन्तमुखं मुहुर्विततपक्षनिरुद्धनभस्तलम् । खगपतेः समरोचत तद्वपुर्निहितदण्डमिवातपवारणम् ॥१४॥ युधि रयादपहाय तदायुधं चपलतुण्डविखण्डितमण्डनम् । विवुधशुत्रुशिरस्तरसा रसन्नभिनिपत्य जघान पतत्पतिः ॥१५॥ नखशिखाङ्क शकोटिषु मस्तके निपतितासु दशाननदिग्गजः । अभिननाद भृशं दशभिर्मुखैः प्रबलनादनिनादितदिङ्मुखः ॥१६॥ नखमुखोपहितायुधकर्मणस्तनुतनुच्छदसन्ततिवर्मणः रणमवेक्ष्य विहङ्गपतेर्जगुः सपदि साधुवचः सुरकिन्नराः ॥१७॥ १२. भाले के समान पैने नख और शिखा की चोट से दिशायें, फूटे मारिणक्य की तरह पिशङ्ग हो गई । उस युद्ध में नाद करते हुए पक्षिराज ने, शत्रु के सिर पर, किरीट के किनारे आपात किया। १३. उसने (रावण ने) युद्ध में भाले की नोक से उस पक्षिराज को छेद दिया। तब पक्षियों में श्रेष्ठ (जटायु) ने भी उसके (रावण के) दृढ़ शरीर पर, मेघों को विदीर्ण करते हुए अपने नखों से गहरा प्राघात किया। १४. पक्षिराज (जटायु) के हृदय में भाले की नोक के बार-बार पुस जाने से, उसका शरीर, जिसके फैले हुए पंख आकाश को घेरे थे, ऐसा शोभायमान हुआ जैसे दंड लगा हुमा छाता हो। १५. युद्ध में बड़े वेग से उसके शस्त्र को छीन कर, पक्षियों के स्वामी (जटायु) ने (अपनी) चोंच से, उसके (रावण के) शृङ्गार को तहस-नहस कर दिया । और नाद करते हुए फुर्ती से उस देवताओं के शत्रु (रावण) के सिर पर टूट कर, मापात किया । १६. अंकुश के समान, नस और शिखा की नोक, सिर पर पड़ने से, उस दिग्गज रायण ने (अपने) दसो मुखों से ऐसा भयङ्कर नाद किया कि उस पोर नाद से दिशामें गूंज उठी । १७. नस भोर चोंच से ही, दास्त्र का कार्य करते हुए, शरीर ढ़कने वाले पंतों मे ही, कवों की कतार बनाये, पक्षिराज (जटायु) को युद्ध करते देगे, देवता भौर किमर तुरन्त साधुवाद करने लगे। टिप्पणी-नापु गाविति भूतानि गुरागमपूजयन् । अरण्यकाण्ड, ५१-२१, याल्मीकि ।

एकादशः सर्गः १४१ अथ विदर्शितपूर्वपुरन्दरद्विरदकुम्भविपाटनपाटवम् । असिमसावसितोत्पलसप्रभं सुररिपुः समराय समाददे ॥१८॥ सपदि मातुमिवास्य दिगन्तरं विततपक्षयुगस्य पतत्रिणः । पृथुवितानमिवामरवर्मनो विपुलमंसपुटं निजघान सः ॥१६॥ द्विजवरस्य तनुः कृतवेदिनः सुरवधूनयनोदकसन्ततिः। कुसुमवृष्टिरिति त्रितयं ततः समंपतत्सममेव नभस्तलात् ॥२०॥ विधिवशेन वशी समुपस्थितो निजगदे शिथिलीभवदुष्मणा। रघुपतिः प्रभुणाथ पतत्रिणां दशमुखेन कलत्रमपोहितम् ॥२१॥ समरशक्तिरियं ममतावती दशमुखो हरति स्म वधूमिति । दशरथाय यथा गदितुं स्वयं द्विजवरोऽधिरुरोह सुरालयम् ॥२२॥ नृपसुतः पवनात्मजलोभितः फलितवृक्षवनं वनजेक्षणः । अगमदृष्य पदादिमगोत्तमं सपदि मूकममूकविहङ्गमम् ॥२३॥ १८. जो पहिले ही इन्द्र के गज के कपोलों के विदारण में पटुता प्रदर्शित कर चुकी थी, उस नील कमल के समान प्रभा वाली तलवार को उस देवतामों के शनु (रावण) ने युद्ध के लिये ग्रहण किया। १६. तव उसने (रावण ने) जटायु के फैले हुए दोनों पंखो पर, जो ऐसे लगते थे मानो दिशाओं के अन्तर (अथवा अन्तरिक्ष) को नाप रहे हों,जो देवताओं के मार्ग में विस्तृत वितान के सदृश थे और जो लम्बे-चौड़े और खुले हुए थे, फुर्ती से प्राघात किया। २०. तब कृतज्ञ पक्षिश्रेष्ठ का शरीर, देवताओं की स्त्रियों के नयनाथु की धारा और देवतामो के द्वारा की गई पुष्पवृष्टि-ये तीनों ही साथ-साथ प्राकारा से गिरे। २१. भाग्य से, इन्द्रियजित राम के उपस्थित होने पर, पक्षिराज (जटायु) ने जिसकी उप्णता शिथिल हो रही थी, रावण के द्वारा जानकी के हरण का वृत्तान्त कहा । २२. "मेरी इस युद्ध करने की शक्ति को मौर बहू (सौता) को रावण ने हर लिया", जैसे दशरथ से यह कहने के लिये वह पक्षिश्रेष्ठ स्वर्ग में चला गया। २३. तब कमल के समान नेत्र वाले राम, पवन के पुत्र हनुमान की लालच से, फले हुए वृक्षों से भरे, जहां चिड़ियां चहचहा रही थीं, ऐसे सुन्दर ऋष्यमूक पर्वत पर तुरन्त गये ।

१४२ जानकीहरणम् कपिरजर्य्यमचिन्तितलम्भितं तदनुभूय विरोचनसम्भवः। रिपुमयाचत कौशिकवैरिणां निहतये न न दुन्दुभिविद्विषः ॥२४॥ उपकपीश्वरवास गुहामुखं समधिगम्य र दहचोदितः । प्रतिनिनादवतो जगतीधरान् गुरु जगज हरिः परिकम्पयन् ॥२५॥ अभिपपात रुपारुणिताननः कपिपतिः कपिलद्युतिमण्डनः । नव विरोचनमण्डलमुद्वहन् गिरिवरः शिरसेव हिरण्मयः ॥२६॥ अथ रणो ववृते धरणीमृतां शिखरखण्डमहीरुहमण्डलैः । हरिहरिद्वयनन्दननर्दितप्रतिनिनादितभीमदरीमुखः ॥२७॥ पतितभूरुहभूरिभरस्फुटकठिनविग्रहविग्रहतेजितौ । अचरतामचिरेण परस्परच्छलनिरूपुणविक्षणवीक्षणी ॥२८॥ शिरसि पातितभिन्नगिरिद्रुमक्षणनिरासलघूकृतहस्तयोः । अघरदंशपरिस्तशोणितं बलितमुष्टि जवादुपसर्पतोः ॥२६॥ २४. अप्रत्याशित रूप से प्राप्त मैत्री का अनुभव कर, सूर्यपुत्र, कपि सुग्रीव ने, विश्वामिन के शत्रुनो के रिपु (राम) से दुन्दुभी नामक असुर के शत्रु (यालि) के वध के लिये, याचना न की हो-ऐसा नहीं, अर्थात् याचना की। २५. उस गुफा के द्वार के पास, जहाँ वानरो के स्वामी रहते थे, पहुंचे हुए राग से उत्साहित सुग्रीव, पर्वतों को कम्पायमान और प्रतिध्वनित करते हुए, बड़े जोर से गरजे । २६. (तव) क्रोष से जिनका मुख लाल हो गया था, जो कपिलवणं कान्ति से शोभित थे, जिनके चारो मोर नयोदित सूर्य के मण्डल के समान प्रभा थी, जो अपने शिरोभाग रो सुवर्णमय पर्वत के समान लगते थे, ऐसे वानरों के स्वामी (सुग्रीव) युद्ध के लिये उद्यत २७. सूर्य और इन्द्र के पुत्र, सुग्रीव और वालि ने अपने गर्जन से कन्दरामों के द्वार को प्रतिध्वनित कर, शिसर-सण्डों पोर वृक्षों के समूह से युद्ध किया । २८, अपने ऊपर पड़ते पर्वतों के प्रतिराय भार रो, कठिन दरीर के फूटने के कारण, युद्ध तीय कर देने वाले, उन दोनों ने शीघ्र ही माया के प्रयोग रो सपिस दगंन या माधम हो गये। लिया । २६. गिर पर फेंके गये, जिन-भिन्न होते, वृक्षों और पर्वतों को क्षण भर रोक्ने रे नि हाय टेढ़ा किये हुए, अपने घर काट कर रक्त बहाते हुए, गुट्ठी याप, वेग रो दोश्ते (उन दोनों मा) युट हमा।

एकादशः सर्गः सरभर्स रिपुवक्षसि वक्षसा समभिहत्य सहूकृति वलातोः । ललितमुक्तपटान्तमनोहर प्रचलपुच्छगुणद्वयशोभिनोः ॥३०॥ रविपुरन्दरनन्दनमल्लयोरथ बभूव भुजैः सुमहाहवः । करणवन्धनबद्धसमुच्छसज्जठरमुक्तमुखागतशोणितः ॥३१॥ नभसि कि क्षिपतः कुलपवतानुत भुजेन विवर्तयतो महीम् । इति विवेश वितर्कमथैतयो पसुतः क्षिपतोरितरेतरम् ॥३२॥ बलपरीक्षण तत्क्षणकर्षणप्रसभतानितहतिगज्जितः । हरिगुरुं हरिदश्वसुतो मुहुविनमयन् निजनाम समाददे ॥३३॥ अथ नितितनिश्वसितातुरं ग्रहणनिर्गतनिश्चललोचनम् । भुजभुजङ्गमबन्धनवन्धुरं स्रवदसृग्नसरञ्जितकन्धरम् ॥३४॥ भ्रमितपादयुगाहतपातितद्रुमशतं द्रुतमुक्तरवं सुतवरं वरविक्रममम्बरे भ्रमयति स्म सुराधिपसम्भवः ॥३५॥ रवेः । . ३०. शत्रु के वक्ष पर प्रचण्ड आघात करते हुए और हुंकार से शरीर को हिलाते हुए, सुन्दर, लहराते वस्त्राञ्चल की भांति हिलती पूंछों से (उन दोनों का युद्ध हुआ।) ३१. रविनन्दन (सुग्रीव) और पुरन्दर नन्दन (बालि), दोनों पहलवानो मे भुजाभो से भय- हर युद्ध हुमा । दांव बांध कर कर कसने के कारण उदर से रुधिर निकल कर मुख मे या गया। . ३२. एक दूसरे को पटकते हुए देख कर, राजपुत्र ( राम ) ने यह तर्क किया कि क्या माकाश में 'कुलाचल' फेंका जा रहा है मथवा मुजामों से पृथ्वी हिलाई जा रही है। विशेष-कुलाचल प्रसिद्ध सात पर्वतों में से कोई-महेन्द्र, मलय, सह, शुक्ति, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र। ३३. तत्क्षण बल की परीक्षा करते हुए, जोर से सींच कर गरजते हुए हरिदश्व पुत्र (सुग्रीव) ने हरिगुरु (बालि) को बार-बार झुका कर अपना नाम बताया। ३४. जो उलटी सांस चलने के कारण व्यथित था, जिसकी भांमे पथरा कर बाहर निकल पड़ी थी, जो सर्प के समान भुजामों की जकड़ से पकड़ गया था पोर जिसकी गरदन वहते हुए रधिर के रस से लाल हो गई थी, ३५. इन्द्र के पुत्र (वालि) ने सूर्य के बली पुत्र (सुग्रीव) को, जो घूमते हुए दोनों पैरों गे सैकड़ों वृप्तो को उखाड़ कर गिरा रहा पा, जो तेजी से गन्न कर रहा था, पापाश में नचाया।

१४४ जानकीहरणम् इति पपात वितन्वति पौरुषं रिपुदृढ़ाङ्गविदालिनि बालिनि । परुपवह्निशिखोदगमनिष्ठुरः क्षितिपनन्दनबाणमहाशनिः ॥३६॥ अकृतबाणनिकृत्ततनुः कृती चिरविनिन्दितराघवलाघवः । पदमधिक्षयमक्षयसम्पदः सुरपुरस्य पुरन्दरनन्दनः ॥३७॥ सदनुजे दनुजेशरिपौ नगे स्थितवतीतवतीन्द्रसुते दिवम् । स्तुतनये तनयेऽशिशिरातेनिपतितां पतितां पुनरास्थिते ॥३८॥ ऋतुरतारतभास्वदिरम्मदारुचिपिशङ्गितवारिदमण्डलः । प्रचलवातविधूतपरिभ्रमत्सितविहङ्गमदन्तुरदिङ्मुखः ॥३६॥ उदितसारवसारवदम्बुदः पथिकरोदकरोदकशीकरः। उपययौ वनयौवनसम्पदः प्रजनकोमलकोमलकन्दलः ॥४०॥ जलधरः पवनेन वितानितः क्षितिपनन्दनविक्रमदन्तिनः । मुखपटः समराय गमिष्यतस्तपनमण्डलकेशरिपञ्जरः ॥४१॥ ३६. उसी समय अपने पौरुष का विस्तार करने वाले और शत्रु (सुग्रीव) के दृढ अङ्ग यो विदीर्ण करने वाले, वालि पर, प्रचण्ड अग्नि की लपलपाती ज्वाला के सदृश कठोर, महाशनि के समान, पृथ्वीपति (राम) का वाण गिरा। ३७. उम भाग्यवान, इन्द्र के पुत्र (बालि) ने, जिसका शरीर बाण से काट डाला गया था, और जिसको कारण राम के हल्वेपन की बहुत दिनों तक निन्दा हुई, अक्षय सम्पत्तिवान, स्वर्ग में, अमर-पद को प्राप्त किया। ३८. अपने श्रेष्ठ, छोटे भाई (लक्ष्मण) के सहित पर्वत पर आसीन होने पर, मोर इन्द्र के पुत्र (बालि) के मरणोपरान्त स्वर्ग में चले जाने पर, मौर राजनीति के लिये प्रशसित, सूर्य के पुत्र (मुग्रीव) के गिरे हुए स्वामित्व के पुनः प्राप्त कर लेने पर, ३६. ऋतु के समाप्त होने पर, चमकती विद्युत की प्रभा से पिशङ्गवणं बादलों के समूह युक्त दिपान्त, में बहती हुई हवा के झकोरे से मंडराते हुए श्वेत पक्षियों से लहरियादार हो गया। ४०. मनोहर और मृदु अंकुरों का जनक, पथिक जनों को पलाने वाले जलविन्दुमों से युक्तः उमड़ा हुमा, गरजता हुमा, जल से भरा बादल, बन की योपन-सम्पति मो प्राप्त ४५. पवन से फैलाया हुमा यादल, गूर्य मण्डन रूपी, सिंह के पिजड़े औसा, गमर के लिये जाते, राजहमारी जय गज का मुगपट सा प्रतीत हुमा ।

एकादशः सर्गः १४५ मलय-मन्दर-विन्ध्य-महीभृतां शिखरयष्टिसमपितमायतम् । प्रततशीकरशुक्तिजमण्डनं जगति मेघवितानमरोचत ॥४२॥ भुवनतापनधर्मजयोत्सवः समुदितः परिनृत्यत बहिणः । इति जघान यथा समयस्तडित्कनकदण्डशतैर्घनदुन्दुभिम् ।।४३॥ प्रथममश्रुमुखीमपहाय तां पथिक ! सम्प्रति किं परितप्यसे । इति यथा विजहास वनस्थली प्रविकसद्दलकन्दलशोभिनी ॥४४॥ अतनुना तनुना घनदारुभिः स्मरहितं रहितं प्रदिधक्षुणा । रुचिरभा चिरभासितवमंना प्रखचिता खचिताननदीपिता ॥४५॥ जलदकालविवद्धिततेजसः शुशुभिरे कुलिशायुधगोपकाः । मनसिजस्य शरव्यथितात्मनां विरहिणामिव शोणितबिन्दवः ॥४६॥ ४२. ससार के ऊपर, मेघों का बड़ा-सा छत्र, जिसमें मलय, मन्दर, एवं विन्ध्य पर्वतों के हंडे लगे थे और जो मोती के समान विस्तृत जलकरणो से अलकृत था, वड़ा शोभायमान् लगता था। ४३. आह्लाद से नाचते हुये मयूरों ने, अवसर प्राने पर बादल रूपी नगाड़े को, बिजली रूपी सैकड़ों सोने के डंडों से पीटा । जैसे संसार में गृष्म ऋतु की तपन पर विजय पाने का उत्सव मनाया जा रहा हो। ४४. 'हे पथिक ! पहिले तो तुमने रोती हुई प्रेयसी को छोड़ दिया मौर अव उसका परिताप करते हो।' यह कह कर निकले हुए पत्तियो और कोपलों से वनस्थली जैसे हमी। ४५. प्रवल कामदेव ने, काम रहित जनों को कामाग्नि से दग्ध करने की इच्छा से, लपलपाती विजली की अग्नि से, धन-रूपी काष्ठ समूह से रचित प्राकाश रूपी चिता को न प्रज्ज्व. लित किया हो, ऐसा नहीं है । अर्थात् अवश्य ही प्रज्ज्वलित किया। टिप्पपी 1--रूपक कुछ इस प्रकार है यर्या तु है । आकाश में बादल छाये हैं। उनके बीच में बिजली लपलपा उठती है और वे वादल जल से उठते हैं । ऐसा लगता है कि मानो वादल रूसी काष्ठसमूह से संजोई हुई माफाश रूपी चिता को कामदेव, बिजली रूपी अग्नि से प्रजवलित कर देता है और इस प्रकार साधारणतः काम-रहित जनो के भी हृदय में कामोद्दीपन करता है ४६. वर्षा ऋतु के कारण जिनका तेज बढ़ गया है, ऐसे विद्युत को धारण करने वाले (बादल) ऐरो शोमापमान् हुए जैसे कामदेव के यारणों से पीड़ित-हृदय विरही जनों के रुधिर की वूद हो।

१४६ जानकीहरणम् धनपरिस्रवणा गिरयो बभुः सतड़िदम्बुदसन्ततिसंवृताः । कनकचित्रकुथावृतमूर्तयः सुतमदाइव दानवदन्तिनः ॥४७॥ मुरजनादगभीरमनोहरैः प्रमुदितेन पयोधरनिस्स्वनैः । उपरिवृष्टिभयादिव तानितः प्रचलपिच्छचयो विशदभ्रुवा ॥४८॥ मुहुरुदनपयोदमतङ्गजश्रवणचामरभावमुपेतया । गगन सागरशङ्खवपुःश्रिया प्रचरितं प्रमदेन बलाकया ॥४६॥ कमलिनी मलिनीकृतकन्ततिः सकलह कलहंसगणं जहौ । अविकलं विकलङ्कतनुच्छदं समदनम्मदनम्रतनुभियम् ॥५०॥ दिशि बभौ नववारिदसञ्चयस्त्रिदशनाथशरासनरञ्जितः । जलनिधिबहुवर्णमणिद्युतिप्रकरवानिव तिय्यंगवस्थितः ॥५१॥ जलधरस्य तटे तड़ितो वभुर्ग्रहगणनसनानि वितन्वतः । उदरमाशु विभिद्य विनिर्गता रविकरा इव काञ्चनरोचिषः ॥५२॥ ४७. विद्युत से युक्त बादलों की परम्परा से घिरे हुए घनघोर जल के वर्षों से पवित्र, उन राक्षसों के हाथियों के समान लगते थे, जिनके शरीर पर सुवर्ण-चिमित भूल पड़ी थी और जिनसे मत यह रहा था। ४८, बादलों के, मृदङ्ग के समान, हृदय को हरने वाले, गम्भीर नाद से आह्लादित, चमकीली भों वाले मयूरों ने, वृष्टि के भय से, अपने ऊपर हिलती हुई पूंछ के समूह का चंदीया कर लिया। ४६. प्रमत्त बगुलों को पक्ति, जो सागर रूपी आकाश के शंख के समान शुभ्रवदना थी और जो बार-चार उमड़ते हुए, हाथी के समान, बादलों के कान रूपी वर के सदृश लगती थी, धूमने लगी। ५०. मलिन पत्तो वाली कमलिनी ने उन कलहंसों को छोड़ दिया जो आपस में कलह करते थे, जिनके पख पूर्ण रूप से कलव-रहित थे और जिन मतवालों के शरीर की शोभा मद से नन हो गई थी। ५१. दिशा मे देवराज इन्द्र के धनुप से रक्षित मेघ समूह उठ पाये जैसे विविध मणियों के कान्ति-समूह से युक्त जलनिधि प्राकास में उठ माया हो। ५२. बादल के किनारे पर सुवर्ण के समान चमकती हुई विजली, तारागणों को निगलती हुई, सूर्य के किरणों के समप्रम, उदर को चीर कर निकलती हुई, यही दोभायमान लगती थी।

दिशः सर्गः १४७ विमलवारि निपीय नदीशतं सलिलभारनिरन्तरितोदरः । कममिवाभिवहन्नतिपानजं गिरितटे निषसाद पयोधरः ॥५३॥ विरहिणीभिरलक्ष्यत मन्युना सलिलविच्युततैलसमप्रभम् । प्रतिनवोदितमस्फुटमम्बुदे विवुधनाथशरासनखण्डकम् ॥५४॥ नन चकार ततारततारका भरितसर्वनदा वनदाचली। मदमयूरवरं रवरंहसा प्रमदसारमितं रमितं गिरी ॥५५॥ वनदमण्डलदन्तपदश्चिरं समभिहत्य रयेण हृतेऽग्रतः । जलधरे पवनेन हरिद्वजः कचिदतिष्ठदुपागतसम्भ्रमः ॥५६॥ पिहितविष्णुपथस्य पयोमुचः पटलरन्ध्रविभावितमण्डलः । दिनकरः क्वचिदन्वगमद्रुचा जलनिधी वडवानलसंहतिम् ।।५७॥ जलधिवारि निपीतवतो भृशं वनमुचो रुधिरस्रवलोहिताः। अतिभरस्फुटितोदरनिर्गता वभुरिवान्नलता दिवि विद्युतः ॥५८॥ ५३. बहुत सी नदियों के स्वच्छ जल को पीकर भौर अपने उदर में जल के भार को रख कर, मधिक पानी पी जाने के कारण, पकावट से (वह) बादत गिरि के किनारे विधाम करने लगा। वशेष-समुदहस सलिलातिभारं, पलाकिनो यारिधरा नवन्तः । महत्सु शृंगेषु महीधराणा, विधम्य विधम्म पुनः प्रयान्ति ॥ --किष्किन्धा काण्ड, २८-२२ बाल्मीकि । ५४. विरहिणी स्त्रियों ने बादल मे, नवोदित मस्पष्ट इन्द्रधनुष के खंड को, जो जल में गिरे हुए तेल के समान चमक रहा था, कोष से देखा। ५५. जिसमें विस्तृत तारिकाएँ ढकी हुई थी, जिसने सारे नदों को भर दिया था ऐसी जलदा- वली ने, मतवाले मयूरों को अपने भयङ्कर गर्जन से अत्यधिक मत्त कर मुदित न किया हो, ऐमा नहीं। ५६. जलद-मण्डल (नायक) के दन्तक्षत से युक्त, दिशा (नायिका) का समूह, पवन द्वारा आघात करके, वेग से बादलों के उड़ा देने पर कही-कही देर तक सम्भ्रमित रहा । ५७. बादलों से आकाश के घिर जाने पर, सूर्य जिसका मण्डल (बीच-बीच मे) रन्ध्र-राशि से विभासित था, अपनी किरणों के महित, समुद्र के बाडवाग्नि में कही पर समा गया। ५८. समुद्र का जल अत्यधिक पी जाने के कारण, बोझ से पेट फट जाने से, बाहर निकल पड़ी हुई, बहते रुधिर के समान, लाल अंतड़ियों के सदृश, विजलियां प्रकाश में फैल . गई।

૨૪૮ जानकीहरणम् रविकरानुपरुध्य कृतं मया भुवनदृष्टिनिरोधि तमस्तडित् । विलसितेन निहन्ति मुहुर्मुहर्धन इतीव ररास रुषा घनः ॥५६॥ दिशि निवेशितताम्रविलोचना नवधनानिलकम्पितकुन्तलाः। नयनवारि चिरं पथिकाङ्गना विससृजुः सह वारिदशीकरैः ॥६०॥ विततपावनके वनकेतकीसुरभिगन्धवहे धव ! हे ! पथि । इतिरवैरुदिता रुदिताः स्त्रियः शिखिगिरं सहसे सहसेरितम् ॥६१॥ नभसि नूतनकन्धरजृम्भितस्थगिततिग्मकरद्युतिसम्पदि । व्यपगतेन पदं शुचितेजसा हृदि वियोगवतामिव सन्दधे ॥६॥ शिशिरशीकरवाहिनि मारुते चरति शीतभयादिव सत्वरः । 'मनसिजः प्रविवेश वियोगिनीहृदयमाहितशोकहुताशनम् ॥६३॥ प्रथमपीतजलाहितमेचकप्रभमनङ्गकृपाणमिवाम्बुदम् । विमलधारमुदीक्ष्य समुद्गतं विरहिणीहृदयं न न विव्यथे ॥६॥ ५६. सूर्य के किरणों को रोक कर, संसार की दृष्टि को विफल करने वाला अन्धकार तो मैंने किया पर यह विजली बार-बार चमक कर अन्धकार को नष्ट कर देती है, यह विचार कर क्रोध से बादल ज़ोर से गरजा । ६०. पथिकों की स्त्रियां, जिनके केश नयी और पनी वायु से हिल रहे थे, बादलों की बूंदों के साथ-साथ, अपने ताम्र वर्ण नेत्रों से दिशामों को निहारती हुई, और वहाती थीं। ६१. "हे प्रिय ! जल से भरे वन केवड़े से सुरभित वायु से युक्त मार्ग पर तुम, सहसा उच्चरित मयूर की बोली को कैसे सहन करते हो ?' यह कहते हुए स्त्रियां रो-रो पड़ती ६२. माकाश में, सूर्य, जिसकी प्रखर किरणों की प्रामा, नये बादलों के गर्जन से रद्ध हो गई थी, अपने विशुद्ध तेज से च्युत होने के कारण, विरागियों के पद को धारण करने लगा। ६३. जब सीतल जल-करए वहन करने वाली वायु बहने लगी तो, ठंड के भय से, कामदेव, विरहिणी स्त्रियों के हृदय में, जहाँ शोकाग्नि जल रही थी, घुस गया। विशेप--शोतात बलवदुपेषुषेय नोरैरासेकान्छिशिरसमीरफम्पितेन । रामाणामभिनवयौवनोमभाजोराश्लेपिस्तनतत्योर्नवांशुऊन ॥ --माघ ८-३२॥ ६४. पहिले पिये हुए जल से, जिसमें काली प्रभा था गई थी, और जो फामदेव की तलवार को समान था, ऐसे बादल की विमल धारा को निकलते हुए देस कर, क्या विरहिणी में हृदय में व्यथा नहीं हुई?

: सर्गः १४९ विततमेघतमिस्रवृता दिशः समवलोक्य निशागमशङ्कया। विरहभीतिमहन्यपि निर्विशन् मृदु रराव रथाङ्गसमाह्वयः ॥६५॥ पथिकमानसमानसमुन्नतिस्थितिबहिष्कृतवहिकलापिनि । जगति वाशितरासितवारिदप्रसृतकन्वृतिकन्धुतिराश्रिता ॥६६॥ नवपयोधरकुखरमस्तके तडिदसी पतिते परितश्च्युतः । स्फटिकभङ्गरुचो जलबिन्दवो विससृपुः प्रकरा इव मौक्तिकाः ॥६७॥ जलधरेण कृता रवितारका नभसि देवनगोलकवृत्तयः । बलनिपूदनजालविदा यथा ग्रसननिर्वमणक्षयन्त्रिताः ॥६८॥ अधिरयेण समीरगवाहिता विबुधवम॑नि वारिददन्तिनः । अविरलं मुमुचुर्जलशीकराञ्छमकृतानिव धर्मपयःकणान् ॥६६॥ जलदशाखिनि लोलतडिल्लताक्रकचपननिपातविदारिते। प्रवितता इव चूर्णचया वभुः पवनवेगवृता जलरेणवः ॥७०॥ ५. फैले हुए मेघों से जनित अन्धकार से दिशामों को व्याप्त देखकर, रात के प्रागमन की शंका से, दिन में भी ( चकई के ) विरह के डर से, चनवाक ने धीरे से चक्रवाकी को बुलाने का शब्द किया। १६. वर्षा काल के कारण पथिक-वनितानों के मन में मान-वृत्ति इतनी ऊंची उठी कि उसने मयूरों की (नृत्य काल में) ऊपर उठी पूंछ की ऊंचाई को मात कर दिया और गरजते एवं वरसते वादलों की गर्दन का सहारा लिया । १७. नये बादल के समान, हाथी के मस्तक पर, विजली के गिरने से, फूटे हुए स्फटिक के समान चमकीले जलविन्दु के समूह के सदृश, मोती चारों ओर गिर कर वहने लगे। १८. आकाश में मेघों के कारण सूर्य-विम्व, क्रीडा-कन्दुक के समान दिखने लगा। मानो उसे इन्द्र की माया को जानने वाले कृष्ण ने गोवर्धन धारण करने के समय उसे निग- लने और उगलने के क्षण में नियंत्रित कर दिया हो । ६६. हाथी के समान बादल, तेजी से चलती हुई वायु मे मिले हुए जलकणों से देवतानों के मार्ग को निरन्तर सोच रहे थे। ऐसा लगता था जैसे वे (जलकण) परिश्रम के कारण निकली हुई, पसीने की बूंदें हों। ७०. पारे की धार के समान लपलपाती, बिजली के ग्राघात से रेती हुई, वादल की शाखाओं से गिरी हुई, जल की फुहार, वादल के चूर के समान, वायु के वेग से फैल गई ।

जानकीहरणम् महिषधूसरितस्सरितस्तत: परिगतो विपदा विपदाचितः । धुतमहाककुभः ककुभः पतन्नकृत भीमरुता मरुताकुलाः ।।७।। रविकराहिततेजसि भूतले हविषि वृष्टिमये बलशत्रुणा । उपहिते समरोचत लाङ्गली समुदितेव कृशानुशिखावली ॥७२॥ नवविवोधमनोहरकेतकीकुसुमगर्भगतः सह कान्तया। अविदितानिलवृष्टिभयागमः सुखमशेत चिराय शिलीमुखः ॥७३॥ अभिविसृज्य वनानि कृनावना मनुजलोकसमीपनिपेविणः । तडिदलातशतैरभिताड़िता वनगजा इव सस्वनुरम्बुदः ॥७४॥ समयवृष्टिहतेऽपि दवानले भ्रमरधूममृता नवलाङ्गलीः । समभिवीक्ष्य कृशानुसमप्रभा मुमुचेरेव भयं न मृगाङ्गनाः ॥७५॥ कमलघामहतो महतोऽनिशं विविधहंसहितः सहितः खगैः । प्रविदधौ कमलं कमलं रुजन्निपतितः सरसस्सरसस्तटः ॥७६॥ के भय ७१. भैसे से धूसरित, एवं पक्षियों से भरे, गिरते हुए नदी के तट ने (इस प्रकार) विपत्ति से पिर कर, बड़े-बड़े पर्वत शृंगों को कम्पायमान करते हुए, वायु से आकुल दिशाओं को भयङ्कर ध्वनि से भर दिया। ७२. सूर्य की किरणों से सन्तप्त पृथ्वी पर, इन्द्र से डाले हुए, जलमय हवि से, नारियल वृक्ष ऐसे लगते थे जैसे अग्नि-ग्याला की परम्परा हो । टिप्पणी-हयन कुंड में हवि डालने से जैसे अग्नि को शिखा उठती है उसी प्रकार सन्तप्त भूमि पर वृष्टि होने से नारियल के वृक्ष अग्नि-शिखा के समान लगते थे। उत्प्रेक्षालंफार। ७३. नव-विकसित केतकी के सुन्दर फूल के भीतर घुसा हुपा मोर वृष्टि के मागमन से अनभिज्ञ, भ्रमर, अपनी पत्नी (भ्रमरी) के साथ, बहुत देर तक सुप से सोता रहा। ७४. पन को छोड़ कर, मादमियों की बस्ती के निकट रहने वाले बनेसे हाथी के समान वादल, विजली की जलती हुई सैकड़ों लुमाठियों से जैसे ताहित होकर गरजने लगे। ७५. उपयुक्त समय से वृष्टि हो जाने से, यद्यपि जङ्गल की माग बुझ गई थी, फिर भी मग्नि के समान चमकने वाले और धुएं के समान भौरी से घिरे हुए, नये नारियल के वृक्षों को देखकर, हरिणियों ने भय का त्याग नहीं किया, अर्थात् डर रही थी। ७६ पक्षियों के गहित, विशाल एवं मुन्दर, गिरते हुए गरोवर के तट ने, जिसमें कमलों का सौदयं नष्ट हो गया था, जहाँ नाना-प्रकार के हंग रहते थे, लगातार कमस मो टुकड़े टुकड़े करता हुमा, जल की मलिनता को धारण किया। मात् वहाँ मा जत गरप्ता हो गया।

तः सर्गः . १५१ प्रवितता नु पुरन्दरगोपका विविधवर्णरसेन विधातरि । रचयतीन्द्रधनुश्चलतूलिका गलितधातु जलस्य नु विन्दवः ॥७७॥ रजत रज्जुशताकृतिरायता पतति वृष्टिरियं नु निरन्तरम् । जलधरस्य पतद्भवि मण्डलं स्फटिकदण्डशतैर्नु विधारितम् ॥७८॥ रचयतः समयस्य सुरायुधं करशतं नु सधातुरसारुणम् । विगलितं नु ततः शकलं तडिल्लसितशस्त्रनिपातनतक्षितात् ॥७६॥ समुदयो नु विकाशकृतद्युतेविततवह्नि शिखाकुसुमश्रियः । इति नृणामभवज्जलदोदये ग्रथितभूरिवितर्कपरं मनः ॥२०॥ अथ सुवाहुरिपुः सुबहु स्पृशन् स्मरधनञ्जयजय्यतनुः शुचम् । हरिशरासन लक्ष्मणि वारिदे निहितदृष्टिरवोचत लक्ष्मणम् ॥८१॥ विधुतनीपवनैः पवनैस्ततं मदनविभ्रमदं भ्रमदम्वुदम् । जलविकासमयं समयं भवान् धृतिगुणे सहते सहते कथम् ॥२॥ ७. क्या ये (वृष्टि जल की बूंदें) वीरबहूटियां तो फैली हुई नही हैं । अथवा विविध प्रकार के रंगों से, इन्द्रधनुप के बनाने के समय, ब्रह्मा की कूची के हिल जाने से गिरी हुई उन धातुओं के जल की बूंदें तो नहीं हैं ! सैकड़ो चांदी की लम्बी रस्सियो की आकृति की यह निरन्तर गिरती हुई वृष्टि ऐसी लगती थी जैसे पृथ्वी पर गिरते हुए मेघ-मण्डल को सैकड़ों, स्फटिकमरिण के डडों से वह धारण किये हो अर्थात् सम्हाले हो। ६. नया धातुओं के रस से अरुरिणत इन्द्रधनुप के बनाने के समय ये उसके सैकड़ों हाथ (नोक) तो नहीं हैं । अथवा (बनाने के समय) विद्युत् से प्रवाहित लोहे के हथौड़े की चोट से टूक-टूक हुए उसके (इन्द्र-धनुप के) टुकड़े तो नहीं गिर रहे हैं। .. क्या मग्नि-शिखा के समान, प्रकाश करने वाले सूर्य की प्रभा की कुसुम-सम्पत्ति का उदय तो नहीं हो रहा है । ऐसे उठे हुए वादल को देख कर, लोगों के मन में वितर्क की भारी गुत्थी पड़ गई। १. तब सुबाहु राक्षस के शत्रु (राम) जिन्हे कामाग्नि नहीं जीत सकी थी, बहुत शोकाकुल होकर, इन्द्र-धनुष से सुशोभित वादल की ओर देखते हुए लक्ष्मण से बोले । २. झकोरा खाते हुए साल-वन के पवन से व्याप्त, कामोद्दीपन करने वाले मंडराते हुए वारि- धरों से युक्त, चारो मोर जल के विस्तार से भरे हुए, समय को, माप धैर्यवान् होते हुए भी, कैसे सहते हैं ?

१५२ जानकीहरणम् गिरितटे लुठनेन पयोमुचि प्रणिहिता इव धातुरजश्चयाः । त्रिदशनाथशरासनकान्तयः प्रवितरन्ति परं नयनोत्सवम् ॥८३|| वनकृशानुशिखा निहता वपुस्त्वयि तदीयमिदं प्रतिपाद्यते । जलमितीव विमुञ्चति लाङ्गलीकुसुमहस्ततले जलदोदयः ।।८४॥ दिशि लसन्ति खरानिलरहसि क्षिपतिमेघमहीधरसंहतिम् । ततपरस्परपातसमुद्भवज्वलितवह्निशिखा इव विद्युतः ॥८५॥ तरुतले विषमारुतमारुतक्षततनुलतावति तावति । विरतिरब्जरसं प्रति सम्प्रति स्वमलिसंहतिरक्षति रक्षति ॥८६॥ धावन्नकाण्डविहितध्वनिरम्बरस्य त्यागं विधाय निकटे विलसज्जनस्य । निघ्नच्छिलाभिरुदकेन जगन्निषिञ्चनुन्मत्तवर्द्रमति वायुक्शः पयोदः ॥८७॥ वारिप्रवाहपरिलङ्घितभूमिपृष्ठं धारान्धकारहृतदिनविभागभित्ति । मेघप्रतानपिहिताद्रि घनागमेन प्रस्तं समस्तमिव भाति जगत् समन्तात् ॥८८॥ ८३. पर्वत के किनारे मॅडराते हुए बादलों से मानो फैलाया हुआ, इन्द्र-धनुप के समान कान्ति- मान, धातुओं के कणों का समूह नेत्रों को बड़ा आनन्दित करता है। ८४. 'दावानल से झुलसा हुमा तुम्हारा शरीर है, उसके लिये उसी का जल मैं तुम्हें समर्पण करता हूँ' इस प्रकार उमड़ा हुआ बादल, नारियल के फूल के करतल पर जल छोड़ता ८५. प्रचण्ड वायु से फेंके हुए, पवंताकार बादलों के समूह के परस्पर संपर्प से उत्पन्न, जलती हुई भग्नि की ज्वाला के समान, विजली दिशा में लपलपा रही है। ८६. नरकुल के वृक्ष की छाया में भयङ्कर ध्वनि करती हुई हवा के झपेटे से घायल हो जाने वाला भ्रमर-समूह अव वर्षा-काल में कमल के प्रति विरक्ति के कारण अपनी सकुशल रक्षा कर लेता है। ५७. आकाश में निरर्थक गड़गड़ा कर दौड़ते हुए, विलासीजनों के पास से हट कर, गिलानों पर जल से मापात करते और पृथ्वी को जल से सींचते, वायु के वश मे होकर, बादल, उन्मत्त की भांति (इधर-उपर) घूमते थे। ५८. जस के प्रवाह से जो पृथ्वी के तल को लांघ गया है, जिसने अपनी पारजनित मन्य. कार से दिशामों की सीमाओं को मिटा दिया है, जिसने मेयों के प्रतान से पहाड़ों को दिपा दिया है, ऐसा लगता है जैरो मेघ के भागमन में सम्पूर्ण जगत को समूगा निपल लिया हो।

एकादशः सर्गः १५३ एतानि भान्ति हरिगोपकमण्डलानि प्रावृच्छियो जगति सम्प्रति सञ्चरन्त्याः । भूमी पदानि रचितानि यथोदविन्दुस्पर्शद्रुतोपहितयावकमण्डनानि ।।८६॥ स्वादूनि सिन्धुसलिलानि निपीय कामं गजनसौ गिरितटे विहितोपदेशः । अत्यन्तभूरिजलभारगुरुदरत्वा- दुद्गारनादमिव मुश्चति वारिवाहः ॥१०॥ निरस्तगृहसङ्गति भ्रमत एव तन्व्यास्तव स्तनद्वयमियद्वपुः पथिक ! जातमुद्यौवनम् । इतीव वदति स्फुटत्कुसुमहस्तमुद्यम्य सा भ्रमभ्रमरमण्डलक्वणितपेशला लागली ॥११॥ प्रणाशो मित्रस्य प्रसभरचितज्येष्ठविरहः प्रवृत्तः शोकादित्यधिकतरतारं निनदतः । निराशस्योत्कस्य स्फुटति नवमेघस्य हृदये रयादुद्यद्धारा असृजइव निर्भान्ति तडितः ॥१२॥ ८९. बीर बहूटियो के मण्डल ऐसे शोभायमान हो रहे हैं जैसे संसार मे धूमती हुई वर्षा ऋतु रूपी सुन्दरी नायिका के पद चिह्न, जल विन्दु के स्पर्श से तुरन्त लगे हुए महावर से मण्डित भूमि पर रच गये हों। टिप्पणी-हरिगोपक-बोरबहूदी १०. नदियों के स्वादिष्ट जल को मनमाना पी कर, गरजते हुए, पर्वत के किनारे विश्राम कर, वह बादल, जिसका पेट, अत्यधिक जल पी जाने के बोझ से भारी हो गया था, जैसे डकार रहा है। ६१. "हे पथिक! तुम घर मे उसका साहचर्य छोड़ कर (मारे-मारे) घूम रहे हो । उस सुकुमाराङ्गी के स्तन यौवन से भर कर बड़े हो गये हैं," इस प्रकार वह नारियल (का वृक्ष), जो उस पर भनभनाते हुए भ्रमरो के समूह के मंडराने से बड़ा सुन्दर लगता है, अपने नव प्रस्फुटित पुष्पो से भरे हुए हाथ को उठा कर कहता है । टिप्पणी-लागलो='नारिकेलस्तु लागली'-इत्यमरः । ६२. सूर्य का विनाश हो गया। बरजोरी ज्येष्ठ मास से विरह हो गया (अर्थात् ज्येष्ठ मास समाप्त हो गया) विखरे हुए, निराश एवं अनमने, नये मेघों के वक्ष पर तेजी से अपनी धार उठाये हुए, बिजली, रुधिर के समान लगती है। २० १५४ । जानकीहरणम् नभोवारीरुद्ध सुरपतिधनुर्धातुनिकरैः कृताभिज्ञानं यन्नवजलदवन्यद्विपकुलम् । नदत्युच्चैरेतत्कृतवनपरित्यागचपलं स्फुरद्विधुच्चक्रग्रहणविधिपाशे निपतति ॥३॥ अम्भोभिः सह पद्मरागसरणिर्मासीकृता वारिधे- रुद्वान्ता पुनरिन्द्रगोपककुलव्याजेन मेधैरिह । तेनैपामुदरेषु रत्नविततिन्तिावशिष्टानव- प्रोद्यद्भासुरवृत्रसूदनधनुाजेन संलक्ष्यते ॥१४॥ अनुत्तारं भूम्ना तिमिरचितमक्षय्यसलिलं निशीथं कालेऽस्मिन्नहि मकर सञ्चारविभवम् । तरेयं सिन्धूनां पतिमिव यदि व्यायततरं लभेयाहं देव्याः कुचकलससङ्घाटमुडुपम् ॥६५॥ ६३. वायु मण्डल रूपी सांकल से अवरुद्ध इन्द्रधनुप के धातुओं के समूह से जो पहिचाना जाता था, ऐसा, बनैले हाथियों के झुंड के समान नया बादल, जोर से गड़गड़ाता हुआ और जो जल के निकल जाने के कारण हलका हो जाने से चपल हो गया था, लपलपाती हुई विजली के चक्र की पकड़ में फंस गया। विशेष-वारी 'वारीतु गनबन्धनी'-इत्यमरः हाथी बांधने की रस्सी या साकल। 'कृत यन परित्याग, श्लेष । वन जंगल जल-"पयः फोलालममृतं जीवनं भुवन वनम्'--- --इत्यमरः । इस श्लेष में रूपक और श्लेष दोनों ही है । ६४. समुद्र के जल के साथ, पद्मराग मणि के समूह को, मेघ निगल गये, फिर वीर बहूटी के बहाने उन्होंने उसे उगल दिया । अव उनके (मेघों के) उदर में जो वमन से बचा हुमा रत्न समूह था वह नये उगे हुए, चमकते इन्द्र धनुप के रूप में दिखाई पड़ता था। टिप्पणी--इन्द्र गोपफ दोर बहूटी। एक लाल कोड़ा जो बरसात में पैदा होता है। ६५. इस समय कठिनता से कटने वाली, समुद्र के समान लम्बी रात को, जो घने अन्धकार से व्याप्त है, जहाँ अंधाधुंध पानी वरस रहा है और जहाँ मकर की प्राकृति के मेघ बहुतायत से घूम रहे हैं, उसे मैं पार कर सकता हूँ यदि करश के समान स्तनों से सनद, सीता रूपी भारी नाव मुझे मिल जाय । टिप्पणी -इस श्लोक में श्लेष है : अहि = मेघ-सर्प-समुद्र के सम्बन्ध में (१) अनुत्तार जिसफा पार करना कठिन है (२) भूम्ना-विशाल । (३) तिमिरचित-- भीमकाय मत्स्य से अलंकृत है। (४) 'अक्षम्य सलिल' जिसके जल का कभी क्षम नहीं होता (५) 'महिमकर सञ्चारविभयं' =जिसमें सर्प और मकर का तून सञ्चार पकादशः सर्गः एवं सस्मरमन्तराकृतगिरं तुङ्गं गिरि गौरव- व्यालम्बाम्बुदशकनीलकलसोद्वान्ताम्बुधौतोपलम् । रामस्यावसतस्सतस्नुतपयः पातकणनिझरं काल: कालपयोदगजितजिताम्भोधिध्वनिनियंयो ॥६६॥ इति एकादशः सर्गः। ६६. उस ऊँचे पर्वत पर, जहाँ (पानी के) बोझ से लटकते हुए वादलो के इन्द्रनील मरिण के कलशों से उगले हुए पानी से घट्टान स्वन्ध हो गई थी, जहाँ बहते हुए जल के प्रपात से झरने मदार कर रहे थे, वहाँ राम को रहते हुए भोर (सीता सम्बन्धी) मासक्ति की चातें करते-करते, वह वर्षा ऋतु जिसके प्रलय के समान मेघों ने गड़गड़ाहट मे समुद्र के गर्जन को जीत लिया था, चली गई। (मर्थात् वर्षा ऋतु व्यतीत हो गई।) ग्यारहया सर्ग समाप्त।

-- अथ द्वादशः सर्गः वनेऽथ लब्धावसरेऽवसेवितुं स्मरावहे राजसुताविनाकृतम् । अफुल्लपङ्केरुहकर्कशस्तनी शरत्. प्रपेदे नृपवासवात्मजम् ॥१॥ सहस्ररश्मेरुपरोधिनिग्गंमान्नभस्य नाकुश्चितरश्मिसम्पदः । ययुः खुरग्राहकमेघ कईमव्यपायनिस्सङ्गसुखं तुरङ्गमाः ॥२॥ दिशो यदि स्वं प्रथमोचितं वपुः पयोदनिर्मोकमुदस्य भेजिरे । जहौ किमिन्द्रायुधरत्नरञ्जितभ्रमत्तडिन्मण्डलमण्डनं नमः ॥३॥ घनव्यपायेन सुदूरमुत्सृताः परिवणत्सारसपङ्क्तिभूषणाः । बभूवुरुत्तारमनोहरा दिशः समुद्रकान्ता इव निर्मलप्रभाः ॥४॥ १. तब अवसर प्राप्त होने पर, (अर्थात् वर्षा ऋतु के बीत जाने पर) कमल की कली के समान कड़े स्तन वाली, शरद् ऋतु उस कामोत्तेजक वन में, नृपों में इन्द्र के समान (दशरथ) के पुत्र (राम), जिनसे राजपुत्री ( सीता ) हर ली गई थी, के पास, सेवा के हेतु गई। टिप्पणी गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है 'वर्षा विगत शरद् ऋतु आई। पिछला सर्ग (११याँ) वर्षा ऋतु के अन्त होने पर समाप्त होता है और यह सर्ग (१२वां) शरद ऋतु के भागमन से आरम्भ होता है। रुकावट के निकल जाने से (अर्थात् बादल का अवरोध हट जाने से) आकाश मे फैली हुई सूर्य की किरण-सम्पत्ति के कारण, खुरों के पकड़ने वाले कीचड़ के सूख जाने से, घोड़े निर्बाध चलने लगे। ३. यदि दिशामो ने बादल के केनुल को फेक कर, अपना पूर्ववत् शरीर धारण कर लिया तो क्या माकाश ने भी, इन्द्रधनुष के रत्नो से रक्षित लपलपाती विजली के चक्र के प्रलङ्करण को त्याग दिया! बादलों के चले जाने से दिशायें, जो बहुत दूर खिसक गई थीं, जो नाद करते हुए सारसों की पंक्ति से विभूषित थी मौर जिनकी कान्ति निर्मल थी, वे बहुत ही मनोहर हो २. विशेष--परिषवणरसारसपंबित मेखल:'-किरातार्जुनीय, ८-९ -भारदि। .

द्वादशः सर्गः प्रपेदिरे शोपमशेपमम्भसः क्षयण केदारतलेपु शालयः । तपन्ति पादायिणामसंशयं विपत्तयो हि स्पृशतस्सशूकताम् ॥५॥ निजेक्षणस्पद्धि निकृत्य पङ्कजं दधुः शिरोभिः कमलस्य पालिकाः । विपक्षमुद्धृत्य नयन्ति यत्नतः पदं विशेपेण सदैव साधवः ॥६॥ सितच्छदे गायति तत्त्ववत्तिना लयेन कालस्य कुशेशयाकरः।। सरोजपाणावनुपूर्वमुल्लसद्दलाङ्गुलीभिः कलनामिवाददे ॥७॥ सहैव वृष्टया पतितं महीतले सरो नभःखण्डमिव व्यराजत । प्रचण्डवातापगमेन निश्चलं प्रसन्नमन्तजलदृष्टतारकम् ॥८॥ मणिप्रभेपु प्रतिविम्बशोभया निमग्नया बालमृगासलेखया । विचिच्छिदे वारिषु वञ्चितात्मना नराजहंसेन पुनर्विसाङ्करः ॥६॥ निपीड्य चञ्च्वा कमलस्य कुड्मलं निवोधयामास बलेन सारसः । सुगन्धिगर्भ मुकुलीकृतं ह्रिया पतिः प्रयत्नादिव कन्यकामुखम् ॥१०॥ पर्वत के नीचे, पान के नितान्त प्रभाव से चावल के खेत सूख गये मौर वह पैदल चलने वालों के लिये एक विपत्ति थी। वे छू जाने पर कांटे को समानता करते हुए निस्सन्देह बड़ा क्लेश देते थे। विशेष-'शूकोऽस्त्री इलक्षणतीक्ष्णाले,' इत्यमरः । अपनी आंखो की स्पर्धा करने वाले कमल को तोड़ कर कमलवन की ओर टकटकी लगा कर देखने वाली स्त्रियों ने उसको सर पर रख लिया । सत्पुरुष लोग शत्रुमों का नाग कर उन्हें उचित पद विशेप देकर उनका उपयोग करते हैं । विशेष-अर्थान्तरन्यास अलंकार । सरोवर ने, हंस गान के समय (शास्त्र) मतानुसार, लय के साथ, अपने कमल-हस्त की चमकती हुई पल्लवागुलियों से, मानो समपरिमित ताल दिया । वह सरोवर, वृष्टि के साथ गिरा हुअा, आकाश का एक खण्ड-सा लगता था, जो प्रचण्ड वायु के बन्द हो जाने से निश्चल था और जिसके स्वच्छ जल के भीतर तारि- कायें दिखलाई पड़ती थीं। स्फटिक मरिण के समान स्वच्छ जल में निमग्न वाल चन्द्र के प्रतिविम्व की शोभा से वञ्चित होकर राजहंस ने फिर कमल नाल के मखुवा को नहीं कुतरा । १०. सारस ने अपनी चोंच से पीड़ित कर, कमल की कली को वल पूर्वक खोला । जैसे लज्जा से ढांके हुए, कम उम्र वाली पत्नी के सुगंधित मुख को, पति बड़े यत से खोलता है । ६.

जानकीहरणम् ततस्ततं धाम निरीक्ष्य शारदं कृतस्मरोद्दीप्ति महीभुजस्सुता। तोरिदं वैभवशंसि हारिणश्चकार लक्षीकृतलक्ष्मणं वचः ॥११॥ पयोदकालस्य गतस्य विलसां घनच्छलेन प्रथितेषु सर्वतः ।। शिरोरुहेषु स्फटिकप्रभामुषः फलन्ति पालित्यकृता इव विपः ॥१२॥ प्रवासमालम्वच धनागमश्रियः पयोधरस्पर्श वियोगनिस्पृहः । महीधरः स्वं शिखरावसङ्गिनं त्यजत्यसौ मत्तशिखण्डिशेखरम् ॥१३॥ विभान्त्यमी वालमृणालपाण्डुरा विसृष्टधाराः शरदन्भ्रसञ्चयाः । सुरेन्द्रचापेन विधूय सञ्चिता दिगङ्गनानामिव तूलराशयः ॥१४॥ ११. काम को उद्दीप्त करने वाले, शरद् ऋतु के विस्तार को देख कर, राजपुत्री सीता लक्ष्मण की ओर लक्ष्य कर उस मनोहर ऋतु के वैभव की प्रशंसा करते हुए ये वचन बोलीं। १२. वर्षा काल का बुढ़ापा आ जाने पर, चारों ओर फैले हुए, स्फटिक के समान श्वेत प्रामा को चुराने वाले, पलित केश के सदृश, बादल, नारों ओर व्याप्त हो रहे हैं। १३. बादलों की सम्पत्ति प्रब चली गई यह समझ कर, और उनसे बादलों से वियोग हो जाने के कारण अभिलाष-हीन, उस पर्वत ने, अपने शिखर के साथी (अर्थात् शिखर पर विचरने वाले) मद-मत्त मयूर का परित्याग कर दिया। विशेष-इलेप--पयोपर:-स्तन-वादल इस श्लोफ में समासोक्ति अलंकार है। "समासोक्तिः समंयंत्र कालिगं विशेषणः । व्यवहारसमारोपः प्रस्तुतेज्यस्य यस्तुनः॥ महीधर नायक है । उसे धनागमधी नायिका का वियोग हो गया है । जैसे वियोग में, प्रमिलापहीन नायक प्रपना शिरोमूपण, विक्षिप्तता में फेंक देता है वैसे ही महीपर नायफ ने शिरोभूपण मयूर को त्याग दिया। दारद ऋतु में मयूर की बेकदरी होती है और हंस का बोलबाला होता है। "समय एव करोति मलायलं प्राणिगदम्त इतोय शरीरिणाम् । पारदि हंसरपाः परपीकृता स्वरमयूर मपूरमणीयताम् ॥ माघ १४. नये कमल नाल के समान वेत, पारद् ऋतु में धारा प्रवाह के समान फेंका हुमा, मादप्तों का समूह, ऐसा लगता था, जैसे इन्द्र धनुष से धुनका हुमा दिगाङ्गनाओं का रूई फा में द्वादशः सर्गः १५९ असौ नभस्सागरवीचिसन्ततिः प्रसन्नदिक्काननराजिलाङ्गली । प्रभाभिरामेड़ितशनकार्मुका तनोति तोपं जगतः शुकावली ॥१५॥ अमी समीराश्रयदूरपातिनः सरोजगन्धेन विकृष्टचेतसः । भ्रमन्ति हंसा हिमरश्मिरोचिषः सिताब्भ्रखण्डा इव मारुतेरिताः ॥१६॥ तनोति हासं विहतो विवस्वतो यदेप पादेन सरोरुहाकरः । जगत्प्रभावेण महद्भिरायतं कृतंपरीभावमपि प्रशंसति ॥१७॥ अमीषु वप्रस्य विपाण्डु विभ्रतः शुधेव शोचिः सलिलेपु शालयः । अलङ्घचमागामि शुकाननाद्भयं विचिन्तयन्तीव विनम्रमस्तका. ॥१८॥ सरोजमेकं प्रथमं समुद्गतं विभाति पद्माकर नाशनो धनः । गतो न वेतीक्षितुमम्बुजैः परै रुदेतुकामैः कृतमग्रतो यथा ॥१६॥ १५. यह शुकों की पंक्ति जो अपनी प्रभा से इन्द्रधनुष की प्रतिरूपता करती है, जो निर्मल दिशाओं की वनश्री नारियल के वृक्ष के स्वरूप है और जो भाकाश रूपी सागर की लहरों की परम्परा के समान है, संसार मे आनन्द का संचार कर रही है । विशप--"नारिकेलस्तु लागली"-इत्यमरः । १६. ये हंस, जो वायु के सहारे दूर-दूर तक फैले हैं, जिनका हृदय कमलों की सुगंधि से प्रलुब्ध हो गया है और जो चन्द्र-रश्मि के समान कान्तिमान हैं, वे वायु से प्रेरित, श्वेत बादल के खण्ड के समान लगते हैं। १७. यह कमलों का समूह सूर्य से पादाहत (श्लेष-पैर रश्मि) होकर भी वायु के प्रभाव से सौंदर्य एवं सुगंधि का विस्तार करता है । बड़े लोगो से बहुत अपमानित होने पर भी प्रशंसा होती है। विशेष-पाटीर! तव पटीयान् कः परिपाटीमिभामुरीतुम् । यत् पिपतामपि नृणां पिष्टोपि तनोपि परिमल: पुष्टिम् । -पण्डितराज जगन्नाथ । १८. इस नदी तट पर जल में धान के पौधे जैसे सोच के मारे पीले पड़ गये हैं और पाने वाले, दुनिवार तोतों के मुख के भय से, जैसे चिन्ता से उनके मस्तक (अग्रभाग) झुक गये हैं। विशेष तीनों मसल के लिये आपत्ति होते हैं। इंति=आपत्ति- अतिवृष्टिरनावृष्टिः शलभाः मूपका : शुकाः । प्रत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः ॥ १६. पहिले (जल के बाहर) एफ कमल निकल कर खिला, जैसे बाहर निकलने की इच्छा करने वाले, अन्य कमलों ने उसे इस हेतु आगे कर दिया हो कि वह देख ले कि कमलों का नाश करने वाले बादल चले गये या नहीं। .

जानकीहरणम् समुल्लसन्त्यो निजपत्रसञ्चयं शरद्घनासारनिपेकशीतलम् । सरोजमालास्तरुणाकरश्मिभिः प्रसारयन्तीव विशोषवाञ्छया ॥२०॥ न केवलं स्वं निरुणद्धि लुम्पतः स्वनेन शस्य कमलस्य पालिका । इह प्रणुमान् पशुपक्षिणो गुणैविपाकभाजो हृदि शालिसम्पदः ॥२१॥ कृशस्य मध्यस्य भिदामुपाहरनियम्य हारेण वृहत्कुचद्वयम् । प्रमाणमुल्लङ्घय वपुर्विधित्सती विलोचने च श्रवणस्य सम्पदा ॥२२॥ विपाण्डुनो धामनि रोचिषः शुभे बलित्रये सङ्गतरोमसन्ततिम् । विवर्द्धमानेन च दूरमेष्यती कुचद्वयेनाभिनिपीड़ितान्तरम् ॥२३॥ मृणालनालाधिकमाइवे भृशं प्रसह्य जङ्के विपुलं पराभवत् । तटं नितम्बस्य च मेखलागुणैनिवद्धय पीनोरुशुभं निपेति ॥२४॥ २०. चमकती हुई कमलों की पंक्ति ने शरद् धन के जल पड़ने से शीतल, अपने पत्तों के समूह को तरुण सूर्य की किरणों से जैसे सुखाने के लिये फैला दिया है। २१. वह सेतों की रखवाली करने वाली, चिल्ला-चिल्ला कर, न केवल अपने शस्य-धन को चुराने वालों को रोकती है बल्कि, भीतर से पकी हुई शालि-सम्पत्ति के गुणों से प्राकृष्ट, पशु-पक्षियों को भी दूर रखती है। २२. दुबली-पतली कमर को टूटने से बचाने के लिये, (वह स्त्री) (अपने) विशाल स्तनों को हार से बांध कर रोकती है और दोनों आंखों को जो सीमा का उल्लंघन फर मागे यढ़ती जा रही थी अपनी कर्ण-सम्पत्ति से रोकती है। विशेष-लोक २२, २३ और २४ विशेषक हैं। २४ श्लोक के 'निषेषति' से इन इलोकों का अन्यय होता है । विशेषक को प्यारपा २-१ में। २३. गोरी पोर चमकती हुई त्रिवली से संलग्न रोम-रेसा को जो दूर तक (ऊपर) बढ़ती जा रही पी उसे भरते हुए अपने दोनों स्तनों से, जो मापस के संपर्ष से मन्तर को पीड़ित कर रहे थे, रोस्ती है। २४: (वह स्मी प्रपन) मोटे, विशाल एवं सुन्दर नितम्ब के किनारे को, जो कमन-नाल भी अधिक चिकनी जांघ को यरवस दाये जा रहे पे (उसे) मेससा से बांध कर रोपती द्वादशः सर्गः अमी निरस्ता युवतीभिरग्रतः शुका विपनश्रियमप्यधिश्रिताः। वसन्तगम्यं गमयन्ति किंशुक सपल्लवं कुड्मलमण्डितं वपुः ॥२५॥ वपुर्वहन्त्या शितिकण्ठसन्निभं त्रिकोपकण्ठे शरपाण्डुरत्विषि । इयं कवाऽसितपद्मसंहतिव्युदस्तबन्धुच्युतया शिखण्डिनीम् ॥२६॥ प्रसपंतः स्तम्बकरेनिरन्तरं निगूढजानि कमलस्य कानने । रथाङ्गनामानमुदस्तवाससा कुचेन तत्प्राणसमानुकारिणा ॥२७॥ अनुव्रजन्त्या वकुलं विपक्ककं समस्तबद्धारुणिमाधरश्रिया । शुकं प्रसक्तश्रवणेन शिक्षितस्वयूथनिर्वासनवर्णसंहतिम् ॥२८॥ कुरङ्गशावं नवपल्लवश्रियं तरोरशोकस्य करेण विभ्रता । विलोभयन्ती निजशस्यसम्पदः शनैरुदस्यत्यपरा पराभवम् ॥२६॥ नखेन कृत्वा नवचन्द्रसन्निभं निघाय बन्धूकदलं कपोलयोः । प्रियाय गोपी नखमार्गशङ्किने परस्यकोपं समुपाहरत्यसौ ॥३०॥ २५. सेत ताकने वाली युवतियों से प्रागे भगाये हुए ये तो, (ऋतु के कारण) विपन्नवस्था को प्राप्त किंशुक वृक्ष पर बैठ कर ऐसा पल्लवित और पुष्पों से अलइत (सा) कर देते हैं जैसा वह वसन्त ऋतु में रहता था । २६. यह स्त्री जिसके नरकुल के समान गौर नितम्ब पर मयूर की प्राभा के समान, खुले हुए बाल बिखरे थे मयूरी का तिरस्कार करती है। २७. (एक स्त्री) शालिकानन के गुच्छ में निरन्तर घूमती हुई अदृश्य चकवी को उसके सदृश अपने खुले हुए स्तन से अनुकरण करती हुई चकवा की याद दिलाती है । २८. एक स्त्री जिसके लाल अधर विकसित मौलसिरी के फूल के समान लाल थे वह एक तोते को, जो बार-बार सुनने से अपने झुंड के तोतों को भगाने मे शिक्षित था, अपनी और प्राकृष्ट कर. रही थी। २६. एक दूसरी स्त्री, मृग के बच्चे को, अशोक के कोमल पल्लव के समान सुन्दर हायों से धीरे-धीरे ललचा कर अनाज के खेतो को खाये जाने से बचा रही थी। ३०. नवोदित चन्द्रमा के समान चमकती हुई गुलदुपहरिया की पंखुरी को अपने नखों से तोड़, अपने गालों पर चपका कर, यह स्त्री अपने प्रिय को शठ नायक का कोपभाजन बनाती है। टिप्परगी -एक स्त्री के दो प्रेमी हैं। स्त्री ने गुलदुपहरिया के लाल फूल को काट कर गालों पर चपका लिया, जिससे नखक्षत का भ्रम होता था । एक नायक ने उसे देखा और दूसरे नायक ने नखक्षत किया है ऐसा समझ कर उस पर 'ईया' से क्रुद्ध हुआ। यह भाव है ।

१६२ जानकीहरणम लिखन् खुरेण क्षितिमुग्रनहितः पतिर्गवामेप जयस्य शङ्कया । करोति रेखा नु विधित्सुराहवं द्विपदवृपानाह्वयते नु संज्ञया ॥३१॥ असौ चरन्ती विसमास्यनिःसृतैस्तदङ कुरैः कल्पितदन्तनिर्गमा । वराहधेनुस्तनयेन दूरतः समीक्ष्यते मत्तवराहशङ्कया ॥३२॥ उपेक्षते यः समरोद्यमक्षमां श्रियं प्रवृत्तामिति साधु शारदीम् । स यातु हन्ता समयस्य वानरः प्रबोधमित्यं प्रहतो वचश्शरैः ।।३३।। विधाय संग्राहनिपातचूणितं रणे शिरस्त्वां तनुजो मरुत्वतः । नयन् कर दण्डधरस्य पातितो मया किमेतत्फलमस्य कर्मणः ॥३४॥ धियोपगूढः समये पयोमुचां विधाय भोगे महति स्थिति चिरम् । न विप्रबोधं शरदोऽपि सङ्गमे भवानपूर्वः खलु सेवते हरिः ॥३५॥ ३१. क्या यह सांड़ की पाका से, घोर नाद करता हुग्रा, खुर से पृथ्वी को कुरेद रहा है अथवा युद्ध की इच्छा करता हुआ वह ( इस ) इशारे से प्रतिद्वन्दी सांड़ों को बुला रहा है (चुनौती दे रहा है ?) ३२. कमल-नाल को चरती हुई, इस सुभरी के मुख से निकले हुए, उसके (कमल-नाल के) अंकुवा को, निकला हुआ दांत समझ कर उसका (उस सुअरीका) बच्चा उसे दूर से मत्त सुअर समझ रहा है। ३३. जो वानर, युद्ध की तय्यारी के लिये उपयुक्त शरद् ऋतु की सम्पत्ति के उपस्थित होने पर, उसकी उपेक्षा करता है वह अवश्य ही अपनी प्रतिज्ञा भंग करता है। उसे जाग जाना चाहिये । निम्नलिखित वारण सदृश वचनों से उस पर (सुग्रीव पर) प्रहार किया गया। ३४. तुम्हे युद्ध में लेजाकर और बालि के सिर को धूंसे से चूर-चूर करवा कर जो यमराज का हाथ उस पर गिरा है क्या वह उसके कर्म का फल है ? विशेष-यह बालि के कर्म का फल नहीं है। यह मैंने किया है। यह भाव है। ३५. वर्षा ऋतु में चिरकाल तक, ऐश्वर्य में डूवे और खूब भोग विलास में फसे प्राप प्रव शरद् ऋतु के आने पर भी नहीं जागते । (प्रतएव) पाप अवश्य ही अपूर्व हरि हैं । टिप्पणी 1 इस श्लोक में श्लेप है :-हरि=विष्णु = बन्दर। श्रिया=ऐश्वर्य से लक्ष्मी से। भोगे-भोग विलास में शेष नाग पर। पयोमुचां वर्षा ऋतु में क्षीर सागर में। क्षीर सागर में लक्ष्मी से सेवित, विष्णु तो शेष नाग पर केवल देवशयनी एकादशी देवोत्यान एकादशी तक सोकर उठ जाते हैं, आप अपूर्व हरि (बानर) है कि तब भी सोते रहते हैं।

द्वादशः सर्गः १६३ पदं नवैश्वयंवलेन लम्भितं विसृज्य पूवं समयो विमृश्यताम् । जगन्निघत्सातुरकण्ठपद्धतिर्नवालिनैवाहिततृप्तिरन्तकः ॥३६॥ कृतं गुणेषु स्पृहया गुणवतैरवस्तुभावं गमयन्नसज्जनः । असंशयं व्यर्थपरिश्रमाहितप्रकोपदुष्टैः पुनरेव हन्यते ॥३७॥ गिरीन्द्रसारस्य गरीयसी गिरं ततः समाकण्यं नतस्समाहितः । कृतव्यलीकस्य बलोमुखप्रभोर्यायौ नयज्ञो भवनाय लक्ष्मणः ॥३८॥ अथ प्रमाणन्निपुघि महीभुजः सुतस्य संदेशमशेषमुद्धतः । दहन्नमामलघूमरेखया स तं भृकुटया निजगौ कपीश्वरम् ॥३६॥ ततः स नीताविति वृत्तविक्रिय प्रसाद्य रामस्य नमस्ययाऽनुजम् । कपिः स्व मेवं विनिनिन्द गर्वतो विनाशयन्तं समयं स्वयं कृतम् ॥४०॥ क्षमस्व वीरप्रवरातिकातरे शरासनाकर्षणकर्मणा किमु । भुजो भुजङ्गाधिपभोगसन्निभो जयत्ययन्ते भुवि भीतभीतिहृत् ॥४१॥ ३६. नये ऐश्वयं के तल से प्राप्त पाद को छोड़ कर पहिले की प्रतिज्ञा का स्मरण कीजिये । (समझ लीजिये कि) संसार को मारने की मातुरता जिसका क्रम है ऐसे यमराज को, केवल बालि को मार कर तृप्ति नहीं होगी। भर्यात् वह प्रापको भी मारेगा। ३७. गुण की स्पृहा से, गुणवान् पुष्पों से किये हुए उपकार को जो प्रसज्जन पुरुष तुच्छ समझता है, वह व्ययं किये हुए परिश्रम-जनित कोप से निस्सन्देह मारा जाता है । ३८. हिमालय के समान पौरुप वाले (राम) की सार-गमित वात, नतमस्तक एवं एकाग्रचित होकर, नीति को जानने वाले लक्ष्मण, उस भूठे वानरों के स्वामी (मुग्रीव) के द्वार गये। ३६. तब वह उद्धन लक्ष्मण ने तरकश एवं प्रस्त्रों को धमका कर (उनसे सैस होकर) उस यानरों के स्वामी (मुग्रीव) से, जलते हुए कोष की स्वच्छ घूम रेसा के समान भृकुटी पड़ा कर, राजपुत्र (राम) के सम्पूर्ण सन्देश को कहा । ४०. तर उस वानर (सुग्रीव) ने राम के छोटे भाई (लक्ष्मण) को जिनके साथ उसने दुष्पंवहार किया था, पूजा के द्वारा प्रसन्न कर, स्वयं ही गर्व के कारण अपने पिये हुए प्रतिमा मङ्ग को निन्दा की। ४१. हे वीरों में श्रेष्ठ ! क्षमा कीजिये । मापको धनुप सोचने की कोई मायश्यकता नहीं है। मापकी सर्पराज के समान पमस्ती हुई भगायें वो ससार के भय से पातर मनुष्यों का भय दूर करने के लिये हैं।

१६४ जानकीहरणम् विलुप्तदुःखस्य तवाब्रिसेवया तवैव बाहुप्रतिवद्धसम्पदः । अयं प्रमादो मम सम्पदा कृतः शशिप्रभं तानयतीव ते यशः ॥४२॥ कृतानभिशेऽपि मयि त्वया कृतं विचिन्त्य हृदय उपति माईवम् । अवैति नो वर्द्धयितारमध्रिपस्तथापि तं वर्षयिताऽनुकम्पते ॥४३॥ वदन्ति विद्यापरिशुदबुद्धयो यदादिमत् तन्नियतं विनाशवत् । अपि क्षणं जातमहो भवाइशो जनस्य शंसन्त्यविनाशिसङ्गमम् ॥४४॥ इहाधिपत्यं तव पादसेवया मयाऽनुभूतं च न चेह विस्मयः । वने वृकेणापि मृगेन्द्रसेविते न दुल्लभं हि द्विपराजशोणितम् ॥४५॥ मयि स्म मासीदवनेरधीशितुस्सुतेन तस्योपकृतस्य निष्क्रयः । जनो विपत्तौ भजते हि शक्तिभिविना कृतः प्रत्युपकारमन्यतः ॥४६॥ तनोति साधुः फलबन्धिलिप्सया विनैव पादानयिणामुपक्रियाम् । क्षपाकरा: कि कुमुदानि बोधयन् फलं ततो वाञ्छति किञ्चिदात्मनः ॥४७॥ ४२. तुम्हारे चरणों की सेवा से मेरा दुःख दूर हुआ है । तुम्हारे ही भुजानों पर मेरी सम्पत्ति निर्भर है । अपने ऐश्वयं के कारण जो मुझसे प्रमाद बन पड़ा है वह तुम्हारे चन्द्र की ज्योत्स्ना के समान यश का विस्तार करेगा। ४३. आपने मुझ ऐसे अकृतज्ञ व्यक्ति के साथ जो (उपकार) किया है उसे सोचकर फिर से हृदय गद्गद हो जाता है । वृक्ष अपनी वृद्धि करने वाले को नहीं जानता फिर भी वृद्धि करने वाला उस पर दया करता है। ४४. ज्ञान से परिशुद्ध बुद्धि वाले कहते हैं कि जिसका मादि है उसका अन्त निश्चिय है। परन्तु उनका कहना यह भी है कि आप ऐसे व्यक्ति के साथ क्षण भर का भी मेल अवि- नाशी है। ४५. पापकी चरण-सेवा से इस संसार में मुझे राजत्व का अनुभव हुआ है, यह कोई विस्मय की बात नहीं है । जिस वन में सिंह रहता है उसमें शृगाल को भी हस्तिराज के रुधिर को पा जाना दुर्लभ नहीं है। ४६. पृथ्वीपति के पुत्र (राम) ने जो मेरे साथ उपकार किया है उसका बदला सम्भव नहीं है । परन्तु विपत्ति में शक्ति क्षीण हो जाने पर मनुष्य प्रत्युपकार का पाश्रय लेता है । ४७. साधु पुरुष, अपने चरणों के प्राधित जनों का फल के प्रतिबन्ध की इच्छा के बिना ही उपकार करते हैं । चन्द्रमा जो कुमुदों को विकसित करता है वह क्या किसी फल की इच्छा से करता है ?

