Sanmati Library, Jaipur

Ath Chaubisi Pooja

Ramchandra · 2010/05

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चौबी० اشتهار ; पजन संग्रह विज्ञापन। Notice. पंचकल्याणक तिथियों का शुद्ध करना ऐसा कठिन था कि ५०० वर्ष से बड़े बड़े जैन पण्डित इस को आज तक नहीं कर सके.इन पंचकल्याणक तिथियों को शुद्ध करने में हमारी माधी मायु अर्थात् २५ वर्ष खरव हुए हैं। और इस परिश्रम में भाषा और संस्कृत प्राकृत पूजा पाठों की प्रतियां तलाश करते हुए देश बदेश फिरने में निहायत तकलीफ हम को उठानी पड़ी है, सिवाय इस के विद्वान ब्याकरणी महा पण्डितों वा महा ज्योतिषियोंकी तनखा नज़र, इनाम,सफर खरच और प्रतियों की लिखवाई मिलान कराई गूढ संस्कृत पाठों के अर्थ करवाई में हमारी एक बहुत ही बड़ी रकम खरच पड़ी है । इस वास्ते सरकारी कानून के मुताबिक इस का हक हमने अपने स्वाधीन रक्खा है, यह पूजा पाठ या यह १२० पंचकल्याणक शुद्ध तिथि किसी पुस्तक में या किसी अखबार में या किसी मलहदे कागज वगैरा पर कोई न छापे अगर कोई छापेगा तो उस पर जकर मुकदमा किया जावेगा। पंचकल्याणक तिथियों को शुद्ध कर्ता बाबू ज्ञानचंद्र जैनी लाहौर । तेरह पंथी जैनी भाइयों को समझावट इस पुस्तक में इक्षुरस, घत, दुग्ध, दधि, सर्व औषधि मादि से जो प्रतिविम्ब का प्रक्षालन करना और दश दिकपालादिको को भर्धादि देना लिखा है। यह आम्नाय २० पथ की है, हमने यह लेख इस संस्कत पुस्तक में इस वास्ते छापा है कि यह लेख इस पुस्तक की प्राचार्यों कृत हस्त लिखित असली प्रतिमें है । और सिवाय इस के जितने सस्कृत प्राकृत पूजन पाठ आचार्यों से रचित हमने देखे हैं । मूल प्रथों में हमने सर्व ही ऐसा लेख देखा है, हस्त लिखित संस्कृत मूल ग्रंथ नित्यनियम पूजा में भी ऐसा ही पाठ है सो मूल ग्रंथों के पाठ को काटना हम महा पाप समझते हैं । इस वास्ते हमने यह लेख यहां छापा है। सोजो १३ पंथी भाई इतना लेख पसन्द नहीं करते वह नरूको छोड़ कर इससे आगे जहां से चौवीसी पूजा संस्कृत शुरू होती है वहां से पाठ पढ़ कर पूजन करें। पुस्तक मिलनेका पता - बाबू ज्ञानचन्द्र जैनी लाहौर -- चौबीर अथ सूचीपत्रम्। संग्रह विषय पृष्ठ १९. १३७ २०२ २०८ विषय पृष्ठ भूमिका पहिलीहस्तलिखित प्रतियों में पंचवरयाणक तिथियों की मशुद्धता ३ संस्कृत में मास पक्षों के नाम ११ शुद्ध पंचकल्याणक तिथियें १२ मासाधर कृत संस्कृत पाठ (भाषाभर्थ सहित) वर्तमान चतुर्विशति तीर्थंकरों का संस्कृत पूजा पाठ २५ जिन सहस्र नाम स्तोत्रम् २८ जिन सहस नाम वर्तमान चतुर्विशति तीर्थंकरों की समुच्चय पूजा ४१ १ ऋपमदेव पूजा २ मजित पूजा ४९ पृष्ठ ३ सम्भवनाथ जिन पूजा ५३ ४ भमिनन्दन पूजा ५७ ५ सुमतिनाथ पूजा ६ पद्मप्रम पूजा ७ सुपार्श्व पूजा ६९ ८ चन्द्रप्रभ पूजा ७३ ९ पुष्पदन्त पूजा १० शीतल पूजा ११ श्रेयांस पूजा १२ वासुपूज्य पूजा ८९ १३ विमल पूजा १४ अनन्त पूजा १५ धर्मनाथ पूजा १६ शान्तिनाथ पूजा १७ कुथनाथ पूजा १८ अरनाथ पूजा विषय पृष्ठ विषय १९ मल्लिनाथ पूजा ११७६ पमप्रम पूजा २. मुनिसुव्रत पूजा ७ सुपार्श्वनाथ पूजा १८५ २१ नमिनाथ पूजा १२५ ८ चन्द्रप्रभ पजा २२ नेमिनाथ पूजा ९ पुष्पदन्त पूजा २३ पार्श्वनाथ पूजा १. शीतलनाथ पूजा २५ वर्द्धमान पूजा ११ श्रेयांसनाथ पजा पूजा फलम् १४१ १२ वासुपूज्य पूजा २१४ अथ रामचन्द्रकृत १३ विमल नाथ पूजा २२० रामचन्द्रकृत भाषा वर्तमान १४ अनन्तनाथ पूजा ' २२५ १५५ /१५ धर्मनाथ पूजा चौबीसीसमुच्चय पूजा १५७ १६ शान्तिनाथ पूजा १ ऋषभदेव पूजा १५१ | १७ कुन्थुनाथ पूजा भजितनाथ पूजा १५७ | १८ भरनाथ पूजा २४९ ३ सम्भवनाथ पूजा १९ मल्लिनाथ पूजा ४ भमिनन्दन पूजा २० मुनिसुप्रत पूजा ५ सुमतिनाथ पूजा १७५ | २१ नमिनाथ पूजा चौबीसी पूजा 26 २३१ રરૂe २४३ २५५ पृष्ठ पृष्ठ चौबी पूजन संग्रह ३४१ ३४६ ३५२ ३ विषय २२ नेमिनाथ पूजा २७२ २३ पार्श्वनाथ पूजा २७७ २४ बर्द्धमान पजा २८३ पूजा फलम् ૨૮૮ अथ 'बृन्दावन कृत वृन्दाबन कृत भाषा। वर्तमान चौबीसीपूजा २८९ चौबीसीसच्चापजा २९१ १ ऋषभदेव पूजा २९५ २ 'भजितनाथ पूजा ३ सम्भवनाथ पूजा ४ मभिनन्दन पजा ३१२ ५ सुमतिनाथ पुजा ६ धामपना ३२४ ७ सुपापर्व पूजा ३२९ विषय ८ वन्द्रप्रम पजा ९ पुष्पदन्त पूजा १० शीतलनाथ पूजा ११ श्रेयांसनाथ पूजा १२ वालुपज्य पूजा १३ विमलनाथ पूजा १४ भनन्तनाथ पूजा १५ धर्मनाथ पूजा १६ शान्तिनाथ पूजा १७ कुन्थुनाथ पूजा १८भरनाथ पजा १९ मल्लिनाथ पवा २० मुनिसुव्रत पूजा २१ नमिनाथ पूजा २२ नेमिनाथ पूजा विषय विषय पृष्ठ २३ पार्श्वनाथ पूजा ४२४ १. शीतलनाथ पूजा २४ वर्द्धमान पूजा ११ श्रेयांसनाथ पूजा' ५.२ १२ वासुपूज्य पूजा ५०८ अथवखतावर कृत १३ विमलनाथ पूजा बखतावर सिंह कत भाषा १४ मनन्तनाथ पजा ५२० वर्तमान चौबीसी पूजा ४३७ १५ धर्मनाथ पूजा ५२६ चौबीसीसमुच्चय पूजा ४३९ १६ शान्तिनाथ पूजा १ ऋषभदेव पूजा १७ कुन्युनाथ पूजा ५३७ २ अजितनाथ पूजा ४५. १८ अरनाथ पजा ५४३ ३ सम्भवनाथ पूजा ४५६ १९ मल्लिनाथ पूजा ५४९ ४ मभिनन्दन पूजा ४६१] २० मुनिसुव्रत पूजा ५ सुमति नाथ पूजा .४६७, २१ नमिनाथ पूजा ६ 'पप्रम पजा ५७३/ २२ नेमिनाथ पजा ७ सुपाश्वनाथ पूजा ४७९ | २३ पार्श्वनाथ पजा ५७२ ८ चन्द्रप्रभ पजा ५८५ | २४ पदमान पूजा ५७ ९ पुष्पदन्त पूजा ४९१ ३७५ ३८७ ३१८ .५ . चौबी० पूजन संग्रह + इस ग्रंथ की कीमत १०) क्यों ? बहुत से भाई यह कहेंगे कि बम्बई का छपा चौवीसी पूजा पाठ II) में आताहै यह चार पाठ हैं इन का दाम १०) क्यों रखा? पहले पाठों में सिरफ जल की साथ पहले छंद में आंचली लिख रक्खी है। दूसरे द्रव्य चढाने को वार वार वरक उलट कर पहलेमें ही देखनी पड़तो है सिवा इसके द्रव्य चढानेका मंत्रमी एक ही जगह दिया है। जैसे (ॐ ह्रीं श्रीऋपम तीर्थंकरायजलंनिर्वपामीति स्वाहा। दूसरे द्रव्य चढाने को फिर पीछे ही देखना पड़ता है और वह एक भी गलत है जैसे यह जल का मंत्र इस प्रकार चाहिये ॥ (ॐ ही श्रीऋषभदेव जिनेंद्राय गर्भ,जन्म,तप,शान,निर्वाण, पंचकल्याण प्राप्ताय जन्ममृत्यु जरारोग विनाशनायजलंनिर्वपामोतिस्वाहा) इसी प्रकार चदन में । इस में संसारा ताप रोग विनाशनाय । अक्षत में अक्षय पद प्राप्तये यह पाठ यदल कर पढना चाहिये। इसी प्रकार कुलं द्रव्यों का अलग अलग बदल कर पढना चाहिये । सिवाय इस के जव एक वस्तु चढावे जैसे जल । उस का पाठ अलग एक वचन में होना चाहिये जय बहुत वस्तु चढावे जैसे अक्षत । उस का बहु वचन होना चाहिये । सिवाय इस के स्थापना का पाठ जिनेंद्राय तो विलकुल गलतादूपित, है इस की गलती वही जानते हैं जो आला दरजे के सस्कृत व्याकरणी पंडित हैं। संस्कृत की तो अनेक गलती है जयपुर में जो १) रुपये का एक श्लोक लिखा ऐसे ग्रन्थ हैं वह संस्कृत शुद्धता का दाम है, खूब सूरती का नहीं ॥ सो हर जगह आंचली और पूरा बड़ा हर जगह द्रव्य चढाने का मंत्र होने से यह पाठ पहले से तीन गुना हो जाने से, तीन तिया १) रुपये दाम तो तुम्हारे खियाल की मुताविक ही हुआ और वह कमीशन नहीं काटते और डाक महसूल भी अपने पास से नहीं देते हम कमिशन भी काटते हैं और डाक महसूल भी अपने पास से देते हैं वह भी १०) में से घटाईये। सिवा इस के खरच की तरफ खियाल कीजिये कि पहली प्रति मदिर से लेकर गलत तिथि को गलत तिथि जैसी थी वैसी ही छाप दी और हम ने २५ वर्ष में तमाम हिन्दुस्तान में तलाश कर के १६ मापा पूजा पाठों का पता लगाया जिन का इतने होने का किसी को खियाल भी न था, फिर विद्वान पंडितों को माकूल तनखा भौर सफर स्वरच देकर उन से उन का मिलान करवाया। फिर और पाठों पुस्तकों ग्रन्थों में इन को दुंडवाया जब भाषा पाठ पुस्तक प्रन्थ चारित्रों से काम ठीक न हुआ तब अनेक संस्कृत चौबी० । F पजन संग्रह ५ अन्योका खोज लगाकर उन का अवलोकन करवाया, जो संस्कृत चौवीसी पूजा पाठ जहां बीस बीस मंदिर हैं ऐसे बड़े शहरों में भी नही उस का पता लगाकर नकल करवा कर मगाया, फिर उस को दूसरी प्रतिका वरषों में पता लगा कर दूसरी प्रति मंगाई फिर आदि पुराण उत्तर पुराण सस्कृत ग्रथ आसाधर कन सस्कृत पाठ मंगाकर उन का अवलोकन कराय लोहाचार्य रचित पाठ से मुकाबला करवाया, जो संस्कृत शुद्ध श्लोक १) रुपये का एक लिखा जाळे हमने इन संस्कृत ग्रन्थों के शुद्र पाठ लिखवाने में क्या दाम दिया होगा। मामूली भाषा ग्रन्थ की शब्द शुद्धि में भी सैंकडों रुपया खरच हो जाता है इन संस्कृत ग्रंथों की शब्द शुद्धि में विद्वानों को क्या देना पड़ा होगा इन सब बातो के खरच का जरा गौर करना चाहिये । हम इस के जवाब में सिरफ इतना ही कहना चाहते हैं कि इस काम में २५ वर्ष में जो हमारा खरच हुवा अगर हम इस प्रतिका दाम ९००) भी रक्खें तो भी वह रकम हमारी वरामद नहीं हो सकती १) रुपये दाम तो हमने बहुत सोच कर ऐसा रक्खा है, जैसे हीरे को कांच के भाव वेचा । और जो अपनी आधी उमर इस काम में खरव को यह तो बात ही अलग है। शुद्धता में २५ वर्ष कैसे लगे। एक शब्द शुचौ आसाधर कृत पाठ में है इस के मायने आसाधर ने आपाढ के लिय ह और संस्कृत उत्तर पुराण में यह शब्द कई जगह है उत्तर पुराण के शब्द का अर्थ भाषा करताओं ने ज्येष्ठ लिया है वह शब्द ज्योतिष का है व्याकरणी पंडित इस को कम जानते हैं हमने अनेक ज्योतिषयों से इस का मर्थ पूछा सव ने इस का अर्थ भाषाढ ही किया और संस्कृत कोष में देखा तो वहां भी इस का अर्थ आषाढ ही लिखा है देखो अमर कोष प्रथम कांड । चतुर्थ वर्ग । १६ श्लोक ।। सिरफ एक महान ज्योतिषी जी जो कांशी में ३० वर्ष ज्योतिष पढ कर आये हैं उन्हों ने कहा इस शब्द के मायने आषाढ 'भी है ज्येष्ठ भी है और २ अंगरेजी कोष देखे एक पुराणा जो विलायत में सन् १८६६ में छपा था देखो गोटिंगर का इंगलिश कोश पृष्ट १५४ लडन का छपा हुमा । भौर दूसरा आप्टे का इंगलिश कोश पृष्ट १०४ सन् १८९० का पना आर्य प्रेस का छपा हुमा। दोनों इंगलिश कोषों में शुचौ का अर्थ ज्येष्ठ और मापाढदोनों लिने हैं। तब हमारी यह तो तसल्ली हो गई कि इस शब्द के आषाढ और ज्येष्ठ दोनों अर्थ है परन्तु यह शक पाकी रहा कि हम . .

चौबी० पजन संग्रह . इस का अर्थ भाषाढ करें कि ज्येष्ठ तब उस महान ज्योतिषी ने हम को बताया कि फलाने मौके पर तो इसका मर्थ भाषाढ होता है फलाने मौके पर ज्येष्ठ, उस से देखा तो आसाधर के पाठ में उस का अर्थ आषाढ ही हो सकता है ज्येष्ठ नहीं, और उत्तर पुराण में उस का मर्थ ज्येष्ठ ही होसकता है भाषाढ नहीं तब हमारी तसल्ली हुई। इस तरह हमने संस्कृत के सैंकड़ों शब्दों की जिन में शक हुवा तहकीकात की है इस वास्ते इन शब्दों के अर्थ के खोज में हमारी माधी उमर अर्थात् २५ वर्ष गुजर गए जब खूब तसल्ली हुई तब हमने पंचकल्याणक का पाठ शुद्ध करा है ॥ भाषा पाठों में इतनी गलतियें कैसे हुई। उन महा ज्योतिषी जी ने उत्तर पुराण का लेख देख कर यह भी कहा है कि जिन माचार्यों ने यह प्रन्थ रवा है वह ज्योतिष के महासागर थे उन्हों ने अपनी ज्योतिष विद्या की निपुणता से उत्तर पुराण में अनेक स्थानों पर श्लोकों में कहीं मास कहीं पक्ष कहीं नक्षत्र का नाम ऐसा गुम (understood) रक्खा है कि जिस को सिवाय महान ज्योतिषी के कोई भी व्याकरणी पंडित नहीं बता सकता और साथ में यह भी कहा कि तुम कहते हो हमारे यहां भाषा उत्तर पुराण भी है सो यदि मर्थ करता ज्योतिष नहीं जानता होगा तो उस ने मास पक्ष नक्षत्रों के अर्थ करने में सैकड़ों गलती करी होगी। सो उनका कहना यह ठीक है जो यह भाषापाठों में तिथियोंका फरक पड़ाहै अर्थ करतामों के ज्योतिष न जानने से ही पड़ा है। परमात्मा का धन्यवाद। जैसे सीता के पिता और नेमनाथ जी को जन्म नगरी का फरक आज तक नहीं निकला ऐसे ही भगरचे इस तहकीकात में हमने अपनी आधी उमर लगाई और हजारहा रुपया विद्वानो को तनखा नजर इनाम सफर खरच में लगाया फिर भी अगर हम कुछ इलम ज्योतप के माहिर न होते तो हम भी इस काम को पूरा न कर सकते ॥ पस हम परमात्मा को लाख लाख धन्यवाद देते हैं कि हमारे धर्म में जो पंचकल्याणक तिथियों में गड वड हो रही थी सर्व विघ्न दूर होकर हमारे धर्म की पंचकल्याणक तिथि हमारी जिन्दगी में ही परम शुद्धमोती समान निर्मल होगई ॥

पाबी० पूजन संग्रह आखड़ी भंग महा पाप है। भनेक जैन स्त्रियों के पंचकल्याणक तिथि में व्रत करने तथा हरी वगैरा समक्ष न खाने तथा रात्रि भोजन नहीं करने की भाबडी होती है । सो भाषा पूजन पाठों में तिथि गलत लिखो रहने से जिस दिन पंचकल्याणक तिथि नहीं होती उस दिन तो वह प्रतादि करती हैं और जिस दिन सच्ची पवकल्याणक तिथि होती है वह तिथि भाषा पाठों में न लिखी रहने से उस दिन वह व्रत वगैरा नहीं रखती इस गलती से उन को भाखडी भंग का पाप लगता है। इस लिये भाखडी मंग के पाप से बचने के लिये इस पाठ में पंचकल्याणक लिखी तिथियों के मनुसार प्रतादि किया करें। मन्दिर में प्रतिमा के सन्मुख झूठ बोलना महा पाप है। भगवान का कल्याणक हुवा तो हो किसी भौर तिथि को और भाप श्रीजिन मंदिर में पूजन करते हुए प्रतिविम्ब के सन्मुख । बोले मूठ अर्थात् कहे कोई और तिथि इस झूठ के पाप का क्या ठिकाना है ।। पस जो जैनी माई मंदिर में प्रतिमा के सन्मुख सूठ बोलने को पाप समझते हैं और झूठ बोलने के पाप से बचना चाहते हैं वह यह शुद्ध प्रति हमारे यहां से मंगा कर इस शुद्ध पंचकल्याणक तिथि का पाठ पढ कर भगवान का पूजन किया करें मूल्य १) प्रन्थ मिलने का पता-बाब ज्ञानचंद्र जैनीलाहौर ८ चौबी० पजन संग्रह ८ mmam स्वाहा शब्द बहुत से भाईयों का यह खयाल है कि स्वाहा शब्द होम आदिक में जब कोई सामग्री अग्नि में डालते हैं तब बोलते है इसका मत- लब वह भस्म होना समझते हैं, सो ऐसे खयालात के भाईयों से प्रार्थना है कि एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं जिस स्थान पर जी | अर्थ सम्भव हो वहां वही लिया जाताहै सो स्वाहा शब्दका अर्थ अर्पण करनाभी है। इसी वास्ते आचार्योंने यह शब्द योग्य जानकर संस्कृत, प्राकृत पूजन.पाठ मूल ग्रंथो में ग्रहण किया है पस पूजन में सामग्री चढाने के वक्त इस का अर्थ अर्पण करना है । इस वास्ते पूजन में समाग्री चढाने के वक्त स्वाहा बोलते हैं। इसमें कोई दोष नहीं। ।

. चौबी० -पजन संग्रह भूमिका। इस बात को अरसा २५ साल का हुआ कि इतफाक से हमने श्री मंदिरजी लाहौर में बैठे बेठे स्वतः स्वभाव वृन्दावन कृत रामचंद कृत बखतावर कृत तीनों पाठों की १२० तिथि का मुकाबला किया सो उनमें बड़ा फरक पाया तब हम हैरान हुए कि पूजनमें तिथि कौन से पाठ के अनुसार पढ़ें कई तिथि एक में कुछ दूसरे में कुछ तीसरे में कुछ जब हमने यह सोचा कि यदि कोई औरभी चौवीसी पूजापाठ होय तो उसकी साथ मुकाबला करने को और पाठ तलाश करना चाहिये तब तमाम हिदुस्तान में पंजाब अहाता इलहाबाद बंगाल विहार बुंधेलखंड मध्यप्रदेश राजपूताना अहाता बम्बई गुजरात दक्षिन अहाता मदरास देश करनाटक रियास्त मेसूर इंदौर बडौदा उदयपुर वगैरा में तलाश करने से १६ भाषा चौबीसी पाठ मिले उनके नाम इस प्रकार हैं १ रामचंदकृत २ सेवारामकृत३चुनीलाल कृत ४ बखतावर कृत ५ वृन्दावन कृत ६ देवीदास कृत ७ टेकचंद कृत ८ नेमिचंद कृत ९ सुगनचंद कृत १० छोटीलाल कृत ११ झूनकलाल कृत १२ हीरालाल कृत १३ जिनेश्वरदास कृत १४ मनरंगलाल कृत १५ अमरचंद कृत १६ थान जीकृत जब इन सब की तिथि मिलाई तो सब में ही फरक पाया तब लाचार और तलाश करी तब १ पंचकल्यानक पूजा पाठ देखा इस में १२० तिथि के १२० अर्घ हैं १ वासठ ठाणा देखा इसमें एक एक भगवान की वासठ बासठ बातें हैं एक चौरासी ठाना देखा इसमें हर एक तीर्थकर की चौरासी बातें हैं एक बडा शिखर महास्य पाठ देखा उस में भी तिथि हैं अनेक पुराण । पजन संग्रह २ . चौबी०॥ और चरित्रों में भी तिथि देखी परंतु प्रत्येक पाठ में अनेक तिथियों में फरक पाया आपस में कोई भी 'न मिला एक आश्चर्य कीबात यह देखी कि एक पाठ भी अपनी दूसरी प्रति से नहीं मिलता तव 'बडी हांसी आई और लाचार यह विचारा कि कुल भाषा पाठ संस्कृत से बने हैं आचायों ने पहले संस्कृत प्राकृत पाठ रचे थे तब उनकी तलाश करनी शुरू की सो वडी कठिनताई से संस्कृत चौबीसी 'पूजा पाठ प्राप्त हुआ फिर दिल में यह शक हुआ कि जैसे भाषा पाठ एक दूसरे से नहीं मिलते कहीं यही हाल संस्कृत पाठों का भी न हो तव संस्कृत उत्तर पुराणमें से १२० तिथि का संस्कृत पाठ उतर- वापा फिर एक पंचकल्यानमाला संस्कृत पाठ मंगाया फिर लोहाचार्य कृत संस्कृत पाठ की तिथियों से इन सब संस्कृत पाठोंका मिलान किया तो आपसमें चारों पाठ मिल गए तव बड़ीभारी खुशी हासिल हुई और उनका एक १२० तिथियों का शुद्ध पाठ भाषा में लिखा और भाषा पाठों से मिलान करने पर मालूम हुआ कि सर्व भाषा पाठों में १२ से लेकर २८ तक तिथियां गलत हैं यानि १२ से कम किसी में भी गलती नहीं और बाजे पाठों में २८ तक तिथि गलत हैं, पस हमने यह सोचा कि जैनी भाई मंदिरों में भगवान का पूजन भाषा के.गलत पाठ पढ कर कर रहे हैं यह सखत अनुचित और पाप कार्य है पस हमने वह संस्कृत चौवीसी पूजा पाठ शुद्ध करके इस पुस्तक में छाप दिया और. जो भाई संस्कृत नहीं जानते उन के वास्ते.२,भाषा चौवीसी पूजा पाठ यानि रामचन्द्र,और वृन्दावन कृत दोनों भाषा पाठों की गलत तिथियों के चरण छंदों में से दूर कर सही तिथियों के नए वर्ण 17 संग्रह ३ चोवी उन में लिख कर उन दोनों भाषा पाठों की भी १२० तिथि संस्कृत की मुताविक शुद्ध कर भाषा पूजन || पूजा करने वाले भाइयों के वास्ते इसी पुस्तक में छाप दिये। १ पस जैनीभाइयों को चाहिये कि भगवान् का पूजन इस १२० पंच कल्याणक शुद्ध तिथि वाली पुस्तक के अनुसार किया करें क्योंकि शुद्ध प्रति मिलते हुए गलत तिथि पढ कर पूजन करना महा अयोग्य कार्य है। जो जैनी पक्षपात कर आचार्थों कृत संस्कृत पाठों को झूठे कहकर गलत तिथियों के पाठों से भगवान का पूजन करेंगे वह महा पाप के भागी होकर अपनी करनी का फल पावेंगे। अथ पंच कल्याणक तिथियों में अशुद्धता का सबूत । १६ भाषा चौवीसी पूजा पाठ, दूसरे पाठ और पुराणों में जितनी तिथि पंच कल्याणक की हर एक में गलत हैं अगर सब का खुलासा यहां लिखा जावे तो पाठ, बहुत बढ. जावे इस वास्ते सिरफ तीन चार चौवीसी पूजा पाठों की तिथियां लिखते हैं ताकि जैनी भाइयों को इस बात का निश्चय होजावे कि पाठों में तिथियां जरूर ही गलत हैं।. ' अथ अशुद्ध पंच कल्याणक तिथि। १ ऋषभदेव-के जन्मकी शुद्ध तिथि चैत्र कृष्ण ९ है परंतु चुनीलालकृत पाठमें चैत्रशुक्ल ९ है। - .

चौबा०
पूजन
संग्रह
४
-
२ अजित नाथ-के तप की शुद्ध तिथि माघ शुक्ल ९ है परंतु वृंदावन, रामचंद, वखतावर
और चुनीलाल कृतमें माघ शुक्ल १० हे और सेवाराम कृतमें पौष शुक्ल ११ है।
३ अजितनाथ-के ज्ञानकी शुद्ध तिथि पोष शुक्ल ११ है,वृन्दाबन,वखतावर में पौष शुक्ल ४ है।
४ संभव नाथ-के ज्ञानकी शुद्ध तिथि कार्तिक कृष्ण ४ है,चुनीलाल कृतमें चैत्रकृष्ण ४ है ।।
५संभवनाथ-के निर्वाणकी शुद्ध तिथि चैत्र शुक्ल ६ है,देवीदास कृत में वैशाख कृष्ण ६ है।
६ अभिनंदन नाथ-के गर्भ की शुद्ध तिथि वैशाख शुक्ल ६ है परंतु रामचंद्र और चुनीलाल
-
कृत में वैशाख
शुक्ल है।
॥
७ सुमतिनाथ-के तप की शुद्ध तिथि वैशाख शुक्ल ९ है परन्तु वृन्दाबन और वखतावर कृत
में चैत्र शुक्ल ११ है।
८ पद्मप्रभ-के गर्भ का शुद्ध तिथि माघ कृष्ण ६ है परन्तु देवीदास कृत में माघशुक्ल ६ है।
९ पाप्रभ-के जन्म की शुद्ध तिथि कार्तिक कृष्ण १३ है परन्तु वृदावन कृत में कार्तिक
शुक्ल १३ है और वखतावर कृत में कार्तिक शुक्ल १२ है।
१० पद्मप्रभ-के तप की शुद्ध तिथि कार्तिक कृष्ण १३ है परन्तु वृन्दावन और बखतावर कृत
में कार्तिक शुक्ल १३ हे ॥
११ पनप्रभ-के ज्ञानको शुद्ध तिथि चैत्र शुक्ल १५ हे परन्तु चुनीलाल कृतमें चैत्र शुक्ल ४ है।
,

E संग्रह ५ १२ पमप्रभ-के निर्वाण की शुद्ध तिथि फाल्गुण कृष्ण ४ है परंतु सेवाराम कृत में फाल्गुण शुक्ल ४ है और देवीदास कृत में फाल्गुण शुक्ल ७ है। १३ सुपार्श्वनाथ-के गर्भ कीशुड तिथि भादों शुक्लप है परन्तु वृन्दावन कृत में भादों शुक्ल २ हे १४ सुपार्श्वनाथ-के ज्ञान की शुद्ध तिथि फाल्गुण कृष्ण ६ है परन्तु सेवाराम और देवीदास कृत में फाल्गुण शुक्ल ६ है। १५ चंद्रप्रभ-के गर्भकी शुद्ध तिथि चेत्र कृष्ण ५हे परन्तु चुनीलाल कृत में चैत्र शुक्ल ५ है। १६ चंद्रप्रभ-के तपकी शुद्ध तिथि पौष कृष्ण ११ है परन्तु देवीदास कृतमें पौष शुक १२ है और सेवाराम कृत में पौष कृष्ण १०। १७ चंद्रप्रभ-के ज्ञानकी शुद्ध तिथि फाल्गुण कृष्ण ७ हे,देवीदास कृतमें फाल्गुण शुक्ल है १८ चंद्रप्रभ के निर्वाण की शुद्ध तिथि फाल्गुण कृष्ण ७ है परन्तु वखतावर कृत में माघ कृष्ण ७ है और वृन्दावन और रामचंद्र कृतमें फाल्गुण शुक्ल ७ है। १९ पुष्प दंत-के तपकी शुद्ध तिथि मार्गशिरशुक्ल १ है,सेवाराम कृतमेंमार्गशिरकृष्ण १ है। २० पुष्पदंत-के ज्ञानकी शुद्ध तिथि कार्तिक शुक्ल २ है,देवीदास कृत में कार्तिककृष्णर है। और सेवाराम कृत में फाल्गुण कृष्ण २ है ॥ -- --- चौबी० पूजन संग्रह ६ कृत में २१ पुष्पदंत-के निर्वाणकी शुद्ध तिथि भादौ शुक्ल ८ हैं परन्तु वृन्दावन और वखतावर कृत में आश्वन शुक्ल ८ है और देवीदास कृतमें भादों शुक्ल ९ है । २२ शीतलनाथ-के गर्भकी शुद्धतिथि चैत्र कृष्ण है परन्तु सेवाराम कृतमें चैत्र कृष्ण ६ है ॥ २३ शीतलनाथ-के ज्ञानकी शुद्ध तिथि पौष कृष्ण १४ है,देवीदास कृतमें पौष कृष्ण १० है। २४ शीतलनाथ-के निर्वाण की शुद्धांतथि आश्विन शुक्ल ८ है परन्तु सेवाराम ज्येष्ठ कृष्ण है और देवीदास कृत में आश्विन कृष्ण ३० अमावस्या है। २५ श्रेयांसनाथ-के गर्भ को शुद्ध तिथि ज्येष्ठ कृष्ण ६ है परन्तु वृन्दावन और बखतावर कृत में ज्येष्ठकृष्ण है। २६ श्रेयांसनाथ-के ज्ञान की शुद्ध तिथि माघ कृष्ण ३० अमावस्या है परन्तु वखतावर 'कृत में माघ कृष्ण १० है॥ २७ श्रेयांसनाथ-के निर्वाण की शुद्ध तिथि श्रावण शुक्ल १५है देवीदास में श्रावण शुक्ल ५ है। २८ वासुपुज्य-के तपकी शुद्ध तिथि फाल्गुण कृष्ण १४ हे सेवाराम कृतमें फाल्गुण कृष्ण २ है ।। २९ वासुपूज्य-के ज्ञानकी शुद्ध तिथिमाघ शुक्लरहे वृन्दावन और वखतावर कृतमभाद्रपद कृष्णरहे ३० वासु पुज्य के निर्वाणकी शुद्ध तिथि भाद्रपद शुक्ल १४है देवीदास कृतमें भाद्रपद शुक्ल५ है ।

