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Shreepanchastikay Sangrah

Jain, Maganlal · 2009/11

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श्री वीतराग सत्साहित्य ग्रन्थमाला पुष्प २
|| मर्वज्ञवीतरागाय नमः ॥
श्रीमद्भगवत्कुन्द कुन्दाचार्यदेवप्रणीत
भी पंचास्तिकाय संग्रह
मंस्कृत छाया,
मूल गाथाएँ.
श्रीअमृतचन्द्राचार्यदेवविरचित
संस्कृत समयव्याख्या टीका तथा उसके गुजराती
अनुवाद के हिन्दी अनुवाद सहित
गुजराती अनुवादक :
श्री हिमतलाल जेठालाल शाह
बी. एस. सी.
E
हिन्दी अनुवादक :
श्री मगनलाल जैन

प्रकाशक :
श्री वीतराग सत् साहित्य प्रसारक ट्रस्ट
६०२ कृष्ण नगर,
भावनगर (गुजरात)
D®
प्रकाशन :
प्रथम संस्करण : १.०० १ श्री सेठी दि. जैन ग्रन्थमाला, बम्बई
द्वितीय संस्करण : १५०० : श्री दि० जन स्वाध्याय मंदिर ट्रस्ट, सोनगढ़
तृतीय संस्करण : २५०० । श्री वीतरागसत्-साहित्य प्रसारक ट्रस्ट, भावनगर
प्रकाशन तिथि:
भाद्रपद शुक्ला पंचमी, वीर नि० सं० २५०१
मूल्य :
७)५० रूपये
प्राप्ति स्थान:
(१) श्री वीतराग सत् साहित्य प्रसार ट्रस्ट, ६०२ कृष्ण नगर, भावनगर
(२) श्री दि. जैन स्वाध्याय मन्दिर ट्रस्ट, पौनगढ़ ( सौराष्ट्र)
(३). धी टोडरमल स्मारक भवन, ए-४ वापूनगर, जयपुर
मुद्रक :
नेमीचन्द पांचूलाल जैन
कमल प्रिन्टर्स,
मदनगंज (किशनगढ़).

-- -erra- " -- . R-A ----- पू० श्री कानजी स्वामी स्वाध्याय करते हुए

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अर्पण
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जिन्होंने इस पामर पर अपार उपकार किया है, जिनकी प्रेरणा
और कृपासे यह "पंचास्तिकायसंग्रह"का अनुवाद हुआ है,
जो श्री कुन्दकुन्दभगवानके मसाधारण भक्त हैं, पाँच
अस्तिकायोंमें सारभूत ऐसे शुद्धजीवास्तिकायका अनुभवन
करके जो स्व-पर कल्याण साध रहे हैं, और जिनकी
अनुभवयुक्त कल्याणमयी शक्तिशाली वाणी के परम
प्रतापसे पाँच अस्तिकायोंकी स्वतंत्रताका
सिद्धांत तथा शुद्धजीवास्तिकायकी
मनु-
भूतिकी महिमा सारे
भारतमें गूंज
रही है, उन परमपूज्य परमोपकारी
कल्याणमूर्ति गुरुदेव श्री कानजी
स्वामी को यह अनुवाद
पुष्प अत्यन्त भक्ति
भावसे अर्पण
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करता
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संस्कृत टीका के अनुवादक :
हिंमतलाल जेठालाल शाह
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प्रकाशकीय निवेदन चरम तीर्थकर श्री १००८ श्री महावीर भगवान के २५०० वें निर्वाण महोत्सव के अन्तर्गत सोनगढ़ ( सौराष्ट्र ) में फाल्गुन सम्वत् २०३० में प्रत्यन्त उल्लास पूर्वक श्री महावीर कुन्द-कुन्द परमागम मन्दिर को प्रतिष्ठा का उत्सव हजारों मुमुक्षुत्रों ने दूर-दूर से प्राकर मनाया था। उस प्रसंग में श्री वीतराग सत् साहित्य प्रसारक ट्रस्ट की स्थापना हुई थी। श्री जिनवाणी-वीतराग साहित्य का खूब-खूब प्रसार हो और भव्य जीवों को निज कल्याण में निमित्त हो यह इस ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य है । उस उद्देश्य के अनुसार "श्री पंचास्तिकाय संग्रह" शास्त्रजी की तृतीय श्रावृत्ति का प्रकाशन मुमुक्षुत्रों के सम्मुख रखते हुए हमको आनन्द होरहा है । इस शास्त्र का ज्यादा से ज्यादा संख्या में मुमुक्ष भाई लाभ ले सकें इस हेतु से इस शास्त्र की कीमत लागत मूल्य से लगभग.७५% रखने में प्राई है। प्रथम संस्करण श्री सेठी दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला व द्वितीय संस्करण श्री दिगम्बर जैन स्वाध्याय मन्दिर द्वारा प्रकाशित हुआ था। परन्तु वर्तमान में यह शास्त्र प्राप्य नहीं होने से इस चालू प्रावृत्ति का प्रकाशन प्रावश्यक था। कमल प्रिन्टर्स के मालिक श्री नेमीचन्दजी पाँचूलालजी जैन ने इस शास्त्र के प्रकाशन में खूव-सहयोग किया है उसके लिए हम उनके प्राभारी हैं। अन्त में जिनकी प्रेरणा से इस ट्रस्ट की स्थापना हुई जो अपने निज स्वरूप को साचते-साधते भव्य जीवों को स्वरूप प्राप्ति का उपाय बता रहे हैं और स्वरूप प्राप्ति के निमित्त भूत, जिनवाणी के प्रसार में प्रेरणा रूप हैं ऐसे पूज्य श्री कानजी स्वामी के हम अत्यन्त ऋणी हैं। इस शास्त्र में प्राचार्य भगवन्तों द्वारा लिखे हुए निज स्वरूप-रूप अध्यात्म मन्त्रों द्वारा भव्य जीवोंको आत्मानुभूति प्राप्त हो ऐसी हमारी हादिक भावना है। भाद्रपद शुक्ला पंचमी वीर नि० सं० २५०१ ट्रस्टीगरण: श्री वीतराग मन साहित्य प्रसारक ट्रस्ट भावनगर (गुजरात) || नमः श्री सद्गुरवे ॥ * उपोद्घात * भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेव प्रणीत यह "पंचास्तिकायसंग्रह" नामक शास्त्र 'द्वितीय श्रुतस्कन्ध के सर्वोत्कृष्ट आगमोंमेंसे एक 'द्वितीय श्रुतस्कन्ध'को उत्पत्ति किसप्रकार हुई, यह हम पट्टावलियोंके आधारसे संक्षेपमें देखें: - माजसे २४८५ वर्ष पूर्व इस भरतक्षेत्रकी पुण्यभूमिमें जगत्पूज्य परम भट्टारक भगवान श्री महावीर स्वामी मोक्षमार्गका प्रकाश करनेके लिये समस्त पदार्थोंका स्वरूप अपनी सातिशय दिव्यध्वनि द्वारा प्रगट कर रहे थे। उनके निर्वाणके पश्चात् पाँच श्रुतकेवली हुए, जिनमें अन्तिम श्रुतकेवली श्री भद्रबाहुस्वामी थे। वहां तक तो द्वादशांगशास्त्रकी प्ररूपणासे निश्चयव्यवहारात्मक मोक्षमार्ग यथार्थरूपमें प्रवर्तमान रहा । तत्पश्चात् कालदोषसे क्रमशः अंगोंके ज्ञानकी व्युच्छित्ति होती गई। इसप्रकार अपार ज्ञानसिन्धुका बहुभाग विच्छेदको प्राप्त होनेके पश्चात् दूसरे भद्रबाहुस्वामी आचार्यकी परिपाटीमें दो समर्थ मुनिवर हुए-एक श्री धरसेनाचार्य और दूसरे श्री गुणधराचार्य । उनसे प्राप्त ज्ञानके द्वारा उनकी परम्परामें होनेवाले आचार्योंने शास्त्रोंकी रचना की और वीर भगवानके उपदेशका प्रवाह अच्छिन्न रखा। श्री धरसेनाचार्यको अग्रायणी पूर्वके पंचमवस्तुप्रधिकारके महाकर्मप्रकृति नामक चतुर्थ प्राभृतका ज्ञान था । उस ज्ञानामृतमेंसे क्रमशः उनके वाद होनेवाले प्राचार्यो पट्खण्डागम, धवल, महाधवल, जयधवल, गोम्मटसार, लघिसार [ ६ ] क्षपणासार आदि शास्त्रोंकी रचना की। इस प्रकार प्रथम श्रुतस्कंधकी उत्पत्ति हुई। उसमें मुख्यतः जीव और कर्मके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली प्रात्माकी संसार--पर्यायका-गुणस्थान, मार्गरणास्थान आदिका वर्णन है। पर्यायाथिक नयको प्रधान करके कथन है । इस नयको अशुद्धद्रव्याथिक भी कहते हैं और अध्यात्मभाषामें अशुद्धनिश्चयनय अथवा व्यवहार कहा जाता है । श्री गुणधराचार्यको ज्ञानप्रवादपूर्वके दशम वस्तुके तृतीय प्राभृतका ज्ञान था। उस ज्ञानमेंसे उनके पश्चात् होनेवाले प्राचार्योंने क्रमशः सिद्धान्त-रचना की। इसप्रकार सर्वज्ञ भगवान महावीरसे पानेवाला ज्ञान आचार्य-परम्परा द्वारा भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवको प्राप्त हुआ। उन्होंने पंचास्तिकायसंग्रह, प्रवचनसार, समयसार, नियमसार, अष्टपाहुड़ आदि शास्त्रोंकी रचना की। इसप्रकार द्वितीय श्रुतस्कंधकी उत्पत्ति हुई । उसमें ज्ञानकी प्रधानतापूर्वक शुद्धद्रव्याथिक नयसे कथन है, आत्माके शुद्ध स्वरूपका वर्णन है। भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेव विक्रम संवत्के प्रारम्भमें हुए हैं। दिगम्बर जैन परम्परामें भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवका स्थान सर्वोत्कृष्ट है । "मंगलं भगवान वीरो मंगलं गौतमो गणी। मंगलं कुन्दकुन्दार्यों जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥"-यह श्लोक प्रत्येक दिगम्बर जैन, शास्त्रपठनके प्रारम्भमें मंगलाचरणरूपसे बोलता है । इससे सिद्ध होता है कि सर्वज्ञ भगवान श्री महावीरस्वामी और गणधर भगवान श्री गौतमस्वामीके पश्चात् तत्काल ही भगवान कुन्दकुन्दाचार्यका स्थान प्राता है। दिगम्बर जैन साधु अपनेको कुन्दकुन्दाचार्यकी परम्पराका कहलानेमें गौरव मानते हैं । भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवके शास्त्र साक्षात् गणधरदेवके वचनों जितने ही प्रमाणभूत माने जाते हैं उनके पश्चात होनेवाले आचार्य अपने किसी कथनको सिद्ध करने के लिये कुन्दकुन्दाचार्यदेवके शास्त्रोंका प्रमाण देते हैं जिससे वह कथन निर्विवाद सिद्ध हो जाता है । उनके पश्चात् लिखे गये ग्रंथोंमें उनके शास्त्रोंमेंसे बहुत अवतरण लिये गये हैं । वास्तवमें भगवान कुन्दकुन्दाचार्यने अपने परमागमोंमें तीर्थंकरदेवों द्वारा प्ररूपित उत्तमोत्तम सिद्धान्तोंको सुरक्षित करके मोक्षमार्गको स्थिर रखा है । वि० सं० ६६० में होनेवाले श्री देवसेनाचार्यवर अपने दर्शनसार नामक ग्रन्थमैं कहते हैं कि-"विदेहक्षेत्रके वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधरस्वामीके समवसरणमें जाकर श्री * मूल श्लोक के लिये देखिये पृष्ठ १४ ।

.. भव्य [७] पद्मनन्दिनाथ (कुन्दकुन्दाचार्यदेव) ने स्वयं प्राप्त किये हुए ज्ञान द्वारा बोध न दिया होता तो मुनिजन सच्चे मार्गको कैसे जानते ?" हम एक दूसरा उल्लेख भी देखें, जिसमें कुन्दकुन्दाचार्यदेवको कलिकालसर्वज्ञ कहा गया है : "पद्मनन्दि, कुन्दकुन्दाचार्य, वक्रग्रीवाचार्य, एलाचार्य और गृध्रपिच्छाचार्य इन पांच नामोंसे विभूषित, जिन्हें चार अंगुल ऊपर आकाशमें गमन करनेकी ऋद्धि प्राप्त थी, जिन्होंने पूर्व विदेहमें जाकर सीमंधरभगवानकी वन्दना की थी और उनसे प्राप्त हुए श्रुतज्ञानके द्वारा जिन्होंने भारतवर्ष के जीवोंको प्रतिबोधित किया है-ऐसे जो जिनचन्द्रसूरिभट्टारकके पट्टके आभरणरूप कलिकालसर्वज्ञ ( भगवान कुन्दकुन्दाचार्य- देव) उनके द्वारा रचे गये इस षट्प्राभृत ग्रन्थमें......सूरीश्वर श्री श्रुतसागर रचित मोक्षप्राभृतकी टीका समाप्त हुई।"-ऐसा षट्प्राभृतकी श्री श्रुतसागर सूरिकृत टीकाके अंतमें लिखा है । भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवकी महत्ता दर्शाते हुए ऐसे अनेकानेक उल्लेख जैन साहित्यमें मिलते हैं; शिलालेख* भी अनेक हैं। इसप्रकार हम देखते हैं कि सवातन जैन सम्प्रदायमें कलिकाल सर्वज्ञ भगवान कुन्दकुन्दाचार्यका स्थान अद्वितीय है। भगवान कुन्दकुन्दाचार्य द्वारा रचित अनेक शास्त्र हैं, जिनमेंसे कुछ वर्तमानमें विद्यमान हैं । त्रिलोकीनाथ सर्वज्ञदेवके मुखसे प्रवाहित श्रुतामृत-सरितामेंसे भर लिये गये अमृतभाजन आज भी अनेक आत्मार्थियोंको आत्मजीवन प्रदान कर रहे हैं । उनके समयसार, प्रवचनसार, नियमसार एवं पंचास्तिकायसंग्रह नामके उत्तमोत्तम परमागमोंमें हजारों शास्त्रोंका सार आ जाता है । भगवान कुन्दकुन्दाचार्यके पश्चात् लिखे गये अनेक ग्रंथोंके बीज इन परमागमोंमें विद्यमान हैं-ऐसा सूक्ष्म दृष्टिसे अभ्यास करने पर ज्ञात होता है। श्री समयसार इस भरतक्षेत्रका सर्वोत्कृष्ट परमागम है। उसमें शुद्धनयकी दृष्टि से नव तत्त्वोंका निरूपण करके जीवका शुद्ध स्वरूप सर्व प्रकारसे-आगम, युक्ति, • भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवके विदेहगमन सम्बन्धी एक उल्लेख ( लगभग विक्रम संवत् की १३ वी शताब्दीमें होनेवाले ) मी जयसेनाचायंने भी किया है। उस उल्लेखके लिये इस शाष के तीसरे पृष्ठ की टिप्पणी देखें। * शिलालेखों के लिये देखिये पृष्ठ............

[ ८ ] अनुभव और परम्परासे-अति विस्तारपूर्वक समझाया है। श्री प्रवचनसारमें उसके नामानुसार जिनप्रवचनका सार संग्रहीत किया है तथा उसे ज्ञानतत्त्व, ज्ञेयतत्त्व और चरणानुयोगके तीन अधिकारोंमें विभाजित कर दिया है। श्री नियमसारमें मोक्षमार्गका स्पष्ट सत्यार्थ विरूपण है । जिसप्रकार समयसारमें शुद्धनयसे नव तत्त्वोंका निरूपण किया है उसीप्रकार नियमसारमें मुख्यतः शुद्धवयसे जीव, अजीव, शुद्धभाव, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान, आलोचना, प्रायश्चित्त, समाधि, भक्ति, आवश्यक, शुद्धोपयोग आदिका वर्णन है । श्री पंचास्तिकायसंग्रहमें कालसहित पांच अस्तिकार्योका (अर्थात् छह द्रव्योंका) और नव पदार्थपूर्वक सोक्षमार्गका विरूपण है। इस पंचास्तिकायसंग्रह परमागमको प्रारम्भ करते हुए शास्त्रकर्ताने इसे "सर्वज्ञ महामुनिके मुखसे कहे गये पदार्थों का प्रतिपादक, चतुर्गतिनाशक तथा निर्वाणका कारण" कहा है । इसमें कहे गये वस्तुतत्त्वका सार इस प्रकार है: विश्व अर्थात् अनादि-अनंत स्वयंसिद्ध सत् ऐसो अनंतानन्त वस्तुओंका (-छहों द्रव्यका ) समुदाय । उसमेंकी प्रत्येक वस्तु अनुत्पन्न एवं अविनाशी है । प्रत्येक वस्तुमें अनंत शक्तियां अथवा गुण जो हैं त्रैकालिक चित्य हैं । प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण अपने में अपना कार्य करती है तथापि अर्थात् नवीन दशाएँ-अवस्थाएं--पर्यायें धारण करती है तथापि वे पर्यायें ऐसी मर्यादामें रहकर होती हैं कि वस्तु अपनी जातिको नहीं छोड़ती अर्थात् उसकी शक्तियों में से एक भी कम-अधिक नहीं होती। वस्तुओंकी (-द्रव्योंकी) भिन्न-भिन्न शक्तियोंकी अपेक्षासे उनकी (-द्रव्योंकी) छह जातियां हैं: जीवद्रव्य, पुद्गलद्रव्य, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य और कालद्रव्य । जिसमें सदा ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सुख आदि अवन्त गुण (-शक्तियां ) हों वह जीवद्रव्य है ; जिसमें सदा वर्ण, गंध, रस, स्पर्श प्रादि अनन्त गुण हो वह पुद्गल द्रव्य है; शेष चार द्रव्योंके 'विशिष्ट गुण अनुक्रमसे गतिहेतुत्व, स्थितिहेतुत्व, अवगाहहेतुत्व तथा वर्तनाहेतुत्व हैं। इन छह द्रव्योंमेंसे प्रथम पांच द्रव्य सत् होनेसे तथा शक्ति अथवा व्यक्ति- अपेक्षासे विशाल क्षेत्रवाले होनेसे 'अस्तिकाय' हैं; कालद्रव्य 'अस्ति' है किन्तु 'काय' नहीं है। जिनेन्द्र के ज्ञानदर्पणमें झलकते हुए यह सर्व द्रव्य-अनंत जीवद्रव्य, अनंतावन्त पुद्गलद्रव्य, एक धर्मद्रव्य, एक अधर्मद्रव्य, एक आकाशद्रव्य तथा असंख्य कालद्रव्य- [६] स्वयं परिपूर्ण हैं और अन्य द्रव्योंसे विलकुल स्वतंत्र हैं; वे परमार्थतः कभी एक-दूसरेसे मिलते नहीं हैं, भिन्न ही रहते हैं। देव, मनुष्य, तिर्यञ्च, नारक, एकेंद्रिय, द्वीन्द्रिय, प्रादि जीवों में जीव-पुद्गल मानों मिल गये हों ऐसा लगता है किन्तु वास्तवमें ऐसा नहीं है; वे बिलकुल पृथक हैं । सर्व जीव अनंत ज्ञानसुखकी निधि हैं तथापि, पर द्वारा उन्हें कुछ सुख-दुःख नहीं होता तथापि, संसारी अज्ञानी जीव अनादि कालसे स्वतः अज्ञावपर्यायरूप परिणमित होकर अपने ज्ञानानंदस्वभावको, परिपूर्णताको, स्वातंत्र्यको एवं अस्तित्वको भी भूल रहा है और पर पदार्थों को सुखदुःखका कारण मानकर उनके प्रति राग-द्वेष करता रहता है; जीवके ऐसे भावोंके निमित्तसे पुद्गल स्वतः ज्ञानावरणादिकर्मपर्यायरूप परिणमित होकर जीवके साथ संयोगमें पाते हैं और इसलिये अनादि कालसे जीवको पौदुगलिक देहका संयोग होता रहता है । परन्तु जोव और देहके संयोगमै भी जीव और पुद्गल विलकुल पथक् हैं तथा उनके कार्य भी एकदूसरेसे बिलकुल भिन्न एवं निरपेक्ष हैं-ऐसा जिनेन्द्रोंने देखा है, सम्यग्ज्ञानियोंने जाना है और अनुमावगम्य भी है। जीव केवल भ्रान्तिके कारण ही देहकी दशासे तथा इष्ट-अनिष्ट पर पदार्थोंसे अपनेको सुखी-दुःखीं मानता है। वास्तवमें अपने सुखगुणको विकारी पर्यायरूप परिणमित होकर वह अनादि कालसे दुःखी हो रहा है। जीव द्रव्य-गुणसे सदा शुद्ध होने पर भी, पर्यायप्रपेक्षासे शुभशुभभावरूपमें, आंशिकशुद्धिरूपमें, शुद्धिको वृद्धिरूपमें तथा पूर्णशुद्धिरूपमें परिणमित होता है और उन भावोंके निमित्तसे शुभाशुभपुद्गलकर्मोंका आस्रवण एवं बंधत तथा उनका रुकना, खिरना और सर्वथा छूटना होता है । इन भावोंको समझानेके लिये जिनेन्द्रभगवन्तोंने नव पदार्थों का उपदेश दिया है। उप नव पदार्थोंको सम्यक्पसे समझने पर, जीवको क्या हितरूप है, क्या अहित-रूप है, शाश्वत परम हित प्रगट करनेके लिये जीवको क्या करना चाहिये, पर पदार्थों के साथ अपना क्या सम्बन्ध है-इत्यादि बातें यथार्थरूपसे समझमें आती हैं और अपना सुख अपने में ही जानकर, अपनी सर्व पर्यायों में भी ज्ञानानन्दस्वभावी चिज जीवद्रव्यसामान्य सदा एकरूप जानकर, वह अनादिअप्राप्त ऐसे कल्याणवीज सम्यग्दर्शनको तथा सम्यग्जानको प्राप्त करता है। उनकी प्राप्ति होने पर जीव अपवेको द्रव्य-प्रपेक्षासे कृतकृत्य मानता है और उस कृतकृत्य द्रव्यका परिपूर्ण आश्रय करनेसे ही शाश्वत सुखको प्राप्ति-मोक्ष-होती है ऐसा समझता है।

[ १० ] सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होने पर जीवको शुद्धात्मद्रव्यका जो अल्प आलम्बन हो जाता है उसमें वृद्धि होने पर क्रमशः देशविरत श्रावकत्व एवं मुनित्व प्राप्त होता है । श्रावकको तथा मुनिको शुद्धात्मद्रव्यके मध्यम आलम्बनरूप प्रांशिक शुद्धि होती है वह कर्मोंके अटकने तथा खिरनेमें निमित्त होती है, और जो अशुद्धिरूप अन्श होता है वह श्रावकके देशवतादिरूपसे तथा मुनिके महाव्रतादिरूपसे दिखाई देता है, जो कर्मबन्धका निमित्त होता है । अनुक्रमसे वह जीव ज्ञानानन्दस्वभावी शुद्धात्मद्रव्यका अति उग्ररूपसे अवलम्बन करके, सर्व विकल्पोंसे छूटकर, सर्व रागद्वेष रहित होकर, केवलज्ञानको प्राप्त करके, प्रायुष्य पूर्ण होने पर देहादिसंयोगसे विमुक्त होकर, सदाकाल परिपूर्ण ज्ञानदर्शनरूपसे और अतीन्द्रिय अनन्त अव्यावाध आनन्दरूपसे रहता है। तवतक -यह, भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवने पंचास्तिकायसंग्रह शास्त्रमें परम करुणाबुद्धि पूर्वक प्रसिद्ध किये हुए वस्तुतत्त्वका संक्षिप्त सार है। इसमें जो रीति बतलाई है उनके अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार जीव अनादिकालीन भयंकर दुःखसे नहीं छूट सकता । जब तक जीव वस्तुस्वरूपको नहीं समझ पाता अन्य लाख प्रयत्नोंसे भी मोक्षका उपाय उसके हाथ नहीं लगता । इसीलिये इस शास्त्रमें सर्व प्रथम पंचास्तिकाय और नवपदार्थोंका स्वरूप समझाया गया है कि जिससे जीव वस्तुस्वरूपको समझकर मोक्षमार्गके मूलभूत सम्यग्दर्शनको प्राप्त हों। अस्तिकायों और पदार्थोके निरूपणके पश्चात् इस शास्त्रमें मोक्ष- मार्गसूचक चूलिका है। यह अन्तिम अधिकार शास्त्ररूपी मन्दिर पर रत्नकलशकी भांति शोभा देता है । अध्यात्मरसिक आत्मार्थी जीवोंका यह अतिप्रिय अधिकार है। इस अधिकारका रसास्वादव करते हुए मानों उन्हें तृप्ति ही नहीं होती ! इसमें मुख्यतः वीतराग चारित्रका-स्वसमयका-शुद्ध मुनिदशाका- पारमार्थिक मोक्षमार्गका भाववाही मधुर प्रतिपादन है, तथा मुनिको सरागचारित्रकी दशामें आंशिक शुद्धिके साथ-साथ कैसे शुभभावोंका सुमेल अवश्य होता ही है उसका भी स्पष्ट निर्देश है । जिनके हृदयसै वीतरागताको भावनाका मंथन होता रहता है पैसे शास्त्रकार और टीकाकार मुनीन्द्रोंने इस अधिकारमें मावों शान्त [ ११ ] वीतराग रसकी सरिता प्रवाहित की है। धीर गम्भीर . गतिसे बहती हुई उस शान्तरसकी अध्यात्मगंगामें स्नान करनेसे तत्त्वजिज्ञासु भावुकजीव शीतलताभिभूत होते हैं और उनका हृदय शांत-शांत होकर . मुनियोंकी आत्मानुभवमूलक सहजशुद्ध उदासीव दशाके प्रति बहुमान पूर्वक नमित हो जाता है । इस अधिकारका मनन करनेसे सुपात्र मुमुक्षु जीवोंकी समझमें आता है कि-"शुद्धात्मद्रव्यके आश्रयसे सहजदशाका अंश प्रगट किये बिना मोक्षके उपायका अंश. भी. प्राप्त नहीं होता।" इस पवित्र शास्त्रके रचयिता श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवके प्रति पूज्य गुरुदेव (श्री कानजी स्वामी ) की अपार भक्ति है। वे अनेकों बार कहते हैं कि-"श्रीसमयंसार, नियमसार, प्रवचनसार, पंचास्तिकायसंग्रह आदि शास्त्रोंकी प्रत्येक गाथामें दिव्यध्वनिका सन्देश है। इन गाथाओं में इतनी अपार गहराई है कि उसे मापते हुए अपनी ही शक्तिका माप निकल आता है। इन सारगम्भीर शास्त्रोंके रचयिता परम कृपालु प्राचार्य भगवावको कोई परम अलौकिक सामर्थ्य है। परम भभुत सातिशय अंतर्बाह्य योगोंके विना इन शास्त्रोंकी रचना शक्य नहीं है । इन शास्त्रोंकी वाणी तरते हुए पुरुषकी वाणी है ऐसा हम स्पष्ट जानते हैं। इनकी प्रत्येक गाथा छ?-सातवें गुणस्थानमें झूलते हुए महामुनिके प्रात्मानुभवमेंसे प्रगट हुई है । इन शास्त्रोंके रचयिता भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेव महाविदेहक्षेत्रमें सर्वज्ञ वीतराग श्रो सीमंधर भगवानके समवशरणमें गये थे। भोर वहाँ वे पाठ दिन तक रहे थे यह वात यथातथ्य है, अक्षरश: सत्य है, प्रमाणसिद्ध है। उन परमोपकारी प्राचार्य भगवान द्वारा रचे गये समयसारादि शास्त्रोंमें तीर्थकरदेवकी ॐकारध्वनिमेंसे विकला हुमा उपदेश है। इस शास्त्रमें भगवान कुन्दकृन्दाचार्यदेवकी प्राकृत गाथानों पर समयव्याख्या नामक संस्कृत टीकाके लेखक ( लगभग विक्रम संवत्को १० वीं शताब्दी में हो गये ) श्रोममृतचन्द्राचार्यदेव हैं। जिस प्रकार इस शास्त्रके मूल कर्ता अलौकिक पुरुष हैं, उसोप्रकार उसके टीकाकार भी महासमर्थ प्राचार्य हैं। उन्होंने समयसारकी तथा प्रवचनसारकी टीका भी लिखी है और तत्त्वार्थसार, पुरुषार्थसिद्ध्युपाय मादि स्वतंत्र [ १२ ] ग्रंथ भी रचे हैं । उनकी टोकाओं जैसी टो का अभी तक किसो जैवग्रन्थको नहीं लिखो गई है। उनकी टीकाएँ पढ़नेवालेको उनकी अध्यात्मरसिकता, प्रात्मानुभव, प्रखर विद्वत्ता, वस्तु स्वरूपको न्यायसे सिद्ध करनेकी असाधारण शक्ति, जिवशासनका सातिशय अगाध ज्ञान, निश्चय-व्यवहारका संधिवद्ध निरूपण करनेकी विरल शक्ति एवं उत्तम काव्यशक्तिको सम्पूर्ण प्रतीति हो जाती है । प्रति संक्षेपमें गम्भीर रहस्य भर देनेकी उनकी शक्ति विद्वानोंको आश्चर्यचकित कर देती है। उनकी देवी टोकाएँ श्रुतकेवलीके वचन समान हैं । जिसप्रकार मूल शास्त्रकारके शास्त्र अनुभव, युक्ति आदि समस्त समृद्धिसे समद्ध हैं उसीप्रकार टोकाकारकी टोकाएं भी उन-उन सर्व समृद्धियोंसे विभूषित हैं । शासनमान्य भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवने इस कलिकालमें जगद्गुरु तीर्थङ्करदेव जैसा कार्य किया है और श्री अमृतचन्द्राचार्यदेववे-मानों वे कुन्दकुन्दभगवानके हृदयमें प्रविष्ट हो गये हों इसप्रकार-उनके गंभीर आशयोंको यथार्थरूपसे व्यक्त करके उनके गणधर जैसा कार्य किया है। श्री अमृतचन्द्राचार्यदेवके रचे हुए काव्य भी अध्यात्मरस एवं प्रात्मानुभवकी मस्तीसे भरपूर हैं । श्री समयसारकी टोकामें आनेवाले काव्यों ( -कलशों )ने श्री पद्मप्रभदेव जैसे समर्थ मुनिवरों पर गहरा प्रभाव डाला है और आज भी वे तत्त्वज्ञान एवं अध्यात्मरससे भरपूर मधुर कलश अध्यात्मरसिकोंको हृदुतंत्रीको झंकृत कर देते हैं । अध्यात्म कविके रूपमें श्री अमृतचन्द्राचार्यदेवका स्थान अद्वितीय है । पंचास्तिकायसंग्रहमें भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेवने १७३ गाथाओंकी रचना प्राकृतमें को है । उस पर श्री अमृतचन्द्राचार्यदेवने समयव्याख्या नामकी तथा श्रीजयसेनाचार्यदेवने तात्पर्यवृत्ति नामकी संस्कृत टीकाएं लिखी हैं। श्री पांडे हेमराजजोने समयव्याख्याका भावार्थ (प्राचीन ) हिन्दीमें लिखा है और उस भावार्थका नाम बालावबोध भाषा टीका रखा है। विक्रम सम्वत् १९७२ में श्री परमश्रुत प्रभावक मंडल द्वारा प्रकाशित हिन्दी पंचास्तिकायमें मूल गाथाएं', दोनों संस्कृत टीकाएँ और श्री हेमराजजो कृत बालावबोध भाषा टोका (श्री पन्नालालजी बाकलीवाल द्वारा, प्रचलित हिन्दी भाषाके परिवर्तित स्वरूपमें ) दी गई है । इसके पश्चात् प्रकाशित होनेवाले गुजराती पंचास्तिकायसंग्रहमें मूलगाथाएँ, उनका गुजराती पद्यानुवाद, संस्कृत समयव्याख्या टोका और उस गाथाटीकाका अक्षरशः गुजराती अनुवाद प्रकाशित किया गया, जिसका यह हिन्दी अनुवाद है । जहाँ विशेष. स्पष्टताकी [ १३ ] प्रावश्यकता दिखाई दी वहां "कौंस"में, "भावार्थ" में अथवा टिप्पणी में स्पष्टता की है । उस स्पष्टतामें अनेक स्थानों पर श्री जयसेनाचार्यदेवकृत तात्पर्यवृत्ति अतिशय उपयोगी हुई है। कुछ स्थानों पर तो तात्पर्यवृत्तिके किसी-किसी भागका अक्षरशः अनुवाद ही "भावार्थ" अथवा टिप्पणीरूपमें किया है । श्री हेमराजजीकृत बालावबोध भाषा टीकाका आधार भी किसी स्थान पर लिया है । श्री परमश्रुत प्रभावक मण्डल द्वारा प्रकाशित पंचास्तिकायमें . छपो हुई संस्कृत टोकाका हस्तलिखित प्रतियोंके साथ मिलान करने पर उसमें कहीं अल्प अशुद्धियाँ दिखाई दी वे इसमें सुधार ली गई हैं। इस शास्त्रकी टोकाका गुजराती अनुवाद करनेका जो महाभाग्य मुझे प्राप्त हुप्रा वह अत्यन्त हर्षका कारण है । परमपूज्य गुरुदेवके आश्रयमें इस गहन शास्त्रका अनुवाद हुमा है । अनुवाद करनेको समस्त शक्ति मुझे पूज्यपाद गुरुदेव द्वारा ही प्राप्त हुई है । परमोपकारी गुरुदेवके पवित्र जोवनके प्रत्यक्ष परिचय बिना तथा उनके आध्यात्मिक उपदेशके बिना इस पामरको जिनवाणीके प्रति लेशमात्र भी भक्ति या श्रद्धा कहाँसे प्रगट होती ? भगवान कुन्दकुन्दाचार्यदेव और उनके शास्त्रोंकी लेशमात्र भी महिमा व हाँसे आतो और उन शास्त्रोंका अर्थ समझनेको लेशमात्र भी शक्ति कहाँसे प्राप्त होती ? इसप्रकार अनुवादकी समस्त शक्तिका मूल श्री गुरुदेव हो होनेसे वास्तवमें तो गुरुदेवकी अमृतवाणीका स्रोत ही-उनके द्वारा प्राप्त अनमोल उपदेश ही-यथासमय इस अनुवादरूपमै परिणमित हुआ है। जिनके शक्तिसिंचन तथा छत्रछायासे मैंने इस गहनशास्त्रके अनुवादका साहस किया था और जिनकी कृपासे वह निर्विघ्न समाप्त हुआ है उन परमपूज्य परमोपकारो गुरुदेव ( श्री कानजो स्वामी) के चरणारविन्दमें अत्यंत भक्तिभाव पूर्वक वंदन करता हूँ। परमपूज्य वेनश्री चंपावेन तथा परमपूज्य वेन शांतावेनके प्रति भो, इस अनुवादकी पूर्णाहुति करते हुए, उपकारवशताको उग्रवृत्तिका अनुभव होता है । जिनके पवित्र जीवन और बोध इस पामरको श्री पंचास्तिकायसंग्रहके प्रति, पंचास्तिकायसंग्रहके महान कर्ताके प्रति एवं पंचास्तिकायसंग्रहमें उपदेशित वोतराग विज्ञानके प्रति बहुमान वृद्धिके विशिष्ट निमित्त हुए हैं-ऐसो उन परमपूज्य वेनोंके चरणकमलमें यह हृदय नमन करता है। इस अनुवादमें पादरणीय श्री वकील रामजीभाई मारणेकचन्द दोशी तथा बालब्रह्मचारो भाईश्री चन्दुलाल खोमचन्द झोवालियाकी हार्दिक सहायता है ।

[ १४ ] पादरणीय श्री रामजोभाईने अपने व्यस्त धार्मिक व्यवसायोंमेंसे समय निकालकर समस्त अनुवादकी सूक्ष्मतासे जाँच की है, यथोचित सूचनाएं दी हैं और अनुवादमें आनेवाली छोटो-बड़ी कठिनाइयोंका अपने विशाल शास्त्रज्ञानसे निराकरण किया है। उनकी सूचनाएँ मेरे लिये अतिउपयोगी सिद्ध हुई हैं । ब्रह्मचारी भाई श्री चन्दुलालजी ने समस्त अनुवादको अतिसूक्ष्मतासे जांचकर उपयोगी सूचनाएं दी हैं, बहुत परिश्रम पूर्वक हस्तलिखित प्रतियोंके आधारसे संस्कृत टीका सुधारी है, अनुक्रमणिका, गाथासूचि, शुद्धिपत्र आदि तैयार किये हैं, तथा अत्यन्त सावधानीसे प्रूफ संशोधन किया है-इस प्रकार प्रति परिश्रम एवं सावधानी पूर्वक सर्वतोमुखी सहायता को है। दोनों सज्जनोंकी हार्दिक सहायताके लिये मैं उनका अन्त:करण पूर्वक आभार मानता हूँ । उनकी हार्दिक सहायताके बिना इस अनुवादमें अनेक त्रुटियां रह जाती । जिन-जिन टीकाओं तथा शास्त्रोंका मैंने आधार लिया है उन सबके रचयिताओंका भी मैं ऋणी हूँ। यह अनुवाद मैंने पंचास्तिकायसंग्रहके प्रति भक्ति एवं गुरुदेवको प्रेरणासे प्रेरित होकर, निजकल्याणके हेतु, भवभयसे डरते-डरते किया है । अनुवाद करते समय इस बातकी मैंने यथाशक्ति सावधानी रखी है कि शास्त्रके मूल आशयोंमें कोई परिवर्तन न हो जाये । तथापि अल्पज्ञताके कारण इसमें कहीं प्राशय-परिवर्तन हुआ हो या भूलें रह गई हों तो उसके लिये मैं शास्त्रकार श्री कुन्दकुन्दाचार्य भगवान, टोकाकार श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव, परम कृपालु श्री गुरुदेव एवं मुमुक्षु पाठकोंसे हार्दिक क्षमायाचना करता हूँ। जिनेन्द्र शासनका संक्षेपमें प्रतिपादन करनेवाले इस पवित्र शास्त्रका अध्ययन करके यदि जीव इसके प्राशयोंको भलीभाँति समझ ले तो वह अवश्य ही चार गतिके अनन्त दुःखोंका नाश करके निर्वाणको प्राप्त हो। इसके प्राशयोंको सम्यक् प्रकारसे समझनेके लिये निम्नोक्त बातोंको लक्षमें रखना आवश्यक है : इस शास्त्र में कुछ कथन स्वाश्रित निश्चयनयके हैं (-जो स्वका पर से पृथक्- रूप निरूपण करते हैं ), और कुछ कथन पराश्रित व्यवहारनयके हैं (-जो स्वका परके साथ सम्बन्ध लगाने रूपसे विरूपण करते हैं ); तथा कुछ कथन अभिन्नसाध्यसाधन- भावाश्रित निश्चयनयके हैं और कुछ भिन्नसाध्यसाधनभावाश्रित व्यवहारनयके हैं। वहाँ निश्चय कथनोंका तो सीधा ही अर्थ करना चाहिये और व्यवहार कथनोंको परद्रव्यका इस शास्त्रमें [ १५ ] अभूतार्थ समझकर उनका सच्चा प्राशय क्या है वह निकालना चाहिये । यदि ऐसा नहीं किया जायेगा तो विपरीत समंझ होनेसे महाअनर्थ होगा। "प्रत्येक द्रव्य स्वतन्त्र है । वह अपने ही गुणपर्यायोंको तथा उत्पादव्ययध्रौव्यको करता है। ग्रहणत्याग नहीं कर सकता तथा परद्रव्य वास्तवमें उसे कोई लाभ-हानि या सहाय नहीं कर सकता.......जीवकी शुद्धपर्याय संवर-निर्जरा-मोक्षके कारणभूत हैं और अशुद्धपर्याय आस्रव-बन्धके कारणभूत है।"-ऐसे मूलभूत सिद्धान्तोंको कहीं बाधा न पहुँचे इसप्रकार सदैव शास्त्रके कथनोंका अर्थ करना चाहिये । पुनश्च, कुछ परमप्रयोजनभूत भावोंका निरूपण अति संक्षेपमें ही किया गया है इसलिये, यदि इस शास्त्रके अभ्यासको पूर्ति समयसार, नियमसार, प्रवचनसार आदि अन्य शास्त्रोंके अभ्यास द्वारा की जाये तो मुमुक्षुओंको इस शास्त्रके आशय समझने में विशेष सुगमता होगी। प्राचार्य भगवानने सम्यग्ज्ञानको प्रसिद्धि के हेतुसे तथा मार्गकी प्रभावनाके हेतुसे. यह पंचास्तिकायसंग्रह शास्त्र कहा है। हम इसका अध्ययन करके, सर्वद्रव्यों की स्वतन्त्रता समझकर, नवपदार्थों की यथार्थ समझ करके, चैतन्यगुणमय जीवद्रव्यसामान्यका प्राश्रय करके, सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान प्रगट करके मार्गको प्राप्त करके भवभ्रमणके दुःखोंका अन्त प्राप्त करें यही भावना है । श्री अतमृचन्द्राचार्यदेवने पंचास्तिकायसंग्रहके सम्यक अवबोधके फलका निम्नोक्त शब्दोंमें वर्णन किया है:- वास्तवमें समस्त वस्तुतत्त्वका कथन करनेवाले इस "पंचास्तिकायसंग्रह" को अर्थतः अर्थीरूपसे जानकर, इसी में कहे हुए जोवास्तिकायमें अन्तर्गत विद्यमान अपनेको (निज आत्माको) स्वरूपसे अत्यन्त विशद्ध चैतन्यस्वभाववान निश्चित करके, परस्पर कार्यकारणभूत ऐसे अनादि रागद्वेष परिणाम एवं कर्मबंधको परम्परासे जिसमें स्वरूप विकार आरोपित है ऐसा अपनेको ( निज आत्माको ) उसकाल अनुभव, आता अवलोक कर, उस समय विवेकज्योति प्रगट होनेसे ( अर्थात् अत्यन्त विशुद्ध चैतन्य स्वभावका तथा विकारका भेदज्ञान उस काल ही प्रगट प्रवर्तमान होनेसे ) कर्मवन्धको परम्पराको प्रवर्तन करानेवालो रागद्वेषपरिणतिको छोड़ता है, वह पुरुष, सचमुच जिसका स्नेह जीर्ण होता जाता है ऐसा, जघन्य स्नेहगुणके सम्मुख वर्तते हुए परमाणुकी भांति भावी बन्धसे पराङ मुख वर्तता हुअा, पूर्वबंधसे छूटता हुप्रा, अग्वितप्त जलकी दुःस्थिति समाव जो दुःख उससे परिमुक्त होता है।" कार्तिक कृष्णा ४, हिंमतलाल जेठालाल शाह वि. सं. २०१३ सोनगड़ ( सौराष्ट्र) "जो पुरुष [ १६. ] शास्त्रोंका अर्थ करनेकी पद्धति . व्यवहारका श्रद्धान छोड़कर निश्चयनयका श्रद्धान करना योग्य है। व्यवहारनय स्वद्रव्य-परद्रव्यको तथा उनके भावोंको तथा-कारण-कार्यादिको किसी में मिलाकर निरूपण करता है, इसलिये ऐसे ही श्रद्धानसे मिथ्यात्व है। इसलिये उसका त्याग करना । तथा निश्चयनय उन्हींका यथावत् निरूपण करता है, किसीको किसीमें नहीं मिलाता, इसलिये ऐसे हो श्रद्धानसे सम्यक्त्व होता है, इसलिये उसका श्रद्धान करना चाहिये । प्रश्न:-यदि ऐसा है तो जिनमार्गमें दोनों नयोंको ग्रहण करना कहा है-वह किस प्रकार? उत्तर:-जिनमार्गमें कहीं तो निश्चयनयकी मुख्यतासे व्याख्यान है, उसे तो 'सत्यार्थ ऐसा ही है-ऐसा जानना; तथा कहीं व्यवहारनयकी मुख्यतासे व्याख्यान है, उसे 'ऐसा है नहीं, निमिचादिकी अपेक्षासे उपचार किया है' ऐसा जानना । इसप्रकार जाननेका नाम ही दोनों नयोंका ग्रहण है । परन्तु दोनों नयोंके व्याख्यानको समान सत्यार्थ जानकर "ऐसा भी है और ऐसा भी है"-इसप्रकार भ्रमरूप प्रवर्तनसे तो दोनों नयोंको ग्रहण करना नहीं कहा है । प्रश्न:-यदि व्यवहारनय असत्यार्थ है, तो उसका उपदेश जिनमार्गमें किसलिये दिया ? एक निश्चयनयका ही निरूपण करना था ? उत्तर:-ऐसा ही तर्क श्री समयसारमें किया है। वहीं यह उत्तर दिया है: जह णवि सक्कमणज्जो अणज्जमासं विणा उ गाहेउ । तह ववहारेण विणा परमत्थुवएसणमसक्कं ॥ अर्थ:-जिसप्रकार अनार्यको-म्लेच्छको-म्लेच्छ भाषाके बिना अर्थ ग्रहण करना शक्य नहीं है, उसी प्रकार व्यवहारके बिना परमार्थका उपदेश अशक्य है । इसलिये व्यवहारका उपदेश है । तथा इसी सूत्रकी व्याख्यामें ऐसा कहा है कि-'व्यवहारनयो नानुसर्तव्यः' अर्थात् निश्चयको अंगीकार करानेके लिये व्यवहार द्वारा उपदेश किया जाता है, परन्तु व्यवहारनय है वह अंगीकार करने योग्य नहीं है। R2ET [ १७ ]. ? प्रश्न:- (१) व्यवहारके विना निश्चयका उपदेश नहीं होता-वह किस प्रकार ? तथा (२) व्यवहारनयको अंगीकार नहीं करना चाहिये-वह किस प्रकार ? उत्तर: (१) निश्चयनयसे तो आत्मा परद्रव्यसे भिन्न, स्वभावोंसे अभिन्न स्वयंसिद्ध वस्तु है उसे जो न पहिचानें, उनसे ऐसा ही कहते रहें तो वे नहीं समझेगे । इसलिये उन्हें समझानेके लिये व्यवहारनयसे शरीरादिक परद्रव्योंकी सापेक्षता द्वारा नर-नारक-पृथ्वीकायादिरूप जीवके भेद किये, तब 'मनुष्य जीव है,' 'नारकी जीव है' इत्यादि प्रकारसे उन्हें जीवकी पहिचान हुई; अथवा अभेद वस्तुमें भेद उत्पन्न करके ज्ञान-दर्शनादि गुणपर्यायरूप जीवके भेद किये, तब 'जाननेवाला जीव है,' देखनेवाला जीव है,' इत्यादि प्रकारसे उन्हें जीवकी पहिचान हुई । और निश्चयसे तो वीतरागभाव मोक्षमार्ग है; किन्तु उसे जो नहीं जानते उनसे ऐसा ही कहते रहें तो वे नहीं समझेंगे; इसलिये उन्हें समझानेके लिये, व्यवहारनयसे तत्त्वार्थश्रद्धान-ज्ञानपूर्वक परद्रव्यका निमित्त मिटानेकी सापेक्षता द्वारा व्रतशील-संयमादिरूप वीतरागभावके विशेष दर्शाये, तब उन्हें वीतरागकी पहिचान हुई । इसी प्रकार अन्यत्र भी व्यवहारके विना निश्चयका उपदेश न होना समझना । (२) यहाँ व्यवहारसे नर-नारकादि पर्यायको ही जीव कहा । इसलिये कहीं उस पर्यायको ही जीव नहीं मान लेना चाहिये । पर्याय तो जीव-पुद्गलके संयोगरूप है । वहां निश्चयसे जीवद्रव्य पृथक् है; उसीको जीव मानना । जीवके संयोगसे शरीरादिकको भी जीव कहा वह कथनमात्र ही है । परमार्यसे शरीरादिक जीव नहीं होते । ऐसा ही श्रद्धान करना। दूसरे, अभेद आत्मामें ज्ञान-दर्शनादि भेद किये इसलिये कहीं उन्हें भेदरूप ही नहीं मान लेना चाहिये; भेद तो समझानेके लिये हैं। निश्चयसे आत्मा अभेद ही है। उसीको जीववस्तु मानना । संज्ञा-संख्यादि भेद कहे वे कथनमात्र ही हैं, परमार्थसे वे पृथक्-पृथक् नहीं हैं। ऐसा ही श्रद्धान करना । पुनश्च, परद्रव्यका निमित्त मिटानेकी अपेक्षासे व्रत-शील-संयमादिकको मोक्षमार्ग कहा इसलिये कहीं उन्हींको मोक्षमार्ग नहीं मान लेना चाहिये; क्योंकि परद्रव्यके ग्रहण-त्याग आत्माको हों तो आत्मा परद्रव्यका कर्ता-हर्ता हो जाये; किन्तु कोई द्रव्य किसी द्रव्यके आधीन नहीं है । आत्मा तो अपने भाव जो रागादिक हैं उन्हें छोड़कर वीतरागी होता है, इसलिये निश्चयसे वीतरागमाव ही मोक्षमार्ग है। वीतरागभावोंको और ब्रतादिकको कदाचित् कार्यकारणपना है इसलिये व्रतादिकको मोक्षमार्ग कहा किन्तु वह कयनमात्र

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ही है। परमार्थसे वाह्यक्रिया मोक्षमार्ग नहीं है । ऐमा ही श्रद्धान करना । इसी प्रकार
अन्यत्र भी व्यवहारनयको अंगीकार न करता समझ लेना चाहिये ।
प्रश्न:-व्यवहारनय परको उपदेश करने में ही कार्यकारी है या स्वयंका भी
प्रयोजन साधता है ?
उत्तर:-स्वयं भी जव तक निश्चयनयसे प्ररूपित वस्तुको नहीं जानता तव
तक व्यवहार मार्ग द्वारा वस्तुका निश्चय करता है । इसलिये निचली दशामें स्वयंको
भी व्यवहारनय कार्यकारी है । परन्तु व्यवहारको उपचारमात्र मानकर उसके द्वारा
वस्तुका श्रद्धान बराबर किया जाये तो वह कार्यकारी होता है, और यदि निश्चयकी
भाँति व्यवहार भी सत्यभूत मानकर 'वस्तु ऐसी ही है' ऐसा श्रद्धान किया जाये तो वह उल्टा
अकार्यकारी हो जाता है।
यही पुरुषार्थ सिद्ध्युपायमें कहा है.
अवुधस्य वोधनार्थ मुनीश्वरा देशयन्त्यभूतार्थम् ।
व्यवहारमेव केवलमवैति यस्तस्य देशना नास्ति ।।
माणवक एव सिंहो यथा भवत्यनवगीतसिंहस्य ।
व्यवहार एव हि तथा निश्चयतां यात्यनिश्चयज्ञस्य ।।
अर्थः- मुनिराज, अज्ञानीको समझानेके लिये असत्यार्थ जो व्यवहारनय
उसका उपदेश देते हैं । जो मात्र व्यवहारको ही समझता है, उसे तो उपदेश देना ही
योग्य नहीं है । जिस प्रकार-जो सच्चे सिंहको नहीं जानता उसे तो विलाव ही सिंह
है; उसी प्रकार जो निश्चयको नहीं समझता उसकें तो व्यवहार ही निश्चयपंनेको
प्राप्त होता है।
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-श्री मोक्षमार्ग प्रकाशक ।

[ १६ ] निश्चयव्यवहारामास-अवलम्बियोंका निरूपण प्रव, निश्चय-व्यवहार दोनों नयोंके आभासका अवलम्बन लेते हैं ऐसे मियादृष्टियोंका निरूपण करते हैं : कोई जीव ऐसा मानते हैं कि जिनमतमें निश्चय और व्यवहार दो नय कहे हैं इसलिये हमें उन दोनोंका अंगीकार करना चाहिये। ऐसा विचार कर, जिस प्रकार केवलनिश्चयाभासके पवलम्बियोंका कथन किया था तदनुसार तो वे निश्चयका अंगीकार करते हैं और जिस प्रकार केवलव्यवहाराभासके प्रवलम्बियोंका कथन किया था तदनुसार व्यवहारका अंगीकार करते हैं। यद्यपि इसप्रकार अंगीकार करने में दोनों नयोंमें परस्पर विरोष है, तथापि करें क्या? दोनों मयोंका सच्चा स्वरूप तो भासित हुआ नहीं है और जिनमतमें दो नय कहे हैं उनमेंसे किसीको छोड़ा भी नहीं जाता, इसलिये भ्रमपूर्वक दोनों नयोंका साधन सापते हैं । उन जीवोंको भी मिथ्यादृष्टि जानना । प्रब उनकी प्रवृत्तिको विशेषता दर्शाते हैं।- अंतरंगमें स्वयं तो निर्धार करके यथावत् निश्चय-व्यवहार मोक्षमार्गको जाना नहीं है परन्तु जिन प्राज्ञा मानकर निश्चय व्यवहाररूप दो प्रकारके मोक्षमार्ग मानते हैं । पब, मोक्षमार्ग तो कहीं दो हैं नहीं, मोक्षमार्गका निरूपण दो प्रकारसे है । जहाँ सच्चे मोक्षमार्गको मोक्षमार्ग निरूपण किया है वह निश्चयमोक्षमार्ग है, और जहां मोक्षमार्ग तो है नहीं किन्तु मोक्षमार्गका निमित्त है अथवा सहचारी है उसे उपचारसे मोक्षमार्ग कहें वह व्यवहार मोक्षमार्ग है। क्योंकि निश्चय व्यवहारका सर्वत्र ऐसा हो लक्षण है । सच्चा निरूपण सो निश्चय, उपचार निरूपण सो व्यवहार । इसलिये निरूपण की अपेक्षासे दो प्रकारसे मोक्षमार्ग जानना। परन्तु एक निश्चयमोक्षमार्ग है तथा एक व्यवहारमोक्षमार्ग है इसप्रकार दो मोक्षमार्ग मानना मिथ्या है । पुनश्च, वे निश्चय-व्यवहार दोनोंको उपादेय मानते हैं वह भी भ्रम है। क्योंकि निश्चय और व्यवहारका स्वरूप तो परस्पर विरोध सहित है.... -श्री मोक्षमार्गप्रकाशक।

श्री पंचास्तिकायसंग्रहकी विषयानुक्रमणिका विषय गाथा १ १-षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन षद्रव्यपंचास्तिकायके सामान्य व्याख्यानरूप पीठिका शास्त्रके आदिमें जिनको भावनमस्काररूप असाधारण मंगल समय अर्थात् मागमको प्रणाम करके उसका कथन करने सम्वन्धी भीमद् कुन्दकुन्दाचार्यदेवको प्रतिज्ञा शब्दरूपसे, ज्ञानरूपसे और अर्थरूपसे ऐसे तीन प्रकारका 'समय' शब्दका अर्थ तथा लोक-अलोकरूप विभाग २ ३ ४ ५ ur ७ ८ पांच अस्तिकायोंकी विशेष संज्ञा, सामान्य-विशेष-प्रस्तित्व तथा कायत्वका कथन पांच मस्तिकायोंको अस्तित्व किस प्रकारसे है और कायत्व किस प्रकारसे है उसका कथन पांच अस्तिकायोंको तथा कालको द्रव्यपनेका कथन छह द्रव्योंको परस्पर अत्यन्त संकर होने पर भी वे अपने-अपने स्वरूपसे च्युत नहीं होते ऐसा कथन अस्तित्व का स्वरूप सत्ता और द्रव्यको अर्थान्तरपना होनेका खण्डन तीन प्रकारसे द्रव्यका लक्षण दोनों नयों द्वारा द्रव्यके लक्षणका विभाग द्रव्य और पर्यायोंके अभेदपनेका कथन द्रव्य और गुणोंके अभेदपनेका कथन द्रव्यके आदेशके वश सप्तभंगी उत्पादमें असत्का प्रादुर्भाव और व्ययमें सत्का विनाश होनेका निषेध द्रव्यों, गुणों तथा पर्यायोंका प्रज्ञापन ६ ११ १२ AW १५ १६ [ २१ ] गाथा . १८. २०. २१ २२ २३ २४ २५ २६ विषय "भावका नाश नहीं होता और अभावका उत्पाद नहीं होता! उसका उदाहरण द्रव्य कथंचित् व्यय और उत्पादवान होने पर भी उसका सदैव अविनष्पना एवं अनुत्पन्नपना ध्रुवताके पक्षसे सत्का अविनाश और असत्का अनुत्पाद सिद्धको अत्यन्त असत्-उत्पादका निषेध जीवको उत्पाद, व्यय, सत्-विनाश एवं असत्-उत्पादका कर्तापना होने की सिद्धिरूप उपसंहार छह द्रव्यों में से पांचको अस्तिकायपनेका स्थापन काल अस्तिकायरूपसे अनुक्त होने पर भी उसका अपना निश्चय कालका स्वरूप व्यवहारकालका कथंचित् पराश्रितपना व्यवहारकालके कथंचित् पराभितपने सम्बन्धी सत्य युक्ति नीबद्रग्यास्तिकायका व्याख्यान संसार दशावाले आत्माका सोपाधि और निरुपाधि स्वरूप मुक्त दशावाले आत्माका निरुपाधि स्वरूप सिद्धके निरुपाधि ज्ञान, दर्शन और सुखका समर्थन जीवत्व गुणको व्याख्या जीवोंका स्वाभाविक प्रमाण तथा उनका मुक्त और अमुक्त ऐसा विभाग जीवके देह प्रमाणपनेके दृष्टान्तका कथन जीवका देहसे देहान्तरमें अस्तित्व, देहसे पृथक्त्व तथा देहान्तरमें पमनका कारण सिद्ध भयवन्तोंके जीवत्व एवं देह प्रमाणत्वको व्यवस्था सिद्ध भयवानको कार्यपना और कारणपना होनेका निराकरण "जीवका अभाव सो मुक्ति"-इस बातका खण्डन चेतयितृत्व गुणकी व्याख्या किस जीवको कौनसी चेतना होती है उसका कथन उपयोग गुणके व्याख्यानका प्रारम्भ ज्ञानोपयोगके भेदों के नाम और स्वरूपका कयन दर्शनोपयोगके भेदों के नाम और स्वरूपका कथन एक मात्मा अनेक ज्ञानात्मक होनेका समर्थन २७ २८ २१ ३० ३१-३२ ર ३६ ३१ ४२ ४३ [ २२ ] विषय गाथा ४४ ४५ ४६ ४७ ४८ ४६ ५१-५२ ? ५४ ५५ द्रव्यका गुणोंसे भिन्नत्व और गुणोंका द्रव्यसे भिन्नत्व होने में दोष द्रव्य और गुणोंका स्वोचित अनन्यपना व्यपदेश आदि एकान्तसे द्रव्य-गुणोंके अनन्यपनेका कारण होने का खंडन वस्तुरूपसे भेद और ( वस्तुरूपसे ) अभेदका उदाहरण द्रव्य और गुणोंको अर्थान्तरपना होनेमें दोष ज्ञान और ज्ञानीको समवाय सम्बन्ध होनेका निराकरण समवायमें पदार्थान्तरपना होनेका निराकरण दृष्टांतरूप तथा दान्तिरूप पदार्थपूर्वक, द्रव्य और गुणोंके अभिन्न-पदार्थपनेके व्याख्यानका उपसंहार अपने भावों को करते हुए क्या जीव अनादि-अनंत हैं ? क्या सादि सांत हैं ? क्या सादि-अनन्त हैं ? क्या तदाकाररूप परिणत हैं ? क्या तदाकाररूप अपरिणत हैं ? -इन आशंकाओंका समाधान जीवको भाववशात् सादि-सान्तपना और अनादि-अनन्तपना होने में विरोधका परिहार जीवको सद्भावके उच्छेद और असवभावके उत्पादमें निमित्तभूत उपाधिका प्रतिपादन जीवोंको पांच भावोंकी प्रगटताका वर्णन जीवके औदयिकादि भावों के कर्तृत्व प्रकारका कथन निमित्तमात्ररूपसे द्रव्यकर्मोको औदयिकादि भावोंका कर्तापना कर्मको जीवभावका कर्तापना होनेके सम्बन्धमें पूर्वपक्ष उनसठवीं पाथामें कहे हुए पूर्वपक्षके समाधानरूप सिद्धान्त निश्चयसे जीवको अपने भांवोंका कर्तापना और पुद्गल-कर्मोंका अकर्तापना निश्चयनयसे अभिन्न कारक होनेसे कम और जीव स्वयं अपने-अपने रूपके कर्ता हैं- तत्सम्बन्धी निरूपण यदि कर्म और जीवको अन्योन्य अकर्तापना हो, तो "अन्यका दिया हुआ फल अन्य भोगे', ऐसा प्रसंग आयेगा;-ऐसा दोष बतलाकर पूर्वपक्षका निरूपरण कर्मयोग्य पुद्गल समस्त लोकमें व्याप्त हैं; इसलिये जहां आत्मा है वहां, बिना लाये ही वे विद्यमान हैं-तत्सम्बन्धी कथन अन्य द्वारा किये विना कमंकी उत्पत्ति किसप्रकार होती है उसका कथन ५६ ५८ ६१ ३ .. -६४. ६५ [ २३ ] गाथा ६६ ६. ६८ ६६ ७० ७१-७२ . ७५ विषय कर्मोकी विचित्रता अन्य द्वारा नहीं की जाती-तत्सम्बन्धी कथन निश्चयसे जीव और कर्मको निज-निज रूपका ही कपिना होने पर भी, व्यवहारसे जीवको कम द्वारा दिये गये फलका उपभोग विरोधको प्राप्त नहीं होता- तत्सम्बन्धी कथन कतृत्व और भोक्तृत्वकी व्याख्याका उपसंहार कर्म संयुक्तपनेकी मुख्यतासे प्रभुत्व गुणका व्याख्यान : फर्म वियुक्तपनेकी मुख्यतासे प्रभुत्व गुणका व्याख्यान जीवके भेदों का कथन बद्ध जीवको कम निमित्तक पविध गमन और मुक्त जीवको स्वाभाविक ऐसा एक कध्वंगमन पुद्गल द्रव्यास्तिकायका व्याख्यान पुद्गल द्रव्यके भेद पुद्गल द्रव्यके भेदों का वर्णन स्कंधोंमें "पुद्गल" ऐसा जो व्यवहार है.उसका समर्थन परमाणुको व्याख्या परमाणु भिन्न-भिन्न जातिके होनेका खण्डन शब्द पुद्गलस्कंधपर्याय होनेका कथन परमाणुके एक प्रदेशीपनेका कथन परमाणु द्रव्यमें गुण-पर्याय वर्तने का कपन सर्व पुद्गल भेदों का उपसंहार धर्मद्रव्यास्तिकाय और अधर्मद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान धर्मास्तिकायका स्वरूप धर्मास्तिकायका ही शेष स्वरूप धर्मास्तिकायके गति हेतुत्व सम्बन्धो दृष्टान्त अधर्मास्तिकायका स्वरूप धर्म और अधर्म के सद्भावको सिद्धिके लिये हेतु धर्म और अधर्म गति और स्थितिके हेतु होने पर भी उनको अत्यन्त उदासीनता धर्म और अधर्मके उदासीनपने सम्बन्धी हेतु ७६ ७८ ८१ ८३ ५६ [ २४ ] विषय गाथा आकाशद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान । आकाशकास्वरूप . . ११ ६२ ६३ लोकके बाहरकी गाकाश होनेकी सूचना अकाशमें गतिस्थिति हेतुत्व होनेमें दोषका निरूपण १२ वीं गाथामें गतिपक्षसम्बन्धी कथन करनेके पश्चात् स्थितिपक्ष सम्बन्धी कथन आकाशको गतिस्थिति हेतुत्वका अभाव होने के सम्बन्धमें हेतु अकिाशको गतिस्थिति हेतुत्व होनेके खण्डन सम्बन्धी कथनका उपसंहार धर्म, अधर्म और लोकाकाशका अवगाहकी अपेक्षासे एकत्व होने पर भी वस्तुरूपसे KocI अन्यत्व E ६६ १०० १ १०२ चूलिका द्रव्योंका मूर्तामूर्तपना और चेतनाचेतनपंना द्रव्यों का सक्रिय-निष्क्रियपना मूर्त अमूर्त के लक्षण कालद्रव्यका व्याख्यान व्यवहारकाल तथा निश्चयकालका स्वरूप कालके नित्य' और 'क्षणिक' ऐसे दो विभाग कालको द्रव्यपनेका विधान और अस्तिकायपनेका निषेध उपसंहार पंचास्तिकायके अवबोधका फल कहकर उसके व्याख्यानका उपसंहार दुःखसे विमुक्त होनेके क्रमका कथन २-नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंच वर्णन आप्तको स्तुतिपूर्वक प्रतिज्ञा मोक्षमार्गकी सूचना सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रको सूचना पदार्थों के नाम और स्वरूपका कथन जीवपदार्थका व्याख्यान जीवके स्वरूपका कथन १०३ १०४ १.६ १०७ . १०८ [ २५ ] गाथा ११० १२२ ११३ ११४ ११५ ११६ ११७ ११६ १२० विषय संसारी जीवोंके भेदोंमेंसे पृथ्वीकायिक आदि पांचों भेदोंका कथन पृथ्वीकायिक आदि पंचविध जीवों के स्थावरत्रसपने सम्बन्धी कथन पृथ्वीकायिक आदि पंचविध जीवोंके एकेन्द्रियपनेका नियम एकेन्द्रियोंको चैतन्यका अस्तित्व होने सम्बन्धी दृष्टान्त द्वीन्द्रिय जीवों के प्रकारको सूचना श्रीन्द्रिय जीवों के प्रकारको सूचना चतुरिन्द्रिय जावोंके प्रकारको सूचना पंचेन्द्रिय जीवोंके प्रकारको सूचना एके रिद्रय जीवोंका चतुर्गति सम्बन्ध दर्शाकर उन जीव भेदोंका उपसंहार पतिनामकर्म मीय आयुकर्मके उदयसे निष्पन्न होनेके कारण देवत्वादिका अनात्म- स्वभावपना पूर्वोक्त जीव विस्तारका उपसंहार व्यवहाय जीवत्वके एकान्तको प्रतिपत्तिका खंडन मन्यमे असाधारण ऐसे नोवकार्योंका कथन जीवव्याख्यानके उपसंहारको तथा अजीवव्याख्यानके प्रारम्भकी सूचना अजीवपदार्थका व्याख्यान आकाशादिका अजीवपना दर्शाने के लिये हेतु आकाशादिका अचेतनत्व सामान्य निश्चित् करनेके लिये अनुमान जीव-पुद्गलके संयोपमें भो, उनके भेदके कारणभूत स्वरूपका कथन जीव-पुद्गलके संयोपसे निष्पन्न होनेवाले अन्य सात पदार्थोके उपोद्घात हेतु जीवकर्म और पुद्गलकमके चक्रका वर्णन पुण्य-पाप पदार्थका व्याख्यान पुण्य-पापको योग्य भावके स्वभावका कथन पुण्य-पापका स्वरूप मूर्त कर्मका समर्थन मूर्तकर्मका मूर्तकर्मके साथ जो वन्धप्रकार तथा अमूर्त जीवका मूर्तकमके साथ जो वन्धप्रकार उसको सूचना आस्रव पदार्थका व्याख्यान पुण्यासवका स्वरूप १२१ १२२ १२३ . १२४ १२५ १२६-१२७ १२८-१३० १३३ १३४ [ २६ ] विषय पाथा प्रशस्त रागका स्वरूप अनुकम्पाका स्वरूप चित्तकी कलुषताका स्वरूप पापास्तवका स्वरूप पापास्रवभूत भावों का विस्तार १३० १३८ १३. -१४० संवर पदार्थका व्याख्यान पापके संवरका कथन सामान्यरूपसे संवरका स्वरूप विशेषरूपसे संवरका स्वरूप १४१ १४२ १४३ निर्जरा पदार्थका व्याख्यान १४४ निराका स्वरूप निराका मुख्य कारण • . -१४५ १४६ ध्यानका स्वरूप १४७ १४० १४६ । . बंध पदार्थका व्याख्यान वन्धका स्वरूप बन्धका बहिरंग और अन्तरंग कारण मिथ्यात्वादि द्रव्यपर्यायोंको भी बन्धके बहिरंग-कारणपनेका प्रकाशन मोक्ष पदार्थका व्याख्यान द्रव्यकर्म मोक्षके हेतुभूत परमसंवररूपसे भावमोक्षके स्वरूपका कथन द्रव्यकम मोक्षके हेतुभूत ऐसी परम निर्जराके कारणभूत ध्यान द्रव्य मोक्षका स्वरूप मोक्षमार्गप्रपंचसूचक चूलिका मोक्षमार्गका स्वरूप स्वसमयके ग्रहण और परसमयके त्यायपूर्वक कर्मक्षय होता है-ऐसे प्रतिपादन द्वारा "जीवस्वभाव में नियत चारित्र वह मोक्षमार्ग है"-ऐसा निरूपण . परचारियमें प्रवर्तन करनेवालेका स्वरूप परचारित्र प्रवृत्ति बन्धहेतुभूत होनेसे उसे मोक्षमार्गपनेका निषेध -१५१ १५२ १५३ १५४ १५५ १५६ १५७ [ २७ ] गाघा १५८ १६० १६१ १६२ १६३ विषय स्वचारित्रमें प्रवर्तन करनेवालेका स्वरूप शुद्ध स्वचारित्र प्रवृत्तिका मार्ग निश्चय मोक्षमार्गके साधनरूपसे, पूर्वोद्दिष्ट व्यवहारमोक्षमार्गका निर्देश व्यवहाय मोक्षमार्गके साध्यरूपसे, निश्चय मोक्षमार्गका कथन आत्माके चारित्र-ज्ञान-दर्शनपनेका प्रकाशन सर्व संसारी आत्मा मोक्षमार्गके योग्य होनेका निराकरण दर्शन-ज्ञान-चारित्रका कथंचित बंधहेतुपना और जीवस्वभावमें नियत चारित्रका साक्षात मोक्षहेतुपना सक्ष्म परसमयका स्वरूप शुद्ध सम्प्रयोगको कथंचित् बन्धहेतुपना होनेसे उसे मोक्षमापनेका निषेध स्वसमयकी उपलब्धिमें राग ही एक हेतु रागलवमूलक दोषपरम्पराका निरूपण रापरूप क्लेशका निःशेष नाश करने योग्य होनेका निरूपण अहंतादिकी भक्तिरूप परसमय प्रवृत्तिमें साक्षात् मोक्षहेतुपनेका अभाव होने पर भी परम्परासे मोक्षहेतुपनेका सद्भाव मात्र अर्हतादिको भक्ति जितने रागसे उत्पन्न होनेवाला साक्षात् मोक्षका अन्तराय साक्षात् मोक्षमार्गके सारसूचन द्वारा शास्त्र तात्पर्यरूप उपसंहार शास्त्रकर्ताको प्रतिज्ञाकी पूर्णता सूचित करनेवाली समाप्ति १६४ १६५ १६६ १६. १६८ १६६ १७० १७१ १७२ १७३ पंचास्तिकाय संग्रह veeraheecrezarezzresereer eceaeera || ॐ॥ म जिलजी की वाणी + भली, रे, सीमंधर मुखसे फुलवा मुखसे फुलवा खिरें, नींकी कुन्दकुन्द [थे माल रे, जिननीकी वाणी मली रे वाणी प्रभू मन लागे जिसमें सार-समय सिरताज रे, जिनजीकी वाणी भली रे ॥ सीमंधर० ।। गूंथा पाहुइ अरु गूंथा पंचास्ति, Dथा जो प्रवचनसार जिनजीकी वाणी मली रे ।। सीमंघर० ॥ गूंथा नियमसार, गूंथा रयणसार, गुथा समयका सार रे, जिनजीकी वाणी मली रे ॥ सीमंघर० ।। स्याद्वादरूपी सुगंधी भरा जो. जिनजीका ओंकारनाद जिनजीकी वाणी मली रे || सीमंघर० ॥ वंद जिनेश्वर, व, मैं कुन्दकुन्द, वहूँ यह ओंकारनाद जिनजीकी वाणी भली रे ।। मीमंधर० ॥ हृदय रहो मेरे भावों रहो, मेरे ध्यान रहो जिनवाण रे, जिननीकी वाणी भली रे ॥सीमंधर० ॥ जिनेश्वर देवकी वाणीकी गेंज, मेरे गूंजती रहो दिनरात रे, जिनीशी वाणी भली रे ।। मीनंधर. ।। excerea secretrieverrza rezzece रे। रे, RAMA PADMAAMKAR भगवान श्री छन्दकुन्दाचार्यदेवके सम्बन्ध उल्लेख वन्यो विभुम् वि न कैरिह कौण्डकुन्दा कुन्द-प्रभा-प्रणयि-कीर्ति-विभूषिताशा । यश्चारु चारण-कराम्बुजचश्वरीक- श्चक्रे श्रुतस्य भरते प्रयतः प्रतिष्ठाम् ।। [ चन्द्रगिरि पर्वतका शिलालेख ] अर्थ:-कुन्द पुष्पको प्रभा धारण करनेवाली जिनको कीर्ति द्वारा दिशाएं विभूषित हुई हैं, जो चारणोंके–चारणऋद्धिधारी महामुनियोंके सुन्दर हस्त- कमलोंके भ्रमर थे और जिव पवित्रात्माने भरतक्षेत्रमें श्रुतको प्रतिष्ठा की है, वे विभु कुन्दकुन्द इस पृथ्वी पर किससे वंद्य नहीं हैं ? ...कोण्डकुंदो यतीन्द्रः ॥ रजोभिरस्पृष्टतमत्वमन्त- बांद्यपि संव्यञ्जयितुं यतीशा। रजापदं भूमितलं विहाय चचार मन्ये चतुरंगुलं सः ।। [विध्यगिरि-शिलालेख ]