द्वादशः सर्गः १६५ स्थितो जनस्तेजसि ताहगात्मनो वृणोति कृत्ये न परं सहायकम् । तामित्रभेदाय दिशः परिभ्रमन् नहि प्रदीपं भजति प्रभाकरः ॥४८॥ विचिन्त्यमाने गुणदोपमिश्रता न वै न सर्वत्र जने विभाव्यते। गुणापराधेपु जनस्प योऽधिकः स एव सद्भिः परिगृह्यते ततः ॥४६॥ अनन्यभक्तित्वमनिन्द्यसङ्गतं गुणं मदीपं विगणय्य दुस्त्यजम् । वसन्निहैवागमयस्व यावता पतन्ति कालेन वने वनौकसः ॥५०॥ इति प्रयुक्तैरतुनीय नीतिभिः सुतं नरेन्द्रस्य वचोभिरुद्धतम् । चचाल यूथाधिपतिवनौकसां गतेषु यूथेन दिनेषु केचित् ॥५१॥ पतिः कपीनामभि राममानतो नुनोद कोपं हृदि तस्य दुश्छिदम् । जनस्य चेतो दधतः समुन्नतं रुपः प्रणीवाकविधिः प्रतिक्रिया ॥५२॥ ४८. अपने तेज में स्थित मर्यात् तेजस्वी पुरुष, अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिये किसी की सहायता का माश्रय नहीं लेता । अन्धकार का नाश करने के लिये दिशामों में अमए करता हुमा सूर्य, प्रदीप की सहायता नहीं लेता। विशेष-"किया सिद्धिः सत्त्वे यसति महतां नोपकरणे" यह भाव है। ४६. विचार कर देखने से मालूम होगा कि (मनुष्य में) गुण पौर दोप, दोनों का सम्मिश्रण रहता है (प्रतएव) सज्जन लोग मनुष्य में गुरण प्रयवा दोप, जिसकी अधिकता होती है उसीको स्वीकार करते हैं । ५०. मेरी अनन्य भक्ति एवं कभी न छुटने याती, मनिंद्य मैत्री का जो मुझमें गुण है उसी को स्वीकार फर, यहाँ ही रहते हुए तब तक प्रतीक्षा करे व तक, वन के रहने वाले पानर, रीघ स्यादि सब के सब इस वन में न एकत्र हो जायें। ५१. इस प्रकार नीति से भरे वाक्यों का प्रयोग कर, सदा राजपुत्र (लक्मण) से मनुनय कर यह वनोक्सों के पूय का स्वामी, कुछ दिनों के बाद (सवों के एकत्र हो जाने पर) अपनी सेना के साप पल पड़ा। ५२. यानरों के स्वामी (सुप्रीव) के राम के सम्मुस इस प्रकार नतमस्तक होने से, उनके हृदय वासीय नोप पना गया । उन्नत घेता के सामने नतमस्तक होना ही तोप का परिशोप होता है। विदोष-निपात प्रोकार संम्भोहि मारमनाम' पह भाव है। इस नोक पपंचरण में प्रयोग के स्थान में 'प्रमोपात' डोर लगता है।

१६६ जानकीहरणम गयगवयगवाक्षनीलधूम्रान् पनसदरीमुखभीमवत्रतारान् । शरभवृषभकेशरीन्द्रजानून् नलकुमुदाङ्गदगन्धमादनाद्यान ॥५३॥ इतरदपि वापिः कपीश्वराणां समुपनमय्य कुलं कुलन्दधानः । स्वयमपि निगदन्ननाम नाम क्षितिपसुताय सुतः समीरणस्य ॥५४|| शतवलिविनती भिषक-समीरप्रवरसुतौ स दिशः ससज्ज गुप्ताः । घनविबुधपयः परेतनाथैर्जनकसुताविचयाय वानरेन्द्रः ॥५५॥ निरुद्धदशदिङ्मुखं दशमुखस्य कपिप्रभुविसज्जितं जितमृगेन्द्र विस्फूर्जितम्। चचार जनकात्मजासमुपलब्धिचिन्ताकुलं कुलं तरलवीक्षणं क्षितिधरौकसां तत्क्षणम् ॥५६॥ इति द्वादशः सर्गः। वेत्तु गति . ५३-५४ गय, नर नीलगाय, गवाक्ष, नील धूम, पनस, दरीमुख, शूकर, भैसे और सिंह के समान घुटने वाले, नल, कुमुद, अङ्गद और गन्धमादन भादि वानरों को, कुलपति पवनसुत हनुमान ने अन्य वानरों को ले जाकर और नाम बतला कर स्वयं भी प्रणाम किया । ५५. वानर श्रेष्ठ सुग्रीव ने दिक्पालों से रक्षित दिशाओं में शतवलि को, उत्तर दिशा में, विनत को पूर्व दिशा में, सुपेण को पश्चिम दिशा मे और हनुमान को दक्षिण दिशा में जनक सुता (सीता) को ढूंढने के लिये भेजा। विशेष-(१) 'धन नाय' उत्तर दिशा अर्थात् धनाधिप फुवेर को दिशा । (२) विबुध नाथ : पूर्व दिशा अर्थात् इन्द्र को दिशा (३) 'पमानाथ-पश्चिम दिशा अर्थात् वरुण को दिशा। (४) 'परेतनाथ'-दक्षिण दिशा अर्थात् यमराज को दिशा। ५६. रावण की गति-विधि को जानने के लिये, सो दिशाओं के द्वार को बन्द कर, उसी क्षण, वानरों के स्वामी (सुग्रीव) के भेजे हुए, वानरों के मुंड, जिन्होंने स्फूर्ति मे सिंह को जीत लिया था, जिनकी आंसे चौकन्नी थी और जो जनकसुता (सीता) को ढूंढ निकालने के लिये आकुल थे, घूमने लगे। बारहवां सर्ग समाप्त। ।

अथ त्रयोदशः सर्गः अथ तन भूधरशिरस्यधिकां समुनुव्रजन् मनुकुलप्रभवः । विरहानलक्षततनुस्तनुतां गमयाम्बभूव निवसन्दिवसान् ॥१॥ अनिमीलितायतदृशोऽस्य चिरं कतरः प्रहार इति चोदयतः । स्फुटतारकेन्दुकुमुदाभरणाः शतयामिका इव निशा विगताः ॥२॥ नृपनन्दनेन मदनो विजितः प्रथमं मनोहररुचा वपुपा । दयितावियोगजनितेऽवसरे स तदाऽवधीदनुशयादिव तम् ॥३॥ परिशुष्यतः प्रववृते सलिलं नयनाद्दशाननरिपोरधिकम् । हृदयं विलोचनपयस्ततिभिः स्नपितं न तापमपि तद्विजही ॥४॥ न ददर्श मारुतिगतामुदिते नयनस्य वारिणि दिशं नृहरिः । न चकार राजदुहितुश्च शुचा गुणकीतितानि विधृते वचने ॥५॥ १. तब वह, मनुकुल के वंशज (राम) जिनका (सीता के) विरह के प्राघात से शरीर पहिले ही से बहुत घायल था और अब अधिक दुवला हो गया, उनको (वानरों को) थोड़ी दूर पहुँचा कर उस पर्वत पर दिन बिताने लगे । २. बड़ी-बड़ी अनिमेप माखों से, बहुत देर तक यह विचार करते हुए कि भव कौन-सा प्रहार किया जायगा, विकसित तारिकानों, चन्द्र पोर कुमुद से अलंकृत रातें ऐसी बीती जैसे एक-एक रात सैकड़ों रातें हो गई हों। राजपुन (राम) ने तो पहिले अपने सुन्दर पारीर की कान्ति से कामदेव को जीत लिया था। अव सीता के वियोग की स्थिति में कामदेव ने मानो बदला लेने के लिये राम पर खूब प्रहार किया। रावण के पात्र (राम) की कुम्हलाई हुई पासो से बहुत प्रांसू निकले । उन नेत्रों से निकले हुए मासुमों से वक्ष भीग गया पर हृदय का ताप नहीं गया। उस नरसिंह (राम) ने, मांखों में मासू जाने के कारण उस दिगा को नहीं देखा जिपर हनुमान गये थे और वाणी प्रवरुद्ध हो जाने से राजपुमी (सीता) का गुणानुवाद भी नहीं कर सके।

जानकीहरणम् जगतीपतेरथ सुतः प्रभुणा विपिनौकसामभि शुचो मनसः । प्रविणोदनाय दयिताविरहव्यसनातुरो वच इदं जगदे ॥६॥ - हरिराजवंशवसतौ वसुभिः परिपूर्णकन्दरदरीविवरे। जगतीधरे निपततामिह व: सरसीरुहद्युतिमुषी नयने ॥७॥ उदितो नु लङ्घनभिया पतता सततं समुन्नतवतः शिरसः । उदितो नु वीक्षितुमयं तरसा हरिणोऽस्ति नेत्युपरि कि शशिनः ।।८॥ अधिकुञ्जमस्य निपतद्धरितामनुरञ्जितः शुकमुखद्युतिभिः । खूरधूतधातुकणिकानिकरैस्तरुणायते परिणतोऽपि रविः ॥६॥ इममातपे रविमणिप्रभवज्वलनाभिदीपिततर्नु सकलम् । शशिकान्तरलविसुतैरजनी शिशिरीकरोति पयसां निकरैः ॥१०॥ प्रतिनाग इत्यवगतस्तरसा मदहस्तिहस्तहतजर्जरितः । इह तत्प्रकोपहुतभुग्यतये सलिलानि मुञ्चति यथा जलदः ॥११॥ ६. पृथ्वीपति (दशरथ) के पुत्र (राम) से, जिनका हृदय पत्नी के विरह से पीड़ित था, (उनके) मन का दुःख कम करने के लिये सुग्रीव ने ये वचन कहे । (हे राम) आप अपने इन कमलों से अधिक सुन्दर नेत्रों से हमारे इस पर्वत को देखिये जहाँ वानरों के वंश रहते हैं तथा तेज किरणों से जिसकी कन्दरायें, घाटी और विवर भरे हुए हैं। चन्द्रमा में जो यह मृग है वह क्या हमें देखने के लिये उदय हुआ है अथवा हर समय सिर ऊपर किये इसका उदय इसलिये हुआ है कि वह देखता रहे कि कहीं उछलते हुए (वानर) इसे जल्दी से लांघ तो नहीं जाते। ६. इसके (पर्वत के) कुञ्ज के ऊपर ढलता हुआ, तोते की चोंच के समान धुतिमान हरित घोड़े के सुरों से फेंके हुए धातुओं के फरण-समूह से अनुरञ्जित, सूर्य, इयते समय भी अधिक सेजस्वी हो रहा है। १०. धूप में सूर्यकान्त मणि से निकलती हुई अग्नि से तपे हुए पर्वत के सम्पूर्ण शरीर को, रात्रि, पन्द्रकान्त मरिण से निकले हुए जल के समूह से ठंडा कर देती है। ११. थेग रो लगाये हुए, गदमत हायी के मुंह के प्रहार से चोट साए प्रतिमन्दी हापी अपनी पोधाग्नि को पान्त करने के लिये, मेप के समान पस छोड़ता है।

त्रयोदशः सर्गः अवजित्य खर्ववपुषः शिखरैर्हसतीव सोऽयमितरानचलान् । स्फुटधातुलोहितदरीवदनस्थितहंसपंक्ति दशनद्युतिभिः ॥१२॥ नुतधातुपङ्किततनुद्धरणीधरणक्षमो हरिवराहरुचम्। अयमुद्वहत्यभिमुखापतिते दशनाकृतौ हिमरुचः शकले ॥१३॥ इह धातुसानुषु निपण्णदृशः शिरसि स्थितासितधनावलिपु । मृगयोपितो जहति मुग्धधियो दवकृष्णपद्धतिभयं न चिरम् ॥१४॥ अधिशृङ्गमस्य रुचिभिः स्फुरितग्रहवृन्दसक्तशिरसस्तरवः । परिफुल्लनीपतरुखण्डरुचां जनयन्ति चेतसि मदं शिखिनाम् ॥१५॥ शिखरेषु पङ्कजमणिप्रकरद्युतिरजितच्छदमृतो इह भूरिभूरुहलताततयः समये गतेऽप्यरुपपल्लवताम् ॥१६॥ अयमेप सोदकदरीवदन सुतघातुघौतकटुकावयवः । प्रविभात्यसृक्स्रवपिशङ्गितनुयुधि दानवद्विप इव प्रहतः ॥१७॥ १२. यह पर्वत अपने शिखरो की ऊंचाई से अन्य वौने पवतो को हराकर जैसे हंस रहा है । (हंसने के समय) स्वच्छ धातु से रसित इसके विवर के मुख पर बैठी हुई हंस-पंक्ति, दांत के समान शोमायमान हो रही है। १३. यह पर्वत, जिसका शरीर (गैरिकादिक) घातुनो से रञ्जित है, हरि के वराह अवतार की शोभा धारण करता है। इसके सम्मुख उदित चन्द्र खण्ड दांत के समान लगता दघते । १४. यहाँ धातुमों से भरे पहाड़ पर मांस गड़ाये मौर सिर के ऊपर काले बादलों की पंक्ति के कारण, सीधी सादी हरिसिमां दावाग्नि के काले मार्ग के भय को नहीं छोड़तीं। विशेष-धातुओं के कारण पहाड़ के अग्नि के समान चमचमाते और ऊपर धुएं के समान फाले यादलों के होने से उसे दावाग्नि समन कर बेचारी हरिगियां डरती हैं। यह भाव है। १५. इस पर्वत की चोटी पर के वृक्ष, जिनके ऊपरी भाग से संलग्न, प्रभा चमकते तारों का समूह है, (वे) पुष्पित कदम्ब वृक्ष की डाल के लोभी मयूरों के हृदय में मद का सवार करते हैं। १६. यहाँ शिखरों पर, माणिक्य के समूह को प्रभा से रजित, बहुत से वृक्षों क्या सतानों की पंक्ति, समय बीत जाने पर भी, लाल-लाल पत्तों से भरी मानूम पड़ती है। १७. जल से भरी गुफा के मुस से बहते हुए घातुपों से पुती हुई यह कुसमी गती, रुपिर के बहने से लाल, युद्ध में मारे हुए दानव-हापो के समान सगती है।

१७० जानकीहरणम् अयमर्कतापिततनुः शशिनः परिपीय सामृतकणानचलः । पुनरुद्वहत्युरुदरीवदननुतनिझरच्छलमृतः किरणान् ॥१८॥ भृशमस्य गोपतिमणिप्रभवज्वलदग्धिविपिने .शिरसि । चलनादुपाहितमसीमलिनं वहतीव शीतकिरणः करणम् ॥१६॥ मददृप्तनीलगलसंहतिभिर्हतभीतपन्नगगुणं तदितः । शिखरान्महीधरपतेररुणो रविवाहनं गमयति त्वरितम् ॥२०॥ खुतधातुलोहितममी जलदा अमितं निपीय सलिलं सरितः । अथ कल्पयन्त्यरुणकान्तिमृतः स्थिरसन्ध्यया परिगतं गगनम् ॥२१॥ परिधावतः शिखरिणः शिखरे वनदन्तिनः प्रति रिपुद्विरदम् । पवनैरसावुपहितो वदने जलदः क्षणं मुखपटो भवति ॥२२॥ गजभिन्नगैरिकरसारुणिताः सितपङ्कजैरनुगताः सरितः। नवबद्धरक्तवसनाकृतयः प्रविभान्त्यमूगिरिनितम्बगताः ॥२३॥ १८. यह सूर्य से तपाया हुमा पर्वत, चन्द्रमा के अमृतकणों को पीकर, अपनी विशाल कन्दरानों के मोहाने से बहते हुए झरनों के रूप में चन्द्र किरणो को फिर धारण करता है । १६. इसकी चोटी पर जहाँ सूर्यमणि के प्रभाव से जलती हुई प्रचण्ड अग्नि से दग्ध जङ्गल है वहां चलने के कारण, चन्द्रमा का शरीर जैसे फाजल के समान काला हो गया , २०. मदोन्मत्त नील (वानर विशेष) को गरदन से टकराने के कारण सूर्य के रथ में घोड़ों की पूंछ से संलग्न सर्प डर गये हैं, इसलिये सारथी अरुण, रथ को शीघ्र पर्वतराज के शिखर से अन्यत्र ले गया । २१. (पर्वतो से) बहते हुए गैरिकादिक धातुनों से रजित, नदियों के जल को अत्यधिक पीकर ये अरुण कान्ति धारण करने वाले बादल, थोड़ी देर तक लाल रहने वाली सन्ध्या को माकाश में बहुत देर तक लाल रखते हैं। २२. पर्वत की चोटी पर शत्रु के हाथी पर झपटते हुए वन के हाथी के मुख पर, वायु से उड़ाकर लाया गया बादल, क्षण भर के लिये उसका मुख-पट हो जाता है। २३. हाथियों से चूर्ण किये हुए, गेरू से रञ्जित मौर श्वेत कमलो से अलंकृत, ये नदियाँ पर्वत की ढलवार पर नई पहिनी हुई साल साड़ी के समान लगती हैं । विशेष लेप : नितम्यदलवान-नितम्ब त्रयोदशः सर्गः १७१ / शिखरैकभागनिरतः पवनैरुपनीयतेऽयमुदधि जलदः। अवगाहपानविधये समदः प्रविमुच्य वृक्षत इव द्विरदः ॥२४॥ रदनक्षतक्षितिधरक्षतजस्रवसन्निभैररुणिता रदिनः। कटकेपु धातुभिरिमे दधते तरुणारुणावृतपयोदरुचः ॥२॥ इति भास्वतः सुतवरे वदति न्यपतत् पयोधरपथादभितः । मधुकाननं हृतमधुप्रसभं प्रविधाय वेदितधृतिहनुमान् ॥२६॥ अशिवस्य जल्पनभियानिमृते दुहितुर्भुवो वरकपिपतौ। प्रथमं शिवं समनुवेद्य पुनः सहविस्तरं वचइदं विदधे ॥२७॥ भवदाज्ञया दिशि परेतपतेर्जनकात्मजाविचयनेऽस्य मम । तृणपणिकानि च विवर्तयतो विगता शरच्छशधराभरणा ॥२८॥ रविदग्धपक्षतियुगं विहगं प्रतिपद्य रावणगमे विदिते । मकराकरं सपदि लवयितुं मलयादगामथ महेन्द्रमगम् ॥२६॥ २४. शिखर के एक भाग में स्थित बादल को वायु, समुद्र की ओर, उड़ा कर ले जा रहा है, जैसे मत हाथी को वृक्ष से खोलकर स्नान एवं जलपान के लिये, जलाशय की ओर ले जाया जाता है। २५. ढलवान पर हाथी के दांत की चोट से उत्पन्न, पर्वत-रुधिर के समान, गैरिकादिक धातुमो से अरुणवणं हाथी, प्रातःकालीन मरुण की प्रभा से रञ्जित बादलों के समान दिखते हैं। २६. कान्तिमान, सूर्यपुत्र सुग्रीव यह कही रहे थे कि बादलो के मार्ग (आकाश) के निकट से, मधु से भरे उस जङ्गल से जबर्दस्ती मधु का अपहरण कर, धैर्यवान हनुमान कूद कर या पहुंचे। २७. कपिश्रेष्ठ (हनुमान) नृपति राम से जो पृथ्वी की पुत्री (सीता) के सम्बन्ध में कोई अमङ्गल बात सुनने के डर से सन्न थे, तब (हनुमान ने) पहिले कुशल-मङ्गल वार्ता को निवेदन कर तदनन्तर विस्तार से ये वचन बोले । २८. आपकी आज्ञा से, जनक पुत्री (सीता) को ढूंढने मैं यमराज की दिशा (दक्षिण दिशा) मे गया। वहां पर्णशालानों तक में परिभ्रमण करते, चन्द्रदेव से अलंकृत शरद् ऋतु व्यतीत हो गई। २६. सूर्य के ताप से झुलसे हुए जिनके दोनों पक्ष हैं ऐसे पक्षी (जटायु) के पास पहुँच कर और रावण के जाने का मार्ग जान कर मैं तुरन्त समुद्र को लांघने के हेतु, मलगिरि से महेन्द्रगिरि पर गया। ।

१७२ मानकीहरणम् मयिकुवंति क्रममथो चरणद्वयपीड़िताग्रशिखरः स गिरिः । स्रुतगैरिकोदकगुहावदनो वमति स्म शोणितमिव व्यथितः ॥३०॥ समरुध्यत क्रमभरोपहते चलिते नगे मम समुत्पतनात् । इतरेतराहतदलच्छिखरप्रभवेण वारिदपथो रजसा ॥३१॥ चलताचलेन तरसोपचिताः सरितो भुवि क्रमगतीविधुताः । प्रविहाय सागरजले .पतिता नभसो गुरुध्वनिहतश्रुतयः ॥३२॥ तनुजायमानवपुपं क्रमशस्तमपश्यमुत्पतितवानचलम् । क्रमलब्धपीड़ितवृहच्छिखरं प्रविशन्तमाश्विव महीमखिलम् ॥३३॥ उपविष्टकुञ्जरनिभाः पतता प्रविलोकिता दिवि मया गिरयः । तरवस्तृणैरुपमिताकृतयो हलचम्मतुल्यवपुपः सरितः ॥३४॥ ३०. उस पर्वत पर घूमते हुए मेरे दोनों चरणों से, जिसका शिसर पीड़ित हो गया था, (ऐसा वह पर्वत) व्यषित होकर अपने कन्दरा रूपी मुख से गेरुमा पानी उगलने लगा। विशेष—'यहति स्म-सम्भवतः 'वमति स्म' है। ३१. मेरे कूदने तथा चलने से वह पर्वत चलायमान हो गया और शृङ्गों के एक दूसरे से भिड़ने के कारण, चोटियों के टूटने से निकली हुई धूलि से बादलों का मार्ग रुक गया अर्थात् आकाश भर गया। ३२. पर्वत के चलायमान होने से पृथ्वी पर नदियों में बाढ़ आ गई और वे ताड़ित होकर, अपने मार्ग को छोड़, समुद्र के जल में गिर पड़ी, मोर प्राकाश में गूंजती हुई उनकी तीव्र ध्वनि से कुछ भी सुनना असम्भव हो गया। ३३ जिसका आकार क्रमशः छोटा होता जाता था, जिसके बड़े-बड़े शिखर उसके (पहाड़ के) चलायमान होने से पिड़ित हो रहे थे, उस पहाड़ को उछल कर जैसे समूचा-का-समूचा मैंने पृथ्वी में फंसते देखा। ३४. आकाश में पहुँचने पर मुझे पर्वत, बैठे हुए हाथियों के समान, वृक्ष, तिनकों को प्राकृति - के समान और नदियाँ हराई को लीक के समान शरीर वाली दिखलाई पड़ी। विशेष-पण्डित हरिदास शास्त्री द्वारा सम्पादित जानकोहरण में 'हल चर्म' पाठ है। के० धर्माराम स्थविर द्वारा सम्पादित और सिंहल भाषा में मुद्रित जानकोहरण में भी 'हल-चम्म' ही पाठ है। परन्तु यह लेखक के प्रमाद के कारण हुआ लगता है। क्योंकि 'हलचम्म' का कोई अर्थ नहीं बैठता । अतः मैंने 'हल फर्म' को ही स्वीकार करने का साहस किया है।

१७३ त्रयोदशः सर्गः विषमा महानदनदीगहनैः समतामलक्ष्यत गता वसुधा । पृथुकन्दरस्फुटवतां विततिद्धरणीमृतामवगता मसृणा ॥३५॥ अथ लङ्घने सुरसया जलधेः क्षणविधितो विहिततद्विजयः । पतितोऽहमदिशिखरे नखरक्रकचावपाटितशिलानिकरः ॥३६॥ दशकन्वरस्य भवनोपवनं प्रविचिन्वता विजटयाऽनुगता। सुचिरादलक्ष्यत मया विरहज्वलनाहुतिनृपसुता भवतः ॥३७॥ तदीयमरुणत्विषी सततचिन्तया विभ्रतं मुखेन्दुभवलोकयन् विगलदश्रुणी लोचने । कपोललुठितालकं व्रजति माईवं चेतसि क्षपाचरगणः श्रुतं सपदि शक्तमुत्प्रेक्षते ॥३८॥ विकल्परचितं स्वयं दिशि भवन्तमालोक्य सा चिरेण कृत इत्ययं स्मृतिपथे जनो निघृणः । खलु प्रजहती मुहविरचिताञ्जलिविंष्टरं करोति तव विद्विपश्चकितदृष्टिकृष्टायुघान् ॥३६॥ ३५. महानद, नदियां मोर जङ्गलों को ऊंची-नीची भूमि समतल दिसाई पड़ने लगी और वन्दरामों की पंक्ति बिलकुल चिकनी लगने लगी। ३६. तदनन्तर समुद्र लांघने में, सुरसा के क्षण भर के लिए विघ्न उपस्थित करने पर, उसको पराजित कर, गिलामो के समूह को मारे के समान नसों से पीर फर पर्वत के ऊपर पहुँच गया । ३७. रावण के महल के उपवन में ढूंढ़ता हुमा मैंने बिजटा (एक राक्षसी) साप, राज- पुत्री (सीता) को, जो यहत दिनों से, भापकी विरहाग्नि में माहुत्ति के समान थी, देसा। ३८. निरन्तर चिन्ता के कारण जिसका पारीर ताम्रपत हो गया था, जिसके नेत्रों से मांगू गिर रहे थे, मोर जिसके केरा विरार कर कपोलों पर मा गये थे, ऐमी सीता के मुरा- पन्द्र को देप, विस में दुगी होकर निशाचरों के समूह ने, पराम्पूर्ण पन्द्र की उपेक्षा दी। टिप्परपी -रल-फत टुकड़ा-असम्पूर्ण । पोलों पर फेलों के गिरने और आंगुभों के पहने से सीता पा मुगपट असम्पूर्ण चन्द्र पा। यह भाव है। ३६. उग सीने पापो प्रपती पत्पना रो दिमागों में देग कर यह विचार पिया किग मलो पुरष (राम) ने इतने दिनों बार याद किया । राधम मोग उसे (मीको) बार-बार माग्न घोर माशल होते देग, परित होकर, पानुष गौच से है। टिपरी-गोता, राम को सपना में दो है और भागन छोड़ पसाबति होर पार-बारउठ पाहोहो है मो परोपर गागारित होर तमरार गांव के हैं।

जानकीहरणम भविष्यति पुनस्तव प्रियसमागमात् सम्मदं शुचं परमचिन्तया हतरतिः स्म मैवं गमः । इतीव रशनागुणः पतति पादयोनिस्वनन् विहाय तव योपित. प्रतिपदं नितम्बस्थलीम् ॥४०॥ प्रयाति विरहाहितस्मरहुताशनेन व्यथा- मिहोपरचितस्थितिः प्रियतमः पुरा तप्यते । इतीव हृदयं चिरस्तिमितलोचनान्तच्युतै- स्तनोति नयनाम्बुभिः श्वसितभिन्नधाराकणैः ॥४१॥ तुम्हारे प्रिय (राम) से फिर तुम्हारा हपंपूर्वक समागम होगा। तुम परम चिन्ता के कारण उदास होकर हेच मत करो, इस प्रकार जैसे झनझनाता हुआ तुम्हारी पत्नी की मेखला प्रतिपद पर उसके नितम्ब स्थल से सरक कर उसके चरणों पर गिरती टिप्परपी 1-राम के वियोग से सोता कृशांगी हो गई है । उसके नितम्ब दुबले पड़ गये हैं। अतः जब वह चलती है तो मेखला नितम्ब से सरफ कर खनखनाती हुई उसके पैरों पर गिर पड़ती है। मानो यह कह रही हो कि फिर तुम्हारा राम से समागम होगा। सोच मत करो, यह भाव है। (२), व्याकरण के अनुसार 'सम्मद' : होना चाहिये तभी श्लोक के अन्यय करने में 'सम्मदः' ठीक बैठता है ४१. "मेरा प्रियतम (राम) मेरे हृदय में पहिले से बैठा हुआ विरह के कारण, कामदेव से जनित, अग्नि में तप रहा है" यह समझ कर (सीता) बहुत देर से मुंदी हुई प्रांखों से गिरते हुए आंसुओं से, जिनका प्रवाह उसके उभर-उभर कर सांस लेने से जर्जर-कण हो हो गया है, हृदय को सींचती रहती है । टिप्परपी-इसी भाव को निम्नलिखित श्लोक में देखिये-- अंगानि मे दहतु, कान्त वियोग वह्निः संरक्ष्यतां प्रियतमो हृदि वर्तते यः । इत्याशया शिमुखी गलवश्रवारि धाराभिरुष्णमभिसिञ्चति हृत्प्रदेशम्॥

त्रयोदशः सर्गः १७५ इति व्यथितचेतसं समनुनीय पृथ्वीसुतां धृतोच्छिखशिखामणिमणितपूरिताशामुखान् । निहत्य तव विद्विपो गगनमुत्पतन् भोगिभि- नियम्य हरिवैरिणा हुतभुजाहमादीपितः ॥४२॥ सतैलपटवेष्टिता चटचटं स्फुटन्ती मृशं ममावयवमञ्जरी क्षणमदाहि सख्या गुरोः । समीरणरणच्छिखापटलपातपीतामृजा स्वकर्मनिरते जने नहि भृशायते सङ्गतम् । ४३॥ ४२. इस प्रकार व्यथितहृदया, पृथ्वीसुता (सीता) को आश्वासन देकर, मैं उसकी दी हुई चूड़ामरिण को हाथ में लेकर आकाश में उछल कर पहुँच गया। वहां राक्षसों को जो चिल्लाने से दिशानों को ध्वनित कर रहे थे मार कर मैं मेघनाद द्वारा नाग पाश मे बांधा गया और मुझे माग लगा दी गई। विशेष-देखिये रामचरितमानसः समपनीय जनक सुतहि समुताई करि बहु विधि धीरज दोन्ह । (२) 'तोच्छिषमणि' चूड़ामनि उतार तव दया ( ३ ) 'भोगिभिः नियम्य' नागपास बांधेसि ले गए। वाल्मीकि के अनुसार हनुमान जी ब्रह्मास्त्र से बांधे गये थे- "तेन बद्धस्ततोस्प्रेण राक्षसेन स वानरः।" ४३. पिता (पवमान-पवन) के सरना (मग्नि), ने तेल से भिगोये हुए कपड़ों से लपेटी हुई मेरी पूंछ में, जो-फुरफुराती हुई, भयङ्कर रूप से चट-चटा रही थी और जिससे बहते हुए रुधिर को, वायु से प्रेरित पोर ध्वनि करती हुई पग्नि-शिखायें पी रही थीं-क्षरण मर में भाग लगा दी। जब लोग एक साथ मिलकर लगन से काम करते हैं तो ह्रास नही होता अर्थात् कार्य सिद्धि में देर नहीं लगती। विशेप-देखिये रामचरितमानस : "कवि को ममता पूंछ पर सहि कहाँ समुप्ताइ । तेल बोरि पट बांधि पुनि पायक देहु लगाइ।। वाल्मीकि : फपीना फिल लांगूलमिष्टं भवति भूषणम्। सदस्य दीप्यतां शीघ्रं तेन दम्पन गच्छतु ।। नी-1 १७६ जानकोहराम स्फुलिङ्गहतनिस्वनावतिवृद्धरक्षोद्यत- क्षपाचरकुलाकुलं क्षुभितभीतगुञ्जदगजम्। गृहव्यपहताहितप्रचुररलरथ्यान्तरं मया वियति वलाता मुहुरकारि धाम द्विपाम् ॥४४॥ इतीरितमथापदाममृतबिन्दुनिष्यन्दि तन- निशम्य शमनं परं वचनमुन्नतस्तेजसा । जगाम सहसेनया नृपसुतः पयोधेस्तटं तटाचलगुहाहतप्रहितवारिवृद्धध्वनिम् ॥४५॥ जलधिरिषुणा भिन्नस्तस्मिन् महाय महीयसि प्रथितमहसि प्रेमाकृष्टो विभीश्च विभीषणः । भुवनमहितो मादायां स्थितेरनतिक्रमा- ज्जनितयशसो गाम्भीर्येण त्वरितमुपेयतुः ॥४६॥ इति त्रयोदशः सर्गः। ४४. लेलिहान ज्वाला-सम्भार के भयङ्कर शब्द से घबराया हुआ, युवति एवं वृद्ध राक्षसों का कुल, उठ खड़ा हुमा । भय से क्षुब्ध होकर हाथी चिग्घाड़ने लगे और नागरिकों ने घरों के भीतर से खींच-खींच कर, सड़क के मध्य भाग में प्रचुर रत्नों का ठेर लगा दिया। मैंने पाकाश में घूम-घूम कर राक्षसों के धाम (लद्धा) को बार-बार इस हालत पर पहुंचा दिया। ४५. इस प्रकार उन्नत तेजस्वी, हनुमान से, अमृत विन्दु के समान रसीले, आपत्तियों को पूर्ण रीति से शमन करने वाले वचन को सुनकर, राजपुत्र (राम), समुद्र के तट पर जो किनारे पर स्थिति पर्वतों की गुफानों से टकराते हुए जल के नाद से ध्वनित था, सेना सहित गये। ४६. बाण चलाने के कारण जिसकी प्रकृति बदल गई थी वह, भयभीत समुद्र, अपने कल्याण के लिये, और विभीपण (राम के) प्रेम से प्राकृष्ट होकर, दोनों महान् प्रारमा राम के पास आये, जो संसार में पूजित थे और जो गाम्भीर्य के लिये और जो मर्यादा के न उल्लंघन करने से जनित यश के लिये विख्यात थे। टिप्परपी-'भिन्नः' जिसका स्वभाव भिन्न हो गया था। देखिये रामचरित मानस : "विप्र रूप आएउ तजि माना॥ तेरहयां सर्ग समाप्त ।

अथ चतुर्दश: सर्ग: अथ नृपोऽनुमतेन पयोनिधेर्नयधनैरभिमन्त्र्य हरीश्वरैः । सपदि सेतुविधौ विधिकोविदं नलमयोजयजितविक्रमम् ॥१॥ नृहरिणा हरिणाधिपगामिना स्थितिभुजाऽतिभुजा गिरिदारणे। कृतरसा तरसा कपिसंहतिहनुमताऽनुमता सहनिर्ययौ ।।२।। तलगतं श्रमवारि करद्वयक्षतशिलानिकरस्य रजकणैः । समवधूय विधाय विधातरि प्रकृतिसिद्धिसुखाय नमस्क्रियाम् ॥३॥ रचितगज्जितमूरुमुरु दृढं समभिहत्य करेण सज्जितम् । कटिं कठिनायतैविपुलपुच्छगुणैरकृतान्तरम् ॥४॥ बलविशेषपरीक्षणकारणं नद नदीशतनादिमहीमृतः। समभिहत्य तट रटनस्फुटस्फुटितशीणशिलानिकरं करैः ॥५॥ तदनन्तर नृप (राम) ने, नीति के जानने वाले कपीश्वरों से मत्रणा कर, उनकी सलाह के अनुसार, कार्य प्रणाली को जानने वाले, समृद्धिशाली, मल को तुरन्त सेतु बांधने के लिये नियुक्त किया। पटु नियम्य १. . २. सिंहगामी, नरसिंह (राम) से प्रोत्साहित होकर, पहाड़ के तोड़ने में कर्तव्य परायण भुजाओं वाले वानरों का समूह, जिनकी भुजानों में उत्कर्ष भरा था, मनुमति पाकर हनुमान के साय चल पड़ा। ३. दोनो हाथों से तोड़े हुए शिला-समूह के कणों से तलुये के पसीने को पोंछ कर मौर विधाता को स्वाभाविक सिद्धि के सुख के हेतु नमस्कार कर, गरजते अपनी दृढ़ जंघा पर, हाप से ताल ठोंक कर ध्वनि उत्पन्न करते हुए मौर अपनी कड़ी एवं लम्बी-चौड़ी पूंछ को रस्सी से, यही कुशलता से कमर को बांध, उसके मध्य भाग को मिटाते हुए, ५. सैकड़ों नद और नदियों से निनादित पहाड़ों पर, जो उनके दल के परीक्षण के कारण हो गये थे, तया शिलामों के समूह पर, जो किलकारी मार कर टूकन्ट्रक कर दिया गया पा, होपों से मापात कर, २३ जानकीहरणम् समवितानितहूंकृति वानरेविनमितस्य ररास महीमृतः । विपुलमूलविकम्पनकम्पिता, , विनमदुन्नमदंशधरा धरा ॥६॥ अथ विपाटय नदीचरं चिरं दधतमनचलताभवनं वनम् । अमृत नित्यातेरसुतः सुतः प्रियतमो भुजवन्धनगं नगम् ॥७॥ ग्रगणः शिरसा दिशि पातितश्चलितमूलधुतं सरसातलम् । अवनिमण्डलमाशु जगत्त्रयम् मथितमुद्धरणे धरणीधरैः ॥८॥ निकटभूधरपातरटत्तटस्फुटनसञ्जनितो गिरिनिस्वनः । वधिरतामनयद बलवद् बलध्वनितसंवलितो वलयं दिशाम् ॥६॥ स्वनवता नवताड़ितभूरुहा सगवयागवयाः शिरसा मुहुः । द्विपतता पतता गिरिमेखला शकलिता कलितापजलाशया ॥१०॥ कपिभुजस्फुटपिष्टरवत्तटो विनमितः परिरभ्य महागिरिः । चलितधातुजलं विवराननादुदवमत्स्त्रवमुग्रमिवासृजः ॥११॥ वानरों के एक साथ हुंकार कर जोर लगाने से झुकाये हुए पहाड़ की विशाल नौंव के हिलने से कम्मित पृथ्वी ने, जो ऊपर नीने होते अंशों को सम्हाले थी, (चर-चरा कर) तीव्र ध्वनि किया। पवन के प्रिय पुत्र, निस्सन्तान हनुमान ने, सौ के भुज-बन्ध से युक्त, मोर नदियों से शोभायमान, पर्वत को देर तक चीर कर, लता-मण्डपों से भरे वन को उठा लिया। ८. उठाये जाने के समय, सिर (को टक्कर) से दिशा में, नक्षत्रो के समूह को बिखेरते हुए, जड़ से हिल जाने के कारण कम्पायमान रसातल, पृथ्वी मण्डल एवं तीनों जगत को पर्वतों ने तुरन्त मथ डाला। निकटस्थ पहाड़ के गिरने के कारण, इस पर्वत के तट के टूट जाने से जनित, घोर शब्द ने दिशाओं के मण्डल को शब्दायमान करते हुए कानों को बधिर कर दिया। १०. जिसमें ध्वनि करते हुए, नये गिराये हुए वृक्ष हैं। जिसमें नर और मादा नीलगाय हैं। जिसमें कल-कल करते हुए जल से भरे सरोवर हैं, जहां हाथियों की पंक्ति सिर के बल गिर रही है, ऐसा पर्वत का ढलवान टुकड़े-टुकड़े कर दिया गया। ११. उस विशाल पर्वत को, जिसके तट, कपि (हनुमान) की भुजा से तोड़े जाने से चूर-चूर हो गये थे, जिसके गुफा रूपी मुख से बहता हुप्रा (गैरिकादिक) धातुओं का जल, के उग्र साव के समान उद्वमित हो रहा था, (ऐसे पर्वत को) लपेट कर झुका दिया । a रुधिर चतुर्दशः सर्गः फणिनि मूलमधः परिकर्पति प्रसभमुत्क्षिपति प्लवगे शिरः । गुरुरवं दिशि भैरवमुत्सृजन्नुपतटं त्रुटति स्म घराघरः ॥१२॥ विनमितस्य करेण महाहरेः क्षितिभृतो गुरुमूलतलोपलः । समुदियाय सपत्तनकाननं पटु विपाट्य भुवस्तलमन्यतः ॥१३॥ क्षितिघरे चितरेचितनिझरे रुतमतन्वति तन्वति कम्पिते । सपदि गौ रवगौरवसंहिता मृशमकम्पत कम्पतदाकुला ॥१४॥ समुपगुड़तटो हरिणा दृढं गिरिरुदारदरीमुखतो रसन् । रसनमुग्नमिवाजगरं निजं क्षणमलम्बयदद्धविनिर्गतम् ॥१५॥ अहिकुलं ददृशे मणिभास्वति क्षितिघरोद्धृतिरन्ध्ररसातले । सरुधिरत्रणगर्भविभावितं विपुलमन्त्रमिव स्फुरितं भुवः ॥१६॥ घनरसातलपङ्कवृतोपलश्रितवृहत्तनवो विललम्बिरे। चपलमूलशिखा इव भोगिनः क्षणमुदस्य धृतस्य महीभृतः ॥१७॥ १२. वह पर्वत जिसके मूल को शेषनाय नीचे खींचते और कपि (हनुमान) सिर को झटक कर ऊपर खीचते थे, दिशाओं में भयङ्कर नाद का विस्तार करता हुआ तट के निकट टूट गया। १३. (एक ओर) महावीर कपि को मुजा से मुकाये जाने पर, उस पर्वत की नींव की भारी चट्टान, (दूसरी मोर) आस-पास के नगरों के सहित उस वन को बड़ी सफाई से पीर कर पृथ्वी के नीचे से ऊपर पागई। १४. पर्वत पर, हिल्लोर मारते हुए झरनों की ध्वनि के विस्तार के कारण, कम्प से व्याकुल, पृथ्वी, सहसा अत्यन्त कांपने लगी। १५. कपि (हनुमान) ने जिसके तट को दृढ़ता से छाप लिया था, ऐसे गरजते हुए पर्वत ने, अपने विशाल गुफा रूपी मुख से, क्षण भर में, लम्बी जीम के समान, मापा बाहर निकाले हुए अजगर को लटका दिया । १६. पहाड़ के उखड़ने के कारण, रसातल के विवरों के ऊपर सिंच माने से, वहाँ के रहने वाले सों का समूह, जो रुधिर से सने हुए घाव के गढ़ों से भरा था, पृथ्वी की लम्बी पांत के समान चमकता हुमा दिखलाई पड़ा। १७. रसातल के घने कीचड़ में सने हुए चट्टानों पर अधिष्ठिन वृहदाकार पर्वत, सोच कर पकड़े हुए सों की चयल पूंछ के समान लटक रहे थे। .

१८० जानकीहरयम घनमिते नमिते गिरिसञ्चये वरवयोरवयोगशुभद्रुमे । जुतदकं तदकम्पत मण्डलं कृतरुतं तरुतन्त्रधरं भुवः ॥१८॥ स्फुरितपङ्कजरागमणित्विपि व्यपहताचलधामनि भैरवा । मशिरलक्ष्यत रत्नचिता क्षितेहंदयमांसमिवासृजि संप्लुतम् ॥१६॥ अगमयन्निवदुर्द्धरविग्रहाः शिखरिणः कपिसैन्यसमुद्धृताः । स्वपरिणाहनिराकृतमम्बरं निजसमुद्धृतिरन्ध्ररसातलम् ॥२०॥ द्रुततरं ततरन्ध्रशताननैर्ध्वनिकरं निकरं घरणीभृताम् । गुरुतरं रुतरङ्कमृगं घृतद्रुमधुरं मधुरं शिखिवल्गितैः ॥२१॥ रवितुरङ्गखुराहतमस्तकं ध्वनिकृतः परिगृह्य वनौकसः । पदभरेण ययुस्तटमम्बुधेविनमितोन्नमितक्षितिमण्डलम् ॥२२॥ नियतमेष पयोधिमगाधिपः पिबति सर्वमसङ्घय गुहामुखैः । इति चिराय सविस्मयमीक्षितो नृपसुतेन समीरणनन्दनः ॥२३॥ १८. जिसमें अनगिनती, गिरे हुए पर्वतों का समूह था, जो वेहद घने वृक्षों के समुदाय को धारण करता था, जो गौरेया पक्षी के चहचहाने से शोभायमान था, ऐसा पृथ्वीमण्डल वेदना से कांपने लगा। १६. चमकते हुए पद्मराग मरिण की प्रभा से युक्त, उखाड़े हुए पर्वत के तल की भूमि, भयङ्कर स्याही के समान दिखलाई पड़ी, जैसे वह रत्नो से जड़ी पृथ्वी के हृदय का, रुधिर से सना हुमा मांस हो । विषेश-मशिनमसि स्याही । देखिये परिशिष्ट-असाधारण शब्द और उनके अर्थ । २०. वानर सेना उखाड़े हुए, भयङ्कर प्राकार वाले पर्वत, अपनी विशदता से प्राकारा को तिरस्कृत करने वाले, और जिसके विवर 'खुल गये थे, रसातल में जाते हुए लगते थे। २१. सैकड़ों विस्तृत गुफाओं रूपी मुख से, घोर नाद करने वाले पर्वत समूह को, जहाँ रङ्ग (पहाड़ी) मृग चिल्ला रहे थे और जहां वृक्षों की धुरी पर सुन्दर मयूर नाच रहे थे। २२. सूर्य के घोड़ों के खुरों से जिसका मस्तक माहत था, ऐसे पृथ्वीमण्डल को पकड़ कर, उसे झुकाता और उछालता वह वानर (हनुमान) गर्जता हुमा समुद्र तट पर आ गया । २३. यह पर्वत अपने असंख्य गुफा रूपी मुखों से सागर को पी जायगा, यह विचार कर राजपुत्र (राम) विस्मय के साथ, बहुत देर तक हनुमान की ओर देखते रहे।

चतुर्दशः सर्गः १८१ अथ ससर्ज स सर्जवनाकुलं धुतिमदभ्रमदभ्रमदद्विपम् । भयसरोगसरोगतपन्नगं पथि धनस्य घनस्यदनादिनम् ॥२४॥ तटयुगाततवारिदपक्षतिगुरुदरीमुखलम्बितपन्नगः । अनुचकार पतत्पतिमुत्पतन् फणधरोद्धरणे धरणीधरः ॥२५॥ क्षितिमृताऽभिहतादथ वारिधेःसमुदिताऽभिविहत्य विरोचनम् । अकृतमीनकुला कुलितान्तरा गुरुपयस्समितिर्जमितिध्वनिम् ॥२६॥ अभिहतो गिरिणा बड़वानलप्रबलरोषधरो जलधिद्विपः । रचयति स्म सुवेलमहातरौ नियमितस्थित एव गतागतम् ॥२७॥ उपलसङ्कटकैः कटकैस्तताः कपिवलेन नगा न न गात्रगाः । पथि रवेरवितारविताण्डजाः कृतरवं समुदा समुदासिरे ॥२८॥ प्रविदधुगिरिभङ्गसमुत्पतद्विविधधातुरजांसि मरुत्पथम्। सपदि चित्ररुचं घुणविक्षतत्रिदशचापकणा इव विच्युताः ॥२६॥ २४. तब उसने (हनुमान ने) चमकते हुए प्रावतं (भंवर) से युक्त समुद्र के, चिग्घाड़ते हुए मतवाले हाथी के समान, भय से पीड़ित करने वाले और तपते हुए पर्वत को, यड़े वेग से मेघों के मार्ग में (अर्थात् आकारा में) फेंका । २५. वह पर्वत जिसके दोनों तट पर बादलो की पंक्ति थी और जिसके विशाल गुफा रूपी मुख से सपं लटक रहा था ऐसा लगता था जैसे सर्पो को खीच कर निकालने के लिये झपटता हुमा पक्षिराज (गरुड़) हो। २६. इसके बाद पर्वत से प्रताड़ित एक विशाल जल-राशि सूर्य से टकराती हुई समुद्र से ऊपर की ओर उठी। उसने जल के भीतर मीन-कुल को पाकुल कर दिया और सम् सम् की घोर ध्वनि की। २७. बड़वानल के भयङ्कर क्रोध वाले समुद्र रूप हाथी ने पर्वत से पिटने पर सुवेल पर्वत के विशाल वृक्ष के निकट ही अपने आने-जाने (घूमने) की व्यवस्था कर ली। टिप्पणी--सुपेललंका का त्रिकूल पर्वत । २८. उस पहाड़ की, विशाल चट्टानों से भरी बढ़ाइयां कपि-सेना से भर गई थी। वे सब पर्वत के शरीर ही पर थे। मार्ग में सूर्य से रक्षित, चह-बहाने वाले पक्षी, प्रसन्न होकर कलरव करते हुए वहाँ (उस पर्वत) पर मा बैठे। २६. पर्वत के टूटने से उड़ी हुई, दो प्रकार के पातुमों की रंगीन धूलि ने, देवतामों के मार्ग को अवस्ट कर दिया और तुरन्त उसे रञ्जित कर वह, घुन से माये हुए इन्द्रधनुष से झरे हुए करण के समान गिरने लगी।

जानकीहरणम हतसमुत्पतितोदकसन्ततिस्फटिकदण्डयुगं क्षणमावभौ। किरणमौक्तिकजालवृतं सदा सकलचन्द्रसिता तपवारणम् ॥३०॥ . प्रथममुद्गतवारिततिः पतदिगरितटाहतकोटिरुदन्वतः। क्षणमरोचत वृष्टिषु बिभ्रतो भुज इवाद्रिवरं मुरविद्विपः ॥३१॥ हुतकपोतकपोतगलच्छविः परिततान तता नगसम्प्लवे । द्रुतवितानवितानमभिस्फुटत्तटपरागपरागततिर्नभः ॥३२॥ पतितशैलगुहाशतपूरणे रजतशैलनिभो जलबुद्धदः। जलनिमग्नसुरद्विपपुष्करश्वसितसृष्ट इवाम्बुनि इवाम्बुनि पप्रथे ॥३३॥ ३०. टक्कर खा कर गिरती हुई जल की धारा, जो स्फटिक के डंडे के समान लगती थी, उससे संलग्न, किरणों के मोती की झालर से परिवेष्टित, पूर्णचन्द्र, श्वेत-छत्र के समान क्षण भर में शोभायमान हुमा । विशेष-'स्फटिक दण्ड युग' पाठ अशुद्ध लगता है, 'स्फटिक दण्ड युतं' अधिक ठीक बैठता है। एक पूर्ण चन्द्र है तो छत्र के लिये एक ही डंडा होना चाहिये। ३१. समुद्र से उछलता हा वारि-समूह, जो गिरने के रामय पर्वत के तटों पर टकरा रहा था, क्षण भर के लिये ऐसा दिखलाई पड़ा मानो मुर राक्षस के शत्रु कृष्ण की पर्वत- श्रेष्ठ (गोवर्धन) को उठाती हुई भुना हो। ३२. पर्वत के जल में डूबने के समय, कबूतर के कपोत-वर्ण गर्दन के समान कान्ति बाली, पर्वत तटों पर प्रकाशमान, राग-रहित पुष्परज का ढेर, द्रुतगामी पशि-समूह रूपी मण्डल युक्त प्राकाश में फैल गई। टिप्पणी 1-परागपराग=अपराग+पराग । "वष्टि भागरिरहलोपमवाप्योरुपसर्गयोः । अपं चंव हलन्तानां यथा वाचानिशा दिशा।" भागरि के अनुसार 'अप' उपसर्ग का 'अ' लुप्त हो जाता है। ३३. गिरे हुए पर्वतों के सैकड़ों गुफामों के झरनो से, चांदी के समान चमचमाता, जल-बुद- बुद ऐसा फैला जैसे वह जल मे निमग्न, देवतागो के हाथी के सूंड के निश्वास से उत्पन्न हुमा हो।

चतुर्दशः सर्गः १८३ प्रचलतुङ्गतरङ्गदलान्तरस्फुरितविद्रुमकेसरसम्पदि । क्षुभितसिन्धुसरोरुहि कणिकावपुरुवाह पतन् कनकाचलः ॥३४॥ कपिधुताचलधातसमुत्पतज्जलधिखण्डनिरस्तनिपातितः । भुवि विवेष्टनपिष्टगिरिद्रुमः पृथुतनुः स्फुरतिस्म तिमिङ्गिलः ॥३५॥ असमकं समकम्पत वारिधेःस्वरचिता रचिता ततिरूमिभिः । अहितताहिततालकृतध्वनिवलियनी लयिनीव भुजावली ॥३६॥ विससृपुः सितशङ्खविभक्तयः सलिलवेगधुताः परितस्तटम् । शिखरिणाभिहतस्य पयोनिविदलितास्थिलवा इव भूरिशः ॥३७॥ गिरिहताभितो मकराकरस्तटभुवं परिलङ्घय कटु कणन् । अपससर्प नगोद्धरणाहितप्रकटरन्ध्रनिपीततनूकृतः ॥३८॥ ३४. चञ्चल एवं उत्तुङ्ग तरङ्गों के समूह के गर्भ मे देदीप्यमान, विद्रुम के पुष्प-पराग से विभूषित, और कमल से भरे क्षुब्ध समुद्र में गिरने पर वह सुवर्ग-पर्वत, कर्ण कुंडल की प्राकृति धारण करने लगा। विषेश सागर में कमल नहीं होता। परन्तु यह कवि समय-स्थापना के नियमानुसार कहा जाता है। राजशेखर 'काव्य मीमांसा,' में कहते हैं : "तत्र सामान्य स्याऽसतो निबन्धनं यथा नदीप पद्मोत्पलादीनि, जलासय मात्रेऽपि हंसादयो, यत्र तत्र पर्वते सुवर्ण रत्नादिकं च।" जाति गत अर्थ में असत् के दो उदाहरण हैं। जैसे नदियों में कमल आदि जलाशयों में हंस आदि, सब पर्वतों में रत्न आदि, ये सब असत् हैं पर समयानुसार, उनका वर्णन आवश्यक होता है। ३५. हनुमान के टफार मारने से, समुद्र में पर्वत के गिरने के कारण, समुद्र के उस भाग से उछाल कर फेंका हुमा, तिमिङ्गिल ( भीमकाय मत्स्य ) पर्वत के वृक्ष को धाप कर पीसता हुमा, पृथ्वी पर धरनेि लगा। ३६. समुद्र की लहरों की झनझनाती हुई राशि, श्रीकृष्ण की, वालयुक्त ध्वनि वाली (जिसमें ताल का निर्वाह था) कङ्कण सहित भुजावली के समान ऊपर-नीच कांप रही थी। टिप्पणी-अहि-कालिय+ तत-फण+अहितशत्र-श्रीकृष्ण ३७. जल के वेग तट पर चारों मोर फेके हुए, श्वेत-शंख के खण्ड, ऐसे लगते ये जैसे पर्वत के मापात से टूटी हुई, समुद्र की हड्डी के बहुत से टुकड़े, दिखरे हों। ३८. पर्वत की चोट से क्षुब्ध, वह समुद्र कटुवनि करता हुमा, तट की भूमि को लांघ कर, पर्वत के उसड़ने से जनित, गड़े के बहुत सा पानी पी जाने के कारण, दुवला होकर (पीछे लोट माया)। विशेष -समुद्र में पर्वत के गिरने से उसका जल बढ़ा और वह तट को लांघगया । परन्तु पर्वत के उसड़ने से इतना बड़ा गड्दा हो गया कि उसमें रहत-सा मत समा गया और समुद्र डोटा हो गया। यह भाव है।

१८४ जानकीहरणम् उदपतत्कपिघूर्णमहीधराभितभिन्नमहार्णवकन्ततिः । निहतये नु विरोचनतेजसः शशिनि लक्ष्म नु माष्टुंमसङ्गिनी ॥३६॥ क्षितिधराहतदूरसमुत्प्लुतप्रवलवारिरयेण निपातितः। तटवनानि ददाह महोरगस्तनुभरेण रुजन् विपवह्निना ॥४०॥ अधिपयोधि नभश्चरसंहतिनंभसि मीनततिर्भुवि तद्वयम् । इति जगलितप कपिभिः क्षणाद्विवशजङ्गमवृत्तिविमिश्रितम् ॥४१॥ उपनिषेदुरदृष्टतटद्वयं नभसि दीर्घपरिभ्रमणातुराः । सलिलवेगवशेन परिभ्रमन्महिषश्रृङ्गवनेषु शिखण्डिनः ॥४२॥ मकरकृत्तकरस्य करश्रियं प्रतरतो रदिनः पुनरादधौ । क्षतजगन्धहतः सरसत्रणासनगृधुरहिस्तनुसम्पदा ॥४३॥ ३६. हनुमान के कूदने से चकर खाये हुए पर्वत री क्षुब्ध, सागर की भिन्न की हुई लहरें, क्या अग्नि (वाड़वाग्नि) का शमन करने के लिये है अथवा समुद्र से विरक्त होकर चन्द्रमा के लाञ्छन का प्रक्षालन करने के लिये है। ४०. पर्वत से आहत होने पर, दूर तक प्रसारित, प्रचण्ड वायु के वेग से गिरे हुए, विशाल अजगर ने, अपने शरीर के भार से तट से संलग्न वन को ट्रक-ट्रक करते हुए, उसे अपने विष के अग्नि से जला डाला। ४१. (जब इतना उथल-पुथल हुआ) तव समुद्र के ऊपर पक्षियों का समूह, आकाश में मछलियों का समूह, और भूमि पर पक्षिगण और मछलियां दोनों फैल गई। इस प्रकार तीनों जगत, बन्दरों की करतूत से ऐसे हो गये जैसे सब जीवों का रहन-सहन उलट- पुलट गया हो। ४२. बहुत देर से आकाश में उड़ने के लिये आतुर, मयूरों का समूह, दोनों तटो को न देख कर, जल के वेग के कारण मुंड के झुंड धूमते हुए भैसों के सौगों पर बैठ गये, जो सीग के जंगलों जैसे दीख रहे थे। ४३. घड़ियाल से काटे हुए (जल में) उतराते हुए हाथी के सूंड़ के समान वह जल-सर्प, अपनी शरीर-सम्पत्ति से चमचमाता हुआ दिखलाई पड़ा। और चुटहिल हाथी के बहते हुए रुधिर की गध से प्राकृष्ट होकर, उसको चाटने की इच्छा से वह सर्प हाथी की मोर बड़ा।

चतुर्दशः सर्गः निनदता नदताड़ितमेखलं विगलताऽगलतावृतसानुना। असुभुजा सुभुजाऽसुरसंहतिः प्रविदिता विदिता दिशि भूभृता ॥४४॥ अथ निरीक्ष्य चिरं हरिचेष्टितं सपदि वन्ध्यमवन्ध्यपराक्रमः । इदमुवाच गभीरतया जितक्षुभितसिन्धुरवं नृवरो वचः ॥४५॥ इह गिलन्ति तिमिङ्गिलपङ्क्तयः क्षुभितसम्पतितास्तिमिशङ्कया। सलिलधौ तिमितं तिमितं नगं त्यजत सेतुविधानमनोरथम् ॥४६॥ गिरिकुलानि कुलानि संमोरणक्षुभितरङ्गितरङ्गिजलोच्चयम् । शरभवन्ति भवन्ति न किञ्चन द्विपहितानि हितानि महोदधिम् ॥४७॥ अयमुपाहितसेतुरकम्पितस्थितमहातिमिदेहमहीधरैः । बलमिदं सकलं शरताड़ितो नयतु वारिधिरेव परं तटम् ॥४८॥ मकर दन्तिगतो नृपलीलया जलधिमुत्तरतु प्लवगेश्वरः । भुजगसैन्यवृतः स्फुटविद्रुमद्रुमवनं रदनेन विभञ्जयन् ॥४६॥ ४४. ध्वनि करते हुए नद जिसके ढलवान पर टक्कर मार रहे थे, जिसके शृङ्गों के ऊपर की समतल भूमि वृक्षों और लताओं से भरी थी और जिनसे पानी निरन्तर बह रहा था, ऐसे पर्वत के सामने उन असुरों के समूह जो अपनी सुन्दर भुजामों के लिये दिशाओं में प्रख्यात था। ४५. तदनन्तर, हनुमान ने जो कुछ उद्योग किया था उसे देर तक सोच-विचार कर, नरश्रेष्ठ रामचन्द्र, जिनके पराक्रम को कोई बांध नही सकता था (मर्थात् असीम था), गम्भीरता मे क्षुब्ध समुद्र के गर्जन को जीतने वाले वचन वोले । ४६. यहां गिरकर क्षुब्ध और थर्राती हुई तिमिङ्गि की पंक्ति ने, समुद्र में सेतु बांधने के लिये फेंके हुए, निश्चल और तिमि के समान भारी-भरकम पहाड़ को तिमि को पड़ा से निगल कर बाद में उगल दिया। टिप्पणी-तिमि भीमकाय मत्स्य। तिमिगंल=तिमि से अधिक भीमकाय मत्स्य जो तिमि को भी निगल जाता है। ४७. प्रचण्ड मांधी के कारण जिसमें क्षुम्प एवं लहराती हुई उत्ताल तरतें उठ रही हों, ऐसे समुद्र के हाथियो को प्रिय पर्वतो की पंक्ति एवं पारभों की कोई गणना न रह गई। मर्थात उनसे भी अधिक वे ऊँची और भयङ्कर थीं। ४८. (राम ने कहा) बाणों से पीड़ित समुद्र के उस तट पर तिमिलिल के समान भीमकाय पर्वतों से बांधे हुए सेतु के द्वारा इस समस्त सेना को ले जाया जाय । ४६. पड़ियाल मौर हापी का रूप धर कर, सौ की सेना के सहित, विद्रुम के वृक्षों के यन को दांत से तोड़ते हुए वानरों के स्वामी (हनुमान) समुद्र के पार जोय १८६ जानकीहरणम् मदितरोऽदितरोपधरैरणक्षमकरैमकरैगजसन्निभैः । तरति को रतिकोपवृतासुरं ध्रुवदकं वद कम्पतिमाकुलम् ॥५०॥ इति गिरा चलितो पढ़कीलनध्वनितकम्पितदिग्विदिशो नलः । मलयकुलदरीषु महीमृतः पृथुरुतः प्रथमं समवेशयत् ॥५१॥ हरिवरः क्रमशो गिरिसंक्रमं दृढ़समर्पितमूलनिवन्धनम् । सपदि बद्धमभेदनमम्बुधौ शिखरिणां निकरैरुपचक्रमे ॥५२॥ तटसमर्पितमूलनिवन्धनः पृथुधराधरसेतुरकम्पनः । जलनिधी मलयस्य महीभृतः प्रसरदकुरवद् ववृधे शनैः ॥५३॥ अभिहतो गिरिणा रवभैरवः पतिरपामनिमेपविलोचनः । समुदितोदकसंहतिबाहुना हृदि जघान रुपेव महाकपिम् ॥५४॥ ५०. भयङ्कर क्रोधी एवं प्रहार करने में शक्त, हाथी के समान दुर्धर्ष घड़ियालों से कम्पित और क्षुभित समुद्र को, एवं काम-जनित क्रोध से भरे रावण को मेरे सिवाय और कौन जीत सकता है ? विशेष काम के सफल न होने से कोच होता है। 'कामात् क्रोधोऽभिजायते' -गीता। ५१. इस प्रकार (राम के) वचन से प्रेरित होकर, नल, जिसने ध्वनि करती हुई, कम्पाय- मान दिशानों के कोनों को दृढ़ता से गाड़ दिया था, भयङ्कर गर्जन करता हुआ मलय पर्वत की कुञ्ज रूपी गुफ़ाओं में पहिले (सेना को) प्रविष्ट कर दिया। ५२. वानरों से श्रेष्ठ (नील) ने तुरन्त दृढ़ नीव रख कर क्रमशः पर्वतो के समूह से समुद्र पर अभेद्य, पर्वत का पुल बांधना प्रारम्भ कर दिया। ५३. तट पर जिसकी नीव का बन्धन रख दिया गया था, ऐसा विशाल, पर्वत का सेतु, समुद्र में मलय गिरि से अंकुर के समान प्रसार करता हुअा बढ़ने लगा। विशेष-सेतुबन्धन पर गोवर्धनाचार्य का चमत्कार देखिये : "गुपरपिलघूपनौती न निमज्जति नियतमाशये महतः। करोपनीतः बोलो मकरलायस्यैव ॥-पोषर्धन शप्तशती (यदि कोई छोटा आदमी सारगर्भित बात भी कहता है तो वह महान् पुरुषों के हृदय में नहीं घसती। यही कारण है कि जब वानरों ने भारी-भारी पर्वत उठाकर समुद्र में छोड़ा तोघे नहीं डूबे अर्थात् तं रने लगे ( और सेतु बैंप गया।) ५४. पर्वत से पाहत होकर, भयङ्कर गर्जन करते हुए समुद्र ने, विना प्रांत झपाये, बड़े क्रोध से, लहरो के समूह रूपी भुजा से नील के हृदय पर प्राघात किया । धानर चतुर्दशः सर्गः शमितरेणुकरेणुकटद्रवनुतिलवासितवासितकन्दरैः । प्रविदधौ ततधौततटं 'नगैः कपिरशङ्कमशङ्कमभिक्षिपन् ॥५५॥ अधिपयोधि नलेन निपातितः सलिलनादनिनादितदिङ्मुखः । धुततिमिङ्गिलपुच्छहतः पुनगंगनमुत्पतितो जगतीधरः ॥५६॥ दधति कूर्मपतिर्वपुरायतं कठिनपृष्ठतटे पतितं नगम् । कृतरवैर्गुरुविस्मयमीक्षितो भ्रमयति स्म चिरं हरिसैनिकैः ॥५७॥ मलयशैलमुखाहितबन्धनः कपिभिरर्द्धकृतो गिरिसंक्रमः । जलनिधी निहितो जलवाञ्छया भुज इवास महासुरदन्तिनः ॥५८॥ अपहसन्निव फेनरुचा चिरं गिरिहतोदितकन्ततिबाहुना । अभिजधान पयोनिधिरुद्धतः कुसुमभाजि सुवेलशिरस्तटे ॥५६॥ परिसरस्थसरस्थपुटाचलक्षतविमानविमानमहोरगम् । विततरागतरागमणिप्रभाजनितरङ्गतरङ्गकृतध्वनिम् ॥६॥ ५५. निःशंक होकर फेंकते हुए कपि ने धूलि को शान्त कर देने वाले, हाथियों के कपोलों से वहते मद से काला हो उठे और सुगन्धित कन्दरामो वाले पर्वतों के द्वारा विस्तृत, धुले तट को निर्भय कर दिया । ५६. समुद्र में नल से फेंका गया पहाड़, जल के गर्जन से दिशामों को ध्वनित करता, तिमि. गिल की पूंछ से माहत होकर पुनः माकाश में उड़ कर गिरा। ५७. विशाल शरीर धारण करने वाला, कछुओं का स्वामी, अपनी कड़ी पीठ के तट पर पर्वत के गिरने से चफर खा गया । उसे किलकारी मारते हुए वानर सैनिक बड़े विस्मय से देख रहे थे। ५८, मलय पर्वत के मुख पर यन्धन निहित करने वाला कपियों द्वारा (समुद्र में) भाषा ढकेला पर्वत ऐसे लगा जैसे समुद्र में जल की इन्धा से डाली गयी ऐरावत की मूंड हो। . ५६. उजत समुद्र ने, पांत के गिरने से उठी हुई, याह के समान लहरो से, मानो फैन की पान्ति ये हंसते हुए, पुपो से भरे हुए मुवेल पर्वत के मस्तफ के तट पर, मापात किया । १०. रामीप मे रियत, सरसते पौर विषम रूप से उठे पर्वतों द्वारा विमानों को ध्वस्त करते हए या महासों को मानरहित करते हुए, माती फैलाती साल मरिणयों की कातिगे रंग उठी तरंगों को पनि करते हुए।

१८८ जानकीहरणम् विततधातुरसं धरणीधरक्षतकृतवणचक्रमिवाम्बुः । अभिचकर्त्त नलोऽनलभासुरः सलिलपृष्ठतटं गिरिसेतुना ॥६१॥ . अवसितो नगसेतुरलक्ष्यत क्षिपति विष्णुवराहरदे भुवि । विपमकृष्टतया जलपृष्ठतः समुदितः क्षितिपार्श्वइवैकतः ॥६२॥ उदधिसेतुरगद्वयसङ्गतः सरलपुच्छविदारितदन्तिनः। वपुरवाह परं ग्रसितुं गजं प्रसरतोऽजगरस्य गरीयसः ॥६३॥ द्विरदयुद्धविधौ गिरिसंक्रमे जलधिखातकृतान्तरसङ्गिनि । मलयतुङ्गसुवेलसुरद्विपद्वयबृहद्भजवन्यइवावभौ ॥६४॥ मलयकुञ्जसुवेलतटाश्रयः स्थिरतरो नु धराधरसंक्रमः । उभयकोटिगतौ धरणीधरौ तुलयितुं नु तुला परिनिम्मिता ॥६५॥ अपरसेतुपयस्य विधित्सया कठिनकोटियुगे विनिवेशिती। अजनि काचवरो नु वनौकसा गिरिवरावपनेतुमितोऽन्यतः ॥६६॥ ६१. अग्नि के समान देदीप्यमान नल ने, पहाड़ों से बनाये हुए सेतु से, जल से संलग्न समुद्र के तट को काट डाला, जहाँ गैरिकादिक धातुओं का जल फैला था और जो पर्वत के आघात से जनित, पाव के चक्र के समान लगता था। ६२. एक अोर से, पूर्णरूप से निर्मित, पर्वत सेतु, ऐसा लगता था जैसे जल के पृष्ठ से, कहि- नता से खीच कर, विष्णु-वराह के दांत पर रखी हुई पृथ्वी उदित हुई हो। ६३. समुद्र (के ऊपर बंधा हुआ) सेतु, जो दोनों पर्वतों (मलय प्रौर सुवेल) से जुड़ा हुआ था, उस अजगर के शरीर के समान लगता था जो हाथी के निगलने के लिये बढ़ रहा हो और जिसमे हाथियो को विदीर्ण करने की क्षमता हो । ६४. समुद्र के गों के भीतर परस्पर मिल जाने वाले उस गिरियों के संक्रमण मे ऊँचे मलय और पर्वतराज सुवेल दोनों का परस्पर टकराना गजयुद्ध मे दो हाथियों की विशाल सूंडों के फंसने सा हो गया । ६५. मलय पर्वत के कुछ और सुवेल पर्वत के तट से बंधा हुआ वह पर्वतों से बना हुआ सेतु जो दोनों किनारों तक गया था, क्या तौलने के लिये तराजू बनाया गया था? विषेश-मलयगिरि समुद्र के इधर और सुवेल उपर है। बीच में समुद्र है। समुद्र के ऊपर दोनो पर्वतों से बंधा सेतु है। इस प्रकार उसको आकृति तराजू के समान हुई यह भाव है। ६६. यहाँ से अन्यत्र हटाये जाते दोनो पर्वत वनवासियों, द्वारा एक दूसरे पुल मार्ग बनाने की इच्छा से दो मजबूत नोकों पर टिकाये गये कांच की भांति लगे।

पतुर्दशः सर्गः १८९ जलमुदस्य तिमिङ्गिलसम्पदः प्रसभमुद्धरणाय पयोनिधेः । पृथुदुरुद्धरमन्तकधीवरप्रविहितं नु दृढ़ दृड़े वृतिबन्धनम् ॥६७॥ उत भुवः कुलिशायुधविद्विषो विषयचक्रनितम्बसमाश्रयम् । घटनसन्धिवलीततिमध्यम बलितमङ्गमगस्तनसम्पदः ।।६८|| अथ निवारयितुं दृढ़मन्तरा प्रथमपश्चिमसागर विग्रहम् । विपुलमद्रियुगेन महीयसा विरचितं न भुजद्वयबन्धनम् ॥६६॥ अतिनिमग्नमदीयमहाशरव्रणरुजाकृतकार्यविभावितम् । लवणसागरदानवदन्तिनः प्रकटमस्थि नु वंशसमुद्भवम् ॥७०॥ प्रथिमणि प्रथिते कृतकौतुकैरुदधिमापनदण्ड उपाहितः । इति चकार मनो मनुवंशजश्चिरविचारपरम्परमादृतः ॥७॥ समधिरूढ़समीरणसम्भवप्रणयदत्तकरो रघुनन्दनः। अधिरोह धराधरसंक्रमं भुवि निषण्णमिवासुरदन्तिनम् ॥७२॥ ६७. जल को हटा कर, समुद्र की तिमिङ्गिल सम्पत्ति को जबर्दस्ती वाहर निकालने के लिये, क्या यह यम रूपी मल्लाह का बनाया हुअा, अपनी जगह से न हटने वाला, दृढ़ महाजाल ६८. अथवा यह वज्रायुध इन्द्र के शत्रु अगस्त्य के चक्र की धार पर टिका, मध्य में जोड (सधिस्थल) की रेखा के विस्तार से युक्त मुड़ा हुआ अंग है ? ६६. या फिर पूर्व और पश्चिम सागर के अन्तर को दूर करने की इच्छा से दोनों महान् पर्वतों द्वारा दृढ रूप से अपनी बांहे फंसा ली गयी हैं । ७०. क्या यह सेतु, खारे समुद्र में रहने वाले, हाथी के समान राक्षसों की हड्डी है भो, शरीर के भीतर बहुत गहरे घुसे हुए हमारे बाणों से किये हुए घाव की वेदना को प्रकट करता है। ७१. कुतूहल से प्रेरित होकर, वानरों ने, इस विख्यात और मणियों से भरे समुद्र पर उसके नापने का दण्ड रख दिया है, ऐसा मनु के वंशज एवं पाहत राम ने (सेतु के सम्बन्ध में) विचार किया। विशेष-समुद्र के ऊपर ऐसा लगता था जैसे उसका मापदंड हो, यह भाय है। ७२. पहिले पवन-सुत (हनुमान) के चढ जाने पर और प्रेम से बढ़ाये हुए उनके हाय को पकड कर, रघुनन्दन उस पर्वत से बने सेतु पर जो पृथ्वी पर बैठा हुमा प्रमुर-दन्ती के समान लगता था, चढ़ गये ।

जानकीहरणम् शुभवयोधनयोधनयोऽर्णवं नृतिमिना दितनादितवीचिकम् । पिहितवेलसुवेलसुदभ्मसं सपदि । वानरवानरमत्यगात् ॥७३॥ तटविशालकपोलतले चलत्तपनमण्डलकुण्डलमण्डनम् । विविधभूरुहपण्डविनिजितत्रिदशनन्दननन्दनचन्दनम् ॥७४॥ मदगरगजैरगनिझरध्वनितहितहितसूचितैः । . सरसि तैरसितैरपि वारिदैः प्रविततं सततं सपयःकणैः ॥७५॥ निकषणेन युगस्य हिरण्मयज्वलितरूपधरस्य विघृष्टया । कटकभित्तिषु काञ्चनरेखया रविगतं प्रथयन्तमुदारया ॥७॥ हरिसमानसमानमृगान्वितं सभवनोपवनोपवृतान्तरम् । तटगुहासु गुहासुसमैविभिः कृतरवं शरवंशरनावृतम् ॥७७।। रचयति क्रमबन्धमिभद्विषि क्षणमवेत्य मृगं मृगलक्षणः । परिहृतं प्रसभं हिमकान्तिना नखरघातभयेन विदूरतः ॥७॥ ७३. सुन्दर वयःसम्पत्ति वाले तथा योद्धा (राम एवं हनुमान) के नर्तन से खंड-खंड होती, निनाद करती तरङ्गों वाले, सुवेल पर्वत से अवरुद्ध तट एवं जल वाले समुद्र को नर राम और वानर हनुमान शीघ्र पार कर गये। ७४. विविध प्रकार के वृक्षो को पराजित करने वाले तया देवतामों को हपित करने वाले नन्दन कानन के चन्दन से युक्त, चंचल सूर्य मंडल की मांति कुंडल के प्राभूपण की शोमा विस्तृत कपोल तल पर हुई। -- ७५. जंगली, मतवाले, गज तथा पहाड़ी झरनों की बढ़ी हुई ध्वनि से सूचित होते, जलकरण से युक्त बादल निरन्तर उस जलराशि पर फैल गये। ७६. तपाये स्वर्ण का रूप धरे दोनों के रगड़ने से कटकभित्ति (Mountain ridge) पर चमकती स्वर्ण रेखा को प्रकट करते, सूर्य तक पहुँचे (पर्वत पर राम घ) । ७७. सिंह के समान मानी भूगों से युक्त, भवन सहित उपवनों से पाच्छादित पन्तर वाले तटवर्ती गुफामो में निनादयुक्त शर (Reeds) के यन से ढके (पर्वत पर पड़े) । ७८. मृगा पन्द्र के क्षण भर (उरा पर्वत के) पास पहुंचने पर, (पिन्तु परसवारी) सिंह के पैतरे यांधने पर अपने मग की वारा समभ, कर ही नगों के पापात मे भय से पन्द्र जहाँ में हट गया (उम पर्वत पर राम महे)।

चतुर्दश सर्गः १९१ कृतदवारणवारणशोणितस्रवसदारुणदारुणलुन्धकम् । मकरसारससारसनिम्नगा ततमवारितवारितदिग्गजम् ॥७९॥ ज्वलितरत्नचयेन नभस्पृशा गगनलग्नदवानलसंशयान् । अधिरुरोह सुवेलमगं विभुः प्रतिजनं जनयन्तमनारतम् ॥८०॥ तत्र स्थित्वा किरणनिकरन्यस्तरङ्गैस्तरङ्गै- स्वित्तोयं वरुणनिलयं वैद्माणां द्रुमाणाम् । सततसलिलभ्रंसमुक्तं समुक्तं. शक्रत्रस्तक्षितिधरशतस्थानदन्तं नदन्तम् ।।८१॥ इति चतुर्दशः सर्गः। पश्यन रेमे ७६. वन में युद्ध करने वाले गज के योरिणत प्रवाह लाल रहने वाले भयानक व्याध से युक्त, मकर, सारस और नदियों से युक्त होकर फैले, घेरे हुए दिग्गजों से भी अवारित (पर्वत पर राम चड़े)। ८०. चमचमाते हुए रत्नो के समूह से, प्राकाश में लगी हुई, दावाग्नि का भ्रम उत्पन्न करने वाले, गगन-चुम्बी सुवेल पर्वत पर जिनेन्द्रिय राम, लोगों में शक्ति भरते हुए चढे । ८१. वहाँ (सुवैल पर्वत पर) बैठ कर राम ने, वरुण के निवास स्थान समुद्र को, जिसका जल, विद्रुम (मूंगा) के वृक्षों के किरण-समूह से रञ्जित होकर चमक रहा था, जहां जल के निरन्तर थपेड़े से मोती टूट रहे थे, जहाँ इन्द्र से भयभीत सैकड़ों पर्वत के शृङ्ग ध्वनि कर रहे थे, (ऐसे समुद्र को) देख कर रमण किया। चौदहवां सर्ग समाप्त ।

पञ्चदशः सर्गः- अङ्गदाख्यमथ वानरवीरं रक्षसां पुरमजीगमदीशः । वेदितुं चतुरुपायविधीनां कस्य गम्य इति कौशिकशत्रुम् ॥१॥ प्राविशत् स रहितादरवृत्तिः संसदं च विदितः सुरशत्रोः । राक्षसानधिपथोपनिविष्टान् संस्पृशन् सपदि पुच्छगुणेन ॥२॥ सन्निपद्य निभृतं स मुहूर्त स्वागतादिविधिलम्भितमानः । आददे वच इदं विनयस्थः साधुरूढ़नयपद्धति पश्चात् ॥३॥ निर्गुणोऽपि यदि शौर्यविशिष्टस्तत्र भक्तिमधिगच्छति लोकः । तद्वयन परिदीपितवृत्तेर्दासवद्भवति सर्वजनौघः ॥४॥ त्वय्यनन्यजनखण्डितशक्ती सर्वगुण्यजनगीतगुणौधे । स्नेह बन्धनियतेन गुणज्ञश्चेतसा हियत एव कपीन्द्रः ॥५॥ १. तदनन्तर प्रभु राम ने अङ्गद नाम के वानर-वीर को राक्षस-पुरी, लड्दा में, यह जानने के लिये भेजा कि इन्द्र-शत्रु रावण के साथ, चारों उपायों (साम, दाम, दण्ड और भेद) में से, किस उपाय से व्यवहार किया जा सकता है । २. अगद ने इत्तला कराने पर, बिना किसी अादर के, 'देवतामों के शत्रु (रावण) की सभा में, मार्ग में बैठे हुए राक्षसों को पूंछ से छूते हुए, तुरन्त प्रवेश किया । क्षण भर शान्ति से बैठ कर, स्वागत थादि व्यवहार से सम्मानित होने के बाद मङ्गद, पिनय पूर्वक, सज्जनों में प्रचलित नीति मार्ग का अवलम्बन करते हुए, यह वचन बोले । ४. निर्गुण होने पर भी मनुष्य में यदि शोर्य की विशिष्टता होती है तो लोग उसकी भक्ति करते हैं । गुण और शौर्य इन दोनों से शोभित, ऐसे प्राचरण से प्रभावित व्यक्ति के सब लोग दास के समान हो जाते हैं। जिसने राघों की शक्ति को चूर्ण कर दिया है, जिसके गुणों के समूह का सब गुणी जन गाम करते हैं, ऐसे तुम्हें देख कर वह गुरणी और रास्नेह मित्र, कपीन्द्र (हनुमान) सज्जित होता है।

पञ्चदशः सर्गः तद्वचांस्यवितथानि विपाके कमिष्टफलवन्ति यतेथाः । वल्लभस्य नयविद्विषतो वा सूक्तमेव हृदयेऽभिनिधत्ते ॥६॥ निस्पृहोऽथ पर एव हितानि व्याहरत्यगणितप्रभुकोपः । निष्फलप्रियसुखो ननु मृत्यः पथ्यमाह पतिमानतवृत्तिः ॥७॥ स्वाभिमानपरिवोधनहेतोर्भावशून्यमभिधाय वचांसि । स्वामिनं युधि नियुज्य विमई द्रष्टुमप्युपसरन्ति न केचित् ॥८॥ दूर दृष्टरिपुकेतुशिखाग्रा वारितेऽपि कलहाय यतन्ते । नप्रयान्ति शरवृष्टिनिपाते ताड्यमानशिरसोऽपि पुरस्तात IEM मुश्च घातमभितो भव वीरेत्यन्ययोधमभिधाय जिघांसुम् । लीलया युधि पुरोऽभिसरन्तो नापि सान्ति भुवि पञ्च पुमांसः ॥१०॥ यत्स्वयं युवतिमित्रवतीषु व्याहृतं मधुमदेन सभासु । तत् स्मरन्ति रणमध्यमुपेताः केचिदेव शरजालकरालम् ॥११॥ प्रभाव . अतः तुम उसके वचन को सत्य, और परिणाम में इष्ट फल देने वाला, सिद्ध करने का प्रयत्न करो। सुभापित चाहे स्नेही मित्र का हो या नीति-द्वेषी का हो, हृदय मे करता ही है। कोई व्यक्ति, चाहे पराया क्यों न हो, यदि वह बलवान के क्रोध की परवाह न कर, हित की बात करता है, तो उस नम्रता का व्यवहार करने वाले भृत्य को, चाहे वह अपने स्वामी के सुख सम्पादन में विफल ही हो, उसे कल्याणकारी कहते हैं । कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो अपना अभिमान जताने के हेतु, अभिप्राय से शून्य वात कर, अपने स्वामी को युद्ध में फंसा देते हैं और उनके नारा के समय, उसे देखने तक के लिये पास नही फटकते। ६. दूर से शत्रु के झडे के अग्रभाग को देखते ही, रोके जाने पर भी लड़ने को गिरे पड़ते हैं, परन्तु जव वाण की वर्षा होने लगती है तो सिर पर मार पड़ने पर भी मागे नहीं माते । १०. दुनिया में ऐसे पांच भी पुरुष न मिलेंगे जो मारने की इच्छा करने वाले योद्धा से यह कहें कि 'बोर हो तो, मेरे दोनों मोर मानो' और (यह कहते हुए) युद्ध भूमि में मेलते-खेलते आगे बढ़ें। ११. युवतियों और मित्रों से भरी सभा में, जो मदिरा के नशे में पूर होकर शान वधारते पे, वारणवर्षा से भयङ्कर हो गयी रणभूमि में उनमे से विरले ही उन वथनों को याद रसते हैं । अर्थात् युद्ध में उनकी शेखी भून जाती है।