चौबी० 4 । . संग्रह । m । है ३१ विमलनाथ-के जन्मकी शुद्ध तिथि माघ शुक्ल४ है परंतु देवोदास और रामचंद्र कृतमें माघशुक्ल १२ हैं और चुनीलाल कृत में माघ शुक्ल १४ है।।... " ३२ विमलनाथ के निर्वाण की शुद्ध तिथि आषाढ कृष्ण है परन्तु वृन्दावन कृत में आषाढ कृष्णं ६ है और देवीदास और चुनीलाल कृतमें आषाढ़ शुक्ल ८ है। ३३ अनंतनाथ-के तप की शुद्ध तिथि ज्येष्ठ कृष्ण १२ है परन्तु रामचंद्र, देवीदास, सेवाराम, और चुनीलाल कृत में पौष कृष्ण १२हे ।। ३४ .अनंतनाथ के निर्वाण की शुद्ध तिथि चैत्र कृष्ण ३० अमावस्या है परन्तु वृन्दावन और वखतावर कृत में चैत्र कृष्ण ४ है ॥ ३५ धर्मनाथ-के गर्भ की शुद्ध तिथि वैशाख कृष्ण १३ है परन्तु वृन्दावन और बखतावर कृत में वैशाख शुक्ल: है और देवीदास,रामचंद्र,चुनीलाल कृतमें वैशाख शुक्ल १३ है। ३६-धर्मनाथ-के ज्ञान की शुद्ध तिथि पौष शुक्ल १५ है परन्तु चुनीलाल कृत में माघ शुक्ल १५ है देवीदास कृत में पौष कृष्ण ३० अमावस्या है। ३७ शांतिनाथ-के जन्मकी शुद्ध तिथिज्येष्ठ कृष्ण१४ है परंतु देवीदास कृतम ज्येष्ठ कृष्ण १३ हैं। ३८ शान्तिनाथ के तपकी शुद्ध तिथि ज्येष्ठ कृष्ण १४है परन्तु देवीदास कृतमें ज्येष्ठकृष्ण१३ हैं। ४ - -- 8 . । 2 m . . म म । - - - पूजन संग्रह ८ ३९ शांतिनाथ-के ज्ञान की शुद्ध तिथि पौष शुक्ल १० है परन्तु रामचंद्र चुनीलाल कृत में पौष शुक्ल ११ है। ४० शांतिनाथ-के निर्वाण की शुद्ध तिथि ज्येष्ठ कृष्ण १४ है परन्तु देवीदास कृत में ज्येष्ठ गुक्ल १४ हे। ४१ कुंथुनाथ-के गर्भ की शुद्ध तिथि श्रावणकृष्ण१० है परन्तु रामचंद्र कृतमें श्रावण शुक्ल १० है। ४२ कुंथुनाथ-के तप की शुद्ध तिथि वैशाख शुक्ल १ है परन्तु सेवाराम कृत में वैशाख कृष्ण ११ है। ४३. कुथुनाथ-के ज्ञान की शुद्ध तिथि चैत्र शुक्ल ३ है परन्तु चुनीलाल कृतमें चैत्र शुक्ल १३ है। ४४ अरनाथ-के गर्भकी शुद्ध तिथि फाल्गुण शुक्ल३ है परन्तु सेवारामकृतमें फाल्गुणकृष्ण३ है। ४५ अरनाथ-के तप की शुद्धतिथि मार्गशिर शुक्ल १० है परन्तु वृन्दावन, बखतावर कृत में मार्गशिर शुक्ल १४ हे सेवाराम कृत में कार्तिक कृष्ण १२ है। १६ अरनाथ-के ज्ञानकी शुद्ध तिथि कार्तिक शुक्ल१२है परन्तु बखतावर और सेवारामकृतमें कार्तिक कृष्ण १२ है और चुनीलाल कृत में पौष कृष्ण २ है। ४७ अरनाथ के निर्वाण की शुद्ध तिथि चैत्र कृष्ण ३० अमावस्या है परन्तु वृन्दावन, बखतावर कृत में चैत्र शुक्ल ११ है। ४८मल्लिनाथ-केज्ञान की शुद्ध तिथि पौषकृष्ण रहे परन्तु चुनीलाल कृत में वैशाख कृष्ण १०है।

चौबी० पूजन संग्रह २ ४९ मल्लिनाथ-के निर्वाण की शुद्ध तिथि फाल्गुण शुक्ल ५ ह.परन्तु देवीदास कृत में फाल्गुण कृष्ण ५ है। ५० मुनिसुव्रतनाथ-के गर्भ की शुद्ध तिथि श्रावण कृष्ण २ है परन्तु देवीदास कृत में श्रावण शुक्ल २३॥ ५१ मुनिसुवनाथ-के जन्म की शुद्ध तिथि वैशाख कृष्ण १० है परन्तु सेवाराम कृत में वैशाख कृष्ण ५ है। ५२ मुनिसुव्रतनाथ-के ज्ञान की शुद्ध तिथि वैशाख कृष्ण ९ है परन्तु देवीदास कृत में वैशाख कृष्ण १० है और चुनीलाल कृत में मार्गशिर शुक्ल ११ है । ५३ नमिनाथ-के ज्ञान की शुद्ध तिथि मार्गशिर शुक्ल ११ है परन्तु चुनीलाल कृत में आश्विन शुक्ल १ है। ५४ नमिनाथ-के निर्वाणकी शुद्ध तिथि वैशाखकृष्ण है परन्तु देवीदास कृतमें वैशाख शुक्ल१४ है। ५५ नेमिनाथ-के गर्भ की शुद्ध तिथि कार्तिक शुक्ल ६ है,रामचद्र कृत.में कार्तिककृष्ण ६ है। ५६ नेमिनाथ-के निर्वाणकी शुद्ध तिथि अषाढ़ शुक्ल७ हे परन्तु देवीदास वृन्दावन,वखतावर कृन में आषाढ़ शुक्ल ८ है॥ ५७ पाश्वनाथ-के गर्भकी शुद्ध तिथि वैशाख कृष्णर है परन्तु देवीदास कृतमें वैशाखशुक्ल३ है ।

चौवी० पूजन 'संग्रह ५८महावीर-के गर्भ की शुद्ध तिथि आषाढ शुक्ल ६ह परन्तु देवीदास कृत में आषाढ़ कृष्ण १० है। ५९ महाबीर के जन्मकी शुद्ध तिथि चैत्र शुक्ल १३ है परन्तु सेवाराम कृत में चैत्रकृष्ण १३ है ॥ ६० महावीर-के तपकी शुद्ध तिथि मार्गशिर कृष्ण१०है परन्तु देवादास कृतमें मार्गशिर शुक्ल१०है। ६१ महावीर-के ज्ञानकी शुद्ध तिथि वैशाख शुक्ल१०है परन्तु देवीदास कृतमें वैशाखकृष्ण१०हे ॥ नोट-यह अशुद्धि सिर्फ चार पांच पाठों को दिखलाई हैं अगर सारे १६ पाठों दूसरी पुस्तकों और पुराणों की दिखलाई जाती तो कथन इस से बीस गुणा वढता जाता इस वास्ते नही दिखाई, जिस भाई को निश्चय न हो जोनसा पाठ चाहे निकाल कर संस्कृत चौवीसी पाठ जो इस पुस्तक में छपा है उस के साथ मुकाबला करके देख लेवें ॥ भाषा पुराणों में वनिसंवत पजा पाठों के जियादा तिथि गलत हैं और अनेक पाठ भी अपनी प्रति के साथ नहीं मिलते। मसलन अगर तुम हस्त लिखित वृंदावन या रामचंद या किसी और पूजन पाठ की एक जाति को १० प्रति इकट्ठी करके उनमें तिथियों का मिलान करो तो अनेक जगह फरक पावोगे। हम ने २५ वर्ष तक हिंदुस्तान के अनेक नगरों में एक एक जाति की तीस तीस चालिस चालीस प्रति देखी हैं अनेकों में बड़े फरक पाये हैं । यह इतनी गलतियां अल्पमति लेखकों की कृपा से हैं और कई जगह पाठ रचताओं ने मासों और पक्षों के नाम के अर्थ करने में गलती की है क्योंकि एक मास और एक पक पक्ष के संस्कृत में अनेक नाम है कितनी ही जगह संस्कृत ग्रंथों में तिथियों का ऐसा वर्णन है जो सिवाए योतिपियों के उनका पूरा अर्थ समझ ही नहीं सकता। इस कारण से यह गलतियां पाठों में हुई हैं सो जो इस शुद्ध पाठ के होते हुए गलत पाठ की गलत तिथि पढ कर पूजन करेगा वह अपने भशुभ कर्म बांधेगा। पंच कल्याणक तिथियों का संशोधन कर्ता ज्ञानचंद जैनी लाहौर चौबी० पजन संग्रह ११ संगत अथ मास और पक्षों के नाम। शुक्ल पक्ष के नाम-शुक्ल, शुभ, शुचि, श्वेत, पांडुर, पांड, अवदात, सित, गौर, वलक्ष, धवल, अर्जुन, हरिण, चांदनी (ज्योत्स्ना)। कृष्ण पक्ष के नाम-कृष्ण, नील, असित, श्याम, मेचक, अंधयारी,तामसी काली। पूर्णमासी के नाम-पक्षांत, पंचदशी, पोर्णमासी। अमावस्या के नाम-अमावस्या, दर्श, सूर्येन्दुसंगम । मासों के नाम-शुक्र, ज्येष्ठ को कहते हैं। शुचि, आषाढ को कहते हैं। नभस, श्रावणिक, श्रावण को कहते हैं । नभस्य, प्रोष्टपद, भाद्र, भाद्रपद, भाद्रों को कहते हैं। आश्विन, इष, अश्वयुज आसोज को कहते हैं। बाहुल, ऊर्ज, कार्तिक को कहते हैं। सहा अगहन मार्गशीर्ष मगसिर को कहते हैं। तेष, सहस्य, पौष को कहते हैं। तपा माघ को कहते हैं। तपस्य फाल्गुनिक फाल्गुण को कहते हैं । मधु, चैत्रिक चैत्र को कहते हैं। माधव, राध वैशाख को कहते हैं। प्रार्थना-पूजन पाठ पढ़ने वाले भाइयों से निवेदन है कि हे भाइयो ! जब तुम भगवान् का पूजन पढ़ो तो जो उस में किसा छन्द में किसी शब्द में मात्रा या अक्षर न्यून या अधिक देखो तो बिना विचारे उसे ठीक करने को काट फाट मत करो क्योंकि जब कोई कवि छन्द रचता है तो . १

चौबी०
पूजन
संग्रह
है
अपने छन्द का वजन ठीक करने को जिस शब्दकी चाहे मात्रा या अक्षर न्यून अधिक कर लेता है
और जब छन्द में एक जाति के दो शब्द आवें तो दसरे शब्दको बदल कर उसी अर्थ वाला रख देता
एक छन्द में एक जाति के दो शब्द लाने यह बड़े कविताओं की कविता में एक जाति का दोष
गिना जाता है यह कवियों का कायदा है इस बात को वही जानते हैं जो कवि हैं।
१२
अथ पंच कल्याणक शुद्ध तिथि।
१ ऋषभदेव-गर्भ आषाढ कृष्ण २ जन्म चैत्र कृष्ण ९ तप चैत्र कृष्ण ९ ज्ञान फाल्गुण
कृष्ण ११ निर्वाण माघ कृष्ण १४ ।' -
२ अजितनाथ-गर्भ ज्येष्ठ कृष्ण ३० अमावस्या जन्म माघ शुक्ल १० तप माघ शुक्ल ९
ज्ञान पौष शुक्ल ११ निर्वाण चैत्र शुक्ल ५।
३ संभवनाथ-गर्भ फाल्गुण शुक्ल ८ जन्म कार्तिक शुक्ल १५ तप मार्गशिर शुक्ल १५
ज्ञान कार्तिक कृष्ण ४ निर्वाण चैत्र शुक्ल ६ ।
४ अभिनंदननाथ-गर्भ वैशाख शुक्ल ६जन्म माघ शुक्ल १२ तप माघ शुक्ल १२ ज्ञान पौष
शुक्ल १४निर्वाण वैशाख शुक्ल ६ ।

चौबी०
बजन
संग्रह
१३
५ सुमतिनाथ-गर्भ श्रावण शुक्ल २ जन्म चैत्र शुक्ल ११ तप वैशाख शुक्ल ९ ज्ञान चैत्र
शुक्ल ११ निर्वाण चैत्र शुक्ल ११ ।
६ पद्मप्रभ-गर्भ माघ कृष्ण ६ जन्म कार्तिक कृष्ण १३ तप कार्तिक कृष्ण १३ ज्ञान चैत्र
शुक्ल १५ निर्वाण फाल्गुण कृष्ण ४ ।
७ सुपार्श्वनाथ-गर्भ भाद्रपद शुक्ल ६ जन्म ज्येष्ठ शुक्ल १२ नप ज्येष्ठ शुक्ल १२ ज्ञान
फाल्गुण कृष्ण ६ निर्वाण फाल्गुण कृष्ण ७।
८ चंद्रप्रभ-गर्भ चैत्र कृष्ण ५ जन्म पौष कृष्ण ११ तप पौष कृष्ण ११ ज्ञान फाल्गुण कृष्ण
७निर्वाण फाल्गुण कृष्ण।
९ पुष्पदंत-गर्भ फाल्गुण कृष्ण ९ जन्म मार्गशिर शुक्ल १ तप मार्गशिर शुक्ल १ ज्ञान
कार्तिक शुक्ल २ निर्वाण भाद्रपद शुक्ल ८॥
१० शीतलनाथ-गर्भ चैत्र कृष्ण ८ जन्म माघ कृष्ण १२ तप माघ कृष्ण १२ ज्ञान पौष
कृष्ण १४ निर्वाण आश्विन शुक्ल ८।
११ श्रेयांसनाथ-गर्भ ज्येष्ठ कृष्ण ६ जन्म फाल्गुण कृष्ण ११ तप फाल्गुण कृष्ण ११ ज्ञान
माघ कृष्ण ३० अमावस्या निर्वाण श्रावण शुक्ल १५।
.
.

चौबी०
पजन
संग्रह
४
..
१२ वासुपूज्य-गर्भ आषाढ़ कृष्ण ६ जन्म फाल्गुण कृष्ण १४ तप फाल्गुण कृष्ण १४
ज्ञान माघ शुक्ल २ निर्वाण भाद्रपद शुक्ल १४ ।
१३ विमलनाथ-गर्भ ज्येष्ठ कृष्ण १० जन्म माघ शुक्ल ४ तप माघ शुक्ल ४ ज्ञान माघ
शुक्ल ६ निर्वाण आषाढ कृष्ण ।
१४ अनंतनाथ-गर्भ कार्तिक कृष्ण १ जन्म ज्येष्ठ कृष्ण १२ तप ज्येष्ठ कृष्ण १२ ज्ञान
चैत्र कृष्ण ३० अमावस्या निर्वाण चैत्र कृष्ण ३० अमावस्या ।
१५धर्मनाथ-गर्भ वैशाख कृष्ण १३ जन्म माघ शुक्ल १३ तप माघ शुक्ल १३ ज्ञान
पौष शुक्ल १५ निर्वाण ज्येष्ठ शुक्ल ४ ।
१६ शांतिनाथ-गर्भ भाद्रपद कृष्ण ७ जन्म ज्येष्ठ कृष्ण १४ तप ज्येष्ठ कृष्ण १४ ज्ञान
पौष शुक्ल १० निर्वाण ज्येष्ठ कृष्ण १४ ।
१७ कुंथुनाथ-गर्भ श्रावण कृष्ण १० जन्म वैशाख शुक्ल १ तप वैशाख शुक्ल १ ज्ञान क्षेत्र
शुक्ल ३ निर्वाण वैशाख शुक्ल ।
१८ अरनाथ-गर्भ फाल्गुण शुक्ल ३ जन्म मार्गशिर शुक्ल १४ तप मार्गशिर शुक्ल १० ज्ञान
कार्तिक
शुक्ल १२ निर्वाण चैत्र कृष्ण ३० अमावस्या।

१
चौबी०
पजन
सप्रह
१५
१९ मल्लिनाथ-गर्भ चैत्र शुक्ल १ जन्म मार्गशिर शुक्ल ११ तप मागशिर शुक्ल ११ ज्ञान
पौष कृष्ण २ निर्वाण फाल्गुण शुक्ल ५।
२० मुनिसुव्रतनाथ-गर्भ श्रावण कृष्ण २ जन्म वैशाख कृष्ण १० तप वैशाख कृष्ण १०
ज्ञान वैशाख कृष्ण ९ निर्वाण फाल्गुण कृष्ण १२ ।
२१ नमिनाथ-गर्भ आश्विन कृष्ण २ जन्म आषाढ़ कृष्ण १० तप आषाढ़ कृष्ण १०
ज्ञान मार्गशिर शुक्ल ११ निर्वाण वैशाख कृष्ण १४ ।
२२ नेमिनाथ-गर्भ कार्तिक शुक्ल ६ जन्म श्रावण शुक्ल ६ तप श्रावण शुक्ल ६ ज्ञान
आश्विन शुक्ल १.निर्वाण आषाढ शुक्ल ७।
२३ पार्श्वनाथ-गर्भ वैशाख कृष्ण २ जन्म पौष कृष्ण ११ तप पौष कृष्ण ११ ज्ञान चैत्र
कृष्ण ४ निर्वाण श्रावण शुक्ल ७।
२४ महावीर-गर्भ आषाढ़ शुक्ल ६ जन्म चैत्र शुक्ल १३ तप मार्गशिर कृष्ण १० ज्ञान
वशाख शुक्ल १०.निर्वाण कार्तिक कृष्ण ३० अमावस्या।

चौवा० पूजन संग्रह अथ शुद्ध तिथियों का संस्कृत पाठ । "(असाधर कृत संस्कृत जिन कल्याणक माला) श्लोक-पुरुदेवादि वीरान्त, जिनेन्द्राणां ददातुनः । श्रीमद्गर्भादि कल्याण श्रेणीनिःश्रेयसः श्रियम् ॥ १ ॥ आषाढ़ कृष्ण-शुचौ कृष्णेद्वितीयायां वृषभोगर्भमाविशत्। वासुपूज्यस्तथा षष्टयामष्टम्यां विमलः शिवम् ॥ २॥ दशम्यां जन्मा तपसी नमः अर्थ-आषाढ कृष्ण २ को वृषभनाथ का गर्भ। ६ को वासुपूज्य का गर्भ। ८ को विमलका निर्वाण । १० को नमि का जन्म । १० को नमि का तप । आषाढ़ शुक्ल- शुक्लेतु सन्मतेः। षष्टयां गर्भो ऽभवन्नमेः सप्तम्यां मोक्षमाविशत् ॥३॥ अर्थ-आषाढ़ शुक्ल ६ को महावीर का गर्भ । ७ को नेमिनाथ का निर्वाण । श्रावणकृष्ण-सुव्रतः श्रावणे कृष्णे द्वितीयायां दिवश्च्युतः। कुन्थुर्दशभ्यां अर्थ-श्रावण कृष्ण २ को मुनिसुव्रतनाथ का गर्भ । १० को कुन्थुनाथ का गर्भ ॥ - .

4 , , - चौबी० पजन संग्रह . श्रावण शुक्ल शुक्लेतु द्वितीया सुमतेस्तिथिः॥४॥ जन्म निष्क्रमणे षष्टयां नेमेः पार्श्वः सुनिर्वृतः । सप्तम्यां पूर्णिमायांतु श्रेयान्निःश्रेयसङ्गतः॥ ५॥ अर्थ-श्रावण शुक्ल २ को सुमतिनाथ का गर्भ। ६ को नेमिनाथ का जन्म। ६ को नेमिनाथ का तप । ७ को पार्श्वनाथ का निर्वाण ।१५को श्रेयांसनाथ का निर्वाण ॥ भाद्रपद कृष्ण-भाद्रकृष्णस्य सप्तम्यां गर्भ शान्तिरवातरत् । अर्थ-भाद्रपद कृष्ण ७ को शान्ति नाथ का गर्भ। भाद्रपद शुक्ल-गर्भावतरणं षष्ठयां सुपाश्वस्य सितेऽभवत् ॥ ६ ॥ पुष्पदन्तस्य निर्वाणं शुक्लाष्टम्यांमजायत । "श्रितः शुक्ल चतुर्दश्यां वासु पूज्यः परं पदम् ॥७॥ अर्थ-भाद्रपद शुक्ल ६ को सुपार्श्वनाथ का गर्भ । ८ को पुष्पदन्त का निर्वाण । १४ को वासपज्य का निर्वाण॥ आश्विन कृष्ण-आश्विनेऽभूद्वितीयायां कृष्णेग नमः अर्थ-आश्विन कृष्ण २ को नमिनाथ का गर्भ । आश्विन शुक्ल-........... सिते। नेमे प्रतिपद्विज्ञान सिद्धोऽष्टम्यां च सिते शीतलः ॥८॥ -- .

चौबी० पूजन संग्रह . अर्थ-आश्विन शुक्ल १ को नेमिनाथ का ज्ञान । ८ को शीतलनाथ का निर्वाण कार्तिक कृष्ण-अनन्तः कार्तिक कृष्णे, गर्भेऽभूत्प्रतिपदिने । चतुर्थी सम्भवाधीशः केवलज्ञान माप्तवान् ॥ ९॥ पनप्रभस्त्रयोदश्यां प्राप्तोजन्म व्रतेशिवम् । दर्श वीरो अर्थ-कार्तिक कृष्ण-१ को अनन्तनाथ का गर्भ। ४ को सम्भव नाथ का ज्ञान । १३ पद्मप्रभ का जन्म । १३ को पद्मप्रभ का तप । ३० (अमावस्या) को महावीर का निर्वाण। ' 'द्वितीयायां कैवल्यं सुविधिस्तिथौ॥ १० ॥ षष्ठयों गर्भोऽभवन्नमेादश्यां केवलोद्भवः । अरनाथस्य पक्षान्त सम्भवेशस्य जन्म च ॥ ११ ॥ अर्थ-कार्तिक शुक्ल-२ को पुष्पदन्त का ज्ञान । ६ को नेमिनार्थका गर्भ । १२ को अरनाथ'का ज्ञान । १५ को सम्भव नाथ का जन्म ॥ मार्गशिर कृष्ण-मार्गे दशम्यां कृष्णेऽगाद्वीरोदीक्षां। अर्थ-मार्गशिर कृष्ण-१० को महावीर का तप । . कार्तिक शुक्ल + - . . - मार्गशिर शुक्ल- चौबी० पजन संग्रह संव . , . जनिव्रते। • सुविधेः पक्षनौशक्ले दशम्यांवरदीक्षणम् ॥ १२ ॥ एकादश्यां जनुर्दीक्षे मल्लेऑन नमस्तथा। अरजन्म चतुर्दश्यां पक्षान्त सम्भवव्रतम् ॥१६॥ ' अर्थ-मार्गशिर शुक्ल-१ को पुष्पदन्त का जन्म । १को पुष्पदन्तका तप । १°को अरनाथ का तप । ११ को मल्लिनाथका जन्म । ११को मल्लिनाथ का तप । ११ को नमिनाथ का ज्ञान । १४ को अर का जन्म । १५ को सम्भव का तप ॥ पौष कृष्ण-पौषकृष्णे द्वितीयायां मल्लिः कैवल्य मासदत् । चन्द्रप्रभस्तथा पार्श्व एकादश्यां ज़निवते ॥१४॥ शीतलस्तु चतुर्दश्यां कैवल्यमुदमीमिलत्। अर्थ-पौष कृष्ण-२ को मल्लिनाथ का ज्ञान । ११ को चन्द्रप्रभ स्वामी का जन्म । ११.को चन्द्र प्रभ स्वामी का तप । ११ को पार्श्वनाथ का जन्म। ११ को पाश्र्वनाथ का तप।११ को शीतल नाथ का ज्ञान पौष शुक्ल-शान्तिनाथो दशम्यां तु शुक्ले केवल्ये माप्तवान् ॥१५॥ एकादश्यान्तु कैवल्यम जितेशोजभनन्दनः। . . - पन . २० ។ चतुर्दश्यां पूर्णिमायां धर्मश्च लभतेस्मतत् ॥ १६ ॥ अर्थ-पौष शुक्ल१० को शान्तिनाथ का ज्ञान । ११ को अजित का ज्ञान । १४ को अभिनन्दन का ज्ञान । १५ धर्मनाथ का ज्ञान ॥ माघ कृष्ण-माघे पद्मप्रभः कृष्णे षष्ठयां गर्भमवातरत् । शीतलस्य जनुर्दीक्षे द्वादश्यां वृषभस्यतु ॥ १७ ॥ मोक्षोऽभवच्चतुर्दश्यां दर्श श्रेयांस केवलम् । अर्थ-माघ कृष्ण ६ को पद्मप्रभ का गर्भ । १२ को शीतलनाथ का जन्म । १२ को शीतल नाथका तप । १४ को ऋषभनाथ का निर्वाण । ३० (अमावस्या)को श्रेयांस काज्ञान। माघ शुक्ल-शुक्लपक्षे द्वितीयायां वासुपूज्यस्य केवलम् ॥१८॥ चतुर्थी विमलो जन्मदीक्षे षष्ठयां च केवलम् । नवम्यामजितो दीक्षां दशम्यां जन्म चासदत् ॥ १९ ॥ अभिनन्दननाथस्य द्वादश्यां जन्मनिष्कमौ। धर्मस्य जन्मतपसी त्रयोदश्यां वभूवतुः ॥ २०॥ अर्थ-माघ शुक्ल २ कोवासुपूज्य का ज्ञान।४को विमल नाथ का जन्म।४को विमलनाथ : का तप । ६ को विमलनाथ का ज्ञान ।९ को अजित नाथ का तप। १० को अजित , ,

.
-
चौबी०
पूजन
संग्रह
२१
.
नाथ का जन्म । १२ को अभिनन्दन का जन्म १२को अभिनन्दन कातप।१३ को
धर्मनाथ का जन्म । १३ को धर्मनाथ का तप ।
फाल्गुण कृष्ण-चतुर्थी फाल्गुणे कृष्णे मुक्तिं पद्मप्रभो गतः।
षष्ठयां सुपाश्वः कैवल्यं सप्तम्यां चाप निवृनिम्॥२१॥
सप्तम्या मेव केवल्यमोक्षौ चन्द्रप्रभोऽभजत् ।
नवम्यां सुविधिर्गभंमेकादश्यां तु केवलम् ॥ २२॥
वृषो जन्मवते तद्वच्छ्यान्मुक्तिं तु सुवतः ।
द्वादश्यां वासुपूज्यस्तु चतुर्दश्यां जनिव्रते ॥ २३ ॥
अर्थ-फाल्गुण कृष्ण ४ को पद्मप्रभ का निर्वाण । ६ को सुपार्श्व का ज्ञान ।७ को सुपार्श्व
का निर्वाण। ७ को चन्द्रप्रभ का ज्ञान ।७ को चन्द्रप्रभ का निर्वाण । ९ को
पुष्पदन्त का गर्भ । ११ को ऋषभदेव का ज्ञान । ११ को श्रेयांस का जन्म ।
११को श्रेयांसका तप । १२को मुनिसुव्रत का निर्वाण । १४को वासपूज्य का जन्म ।
१४ को वासुपूज्य का तप॥
फाल्गुण शुक्ल-अर-शुक्ले तृतीयायां गर्भ मल्लिस्तुनिवनिम्।
पञ्चम्यां प्रापदष्टम्यां गर्भ श्रीसम्भवोऽपि च ॥२४॥

" i चौबी० पूजन संग्रह २२ अर्थ-फाल्गुण शुक्ल ३ को अरनाथ का गर्भ। ५ को मल्लिका निर्वाण । ८को सम्भव नाथ का गर्भ। चैत्र कृष्ण-चैत्रे चतुया कृष्णेऽभूत्पार्श्वनाथस्य केवलम् । पञ्चम्यां चन्द्रभो गर्भमष्टम्यां शीतलोऽयत् ॥२५॥ नवम्यां जन्मतपसी वृषभस्य वभूवतुः । दशेऽनन्तस्य कैवल्यं मोक्षोऽरस्याऽभवत्तथा ॥ २६ ॥ अर्थ-चैत्र कृष्ण ४ को पार्श्वनाथ का ज्ञान । ५ को चन्द्रप्रभ का गर्भ । ८ को शीतलं का गर्भ।९ को ऋषभ का जन्म । ९ को ऋषभ का तप । ३०.(अमावस्या) को अनन्त का ज्ञान । ३० (अमावस्या) को अनन्त का मोक्ष । ३० (अमावस्या) को - 1. - अरनाथ को मोक्ष - चैत्र शुक्ल-शुक्ल प्रतिपदागर्भ मल्लिः कुन्थुस्तृतीयया । ज्ञानेऽजितोऽभूत्पञ्चम्यां मोक्षे षष्ठयां च सम्भवः ॥२७॥ ,.एकादश्यां जनिज्ञानमोक्षान्सुमति राप्तवान् । वीरः प्राप्तस्त्रयोदश्यां पद्माभोऽन्त्येहि केवलम् ॥२८॥ अर्थ-चैत्र शुक्ल १ को मल्लिनाथ का गर्भ । ३ को कुन्थुनाथ का ज्ञान । ५को अजित का ३ चौबी० पूजन 'संग्रह २३. - निर्वाण । ६को सम्भवका निर्वाण । ११को सुमतिका जन्म । ११को सुमतिका ज्ञान ११ को समति का निर्वाण । १३ को महावीरका जन्म।१५ को पद्मप्रभ का ज्ञान वैशाख कृष्ण-पार्वः कृष्णे द्वितीयायां वैशाखे गर्भमाविशत् । नवम्यां सुव्रतो ज्ञानं दशम्यां च जनिवते ॥ २९॥ धों गर्भ त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां नामः शिवम् । अर्थ-वैशाख कृष्ण २ को पार्श्वनाथ का गर्भ । ९ को मुनिसुव्रत नाथ का ज्ञान । १. को मुनिसुव्रत नाथ का जन्म । १० को मुनि सुवतनाथ का तप । १३ को धर्मनाथ का गर्भ । १४ को नमिनाथ का निर्वाण ॥ वैशाख शुक्ल-शुक्ल प्रतिपदि प्राप-कुन्थुर्जन्म तपः शिवम् ॥ ३० ॥ प्राप्तोऽभिनन्दनः षष्ठयां गर्भ मोक्षं च दीक्षणम् । नवम्यां सुमति:रो दशम्यां ज्ञान मक्षयम् ॥३१॥ अर्थ-वैशाख शुक्ल १ को कुन्थु का जन्म । १ को कुन्थु का तप। १ को कुन्थु का निर्वाणः। ६ को अभिनन्दन का गर्भ। ६ को अभिनन्दन का निर्वाण। ९ को सुमति का तप। १०.को महावीर का ज्ञान । ज्येष्ठ कृष्ण-श्रेयान ज्येष्ठऽसितेषष्ठयां दशम्यां विमलोऽपिच. . १ पोबी० . पजन संग्रह - गर्भ समाश्रितोऽनन्तो द्वादश्यां जन्मनिष्क्रमौ ॥ ३२॥ शान्तिः श्रितश्चतुर्दश्यां जन्म दीक्षा शिवश्रियम् । अमावास्या दिनेगर्भ मवतीणों जितेश्वरः ॥ ३३ ॥ अर्थ-ज्येष्ठ कृष्णदकोश्रेयांस का गर्भ। १ को विमलनाधका गर्भा१२को अनन्तनाथका जन्म। १२को अनन्तनाथका तप। १४को शान्तिनाथका जन्म। १४को शान्तिनाथ का तप १४को शान्ति नाथ को निर्वाण ३० (अमावस्या)को अजितनाथका गर्भ ॥ ज्येष्ठ शुक्ल-शुक्ल चतुर्थी निर्वाणं प्राप्तो धर्मो जिनेश्वरः । सुपार्श्वनाथो द्वादश्यां जनिप्रवजिते तियो । अर्थ-ज्येष्ठ शुक्ल ४ को धर्मनाथ का निर्वाण । १२ को सुपार्श्वनाथ का जन्म । १२ को सुपार्श्वनाथ का तप । इतीमां वृषभादीनां पुण्यां कल्याण मालिकाम् । करोति कण्ठे भूषां यः सस्यादाशाधरेडितः ॥ .