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ભગવાત શ્રી કુંદકુંદાચાર્યદેવ વતમાં તાડપત્ર ઉપર શાસ્ત્ર લખે છે.
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merecreareezezre Pez अर्थ:-यतीश्वर ( श्री कुन्दकुन्दस्वामी) रजःस्थानको-भूमितलको छोड़कर चार अंगुल ऊपर प्राकाशमें गमन करते थे उसके द्वारा में ऐसा समझता हूँ कि वे अन्वरमें तथा वाह्यमें रजसे ( अपनी) अत्यन्त अस्पृष्टता व्यक्त करते थे (- अन्तरमें वे रागादिक मलसे अस्पृष्ट थे और वाह्यमें धूलसे अस्पृष्ट थे)। जइ पउमणदिणाहो सीमंघरसामिदिवणाणेण । म विवोहह तो समणा कहं सुमग्गं पयाणति ॥ -[दर्शनसार] अर्थ:-( महाविदेह क्षेत्रके वर्तमान तीर्थंकरदेव ) श्री सीमंधर स्वामी के प्राप्त हुए दिव्य ज्ञान द्वारा श्री पद्मनन्दिनायने ( श्री कुन्दकुन्दाचार्यदेवने) वोध न दिया होता तो मुनिजन सच्चे मार्गको कैसे जानते ? है कुन्दकुन्दादि आचार्यो ! मापके वचन भी स्वरूपानुसंधानमें इस पामर- को परम उपकारभूत हुए हैं। उसके लिये मैं मापको अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ। [ श्रीमद् राजचन्द्र ] AAMKARAMMARRIAMERMERE: * श्री सर्वज्ञवीतरागाय नमः शास्त्र - स्वाध्याय का प्रामक मंगलाचरण - बोकारं विन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः । कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमोनमः ।।१।। अविरलशब्दघनौघप्रक्षालितसकलभूतलकलङ्का मुनिभिरुपासिततीर्था सरस्वती हरतु नो दुरितान् ।। २ ॥ महानतिमिरान्धानां ज्ञानाञ्जनशलाकया चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥३।। ॥ श्रीपरमगुरवे नमः, परम्पराचार्यगुरवे नमः ॥ सकलकलुपविध्वंसक, श्रेयसा परिवर्धक, धर्मसम्बन्धक, भव्य- जीवमनाप्रतिबोधकारक, पुण्यप्रकाशकं, पापप्रणाशकमिदं शास्त्रं श्रीपंचास्तिकायसंग्रहनामधेयं, अस्य मूलग्रन्थकर्तारः श्रीसर्वज्ञ- देवास्तदुचरग्रन्थकर्तारः श्रीगणधरदेवाः प्रतिगणधरदेवास्तेषां वचनानुसारमासाद्य आचार्यश्रीकुन्दकुन्दाचार्यदेव विरचितं, श्रोतार! सावधानतया शृण्वन्तु ।। मंगलं भगवान वीरो मंगल गौतमो गणी । मगलं कुन्दकुन्दार्यों जैनधर्मोऽस्तु मंगलम् ॥१॥ सर्वमंगलमांगल्यं सर्वकल्याणकारकं । प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयतु शासनम् ।। २॥ - - - NARE

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*भी जीतापाम: *
बाजार କିଛି
Facार्यदेवाणी
श्री पंचास्तिकायसंग्रह
(१
षड्द्रव्य-पंचास्तिकाय वर्णन
প্রয়াঙাহিনি গ্রো
सहजानन्दचैतन्यप्रकाशाय महीयसे ।
नमोऽनेकान्तविश्रान्तमहिम्ने परमात्मा
मायाजात हा सारख्याल्या "बामद
हिन्दी अनुवाद
[ प्रथम, ग्रन्थके आदिमें श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत प्राकृतगाथाबद्ध
इस "पंचास्तिकायसंग्रह" नामक शास्त्रकी "समयव्याल्या" नामक संस्कृत टीका
रचनेवाले आचार्य श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव श्लोक द्वारा मंगलके हेतु परमात्माको नमस्कार
करते हैं :-]
[ श्लोकार्थ:--] सहज प्रानन्द एवं सहज चैतन्यप्रकाशमय होनेसे जो अति
महान है तथा अनेकान्तमें स्थित जिसकी महिमा है, उस परमात्माको नमस्कार
हो। [१]

२ पंजास्तिकायसंग्रह दुर्निवारनयानीकविरोधध्वंसनौपधिः । स्यात्कारजीविताःजीयाज्जैनी सिद्धान्तपद्धतिः ।। २ ।। सम्यग्ज्ञानामलज्योतिर्जननी द्विनयाश्रया । अथातः समयव्याख्या संझेपेणाभिधीयते ।। ३ ।। ..- ! [ अब टीकाकार आचार्यदेव श्लोक द्वारा जिनवाणीकी स्तुति करते हैं:-] [ श्लोकार्थ:-] 'स्यात्कार जिसका जीवन है ऐसी जैनी (-जिनंभगवानकी) सिद्धान्तपद्धति-जो कि 'दुनिवार नयसमूहके 'विरोधका नाश करनेवाली औषधि है वह-जयवन्त हो ! [२] [ अब टीकाकार आचार्यदेव श्लोक द्वारा इस पंचास्तिकायसंग्रह नामक शास्त्रकी टीका रचनेकी प्रतिज्ञा करते हैं :-] श्लोकार्थः-] अब यहाँसे, जो सम्यग्ज्ञानरूपी निर्मल ज्योतिकी जननी है ऐसी द्विनयाश्रित ( दो नयोंका आश्रय करनेवाली) समयव्याख्या (पंचास्तिकायसंग्रह नामक शास्त्रकी समयव्याख्या नामक टीका ) संक्षेपसे कही जाती है । [३] १-'स्यात्' पद जिनदेवको सिद्धान्तपद्धतिका जीवन है । ( स्यात् कचित् ; किसी अपेक्षासे; किसी प्रकारसे ।) २-दुनिवार = निवारण करना कठिन : टालना कठिन । ३-प्रत्येक वस्तु नित्यत्व, अनित्यत्व आदि अनेक अंत्मय (धर्ममय ) है। वस्तुकी सर्वथा नित्यता तथा सर्वथा अनित्यता माननेमें पूर्ण विरोध आने पर भी, कथंचित् (अर्थात् द्रव्य-अपेक्षासे) नित्यता और कथंचित् (अर्थात् पर्याय-अपेक्षासे) अनित्यता मानने में किंचित् विरोध नहीं आता- ऐसा जिनवाणी स्पष्ट समझाती है । इसप्रकारः जिनभगवानकी वाणी स्याद्वाद द्वारा ( अपेक्षा कथनसे) वस्तुका परम यथार्य निरूपण करके, नित्यत्व-अनित्यत्वादि धर्मोंमें (तथा उन-उन धर्मोको वतलानेवाले नयोंमें ) अविरोध (सुमेल ) अबाधितरूपसे, सिद्ध करती है और उन धर्मोके 'विना वस्तुकी निष्पत्ति ही नहीं हो सकती-ऐसा निर्वाधरूपसे स्थापित करती है। ४-समयव्याख्या=समयकी व्याख्या; पंचास्तिकायकी व्याख्या; द्रव्यकी व्याख्या; पदार्थकी व्याख्या । [व्याख्या=व्याख्यान; स्पष्ट कथन; विवरण; स्पष्टीकरण । ] पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन पंचास्तिकायपद्रव्यप्रकारेण प्ररूपणम् । पूर्व मूलपदार्थानामिह सूत्रकृता कृतम् ॥ ४ ॥ जीवाजीवद्विपर्यायरूपाणां चित्रवर्त्मनाम् । ततो नवपदार्थानां व्यवस्था प्रतिपादिता ॥ ५ ॥ ततस्तत्त्वपरिझानपूर्वेण त्रितयात्मना । प्रोक्ता मार्गेण कल्याणी मोक्षप्राप्तिरपश्चिमा ।। ६ ॥ [ अब, तीन श्लोकों द्वारा टीकाकार आचार्यदेव अत्यन्त संक्षेपमें यह बतलाते हैं कि इस पंचास्तिकायसंग्रह नामक शास्त्रमें किन-किन विषयोंका निरूपण है :-] [ श्लोकार्थः-] यहाँ प्रथम *सूत्रकर्ताने मूल पदार्थोंका पंचास्तिकाय एवं पड्द्रव्यके प्रकारसे प्ररूपण किया है (अर्थात् इस शास्त्रके प्रथम अधिकारमें श्रीमद्भग- वत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवने विश्वके मूल पदार्थोंका पाँच अस्तिकाय और छह द्रव्यकी पद्धतिसे निरूपण किया है । ) [४] [ श्लोकार्थः-] पश्चात् (दूसरे अधिकारमें), जीव और अजीव-इन दो की पर्यायोंरूप नव पदार्थोंकी-कि जिनके मार्ग अर्थात् कार्य भिन्न भिन्न प्रकारके हैं उनकी व्यवस्था प्रतिपादित की है। [५] [ श्लोकार्थः-] पश्चात् (दूसरे अधिकारके अन्तमें), तत्त्वके परिज्ञानपूर्वक ( पंचास्तिकाय, षड्द्रव्य तथा नव पदार्थोके यथार्थ ज्ञानपूर्वक ) त्रयात्मक मार्गसे (सम्यग्दर्शनजानचारित्रात्मक मार्गसे) कल्याणस्वरूप उत्तम मोक्षप्राप्ति कही है । [६] * इस शास्त्रके कर्ता श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव हैं। उनके दूसरे नाम पद्मनन्दि, वक्र- ग्रीवाचार्य, एलाचार्य और गृध्रपिच्छाचार्य हैं । श्री जयसेनाचार्यदेव इस शास्त्रको तात्पर्यवृत्ति नामक टोका प्रारम्भ करते हुए लिखते हैं कि:-"अव श्री कुमारनन्दि-सिद्धान्तिदेवके गिप्य श्रीमदकुन्दकुन्दा- चार्यदेवने-जिनके दूसरे नाम पद्मनन्दि आदि थे उन्होंने-प्रसिद्ध कयान्यायसे पूर्वविदहमें जाकर वीतराग-सर्वज्ञ सीमंधरस्वामी तीर्थकर परमदेवके दर्शन करके, उनके मुखकमलसे निकली हुई दिव्य ध्वनिके श्रवणसे अवधारित पदार्थ द्वारा शुद्धात्मतत्वादि सारभूत अर्थ ग्रहण करका, यहांने लौटकर अंतःतत्त्व एवं बहिःतत्त्वके गोण-मुख्य प्रतिपादनके हेतु अयवा शिवकुमारमहाराजादि संक्षेपवि शिष्योंके प्रतिवोधनार्थ रचे हुए पंचास्तिकायप्राभूतशास्त्रका यथाक्रमसे अविकारगुद्धिपूर्वक तात्पर्याधरूप व्याख्यान किया जाता है ४ पंचास्तिकायसंग्रह अथ सूत्रावतार: इंदसदवंदियारणं तिहुवरणहिदमधुरविसदवक्काणं । अंतातीदगुणारणं णमो जिणारणं जिदभवारणं ॥१॥ इन्द्रशतवन्दितेभ्यस्त्रिभुवनहितमधुरविशदवाक्येभ्यः । अन्तातीतगुणेभ्यो नमोः जिनेभ्यो जितभवेभ्यः ॥१॥ अथात्र 'नमो जिनेभ्यः' इत्यनेन जिनभावनमस्काररूपमसाधारणं शास्त्रस्यादौ मङ्गल- मुपाचम् । अनादिना संतानेन प्रवर्तमाना अनादिनैव सन्तानेन प्रवर्तमानैरिन्द्राणां शन्दिता ये अब ( श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव विरचित ) गाथासूत्रका अवतरण किया जाता है:- गाथा १ अन्वयार्थः-[ इन्द्रशतवन्दितेभ्यः ] जो सौ , इन्द्रोंसे वन्दित हैं, [ त्रिभुवनहित- मधुरविशंदवाक्येभ्यः] तीन लोकको हितकर, मधुर एवं विशद ( निर्मल, स्पष्ट ) जिनकी वाणी है, [ अन्तातीतगुणेभ्यः] ( चैतन्यके अनन्त विलासस्वरूप ) अनन्त गुण जिनके वर्तते हैं और [जितभवेभ्यः] जिन्होंने भव पर विजय प्राप्त की है, [जिनेभ्यः ] उन जिनोंको [ नमः] नमस्कार हो । टीका:-यहाँ ( इस गाथामें ) "जिनोंको नमस्कार हो" ऐसा कहकर शास्त्रके आदिमें जिनको भावनमस्काररूप. असाधारण अमंगल कहा । "जो अनादि प्रवाहसे प्रवर्तते (-चले. पा रहे ) हुए अनादि प्रवाहसे ही प्रवर्तमान (-चले आ रहे.).*सौ-सौ * मलको अर्थात् पापको गाले-नष्ट करे वह मंगल है; अथवा सुखको प्राप्त करे-लाये वह. मंगल है। * भवनवासी देवोंके ४०, व्यन्तर देवोंके ३२, कल्पवासी देवोंके २४, ज्योतिष्क देवोंके २,. मनुष्योंका १ और तिर्यंचोंका १-इसप्रकार कुल १०० इन्द्र अनादि प्रवाहरूपसे चले आ रहे हैं । शत-इंद्रवंदित; त्रिजगहित-निर्मल-मधुर वदनारने ।' निःसीम गुण धरनारने, जितभव नमुं जिनराजने ॥१शा. - पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ५ - इत्यनेन सर्वदेव देवाधिदेवत्वाचेपामेवासाधारणनमस्कारार्हत्वमुक्तम् । त्रिभुवनमूर्ध्वाधोमध्यलोकवर्ती समस्त एव जीवलोकस्तस्मै निव्वाधविशुद्धात्मतत्त्वोपलम्भोपायाभिधायित्वाद्धितं, परमार्थरसिक- जनमनोहारित्वान्मधुरं, निरस्तसमस्तशंकादिदोपास्पदत्वाद्विशदं वाक्यं दिव्यो घनिर्येपमित्यनेन समस्तवस्तुयाथात्म्योपदेशित्वात्प्रेसावत्प्रतीक्ष्यत्वमाख्यातम् । अन्तमतीतः क्षेत्रानवच्छिन्नः कालानवच्छिन्नश्च परमचैतन्यशक्तिविलासलक्षणो गुणो येपामित्यनेन तु परमात- ज्ञानातिशयप्रकाशनादवाप्तज्ञानातिशयानामपि योगीन्द्राणां वन्यत्वमुदितम् । जितो भव आजवंजवो यैरित्यनेन तु कृतकृत्यत्वप्रकटनात्त एवान्येषामकृतकृत्यानां शरणमित्युपदिष्टम् । इति इन्द्रोंसे वन्दित हैं"-ऐसा कहकर सदैव देवाधिदेवपनेके कारण वे ही ( जिनदेव ही ) असाधारण नमस्कारके योग्य हैं-ऐसा कहा । "जिनकी वाणी अर्थात् दिव्यध्वनि तीन लोकको-ऊर्ध्व-अधो-मध्य लोकवर्ती समस्त जीवसमूहको निर्वाध विशुद्ध पात्मतत्त्वकी उपलब्धिका उपाय कहनेवाली होनेसे हितकर है, परमार्थरसिक जनोंके मनको हरने- वाली होनेसे मधुर है और समस्त शंकादि दोपोंके स्थान दूर कर देनेसे विशद (निर्मल, स्पष्ट ) है"-ऐसा कहकर ( जिनदेव ) समस्त वस्तुके यथार्थ स्वरूपके उपदेशक होनेसे विचारवन्त बुद्धिमान पुरुषोंके बहुमानके योग्य हैं ( अर्थात् जिनका उपदेश विचारवंत बुद्धिमान पुरुषोंको वहुमानपूर्वक विचारना चाहिये ऐसे हैं ) ऐसा कहा । "अनन्त-क्षेत्रसे अंत रहित और कालसे अन्त रहित-परमचैतन्यशक्तिके विलासस्वरूप गुण जिनके वर्तते हैं" ऐसा कहकर (जिनोंको) परम अद्भुत ज्ञानातिशय प्रगट होनेके कारण जानातिशयको प्राप्त योगीन्द्रोंसे भी वंद्य हैं ऐसा कहा । "भव अर्थात् संसार पर जिन्होंने विजय प्राप्त की है" ऐसा कहकर कृतकृत्यपना प्रगट हो जानेसे वे ही ( जिन ही ) अन्य प्रकृतकृत्य जीवोंको शरणभूत हैं ऐसा उपदेश दिया ।-ऐसा सर्व पदोंका तात्पर्य है। भावार्थ :-यहाँ जिनभगवन्तोंके चार विशेषगोंका वर्णन करके उन्हें भाव नमस्कार किया है । (१) प्रथम तो, जिनभगवन्त सौ इन्द्रोंसे वंद्य हैं । ऐसे असाधारण नमस्कारके योग्य अन्य कोई नहीं है। क्योंकि देवों तथा अनुरोंमें युद्ध होता है इसलिये (. देवाधिदेव जिन भगवानके अतिरिक्त.) अन्य कोई भी देव सी इन्द्रोंने बन्दित नहीं है। (२) दूसरे जिनभगवानकी वाणी तीनलोकको शुद्ध मात्मस्वरूपकी प्राप्तिका उपाय पंचास्तिकायसंग्रह सर्वपदानां तात्पर्यम् ॥१॥ दर्शाती है इसलिए हितकर है; वीतराग निर्विकल्प समाधिसे उत्पन्न सहज-अपूर्व- परमानन्दरूप पारमार्थिक सुखरसास्वादके रसिकजनोंके मनको हरती है इसलिए (अर्थात् परम समरसीभावके रसिक जीवोंको मुदित करती है इसलिए ) मधुर है; शुद्ध जीवास्तिकायादि सात तत्त्व, नव पदार्थ, छह द्रव्य और पांच अस्तिकायका संशय- विमोह-विभ्रम रहित निरूपण करती है इसलिये अथवा पूर्वापर विरोधादि दोष रहित होनेसे अथवा युगपद् सर्व जीवोंको अपनी-अपनी भाषामें स्पष्ट अर्थका प्रतिपादन करती है, इसलिए विशद-स्पष्ट-व्यक्त है । इसप्रकार जिनभगवानकी वाणी ही प्रमाणभूत है; एकान्तरूप अपौरुषेय वचन या विचित्र कथारूप कल्पित पुराणवचन प्रमाणभूत नहीं हैं । (३) तीसरे, अनन्त द्रव्य-क्षेत्र-काल-भावका जाननेवाला अनन्त केवलज्ञानगुण जिनभगवन्तोंको वर्तता है । इसप्रकार वुद्धि आदि सात ऋद्धियाँ तथा मतिज्ञानादि चतुर्विध ज्ञानसे सम्पन्न गणधरदेवादि योगीन्द्रोंसे भी वे वंद्य हैं। (४) चौथे, पाँच प्रकार- के संसारको जिनभगवन्तोंने जीता है। इसप्रकार कृतकृत्यपनेके कारण वे ही अन्य अकृतकृत्य जीवोंको शरणभूत हैं, दूसरा कोई नहीं। -इसप्रकार चार विशेषणोंसे युक्त जिनभगवन्तोंको ग्रन्थके आदिमें भावनमस्कार करके मंगल किया। प्रश्नः-जो शास्त्र स्वयं ही मंगल है, उसका मंगल किसलिए किया जाता है ? उचर:-भक्तिके हेतुसे मंगलका भी अमंगल किया जाता है । सूर्यकी दीपकसे, महासागरकी. जलसे, वागीश्वरी ( सरस्वती )की वाणीसे और . मंगलकी मंगलसे अर्चना की जाती है ॥१॥ * इस गाथाकी श्री जयसेनाचार्यदेवकृत टीकामें शास्त्रका मंगल, शास्त्रका निमित्त, शास्त्रका हेतु (फल), शास्त्रका परिमारण, शास्त्रका नाम तथा शास्त्रके कर्ता-इन छह विषयोंका विस्तृत विवेचन किया है। पुनश्च, श्री जयसेनाचार्यदेवने इस गाथाके- शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ, आगमार्थ एवं भावार्थ समझाकर "इसप्रकार व्याल्यान कालमें सर्वत्र शब्दार्थ, नयार्थ, मतार्थ, आगमार्थ और भावार्थ प्रयुक्त करने योग्य है"-ऐसा कहा है।

पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन समणमुहुग्गदमट्ठचदुग्गदिणिवारणं सणिव्वाणं । एसो पणमिय सिरसा समयमिणं सुणह वोच्छामि ॥२॥ श्रमणमुखोद्गतार्थ चतुर्गतिनिवारणं सनिर्वाणम् । एपः प्रणम्य शिरसा समयमिमं शृणुत वक्ष्यामि ॥२॥ समयो ह्यागमः। तस्य प्रणामपूर्वक्रमात्मनाभिधानमत्र प्रतिज्ञातम् । युज्यते हि स प्रणन्तुमभिधातु चाप्तोपदिष्टत्वे सति सफलत्वात् । 'तत्राप्तोपदिष्टत्वमस्य श्रमणमुखोद्गतार्थत्वान् । श्रमणा हि महाश्रमणाः सर्वज्ञवीतरागाः । अर्थः पुनरनेकशब्दसम्बन्धेनाभिधीयमानो वस्तुतये- गाथा २ अन्वयार्थ:-[श्रमणमुखोद्गतार्थ ] श्रमणके मुखसे निकले हुए अर्थमय ( सर्वज्ञ महामुनिके मुखसे कहे हुए पदार्थोंका कयन करनेवाले [ चतुर्गतिनिधारणं ] चार गतिका निवारण करनेवाले और [ सनिर्वाणम् ] निर्वाण सहित ( -निर्वाणके कारणभूत )-[ इमं समयं ] ऐसे इस समयको [ शिरसा प्रणम्य ] शिरसा नमन करके [एप वक्ष्यामि ] मैं उसका कथन करता हूँ; [शृणुत ] वह श्रवण करो। टीकार-समय अर्थात् आगम; उसे प्रणाम करके स्वयं उसका कयन करेंगे ऐसी यहाँ ( श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवने ) प्रतिज्ञा की है। वह ( समय ) प्रणाम करने एवं कथन करने योग्य है; क्योंकि वह प्राप्त द्वारा उपदिष्ट होनेने सफल है। वहां, उसका प्राप्त द्वारा उपदिष्टपना इसलिये है कि जिससे वह "श्रमणके मुखसे निकला हुअा अर्थमय" है । 'श्रमण' अर्थात् महाश्रमण- सर्वज्ञवीतरागदेव; पीर 'अर्थ' अर्थात् अनेक शब्दोंके सम्बन्धसे कहा जानेवाला, वस्तुरूपसे एक ऐसा पदार्थ, पुनश्त्र (उनकी * प्राप्त = विश्वासपात्र; प्रमाणभूत ; यथार्थ वक्ता। [सवंज्ञदेव समस्त विश्वको प्रतिममय सम्पूर्ण रूपसे जान रहे हैं और वे वीतराग ( मोहरागढ परहिन ) होने के कारण उन्हें अमत्य कहतका लेशमात्र प्रयोजन नहीं रहा है। इसलिए वीतरागसवनदेव सचमुत्र प्रान्त है। ऐसे प्राप्त द्वारा ग्रागम उपदिष्ट होनेसे वह (भागम ) सफल है । या समयने शिरनमनपूर्वक भावुटुं. मूणजो नमे । जिनवदननिर्गन-अर्थमय, चउगतिहरण, गिबहेतु रे ॥२॥ : -- पंचास्तिकायसंग्रह कोऽभिधेयः । सफलत्वं तु चतसृणां नारकतिर्यग्मनुष्यदेवत्वलक्षणानां गतीनां निवारणत्वात् पारतंत्र्यनिवृत्तिलक्षणस्य निर्वाणस्य शुद्धात्मतत्त्वोपलम्भरूपस्य परम्परया कारणत्वात् स्वातंत्र्य- प्राप्तिलक्षणस्य च फलस्य सद्भावादिति ॥ २ ॥ समवानो पंचण्हं समउ ति जिणुत्तहिं पण्णत्तं । सो चेव हवदि लोश्रो तत्तो अमिनो अलोगो खं ॥३॥ * समवादः समवायो वा पंचानां समय इति जिनोचमैः प्रज्ञप्तम् । स च एव भवति लोकस्ततोऽमितोऽलोकः खम् ॥ ३ ॥ (-समयकी ) सफलता इसलिये है कि जिससे वह समय ( १ ) “नारकत्व, तिर्यंचत्व, मनुष्यत्व तथा देवत्वस्वरूप चार गतियोंका निवारण" करनेके कारण और (२) शुद्धात्मतत्त्वकी उपलब्धिरूप “निर्वाणका परम्परासे कारण" होनेके कारण ( १ ) परतंत्रतानिवृत्ति जिसका लक्षण है और ( २ ) स्वतन्त्रताप्राप्ति जिसका लक्षण है-ऐसे+फल सहित है। भावार्थ:-वीतरागसर्वज्ञ महाश्रमणके मुखसे निकले हुए शब्दसमयको कोई आसन्नभव्य पुरुष सुनकर, उस शब्दसमयके वाच्यभूत पंचास्तिकायस्वरूप अर्थसमयको जानता है और उसमें आजानेवाले शुद्ध जीवास्तिकायस्वरूप अर्थमें (पदार्थमें) वीतराग निर्विकल्प समाधि द्वारा स्थित रहकर चार गतिका निवारण करके, निर्वाण प्राप्त करके, स्वात्मोत्पन्न, अनाकुलतालक्षण, अनन्त सुखको प्राप्त करता है। इस कारणसे द्रव्यागमरूप शब्दसमय नमस्कार करने तथा व्याख्यान करने योग्य है ।। २ ।। गाथा ३ अन्वयार्थ :-[ पंचानां समवादः ] पांच अस्तिकायका समभावपूर्वक * मूल गाथामें समवानो शब्द है; संस्कृत भाषामें उसका अर्थ समवादः भी होता है और समवाय: भी होता है। + चार गतिका निवारण (.अर्थात् परतंत्रताकी निवृत्ति ) और 'निर्वाणकी उत्पत्ति ( अर्थात् स्वतन्त्रताकी प्राप्ति ) वह समयका फल है । समवाद वां समवाय पांच तणो समय-भाख्यु जिने । ते लोक छे, आगल अमाप अलोक थामस्वरूप छ।

पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ह अत्र शब्दज्ञानार्थरूपेण त्रिविधाऽभिधेयता समयशब्दस्य लोकालोकविभागश्चाभि- हितः । तत्र च पंचानामस्तिकायानां समो मध्यस्थो रागद्वेपाभ्यामनुपहतो वर्णपदवाक्यसन्निवेश- विशिष्टः पाठो बादः शब्दसमयः शब्दागम इति यावत् । तेषामेव मिथ्यादर्शनोदयोच्छेदे सनि सम्यगवायः परिच्छेदो ज्ञानसमयो ज्ञानागम इति यावत् । तेपामेवाभिधानप्रत्ययपरिच्छिन्नानां वस्तुरूपेण समवायः संघातोऽर्थसमयः सर्वपदार्थ सार्थ इति यावत् । तदत्र ज्ञानसमयप्रसिद्धयर्थ निरूपण [वा] अथवा [समवायः] उनका समवाय (-पंचास्तिकायका सम्यक्वोध अथवा समूह ) [ समयः ] वह समय है [ इति ] ऐसा [ जिनोचमैः प्रज्ञप्तम् ] जिनवरोंने कहा है। [सः च एव लोकः भवति ] वही लोक है (-पांच अस्तिकायके समूह जितना ही लोक है); [ततः ] उससे आगे [ अमितः अलोकः ] अमाप अलोक [सम् ] आकाशस्वरूप है। टीका:-यहाँ ( इस गाथामें ) शब्दरूपसे, ज्ञानरूपसे और अर्थरूपसे (-शब्द- समय, ज्ञानसमय और मर्थसमय )-ऐसे तीन प्रकारसे "समय" शब्दका अर्थ कहा है तथा लोक-अलोकरूप विभाग कहा है । वहाँ, (१) 'सम' अर्थात् मध्यस्थ यानी जो रागद्वे पसे विकृत नहीं हुया; 'वाद' अर्थात् वर्ण ( अक्षर ), पद ( शब्द ) और वाक्यके समूहवाला पाठ । पाँच अस्तिकायका 'समवाद' अर्थात् मध्यस्थ (-रागट्टे पसे विकृत नहीं हुआ) पाठ ( -मौखिक या शास्त्रारूढ़ निरूपण ) वह शब्दसमय है अर्थात् शब्दागम वह शब्दसमय है। (२) मिथ्यादर्शनके उदयका नाश होने पर, उस पंचास्तिकायका ही सम्यक्र अवाय अर्थात् सम्यक् ज्ञान वह ज्ञानसमय है, अर्थात् नानागम वह जानसमय है। ( ३ ) कथनके निमित्तसे ज्ञात हुए उस पंचास्तिकायका ही वस्तुरूपसे समवाय* अर्थात् समूह वह अर्थसमय है, अर्थात सर्वपदार्थसमूह वह अर्थसमय है । उसमें, यहां * समवाय% (१) सम् + अवाय; सम्यक् प्रवाय; सम्यक ज्ञान । (२) ममूह । इन पंचास्तिकायसंग्रह शास्यमें यहां कालद्रव्य-कि जो द्रव्य होने पर भी प्रस्तिकाय नहीं है उसे विवक्षामें गौरण करके 'पंचास्तिकायका समवाय वह समय है। ऐसा कहा है। इसलिये 'छह द्रव्यका समवाय वह समय है' ऐसे कथनके भावके साथ इस कथनके भावका विरोध नहीं समनना नाहिये; मात्र विवक्षाभेद है ऐसा समझना चाहिये । और इसीप्रकार अन्य स्थान पर भी विवक्षा समनकर प्रविन्द अर्थ समझ नेना चाहिये ।] २ १० पंचास्तिकायसंग्रह शब्दसमयसम्बन्धेनार्थसमयोऽभिधातुमभिप्रेतः अथ तस्यैवार्थसमयस्य द्वैविध्यं लोकालोक- विकल्पात् । स एव पञ्चास्तिकायसमवायो यावांस्तावाँल्लोकस्ततः परममितोऽनन्तो हलोका, स तु नाभावमात्रं किन्तु तत्समवायातिरिक्तपरिमाणमनन्तक्षेत्रं खमाकाशमिति ॥३॥ जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मा तहेव आगासं । अत्थित्तम्हि य णियदा अणण्णमइया अणुमहंता ॥४॥ जीवाः पुद्गलकाया धर्माधमौं तथैव आकाशम् । अस्तित्वे च नियता अनन्यमया अणुमहान्तः ॥४॥ ज्ञानसमयकी प्रसिद्धिके हेतु शब्दसमयके संबंधसे अर्थसमयका कथन ( श्रीमद्भगवत्- कुन्दकुन्दाचार्यदेव ) करना चाहते हैं । अब, उसी अर्थसमयका लोक* और अलोकके भेदके कारण द्विविधपना है । वही पंचास्तिकायसमूह जितना है, उतना लोक है। उससे आगे अमाप अर्थात् अनन्त अलोक है । वह अलोक अभावमात्र नहीं है किन्तु पंचास्तिकायसमूह जितना क्षेत्र छोड़कर शेष अनन्तक्षेत्रवाला प्राकाश है ( अर्थात् अलोक शून्यरूप नहीं है किन्तु शुद्ध आकाशद्रव्यरूप है । ) ३ ।। गाथा ४ अन्वयार्थः-[जीवाः ] जीव, [ पुद्गलकायाः ] पुद्गलकाय, [ धर्माधर्मों ] धर्म, अधर्म, [ तथा एव ] तथा [आकाशम् ] आकाश [ अस्तित्वे नियताः ] अस्तित्वमें नियत, [अनन्यमयाः] ( अस्तित्वसे ) अनन्यमय [च ] और [ अणुमहान्तः] xअणुमहान ( प्रदेशमें बड़े ) हैं। * लोक्यन्ते दृश्यन्ते जीवादिपदार्था यत्र स लोकः अर्थात् जहाँ जीवादिपदार्थ दिखाई देते हैं वह लोक है। x अणुमहान = (१) प्रदेशमें बड़े अर्थात् अनेकप्रदेशी; (२) एकप्रदेशी ( व्यक्ति-अपेक्षासे ) तथा अनेकप्रदेशी ( शक्ति-अपेक्षासे।) जीवद्रव्य पुद्गलकाय, धर्म, अधर्म ने आकाश । अस्तित्वनियत, अनन्यमय ने अणुमहान पदार्थ छे ॥४॥ . - पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन अत्र पंचास्तिकायानां विशेषजा सामान्यविशेपास्तित्वं काय चोक्तम् । तत्र जीवाः पुद्गलाः धर्माधौं आकाशमिति नेपां विशेपसंज्ञा अन्वर्थाः प्रत्येयाः । सामान्यविशेषास्तित्वं च तेपामुत्पादव्ययध्रौव्यमय्यां सामान्यविशेषसत्तायां नियतत्वाद्वयवस्थितन्वादबसेयम् । अस्तित्वे नियतानामपि न तेपामन्यमयत्वम् , यतस्ते सर्वदेवानन्यमया आत्मनिर्वृत्ताः । अनन्यमयत्वेऽपि तेषामस्तित्वनियतत्वं नयप्रयोगात । द्वौ हि नया भगवता प्रणीतों-द्रव्यार्थिकः पर्यायार्थिकश्च । तत्र न खल्वेकनयायचा देशना किंतु तदुभयायचा । ततः पर्यायार्थादेशादस्तित्वे स्वतः कथंचिद्भिन्नेऽपि व्यवस्थिताः द्रव्यादेशात्म्वयमेव सन्तः सतोऽनन्यमया भवन्तीति । कायत्वमपि तेपामणुमहत्त्वात् । अणवोऽत्र प्रदेशा मूर्ताऽमृश्चि निर्विभागांशास्तैः टीकाः–यहाँ ( इस गाथामें ) पांच अस्तिकायोंकी विशेपसंना, सामान्य- विशेप अस्तित्व तथा कायत्व कहा है । वहाँ जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश-यह उनकी विशेप संज्ञाएँ *अन्वर्थ जानना । वे उत्पाद-व्यय, ध्रौव्यमयी सामान्यदिशेपसत्तामें नियत-व्यवस्थित ( निश्चित विद्यमान ) होनेसे उनके सामान्यविशेप-अस्तित्व भी है ऐसा निश्चित् करना चाहिये । वे अस्तित्वमें नियत होने पर भी (जिसप्रकार वर्तनमें रहनेवाला घी वर्तनसे अन्यमय है उसीप्रकार ) अस्तित्वसे अन्यमय नहीं हैं; क्योंकि वे सदैव अपनेसे निष्पन्न ( अर्थात् अपनेसे सत् ) होनेके कारण ( अस्तित्वसे) अनन्यमय हैं ( जिसप्रकार अग्नि उप्णतासे अनन्यमय है उसीप्रकार । ) "अस्तित्वसे अनन्यमय" होने पर भी उनका "अस्तित्व में नियतपना" नयप्रयोगसे है। भगवानने दो नय कहे हैं-द्रव्याथिक और पर्यायाथिक । वहां कथन एक नयके आधीन नहीं होता किन्नु दोनों नयोंके आधीन होता है । इसलिये वे पर्यायाथिक कथनसे जो अपनेसे कथंचित भिन्न भी है ऐसे अस्तित्वमें व्यवस्थित ( निश्चित स्थित ) हैं और द्रव्याधिक कवनसे स्वयमेव सत् (-विद्यमान) होनेके कारण अस्तित्वसे अनन्यमय हैं । * अन्वर्यका अनुसरण करती हुई; प्रर्यानुसार । (पौर प्रस्तिकाचों. नाम उनके पर्यानुसार है।)

१२ पंचास्तिकायसंग्रह महान्तोऽणुमहान्तः प्रदेशप्रचयात्मकाः । इति सिद्धं तेषां कायत्वम् । अणुभ्यां महान्त इति व्युत्पत्त्या द्वयणुकपुद्गलस्कन्धानामपि तथाविधत्वम् । अणवश्च महान्तश्च व्यक्तिशक्तिरूपाभ्या- मिति परमाणुनामेकप्रदेशात्मकत्वेऽपि तत्सिद्धिः । व्यक्त्यपेक्षया शक्त्यपेक्षया च प्रदेशप्रचया- स्मकस्य महत्त्वस्थाभावात्कालारणूनामस्तित्वनियतत्वेऽप्यकायत्वमनेनैव साधिनम् । अत एव तेपामस्तिकायप्रकरणे सतामप्यनुपादानमिति ।। ४ ।। उनके कायपना भी है क्योंकि वे अणुमहान हैं। यहां अणु अर्थात् प्रदेश- मूर्त और अमूर्त निर्विभाग ( छोटेसे छोटे ) अंश; 'उनके द्वारा (-बहु प्रदेशों द्वारा ) महान हो' वह अणुमहान; अर्थात् प्रदेशप्रचयात्मक (-प्रदेशोंके समूहमय ) हो वह अणुमहान है। इसप्रकार उन्हें ( उपरोक्त पाँच द्रव्योंको ) कायत्व सिद्ध हुआ। ( ऊपर जो अणुमहानकी व्युत्पत्ति की उसमें अणुओंके अर्थात् प्रदेशोंके लिये वहुवचनका उपयोग किया है और संस्कृत भाषाके नियमानुसार बहुवचनमें द्विवचनका समावेश नहीं होता इसलिये अव व्युत्पत्तिमें किंचित् भापाका परिवर्तन करके द्वि-अणुक स्कन्धों- को भी अणुमहान वतलाकर उनका कायत्व सिद्ध किया जाता है : ) 'दो अगुओं (-दो प्रदेशों ) द्वारा महान हो' वह अणुमहान-ऐसी व्युत्पत्तिसे द्वि-अणुक पुद्गल- स्कन्धोंको भी ( अणुमहानपना होनेसे ) कायत्व है। ( अव, परमाणुओंको अणु- महानपना किसप्रकार है वह बतलाकर परमाणुगोंको भी कायत्व सिद्ध किया जाता है : ) व्यक्ति और शक्तिरूपसे 'अणु तथा महान' होनेसे ( अर्थात् परमाणु व्यक्तिरूपसे एकप्रदेशी तथा शक्तिरूपसे अनेकप्रदेशी होनेके कारण ) परमाणुओंको भी, उनके एकप्रदेशात्मकपना होने पर भी, (अणुमहानपना सिद्ध होनेसे ) कायत्व सिद्ध होता है । कालाणुओंको व्यक्ति-अपेक्षासे तथा शक्ति-अपेक्षासे प्रदेशप्रचयात्मक महानपनेका अभाव होनेसे, यद्यपि वे अस्तित्व में नियत हैं तथापि, उनके अकायत्व है-ऐसा इसीसे ( -इस कथनसे ही) सिद्ध हुआ। इसीलिये, यद्यपि वे सत् (विद्यमान ) हैं तथापि, उन्हें अस्तिकायके प्रकरणमें नहीं लिया है। भावार्थः-पाँच अस्तिकायोंके नाम-जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश हैं । यह नाम उनके अर्थानुसार हैं। यह पाँचों द्रव्य पर्यायाथिकनयसे अपनेसे कथंचित् भिन्न ऐसे अस्तित्वमें विद्यमान हैं और द्रव्यार्थिकनयसे अस्तित्वसे अनन्य हैं ।

पड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन जेसि अस्थि सहाम्रो गुहिं सह पज्जएहि विविहिं । ते होंति अत्थिकाया णिप्पण्णं जेहिं तेल्लोक्कं ॥ ५॥ येपामस्ति स्वभावः गुणः सह पर्ययविविधः । ते भवन्त्यस्तिकायाः निष्पन्न यस्त्रैलोक्यम् ||५|| पुनश्च, यह पांचों द्रव्य कायत्ववाले हैं क्योंकि वे अणुमहान हैं । वे अणुमहान किसप्रकार हैं सो वतलाते हैं:-'अणुमहान्तः' की व्युत्पत्ति तीन प्रकारसे हैं : ( १ ) अणुभिः महान्तः अणुमहान्तः अर्थात् जो बहुप्रदेशों द्वारा (-दो से अधिक प्रदेशों द्वारा ) बड़े हों वे अणुमहान हैं। इस व्युत्पत्तिके अनुसार जीव, धर्म और अधर्म असंख्यप्रदेशीय होनेसे अणुमहान हैं; आकाश अनन्तप्रदेशी होनेसे अणुमहान है; और त्रि-अणुक स्कन्धसे लेकर अनन्ताणुक स्कन्ध तकके सर्व स्कन्ध बहुप्रदेशी होनेसे अणुमहान हैं। (२) अणुभ्याम् महान्तः अणुमहान्तः अर्थात् जो दो प्रदेशों द्वारा बड़े हों वे अणुमहान हैं । इस व्युत्पत्तिके अनुसार द्वि-अणुक स्कन्ध अणुमहान हैं। (३) अण्वश्च महान्तश्च अणुमहान्तः अर्थात् जो अणुरूप (-एकप्रदेशी ) भी हों और महान (-अनेकप्रदेशी) भी हों वे अणुमहान हैं। इस व्युत्पत्तिके अनुसार परमाणु अणुमहान हैं; क्योंकि व्यक्ति-अपेक्षासे वे एकप्रदेशी हैं और शक्ति अपेक्षासे अनेकप्रदेशी भी ( उपचारसे ) हैं । इसप्रकार उपरोक्त पाँचों द्रव्य अणुमहान होनेसे कायत्ववाले हैं-ऐसा सिद्ध हुआ । कालाणुको अस्तित्व है किन्तु किसी प्रकार भी कायत्व नहीं है, इसलिये वह द्रव्य है किन्तु अस्तिकाय नहीं है ।४। गाथा ५ अन्वयार्थ:-[ येपाम् ] जिन्हें [विविधैः ] विविध [ गुणैः ] गुणों और [पर्ययः] पर्यायोंके (-प्रवाहक्रमके तथा विस्तारक्रमके अंगोंके ) [ मह ] साथ ६ पर्याय = ( प्रवाहामके तथा विस्तारक्रमक ) निविभाग अंश। [प्रवाहनमो ग तो प्रत्येक द्रव्यके होते हैं, किन्तु विस्तारक्रमके अंग यस्तिकायके ही होते हैं । ) विधविध गुणोने पर्ययो सह जे अनन्यपणु घरे । ते अस्तिकायो आणवा, त्रैलोक्यरचना जे चड ||५|| १४ पंचास्तिकायसंग्रह अत्र पंचास्तिकायानामस्तित्वसंभवप्रकारः कायत्वसंभवप्रकारश्चोक्तः । अस्ति ह्यस्तिकायानां गुणैः पर्यायैश्च विविधैः सह स्वभावो आत्मभावोऽजन्यत्यम् । वस्तुनो विशेषा हि व्यतिरेकिणः पर्याया गुणास्तु त एवान्वयिनः । तत एकेन पर्यायेण प्रलीयमानस्थान्येनो- पजायमानस्यान्वयिना गुणेन ध्रौव्यं विप्राणस्पैकस्यापि वस्तुनः समुच्छेदोत्पादध्रौव्यलक्षण- मस्तित्वमुपपयत एव । गुणपर्यायैः सह सर्वथान्यत्वे त्वन्यो विनश्यत्यन्यः प्रादुर्भवत्यन्यो ध्रुवत्वमालम्बत इति सर्व विप्लवते । ततः साध्यस्तित्वसंभवप्रकारकथनम् । कायत्वसंभवप्रकारस्त्वयमुपदिश्यते । अवयविनो हि जीवपुद्गलधर्माधर्माकाशपदार्था- [ स्वभावः ] अपनत्व [ अस्ति ] है [ ते ] वे [ अस्तिकायाः भवन्ति ] अस्तिकाय हैं [यैः] कि जिनसे [ त्रैलोक्यम् ] तीन लोक [निष्पन्नम् ] निष्पन्न हैं । टीका:-यहां, पांच अस्तिकायोंको अस्तित्व किसप्रकार है और कायत्व किस- प्रकार है वह कहा है। वास्तवमें अस्तिकायोंको विविध गुणों और पर्यायोंके साथ स्वपना-अपना- पन-अनन्यपना है । वस्तुके 'व्यतिरेकी विशेष वे पर्यायें हैं और 'अन्वयी विशेष वे गुण हैं । इसलिये एक पर्यायसे प्रलयको प्राप्त होनेवाली, अन्य पर्यायसे उत्पन्न होनेवाली और अन्वयी गुणसे ध्रुव रहनेवाली एक ही वस्तुको व्यय-उत्पाद-ध्रौव्य लक्षण अस्तित्व घटित होता ही है । और यदि गुणों तथा पर्यायोंके साथ ( वस्तुको) सर्वथा अन्यत्व हो तब तो अन्य कोई विनाशको प्राप्त होगा, अन्य कोई प्रादुर्भावको (उत्पादको) प्राप्त होगा और कोई अन्य ध्रुव रहेगा-इसप्रकार सब "विप्लवको प्राप्त हो जायेगा। . १. व्यतिरेक भेद; एकका दूसरेरूप नहीं होना; 'यह वह नहीं है'-ऐसे ज्ञानके निमित्तभूत भिन्नरूपता । [ एक पर्याय दूसरी पर्यायरूप न होनेसे पर्यायोंमें परस्पर व्यतिरेक है; इसलिये पर्यायें द्रव्यके व्यतिरेकी ( व्यतिरेकवाले ) विशेष हैं। ] २. अन्वय=एकरूपता; सदृशता; 'यह वही है'-ऐसे ज्ञानके कारणभूत एकरूपता । [ गुणोंमें सदैव सदृशता रहती है इसलिये उनमें सदैव अन्वय है, इसलिये गुण द्रव्यके, अन्वयी विशेष (अन्वयवाले भेद ) हैं।] ३. अस्तित्वका लक्षण अथवा स्वरूप व्यय-उत्पाद-ध्रौव्य है । ४. विप्लव-अंधाधुन्धी; उथलपुथल, गड़बड़ी, विरोध ।

१५ पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन स्तेषामवयवा अपि प्रदेशाख्याः परस्परव्यतिरेकित्वात्पर्यायाः उच्यन्ते । तेषां ते सहानन्यत्वे कायत्वसिद्धिपपचिमती । निरवयवस्यापि परमाणोः सावयवत्वशक्तिमझावात् कायत्वसिद्धिर- नपवादा । न चैतदाशङ्कयम् पुद्गलादन्येपाममूर्तत्वादविभाज्यानां सावयवत्वकल्पनमन्याय्पम् । दृश्यत एवाविभाज्येऽपि विहायसीदं घटाकाशमिदमघटाकाशमिति विभागकल्पनम् । यदि तत्र विभागो न कल्पेत तदा यदेव घटाकाशं तदेवाघटाकाशं स्यात् । न च तदिष्टम् । ततः काला- गुभ्योऽन्यत्र सर्वेषां कायत्वाख्यं सावयवत्वमवसेयम् । इसलिये ( पांच अस्तिकायोंको ) अस्तित्व किसप्रकार है तत्सम्बन्धी यह (उपरोक्त) कथन सत्य-योग्य-न्याययुक्त है। अव, ( उन्हें ) कायत्व किसप्रकार है उसका उपदेश किया जाता है:-जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश यह पदार्थ 'अवयवी हैं। प्रदेश नामके उनके जो अवयव हैं वे भी परस्पर व्यतिरेकवाले होनेसे 'पर्यायें कहलाती हैं। उनके साथ उन (पांच) पदार्थोंको अनन्यपना होनेसे कायत्वसिद्धि घटित होती है। परमाणु (व्यक्ति-अपेक्षासे) 'निरवयव होनेपर भी उनको सावयवपनेकी शक्तिका सदुभाव होनेसे कायत्वसिद्धि 'निरपवाद है। वहाँ ऐसी आशंका करना योग्य नहीं है कि पुद्गलके अतिरिक्त अन्य पदार्थ अमूर्तपनेके कारण "अविभाज्य होनेसे उनके सावयवपनेकी कल्पना न्यायविरुद्ध (अनुचित) है । आकाश अविभाज्य होने पर भी उसमें 'यह घटाकाश है, यह १. अवयवी = अवयववाला; सावयन; अंशवाला; अंधी; जिनके अवयव (प्रति एकसे अधिक प्रदेश ) हों ऐसे । २. पर्यायका लक्षण परस्पर व्यतिरेक है । वह लक्षण प्रदेशों में भी व्याप्त है, क्योंकि एक प्रदेश दूसरे प्रदेशरूप न होनेसे प्रदेशों में परस्पर व्यतिरेक है। इसलिये प्रदेश भी पर्याय कहलाते हैं। ३. निरवयव-अवयव रहित; अंश रहित; निरंग; एकसे अधिक प्रदेश रहित । ४. निरपवाद - अपवादरहित; [पांच मस्तिकायों को कायपना होनेमें एक भी अपवाद नहीं है। क्योंकि ( उपचारसे ) परमागुको भी गक्ति अपेक्षाले अवयव-प्रदेग हैं।] ५. अविभाज्य-जिनके विभाग न किये जा सके ऐसे।

पंचास्तिकायसंग्रह त्रैलोक्यरूपेण निष्पन्नत्वमपि तेषामस्तिकायत्वसाधनपरमुपन्यस्तम् । तथा च- त्रयाणामूर्धाधोमध्यलोकानामुत्पादव्ययध्रौव्यवन्तस्तद्विशेषात्मका भावा भवन्तस्तेषां मूलपदार्थानां गुणपर्याययोगपूर्वकर्मस्तित्वं साधयन्ति । अनुमीयते च धर्माधर्माकाशानां प्रत्येकमूर्ध्वाधोमध्यलोक- विभागरूपेण परिणमनात्कायत्वाख्यं सावयवत्वम् । जीवानामपि प्रत्येकमूर्ध्वाधोमध्यलोकविभाग- -1 अघटाकाश ( पटाकाश ) हैं'-ऐसी विभागकल्पना दृष्टिगोचर होती ही है। यदि वहाँ (कथंचित्) विभागकी कल्पना न की जाये तो जो घटाकाश है वही (सर्वथा) अघटाकाश हो जायेगा; और वह तो इष्ट ( मान्य ) नहीं है । इसलिये कालाणुओंके अतिरिक्त अन्य सर्वमें कायत्वनामका सावयवपना निश्चित करना चाहिये । उनकी जो तीन-लोकरूप - निष्पन्नता--(-रचना:)- कही, वह. भी उनका अस्तिकायपना (-अस्तिपना तथा कायपना ) सिद्ध करनेके साधनरूपसे कही है। वह इसप्रकार है : (१) ऊर्ध्व-अधो-मध्य तीनलोकके उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यवाले भाव-कि जो तीन लोकके विशेषस्वरूप हैं वे-भवते हुए-(परिणमित होते हुए) अपने मूल पदार्थोंका गुणपर्याययुक्त अस्तित्व सिद्ध करते हैं । (तीन लोकके भाव सदैव कथंचित् सदृश रहते हैं और कथंचित् बदलते रहते हैं वे ऐसा सिद्ध करते हैं कि तीन लोकके मूल पदार्थ कथंचित् सदृश रहते हैं और कथंचित् परिवर्तित होते रहते हैं अर्थात् उन मूल पदार्थों- का उत्पाद-व्यय-धौव्यवाला अथवा गुणपर्यायवाला अस्तित्व है । (२) पुनश्च, धर्म, अधर्म और आकाश-यह प्रत्येक पदार्थ ऊर्ध्व-अधो- मध्य ऐसे लोकके ( तीन ) *विभागरूपसे परिणमित होनेसे उनके कांयत्व नामका सावयवपना . है ऐसा अनुमान किया जा सकता है। प्रत्येक जीव के भी ऊर्ध्व- . * यदि लोकके ऊर्ध्व, अधः और मध्य-ऐसे तीन भाग हैं तो फिर 'यह ऊर्चलोकका आकाश-भाग है, यह अधोलोकका प्रकाशभाग है और यह मध्यलोककी आकाशभाग हैं' इसप्रकार आकाशके भी विभाग किये जा सकते हैं और इसलिये वह सावयव अर्थात् कायत्ववाला है ऐसा सिद्ध होता है । इसीप्रकार धर्म और अधर्म भी सावयव अर्थात् कायंत्ववाले. हैं । - पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन रूपेण परिणमनालोकपूरणावस्थाव्यवस्थितव्यक्तस्सदा सन्निहितशक्तस्तदनुमीयत एव । पुद्गलाना- मप्यू_धोमध्यलोकविभागरूपपरिणतमहास्कन्धत्वप्राप्तिव्यक्तिशक्तियोगित्वाचथाविधा सावयव- त्वसिद्धिरस्त्येवेति ।। ५ ।। ते चव अत्थिकाया तेक्कालियभावपरिणदा रिगच्चा । गच्छंति दवियभावं परियट्टरलिंगसंजुत्ता ॥६॥ ते चैवास्तिकायाः कालिकभावपरिणता नित्याः । गच्छन्ति द्रव्यभावं परिवर्तनलिङ्गसंयुक्ताः ॥ ६ ॥ भत्र पंचास्तिकायानां कालस्य च द्रव्यत्वमुक्तम् । द्रव्याणि हि सहक्रमभुवां गुण- पर्यायाणामनन्यतयाधारभूतानि भवन्ति । ततो वृत्तवर्तमानवर्तिप्यमाणानां भावाना पर्यायाणां अधो-मध्य ऐसे तीन लोकके ( तीन ) विभागरूपसे परिणमित लोकपूरण अवस्थारूप व्यक्तिकी शक्तिका सदैव सद्भाव होनेसे जीवोंको भी कायत्व नामका सावयवपना है ऐसा अनुमान किया ही जा सकता है । पुद्गल भी ऊर्ध्व-अधो-मध्य ऐसे लोकके (तीन) विभागरूप परिणत महास्कन्धपनेकी प्राप्तिकी व्यक्तिवाले अथवा शक्तिवाले होनेसे उन्हें भी वैसी ( कायत्व नामकी ) सावयवपनेकी सिद्धि ही है । ५ । गाथा ६ अन्वयार्थः-[कालिकभावपरिणताः ] जो तीन कालके भावोंरूप परिणमित होते हैं तथा [नित्याः ] नित्य हैं [ते च एव अस्तिकायाः] ऐसे वे ही अस्तिकाय; [ परिवर्तनलिङ्गसंयुक्ताः ] परिवर्तनलिंग ( काल ) सहित, [ द्रव्यमानं गच्छन्ति ] द्रव्यत्व- को प्राप्त होते हैं ( अर्थात् वे छहों द्रव्य हैं । ) टीका:-यहां पांच अस्तिकायोंको तथा कालको द्रव्यपना कहा है। 2 लोकपूरण = लोकव्यापी । [ केवलसमुद्घातके समय जीवको त्रिलोकव्यापी दशा होती है। उस समय 'यह अलोकका जीवभाग है, यह प्रयोतोकका जीवभाग है और यह मध्यलोकमा जीवभाग है' ऐसे विभाग किये जा सकते हैं। ऐसी गिलोकव्यापी दशा (-प्रवस्या) की गक्ति तो जीवोंमें सदेव है इसलिये जीव सदैव सावयव अर्थात् कायत्ववाले है-ऐसा सिद होता है। ते अस्तिकाय त्रिकालभावे परिणमे , नित्य दे। अ पांच तेम ज ात वर्ननलिंग सर्वे इन्ध छ ।॥ ६ ॥ ३ १८ पंचास्तिकायसंग्रह स्वरूपेण परिणतत्वादस्तिकायानां परिवर्तनलिंगस्य कालस्य चास्ति द्रव्यत्वम् । न च तेषां भूतभवद्भविष्यद्भावात्मना परिणममानानामनित्यत्वम् यतस्ते भूतभवद्भविष्यद्भावावस्थास्वपि प्रतिनियतस्वरूपापरित्यागान्नित्या एव । अत्र कालः पुद्गलादिपरिवर्तनहेतुत्वात्पुद्गलादिपरिवर्तन- - द्रव्य वास्तवमें सहभावो गुणोंको तथा क्रमभावी पर्यायोंको 'अनन्यरूपसे आधारभूत हैं । इसलिये जो वर्त चुके हैं, वर्त रहे हैं और भविष्यमें वर्तंगे उन भावों- पर्यायोंरूप परिणमित होनेके कारण ( पाँच ) अस्तिकाय और परिवर्तनलिंग काल ( वे छहों ) द्रव्य हैं । भूत, वर्तमान और भावी भावोंस्वरूप परिणमित होनेसे वे कहीं अनित्य नहीं हैं, क्योंकि भूत, वर्तमान और भावी भावरूप अवस्थाओंमें भी प्रतिनियत (-अपने-अपने निश्चित ) स्वरूपको नहीं छोड़ते इसलिये वे नित्य ही हैं । यहाँ काल पुद्गलादिके परिवर्तनका हेतु होनेसे तथा पुद्गलादिके परिवर्तन द्वारा उसकी पर्यायें गम्य . ( ज्ञात.) होती. हैं इसलिये. उसका अस्तिकायोंमें समावेश करनेके हेतु उसे 'परिवर्तनलिंग' कहा है। [ पुद्गलादि अस्तिकायोंका वर्णन करते हुए उनके परिवर्तन ( परिणमन ) का वर्णन करना चाहिये और उनके परिवर्तनका वर्णन करते हुए उस परिवर्तनमें निमित्तभूत पदार्थका ( कालका ). अथवा उस परिवर्तन द्वारा जिनकी पर्यायें व्यक्त होती हैं उस पदार्थका ( कालका ) वर्णन करना अनुचित नहीं कहा जा सकता । इसप्रकार पंचास्तिकायके वर्णनमें कालके वर्णनका १. अनन्यरूप-अभिन्नरूप । [ जिसप्रकार अग्नि आधार है और उष्णतां प्राधेय है तथापि वे अभिन्न हैं; उसीप्रकार द्रव्य आधार हैं और गुण-पर्यायें आधेय हैं तथापि वे अभिन्न हैं। ] २. परिवर्तनलिंग पुद्गलादिका परिवर्तन जिसका लिंग है; पुद्गलादिके परिणमन द्वारा जो ज्ञात होता है । ( लिंगचिह्नः सूचक; गमक; गम्य करानेवाला; बतलानेवाला; पहिचान करानेवाला।): ३. (१) यदि पुद्गलादिका परिवर्तन होता है तो उसका कोई निमित्त होना चाहिये- 'इसप्रकार परिवर्तनरूपी 'चिह्न द्वारा कालका अनुमान होता है (जिसप्रकार धुआंरूपी चिह्न द्वारा अग्निका अनुमान होता है उसीप्रकार); इसलिये काल परिवर्तनलिंग' है। (२) और पुद्गलादिके परिवर्तन द्वारा कालकी पर्यायें (-'कम समय', 'अधिक समय ऐसी कालकी अवस्थाएँ ) गम्य होती हैं इसलिये भी काल 'परिवर्तनलिंग' है। ... .

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
गम्यमानपर्यायत्वाच्चास्तिकायेष्वन्तर्भावार्थं स परिवर्तनलिंग इत्युक्त इति ॥६॥
अण्णोण्णं पविसंता देता प्रोगासमण्णमण्णस्स ।
मेलंता वि य णिच्चं सगं समावं ण विजहंति ॥७॥
अन्योऽन्यं प्रविशन्ति ददन्त्यवकाशमन्योऽन्यस्य ।
मिलन्त्यपि च नित्यं स्वकं स्वभावं न विजहन्ति ||७||
अत्र पण्णां द्रव्याणां परस्परमत्यन्तसंकरेऽपि प्रतिनियतस्वरूपादप्रच्यवनमुक्तम् ।
मत एव तेषां परिणामवत्त्वेऽपि प्राग्नित्यत्वमुक्तम् । अत एव च न तेपामेकत्यापचिर्न च
जीवकर्मणोर्व्यवहारनयादेशादेकत्वेऽपि परस्परस्वरूपोपादानमिति |७||
समावेश करना अनुचित नहीं है--ऐसा दर्शानेके हेतु इस गाथासूत्रमें कालके लिये
'परिवर्तनलिंग' शब्दका उपयोग किया है। ] । ६ ।
गाथा ७
अन्वयार्थः-[ अन्योन्यं प्रविशन्ति ] वे एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं, [ अन्यो-
न्यस्य ] अन्योन्य [ अवकाशम् ददन्ति ] अवकाश देते हैं, [ मिलन्ति ] परस्पर ( क्षीर-
नीरवत् ) मिल जाते हैं, [ अपि च ] तथापि [नित्यं ] सदा [स्वकं स्वभावं ] अपने-
अपने स्वभावको [न विनहन्ति ] नहीं छोड़ते ।
टीका:-यहां छह द्रव्योंको परस्पर अत्यन्त संकर होने पर भी वे प्रतिनियत
(-अपने-अपने निश्चित् ) स्वरूपसे च्युत नहीं होते ऐसा कहा है । इसीलिये (-अपने-
अपने स्वभावसे च्युत नहीं होते इसीलिये ), परिणामवाले होने पर भी वे नित्य हैं-
ऐसा पहले ( छठवीं गाथामें ) कहा था; और इसीलिये वे एकत्वको प्राप्त नहीं होते;
और यद्यपि जीव तथा कर्मको व्यवहारनयके कयनसे एकत्व ( कहा जाता ) है तथापि
वे ( जीव तथा कर्म ) एक-दूसरेके स्वरूपको ग्रहण नहीं करते । ७ ।
संकर=मिलन; मिलाप (अन्योन्य-प्रवगाहरूप ) मिथितपना ।
अन्योन्य थाय प्रवेश, में अन्योन्य दे अवकाशने ।
अन्योन्य मितन, दतां कदी छोडे न मापस्वभावनं ॥७॥

२० पंचास्तिकायसंग्रह सत्ता सव्वपयत्था सविस्सरूवा प्रांतपज्जाया। भंगुप्पादधुवत्ता सप्पडिवक्खा हवदि एक्का ॥ ८॥ सत्ता सर्वपदार्था सविश्वरूपा अनंतपर्याया । भङ्गोत्पादध्रौव्यात्मिका सप्रतिपक्षा भवत्येका ||८|| अत्रास्तित्वस्वरूपमुक्तम् । अस्तित्वं हि सत्ता नाम सतो भावः सत्त्वम् । न सर्वथा नित्यतया सर्वथा क्षणिकतया वा विद्यमानमात्रं वस्तु । सर्वथा नित्यस्य वस्तुनस्तत्त्वतः क्रमभुवां भावानामभावात्कुतो विकारवत्त्वम् । सर्वथा क्षणिकस्य प्रत्यभिज्ञानाभावात् कुत एकसंतानत्वम् । ततः प्रत्यभिज्ञानहेतुभूतेन · केनचित्स्वरूपेण ध्रौव्यमालम्ब्यमानं काम्यांचित्क्रमप्रवृत्ताभ्यां स्वरूपाभ्यां प्रलीयमानमुपजायमानं चैककालमेव च तत्त्वतः गाथा ८ अन्वयार्थः-[ सत्ता] सत्ता [ भङ्गोत्पादधौव्यात्मिका ] उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक, [एका ] एक, [ सर्वपदार्था ] सर्वपदार्थस्थित, [ सविश्वरूपा ] सविश्वरूप, [अनन्त- पर्याया ] अनन्तपर्यायमय और [ सप्रतिपक्षा] सप्रतिपक्ष [ भवति ] है । टीका:-यहां अस्तित्वका स्वरूप कहा है। अस्तित्व अर्थात् सत्ता नामक सत्का भाव अर्थात 'सत्त्व । विद्यमानमात्र वस्तु न तो सर्वथा नित्यरूप होती है और न सर्वथा क्षणिकरूप होती है। सर्वथा नित्यवस्तुको वास्तवमें क्रमभावी भावोंका अभाव होनेसे विकार (-परिवर्तन, परिणाम ) कहांसे होगा? और सर्वथा क्षणिक वस्तुमें वास्तवमें प्रत्यभिज्ञान का अभाव होनेसे एकप्रवाहपना कहांसे रहेगा ? इसलिये प्रत्यभिज्ञानके हेतुभूत किसी स्वरूपसे ध्रुव रहती हुई और किन्हीं दो क्रमवर्ती स्वरूपोंसे नष्ट होती हुई तथा उत्पन्न होती हुई—इसप्रकार परमार्थतः एक ही कालमें तिगुनी ( तीन अंश- वाली) अवस्थाको धारण करती हुई वस्तु सत् जानना । इसीलिये 'सत्ता' भी १. सत्व-सत्पना; अस्तित्वपना; विद्यमानपना अस्तित्वका भाव; 'है' ऐसा भाव । * वस्तु सर्वथा क्षणिक हो तो 'जो पहले देखने में (-जाननेमें ) आई थी वही यह वस्तु है'- ऐसा ज्ञान नहीं हो सकता। सर्वार्थ प्राप्त, सविश्वरूप, अनंतपर्ययवंत छ । सचा जनमलय-धौन्यमय छे, मेक छे, सविपक्ष के ।।८॥ , .

पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन . - परमार्थतखितयीमवस्था विभ्राणं वस्तु सदवबोध्यम् । अत एव सत्ताप्यत्पादव्ययधान्यात्मि- काऽयबोद्धव्या, भावभाववतोः कथंचिदेकस्वरूपत्वात् । सा च विलक्षणस्य समस्तस्यापि वस्तुविस्तारस्य सादृश्यमूचकन्वादेका । सर्वपदार्थस्थिता च विलक्षणस्य सदित्यभिधानस्य सदिति प्रत्ययस्य च सर्वपदार्थेषु तन्मूलस्यैवोपलम्भात् सविश्वरूपा च विश्वस्थ समस्तवस्तुविस्तारस्यापि रूपैखिलक्षणः स्वभावैः सह वर्तमानत्वात्, अनन्तपर्याया चानन्ताभिर्द्रव्यपर्यायव्यक्तिभिस्त्रि- लसणाभिः परिगम्यमानत्वात् । एवंभूतापि सा न खलु निरंकुशा किन्तु सप्रतिपक्षा | प्रतिपक्षो 'उत्पादव्ययध्रौव्यात्मक' ( विलक्षणा ) जानना; क्योंकि 'भाव और भाववानका कथंचित् एक स्वरूप होता है । और वह ( सत्ता) 'एक' है, क्योंकि वह विलक्षणवाले समस्त वस्तुविस्तारका सादृश्य सूचित करती है । और वह ( सत्ता ) 'सर्वपदार्थस्थित' है; क्योंकि उसके कारण ही ( -सत्ताके कारण ही ) सर्व पदार्थोंमें विलक्षणकी (-उत्पाद व्ययध्रौव्यकी ), 'सत्' ऐसे कथनकी तथा 'सत्' ऐसी प्रतीतिकी उपलब्धि होती है । और वह ( सत्ता ) 'सविश्वरूप' है, क्योंकि वह विश्वके रूपों सहित अर्थात् समस्त वस्तुविस्तारके विलक्षणवाले स्वभावों सहित वर्तती है । और वह ( सत्ता ) 'अनन्तपर्यायमय' है, क्योंकि वह विलक्षणवाली अनन्त द्रव्यपर्यायरूप व्यक्तियोंसे व्याप्त है। ( इसप्रकार सामान्य-विशेषात्मक सत्ताका उसके सामान्य पक्षकी अपेक्षासे अर्थात् महासत्तारूप पक्षकी अपेक्षासे वर्णन हुआ।) ऐसी होने पर भी वह वास्तवमै 'निरंकुश नहीं है किन्तु *सप्रतिपक्ष है । (१) सत्ताको प्रसत्ता प्रतिपक्ष है; (२) विलक्षणाको अप्रिलक्षणपना प्रतिपक्ष है; (३) एकको अनेकपना प्रतिपक्ष है; (४) सर्वपदार्थस्थितको एकपदार्थस्थित- १. सत्ता भाव है और वस्तु भाववान है। २. यहाँ 'सामान्यात्मक' का अर्थ 'महा' समझना चाहिये और 'विगेपारमक' का अर्थ 'प्रवान्तर' समझना चाहिये। सामान्य-विशेपके दूसरे प्रथं यहां नहीं समन्ता। ३. निरंकुशमंकुश रहित; विरुद्ध पक्ष रहित; निप्रतिपक्ष । [ सामान्ययिपात्मक सत्ताका ऊपर वो वर्णन किया है वैसी होने पर भी सर्वया यती नहीं है। मयंचित ( सामान्य-प्रपेक्षासे ) वंसी है पौर कपंचिन् (यिगेप-प्रपेक्षा ) विरुद्ध प्रकारली है। ४ मप्रतिपक्ष-प्रतिपा महिन; विपन सहित; विरुद्ध पसरहित ।

२२ पंचास्तिकायसंग्रह - - ह्यसत्ता सचायाः, अत्रिलक्षणत्वं विलक्षणायाः, अनेकन्वमेकस्याः, एकपदार्थस्थितत्वं सर्वपदार्थ- स्थितायाः, एकरूपत्वं सविश्वरूपायाः, एकपर्यायत्त्वमनन्तपर्यायाया इति । द्विविधा हि सचा-महा- सत्तावान्तरसचा च । तत्र सर्वपदार्थसार्थव्यापिनी सादृश्यास्तित्वसूचिका महासचा प्रोक्तव अन्या तु प्रतिनियतवस्तुवर्तिनी स्वरूपास्तित्वसूचिकाऽवान्तरसचा । तत्र महासचाऽवान्तरसत्ता- रूपेणाऽसत्ताऽवान्तरसत्ता च महासचारूपेणाऽसचेत्यसत्ता सत्तायाः । येन स्वरूपेणोत्पादस्तत्तथो- पना प्रतिपक्ष है; (५) सविश्वरूपको एकरूपपना प्रतिपक्ष है; (६) अनन्तपर्यायमयको एकपर्यायमयपना प्रतिपक्ष है। (उपरोक्त सप्रतिपक्षपना स्पष्ट समझाया जाता है:-) सत्ता द्विविध है : महासत्ता और अवान्तरसत्ता । उनमें, सर्वपदार्थसमूहमें व्याप्त होनेवाली, सादृश्य- अस्तित्वको सूचित करनेवाली महासत्ता ( सामान्यसत्ता) तो कही जा चुकी है । दूसरी प्रतिनिश्चित (-एकएक निश्चित ) वस्तुमें रहनेवाली, स्वरूप-अस्तित्वको सूचित करने- वाली अवान्तरसत्ता (विशेषसत्ता ) है । (१) वहाँ, महासत्ता अवान्तरसत्तारूपसे असत्ता है और अवान्तरसत्ता महासत्तारूपसे असत्ता है इसलिये सत्ताको असत्ता है (अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होनेसे 'सत्ता' है वही अवान्तरसत्तारूप भी होनेसे 'असत्ता' भी है । ) (२) जिस स्वरूपसे उत्पादं है उसका (उस स्वरूपका) उसप्रकारसे उत्पाद एक ही लक्षण है; जिस स्वरूपसे व्यय है उसका (-उस स्वरूपका) उसप्रकारसे व्यय एक ही लक्षण है और जिस स्वरूपसे ध्रौव्य है उसका (-उस स्वरूपका ) उस प्रकारसे ध्रौव्य एक ही लक्षण है इसलिये वस्तुके उत्पन्न होनेवाले, नष्ट होनेवाले और ध्रुव रहनेवाले स्वरूपोंमेंसे प्रत्येकको त्रिलक्षणका अभाव होनेसे त्रिलक्षणा ( सत्ता )को अत्रिलक्षणपना है (अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होनेसे 'त्रिलक्षणा' है वही यहाँ कही हुई अवान्तरसत्तारूप भी होनेसे 'अत्रिलक्षणा' भी है। ) (३) एक वस्तुकी स्वरूपसत्ता अन्य वस्तुको स्वरूपसत्ता नहीं है इसलिये एक ( सत्ता) को अनेकपना है (अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूपसे होनेसे 'एक' हैं वही यहाँ : कही हुई अवान्तरसत्तारूप भी होनेसे 'अनेक' भी है।) (४) प्रतिनिश्चित (-व्यक्तिगत निश्चित ) पदार्थमें स्थित सत्ताओं द्वारा ही पदार्थोंका प्रतिनिश्चितपना (-भिन्नभिन्न निश्चित व्यक्तित्व.) होता है इसलिये सर्वपदार्थस्थित पद्रव्य-पंचास्तिकायवान - त्पादैकलक्षणमेव, येन स्वरूपेणोच्छेदस्तत्तथोच्छेदैकलक्षणमेव, येन स्वरूपेण धौल्यं तत्तथा धौव्यैकलक्षणमेव, तत उत्पद्यमानोच्छिद्यमानावतिष्ठमानानां वस्तुनः स्वरूपाणां प्रत्येक लक्षण्या- भावादविलक्षणत्वं विलक्षणायाः । एकस्य वस्तुनः स्वरूपमत्ता नान्यस्य वस्तुनः स्वरूपसचा भवतीत्यनेकन्वमेकस्याः । प्रतिनियतपदार्थस्थिताभिरेव सत्ताभिः पदार्थानां प्रतिनियमो भवतीत्येक- पदार्थस्थितत्वं सर्वपदार्थस्थितायाः । प्रतिनियतकरूपाभिरेव सत्ताभिः प्रतिनियतैकरूपत्वं वस्तूनां ( सत्ता )को एकपदार्थस्थितपना है (अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होनेसे 'सर्वपदार्थस्थित' है वही यहां कही हुई अवान्तरसत्तारूप भी होनेसे 'एकपदार्थ- स्थित' भी है । ) (५) प्रतिनिश्चित एक-एक रूपवाली सत्तात्रों द्वारा ही वस्तुओंका प्रतिनिश्चित एक-एकरूप होता है इसलिये सविश्वरूप (सत्ता)को एकरूपपना है (अर्थात् जो सामान्यविशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होनेसे 'सविश्वरूप' है वही यहां कही हुई अवान्तरसत्तारूप भी होनेसे 'एकरूप' भी है।) (६) प्रत्येक पर्यायमें स्थित ( व्यक्तिगत भिन्नभिन्न ) सत्ताओं द्वारा ही प्रतिनिश्चित एक-एक पर्यायोंका अनंतपना होता है इसालये अनंतपर्यायमय ( सत्ता )को एकपर्यायमयपना है (अर्थात् जो सामान्य- विशेषात्मक सत्ता महासत्तारूप होनेसे 'अनंतपर्यायमय' है वही यहाँ कही हुई अवान्तर- सत्तारूप भी होनेसे 'एकपर्यायमय' भी है। ) इस प्रकार सब निरवद्य है ( अर्थात् ऊपर कहा हुअा सर्व स्वरूप निर्दोप है, निर्वाध है, किंचित् विरोधवाला नहीं है ) क्योंकि उसका ( सत्ताके स्वरूप- का ) कथन सामान्य और विशेषकी प्ररूपरणाकी ओर ढलते हुए दो नयोंके आधीन है। भावार्थ:-सामान्यविशेषात्मक सत्ताके दो पक्ष हैं-एक पक्ष वह महासत्ता और दूसरा पक्ष वह अवान्तरसत्ता। (१) महासत्ता अवान्तरसत्तारूपसे असत्ता और अवान्तरसत्ता महासत्तारूपसे असत्ता है; इसलिये यदि महासत्ताको 'सत्ता' कहें तो अवान्तरसत्ताको 'असत्ता' कहा जायेगा। (२) महासत्ता उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य ऐसे तीन लक्षणवाली है इसलिये वह 'विलक्षणा' है। वस्तुके उत्पन्न होनेवाले स्वरूपका उत्पाद ही एक लक्षण है, नष्ट होनेवाले स्वरूपका व्यय ही एक लना है और ध्रुव रहनेवाले स्वरूपका ध्रौव्य ही एक लभरण है इसलिये उन तीन स्वरूपोममें प्रत्येककी अवान्तरसत्ता एक ही लक्षणवाली होनेसे 'अविलक्षणा' है। (३) महासत्ता . २४ पंचास्तिकायसंग्रह भवतीत्येकरूपत्वं सविश्वरूपायाः। प्रतिपर्यायनियतामिरेव सचाभिः प्रतिनियतकपर्यायाणा- मानन्त्यं भवतीत्येकपर्यायत्वमनन्तपर्यायायाः । इति सर्वमनवा सामान्यविशेषप्ररूपणप्रवणनय- द्वयायचत्वात्तद्देशनायाः ॥ ८॥ दवियदि गच्छदि ताई ताइं सब्भावपज्जयाई जं। ददियं तं भण्णंते अणण्णभूदं तु सत्तादो ॥६॥ समस्त पदार्थसमूहमें 'सत्, सत्, सत्' ऐसा समानपना दर्शाती है इसलिये एक है। एक वस्तुकी स्वरूपसत्ता अन्य किसी वस्तुकी स्वरूपसत्ता नहीं है, इसलिये जितनी वस्तुएँ उतनी स्वरूपसत्ताएँ; इसलिये ऐसी स्वरूपसत्ताएँ अथवा अवान्तरसत्ताएं 'अनेक' हैं । (४) सर्व पदार्थ सत् हैं इसलिये महासत्ता 'सर्व पदार्थोंमें स्थित है। व्यक्तिगत पदार्थों में स्थित भिन्न-भिन्न व्यक्तिगत सत्ताओं द्वारा ही पदार्थोंका भिन्न-भिन्न निश्चित व्यक्तित्व रह सकता है, इसलिये उस-उस पदार्थकी अवान्तरसत्ता उस-उस 'एक पदार्थ में ही स्थित' है । (५) महासत्ता समस्त वस्तुसमूहके रूपों ( स्वभावों) सहित है इसलिये वह 'सविश्वरूप' ( सर्वरूपवाली ) है । वस्तुकी सत्ताका. ( कथंचित् ) एक रूप हो तभी उस वस्तुका निश्चित एक रूप (-निश्चित एक स्वभाव ) रह सकता है, इसलिये प्रत्येक वस्तुकी अवान्तरसत्ता निश्चित ‘एक रूपवाली' ही है । (६) महासत्ता सर्व पर्यायोंमें स्थित है इसलिये वह, 'अनन्तपर्यायमय' है । भिन्न-भिन्न पर्यायोंमें ( कथंचित् ) भिन्न-भिन्न सत्ताएँ हों तभी प्रत्येक पर्याय भिन्न-भिन्न रहकर अनन्त पर्यायें सिद्ध होंगी, नहीं तो पर्यायोंका अनन्तपना ही नहीं रहेगा-एकपना हो जायेगा; इसलिये प्रत्येक पर्यायकी अवान्तरसत्ता उस-उस 'एकपर्यायमय' ही है। इस प्रकार सामान्यविशेषात्मक सत्ता, महासत्तारूप तथा अवान्तर- सत्तारूप होनेसे, (१) सत्ता भी है और असत्ता भी है, (२) त्रिलक्षणा भी है और अत्रिलक्षरसा भी है, (३) एक भी है और अनेक भी है, (४) सर्वपदार्थस्थित भी है और एकपदार्थस्थित भी है, (५) सविश्वरूप भी है और एकरूप भी है, (६) अनन्तपर्यायमय भी है और एकपर्यायमय भी है ।। ते ते विविध सद्भावपर्ययने द्रवे-व्यापे-लहे । तेने कहे के द्रव्य, जे सत्ता थकी नहि अन्य छे ।।९।। - --- पद्रव्य-पंचास्तिकायवरणंन २५ द्रवति गच्छति तांस्तान् सद्भावपर्यायान् यत् । द्रव्यं तत् भणन्ति अनन्यभूतं तु सत्तातः ॥ ९ ॥ अत्र सचाद्रव्ययोरर्थान्तरनं प्रत्याख्यातम् । द्रवति गच्छति सामान्यरूपेण स्वरूपेण व्याप्नोति तांस्तान् क्रमभुवः सहभुवश्च सद्भावपर्यायान् स्वभावविशेषानित्यनुगतार्थया निहत्या द्रव्यं व्याख्यातम् । द्रव्यं च लक्ष्यलक्षणभावादिम्यः कथञ्चिभेदेऽपि वस्तुतः सत्ताया अपृथग्भृतमेवेति मन्तव्यम् । ततो यत्पूर्व सत्त्वमसत्त्वं विलक्षणत्वमविलक्षणत्वमेकत्वमनेकत्वं सर्वपदार्थस्थितत्वमेकपदार्थस्थितत्वं विश्वरूपत्वमेकरूपत्वमनन्तपर्यायत्वमेकपर्यायत्वं च प्रतिपादित गाथा ९ अन्वयार्थः-[ तान् तान् सद्भावपर्यायान् ] उन-उन सद्भावपर्यायोंको [ यत् ] जो [ द्रवति ] द्रवित होता है-[ गच्छति ] प्राप्त होता है, [तत् ] उसे [द्रव्यं भणन्ति ] ( सर्वज्ञ ) द्रव्य कहते हैं-[ सचातः अनन्यभृतं तु] जो कि सत्तासे अनन्य- भूत है। टीका:-यहां सत्ताको और द्रव्यको अर्थान्तरपना ( भिन्नपदार्थपना, अनन्य- पदार्थपना ) होनेका खंडन किया है । 'उन-उन क्रमभावी और सहभावी सभावपर्यायोंको अर्थात् स्वभावविशेषोंको जो 'द्रवित होता है प्राप्त होता है-सामान्यरूप स्वरूपसे व्याप्त होता है वह द्रव्य है'-इसप्रकार अनुगत अर्थवाली निरुक्तिसे द्रव्यकी व्याख्या की गई। और यद्यपि 'लक्ष्यलक्षरण भावादिक द्वारा द्रव्यको सत्तासे कथंचित भेद है तथापि वस्तुतः (परमार्थतः) द्रव्य सत्तासे अपृथक् ही है ऐसा मानना । इसलिये पहले ( ८ वी गाथा- में ) सत्ताको जो सत्पना, असत्पना, विलक्षणपना, अविलक्षणपना, एकपना, अनेक- पना, सर्वपदार्यस्थितपना, एकपदार्थस्थितपना, विश्वरूपपना, एकरूपपना, अनंतपर्याय- १. श्री जयसेनाचार्यदेवकी टीकामें भी यहां की भांति ही 'द्रवति गच्छति' का एक भयं तो 'द्रवित होता है अर्थात् प्राप्त होता है-ऐसा किया गया है। तदुपरान्त 'द्रवति प्रयात् स्वभावपर्यायौंको द्रवित होता है और गच्छति अर्थात् विभावपर्यायोंको प्राप्त होता है'-ऐमा दूसरा अयं भी वहीं किया गया है। २. यहां द्रव्य की जो निरुक्ति की गई है वह 'इ' धातृका अनुसरण करते हुए (-मिनते हुए) प्रयंवानी है। ३. सत्ता लक्षण है और इन्य लक्ष्य है। 20 पंचास्तिकायसंग्रह सचायास्तत्सर्व तदनन्तरभूतस्य द्रव्यस्यैव द्रष्टव्यम् । ततो न कश्चिदपि तेषु सत्ताविशेषोऽध- शिष्येत यः सचां वस्तुतो द्रव्यात्पृथक् व्यवस्थापयेदिति ।।९।। दव्वं सल्लक्खरिणयं उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं । गुरणपज्जयासयं वा जं तं भरणंति सन्दरहू ॥१०॥ द्रव्यं सल्लक्षणकं उत्पादव्ययध्रुवत्वसंयुक्तम् । गुणपर्यायाश्रयं वा यचद्भणन्ति सर्वज्ञाः ॥१०॥ अत्र त्रेधा द्रव्यलक्षणमुक्तम् । सद्रव्यलक्षणम् । उक्तलक्षणायाः सचाया अविशेषा- द्रव्यस्य सत्स्वरूपमेव लक्षणम् । न चानेकान्तात्मकस्य द्रव्यस्य सन्मात्रमेव स्वं रूपं यतो लक्ष्य- . मयपना और एकपर्यायमयपना कहा गया वह सब सत्तासे अनर्थान्तरभूत (-अभिन्नपदार्थ- भूत, अनन्यपदार्थभूत ) द्रव्यको ही देखना ( अर्थात् सत्पना, असत्पना, त्रिलक्षणपना, अत्रिलक्षणपना आदि समस्त सत्ताके विशेष द्रव्यके ही हैं ऐसा मानना । ) इसलिये उनमें (-उन सत्ताके विशेषोंमें ) कोई सत्ताविशेष शेष नहीं रहता जो कि सत्ताको वस्तुतः ( परमार्थतः ) द्रव्यसे पृथक् स्थापित करे । ६ । गाथा १० अन्वयार्थः-[ यत् ] जो [ सल्लक्षणकम् ] 'सत्' लक्षणवाला है, [ उत्पादव्यय- ध्रुवत्वसंयुक्तम् ] जो उत्पादव्ययध्रौव्यसंयुक्त है [वा ] अथवा [ गुणपर्यायाश्रयम् । जो गुणपर्यायोंका आश्रय है, [ तद् ] उसे [ सर्वज्ञाः ] सर्वज्ञ [ द्रव्यं ] द्रव्य [ भणन्ति ] कहते हैं। टीका:-यहां तीन प्रकारसे द्रव्यका लक्षण कहा है। 'सत्' द्रव्यका लक्षण है । पूर्वोक्त लक्षणवाली सत्तासे द्रव्य अभिन्न होनेके कारण 'सत्' स्वरूप ही द्रव्यका लक्षण है। और अनेकान्तात्मक द्रव्यका सत्मात्र ही स्वरूप नहीं है कि जिससे लक्ष्यलक्षणके विभागका अभाव हो । ( सत्तासे द्रव्य अभिन्न छे सत्त्व लक्षण जेहनु, उत्पादव्ययध्रुवयुक्त गुणपर्ययाश्रय जेह, तेने द्रव्य सर्वज्ञो कहे. ॥१०॥ जे - पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन २७ लक्षणविभागाभाव इति । उत्पादव्ययधौव्याणि वा द्रव्यलक्षणम् । एकजात्यविरोधिनि क्रमभुवा भावानां संताने पूर्वभावविनाशः समुच्छेदः, उत्तरभावप्रादुर्भावश्च समुत्पादः, पूर्वोत्तरभावोच्छेदो- स्पादयोरपि स्वजातेरपरित्यागो धौव्यम् । तानि सामान्यादेशादभिन्नानि विशेषादेशाद्भिन्नानि युगपद्भावीनि स्वभावभृतानि द्रव्यस्य लक्षणं भवन्तीति । गुणपर्याया वा द्रव्यलक्षणम् । अनेकान्तात्मकस्य वस्तुनोऽन्वयिनो विशेषा गुणा व्यतिरेकिणः पर्यायास्ते द्रव्ये योगपद्येन क्रमेण च प्रवर्तमानाः कथंचिद्भिन्नाः कथंचिदभिन्नाः स्वभावभृताः द्रव्यलक्षणतामापद्यन्ते । है इसलिये द्रव्यका जो सत्तारूप स्वरूप वही द्रव्यका लक्षण है। प्रश्नः-यदि सत्ता और द्रव्य अभिन्न हैं-सत्ता द्रव्यका स्वरूप ही है, तो 'सत्ता लक्षण है और द्रव्य लक्ष्य है'-ऐसा विभाग किस प्रकार घटित होता है ? उत्तरः-अनेकान्तात्मक द्रव्यके अनन्त स्वरूप हैं, उनमेंसे सत्ता भी उसका एक स्वरूप है; इसलिये अनन्तस्वरूपवाला द्रव्य लक्ष्य है और उसका सत्ता नामका स्वरूप लक्षण है-ऐसा लक्ष्यलक्षणविभाग अवश्य घटित होता है । इसप्रकार अवाधितरूपसे सत् द्रव्यका लक्षण है।) अथवा, उत्पादव्ययध्रौव्य द्रव्यका लक्षण है । 'एक जातिका अविरोधक ऐसा जो क्रमभावी भावोंका प्रवाह उसमें पूर्व भावका विनाश सो व्यय है, उत्तर भावका प्रादुर्भाव (-बादके भावकी अर्थात् वर्तमान भावकी उत्पत्ति ) सो उत्पाद है और पूर्व- उत्तर भावोंके व्यय-उत्पाद होने पर भी स्वजातिका अत्याग सो ध्रौव्य है । वे उत्पाद- व्यय-ध्रौव्य-जो कि सामान्य प्रादेशसे अभिन्न हैं (अर्थात् सामान्य कथनसे द्रव्यसे अभिन्न हैं ), विशेष आदेशसे ( द्रव्यसे ) भिन्न हैं, युगपद् वर्तते हैं और स्वभावभूत हैं वे-द्रव्यका लक्षण है। अथवा, गुणपर्यायें द्रव्यका लक्षण है । अनेकान्तात्मक वस्तुके 'अन्वयी विशेष वे गुण हैं और व्यतिरेकी विशेष वे पर्यायें हैं । वे गुणपर्यायें (गुण और पर्याय ) जो कि द्रव्यमें एक ही साथ तथा क्रमशः प्रवर्तते हैं, (द्रव्यले) कवंचित् भिन्न और कथंचित् अभिन्न हैं तथा स्वभावभूत हैं वे-द्रव्यका लक्षण है। १. द्रव्यमें क्रमभावी भावोंका प्रवाह एक जातिको संडित नहीं करता-तोड़ता नहीं है प्रर्यात जाति-प्रपेक्षासे सदैव एकत्व ही रखता है। २. अन्वय मोर व्यतिरेकके प्रथंके लिये पृष्ट १४ पर टिप्पणी देखिये।

२८. पंचास्तिकायसंग्रहः प्रयाणामप्यमीपां द्रव्यलक्षणानामेकस्मिन्नभिहितेऽन्यदुभयमर्थादेवापद्यते । सच्चेदुत्पादव्ययधोव्य- चच्च गुणपर्यायवच । उत्पादव्ययधौव्यवच्चेत्सच्च गुणपर्यायवच्च । गुणपर्यायबच्चेसच्चोत्पाद- व्ययध्रौव्यवच्चेति । सद्धि नित्यानित्यस्वभावत्वाद् ध्रुवत्वमुत्पादव्ययात्मकतां च प्रथयति, ध्रुवत्वात्मकैर्गुणैरुत्पादव्ययात्मकः पर्यायैश्च सहकत्वं चाख्याति । उत्पादव्ययधौव्याणि तु नित्यानित्यस्वरूप परमार्थ सदावेदयन्ति, गुणपर्यायांश्चात्मलाभनिवन्धनभूतान् प्रथयन्ति । गुण- - द्रव्यके इन तीनों लक्षणोंमेंसे (-सत, उत्पादव्ययध्रौव्य तथा गुणपर्यायें इन तीन लक्षणोंमेंसे ) एकका कथन करने पर शेष दोनों ( विना कथन किये ) अर्थसे ही आजाते हैं । यदि द्रव्य सत् हो, तो वह (१) उत्पादव्ययध्रौव्यवाला और (२०) गुण- पर्यायवाला होगा; यदि उत्पादव्ययध्रौव्यवाला हो, तो वह (१) सत् और (२) गुणपर्यायवाला होगा; यदि गुणपर्यायवाला हो, तो वह (१) सत् और (२) उत्पाद- व्ययध्रौव्यवाला होगा। वह इस प्रकार:-सत् नित्यानित्यस्वभाववाला होनेसे (१) ध्रौव्यको और उत्पादव्ययात्मकताको प्रगट करता है तथा (२) ध्रौव्यात्मक गुणों और उत्पादव्ययात्मक पर्यायोंके साथ एकत्व दर्शाता है । उत्पादव्ययध्रौव्य ( १ ) नित्यानित्यस्वरूप 'पारमार्थिक सत्को वतलाते हैं तथा ( २ ) अपने स्वरूप- की प्राप्तिके कारणभूत गुणपर्यायोंको प्रगट करते हैं । 'गुणपर्यायें अन्वय और व्यतिरेक- १. पारमार्थिक वास्तविक; यथार्थ; सच्चा । ( वास्तविक सत् नित्यानित्यस्वरूप होता है। उत्पादव्यय अनित्यताको और ध्रौव्य नित्यताको बतलाता है इसलिये उत्पादव्ययध्रौव्य नित्या- नित्यस्वरूप वास्तविक सत्को बतलाते हैं। इसप्रकार 'द्रव्य उत्पादव्ययध्रौव्यवाला है'-ऐसा कहनेसे 'वह सत् है-ऐसा भी विना कहे ही आजाता है । २. अपने उत्पादव्ययध्रौव्यके ( यदि गुण हो तभी ध्रौव्य होता है, और यदि पर्यायें हों तभी उत्पादव्यय होता है; इसलिये यदि गुणपर्यायें न हों तो उत्पादव्ययध्रौव्य अपने स्वरूपको प्राप्त हो ही नहीं सकते । इसप्रकार 'द्रव्य उत्पादव्ययध्रौव्यवाला है'-ऐसा कहनेसे वह गुणपर्यायवाला भी सिद्ध हो जाता है।) ३. प्रथम तो, गुरणपर्यायें अन्वय द्वारा ध्रौव्यको सूचित करते हैं और व्यतिरेक द्वारा उत्पादव्ययको सूचित करते हैं, इसप्रकार वे उत्पादव्ययध्रौव्यको सूचित करते हैं। दूसरे, गुणपर्यायें अन्वय द्वारा नित्यताको वतलाते हैं और व्यतिरेक द्वारा अनित्यताको बतलाते हैं। :-इसप्रकार वे नित्यानित्यस्वरूप सत्को वतलाते हैं।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
२६
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पर्यायान्त्वन्वयव्यतिरेकित्वाद् ध्रौव्योत्पत्तिविनाशान् सूचयन्ति, नित्यानित्यस्वभावं परमार्थ
संच्चोपलक्षयन्तीति ।। १० ।।
उप्पत्ती व विणासो दन्वस्स य णत्थि अस्थि सम्भावो।
विगमुप्पादधुवत्तं करेंति तस्सेव पज्जाया ॥११॥
उत्पत्ति विनाशो द्रव्यस्य च नास्त्यस्ति सद्भावः ।
विगमोत्पादध्रुवत्वं कुर्वन्ति तस्यैव पर्यायाः ॥११॥
अत्रोभयनयाभ्यां द्रव्यलक्षणं प्रविभक्तम् । द्रव्यस्य हि सहक्रमप्रवृत्तगुणपर्यायसद्भाव-
रूपस्य त्रिकालावस्थायिनोऽनादिनिधनस्य न समुच्छेदसमुदयौ युक्तौ । अथ तस्यैव पर्यायाणां
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वाले होनेसे ( १ ) ध्रौव्यको और उत्पादव्ययको सूचित करते हैं तथा (२) नित्या-
नित्यस्वभाववाले पारमार्थिक सत्को बतलाते हैं।
भावार्थः-द्रव्यके तोन लक्षण हैं; सद, उत्पादव्ययध्रौव्यः और गुण. पर्यायें ।
ये तीनों लक्षण परस्पर अविनाभावी हैं; जहाँ एक हो वहाँ शेष दोनों नियमसे होते ही
हैं । १० ।
गाथा ११
अन्वयार्थः-[ द्रव्यस्य च ] द्रव्यका [ उत्पतिः ] उत्पाद [वा ] यो
[विनाशः ] विनाश [ न अस्ति ] नहीं है, [ सद्भावः अस्ति ] सद्भाव है । [ तस्य
एव पर्यायाः ] उसीकी पर्यायें [ विगमोत्पादध्रुवत्वं ] विनाश, उत्पाद और ध्रुवता
[कुवन्ति ] करती हैं।
टीका:-यहां दोनों नयों द्वारा द्रव्यका लक्षण विभक्त किया है (अर्थात् दो
नयोंकी अपेक्षासे द्रव्यके लक्षणके दो विभाग किये गये हैं। )
सहवर्ती गुणों और क्रमवर्ती पर्यायोंके सभावरूप, त्रिकाल-अवस्थायी
( त्रिकाल स्थित रहनेवाले ), अनादि-अनन्त द्रव्यके विनाश और उत्पाद उचित नहीं
F-
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नहि द्रव्यनो उत्पाद अथवा नाश नहि, सद्भाव छ ।
तेना ज जे पर्याय ते उत्पाद-लय-ध्रुवता करे ॥११॥

३० पंचास्तिकायसंग्रह सहप्रवृत्तिभाजां केषांचित् ध्रौव्यसंभवेऽप्यपरेप क्रमप्रवृत्तिभाजां विनाशसंभवसंभावनमुपपन्नम् । ततो द्रव्यापणायामनुत्पादमनुच्छेदं सत्स्वभावमेव द्रव्यं, तदेव पर्यायापिणायां सोत्पाद सोच्छेदं चावबोद्धव्यम् । सर्वमिदमनवद्यं च द्रव्यपर्यायाणामभेदात् ॥ ११ ॥ पज्जयविजुदं दव्वं दवविजुत्ता य पज्जया णत्थि । दोण्हं अणण्णभूदं भावं समणा परू-ति ॥ १२॥ पर्ययवियुतं द्रव्यं द्रव्यवियुक्ताश्च पर्याया न सन्ति । द्वयोरनन्यभृतं भावं श्रमणाः प्ररूपयन्ति ॥ १२ ॥ अत्र द्रव्यपर्यायाणामभेदो निर्दिष्टः । दुग्धदधिनवनीतघृतादिवियुतगोरसवत्पर्याय- वियुतं द्रव्यं नास्ति । गोरसवियुक्तदुग्धदधिनवनीतघृतादिवद्व्यवियुक्ताः पर्याया न सन्ति । हैं । परन्तु उसीकी पर्यायोंके-सहवर्ती कुछ (पर्यायों) का ध्रौव्य होने पर भी अन्य क्रमवर्ती (पर्यायों) के-विनाश और उत्पाद होना घटित होते हैं। इसलिये द्रव्य द्रव्याथिक आदेशसे (-कथनसे ) उत्पादरहित, विनाशरहित, सत् स्वभाववाला ही जानना चाहिये और वही (द्रव्य) पर्यायार्थिक आदेशसे उत्पादवाला तथा विनाशवाला जानना चाहिये । -यह सब निरवद्य (-निर्दोष, निर्बाध, अविरुद्ध ) है, क्योंकि द्रव्य और पर्यायोंका अभेद (-अभिन्नपना) है । ११ । गाथा १२ अन्वयार्थः-[पर्ययवियुतं ] पर्यायोंरहित [ द्रव्यं ] द्रव्य [च] और [ द्रव्य- वियुक्ताः ] द्रव्यरहित [ पर्यायाः ] पर्यायें [न सन्ति ] नहीं होती; [ द्वयोः ] दोनोंका [ अनन्यभूतं भावं ] अनन्यभाव (अनन्यपना ) [ श्रमणाः ] श्रमण [प्ररूपयन्ति ] प्ररूपित करते हैं। टीका:-यहाँ द्रव्य और पर्यायोंका अभेद दर्शाया है। जिसप्रकार दूध, दही, मक्खन, घी इत्यादिसे रहित गोरस नहीं होता उसी- प्रकार पर्यायोंसे रहित द्रव्य नहीं होता; जिसप्रकार गोरससे रहित दूध, दही, मक्खन, पर्यायविरहित द्रव्य नहि, नहि द्रव्यहीन पर्याय छ । पर्याय तेम ज द्रव्य केरी अनन्यता श्रमणो कहे ॥१२॥ .

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन -३.१ ततो द्रव्यस्य पर्यायाणां चादेशवशात्कथंचिद्भेदेऽप्येकास्तित्वनियतत्वादन्योन्याजहवृत्तीनां वस्तुत्वेनाभेद इति ।। १२ ॥ दम्बेण विणा ण गुणा गुणेहिं दव्वं विणा ण संभवदि । अव्वदिरित्तो भावो दव्वगुणाणं हवदि तम्हा ॥ १३ ॥ द्रव्येण विना न गुणा गुणैव्यं विना न सम्भवति । अव्यतिरिक्तो भावो द्रव्यगुणानां भवति तस्मात् ।। १३ ।। अत्र द्रव्यगुणानामभेदो निर्दिष्टः । पुद्गलपृथग्भूतस्पर्शरसगन्धवर्णवद्रव्येण विना न गुणाः संभवन्ति । स्पर्शरसगंधवर्णपृथग्भूतपुद्गलवद्गुणैर्विना द्रव्यं न संभवति । ततो घी इत्यादि नहीं होते उसीप्रकार द्रव्यसे रहित पर्याय नहीं होती। इसलिये, यद्यपि द्रव्य और पर्यायोंका आदेशवशात् ( -कथनके वश ) कथंचित् भेद है तथापि, वे एक अस्तित्वमें नियत (दृढ़रूपसे स्थित )होनेके कारण *अन्योन्यवृत्ति नहीं छोड़ती इसलिये वस्तुरूपसे उनका अभेद है । १२ । गाथा १३ अन्वयार्थः-[द्रव्येण विना ] द्रव्य विना [ गुणाः न ] गुण नहीं होते, [ गुणैः- विना] गुणों विना [ द्रव्यं न सम्भवति ] द्रव्य नहीं होता; [ तस्मात् ] इसलिये [द्रव्यगुणानाम् ] द्रव्य और गुणोंका [ अव्यतिरिक्ता भावः ] अव्यतिरिक्तभाव (अभिन्न- पना) [ भवति ] हैं। टीका:-यहाँ द्रव्य और गुणोंका अभेद दर्शाया है। जिसप्रकार पुद्गलसे पृथक् स्पर्श-रस-गंध-वर्ण नहीं होते उसीप्रकार द्रव्यके विना गुण नहीं होते ; जिसप्रकार स्पर्श-रस-गंध-वर्णसे पृथक् पुद्गल नहीं होता उसी- * अन्योन्यवृत्ति-एक-दूसरेके आश्रयसे निर्वाह करना; एक-दूसरेके आधारसे स्थित रहना; एक-दूसरेके कारण बना रहना । नहि द्रव्य विण गुण होय, गुण विण द्रव्य पण नहि होय छ। : तेथी गुणो ने , द्रव्य केरी . अभिन्नता निर्दिष्ट: छे ॥ १३ ॥ -

३२
पंचास्तिकायसंग्रह
द्रव्यगुणानामप्यादेशवशात् कथंचि देऽप्येकास्तित्वनियतत्वादन्योन्याजहवृत्तीनां वस्तुत्वेनाभेद
इति ।। १३॥
सिय अस्थि रगत्थि उहयं अव्वत्तवपुरणो य तत्तिदयं ।
दव्वं खु सत्तभंगं प्रादेसवसेण संभवदि ॥ १४ ॥
स्यादस्ति नास्त्युभयमवक्तव्यं पुनश्च तत्रितयम् ।
द्रव्यं खलु सप्तभंगमादेशवशेन सम्भवति ॥१४॥
अत्र द्रव्यस्यादेशवशेनोक्ता सप्तभंगी । स्यादस्ति द्रव्यं, स्यान्नास्ति द्रव्यं,
स्यादस्ति च नास्ति च द्रव्यं, स्यादवक्तव्यं द्रव्यं, स्यादस्ति चावक्तव्यं च द्रव्यं, स्यान्नास्ति
चावक्तव्यं च द्रव्यं, स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यं च द्रव्यमिति । अत्र सर्वथात्वनिषेधकोऽ-
प्रकार गुणोंके बिना द्रव्य नहीं होता । इसलिये, यद्यपि द्रव्य और गुणोंका आदेशवशात्
कथंचित् भेद है तथापि, वे एक अस्तित्वमें नियत होनेके कारण अन्योन्यवृत्ति नहीं
छोड़ते इसलिये वस्तुरूपसे उनका भी अभेद है ( अर्थात् द्रव्य और पर्यायोंकी भांति
द्रव्य और गुणोंका भी वस्तुरूपसे अभेद है । ) । १३ ।
गाथा १४
अन्वयार्थः-[ द्रव्यं ] द्रव्य [ आदेशवशेन ] प्रादेशवशात् (-कथनके वश )
[खलु ] वास्तवमें [ स्यात् अस्ति ] स्यात् अस्ति, [ नास्ति ] स्यात् नास्ति, [ उभयम् ]
स्यात् अस्ति-नास्ति, [ अवक्तव्यम् ] स्यात् अवक्तव्य [ पुनः च] और फिर
[ तस्त्रितयम् ] अवक्तव्यतायुक्त तीन भंगवाला (-स्यात् अस्ति-अवक्तव्य, स्यात् नास्ति-
अवक्तव्य और स्यात् अस्ति-नास्ति-प्रवक्तव्य )-[ सप्तभङ्गम् ] इसप्रकार सात भंगवाला
[ सम्भवति ] है।
टीका:-यहां द्रव्यके आदेशके वश सप्तभंगी कही है।
(१) द्रव्य 'स्यात् अस्ति' है; (२) द्रव्य 'स्यात् नास्ति' है; (३) द्रव्य
'स्यात् अस्ति और नास्ति' है; (४) द्रव्य 'स्यात् अवक्तव्य' है; (५) द्रव्य 'स्यात्
.
छे अस्ति, नास्ति, उभय तेम अवाच्य आदिक भंग जे ।
आदेशवश ते सात भंगे युक्त सर्वे द्रव्य छ ॥ १४ ॥

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ३३ - -- नेकान्तद्योतकः कथंचिदर्थे स्याच्छब्दो निपातः । तत्र स्वद्रव्यक्षेत्रकालभारादिष्टमस्ति· द्रव्यं, परद्रव्यक्षेत्रकालभावैरादिष्टं नास्ति द्रव्यं, स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावैः परद्रव्यक्षेत्रकालभावैश्च क्रमेणादिष्टमस्ति च नास्तिच द्रव्यं , स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावैः परद्रव्यक्षेत्रकालभावैश्च युगपदादिष्टम- वक्तव्यं द्रव्यं, स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावयुगपत्स्वपरद्रव्यक्षेत्रकालभावश्चादिष्टमस्ति चावक्तव्यं च द्रव्यं , परद्रव्यक्षेत्रकालभावयुगपत्स्वपरद्रव्य क्षेत्रकालभावैश्चादिष्टं नास्ति चावक्तव्यं च द्रव्यं, स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावैः परद्रव्यक्षेत्रकालभात्रैश्च युगपत्स्वपरद्रव्यक्षेत्रकालभावश्चादिष्टमस्ति च अस्ति और अवक्तव्य' है; (६) द्रव्य 'स्यात् नास्ति और प्रवक्तव्य' है; (७) द्रव्य 'स्यात् अस्ति, नास्ति और प्रवक्तव्य' है। यहाँ ( सप्तभंगीमें ) सर्वथापनेका निषेधक, अनेकान्तका द्योतक "स्यात्' शब्द 'कथंचित्' ऐसे अर्थ में अव्ययरूपसे प्रयुक्त हुआ है । वहाँ-(१) द्रव्य स्वद्रव्य-क्षेत्र- काल-भावसे कथन किया जाने पर 'अस्ति' है; (२) द्रव्य परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे कथन किया जाने पर 'नास्ति' है, (३) द्रव्य स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे और परद्रव्य- क्षेत्र-काल-भावसे क्रमशः कथन किया जाने पर 'अस्ति और नास्ति' है; (४) द्रव्य स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे और परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे युगपद् कथन किया जाने पर "प्रवक्तव्य' है; (५) द्रव्य स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे और युगपद् स्वपर-द्रव्य-क्षेत्र-काल भावसे कथन किया जानेपर 'अस्ति और अवक्तव्य' है; (६) द्रव्य परद्रव्य-क्षेत्र-काल- भावसे और युगपद् स्वपरद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे कथन किया जाने पर 'नास्ति और अवक्तव्य' है; (७) द्रव्य स्वद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे, परद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे और युगपद् स्वपरद्रव्य-क्षेत्र-काल-भावसे कथन किया जाने पर 'अस्ति, नास्ति और अवक्तव्य' है। यह ( उपरोक्त वात ) अयोग्य नहीं है, क्योंकि सर्व वस्तु (१) स्वरूपादिसे "अशून्य' है, (२) पररूपादिसे "शून्य' है, (३) दोनोंसे ( स्वरूपादिसे और पर- १. स्यात् = कथंचित् ; किसी प्रकार; किसी अपेक्षासे । ('स्यात्' शब्द सर्वथापनेका निषेध करता है और अनेकान्तको प्रकाशित करता है-दर्शाता है।) २. अवक्तव्य जो कहा न जा सके; अवाच्य । (एक ही साथ स्वचतुष्टय तथा परचतुष्टयकी अपेक्षासे द्रव्य कथनमें नहीं आसकता इसलिये 'प्रवक्तव्य' है।) ३. अशून्य = जो शून्य नहीं है ऐसा; अस्तित्ववाला; सत् । ४. शून्य = जिसका अस्तित्व नहीं है ऐसा; असत् । ५ ३४ पंचास्तिकायसंग्रह .. नास्ति चावक्तव्यं च द्रव्यमिति । न चैतदनुपपन्नम्। सर्वस्य वस्तुनः स्वरूपादिना अशून्यत्वात्, पररूपादिना शून्यत्वात् , उभाभ्यामशून्यशून्यत्वात्, सहावाच्यत्वात् , भङ्गसंयोगार्पणायामशून्या- वाच्यत्वात्, शून्यावाच्यत्वात् , अशून्यशून्यावाच्यत्वाच्चेति ।। १४ ।। भावस्स पत्थि णासो पत्थि अभावस्स चेव उप्पादो। गुणपज्जएसु भावा उप्पादवए पकुव्वति ।। १५ ।। भावस्य नास्ति नाशो नास्ति अभावस्य चैव उत्पादः । गुणपर्यायेपु भावा उत्पादन्ययान् प्रकुर्वन्ति ॥ १५ ॥ रूपादिसे ) 'अशून्य और शून्य' है, (४) दोनोंसे ( स्वरूपादिसे और पररूपादिसे ) एक ही साथ 'अवाच्य' है, भंगोंके संयोगसे कथन करने पर (५) 'अशून्य और अवाच्य' है, (६) 'शून्य और अवाच्य' है, (७) 'अशून्य, शून्य और अवाच्य' है । भावार्थः-(१) द्रव्य *स्वचतुष्टयकी अपेक्षासे 'है ।' (२) द्रव्य परचतुष्टयकी अपेक्षासे 'नहीं है ।' (३) द्रव्य क्रमशः स्वचतुष्टयकी और परचतुष्टयकी अपेक्षासे 'है और नहीं है।' (४) द्रव्य युगपद् स्वचतुष्टयकी और परचतुष्टयकी अपेक्षासे 'प्रवक्तव्य है ।' (५) द्रव्य स्वचतुष्टयकी और युगपद् स्वपरचतुष्टयकी अपेक्षासे 'है और अवक्तव्य है।' (६) द्रव्य परचतुष्टयकी और युगपद् स्वपरचतुष्टयको अपेक्षासे 'नहीं और अवक्तव्य है।' (७) द्रव्य स्वचतुष्टयकी, परचतुष्टयकी और युगपद् स्वपरचतुष्टयकी अपेक्षासे 'है, नहीं है और अवक्तव्य है ।'—इसप्रकार यहां सप्तभंगी कही गई ।१४। गाथा १५ अन्वयार्थः-[ भावस्य ] भावका ( सत्का ) [ नाशः ] नाश [ न अस्ति ] नहीं है [च एव ] तथा [ अभावस्य ] अभावका (असत्का) [ उत्पादः] उत्पाद [ न अस्ति ] नहीं है; [ भावाः ] भाव ( सत् द्रव्यों ) [गुणपर्यायेषु ] गुणपर्यायोंमें [ उत्पादव्ययान् ] उत्पादव्यय [ प्रकुर्वन्ति ] करते हैं। * स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावको स्वचतुष्टय कहा जाता है। स्वद्रव्य अर्थात् निज गुण- पर्यायोंके आधारभूत वस्तु स्वयं; स्वक्षेत्र अर्थात् वस्तुका निज विस्तार अर्थात् स्वप्रदेशसमूह; स्वकाल अर्थात् वस्तुकी अपनी वर्तमान पर्याय; स्वभाव अर्थात् निजगुणस्वशक्ति । नहि 'भाव' केरो नाश होय, 'अभाव'नो उत्पाद ना । 'भावों' करे के नाश ने उत्पाद गुणपर्यायमा ।।१५।। . - षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ३५ अत्रासत्प्रादुर्भावत्वमुत्पादस्य सदुच्छेदत्वं विगमस्य निषिद्धम् । भावस्य सतो हि द्रव्यस्य न द्रव्यत्वेन विनाशः, अभावस्यासतोऽन्यद्रव्यस्य न द्रव्यत्वेनोत्पादः, किन्तु भावाः सन्ति द्रव्याणि सदुच्छेदमसदुत्पादं चान्तरेणैव गुणपर्यायेषु विनाशमुत्पादं चारभन्ते । यथा हि घृतोत्पत्तौ गोरसस्य सतो न विनाशः, न चापि गोरसव्यतिरिक्तस्यार्थान्तरस्यासतः उत्पादः किन्तु गोरसस्यैव सदुच्छेदमसदुत्पादं चानुपलभमानस्य स्पर्शरसगन्धवर्णादिषु परिणामिषु गुणेषु पूर्वावस्थया विनश्यत्युत्तरावस्थया प्रादुर्भवत्सु नश्यति च नवनीतपर्यायो घृतपर्याय उत्पद्यते, तथा सर्वभावानामपीति ॥१॥ टीका:-यहां उत्पादमें असत्के प्रादुर्भावका और व्ययमें सबके विनाशका निषेध किया है ( अर्थात् उत्पाद होनेसे कहीं असत्की उत्पत्ति नहीं होती और व्यय होनेसे कहीं सत्का विनाश नहीं होता-ऐसा इस गाथामें कहा है । भावका-सत् द्रव्यका-द्रव्यरूपसे विनाश नहीं है, अभावका-असत् अन्य द्रव्यका-द्रव्यरूपसे उत्पाद नहीं है; परन्तु भाव-सत् द्रव्यों, सत्के विनाश और असत्के उत्पाद बिना ही, गुणपर्यायोंमें विनाश और उत्पाद करते हैं। जिसप्रकार घीकी उत्पत्तिमें गोरसका-सत्का-विनाश नहीं है तथा गोरससे भिन्न पदार्थान्तर- का-असत्का-उत्पाद नहीं है, किन्तु गोरसको ही सत्का विनाश और असत्का उत्पाद किये बिना ही, पूर्व अवस्थासे विनाशको प्राप्त होनेवाले और उत्तर अवस्थासे उत्पन्न होनेवाले स्पर्श-रस-गंध-वर्णादिक परिणामी गुणोंमें मक्खनपर्याय विनाशको प्राप्त होती है तथा घीपर्याय उत्पन्न होती है; उसीप्रकार सर्व भावोंका भी वैसा ही है [ अर्थात् समस्त द्रव्योंको नवीन पर्यायकी उत्पत्तिमें सत्का विनाश नहीं है तथा असत्का उत्पाद नहीं है; किन्तु सत्का विनाश और असत्का उत्पाद किये बिना ही, पहलेकी (पुरानी) अवस्थासे विनाशको प्राप्त होनेवाले और बादकी (नवीन) अवस्थासे उत्पन्न होनेवाले परिणामी गुणोंमें पहलेकी पर्यायका विनाश और बादकी पर्यायकी उत्पत्ति होती है। ] * परिणामी परिणमित होनेवाले; परिणामवाले । ( पर्यायाथिकनयसे गुण परिणामी हैं अर्थात् परिणमित होते हैं । ) ३६ पंचास्तिकायसंग्रह . : भावा जीवादीया जीवगुणा चेदणा य उवनोगो । सुरणरणारयतिरिया जीवस्स य पज्जया बहुगा ॥१६॥ भावा जीवाद्या जीवगुणाश्चेतना चोपयोगः । सुरनरनारकतियश्चो जीवस्य च पर्यायाः बहवः ।।१६।। यत्र भावगुणपर्यायाः प्रज्ञापिताः । भावा हि जीवादयः पट पदार्थाः । तेषां गुणाः पर्यायाश्च प्रसिद्धाः । तथापि जीवस्य वक्ष्यमाणोदाहरणप्रसिद्धयर्थमभिधीयन्ते । गुणा हि गाथा १६ अन्वयार्थः- [जीवाद्याः ] जीवादि ( द्रव्य ) वे [ भावाः ] 'भाव' हैं । [ जीव- गुणाः].जीवके गुण [ चेतना च उपयोगः] चेतना तथा उपयोग हैं [च] और [ जीवस्य पर्यायाः ] जीवकी पर्यायें [ सुरनरनारकतिर्यश्चः ] देव-मनुष्य-नारक-तिर्यञ्चरूप [ यहवा ] अनेक हैं.। टीकाः-यहाँ भावों (-द्रव्यों ), गुणों और पर्यायें वतलाये हैं। जीवादि छह पदार्थ वे 'भाव' हैं । उनके गुण और पर्यायें प्रसिद्ध हैं; तथापि 'आगे ( अगली गाथामें ) जो उदाहरण देना है उसकी प्रसिद्धिके हेतु जीवके गुणों और पर्यायोंका कथन किया जाता है:- जीवके गुणों ज्ञानानुभूतिस्वरूप शुद्धचेतना तथा कार्यानुभूतिस्वरूप और - कर्मफलानुभूतिस्वरूप अशुद्धचेतना हैं और चैतन्यानुविधायी-परिणामस्वरूप, सविकल्प- १. अगली गाथामें जीवकी वात उदाहरणके रूप में लेना है। इसलिये उस उदाहरणको प्रसिद्ध करनेके लिये यहाँ जीवके गुणों और पर्यायोंका कथन किया गया है । २. शुद्धचेतना ज्ञानकी अनुभूति स्वरूप है और अशुद्धचेतना कर्मकी तथा कर्मफलकी अनुभूति- स्वरूप है। चैतन्य-अनुविधायी परिणाम अर्थात् चैतन्यका अनुसरण करनेवाला परिणाम वह उपयोग है । सविकल्प उपयोगको ज्ञान और निर्विकल्प उपयोगको दर्शन कहा जाता है। ज्ञानोपयोगके भेदों- मेंसे मात्र केवलज्ञान ही शुद्ध होनेसे सकल ( अखण्ड, परिपूर्ण ) है और अन्य सव अशुद्ध होनेसे विकल ( खण्डित, अपूर्ण) हैं; दर्शनोपयोगके भेदोंमेंसे मात्र केवलदर्शन ही शुद्ध होनेसे सकल है और अन्य सव अशुद्ध होनेसे विकल हैं। जीवादि सौ छे 'भाव', जीवगुण चेतना उपयोग छ । नीवपर्ययो तिर्यंच-नारक-देव-मनुज अनेक छे ।।१६।। --

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
३७
-
-
जीवस्य ज्ञानानुभूतिलक्षणा शुद्धचेतना, कार्यानुभूतिलक्षणां कर्मफलानुभूतिलक्षणा चाशुद्धचेतना,
चैतन्यानुविधायिपरिणामलक्षणः सविकल्पनिर्विकल्परूपः शुद्धाशुद्धतया सकलविकलतां दधानो
दूधोपयोगश्च । पर्यायास्त्वगुरुलघुगुणहानिवृद्धिनिर्वृत्ताः शुद्धाः, सूत्रोपाचास्तु सुरनारकतियङ्-
मनुष्यलक्षणाः परद्रव्यसंवन्धनिवृत्तत्वादशुद्धाश्चेति ।। १६ ।।
मरणुसत्तणेण गट्ठो देही देवो हवेदि इदरो वा ।
उभयत्थ जीवभावो गणस्सदि रण जायदे अपणो ॥१७॥
मनुष्यत्वेन नष्टो देही देवो भवतीतरो वा ।
उभयत्र जीवभावो न नश्यति न जायतेऽन्यः॥१७॥
इदं भावनाशाभावोत्पादनिषेधोदाहरणम् । प्रतिसमयसंभवदगुरुलघुगुणहानिवृद्धिनिर्वृत्त-
निर्विकल्परूप, शुद्धता-अशुद्धताके कारण सकलता-विकलता धारण करनेवाला दो
-प्रकारका उपयोग है (अर्थात् जीवके 'गुणों शुद्ध-अशुद्ध चेतना तथा दो प्रकारके
• उपयोग हैं ।)
जीवकी पयायें इसप्रकार हैं:-अगुरुलघुगुणकी हानिवृद्धिसे उत्पन्न होनेवाली
पर्यायें शुद्ध पर्यायें हैं और सूत्रमें (-इस गाथामें ) कही हुई, देव-नारक-तिर्यंच-मनुष्य-
स्वरूप पर्यायें परद्रव्यके सम्बन्धसे उत्पन्न होती हैं इसलिये अशुद्ध पर्यायें हैं ।१६।
i.
गाथा १७
अन्वयार्थः-[ मनुष्यत्वेन ] मनुष्यत्वसे [नष्टः ] नष्ट हुआ [ देही ] देही
(जीव) [ देवा वा इतरः ] देव अथवा अन्य [ भवति ] होता है; [ उभयत्र ] उन
दोनोंमें [ जीवभावः ] जीवभाव [ न नश्यति ] नष्ट नहीं होता और [अन्यः ] दूसरा
जीवभाव [ न जायते ] उत्पन्न नहीं होता।
टीका:-'भावका नाश नहीं होता और अभावका उत्पाद नहीं होता' उसका
यह उदाहरण है।
१. पर्यायाथिकनयसे गुण भी परिणामी हैं । ( देखिये, १५ वीं गाथा की टीका ।)
मनुजत्वथी व्यय पामीने देवादि देही थाय छ।
त्यांजीव भाव न नाश पामे, अन्य नहि उद्भव लहे॥१७॥

३८
पंचास्तिकायसंग्रह
.
स्वभावपर्यायसंतत्यविच्छेदकेनकेन सोपाधिना मनुष्यत्वलक्षणेन पर्यायेण विनश्यति जीवः,
तथाविधेन देवत्वलक्षणेन नारकतिर्यक्त्वलक्षणेन वान्येन पर्यायेणोत्पद्यते । न च मनुष्यत्वेन
नाशे जीवत्वेनापि नश्यति, देवत्वादिनोत्पादे जीवत्वेनाप्युत्पद्यते; किंतु सदुच्छेदमसदुत्पादमन्तरेणैव
तथा विवर्तत इति ॥ १७॥
सो चेव जादि मरणं जादि ण णट्टो ण चेव उप्पण्णो ।
उप्पण्णो य विणट्ठो देवो मणुसो त्ति पज्जारो ॥१८॥
स च एव याति मरणं याति न नष्टो न चैवोत्पन्नः ।
उत्पन्नश्च विनष्टो देवो मनुष्य इति पर्यायः ॥१८॥
अत्र कथंचिद्व्ययोत्पादवत्त्वेऽपि द्रव्यस्य सदाविनष्टानुत्पन्नत्वं ख्यापितम् । यदेव
पूर्वोत्तरपर्यायविवेकसंपर्कापादितामुभयीमवस्थामात्मसात्कुर्वाणमुच्छिद्यमानमुत्पद्यमानं च द्रव्य-
प्रतिसमय होनेवाली अगुरुलघुगुणकी हानिवृद्धिसे उत्पन्न होनेवाली स्वभाव-
पर्यायोंकी संततिका विच्छेद न करनेवाली एक सोपाधिक मनुष्यत्वस्वरूप पर्यायसे जीव
विनाशको प्राप्त होता है और तथाविध (-स्वभावपर्यायोंके प्रवाहको न तोड़नेवाली
सोपाधिक ) देवत्वस्वरूप, नारकत्वस्वरूप या तिर्यंचत्वस्वरूप अन्य पर्यायसे उत्पन्न
होता है । वहाँ ऐसा नहीं है कि मनुष्यत्वसे विनष्ट होने पर जीवत्वसे भी नष्ट होता है
और देवत्व आदिसे उत्पाद होने पर जीवत्वसे भी उत्पन्न होता है, किन्तु सत्के
उच्छेद और असत्के उत्पाद बिना ही तदनुसार विवर्तन (-परिवर्तन, परिणमन )
करता है । १७ ।
गाथा १८
अन्वयार्थः-[सः च एव ] वही [ याति ] जन्म लेता है और [ मरणं याति ]
मृत्यु प्राप्त करता है तथापि [ न एव उत्पन्नः ] वह उत्पन्न नहीं होता [च ] और
[ न नष्टः ] नष्ट नहीं होता; [ देवः मनुष्यः ] देव, मनुष्य [ इति पर्यायः] ऐसी पर्याय
[ उत्पन्नः ] उत्पन्न होती है [च ] और [ विनष्टः ] विनष्ट होती है।
टीका:-यहाँ, द्रव्य कथंचित् व्यय और उत्पादवाला होने पर भी उसका
सदैव अविनष्टपना और अनुत्पन्नपना कहा है ।
जन्में मरे छे ते ज, तोपण नाश-उद्भव नव लहे ।
सुर-मानवांदिक पर्ययो उत्पन्न ने लय थाय छे ॥१८॥

षड्दव्य-प्रचास्तिकायवर्णन
३६
-
मालक्ष्यते, तदेव तथाविधोभयावस्थाव्यापिना प्रतिनियतैकवस्तुत्वनिबन्धनभूतेन स्वभावेनाविनष्ट-
मनुत्पन्नं वा वेद्यते । पर्यायास्तु तस्य पूर्वपूर्वपरिणामोपमर्दोत्तरोत्तरपरिणामोत्पादरूपाः प्रणाश-
संभवधर्माणोऽभिधीयन्ते । ते च वस्तुत्वेन द्रव्यादपृथग्भूता एवोक्ताः । ततः पर्यायैः सहैकवस्तु-
त्वान्जायमानं म्रियमाणमपि जीवद्रव्यं सर्वदानुत्पन्नाविनष्टं द्रष्टव्यम् । देवमनुष्यादिपर्यायास्तु
क्रमवर्तित्वादुपस्थितातिवाहितस्वसमया उत्पद्यन्ते विनश्यन्ति चेति ॥१८॥
एवं सदो विरणासो असदो जीवस्स रणत्थि उप्पादो।
तावदियो जीवारणं देवो मणुसो त्ति गदिणामो ॥१६॥
एवं सतो विनाशोऽसतो जीवस्य नास्त्युत्पादः ।
तावज्जीवानां देवो मनुष्य इति गतिनाम ||१९।।
जो द्रव्य 'पूर्व पर्यायके वियोगसे और उत्तर पर्यायके संयोगसे होनेवाली
उभय अवस्थाओंको आत्मसात् ( अपने रूप ) करता हुआ विनष्ट होता और उपजता
दिखाई देता है, वही (द्रव्य) वैसी उभय अवस्थाओं में व्याप्त होनेवाला जो प्रतिनियत-
एकवस्तुत्वके कारणभूत स्वभाव उसके द्वारा (-उस स्वभावकी अपेक्षासे) अविनष्ट एवं
अनुत्पन्न ज्ञात होता है; उसकी पर्यायें पूर्व-पूर्व परिणामके नाशरूप और उत्तर-उत्तर
परिणामके उत्पादरूप होनेसे विनाश-उत्पादधर्मवाली (-विनाश एवं उत्पादरूप धर्म-
वाली ) कही जाती हैं; और वे ( पर्यायें ) वस्तुरूपसे द्रव्यसे अपृथग्भूत ही कही गई
हैं । इसलिये, पर्यायोंके साथ एकवस्तुपनेके कारण जन्मता और मरता होने पर भी
जीवद्रव्य सर्वदा अनुत्पन्न एवं अविनष्ट ही देखना (-श्रद्धा करना); देव-मनुष्यादि
पर्यायें उपजती हैं और विनष्ट होती हैं क्योंकि वे क्रमवर्ती होनेसे उनका स्वसमय उपस्थित
होता है और बीत जाता है । १८ ।
गाथा १९
अन्वयार्थ:-[ एवं ] इसप्रकार [ जीवस्य ] जीवको [ सतः विनाशः ] सत्का
विनाश और [ असतः उत्पादः ] असत्का उत्पाद [ न अस्ति ] नहीं है; ('देव जन्मता है
१. पूर्व-पहलेकी। २. उत्तरबादकी।
मेरीत सत् व्यय ने असत्-उत्पाद होय न जीवने ।
सुरनरप्रमुख गतिनामनो हदयुक्त काल ज होय छे ॥१९॥

४० पंचास्तिकायसंग्रह . . अत्र सदसतोरविनाशानुत्पादौ स्थितिपक्षत्वेनोपन्यस्तौ । यदि हि जीवो य एव म्रियते स एव जायते, य एव जायते स एव म्रियते, तदैवं सतो विनासोऽसत उत्पादश्च नास्तीति व्यवतिष्ठते । यत्तु देवो जायते मनुष्यो म्रियते इति व्यपदिश्यते तदवधृतकालदेवमनुष्यत्वपर्याय निर्वर्तकस्य देवमनुष्यगतिनाम्नस्तन्मात्रत्वादविरुद्धम् । यथा हि महतो वेणुदण्डस्यैकस्य क्रम- वृत्तीन्यनेकानि पर्वाण्यात्मीयात्मीयप्रमाणावच्छिन्नत्वात् पर्वान्तरमगच्छन्ति स्वस्थानेषु भावभाजि परस्थानेष्वभावभाजि भवन्ति, वेणुदण्डस्तु सर्वेष्वपि पर्वस्थानेषु भावभागपि पर्वान्तरसंबन्धेन पर्वान्तरसंवन्धाभावादभावभाग्भवति; तथा निरवधित्रिकालावस्थायिनो जीवद्रव्यस्यैकस्य क्रम- वृत्तयोऽनेके मनुष्यत्वादिपर्याया आत्मीयात्मीयप्रमाणावछिन्नत्वात् पर्यायान्तरमगच्छन्तः . और मनुष्य मरता है'-ऐसा कहा जाता है उसका यह कारण है कि ) [ जीवानाम् ] जीवोंको [ देवः मनुष्यः ] देव, मनुष्य [ इति गतिनाम ] ऐसा गतिनामकर्म [ तावत् ] उतने ही कालका होता है । टीका:-यहाँ सत्का अविनाश और असत्का अनुत्पाद ध्रुवताके पक्षसे कहा है ( अर्थात् ध्रुवताकी अपेक्षासे सत्का विनाश या असत्का उत्पाद नहीं होता-ऐसा इस गाथामें कहा है । ) यदि वास्तवमें जो जीव मरता है वही जन्मता है और जो जीव जन्मता है वही मरता है, तो इसप्रकार सत्का विनाश और असत्का उत्पाद नहीं है ऐसा निश्चित होता है । और 'देव जन्मता है तथा मनुष्य मरता है ऐसा जो कहा जाता है वह (भी) अविरुद्ध है क्योंकि मर्यादित कालकी देवत्वपर्याय और मनुष्यत्वपर्यायको रचनेवाले देव- गतिनामकर्म और मनुष्यगतिनामकर्म मात्र उतने काल जितने ही होते हैं। जिसप्रकार एक बड़े बाँसके क्रमवर्ती अनेक 'पर्व अपने-अपने मापमें मर्यादित होनेसे अन्य पर्वमें न जाते हुए अपने-अपने स्थानोंमें भाववाले (-विद्यमान) हैं और परस्थानोंमें अभाववाले (-अविद्यमान) हैं तथा बाँस तो समस्त पर्वस्थानोंमें भाववाला होने पर भी अन्य पर्वके सम्बन्ध द्वारा अन्य पर्वके सम्बन्धका अभाव होनेसे अभाववाला (भी) है; उसीप्रकार निरवधि त्रिकाल स्थित रहनेवाले एक जीवद्रव्यकी क्रमवर्ती अनेक मनुष्यादिपर्यायें अपने-अपने मापमें मर्यादित होनेसे अन्यं पर्यायमें न जाती हुई अपने-अपने स्थानों १. पर्व=एक गाँठसे दूसरी गाँठ तकका भाग; पोर ।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ४१ स्वस्थानेषु भावभाजः परस्थानेष्वभावभाजो भवन्ति, जीवद्रव्यं तु सर्वपर्यायस्थानेषु भावभागपि पर्यायान्तरसंवन्धेन पर्यायान्तरसंवन्धाभावादभावभाग्भवति ।। १९ ।। णाणावरणादीया भावा जीवेण सुट्ठ अणुबद्धा । तेसिमभावं किच्चा प्रभूदपुवो हवदि सिद्धो ॥२०॥ ज्ञानावरणाद्या भावा जीवेन सुष्टु अनुबद्धाः । तेषामभावं कृत्वाऽभूतपूर्वो भवति सिद्धः ॥ २० ॥ भाववाली हैं और परस्थानोंमें अभाववाली हैं तथा जीव द्रव्य तो सर्वपर्यायस्थानोंमें भाववाला होने पर भी अन्य पर्यायके सम्बन्ध द्वारा अन्य पर्यायके सम्बन्धका अभाव होनेसे अभाववाला (भी) है । भावार्थ:-जीवको ध्रौव्य अपेक्षासें सत्का विनाश और असत्का उत्पाद नहीं है। 'मनुष्य मरता है और देव जन्मता हैं'-ऐसा जो कहा जाता है वह बात भी उपरोक्त विवरणके साथ विरोधको प्राप्त नहीं होती। जिसप्रकार एक बड़े बांसकी अनेक पोरें अपने-अपने स्थानोंमें विद्यमान हैं और दूसरी पोरोंके स्थानोंमें अविद्यमान हैं तथा बांस तो सर्व पोरोंके स्थानोंमें अन्वयरूपसे विद्यमान होने पर भी प्रथमादि पोरके रूपमें द्वितीयादि पोरमें न होनेसे अविद्यमान भी कहा जाता है; उसीप्रकार त्रिकाल- अवस्थायी एक जीवकी नरनारकादि अनेक पर्यायें अपने-अपने कालमें विद्यमान हैं और दूसरी पर्यायोंके कालमें अविद्यमान हैं तथा जीव तो सर्व पर्यायोंमें अन्वयरूपसे विद्यमान होने पर भी मनुष्यादिपर्यायरूपसे देवादिपर्यायमें न होनेसे अविद्यमान भी कहा जाता है । १६ । गाथा २० अन्वयार्थः-[ ज्ञानावरणाद्याः भावाः ] ज्ञानावरणादि भाव [ जीवेन ] जीवके साथ [ सुष्ठ ] भलीभांति [ अनुबद्धाः ] अनुबद्ध हैं; [ तेषाम् अभावं कृत्वा ] उनका अभाव करके वह [ अभूतपूर्वः सिद्धः] अभूतपूर्व सिद्ध [ भवति ] होता है। ज्ञानावरण इत्यादि भावो जीव सह अनुबद्ध छ। तेनो करीने नाश, पामे जीव सिद्धि अपूर्वने ॥२०॥ w ४२ पंचास्तिकायसंग्रह .. अत्रात्यन्तासदुत्पादत्वं सिद्धस्य निषिद्धम् । यथा स्तोककालान्वयिपु नामकर्मविशेपो- दयनिर्वृत्तेषु जीवस्य देवादिपर्यायेष्वकस्मिन् स्वकारणनिवृत्ती निवृत्तेऽभूतपूर्व एव चान्यस्मि- न्नुत्पन्ने नासदुत्पत्तिः, तथा दीर्घकालान्वयिनि ज्ञानावरणादिकर्मसामान्योदयनिर्वृत्तसंसारित्व- पर्याये भव्यस्य स्वकारणनिवृत्तौ निवृत्ते समुत्पन्ने चाभूतपूर्दै सिद्धत्वपर्याये नासदुत्पचिरिति । किं च-यथा द्राधीयसि वेणुदण्डे व्यवहिताव्यवहितविचित्रचित्रकिरितासचिंताधस्तनार्धभागे एकान्तव्यवहितसुविशुद्धोधिभागेऽवतारिता दृष्टिः समन्ततो विचित्रचित्रकिर्मीरताव्याप्ति पश्यन्ती समनुमिनोति तस्य सर्वत्राविशुद्धत्वं, तथा क्वचिदपि जीवद्रव्ये व्यवहिताव्यवहितज्ञा- - टीका:-यहाँ सिद्धको अत्यन्त असत्-उत्पादका निषेध किया है (अर्थात् सिद्धत्व , होनेसे सर्वथा असत्का उत्पाद नहीं होता ऐसा कहा है )। : जिसप्रकार कुछ समय तक अन्वयरूपसे (-साथ-साथ) रहनेवाले नामकर्म- विशेषके उदयसे उत्पन्न होनेवाली जो देवादिपर्यायें उनमेंसे जीवको एक पर्याय स्वकारण की निवृत्ति होने पर निवृत्त हो तथा अन्य कोई अभूतपूर्व पर्याय ही उत्पन्न हो, वहाँ असत्की उत्पत्ति नहीं है; उसीप्रकार दीर्घकाल तक अन्वयरूपसे रहनेवाली ज्ञानावरणा- दिकर्मसामान्यके उदयसे उत्पन्न होनेवाली संसारित्वपर्याय भव्यको स्वकारणकी निवृत्ति होने पर निवृत्त हो और अभूतपूर्व (-पूर्वकालमें नहीं हुई ऐसी) सिद्धत्वपर्याय उत्पन्न हो, वहाँ असत्की उत्पत्ति नहीं है । पुनश्च ( विशेष समझाया जाता है ):- जिसप्रकार जिसका विचित्र चित्रोंसे चित्रविचित्र नीका अर्ध भाग कुछ ढंका हुआ और कुछ बिन ढंका हो तथा सुविशुद्धं (-अचित्रित ) ऊपरका अर्ध भाग मात्र ढंका हुआ ही हो ऐसे बहुत लम्बे बाँस पर दृष्टि डालनेसे वह दृष्टि सर्वत्र विचित्र चित्रोंसे हुए चित्रविचित्रपनेकी व्याप्तिका निर्णय करती हुई "वह बांस सर्वत्र अविशुद्ध है ( अर्थात् सम्पूर्ण -रंगबिरंगा है)". ऐसा अनुमान करती है; उसीप्रकार जिसका ज्ञाना- वरणादि कर्मोंसे हुआ चित्रविचित्रतायुक्त (-विविध विभावपर्यायवाला) बहुत बड़ा नीचेका भाग कुछ ढंका हुआ और कुछ बिन ढंका है.तथा सुविशुद्ध. (सिद्धपर्यायवाला ), बहुत बड़ा ऊपरका भाग मात्र ढंका हुआ ही है ऐसे-किसी-जीवद्रव्यमें बुद्धि लगाने से. वह बुद्धि सर्वत्र ज्ञानावरणादि कर्मसे हुए चित्रविचित्रपनेकी व्याप्तिका निर्णय करती हुई 'वह जीव सर्वत्र अविशुद्ध है ( अर्थात् सम्पूर्ण संसारपर्यायवाला है:) ऐसा अनुमान षद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन नावरणादिकर्मनिर्भीरताखचितबहुतराधस्तनमागे एकान्तव्यवहितसुविशुद्धबहुतरोयभागेऽवतारिता घुद्धिः समन्ततो ज्ञानावरणादिकर्मकिर्मीरताव्याप्ति व्यवस्यन्ती समनुमिनोति तस्य सर्वत्राविशुद्ध- त्वम् । यथा च तत्र वेणुदण्डे व्याप्तिज्ञानाभासनिवन्धनविचित्रचित्रकिर्मीरतान्वयः, तथा च क्वचिज्जीवद्रव्ये ज्ञानावरणादिकर्म किर्मीरतान्वयः । यथैव च तत्र वेणुदण्डे विचित्रचित्रकिर्मीर- करती है । पुनश्च, जिसप्रकार उस बांसमें व्याप्तिज्ञानाभासका कारण ( नीचेके खुले भागमें ) विचित्र चित्रोंसे हुए चित्रविचित्रपनेका अन्वय (-संतति, प्रवाह ) है, उसी- प्रकार उस जीवद्रव्यमें व्याप्तिज्ञानाभासका कारण (नीचेके खुले भागमें) ज्ञानावरणादि कर्मसे हुए चित्रविचित्रपनेका अन्वय है । और जिसप्रकार उस बाँसमें (ऊपरके भागमें) सुविशुद्धपना है क्योंकि (वहाँ) विचित्र चित्रोंसे हुए चित्रविचित्रपनेके अन्वयका अभाव है, उसीप्रकार उस जीवद्रव्यमें (ऊपरके भागमें) सिद्धपना है क्योंकि (वहाँ) ज्ञाना- वरणादि कर्मसे हुए चित्रविचित्रपनेके अन्वयका अभाव है कि जो अभाव आप्त- आगमके ज्ञानसे, सम्यक् अनुमानज्ञानसे और अतीन्द्रियज्ञानसे ज्ञात होता है। भावार्थ:- संसारी जीवकी प्रगट संसारी दशा देखकर अज्ञानी जीवको भ्रम उत्पन्न होता है कि-'जीव सदा संसारी ही रहता है, सिद्ध हो ही नहीं सकता; यदि सिद्ध हो तो सर्वथा असत्-उत्पादका प्रसंग उपस्थित हो।' किन्तु अज्ञानीकी यह बात योग्य नहीं है। जिसप्रकार जीवको देवादिरूप एक पर्यायके कारणका नाश होने पर उस पर्यायका नाश होकर अन्य पर्यायकी उत्पत्ति होती है, जीवद्रव्य तो ज्योंका त्यों रहता है; उसीप्रकार जीवको संसारपर्यायके कारणभूत मोहरागद्वेषादिका नाश होने पर संसारपर्यायका नाश होकर सिद्धपर्याय उत्पन्न होती है, जीवद्रव्य तो वही रहता है । संसारपर्याय और सिद्धपर्याय दोनों एक ही जीवद्रव्यकी पर्यायें हैं। पुनश्च, अन्य प्रकारसे समझाते हैं:-मान लो कि एक लम्बा बांस खड़ा रखा गया है। उसका नीचेका कुछ भाग रंगबिरंगा किया गया है और शेष ऊपरका भाग अरंगी (-स्वाभाविक शुद्ध) है । उस बोसके रंगबिरंगे भागमेंसे कुछ भाग खुला रखा गया है और शेष सारा रंगबिरंगा भाग तथा पूरा अरंगी भाग ढंक दिया गया है। उस बांसका खुला रंगबिरंगा भाग देखकर अविचारी जीव 'जहां-जहां बांस हो वहां-वहां

पंचास्तिकायसंग्रह
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तान्वयाभावात्सुविशुद्धत्वं, तथैव च क्वचिजीवद्रव्ये ज्ञानावरणादिकर्मकिर्मीरतान्धयाभावादाप्ताग-
मसम्यगनुमानातीन्द्रियज्ञानपरिच्छिन्नासिद्धत्वमिति ॥२०॥
एवं भावमभावं भावाभावं अभावभावं च ।
गुणपज्जएहि सहिदो संसरमाणो कुणदि जीवो ॥२१॥
रंगबिरंगापन होता है' ऐसी व्याप्ति (नियम, अविनाभावसम्बन्ध ) की कल्पना कर
लेता है और ऐसे मिथ्या व्याप्तिज्ञान द्वारा ऐसा अनुमान खींच लेता है कि 'नीचेसे
ऊपर तक सारा वांस रंगविरंगा है।' यह अनुमान मिथ्या है; क्योंकि वास्तवमें तो
उस बांसका ऊपरी भाग रंगबिरंगेपनके अभाववाला, अरंगी है । बांसके दृष्टांतकी भांति-
कोई एक भव्य जीव है; उसका नोचेका कुछ भाग ( अर्थात् अनादिकालसे वर्तमान
काल तकका और अमुक भविष्य काल तकका भाग ) संसारी है और शेष ऊपरका
अनंत भाग सिद्धरूप (-स्वाभाविक शुद्ध) है । उस जीवके संसारी भागमेंसे कुछ भाग
खुला (प्रगट) है और शेष सारा संसारी भाग तथा पूरा सिद्धरूप भाग ढंका हुआ
(अप्रगट) है । उस जीवका खुला ( प्रगट ) भाग संसारी देखकर अज्ञानी जीव-'जहाँ-
जहां जीव हो वहां-वहां संसारीपना होता है। ऐसी व्याप्तिकी कल्पना कर लेता है और
ऐसे मिथ्या व्याप्तिज्ञान द्वारा ऐसा अनुमान करता है कि 'अनादि-अनंत सारा जीव
संसारी है।' यह अनुमान मिथ्या है; क्योंकि उस जीवका ऊपरका भाग (-अमुक
भविष्य कालके वादका अनंत भाग) संसारीपनेके अभाववाला है, सिद्धरूप है. ऐसा
सर्वज्ञप्रणीत आगमके ज्ञानसे, सम्यक् अनुमानज्ञानसे तथा अतीन्द्रिय ज्ञानसे स्पष्ट
ज्ञात होता है।
-इसतरह अनेक प्रकारसे निश्चित होता है कि जीव संसारपर्याय
नष्ट करके सिद्धपर्यायरूप परिणमित हो वहाँ सर्वथा असत्का उत्पाद नहीं
होता । २० ।
गुणपर्यये संयुक्त जीव संसरण करतो ये रीते ।
उद्भव, विलय, वणी भाव-विलय, अभाव-उद्भवने करे ॥२१॥

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ४५ एवं भावमभावं भावाभावमभावभावं च । गुणपर्ययैः सहितः संसरन् करोति जीवः ॥२१॥ जीवस्योत्पादव्ययसदुच्छेदासदुत्पादकर्तृत्वोपपत्त्युपसंहारोऽयम् । द्रव्यं हि सर्वदाऽ- विनष्टानुत्पन्नमाम्नातम् । ततो जीवद्रव्यस्य द्रव्यरूपेण नित्यत्वमुपन्यस्तम् । तस्यैव देवादि- पर्यायरूपेण प्रादुर्भवतो भावकर्तृत्वमुक्तं तस्यैव च मनुष्यादिपर्यायरूपेण व्ययतोऽभावकर्तृत्व- माख्यातं; तस्यैव च सतो देवादिपर्यायस्योच्छेदमारममाणस्य भावाभावकर्तृत्वमुदितं; तस्यैव चासतः पुनर्मनुष्यादिपर्यायस्योत्पादमारभमाणस्याभावभावकर्तृत्वमभिहितम् । सर्वमिदमनवयं गाथा २१ अन्वयार्थः- [ एवम् ] इसप्रकार [ गुणपर्ययः सहितः ] गुणपर्यायों सहित [ जीवः ] जीव [ संसरन् ] संसरण करता हुआ [ भावम् ] भाव, [ अभावम् ] अभाव, [ भावाभावम् ] भावाभाव [च ] और [ अभावभावम् ] अभावभावको [ करोति ] करता है। टीका:-यह, जीवको उत्पाद, व्यय, सत्-विनाश और असत्-उत्पादका कर्तृत्व होनेकी सिद्धिरूप उपसंहार है । द्रव्य वास्तवमें सर्वदा अविनष्ट और अनुत्पन्न आगममें कहा है; इसलिये जीवद्रव्यको द्रव्यरूपसे नित्यपना कहा गया। (१) देवादिपर्यायरूपसे उत्पन्न होता है इसलिये उसीको (-जीवद्रव्यको ही) भावका (-उत्पादका) कर्तृत्व कहा गया है। (२) मनुष्यादिपर्यायरूपसे नाशको प्राप्त होता है इसलिये उसीको अभावका (व्यय- का) कर्तृत्व कहा गया है; (३) सत् (विद्यमान) देवादिपर्यायका नाश करता है इसलिये उसीको भावाभावका ( सत्के विनाशका ) कर्तृत्व कहा गया है; और (४) फिरसे असत् (-अविद्यमान ) मनुष्यादिपर्यायका उत्पाद करता है इसलिये उसीको अभावभावका (-असत्के उत्पादका) कर्तृत्व कहा गया है । -यह सब निरवद्य (निर्दोष, निर्बाध, अविरुद्ध ) है, क्योंकि द्रव्य और पर्यायोंमेंसे एककी गौणतासे और अन्यकी मुख्यतासे कथन किया जाता है। वह इसप्रकार है:

४६ पंचास्तिकायसंग्रह - - द्रव्यपर्यायाणामन्यतरगुणमुख्यत्वेन व्याख्यानात् । तथा हि-यदा जीवः पर्यायगुणत्वेन द्रव्यमुख्यत्वेन विवक्ष्यते तदा नोत्पद्यते, न विनश्यति, न च क्रमवृत्त्याऽवर्तमानत्वात् सत्पर्याय- जातमुच्छिनति, नासदुत्पादयति । यदा तु द्रव्यगुणत्वेन पर्यायमुख्यत्वेन विवक्ष्यते तदा प्रादु- भवति, विनश्यति, सत्पर्यायजातमतिवाहितस्वकालमुच्छिनचि, असदुपस्थितस्वकालमुत्पादयति चेति । स खल्वयं प्रसादोऽनेकान्तवादस्य यदीशोऽपि विरोधो न विरोधः ।।२।। - इति पद्रव्यसामान्यप्ररूपणा । जीवा पुग्गलकाया प्रायासं अस्थिकाइया सेसा। . अमया अत्थित्तमया कारणभूदा हि लोगस्स ॥२२॥ जीवाः पुद्गलकाया आकाशमस्तिकायौ शेषौ । अमया अस्तित्वमयाः कारणभूता हि लोकस्य ।।२२।। जब जीव, पर्यायकी गौणतासे और द्रव्यकी मुख्यतासे विवक्षित होता है तब वह (१) उत्पन्न नहीं होता, (२) विनष्ट नहीं होता, (३) क्रमवृत्तिसे वर्तन नहीं करता इसलिये सत् (-विद्यमान) पर्यायसमूहको विनष्ट नहीं करता और (४ ) असत्को (-अविद्यमान पर्यायसमूहको) उत्पन्न नहीं करता; और जब जीव, द्रव्यकी गौणतासे तथा पर्यायकी मुख्यतासे विवक्षित होता है तब वह (१) उपजता है, (२) विनष्ट होता है, (३) जिसका स्वकाल बीत गया है ऐसे सत (-विद्यमान) पर्यायसमूहको विनष्ट करता है और (४) जिसका स्वकाल उपस्थित हुआ है ( आ पहुँचा है ) ऐसे असतको (अविद्यमान पर्यायसमूहको) उत्पन्न करता है । यह प्रसाद वास्तवमें अनेकान्तवादका है कि ऐसा विरोध भी ( सचमुच ) विरोध नहीं है ।२१॥ इसप्रकार षड्द्रव्यकी सामान्य प्ररूपणा समाप्त हुई । गाथा २२ अन्वयार्थः-[जीवाः] जीव, [ पुद्गलकायाः] पुद्गलकाय [ आकाशम् ] आकाश और [ शेषौ अस्तिकायौ ] शेष दो अस्तिकाय [ अमयाः ] अकृत हैं, [ अस्तित्वमयाः ] अस्तित्वमय हैं और [ हि ] वास्तवमें [ लोकस्य. कारणभूताः ] लोकके कारणभूत हैं । जीवद्रव्य, पुद्गलकाय, नभने अस्तिकायो शेष वे । अणकृतक छ, अस्तित्वमय छ, लोककारणभूत छे ।।२२।। ...