१९४ जानकीहरणम् के नयन्ति पुरुपस्य सहाया भोक्तुमिद्धविभवस्य समृद्धिम् । युद्धमध्यवमिच्छति तस्मिन् दुर्लभाः सह कृतव्यवसायाः ॥१२॥ नियंपेक्षमवधूय वचस्तत् सेवकैरभिहितं श्रुतिहारि । यन्नयेन न समेति विरोधं तद्विचारनिपुणेन विधेयम् ॥१३॥ गीयते द्विविधमागमविद्भिः कर्म यत् सुकृतदुष्कृतभेदात् । सिद्धिदेयगुणदोषवशात्तद्भदमेति पुनरेव चतुर्दा ॥१४॥ पक्षयुग्मगतसिद्धिविधेयं तदविचिन्त्य गुणदोषविशेषम् । यः करोति करणीयमनिन्द्यं विद्धि नीतिफलमस्य करस्थम् ॥१५॥ दोप दुष्टफलनिन्धविरामं योऽर्थमर्थविपरीतमुदस्य । सेवते सदनुबन्ध विशुद्धं धाम तत्र न तनोति विपत्तिः ॥१६॥ दुजयेन सह वैरमनयं स्त्रीपरस्य न हिताय परत्र । तत्कलत्रमपहाय सुखार्थ राघवस्य मृगयस्व सुहृत्वम् ॥१७॥ १२. सुख भोगने के लिये, धनी पुरुप के, कौन सहायक नहीं होते ? युद्धभूमि में जब उनका वध होने लगता है, तो साथ देने वाले दुर्लभ होते हैं। १३. इस विचारशील पुरुप को उचित है कि वह सेवकों के प्रिय किन्तु निराधार बात की परवाह न करे, जो नीति-विरुद्ध न हो उसे करे । १४. शास्त्रकारों ने 'कर्म' के दो प्रकार कहे हैं, एक सुकर्म और दूसरा दुष्कर्म । परन्तु सिद्धि- काल के लिये गुणदायक और दोषदायक, ये दो और मिल कर वह कर्म चार प्रकार का हो जाता है। १५. जो कार्य दोनों पक्षों के विचारने के बाद सिद्धि-प्रद जान पड़ता है, ऐसे मनिन्द्य कार्य को जो मनुष्य उराके गुण और दोप पर खूब विचार कर एवं करने योग्य समझ कर, फरता है, तो इस नीति का फल उसके करतल-गत रहता है । विशेष-सहसा विवधीत नफियामविवेकः परमापदास्पदम् । ते हि विमृष्यकारिणं गुणलुम्पाः स्ययमेव सम्परः ।। भारथिः-२-३०. १६ निमका परिणाम, दोपयुक्त, पुरे फल के कारण, निन्दनीय है, और जो प्रयोजन के विरुद्ध पड़ता है, ऐसे माचरण को छोड़ कर जो निष्कलुष प्रपोजन में अनुराग रसता है उसे विशत्ति नहीं धेरती। १७. जो स्त्री मे लीन है, उसका प्रजेय पुरुष से पैर हानिकारक होता भौर परलोक में उसका हित नहीं होता। अतः स्त्री (मीता) को छोड़फर राघव की मित्रता रामनुगन्धान -- करो।

पश्चदशः सर्गः १९५ इन्द्रियाणि मतिमन्तमजय्यं योजयन्ति विपयेषु विजित्य । तद्वशित्वमवधूय यशोभियंस्तनोति भुवनानि स वीरः ॥१८॥ यौवनं चलमपायि शरीरं गत्वरं वसु विमृश्य विसृष्टः । अन्यजन्मगततिक्तविपाकं दृष्टसौम्यमपि कर्म न धत्ते ॥१९॥ हेतुरन्यभवभोगविवृद्धय॑यतश्च भवतीह विभुत्वम् । स्थास्नु यच्च वितनोति यशस्तत् साधनीयमितरत्तु न धीरैः ॥२०॥ रूपवन्तमपि हन्ति जरात्तिः सङ्गमे महति चास्ति वियोगः । याति दोघमपि विच्युतिमायुः पुण्यमेव निरपायि भजध्वम् ॥२१॥ तविहाय मुनितुल्यमहिम्नो दुर्जयस्य मनसापि युवत्याः । लोकयुग्मगतशमविनाशं स्पर्शमस्य सुखमेहि यशो वा ॥२२॥ १८. ये इन्द्रियां, बुद्धिमान् और प्रजेय पुरुष को (भी) जीत कर, उसे विषयों की मोर प्रवृत्त करती हैं । अतः इनमें प्रासक्ति को मिटाकर, जो यश का त्रिभुवन में विस्तार करता है वह वीर है। १६. यौवन अस्थिर है। शरीर नाशवान है । धन-सम्पत्ति चलायमान है । यह सोच कर विरक्त पुरुप देखने में अच्छा पर जन्मान्तर में तीखे फलवाला कर्म नहीं करता। २०. धीर पुरुप, उस ऐश्वर्य की साधना करते हैं जो स्यायी यश का विस्तार करता है, जो इस जन्म और जन्मान्तर में समृद्धि का कारण होता है । अन्यविध ऐश्वर्य की साधना वे नहीं करते। २१. बुढ़ाई का क्लेश, सौंदर्य का भी नाश कर देता है । महान् सम्मिलन मे भी विछोह होता है । दीर्घमायु का भी अधःपतन होता है । केबल पुण्य मनश्वर है । उसी का पत्र- लम्बन करो। २२. मुनियों के समान महान् पोर भत्रेय राम की युवती भार्या का मन से भी स्पर्श दोनों लोक के मानन्द का नाश करने वाला है । अतः उसे छोड़ फर यश के द्वारा मुम को प्राप्ठ करो। विशेष-महाम को हस्तलिखित जानसोहरण की प्रति में यह श्लोक इस प्रकार है : लोक गामात सामं पिना स्पर्शमस्य मनसापि युवस्या। दुर्जयस्य मुनि पुस्य महिम्नः सहाय सलमेहि यशोभिः।।

जानकीहरणम सप्रियावितरणेन कृतज्ञः तोपितस्सफल हार्दविरोधः । स्वर्गिवर्गमवजित्य समस्तं भृत्यवत्तव पुरीह विधत्ते ॥२३॥ ये भवन्तमतिवश्यममात्याः नूतनं पतिमिहाभिलषन्ति । कारयन्ति यदि नीतिविरुद्ध मा तदीयमनुरोधि वचस्ते ॥२४॥ हेतुरस्ति नरवानरभावे नैव दर्पविरहस्य चिरज्ञा । यत्सुरेन्द्रकृतवीर्यसुताभ्यां अस्तशक्तिमिह कश्चिदुशन्ति ॥२५॥ शासनं यदि शिरोभिरुदनं मौलिवन्नृपसुतस्य न धत्से । शैलशृङ्गगुरुमस्तकभारत्यागसौख्य तव गच्छ व्रतं ते ॥२६॥ शक्रलोकजयदत्तमजय्यं दिक्षु फुल्लमिव काशवनं तत् । रामधामभवपावकदीप्त्या दग्धमेव समवैहि यशस्स्वम् ॥२७॥ 'गर्वमस्य वचनानि वहन्ति श्रोतुमन्तविरसानि मृदूनि । न प्रपद्य विततार विकारं क्रोधवद्धमिति राक्षसलोकः ॥२८॥ २३. वह (राम) प्रिया (सीता) के लौटा देने से कृतज्ञ एवं सन्तुष्ट हो जायगे और उनके हृदय का विरोध मिट जायगा। समस्त देव-वृन्द को जीत कर यहाँ वे तुम्हारे नौकर के समान रहने लगेंगे। २४. ये जो आपके अत्यन्त माज्ञाकारी मंत्री हैं, नये स्वामी की इच्छा रखते हैं । यदि ये लोग भी मापसे कोई नीति-विरुद्ध बात करवाना चाहें तो उनकी बात पाप न मानें । २५. नर अथवा वानर होने में दर्पहीनता का लम्या ज्ञान कारण नहीं है । जो इन्द्र कृतवीर्य पुत्रों द्वारा शक्तिहीन किये गये किसी की इच्छा करते हैं । तुम राजपुत्र (राम) के उन्नत शासन को अपने सिर पर मुकुट के समान नहीं धारण करते तो जामो पर्वत शिखर के समान बोझ हटाने का सुस प्राप्त करने वाले तुम्हारा यक्त जाये (तुम मर जामो!) २६. यदि . २७. इन्द्रलोक को जीतने वाले अपने इस अजेय पश को, राम के वेज से उपर मांग की दीप्ति रो, दिशामों में फूले हुए कांसे को वन के समान जसा हुमा समझो। २८. 'इसके (मगद फे) वनन, गवं से भरे हुए हैं और मुनने में मीठे पर भीतर से कड़ये है यह रामझ कर रासस-समूह ने ोष से भरे हुए अपने उदेंग को प्यास नहीं किया।

पश्चपरा सर्गः १९७ अट्टहास निनदोऽतिगभीर क्रोघगर्भमतिकाय विमुक्तः । निस्फुलिङ्ग निकरेण सदस्तं दीपयन्दशदिशोथ ससर्प ॥२६॥ कम्पनोऽपि परिकम्पितमू( दन्तकान्ति निचिताधररागः । उन्नतैकचपलभ्रुकाटाक्षं पातयन्द्विषति तत्र विरेजे ॥३०॥ आहतान्यथ परस्परमेव क्रुध्यतस्त्रिशिरसोऽपि शिरांसि । घातविस्फुटितमौलिमणित्विट् द्योतिताम्बर तलानि विरेजुः ॥३१॥ इन्द्रजित्पथमदानदशायां दिग्द्विपेन्द्र इव गण्डतटाभ्याम् । निमुमोच मदसेकमनोज्ञ धर्मवारिमदमत्थरनेत्रः ॥३२॥ मानगर्भमवकणित दूत व्याहृतो भुवि न मय्यमुखेन्दुः । भूमिभक्तिकुसुमेन निवेशं मण्डलस्य विततान निकुम्भः ॥३३॥ क्रोधवेगविकृतश्च तथासीच्छोणिताक्ष मुखतिग्ममरीचिः । यत्सदस्थकिरणाधिप रलस्तम्भवह्निरपि तेन विवने ॥३४|| २६. राक्षसों के भीमकाय से निकला हुआ, भयङ्कर क्रोध से युक्त, उनके अट्टहास का गर्जन, चिनगारियो के समूह से, उस सभा को दीप्तिमान् करता हुआ दशो दिशाओं में फैल गया। ३०. (दूसरों को) कपाने मे शक्तिमान होते हुए भी जिसका सिर (क्रोध से) काँप रहा था और जिसके दांतों की चमक ने उसके अधर-राग को ढंक लिया था, तरेरते हुए चञ्चल 5 कटाक्ष को शत्रु (मङ्गद) की ओर प्रेरित करता हुआ, वहाँ शोभायमान हुमा । ३१. तदनन्तर क्रोध से भरे हुए, विशिरस नामक राक्षस के भी चोट खाये हुए सिर परस्पर टकरा गये और जिनके मुकुट की मणियों के परस्पर संघर्ष से आकाश का तल मालो- कित हो गया था, चमक उठे। ३२. इन्द्रजित ने, कनपटी के किनारे से, पसौना रूपी मद के कारण जिसके नेत्र शिथिल पड गये थे, मद न बहाते हुए दिग्गज की भांति, मद से सोचे हुए मार्ग का परित्याग कर दिया। ३३. निकुम्भ राक्षस ने, धरती पर सर मुका कर, सभा-मण्डप मे, दूत के अभिमान युक्त वचन सुन कर, भूमि पर बनी पुष्प रचना के भाकार का विस्तार किया । ३४. फिर भी कोष के वेग से जिसका चेहरा भयङ्कर हो गया था और जिमकी रुधिर ममान लाल-लाल प्रांख पौर मुख की किरणें तिरछी हो गई थी, उसने सभा में स्थित, सूर्यकान्त मणि के खम्भों की भग्नि को प्रज्ज्वलित कर दिया।

सानकीहरणम् रक्तपद्मरुचिहारि कराग्र प्रस्थितालि कुलरोचिषि कुम्भः। न्यस्यति स्म भुजवतिनि मन्दं ज्याभिघातकिणवत्मनिचक्षुः ॥३५॥ सेन्द्रनीलमथ वक्षसि हारं चूर्णयत्सपदि पाणितंलेन । बद्धकृष्णमृगचर्मवदासीतद्गजस्सुविततेषु करालम् ॥३६॥ न्यस्य वक्त्रमधिपाणि विसृष्टस्वेदविन्दुविकटोऽपि चिराय । विस्मयेन किल दूतमनन्यव्यावृत्तेन नयनेन ददर्श ॥३७॥ लोचनस्थधनरागशिखाभिलक्ष्यरोपबडवानलराशिः । व्यस्तहस्तचलवीचिकराल क्षुभ्यति स्म दशकण्ठसमुद्रः ॥३८॥ राक्षसेषु विकृतेषु न सद्यो माल्यवानिति विकारमियाय । युक्तियुक्तमपि वाक्यमनिष्टं स्वीकरोति न हि दुर्जनलोकः ॥३६॥ ईहितं हितमितीव विकारः वीक्ष्य वीततिभतुंधीरः । बन्धुमिन्द्रसुतबन्धुमथैनं क्रोधनस्समुदियाय सदस्तः ॥४०॥ ३५. भुजाओं के सन्निकट स्थित, हथेली पर से उड़े हुए भ्रमर-समूह के समान चमकती हुई, पट्टे की लकीर को, जो (निरन्तर) प्रत्यञ्चा के खीचने से पड़ गई थी, कुम्भ राक्षस ने अपने लाल कमल को हराने वाले, नेत्रों से देखा। ३६. उसने अपने वक्ष पर पड़े हुए, इन्द्रनील मणि के कराल हार को तुरन्त हथेली के आधात से चूर-चूर कर डाला । उसका चूर्ण फैलने से ऐसा लगता था जैसे उसने अपने वक्ष- स्थल पर कृष्ण-मृग चर्म लपेट लिया हो। ३७. अपने मुख को हथेली पर रखकर और भयङ्कर होते हुए भी, पसीने-पसीने होकर, वह बहुत देर तक उस दूत को एक टक, विस्मय से देखता रहा। दशकण्ठ रूपी समुद्र, जिसमें आंखों की गहरी ललाई की लपट से, बड़वानल के समान पोध झलक रहा था, और जिसमें विकल हायों का सञ्चालन, भयङ्कर तरङ्गो की हिलोर के समान था, उत्तेजित हो उठा। ३६. यद्यपि अन्य राक्षस लोग क्षुध हो गये थे पर माल्यवान (सुकेतु राक्षस का पुत्र) और रावण के नाना को कोई घबराहट नही हुई। दुर्जन मनुष्य, अनिच्छित बात को युक्ति- सङ्गत होने पर भी नहीं स्वीकार करते। ४०. विकार नाम के अधीर एवं क्रोधी राक्षस ने जब यह देखा कि उसके स्वामी (रावण) का धैर्य छूट गया और उसका हित इसी में है (मर्थात् अङ्गद के पकड़ लेने में) तो वह सभा से उठ खड़ा हुमा। ३5 पञ्चदशः सर्गः १९९ b आत्मपुच्छलतयैव स पश्चाद्वाहु संयमितमिच्छतिकर्तुम् । राक्षसे हतनिपातितशत्रुस्स्वं जगाम बलमम्बरवा ॥४१॥ राक्षसेष्वथ विलक्षतमेपु प्रेक्ष्य नम्रवदनाम्बुजपुञ्जम् । रावणं स्म नयनिर्मलवुद्धिर्मातुरस्य गुरुराह वचांसि ॥४२॥ उक्तमत्र हितमेव विधातुं तत्क्षमस्व यदि वाक्यमहारि । औपघानि विरसानि तथापि द्वेष्यभावमुपयाति न वैद्यः ॥४३॥ अप्रियाणि रिपुराह गुरुर्वा नष्टशीलमयमत्र विभागः । क्षेप्तुमेव कटु जल्पति पूर्वः प्रेमगर्भमपरस्तु हितैषी ॥४४॥ यत्वयाहमवकोणितपूर्वं व्याहृतोऽपि विरमामि न वक्तुम् । तत्र हेतुरितरैरसमानस्नेह एव न तु जीवित तृष्णा ॥४५॥ ४१. जब उस राक्षस ने अङ्गद की ही पूंछ से उनके हाथ को वाँधने की चेष्टा को तब वह अगद जो अपनी मार से शत्रुओं को गिरा देते थे, आकाश-मार्ग से अपनी सेना में चले गये। ४२. राक्षस लोग इस व्यापार को भौचक्के होकर देख ही रहे थे, कि नीतिज्ञ माल्यवान (मातुः गुरुः=नाना) उसके (रावण के) नीचे किए हुए सिरों के पुञ्ज को देख कर वोले । विशेष—मातुः गुरु माता के पिता=नाना=माल्यवान । ततस्तु सुमहाप्राज्ञो माल्यवान नाम राक्षसः । रावणस्य वचः श्रुत्वा इति माता महोऽब्रवीत् । -वाल्मीकीय रामायण-२५-७१ ४३. जो तुम्हारे हित के लिये मैं बात करता हूँ यदि वह कटु हो तो क्षमा करना । यद्यपि मोपधि कड़वी होती है फिर भी उसके प्रयोग करने में वैद्य को कोई द्वेष-भाव नहीं होता। विशेष -मद्रास की हस्तलिखित प्रति में इलोक की दूसरी पंक्ति में 'विरसानि' और 'द्वेष्यमाव' के बीच में कुछ असर नहीं है। मैंने उसको प्रति 'तयापि' से करने का साहस किया है। ४. भ्रष्टाचरण करने को भप्रिय उपदेश, चाहे सत्रु दे अपवा गुरु । उन दोनों में अन्नर केवल इतना ही होता है कि सत्रु उस उपदेश के द्वारा निन्दा करता है और हितपी के उपदेश के भीतर प्रेम रहता है । ४५. यद्यपि तुम मेरा पहिले अपमान कर चुके हो, फिर भी मैं कहने में न दूंगा। इसका कारण यह है कि दूसरों से कहीं अधिक मैं तुमसे प्रेम करता हूँ। उसका कारण जीने की तृष्णा नहीं है।

२०० जानकीहरणम् यस्य वृद्धिमधिगम्य विवृद्धिर्जायते विपदि यस्य विपत्तिः । तं स एव हितमाह जनस्तु श्रोत्रहारिवचनैस्तुविदग्धः ॥४६॥ स्वार्थरागरतिशुद्धमतीनां सद्विवेक पटुदृष्टफलानि । यच्छृणोति वचनानि गुरूणां तन्न जातु विपदेति न यज्ञम् ॥४७॥ ऋश्यमूकमितवत्यरिवीरे त्वं तदैव घटनामकरिष्यः । यद्युपेत्य कुलिशायुधसूनुन भविष्यदियमत्र विपत्तिः ॥४८॥ सम्पतन्ति कपयोऽस्य न यावत्तावदेनमभिगम्य सवेगम् । विग्रहीतुमपि युक्तमभूद्वस्तत्कृतन्न हृदयेषु मदेन ॥४९॥ आसनंतव रसातलमेत्य स्तोक काल मसुराधिपवन्धोः । युक्तमत्र परिणश्यति यावज्जीवनेन फलमप्रतिवन्धम् ॥५०॥ ४६. जो स्वामी के अभ्युदय में प्रसन्न होता है और उसकी विपत्ति मे दुखी होता है वही उससे हित की बात कहने में समर्थ होता है। अन्य लोग जो काइयां होते हैं वे तो केवल ठकुर-सोहाती कहते हैं। ४७. स्वार्थ, राग-द्वेप, एवं प्रासक्ति से रहित जिनकी बुद्धि शुद्ध है, ऐसे गुरुजनों के विवेक- पूर्ण अतएव सफल वचनों को जो नितिज्ञ सुनता है उसके पास विपत्ति नहीं पाती। विशेष--वृणुते हि विमृष्यकारिणं गुणलुन्धाः स्वयमेव सम्पदः --भारवि हिताननयः संशृणुते सकिम्प्रभुः।-भारवि ४८. जब ऋष्यमूक पर्वत पर राम गये थे तभी यदि तुम, शत्रुओं में वीर राम से सन्धि फर लेते तो यह विपत्ति तुम पर न आती। विशेष--'न शत्रुमवमन्येत ज्यायान् कुर्वीत विग्रहम् । तन्मह्यं रोचते सन्धिः सह रामेण रावण ॥ -वाल्मीकि रामायण : युद्ध काण्ड, २५--१०॥ ४६. जब तक वानर लोग संघटित नहीं हुए थे तभी यदि तुमने आक्रमण कर दिया होता तो उचित होता । परन्तु तुमने अभिमान के कारण इसे अपने हृदय में स्थान नहीं दिया। ५०. असुरों के स्वामी (बलि) के मित्र होते हुए भी तुम्हारा पासन रसातल में जाकर थोड़े समय में नष्ट हो जायगा यह उचित ही है । (ऐसा कुछ विधान है कि) मनुष्य को जीवन ही में अपने कर्म का फल मिल जाता है। विशेष-असुराधिपबन्धोः बलि के मित्र। वाल्मीकीय रामायण में इस सम्बन्ध को एक कया इस प्रकार है: "एक बार रावण पाताल में गया। बलि से उसने कहा कि हम तुम्हें हंद से छोड़ाने आये हैं। बलि ने कहा कि तुम यदि हिरण्यकशिपु का कुण्डल छीन लाओ तो हम समझें तुममें शक्ति है । परन्तु बहुत प्रयत्न करने पर भी रावण ऐसा न कर सका।" रावण बलि की सहायता के लिये गया था, इसलिये कवि ने उसे 'असुराधिपबन्धु' कहा।

मञ्चपरास वेत्सि। २०१ प्रेरणाय न दिवस्य न यज्ञैर्व्याहृतस्य भवतात्र विधातुम् । द्वैधमुग्ररिपुसैन्यसमुद्रप्रस्तसर्वविषयेन न शक्यम् ॥५१॥ सद्धनेन पणबन्ध भारतौ कल्पयन्ति वलभाजि न यज्ञाः । तं प्रियावितरणेन यदि स्यासिद्धिरत्र परमोऽयमुपायः ॥५२॥ त्वय्यलङ्घयनलकूबरशापक्रूरवक्त्रपतनं न केवलन्तु कुलहिंसनहेतोः पासि विष्णुतुलितस्य कलत्रम् ॥५३॥ ग्रस्ति काचिदिति नूनमनूना राघवेऽपि तव दुर्जयशङ्का । येन वणिवपुरेत्य कलत्रं तस्य हर्तुमभवत्तव यत्नः ॥५४॥ ५१. तेजस्वी शत्रु के सेना रूपी समुद्र से मापका सम्पूर्ण देश प्रस्त हो गया है। अब माप नीतिज्ञों से कहे गये 'वैध' (भेद करा देना) का भी विधान नही कर सकते। ५२. नीतिज्ञ कहते हैं यदि शत्रु बली हो तो उसे कुछ ले-दे कर सन्धि कर लेनी चाहिये । इसलिये उनकी प्रिया (सीता) को वापिस देकर यदि कार्य-सिद्धि हो तो यही एक परम उपाय है । ५३. क्या तुम मजेय नलकूवर का अपने क्रूर सिर के पतन वाला शाप मूल गये हो ? हमें तो ऐसा लगता है कि तुम केवल अपने कुल के नाश के हेतु, विष्णु के समान राम की पत्नी की रक्षा कर रहे हो। विशेष -लकघर का शाप-कया:-एक समय रावण कैलास पर्वत पर गया। वहां वह 'सर्वश्रेष्ठ, पूर्ण चन्द्रमुखी' रम्भा को देखकर अतीव फामासक्त हो गया; और रम्भा के हजार कहने पर कि मैं तो आपको पुत्रवधू हूँ' उसने बलात् उससे संमोग किया। रावण कुवेर का भाई था। नलकूवर, कुवेर का पुत्र था। इस प्रकार रम्भा रावण की पुत्रवधू हुई। जय नलकूवर ने रम्भा से यह वृत्तान्त सुना तो उसने रावण को शाप दिया कि जब कभी तुम परस्त्री के साथ बलात् ऐसा करना चाहोगे तो तुम्हारे सर कट-कट जायगे। काममोहाभिभूतात्मा नायौषतिद्वचो मम। याच्यमानो मया देव स्नुषातेऽहमिति प्रभो॥ यत्सवं पृष्ठतः कृत्वा बलात्तनास्मि घर्पिता। जब रम्भा ने यह बतलाया तो, नलकूवर ने शाप दिया : 'तस्मात्स युवती मन्यां ना कामामुपयास्यति । यदा ह्यकामा कामार्तो घर्षयिष्यति योषितम् ॥ मूर्धातु सप्तधातस्य शकलो भविता तदा। वा० रा० उ०-२६-५४-५६। ५४. अवश्य ही तुम्हें राम को जीतने में बड़ी शङ्का भी रही है । तभी तो तुमने मन्यासी का वेष बना कर उनकी पत्नी को हर लाने का यत्न किया है। २६ जानकीहरणम तस्य दूतमपि वेत्सि चयेन पातितस्तव सुतोऽक्षकुमारः। इत्युदारमभिभाष्य स तूष्णीमास्त मौनमुचितं खलु ते ॥५५॥ इतीरितं मातृगुरोवंचस्तत् प्रशंसतस्संमदि यातुधानात् । अङ्गारवरिव लोचनानां वातैः किरनिन्द्ररिपुर्वभाषे ॥५६॥ पद्यं पथोपत्यमयं व्यपेतं वशी विशङ्कं वदतु प्रसह्य । निन्दन्ति ये तद्युपदेशलाभात् तद्दन्तमद्यैव पिनष्टि मुष्टम् ॥५७॥ शङ्का कुतो मस्करिवेपलक्षम्या वयं न सञ्चस्करिमात्मरूपम् । मा योपितन्नीनशदुनमने दृष्टं वपुस्तामिति गोपितं नः ॥५८॥ विनोपभोगं भवने भवन्तु सीतादयो मे वशगस्य देव्याः । अनन्तकोशस्य नृपस्य रत्नं शिखान्तमारोहति किञ्चिदेव ॥५६॥ - ५५. तुम उसके दूत (हनुमान) को भी जानते हो जिसने तुम्हारे पुत्र को मारा है। इतनी सारगभित बात कह कर माल्यवान चुप हो गया । (ठीक ही है) जब सुनने वाला मूर्ति के समान बैठा रहे अर्थात् उस पर उपदेश का कोई असर न हो तो फिर चुप रह जाना ही उचित है। ५६. माल्यवान के द्वारा कहे हुए उपदेश की सभा में प्रशंसा करते हुए राक्षसों को देखकर इन्द्र का रिपु रावण, उन राक्षसों की ओर आँखें तरेर पर, जैसे अङ्गार की वर्षा कर रहा हो, देख कर बोला। ५७. ये मनस्वी माल्यवान निःशङ्क होकर जो खामखाह हमारे विरुद्ध पथ्य की बात कह रहे हैं, वे कहा करें। परन्तु अन्य लोग जो लाभ के बहाने हमारे प्रावरण की निन्दा करेंगे उनको यह हमारा धूसा अभी ही पीस डालेगा। ५८. हमें क्या शङ्का है ? हमने तो भिखारी का रूप नही बनाया है । (भिखारी का रूप तो राम ने बनाया है, यह भाव है) उनकी पत्नी को ये उन राक्षस लोग जो सामने बैठे दिखाई पड़ रहे हैं, कहीं नष्ट न कर दें, इसलिए हमने उसे छिपा दिया है । ५६. मैं तो देवी मन्दोदरी के वश में हूँ। सीता ऐसी कितनी (नगण्य) स्त्रियां हमारे महल में पड़ी हैं । जिसके पास स्वयं रत्नों का अनन्त कोश है वह किसी खास ही रत्न को सिर पर चढ़ाता है।

पञ्चदशः सर्गः २०३ दिग्दन्तिदन्तायुधभिन्नरत्नकेयूर बन्धज्वलितांसपीठः। सोऽयं भुजो मे पणबन्धबुद्धिं युद्धकलब्धो न ददाति कर्तुम् ॥६०॥ यं शक्रः प्रतिपद्य खण्डितबृहद्वामानतो मानतो विभ्रष्टैरुपवीज्यते प्रतिदिनं यश्चामरैश्चामरैः। कातर्यातुरचेतसः प्रतिकथात्कामानवान्मानवात् विष्णुस्तन्नजयेज्जितद्विरदरावैरावणं रावणम् ॥६॥ कर्तुम शक्तोहमाजौ शरभ मुखगतन्यंकुमारं कुमार नो वै मन्ये तृणाय त्रिभुवनमखिलं संहरन्तं हरन्तम् । युद्धे वेदाम्बुनाथं प्रथमतरजितं पाशवन्तं वशन्तं कास्था जन्येषु भीत्या तरलतरदृशि स्यानरे वानरेवा ॥२॥ भीम संग्रामभूमौ रिपुकुलजयसंयोगदायागदायाः पक्षमैलेन सोद्वाचलितगुरुधृतिः के प्रहारं प्रहारम् । लोलोदस्तैकहस्तक्षतदलितमुखच्छिन्न दन्तं न दन्तं सोऽहं नेतुं समर्थों भुजतरुघटनावन्धनेशं धनेशम् ॥६३।। ६०. दिग्गजों के दांत रूपी आयुध से तोड़े हुए रनों से जड़े केयूरवन्ध से जिसके कषे मलकृत हैं ऐसी भारी भुना इस युद्ध का अवसर पाकर किसी सन्धि की बात नहीं करती। विशेष-उपर्युक्त श्लोकों में रावण ने माल्यवान की प्रत्येक शंका का उत्तर दिया है । ६१. जिस रावण की सहायता प्राप्त कर इन्द्र की सेवा पति-परित्यक्ता कामिनियों का समूह करता है और जिस पर मान-भ्रष्ट देव-वृन्द प्रतिदिन चंवर डोलाते रहते हैं तो कामी मनुष्यों की कौन गिनती ? उस रावण को जिसने हस्तिराज को जीत लिया है विष्णु भी नहीं जीत सकते। ६२. युद्ध में मैं कातिकेय को एक छोटे बच्चे के समान पकड़ कर शरभ के मुख में छोड़ सकता हूं (जो उन्हें कच्चा चवा डाले) । मैं सम्पूर्ण त्रिभुवन संहार करने वाले शिव को तिनके के समान भी नहीं मानता। पाश धारण करने वाले वरुण को, जिसे मैं पहिले ही जीत चुका हूँ, उसे तो मैं अपने वश में ही जानता हूँ, तब फिर मनुष्यो एवं वानरो की क्या हस्ती है जिनकी पाँखें डर के मारे सदा माई रहती हैं। ६३. ऐल के द्वारा संग्रामस्थली मे शत्रुवर्ग पर जय का सयोग प्रदान करने वाली गदा अचानक प्रहार को सह कर अविचलित महान् धैर्य वाला में मनायास ही एक हाय से ही विक्षत किये गये पौर दलित मुख एव टूटे दात वाले निल्लाते कुबेर को अपनी भुजा- रूपी तरु के बन्धन में ले पा सकता हूँ।

जातकीहरणम एवं नेतुं न शक्यो नयविदुशनसायं स मोहं समोहं निर्दोपावस्समूह क्षितपतितनयं यानवन्तं नवन्तं । तद्यातेति प्रतस्थे कुलिशहतिकृतव्यासमांसे समांसे .न्यस्य स्कन्चे पतन्तं त्रिदशजन वचूहासहारं सहारम् ॥६४॥ ... इति पञ्चदशः सर्गः । m ६४. तब वह रावरण, उन लोगों से जो राम के प्रशंसक थे और जो राम के पास जाने के लिये उत्सुक थे, यह कह कर कि "मैं नीतिज्ञ उशानस (शुक्राचार्य) के समान हूँ, मुझे इस प्रकार पबड़वाया नहीं जा सकता; तुम लोग पृथ्वीपति (राम) के पास, जिनके साथ । निर्दोष राजापों का समूह है, चले जामो," (ऐसा कह कर) अपने मांसल कन्धे पर जिसका मांस ववाघात से कट गया था, अपने हार को जिसने सौंदर्य में देवानामों के हास को जीत लिया था, झटके से डालकर, वहाँ से चला गया । पन्द्रहवा सर्ग समाप्त।

अथ षोडशः सर्ग: अथ दिवसविधेयमिन्द्रशत्रोनिरवसितं प्रतिहारतो विदित्वा । अनुमतिमधिगम्य तस्य भानुः गिरिमपरान्तमहार्णवस्थमीये ॥१॥ अरुण करदृढावकृष्टरश्मि प्रणमितकन्धरभुग्नचारुघोणाः । दिवसकरया गिरीन्द्रभित्तेजघनपतद्रथनेमयो वतेरुः ॥२॥ सरभसनिपतद्धनान्धकार भ्रमरकुलैरवलुप्यमान मूर्तिः । अपसरण विधानमीहमानः पयसि भयादिव मज्जतिस्म भानुः ॥३॥ अरुणितमथ सन्ध्यया मुहूर्त तदनु तमोभिरुपात्त कोशरन्ध्रम् । कुमुदमलिगणो ददर्श दूरादरुणसितेतर वारिजाभिशङ्की ॥४॥ सरसिजमणिवेदिकासुभिन्नप्रचुरतरङ्गकणावकीणंवाते । उपवनसरसोरुहं दिनान्ते हतमिव शोतरयेण संचुकोच ॥५॥ १. तब द्वारपाल से यह जान कर कि रावण का दिन भर का काम समाप्त हो गया, सूर्य उसकी मनुमति लेकर, पश्चिम महासागर में स्थित प्रस्ताचल पर चले गये। विशेष-यहां से बड़ा हो सुन्दर, सूर्यास्त, सन्ध्या एवं रात्रि का वर्णन आरम्भ होता है। २. (ढालपर) अरूण (सूर्य का साथी) ने बड़ी दृढ़ता से, अपने हाथों से राम को खीचा, जिसके कारण घोड़ों के कंधे झुक गये और उनके सुन्दर नयने तिरछे हो गये, इस प्रकार सूर्य के घोड़े, पहाड़ की चोटी से नीचे उतरे भोर (उतरते समय) रय के पहिये उनकी जांघों से सट गये। ३. सहसा पने अन्धकार से परिवेष्टित हो जाने के कारण, जैसे भ्रमरों के समूह ने उसे घेर लिया हो, सूर्य, भागने की इच्छा से, डौल लगाकर पानी में डूब गया । विशेप 1-जय मनुष्य को मधुमक्खियों का झुड घेर लेता है तो वह जान बचाने के लिये पानी में बूड़ जाता है। तद्वत् । सन्ध्या के कारण जिसका गर्भ (भीतरी भाग) क्षण भर के लिये पहिले लाल हो गया था और फिर अन्धकार के कारण श्यामल हो गया, ऐसे कुमुद को देख कर भ्रमरो के झुंड को शङ्का हुई कि यह लाल कमल है या नील कमल । सध्या पा समय, माणिक्य की वेदी पर, हवा के कारण, टकराने से सरोवर की बहुत सी लहरियो से सिश्चित, उपवन का कमल, तीव्र शीत से जैसे पीड़ित होकर, सिकुड गया।

२०६ जानकीदरणम द्रुतमपसरतैति भानुरस्तं सरसिरहेषु दलार्गलाः पतन्ति । भ्रमरकुलमिति अवन्निवालिः क्वणितकलं विचचार दीपिकायाम् ॥६॥ सति दिवसपरिक्षयस्य योगे निपतितसद्वयसस्तमोऽभिभूताः । विनमितचलमस्तका बभूवुः समुपहता जरसेव वृक्षगुल्माः ॥७॥ विगलितवति तिग्मभासि सन्च्या परिगतलोहिततारकं नभस्तत् । त्रिदशशरशत व्रणावकोणं हृदयमनुव्रजति स्म रावणस्य ॥८॥ दिवसकरभयादिवोपलीनो जलधिजलान्तरितस्तुपाररश्मिः । रविरपचलितो नवेतिबोद्ध नभसि करानिव चारयांवभूव ॥६॥ प्रथम गमितमन्थकारिभावं पुनरतिपिङ्गलतारकं विधाय । भुवनमथ कलात्मना समस्य त्रिनयनरूपमलम्भयत्प्रदोपः ॥१०॥ दिवसविगमलवितस्य भानोरवनतिरुन्नतिरिन्दुमण्डलस्य । अविकलवपुपः समानकालं नभसि तुलामधिरूढयोरिवास्ताम् ।।११।। "जल्दी से निकल भागो, सूर्यास्त हो गया, कमलों पर उनकी पंखुड़ी रूपी कुंडी बन्द हो रही है", भ्रमरों के समूह को यह चेतावनी देता, एक भृग भनभनाता हुषा, सरसी पर इधर-उधर चक्कर लगाने लगा। दिन के अवसान पर, वृक्षों के कुओं ने, जैसे बुढ़ापे के कारण, अपने हिलते हुए मस्तकों को झुका दिया, और अन्धकार से प्राक्रान्त उसे छोड़ कर पक्षिगण (अपने-अपने स्थान पर बसेरा लेने) चले गये। सन्ध्या के समय, सूर्य के ढल जाने पर, लाल-लाल तारों से व्याप्त माकाश, रावण के हृदय की भांति लगता था, जिसमें देवताओं के वाणों से लगाये हुए अनन्त धाव हों। ६. सूर्य के डर से छिपा हुआ चन्द्रमा, जो समूद्र के जल के भीतर था अब (सन्ध्या हो जाने पर) यह जानने के लिये कि सूर्य चला गया या नहीं, अपने करों को (कर-हाथ- रश्मि) (बाहर निकाल कर) आकाश में चारों पोर फेर रहा है । १०. सध्या ने पहिले तो अन्धकार का भाव ग्रहण किया। फिर अतीव पिङ्गलवर्ण तारिकाओं का सृजन किया। तदनन्तर अपनी कलाओ के द्वारा (चन्द्रमा से) सम्पूर्ण भवन का एकीकरण किया। इस प्रकार उसने त्रिनेत्र (शिव) का रूप धारण किया। ११. दिन के अन्त होने पर, एक ही समय में, सूर्य के मस्त होने और सम्पूर्ण कलाओं से चन्द्रमा के उदय होने से ऐसा लगता है जैसे वे प्राकाश में, तराजू पर एजा-एक पलड़े पर ६. बैठे हो।

षोडशः सर्गः २०७ उदयमरुणिमां परित्यजन्तं प्रविसृजति स्म शशाङ्कमच्छविम्बम् । चपकममलमिन्द्रदिङ्मुखेन स्फटिकमयं मधुनीव पीयमाने ॥१२॥ शठमिवदयितं दिशः प्रदोपं मुहुरधिगम्य रुपेव भिन्नवर्णाः । स्थितिमुपरिपयोधरस्य सन्ध्या विलसितकुङ्कुममण्डन ममार्जुः ॥१३॥ क्षिपति निशि पयोधरे निशान्ते रहयति कि तिमिरोत्तरीयमाशा । इति रचितविपर्ययस्य साक्षिस्फुटमिव कौमुदमाततान हासम् ॥१४॥ परभूतरुचितासमं हिमांशोरुदयगिरेरुदितस्य मण्डलेन । अतिपटु पटलं विपाट्य विश्वं विवरगते विहितं नु संहृतं नु ॥१५॥ १२. उदय होने के समय की ललाई को छोड़ते हुए, चन्द्रमा का स्वच्च विम्ब, ऐसा लगता है, जैसे पूर्व दिशा ने स्फटिक के शुभ्र चषक (मदिरा का प्याला) से मदिरा पी डाली हो। १३. दिशाएं बार-बार यह देखकर कि प्रदोष (सन्ध्या) तो बड़ा धोखेबाज प्रेमी है जैसे मारे गुस्से के विवरणं हो गई और अपने स्तनों ( श्लेष-बादलों) पर विलास करते हुए चित्रण को उन्होने मिटा दिया। विशेष-प्रदोष के समय दिशाओं का रंग क्षण-क्षण में बदलता है और अन्त में सब रंग मिट जाते हैं, यह प्राकृतिक नियम है। १४. यह दिशा (नायिका) अपनी अन्धकार रूपी चादर, सन्ध्या के समय अपने स्तनों पर ओढ़ लेती है और रात्रि के समाप्त होने पर वह क्यों उतार कर फेंक देती है । उसके इस उलटे व्यवहार को देखने वाला कुमुद जोर से हंसा । विशेष -सन्ध्या समय दिशायें अन्धकार से ढक जाती हैं और फिर प्रातःकाल स्वच्छ हो जाती हैं। यह प्राकृतिक नियम है। सन्ध्या हुई, कुमुद फूला । उसके फूलने को कवि कहता है कि यह हंसा। वह क्यों हैसा? इसलिये कि उसने देखा कि दिशा रूपो नायिका को सन्ध्या के समय अँधेरे में जब उसे अपने को ढकने की कोई आवश्यकता न थी तब तो अपने स्तनों को अन्धकार रूपी चादर से ढक लेती है और प्रातःकाल जब उसे स्तनों को टंक लेना चाहिये तब वह उस चादर को उतार कर फेंक देती है। ऐसी उलटी रोति को देख कर वह हंसा । यह भाव है। १५. उदयाचल पर निकले हुए चन्द्रमा के मण्डल ने, कोयल की तरह काले विश्वभर के प्रति घने अन्धकार को छिन्न-भिन्न करके, क्या गुफापों को कन्दरा में रख दिया है या उसे नष्ट ही कर डाला?

२०८ जानकीहरणम इह हरिणकलङ्ककान्तिलेशैः सहपतिता मृगलक्षणस्य कान्तिः । अलिभिरवततैन्यंघत्त वापी कुमुदवनैरिति शङ्कितं जनेषु ॥१६॥ अचिरसमुदिताय हारगौरैः हिमशिशिरैरनुगृह्णते करोषैः । उदकलवपरम्पराभिरध्यं शशिमणितोरणमिन्दवे ततान ॥१७॥ द्युतिभिरवजितो निशाचरीणामहमतुलस्य न केवलं मुखस्य अयमपि हरिणो जितः कटाक्षैरिति जगतामिव दर्शयन् मृगाङ्कम् ॥१८॥ घृणिभिरधिपुरं पुरस्सुवेलक्षितिधरमस्तकजरैः पतद्भिः। प्रमदमधिमनो नितम्बिनीनां अभिनवनिर्धारशङ्कया वितन्वन् ॥१६॥ मनसि मनसिजं मनस्विनीनामविरलमुन्नमयन्निजेन धाम्ना । द्विपदशनरुचिः पदं कलानामुदयगिरेरुदियाय दिवप्रदीपः ॥२०॥ १६. 'यहां पर चन्द्रमा की कान्ति, उसके हरिण रूपी कलङ्क के टुकड़ों के साथ गिर पड़ी है'-इस प्रकार उस झील में फूले हुए कुमुद समूह को, जिन पर भृङ्ग मंडरा रहे थे, देखकर लोगों ने शङ्का की। १७. जैसे ही चन्द्रमा ने उदय होकर, चन्द्र कान्त मणि से बने हुए तोरणों को, अपने हिम के समान शीतल और हार के समान शुभ्र किरणों से अनुगृहीत किया (त्योंही उन पर चन्द्रकिरणें पड़ी) तो उन्होंने (तोरणोने) जल के कणों की पार से उसको मध्य दिया। विशेष -चन्द्रमा की किरणों के पड़ने से चन्द्रकान्त मणि से पानी यहता है, ऐसा कहना है। १८. "इन निशाचारियों के अनुपम मुखों को कान्ति ‘से हमीं केवल नही हारे हैं । देखो यह मृग भी उनके कटाक्षों से हार गया है", ऐसा कहता हुमा वह (चन्द्रमा) जैसे दुनिया को अपने मृगाङ्क को दिखला रहा है । विशेष-कान्तानां कुवलयमप्यपास्तमक्ष्णोः शोभाभिन मुखरुचाहमेकमेव । सहर्षा दलिवितरितोव गायल्लोलोर्मों पयसि महोत्पलं ननतः निभाय । १६. सामने सुवेल पर्वत के शिखर पर छिटक कर गिरती हुई किरणों के द्वारा, सुन्दर नितम्ब वाली स्त्रियों के हृदय में, एक नये निझर की शङ्का उत्पन्न कर उनमें काम का सञ्चार करता हुआ। विषेश-श्लोक १९ और २० 'विशेषक' है। २०३ श्लोक में 'उदयगिरेपदिपाय दिक् प्रदीपः' के साथ अन्वय होगा। २०. मनस्विनी स्त्रियों के मन में, अपनी प्रभा से, निरन्तर कामोद्दीपन करता हुआ, हाथी दांत के समान शुभ्र, कलापो का प्राश्रय स्थान, दिशानों का प्रदीप, (चन्द्रमा) उदया. चल से उदय हुआ।

रुचैव। पोडशः सर्गः २०९ गगनसरसि चन्द्ररूप्यकुम्भे व्यपसरति स्म निपातिते रजन्या। तदुपहित तरङ्ग धूतनीलीनिकरइवातिघनस्तमः प्रवाहः ॥२१॥ सुरकरिणइवाहतः करेण प्रवितत सन्तमसाम्बुराशिरिन्दोः । अनुपहतगतिदिगन्तवेलावलयवनानि विलङ्घयन् प्रतस्थे ॥२२॥ प्रियविरहसमागमाश्रयाणांमुखकमलानिनिशा नितम्बिनीनाम् । उदितवति मृगाङ्कचन्द्रविम्बद्युतिभिरिवोडुपतावलञ्चकार ॥२३॥ पथिकयुवतिदृष्टयोऽनुजग्मुः सरसिजरागमणिश्रिय शशिनि समुदिते शशाङ्ककान्तं किरणवृतं क्रियया निदर्शयन्त्यः ॥२४॥ अपिहितसलिलेन निष्प्रदेशं कुमुदवनेन कुमुद्वती विरेजे । घननिपतित मृङ्गचित्रभासा मृगरिपुचर्म कृतावकुण्ठनेव ॥२५॥ निशिपयसि पदानि कुर्वतीषु ग्रहनिकरप्रतिमासु मल्लिकाक्षः । इतरमपि जलाशयं निकूजन समुपससार कुमुद्वतीति हृष्टः ॥२६॥ २१. जय रात्रि (नायिका) ने चन्द्ररूपी चांदी के पड़े को आकाश रूपी सरोवर में गिराया तो उसरी उठी हुई लहरों ने सेवार के समूह रूपी घने अन्धकार को दूर फेंक दिया । २२. चन्द्रमा की किरणों के पड़ने से अन्धकार का समुद्र उमड़ कर दिगन्त के किनारे पर कड़े के समान स्थित बनों में चला गया जैसे देवताओं के हाथी ऐरावत के सदृश उन्हें यहाँ खदेड़ दिया हो। २३. राम ने चन्द्रमा के उदित होने पर प्रिय विरह के बाद मिलन का माश्रय पाने वाली नितम्बिनियो के मुख कमलों को मृग से अक्ति शशि की किरणों से मानो अलंकृत किया। २४. पथिकों की (विरहिणी) की मौखें जो पहिले माणिक्य की प्रभा की तरह लाल थी, परन्तु जय चन्द्र उदय हुमा तो उसकी किरणो से घिर जाने के कारण वे चन्द्रकान्त- मरिण के (स्वाभाविक) फाम को दिसलाने लगीं। विशेष-पथिकों को (पिरहिणी) स्त्रियों की आस पहिले पियोग के गोर से फेयल लाल थी, परन्तु चन्द्रमा के उदय होने से ये रोने लगीं। यह भाव है। २५. कुमुदिनी को लता, जिसने अपने पुषों के समूह से जल को ढक लिया था मोर जो शृगों के झं: के उन पर बैठ जाने से रंग-बिरंगी हो गई थी, ऐसी लगती थी जैसे उसने चीते की साल को मोड़ लिया हो। २६. रानि के समय तेरते हुए मक्षिकास (हंस विशेष) ने एक दूसरे तालाब में तारिणामों के गगृह की परमाई पड़ते देग, यह समझ कर कि वह कुमुदती है, बड़े हपं ये दना हमा गहाँ चला गया।

२१० जानकीहरणम इति तुहिनरुची विकीर्णधाम्नि प्रचुरतमोभिदुरस्वरश्मिजाले । मनसि गकरकेतनस्य यूनां विलसितमात्मनि विक्रिया विवन्नः ॥२७॥ स्वयमपि विरचय्य पत्रभङ्गीवंदनहिमद्युतिलक्षणं कयाचित् । !' · चिरयति हृदयेश्वरे रमण्या नयन जलेन फलच्युतां निरासे ॥२८॥ न भवति दयितस्य सन्निकर्पे फलरहितो विरहेपु तस्य रागः । इति मनसि निधाय यावकेन व्यचरयदन्यतरा न दन्तवासः ॥२६॥ इतरयुवतिपादघातचिह्न सरससमर्पित यावकं पदं यत् । उरसि न दयितस्य तद्विवेद स्फुटमणिकुण्डल रागरुद्धमन्या ॥३०॥ प्रियवचनविधायिनी न भर्तुः चलदलकच्युत चूर्णलेशमक्ष्णोः । मदनसमुचिताङ्गसङ्गिदृष्टेव्यपनयति स्म मुखानिलेन काचित् ॥३१॥ सुरपतिरिपवः प्रियानिरस्तश्रवणसरोरुह निर्वतेऽपि दीपे । रतिषु ददृशुरेव कांश्चिरत्रलद्युतिपरिभितमिस्रमूरुमूलम् ॥३२॥ २७. जव शीत रश्मि चन्द्रका ने चांदनी छिटका कर अपने रश्मि जाल से धने अन्धकार को मिटा दिया, तो कामदेव ने युवा पुरुषों के हृदय में अपने विलारा का विस्तार किया। २८. एक रमणी ने, जिसने अपने चन्द्रमा के समान मुख को स्वयं अपने हाथों से चित्रित किया था, जब देखा कि उसके हृदय के स्वामी के प्राने मे बहुत देर हो गई है, तो उसने उस चित्रण को, निरर्थक समझ कर, अपने आँसुओं से धो डाला । २६. 'जब प्रेमी पास रहता है तो यह यावक लगा नहीं रहता । घोर जब वह (प्रेमी) पास नहीं रहता तो उसकी कोई आवश्यकता नहीं रहती।' ऐसा अपने मन में सोच कर एक दूसरी स्त्री ने अपने ओठों पर यावक नहीं लगाया । विशेष -जब प्रेमी पास रहता है तो गोंठों पर यावक रहने नहीं पाता। चुम्बनों से वह उरो मेट देता है। यह भाव है। ३०. अपने प्रियतम के वक्ष पर, किसी दूसरी ,रमणी का लगाया हुआ गीले यावक का पद चिह्न, उस स्त्री के (माणिक्य) मणि के बने हुए कुण्डल की प्रभा में छिप गया । (अर्थात् कुण्डल को प्रभा के कारण उसने नहीं देख पाया, यह भाव है।) ३१. एक आज्ञाकारिणी स्त्री ने अपने लहराते हुए वालों से पति की आंखों में गिरे हुए 'पाउडर' (सुगंधित युकनी) को मुंह से फूंक कर नहीं हटाया। क्योकि उस समय उसकी प्रखेिं उसके कामासक्त करने वाले अङ्गों को देख रही थी। ३२. यद्यपि प्रेयसी ने अपने काम में लगे हुए फमल को फेंक पर दीपक को वुझा दिया था पर देवताओं के शत्रु, राक्षसों ने, रति के समय मेखला की मणियों से निकली हुई प्रभा से उसके उरु भागों को देख लिया।

पोडशः सर्गः विवसनविहितोतगृहनानां घनजघनस्तनकुम्भकुङ्कुमेपु । अपि परिगलितेषु कामिनीनां न विगलितानि तनूदराश्रयाणि ॥३३॥ चरणतल सरोरुहेण यत्त्वां प्रहृतवती शिरसि प्रियातिकोपे। स किलपरमनुग्रहः प्रसादे हृदिरचिते तव कीदृशो नु लाभ. ॥३४॥ अधरपुटमिदं मदातरामारभससमर्पितदन्त खण्डितं ते। अयि शठ परिशान्तये रुजायाः नयन जलेन निपिञ्चसि प्रसक्तम् ॥३५॥ करकिसलयगोपितं मुखं खं किमिह विधाय वदस्ययं ममाने । तिरयसि दशनक्षतं प्रियायाः वयमुत गौरवभाजनं किमेवम् ॥३६॥ इति वचसि रूपा परिस्खलन्त्यः प्रणयिषु राक्षसयोपितो विपक्षैः । परिमिलितविसजितेपु स्वां नयनजलग्नथितं वचो वितेनुः ॥३७॥ अपि तव दयिते समीपभाजि श्वसितरयग्लपिताधरस्य कान्तिः । चरणनितिने निपातितस्ते न च करुणा परिमन्थरः कटाक्षः ॥३८॥ ३३. कामिनियों के वस्नों के उतार डालने पर, प्रालिङ्गन से उनकी उभरी हुई जांघों मोर स्तनों का कुकुम तो पुछ गया पर उनके पतले कटि प्रदेश का कुंकुम नहीं पुंछा। ३४. कुपित होने के कारण अपने चरण कमल से जो उसने (प्रिया ने) तुम्हारे सर पर माघात किया है और फिर तुम पर हृदय से प्रसन्न हो गई है, तो इससे अधिक तुम्हारा क्या लाभ हो सकता है। ३५. मरे पूतं ! वाम-पीड़ित होकर उस ललना ने जो तुम्हारे मोंठों को जोर से काट लिया है तो उसके पाव को शान्त करने के निये तू उसे अपने प्रसुप्रों से सोचता है । (कितना बड़ा वंचक है तू! यह भाव है।) ३६. मेरे सामने तुम पपने विमलय के समान होप रो मुम को छिपा कर बोलते हो । इमका कारण यह है कि तुम्हारी प्रिया ने जो तुम्हारं मोंठो को दांत से काट लिया है उसे छिपाना चाहते हो या हमारा मादर रिया चाहते हो विशेष-कहीं-रहीं यह प्रया है कि गुरुजनों से बोलने के समम, लोग आदर के लिये, मुंह के सामने होप कर लेते हैं। ३७. जब उनो प्रेमियों को सौतों ने अपने गा मानिान से मुक्त किया तो राशग परिनयाँ पपनी पामों के जल से कंधे हुए, प्रोध के कारण पटर-पटक कर, दस प्रार पठोर वपन योनीं। ३८. "सर मुम्हारा प्रेमी (सौत को फोड़कर) तुम्हारे पाग पा गया तो क्या दीपं निवास सुम्हारे पपरों की नाति पर नहीं पा गये ? क्या तुम्हारे नयनों के पटाश, रमणा से बोले नही पड़ गपे गा यह तुम्हारे परणों पर गिर पड़ा?"

जानकीहरणम २१२ स्तनतटनिहितः . करोऽवधूतः परिगदिते समधिश्रितं च मौनम् । विहसितमपि सान्त्वने सरोपं प्रणयिजने युवतेरयं हि दण्डः ॥३६॥ सखि जहिहि रुपं हिनस्ति पश्चात्तव तरलं हृदयं पुरानुतापः । इति निपुणसखी गिरा निरासे मनसि निशाचरयोपितोऽभिमानः ॥४०॥ यदि चिरयति दूति वल्लभो मे भृशमनि त्वयि कि रुपोवकाशः । निजमतिरभसं यतो विदश्य क्षतिभिरिमं समयूयुजस्त्वमोष्ठम् ॥४१॥ मधुकुसुमविलेपनादि भागग्रहण विदर्शितसौहृदय्यवृत्त्या। अयमपि च सखि स्वयं वृतस्ते प्रियपरिभोग सुखस्य संविभागः ॥४२॥ दशन पदमतिस्फुटं विभाति स्फुरति तनुः श्रमवारिसिक्तमास्यम् । अवितथमभिधत्स्व कामिनी त्वां कुटिलगतिर्ननु दष्टवान् भुजङ्गः ॥४३॥ अवितथमिदमात्मनिर्विशेषा सखि भवसीति वचः पुरा यदुक्तम् । अभिदयितमनुष्ठितं त्वया हि स्वयमखिलं मम यत्नतो विधेयम् ॥४४॥ ३६. जब उसने अपने हाँथ को तुम्हारे स्तन-तट पर रखा तो तुमने (उस हाँथ को) हटा दिया, (उसके) बोलने पर तुमने चुप्पी साध ली, और उसके अनुनय विनय करने पर तुम (बनावटी) गुस्से से हँस दी, अपने प्रेमी के प्रति युवतियों का यही दण्ड होता ४०. 'हे सखी ! क्रोध मत करो। बाद में (अर्थात् गुस्सा उतर जाने पर) तुम्हारा पश्चात्ताप तुम्हारे कोमल हृदय को सालेगा।' इस प्रकार एक चतुर सखी के कहने पर उन राक्षस पत्नियों के मन से अभिमान निकल गया। विशेष-"जहि कोपं दयितोऽनुगम्यतां पुरानुशेते तव चञ्चलं मनः । शत प्रियं काश्चिदुपंतु मिच्छतों पुरोऽनुनिन्ये निपुणः सखीजनः । ४१. यदि हमारा प्रियतम (तुम्हारे पास) माने में देर करता है तो तुम क्यों इतना अधिक क्रोध दिखला कर अपना मोठ काटे डालती हो? ४२. मैंने जब इतने मित्र भाव से मदिरा, पुष्प, विलेपन आदि तुम्हारे साथ वाट कर लिया है तो हे सखि ! इससे तुम्हारा भी तो प्रियतम के साथ संभोग का सुख बढ़ गया होगा। ४३. उसके दांत काटने का घाव स्पष्ट देस पड़ रहा है, शरीर कांप रहा है, भ्रम के कारण मुंह पसीने-पसीने हो रहा है, सच-सच बतायो कि तुम्हारी कामासक्त अवस्था में उस कुटिल सर्प ने तुमको डसा है कि नहीं। ४४. हे सखि ! किसी समय तुमने कहा था कि तुम और हम पिलगुल एक समान हैं । वह विल्कुल सच निकला, क्योकि जो कुछ तुमने मेरे प्रेमी के साथ किया यह स्वयं मुझे मन से करना चाहिये था। --किरातार्जुनीयम् , मारवि षोडशः सर्गः २१३ इति रचितरुपः सहासगर्व श्रमजलबिन्दुचितं गुखं दधत्याः । श्रवणकटुनिशाचरस्य वध्वाश्चलित धृतरुपति वाग्जजम्भे ॥४५॥ श्वसित हतरुचिर्वराधरोष्ठः करतलसंक्रमितश्च पत्रलेखः । निजगदतुरुपागते.चिरेण प्रणयिनि राक्षसयोषितः प्रचिन्ताम् ॥४६॥ विफलपरिकरा विधायदूतीस्तदनु समेत्य च पृष्ठतो निलीनैः । युवतिनिगदितं सरोष गर्व परिहृषितैरुपशुश्रुवे तदीशैः ॥४७॥ क्षितिरियमघरस्य यत्सुरासु सुतसहकार रसाहिता तदस्तु। अतरल हृदयस्य गण्डबिम्बे तव कतरोध नखक्षतस्य हेतुः ॥४८॥ युवतिनयनचुम्बनेषु पक्ष्मप्रविरचिता पदुरञ्जनस्य राजिः । तव चपलनिरूपिता नवोद्यत्प्रविरलरोम्णि कथञ्चिदुत्तरोष्ठे ॥४६॥ युवति मुखगतेन लोचनेन स्फुटमपि मे न शृणोपि जल्पितानि । मुखमधुर भुजङ्ग येन सत्यं कुटिलगते नयनश्रवोऽपि जातः ॥५०॥ ४५. इस प्रकार सुनने मे कड़वे भौर श्रोध एवं ताने से भरे हुए वचन उस राक्षसी के जो अधीर हो उठी पो और श्रम के कारण पसीने से भरे मुख से, दूती के प्रति वचन निकले। ४६. जब उम राक्षस की पत्नी का प्रेमी देर से पाया तो उसके (राक्षस की पत्नी के) निश्वास से मघरों की चमक निकल जाने से, और उसके पर के चित्रण (चिन्ता से बार-बार रगड़ने से) हथेली पर उतर पाने से उसको चिन्ता का पता चलता था। विशेष-यसित चलित पल्लवापरोळे।' किरातार्जुनीयम् १० -३४, भारवि। ४०. जब दूतियां प्रेमियों को बुला लाने में असफल हो गई तो ये (प्रेमी लोग) वह चुपके से माकर पीछे छिप गये और यहाँ से उन युवतियों के क्रोध मौर गवं भरे वचनों को बड़े हर्ष के साथ मुना। ४६. यह हो सकता है कि तुम्हारे मघरों पर जो पाला पड़ गया है वह मदिरा में पाम का रस गिर साने से हुमा हो । पर हे कठोर हृदय बाती! यह तो वतामो कि तुम्हारे गालों पर यह नसात से हपा ? ४६. हे उतावते ! (उस) युवती की मांसो का चुम्बन लेने से जो तुम्हारी भोजती हुई बीदर मसो में उसकी बरोनी का काल सग गया है, वह स्पष्ट दिसाई पड़ रहा है। ५०. (उग) गुयती से मुग बी पोर. तुम्हारी मांग सगी होने के कारण मेरी स्पष्ट पारों को तुम मुन नहीं रहे हो । हे पिस्नी-गुपड़ी यात भरने पाले (भवासम्ब) तुम गगमुप दुटिल हो मोर (सर्प की मांति) तुम देवम मात्र से मुनते हो।

२१४ जानकीहरणम् इति मनसिजचञ्चलं युवानं रजनिचरप्रमदा निरूपयन्ती । अनिमिपनयना सहासवर्ग प्रणयरुपः प्रथनं वचोबभापे ॥५१॥ स्वतनु वितरणेन तं प्रलोभ्य द्विपमिव वन्यमिहोपनेतुकामा । सखि गजगणिकेव चेष्टितासि स्मरति हि सज्जन एव मित्रकृत्यम् ॥५२॥ अकरुणमधिगम्य तं मदर्थे विशसनमेवमसंहमास्थितायाः । क्षतमिदमधरस्य केवलं ते मम हृदयस्य सखि व्यथातुतीबा ॥५३॥ इति सखि हसितां कृतव्यलीकामरुणितलोचनरम्यवक्तबिम्बा । सुरिपु वनिताऽपदिश्य दूतीमकृतगिरः परुपा रुपापरीतः ॥५४॥ सरसिज मणि कुन्तलोपमुक्तं मधु पपुरङ्गजमन्थरा युवत्यः । कथमपि परिनिस्सृतस्तदीयो रस इति मुग्धतया विशङ्कमानाः ॥५५॥ ५१. इस प्रकार, उस कामासक्त होने के कारण चञ्चल युवा को दरसाती हुई, उस निशाचरी ने, उसको हिकारत भरी हंसी से, प्रांखें तरेर कर देखती हुई, प्रेम के कारण उत्पन्न क्रोध से कटु वचन बोली। ५२. हे सखि ! तुमने अपने शरीर के समर्पण से लुभा कर उसे यहां बुलाने की चेष्टा की है वह उस हथनी की भांति है जो बनले हाथी को लुभा-फैसा लेती है । सज्जन पुरुष मित्र के किये हुये काम को याद रखते हैं (भला मैं कैसे इस उपकार को भूल सकती हूँ) यह भाव है। ५३. हे सखि ! तुमने उस कठोर पुष्प के पास जाकर मेरे लिये क्लेश उठाया है। तुम्हारे अधर पर केवल घाव लगा है । परन्तु मेरे हृदय में उसकी बड़ी तीव्र पीड़ा हो रही + विशेष-सत्यमेव कथित त्वया प्रभो जीष एफ इति यत्पुरावयोः अन्य दारनिहिताः नखवणा- स्तावके वपुषि पीडयन्ति माम् । ५४. इस प्रकार वह तरुणी राक्षसी, जिसका मुख, क्रोध से लाल आँखों के कारण बड़ा सुन्दर लगता था, क्रोध से भरे, कटु शब्द, उस दूती से बोली, जो इतनी छलिया निकली, और जिसे और राखियां हंस रही थी। ५५. लात कमल के समान मणि अर्थात् माणिक्य के प्याते से ढाली गई मदिरा को पीकर, मदोन्मत्त होने के कारण मलसाई हुई मुग्धा युवतियों का शवा हुई कि यह मदिरा किसी न किसी प्रकार स्वयं (चषक से निकल रही है।)

षोडशः सर्गः हृदयवदनलोचनेषुः तासां मधु मदगन्धवपुः श्रियं निधाय । श्रमसलिलकणच्छलेन शुभ्रं बहिरभवच्छर पाण्डुगण्डविम्बात् ॥५६॥ मुकुलयति सितेतरं सरोज शशिनि समग्रकलास्पदे तदीयः 1 असितकुवलयद्युति कुरङ्गप्रतिनिधिरत्र ततान सीधुपात्रे ॥५७॥ प्रियगुणशतजर्जरैव पूर्व मधुपु चिरं परिभोगवत्सुलज्जा । न युवति हृदये पदं विधातुं मदमदनास्थिति सङ्कटे विपेहे ॥५॥ अभिनवरविबिम्ब लोहिनीभिद्युतिभिरभिन्नतया मनोहराभिः । सरसिजमणिशुक्तिषु प्रणष्टं युवति जनैर्मधु गौरवेण जज्ञे ॥५६॥ स्वयमथ पवनेन सौधपृष्ठे हृतरजसि प्रतिहारचोदितेन । किरणमनुपहत्य शीतभासः क्षणमधिगम्य पयोधरैःनिपिक्ते ॥६०॥ सुरयुवतिकदम्बकस्य गीतैरनुगत तुम्बुरुवल्लकी निनादे । सपदि परिवृतस्समन्मथेन त्रिदशरिपुः प्रमदाजनेन रेमे ॥६१॥ ५६. वह मदिरा उनके हृदय, मुख और नेत्र में, नशा, सुगंध मोर रंग को (अमानुसार) रख कर उनके नरकुल के समान पांडु गालों के बिम्ब पर पसीने के कणों के रूप में स्वच्छ होकर बाहर निकल पाई। ५७. जब चन्द्रमा ने अपनी सम्पूर्ण कलामों से नील कमल को बन्द कर दिया तो उसके (चन्द्रमा के) प्रतिनिधि, कुरङ्ग ने नील कमल के सदृश परछाई को मदिरा के प्याले में फैला दिया। ५८. प्रियतम के मनगिनती गुणों के कारण तो उसको लज्जा पहिले ही चूर-चूर हो चुकी थी, परन्तु जब उसने बहुत देर तक मदिरा पी तो उस तरुणी के हृदय में मद और काम के भर जाने से उसे (लग्जा को) पैर रखने तक की जगह न मिल सकी। ५६. मारिएकप का प्याला प्रोर मदिरा दोनों ही एक समान मनोहर पे और नवोदिन मूर्य के विम्ब के सहा लाल थे, इसलिये युवतियां प्याले की गुरुता ही से समझ पाती थी कि (उसमें सी)मदिरा समात हो गई। ६०. जब द्वारपाल की मात्रा से स्वय पवन देव ने राजमहल को झाड़-पोंछ कर धूल रहित कर दिया और बादलो ने, क्षण भर मे, विना पन्द्रमा की किरणों को रोके छिड़काव कर दिया। विशेष-लोक ६० और ६१'विशेष है। ६१वलोक के 'प्रमदा जनेन रेमे के साप अन्वय होगा। ६१. जब देयतामों की स्त्रियों गा रहीं थी पौर सुम्बुर की बीगा उना साय कर रही यो सब महमा गामामक्त होकर यम देवतानों के सत्र (गवण) ने युवती स्त्रियों के साथ रमण किया।

२१६ जानकीहरणम् मधुविनमित्तशातकुम्भकुम्भ स्रुतमखिलाननसक्तहेमशुक्तिः । सपदि दशमुखः पिवन् विजिग्ये सलिलनिधि ददिङ्नदोः पिबन्तम् ॥६२॥ तत विततघनाद्य वाद्यजातैः निजकरसन्ततिवादितैः स कः । त्रिविधकलपरिग्रहेण वक्तैर्युवतिमनर्तयताष्टभिश्च गायन् ॥६३॥ प्रति युवति विषक्तबाहुपतिर्दशवदनागत तन्मुखारविन्दः । सममथ परितः प्रिया निषण्णाः परिरमयन्न ददो रुषोऽवकाशम् ॥६४॥ इतरयुवतिदष्टदन्तवासाः वदनततिस्थित सीत्कृतिः प्रियाभिः । न वसुमनसिजन्मना शिरस्सु क्षतधृतिभिर्दयितो रुपाभिजध्ने ॥६५॥ शठ यदि चपकीकृतं मुखं मे किमधरमद्य विखण्डयस्यकाण्डे । भवति मधु निपीय भाजनानग्रसनरतिन हि कश्चनाप्रमत्तः ॥६६॥ ६२. तब उस दशमुख (रावण) ने जिसके प्रत्येक मुख में सोने की सुतुही लगी थी, सुवर्ण के घड़ों से ढरकाई हुई मदिरा को पीते हुए, (ऐसा लगता था जैसे) उसने समुद्र को परास्त कर दिया जो दशों दिशाओं से उसमें गिरती हुई नदियों को आत्मसात् कर रहा हो । ६३. तब वह अकेला रावण अपने हाथों की परम्परा से अनेक प्रकार के वीणा, पन मोर वाद्यों को वजाता हुआ और आठ मुखों से, मन्द, मध्य एवं तार सप्तकों में गाता हुमा एक युवती को नचा रहा था । टिप्पणी -रावण के दस मुख थे। आठ मुखों से तो यह गा रहा था, एक से बांसुरी बजा रहा था, और एक से नृत्य का निदेशन कर रहा था। 'वितत'-यह यंत्र, जैसे वीणा, जिस पर तांत खिचा हो। 'धन'-कांसे का बना यंत्र जिससे टन-टन फर ताल दिया जाता हो। 'आदि' में यांसुरी सम्मिलित है, ऐसा लगता है। ६४. उस रावण ने अपने हाथों की पंक्ति से प्रत्येक युवती को जो उसके पास बैठी थी, मालिङ्गन कर, और उनके मुख को अपने दसों मुखों के पास समेट कर (मर्यात् उनका चुम्बन कर) रावों के साथ एक समय में विलास किया। इस प्रकार उसने किगी को भी पोध करने का अवसरनहीं दिया। ६५. अब उराफे (रावण के) मोठ को एक तरुणी ने दांत से काट लिया और (उसके कारण) उसे सभी मुखों से सीत्कार का शब्द निकला तो भन्य सभी युवतियों ने जिनका कामा. रात होने के कारण धैर्य छूट गया था, उसके याकी नवों सिरों पर प्रहार किया। ६६. 'हे पाठ ! जब तूने मेरे मुस से मदिग के प्याले का काम लिया तो तूने बिना पिगी कारण मेरे मोठ को क्यो काट लिया ? किमी मदाय को मदिरा पीकर प्यासे के पोंठ को चबाने की रुचि नहीं होती ?'

षोडशः सर्गः पिवति कथमिवापरा युवत्या दशन पदैः परिमुद्रितं तवोष्ठम् । इति युवतिजनेन राक्षसेन्द्रः स्फुट रचित भृकुटी पताकमूचे ॥६७] अथ कटकनिवास दृप्तनागः प्रविततधातुविभूपितः सुमेरुः । द्युतिमभृत पुरत्रयस्य भेत्तुः शिरसि मुहुः स्थितशीतरश्मिबिम्बः ॥६८॥ त्रिभुवनभयरोगदानवन्तं द्विपमिव निर्भयमेत्य दानवन्तम् । नवशशधरकोटि धामदन्तं दधतमगुः सुरमागधामदेन्तम् ॥६६॥ मेरोःशृङ्गंतुहिननिकरस्पर्शशीतश्शशीतः पृथ्वीभागोऽप्यरुणकिरणैर्व्यक्तमस्तस्समस्तः धुन्वन्पङ्क्ति वहति कुमुद प्रेमलीनामलीना- मस्यन्वीचीनिलयमनिलस्सारसन्तं रसन्तम् ॥७०॥ मुञ्चधुदधिरुदकहासवेलां सवेलां याता निद्राविगमविरुतीश्चाविरामा विरामाः । पाण्डुच्छायामुपयति दिशामाननेनं ननेतं ताराचक्र विगत किरणोल्लासमस्तं समस्तम् ॥७१।। . ६७. "जब किसी दूसरी युवती ने तुम्हारे ओंठ को काट कर उस पर चिह्न बना दिया है तब कोई दूसरा कैसे तुम्हारा अघर-पान कर सकता है ?' इस प्रकार भौहों को चढ़ा कर युवतियों ने राक्षसों के स्वामी (रावण) से कहा । सुमेरु पर्वत जिसके ढलवान पर मस्त हाथी निवास करते थे, जो विखरे हुए धातु (गैरिकादिक) से शोभायमान था और जिसके शृङ्ग पर चन्द्रमा का मण्डल था, वह तीन नगरों के विध्वंस करने वाले, शिव की शोभा को क्षण-क्षण मे धारण करता था। विशेष-शिव के पक्ष में (१) 'कटक' =कमर के पास (२) दृप्त नागः = भयंकर सर्प। (३) 'प्रवितत धातु विभूषितः' =भस्म से विभूषित (४) शिरतिमस्तक पर। ६६. देवताओं के मागध, नशे में चूर, उस दानव के पास (गाना गाकर जगाने के लिये) गये, जो तीनों लोकों को व्याधि मोर भय का दान देने वाला था, जो मस्त हाथी के समान निर्भय था और जिसके दांत, अथं चन्द्र के कोने के समास नुकीले थे । बर्फ के चट्टे के स्पर्श के समान शीतल चन्द्रमा मेरु के पर्वत के शृग पर चला गया। लाल किरणों से पृथ्वी का भाव, अन्धकार से पृथक् दिखलाई पड़ने लगा। कुमुद में प्रेम से घुसे हुए भृगों को वायु उड़ाने लगी और कूजता हुमा वह सारस लहरियो के ऊपर खड़ा हो गया। ७१. समुद्र के उतार (भाटा) होने पर मूर्य किनारे से लौट रहा है । चिड़ियां, निद्रा के प्रद. सान पर (जागने पर) निरन्तर चहचहा रही हैं । मौर दिशामों का मुख, प्रातःकाल होने पर, पाण्ड हो गया तो समस्त तारा मण्डल, क्षीण किरण होकर, प्रस्त हो गया। विशेष-विरामा' =विपक्षी, रामा' स्त्री-अर्थात् चिड़िया । २८ २१८ जानकीहरणम ऋक्षश्रेण्यांविहित परिघोल्लङ्घनायां घनायां सौमित्रे चागतवति रिपुत्रासहेती सहेतौ । को रामे च घ्नति परभटस्तत्स हस्ते सहस्ते कि तत्सैन्ये प्रहरति रिपुच्छिद्यशेषेऽद्यशेष ॥७॥ रक्षोलोकविनाशनेषु रहितच्छेदं सितो दंसितो . दृप्तः पाणियुगेन दुस्तरतरस्स्वर्हेतिना हेतिना। युद्धायोपगतः करोति मनसां कम्पंसनः पंसनः सेयं मानदतावदश्रुतपुराक्रोशायिता शायिता ॥७३॥ नक्तं नक्राधिवासं कुसुमशरशतत्रासितानां सितानां क्रीडायामङ्गनानां घनकुचकलशैः कातरं तं तरन्तम् । उत्थाप्यैवं ततस्ते सततरतिसुख व्यासकामं सकामं तूष्णीमासन सशङ्खध्वनिपटहरवज्या निशान्ते निशान्ते ॥७४॥ इति षोडशः सर्गः। ७२. जव रीछों की भारी सेना, फाटक को लांघ कर भीतर पुस आवेगी, जब शत्रुनों को 'दहलाने वाले, सुमित्रा के पुत्र (लक्ष्मण) अस्त्र-शस्त्र के सहित चले पायेंगे और जब राम और उनकी सम्पूर्ण सेना के प्रहार से शत्रु लोग (राक्षस) विदीर्ण हो जायगे तब आपके पास कोन ऐसा वीर है जो उनके प्रहार को सह सकेगा, जब पाप सो रहे हैं । ७३. राक्षसों का अच्छी तरह विनाश करने पर तुले हुए, अपनी दीप्ति से प्रसन्नचित्त, अपने दोनों हाथों में दुर्जेय दिव्यास्त्रों को लिये युद्ध के हेतु माये हुए, राम, हम लोगों के हृदय में कपकपी पैदा कर रहे हैं । हे मान की रक्षा करने वाले ! (रावण), भाप नगर के क्रन्दन को न सुन कर, सो रहे हैं। ७४. रात्रि के अन्त में जब बाह्य की ध्वनि भौर नगाड़ों का नाद समाप्त हो गया, तब रावण को, जो अपने कमरे में सो रहा था, जो कामदेव के वारणो से व्यथित सुन्दरी स्त्रियों के साप विलास. में रत होकर उनके स्थूल कुच कलपा के सहारे रात्रि रूपी समुद्र में तैर रहा पौर जो निरन्तर रति में लिष्ठ होने से कामासक्त होकर कातर हो गया था, जगा- कर दे मागध घुप हो गए। था, सोलहवा सर्ग समाप्त।

अथ सप्तदशः सर्गः प्रणम्य भक्तयाथ पितामहं महं विधाय बद्धादरमग्नये नये । स्थितस्सुवेलादचिरादगा दगा दजस्य बन्धुः समरक्षमा क्षमाम् ॥१॥ द्विषो हि तस्यारिनिवारणे रणे विधित्सव. पौरुपदर्पदं पदम् । हुताशनाम्नि द्युतिभासुरे सुरे विधि वितेनुवंलिसंहितं हितम् ॥२॥ प्रथाजनक्ष्माधरपीवरो वरो गतः सुहृद्वक्त्रविकासदः सदः । इमानि वाक्यानि दशाननोन नो जगाद वह्निप्रविकसभा सभाम् ॥३॥ यथा भवन्तो मयि घोरतारताः हिताह्वयं प्रेमसुशीभर भरम् । वहन्ति नैवं जननी सती सती प्रियात्मजो नाप्यनुकम्पिता पिता ॥४॥ तदेतदस्मिंस्तु कथं भवे भवेदनेकशो यन्मयि नाहितं हितम् । असौ च कीर्ति वि सानया नया गुणेन वो मामभिरक्षता क्षता ॥५॥ जगत् के स्रष्टा, ब्रह्मा को भक्ति से प्रणाम कर मौर अग्नि की पादर के साथ, विधि- वत पूजा कर, वह उचित नीति का पालन करने वाला, मज का वंगज, मुवेल पर्वत पर से समर भूमि में अविलम्ब मा गया । १. '. २. दाघु (रासस) ने भी युद्ध में अपने शत्रु (राम) को रोकने के लिए ऐसे मौके के स्थान को चुनने की इच्छा से जो उनके पोप एवं दपं के अनुकूल हो, प्रज्ज्वलित अग्निदेव का बलि के साथ विधिवत पूजन किया। ३. सब वह श्रेष्ठ रावण जो, मजन के पर्वत के समान वृहदाकार पा मोर जो मित्रों के मुस को प्रफुल कर देता था, सभामण्डप में गया पोर वहाँ पर उसने अग्नि के समान लपलपाते सभासदों से ये वचन कहे । ४. जिस प्रकार रढ़ता भाप लोग हमारे हित में लगे हुए हैं, जो प्रापके प्रेम से बड़ा स्निग्ध हो गया है, वैसा प्रेम न तो माता पोर न पतिव्रता पत्नी, न प्यारे पुन मोर न दयालु पिना ही में होता है। पहिले कई यसरों पर प्राप मोगों ने मेरा कोई पहित नहीं दिया है। अब इग पवसर पर उसके विपरीत कैसे हो सकता है ? मंमार में मेरा जो यह पा है यह मे सन हो सकता है जब पाप अपनी राजनीतिक प्रतिमा तपा गुणों से मेरी रक्षा कर रहे है ?