चौबी.
पूजन
संग्रह
२५
,
डानमः सिद्धेभ्यः।
अथ चतुर्विंशतितीर्थङ्कराणां सस्कृत पूजा लिख्यते ।
विघ्नौघाःप्रलयं यान्ति शाकिनी भूतपन्नगाः । विषं निर्विषतां याति पूज्यमाने जिनेश्वरे ॥१॥
डों जय जय जय नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु ।
णमो अरहन्ताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणम् । णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणम्।।२॥
प्रणम्य श्रीजिनाधीशं लब्बिसामस्त्यसयतम् । चतुर्विंशतितीर्थेशां वक्ष्ये पूजां क्रमागताम् ॥३॥
अथ आचार्य लक्षणम्-
दर्शन ज्ञान चारित्र संयुतो ममतातिगः।
प्राज्ञःप्रश्नसहश्च गुरुः स्यात्क्षान्तिनिष्ठितः॥४॥
अथ पजक लक्षणम्-
दश कालादिभावज्ञो निर्ममः श्रुद्धिमान्वरः ।
संदाण्यादिगुणोपेतः पूजकः सोत्र शस्यते ॥५॥
* यजमान लक्षणम् विनीतो बुद्धिमान्प्रीतो न्यायोपात्तधनो महान् ।
शीलादिगुणसंपन्नो यष्टा सोयं प्रशस्यते॥६॥
मण्डपलक्षणम् निर्मलं पृथुलं घण्टातारिकातोरणान्वितम् ।
प्रलंबत्पुष्पमालाढचं चतुर्धाकुम्भसंयतम् ॥७॥

चौबी० . जन संग्रह २६ , - भेरीपटहकशालतालमर्दल निःस्वनैः। आकुलं स्त्रैणगीताधैमण्डपं कारयेद्वधः ॥८॥ सामग्री लक्षणम्- स्वजात्योत्कर्षणी पूता नेत्रमानसहारिणी। सामग्री शस्यते सद्भिः पश्यतां मोंद कारिणी ॥९॥ स्वस्तिकं सर्षपं दूर्वानन्यावतं सुशोभनम् । दर्भमष्टद्रव्यं च स्वर्णपात्रेषु योजयेत् ॥१०॥ अथमनवचनकायशोधनम्- जिनसिद्धमहर्षीणामधं दत्त्वा श्रुभाप्तये। सकली करणं कृत्वा मनोवाकाय शोधनम् ॥ ११॥ अतोग्रेचतुर्विंशतिकास्नपनं क्रियते। हेमाचलनिभं शुभ्रमणिपीठं प्रभोज्वलम् । निवेशयामि तिर्थेशामभिषेकाय सद्भवि ॥१२॥ भूमिशोधनम्- श्रुद्धान्वयसमुत्पन्ना ये जिनाश्चित्रियान्विताः। विदधामि पुरस्तेषां वारिणा भूमिशोधनम् ॥ १३ ॥ * नोट--यजमान उसको कहते हैं जो अपने पाससे सामग्री या सामग्रीके वास्ते रुपये देकर दूसरे से भगवान का पूजन करवाता है। पीठ स्थापनम्- 1- चोषी० पूजन संग्रह २७ क्षीराब्धिजीवनर्देवैधौत यद्वहुशः पुरा। पीठ प्रक्षालनम्- तदंघ्रिपीटतीर्थेशां क्षालयामि शिवालयम् ॥१४॥ दशदिक्पालार्घदानम्- पुरुहुतादयो देवा हरिदन्तरवासिनः । गृह्णन्तु शेषयज्ञांशं समाश्रित्येष्टिभूमिकाम् ॥ १५ ॥ किंषस्थापनम्-यं सुरागौ सुरास्तोयैःशुद्धैरस्नापयन्मुदा। तद्विवं विष्टर स्थाप्यं यायज्मिकुसुमादिभिः॥ फलशस्थापनम्-तुग्धाब्धिपाथःसंपूर्णाल्लसत्पल्लवचर्चितान हैमराजतकुम्भौघानस्थापयाम्यभितोजिनान् तीर्थावकाभिषेक तीनिीतकवन्धः श्रीखण्डद्ववासितैःस्नापयामिजिनान्सर्वान्युसदभ्यर्चितामिकान् इक्षुरसाभिषेकः- सुस्वादिक्षुरसालादिरसः पीयूषभावितैः । अभिषिचेहंतःसर्वानशोषामरसेवितान्। घृताभिषेक:- शात कुम्भरसाभासः सुरभिघ्राणतर्पणः । आज्यैराप्लावये तीर्थेश्वरान् भव्यगुणार्णवान् दुग्धाभिषेक:- शीताशुविशार्दुग्धकोप्रक्षपुष्टिदै । विदधामि जिनेशानामभिषेकं भवापहम् ॥ दधिस्नपनम्- घनीभूतः सुधामन्ये राजतामन्त्र सङ्गतः। रसज्ञाहर्षदेः श्रुद्धेर्दधिभिः स्नापये जिनान् सर्वोषधिस्नपनम्-काश्मीरागुरुकालेयश्रीखण्डेलासुस्त्रामुखैः सर्वोषधिभिराइन्त्यं स्नपनं विदधाम्यहम् कलशाभिषेकः-शुद्धगन्नाम्बुसंपूर्णःस्वर्णकुम्भः प्रभावले विश्वान्ते विश्वतीर्थेशानभिषिञ्चे घहानये गंधास्नपनम्-इन्दिराजीवगर्भण शातकुम्भगयेन च । गन्धाम्बुपूर्णकुम्भेन जिनान् संस्नापयाम्यहम्।। ॥ इति चतुर्विंशतिकास्नपनम् ॥ MENT

चौबी०
पूजन
संग्रह
२८
अथ मण्डलमध्ये सुप्रतीक संस्थाप्य वसुट्रव्यैः प्रपूजयेत् ।
(अत्र क्षेत्र पालाय अर्घ दला पूजनं प्रारभ्यते)।
मण्डलसुप्रतीकस्तु स्थाप्यः पैत्तलकस्तथा। तस्योपरि नवंकास्यं भाजनं स्थापयेहुधः ॥ २६ ॥
तस्योपरि चतुर्विंशतीर्थकृत्प्रतिमां शुभाम् । संस्थाप्य पूजयित्तानु स्वस्तिकं पूजयेत्ततः ॥ २७ ॥
ततोग्रे सहस्रनामानि पठनीयानि ।
अथ जिनसहस्रनामस्तोत्रम्
स्वयंभुवेनमस्तुभ्यमुत्पाद्यात्मानमात्मनि । स्वात्मनेव तयोद्भुतं वृत्तये चित्तवृत्तये ॥ १ ॥
नमस्ते जगतां पत्ये लक्ष्मीभत्रे नमोनमः । विदांवर नमस्तुभ्यं नमस्ते वदतांवर ॥ २॥
कामशत्रुहणं देवमामनन्ति मनीषिणः । सामानमःमुरमालिनग्मालाभ्यर्चितकमम् ॥ ३॥
ध्यानदुर्घणनिर्भिन्नः घनघाती महातरुः । अनन्तभवसन्तानजयोप्यासीरनन्तजित् ॥ ४ ॥
त्रैलोक्यविजयेनोप्तदुर्दर्यमतिदुर्जयम् । मृत्युराज विजित्यासीज्जन्ममृत्युञ्जयो भवान् ॥ ५॥
विधूताशेषसंसारोबन्धुनोंभव्यवान्धवः । त्रिपरारिस्वमीशोसि जन्ममृत्यु जरान्तकृत् ॥६॥
त्रिकालविषयाशेषतत्स्वभेदात् त्रिधोच्छिदम् । केवलाख्य दधच्चक्षुस्त्रिनेत्रोसि खमीशिता ॥७॥

-
चौबी०
'बजन
संग्रह.
२९
न
वामन्धकान्तकं प्राहुर्मोहान्धासुरमर्दनात् । अद्धन्ते नरियो यस्मादधनारीश्वरोस्युत ॥८॥
शिवः शिवपदाध्यासाद् बुरितारिहरोहरः । शङ्करः कृतशं लोके संभवस्त्वं भवन्मुखे ॥९॥
वृषभोसि जगज्ज्येष्ठः गुरुर्गुरुगुणोदयः । नमियो नाभिसंभूतेरिक्ष्वाकुः कुलनन्दनः ॥ १० ॥
त्वमेकः पुरुषस्कन्धस्त्वं द्वे लोकस्य लोचने । त्वंत्रिधावुधसन्मार्गस्त्रिज्ञस्त्रिज्ञानधारकः ॥ ११ ॥
चतुःशरणमाङ्गल्यमूर्तिस्त्व चतुरः सुधी। पञ्चब्रह्ममयोदेवः पावनस्त्वं पुनीहि माम् ॥ १२ ॥
स्वर्गावतारिणे तुभ्यं सद्योजातात्माने नमः। जन्माभिषेकवामाय वामदेव नमोस्तुते ॥ १३ ॥
संनिकान्ताय घोराय परं प्रशममीयुषे। केवलज्ञानसंसिद्धविषाणाय नमोस्तुते ॥१४॥
पुरुस्तुत् पुरुषस्तुभ्यं विमुक्तिपदभागिने। नमस्तत्पुरुषावस्था भावनानघं विभ्रते ॥ १५॥
ज्ञानावरणनिर्हास नप्तस्तेनन्तचक्षुषे । दर्शनावरणोच्छेदान्नमस्ते विश्वदर्शने ॥ १६ ॥
नमो दर्शनमोहादिक्षायिकामलदृष्टये । नमश्चारित्रमोहने विरागायमहौजसे ॥ १७ ॥
नमस्तेऽनन्तवीर्याय नमोनन्तसुखाय ते । नमस्तेऽनन्तलाकाय लोकालोकविलोकिने ॥१८॥
नमस्तेऽनन्तदानाय नमस्तेऽनन्तलब्धये । नमस्तेऽनन्तभोगाय नमोऽनन्ताय भोगिने ॥ १९॥
नमः परमयोगाय नमस्तुभ्यमयोनये । नमः परमपूताय नमस्ते परमर्षये ॥ २० ॥
नमः परमविद्याय नमः परभवच्छिदे । नमः परमतत्त्वाय नमस्ते परमात्मने ।। २१ ॥
नमः परमरूपाय नमः परमतेजसे । नमः परममार्गाय नमस्ते परमेष्ठिने ॥ २२ ॥

- चौबी० 'पूजन संग्रह । परमद्धिजुषे धाम्ने परमज्योतिषे नमः । नमः पारेतमःप्राप्तधाम्ने ते परमात्मने ॥ २३ ॥ नमः क्षीणकलंकाय क्षीणवन्धनमोस्तुते । नमस्ते क्षीणमोहाय क्षीणदोषाय ते नमः ॥ २४ ॥ नमः सुगतये तुभ्यं शोभनागतमीयुषे। नमस्तेऽतीन्द्रियज्ञानसुखायानिन्द्रियात्मने ॥ २५॥ कायबन्धननिर्मोक्षादकायाय नमोस्तुते । नमस्तुभ्यमयोगाययोगिनामपि योगिने ॥ २६ ॥ अवेदाय नमस्तुभ्यमकषायाय ते नमः । नमः परमयोगीन्द्रवन्दिताघिदयायत ॥२७॥ नमः परमविज्ञान नमः परमसंयम । नमः परमहरदृष्टपरमार्थाय ते नमः ॥ २८॥ नमस्तुभ्यमलेश्याय शुक्ललेश्यांशकस्पृशे । नमो भव्येतरावस्थाव्यतीताय विमोक्षणे ॥ २९ ॥ संज्ञासंज्ञिद्वयावस्थाव्यतिरिक्तामलात्मने । नमस्ते वीतसंज्ञाय नमः क्षायकदृष्टये ॥३०॥ अनाहाराय तृप्ताय नमः परमभाजुये । व्यतीताशेषदोषाय भवाद्वैपारमीयुषे ॥३१॥ अजराय नमस्तुभ्यनमस्तेऽतीतजन्मने। अमृत्यवे नमस्तुभ्यमचलायाक्षरात्मने ॥ ३२ ॥ अलमास्तां गुणस्तोत्रमनन्तास्तावकागुणाः। त्वन्नामस्मृतिमात्रेण परमंशंप्रशास्महे ॥ ३३ ॥ प्रसिद्धाष्टसहस्रद्धलक्षणस्त्वं गिरांपतिः । नाम्नामष्टसहस्रेणवां स्तुमोभीष्टसिद्धये ॥ ३४ ॥ एवं स्तुत्वाजिनंदेवं भत्त्यापरमया सुधीः। पठेदष्टोत्तरं नाम्नां सहस्रं पापशान्तये ॥३५॥ अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ इति जिनसहस्रनाम स्तोत्रं ॥

चौबी० पजन संग्रह अथ जिनसहस्रनाम लिख्यते। - श्रीमान्स्वयंभूषभः शंभवः शंभुरात्मभूः । स्वयंप्र (भुः) भाप्रभु क्ताविश्वभरपुनर्भवः ॥३६॥ विश्वात्मा विश्वलोकेशोविश्वतश्चक्षुरक्षरः। विश्वविद्विश्वविद्यशोविश्वयोनिरनीश्वरः ॥ ३७॥ विश्वश्वा विभुर्धाता विश्वेशोविश्वलोचनः । विश्वव्यापी विधिधाः शाश्वतोविश्वतोमुखः॥३०॥ विश्वकर्मा जगज्ज्येष्ठोविश्वमूर्तिर्जिनेश्वरः। विश्वविश्वभूतेशोविश्वज्योतिरनीश्वरः ॥ ३९ ॥ जिनोजिष्णुरमेयात्मा विष्णुरीशोजगत्पतिः । अनन्तजिदचिंत्यात्माभव्यबंधुरबंधनः ॥ १० ॥ युगादिपुरुषोब्रह्मापंचब्रह्ममयःशिवः । परम्परतरः सुक्ष्मः परमेष्ठीसनातनः ॥४१॥ स्वयं ज्योतिरजोऽजन्मा ब्रह्मयोनिरयोनिजः । मोहारिविजयीजेताधर्मचक्री दयाध्वजः ॥ ४२ ॥ प्रशांतारिरनंतात्मायोगीयोगीश्वरार्चितः। ब्रह्मविब्रह्मतत्वज्ञोब्रह्म याविद्यतीश्वरः ॥ १३॥ सिद्धोबुद्धाप्रबुद्धात्मा सिद्धार्थः सिद्धशासनः। सिद्धसिद्धान्तविद्ध्येयःसिद्धसाध्योजगद्धितः ।। सहिष्णुरच्युतोऽनंतः प्रभविष्णुर्भवोद्भवः प्रभूष्णुरजरोजर्यात्राजिष्णु(श्वरोव्ययः ॥ ४५ ॥ विभावसुरसंभूष्णुः स्वयंभूष्णुः पुरातनः। परमात्मा परंज्योतिस्त्रिजगत्परमेश्वरः॥४६॥ इति श्रीमदादिशतम् ॥१॥ अर्धनिर्वपामीति स्वाहा ।

-
चौबी.
पजन
संग्रह
३२
दिव्यभाषापतिर्दिव्यः पूतवाक्पूनशासनः। पूतात्मा परमज्योतिधर्माध्यक्षोदमीश्वरः ॥ ४७॥
श्रीपतिर्भगवानहन्नरजाविरजाः शुचिः । तीर्थकृत्तवलीशानः पूजाहःस्नातकोऽमलः ॥४८॥
अनंतदीप्तिर्ज्ञानात्मास्वयंबुद्धः प्रजापतिः। मुक्तःशक्तोनिराबाधोनिष्कलोभुवनेश्वरः ।। ४९ ॥
निरंजनोजगज्ज्योतिनिरुक्तोक्तिनिरामयः। अचलस्थितिरक्षोभ्याकूटस्थः स्थाणुरक्षयः॥ ५० ॥
अग्रणीामणीनेता प्रणेता न्यायशास्त्रकृत्। शास्ताधर्मपनिर्द्धर्मोधर्मात्माधर्मतीर्थकृत् ॥ ५१ ॥
वृषध्वजोवृषाधीशोवृषकेतुर्वृषायुधः। वृषोवृषपतिर्भावृषभांकोवृषोद्भवः॥ ५२ ॥
हिरण्यनाभिर्भूतात्माभूतभृद्भूतभावनः। प्रभवोविभवोभास्वानभवोभावो भवांतकः ॥ ५३ ॥
हिरण्यगर्भःश्रीगर्भःप्रभूतविभवोद्धवः । स्वयंप्रभुः प्रभूतात्मा भूतनाथोजगत्प्रभुः॥ ५४॥
सर्वादिः सर्वहक्सर्वः सर्वज्ञः सर्वदर्शनः । सर्वात्मासर्वलोकेशः सर्ववित् सर्वलोकजित् ॥ ५५ ॥
सुगतिःसुश्रुतःसुश्रुक्सवाकसू रिर्बहुश्रुतः । विश्रुनोविश्वतः पादोविश्वशीर्षः शुचिश्रवाः॥ ५६ ॥
सहस्रशीर्षः क्षेत्रज्ञः सहस्राक्षः सहस्रपात् । भूतभव्यभवद्भर्ता विश्वविद्यामहेश्वरः ॥ ५७॥
इति दिव्यादि शतम् ॥२॥ अर्ध निर्वपामीपि स्वाहा।
स्थविष्ठः स्थविरोज्येष्ठः प्रष्ठः प्रेष्ठोवरिष्ठधी।स्थेष्ठोगरिष्ठोबहिष्ठः श्रेष्ठोनिष्ठोगरिष्ठगीः॥
विश्वभृद्विश्वसृटविश्वविश्वभुग्विश्वनायकः। विश्वाशीविश्वरूपात्मा विश्वजिद्विजितान्तकः॥५९
विभवोविभयोवीरोविशोकोविजरोजरन्। विरागोबिरतोऽसंगोविविक्कोवीतमत्सरः ॥६०॥

चौबी० पजन संग्रह ३३ - - विजेयजनताबन्धुर्विलीनाशेषकल्मषः । वियोगोयोगविद्विद्वान्विधातासुविधिः सुधीः॥६१॥ क्षांतिभापृथिवीमूर्तिः शांतिभाक्सलिलात्मकः । वायुमूर्तिरसंगारमावन्हिमूर्तिश्चधर्मधृक् ॥६॥ सुयज्वायजमानात्मासुवासुत्रामपूजितः! ऋविग्यज्ञपतिर्यज्ञो यज्ञांगममृतंहविः ॥ ६६ ॥ व्योममूर्तिरमूर्तास्मानिलेपोनिर्मलोचलः । सोममूर्तिःसुसौम्यात्मासूर्य मूर्तिमहाप्रभः ॥ ६४ ॥ मंत्रविन्मत्रकृन्मंत्रीमंत्रमूर्तिरनंतकः । स्वतंत्रस्तंत्रकृत्स्वांतः कृतांतांतः कृतांतकृत् ॥६५॥ कृती कृतार्थः सत्कृत्यः कृतकृत्यः कृतक्रतुः । नित्योमृत्युंजयोमृत्युरमृतात्मामृतोद्भवः॥६६॥ ब्रह्मनिष्ठः परंब्रह्मब्रह्मात्मा ब्रह्मसंभवः। महाब्रह्मपतिब्र टू महाब्रह्मपदेश्वरः ॥१७॥ सुप्रसन्नः प्रसन्नात्मा ज्ञानधर्मदमप्रभुः प्रशमात्माप्रशांतांत्मापुराणपुरुषोत्तमः ॥ ६८ ॥ ' ॥इतिस्थविष्ठादिशतं । अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ महाशोकध्वजोशोकःकःस्रष्टापनविष्ठरः। पोशःपद्मसंभूतिः पानाभिरनुत्तरः॥ ६९ ॥ पद्मयोनिर्जगद्योनिरित्यः स्तुत्यः स्तुतीश्वरः । स्तवना)हषीकेशोजितजेयःकृतक्रियः ॥ ७॥ गणाधिपोगणज्येष्ठोगण्यः पुण्योगपापणीः । गुणाकरोगुणांभोधिर्गुणज्ञोगुणनायकः॥७१। गुणादरी गुणोच्छेदी निर्गुणः पुण्यगीर्गुणः। शरण्यः पुण्यवाक्पूतोवरेण्यःपुण्यनायकः ॥ ७२ ।। अगण्यः पुण्यधीगुण्यः पुण्यकृत्पुण्यशासनः। धर्मारामोगुणग्रामःपुण्यापुण्यनिरोधकः ॥७३॥ पापापेतोविपापारमाविपाप्मावीतकल्मषः । निद्वंद्वोनिर्मदःशांतोनिर्मोहोनिरुपद्रवः ॥ ७ ॥ - ॥

- चौबी पजन संग्रह । ३४ . निनिमेषोनिराहारो निःक्रियोनिरुपप्लवः । निष्कलंकोनिरस्तैनानिधूतांगोनिरास्रवः ॥७५ ॥ विशालोविपुलज्योतिरतुलोचिंत्यवैभवः । सुसंवृत्तः सुगुप्तात्मा सुवृत्सुनयतत्ववित् ॥ ६ ॥ एकविद्योमहाविद्योमुनिः परिवृढः पतिः । धीशोविद्यानिधिः साक्षीविनेताविहतांतकः ॥ ७७॥ पितापितामहःपातापवित्रः पावनोगतिः । त्राताभिषग्वरोवर्योवरदः परमः पुमान् ॥ ७८॥ कविःपुराणपुरुषोवर्षीयान्वृषभः पुरु. प्रतिष्ठाप्रभवोहेतुर्भुवनैकपितामहः ॥७९॥ ॥ इति महादिशतं । अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ श्रीवृक्षलक्षणःश्लक्ष्णोलक्षण्यः शुभलक्षणः । निरक्षःपुण्डरीकाक्षः पुष्कलःपुष्करेक्षणः॥ ८०॥ सिद्धिदःसिद्धसंकल्पः सिद्धारमा सिद्धिसाधनः । बुद्धबोध्योमहाबोधिवर्धमानोमहर्धिकः ॥ ८१॥ वेदांगोवेदविद्वद्योजातरूपोविदांवरः । वेदवेद्यः स्वसंवेद्योविवेदोवदतांवरः ॥ ८२॥ अनादिनिधनोव्यक्तोव्यक्तवाकव्यक्तशासनः । युगादिकृयुगाधारो युगादिर्जुगदादिजः ॥८३ ॥ अतींद्रोतींद्रियोधींद्रोमहेन्द्रोऽनींद्रियार्थहक । अनिद्रियोऽहमिंद्राच्योमहेंद्रमहितोमहान् ॥४॥ उद्भवः कारणकर्तापारगोभवतारकः । अगायोगहनंगुह्यं पराध्यःपरमेश्वरः॥८५॥ अनंतर्द्धिरमेयर्द्धिरचिंत्यद्धिः समग्रधीः । प्रायःप्रायहरोभ्यायः प्रत्यप्रयोग्रयोऽग्रिमोग्रजः ॥ महातपामहातेजामहोदकामहोदयः। महायशामहाधामामहासत्वोमहाधृतिः ॥८७॥ महाधैर्योमहावीर्योमहसंपन्महाबलः । महाशक्तिर्महाज्योतिर्महाभूतिर्महाद्युतिः।। ८८ ॥ .

, चौबी० पजन संग्रह ३५ - - महामतिर्महानीतिर्महाक्षांतिमहोदयः। महाप्राज्ञोमहाभागो महानंदोमहाकविः॥ ८९॥.। महामहामहाकीर्तिमहाकांतिमहावपुः। महादानोमहाज्ञानोमहायोगोमहागुणः ॥९॥ महामहपतिःप्राप्नमहाकल्याणपंचकः । महाप्रभुमहाप्रातिहार्याधीशोमहेश्वरः ॥११॥ इति श्रीवृक्षादि शतम्। अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । महामुनिमहामौनीमहाध्यानीमहादमः। महाक्षमोमहाशीलोमहायज्ञोमहामखः ॥ १२ ॥ महाव्रतपतिर्मह्योमहाकांतिधरोऽधिपः । महामंत्रीमयोऽमेयोमहोपायोमहोदयः ॥ ९३ ॥ महाकारुणिकोमंतामहामंत्रीमहायतिः महानादोमहाघोषोमहेथ्योमहसांपतिः॥ ९४ ॥ महाध्वरधरोधुर्योमहोदायोंमहेष्टवाक् । महात्मामहसांधाममषिर्महितोदयः ॥१५॥ महाक्लेशांकुशःशूरोमहाभूतपतिगुरुः। महापराक्रमोऽनंतोमहोक्रोधरिपुर्वशी॥ ९६ ॥ महाभवाब्धिसंतारिमहामोहाद्रिसूदनः । महागुणाकरःक्षातोमहायोगीश्वरः शमी ॥९७॥ महाध्यानपतिातामहाधर्मामहाव्रतः। महाकर्मोऽरिहात्मज्ञोमहादेवोमहेशिता ॥९८॥ सर्व क्लेशापहः साधुःसर्वदोषहरोहरः । असंख्ययोऽप्रमेयात्माशमात्माप्रशमाकरः॥ ९९ ॥ सर्वयोगीश्वरोचिंत्यः श्रुतात्माविष्टरश्रवाः। दांतात्मादमतीर्थेशोयोगात्माज्ञानसर्वगः ॥ १० ॥ , प्रधानमात्मा प्रकृतिः परमः परमोदयः। प्रक्षीण बन्धःकामारिः क्षेमकृत्क्षेमशासनः॥१०१॥ प्रणवः प्रणयः प्राणः प्राणदः प्रणतेश्वरः।प्रमाणप्रणिधिदक्षोदक्षिणोऽध्वर्युरध्वरः॥ १०२॥ ॥

चौबा०
पजन
संग्रह
३६
--
-
आनंदोनंदनोनंदोवंद्योनियोभिनदनः। कामहाकामदः काम्यः कामधेनुररिज्जयः ॥१०३॥
इति महा मुन्यादि । अर्घ निपामोति स्वाहा ।
असंस्कृतसुसस्कारोप्राकृतोवकृतांतकृत् । अंतकृकांतगुः कांतश्चिन्तामणिरभीष्टदः ॥१०४॥
अजितोजितकामारिरमितोमितशासनः । जित काधाजितामित्राजितक्लेशोजितांतकः ।। १०५॥
जिनेंद्रः परमानंदोमुनींद्रोदुंदुभिस्वनः । महेंद्रवंद्योयोगींद्रोयतींद्रोनाभिनंदनः ॥ १०६ ॥
नाभेयोनाभिजोऽजातः सुबतोमनुरुत्तमः। अभेद्योऽनत्ययोनाश्वानधिकोधिगुरुः सुधीः ॥ १०७॥
सुमेधा विक्रमीस्वामीदुराधोंनिरुत्सुकः । विशिष्टः शिष्टभुशिष्टः प्रत्ययःकर्मणोनघः॥
क्षेमीक्षेमकरोक्षय्यःक्षेमधर्मपतिःक्षमी । अग्राह्योज्ञाननिग्राह्योध्यानगम्योनिरुत्तरः ॥१०९ ।।
सुकृतीधातुरिज्याहः सुनयश्चतुराननः । श्रीनिवासश्चतुर्वक्रश्चतुरास्यश्चतुर्मुखः १०१
सत्यात्मासत्यविज्ञानः सत्यवाक्सत्यशासनः । सत्याशी सत्यसंधानःसत्यासत्यपरायणः ॥ १११ ॥
स्थेयानस्थवीयान्नेदीयान्दवीयान्दूरदर्शनः । अणोरणोयाननणुर्गुरुरायोगरीयसाम्॥११२॥
सदायोगः सदाभोगः सदातृप्तः सदाशिवः। सदागतिः सदासौख्यःसदाविद्यः । सदोदयः ॥११३॥
सुघोषः सुमुखः सौम्यः सुखदः सुहितः सुहृत्। सुगुप्नोगनिभृद्गोप्तालोकाध्यक्षोदमेश्वरः ॥११४॥
॥ इति असंस्कृतशतं । अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥
बृहन्बृहस्पतिवामीवाचस्पतिरुदारधीः। मनीषीधिषणोधीमानशेमुषीशोगिरांपतिः ॥११५॥

चौबी० पजन संग्रह ३७ - . नेकरूपोनयस्तुगोनैकात्मानकंधर्मकृत् । अविज्ञेयोप्रतात्माकृतज्ञः कृतलक्षणः ॥ ११६ ॥ ज्ञान गोंदयाग रत्नगर्भःप्रभास्वरः । पद्म गर्भोजगद्गोंहेमगर्भःसुदर्शनः ॥ ११७ ॥ 'लक्ष्मीवांस्त्रिदशाध्यक्षोद्रगढीयाजिनईशिता । मनोहरोमनोज्ञांगोधीरोगंभीरशासनः॥ ११८ ॥ धर्मयूपादयायागोधर्मनेमिर्मुनीश्वरः । धर्मचक्रायुधोदेवःकर्महाधर्म घोषणः ॥ ११९ ॥ अमोघवागमोघाज्ञःनिर्मलोमोघशासनः। सुरूपःसुभगस्त्यागीसमयज्ञःसमाहितः ॥ १२० ॥ सुस्थितःस्वास्थ्यभास्वस्थोनीरजस्कोनिरुद्धवः । अलेपोनिष्कलकारमावीतसंगोगतस्पृहः ॥ १२१॥ वश्येंद्रियोविमुकात्मानिःसपल्गेजितेंद्रियः। प्रशांतीनंतधामर्षिमंगलंमलहानघः ॥ १२२ ॥ अनीहगुपमाभूतोदृष्ठिर्देवमगोचरः ।अमूर्तोमूर्तिमानेकोनैकोनानकतत्त्वहक् ॥ १२३ ॥ अध्यात्मगम्यागम्यात्मा योगविद्योगिवंदितः । सर्वत्रगःसदाभावीत्रिकालविषयार्थदृक् ॥ १२४ ॥ शंकरःशंवदोदान्तोदमीक्षांतिपरायणः । अधिपःपरमानंदापरात्मज्ञःपरात्परः ॥ १२५॥ त्रिजगबल्लभोभ्यय॑स्त्रिजगन्मंगलोदयः। त्रिजगत्पतिपूज्यांधूिस्त्रिलोकायशिखामणिः । इति बृहदादि शतम् । अर्घ निर्वामीति स्वाहा। त्रिकालदर्शीलोकेशोलोकधातादृढव्रतः। सर्वलोकातिगःपूज्यःसर्वलोकैकसारथिः ॥ १२७॥ पुराणपुरुष-पूर्व कृतपूर्वाङ्गविस्तरः । आदिदेव पुराणाद्यःपुरुदेवोधिदेवता ॥ १२८॥ युगमुख्योयुगज्येष्ठोयुगादिस्थितिदेशकः । कल्याणवर्ण कल्याण कल्याकल्याणलक्षणः ॥ । -

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चौबी०
पूजन
संग्रह
३८
कल्याणप्रकृतिर्दीप्तःकल्याणारमाविकल्मषः । विकलंकःकलातीतः कलिलनःकलाधरः॥१३०॥
देवदेवोजगन्नाथोजगबंधुर्जगद्विभुः । जगद्धितैषीलोकज्ञः सर्वगो जगदग्रजः ॥ १३१ ॥
चराचरगुरुगोप्योगूढात्मागूढ गोचरः । सद्योजातःप्रकाशात्माज्वलज्ज्वलनसप्रभः ।। १३२ ॥
आदित्यवर्णोभर्माभःसुप्रभःकनकप्रभः। सुवर्णवर्णोरुक्माभःसूर्यकोटिसमप्रभः ॥ १३३॥ .
तपनीयनिभस्तुंगोवालार्काभोनलप्रभः। संध्याभ्रवर्हमाभस्तप्तचामीकरच्छविः ॥ १३४ ॥
निष्टप्तकनकच्छायाकनकांचनसन्निभः। हिरण्यवर्णःस्वाभःशातकुंभनिमप्रभः ॥१३५॥
द्युम्नभाजातरूपाभोदीप्नजांवूनद्युतिः। सुधौतकलधौतश्री:प्रदीप्तोहाट न्युतिः ।।१३६ ।।
शिष्टेष्टःपुष्टिदःपुष्टःस्पष्टःस्पष्टाक्षरक्षमः । शत्रुघ्नोप्रतिघोमोघःप्रशास्ताशासितास्वभूः ॥
शांतिनिष्ठोमुनिज्येष्ठ शिवतातिःशिवप्रदः। शांतिदःशांतिकृच्छांतिःकांतिनानकामितप्रदः
श्रेयोनिधिरधिष्ठानमप्रतिष्टःप्रतिष्ठितः । सुस्थितःस्थावरः स्थाणुःप्रथीयान् प्रथितःपृथुः॥
इति त्रिकालदर्यादि शतम् ।अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा।
दिग्वासावातरसनोनियंथेशोदिगम्बरः । निष्किंचनोनिराशंसोज्ञानचक्षुरमोमुहः ॥ १४ ॥
तेजोराशिरनंतौजः ज्ञानाब्धिः शीलसागरः। तेजोमयोऽमितज्योतिज्योतिर्मूर्तिस्तमोपहः ॥ १४१
जगच्चूडामणिर्दीप्तः सर्व विघ्नविनायकः । कलनिकर्मशत्रुघ्नोलोकालोकप्रकाशकः ॥१४२॥
अनिद्रालुरतंद्रालुजीगरूकःप्रमामयः । लक्ष्मीपतिजगज्ज्योतिर्धर्मराजःप्रजाहितः ॥ १४३॥

चौबी०
पूजन
संग्रह
३९
॥
मुमुक्षबंधमोक्षज्ञोजिताक्षोजितमन्मथः। प्रशांतरसशैलूषोभव्यपेटकनायकः ॥१४४॥
मूलकर्ताखिलज्योतिर्मलघ्नोमूलकारणः। आप्तोवागीश्वरम्श्रेयानश्रेयसोक्तिनिरुक्तवाक्॥१४५॥
प्रवक्तावचसामीशोमार जिद्विश्वभाववित् । सुतनुस्तनुनिर्मुक्तःसुगतोहतदुनयः॥ १४६ ॥
श्रीशःश्रीश्रितपादाब्जोवीतभीरभयंकरः। उत्सन्नदोषोनिर्विघ्नोनिश्चलोलोकवत्सलः॥
लोकोत्तरोलोकपतिलोकचक्षुरपारधीः । धीरधीवुद्धसन्मार्गःशुद्धःसूनृतपूतवाक् ॥ १४८।।
प्रज्ञापारमितःप्राज्ञोयतिनियमितेंद्रियः । भदंतोभद्रकृद्भद्रकल्पवृक्षोवरप्रदः ॥ १५९ ॥
समुन्मूलितकारिःकर्मकाष्ठाशुगुक्षणीः । कर्मण्यःकर्मठःप्रांशुहेयोदेयविचक्षणः ॥ १५०॥
अनंतशक्तिरच्छेद्यस्त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः । त्रिनेत्रत्र्यंबकस्न्यक्षःकेवलज्ञानवीक्षणः ॥ १५१ ॥
समंतभद्रःशांतारिधर्माचार्योदयानिधिः । सक्ष्मदर्शीजितानंगःकृपालुर्धर्मदेशकः ॥१५२॥
इति दिग्वसादि शतम् । अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
शुभंयुःसुखसाद्भूतःपुण्यराशिरनामयः'। धर्मपालोजगत्पालोधर्मसाम्राज्यनायकः॥१५३॥
धाम्नांपते तवामूनि नामान्यागमकोविदः । समुच्चितान्यनुध्यायन्पुमान् पूतस्मृतिर्भवेत् ॥
गोचरोपि गिरामासां समवाग्गोचरो मतः । स्तोता तथाप्यसंदिग्धं त्वत्तोभीष्टफलं लभेत् ॥ १५५॥
त्वंमतोसिजगबंधुस्त्वंमतोसिजगद्भिषक् । त्वंमतोसिजगद्धातात्वंमतोसिजगद्धितः ॥१५६ ॥
त्वमेकंजगतांज्योतिस्त्वंद्रिरूपोपयोगभाक् । त्वंत्रिरूपेकमुक्त्यंग सोत्यानंतचतुष्टयः ॥ १५७॥

- चौबी० पजन संग्रह में ४० त्वं पंचब्रह्मतत्वात्मापंचकल्याणनायकः । षड्भेदभावतत्वज्ञस्त्वं सप्तनयसंग्रहः॥१५८ ॥ दिव्याष्टगुणमूर्तिस्त्वं नवकेवललब्धिकः । दशावतारनिर्धार्यों मांपाहि परमेश्वर ॥ १५९॥ युष्मन्नामावलींहब्धाविलसत्स्तोत्रमालया। भवंतवरिवस्यामःप्रसीदानुगृहाणनः॥१६० ॥ इदंस्त्रोत्रमनुस्मृत्यपूतोभवतिभाक्तिकः । यःसपाठपठत्येनंसस्यात्कल्याणभाजनं ॥१६१॥ ततःसदेदंपुण्यार्थीपुमान्पठतुपुण्यधीः । पौरुहूतींश्रियंप्राप्तुंपरमामभिलाषुकः॥१६२ ॥ स्तुत्वेतिमघवादेवंचराचरजगद्गुरुं । ततस्तीर्थविहारस्यव्यधात्प्रस्तावनामिमाम् ॥ १६३०॥ भगवन्भव्यशस्यानांपापावग्रहशोषणम् । धामृतप्रसेकास्यास्त्वमेवशरणंप्रभो ॥१६४॥ भव्यसार्थाधिपःप्रोद्ययाध्वजविराजितः।धर्मचक्रमिदंवजंत्वंजयोद्योगसाधनः ॥ १६५ ॥ नियमोहवृत्तान्तं मुक्तिमार्गपरोधनी । तवोपदिष्टसन्मार्गकालोऽयंसमुपस्थितः॥१६६ ॥ इतिप्रबुद्धतत्त्वस्य स्वयंभ जिगीषतः पुनरुक्तंतदा वाचा प्रादुरासीच्च तत्कृता।। १६७ ।। कृतानिजिनसेनेनजिननामानिसार्थकम् । अष्टोत्तरसहस्राणिसवाभीष्टकराणिच ॥१६८ ॥ तंदेवंत्रिदशाधिपार्चितपदंघातिक्षयानतरं । प्रोत्यानंतचतुष्टयंजिनमिमभव्याजनीनामिनम्।।१६९॥ मानस्तंभविलोकनानतजगन्मान्यंत्रिलोकीपति । प्राप्ताचिंत्यवहिर्विभूतिमनघंभक्त्याप्रवंदामहे ॥ इति श्रीजिनसेनाचार्यविरचितं जिनाष्टोत्तर सहस्रनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

बी अथ चतुर्विंशतितीर्थकराणां समुच्चयपूजा प्रारभ्यते। ३ ४१ ये जित्वा निजकर्म कर्कशरिपून कैवल्यमाभेजिरे, दिव्येनध्वनिनाववोधनिखिल चक्रम्यमाणं जगत् । प्राप्ता निर्वृतिमक्षयामतितरामन्तातिगामादिमां, यक्षे तान् वृषभादिकान् जिनवरान् वृषभादिवीरान्तकान् ॥२८॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवर्द्धमानान्तास्त्रीर्थङ्करपरमंदेवा अत्रवितरतावतरत संवौषट् ।आह्वाननम् । ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवर्द्धमानान्तास्तीर्थङ्करपरमदेवा अत्र तिष्ठत तिष्ठत ठाठःस्थापनम् ॥ ॐह्रींवृषभादि वर्द्धमानान्तास्तीर्थङ्करपरमदेवा अत्र मम सन्निहिताभवतभवत वषट्सन्निधीकरणम् अथाष्टकम्। सुरसरिज्जलनिर्मलधारया जन्ममृत्यु जरामयवारया। विविधदुःख निवारणकारणं परियजे जिनराजपदांबुजम् ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवर्द्धमानपर्यंत चतुर्विशति तीर्थकरेभ्यो जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ चन्दन अतिसुगन्ध सुचन्दनपावनैरगुरुकुंकुमसार विलेपनैः। - । .