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ४७ अत्र सामान्येनोक्तलक्षणानां षण्णां द्रव्याणां मध्यात्" पंचानामस्तिकोयत्वं व्यव- स्थापितम् । अकृतत्वात् अस्तित्वमयत्वात् विचित्रात्मपरिणतिरूपस्य लोकस्य कारणत्वाचाभ्यु- पगम्यमानेषु पट्सु द्रव्येषु जीव मुद्गलाकाशधर्माधर्माः प्रदेशप्रचयात्मकत्वात् पंचास्तिकायाः । न खलु कालस्तदभावादस्तिकाय इति सामर्थ्यादवसीयत इति.॥२२॥ सम्भावसभावाणं जीवाणं तह य पोग्गलाणं च । परियट्टणसंभूदो कालो णियमेण पण्णत्तो ॥ २३ ॥ सद्भावस्वभावानां जीवानां तथैव पुद्गलानां च । परिवर्तनसम्भृतः कालो नियमेन प्रज्ञप्तः ॥२३॥ टीका:-यहाँ ( इस गाथामें), सामान्यतः जिनका स्वरूप (पहले) कहा गया है ऐसे छह द्रव्योंमेंसे पाँचको अस्तिकायपना स्थापित किया गया है । अकृत होनेसे, अस्तित्वमय होनेसे और अनेकप्रकारकी *अपनी परिणतिरूप लोकके कारण होनेसे जो स्वीकार.(-संमत),किये गये हैं ऐसे छह द्रव्योंमें जीव, पुद्गल, आकाश, धर्म और अधर्म प्रदेशप्रचयात्मक (-प्रदेशोंके समूहमय) होनेसे वे पांच अस्तिकाय हैं । कालको प्रदेशप्रचयात्मकपनेका अभाव होनेसे वह वास्तवमें अस्तिकाय नहीं है ऐसा (बिना कथन किये भी) सामर्थ्य से निश्चित होता है ।२२। गाथा २३ अन्वयार्थः-[ सद्भावस्वभावानाम् ] सत्तास्वभाववाले [जीवानाम् तथा एवं पुद्गलानाम् च ] जीवों और पुद्गलोंके [ परिवर्तनसम्भूतः ] परिवर्तनसे सिद्ध होनेवाले [ कालः ] ऐसे कालका [ नियमेन प्रज्ञप्तः ] ( सर्वज्ञों द्वारा) नियमसे (निश्चयसे) उपदेश दिया गया है। १ ... * लोक छह द्रव्योंके अनेकविध परिणामरूप ( -उत्पादध्रौव्यरूप.) है; इसलिये छह द्रव्य सचमच लोकके कारण हैं। सत्तास्वभावी जीवने पुद्गल तणा परिणमनथी। छ सिद्धि जेनी, काल ते भाख्यो जिणंदे नियमथी ।।२३।। .

४८ पंचास्तिकायसंग्रह . अत्रास्तिकायत्वेनानुक्तस्यापि कालस्यार्थापन्नत्वं घोतितम् । इह हि जीवानां पुद्गलानां च सचास्वभावत्वादस्ति प्रतिक्षणमुत्पादव्ययध्रौव्यैकवृत्तिरूपः परिणामः । स खलु सहकारि- कारणसद्भावे दृष्टः, गतिस्थित्यवगाहपरिणामवत् । यस्तु सहकारिकारणं स कालः । तत्परिणा- मान्यथानुपपत्तिगम्यमानत्वादनुक्तोऽपि निश्चयकालोऽम्तीति निश्चीयते । यस्तु निश्चय- कालपर्यायरूपो व्यवहारकालः स जीवपुद्गलपरिणामेनाभिव्यज्यमानत्वाचदायत्त एवाभिगम्यत एवेति ॥ २३ ॥ टीका:- काल अस्तिकायरूपसे अनुक्त (-कथन नहीं किया गया ) होने पर भी उसे अर्थपना (-पदार्थपना) सिद्ध होता है ऐसा यहाँ दर्शाया है। इस जगतमें वास्तवमें जीवोंको और पुद्गलोंको सत्तास्वभावके कारण प्रतिक्षण उत्पादव्ययध्रौव्यकी एकवृत्तिरूप परिणाम वर्तता है। वह (-परिणाम ) वास्तव में सहकारी कारणके सद्भावमें दिखाई देता है, गति-स्थिति-अवगाह परिणामकी भांति । (जिसप्रकार गति, स्थिति और अवगाहरूप परिणाम धर्म, अधर्म और आकाशरूप सहकारी कारणोंके सद्भावमें होते हैं, उसीप्रकार उत्पादव्ययध्रौव्यकी एकतारूप परिणाम सहकारी कारणके सद्भावमें होते हैं। ) यह जो सहकारी कारण सो काल है । 'जीवपुद्गलके परिणामकी 'अन्यथा अनुपपत्ति द्वारा ज्ञात होता है इसलिये, निश्चयकाल -(अस्तिकायरूपसे ) अनुक्त होने पर भी-( द्रव्यरूपसे ) विद्यमान है ऐसा निश्चित होता है । और जो निश्चयकालकी पर्यायरूप व्यवहारकाल वह जीव-पुद्गलोंके परिणामसे व्यक्त ( गम्य ) होता है इसलिये अवश्य तदाश्रित ही (-जीव तथा पुद्गलके परिणामके आश्रित ही) गिना जाता है ।२३। १. यद्यपि कालद्रव्य जीव-पुद्गलोंके परिणामके अतिरिक्त धर्मास्तिकायांदिके परिणामको भी निमित्तभूत है तथापि जीव-पुद्गलोंके परिणाम स्पष्ट ख्यालमें आते हैं इसलिये कालद्रव्यको सिद्ध करनेमें मात्र उन दो के परिणामकी ही बात ली गई है। २. अन्यथा अनुपपत्ति-अन्य किसी प्रकारसे नहीं हो सकना । [ जीव-पुद्गलोंके उत्पादव्यय- ध्रौव्यात्मक परिणाम अर्थात् उनकी समयविशिष्ट वृत्ति । वह समयविशिष्ट वृत्ति समयको उत्पन्न करनेवाले किसी पदार्थके विना (-निश्चयकालके बिना ) नहीं हो सकती। जिसप्रकार आकाश विना द्रव्य अवगाहन प्राप्त नहीं कर सकते अर्थात् उनका विस्तार (तिर्यक्पना ) नहीं हो. सकता उसीप्रकार निश्चयकाल विना द्रव्य परिणामको प्राप्त नहीं हो सकते अर्थात् उनका प्रवाह (-ऊर्ध्वपना) नहीं होसकता। इसप्रकार निश्चयकालके अस्तित्व बिना (अर्थात् निमित्तभूत कालद्रव्यके सद्भाव विना) अन्य किसी- प्रकार जीव-पुद्गलके परिणाम बन नहीं सकते इसलिये "निश्चयकाल विद्यमान है' ऐसा ज्ञात होता है-निश्चित होता है ] ।

षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन ४६ ववगदपणवण्णरसो ववगददोगंधप्रहफासो य । अगुरुलहुगो प्रमुत्तो वट्टणलक्खो य कालो ति ॥२४॥ व्यपगतपंचवर्णरसो व्यपगतद्विगन्धाटस्पर्शश्च । अगुरुलघुको अमूतों वर्तनलक्षणश्च काल इति ॥२४॥ गाथा २४ अन्वयार्थः-[ कालः इति ] काल ( निश्चयकाल ) [ व्यपगतपञ्चवर्णरसः ] पांच वर्ण और पांच रस रहित, [ व्यपगतद्विगन्धाष्टस्पर्शः च ] दो गंध और आठ स्पर्श रहित, [ अगुरुलघुकः ] अगुरुलघु, [ अमूर्तः ] अमूर्त [च ] और [वर्तनलक्षणः ] वर्तना- लक्षणवाला है। भावार्थ:-यहां निश्चयकालका स्वरूप कहा है । लोकाकाशके प्रत्येक प्रदेशमें एक-एक कालागु ( कालद्रव्य ) स्थित है। वह कालाणु ( कालद्रव्य ) सो निश्चयकाल है। अलोकाकाशमें कालाणु ( कालद्रव्य ) नहीं है। वह काल (निश्चयकाल ) वर्ण-गंध-रस-स्पर्श रहित है, वर्णादि रहित होनेसे अमूर्त है और अमूर्त होनेसे सूक्ष्म, अतीन्द्रियज्ञानग्राह्य है । और वह षट्गुणहानिवृद्धि- सहित अगुरुलधुत्वस्वभाववाला है । कालका लक्षण वर्तनाहेतुत्त्व है; अर्थात् जिसप्रकार शीतऋतुमें स्वयं अध्ययन क्रिया करते हुए पुरुषको अग्नि सहकारी (-बहिरंग निमित्त) है और जिसप्रकार स्वयं घूमनेकी क्रिया करते हुए कुम्हारके चाकको नीचेकी कीली सहकारी है उसीप्रकार निश्चयसे स्वयमेव परिणामको प्राप्त जीव-पुद्गलादि द्रव्योंको (व्यवहारसे) कालाणुरूप निश्चयकाल बहिरंग निमित्त है । प्रश्न:-अलोकमें कालद्रव्य नहीं है तो वहां आकाशकी परिणति किसप्रकार हो सकती है? * श्री अमृतचन्द्राचार्यदेवने इस २४ वीं गाथाकी टीका नहीं लिखी इसलिये अनुवादमें अन्वयार्थके बाद तरन्त भावार्थ लिखा गया है। रसवर्णपंचक, स्पर्श-अटक, गंधयुगल विहीन छ । छ मूर्तिहीन, अगुरुलचुक छ, काल वर्तनलिंग छे ॥२४॥ - ७ ५० पंचास्तिकायसंग्रह . समझो णिमिसो कट्ठा कला य णाली तदो दिवारत्ती। मासोदुप्रयणसंवच्छरो त्ति कालो परायत्तो ॥२५॥ समयो निमिषः काष्ठा कला च नाली ततो दिवारात्रः । मासवयनसंवत्सरमिति काल: परायचः ॥ २५ ॥ अत्र व्यवहारकालस्य कथंचित्परायचत्वं द्योतितम् । परमाणुप्रचलनायचः समयः । नयनपुटघटनायचो निमिषः । तत्संख्याविशेषतः काष्ठा कला नाली च । गगनमणिगमनायत्तो उत्तर:-जिसप्रकार लटकती हुई लम्बी डोरीको, लम्बे वांसको या कुम्हारके चाकको एक ही स्थान पर स्पर्श करने पर भी सर्वत्र चलन होता है, जिसप्रकार मनोज्ञ स्पर्शनेन्द्रियविषयका अथवा रसनेन्द्रियविषयका शरीरके एक ही भागमें स्पर्श होने पर भी सम्पूर्ण आत्मामें सुखानुभव होता है और जिसप्रकार सर्पदंश या व्रण (घाव) आदि शरीरके एक ही भागमें होने पर भी सम्पूर्ण आत्मामें दुःखवेदना होती है, उसीप्रकार कालद्रव्य लोकाकाशमें ही होने पर भी सारे आकाशमें परिणति होती है क्योंकि आकाश अखण्ड एक द्रव्य है । यहाँ यह बात मुख्यतः ध्यानमें रखना चाहिये कि काल किसी द्रव्यको परिणमित नहीं करता; सम्पूर्ण स्वतंत्रतासे स्वयमेव परिणमित होनेवाले द्रव्योंको वह बाह्यनिमित्तमात्र है। इसप्रकार निश्चयकालका स्वरूप दर्शाया गया ।२४! गाथा २५ अन्वयार्थः-[ समयः ] समय, [ निमिषः ] निमेष, [ काष्ठा] काष्ठा, [ कला च ] कला, [ नाली ] घड़ी, [ ततः दिवारात्रः] अहोरात्रं, (-दिवस), [ मासर्वयन- संवत्सरम् ] मास, ऋतु, अयन और वर्ष-[ इति काल:] ऐसा जो काल ( अर्थात् व्यवहारकाल ) [ परायत्तः ] वह पराश्रित है। टीका:-यहाँ व्यवहारकालका कथंचित् पराश्रितपना दर्शाया है । परमाणुके गमनके आश्रित .समय है; आंख मिचनेके आश्रित निमेष-है; उसकी (-निमेषकी) अमुक संख्यासे काष्ठा, कला और घड़ी होती है। सूर्य के गमनके जे समय, निमिष, कला, घडी, दिनरात, मास, ऋतु अने । जे अयन ने वर्षादि छे, ते काल पर-आयचं छे ।।२।। - . -

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
दिवारानः । तत्संख्याविशेषतः मासः, ऋतुः, अयनं, संवत्सरः इति । एवंविधो हि व्यवहारकाल:
केवलकालपर्यायमात्रत्वेनावधारयितुमशक्यत्वात् परायत्त इत्युपमीयत इति ॥२५॥
रगत्थि चिरं वा खिप्प मत्तारहिदं तु सा वि खलु मत्ता।
पोग्गलदम्वेण विणा तम्हा कालो पडुच्चभवो ॥२६॥
आश्रित अहोरात्र होता है; और उसकी (-अहोरात्रकी) अमुक- संख्यासे मास, ऋतु,
अयन और वर्ष होते हैं ।-ऐसा व्यवहारकाल केवल कालकी पर्यायमात्ररूपसे अवधारण
करना अशक्य होनेसे (अर्थात् परकी अपेक्षा बिना-परमाणु, अांख, सूर्य आदि पर
पदार्थोंकी अपेक्षा बिना-व्यवहारकालका माप निश्चित करना अशक्य होनेसे ) उसे
'पराश्रित' ऐसी उपमा दी जाती है ।
भावार्थ:-'समय' निमित्तभूत ऐसे मंदगतिसे परिणत पुद्गलपरमाणु द्वारा
प्रगट होता है-मापा जाता है ( अर्थात् परमाणुको आकाशप्रदेशसे दूसरे अनन्तर एक
आकाशप्रदेशमें मंदगतिसे जानेमें जो समय लगे उसे समय कहा जाता है) । 'निमेष'
आँखके मिंचनेसे प्रगट होता है (अर्थात् खुली आंखके मिचनेमें जो समय लगे उसे
निमेष कहा जाता है और वह एक निमेष असंख्यात समयका होता है)। पन्द्रह
निमेषकी एक 'काष्ठा', तीस काष्ठाकी एक 'कला' बीससे कुछ अधिक कलाकी एक
'घड़ी' और दो घड़ीका एक 'मुहूर्त' बनता है । 'अहोरात्र' सूर्यके गमनसे प्रगट होता है
( और वह एक अहोरात्र तीस मुहूर्तका होता है ) । तीस अहोरात्रका एक 'मास',
दो मासकी एक 'ऋतु', तीन ऋतुका एक 'अयन' और दो अयनका एक 'वर्ष' बनता
है। यह सब व्यवहारकाल है। 'पल्योपम', 'सागरोपम' आदि भी व्यवहारकालके
भेद हैं।
उपरोक्त समय-निमेषादि सब वास्तवमें मात्र निश्चयकालकी ही (-कालद्रव्य-
की ही) पर्यायें हैं परन्तु वे परमाणु आदि द्वारा प्रगट होती हैं इसलिये ( अर्थात्
पर पदार्थों द्वारा मापी जा सकती हैं इसलिये ) उन्हें उपचारसे पराश्रित कहा
जाता है । २५॥
'चिर' 'शीघ्र' नहि मात्रा विना, मात्रा नहीं पुद्गल विना ।
ते कारणे पर-आश्रये उत्पन्न भाख्यो काल आ ॥२६॥

पंचास्तिकायसंग्रह नास्ति चिरं वा क्षिप्र मात्रारहितं तु सापि खलु मात्रा। पुद्गलद्रव्येण , विना तस्मात्कालः प्रतीत्यभवः ॥ २६ ।। अत्र व्यवहारकालस्य कथंचित् परायत्तत्वे सदुपपचिरुक्ता । इह हि व्यवहारकाले निमिपसमयादौ अस्ति तावत् चिरं इति क्षिप्रं इति संप्रत्ययः। स खलु दीर्घहस्वकालनिधनं प्रमाणमंतरेण न संभाव्यते । तदपि प्रमाणं पुद्गलद्रव्यपरिणाममन्तरेण नावधार्यते । ततः परपरिणामयोतमानत्वाद् व्यवहारकालो निश्चयेनानन्याश्रितोऽपि प्रतीत्यभव इत्यभिधीयते । तदनास्तिकायसामान्यप्ररूपणायामस्तिकायत्वाभावात्साक्षादनुपन्यस्यमानोऽपि नीवपुद्गलपरिणा- गाथा २६ अन्वयार्थः-[चिरं वा क्षिप्र] 'चिर' अथवा 'क्षिप्र' ऐसा ज्ञान (-अधिक काल अथवा अल्प काल ऐसा ज्ञाव ) [ मात्रारहितं तु ] परिमाण विना (-कालके माप बिना) [न अस्ति ] नहीं होता; [ सा मात्रा अपि] और वह परिमाण [खलु ] वास्तवमें [ पुद्गलद्रव्येण विना ] पुद्गलद्रव्यके बिना नहीं होता; [ तस्मात ] इसलिये [कालः प्रतीत्यभवः ] काल आश्रितरूपसे उपजनेवाला है (अर्थात् व्यवहारकाल परका आश्रय करके उत्पन्न होता है ऐसा उपचारसे कहा जाता है ) । टीका:-यहां व्यवहारकालके कथंचित् पराश्रितपनेके विषयमें सत्य युक्ति कही गई है। प्रथम तो, निमेष-समयादि व्यवहारकालमें 'चिर' और 'क्षिप्र' ऐसा ज्ञान (-अधिक काल और अल्प काल ऐसा ज्ञान ) होता है । वह ज्ञान वास्तवमें अधिक और अल्प कालके साथ सम्बन्ध रखनेवाले प्रमाण (-कालपरिमाण ) विना संभवित नहीं होता; और वह प्रमाण पुद्गलद्रव्यके परिणाम विना निश्चित नहीं होता । इसलिये, व्यवहारकाल परके परिणाम द्वारा ज्ञात होनेके कारण-यद्यपि निश्चयसे वह अन्यके आश्रित नहीं है तथापि-आश्रितरूपसे उत्पन्न होनेवाला ( -परके अवलम्बनसे उपजने- वाला) कहा जाता है । इसलिये, यद्यपि कालको अस्तिकायपनेके अभावके कारण यहां अस्तिकायकी सामान्य प्ररूपणामें उसका साक्षात्* कथन नहीं है तथापि जीव-पुद्गलके परिणामकी * साक्षात् सीधा । [ कालका विस्तृत सीधा कथन श्री प्रवचनसारके द्वितीय श्रुतस्कन्धमें किया गया है। इसलिये कालका स्वरूप विस्तारसे जाननेके इच्छक जिज्ञासको वह प्रवचनसारसे जान लेना चाहिये ।

पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ५३ मान्यथानुपपत्त्या निश्चयरूपस्तत्परिणामायत्ततया व्यवहाररूपः कालोऽस्तिकायपंचकवल्लोक- रूपेण परिणत इति खरतरदृष्टयाभ्युपगम्यत इति ।। २६ ।। अन्यथा अनुपपत्ति द्वारा सिद्ध होनेवाला निश्चयरूप काल और उनके परिणामके आश्रित निश्चित होनेवाला व्यवहाररूप कालपंचास्तिकायकी भांति लोकरूपमें परिणत है-ऐसा, अत्यन्त तीक्ष्ण दृष्टिसे जाना जा सकता है। भावार्थः-'समय' अल्प है, 'निमेष' अधिक है और 'मुहूर्त' उससे भी अधिक है ऐसा जो ज्ञान होता है वह 'समय', 'निमेष' आदिका परिमाण जाननेसे होता है; और वह कालपरिमाण पुद्गलों द्वारा निश्चित होता है । इसलिये व्यवहारकालकी उत्पत्ति पुद्गलों द्वारा होती (उपचारसे) कही जाती है। इसप्रकार यद्यपि व्यवहारकालका माप पुद्गल द्वारा होता है इसलिये उसे उपचारसे पुद्गलाश्रित कहा जाता है तथापि निश्चयसे वह केवल कालद्रव्यकी ही पर्यायरूप है, पुद्गलसे सर्वथा भिन्न है-ऐसा समझना। जिसप्रकार दस सेर पानीके मिट्टीमय घड़ेका माप पानी द्वारा होता है तथापि घड़ा मिट्टीकी ही पर्यायरूप है, पानीकी पर्यायरूप नहीं है, उसीप्रकार समय-निमेषादि व्यवहारकालका माप पुद्गल द्वारा होता है तथापि व्यवहारकाल कालद्रव्यकी ही पर्यायरूप है, पुद्गलकी पर्याय- रूप नहीं है। कालसम्बन्धी गाथासूत्रोंके कथनका संक्षेप इसप्रकार है:-जीवपुद्गलोंके परिणाममें ( समयविशिष्ट वृत्तिमें ) व्यवहारसे समयकी अपेक्षा आती है; इसलिये समयको उत्पन्न करनेवाला कोई पदार्थ अवश्य होना चाहिये । वह पदार्थ सो कालद्रव्य है । कालद्रव्य परिणमित होनेसे व्यवहारकाल होता है और वह व्यवहारकाल पुद्गल द्वारा मापा जानेसे उसे उपचारसे पराश्रित कहा जाता है। पंचास्तिकायकी भांति निश्चयव्यवहाररूप काल भी लोकरूपसे परिणत है ऐसा सर्वज्ञोंने देखा है और अति. तीक्ष्ण दृष्टि द्वारा स्पष्ट सम्यक् अनुमान भी हो सकता है। कालसम्बन्धी कथनका तात्पर्यार्थ निम्नोक्तानुसार ग्रहण करने योग्य है:- अतीत अनन्तकालमें जीवको एक चिदानन्दरूपी काल ही (-स्वकाल ही) जिसका स्वभाव है ऐसे जीवास्तिकायकी उपलब्धि नहीं हुई है; उस जीवास्तिकायका ही सम्यक् श्रद्धान, उसीका रागादिरूपसे भिन्नरूप भेदज्ञान और उसीमें रागादिविभावरूप समस्त संकल्प-विकल्पजालके त्याग द्वारा स्थिर परिणति कर्तव्य है । २६ । . १ . पंचास्तिकायसंग्रह -इति समयव्याख्यायामन्तींतषड्द्रव्यपंचास्तिकायसामान्यव्याख्यानरूपः पीठ- चंधः समाप्तः ॥ अथामीषामेव विशेषव्याख्यानम् । तत्र तावत् जीवद्रव्यास्तिकायव्याख्यानम् । जीवो त्ति हदि चेदा उवयोगविसेसिदों पहू कत्ता । भोत्ता य देहमेत्तो ण हि मुत्तो कम्मसंजुत्तो ॥२७॥ जीव इति भवति चेतयितोपयोगविशेषितः प्रभुः कर्ता । भोक्ता च देहमात्रो न हि मूर्तः कर्मसंयुक्तः ॥२७|| अत्र संसारावस्थस्यात्मनः सोपाधि निरुपाधि च स्वरूपमुक्तम् । भात्मा हि निश्चयेन इसप्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत श्री पंचास्तिकायसंग्रह शास्त्रकी श्री अमृतचन्द्राचार्यदेवविरचित ) समयव्याख्या नामकी टीकामें पद्रव्यपंचा- स्तिकायके सामान्य व्याख्यानरूप पीठिका समाप्त हुई। अब उन्हींका (-पद्रव्य और पंचास्तिकायका ही) विशेष व्याख्यान किया जाता है। उसमें प्रथम, जीवद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान है । गाथा २७ अन्वयार्थः- [जीवः इति भवति ] (संसारस्थित) आत्मा जीव है, [ चेतयिता ) चेतयिता ( चेतनेवाला ) है, [ उपयोगविशेषितः ] उपयोगलक्षित है, [प्रभुः ] प्रभु है, [फर्ता ] कर्ता है, [ भोक्ता] भोक्ता है, [देहमात्रः ] देह प्रमाण है, [न हि मूर्तः ] अमूर्त है [च ] और [कर्मसंयुक्तः ] कर्म संयुक्त है । टीकाः--यहाँ ( इस गाथामें ) संसारदशावाले आत्माका *सोपाधि और निरुपाधिस्वरूप कहा है। प्रात्मा निश्चयसे भावप्राणको धारण करता है इसलिये 'जीव' है, व्यवहारसे ( असद्भूत व्यवहारनयसे ) द्रव्यप्राणको धारण करता है इसलिये 'जीव' है; * सोपाधि- उपाधि सहित; जिसमें परकी अपेक्षा आती हो ऐसा । के जीव, चेतयिता, प्रमु, उपयोगचिव, अमूर्त छ । कर्ता अने भोक्ता, शरीर प्रमाण, कर्म युक्त के ॥२७॥ .

षड्द्रव्य-पंचास्तिकापवर्णन ५५ - आवप्राणधारणांजीवः, व्यवहारेण द्रव्यप्राणधारणाज्जीवः । निश्चयेन चिदात्मकत्वात् , व्यवहारेण चिच्छक्तियुक्तत्वाच्चेतयिता | निश्चयेनापृथग्भूतेन, व्यवहारेण पृथग्भृतेन चैतन्यपरिणामलक्षणे- नोपयोगेनोपलक्षितम्बादुपयोगविशेषितः । निश्चयेन भावकर्मणां, व्यवहारेण द्रव्यकर्मणामास्रव- णपंधनसंघरणनिर्जरणमोक्षणेषु स्वयमीशत्वात् प्रभुः । निश्चयेन पौरालिककर्मनिमिचात्मपरिणा- मानां, व्यवहारेणात्मपरिणामनिमित्तपोद्गलिककर्मणां कर्तृत्वात्कर्ता । निश्चयेन शुभाशुभकर्म- निमित्सुखदुःखपरिणामानां, व्यवहारेण शुभाशुभकर्मसंपादितेष्टानिष्टविषयाणां भोक्तृत्वाद्भोक्ता । निश्चयेन लोकमात्रोऽपि विशिष्टावगाहपरिणामशक्तियुक्तत्वान्नामकर्मनिवृत्तमणु महच्च - 'निश्चयसे चित्स्वरूप होनेके कारण 'चेतयिता' ( चेतनेवाला) है, व्यवहारसे, ( सद्भूत व्यवहारनयसे ) चित्शक्तियुक्त होनेसे 'चेतयिता' है; निश्चयसे 'अपृथरभूत ऐसे चैतन्यपरिणामस्वरूप उपयोग द्वारा लक्षित होनेसे 'उपयोगलक्षित' है, व्यवहारसे ( सद्भूत व्यवहारनयसे ) पृथग्भूत ऐसे चैतन्यपरिणामस्वरूप उपयोग द्वारा. लक्षित होनेसे 'उपयोगलक्षित' है; निश्चयसे भावकर्मोंके आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष करनेमें स्वयं ईश (समर्थ) होनेसे 'प्रभु' है, व्यवहारसे ( असभूत व्यवहारनयसे ) द्रव्यकर्मोंके आस्रव, वंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष करनेमें स्वयं ईश होनेसे 'प्रभु' है; निश्चयसे पौद्गलिक कर्म जिनका निमित्त है ऐसे आत्मपरिणामोंका कर्तृत्व होनेसे 'कर्ता' है, व्यवहारसे (असदुद्भूत व्यवहारनयसे ) आत्मपरिणाम जिनका निमित्त है ऐसे पौद्गलिक कर्मोंका कर्तृत्व होनेसे 'कर्ता' है; निश्चयसे शुभाशुभ कर्म जिनका निमित्त है ऐसे सुखदुःखपरिणामोंका भोक्तृत्व होनेसे 'भोक्ता' है, व्यवहारसे ( असदुद्भूत व्यवहारनयसे ) शुभाशुभ कर्मोंसे सम्पादित (प्राप्त) इष्टानिष्ट विषयोंका भोक्तृत्व होनेसे 'भोक्ता' है; निश्चयसे लोकप्रमाण होनेपर भी, विशिष्ट अवगाहपरिणामकी शक्तिवाला होनेसे नामकर्मसे रचनेवालेः छोटे-बड़े शरीरमें रहता हुआ व्यवहारसे ( सद्भूत व्यवहारनयसे ) 'देहप्रमाण' है; व्यवहारसे ( असदुभूत व्यवहारनयसे ) कर्मोंके साथ एकत्वपरिणामके कारण मूर्त होने पर भी, निश्चयसे अरूपी स्वभाववाला १. निश्चयसे चित्शक्तिको आत्माके साथ अभेद है और व्यवहारसे भेद है; इसलिये निश्चयसे आत्मा चित्शक्तिस्वरूप है और व्यवहारसे चित्शक्तिवान है। २. अपृथग्भूत अपृथक्; अभिन्न । (तिश्चयसे उपयोग प्रारमासे अपृथक् है और व्यवहारसे पृथक् है।)

- ५६ पंचास्तिकायसंग्रह - .. शरीरमधितिष्ठन् व्यवहारेण देहमात्रः। व्यवहारेण कर्ममिः सहैकत्वपरिणामान्मूर्तोऽपि निश्चयेन नीरूपस्वभावत्वान्न हि मूर्तः । निश्चयेन पुद्गलपरिणामानुरूपचैतन्यपरिणा- मात्मभिः, व्यवहारेण चैतन्यपरिणामानुरूपपुद्गलपरिणामात्मभिः कर्मभिः संयुक्तत्वात्कर्मसंयुक्त इति ।। २७ ।। कम्ममलविष्पमुक्को उड्ढे लोगस्स अन्तमधिगंता । सो सव्वणाणदरिसी लहदि सुहमणिदियमणंतं ॥२८॥ कर्ममलविप्रमुक्त ऊर्ध्व लोकस्यान्तमधिगम्य । स सर्वज्ञानदी लभते सुखमनिन्द्रियमनंतम् ।।२८|| होनेके कारण 'अमूर्त' है; *निश्चयसे पुद्गलपरिणामको अनुरूप चैतन्यपरिणामात्मक कर्मोंके साथ संयुक्त होनेसे 'कर्मसंयुक्त' है, व्यवहारसे ( असद्भूत व्यवहारनयसे ) चैतन्य- परिणामको अनुरूप पुद्गलपरिणामात्मक कर्मों के साथ संयुक्त होनेसे 'कर्मसंयुक्त' है । भावार्थ:-पहली २६ गाथाओंमें षड्द्रव्य और पंचास्तिकायका सामान्य निरूपण करके, अब इस २७ वी गाथा से उनका विशेष निरूपण प्रारम्भ किया गया है । उसमें प्रथम, जीवका ( आत्माका ) निरूपण प्रारम्भ करते हुए इस गाथामें संसारस्थित आत्माको जीव (अर्थात् जीवत्ववाला), चेतयिता, उपयोगलक्षण वाला, प्रभु, कर्ता इत्यादि कहा है । जीवत्व, चेतयितृत्व, उपयोग, प्रभुत्व, कर्तृत्व इत्यादिका विवरण अगली गाथाओंमें आयेगा ।। २७ ।। गाथा २८ अन्वयार्थ :-[कर्ममलविप्रमुक्ता] कर्ममलसे मुक्त आत्मा [ ऊवं ] : ऊपर [ लोकस्य अन्तम् ] लोकके अन्तको. [ अधिगम्य ] प्राप्त करके [सः सर्वज्ञानदर्शी ] * संसारी आत्मा निश्चयसे निमित्तभूत पुद्गलकर्मों को अनुरूप ऐसे नैमित्तिक प्रात्मपरिणामोंके साथ (अर्थात् भावकर्मोंके साथ ) संयुक्त होनेसे कर्मसंयुक्त है और व्यवहारसे निमित्तभूत आत्म- परिणामोंको अनुरूप ऐसे नैमित्तिक पुद्गलकर्मों के साथ ( अर्थात् द्रव्यकर्मों के साथ ) संयुक्त होनेसे कर्मसंयुक्त है। सौ कर्ममलथी मुक्त आत्मा पामीने लोकाग्रने । सर्ववदी ते अनंत भनिद्रि सुखने अनुभवे ।। २८ ।।

षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन ५७ - - - अत्र मुक्तावस्थस्यात्मनो निरुपाधिस्वरूपमुक्तम् । आत्मा हि परद्रव्यत्वात्कर्मरजसा साकल्येन यस्मिन्नेव क्षणे मुच्यते तस्मिन्नेवोर्ध्वगमनस्वभावत्वाल्लोकांतमधिगम्य परतो गतिहेतोरभावादवस्थितः केवलज्ञानदर्शनाभ्यां स्वरूपभूतत्वादमुक्तोऽनंतमतीन्द्रियं सुखमनुभवति । मुक्तस्य चास्य भावप्राणधारणलक्षणं जीवत्वं, चिद्पलक्षणं चेतयितृत्वं, चित्परिणामलक्षण उपयोगः, निर्वर्तितसमस्ताधिकारशक्तिमात्र प्रभुत्वं, समस्तवस्त्वसाधारणस्वरूपनिर्वर्तनमात्रं कर्तृत्वं, स्वरूपभूतस्वातन्त्र्यलक्षणसुखोपलम्मरूपं भोक्तृत्वं, अतीतानंतरशरीरपरिमाणावगाहपरि- णामरूपं देहमात्रत्वं, उपाधिसंवन्धविविक्तमात्यन्तिकममूर्तत्वम् । कर्मसंयुक्तत्वं तु द्रव्यभावकर्म- वह सर्वज-सर्वदर्शी [ अनंतम् ] अनन्त [ अनिन्द्रियम् ] अनिन्द्रिय [ सुखम् ] सुखका [ लभते ] अनुभव करता है। टीका:-यहां मुक्तावस्थावाले आत्माका निरुपाधिस्वरूप कहा है। आत्मा ( कर्मरजके ) परद्रव्यपनेके कारण कर्मरजसे सम्पूर्णरूपसे जिस क्षण छूटता है (-मुक्त होता है ), उसी क्षण ( अपने ) ऊर्ध्वगमनस्वभावके कारण लोकके अन्तको पाकर आगे गतिहेतुका अभाव होनेसे ( वहाँ.) स्थिर होता हुआ केवलज्ञान और केवलदर्शन (निज) स्वरूपभूत होनेके कारण उनसे न छूटता हुआ अनन्त अतीन्द्रिय सुखका अनुभव करता है। उस मुक्त आत्माको, भावप्राणधारण जिसका लक्षण ( स्वरूप ) है ऐसा 'जीवत्व' होता है; चिद्रूप जिसका लक्षण. (-स्वरूप) है ऐसा 'चेतयितृत्व' होता है; चित्परिणाम जिसका लक्षण -(-स्वरूप) है ऐसा 'उपयोग' होता है। प्राप्त किए हुए समस्त (पात्मिक ) अधिकारोंकी 'शक्तिमात्ररूप 'प्रभुत्व' होता है; समस्त वस्तुओंसे असाधारण ऐसे स्वरूपकी निष्पत्तिमात्ररूप (-निज स्वरूप- को रचनेरूप ) 'कर्तृत्व' होता है; स्वरूपभूत स्वातन्त्र्य जिसका लक्षण (-स्वरूप) है ऐसे सुखकी उपलब्धिरूप 'भोक्तृत्व' होता है। अतीत अनन्तर (-अन्तिम) शरीरानुसार अवगाहपरिणामरूप ''देहप्रमाणपना' होता है; और उपाधिके सम्बन्धसे' 'विविक्त • . १. शक्ति सामर्थ्य ; ईशत्व । ( मुक्त वात्मा समस्त आत्मिक अधिकारोंको भोगने में अर्थात् उनका उपयोग करनेमें स्वयं समर्थ है इसलिये वह प्रभु है)। २. मुक्त आत्माकी अवगाहना चरमशरीरप्रमाण होती है इसलिये उस अन्तिम शरीरकी अपेक्षा लेकर उनको 'देहप्रमाणपना' कहा जासकता है। ३. विविक्त = भिन्न; रहित । .- पंचास्तिकायसंग्रह . विप्रमोक्षान्न भवत्येव । द्रव्यकर्माणि हि पुद्गलस्कंधा, भावकर्माणि तु चिद्विवर्ताः। विवर्तते हि चिच्छक्तिरनादिज्ञानावरणादिकर्मसंपर्ककूणितप्रचारा परिच्छेद्यस्य विश्वस्यैकदेशेषु क्रमेण व्याप्रिय- माणा । यदा तु ज्ञानावरणादिकर्मसंपर्कः प्रणश्यति तदा परिच्छेद्यस्य विश्वस्य सर्वदेशेषु युगपद्वयाता कथंचित्कोटस्थ्यमवाप्य विषयांतरमनाप्नुवंती न विवर्तते । स खल्वेप निश्चित: सर्वज्ञसर्वदर्शित्वोपलम्भः । अयमेव द्रव्यकर्मनिबंधनभूतानां भावकर्मणां कर्तृत्वोच्छेदः । अयमेव च विकारपूर्वकानुभवाभावादोपाधिकसुखदुःखपरिणामानां भोक्तृत्वोच्छेदः । इदमेव चानादिविवर्त- ऐसा प्रात्यंतिक ( सर्वथा ) 'अमूर्तपना' होता है । (मुक्त आत्माको) "कर्मसंयुक्तपना' तो कदापि नहीं होता, क्योंकि द्रव्यकर्मों और भावकर्मोसे विमुक्ति हुई है । द्रव्यकर्म वे पुद्गलस्कन्ध हैं और भावकर्म वे 'चिद्विवर्त हैं। चित्शक्ति अनादि ज्ञानावरणादि- कर्मोंके सम्पर्कसे ( सम्बन्धसे ) संकुचित व्यापारवाली होनेके कारण ज्ञेयभूत विश्वके (-समस्त-पदार्थोके ) एक-एक देशमें क्रमशः व्यापार करती हुई विवर्तनको प्राप्त होती है । किन्तु जब ज्ञानावरणादिकर्मोंका सम्पर्क विनष्ट होता है तब वह ज्ञेयभूत विश्वके सर्व देशोंमें युगपद् व्यापार करती हुई कथंचित् कूटस्थ होकर, अन्य विषयको प्राप्त न होती हुई विवर्तन नहीं करती। वह यह (चित्शक्तिके विवर्तनका अभाव), वास्तवमें निश्चित (-नियत, अचल ) सर्वज्ञपनेकी और सर्वदर्शीपनेकी उपलब्धि है। यही, द्रव्यकर्मोके निमित्तभूत भावकर्मोंके कर्तृत्वका विनाश है; यही, विकारपूर्वक अनुभवके अभावके कारण औपाधिक सुखदुःखपरिणामोंके भोक्तृत्वका विनाश है; और यही, अनादि विवर्तनके खेदके विनाशसे जिसका अनन्त चैतन्य सुस्थित हुआ है ऐसे आत्माको १. पूर्व सूत्रमें कहे हुए 'जीवत्व' आदि नौ विशेषोंमेंसे प्रथम आठ विशेष मुक्तात्माको भी यथासम्भव होते हैं, मात्र एक 'कर्मसंयुक्तपना' नहीं होता। २ चिद्विवर्त चैतन्यका परिवर्तन अर्थात् चैतन्यका एक विषयको छोड़कर अन्य विषयको जाननेरूप वदलना; चित्शक्तिका अन्य-अन्य ज्ञेयोंको जाननेरूप परिवर्तित होना। ३. कूटस्थ सर्वकाल एकरूप रहनेवाली; अचल । [ ज्ञानावरणादि कर्मोका सम्वन्ध नष्ट होने पर कहीं चित्शक्ति सर्वथा अपरिणामी नहीं होजाती; किन्तु वह अन्य-अन्य ज्ञेयोंको जाननेरूप परि- वर्तित नहीं होती-सर्वदा तीनों कालके समस्त ज्ञेयोंको जानती रहती है, इसलिए उसे कथंचित् कूटस्थ कहा है। ४. औपाधिक=द्रव्यकर्मरूप उपाधिके साथ सम्वन्धवाले: जिनमें द्रव्यकर्परूपी उपाधि निमित्त होती है ऐसे; अस्वाभाविक, वैभाविक, विकारी ।

षद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
खेदविच्छिचिसुस्थितानंतचैतन्यस्यात्मनः स्वतंत्रस्वरूपानुभूतिलक्षणसुखस्य भोक्तृत्वमिति ।।२८।।
जादो सयं स चेदा सवण्हू सव्वलोगदरिसी य ।
पप्पोदि सुहमणंतं अव्वाबाधं सगममुत्तं ॥ २६ ॥
जातः स्वयं स चेतयिता सर्वज्ञः सर्वलोकदर्शी च ।
प्राप्नोति सुखमनंतमव्यावाधं स्वकममूर्तम् ॥ २९ ।।
इदं सिद्धस्य निरुपाधिज्ञानदर्शनसुखसमर्थनम् । आत्मा हि ज्ञानदर्शनसुखस्वभावः
संसारावस्थायामनादिकर्मक्लेशसंकोचितात्मशक्तिः परद्रव्यसंपर्केण क्रमेण किंचित् किंचिज्जानाति
,
स्वतंत्रस्वरूपानुभूतिलक्षण सुखका (-स्वतंत्र स्वरूपकी अनुभूति जिसका लक्षण है ऐसे
सुखका ) भोक्तृत्व है । २८ ।
गाथा २९
अन्वयार्थः-[ सः चेतयिता] वह चेतयिता (चेतनेवाला आत्मा) [ सर्वज्ञः ]
सर्वज्ञ [च ] और [ सर्वलोकदर्शी ] सर्वलोकदर्शी [स्वयं जातः ] स्वयं होता .. हुआ,
[स्वकम् ] स्वकीय [ अमूर्तम् ] अमूर्त [ अव्यायाधम् ] अव्याबाध [ अनन्तम् ] अनन्त
[ सुखम् ] सुखको [प्राप्नोति ] उपलब्ध करता है ।
टीका:-यह, सिद्धके निरुपाधि ज्ञान, दर्शन और सुखका समर्थन है ।
वास्तवमें ज्ञान, दर्शन और सुख जिसका स्वभाव है ऐसा आत्मा संसारदशामें,
अनादि कर्मक्लेश द्वारा आत्मशक्ति संकुचितं की गई होनेसे, परद्रव्यके सम्पर्क द्वारा
(-इन्द्रियादिके सम्बन्ध द्वारा ) क्रमशः 'कुछ-कुछ जानता है और देखता है तथा
पराश्रित, मूर्त ( इन्द्रियादि ) के साथ सम्बन्धवाला, सव्याबाध (-बाधासहित) और
सान्त सुखका अनुभव करता है। किन्तु जब उसके कर्मक्लेश समस्तरूपसे विनाशको
प्राप्त होते हैं तब, आत्मशक्ति अनर्गल (-निरंकुश ) और असंकुचित होनेसे, वह
असहायरूपसे (-किसीकी सहायताके बिना ) स्वयमेव युगपद् सब (-सर्व द्रव्यक्षेत्र-
कालभाव ) जानता है और देखता है तथा स्वाश्रित, मूर्त (इन्द्रियादि) के साथ सम्बन्ध
स्वयमेव चेतक सर्वज्ञानी-सर्वदर्शी थाय छ।
ने निज अमूर्त अनंत अव्यावाध सुखने अनभवे ॥२९॥

पंचास्तिकायसंग्रह . 4 - पश्यति, परप्रत्ययं मूर्तसंबद्धं सव्यावाधं सांत सुखमनुभवति च । यदा त्वस्य कर्मक्लेशाः सामरत्येन प्रणश्यन्ति, तदाऽनर्गलासंकुचितात्मशक्तिरसहायः स्वयमेव युगपत्समग्रं जानाति रहित, अव्याबाध और अनन्त सुखका अनुभव करता है । इसलिये सब स्वयमेव जानने और देखनेवाले तथा स्वकीय सुखका अनुभवन करनेवाले सिद्धको परसे (कुछ भी) प्रयोजन नहीं है। भावार्थ:-सिद्धभगवान ( तथा केवलीभगवान ) स्वयमेव सर्वज्ञत्वादिरूपसे परिणमित होते हैं। उनके उस परिणमनमें लेशमात्र भी ( इन्द्रियादि) परका आलम्बन नहीं है। यहां कोई सर्वज्ञका निषेध करनेवाला जीव कहे कि-'सर्वज्ञ हैं ही नहीं, क्योंकि देखने में नहीं आते; तो उसे निम्नोक्तानुसार समझाते हैं:- 'हे भाई ! यदि तुम कहते हो कि 'सर्वज्ञ नहीं हैं, तो हम पूछते हैं कि सर्वज्ञ कहां नहीं हैं ? इस क्षेत्रमें और इस कालमें अथवा तीनों लोकमें और तीनों कालमें ? यदि 'इस क्षेत्रमें और इस काल में सर्वज्ञ नहीं हैं' ऐसा कहो, तो वह संमत ही है । किन्तु यदि तीनों लोकमें और तीनों कालमें सर्वज्ञ नहीं हैं' ऐसा कहो, तो हम पूछते हैं कि वह तुमने कैसे जाना ? यदि तीनों लोकको और तीनों कालको सर्वज्ञके बिना तुमने देख- जान लिया तो तुम्ही सर्वज्ञ होगये, क्योंकि जो तीन लोक और तीनों कालको जाने वही सर्वज्ञ है । और यदि सर्वज्ञ रहित तीनों लोक और तीनों कालको तुमने नहीं देखा-जाना है तो फिर 'तीन लोक और तीन कालमें सर्वज्ञ नहीं है, ऐसा तुम कैसे कह सकते हो? इसप्रकार सिद्ध होता है कि तुम्हारा किया हुआ सर्वज्ञका निषेध योग्य नहीं है। हे भाई ! आत्मा एक पदार्थ है और ज्ञान उसका स्वभाव है; इसलिये उस ज्ञानका सम्पूर्ण विकास होने पर ऐसा कुछ नहीं रहता कि जो उस ज्ञानमें अज्ञात रहे । जिसप्रकार परिपूर्ण उष्णतारूप परिणमित अग्नि समस्त दाह्यको जलाती है, उसीप्रकार परिपूर्ण ज्ञानरूप परिणमित आत्मा समस्त ज्ञेयको जानता है। ऐसी सर्वज्ञदशा इस क्षेत्रमें इस कालमें ( अर्थात् इस क्षेत्रमें इस कालमें जन्म लेनेवाले जीवोंको ) प्राप्त नहीं होती तथापि सर्वज्ञत्वशक्तिवाले निज आत्माका स्पष्ट अनुभव इस क्षेत्रमें इस कालमें भी . हो सकता है।

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षड़द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
पश्यति, स्वप्रत्ययममूर्तसम्बद्धमव्यावाधमनंतं सुखमनुभवति च । ततः सिद्धस्य समस्तं स्वयमेव
जानतः पश्यतः, सुखमनुभवतश्च स्वं, न परेण प्रयोजनमिति ॥२९।।
पाहिँ चहिं जीवदि जीविस्सदि जो हु जीविदो पुव्वं ।
सो जीवो पाणा पुण बलमिदियमाउ उस्सासो ॥३०॥
प्राणैश्चतुर्भिर्जीवति जीविष्यति यः खलु जीवितः पूर्वम् ।
स जीवः प्राणाः पुनर्वलमिन्द्रियमायुरुच्छ्वासः ॥ ३० ॥
जीवत्वगुणव्याख्येयम् । इन्द्रियवलायुरुच्छ्वासलक्षणा हि प्राणाः । तेषु चित्सा-
मान्यान्वयिनो भावप्राणाः, पुद्गलसामान्यान्वयिनो द्रव्यप्राणाः । तेपामुभयेपामपि त्रिष्वपि
यह शास्त्र अध्यात्मशास्त्र होनेसे. यहां सर्वज्ञसिद्धिका विस्तार नहीं किया गया
है; जिज्ञासुको वह अन्य शास्त्रोंमें देख लेना चाहिए ।२६।
गाथा ३०
अन्वयार्थ:-[ यः खलु ] जो [चतुर्भिः प्राणैः ] चार प्राणोंसे [ जीवति ]
जीता है, [जीविष्यति ] जियेगा और [ जीवितः पूर्वम् ] पूर्वकालमें जीता था,
[ सः जीवः ] वह जीव है; [ पुनः प्राणाः ] और प्राण [ इन्द्रियम् ] इन्द्रिय, [वलम् ]
वल, [ आयुः ] आयु तथा [ उच्छ्वासः ] उच्छवास है ।
टीकाः—यह जीवत्वगुणकी व्याख्या है ।
प्राण इन्द्रिय, बल, आयु तथा उच्छ्वासस्वरूप हैं। उनमें (-प्राणोंमें),
*चित्सामान्यरूप अन्वयवाले वे भावप्राण हैं और पुद्गलसामान्यरूप अन्वयवाले वे
द्रव्यप्राण हैं। उन दोनों प्राणोंको त्रिकाल अच्छिन्न-संतानरूपसे ( अटूट धारासे )
]
*
जिन प्राणोंमें चित्सामान्यरूप अन्वय होता है वे भावप्राण हैं अर्थात् जिन प्रारणोंमें सदैव .
'चित्सामान्य, चित्सामान्य, चित्सामान्य' ऐसी एकरूपता-सदृशता होती है वे भावप्राण हैं ।
( जिन प्राणोंमें सदैव 'पुढंगलसामान्य, पुद्गलसामान्य, पुद्गलसामान्य' ऐसी एकरूपता-सदृशता
होती है वे द्रव्यप्राण हैं)।
जे चार प्राणे जीवतो पूर्वे, जीवे छे, जीवशे ।
ते जीव छ; ने प्राण इन्द्रिय-आयु-चल-उच्छ्वास छे ॥३०॥

पंचास्तिकायसंग्रह
4.
.
कालेष्वनवच्छिन्नसंतानत्वेन धारणात्संसारिणो जीवत्वम् । मुक्तस्य तु केवलानामेव भावप्राणानां
धारणाचदवसेयमिति ।। ३० ।।
अगुरुलहुगा अणंता तेहिं अणंतेहिं परिणदा सव्वे ।
देहिं असंखादा सिय लोगं सव्वमावण्णा ॥३१॥
केचित्तु अणावण्णा मिच्छादसणकसायजोगजुदा ।
विजुदा य तेहिं बहुगा सिद्धा संसारिणो जीवा ॥३२॥
अगुरुलघुका अनंतास्तरनंतः परिणताः सर्वे ।
देशैरसंख्याताः स्याल्लोकं सर्वमापन्नाः ॥३१ ।।
केचित्तु अनापन्ना मिथ्यादर्शनकषाययोगयुताः ।
वियुताश्च तैर्बहवः सिद्धाः संसारिणो जीवाः ॥ ३२ ॥
धारण करता है इसलिए संसारीको जीवत्व है । मुक्तको ( सिद्धको ) तो केवल भाव-
प्राणोंका ही धारण होनेसे जीवत्व है ऐसा समझना । ३० ।
गाथा ३१-३२
अन्वयार्थः -[ अनंता अगुरुलघुकाः ] अनन्त ऐसे जो अगुरुलघु ( गुण, अंश )
[तैः
उन अनन्त अगुरुलघु (गुण) रूपसे [ सर्वे ] सर्व जीव [परिणताः]
परिणत हैं; [ देशैः असंख्याताः ] वे असंख्यात प्रदेशवाले हैं। [स्यात् सर्वम् लोकम्
मापन्नाः ] कुछ कथंचित् समस्त लोकको प्राप्त होते हैं . [ केचित् तु] और कुछ
[ अनापन्नाः ] अप्राप्त होते हैं । [ बहवः जीवाः ] अनेक ( -अनंत ) जीव [ मिथ्यादर्शन-
कषाययोगयुताः ] मिथ्यादर्शन-कषाय-योगसहित [ संसारिणः] संसारी हैं [च ] और
अनेक ( -अनन्तजीव ) [ तैः वियुताः ] मिथ्यादर्शन-कषाय-योग रहित [ सिद्धाः ]
सिद्ध हैं।
जे अगुरुलघुक अनंत ते-रूप सर्व जीवो परिणमे ।
सौना प्रदेश असंख्य कतिपय लोकव्यापी होय छे ॥३१॥
अव्यापी छे कतिपय; वणी निर्दोष सिद्ध जीवो घणा ।
मिथ्यात्व-योग-कपाययुत संसारी जीव बहु जाणवा ॥३२॥

- पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन अत्र जीवानां स्वाभाविकं प्रमाणं मुक्तामुक्तविभागश्चोक्तः । जीवा विभागैकद्रव्य- वाल्लोकप्रमाणकप्रदेशाः । अगुरुलघवो गुणास्तु सेपामगुरुलघुत्वाभिधानस्य स्वरूपप्रतिष्ठत्व- निबंधनस्य स्वभावस्याविभागपरिच्छेदाः प्रतिसमयसंभवत्पस्थानपतितवृद्धिहानयोऽनंताः । प्रदेशास्तु अविभागपरमाणुपरिच्छिन्नसूक्ष्मांशरूपा असंख्येयाः। एवंविधेषु तेषु केचित्कथं- टीका:-यहां जीवोंका स्वाभाविक *प्रमाण तथा उनका मुक्त और अमुक्त ऐसा विभाग कहा है। जीव वास्तवमें अविभागी-एकद्रव्यपनेके कारण लोकप्रमाण-एक-प्रदेशवाले हैं । उनके (-जीवोंके ) 'अगुरुलघुगुण-अगुरुलघुत्व नामका जो स्वरूपप्रतिष्ठत्वके कारणभूत स्वभाव उसके अविभाग परिच्छेद-प्रतिसमय होनेवाली षट्स्थानपतित वृद्धिहानिवाले अनन्त हैं; और ( उनके अर्थात् जीवोंके ) प्रदेश-जो. कि अविभाग परमाणु जितने मापवाले सूक्ष्म अंशरूप हैं वे-असंख्य हैं । ऐसे उन जीवोंमें कुछ कथंचित् ( केवलसमुद्घातके कारण ) लोकपूरण-अवस्थाके प्रकार द्वारा समस्त लोकमें व्याप्त होते हैं और कुछ समस्त लोकमें अव्याप्त होते हैं । और उन जीवोंमें जो अनादि प्रवाहरूपसे प्रवर्तमान मिथ्यादर्शन-कपाय-योग सहित हैं वे संसारी हैं, जो उनसे विमुक्त 8 प्रमाण माप; परिमाण। [जीवके अगुरुलघुत्वस्वभावके छोटे-से छोटे अंश (अविभाग परिच्छेद ) करने पर स्वभावसे ही सदैव अनन्त अंश होते हैं, इसलिए जीव सदैव ऐसे (षट्गुण- वृद्धिहानियुक्त ) अनन्त अंशों जितना है। और जीवके स्वक्षेत्रके छोटेसे-छोटे अंश करने पर स्वभावसे ही सदैव असंख्य अंश होते हैं, इसलिए जीव सदैव ऐसे असंख्य अंशों जितना है ] । १. गुण-ग्रंश; अविभाग परिच्छेद । [ जीवमें अगुरुलघुत्व नामका स्वभाव है । वह स्वभाव जीवको स्वरूप प्रतिष्ठित्वके ( अर्थात् स्वरूपमें रहनेके ) कारणभूत है। उसके प्रविभाग परिच्छेदोंको यहाँ अगुरुलघुगुण ( अंश ) कहा है ] | २. किसी गुणमें ( अर्थात् गुणकी पर्यायमें ) अंशकल्पना की जाने पर, उसका जो छोटे-से छोटा ( जघन्य मात्रारूप, निरंश) अंश होता है उसे उस गुणका (अर्थात गुणकी पर्यायका) अविभाग परिच्छेद कहा जाता है। ३. पट्स्थानपतित वृद्धिहानि= छह स्थानमें समावेश पानेवाली वृद्धि हानि; षट्गुण वृद्धिहानि । [ अगुरुलघुत्वस्वभावके अनन्त अंशोंमें स्वभावसे ही प्रतिसमय षट्गुण वृद्धिहानि होती रहती है ।

६४ पंचास्तिकायसंग्रह चिल्लोकपूरणावस्थाप्रकारेण सर्वलोकव्यापिनः, केचित् तदव्यापिन इति । अथ ये तेषु मिथ्या- दर्शनकपाययोगैरनादिसंततिप्रवृत्तैर्युक्तास्ते संसारिणः, ये विमुक्तास्ते सिद्धाः, ते च प्रत्येक बहव इति । ३१-३२ । . जह पउमरायरयणं खित्तं खीरे पभासयदि खीरं । तह देही देहत्थो सदेहमेत्तं पभासयदि ॥ ३३ ॥. यथा पद्मरागरत्नं क्षिप्त क्षीरे प्रभासयति क्षीरम् । तथा देही देहस्थः स्वदेहमानं प्रभासयति ॥३३|| एष देहमात्रत्वदृष्टांतोपन्यासः । यथैव हि पद्मरागरत्नं क्षीरे क्षिप्तं स्वतोऽव्यतिरिक्त- प्रभास्कंधेन तद्व्याप्नोति क्षीरं, तथैव हि जीवः अनादिकपायमलीमसत्वमूले शरीरेऽवतिष्ठमान स्वप्रदेशैस्तदभिव्याप्नोति शरीरम् । यथैव च तत्र क्षीरेऽग्निसंयोगादुद्वलमाने तस्य पद्मराग- हैं ( अर्थात् मिथ्यादर्शन-कषाय-योग रहित हैं ) वे सिद्ध हैं; और वे हर प्रकारके जीव अनेक हैं ( अर्थात् संसारी तथा सिद्ध जीवोंमेंसे हरएक प्रकारके जीव अनन्त हैं.)। ३१-३२ ।। ... गाथा ३३. अन्वयार्थः-[ यथा ] जिसप्रकार [ पद्मरागरत्नं ] पद्मरागरत्न [ क्षीरे क्षिप्तं ] दूधमें डाला.जाने पर [.क्षीरम् प्रभासयंति ] दूधको प्रकाशित करता है, [ तथा ] उसी- - प्रकार [ देही ] देही. ( जीव ) [ देहस्थः ] देहमें रहता हुआ [ स्वदेहमानं प्रभासयति ] स्वदेहप्रमाण प्रकाशित होता है । टीका:-यह देहप्रमाणपनेके अदृष्टान्तका. कथन है ( अर्थात् यहां. जीवका देहप्रमाणपना समझानेके लिए दृष्टान्त कहा है ) । * यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि दृष्टान्त और दाष्टन्ति अमुक अंशोंमें ही एक-दूसरेके साथ मिलते हुए (-समानतावाले) होते हैं, सर्व अंशोंमें नहीं। ज्यम दूधमां स्थित पद्मरागमणि प्रकाशे दूधने । त्यम देहमां स्थित देही देहप्रमाण व्यापकता लहे ।।३३।।.

षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन ६५ - रत्नस्य प्रभास्कंध उबलते पुनर्निविशमाने निविशते च, तथैव च तत्र शरीरे विशिष्टाहारादिवशा- दुत्सर्पति तस्य जीवस्य प्रदेशाः उत्सर्पन्ति पुनरपसर्पति अपसर्पन्ति च । यथैव च तत्पद्मराग- रत्नमन्यत्र प्रभूतक्षीरे क्षिप्त स्वप्रभास्कंधविस्तारेण तद् व्याप्नोति प्रभूतक्षीरं, तथैव च जीवोऽन्यत्र महति शरीरेऽवतिष्ठमानः स्वप्रदेशविस्तारेण तद व्याप्नोति महच्छरीरम् । यथैव च तत्पराग- रत्नमन्यत्र स्तोकक्षीरे निक्षिप्तं स्वप्रभाम्कंधोपसंहारेण तद् व्याप्नोति स्तोकक्षीरं, तथैव च जिसप्रकार पद्मरागरत्न दूधमें डाला जाने पर अपनेसे *अव्यतिरिक्त प्रभासमूह द्वारा उस दूधमें व्याप्त होता है, उसीप्रकार जीव अनादिकालसे कषाय द्वारा मलिनता होनेके कारण शरीरमें रहता हुआ स्वप्रदेशों द्वारा उस शरीरमें व्याप्त होता है । और जिसप्रकार अग्निके संयोगसे उस दूधमें उफान आने पर उस पद्मरागरत्नके प्रभासमूहमें उफान आता है ( अर्थात् वह विस्तारको प्राप्त होता है ) और दूध बैठ जाने पर प्रभासमूह भी बैठ जाता है। उसीप्रकार विशिष्ट आहारादिके वश उस शरीरमें वृद्धि होने पर उस जीवके प्रदेश विस्तृत होते हैं और शरीर फिर सूख जाने पर प्रदेश भी संकुचित होजाते हैं । पुनश्च, जिसप्रकार वह पद्मरागरत्न दूसरे अधिक दूधमें डाला जाने पर स्वप्रभासमूहके विस्तार द्वारा उस अधिक दूधमें व्याप्त होता है, उसीप्रकार जीव दूसरे बड़े शरीरमें स्थितिको प्राप्त होने पर स्वप्रदेशोंके विस्तार द्वारा उस बड़े शरीरमें व्याप्त होता है। और जिसप्रकार वह पद्मरागरत्न दूसरे कम दूधमें डालने पर स्वप्रभासमूहके संकोच द्वारा उस थोड़े दूधमें व्याप्त होता है; उसीप्रकार जीव अन्य छोटे शरीरमें स्थितिको प्राप्त होने पर स्वप्रदेशोंके संकोच द्वारा उस छोटे शरीरमें व्याप्त होता है। ॐ अव्यतिरिक्त अभिन्न । [ जिसप्रकार "मिश्री एक द्रव्य है और मिठास उसका गुण है"-ऐसा कहीं दृष्टान्तमें कहा हो तो उसे सिद्धान्तरूप नहीं समझना चाहिये; उसीप्रकार यहाँ भी जीवके संकोच-विस्ताररूप दान्तिको समझने के लिये रत्न और (दूधमें फैली हुई ) उसकी प्रभाको जो अव्यतिरिक्तपना कहा है वह सिद्धान्तरूप नहीं समझना चाहिये । पुद्गलात्मक रत्नको दृष्टान्त बनाकर असंख्यप्रदेशी जीवद्रव्यके संकोच-विस्तारको किसीप्रकार समझानेके हेतु .यहाँ रत्नकी प्रभाको रत्नसे अभिन्न कहा है (अर्थात् रत्नकी प्रभा संकोच-विस्तारको प्राप्त होने पर मानो रत्नके अंश ही-रत्न हो- सकोच-विस्तारको प्राप्त हुए हों ऐसा समझनेको कहा है )]।

६६ पंचास्तिकायसंग्रह - जीवोऽन्यत्राणुशरीरेऽवतिष्ठमानः स्वप्रदेशोपसंहारेण तद् व्याप्नोत्यणुशरीरमिति ।।३३।। सब्वत्थ अस्थि जीवो ण य एक्को एक्ककाय एक्कट्ठो। अज्झवसाणविसिट्ठो चिदि मलिणो रजमलेहिं ।।३४॥ सर्वत्रास्ति जीवो न चैक एककाये ऐक्यस्थः । अध्यवसानविशिष्टश्चेष्टते मनिलो रजोमलेः ।। ३४ ।। अत्र जीवस्य देहादेहांतरेऽस्तित्वं, देहात्पृथग्भूतत्वं, देहांतरसंचरणकारणं चोपन्यस्तम् । आत्मा हि संसारावस्थायां क्रमवर्तिन्यनवच्छिन्नशरीरसंताने यथैकस्मिन् शरीरे- वृत्तः तथा भावार्थ:-तीन लोक और तीन कालके समस्त द्रव्य-गुण-पर्यायोंको एक समयमें प्रकाशित करनेमें समर्थ ऐसे विशुद्ध-दर्शनज्ञानस्वभाववाले चैतन्यचमत्कारमात्र शुद्धजीवास्तिकायसे विलक्षण मिथ्यात्वरागादि विकल्पों द्वारा उपाजित जो शरीरनाम- कर्म उमसे जनित (अर्थात् उस शरीरनामकर्मका उदय जिसमें निमित्त है ऐसे ) संकोचविस्तारके आधीनरूपसे जीव सर्वोत्कृष्ट अवगाहरूपसे परिणमित होता हुआ सहस्र- योजनप्रमाण महामत्स्यके शरीरमें व्याप्त होता है, जघन्य अवगाहरूपसे परिणमित होता हुआ उत्सेध घनांगुलके असंख्य भाग जितने लब्ध्यपर्याप्त सूक्ष्मनिगोदके शरीरमें व्याप्त होता है और मध्यम अवगाहरूपसे परिणमित होता हुआ मध्यम शरीर में व्याप्त होता है । ३३ । गाथा ३४ अन्वयार्थ:-[ जीवः ] जीव [ सर्वत्र ] सर्वत्र ( क्रमवर्ती सर्व शरीरोंमें ) [ अस्ति ] है [च ] और [एककाये] किसी एक शरीरमें [ऐक्यस्थः] (.क्षीरनीरवत्..) एकरूपसे रहता है तथापि [न एकः] उसके साथ एक नहीं है; [ अध्यवसानविशिष्टः ] अध्यवसायविशिष्ट वर्तता हुआ [ रजोसलैः मलिनः ] रजमल (कर्ममल) . द्वारा मलिन होनेसे [चेष्टते ] वह भ्रमण करता है । टीकाः—यहाँ जीवका देहसे देहान्तरमें ( -एक शरीरसे. अन्य शरीरमें ) अस्तित्व, देहसे पृथक्त्व तथा देहान्तरमें गमनका कारण कहा है । तन तन धरे जीव, तन महीं जैक्यस्थ पण नहि भेक छ। जीव विविध अध्यवसाययुत, रजमलमलिन थईने भमे ॥३४॥ - -

६७
षद्रव्य-पंचास्विकायवर्णन
क्रमेणान्येष्वपि शरीरेषु वर्तत इति तस्य सर्वत्रास्तित्वम् । न चैकस्मिन् शरीरे नीरे क्षीरमिवैक्येन
स्थितोऽपि भिन्नस्वभावत्वात्तेन सहक इति तस्य देहात्पृथग्भूतत्वम् । अनादिबंधनोपाधिविवर्तित-
विविधाध्यवसायविशिष्टत्वाचनमूलकर्मजालमलीमसत्वाच्च चेष्टमानस्यात्मनस्तथाविधाध्यवसायकर्म-
निर्वर्तितेतरशरीरप्रवेशोभवतीति तस्य देहांतरसंचरणकारणोपन्यास इति ॥ ३४ ॥
जेसि जीवसहावो पत्थि अभावो य सव्वहा तस्स ।
ते होंति भिण्णदेहा सिद्धा वचिगोयरमदीदा ॥ ३५ ।।
येषां जीवस्वभावो नास्त्यभावश्च सर्वथा तस्य ।
ते भवन्ति भिन्नदेहाः सिद्धा वाग्गोचरमतीताः ॥३॥
आत्मा संसार-दशामें क्रमवर्ती अच्छिन्न (-अटूट) शरीरप्रवाहमें जिसप्रकार
एक शरीरमें वर्तता है उसीप्रकार क्रमसे अन्य शरीरोंमें भी वर्तता है; इसप्रकार उसे
सर्वत्र (-सर्व शरीरोंमें) अस्तित्व है । और किसी एक शरीरमें, पानीमें दूधकी भांति
एकरूपसे रहने पर भी, भिन्न स्वभावके कारण उसके साथ एक ( तद्रूप ) नहीं है।
इसप्रकार उसे देहसे पृथक्पना है। अनादि बंधनरूप उपाधिसे विवर्तन (परिवर्तन)
पानेवाले विविध अध्यवसायोंसे विशिष्ट होनेके कारण ( अनेक प्रकारके अध्यवसायवालां
होनेके कारण ) तथा वे अध्यवसाय जिसका निमित्त हैं ऐसे कर्मसमूहसे मलिन होनेके
कारण भ्रमण करते हुए आत्माको तथाविध अध्यवसायों तथा कर्मोंसे रचेजानेवाले
(-उस प्रकारके मिथ्यात्वरागादिरूप भावकर्मों तथा द्रव्यकर्मोंसे रचेजानेवाले) अन्य
शरीरमें प्रवेश होता है; इसप्रकार उसे देहान्तरमें गमन होनेका कारण कहा गया ।३४।
गाथा ३५
अन्वयार्थ:-येषां ] जिनके [जीवस्वभावः ] जीवस्वभाव (-प्राणधारणरूप
जीवत्व ) [न अस्ति ] नहीं है, और [ सर्वथा ] सर्वथा [ तस्य अभावः च ] उसका
अभाव भी नहीं है, [ ते ] वे [ भिन्नदेहाः ] देहरहित [ वाग्गोचरम् अतीताः ] वचनगोच-
रातीत [ सिद्धाः भवन्ति ] सिद्ध (सिद्धभगवंत) हैं ।
जीवत्व नहि ने सर्वथा तदभाव पण नहि जेमने।
ते सिद्ध छे–जे देहविरहित वचनविषयातीत छे ॥३५॥

६८ पंचास्तिकायसंग्रह सिद्धानां जीवत्वदेहमात्रत्वव्यवस्थेयम् । सिद्धानां हि द्रव्यप्राणधारणात्मको मुख्यत्वेन जीवस्वभावो नास्ति । न च जीवस्वभावस्य सर्वथाभावोऽस्ति भावप्राणधारणात्मकस्य जीव- स्वभावस्य मुख्यत्वेन सद्भावात् । न.च तेषां शरीरेण सह नीरक्षीरयोरिचक्येन वृत्तिः यतस्ते तत्संपर्कहेतुभूतकपाययोगविप्रयोगादतीतानन्तरशरीरमात्रावगाहपरिणतत्वेऽप्यत्यंतभिन्नदेहाः । वाचां गोचरमतीतश्च तन्महिमा, यतस्ते लौकिकप्राणधारणमंतरेण शरीरसम्बन्धमतरेण च परिप्राप्तनिरुपाधिम्वरूपाः सततं.प्रतपंतीति ।। ३५ ॥ ण कुदोचि वि उप्पण्णो जम्हा कज्जं ण तेण सो सिद्धो । उप्पादेदि ण किंचि वि कारणमवि तेण ण स होदि ।। ३६ ।। - टीका:-यह सिद्धोंके ( सिद्धभगवन्तोंके ) जीवत्व और देहप्रमाणत्वकी व्यवस्था है। सिद्धोंको वास्तवमें द्रव्यप्राणके धारणस्वरूप जीवस्वभाव मुख्यरूपसे नहीं है; ( उन्हें ) जीवस्वभावका सर्वथा अभाव भी नहीं है, क्योंकि भावप्राणके धारणस्वरूप जीवस्वभावका मुख्यरूपसे सद्भाव है । और उन्हें शरीरके साथ नीरक्षीरकी भांति एक- रूप 'वृत्ति नहीं है; क्योंकि शरीरसंयोगके हेतुभूत कषाय और योगका वियोग हुआ है इसलिये वे 'अतीत अनन्तर शरीरप्रमाण अवगाहरूप परिणत होने पर भी अत्यन्त देह रहित हैं । और वचनगोचरातीत उनकी महिमा है; क्योंकि लौकिक प्राणके धारण विना और शरीरके सम्बन्ध विना सम्पूर्णरूपसे प्राप्त किये हुए निरुपाधि स्वरूप-द्वारा वे सतत प्रतपते हैं (-प्रतापवंत वर्तते हैं)। ३५ । १. वृत्ति वर्तन; अस्तित्व । २. अतीत अनन्तर- भूतकालका सबसे अन्तिम; चरम । (सिद्ध भगवंतोंकी अवगाहना चरमशरीर- प्रमाण होनेके कारण उस अन्तिमशरीरकी अपेक्षा लेकर उन्हें 'देहप्रमाणपना' कहा जा सकता है तथापि, वे अत्यन्तदेह रहित हैं।) ३. वचनगोचरातीत-वचनगोचरपनेका जिसने अतिक्रम किया है; वचनविषयातीत; वचन .. अगोचर। उपजे नहीं को कारणे ते सिद्ध तेथी न कार्य छ । उपजावता नथी कांई पण तेथीन कारण पण ठरे ।। ३६ ।।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ६६ न कुतश्चिदप्पुत्पन्नो यस्मात् कार्य न तेन सः सिद्धः । उत्पादयति न किंचिदपि कारणमपि तेन न स भवति ॥ ३६ ॥ सिद्धस्य कार्यकारणभावनिरासोऽयम् । यथा संसारी जीवो भावकर्मरूपयात्मपरिणाम- संतत्या द्रव्यकर्मरूपया च पुद्गलपरिणामसन्तत्या कारणभूतया तेन तेन देवमनुष्यतिर्यग्नारक- रूपेण कार्यभूत उत्पद्यते, न तथा सिद्धरूपेणापीति । सिद्धो धुभयकर्मक्षये स्वयमुत्पद्यमानो नान्यतः कुतश्चिदुत्पद्यत इति । यथैव च स एव संसारी भावकर्मरूपामात्मपरिणामसंतति द्रव्यकर्मरूपां च पुद्गलपरिणामसंतति कार्यभूतां कारणभूतत्वेन निर्वतयन तानि तानि देवमनुष्य- . गाथा ३६ अन्वयार्थ:-[ यस्मात् सः सिद्धः ] वे सिद्ध [ कुतश्चित् अपि ] किसी (अन्य ) कारणसे [ न उत्पन्नः] उत्पन्न नहीं होते [ तेन ] इसलिये [ कार्य न ] कार्य नहीं है, और [ किंचित् अपि ] किसी भी ( अन्य कार्यको) [न उत्पादयति ] उत्पन्न नहीं करते [ तेन ] इसलिये [ सः ] वे [ कारणम् अपि ] कारण भी [ न भवति ] नहीं हैं । टीका:-यह, सिद्धको कार्यकारणभाव होनेका निरास है ( अर्थात् सिद्ध- भगवानको कार्यपना और कारणपना होनेका निराकरण-खंडन है)। जिसप्रकार संसारी जीव कारणभूत ऐसी भावकर्मरूप प्रात्मपरिणामसंतति और द्रव्यकर्मरूप पुद्गलपरिणामसंतति द्वारा उन-उन देव-मनुष्य-तिर्यंच-नारकके रूप में कार्यभूतरूपसे उत्पन्न होता है, उसी प्रकार सिद्धरूपसे भी उत्पन्न होता है-ऐसा नहीं है। ( और ) सिद्ध ( -सिद्धभगवान ) वास्तव में, दोनों कर्मोका क्षय होने पर, स्वयं ( सिद्धरूपसे ) उत्पन्न होते हुए अन्य किसी कारणसे (-भावकर्मसे या द्रव्यकर्मसे ) उत्पन्न नहीं होते। पुनश्च, जिसप्रकार वही संसारी (जीव) कारणभूत होकर कार्यभूत ऐसी भावकर्मरूप आत्मपरिणामसंतति और द्रव्यकर्मरूप पुद्गलपरिणामसंतति रचता हुमा कार्यभूत ऐसे वे-वे देव-मनुष्य-तिर्यंच-नारकके रूप अपने में उत्पन्न करता है, उसी प्रकार सिद्धका रूप भी ( अपनेमें ) उत्पन्न करता है-ऐसा नहीं है; ( और ) सिद्ध * आत्मपरिणामसंतति प्रात्माके परिणामोंकी परम्परा ।

७०. पंचास्तिकायसंग्रह तिर्यग्नारकरूपाणि कार्याण्युत्पादयत्यात्मनो न तथा सिद्धरूपमपीति । सिद्धो बुभयकर्मक्षये स्वयमात्मानमुत्पादयन्नान्यत्किञ्चिदुत्पादयति ॥३६।। सस्सदमध उच्छेदं भव्वमभव्वं च सुण्णमिदरं च । विण्णाणमविण्णाणं ण वि जुज्जदि असदि सब्भावे ॥३७॥ शाश्वतमथोच्छेदो भव्यमभव्यं च शून्यमितरच । विज्ञानमविज्ञानं नापि युज्यते असति सद्भावे ।। ३७ ।। अत्र जीवाभावो मुक्तिरिति निरस्तम् । द्रव्यं द्रव्यतया शाश्वतमिति, नित्ये द्रव्ये पर्यायाणां प्रतिसमयमुच्छेद इति, द्रव्यस्य सर्वदा अभृतपर्यायः भाव्यमिति, द्रव्यस्य सर्वदा वास्तवमें, दोनों कर्मोंका क्षय होने पर, स्वयं अपनेको (सिद्धरूपसे ) उत्पन्न करते हुए अन्य कुछ भी (भावद्रव्यकर्मस्वरूप अथवा देवादिस्वरूप कार्य) उत्पन्न नहीं करते ।३६। गाथा ३७ अन्वयार्थः-[ सद्भावे असति ] यदि (मोक्षमें जीवका ) सद्भाव न हो तो [ शाश्वतम् ] शाश्वत, [ अथ उच्छेदः ] नाशवंत, [ भव्यम् ] भव्य (-होने योग्य ), [ अभव्यम् च ] अभव्य (-न होने योग्य ), [ शून्यम् ] शून्य, [ इतरत् च ] अशून्य, [विज्ञानम् ] विज्ञान और [ अविज्ञानम् ] अविज्ञान [ न अपि युज्यते ] ( जीव द्रव्यमें ) घटित नहीं हो सकते । ( इसलिये मोक्षमें जीवका सभाव है ही। ) टीका:-यहां, 'जीवका प्रभाव सो मुक्ति है' . इस बातका खंडन किया है। (१) द्रव्य द्रव्यरूपसे शाश्वत है, ( २ ) नित्य द्रव्यमें पर्यायका प्रति समय नाश होता है, ( ३ ) द्रव्य सर्वदा अभूत पर्यायोंरूपसे भाव्य (होनेयोग्य, परिणमित होने योग्य ) है, ( ४ ) द्रव्य सर्वदा भूत पर्यायोंरूपसे अभाव्य ( -न होने योग्य ) है, ( ५ ) द्रव्य अन्य द्रव्योंसे सदा शून्य है, (६) द्रव्य स्वद्रव्यसे सदा अशून्य है, - सद्भाव जो नहि होय तो ध्रुव, नाश, भव्य, अभव्य ने । विज्ञान, अणविज्ञान, शून्य, अशून्य-से कई नव घटे ॥३७॥ - - षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ७.१ - भूतपर्यायैरभाव्यमिति, द्रव्यमन्यद्रव्यैः सदा शून्यमिति, द्रव्यं स्वद्रव्येण संदाऽशून्पमिति, क्वचिजीवद्रव्येऽनंतं ज्ञानं क्वचित्सतिं ज्ञानमिति, क्वचिजीवद्रव्येऽनंतं क्वचित्सांतमज्ञानमिति- एक्दन्यथानुपपद्यमानं मुक्तौ जीवस्य सद्भावमावेदयतीति ॥३७।। कम्माणं फलमेक्को एक्को कज्ज तु णाणमध एक्को। चेदयदि जीवरासी चेदगभावेण तिविहेण ॥ ३८ ॥ कर्मणां फलमेकः एका कार्य तु ज्ञानमथैकः । चेतयति जीवराशिश्चेतकभावेन त्रिविधेन ||३८|| (७) 'किसी जीवद्रव्यमें अनन्त ज्ञान और किसीमें सांत ज्ञान है,.. (८) किसी जीवद्रव्यमें अनन्त अज्ञान और किसीमें सांत अज्ञान है-यह सब, अन्यथा घटित न होता हुआ, मोक्षमें जीवके सदुभाव को प्रगट करता है ।३७। गाथा ३८ अन्वयार्थः-[त्रिविधेन चेतकभावेन ] त्रिविध चेतकभाव द्वारा [एकः जीव- राशिः ] एक जीवराशि [ कर्मणां फलम् ] कर्मोंके फलको, [ एका तु ] एक जीवाशि १. जिसे सम्यक्त्वसे च्युत नहीं होना है ऐसे सम्यक्त्वी जीवको अनन्त ज्ञान है और जिसे सम्यक्त्वसे च्युत होना है ऐसे सम्यक्त्वी जीवको सांत ज्ञान है। २. प्रभव्य जीवको अनन्त अज्ञान है और जिसे किसी काल भी ज्ञान होना है ऐसे अज्ञानी भव्य जीवको सांत अज्ञान है। ३. अन्यथा अन्य प्रकारसे; दूसरी रीतिसे । [ मोक्षमें जीवका अस्तित्व ही नहीं रहता हो तो उपरोक्त आठ भाव घटित हो हो नहीं सकते। यदि मोक्षमें जीवका अभाव ही हो जाता हो तो, (१) प्रत्येक द्रव्य द्रव्यरूपसे शाश्वत है-यह वात कैसे घटित होगी ? (२) प्रत्येक द्रव्य नित्य रहकर उसमें पर्यायोंका नाश होता रहता है-यह बात कैसे घटित होगी? ( ३-६) प्रत्येक द्रव्य सर्वदा अनागत पर्यायसे भाव्य, सर्वदा अतीत पर्यायसे प्रभाव्य, सर्वदा परसे शून्य और सर्वदा स्वसे अशून्य है-यह बातें कैसे घटित होंगो ? (७) किसी जीवद्रव्यमें अनन्त ज्ञान है-यह बात कैसे घटित होगी? और ( ८) किसी जीवद्रव्यमें सांत अज्ञान है (अर्थात् जीव- त्रणविध चेतकभावथी को जीवराशि 'कार्य' ने। को जीवराशि 'कर्मफल' ने, कोई चेते 'ज्ञान' ने ।। ३८ ॥ ?