२२० जानकीहरणम् प्रसहय कर्तुं हृतवैभवं भवं भयं विधातुं च विवस्वतः स्वतः । भवत्सु नित्यं ननु शक्तता तता तथापि मानेन न साधुता धुता ॥६॥ बलेन वस्तेन भयानके नके रणस्य भीमस्य बभञ्जिरेऽजिरे । प्रकम्पते येन कृते, रवे रवेरनूनमा मातलि सारथी रथी ॥७॥ पुरेव यूयं युधिकातरे तरे जनादितस्तीव्रमसुन्दरं दरम् । बले रणस्थेऽयुगलोचनं च न: पिशाचिका ताण्डवलासकः सकः ॥८॥ युधि प्रचेता विषवाहिना हिना जनस्य कण्ठे कृतशृङ्खलः खलः । सलीलवीक्षाविधितजितो जितो भवद्भिराक्रोश हुताशनैः शनैः ॥६॥ प्रकाशितक्रोध समुद्भवो भवो गणध्वजिन्या च समन्ततस्ततः । प्रयाति यो भीतिमजय्यतोयतो न कोपरस्त्रस्यति हस्ततस्ततः ॥१०॥ परद्विपासृक्स्रवलोहितोऽहितो निकृत्तविद्याघर चारणे रणे । उमासुतः शक्तिवियोजितो जितो भवद्भिरभ्रध्वनिभैरवै रवैः ॥११॥ आप शिव के वैभव को बलपूर्वक छीन सकते हैं और प्राप स्वयं सूर्य के हृदय में भय उत्पन्न कर सकते हैं । सर्वदा आपकी शक्ति का इतना विस्तार रहा है । इतने पर भी, गर्व के कारण आपने हमारे प्रति अपनी साघुता नहीं छोड़ी। कौन ऐसा है जिसे आपकी दुर्घपं सेना ने घोर समर भूमि में नहीं पछाड़ा? मातलि जिसका सारथी है ऐसा इन्द्र भी जिसका तेज सूर्य से कम नहीं है, रथ पर चढ़ कर प्रापकी सेना के कोलाहल से कांप उठता है। आप युद्ध में वैसे ही निर्भय हैं जैसे पहिले थे। राम भर्त्य है। उससे बहुत डरना भापके लिये प्रशोभन है । हम लोगों की सेना जब युद्ध-भूमि में उतरेगी तब उसके सामने यह तीन नेत्र वाला, पिशाचियों का नचनियां क्या चीज है ? ६. मनुष्यो की गर्दन मे विपाक्त सर्प की रस्सी डालने वाला, यह शठ, वरुण आपकी साधा. रणसी दृष्टि ही से डपटा जा चुका है और केवल गालियों से माप लोगों ने उसे परास्त कर दिया है। १०. जब अपने त्रोध को प्रदर्शित करते हुए मोर अपने गणों की सेना से घिरे हुए, शिव डर जाते हैं तो इन पजेय भुजामों से मोर कोई दूसरा पयों न भयभीत हो जाय ? ११. युद्ध में विद्याधरों और चारणों को मार कर, माप लोगों ने, पार्वती पुत्र (कार्तिकेय) की, जो शत्रुओं की सेना के हाथियों के रुधिर से लाल पर्ण हो गये थे, मपने मेप के समान भीपरए नाद से जीत कर, शक्ति को छीन लिया था। ८.

सप्तदशः सर्गः २२१ जयन्त्यमित्रा युधि संनयं नयं समुन्नता यत्र च शूरता रता। तमप्यपश्यं मदवजितं जितं गुरुं भवद्भिः क्षतविग्रहे ग्रहे ॥१२॥ जनाधिपः संयति धामतो मतो जहाति नित्योन्नत शासनस्सन । प्रपद्य सन्नाति महावलं वलं रणाभि दीक्षाविधिसंवरं वरम् ॥१३॥ वलद्विपः प्रोच्छ्रितगोपुरं पुरं जयाद्भिरुन्मूलिततोरणे रणे। स्थितैर्भवद्भिर्वलदामदे मदे न संग्रहीता रिपुभङ्गदा गदा ॥१४॥ रणे हुताखण्डलपौरुपो रुपो रयेण तन्वन् महतिस्वरं स्वरम् । सुरेषु को नारिभयंकरं करं न्यपातयद्यो जयभागुरुं गुरुम् ॥१५॥ जिता न शक्त्या युधिभीमया मया सविष्फुलिङ्गायुध सञ्चया चया । असौ भवद्भिः कृतयाचिता चिता मरुच्चमूरचिषु नामिता मिता ॥१६॥ - ॥१७॥ १२. राजनीति में प्रतिभावन्, देवताओं के गुरु (वृहस्पति) जिन्हे युद्ध में शत्रु नही जीत सकते और जिनमें उच्चकोटि की वीरता भरी है, उनका भी गर्व माप लोगों ने, उस लड़ाई मे, जिसमे शत्रुओं के शरीर क्षतविक्षत हो गये थे, चूर्ण कर दिया था। १३. यह जनाधिप (कुवेर) जिसके शौर्य के कारण, उसका शासन प्रतिदिन उन्नत हो रहा है, रण मे माकर हमारी नीति में बलवती सेना के सामने, जो विद्या में अपना (लड़ने का)इरादा छोड़ देता है। १४. ऊँचे-ऊंचे मीनारो वाले, इन्द्र के नगर के प्रवेश द्वार को जड़ से उखाड़ कर जब मापने उसे जीता तब मद में मत्त, आप लोग तो, अपने साथ शत्रुओं का नाश करने वाली, अपनी गदा (भी) नहीं ले गये थे। १५. प्रोध के आवेश में भयानक गर्जन करते हुए मोर युद्ध में इन्द्र के पौरप को खण्ड-खण्ड फरते हुए, आपमे कौन ऐसा जय की इच्छा रखने वाला वीर है, जिसने देवतामों के वक्ष पर शत्रुओं को दहलाने वाली, अपनी भारी भुजा को नहीं मारा। १६. देवताओं की अपार मौर संगठित सेना, जिसमे लपलपाते हुए मस्त्रों का समूह,पा, पौर जिसे मेरी 'शक्ति' नहीं हरा सकी उसे माप लोगो ने हमारे चरणों पर मुका दिया। (मर्थात् उमे जीत लिया)। १७. (यह श्लोक मूल में नहीं है।)

२२२ जानकीहरणम रणस्य युक्ता फणबन्धुरा, धुरा वितन्वती दर्शितरंहसं हसम् । भुजङ्गसेना प्रियसंयता, यता वलेन वो वासुकि चोदिता दिता ॥१८॥ अनन्तनाम्नश्च फणावतोऽवतो विपैरमित्रानभिहिंसतस्सतः । स्थितस्य तेजस्य विखण्डिते डिते सुरारिभिः प्रस्फुरदीहता हता ॥१६॥ इति प्रतापैररितापदं पदं श्रितैर्भवद्भिः सहसेनयाऽनया। स जीयतां संयति मानवो नवो गृहीत मौजीकृतमेखलः खलः ॥२०॥ यमेत्य नष्टः कुलशेखरः खरः कृतं च मे वैरमसाधुनाऽधुना अनेन दर्पादभिभाविना विना विनाशतीयो भुवि कोपरः परः ॥२१॥ यतो विनाशेन विजितोजितो रिपुप्रवीराङ्ग विदारणे रणे। न संमुखं तिष्ठति वासवः सवः कथैव का संभृतवानरे नरे ॥२२॥ यशस्युपते ममता नवं नवं सहे न दैन्यं बलहानिजं निजम् । करोमि यद्यझि युगानतं नतं जुहोमि हस्तौ कटकोचितौ चितौ ॥२३॥ १८. सुन्दर फरणों से संयुक्त, युद्ध का भार उठाये हुए, और तेजी के साथ-साथ हंसी बिखेरती हुई, वासुकी के नेतृत्व में नागों की सेना को पाप लोगों की सेना ने टुकड़े-टुकड़े कर दिया । १६. नागों की रक्षा करने वाला अनन्त, जो शत्रुओं को विप से मार डालता है, जो अपने प्रखंडित तेज के कारण मौज से मपने स्थान पर अडिग है, देवताप्रो के शत्रु माप लोगों ने उसकी उद्दीप्त इच्छा का विनाश कर दिया । २०. आप लोगों ने अपने प्रताप से शत्रुषों सन्तप्त करने की प्रतिष्ठा पाई है, अपने इस सेना के साथ, इस दुष्ट को जो नौसिखिया मनुष्य है भौर जो पास की बनी करपनी पहिनता है, युद्ध मे जीते। २१. जिसने हमारे कुल के सिरमौर खर को मार डाला, जो दुष्ट मद मुझसे वैर ठानता है, और मारे गवं के हमारे ऊपर भाक्रमण करता है, उसके अतिरिक्त, संसार में, पौर दूसरा कौन हैं जिसका विनाश किया जाय? २२. जब घुओं का नाश करने वाली सेना के सामने, इन्द्र जिसका यश अपहरण कर लिया गया है, मुंह सामने नहीं कर सकता तो इस मनुष्य की कौन गिनती, जिसने बन्दरों को एका कर रमा है ? २३. मेरा या जो नया-नया (मर्थात् पहिली पार) शत हुमा है मोर उसके कारण अपने यल की हानि होने से जो (मुझे) ग्लानि हुई है, वह मुझरो राही नहीं जाती। या तो मैं उसे (गम मो) अपने चरणों पर नत करूगा या इन भारी भुजामों को, जो बाजूवन्द पहिलने के योग्य हैं. मग्नि में भोंक दूंगा।

सप्तदशः सर्गः २२३ मुखं यदीयं मदषट्पदा पदा विहन्यते फुल्लकुशेशया शया । असौ दहन्ती स्मरधामनो मनो हतं निरीक्षेत सदेवरं वरम् ॥२४॥ सुता नरेन्द्रस्य सबान्धवं धवं निरीक्ष्य युद्धे महतीहतं हतम् । बलानुरक्त मयि तद्विधा द्विधा प्रयातु शोपं व्रजतो रसा रसा ॥२५॥ समैव मुक्ताऽवनि कम्पदं पदं वितन्वती शाश्वमाकुलं कुलम् । विधातुकामा स्फुरदङ्गदा गदा शुभाथ हारेण विवलगता गता ॥२६॥ जगाम काश्चिनिजवेश्मनो मनो विधाय तन्व्या मृदुवालकेऽलके । भृशं किरन्त्याश्रु पयोधरे घरे निरीक्ष्यमाणो बहुचिन्तया तया ॥२७॥ विलासिनी पायित सत्सुरोऽसुरो वहन्नुरः कुङ्कमचचितं चितम् । ययौ विमानादतिपानतो नतो विगृह्य भूचुम्बनलम्पट पटम् ॥२८॥ तथापरः कङ्कटशोऽभितोऽभितो धृतं विसर्पन मदवासितं सितम् । रणाय बद्धांशुक सुन्दरो दरो गजं जगामासुरयोनिजं निजम् ॥२६॥ २४. यह सीता, जिसके मुख पर विकसित कमल के धोखे में मत भौरे आत्रमरण कर रहे हैं, और जो मेरे कामासक्त मन को दग्ध कर रही है, वह देवर के सहित अपने पति को मरा हुप्रा देखे। २५. अपने वन्धु-बान्धवों महित अपने पति को युद्ध में मरा देख कर इस राजपुत्री (मीता) का हृदय प्रेम-विहीन हो जाने से दो टूक होकर सूख जाय । २६. इस प्रकार (रावण के) कहने पर सभा चमचमाते मङ्गदों मोर झूलते हुए हारों से सुशोभित, पृथ्वी को कंपाने वाले पदचाप का विस्तार करती, शत्रुमों के कुल को व्याकुल करने की इच्छा से, विसर्जित हुई। २७. एक राक्षस, अपनी छरहरी प्रेयसी की मुलायम मलकों मे मन को छोड़कर अपने घर के बाहर चला गया और वह (प्रेयसी) बड़ी चिन्ता से अपने स्तन और अधर पर आंसू निरन्तर गिराती हुई उसको निहार रही थी। २८. एक राक्षस, जिसको उसकी विलासवती (प्रेयमी) ने बहुत बढ़िया मदिरा पिला दी थी, अपने पक्ष पर उसके कुंकुम की चित्रकारी लिये हुए (जो प्रिया के मालिङ्गन करने से उपट भाई थी), अधिक मदिरा पीने से भुका हुअा, मोर जमीन पर लथरते हुए यस्त्र को पकड़े महल से निकला । २६. एक दूमरा (राक्षस) कमर मे मुन्दर फेंटा लपेटे, पवच पहन कर, रण के लिये उद्यत, ममुरों के नस्ल वाले, अपने सफेद हापी के पास, जो मद के कारण सुगन्धित था पौर जिसे चारों ओर से लोग पकड़े थे, चला।

in २२४ जानकीहरणम् द्रुतं दृढैवर्मभिराततस्ततः समारुरोहाहव तत्परः परः । सृजन्तमाधोरणकामदं मदं बलं दधानं मदवेगजं गजम् ॥३०॥ कृता बलौघेन तथा यता यता रजस्ततिः प्रावृतदिग्धना घना । यथा रवेरश्वपरम्परा परा ययौ निमज्जत्खुरमालयालया ॥३१॥ ततो विनिर्गम्य वलं पुरः पुरः स्थितं ययौ निग्रहवद्विपं द्विषम् । कपीन्द्रमाजी विहितत्वरं त्वरं वहन्तमन्तस्थित पन्नगं नगम् ॥३२॥ उपेत्य गत्या मदमन्दया दया वनौकसः स्वीकृतशोभया भया । प्रवाल शोभाजित विद्रुमै द्रुमैः दृढं निजघ्नुः गिरिसन्निभानिभान् ॥३३॥ असृक्स्रवैराहव दारुणारुणा चचार दीप्ता निजवर्चसा च सा । पताकिनीवीतभयामयो मयो विनिजितः संयति मायया यया ॥३४॥ द्विषद्भिरन्तस्थ महोरगैरगैर्हतस्य कस्यापि समन्ततस्ततः । स चर्म मांसे हि विदारिते रिते गतायुपः प्रस्फुरदस्थिता स्थिता ॥३५॥ ३०. तवं एक दूसरा (राक्षरा) मजबूत जिरह वख्तर से ढका हुआ, युद्ध के लिये तत्पर, तुरन्त उस हाथी पर चढ़ गया जो मद के कारण बड़ा बलवान् हो गया था और जो महावत की उपेक्षा कर निरन्तर मद वहा रहा था । ३१, बढ़ती हुई सेना से उठे हुए घने धूल के समूह ने दिशाओं और बादलों को इतना पाच्छादित कर दिया कि मूर्य के घोड़ों के नश्वर खुरों की पंक्ति उनमें (घूल के समूह में) घस कर कष्ट पाने लगी। ३२. नगर के बाहर निकल कर राक्षसों की सेना, सामने खड़े हुए, (अपने) शत्रु, वानरों के के स्वामी, के पास पहुंच गई, जो मूर्तिमान विप लगते थे मोर जो युद्ध के लिये पातुर, फुर्ती से पहाड़ उठाये थे, जिसके भीतर सर्प भरे थे। ३३. प्रपनी सुन्दर एवं मद के कारण धीमी चाल से (उन) निर्भीक मोर निर्दय वानरों ने, मागे यढ कर, पर्वत के समान हाथियो पर, वृक्षों से, जिन्होंने (मपने) मधुमी से मूंगे को मात कर दिया था, जोर का प्राघात किया। ३४. मुख में दारण, यहते हुए रघिर से लाल, पौर अपने प्रताप से देदीप्यमान, जिसने भय और व्यापि से रहित मय (दागव) को माया के बल रो पछाड़ दिया पा ऐमी (राक्षसों फी) सेना (युद्ध भूमि में) घूमने लगी। ३५. जप एक राग को, पत्रुपों ने, सो से भरा पहाड़ सीप कर मारा तो उसकी गाल पोर मांग उघड़ फर पारो पार बिगर गये मोर यह मर गया । वन उगमा पमाता हमा परिय पार पहारह गया।

सप्तदशः सर्गः २२५ विपाट्य कचिद्विज खटं वटं शिखाभिरम्भोदवितानगं नगम् । मुमोच सैन्यस्य ययं दिशन् दिशन निनादयन् संयति तारवै रवै ॥३६॥ विपाट्य वेगादितरो नदन्नदं निपात्यशैलं जितभूभुजैर्भुजैः । रुरोज कस्यापि गदाकृती कृती ययौ सभूमिं रथ पक्षतः क्षतः ॥३७॥ पतद्भिरस्त्रैरभिदारितो रितो भुवोऽपरः शोपितशीतले तले। अशेत सर्पदशनांशुना शुना हतो विलुप्तः परिराविभिर्विभिः ॥३८॥ तथापरो भूरुह धारिणारिणा हतो दृढं कुङ्कमपिङ्गले गले । विवृत्तदृष्टियुधि मोहितो हितो महीतलं शोणित मिश्रितःश्रितः ॥३९॥ बहून्निहत्य द्युतिभासिनाऽसिना पैपात पश्चादसुदारिणा रिणा। नगेन कुञ्जस्थित भोगिनागिना हतस्फुरन्मस्तक कर्परः परः ॥४०॥ - जिनैर्वलैरेव सुरक्षितौ क्षितौ वितत्य तेजोजितभास्करी करौ। अशेत कश्चिज्जितवैरिणाऽरिणा हतो रणे विक्रमवस्तुतः स्तुतः ॥४१॥ ३६. एक (बन्दर) ने एक बरगद के पेड़ को, जो चिड़ियों का निवास स्थान था, जिसकी (छतनार) डालियां, चंदोवे के समान वादलों तक पहुँचती थीं और जिसके निनाद से दिशायें गूंज उठी, सेना की ओर फेंका । विशेष--खवंट पहाड़ को तराई का माम । यह बरगद का पेड़ इतना बड़ा था जैसे चिड़ियों के बसने का कोई ग्राम हो । मह भाव है। ३७. एक चतुर वीर ने अपनी भुजामों से, जिनसे उसने राजाग्री को जीत लिया था, नाद करते हुए झरने से युक्त एक पहाड़ी को फुर्ती से उखाड़ कर फेंका तो एक शत्रु का शरीर और (उसको) गदा चूर-चूर हो गये और वह माहत होकर, रम के एक मोर से भूमि पर गिर पड़ा। ३८. गत्र के चलाये हुए बाणों से, सब मोर से चिय-चिथड़े किया हुमा एक दूसरा, रुधिर से शीतल भूमि पर लेट गया, और उसे कुसे ने अपने चमचमाते दातो से और दोर मचाती हुई चिड़ियों ने अपनी चोंच से टुकड़े-टुकड़े कर डाला। ३६. इसी प्रकार युद्ध में एक दूसरे (पत्र) को, पर्वत को उठाये हुए एक पात्र ने उसके केसर के समान पिङ्गल वर्ण गर्दन पर जोर से मापात किया तो उसकी मांग विवृत हो गई मौर वह बेहोश होकर रुधिर से सनी भूमि पर गिर पड़ा। ४०. एक दूसरा (राक्षम), मपनी चमचमाती तलवार से बहुतों को मार डालने के बाद, एक प्राण लेने वाले पान के हाय मारा गया, जिमने (एक) पहाड़ से, जिसमे सपं और हापी रहते पे, उसके सोपड़े को तोड़ डाला। ४१. एक (रासस) जो पुट में मपने विक्रम की प्रशंसा के साप पाया पा, यह किसी विजयी दान के हाथ से मारा जाकर, सेना से सुरक्षित भौर मूर्य की पमर को हराने वाली भुजाओं को पसार कर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

जानकीहरणम इति क्षताफेनवसासृजो सृजो रुचिप्रतानेन. सुचारुणाऽरुणा। सुरारिसेना पुरमुद्रतं द्रुतं ययौ समेपि स्खलितापदापदा ॥४२॥ एवं सैन्यं जितमधिगतत्रासमस्तं समस्तं श्रुत्वा रोपज्ज्वलितवदनो भासमानस्समानः लङ्घानाथो नृपसुतमुपानीतदारं सदारं । हन्तुं युद्धे तनुजमवदगीमहासं महासम् ॥४३॥ इति सप्तदशः सर्गः। ४२. इस प्रकार देवताओं के शत्रुओं (राक्षसों) की सेना पीटी जाकर, फेनिल रुधिर और चर्वी से चमकती हुई, लाल होने के कारण जो बड़ी सुन्दर लग रही थी, चिल्लाहट से भरे नगर के भीतर, आपत्ति की मारी, समतल भूमि पर भी लड़खड़ाती हुई तेजी से भागी। ४३. इस प्रकार अपनी सम्पूर्ण सेना को भयत्रस्त होकर हारी हुई सुन कर, अभिमानी लाधिपति (रावण) का ज्योतिवान चेहरा क्रोध से जलने लगा। (तब) उसने अपने भाई, धनुर्धारियों में श्रेष्ठ (इन्द्रजित) से, जो भयङ्कर अट्टहास करने वाला था, राज- पुत्र (राम) को जिसकी पत्नी को वह उड़ा लाया था, युद्ध में, चीथ कर मार डालने के लिये कहा। सत्रहवां सर्ग समाप्त।

अथ अष्टादशः सर्ग: संग्राम शजिद्यास्यन् प्रादक्षिणयदीश्वरम् । स्निग्धमालोकितः पङ्त्या तस्यैव परितो दृशाम् ॥१॥ प्रणम्य च तो भक्तया विज्ञाय समयं मयम् । निजंगाम पुरः कर्पन् केतुभिःशवलं बलम् ॥२॥ गूढ़ चतुर्यम्- कणन्तश्चक्रितैश्चापैरसृग्गन्धकृतौजसः । घोरेपु वितति तत्र सृजन्तश्चक्रिरे रणम् ॥३॥ नगनिभिन्नमातङ्गघटाघटमुखोज्झितैः । युद्धमासीद्द रालोकं स्नातयौघमसृग्जलैः ॥४॥ रजस्सन्तमसच्छित्यै विततार परिज्वलन् । ग्रावप्रहतमातङ्ग दन्तकोशोद्भवोऽनलः ॥५॥ १. युद्ध के लिये जाते हुए, इन्द्रजित ने रावण की प्रदक्षिणा की, जिसकी मांखो की पक्ति उसे चारों भोर से प्रेम से देख रही थी। तम भक्ति से भय को प्रणाम कर, समय को उपयुक्त जान वह रंग-बिरंगी ध्वजामों से लहराती हुई सेना को खीचता हमा भागे बढ़ा। विशेष-खींचता हुमा-यह आगे आगे चला । सेना पीछे पीछे भली । जैसे यह सेना को खोचे लिपे जा रहा हो । यह भाव है। ३. गूद चतुपंम्-इपिर के गंध से जिसमें तेजी मा गई थी, ऐसे मनमनाते हा अनुमों मे बापो को भय दूर वर्षा करते हुए उन्होंने युट किया। ४. पहाड़ों की चोट से विदीणं हापियो के सरकर के मुख से बढे हुए रुधिर की गय से उत्तजित, पून से भीगे यौदामों ने ऐमा युट पिया कि उन पर प्रास नहीं ठहरती परपरो की मार से हापियों के दांतों के कोप (पर) निरनी हुई मग्नि की ग्वामा पूल गे बनित मापार को भेदती हुई पारों पोर फैल गई।

२२८ जानकीहरणम सारासिरूरुसुरूराः सारासारासु सूरसः । ससार सारसारासः सुरासारिः ससार सः ॥६॥ एत्य शोणिसंसिक्तरजश्छेदेन दर्शितौ । बबन्ध रावणिर्वीरौ राघवौ भोगिपाश्यया ॥७॥ विवेश पुरमेवाड्य नद्धे तत्र विशारदः । निजितमातङ्गमन्थरक्रमहेलया ॥८॥ गत्या पादयमकम्- दधानौ नृपती खिन्ने शतधा मनसी तया । दृष्टी विवशयाऽनातिशतधाम न सीतया ॥६ आदियमकम्- विराजं तमिदं दीप्त्या विराजन्तं स्मृतिक्षणे। सदसनासितो भ्रात्रा सहसन्नास्पदागतम् ॥१०॥ यह (सः) स्वर्ग का शत्रु, (सुर-प्रास-अरि) मजबूत तलवार (सार-असि) लेकर सुन्दर जंघा और वक्ष वाला (उरु-सु-उरु-उरा:) जिसको बाण की तीव्र वर्षा करने में मजा अाता था (स-पर-पासार-असुसु-रहाः) हंस के समान गम्भीर नाद करता हुमा (स-सार-सारस-पारासः) मागे बढ़ा (संसार)। पाते ही रावण के पुत्र, (इन्द्रजित) ने उन दोनों राघव वीरों (राम और लक्ष्मण) को जो रुधिर से सनी पूल के छिद्रों से दिखलाई पड़ते थे नागपाश से बांध लिया। तब वह साहसी उन्हें वाँध कर, हाथी को जीतने वाली मन्यर गति से बड़ी सरलता से नगर मे घुसा। विषेश-हेलपा सरलता से अनादर प्रदर्शित करते हुए। शोक से विवश सीता ने, दोनों राजपुत्रों को जिनके मन में हजारों व्यथाएं थीं, देखा पर यह न देरा सकी कि उनको पीड़ा पहुँचाना असम्भव है जिससे उनका तेज हजार गुना बढ़ गया है। १०. अपने भाई मे गाय बैठे हुए राम ने, अपनी दीप्ति से देदीप्यमान्न, पक्षिराज गढ़ से जो रेवल स्मरण मात्र मे वहाँ मा गये थे, हंस कर यह महा- अष्टादशः सर्गः २२९ . प्रतिलोमम्- पक्षिराजतयामेप हिसारागहितान्तक । कन्तताहिगरासाहि यमेयातजराक्षिप ॥११॥ इत्युक्तगरुडग्रस्तपन्नगाहितविस्मयैः । प्रास्फोटस्फोटितानीकश्रुतिरेसे कपीश्वरैः ॥१२॥ चतुरक्षी- रुरोरारैररीरोरि होहोहाहाहिहीहहि । ततेतात्तुतितो तोतौ विववावववावव ॥१३॥ कुम्भ कर्णोऽथ रक्षोभिरवोघि हृदि ताडितः । स्वयंकृतखरनाथवातधूतैः कथश्चन ॥१४॥ चमूपतिबंहिस्तस्थौ सेनया सहसासुरः। कुम्भकर्णं प्रतीक्ष्याथो सेनया सहसासुरः ॥१५॥ ११. पक्षिराज होने के कारण मो परिमेय ! हिंसा में अनुरक्तों के हितों के विनाशक, जरा- रहित विस्तृत सों की निष्क्रियता के कारण ! किसी अलौकिक सर्प के अन्त के लिए प्रक्षेप करो। १२. राम से इस प्रकार कहे जाने पर, जब गरुड़ सपा को निगलने लगे, तो विस्मय से भर, वन्दरों के सेनानायक इतनी जोर से ताल ठोकने लगे कि सेना के योद्धानों के कान के परदे फटने लगे। १३. रुरु मृग की हिंसा के प्रेरक, हे गमनशील, परे हवनकर्ता, हाहाकार कर सपों के पास जाने वाले (गरुड़) ने वेगपूर्वक गमन के कारण व्यथा से गमन करने वाले राम लक्ष्मण की विष्णु की भांति रक्षा की। १४. तब राक्षसों ने जो कुम्भकर्ण के स्वयं सांस लेने की तीव्रता से लड़खड़ा रहे थे, उसके वक्ष पर प्राघात करके किसी तरह उसे जगाया। १५. अपनी शक्ति से देवता के समान (सहसा-सुरः) वह वन्दरों की सेना का अध्यक्ष, सेना नायकों के साथ (स-इनया-सेनया) विभीषण (स-असुरः) के सहित, कुम्भकर्ण की प्रतीक्षा में बाहर पाकर सड़ा हो गया। विशेष-सहसमाक्ति । इम-नायक, स्वामी।

जानकीहरणम् समुद्गयमकम्- अभिरामाशुगासन्ना सा सेना विभया सती। अभिरामाशुगासन्ना सा सेना विभया सती ॥१६॥ उपविष्ट: पुरो वप्रभूधरस्य शिरस्तटात् । संख्ये दृष्टिं समासज्य क्रोधेन विकृताननः ॥१७॥ गोमूत्रिका- आसादितवसास्वादक्षतस्तुतिरगोत्किरः । ससार तरसा पादघातपातितगोपुरः ॥१८॥ शिरांसि कृतटवारं चर्वतोऽस्य वनौकसाम् । सिषेच शोणितं वक्षः सद्यः सन्त्यज्य सक्कणी ॥१६॥ तच्छूलपातनिभिन्नपिष्टाशिष्टा महाचमूः। प्रङ्गदेन पितुर्षीरं जगदे विद्रुता दिशः ॥२०॥ अपभ्रयमकम्- सुभासासातियतातिभासुरा दर्पभाविता। साराधीरासशोभाया सादरा युधि सर्पति ॥२१॥ १६. चमचमाती और द्रुतगामी बाणों वाली वह सेना, निर्भय होकर (शत्रुओं को) सेना के विलकुल निकट खड़ी रही। स्वामी के निकट होने के कारण (स- इना= स्वामी के साथ) सीता का भय दूर हो गया। १७-१८. क्रोध के कारण जिसका मुख भयङ्कर हो गया था, पहाड़ी परिता पर बैठ कर, सामने युद्ध की ओर देखते हुए, १६. बन्दरों को चवाने के कारण उनके सिरो के कड़कड़ा कर टूटने से, मुंह के दोनों कोनों से वहते हुए रुधिर ने उसके (कुम्भकर्ण के) वक्ष को भिगो दिया । २०. अपनी पिता की बड़ी सेना जो उसके ( कुम्भकर्ण के ) त्रिशूल से पिस जाने से पौर दिशामों में भाग जाने से बच रही थी, उससे मङ्गद धीरता से बोले । २१.२२. मपनी सुन्दर दीप्ति से (सु-मासा), जिराने समस्त दुखों को दूर कर दिया था (पनि- यात-मतिः), प्रभा से गम्पन्न (भासुरा), गर्व से भरी (पं-भाविता), मसक्ती (सारा), माहसी (पीरा) शोभायमान (स-शोभा-प्रया), निर्भय होकर (स-अदरा) वह सपो की सेना, कुम्भकर्ण को प्रागे करके युद्ध के लिए बढ़ रही है पौर रण से भागने वाले, सुम लोगों को पंछ काट डालने की इच्छा करती है।

अष्टादशः सर्गः २३१ इयं वः शात्रवी सेना रणे वैमुख्यमायताम् । छेतुमिच्छति पुच्छाग्नं कुम्भकर्णपुरस्सरी ॥२२॥ हनुमन्नातुरो भूत्वा मा गा युध्यस्व निर्भयम् । ननु स्कन्नादरोऽसौ त्वा वेगाद्विध्यति निर्दयम् ॥२३॥ गोमूत्रिकामुरजबन्धञ्च- सुते संयति वैमुख्यं याति क्षीरोदजन्मनः । सुपेणे लम्भयदन्यः कस्तं बासरसंज्ञताम् ॥२४॥ गृह संबन्धः- दोषपानपरांधीनखलं एष वद क्षमः। त्वं सशैलेन हस्तेन ही न कि हंसि राक्षसम् ॥२५॥ माचन्तयमकम्-- ततं दर्पण सततं परस्संग्रामतत्परः । सत्वाढ्यो वाधते सत्वामरं तेजोजितामरम् ॥२६॥ भुनक्ति भवति यासलस्तहस्तेऽद्य केसरी। नैऋतग्राहदन्ताग्रमासात्लोऽन्यो वनौकसः ॥२७॥ २३. है हनुमान् ! पदरा कर मत भागो, निर्भय होकर युद्ध करो क्योकि (भागने से) वह तुम्हारा अनादर कर बड़ी निर्दयता से तुम्हें बोधेगा। २४. जब धन्वन्तरि के पुत्र (सुपेण) युद्ध से भाग जायगे तो भय से ग्रस्त उन्हें कौन लोटा लावेगा? लेकर इग दुष्ट २५. यह बतलाइये कि जब भापमे क्षमता है तो आप अपने हाथ मे पहाड़ और पापी राक्षस का वध क्यों नहीं कर डालते? यह बड़ा माश्चर्य है। २६. वह (कुम्भकएं) गर्व से सदा के लिये तत्पर रहता है, और (अपने) बल से हमारे पिता को पौर प्रापको, जिसने तेज से देवतामो को जीत लिया है, सताता है । २७. जब डर से भापही के हाप ढीले पड़ जायेंगे तो और दूमरा ऐसा सिंह है जो इस राक्षग रुपी घड़ियाल के दादों से जो बन्दरों को निगलने के अभिलापी हैं, बचावेगा।

२३२ जानकीहरपम् भाधन्तयमकम्- तेनते सुरसाराशसामाभीतजिताहिना । नहिताजित भीमा सा शरासार सुतेनते ॥२८॥ नैकसेयकसन्त्रस्तः संपदः खलु हीयसे । राज्यं तव जयेनास्तु तदेव गहनं गिरेः ॥२६॥ सर्वतोभद्रम्- सासाराससरासासा रसापाततपासारा साहुसाप्यप्यसाहसा। सव्यतक्षक्षतव्यसः ॥३०॥ गृहेऽपि सुलभो मृत्युः शिवं युद्धेऽपि कस्यचित् । प्रभुं त्रासेन ते जन्ये यतस्त्यक्तुमसाम्प्रतम् ॥३१॥ मुरजबन्नश्लोकद्वयम्- कि यासि कपिहास्यारहामी तत्राहमाकुकः । हसानिरमयाकाशं स वीक्ष्य रणमार्गलम् ॥३२॥ पतत्सु राघवे वैरिविशिखेष्व विशङ्कितम् । पौरुषस्यापरं कालं किं सौमित्रिरुदीक्षते ॥३३॥ २८. प्रो देवताओं के बल की माशा, मो लक्ष्मीरहित (राक्षसों) से अभीत वीर, डर कर भाग रहे हो, क्योंकि बाण चलाने वालो के पुत्रों में श्रेष्ठ, हमारी भयंकर योद्धातों को जीतने पाली सेना तुम्हारा हित करने वाली नहीं हो रही है। २६. निकषा के पुत्रों (राक्षसों) से डरने के कारण आपका वैभव नष्ट हो जायगा । (ईश्वर करे) आपका घना पर्वत राज्य विजय से पैसा ही बना रहे । ३०. सार मर्यात् बल की स्थिति को प्राप्त करने वाली, माण प्रक्षेपण से युक्त, साहस एवं हासहीन (सेना) सूर्य तेज से युक्त है । हे पृथ्वी को नम कर देने वाले हनुमान् (तुम) कर्मों (योगादि) को नष्ट करने वाले राक्षसों के प्रहार को दूर करने वाले हो । ३१. अपने पर में भी सरलता से मृत्यु हो सकती है मौर रणभूमि में भी कल्याण हो सकता है । इसलिये अपने स्वामी को लड़ाई के मैदान में छोड़ना सुम्हारे लिये उचित न होगा। ३२. रणस्पल में मापा को ग्रहण करने वाले उत्साही अंगद ने मुट की माया के प्रतिरोधक शोमा से प्रकाशमान हनुमान से कहा, हे कपियों के हास्य को ग्रहण करने पाते श्यो जाते हो? ३३. अब राग पर गओं के बाणों की निरन्तर वर्षा हो रही है सो पया महमा पानी वीरता दिसान का कोई भोर दुरारा प्रवरार दूं रहे है ?

भष्टादशः सर्गः हेयहासरवस्था मा न सेना विहिताईनः । सातचेतनपाता सा लब्या किं वहुनासिना ॥३४॥ अर्थ चतुष्टयवाच:- बृहत्फलकरः श्रीमांस्तुङ्गको वरवावणः । किन्न गोपतिरेप त्वं प्रथते परमोदयम् ॥३५॥ रणं सद्यशसः , क्षेत्र स्थितस्तेजस्यखण्डिते । सन्त्यजन सह सैन्येन हरिराज न राजसे ॥३६॥ निरीष्ठयम्- न याचारयुतो रामः प्रयासरहितोश्रमः । न याति रणतो भीमश्रिया सारश्च्युतोपमः ॥३७॥ संख्ये संख्यमिहासंख्यशस्त्रसंपातभैरवे । विधत्स्व तस्य लोकोऽन्यः सर्वस्मिन्नसुखेसुखे ॥३८॥ यासि सक्षतमम्बाशं शंसिताबासमान्य सा । सदद्धा धमसामास सस्ययागमबुद्धिया ॥३६॥ ३४. अनुचित अट्टहास शब्द करती, अलक्ष्मी युक्त सेना क्या सलवार से काटने योग्य नहीं है, जो भागते प्राणियों को गिरा रही है। ३५. हे हनूमान तुम बड़े फल देने वाले, ऊचे स्थान को जाने वाले, अधिक बलशाली को भी रोकने वाले हो । यह जितेन्द्रिय क्या श्रेष्ठ उन्ननि नहीं विस्तारित करता? अवश्य ही करता है। ३६. हे वानर राज ! तुम्हारी वीरता अखण्डित है। यह अच्छा नहीं लगता कि तुम अपनी सेना के सहित युद्ध छोड़ कर चले जामो, जब युद्ध ही स्वच्छ पश का क्षेत्र है। ३७. जब नीति एवं व्यवहार में कुशल, कभी न थकने वाले प्रयास रहित, अपने भयङ्कर तेज के कारण बलवान और भनुपम राम रण से पीछे नहीं हटते । ३८. यहां (इस लोक में) प्रसंस्य दाम्पो की वर्षा से भीषण रणदात्र में सड़ने से उसका फल दूसरे लोक में, स्वर्ग-प्राप्ति है, सुख ही सुख है । ३६. हे हनूमान, तुम डर कर लड़खड़ाते शन्द बोलते हो, भय खाते हो, प्राणियों को नष्ट करने वाली राक्षस सेना तुम्हारी शान्त सेना को खाने के लिए दौड़ रही है, तुम तेजस्वी रूप धारण करो।

२३४ जानकीहर त्रासेन जहतो जन्ये जनेशं तं गुणाधिकम् । किन्न भ्रश्यति शुभ्राभ्रविभ्रमं भवतो यशः ॥४०॥ तनसानधमा सारा सातायासवरास्थिता। नरता न समाधीरा मता हासस्वरानता ॥४१॥ जालकद्वयम्- भ्रमद्धिभूरिभिर्भरीरवैर्गम्भीर भैरवैः। भ्राम्यन्मन्दरमन्थानक्षुभ्यत्क्षीराणवोपमा ॥४२॥ जालेन श्लोकत्रयम्- कृपाणज्योतिरालोकस्फारदुर्दशना तता। प्रक्कणच्छर संपात संरावपिहितश्रुतिः ॥४३॥ सा राक्षसकरस्तस्तरामा पात्र स्वधावना। सा रासापानयागाय हसावनधर स्वनम् ॥४४॥ जालेमश्लोकचतुष्टयम्- द्विषतामायुधैरेवं अस्मदीया पताकिनी । विह्वला चलितादित्यद्युतिभिः प्रतने कृता ॥४५॥ ४०. प्रगणित गुणों से सम्पन्न जनता के स्वामी, उन्हें (राम को) डर के मारे युद्ध मे छोड़ देने से जो माप का शुभ्र वादल के समान यश है क्या भ्रष्ट न हो जायगा ? ४१. प्राणियों को शोभा प्राप्त करने वाली यह जनता (सेना) है । निरन्तर प्रयास में लगी, विजय-लक्ष्मी से युक्त, घीर, हास स्वर से प्रविनत यह है । ४२. गम्भीरता के कारण भीपण, मोर सब मोर व्यास, बहुत से भेरियों के माद से भरी, पौर घूमते हुए मन्दर पर्वत के मघने से क्षन्ध क्षीर सागर के समान है। ४३. जो तलवारों की विस्तृत चमक से दिसताई नहीं पड़ती थी पौर जिराने पार-रागृह की अनसनाहट से कान का मार्ग रोक दिया था। १५. रण में रानुमों के गस्त्रों ने, जिन्होने चमक में गर्म को हरा दिया पा, रगारी रोना को विहस कर दिया है।

अष्टादराःसर्गः २३५ निरन्तरानुप्रासम्- ततातीति ततोतीता तात तातात्ततत्ततौ। ततो तोतिततैतेतो ताते तुत्तितते ततिः ॥४६॥ इति श्रुत्वा निववृते तां गिरं कपिभिर्दिशः । अपथत्याजनेसाधोनिन्दाहि निशितोऽङ्कुशः ॥४७॥ अर्य प्रतिलोमः- तेहिकासुकसन्त्रास सत्रसंकसुकाहिते। तेनुरापदमत्याग गत्यापदपरानुते ॥४८॥ आयतामायतां वृष्टिं शृङ्गिशृङ्ग महीरुहैः । कुम्भकर्ण किरन्तं तं नलनीलौ रणस्पृहौ ॥४६॥ मानापहारयथेष्टमात्रादानाम्यां श्लोकत्रयम्- अपितु द्युतिमत्यस्य नीलस्सेहे न वै व्यथाम् । सहेति क्षितिजच्छिन्न प्रवीरस्स क्षितिस्तुतः ॥५०॥ ततो हतहुताशात्मसंभवे पतिते नले। प्रार्थयन्त वलं शत्रोः क्रव्यमत्तु निशाचराः ॥५१॥ ४६. हे (स्वप्रताप से) शम्मु का विस्तार करने वाले (शिवरूप) हनूमान, हे अतिशय गमन. शील ! 'तात' 'तात' शब्दों को ग्रहण करने वाले (वानर, राक्षस आदि) की फैली पक्तियों वाले, विपक्षी भटो के प्रत्यल विस्तृत प्रागमन वाले व्यया के विस्तार से युक्त फैले संग्राम मे यहां से वहां तक अपने प्रति श्रद्धा विस्तारित करते हुए, शत्रुमो का भक्षण करते हुए जाओ ! जायो ! ४७. यह सुन कर बन्दर लोग दिशामों से लौट आये । बुरे मार्ग में जाने बालों के लिये साधुजनों को फटकार तीखा अंकुश होती है । ४८. कुत्सित प्राणों को धारण करने वाले शत्रुओं के लिए (युद्ध रूप) यन में शब्द करते सुन्दर शत्रुओं, वाले संग्राम में चरणों पर गिरते सत्र मों द्वारा स्तुति करते रहने पर निरन्तर विनाश विस्तारित किया। ४६. युद्ध करने की इच्छा से नल और नील, कुम्भकर्ण के पास पहुंचे जो पहाड़ों की चोटियों से चूमों की निरन्तर वर्षा कर रहा था। ५०. मौर कान्ति का परित्याग कर उस प्रकृष्ट वीर नील ने हानि उठा कर बाणों से छिदने पर 'हा' करते हुए साधारण भूमि-जन्मा की भांति व्यपा नहीं मही, ऐमा नहीं। ५१. जब मग्नि के पुत्र (नल) मारे जाने से गिर पड़े तो राक्षस लोग पत्र की सेना को माने के लिए बड़े।

२३६ . जानकीहरणम् द्वयक्षरानुप्रास:- ततारीति रतीताती तन्तिताररुतेरिताः। ततारारिततीरेता रत तारारतौरतः ।।५२॥ प्रत्यागत्य ततः क्रुद्धः कुम्भकाहतिमूच्छितः । विदश्य दशनैर्नासान्नीयमानञ्चकर्त सः ॥५३॥ क्रोधादविहितस्वान्यमश्नतश्शस्त्रमालिनीम् । राघवायुधघातेन पेते तस्याङ्गभूधरैः ॥५४॥ सन्नयोऽसन्नयो रुद्धो दानादानाकुलालिभिः । नागैगिरिवोच्छायैः सन्नासन्नारिविक्रमः ॥५५॥ आधोनेडितम्- नागास्सरसगण्डास्ते विन्दुचित्र मुखान्विताः । सपताकावृतिमृर्श चक्रुस्सन्नाटकोपमाः ॥५६॥ ५२. विस्तृत शव रूपी ईति (आपदा) के साथ संयोग प्राप्त (भिड़े) शत्रुओं द्वारा छेड़े युद्ध के लिए प्रेरित, विजयेच्छा से ऊँचे स्वरों में ललकारती, विश्राम न करने के कारण चंचल पुतलियों (नेत्रों) वाली सेना निरन्तर आगे बढी । ५३. जब कुम्भकर्ण के आघात से सुग्रीव मूर्छित हो गये और वह (कुम्भकर्ण) उन्हें ले जाने लगा तब (होश में आकर) सुग्रीव लौट पड़े और उन्होने क्रुद्ध होकर दांतों से उसकी नासिका काट ली । ५४. क्रोद्ध के पादेश में अपना और पराया न पहिचान सकने के कारण वह (कुम्भकर्ण) सेना को निगलता जा रहा था। तब राम के शस्त्रों के प्रहार से उसके पहाड़ के समान मङ्ग कट-पट कर गिरने लगे। C ~५५. शत्रुमो की सेना जिसका सञ्चालन कम नष्ट हो गया था, और जिसके शौयं का हारा हो गया था, उसका मार्ग, हापियों ने जो ऊँनाई के कारण बादल के रामान लगते थे, मौर जिन पर भृग मद पीने के लिये व्याकुल थे, रोक दिया। ५६. सजल कपोल वाले, बिन्दु नित्र से युक्त मुख यासी पताका शोभित पाति बहुल वे गल नाटकोपम हो गये, क्योंकि उन्होंने सरस मंकों से मुक्त, विन्दु, चित्र यथून तपा मुरा युक्त एवं पताकामों वाले नाटकों की भांति प्राप्ति की।

अष्टादशः सर्गः २३७ शिलीमुखमुखक्षुण्णकुमुदं सप्लवङ्गमम् । स शरारि रणं रामो ग्रीष्मे ह्रदर्मिवाविशत् ॥५७॥ तन्मन्त्रसाधनादीनि व्यर्थयन्तो रिपुद्विपाः । तेन लुप्तैकरदनाः कृताः केचिद्विनायकाः ॥५८॥ मुक्तासारा द्विजैरशुभ्रः भूषिता मेचकत्विषः । तेन केचित क्षयं नीताः शरदेव पयोमुचः ॥५९॥ शरैरुत्सारिता दूरं हत्वा रामस्य वेगिभिः । बभ्रभुजझरैवंशैः मातङ्गा निर्मदीकृताः ॥६०॥ रक्षस्सैन्यनगो रामबाणक्षिप्तजडोऽपि सः । अचलश्शत्रुसेनायाः प्रपेदे नैव सह्यताम् ॥६१॥ ५७. तव राम उस रणक्षेत्र में, जो बाणों, शत्रुओं और वानरों से भरा था और जहाँ कुमुद नाम का वानर याणों की नोक से घायल हो गया था, ऐसे घुसे जैसे घोड़ा, श्रीप्म में उस सरोवर में घुसता है जहाँ शरारि पक्षी कलरव करते हैं, जो मेढ़कों से युक्त है और जहां भृग अपने मुख से कुमुद का रस चूसते हैं। विशेष-श्लोक में श्रेय है : (१) शिलीमुख= =वाण-भ्रमर (२) कुमुद-वानर=फमल। (३) प्लवंगम् - वानर-मेढक । (४) शरारिपक्षी विशेष = (शर, बाण, अरिशत्रु (५) राम= रामचन्द्र घोड़ा। ५८. शत्रुभों के उन हाथियोंने जिन्होने उनके मंत्र से मभिषिक्त मस्त्रों तथा अन्य साधनों को व्यर्थ कर दिया था, उनका एक दांत उन्होंने तोड़ डाला भौर उन्हें विनायक = गणेश-विना नायक अर्थात् महावत के कर दिया । ५६. बहुत से हाथी जो सफेद दांत से विभूषित थे, जिनका चमड़ा श्यामल रंग का था और जिनमे गजमुक्ता का प्राचुर्य था, उन्हें रामने नष्ट कर दिया जैसे शरद् ऋतु में बादल, नष्ट हो जाते हैं। विशेष-दारद् तु के प्रसंग में -मुक्त-आसराः द्विजः पक्षिगण । ६०. राम के तेज वालो से दूर फेके गए जिन हाथियों का मद बहना बन्द हो गया मोर जिनकी रीढ़ की हड्डी टूट गई थी इधर-उपर घूमने लगे। जैसे मातङ्ग जति के लोग दूर भगाये जाने के कारण अस्तव्यस्त गृहस्थी के साप बरावर घूमते रहते हैं। विशेष-मतंग-हायो जाति विशेष । बारोड़-गृहस्पो। ६१. राक्षसो को रोना में गये, राम के वाण ये फेंके गये भी उस पर्वत को गत्र सकी। - A सेना सहन २३८ जानकीहरणम् प्रहस्तशुकधूम्राक्ष प्रजङ्घन्सुरान्तकान् । विद्युतज्जिह्वमहापार्श्वमकराक्षमहोदरान् ॥६२॥ हत्वा भूयः स्वलाङ्ग लैः वेष्टयित्वा दृढं करीम् । स्थितेष्व िपहस्तेषु यूथपेषु वनौकसाम् ॥६३॥ नाशमिन्द्रजितः श्रुत्वा निर्जगाम दशाननः । कृती सेनाकृतेनाय रुन्धन् रासेन रोदसी ॥६४॥ रावणस्यभवत्तत्र रणः सौमित्रितापनः । व्याप्तसर्वदिगाभोगज्याघोषजयघोषणः ॥६५॥ सौमित्रपत्रिणामित्र क्रुद्ध धनुषि खण्डिते । वधाय विद्विषो भीमशक्तिशक्ति समाददे ॥६६॥ सन्दप्टकम्- ततः क्रोधहतं चके चक्रे शत्रुभयङ्करम् । करं युद्धे पतन्नागे पतन्नागेन्द्रगौरवः ॥६७॥ ६२-६३ . जब फिर बन्दरों की टोलियां अपनी पूंछों से दृढता से कमर कस कर और हाथों में वृक्ष लिये, प्रहस्त, शुक, धूम्राक्ष, प्रजन, नरान्तक, सुरान्तक, विद्युत् जिह्व, महापाप्व, मकराक्ष, महोदर (राक्षसों) को मार कर खड़ी थीं। ६४. तब इन्द्रजित का पिनाग मुन कर चतुर रावण अपनी सेना के गर्जन से पृथ्वी को कंपाता हमा बाहर निकला। ६५. तय लक्ष्मण को सन्तापित करने वाला युद्ध रावण ने किया मोर पनुप की टद्वार एवं जय पोप से दिशायें व्याप्त हो गई। ६६. जय लक्ष्मण में वाए से उसफा धनुप कट गया तब उस भयर परानमी रावण ने पत्र (लक्ष्मण) के वध के लिये 'शक्ति' उठा ली। ६७. राय उस युद्ध मे जहाँ हापी गिर रहे पे, रावण ने जो हस्तिराज से प्रपिक भारी पा. समों के लिये भयङ्कर अपने हाथ को पोप के माता में सुर-ममि पर गरमा।

अष्टादशः सर्गः २३९ चक्रे रणं वानर-का-न्तकारी, चक्के रण-वा-नूर-कान्त-कारी। चक्रे रणं वानरका-न्तकारी, चक्रे, रणन्वानर-कान्त-कारी ॥६८|| अर्घयमकम्- युद्धतिजेये तरसा रसन्तं युद्धतिजेये तरसा रसन्तम् । परं ससाराहतशक्तिहेत्या-परं ससार-पाहतशक्ति हेत्या ॥६६॥ सवितारमिवापरमस्तमितं स निरीक्ष्य भुवं परमस्तमितम् । चरितुं कवचैश्शवलं स्वबलं निजगी मनुजेशबलं स्वबलम् ॥७०॥ यमकावलिः- महता महता समरे समरे विभया विभया सहिता सहिता । विशदा विशदा शुभया शुभया जनता जनता न हिता नहिता ॥७१॥ व्युदस्तधरणीरुहक्षितिधरायुधं विद्रुत- प्रधानकपिसर्वतश्चपलदृष्टि तद्विह्वलम्। न कश्चिदपि रक्षितुं युधि शशाक शाखामृगः सुरारि कबलं वलं हृतवलं प्रयादात्मनः ॥७२।। ६८. सेना में गरजते हुए (चक्र-रणन्) रावण ने जो वानरों तया अन्य जीवों की प्रसन्नता का अन्त करने वाला था (वानर-क-मन्तकारी) युद्ध किया (रणं-चक्रे) । उसी प्रकार राम ने भी, जिन्होंने नरकासुर का अन्त किया था (नरक-मन्तकारी) और जो वानरों को प्रसन्न कर रहे थे (वानर-कान्तकारी) शत्रुओं की सेना को क्षुब्ध करने वाला जय घोप कर (रणं-चक्र-ईरणं-च) युद्ध किया । ६६. इस युद्ध में (यु) जो युद्ध के शस्त्रों से जीता जाने वाला पा ( युद्ध-हेलि- जेथे) वह रावण फुर्ती से (तरसा) शत्र (पर) मर्यात लक्ष्मण को मोर बढ़ा, जो प्रजित पराक्रम से भरपूर थे (मति-जेयेतर-सार-सान्त), मोर 'गक्ति' से ऐसा तीव्र माघात किया जिससे माहत व्यक्ति का बल नष्ट हो जाता है और उसे बड़ा कष्ट पहुंचता है (भाहत-शक्ति-ह-इत्या)। ७०. साक्षात् मस्त होते हुए सूर्य के समान लक्ष्मण (मपर) को पाहत मौर धराशायी देख कर रावण ने अपनी सेना से जिसमे रंग-बिरंगे शस्त्र थे, राम की सेना में, जो बहुत शिपिल हो गई पी, घुसने के लिये कहा । ७१. महान वीरों के संग्राम में प्रविनष्ट, (वीरोचित) कान्ति के कारण भयरहित, सहायक मित्रो से युक्त, दुर्गुणों से रहित प्रतएव निर्मल किन्तु शीघ्रमय से मात्रान्त रावण को सेना ने मज (राम) के लिए नम्र विभीषण मादि के प्रति पूर्णरूप से हितकारिणी होकर (राम की सेना मे) प्रवेश किया । ७२. वृक्ष पौर पर्वत रूप मामुप को बिसरा देने वाले, अपान वानरोको पारो मोर भगा देने बोले, चंचल दृष्टि पौर विह्वल, देवतापों के शत्रु रावण के पास बनते, बलरहित भागते अपने मैन्य को कोई यानर रोक न मका।

जानकीहरणम् चक्रवृत्तम्- पिङ्गं शोणितनिर्गमेन करणं भिन्नं सुरेन्द्रद्रुहा यत्नं प्राप्य दधानया विकलितेष्वोजस्सुचश्चदृशा । तिग्मांशोस्तनयस्य पूर्वकलनामुल्लङ्घयन्त्या भिया यान्तं कापि विहाय संयतिरति हानिस्पृशा सेनया ॥७३।। बिभ्राणं वदनं सरोरुहमणि क्षोदारुणं दारुणं देहीपणमुग्रवक्त्रदशनैः आसन्नखैस्सन्नखैः। रामोऽथ स्वबलं प्रसह्य समरे सन्त्रस्यतों त्रस्यतो बाणेनोपरुरोध वमंनि करच्छन्नादिना नादिना ॥७४|| इति अष्टादशःसर्गः। ७३. रावण के आघात से रुधिर निकलने के कारण जिसका शरीर लाल हो गया था और वल क्षीण हो जाने से जिसकी आखें नाच रहीं थीं और जिसके सब प्रयत्न रावण ने निष्फल कर दिये थे ऐसी वानरों की जर्जरित सेना, लड़ाई का हौसला छोड़ कर, डर के कारण सुग्रीव के पूर्वाचरण को माप्त करती हुई, लड़ाई के मैदान से गालूम नहीं कहाँ भाग गई। विशेष-सुप्रीव के पूर्वाचरण से तात्पर्य है सूग्रीव का बड़ी तेजी से भागना जब बालि ने उसे चहेटा था। ७४. पनरागमणि के समान अरुण मुखवाले तीक्ष्णमुख (ऊंची कूद के कारण) समीपवर्ती प्राकाश वाले, उग्रमुख और दांतों से दारुण अपनी सेना को शत्रुभक्षक निर्भय रावण सेना के संग्राम में हाथ से ढंके शरीर को भी भक्षण कर जाने वाले, शब्द करते वाणों से राम ने बलात् रोक दिया। अठारहवां सर्ग समाप्त।

अथ एकोन विंशस्सर्गः अथारिणावत्मनि कालनेमिना रयादयश्चक्रनिभेन निहंतः। कथंचिदेनं विनिगृह्य मारुतिः समुद्वहन् भूघर शृङ्गमाययौ ॥१॥ हविभिपग्भूधरसानुतो नुतो महौपधिं प्राप्य मुदा ततस्ततः । चकार रामावरजं हृतवलुममं पुनः समुन्मीलित वीक्षणं क्षणात् ॥२॥ रथस्तत: सारथिनामरुत्वतो मरुनदीमारुतकम्पितध्वजः । अरान्तरासक्त पयोदखण्डकः प्रभोरुपानीयत सूनवे भुवः ॥३॥ सुरेश्वरप्राजितहस्तसङ्गिना करेण सव्येन सवासवोपमः । तदन्य हस्तस्थ शरासनः शनैः समारुरोह प्रवृतं वरुथिनम् ॥४॥ रणं दिक्षुः सुरसंहतिर्घनं समाक्षिपत्संमुखमागतं रुषा । परस्पराघात निवृत्त वृत्ति तत्वलं च तस्थौ निहितेक्षणं तयोः ॥५॥ जब रास्ते में, लोहे के चक्र के समान प्रतिभावान, शत्रु, कालनेमि ने हनुमान पर बड़े जोर से प्रापात किया तो उन्होंने उसे किसी न किसी तरह परास्त किया और पहाड़ की चोटी उठाये हुए मा पहुँचे । २. तव (चारो मोर से) प्रशंसित, वैद्य सुषेण ने, बड़ी प्रसन्नता से उस पहाड़ी की ढलवान से, महौषधि लेकर, उससे, राम के छोटे भाई (लक्ष्मण) की थकान दूर कर दी और मौर एक क्षण में उन्होंने (लक्ष्मण ने) प्रांखें खोल दी। ३. तव इन्द्र का सारथी, (मातलि) पृथ्वीपति के पुत्र (राम) के पास रप लाया, जिसकी ध्वजा पाकास गङ्गा को वायु से लहरा रही थी मौर जिसके पहियों के सारों के बीच- बीच में मेघ के टुकड़े चपके थे। तव बाँप हाप से इन्द्र के सारपी का हाथ पकड़ कर और दाहिने हाथ में धनुष लिये, इन्द्र के समान, राम धीरे से रप पर चढ़े। टिप्पणी-प्राति सारयो। युट को देखने की इच्छा से, देवतापों की घनी मौड़ त्रोध से बादलों को हटाती हुई सामने मा गई । मोर दोनों सेनायें (राम भोर रावण की) पिना एक दूसरे पर वार किये (माता की प्रतीक्षा में) दोनों पर दृष्टि गडाये खड़ी रहीं। विशेष-सस्यु : प्रेक्ष्यत्त संप्रामं नाभिजन्नः परस्परम् । पापता विस्मितामाणो संन्यं चित्र मिवावभौ ॥१०९-४-५, पा० रा०,पुरकाण।

२४२ जानकीहरणम पुरन्दराराति मरातिसूदनः शरं सलीलं शरघेस्समुद्धरन् । उपाययौ सायक दष्ट कामुकं रणे रणस्थं रथिको महारथम् ॥६॥ शरं सृजत्वं प्रथम प्रतीच्छवेत्युदोरणानन्तरमिन्द्रविद्विपः । विपाटयन्तः श्रुतिमस्य निस्सनैनिपेतुरुप्रैरभिराममाशुगाः ॥७॥ विभिद्य रामच्छलमादिपूरुषं हृता यथा दुष्पसहेन पाप्मना । प्रपद्य तियंगतिमस्य सायकाः क्षणेन पातालमपि प्रपेदिरे ॥८॥ मुखैरसक्तं दशभिर्दशाननो नदन् तटित्सन्निभहेमभूषणः । युगान्तमेघप्रतिमो महेपुभिः ततान धाराभिरिवान्तरं दिवः ।। वनं ततस्तत्र शरप्रभजनक्षतावनम्रीकृत भूरुहौषधी । महापगापात परास्तनामित स्फुटत्तटीकाननकान्तिमाददे ॥१०॥ न केवलं वारिणि वारिधेरगैर्नरेन्द्रसूनुर्विजयाय विद्विपः । बबन्ध भानोरपि सेतुमायतं पथि प्रतानेन घनेन पत्रिणाम् ॥११॥ ६. शत्रुषों का विनाश करने वाले राम, रप पर चढ़े हुए, सरलता से, तरकश से तीर निकाल कर, लड़ाई के मैदान में, महारयी, इन्द्र के शत्रु (रावण) के पास, जो धनुष पर तीर चढ़ाये हुए खड़ा था, पहुंचे। 'या तो तुम पहिले बाण छोड़ो या पहिले मेरे बाणों का सामना करों'। राम के इतना कहते ही, देवताओं के शत्रु (रावरण) के द्रुतगामी वाण अपनी भयकर ध्वनि से राम के कान के परदे फाड़ते हुए सामने गिरे । राम को जो अपने रूप में प्रादि पुरुष थे, छेद कर उसके (रावण के) बाण, जैसे अपने भयङ्कर पाप से भरे हुए तिरछे होकर एक क्षण में पाताल में घुस गये । विशेष-जैसे पापी पुरुष तिर्यक योनि में जन्म लेता है, वैसे ही इन लोगों का भी पतन होने पर वे तिर्यक-तिरछे होकर पाताल में गये-यह भाव है। बिजली के समान लपलपाते सुवर्ण के गहने पहिने, अपने दसो मुखों से, निरन्तर अट्टहास करते हुए, प्रलयकाल के मेघ के समान, उस रावण ने, अपने भयङ्कर प्रस्त्रों से, वर्षा के समान माकाश के बीच के स्थान को भर दिया। १०. तब शरों के प्रहार से उस वन विभाग के वृक्ष टुकड़े-टुपाड़े हो गये और जड़ी-बूटियाँ झुक गई । उस समय वह वनस्थली ऐसी लगती थी जैसे नदी के तीर का वन वृक्षों सहित जिसका तट एक बड़ी नदी की बाढ़ के टक्कर से झुक कर भहरा पड़ा हो। ११. राजपुत्र (राम) ने शत्रु को जीतने के लिये न केवल समुद्र पर सेतु बांधा बल्कि अपने बाणों की घनी परम्परा से सूर्य के रास्ते में भी पुल बांध दिया । है.

एकोनविंशस्सर्गः २४३ ॥१२॥ निरन्तराकर्षण सृष्ट संपदः प्रसक्त संचालविधिधनुर्गुणः । ररक्षवक्षो नृवरस्य रक्षसः कृत प्रणादं पततोऽस्य पत्रिण: ॥१३॥ शरस्य मोक्षः प्रथमं महीभुजः ततश्च तद्वैरि शरीरविक्ष्पतिः । इति क्रमोगादनुमानगम्यतां अलक्ष्य वेगेषु शरेषु धन्विनः ॥१४॥ असौ शरातानमयं मरुन्नदी विधाय रूपं पतिता नु सस्वना । जयःश्रियः संक्रमणाय भास्वतः पथि प्रयुक्तो न महेपुसंक्रमः ॥१५॥ कटु क्वणन्तः तपनस्य दीधितिं तिरोदधाना निकरण पत्रिणः । विहाय बाणासनमस्य विद्विपः स्वयं प्रहतुं नु नभः समुद्गताः ॥१६॥ बृहत्पृषत्कग्रथिता मरुत्पथे मृगं ग्रहीतुं मृगराजशायिनम् । प्रसारिता नु प्रसरं निरुन्धती रविप्रभाया गुरुवागुराततिः ॥१७॥ १२. - १३. निरन्तर खींचते और छोड़ते रहने के कारण, झनझनाती हुई, धनुप की प्रत्यञ्चा से, पुरुपयेष्ठ (राम) के नाद कर गिरते हुए बाणों राक्षस (रायण) ने अपने वक्ष की रक्षा की। १४. राम इतनी फुर्ती से बाण चलाते थे कि वे (बाण) दिखलाई नहीं पड़ते थे। पत: उनका धनुप से पहिले निकालना और पात्रु के शरीर में उसका लगना केवल अनुमान से जाना जा सकता था। १५. क्या यह सुर नदी, वाणों के वितान के रूप मे शब्द करती हुई गिर रही है भयवा जय- लक्ष्मी के पाने के लिये माकाश में, सूर्य के रास्ते में, पुल बांध दिया गया है। १६. तीखी प्वनि करता हुमा रावण का पार-समूह, सूर्य की किरणों को ढंक कर उसके (मूर्य के) शत्रु, रावण के धनुप से निकल कर सूर्य को मारने के लिये, क्या स्वयं भाकार में जा रहे हैं ? विशेष-रावण सूर्य का शत्रु है। रावण के दार स्वामि-भरत हैं। कवि कहता है कि क्या पाण धनुष से निकल कर स्वयं सूर्य को मारने जा रहे हैं। यह भाव है। १७. सूर्य मे मार्ग में, बड़े-बड़े मस्त्रों से विना यह एक भारी बाल है जो मूर्य के प्रकाश को रोक कर, पन्द्रमा पर सोते हुए मृग को पकड़ने के लिये विद्याया गया है। टिप्पणी-पागुरा-जाल।

२४४ जानकाहरणम विधाय नाराचमयं समन्ततः सन्ति धारानिकरं नु वारिदाः। इति क्षणं क्षीणबलेन तत्रतत् बलेन तीनं मुमुहे महाहवे ॥१८॥ अशेषमन्तः कृतसैनिकं तयोवृहद्भुजस्तम्भ निवद्धमायतम् । निरस्ततिग्मद्युतिरश्मि भूयसा रुरोध तद्वाणवितानमम्बरम् ॥१६॥ चकर्त शत्रोरधिजत्रु राघवः शरेण बाहुं शरसन्ततिच्युतः । बभार तच्छेदविनिर्गतो मुहुढं करोऽन्यो निपतच्छरासनम् ॥२०॥ ततस्ततं धर्मजलस्यरेखया रिपुर्महेन्द्रस्य सुतस्य भूभृतः । लुठज्जटा सन्तति वेल्लितं ज्वलत्तटं ललाटस्य विभेद पत्रिणा ॥२१॥ अथ भुवोरन्तर लक्ष्यहाटकप्रदीप्तपुङ्खण शरेणराघवः। श्रिय ज्वलत्पिङ्ग ललाटतारकां उवाह रूपस्य विरूपचक्षुषः ॥२२॥ शरैरुपक्रोशपदे नृपात्मजशिरो रिपोरच्छिनदर्घ भाषिते । प्रणादतः शेपमुदीरयन् मुहुः शिरोपरं प्रादुरभूदविक्षतम् ॥२३॥ १८. "क्या इन मेघों ने अपनी दृष्टि को सब मोर बाणों में परिवर्तित कर दिया है ?" इस प्रकार उस महायुद्ध में (रावण की) सेना को, जिसका बल क्षीण हो गया था, क्षए भर के लिये भारी शङ्का हुई। १६. दोनों (राम और रावण) की भारी भुजामों पर आधारित, प्राकाश में फैले हुए, दोनों के शरों के बने हुए छत्र ने, सम्पूर्ण सैनिकों को अपने नीचे कर, सूर्य की रश्मियों को रोक दिया। २०. राम ने अपनी बाए परम्परा से छूटे हुए शर से, रावण की गरदन के नीचे की हड्डी से उनके हाथ को, जो निरन्तर बाण छोड़ रहा था, काट दिया, परन्तु प्रत्येक बार काटने पर उसी स्थान पर दूसरा हाथ उत्पन्न हो जाता था जो गिरते हुए धनुष को दृढ़ता से पकड़ लेता था। टिप्पणी जत्रु कंधे के नीचे की कमानीदार हड्डो । २१. तब इन्द्र के शत्रु (रावण) ने राजपुत्र (राम) के ललाट-स्थल को, जो पसीने के कारण चमक रहा था, मौर जिस पर उनके बात की लटें लोट रही थी, बाण से छेद दिया। २२. ऐसे शर से जिसके पंख सुवर्ण के समान चमक रहे थे, भौंहों के बीच में मारे जाने से, राम ने त्रिनेत्र शिव की शोभा को धारण किया जिनके मस्तक पर जलती हुई लाल भाख थी। २३. राजपुत्र (राम) ने जैसे ही शत्रु (रावण) के एक सिर को, जिससे अभी माघे ही गाली के शब्द निकल पाये थे, काट डाला तो एक दूसरा मक्षत सिर, बचे हुए गाली के शब्दों को बार-बार चिल्लाता हुमा, उत्पन्न हो गया ।

एकोन विशरसर्गः २४५ ददर्श भल्लाभिनिपातपातितप्रकीर्णमौलीनि समुद्गताननः । मुखानि दन्तक्रकचक्षताधर प्रवर्तिता सृजि निशानि राक्षसः ॥२४॥ बृहद्विपत्सक्तपृषत्कपातित स्वमस्तकप्रस्तरणे रणे स्थितः । स युध्यमानो महिमान माहवे विदर्शयामास नृलोक दुर्लभम् ॥२५॥ तयो रयो वाणरयोपहितस्फुटत्ध्वनिस्फोटित कर्णमाहवम् । गरुत्मदाशी विषपातदुःसहं निरीक्षितं तं विततार तत्समम् ॥२६॥ अथो हिताय प्रहितं मरुत्वता सुरद्विषो मर्म निगद्य मातलिः । नरेन्द्र पुत्राय तनुत्रभेदिनं विपत्रपत्रं विततार पत्रिणम् ॥२७॥ विकर्षणादस्य मरुन्मरुत्सखप्रसन्नसत्पुङ्ख फलेन वेगिना । स्वयं च तन्मर्म विवक्षुणा यथा शरेण मूलं श्रवणस्य शिश्रिये ॥२८॥ स तेन भीमं रसता भुजान्तरे गिरीन्द्रसारेण शरेण मर्मणि । हतः सुराणामहितो महीयसा पपात भीमेन रवेण रावणः ॥२६॥ २४. उस राक्षस (रावण) ने (नये) निकले हुए सिर से अपने पुराने कटे हुए सिरों को देखा, जिनके मुकुट वाणों के लगने से छिन्न-भिन्न हो गये थे, जिनके प्रघर उन्हीं के दांतों के मारे से कट गये थे और उनसे रुधिर वह रहा था। २५. उस युद्ध भूमि में जहाँ शत्रु (राम) के मारी बाणों से विषे हुए उसके सिर पोये, हट कर लड़ते हुए उसने (रावण) ने ऐसी वीरता दिखलाई जो संसार में दुर्लभ थी। २६. उन दोनों (राम पौर रावण) के युद्ध का नाद जो वाणों नाद से तीव्रतर हो गया था, कान के परदे फाड़े डालता था। मोर गरुड़ पौर सर्प रूपी वाणों के मापस मे टक- राने से मसहनीय हो गया था। ऐसा युद्ध जिसकी कोई उपमा नहीं दी जा सकती मोर जिसकी समता उसी युद्ध से की जा सकती है, जो लोग खड़े देख रहे थे। २७. तव (राम को) रावण का ममं स्थान बताते हुए माउति ने उनके हित के लिये इन्द्र का भेजा हुमा एक अद्भुत बाण दिया, जिसमें उसके (रावण के) जिरह बस्तर के भेदने की शक्ति थी। २८. तब वह दुत गति वाला बाण जिसके अग्रभाग मोर धमकते हुए मुख में अग्नि मोर मस्त पे, सोचने पर राम के कान के मूल तक पहुंचा। जैसे वह उनके (रावण के) मम-स्थान को स्वयं बतलाने की इन्छा कर रहा हो । २६. जब राम ने, भयर पनि करते हुए, और पर्वतराज के समान भारी शर से उस देवतामों के श रावण के वक्षस्थसके मर्मस्थान में मारा तो वह दहाड़ता हुमा गिर पड़ा।

२४६ जानकीहरणम् निकृत्य रक्षोधिप मर्म मागंण: पपात पातालतले महीयसः । कृतापराधो भुवनत्रयाधिपं निहत्य भीत्येव तिरोबभूषया ॥३०॥ अथ क्षितिस्तत्क्षणबद्धनिस्स्वना चचाल भीतेव शरेण ताडिता । पपात, वृष्टिः कुसुमस्य राघवे दिवो निवृत्तेव रिपोर्यशस्ततिः ॥३१॥ सुता नरेन्द्रस्य परासुरीश्वरस्त्वया विपक्षक्षतवृत्तिरीक्षिता । इतीव काच्या विनिपत्य पादयोनिरुध्यमानापि ययौरणाजिरम् ॥३२॥ द्विधा न यातं निजमिन्द्रजिद्गुरौ सुता मयस्योपगतेऽपि वैशसम् । शुचा नु रोषेण नु मुक्तनिस्स्वनं रुरोज पाणिद्वयपातनैरुरः ॥३३॥ नृपात्मजा संग्रह विग्रहेण यत् बभूव यत्नादपि तस्य दुर्लभम् । तमिन्द्रशत्रुश्चिरवाञ्छितं क्षणादवाप देव्या मृतुबाहुवन्धनम् ॥३४॥ हृदि प्रियाभावकृशानुदीपिता भिदामुपैतीति यथा विशङ्किनी । विलोचने तामनुताप विह्वलां असिश्चतामश्रुजलेन सन्ततम् ॥३५॥ ३०. तब उस महापुरुप (राम) का बाण, राक्षसराज ( रावण ) के मर्म-स्थल को चीर कर पाताल में घुस कर छिप गया । जैसे उसने तीनों भुवन के स्वामी (रावण) को मार फर कोई पाप किया हो । ३१. पृथ्वी पर वाण के गिरने से वह उसी क्षण प्रतिध्वनित हो उठी मोर भय से कांपने लगी । और राम के ऊपर प्राकारा से पुष्प-वृष्टि हुई। ऐसा लगता था जैसे शत्रु (रावण) को यरा का समूह पलट कर राम के पाग पा गया हो। ३२. यद्यपि नरेन्द्र की पुत्री (मन्दोदरी) की मेखला सरक कर उसके पैर पर गिर पड़ी पोर उसे रोक कर कहा कि 'तुम्हारे पति मर गये । तुमने अपनी मांखों से शत्रु के किये हुए विनाश को देखा है।' फिर भी यह रणभूमि में गई। ३३. मय की पुत्री (मन्दोदरी) ने दोनों हाथों से अपनी छाती जोर-जोर रोकर पीटी परन्तु, उसका शरीर इन्द्रजित के पिता (अर्थात् अपने पति) के मरने पर भी ट्रक-ट्रक नहीं हुपा, या तो (पति के मरने पर) शोक के कारण, या (पति के साथ) न जा सकने से पोप के कारण। ३४. एक क्षण में रावण को उस देवी (मन्दोदरी) के गुफोमल हाथों का मालिङ्गन प्राप्त हो गया जो राजपुत्री (सीता) को हर लागे से लड़ाई हो जाने के कारण, यल से भी दुनम हो गया था। ३५. अपने प्रिय (रावण) के मरने रो, हृदय में जलती हुई अग्नि से यह नहीं दस-ट्रकन हो जाय, रा रासा से, दशोक से विहल मन्दोदरी को उसमे नेर, पशुबल से उसे निरन्तर सीपते रहे।

: एकोनविंशस्वर्ग २४. प्रियस्थ बाणवणरन्ध्ररोधिनं महीरजस्संचयमश्रवर्षिणी। प्रिया परासोरपि खेदशङ्कया सकम्पहस्ता शनकैरपाहरत ॥३६॥ मयात्मजाया नयने मुहुर्मुहुः प्रियेण पूर्व परिचुम्ब्य लालिते । तदाश्रुभिश्चक्षु पुटान्तनिस्सृतैहंतस्य तोयाञ्जलिमस्य तेनतुः ॥३७॥ पुरानुरक्तो रति दायिनि प्रियः प्रियामुखस्यावयवेषु यत्र सः । तदा तदापत्कृतशोकशोपितः स एव सावेगमकम्पताघरः ॥३८॥ कृशोदरी काञ्चनकुम्भसन्निभं कुचद्वयं रावण(?)मिमात्मनः । गते दिवं तत्र विलोचनच्युतैर्जलैरपस्नानविधाययोजयत् ॥३६॥ शुचा मुखेन व्यपनीतरोचिषा सुता मयस्य व्यथिता तपस्विनी । विलापमेवं करुणं समाददे दिशि क्षिपन्तो कृपणे विलोचने ॥४०॥ प्रियस्य सोऽयं पिशिताभिकाक्षिभिकैविकृष्यावयवोऽपि कम्पितः । प्रहर्षमाशाविषयं विधाय मे पुनर्यथार्थावगमे निरस्यते ॥४१॥ ३६. यद्यपि रावण के शरीर मे प्राए नही रह गया था, फिर भी इस राका से कि कही उसे कप्ट न हो, वह मन्दोदरी, पांसू बहाती हुई, बाणों के किये हुए पाव के छिद्रों को रोकने वाली, जो भूमि पर एकत्रित पूलि थी, उसे अपने कांपते हुए हायो से, धीरे-धीरे हटाने लगी। ३७. जिस मन्दोदरी की मांखों का, पहिले रावण ने अनेकों बार चुम्बन और लालन किया था, उन्ही प्रांखों को कोर से बहते हुए मश्रुजल से उसने मरे हुए रावण को जलाअलि अपित की। ३८. यही भयर जो पहिले प्रिया के मुख में सबसे अधिक प्रानन्द दायी था और जिस पर वह मनुरक्त था, वह भर उसके (रावण के) मरने की व्यया से सूख कर पोक के प्रावेश से कांपने लगा। ३६. उस पतली कमर वाली मन्दोदरी ने, सुवर्ग-घट के समान दीप्तिमान अपने दोनो स्तनों को, जैसे अपने नेत्र से बहते हुए मश्रुजल रो, स्वर्ग में गये अपने पति को, मन्तिम स्नान कराने के लिये नियुक्त किया हो। ४०, तय वह दुखी और दीन, मय की पुत्री (मन्दोदरी), जिसके मुख मी कान्ति शोक से नष्ट हो गई थी, मपने कातर नेत्रों से दिशामों की मोर देसती हुई, इस प्रकार रोने मगी। ४१. "मेरे प्रिय (रावण) के मङ्ग, माम-लोलुप भेड़ियों से सोचे जाने के कारण जो हिलते है, उसमे मेरे हृदय में माता मा सबार होता है कि उनमें सभी प्राग्य है और उससे में प्रसन्न है। परन्तु जब मुझे पता चलता है कि वे निष्प्राण है तब मैं उन्हें (उन महों) को छोड़ देती हूं।"

२४८ जानकीहरणम त्रिलोकभतुंर्वनितासु तादृशी न काचिदासीदनवद्यलक्षणा । अलक्षणायामपि यत्प्रसादतश्चिरं ध्रियेताविधवा यशोमयि ॥४२॥ इयानल निग्रह एव मानिनं धुरि व्यवस्थापयितुं सुमेघसाम् । प्रियं सुरारक्षत विग्रहेऽपि यत् यशो हरन्ति श्वसितं न साधवः ॥४३॥ पुरन्दरानेन पुरापराभवं कृतं कृथाश्चेतसि माति मानिना । मुखादिमं दण्ड धरस्य तेजसश्च्युतं नमन्तं तव पाहिपादयोः ॥४४॥ प्रवेपमानाधरपत्रसन्तति विलोकष्टि भ्रमरं त्वदिष्टये। स्मरासिना देव निकृत्तमुज्ज्वलं त्रिलोक भर्तुः मुखपद्मसंचयम् ॥४५॥ विधाय वित्तस्य कृते कृतीजनः कुबेर वैरं सहबन्धुभिर्बुधः । सतिप्रवृत्ते परतः पराभवे कुलस्य कृत्यैः कुरुते सहार्थताम् ॥४६॥ गुरो गुरोरस्य गुरुप्रसादने चतुर्मुख त्वं चतुरस्य नक्षसे । विकीर्यमाणं भुवि विष्किरैरिमं शिखासमूहं मणिवन्मनस्विनः ॥४७॥ ४२. त्रिलोक के स्वामी (रावण) की (इतनी) पलियों में क्या एक भी ऐसी सौभाग्यवती नही थी जिसके कारण मुझ प्रभागी को सौभाग्यवती होने का यश मिलता। ४३. इतना पराभव बहुत पर्याप्त है कि एक स्वभिमानी पुरुष के ऊपर एक बुद्धिमान् व्यक्ति रख दिया जाय । हे ईश्वर ! मेरे प्रिय (रावण) की रक्षा कीजिये । युद्ध में भी साधु । लोग यश का हरण करते हैं, प्राण का नहीं। ४४. हे इन्द्र ! अपने हृदय में यह वैमनस्य न रखिये कि किसी समय में इन्हीं ने (रावण ने) दर्प के मावेश में प्रापको पराजित कर दिया था। प्रापके चरणों पर गिरे हुए, तेज से च्युत इनकी यम के मुख से रक्षा कीजिये। ४५. हे ईश्वर ! त्रिलोक के स्वामी (रावण) के इस कटे हुए उज्ज्वल, मुस कमल के समूह को, जिसके अधर की पंखुरियां कांप रही हैं, मौर जिसमें चञ्चल अमरों के समान मासे हैं, काम-वासना की तलवार ने पापकी तुष्टि के लिये काट डाला है। ४६. हे कुवेर ! धन के लिये बुद्धिमान् प्रादमी भी अपने भाई-बन्युमों से लड़ाई ठान लेता है। परन्तु जब किसी बाहरी व्यक्ति से पराभव की प्रवृत्ति होती है तो वह अपने भाई- बन्धु का साथ देता है। ४७. हे ब्रह्मा ! पाप, गुरुजनों को प्राप्त करने में चतुर रावण के पितामह हैं । इस मनरवी फे मुकुटों के समूह को माप नहीं देखते, जिसे मनकों (मणि के दाने) की तरह पिड़ियाँ पृथ्वी पर बिखेर रही हैं।

एकोन विशस्सर्गः २४९ तथातिदीनैः परिदेविनाक्षरैनलोकपालेषु गतेषु विक्रियाम् । असत्प्रमाणेन च शब्दमात्रमित्युदीरितं तत्र जनेन देवताः ॥४८॥ विपाण्डु गण्डाघरबिम्बसंश्रया विशेषकालक्तकमण्डनश्रियः । सखीव तत्काल विधेयवेदिनी ममाज तस्या नयनाम्बु सन्ततिः ॥४६॥ जने विधिज्ञे विधिमौर्वदैहिक सुरद्विषः कुर्वति वैदिकाग्निभिः । प्रिया ततः स्नानविधौ जलाशयं बलेन नीता परिगृह्य वन्धुभिः ॥५०॥ असौ विभिन्ने चरमे च कर्मणी कृशानुपद्माकर दाह गाहने । अभिन्नवृत्त्योरिह युक्तमावयोमशं भजे ते इति नादमाददे ॥५१॥ शिखापरिस्पृष्ट सिरावकुम्चनात्करेषु मुष्टिं वलपत्सु मानिनः । हतेऽपि सम्यग्ज्वलितं नभस्वता न भीत भीतेन हिरण्यरेतसा ॥५२॥ पुमानमित्रस्य पुरं पुरातनः प्रविश्य मायामनुजो विभीषणे। निसृष्टराज्यो रजनीचरैश्चिरं सभां स भेजे परितः सभाजितः ॥५३॥ - ४८. जब देवतामों पर (मन्दोदरी के) दीन क्रन्दन का कोई असर नहीं हुआ तो लोगों ने कहा कि देवताओं के अस्तित्व का कोई प्रमाण नहीं है । वे केवल नाम मात्र के देवता हैं। ४६. उसको (मन्दोदरी की) मांखों से बहते हुए पांसुओं की झड़ी ने, एक सखी की भांति जो यह समझती है कि ऐसे अवसर पर क्या करना चाहिए, उसके अधर मोर पीले गालों पर लगे हुए, लाक्षारस एवं शृङ्गारिक बेल-बूटों को धो दिया। ५०. जब अन्येष्टि क्रिया की विधि को जानने वाले लोग उस देवताओं के शत्रु (रावण) का वैदिक अग्नि-संस्कार कर रहे थे तब उसके बन्धु उसकी प्रिया ( मन्दोदरी) को स्नान कराने के लिये, जबर्दस्ती जलाशय पर ले गये। ५१. "अन्तिम समय की, दो विभिन्न क्रियायें, (एक तो) मग्नि-संस्कर (रावण के लिये) और (दूसरी) जल से स्नान (मेरे लिये), हम दोनो के लिये जिनका आचरण एक दूसरे के प्रति अभिन्न रहा क्या उचित है ? मैं तो तुरन्त तुम्हारा अनुकरण करूंगी।" इस प्रकार उसने चन्दन किया। ५२. जब अग्नि की लपटों के कारण उसकी शिराय एठनी लगी और उसके हाथों की मुट्टियां बंध गई तो मग्नि डर के मारे धीमे-धीमे जलने लगा, यद्यपि पवन देव ने उसे मार डाला था। विशेष -पवन अग्नि का मित्र है। श्वास का निकल जाना ही मृत्यु है। यह भाव है। ५३. तब वह पुराण पुरुष, जिसने माया से मनुष्य ( राम ) का रूप धारण किया था, नगर (लड़ा) में प्रवेश कर पौर विभीषण को राज्य सौंप कर, चारो मोर निशाचरों से देर तक ममिनन्दित होकर समा-मवन में पहुँचे ।

२५० जानकीहरणम् निधि कलानामथ लक्ष्मणान्वितं हितं वहन्तं कुमुदस्य सैनिकाः । प्रणेमुरिन्द्रद्विप दास्यनिर्गतं शिवेन रामाह्वयमिन्दुराहतम् ॥५४॥ कृतास्पदं धामनि कौशिकद्विषो जयेन दीप्तं दशकण्ठसूदनम् । हृतानुरागेण जगाम वीक्षितुं सुता नृपस्य त्रिजटादिभिर्वता ॥५५॥ विपाण्डुनो धूसरवेणिरोचिषः पदं दधत्या वपुरीक्षितुमनः । तया शुचः स्थानमुपाहिता रतिः प्रियस्य चक्रे गलदश्रुधारया ॥५६॥ भयं विमृश्य प्रतिसंहते क्षणे जनापवादादथ रावणद्विपि । मनस्विनी मन्युनिरन्तरा गिरः परिस्खलन्तीरिति दीनमाददे ॥५७॥ अयं सरोजस्य परं पराभवन् वपुर्विनिद्रस्य कटाक्षषट्पदः । निपातितस्ते यशसो विपर्ययं मयि स्वयं पुष्यति वीर कीदृशम् ।।५८॥ ५४. तव कुमुद बानर के हितू, लक्ष्मण सहित, समस्त कलामों से परिपूर्ण, चन्द्रमा के समान जो इन्द्र के शत्रु (रावण) के मुख से वचकर निकल पाये थे ऐसे शुभ लक्षणों से सम्पन्न राम को सैनिकों ने प्रणाम किया। विशेष -चन्द्र भट के सन्दर्भ में-'कलानिधि'कलाओ से सम्पन्न । 'लक्ष्मण'-मृगलाच्छन युक्त। 'कुमुद' कमल जो चांदनी में फूलता है । 'हितवहन्त' विकसित करते हुए। 'इन्द्रद्विष' =राहु । 'शिवे न आद्वितं'=शिवने जिसको मस्तक पर चढ़ा कर आदर किया है। ५५. तव राजपुत्री (सीता), प्रेम से प्रेरित होकर, विजटा आदि से घिरी हुई, रावण का विनाश करने वाले, प्रतापी राम को देखने की इच्छा से, जहां वे (राम) बैठे थे, गई। ५६. पीला शरीर, धूलि धूसरित केश, प्रांखों से अश्रु को धारा निकलती हुई, सीता को देख फर, राम पोक से भर गये और उनके हृदय से प्रानन्द निकल गया। ५७. तब, जब रावण के शत्रु (राम) ने, जनापवाद के भय से, सोच-विचार कर, अपनी मांसों को सीता की मोर से फेर लिया, तो वह मानिनी, क्रोध से भरे हुए, रुक-एक कर ये दीन वचन बोती-- ५८. "हे धीर ! फूले हुए कमल के शरीर को पूर्ण रूप से हराने वाली, भृङ्ग के समान ये प्रापको माल मुझ पर पड़ जायेगी मापके यश को मा हानि पहुँचेगी?