चौबी० पूजन संग्रह अक्षता:-- ४२ पुष्प- नैवेद्य-- भवभयातपदुःख निवारणं जिनपतेश्चरणं परिपूजये ॥२॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवीरान्त जिनेभ्यश्चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ॥ सलिलक्षालित तण्डुलपुष्पकैः सुमनसामपि मानसमोदकैः । विविधदुःखनिवारणकारणं परियजे जिनराजपदाजकम् ॥३ ॐ ह्रीं वृपभादिवीरान्त जिनेभ्यो ऽक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥ कमलकेतकिकुञ्जकदम्बकैः जिनपतिं जितमारमहंयजे। भवभयातपदुःखनिवारणं जिनपतेश्चरणं परिचर्चये ॥४॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवीरान्त जिनेभ्यः पुष्पाणि निर्वपामीति स्वाहा । सरसघेवरपायसमोदकै रतिसुगन्धघृतैरसनप्रियः। परमकाञ्चनपात्रगतैरहं जिनपति क्षुद्रोगहरंयजे॥ ५॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवीरान्तजिनेभ्यो नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा॥ घृतसुस्नेहभवैवरदीपकः सकलदिकसुप्रकाशनकारकैः । विमलवोधमयं तमोनाशकं प्रतिदिनं जिनपं परिपूजये ॥६॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवीरान्तजिनेभ्यो दीपान निर्वामीति स्वाहा ॥ अगुरुचन्दनगन्धशिलारसैःभ्रमरषट्पदनादसनादितः । .. दीप:-- M : - . चौबी० पजन 1 संग्रह ४३ प्रवरपुण्य सुगन्धविराजितं जिनपति जितगन्धभरयजे ॥७॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवीरान्तजिनेभ्यो धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ फलं. कमुकनियुकदाडिममोचकैः फलभरेरपरेः रसमाश्रितः ।। परममोक्षफल प्रतिपत्तये शतमखैमहितं जिनपं यजे ॥८॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवीरान्त जिनेभ्यः फलानि निर्वपामीति स्वाहा । अर्घः-- जलसुचन्दन तण्डुलपुष्पकैः घृतवरैर्वरदीपकधूपकः । फलभरैर्जिनराजपदाम्बुजे परियजेऽविधानप्रधानतः ॥९॥ ॐ ह्रीं वृषभादिवीरान्तजिनेभ्योऽघ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ जयमाला। नाभेयादिचतुष्क विंशतिजिनाः लोकाग्रभागेस्थिताः पापाल्यःस्मरणाद्वजन्ति विलययेषां क्षणान्नामतः । ते कुर्वन्तु सुमङ्गलं मुनि गण राराधनीयाश्चवोभव्यानामिह पूजिताश्चं विमलाध्येयाः स्तुताःसं भिताः॥१॥ पीतप्रभ श्रीवृषभंहिदेवं वन्देवृषाङ्क सुरनाथसेव्यं । स्तोष्य जितहाटकों यथार्थ कर्मघ्नतोनागध्वजं कृतार्थम् ॥ २॥ श्रीसंभवनौमिगुणैर्गरिष्ठं वाहाङ्कितं गौरतर्नु वरिष्ठं । सेव्यभि- नन्धं कपिचिह्नधारं गाङ्गेयभं मुक्तिगृहाप्तसारम् ॥३॥ कोकाङ्कितं श्रीसुमतिं गणेशंपीतच्छविं नोमि ४४ - - चौबी. 'हरिं जिनेशं । पनप्रभं स्तौमिविभु जिनेन्द्रं पद्मध्वज रक्तभमानतेन्द्रम् ॥नीलच्छविं स्वस्तिकलक्ष्मधारं पूजन 'वन्दे सुपाश्चममतापकारम् ॥ चन्द्रप्रभ चन्द्रसमानभासं चन्द्राङ्कितनौमिहताशपाशम् ॥ ५॥ श्रीपुष्प संग्रह दन्तसितकान्तमन्तम् मीनध्वजं स्तौमि गुणैरनन्तम् । हेमद्युतिं शीतलमातिहारं श्रीवृक्षचिहुं परि नौमि सारम् ॥ ६ ॥ श्रेयांसमीशं वरगण्डकेतुं पीतप्रभं स्तौमि भवाब्धिसेतुम् । श्रीवासुपूज्यं वरशोण भासं वन्दे लुलायाङ्कधरं गताशम् ॥ ७॥ दोषविहीनं विमलं स्तुवेऽहं सत्सूकरावं श्रुभगौरदेहम् । वन्दे ह्यनन्तं किल चम्पकाभं सेधाङ्कितं पञ्चमलब्ध लाभम् ॥ ८॥ धर्म जिनेशं कनकावदातं वज्राङ्कितं 'नौमि शिवाप्तशातम् । शान्ति मृगाईं तपनीयगात्रं वन्दे क्षमासत्यसुधर्मपात्रम् ॥९॥ कुन्थुप्रभु स्तौमि सुहेमकांर्ति छागाङ्कितं लम्भितकर्मशान्तिमावन्देऽरनाथ कनक प्रभासं पाठीनचिढं सुगुणावकाशम्।१०। नीलोत्पलाईनमिमर्थिमान्य पीतप्रभं नौमि सुमुक्तधान्यम्। शंखाङ्कितं. नेमिजिनेन्द्रराजंकृष्णप्रभस्तौमि गिरीन्द्रराजम् ॥११॥ पार्श्व भुजङ्गाङ्कमहं सुशान्तं नील प्रभं स्तोमि हृषीककान्तम् । श्रीवर्धमानंबहुव र्द्धमानं सिंहाङ्कितं नौमि सुरेशगानम् ॥ १२॥ इति जिन जयमालां पावनां वर्णसारांपठति विमलवुद्धया प्रातरुत्थाय नित्यम्। सुरहरिहयकी| कीर्तितां यो विश्रुद्धां स भवति नितरां वैस्वर्गरामाक्षिपूज्यः ॥१३॥ पत्ता छन्दः-सकल गुणसमृद्धान् केवलज्ञानश्रुद्धान् । सुमतिजनपयोधीन ते हि मांदत्तसिद्धीन्॥१४॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभादिवईमान तीर्थङ्कर परमदेवेभ्योऽधं निर्वपामीति स्वाहा। इति चतुर्विशति तीर्थङ्करसमुच्चयपूजा- समाप्ता । - चोबी० पूजन संग्रह ४५ - + अथ श्रीऋषभदेवपूजाप्रारभ्यते। स्वामिन् संवौषट् कृताह्वाननस्य द्विष्टान्तेनोंदृङ्कितस्थापनस्य । स्वनिर्नेक्तुं ते वषट्कार जाग्रत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ १ ॥ ॐह्रीं अर्हन, श्रीऋषभदेव, अत्रागच्छ आगच्छ, अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐह्रीं अर्हन श्रीवृषभदेव, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ह्रीं श्रीअर्हन श्रीयुगादिदेव, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम्॥ जलं-- विमलगन्धसुवासितसारयासुरसरिद्वरजीवनधारया । सकल दुःख हरं वृषभेश्वरं प्रवियजे नतनाकिनरेश्वरम् ॥१॥ ॐह्रीं श्रीवृषभतीर्थङ्कराय जलं निवपामीति स्वाहा । चन्दनं-सकलतापहरैः सुखदायकैरगुरुकुकुंममिश्रितचन्दनः॥ सकलदुःखहरं वृषभेश्वर प्रवियजे नतनाकिनरेश्वरम् ॥ २॥ ॐह्रीं श्रीवृषभदेवाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षताः--कमल गन्धसुवासित तण्डुलैर्धवलमौक्तिकराशिसमानकैः। सकलदुःखहरं वृषभेश्वरं प्रवियजे नतनाकिनरेश्वरम् ॥ ३॥ ॐह्रीं श्रीऋषभदेवाय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । - - । चौबी० -- संग्रह १६ पुष्पं-- कुसुममालति जाति सुचम्पकैः वकुलपाडलकुन्दसरोरुहः । सकल दुःख हरं वृषभेश्व प्रवियजे नतनाकिनरेश्वरम् ॥ ४ ।। ॐह्रीं श्रीवृषभेश्वराय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्यं सुघृत मिश्रित मोदकखज्जकः वरसुपायसव्यञ्जनभक्तकैः। सकल दुःखहरं वृषभेश्वरं प्रवियजे नतनाकिनरेश्वरम् ॥ ५॥ ॐह्रीं श्रीवृषभजिनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपः-- कनककान्तिसुसर्पिकृतेर्वरः प्रबलकान्तिभरैस्तमोनाशकः। सकल दुखहरं वृषभेश्वरं प्रवियजे नतनाकिनरेश्वरम्॥६॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभतीर्थराजाय दीपं निर्वामीनि स्वाहा। धूप: अगुरुचन्दनमिश्रितधूपकैः सकलकर्मविदाहनदक्षकैः । सकल दुःखहरंवृषभेश्वरं प्रवियजे नतनाकिनरेश्वरम् ॥७॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभेश्वरदेवाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फलं- रुचिकदाडिम श्रीफलमोचकैः क्रमुक निम्बरसालकसत्फलैः। सकल दुःखहर वृषभेश्वरं प्रवियजे नतनाकिनरेश्वरम् ॥ ८॥ ॐह्रीं श्रीवृषभदेवाय फलं निर्वपामीतिस्वाहा ॥ अर्घः- सुजीवनगन्धसुतण्डुलौघैः पुष्पैः स्विक्षुभरचयः सुधूपैः। अधैर्महाफलभरैः कुशदर्भयुक्तः श्रीमयुगादिपदयुग्म समचयहम् ॥ ९॥ ॐह्रीं श्रीवृषभजिनेन्द्रायऽध निर्वपामीतिस्वाहा ॥ अथ पञ्चकल्याणकानि॥ गर्भः- आषाढकृष्णपक्षेच द्वितीयायां ज़िनोत्तमम् । मझदेवीगर्भसज्जातं पूजायाम्यष्टधाचनः॥१॥ ॐह्रीं आषाढकृष्णद्वितीयायां श्रीऋषभदेवगर्भावतारायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा - - ܐ܀ " . चौबी० पजन संग्रह ४७ - . जन्म- पवित्रे चैत्रमासे च कृष्णे सुनवमीदिने। जातमादिजिनं चर्चे शुद्धधर्मप्रकाशकम् ॥२॥ ॐ ह्रीं श्रीआदिदेवाय चैत्र कृष्ण नवम्यां जन्म जातकायअघनिर्वपामीति स्वाहा। तपः- - शोभने चैत्र मोसे च कृष्णे सुनवमीदिने । सर्वोषधीन् परित्यज्य धारितं चोत्तमं तपः ॥३॥ ॐह्रीं चैत्र कृष्ण नवम्यां युगादिदेवतपोधारकायअर्घनिर्वपामीति स्वाहा ॥ ज्ञान- फाल्गुणे कृष्ण पक्षे च शोभनैकादशीदिने । वृषभं वृषदातारं संयजे ज्ञाननायकम् ॥ ४ ॥ ॐह्रीं फाल्गुणकृष्णकादश्यां श्रीआदिनाथज्ञानकल्याणकायअर्घनिवंपामीति स्वाहा। निर्वाणं-माघ मासे कृष्ण पक्षे पूते चतुर्दशी दिने। वृषभं मुक्तिसंप्राप्त पञ्चमीगतिदायकम् ॥५॥ ॐ ह्रीं माघ कृष्ण चतुर्दश्यां श्रीऋषभदेव मोक्ष कल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥ श्रीतीर्थकृत्प्रथम एव वृषाङ्कमूर्तिः प्राकर्मभुवि विधिनिरूपकआर्यपुंसाम्। योधर्मचक्रपरिवर्तक आर्यखण्डे मुक्त्यै तमेव वृषभं वृषदं नमामि॥६॥ इतिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् अथ जयमाला। जय प्रथम जिनेश्वर महिपरमेश्वर ईश्वर गुणगणमय सदनम्। जय नमितसुरासुर सकलसुखाकर जय जिन जननामय हरणम् ॥ १ ॥ जय आदिजिनेन्द्र विशालरूप जय पूजितशकसुचन्द्रभूपः। N । -- an चौबी. पूजन संग्रह - जय नाभिनरेश्वरपुत्रसार जयमरुदेवीसुत धर्मधार ॥२॥ जयओदि.धर्म प्रकाशवोर जय प्रथमयतीश्वर प्रथमधीर । जय वन्दितव्यन्तरराजराज जयनमितसुहिमकरभानुराज ॥३॥ जयज्ञानरूप जयशर्मरूप जयचन्द्रवदन अकलङ्कभूप। जय भव्यदयाकर भव्यहंस जय प्रकटितशुभवरचारुवंश ॥४॥ जय प्रथम प्रजापति आदिईश जय प्रथमयतीश्वर प्रथमधीश । जय गणधरयतिनुतसेव्यपाद जय खगशकादिकसेव्यपाद ॥५॥ घचाछन्दः- जय पापतिमिरहर पूर्णचन्द्र जयं दोषनिवारण पुरुजिनेन्द्र । जयप्रथमतीर्थकृत्परमदेव जय परम पुरुष कृतविबुधसेव ॥६॥ जय जिनसारं दर्शनधारं शुद्धं केवलवोधमयम् ॥ बन्दे भवतारं कृतितं मारं शान्तभोवकृत व्रतसुदयम् ॥७॥ ॐ ह्रीं श्रीवृषभजिनेन्द्राय महाअर्घ निर्वपामीति स्वाहा। , छन्दः-नाभिस्तानोऽथ माता विलसति मरुदेव्युत्तराद्याच षाढा, तारा कैलाशशैलःपरमपदपदंपूर्व नीतावृषाङ्कः । चापानां पञ्चाशदुन्नतिरपिकनकभाङ्गदीप्तिर्वटोगो, यस्यासौगोमुखेशपुरुवतु जिनो नःसच क्रेश्वरीशः॥ इत्याशीर्वादः ॥ इति श्रीऋषभदेव पूजा जयमाला समाप्ता॥ - ::

चौबी० पूजन 4 संग्रह, ४९ अथ अजितनाथ जिनपूजा पारभ्यते । स्वामिन् संवौषट्कृताहाननस्य द्विष्टान्तेनोहङ्कितस्थापनस्य । स्वनिर्नेक्तुं ते वषट्कारजाग्रत् सान्निध्यस्य प्रारंभेयाष्टधेष्टिम् ॥ ॐह्रीं श्रीअर्हन्श्रीअजितनाथ, अत्रागच्छ आगच्छं, अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् ॐ ह्रीं अर्हन् श्री अजितनाथ, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठःस्थापनम् । ॐ ह्रीं श्री अर्हन् अजितनाथ अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम। जलं-विमलगन्ध सुवासितसारया वरसुक्षीरधिनीरसुधारया ।अजितदेवपतिं जिननायक प्रवियजे जिनरोजपदान्जकम् ॥१॥ ॐ ह्रीं अजितनाथ तीर्थकराय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दन--सकलतापहरैः शिवदायरगुरुकुंकुममिश्रितचन्दनः । अजितदेवपति जिननायक प्रवियजे जिनराजपदाब्जकम् ॥ २॥ॐ ह्रीं अजितनाथाय चन्दनं निर्वामीति स्वाहा । अक्षता:-कमलगन्धसुमिश्रिततण्डुलैधवलमौक्तिकराशि समप्रभः। अजितदेवपति जिननायक प्रवियजे जिनराजपदान्जकम् ॥३॥ ॐ ह्रीं अजितजिनेन्द्राय अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा । पुष्पं--कुसुममालतिजाति सुचम्पकैर्वकुलपाडलकुन्दसरोरुहः । अजितवपति जिननायक .

'चौबी० पूजन संग्रह ५० - प्रवियजे जिनराज पदान्जकम् ॥ ४ ॥ ॐ ह्रीं अजितजिनेन्द्राय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्यं--घृतसुमिश्रितमोदकखज्जकहृदयनेत्रप्रमोदकरवरैः। अजितदेवपति जिननायक ' प्रवियजे.जिनराजपदान्जकम् ॥ ५॥ ॐ ह्रीं अजितस्वामिने नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । दीपः-घृतस्नेह कृतेर्वरदीपकैस्तमवितानहरैः कर्पूरजः । अजितदेवपति जिननायक प्रवियजे जिनराजपदान्जकम् ।। ६॥ ॐ ह्रीं अजितनाथाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूपः-अगुरुचन्दनमिश्रितधूपकैरशुभकमविवाहनदक्षकः। अजितदेवपति जिननायक प्रवियजे जिनराजपदान्जकम् ॥७॥ ॐ ह्री अजितजिनेश्वराय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फलं--रुचिकदाडिम श्रीफलमोषकैः क्रमुकनारंगनिवरसालकैः। अजितदेवपति जिननायक प्रवियजे जिनराजपदान्जकम् ॥८॥ ॐ ह्रीं अजितनाथभगवते फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घः--वार्गन्धपुष्पाक्षतचारुदीपधूपैः फलेः सर्पपदर्भवाद्यैः। अनय॑सत्काञ्चनपात्रसंस्थमघ । ददाम्यजितनाथपदाम्बुजाय ॥९॥ ॐ हीं अजितनाथायअर्घ निर्वपामीति स्वहा । अथ पञ्चकल्याणकानि । गर्भ:--ज्येष्ठमासे अमावस्या रोहिणीसुनक्षत्रके । देव्या विजयसेनाया गर्भप्राप्तं जिनंयजे ॥१॥ ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णामावस्यायां श्री अजितनाथगर्भावताराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।

चौबी० पूजन संग्रह , . जन्म--माघमासे शुचौ पक्षे पवित्रे दशमीदिने । सुलग्ने अजितदेवं पूजयामि सुजन्मजम् ॥२॥ ॐ ह्रीं अजितनाथाय माघश्रुवदशम्यां जन्मकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा । तपः--माघमासे शुक्लपक्षे विशुद्ध नवमीदिने । अजितं जितकौघं महाभिषवसारथिम् ॥३॥ ॐ ह्रीं अजिततीर्थेश्वराय माघशुक्लनवम्यां तपःकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञान-पौषमासे शुचौ पक्षे विशालेकादशीदिने । अजितं जितमोहारिं पूजयामि गुणोदधिम् ॥ ४॥ ॐ हा पौषशुक्लेकादश्यां अजितदेवज्ञानकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाणं--चैत्रमासे शुभ्रपक्षे विशाले पञ्चमीदिने। अजितं पूजये सिद्धं विवर्णविगतामयम् ॥५॥ ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लपञ्चम्यां अजितनाथनिर्वाणकल्याणकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा। गजध्वज़: काञ्चनकान्तिकायोजितारिकान्तो विजयातनजः। इक्ष्वाकुवंशाम्बुजतिरमरोचिः संप्राय॑तेऽस्मिन्नजितो जिनेशः ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं अजितनाथाय महाघ निर्वपामीति-स्वाहा। अथ जयमाला।। जय अजितजिनेश्वर सकलदुरितहर प्रतिवोधितत्रिभुवननिलय । जयज्ञानविवाकर सकलसुखाकर धर्ममयीकृतभवलय ॥ १॥ - A - । चौबी० पूजन संग्रह ५२ PATI जय अजितजिनेश्वर अजितनाथ प्रतिबोधितवहुजन भव्यसार्थ । जयजितशत्रुसुतधीर धीर जय विजयासेनासूनुवीर ॥२॥ जयहेमवर्ण वरशुद्धकाय जयसार्द्धचतुःशतधनुष्काय । जयदिःसप्ततिलक्षसुपूर्वआयः जयसेवित सुरनरइन्द्रराय ॥३॥ जयदर्शनभवनसरोजसूर दूरीकृत दुर्नय तिमिरपूर। जयविषम मदाष्टकविटपनाग जनवाञ्छितार्थ वितरणसुराग ॥ ४॥ जय सकलत्रिदशपतिवन्धपाद जयजलधरसमगम्भीरनाद । जय स्याद्वादध्वनिविजितवाद जयहरिहरवरसुरनमितपाद ॥५॥ घताछन्दः-जय अजितजिनेन्द्रं नमितसुरेन्द्रं वन्दितसकलसभासुगणम् । जय विजितकुज्ञानं दत्तसुज्ञानं वन्देभव्यसुशान्तकरम् ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं श्री अजितनाथजिनाय पूजाजयमाला निर्वामीति स्वहा । छन्दः माता श्रीविजयापिता जितरिपूरोहिणीभ पुरं शाकेतं कनकाङ्कभाध्वजइभःस्यात्सप्तपर्णोद्रुमः । सम्मेदः शिवभूशतानि धनुषां चत्वारि चञ्चाशता-मानं यस्य सरोहिणी युतमहायक्षेट्पुनीतोऽजितः॥७॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीअजितनाथपूजा समाप्ता ॥२॥ . Dead .

- a चौबी० पजन संग्रह ५३ अथ सम्भवनाथाजनपूजा प्रारभ्यते । स्वामिन् संवौषट् कृताह्वाननस्य द्विष्टान्तेनोङ्कितस्थापनस्य । स्वं निर्नेक्तुं तेवषट्कार जाग्रत्सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥१॥ ॐ ह्रीं अईन् श्रीसम्भवनाथजिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ,अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं अर्हन् श्री सम्भवनाथजिनेन्द्र, अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं अर्हन् श्री सम्भनाथजिनेन्द्र अत्र ममसन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम् जलम्-वारिणाहारिणा नित्यंगन्धद्रव्येन वासिना। पूजयामि जिनाधीशं सम्भवं शिवलब्धये ॥१॥ ॐ ह्रौं सम्भवतीर्थङ्कराय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दनम्--चन्दनागुरुकर्पूरकाश्मीरण सुगन्धिना। पूजयामि जिनाधीशं सम्भवं शिवलब्धये ॥२॥ ॐ ह्रीं सस्भवनाथाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा । अक्षताः--अक्षतरक्षतेदीघ विशदेश्चन्द्रसन्निभैः । पूजयामि जिनाधीशः सम्भवं शिवलव्धये ॥३॥ ॐ ह्रीं सम्भवनाथायअक्षतानिपामोति स्वाहा । ।

चौबी० संग्रह ५४ - पुष्पं-चम्पक कमलैः कुन्दैः केतकीपारिजातकः। पूजयामिजिनाधीशं सम्भवं शिवलब्धये ॥४॥ ॐ ह्रीं सम्भवजिनाय पुष्पं सिर्वपामीतिस्वाहा ॥ नैवेद्य-खज्जकैरोदनेश्वारुव्यञ्जनः प्राज्यपूरकैः ।पूजयामि जिनाधीशं सम्भवं शिवलब्धयः॥५॥ ॐ ह्रीं सम्भवदेवाय नेवनिर्वपामीतिस्वाहा ॥ दीपः-तैलाज्यकृतदीपश्च कर्पूरैस्तिमिरापहः । पूजयामि जिनाधीशं सम्भवं शिवलब्धये ॥६॥ ॐ ह्रीं सम्भवभगवते दीपं निर्वपामीतिस्वाहा ।। धपः-धूपैधूपितदिकचकैः कर्पूरागुरुसम्भवैः । पूजयामि जिनाधीशंसम्भवं शिवलब्धये ॥७॥ ॐ ह्रीं सम्भव जिनदेवाय धूपं निर्वपामीनिस्वाहा ॥ फलं-नारिकेलादिनारङ्गपनसैः वीजपूरकः । पूजयामि जिनाधीशं सम्भवं शिवलव्धये ॥८॥ ॐ ह्रीं सम्भवनाथाय फलंनिर्वपामीति स्वाहा। अर्घः-अवगन्धाक्षतपुष्पैश्च दीपैधुपैः फलस्तथा । पूजयामि जिनाधीशं सम्भवं शिवलव्धये ॥९॥ ॐ ह्रीं सम्भवजिनेन्द्रायअघ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ पञ्चकल्याणकानि। गर्भः-फाल्गुणेसितपक्षे च अष्टम्यां सम्भवं जिनम् । सुषेणाया महागर्भे यजेहं जिनपुङ्गवम् ॥१॥ ॐ ह्रीं सम्भवनाथाय फाल्गुणशुक्लाष्टम्यां गर्भकल्याणकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा ।

- चौबा पजन संग्रह ५५ जन्म-शोभने कार्तिकेमासे पूर्णिमायांतु सम्भवम् । पूजयामि जिनाधीशमष्टद्रव्य समुच्चकैः ॥२॥ ॐ ह्रीं सम्भवतीर्थेश्वराय कार्तिक शुक्लपूर्णिमायां जन्मकल्याणकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा। तपः-मासे मार्गशिरे शुभ्रे शोभने पूर्णिमातिथौ। सम्भवं व्रतदातारं यजे चारित्रभूषणम् ॥ ३॥ ॐ ह्रीं सम्भवजिनेन्द्राय मार्गशिर शुक्लपूर्णिमायां तपःकल्याणयअर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञानम-कार्तिक कृष्णपक्षे च चतुर्थ्यामुत्तमेदिने । सम्भवं भवहन्तारं संयजे भुवनोत्तमम् ॥४॥ ॐ हा सम्भवतीर्थङ्कराय कार्तिककृष्णचतुर्थी ज्ञानकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा। निर्वाणम्-चैत्रमासे शुक्लपक्षे विशाखापष्ठिकादिने । सम्भवं प्रयजे सिद्धं गुणाष्टकविभूषितम् ॥५॥ ॐ ह्रीं सम्भवजिनेश्वराय चैत्रशुक्लषष्ठयां मोक्षकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा। सावस्तिनाथोहढराजसूनुः प्रज्ञप्तियक्षीत्रिमुखाधिनाथः । वाजिध्वजश्चारुसुवर्णवर्णः संपूज्यते सम्भवतीर्थनाथः ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं सम्भवजिनपञ्चकल्याणकायार्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ जयमाला। जयसम्भवजिनवर नमितसुरेश्वर गणधरमुनिपूजितचरणम् । जयतृतीयजिनेशं परमविशुद्धं वन्दे त्रिभुवन शिवकरणम् ॥ १॥ , चौबी० भजन संग्रह ५६ संग्रह जयधर्मप्रकाशनदेवदेव जयअमरेश्वरकृतचरणसेव। जयकामविमर्दनपरमशूर जयमोहविमर्दन परमकर ॥२॥ जयहढरथतात सुभूविख्यात जयमातसुषेणागर्भजात । जयधनुष्चतुःशतउच्चकाय जयवजवृषभ नाराचधाय ।।३॥ जयतप्तकनकसमशुद्धकाय जयषष्ठिलंक्षसुपूर्वआय । जयकेवलबोधस्वरूपरूप जयवन्दितेन्द्रफणीन्द्रभूप ॥ ४॥ जयपरमपुरुष परमात्मज्योतिर्जय जगदानन्दक विश्वयोति । जयसकलतत्वज्ञायकसुसार जयसकलपदार्थविचारधार ॥ ५॥ जयकर्मरहितविकलङ्कशुद्ध'जयज्ञानपयोनिधिविवुधबुद्ध । जयमुक्तिकामिनीरमणदक्ष जयज्ञानवजहंतवादिपक्ष॥ ६॥ घताछन्दः-जयबोधीवभानु सुरकृतगानं ज्ञानं सकलकुंज्ञानहरम् । जयवंजीकृतमानं विबुधप्रधान वन्दे सम्भववरचरणम् ॥७॥ ॐ ह्रीं सम्भवनाथाये पूजाजयमाला निर्वपामीति स्वाहा । छन्दः-सेना वा जनको जितारिरनघःशीर्षमृगांढयशुभंस्रावस्तीनगरी ध्वजश्च तुरगःशालश्च चैत्यद्रुमः। सम्मेद शिवभूः शतानिधनुषां चत्वारिमा शुभंगोरीयस्य ससम्भवस्त्रिमुखयुक् प्रज्ञप्तिनाथोऽवतात्॥ इत्याशीर्वादः । इति श्री सम्भवनाथतीकर पूजा समाप्ता । .

पोवी. अथ अभिनन्दनपूजापारभ्यते। संग्रह । . - स्वामिन् संवौषट् कृताहाननस्य द्विष्टान्तेनोहङ्कितस्थापनस्य । स्वनिर्नक्तुं ते वषट्कारजासत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् । ॐ ह्रीं अर्हन् श्रीअभिनन्दन जिनेन्द्र,अत्रागच्छ आगच्छ,अत्रावतरावतर संवौषट् आहाननम्। ॐ ह्रीं अर्हन श्री अभिनन्दनजिनेन्द्र, अत्र'निष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ॥' ॐ ह्रीं अभिनन्दनजिनेन्द्र, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथाष्टकम् । जलम्-विमलगन्धसुबासितसारया.वरसुक्षीरधिनीरसुधारया। प्रवियजे जिनपं ह्यभिनन्वनं सकलकल्मषबातहरंपरम् ॥ १॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनजिनेन्द्राय जल निर्वपामीति स्वाहा ॥ चन्दनम्-सकलतापहरैः शिवदायकैरगुरुकुंकुममिश्रितचन्दनः । प्रवियजे, जिनपं झभिनन्दनं । सकलकल्मषबातहरं परम् ॥२॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनाय चन्दनं निर्वपामीतिस्वाहा ।। अक्षता:-कमलशालिजकृष्णसुजीरकः विशदमौक्तिकराशिसमानः प्रवियजे जिनपं ह्यभिनन्दन सकलतापहरं सुखदंपरम् ॥३॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनजिनायअक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥

चौबी० पजन ॥ सप्रह ५८ - . पुष्पम्-कमलमालरिजातिसुचम्पकैर्वकुलपाडल कुन्दकदम्बकैः । प्रवियजे जिनपं ह्यभिनन्दन सकलकल्मषबातहरं परम् ॥ ४ ॥ ॐ ह्रीं आभनन्दनभगवते पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ नैवेद्यं-घृतसुपायसमोदकखज्जकः हृदयनेत्रप्रमोदकरवरैः। प्रवियजे जिनपं ह्याभनन्दनं सकलकल्मषत्रातहरं परम् ॥ ५॥ ॐह्रीं अभिनन्दनतीर्थङ्कराय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । दीपः-घृतस्नेहकृतेर्वरदीपकैःतमवितानहरैबलदर्चिभिः । प्रवियजे जिनपं ह्यभिनन्दनं सकलकल्मषत्रातहरं परम् ॥ ६ ॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ धूपः-अगुरुचन्दनयुलासिलारसैः प्रवलकर्मविदाहनदक्षकः । प्रवियजे जिनपं ह्यभिनन्दनं सकलकल्मषबातहरं परम् ॥ ७॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनतीर्थाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।। फलम्-रुचिकदाडिम श्रीफलमोचकैः क्रमुकनारंगनिम्बुकसत्फलेः। प्रवियजेजिनपं ह्यभिनन्दन सकलकल्मषबातहर परम् ॥ ८॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनजिनेन्द्राय फलंनिर्वपामीति स्वाहा ॥ अर्घः-वार्गन्धतण्डुलसुपुष्पचरुप्रदीपै पैः फलैरद्भुत वाद्यगीतः। सिद्धार्थसूनुं कपिराजचिह्न संपूजये श्रीअभिनन्ददेवम् ॥ ९॥ ॐहीं अभिनन्दनजिनेन्द्राय महाघ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ पञ्चकल्याणकानि। गर्भ:-वैशाखशुक्लपक्षे च षष्ठीतिथौ जिनोंत्तमम् । सिद्धार्थागर्भसेंजातं यजेहमभिनन्दनम् ॥ १ ॥ ३ 4 बी० पूजन संग्रह ५९ ॐ हों अभिनन्दनजिनेन्द्राय वैशाखशुक्लषष्ठ्या गर्भकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा॥ जन्म-माघमासे शुभ्रपक्षे विद्युद्धेद्वादशीदिने । पूजायाम्यहमण अभिनन्दनस्वामिनम् ॥२॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनजिनेशाय माघशुक्लद्वादश्यां जन्मजातकायअर्घ निर्वपोमीतिस्वाहा ।। तपः-माघमासे निर्मले च विशुद्धे द्वादशीदिने । यजेभिनन्दनं देवं लोकालोकप्रकाशकम् ॥ ३ ॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनजिनाधीशाय माघशुक्लद्वादश्यां तपोधारकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा ॥ ज्ञानम्-पोषमासे परमशुक्ल चतुर्दशीदिने शुभे । अभिनन्दनमहं केवलज्ञानभाजनम् ॥ ४॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दन परमेश्वराय पौषशुक्ल चतुर्दश्यां ज्ञानप्राप्तायाध निर्षपामीति स्वाहा ॥ निर्वाणम्-वैशाखे चार्जुनेपक्षे.सुषष्ठीश्रुद्धवासरे । अभिनन्दनज्ञानेशं मुक्तिसाम्राज्यनायकम् ॥५॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनजिनेन्द्राय वैशाख शुक्लषष्ठ्यांनिर्वाणप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ सिद्धार्था संवराज्जातं तप्तकाञ्चनसन्निभम् । शाकेतस्वामिनापूज्यं कपिकं अभिनन्दनम् ॥६॥ ॐ ह्रीं अभिनन्दनाय पञ्चकल्याणकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा ॥ अथ जयमाला। जय अभिनन्दन सुरनरवन्दन पूजयामि तव पदकमलम् । शिवतियरञ्जन दुःखविभजन वसुद्रव्यैःप्रयजे शिवदम् ॥१॥ कनककोमलपादतलं वरं विशदबोधमयं गुणसुन्दरम् । प्रबलमोहनिकृन्त .