७ पंचास्तिकायसंग्रह चेतयितृत्वगुणव्याख्येयम् । एके हि चेतयितारः प्रकृष्टतरमोहमलीमसेन प्रकृष्टतर- ज्ञानावरणमुद्रितानुभावेन चेतकस्वभावेन प्रकृष्टतरवीर्यांतरायावसादितकार्यकारणसामर्थ्याः सुखदुःखरूपं कर्मफलमेव प्राधान्येन चेतयंते । अन्ये तु प्रकृष्टतरमोहमलीमसेनापि प्रकृष्टज्ञाना- वरणमुद्रितानुभावेन चेतकस्वभावेन मनावीर्यांतरायक्षयोपशमासादितकार्यकार रणसामर्थ्याः सुखदुःखरूपकर्मफलानुभवनसंवलितमपि कार्यमेव प्राधान्येन चेतयंते । अन्यतरे तु प्रक्षालितसकल- [ कार्य ] कार्यको [ अथ ] और [ एकः ] एक जीवराशि [ ज्ञानम् ] ज्ञानको [ चेतयति] चेतती (-वेदती) है। टीका:-यह, 'चेतयितृत्वगुणकी व्याख्या है । कोई चेतयिता अर्थात् आत्मा तो, जो अति प्रकृष्ट मोहसे मलिन है और जिसका प्रभाव ( शक्ति ) अति प्रकृष्ट ज्ञानावरणसे मुंद गया है ऐसे चेतकस्वभाव द्वारा सुखदुःखरूप 'कर्मफल, को ही प्रधानतः चेतते हैं, क्योंकि उनका अति प्रकृष्ट वीर्यांतरायसे कार्य करनेका (-कर्मचेतनारूप परिणमित होनेका ) सामर्थ्य नष्ट हो गया है। दूसरे चेतयिता अर्थात् आत्मा, जो अति प्रकृष्ट मोहसे मलिन है और जिसका प्रभाव 'प्रकृष्ट ज्ञानावरणसे मुंद गया है ऐसे चेतकस्वभाव द्वारा -भले ही सुखदुःख- रूप कर्मफलके अनुभवसे मिश्रितरूपसे भी-'कार्य'को ही प्रधानतः चेतते हैं, क्योंकि उन्होंने अल्प वीर्यांतरायके क्षयोपशमसे कार्य करनेका सामर्थ्य प्राप्त किया है । द्रव्य नित्य रहकर उसमें अज्ञानपरिणामका अन्त आता है )-यह बात कैसे घटित होगी? इसलिये इन आठ भावों द्वारा मोक्षमें जोवका अस्तित्व सिद्ध होता है।] १. चेतयितृत्व चेतयितापना; चेतनेवालापना; चेतकपना । २. कर्मचेतनावाले जीवको ज्ञानावरण 'प्रकृष्ट' होता है और कर्मफलचेतनावालेको अति प्रकृष्ट' होता है। ३. कार्य=( जीव द्वारा ) किया जाता हो वह; इच्छापूर्वक इष्टानिष्ट विकल्परूप कर्म । [जिन जीवोंको वीर्यका किंचित् विकास हुआ है उनको कर्मचेतनारूपसे परिणमित होनेका सामर्थ्य प्रगट हुआ है इसलिये वे मुख्यतः कर्मचेतनारूपसे परिणमित होते हैं। वह कर्मचेतना कर्मफलचेतनासे मिश्रित होती है। ] षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ७३ मोहकलंकेन समुच्छिन्नकृत्स्नज्ञानावरणतयात्यंतमुन्मुद्रितसमस्तानुभावेन चेतकस्वभावेनसमस्त- वीर्यांतरायक्षयासादितानंतवीर्या अपि निर्जीर्णकर्मफलत्वादत्यंतकृतकृत्यत्वाच्च स्वतोऽव्यतिरिक्त- स्वाभाविक सुखं ज्ञानमेव चेतयंत इति ।। ३८ ।। सव्वे खलु कम्मफलं थावरकाया तसा हि कज्जजुदं । पाणित्तमदिक्कता जाणं विदंति ते जीवा ॥३६॥ सर्वे खलु कर्मफलं स्थावरकायास्त्रसा हि कार्ययुतम् । प्राणित्वमतिकांता: ज्ञानं विदन्ति ते जीवाः ।। ३९ ।। और दूसरे चेतयिता अर्थात् आत्मा, जिसमेंसे सकल मोहकलंक धुल गया है तथा समस्त ज्ञानावरणके विनाशके कारण जिसका समस्त प्रभाव अत्यन्त विकसित होगया है ऐसे चेतकस्वभाव द्वारा 'ज्ञान' को ही-कि जो ज्ञान अपनेसे 'अव्यतिरिक्त स्वाभाविक सुखवाला है उसीको-चेतते हैं, क्योंकि उन्होंने समस्त वीर्यान्तरायके क्षयसे अनन्त वीर्यको प्राप्त किया है इसलिये उनको (विकारी सुखदुःखरूप) कर्मफल निर्जरित होगया है और अत्यंत 'कृतकृत्यपना हुआ है ( अर्थात् कुछ भी करना लेशमात्र भी नहीं रहा)।३। गाथा ३९ अन्वयार्थ:-[ सर्वे स्थावरकायाः ] सर्व स्थावर जीवसमूह [ खलु ] वास्तवमें [ कर्मफलं ] कर्मफलको वेदते हैं, [त्रसाः] त्रस [ हि ] वास्तवमें [ कार्ययुतम् ] कार्य- सहित कर्मफलको वेदते हैं और [प्राणित्वम् अतिक्रांता: ] जो प्रारिणत्वका (-प्राणोंका) अतिक्रम कर गये हैं [ ते जीवाः ] वे जीव [ ज्ञानं ] ज्ञानको [विंदन्ति ] वेदते हैं । १. अव्यतिरिक्त अभिन्न । ( स्वाभाविक सुख ज्ञानसे अभिन्न है, इसलिये ज्ञानचेतना स्वाभाविक सुखके संचेतन अनुभवन-सहित ही होती है।) कृतकृत्यकृतकार्य । [ परिपूर्ण ज्ञानवाले प्रात्मा अत्यन्त कृतकार्य हैं इसलिये, यद्यपि उन्हें अनन्त वीर्य प्रगट हुआ है तथापि, उनका वीर्य कार्यचेतनाको ( कर्मचेतनाको ) नहीं रचता, ( और विकारी सुखदुःख नष्ट हो गये हैं इसलिये उनका वीर्य कर्मफलचेतनाको भी नहीं रचता,) ज्ञानचेतनाको ही रचता है। वैदे करमफल स्थावरो, प्रेस कार्ययुत फल अनुभवे । प्राणित्वथी अतिक्रांत जे ते जीव वेदे ज्ञानने ॥३९॥ १. २

७४
पंचास्तिकायसंग्रह
अत्र कः किं चेतयत इत्युक्तम् । चेतयंते अनुभवन्ति उपलभंते विंदतीत्येकार्थाश्चेतना-
नुभृत्युपलब्धिवेदनानामेकार्थत्वात् । तत्र स्थावराः कर्मफलं चेतयंते, त्रसाः कार्य चेतयंते, केवल-
ज्ञानिनो ज्ञानं चेतयंत इति ।। ३९ ।।
अथोपयोगगुणव्याख्यानम् ।
उवयोगो खलु दुविहो णाणेण य दंसणेण संजुत्तो।
जीवस्स सव्वकालं अणण्णभूदं वियाणीहि ॥ ४० ॥
टीका:-यहां, कौन क्या चेतता है (अर्थात् किस जीवको कौनसी चेतना होती
है) वह कहा है।
चेतता है, अनुभव करता है, उपलब्ध करता है और वेदता है-ये एकार्थ
हैं ( अर्थात् यह सब शब्द एक अर्थवाले हैं ), क्योंकि चेतना, अनुभूति, उपलब्धि और
वेदनाका एक अर्थ है। वहीं, स्थावर कमफलको चेतते हैं, त्रस कार्यको चेतते हैं,
केवलज्ञानी ज्ञानको चेतते हैं ।
भावार्थ-पांच प्रकारके स्थावर जीव अव्यक्त सुखदुःखानुभवरूप शुभाशुभ-
कर्मफलको चेतते हैं। द्वीन्द्रियादि त्रस जीव उसी कर्मफलको इच्छापूर्वक इष्टानिष्ट
विकल्परूप कार्यसहित चेतते हैं । *परिपूर्ण ज्ञानवंत भगवन्त ( अनन्त सौख्य सहित )
ज्ञानकोही चेतते हैं । ३९ ।
अब उपयोग गुणका व्याख्यान है।
* यहाँ परिपूर्ण ज्ञानचेतनाकी विवक्षा होनेसे, केवलीभगवन्तों और सिद्धभगवन्तोंको ही ज्ञानचेतना
कही गई है । अांशिक ज्ञानचेतनाकी विवक्षासे तो मुनि, श्रावक तथा अविरत सम्यग्दृष्टिको भी
ज्ञानचेतना कही जा सकती है। उसका यहाँ निषेध नहीं समझना, मात्र विवक्षाभेद है ऐसा
समझना चाहिये।
छ ज्ञान ने दर्शन सहित उपयोग युगल प्रकारनो;
जीवद्रव्यने ते सर्व काल अनन्यरूपे जाणवो ॥ ४० ॥

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन उपयोगः खलु द्विविधो ज्ञानेन च दर्शनेन संयुक्तः । जीवस्य सर्वकालमनन्यभूतं विजानीहि ॥ ४० ॥ आत्मनश्चैतन्यानुविधायी परिणाम उपयोगः। सोऽपि द्विविधः-ज्ञानोपयोगो दर्शनोपयोगश्च । तत्र विशेषग्राहि ज्ञानं, सामान्यग्राहि दर्शनम् । उपयोगश्च सर्वदा जीवाद- पृथग्भृत एव, एकास्तित्वनि तत्त्वादिति ॥ ४०॥ प्राभिणिसुदोधिमणकेवलाणि णाणाणि पंचभेयाणि । कुमदिसुदविभंगाणि य तिण्णि वि णाहिं संजुत्ते ॥४१॥ आभिनिवोधिकश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि ज्ञानानि पंचभेदानि । कुमतिश्रुतविभङ्गानि च त्रीण्यपि ज्ञानैः संयुक्तानि ॥ ४१ ॥ गाथा ४० मन्वयार्थः--[ ज्ञानेन च दर्शनेन संयुक्तः] ज्ञान और दर्शनसे संयुक्त ऐसा [ खलु द्विविधः ] वास्तवमें दो प्रकारका [ उपयोगः ] उपयोग [जीवस्य ] जीवको [ सर्वकालम् ] सर्वकाल [ अनन्यभूतं ] अनन्यरूपसे [ विजानीहि ] जानो। टीका:-आत्माका चैतन्य-अनुविधायी (अर्थात् चैतन्यका अनुसरण करनेवाला) परिणाम सो उपयोग है। वह भी दो प्रकारका है-ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । वहीं, विशेषको ग्रहण करनेवाला ज्ञान है और सामान्यको ग्रहण करनेवाला दर्शन है (अर्थात् विशेष जिसमें प्रतिभासित हो वह ज्ञान है और सामान्य जिसमें प्रतिभासित हो वह दर्शन है) । और उपयोग सर्वदा जीवसे *प्रपृथग्भूत ही है, क्योंकि एक अस्तित्व से रचित है । ४० । गाथा ४१ अन्वयार्थी-[आभिनिवोधिकश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि] प्राभिनिबोधिक (-मति,) श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवल-[ ज्ञानानि पंचभेदानि ] इसप्रकार ज्ञानके पाँच भेद हैं; [ कुमतिश्रुतविभङ्गानि च ] और कुमति, कुश्रुत तथा विभंग-[त्रीणि अपि ] * अपृथग्भूत-अभिन्न । (उपयोग सदैव जीवसे अभिन्न ही हैं, क्योंकि वे एक अस्तित्वसे निष्पन्न हैं।) मति, श्रुत, अवधि, मनः, केवल-पांच भेदो ज्ञानना । कुमति, कुश्रुत, विभंग-त्रण पण ज्ञान साथे जोडवां ।। ४१ ।। - पंचास्तिकायसंग्रह - ज्ञानोपयोगविशेषाणां नामस्वरूपाभिधानमेतत् । तत्राभिनिवोधिकज्ञानं श्रुतज्ञान- मवधिज्ञानं मनःपर्ययज्ञानं केवलज्ञानं कुमतिज्ञानं कुश्रुतज्ञानं विभङ्गज्ञानमिति नामाभिधानम् । आत्मा ह्यनंतसर्वात्मप्रदेशव्यापिविशुद्धज्ञानसामान्यात्मा । स खल्वनादिज्ञानावरणकर्मावच्छन्नप्रदेशः सन् , यत्चदावरणक्षयोपशमादिन्द्रियानिन्द्रियावलम्बाच्च मूर्तामूर्तद्रव्यं विकलं विशेषेणावबुध्यते तदाभिनिवोधिकज्ञानम् , यचदावरणक्षयोपशमादनिन्द्रियावलंबाच्च मूर्तामूर्तद्रव्यं विकलं विशेष- णाववुध्यते तत् श्रुतज्ञानम् । यत्चदावरणक्षयोपशमादेव मूर्तद्रव्यं विकलं विशेषेणावबुध्यते तदवधि- ज्ञानम्, यत्तदावरणक्षयोपशमादेव परमनोगतं मूर्तद्रव्यं विकलं विशेषेणावबुध्यते तन्मनःपर्यय- ज्ञानम्, यत्सकलावरणात्यंतक्षये केवल एव मूर्तामूर्तद्रव्यं सकलं विशेषेणावबुध्यते तत्स्वाभाविक यह तीन ( अज्ञान ) भी [ ज्ञानैः ] ( पांच ) ज्ञानके साथ [ संयुक्तानि ] संयुक्त किये गये। (-इसप्रकार ज्ञानोपयोगके आठ भेद हैं। ) टीका:-यह, ज्ञानोपयोगके भेदोंके नाम और स्वरूपका कथन है । वहाँ, (१) आभिनिबोधिकज्ञान, (२) श्रुतज्ञान, (३): अवधिज्ञान, ( ४ ) मनःपर्ययज्ञान, ( ५ ) केवलज्ञान, ( ६ ) कुमतिज्ञान, (७) कुश्रुतज्ञान और (८) विभंगज्ञान-इसप्रकार ( ज्ञानोपयोगके भेदोंके ) नामका कथन है । ( अब उनके स्वरूपका कथन किया जाता है:-) आत्मा वास्तवमें अनन्त, सर्व प्रात्मप्रदेशोंमें व्यापक, विशुद्ध ज्ञानसामान्यस्वरूप है। वह (आत्मा) वास्तवमें अनादि ज्ञानावरणकर्मसे आच्छादित प्रदेशवाला वर्तता हुआ; (१ ) उस प्रकारके ( अर्थात् मतिज्ञानके ) आवरणके क्षयोपशमसे और इन्द्रिय-मनके अवलम्बनसे मूर्त- अमूर्त द्रव्यका 'विकलरूपसे विशेषतः अवबोधन करता है वह आभिनिबोधिकज्ञान है; ( २ .) उस प्रकार के ( अर्थात् श्रुतज्ञानके ) आवरणके क्षयोपशमसे और मनके अवलम्बनसे मूर्त-अमूर्त द्रव्यका विकलरूपसे विशेषतः अवबोधन करता है वह श्रुतज्ञान है; (३) उस प्रकारके आवरणके क्षयोपशमसे ही मूर्त द्रव्यका विकलरूपसे विशेषतः अवबोधन करता है वह अवधिज्ञान है; ( ४ ) उस प्रकारके आवरणके क्षयोपशमसे .. १. विकलरूपसे अपूर्णरूपसे; अंशतः । २. विशेपतः अवबोधना करना=जानना । ( विशेष अववोध अर्थात् विशेष प्रतिभास सो ज्ञान है ।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन :५७ केवलज्ञानम् मिथ्यादर्शनोदयसहचरितमाभिनिबोधिकज्ञानमेव कुमतिज्ञानम्, मिथ्यादर्शनोदयसहचरितं श्रुतज्ञानमेव कुश्रुतज्ञानम्, मिथ्यादर्शनोदयसहचरित- ही परमनोगत (-दूसरोंके मनके साथ सम्बन्धवाले ) मूर्त द्रव्यका विकलरूपसे विशेषतः अववोधन करता है वह मनःपर्ययज्ञान है; (५) समस्त आवरणके अत्यन्त क्षयसे, केवल ही (-अकेला आत्मा ही ) मूर्त-अमूर्त द्रव्यका सकलरूपसे विशेषतः अववोधन करता है वह स्वाभाविक केवलज्ञान है। (६) मिथ्यादर्शनके उदयके साथका आभिनिबोधिकज्ञान ही कुमतिज्ञान है, (७) मिथ्यादर्शनके उदयके साथका श्रुतज्ञान ही कुश्रुतज्ञान है; (८) मिथ्यादर्शनके उदयके साथका अवधिज्ञान ही विभंगजान है । इस प्रकार ( ज्ञानोपयोगके भेदोंका ) स्वरूपका कथन है । इसप्रकार मतिज्ञानादि आठ ज्ञानोपयोगोंका व्याख्यान किया गया । भावार्थः-प्रथम तो, निम्नानुसार पांच ज्ञानोंका स्वरूप है:- निश्चयनयसे अखंड-एक-विशुद्धज्ञानमय ऐसा यह आत्मा - व्यवहारनयसे संसारावस्थामें कर्मावृत वर्तता हुआ, मतिज्ञानावरणका क्षयोपशम होने पर, पांच इन्द्रियों और मनसे मूर्त-अमूर्त वस्तुको विकल्परूपसे जो जानता है वह मतिज्ञान है। वह तीन प्रकारका है; उपलब्धिरूप, भावनारूप और उपयोगरूप । मतिज्ञानावरणके क्षयोपशमसे जनित अर्थग्रहणशक्ति (पदार्थको जाननेकी शक्ति ) वह उपलब्धि है, जाने हुए पदार्थका पुनः पुनः चिंतन सो भावना है और 'यह काला है,' 'यह पीला है, इत्यादिरूपसे अर्थग्रहण व्यापार (-पदार्थको जाननेका व्यापार ) सो उपयोग है। उसीप्रकार वह ( भतिज्ञान ) अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणारूप भेदों द्वारा अथवा कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि पदानुसारीबुद्धि तथा संभिन्नश्रोतृताबुद्धि ऐसे भेदों द्वारा चार प्रकारका है । ( यहाँ, ऐसा तात्पर्य ग्रहण करना चाहिये कि निर्विकार शुद्ध अनुभूति के प्रति अभिमुख जो मतिज्ञान वही उपादेयभूत अनन्त सुखका साधक होनेसे निश्चयसे उपादेय है, उसके साधनभूत बहिरंग मतिज्ञान तो व्यवहारसे उपादेय है।) वही पूर्वोक्त आत्मा, श्रुतज्ञानावरणका क्षयोपशम होने पर मूर्त-अमूर्त वस्तुको परोक्षरूपसे जो जानता है उसे ज्ञानी श्रुतज्ञान कहते हैं । वह लब्धिरूप और भावना- ७८ पंचास्तिकायसंग्रह मवधिज्ञानमेव विभंगज्ञानम् इति स्वरूपाभिधानम् । इत्थं मतिज्ञानादिज्ञानोपयोगाष्टकं व्याख्यातम् ।। ४१ ॥ रूप है तथा उपयोगरूप और नयरूप है । 'उपयोग' शब्दसे यहाँ वस्तुको ग्रहण करने वाला प्रमाण समझना चाहिये अर्थात् सम्पूर्ण वस्तुको जाननेवाला ज्ञान समझना चाहिये और 'नय' शब्दसे वस्तुके (गुणपर्यायरूप ) एक देशको ग्रहण करनेवाला ऐसा ज्ञाताका अभिप्राय समझना चाहिये । ( यहां ऐसा तात्पर्य ग्रहण करना चाहिये कि विशुद्धज्ञानदर्शन जिसका स्वभाव है ऐसे शुद्ध प्रात्मतत्त्वके सम्यक् श्रद्धान-ज्ञान-अनु- चरणरूप अभेदरत्नत्रयात्मक जो भावश्रुत वही उपादेयभूत परमात्मतत्त्वका साधक होनेसे निश्चयसे उपादेय है किन्तु उसके साधनभूत बहिरंग श्रुतमान तो व्यवहारसे उपादेय है।) यह आत्मा, अवधिज्ञानावरणका क्षयोपशम होने पर, मूर्त वस्तुको जो प्रत्यक्षरूपसे जानता है वह अवधिज्ञान है। वह अवधिनान लब्धिरूप तथा उपयोगरूप ऐसा दो प्रकारका जानना । अथवा अवधिज्ञान देशावधि, परमावधि और सर्वावधि ऐसे भेदों द्वारा तीन प्रकारसे है । उसमें परमावधि और सर्वावधि चैतन्यके उछलनेसे भरपूर आनन्दरूप परमसुखामृतके रसास्वादनरूप समरसीभावसे परिणत चरमदेही तपोधनोंको होता है । तीनों प्रकारके अवधिज्ञान विशिष्ट सम्यक्त्वादि गुणसे निश्चयसे होते हैं । देवों और नारकोंको होनेवाला भवप्रत्ययी जो अवधिज्ञान वह नियमसे देशावधि ही होता है। यह आत्मा, मनःपर्ययज्ञानावरणका क्षयोपशम होने पर, परमनोगत मूर्त वस्तुको जो प्रत्यक्षरूपसे जानता है वह मनःपर्ययज्ञान है । ऋजुमति और विपुलमति ऐसे भेदों द्वारा मनःपर्ययज्ञान दो प्रकारका है । वहाँ, विपुलमति मनःपर्ययज्ञान परके मनवचनकाय सम्बन्धी पदार्थको, वक्र तथा अवक्र दोनोंको, जानता है और ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान तो ऋजुको ( अवक्रको ) ही जानता है । निर्विकार आत्माकी उपलब्धि और भावना सहित चरमदेही मुनियोंको विपुलमति मनःपर्ययज्ञान होता है । यह दोनों मनःपर्ययज्ञान वीतराग आत्मतत्त्वके सम्यक श्रद्धान-ज्ञान-अनुष्ठानकी भावना सहित, पन्द्रह प्रमादरहित अप्रमत्त मुनिको उपयोगमें-विशुद्ध परिणाममें-उत्पन्न होते हैं ।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवरणंन
दसणमवि चक्खुजुदं अचक्खुजुदमवि य ओहिणा सहियं ।
प्रणिधणमणंतविसयं केवलियं चावि पण्णत्तं ॥४२॥
यहाँ मनःपर्ययज्ञानके उत्पादकालमें ही अप्रमत्तपनेका नियम है, फिर प्रमत्तपनेमें भी
वह संभवित होता है।
जो ज्ञान घटपटादि ज्ञेय पदार्थोंका अवलम्बन लेकर उत्पन्न नहीं होता वह
केवलज्ञान है । वह श्र तज्ञानस्वरूप भी नहीं है । यद्यपि दिव्यध्वनिकालमें उसके आधार
से गणधरदेव आदिको श्रुतज्ञान परिणमित होता है तथापि वह श्रुतज्ञान गणधरदेव
आदिको ही होता है, केवलीभगवन्तोंको तो केवलज्ञान ही होता है । पुनश्च, केवली-
भगवन्तोंको श्रुतज्ञान नहीं है इतना ही नहीं, किन्तु उन्हें ज्ञान-अज्ञान भी नहीं है अर्थात्
उन्हें किसी विषयका ज्ञान तथा किसी विषयका अज्ञान हो ऐसा भी नहीं है-सर्व
विषयोंका ज्ञान ही होता है; अथवा, उन्हें मतिज्ञानादि अनेक भेदवाला ज्ञान नहीं
है-एक केवलज्ञान ही है।
यहाँ जो पांच ज्ञानोंका वर्णन किया गया है वह व्यवहारसे किया गया है ।
निश्चयसे तो बादल रहित सूर्यकी भांति आत्मा अखंड-एक-ज्ञान-प्रतिभासमय ही है ।
अव अज्ञानत्रयके सम्बन्धमें कहते हैं:
मिथ्यात्व द्वारा अर्थात् भाव-आवरण द्वारा अज्ञान (-कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान
तथा विभंगज्ञान ) और अविरतिभाव होता है तथा ज्ञेयका अवलम्बन लेनेसे (-ज्ञेय-
सम्बन्धी विचार अथवा ज्ञान करनेसे ) उस-उस काल दुःनय और दुःप्रमाण होते हैं ।
( मिथ्यादर्शनके सभावमें वर्तता हुआ मतिज्ञान वह कुमतिज्ञान है, श्रुतज्ञान वह
कुश्रुतज्ञान है, अवधिज्ञान वह विभंगज्ञान है; उनके सभावमें वर्तते हुए नय वे
दुःनय
हैं और प्रमाण वह दुःप्रमाण है । ) इसलिये ऐसा भावार्थ समझना चाहिये कि
निर्विकार शुद्ध आत्माकी अनुभूतिस्वरूप निश्चय सम्यक्त्व उपादेय है ।
इस प्रकार ज्ञानोपयोगका वर्णन किया गया । ४१ ।
दर्शन. तणा चनु-अचनुरूप, अवधिरूप ने ।
निःसीम विषय अनिधन केवलरूप भेद कहेल के ॥४२॥

पंचास्तिकायसंग्रह दर्शनमपि चक्षुर्य तमचक्षुर्यु तमपि चावधिना सहितम् । अनिधनमनंतविषयं कैवल्यं चापि प्रज्ञप्तम् ॥ ४२ ।। दर्शनोपयोगविशेषाणां नामस्वरूपाभिधानमेतत् । चक्षुर्दर्शनमचक्षुर्दर्शनमयधिदर्शनं केवलदर्शनमिति नामाभिधानम् । आत्मा ह्यनन्तसर्वात्मप्रदेशव्यापिविशुद्धदर्शनसामान्यात्मा । स खल्वनादिदर्शनावरणकर्मावच्छन्नप्रदेशः सन् , यत्तदावरणक्षयोपशमाच्चक्षुरिन्द्रियावलम्बाच्च मूर्तद्रव्यं विकलं सामान्येनावबुध्यते तच्चक्षुर्दर्शनम्, यत्तदावरणक्षयोपशमाचक्षुर्वर्जितेतरचतुरिन्द्रि- - गाथा ४२ अन्वयार्थः-[ दर्शनम् अपि ] दर्शन भी [ चक्षुर्युतम् ] चक्षुदर्शन, [ अचक्षुयु तम् अपि च ] अचक्षुदर्शन, [ अवधिना सहितम् ] अवधिदर्शन [च अपि ] और [अनंतविषयम्] अनंत जिसका विषय है ऐसा [ अनिधनम् ] अविनाशी [ कैवल्यं ] केवलदर्शन [प्रज्ञप्तम् ] -ऐसे चार भेदवाला कहा है । टीका:-यह, दर्शनोपयोगके भेदोंके नाम और स्वरूपका कथन है । ( १ ) चक्षुदर्शन, ( २ ) अचक्षुदर्शन, ( ३ ) अवधिदर्शन और ( ४ ) केवलदर्शन-इस प्रकार ( दर्शनोपयोगके भेदोंका ) नामका कथन है । ( अव, उनके स्वरूपका कथन किया जाता है:-) आत्मा वास्तवमें अनन्त, सर्व प्रात्मप्रदेशोंमें व्यापक, विशुद्ध दर्शनसामान्यस्वरूप है । वह (आत्मा) वास्तवमें अनादि दर्शनावरणकर्मसे आच्छादित प्रदेशोंवाला वर्तता हुआ, ( १ ) उस प्रकारके ( अर्थात् चक्षुदर्शनके ) आवरणके क्षयोपशमसे और चक्षु-इन्द्रियके , अवलम्वनसे मूर्त द्रव्यको विकलरूपसे *सामान्यतः अवबोधन करता है वह चक्षुदर्शन है, ( २ ) उस प्रकारके आवरणके क्षयोपशमसे तथा चक्षुके अतिरिक्त शेष चार इन्द्रियों और मनके अवलम्वनसे मूर्त-अमूर्त द्रव्यको विकलरूपसे सामान्यतः अंववोधन करता है वह अचक्षु- दर्शन है, ( ३ ) उस प्रकारके आवरणके क्षयोपशमसे ही मूर्त द्रव्यको विकलरूपसे सामान्यतः अववोधन करता है वह अवधिदर्शन है, ( ४ ) समस्त आवरणके अत्यन्त सामान्यतः अववोधना-देखना । दर्शन है । ) ( सामान्य अववोध अर्थात् सामान्य प्रतिभास वह ८१ षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन यानिन्द्रियावलम्बाच्च मूर्तामूर्तद्रव्यं विकलं सामान्येनावबुध्यते तदचक्षुर्दर्शनम्, यचदावरणक्षयो- पशमादेव मूर्तद्रव्यं विकलं सामान्येनावबुध्यते तदवधिदर्शनम्, यत्सकलावरणात्यंतक्षये केवल एव मूर्तामूर्तद्रव्यं सकलं सामान्येनावबुध्यते तत्स्वाभाविकं केवलदर्शनमिति स्वरूपाभि- धानम् ॥ ४२ ॥ ण वियप्पदि णाणादो णाणी गाणाणि होति णेगाणि । तम्हा दु विस्सरूवं भणियं दवियं त्ति णाणीहि ॥ ४३ ।। न विकल्प्यते ज्ञानात् ज्ञानी ज्ञानानि भवंत्यनेकानि । तस्मातु विश्वरूपं भणितं द्रव्यमिति ज्ञानिभिः ।। ४३ ।। एकस्यात्मनोऽनेकज्ञानात्मकत्वसमर्थनमेवत् । न तावज्ज्ञानी ज्ञानात्पृथग्भवति, द्वयोरप्येकास्तित्वनि चत्वेनैकद्रव्यत्वात्, द्वयोरप्यभिन्नप्रदेशत्वेनैकक्षेत्रत्वाद, द्वयोरप्येकसमय- क्षयसे, केवल ही (-आत्मा अकेला ही ), मूर्त-अमूर्त द्रव्यको सकलरूपसे सामान्यतः अववोधन करता है वह स्वाभाविक केवलदर्शन है। इस प्रकार ( दर्शनोपयोगके भेदोंके ) स्वरूपका कथन है । ४२ । गाथा ४३ अन्वयार्थः-[ ज्ञानात् ] ज्ञानसे [ ज्ञानी न विकल्प्यते ] ज्ञानीका (-आत्माका) भेद नहीं किया जाता; [ज्ञानानि अनेकानि भवंति] तथापि ज्ञान अनेक हैं । [तस्मात् तु] इसलिये तो [ ज्ञानाभिः ] ज्ञानियोंने [ द्रव्यं ] द्रव्यको [ विश्वरूपम् इति भणितम् ] विश्वरूप (-अनेकरूप ) कहा है । टीका:-एक आत्मा अनेक ज्ञानात्मक होनेका यह समर्थन है। प्रथम तो ज्ञानी (-आत्मा ) ज्ञानसे पृथक् नहीं है; क्योंकि दोनों एक अस्तित्वसे रचित होनेसे दोनोंको एकद्रव्यपना है, दोनोंके अभिन्न प्रदेश होनेसे दोनोंको एकक्षेत्रपना है, दोनों एक समयमें रचे जाते होनेसे दोनोंको एककालपना है, दोनोंका एक स्वभाव होनेसे दोनोंको एकभावपना है। किन्तु ऐसा कहा जाने पर भी, एक छे ज्ञानथी नहि भिन्न ज्ञानी, ज्ञान तोय अनेक छ। ते कारणे तो विश्वरूप का दरवने ज्ञानी ।। ४३ ।। ११ -

८२
पंचास्तिकायसंग्रह
.
निवृत्तत्वेनैककालत्वात्, द्वयोरप्येकस्वभावत्वेनैकभावत्वात् । न चैवमुच्यमानेप्येकस्मिन्नात्मन्या-
भिनिवोधिकादीन्यनेकानि ज्ञानानि विरुध्यते, द्रव्यस्य विश्वरूपत्वात् । द्रव्यं हि सहक्रम-
प्रवृत्तानंतगुणपर्यायाधारतयानंतरूपत्वादेकमपि विश्वरूपमभिधीयत इति ।। ४३ ॥
जदि हवदि दव्वमण्णं गुणदो य गुणा य दव्वदो अण्णे ।
दव्वाणतियमधवा दवाभानं पकुन्नति ॥४४ ॥
यदि भवति द्रव्यमन्यद्गुणतश्च गुणाश्च द्रव्यतोऽन्ये ।
द्रव्यानंत्यमथवा द्रव्याभावं प्रकुर्वन्ति ॥ ४४ ।।
द्रव्यस्य गुणेभ्यो मेदे, गुणानां च द्रव्याभेदे दोपोपन्यासोऽयम् । गुणा हि
क्वचिदाश्रिताः । यत्राश्रितास्तद्र्व्यं । तच्चेदन्यद्गुणेभ्यः । पुनरपि गुणाः क्वचिदाश्रिताः ।
आत्मामें आभिनिबोधिक (-मति ) आदि अनेक ज्ञान विरोध नहीं पाते, क्योंकि द्रव्य
विश्वरूप है । द्रव्य वास्तवमें सहवर्ती और क्रमवर्ती ऐसे अनंत गुणों तथा पर्यायोंका
आधार होनेके कारण अनंतरूपवाला होनेसे, एक होने पर भी, *विश्वरूप कहा
जाता है । ४३ ।
गाथा ४४
अन्वयार्थ:-[ यदि ] यदि [द्रव्यं ] द्रव्य [ गुणतः ] गुणोंसे [अन्यत् च
भवति ] अन्य (-भिन्न ) हो [ गुणाः च ] और गुण [ द्रव्यतः अन्ये ] द्रब्यसे अन्य हों
तो [ द्रव्यानंत्यम् ] द्रव्यकी अनंतता हो [ अथवा ] अथवा [ द्रव्याभावं ] व्यका अभाव
[प्रकुर्वन्ति ] हो।
टीका:-द्रव्यका गुणोंसे भिन्नत्व हो और गुणोंका द्रव्यसे भिन्नत्व हो तो दोष
आता है-उसका यह कथन है ।
* विश्वरूप-अनेकरूप । [एक द्रव्य सहवर्ती अनंत गुणोंका और क्रमवर्ती अनंत पर्यायोंका
आधार होनेके कारण अनन्तरूपवाला भी है, इसलिये उसे विश्वरूप ( अनेकरूप ) भी कहा
जाता है । इसलिये एक आत्मा अनेक ज्ञानात्मक होनेमें विरोध नहीं है।
जो द्रव्य गुणथी अन्य ने गुण अन्य मानो द्रव्यथी ।
तो थाय द्रव्य-अनंतता वा थाय नास्ति द्रव्यनी ॥४४॥

षड्द्रव्य-पंचास्विकायवर्णन
यत्राश्रितास्तद्र्व्यम् । तदपि अन्यच्चेद्गुणेभ्यः । पुनरपि गुणा क्वचिदाश्रिताः । यत्राश्रिताः
तद्रव्यम् । तदप्यन्यदेव गुणेभ्यः । एवं द्रव्यस्य गुणेभ्यो भेदे भवति द्रव्यानंत्यम् । द्रव्यं हि
गुणानां समुदायः । गुणाश्चेदन्ये समुदायात्, को नाम समुदायः । एवं गुणानां द्रव्याद्भदे
भवति द्रव्याभाव इति ।। ४४ ।।
अविभत्तमणण्णत्तं दन्वगुणाणं विभत्तमण्णत्तं ।
णेच्छंति णिच्छ्यण्हू तविवरीदं हि वा तेसि ॥४५॥
अविभक्तमनन्यत्वं द्रव्यगुणानां विभक्तमन्यत्वम् ।
नेच्छन्ति निश्चयज्ञास्तद्विपरीतं हि वा तेषाम् ॥ ४५ ॥
गुरण वास्तवमें किसीके आश्रयसे होते हैं; ( वे ) जिसके आश्रित हों वह
द्रव्य होता है । वह (-द्रव्य ) यदि गुणोंसे अन्य (-भिन्न ) हो तो-फिर भी, गुण
किसीके आश्रित होंगे; ( वे ) जिसके आश्रित हों वह द्रव्य होता है। वह यदि गुणोंसे
अन्य हो तो-फिर भी, गुण किसीके आश्रित होंगे; ( वे ) जिसके आश्रित हों वह
द्रव्य होता है । वह भी गुणोंसे अन्य ही हो......इस प्रकार यदि द्रव्यका गुणोंसे भिन्नत्व
हो तो, द्रव्यकी अनंतता हो ।
वास्तवमें द्रव्य अर्थात् गुणोंका समुदाय । गुण यदि समुदायसे अन्य हों तो
समुदाय कैसा ? ( अर्थात् यदि गुणोंको समुदायसे भिन्न माना जाये तो समुदाय कहां-
से घटित होगा ? अर्थात् द्रव्य ही कहांसे घटित होगा? ) इस प्रकार यदि गुणोंका
द्रव्यसे भिन्नत्व हो तो, द्रव्यका अभाव हो । ४४ ।
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गाथा ४५
अन्वयार्थः-[ द्रव्यगुणानाम् ] द्रव्य और गुणोंको [ अविभक्तम् अनन्यत्वम् ]
अविभक्तपनेरूप अनन्यपना है; [निश्चयज्ञाः हि ] निश्चयके ज्ञाता [ तेषाम् ] उन्हें
[विभक्तम् अन्यत्वम् ] विभक्तपनेरूप-अन्यपना [ वा ] या [ तद्विपरीतं ] ( विभक्तपने-
रूप ) अनन्यपना [ न इच्छन्ति ] नहीं मानते ।
गुण-द्रव्यने अविभक्तरूप अनन्यता बुधमान्य.छ ।
पण त्यां विभक्त अनन्यता वा अन्यता नहि मान्य छे ॥४॥

८४ पंचास्तिकायसंग्रह द्रव्यगुणानां स्वोचितानन्यत्वोक्तिरियम् । अविभक्तप्रदेशत्वलक्षणं द्रव्यगुणानामन- न्यत्वमभ्युपगम्यते । विभक्तप्रदेशत्वलक्षणं त्वन्यत्वमनन्यत्वं च नाभ्युपगम्यते । तथा हि-यथैकस्य परमाणोरेकेनात्मप्रदेशेन सहाविभक्तत्वादनन्यत्वं, तथैकस्य परमाणोस्तद्वर्तिनों स्पर्शरसगंधवर्णादिगुणानां चाविभक्तप्रदेशत्वादनन्यत्वम् । यथा त्वत्यंतविप्रकृष्टयोः सह्यविंध्य- योरत्यंतसन्निकृष्टयोश्च मिश्रितयोस्तोयपयसोर्विभक्तप्रदेशत्वलक्षणमन्यत्वमनन्यत्वं च, न तथा द्रव्यगुणानां विभक्तप्रदेशत्वाभावादन्यत्वमनन्यत्वं चेति ।। ४५ ।। टीकाः—यह, द्रव्य और गुणोंके स्वोचित अनन्यपनेका कथन है ( अर्थात् द्रव्य और गुणोंको कैसा अनन्यपनाः घटित होता है वह यहां कहा है। ) द्रव्य और गुणोंको अविभक्तप्रदेशत्वस्वरूप अनन्यपना स्वीकार किया जाता है; परन्तु विभक्तप्रदेशत्वस्वरूप अन्यपना तथा (विभक्तप्रदेशत्वस्वरूप ) अनन्यपना स्वीकार नहीं किया जाता । वह स्पष्ट समझाया जाता है:-जिसप्रकार एक परमाणुको एक स्वप्रदेशके साथ अविभक्तपना होनेसे अनन्यपना है, उसींप्रकार एक परमाणुको तथा उसमें रहनेवाले स्पर्श-रस-गंध-वर्ण आदि गुणोंको अविभक्त प्रदेश होनेसे ( अविभक्तप्रदेशत्वस्वरूप ) - अनन्यपना है; परन्तु जिसप्रकार अत्यन्त दूर ऐसे 'सह्य और विंध्यको विभक्तप्रदेशत्वस्वरूप अनन्यपना है तथा अत्यन्त निकट ऐसे मिश्रित क्षीरनीरको विभक्तप्रदेशत्वस्वरूप अनन्यपना है, उसीप्रकार द्रव्य और गुणोंको विभक्त प्रदेश न होनेसे ( विभक्तप्रदेशत्वस्वरूप ) अन्यपना तथा (विभक्तप्रदेशत्वस्वरूप ) अनन्यपना नहीं है । ४५ । * अविभक्त= अभिन्न । (द्रव्य और गुणोंके प्रदेश अंभिन्न हैं इसलिये द्रव्य और गुणोंको अभिन्न प्रदेशत्वस्वरूप अनन्यपना है।) . अत्यन्त दूर स्थित सह्य और विंध्य नामके पर्वतोंको भिन्नप्रदेशत्वस्वरूप अन्यपना है। २. अत्यन्त निकट स्थित मिश्रितं दूध-जलको भिन्नप्रदेशत्वस्वरूप अनन्यपना है । द्रव्य और गुणोंको ऐसा अनन्यपना नहीं है, किन्तु अभिन्नप्रदेशत्वस्वरूप अनन्यपना है ।

षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन ८५ ववदेसा संठाणा संखा विसया य होंति ते बहुगा । ते तेसिमरणण्णत्ते अण्णत्ते चावि विज्जंते ॥ ४६ ।। व्यपदेशाः संस्थानानि संख्या विषयाश्च भवंति ते बहुकार । ते तेषामनन्यत्वे अन्यत्वे चापि विद्यते ।। ४६ ।। व्यपदेशादीनामेकांतेन द्रव्यगुणान्यत्वनिवंधनत्वमत्र प्रत्याख्यातम् । यथा देवदत्स्य गौरित्यन्यत्वे पष्ठीव्यपदेशः, तथा वृक्षस्य शाखा द्रव्यस्य गुणा इत्यनन्यत्वेऽपि । यथा देवदत्ता फलमंकुशेन धनदचाय वृक्षाद्वाटिकायामवचिनोतीत्यन्यत्वे कारकव्यपदेशः, तथा मृचिका घटभावं स्वयं स्वेन स्वस्मै स्वस्मात् स्वस्मिन् करोतीत्यात्मात्मानमात्मनात्मने आत्मन यात्मनि जानातीत्यनन्यत्वेऽपि । यथा प्रशोदेवदत्तस्य प्रांशुगौंरित्यन्यत्वे संस्थानं, तथा प्रांशोवृक्षस्य गाथा ४६. अन्वयार्थ:-[ व्यपदेशाः ] व्यपदेश, [ संस्थानानि ] संस्थान [संख्याः] संख्याएँ [च ] और [ विषयाः] विषय [ ते बहुकाः भवंति ] अनेक होते हैं । [ ते ] वे (व्यपदेश आदि ), [ तेपाम् ] द्रव्य-गुणोंके [ अन्यत्वे ] अन्यपनेमें [ अनन्यत्वे च अपि] -तथा अनन्यपने में भी [ विद्यते ] हो सकते हैं। टीका:-यहाँ *व्यपदेश आदि एकान्तसे द्रव्य-गुणोंके अन्यपनेका कारण होनेका खंडन किया है। जिसप्रकार "देवदत्तकी गाय" इसप्रकार अन्यपनेमें षष्ठीव्यपदेश (-छठवीं विभक्तिका कथन ) होता है, उसीप्रकार "वृक्षकी शाखा," "द्रव्यके गुण" ऐसे अन- न्यपने में भी (षष्ठीव्यपदेश ) होता है । जिसप्रकार 'देवदत्त फलको अंकुश द्वारा धनदत्तके लिये वृक्ष परसे बगीचेमें तोड़ता है' ऐसे अन्यपने में कारकव्यपदेश होता है, उसीप्रकार 'मिट्टी स्वयं घटभावको (-घड़ारूप परिणामको ) अपने द्वारा अपने लिये र व्यपदेशकयन, अभिधान । ( इस गाथामें ऐसा समझाया है कि-जहाँ भेद हो वहीं व्यपदेश आदि घटित हों ऐसा कुछ नहीं है। जहाँ अभेद हो वहां भी वे घटित होते हैं। इसलिये द्रव्य-गुणोंमें जो व्यपदेश आदि होते हैं वे कहीं एकान्तसे द्रव्य-गुणोंके भेदको सिद्ध नहीं करते।) व्यपदेश ने संस्थान, संख्या, विषय बहु ये होय छे। ते तेमना अन्यत्व तेम अनन्यतामां पण घटे ॥ ४६ ।। .

पंचास्तिकायसंग्रह
प्रांशुः शाखाभरो मूर्तद्रव्यस्य मूर्ता गुणा इत्यनन्यत्वेपि । यथैकस्य देवदचस्य दश गाव
इत्यन्यत्वे संख्या, तथैकस्य वृक्षस्य दश शाखाः एकस्य द्रव्यस्यानंता गुणा इत्यनन्यत्वेऽपि ।
यथा गोष्ठे गाव इत्यन्यत्वे विषयः, तथा वृक्षे शाखाः द्रव्ये गुणा इत्यनन्यत्वेऽपि । ततो न
व्यपदेशादयो द्रव्यगुणानां वस्तुत्वेन भेदं साधयंतीति ॥ ४६ ॥
णाणं धणं च कुवदि धणिणं जह णाणिणं च दुविधेहिं ।
भण्णंति तह पुधत्त एयत्तं चावि तच्चण्हू ॥ ४७ ॥
ज्ञानं धनं च करोति धनिनं यथा ज्ञानिनं च द्विविधाभ्याम् ।
भणति तथा पृथक्त्वमेकत्वं चापि तत्त्वज्ञाः ॥ ४७ ॥
.
अपनेमेंसे अपनेमें करती है, 'आत्मा आत्माको आत्मा द्वारा आत्माके लिये आत्मामेंसे
आत्मामें जानता है' ऐसे अनन्यपनेमें भी ( कारकव्यपदेश ) होता है । जिसप्रकार
'ऊँचे देवदत्तकी ऊँची गाय' ऐसा अन्यपने में संस्थान होता है, उसीप्रकार 'विशाल वृक्ष
का विशाल शाखासमुदाय,' 'मूर्त द्रव्यके मूर्त गुण' ऐसे अनन्यपनेमें भी ( संस्थान )
होता है । जिसप्रकार 'एक देवदत्तकी दस गायें, ऐसे अन्यपनेमें संख्या होती है, उसी-
प्रकार 'एक वृक्षकी दस शाखायें' 'एक द्रव्यके अनन्त गुण' ऐसे अनन्यपनेमें भी (संख्या)
होती है । जिसप्रकार 'वाड़ेमें गायें' ऐसे अन्यपनेमें विषय (-आधार ) होता है उसी-
प्रकार 'वृक्षमें शाखायें,' 'द्रव्यमें गुण' ऐसे अनन्यपनेमें भी ( विषय ) होता है ।
इसलिये ( ऐसा समझना चाहिये कि ) व्यपदेश आदि, द्रव्य-गुणोंमें वस्तुरूपसे भेद
सिद्ध नहीं करते । ४६ ।
गाथा ४७
अन्वयार्थः-[ यथा ] जिसप्रकार [ धनं ] धन [च ] और [ ज्ञानं ] ज्ञान
[धनिनं ] ( पुरुषको ) 'धनी' [च ] और [ ज्ञानिनं ] 'ज्ञानी' [ करोति ] करते हैं
[ द्विविधाभ्याम् भणंति ] ऐसा दो प्रकारसे कहा जाता है, [ तथा ] उसीप्रकार [तत्त्वज्ञाः]
तत्त्वज्ञ [ पृथक्त्वम् ] पृथक्त्व [च अपि ] तथा [ एकत्वम् ] एकत्वको कहते हैं ।
धनथी 'धनी' ने ज्ञानथी 'ज्ञानी'-द्विधा व्यपदेश छ ।
ते रीत तत्त्वज्ञो कहे . अकत्व तेम पृथक्त्वने ॥१७॥

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
८७
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वस्तुत्वभेदाभेदोदाहरणमेतत् । यथा धनं भिन्नास्तित्वनिर्वृत्वं भिन्नास्तित्वनिवृत्तस्य,
भिन्नसंस्थानं भिन्नसंस्थानस्य, भिन्नसंख्यं भिन्नसंख्यस्य, भिन्नविषयलब्धवृत्विक भिन्नविषय-
लव्धवृत्तिकस्य पुरुषस्य धनीति व्यपदेशं पृथक्त्वप्रकारेण कुरुते, यथा च ज्ञानमभिन्नास्तित्व-
निवृत्तमभिन्नास्तित्वनि चस्याभिन्नसंस्थानमभिन्नसंस्थानस्याभिन्नसंख्यमभिन्नसंख्यस्याभिन्न-
विषयलब्धवृत्तिकमभिन्नविषयलब्धवृत्तिकस्य पुरुषस्य ज्ञानीति व्यपदेशमेकत्वप्रकारेण कुरुते
तथान्यत्रापि । यत्र द्रव्यस्य भेदेन व्यपदेशादिः तत्र पृथक्त्वं, यत्राभेदेन तत्रैकत्वमिति ॥४७॥
णाणी णाणं च सदा अत्यंतरिदा दुअण्णमण्णस्स ।
दोण्हं अचेदणत्तं पसजदि सम्मं जिणावमदं ॥४॥
ज्ञानी ज्ञानं च सदार्थांतरिते त्वन्योऽन्यस्य ।
द्वयोरचेतनत्वं प्रसजति सम्यग जिनावमतम् ।।४८||
टीकाः—यह, वस्तुरूपसे भेद और ( वस्तुरूपसे ) अभेदका उदाहरण है ।
जिसप्रकार (१) भिन्न अस्तित्वसे रचित, (२) भिन्न संस्थानवाला, (३)
भिन्न संख्यावाला और ( ४ ) भिन्न विषयमें स्थित ऐसा धन ( १ ) भिन्न अस्तित्वसे
रचित, (२) भिन्न संस्थानवाले, ( ३ ) भिन्न संख्यावाले और (४) भिन्न विषयमें
स्थित ऐसे पुरुषको 'धनी' ऐसा व्यपदेश पृथक्त्व प्रकारसे करता है, तथा जिसप्रकार
(१) अभिन्न अस्तित्वसे रचित, (२) अभिन्न संस्थानवाला, (३) अभिन्न
संख्यावाला और ( ४ ) अभिन्न विषयमें स्थित ऐसा ज्ञान ( १ ) अभिन्न अस्तित्वसे
रचित, (२) अभिन्न संस्थानवाले, ( ३ ) अभिन्न संख्यावाले और ( ४ )
अभिन्न विषयमें स्थित ऐसे पुरुषको 'ज्ञानी' ऐसा व्यपदेश एकत्वप्रकारसे करता है, '
उसीप्रकार अन्यत्र भी समझना चाहिये । जहाँ द्रव्यके · भेदसे व्यपदेश आदि हों वहाँ
पृथक्त्व है, जहां ( द्रव्यके ) अभेदसे ( व्यपदेश आदि ) हों वहाँ एकत्व है ।४७॥
गाथा ४८
अन्वयार्थ:-[ ज्ञानी ] यदि ज्ञानी (-आत्मा) [च ] और [ ज्ञानं ] ज्ञान
[सदा ] सदा [ अन्योऽन्यस्य ] परस्पर [ अर्थांतरिते तु ] अर्थांतरभूत (भिन्नपदार्थभूत)
हों तो [ द्वयोः ] दोनोंको [ अचेतनत्वं प्रसजति ] अचेतनपनेका प्रसंग आये-[ सम्यग्
जिनावमतम् ] जो कि जिनोंको सम्यक् प्रकारसे असंमत है।
जो होय. अर्थांतरपणु अन्योन्य ज्ञानी-ज्ञानने ।
बन्ने अवेतनता लहे-जिनदेवने नहि मान्य जे ॥ ४८ ॥

पंचास्तिकायसंग्रह द्रव्यगुणानामांतरभूतत्वे दोपोऽयम् । ज्ञानी ज्ञानाद्यद्यांतरभृतस्तदा स्वकरणा- शमंतरेण परशुरहितदेवदत्तवत्करणव्यापारारामर्थत्वादचेतयमानोऽचेतन एव स्यात् । ज्ञानं च यदि ज्ञानिनोऽर्थांतरभृतं तदा तत्कशमंतरेण देवदत्तरहितपरशुवचत्कर्तृत्वव्यापारासमर्थत्वाद- चेतयमानमचेतनमेव स्यात् । न च ज्ञानशानिनोर्यु तसिद्धयोस्संयोगेन चेतनत्वं, द्रव्यस्य निर्वि- शेफ्स्य गुणानां निराश्रयाणां शून्यत्वादिति ।। ४८ ॥ टीकाः-द्रव्य और गुणोंको अर्थांतरपना हो तो यह ( निम्नानुसार ) दोप पायेगा। यदि ज्ञानी (-आत्मा ) ज्ञानसे अर्थान्तरभूत हो तो ( आत्मा ) अपने करण-अंश विना, कुल्हाड़ी रहित देवदत्तकी भांति *करणका व्यापार करनेमें असमर्थ होनेसे न चेतता (-जानता ) हुआ अचेतन ही होगा । और यदि ज्ञान ज्ञानीसे (-आत्मासे ) अर्थातरभूत हो तो ज्ञान अपने कर्तृ-अंशके विना, देवदत्त रहित कुल्हाड़ी की भांति, अपने 'कर्ताका व्यापार करनेमें असमर्थ होनेसे न चेतता (-जानता ) हुआ अचेतन ही होगा । पुनश्च, 'युतसिद्ध ऐसे ज्ञान और ज्ञानीको (-ज्ञान और आत्माको) संयोगसे चेतनपना हो ऐसा भी नहीं है, क्योंकि निविशेप द्रव्य और निराश्रय गुण शून्य होते हैं । ४८ । करणका व्यापार=साधनका कार्य। [प्रात्मा कर्ता है और ज्ञान करण है। यदि आत्मा ज्ञानसे भिन्न ही हो तो आत्मा साधनका व्यापार अर्थात् ज्ञानका कार्य करने में असमर्थ होनेसे जान नहीं सकेगा इसलिये आत्माको अचेतनत्व आजायेगा। १. कर्ताका व्यापारकर्ताका कार्य । [ ज्ञान करण है और आत्मा कर्ता है । यदि ज्ञान आत्मासे भिन्न ही हो तो ज्ञान कर्ताका व्यापार अर्थात् प्रात्माका कार्य करनेमें असमर्थ होनेसे जान नहीं सकेगा इसलिये ज्ञानको अचेतनपना पा जायेगा। २. युतसिद्ध=जुड़कर सिद्ध हुए; समवायसे-संयोगसे सिद्ध हुए। [ जिसप्रकार लकड़ी और मनुष्य पृथक् होने पर भी लकड़ीके योगसे मनुष्य 'लकड़ीवाला' होता है उसीप्रकार ज्ञान और आत्मा पृथक् होने पर भी ज्ञानके साथ युक्त होकर आत्मा 'ज्ञानवाला (-ज्ञानी ) होता है ऐसा भी नहीं है । लकड़ी और मनुष्यकी भाँति ज्ञान और आत्मा कभी पृथक् होंगे ही कैसे ? विशेषरहित द्रव्य हो ही नहीं सकता, इसलिये ज्ञान रहित आत्मा कैसा ? और आश्रय विना गुण हो ही नहीं सकता, इसलिये आत्माके विना ज्ञान कैसा? इसलिये 'लकड़ी' और 'लकड़ीवाले' की भांति 'ज्ञान' और 'ज्ञानी' का युतसिद्धपना घटित नहीं होता।]

षद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ८६ रग हि सो समवायादो अत्यंतरिदो दुरणारखदो रगारणी। अण्णारणीत्ति य वयशं एगत्तपसाधगं होदि ॥४६॥ . न हि सः समवायादार्थतरितस्तु ज्ञानतो ज्ञानी । यज्ञानीति च वचनमेकत्वप्रसाधकं भवति ।। ४९ ॥ ज्ञानज्ञानिनोः। समवायसंबंधनिरासोऽयम् । न खलुज्ञानादर्थान्तरभूतः पुरुषो ज्ञानसमवायात् ज्ञानी भवतीत्युपपन्नम् । स खलु ज्ञानसमवायात्पूर्वं किं ज्ञानी किमानी ? यदि ज्ञानी तदा ज्ञानसमवायो निष्फलः । अथाज्ञानी तदा किमज्ञानसमवायात्, किमज्ञानेन सहकत्वात् ? न तावदज्ञानसमवायात्; अज्ञानिनो ह्यज्ञानसमवायो निष्फला, ज्ञानित्वं तु . गाथा ४९ अन्वयार्थः-[ ज्ञानतः अर्थांतरितः तु] ज्ञानसे अर्थांतरभूत [सः] ऐसा वह (-आत्मा) [ समवायात् ] समवायसे [ ज्ञानी ] ज्ञानी होता है [ न हि ] ऐसा वास्तवमें नहीं है। [अज्ञानी] 'अज्ञानी' [ इति च वचनम् ] ऐसा वचन [ एकत्व- प्रसाधकं भवति ] ( गुण-गुणीके ) एकत्वको सिद्ध करता है । टीका:-यह, ज्ञान और ज्ञानीको समवायसम्बन्ध होनेका निराकरण ( खंडन ) है। ज्ञानसे अर्थांतरभूत आत्मा ज्ञानके समवायसे ज्ञानी होता है ऐसा मानना वास्तवमें योग्य नहीं है । ( आत्माको ज्ञानके समवायसे ज्ञानी होना माना जाये तो हम पूछते हैं कि ) वह (-आत्मा ) ज्ञानका समवाय होनेसे पहले वास्तवमें ज्ञानी है या अज्ञानी ? यदि ज्ञानी है ( ऐसा कहा जाये ) तो ( ज्ञानका समवाय निष्फल है । अब यदि अज्ञानी है ( ऐसा कहा जाये ) तो ( पूछते हैं कि ) अज्ञानके समवायसे अज्ञानी है कि अज्ञानके साथ एकत्वसे अज्ञानी है ? प्रथम, अज्ञानके समवायसे अज्ञानी हो नहीं सकता; क्योंकि अज्ञानीको अज्ञानका समवाय निष्फल है और ज्ञानीपना तो ज्ञानके समवायका अभाव होनेसे है ही नहीं। इसलिये 'अज्ञानी' ऐसा वचन प्रज्ञानके रे । जीव ज्ञानविभिन्न नहि समवायथी ज्ञानी बने । 'अज्ञानी' अव॒ वचन ते अकत्वनी सिद्धि करे ॥ ४९ ॥ १२ ६० पंचास्तिकायसंग्रह ज्ञानसमवायाभावान्नास्त्येव । ततोऽज्ञानीति वचनमज्ञानेन सहकत्वमवश्यं साधयत्येव | सिद्ध चैवमज्ञानेन सहकत्वे ज्ञानेनापि सहकत्वमवश्यं सिध्यतीति ।। ४९ ।। समवत्ती समवाओ अपुधब्भूदो य अजुदसिद्धो य । तम्हा दव्वगुरगाणं अजुदा सिद्धि त्ति रिगद्दिट्टा ॥ ५० ॥ समवर्तित्वं समवायः अपृथग्भूतत्वमयुतंसिद्धत्वं च । तस्माद्र्व्यगुणानां अयुता सिद्धिरिति निर्दिष्टा ।। ५० ।। .. साथ एकत्वको अवश्य सिद्ध करता ही है । और इसप्रकार अज्ञानके साथ एकत्व सिद्ध होनेसे ज्ञानके साथ भी एकत्व अवश्य सिद्ध होता है। भावार्थ:-आत्माको और ज्ञानको एकत्व है ऐसा यहां युक्तिसे समझाया है । प्रश्नः-छद्मस्थदशामें जीवको मात्र अल्पज्ञान ही होता है और केवलीदशामें तो परिपूर्ण ज्ञान-केवलज्ञान होता है; इसलिये वहां तो केवलीभगवानको ज्ञानका समवाय (-केवलज्ञानका संयोग ) हुआ न ? उत्तरः-नहीं, ऐसा नहीं है । जीवको और ज्ञानगुणको सदैव एकत्व है, अभिन्नता है । छद्मस्थदशामें भी उस अभिन्न ज्ञानगुणमें शक्तिरूपसे केवलज्ञान होता है । केवलीदशामें, उस अभिन्न ज्ञानगुणमें शक्तिरूपसे स्थित केवलज्ञान व्यक्त होता है; केवलज्ञान कहीं बाहरसे आकर केवलीभगवानके आत्माके साथ समवायको प्राप्त होता हो ऐसा नहीं है । छद्मस्थदशामें और केवलीदशामें जो ज्ञानका अन्तर दिखाई देता है वह मात्र शक्ति-व्यक्तिरूप अन्तर समझना चाहिये । गाथा ५० अन्वयार्थ:-[ समवर्तित्वं समवाया ] समवर्तीपना वह समवाय है; [ अपृथ- ग्भूतत्वम् ] वही, अपृथक्पना [च ] और [ अयुतसिद्धत्वम् ] अयुतसिद्धपना है। [ तस्मात् ] इसलिये [ द्रव्यगुणानाम् ] द्रव्य और गुणोंकी [ अयुता सिद्धिः इति ] अयुतसिद्धि [ निर्दिष्टा] ( जिनोंने ) कही है । समवर्तिता समवाय छे, अपृथक्त्व ते, अयुतत्त्व ते । ते कारणे भाखी अयुतसिद्धि गुणो ने द्रव्यने ।। ५० ।।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन समवायस्य पदार्थान्तरत्वनिरासोऽयम् । द्रव्यगुणानामेकास्तित्वनिर्वृत्त्वादना- दिरनिधना सहवृत्तिर्हि समवर्तित्वम् । स एव समवायो जैनानाम् । तदेव संज्ञादिभ्यो भेदेऽपि वस्तुत्वेनाभेदादपृथग्भूतत्वम् । तदेव युतसिद्धिनिबंधनस्यास्तित्वान्तरस्याभावादयुतसिद्धत्वम् । ततो द्रव्यगुणानां समवर्तित्वलक्षणसमवायभाजामयुतसिद्धिरेव, न पृथग्भूतत्वमिति ॥५०॥ वण्णरसगंधफासा परमाणुपरूविदा विसेसेहिं । दव्वादो य अणण्णा अण्णत्तपगासगा होति ॥५१॥ दसणणाणाणि तहा जीवणिबद्धाणि णण्णभूदाणि । ववदेसदो पुधत्तं कुगंति हि णो सभावादो ॥५२॥ टीका:-यह, समवायमें पदार्थांतरपना होनेका निराकरण (खंडन) है। द्रव्य और गुण एक अस्तित्वसे रचित हैं इसलिये उनकी जो अनादिअनंत सहवृति (-एकसाथ रहना ) वह वास्तवमें समवर्तीपना है; वही, जैनोंके मतमें समवाय है; वही, संज्ञादि भेद होने पर भी (-द्रव्य और गुणोंको संज्ञालक्षण-प्रयोजन आदिकी अपेक्षासे भेद होने पर भी ) वस्तुरूपसे अभेद होनेसे अपृथक्पना है; वही, युतसिद्धिके कारणभूत 'अस्तित्वांतरका अभाव होनेसे अयुतसिद्धपना है। इसलिये समवर्तित्वस्वरूप समवायवाले द्रव्य और गुणोंको अयुतसिद्धि ही है, पृथक्पना नहीं है । ५० । १. अस्तित्वातरं भिन्न अस्तित्व । । युतसिद्धिका कारण भिन्न-भिन्न अस्तित्व हैं। लकड़ी और लकड़ीवालेकी भाँति गुण और द्रव्यके अस्तित्व कभी भिन्न न होनेसे उन्हें युतसिद्धपना नहीं हो सकता। २. समवायका स्वरूप समवर्तीपना अर्थात् अनादि-अनन्त सहवृत्ति है । द्रव्य और गुणोंको ऐसा समवाय ( अनादि-अनंत तादात्म्यमय सहवृत्ति) होनेसे उन्हें अयुतसिद्धि है, कभी भी पृथक्- पना नहीं है। परमाणुमा प्ररूपित वरण, रस, गंध तेम ज स्पर्श जे । अणुथी अभिन्न रही विशेष बडे प्रकाशे भेदने ||५|| त्यम ज्ञानदर्शन जीवनियत अनन्य रहीने जीवथी। अन्यत्वना कर्चा बने व्यपदेशथी-न स्वभावथी ॥५२॥ ~ पंचास्तिकायसंग्रह .- वर्णरसगंधस्पर्शाः परमाणुप्ररूपिता विशेषः । द्रव्याच अनन्याः अन्यत्वप्रकाशका भवन्ति ॥५१॥ दर्शनज्ञाने तथा जीवनिबद्धे अनन्यभृते । व्यपदेशतः पृथक्त्वं कुरुतः हि नो स्वभावात् ।।५२।। दृष्टांतदान्तिकार्थपुरस्सरो द्रव्यगुणानामनांतरत्वव्याख्योपसंहारोऽयम् । वर्ण- रसगंधस्पर्शा हि परमाणोः प्ररूप्यते; ते च परमाणोरविभक्तप्रदेशत्वेनानन्येऽपि संज्ञादिव्यपदेश- निबंधनविशेपेरन्यत्वं प्रकाशयन्ति । एवं ज्ञानदर्शने अप्यात्मनि संबद्ध मात्मद्रव्यादविभक्त- प्रदेशत्वेनानन्येऽपि. संज्ञादिव्यपदेशनिबंधनैर्विशेषैः पृथक्त्वमासादयत; स्वभावतस्तु नित्यमपृथ- क्त्वमेव विभ्रतः ।। ५१-५२ ।। गाथा ५१-५२ अन्वयार्थः-[ परमाणुप्ररूपिताः ] परमाणुमें प्ररूपित किये जानेवाले ऐसे [ वर्ण- रसगंधस्पर्शाः ] वर्ण-रस-गंध-स्पर्श [ द्रव्यात अनन्याः च ] द्रव्यसे अनन्य वर्तते हुए [ विशेपैः] ( व्यपदेशके कारणभूत ) विशेषों द्वारा [ अन्यत्वप्रकाशकाः भवन्ति ] अन्यत्वको प्रकाशित करनेवाले होते हैं (-स्वभावसे अन्य रूप नहीं हैं ); [ तथा इसप्रकार [ जीवनिवद्धे ] जीवमें सम्बद्ध ऐसे [ दर्शनज्ञाने ] दर्शन-ज्ञान [ अनन्यभूते ] ( जीवद्रव्यसे ) अनन्य वर्तते हुए [ व्यपदेशतः ] व्यपदेश द्वारा [ पृथक्त्वं कुरुतः हि ] पृथक्त्वको करते हैं, [ नो स्वभावात् ] स्वभावसे नहीं । टीका:-दृष्टान्तरूप और *दान्तिरूप पदार्थपूर्वक, द्रव्य तथा गुणोंके अभिन्न- पदार्थपनेके व्याख्यानका यह उपसंहार है । वर्ण-रस-गंध-स्पर्श वास्तवमें परमाणुमें प्ररूपित किये जाते हैं; वे परमाणुसे अभिन्न प्रदेशवाले होनेके कारण अनन्य होने पर भी, संज्ञादि व्यपदेशके कारणभूत विशेषों द्वारा अन्यत्वको प्रकाशित करते हैं । इसप्रकार आत्मामें सम्बद्ध ज्ञान-दर्शन भी आत्मद्रव्यसे अभिन्न प्रदेशवाले होनेके कारण अनन्य होने पर भी, संज्ञादि व्यपदेशके कारणभूत विशेषों द्वारा पृथक्पनेको प्राप्त होते हैं, परन्तु स्वभावसे सदैव अपृथक्पनेको ही धारण करते हैं । ५१-५२ । * दान्ति दृष्टान्त द्वारा समझाना हो वह बात; उपमेय । ( यहाँ परमाणु और वर्णादिक दृष्टान्तरूप पदार्थ हैं तथा जीव और ज्ञानादिक दा तरूप पदार्थ हैं।) • .