एकोनविंशस्सर्गः २५१ अविच्छिदामस्य विवृद्धिमेयुपः तवाननादर्शन जन्मनस्त्वया। चिरप्रवृत्तस्य कृतं कृतात्मना कथं न विच्छेदनमात्रमश्रुणः ॥५६॥ दुःखासिकामसुतरां सुतरां प्रपद्य वैवर्ण्य सम्पदमितादमिता तपोभिः । तस्थौ गुणैरविकलं विकलङ्कमेवमुक्ता वचः क्षतमदान्तमदान्तमृत्युम् ॥६०॥ शोकं तयानुपरमं परमं प्रपद्य प्रोक्तं कृपार सहितं सहितं सवाष्पैः । श्रुत्वा विशुद्धिजननं जननन्दनाथं चक्रेऽनलं तरुचितं रुचितं प्रियायै ॥६१॥ आत्मप्रभावरमितैरमितैरुदस्त्र दृष्टाथ वानरबलैरबलैनमग्निम् । क्षत्रौजसा कृतरसा तरसां विविक्षुः सा सत्यवाग्रसमयं समयं चकार ॥६२॥ क्रोधाकृष्टत्रिदशवनितोत्तंसमच्छेदशास्यं चेतस्यस्मिन् विनिहितपदं तं समच्छेदशास्यम् । नाथाकापं यदिहृतमहा सत्व सा रामदाहं गच्छेयं तद्रिपुहतमहा सत्व सा राऽमदाहम् ॥६३॥ ५६. "मापकी पारमा पवित्र है । आप हमारे आंसुमों को, जो मापके दर्शन न मिलने के कारण, बहुत दिनों से, उत्तरोत्तर बढ़ते हुए, निरन्तर बह रहे हैं, क्यों नहीं रोक ६०. प्रासानी से पार न की जा सकने वाली दुःस की दशा मे पड़ कर विवर्ग हो गयी, तपस्या के द्वारा निग्रह को प्राप्त कर लेने वाली सीता गुणो से पूर्ण, कलङ्कहीन, मद की परिणति को नष्ट करने वाले, दमनकारिणी मृत्यु से रहित राम से ये बातें कह कर चुप हो गयी। ६१. मनन्त शोक मौर करुण-वन्दन से कहे गये, उसके (सीता के) वाक्य सुन कर, उन्होंने (राम ने) सीता को अग्नि-परिशुद्धि द्वारा, जनता को सन्तुष्ट करने के हेतु और इसी कारण रुचिकर-पेड़ों के कुन्दों को एकत्र कर, अग्नि तैयार कराई। ६२. तब अनगिनती, बलवान् बानरों के सामने, जिनकी मांखें अश्रुपूर्ण थी, सत्य बोलने बाली सीता ने क्षत्रिय-बल से प्रेरित होकर, तुरन्त अग्नि में प्रवेश करने की इच्छा से यह शपथ ली- देते ?" ६३. "हे राम! यदि इस रावण को, जिसे मापने मार डाला है, जिसने क्रोध से देवतानों की वनितामो का वस्त्र खीचा था (मर्थात् वस्न खीच कर घसीट लाया था), जिसका शासन मकाट्य था, जिसने हमारे वैभव को निःमार कर दिया है, हे नाथ, यदि मैंने अपने हृदय में उसे स्थान दिया हो तो में मग्नि में जल जाऊँ।"

२५२ जानकीहरणम् स्वप्ने नापीन्द्रशत्रुस्य यदि सह मया जातुवैश्वानरेमे वाहः स्वप्नोपि मा भूत्तत इह सुमहत्यद्यवैश्वानरेमे । वाक्यं स्मैवं सुदीना बहुविगलितदृग्वारिसत्याह तेन क्रूरं धाम स्वकीयं सपदिहुत भुजावारिसत्याह तेन ॥६४॥ इति एकोन विशस्सर्गः। ६४. “यदि उस कुत्ते, इन्द्र के शत्रु, रावण ने मेरे साथ स्वप्न में भी रमण न किया हो, तो यह भयङ्कर अग्नि मुझे तनिक भी दहन न करे।" इस प्रकार जब वह सती (सीता) दीन होकर प्रांखों से आंसू बहाती हुई बोली, तो अग्नि ने तुरन्त अपने दारुण तपन को रोक दिया। . उन्नीसवाँ सर्ग समाप्त।

अथ विंशतितमस्सर्ग: अथ स्फुरत्काञ्चनभित्ति पुष्पक विमानमारुह्य विभीषणान्वितः । समं सुमित्रात्मजवानरेश्वरैः खमुत्पपात स्वपुरी यियासया ॥१॥ ललाट विन्यस्तकरानवारिताप्रभाकरांशुत्रवजिझितेक्षणैः । निशाचरैरस्य विमानमीक्षितं विवेश मृङ्गोदरसन्निभं नभः ॥२॥ चिरप्रवासानलधूमसन्निभां करेण वेणीमवमोचयन स्वयम् । उदलचक्षुः परिरभ्य वक्षसा मिथः प्रियामेवमुवाच राधवः ॥३॥ जनेन रामाकृतिरलमीदृशं समीयते नाकृतपुण्यकर्मणा । इति स्वयं चिन्तयतः पदे पदे मम स्फुरत्यात्मनि भूरि गौरवम् ।।४।। जगदद्वयं द्वावधितिष्ठतः प्रिये पतिव्रतालाभविभूतिगवितौ। अहं भवत्या भूतको महीतलं महामुनिः स्वर्गमरुन्धतीपतिः ॥५॥ १. तब विभीषण को साय में लिये, लक्ष्मण और वानर नायकों के साथ, राम पुष्पक विमान पर, जिसके दोनों पक्ष सुवर्ण की भांति चमचमा रहे थे, अपनी राजधानी में जाने की इच्छा से, चढ़कर माकाश में पहुंच गये। २. वह विमान, जिसे रासस लोग, सूर्य के आतप को रोकने के लिये, अपने हथेलियों को ललाट के सामने किये हुए देख रहे थे और जिनकी पांसें, सूर्य के किरणों के पड़ने से तिरछी हो गई थीं, भृङ्ग के समान चमकीले माकाश में घुस गया। ३. (तब) राम स्वयं अपने हाथ से (सीता की) चोटी को, जिसकी कान्ति चिर प्रवास की अग्नि के धुंए के समान थी, खोलते और अपनी प्रोखों मे उमड़ते हुए मांसुओं को भरे हुए, अपनी प्रिया का मालिङ्गन कर, चुपके से इस प्रकार बोले- जब मैं अपने हृदय में सोचता हूँ कि तुम्हारे समान नारी-रल किसी पुरुष को बिना पुण्य-कर्म किये नहीं मिल सकती, तो पद-पद पर मेरे हृदय में महान गौरव का स्फुरण होता है। विशेष-"प्रवर्तते नाकृत पुण्य कर्मणा"-किरतार्जुनीयम्-१४-३, भारवि । ५. हे प्रिये ! दोनों जगत् मे केवल दो ऐसे व्यक्ति रहते हैं, जिन्हें पतिव्रता पत्नी पाने के सौभाग्य का गर्व है । पृथ्वी पर तुम्हारा अनुचर मैं और स्वर्ग में अरुन्धती के पति महपि वशिष्ठ ।

२५४ जानकीहरणम् पतिव्रतायास्तव देवि तेजसा हतप्रभावो निहतो निशाचरः । मनुष्यमुक्तः कथमन्यथा शरः क्रमेत लोकत्रितयस्य जेतरि ॥६॥ इदं विधायोचितमङ्कमासनं भुजेन मत्कण्ठतटावलम्विनी । समीरणाकम्तिपक्ष्मसन्तती दृशौ मुहुः पातय देवि दिङ्मुखे ॥७॥ दिगङ्गना हारि बृहत्पयोधरा दृशौ दहन्ती बडवामुखेन नः । शुभाशुभैरश्वमुखीव सेविता गुणैरियं दण्डधरेण रक्ष्यते ॥८॥ अमूमधः पश्य जवेन पुष्पके नभस्समाक्रामति ते वियोगतः । समुद्भवच्छोकरयेण तापिना कृशीभवन्तीमिव रक्षसः पुरीम् ॥६॥ पयोधिरत्नालयमीक्ष्यते समं समुन्नमद्वीचिविभिन्नमप्यदः । निमनतीवाम्बुनिधौ समन्ततः क्रमेण लङ्का सहशैलकानना ॥१०॥ विशालशृङ्गरिशखरैरधिष्ठितो विभाति वल्मीक इवैष भूधरः । यतस्स्रवन्त्यः सरितः समन्ततः परिस्फुरन्त्यः कुटिला इवोरगाः ॥११॥ ६. हे देवि ! तुम्हारे पातिव्रत के तेज ने उस निशाचर के प्रभाव का (पहिले ही) नाश फर दिया था। नहीं तो मनुष्य का छोड़ा हुआ बाण उस त्रैलोक्य के जीतने वाले को कैसे पकड़ में ला सकता था? ७. हे देवि ! हमारी गोद में बैठ कर अपने हाथों को हमारी गर्दन में डालकर, अपनी आँखों से, जिनको बरौनियों की पंक्ति हवा से हिल रही है, दिशाओं की शोभा को बार-बार देखो। (वह देखो) किन्नरी के समान दक्षिण दिशा को जिसके बड़े-बडे स्तन लुभावने हैं, जो हमारी आंखो को बाड़वाग्नि से झुलसा रही है और इस प्रकार शुभ और अशुभ गुणों को धारण करने वाली है, दण्उधर (यमराज) रक्षा कर रहे हैं। नीचे देखो । जैसे-जैसे पुष्पक विमान, आकाश में तेजी से प्रागे बढता जाता है, वैसे-वैसे वह राक्षरों की पुरी (लड़ा), जैसे तुम्हारे विछोह से पीड़ित होकर दुबली (छोटी) होती जाती है। १०. पयोधि (हिन्द महासागर) और रत्नालय (बंगाल की खाड़ी अथवा रत्न द्वीप लद्वा) यद्यपि उमड़ती हुई लहरों के परस्पर टकराने से, एक दूसरे से पृषक है फिर भी (विमान के ऊपर से) एक दूसरे से मिली हुई लगती है और बनो और पहाड़ों सहित वह लद्दा द्वीप, समुद्र में धीरे-धीरे राय भोर से दूबता हुमा मालूम होता है । ११. यह विशाल शृङ्ग एव शिखर याला पयंत, दीमको का बनाया हुमा मिट्टी मा टेर लगता है मौर जिससे पारो मोर निकलती हुई नदिया, टेढ़े-मेढ़े सर्प की भांति पमपमा रही ६. .

विंशतितमस्सर्गः २५५ सचन्दनेयं मणिचित्रमेखला परिस्फुरन्नीलतमालकानना । हृदि प्रियेव प्रमदं तनोति नः सुवर्णकूटानुगशेल सन्ततिः ॥१२॥ क्रमादतिकामति पुष्पके घनं सविग्रहोल्लङ्घनशया यथा । तिरोदधानं गगनं समन्ततः प्रवर्धते मण्डलमुष्णदीधितेः ॥१३॥ विधाय पादौ दृढमक्षपाटके विसृज्य देहं गगने सकौतुकाः । अमी समीपागतमेघभित्तिषु स्पृशन्ति विद्युद्वलयं वलीमुखाः ॥१४॥ इदं कणत्काञ्चनकिङ्किणीगुणं विमानमग्ने दशनस्य पुष्करम् । निधाय कौँ विनियम्य निश्चलं सकौतुकं दिग्गज एव वीक्षते ॥१५॥ इदं समासन्नरविप्रदीपितं दधानमुष्णातिकान्तिमण्डनम्। भ्रमत्युपाहत्य करोति निस्वनं विमानमम्भनुतिमन्तरम्बुदम् ॥१६॥ सदैव पूणे बहुरत्नसंपदाप्युपान्तभागस्थिततालभूषणः । अयं समुद्रः परिकर्पति श्रियं प्रचेतसो रत्नसमुदगसंभवाम् ॥१७॥ १२. यह सुवर्ण के ढेर के समान पर्वतों की श्रेणी जो रत्न-जटित मेखला पहिने है मौर जिसमे नील वणं समाल के कुल हैं, हम लोगों के हृदय को प्रेयसी की भांति माह्लादित करती है। १३. जब पुष्पक वादलों को पार कर ऊपर उठ रहा था तो सूर्य का मण्डल, जैसे इस डर से कि कही वह विमान उसको भी न डांक जाय, इतना बड़ा हो गया कि उसने सम्पूर्ण आकाश को घेर लिया। १४. इन वानरों ने (विमान के) धुरे के किनारे को दृढता से पकड़ कर, अपने शरीर को प्रसन्नता से आकाश में लटका दिया है मौर निकट में पाये हुए बादलो के ऊपर (चमकती हुई) बिजली के पेरे को छू रहे हैं । १५. यह दिग्गज, सूड को दांतों के सामने रखकर, अपने कानों को बिना हिलाये-डोलाये, पुष्पक विमान को, जिसमें सोने की घटियां खनखना रही हैं, पाश्चयं से देख रहा है । १६. यह विमान, उन बादलो को, जो सूर्य के समीप पा जाने के कारण गरम हो गये हैं, जो सूर्य की प्रभा से रंग-बिरंगे हो गये हैं मोर जिनमें से पानी बरस रहा है. अपनी टक्कर से भेद कर, उनके भीतर ध्वनि करता हुप्रा, चक्कर काट रहा है। १७. यह समुद्र भनेकों रलों से सदा परिपूर्ण होते हुए भी, किनारे पर उगे हुए, केवल ताल- पनों के आभूपण को धारण करते हुए, वरुण की रत्नो की पेटारी से उत्पन्न लक्ष्मी को खीच रहा है। विशेष--यह समुद्र पनवान होते हुए भी धनलोलप हो रहा है, यह भाव है।

२५६ जानकीहरणम् हरौ हृतेऽसौ हरितुल्यतेजसः ऋतुप्रसङ्गे सगरस्य सागरः । विभिद्य तत्संभववीरबाहुभिः गभीरभावं किल भूरि लम्भितः ॥१८॥ अयं त्वदर्थे गिरिसेतुराहितः प्रमित्सुनेव प्रथिमावमम्बुधे । सकौतुकेनावनिमण्डलेन यः प्रसारितो बाहुरिवावभासते ॥१९॥ समुत्प्लुतस्योदधिदन्तिनो मुखे शरीरभागे च बिभिन्न संहतिः । विभाति सा भक्तिवितानभासुरा सितेव भूति वफेनसन्ततिः ॥२०॥ शिखिप्रभाभासुरविद्रुमद्रुमप्रताननिभिन्नतरङ्गसंहतिः । स्वयं पयश्शोपविशेषनिस्पृहं द्वितीयमौवं बहतीव वारिधिः ॥२१॥ बित्ति शङ्खप्रकरावतंसकः प्रवालरत्नाकर एष वारिधिः । परिभ्रमन्मन्दरकोटिघट्टितव्रणश्रियं प्रस्फुरदस्थिदन्तुरा ॥२२॥ अपूर्वसोमाविभावनस्फुरत् फणालपाशाङ्ककपालभूषणः । ककुत्प्रदेशोऽयमुपैति पश्चिमः सरूपभावं वपुषः पिनाकिनः ॥२३॥ १८. विष्णु के समान तेजस्वी, सगर के यज्ञ में जब घोड़ा चोरी गया तो उनके पुत्रों के बल. वान मुजामों से खोदा गया यह समुद्र बहुत गहरा हो गया। १६. तुम्हारे लिये, पहाड़ों का बना हुमा, यह सेतु ऐसा लगता है जैसे हंसी-हंसी में पृथ्वी मण्डल ने समुद्र की चौड़ाई नापने की इच्छा से अपनी बाहु फैला दी हो । २०. (यह देखो) समुद्र में रहने वाली हथिनी के जल के बाहर निकलने पर उसके मुख और शरीर पर ताजा समुद्र फेन की पंक्ति बिखर कर, चमकती हुई, सफेद, धूलि की धारी के समान लगती है। २१. समुद्र की लहरों के, मूगों के वृक्ष पर टकराने के कारण प्रभा से दीधिमान्, वे वृक्ष यह यानल के समान लगते हैं । हो, इनमें जल को सोख लेने की बिलकुल इच्छा नहीं है। विशेष--बड़यानल तो समुद्र के जल को सोखता रहता है, पर ये बड़वानल के समान धमकते हए विद्यम के पेड़ नहीं सोखते, यह भाव है। २२. पॉप का समूह जिसका गहना है, ऐसा विन्दुमो पौर रत्नों का खजाना यह समुद्र, धूमते हुए मन्दर पर्वत के किनारों की टक्कर से उभरी हुई हहियों और पायों से भरा हमा लगता है। २३. पश्चिम दिशा, जो अपने स्वामी, नागपास से विभूषित एवं श्रेष्ठ सोम के पर्षपान से इगत उद्दीप्त वदन, यरुण की प्रभा से विभूषित थी, शहर के पारीर की समानता को प्राप्त हुई। विशेष-संध्या के समय पश्चिम दिशा का वर्णन है। वरण के संदर्भ में : पश्चिम दिशा के स्वामी नागपाश से विभूषित यरुण हैं । पश्चिम दिशा, अपं चोरप से इपत् तमतमा उठो है। जसे यरण ने सोम फा मपंपान किया हो। सोम में इलेप है : सोम-अपंचर - सोम रस । पपाल में इलेप है :+पाल-जल के स्वामी याग, दूसरे सोपोर के संदर्भ में से ही सय गइर के आभूषण है-फणामपं, मंशमपंचय, कपालमोपड़ी। इस प्रकार पश्चिम दिशा का दर रो सादृश्य हमा।

विशवितमस्सर्गः २५७ असौ निजोत्सङ्गलुठत्पयोधरा पतद्विजासन्नतर त्रिविष्टपा । विदुरतो वृद्धतरेव कामिनी विजिता मेखलयाद्रिसन्ततिः ॥२४॥ हृताम्बरोऽसावुयकण्ठनीलतां समुद्रहन्निन्दुविपक्तमस्तकः । विभर्ति कान्तावृतभागसुन्दरः श्रियं गिरिदेवसदृस्त्रिशूलिनः ॥२५॥ परिभ्रमन्तो मनुजा महीतले विदूरभावादतिसूक्ष्मदर्शनाः । विभान्त्यमी वमंनि शुक्लवाससो मुखाहिताना इव कोटपङ्कयः ॥२६॥ विवर्धमानः किला सोऽयमायतं निरन्तरत्वं प्रसभं दिशन दिशांम् । हतः पदा पातितगर्वखर्वतां अगादगस्येन रयादगाधिपः ॥२७॥ २४. (वह देखो) जो दूर पर पहाड़ की पंक्ति है, जिसमे कोई ढलवान नहीं है, जिसकी गोद में बादल मडरा रहे हैं, जिस पर पक्षी उड़ रहे हैं मोर जो (इतनी ऊंची है कि) स्वर्ग के निकट पहुंच गई है, एक प्रतीव वृद्धा स्त्री के समान लगती है । विशेष-(१) नजोत्संग लुठत्पयोधरा-जिसके स्तन उसकी गोद में लटक रहे हैं । (२) 'पतद्विजाः' जिसके दांत गिर गये हैं । द्विजदांत । ( ३ ) 'आसन्नतर त्रिविष्टया' =जो स्वर्ग के निकट पहुंच गई है अर्थात् मरने के किनारे है। ( ४ ) 'मेखलया विजिता' (पर्वत के सन्दर्भ में) ढलवान रहित। (वृद्धा के सन्दर्भ में) करघनी होन। २५. यह देवसह नामक पर्वत, जो माकाश को छू रहा है, जिसके समीप का भाग नीली आभा धारण किये है, जिसकी चोटी पर चन्द्रमा विराजमान है, जो विभागों के रत्नों से भरे होने के कारण सुन्दर लगते हैं, शङ्कर की शोभा धारण करता है। विषेश-शंकर के सन्दर्भ मे : -(१) 'हृतान्बर'नग्न । (२) 'उपकंठनोलता-कष्ठ । में नीलापन। (३) 'इन्दु विषक्त मस्तका'=जिनके मस्तक पर चन्द्रमा है। (४) 'कान्तावत भाग सुन्दरः' जिनका पार्वती से घिरा हुआ भाग सुन्दर है। २६. ये आदमी जो पृथ्वी पर मार्ग में चल रहे हैं मोर जो सफेद वस्त्र पहिने हैं, वे इतनी दूर से देखने में इतने छोटे लगते हैं जैसे अपने मुख मे मन लिये हुए कतार की कतार कीड़े हों। २७. यह पर्वत राज जो वहाँ घूमने वालों को सदा मानन्द देता था मोर जो निरन्तर भागे बढ़ता हुमा दिशाओं को घेरे जा रहा था, उसे भगस्त्य ने, तेजी से पैर से ठुकरा कर पूर्ण कर दिया, वह ठिगना हो गया है।

२५८ जानकीहरणम अयं नगस्सङ्गतनन्दकः सदा मनोज्ञपद्माकरसक्तपादकः । अनन्तनागासनबद्धसङ्गतिः हिरण्यगर्भो मधुसूदनायते ॥२८॥ मनोज्ञसौगन्धिकजातिरलतः सपद्मरागारुणतोयसन्ततिः । अयं कुणालो बहुसागरप्रिये विराजतेऽनेकविजातिमण्डनः ॥२६॥ परिस्फुरत्काञ्चनकान्तिरन्तिक प्रयाततारो हरिसैन्यसेवितः । दिवाकराचुम्बिततुङ्गमस्तको विभाति सुग्रीव इवैष मन्दरः ॥३०॥ सदप्सरोभिः परितोभिवेष्टितः समीपवर्तिद्विजराजमण्डनः । विभति पीताम्बर एष भूधरः श्रियं मुरारेरपि रूपसंश्रयाम् ॥३१॥ इहानुगोदं निशि चन्द्ररश्मिभिः निषेव्यमाणौ सुरतश्रमान्तरे । प्रियेऽभिजानासि मनोज्ञसंकथौ तटे चरिष्याव उपान्तसैकते ॥३२॥ २८. यह पर्वत, जिसके नीचे के भाग में सुन्दर कमलों के सरोवर हैं, और जो अनन्त हाथियों और 'पीतशाल' के वृक्षों से युक्त है और जिसके गर्भ में सुवर्ण है, वह विष्णु के समान लगता है। विशेष-विष्णु के सन्दर्भ में (१) 'संगतनन्दकः' =जो 'नन्दक' नामक तलवार लिये हैं। (२) 'मनोज पवाफर सस्त पादकः' =निनके पैर सुन्दर लक्ष्मी हायों से दबा रही हैं । 'अनन्त नागासनबद्ध संगतिः-जो अनन्त नाग के आसन पर बैठे हैं । 'हिरण्यगर्भः' =आदि पुरुष विष्णु । २६. मनोहर कमलं तथा मालती से रंजित, पद्यरागमणि से अरुण जलधारवाला, भनेक 'पक्षियों की जातियों का भूपण रूप यह कुणाल भो सागरप्रिये, शोभित हो रहा है । ३०. यह चमकते हुए सुवर्ण के समान कान्तिवान, मन्दर पर्वत, जिसके निकट तारिकायें फैली हैं, जिसमें झुण्ड के झुण्ड वानर निवास करते हैं और जिसकी ऊँची पोटी को सूर्य घूम रहा है, सुग्रीव के समान शोभित हो रहा है। विशेष-सुपीय के सन्दर्भ में-(१) 'अन्तिक प्रयात तारा जिसके निकट 'तारा' सुग्रीय फी पत्नी जा रही है। (२)हरिसन्य-वानरों को सेना। ३१. यह पर्वत, जो पारो पोर से स्वच्छ जल के सरोवरों से घिरा है, जो निकटवर्ती चन्द्रमा मलङ्कत है और जिसके ऊपर का प्राकारा पीतवर्ण है। यह मुरारि बड़ी योमा को धारण करता है विशेष-मुरारि के सन्दर्भ में : (१) 'सहपारोभिः = सुन्दर अप्सरामों से । (२) "द्विजराज'=गव । ३) पीताम्बर' =यस्त्र विशेष । ३२. हे प्रिये ! पया तुम्हें स्मरण है कि रात्रि के समय, रति के थम फे बाद, गोदापरी के तट पर, बालू रेत में, जब पांदनी हम लोगों पर पढ़ रही थी, हम लोग स्नेहालाप फरते पुम रहे।

विशतितमस्वर्ग: २५९ + पयः प्रवाहस्सरितस्सरित्पति गिरिश्च विन्ध्यं प्रथतेऽमन्तरा। भुवं समालम्बितुमद्रिमस्तके पयोधिना वाहुरिव प्रसारितः ॥३३॥ अनेकपुष्पप्रकराधिवासिता भुजङ्गविक्षोभितलोलमानसा। स्पृहावता वेशविलासिनी यथा दिगुत्तरासौ धनदेन सेव्यते ॥३४॥ निषेव्यमाणो हरिभिमंतङ्गज क्षरक्षरद्भमिनिषिक्तबाहुभि । हिमालयस्सानुजरलभूषणो गुणश्रियाऽसावनुगच्छतीव माम् ॥३५॥ सधातुकूटं धृतविश्वसंपदः शिवोपभोगप्रणयस्य भाजनम् । इमं तपस्सिद्धिगुणाय वृण्वते श्मशानकल्पं प्रतिनो विरागिणः ॥३६॥ हतस्समुद्रद्वितयेन वेगतः तटोरसि प्रस्फुरदूमिबाहुभिः । बृहद्दरीनिस्सृतधातुनिभंरो मुखादयो प्रोद्विरतीव शोणितम् ॥३७॥ इह प्रवृत्तं रविरश्मिसंगमे पतङ्गकान्तप्रभवं दवानलम् । निशासु निर्वापयति क्षपाकरः प्रवाहिना चन्द्रमणिस्रुवाम्बुना ॥३८॥ ३३. यह नदी का प्रवाह, जो समुद्र और विन्ध्या पर्वत के बीच में फैला हुआ है वह समुद्र की भुजा के समान लगता है जो पृथ्वी को उसके शृङ्गरूपी मस्तक के पकड़ना चाहता है। ३४. अनेक प्रकार के पुष्पों से सुवासित, सर्पो से विसुन्ध और पान्दोलित मानसरोवर से शोभायमान इसे उत्तर दिशा की सेवा, कुवेर बड़ी अभिलाषा से करते हैं । ३५. पर्वतों में पैदा होने वाले रत्नो से विभूषित, जहाँ (सिंहसे मारे हुए) हाथियों के रुधिर परिप्लुत भूमि पर जिनके पैरों के चिह्न अङ्कित हैं, ऐसा हिमालय, अपने गुणों के उत्कर्ष से जैसे हमारे पीछे-पीछे चला मा रहा है । ३६. इसे (हिमालय को) जिसके शृङ्ग हड्डियों (धातु खनिज पदार्थ = हड्डी) से भरे हैं, जिसमे विश्वभर को सम्पत्ति निहित है, जो शिव के उपभोग के कारण उनका प्रियपात्र हो गया है, विरागी व्रती लोग, तपः सिद्धि के शुभ परिणाम के हेतु, श्मसान के समान वरण करते हैं । अर्थात् वहाँ तपस्या करते हैं। विशेष--'प्रतिनः'–देखिये ='प्रतिनमिव भस्मसित पुण्डुकांकितमुखम् = कादम्बरी। महाव्रती% शल। दो समुद्रों से उठती हुई, लहर रूपी बाहुमों के टक्कर से, ढलवान के वक्ष पर जोर से टक्कर लगने से यह पर्वत, जिसकी बड़ी-बड़ी गुफापों से, निकल कर धातु (गैरिकादिक) वह रहे थे तो ऐसा लगता था जैसे वह मुख से रुधिर वमन कर रहा हो । ३८. यहाँ सूर्य की किरणें और सूर्यकान्त मरिण के संयोग से निकले हुए दावानल को, रात्रि मे, चन्द्रमा भौर चन्द्रकान्त मरिण के संयोग से निकल कर जल प्रवाह बुझा देता है।

२६० जानकीहरणम् अनेन शेलेन सुरालयस्पृशा तिरोभवन्नैशतमिस्रञ्चयः । विवस्वतो भीत इवोग्रतेजसः परिभ्रमत्यर्खनखण्डकव॒रः ॥३६॥ निशि प्रवृत्तोदयया दवानले तुषार वृष्टया शमितेऽपि सर्वतः । इहौषधिज्योतिषि दत्तदृष्टयः सृजन्ति भीति न कुरङ्गयोपितः ॥४०॥ अमुष्य शृङ्गे दुहितुर्महीभृतः तपश्चरन्यास्सविता समीपगः । शशाङ्कशोभामवहद्विलोचन प्रभाततिश्यामितमध्यमण्डलः ॥४१॥ पतिप्रसादादरमण्डितालका गुहाननासक्तगलत्पयोधरा। अधित्यकासौ हिमशैलसंभवा बिभत्ति गौरेवि मनोहरं वपु ॥४२॥ ३६. अञ्जन के समूह के समान काला, रात्रि का सश्चित अन्धकार, स्वर्ग को छूते हुए, इस पर्वत में छिपा हुआ, जैसे सूर्य के उन तेज से डर कर इधर-उधर घूमता फिरता है । ४०. यद्यपि रात्रि में बर्फ पड़ने से, दावानल मुझ गया था, फिर भी हरिणियां, चमकती हुई जड़ी-बूटियों पर आंख गड़ाये थीं और उनका डर नहीं छूटता था। ४१. जब शङ्ग पर बैठकर, उसकी (हिमालय की) पुत्री (पार्वती) तपस्या कर रही थी तो निकटवर्ती सूर्य, चन्द्रमा के समान शोभायमान हो गया और उसकी (पार्वती की) आँखों की प्रभा से सूर्य मण्डल का मध्यभाग काला पड़ गया। विशेष--पार्वती सूर्य को एकटक देखकर तपस्या करती थी। देखिये :-"शुची चतुर्णा ज्यलतां हविभुजा शुचिस्मिता मध्यगता सुमध्यमा । विजित्य नेत्र प्रतिवातिनी प्रभा- मनन्य दृष्टिः सवितार मैक्षत ॥ कुमारसम्भव, ५-२० । कुमारदास, एक पग और आगे बढ़ जाते हैं। वे फहते हैं कि तपस्या करते समय जब पार्वती एकटक सूर्य को देखती थी तो उसकी आंखों की फाली पुतली की परछाई पड़ने के कारण सूर्य मण्डल फा मध्य भाग काला पड़ गया और यह शशांक के समान हो गया। ४२. मह हिमालय के ऊपर की समतल भूमि, जहाँ अलकापुरी, (अपने) स्वामी (कुवेर) फे भनुग्रह एवं पादर से सजी हुई है, और जिसकी गुफामों के द्वार पर लपटे हुए बादल मंडरा रहे हैं, पार्वती के समान शरीर धारण कर रही है। विशेष-पार्वती के सन्दर्भ में :-(१) 'पतिप्रसारादर मण्डितालफा' =जिराके केश फुन्तल शिष ने प्रेम और आदर से सजाया है। (२) 'गुहानना रास्त गलत्पयोधरा-गिराके (धिकने) सटकते हुए स्तन कात्तिकेय के मन में लगे थे। (३) 'हिमशेल राम्भया' 3 पार्वती।

विंशतितमरसर्गः २६१ असौ गुहा धातु परिस्त्रवारुणा विलुप्तपक्षस्य तटे महीभृतः । स्रवन्मुखस्य त्रिदशाधिपायुध वणस्य नालीव विभाति रागिणी ॥४३॥ स एप शीततिहासि निझरे विकीर्णवारिः स्फटिकोपलोच्छ्यः । गुहानिबद्धप्रतिशब्द भैरवैः अलक्षितोऽपि ध्वनिभिविभाव्यते ॥४४॥ शिखासु पुण्यप्रकरो महीरुहां मुहुः किलाघोऽञ्जनशैलभित्तिषु । क्षणं विनष्टः स्फटिकोपले घनः सितप्रभोयं मरुता विधूयते ॥४५॥ विमुच्यमानस्सितवारिदैरसौ विभाति घातूपलराशिकच्छितः । समन्ततो भस्मनि भासुरप्रभः प्रयाति वातैरिव वह्निसञ्चयः ॥४६॥ घनस्य तिष्ठन्ति ततो धृताम्भसः तटे पतन्तश्शिरसो महीभृतः । अमी रवेरूर्ध्वमुखांशुवह्निना पराहतः पादतलेषु किन्नराः ॥४७॥ विकृष्यमाणे सितमेद्यमण्डले नभस्वतो यो बिसखण्पाण्डुरः। विभाति निर्मोकमिव त्यजनितः स एप कैलासतटो विलोक्यताम् ॥४८i ४३. यह गुफा जो (गैरिकादिक) धातुओं के बहने से लाल हो गई है, उस वहते हुए घाव की नाड़ी के समान लगती है जिसे इन्द्र के वज ने पहाड़ के किनारे के पक्षों को काट कर किया था। . ४४. यह चन्द्रमा को लजाने वाला झरना, जिसका जल स्फटिकशिला पर गिर कर बिखर रहा है, यद्यपि दिखलाई नहीं पड़ता, पर गुफा के भीतर भयंकर प्रतिध्वनि से जाना जाता है। ४५. यह बादल प्रायः वृक्षो के शिखर पर, पुष्पों के समूह के समान लगता है और कभी काले पर्वत के पार्श्व में लोप हो जाता है, और (कमी) स्फटिक की चट्टान पर शुभ्र प्रभा धारण कर वह वायु से हिलने डुलने लगता है। ४६. धातुओ से समृद्ध इस ऊजे शृङ्ग पर जब बादल जाते हैं और वायु जव चारो मोर से धूल उड़ा देती है तो वह अग्नि के समूह के समान चमकने लगता है । ४७. इन किन्नरों के पैर के तलुवे जब सूर्य की ऊर्ध्वमुखी किरणों से जलने लगते हैं तो वे शृङ्ग पर से नीचे कूद कर जल से भरे बादलो के पास खड़े हो जाते हैं। ४८. देखो, यह वह कैलास पर्वत है जो कमल नाल के समान श्वेत है और जो पाव मे स्थिर, श्वेत बादलों के वायु से हटाये जाने पर ऐसा शोभायमान् लगता है जैसे वह केचुल छोड़ रहा हो।

जानकीहरणम् कुतः कुरङ्ग किरणस्य चन्द्रमाः सदा शिरस्स्पर्शकृतं विभति सः । स्वयं च तद्धर्षणजातनिष्पतद्धिमांशुधूलीकृतशुक्लिमाचलः ॥४६॥ लतावितानावरणे शिलातले गिरावमुष्मिन् सुरसिद्धयोषिताम् । . सुवृत्तकाञ्चीगुणधृष्टिरेखया विदन्ति वृत्तं सुरतं वनेचराः ॥५०॥ उपागतोऽपि ग्रसितुं विलोचन प्रभानिषेकाहितमेचकद्युतिम् । मृगीसमूहः परिणामदूषितं विशङ्कय भूयस्त्यजतीव पल्लवम् ॥५१॥ ननु विदधति पादपूरणानि प्रथितयतावचले किरातदेशाः । विशदमतिभिख्ययाः प्रबन्धे रचित इवार्थवतीव विप्रहीनाः ॥५२॥ दुरुत्तरं विवरमुखस्थपन्नगं वनश्रिया परिगतमुत्प्रवालया। इति स्तुवन् जलधिमिवाथ भूभृतं सुतो भुवं समवततार भूभुजः ॥५३॥ महर्षयो नरपतिपौरसंहिताः मुखानि तन्नुतिमुखराणि बिभ्रतः । उपस्थितश्रियमभिषेक संभृति प्रगृह्य तं नृपतिसुतं प्रपेदिरे ॥५४॥ ४६. मृग कहाँ से? वह चन्द्रा सदा किरण का शिरस्पर्श करते हुए, स्वयं उसके संघर्षण की उत्पत्ति से गिरती शीतल किरणों की पुलि से पर्वत को घवल बनाता हुआ धारण करता है। ५०. इस पर्वत पर लता कुन्ज की आड़ में, शिलामों के ऊपर दैवतामों मोर सिद्धों (एक देवयोनि विशेष) की वनितामों के किये हुए रति-विलास के समय, (उनकी) गोल करपनी की रगड़ से (शिला पर) खिंची हुई रेसामों से, वनवासी लोग (सब बात) समझ जाते हैं। ५१. हरिणियों का समूह, खाने के लिए सामने प्रस्तुत पल्लवों को जो उनकी प्रांस की प्रभा पढ़ने से काले पड़ गये थे, उन्हें भ्रष्ट समझकर शरसा से छोड़ दिया। ५२. इस पहाड़ के नीचे, यशस्वी सिदों के साथ-साथ किरातों के भावास उसी प्रकार पे जैसे बुद्धिमान प्रवन्धकर्ता अपनी कृति में पाद पूरण के लिये, निरपंक मध्यययों का सापक की भाति प्रयोग करता है। ५३. समुद्र के समान, जिसका पार करना दुष्कर था जिसको गुफामों के मोहाने पर सो का निवास था, जिसकी वनसक्षमी नव पल्लवों से भरी पी, इस प्रकार पर्वत की प्रशंसा करते हुए त्रिभुवन के स्वामी (राम) पृथ्वी पर उतरे । ५४. तय महपि मोग पोर राजे, पौरजनों को, जिनके मुस उनकी (राम की) प्रशंसा कर रहे थे, पौर प्रमिक की सामग्री मेकर उस रामपुर (राम) के पास पहुं।

विंशतितमस्सर्गः रामोवृतो भरतलक्ष्मणतत्कनिष्ठः बद्धाञ्जलिगुरुविधेयकतैव पृच्छन । वीरश्चकार हृदयं सहसा सतीबोलावतारविधुरं भरतस्य मातुः ॥५५॥ तस्यानुजद्वयकरस्थितशातकुम्भ कुम्भच्युतं शिरसि राक्षसनाथशत्रोः । श्वेतातपत्रतलभाजिनि बद्धधारं मातुर्ममर्ज भरतस्य कलङ्कमम्मः ॥५६॥ दृष्ट्वा राज्यग्रहणविभवं तं महान्तं महान्तं गत्वा रामे विहितविनतिः सत्सभार्ये सभायें । सिद्धः क्रीडानुभवविधिभिर्मानितान्तं नितान्तं शैलं प्रायादिगरिरिव निरातङ्कपीनः कपीनः ॥५७।। पारावारं नयनसलिलातानमस्यन्नमस्यन् रामं वर्णस्थितिपरिकरबासकान्तं सकान्तम्। तेन प्रायात्सुररिपुपतिश्शोकसन्नः लसन्नः खेदं मा गा इति कृतिसमाश्वासमुक्तः समुक्तः ॥५॥ ५५. भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से घिरे हुए, हाथ जोड़ कर गुरुजनोचित मादर से हाल चाल पूछते हुए, उस वीर राम ने तुरन्त भरत की माता (कैकेयी) के हृदय में तीव्र लज्जा को मिटा दिया। ५६. अपने दोनों भाइयों के हाथ में लिये हुए सोने के घड़ों से, श्वेत छत्र के नीचे बैठे हुए, रावण के शत्रु (राम) के सिर पर पार से गिरते हुए, अभिषेक के जल ने, भरत की माता (कैकेयी) के कलङ्कको को दिया। ५७. तब राज्याभिषेक के महान् (महान्तं) पैमव को देखकर वानरों के सरदार (कपमीन:) सुग्रीव ने जो प्रातंक के मिट जाने से मोटे हो गये थे (निरातङ्क-मीनः) समासदों (समायें) और भार्या सहित (स-भायें), बैठे हुए, राम को विनयपूर्वक प्रणाम किया पौर अपने पर्वत पर, जिसके पावं के भाग (नितान्तं) सिद्धों (देवयोनि विशेष) की क्रीड़ामों से नितान्त माहत थे, पर्वत के समान (सुप्रीव) चले गये। ५८. प्रश्रुजल से प्रति विस्तृत हो गये पारावार में स्थित ब्राह्मणादि वर्गों की स्थिति के लिए भयकर्ता के विनासक, प्रियासहित राम को नमस्कार करता हुप्रा शोकावसन- राक्षसपति उनसे 'खेद मत करों' ऐसा कहा जाने पर गहरी सास छोड़कर चला गया।

२६४ जानकीहरणम् चक्रे देवीमुपकृतमुनिस्थानयज्ञो नयज्ञो वृत्तौ सक्तामणि चलगुणाभ्याससत्यां सत्याम् । क्रोधं हन्तीमपि बहुमतासृग्वसानां वसानां हीशौचारख्ये सततमहते वाससीतां ससोताम् ॥५९॥ नित्यं सद्गुणभक्तिरिन्द्रियदम श्रीसंयतः संयतः शस्त्रद्योतितमूनि भुक्तहृदयोऽमी सङ्गतः सङ्गतः । विद्वानस्यकवेः पितार्यहृदयं धीमानितो मानितः लडैश्वयंभुजा कुमारमणिरित्यासन्नथः सन्नथः ॥६०॥ ये नारि प्रकृति निराकृतवता सम्मानितो मानितः यस्य स्वाङ्गमभिन्नतो रिपुभृशं नाशेऽयितः शेयितः । श्री मेघोऽस्य कवेरसौगिल बृहद्घामातुलो मातुलः दृष्टस्त्रासजडं द्विपामधिगतत्रासेनया सेनया ॥६१॥ ५६. नीतिज्ञ राम ने, जो तपोभूमि एवं यज्ञों की रक्षा करने वाले थे, सत्यवादिनी अथवा सती सीता को अपनी रानी वनाया, जो उन शुद्धाचरण के गुणों से सम्पन्न थीं जो सतीत्व के गुणों के अभ्यास में लगे रहते थे, और जिसने रक्त और मज्जा (के पान में) दत्तचित्त राक्षसों के भी क्रोध का नाश कर दिया था और जिसके लज्जा और शुद्धता ही दो बसनु थे। ६०. सर्वदा इंद्रिय-निग्रह को ससंति से संयुक्त, सद्गुणों में निष्ठावान् और निर्भय तथा विद्वान् मानित नामधेय कवि के पिता थे। वे भली नीति का पालन करने वाले थे। वे लङ्का- गरेश कुमार मणि की सेना में प्रागे बढ़ कर सड़ने वाले थे । सर्वोच्च अधिकारी होकर उन्होंने युद्ध में, जहां शस्त्र चमक रहे थे (संयतः-शस्त्र द्योतित मूभि) जूझ कर (संगतः) अपना प्राण दे डाला, परन्तु यह सज्जनों के हृदय मे प्रवेश कर गये । (मार्य-हृदयम्) - ६१. ये प्रद्वितीय और बड़े तेजस्वी, मेघ नाम घेय कवि के मामा (मातुल) थे, जिन्होंने पात्रों को परास्त किया पौर मानित का सम्मान किया, पौर जिन्होने अपने पारो भोर मों का हनन कर (स्वाङ्ग-ममिघ्नतः) उनके पराजय को सर्वत्र प्रकाशमान किया (रिपु- भृशं मारा:-मभितः पोभितः), जिन्हें शत्रु की सेना भय से देख कर कर्तव्य-विमूढ़ हो पाती पी (नास-जड) मोर उसके नायक भी भयभीत होते थे (मधिगत-त्रास-इनया)।

विशतितमस्सर्ग २६५ श्रीमानेकः शरण्यः परिभवविवदायाजनानां जनानां रूपेणानुप्रयातो दिवतिसुभगं रचयन्तं जयन्तम् । भ्राता तन्मातुरन्यः शशिधवलयशःकारणानां रणानां कर्ता पुत्रोऽग्रबोधिर्जनशिरसि लसद्भासुराज्ञः सुराज्ञः ॥६२॥ आदायैनं दशायां स्थितमपितदह स्रस्तनाभ्यां स्तनाभ्यां तुष्टे तस्मिन् गदानामरिहतपित्रिके पारयन्ती रयन्तौ । आत्मापत्याविशेष युषतु रहतप्रेमदान्तौ मदान्ती यत्सानाथ्यात्स काव्यं व्यरचयदसुरद्विण्महाथ महार्थम् ॥६३।। इति विशतितमस्सर्गः। ६२. उनकी माता के एक दूसरे भाई थे जिनका नाम घेय अग्नवोधि था। वे एक राजा के पुत्र थे जो बहुत ही भले थे (सु-राजः) और अपनी प्रजा पर भापनि तथा अपमान के विषय में उनके एक-मात्र राक थे। उनका व्यक्तित्व स्वर्ग को आह्लादित करने वाले जयन्त के समान था । वे ऐसे युद्ध में प्रवृत्त होते थे जो उन्हें चन्द्र के समान शुभ्र यश देता था और जिनकी भाना लोग सिर-मापों पर बड़ी प्रसन्नता से लेते थे (जन- शिरसि-लसत्-भासुर-माज्ञः) । ६३. जब उस कवि ने जन्म लिया ही था (तदह-सुस्त-गाभ्यां) और जब वह स्तन पायी ही था (स्तनाम्यां-तुष्टे) और उसके पिता युद्ध में मारे जा चुके थे, तब उसके दो मातुलों ने उसकी व्याधियों की तीव्रता का निराकरण कर (गदानां-रयं-पार पन्ती) निरन्तर उसके प्रति स्नेह से भर कर और आत्म-निर्भर (महत-प्रेम-दान्तौ) एवं मद-रहित (मद-मन्तौ) होकर उसका (कविका) ऐसा लालन-पालन किया जैसे वह उनका ही पुत्र हो । और उन्ही की सहायता से कवि ने इस विशिष्ट (महा-अर्थ) काव्य की रचना की जिसका अर्थ महान् है (महा-मयं) और जिसका विषय उस महापुरुष एवं राक्षसों के शत्रु (राम) का गुणानुवाद है। बीसवां सर्ग समाप्त।

or चरित्रा-कोश अगस्त्य-वसिष्ठ की भौति ये भी मित्रावरुण के पुत्र थे (ऋ-७-३३-१३) । उर्वशी को देख कर मित्रावरुण का वीर्य स्खलित होकर कमल में गिर पड़ा। उससे वसिष्ठ तथा अगस्त्य उत्पन्न हुए (वृहद्द ५-१३४) । ऋग्वेद में अगस्त्य के बहुत से सूक्त हैं। एक स्थान पर अगस्त्य का नाम 'सुमेघस' आया है (ऋ० १-१८५-१०) मान्य तया मान्दाय जैसे पैतृक नाम भी अगस्त्य के लिए प्रयुक्त मिलते हैं । (ऋ० १-१६५-१४-१५) । मरुत् के लिये लाये हुए पशु को इन्द्र भगा ले गया। अतः वे वज्र लेकर इन्द्र को मारने के लिए प्रस्तुत हुए । उस समय अगस्त्य ने ही मरुत् को सान्त्वना दी और दोनों की मित्रता बनी रही । वह अगस्त्य का कयाशुभीय सूक्त है (ऐ० वा. ५-१६) । कयाशुभीय सूक्त में इन्द्र और मस्त का विवाद है (ऋ० १६५) । इनकी स्त्री का नाम लोपामुद्रा या (ऋ० १-१७९-४) । इस सूक्त में अगस्त्य और लोपामुद्रा का संवाद है । अगस्त्य के वृद्ध हो जाने पर लोपामुद्रा उन्हें सम्भोग के लिये प्रवृत्त करती है (ऋ० १-१८२-१) । ऋपियों में ये अत्यन्त वृद्ध थे । अतः इन्द्र ने इन्हें गायत्रयुपनिषद् का उपदेश किया और इन्होंने उसे इषा को सुना कर परम्परा आरम्भ की (जै० उ० प्रा० ४-१५-१-) १६१ । समुद्र में छिपे हुए असुरों ने इन्द्रादि देवताओं को सताना आरम्भ किया । तव देवताओं ने अग्नि तथा यायु से समुद्र को सुखा डालने के लिये कहा । परन्तु ऐसा करने से समुद्र में रहने वाले प्राणियों का नाश होगा, इसलिये उन्होंने समुद्र को सोखने से इन्कार कर दिया। तब इन्द्र के दिये शाप से मित्रावरुण के वीर्य से यह कुंभ से उत्पन्न हुआ। उनमें अगस्त्य अग्नि है। इन्हें मंत्रावरुणि तथा कुभयोनि भी कहते है (मत्स्य ६१-२०१: पन मृ० २२, म० व० १८. दो० १५७; १८५; शां० ३४५, ब्रह्माण्ड ३-३५) । अगरत्य विरक्त थे तथा पितरों के आज्ञानुसार विदर्भ राज की कन्या लोपामुद्रा से इनका विवाह हुआ । राजकन्या होने के कारण अगस्त्य की अपेक्षा उसे ऐश्वर्य की कल्पना विशेष थी । अपने तप के बल से किसी भी इच्छित वस्तु का संपादन करने की शक्ति रखते हुए तप का अपव्यय करने की अगस्त्य की इच्छा नहीं थी। परन्तु लोपामुद्रा की उत्कट इच्छा देखकर, अ वन, वध्नश्व तथा सदस्यु से सम्पत्ति प्राप्त करने का इन्होने प्रयत्न किया। परन्तु सफल नही हुए। त्रसदस्य ने अगस्त्य को इल्वल की अपरम्पार सम्पत्ति का वर्णन सुनाया। तब तीनों राजाओं को लेकर ये इल्वल के पास गये और इन्होने अपने असीम सामथ्र्य से इल्वल की सम्पत्ति लेकर लोपामुद्रा को सन्तुष्ट किया। समुद्र में रहने वाले कालकेय ने जब लोगों को बहुत सताना आरम्भ किया तब अगस्त्य में समुद्र को पी डाला। इसके बाद देवताओं ने कालकेय को मार संबों को त्रास से मुक्त किया। परन्तु उसे समुद्र के बाहर छोड़ने को कहा गया था, अत. उसे पेट में पचा लिया -(पा. स. १९, भ० १० १०५)। अगस्त्य शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार हैं-अग का अर्थ है पर्वत अर्थात पर्वत का स्तम्भन करने वाला । (वा० रा० अ० ११)1। विन्ध्य पर्वत के गुरु थे। अगस्त्य जब दक्षिण दिशा की २७० जानकी हरणम् ओर गये तव विन्ध्य ने इन्हें नमस्कार किया। तब इन्होंने विन्ध्य से कहा कि जब तक मैं न लौटूं तब तक तुम इसी प्रकार पड़े रहो। उनके भाज्ञानुसार उसने वैसा ही किया । अतः कोई वाधा न होने के कारण दक्षिण से उत्तर का आना जाना आरम्भ हो गया । (१० त० १०४; दे० भा० १०-३-७) । अगस्त्य पहिले काशी में रहते थे। पर दक्षिण-उत्तर का मार्ग निकालने के लिये इन्होंने फाशी में रहना छोड़ दिया । तब अगस्त्य के वचनानुगार काशी विश्वेश्वर रामेश्वर आकर रहने लगे (अ० रा० सार० १०)। काशी में रहने की इच्छा होते हुए भी वे ऐसा न कर सके । तव गोदावरी के तट पर लक्ष्मी ने इन्हे यह वर दिया कि ये उन्नीसवें द्वापर युग में व्यास धन कर काशी में रहेंगे (स्कन्द ४-१-५) । दक्षिण में आने पर इन्होंने एक द्वादन-वार्षिकोत्सव किया। उसमें के ब्राह्मणों को पिप्पल तथा अश्वत्थ खा डालते थे । शनि देव ने उन्हें मार डाला। (ब्रह्म० ११८) । नहुप ने वाहन बना कर इनका अपमान किया, इस लिये अगस्त्य की जटा में बैठे हुए भृगु ने उसे दस हजार वर्षों तक साँप बन कर पड़े रहने का शाप दिया । (म० अनु० १-५७; स्कन्द १-१-१५)। बनवास में राम अगस्त्य के आश्रम में उनके दर्शन के लिये गये थे। अगस्त्य ने राम को सोने और हीरों से अलंकृत, सुन्दर घनुप, अमोघ वाण और बाण न समाप्त होने वाला तरकश तथा सोने के म्यान सहित सोने की मूठ वाला खंग दिया। इदं दिव्य महच्चापं हेम रत्न विभूषितम् । वैष्णवं पुरुष व्या निर्मितं विश्वकर्मणा । अमोघः सूर्य संकाशो ब्रह्मदत्तः शरोत्तमः ॥ दत्तो मम महेन्द्रेण तुणी चाक्षयसायको । सम्पूौं निशितैर्वाण ज्वलभिरिव पावके । महारजत कोशोऽयमसिहॅम विभूषितः । दत्वा रामाय,..(या रा० अर० १२, ३२-३५) । अगस्त्य के आश्रम में, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, सोम इत्यादि देवताओं के लिये योजित स्थान (मन्दिर) दिखलाई पड़े। सतत्र ब्रहमणः स्थानमग्नेः स्थानं तथवच । विष्णोः स्थानं महेन्द्रस्य स्थानं चंय विवस्वतः ॥ स्पानं च पाहिस्तस्य वष्णस्य महात्मनः । कातिकेमस्य च स्यानं धर्म स्थानं च पश्यति । -या० रा० अर० १२, १५-२१ । -- अगस्त्य का सम्बन्ध हमेशा दक्षिण से ही रह आया है। इन्हें लंकावासी भी महा गया है (मत्स्य० ६१-५१) । भगस्त्य को दक्षिण मा स्वामी तपा विजेता कहा गया है । (ब्रह्म ११८-१५९) । दक्षिण में अगस्त्य का आश्रम मलय पर्वत पर था (मत्स्य ६१-३७) । और : सरयासोनं नगस्याप्रे मलयस्य महोमसम् । पवातिरय संकायमाररयमपि सप्तमम् ॥-या० स० कि०४१-१६॥

धरित्रकोश २७१ पाण्ड्य तथा महानदी के निकट महेन्द्र पर्वत से भी अगस्त्य का सम्बन्ध है (वा० रा०कि० ४१-४७-२४) । इस समय अगस्त्य के मन्दिर जावा आदि टापुओं भी मिलते है । अगस्त्यपुरी भी नासिक के निकट है। वातापि अर्थात् बदामी का स्थान दक्षिण में ही है, ऐसा अभी तक समझा जाता है। परन्तु नन्दलाल दे ने वैरुल के निकट का स्थान बताया है । विन्ध्य को कथा, दक्षिण से सम्बन्ध की ओर संकेत करती है । विदर्भ अथात् बरार दक्षिण की ओर का देश है। और वहां के नरेश की कन्या इनकी स्त्री है। इन सब प्रमाणो से यह कहा जा सकता है कि वह दक्षिण के ही रहने वाले थे। वाल्मीकि ने भी उन्हें दक्षिणाशाश्रयं मुनिम्' कहा है। (वा० रा० उ० ३५-१) । दक्षिण का मार्ग खोलने ही के लिये तो उन्होंने अभ्रंलिह विन्ध्य को नत किया था। अतः उत्तर की और यमुना प्रयाग, गंगा आदि से इनका सम्बन्ध आया है। अगस्त्य नामक एक तारा भी दक्षिण की ओर भाद्रपद में उगता है और उसके उगने पर जल स्वच्छ हो जाता है। यह अगस्त्य की महत्ता का सूचक है (मत्स्य ६१)। प्राचीन काल में सुकेतु नाम का एक महाबली यक्ष था। उसके कोई सन्तान नहीं थी। वह बड़ा तपस्वी था। ब्रह्मा के वरदान से उसके एक असीम सुन्दरी पुत्री हुई। उसके १००० हाथी का बल था । विवाहोपरान्त उसके एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम मारीच था । वह वड़ा बलवान् था। किसी शाप के कारण वह राक्षस हो गया। अपने पति सुन्द के वाद माता और पुत्र अर्यात् ताटका और मारीच अगस्त ऋपि को सताने लगे। जब एक दिन वे दोनों उन्हें खाने को दौड़े तो अगस्त्य ने मारीच को शाप दिया कि तू राक्षस हो जा और ताटका को शाप दिया कि तेरा रूप भयंकर और विकृत हो जाय । ताटका सह पुत्रेण प्रवर्षपितुमिच्छति । भक्षायं जात संरम्भा गर्जन्ती साम्ययावत ॥ आपतन्ती तु नां दृष्ट्वा अगस्त्ये भगवानृषिः । राक्षसत्यं भजस्वेति मारीचं व्याजहार सः । परम क्रुद्धस्ताटकामपि शप्तवान् । पुरुषादी महायक्षो विरूपा विकृतानना । -बा० रा०बा० २५.१०-१२। अंगद--बालि का, उसकी पली तारा से उत्पन्न एक मात्र पुर । उसने राम की सहायता के लिये वृहस्पति के अंश से जन्म लिया था। यह बातचीत करने में बड़ा चतुर या । सुग्रीव और बालि के युद्ध मे जव बालि, राम के बाण से मारा गया तो मरने के समय उसने राम से अगद की रक्षा के लिये विनती की- अगस्त्यः । बालश्चाकृत बुद्धिश्च एक पुत्राश्च मे प्रियः । तारेयो रामभवता रक्षणीयो महाबलः ॥ -पा० रा० कि० २८-५३ । चालि के बध के बाद राम ने सुग्रीव को किष्किन्धा की राजगद्दी और राम की आज्ञा से सुग्रीव ने अंगद को युवराज पद दिया- सलिलेन सहस्राक्षं वासवो पासवं यथा । अभिषिञ्चन्त सुप्रीवं प्रसन्नेन सुगन्धिना ॥

जानकीहरणम् प्रचुक्रुशर्महात्मानो हृष्टास्तत्र सहस्रसः । रामस्य तु वचः कुर्वन् सुग्रीवो हरिसुंगवः ॥ अंगद सम्परिष्यज्य मौरराज्येऽन्यचयत् । अंगवे चाभिषिक्तेनु सानु कोशः प्लवंगमाः ॥ --वा. रा. कि. २६-३६-३८॥ सुग्रीव ने सीता को ढूंढ़ने के लिये जिस वानर-सेना को दक्षिण भेजा था उसका नायक अंगद था । तेपामग्रेसरं चैव महवलमयागंदम् । विधाय हरवीराणा मांदिशदक्षिणां दिशम् ॥ -वा. रा. कि. ४१-६ । ढूंढते-ढूंढते वे कण्डु ऋपि से शापित एक जंगल में पहुंचे। वहां उन्हे एक पर्वताकार निर्भय नामक सुर-राक्षस मिला। वह अंगद पर झपटा। पर अंगद ने उसे रावण समझ कर ऐसा थप्पड़ मारा कि वह रक्त वमन करने लगा और भूमि पर गिर कर मर गया- नभापतन्तं सहसा बालि पुत्रोङ्गवस्तदा । रावणोऽयमिति ज्ञात्वा तालेनामिजधानह ॥ स वालि पुत्राभिहतो यत्राच्छोणित मुद्वमन् । असुरो न्यपतद् भूमौ पर्यस्त इव पर्वतः ॥ -या० रा० कि० ४८. २०-२१ । जब सुग्रीव द्वारा निर्धारित समय के भीतर, अंगद सीता को न ढूंढ सके तो अनशन कर प्राण त्यागने को तैयार हुए-- अहं यः प्रतिजानामि नागमिष्याम्यहं पुरीम् । प्रायमासिध्ये थेयो मरणमेव मे ॥ -~वा०रा० कि० ५५-१२॥ फिर अंगद से जटायु की मृत्यु का सब वृत्तान्त सुनकर उसके बड़े भाई राम्पाति गुण ने अंगद को विस्तार मे सीता का पता बताया । रापण से युद्ध छेड़ने के पूर्व राम ने सभा-चतुर अंगद को अपना दूत बना कर रावण के पारा भेजा, पर उसे समझाने में अंगद असफल रहा । फिर युद्ध दिह गया । युद्ध में अंगद ने देवान्तक, मिशिरा, महोदर, गरकान्तक इत्यादि बहुत से राक्षम पीरों का वध किया । अंगद ने मेघनाद से घोर युद्ध किया । जय कुम्भकर्ण युद्ध करने लगा तो उसका भयंकर आकार ही देश भर यानर-रोना पदरा गई और माग पड़ी हुई । परन्तु जब अंगद ने अपने पीर-रग से भरे वाफ्यों से उन्हें उत्तेजित किया तो सम्पूर्ण वानर सेना लौट आयी और द्विगुणित उत्साह से सड़ने लगी। - चरित्र कोश २७३ युद्ध जीत लेने के बाद जब राम का राज्याभिषेक हुआ तो उन्होने अंगद को बहुत से बहुमूल्य आभूषण दिये । सुग्रीव के वाद अंगद ने किष्किन्या पर राज्य किया। अज-महाराज रघु के पुत्र और दशरथ के पिता । पद्म पुराण में इन्हें रघु का पौत्र तथा द्वितीय दिलीप का पुत्र कहा गया है (पा० सृ०९) । बकरियो (अजा) के पालने के कारण ये 'मज' कहलाये। इन्द्र-ये देवताओं के राजा और वर्षा के देवता हैं । एक वार नाग गरुड़ की पीठ पर बैठ फर जा रहे थे। तब गरुण इतने ऊँचे उड़े कि सब सूर्य-ताप से मूछित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। तव उनकी माता कद्रु ने इन्द्र की स्तुति करके ताप के दामन के लिये वर्षा करायी (म० आ० २५-२६) । इन्द्र ने मन्दर पर्वत के पंस तोड़ डाले थे । (स्कंद १-१९-९)। वृत्रासुर ने इन्द्र का पराभव किया । इस पर इन्द्र ने सुभ्रमती के तट पर दुर्घश्वर की प्रार्थना की । तव भगवान शंकर ने उन्हे पाशुपत अस्त्र दिया । इन्द्र को वृत्रासुर के वध के लिये वज्र की जरूरत थी। दधीचि ऋषि की अस्थियों से विश्वकर्मा ने वज्र बनाया। शंकर ने इन्द्र को बज दिया। उससे उन्होंने वृत्रासुर का वध किया (पद्म उ० १६८) । मेघनाद ने इन्द्र को पराजित किया था। पुराणों में इन्द्र को प्रथम स्थान न देकर त्रिमूर्तियो के नीचे दिया गया है । उनके अनुसार यह अंतरिक्ष और पूर्व दिगा का राजा है । वह विद्युत छोड़ता और फेंकता है । इन्द धनुप को सुसज्जित करता है । सोमरस पीने में उसे आसक्ति है । यह असुरों से लड़ता और उनसे सदा भयभीत रहता है । यह सुस्वरूप है। सफेद घोड़ा या हाथी पर वन लेकर बैठता है। इसका निवास स्थान स्वर्ग है, जिमको राजधानी अमरावती है । इसके महल का नाम वैजयन्त है। इसका उद्यान नन्दन बन, गज ऐरावत, अश्व उच्चैश्रवा, रथ विमान, सारयी मातलि, धनुप शंकु धन और तलवार परंज है। इसको सदा डर लगा रहता है कि कही घोर तप एव यज्ञ करके कोई उसका इन्द्र पद न छीन ले । अतः वह विविध प्रकार से उनका तप भग करता है । वह कभी शस्त्रों के द्वारा और कभी अपनी अप्सराओं के द्वारा साधकों का तप भ्रष्ट करता था। काव्यशास्त्र कहता है- अवशो सुकुमार प्रहरणं महेन्द्रस्य । प्रत्यादेशः रूपविताया श्रियः अलंकारः स्वर्गस्य ।' - इन्द्रजित--लंका के राजा रावण तथा मन्दोदरी का ज्येष्ठ पुत्र । इसका नाम मेघनाद था। चूंकि यह जन्म लेते ही मेघ के समान नाद करने लगा अतः इसका नाम 'मेघनाद' पड़ा। जात मात्रेण हि पुरा तेन रावण सूनुना पदता सुमहान्मुक्तो नादो जलपरोपमः । पिता तस्या करोन्नाम मेघनाद इतिस्वयम् । -या० रा० उ० १२, ३०-३१ । मेघनाद युद्ध में इन्द्र को जीत कर लंका मैं पकड़ ले गया । तब देवता लोगो ने इन्द्र की रक्षा के लिये ब्रह्मा जी से विनती की । तब ब्रह्मा जी देवताओ के साप लका में गये और रावण से बोले- ३५ २७४ जानकोहरणम् . अयं च पुत्रोऽतिबलस्तव रावण वीर्यवान् । जगतीन्द्रजिदित्येव परिस्यातो भविष्यति ॥ अंत में ब्रह्मा जी ने मेघनाद का नाम इन्द्रजित रखा । परन्तु फिर भी उसने इन्द्र को नही छोड़ा और कहा कि यदि आप हमें अमरत्व प्रदान करें तो हम इन्द्र को छोड़ें । ब्रह्मा के यह कहने पर कि संसार में कोई भी अमर नहीं हो सकता "इन्द्रजित ने कहा कि, तो फिर जब मैं शत्रु को जीतने के लिये निकलूं और उस समय अग्निदेव का पूजन कर हवनीय द्रव्य की आहुतिदूं तब उस अग्नि में से मेरे लिये घोड़ों सहित रथ निकले । उस रथ पर जब तक मैं सवार रहूँ तब तक अमर रहूँ। इतने से कम वरदान में मैं इन्द्र को न छोड़गा।" तव ब्रह्मा जी ने 'एवमस्तु' कह दिया। तब इन्द्रजित ने इन्द्र को छोड़ दिया (वा० रा० उ० ३०,१२-१६) । रावण जब सीता को लंका में ले आया तब उनकी खोज के लिये हनुमान सुग्रीव की आज्ञा से लंका गये। उन्होंने अशोक बाटिका का विध्वंस कर रावण के पुत्र अक्ष को मार डाला । उस समय इंद्रजित वहाँ गया और हनुमान को ब्रह्मास्त्र से बांध कर रावण की सभा में लाया। वहाँ यह निश्चित हुआ कि हनुमान की पूंछ जला दी जाय क्योंकि बन्दरों को अपनी पूंछ ही सब से अधिक प्रिय होती है- कपीनां किल लाडगूलमिष्टं भयति भूषणम् । तदस्पदीप्यनां शीण तेन दग्धेन गच्छतु ॥ -वा० रा० उ० ५३-३ । लंका-युद्ध में अनेक वार इन्द्रजित युद्ध करने के लिये भेजा गया । एक बार उसने युद्ध में राम की सेना को बहुत राताया और एक मायावी सीता बना कर, और उसे दीन मुख से राम-राम जपते हुए रथ में बैठी दिसा कर उसका वध किया । इसके कारण रामा- दिक बहुत दुखी हुए। या० रा० यु० ८१, ३०-३६ । जब विभीपण ने राम को बताया कि इन्द्रजित ने माया-मयी सीता बना कर उसका वध किया है तब राम शान्त हुए । इन्द्रजित ने युद्ध में अनेक बार युद्ध किया, परन्तु अन्त में लक्ष्मण के हाथों मारा गया । (वा० रा० यु० ९१) । राक्षस सेना इन्द्रजित या कटा हुआ सिर सुवेल पर्वत पर राम को दिखलाने के लिये ले गई। तदन्तर इन्द्रजित की पत्नी सुलोचना अपने पति के साथ सती हो गई। ईश्वरा-दुर्गा का एक नाम । उमिला-लक्ष्मण की पत्नी और विदेहराज जनक की पुत्री, जिसका उसी रागय लक्ष्मण से विवाह करने के लिये जनक वचन-वद्ध हो गये थे जब शिव-धनुप पर प्रत्यञ्चा पाने के कारण रामने सीता को पाया था। उर्वशी-एफ असीम सुन्दरी अप्सरा । मित्र और वरुण के शाप से उसने पृथ्वी पर जन्म लिया । पुरगया पर यह आगरा हो गई। उससे एक पुत्र हुआ जिसका नाम नारद ने आयु रसा। साप फी अवपि समाप्त होने पर यह फिर स्वगं चली गयी। मानस-यह मसुरों का फुल गुरु एवं अध्वंयु पा । दिव्या से उत्पन भृगु मा पुन एक और उनसय एक ही पे (ब्रह्माण्ड ३-१-७४)इनकी स्त्री वातपर्वा पी (म० उ० ११७-१३-१०) पितृ गुना आंगी नाममः उगफी एक और पली पी। उसनम ने सरेर पापन लूट रिया । मागिन चरित्रकोश २७५ ने उसे निगल लिया; तब यह शिव के शिश्न से निकला। तब से इसका नाम शुक्र हुआ (म० श्यं० २९५, विष्णु धर्म १-१०-६)। शुक्र की अनुपस्थिति में देवताओं ने असुरों को सताना आरम्भ कर दिया । तव शुक्र की माता लड़ने के लिए भागे बढ़ी और उसने देवताओं को जलाना आरम्भ किया। इन्द्र तो भाग गया, पर विष्णु ने उसकी माता को मार कर देवताओं की रक्षा की। परन्तु स्त्री पर शस्त्र प्रहार करने के कारण भृगु ने विष्णु को पृथ्वी पर जन्म लेने के लिये शाप दिया और शुक्र की माता का मस्तक फिर घड़ से जोड़ कर उसे जीवित कर दिया। तव इन्द्र बहुत घबराया और अपनी जयन्ती नामक कन्या शुक्र को अर्पित कर दी । इपर शुक्र ने भी हजार वर्ष तप कर शिव से प्रजेशत्व, और अवध्यत्व प्राप्त किये (मत्स्य ४७; विष्णु धर्म १-१०६) । उसनस धर्म शास्त्र नामक सात अध्यायो की एक छोटी सी पुस्तिका उपलब्ध है। इसी प्रकार औशनस नामक दो भिन्न-भिन्न अन्य, जीवानन्द संग्रह में उपलब्ध हैं। इसी प्रकार राजनीति पर भी इनका शुक्रनीति नामक ग्रंथ भी उपलब्ध है। ऋषीक-भार्गव कुल के च्यवन वंश में उत्पन्न एक प्रख्यात ऋषि (मनु०४) और्वा के पुत्र (म० अ० ६६) यह और्वा की जांघ फाड़ कर निकले थे (ब्रह्माण्ड ३-१-७४-१००) । इन्हें काव्य-पुत्र भी कहा गया है (ब्रह्म १०) । बाल्यावस्था ही से इन्होंने अपना समय वेदानुष्ठान और तपस्या में लगाया। . एक समय तीर्थ यात्रा करते समय इन्होंने विश्वामित्री के तीर पर कान्यकुब्ज-राज गाधि की कन्या को स्नानाथं आते देखा । उसके रूप पर मोहित होकर इन्होंने कान्यकुब्जराज गापि से उसे मांगने का निश्चय किया। जब इन्होंने मांगा तो गाघि ने कहा यदि तुम एक हजार श्याम वर्ण अश्व लाकर मुझे शुल्क के रूप में दोगे तो मैं अपनी यह कन्या दूंगा (म० अनु, ३१, विष्णु ४.७, भा० ९-१५) । राजा की उस मांग को सुनकर तत्काल वह गंगा तट पर गये और अरुण की स्तुति करके अश्व प्राप्त कर लिये (म० २० ११५; अनु० ४)। अश्व लेकर गाधि ने अपनी कन्या सत्यवती इन्हें दे दी। पोड़े समय गृहस्थाश्रम का पालन कर ऋचीक जब तपस्या के लिये निकले तो सत्यवती से वर मांगने के लिये कहा। उसने अपने और अपनी माता के लिये उत्तम लक्षणों से युक्त पुत्र मांगे। तब ऋचीक ने ब्राह्मणोत्पत्ति के लिये एक, और क्षत्रियोत्पत्ति के लिये एक इस प्रकारदो चावल मंत्र से सिद्ध कर दिये । (म० सां० ४९; अनु ५६; वायु २-४) । चावल तो दियेही पर सत्यवती को यह भी आदेश दिया कि ऋतु-स्नान के बाद तुम्हारी मातापीपल को और तुम औदुम्बर वृक्ष को आलिंगन.करना (म०व० ११५अनु०४; विष्णु धर्म १-३२-३३) । इसके अतिरिक्त ऋचीक ने दो घट भी अभिमत्रित कर दिये और कहा कि सत्यवती की माता वट वृक्ष की और सत्यवती पीपल की सहात प्रदक्षिणा करें (स्कन्द ६-१६६-६७) फिर जब गाघि तीर्थ यात्रा करते हुए आश्रम में आये तो सत्यवती को पति के दिये हुये चावल का स्मरण हुआ। परन्तु माता के कहने पर दोनों ने अदल बदल कर चावलों को खाया। कुछ ही काल के बाद ऋनीक को इस गड़बड़ी का पता चल गया । परन्तु सत्यवती के इच्छानुसार यह कहा कि क्षत्रिय स्वभाव का पुत्र नहोकर पात्र होगा। तत्पश्चात् सत्यवती जमदग्नि प्रभूति सौ पुत्र हुए। वे सब ब्राह्मण स्वभाव के थे। परन्तु जमदग्नि को रेणुका से उत्पन्न हुआ परशुराम बड़े उग्र स्वभाव कापदाहुआ। इषर गाधि को सत्यवती से विश्वामित्र उत्पन्न हुआ और अपनी घोर तपस्या से उसने बाहालका सम्पादन किया। (म० अ०६१ व ११५, १६:४९) ।