। चौबी० सनातनं प्रवियजे प्रमदादभिनन्दनम् ॥ २॥ अचलधेर्यगुणैः प्रविराजितं शतसुवासवराजितराजितम् । पूजन अवलमोहनिकृन्तसनातनं प्रवियजे प्रमादादभिनन्दनम् ॥ ३॥ दलितदुष्टतरं अघसंचयं विशदवाग्भ संग्रह रदर्शितसंचयम् । प्रबलमोहनिकृन्तसनातन प्रवियजे प्रमदादभिनन्दनम्॥४॥अतिशयामृततर्पितगात्रक परमनिवृतिदं वरपत्रिकम् । प्रबलमोहनिकृन्तसनातन प्रवियजे प्रमदादभिनन्दनम्॥५॥ विमलमोक्षपद प्रविराजितं स्तवमिमं विशदाक्षरगुम्फितम् ।प्रबलमोहनिकृन्तसनातनं प्रवियजे प्रमदादभिनन्दनम्॥६॥ घताछन्दः- इत्थं जनोयो विदधाति पूजां भक्तयासदा श्रीजिननायकस्य । स्वर्गापवर्गलभते सदैव श्रीभूषणोक्तं विदधातुचित्ते ॥ ७॥ ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दनजिनेन्द्राय पूजाजयमालाघं निर्वपामीति स्वाहा ॥७॥ वृत्तम्-सिद्धार्था वा सुवरणाभरुगरपिजनकः संवरोंकः कपिः, पूशाकेताख्याश्रितागः सरल इति पुनर्वस्वभिख्यंगमुर्वी । मुक्तःसम्मेदशेल स्त्रिशतधनुरथोद्धं च पञ्चाशतामा यस्यासौ, श्रृंखलेशोवतु जगदपि यक्षेश्वरेशोभिनन्दः ॥ ८॥ इत्याशीर्वादः । इति श्री अभिनन्दनजिन पूजा समाप्ता॥ - . 32 तोबी० 'पजन संग्रह अथ सुमतिनाथ पूजापारभ्यते। स्वामिन् संवौषट्कृताह्वाननस्य द्विष्टान्तेनोद्दङ्कितस्थापनस्य । स्वनिर्नेक्तुंते वषट्कारजाग्रत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ १॥ ॐहींअर्हन श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र, अत्रागच्छ आगच्छ,अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐह्रींअर्हन् श्रीसुमतिनाथ, जिनेन्द्र , अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् । ॐहीं महन् श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र, अत्रमम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । । अथाष्टकम्-जलम्-स्वर्धनीसमुद्भवः सुगन्धमिश्रितै लैः भृङ्गनालनिर्गतै रादिदुःखनाशकः । सुसन्मति यजेमुदाशिवाप्तयेहमञ्जसा सिद्धसौख्यदायकं निरामयं निरञ्जनम् ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं समतिनाथ तीर्थंकराय जलम् निर्वपामीतिस्वाहा॥ चन्दनम्-चन्दनैश्च शीतकान्तिसन्निभैः जिनांधूयगैः कुंकमेन कपूरेण मिश्रितैः सुघर्षितैः । सुसन्मति यजे मुदा शिवाप्तयेहमञ्जसा सिद्धसौख्यदायकं निरामयं निरञ्जनम् ॥२॥ ॐ ह्रीं सुमतिजिनेन्द्राय चन्दनन् निर्वपामीति स्वाहा । अक्षताः-प्रीहिजातिसम्भवैः शुभाक्षतैः सुनिर्मलेः मौक्तिकाभ पुजर्हिरण्यपात्र संस्थितः । सुसन्मति यजे मुदा शिवाप्तयेहमञ्जसा सिद्धिसौख्यदायकं निरामयं निरञ्जनम् ॥३॥ --- ।

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चौबी०
पूजन
संग्रह
॥
ॐ ह्रीं सुमतिनाथ जिनेन्द्राय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
पुष्पं-केतकीसुमालतीसुपारिजातसम्भवैः कदम्बकुन्दपङ्कजैरनङ्ग वाणनाशकः ।
सुसन्मति यजे मुदा शिवाप्तयेहमञ्जसा सिद्ध सौख्यदायक निरामयं निरज्जनम् ॥ ४॥
ॐ ह्रीं सुमतिनाथाय पुष्पाणि निर्वपामीति स्वाहा ।
नेवयं- भक्तपायसान्नदुग्धशर्करादिसंयुतैः मोदकैः सुव्यजनैरसप्रदेःसमुन्वलेः ।
सुसन्मतिं यजे मुदा शिवाप्तयेहमञसा सिद्धसोरव्यदायक निरामय निरञ्जनम् ॥५॥
ॐ ह्रीं सुमतिदेवाय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा।
दीप:-सुतैलसपिनिीमतेर्घनान्धकारनाशकः ज्वलत्प्रदीपसञ्चयः शिखोज्वल सुनिर्मितैः।
सुसन्मतियजे मुदा शिवाप्तयेहमञ्जसा सिद्धसौरव्यदायकंनिरामयं निरञ्जनम् ॥६॥
ॐ ह्रीं सुमति नाथाय दीपान् निर्वपामीति स्वाहा ।
धूपः-लवङ्गदेवदारुमोथचन्द्रचन्दनाश्रितः सिलारसैकयोगजादिकर्म मर्मदाहकः।
सुसन्मतिं यजे मुदाशिवाप्तयेहमनसा सिद्धसौरव्यदायकं निरामयं निरूजनम् ॥ ७ ॥
ॐ ह्रीं सुमतिनाथस्वामिने धूपं निवंपामीति स्वाहा।
फलम्-चोचमोचद्राक्षस्वामूर्निचुदाडिमैः फले वीजपूरचिर्भटेः सुमोक्षमार्गदायकैः।
सुसन्मति यजे मुदाशिवाप्तयेहमञ्जसा सिद्धसौरव्यदायकं निरामयंनिरञ्जनम् ॥८॥

. चौबी० पजन संग्रह ६३ ॐ ह्रीं सुमतिनाथतीर्थनाथाय फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घः-चार्गन्धाक्षतपुष्पभक्ष्यचरुकै पैश्चधूपैः फलैः दुर्वास्वस्तिक पुष्पदामबहुभिर्वाद्यैरनेकैः शुभैः। स्तोत्रैमङ्गलपाठकैर्जयरवैश्रीमत्सुवुद्धयनिगांभूमि मोक्षसुखाप्तये सुविधिना संपूजयामोवयम् ।। ॐह्रीं सुमतिनाथपरमदेवाय पूणा निर्वपामीति स्वाहा । • अथ पंञ्च कल्याणकानि।' गर्भ:-श्रावणे चार्जुनेपक्षे सुमतिं मंति दायकम् द्वितीयायां मुदागर्भमङ्गलाया यजेसदा ॥१॥ ॐहीं सुमतिजिनवराय श्रावण शुक्ल द्वितीयायां गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा । जन्म-चैत्र मासे शुक्लपक्षे विशुद्ध कादशीदिने सुमतिं बुद्धिदातारंयजामि जन्मसङ्गतम् ॥२॥ ॐ ह्रीं सुमति जिनेन्द्राय चैत्र शुक्लैकादश्यां जन्मकल्याणकायअर्घनिर्वपामीति स्वाहा । तपः-वैशाखे शुभ्र पक्षे च पवित्रे नवमी दिने। यजामि सुमतिं देवं तपोभरविभूषितम् ॥३॥ ॐ ह्रीं सुमतितीर्थङ्कराय वैशाख शुक्लनवम्यां तपः कल्याणकायअर्धनिर्वामीति स्वाहा। ज्ञान-चत्रे विशदपक्षेच परमेकादशीदिने । संयजे बुद्धि वाराशिं सन्मति ज्ञान ज्ञाननायकम् ॥ ४॥ ॐह्रीं सुमतितीर्थनाथायचैत्रशुक्लकादश्यां ज्ञानप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाणम्-चैत्र मासे शुचौ पक्षे पवित्रैकादशीदिने । सुमति मुक्तिदातारं यजेहं मुक्तिवल्लभम् ॥५॥ ॐहीं सुमतिनाथाय चैत्र शुक्लकाश्यां निर्वाणप्राप्तायअर्धनिर्वपामीति स्वाहा। - चोबी० पूजन संग्रह - सुमङ्गलामेघरथात्मजातोनाभेयवंशाम्बुधिपूर्ण चन्द्रः। कोकध्वजस्तप्तहिरण्यकायः। संप्रार्थ्यतेऽत्रसुमति जिनेन्द्रः ६॥ ॐह्रीं सुमतिनाथदेवपञ्चकल्याणकायअर्धनिर्वयामीति स्वाहा। अथजयमाला-जय सुमतिजिनेश्वर नमितसुरेश्वर फणिपतिनरपतिनमितपदम् । घनरथ नृपतातं जगत विख्यातं मातमङ्गलामोदकरम् ॥ १॥ जय सुमतिनाथ मतिदानदक्ष जय, लोकित लोकालोकपक्ष जय चतुस्त्रिश अतिशयविशेष । जय प्रातिहार्य युतत्यक्तद्वेप ॥२ ॥जय ज्ञान चतुष्टययुक्तयुदेव। जय समवशरण स्थित स्वमेव । जय चमरकरत चतुषष्ठिपक्ष । जय मङ्गल द्रव्यध्वजाप्रत्यक्ष ॥३॥ जय घनरथ नृपकुलनभदिनेश जन्माभिषेककृतखगसुरेश । जय शचीदेविकृतजातिकम जय कायकान्ति जिततप्तभर्म ४ जय क्रोधमानतजिलोभमाय जय अष्टाधिकशतचिह्नकाय। जय नवशतव्यञ्जन पूर्ण देह । जय त्यक्तमोहमदमदननेह ५ जयं ध्यान खड्ग हतकर्मपाश जय ज्ञान दिवाकर जग प्रकाश। जय शिवरमणीवरराजराज मम सिद्धमनोरथसुखसमाज ॥ ६ ॥ पत्ताछन्दः-इति गुणगणसारं भुक्ति मुक्ति प्रदानं सुमतिजिनवरेन्द्र कोकचिन्हेन युक्तम् । त्रिभुवनपतिपूज्यं वुद्धिसारं त्रिशुद्धया वसुविधिवरदव्यः पूजयेहं सुखाप्त्यै ॥७॥ ॐहीं सुमतिनाथ जिनवराय पूजाजयमाला निर्वामीति स्वाहा । वृत्तम्-कोकोङ्कःफालिनीतमः पुरमथायोध्यामघाजन्मभं चापानां च शतत्रयं परिमितिः कान्तिःसुवर्णोत्तमा। सम्मेदःशिवभूविभातिजनकोमेघप्रभोमङ्गलामातायस्य स पातुनःसुमतिरिड्वजानुशोतुंवरः ॥ इत्याशार्वादः - - . 4 पूजा लिख्यते - - बोबी० पूजन संग्रह ६५ : अथ पद्मप्रभ पू स्वामिन् संवौषट् कृताहाननस्य द्विष्टान्तेनोहङ्कितस्थापनस्य ।' स्वनिर्नेछु ते वषट्कारजामत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् । ॐ ह्रीं अहंन् श्रीपप्रभजिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर सवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं अर्हन श्रीपद्मप्रभजिनेन्द्र अत्र तिष्ठतिष्ठ ठाठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं अर्हन् श्रीपयप्रभजिनेन्द्र अत्र ममसन्निहितो भवभव वषट्सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम् जलं-विशालभृङ्गनालेन निर्गतेन सुवारिणा। पूजयामि जिनाधीशं पद्मप्रभं सुभावतः ॥ ॐ ह्रीं पचप्रभजिनेन्द्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दन-कुङ्कमेनकर्पूरेण अगरेण सुगन्धिना। पूजयामिजिनाधीशं पद्मप्रभं सुभावतः ॥२॥ ॐहीं पद्मप्रभजिनीय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा ।। अक्षता:-अक्षतेरक्षतेश्चारुदीर्घोज्ज्वलगात्रकैः । पूजयामि जिनाधीश पद्मप्रभ सुभावत ॥३॥ ॐहीं पद्मप्रभपरमेश्वराय अक्षतोन् निर्वामीति स्वाहा। 4 चौबी० पजन संग्रह - पुष्पं-कमल कुंन्दजातीभिर्मालतीसुकदवकैः। पूजयामि जिनाधीशं पद्मप्रभ सुभावतः ॥४॥ ॐ ह्रीं पद्मप्रभपरमेश्वराय पुष्पं निवंपामीति स्वाहा। नैवेद्यम्भवज्जकैर्मोदकैःपूदिलाभक्तव्यञ्जनैः । पूजयामि जिनाधीशं पद्मप्रभंसुभावतः ॥ ॐ ह्रीं पद्मप्रभतीर्थङ्कराय नैवेद्यम् निर्वपामीति स्वाहा । दीपः-रत्नदीपैः सुकर्पूरैः प्राज्यसुस्नेहवर्तिभिः । पूजयामि जिनाधीशं पद्मप्रभं सुभावतः ॥६॥ ॐ ह्रीं पद्मप्रभाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ धूपः-कर्पूरागुरुसम्मिश्रे धूपैःशिलारसोत्कटेः। पूजयामि जिनाधीशं पद्मप्रभं सुभावतः ॥७॥ ॐ ह्रीं पद्मप्रभ तीर्थराजाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ फलम्-पक्वाम्रनालिकरैश्च पनसैवर्वीजपुरकैः । पूजयामि जिनाधीश पद्मप्रभं सुभावतः॥८॥ अह्रौं पनप्रभ तीर्थेश्वराय फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥ अर्घः-वार्गन्धाक्षतपुष्पैश्च धूपैर्दीपैःफलैस्तथापिद्मप्रभं जिनंदेवं भावेनाचे वराघतः । ॐ ही पुनप्रभे जिनेशाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। महाघः-कौशांव्याधरणीश्वरस्य तनुजोमाता सुसीमा सती, चित्राभेच समुद्भवःशिवकरःपद्माङ्कपद्मप्रभः। सम्मेद शिवभूस्तनन्नतिधनुःसार्दाधिकाद्वि शती, सो मापद्मजिनः पुनातुसततं पुष्पाख्ययक्षेट्समम्। ॐ ह्रीं पद्मप्रभजिनद्राय महाघ स्वाहा J . निर्वामीति - E . चौबा० पूजन संग्रह ६७ - अथ पञ्चकल्याणकानि । गर्भः-माघमासे शुभेकृष्णे षष्ठयांग यजाम्यहम् । सुसीमायामहादेव्याः पद्मप्रभजिनेशिनम् ॥१॥ ॐ ह्री पद्मप्रभजिनेन्द्राय माघकृष्णषष्ठयां गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ जन्म-कार्तिकेश्यामपक्षेच त्रयोदश्यां सुवासरे। पद्मप्रभमहादेवं जगत्सर्वसुखास्पदम् ॥२॥ ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णत्रयोदश्यां पद्मप्रभेजन्मकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। तपः-कार्तिके मेचकेपक्षे त्रयोदश्यांदिनेवरे। तपशेलक्ष्मोसुभर्तारं संसाराम्बुधितारकम् ॥३॥ ॐ ह्रीं पद्मप्रभजिनाय कार्तिक कृष्णत्रयोदश्यां तपोधारकाय अघ निर्वपामीति स्वाहा ।। ज्ञान-चैत्रमासे शुक्लपक्षे पूर्णिमा शुभवासरे। केवलज्ञानसंप्राप्त लोकालोकप्रकाशकम् ॥ ४॥ ॐ ह्रीं चैत्र शुक्ल पूर्णिमायां पद्मप्रभज्ञानकल्याणकाय अब निर्वपामीति स्वाहा ॥ निर्वाणम्-फाल्गुणे कृष्णपक्षे च चतुर्थीनिर्मलेदिने । सुपद्मप्रभमर्चामि मुक्तिपद्ममधुव तम् ।। ॐ ह्रीं फाल्गुण कृष्णचतुर्थी पद्मजिनराजाय मोक्षकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ जयमाला। श्रीपद्मप्रभंदेवं बन्देभक्या त्रिविष्टपाधीशम् । वक्ष्येहं जयमालााशक्षा संक्षेपतो नित्यम् ॥१॥ जय पद्मप्रभपद्माभदेव जय नृपसुरअहिपतिकृतसुसेव। जय दुःखदावानलजलदरूप जय ध्वनिरवि- है . - 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पजन चौबी० | शोषितजगत्कूप ॥२॥ जय गर्जितघनगम्भीरनाद जयदुर्नयवादीजितकुवाद। जयमुक्तिकामिनीकण्ठ- हार जय उपदेशामृतभव्यसार ॥३॥ जय शुद्धबुद्ध परमपवित्र जयसमयसारविस्तारमन्त्र । जय संग्रह पद्मप्रभ पद्माभकान्त जय जन्मजरामृतरोगशान्त ॥ ४॥ जयप्रातिहार्यशोभितसुगात्र । जय दर्शनज्ञान ६८ चरित्रपात्र । जय अन्तरहित गुणगणभण्डार। जय शीलायुध मारितसुमार॥५॥ जय ऋषिमुनियति गणराजहंस । जयसकलनरोत्तम पुण्यवंश। जयइन्द्रनरेन्द्रखगेन्द्रराज ।जय मुक्तिवकृतसुखसमाजा। पत्ताछन्दः-इति पद्मजिनेन्द्रं नमितमुनीन्द्रं जन्मजरामृतकामहरम् । बंदेचिन्मयमूर्तिशिवसुखपूर्ति सकलजीवपरमार्थकरम् ॥७॥ ॐ ह्रीं पद्मप्रभजिनेन्द्राय पूजाजयमाला निर्वपामीति स्वाहा ॥ छन्दः-पद्माङ्कःफलनीतरुःपुरमथो कौशांविका मुक्तिभूः,सम्मेदो धरणःपिताजननभंचित्रा सुसीमाविका । साईचापशतद्वयं परिमिती रक्तातनुर्यस्यतो ऽध्यात्पद्मप्रभुरीश्वरःकुसुमयक्षश्रीमनोवेगयोः। इत्याशीर्वादः। इतिश्रीपद्मप्रभतीर्थङ्कर पूजा समाप्ता।

7 चौबी० पजन सग्रह ६९ अथ सुपार्श्वनाथजिन पूजा प्रारभ्यते । स्वामिन् सवौषट् कृताह्वाननस्य द्विष्टान्तेनोदृङ्कितस्थापनस्य । स्वनिर्नेक्तु तेवषट्कारजाग्रत्सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ ॐह्रींअर्हन श्री सुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐहींअर्हन् श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र अत्रतिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐहीं अहंन् श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम्। जलं- विशालभृङ्गनालेन निर्गतेन सुवारिणा। पूजयामि जिनाधीशं सुपाश्वं पार्श्वदायकम् ॥ १॥ अह्रींसुपार्श्वजिनेन्द्राय जलं निर्वपामीतिस्वाहा । चन्दनं- कुंकुमेन कपूरेण चन्दनेनसुगन्धिना। श्रीजिनेन्द्रपदाम्भोज विलेपेहं सुभावतः ॥ २ ॥ ॐह्रीं सुपाश्वजिनेन्द्राय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा । अक्षताः- अखण्डितैरक्षतेश्चारुदीर्घरुज्ज्वलगात्रकैः। विभूषयाम्यंत्रिभुवं अक्षयपदलव्धये ॥ ३॥ ॐ ह्रीं सुपाश्र्वतीर्थेश्वराय अक्षतान् निर्वामीति स्वाहा ॥ S चौबी० पजन संग्रह केतकीपारिजातैश्च मालतीसुजयादिभिः। कामवाणविनाशाय अर्चयेहं क्रमाम्बुजम् ॥ ४॥ ॐ ह्रींसुपाश्वनाथाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ॥ नैवेद्यं- मोदक घेवरैः पूपैःवटुकैर्भक्तव्यञ्जनः । यजेहं स्वर्णपात्रस्थैः क्षुदाधाप्रशान्तये ॥५॥ ॐहीं सुपार्श्वनीर्थकराय नैवेद्य निर्वपामीति स्वाहा ॥ दीपः- घृतदीपर्धान्तनाशैश्च प्रज्वलद्वार्तिकर्घनैः । सन्मुखोत्तारयाम्यत्री केवलज्ञान प्राप्तये ॥६॥ ॐहीं सुपार्श्वनाथाय दोपं निर्वपामीति स्वाहा । धूपः- कृष्णागुरुधनैःमारै धुपैयूंपिनदिग्मुखेः । धूपयामि विभोर कर्मकक्षहुताशनैः ॥७॥ ॐह्रीं सुपाश्वनाथाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलम्- पक्काम्रनालिकेरैश्च पनसैर्वीजपूरकैः अर्हत्पदाम्बुजयु पूजये शिवलब्धये ॥८॥ '' ॐहों सुपाश्र्वजिनेशाय फलं निर्वपार्माति स्वाहा ॥ अर्घः- जलगन्धाक्षत पुष्पैश्च नेवर्दीपधूपकैः । यजे सुपार्श्वनाथवे फलैश्च फलदायकैः ॥ ९ ॥ ॐष्ट्ठी सुपार्श्वनाथाय महाध निर्वपामीति स्वाहा ।। अथ पञ्चकल्याणकानि। गर्भ:- पुण्यभाद्रपदे मासे शुक्ल षष्ठ्यांसुपार्श्वकम् । मातृवसुन्धरागर्भे यजामि नृपनायकम् ।। । ।

. चोबी० पजन संग्रह संमत GC ॐहीं सुपाश्र्वनाथाय भाद्रपदशुक्लषष्ठयां गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जन्म- ज्येष्ठमासे परेशुक्ले द्वादशीदिवसे शुभे। मेरौ शक्रकृतस्नान यजे सुपार्श्वदेवकम् ॥ ॐहीं सुपार्श्वनाथाय ज्येष्ठशुक्लदादश्यां जन्मजातकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । तपः- ज्येष्ठमासार्जुने पक्षे सुलग्ने द्वादशीदिने । श्रीसुपाचं महादेवं तपोधीशं समर्चये ॥ ॐहीं सुपाश्र्वजिनन्द्राय ज्येष्ठशुक्ल द्वादश्यां तपोधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।। ज्ञानम्- फाल्गुणे कृष्णपक्षे च सुषष्ठयां ज्ञाननायकम् । श्रीसुपावं यजेनित्यं लोकालोक प्रकाशकम् ॥ ॐहीं सुपार्श्वनाथाय फाल्गुण कृष्णषष्ठयां ज्ञानधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाणम्-फाल्गुणे श्यामपक्षे च प्रकृष्टे सप्तमादिने । श्रीसुपाइवं यजेनित्यरूपातीतं गुणात्मकम् ॥ अह्रीं फाल्गुण कृष्णसप्तम्यां श्रीसुपार्श्वनाथ मोक्षकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। पृथ्वीषेणासुप्रतिष्ठाप्रसूनुं काशीनाथं पूजयेहं सुपार्श्वम् । कालीयक्षीरक्षितं स्वस्तिकाङ्क भक्त्यानित्यं मङ्गलाघुरनूनम् ॥ ॐहीं सुपार्श्वनाथतीर्थङ्कराय महाध निर्वपामीति स्वाहा । अथ जयमाला। पाचपश्य दयानिधिं जिनवरं कर्माटवीज्वालकं, देवनाकिखगेन्द्रभूचरनुतं स्नातं गिरे र्द्धनि । ।

चोवी० पूजन संग्रह ७२ भव्याम्भोरुहभास्करं प्रतिदिनं सिद्धिप्रदंशाश्वतं, सर्वज्ञान महानिधि मुनिवरंवारानसीनायकम् ॥ जयमाला-जयसुपार्श्वदेवत्वं संसारांवुधितारक । स्वस्तिकाङ्कधरोनित्यं लोकेस्वस्ति सदा कुरु॥जय जय हि सुपाश्र्वसुपार्श्वदेव जयसुरनरमुनिगणकृतसुसेव । जयपृथ्वीषेणामातसून जयसुप्रतिष्ठ जिन पतिअनून॥जयगर्भसमयबहुरत्नवृष्टि।जयसुखमयधनमयकृतसुसृष्टि। जयमेरुशिखरजिनजन्मस्नान। जयइन्द्रशचीकृतनृत्यगान ॥ जयहरितमहामणितुल्यकान्तिाजयस्वस्तिकलक्षण सकलशान्ति॥जयदुर्ध. रतपधारितजिनेश । जयपञ्चमुष्टिकृतलौंचकेश ॥ लेक्षीरोदधिक्षेपेसुरेश जयद्वादशधातपतपविशेष । जयघातिकर्मकोनाशदेव ।जयप्राप्तज्ञानकेवलस्वमेवाजय समवशरणसुरपतिरचाय जयप्रातिहार्य अद्भुत लखाय । जय अनन्त चतुष्टययुक्तदेव त्यारेसंबोधिभव्यराशिएव ॥ जय शेषकर्महनि प्राप्तमोक्ष। जय सिद्धिावलासनभुक्तिसौख्य । जय अनन्तगुणात्मकचित्स्वरूप । जयलोकशिखास्थितसिद्धभूप ॥ पत्ताछन्दः-जिनराजनमस्तुभ्यं नरराजेनसस्तुत अहिराजफणाटोप सुरराजेनपूजितं ॥ ॐ ह्रीं श्रीसुपार्श्वनाथजिनेन्द्राय पूजाजयमाला निर्वपामीति स्वाहा । छन्दः-काशीपःसुप्रष्ठोविलसतिजनकोवाचपृथ्वीशिरीषश्चैत्यद्गर्भविशाखाशिवपथमथसम्मेदभूवंशजिद्रुक कोदण्डानांशतवमितिरपिमकर कश्चयक्षीश्चकालीयस्यासौ नः सुपाश्वोवितरतुवरंनन्याख्ययक्षेश्वरेशः।। ॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीसुपाश्र्व जिनपूजा समाप्ता-॥ 11 - । चोबी - पूजन संग्रह ७३ अथ श्रीचन्द्रप्रभ पूजा लिख्यते। स्वामिन् संवौषट् कृताहाननस्य द्विष्टान्तेनोहङ्कितस्थापनस्य । 'स्वं निर्नेक्तुं तेवषट्कारजासत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ १॥ ह्रीं अर्हन् श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संबौषट् आह्वाननम्। ॐ ह्रीं अर्हन श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं अर्हन श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्र, अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्सन्निधीकरणम् । - अथाष्टकम्॥ जलं- मन्दाकिनीतीर्थभर्जलैश्च भृङ्गारनालेन विनिर्गतैश्च । चन्द्रप्रभ चन्द्रसुचिह्न- लाञ्छितं यजेत्रिकालं भवरोगशान्तये ॥१॥ ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभतीङ्कराय जलं निवेमीति स्वाहा। चन्दनं- सुकुंकुमश्चन्दन चन्द्रमियतैर्विलेपयेहं शशिपादपद्मस् । चन्द्रप्रभ चन्द्रसुचिंबलाञ्छितं: यजे त्रिकालं भवरोगशान्तये ॥२॥ ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभजिनेन्द्रीय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा । अक्षतः- अखण्डशाल्यक्षतपुण्यपुजैः सुमोक्तिकाभर्जिनपादयुग्मम् । चन्द्रप्रभ चन्द्र सुचिह्नलाञ्छितं- यजेत्रिकालं भवरोगशान्तये ॥३॥ ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभजिनेश्वराय अक्षतानिर्वपामीति स्वाहा। vi. , चौबी० पजन संग्रह . ७४ 1 पुष्प-कंदम्बनीलोत्पलस्वर्णजाति सुकेतकीचंपकमालतीभिः। चन्द्रप्रभं चन्द्रसुचिह्नलाञ्छितं- यजेत्रिकालं भवरोगशान्तये ॥४॥ॐहीं चन्द्रप्रभजिनेश्वराय पुष् निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्य- सुखज्जक पायसमोदकैश्चदुग्धाज्यभक्तदधिभिर्वहुव्यञ्जनेश्च। चन्द्रप्रभंचन्द्रसुचिह्नलाञ्छितं यजेत्रिकालं भवरोगशान्तये ॥ ५॥ ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभपरमेश्वराय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । दीपः-घृतस्नेहकर्परसुसम्भवैश्च प्रदीपकैर्ध्वान्तविनाशनाय । चन्द्रप्रभ चन्द्र सुचिढ़लाञ्छितं- यजेत्रिकालं भवरोगशान्तये ॥६॥ ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभस्वामिने दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूपः- कर्पूरकृष्णागुरुचन्दनौधैः सुगन्धीकृतदिक्चयैश्च । चन्द्रप्रभं चन्द्रसुचिन्हलाञ्छितं. यजेत्रिकालं भवरोगशान्तये ॥७॥ ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभ जिनेन्द्राय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलं- सुमातुलिङ्गाम्रकपित्थमोचै रङ्गनिवुपनसैः सुरसैफलेश्च । चन्द्रप्रभ चन्द्रसुचिह्नलाञ्छितं- यजेत्रिकालं भवरोगशान्तये ॥८॥ ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभस्वामिने फेल निर्वपामीति स्वाहा । अर्घः- वार्गन्धतण्डुलंसुपुष्पचरुप्रदापधूपैः फलैर्दर्भसुसपैश्च । अर्घददे स्वस्तिकनृत्यगीतः श्री चन्द्रनाथाय सुभक्तितोऽहम् ॥९॥ ॐ ह्रीं श्रीचन्द्रप्रभतीर्थङ्कराय अर्घनिर्वपामीति स्वाहा । चन्द्रप्रभं चन्द्रमरीचिगौर चन्द्रद्वितीय जगतीवकान्तं । वन्देभिवन्धं महतामृषीन्द्रजिनं- जितस्वादुकषायवन्धम् ॥१०॥ इति पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत् - न । - चौबी० . पजन संग्रह ७५ अथ पञ्चकल्याणकानि । गर्भः- चैत्रकृष्णेसुपञ्चम्यां चन्द्राभं चन्द्र लाञ्छनम् । जातं सुलक्ष्मणागर्भ महामि वसुद्रव्यकः ॥१॥ ॐ ह्रीं चेत्रकृष्णपञ्चम्यां श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्रायः गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । जन्म- पौषकृष्णेशुभेघने चैकाश्यां जिनोत्तमम् । महासेनात्मज चर्चेस्नापितं क्षीरसज्जलैः ॥२॥ ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभजिनेश्वराय पोषकृष्णैकादश्यां जन्मजातकाय अघ निर्वपामीति स्वाहा। तपः- पौषे च श्यामलेपक्षेचैकादश्यां तपोजितम् । चन्द्रप्रभंयजे नित्यं कर्माष्टकविनाशकम् ॥३॥ ॐ ह्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय पौषकृष्णकादश्यां तपोधारकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा। ज्ञान-फाल्गुणे कृष्णपक्षेचसप्तम्यां ज्ञाननायकम् । यजेचन्द्र शुभेद्रव्यः परमस्थानसप्तदम् ॥४॥ ॐ ह्रीं चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय फाल्गुणकृष्णसप्तम्यां ज्ञानकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति-स्वाहा । निर्वाण- फाल्गुणे कृष्णसप्तम्यां यजेहं मुक्तिनायकम् । अष्टमं तीर्थनार्थ च पञ्चमीगतिदायकम् ॥५॥ ॐ ह्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय फाल्गुण कृष्णसप्तम्यां मोक्षकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। चन्द्रं पुरांबुधिचन्द्रचन्द्राङ्क चन्द्रसंकाशं । चन्द्रप्रभजिनमर्चे पूर्णेन्दुस्फारकीर्तिकान्तं च ६॥ .'ॐहीं चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय पञ्चकल्याणकाय अघ.निर्वपानीतिःस्वाहा।। ... जयमाला-जन्ममरणत्राता दुःखदारिद्रयहर्ता त्रिभुवनसुखकर्ता मोक्षमार्गकभत्ता दुरितविपिनच्छेदे । - 1 ।

- चौबी० | तीक्ष्णशस्त्रहिनोवा वसुपरिमितिगण्यो रक्षतात्तीर्थनाथः ॥ १ ॥ जय चन्द्रप्रभकृतशर्मपूर जय चन्द्र- पूजन | प्रभजिनपापदूर । जय चन्द्रप्रभविजितारिवर्ग जयचन्द्रप्रभकृतविविधसर्गः ॥२॥ जय चन्द्रप्रभ संग्रह भवपापत्यक्त जयचन्द्रप्रभ निजशर्मशक्त । जयचन्द्रप्रभ देवाधिदेव जयचन्द्रप्रभकृतशकसेव ॥३॥जय ७६ चन्द्रप्रभ भवप्राप्ततीर जय चन्द्रप्रभ कर्मारिवीर । जय चन्द्रप्रभ.जगजीवमित्र जय चन्द्रप्रभ मिथ्या. सशस्त्र ॥ ४॥ जय चन्द्रप्रभ गुणगणनिवास जय. चन्द्रप्रभ हतकुन्दभास । जय चन्द्रप्रभ जिन. भृत्यरक्ष जयचन्द्रप्रभकृतभव्यपक्ष ॥५॥ जय चन्द्रप्रभदुःखाब्धितीर जयचन्द्रप्रभजितकामवीर। जयचन्द्रप्रभकृतसकलकाम जयचन्द्रप्रभ जिनत्यक्तवाम ॥६॥ पत्ताछन्दः-जयत्रिभुवननेत्रं परमचरित्रं सफलप्रकाशक ज्ञानमयम् । जय चन्द्रजिनेश्वर नमितसुरेश्वर महासेनसुतशर्मकरम् ॥७॥ ॐह्रीं श्रीचन्द्रप्रभ तीर्थङ्करायपूजा जयमालार्घ निर्वपामीति स्वाहा। छन्दः-जन्मक्षवनुराधिका मृगधरोङ्कोंगश्चनागोजभा, साईचापशतप्रमा शिवपदं सम्मे- दको लक्ष्मणा । माताचन्द्रपुरीपुरीच विजयायक्षेश्वरी मालिनी, ज्वालायापचकास्ति यस्यस महासेना स्मजश्चन्द्रभः ॥ ॥ इत्याशीर्वादः । इतिश्रीचन्द्रप्रभतीर्थङ्करपूजा समाप्ता ॥ .