षड्द्रव्य-पंचास्विकायवर्णन -इति उपयोगगुणव्याख्यानं समाप्तम् । अथ कर्तृत्वगुणव्याख्यानम् । तत्रादिगाथात्रयेण तदुपोद्घातः- जीवा अगाइरिणहरणा संता ता य जीवभावादो। सब्भावदो प्ररणंता पंचग्गगुरगप्पधारणा य ॥ ५३ ।। जीवा अनादिनिधनाः सांता अनंताश्च जीवभावात् । सद्भावतोऽनंता: पञ्चाग्रगुणप्रधानाः च ॥ ५३ ।। जीवा हि निश्चयेन परभावानामकरणात्स्वभावानां कर्तारो भविष्यन्ति । तश्चि कुर्वाणाः किमनादिनिधनाः, किं सादिसनिधनाः, किं साधनिधनाः, किं तदाकारेण परिणतार, किमपरिणताः भविष्यतीत्याशंक्येदमुक्तम् । जीवा हि सहजचैतन्यलक्षणपारिणामिकभावेनानादि- निधनाः । त एवौदयिकक्षायोपशमिकोपशमिकभावः सादिसनिधनाः । त एव शायिकभावेन- . . ] इसप्रकार उपयोगगुणका व्याख्यान समाप्त हुआ । अब कर्तृत्वगुणका व्याख्यान है । उसमें, प्रारम्भकी तीन गाथाओंसे उसका उपोद्घात किया जाता है । गाथा ५३ मन्वयार्थः- [जीवाः ] जीवों [ अनादिनिधना:] ( पारिणामिकभावसे.) अनादि-अनन्त हैं, [ सांताः ] ( तीन भावोंसे ) सांत ( अर्थात् सादि-सांत ) हैं, [] और [ जीवभावात् अनन्ताः ] जीवभावसे अनन्त हैं ( अर्थात् जीवके सभावरूप क्षायिक- भावसे सादि-अनन्त हैं ) [ सद्भावतः अनंता: ] क्योंकि सद्भावसे जीव अनन्त ही होते हैं । [पंचाग्रगुणप्रधानाः च ] वे पांच मुख्य गुणोंसे प्रधानतावाले हैं। टीका:-निश्चयसे पर-भावोंका कर्तृत्व न होनेसे जीव स्व-भावोंके कर्ता होते हैं; और उन्हें (-अपने भावोंको ) करते हुए, क्या वे अनादि-अनंत हैं ? क्या सादि-सान्त हैं ? क्या सादि-अनन्त हैं ? क्या तदाकाररूप ( उस-रूप ) परिणत हैं ? क्या ( तदाकाररूप ) अपरिणत हैं ?-ऐसी आशंका करके यह कहा गया है (अर्थात् उन आशंकाओंके समाधानरूपसे यह गाथा कही गई जीवो अनादि-अनंत, सांत, अनंत.छे जीवभावथी । सद्भावथी नहि अंत होय; प्रधानता गुण पांचथी ।। ५३ ॥

६४ पंचास्तिकायसंग्रह साधनिधनाः । न च सादित्वात्सनिधनत्वं क्षायिकमावस्याशंक्यम् । स खलूपाधिनिवृत्ती प्रवर्तमानः सिद्धभाव इव सद्भाव एव जीवस्य; सद्भावेन चानंता एव जीवाः प्रतिज्ञायते । न च तेषामनादिनिधनसहजचैतन्यलक्षणैकभावानां सादिसनिधनानि साद्यनिधनानि भावांतराणि नोप- पद्यत इति वक्तव्यम् ते खल्चनादिकर्ममलीमसाः पंकसंपृक्ततोयवचदाकारेण परिणतत्वात्पञ्च- प्रधानगुणप्रधानत्वेनैवानुभूयंत इति ।। ५३ ।। जीव वास्तवमें असहजचैतन्यलक्षण पारिणामिक भावसे अनादि-अनंत हैं। वे ही औदयिक, क्षायोपशमिक और प्रौपशमिक भावोंसे सादि-सान्त हैं । वे ही क्षायिक भावसे सादि-अनन्त हैं। 'क्षायिक भाव सादि होनेसे वह सांत होगा'-ऐसी आशंका करना योग्य नहीं है । ( कारण इसप्रकार है:-) वह वास्तवमें उपाधिकी निवृत्ति होने पर प्रवर्तता हुआ, सिद्धभावकी भांति, जीवका सद्भाव ही है (अर्थात् कर्मोपाधिके क्षयरूपसे प्रवर्तता है इसलिये क्षायिक भाव जीवका सद्भाव ही है ); और सद्भावसे तो जीव अनन्त ही स्वीकार किये जाते हैं। ( इसलिये क्षायिकभावसे जीव अनन्त ही अर्थात् विनाशरहित ही हैं। ) पुनश्च, 'अनादि-अनन्त सहजचैतन्यलक्षण एक भाववाले उन्हें सादि-सांत और सादि-अनंत भावान्तर घटित नहीं होते ( अर्थात् जीवोंको एक पारिणामिक भावके अतिरिक्त अन्य भाव घटित नहीं होते )' ऐसा कहना योग्य नहीं है; (क्योंकि ) वे वास्तवमें अनादि कर्मसे मलिन वर्तते हुए 'कादवसे संपृक्त जलकी भाँति तदाकार- रूप परिणत होनेके कारण, पाँच प्रधान गुणोंसे प्रधानतावाले ही अनुभवमें आते हैं । ५३ । * जीवके पारिणामिक भावका लक्षण अर्थात् स्वरूप सहज-चैतन्य है। यह पारिणामिक भाव अनादि-अनन्त होनेसे इस भावकी अपेक्षासे जीव अनादि-अनन्त है। १. कादवसे संपृक्त= कादवका सम्पर्क प्राप्त; कादवके संसर्गवाला। ( यद्यपि जीव द्रव्यस्वभावसे शुद्ध है तथापि व्यवहारसे अनादि कर्मवन्धनके वश, कादववाले जलकी भांति, प्रौदयिक आदि भावरूप परिणत है।) २. औदयिक, औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक और पारिणामिक-इन पांच भावोंको जीवके पाँच प्रधान गुण कहा गया है। .

षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन एवं सदो विणासो असदो जीवस्स हवदि उप्पादो। इदि जिणवरेहिं भणिदं अण्णोण्णविरुद्धमविरुद्ध ॥५४॥ एवं सतो विनाशोऽसतो जीवस्य भवत्युत्पादः । इति जिनवरैर्भणितमन्योऽन्यविरुद्धमविरुद्धम् ।। ५४ ।। जीवस्य भाववशात्सादिसनिधनत्वेऽनाधनिधनत्वे च विरोधपरिहारोऽयम् । एवं हि पंचभिर्भावैः स्वयं परिणममानस्यास्य जीवस्य . कदाचिदौदयिकेनैकेन मनुष्यत्वादिलक्षणेन भावेन सतो विनाशस्तथापरेणौदायिकेनैव देवत्वादिलक्षणेन भावेन असत उत्पादो भवत्येव । गाथा ५४ यन्वयार्थी-[ एवं ] इसप्रकार [ जीवस्य ] जीवको [ सतः विनाशः ] सत्का विनाश और [ असतः उत्पादः ] असत्का उत्पाद [ भवति ] होता है-[इति ] ऐसा [जिनवरैः भणितम् ] जिनवरोंने कहा है, [अन्योन्यविरुद्धम् ] जो कि अन्योन्य विरुद्ध ( १६ वीं गाथाके कथनके साथ विरोधवाला ) तथापि [ अविरुद्धम् ] अविरुद्ध है। टीका:-यह, जीवको भाववशात् (औदयिक आदि भावोंके कारण ) सादि- सांतपना और अनादि-अनंतपना होने में विरोधका परिहार है । इसप्रकार वास्तवमें पांच भावरूपसे स्वयं परिणमित होनेवाले इस जीवको कदाचिव औदयिक ऐसे एक मनुष्यत्वादिस्वरूप भावकी अपेक्षासे सत्का विनाश और प्रौदयिक ही ऐसे दूसरे देवत्वादिस्वरूप भावकी अपेक्षासे असत्का उत्पाद होता ही है । और यह ( कथन ) 'सबका विनाश नहीं है तथा असतका उत्पाद नहीं है' ऐसे पूर्वोक्त सूत्रके ( १६ वीं गाथाके ) साथ विरोधवाला होने पर भी ( वास्तवमें ) विरोधवाला नहीं है। क्योंकि जीवको द्रव्यार्थिकनयके कथनसे सत्का नाश नहीं है और असत्का उत्पाद नहीं है तथा उसीको पर्यायाथिकनयके कथनसे सत्का नाश है और असत्का उत्पाद है । और यह 'अनुपपन्न नहीं है, क्योंकि नित्य ऐसे जलमें कल्लोलोंका अनित्य- पना दिखाई देता है। * यहाँ 'सादि' के बदले 'अनादि' होना चाहिये ऐसा लगता है। इसलिये गुजरातीमें 'अनादि' ऐसा अनुवाद किया है। १. अनुपपन्न- प्रयुक्त; असंगत; अघटित; न हो सके ऐसा। मेरीत सत्-व्यय ने असत्-उत्पाद जीवने होय छे। -माख्यु जिने, जे पूर्व-अपर विरुद्धपण अविरुद्ध छे ।। ५४ ॥ 1 पंचास्तिकायसंग्रह . एतच्च 'न सतो विनाशो नासत उत्पाद' इति पूर्वोक्तसूत्रेण सह विरुद्धमपि न विरुद्धम्। यतो जीवस्य द्रव्यार्थिकनयादेशेन न सत्प्रणाशो नासदुत्पादः, तस्यैव पर्यायार्थिकनयादेशेन सत्प्रणाशोऽसदुत्पादश्च । न चैतदनुपपन्नम्, नित्ये जले कल्लोलानामनित्यत्व- दर्शनादिति ।। ५४॥ रइयतिरियमणुया देवा इदि गामसंजुदा पयडी। कुन्नति सदो णासं असदो भावस्स उप्पादं ॥ ५५ ॥ नारकतिर्यङ्मनुष्या देवा इति नामसंयुताः प्रकृतयः । कुर्वन्ति सतो नाशमसतो मावस्योत्पादम् ॥ ५५ ॥ भावार्थः-५३ वीं गाथामें जीवको सादि-सांतपना तथा अनादि-अनन्तपना कहा गया है । वहाँ प्रश्न संभव है कि-सादि-सांतपना और अनादि-अनन्तपना परस्पर विरुद्ध हैं; परस्पर विरुद्ध भाव एकसाथ जीवको कैसे घटित होते हैं ? उसका समाधान इसप्रकार है : जीव द्रव्य-पर्यायात्मक वस्तु है । उसे सादि-सांतपना और अनादि- अनन्तपना दोनों एक ही अपेक्षासे नहीं कहे गये हैं, भिन्न-भिन्न अपेक्षासे कहे गये हैं; सादि-सांतपना कहा गया है वह पर्याय-अपेक्षासे है और अनादि-अनंतपना द्रव्य-अपेक्षा से है । इसलिये इसप्रकार जीवको सादि-सांतपना तथा अनादि-अनन्तपना एक साथ बराबर घटित होता है। ( यहां यद्यपि जीवको अनादि-अनंत तथा सादि-सांत कहा गया है, तथापि ऐसा तात्पर्य ग्रहण करना चाहिये कि पर्यायाथिकनयके विषयभूत सादि-सांत जोवका आश्रय करने योग्य नहीं है किन्तु द्रव्याथिकनयके विषयभूत ऐसा जो अनादि-अनंत, टंकोत्कीर्णज्ञायकस्वभावी, निर्विकार, नित्यानन्दस्वरूप जीवद्रव्य उसीका आश्रय करनेयोग्य है । ) ५४ । . गाथा ५५ अन्वयार्थः-[ नारकतिर्यङ मनुष्याः देवाः ] नारक, तिथंच, मनुष्य और देव [इति नामसंयुताः ] ऐसे नामोंवाली [प्रकृतया] ( नामकर्मकी ) प्रकृतियाँ [ सत: नाशम् ] सत् भावका नाश और [ असतः भावस्य उत्पादम् ] असत् भावका उत्पाद [कुर्वन्ति ] करती हैं। तिर्यंच नारक-देव-मानव नामनी के प्रकृति जे। ते व्ययं करे सत् भावनो, उत्पाद असत् तणो करें ।। ५५ ।।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकाववर्णन जीवस्य सदसद्भायोच्छित्त्युत्पत्तिनिमित्तोपाधिप्रतिपादनमेतत् । यथा हि जलराशे- जलराशित्वेनासदुत्पादं सदुच्छेदं चाननुभवतश्चतुभ्यः ककुब्बिभागेभ्यः क्रमेण वहमानाः पवमानाः कल्लोलानामसदुत्पादं सदुच्छेदं च कुर्वन्ति, तथा जीवस्यापि जीवत्वेन सदुच्छेदमसदुत्पत्ति चाननुभवतः क्रमेणोदीयमानाः नारकतिर्यक मनुष्यदेवनामप्रकृतयः सदुच्छेदमसदुत्पादं च कुर्वतीति ।। ५५ ।। उदयेण उवसमेण य खएण दुर्हि मिस्सिहिं परिणामे । जुत्ता ते जीवगुणा बहुसु य अत्थेसु वित्यिण्णा ॥ ५६ ॥ उदयेनोपशमेन च क्षयेण द्वाभ्यां मिश्रिताभ्यां परिणामेन | युक्तास्ते जीवगुणा बहुपु चार्थेषु विस्तीर्णाः ॥ ५६ ॥ टीकाः-जीवको सत् भावके उच्छेद और असत् भावके उत्पादमें निमित्तभूत उपाधिका यह प्रतिपादन है। जिसप्रकार समुद्ररूपसे असत्के उत्पाद और सत्के उच्छेदका अनुभव न करने वाले ऐसे समुद्रको चारों दिशाओंमेंसे क्रमश: बहती हुई हवाएँ कल्लोलोंसम्बन्धी असत्का उत्पाद और सत्का उच्छेद करती हैं । ( अर्थात् अविद्यमान तरंगके उत्पादमें तथा विद्यमान तरंगके नाशमें निमित्त बनती हैं ), उसी प्रकार जीवरूपसे सत्के उच्छेद तथा असत्के उत्पादका अनुभव न करनेवाले ऐसे जीवको क्रमशः उदयको प्राप्त होने बाली नारक-तिर्यंच-मनुष्य-देव नामकी ( नामकर्मकी ) प्रकृतियाँ ( भावोसम्बन्धी, पर्यायोंसम्बन्धी ) सत्का उच्छेद तथा असत्का उत्पाद करती हैं ( अर्थात् विद्यमान पर्यायके नाशमें और अविद्यमान पर्यायके उत्पादमें निमित्त बनती हैं ) । ५५ । गाथा ५६ अन्वयार्थ:-[ उदयेन ] उदयसे युक्त, [ उपशमेन ] उपशमसे युक्त, [क्षयेण ] क्षयसे युक्त, [ द्वाभ्यां मिश्रिताभ्यां ] क्षयोपशमसे युक्त [च ] और [ परिणामेन युक्ताः ] परिणामसे युक्त-[ ते ] ऐसे [ जीवगुणाः ] ( पाँच ) जीवगुण (-जीवके भाव ) हैं; [च ] और [ बहुपु अर्थेषु विस्तीर्णाः ] उन्हें अनेक प्रकारोंमें विस्तृत किया जाता है। परिणाम, उदय, क्षयोपशम, उपशम, क्षये संयुक्त जे । ते पाच जीवगुण जाणवा; बहु भेदमा विस्तीर्ण छ । ५६ ।। १३ ६८ पंचास्तिकायसंग्रह . - जीवस्य भावोदयवर्णनमेतत् । कर्मणां फलदानसमर्थतयोद्धृतिरुदयः, अनुभृति- रुपशमः, उद्भूत्यनुद्भूती क्षयोपशमः, अत्यंतविश्लेपः क्षयः, द्रव्यात्मलाभहेतुकः परिणामः । तत्रोदयेन युक्त औदायिकः, उपशमेन युक्त औपशमिका, क्षयोपशमेन युक्तः क्षायोपशमिका, क्षयेण युक्तः क्षायिकः, परिणामेन युक्तः पारिणामिकः । त एते पञ्च जीवगुणाः । तत्रोपाधि- चतुर्विधत्वनिबंधनाश्चत्वारः, स्वभावनिबंधन एकः । एते चोपाधिभेदात्स्वरूपभेदाच भिद्यमाना बहुवर्थेषु विस्तार्यत इति ।। ५६ ।। . टीकाः-जीवको भावोंके उदयका (-पांच भावोंकी प्रगटताका ) यह वर्णन है। कर्मोंका 'फलदानसमर्थरूपसे उद्भव सो 'उदय' है, अनुभव सो 'उपशम' है, उद्भव तथा अनुभव सो 'क्षयोपशम' है, 'अत्यन्त विश्लेष सो 'क्षय' है, द्रव्यका 'आत्मलाभ ( अस्तित्व ) जिसका हेतु है वह 'परिणाम' है । वहां उदयसे युक्त वह 'औदयिक' है, उपशमसे युक्त वह 'औपशमिक' है, क्षयोपशमसे युक्त वह 'क्षायोपशमिक' है, क्षयसे युक्त वह 'क्षायिक' है, "परिणामसे युक्त वह 'पारिणामिक' है । ऐसे यह पाँच जीवगुण हैं । उनमें (-इन पांच गुणोंमें ) 'उपाधिका चतुर्विधपना जिनका कारण (निमित्त ) है ऐसे चार हैं, स्वभाव जिसका कारण है ऐसा एक है । उपाधि के भेदसे और स्वरूपके भेदसे भेद करने पर, उन्हें अनेक प्रकारोंमें विस्तृत किया जाता है । ५६ । १. फलदानसमर्थ=फल देने में समर्थ । २. अत्यन्त विश्लेप-अत्यंत वियोग; प्रात्यंतिक निवृत्ति । ३. आत्मलाभ =स्वरूपप्राप्ति; स्वरूपको धारण कर रखना; अपनेको धारण कर रखना; अस्तित्व । (द्रव्य अपनेको धारण कर रखता है अर्थात् स्वयं बना रहता है इसलिये उसे 'परिणाम' है।) ४. क्षयसे युक्त=क्षय सहित; क्षयके साथ सम्बन्धवाला । (व्यवहारसे कर्मोके क्षयकी अपेक्षा जीव के जिस भावमें आये वह 'क्षायिक' भाव है।) ५. परिणामसे युक्तपरिणाममय; परिणामात्मक परिणामस्वरूप । ६. कर्मोपाधिकी चार प्रकारकी दशा (-उदय, उपशम, क्षयोपशम और क्षय ) जिनका निमित्त है ऐसे चार भाव हैं। जिनमें कर्मोपाधिरूप निमित्त विलकुल नहीं है, मात्र द्रव्यस्वभाव हो जिसका कारण है ऐसा एक पारिणामिक भाव है।

षड्द्रध्य-पंचास्तिकायवरणेन कम्मं वेदयमाणो जीवो भावं करेदि जारिसयं । सो तस्स तेण कत्ता हदि ति य सासणे पढिदं ॥५७॥ कर्म वेदयमानो जीवो भावं करोति यादृशकम् । स तस्य तेन कर्ता भवतीति च शासने पठितम् ।। ५७ ।। जीवस्यौदयिकादिभावानां कर्तृत्वप्रकारोक्तिरियम् । जीवेन हि द्रव्यकर्म व्यवहार- नयेनानुभूयते; तच्चानुभूयमानं जीवभावानां निमित्तमात्रमुपवर्ण्यते । तस्मिन्निमित्तमात्रभूते जीवेन कर्तृभूतेनात्मनः कर्मभूतो भावः क्रियते । अमुना यो येन प्रकारेण जीवेन भावः क्रियते, स जीवस्तस्य भावस्य तेन प्रकारेण कर्ता भवतीति ॥ ५७ ॥ कम्मेण विणा उदयं जीवस्स ण विज्जदे उवसमं वा। खइयं खोवसमियं तम्हा भावं तु कम्मकदं ॥ ५८ ॥ and गाथा ५७ अन्वयार्थः-[कर्म वेदयमानः ] कर्मको वेदता हुआ [जीवः] जीव [ यादृशकम् भावं ] जैसे भावको [ करोति ] करता है, [ तस्य ] उस भावका [ तेन ] उस प्रकारसे [ सः] वह [ कर्ता भवति ] कर्ता है- [इति च ] ऐसा [ शासने पठितम् ] शासनमें कहा है। टीका:-यह, जीवके औदयिकादि भावोंके कर्तृत्वप्रकारका कथन है । जीव द्वारा द्रव्यकर्म व्यवहारनयसे अनुभवमें आता है; और वह अनुभवमें आता हुआ जीवभावोंका निमित्तमात्र कहलाता है । वह ( द्रव्यकर्म.) निमित्तमात्र होनेसे, जीव द्वारा कर्तारूपसे अपना कर्मरूप ( कार्यरूप ) भाव किया जाता है । इसलिये जो भाव जिस प्रकारसे जीव द्वारा किया जाता है, उस भावका उस प्रकारसे वह जीव कर्ता है । ५७ । पुद्गलकरमने वेदतां आत्मा करे जे भावने । ते भावनो ते जीव के कर्ता-कधु जिनशासने ।। ५७ ।। पुद्गलकरम विण जीवने उपशम, उदय, क्षायिक भने । क्षायोपशमिक न होय, तेथी कर्मकृत अभाव छ । ५८ - .१०. पंचास्तिकायसग्रह कर्मणा विनोदयो जीवस्य न विद्यत उपशमो वा । क्षायिका बायोपशमिकस्तस्माद्धावस्तु कर्मकृतः ॥ ५८ ॥ द्रव्यकर्मणां निमित्तमात्रत्वेनौदयिकादिभावकर्तृत्वमत्रोक्तम् । न खलु कर्मणा विना जीवस्योदयोपशमौ क्षयक्षायोपशमावपि विद्यते; ततः क्षायिकक्षायोपशमिकश्चौद- यिकौपशमिकश्च भावः कर्मकृतोऽनुमंतव्यः । पारिणामिकस्त्वनादिनिधनो निरुपाधिः स्वाभाविक एव । क्षायिकस्तु स्वभावव्यक्तिरूपत्वादनंतोऽपि कर्मणः क्षयेणोत्पद्यमान- गाथा ५८ अन्वयार्थः-[ कर्मणा विना ] कर्म विना [ जीवस्य ] जीवको [ उदयः] उदय, [ उपशमः ] उपशम, [क्षायिकः ] क्षायिक [पा] अथवा [क्षायोपशमिका] क्षायोपशमिक [ न विद्यते ] नहीं होता, [ तस्मात् तु ] इसलिये [ भावः ] भाव (-चतु- विध जीवभाव ) [ कर्मकृतः ] कर्मकृत हैं । टीका::-यहां, ( औदयिकादि भावोंके ) निमित्तमात्र रूपसे द्रव्यकर्मीको औदयिकादि भावोंका कर्तापना कहा है। ( एक प्रकारसे व्याख्या करने पर-) कर्मके विना जीवको उदय-उपशम तथा क्षय-क्षयोपशम नहीं होते ( अर्थात् द्रव्यकर्मके बिना जीवको औदयिकादि चार भाव नहीं होते ); इसलिये क्षायिक, क्षायोपशमिक, औदयिक या औपशमिक भावोंको कर्मकृत संमत करना । पारिणामिक भाव तो अनादि-अनंत, अनिरुपाधि, स्वाभाविक ही है । (औदयिक और क्षायोपशमिक भाव कर्मके बिना नहीं होते इसलिये कर्मकृत कहे जा सकते हैं यह बात तो स्पष्ट समझमें आ सकती है; क्षायिक और औपशमिक भावोंके सम्बन्धमें निम्नोक्तानुसार स्पष्टता की जाती हैः) क्षायिक भाव, यद्यपि स्वभाव की व्यक्तिरूप (-प्रगटतारूप ) होनेसे अनंत ( अंत रहित ) है तथापि, कर्मक्षय द्वारा उत्पन्न होनेके कारण सादि है इसलिये कर्मकृत ही कहा गया है । औपशमिक भाव * निरुपाधि = उपाधि रहित; औपाधिक न हो ऐसा । ( जीवका पारिणामिक भाव सर्व कर्मो. पाधिसे निरपेक्ष होनेके कारण निरुपाधि है।) 4 - - षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन त्वात्सादिरिति कर्मकृत एवोक्तः । औपशमिकस्तु कर्मणामुपशमै समुत्पद्यमानत्वादसंशों समुच्छिद्यमानत्वात् कर्मकृत एवेति । अथवा उदयोपशमक्षयक्षयोपशमलक्षणाश्चतस्रो द्रव्यकर्मणामेवावस्थाः, न पुनः परिणामलक्षणकावस्थस्य जीवस्य; तत उदयादिसंजातानामात्मनो भावानां निमिच- मात्रभूततथाविधावस्थत्वेन स्वयं परिणमनाद्व्यकर्मापि व्यवहारनयेनात्मनो भावानां कर्तृत्व- मापद्यत इति ॥ ५८ ॥ भावो जदि कम्मकदो अत्ता कम्मस्स होदि किध कत्ता। ण कुरणदि अत्ता किंचि वि मुत्ता अण्णं सगं भावं ॥५६॥ भावो यदि कर्मकृत आत्मा कर्मणो भवति कथं कर्ता । न करोत्यात्मा किंचिदपि मुक्त्वान्यत् स्वकं भावम् ।। ५९ ।। कर्मके उपशमसे उत्पन्न होनेके कारण तथा अनुपशमसे नष्ट होनेके कारण कर्मकृत ही है । (इसप्रकार औदयिकादि चार भावोंको कर्मकृत संमत करना।) अथवा (दूसरे प्रकारसे व्याख्या करने पर)-उदय, उपशम, क्षय और क्षयोप- शमस्वरूप चार (अवस्थाएँ) द्रव्यकर्मकी ही अवस्थाएँ हैं, परिणामस्वरूप एक अवस्था- वाले जीवको नहीं हैं (अर्थात् उदय आदि अवस्थाएँ द्रव्यकर्मकी ही हैं, 'परिणाम' जिसका स्वरूप है ऐसी एक अवस्थारूपसे अवस्थित जीवकी-पारिणामिक भावरूप स्थित जीवकी-वे चार अवस्थाएं नहीं हैं ); इसलिये उदयादिक द्वारा उत्पन्न होनेवाले आत्माके भावोंको निमित्तमात्रभूत ऐसी उसप्रकारको अवस्थाओंरूप (द्रव्यकर्म) स्वयं परिणमित होनेके कारण द्रव्यकर्म भी व्यवहारनयसे आत्माके भावोंके कर्तृत्वको प्राप्त होता है । ५८ । गाथा ५९ अन्वयार्थः-[ यदि भावः कर्मकृतः ] यदि भाव (-जीवभाव ) कर्मकृत हों तो [आत्मा कर्मणः कर्ता भवति] आत्मा कर्मका (-द्रव्यकर्मका) कर्ता होना चाहिये । कथा वह तो कैसे हो सकता है ? [मात्मा ] क्योंकि आत्मा तो [ स्वकं भावं मुक्त्वा ] अपने भावको छोड़कर [ अन्यत् किंचित् अपि ] अन्य कुछ भी [ न करोति ] नहीं कमा । जो भावकों कर्म, तो शुं कर्मका जीव छे नीव तो कदी करतो नथी निज भाव विण कई अर्थ ने A.RAJ3 . Est

पंचास्तिकायसग्रह
१०२
जीवभावस्य कर्मकर्तृत्वे पूर्वपक्षोऽयम् । यदि खल्चौदयिकादिरूपो जीवस्य मावः
कर्मणा क्रियते, तदा जीवस्तस्य कर्ता न भवति । न च जीवास्याकर्तृत्वमिष्यते । ततः पारिशे-
ध्येण द्रव्यकर्मणः कर्तापद्यते । तत् कथम् ? यतो निश्चयनयेनात्मा स्वं भावमुज्झित्वा नान्य-
किमपि करोतीति ।। ५९ ।।
भावो कम्मणिमित्तो कम्म पुरण भावकाररणं हवदि ।
रण दु तेसि खलु कत्ता ण विणा भूदा दु कत्तारं ॥६॥
भावः कर्मनिमित्तः कर्म पुनर्भावकारणं भवति ।
न तु तेषां खलु कर्ता न विना भूतास्तु कर्तारम् ।। ६० ।।
टीका:-कर्मको जीवभावका कर्तृत्व होनेके सम्बन्धमें यह पूर्वपक्ष है ।
यदि औदयिकादिरूप जीवका भाव कर्म द्वारा किया जाता हो, तो जीव
उसका (-प्रौदयिकादिरूप जीवभावका) कर्ता नहीं है ऐसा सिद्ध होता है। और जीव
का अकर्तृत्व तो इष्ट (-मान्य) नहीं है। इसलिये, शेष यह रहा कि जीव द्रव्यकर्मका
कर्ता होना चाहिये । लेकिन वह तो कैसे हो सकता है ? . क्योंकि निश्चयनयसे
आत्मा अपने भावको छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं करता।
( इसप्रकार पूर्वपक्ष उपस्थित किया गया । ) । ५६ ।
गाथा ६०
अन्वयार्थः-[भावः कर्मनिमित्ता] जीवभावका कर्म निमित्त है [ पुनः ] और
[कर्म भावकारणं भवति ] कर्मका जीवभाव निमित्त है, [न तु तेषां खलु कर्ता] परन्तु
वास्तवमें एक-दूसरेके कर्ता नहीं हैं; [ न तु कर्तारम् विना भूताः ] कर्ताके विना होते हैं
ऐसा भी नहीं है।
पूर्वपक्ष=चर्चा या निर्णयके लिये किसी शास्त्रीय विषयके सम्बन्धमें उपस्थित किया हुमा पक्ष
या प्रश्न ।
रे। भाव कर्मनिमित्त छ ने कर्म भावनिमिच छ ।
अन्योन्य नहि कर्चा खरे, कर्चा बिना नहि थाय छे ॥६॥

पद्रव्य पंचास्तिकायवर्णन १०३ - - पूर्वस्त्रोदितपूर्वपक्षसिद्धांतोऽयम् । व्यवहारेण निमिचमात्रत्वाजीवभावस्य कर्म कर्तु, कर्मणोऽपि जीवभावः कर्ता; निश्चयेन तु न जीवभावानां कर्म क, न कर्मणो जीवभावः । न च ते कर्तारमंतरेण संभूयेते; यतो निश्चयेन जीवपरिणामानां जीवः कर्ता, कर्मपरिणामानां कर्म का इति ।। ६०॥ कुव्वं सगं सहावं अत्ता कत्ता सगस्स भावस्स । रण हि पोग्गलकम्मारणं इदि जिणवयरणं मुणेदव्वं ॥१॥ कुर्वन् स्वकं स्वभावं आत्मा कर्ता स्वकस्य भावस्य । न हि पुद्गलकर्मणामिति जिनवचनं ज्ञातव्यम् ।। ६१ ।। टीका:-यह, पूर्व सूत्रमें ( ५६ वीं गाथामें ) कहे हुए पूर्वपक्षके समाधानरूप सिद्धांत है। व्यवहारसे निमित्तमात्रपनेके कारण जीवभावका कर्म कर्ता हैं (-औदयिकादि जीवभावका कर्ता द्रव्यकर्म है ), कर्मका भी जीवभाव कर्ता है; निश्चयसे तो जीव- भावोंका न तो कर्म कर्ता है और न कर्मका जीवभाव कर्ता है । वे ( जीवभाव और द्रव्यकर्म ) कर्ताके विना होते हैं ऐसा भी नहीं है। क्योंकि निश्चयसे जीवपरिणामोंका जीव कर्ता है और कर्म परिणामोंका कर्म (-पुद्गल ) कर्ता है । ६० । गाथा ६१ अन्वयार्थ:-[ स्वकं स्वभावं ] अपने स्वभावको [कुर्वन् ] करता हुआ [ आत्मा ] आत्मा [हि ] वास्तवमें [ स्वकस्य भावस्य ] अपने भावका [कर्ता] कर्ता है, [न पुद्गलकर्मणाम् ] पुद्गलकर्मों का नहीं; [ इति ] ऐसा [ जिनवचनं ] जिनवचन [ ज्ञातव्यम् ] जानना । * यद्यपि शुद्धनिश्चयसै केवलज्ञानादि शुद्धभाव 'स्वभाव' कहलाते हैं तथापि अशुद्ध निश्चयसे रागादिक भी 'स्वभाव' कहलाते हैं। निज भाव करतो आतमा कर्चा खरे निज भावनो। कर्चा न पुद्गलकर्मनो;-उपदेश जिननो जाणवो ॥ ६१ ।।

१०४ पंचास्तिकायसंग्रह निश्चयेन जीवस्य स्वभावानां कईत्वं पुद्गलकर्मणामकर्तृत्वं चागमेनोपदर्शितमत्र इति ।। ६१ ॥ कम्म पि सगं कुर्वदि सेण सहावेण सम्ममप्पारणं । जीवो वि य तारिसनो कम्मसहावेण भावेण ।। ६२ ।। कर्मापि स्वकं करोति स्वेन स्वभावेन सम्यगात्मानम् । जीवोऽपि च ताशकः कर्मस्वभावेन भावेन ।। ६२ ।। पत्र निश्चयनयेनाभिन्नकारकत्वात्कर्मणो जीवस्य च स्वयं स्वरूपकत्वमुक्तम् । कर्म खलु कर्मत्वप्रवर्तमानपुद्गलस्कंधरूपेण कर्तृतामनुविभ्राणं, कर्मत्वगमनशक्तिरूपेण करणता- मात्मसात्कुर्वत्, प्राप्यकर्मवपरिणामरूपेण कर्मतां कलयत्, पूर्वभावव्यपायेऽपि ध्रुवत्वालंबना- दुपाचापादानत्वम्, उपजायमानपरिणामरूपकर्मणाश्रीयमाणत्वाद्रुपोढसंप्रदानत्वम् . आधीय- टीका:-निश्चयसे जीवको अपने भावोंका कर्तृत्व है और पुद्गलकोंका अकर्तृत्व है ऐसा यहाँ आगम द्वारा दर्शाया गया है । ६१ । गाथा ६२ अन्वयार्थ:-[ कर्म अपि ] कर्म भी [स्वेन स्वभावेन ] अपने स्वभावसे [ स्वकं करोति ] अपनेको करते हैं [च ] और [ तादृशकः जीवः अपि ] वैसा जीव भी [ कर्मस्वभावेन भावेन ] कर्मस्वभाव भावसे (-औदयिकादि भावसे ) [ सम्यक मात्मानम् ] वरावर अपनेको करता है। टीकाः-निश्चयनयसे अभिन्न कारक होनेसे कर्म और जीव स्वयं स्वरूपके (-अपने-अपने रूपके ) कर्ता हैं ऐसा यहां कहा है । कर्म वास्तवमें (१) कर्मरूपसे प्रवर्तमान पुद्गलस्कंधरूपसे कर्तृत्वको धारण करता हुआ, (२) कर्मपना प्राप्त करनेकी शक्तिरूप करणपनेको अंगीकृत करता हुआ, (३) प्राप्य ऐसे कर्मत्वपरिणामरूपसे कर्मपनेका अनुभव करता हुआ, (४) पूर्व भावका नाश हो जाने पर भी ध्रुवत्वको अवलम्बन करनेसे जिसने अपादानपनेको प्राप्त किया है ऐसा, ( ५ ) उत्पन्न होनेवाले परिणामरूप कर्म रे! कर्म आपस्वभावथी निज कर्मपर्ययने करे । आत्माय कर्मस्वभावरूप निन भावथी निजने करे ।। ६२ ।।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन ~ मानपरिणामाधारत्वाद्गृहीताधिकरणत्वं, स्वयमेव षट्कारकीरूपेण व्यवतिष्ठमानं न कारकातरमपेक्षते । एवं जीवोऽपि भावपर्यायेण प्रवर्तमानात्मद्रव्यरूपेण कर्तृतामनुविभ्राणो, भावपर्यायगमनशक्तिरूपेण करणतामात्मसात्कुर्वन्, प्राप्यभावपर्यायरूपेण कर्मतां कलयन् , पूर्वभावपर्यायव्यपायेऽपि ध्रुवत्वालंबनादुपाचापादानत्वः, उपजायमानभावपर्यायरूपकर्मणा- श्रीयमाणत्वादुपोढसंप्रदानत्वः, आधीयमानभावपर्यायाधारत्वाद्गृहीताधिकरणत्वः, स्वयमेव - द्वारा समाश्रित होनेसे ( अर्थात् उत्पन्न होनेवाले परिणामरूप कार्य अपनेको दिया जानेसे ) सम्प्रदानपनेको प्राप्त और ( ६ ) धारण किये हुए परिणामका आधार होने से जिसने अधिकरणपनेको ग्रहण किया है ऐसा-स्वयमेव षट्कारकरूपसे वर्तता हुआ अन्य कारककी अपेक्षा नहीं रखता। इसप्रकार जीव भी ( १ ) भावपर्यायरूपसे प्रवर्तमान आत्मद्रव्यरूपसे कर्तृत्वको धारण करता हुआ, (२) भावपर्याय प्राप्त करनेकी शक्तिरूपसे करणपनेको अंगीकृत करता हुआ, (३) प्राप्य ऐसी भावपर्यायरूपसे कर्मपनेका अनुभव करता हुआ, ( ४ ) पूर्व भावपर्यायका नाश होने पर भी ध्र वत्वका अवलम्बन करनेसे जिसने अपादानपनेको प्राप्त किया है ऐसा, (५) उत्पन्न होनेवाले भावपर्यायरूप कर्म द्वारा समाश्रित होनेसे ( अर्थात् उत्पन्न होनेवाला भावपर्यायरूप कार्य अपनेको दिया जाने से ) सम्प्रदानपनेको प्राप्त और (६) धारण की हुई भावपर्यायका आधार होनेसे जिसने अधिकरणपनेको ग्रहण किया है ऐसा-स्वयमेव षट्कारकरूपसे वर्तता हुआ अन्य कारककी अपेक्षा नहीं रखता। इसलिये निश्चयसे कर्मरूप कर्ताको जीव कर्ता नहीं है और जीवरूप कर्ताको कर्म कर्ता नहीं है । ( जहाँ कर्म कर्ता है वहाँ जीव कर्ता नहीं है और जहाँ जीव कर्ता है वहाँ कर्म कर्ता नहीं है । ) भावार्थ:-(१) पुद्गल स्वतंत्ररूपसे द्रव्यकर्मको करता होनेसे पुद्गल स्वयं ही कर्ता है; ( २ ) स्वयं द्रव्यकर्मरूप परिणमित होनेकी शक्तिवाला होनेसे पुद्गल स्वयं ही करण है; ( ३ ) द्रव्यकर्मको प्राप्त करता-पहुँचता होनेसे द्रव्यकर्म कर्म है, अथवा द्रव्यकर्मसे स्वयं अभिन्न होनेसे पुद्गल स्वयं ही कर्म (-कार्य ) है; ( ४ ) अपनेमेंसे पूर्व परिणामका व्यय करके द्रव्य- कर्मरूप परिणाम करता होनेसे तथा पुद्गलद्रव्यरूप ध्रुव रहता होनेसे पुद्गल स्वयं ही १४ ૨૬ पंचास्तिकायसंग्रह षट्कारकीरूपेण व्यवतिष्ठमानो न कारकांतरमपेक्षते । अतः कर्मणः कर्तुनास्ति जीवः कर्ता, जीवस्य कर्तुर्नास्ति कर्म कर्तृ निश्चयेनेति ।। ६२ ।। कम्मं कम्मं कुम्वदि जदि सो अप्पा करेदि अप्पारणं । किध तस्स फलं भञ्जदि अप्पा कम्मं च देदि फलं ।। ६३ ।। अपादान है; (५) अपनेको द्रव्यकर्मरूप परिणाम देता होनेसे पुद्गल स्वयं ही सम्प्रदान है; (६ ) अपने में अर्थात् अपने आधारसे द्रव्यकर्म करता होनेसे पुद्गल स्वयं ही अधिकरण है। इसीप्रकार (१) जीव स्वतंत्ररूपसे जीवभावको करता होनेसे जीव स्वयं ही कर्ता है; (२) स्वयं जीवभावरूपसे परिणमित होनेकी शक्तिवाला होनेसे जीव स्वयं ही करण है; ( ३ ) जीवभावको प्राप्त करता-पहुँचता होनेसे जीवभाव कर्म है, अथवा जीवभावसे स्वयं अभिन्न होनेसे जीव स्वयं ही कर्म है; ( ४ ) अपनेमेंसे पूर्व भावका व्यय करके ( नवीन ) जीवभाव करता होनेसे और जीवद्रव्यरूपसे ध्रुव रहनेसे जीव स्वयं ही अपादान है; ( ५ ) अपनेको जीवभाव देता. होनेसे जीव स्वयं ही सम्प्रदान है; (६ ) अपनेमें अर्थात् अपने आधारसे जीवभाव करता होनेसे जीव स्वयं ही अधिकरण है। इसप्रकार, पुद्गलकी कर्मोदयादिरूपसे या कर्मबंधादिरूपसे परिणमित होनेकी क्रियामें वास्तवमें पुद्गल ही स्वयमेव छह कारकरूपसे वर्तता है इसलिये उसे अन्य कारकोंकी अपेक्षा नहीं है तथा जीवकी औदयिकादि भावरूपसे परिणमित होनेकी क्रियामें वास्तवमें जीव स्वयं ही छह कारकरूपसे वर्तता है इसलिये उसे अन्य कारकोंकी अपेक्षा नहीं है । पुद्गलकी और जीवकी उपरोक्त क्रियाएँ एक ही कालमें वर्तती हैं तथापि पौद्गलिक क्रियामें वर्तते हुए पुद्गलके छह कारक जीवकारकोंसे विल्कुल भिन्न और निरपेक्ष हैं तथा जीवभावरूप क्रियामें वर्तते हुए जीवके छह कारक पुद्गलकारकों से विलकुल भिन्न और निरपेक्ष हैं । वास्तवमें किसी द्रव्यके कारकोंको किसी अन्य द्रव्यके कारकोंकी अपेक्षा नहीं होती । ६२ । . जो कर्म कर्म करे अने आत्मा करे बस आत्मने । कयम कम फल दे नीचने ? कयम जीव ते फल भोगवे ? ।। ६३ ।।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १०७ कर्म कर्म करोति यदि स आत्मा करोत्यात्मानम् । कथं तस्य फलं भुङ्क्त आत्मा कर्म च ददाति फलम् ।। ६३ ।। कर्मजीवयोरन्योन्याकर्तृत्वेऽन्यदचफलान्योपभोगलक्षणदूषणपुरस्सरः पूर्वपक्षोऽयम् ॥६३।। यथ सिद्धांतसूत्राणि- भोगाढगाढणचिदो पोग्गलकाएहिं सव्वदो लोगो। सुहहिं बादरहिं य ताणंतेहिं विविहिं ॥ ६४ ॥ गाथा ६३ अन्वयार्थः-[ यदि ] यदि [ कर्म ] कर्म [ कर्म करोति ] कर्मको करे और [सः आत्मा ] आत्मा [ आत्मानम् करोति ] आत्माको करे तो [ कर्म ] कर्म [ फलम् कथं ददाति ] आत्माको फल क्यों देगा [च ] और [ आत्मा ] आत्मा [ तस्य फलं भुङ्क्ते ] उसका फल क्यों भोगेगा ? टीका:-यदि कर्म और जीवको अन्योन्य अकर्तापना हो, तो 'अन्यका दिया हुमा फल अन्य भोगे' ऐसा प्रसंग आयेगा;-ऐसा दोष बतलाकर यहाँ पूर्वपक्ष उपस्थित किया गया है । भावार्थ:-शास्त्रोंमें कहा है कि ( पोद्गलिक ) कर्म जीवको फल देते हैं और जीव ( पौद्गलिक ) कर्मोंका फल भोगता है । अब यदि जीव कर्मको करता ही न हो तो जीवसे नहीं किया गया कर्म जीवको फल क्यों देगा और जीव अपनेसे नहीं किये गये कर्म के फलको क्यों भोगेगा ? जीवसे नहीं किया गया कर्म जीवको फल दे और जीव उस फलको भोगे यह किसी प्रकार न्याययुक्त नहीं है । इस प्रकार, 'कर्म कर्मको ही करता है और आत्मा आत्माको ही करता है' इस बातमें पूर्वोक्त दोष आने से यह बात घटित नहीं होती-इस प्रकार यहाँ पूर्वपक्ष उपस्थित किया गया है ।६३। अव सिद्धान्त सूत्र हैं ( अर्थात् अब ६३ वीं गाथामें कहे गये पूर्वपक्षके निरा- करणपूर्वक सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाली गाथाएँ कही जाती हैं ) । * प्रवचनसारमें १६८ वीं गाथा इस गाथासे मिलती है। अवगाढ गाढ भरेल छ सर्वत्र पुद्गलकायथी । आलोक वादर-सूक्ष्मथी, विधविध अनंतानंतथी ॥ ६४ ।। - .१०८ पंचास्तिकायसंग्रह अवगाढगाढनिचितः पुद्गलकायैः सर्वतो लोकः । सूक्ष्मदिरैश्चानंतानंतैर्विविधैः ॥ ६४ ।। कर्मयोग्यपुद्गला अंजनचूर्णपूर्णसमुद्गकन्यायेन सर्वलोकव्यापित्वाद्यत्रात्मा तत्रानानीता एवावतिष्ठत इत्यत्रोक्तम् ।। ६४ ।। अत्ता कुणदि सभावं तत्थ गदा पोग्गला सभावेहिं । गच्छंति कम्मभावं अण्णण्णोगाहमवगाढा ॥६५॥ आत्मा करोति स्वभावं तत्र गताः पुद्गलाः स्वभावैः । गच्छन्ति कर्मभावमन्योन्यावगाहावगाढाः ।। ६५ ।। गाथा ६४. अन्वयार्थ:-[लोकः ] लोक [ सर्वतः ] सर्वतः [ विविधैः ] विविध प्रकारके, [ अनंतानंतः ] अनंतानंत [ सूक्ष्म बादरैः च ] सूक्ष्म तथा बादर [ पुद्गलकायैः ] पुद्गल- कायों (.पुद्गलस्कन्धों ) द्वारा [ अवगाढगाढनिचितः] ( विशिष्ट रीतिसे ) अवग़ाहित होकर गाढ़ भरा हुआ है । : टीका:-यहाँ ऐसा कहां है कि-कर्मयोग्य पुद्गल . ( कार्माणवर्गणारूप पुद्गलस्कन्ध ) अंजनचूर्णसे ( अंजनके वारीक चूर्णसे ) भरी हुई डिब्बीके न्यायसे समस्त लोकमें व्याप्त हैं; इसलिये जहाँ आत्मा है वहाँ, विना लाये ही ( कहींसे लाये गये विना ही ), वे स्थित हैं । ६४ । गाथा ६५ अन्वयार्थः-[आत्मा ] आत्मा [ स्वभाव ] ( मोहरागढ परूप ) अपने भाव को [ करोति ] करता है; [ तत्र गताः पुद्गलाः ] ( तव ) वहाँ रहनेवाले पुद्गल [ स्वभावैः ] अपने भावोंसे [ अन्योन्यावगाहावगाढाः] जीवमें ( विशिष्ट प्रकारसे ) अन्योन्य-अवगाहरूपसे प्रविष्ट हुए [ कर्मभावम् गच्छन्ति ] कर्मभावको प्राप्त होते हैं आत्मा करे निज भाव ज्यां, त्यां पुद्गलो निजभावथी । कर्मत्वरूपे. परिणमे अन्योन्य-अवगाहित थई ।। ६५ ।।

षड्दव्यं-पंचास्तिकायवर्णन १०.६ तते । स्वभावैरेव पुद्गलाः अन्याकृतकर्मसंभृतिप्रकारोक्तिरियम् । आत्मा हि संसारावस्थायां पारिणामिक- चैतन्यस्वभावमपरित्यजन्नेवानादिवंधनवद्धत्वादनादिमोहरागद्वेषस्निग्धैरविशुद्धैरेष भावैर्विव- स खलु यत्र यदा मोहरूपं रागरूपं. द्वेषरूपं वा. स्वस्य भावमारभते, तत्र तदा तमेव निमित्तीकृत्य जीवप्रदेशेषु परस्परावगाहेनानुप्रविष्टाः कर्मभावमापद्यंत इति ।। ६५ ।। । जह पोग्गलदवारणं बहुप्पयारेहिं खंधरिणवत्ती। प्रकदा परेहिं विट्ठा तह कम्माणं वियाणाहि ॥६६ ॥ टीका:-अन्य द्वारा किये गये बिना कर्मकी उत्पत्ति किसप्रकार होती है उसका यह कथन है। आत्मा वास्तवमें संसार-अवस्थामें, पारिणामिक चैतन्यस्वभावको छोड़े बिना ही अनादि बंधन द्वारा बद्ध होनेसे अनादि मोहरागद्वेष द्वारा *स्निग्ध, ऐसे अविशुद्ध भावोंरूपसे ही विवर्तनको प्राप्त होता है (-परिणमित होता है ) । वह ( संसारस्थ आत्मा) वास्तवमें जहाँ और जब मोहरूप, रागरूप या द्वेषरूप ऐसे अपने भावको करता है, वहाँ और उस समय उसी भावको निमित्त बनाकर पुद्गल अपने भावोंसे ही जीवके प्रदेशोंमें ( विशिष्टतापूर्वक ) परस्पर-अवगाहरूपसे प्रविष्ट हुए कर्मभावको 'प्राप्त होते हैं। भावार्थः-आत्मा जिस क्षेत्रमें और जिस कालमें अशुद्ध भावरूप परिणमित 'होता है, उसी क्षेत्रमें स्थित कार्माणवर्गणारूप पुद्गलस्कंध उसी काल में स्वयं अपने 'भावोंसे ही जीवके प्रदेशोंमें विशेष प्रकारसे · परस्पर-अवगाहरूपसे प्रविष्ट हुए कर्मपनेको प्राप्त होते हैं। इसप्रकार, जीवसे किये गये बिना ही पुद्गल स्वयं कर्मरूपसे परिणमित होते हैं । ६५ । * स्निग्ध = चिकने; चिकनाईवाले। ('मोहरागद्वेष कर्मबंधमें निमित्तभूत होनेके कारण उन्हें स्निग्धताकी उपमा दी जाती है । इसीलिये यहाँ अविशुद्ध भावोंको 'मोहरागद्वेष द्वारा स्निग्ध' कहा है।) ज्यम स्कंधरचना बहुविधा देखाय छे पुद्गल तणी। परथी अकृत, ते रीत जाणो विविधता कर्मों तणी ।। ६६ ॥

११० पंचास्तिकायसंग्रह यथा पुद्गलद्रव्याणां बहुप्रकारैः स्कंधनिर्वृतिः । अकृता परैदृष्टा तथा कर्मणां विजानीहि ।। ६६ ।। अनन्यकृतत्वं कर्मणां वैचित्र्यस्यात्रोक्तम् । यथा हि स्वयोग्यचंद्रार्कप्रमोपलंभे संध्याघ्र चापपरिवेषप्रभतिभिर्बहुभिः प्रकारैः पुद्गलस्कंधविकल्पाः कतरनिरपेक्षा एवोत्पद्यते, स्वयोग्यजीवपरिणामोपलंभे ज्ञानावरणप्रभृतिभिर्बहुभिः प्रकारैः कर्माण्यपि कत्रतरनिरपेक्षाण्येवोत्पद्यते इति ॥ ६६ ॥ जीवा पोग्गलकाया अण्णण्णोगाढगणपडिबद्धा । काले विजुज्जमाणा सुहदुक्खं देति भुञ्जन्ति ।। ६७ ।। तथा : गाथा ६६ अन्वयार्थः-[ यथा ] जिसप्रकार [ पुद्गलद्रव्याणां ] पुद्गलद्रव्योंकी [ बहु- प्रकारैः ] अनेक प्रकारकी [ स्कंधनिचिः ] स्कंधरचना [ परैः अकृता] परसे किये गये विना [ दृष्टा ] होती दिखाई देती है, [ तथा ] उसीप्रकार [ कर्मणां ] कर्मोंकी वहु- प्रकारता [ विजानीहि ] परसे अकृत जानो। टीका:-कर्मोकी विचित्रता (बहुप्रकारता ) अन्य द्वारा नहीं की जाती ऐसा यहाँ कहा है। जिसप्रकार अपनेको योग्य चन्द्र-सूर्यके प्रकाशकी उपलब्धि होने पर, संध्या- बादल-इन्द्रधनुष-प्रभामण्डल इत्यादि अनेक प्रकारसे पुद्गलस्कंधभेद अन्य कर्ताकी अपेक्षाके विना ही उत्पन्न होते हैं, उसीप्रकार अपनेको योग्य जीव-परिणामकी उपलब्धि होने पर, ज्ञानावरणादि अनेक प्रकारके कर्म भी अन्य कर्ताकी अपेक्षाके विना ही उत्पन्न होते हैं। भावार्थ:-कर्मोकी विविध प्रकृति-प्रदेश-स्थिति-अतुभागरूप विचित्रता भी जीवकृत नहीं है, पुद्गलकृत ही है । ६६ । जीव-पुद्गलो अन्योन्यमां अवगाह ग्रहीने बद्ध छ । काले वियोग लहे तदा सुखदुःख आपे भोगवे ॥ ६७ ।।

षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन १११ जीवाः पुद्गलकायाः अन्योन्यावगाढग्रहणप्रतिवद्धाः । काले वियुज्यमानाः सुखदुःखं ददति भुञ्जन्ति ।। ६७ ।। निश्चयेन नीवकर्मणोश्चैककतत्वेऽपि व्यवहारेण कर्मदचफलोपलंभो जीवस्य न विरुध्यत इत्यत्रोक्तम् । जीवा हि मोहरागद्वषस्निग्धत्वात्पुद्गलस्कंधाश्च स्वभाव- स्निग्धत्वाद्वन्धावस्थायां परमाणुद्वन्द्वानीवान्योन्यावगाहग्रहणप्रतिवद्धत्वेनावतिष्ठते । यदा तु ते परस्परं वियुज्यंते, तदोदितप्रच्यवमाना निश्चयेन सुखदुःखरूपात्मपरिणामानां - गाथा ६७ अन्वयार्थः-[ जीवाः पुद्गलकायाः ] जीव और पुद्गलकाय [ अन्योन्याव- गाढग्रहणप्रतिबद्धाः ] ( विशिष्ट प्रकारसे ). अन्योन्य-अवगाहके ग्रहण द्वारा (परस्पर ) बद्ध हैं; [ काले वियुज्यमानाः ] कालसे पृथक् होने पर [ सुखदुःखं ददति भुञ्जन्ति ] सुखदुःख देते हैं और भोगते हैं ( अर्थात् पुद्गलकाय सुखदुःख देते हैं और जीव भोगते हैं)। टीकाः-निश्चयसे जीव और कर्मको एकका (निज-निजरूपका ही ) कर्तृत्व होने पर भी, व्यवहारसे जीवको कर्मद्वारा दिये गये फलका उपभोग विरोधको प्राप्त नहीं होता (अर्थात् 'कर्म जीवको फल देता है और जीव उसे भोगता हैं' यह बात भी व्यवहारसे घटित होती है ) ऐसा यहां कहा है। जीव मोहरागद्वेष द्वारा स्निग्ध होनेके कारण तथा पुद्गलस्कन्ध स्वभावसे स्निग्ध होनेके कारण, ( वे ) बंध-अवस्थामें-'परमाणुद्वन्द्वोंकी भांति-(विशिष्ट प्रकारसे ) अन्योन्य-अवगाहके ग्रहण द्वारा बद्धरूपसे रहते हैं । जब वे परस्पर पृथक् होते हैं तव (-पुद्गलस्कन्ध निम्नानुसार फल देते हैं और जीव उसे भोगते हैं)-उदय पाकर खिर जानेवाले पुद्गलकाय सुखदुःखरूप आत्मपरिणामोंके निमित्तमात्र होनेकी अपेक्षासे *निश्चयसे, और इष्टानिष्ट विषयोंके निमित्तमात्र होनेकी अपेक्षासे व्यवहारसे, १. परमाणुद्वंद्व= दो परमाणुप्रोंका जोड़; दो परमाणुओंसे निर्मित स्कंध; द्वि-अणुक स्कंध । 8 (१) सुखदुःखपरिणामोंमें तथा (२) इष्टानिष्ट विषयोंके संयोगमें शुभाशुभ कर्म निमित्तभूत होते हैं, इसलिये उन कर्मोको उनके निमित्तमात्रपनेकी अपेक्षासे ही "(१) सुखदुःखपरिणामरूप ( फल ) तथा ( २ ) इष्टानिष्ट विषयरूप फल देनेवाला' " ( उपचारसे ) कहा जा सकता है। अव, (१) सुखदुःखपरिणाम तो जीवकी अपनी ही पर्यायरूप होनेसे जीव सुखदुःखपरिणाम- .

पंचास्तिकायसंग्रह ११२ व्यवहारेणेष्टानिष्टविषयाणां निमिचमात्रत्वात्पुद्गलकायाः सुखदुःखरूपं फलं प्रयच्छन्ति । जीवाश्च निश्चयेन निमित्तमात्रभूतद्रव्यकर्मनिवर्तितसुखदुःखरूपात्मपरिणामानां व्यवहारेण *सुखदुःखरूप फल देते हैं; तथा जीव निमित्तमात्रभूत द्रव्यकर्मसे निष्पन्न होनेवाले सुखदुःखरूप आत्मपरिणामोंके भोक्ता होनेकी अपेक्षासे निश्चयसे, और ( निमित्तमात्रभूत ) द्रव्यकर्मके उदयसे संपादित इष्टानिष्ट विषयोंके भोक्ता होनेकी को तो 'निश्चयसे' भोगता है, और इसलिये सुखदुःखपरिणाममें निमित्तभूत वर्तते हुए शुभाशुभ कर्मों में भी (-जिन्हें "सुखदुःखपरिणामरूप फल देनेवाला" कहा था उनमें भी) उस अपेक्षासे ऐसा कहा जा सकता है कि "वे जीवको 'निश्चयसे' सुखदुःखपरिणामरूप फल देते हैं;" तथा (२) इष्टानिष्ट विषय तो जीवसे विल्कुल भिन्न होनेसे जीव इष्टानिष्ट विषयोंको तो व्यवहार से' भोगता है, और इसलिये इष्टानिष्ट विषयोंमें निमित्तभूत वर्तते हुए शुभाशुभ कर्मोंमें भी (-जिन्हें “इष्टानिष्ट विषयरूप फल देनेवाला" कहा था उनमें भी ) उस अपेक्षासे ऐसा कहा जा सकता है कि "वे जीवको 'व्यवहारसे' इष्टानिष्ट विषयरूप फल देते हैं।" यहाँ ( टोकाके दूसरे पैरेमें ) जो 'निश्चय' और 'व्यवहार' ऐसे दो भंग किये हैं वे मात्र इतना भेद सूचित करनेके लिये ही किये हैं कि 'कर्मनिमित्तक सुख:दुखपरिणाम जीवमें होते हैं और कर्मनिमित्तक इष्टानिष्ट विषय जीवसे विल्कुल भिन्न हैं। परन्तु यहाँ कहे हुए निश्चयरूप भंगसे ऐसा नहीं समझना चाहिये कि 'पौद्गलिक कर्म जीवको वास्तव में फल देता है और जीव वास्तवमें कर्मके दिये हुए फलको भोगता है।' परमार्थतः कोई द्रव्य किसी अन्य द्रव्यको फल नहीं दे सकता और कोई द्रव्य किसी अन्य द्रव्यके पाससे फल प्राप्त करके भोग नहीं सकता। यदि परमार्थतः कोई द्रव्य अन्य द्रव्यको फल दे और वह अन्य द्रव्य उसे भोगे तो दोनों द्रव्य एक हो जायें। यहां यह ध्यान रखना खास आवश्यक है कि टीकाके पहले पैरेमें सम्पूर्ण गाथाके कथनका सार कहते हुए श्री टीकाकार प्राचार्यदेवने स्वयं ही जीवको कर्म द्वारा दियेगये फलका उपभोग व्यवहारसे ही कहा है, निश्चयसे नहीं। सुखदुःखके हो अर्थ होते हैं : (१) सुखदुःखपरिणाम, और ( २ ) इष्टानिष्ट विषय । जहाँ 'निश्चयसे' कहा है वहाँ 'सुखदुःखपरिणाम' ऐसा अर्थ समझना चाहिये और जहाँ 'व्यवहारसे' कहा है वहां 'इष्टानिष्ट विषय' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन द्रव्यकर्मोदयापादितेंप्टानिष्टविषयाणां भोक्तृत्वाचथाविधं फलं भुञ्जन्ते इति । एतेन जीवस्य भोक्तृत्वगुणोऽपि व्याख्यातः ॥ ६७ ॥ तम्हा कम्म कत्ता भावेण हि संजुदोध जीवस्स । भोत्ता ह हवदि जीवो चेदगभावेण कम्मफलं ॥ ६८ ।। तस्मात्कर्म कर्तृ भावेन हि संयुतमथ जीवस्य । भोक्ता तु भवति जीवश्चेतकभावेन कर्मफलम् ॥ ६८ ॥ कर्तृत्वभोक्तृत्वव्याख्योपसंहारोऽयम् । तत एतत् स्थितं निश्चयेनात्मनः कम कर्व, व्यवहारेण " जीवभावस्य; जीवोऽपि निश्चयेनात्मभावस्य कर्ता, व्यवहारेण कर्मण इति । यथात्रोभयनयाभ्यां कर्म कर्त, तथैकेनापि नयेन न भोक्त । कुतः ? अपेक्षासे व्यवहारसे, उस प्रकारका ( सुखदुःखरूप ) फल भोगते हैं ( अर्थात् निश्चयसे सुखदुःखपरिणामरूप और व्यवहारसे इष्टानिष्ट विषयरूप फल भोगते हैं )। इससे ( इस कथनसे ) जीवके भोक्तृत्वगुणका भो व्याख्यान हुआ। ६७ । गाथा ६८ अन्वयार्थः-[ तस्मात् ] इसलिये [ अथ जीवस्य भावेन हि संयुतम् ] जीवके भावसे संयुक्त ऐसा [ कर्म ] कर्म ( द्रव्यकर्म ) [ कर्तृ ] कर्ता है (-निश्चयसे अपना कर्ता और व्यवहारसे जीवभावका कर्ता; परन्तु वह भोक्ता नहीं है )। [ भोक्ता तु ] भोक्ता तो [ जीवः भवति ] ( मात्र ) जीव है [ चेतकभावेन ] चेतकभाव- के कारण [ कर्मफलम् ] कर्मफलका । टीका:-यह, कर्तृत्व और भोक्तृत्वकी व्याख्याका उपसंहार है । इसलिये ( पूर्वोक्त कथनसे.). ऐसा निश्चित हुप्रा कि-कर्म निश्चयसे अपना कर्ता है, व्यवहारसे जीवभावका कर्ता है; जीव भी निश्चयसे अपने भावका कर्ता है, व्यवहारसे कर्मका कर्ता है । जिसप्रकार यहां दोनों नयोंसे कर्म कर्ता है, उसीप्रकार एक भी नयसे वह भोक्ता नहीं है। किसलिये ? क्योंकि उसे *चैतन्यपूर्वक अनुभूतिका सद्- जो अनुभूति चैतन्यपूर्वक हो उसीको यहाँ भोक्तृत्व कहा है; उसके अतिरिक्त अन्य अनु- भूतिको नहीं ! तेथी करम, जीवभावथी संयुक्त, कर्ता जाणवू। भोक्तापणु तो जीवने चेतकपणे तत्फल तणु ॥ ६८ ॥ १५ .

पंचास्तिकायसंग्रह
चैतन्यपूर्वकानुभूतिसद्भावाभावात् । ततश्चेतनत्वात् केवल एव जीवः कर्मफलभूतानां
कथंचिदात्मनः सुखदुःखपरिणामानां कथंचिदिष्टानिष्टविषयाणां भोक्ता प्रसिद्ध इति ।। ६८ ।।
एवं कत्ता भोत्ता होज्ज अप्पा सहि कम्मेहिं ।
हिंडदि पारमपारं संसारं मोहसंछण्णो ।। ६६ ॥
एवं कर्ता भोक्ता भवनात्मा स्वकैः कर्ममिः ।
हिंडते पारमपारं संसारं मोहसंछन्नः ।। ६९ ।।
कर्मसंयुक्तत्वमुखेन प्रभुत्वगुणव्याख्यानमेतत् । एवमयमात्मा प्रकटितप्रभुत्व-
शक्तिःस्वकः कर्म मि हीतकर्तृत्वभोक्तृत्वाधिकारोऽनादिमोहावच्छन्नत्वादुपजातविपरीताभिनिवेशः
भाव नहीं है। इसलिये चेतनपनेके कारण मात्र जीव ही कर्मफलका-कथंचित
आत्माके सुख-दुःखपरिणामोंका और कथंचित् इष्टानिष्ट विषयोंका-भोक्ता प्रसिद्ध
है ॥ ६८ ॥
गाथा ६९
अन्वयार्थ:-[ एवं ] इसप्रकार [स्वकैः कर्मभिः ] अपने कर्मोसे [कर्ता भोक्ता
भवन् ] कर्ता-भोक्ता होता हुआ [ आत्मा ] आत्मा [मोहसंछन्नः ] मोहाच्छादित वर्तता
हुआ [ पारम् अपारं संसारं ] सांत अथवा अनंत संसारमें [ हिंडते ] परिभ्रमण करता है ।
टीका:-यह, कर्मसंयुक्तपनेकी मुख्यतासे प्रभुत्वगुणका व्याख्यान है ।
इसप्रकार प्रगट प्रभुत्वशक्तिके कारण जिसने अपने कर्मों द्वारा (-निश्चयसे
भावकों और व्यवहारसे द्रव्यकर्मों द्वारा) कर्तृत्व एवं भोक्तृत्वका अधिकार ग्रहण
किया है ऐसे इस आत्माको, अनादि मोहाच्छादितपनेके कारण विपरीत अभिनिवेशकी
उत्पत्ति होनेसे सम्यग्ज्ञानज्योति अस्त होगई है, इसलिये वह सांत अथवा अनंत
संसारमें परिभ्रमण करता है।
* अभिनिवेश-अभिप्राय; आग्रह ।
कर्ता भने भोक्ता थतो ये रीत निज कर्मों वडे ।
जीव मोहथी आच्छन्न सांत अनंत संसारे भमे ॥६९॥

पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १११ प्रत्यस्तमितसम्यग्ज्ञानज्योतिः सांतमनंतं वा संसारं परिभ्रमतीति ।। ६९ ॥ उवसंतखीणमोहो मग्गं जिणभासिदेण समुवगदो। रणाराणुमग्गचारी णिव्वाणपुरं वजदि धीरो ॥ ७० ॥ उपशांतक्षीणमोहो मागं जिनभाषितेन समुपगतः । ज्ञानानुमार्गचारी निर्वाणपुरं ब्रजति धीरः ॥ ७० ॥ कर्मवियुक्तत्वमुखेन प्रभुत्वगुणव्याख्यानमेतत् । अयमेवात्मा यदि जिनाज्ञया मार्गसु- पगम्योपशांतक्षीणमोहत्वात्प्रहीणविपरीताभिनिवेशः समुद्भिन्नसम्यग्ज्ञानज्योतिः कर्तृत्व- ( इसप्रकार जीवके कर्मसहितपनेकी मुख्यतापूर्वक प्रभुत्वगुणका व्याख्यान किया गया । ) ६६ । गाथा ७० अन्वयार्थः-[जिनभापितेन मार्ग समुपगतः ] जो ( पुरुष ) जिनवचन द्वारा मार्गको प्राप्त करके [ उपशांतक्षीणमोहः ] उपशांतक्षीणमोह होता हुआ (अर्थात् जिसे दर्शनमोहका उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशम हुआ है ऐसा होता हुआ ) [ ज्ञानानुमार्ग- चारी] ज्ञानानुमार्गमें विचरता है (-ज्ञानका अनुसरण करनेवाले मार्गमें वर्तता है ), [धीरः ] वह धीर पुरुप [ निर्वाणपुरं व्रजति ] निर्वाणपुरको प्राप्त होता है । टीका:-यह, कर्मवियुक्तपनेकी मुख्यतासे प्रभुत्वगुणका व्याख्यान है । जव यही आत्मा जिनाज्ञा द्वारा मार्गको प्राप्त करके, उपशांतक्षीणमोहपनेके कारण (दर्शनमोहके उपशम, क्षय अथवा क्षयोपशमके कारण) जिसे विपरीत अभिनि- वेश नष्ट हो जानेसे सम्यग्ज्ञानज्योति प्रगट हुई है ऐसा होता हुआ, कर्तृत्व और भोक्तृ- त्वके अधिकारको समाप्त करके सम्यकपसे प्रगट प्रभुत्वशक्तिवान होता हुआ ज्ञानका ही अनुसरण करनेवाले मार्गमें विचरता है (-प्रवर्तता है, परिणमित होता है, प्राचरण . जिनवचनथी लही मार्ग जे, उपशांतक्षीणमोही बने । ज्ञानानुमार्ग विपे चरे, ते धीर शिवपुरने वरे ।।७।।

पंचास्तिकायसंग्रह भोक्तृत्वाधिकार परिसमाप्य सम्यक्प्रकटितंप्रभुत्वशक्तिमा॑नस्यैवानुमार्गेण चरति, तदा विशुद्धा- स्मतत्त्वोपलंभरूपमपवर्गनगरं विगाहत इति ।। ७० ॥ . अथ जीवविकल्पा उच्यन्ते । एक्को चेव महप्पा सो दुवियप्पो तिलक्खणो होदि । चदुचंकमणो भणिदो पंचग्गगुणप्पधाणो य ॥ ७१ ।। छक्कापक्कमजुत्तो उवउत्तो सत्तभंगसब्भावो । अट्ठासमो णवट्ठो जीवो दसट्ठाणगो भणिदो ॥ ७२ ।। एक एव महात्मा स द्विविकल्पस्त्रिलक्षणो भवति । चतुश्चक्रमणो भणितः पश्चाग्रगुणप्रधानश्च ।।-७१. ॥ षट्कापक्रमयुक्तः उपयुक्तः सप्तमङ्गसद्भावः । अष्टाश्रयो नवार्थो जीवो दशस्थानगो भणितः ।। ७२ ॥ करता है ), तब वह विशुद्ध आत्मतत्त्वकी उपलब्धिरूप अपवर्गनगरको ( मोक्षपुरको) प्राप्त करता है। (इसप्रकार जीवके कर्मरहितपनेकी मुख्यतापूर्वक प्रभुत्वगुणका व्याख्यान किया गया। ) ७०। अब जीवके भेद कहे जाते हैं । गाथा ७१-७२ अन्वयार्थः-[ सः महात्मा] वह महात्मा [ एका एव ] एक ही है; [द्विवि- कल्पः ] दो भेदवाला है और [ त्रिलक्षणः भवति ] त्रिलक्षण है; [चतुश्चंक्रमणः ] और उसे चतुर्विध भ्रमणवाला [च ] तथा [पंचाग्रगुणप्रधानः ] पाँच मुख्य गुणोंसे प्रधानतावाला [ भणितः ] कहा है। [ उपयुक्तः जीवः ] उपयोगी ऐसा वह जीव [ षट्- कापक्रमयुक्तः ] छह *प्रपक्रम सहित, [ सप्तभंगसद्भावः ] सात भंगपूर्वक सद्भाववान, अपक्रम ( संसारी जीवको अन्य भवमें जाते हुए ) अनुश्रेणी गमन अर्थात् विदिशाओंको छोड़ . करगमन । एक ज महात्मा ते 'द्विभेद अने त्रिलक्षण उक्त छ। चउभ्रमणयुत, पंचाग्रगुणपरधान जीव कहेल छ । ७१ ॥ . उपयोगी षट-अपक्रमसहित छ, सप्तभंगीसत्त्व छ । जीव अष्ट-आश्रय, नव-भरथ, दशस्थानंगत भाखेल छे॥७२।। - ११७ 7 . . . . षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन स खलु जीवो महात्मा नित्यचैतन्योपयुक्तत्वादेक एव, शानदर्शनभेदाद्विविकल्पः, कर्मफलकार्यज्ञानचेतनाभेदेन लक्ष्यमाणत्वात्रिलक्षण: ध्रौव्योत्पादविनाशभेदेन वा, चतसृषु गतिषु चंक्रमणत्वाचतुश्चंक्रमणः, पञ्चभिः पारिणामिकौदयिकादिभिरग्रगुणः प्रधानत्वात्पश्चाग्र- गुणप्रधाना, चतसृषु दिक्ष मधश्चेति भवांतरसंक्रमणषट्केनापक्रमेण युक्तत्वात्पट्कापक्रमयुक्तः, अस्तिनास्त्यादिभिः सप्तभंगैः सद्भावो यस्येति सप्तभङ्गसद्भावः, अष्टानां कर्मणां गुणानां वा आश्रय- वादष्टाश्रयः, नवपदार्थरूपेण वर्तनान्नवार्थः, पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतिसाधारणप्रत्येकद्वित्रिचतुः पञ्वेन्द्रियरूपेषु दशसु स्थानेषु गतत्वादशस्थानग इति ।। ७१-७२ ।। पडिहिदिअणुभागप्पदेसबंधेहिं सव्वदो मुक्को । उड्ढं गच्छदि सेसा विदिसावज्जं गदि जंति ॥ ७३ ।। [ अष्टाश्रयः ] पाठके आश्रयरूप, [ नवार्थः] नौ-अर्थरूप और [ दशस्थानगः] दशस्था- नगत [ भणितः ] कहा गया है । टीका:-वह जीव महात्मा ( १ ) वास्तवमें नित्यचैतन्य-उपयोगी होनेसे "एक हो" है; ( २ ) ज्ञान और दर्शन ऐसें भेदोंके कारण "दो भेदवाला" है; : ( ३ ) कर्मफलचेतना, कार्यचेतना और ज्ञानचेतना ऐसे भेदों द्वारा अथवा ध्रौव्य, उत्पाद और विनाश ऐसे भेदों द्वारा लक्षित होनेसे "त्रिलक्षण ( तीन लक्षणवाला )" है; (४) चार गतियोंमें भ्रमण करता है इसलिये "चतुर्विध भ्रमणवाला" है; ( ५ ) पारिणार्मिक, औदयिक इत्यादि पाँच मुख्य गुणों द्वारा प्रधानता होनेसे “पाँच मुख्य गुणोंसे प्रधानतावाला" है; (६) चार दिशाओंमें, ऊपर और नीचे इसप्रकार षड्विध भवान्तरगमनरूप अपक्रमसे युक्त होनेके कारण (अर्थात् अन्य भवमें जाते हुए उपरोक्त छह दिशात्रोंमें गमन होता है इसलिये ) "छह अपक्रम सहित" है; (७) अस्ति, नास्ति आदि सात भंगों द्वारा जिसका सद्भाव है ऐसा होनेसे "सात भंगपूर्वक सद्भाववान" है; ( ८ ) ( ज्ञानावरणीयादि ) आठ कर्मोंके अथवा (सम्यक्त्वादि) आठ गुणोंके आश्रयभूत होनेसे "पाठके आश्रयरूप" है; (6) नव पदार्थरूपसे वर्तता है इसलिये “नव-अर्थरूप” है; (१० ) पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, साधारण वनस्पति, प्रत्येक वनस्पति, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रियं, चतुरिंन्द्रिय और पंचेन्द्रियरूप दस स्थानोंमें प्राप्त होनेसे "दसस्थानगत" है । ७१-७२ । प्रकृति-स्थिति-परदेश-अनुभवबंधथी परिमुक्तने । गति-होय ऊँचे; शेषने विदिशा तजी गति होय छे ।। ७३ ।। ..