जानकोहरणम् ऋष्यशृंग--विभाण्डक काश्यपं का पुत्र । एक वार विभाण्डक गंगा स्नान के लिये गये थे। वहां उन्हें उर्वशी दिखलाई पड़ी। उसे देखते ही विमाण्डक को काम-विकार उत्पन्न हुआ और उनका वीर्य स्खलित होकर जल में गिर पड़ा। उसी समय शाप से हरिणी बनी हुई एक देवकन्या वहां पानी पीने को आई। पानी पीते समय वह वीर्य उसके पेट में चला गया। उसी से ऋष्यशृंग उत्पन्न हुए (म० व० ११०) । सारा आकार मनुष्य की भाँति मगर सिर पर ऋष्य नामक मृग की तरह सीग था । अतः इनका नाम 'ऋष्यशृंग' पड़ा (म० व० ११०) । इनके जन्म लेते ही इनकी माता शापमुक्त होकर स्वर्ग चली गयी । उस समय इस अनाथ ऋष्यशृंग का पालन-पोषण विभाण्डक ने किया और उसे वेद-वेदांग में पारंगत किया। मृग योनि का होने के कारण वह बड़ा मीरु था। वह कभी आश्रम के बाहर नही जाता था। (वा० रा. वा० ९) अतः अपने पिता के सिवा उसने किसी को नहीं देखा था । उसी समय अंग देश मै अवर्षण के कारण काल पड़ा । तव उनके ध्यान में आया कि यदि ऋष्यशृंग राज्य में आ जायं तो वृष्टि होगी । परन्तु यह बड़ी कठिन समस्या थी। एक बूढ़ी वेश्या ने इस कार्य को अपने ऊपर लिया। वह कुछ तरुणी वेश्याओं को साथ लेकर विभाण्डक की अनुपस्थित में उनके आश्रम के निकट एक नाव पर रहने लगी ।वे तरुणी वेश्यायें घूमने निकलती, आश्रम में जाती, वहीं ऋष्य शृंग से भेंट हो जाती । भोले-भाले ऋष्यशृंग ने उन सवों को मुनि कुमार समझा। धीरे-धीरे ऋष्यशृंग को फंसा कर वे अंग देश में ले गई। उनके जाते ही वहाँ वृष्टि हुई। राजा रोमपाद ने इन्हे अपनी शान्ता नामक कन्या दी। भवभूति उत्तर राम चरित मे कसते है : कन्यां दशरयो राजा शान्ता नाम व्यजीजनत् । अपत्यकृतिकां राज्ञे लोमपादाय यां ददौ । विभाण्डक सुतस्तां प्राप्यशृंग उपेयमे । अतः ऋष्यश्रगं राम के बहनोई हुये। राम सीता से पाहते हैं "नियिनः सोमपीती भावुत्तो मे भगवान प्यशृंगः" । आवुत्तो भगिनी पतिः । भयभूति ॥ विमाण्डक अपने पोप्य पुत्र को ढूंढ़ता-ढूंढ़ता यहां आया । परन्तु अतिथि सत्कार से वह प्रसन्न हो गया । शान्ता से एक पुत्र होने पर ऋष्यशृंग शान्ता सहित अपने आश्रम में चला गया ( म० १० ११०-११३; ना० रा. बा. ९-१० । दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ कराने के लिये, रोमपाद की मध्यस्थता से दशरथ ने ऋष्यशृंग को अपने यश में अध्यय बनाया। इससे दशरय के राम लक्ष्मणादि पुन हुए (वा० रा. वा० ११) । मट्टिकाव्य में कहा है-- फोगल्यया साविसुसेन रामः प्रास्फयोतो भरतस्ततोभूत् । प्रसोप्ट साध्नमुदार घेप्टमेषा सुमित्रा सहयक्ष्मणेन ॥--भट्टि १-१४ । फारस्य-साद विकुक्षी का पुत्र । एक समय घेता युग में देवताओं और दानवों में पोर युद्ध हुआ, जिसमें देवता परास्त हो गये । तब ये विष्णु के पास सहायतार्थ गये । विष्णु ने उनसे अयोध्यानरेश पुरजय से सहायता लेने के लिये कहा । तब देवता लोग उसके पास गये और उन्होंने सहापता की याचना की । पुरख्जय ने यहा कि यदि इंद्र हमें अपने फन्पों पर समर में ले गले सो हम आप लोगों धरिन कोश २७७ की ओर से लड़ सकते हैं। इस पर इन्द्र राजी हो गये और वृपभ का रूप रस कर उनके वाहन बने और उन्होंने दैत्यों का नाश कर दिया । तब से पुरजय का नाम 'ककुत्स्थ' पड़ गया। अर्थात् बैल के ककुद पर बैठने वाला और उसके वंश के दारय, राम इत्यादि काकुत्स्थ कहलाये। कालनेमि (~-रावण का मामा, एक राक्षस । युद्ध में लक्ष्मण के मूर्षित होने पर, हनुमान, द्रोणाचल से औषध लाने जा रहे हैं-यह सुन कर रावण ने हनुमान का मार्ग-रोध करने के लिये कालनेमि को भेजा था उस समय वह एक ऋपि का वेश धर कर मार्ग में बैठा था। परन्तु हनुमान को उसका कपट तुरन्त मालूम हो गया । इसलिये उन्होंने अविलम्ब उसे मार डाला और आगे बढ़ गए (अध्या० रा० यु०७) । का वीर्य-चन्द्रवंशीय कृतवीयं राजा का पुत्र सहस्रार्जुन । एक समय रावण नर्मदा के तट पर शिवार्चन कर रहा था । उससे थोड़ी दूर पर माहिष्मती या राजा सहस्रार्जुन अपनी बहुत सी रानियों के साथ जल-विहार कर रहा था । उसने अपनी सहर मुजाओं से नर्मदा की धारकों रोक दिया। प्रवाह के रुकने से कार जल उमड़ पड़ा और रावण की पूजा की सामग्री तितर-वितर हो गई। तब इसका कारण जानने के लिये शुक और सारण को भेजा । लौट कर उन्होंने बताया कि सहस्रार्जुन ने ऐसा किया है । तब रावण उससे युद्ध करने के लिये चल पड़ा। दोनों में घोर युद्ध हुआ। तब रावण को पायल कर सहस्रार्जुन ने उसे बांध लिया और बांध कर रावण को अपनी राजधानी ले गया (वा० रा० उ० ३२) । पुलस्त्य ने जय सुना सब वह माहिष्मती गये और उनके कहने से सहस्रार्जुन ने रावण को छोड़ दिया और रावण ने उससे मंत्री कर ली एवं स रावगः प्राप्तः कार्तनीति प्रपर्पणम् । पुलस्त्य वचनाच्चापि पुनमुक्तो महाबलः ॥ (वा० रा० उ० ३३-२१, २३) । कार्तवीर्य ने जमदग्नि ऋपि के आश्रम से बछड़े सहित कामधेनु को चुरा लिया था। जमदग्नि के पुत्र परशुराम ने उन्हें मार डाला और घेनु को ले आये । खर-दूषण-ये दोनों महाबली राक्षस रावण के सौतेले भाई थे। इनके पिता का नाम विश्रवा और माता का नाम राका था। शूर्पणखा इनकी बहिन थी। पञ्चवटी में यह लक्ष्मण के ऊपर कामासक्त हो गई। उनसे तिरस्कृत होने पर मारने दौड़ी। तब लक्ष्मण ने उसकी नाक काट ली। शूर्पणखा ने अपने भाई रावग से गोहार लगाई। रावण ने खर और दूपण को बदला लेने के लिये भेजा। ये दोनों घोर युद्ध में मारे गये। कोनाश [---यम को क्रीनाश भी कहते हैं। वेदों से यम को मत्यु का देवता कहा गया है, जिसके पास मृत प्राणियों की प्रेतात्मा रहती है। ये विवस्वत (सूर्य) के पुत्र थे। इनके दो जुड़ौरा बहिनें यमी और यमुना थीं। वेद के एक दूसरे सूक्त में कहा गया है कि "यम पहिले मनुष्य थे जिनका मरण हुआ और वे सर्व प्रथम स्वर्ग को गये ।" महाकाव्यों में यम को संज्ञा से उत्पन्न सूर्य का पुत्र और विवस्वत मनु का माई कहा गया है । पौराणिक कथाओं में इन्हें युधिष्ठिर का पिता कहा है । ये प्रेतात्माओं के देवता हैं और मृत प्राणियो के सम्बन्ध में न्याय करते हैं। जब आत्मा पार्थिव शरीर को छोड़ती है तो वह पाताल में उनके निवास स्थान पर जाती है। तब वहाँ एक बड़ी पञ्जिका से जिसे 'अग्रसंघानी' कहते चित्रगुप्त जो उसके लेखक हैं, उस मृत पुरुष का कच्चा चिट्ठा पढ़ते हैं। तब यम उसे प्रेतात्मा को यथार्थ दण्ड देते है और उसके अनुसार वह प्रेतात्मा या २७८ जानकाहरणम् तो पितृ योनि में जाती है या अपने कर्मानुसार एक्कीस नरकों में से किसी एक नरक में जाती है अथवा पृथ्वी पर किसी दूसरी योनि में पैदा होती है। यम दक्षिण दिशा के स्वामी हैं । अतः उन्हें दक्षिणाशापति कहते हैं। उनका शरीर हरे रंग का और वस्त्र लाल है। उनका वाहन मैसा है । उनका शस्त्र भारी गदा है और मृतात्मा को बांधने के हेतु वह हाथ में पाश लिये रहते हैं। कुम्भ यह भयंकर बलवान् राक्षस कुम्भकर्ण काबटा था और निकुम्भ का भाई था । जब राक्षसों के बड़े-बड़े सेनापति मारे गये तो रावण ने कुंम को युद्ध करने के लिये भेजा। कुंभ ने बड़ा भयंकर युद्ध किया (वा० रा० यु०७६) । सुप्रीव ने इसे युद्ध में मार डाला। तब, उसके भाई निकुम्म ने घोर युद्ध किया। निकुम्भो भ्रातरं वृष्टवा सुग्रीवेण निपातितम् । प्रदस्तिवकोपेन वानरेन्द्रमवक्षत ॥-वा० रा० यु० ७७.१ । कुम्भकर्ण-वैवस्वत मन्वन्तर में पुलस्त्य सुत्र । विश्रवा ऋषि और उनकी भार्या कैकसी से उत्पन्न चार पुत्रों में द्वितीय । यह रावण का छोटा भाई था। भागवत मतानुसार इसकी माता का नाम केशिनी था। इसने जन्म लेते ही हजारों लोगों को खा डाला । तब जन समूह अपनी फ़र्याद लेकर इन्द्र के पास गया । इन्द्र ने क्रोध से कुम्भकर्ण पर वज्र फेंका । उस पर कुछ असर नहीं हुआ वरन् वह और गर्जन करने लगा । इराने ऐरावत का एक दांत उसाड़ कर इन्द्र पर फेंकातो इन्द्र रुधिर से मर गया । जब ब्रह्मा को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने शाप दिया कि यह सदैव निद्रित रहेगा। परन्तु रावण की विनती पर उस शाप को घटा दिया और कहा कि यह छः महीने पर एक बार जागेगा (का० रा० यु०६१)। कुवेर की लंका को रावण के वापस ले लेने पर, यह रावण के साथ लंका में गया। वहां विरोचन पुत्र (बलि) की नातिन बज ज्वाला से इसका विवाह हुआ (वा० रा० उ० १२)। रावण ने अपने निद्रालु माई के सोने की उत्तम व्यवस्था कर दी। उसने विश्वकर्मा से आठ कोस लम्बा और चार कोस चौड़ा एक सुन्दर पर तैयार करवाया। उसी मेंयह बराबर सोता रहता था (या० रा० उ० १३) । जब यह जागता था तब रावण की सभा में आता था । युद्ध आरम्म होने से पहिले रावण उसके पास गया और कहा: अह्नाय प्रतिवद्ध्यता, किमभवत्, रामाङ्गनाहपाहता भक्ता सा न कर्य, न भजते रामादते जानकी । रामः किनभवानभूत, शृणु सखे, तालोदल श्यामलं रामाङ्ग वपतो ममापिकलुषी भावो न सजायते ॥ यह प्रश्नोतरी श्लोक है : रावण कहता है "जल्दी उठो," कुम्भकर्ण पूछता है "क्या हुआ!' उत्तर-"राम की पत्नी को हम उड़ा लाये हैं", प्रश्नः -"तुमने उससे सम्मोग नहीं किया।" उत्तर- "वह राम के सिवा किसी की बात ही नहीं करती।" प्रदन "तुमने राम का मायावी स्वरूप श्यों नहीं रण लिया?" उत्तर "अरे माई, मैंने ताली दल श्यामल राम को रूप बनाया, परन्तु जरो ही मैंने राग का रूप धारण किया से ही मेरे ऐसे व्यक्ति के भो हृदय में कोई कति भाव में उत्पन्न हो सका।"

चरित्र कोश २७९ युद्ध आरम्म होने के पहिले कुम्भकर्ण ने रावण को सीता को लौटा देने के लिये बहुत समझाया, परन्तु रावण ने एक न माना। अन्त में लाचार होकर उसने युद्ध में लड़ना स्वीकार किया। और फिर उसने घोर युद्ध किया। राम की सेना के पैर उखड़ गये, इसने उतना भयंकर संहार किया। अन्त में राम के वाण से वह मारा गया: स कुम्भकर्ण सुरसंघ मर्दन, महत्सु युद्धष पराजितपमम् । ननन्द हत्वा भरताप्रजो रणं, महासुरं वृमिवा भराधिपः ॥-वा० रा० ० ६७. १९१ । कुमुद-राम की सेना में एक बानर का नाम । फुवेर-ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य, पुलस्त्य के पुन विश्रवा और उनके वैश्रवण । अगस्त्य राम से कहते हैं: पुरा कृतयुगे राम प्रजापति सुतः प्रभुः। पुलस्त्यो नाम ब्रह्मषिः साक्षादिव पितामहः॥ -पा० रा० उ० २-४ ॥ ब्रह्मपि पुलस्त्य जी तपः स्वाध्याय में संलग्न हो गये। पर उनके आश्रम में जाकर कन्यायें विघ्न डालने लगी (वा० रा० उ०२-८) । तब उन्होंने क्रुद्ध होकर शाप दिया कि जो लड़की मेरी आँखों के सामने पड़ जायगी वह गर्भवती हो जायगी (वा० रा० उ०२-१३)। सव कन्याओं ने शाप के भय से आश्चम में जाना बन्द कर दिया, परन्तु राजपि तृणविन्दु को कन्या ने इस शाप को नहीं सुना। वह आश्रम में गयी। पुलस्त्य ने उसे देखा और वह गर्भवती हो गई (बा० रा० उ०२-१७) । तृणविन्दु अपनी पुत्री को इस अवस्था को देख कर बहुत घबराये । तृणविन्दु को विनती पर पुलस्त्य ने उस कन्या को पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया और उसकी सेवाओं से प्रसन्न होकर बोले 'हे देवि, आज मैं तुझे अपने तुल्य पुत्र देता है और वह पौलस्त्य के नाम से प्रसिद्ध होगा और उसका नाम विश्रवा होगा" (वा० रा० उ०२. ३०-७१)। थोड़े समय वाद विनवा तप करने लगा । महामुनि भरद्वाज ने उन्हें अपनी देव-वणिनी नाम की कन्या व्याह दी (वा० रा० ३-३)। उन दोनों से घनाध्यक्ष कुवेर उत्पन्न हुए और पुलस्त्य ने उनका नाम वैश्रवण रखा। ब्रह्मा जी ने वैश्रवण को तपस्या से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम इन्द्रादिक के समान चौथे लोकपाल होगे और उन्हें सवारी के लिये पुष्पक विमान दिया। उनके पिता विधवा ने उन्हें रहने के लिये लंकापुरी दी। (वा० रा० उ० ४-३३) । परन्तु रावण ने उनको वहां से निकाल दिया। तब अपने पिता की आज्ञा से कुबेर ने कैलास पर अति सुन्दर अलकापुरी वसाई और वहाँ सपरिवार रहने लगा। धनेश्वरस्त्वथ पितवाश्य गौरवात्, न्यवेशयन्छशि विमले गिरी पुरोम् । स्वलंकृतभवनवरविभूषिता, पुरग्दरः स्वरिव ययामरावतीम् ॥-वा० रा० उ० ११-५० ।

२८० जानकीहरणम् कौशिक--देखिये-विश्वामित्र और वसिष्ठ । गगा-भारत की सर्वाधिक प्रसिद्ध और पवित्र नदी, जिसका उद्गम हिमालय में गंगोत्री से हुआ। जब भगवान् ने बलि को छल कर अपने तीन पैरों से पृथिवी नापने के लिये त्रिविक्रम का रूप धारण किया था, उस समय ब्रह्मा जी ने उनके नख घोकर उस जल को अपने कमण्डलु में रख लिया था। वहीं ब्रह्म-तोय, सगर वंशज भगीरथ के तप से महादेव जी की जटाजूट में गिरा और वही जल की धारागंगा कहलाई जिसने भगीरथ के पीछे-पीछे चल कर कपिल के कोप से जले हुए सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार किया । यह नदी भारत के उत्तर-पूर्वी प्रदेश में बहती हुई बंगाल की खाड़ी में समुद्र से मिलती है। एक समय देव सभा में गंगा स्त्री के रूप में गई । पवन के वेग से गंगा के शरीर से वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गया। सब देवताओं ने तो अपने सिर झुका लिये, परन्तु एक राजपि गंगा को देखते रहे । तब ब्रह्मा ने उन्होंने उस राजर्पि को शाप दिया कि तुम पृथ्वी पर जाकर जन्म लो और गंगा को भी पृथ्वी पर जाना पड़ेगा । गंगा जव शापवश ब्रह्मलोक से जा रही थी तो मार्ग में अष्टवसु मिले । उन्हें भी वसिष्ठ ने अभिवादन न करने के कारण शाप दिया था कि तुम पृथ्वी पर जन्मलो । उन वसुओं ने गंगा से प्रार्थना की कि हम तुम्हारे पुत्र होकर शान्तन राजा के यहां जन्म लें। यही हुआ। गंगा ने अपने पुत्रों को जल में डुबो दिया । उनकी शाप से मुक्ति हो गई। परन्तु अन्तिम पुभ को राजा शान्तनु के कहने से नहीं डुबोया । वे ही देवव्रत, भीष्म और गांगेय के नाम से प्रसिद्ध गंगा भारत की बड़ी पवित्र नदी हैं। लोग गंगा को माता कहते हैं और उनका विश्वास है कि गंगा कानाम मात्र लेने से मनुष्य के सब पाप दूर हो जाते हैं और उसे विष्ण, लोक प्राप्त होता है- गंगा गंगेति यो यात् योजनानां शतैरपि । मुच्यते सर्व पापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ गरुत्मान-महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी विनता से उत्पन्न पुत्र । महर्षि कश्यप की दो पत्नियां थी । एक का नाम विनता था । वह दक्ष की पुत्री थी। और दूसरी का कद्रु । विनता से गरुण आदि पक्षियों की उत्पत्ति हुई और कद्र से सपो की । एक दिन विनता और कद्रु के बीच विवाद छिड़ गया कि उच्चैःश्रवा अश्व की पूंछ का रंग सफेद है या काला। विनता का कहना था कि सफ़ेद है और कद्र कहती थी कि काला । अन्त में यह बाजी लगी कि जिसकी बात गलत निकले वह दूसरे की दासी हो कर रहे । वास्तव में उच्चः श्रवा को पूंछ सफेद थी । जब कद्रु को यह पता चला तो उसने अपने काले सर्पपुत्र से कहा कि तुम लोग उच्चैःश्रवा को पूंछ में लिपट जामो। इस प्रकार छल से उसने विनता को काली पूंछ दिखला दी । विनता को हार मानना पड़ा और वह उसकी दासी बन गई। अन्त में उसके पुत्र गरड़ ने अपनी माता को दासत्व से छुड़ाया। गरम भगवान् के पाहन पे । उन्होंने भगवान् को प्रसन्न कर यह वर प्राप्त कर लिपा कि सपों का भक्षण करने से उनका यिप न पड़े । पर प्राप्त होने पर गरण सर्पो को खाने लगे । राव कद पराई और विनता से क्षमा मांग कर उगे दासत्व से मुक्त कर दिया । अरुण, जो गूर्य के आगे रप पर बैठते हैं, गण्ड के भाई है । एक बार गपड़ अमृत लेकर विष्णु के साप जा रहे थे । विष्णु ने पहा वर मांगी।

चरित्र कोश २८१ गरुण ने कहा 'मैं आकाशगामी होकर आपके ऊपर के माग में रहूँ और अमृत के बिना ही अजर-अमर रहूँ।" जब विष्णु ने 'तथास्तु कह दिया तो गरुड़ ने विष्णु से कहा कि आप वरदान मांगिये। तव विष्णु ने कहा 'आप मेरे वाहन बनिये और मेरी ध्वज में रहिये । इस प्रकार आप मेरे ऊपर रहेगे।' एक बार गरुड़ इन्द्र के यहाँ से अमृत चुरा लाये । उस पर दोनों में युद्ध हुआ। इंद्र को अमृत तो मिल गया पर इन्द्र बुरी तरह पिटे और उनका वज्र टूट फूट गया। गणाधिप--गणेश । शिव और पार्वती के पुत्र। ये बुद्धि एवं कल्याण के देवता हैं। विघ्नों के नाश करने वाले हैं। अतः कोई भी मंगल कार्य यज्ञ आदि में सर्व प्रथम गणेश की पूजाहोती है। इनकी प्रतिमा प्रायः बैठे हुए वनती है। परन्तु नृत्य करते हुए भी बहुत सो प्रतिमायें मिलती हैं। इनका सम्पूर्ण शरीर मनुष्य का है, परन्तु सिर, कान, नाक, इत्यादि हाथी का है। इनके सिर के सम्बन्ध में बहुत सी कथायें हैं। गणेश और परशुराम के बीच युद्ध हुआ, उसमें परशुराम ने इनका एक दांत काट डाला । तब से इन्हें 'एक दन्त' भी कहते हैं। एकरद वैमातुनि स्त्रिाग चतुभुजाऽपि पञ्चकर । जय पण्मुखनत सप्तच्छदगन्धिमदाष्ट तनुतनय ॥ ये शिव गणों के नायक है । अतः इन्हें 'गणाधिप' कहते है । जव व्यास जी महाभारत की रचना करने लगे तो उन्हें एक लेखक को आवश्यकता पड़ी । उन्होंने गणेश से कहा। गणेश ने इस शर्त पर स्वीकार कर लिया कि व्यास जी बोलने में न रुकें । व्यास जी चतुर थे। उन्होंने भी एक शर्त लगायी कि गणेश जी श्लोक का अर्थ बिना समझे न लिखें। बात पक्की हो गयी। गणेश जी ने लिखना आरम्भ कर दिया। गणेश जी एक तो तेज लिखने वाले दूसरे घुरन्धर विद्वान् थे। व्यास जी ने जब देखा कि एक कठिन लेखक से पाला पड़ा तो बीच-बीच में ऐसे कूट श्लोक कहते थे कि गणेश को उन्हें समझने में कुछ समय लग जाता था। अन्यि ग्रन्यि तदा चके मुनिगूढं कुतूहलात् । महाभारत इस प्रकार दोनों की बात रह गयो और महाभारत का निर्माण सम्भव हो सका। गौतम-ये, गौतम ऋषि के पुत्र थे । इनका नाम शरद्वत मी था। इनकी पत्नी का नाम अहल्या था । वह असीम सुन्दरी थी। एक दिन जब गौतम आश्रम में नही थे तब इन्द्र ने गौतम का रूप बना कर आश्रम मे प्रवेश किया। यद्यपि अहल्या पहिचान गयी कि ये इन्द्र हैं और गौतम का रूप धरे हैं,पर वह राजी हो गयी (वा० रा० बा० ४८-२०) । जसे ही इन्द्र आश्रम से निकलागौतम से उसकी भेंट हो गयी । गौतम सब समझ गये और इन्द्र को शाप दिया : मम रूपं समास्याय कृतवानसि दुर्मते । अकर्तध्यमिदं तस्माद्विफलस्वं भविष्यसि ॥ और अहिल्या को उन्होंने शाप दिया कि तू हजारों वर्ष तक इम स्थान पर मिट्टी में लोटती रहेगी, तुझे कोई न देख सकेगा, और तेरा भोजन केवल पवन होगा। जब रामचन्द्र मिथिला ૨૮૨ भानकोहरणम् जाते समय इस आश्रम में आये तव अहल्या शाप मुवत हुई और उसने अपना पूर्व सुन्दर रूप पा लिया। तब देवताओं के विनती करने पर पितरों ने इन्द्र को पुंसत्व प्रदान किया । गौरी-शिव की पत्नी पार्वती का एक नाम । चंडी-दुर्गा का एक नाम, विशेष कर जब उन्होंने महिपासर को मारा था। जटायु-एक प्रसिद्ध पक्षी जो सूर्य के सारथी अरुण के औरस तथा थेनी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। इनके बड़े भाई का नाम संपाती था। जब रावण ने जानकीहरण किया तो सीता की चिल्ला- हट सुन कर वह जागा । पहिले उसने रावण को बहुत समझाया, पर जब वह नहीं माना तो उससे घोर युद्ध कर वह मारा गया। राम ने उसे अपने पिता का मित्र समझ कर उसका दाह संस्कार किया। (वा० रा० अर० ५१)। तारक-एक भयंकर राक्षस, वांग और वरांगी का पुत्र । उसने तप कर ब्रह्मा से यह वर प्राप्त कर लिया कि वह सिवाय उस बच्चे के जो सात दिन का हो, और किसी से न मारा जा सके । जब वह बहुत अत्याचार करने लगा तो शिव-पार्वती से कार्तिकेय का जन्म हुआ और जब वे सात ही दिन के थे तभी उन्होंने तारक को मार डाला। तिलोत्तमा- सृष्टि की समस्त सुन्दर वस्तुओं से तिल-तिल अंश लेकर विश्वकर्मा द्वारा बनाई हुई एक अनुपम सुन्दरी अप्सरा । इसी से इसका नाम तिलोत्तमा हुआ । हिरण्यकशिपु के वश मे सुन्द और उपसुन्द नामक दो दैत्य थे। ये दोनों माई-भाई थे। ब्रह्मा को प्रसन्न कर इन दोनों ने यह वर प्राप्त कर लिया कि जब तक दोनों भाइयों में मंत्री रहे वे न मरें। तदनन्तर उन्होंने देवताओं पर घोर अत्याचार करना आरम्भ कर दिया। तब उन्होंने विश्वकर्मा द्वारा तिलोतमा को बनवाया और कहा कि तुम जाकर दोनों भाइयों में झगड़ा करा दो । तिलोत्तमा गई और दोनों से प्रेम का अभिनय करने लगी। परिणाम यह हुआ कि दोनों आपस में कट मरे । तुम्बुर-एक गंधर्व जो बहुत सुन्दर बल्लकी बजाता था। उसे रावण ने अन्य देवताओं के साथ लंका में कैद कर रखा था। देखिये : अन्नध्यनस्य नेष समयः तूष्णीं बहिःस्यीयता स्यल्प जल्प वृहस्पते जडमते नैषा सभानधिपः । वीणां संहर नारद स्तुति फया लापरलं तुम्बुशे सीतारल्लकमल्लभग्नहृदयः स्वस्थो म फेश्वरः ॥ दनु-कश्यप को एक पली और दानवों की माता। दुन्दुभी-मय दैत्य का एक अति बलवान भैसे के आकार का पुत्र । उसका एक भाई और था। उसका नाम था मायावी । दुन्दुभी ने एक वार समुद्र की थाह ली तो समुद्र उसकी कमर तक ही आया । दुन्दुमी ने समुद्र को युद्ध के लिये ललकारा । तब समुद्र ने कहा कि मैं तुमसे युद्ध करने में असमर्थ हूँ। तुम हिमालय के पास जामो वह तुमसे युद्ध कर सकेगा। समयों नास्मि से दात युवं युद्ध विशारद । शैलरानो महारष्ये तपस्वि शरणं परम् । स समस्त व प्रीतिमतुला कर्तुमाहर्षे ॥ -चा. रा० कि. ११-११-१२।

चरित्र कोश २८३ समुद्र ने इस तरह अपनी बला टाली । तब दुन्दुमी ने हिमालय के पास जाकर युद्ध के लिये ललकारा। हिमालय सागर से भी अधिक चतुर थे। उन्होंने कहा कि मैं तो तपस्वियों को पारण देता हूँ। तुमसे बाली लड़ सकता है। बालो नाम महा मानः शकतुल्प पराकमः । द्वन्द युद्ध महातु नमुचेरिव वासवः । तव किष्किन्धा में जाकर दुन्दुभी ने बाली को ललकारा। दोनों में घोर युद्ध हुआ, जिसमें बालि ने उसे मार डाला और उठा कर उसको एक योजन फेंक दिया। उस मैसे के मुख से बहता हुआ रुधिर मतंग ऋपि के आश्रम में गिरा । इस पर ऋपि ने क्रोध में भर कर शाप दिया कि जिसने इस माश्रम को दूपित किया है यदि वह इस आश्रम में भावेगा तो मर जायेगा। 'इहतेनाप्रवेष्टव्यं प्रविष्टस्य अधो भयेत् -वा० रा० कि० ११,५३ । बालि इस आश्रम मे न आ सकेगा, यह समझ कर, मातंग की आज्ञा से सुग्रीव, किष्किन्धा से भाग कर वहां रहने लगा। वही राम ने उससे मेंट की। दुहिण-ब्रह्मा । त्रिमूर्ति, ब्रह्मा, विष्णु, महेश में सर्व प्रथम । ब्रह्म के तीन सगुण रूपों में से सृष्टि की रचना करने वाला रूप ब्रह्मा है । इन्हें सृष्टिकर्ता, विधाता और पितामह भी कहते हैं। क्षीर सागर मे जव भगवान् योगनिद्रा में शयन करने लगे तो उनकी नाभि से एक कमल उत्पन्न हुआ। उससे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा चतुर्मुख हैं। एक कथा है कि एक बार ब्रह्मा के शरीर से एक अत्यन्त सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई तो वे उस पर मोहित होकर ताकने लगे। वह कन्या उनके चारों ओर घूमने लगी। जिधर वह जाती उपर देखने के लिये ब्रह्मा के एक सिर उत्पन्न हो जाता। अतः वे चतुर्मख हो गये । इनके दम मानस पुत्र हुए-मरीचि, अत्रि, अगिरा, पुलस्त्य, पुलह, ऋतु, प्रचेता, वसिष्ठ, भगु और नारद । सृष्टि उत्पन्न करने के कारण ये दस प्रजापति भी कहलाते हैं । देवि सरस्वती और सावित्री ब्रह्मा की पत्नी हैं। ब्रह्मा की अनेक पलियों में गायत्री मी हैं। एकबार एक यज्ञ के समय ब्रह्मा ने सरस्वती को बुलवा भेजा। किन्तु किसी काम में व्यस्त होने के कारण वे न आसकी। यज्ञ के अनुष्ठान के समय पत्नी का होना अनिवार्य था । अतः उन्होंने पथ्वी की एक गरेप कन्या, गायत्रो से विवाह कर यन पूराकर लिया । तब से गायत्री वेद माता और पूज्य कही जाने लगी और उनके नाम से गायत्री मंत्र प्रसिद्ध हो गया। सरस्वती ने जब यह सुना तो क्रोधित होकर उन्होने ब्रह्मा को शाप दिया कि पथ्वी पर तुम्हारी कोई पूजा न करेगा । ब्रह्मा और सरस्वती का वाहन हंस है। घिषण-वृहस्पति । अंगिरा के पुत्र और देवताओं के गुरु । धर्मशास्त्र के प्रणेता और नवग्रहो मे पञ्चम । एक बार चन्द्रमाने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करली । उसे इतनागर्व हो गया कि वह अपने गुरू, वृहस्पति की पत्नी तारा से अशिष्ट व्यवहार कर बैठा जिससे चन्द्रमा को बुध नामक पुन उत्पन्न हुआ। बुध को अपना पुत्र समझ कर जब वहस्पति उसका नाम करण करने लगे तो चन्द्रमा ने कहा कि यह पुत्र तो मेरा है। इस पर गुरु और शिष्य में विवादहोने लगा। चन्द्रमा २८४ नानकोहरणम् देवतासे असुर हो गया तो दैत्य सब चन्द्रमा के पक्ष में हो गये। देवता लोग वृहस्पति के पक्ष मे थे। दोनों में घोर युद्ध हुआ। इस युद्ध में ब्रह्मा जी ने बीच-बचाव किया । आपस में सधि हो गई और चन्द्रमा को अपना पुत्र, बुध मिल गया । धनद्-धनेश–देखिये कुबेर नलकूबर–कुवेर का पुत्र और मणिग्रीव का माई। एक बार ये दोनों भाई कलास पर्वत पर मदिरा पीकर स्त्रियों के साथ विहार कर रहे थे । तब नारद के शाप से ये वृन्दावन में यमलार्जुन हुए। और वहाँ भगवान् श्रीकृष्ण ने इन्हें शाप से मुक्त किया। एक समय रावण कैलास पर्वत पर घूम रहा था। वहां उसने असीम सुन्दरी अप्सरा रम्भा को देखा । वह नलकूबर के पास जा रही थी । रावण ने कामासक्त होकर उसे पकड़ा । रम्मा ने कहा कि मुझे छोड़ दो क्योंकि मैं तो तुम्हारी पुत्रवधू हूँ। रावण कुबेर का माई या । नलकूबर कुबेर का पुत्र था । रम्भा नलकूबर की स्त्री । इस प्रकार रम्मा रावण की पुत्रवधू हुई। पर रावण ने एक न माना और उसके साथ अशिष्ट व्यवहार किया । रम्मा रोती हुई नवलकूबर के पास गई। जब नलकूबर को यह वत्तान्त रम्मा से मालूम हुआ तो उसने रावण को शाप दिया कि अब तुम किसी स्त्री के साथ बलात्कार करने की चेष्टा करोगे तो तुम्हारे सिर सात टुकड़े होकर पृथ्वी पर गिर पड़ेंगे। नाग-कश्यप की कद्रु नामक पत्नी से उत्पन्न सर्प-सन्तान । इनका मुख मनुष्य सा, और नीचे का भाग सर्प कासा होता है। ये नाग भूमि के नीचे रामणीयक द्वीप की भोगवती नगरी में रहते हैं। इनकी नागकन्यायें अतीव सुन्दरी होती हैं । कवियों के अनुसार से हिमवंत के निकुञ्जों में घूमा करती हैं। निकुम्भ-कुम्भ और निकुम्भ कुम्भकर्ण के पुत्र थे । देखिये 'कुम्भ' । नकसो-इसे ककसी भी कहते हैं । सुमाली राक्षस और उसकी पत्नी केतुमती से उत्पन्न पुत्री। नकसी विश्रवा की पत्नी थी। जब नकसी बड़ी हुई तो सुमाली को उसके विवाह की चिन्ता हुई । विश्रवा उस समय घोर तप कर रहे थे । सुमाली ने नकसी को उनके पास भेजा। उसके प्रार्थना करने पर विश्रवा ने उससे ब्याह कर लिया। विश्रवा से उसके तीन पुत्र, दशग्रीव, कुम्भकर्ण और विमीषण और एक पुत्री शूर्पणखा, हुए । पुलस्त्य-ब्रह्मा के मानस पुत्र और सप्तर्षियों में से एक ऋपि जिनकी गिनती प्रजापतियों में भी होती है। इन्होंने ब्रह्मा से आदि पुराण सुनकर उसका प्रचार पथ्वी पर किया था। विश्रवा के पिता तया रावण और कुवेर के पितामह थे । तणयिन्दु की कन्या इनकी पत्नी थी । विशेष परिचय के लिये 'कुबेर' के अन्तर्गत देखिये । बलि-प्रह्लाद के पौत्र, विरोचन के पुत्र और पाताल के राजा जिन्हें बाँधने के लिए स्वयं विष्णु भगवान् ने वामन का रूप धारण किया था । बलि ने अश्वमेघ यज्ञ करके जब बहुत दान देना प्रारम्भ किया तब विष्णु भगवान् वामन रूप घर फर वहाँ आये और तीन पग पृथ्वी मांगी। शुभाचायं तुरन्त पहिचान गये और बलि को दान देने से रोका । परन्तु बलि ने कहा-"मैं यपन दे घुका है, मैं अवश्य दूंगा। तव शुत्राचार्य ने उसे शाप दिया कि, "मेरे वचनों को अपशा मारने में कारण तू धी-प्रष्ट होगा।" विष्णु ने एया पर से समस्त पृथ्वी, शरीर से आकाश और दोनों मुजाओं से दिसाओं को और दूगरे पर से स्वर्ग फो नाप लिया। तीसरेपर के लिये कोई स्थान नहीं मिला। राव बलि ने महा कि "सोगरा परण मेरे सिर पर रसिये।" यिष्ण बड़े प्रसन्न हुए और पोले-"मैं तुम्हें यह स्पानगा चरित्र कोश २८५ जो देवताओं को भी अप्राप्य है।तुम विश्वकर्मा के बनाये हुए सुतल में रहो। मैं कौमुदी की गदा से तुम्हारी रक्षा करूंगा।" और तभी से विष्णु भगवान बलि के यहां द्वारपाल बन कर रहते हैं। यालि-मेर पर्वत पर योगाभ्यास करते समय ब्रह्मा जी की आंख से सहसा आंसू की बूंद टपकने से ऋक्षराज नाम का वानर उत्पन्न हुआ जिसे ब्रह्मा ने सुमेरु पर्वत पर फल-फूल साने और अपने पास रहने को कहा। एक दिन वह वानर प्यास के मारे सुमेरु के सरोवर मे अपनी छाया देखकर सोचने लगा-यह मेरा शत्रु है। वह झट पानी में कूद पड़ा और निकलने पर एक सुन्दरी स्नी बन गया। इन्द्र और सूर्य उस पर मोहित हो गये। इन्द्र ने उसके मस्तक पर और सूर्य ने उसकी ग्रीवा पर अपना वीर्य छोड़ा । इसी इन्द्र के वीर्य से वालि का जन्म हुआ और सूर्य के वीर्य से सुग्रीव का। कुछ दिनों में वह ऋक्षराज फिर बानर हो गया और अपने दोनों पुत्रों को लेकर ब्रह्मा के पास पहुंचा। ब्रह्मा ने उन दोनों पुत्रों को किष्किन्धा में राज्य करने की आज्ञा दी । विश्वामित्र ने एक सुन्दर नगरी वसा रखी थी। अपनी पत्नी तारा के साथ वालि और अपनी पत्नी रोमा के साथ सुग्रीव वहां रहने लगे। एक दिन वहाँ दुन्दुमी नाम का एक महा बलवान् दैत्य बाली से लड़ने के लिये आया। उससे युद्ध करते हुए और उस दैत्य का पीछा करते वालि पर्वत की गुफा में घुस गया। जब बहुत दिन बीत जाने पर भी बालि नहीं लौटा और उस गुफ़ा से रक्त की धारा निकली तव सुप्रीव ने समझा कि बालि मारा गया। वह गुफा के द्वार पर पत्थर रख कर किष्किन्धा लौट आया और तारा से विवाह कर किष्किन्धा का राजा हो गया। जव वालि लौटा तो उसने राज्य छीन कर अपनी पत्नी तारा को और सुग्रीव की पत्नी रोमा को भी छीन लिया। डर के मारे सुग्रीव ने मतंग ऋपि के आश्रम में शरण ली। उसी बीन एक बार रावण उसे हराने के लिये उसके पास पहुँचा । तब रावण को कांख में दबाकर बालि सन्ध्या करता रहा । इसी समय अवसर पाकर रावण भाग निकला। सीता को ढूंढ़ते हुए जब राम वहां पहुंचे तब उन्होंने सुग्रीव से मित्रता की और बालि का वध कर किष्किन्धा का राज्य सुग्रीव को दे दिया। वालि का पुत्र अगद भी बड़ा पराक्रमी था। उसने राम-रावण युद्ध मे राम की बड़ी सहायता की। भार्गन-भृगु-कुल में उत्पन्न । मृगु मुनि के ऋचीक, उनके जमदग्नि और जनार्दन, जमदग्नि के परशुराम पुत्र थे। अत, परशुराम को भार्गव और जामदग्न्य भी कहते हैं। इनकी माता का नाम रेणुका था । परशुराम पांच भाई थे। रुमण्वान्, सुखेण, वसु, विश्वावसु और परशुराम । परशुराम सब से छोटे थे। चैत्र शुक्ला तृतीया, पुनर्वसु नक्षत्र में इनका जन्म हुआ था। इन्होंने गन्धमादल पर्वत पर तपस्या करके महादेव जी से अस्त्र-विद्या और गणेश जी से परशु-विद्या सीखो। इसीलिये पशुराम कहलाते हैं। एक बार इनकी माता, रेणुका ने नदी में चित्ररथ को अपनी पत्नी के साथ विहार करते देखा और वहां से कामोद्विग्न होकर पर आई। जमदग्नि को इस पर क्रोध हुआ और उन्होंने अपने पुत्रों को बारी-बारी से आज्ञा दी कि माता का बध कर डालो। अन्य चारों भाइयों ने तो पिता का कहना नही माना, पर परशुराम ने पिता की आज्ञा से माता का सिर काट डाला। इस पर प्रसन्न होकर जमदग्नि ने वर मांगने के लिये कहा । परशुराम ने कहा "मेरी माता को जिला दीजिये, उन्हें परमायु दीजिये, मेरे भाइयों को चेतन कर दीजिये और ऐमा कीजिये कि युद्ध में मेरा सामना कोई न कर सके।" जमदग्नि ने 'तथास्तु' कह दिया। एक बार हैहय राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन जमदग्नि के २८६ जानकीहरणम् आश्रम में आया और वछड़े सहित कामधेनु को लेकर चल दिया। जब परशुराम को पता चला तो उन्होंने परशु से उसकी सहस्रों मुजायें काट डाली। इसके बदले में कार्तवीर्य के कुटुम्बियों ने जमदग्नि को मार डाला । इस पर क्रुद्ध होकर परशुराम ने क्षत्रियों का नाश करने का प्रण किया और सब क्षत्रियों को मार डाला । जब इस क्रूरता की ब्राह्मणों में निन्दा होने लगी तब वे तपस्या के लिये वन में चले गये। वहाँ इनके पौत्र परक्क्षु ने यह कह कर इन्हें उत्तेजित किया कि ययाति के यज्ञ में अभी बहुत से राजा आये थे । इस पर उन्होंने फिर क्षत्रियों का नाश प्रारम्भ किया। और यह सब कर चुकने पर सारी पृथ्वी कश्यप को दान कर दी । कश्यप ने बचे हुए क्षत्रियों की रक्षा के लिये परशुराम से कहा, "यह पृथ्वी हमारी हो चुकी। अब तुम जाकर दक्षिण में रहो। तब वे समुद्र के तट पर शूर पारक नामक स्थान में रहने लगे।" परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय करके समन्त पञ्चक (५ ताल) रुधिर से भर दिये और उन्हीं तालों से तर्पण करके अपने पितामह महर्षि ऋचीक का दर्शन पाया था, जिसमें ऋचीक ने परशुराम को क्षत्रिय-वध करने से रोक दिया । परशुराम विष्णु के छठे अवतार माने जाते हैं। कातिवाय से ईर्ष्या करने के कारण एक बार इन्होंने क्रौञ्च पर्वत को अपने वाणों से आर-पार वेध दिया था। जनक के धनुष यज्ञ के बाद इन्हें रामचन्द्र से नीचा देखना पड़ा । तब से अब तक ये महेन्द्र पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं। ये चिरजीवी हैं : अश्वत्यामा बलिप्सो हनूमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामञ्च सप्तैते चिरजीविनः ॥ भूगु-१. भगवान् रुद्र ने वारुणि मूर्ति धारण कर एक यज्ञ का अनुष्ठान किया। इस यज्ञ को देखने के लिये तप, यज्ञ, दीक्षा, व्रत, दिग्पति देव कन्या, देव पत्नी आई थी। ब्रह्मा उस समय आहुति कर रहे थे। देव कन्या को देखकर उनका वीर्य स्खलन हो गया। सूर्य ने उस वीर्य को अग्नि में फेंक दिया। ब्रह्मा का वीर्य अग्नि में आहुति होते ही उसकी शिखा से भगु, सघूम अंगारे से अंगिरा, निघूम अंगार से कवि की उत्पत्ति हुई। महादेव जी ने कहा-"यज्ञ का अधिष्ठाता मैं हूँ, ये तीनों पुत्र मेरे हैं।" यह सुन कर अग्नि ने कहा-"ये मेरे अंग से उत्पन्न हुए हैं, अतः मेरे पुत्र हैं।" ब्रह्मा ने कहा-"मेरे वीर्य से इनकी उत्पत्ति हुई है, अत: ये मेरे पुत्र हैं।" तव सब देवों ने मिल कर इस झगड़े का निबटारा किया । भृगु महादेव को, अंगिरा अग्नि को और कवि ब्रह्मा को दे दिये गए (भारत० अ० पर्य) । २. भृगु ब्रह्मा के मानस पुत्र थे । ये दस प्रजापतियों में से एक हैं। दक्ष को कन्या ख्याति के साथ इनका विवाह हुआ । इनके गर्भ से लक्ष्मी कन्या तथा धाता और विधाता नाम के दो पुत्र हुए। महात्मा मेरुको आपति और नियति नाम की दो कन्याओं के साथ इन दोनों पुत्रों का विवाह हुआ। धीरे-धीरे इनका वंश विस्तृत होकर भार्गव नाम से प्रसिद्ध हुआ। भृगु धनुर्विद्या के प्रवर्तक मी थे। ३. किसी-किसी गन्वन्तर में मुगु की गणना सप्तपियों में होती है। महर्षि व्यवन इन्ही के पुत्र थे। एक समय सरस्वती नदी के किनारे बहुत से ऋपि गण बैठे हुए यार्तालाप कर रहे थे। उनमें विवाद छिड़ गया कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश में कौन बड़ा है। मिन्न-भिन्न सम्मतियों में होने पर ब्रह्मा के पुत्र मुगु को तीनों देवों की परीक्षा लेने के लिये भेजा गया।

चरित्र कोश २८७ सर्व प्रथम वे ब्रह्मलोक में ब्रह्मा की सभा में चुपके से जाकर बैठ गये। अपने पुत्र की इस अशिष्टता से ब्रह्मा को मन मे बड़ा क्रोध आया। पर अपना पुत्र समझ कर तत्क्षण उन्हें क्षमा कर दिया। ब्रह्मा को रजोगुण से परिपूर्ण देस मगु कैलास पर्वत पर शिव जी के पास गये। अपने छोटे भाई को देस शिव जी बड़े प्रेम से खड़े हो गये और आलिंगन करने के लिये आगे बढ़े तो मृगु बैठ गये ! यह देस शिव जी क्रोधित हो त्रिशूल उठाकर मारने दौड़े, पर पार्वती ने बचा लिया । महादेव जी को उन्होंने तमोगुणी पाया। फिर वे वैकुण्ठ में विष्णु की परीक्षा लेने चले गये । वहाँ देखा कि विष्णु का द्वार सब के लिये खुला है । वे अन्दर गये तो देखा कि विष्णु सो रहे हैं और लक्ष्मी उनके पैर दाव रही हैं। मुगु ने उन्हे छाती में लात मार कर जगा दिया। मुगु जी को देख विष्णु भगवान् नत हो कर उनका चरण दाबने लगे और बोले-"क्षमा कीजियेगा। मेरा वक्ष स्थल बड़ा कठोर है। आपका चरण दुखने लगा होगा।" मृगु जी ने देखा कि विष्णु में सत्वगुण की मात्रा बहुत अधिक है। लौट कर पियों को उन्होंने सव वृतान्त सुनाया । ब्रह्मा को रजोगुणी होने के कारण उन्होंने शाप दिया कि-"तुम्हारी पूजा कोई न करे ।। शिव को तमोगुणी होने के कारण शाप दिया कि -"तुम्हारी लिंग पूजा हो।" और विष्णु जी को सर्वश्रेष्ठ देव घोषित कर उन्ही को पूज्य बतलाया (पद्म पुराण) । विष्णु भगवान् के वक्षस्थल पर मृगु के चरण प्रहार का अमिट चिन्ह वन गया जो 'श्रीवत्स', 'भृगु रेखा' और 'मगुलता' के नाम से प्रसिद्ध है । भृगु की पुत्री लक्ष्मी ने जनपति का अपमान देखा तो मृगु से रुष्ट हो कर शाप दिया कि-"मैं ब्राह्मणों के घर जाने में अब मैं संकोच अनुभव किया करूंगी।" परशुराम मृगु वंश हो मे उत्पन्न हुए थे। मृगु मुनि के आशीर्वाद से ही परशुराम के पिता जमदग्नि की उत्पत्ति हुई थी। महाभारत के अनुसार वे दक्ष प्रजापति के उस यज्ञ में अध्वर्यु थे जिसमें शिव ने उनकी दाढ़ी नोच ली थी। मुगु ने अगस्त्य ऋपि का, अमानुपीय शक्ति वाले राजा नहुष के अत्याचार से परिवाण किया था जब उम अस्यापारी नहुष ने अगस्त्य को अपने रथ में जोत कर, आगे बढ़ने के लिये उनके सिर पर लात मारी तो मगु ने नहुप की अकल्याणकारो दष्टि को बचाने के लिये अगस्त्य के बालों में छिप कर नहुप को शाप दिया कि-"तू सर्प हो जा।" नहुष के विनती करने पर मुगु ने उस शाप की अवधि कम कर दी (महाभारत) । मदन-दक्ष की मानस पुत्री सन्ध्या से कामदेव का जन्म हुआ । दक्ष से उत्पन्न रति नाम की कन्या इसकी पली हुई। शास्त्रकारों ने कामदेव के पचास मेद बताये हैं। स्मर दीपिका में कहा गया है -प्रतिपदा को पैर के अंगूठे में, द्वितीया को एड़ी के ऊपर टसने में, तुतीया को जांघ में, चतुर्थी को भग में, पञ्चमी को नाभि में, पष्ठी को स्तनों में, सप्तमी को हृदय में, अष्टमी को कक्ष (बगल) में, नवमी को कण्ठ में, दशमी को होंठ में, एका-दशी को गालों में, द्वादशी को नेत्रों मे, त्रयोदशी को भ्रू पर, चतुर्दशी को ललाट पर और पूर्णिमा को मस्तक पर कामदेव रहता है। दामोदरगुप्त बुट्टनीमतम् मंगलाचरण में साहित्यिक ढंग से कहते हैं कि अनुरक्त ललना को तिरछी चितवन मे वह (समी तिथियों पर) सर्वदा रहता है: सत्जयति संकल्पभवो रतिमुखमतपत्रचुम्बनभ्रमरः । यस्यानुरक्तललनानयनान्तविलोकितं धप्ततिः॥ कामदेव शंख, पय, धनुष और वाणधारी है। इनके तरफस में पांच हो वाण हैं। वे पांच बाण में हैं :

जातकोहरणम २८८ अरविन्दमशोकञ्च चूतञ्च नव मल्लिका । नोलोत्पलञ्च पञ्चते पञ्च वाणाः प्रकीर्तिताः ॥ भोजराज के, सम्मुख एक स्त्री कामदेव के सम्बन्ध में समस्या पूर्ति इस प्रकार करती है घनः पौष्प, मौवीं मधुकरमयो, पञ्चविशिषः दृष्टाङ्कोणो वावः सुहृदपिजडात्मा हिमकरः । तथाप्येकोऽनंगस्त्रिभुवनमपि व्याकुलयति क्रियासिद्धिः सत्वे वसति महतानोपफरणे ॥ उनके झंडे पर मकर है। रति, प्रीति, शक्ति और उज्ज्वला उनकी चार पलियां हैं । तारकासुर के उत्पात करने पर जब देवताओं ने कामदेव को महादेव जी के पास उन्हें कामपीड़ित कर उनकी तपस्या भंग करने के लिये भेजा तब महादेव ने अपना तीसरा नेत्र खोल कर उसे भस्मसात् कर दिया और कामदेव अनंग हो गया । पार्वती के साथ विवाह होने पर प्रसन्न होकर महादेव जी ने उसे फिर सशरीर कर दिया। इस जन्म से कृष्ण और रुक्मिणी के गर्म से प्रद्युम्न नाम से कामदेव का जन्म हुआ। महाभारत ने कामदेव को धर्म का पुत्र माना है । मयु-कंटभ--१. प्रलय काल में जब समस्त सृष्टि जलमग्न थी तब नारायण जल में शेप- शय्या पर शयन कर रहे थे। भगवान् को लेटे-लेटे अपने महान् गुणों का स्मरण हो आया। इससे अहंकार प्रकट हुआ । यह अहंकार ही चतुर्मख ब्रहमा थे, जो सत्व-गुण रूप हो, नारायण को नामि से उत्पन्न कमल पर विराजमान हुए । सहस्रदल कमल पर बैठने से उन्हें समस्त संहार जलमय दिखाई दिया । तब ब्रह्मा जी ने सृष्टि करने का विचार किया । एकाएक पास ही लगे कमल के पत्ते पर उन्हें दो जल बिन्दु दिखलाई पड़े। ये रजोगुण और तमोगुण के प्रतीक थे। भगवान् ने उन बूंदों की ओर देखा तो एक बूंद तमोमय रूपी मधु नामक दैत्य और दूसरी बूंद रजोगुण रूपी कैटभ नामक दैत्य में परिवर्तन हो गयी । उन दोनों दैत्यों ने विशाल रूप धारण कर ब्रह्मा जी से चारो वेद सहमा हर लिया और वे रसातल में चले गये। वेदों के अपहरण से दुखी ब्रह्मा जी भगवान् की स्तुति करने लगे । इस स्तुति से नारायण को अपनी योग निद्रा त्यागनी पड़ी और उन्होंने तुरन्त 'हयग्रोव' का रूप धारण किया। इस अवतार में नारायण का मस्तक घोड़े के समान था। रसातल में जाकर भगवान् ऊंचे स्वर से सामवेद का गान करने लगे। दोनों दैत्यों ने रसातल में जाकर सब वेदों को आप कर एक कोने में फेंक दिया था । भगवान् हयग्रीव ने उन वेदों को उठा लिया और लाकर ब्रह्मा जी को फिर सौंप दिया। मव-कटम वेदों को रमातल में न पाकर बहुत युद्ध हुए । रसातल के बाहर आये तो देखा कि भगवान् सो रहे हैं । उन्होंने शोर मचा कर भगवान् को जगा दिया और युद्ध करने के लिये ललकारा । थोड़ी ही देर में भगवान् ने उन दोनों दैत्यों को मारकर ब्रह्माजी को चिन्ता दूर कर दी । उन्हें गृष्टि रखने की आजा देकर नारायण अपने पाम को पले गये।

चरित्र कोश २८९ २. महाभारत के अनुसार ये दोनों दैत्य विष्णु के कान से उत्पन्न हुए थे, जब वे युगान्त मे मो रहे थे। कमल पर लेटे हुए ब्रह्मा को जब इन दोनों दैत्यों ने मार डालना चाहा तो विष्णु ने इन दोनों का वध कर दिया और इमो से इनका नाम 'कंटमजित' और 'मधुसूदन' पड़ा। ३. मार्कण्डेय पुराण के अनुसार कटम की मृत्यु उमा द्वारा हुई, अतः उमा को 'केटमा' को उपाधि मिली। ४. हरिवंश के अनुसार जब इन दैत्यों का शरीर समुद्र में फेंका गया तो इतनी चरखी ( मेदस ) निकली कि उससे इन्होंने पृथ्वी का निर्माण किया और उसी पुराण में एक स्थान पर यह कहा गया उन दैत्यों के शरीर से इतनी चरबी निकली कि पृथ्वी भर गई। इसीसे पृथ्वी को मेदिनी भी कहते हैं। मन-१-ब्रह्मा के पुत्र और मानव जाति के आदि पुरप जो प्रजापति और धर्मशास्त्र- वक्ता होते हैं। प्रत्येक कल्प में १४ मनु होते हैं, स्वायम्भुव, स्वारोचिप, औतमि, तामस, रवत, चाक्षुप, वैवस्वत साणि, दक्ष-साणि, ब्रह्म-सावणि, धर्म साणि, रुद्र सावणि, देव सावणि और इन्द्र सावणि । इस समय वैवस्वत मनु का युग चल रहा है । इनके पुत्र इक्ष्वाकु, नामाग, घृष्टशांति, नरिप्यन्त, दिप्ट, करुप, पृषघ्र और वसुमान हैं। २-सूर्य (विवस्वत) के एक पुत्र का नाम वैवस्वत मनु या। उन्होंने वदरिकाश्रम में जाकर उग्र तपस्या की। एक दिन नदी के तट पर जव यह स्नान कर रहे थे तो उनके पास एक छोटी सी मछली ने आकर प्रार्थना की-"याप मेरी रक्षा कीजिये, नही तो बड़ी मछलियां मुझे खा जायेंगी।' मनु को दया आ गई। उन्होंने उसे घड़े में डाल दिया। वहां वह मछली थोड़े ही समय में बढ़ गई । वह क्रमश: बढ़ती गई और मनु उसे क्रमश: सरोवर में, और गंगा जी में डालते गये । जव यह बहुत बढ़ गई तो उसका आकार महामत्स्य तिमि के समान बड़ा हो गया। महामत्स्य ने मनु से कहा-"तुमने मेरी रक्षा की। मैं तुम्हारी बहुत कृतज्ञ हूँ। आज के सातवें दिन प्रलय होने पर समस्त विश्व जलमग्न हो जायगा । अतएव तुम एक सुदृढ़ नौका बनवाओ और उसे एक मजबूत रस्सी से बांध दो । उस नाव पर सप्तपियों को और अपने सामान लेकर बैठ जाना । मैं तुम्हारी नाव को खीच कर प्रलय से बचा दूंगी।" सातवें दिन सब तैयारी कर मनु नाव पर बैठे ही थे कि उन्होंने महामत्स्य को देखा। प्रलय आ पहुंचा और भूमि का कही नाम-निशान भी न था । महामत्स्य ने नाव को खीच कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर' पर बांध दिया । वहाँ मनु और सप्तपि उतर पड़े। महामत्स्य उन्हें समस्त चराचरों की सृष्टि करने की आज्ञा देकर अन्तर्धान हो गये। मन्यरा-महाराज दशरथ की रानी कैकेयी की एक कुरूप और कुबड़ी परन्तु बड़ी छल- छंद वाली दासी और सलाहकार । इसी ने कैकेयी को ऊंचा-नीचा दिखा कर उसका मन बदल दिया और राम के लिये १४ वर्ष का वनवास और कैकेयी के पुत्र भरत के लिये राज्याभिषेक का वर प्राप्त कर लिया। एक कथा के अनुसार यह गांधर्वी दुन्दुभी की अवतार थी; और दूसरे के अनुमार यह विरोचन की पुत्री थी। मन्दोदरी यह दैत्यों के विनिर्माता मय दानव की पुत्री थी। मय ने हेमा नाम की एक अप्सरा से विवाह किया । मन्दोदरी जब छोटी ही थी तो हेमा उसे मय के पास ही छोड़ स्वर्ग चली गई। जव वह पुत्रो बड़ी हुई तो मय ने उसका विवाह रावण के साथ कर दिया।

। २९० जानकीहरणम् मन्दोदरी रावण की सव से प्रिय पटरानी थी । वह बड़ी साघु प्रकृति की थी, और रावण को सदैव बुरे कर्मों को करने से रोकती रहती थी। जानकीहरण सुन कर उसने रावण को अनेक प्रकार से सीता को लौटा देने के लिये समझाया था। पर रावण को तो रामचन्द्र के हाथों मरना था। वह नहीं माना । रावण की मृत्यु के उपरान्त वह रोती-बिलखती रणक्षेत्र में गई और दुखी होने पर भी रामचन्द्र का अनुग्रह माना कि रावण जैसे महापापी को भी उन्होंने परमगति प्रदान की। मन्दोदरी सुमाली राक्षस की लड़की थी (वा० रा० यु० ११५-८१)। मातरिश्या-वायु देवता । अग्नि देवता का भी यह नाम है। मातलि-इन्द्र का सारथी । भारीच-सुन्द राक्षस और ताड़का का पुत्र और रावण का मामा। जव लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक और कान काट डाले और खर-दूपण को मार डाला तो रावण मारीच के पास गया । समुद्र के उस पार जाकर रावण ने एकान्त, पवित्र और रमणीक वन प्रदेश मे कृष्ण-मृग-चर्म को ओढ़े हुए और जटाजूट सर पर रखाये, नियमित आहार करने वाले मारीच नामक राक्षस को देखा । (वा० रा० अर० ३५, ३७-३८)। रावण ने मारीच से जानकीहरण में सहायता करने के लिये कहा । उसने कहा कि, "सुवर्ण मृग बन कर तुम राम के आश्रम के निकट फिरो । रिता तुम्हें पकड़ने के लिये राम को प्रेरित करेगी। उनके और लक्ष्मण के आश्रम से चले जाने पर मैं सीता को हर ले जाऊँगा।" पहिले तो मारीच ने ऐसा न करने के लिये बहुत समझाया, पर रावण ने जब उसे मार डालने का भय दिखलाया तो लाचार होकर वह राजी हो गया । राम के हाथों वह मारा गया । माल्यवान---यह रावण का नाना, बड़ा भयंकर राक्षस था। ये तीन भाई थे। माल्यवान, सुमाली और माली । सुमाली की पुत्री कैकसी विथवा को व्याही थी । रावण विश्रवा और फैकसी का पुत्र था । इस प्रकार वह रावण का नाना हुआ। मुरारि--मुर दैत्य के रिपु अर्थात, श्रीकृष्ण । मोमासुर को मारने के लिए श्रीकृष्ण उसकी राजघानो प्राग-ज्योतिपपुर गये तो वहाँ देखा कि मुर नामक दैत्य ने अपने जाल बिछा रक्से हैं । भगवान् ने तत्काल अपने चक्र से उस जाल के फंदों को काट डाला और अपने पाञ्चजन्य हॉख को भयंकर ध्यान से सुर दैत्य को जगा दिया। वह बाहर निकल आया। उसके पांच सिर थे। यह जल के भीतर सो रहा था। वह निशूल उठा कर दौड़ा । पर श्रीकृष्ण ने चक्र से उसके पांचों सिर काट डाले और वह मर गया । मैथिल-मिथिलाधिपति राजपि जनक विदेह के राजा और सीता के पिता थे। इनका नाम सीरध्वज भी है । इनके झंडे में सीर-हल का चिह्न है। जब वह संतानोत्पत्ति के लिये यश करने के हेतु हल से भूमि जोत रहे थे तब उसमे से पूर्णवयस्का सोता निकली थी। याज्ञवल्लय ऋपि उनके पुरोहित और सलाहकार थे । ब्राह्मण ग्रन्थों में कहा गया कि जब भी जनक यज्ञ करते पे तो ये ग्राह्मणों के या कराने के अधिकार को नहीं मानते थे और विना उनके पौरोहित्य के ये यसादिक करते थे और उन यज्ञों में वे सफल रहते थे। इसका कारण यह कहा जाता था कि उनका जीवन इतना शुद्ध और पार्मिक था कि वे ग्राह्मण के समान थे और राजाप थे। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने और याजवल्लम ने मिल कर युद्ध के लिये मार्ग प्रशस्त कर दिया पा) (रिपे युद्ध गरित, १-५०)। मैथिल उन लोगों या प्राचीन नाम है जो उस समय विदेह अगला - चरित्र कोश २९१ उत्तर विहार में निवास करते थे। यह क्षेत्र अव गण्डको और कोशी नदियों के बीच तिरहुत और पूर्णिया के नाम से विख्यात है। सुधाजित-ये केकय महाराज अश्वपति के पुत्र और दशरथ की पत्नी कैकेयी के भाई थे। जब अश्वपति ने वृद्धावस्था में वानप्रस्प लेने का विचार किया तो युधाजित को अयोध्या भेज कर अपने नाती मरत और शत्रुघ्न को देखने के लिये वुलवाया था (वा०रा० वा० ७७-१६-१७-१८)। रघु-परमेश्वर के पुत्र ब्रह्मा, ब्रह्मा के मरीचि, मरीचि के कश्यप, कश्यप के सूर्य और सूर्य के वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के पुत्र का नाम इक्ष्वाकु था। ये त्रेतायुग में अयोध्या के राजा थे । सूर्य वंग में राजा दिलीप और रानी सुदक्षिणा के पुत्र रघु हुए। कामधेनु की पुत्री 'नन्दिनी' की सेवा करने से उसके प्रसाद से रघु का जन्म हुआ। राम--इश्वाकु कुल वंशीय महाराज दशरथ तया कौशल्या रानी के गर्भ से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र । राम चार माई थे। राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न । लक्ष्मण और शत्रुघ्न जुडौरा माई थे । कौशल्यया साविसुखेन रामो प्राक्कैकयीतो भरतस्ततोभूत् । प्रासोप्ट शत्रुघ्नमुदारचेष्टमेका सुमित्रा सह लक्ष्मेणन ॥ -(भट्टिकाव्य, १-१४) । रावण-विधवा का उसकी पत्नी कैकसी से उत्पन्न पुत्र । जब यह उत्पन्न हुआ तो इसके दस सिर थे। अतः इसके पिता ने इसका दशग्रीव नामकरण किया । (वा० रा० उ० ९-३०)। इसकी कथा इस प्रकार है। मुकेश के पुत्र सुमाली के अपनी पत्नी केतुमती से ११ पुत्र और ४ कन्यायें उत्पन्न हुई। (देखिये सलग्न राक्षसों का वंशवृक्ष) उन कन्याओं मे कंकसी (नैकसी) नाम की एक कन्या थी। जब वह बड़ी हुई तब उसके विवाह के लिये चिन्तित मुमाली ने उसे महर्षि विश्रवा के पास भेजा जो उस समय घोर तप कर रहे थे। पुत्रोत्पत्ति के लिये ककसी के अनुनय-विनय करने पर विश्रवा राजी हो गये और बोले कि "तेरे पुत्र तो होंगे पर वे बड़े विकराल और क्रूर होंगे ।" परन्तु जव कैकसी ने कहा कि, "वह ऐसे क्रूर पुत्र नहीं चाहती" तब विश्रवा ने कहा कि, "अच्छा, तुम्हारी सन्तान में पिछला पुत्र मेरे वशानुरूप धर्मात्मा होगा।" पश्चिमो यस्तव सुतो भविष्यति शुभानने । मम वंशानुरूपः स धर्मात्मा च न संशयः ।।-वा० रा० उ० ९-२७ । इस प्रकार विश्रवा के दो भयंकर पुत्र, दशग्रीव और कुम्भकर्ण एक भयंकर पुत्री, सूर्पणखा और एक धर्मात्मा, पुत्र, विमीषण हुए। एक बार कैलास पर्वत की ऊंचाई के कारण उसके पुष्पक विमान का मार्ग रुक गया तोरावण बोला-“हे वृषमपते रुद्र, तुम्हारे जिस पर्वत के कारण मेरे विमान को गति रुक गई उसे उखाड़ कर मैं फेंक देता हूँ (वा० रा० उ०१६-२३)।" यह कह कर रावण ने अपनी मुजाओं को कैलाश के नीचे घुसेड़ कर उठाना चाहा । परन्तु शकर ने विना किसी प्रयास के अपने पैर के अंगूठे से उस पर्वत को दवा दिया, जिससे दशग्रीव को मुजायें पिचने लगी तो उसने घोर चीत्कार किया। परन्तु दशग्रीव के विनती करने पर शंकर ने उसे क्षमा कर दिया और कहा कि,"आज से तुम रावण कहलाओगे।" राम के वनवास के समय रावण सीता को हर ले गया था। इस पर घोर राम-रावण युद्ध हुआ जिसमें रावण मारा गया।

२९२ जानकीहरणम् रम्भा एका असीम सुन्दरी अप्सरा जो समुद्र मंथन के समय निकली थी। उसे विश्वामित्र का तप भंग करने के लिये मेजा गया था। परन्तु विश्वामित्र ने उसे शाप दिया कि तू हजार वर्ष तक के लिये पत्थर होजा। रामायण के अनुसार जो कथा है उसे 'नलकूबर' के अन्तर्गत देखिए। लक्ष्मण---राम के अन्तर्गत देखिये । वरुण-सव से पुराने वैदिक देवों में से यह एक है । ये स्वर्ग और पृथ्वी के स्रष्टा और पालक हैं । ये अथाह ज्ञानी हैं । प्राय: इनका नाम मित्र के साथ आता है । वरुण दिन के स्वामी और मित्र रात्रि के। आगे चल कर इन्हे आदित्यों मे प्रमुख कहागया है और इसके बाद इन्हें समुद्रों और नदियों का देवता कहा गया है। इनका वाहन मकर है । महाभारत के अनुसार इन्हे कर्दम का पुत्र और पुष्कर का पिता कहा गया है। वे एक प्रकार से वसिष्ठ के पिता थे। वेदों में वरुण का जल से कोई विशेष सम्वन्ध नहीं बताया गया है। परन्तु पुराणों में वरुण को जल का स्वामी कहा गया है। ये हाथ में पाश लिये रहते थे। वैदिक वरुण के भी हाथ में पाश रहताथा जिससे वे अपराधियों को बांधते थे। इस पाश को नागपाश', 'पुलकाङ्ग' अथवा 'विश्वजित' कहते हैं । वे पुष्पगिरि पर रहते थे। कश्यप अदिति के आठ पुत्रों में एक वरुण भी थे। वसिष्ठ-~-ये ब्रह्मा के प्राण से उत्पन्न हुए थे । कर्दम की पुत्री अरुन्धती इनकी पत्नी थी। ऋग्वेद के सप्तम मण्डल का अधिकांश वसिष्ठ का बनाया हुआ है । जब मित्र और वरुण का वीर्य वसतीवर नामक यज्ञ में गिरा तो उससे अगस्त्य और वसिष्ठ की उत्पत्ति हुई (देखिये अगस्त्य) । ये सूर्यवंश के गुरु थे। इस पद को इन्होंने इसलिये स्वीकार किया था क्योंकि वे जानते थे कि इस कुल में रामचन्द्र का जन्म होगा। एक वार गाघि-पुत्र राजा विश्वामित्र ससैन्य वसिष्ठ के आश्रम में गये । उस समय वसिष्ठ ने अपनी शवला गौ की सहायता से विश्वामित्र का ठाठदार सत्कार किया। विश्वामित्र उस कामदुधा शवला पर लट्टू हो गये और उसे मांगा । पर वसिष्ठ ने अस्वीकार कर दिया। इस पर विश्वामित्र उसे बरजोरी ले जाने लगे तो शवला के शरीर से हजारों की संख्या में म्लेच्छ और यवनों की सेना निकली । उसने विश्वामित्र को पराजित कर दिया। वे लज्जित होकर लौट गये । ब्रह्मबल को क्षात्र बल पर विजय हुई। वाचस्पति---वृहस्पति का दूसरा नाम । ये अंगिरा ऋपि यो पुत्र थे, अतः इन्हें आंगिरस भी कहते हैं। ये देवताओं के गुरु, धर्मशास्त्र के प्रयोक्ता और नवग्रहों में पञ्चम थे। इनके रथ का नाम नीतिघोप था। देवताओं के गुरु होने के कारण इनका नाम अनिमिपाचार्य था। एक बार इनकी पत्नी तारा को सोम (चन्द्रदेव) उठा ले गये । इसके कारण दोनों के बीच भपकर युद्ध हुआ। इस युद्ध का नाम तारकामय या । सोम के हिमायती, उशनस, रुद्र और सम्पूर्ण दैत्य और दानव थे। और वृहस्पति के हिमायती इन्द्र और सम्पूर्ण देव मण्डल था। इस युद्ध से पृथ्वी कांपती उठी और ब्रह्मा के पारण में गयी । ब्रह्मा ने बीच-बिचाव कर सोम से ताराको लेकर बृहस्पति को लौटा दिया। तारा के एक पुम हुआ जिसे वृहस्पति और सोम, दोनों ने कहा कि हमारा है। ब्रह्मा ने नारा को सच-सच बताने की आशा दी । तब तारा ने बताया कि यह पुत्र सोग का है। उस पुष का नाम युध पड़ा । यामुकि-पाताल में रहने वाले सो के राजा। एक बार जब सो को माता ने रापों को उन्नःपया की'छ मे लिपट जाने की आज्ञा दी तो कुछ सपों ने इगको नहीं माना। तब कट्ट ने शाप दिया कि जय जन्मेजय गप-या मरेंगे तो अग्नि तुमको जला डालेगी।

चरित्र कोश २९३ . वासुकि को माता के इस शाप से बड़ी चिन्ता हुई । उसने तप से ब्रह्मा को प्रसन्न किया तो ब्रह्मा ने कहा-"जव यायावर वंश के जरत्कारु मुनि तुमसे पत्नी की याचना करें तो तुम अपनी बहिन को उनसे व्याह देना। तव उससे आस्तीक नाम का पुत्र होगा। वे सर्प-यज्ञ बन्द कर धार्मिक सौ का छुटकारा करेंगे।" इसके थोड़े दिन बाद समुद्र मंथन हुआ तो वासुकि नाग को देवताओं और असुरों ने मथने वाली रस्सी बनाया । विद्यापर--एक देवयोनि जिसके अन्तर्गत, खेचर, गंधर्व और किमर आते हैं। विभीयण-विधया का पुत्र और रावण का छोटा भाई । सुरमा इनकी पत्नी थी। विडोजा--विष्णु का नाम। वेदो में विष्णु को इन्द्र का छोटा भाई कहा गया है। वैदिक काल में विष्णु को प्रथम स्थान नहीं दिया गया है। यद्यपि इन्द्र, वरुण, मरुतगण, रुद्र, वायु और आदित्यों के साथ उनका जावान होता है। वे एक स्थान पर इन्द्र की स्तुति करते और उनसे शक्ति प्राप्त करते दिखलाये गये हैं। विष्णु का निवास स्थान क्षीर सागर है । वे शेष शैया पर सोते हैं। लक्ष्मी और सरस्वती उनकी रानी हैं। उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए जिन्होंने सृष्टि की उत्पत्ति की। विराधजय का उसकी पत्नी शतहदा से उत्पन्न पुत्र । उसे राक्षस लोग विराध कहते थे। वह एक भयंकर राक्षस था- पुत्रः किल जवस्याहं माता मम शतह्रदा । विराध इति मामाहुः पृथिव्यां सर्वराक्षसा ॥ वा० रा० अ० ३-५ । उसको ब्रह्मा का वरदान था कि वह किसी शस्त्र न मरेगा (वा० रा० अर० ३-७)। दण्डक बन मे वह राम लक्ष्मण को मिला और सीता को उठा कर मागा। तब लक्ष्मण ने एक वाण मारा। वह सीता को छोड़कर इनकी ओर लपका और उसने घोर युद्ध किया। विराघ राम और लक्ष्मण को अपने कन्धों पर बच्चों की भांति बिठा कर भागा । तव राम लक्ष्मण ने घूसों से मारते-मारते उसे अधमरा कर दिया। वह मर तो सकता नहीं था । उसे वे पृथ्वी मे सजीव गाड़ देने के लिये प्रस्तुत हुए तो विराध बिनती करने लगा। वह बोला कि मैं तुम्बुर नाम का गंधर्व हूँ। मैंने कुबेर के शाप के कारण राक्षस शरीर पाया है। कुबेर ने कहा था कि जब राम तुझे मारेंगे तब तू पूर्ववत् शरीर पाकर स्वर्ग जायगा। मुझे कुबेर ने इसलिए शाप दिया था कि रम्मा मे लिप्त होने के कारण मैं उनके पास समय से नहीं पहुंच पाता था । यह कह कर विराध अपने पूर्व रूप में स्वर्ग चला गया। (वा० रा० अर० ३,४) । विश्रवसःसुतः-रावण-देखिये 'रावण' और मंलग्न राक्षस वंश वृक्ष । विश्वामित्र--इन्होंने क्षत्रिय वंश में जन्म लेकरसप के बल ब्राह्मणत्व प्राप्त किया और सात ब्रह्मर्पियों मे गिने जाने लगे। इनके पिता का नाम गाधि था । विश्वामित्र राम से कहते हैं- स पिता मम काकुत्स्थ गाधिः परमधार्मिकः । कुशवंशप्रसूतोऽस्मि कौशिको रघुनन्दन ॥ वा० रा० वा० ३४-६ । विश्वेश-ब्रह्मा जी का नाम देखिये 'दुहिण' ।