-
चौबी०
जन
संग्रह
अथपुष्पदन्त पूजापारभ्यत ।
स्वामिन् संवौषट्कृताहाननस्य द्विष्टान्तनोदृङ्कित स्थापनस्य ।
स्वनिर्नेक्तुते वषट्कारजायत्सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥
अह्रींअर्हन्श्रीपुष्पदन्तजिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर.संवौषट् आह्वाननम् ।
ॐह्रींअर्हन श्रीपुष्पदन्त जिनेन्द्र अत्रतिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् ।
ॐह्रींअर्हन् श्रीपुष्पदन्तजिनेन्द्र अत्रमम सन्निहितो भवभव वषट् सन्निधीकरणम् ।
अथाष्टकम्-जल-क्षीरनीरवासितैःसुवर्णभृङ्गसंस्थितः। पापतोपनाशकैः सु। न्द्रकान्तिनिर्मलः।
पुष्पदन्ततीर्थपंजिनाधिपं गुणाकरं संयजेशिवप्रदं जितार्ककोटिसत्प्रभम् ॥ १ ॥
ॐहींपुष्पदन्ततीर्थकराय जलंनिर्वपामीतिस्वाहा।
चन्दनम्-गन्धलुब्धषट्पदैः सुकुंकुमैःसुचन्दनः कर्पूरादिगन्धद्रव्यशोभितैः सुगन्धिभिः।
पुष्पदन्ततीर्थपं जिनाधिपंगुणाकरंसंयजेशिवप्रदं जितार्ककोटिसत्प्रभम् ॥ २॥
ॐही पुष्पदन्तजिनायचन्दन निर्वपामीति स्वाहा।
अक्षताः-अक्षतैरखण्डितैः सुकृष्णजीरकैघनः सुगन्धराजभक्ष्यकेश्च मोक्षसौख्यलव्धये ।
पुष्पदन्ततीर्थपं जिनाधिपं गुणाकरं संयजेशिवप्रदं जितार्ककोटिसत्प्रभम् ॥३॥

चौबी० पूजन संग्रह ॐह्रीं पुष्पदन्तजिनाय अक्षतान् निवपामीति स्वाहा। पुष्पम्- सुचम्पकैश्च केतकीसुपारिजातजैघनः मल्लिकारविन्दकुन्द जूथिकादिभिर्वरैः। पुष्पदन्ततीर्थपं जिनाधिपं गुणाकरं संयजेशिवप्रद जितार्ककोटि सत्प्रभम् ॥ ४ ॥ ॐहो पुष्पदन्तजिनाय पुष्पं निर्वामीनि स्वाहा । नैवेद्यम्-पायसान्तमोदकादिघेवरैः सुखज्जकैप्राज्यपूरपूरितः सुतप्तभक्तव्यञ्जनः । पुष्तदन्ततीर्थपं जिनाधिपं गुणाकरं संयजेशिवप्रदं जितार्ककोटिसत्प्रभम् ॥ ५॥ ॐ ह्रीं पुष्पदन्तजिनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । दीपः- - हिरण्यपात्रसंस्थितैः सुरत्नजातदीपकैः प्राज्यस्नेहवर्तिभिर्घनान्धकारनाशकः। पुष्पदन्ततीर्थपं जिनाधिपं गुणाकरं संयजेशिवप्रदं जितार्क कोटिसत्प्रभम् ॥ ६ ॥ ॐह्री पुष्पदन्तजिनाय दीपं निर्वामीति स्वाहा । धूपः- मोथदेवदारुभिः सुचन्दनैः शिलारसे: लवङ्गचन्द्रमिश्रितः कुकल्मपौघदाहकैः । पुष्पदन्ततीर्थपं जिनाधिपं गुणाकरं संयजेशिवप्रदं जिनार्ककोटिसत्प्रभम् ॥७॥ ॐहीं पुष्पदन्तजिनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलं- नालिकेरवीजपुरद्राक्ष पनि कैः, कपित्थमोचचोचकैः सुपक्कनागरगकः । पुष्पदन्ततीर्थपं जिनाधिपं गुणाकरं संयजेशिवप्रदं जितार्ककोटिसत्प्रभम् ॥ ८॥ । .

- . . योबी० पूजन संग्रह ७९ ॐहीं पुष्पदन्तर्जिनाय फलं निर्वपामीति स्वाहा। महाघः- वागन्धाक्षतपुष्पभक्ष्यचरुकैदीपैश्चधूः फलैः। दुर्वास्वस्तिकस्नोत्रपाठनिवहै यैिरनेकैःशुभैः । श्रीसुविधि चं सुपूजये सुविधिना अर्धेः सुपात्रस्थितैः ॥९॥ ॐहीं पुष्पदन्ततीर्थङ्कराय महार्घ निर्वपामीति स्वाहा । पञ्चकल्याणकानि-गर्भः-नवम्यां फाल्गुणेकृष्णेजयारामाशुभोदरो पुष्पदन्त यजेनित्यमष्टद्रव्यसमुच्चयैः ह्रीं पुष्पदन्ततीर्थंकराय फाल्गुणकृष्ण नवम्यां गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जन्म- शुभ्रमार्गशिरे मासेपवित्रे प्रतिपदिने । पुष्पदन्तं यजेनित्यमिक्ष्वाकु कुलसम्भवम् ॥२॥ ॐह्रींपुष्पदन्तजिनाय मागशीर्षशुक्लप्रतिदि जन्मजातकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। तपः- मासेमार्गशिरे शक्ले शोभने प्रतिपत्तिथौ ।श्रीसुविधिं च यजेनित्यं सच्चारित्र्यमहोदधिम् ॥३॥ ॐहीपुष्पदन्ततीर्थनाथायमार्गशीर्षशुक्लप्रतिपदि तपःकल्याणकायअर्घ निर्वपामीतिस्वाहा। ज्ञानम्- कार्तिकेचार्जुने पक्षेशोभने द्वितीयादिने । पुष्पदन्तं महाशान्तं चर्चेकवलिनं परम् ॥ ४ ॥ ॐह्री पुष्पदन्ताय कार्तिकशुक्लद्वितीयायां ज्ञानकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाणम्-शुक्लेभाद्रपदेमासे चाष्टमीशोभनेदिने । पुष्पदन्त यजेधीरं सर्वकर्म निवारकम् ॥ ५॥ अह्रीं पुष्पदन्तजिनेशाय भाद्रपदशुक्लाष्टम्यां मोक्षप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । जयरामारमणेशस्य सुग्रीवस्य च सूनुकम्। पुष्पदन्तमहवन्दे पुष्पदन्तसमप्रभम् ॥ ३ ।

चोबा० पूजन संग्रह ८० ॥ । अह्रीं पुष्पदन्तजिनेन्द्राय पञ्चकल्याणकेभ्यो ऽध निर्वपामीति स्वाहा। जयमाला-जय भवभयहरणं शिवसुखकरणं पुष्पदन्तजिनपति चरणम्।जयशुभमतिकरणं यतिपति शरणं संस्तवीम भवजलतरणम् ॥१॥ जय पुष्पदन्तजिनराजराज जय सुधासमानसिततनुसमाज। जय दिनकरनमितसुचन्द्रपाद जय मकरचिह्वजितमोहवाद ॥ २ ॥ जय नृपतितात सुग्रीवनाम जय रामाजननी तेजोधाम । सुरनर अहिसेवत अष्टयाम जय ब्रह्मचर्यधृतत्यक्तवाम ॥३॥ जय क्षमाभाव जितक्रोधदोष जय मार्दवगुण जितमानकोष । जय आर्जव भावकुमायत्यक्त जय द्विविधपरिग्रहलोभ मुक्तं ॥४॥ जय अष्टादशदोषविमुक्तदेव जय अनन्तचतुष्टययुक्तदेव । जय जय हि अनन्तानन्तज्ञान जय शकसुरासुर कृतसुमान॥५॥जय समवशरणमध्य अन्तरीक अङ्गलीचतुष्टय स्थितसुठोक। जय चामरचौसठिचन्द्रश्वेत यक्षठारेहि निजभक्तिहेत॥६॥जय संसृतिसागर तरणपोत जय भवदावानल 'मेघश्रोत । जय षटकायनके रक्षपाल जय ध्यानवजहनिकर्मजाल ॥७॥ जय पञ्चकल्याण उत्सवमहान जिहे देखे भजिह भ्रम अज्ञान । जय अनन्तगुणात्मक चित्तुरूप । जय शिवरमणीवर सिद्ध भूप ॥८॥ पत्ताछन्दः-जय दोषातीतं वसुविधिहतकं वसुगुणयुक्तं श्रीजिनपम्। जय धर्मपवित्रं शुद्धसुमोत्रं लोक शिखर वसुभूमि गतम् ॥९॥ ॐहीं पुष्पदन्ततीर्थंकराय पूजाजयमाला निर्वपामीति स्वाहा । छन्दः-मूलोनं मकरध्वजोजनयितासुग्रीवनामाम्बिका रामाचापशतप्रमाणमवनिर्मुक्तेःसुसम्मेदकः।नागो गोजित यक्षकोप्यथमहा कल्पाभिधा यक्षिणीकाकन्दीनगरी च यस्यससितोनःपुष्पदन्तोऽवतु। इत्याशीर्वादः।

चौबी० जन संग्रह ८१ Se go न अथ शीतलनाथ पूजा पारभ्यते। स्वामिन संवौषट्कृताह्वाननस्य द्विष्टान्तेनोहङ्कितस्थापनस्य । स्वनिर्नेक्तुं ते वषट्कारजाग्रत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ ह्रीं अर्हन श्री शीतलनाथ जिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् ॥ ॐ ह्रीं अहंन् श्रीशीतलनाथ जिनेद्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। ह्रीं अर्हन श्रीशीतलनाथजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम् । लम्- गङ्गासरित्प्रमुखजैर्वरवारिभिश्च भृङ्गारनालेन विनिर्गतैश्च । श्रीशीतलेशं विधिना यजामि संसारतापहननाय सुखाय शान्त्यै ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं शीतलनाथ जिनेद्राय जलं निवंपामीति स्वाहा । चन्दनम्-सुकुंकुमेश्चन्दनचन्द्रमिश्रिते विलेपयामि जिनपादपयोजयुग्मम् । श्रीशीतलेशं विधिना यजामि संसारतापहननाय सुखाय शान्त्यै ॥२॥ ॐ ह्रीं शीतलनाथजिनेन्द्राय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा । अक्षताः-सुतण्डुलेश्चन्द्रकरावदातः सुमौक्तिकाभैर्वरपुण्यपुजैः श्रीशीतलेशं विधिना यजामि संसार चौबी० पूजन संग्रह ।८२ तापहननाय सुखाय शान्त्यै॥ ३॥ॐ ह्रीं शीतलनाथजिनेन्द्राय अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा पुष्पम्- सुमालतीचम्पकमालतीभिः पयोजकुन्दैवरदेवपुष्पैः । श्रीशीतलेशं विधिना यजामि संसारतापहननाय सुखायशान्त्यै ॥ ४॥ ॐ ह्रीं शीतलनाथ स्वामिने पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्यम्-सुमोदकैःखज्जकपायसान्नै दधीक्षुभक्कादिसुव्यञ्जनैश्च । श्रीशीतलेशं विधिनायजामि संसारतापहननाय सुखायशान्त्यः ॥५॥ ॐह्रीं शीतलस्वामिने नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपः- कर्पूरस्नेहाज्यभवैः प्रदीपस्तमोवितानंदलितवलद्भिः । श्रीशीतलेशंविधिना यजामि- संसारतापहननाय सुखायशान्त्ये ॥६॥ ॐहों शीतलपरमेश्वराय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूपः- कर्पूरकृष्णागुरुदेवपुष्पैः शिलारसैश्चन्दनचन्द्रयुक्तः। श्री शीतलेशं विधिना यजामि- संसारतापहननाय सुखाय शान्त्यै ॥७॥ ॐबों शीतलनाथ जिनेन्द्राय धूपं निर्वपामीतिस्वाहा । फलं- चोचाम्रमोर्वरनागरङ्गैः कपित्थद्राक्षहृदंजिनैश्च । श्री शीतलेशं विधिना यजामि- संसारतापहननाय सुखाय शान्त्यै ॥ ॐ ह्रीं शीतलनाथभगवते फलं निर्वपामीति स्वाहा। महापः- जलगन्धाक्षतपुष्पैश्चरुदीपेधूपपक्कफलैः । दुर्वास्वस्तिकवाद्यैरर्घमुत्तारयेद्विबुधैः ॥९॥ ॐ ह्रीं शीतलनाथाय महार्घ निपामीति स्वाहा ।

चौबी. पजन सग्रह ८३ अथ पञ्चकल्याणकानि । गर्भः-चैत्रमासे सुकृष्णे च पक्षेष्टम्यांसुशोतलम् । यजामि विधिना गर्भ सुनन्दामातृसौख्यदम्॥१॥. ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णाष्टम्यां श्री शीतलनाथगर्भावताराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जन्म-माघकृष्णेसुद्वादश्यां जयजन्मजिनेशिनः। सुनन्दादृढरथावासे कृतोत्सवसुराधिपः॥२॥ ॐ ह्रीं माघकृष्णद्वादश्यां शीतलनाथजन्मकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । तपः- माघमासे श्यामपक्षे द्वादश्यांसुतपोर्जिम् । शीतलेशंमुदाचर्चेसुद्रव्येस्तपसेमुदा ॥३॥ ॐ ह्रीं माघकृष्णद्वादश्यां शीतलनाथतपोधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । ज्ञानं- पौषमासचतुर्दश्यां कृष्णपक्षेजिनेशिनम् । प्राप्तं च केवलज्ञानं यजेहं ज्ञानलब्धये ॥४॥ ॐ ह्रीं पौषकृष्णचतुर्दश्यां शीतलनाथज्ञानकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। निर्वाणं-आश्विने चार्जुने पक्षे चाष्टम्यां श्रुद्धवासरे। वसुद्रव्यैः सुमुक्तयर्थं वसुभूमिगतंयजे॥५॥ ॐ ह्रीं शीतलनाथजिनेन्द्राय आश्विनशुक्लाष्टम्यां निर्वाणप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा • भद्रपुर्यासुमाङ्गल्यं प्राप्तं शीतलेशिनम् । सुनन्दादृढरथावासे पूजितं नृसुराधिपः ॥६॥ ॐ ह्रीं शीतलनाथ पञ्चकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।

चोवी० पूजन - अवजयमाला। यस्मिन् वसन्ति कमला दिमला सदेव शीतलं जिना दशमं नितान्तं । तुत्यास्तुवेदमनि- संग्रह 'निर्मलनामुखेन वैराग्यवारिधिविधुपममादरेण ॥ १॥ शीतं मुखंलानि समानुजीवान नं शीनलंप्रणिग- दन्ति यतीश्वगयाः। तं शीतलं श्रयतभव्य जनाहि भाया यस्यायेण भवनीहममापिसोयम् ॥२॥ शीतलेश नमस्तुभ्यं संसारातापनाशक । संसारोत्तरणेनेनो दुःबदारयनारन ॥३॥ ननुर्गनिभवावर्त सनैकसुधासम मांत्राहिभवसंपानान् रक्ष रक्ष दयानिधे ॥१॥ जय तं भवकान्नारे मार्गदान करना। जय त्वं कर्मक्षोणीशपातनं कुलिशोपम ॥ ५॥ जग त्वं कराधार जय ज्ञाननायक । जय वं मुक्ति रामायपत्येजगति विश्रुन ॥ ३॥ जयस्वंप्रानिहाचंग जयानन्नतुष्टक । जयानन्न गुणाधीश सर्वदीप विदरग ॥ ७॥ जय सनन्दासनोडा हटरयस्य कुलांगुमन् । दिकयध्वनिमुभावष्टगा भवाग्निदाह- नाशक ॥ ८ ॥ परमात्मन्नमस्तुभ्य निास्वरूपसम्यानुभुज । जय त्वं बीनगगाणां शामिनाक्तिरमावर १ घत्ता छन्दः-जय शीतलस्वामिन् ज्ञानमधार रविचन्द्रार्चितपदयुगल । जय त्रिभुवननायक- ज्ञानसुदायक स्त्र स्वरूपमयज्ञानभर ॥१॥ॐहीं श्री शीतलनाधापनाजयमाला निर्मपामीतिमाहा। छन्दः-पीतामा विन्धवृक्षाढायनृपतिजन्मान्मुक्तिभूमिः सम्मेंदाकायमानं नवनिधनुरसो. भद्रकापासुनन्दा। माता ब्रह्मा च यक्षः पदयुगलनतामानवी मालिका पूर्वाधादा व यस्य प्रदितुः स जिनः शीतलाग्यः श्रियंनः ॥ इत्याशीर्वादः । इति श्री शीतलनायजिनपूजा समाना ।

चौबी० E पजन संग्रह ८५ -- अथ श्रेयांशनाथ पूजाप्रारभ्यते । स्वामिन संवौषट्कृताह्वानस्य द्विष्टान्ते नोवृतितस्थापनस्य । स्वं निर्नेक्तुं ते वषट्कारजाग्रत्- सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ ॐ ह्रीं अर्हन् श्रीश्रेयांनाथ सजिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संबोषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं अर्हन् श्री श्रेयांसजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं अहंन् श्री श्रेयांसजिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम। जलं- मन्दाकिनीतीर्थजलैः पवित्रैर्गाङ्गेयभृङ्गारसुनालनिर्गतः। श्रेयांसदेवं परिपूजयेह- • त्रैलोक्यनाथार्चितपादयुग्मम् ॥ १॥ ॐही श्रेयांसनाथाय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन- सुकुंकुमैश्चन्दनचन्द्रयक्तैर्विलेपयेहं जिनपादयुग्मम् । श्रेयांसदेवं परिपूजयेह- त्रैलोक्यनाथार्चितपादयुग्मम् ॥२॥ॐ ह्रीं श्रेयांसतीर्थङ्कराय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षताः- चन्द्रावदातःसरलैः सुतण्डुलैःसुमौक्तिकानामिवपुण्य पुजैः । श्रेयांसदेवं परिपूजयेहं- त्रैलोक्यनाथार्चितपादयुग्मम् ॥ ३॥ ॐ ह्रीं श्रेयांसदेवाय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । पुष्पं- सुमालनीकेतकिपुष्पकैश्च पयोजकुन्दै सरसोरुहेश्च । श्रेयांसदेवं परिपूजयेह- E चौबी० पूजन संग्रह ८६ . त्रैलोक्यनाथार्चितपोदयुग्मम् ॥ ४॥ ॐह्रीं श्रेयांप्तनाथदेवाय पुष्प निर्वपामीति स्वाहा। नैवेद्यं-क्षीरान्नपूर्वरमोदकैश्च सुव्यंजनर्भक्तदवीक्षुभयः । श्रेयांस देवंपरिपूजयेहं. त्रैलोक्यनाथार्चितपादयुग्मम् ॥५॥ ॐ ह्रीं श्रेयांसतीर्थनाथाय नैवेद्यं निवपामीति स्वाहा। दीपः- दीपैःसुकर्पूरघृतोद्भवैश्च आरार्तिकस्थस्तमोनाशकैश्च । श्रेयांसदेवं परिपूजयेह- त्रैलोक्यनाथार्चितपादयुग्मम् ॥ ६ ॥ ॐ हो श्रेयांसनाथाय दीपं निर्वपामीनि स्वाहा । धूपः-कर्पूरचन्दनशिलारसदवपुष्पेधूपः कुर्मेन्धनरावकेश्च । श्रेयांसदेवंपरिपूजयेह- त्रैलोक्यनाथार्चितादयुग्मम् ॥७॥ ॐ ह्रीं श्रेयांपतीर्थकराय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलं- नारङ्गनिम्धुपनसैर्वरमातुलिङ्गैक्षिाम्रमोचकदली सुकपित्थकैश्च । श्रेयांसवं परिपूजयेह- त्रैलोक्यनाथार्षिनपादयुग्मम् ॥ ८॥ ॐहीं श्रेयांसनाथाय फलं निर्वामीति स्वाहा । महाघः- वार्गन्धतण्डुलसुपुष्पचरुप्रदीपै पैःफलैः प्रचुरमर्घमुनारयामि । गीतादिवायवरनर्तनमङ्गलेश्च- श्रेयासदेवयजनाय शिवायशान्त्यै ॥९॥ॐ ही श्री श्रेयांसनाथाय महाघ निर्वपामीति स्वाहा। श्रवणेसिंहपुर्यां च विमला विमलाङ्गजः। गण्डकाङ्कः प्रियोलोके श्रीश्रेयांसो मुदेस्तु वः ॥१०॥ ॐ ह्रीं श्रेयांसस्वामिने पूणा निवपामीति स्वाहा । अथ पञ्चकल्याणकानि। गर्भ:- ज्येष्ठकृष्णतिथोषष्ठयां विमलोदरगर्भकम् । यजेमनोत्सवं कृत्वा सुरासुरनमस्कृतम् ॥१॥ - ८७ चौबी० ॐ ह्रीं श्रेयांसतीर्थकराय ज्येष्ठकृष्णषष्ठयां गर्भकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। जन्म- फाल्गुणे कृष्णपक्षं च एकादश्यां सुतोत्तमम् । यजे स्वर्णगिरौस्नातं विमलाख्यनृपगृहे ॥२॥ संग्रह ॐह्रीं श्रेयांसजिनेन्द्राय फाल्गुण कृष्णकादश्यां जन्मधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। तपः- फाल्गुणेश्यामलेपक्षेचेकादश्यां जिनेशिनं । तपस्तप्तं द्विधासम्यक् वाह्यभ्यन्तरश्रुद्धिदम् ॥ ३॥ ॐ ह्रीं श्रेयांसजिनेन्द्राय फाल्गुणकृष्णकादश्यां तपोधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञानं- माघकृष्णे अमावस्या ज्ञानावरणसंक्षयात् । प्राप्तं च केवलज्ञानं संयजे ज्ञाननायकम् ॥ ४॥. - ॐ ह्रीं श्रेयांसनाथाय माघकृष्णामावस्यायां ज्ञानकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाणं- श्रावणेशुक्लपक्षे च पूर्णिमायां यजेजिनम् । वसुभूमिगतंकर्मत्यक्तं चाष्टगुणाधिकम् ॥५॥ ॐ ह्रीं श्रावणशुक्लपूर्णिमायां श्रेयांसनिर्वाणप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । महाघः-विमलाविमलयोः सूनुं चामीकरसमद्युतिम् । श्रेयांस संयजेहर्षादगौरीगन्धर्वनायकम् ॥ ६॥ ॐ ह्रीं श्रेयांसजिनेन्द्राय पञ्चकल्याणकाय महा निर्वपामीति स्वाहा। अथ जयमाला। श्रेयांसदेवं परमं पवित्रं दूरीकृतं पुत्रसुहृत्कलनम्। वन्देऽमराधीश्वरपुण्यपात्रं स्तोष्ये सदा . .

- चौबी० संग्रह सकलजीवपुराणमित्रम् ॥१॥ जयत्वं देवदेवेश जय श्रेयांसनायक। जय त्वां श्रेयकर्तारं वन्देश्रेयः सुखप्रदम् ॥ २॥ जयत्वां वसुकर्माणां ध्वंसकं ज्ञाननायकम् । वन्दे त्वां दुःखहन्तारं त्रातारं भववारिधः ॥३॥ नेतारं शिवभूमौच कर्तारं सुखसन्ततः। भर्तार मुक्तिरामाया भेत्तारं कर्मभूभृताम् ॥ ४॥ जय त्वं प्रातिहार्येश जयानन्तचतुष्टक । जयानन्तगुणाधार जय तत्त्वार्थदेशक ॥ ५॥ जय द्विधा तप- स्तप्त जय न्यवित्यक्तक जय कर्मधराधीशपातने कुलिशोपम ॥ ६॥सिंहपुर्या नृपाशीश विमलस्य सुतोत्तम । विमलामातृसूनोत्व जय जीवदयानिधे ॥७॥ तप्तहाटकतनोदीप्ताष्टाधिकसहस्रक । लक्षणांनां निर्धे श्रीमन् पाहि त्राहि जगज्जनान् ॥८॥ चिदानन्दस्वरूपस्य ध्यातारं परमेष्ठिनम् । गण्डकाध्वजोपेतं निर्विकारं स्तुवे सदा ॥९॥ घत्ताछन्दः-श्रेयांसजिनेन्द्र नमितनरेद्रं जयन्मुनीन्द्रं पापहरम् । हृत्कर्मकुवादं घनसमनादं वन्देहं जगत्प्रमोदकरम् ॥ १०॥ ॐ ह्रीं श्रेयांस तीर्थंकरपूजाजयमालाघं निर्वपामीनि स्वाहा ॥ पद्यम्-यक्षों गौरीश्वरोभं श्रवण इति तरुस्तिन्दुकोङ्कश्च गैण्डो मानं चाशीतिचाप कनकनिभंतनुः सिंहनादा पुरीच। सम्मेदो मुक्तिभूमिर्विलसतजननी वैष्णवी विष्णुराजस्तातो यस्यास्तु तस्मै नम इह सततं श्रेयसे श्रीजिनाय ॥११॥ इत्याशीर्वादः ॥ ॥ इतिश्रेयांसतीर्थङ्करपूजा सम्पूर्णा ॥ ।

। पूजा लिख्यते। चौबी० पजन संग्रह ८९ अथ वासुपूज्यजिन स्वामिन् संवौषकृताहाननस्य दिष्टान्तेनोहङ्किनस्थापनस्य । स्वं निर्नेक्तुं ते वषट्कारजापत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ ॐहीं अर्हन श्री परमब्रह्म वासुपूज्यजिनेन्द्र' अत्रागच्छ'आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम्। ॐ ह्रीं अर्हन श्री परमब्रह्म वासुपज्यजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् । ॐ ह्रीं अर्हन श्री परमब्रह्मे वासुपूज्य जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरम् ॥ अथाष्टकम्। जलम्-श्रीजाह्नवीप्रमुखतीर्थजले पवित्रर्गाङ्गेयभृङ्गारसुनालनिर्गतैः । श्रीवासुपूज्यं प्रयजे सदाहं सुवासवानां शतकनपूज्यम् ॥ ॐह्रीं श्रीवासुपूज्यजिनेश्वराय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दनम्-सुचन्दन कुंकुमचन्द्र मिश्रित विलेपयेहें जिनपादप-कम् । श्रीवासुपूज्यं प्रयजे सदाहं सुवासवानां शतकेन पज्यम् ॥२॥ ॐह्रीं श्रीवासुपूज्यतीर्थनाथाय चन्दनं निर्वपामोति स्वाहा । अक्षता:-अखण्डचन्द्रोपमतण्डुलौघेः सुमौक्तिकाभैरिव पुण्यपुजैः। श्रीवासुपूज्यं प्रयजे सदाहं सुवासवानां शतकेन पूज्यम् ॥ ३॥ ॐह्रीं श्रीवासुपूज्य जिनेश्वरायअक्षतान निर्वपामीनि स्वाहा पुष्पं-सुमालतीकेतकिवारिजश्चकदम्बजातीवरनागचम्पकः। श्रीवासुपूज्यं प्रयजे सदाहं । ६ h , चोवी० पूजन संग्रह ९० सुवासवानां शतकेन पूज्यम् ।। ॐ ह्रीं वासुपज्यजिनराजाय पुष्पं निवेपामीति स्वाहा। नवेद्यम्-सशर्करैर्मुग्दभवःसुमोदकः सुव्यञ्जनभक्तदधीरुभक्ष्यैः। श्रीवासुज्यं प्रयजे सदाऽहं सुवासवानां शतकेनपूज्यम् ॥५॥ ॐ ह्रीं वासुपूज्यजिनेद्राय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपः-स्नेहाज्यकर्पूरभवैःप्रदीपर्वलत्प्रभोहतमोहरैश्च । श्रीवासुपूज्यं प्रयजे सदाऽह सुवासवानां शतकेन पुज्यम् ॥६॥ॐ ह्रीं वासुपूज्यजिनेशाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूपः-कर्पूरकृष्णागुरुचन्द्रयुक्तः शिलाद्रवैश्चन्दनगन्धधुपैः। श्रीवासुपूज्यं प्रयजे. सदाहं सुवासवानां शतकेन पूज्यम् ॥ ७॥ ॐ ह्रीं वासुपूज्यजिनेश्वराय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फलं-क्रमुकदाडिमद्राक्षकपित्थकै. नारङ्गनिम्बुपनसैःसरसफलौघेः । श्रीवासुपूज्यं प्रयजे सदाहं सुवासवानां शतकेनपूज्यम् ॥ ८॥ ॐहीं वासुपूज्यतीर्थपतये फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घः-वागंन्धतण्डुलसुपुष्पचरुप्रदीपैडूंपैःफलैःसर्षपदर्भयुक्तः। अधैर्यजे जिनवरेंद्रसुवासुपूज्यं नानाविधैर्मङ्गलंगीतनृत्यैः॥ ९॥ ॐह्रीं वासुपूज्यतीर्थंकराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ पञ्चकल्याणकानि। गर्भ:- आषाढकृष्णपक्षे च षष्ठ्यां गर्भ जिनेशिनम् । जयावत्युदरेजातं,चर्चे नृसुरसेवितम् ॐहीं वार पत्यतीर्थंकराय आषाढकृष्णषष्ठयां गर्भावताराय अध निर्वपामोनिस्वाहा। । 4 वी संग्रह ९१ जन्म- फाल्गुणे श्यामलेपक्षे चतुर्दश्यां यजेमुदा । स्नापितं मेरुशिखरे जन्मजातनृपालये॥ ॐहीं वासुपूज्यजिनेश्वराय फाल्गुणकृष्णचतुर्दश्यां जन्मकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा। फाल्गुणे कृष्णपक्षे च चतुर्दश्यां जिनेशिनं । चर्चे महातपस्तप्तं कर्माष्टकसुहानये ॥ ॐह्री वासुपूज्यजिनेश्वराय फाल्गुणकृष्णचतुर्दश्यां तपोधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । ज्ञानम्- माघशुभ्रद्वितीयायां संप्राप्तं ज्ञानमद्भुतम् । लोकालोकप्रकाशाय संयजे ज्ञाननायकम् ॥ ॐह्रीं वासुपूज्यतीश्वराय माघशुक्लद्वितीयायां ज्ञानकल्याणकाय अघ निर्वपामीति स्वाहा। निर्वाणम्-शुद्धभाद्रपदे.शुभ्रचतुर्दशी सुवासरे। संयजे कर्मनाशाय पञ्चमीगतिनायकम् । ॐह्रीं भाद्रपदशुक्लचतुर्दश्यां वासुपूज्यनिर्वा णिप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। । जयरामावसुपज्यसुतश्चम्पाधिपोऽरुणः। वासुपूज्यो मयापूज्यो महिषध्वजरांजितः ।। डों ह्रीं वासुपूज्यजिनेश्वराय । पञ्चकल्याणधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ जयमाला। + ८ श्रीवासुपूज्यं प्रणमामि नित्यं पापापहं केवललोचनं च । चम्पापुरे मोक्षगतं विकामं स्मृता- ऽपि कर्मक्षयमातनोति ॥ १॥ श्रीवासुपूज्यं वसुपूज्यजातं रामाजयायाः सत्पुण्यपात्रम् । सुवासवाना शतकेन वन्ध स्तोष्ये सदा मङ्गलपाठमुख्यः ॥ २॥ जय वासुपूज्य जिनराजदेव सुरनरअहिपति नित --- पजन संग्रह ९२ चौबी० कृतसुसेव । वसुपूज्यनृपतिजिनराजतात , जयरामाजिनजननीविख्यात ॥ ३॥ जय महिषचिह्वज़िन चरणराज जय चम्पानगरी कृतसुकाज । जय जगत् विनश्वररूपदेखि जय राज्य विवाह सत्यज- नपेखि ॥ ४॥ जय लोकान्तिक कृतस्तुतिनियोग प्रभुजायधरयो वनमध्ययोग । जय षष्ठ सुपूरणकरि- सुधीर नृपसुन्दरहितदतदानखीर ॥ ५॥ जय घोरमहातपतप्तवीर विधिसकलनाशि केवलसुधीर । जय समवशरण सुरराजकीन जय अन्तरीकपरमात्मलीन ॥६॥ जय प्रातिहार्य अतिशय महान जय अनंतचतुष्टय ऋद्धिथान । जय चम्पापुर निजध्यानरूप शिवधामगये प्रभुसुख स्वरूप ॥ ७॥ पत्ताछन्दः-इतिपरमपवित्रं हृत्सुकलत्रं धृतशमशस्त्रं पुण्यभरम् । वसुविधिगिरिहंत परम पुनीतं जयजय द्वादश अर्हन्तम् ॥ ८॥ोंह्रीवासुपूज्यनीर्थकराय पूजा जयमाला निर्वपामीति स्वाहा। पद्यम्-चम्पानिर्वृतिभूश्च पूःशतविशाखाजन्मभं पाटलाग्रक्तातनुरप्ययोमहिषकोङ्कःसप्ततिश्चापकाः। उत्सेधोविलयांविकाच वसुपूज्यःकारणं यस्यतं गान्धारी महाकुमारविनुतं श्रीवासुपूज्यंभजे ॥ इत्याशीर्वादः । इति श्रीवासुपूज्य तीर्थंकरपूजा समाप्ता॥ ।

अक्षता : -बीच तण्डुलैमाक्तिसन्निभैः । विमलस्य पदाच चर्चेभक्तिभरादहम् ॥३ ॥ चौबी० . संग्रह ९३ । अथ विमलनाथजिन पूजा प्रारभ्यते। स्वामिन्संवौषट्कृताह्वाननस्य द्विष्टान्तेनोहकिंतस्थापनस्य । स्वं निक्तुं ते वषट्कारजाग्रत् सान्निध्यस्थ प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ गेह्रीं अर्हन् श्रीविमलनाथ जिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् ॥ डोह्रीं विमलनाथजिनेन्द्र अतिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् ॥ डॉ.ह्रीं विमलनाथजिनेन्द्र अत्रमम सन्निहितो भव भव वषट्सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम् जलं- स्वधुनीवारिणा नित्यप्रासुकेन सुगन्धिना । संयजेविमलंदेवं जन्मादिदुःखहानये ॥१॥ ॐ ह्रीं विमलगाथाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दनं- सकुंकुमकपुरेण चन्दनेन विलेपये। विमलस्य पदद्वन्द्वं संसारातापहानये ॥२॥ ओं ह्रीं विमलनाथाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा । ह्रीं विमलनाथजिनेन्द्राय अक्षातान् निर्वपामीति स्वाहा।