पंचास्तिकायसंग्रह प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशबंधैः सर्वतो मुक्तः । ऊर्ध्व गच्छति शेषा विदिग्वर्जा गतिं यांति ।। ७३ ।। बद्धजीवस्य षड्गतयः कर्मनिमित्ताः । मुक्तस्याप्यूर्ध्वगतिरेका स्वाभाविकीत्य- त्रोक्तम् ।। ७३ ।। -इति जीवद्रव्यास्तिकायव्याख्यानं समाप्तम् । यथ पुद्गलद्रव्यास्तिकायव्याख्यानम् । खंधा य खंधदेसा खंधपदेसा य होंति परमाणू । इदि ते चदुवियप्पा पोग्गलकाया मुणेदव्या ॥ ७४ ॥ गाथा ७३ अन्वयार्थः-[प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशबंधैः ] प्रकृतिबन्ध, स्थितिबंध, अनुभाग- बंध और प्रदेशबंधसे [ सर्वतः मुक्तः] सर्वतः मुक्त जीव [ ऊर्ध्वं गच्छति ] ऊर्ध्वगमन करता है; [ शेषाः ] शेष जीव ( भवान्तरमें जाते हुए ) [विदिग्वर्जा गतिं यांति ] विदिशाएँ छोड़कर गमन करते हैं। टीकाः बद्ध जीवको कर्मनिमित्तक षड्विध गमन ( अर्थात् कर्म जिसमें निमित्तभूत है ऐसा छह दिशाओं में गमन ) होता है; मुक्त जीवको भी स्वाभाविक ऐसा एक ऊर्ध्वगमन होता है ।-ऐसा यहाँ कहा है। भावार्थः-समस्त रागादिभाव रहित ऐसा जो शुद्धात्मानुभूतिलक्षण ध्यान उसके बल द्वारा चतुर्विध बधसे सर्वथा मुक्त हुआ जीव भी स्वाभाविक अनन्त ज्ञानादि गुणोंसे युक्त वर्तता हुअा, एकसमयवर्ती प्रविग्रहगति द्वारा ( लोकाग्रपर्यन्त ) स्वाभाविक ऊर्ध्वगमन करता है । शेष संसारी जीव मरणांतमें विदिशाएँ छोड़कर पूर्वोक्त षट्- अपक्रमस्वरूप ( कर्म निमित्तक ) अनुश्रेणीगमन करते हैं । ७३ । -इसप्रकार जीवद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान समाप्त हुआ। अब पुद्गलद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान है । जडरूप पुद्गलकाय केरा चार भेदो जाणवा । ते स्कंध, तेनो देश, स्कंधप्रदेश, परमाणु कह्या ।। ७४ ॥ - - षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन स्कंधाश्च स्कंधदेशाः स्कंधप्रदेशाश्च भवन्ति परमाणवः । इति ते चतुर्विकल्पाः पुगलकाया ज्ञातव्याः ॥ ७४ ॥ पुद्गलद्रव्यविकल्पादेशोऽयम् । पुद्गलद्रव्याणि हि कदाचित्स्कंधपर्यायेण, कदा- चित्स्कंधदेशपर्यायेण, कदाचित्स्कंधप्रदेशपर्यायेण, कदाचित्स्कंधप्रदेशपर्यायेण, कदाचित्परमाणुत्वेनात्र तिष्ठन्ति । नान्या गतिरस्ति । इति तेषां चतुर्विकल्पत्वमिति ।। ७४ ।। खंछ सयलसमत्थं तस्स दु अद्ध भरणंति देसो त्ति । प्रद्धद्धं च पदेसो परमाणू चेव अविभागी॥ ७५ ॥ स्कन्धः सकलसमस्तस्तस्य त्वधं भणन्ति देश इति । अर्धाधं च प्रदेशः परमाणुश्चैवाविभागी ॥ ७५ ॥ गाथा ७४ अन्वयार्थः-[ ते पुद्गलकायाः ] पुद्गलकायके [ चतुर्विकल्पाः ] चार भेद [ ज्ञातव्याः ] जानना [ स्कंधाः च ] स्कन्ध, [ स्कन्धदेशाः ] स्कन्धदेश, [स्कन्धप्रदेशाः ] स्कन्धप्रदेश [च ] और [ परमाणवः भवन्ति इति ] परमाणु । टीका:-यह पुद्गलद्रव्यके भेदोंका कथन है । पुद्गलद्रव्य कदाचित् स्कंधपर्यायसे, कदाचित् स्कन्धदेशरूप पर्यायसे, कदाचित् स्कन्धप्रदेशरूप पर्यायसे और कदाचित् परमाणुरूपसे यहाँ ( लोकमें ) होते हैं। अन्य कोई गति नहीं है । इसप्रकार उनके चार भेद हैं ।। ७४ ।। गाथा ७५ अन्वयार्थः-[ सकलसमस्तः] सकल-समस्त ( पुद्गलपिंडात्मक सम्पूर्ण वस्तु ) वह [ स्कन्धः ] स्कंध है, [तस्य अधं तु] उसके अर्धको [ देशः इति भणन्ति ] देश कहते हैं, [ अर्धा च] अर्धका अर्ध वह [ प्रदेशः] प्रदेश है [च ] और [ पविभागी.] अविभागी वह [ परमाणुः एव ] सचमुच परमाणु है । पूरण-सकल ते 'स्कन्ध छे ने अर्थ तेनु 'देश' छ। अर्धा तेनु 'प्रदेश' ने अविभाग ते 'परमाणु' छे ।।.७५ ॥

१२० पंचास्तिकायसंग्रह . पुद्गलद्रव्यविकल्पनिर्देशोऽयम् । अनंतानंतपरमाण्वारब्धोऽप्येकः स्कन्धो नाम पर्यायः । तदर्थं स्कन्धदेशो नाम पर्यायः । तदर्धाधं स्कन्धप्रदेशो नाम पर्यायः । एवं भेदवशात् द्वयणुकस्कन्धादनंताः स्कन्धप्रदेशपर्यायाः । निर्विभागकप्रदेशः स्कन्धस्यां- टीका:-यह, पुद्गल लद्रव्यके भेदोंका वर्णन है। अनन्तानन्त परमाणुओंसे निर्मित होने पर भी जो एक हो वह स्कंध नामकी पर्याय है; उसकी आधी स्कंधदेश नामक पर्याय है; आधीकी आधी स्कंधप्रदेश नामकी पर्याय है । इसप्रकार भेदके कारण ( पृथक् होनेके कारण ) द्वि-अणुक स्कंधपर्यंत अनन्त स्कंधप्रदेशरूप पर्यायें होती हैं । निविभाग-एकप्रदेशवाला, स्कंधका अन्तिम अंश वह एक परमाणु है । ( इसप्रकार *भेदसे होनेवाले पुद्गलविकल्पोंका वर्णन हुआ । ) पुनश्च, दो परमाणुओंके संघातसे ( मिलनेसे ) एक द्विअणुक-स्कन्धरूप पर्याय होती है । इस प्रकार संघातके कारण ( द्विअणुक-स्कन्धकी भाँति त्रिअणुक- स्कन्ध चतुरणुक-स्कन्ध इत्यादि ) अनन्त स्कन्धरूप पर्यायें होती हैं । ( इस प्रकार संघातसे होनेवाले पुद्गलविकल्पका वर्णन हुआ।) - भेदसे होनेवाले पुद्गलविकल्पोंका ( पुद्गलभेदोंका ) टीकाकार श्री जयसेनाचार्यदेवने जो वर्णन किया है उसका तात्पर्य निम्नानुसार है:-अनंतपरमाणुपिंडात्मक घटपटादिरूप जो विवक्षित सम्पूर्ण वस्तु उसे "स्कन्ध" संज्ञा है। भेद द्वारा उसके जो पुद्गलविकल्प होते हैं वे निम्नोक्त दृष्टान्तानुसार समझना । मान लो कि १६ परमाणुओंसे निर्मित एक पुद्गलपिंड है और वह टूटकर उसके टुकड़े होते हैं । वहाँ १६ परमाणुओंके पूर्ण पिंडको "स्कन्ध" मानें तो ८ परमाणु- ओंवाला उसका अर्धभागरूप टुकड़ा वह "देश" है, ४ परमाणुओंवाला उसका चतुर्थभागरूप टुकड़ा वह "प्रदेश" है और अविभागी छोटे-से-छोटा टुकड़ा वह "परमाणु" है । पुनश्च, जिसप्रकार १६ परमाणुवाले पूर्ण पिंडको "स्कन्ध" संज्ञा है, उसीप्रकार १५ से लेकर पर- माणुप्रों तकके किसी भी टुकड़ेको भी "स्कन्ध" संज्ञा है; जिसप्रकार ८ परमाणुओंवाले उसके अर्धभागरूप टुकड़ेको "देश" संज्ञा है, उसीप्रकार ७ से लेकर ५ परमाणुओं तकके उसके किसी भो टुकड़ेको भी "देश" सज्ञा है। जिस प्रकार ४ परमाणुवाले उसके चतुर्थभाग़रूप टुकड़ेको "प्रदेश" संज्ञा है, उसीप्रकारं ३ से लेकर २ परमाणु तकके उसके किसी भी टुकड़ेको भी "प्रदेश" संज्ञा है। इस दृष्टान्तके अनुसार, भेद द्वारा होनेवाले पुद्गलविकल्प समझना ।

षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन १२१ . त्योभेदः परमाणुरेकः । पुनरपि द्वयोः परमाण्वोः संघातादेको द्वयणुकस्कंधपर्यायः । एवं संघातक्शादनंताः स्कंधपर्यायाः । एवं भेदसंघाताभ्यामप्यनंता भवंतीति । ७५ ।। बादरसुहुमगदाणं खंधारणं पोग्गलो त्ति ववहारो। ते होंति छप्पयारा तेलोक्कं जेहि णिप्पण्णं ॥ ७६ ॥ यादरसौम्यगतानां स्कंधानां पुदलः इति व्यवहारः। ते भवन्ति षट्प्रकारास्त्रैलोक्यं यः निष्पन्नम् ।। ७६ ॥ स्कंधानां पुद्गलव्यवहारसमर्थनमेतत् । स्पर्शरसगंधवर्णगुणविशेषः षट्र- स्थानपतितवृद्धिहानिमिः पूरणगलनधर्मत्वात स्कंधव्यक्त्याविर्भावतिरोभावाभ्यामपि च पूरणगलनोपपचः परमाणवः पुद्गला इति निश्चीयते । स्कंधास्त्वनेकपुद्गलमयकपर्यायत्वेन पुद्गलेभ्योऽनन्यत्वात्पुद्गला इति व्यवहियंते, तथैव च बादरसूक्ष्मत्वपरिणामविकल्प - इसप्रकार भेद-संघात दोनोंसे भी ( एकसाथ भेद और संघात दोनों होनेसे भी ) अनन्त ( स्कन्धरूप पर्यायें ) होती हैं । ( इसप्रकार भेद-संघातसे होनेवाले पुद्गलविकल्पका वर्णन हुआ। ) ॥ ७५ ।। गाथा ७६ अन्वयार्थ:-[ बादरसौम्यगतानां ] बादर और सूक्ष्मरूपसे परिणत [ स्कन्धानां ] स्कन्धोंको [ पुद्गलः ] "पुद्गल" [ इति ] ऐसा [ व्यवहारः ] व्यवहार है । [ ] वे [ षट्प्रकाराः भवन्ति ] छह प्रकारके हैं, [यै] जिनसे [ त्रैलोक्यं ] तीन लोक [ निष्पन्नम् ] निष्पन्न हैं। टीका:-स्कन्धोंमें "पुद्गल" ऐसा जो व्यवहार है उसका यह समर्थन है। (१) जिनमें षट्स्थानपतित ( छह स्थानोंमें समावेश पानेवाली ) वृद्धिहानि होती है ऐसे स्पर्श-रस-गंध-वर्णरूप गुणविशेषोंके कारण ( परमाणु ) "पूरण-गलन"-धर्मवाले होनेसे तथा (२) स्कन्धव्यक्तिके (-स्कन्धपर्यायके ) सौ स्कंध वादर-सूक्ष्ममा 'पुद्गल' तणो व्यवहार छ। छ विकल्प के स्कंधो तणा, जेथी त्रिजग निष्पन्न छे ।। ७६ । १६ १२२ पंचास्तिकायसंग्रह " पटप्रकारतामापद्य त्रैलोक्यरूपेण निष्पद्य स्थितवंत इति । तथा हि-वादरवादरा, चादराः, बादरसूक्ष्माः, सूक्ष्मवादराः, सूक्ष्माः, सूक्ष्ममूक्ष्मा इति । तत्र छिन्नाः स्वयं 'संधानासमर्थाः काष्ठपाषाणादयो चादरवादराः । छिन्नाः स्वयं संधानसमर्थाः क्षीरघृततैलतोयरसप्रभृतयो बादराः । स्थूलोपलंभा अपि छेत्तु मेत्तुमादातुमशक्याः छायातपतमोज्योत्स्नादयो बादरसूक्ष्माः। सूक्ष्मत्वेऽपि स्थूलोपलंभाः स्पर्शरसगंधशब्दाः सूक्ष्मवादराः । सूक्ष्मत्वेऽपि हि करणानुपलम्याः आविर्भाव और तिरोभावकी अपेक्षासे भी (परमाणुओंमें ) "पूरण-गलन" घटित होनेसे परमाणु निश्चयसे "पुद्गल" हैं। स्कन्ध तो अनेकपुद्गलमय एकपर्यायपनेके कारण पुद्गलोंसे अनन्य होनेसे व्यवहारसे "पुद्गल" हैं; तथा ( वे ) बादरत्व और सूक्ष्मत्वरूप परिणामोंके भेदों द्वारा छह प्रकारोंको प्राप्त करके तीन लोकरूप होकर रहे हैं । वे छह प्रकारके स्कन्ध इस प्रकार हैं:-(१) वादरवादर; (२) बादर; ( ३ ) वादरसूक्ष्म; (४) सूक्ष्मवादर; (५) सूक्ष्म; (६ ) सूक्ष्मसूक्ष्म । वहाँ, (१) काष्ठपाषाणादिक (स्कन्ध ) जो कि छेदन होने पर स्वयं नहीं जुड़ सकते वे ( घन पदार्थ ) "वादरबादर" हैं; (२) दूध, घी, तेल, जल, रस आदि ( स्कन्ध ) जो कि छेदन होने पर स्वयं जुड़ जाते हैं वे (प्रवाही पदार्थ ) "बादर" हैं; (३) छाया, धूप, अंधकार, चांदनी आदि ( स्कन्ध ) जो कि स्थूल ज्ञात होने पर भी जिनका छेदन, भेदन अथवा ( हस्तादि द्वारा ) ग्रहण नहीं किया जा सकता वे "वादरसूक्ष्म” हैं; (४) स्पर्श-रस-गंध-शब्द जो कि सूक्ष्म होने पर भी स्थूल ज्ञात होते हैं (अर्थात् चक्षुको छोड़कर चार इद्रियोंके विषयभूत स्कन्ध जो कि आँखसे दिखाई न देने पर भी जिन्हें स्पर्शनेन्द्रिय द्वारा स्पर्श किया जा सकता है, जीभ द्वारा जिनका १. जिसमें ( स्पर्श-रस-गंध-वर्णकी अपेक्षासे तथा स्कन्धपर्यायकी अपेक्षासे ) पूरण और गलन हो वह पुद्गल है । पूरण-पुरना; भरना; पूर्ति; पुष्टि; वृद्धि । गलन-गलना; क्षीण होना कृशता; हानि, न्यूनता। [(१) परमाणुओंके विशेष गुण जो स्पर्श-रस-गंध-वर्ण हैं उनमें होने वालो षट्स्यानपतित वृद्धि वह पूरण है और षट्स्थानपतित हानि वह गलन है; इसलिये इसप्रकार परमाणु पूरण-गलन-धर्मवाले हैं। (२) परमाणुओंमें स्कन्धरूप पर्यायका.आविर्भाव होना सो पूरण है और तिरोभाव होना सो गलन है। इस प्रकार भी परमाणुओंमें पूरण-गलन घटित होता है। स्कन्व अनेकपरमाणुमय एकपर्याय है, इसलिये वह परमाणुओंसे अनन्य है; और परमाणु तो पुद्गल हैं। इसलिये स्कन्ध भी व्यवहारसे "पुद्गल" है। २.

१२३ षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन कर्मवर्गणादयः सूक्ष्माः । अत्यंतसूक्ष्माः कर्मवर्गणाभ्योऽधो द्वयणुकस्कन्धपर्यन्ताः सूक्ष्मसूक्ष्मा इति ॥ ७६ ॥ ससि खंधारणं जो अंतो तं वियाण परमाणू । सो सस्सदो असद्दो एक्को अविभागी मुत्तिभवो ॥७॥ सर्वेषां स्कन्धानां योऽन्त्यस्तं विजानीहि परमाणुम् । स शाश्वतोऽशब्दः एकोऽविभागी मूर्तिभवः ॥ ७७ ।। परमाणुव्याख्येयम् । उक्तानां स्कन्धरूपपर्यायाणां योऽन्त्यो भेदः स परमाणुः । स तु पुनर्विभागाभावादविभागी, निर्विभागैकप्रदेशत्वादेका, मूर्तद्रव्यत्वेन सदाप्यविनश्वरत्वानित्या, अनादिनिधनरूपादिपरिणामोत्पन्नत्वान्मूर्तिभवः, रूपादिपरिणामोत्पन्नत्वेऽपि शब्दस्य परमाणु- - स्वाद लिया जा सकता है, नाकसे सूघा जा सकता है और कानसे सुना जा सकता है) वे "सूक्ष्मबादर" हैं; (५) कर्मवर्गणादि (स्कन्ध) कि जिन्हें सूक्ष्मपना है तथा जो इन्द्रियोंसे ज्ञात न हों ऐसे हैं वे सूक्ष्म हैं; (६) कर्मवर्गणासे नीचेके ( कर्मवर्गणातीत ) द्विअणुक-स्कन्ध तकके ( स्कन्ध ) जो कि अत्यन्त सूक्ष्म हैं वे "सूक्ष्मसूक्ष्म" हैं । ७६ । गाथा ७७ अन्वयार्थ:- [ सर्वेषां स्कन्धानां ] सर्व स्कन्धोंका [ या अन्त्यः] जो अंतिम भाग [ तं ] उसे [ परमाणुम् विजानीहि ] परमाणु जानो। [सः] वह [ अविभागी ] अविभागी, [ एकः ] एक, [ शाश्वतः ] शाश्वत, [ मृर्तिभवः ] मूर्तिप्रभव ( मूर्तरूपसे उत्पन्न होनेवाला ) और [ अशब्दः ] अशब्द है । टीका:-यह, परमाणुकी व्याख्या है । पूर्वोक्त स्कंधरूप पर्यायोंका जो अन्तिम भेद (छोटे-से छोटा अंश ) वह पर- माणु है । और वह तो, विभागके अभावके कारण अविभागी है; निविभाग-एकप्रदेशी होनेसे एक है; मूर्तद्रव्यरूपसे सदैव अविनाशी होनेसे नित्य है; अनादि-अनंत रूपादिके . जेअंश अंतिम स्कंधनो, परमाणु जाणो तेहने । ते अक ने अविभाग, शाश्वत, मूर्तिप्रभव, अशब्द छे॥७७॥ -

१२४
पंचास्तिकायसंग्रह
दु
गुणत्वाभावात्पुद्गलस्कन्धपर्यायत्वेन वक्ष्यमाणत्वाचाशब्दो निश्चीयत इति ॥ ७ ॥
आदेसमेत्तमुत्तो धादुचदुक्कस्स कारणं जो
सो णेनो परमाणू परिणामगुणो सयमसहो ॥७॥
आदेशमात्रमूर्तः धातुचतुष्कस्य कारणं यस्तु ।
स या परमाणुः परिणामगुणः स्वयमशब्दः ।। ७८ ॥
परमाणुना जात्यंतरत्वनिरासोऽयम् । परमाणोहि मूर्तत्वनिबंधनभूताः स्पर्शरसगंध-
वर्णा मादेशमात्रेणैव भियन्ते; वस्तुतस्तु यथा तस्य स एव प्रदेश आदिः, स एव मध्यं,
परिणामसे उत्पन्न होनेके कारण मूर्तिप्रभव है; और रूपादिके परिणामसे उत्पन्न
होने पर भी अशब्द है ऐसा निश्चित है, क्योंकि शब्द परमाणुका गुण नहीं है तथा
उसका ( शब्दका) अब ( ७६ वी गाथा में ) पुद्गलस्कन्धपर्यायरूपसे कथन
है । ७७ ।
स
.
गाथा ७८
अन्वयार्थ:-[ यः तु ] जो [ आदेशमात्रमूर्तः ] आदेशमात्रसे मूर्त है (अर्थात
मात्र भेदविवक्षासे मूर्तत्ववाला कहलाता है) और [ धातुचतुष्कस्य कारणं ] जो (पृथ्वी
आदि) चार धातुओंका कारण है [ सः] वह [ परमाणुः ज्ञेया ] परमाणु जानना-
[परिणामगुणः ] जो कि परिणामगुणवाला है और [ स्वयम् अशब्दः ] स्वयं
अशब्द है।
टीका:-परमाणु भिन्न-भिन्न जातिके होनेका यह खंडन है ।
मूर्तत्वके कारणभूत स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णका, परमाणुसे 'आदेशमात्र द्वारा
ही भेद किया जाता है; वस्तुतः तो जिसप्रकार परमाणुका वही प्रदेश आदि है,
* मूर्तिप्रभव मूर्तपनेरूपसे उत्पन्न होनेवाला अर्थात् रूप-गन्ध-रस-स्पर्शके परिणामरूपसे जिसका
उत्पाद होता है ऐसा । ( मूर्ति मूर्तपना)
१. आदेश-कथन । [ मात्र भेरकथन द्वारा ही परमाणुसे स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णका भेद किया जाता
है; परमार्थतः तो परमाणुसे स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णका अभेद है। ]
आदेशमात्रथी मूर्त, धातुचतुष्कनो छ हेतु जो,
ते जाणवो परमाणु-जे परिणामी, आप अशब्द छ ॥७८॥

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १२५ स . . - एवातः इति, एवं द्रव्यगुणयोरविभक्तप्रदेशत्वात् य एव परमाणोः प्रदेशः, स एव स्पर्शस्य, एव रसस्य, स एव गंधस्य, स एव रूपस्येति । ततः क्वचित्परमाणौ गंधगुणे, क्वचित गंधरस- गुणयो', क्वचित गंधरसरूपगुणेषु अपकृष्यमाणेषु तदविभक्तप्रदेशः परमाणुरेव विनश्यतीति । न तदपकों युक्तः । ततः पृथिव्यप्तेजोवायुरूपस्य धातुचतुष्कस्यैक एव परमाणुः कारणं परिणामवशात् । विचित्रो हि परमाणोः परिणामगुणः क्वचित्कस्यचिद्गुणस्य व्यक्ताव्यक्तत्वेन विचित्रां परिणतिमादधाति । यथा च तस्य परिणामवशादव्यक्तो गन्धादिगुणोऽस्तीति प्रतिज्ञायते, न तथा शब्दोऽप्यव्यक्तोऽस्तीति ज्ञातुं शक्यते तस्यैकप्रदेशस्यानेकप्रदेशात्मकेन - वही मध्य है और वही अन्त है; उसीप्रकार द्रव्य और गुणके अभिन्न प्रदेश होनेसे, जो परमाणुका प्रदेश है, वही स्पर्शका है, वही रसका है, वही गन्धका है, वही रूपका है। इसलिये किसी परमाणुमें गन्धगुण कम हो, किसी परमाणुमें गन्धगुण और रसगुण कम हो, किसी परमाणुमें गन्धगुण, रसगुण और रूपगुण कम हो, तो उस गुणसे अभिन्न प्रदेशी परमाणु ही विनष्ट हो जायेगा । इसलिये उस गुणकी न्यूनता युक्त ( उचित ) नहीं है । [ किसी भी परमाणुमें एक भी गुण कम हो तो उस गुणके साथ अभिन्न प्रदेशी परमाणु ही नष्ट हो जायेगा; इसलिये समस्त परमाणु समान गुणवाले ही हैं, अर्थात् वे भिन्न भिन्न जातिके नहीं हैं। ] इसलिये पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुरूप चार धातुओंका, परिणामके कारण, एक ही परमाणु कारण है (अर्थात् परमाणु एक ही जातिके होने पर भी वे परिणामके कारण चार धातुओंके कारण बनते हैं); क्योंकि विचित्र ऐसा परमाणुका परिणामगुण कहीं किसी गुणकी 'व्यक्ताव्यक्तता द्वारा विचित्र परिणतिको धारण करता है । और जिसप्रकार परमाणुको परिणामके कारण अव्यक्त गंधादिगुण हैं ऐसा १. व्यक्ताव्यक्तता व्यक्तता अथवा अव्यक्तता; प्रगटता अथवा अप्रगटता। [पृथ्वीमें स्पर्श, रस- गन्ध और वर्ण यह चारों गुण व्यक्त (अर्थात् व्यक्तरूपसे परिणत ) होते हैं। पानीमें स्पर्श, रस और वर्ण व्यक्त होते हैं तथा गन्ध अव्यक्त होता है; अग्निमें स्पर्श और वर्ण व्यक्त होते हैं और शेष दो अव्यक्त होते हैं। वायुमें स्पर्श व्यक्त होता है और शेष तीन अव्यक्त होते हैं। ) २. जिसप्रकार परमाणुमें गंधादिगुरण भले ही अव्यक्तरूपसे भी होते तो अवश्य हैं; उसीप्रकार परमाणुमें शब्द भी अव्यक्तरूपसे रहता होगा ऐसा नहीं है, शब्द तो परमाणुमें व्यक्तरूपसे या अव्यक्तरूपसे बिलकुल होता ही नहीं है।

१२६ पंचास्तिकायसंग्रह शब्दन सहकत्वविरोधादिति ।। ७८ ॥ सद्दो खंधप्पभवो खंधो परमाणुसंगसंघादो। पुढेसु तेसु जायदि सद्दो उप्पादिगो णियदो ।। ७६ ॥ शब्दः स्कन्धप्रभवः स्कन्धः परमाणुसङ्गसङ्घातः । स्पृष्टेषु तेषु जायते शब्द उत्पादिको नियतः ।। ७९ ।। शब्दस्य पुद्गलस्कन्धपर्यायत्वख्यापनमेतत् । इह हि बाह्यश्रवणेन्द्रियावलम्बितो भावेन्द्रियपरिच्छेद्यो ध्वनिः शब्दः । स खलु स्वरूपेणानंतपरमाणूनामेकस्कन्धो नाम पर्यायः । बहिरङ्गसाधनीभूतमहास्कन्धेभ्यः तथायिधपरिणामेन समुत्पद्यमानत्वात् स्कन्धप्रभवः, यतो हि परस्परामिहतेषु महास्कंधेषु शब्दः समुपजायते । किं च स्वभावनिर्वृत्ताभिरेवानंतपरमाणुमयीभिः ज्ञात होता है उसीप्रकार शब्द भी अव्यक्त है ऐसा नहीं जाना जा सकता, क्योंकि एकप्रदेशी परमाणुको अनेकप्रदेशात्मक शब्दके साथ एकत्व होनेमें विरोध है । ७८ । गाथा ७९ अन्वयार्थः-[शब्दः स्कन्धप्रभवः ] शब्द स्कन्धजन्य है। [स्कन्धः परमाणु- सङ्गसङ्घातः ] स्कन्ध परमाणुदलका संघात है, [ तेषु स्पृष्टेषु ] और वे स्कन्ध स्पर्शित होने-टकरानेसे [शब्दः जायते ] शब्द उत्पन्न होता है; [नियतः उत्पादिका ] इसप्रकार वह ( शब्द ) नियतरूपसे उत्पाद्य है। टीका:-शब्द पुद्गलस्कन्धपर्याय है ऐसा यहाँ दर्शाया है। इस लोकमें, बाह्य 'श्रवणेन्द्रिय द्वारा अवलम्बित, भावेन्द्रिय द्वारा जानने- योग्य ऐसी जो ध्वनि वह शब्द है । वह ( शब्द ) वास्तविक स्वरूपसे अनन्त परमाणुओंके एक स्कन्धरूप पर्याय है । बहिरंग साधनभूत (-बाह्य-कारणभूत ) महास्कन्धों द्वारा तथाविध परिणामरूप ( शब्दपरिणामरूप ) उत्पन्न होनेसे वह १. शब्द श्रवणेन्द्रियका विषय है इसलिये वह मूर्त है । कुछ लोग मानते हैं तदनुसार शब्द आकाशका गुण नहीं है, क्योंकि अमूर्त आकाशका अमूर्त गुण इन्द्रियका विषय नहीं हो सकता। छे शब्द स्कंधोत्पन्न; स्कंधो अणुसमूहसंघात छ । स्कंधाभिघाते शब्द उपजे, नियमथी उत्पाथ छे ।। ७९ ।।

षद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १२७ शब्दयोग्यवर्गणाभिरन्योन्यमनुप्रविश्य समंततोऽभिव्याप्य पूरितेऽपि सकले लोके यत्र यत्र वहिरङ्गकारणसामग्री समुदेति तत्र तत्र ताः शब्दत्वेन स्वयं व्यपरिणमंत इति शब्दस्य नियतमुत्पाद्यत्वात् स्कन्धप्रभवत्वमिति ॥ ७९ ।। स्कन्धजन्य है, क्योंकि महास्कन्ध परस्पर टकरानेसे शब्द उत्पन्न होता है । पुनश्च यह वात विशेष समझाई जाती है:-एकदूसरेमें प्रविष्ट होकर सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित ऐसी जो स्वभावनिष्पन्न ही (-अपने स्वभावसे ही निर्मित ), अनन्तपरमाणुमयी शब्दयोग्य-वर्गणाओंसे समस्त लोक भरपूर होने पर भी जहाँ-जहाँ बहिरंगकारण- सामग्री उदित होती है वहाँ-वहाँ वे वर्गणाएँ 'शब्दरूपसे स्वयं परिणमित होती हैं; इसप्रकार शब्द नियतरूपसे ( अवश्य ). उत्पाद्य है; इसलिये वह स्कंधजन्य है ।७६। १. शब्दके दो प्रकार हैं-(१) प्रायोगिक और (२) वैश्रसिक । पुरुषादिके प्रयोगसे उत्पन्न होनेवाला शब्द वह प्रायोगिक है और मेघादिसे उत्पन्न होनेवाला शब्द वैश्रसिक है। अथवा निम्नोक्तानुसार भी शब्दके दो प्रकार हैं :-(१) भाषात्मक और (२) अभाषात्मक । उनमें भाषात्मक शब्द द्विविध है-अक्षरात्मक और अनक्षरात्मक । संस्कृतप्राकृतादिभाषारूपसे वह अक्षरात्मक है और द्वीन्द्रियादिक जीवोंके शब्दरूपसे तथा ( केवलीभगवानकी ) दिव्य ध्वनि रूपसे वह अनवरात्मक है । प्रभाषात्मक शब्द भी द्विविध है-प्रायोगिक और वैश्रसिक । वीणा, ढोल, झांझ, वंसरी आदिसे उत्पन्न होता हुआ वह प्रायोगिक है और मेघादिसे उत्पन्न होता हुआ वह वैश्रसिक है। किसी भी प्रकारका शब्द हो किन्तु सर्न शब्दोंका उपादान कारण लोक में सर्वत्र व्याप्त शब्द- योग्य वर्गणाएं ही हैं। वे वर्गणाएं ही स्वयमेव शब्दरूपसे परिणमित होती हैं। जीभ-ढोल-मेघ आदि मात्र निमित्तभूत हैं। २. उत्पाद्य उत्पन्न कराने योग्य; जिसकी उत्पत्तिमें अन्य कोई निमित्त होता है ऐसा । ३. स्कन्धजन्य स्कन्धों द्वारा उत्पन्न हो ऐसा; जिसकी उत्पत्तिमें स्कन्ध निमित्त होते हैं ऐसा। (समस्त लोकमें सर्वत्र व्याप्त अनन्तपरमाणुमयी शब्दयोग्य वर्गणाएँ स्वयमेव शब्दरूप परिणमित होने पर भी वायु-गला-तालु-जिह्वा-ओष्ठ, घंटा-मोगरी आदि महा- स्कन्वोका टकराना वह बहिरंगकारणसामग्री है अर्थात् शब्दरूप परिणमनमें वे महास्कंध निमित्तभूत हैं इसलिये उस अपेक्षासे (निमित्त-अपेक्षासे ) शब्दको व्यवहारसे स्कन्धजन्य कहा जाता है।

१२८ पंचास्तिकायसंग्रह णिच्चो णाणवगासो ण सावगासो पदेसदो भेदा। खंधारणं पिय कत्ता पविहत्ता कालसंखाणं ॥२०॥ नित्यो नानवकाशो न सावकाशः प्रदेशतो भेचा । स्कंधानामपि च कर्ता प्रविभक्ता कालसंख्याया: ।। ८० ॥ परमाणोरेकप्रदेशत्वख्यापनमेतत् । परमाणः स खल्वेकेन प्रदेशेन रूपादिगुणसामान्य- भाजा सर्वदेवाविनश्वरत्वान्नित्यः, एकेन प्रदेशेन तदविभक्तवृत्तीनां स्पर्शादिगुणानामवकाशदाना- न्नानवकाशः; एकेन प्रदेशेन द्वयादिप्रदेशाभावादात्मादिनात्ममध्येनात्मांतेन न सावकाशः; एकेन प्रदेशेन स्कन्धानां भेदनिमित्त्वात् स्कन्धानां भेचा; एकेन प्रदेशेन स्कंधसंघातनिमित्चत्वात्स्कंधानां गाथा ८० अन्वयार्थः-[प्रदेशतः ] प्रदेश द्वारा [ नित्यः ] परमाणु नित्य है, [न अनव- काशः ] अनवकाश नहीं है, [ न सावकाशः ] सावकाश नहीं है, [स्कन्धानाम् भेचा ] स्कन्धोंका भेदन करनेवाला [ अपि च कर्ता] तथा करनेवाला है और [ कालसंख्यायाः प्रविभक्ता ] काल तथा संख्याको विभाजित करनेवाला है (अर्थात् कालका विभाजन करता है और संख्यांका माप करता है) । टीका:-यह, परमाणुके एकप्रदेशीपनेका कथन है। जो परमाणु है, वह वास्तवमें एक प्रदेश द्वारा-जो कि रूपादिगुणसामान्य- वाला है उसके द्वारा-सदैव अविनाशी होनेसे नित्य है; वह वास्तवमें एक प्रदेश द्वारा उससे (-प्रदेशसे) अभिन्न अस्तित्ववाले स्पर्शादिगुणोंको अवकाश देता है इसलिये अन- वकाश नहीं है; वह वास्तवमें एक प्रदेश द्वारा ( उसमें ) द्वि-आदि प्रदेशोंका प्रभाव होनेसे, स्वयं ही आदि, स्वयं ही मध्य और स्वयं ही अंत होने के कारण (अर्थात् निरंश होनेके कारण), सावकाश नहीं है; वह वास्तवमें एक प्रदेश द्वारा स्कन्धोंके भेदका निमित्त होनेसे (अर्थात् स्कंधके बिखरने-टूटनेका निमित्त होनेसे) स्कन्धोंका भेदन करने वाला है; वह वास्तवमें एक प्रदेश द्वारा स्कन्धके संघातका निमित्त होनेसे ( अर्थात् स्कन्धके मिलनेका-रचनाका निमित्त होनेसे ) स्कन्धोंका क़र्ता है;.. वह वास्तवमें नहि अनवकाश, न सावकाश प्रदेशथी, अंणु शाश्वतो । भेचा रचयिता स्कंधनो, प्रविभागी संख्या-कालनो ।। ८० ।।

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १२६ . कर्ता; एकेन प्रदेशेनैकाकाशप्रदेशातिवर्तितद्गतिपरिणामापन्नेन समयलक्षणकालविभागकरणात् कालस्य प्रविभक्ता; एकेन प्रदेशेन तत्सूत्रितद्वयादिभेदपूर्विकायाः स्कंधेषु द्रव्यसंख्यायाः, एकेन प्रदेशेन तदवच्छिन्नैकाकाशप्रदेशपूर्विकायाः क्षेत्रसंख्यायाः, एकेन प्रदेशेनैकाकाशप्रदेशा- तिवर्तितद्गतिपरिणामावच्छिन्नसमयपूर्विकायाः कालसंख्यायाः, एकेन प्रदेशेन तद्विवर्तिजघन्य- एक प्रदेश द्वारा जो कि एक आकाशप्रदेशका अतिक्रमण करनेवाले (-लांघनेवाले ) अपने गतिपरिणामको प्राप्त होता है उसके द्वारा-'समय' नामक कालका विभाग करता है इसलिये कालका विभाजक है; वह वास्तवमें एक प्रदेश द्वारा संख्याका भी 'विभाजक है, क्योंकि (१) वह एक प्रदेश द्वारा उसके रचे जानेवाले दो आदि भेदोंसे लेकर ( तीन अणु, चार अणु, असंख्य अणु इत्यादि ) द्रव्यसंख्याके विभाग स्कन्धोंमें करता है, ( २ ) वह एक प्रदेश द्वारा उसके जितनो मर्यादावाले एक "आकाशप्रदेशसे' लेकर ( दो आकाशप्रदेश, तीन आकाशप्रदेश, असंख्य आकाशप्रदेश इत्यादि ) क्षेत्रसंख्याके विभाग करता है, (३) वह एक प्रदेश द्वारा, एक आकाश- प्रदेशका अतिक्रम करनेवाले उसके गतिपरिणाम जितनी मर्यादावाले समयसे लेकर ( दो समय, तीन समय, असंख्य समय इत्यादि ) कालसंख्याक विभाग करता है, और ( ४ ) वह एक प्रदेश द्वारा उसमें विवर्तन पानेवाले (-परिवर्तित, परिण- १. विभाजक= विभाग करनेवाला, मापनेवाला। [स्कन्धोंमें द्रव्यसंख्याका माप ( अर्थात् वे कितने अणुओं परमाणुओंसे बने हैं ऐसा माप ) करनेमें अणुओंकी-परमाणुओंकी अपेक्षा आती है, अर्थात् वैसा माप परमाणु द्वारा होता है। क्षेत्रके मापका एकक ( एकम् ) 'आकाशप्रदेश' है और प्राकाशप्रदेशकी व्याख्यामें परमाणुकी अपेक्षा आती है। इसलिये क्षेत्रका माप भी परमाणु द्वारा होता है । कालके मापका एकक 'समय' है और समयकी व्याख्यामें परमाणुकी अपेक्षा प्रती है; इसलिये कालका माप भी परमाणु द्वारा होता है । ज्ञानभावके (-ज्ञानपर्यायके) मापका एकक "परमाणुमें परिणमित जघन्य वर्णादिभावको जाने उतना ज्ञान" है और उसमें परमाणु की अपेक्षा पाती है। इसलिए भावका ( -ज्ञानभावका) माप भी परमाणु द्वारा होता है। इसप्रकार परमाणु द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावका माप करनेके लिये गज समान है। एक परमाणुप्रदेश जितने आकाशके भागको ( -क्षेत्रको ) 'आकाशप्रदेश' कहा जाता है। वह 'आकाशप्रदेश क्षेत्रका 'एकक' है। [ गिनती के लिये, किसी वस्तुके जितने परिमाणको 'एक- माप' माना जाये, उतने परिमाणको उस वस्तुका 'एकक' कहा जाता है। ] ३. परमाणुको एक आकाशप्रदेशसे दूसरे अनन्तर आकाशप्रदेशमें ( मंदगतिसे) जाते हुए जो समय लगता है उसे 'समय' कहा जाता है। १७ १३० . पंचास्तिकायसंग्रह वर्णादिभावाववोधपूर्विकाया भावसंख्यायाः प्रविभागकरणात् प्रविभक्का संख्याया अपीति ।। ८० ॥ एयरसवण्णगंधं दोफासं सद्दकारणमसदं । खधंतरिदं दव्वं परमाणु तं वियाणाहि ।। ८१॥ एकरसवर्णगंधं द्विस्पर्श शब्दकारणमशब्दम् । स्कंधांतरितं द्रव्यं परमाणु तं विजानीहि ।। ८१ ॥ परमाणुद्रव्ये गुणपर्यायवृत्तिप्ररूपणमेतत् । सर्वत्रापि परमाणौ रसवर्णगंधस्पर्शाः सहभुवो गुणाः। ते च क्रमप्रवृत्तैस्तत्र स्वपर्यायैवर्तन्ते । तथा हि-पञ्चानां रसपर्याया- णामन्यतमेनकैनैकदा रसो वर्तते । पञ्चानां वर्णपर्यायाणामन्यतमेनकैनैकदा वर्णों वर्तते । उभयोग- धपर्याययोरन्यतरेणकेनैकदा गंधो वर्तते । चतुर्णां शीतस्निग्धशीतलतोष्णस्निग्धोष्णरूलरूपाणां मित ) जघन्य वर्णादिकभावको जाननेवाले ज्ञानसे लेकर भावसंख्याक विभाग करता है । ८० । गाथा ८१ अन्धयार्थः-[तं परमाणु ] वह परमाणु [ एकरसवर्णगंधं ] एक रसवाला, एक वर्णवाला, एक गंधवाला तथा [ द्विस्पर्श ] दो स्पर्शवाला है; [शब्दकारणम् ] शब्दका कारण है, [ अशब्दम् ] अशब्द है और [ स्कंधांतरितं ] स्कन्धके भीतर हो तथापि [ द्रव्यं ] ( परिपूर्ण स्वतन्त्र ) द्रव्य है ऐसा [ विजानीहि ] जानो। टीका:- यह, परमाणुद्रव्यमें गुण-पर्याय वर्तनेका ( गुण और पर्याय होनेका कथन है। सर्वत्र परमाणुमें रस-वर्ण-गंध स्पर्श सहभावी गुण होते हैं; और वे गुण उसमें क्रमवर्ती निज पर्यायों सहित वर्तते हैं। वह इसप्रकार:-पांच रसपर्यायोंमेंसे एक समय कोई एक (रसपर्याय) सहित रस वर्तता है; पाँच वर्णपर्यायोंमेंसे एक समय किसी एक वर्णपर्याय सहित वर्ण वर्तता है; दो गंधपर्यायोंमेंसे एक समय किसी एक (गंधपर्याय) सहित गंध वर्तता है; शीतस्निग्ध, शीत-रूक्ष, उष्ण-स्निग्ध और उष्ण-रूक्ष अक ज वरण-रस-गंध ने वे स्पर्शयुत परमाणु छ । ते शब्दहेतु, अशब्द छ, ने स्कंधमां पण द्रव्य छे ।।८१॥ - पद्रव्य-पंचास्विकायवर्णन १३१ स्पर्शपर्यायद्वन्द्वानामन्यतमेनकनेकदा स्पर्शी वर्तते । एवमयमुक्तगुणवृत्तिः परमाणुः शब्दरकंध- परिणतिशक्तिस्वमावान् शब्दकारणम् । एकप्रदेशत्वेन शब्दपर्यायपरिणतिवृत्त्यभावादशब्दः । स्निग्धरूक्षत्वप्रत्ययवंधवसादनेकपरमाण्वेकत्वपरिणतिरूपस्कन्धांतरितोऽपि स्वभावमपरित्यजन्नु- पाचसंख्यत्वादेक एव द्रव्यमिति ।। ८१ ॥ उवभोमिदिएहि य इंदियकाया मणो य कम्माणि । जं हवदि मुत्तमण्णं तं सव्वं पोग्गलं जाणे ॥ २ ॥ उपमोग्नमिन्द्रियश्चेन्द्रियकाया मनश्च कर्माणि । यद्भवति मूर्तमन्यत् तत्सर्वं पुद्गलं जानीयात् ।। ८२ ।। इन चार स्पर्शपर्यायोंके युगलमेंसे एक समय किसी एक युगल सहित स्पर्श वर्तता है। इसप्रकार जिसमें गुणोंका वर्तन (-अस्तित्व) कहा गया है ऐसा यह परमाणु शब्द- स्कन्वरूपसे परिणमित होनेकी शक्तिरूप स्वभाववाला होनेसे शब्दका कारण है; एक- प्रदेशी होनेके कारण शब्दपर्यायल्प परिणति न वर्तती होनेसे अशब्द है; और 'स्निग्ध- रुक्षत्वके कारण बंध होनेसे अनेक परमाणुअोंकी एकत्वपरिणतिरूप स्कन्धके भीतर रहा हो तथापि स्वभावको न छोड़ता हुआ, संख्याको प्राप्त होनेसे (अर्थात् परिपूर्ण एककी भांति पृथक् गिनतीमें आनेसे ) 'अकेला ही द्रव्य है । ८१ । गाथा ८२ अन्वयार्थ:-[इन्द्रियः उपभोग्यम् च] इन्द्रियों द्वारा उपभोग्य विषय, [इन्द्रि- यकायाः ] इन्द्रियाँ, शरीर, [मनः ] मन, [ कर्माणि ] कर्म [च ] और [ भन्यत् यत् ] अन्य जो कुछ [ मृत मवति ] मूर्त हो [ तद् सब ] वह सब [ पुद्गलं जानीयात् ] पुद्गल जानो। १ स्निग्व-हनत्व =चिकनाई और स्क्षता। २ यहां ऐसा बतलाया है कि स्कन्वमें भी प्रत्येक परमाणु स्वयं परिपूर्ण है, स्वतंत्र है, परकी सहायता से रहित और अपनेसे ही अपने गुणपर्यायमें स्थित है। इंद्रिय बडे उपमोग्य, इन्द्रिय, काय, मन ने कर्म जे । वणी मन्य जे कई मूत ते सघणु य पुद्गल जाणजे ।।८२॥ - १३२ - . पंचास्तिकायसंग्रह सकलपुद्गलविकल्पोपसंहारोऽयम् । इन्द्रियविषयाः स्पर्शरसगंधवर्णशब्दाश्च, द्रव्ये- न्द्रियाणि स्पर्शनरसनघाणचक्षुःश्रोत्राणि, कायाः औदारिकवैक्रियकाहारकतैजसकार्मणानि- शरीराणि, द्रव्यमनः, द्रव्यकर्माणि, नोकर्माणि, विचित्रपर्यायोत्पचिहेतवोऽनंता अनन्ताणुवर्गणाः, अनन्ता असंख्येयाणुवर्गणाः, अनन्ताः संख्येयाणुवर्गणाः द्वयष्णुकस्कंधपर्यंता, परमाण्वश्च, यदन्यदपि मूर्त तत्सर्वं पुद्गलविकल्पत्वेनोपसंहर्तव्यमिति ||८२।। -इति पुद्गलद्रव्यास्तिकायव्याख्यानं समाप्तम् । अथ धर्माधर्मद्रव्यास्तिकायव्याख्यानम् । टीका:-यह, सर्व पुद्गलभेदोंका उपसंहार है । स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्दरूप ( पाँच ) इन्द्रियविषय, स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और श्रोत्ररूप ( पांच ) द्रव्येन्द्रियाँ, औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तेजस और कार्मणरूप ( पाँच ) शरीर, द्रव्यमन, द्रव्यकर्म, नोकर्म, विचित्र पर्यायोंकी उत्पत्तिके हेतुभूत ( अर्थात् अनेक प्रकारकी पर्यायें, उत्पन्न होनेके कारणभूत ) 'अनंत अनंतागुक वर्गणाएँ, अनंत असंख्याताणुक वर्गणाएँ और द्वि-अणुक स्कन्ध तककी अनंत संख्याताणुक वर्गणाएं तथा परमाणु तथा अन्य जो कुछ मूर्त हो वह सव पुद्गलके भेद- रूपसे समेटना। भावार्थ:-वीतराग अतीन्द्रिय सुखके स्वादसे रहित जीवोंको उपभोग्य पंचे- न्द्रियविषय, अतीन्द्रिय आत्मस्वरूपसे विपरीत पाँच इन्द्रियाँ, अशरीर आत्मपदार्थसे प्रतिपक्षभूत पाँच शरीर, मनोगत-विकल्पजालरहित शुद्धजीवास्तिकायसे विपरीत मन, कर्मरहित आत्मद्रव्यसे प्रतिकूल आठ कर्म और अमूर्त आत्मस्वभावसे प्रतिपक्षभूत अन्य भी जो कुछ मूर्त हो वह सब पुद्गल जानो ।२। इसप्रकार पुद्गलद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान समाप्त हुआ। अब धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकायका व्याख्यान है। १. लोकमें अनन्त परमाणुओंकी बनी हुई वगणाएँ अनन्त हैं, असंख्यात परमाणुओंकी बनी हुई वर्गणाएँ भी अनन्त हैं और ( द्वि-अणुक स्कन्ध, त्रि-अणुक स्कन्ध इत्यादि ) संख्यात परमाणुओं- की बनी हुई वर्गणाएँ भी अनन्त हैं । ( अविभागी परमाणु भी अनंत हैं।)

पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन धम्मत्थिकायमरसं अवण्णगंधं असद्दमप्फासं । लोगागाढं पुटुं पिहुलमसखादियपदेसं ॥ २३ ॥ धर्मास्तिकायोऽरसोऽवर्णगंधोऽशब्दोऽस्पर्शः । लोकावगाढः स्पृष्टः पृथुलोऽसंख्यातप्रदेशः ।। ८३ ।। धर्मस्वरूपाख्यानमेतत् । धर्मो हि स्पर्शरसगन्धवर्णानामत्यंताभावादमूर्तस्वभावः । तत एव चागन्दः । सकललोकाकाशामिव्याप्यावस्थितत्वाल्लोकावगाढा, अमृतसिद्धप्रदेशत्वात् स्पृष्टः, स्वभावादेव सर्वतो विस्तृतत्वात्पृथुलः, निश्चयनयेनैकप्रदेशोऽपि व्यवहारनयेनासंख्यात- प्रदेश इति ।। ८३ ॥ : गाथा ८३ अन्वयार्थ:--[धर्मास्तिकायः ] धर्मास्तिकाय [ अस्पर्शः ] अस्पर्श, [ अरसः ] अरस, [ अवर्णगंधः ] अगंध, अवर्ण और [ अशब्दः ] अशब्द है; [लोकावगाढः] लोकव्यापक है; [स्पृष्टः ] अखण्ड [ पृथुलः ] विशाल और [ असंख्यातप्रदेशः ] असंख्यातप्रदेशी है। टीका:-यह, धर्मके (धर्मास्तिकायके ) स्वरूपका कथन है । स्पर्श, रस, गंध और वर्णका अत्यन्त प्रभाव होनेसे धर्म ( धर्मास्तिकाय ) स्तव में अमूर्तस्वभाववाला है। और इसीलिए अशब्द है; समस्त लोकाकाशमें व्याप्त होकर रहनेसे लोकव्यापक हैं; 'अयुतसिद्ध प्रदेशवाला होनेसे अखण्ड है; स्वभावसे ही सर्वतः विस्तृत होनेसे विशाल है; निश्चयनयसे एकप्रदेशी होने पर भी व्यवहार- नयसे असंख्यातप्रदेशी है 1८३। १. युतसिद्ध - जुड़े हुए; संयोगसिद्ध । [धर्मास्तिकायमें भिन्न-भिन्न प्रदेशोंका संयोग हुआ है ऐसा नहीं है, इसलिए उसमें वीचमें व्यवधान-अंतर-अवकाश नहीं है। इसलिए धर्मास्तिकाय अखंण्ड है ।] २. एकप्रदेशी = अविभाज्य-एकक्षेत्रवाला। (निश्चयनयसे धर्मास्तिकाय अविभाज्य-एक-पदार्थ होनेसे अविभाज्य-ए कक्षेत्रवाला है।) धर्मास्तिकाय अवर्णगंध, अशब्दरस, अस्पश छ । लोकावगाही, अखंड छ, विस्तृत, असंख्यप्रदेश छे ।।८३।। - १३४ पंचास्तिकायसंग्रह अगुरुगलघुगेहि सया तेहि अणंतेहिं परिणदं णिच्चं । गदिकिरियाजुत्ताणं कारणभूदं सयमकज्जं ॥८४ ॥ अगुरुकलघुकैः सदा तैः अनंतैः परिणतः नित्यः । गतिक्रियायुक्तानां कारणभूतः स्वयमकार्य: ॥८४॥ धर्मस्यैवावशिष्टस्वरूपाख्यानमेतत् । अपि च धर्मः अगुरुलघुभिर्गुणैरगुरुलघुत्वामि- धानस्य स्वरूपप्रतिष्ठन्वनिबंधनस्य स्वभावस्याविभागपरिच्छेदः प्रतिसमयसंभवत्पस्थानपतित- वृद्धिहानिमिरनंतः सदा परिणतत्वादुत्पादव्ययवत्वेऽपि स्वरूपादप्रच्यवनान्नित्यः, गतिक्रिया- . गाथा ८४ अन्वयार्थः-[ अनंते तैः अगुरुकलघुकैः ] वह ( धर्मास्तिकाय ) अनंत ऐसे जो अगुरुलघु ( गुण, अंश ) उन-रूप [ सदा परिणतः ] सदैव परिणमित होता है, [नित्यः ] नित्य है, [गतिक्रियायुक्तानां ] गतिक्रियायुक्त और [ कारणभूतः ] कारणभूत ( निमित्तरूप ) है और [ स्वयम् अकार्यः ] स्वयं अकार्य है। टीका:-यह, धर्मके ही शेष स्वरूपका कथन है । पुनश्च, धर्म (धर्मास्तिकाय ) अगुरुलघु 'गुणोंरूपसे अर्थात् अगुरुलघुत्व नामका जो स्वरूपप्रतिष्ठत्वके कारणभूत स्वभाव उसके अविभाग प्रतिच्छेदोंरूपसे-जो कि प्रतिसमय होनेवाली षट्स्थानपतित वृद्धिहानिवाले अनन्त हैं उनके रूपसे-सदैव परिणमित होनेसे उत्पादव्ययवाला है, तथापि स्वरूपसे च्युत नहीं होता इसलिए नित्य १. गुण-अंश; अविभाग परिच्छेद । [ सर्व द्रव्योंकी भांति धर्मास्तिकायमें अगुरुलघुत्व नामका स्वभाव है। वह स्वभाव धर्मास्तिकायको स्वरूपप्रतिष्ठत्वके (अर्थात् स्वरूपमें रहनेके ) कारणभूत है । उसके अविभाग प्रतिच्छेदोंको यहाँ अगुरुलघु गुण (-अंश ) कहे हैं । ] २. षट्स्थानपतित वृद्धिहानि छह स्थानमें समावेश पानेवाली वृद्धिहानि, षट्गुण वृद्धिहानि । [अगुरुलघुत्वस्वभावके अनंत अंशोंमें स्वभावसे ही प्रतिसमय षट्गुण वृद्धिहानि होती रहती है।] जे अगुरुलघुक अनंत ते-रूप सर्वदा मे परिणमे । छे नित्य, आप अकार्य छ, गतिपरिणमितने हेतु छे ।।८४॥ . -

पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
-
परिणतानामुदासीनाविनाभूतसहायमानत्वात्कारणभूतः, स्वास्तित्वमात्रनिवृत्त्वात् स्वयमकार्य
इति ॥ ८४ ॥
उदयं जह मच्छाणं गमणाणुग्गहकरं हवदि लोए।
तह जीवपोग्गलाणं धम्मं दव्वं वियाणाहि ॥ २५॥
उदकं यथा मत्स्यानां गमनानुग्रहकरं भवति लोके ।
तथा जीवपुद्गलानां धर्मद्रव्यं विजानीहि ॥ ८५ ।।
है; गतिक्रियापरिणतको (गतिक्रियारूपसे परिणमित होनेमें जीव-पुद्गलोंको) 'उदासीन
'अविनाभावी सहायमात्र होनेसे ( गतिक्रियापरिणतको ) कारणभूत है; अपने अस्ति-
त्वमानसे निष्पन्न होनेके कारण स्वयं अकार्य है (अर्थात् स्वयंसिद्ध होनेके कारण किसी
अन्यसे उत्पन्न नहीं हुआ है इसलिए किसी अन्य कारणके कार्यरूप नहीं
है। ८४ ।
गाथा ८५
अन्वयार्थः-[यथा] जिसप्रकार [लोके ] जगतमें [ उदकं ] पानी [मत्स्यानां ]
मछलियोंको [ गमनानुग्रहकरं भवति ] गमनमें अनुग्रह करता है, [तथा ] उसीप्रकार
[ धर्मद्रव्यं ] धर्मद्रव्य [ जीवपुद्गलानां ] जीव-पुद्गलोंको गमनमें अनुग्रह करता है
(-निमित्तभूत होता है ) ऐसा [विजानीहि ] जानो।
१. जिसप्रकार सिद्धभगवान, उदासीन होने पर भी, सिद्धगुणोंके अनुरागरूपसे परिणमित भव्य
जीवोंको सिद्धगतिके सहकारी कारणभूत हैं, उसीप्रकार धर्म भी, उदासीन होने पर भी अपने
अपने भावोंसे ही गतिरूप परिणमित जीवपुद्गलोंको गतिका सहकारी कारण है।
२ यदि कोई एक, किसी दूसरेके विना न हो, तो पहलेको दूसरेका अविनाभावी कहा जाता है।
यहां धर्मद्रव्यको "गतिक्रियापरिणतका अविनाभावी सहायमात्र" कहा है उसका यह अर्थ है कि-
गतिक्रियापरिणत जीव-पुद्गल न हों तो वहाँ धर्मद्रव्य उन्हें सहायमात्ररूप भी नहीं है। जीव-
पुद्गल स्वयं गतिक्रियारूपसे परिणमित होते हों तभी धर्मद्रव्य उन्हें उदासीन सहायमात्ररूप
(निमित्तमात्ररूप ) है, अन्यथा नहीं।
ज्यम जगतमांजण मीनने भनुग्रह करे के गमनमा ।
त्यम धर्म पण अनुग्रह करे जीव-पुद्गलोने गमनमा ॥८॥

१३६ पंचास्तिकायसंग्रह - धर्मस्य गतिहेतुत्वे दृष्टांतोऽयम् । यथोदकं स्वयमगच्छदगमयच्च स्वयमेव गच्छता मत्स्यानामुदासीनाविनाभृतसहायकारणमात्रत्वेन गमनमनुगृह्णाति, तथा धर्मोऽपि स्वयमगच्छन् अगमयंश्च स्वयमेव गच्छतां जीवपुद्गलानामुदासीनाविनाभूतसहायकारणमात्रत्वेन गमनमनुगृह्णाति इति ।। ८५ ॥ जह हवदि धम्मदव्वं तह तं जाणेह दवमधमक्खं । ठिदिकिरियाजुत्ताणं कारणभूदं तु पुढवीव ॥८६॥ यथा भवति धर्मद्रव्यं तथा तजानीहि द्रव्यमधर्माख्यम् । स्थितिक्रियायुक्तानां कारणभूतं तु पृथिवीव ॥ ८६ ।। टीका:-यह, धर्मके गतिहेतुत्वका दृष्टान्त है । जिसप्रकार पानी स्वयं गमन न करता हुआ और ( परको ) गमन न कराता हुआ, स्वयमेव गमन करती हुई मछलियोंको उदासीन अविनाभावी सहायरूप कारण- मात्ररूपसे गमनमें अनुग्रह करता है, उसीप्रकार धर्म ( धर्मास्तिकाय ) भी स्वयं गमन न करता हुआ और ( परको ) गमन न कराता हुआ, स्वयमेव गमन करते हुए जीव-पुद्गलोंको उदासीन अविनाभावी सहायरूप कारणमात्ररूपसे 'गमनमें अनुग्रह करता है । ८५। गाथा ८६ अन्वयार्थी-[ यथा ] जिसप्रकार [ धर्मद्रव्यं भवति ] धर्मद्रव्य है [ तथा ] उसीप्रकार [ अधर्माख्यम् द्रव्यम् ] अधर्म नामका द्रव्य भी [ जानीहि ] जानो; [वत् तु] परन्तु वह ( गतिक्रियायुक्तको कारणभूत होनेके बदले ) [स्थितिक्रियायुक्तानाम् ) स्थितिक्रियायुक्तको [ पृथिवी इव ] पृथ्वीकी भांति [ कारणभूतम् ] कारणभूत है (अर्थात् स्थितिक्रियापरिणत जीव-पुद्गलोंको निमित्तभूत है)। १. गमनमें अनुग्रह करना अर्थात् गमनमैं उदासीन अविनाभावी सहायरूप ( निमित्तरूप ) कारणमात्र होना। त्यम धर्मनामक द्रव्य तेम अधर्मनामक द्रव्य छ। पण द्रव्य मा छे पृथ्वी माफक हेतु थितिपरिणमितने ।।८।।

पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन - अधर्मस्वरूपाख्यानमेतत् । यथा धर्मः प्रज्ञापितस्तथाऽधर्मोऽपि प्रज्ञापनीयः । अयं तु विशेषः । स गतिक्रियायुक्तानामुदकवत्कारणभूतः, एपः पुनः स्थितिक्रियायुक्तानां पृथिवी- वत्कारणभृतः । यथा पथियी स्वयं पूर्वमेव तिष्ठंती परमस्थापयंती च स्वयमेव तिष्ठतामश्वादीना- मुदासीनाविनाभृतसहायकारणमात्रत्वेन स्थितिमनुगृह्णाति, तथाऽधर्मोऽपि स्वयं पूर्वमेव तिष्ठन् परमस्थापयंश्च स्वयमेव तिष्ठतां जीवपुद्गलानामुदासीनाविनाभूतसहायकारणमात्रत्वेन स्थिति- मनुगृहातीति ।। ८६ ॥ जादो प्रलोगलोगो जेसि सब्भावदो य गमणठिदी। दो वि य मया विभत्ता अविभत्ता लोयमेत्ता य॥७॥ जातमलोकलोकं ययोः सद्भावतश्च गमनस्थिती। द्वावपि च मती विभक्तावविभक्तौ लोकमात्रौ च ।।८७|| टीका:-यह, अधर्मके स्वरूपका कथन है । जिसप्रकार धर्मका प्रज्ञापन किया गया, उसीप्रकार अधर्मका भी प्रज्ञापन करने योग्य है । परन्तु यह ( निम्नोक्तानुसार ) अन्तर है : वह (-धर्मास्तिकाय ) गति- क्रियायुक्तको पानीको भांति कारणभूत है और यह ( -अधर्मास्तिकाय ) स्थितिक्रिया- युक्तको पृथ्वीकी भांति कारणभूत है । जिसप्रकार पृथ्वी स्वयं पहलेसे ही स्थितिरूप (-स्थिर ) वर्तती हुई तथा परको स्थिति (-स्थिरता ) न कराती हुई, स्वयमेव स्थितिरूपसे परिणमित अश्वादिकको उदासीन अविनाभावी सहायरूप कारणमात्रकी भाँति स्थितिमें अनुग्रह करती है, उसीप्रकार अधर्म (अधर्मास्तिकाय ) भी स्वयं पहलेसे ही स्थितिरूपसे वर्तता हुआ और परको स्थिति न कराता हुआ, स्वयमेव स्थिति- रूप परिणमित होते हुए जीव-पुद्गलोंको उदासीन अविनाभावी सहायरूप कारणमात्र- की भाँति स्थितिमें अनुग्रह करता है ।८६। गाथा ८७ अन्वयार्थः-[गमनस्थिती ] ( जीव-पुद्गलकी) गति-स्थिति [च ] तथा [ अलोकलोकं ] अलोक और लोकका विभाग, [ ययोः सद्भावतः ] उन दो द्रव्योंके धर्माधरम होवाथी लोक-अलोक'ने स्थितिगति बने । ते उमय भिन्न-भिन्न छ ने सकललोकप्रमाण छे ।।८।। १८ पंचास्तिकायसंग्रह धर्माधर्मसद्भावे हेतूपन्यासोऽयम् । धर्माधमौं विद्येते, लोकालोकविभागान्यथानुपपः । जीवादिसर्वपदार्थानामेकत्र वृत्तिरूपो लोकः । शुद्धकाकाशवृचिरूपोऽलोकः । तत्र जीवपुद्गलौ स्व- रसत एव गतितत्पूर्वस्थितिपरिणामापन्नी । तयोर्यदि गतिपरिणाम तत्पूर्वस्थितिपरिणामं वा स्वयमनुभवतोबहिरङ्गहेतू धर्माधौं न भवेताम्, तदा तयोनिरर्गलगतिस्थितिपरिणामत्वाद- लोकेऽपि वृत्तिः केन वार्येत । ततो न लोकालोकविभागः सिध्येत । धर्माधर्मयोस्तु जीवपुद्गल- योगतितत्पूर्वस्थित्योबहिरङ्गहेतुत्वेन सद्भावेऽभ्युपगम्यमाने लोकालोकविभागो जायत इति । किञ्च धर्माधौं द्वावपि परस्परं पृथग्भूतास्तित्वनिर्धचत्वाद्विभक्तौ । एकक्षेत्रावगाढत्वाद- सभावसे [ जातम् ] होता है । [च ] और [द्वौ अपि ] वे दोनों [विभक्तौ ] विभक्त, [अविभक्तौ ] अविभक्त [ च ] और [ लोकमात्रौ ] लोकप्रमाण [ मतौ] कहे गए हैं । टीका:-यह, धर्म और अधर्मके सदुभावकी सिद्धिके लिए हेतु दर्शाया गया है। धर्म और अधर्म विद्यमान हैं, क्योंकि लोक और अलोकका विभाग अन्यथा नहीं बन सकता। जीवादि सर्व पदार्थों के एकत्र-अस्तित्वरूप लोक है; शुद्ध एक आकाशके अस्तित्वरूप अलोक है । वहां, जीव और पुद्गल स्वरससे ही (स्वभावसे ही) गतिपरिणामको तथा गतिपूर्वक स्थितिपरिणामको प्राप्त होते हैं। यदि गतिपरिणाम अथवा गतिपूर्वक स्थितिपरिणामका स्वयं अनुभव करनेवाले जीव- पुद्गलको बहिरंगहेतु धर्म और अधर्म न हों, तो जीव-पुद्गलके 'निरर्गल गतिपरिणाम और स्थितिपरिणाम होनेसे अलोकमें भी उनका ( जीव-पुद्गलका ) होना किससे निवारा जा सकता है ? ( किसीसे नहीं निवारा जा सकता । ) इसलिए लोक और अलोकका विभाग सिद्ध नहीं होता। किन्तु यदि जीव-पुद्गलकी गतिके और गतिपूर्वक स्थितिके बहिरंग हेतुओंके रूपमें धर्म और अधर्मका सदुभाव स्वीकार किया जाए तो लोक और अलोकका विभाग ( सिद्ध ) होता है । ( इसलिए धर्म और अधर्म विद्य- मान हैं । ) और ( उनके सम्बन्धमें विशेष विवरण यह है कि ), धर्म और अधर्म दोनों परस्पर पृथग्भूत अस्तित्वसे निष्पन्न होनेसे विभक्त (भिन्न ) हैं; एकक्षेत्रावगाही होनेसे अविभक्त (अभिन्न ) हैं; समस्त लोकमें प्रवर्तमान जीव-पुद्गलोंको गति- उन १. निरर्गल-निरंकुश; अमर्यादित ।

पदव्य-पंचास्तिकायवर्णन १३६ विभक्तौ । निष्क्रियत्वेन सकललोकवर्तिनोर्जीवपुद्गलयोर्गतिस्थित्युपग्रहकरणाल्लोक मात्रा- विति ॥८७॥ ण य गच्छदि धम्मत्थी गमणं ण करेदि अण्णदवियस्स । हवदि गदिस्स य पसरो जीवाणं पोग्मलाणं च ॥ ८ ॥ न च गच्छति धर्मास्तिको गमनं न करोत्यन्यद्रव्यस्य । भवति गतेः सः प्रसरो जीवानां पुद्गलानां च ॥ ८८ ॥ धर्माधर्मयोर्गतिस्थितिहेतुत्वेऽप्यत्यंतौदासीन्याख्यापनमेतत् । यथा हि गतिपरिणतः प्रभजनो वैजयंतीनां गतिपरिणामस्य हेतुकर्ताऽवलोक्यते, न तथा धर्मः । स खलु निष्क्रियत्वात् न कदाचिदपि गतिपरिणाममेवापद्यते । कुतोऽस्य सहकारित्वेन परेषां गतिपरिणामस्य हेतुक- त्वम् । किंतु सलिलमिव मत्स्यानां जीवपुद्गलानामाश्रयकारणमात्रत्वेनोदासीन एवासौ गतेः स्थितिमें निष्क्रियरूपसे अनुग्रह करते हैं इसलिए ( -निमित्तरूप होते हैं इसलिये ) लोकप्रमाण हैं ।८७ गाथा ८८ अन्वयार्थः-[ धर्मास्तिकः ] धर्मास्तिकाय [ न गच्छति ] गमन नहीं करता [च ] और [ अन्यद्रव्यस्य ] अन्य द्रव्यको [ गमनं न करोति ] गमन नहीं कराता; [ सः ] वह, [ जीवानां पुद्गलानां च ] जीवों तथा पुद्गलोंको (गतिपरिणाममें आश्रय- मात्ररूप होनेसे ) [ गतेः प्रसरः] गतिका उदासीन प्रसारक ( अर्थात् गतिप्रसारमें उदासीन निमित्तभूत ) [ भवति ] है । टीका:-धर्म और अधर्म गति और स्थितिके हेतु होने पर भी वे अत्यन्त उदासीन हैं ऐसा यहाँ कथन है। जिसप्रकार गतिपरिणत पवन ध्वजाओंके गतिपरिणामका हेतुकर्ता दिखाई देता है; उसीप्रकार धर्म ( जीव-पुद्गलोंके गतिपरिणामका हेतुकर्ता ) नहीं है । वह ( धर्म ) वास्तवमें निष्क्रिय होनेसे कभी गतिपरिणामको ही प्राप्त नहीं होता; तो फिर धर्मास्ति गमन करे नहीं, न करावतो परद्रव्यने । जीव-पुद्गलोना गतिप्रसार तणो उदासीन हेतु छे ।।८८|| १४० पंचास्तिकायसंग्रह प्रसरो भवति । अपि च यथा गतिपूर्वस्थितिपरिणतस्तुरंगोऽश्ववारस्य स्थितिपरिणामस्य हेतुकर्ताऽवलोक्यते, न तथाऽधर्मः । स खलु निष्क्रियत्वात् न कदाचिदपि गतिपूर्वस्थितिपरि- उसे ( परके ) 'सहकारीकी भाँति परके गतिपरिणामका हेतुकर्तृत्व कहाँसे होगा ? (-नहीं हो सकता। ) किन्तु जिस प्रकार पानी मछलियोंको (गतिपरिणाममें ) मात्र आश्रयरूप कारणकी भाँति गतिका उदासीन ही प्रसारक है, उसीप्रकार धर्म जीव- पुद्गलोंको ( गतिपरिणाममें ) मात्र प्राश्रयरूप कारणकी भाँति गतिका उदासीन ही प्रसारक ( अर्थात् गतिप्रसारका उदासीन ही निमित्त ) है। और (अधर्मास्तिकायके सम्बन्धमें भी ऐसा है कि )-जिसप्रकार गति- पूर्वकस्थितिपरिणत अश्व सवारके ( गतिपूर्वक ) स्थितिपरिणामका हेतुकर्ता दिखाई देता है, उसी प्रकार अधर्म ( जीव-पुद्गलोंके गतिपूर्वक स्थितिपरिणामका हेतुकर्ता ) नहीं है । वह ( अधर्म ) वास्तवमें निष्क्रिय होनेसे कभी गतिपूर्वक स्थितिपरिणामको ही प्राप्त नहीं होता; तो फिर उसे ( परके ) 'सहस्थायीकी भाँति परके गतिपूर्वक स्थितिपरिणामका हेतुकर्तृत्व कहाँसे होगा ? ( नहीं हो सकता। ) किन्तु जिसप्रकार १. सहकारी साथमें कार्य करनेवाला अर्थात् साथमें गति करनेवाला। [ध्वजाके साथ पवन भी गति करता है इसलिए यहां पवनको ( ध्वजाके ) सहकारीकी भांति हेतुकर्ता कहा है। और जीव-पुद्गलोंके साथ धर्मास्तिकाय गमन न करके ( अर्थात् सहकारी न बनकर ), मात्र उन्हें ( गतिमें ) आश्रयरूप कारण बनता है इसलिए धर्मास्तिकायको उदासीन निमित्त कहा है । पवनको हेतुकर्ता कहा उसका यह अर्थ नहीं समझना कि पवन ध्वजाओंका गतिपरिणाम कराता होगा । उदासीन निमित्त हो या हेतुकर्ता हो-दोनों परमें अकिचित्कर हैं। उनमें मात्र उपरोक्ता- नुसार ही अन्तर है । अब अगली गाथाको टीकामें आचार्यदेव स्वयं ही कहेंगे कि "वास्तवमें समस्त गतिस्थितिमान पदार्थ अपने परिणामोंसे ही निश्चयसे गतिस्थिति करते हैं।" इसलिए ध्वजा, सवार इत्यादि सब, अपने परिणामोंसे ही गतिस्थिति करते हैं, उसमें धर्म तथा पवन, और अधर्म तथा अश्व अविशेषरूपसे अकिचित्कर हैं ऐसा निर्णय करना। ] २. सहस्थायी साथमें स्थिति (स्थिरता ) करनेवाले । [अश्व सवारके साथ स्थिति करता है, इसलिए यहाँ अश्वको सवारके सहस्थायी की भांति सवारके स्थितिपरिणामका हेतुकर्ता कहा है । अधर्मास्तिकाय तो गतिपूर्वक स्थितिको प्राप्त होनेवाले जीव-पुद्गलोंके साथ स्थिति नहीं करता, पहलेसे ही स्थित है। इस प्रकार वह सहस्थायी न होनेसे जीव-पुद्गलोंके गतिपूर्वक स्थिति- परिणामका हेतुकर्ता नहीं है। ] षद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १४१ .. णाममेवापद्यते । कुतोऽस्य सहस्थायित्वेन परेषां गतिपूर्वस्थितिपरिणामस्य हेतुकर्तृत्वम् । किन्तु पृथिवीवचुरंगस्य जीवपुद्गलानामाश्रयकारणमात्रत्वेनोदासीन एवासौ गतिपूर्वस्थितैः प्रसरो भवतीति ।। ८८॥ विज्जदि जेसि गमणं ठाण पुण तेसिमेव संभवदि । ते सगपरिणामेहिं दु गमणं ठाणं च कुव्वंति ॥८६॥ विद्यते येषां गमनं स्थानं पुनस्तेषामेव संभवति । ते स्वकपरिणामस्तु गमनं स्थानं च कुर्वन्ति ॥८९|| धर्माधर्मयोरौदासीन्ये हेतूपन्यासोऽयम् । धर्मः किल न जीवपुद्गलानां कदाचिद्गति- हेतुत्वमभ्यस्यति, न कदाचिस्थितिहेतुत्वमधर्मः । ती हि परेषां गतिस्थित्योर्यदि मुख्यहेतू स्यातां तदा येषां गतिस्तेषां गतिरेव, न स्थितिः, येषां स्थितिस्तेषां स्थितिरेव, न गतिः । पृथ्वी अश्वको ( गतिपूर्वक स्थितिपरिणाममें ) मात्र आश्रयरूप कारणकी भाँति गति- पूर्वक स्थितिकी उदासीन ही प्रसारक है, उसीप्रकार अधर्म जीव-पुद्गलोंको ( गतिपूर्वक स्थितिपरिणाममें ) मात्र आश्रयरूप कारणकी भाँति गतिपूर्वक स्थितिका उदासीन ही प्रसारक (अर्थात् गतिपूर्वक-स्थितिप्रसारका उदासीन ही निमित्त ) है ।८८ गाथा ८९ मन्वयार्थ:-[ येषां गमनं विद्यते ] ( धर्म-अधर्म गति-स्थितिके मुख्य हेतु नहीं हैं, क्योंकि ) जिन्हें गति होती है [ पाम् एव पुनः स्थानं संभवति ] उन्हींको फिर स्थिति होती है ( और जिन्हें स्थिति होती है उन्हींको फिर गति होती है )। [ते तु] वे ( गतिस्थितिमान पदार्थ ) तो [स्वकपरिणामैः ] अपने परिणामोंसे [ गमनं स्थानं च ] गति और स्थिति [ कुर्वन्ति ] करते हैं । टीका:-यह, धर्म और अधर्मकी उदासीनताके सम्बन्धमें हेतु कहा गया है। वास्तवमें ( निश्चयसे ) धर्म जीव-पुद्गलोंको कभी गतिहेतु नहीं होता, अधर्म कभी स्थितिहेतु नहीं होता; क्योंकि वे परको गतिस्थितिके यदि मुख्य हेतु ( निश्चयहेतु ) हों, तो जिन्हें गति हो उन्हें गति ही रहना चाहिए, स्थिति नहीं होना रे! जेमने गति होय छे, तेको ज वणी स्थिर थाय छे । ते सर्व निज परिणामथी ज करे गतिस्थितिभावने ॥८९।।