जानकोहरणम् शची-इन्द्र की पत्नी और दातव-राज प्रलोम की पुत्री । हिन्दुओं के यहाँ विवाह के आरम्न में शची और इन्द्र का आवाहन किया जाता है, क्योंकि शची को वैधव्य से मुक्ति का वरदान था। पुराणों का कथन है कि जो भी चाहे शक्र अर्थात देवराज हो, शची सर्वदा इन्द्राणी रहेगी। शतक्रतु–इन्द्र का नाम , जिन्होंने १०० अश्वमेध यज्ञ किये थे। (देखिये 'इन्द्र)। शतानन्द--गौतम का अहल्या रो उत्पन्न पुत्र । ये जनक के कुल पुरोहित थे । शरजन्म-शिव के पुत्र कार्तिकेय । देखिये 'तारक' । शुनाशोर--इन्द्र का नाम । देखिये इन्द्र । सगर-सूर्य वंश में वाहु नामक प्रतापी राजा थे। इनकी स्त्री का नाम यादवी था। एक दिन अकस्मात इनके ऊपर शत्रुओं ने चढाई कर दी । युद्ध में वाहु परास्त हुए और पत्नी के साथ जंगल में भाग गये। उस समय उनकी पत्नी गमिणी थी । यादवी की सपत्नी को मालूम हुआ कि यादवी गर्भिणी है तो उसने उसे विप पिलादिया । पर उससे कोई अनिष्ट नहीं हुआ। राजा की मृत्यु जंगल में ही हो गई । रानी जब राजा के साथ सती होने जा रही थी उसी समय और्व ऋपि ने वहां आकर उसे रोक दिया। समय से उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ । और्व ने उसका जात संस्कार किया और विषपान करने के कारण उसका नाम सगर रखा । और्वने ही उन्हें वेद-शास्त्र और शस्त्र-विद्या की शिक्षा दी। बाद में उन्होंने हैहय आदि शत्रुओं को मार डाला। राजा सगर तब राजसिंहासन पर बैठे। इनकी दो रानियां थी--वैदर्भी और शव्या । शंकर जी ने इन्हें वरदान दिया कि उन्हें एक पत्नी से ६० हजार पुत्र होंगे, पर उनका नाश होगा और एक वंशधर पुत्र होगा । कुछ दिन बाद वैदर्भी से एक कद् हुआ और शैव्या से एक वीर्यवान पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा सगर उस कद्दू को फेंकने जा रहे थे कि आकाशवाणी सुनाई दी कि--"हे राजन् ! इसमें तुम्हें ६० हजार पुत्र उत्पन्न होंगे।" राजा ने उस कद् में से एक एक बीज निकाल कर एक एक को घृत कुण्ड मे रख दिया और उसकी रक्षा के लिये एक घातृ नियुक्त कर दी। कुछ दिन बाद उसमें से एक एक बलिष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए । वे लोग देवताओं के साथ अत्याचार करने लगे। कुछ दिन बाद राजा ने अश्वमेघ यज्ञ आरम्भ किया । घोड़े के साथ ६० हजार सगर के पुत्र रक्षा के लिये चले । कुछ दूर पर घोड़ा लुप्त हो गया। राजा ने उन्हें खोजने की आज्ञा दी । वे खोजते-खोजते कपिल मुनि के आश्रम में गये । वहाँ बघे हुए घोड़े को देख कर उन उदंड सगर-पुत्रों ने कपिल मुनि को फटकारना आरम् किया। ऋपि ने क्रोध-पूर्ण नेत्रों से देखकर उन्हें भस्म कर दिया। याद में राजा सगर के पौत्र तथा असमंजम के पुत्र भगीरय कठिन तपस्या कर स्वर्ग से गंगा जी को लाये और इनका उद्धार किया। सिद्ध-सिद्धों को 'देव योनि' कहा गया है । ये बड़े शुद्ध और धार्मिक प्रकृति के होते थे। इनमें ये अमानुपिक शक्तियां थी- । . अणिमा महिमा चंय गरिमा लधिमा तया । प्राप्तिः प्राकाम्पमोशियं वशिरयं चाप्ट सिद्धयः ॥ कही कही इससे भी अधिक शक्तियां कही गई हैं। सीता-राजर्षि जनप की पुत्री और रामचन्द्र को पली। समीरण सुत-देसिपे हनुमान् ।

चरित्र कोश २९५ सुकेत-सुता--सुकेतु नाम काएक बड़ा बलवान पक्ष था। सदाचारी होने पर भी उसके कोई सन्तान नयो। ब्रह्माजी के वरदान से उसे एक पुत्री ताटका नाम की हुई । और ब्रह्मा जी ने उसके शरीर में हजार हाथियों का बल दिया। जब बड़ी हुई तो उसके पिता सुकेतु ने उसका ब्याह जम्म के पुत्र सुन्दर के साथ कर दिया । उमसे उसको एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम मारीच था। अगस्त्य के शाप से मारीच राक्षस हो गया और ताटका मनुष्य मक्षिणी और भयंकर स्वरूपा हो गई। वनवास के प्रसंग में राम ने उसका वध किया। सुबाह-मारीच का माई जो ताटका के साथ राम से लड़ने आया और जिसे लक्ष्मण ने मार डाला। सुमंत्र-राजा दशरथ के मंत्री और सारथी। ये ही बनवास के समय राम-लक्ष्मण-सीता को रथ में बैठा कर कुछ दूर के बाद छोड़ आये थे । सुरदन्ती-ऐरावत । इन्द्र का हाथी । सुरसा-सुरसा एक प्रसिद्ध 'नाग माता' थी। जिस समय हनुमान जी सीता की खोज में लंका जा रहे थे, उस समय उसे कहा गया कि कि "तुम विकराल राक्षसी वनकर उनको रोको।" सुरसा समुद्र में रहती थी। उसने हनुमान को रोक कर कहा-"मैं तुम्हें खाऊँगी।" हनुमान जी ने कहा--"जानकी जी का ममाचार रामजी को देकर मैं तुम्हारे पास आ जाऊँगा ।" सुरसा न मानी, कहा "पहिले तुम्हें हमारे मुंह में प्रवेश करना होगा ।" तव हनुमान जी ने अपना शरीर बढाया। ज्यों-ज्यों सुरसा अपना मुंह बढाती गई, हनुमान जी अपना शरीर बढाते गये। अन्त में हनुमान जी बहुत ही छोटा रूप धारण करके उसके मुंह मे प्रवेश कर बाहर निकल गये। तब सुरसा ने प्रसन्न होकर उनको सफलता की कामना की। सुषेण-एक वानर जिसे सुग्रीव ने पश्चिम की ओर सीता को ढूंढने के लिये भेजा था। हनुमान-वायु पुत्र हनुमान् । ये रामचन्द्र के अनन्य भक्त थे। सुग्रीव ने हनुमान को दक्षिण को ओर सीता के ढूंढ़ने के लिया भेजा था। अञ्जना के गर्भ से पवन के ये पुत्र थे। जन्म लेते ही क्षुधातुर हो गए । लाल, विम्ब फल समझ कर ये सूर्य पर उछले । यह देख कर देव-दानवों में हाहाकार मच गया। सूर्य के ताप से बचने के लिये पवन देव ने शीतल वायु के द्वारा इनकी रक्षा की। उस समय राहु सूर्य को ग्रसने जा रहा था। हनुमान के पहुंचने पर राहु भाग खड़ा हुआ और इन्द्र से सब वृत्तान्त कहा । इस पर क्रुद्ध होकर इन्द्र ने इन पर वज्र से प्रहार किया जिससे इनका वाम हनु टूट गया। पवन अपने पुत्र को उठा कर एक गुफा में ले गये । पवन ने क्रुद्ध होकर बहना बंद कर दिया। चारो ओर हाहाकार मच गया । देवों ने जाकर ब्रह्मा से कहा। ब्रह्मा ने आकर शिशु हनुमान् को आशीर्वाद दिया और सब देवों ने उसे अमोघ वर दिया। ये अमर हैं। ऐसा वर पाकर ये ऋषियों को मताने लगे। ऋपियों ने शाप दिया कि--"तुम अपना बल भूल जाओगे । जब तुम्हें कोई याद दिलावेगा तब तुम्हारा बल दुगना बढेगा।" बालि और सुग्रीव के परस्पर कलह में इन्होंने सुग्रीव का साथ दिया। इन्होंने जानकी का पता लंका मे लगाया। इन्होंने लंका को जला डाला । राम की विजय हुई। हलायुध-बलमद्र, कृष्ण के छोटे भाई । हिरण्यगर्भ ब्रह्मा । विजदा-एक राक्षसी । जब रावण सीता को हर लाया तो उन्हें लंका की अशोक वाटिका में रखा 1 चौकसी के लिये और उनको डरा-धमका कर वश में लाने के लिये जिन बहुत सी जानकोहरणम् राक्षसियों को उसनें तैनात कर दिया उनमें एक त्रिजटा भी थी । वह धर्मात्मा, विवेकशील और प्रियम्बदा थी। वह सीता को बरावर आश्वासन देती रहती थी । वह राम के युद्ध की तैयारी की भी खबर देती रहती थी। इससे सीता को बड़ी सान्त्वना मिली । त्रिविक्रम-विष्णु । देखिये बलि । निशिरस-रावण की सेना में तीन सिर का एक भयंकर राक्षस ।

२ स्थान कोश अलका-सर्व प्रथम विश्वकर्मा ने, माल्यवान, सुमाली, माली, इन तीन दुघर्ष राक्षसों एवं उनकी विशाल सेना के लिये सुवेल पर्वत पर लंकापुरी का निर्माण किया और सब राक्षस लोग वहां रहने और अजेय होने के कारण सब को सताने लगे। तत्पश्चात् जव विष्णु ने उन्हें युद्ध में पराजित किया तो वे लोग भयभीत होकर पाताल में रहने लगे । लंका खाली हो गई। उसके बाद पिता की आज्ञा से कुवेर लंका में रहने लगे "तत्र त्व वस भद्र ते लकायां ना संशयः"-वा०रा० उ०३-२८॥ जब रावण, शिव के वरदान से आति बलवान हो गया तो उसके साथियो ने बहकाया कि लंका तो राक्षसों के लिये बनाई गई थी, कुवेर उसके अधिकारी नहीं हैं, तुम लंका को उनसे वापस ले लो । कुवेर बुद्धिमान थे। उन्होंने लंका को छोड़ना स्वीकार कर लिया। तब यह प्रश्न उठा कि इतना बड़ा यक्षों का परिवार कहाँ रहे। इस पर अपने पिता की आज्ञा से, कुवेर ने कैलास पर्वत पर अति सुन्दर एवं शोभायमान अलकापुरी बसायी । धनेश्वरस्त्यपपितृवाक्यगौरवा- न्यवेशयच्छशिविमले गिरी पुरीम् ॥ -वा० रा० उ०११-५२ । अयोध्या-कोसल जनपद की एक प्रसिद्ध नगरी। अवधपुरी सूर्यवंशी राजाओं की राजधानी। रामचन्द्र की जन्मभूमि । सरयू तट पर एक प्रसिद्ध एवं प्राचीन तीर्थ। कोसलो नाम मुदितः स्फोतो जनपदो महान् । निविष्टः सरयूतीरे प्रभूत धनधान्यवान् ॥ अयोध्या नाम नगरी तत्रासोल्लोकविश्रुता । मनुना मानवेन्द्रण या पुरी निर्मिता स्वयम् ।। -वा०रा० बा०५-५,६। . एक समय रावण ने अयोध्या में जाकर अयोध्या के सम्राट अनरण्य को युद्ध में परास्त कर मार डाला । मरते समय अनरण्य ने रावण को शाप दिया, "महात्मा इक्ष्वाकु वंशी नरेशों के इस वश में ही दशरथ नन्दन श्री राम होंगे, जो तेरे प्राणों का अपहरण करेंगे।" उत्तर कोसल-रामायण के अनुसार कोसल, सरयू जिसे आजकल घाघरा कहते हैं, के तट पर स्थित था। कहा जाता है कि इसकी लम्बाई अड़तालीस मील और चौडाई बारह मील यो। इसे 'साकेत' भी कहते थे और उसका एक मुख्य पर्यन्त भाग 'नन्दि ग्राम' था जहां से राम के वनवास के समय, उनकी अनुपस्थिति में भरत राज्य शामन करते थे। अयोध्या काण्ड से पता चलता है कि वह राजधानी के पूर्व में था। आनन्दराम वरुआ कहते हैं कि "मेरे मत के अनुसार, महामारत और मत्स्य पुराण के कई पद्य हैं जिनसे न केवल यह पता चलता है कि वह गोमती के आसपास था बल्कि वह ३८ २९८ जानकीहरणम् गोमती और गंगा के संगम के सनिकट था।" इस नदी के दक्षिण तट पर, सुल्तानपुर (जिसे पहिले कुशभवनपुर कहते थे) के १८ मील दक्षिण पूर्व एक प्रसिद्ध तीर्थस्थान है जो सम्भवतः रामतीर्थ है, जिसका वर्णन महाभारत में आया है। उस स्थान के नक्शे के देखने से पता चलता है कि वह अयोध्या से प्रयाग के सीधे रास्ते में पड़ता है, जिस मार्ग से राम वनवास के समय गये थे। राम के स्वर्गारोहण के समय, उनके दोनों पुत्र कुश और लव, दक्षिण कोसल में विन्ध्य पर्वत की घाटी मे कुशावती में और उत्तर कोसल के श्रावस्ती में, राज्य करते थे । मत्स्य पुराण में श्रावस्ती को 'गण्ड' कहा गया है जो आज भी उसी नाम से प्रसिद्ध है। महामारत में इसका नाम भीम द्वारा विजित देशों में पाञ्चाल के बाद आया है । अतः इसमें कोई सन्देह नहीं रह जाता कि अयोध्या के उत्तर का प्रदेश जिसमें गोण्डा और वहराइच सम्मिलित है वह उत्तर कोसल के नाम से जाना जाता था। इसके विस्तृत वर्णन के लिये देखिये आनन्दराम बरुआ के 'प्राचीन भारत का भूगोल' के अनुच्छेद ९३-९६, पृष्ठ ४८-९० । गोपाल रघुनाथ नन्दरगिकर की जानकीहरण १०-५२ की टीका से) । राम का महाप्रस्थान : कोशलेषु फुशं वीरमुत्तरेषु तथा लवम् । अभिषिच्य महात्मानावुभी रामः कुशोलवी । -वा०. रा०3०१०७-१७ । अध्यधंयोजनं गत्वा नदी पञ्चान्मुखाधितम् । सरयू पुण्यसलिलां ददर्श रघुनन्दनः । या० रा० उ० ११०-१ । पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः । विवेश बंप्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः।। -वा० रा० उ० ११०-१२ । ऋष्यमूक-पम्पासर के निकट एक पर्वत जहाँ सुग्रीव अपने बड़े भाई यालि के भय से किष्किन्धा से भाग कर अपने मंत्री हनुमान के साथ रहता था। पम्पा के बाद राम वहाँ गये थे । तुलसीदास जी कहते हैं : आगे चले बहुरि रघुराया। रिष्य मूक परवत नियराया। एक समय वलि ने पर्वताकार, मैसे के स्वरूप वाले असुर को मारकर उसके गत-प्राण शारीर को उठा कर एक योजन दूर फेंक दिया। यह असुर रुपिर वहाता हुआ मतंग ऋपि के आश्रम मे गिरा। मतंग ने शाप दिया कि इस मैसे को मारने याला यदि मेरे आश्रम की परिधि के भीतर आवेगा तो उसकी मृत्य हो जायगी। इह तेनाप्रवेष्टव्यं प्रविष्टस्य पयो भवेत् । पनं मसंधयं येन दूषितं कपिरसः।। --वा. रा. कि०११-५३ ।

स्पान कोश तब मतल की अनुमति से वह वहां रहने लगा। शाप के मय से बालि वहाँ नही जा सकता था। ततः शापभपाद् भीतो प्यमूर्फ महागिरिम् । प्रवेष्टुं नेच्छति हरिदष्टं पापि नरेश्वर ॥ -या. रा० कि० ११-६४। इसी पर्वत पर राम और सुग्रीव की मैत्री हुई। फटाह-~यह मलयद्वीपसमूह का एक द्वीप था जिसे 'केदाह' कहते हैं। इसे भारतीय विद्वान, हरिभद्र सूरि के समय से (आठवीं शताब्दी) लेकर सोमदेव के कथा सरित्सागर तक ग्रंथों में किये गये निर्देशन से जानते हैं। करुष-मलद देखिये। काञ्ची-दक्षिण भारत का एक बड़ा प्रख्यात एवं पवित्र व्यापार केन्द्र । यह सात नगरों में से एक था जिसे मोक्षदायी कहा गया। काञ्चीपुरी, आधुनिक काजीवरम् । अयोध्या मयुरा माया काशी फाञ्चीअवन्तिका । पुरी द्वारावती चैव सप्तता मोक्षदायिकाः ॥ पल्लव महेन्द्रवर्मन (जिनका राज्यकाल ईसा के पश्चात् ६०० से ६३० तक था) का पुत्र एवं उत्तराधिकारी पल्लव नरसिंह वर्मन (राज्यकाल ६३०-६६०) जो महामल्ल मी कहलाता था। इस पल्लव-वंश का सबसे प्रख्यात एवं प्रतिभाशाली राजा था। उसके राज्यकाल में काञ्ची जगत्- विश्रुत राजधानी हो गई थी। उस समय वह इतना प्रसिद्ध व्यापार-केन्द्र हो गया था कि वहां अनेक देशों के सार्थवाह व्यापारिक आदान-प्रदान के लिये एकत्र होते थे । "काञ्चीगुणाकषितसालोका" जानकीहरण, १-१८ । कालिन्दी-कालिन्दस्य कलिन्द नाम्नः पर्वतस्य इयं कालिन्दी। यमुना नदी । देखिये पाणिनि ४-३-१२० । यमुना नदी जो कलिन्द पर्वत से निकलती है । यमुना को सूर्य की, उसकी स्त्री संज्ञा से उत्पन्न, पुत्री कहा गया है। अतः वह यम की बहिन थी । एक बार वलराम ने मत्तावस्या मे स्नान करने के हेतु उसे बुलाया । पर उसने कुछ ध्यान नहीं दिया । अत: बहुत क्रुद्ध होकर अपने हलायुध से उसे अपने पास घसीट लिया और वन में जहां-जहाँ घूमते थे यमुना को अपने पीछे पीछे चलने के लिये वाध्य किया। तब उम नदी ने मनुष्य का रूप रख कर बलराम से क्षमा याचना की। परन्तु उन्हे मनाने में उसे बहुत दिन लग गये। विल्सन का ख्याल है कि "यह कया सिंचाई के लिये यमुना से नहरों के निकालने की ओर इंगित करती है ।"-गोपाल रघुनाथ नन्दरगिकर । प्रयाग मे गंगा और यमुना का संगम है। कुलाचल-प्रसिद्ध सप्त पर्वतों में से कोई-~-महेन्द्र, मलय, सह, शुक्ति, विन्ध्य और परियात्र। फैलास-भगवान् शंकर का निवास स्थान । हिमालय में एक पर्वत । जब रावण ने उसके नीचे अपनी भुजाओं को डाल कर उठगने की चेष्टा की तोशंकर ने सरलता से उसे अपने अंगूठे से दबा दिया। इससे रावण की भुजायें पिचटी होने लगी तो उसने भयंकर चीत्कार किया। रावण के विनती करने पर शंकर ने अपने अंगूठे का दबाव ढीला कर दिया। देखिये चरित्र कोश में रावण। देवसह-एक पर्वत का नाम ।

३०० जानकीहरणम् नन्दन-स्वर्ग में इन्द्र का उद्यान । लंका-रावण की राजधानी जो भारत के दक्षिण में है। यह सोने की बनी थी। पहिले इसमे माल्यवान, सुमाली और माली जो बड़े बलवान् और भयंकर राक्षस थे, कुल राक्षस परिवार के साथ रहते थे। वे देवताओं पर बड़ा अत्याचार करते थे। अतः विष्णु ने उन्हें युद्ध में परास्त कर दिया। तब सब राक्षस पाताल में भाग गये। लंका खाली हो गई । तब विश्रवा ने उसे अपने पुत्र कुवेर को यक्ष-परिवार के रहने के लिए दे दिया । जब रावण तप से दुर्घ हो गया तो उसने उसे कुवेर से छीन लिया। तब रावण राक्षसों सहित वहाँ रहने लगा। राम-रावण युद्ध के बाद राम ने विमीपण का उस पर राज्याभिषेक कर दिया । चिन्व्य-एक पर्वत ऋखला जो मनु-कथित मध्यदेश और दक्षिण के बीच में है। विस्तृत कथा के लिये देखिये, चरित्र कोश में 'अगस्त्य' । विदेह-उत्तर-विहार । गण्डकी और कोशी नदियों के बीच का प्रदेश जिसे आजकल तिरहुत और पुणिया कहते हैं। राजर्षि जनक इसके राजा थे । अतः उन्हें विदेहराज कहते हैं और उनकी पुत्री, सीता को वैदेही । देखिये-चरित्र कोश में 'मैथिल' । पञ्चवटी-दण्डकारण्य में नासिक के पास, गोदावरी के किनारे एक वन जिसमें वनवास के प्रसंग में, राम, लक्ष्मण और सीता ने निवास किया था और जहाँ सूर्पणखा के नाक-कान काटे गये थे। यही पर रावण ने सीता को हरा था। रामायण में जो दक्षिण का भूगोल दिया है वह बिलकुल ठीक मालूम होता है। बुन्देल खंड के सीमान्त से लेकर, कृष्ण नदी के तट तक का कुल प्रदेश उस समय जंगल था जिसे दण्डकारण्य कहते थे। अत्रि के आश्रम और चित्रकूट छोड़ने के बाद राम यहां आये। यही पर उन्होंने एक बड़ी नदी पार की, जो एक पर्वत के पास थी । स्पष्ट है कि इसका तात्पर्य नर्मदा से हैं। इसी अरण्य में प्रस्रवण पर्वत और गोदावरी के निकट राम थोड़े दिनों रहें। दण्डक के इस भाग को जनस्थान कहते है । यह बड़ा रम्य स्थान है। उत्तर रामचरित में भवभूति इस रम्य स्थान का इस प्रकार वर्णन करते हैं- "अपमविरलानोकहनियहनिरन्तरस्निाधनीलपरिसरारप्यपरिणद्धगोदावरी- मुखरफन्दरः सततमभिध्यन्दमान-मेघमेरितनीलिमा जनस्थानमध्यगो गिरिः प्रस्रवणः ।" पुष्पवः-कुबेर का विमान जो वाहक के इच्छानुसार चलता था। रावण ने इस विमान को मुबेर से छीन लिया था । परन्तु राम ने रावण-वध के उपरान्त उसे कुर्वर को लोटा दिया । मन्दर-एका पुनीत पर्वत जो ११ हजार योजन नीचे गड़ा था । उससे क्षीर सागर मया गया था। विष्णु के कहने पर वासुकि उसे उसाड़ कर लाये और उसे मथानी की जगह प्रयोग किया। तब समुद्र से अमृत और तेरह अन्य वस्तुएँ जो प्रलय में समय लुप्त हो गई थी, निकली। मलय-भारत की ओर लंका के सामने समुद्र तट पर एक पर्वत, जिस को पार कर राम को रोना ममुद्र तट पर गयी थी। मेरु-गृथ्वी के मस्तक पर एक विशाल पर्यंत जिगके ऊपर स्वयं स्थित है। इस पर्वत में पा और सूर्य और मम्पूर्ण नक्षत्र मण्डल घूमता है। अब यह गिद हो गया है कि यह पर्वत श्रेणी उतरी घर में है। देखिये गाल गंगाधर तिलकका 'ओरायन,दि आवंटिक होम मार दियेदार', अध्याय--1 स्थान कोश मनार---एक पर्वत जो महाभारत के अनुसार कैलास पर्वत के उत्तर में है। यह हिमवत और मेनका का पुत्र कहा गया है, इसीसे इसे मैनाक कहते हैं । इन्द्र जब पर्वतों के पख काट रहे थे तो यह डर कर समुद्र में छिप गया। अतः इसके पंस नहीं कटे । लंका जाते समय ममुद्र के कहने पर इसने हनुमान को आश्रय देना चाहा था। राय-ताप्ती नदी से कन्याकुमारी तफ फैली हुई पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ सह्याद्रि कहलाती हैं। इसे पार कर राम समुद्र पर गये थे। सुमेरु-सुवर्ण पर्वत । सुवेल-लंका की ओर समुद्र तट पर एक पर्वत जिस में एक सिरा बांध कर वानरों ने सेतु का निर्माण किया था। त्रिकूट-एक पर्वत जिसके शिखर पर लंकापुरी वसी है।

३
जानकीहरणम्
संस्कृत महाकाव्य
विख्यात सिंहलीय कवि एवं लंका-नरेश
कुमारदास रचित
के० धर्माराम स्थविर
प्रिन्सिपल, विद्यालंकार (ओरियंटल) कालेज
पेलियगोड केलानिया
द्वारा
सिंहलीय शम्दानुसार--अन्यय से पुननिर्मित
और
संशोपित सप्त सहित सम्पादित
सीलोन
मुद्रक एवं प्रकाशक गे० ० ० रोनानायक मारष्य
"सत्य समन्वय" प्रेस-पेलियगोर

भूमिका सम्पन्नता और विविधता की दृष्टि से देव-भाषा संस्कृत के जोड़ की भापायें बहुत कम हैं। उसमें संसार की प्रायः प्रत्येक विद्या का समन्वय है और उसका काव्य, जैसा कि सुसंस्कृत, प्राच्य जन की प्रतिभा से अपेक्षित है, गुण और मात्रा दोनों दृष्टिकोणो से अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। काव्य में भी सबसे अधिक प्रतिष्ठा महाकाव्यों की है । हिन्दुस्तान का प्रायः हर उत्तम कवि महाकाव्यों की रचना में ही अपनी गरिमा समझता था और यही उसकी महत्वाकांक्षा भी होती थी कि वह अपने पीछे इस श्रेणी का काव्य छोड़ जाय। महाकाव्यों की संख्या फिर भी अपेक्षाकृत सीमित ही रही। अपनी कला में दक्ष कालिदास आदि महाकवियों की कला से अपनी कला की तुलना करना एक अज्ञात कवि के लिये साहसपूर्ण और रोचक प्रयत्न है। किन्तु, जैसा कि निम्नलिखित पंक्तियों से स्पष्ट होगा, ऐसा प्रयत्न किया गया है और सफलता भी कोई कम नहीं मिली है । प्रयत्न करने वाला भी कोई साधारण व्यक्ति नहीं बल्कि इस द्वीप का ही एक महान सम्राट् था। पाठकों के समक्ष कुमारदास को इस प्रख्यात रचना 'जानकीहरण' (या उसके इस नव-नियोजित रूप) को प्रस्तुत करते हुये प्रस्तावना-स्वरूप यदि कुछ तथ्य उपस्थित किये जायें तो आशा है कि प्रयत्न क्षम्य होगा। उसकी उपादेयता इस कृति के सन्दर्भ में समयानुकूल तो होगी ही, संस्कृत साहित्य के इतिहास के कुछ घूमिल पृष्ठ भी प्रकाश में आ जायेंगे। सम्राट् कुमारदास ईसा से कोई ५१७ वर्ष पश्चात् लंकाद्वीप के महाराजा हुए । 'महावंग' में किया गया उनके शासन का उल्लेख अत्यन्त संक्षिप्त है । विश्वास तो यह भी है कि उनके शासन काल की घटनाओं सम्बन्धी एक अध्याय कही सो भी गया है । 'महावंश' में उनका उल्लेख केवल थोड़ी-सीपंक्तियों में आता है जिनका प्रारंभ इस प्रकार होता है 1-"तस्सच्चये कुमारादिषातुसे- नोति विस्सुतो अहु तस्स सुतो राजा देवरूपो महाबलो।" इन पक्तियों में इस पाक्तिशाली सम्राट की प्रमुख कृतियो का उल्लेख है और उनका नाम 'कुमार धातुसेन था, जिनका रूप देवताओं के समान सुन्दर था, बतलाया गया है । यह भी कथित है कि उनकी मृत्यु शासन के नवे वर्ष में हुई। किन्तु उनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे उनके एक महान् कवि होने अथवा 'जानकीहरण' का रचयिता होने का संकेत मिलता हो। हां, कुछ अन्य अकाटय तथ्यों के आधार पर ये दोनों ही बातें सरलता से सिद्ध होती हैं। 'मयूरपद परिवेण' के अध्यक्ष की प्रख्यात कृति 'पूजावली' का एक अंग इस प्रकार है-'दरानकेलि (धातुसेन) का पुत्र राजकुमार मोगल्लान सिगरि के नृपति (कश्यप) के डर से हिन्दुस्तान भाग जाता है और फिर वहाँ से सैनिकों की एक फ़ौज लेकर वापस आता है और पितृघाती कसुब (कश्यप) का नाश करके अठारह साल तक राज्य करता है। उसका पुत्र कुमारदास, जो एक गम्भीर विद्वान भी था, नौ वर्ष तक राज्य करता है और अन्त में अपने को अपने मित्र कालिदास की चिता की अग्नि में जलाकर भस्म कर देता है।" 'परकुम्वमिरित' से उद्धत निम्नलिखित पंक्तियों के भाषानुवाद से उपर्युक्त कयन की सत्यता प्रमाणित हो जाती है और यह भी विदित हो जाता है कि सम्राट का कवि रूप भी उतना ही उत्कृष्ट था- 'जानकीहरण' तथा अन्य महाकाव्यों के अमर कवि सम्राट् कुमारदास ने अपना जीवन महाकवि कालिदास के लिये निछावर कर दिया।' इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि मोगल्लान का पुत्र जो उसका उत्तराधिकारी हुआ, .

३०४ जानकोहरणम् उसका नाम कुमारदास भी था और कुमार घातुसेन भी था । इन ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आधुनिक काल के कुछ लेखको की यह धारणा कि कवि और सन्नाट 'दोपृथक व्यक्ति थे और कुमारदास नामक सम्राट् कभी कोई था ही नही-सर्वथा निर्मूल है और उस पर कोई अम्भीर विचार नहीं हो सकता। 'महावंश' और 'काव्य-शेसर' के अनुसार कुमारदास सीलोन में स्थापित उरा मौर्य फुल के वंशज थे जो सम्राट अशोक द्वारा पवित्र वोपिवृक्ष की सेवा के निमित्त वहाँ भेज दिये गये थे। इस सम्राट कवि की शिक्षा के सम्बन्ध में निश्चित रूप से हमें कुछ भी ज्ञात नहीं है। अनुमान मह अवश्य है कि उनकी शिक्षा उन ब्राह्मण पंडितों के विद्यालय में हुई होगी जो उन दिनों लंका में रहते रहे होंगे तथा राज-अध्यापक और अन्य प्रतिष्ठित पदों पर शोभित और पुरस्कृत होते रहे होंगे। विजय का पौत्र पाण्डुकाम्य, जिसका स्थान लंका-सम्राटों की पंक्ति में चतुर्थ है, एक ऐसे ही धनी और विद्वान् ब्राह्मण का शिष्य था जिसका नाम था पाण्डुल, जिसने युवा राजकुमार को न केवल गिक्षित किया बल्कि उसके 'स्नायुओं को भी सशक्त बनाया जिसके बल पर राजकुमार ने राजदण्ड की उपलब्धि भी की। उस प्राचीन समय में हमारे द्वीप में वेदों और संस्कृत के अन्य अन्यों के अध्ययन और ज्ञान के. प्रचलन का साक्षी इतिहास है। किन्तु पाण्डुकाम्य' के पौत्र देवानां पिय तिस्स के राज्यकाल में जब चौद्ध-धर्म का प्रवेश हुआ तव सिंहलद्वीप के निवासी वेदों के अध्ययन से अधिक इस नवीन धर्म के अध्ययन में दत्तचित हो गये। किन्तु इससे संस्कृत की अवहेलना नहीं हुई वल्कि व्याकरण, तर्क- शास्त्र और संस्कृत से सम्बद्ध अन्य विषयों का अध्ययन करना सिंहल के विद्यार्थियों की स्थायी रीति हो गई; क्योंकि उनके अध्ययन से बुद्ध-दर्शन तथा पालि को समझने में सरलता होती थी। इसलिये लंका में विभिन्न समयों में बहुत-से विद्वान् उत्पन्न हुये जिनको पाणिनि, कात्यायन, पतंजलि चन्द्र इत्यादि तथा और भी पुराने व्याकरण वेत्ताओं आपिगलीय और शाक्टायन मादि को विविध प्रणालियों पर पूरा अधिकार था। इन विद्वानों से बहुत-से संस्कृत ग्रन्य भी लिखे जैसे रत्नधी ज्ञानाचार्य कृत 'चन्द्र-संचिका', महाकश्यपस्थविर का 'बलायबोधन' (चन्द्रवृत्ति) और अनावदशि संघराज का 'दैव कामधेनु' । अब तक हम संघों से सम्बद्ध विद्वज्जनों की चर्चा करते रहे हैं । शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र में साधारण जन भी पीछे नहीं रहे । हम जानते हैं कि सरहपाद तथा धर्मकीर्ति प्रभृति विद्वानों ने संस्कृत में बुद्ध धर्म सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ लिसे । अनुरापपुर के मौद्गल्ल्यायन महास्थविर, पोलोमश्व के सारिपुत्र महास्थविर भोर याद के विद्वानों में सम्राट पंडित पराक्रमबाहु, संपराज वनरत्न, धर्मकीति तथा ६ भाषाओं के उद्भट पंडित' राहुल तथा कुछ अन्य लेखकों की कीत्तियां और कृतित्व इस बात की साक्षी हैं कि सिंहलद्वीप के बौद्ध विद्वान् संस्कृत भाषा में कितने पारंगत थे । ठीक ही कहा गया है कि धार्मिक और अधार्मिक सभी प्रणालियों के अध्ययन से बौद-दर्शन को ठीक-ठीक समझने माय में ही राहायता नहीं मिलती, उगमें अटूट आस्था और विश्वारा भी उत्पन्न होते हैं। १. पट गया के एक संस्कृत शिला-नेख के आधार पर इस विद्वान् को सिंहल का मूल नियामी ठहराया जाता है । शवदर राजेन्द्रलाल मित्र ने अपनी सुप्रसिद्ध रचना 'घुस गया' में इस लेप का एक प्रतिचित्र छापा है । उनके अनुपाव की एक पंक्ति इस प्रकार है-(सिंहलद्वीप जन्मना पंडित रली जन भिक्षणा। धीराइल स्यविर भी 'रल-मतिपद' और 'रल योजानाचार्य नाम से कदापित इसी विद्वान का उल्लेख करते हैं। जीवन के अन्तिम दिनों में वे हिन्दुस्तान चले गये होंगे औरयौर सपादकीतिराज के संरक्षण में रहे होंगे। . - धाराम स्पविर की भूमिका ३०५ यद्यपि सीलोन के प्राचीन पंडितों द्वारा काव्यग्रन्थ तोबहुत-से रचे गये होगे किन्तु काल के क्रूर करों से अब तक बहुत कम बच पाए है। उनमें उदाहरणार्थ हम सस्कृत में 'युर गद्ग' तथा 'नामाष्ट शतफ,' सिंहली में रचित 'ससक 'कुरदमयदेब्द' और 'काव्यशेखर, पालि में रचित 'पारमी सतक, 'समन्त फूटवन्न' तथा 'दठ यंस' प्रभृत्ति छोटी-छोटी रचनाओं के नाम ले सकते हैं । किन्तु संस्कृत में रचित 'जानकीहरण के अतिरिक्त किसी अन्य ऐसे महाकाव्य का उल्लेख हमने नहीं सुना है, जिसकी रचना किसी स्थानीय विद्वान् ने की हो। यद्यपि कुमारदास और उनकी कृति 'जानकीहरण' की ख्याति देश-विदेश में काफी फैली हुपी थी किन्तु सीलोन के बाहर के आधुनिक विद्वान् इस सग्राट् कवि और उसकी कृतियों के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं। प्रोफेसर पीटरसन ने 'बाम्बे रायल एशियाटिक सोसायटी की पत्रिका में निम्न-लिखित श्लोकों को प्रकाशित किया है जो 'औचित्यालंकार', 'शाईपर' पद्धति', और 'सुभाषितावली में कुमारदास की कृतियों से बतलायी जाती है। १. अयि विजहीहि दृढोपगूभनम् त्यज नवसंगमभीरुवल्लभम् । अरुणकरोद्गम एप वर्तते घरतन सम्प्रवदन्ति कुक्कुटाः ॥ २. पश्यन्हतो मन्मथवाणपातः शक्ते विधातु न निमील्य चक्षुः । ऊरू विधामा हि कृतौ कयंता- वित्यास तस्यां सुमतेवितर्कः ॥ ३. शिशिरशीकरवाहिनि मारते चरति वृष्टिभयादिव सत्वरः । - मनसिजः प्रविवेश वियोगिनी हृदयमाहितशोकहुताशनम् ४. भ्रान्त्वा विवस्थानिय दक्षिणाशा- मालम्ब्य सर्वत्र फरप्रसारी। ऋत्विक्ततो निःस्व इव प्रतस्ये चपलब्ध्यै धनदस्य यासम् ॥ प्रस्तुत रचना में पहला श्लोक नहीं आता। सिंहल के सन्नग्रन्थो में इस श्लोक से मिला-जुलता कोई अन्वयांश भी नहीं मिलता । दूसरा पहले सर्ग का उन्नीसवां श्लोक है, तीसरा नवें सर्ग का तिरसठवाँ श्लोक है, तथा तीसरे-चौथे श्लोक दूसरेवर्ग के हैं। यहां भी ध्यान देने योग्य बात यह है कि तीसरे और चौथे श्लोक सर्वथा त्रुटिहीन नहीं हैं और उनके पाठ में भी प्रस्तुत सस्करण के पाठ से थोड़ा अन्तर है। 'अपि विजहोहि आदि प्रथम श्लोक ग्यारहवी सदी के एक कश्मीरी कवि क्षेमेन्द्र के औचित्या- लंकार में उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत हैं । उस श्लोक की चतुर्थ पक्ति उज्ज्वलदत्त द्वारा समीक्षित महाभाष्य तथा उणादि सूत्र में आती है । प्रोफ़ेसर पीटरसन तथा प्रोफेसर भण्डारकर के बीच हुये पतंजलि के तिथि-सम्बन्धी जोरदार विवाद में प्रोफेसर पीटरसन ने उपर्युक्त तथ्य का उल्लेख किया है और उसे कुमारदास के बाद का बतलाया है । ऊपर वतलाया जा चुका है कि यह श्लोक सिंहलियों ॥

जानकोहरणम् - पुछ विद्वान् इग मत पर अड़े है कि महाकवि कालिदास (भारत ये शेपसपियर) १९४६ वर्ष पूर्व उज्जयनी के सम्राट विक्रमादित्य यो दरवार में हुये थे। प्रोफेसर तारानाथ तकवाचस्पति के प्रसिद्ध कोश 'याचस्पत्यम्' में 'ज्योतिबिदामरण' के कुछ श्लोक उद्धृत किये गये हैं जिसके अनुसार पालिदास ने रघुवंश, कुमारसंभय तथा अन्य कविताओं के रचने के पश्चात् कलियुग वर्ष ३०६८ में अर्थात् १९२२ वर्ष पूर्व इस ज्योतिप -अन्य की रपना भी की थी । साधारणतः इतने निश्चित कथन से मान लेना चाहिये कि रामस्या का समाधान हो गया, किन्तु फिर उसी पुस्तक में ऐसी बातें भी लिखी हुई हैं जिनसे विश्वसनीयता को आपात भी पहुंचता है। श्री भामदाजी ने रायल एशियाटिक सोसायटी की पत्रिका में प्रकाशित 'दि संस्कृत पोपट कालिदास' में इस बात का विस्तार से उल्लेख किया है, और दिखलाया है कि ज्योतिर्विदाभरण में शक् वर्ष से ४४५ घटा देने और फिर उसे ६० से विभाजित कर देने की अयनांश निकालने की प्रणाली उपर्युक्त सिद्धान्त का पूरा-पूरा सण्डन करती है । यह प्रश्न विवादास्पद है कि श्री भाऊदाजी को इस बात को सिद्ध करने में सफलता मिली कि नहीं कि कालिदास और मातृगुप्त एक ही व्यक्ति थे और वह कारमीर के प्रशासक थे। हां, इतना अवश्य है कि उन्होंने इस बात को बलपूर्वक कहने का प्रयल किया है कि ६वीं शताब्दी के पूर्व न तो विक्रमादित्य, जिनकी सभा मे नवरल थे, हुये थे और न कालिदास ही। टीकाकार रामदास के अनुसार 'सेतु-प्रबन्ध' की रचना कालिदास ने विक्रमादित्य नामक एयर सम्राट के अनुरोध पर की तथा जैसा कि कुछ अन्य तथ्यों के आधार पर कहा गया है उसकी रचना हुई थी प्रवरसेन नामक एक दूसरे सम्राट के लिये । कहा जाता है कि सम्राट् प्रवरसेन विक्रमादित्य (श्रीहर्ष) के समकालीन और काश्मीर के नृपति थे और वृद्धावस्था में चीनी यानी हुयेन त्सांग के भी समकालीन थे। इसीलिये प्रोफेसर येवर ने उन्हें ५०० तथा ६०० ई० के मध्य में ठहराया है और इस प्रकार उन्हें कुछ काल के लिये कुमारदास का मी समकालीन बतलाया है। विचित्र वात है कि कुमारदास के समकालीन एक भोजराज भी थे। धर्मकीति महास्थविर लंका मे रचित 'हिस्ट्री माय बुद्धिज्म' मे इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख किया मिलता है। और यह भी अच्छी तरह ज्ञात है कि एक कालिदास भोजराज के दरवार को शोमा थे। 'मेघदूत' और 'शब्दार्यरत्न' उन्ही की रचनायें प्रतीत होती हैं । शब्दार्य रत्न को समाप्ति कुछ इस प्रकार होती है-'इतिश्री कालिदास विरचित नानाथं शब्द रत्न...निबन्धनम् समाप्तम् ।' इस रचना पर किये गये निचुल के "तरल" शीर्षक भाष्य में अध्यायों की समाप्ति इस प्रकार होती है-इति श्रीमन्महाराजभोजराजप्रबोधितनिचुलकवियोगिना निमित्तायां महाकविकालिदासकृतनानार्थ शब्द- ...दीपिफायाम् तरलाख्यायाम् ...निबन्धनम् ।" इस तथ्य के आधार पर हम कह सकते हैं कि भोजराज और निचुल समकालीन रहे होंगे । मेघदूत के तेरहवें श्लोक तथा उस पर मलिनाथको टीका के अनुसार कालिदास और निचुल मित्र थे । उससे यह सिद्ध होता है कि भोजराज और मेघदूत के रचयिता कालिदास समकालीन थे। संक्षेप में इस प्रस्तुत रचना पर थोड़ी सी बातें और कहने के पश्चात् इस भूमिका को समाप्त कर दिया जायेगा । इस काव्य का पुननिर्माण, लेखक ने विद्यालंकार कालेज के प्रिंसिपल अपने पूज्य गुरु स्वर्गीय श्री आर० धर्मालोक महास्थविर के अनुरोध पर किया है जिनका ख्याल था कि यह ग्रन्य संस्कृत साहित्य के विद्यार्थियों के लिये इतना ही उपादेय होगा जितना रघुवंश' अथवा भारतवर्ष की अन्य महान् काव्य कृतियां हैं। उन्ही दिनों उन्हें कन्डी के मुखिया यतिनुबर के रतैमहामा गिरगाम दिव्यावदान निलमे का एक पत्र मिला जिसमें उनसे कृति को सम्पूर्ण करने का अनुरोध किया गया था और मन्तव्य प्रकट किया गया था कि इस कृति से संस्कृत साहित्य के विद्यार्थियों का ही भला द्वितीय द्वारा, रत्न..

धर्माराम स्थविर की भूमिका नहीं होगा, वरन् उससे प्राचीन काल में सिंहल द्वीप में फैली हुई प्राचीन विद्या-सम्पदा का भी परिचय प्राप्त होगा । इस अनुरोध के फल-स्वरूप उन्होंने श्लोकों के पुननिर्माण और सिंहली में किये गये उसके भाष्य को पुनः संशोधित किया। जनता के सामने इस कृति का वही रूप प्रस्तुत किया जा इस पुस्तक की रचना में जिन सन्न ग्रन्थों को महायता ली गई है उनमें कृति का कथानक अपूर्ण है। पन्द्रहवें सर्ग के २२वें श्लोक और कृति के अन्तिम पद के बीच का स्थान रिक्त है। परन्तु यहां हमारा लक्ष्य सिंहली सन्न के आधार पर काव्य को पूर्ण करना था। इसलिये जहाँ जहाँ सन्न ग्रन्थो से उपलब्ध सामग्री रचना को पूर्ण करने के लिये पर्याप्त नहीं थी वहां वहां लेखक ने उन अक्षरों और शब्दों का सहारा लिया है जो शब्द अनुकूल प्रतीत हुये। ऐसे सारे स्थल कोष्ठकों में बन्द कर दिये गये हैं। इस पुस्तक का लेखक और पाठक श्रीयुत सी० यच० डी० सूजा (जस्टिस आफ़ पीस) के प्रति आभारी है जिन्हें जव इस रचना के इतिहास और उपयोगिता की बात मालूम हुई तो उन्होंने अपने स्वामाविक विद्यानुरागवश उसके प्रकाशन का समस्त व्यय सहर्ष वहन किया। लेखक प्रोफेसर पोटरसन तथा माऊदाजी का भी आमारी है जिनकी रचनाओं से उसने ऊपर उद्धरण दिये हैं। इस अन्य का लेखक इस बात का मो सहर्ष उल्लेख करना चाहता है कि इसकी रचना मे वह बौद पुस्तकालय और गवनमण्ट ओरियण्टल पुस्तकालय कोलम्बो में संकलित कुछ दुष्प्राप्य एवं महत्वपूर्ण ग्रन्यों का भी अवलोकन करने का सुयोग प्राप्त कर सका है। अन्त में लेखक अपने शिष्य श्री डी० बी० जयतिलक (हेड मास्टर बौद्ध हाई स्कूल, कैन्डी) के प्रति भी आभार प्रकट करता है जिन्होंने इस भूमिका को प्रति तैयार की। --के० डी० .

...निबन्धनम् समाप्तम्।' इस रचना प्रकार होती है-'इतिश्री कालिदास विरचित नानार्थ शब्द रत्न... पर किये गये निचुल के "तरल" शीर्षक भाष्य में अध्यायों की समाप्ति इस प्रकार होती है-इति श्रीमन्महाराजभोजराजप्रबोधितनिचुलकवियोगिना निमितायां महाकविकालिदासकृतनानार्थ शब्द- रत्न...दीपिकायाम् तरलाख्यायाम्...निबन्धनम् ।" इस तथ्य के आधार पर हम यह सकते हैं कि भोजराज और निचुल समकालीन रहे होंगे । मेघदूत के तेरहवें श्लोक तया उस पर मलिन्नाथकी टीका के अनुसार कालिदास और निचुल मित्र थे। उससे यह सिद्ध होता है कि मोजराज और मेघदूत के रचयिता कालिदास समकालीन थे । संक्षेप में इस प्रस्तुत रचना पर थोडी सी बातें और कहने के पश्चात् इस भूमिका को समाप्त कर दिया जायेगा। इस काव्य का पुननिर्माण, लेखक ने विद्यालकार कालेज के प्रिंसिपल अपने पूजा गुरु स्वर्गीय थी आर० धर्मालोक महास्थविर के अनुरोध पर किया है जिनका ख्याल था कि यह अन्य संस्कृत साहित्य के विद्यार्थियों के लिये इतना ही उपादेय होगा जितना रघुवंश' अथवा भारतवर्ष की अन्य महान् काव्य वृतियां हैं। उन्ही दिनों उन्हें कैन्डी के मुखिया यतिनुवर के रतेमहामाय गिरगाम दिव्यावदान निलमे का एक पत्र मिला जिसमे उनसे कृति को सम्पूर्ण करने का अनुरोध किया गया था और मन्तव्य प्रकट किया गया था कि इस कृति से संस्कृत साहित्य के विद्यार्थियों काही भला चानकोहरणम् कुछ विद्वान् इस मत पर अड़े हैं कि महाकवि कालिदास (भारत के शेक्सपियर) १९४६ वर्ष पूर्व उज्जयनी के सम्राट विक्रमादित्य के दरवार में हुये थे। प्रोफेसर तारानाथ तर्कवाचस्पति के प्रसिद्ध कोश 'वाचस्पत्यम्' में 'ज्योतिषिदाभरण' के कुछ श्लोक उद्धृत किये गये हैं जिसके अनुसार कालिदास ने रघुवंश, कुमारसंभव तथा अन्य कविताओं के रचने के पश्चात् कलियुग वर्ष ३०६८ में अर्थात् १९२२ वर्ष पूर्व इस ज्योतिप-ग्रन्थ की रचना भी की थी । साधारणतः इतने निश्चित कपन से मान लेना चाहिये कि समस्या का समाधान हो गया, किन्तु फिर उसी पुस्तक में ऐसी बातें भी लिखी हुई हैं जिनसे विश्वसनीयता को आघात भी पहुंचता है। श्री भाजदाजी ने रायल एशियाटिक सोसायटी की पत्रिका में प्रकाशित 'दि संस्कृत पोयट कालिदास' में इस बात का विस्तार से उल्लेख किया है, और दिखलाया है कि ज्योतियिदाभरण में शक वर्ष से ४४५ घटा देने और फिर उसे ६० से विमाजित कर देने की अयनांश निकालने की प्रणाली उपर्युक्त सिद्धान्त का पूरा-पूरा खण्डन करती है। यह प्रश्न विवादास्पद है कि श्री माऊदाजी को इस बात को सिद्ध करने में सफलता मिली कि नहीं कि 'कालिदास और मातृगुप्त एक ही व्यक्ति थे और वह कारमीर के प्रशासक थे। हां, इतना अवश्य है कि उन्होंने इस बात को बलपूर्वक कहने का प्रयत्न किया है कि ६वी शताब्दी के पूर्व न तो विक्रमादित्य, जिनकी सभा में नवरत्न थे, हुये थे और न कालिदास हो । टीकाकार रामदास के अनुसार 'सेतु-प्रबन्ध' की रचना कालिदारा ने विक्रमादित्य नामक एक सम्राट् के अनुरोध पर की तथा जैसा कि कुछ अन्य तथ्यों के आधार पर कहा गया है उसकी रचना हुई थी प्रवरसेन नामक एक दूसरे सम्राट् के लिये । कहा जाता है कि सम्राट् प्रवरमेन विक्रमादित्य (श्रीहर्ष) के समकालीन और काश्मीर के नृपति थे और वृद्धावस्था में चीनी यात्री हुयेन त्सांग के भी समकालीन थे। इसीलिये प्रोफेसर वेवर ने उन्हे ५०० तथा ६०० ई० के मध्य में ठहराया है और इस प्रकार उन्हें कुछ काल के लिये कुमारदास का भी समकालीन बतलाया है। विचित्र बात है कि कुमारदास के समकालीन एक भोजराज मी थे। धर्मकीति महास्थविर द्वितीय द्वारा, लंका में रचित 'हिस्ट्री आव बुद्धिज्म' में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख किया मिलता है। और यह भी अच्छी तरह ज्ञात है कि एक कालिदास मोजराज के दरवार की शोभा थे। 'मेघदूत' और 'शब्दार्यरत्न' उन्हीं की रचनायें प्रतीत होती है । शब्दार्य रत्न की समाप्ति कुछ इन - जानकीहरणम् . के सन में (टीका) उद्धृत नहीं किया गया है और यदि इस सम्बन्ध में अभी कोई दूसरा लेराक सामने नहीं आता तो कहा जा सकता है कि यह कुमारदास पी ही किसी सोई हुई रचना का कोई अंश होगा। उज्ज्वलदत्त, जिमने एक दूसरे स्थल पर कुमारदास की चर्चा करते हुये इस कविता का उल्लेख किया है, यहाँ पर यम इतना ही कहता है... "सम्युविहस्वत्वे यरतन सम्प्रवदन्ति कुक्कुटाः इति वृत्तिः।" फिर गंगादास को 'छन्दोमंजरी' इस छन्द को भारवि का बताती है । इन तथ्यों पर विचार करते हुये, क्षेमेन्द्र के कथन को श्रमपूर्ण न कहने का अवसर नहीं रह जाता। दूसरे और तीसरे श्लोक 'शापर पद्धति' तथा चौया 'सुभाषितावली' में आते हैं । उज्ज्वल दत्त ने 'उणादि सूत्र' में साकटायन के सूत्र 'कृधौमदुइम्पः कित्' का उदाहरण देते हुये ग्यारहवें सर्ग पो इकहत्तरखें श्लोक की प्रथम पक्ति को इस प्रकार उद्धृत किया है-'महिषपूसरितः सरितस्तर इति जानकीहरणे पमपम् ।' केदार भट्ट ने 'यत्तिरत्नाकर', के पुराने सिंहली रूपान्वय में पहले सर्ग के दूसरे श्लोक को पहली दोपक्तियाँ उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत की हैं। प्रोफेसर पीटरसन के अनुसार राजशेखर की कृति के रूप में मान्य निम्नलिखित श्लोक जल्हण को 'सूक्ति मुक्तावली में प्राप्त है। "जानकीहरणं यातुं रघुवंशे स्थिते सति, कविः युमारदासश्च रावणश्च यदि क्षमः । इस दुहरे अर्थवाले सूत्रात्मक पद से प्रतीत होता है यिा 'जानफोहरण' की रचना 'रघुवंश की रचना के बाद हुई होगी और उसकी ख्याति भी कालिदास की प्रख्यात रचना से कम नही रही होगी। यद्यपि उपर्युक्त तथ्यों के आधार पर अब स्पष्ट हो गया होगा कि 'जानकोहरण' यहाँ के और भारत के प्रायः सभी पुराने पडितों में काफ़ी लोकप्रिय रहा होगा किन्तु दुर्भाग्यवश उसके श्लोकों का मूल रूप आज उपलब्ध नहीं है। गवर्मेण्ट ओरियण्टल लाइब्रेरी द्वारा नियोजित प्राचीन पाण्डुलिपियों के अन्वेषण में केवल उसका सिंहली सन्न अन्य उपलब्ध हुआ था। कोई ऐसाआधार भी सामने नहीं है जिसके बल पर अनुमान किया जा सकता कि इस काव्य का मूल-रूप भारतवर्ष में अब भी कही है। सिंहलीय सन्न द्वारा प्रदत्त सामग्री के आधार पर पुननिर्मित इस कृति के बारे में पाठकों की दृष्टि मे स्थिति अब तक स्पष्ट हो गयी होगी। किन्तु विषय के इस पक्ष पर विचार करने के पहले हम एक ऐसी घटना की ओर आपका ध्यान ले जाना चाहते हैं जो स्वयं में बहुत रोचक' इसलिये है कि उससे सम्राट कुमारदास के जीवन पर प्रकाश तो पड़ता ही है, उसके चारों ओर रहस्य का जोभारी आवरण है उसके बारे मे भी हमे बहुत कुछ ज्ञातहो जाता है। पिछले पृष्ठों पर इन बातों की ओर संकेत किया जा चुका है कि कुमारदास और कवि कालिदास में मैत्री थी और कुमारदास ने कवि कालिदास के लिये अपने जीवन को आहुति दे दी थी। इस छोटी सी भूमिका में यह सम्भव नहीं कि इस दुखद घटना का विस्तार पूर्वक वर्णन किया जाय । हाँ, छोटी-मोटी बातें उन जिज्ञासु पाठको के लिए बतलामी जा सकती हैं जो अभी तक इस द्वीप की प्राचीन परम्परागत कथाओं से अनभिज्ञ हैं। संक्षेप में कहानी इस प्रकार है- सम्राट एक ऐसी स्त्री के घर जाया करते थे जिस पर वे आसक्त थे। एक दिन उन्होंने उसके घर की दी पर निम्नलिखित पंक्ति लिख दी- 'पद्मं पद्येनोद्भूतम् भूयते न च वृश्यते ।'

धर्माराम स्थविर की भूमिका ३०७ (यह सुना गया है किन्तु देसा नहीं गया है कि एक कमल से दूसरा (नया कमल) उत्पन्न होता हो।) और, इन पंक्तियों के नीचे उन्होंने इस बात के लिए सूचना मी लिख दी थी कि जो कोई मो इन पंक्तियों को पूरा करेगा उसे पुरस्कार दिया जायगा । संयोगवन कालिदास, जो उन दिनों उस सम्राट् कवि से मिलने आए हुए थे और जिनकी रचनाओं को मारत में उन्होंने देखा था, उसी स्त्री के घर में सन्ध्या के समय टिक गए हैं और दीवार पर उन पंक्तियों को अकस्मात् देखकर उसकी पूर्ति इस प्रकार की- 'याले तर मुखाम्भोजात् त्वन्धीवरद्वयम् ॥' (हे युवतो, तुम्हारे मुख कमल में तुम्हारी ही नीली आंखों के दो इन्दीवर खिले हुए हैं ) । और, हुआ यह कि जिस स्त्री के लिए प्रेशंसा रूप में ये पंक्तियां लिखी गई यी उसने पुरस्कार पाने की आशा में कालिदास को उस रात्रि मार डाला और उनका शव छिपा दिया । दूसरे दिन प्रातःकाल जब सम्राट् उसके यहाँ गये तो उसने उन दो पंक्तियों की पूर्ति को अपनी बनाई कृति कह कर पुरस्कार मांगा। किन्तु कुमारदास को उन पंक्तियों के पीछे कोई सच्चा महाकवि दिखलाई दिया। इसलिए उसने उस स्त्री पर विश्वास नहीं किया, और उसने उससे असली रचनाकार को बतलाने के लिये विवश किया। धमकी देने पर उस हत्या करने वाली स्त्री ने अपने जुर्म को स्वीकार कर लिया । और जव कालिदास का शव सामने लाया गया तब सम्राट् के दुख और शोध को कोई सीमा न रही। उसने उस प्रख्यात कवि की समुचित अन्त्येष्टि को आज्ञा दी और जब चिता दहकायो गई तब वह उदारचरित सम्राट दुख से आक्रान्त हो उछल कर अग्नि में कूद पड़ा और ज्वाला ने अपने कविबन्धु के साथ उन्हें तुरन्त भस्म कर डाला । उसके बाद सम्राट की पांच रानियां भी तुरन्त जल मरी। सिंहल द्वीप में प्रचलित रीति के अनुसार उन सबके सात स्मारक बनवाये गये और दाह- स्थलों पर सात वट वृक्ष लगा दिये गये। कहा जाता है कि उन दिनों सम्नाट कुमारदास मातर मे रहा करते थे और यह दुखद घटना भी वहीं घटी थी। नगर की सीमा के भीतर ही एक ऐसा स्थान है जिसे सात बो-वृक्षों की बाटिका हठोदिवट्ट कहते हैं । परम्परागत किम्बदन्ती के अनुसार ये दुखद घटनायें वही घटी थी।' इस कहानी में सच्चाई का अंश कहां तक है इसे स्वयं पाठक समझें । हमारा विचार तो यह है कि यह विलकुल निराधार कदापि नहीं हो सकती। इन पंक्तियों के पाठक अपना निष्कर्ष जो चाहे निकालें, हम केवल यह कहते हैं कि कुमारदास के समय में कालिदास नामक एक कवि भी जीवित थे। और जैसा कि ज्ञात है कि कालिदास नामक कवि एक से अधिक हुए हैं यहां यह कहना कठिन है कि उस समय का कालिदास कौन था? स्वयं कालिदास के जीवन और तिथि के सम्बन्ध में लिखने वाले विद्वानों में इस विपय पर भारी मतभेद है और कालिदास के नाम से सम्बद्ध विक्रमा- दित्य तथा भोज आदि नामों के व्यक्ति भी इतने अधिक हैं कि उनसे गुत्थी सुलझने के बजाय और अधिक उलझ जाती है। १. एक बड़ी मनोरंजक बात यह है कि मंसूर में भी एक वैसी ही कहानी प्रचलित है जिसके अनुसार भोज और कुमारदात को एक ही व्यक्ति समझा गया है और कालिदास वहाँ भी एक वेश्या द्वारा इन्हीं परिस्थितियों में मारे जाते हैं । किन्तु यहां भोज कुमारदास की तरह अपने जीवन की आहुति देने की बात नहीं सोचता। २. कालिदास गणक, शत्रु पराभव के रचयिता। जगन्नाथ मिश्र आधुनिक कालिदास, भामिनी पिलास के रचयिता ।

दि जर्नल प्राव दि रायल एशियाटिक सोसायटी श्राव ग्रेट ब्रिटेन ऐण्ड आयरलैण्ड १९०१, पृष्ठ २५३ लेख-९फुमारदास कृत-जानकीहरण एफ० डबल्यू० टामस इस काव्य को बहुत थोड़े से लोग जानते हैं। इसका इतिहास बड़ा विलक्षण है। इसकी कोई भी हस्त-लिखित प्रति अभी तक नहीं मिली है। भारत में इसके अतिस्त्व के चिह्न केवल इतने हैं कि उसके कुछ श्लोक संस्कृत के दो कविता-संग्रहों में पाये जाते हैं । एक तो शाघर पद्धति और सुभाषितायली में और दूसरे क्षेमेन्द्र के औचित्य विचार चर्चा में । और इस काव्य के प्रेणता का नाम राजशेखर के एक प्रख्यात श्लोक में कालिदास के साथ लिया गया है- जानफोहरणं फत् रघुवंशे स्थिते सति कविः कुमारदासश्च रावणश्च पदि क्षमः । सिंहलीय वाडमय ने इस काव्य के पहिले चौदह सर्ग और पन्द्रह सर्ग के अंश का एक सन्न सुरक्षित रखा है। इसमें इलोकों के प्रत्येक शब्द की टीका दी गई है, जिससे शब्दों को यथा- स्थान बैठा कर एका ग्रंथ का प्रस्तुत करना सम्भव हो सका है। यह मूल मन्य से अधिक मिन्न नहीं हो सकता। इसका निर्माण सर्वप्रथम एक सिंहलीय पण्डित ने जेम्स डी अलविस के लिये किया था, जिन्होंने अपनी पुस्तक, 'सीलोन के संस्कृत, पालि एवं सिहलीय साहित्यिक ग्रन्थों की वर्णनात्मक सूची' मे पृष्ठ १९१-१९२ पर उदाहरणार्थ ऐसे दस श्लोकों को दिया है जो प्रकाश में आये हैं। परन्तु जितने भी बचे हुए हैं, उनके उद्धार के लिये, हम के० धर्माराम स्थविर के आभारी हैं। सन् १८९१ में इस विद्वान् ने सीलोन के लिय गोड में, सन्न संयुक्त मूल ग्रन्थ का अपनी उत्कृष्ट भूमिका सहित, प्रकाशन किया । यह कृति आद्योपान्त सिंहलीय लिपि में है। परन्तु सत् १८९३ मे एक संस्करण कलकत्ते से नागरी लिपि में छपा जिसका सकलन थोड़ी-थोड़ी टिप्पणियों के साथ जयपुर स्टेट के शिक्षा विभाग के संचालक स्वर्गीय पण्डित हरिदास शास्त्री एम. ए. ने किया, जिसे उनके निधन के बाद जयपुर-संस्कृत-कालेज के अध्यक्ष कालिपद वन्दोपाध्याय ने प्रकाशित किया। इसकी (जो स्वतंत्र पुनर्निर्माण का मूल्य नहीं रखता) समीक्षा प्रोफेसर राइज डेविड्स ने १८९४ के इसी जर्नल मे पृष्ठ ७२३-७२४ पर की है। धर्माराम के संस्करण का उल्लेख 'ओरियंटलिस्ट' के जिल्द ४,पृष्ठ ७८ पर है और प्रोफेसर लेनमान ने 'वियना ओरियंटल जर्नल', जिल्द ७, १८९३, पृष्ठ २२६-२३२, पर. इस काव्य की मीमांसा करने में उसका उपयोग किया है। दो बातें कुमारदास के काव्य को विशेष महत्व प्रदान करती हैं। पहिली है स्वदेशीय किम्बदन्ती जिसका गम्भीरता से प्रतिवाद नहीं किया गया है और जिसे गीगर ने अपनी हाल ही में प्रकाशित पुस्तक में, जो उन्होंने सिंहलीय भाषा और माहित्य पर लिखी है, स्वीकार किया है । इसके अनुसार इस काव्य के निर्माता कुमारदासअथवा कुमार घातुरोन ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने सीलोन पर इसवी ५१७ से ५२६ तक राज्य किया था। इस प्रकार यह सीलोन की सर्वप्रथम कृति हुई। दूसरी एक दामस को टिप्पणी किम्बदन्ती चली आई है जो उन्हें कालिदास का मित्र और समकालीन बतलाती है । इसकी विशेष व्याख्या के लिये, के. धर्माराम की भूमिका एवं १८८८ के इस जर्नल के पृष्ठ १४८-१४९ पर राइज डेविड्स के लेख को ओर निर्देश करना पर्याप्त होगा। इन कारणों से और इस कारण से भी कि यह काव्य कठिन शैली में लिया गया है, जो किसी मंस्कृत टीका के न होने के कारण क्लिष्टनर हो गया था, मैंने यह उचित समझा कि इसकी अनेक असामान्यताओं की ओर लोगों का ध्यान आकृष्ट कर। पाठक को इस लेस के साथ एक परिशिष्ट भी मिलेगा जिसमें काव्य में वर्णित विषय का संक्षिप्त परिचय मिलेगा। अनुभव बतलाता है कि ऐसा संक्षिप्त परिचय उन काव्यों को सम्बन्ध मे भी कुछ उपयोगी होता है जो इस काव्य से भी अधिक प्रख्यात हैं। ऐसे काव्य के मूल पर जिसमें जटिल छन्द है और जो एक टीका के टुकड़ों को जोड़ जोड़ कर बनाया गया है, कितना भरोसा किया जा सकता है ? प्रोफेसर लेनमान, जिन्होंने अपने उपयुक्त लेख में इस प्रश्न की समीक्षा की है, इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि "जितनी आशा की जा सकती थी उससे अधिक ये नगण्य पाठान्तर मूल के टीका होने को प्रमाणित करते हैं ।" यह निष्कर्ष जो लिखे हुए सात श्लोकों (१-२९ और ३२, ३-२, ९-१२, ११-१६३-७१ और ९२) पर आधारित है. निविवाद है, हालांकि यह बात कि जोड़-जोड़ कर मूल तैयार करने वाले को इनमें से चार श्लोक पहिले ही से मालूम थे, उलझन डाल देती है। दो प्रकार के पागन्तर हैं । एक जो कि सम्पादक को सन्म में दिये हुए शब्दों को मूल से भिन्न क्रम में लाचारी से करना पड़ा और दूसरा सन्न मे ही पाठान्तर के कारण। पहिले वाला ९-१२ से स्पष्ट है और दूसरे के अनेक उदाहरण हैं जिनमें से मैं केवल एक का यहाँ उल्लेख करूंगा जो इस प्रकार है : शाङ्गघरपद्धति धर्माराम पश्यन् हतो मन्मथ वाणयात: तस्याहतम्मन्मयवाणपातः शक्तो विधातु न निमोल्य चक्षुः। शक्यं विधातुन्न निमील्प चक्षुः । करू विधात्रा हि कृतौ फयंता- ऊरू विधाना नु कृती कर्थता- वित्यास तस्यां सुमतेयितर्कः । वित्यास तस्यां सुमतेवितकः । जैसा कि प्रोफेसर लेनमान ने बताया है कि सन्न में विधाना' के स्थान पर 'धाना' है और एक शब्द 'दृष्टी' है जिसके लिये धर्माराम मूल में कोई स्थान नहीं दे सके। दूसरी कठिनता कर समाधान हरिदास शास्त्री ने उस शब्द को 'तस्याः' के स्थान पर रखकर उसका विश्लेषण 'दर्शने सति' करते हुए कर दिया। अब यह तो निश्चित है कि शाङ्ग घर पद्धति मे जो पाट है उसी से ठीक-ठीक भाव निकलता है अर्थात् जैसा मैंने उसे अलग अलग करके दिया है । "अगर वे देखते तो कामवाण से विद्ध हो जाते : आँख मूंद कर वे बना नहीं सकते थे तो फिर ब्रह्मा ने उसके जपनों को बनाया तो कैसे बनाया, इस प्रकार बुद्धिमान लोग भ्रम में पड़ गये ।" यहां पर साहित्यिक सर्क उचित रीति से किया गया है और उसकी व्याख्या का भाव वैसा ही है जैसा आफरेस्त और लेनमान ने किया है : "किसी भी बुद्धिमान् को भ्रम होना ठीक ही है कि विधाता उसके जघनों को किस प्रकार बना सकते थे : बिना आंख मूंदे वे उन्हे बना नही सकते थे और यदि वे देखते तो वे तुरन्त काम के वाणों से विद्ध हो जाते।" फिर भी मेरी समझ में उपर्युक्त पाठ 'हतो' और 'शक्तों को क्रिया मानने से अवश्य हो श्रेष्ठतर हो जाता है। और अब अर्थ भी अधिक स्पष्ट हो जाता है। 'हतो' के स्थान 'हतम्' अवश्य ही अशुद्ध है। इसके अतिरिक्त चूंकि 'पश्यन्' और 'दृष्टी पाठान्तर हैं, दोनों के बीच बीच मे संदेह हो सकता है और मेरा सुझाव है कि दोनों ही को व्युत्पत्ति मूल 'दृष्टा' से हुई है और ३१२ 'जानकीहरणम् 'तस्मा' 'पश्यन्' की विकृत रूप है। अव रहा 'शक्यम्' और 'शयतो'। फिर इनमें चुनने की स्वतंत्रता है। लेकिन जब हम देखते हैं नपुंसक लिंग, 'हतम् पाठ के लिये उपयुक्त होगा और विना किसी लिंग के 'शक्यम्' का प्रयोग सास तौर से अलंकार ग्रंथों (यामन ५.२.२५) से अनुमोदित है और फिर, जैसा कि हम आगे कहेंगे कुमारदास व्याकरण के असाधारण प्रयोगों के भक्त थे, तो हमको इस विचार की ओर झुकना पड़ता है कि उन्होंने इसी शब्द का प्रयोग किया होगा। 'धाना' और 'विषाया' यो प्रश्न पर, हि' और 'नु' (उह विपात्रा न फयं कृतोतो) को मैं विशेष न कहूँगा, परन्तु फेवल यह निष्कर्ष निकालूंगा कि काव्य के अनेक स्रोतों के कारण साधारण पाठान्तर हुए हैं जिसमें खास-सास पाटान्तर पुनःनिर्माणकर्ता के कारण हुए हैं। प्रोफेसर लेनमान ने भी और अधिक सप्न की हस्त लिखित प्रतियों के प्राप्त करने की आवश्यकता की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। सोमाग्य से हमारे लिये यह सम्भव है कि अन्य श्लोकों की सहायता से, जो सम्पादक को नहीं मालूम थे, हम काव्य के पुनर्निर्माण की जांच को जारी रखें, क्योंकि सुभाषितावली में कई श्लोक ऐसे हैं जो किसी एक कवि कुमारदत्त के कहे गये हैं और ये सब श्लोफ जानकी हरण में मिलते हैं। इन दोनों कवियों का एक ही व्यक्ति कुछ महत्व रखता है, जब तक कुमार दत्त के सम्बन्ध में और कुछ बातें न मालूम हो जाय । अव मैं उन इलोकों को और उसी प्रन्यकर्ता के लिखे हुए एक 'अज्ञात' श्लोक को, उद्धृत करता हूँ : फुमारदत्त जानकीहरण विमलमम्य निपीय नदीशतः में है, विमलयारि, नदीशतं सलिलभारनिरन्तरितोदरः। और, अभिभयान (११-५३) । पलममियानुभवप्नतिपाननं गिरिसटे निपसाद पयोषरः ॥ भुवनदृष्टि निरोधकरं कृतं रविकरानुपरुध्य कृतं मया रविकरानुपमध्य मया तमः। भुवनदृष्टिनिरोधितमस्तडित् विलसितेन निहन्ति मुहुर्मुह- निहन्ति महमुंहु- स्तदिवित्तीव ररास रुपा धनः॥ धन इतीव ररास या धनः । नववियोधमनोहरकेतकी- कुसुमगभगतः सह कान्तया। वैसा ही (११-७३)। अविदितानिलवृष्टिभयागमः सुखमशेत चिराय शिलीमुखः ।। विषमवृष्टि हतोऽपि दवानले समयवृष्टिहतेऽपि दवानले भ्रमरघूतिभृतोऽपि यनावलोः । भ्रमरधूमभूतानवलागलीः । समभिवीक्ष्य पृशानुसमप्रभा समभिवीक्ष्य कृशानुसमप्रमा न मुमुचुर्भयमेव मृगाङ्गनाः॥ मुमवुरेव भयं न मगाङ्गनाः ।। सुभाष, १७५१-५॥ (११-७५)। मणिप्रभेषु प्रतिविम्बशोभया पाठ मृगाङ्क है । निमग्नया बालशशाङ्कलेखया। पिशांकुरो वारिप पश्चितात्मना विविच्छिदे वारिषु पञ्चितात्मना न राजहंसेन पनविचिच्छिदे।। राजहंसेन पुनविशांकुरा ।

टामस की टिप्पणी जानकीहरण कुमारदत्त कस्यापि लीलागतिपत्र निसर्गसिद्धा मत्तो न दन्ती मुषितो न हंसः । इतीव जडघायुगलं तदीयं चक्रे तुला कोट्यपिरोहणानि ॥ सुभाप, १५५९। पाठ है गतरत्र (१-२८)। इन श्लोकों के वे ही लक्षण हैं जैसे कि पहिले वाले का दूसरे, तीसरे, पांचवें और छठे क्रम की भिन्नता है। सिवाय चौथे के और में पाठान्तर है और वे भी समानता के साथ एक मूल पाठ अथवा दूसरे मूल पाठ के पक्ष में नहीं हैं। पहिले श्लोक का जो पुननिर्माण किया गया है वह अधिक सीधा-सादा है और उसकी पुष्टि ११-५८ से होती है जिसमें वह उसी प्रकार आता है और जिसका आरम्म 'विमलवारि निपीतवतो भृश' से होता है। उसी भाव को थोड़े दूसरे शब्दों में दोहराना कुमारदास को शैली की एक विलक्षण और बहुधा पायो जाने वाली विशेषता है। दूसरा उदाहरण पांचवें श्लोक में मिलेगा। यह "विषम' पाठ अधिक ग्राह्य है; परन्तु दूसरी पंक्ति में धर्मा- राम का पाठ निश्चय ही अधिक उपयुक्त है सिवाय इसके कि 'भतो' पाठ होना चाहिये। क्योंकि (१) काले भृङ्गों के सहित लाल लांगली-पुष्प की तुलना अग्नि और धुएं से की गई है (२) 'भ्रमर धूलि असंगत वाक्य है और एक हस्तलिखित प्रति मे 'धूम' है । (३) दूसरे 'अपि' के लिये कोई स्थान नहीं है और (४) सम्पूर्ण भाव ५-७२ में भी आया है- समरोचत लागली समुदितेव कृशानु शिखावली। और ११-८० में- समदयो नु विकाशकृताते- विततवाह्निशिखाफुगुमश्रियः। यहाँ वह्निशिखा लांगली की तुलना विजली से की गयी है। सिंहलीय प्रति के दूसरे श्लोक में दो बार 'धन' का प्रयोग क्षति पूर्ति के हेतु किया गया मालूम पड़ता है और तीसरे मे 'दिशि' मुझे अधिक ग्राह्य है। इस अन्त वाले पाठ में केवल एक ही शंका है कि ११-५१ मे भी 'दिशि' है जिसका अर्थ स्पष्टतया 'आकाश में जान पड़ता है । यही अर्थ इष्ट था। इससे स्पष्ट है कि 'ताम्रविलोचन' (ताम्राक्ष) 'कौवा' में श्लेष है और कौवे ऊपर (दिवि) रहते हैं, चारों ओर (दिशि दिगि) नहीं। लेकिन सम्भवतः कुमारदास ने यह सोचा होगा कि दिपि' के इस अर्थ के लिये १४-४४ में प्रमाण है। इस समीक्षा से यह निष्कर्ष निकलता है कि सिंहलीय पाठ में तथा अन्य कविता संग्रहों मे, दोनों ही में अच्छे और बुरे पाठ हैं। पूर्ण रीति से प्रामाणिक काव्य का पुननिर्माण केवल सन्न के आधार पर कभी सम्भव नहीं हो सकता और हमे अपनी आशाओं को किसी भारतीय हस्तलिखित पोधी के मिलने ही पर केन्द्रित करना पड़ेगा। तब तक एक भी नया श्लोक यदि और प्रकाश में आवेगातो वह एक महत्वपूर्ण ज्ञानवद्धि होगी।