: । चौबी० पुष्पं- मालतीवारिजैः कुन्दैः पुष्पैः श्वेतसुजातिभिः। यजेविमलपादंच कामारिशरध्वंसनम् ॥४॥ 0 वीं विमलदेवाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । संग्रह नैवेद्य-मोदकः पुपवटुकैः खज्जकैःभक्तव्यञ्जनः। विमलस्य पदं चर्चे क्षुद्वाधाप्रशान्तये ॥५॥ ९४ डोंह्रीं विमलतीर्थनाथाय नवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । दीपः- दीपःस्नेहाज्यसंजातेः कर्पूरतमनाशकः । द्योतयामि जिनाग्रं च ज्वलत्कीलकजालकैः ॥ ६ ॥ डों ह्रीं विमलतीर्थेश्वाराय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूपः- कर्पूरदेवकुसुमेर्मोथचन्दनदारुभिः। धूपैश्चाये सुगन्धैश्च कर्मेन्धनदावोपमः ॥७॥ डों ह्रीं विमलनाथजिनेन्द्राय धूपं निवपामीति स्वाहा। फलं-दाडिमानसुनारलेः कदलीमिष्टनिबुकैः । यजे विमलपादानं मोक्षस्य फललब्धये ॥ ८ ॥ डों ह्रीं विमलनाथजिनेश्वाराय फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घः-जलादिफलपर्यन्त द्रव्यैः सदर्भस्वस्तिकः । अधैर्महाम्यहं नित्यं जिनं सर्वार्थसिद्धिदम् ॥ डों ही विमलनाथजिनेन्द्रीय महाघ निर्वपामीति स्वाहा। अथ पञ्च कल्याणकानि । गर्भ:- कंपिलायां सुरासायां सहस्रारात्समागतः । ज्येष्ठकृष्णदशम्यां च यजेभ्रूणगतं जिनम् ॥ । - - चौबी० जन संग्रह ॐ ह्रीं विमलजिनेन्द्रायज्येष्ठकृष्णदशम्यां गर्भावताराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । जन्म-माघार्जुनचतुर्थ्यां च कृतवर्मनृपगृहे । जन्मोत्सव कृतं देवैः मेरी चचें जिनाधिपम् ॥ ॐ ह्री विमलनाथाय माघशुक्लचतुर्थी जन्मकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। तपः- माघशुक्लचतुर्थी वे द्विधा सङ्गपरित्यजन् । नानाभेदंतपस्तप्तं चचे श्री विमलेश्वरम् ॥ ॐ ह्री विमलनाथजिनाय माघशुक्लचतुर्थी तपोधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञानं- माघशुक्लेसुषष्ठयां च लोकालोक प्रकाशकम् । वोधं सुकेवलं प्राप्तं यजेहं ज्ञाननायकम् । ॐ ह्रीं विमलनाथजिनेन्द्राय माघशुक्लषष्ठयां ज्ञानप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। निर्वाणं- आषाढश्यामपक्षे च अष्टम्यां वसुभूमिगम् । चार्चेऽहंविमलं देवं सुद्रव्यैर्वसुगुणाप्तये ॥ ॐ ह्रीं विमलनाथाय आषाढकृष्णाष्टम्यां निर्वाणप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। कृतवर्मजयारामासुतः सूकरध्वजाङ्कितः । प्राय॑ते विमलेशोऽत्र वैरोठीषण्मुखाधिपः॥ । ॐ ह्रीं विमलजिनेन्द्राय पञ्चकल्याणधारकाय महापं निर्वगमीतिस्वाहा । अथ जयमाला। जय विमलविरक्तोमोक्षरामासुरक्तो दिशतु शिवमनन्तं संघलोकस्य नित्यम् । अमरनिकरसेव्यो. कर्मवल्लीकुठारो हरिशतपरिपूज्यः प्राप्तसंसारपारः॥ १॥ जय विमलसकलजगपूज्यपाय जय विमल- , चौबी० पूजन संग्रह ९६ कनकमयं अमलकाय । जय रागद्वेषमदत्यक्तमाय जय सर्वलोकमनहर्षथाय ॥२॥ जय सूकरचिन्ह सुचरणराजजय भवोंदधितारणतुमजहाज । जयशान्तभावप्रभुनिर्विकार जय करुणासागरजगउधार३ जय विमल अमलगुणकेस्थान जयजगत्प्रकाशनज्ञानभान । जय धर्मघनाघनवृष्टिकोन जय कुज्ञाना- नल कृतसुहीन ॥ ४ ॥ जय राज्यविभवलखिस्वप्नरूप जयत्यागिभये यति राजभूप । जय द्विविधघोर, तपतप्तसार । जय सकलकर्महंनि बहुप्रकारं ॥५॥ जय शुक्लध्यानधरिकर्मनासि लहि केवललोका. लोकभासि । सम्मेदशिखरते मोक्षप्राप्त निजरूपगुणात्मकसुखसुसात ॥ ६ ॥ पत्ता छन्दः- जय विमलजिनेन्द्र नमितसुरेन्द्रपूजितपातिगगणहरणम् । जय परमपुनीतं प्राप्त जय जय विमलजिनेन्द्रवरम् ॥७॥ डोंहीं विमलनाथ जिनेन्द्राय पूजा जयमालाघ निर्वपामीति स्वाहा । छन्दः-जम्बुश्चैत्यतरुःपिता च कृतवर्मीवासुशोत्तराषाढाभंच षडाननोऽप्यनुचरः कांपिल्लक. पत्तनम्। कोलोंकःपरिमातथैवधनुषांषष्ठिस्तु सम्मेदजामुक्तिर्यस्य पुनातु नः सुविमलोवैरोटिकोस्वर्णरुक् । इत्याशीर्वादः । इति श्री विमलनाथतीर्थङ्करपूजा समाप्ता ॥ १३ ।। . .

चोवी० पूजन संग्रह ९७ अथ अनन्तनाथ पुजापारभ्यते। स्वामिन् संवौषट्कृताह्वाननस्य द्विष्टान्तेनोद्दङ्कित स्थापनस्य । स्वनिनेक्तुं ते वषट्कारजाग्रत्सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ ॐहीं अनन्तनाथ जिनअत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं अनन्तनाथजिन अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठः स्थापनम् ॥ . . ॐहीं अनन्तनाथज़िन, अत्र ममसन्निहितो भवभव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ 7 अथाष्टकम्।. जलम्- मन्दाकिनीप्रमुखतीर्थभवर्जलेश्च गाङ्गेगभृङ्गार सुनालनिर्गतः। यजे त्रिकालं वरभावतोऽह- मनन्तसौख्याय अनन्तनाथम् ॥ १॥ॐ ह्रीं अनन्तनाथाय जलं निर्वपामीति स्वाहा । चन्दनम्-सुचन्दनागुरुकर्पूर सुचन्दनैश्च विलेपये वरमनन्तपदान्जयुग्मम् । यजेत्रिकालं वरभावतोऽह- हमनन्तसौख्याय अनन्तनाथम् ॥२॥ ॐह्रीं अनन्तजिनवरेन्द्राय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षता:-चन्द्रावदातैः संरलैरखण्डैः सव्रीहिजेर्जिनपदाग्रसुपुण्यपुजैः । यजेत्रिकालं वरभावतोऽह- मनन्तसौख्या अनन्तनाथम् ॥ ३॥ ॐह्री अनन्तनाथाय अक्षतान निर्वामीति स्वाहा ।

पजन ९० - चौबी० पुष्पम्- कुन्दाब्जनीलोत्पल केतकश्च जाताजपामालतिचंपकोधेः। यजेत्रिकालं वरभावतोऽह- मनन्तसौख्याय अनन्तनाथम् ॥ ४॥ॐह्रीं अनन्तदेवायपुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । संग्रह | नैवेद्यं- क्षीरान्नपूर्वरमोदकेश्च सुपायसैय॑जनतप्तभक्तः । यजेत्रिकालं वरभावतोऽह- मनन्तसौख्याय अनन्तनाथम् ॥ १॥ॐह्रीं अनन्तजिनवरेन्द्राय नैवेद्यं निर्वामीति स्वाहा। दीपः- कर्पूरस्नेहाज्यभः प्रदीपैरुच्छिखोघेस्तमोनाशकैश्च । यजेत्रिकालं वरभावतोऽह- मनन्तसौख्याय अनन्तनाथम् ॥ ६॥ ॐह्रीं अनन्तजिनराजाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । | धूपः- कपूरकृष्णागुरुचन्दनौघेणूंपैःसुगन्धीकृत दिग्विभागैः । यजे त्रिकालं वरभावतोऽह- मनन्तसौख्याय अनन्तनाथम् ॥ ७॥ ॐहीं अनन्तस्वामिने धूपं निर्वपामीति स्वाहा । । फलम्- नारङ्गद्राक्षाम्रकपित्थपूर्गः सुदाडिमेश्चवरचिर्भटेश्च । यजेत्रिकालं वरभावतोऽह मनन्तसौख्याय अनन्तनाथम् ॥ ८॥ ॐह्रीं अनन्तनाथाय फल निर्वपामीति स्वाहा। अर्घः- वार्गन्धतण्डुलसुपुष्पचरुप्रदीपे धूपैःफलैः स्वस्तिकसर्षपैश्च । वादित्रदुर्वावरगाननर्त्तनै- देदेऽर्घमुच्चर्जिनपतिकराग्रे ॥ ९॥ों ह्रीं अनन्ततीर्थङ्कराय महाघ निर्वपामीति स्वाहा । जयस्यामासिंहसेनस्य सुनुमनन्ततीर्थपम् । यजेशाकेतनाथं च इक्ष्वाकुकुलसम्भवम् ॥ इतिपुष्पाञ्जलिंक्षिपेत् । . . .

है - चौबी० , . . पजन संग्रह ९९ । तपः- अथ पञ्चकल्याणकानि । गर्भ:- कार्तिक कृष्णपक्षेवै सुदिनप्रतिपत्तिथौ । जयस्यामोदरेऽनन्तं यजेऽहं सुमहोत्सवैः॥ डोंहीं कार्तिक कृष्ण प्रतिपदि अनन्तजिनगर्भावताराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । जन्म- ज्येष्ठकृष्णे सुद्वादश्यां सिंहसेननृपालये। जन्मोत्सवं कृतंशकैश्चर्चेऽनन्तजिनेश्वरम् ॥ ॐह्रीं अनन्तपरमेश्वराय ज्येष्ठकृष्णद्वादश्यां जन्मकल्याणकायअर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्येष्ठस्य श्यामलेपक्षे द्वादश्यां कर्महानये । द्वादशधातपस्तप्तं यजेऽनन्ततपोनिधिम् ॥ ॐ ह्रीं अनन्तनाथाय ज्येष्ठकृष्ण द्वादश्यां तगेधारकाय अर्घ निवंपामीति स्वाहा। ज्ञानं- चैत्रकृष्णे च दशे च लोकालोक विलोचनम् । कृतं च येनज्ञानेन चर्चे तं ज्ञानवामिनम् ॥ ॐहीं अनन्तनाथाय चैत्रकृष्णामावस्यायां ज्ञानकल्याणकाय अंघ निर्वपामीति स्वाहा। निर्वाणम्-चैत्रकृष्णे सुदर्श च घात्यघातिविवर्जितम्। वसुभूमिगतं देवं यजेहं वसुद्रव्यकैः ॥ डों ही अनन्तस्वामिने चैत्रकृष्णामावस्यायां मोक्षप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। अथ जयमाला। जय देवजिनंदं पापनिकंदं वयंत्रिभुवन शर्मकरम् । जय नाथमनन्तं श्रीभगवन्तं वन्देशान्तं शान्तिकरम् ॥ १॥ जय जिनवरभवहर वीरवीर जय सकलविमल मतिधीरधीर। जय ज्ञानप्रपंच चोबी प्रचारचार जय पुण्यपयोनिधि पारपार ॥ २ ॥ जय जिनमत पंकजसूरसूर जय ज्ञानसुधारस पूरपुर । जय परमतभंजन दण्डदण्ड जयअमलसकल सुम्वपिण्डपिण्ड ॥३॥ जय मोक्षवधूमन हारहार जय संग्रह त्रिभुवनजन सुखकारकार । जय सकलविवुध पनिवन्धपाद जय सजल घनाघन दिव्य नाद ॥ ४॥ जय मानविमर्दन देवदेव जय दिनकरहिमकर सेवसेव । जय पापनिकन्दन परमगात्र जय कमलसुलो- चन परमपात्र ॥५॥ जय धर्मपयोनिधि चन्द्रचन्द्र जय मोहविमर्दन तन्द्रतन्द्र । जय जन्मजरामद हरणमरण जयपरमनिरञ्जन परमचरण ॥ ६ ॥ जय अनंतगुणात्म अनंतनाथ जय जगत उधारण भव्यसाथ । जय कर्मरहित निजध्यानरूप जय अनन्तसुखात्मकचित्स्वरूप॥७॥ पत्ताछन्दः-जय परमजिनेशं सकलसुरेशं त्रिभुवनजनमन शर्मकरम् । जय जय भगवन्तं देवमनन्तं शान्तिकरंशिव शर्मकरम् ॥ ॐवीं श्रीअनन्तनाथ तीर्थंकराय पूजाजयमाला निर्वपामीति स्वाहा । छन्दः-अश्वत्थोपुरनन्तमत्यपि तथा पाताल लयक्षोनुगः पञ्चाशद्धनरुन्नतिः शिवपदं सम्मेद- भूरेवती। भंताश्चापिससिहसेन नृपतिर्लक्ष्मीः सवित्रीपुरं साकेतं च स यात्वनन्तजिदिनः पीत इचकोरध्वजः॥ इत्याशीर्वादः। इति श्रीअनन्तनाथ पूजा समाप्ता।

- चौबी० पजन संग्रह 4 अथ धर्मनाथजिन पूजा प्रारभ्यते। स्वामिन् संवौषट्कृताह्वाननस्य द्विष्टान्तेनोहङ्कितस्थापनस्य । स्वनिर्नेक्तुं ते वषट्कारजाग्रत् सान्निध्यस्य प्रारमेयाष्टधेष्टिम् । ॐही धर्मनाथ जिन अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् ।। अहीं धर्मनाथ जिन अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐही धर्मनाथ जिन अत्र मम सन्निहिता भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथाष्टकम्। जलं-स्वःस्रवन्त्याः पयोपूरैभर्मभृङ्गारनिगतैः । सर्वक्लेशविनाशाय धर्मनाथं समर्चये ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं धर्मनाथ जिनेन्द्राय जलं निर्वपामोति स्वाहा ॥ चन्दनम्-कुंकुमागुरुकर्पूरचन्दननन्दनोद्भवः। सर्वनापविनाशाय धर्मनाथं प्रपूजये ॥२॥ डोंह्रीं धर्मनाथदेवाय चन्दन निर्वपामीति स्वाहा । अक्षताः-चन्द्रावदातसरलरक्षतैः कृष्ण जीरकैः । सर्व दुःखविनाशाय धर्मनाथं समर्चये ॥ ३ ॥ ॐ ह्रीधर्मनाथजिनेन्द्राय अक्षतान्। निवपामीति स्वाहा।

. है " पजन 1 १०२ चोबी० पुष्पं मालतीकुन्दक श्च वकुल श्रीनागचम्पकः । सर्वशोकविनाशाय चर्चे श्रीधर्मनाथकम् ॥ ४ ॥ • ॐह्रीं धर्मनाथाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्यम्-सुमोदकैः खज्जकश्च व्यञ्जनेर्भक्तपायसः । सर्वभयविनाशाय चर्चे धर्मजिनेश्वरम् ॥ ५॥ संग्रह ॐहीं धर्मनाथदेवाय नैवेद्यं निपामीति स्वाहा। दीपः-ज्वलच्छिखैस्तमोघः कर्पराज्यसमुद्भवः। सर्वग्रहविनाशायधर्मनाथं समर्चये ॥६॥ डोंह्रीं धर्मनायस्वामिने दीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूपः-कर्पूरैलालवङ्गायेधूपः सुदेवदारुजः। सर्वव्याधिविनाशाय धर्मनाथं प्रपूजये ॥७॥ डोंही धर्मनाथजिनेन्द्राय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलम्-द्राक्षामूनारङ्गाद्यः फलैः सुवीजपूरकैः । सर्वव्याधिविनाशाय धर्मनाथं प्रपूजये।॥ ८॥ ह्रीं धर्मनाथाय फलं निवपामीति स्वाहा । अर्थः-वार्गन्धाक्षत पुष्पदामचरुकैर्दीपैः सुधूपैः फले दुर्वासर्षपस्वस्तिकादिविलसन्मङ्गालोद्गानकः । वायेः स्तोत्रसुपाठकैर्जयरवैः धर्माय धर्म यजे भक्तया पापविध्वंसकंभयहरं देवं महाय॑ ददे ॥९॥ डोह्रीं धर्मनाथ जिनेन्द्राय महापं निर्वपामीति स्वाहा। अथ पञ्चकल्याणकानि। गर्भः-वैशाखस्याऽसिते पक्षे त्रयोदश्यां सुधर्मकम् सुप्रभायाः सुगर्भे च यजे श्रीगुणसागरम् ॥ १ ॥ 4 - - . , १०३ । चौबी० डोंह्रीं वैशाख कृष्णत्रयोदश्यां धर्मनाथगर्भावताराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । जन्म-पवित्रेमाघ मासे च शुभे त्रयोदशी दिने । धर्मनाथं यजे मेरौ जन्मस्नानं सुरैः कृतम् ॥ २॥ पूजन ॐहीं धर्मनाथाय माघ शुक्लत्रयोदश्यां जन्म कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ संग्रह तपः-माघ शुक्ल त्रयोदश्यां द्विधा संगं परित्यजन् । यजे भक्तया शुभैव्यैःधर्मनाथं तपोभरम् ॥३॥ डों ह्रीं धर्मनाथजिनेश्वराय माघ शुक्ल त्रयोदश्यां तपोधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । ज्ञान-पौष मासे शुचौ पक्षे पूर्णिमायां जिनोत्तमम् । केवलज्ञान संप्राप्तं चर्चे सद्ज्ञानदायकम् ॥ ४॥ । ॐहीं धर्मनाथ जिनेन्द्राय पौष शुक्लपूर्णिमायां ज्ञानकल्याणकाय अर्घ निर्वपामीतिस्वाहा। निर्वाणम्-ज्येष्ठशुक्ले सुपक्षे च चतुर्थी धर्मनायकम् । वसुकर्मविनाशाय वसुभूमिगतं यजे ॥५॥ ॐ ह्रीं ज्येष्ठशुक्ल चतुया धर्मनाथमोक्ष कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। आर्या-भानु महाराज शुभाकामिन्याः सुप्रभामहादेव्याः । सूनुर्धर्मजिनेन्द्रो रत्नपुरेशो मयाऽऽराध्यः॥ ॐ ह्रीं धर्मजिनेश्वराय पञ्चकल्याणकाय महाघ निर्वपामीति स्वाहा। अथ जयमाला। जय धर्मजिनेन्द्र त्रिभुवनइन्द्रनमितमुनीन्द्रंशर्मकरम्।जय धर्मजिनेशं शिवसुखईशं बन्देधर्म धर्मकरम् ।।जय धर्मनाथदेवाधिदेव जय अहिनरसुरपतिकृतसुसेव । जयधर्मराजराजाधिराज जय दूरी - ।

संग्रह १०४ बी• कृतदुर्नय समाज॥२॥जयप्रातहायशोभितसुगात्र जय रत्नत्रयमणिभृत्सुपात्र । जय अनन्तचतुष्टययुक्त जन सूर जय लक्षण व्यञ्जनदेहपूर।३। जय भानुमहानृपसुतसुसार कृतमातसुबताहर्षभार । जय धर्म नाथकर्मारिवीर जय शिव सुखदायक सिद्धधीर ॥ ४॥ जय धर्मनाथजगधर्मपूर जय कर्ममहाचल कृतसुचूर । जय शुक्लध्यानमय शान्तिरूप शिवकार्मिनिवरहृसुखस्वरूप ॥५॥ पत्ता छन्दः-जय धर्मजिनेश्वर नमिनसुरेश्वर खगहलधरनुनपाद युगम् । कन्दर्पविदारं शिव सुख सारं संस्तवीमिभवजलधिहरम् ॥६॥ॐ ह्रीं धर्मनाथजिनेद्राय पूजाजयमालाघनिर्वपामीतिस्वाहा। वृत्तं-चत्वारिंशद्धनुरुन्नतिरपि सहितैः पञ्चभि मनिसी किन्नरयक्षोसुब्रतांवा जननभमथ पुष्यश्च सम्मेद मुक्तिः । दीक्षागः सत्कपित्थो विलसातजनकोभानुरश्चवज्रं यस्यासौधर्मनाथोऽवतु कनकरुची रत्नपुर्या अधीशः॥ ॥ इत्याशीर्वादः । इति धर्मनाथ पूजा समाप्ता ॥ । ।

चोबी० पजन संग्रह १२१ ३ अथ मुनिसुव्रतनाथ पूजा प्रारभ्यते । स्वामिन संवौषट कृना हाननस्य द्विष्टान्तेनोदृङ्कितस्थापनस्य । स्वं निर्नक्तुं ते वषट्कार जाग्रत् सान्निध्यस्य प्रारभे याष्ट धेष्टिम् । डोंहीं मुनिसुव्रत जिन अत्रागच्छ आगच्छ अत्राऽवतरावतर संवौषट् आह्वाननम् ॥ डोंह्रीं मुनिसुव्रतनाथ जिन अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । डों ह्रीं मुनि सुब्रतनाथ जिन अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट सन्निधीकरणम । । अथाष्टकम्। 'जलम्-व्योमापगाक्षीर समुद्र नारगाङ्गेयपात्राश्रित नाल निर्गनैः। श्रीसुव्रतं जिनवरं सततं सुभत्या समर्चयेह बहुधासुद्रव्यैः ॥ डों ह्रीं मुनिसुव्रतजिनेन्द्राय जल निर्वपामीति स्वाहा । चन्दनम्-कपूरंकुङ्कुमसुचन्दनमिश्रितैश्च गन्धैः सुसौरभगतालिसमूहकैश्च। श्रीसुब्रतं जिनवरं सततं सुभत्या समर्चयेऽहं बहुधासुद्रव्यः ॥ २॥ डोंह्रीं मुनिसुव्रतजिनेशाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षताः-अखण्डशालेयसुतण्डुलौघैः समुज्वलेश्चन्द्रकरावदातेः। श्रीसुव्रतं जिनवरं सततं सुभक्क्या समचरोऽहं बहुधीसुद्रव्यः । ३ । डोंही मुनिसुवतजिनेश्वराय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा । दुष्पम्-कदम्बनीलोत्पलपारिजातः सपुष्पकैः कुन्दसुमालतीभिः । श्रीसुब्रतं जिनवरं सततं सुभक्तया . ।

-- चौबीर पर्जन संग्रह १२२. - समयेऽहं बहुधाऽसुद्रव्यैः ॥ ४ ॥ो ह्रीं मुनिसुव्रततीर्थङ्कराय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। 1. नैवेधम्-सुखज्जेकैः पायसमुग्द मोदकैः सुपूपकैय॑जनतप्तभक्तकैः। श्रीसुव्रतं जिनवर सततं सुभक्तया समर्चयेऽहं बहुधासुद्रव्येः ॥५॥ डोह्रीं मुनिसुव्रततीर्थनाथाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा दीपा:- स्नेहाज्यकर्पूरकृतांतिकाभिरुद्यच्छिखौघेस्तमोनाशकैश्च । श्रीसुव्रतं जिनवरं सततं सुभक्त्या समर्चयेऽहं बहुधासुद्रव्यः ॥६॥ ह्रीं मुनिसुव्रत देवायदीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूपः- कपरकृष्णागुरुचन्दनादिद्रव्यैः सुगन्धैर्वरधूपकैश्च । श्रीसुव्रतं जिनवरं सततं सुभक्त्या समर्च- येऽहं बहुधासुद्रव्यैः ॥ ७॥ डों ह्रीं मुनिसुबततीर्थराजाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। जलम्-नारङ्गचोचाम्सुनिम्बुकैश्च खजूरदाडिमसुचिर्भटनाालकरैः। श्रीसुव्रतं जिनवरं सततं सुभक्त्या समयेऽहं बहुधा'सुद्रव्यैः॥८॥ डोह्रीं मुनिसुव्रत देवाय फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घः-अब्गन्धतण्डुलसुपुष्पंचरुप्रदीपधूपः फलेः प्रवरस्वस्तिकदर्भसर्षपैः । अघ ददामि वरमङ्गलपाठ- कैश्च-श्रीसुव्रत जिनवरंप्रयजे सदाऽहम् ।९।)हीं मुनिसुवतजिनेन्द्राय महाघ निवपामीति स्वाहा। अथ पञ्चकल्याणकानि । गर्भः- श्रावणे कृष्णपक्षे च द्वितीयायां सराधिपः॥ कृतं गोत्सवं यस्य तं यजे मुनिसुव्रतम् ॥ १॥ ॐह्रीं मुनिसुव्रतजिनवराय श्रावण कृष्णद्वितीयायां गर्भावताराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। RAN . . । Premonomm , - जन्म-वैशाखे कृष्णपक्षे च दशम्यां जन्म जातकम्। पद्मावतीसुमित्रस्य गृहे श्रीसुक्त यजे ॥२॥ चौबी० ॐहीं मुनिसुवतजिनवराय वैशाखकृष्णदशम्यां जन्मावताराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। पूजन || तपः-वैशाखे मेचके पक्षे दशम्यां सुत्रतं जिनम् । तपस्तप्तं महाघोरं संयजे कर्म हानये ॥३॥ संग्रह ॐ ह्रों मुनिसुव्रतजिनेन्द्राय वैशाख कृष्ण दशम्यां तपोधारकाय अर्घ निवपामीनि स्वाहा। १२३ ज्ञानम्-वैशाखे श्यामले पक्षे नवम्यां सुवतं जिनम् । केवलज्ञान भानु च चर्चे विश्वप्रकाशकम् ॥ ४॥ अह्रीं वैशाख कृष्ण नवम्यां मुनिसुव्रतज्ञानधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। निर्वाणम्-फाल्गुणे कृष्णपक्षे च द्वादश्यां वसुभूमिगम् । वसुकर्महरदेवं पूजये वसुद्रव्यकैः ॥५॥ ॐह्रीं मुनिसुव्रतदेवाय फाल्गुण कृष्ण द्वादश्यां मोक्ष प्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ जयमाला। • श्रीमान् श्री मुनिसुव्रतो विजयते भूभृत्सुमित्राङ्गजो,पद्मावत्युदरे महा सुखकरःप्रावृट् घनाङ्ग- युतिः। सर्व क्लेश गृहारिमारि भयहत राजग्रहेट्सत्यवाक्,सोयं कच्छपचिह्नपो जिनपतिः दद्यात्सदा मे सुखम् । १।जय मुनिसुब्रनजिनराज देव सुर नर खग मुनिकृनपादसेव । जय सुवन मुनिव्रतदानदक्ष- जय सुव्रतदुर्मतिहतविपक्ष ॥२॥ जयमिथ्यामोहप्रमादचूर जय अष्ठ कर्म खण्डन सुकूर । जय दुष्ठ कषाय विध्वंससूर जय ज्ञान सुधारस विश्वपूर ॥ ३ ॥ जय समवशरण भूमध्यतिष्ट हतरागद्वेषमदं पूजन चौबी० | कर्म अष्ट । जय द्वादशसभास्थजनविशिष्ट जय सप्तमङ्गयुतवचनमिष्ट ॥४॥ जय मदनविमर्दन प्रालवीर जय भववन उत्पाटनसमीर। जय जन्म जलधि नारणतरंड जय रत्नत्रयगुणभृतारण्ड ॥५॥ संग्रह जय नृपतिसुमित्र जिन्नामतातं जय पद्मावनि जननी विख्यात । जय राजग्रहपुरराज राज जय १२४ कच्छपजलचरचिह्नसाज ॥६॥ धत्ता छन्दः-अजर अमरसेव्यं व्यक्त सङ्गत्रियाढयं गुणगणसुखवार्ड प्रातिहायेंप्रयुक्तम् । निहतनिखिलदोषं शान्तिदंतीर्थनार्थ सुक्रतजनगणानां संस्तुबे सुब्रताख्यम् ॥७॥ ॐ ह्रीं मुनिसुव्रत जिनेन्द्राय पुजा जयमाला निर्वपामीति स्वाहा । पद्यम्- यक्षो तो वहुरूपिणी च वरुणोंगश्चम्पको मुक्तिभूः सम्मेदः श्रवणो भमुन्नतिरथोकोदण्डका विंशतिः । पद्मावत्यभिधांविका सरसिज चिह्र सुमित्रः पिता यस्यासावसितोसुराजाहरा एनः सुवतेशः श्रिये। १७ इत्याशीर्वादः । इति श्रीमुनिस्बतनाय पूजा साप्ता ॥२०॥ ।

. J बोबी० पूजन संग्रह RE , अथ नमिनाथ पूजा प्रारभ्यते। स्वामिन् संवौषट्कृताहाननस्य द्विष्टान्तेना हङ्कितस्थापनस्य। स्वं निर्नेक्तु ते वषट् कारजाग्रत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्ठधेष्टिम् । ॐहीं नामिनायजिन अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐहीं नमिनाथ जिन अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐह्रीं नमिनाथ जिन अत्र ममासन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम्। जलम्-व्योमापगा समुद्भूतैनारगन्धविमिश्रितैः । नमिनाथमहं चर्चे सर्वारिष्ठविनाशकम् ॥ १॥ *, ॐह्रीं नमिनाथजिनेन्द्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दनम्-चन्दनः कुकुमोन्मित्रैः शीतलस्तापशान्तये । नमिनाथमहं चर्चे सर्व दुःख विनाशकम् ॥२॥ ॲहीं नमिनाथनोर्थङ्कराय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षताः-अखण्ड शालिजःशुभ्रे रक्षतः शिवलब्धये । नमिनाथमहं चचे सर्वक्लेशविनाशकम् ॥ ३॥ ॐ ह्रीं नमिनाथ जिनेश्वराय अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा। पुष्पम्-चंपकैर्वकुलैः कुन्दैः कमलैः कर्महानये। नमिनाथमहं चर्चे सर्वारिष्टविनाशकम् ॥४॥ ॥ T चौबी० पूजन संग्रह डोंह्रीं नमिनाथ जिनाय पुष्पं निर्वपामाति स्वाहा। नैवेद्यम्-मोदकः पायतैःपूपैय॑जनः क्षुद्विहानये । नमिनाथमहं चर्चे सर्वारिष्टविनाशकम् ॥ ५ ॥ अह्रीं नमिनाथ जिनेन्द्रायनैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । दीपः- कर्पूराज्यभवैपेरुद्यतैस्तमोनाशकः । नमिनाथमहं चर्च सर्वारिष्टविनाशकम् ॥६॥ ॐहीं नमिनाथ जिनेशाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा । धूपः- कृष्णागुरुकपूराद्यैः सुधूपैः कर्महानये । नमिनाथ महं चचें सर्वारिष्ट विनाशकम् ॥७॥ ॐह्रीं नमिनाथ जिनवराय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलम्-नारङ्गाम्रकपित्यैश्च फलेर्मोक्षफलाप्नये । नमिनाथमहं चचें सर्वारिष्टविनाशकम् ॥८॥ ॐही नमिनाथ भगवते फलं निर्वपामीति स्वाहा । अर्घः-वार्गन्धाक्षत पुष्पैश्च चरुभिर्दीपधूपकैः । फलेरेभिर्ददाम्यघं नमिनाथाय शान्तये ॥९॥ ॐहीं नमिनायजिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। 'अथ पञ्चकल्याणकानि । गर्भ:- आश्विने कृष्णपक्षे च द्वितीयायां जिनोत्तमम् । सुभद्रा भ्रगतम्भूतं नमिनाथमहं यजे ॥१॥ ॐ ह्रीं नमिनाथ जिनेन्द्रार्य अश्विन कृष्णद्वितीयायां गर्भावताराय अघ.निर्वपामोति स्वाहा । - ।

THAPA । पजन संग्रह १२७ जन्म-आषाढ कृष्णपक्षे च दशम्यां विजयालये । नमिनाथसुजन्मानं यजेऽहं सज्जलादिकः ॥२॥ ॐहीं नमिनाथ जिनाय आषाढ कृष्णदशम्या जन्मावताराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। तपः-आषाढे कृष्ण पक्षे च दशम्यां शुभ वासरे। द्विर्धा तप्तं तपो येन नमिनाथमहं यजे।३॥॥ ॐहीं नमिनाथ स्वामिने आषाढ कृष्णदशम्यां तपोधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। ज्ञानम्-मार्गशीर्ष शुक्ल पक्षे विशुद्धैकादशी दिने । केवल ज्ञान संप्राप्तं नामनाथं समर्चये ॥ ४॥ ॐहीं नमिनाथाय मार्गशीर्ष शुक्ले कादश्यां केवल ज्ञान प्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । निर्वाणम्-वैशाखेकृष्ण पक्षेच चतुर्दश्यां नमिनायकम् । वसुभूमिगतं देवं पूजयेहं गुणात्मकम् ॥ ५॥ ॐह्रीं नमिनाथ जिनेश्वराय वैशाख कृष्णचतुर्दश्यां मोक्षप्राप्ताय अर्घ निपामीति स्वाहा। 'अथ जयमाला। + . श्रीमान् श्रीन मिनायको गुणनिधिर्नाकाधिः पूजितो,माता 'यस्य पतिव्रता गुणवती शुद्धा सुभद्राभिधा । श्रीमदर्जुनभूभृतो मतिवरः पुत्रोहिरण्याङ्गरुक् सोऽस्माकं मिथिलेश्वरोत्पलध्वजो दद्यात्स दामेसुखम् ॥१॥ जया त्वं देव देवेशजयं सर्वगणाधिप। जयवं. विश्वविद्येश जय त्वं नमिनायक ॥२॥ जय त्वं सर्वलोकेश जयत्वं रक्षकोत्तम । जय- त्वं भुवनाधीश जय त्वं नमिनायक ॥ ३ ॥ जयं त्वं ૨૨૯ चौबीर भोगविमुख जय त्वं योगधारक । जय त्वं ध्यानध्याता च जय त्वं नमिनायक ॥४॥ स्याद्वादश जय त्वं पूजन हि जय कुमतपक्षहन। जय रक्तोत्पलाङ्क त्वं जय त्वं नमिनायक ॥ ५॥ जय कर्मारिवीर त्वं जय मुक्ति संग्रह रमावर । जयानन्तगुणज्ञ त्वं जय त्वं नमिनायक ॥ ६ ॥जय कर्माद्रिकुलिश जय त्वं ज्ञानलोचन । • जय मन्मथवीर त्वं जय त्वं नमिनायक ७॥ जय ज्ञानसरोहंस जय ज्ञान सुधारक। जय मिथ्यातमः 'सूर जय त्वं नमिनायक ॥८॥ घत्ताछन्दः-जय नमिजिनवर त्रिभुवन सुख कर पोप तमोहर शर्मप्रद । जय नाथ गुण कर मुक्तिरमावर रक्ष रक्ष भव वारिनिधे॥९॥ ौं ह्रीं श्रीनमिनाथ जिनेन्द्राय पूजा जयमाला निर्वपामीति स्वाहा। वृत्तम्-अश्विय क्षं च पञ्च दश धनुरुदयो भासुभद्रा हरिद्राजितभाईंकरवंद्रुर्वकुल इति पिता वर्णनामा : जयायः मुक्तिः सम्मेदशेलो विलसति मिथिलापूर्भुकुटयाख्ययक्षा यस्योच्चरस्तु तस्मै नम इति नमय चारुचामुण्डिकेशः ॥ इत्याशीर्वादः ' इति श्रीनमिनाथतीर्थङ्कर पूजा समाप्ता ॥ प न संग्रह .१२९ अथ श्रीनेमिनाथाजिन पूजा प्रारम्यते। स्वामिन् संवौषट् कृनाहाननस्य द्विष्टान्तेनोहङ्कितस्थापनस्य । स्वं गिनेंक्त ते वषद्कार जाप्रत्सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्टधेष्टिम् ॥ ॐ ह्रीं नेमिनाथ जिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् । ॐ ह्रीं नमिनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।। ॐही नेमिनाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् । अथाष्टकम् । जलम्-व्योमापगातीर्थजलैः पवित्रायभृङ्गारसुनालनिर्गतः। कृष्णप्रभं नेमिजिनं यजेऽहंसुकम्बुकाई शिवदेविमनम् ॥ १॥ ॐही नेमिनाथ जिनेन्द्राय जलं निर्वपामीति स्वाहा। चन्दनम्-मुकुंकुम चन्दनचन्द्र युक्तैर्विलेपने मिकमाब्जयुग्मम् ।कृष्णप्रभंनेमिजिनंयजेऽहंसुकम्बुकाढू शिवदेविसुनम् ॥१॥ॐह्रीं नेमिनाथ भगवते चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षताः-सुवाहिजातःसरले रखण्डैपीयुषतुल्यैर्वरराजभक्ष्यः। कृष्णप्रभ नेमिजिनं यजेऽहं सुकम्बुकाङ्क शिवदेविसनुम् ॥ ३॥ ॐही नेमिजिनेशाय अक्षनान् निर्वपामीति स्वाहा। पुष्पम्-सुमालतीसेवतिकजजातीकदम्बकुन्दादिप्रसूनकैश्च । कृष्णप्रभनेमिजिनं यजेऽहं- चाबा० पजन -- संग्रह १३० सुकम्वुकांकं शिवदेविसृनुम् ॥ ४॥ॐह्रीं नेमिनाथजिनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नैवेद्य-सुमोदकः खज्जकपायसैश्च सद्यञ्जनस्तप्तघृताक्तभक्तः । कृष्णप्रभं नेमिजिनंयजेऽहं सुकम्वुकांकशिवदेविसूनुम् ॥५॥ ॐह्रीं नेमिनाथाय नैवेशं निवपामीति स्वाहा । दापः-सुस्नेहचन्द्राज्यभवैः प्रदीपेरुद्यच्छिखैरन्धतमोविनाशैः । कृष्णप्रभं नेमिजिनंयजेऽहं- सकम्वकांक शिवदेविसृनुम ॥ ६॥ ॐह्रीं नेमिनाथभगवते दीपं निर्वामीति स्वाहा। धूपः-कर्पूरकृष्णागुरुचन्दनादिधुपैः सुगन्धीकृनदिङ्मुखैश्च । कृष्णप्रभनेमिजिनंयजेऽहं सकम्बुकांशिवदेविमनुम् ॥ ७॥ ॐहीं नेमिनाथ परमेश्वराय धूपं निर्वपामीति स्वाहा। फलम्-नारिकेलाम्रकपित्थकैश्च नारंगद्राक्षेः सरसैःफलौघैः । कृष्णप्रभ नेमिजिनंयजेऽहं. सुकम्वुकांकशिवदेविसुनुम् ॥८॥ॐही नेमिनाथतीर्थंकराय फलं निर्वपामीति स्वाहा। अर्घः-वार्गन्धतण्डुलसुपुष्पचरुप्रदीपैर्ध पैःफलैः स्वस्तिकगीतनृत्यैः। अर्घददेजिनवराय सुनेमिनाम्ने दुःखौघनाशाय सुखंकराय ॥ ९॥ उौंही नेमिनाथतीर्थकराय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ पञ्चकल्याणकानि। गर्भ:-कार्तिके शुभ्रपक्षे च षष्ठयां श्रीनेमिनायकम् । शिवादेव्याः सुतंगर्भ सयजामि जलादिकः ॥१॥ डोंहीं नंमिनाथजिनेन्द्राय कार्तिक शुक्लषष्ठयां गर्भावताराय अघ निर्वामीति स्वाहा। --more-- चौबी० संग्रह . जग्म-श्रावणेशुक्लपक्षे च सुषष्ठ्यांजन्मजातवान् । स्नानं सुराधिपैरोकृतं चर्चे सुहर्षतः ॥२॥ 'ॐहीं नेमिनाथ जिनेन्द्रीय श्रावणशुक्लषष्ठ्यां जन्मधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। तपः-नभस्य श्वेतपक्षे च षष्ठयांतपोर्जित महत् । द्विधासङ्गविमुच्याशु संयमाप्तं यजे मुदा ॥३॥ डोह्रीं श्रावणशुक्लषष्ठयां नेमिनाथतपोधारकाय 'अर्घ निवपामीतिस्वाहा। ज्ञानम्-आश्विने शुक्लपक्षे च प्रतिपतसुदिनेयजे । केवलज्ञानयुक्तं च नेमि विश्वप्रकाशकम् ॥ ४॥ ॐहीं नेमिनाथजिनेशाय आश्विन शुक्ल प्रतिपदि ज्ञानधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा।' निर्वाणम्-आषाढश्वेतरक्षे च सप्तम्यामुर्जयन्तके । वसुकर्मक्षयंकृत्वा वसुभूमिगतंयजे ॥५॥ डोंही नेमिनाथजिनेन्द्राय आषाढ शुक्लसप्तम्यां मोक्षप्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ जयमाला। स्वस्तिश्रीनेमिनाथो जलंधरयुनिधृतयादवेन्दुदयावान् शंखाङ्कश्च शिवायास्तनमनसुखदः पूजितोनृसुरेश्च । निवृतिरुर्जयन्ते हरिवलवलजिवारिकाया नरेशः सोयंश्रीविजयोन्तवारिधिपुरराज्ञो मनोहर्षदः ॥ ६ ॥ जिनेन्द्र हि नेमिमुदानोमि मुछ्न।नतामृत्यमृत्याहितन्नाथसेव्यम् । गताहीहतारिं स्वकीयाल्पवुद्धयः सदा,वर्द्धमानोपि भूयोजगत्यां ॥७॥ सुसौरनपर्णकपुष्प फलाप्त-सुशोकहरागवि कासितगात्र । समुद्रजयाच्छिवपुत्र गणेश जयामदनेमिजिनेशशिवेशः ॥ ८॥ कनकतपनीय महोज्वल रत्नसुखंचितसिंहकविष्टरसन्न। समुद्रजयाच्छिवपुत्रगणेश जयामदनेमि जिनेशशिवेशः॥९॥ शतामर . 1 ड

है
चौबी. नाथ शतानतधीर सुचामरलक्षित वर्मसुवीर। समुद्रजयाच्छिवपुत्रगणेश जयामदनेमि जिनेशशि-
वेश ॥ १० ॥ अनन्तनिनादितदुन्दुभिगीत सुकेवलवोधयशो भयभीत । समुद्रजयाच्छिवपुत्रगणेश
पूजन
संग्रह
जयामद नेमि जिनेशशिवेश ॥ ११ ॥ दिवौकसहस्रनुमोचितसार सुगन्धितशालिनपुष्पसुभार। समुद्र
१३२
जयाच्छिवपुत्रगणेश जयामदनेनिजिनेश शिवेश ॥ १२ ॥ प्रभाशुभमण्डलकोटिदिवाकर मन्दीकृतका-
न्तिमहोदयभासुर । समुद्र जयाच्छिवपुत्रगणेश जयामदनेमि जिनेशशिवेश ॥ १३ ॥ सुकियनिनाद.
कृनामललोक चतुर्मुखशोभि हृताखिल गोक। समुद्रजयाच्छिवपुत्रगणेश जगमदनेनि जिनेश
शिवेश ॥ १४॥ इत्थंतब विभूनिरियं विमलात्म प्रसिद्धतरां जगतिप्रभवाम समुद्रत्रयाच्छिवपुत्रगणेश
जयामदनमि जिनेश शिवेश ॥१५॥
घत्ताछन्दः-सकलजिनवरिष्टो नेमिनाथो धरियां जयतु सुरनरेन्द्रः सेवितो पादपो ।
सकलजनसमूहान्मङ्गलंदिन्नु यूयं ममहरतु सदाचं धर्मसंविधत्त ।
ॐह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेन्द्रायजा जयमालाघ निर्वामीति स्वाहा।
वृत्तम्-वंशोद्रुकम्वरको विलसति शिरदेव्यंविकक्षं च चित्रा मुक्त भुरुर्जयन्तो दशधनुरुयो
भाति साहयक्षः । यक्षीकूष्माण्डिनीरुग्धं नजिदयपुरं शोपर्वपुरं वै यस्यासो नेमिनाथा जलषिविजय
जः पातुनोऽनाथवन्धुः॥
इत्याशीर्वादः । इति श्रीनेमिनाथपूजा समाप्ता ॥ २२ ॥

EE अथ पाश्वनाथजिन पूजामारभ्यते । स्वामिन् सवौषट् कृताहाननस्य द्विष्टान्तेनोद्दङ्कितस्थापनस्य । स्वनिक्तुं त वषटकार जाग्रत्सान्निध्यस्य प्रारभयाष्टधेष्टिम् ॥ ॐहीं श्रीपाश्वनाथ जिन अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आहाननम् । ॐह्रीं श्रीपाश्र्वनाथ जिन अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । ॐहीं श्रीपाश्र्वनाथजन अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ अथाष्टकम। जलम् - गङ्गापगाक्षीरपयोधिजातेर्गाङ्गेय यात्राश्रितवारिपूरैः। श्रीपाश्वनाथस्य पदान्जयुग्म समयेऽहं भवरोगशान्त्य ॥ १॥ ॐहीं श्रीपार्श्वनाथाय जलं निर्वामीनि स्वाहा । चन्दनम्-श्रीखण्डा'मुचन्दनायेगन्धैमनोज्ञेर्भवतापहान्ये । श्रीपार्श्वनाथस्य पदाजयुग्म समर्चयेऽहं भवरोगशान्त्यै ॥ २॥ ॐही पार्श्वनाथ जिनेन्द्राय चन्दनं निर्वपानीति साहा। अक्षता:-अखण्ड शालपक्षनसञ्चयः सुपुजैःसुकुन्देन्दुकरावदातः । श्रीगर्वनायस्य पदाजयुगम समर्चयेऽहं भवगेगशान्त्यै ॥ ३ ॥ॐही पार्श्वनाथाय अक्षनान् निर्वगमीति स्वाहा। पुष्प-रक्तोत्पलेः कुन्दसुमालतीभि जर्जातीजपाचम्पकदामकेश्च । श्रीपार्श्वनाथस्य पदाब्जयुम्म ॥ चौबी० पूजन संप्रह । । २ समर्चयेऽहं भवरोगशान्त्यै ॥ ४॥ ॐहीं पार्श्वनाथ जिनेशाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा । नेवेद्य-सुपायसान्नैर्वरमोदकश्चतप्नोदनः सर्पिदधीक्षुप्पैः । श्रीपाश्र्वनाथस्य पदाब्जयुग्म समर्चयेऽहं भवरोगशान्त्य ॥५॥ॐट्ठों पाश्वनाथतीर्थ कराय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा । दीपः-सुस्नेहकर्पूरघूनोद्भवैश्च दीपर्वलदर्ति शिखासमूहः । श्रीपार्श्वनाथस्य पदान्जयुग्म समर्चयेऽहं भवगेगशान्त्यै ॥६॥ॐढी पाश्वनाथदेवाय दीपं निर्वपामीतिस्वाहा । । धुपः-कर्पूरकृष्णागुरुचन्दनौघे धूपः कुकर्मेन्धनपावकैश्च श्रीपार्श्वनाथस्य पदाब्जयुग्मं समर्चयेऽहं भवरोगशान्त्ये॥७॥ ॐही पार्श्वनाथाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फलम्-आमःकपित्थैवावीजपूरैक्षिःसुमोचेः शिवहेतुभिश्च । श्रीपार्श्वनाथस्य पदाब्जयुग्म समयेऽहं भवगेगशान्त्ये ॥ ८॥ ॐढीपाश्वनाथभगवते फलं निवेपामीति साहा। अपः-अब्गन्धनण्डुलस्पुष्पचरुप्रदोपे धू फलौघेः सुकृतार्थकंवा सिद्धार्थदर्शवरस्वतिकैश्च यजे सदापाश्र्वप्रभोःक्रमाजम् ॥ ९॥ ॐहीं पाश्र्वनाथतीर्थंकरदेवाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। श्रीमानश्रीपार्श्वनाथो जयतुगुणनिचिब्रह्मचारी दयालु वाराणस्या नृपेन्द्रः हरिन्मगिद्युतिभोगिराजाङ्कयुक्च ।। बामादेव्यास्तनूजः कमठमदहरो यस्य तातोऽश्वसेनः । सोयं श्रीगश्वनाथो ददतु मम सुखं विघ्नवर्गारिहन्ता ॥ १०॥ इति महाघम् . 1 , । चोवी० अथ पञ्चकल्याणकानि। पूजन गर्भ:-वैशाखकृष्णपक्षे च द्वितीयायां जिनोत्तमम् । यजेवामोदरेपार्श्व विश्वानन्दकरंपरम् ॥१॥ संग्रह ॐहीं पाश्र्वनाथाय वैशाख कृष्णाद्वितीयायां गर्भावनाराय अर्घ निर्वामीति स्वाहा। जन्म-पौषमासे सकृष्णे च विशुद्धैकादशीदिने । विश्वसेनालये जन्मयजंजात महोत्सवम् ॥२॥ ह्रीं पाश्र्वनाथ जिनेन्द्राय पोषकृष्णकादश्यां जन्मधारकाय अर्घ निर्वपामोतिस्वाहा। तपः-पौषमा सुकल्याणे मंचकैकादशोदिने । द्विधातप्ततपोयेन संयजे तं तनिधिम् ॥३॥ डोही पार्श्वनाथाय पोषकृष्णेकादश्यां तपोधारकाय अर्घ निर्वपापति स्वाहा । ज्ञानम्-चैत्रमासेसकृष्णे चे चतुर्थीशुद्धवासरे। पचमबोधसंप्राप्तं चर्चेतंज्ञानवारिधिम् ॥ ४ ॥ डोंह्रीं पाश्र्वनाथाय चैत्रकृष्णचतुर्थ्या ज्ञानकल्याणकाय अर्घ निर्वामीति स्वाहा। निर्वाणम्-श्रावण शुक्लाक्षेतु मप्तम्यां वतुभूगतम् । यज कर्माष्टहन्तार पार्श्व वसुगुणात्मकम् ॥ ५॥ अह्री पार्श्वनाथाय श्रावणशुक्लप्तप्तम्यां मोक्षफल्याणकाय अघ निर्वामीति स्वाहा । अथाजयमाला। जय पाश्र्वदेवदेवाधिदेव जय सुरनरपतिकृतपादसेव । जय वाराणसिपुरराजराज जय सकल सुरासुरनृपसमाज ॥१॥ जय राज्यत्यागिकृत तपसुसार जय ब्रह्मचर्यव्रत दलितमार। जय इन्धन चौबी० मध्यसुसर्पकार जिनदत्तमन्त्रवर्र नमस्कार ॥ २ ॥ जय धरणीधरपदप्राप्तसार जय देवीपद्मावतिसखार। जय नागराजकृरध्वजविशाल जय दूरीकृतदुःखभय कुकाल ॥३॥ जय कमठासुरमंदमानचूर जये संग्रह अग्निजलदसहनैकशूर । जय मदनमहारिपुदलनकर जय समवशरण चतुसंघपूर ॥ ४ ॥ जय तरुशो- १३६ कजनशोकटार जय मुरकृतवर्षत कुसुमभार। जय दिव्यध्वनिउपदेशदान जय चौसठिचामरसुर करान ॥ ५॥ जय सिंह रीठ आसनउत्चंग जय देहप्रभामण्डल अभंग । जय दुन्दुभि घोषव्योमपूर जय श्वेतछत्रत्रयलोकशूर ॥ ६ ॥ जय भूतप्रेत भयनाशवीर जय डाकिनिशाकिनि दलित भीर। जय मोहतमोदलने दिनेश जय फणमण्डप कृतअहिसुरेश ॥ पत्ताछन्दः-जय पार्श्वजिनेश्वर नमित सुरेश्वर त्रिभुवनबन्दित पादयुग । बहुविघ्नविना. यकशिवसुखदायक पक्ष रक्ष भवारिनिधेः ॥९॥ डोंही श्रीपाश्र्वनाथाय पूजा जयमाला निर्वपामीति स्वाहा । वृत्तम्-नागाको जनकोऽश्वसेननृपनिर्माता सनीवामका, पद्मावत्यपियक्षिणी धवतरुः सम्मे. दजा नितिः 'जन्मक्ष तुविशाखिका नवकरामानंतु काशीपुरी, यस्यासौ धरणीश्वरो हरितभा पाश्वों जिनः इत्याशीर्वादः । इति श्रीपार्श्वनाथ जिन पूजा समाप्ता॥ पातु नः॥ ।

चोवी. संग्रह ४ प अथ वर्डमानजिन पूजा प्रारभ्यते। स्वामिन सोषद् कृताहाननस्य विष्टोन्तेनोकिन स्थापनस्य । . स्वनिर्नेक्तुं ते वषट्कार जाग्रत् सान्निध्यस्य प्रारभेयाष्ठधेष्टिम् । श्रीवर्डमानजिनेन्द्र अत्रागच्छ आगच्छ अत्रावतरावतर संवौषट् आह्वाननम् ॥ ॐही श्रीवर्डमानजिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठाठ स्थापनम् । ॐहीं श्रीवर्द्धमानजिनेन्द्र अत्रमम सन्निहितोभव भव वषट् सन्निधीकरणम् ॥ मथाष्टकम्। जलम्-हिमकुलाचलनिगंतसज्जलेर्हिरण्य भाजन नाल सुनिर्गतः। परमपावनमुक्तिसुदायकं परियजे जिनवीर पदान्जकम् ॥१॥ ॐह्रीं श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय जलं निवपामीति स्वाहा । चन्दनम्-मलयचन्दनकुंकुमचन्द्रजैः संसृतितापहरैः परिलेपनः । परमपावनमुक्तिसुदायकं परियजे जिनवीरपदाब्जकम् ॥२॥ॐह्रीं श्री वर्द्धमानजिनेशायचन्दनं निर्वपामीति स्वाहा। अक्षता:-कमलवासितशुभ्रसुतण्डले विशदमौक्तिकपुञ्जसमानके। परमपावनमुक्ति सुदायक परियजे जिनवीरपदान्जकम् ॥ ४॥ ॐ ह्रीं श्रीव.मानजिनेशाय अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। -- . " १३८ चौबी० पुष्पम्-कमलचंपकजातिकदम्वकैर्वकुलमन्मथसेवतिदामकैः । परमपावनमुक्तिसुदायकं परियजे जिन- पूजन वीरपदाव्जकम् ॥ ४॥ ॐह्रीं श्रीवर्डमानतीर्थङ्कराय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा। संग्रह · नैवेद्यम्-वटुकमोदकपुपसुखज्जकैर्दधिसुपायसव्यञ्जनभक्तकैः । परमपावनमुक्तिसुदायकं परियजे जिनवीरंपदान्ज कम्॥५॥ ॐह्रीं श्रीवईमानतीर्थपतये नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा। दीपः-घृतसुचन्द्रकृतैर्वारदीपकैः प्रवलकान्ति भरेस्तमोनाशकैः । परमपावनमुक्तिसुदायकं परियजे जिनवीरपदाब्जकम् ॥६॥ ॐह्रीं श्रीवर्द्धमानतीर्थराजायदीपं निर्वपामीति स्वाहा। धूपः-अगुरुचन्दनमिश्रितधूपकैर्हिमलवङ्गसुमोथशिलाद्वैः । परमपावनमुक्तिसुदायकं परियजे जिनवीर पदान्जकम् ॥७॥ ॐही श्री वर्डमानजिनेन्द्रदेवाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा । फलं-रुचिकदाडिमद्राक्षकपित्यकैः प्रवर पूगसुचारुतुमोचके परमावनमुक्तिदायक परियजे जिनवीर पदान्जकम् ॥ ८॥ ॐह्रीं श्री वर्धमानजिनाधिपाय फलं निर्वपामीति स्वाहा। अघः-वार्गन्धाक्षतपुष्पदामचरुकैः सद्दीपधूपैः फलै स्विस्तिक सर्षपैर्जयस्वनैः सन्मङ्गलोद्गानकैः। चर्चेहं सुमतिं सुवीरजिनपं श्रीसन्मतिं सर्वदासर्वक्लेशभयारिरोगहनकमधैर्महावीरकम् ॥९॥ ॐह्रीं श्री महावीरजिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ पञ्च कल्याणकानि। गर्भ:-आषाढेशुभ्र पक्षे सुषष्ठयांतिथो सुसन्मतिम् । त्रिशालादेव्युदरेजातं संयजे वसुद्रव्यकः ॥१॥ - , A ॥ चौबी० ॐह्रीं श्री सन्मतिदेवाय आषाढ शुक्ल षष्ठयां गर्भावताराय, अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। पूजन | जन्म-चैत्र शुक्ले त्रयोदश्यां जन्म प्राप्त महात्सवैः। यजे जिनं महावीरं सिद्धारथनृपालये ॥२॥ संग्रह ॐहीं महावीरजिनेन्द्राय चैत्र शुक्ल त्रयोदश्यां जन्म प्राप्ताय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा। १३९ तपः-मार्गशीर्षदशम्यांतु कृष्ण पक्षे तपोगतम् । द्विधातप्तं तपो येन संयजेभवहानये ॥३॥ ॐ ह्रीं श्रीमहावीरजिनेशाय मार्गशिरकृष्ण दशम्यां तपोधारकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । ज्ञानम्-वैशाख शुक्ल पक्षे च दशम्यां वर्तमानकम् । केवल ज्ञान संयुक्तं संयजे ज्ञान लब्धये ॥४॥ ॐ ह्रीं श्रीमहावीर जिनेश्वराय वैशाख शुक्ल दशम्यां ज्ञान कल्याणकाय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा निर्वाणम्-कार्तिक कृष्ण पक्षे च ह्यमावस्या शिवास्पदम् । पावापुर्यासुनिर्वाणं यजे निर्वृतिसिद्धये ।। .. ॐह्रीं श्रीमहावीरजिनेशाय कार्तिककृष्णामावस्यायां मोक्षककल्याणकाय अर्घ निर्वपासीतिस्वाहा। श्रीमान् श्रीवर्द्धमानो जयतु जिनपतिस्त्यक्तभोगः सुमुक्तंच, पावापुर्याः सुराजः प्रियहितवरवाकु यस्य सिद्धार्थतातः । त्रिशलादेव्यस्तनूजो अवनिसुरपतिः पूज्यपादः शुशीलः सोयं श्रीवीरनाथो मम हरतु विपद्विश्वसौख्यं ददातु ॥ इनि पुष्पाञ्जलिंक्षिपेत् ॥ अथजय माला। जय वर्डमान सुर वर्द्धमान जय सन्मति सन्मति ज्ञान दान। जय महावीर जित कर्मवीरः || जय वीरनाम जिन महतवीर ॥ १ ॥ जय गोतमगण भृत धृतसुनाद जय विश्व भव्य श्रुतस्यादवांद।

A चौबी० जय श्रेणिकनृपकृत प्रश्न भार जय ब्रह्मचर्य कृत मदनकार ॥ २ ॥ जय सकल सुरा सुर विनुतपाद । जय पूजन दिव्यध्वनि जिन कुमतबाद । जय परमयोगनिर्मल विशाल जय तपोभारजित भवकुजाल ॥३॥जय संग्रह भाषाजित मिथ्या अज्ञान यज निर्जित मन इन्द्रिय निदान । जय केवल वोधित जीव राशि जय शुद्धा गमजितभवकुपासि ॥ ४॥ जय खण्डित कर्माराति देह । जय परि हरिताखिलदोषगेह। जयलोक समुद्धरणकधीर ॥ जय कर्म विध्वंसनमहावीर ॥ ५॥ जय ,मोह वृक्षभेदनकुठार जय मुक्तिवाम उरग्नहार। जय तर्जित मदन विकार भार जयराग द्वेष मद कृत प्रहार ॥ ६॥ जय शत्रु मित्र सम. कष्ट हेम जय दूरीत्रासितपाप जेम। जय उत्पाटिन बहुकर्म जाल जय सहजज्ञान सरसीमराल ॥७॥ जय अनन्त चतुष्टयमणि सुपात्र जय लक्षण व्यञ्जन युक्तगात्र । जय समवशरण आसनसुरुद जय सिद्ध अनाहत मन्त्र गूढ ॥ ८॥ पत्ता छन्दः-असमगुण निधानं प्राप्त संसार पारं परपरणतिमुक्तं सर्व संधै प्रवन्धम् । अनुभवरसमेयं वीरनाथ जिनेन्द्रं स्मरति नमति यो वा वाच्छितं लभ्यतेसः॥ इति श्रीवर्धमानतीर्थङ्कराय नाम पञ्चकसंयुक्ताय अर्घ निर्वामीति स्वाहा । वृत्तम्-ख्यातं कुण्डपुरःपुरंजननभं स्वानी तुमिहोवजःशालोद्रुःप्रियकारिणी च जननी पशिप निवृतः। उत्सेधः करसप्तकं कनकमा सिद्धायिनी सेविका मातोपि च यस्य वीरजिनपंसिदार्थ तं भजे ॥ इत्याशीर्वादः ॥ इति श्रीमहावीर जिन पूजा समाप्ता॥

-
३
अथ पूजा फलम् ।
संग्रह
१४१
,
-
ܙ
पूजा पातिगनाशिनी सुखकरी पूजा महारिद्धिदा पूजा संपतिदायिनी भय हरी पूजा शिवा शर्मदा ।
पूजा कल्मषध्वसिनी शुभखनी पूजा मुनीन्द्रःस्तुतापूजापूज्यपदप्रजा वसुविधैव्यैर्विधेया सदा॥
अथ स्तवनम् ॥
अष्ट भेदान्विता पूजों कृत्वा भक्तिभरासुनः । स्तवनं कर्तुमारब्धं पूजकेनातिधीमता ॥१॥
स्वं देव जगतां नाथ त्व त्राता कारणं विना । कथं स्तुवेऽहं सर्वशं त्वामहं वुद्धिवर्जितः ॥२॥
वं देवत्रिदशेश्वरार्चित पदस्वं मुक्तिनाथ.ऽव्ययः वंधर्मामृतसागरःसुखनिषि स्त्वं केवलोपोतका
खं लोकत्रयतारणकचतुरस्त्वं मोहदापहः प्राप्तोऽहं शरणं जिनेश्वर प्रभो ते त्राहि भो मां गुरो॥३
इति स्तवनं पठित्वा चतुर्विशति जिनानां चरणाप्रे कुसुमाञ्जलिंक्षिपेत् ॥
पुनः महाधं गृहीत्वा एवं पठनीयम्-
येषां दर्शनमद्भुतं प्रतिदिनं सर्जन प्रार्थितं येषां ज्ञानमपार मस्ति महितः सर्वप्रकाशात्मकम् ।
पां सच्चरित चिरंतनभवं सभ्यः सदा सेवितं ते तीर्थङ्करनायका हि नितरां सौख्यप्रदा सन्तु नः॥१॥

।
-
चौबी०
पजन
संग्रह
१४२
प्रधान
छन्द चाल (बन्देतानकी में)
बन्दे वृषभं शतमख़बन्धं अजितजिनं जित मारमनिन्द्यम्।
संभवमघघनपवनेसमानं अभिनन्दनआनन्दप्रदानम् ॥ १.॥
बन्दे श्रीसुमतिसारं पद्मप्रभुजिनपं जितमारम् ।
नौमि सुपाश्व जिनं यतिशरणं बन्देचन्द्रप्रभ भवहरणम् ॥२॥
पुष्पदन्त मानिन्दिनलोकंशीतलमखिलविशोषित शोकम् ,
श्रीश्रेयांसं सकल वासुपूज्यमाशंसितज्ञानम् ॥३॥
विमलं निर्मलवोधसुपारं सेवेऽनन्तमदोषविचारम् ।
धर्मधुरं श्रीधम जिनेश शान्ति नाकिनरेशमहेशम् ॥४॥
कुंथुकरुणामयमविकारं अरजिनवरमीडे मतितारम् ।
१.८, मल्लिंशल्यहरं सुखधाम मुनिसुव्रतनाम जितकामम् ॥५॥
• नमिनाथं गुणरूप मुदारं वन्दे नेनिजिनेश्वरसारम् ।''
पाश्वं परमचरित्रविचित्रं वर्द्धमानजितहरितकलत्रम् ॥६॥
त्ता छन्दः इति जिनजयमाला यः पठेद्भावयुक्तःसभवति सुरनायो विश्वविख्यातकीर्तिः ।
त्रिदिवपरमसौख्यं प्राप्य पार प्रेयाति सपदि भवसमुद्रस्यातिदुःखैकहेतोः॥७॥

- चौबी० जन तीर्थङ्करा ये जगति प्रसिद्धाः सिद्धिंगताः सौख्य भरैः समेताः तेसन्तु सौख्याय सतां सदैव पूज्या मया पूजनमाश्रितेन ॥८॥ (एवं पठित्वात्रिःप्रदक्षिणेन महाघ भ्रामयित्वा जिनाये स्थापयेत् )। समूह १४३ पुनरेवं शान्तिधारा पाठः पठ्यते। ॐसंप्रति काल श्रावकश्रेयस्कर स्वर्गावतरणपरिनिष्क्रमण केवल ज्ञाननिर्वाण कल्याणविभूति भूषित महाभ्युदयान, सिद्धविद्याधर राजा. महाराजमण्डलीक मुकुटपटबन्ध बलकेशवसार्वभौमादिविजय दानवीर सार्वभोगीन्द्र किरीटमणि गण प्रभाऽमरधनीप्रवाहक्षालितपापान, चरण नख किरण चन्द्र चन्द्रिका प्रतिहनपापान्धकारान्, वृषभाजित सम्भवाभिनन्दन सुमति पा सुपाश्र्वं चन्द्रप्रभपुष्पदन्त शीतल श्रेयांसंबासुपूज्य विमलानन्न धर्म शान्ति कुश्वरमल्लिमुनिसुव्रन नमिनेमि पाश्र्वनाथवई मानाचेति चतुर्विशति वर्तमान तीर्थङ्करपरमदेवान् सलिलगन्धाक्षतकुसुमनेवेद्य प्रदीपधूपफल स्वस्ति- कनन्यावर्तदूर्वा सर्षपादिमङ्गलद्रव्येराराधयामि महार्पण । , नोट-अब शान्तिधारापठ जो इस पुस्तक के अन्त में छपा हुआ है उस को पढ़ो।

413 8 चौबी० १४४ शान्तिप्रवा भवन्तु, सर्वसौख्यप्रदाः सन्तु सर्वविघ्नानि हरन्तु, घोराणि शम्यन्तु, पापानि पूजन नाशयन्तु, सर्वजगतां मङ्गलावल्यो भवन्तु संपूजकानां प्रतिपालकानां यतीन्द्रसामान्यतपाधनानाम् संग्रह देशस्य राष्ट्रस्य, पुरस्य, राज्ञः करोतु शान्ति भगवाग्जिनेद्रः ॥ 'वृत्तं-नाभेयादिजिनाःप्रशस्तबदनाःख्याताश्चतुर्विंशतिः श्रीमन्तो भरतेश्वर प्रभृतयोयेचक्रिणो दावश । येविष्णुप्रतिविष्णु लाङ्गलधराःसप्ताधिकाविंशतिः,त्रैलोक्याऽभयदास्त्रिपष्ठिपुरुषाःकुर्वन्तु तेमङ्गलम्।। ॥ इत्याशीर्वादः॥ यावच्चन्द्रदिवाकर प्रहमणा मेदियोप्पद्रयो,यावयोमबसुन्धराम्चानधियो यावदिशो वैदश । यावत्सन्तिमुनीश्वरा:शितितले जैनागमयोतका स्तावन्नन्दतु पूजनंसुविमलंकल्याणकोटि प्ररम् । इति श्री चतुर्विशतितीर्थहराणां संस्कृत पूजा समाप्ता।

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Ath Chaubisi Pooja

Author
Ramchandra
Title
Ath Chaubisi Pooja
File name
Ath Chaubisi Pooja
Text
OCR done
Citation
1910
Published
2010/05
Publisher
Punjab Economical Press, Lahore
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
325707
Barcode
99999990003605.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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tZiBIUpvnKA
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