३१४ जानफोहरणम् पान्तरों के प्रश्न को छोड़ने के पहिले मैं उन पद्यांशों की ओर ध्यान आकृष्ट करूंगा जो हरिदास एवं सिंहलीय संस्करण में हैं और जिनके संशोधन की आवश्यकता है : (१) १-४ स्खलितेन्दुसष्ट' ठीक है। धर्माराम पा '०एन्द्र' नहीं । (२) १-८५ 'यामिन' ठीक है। धर्माराम का 'ओ' नहीं। (३) २-१७ निर्माण हरीदास ने सम्भवतः सिंहलीय लिपि में निर्वाण' गलत पढ़ा। (४) २-६९ कथितागमः ठीक है। कठिनागमः। उपयुक्त कारण । (५)२-७५ 'कुक्षिस्थनिःशेषलोक' वर्ण-मात्रा में ठीक नही आता । (६) ५-७ प्रमिज्यमानं शनस्तपस्विभिः कुशस्य मुष्टपानलमन्दिरोदरम् । के स्थान पर- कुशस्य मष्ट्या शनकस्तपस्थिभिः प्रमुग्यमानानलमन्दिरोदरम् ॥ क्योंकि बहुग्रीहि की आवश्यकता है। (७) ५-३८ कुरङ्गमे के स्थान पर धर्माराम का 'तुरङ्गमे' पढना चाहिये और ५-२३ विलोकयहि, "दिव' के स्थान पर। (८) ५-४३ : 'अपणित' छापने की गलती है। होना चाहिये 'अपजितं' । (९) ७-५६ हर्षेः के स्थान पर धर्माराम का 'ह' पढ़िए । (१०) ८-६. सङ्गिनी के स्थान पर 'सङ्गिनी' धर्माराम का पाठ ठीक है । (११) ९-६७-८ विचित्र है। धर्माराम और हरिदास शास्त्री दोनों ही बतलाते हैं कि केकय राजकुमार का नाम 'सुधाजित्' है। लेकिन यह सिंहलीय लिपि के स और य में बहुत-कुछ समानता होने के कारण भ्रान्ति हुई है। (१२) ११-४५ इस प्रकार पढिए- अतनु नाऽतनुना घनदारुभिः स्मरहितं रहितं प्रदिघाणा । रुचिरभा चिरभा' सितवर्मना प्रखचिता खचिता न न दीपिता ॥ "प्रचण्ड काम (अततु) से तिरस्कृत प्रेमी को जला डालने की उत्सुकता से, आकाश की चिता, जिसमें घनरूपी लकड़ी लगी थी, चमचमाती हुई विजली की आग से जलायी गई। (१३) १३-४६-'मृबनहितो' और 'जनित यशसो' के स्थान पर धर्माराम का-तो' और 'सी' पढ़िए । (१४) १४-७८–'मृगलक्षणः' के स्थान पर धर्माराम का-'लक्ष्मणः' पढ़िए (१५).१२-११---'महीनुजस्सुतो' ('मुता' के स्थान पर) ठीक जंचता है। और १३-४० ( ० दम के स्थान पर 'सम्पदः' उपयुक्त है। इस काव्य की विशेषता उसकी व्याकरण एवं शब्दकोश की विलक्षणताओं में है, और जैसा कि भट्टिकाव्य में इस प्रकार की विद्वत्ता दिखलाना एक ध्येय था हम देखते हैं कि न फेवल बड़ी संख्या में ऐसे असाधारण शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनको कोई नहीं जानता या वे टामस की टिप्पणी ३१५ केवल व्याकरण-ग्रंथों और कोशों में पाये जाते हैं बल्कि उनको रचना पद्धति एवं बनावट भी विचित्र है जिसके लिये कवि अपने को अधिकारी समझता था। मैं उनमें से कुछ उदाहरण देता हूं जिनमें यह वात झलकती हैं। ध्याकरण को विशेषताएं (अ) परीक्षभूत आत्मने पद के प्रथम पुरुष एक वचन का प्रयोग करण कारक में कां को रखकर, कर्मवाच्य में करना जो अन्यत्र अज्ञात है, वह निम्न श्लोकों में उदाहृत है : सरारहामुद्दत कष्टकेन प्रीत्येव रम्यं जहसे बनेन । मघावतारव्ययितेन चेतसि क्षणं विवके निक्टन दन्तिना । (५-३६) यवापि प्रपेदे मुगलाञ्छनेन प्रासादियादाय निजं फुरङ्गम् । (१-६८) (और उदाहरण मिलेंगे-१-५५, नेमे; ३-५५, ऊचे और ३,७३, चकम्प) १ (आ) इसी प्रकार एक आसाधारण कर्मवाच्य का प्रयोग है- नृपताविति वेदितापदा मुनिना जोपमभूयत क्षणम् । (४-२७) १ (इ) वैदिक रचना का अनुकरण जो पाणिनि, २, ३-२, काशिका और पतंजलि से अनुमोदित है वह 'सर्वतः' और उभयतः के वाद साथ कर्म का प्रयोग है जैसे- उभयतस्तपोधनम् । (४-६२) हिरण्यरेतःधारणानि सर्वतः । "उत्पातमन' 'अपशकुन के समान' कम असाधारण है। क्रिया का असाधारण रूप हमें नीचे मिलता है- येन येन हरतिस्म तामती तत्तदेव पुनराप योषितः । (८-४५) दूतेन तेन तनयं दुहितुर्दिदृक्षः कालस्य कस्यचिदथेन्द्रसखं ययाचे । (९-६७) सूक्तमेव हृदयेऽभिनिषत्ते । 'हृदय को स्पर्म करता हैं।' (१५-६) (ख) समाः सहस्त्राणि वास्ते समाः (या समानाम्) सहस्रम् । (ग) 'सुबाह्वोः' (५-६१) एक शेष है वास्ते 'मुवाहुमारीचयो' । (घ) नियाओं के निम्नलिखित नये रूप हैं : 'अभिमदद' (४-५) 'उत्पन्न किया।

जानकीहरणम् 'समवीभवद्' (४-१६) 'सम्मान किया गया। 'निरयीयतत्' (४-४९) 'जाने की अनुमति दी। 'समासज्जित' (५-८) . 'लगा हुमा' । 'भदीपपत' (१०-७५) "पिलाया' । 'येय' (१०-५०) 'जाने योग्य' । 'न्यवीयदत' 'सूचित किया' पर व्यवीयिदत (मी असाधारण) इसके लिये उपयुक्त मालूम होता है। (च) 'दोपा' (३-३३ और १०-३) दोपान के करण रूप में हो इसका कोई पूर्व दृष्टान्त नहीं है और 'सुहत्तर' (१०-३९) 'सुहृत्तम' के साथ जुड़ना चाहिये। शब्दकोश सम्बन्धी विशेषतायें यदि उपर्पक्त उदाहरण एक अपण्डित कवि की मनगढन्त नहीं है तो वह उसके दादों के चुनाव से स्पष्ट हो जाता है। संलान सूची (परिशिष्ट) में ऐसे मुख्य-मुख्य शब्द दिये हुए है और इन शब्दों पर जो येवल कोगों और व्याकरणों में पाये जाते हैं सितारों का चिह्न लगा दिया गया है। कुछ को छोड़ कर बाकी विलकुल नये हैं। उन शब्दों के जिन पर सितारा लगा है, के विवेचन से पता चलता कि उनमें अधिकांश पाणिनि एवं उनके भाप्यकारों से लिये गये हैं। स्वभावतः कई रूप जो अन्यत्र भी प्रयुक्त हुए हैं (जैसे "निरस्यत' ७-५५ के बीच मे) उन्हें भी कवि ने पाणिनि से लिया है। उनमें से कुछ जैसे 'आयश्शूलिफता,' 'आसुतोवल, 'इक्षुशाफट' 'कत्तत्रयाः,' 'माशाब्दिक, 'मुष्टिन्यय,' 'पश्यतोहर' 'जम्पती,' 'भिर्देलिमा, 'वितस्तय,' 'सङ्घाट, विचित्र रूप हैं, और यह पूर्णतया स्पष्ट है कि कुमारदास एक अध्यवसायी छात्र था जिसने अपने व्याकरण को असाधारण शब्दों के लिये छान डाला। एक स्थान पर, मुझे विश्वास है कि मैं बता सकता हूँ कि पाणिनि के एक शब्द को कवि ने अपने काव्य में उससे अच्छा बना दिया है। रावण के पास जाना (१०-७६) इन शब्दों में कहा गया है : दम्भाजीविकमुत्तुङ्गजटरमण्डितमस्तकम् । फश्चिन्मस्करिणं सोता वदयिममागतम् ॥ यह शब्द 'आजीविक' अथवा 'आजीयक' 'एक धार्मिक भिक्षुक' जो अभी तक हमें ब्राह्मण-ग्रन्थ वराहमिहिर वृहत-संहिता से मालूम था, हो सकता है कि औचित्य का ध्यान रखते हुए एक बौद्ध कवि के मुख से निकले। परन्तु जव हमें इसका स्मरण आता है कि 'दण्डाजिनिफ' घृणा के साथ एक ढोंगी भिक्षुक के लिये व्यवहत होता है तो कवि ने पाणिनि से प्रयुक्त किये हुए शब्दों में से एक अजीप सुन्दर पुष्प चुन लिया अर्थात् 'आयश्शूलिक'। इसके अतिरिक्त चूंकि दक्षिण की हस्तलिखित पुस्तकों में 'म्ब' और ण्ड की लिपि में प्रायः भेद नहीं होता (जैसे डिण्डिम और "डिम्विम'-'ढोल') इसलिए अधिकतर यही सम्भव है कि इसी शब्द का उपयोग किया गया हो होगा। यह देखते हुए कि काशिका ने दण्डाजिनिक का अनुवाद दाम्भिक निया है मैं इसे स्वीकार करूँगा कि सम्भवत: कुमारदास ने पाणिनि के मूत्र की मोर निर्देश किया है, उसे उद्धृत नहीं किया। दूसरा विचित्र शब्द सङघाट है जो कि निम्न श्लोक में प्रयुक्त हुआ है- ततः प्रतीकसब्याटो वीरो केकयवंशजः । वित्रन्छोकरिणितं अमं रामाममं ययो।

टामस की टिप्पणी - . इस वाक्प 'प्रतीक राजघाट' का अर्थ है, जैसा सिंहलीप सन्न बतलाता है "मंत्रियों के समूह फे सहित' । पाणिनि ३-२-४९ पर पतञ्जलि के वातिक ३ के अनुसार 'सइयाट' समस्त पद के अन्त में सडघात होता है और कशिका कहती है कि तब उसका अर्थ होगा 'वह जो एकत्र करता है, इत्यादि जैसे 'यसबाट 'पोपर्णान् सन्ति' । सम्भव है इन स्थानों पर 'सहयाट' का कोई सम्बन्ध सडपात से न हो परन्तु ऐसा वाक्य जैसे 'यणंसहपाट, वर्णसइप (धर्ण सधोयाय स) से प्रत्यय लगाने से बनता है जैसा कि 'कर्नाट', 'गर्वाट', 'भावाट', थाचाट', इत्यादि जिसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में मैं केम्ब्रिज फिलोलाजिकल सोसायटी के १९०० के उस लेख को ओर इशारा कहेंगा जिसे उसने ' प्रत्यय' पर प्रकाशित किया था। यह रूप 'सइघाट' सम्भवतः उसी अर्थ में 'कुचफलश सडघाट' (११-९५) में आया है। कोग में दो और मजेदार गानों को अभिवृद्धिहुई है; 'ताद' और 'रंग। पहिले वाला जो अब तक अथर्ववेद का सन्दिाघ पाठ माना गया है उसका अर्थ 'कांपना' है जैसा इस श्लोक से ज्ञात होता है- तरतले पिएमारुतमारत- क्षततनु लतायति तावति । विरतिरग्जरस प्रति सम्प्रति स्वमलिसंहतिरक्षति रक्षति ।। (११-८६) यहाँ हमें 'अक्षति' की ओर भी ध्यान देना चाहिये जो क्रिया-विशेषण है और जिसका अर्थ है रक्षा के साथ। 'रंग' त्रिया 'रंगत्तुरंग' (१-५३) में और उसके ब्युत्पत्ति शब्द 'गङ्ग' (१४-२१) में और इस प्रकार धातु पाठ के 'रगति गतो' की पुष्टि होती है। कुमारदास की वाक्यवल्लरी (शब्दकोश) की एक विशेषता है कि उन्हें 'पर्याय', व्यंजना, या उसी बात को घुमा-फिरा कर भिन्न-भिम शब्दों में कहना, बहुत रुचिकर है। सभी काव्यों में यह कौशल मिलता है । परन्त विशेषताओं के सम्बन्ध में तो कुमारदास ने एकदम अति कर दी है; जैसे 'कुलिशायुधगोपक' (११-४६), 'पुरन्दरगोपक' (११-७७) और 'हरिगोपक' (११-८९) ये सारे गन्द 'इन्द्रगोपन' के पर्याय हैं। मौर 'मकराकरपायि' (४-५९)=अगस्त्य, वशिष्ठतजपातितः क्षितिपस्वर्वसतिप्रदो मुनिः ( ४-६३ ) विश्वामित्र, 'बल निषूदन-जाल ( ११-६८ )-इन्द्रजाल,पंकज राग (१४-१९, देखिये 'पंकज-नाम' रघु-५, १८-१९) 'पपराग', 'पक्रनोल' ( ११-९६ )-'इन्द्रनील', 'दत्तवासम' (८-४०)='दन्तच्छद' सितकरफान्त-चन्द्रकान्त (टामस के इस पाठ से छन्दोमंग होता है। हरीदास में 'शोलकर कान्त पाउ है :-अनुवादक) और 'कृष्ण पद्धति' (१३-१४) जैसे 'सितेतरायन' (९-३०) कृष्णपर्मन) और देखिये 'सङ्गतानि परिहत्य कृशानौ' ( ८-५३ )=ब्रह्मचारिणी । काव्य के अन्तिम श्लोक में कविही का नाम मरोड़ कर कुमार परिचारक' रखा गया है। इस प्रकार के वाक्य विस्तार की उपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि वे कमी-कभी, जैसे 'दन्तवासस' और ग्रन्थों से लिये गये है या वे कवियों के सामान्य प्रयोग में आजाते हैं। कुमारदास के अन्य शब्द-प्रयोगों को विलक्षणताओं में हमें 'रामा' के लिये शब्दों का हैर-फेर करके अनेकानेक पर्याय मिलते हैं। और जगह-जगह पर सम्पद' और 'तत' की पुनरावृत्ति, जिसमें अपर उदाहरणार्थ तति संज्ञा के साथ सैकड़ों बार आया है। .

जानकीहरणम् व्याकरण एवं कोश के लिये कुमारदास की शली का विद्वत्तापूर्ण सौन्दर्य उनके काव्य को विशेष महत्ता प्रदान करता है। किसी शब्द अथवा वाक्य-निर्माण के प्रति एक ऐसे सावधान विद्यार्थी के प्रमाण की अवहेलना नहीं की जा सकती। अतः मैं प्रोफेसर लेनमान के इस वचन (पृष्ठ २३२ के सामने) से सहमत नही हूँ कि कवि का मरुन को मरुत के रूपान्तर की भांति प्रयोग करना यह सिद्ध करता है कि इस काव्य का निर्माता महाकवि नहीं है । इसके प्रतिकूल मैं उसी के प्रमाण पर यह स्वीकार करूंगा कि ऐसा शब्द है अथवा व्याकरण के नियम से पुष्ट होता है और वास्तव मे यह शब्द 'बी' और 'आर' तथा अन्य कोशों में मिलता है। १३-१४ में 'हलचर्म' शब्द का, जिसका अर्थ है 'हलाई, प्रयोग किया गया है, जिसमें 'चम' अन्यत्र नहीं मिलता । फिर भी स्पष्टतया यह 'चर' धातु से निकला है । मैं नहीं समझता कि यह शब्द कुमारदास की मनगढन्त है। परन्तु मैं 'कटक' 'पहाड़ का ढलवान' के स्थान पर कटुक का समर्थन नहीं करूंगा (१३-१७)। इसी प्रकार पंक्ति के आरम्भ में खलु' (१३- ३९) और 'इव' ( १०-७२ ) के प्रयोग का समाधान नहीं होता। वामन के 'काव्यालंकारवृत्ति' (५-१-५) के अनुसार यह सर्वथा वर्जित है। मुझे तो ऐसा लगता है कि 'विदित' का अर्थ 'जाना हुआ' नहीं है बल्कि 'जनाया हुआ,' 'बतलाया हुआ' है।' शैली की दृष्टि से जानकीहरण में रघुवंश से अधिक कृत्रिमता है, सम्भवतः किरातार्जुनीय से भी अधिक, परन्तु वह वाद के काव्यों की अत्यधिक कृत्रिमता तक नहीं पहुंचता। यह इतना गूढ़ नही है जैसा वासवदत्ता का गद्य । शब्दों की साधारण क्रीड़ा इस काव्य में पायी जाती है। उदाहरण के लिये 'पराग' पर (१४-३२), 'कुल' पर (१४-४७ 'वृत्त' पर (१-३४)। लेकिन उनकी सूक्ष्म क्रीड़ा उसमें बहुत नहीं है। हमें व्याकरण का उदाहरण १-८९ में मिलेगा- अथ स विषमपादगोपितार्य जगदुपयोगवियुक्तभूरियातुम् । बहुतुहिननिपातदोषदुष्टं गिरिमसुजत्कुकवेरिष प्रबन्धम् ॥ ४५ जिसमें 'पाद' 'धातु' 'तुहिन' (तू हिन) और "निपात' में शब्द-क्रीड़ा है। परन्तु कवि का प्रिय अलंकार, पर्याय को छोड़ कर अनुप्रास है जो कि सारे काव्य में अविच्छिन्न आया है। (देखिए ..पृष्ठ २३१)। इसका अच्छा उदाहरण १४-४४ है- लेनमान..... निनदता नदताडितमेखलं विगलताउगलतावृतसानुना । अमुभूजा मुभुजाऽसुरसंहतिः प्रविदिता विदिता दिशि भूभृता । पर किसी लोक में विस्तृत यमक अथवा एक ही अक्षार को पूरे श्लोक में पुनरावृत्ति नही है। (नोट :-काव्य मा १८वा रार्ग दुर्घर्ष यमों से मरा पड़ा है जैसे 'सर्वतोभनम् १८-३१. निरन्तरानुप्रारा अथवा एकाक्षरानुप्रारा १८-४६, उपदारानमारा-१८-५२, पमापत्ति १८-७१, - टिप्पणी ३१९ इत्यादि। पर जब टामस ने इस लेख को लिखा था तब इस सगं का पता नहीं था। देखिये परिशिष्ट, -'जानकीहरण में प्रयुक्त यमक और शब्द चित्र"-अनुवादक) इस कारण काव्य में ऐसा मपुर प्रवाह है जो छन्द चातुरी एवं सरलता के लिये सम्भवतः संस्कृत में अद्वितीय हैं। इसमे गौड़ शैली के "विफटाक्षरबन्ध' का परित्याग किया गया है जिसका प्रभाव ओन से अधिक माधुर्य और सौकुमार्य का है। जहाँ तक अर्थालंकारों का सम्बन्ध है जैसे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, आक्षेप, अर्थान्तरन्यास इत्यादि उनका थोड़ा ही प्रयोग किया गया है। कुमारदास चारुता एवं विशालता में औरों से आगे बढ जाते हैं। पहिले का एक अच्छा उदाहरण है शिग राम का वर्णन- न स राम इह क्व यात इ- त्यनुयुक्तो वनिताभिरग्रतः। निजहस्तपुटावृताननो विदधेलीकनिलोनमर्भकः ॥ (४-८) पुनश्च--- तारका रजतभङ्गभासुरा लाजका इव विभान्ति तानिताः। दिवपूभिरुदयादुदेप्यतो वर्मनि प्रहपतैः समन्ततः॥ दूसरा गुण विष्णु के वर्णन में अच्छी तरह चित्रित होता है- निजदेहभराकान्तनागनिश्वासरंहसा । गतागतपपोराशिपातालतलमास्थितम् ॥ (२-२) .. और सूर्यास्त के सुन्दर वर्णन में- सतिगृहप करसन्तति क्वचि-- प्रिस्थितोऽपि रविरेप रागवान् । अस्तमस्तकमधिधितः क्षणं पश्यतीव भुवनं समुत्सुकः ॥ (८-५६) और सम्पूर्ण १४वा सर्ग जिसमें राम के सेतुबन्धन का वर्णन है, जैसे.१४-३४, जिसमें क्षुब्ध सागर की उपमा कमल से दी गई है-- प्रचलतुगतरंगदलान्तर- स्फुरितविदुमकेसरिसम्पदि । भभितसिन्धुसरोहि कणिका- पपुरुवाह पतन् कनकावला ।। (१४-३४) जानकीहरणम् यह मानना पड़ेगा विशालता की यह कल्पना-शक्ति कहीं कहीं हास्यास्पद हो गयी है, जैसे वह वर्णन जहां कहा गया है कि बन्दर लोग अपने हाथों पर पर्वतों को उठाये हुए थे और पृथ्वी उनके पदचाप से ऊपर-नीचे उठती-वैठती थी: रवितुरंगखुराहतमस्तकं ध्वनिकृतः परिगृहय यनौकसः । पदभरेण ययुस्तटमम्बुपे- विनमितोन्नमितक्षितिमण्डलम् ॥ (१४-२२) इन सव वातों को देखते हुए कुमारदास एक उत्कृष्ट कवि है और शिक्षण कार्य के लिये बहुत ही उपयुक्त हैं। जिन ग्रन्थों से उनका परिचय था, उनमें पतंजलि का महामाप्य, जैसा कि हमने पाया है, अवश्य है। काशिका जानते थे, यह सन्दिाघ है । उन्होंने क्रिया, सत्यापय-का प्रयोग उसी अर्थ में किया है जैसा केवल उसने (काशिका ने) किया है और 'उपत्रिम वितस्तय-मर्माविध जो पाणिनि के नियमों में नहीं है और न पतंजलि ने उसका उल्लेख किया है, पर वे काशिका में हैं। इसके विपरीत वे 'असुतोवल' का अर्थ (पुजारी) ऐसा देते हैं जो काशिका के 'शौण्डिक' से भिन्न है। इसका ध्यान रखते हुए कि भूतकाल का अचकमत' (८-९८) भी इसी ग्रन्थ से (देखिये पाणिनि ३, १, ४८ और ७, ४-९३) लिया गया है तो मैं तो इसी ओर झुकता हूँ कि उनका काशिका से परिचय था। वामन की 'काव्यालंकार वृत्ति में, चाहे वामन, और काशिका के प्रणेता एक ही व्यक्ति रहे हों, कुमारदास का नाम से प्रयोग नहीं हुआ और हम यह नही मान सकते कि 'खल' को भारम्भ में प्रयोग करने का निषेध, उनके विरुद्ध पड़ता है। परन्तु इस श्लोक मे जिसका उल्लेख, २, १, १३ में किया गया है कुमारदास की शैली के इतने चिन्ह मिलते हैं कि उसके कर्ता के सम्बन्ध में कोई सन्देह नहीं रह जाता। वह इस प्रकार है : 4 सपदि पंक्तिविहंगमनामभ- तनयसंवलितं बलशालिना। विपुलपर्वतवर्षशितैः शरैः प्लवगसैन्यमुलकजिताजितम् ॥ यहां पर प्रयुक्त पंक्ति='दस' और 'प्लयग'-वानर और 'पवितविहगमनामभृत्' में पर्याय-दशरथ और 'उलूकाजित' =इन्द्रजित, एवं अनुप्रास छन्द का प्रवाह और इलोक का विषय, निश्चित रूप से कहते हैं कि यह एक सर्वप्रथम इलोक मिला है जो कुमारदास यो काव्य के लुप्त अंशों में का है। दुर्भाग्य से 'वामन' की वृत्ति का निर्माण काल निश्चित नहीं है और यदि हम 'इत्सिग के कथन (तकाकुसु का अनुवाद, पृष्ठ १७६) को स्वीकार करते हैं तो कालिका का समय सातवी शताब्दी होगा और यदि यह सिद्ध हो गया कि कुमारदास उससे परिचित थे वो फिर कुमारदास ही के समय का फिर से विवेचन करना पड़ेगा । एक विदेशीय पर्यटक के प्रमाण का जो इत्सिग के समान (अनुवादक, पृष्ठ १७८) यह कहता है कि पतंजलि ने काशिका पर-जो स्पष्टतः याद की है--एक माप्य (महाभाष्य) लिखा है, अवश्य सन्देह से देखना चाहिये।

सामस की टिप्पणी कुमारदास ने रामायण और रघुवंश का उपयोग किया है। पहिले का तो उन्होंने पग- पग पर कथा में आद्योपान्त अनुसरण किया है और दूसरे का स्थान-स्थान पर जैसे; १०वें सर्ग में राम के बनवास-वर्णन में जहां कालिदास ने संक्षेप में कहा है, उन्होंने रामायण में प्रयुक्त थोड़े से असाधारण शब्दों का भी उपयोग किया है जैसे 'तनुच्छद ११-१७%-पंस। वे रघुवंश से परिचित थे। इसमें जो सर्ग १० से हमारे काव्य के उसी विषय के माग का मिलान करेगा उसे इस बात में सन्देह नहीं हो सकता परन्तु यह तो और भी बातों से निश्चित रूप से सिद्ध किया जा सकता है। केवल ऐसे असाधारण शब्द ही जैसे 'अवर्ण', 'लज्जा' और 'अजय', 'मंत्री' दोनों में समान रूप से व्यवहुत नहीं हुए हैं बल्कि निम्नलिखित वाक्यों का दोनों ही काव्यों में समान रूप से व्यवहार किया गया है। 'पुरुषाकृति' (रघु० ११-६३; जानकी ९-२६) परशुराम की आकृति का । पलितछाना.. ......जरा (रघु० १२-२; जानकी १०-३) दशरथ की वृद्धावस्था के सम्बन्ध में; 'वृषस्पन्ती' (रघु० १२-३४ जानकी १०-७२) शूर्पणखा का। अतः मैं, परम्परागत किम्बदन्ती की सत्यता को, जो इन दोनों को मिलाती है, प्रमाणित करने में समय नष्ट न करूंगा। कुमारदास ने कामन्दकि नीतिसार का भी अध्ययन किया था, इससे मैं निर्विवाद रूप से सिद्ध नहीं कर सकता। परन्तु १०वें सर्ग में दशरथ का राम को उपदेश उस ग्रंथ के ११वें अध्याय से थोड़ा सा मिलता-जुलता है। तो फिर १०-२६ का 'सामोशनस' कहाँ से आया? इस काव्य के कुछ शब्द शिशुपाल बघ से मिली जुलते हैं, जैसे 'अग' वृक्ष, 'अधिनानु' घुटने के निकट । इस काव्य में जो साकेतिक शब्द आये उनमें से मैं इनका उल्लेस करूंगा 'फटाह (१-१७). 'काञ्ची' (१-१८), यवन (१-१९), 'तुरुष्क' (१-१०) । उद्यान का विहार के साथ प्रयोग (३-२३ में) इलेपात्मक किया गया है- कि कौतुकेन धमकारिणा ते सूज त्वमुद्यानविहाररागम् । बाले ! त्वमस्यो पवस्य लक्ष्मी- रित्येवमूचे ललना सखीभिः ॥ और ५-५५ मे बौद्धों की और इस प्रकार स्पष्ट निर्देश है- स्थित्वा गुणे महति तत्क्षणलापमोक्षा: मुश्लिष्टमुक्तिसफलाननसम्पदस्ते । शाक्या इवास्य विशिखा रिपुसनिकम्म- श्चस्त्रिविष्टपसभागमनोपदेशम् ॥ यवनों और तुरुष्कों के जो सांकेतिक उल्लेख हैं उनकी नन्दरगिकर के रघुवंश के संस्करण की मूमिका में मीमांसा हो चुकी है, जिसके निष्कर्ष से सहमत होना मेरे लिये असम्भव है।

३२२
जानकीहरणम्
सांख्य दर्शन से निम्न श्लोक में श्लेप के लिये मसाला मिलता है--
असंख्य गृहपा अपि तत्र सैनिकाः
पिशाच रक्षस्ततिभिनिरन्तरम् ।
कृतान्धकारं रथचकरेणुभि-
जंगुर्जगत्सत्त्वरजस्तमोभयम् ॥
और १-२८ में 'तुला' (कोटि) अर्थात् तराजू, परीक्षा का उल्लेख है।

बुलेटिन भाव दि स्कूल आव ओरियन्टल स्टडीज लण्डन इनस्टीट्यूशन, जिल्द ४, पृष्ठ २८५ जानकोहरण, १६वां सर्ग एल० डी० बानेंट स्कूल आव ओरियंटल स्टडीज ने हाल ही में एक हस्त लिखित प्रति प्राप्त की है जिसमें जानकोहरण के सम्पूर्ण वीसों सर्ग हैं और उससे मैं निम्नलिखित सर्ग प्रकाशित कर रहा हूँ। चूंकि अब तक केवल १-१५ सर्ग हो सम्पादित हुए हैं, सम्भव है मेरा इसे प्रकाशित करना कुछ रुचि कर हो, यद्यपि अन्य हस्तलिखित प्रतियों के अभाव में एक विवेचनात्मक, निश्चित मूल को ढूंढ़ निकालना असम्भव है। यह हस्तलिखित प्रति मलयाली अक्षरों में १४ इंच लम्बे और १॥ इंच चौड़े ताल पत्रों पर लिखी है। हो सकता है कि यह सोलहवी शताब्दी को हो या सम्मवतः उससे भी पूर्व की हो। पुष्पिका (कोलोफन) में कोई तिथि नहीं है । लेकिन (प्रति के) स्वामी का नाम गर्तवन् शंकर दिया गया है। इस हस्तलिखित प्रति में थोड़ी सी गलतियां भी पाई जाती हैं और कही-कहीं कुछ छूट भी गया है। कुछ तो प्रतिलिपकार की मूल के कारण और कुछ दोषयुक्त मूललिपि के कारण । प्रतिलिपकार की गलतियों से पता चलता है कि मूल प्रति जिससे उसने प्रतिलिप बनायी है या कम मे कम उससे पूर्व की प्रतियाँ सिंहलीय अक्षर में थी । यही वर्तनी दक्षिणी हस्तलिखित प्रतियो में बहुत पायी जाती है। और क में प्रायः भ्रान्ति होती है । अन्तिम 'म' बाद में लगने वाले तालम्य और दन्ति व्यंजन- समूहों मे जुड़ जाता है-र के बाद अक्मर व्यंजन द्विगुणित हो जाते हैं, और अन्तिम स एक प्रार- म्भिक मूर्घन्य अक्षर में मिल जाता है और अक्सर वह प्रारम्भिक मूर्धन्य और व्यंजन के पहिले छोड़ दिया जाता है (व्हिटने ,१७३ अ)। मैंने अपने मूल में इन सबविलपक्षणताओं को, सिवाय अन्तवाली के, ज्यों-का-स्यों रहने दिया है। वे एक दूसरे के जितने विरोधी हों, श्लोकों का विभाजन 'अ' द्वारा किया गया है। मैंने उसके स्थान पर दोहरे दंड (1) से किया है, और श्लोक के बीच में केवल एक दंड से। सोलहवें सर्ग के छन्द है पुष्पिताग्रा (१-७८), मन्दाक्रान्ता (७९,८१,८३) और शार्दूल- विक्रोडित (८२)। मर्ग के विषय हैं, सूर्यास्त वर्णन, राक्षसों का नंग-विहार और युद्ध के दिवस का प्रभात ॥ (इसके बाद पूरा-का-पूरा १६वा सर्ग दिया है : अनुवादक) अनुवादक को टिप्पणी बुलेटिन आप दी स्कूल आव ओरियन्टल स्टडीज, मह ४, पृष्ठ २८५ पर एल. डी. पार्नेट का जो लेस है उसमें उन्होंने बताया है कि उपर्युक्त स्कूल को जानकीहरण की ३२४; जानकोहरणम् एक सम्पूर्ण प्रति १-२० सर्ग) मिली है। यह हस्तलिखित प्रति तालपत्र पर मलयालम लिपि में लिखी है। उस प्रति से बानेंट ने जानकीहरण के सोलहवें सर्ग को अपने लेख मे रोमन लिपि में पूरा उद्धृत किया है। मालयालम वाली प्रति में १६वें सर्ग में ८३ श्लोक हैं । जिस मद्रास वाली प्रति से मैंने भाषानुवाद किया है उसके १६वें सर्ग में केवल ७४ श्लोक हैं अर्थात् मलयालम वाली प्रति के साढ़े नौ श्लोक इसमें नहीं है। वे साढ़े नौ श्लोक नीचे दिये जाते हैं। श्लोकों की क्रम संख्या मैंने वही दी है जो मलयालम वाली प्रति में है। गगन सरसि चन्द्र रूप्य कुम्भे निकर श्वाति घनस्तमः प्रहाराः ॥२१॥ (यह अश्लोक है)। अपरमणिमसो व्यवण्डयत्ते स्पृशति शनरुपचुम्बितो न दोषम् । अमहदपि कृतम्प्रपद्यकर्तु- द्विगुणतरं विदधाति यस्स साधुः ॥४४॥ विरचित पटु चार रम्यभावं प्रमद रसं रति भूल मादरेण । मधुनिहित सरोज मंगनास्व- मुख चयकर्दयितानिपाययन्ते ॥५७॥ चपकमयुनि विम्बितम्प्रियाया नपनमवेक्ष्य सरोजशंकयालिः । अधिम निपयात गन्धलोभा- विषयसुखप्रवणे कथं विवेकः ॥५९॥ दशभिरभिमुखस्सुगन्धि हृद्यम् मधुवदन रुपनीत मंगनाना। बहुवदन फलग्निपीय लेभे सुररिपुरेत रहो दुरापमन्यः ॥६३॥ फर किसलय घुननम्मखान्ताः फलमणितातयनाथं मौलितानि । भवरिल कलसोत्कृतं यथूनों प्रणयिप मन्मयदीपनान्यभूवन् ॥६५॥ अपगतदिन सज्जा समयम्पदनिष्टमस्तयंम् । परवयं असमापिराग रतिपहि सतदभूद् गुणो न दोषाः ॥६६॥ पद

बानॅट की टिप्पणी
३२५
उपरि विहरणे विलासिनीनां
कुचकलशोद गलितानिवाघवारि ।
मनसिजमभिषिञ्चति स्म यूनां
पृयुल भुजान्तर पीठ सन्निविष्टम् ॥६॥
यवनमिदमरोजकुड्डमा
सुतन विलोकयतादिति स्वमड्डम् ।
सरमसमधिरोपिता तदोप्ळं
स्वन्तदिति बुवतो चुनाव हृष्टा ॥६॥
तपणि तव भवाभि वल्लभोन्ह-
म्भवपतिरित्युदिते शिरोषनाना ।
नहि नहि पलयं स्वकीयमेका
दयितकरे ग्यपिताक्षराङ्कम् ॥६॥

६ धार्नेट द्वारा उद्धव जानकीहरण का सोलहवाँ सर्ग मलयालम में अनूादित प्रति मलयालम अनूदित मलयालम लिखी प्रति मद्रास में लिसी प्रति प्रति मद्रास में लिखी प्रति श्लोक संख्या लोक संख्या लोक संख्या श्लोक संख्या श्लोक संख्या अनूदित प्रति मद्रास श्लोक संख्य १ ६१ ६२ ३२. ३२ २ ३ २ ३ ४ ३४ ३५ ३६ ६ ३६ ७ ६७ ८ ८ ३८ ३८ ९ ६९ ६० ९ १० ११ १२ १३ ४१ ४२ ७२ ७३ ६४ १५ १८ २० १७ १२ १३ १४ १५ ४५ ४६ ६७ ७५ ७६ ७७ ७८ ४७ ४८ ४७ ४८ ४९ ५० ७१ ८० २० ७१ ७२ ७३ २२ ८२ ८३ ૧૨ २४ २५ २६ २२ २३ ૨૪ २५ २६ ५४ मलयालम की प्रति के श्लोक २१,४४ ५५ ५७, ५९, ६३, ६५, ६६, ६७, ६८, ६९-ये अनूदित प्रति में नहीं है। २८ २८ ५८ ३२८ जानकीहरणम् " " " इलोक ३-अवलथ्य (म) अनुलिप्य से अधिक अच्छा है। ६-अपसरतीति (म) का भाव अपसरतति से अधिक अच्छा है । ७---नमितवपलमस्तफा (म); समुमता (म) समुपगता से अच्छा है । ९-रपिरपचलितो (म) रविरय चलितो मे स्थान पर । १९-दूसरी पंक्ति में जो टूट गया है वह (म) में इस प्रकार है-अतिपटपटलम् विपाटप विश्यगविपर-गं २०-यपत्त (म) नवयंव । १३-हृत: (ग) जितः के स्थान पर । यह जितः की पुनरावृत्ति को जो पहिलो पंक्ति में प्रयुक्त (अजितः) हो चुका है, पपाता है । १२ -अप मनो (म) अप मनो के स्थान पर अधिक सुन्दर है । १२-यो इस प्रकार पड़ना चाहिये : " गगन सरसि चन्द्र रूप्य कुम्भ ध्यपसरितिस्म निपातिते रजन्या । तदुपहित तरंग धूत नीलो- निकर इवाति धनस्तमःप्रवाहः ॥ " 1 " " " २५–अवकुण्ठनेन (म) ०अयकुण्ठनेव से अधिक अच्छा जंचता है। २९-रागः से रागः अच्छा है । ३१–वसन समुदिताङ्ग सङ्गी० (म) मदन समुचिताङ्ग सङ्गो के स्थान पर । ३२-मिया निरस्त श्रवण ० (म) प्रिया निरस्य श्रवणं से अधिक अच्छा है क्योंकि दूसरे में प्रिया और निरस्य का विश्लेपण कठिन है। ३४-- त्वाम् (म) त्वम् के स्थान पर और प्रियातिकोपे के स्थान पर प्रियाहि कोपे अधिक अच्छा पाठ है । दूसरी पंक्ति में (म) कम परम निग्रह प्रसादे एक समस्त पद है । ३५-निपिञ्चसि (म) निषिञ्चति से अधिक अच्छा है। ३६-तिरयसि (म) तिरयत्ति से अच्छा है । ३८-०परमिन्थरः (म) परिपन्यिकः से श्रेष्ठतर है। ४०-सखिगिरा निरासे (म) सखिभिरानिरासे से अच्छा है। उसी प्रकार मेरी समझ में, हमें २८वें श्लोक की दूसरी पक्ति में फलच्युता निरासे पढ़ना चाहिये। ४२-०भाग० (म) भाव० से बेहतर है हमें के अनुसार विदशि पढ़ना चाहिये। विदर्शिता नही, जिससे छन्दोभंग होता है। ४३-दष्टवान् (म) अवश्य ही दृष्टवान से अच्छा है, जिसका कोई अर्थ नहीं है। ४४-रिक्त स्थान की पूर्ति के लिये (म) लिखता है स्वयमखिलं मम । ५०- अन्तिम पंक्ति (म) में इस प्रकार है तवचपल निरूपिता नवोद्यत्प्रविरल रोम्णि कपश्चि. दुत्तरोष्ठे । ५१-- नयनवोऽसिजातः (म) नयन श्रवोऽपि जातः से अधिक अच्छा लगता है, क्योंकि यहां अपि का कोई अर्थ नहीं है। " " .

जानकीहरण के कुछ पाठ -0 " " " " " श्लोक ५३--मित्र कृत्ये (म) साधु कृत्ये के स्थान पर (ठीक होगा)।रिक्त-स्थान पूर्ति के लिये (म) का एव ले लिया जाय । ५४-सतम् (म) ऋतम के स्थान पर । ५५-- मधु पपुः (म) निश्चय हो मघवपुः से अच्छा है । और (म) में कुन्तलोपमुक्त है ०कुन्तलोपयुक्तं के स्थान पर । जर्जरेव (म) निश्चित ही जर्जरव से अधिक माननीय है। कारण यह उत्प्रेक्षालंकार लगता है जिसमे इव की आवश्यकता है। (म) में परिभोगवत्सु है, परिपीतवत्सु के स्थान पर। ६१-०लोहिनीभिर् (म) वाहिनीभिर् के स्थान में । ७१-परिवृतं (म) अनुगत० के स्थान पर । ७२-अनतंयत (म) अहर्षयत के स्थान पर । ७४-सीत्कृतिः (म) सीत्कृतः के स्थान पर और प्रियाभिः (म) समामिः । ७७-~ -यातु विभूषणः (म) धातु विभूषितः के स्थान पर ७९--(म) के अनुसार व्यक्तं ( स्पष्ट ) व्यस्तं के स्थान पर हमें पढ़ना चाहिये और समस्तः, तमस्तः के स्थान पर। प्रथम पंक्ति में जो शशीतः है उसका विश्लेपण शशिईतः =गतः ) और अन्तिम पंक्ति को सारसं तं रसन्तम् ( सारसं तं सरसम् ) । ८०-हमें (म) के अनुसार उदक ह्रास वेलां पढ़ना चाहिये उदाह्रास चेलां के स्थान पर, यमक और अर्थ दोनो के कारण । घिरामाः शब्द का विश्लेषण वि+रामाः (पक्षियों की स्त्रियाँ) करना चाहिये और नेत को न+इतम् ( गतं )। अन्तिम पंक्ति में (म) का पाठ विगतकिरणोद्भास, विगत चरणोल्लास से अधिक अच्छा मालूम पड़ता है। ८१-विहित० (म) पिहित के स्थान पर। और परमटं, वरभटं के स्थान पर ठीक होगा। ८२-अन्तिम पंक्ति कुछ संदिग्ध है क्योकि अश्रुतपुरा अगर उसका विश्लेषण सेयं के साथ किया जाता है और आकोशायिता समझ में नहीं आता। (म) का यह पाठ अभुतपराकोशामिका शायिका उसी भौति उलझन में डालता है और मुख्य प्रश्न पर उससे कोई प्रकाश नहीं पड़ता। ८३- नक्तं देखने से नक्राधिवास से संगत संज्ञा है (और यहाँ क्रिया विशेषण नहीं है । " - " " " ४२ .. जरनल आव दी रायल एशियाटिक सोसायटी आव प्रेट ब्रिटेन एण्ड आयरलैण्ड : १८९४, पृष्ठ ६२३. राइज डेविड्स फो टिप्पणी जानकीहरण : कुमारदास कृत : जयपुर शिक्षा दिमाग के सञ्चालय, स्वर्गीय पण्डित हरिदास द्वारा सम्पादित । (कलकत्ता : २४ गिरीश विद्यारत्न लेन, १८९३ मूल्य ५ रु०) इसके पूर्व हम इस काव्य के उस संस्करण की ओर ध्यान दिला चुके हैं जिसे धर्माराम ने हाल ही मे संस्कृत-छन्दों में बद्ध कर दिया है और जो १८९१ में सीलोन में प्रकागित हो चुका है। प्रस्तुत ग्रन्थ को एक नवयुवक और बहुत ही योग्य विद्वान्, पण्डित हरिदास शास्त्री ने स्वतंत्र रूप से, उस टीका की प्रतिलिपि से तैयार किया है जो सीलोन से उनके पास भेजी गई थी। उसे अव उनके अतीव दुख- प्रद और असामयिक निधन के पश्चात् 'जयपुर संस्कृत कालेज के प्रिंसिपल (श्री) कालीपद वन्दो. पाध्याय ने प्रकाशित किया है। चूंकि इस टीका में (जो सीलोन के संस्करण में पूरी की पूरी छपी है) इस काव्य का प्रत्येक शब्द है (थोड़े से मामूली शब्दों को छोड़ कर) पर वे किसी खास क्रम से बद्ध नहीं थे, जो गुत्थी सुलझानी थी वह उन शब्दों को छन्द-बद्ध करना था। भारतीय सम्पादक का पुनः प्रामबन्धन, सीलोन के सम्पादन के क्रमबन्धन से बहुत स्थानों में भिन्न है। उन्होंने (भारतीय सम्पादक ने) संस्कृत की छोटी-छोटी टिप्पणियों में उन पंक्तियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया है, जहाँ उनकी मनमझ में , सन्न का ही पाठ गलत है । चूंकि कि सीलोन के राजा का शासन काल, कुछ ही वर्षों के आस-पास निश्चित है (उन्होने ईसा के बाद ५१७-५२६ तक राज किया) उसके साहित्यिक मूल्य के अतिरिक्त उसकी ऐतिहासिक महत्ता है । विद्वान् लोग एक ऐसे संस्करण को पाकर प्रसन्न होगे जो नागराक्षर में है और जिसे एक विद्वान् भारतीय ने सम्पादित किया है । अतः जयपुर संस्कृत विद्यालय के प्रधानाचार्य वधाई के पात्र हैं जिन्होंने पण्डित हरिदास शास्त्री के इस बड़े मनोरञ्जक ग्रन्थ को नष्ट हो जाने से बचाया है ।

जानकीहरण में प्रयुक्त छंद सर्ग संख्या विवरण सख्या १ १-८७ उपजाति इन्द्रवना एवं उपेन्द्रवज्रा मिश्रित (११ वर्ण) मनत रोदोरित लक्ष्मभाजी पादौयदी या चुप जातयः। इत्य किलान्यस्वपिमिधितातुसु वदन्तिजातिस्विदमेव नाम ॥ तत जग ग जत ज ग ग यश्योरप्यनयोस्तु पादा, भवन्ति सोमन्तिनि चन्द्रकान्ते । विद्वभिरायः परिकीर्तिता सा प्रयुज्यतामित्युपजातिरेपा ॥-श्रुतबोष हे चन्द्र कान्ते सुकेशि, जिसमे जिसमें दोनो (इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवजा ) के चरण हो ( पहिला और तीसरा चरण इन्द्रवत्रा का सा एवं दूसरा और तीसरा चौया उपेन्द्रवा का सा) उसे आदि विद्वज्जन 'उपजाति' कहते हैं। पुष्पिताना अयुजि नगरेफतो यकारो। युजि तु मजो जरगाश्च पुष्पितामा ॥ (वृत्तरत्नाकर) २ ८८-९० " न जज र ३ २ १-७७ अनुष्ट्र (श्लोक) श्लोके पठं गुरु मे सर्वत्र लघु पञ्चमम् । तिचतुः पाधोहस्व सप्ततं वीधमन्ययो ।। श्लोक के चारों चरणों में छठा वर्ण दीर्घ, पचिर्वा लम और दूसरे तथा चौथे चरण का सातवा अक्षर ह्रस्व और पहिले तीसरे का दीर्घ होता है। पुष्पिताना देखिये :-1-८८-९०. ७९ शार्दूलविक्रीडित "विपरि म: समौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ॥ (इतरनाकर) पित्रीटित ३३२ जानकीहरणम् सर्ग संख्या विवरण संख्या (१९वर्ण) | गणः-म, स, ज, म, त, त एवं एक लम्बा पान्दांश। भाचे पत्र गुरुनयं प्रियतमे, पष्ठ ततश्चाप्टम सरकादशतस्त्रयस्तदनुवष्टा दशाधान्तिमाः। मातंगमुनिभिश्च या पिरतिः पूर्णेन्दुविम्यानने तवित्तं मयदन्ति काय्य रसिकाशार्दूलविक्रीडितम् ॥ -श्रुतबोध । हे प्रियतमे ! जहाँ प्रथम ये तीनों वर्ण तथा छठा, आठयां गुरु हो फिर ग्यारह से आगे के तीन वर्ण (१२, १३, १४) गुर हों, तया सत्रहवें वर्ण के आदि व अन्त थे (१६, १७, १९) गुरु हों और जहाँ यारह पर यति हो तो हे पूर्णेन्दु विम्बानने ! काध्य- रसिक उस वृत्त को शार्दूलविक्रीडित कहते हैं। ६ १-६३ उपजाति ७ ३ ६४-७६ वंशस्प (१२ वर्ग) देखिये :-१-१-८७. "यवन्ति वंशस्थदिल तो जरों"। गणः-ज,त, ज, र उपेन्द्रवजा घरणेप सन्ति - दुपान्त्य वर्णा लघवः कृता यवा । भदोल्लसद् भूजितफामकार्मुके पदन्ति वंशस्यमिदं युधास्तदा ॥' -~-श्रुतबोध । हे भौहों से कामदेव के धनुष को जीतने वाली ! यदि उपेन्द्रवा के चारों चरणो में ११वां वर्ण ह्रस्व तथा १२वो गुरु हो तो बुधजन उसे वंशस्य छंद कहते हैं। ९ ७७ पुष्पितामा अथवा औप- छन्दसिक ७८-७९ शिखरिणी (१७ वर्ण) लक देखिए :-१-८८-९० 'रसे वश्छिन्ना यमनसभला गः शिखरिणी। (वृत्तरत्नाकर)। गणः-यमनस म एक छोटा और एक लम्बा शब्दांश यदा पूर्वो ह्रस्व कमलनयने पञ्चगुरव- स्ततोवर्णाः पञ्च प्रकृति सुकुमाराङ्गिलघवः । त्रयोऽन्ये चोपान्त्याः सुतनु जघनाभोग सुभगे रसरीशय स्यां भवति विरतिः सा शिखरिणी॥ -तबोष।

निकीहरण में प्रयुक्त व सर्ग संख्या रस्या विवरण हेपंकजाक्षि ! यदि प्रथम वर्ण हस्व, उसके आगे से पांच वर्ण (२ से ६ तक) दीर्घ, फिर उसके (६ के) आगे से पांच (७ से ११ तक) हस्व, फिर तीन वर्षे अन्त के (१४, १५, १६) लघु हो और ६ और ११ वर्गों पर यति हो तो है शुभाङ्गो सुभगे ! वह 'शिख रिणी होगी ८०-८१ स्रग्धरा (२१ वर्ण) | 'नम्नानां त्रयेण त्रिमनियति तासापरा कोर्तितेयम्।' (वृत्त रलाकर)। गण:-मरमन ययय १२ चत्वारो यत्र वर्णाः प्रथम लघवः पष्टकः सप्तमोऽपि द्वातद्वत् षोडशायौ मुगमरमुदिते पोरशान्त्यो तथान्त्यो। रम्भा स्तम्मोह कान्ते मुनिमुनि मुनिभिद्यते चेदिरामो वाले बन्यःकवीन्द्रः सुतनु निगविता अपरा साप्रसिखा। --श्रुतयोप। हे मृगमदमुदिते ! जिस पद्य में प्रयम के चार, वैसे ही १४, १५ो, १७वा, वां, एवं २०वा, २१यों ये अक्षर दीर्ष हों और हे कदालिस्तम्मोह ! जिसमें सात सात पुनः सात वर्गों पर विधाम हो तो, हे सुन्दरो पाले ! माननीय कविवर उसे सम्परा कहते हैं। १-६९ वियोगिनी 'विषमे ससजा गुरुः समे (वंतालीय का समरा लोऽप गुरु वियोगिनी । एक प्रकार) स स ज और एक दीर्घ दादांत समर और एक लघु और एक दीर्घ शब्दांचा । ७०-७२ नर्दटक 'यदि भवतो नजी भजजला गुरु नदंटकम् (अवितय, नटक, कोकिलक) ७३ शार्दूलवित्रीडित देखिये :-७१ १-५४ वस्थ देखिये :-३-(६४-७६) । ५५ वसततिलक "नेयं वसन्त तिलकं तमजाजगी गः।। (वृत्तरत्नाकर)। (१४ वर्ग) | गणः-त भ ज ज एवं दो दीर्घ शब्दांस। आधरितीरामपि देत पर तरतुर्प पत्राष्टमं व सामान्त्यमुपान्यमनस्यम्। अदाभिरिन्दुधरने पिरतिचपरमिः कान्लेदान्त तिलमिलता परन्ति ।। पायोप । १३ ५ जानकाहरणम् छंद सर्गसंख्या विवरण संख्या जहां प्रथम, द्वितीय, चतुर्प, अष्टम, ११वां, १३वां, १४वां वर्ण दीर्घ हों तथा ८व ६ पर विराम हो तो हे चन्द्रानने कान्ते ! निश्चय ही वह छंद वसन्ततिलक कहा जाता है। 'नन मयययुतेय मालिनी मौगि लोकः।' (वृत्तरलाकर)। गण:-न न म य य १७ मालिनी (१५ वर्ण) प्रथममगुरु पट्कम् विद्यते पत्र कान्ते तदनुच दशमं वक्षरं द्वावशान्त्यम् । फरिभिरय तुरङ्ग यत्र कान्ते विरामः सुकवि जन मनोज्ञा मालिनी सा प्रसिद्धा। --श्रुतबोष। हे कान्ते ! प्रथम के छहों वर्ण, १०वां, १३वा जहाँ ह्रस्व हो और ८ व ७ पर विश्राम हो तो हे कान्ते ! उसको विद्वज्जन मनोहर 'मालिनी' छंद कहते हैं । १८ ५७-५८ वसन्ततिलक | देखिये :-५-(५५) । प्रहर्पिणी "त्रपाशाभिमन जरगाः प्रहर्षणीयम् ।" (१३ वर्ण) गण:-म न ज र और एक दीर्घ शब्दांश । आद्यं चेत् त्रितयमयाप्टमं नवान्त्यं द्वायन्त्यो गरुपिरतौ सुभाषिते स्यात् । विधामो भवति महेश नेत्र विग्भि- विज्ञया नन सुदति प्रहषिणी सा ॥-श्रुतबोष । जहाँप्रथम के तीन वर्ण, ८वा. १२वो १३वा दीर्घ हो और ३ व १० यति हो तो हे सुबैनी शुभ्रदंति, उसको प्रहर्षिणी छंद जानो । २० २१ २२ २३ ६०-६१ वसन्ततिलक | देखिये :-५-५५ । १-५४ अनुष्टुप देखिये :-२-१-७७ । ६५५-५७ प्रहपिणी देखिये :-५-५९ । ५८-५९ वसन्त तिलक देखिये :-५-५५ । १-६१ उपजाति देखिये:-१-१-८७ । मालिनी देखिये :--५-५६ । २५ ७ १-९९ रथोद्धता (११ वर्ण) 'रातरायिह रपोसता लगा जानकोहरण में प्रयुक्त छंद सर्ग संख्या विवरण संख्या गण :--रन र एवं एक हस्व और एक दीर्घ शब्दांश । आधमक्षरमतस्तृतोपकं सप्तमंच नवम तयान्तिमम् । दोघंविन्दु मुखि यत्र जायते तां वदन्ति कवयो रयोद्धताम् ।।-श्रुतबोध । हे चन्द्रवदने ! १ला, ३रा, ७वां, ९वां, मन्त का ११वां वर्ण जहाँ दीर्घ हो उस छंद को कविजन रथोद्धता कहते हैं । १००-१०१ नटक देखिये:-४-७०-०-७३ । १-६६ वंशस्य देखिये :-३ (६४-७६) । ६७ वसंत तिलक | देखिये :-५-(५५) । ६८ नदक देखिये :-४ (७०-७३) । १-८१ अनुष्टुप् देखिये :-२-(१-७७) । ८२-८३ वसंततिलक | देखिये :-५ (५५) । ૨૭ ૨૮ २९ ९ १० ३१ ३२ ३४ ११ ८४-८९ शार्दूलविक्रीडित देखिये :-२ (७९) । ९० साधरा देखिये :--३ (८०-८१)। १-८६ द्रुतविलम्वित "अयि कृशोदरिपत्र चतुर्थक, गुरुच सप्तमक दशम तथा। विरति च तवविचक्षणद्रुतविलम्बितमित्युपदिश्यते ।। 'हे कृशोदरि! जहाँ चोया सातवां, दसवां गुरु हो, तथा वारहवां भी गुरु हो तो पण्डितजन उसे द्रुत- विलम्बित छंद कहते हैं। ८५-९० वसन्ततिलक | देखिये :-५ (५५) । ९१ पृथ्वी द्वितयमलि कुन्तले, यदि पाष्टमं द्वादशं । चतुदर्शमयप्रिये गुर गभीर नाभिहदे ॥ सपञ्च दशमान्तिक, तदनयत्र कान्ले यतिः । करोद्रमणि भत्कुलभवति शुभ्रपृथ्वोहि सा ।। हे भ्रमर केनि, यदिदूमरा, छठा, आठवा, वारहवा, चौदहवां, पन्द्रहवा, सत्रहवां, ये अक्षर गुरु हों और हे शुभ्रं प्रिय, रामोरना ! जिममे आठ और नो अक्षरों पर विराम हो तो वह पृथ्वी नाम का छन्द होगा। ९२-९३ शिपरिणी देखिये :-३ (७८-७९). ९४ मार्दूलवित्रीडित देषिर्य :--२ (७१) । ९५ शिखरिणी देखिये :-५ (५५)। ३९ ४० 'जानकीहरणम् मम सर्ग संख्या संख्या छंव विवरण ४१ ४३ ४५ ४६ शार्दूल विक्री- देखिये :-२ (७९) । डित १२ १-५२ वंशस्थ देखिये :-३ (६४-७६) । १२ | ५३-५५ पुष्पिताया देखिये :-१ (८८-९०)। ५६ पृथ्वी देखिये :-११ (९१) । १-३७ प्रमिताक्षरा 'यदि तोटफस्य गुरु पचमक, (१२ वर्ण) विहितं विलासिनि तदक्षरकम् । रस सख्यक गुरु न चेद्वले, प्रमिताक्षरेति कविभिः कथिता ॥ हे विलासिनी ! यदि तोटक छंद का छठां वर्णन होकर पांचवा गुरु होते तो कविजन उसे प्रमिताक्षरा छंद कहेंगे। ३८-४४ पृथ्वी देखिये :-११ (९१) । ४५-४६ हरिणी सुमुखि लघवः पञ्च प्राच्यास्ततो दशमान्तिक- (१७ वर्ण) स्तदनु ललितालामेवर्णस्तृतीयचतुर्थको । प्रभवति पुनर्योपान्त्यः स्फुरत्कनकप्रभे यतिरपि रश्वदर स्मृता हरिणीति सा ॥ हे सुमुखि! जहां प्रथम के पांचों वर्ण लघु हों और ११, १३, १४ भी लघु हो। पुनः हे सुननी, १६ भी लघु और ३, ४, ७ वणों पर क्रमशः विश्राम हो तो हे शुभ्र स्वर्णप्रमे ! उसे हरिणी छंद कहते हैं । १-८० द्रुतविलम्बित | देखिये :-११ (१-८६)। ८१ मन्दाक्रान्ता चत्वारःप्राक् सुतनु गुरवो द्वादशंफदशीचे- मुग्ध वौँ तदनुकमुदामोदिनि द्वादशान्यो। तद्वञ्चान्त्यो युग रस हार्यत्र कान्ते विरामो मन्दाक्रान्तां प्रवर फवयस्तविण सगिरन्तं ।। हे सुन्दरी, जिस छंद में प्रथम के चार वर्ण गुरु तथा १०, ११ दोनो गुरु हों तथा हे मुग्धे! १३, १४ भी दीपं हों और हे कुमदा मोदिनि, ४, ६ तथा ७ पर विधाम हो तो हे कृशाङ्गिकान्ते ! श्रेष्ठ कवि जन उसको मन्दाकान्ता छंद कहते हैं । १-५५ स्वागता अक्षरच नपमं दशम चेद, व्यत्यपादयति यन विनीते। (११ वर्ग) प्रापतनः मुनयने यदिसंय, स्वागतंति कविभिः कथितासो॥ है विनीते सुनयनी ! जहाँ रथोडता छंद ये नवम्, दशम् वर्ण विपरीत (नवम् हिस्व, दशम् दीर्घ) हों उसे कविजन स्वागता छंद कहते हैं । ४८ १४ ५० १५ .

जानकोहरण में प्रयुक्त छंद ३३७ सर्ग संख्या छंद संख्या विवरण ५२ ५३ ५५ ५६-६० उपेन्द्रवज्रा यदोंदवजा चरणेषु पूर्व, भवन्ति व लघवः सुवर्णे। (११ वर्ण) | अमन्द माद्यन्मदने तदानोमुपेन्द्र यत्रा कथिता कवीन्द्रः। हे सुन्दरी कामिनी! यदि इन्द्रवज्रा के चारों पदों में प्रथमाक्षर ह्रस्व हो तो कवीन्द्र उसको उपेन्द्रवजा कहते हैं। ६१ शार्दूल विक्रीडित देखिये :-२ (७१) ६२-६४ स्रग्धरा देखिये :-३ (८०-८१) १-६९ पुटिरताना देखिये :-१ (८८-९०) ७०-७२ मन्दानान्ता देखिये :--१४ (८१) ७३ शार्दूलविक्रीडित देखिये :-२ (७९) ७४ स्रग्धरा देखिये :-३ (८०-८१) १-४२ वंशस्य देखिये :-३ (६४-७६) ४३ मन्दाक्रान्ता देखिये :-१४ (८१) १-६८ अनुष्टुप देखिये :-२ (१-७७) ६९-७० इन्द्रवजा यस्यां त्रियट् सप्तममसर स्यात् । हम्बं सुजघे नवमं च तद्वत् ॥ गत्या विलज्जी कृतहत तामिन्द्रवजा प्रवते कवीन्द्राः। ५७ ५८ १७ ६० १८ कान्ते। ६२ है वरोरु, जिसा तीसरा, छठा, सातवा, नवां, वर्ण हस्व हो वो हे गति में हंस को लगाने वाली, कवीन्द्र उसको 'इन्द्रवजा' छंद कहते हैं। ७१-७२ तोटक(१२वर्ण) सतृतीयक पष्टमनगरते, नवम निरति प्रभव गुरुचेत् । धन मोन पयोपर भार नते ननु तोटक वृत्तमिदं फपिनम् । हे विलासामिलापिणी, जो तीसरा, छठा, नवां, वारहवां ये अक्षर दीर्घ हों तो हे कठिन और म्यूल पयोघरों के मार मे विनम्न, इम छंद को तोटक वृत्त ७३ पध्वी देखिये :-११ (२१) ७४ शार्दूलवित्रीडित देगिये :-२ (७९) १-५९ वंशस्थ देखिये :-३ (६४-७६) ६०-६२ वमन्ततिलका देमिये :-५ (५५) ६३ मन्दानाता देगिये :-१४ (८१) ६४ यम्परा दैगिये :-३ (८०-८१) १-५१ वंशस्य देगिये .-३ (६४-७६) ६७ २०

बानकोहरणम्
सर्ग संख्या
संख्या
विवरण
७२
५२ पुष्पिवाना
५३-५४ रुचिरा
५५-५६ वसन्ततिलका
५७-६० मन्दाक्रान्ता
६१-६२ शार्दूल
विक्रीडित
६३-६४ स्रग्धरा
देखिये :-१ (८०-९०)
देखिये :-५ (५५)
देखिये :-१४ (८१)
देखिये :-२ (८०)
देखिये :-३ (८०-८१)
७५

सों में प्रयुक्त छंद (सर्गानुसार) सर्ग छन्द श्लोक ३ १ से ८७ तक ८८ से ९० तक १ से ७७ तक ७८ ७९ १ से ६३ तक ६४ से ७६ तक ७७ ७८७९ ८० ८१ १६९ तक ७० से ७२ तक ७३ १ से ५४ तक ५५ ४ उपजाति पुष्पितामा अनुष्टुप् पुष्पिताना शार्दूलविक्रीडित उपजाति वंशस्थ पुष्पिताग्रा शिखरिणी प्रग्धरा वियोगिनी नर्दटक शार्दूलविक्रीडित वंशस्थ वसन्ततिलका मालिनी वसन्तलितका प्रहपिणी यतन्ततिलका अनुष्टुप प्रहापणी बसन्ततिलका उपजाति मालिनी रयोद्धता नर्दटक वंशस्थ वसन्ततिलका नर्दटक अनुष्ट्रा वसन्ततिलका गार्दूलविवाहित प्रग्धरा सुतविलम्बित वसन्ततिलका पृथ्वी शखिरिणी १ से ५४ तक ५५, ५६, ५७ ५७, ५९ १ से ६१ तक ८ १ से ९९ तक १ से ६६ तक २४ १० १ से ८१ नक ८२, ८३ ८४ मे ८१ तर ९० १ मे ८६ ना ८७से ९० तक ३४० सगों में प्रयुक्त छंद सर्ग श्लोक ९४ ९५ १२ १ से ५२ तक ५३ से ५५ तक १४ १ से ३७ तक ३८ से ४४ तक ४५,४६ १ से ८० तक ८१ १ से ५५ तक ५६ से ६० तक १५ मार्दूलविक्रीडित शिखरिणी मार्दूलविक्रीडित बंगस्थ पुष्पिताना पृथ्वी प्रमिताक्षरा पृथ्वी हरिणी द्रुतविलम्बित मन्दाक्रान्ता म्बागता उपेन्द्रवजा शार्दूलविक्रीडित सगधरा पुल्पिताना मन्दाक्रान्ता गार्दूलविक्रीडित स्रग्धरा यशस्थ मन्दाक्रान्ता अनुष्टुप् इन्द्रवजा तोटक पृथ्वी गार्दूलविक्रीडित वंशस्थ बसन्ततिलका मन्द्राकान्ता ६२ मे ६४ तक १ से ६९ तक ७० से ७२ तक . १७ १ से ४२ तक १८ १ से ६८ तक ६९, ७० ७१, ७२ ७३ १९ १ से ५९ तक ६० से ६२ तक २० ६४ १ मे ५१ तक बंशस्थ पुष्पिताया रुचिरा वसन्ततिलका मन्द्राकान्ता शार्दूलविक्रीडित स्रग्धरा कुल १४२६ श्लोक ५७ से ६० तक ६१, ६२ ६३-६४ छंवों की श्लोक संख्या सोश सत्या संवा २८. २११ ३ १९ १९ ७ ९ १० बाम्प (१२ वर्ष) अनप्या उपानि (११ वर्ग) इसपिलचिरा (१२ यर्ग) रपालता (११ वर्ग) पुषितामा थियोगिनी गगता (११ वर्ष) प्रमिताभरा (१२ वर्ग) पगन्ततिलका (१४ वर्ग) सामयित्रीति (१९ वर्ष) सम्परा (२१ वर्ष) मन्दाकान्ता (१७ वर्ग) पृप्यो (१७ वर्ग) नईटक (१७ यर्ण) जोन्द्रयगा (११ वर्ष) गिपरिणी (१७ वर्ष) प्रहपिणी (१३ वर्ण) मालिनी (१५ वर्ग) इन्द्रयग्रा (११ वर्ण) तोटक (१२ वर्ण) हरिणी (१७ वर्ण) रुचिरा (१३ वर्ण) १५ १० १२ १३ १० ६ ५ Y २ २ २० २१ २२ २३ २ २ १४२६ महाकाव्य का विवरण स लोक विवरण वर्णन । ३ १-११ | अयोध्या का १२-२५ | महाराज दशरथ । २६-४४ ] महाराज दशरथ की रानियाँ । ४५-७४ | दशरथ का आखेट के लिये जाना और वहाँ अन्ध-मुनि-पुत्र पर धोखे से तीर चलाना। ७५-९० गुनि-पुत्र की मृत्य और मुनि का शाप देना। १-८ देवताओं का विष्णु के पास जाना । विष्णु का वर्णन । ९-१८ देवताओं द्वारा विष्णु की प्रशंसा । १९-३२ | विष्णु का देवताओं से उनके दुख का कारण पूछना । ३३-७३ | वृहस्पति का उनसे रावण के अत्याचारों और उसकी शक्ति का कहना । ७४-७९ | विष्णु का उन्हें ढाढस देना और कहना कि वह राम का अवतार लेकर उनके दुखो को दूर करेंगे। १-१३ वसन्त वर्णन १४-२४ उद्यान दशरथ का अपनी रानियों के साथ क्रीड़ा । २५-३१ दशरथ द्वारा प्रकृति के सौंदर्य का वर्णन | ३२-५८ जल बिहार । ५९-६२ | क्रीड़ा की समाप्ति । ६३-६८ दशरथ द्वारा सूर्यास्त का वर्णन । ६७-७५ | रात्रि-वर्णन । ७६-८१ प्रातःकाल और चारणों द्वारा गुणानुवाद । दशरथ के पुत्रों का जन्म और बड़ा होना। १५-२९ | विश्वामित्र का आना और यज्ञ में विघ्नों को दूर करने के लिये राम को मांगना। दशरथ का स्वीकार करना । ३०-४९ | दशरथ का राम को उपदेश । लक्ष्मण का राम के साथ जाने के लिये तैयारहोना। ५०-५८] तीनों का प्रस्थान । राम का आश्रग को उजड़ा हुआ देखना और उसका वर्णन । ५९-६१ | ताड़का राक्षसी का आना । उसका वर्णन । ६२-६९ | स्त्री होते हुए भी ताड़का के वध के लिये विश्वामित्र काराम को प्रोत्साहित करना। ७०-७३ ताका वध और विश्वामित्र का राम का दिव्यास्त्र देना। १-१० विश्वामित्र के आश्रम में प्रवेश । ११-२४ । विश्वामित्र कारामको यश की रक्षा का मार सौपना। रामद्वारा मात्रम कायर्णन। २५-६१ | पिशाचों की मेना का आ पहुँचना। राम लक्ष्मण का उसका विध्वंस करना। मारीच और सुवाह का वध । --८ | विश्वामित्र का दोनों भाइयो को, जनक काधनुष देखने के लिये, मिपिलाले जाना। ९-१५ | रास्ते में गौतम के आश्रम में ठहरना और बहत्या का उदार । मणों की जन्मभूमि, मिथिला पहुंचना । ३१-१२ मिपिला में स्वागत । ४ महाकाव्य का विवरण सर्ग श्लोक विपरण ७ ८ ९ ३३-४१ / जनक को विश्वामित्र का साधुवाद । ४२-४६ / जनक का धनुष दिखलाना । ४७-५९ राम का पनुप को तोड़ना। जनक का राम को दामाद नाने के लिये चुनना। जनता का राम की प्रशंसा करना। राम और सीता का मिलना। ७-१८ | राम द्वारा सीता का वर्णन । १९-२१ | सीता का लोट जाना । २१-३४ | राम और सीता का प्रेम । ३५-६२ | दारय का अपने पुत्रों के सहित मिथिला में आना । राम और सीता का विवाह । १-५४/ सम्मोग वर्णन । ५५-९२ | सन्ध्या और रानि का सुन्दर वर्णन । ९३-१०१ मघुपान । १-२५ | दशरय का अयोध्या के लिये, अपने पुत्रों और पुत्र-बधुओं के साथ प्रस्थान । मार्ग का वर्णन। २६-४५ | परशुराम का आगमन, राम और परशुराम सम्बाद । ४६-६६ ] अयोध्या में प्रवेश । ६७-६८ कैकेय राज का अपने पुत्र युधाजित को भरत को लाने के लिये अयोध्या भेजना। १० १-४२ दशरथ का राम के राज्याभिषेक के लिये प्रस्ताव और राजा के कर्तव्य का निरूपण । ४३-४५ | मन्थरा का आगमन । ४६-५६ / राम का चित्रकूट-प्रस्थान । ५७-६१ / वहां भरत द्वारा, दशरथकी मृत्यु का संदेश पहुँचाना । ६२-६८ / राम का मरत को सान्त्वना देना और राज्य करने के लिये लोट जाने का आदेश करना। ६९-७० विराध को मुत्य। राम का पञ्चवटी चले जाना। ७२-७५ / शूर्पणखा, खर और दूषण का वृत्तान्त । रावण का जानकीहरण करना । १-२२ | रावण और जटायु का युद्ध । मरते समय जटायु का राम मे जानकोहरण का वृत्तान्त कहना। २३-२४ राम का ऋष्यमूक पर्वत पर जाना और हनुमान से मैत्री। २५-३७ | वालि और सुग्रीव का युद्ध । ३८-८० वर्षा-ऋतु-वर्णन । ८१-९६ राम द्वारा वर्षा-ऋतु-वर्णन । शरद ऋतु का वर्णन । राम के द्वारा शरद्-वर्णन और उनका सुग्रीव की अकर्मण्यता पर भत्र्सना करना। ३८-५२ लक्ष्मण का सुग्रीव को फटकारमा, और सुग्रीव द्वारा क्षमा याचना । ५३-५६ | सीता को खोजने के लिये वानरों का निकल पड़ना । राम की विकलता। ६-२५ / सुग्रीव का राम के मन को बहलाना और पर्वत की शोभा का वर्णन करना। २६-४४ | सौता का पता लगा कर लोट आना और राम से सब हाल कहना। ४५-४६ | राम का समुद्र-तट पर जाना। १-४५ / सेतु-वन्धन ।

३४४ जानकीहरणम् सर्ग श्लोक विवरण *- १७ ४६-५० राम द्वारा उसका वर्णन । ५१-७१ | सेतु वर्णन । १५ १८-२२ | अंगद का रामदूत होकर रावण के पास जाना और सन्देश कहना। २३-२७ अंगद का रावण को उपदेश । २८-४१ | राक्षसों का क्रुद्ध होना। अंगद को बांध लेने का प्रयास । परन्तु अंगद का आकाश मार्ग से अपनी सेना में चले जाना। ४२-५५ | रावण के नाना, माल्यवान का रावण को सीता को लोटा देने का आदेश करता। ५६-६४ रावण की गोंक्ति । १६ १-१४ | लंका में सन्ध्या-वर्णन । १५-२५ | चन्द्रोदय वर्णन । २६-५९ | राक्षसियों का केलि-वर्णन। ६०-६६ | राजमहल में रावण का मद्यपान और राक्षसियों के साथ विहार। प्रातःकाल चारणों का रावण को जगाना। १-२५ राम का युद्ध क्षेत्र में आना; रावण का अपने सेनानायकों को एकत्र कर युद्ध के लिये प्रोत्साहित करना । २६-६२ / राक्षसों का युद्ध के लिये निकल पड़ना । ३३-४३ | वानरों और राक्षसों का युद्ध । राक्षस-सेना का भाग खड़ा होना। रावण का मेघनाद को भेजना। १८ १-१३ : मेघनाद का युद्ध करना और लक्ष्मण को नाग-पाश में बांध लेना । १४-५४ , कुम्भकर्ण का युद्ध । अंगद का हनुमान् को प्रोत्साहित करना। भागती हुई वानर सेना का लौटना । कुम्भकर्ण का वध । ५५-६३ / राक्षसों से युद्ध । ६४-७४ लक्ष्मण और रावण का युद्ध । रावण की 'शक्ति' से लक्ष्मण की मूर्छा । १-३१ / हनुमान् के सञ्जीवनी बूटी लाने से लक्ष्मण को मूर्श टूटना। राम-रावण युद्ध । रावण का वध और आकाश से पुष्प वृष्टि । ३२-५२ मन्दोदरी विलाप । ५३-५६ राम का रावण के राजमहल में सिंहासनारूद होना । वहाँ सीता का आना । परन्तु राम का जनापवाद के भय से मुंह फेर लेना। ५७-६० | सीता का क्रोध से युक्त होकर राम से कहना । ६१-६४ ( सीता का अग्नि को साक्षी देकर शपथ लेना। २० राम का लंका से पुष्पक पर प्रस्थान, सोता के प्रति उनके स्नेहोदगार। ९-५२ | पुष्पक पर से मार्ग के दृश्यों का सीता से वर्णन करना। अयोध्या पहुंचना और राम का राज्याभिषेक । ६१-६४ ] कवि के वंश का वर्णन ।

यमकों के लक्षण सत्यये पगर्यायाः स्वर व्यञ्जन संहतेः । कमेण तेनवावृत्तिमकं विनिगद्यते ॥-- साहित्य दर्पण गोमूत्रिकाध:- वर्णानामेकरूपत्वं पोकान्तरमर्वयोः । गोमूत्रिकेति तत्माह दुष्करन्तद्विदोविदुः ।। सर्वतोमद्रः- - तदिदं सर्वतोभद्रं भ्रमणं यदि सर्वतः ।--दण्डी समुद्गकः- अर्व पुनरावृत्तं जनयति यमकं समुद्गफम् । भट्ट अर्वाभ्यासः समुद्ग स्यात् ।~-दण्डी यमकावली:- पदेष पत्र सर्वेप सादृश्यं दृश्यते पदि । यमकावलियद्दिष्टा श्लिष्टा पमफ कोविदः । प्रतिलोमः-- भावृत्तिः प्रतिलोम्येन पादाश्लोक गोधरा । समर्फ प्रतिलोमत्वात्प्रतिलोममिति स्मृतम् ॥-दण्डी चनबन्ध:- दशमण्डलरेखात्मके नवमण्डलान्तरालपति चक्र नाभिस्यानेन सहेकोनविंशतिप्रकोष्ठ प्रत्येक द्वपक्षणतं पंक्तित्रयं समरेखपा लिखित्वा तत्रका पंक्ती यामपाश्र्वप्रक्रमण आद्यपावमालित्य तथा प्रादक्षिण्येन द्वितीय तृतीययोद्वितीय तृतीयौ लिखित्वा नेमिस्याने वाहवलये साक्षर कोष्ठपकेन सहाष्टादश कोष्ठवति तृतीय पादान्तकोष्ठवति वर्णभारम्य प्रादक्षिण्येन चतुर्थपादं लिखित्वा तव समापयेत् । तत्र तधान्तवर्षः सह चतुर्थ पादोदार: तर नाभिस्थाने आद्य पादत्रयदशमाक्षर संवादः । तुनीयान्त कोठे चतुर्थाद्यन्त वर्णयोः संवादः तृतीय वलये माघ कास्यमिदं । यष्ठे शिशुपाल वध इति कविकाव्य नामोद्धारः। -शिशुपाल वध, १९-१२०. मुरजबन्धः- तिम्र्यखा लिखेत्पञ्च नवोधास्तत्र पंक्तयः । मष्टकोष्ठाश्चततः स्युस्तासु श्लोकं लिखेत् क्रमात् ।

यमकों के
तत्राद्य वित्रितुर्यासु तुर्यत्रियाद्य पक्तिषु ।
भाद्य द्वित्रिचतुः पञ्च पद सप्ताष्टम कोष्ठगः ।
दृश्यते प्रथमः पावश्चतुर्थश्व मेवहि ।
चतुर्थ पंक्ति प्राथम्यात्प्रथमावधि वीक्षणात् ।
द्वितीयादावाद्य द्वियोद्वितुर्ये वितुरीयके ।
तुर्य विद्वयोस्तृतीयाद्ये द्रष्टव्योधिद्वितीयकः ।
तृतीयोधिद्वितीयान्त्ये आद्य सप्तमषष्ठयो ।
द्विनिपञ्चमपोस्तुर्यषष्ठ सप्तमयोः प्रमात् ।
तृतीयान्त्ये च लक्ष्योयमयान्यः क्रम उच्यते ।
आद्यन्त्य युग्मयोः पंक्त्याश्चिन्त्यो गोमूनिका क्रमः ।
कृत्वक द्वितयं द्वच द्वयमेकमिति कमात् ।
यद्वा द्वितयमेकं च द्वयमेकं द्वयं पुनः ।
स्वपक्तिप्रक्रमादेव विन्यासद्वितयं भवेत् ।
यद्वा प्रथम तुर्याधी स्व पंक्त्योस्तदनुक्रमात् ।
द्वितीयोधिद्वितीयस्यां कमादाद्यचतुष्टये ।
व्युत्क्रमाच्च तृतीयस्या माद्यमेव चतुष्टये ।
व्युत्क्रमेण द्वितीयस्यां तृतीयस्यां क्रमेण च ।
द्रष्टव्यो हि तृतीयोऽधिरत्यकोष्ठ चतुष्टये ।
विन्यास भेदास्त्वन्येऽपि सन्त्येव बहवोऽमहि ।
विस्तरात न लिख्यते स्ययमूहमा विचक्षणः ।।
-माघ, १९-२९.

Jankiharnam

Author
Mahakavi,kumardas
Title
Jankiharnam
File name
Jankiharnam
Text
OCR done
Citation
1966
Published
2012/10
Publisher
Allahabad.,mitra Prakashan Pvt.ltd.
Language
Sanskrit
Pages
369
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313541
Barcode
99999990322218.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
tXgOcskSi9z
Download PDF

Jankiharnam