१४२
पंचास्तिकायसंग्रह
तत एकेपामपि गतिस्थितिदर्शनादनुमीयते न तो तयोर्मुख्यहेतू । किंतु व्यवहारनयव्यवस्थापितो
उदासीनी । कथमेवं गतिस्थितिमतां पदार्थानां गतिस्थिती भवत इति चेत्, सर्वे हि गतिस्थिति-
मंतः पदार्थाः स्वपरिणामैरेव निश्चयेन गतिस्थिती कुर्वतीति ॥८९।।
-इति धर्माधर्मद्रव्यास्तिकायव्याख्यानं समाप्तम् ।
अथ आकाशद्रव्यास्तिकायव्याख्यानम् ।
सव्वेसिं जीवाणं सेसाणं तह य पोग्गलाणं च ।
जं देदि विवरमखिलं तं लोगे हवदि आगासं ॥६॥
सर्वेषां जीवानां शेपाणां तथैव पुद्गलानां च ।
यद्ददाति विवरमखिलं तल्लोके भवत्याकाशम् ।।९०॥
चाहिए; और जिन्हें स्थिति हो उन्हें स्थिति ही रहना चाहिए, गति नहीं होना चाहिए ।
किन्तु एकको ही (-उसी एक पदार्थको) गति और स्थिति देखने में आती है। इसलिए
अनुमान हो सकता है कि वे ( धर्म-अधर्म ) गति-स्थितिके मुख्य हेतु नहीं हैं, किन्तु
व्यवहारनयस्थापित ( व्यवहारनय द्वारा स्थापित-कथित ) उदासीन हेतु हैं ।
प्रश्न:-ऐसा हो तो गतिस्थितिमान पदार्थोंको गतिस्थिति किसप्रकार
होती है ?
उचर:-वास्तवमें समस्त गतिस्थितिमान पदार्थ अपने परिणामोंसे ही निश्चयसे
गतिस्थिति करते हैं । ८६
इसप्रकार धर्मद्रव्यास्तिकाय और अधर्मद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान समाप्त
हुआ ।
अव आकाशद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान है।
गाथा ९०
अन्वयार्थ:-[ लोके ] लोकमें [जीवानाम् ] जीवोंको [च ] और [ पुद्गला-
नाम् ] पुद्गलोंको [ तथा एव ] वैसे ही [ सर्वेपाम् शेषाणाम् ] शेष समस्त द्रव्योंको
-
जे लोकमां जीव-पुद्गलोने, शेष द्रव्य समस्तने ।
अवकाश दे छे पूर्ण, ते आकाशनामक द्रव्य छे ॥१०॥

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन
१४३
आकाशस्वरूपाख्यानमेतत् । षद्रव्यात्मके लोके सर्वेषां शेषद्रव्याणां यत्समस्ताव-
काशनिमिचं विशुद्धक्षेत्ररूपं तदाकाशमिति ॥९०॥
जीवा पोग्गलकाया धम्माधम्मा य लोगदो णण्णा ।
तत्तो अणण्णमण्णं प्रायासं अन्तवदिरित्तं ॥१॥
जीवाः पुद्गलकायाः धर्माधमौं च लोकतोऽनन्ये ।
ततोऽनन्यदन्यदाकाशमंतव्यतिरिक्तम् ॥९१ ।।
लोकादहिराकाशसूचनेयम् । जीवादीनि शेषद्रव्याण्यवधृतपरिमाणत्वाल्लोकादनन्या-
[ यद् ] जो [ अखिलं विवरं ) सम्पूर्ण अवकाश [ ददाति ] देता है, [तद् ] वह
[ आकाशम् भवति ] आकाश है।
टीका:-यह, आकाशके स्वरूपका कथन है ।
षद्रव्यात्मक लोकमें शेष 'सभी द्रव्योंको जो परिपूर्ण अवकाशका निमित्त
है, वह आकाश है जो कि ( आकाश ) विशुद्धक्षेत्ररूप है ।१०।
गाथा ९१
अन्वयार्थः-[जीवाः पुद्गलकायाः धर्माधमौं च ] जीव, पुद्गलकाय, धर्म,
अधर्म ( तथा काल) [लोकतः अनन्ये ] लोकसे अनन्य हैं; [ अंतव्यतिरिक्तम्
आकाशम् ] अन्त रहित ऐसा आकाश [ ततः ] उससे ( लोकसे ) [ अनन्यत् अन्यत् ]
अनन्य तथा अन्य है।
टीका:-यह, लोकके बाहर ( भी ) आकाश होनेकी सूचना है।
जीवादि शेष द्रव्य (-आकाशके अतिरिक्त द्रव्य ) मर्यादित परिमाणवाले
१. निश्चयनयसे नित्यनिरंजन-ज्ञानमय परमानन्द जिनका एक लक्षण है ऐसे अनन्तानंत जीव, उनसे
अनन्तगुने पुद्गल, असंख्य कालाणु और असंख्यप्रदेशी धर्म तथा अधर्म-यह सभी द्रव्य
विशिष्ट अवगाहगुण द्वारा लोकाकाशमें-यद्यपि वह लोकाकाश मात्र असंख्यप्रदेशी ही है
तयापि-अवकाश प्राप्त करते हैं।
जीव-पुद्गलादिक शेष द्रव्य अनन्य जाणो लोकथी ।
नभ अंतशून्य अनन्य तेम ज अन्य छे थे लोकथी ॥११॥

१४४
पंचास्तिकायसंग्रह
न्येव । आकाशं त्वनंतत्वाल्लोकादनन्यदन्यच्चेति ।।९।।
आगासं अवगासं गमणद्विदिकारणेहिं देदि जदि ।
उड्ढंगदिप्पधाणा सिद्धा चिट्ठन्ति किध तत्थ ॥३२॥
आकाशमवकाशं गमनस्थितिकारणाभ्यां ददाति यदि ।
ऊर्ध्वगतिप्रधानाः सिद्धाः तिष्ठन्ति कथं तत्र || ९२ ।।
आकाशस्यावकाशैकहेतोगतिस्थितिहेतुत्वशङ्कायां दोषोपन्यासोऽयम् । यदि खल्वा-
काशमवगाहिनामवगाहहेतुरिव गतिस्थितिमतां गतिस्थितिहेतुरपि स्यात्, तदा सर्वोत्कृष्ट-
होनेके कारण लोकसे 'अनन्य ही हैं; आकाश तो अनन्त होनेके कारण लोकसे अनन्य
तथा अन्य है ।
गाथा ९२
अन्वयार्थ:-[यदि आकाशम् ] यदि आकाश [गमनस्थितिकारणाभ्याम् ]
गति-स्थितिके कारण सहित [ अवकाशं ददाति ] अवकाश देता हो ( अर्थात् यदि
आकाश अवकाशहेतु भी हो और गति-स्थितिहेतु भी हो ) तो [ ऊर्ध्वंगतिप्रधानार
सिद्धाः ] ऊर्ध्वगतिप्रधान सिद्ध [ तत्र ] उसमें (आकाशमें) [ कथम् ] क्यों [ तिष्ठन्ति ]
स्थिर हों ? ( आगे गमन क्यों न करें ? )
टीका:-जो मात्र अवकाशका ही हेतु है ऐसा जो आकाश उसमें गतिस्थिति-
हेतुत्व (भी) होनेकी शंका की जाये तो दोष आता है उसका यह
कथन है।
१. यहाँ यद्यपि सामान्यरूपसे पदार्थों का लोकसे अनन्यपना कहा है तथापि निश्चयसे अमूर्वपना,
केवलज्ञानपना, सहजपरमानन्दपना, नित्यनिरंजनपना इत्यादि लक्षणों द्वारा जीवोंका इतर
द्रव्योंसे अन्यपना है और अपने-अपने लक्षणों द्वारा इतर द्रव्योंका जीवोंसे भिन्नपना है ऐसा
समझना।
अवकाशदायक माम गति-थितिहेतुता पण जो धरे।
तो ऊर्ध्वगतिपरधान सिद्धो केम तेमां स्थिति लहे ॥१२॥

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १४५ स्वाभाविकोर्ध्वगतिपरिणता भगवंतः सिद्धा बहिरङ्गांतरङ्गसाधनसामग्र्यो सत्यामपि कुतस्तत्राकाशे तिष्ठंतीति ॥ ९२॥ जम्हा उवरिट्ठाणं सिद्धाणं जिणवरेहि पण्णत्तं । तम्हा गमणट्ठाणं प्रायासे जाण णस्थि त्ति ॥ ६३ ॥ यस्मादुपरिस्थानं सिद्धानां जिनवरैः प्रज्ञप्तम् । तस्माद्मनस्थानमाकाशे जानीहि नास्तीति ॥९३|| स्थितिपक्षोपन्यासोऽयम् । यतो गत्वा भगवंता सिद्धाः लोकोपर्यवतिष्ठते, ततो गतिस्थितिहेतुत्वमाकाशे नास्तीति निश्चेतव्यम् । लोकालोकापच्छेदको धर्माधर्मावेव गतिस्थिति- हेतू मतव्याविति ।। ९३ ।। यदि आकाश, जिसप्रकार वह 'अवगाहवालोंको अवगाहहेतु है उसीप्रकार, गतिस्थितिवालोंको गति-स्थितिहेतु भी हो, तो सर्वोत्कृष्ट स्वाभाविक ऊर्ध्वगतिसे परिणत सिद्धभगवन्त, बहिरंग-अंतरंग साधनरूप सामग्री होने पर भी, क्यों ( -किस कारण ) उसमें-आकाशमें-स्थिर हों ? ।।२। गाथा ९३ अन्वयार्थः-[ यस्मात् ] जिससे [ जिनवरैः ] जिनवरोंने [ सिद्धानाम् ] सिद्धों- की [ उपरिस्थानं ] लोकके ऊपर स्थिति [प्रज्ञप्तम् ] कही है, [ तस्मात् ] इसलिए [ गमनस्थानम् आकाशे न अस्ति ] गति-स्थिति आकाशमें नहीं होती. ( अर्थात् गति- स्थितिहेतुत्व आकाशमें नहीं है ) [इति जानीहि ] ऐसा जानो। टीका:-( गतिपक्ष सम्बन्धी कथन करनेके पश्चात् ) यह, स्थितिपक्ष संबंधी कथन है। जिससे सिद्धभगवन्त गमन करके लोकके ऊपर स्थिर होते हैं ( अर्थात् लोकके ऊपर गतिपूर्वक स्थिति करते हैं ), उससे गतिस्थितिहेतुत्व आकाशमें नहीं है ऐसा निश्चय करना; लोक और अलोकका विभाग करनेवाले धर्म तथा अधर्मको ही गति तथा स्थितिके हेतु मानना । ६३ । १. अवगाह = लीन होना; मज्जित होना; अवकाश पाना । भाखी जिनो लोकना अग्रे स्थिति सिद्धो तणी। ते कारणे जाणो-गतिस्थिति माभमां होती नथी ।।१३।। १९ १४६ पंचास्तिकायसंग्रह जदि हवदि गमणहेदू आगासं ठाणकारणं तेसि । पसजदि अलोगहाणी लोगस्स य अन्तपरिवुड्ढी ॥६४॥ यदि भवति गमनहेतुराकाशं स्थानकारणं तेषाम् । प्रसजत्यलोकहानिर्लोकस्य चांतपरिवृद्धिः ॥ ९४ ।। आकाशस्य गतिस्थितिहेतुत्वाभावे हेतूपन्यासोऽयम् । नाकाशं गतिस्थितिहेतुः, लोकालोकसीमव्यवस्थायास्तथोपपत्तेः । यदि गतिस्थित्योराकाशमेव निमित्चमिष्येत्, तदा तस्य सर्वत्र सद्भावाज्जीवपुद्गलानां गतिस्थित्योनिःसीमत्वात्प्रतिक्षणमलोको हीयते, पूर्व पूर्व व्यवस्था- प्यमानश्चांतो लोकस्योचरोचरपरिवृद्धया विघटते । ततो न तत्र तद्धेतुरिति ।।९४।। गाथा ९४ अन्वयार्थः- [ यदि ] यदि [ आकाशं ] आकाश [ तेषाम् ] ‘जीवपुद्गलोंको [गमनहेतुः ] गतिहेतु और [ स्थानकारणं ] स्थितिहेतु [ भवति ] हो तो [ अलोकहानिः] अलोककी हानिका [ च] और [लोकस्य अंतपरिवृद्धि: लोकके अंतकी वृद्धिका [प्रसजति ] प्रसंग आए। टीका:-यहाँ, आकाशको गतिस्थितिहेतुत्वका अभाव होने सम्बन्धी हेतु उपस्थित किया गया है । आकाश गतिस्थितिका हेतु नहीं है, क्योंकि लोक और अलोककी सीमाकी व्यवस्था इसीप्रकार बन सकती है। यदि आकाशको ही गति-स्थितिका निमित्त माना जाए, तो आकाशका सभाव सर्वत्र होनेका कारण जीव-पुद्गलोंकी गतिस्थितिकी कोई सीमा न रहनेसे प्रतिक्षण अलोककी हानि होगी और पहले-पहले व्यवस्थापित हुआ लोकका अंत उत्तरोत्तर वृद्धि पानेसे लोकका अंत ही टूट जाएगा ( अर्थात् पहले-पहले निश्चित हुआ लोकका अंत फिर-फिर आगे बढ़ते जानेसे लोकका अन्त ही नहीं बन सकेगा ) । इसलिए आकाशमें गति-स्थितिका हेतु नहीं है ।१४। नभ होय जो गतिहेतु ने स्थितिहेतु पुद्गल-जीवने । तो हानि थाय अलोकनी, लोकान्त पामे वृद्धिने ||९४|| , पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १४७ : तम्हा धम्माधम्मा गमणट्ठिदिकारणाणि णागासं । इदि जिणवरेहि भणिदं लोगसहावं सुणंताणं ॥६॥ तस्माद्धौधौं गमनस्थितिकारणे नाकाशम् । इति जिनवरैः भणितं लोकस्वभावं शृण्वताम् ।।९।। आकाशस्य गतिस्थितिहेतुत्वनिरासव्याख्योपसंहारोऽयम् । धर्माधर्मावेव गतिस्थिति- कारणे नाकाशमिति ॥ ९५ ।। धम्माधम्मागासा अपुधबभूवा समाणपरिमाणा। पुधगुवलदिविसेसा करेंति एगत्तमण्णत्तं ॥६६॥ धर्माधर्माकाशान्यपृथग्भूतानि समानपरिमाणानि । पृथगुपलब्धिविशेषाणि कुर्वत्येकत्वमन्यत्वम् ।। ९६ ।। गाथा ९३ अन्वयार्थः-[तस्मात् ] इसलिए [ गमनस्थितिकारणे ] गति और स्थितिके कारण [धर्माधौं ] धर्म और अधर्म हैं, [ न आकाशम् ] आकाश नहीं है । [ इति ] ऐसा [ लोकस्वभावं शृण्वताम् ] लोकस्वभावके श्रोताओंसे [ जिनवरैः भणितम् ] जिनवरोंने कहा है। टीका:-यह, आकाशको गतिस्थितिहेतुत्व होनेके खंडन सम्बन्धी कथनका उपसंहार है। धर्म और अधर्म ही गति और स्थितिके कारण हैं, आकाश नहीं ।६५। गाथा ९६ अन्वयार्थः-[धर्माधर्माकाशानि ] धर्म, अधर्म और आकाश ( लोकाकाश ) [ समानपरिमाणानि ] समान परिमाणवाले [ अपृथग्भूतानि ] अपृथग्भूत होनेसे तथा तेथी गतिस्थितिहेतुओ धर्माधरम छ, नभ नहीं। भाख्यु जिनो आम लोकस्वभावना श्रोता प्रति ॥९॥ धर्माधरम-नभने समानप्रमाणयुत अपृथक्त्वथी। वणी भिन्न-भिन्न विशेषथी, एकत्व ने अन्यत्व छ ॥९६।। - १४८ पंचास्तिकायसंग्रह - धर्माधर्मलोकाकाशानामवगाहवशादेकत्वेऽपि वस्तुत्वेनान्यत्वमत्रोक्तम् । धर्माधर्म- लोकाकाशानि हि समानपरिमाणत्वात्सहावस्थानमात्रेणैवैकत्वभाजि । वस्तुतस्तु व्यवहारेण गतिस्थित्यवगाहहेतुत्वरूपेण, निश्चयेन विभक्तप्रदेशत्वरूपेण विशेषेण पृथगुपलभ्यमानेनान्यत्व- भाज्येव भवंतीति ।। ९६ ॥ इति आकाशद्रव्यास्तिकायव्याख्यानं समाप्तम् । अथ चूलिका । [पृथगुपलब्धिविशेषाणि ] पृथक्-उपलब्ध ( भिन्न-भिन्न ) विशेषवाले होनेसे [ एकत्वम् अन्यत्वम् ] एकत्व तथा अन्यत्वको [ कुर्वति ] करते हैं । टीका:-यहाँ धर्म, अधर्म और लोकाकाशका अवगाहकी अपेक्षासे एकत्व होने पर भी वस्तुरूपसे अन्यत्व कहा गया है । धर्म, अधर्म और लोकाकाश समान परिमाणवाले होनेके कारण साथ रहने- मात्रसे ही ( -मात्र एकक्षेत्रावगाहकी अपेक्षासे ही ) एकत्ववाले हैं; वस्तुतः तो, ( १ ) व्यवहारसे गतिहेतुत्व, स्थितिहेतुत्व और अवगाहनहेतुत्वरूप ( पृथक्- उपलब्ध विशेष द्वारा ) तथा (२) निश्चयसे 'विभक्तप्रदेशत्वरूप पृथक्-उपलब्ध विशेष द्वारा, वे अन्यत्ववाले ही हैं। भावार्थ:-धर्म, अधर्म और लोकाकाशका एकत्व तो मात्र एकक्षेत्रावगाहकी अपेक्षासे ही कहा जा सकता है; वस्तुरूपसे तो उन्हें अन्यत्व ही है, क्योंकि (१) उनके लक्षण गतिहेतुत्व, स्थितिहेतुत्व और अवगाहनहेतुत्वरूप भिन्न-भिन्न हैं तथा (२) उनके प्रदेश भी भिन्न-भिन्न हैं ।९६। इसप्रकार आकाशद्रव्यास्तिकायका व्याख्यान समाप्त हुआ। अब चूलिका है। , १. विभक्त= भिन्न । [ धर्म, अधर्म और आकाशको भिन्नप्रदेशपना है। ] २. विशेष= विशिष्टता; विशेषता; मुख्यता। [व्यवहारसे तथा निश्चयसे धर्म, अधर्म और आकाशके विशेष पृथक्-उपलब्ध हैं अर्थात् भिन्न-भिन्न दिखाई देते हैं।] ३. चूलिका शास्त्रमें जिसका कथन न हुआ हो उसका व्याख्यान करना अथवा जिसका कथन हो चुका हो उसका विशेष व्याख्यान करना अथवा दोनोंका यथायोग्य व्याख्यान करना।

१४६ . , . . - . . घद्रव्य-पंचास्तिकायवणंच आगासकालजीवा धम्माधम्मा य मुत्तिपरिहीणा। मुत्त पुग्गलदव्वं जीवो खलु चेदणो तेसु ॥६७॥ आकाशकालजीवा धर्माधमौं च मूर्तिपरिहीनाः । मूर्त पुद्गलद्रव्यं जीवः खलु चेतनस्तेषु ।। ९७ ।। अत्र द्रव्याणां मूर्तामृतत्वं चेतनावेतनत्वं चोक्तम् । स्पर्शरसगंधवर्णसद्भावस्वभावं मूत, स्पर्शरसगंधवर्णाभावम्बभावममूर्तम् । चैतन्यसद्भावस्वभावं चेतनं, चैतन्याभावस्वभावम- चेतनम् । तत्रामूर्तमाकाशं , अमूर्तः कालः, अमूर्तः स्वरूपेण जीवः पररूपावेशान्मूर्तोऽपि, अमूतों धर्मः, अमूर्तोऽधर्मः, मूर्तः पुद्गल एवैक इति । अचेतनमाकाशं, अचेतनः कालः, अचेतनो धर्मः, यचेतनोऽधर्मः, अचेतनः पुद्गलः, चेतनो जीव एवैक इति ।।९७।। गाथा ९७ अन्वयार्थः- [ आकाशकालजीवाः ] आकाश, काल, जीव, [धर्माधौं च ] धर्म और अधर्म [ मूर्तिपरिहीनाः ] अमूर्त हैं, [ पुद्गलद्रव्यं मूत ] पुद्गलद्रव्य मूर्त है। [ तेषु ] उनमें [ जीवः ] जीव [ खलु ] वास्तवमें [ चेतनः ] चेतन है। टीका:-यहाँ द्रव्योंका मूर्तामूर्तपना ( मूर्तपना अथवा अमूर्तपना ) और. चेतना-चेतनपना ( -चेतनपना अथवा अचेतनपना ) कहा गया है । स्पर्श-रस-गंध-वर्णका सद्भाव जिसका स्वभाव है वह मूर्त है; स्पर्श-रस-गन्ध- वर्णका अभाव जिसका स्वभाव है वह अमूर्त है । चैतन्यका सद्भाव जिसका स्वभाव है वह चेतन है; चैतन्यका अभाव जिसका स्वभाव है वह अचेतन है । वहाँ, आकाश अमूर्त है, काल अमूर्त है, जीव स्वरूपसे अमूर्त है, पररूपमें 'प्रवेश द्वारा (-मूर्त द्रव्यके संयोगकी अपेक्षासे ) मूर्त भी है, धर्म अमूर्त है, अधर्म अमूर्त है; पुद्गल ही एक मूर्त है। आकाश अचेतन है, काल अचेतन है, धर्म अचेतन है, अधर्म अचेतन है, पुद्गल अचेतन है; जीव ही एक चेतन है ।१७। १. जीव निश्चयसे अमूर्त-अखण्ड-एकप्रतिभासमय होनेसे अमूर्त है, रागादिरहित सहजानन्द जिसका एक स्वभाव है ऐसे आत्मतत्त्वकी भावनारहित जीव द्वारा उपार्जित जो मूर्त कर्म उसके संसर्ग द्वारा व्यवहारसे मूर्त भी है। आत्मा अने आकाश, धर्म, अधर्म, काल अमूर्त छ । के मूर्त पुद्गलद्रव्य; तेमां जीव के चेतन खरे ।। ९७ ॥ - - पंचास्तिकायसंग्रह १५० जीवा पोग्गलकाया सह सक्किरिया हवंति ण य सेसा । पोग्गलकरणा जीवा खंधा खल कालकरणा दु॥६॥ जीवाः पुगलकाया: सह सक्रिया भवन्ति न च शेषाः । पुद्गलकरणा जीवाः स्कन्धा खलु कालकरणास्तु ॥ ९८॥ अत्र सक्रियनिष्क्रियत्वमुक्तम् । प्रदेशांतरप्राप्तिहेतुः परिस्पंदनरूपपर्यायः क्रिया । तत्र सक्रिया बहिरङ्गसाधनेन सहभृताः जीवाः, सक्रिया बहिरङ्गसाधनेन सहभूताः पुद्गलाः । निष्क्रियमाकाशं, निष्क्रियो धर्मः, निष्क्रियोऽधर्मः, निष्क्रियः कालः | जीवानां सक्रियत्वस्य बहिरङ्गसाधनं कर्मनोकर्मोपचयरूपाः पुद्गला इति ते पुद्गलकरणाः। तदभावान्नि:- - गाथा ९८ अन्वयार्थ:-[सह जीवाः पुद्गलकायाः] बाह्य करण सहित स्थित जीव और पुद्गल [ सक्रियाः भवन्ति ] सक्रिय हैं, [ न च शेषाः] शेष द्रव्य सक्रिय नहीं हैं ( -निष्क्रिय हैं ); [ जीवाः ] जीव [ पुद्गलकरणाः ] पुद्गलकरणवाले (-जिन्हें सक्रियपनेमें पुद्गल बहिरंग साधन हो ऐसे ) हैं [ स्कन्धाः खलु कालकरणाः तु ] और स्कन्ध अर्थात् पुद्गल तो कालकरणवाले (-जिन्हें सक्रियपनेमें काल बहिरंग साधन हो ऐसे ) हैं। टीका:-यहाँ ( द्रव्योंका ) सक्रिय-निष्क्रियपना कहा गया है । प्रदेशान्तरप्राप्तिका हेतु ( -अन्य प्रदेशकी प्राप्तिका कारण ) ऐसी जो परिस्पन्दरूप पर्याय, वह क्रिया है। वहाँ, बहिरंग साधनके साथ रहनेवाले जीव सक्रिय हैं; बहिरंग साधनके साथ रहनेवाले पुद्गल सक्रिय हैं। आकाश निष्क्रिय है; धर्म निष्क्रिय है; अधर्म निष्क्रिय है; काल निष्क्रिय है। जीवोंको सक्रियपनेका बहिरङ्ग साधन कर्म-नोकर्मके संचयरूप पुद्गल हैं; इसलिए जीव पुद्गलकरणवाले हैं । उसके अभावके कारण (-पुदुगलकरणके अभावके कारण ) सिद्धोंको निष्क्रियपना है (अर्थात् सिद्धोंको कर्म-नोकर्मके संचयरूप पुद्गलोंका . जीव-पुद्गलो सहभूत के सक्रिय, निष्क्रिय शेष छ । छे काल पुद्गलने करण, पुद्गल करण के जीवने ।।९८|| -- षड्द्रल्य-पंचास्तिकायवर्णन १५१ क्रियत्वं सिद्धानाम् । पुद्गलानां सक्रियत्वस्य बहिरंगसाधनं परिणामनिवर्तकः काल इति ते कालकरणाः । न च कर्मादीनामिव कालस्याभावः । ततो न सिद्धानामिव निष्क्रियत्वं पुद्गला- नामिति ॥ ९८॥ जे खलु इंदियगेज्झा विसया जीवेहि होंति ते मुत्ता । सेसं हवदि अमुत्तचित्त उभयं समादियदि ॥६६॥ ये खलु इन्द्रियग्राह्या विषया जीवैभवन्ति ते मूर्ताः । शेपं भवत्यमूर्त चित्तमुभयं समाददाति ॥ ९९ ।। मूर्तामूर्तलक्षणाख्यानमेतत् । इह हि जीवैः स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुभिरिन्द्रियैस्तद्विषय- भूताः स्पर्शरसगंधवर्णस्वभावा अर्था गृह्यन्ते । श्रोत्रेन्द्रियेण तु त एव तद्विषयहेतुभूतशब्दाकार- अभाव होनेसे वे निष्क्रिय हैं। ) पुद्गलोंको सक्रियपनेका बहिरंग साधन 'परिणाम- निष्पादक काल है; इसलिए पुद्गल कालकरणवाले हैं। कर्मादिककी भांति ( अर्थात् जिसप्रकार कर्म-नोकर्मरूप पुद्गलोंका अभाव होता है.) कालका प्रभाव नहीं होता; इसलिए सिद्धोंकी भाँति ( अर्थात् जिस- प्रकार सिद्धोंको निष्क्रियपना होता है उसप्रकार ) पुद्गलोंको निष्क्रियपना नहीं होता । १८ । गाथा ९९ अन्वयार्थ:- [ये खलु ] जो पदार्थ [ जीवैः इन्द्रियग्राह्या विषयाः ] जीवोंके इन्द्रियग्राह्य विषय हैं [ ते मूर्ताः भवन्ति ] वे मूर्त हैं और [ शेपं ] शेष पदार्थसमूह [ अमूर्त भवति ] अमूर्त है । [ चिचम् ] चित्त [ उभयं ] उन दोनोंको [समाददाति] ग्रहण करता है ( -जानता है)। टीका:-यह, मूर्त और अमूर्तके लक्षणका कथन है । इस लोकमें जीवों द्वारा स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय और चक्षुरिन्द्रिय द्वारा उनके ( -उन इन्द्रियोंके ) विषयभूत, स्पर्श-रस-गंध-वर्णस्वभाववाले पदार्थ १. परिणामनिष्पादक=परिणामको उत्पन्न करनेवाला; परिणाम उत्पन्न होने में जो निमित्तभूत (बहिरंग साधनभूत ) है ऐसा । के जीवने जे विषय इंद्रियग्राह्य, ते सौ मूर्त छ । वाकी वधु'य अमूर्त छ; मन जाणतु ते उभय ने ॥९९।। . .

१५२ पंचास्तिकायसंग्रह परिणता गृह्यन्ते । ते कदाचित्स्थूलस्कन्धत्वमापन्नाः कदाचित्सूक्ष्मत्वमापन्नाः कदाचित्परमाणुत्व- मापन्नाः इन्द्रियग्रहणयोग्यतासद्भावाद् गृह्यमाणा अगृह्यमाणा वा मर्ता इत्युच्यते । शेपमितरत समस्तमप्यर्थजातं स्पर्शरसगंधवर्णाभावस्वभावमिन्द्रियग्रहणयोग्यताया अभावादमूर्तमित्युच्यते । चिचग्रहणयोग्यतासद्भावभाग्भवति तदुभयमपि; चिचं ह्यनियतविषयमप्राप्यकारि मतिश्रुतज्ञान- साधनीभूतं मूर्तममूतं च समाददातीति ॥९९।। -इति चूलिका समाप्ता । ( -स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण जिनका स्वभाव है ऐसे पदार्थ ) ग्रहण होते हैं (-ज्ञात होते हैं ); और श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा वही पदार्थ उसके (श्रोत्रेन्द्रियके ) 'विषयहेतुभूत शब्दाकार परिणमित हुए ग्रहण होते हैं । वे ( वे पदार्थ ), कदाचित् स्थूलस्कन्धपनेको प्राप्त होते हुए, कदाचित् सूक्ष्मत्वको ( सूक्ष्मस्कन्धपनेको) प्राप्त होते हुए और कदाचित् परमाणुपनेको प्राप्त होते हुए इन्द्रियों द्वारा ग्रहण होते हों या न होते हों, इन्द्रियों द्वारा ग्रहण होनेकी योग्यताका ( सदैव ) सद्भाव होनेसे 'मूर्त' कहलाते हैं । स्पर्श-रस-गन्ध-वर्णका अभाव जिसका स्वभाव है ऐसा शेष अन्य समस्त पदार्थसमूह इन्द्रियों द्वारा ग्रहण होनेकी योग्यताके अभावके कारण 'अमूर्त' कहलाता है । वे दोनों ( -पूर्वोक्त दोनों प्रकारके पदार्थ ) चित्त द्वारा ग्रहण होनेकी योग्यताके सद्भाववाले हैं; चित्त-जो कि अनियत विषयवाला, अप्राप्यकारी और मतिश्रुतज्ञानके साधनभूत ( -मतिज्ञान तथा श्रुतज्ञानमें निमित्तभूत ) है वह-मूर्त तथा अमूर्तको ग्रहण करता है ( -जानता है ) । ६६ । इसप्रकार चूलिका समाप्त हुई। १. उन स्पर्श-रस-गंध-वर्णस्वभाववाले पदार्थोंको ( अर्थात् पुद्गलोंको) श्रोत्रेन्द्रियके विषय होनेमें हेतुभूत शब्दाकारपरिणाम है, इसलिए वे पदार्थ ( पुद्गल ) शब्दाकार परिणमित होते हुए श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा ग्रहण होते हैं । २. अनियत-अनिश्चित ।[ जिसप्रकार पांच इन्द्रियों मेंसे प्रत्येक इन्द्रियका विषय नियत है उस- प्रकार मनका विषय नियत नहीं है, अनियत है।] ३. अप्राप्यकारी=ज्ञेय विषयोंका स्पर्श किए विना कार्य करनेवाला-जाननेवाला। [मन और चक्षु अप्राप्यकारी हैं। चक्षुके अतिरिक्त चार इन्द्रियां प्राप्यकारी हैं।

षद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १५३ अथ कालगन्यव्याख्यानम् । कालो परिणामभवो परिणामो दव्वकालसंभूदो। दोण्हं एस सहावो कालो खणभंगुरो णियदो ॥१०॥ कालः परिणामभवः परिणामो द्रव्यकालसंभूतः । द्वयोरेप स्वभावः कालः क्षणभङ्गुरो नियतः ।। १०. ।। व्यवहारकालस्य निश्चयकालस्य च स्वरूपाख्यानमेतत् । तत्र क्रमानुपाती समयाख्या पर्यायो व्यवहारकाला, तदाधारभूतं द्रव्यं निश्चयकालः । तत्र व्यवहारकालो निश्चयकाल- पर्यायरूपोऽपि जीवपुद्गलानां परिणामेनावच्छिद्यमानत्वाचत्परिणामभव इत्युपगीयते, जीवपुद्गलाना परिणामस्तु वहिरङ्गनिमिचभूतद्रव्यकालसद्भावे सति संभूतत्वाद् द्रव्यकालसंभूत इत्यभिधीयते । अव, कालद्रव्यका व्याख्यान है। गाथा १०० अन्वयार्थ:-[कालः परिणामभषः ] काल परिणामसे उत्पन्न होता है (अर्थात् व्यवहारकालका माप जीव-पुद्गलोंके परिणाम द्वारा होता है); [ परिणामः द्रव्य- कालसंभूतः ] परिणाम द्रव्यकालसे उत्पन्न होता है । -[ द्वयोः एषः स्वभावः ] यह, दोनोंका स्वभाव है । [ कालः क्षणभंगुर: नियतः ] काल क्षणभंगुर तथा नित्य है । टीका:-यह, व्यवहारकाल तथा निश्चयकालके स्वरूपका कथन है । वहाँ, 'समय' नामकी जो क्रमिक पर्याय सो व्यवहारकाल है; उसके आधार- भूत द्रव्य सो निश्चयकाल है । वहाँ, व्यवहारकाल निश्चयकालकी पर्यायरूप होने पर भी जीव-पुद्गलोंके परिणामसे नपता है-ज्ञात होता है इसलिये “जीव-पुद्गलोंके परिणामसे उत्पन्न होने- वाला" कहलाता है; और जीव-पुद्गलोंके परिणाम बहिरंग-निमित्तभूत द्रव्यकालके सदुभावमें उत्पन्न होनेके कारण "द्रव्यकालसे उत्पन्न होनेवाले" कहलाते हैं। वहाँ परिणामभव छ काल, कालपदार्थभव परिणाम है। -आ छे स्वभावो उभयना; क्षणभंगी ने ध्रुव काल छे ।।१००॥

पंचास्तिकायसंग्रह
तत्रेदं तात्पर्य-व्यवहारकालो जीवपुद्गलपरिणामेन निश्चीयते, निश्चयकालस्तु तत्परिणामान्य-
थानुपपत्त्येति । तत्र क्षणभङ्गी व्यवहारकालः सूक्ष्मपर्यायस्य तावन्मात्रत्वात् , नित्यो निश्चयकालः
स्वगुणपर्यायाधारद्रव्यत्त्वेन सर्वदेवाविनश्वरत्वादिति ।। १०० ॥
कालो त्ति य ववदेसो सम्भावपरूवगो हवदि णिच्चो ।
उप्पण्णप्पद्धसी अवरो दीहंतरवाई ॥१०१ ।।
काल इति च व्यपदेशः सद्भावप्ररूपको भवति नित्यः ।
उत्पन्नप्रध्वंस्यपरो दीर्घातरस्थायी ॥ १०१ ।।
नित्यक्षणिकत्वेन कालविभागख्यापनमेतत् । यो हि द्रव्यविशेषः 'अयं कालः, अयं
तात्पर्य यह है कि-व्यवहारकाल जीव-पुद्गलोंके परिणाम द्वारा निश्चित होता है;
और निश्चयकाल जीव-पुद्गलोंके परिणामकी अन्यथा अनुपपत्ति द्वारा ( अर्थात् जीव-
पुद्गलोंके परिणाम अन्य प्रकारसे नहीं बन सकते इसलिए ) निश्चित होता है ।
वहां, व्यवहारकाल 'क्षणभंगी है, क्योंकि वह मात्र सूक्ष्म पर्याय जितना ही
-क्षणमात्र जितना ही, समयमात्र जितना ही ) है; निश्चयकाल नित्य है, क्योंकि
वह अपने गुण-पर्यायोंके आधारभूत द्रव्यरूपसे सदैव अविनाशी है । १०० ।
गाथा १०१
अन्वयार्थः- [ काला इति च व्यपदेशः ] 'काल' ऐसा व्यपदेश [सद्भावप्ररूपका]
सद्भावका प्ररूपक है इसलिए [ नित्या भवति ] काल (निश्चयकाल ) नित्य. है ।
[ उत्पन्नध्वंसी अपरः] उत्पन्नध्वंसी ऐसा जो दूसरा काल ( अर्थात् उत्पन्न होते ही नष्ट
होनेवाला जो व्यवहारकाल ) वह [ दीर्घान्तरस्थायी ] ( क्षणिक होने पर भी प्रवाह-
अपेक्षासे ) दीर्घ स्थितिका भी ( कहा जाता ) है ।
टीका:-कालके 'नित्य' और 'क्षणिक' ऐसे दो विभागोंका यह कथन है ।
क्षणभंगीप्रतिक्षण नष्ट होनेवाला प्रतिसमय जिसका ध्वंस होता है ऐसा; क्षणभंगुर
क्षणिक ।
छ 'काल' संज्ञा सत्प्ररूपक तेथी काल सुनित्य छ ।
उत्पन्नध्वंसी अन्य जे ते दीर्घस्थायी पण ठरे ॥१०१॥

षड्द्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १५५ कालः' इति सदा व्यपदिश्यते स खलु स्वस्य सद्भावमावेदयन् भवति नित्यः । यस्तु पुन- रुत्पन्नमात्र एव प्रध्वस्यते स खलु तस्यैव द्रव्यविशेषस्य समयाख्या पर्याय इति । स तूत्संगित- क्षणभंगोऽप्युपदर्शितस्वसंतानो नयवलाद्दीर्घातरस्थाय्युपगीयमानो न दुष्यति; ततो न खल्वाव- लिकापल्योपमसागरोपमादिव्यवहारो विप्रतिषिध्यते । तदत्र निश्चयकालो नित्यः द्रव्यरूपत्वात्, व्यवहारकालः क्षणिकः पर्याय रूपत्वादिति ॥१०१।। एदे कालागासा धम्माधम्मा य पोग्गला जीवा। लब्भंति दव्वसण्णं कालस्स दु णत्थि कायत्तं ॥१०२॥ एते कालाकाशे धर्माधमौं च पुद्गला जीवाः । लभंते द्रव्यसंज्ञां कालस्य तु नास्ति कायत्वम् ॥१०२।। "यह काल है, यह काल है"-ऐसा करके जिस द्रव्यविशेषका सदैव व्यपदेश ( निर्देश, कथन ) किया जाता है, वह (द्रव्यविशेष अर्थात् निश्चयकालरूप मुख्य ( खास ) द्रव्य सचमुच अपने सद्भावको प्रगट करता हुआ नित्य है; और जो उत्पन्न होते ही नष्ट होता है, वह ( व्यवहारकाल ) सचमुच उसी द्रव्यविशेषकी 'समय' नामक पर्याय है । वह क्षणभंगुर होने पर भी अपनी संततिको ( प्रवाहको ) दर्शाता है इसलिए उसे नयके बलसे “दीर्घकाल तक स्थित रहनेवाला" कहने में दोष नहीं है; इसलिए आवलिका, पल्योपम, सागरोपम इत्यादि व्यवहारका निषेध नहीं किया जाता। इसप्रकार यहाँ ऐसा कहा है कि-निश्चयकाल द्रव्यरूप होनेसे नित्य है, व्यवहारकाल पर्यायरूप होनेसे क्षणिक है ।१०१॥ गाथा १०२ मन्वयार्थ:-[ एते ] यह [ कालाकाशे ] काल, आकाश, [ धर्माधौं ] धर्म, अधर्म, [ पुद्गला: ] पुद्गल [च ] और [ जीवा ] जीव ( सब ) [ द्रव्यसंज्ञा लभंते ] 'द्रव्य' संज्ञाको प्राप्त करते हैं; [ कालस्य तु ] परन्तु कालको [ कायत्वम् ] कायपना [न अस्ति ] नहीं है। मा जीव, पुद्गल, काल, धर्म, अधर्म तेम ज नम विषे । छ 'द्रव्य' संज्ञा सर्वने, कायत्व छ नहि कालने ॥ १०२ ।।

पंचास्तिकायसंग्रह कालस्य द्रव्यास्तिकायत्वविधिप्रतिपेधविधानमेतत् । यथा खलु जीवपुद्गलधर्माधर्मा- काशानि सकलद्रव्यलक्षणसद्भावाद् द्रव्यव्यपदेशभाजि भवन्ति, तथा कालोऽपि । इत्येवं पद्रव्याणि । किंतु यथा जीवपुद्गलधर्माधर्माकाशानां द्वयादिप्रदेशलक्षणत्वमस्त्यस्तिकायत्वं, न तथा लोकाकाशप्रदेशसंख्यानामपि कालाणूनामेकप्रदेशत्वादस्त्यस्तिकायत्वम् । अत एव च पञ्चास्तिकायप्रकरणे न हीह मुख्यत्वेनोपन्यस्तः कालः । जीवपुद्गलपरिणामावच्छिद्यमानपर्याय- त्वेन तत्परिणामान्यथानुपपत्त्यानुपीयमानद्रव्यत्वेनात्रैवांतर्भावितः ।।१०२। -इति कालद्रव्यव्याख्यानं समाप्तम् । टीका!-यह, कालको द्रव्यपनेके विधानका और अस्तिकायपनेके निषेधका कथन है (अर्थात् कालको द्रव्यपना है किन्तु अस्तिकायपना नहीं है ऐसा यहाँ कहा है)। जिसप्रकार वास्तवमें जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाशको द्रव्यके समस्त लक्षणोंका सद्भाव होनेसे वे 'द्रव्य' संज्ञाको प्राप्त करते हैं, उसीप्रकार काल भी ( उसे द्रव्यके समस्त लक्षणोंका सभाव होनेसे ) 'द्रव्य' संज्ञाको प्राप्त करता है । इसप्रकार छह द्रव्य हैं। किन्तु जिसप्रकार जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाशको 'द्वि- आदि प्रदेश जिसका लक्षण है ऐसा अस्तिकायपना है, उसीप्रकार कालाणुओंको-यद्यपि उनकी संख्या लोकाकाशके प्रदेशों जितनी (-असंख्य ) है तथापि-एकप्रदेशीपनेके कारण अस्तिकायपना नहीं है । और ऐसा होनेसे ही ( अर्थात् काल अस्तिकाय न होनेसे ही ) यहाँ पंचास्तिकायके प्रकरणमें मुख्यतः कालका कथन नहीं किया गया है; ( परन्तु ) जीव-पुद्गलोंके परिणाम द्वारा जो ज्ञात होता है-मपता है ऐसी उसकी पर्यायें होनेसे तथा जीव-पुद्गलोंके परिणामकी अन्यथा अनुपपत्ति द्वारा जिसका अनुमान होता है ऐसा वह द्रव्य होनेसे उसे यहाँ 'अन्तर्भूत किया गया है ।१०२। इसप्रकार कालद्रव्यका व्याख्यान समाप्त हुआ। १. द्वि-प्रादि-दो या अधिक; दो से लेकर अनन्त तक । २. अन्तर्भूत करना= भीतर समा लेना; समाविष्ट करना; समावेश करना । [ इस 'पंचास्तिकाय- संग्रह' नामक शास्त्रमें कालका मुख्यरूपसे वर्णन नहीं है, पाँच अस्तिकायोंका मुख्यरूपसे वर्णन है । वहाँ जीवास्तिकाय और पुद्गलास्तिकायके परिणामोंका वर्णन करते हुए, उन परिणामों द्वारा जिसके परिणाम ज्ञात होते हैं-नपते हैं उस पदार्थका ( कालका ) तथा उन परिणामोंकी अन्यथा अनुपपत्ति द्वारा जिसका अनुमान होता है उस पदार्थका ( कालका ) गौणरूपसे वर्णन करना उचित है-ऐसा मानकर यहाँ पंचास्तिकायप्रकरणमें गौणरूपसे कालके वर्णनका समावेश किया गया है। ] पद्रव्य-पंचास्तिकायवर्णन १५७ एवं पवयणसारं पंचत्थियसंगहं वियाणित्ता। नो मयदि रागदोसे सो गाहदि दुक्खपरिमोक्खं ॥१०३।। एवं प्रवचनसारं पञ्चास्तिकायसंग्रहं विज्ञाय । यो मुञ्चति रागद्वेषौ स गाहते दुःखपरिमोशम् ॥१०॥ तदवयोधफलपुरस्सरः पंचास्तिकायव्याख्योपसंहारोऽयम् । न खलु कालकलितपंचा- स्तिकायेभ्योऽन्यत् किमपि सकलेनापि प्रवचनेन प्रतिपाद्यते । ततः प्रवचनसार एवायं पंचास्ति- कायसंग्रहः । यो हि नामामु समस्तवस्तुतत्त्वाभिधायिनमर्थतोऽर्थितयाववुध्यात्रैव जीवास्तिकायां- गाथा १०३ अन्वयार्थः-[ एवम् ] इसप्रकार [ प्रवचनसारं ] प्रवचनके सारभूत [ पंचास्ति- कायसंग्रहं ] 'पंचास्तिकायसंग्रहको' [विज्ञाय ] जानकर [य] जो [रागद्वेषौ ] राग- द्वेषको [ मुञ्चति ] छोड़ता है, [ स.] वह [ दुःखपरिमोक्षम् गाहते ] दुःखसे परिमुक्त होता है। टीका:-यहां पंचास्तिकायके अवबोधका फल कहकर पंचास्तिकायके व्याख्यानका उपसंहार किया गया है । वास्तवमें सम्पूर्ण ( द्वादशांगरूपसे विस्तीर्ण ) प्रवचन काल सहित पंचास्ति- कायसे अन्य कुछ भी प्रतिपादित नहीं करता; इसलिए प्रवचनका सार ही यह 'पंचास्तिकायसंग्रह' है। जो पुरुष समस्तवस्तुतत्त्वका कथन करनेवाले इस 'पंचास्तिकायसंग्रहको' 'अर्थतः अर्थीरूपसे जानकर, इसीमें कहे हुए जीवास्तिकायमें १. अर्थतः-अर्थानुसार, वाच्यका लक्ष करके; वाच्यसापेक्ष; यथार्थ रीतिसे। २. अर्थीरूपसे-गरजीरूपसे; याचकरूपसे; सेवकरूपसे; कुछ प्राप्त करनेके प्रयोजनसे ( अर्थात् हितप्राप्तिके हेतुसे )। येरीत प्रवचनसाररूप 'पंचास्तिसंग्रह' जाणीने । जो जीव छोडे रागद्वेष, लहे सकलदुखमोशने ॥१०३।।

१५८ पंचास्तिकायसंग्रह तर्गतमात्मानं स्वरूपेणात्यंतविशुद्धचैतन्यस्वभावं निश्चित्य परस्परकार्यकारणीभूतानादिरागद्वेष- परिणामकर्मबन्धसंततिसमारोपितस्वरूपविकारं तदात्वेऽनुभूयमानमवलोक्य तत्कालोन्मीलित- विवेकज्योतिः कर्मबंधसंततिप्रवर्तिका रागद्वेषपरिणतिमत्यस्यति, स खलु जीर्यमाणस्नेहो जघन्य- 'अन्तर्गत स्थित अपनेको ( निज आत्माको ) स्वरूपसे अत्यन्त विशुद्ध चैतन्यस्वभाव- वाला निश्चित करके, परस्पर कार्यकारणभूत ऐसे अनादि रागद्वेषपरिणाम और कर्मबन्धकी परम्परासे जिसमें स्वरूपविकार आरोपित है ऐसा अपनेको ( निज आत्माको ) उस काल अनुभवमें आता देखकर, उस काल विवेकज्योति प्रगट होनेसे ( अर्थात् अत्यन्त विशुद्ध चैतन्यस्वभावका और विकारका भेदज्ञान उसी काल प्रगट प्रवर्तमान होनेसे ) कर्मबन्धकी परम्पराका प्रवर्तन करनेवाली रागद्वेषपरिणतिको छोड़ता है, वह पुरुष, वास्तवमें जिसका "स्नेह जीर्ण होता जाता है ऐसा, जघन्य 'स्नेहगुणके सन्मुख वर्तते हुए परमाणुकी भाँति भावी बन्धसे पराङ मुख वर्तता हुआ, १. जीवास्तिकायमें स्वयं (निज आत्मा) समा जाता है, इसलिए जैसा जीवास्तिकायके स्वरूपका वर्णन किया गया है वैसा ही अपना स्वरूप है, अर्थात् स्वयं भी स्वरूपसे अत्यन्त विशुद्ध चैतन्यस्वभाववाला है। २. रागद्वेषपरिणाम और कर्मवन्ध अनादि कालसे एक-दूसरेको कार्य-कारणरूप हैं । ३. स्वरूपविकार-स्वरूपका विकार । [ स्वरूप दो प्रकारका है : (१) द्रव्याथिक नयके विषयभूत स्वरूप, और ( २) पर्यायार्थिक नयके विषयभूत स्वरूप । जीवमें जो विकार होता है वह पर्यायार्थिक नयके विषयभूत स्वरूपमें होता है; द्रव्याथिक नयके विषयभूत स्वरूपमें नहीं; वह (द्रव्याथिकनयके विपयभूत ) स्वरूप तो सदैव अत्यन्त विशुद्ध चैतन्यात्मक है ] | ४. आरोपित-( नया अर्थात् प्रोपाधिकरूपसे ) किया हुप्रा । [ स्फटिकमरिणमें औपाधिकरूपसे होनेवाली रंगीन दशाकी भांति जीवमें औपाधिकरूपसे विकारपर्याय होती हुई कदाचित् अनुभवमें पाती है ।] ५. स्नेह-रागादिरूप चिकनाहट । ६. स्नेह = स्पर्शगुणकी पर्यायरूप चिकनाहट । (जिसप्रकार जघन्य चिकनाहटके सन्मुख वर्तता हुआ परमाणु भावी वन्धसे पराङ मुख है, उसीप्रकार जिसके रागादि जीर्ण होते जाते हैं ऐसा पुरुष भावी बन्धसे पराङ मुख है।)

१५९ षड्दव्य-पंचास्तिकायवर्णन स्नेहगुणाभिमुखपरमाणुवभाविबन्धपराङ मुखः पूर्वबन्धात्प्रव्यवमानः शिखितप्तोदकदौस्थ्यानु- कारिणो दुःखस्य परिमोक्षं विगाहत इति ॥१०३।। मुणिऊण एतदटुंतवणुगमणुज्जदो णिहद मोहो । पसमियरागद्दोसो हवदि हदपरापरो जोबो ॥१०॥ ज्ञात्वैतदर्थ तदनुगमनोद्यतो निहतमोहः । प्रशमितरागद्वेपो भवति हतपरापरो जीवः ॥ १०४ ।। दुःखविमोक्षकरणक्रमाख्यानमेतत् । एतस्य शास्त्रस्यार्थभूतं शुद्धचैतन्यस्वभावमात्मानं कश्चिज्जीवस्तावज्जानीते । ततस्तमेवानुगंतुमुद्यमते । ततोऽस्य क्षीयते दृष्टिमोहः । ततःस्वरूप- पूर्व बंधसे छूटता हुआ, अग्नितप्त जलकी 'दुःस्थिति समान जो दुःख उससे परिमुक्त होता है ।१०३। गाथा १०४ मन्वयार्थः-[जीवः ] जीव [ एतद्' अर्थ ज्ञात्वा ] इस अर्थको जानकर (-इस शास्त्रके अर्थभूत शुद्ध आत्माको जानकर ), [ तदनुगमनोद्यतः ] उसके अनुसरणका उद्यम करता हुआ [ निहतमोहः ] हतमोह होकर ( -जिसे दर्शनमोहका क्षय हुप्रा हो ऐसा होकर ), [प्रशमितरागद्वेपः ] रागद्वषको प्रशमित (-निवृत्त) करके, [ हतपरापर: भवति ] उत्तर और पूर्व बन्धका जिसे नाश हुआ है ऐसा होता है । टीका:-यह, दुःखसे विमुक्त होनेके क्रमका कथन है । प्रथम, कोई जीव इस शास्त्रके अर्थभूत शुद्धचैतन्यस्वभाववाले (निज ) आत्माको जानता है; इसलिये ( फिर ) उसीके अनुसरणका उद्यम करता है। इसलिये उसे दृष्टिमोहका क्षय होता है; इसलिये स्वरूपके परिचयके कारण ज्ञानज्योति प्रगट १. दुःस्थिति = प्रशांत स्थिति ( अर्थात् तले-ऊपर होना; खदबद होना ); अस्थिरता; खराब-बुरी स्थिति । [ जिसप्रकार अग्नितप्त जल खदबद होता है, तले ऊपर होता रहता है, उसीप्रकार दुःन साकुलतामय है ।] आ अर्थ जाणी, अनुगमन-उद्यम करी, हणी मोहने । प्रशभावी रागद्वेप, जीव उत्तर-पूरव विरहित बने । १०४ ॥ - पंचास्तिकायसंग्रह परिचयादुन्मज्जति ज्ञानज्योतिः । ततो रागद्वेषौप्रशाम्यतः । ततः उचरः पूर्वश्च बंधो विनश्यति । ततः पुनबंधहेतुत्वाभावात् स्वरूपस्थो नित्यं प्रतपतीति ॥ १०४॥ इति समयव्याख्यायामंतींसपद्रव्यपञ्चास्तिकायवर्णन: प्रथमः श्रुतस्कन्धा समाप्तः ॥ १ ॥ होती है। इसलिये रागद्वेष प्रशमित होते हैं—निवृत्त होते हैं; इसलिये उत्तर और पूर्व (-बादका और पहलेका ) वन्ध विनष्ट होता है। इसलिये पुनः, बन्ध होनेके हेतुत्वका अभाव होनेसे स्वरूपस्थरूपसे सदैव तपता है-प्रतापवंत वर्तता है ( अर्थात् वह जीव सदा स्वरूपस्थित रहकर परमानन्दज्ञानादिरूप परिणमित होता है ) ॥ १०४ ।। इसप्रकार ( श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत श्री पंचास्तिकायसंग्रह शास्त्रकी श्रीमद् अमृतचन्द्राचार्यदेवविरचित ) समयव्याख्या नामक टीकामै पद्भ्य-पंचास्तिकायवर्णन नामका प्रथम श्रुतस्कन्ध समाप्त हुआ।

२- नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन -- द्रव्यस्वरूपप्रतिपादनेन शुद्धं बुधानामिह तत्त्वमुक्तम् । पदार्थभंगेन कृतावतारं प्रकीय॑ते संप्रति वर्त्म तस्य ||७|| अभिवंदिऊण सिरसा अपुणब्भवकारणं महावीरं । तेसि पयत्थभंगं मग्गं मोक्खस्स वोच्छामि ॥१०॥ [ प्रथम, श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव पहले श्रुतस्कन्धमें क्या कहा गया है और दूसरे श्रुतस्कन्धमें क्या कहा जाएगा वह श्लोक द्वारा अति संक्षेपमें दर्शाते हैं : ] [ श्लोकार्थः-] यहाँ ( इस शास्त्रके प्रथम श्रुतस्कन्धमें ) द्रव्यस्वरूपके प्रतिपादन द्वारा वुधं पुरुषोंको ( बुद्धिमान जीवोंको ) शुद्ध तत्त्व ( शुद्धात्मतत्त्व ) का उपदेश दिया गया । अव पदार्थभेद द्वारा उपोद्घात . करके (-नव पदार्थरूप भेद द्वारा प्रारम्भ करके ) उसके मार्गका ( -शुद्धात्मतत्त्वके मार्गका अर्थात् उसके मोक्ष मार्गका ) वर्णन किया जाता है। [७ ] [ अब इस द्वितीय श्रुतस्कन्धमें श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवविरचित गाथा- सूत्र प्रारम्भ किए जाते हैं: ] शिरसा नमी अपुनर्जनमना हेतु श्री महावीरने । भाखु पदार्थविकल्प तेम ज मोक्ष केरा मार्गने ।।१०।। २१ पंचास्तिकायसंग्रह अभिवंद्य शिरसा अपुनर्भवकारणं महावीरम् । तेषां पदार्थभंगं मार्ग मोक्षस्य वक्ष्यामि ।। १०५ ॥ आप्तस्तुतिपुरस्सरा प्रतिज्ञेयम् । यमुना हि प्रवर्तमानमहाधर्मतीर्थस्य मूलकत्वेना- पुनर्भवकारणस्य भगवतः परमभट्टारकमहादेवाधिदेवश्रीवर्धमानस्वामिनः सिद्धिनिबंधनभूतां भावस्तुतिमासच्य, कालकलितपंचास्तिकायानां पदार्थविकल्पो मोक्षस्य मार्गश्च वक्तव्यत्वेन प्रतिज्ञात इति ।। १०५ ।। सम्मत्तणाणजुत्तं चारित रागदोसपरिहीणं । मोक्खस्स हवदि मग्गो भन्वाणं लद्धबुद्धीणं ॥१०॥ सम्यक्त्वज्ञानयुक्तं चारित्र रागद्वेषपरिहीणम् । मोक्षस्य भवति मागों मव्यानां लब्धबुद्धीनाम् ॥१०६|| गाथा १०५ अन्वयार्थ:-[ अपुनर्भवकारणं ] अपुनर्भवके कारण [महावीरम् ] श्री महावीर- को [ शिरसा अभिवंद्य ] शिरसा वंदन करके, [ तेषां पदार्थमङ्ग] उनका पदार्थभेद (-काल सहित पंचास्तिकायका नवपदार्थरूप भेद ) तथा [ मोक्षस्य मार्ग ] मोक्षका मार्ग [ वक्ष्यामि ] कहूँगा। टीका:-यह, आप्तकी स्तुतिपूर्वक प्रतिज्ञा है। प्रवर्तमान महाधर्मतीर्थंके मूल कर्ता जो 'अपुनर्भवके कारण हैं ऐसे भगवान, परम भट्टारक, महादेवाधिदेव श्री वर्धमानस्वामीकी, सिद्धत्वके निमित्तभूत भावस्तुति करके, काल सहित पंचास्तिकायका पदार्थभेद ( अर्थात् छह द्रव्योंका नव पदार्थरूप भेद ) तथा मोक्षका मार्ग कहनेकी इस गाथासूत्र में प्रतिज्ञा की गई है ।१०५। गाथा १०६ अन्वयार्थः-[ सम्यक्त्त्वज्ञानयुक्तं ] सम्यक्त्व और ज्ञानसे संयुक्त ऐसा [चारित्रं ] १. अपुनर्भव = मोक्ष । [परम पूज्य भगवान श्री वर्धमानस्वामी, वर्तमानमें प्रवर्तित जो रत्नत्रयात्मक महाधर्मतीर्थ उसके मूल प्रतिपादक होनेसे, मोक्षसुखरूपी सुधारसके पिपासु भव्योंको मोक्षके निमित्तभूत हैं।] सम्यक्त्वज्ञान समेत चारित रागद्वेषविहीन जे । ते होय छे निर्वाणमारग लब्धबुद्धि भव्यने ।।१०६।।

- नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन मोक्षमार्गस्यैव तावत्सूचनेयम् । सम्यक्त्वज्ञानयुक्तमेव नासम्यक्त्वज्ञानयुक्तं, चारित्रमेव नाचारित्रं, रागद्वेपपरिहीणमेव न रागद्वेषापरिहीणम्, मोक्षस्यैव न भावतो बंधस्य, मार्ग एव नामार्गा, भन्यानामेव नामव्यानां, लब्धवुद्धीनामेव नालब्धबुद्धीनां, क्षीणकषायत्वे भवत्येव न कपायसहितत्वे भवतीत्यष्टधा नियमोऽत्र द्रष्टव्यः ॥१०६॥ सम्मत्त सद्दहणं भावाणं तेसिमधिगमो णाणं । चारित्तं समभावो विसएसु विरूढमग्गाणं ॥१०॥ चारित्र-[ रागद्वेपपरिहीणम् ] जो कि रागद्वेषसे रहित हो वह, [लब्धबुद्धीनाम् ] लब्धबुद्धि [ भव्यानां ] भव्यजीवोंको [ मोक्षस्य मार्गः] मोक्षका मार्ग [ भवति ] होता है। टीकाः-प्रथम, मोक्षमार्गकी ही यह सूचना है । सम्यक्त्व और ज्ञानसे ही युक्त-न कि असम्यक्त्व और अज्ञानसे युक्त, चारित्र ही न कि अचारित्र, रागद्वेष रहित हो ऐसा ही ( चारित्र)-न कि रागद्वेष सहित हो ऐसा, मोक्षका ही- 'भावतः न कि बंधका, मार्ग ही-न कि अमार्ग, भव्योंको ही-न कि अभव्योंको, 'लब्धबुद्धियोंको ही-न कि अलब्धबुद्धियों- को, क्षीणकषायपनेमें ही होता है न कि कषायसहितपनेमें होता है। इसप्रकार आठ प्रकारसे नियम यहां देखना ( अर्थात् इस गाथामें उपरोक्त आठ प्रकारसे नियम कहा है ऐसा समझना ) । १०६ । १. भावतः=भाव अनुसार; आशय अनुसार । ('मोक्षका' कहते ही 'बंधका नहीं' ऐसा भाव अर्थात् आशय स्पष्ट समझमें आता है। २. लव्धबुद्धि= जिन्होंने बुद्धि प्राप्त की हो ऐसे । ३. क्षीणकषायपने में ही क्षीणकषायपना होते ही क्षीणकषायपना हो तभी। [ सम्यक्त्वज्ञानयुक्त चारित्र-जो कि रागोषरहित हो; लब्धबुद्धि भव्यजीवोंको, क्षीणकषायपना होते ही, मोक्षका मार्ग होता है। 'भावो' तणी श्रद्धा सुदर्शन, वोध तेनो ज्ञान छ । वधु रूढ मार्ग थतां विषयमा साम्य ते चारित्र के ॥१०७।।

१६४ पंचास्तिकायसंग्रह सम्यक्त्वं श्रद्धानं भावानां तेषामधिगमो ज्ञानम् । चारित्रं समभावो विषयेषु विरूढमार्गाणाम् ।। १०७ ॥ सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणां सूचनेयम् । भावाः खलु कालकलितपंचास्तिकायविकल्प- रूपा नव पदार्थाः। तेपां मिथ्यादर्शनोदयापादिताश्रद्धानाभावस्वभावं भावांतरं श्रद्धान सम्यग्दर्शनं, शुद्धचैतन्यरूपात्मतत्त्वविनिश्चयबीजम् । तेषामेव मिथ्यादर्शनो दयान्नौयान- गाथा १०७ अन्वयार्थः-[ भावाना ] भावोंका ( -नव पदार्थोंका ) [श्रद्धानं ] श्रद्धान [सम्यक्त्वं ] वह सम्यक्त्व है; [ तेषाम् अधिगमः ] उनका अववोध [ ज्ञानम् ] वह जान है; [ विरूढमार्गाणाम् ] ( निज तत्त्वमें ) जिनका मार्ग विशेष रूढ हुआ है उन्हें [ विपयेषु ] विषयोंके प्रति वर्तता हुआ [ समभावः ] समभाव [ चारित्रम् ] वह चारित्र है। टीका:-यह, सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रकी सूचना है। काल सहित पंचास्तिकायके भेदरूप नव पदार्थ वे वास्तवमें 'भाव' हैं । उन 'भावोंका' मिथ्यादर्शनके उदयसे प्राप्त होनेवाला जो अबद्धान उसके प्रभावस्वभाववाला जो 'भावान्तर–श्रद्धान (अर्थात् नव पदार्थों का श्रद्धान), वह सम्यग्दर्शन है जो कि ( सम्यग्दर्शन ) शुद्ध चैतन्यरूप आत्मतत्त्वके 'विनिश्चयका वीज है। नौकागमन- केसंस्कारकी भाँति मिथ्यादर्शनके उदयके कारण जो स्वरूपविपर्ययपूर्वक अध्यवसित होते हैं ( अर्थात् विपरीत स्वरूपसे समझमें आते हैं-भासित होते हैं ) ऐसे उन १. भावान्तर=भावविशेष; खास-मुख्य भाव; दूसरा भाव; भिन्न भाव । नव पदार्थोके अश्रद्धानका अभाव जिसका स्वभाव है ऐसा भावान्तर (-नवपदार्थोके श्रद्धानरूप भाव) वह सम्यग्दर्शन है।] २. विनिश्चय=निश्चय; दृढ़ निश्चय । ३. जिसप्रकार नावमें बैठे हुए किसी मनुष्यको नावकी गतिके संस्कारवश, पदार्थ विपरीत स्वरूपसे समझमें आते हैं (अर्थात् स्वयं गतिमान होने पर भी स्थिर हो ऐसा समझमें आता है और वृक्ष, पर्वत आदि स्थिर होने पर भी गतिमान समझमें लाते हैं ), उसीप्रकार जीवको मिथ्या- दर्शनके उदयवश नव पदार्थ विपरीत स्वरूपसे समझमें आते हैं।

१६५ नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन संस्कारादि स्वरूपविपर्ययेणाध्यवसीयमानानां तन्निवृत्तौ समञ्जसाध्यवसायः सम्यग्ज्ञानं, मनाक्षानचेतनाप्रधानात्मतत्त्वोपलंभवीजम् । सम्यग्दर्शनज्ञानसन्निधानादमार्गेभ्यः समग्रेभ्यः परिच्युत्य स्वतत्वे विशेपेण रूढमार्गाणां सतामिन्द्रियानिन्द्रियविषयभृतेष्वर्थेषुरागद्वेषपूर्वकविकारा- भावान्निर्विकारावबोधस्वभावः समभावश्चारित्रं, तदात्वायतिरमणीयमनणीयसोऽपुनर्भवसौख्य- स्यैकबीजम् । इत्येष त्रिलक्षणो मोक्षमार्गःपुरस्तान्निश्चयव्यवहाराभ्यां व्याख्यास्यते । इह तु सम्यग्दर्शनज्ञानयोपियभूतानां नवपदार्थानामुपोद्घातहेतुत्वेन सूचित इति ।।१०७।। - 'भावोंका' ही ( -नव पदार्थोंका ही), मिथ्यादर्शनके उदयकी निवृत्ति होने पर, जो सम्यक् अध्यवसाय ( सत्य समझ, यथार्थ अवभास, सच्चा अवबोध ) होना, वह सम्यग्ज्ञान है जो कि ( सम्यग्ज्ञान ) कुछ अंशोंमें ज्ञानचेतनाप्रधान आत्मतत्त्वकी उपलब्धिका ( अनुभूतिका ) वीज है । सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानके सभावके कारण समस्त प्रमार्गोंसे छूटकर जो स्वतत्त्वमें विशेषरूपसे 'रूढ़ मार्गवाले हुए हैं उन्हें इन्द्रिय और मनके विषयभूत पदों के प्रति रागद्वेषपूर्वक विकारके अभावके कारण जो निर्विकारज्ञानस्वभाववाला समभाव होता है, वह चारित्र है-जो कि ( चारित्र ) उस कालमें और आगामी कालमें रमणीय है और अपुनर्भवके (मोक्षके) महा सौख्यका एक वीज है। -ऐसे इस विलक्षण ( सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रात्मक ) मोक्षमार्गका आगे निश्चय और व्यवहारसे व्याख्यान किया जाएगा। यहां तो सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानके विषयभूत नवपदार्थोंके 'उपोद्घातके हेतुरूपसे उसकी सूचना दी गई है। १०७ । यहाँ, 'संस्कारादिके बदले जहाँ तक सम्भव है 'संस्कारादिव' होना चाहिए ऐसा लगता है। १. रूढ़ = पक्का, परिचयसे दृढ़ हुआ। (सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञानके कारण जिनका स्वतत्त्वगत मार्ग विशेष रूढ़ हुआ है उन्हें इन्द्रियमनके विषयोंके प्रति रागद्वेषके अभावके कारण वर्तता हुमा निर्विकारज्ञानस्वभावी समभाव वह चारित्र है।) २. उपोद्घात प्रस्तावना। [सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र मोक्षमार्ग है। मोक्षमार्गके प्रथम दो अंग जो सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान उनके विषय नव पदार्थ हैं; इसलिये अब अगली गाथाओं में नव पदार्थोंका व्याख्यान किया जाता है । मोक्षमार्गका विस्तृत व्याख्यान लागे किया जायेगा। यहाँ तो नव पदार्थों के व्याख्यानकी प्रस्तावनाके हेतुरूपसे उसकी मात्र सूचना दी गई है। * १६६ पंचास्तिकायसंग्रह जीवाजीवा भावा पुण्णं पावं च पासवं तेसि । संवरणं णिज्नरणं बंधो मोक्खो य ते अट्ठा ॥ १०८ ॥ जीवाजीवौ भावी पुण्यं पापं चास्रवस्तयोः । संवरनिर्जरवन्धा मोक्षश्च भवन्ति ते अर्थाः ।। १०८ ।। पदार्थानां नामस्वरूपाभिधानमेतत् । जीवः, अजीवः, पुण्य, पापं, आस्रवः, संवरः, निर्जरा, बन्धः, मोक्ष इति नवपदार्थानां नामानि । तत्र चैतन्यलक्षणो जीवास्तिक एवेह जीवः । चैतन्याभावलक्षणोऽजीवः । स पंचधा पूर्वोक्त एव-पुद्गलास्तिका, धर्मास्तिका, अधर्मास्तिका, आकाशास्तिका, कालद्रव्यं चेति । इमौ हि जीवाजीवों पृथग्भूतास्तित्वनिर्वृत्त्वेन भिन्नस्वभावभृती मूलपदाथौं । जीवपुद्गलसंयोगपरिणामनिवृत्चाः सप्तान्ये पदार्थाः । शुभपरिणामो जीवस्य, तन्निमित्ता . . - . - - - गाथा १०८ अन्वयार्थः-[ जीवाजीवौ भावौ ] जीव और अजीव-दो भाव ( अर्थात् मूल पदार्थ ) तथा [ तयोः ] उन दो के [ पुण्यं ] पुण्य, [ पापं च] पाप, [ आस्रवा] आस्रव, [ संवरनिर्जरावधाः] संवर, निर्जरा, बंध [च ] और [ मोक्षा] मोक्ष-[ते अर्थाः भवन्ति ] वह ( नव ) पदार्थ हैं । टीका:-यह, पदार्थों के नाम और स्वरूपका कथन है । जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष- इसप्रकार नव पदार्थों के नाम हैं । उनमें, चैतन्य जिसका लक्षण है ऐसा जीवास्तिक ही (-जीवास्तिकाय ही ) यहाँ जीव है । चैतन्यका अभाव जिसका लक्षण है वह अजीव है : वह ( अजीव ) पांच प्रकारसे पहले कहा ही है- पुद्गलास्तिक, धर्मास्तिक, अधर्मास्तिक, आकाशा- स्तिक और कालद्रव्य । यह जीव और अजीव ( दोनों ) पृथक् अस्तित्व द्वारा निष्पन्न होनेसे भिन्न जिनके स्वभाव हैं ऐसे ( दो ) मूल पदार्थ हैं । वे भाव-जीव मजीव, तद्गत पुण्य तेम ज पाप ने । आसरव, संवर, निर्जरा, वणी बन्ध, मोक्ष-पदार्थ छ ॥ १०८ ।। .

. . नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन कर्मपरिणामः पुद्गलानां च पुण्यम् । अशुभपरिणामो जीवस्य, तन्निमिचा कर्मपरिणामः पुद्गलानां च पापम् । मोहरागद्वेषपरिणामो जीवस्य, तन्निमित्तः कर्मपरिणामो योगद्वारेण प्रविशता पुद्गलानाश्चास्रवः । मोहरागद्वेषपरिणामनिरोधो जीवस्य, तन्निमिचः कर्मपरिणामनिरोधो योगद्वारेण प्रविशता पुद्गलानां च संवरः । कर्मवीर्यशातनसमर्थों बहिरंगान्तरङ्गतपोभिवृहित- शुद्धोपयोगो जीवस्य, तदनुभावनीरसीभूतानामेकदेशसंक्षयः समुपाचकर्मपुद्गलानां च निर्जरा । मोहरागद्वेषस्निग्धपरिणामो नीवस्य, तन्निमिचेन कर्मत्वपरिणतानां जीवेन सहान्योन्यसंमूर्छन पुद्गलानां च बंधः । अत्यंतशुद्धात्मोपलम्भो जीवस्य, जीवेन सहात्यंतविश्लेषः कर्मपुद्गलानां च मोक्ष इति ॥ १०८ ॥ जीव और पुद्गलके संयोग परिणामसे उत्पन्न होनेवाले सात अन्य पदार्थ हैं । ( उनका संक्षिप्त स्वरूप निम्नानुसार है:-) जीवके शुभपरिणाम ( वह पुण्य है ) तथा वे ( शुभ परिणाम ) जिनका निमित्त हैं ऐसे पुद्गलोंके कर्मपरिणाम (-शुभ- कर्मरूप परिणाम ) वह पुण्य है। जीवके अशुभ परिणाम ( वह पाप है ) तथा वे ( अशुभ परिणाम ) जिनका निमित्त हैं ऐसे पुद्गलोंके कर्मपरिणाम ( -अशुभकर्मरूप परिणाम ) वह पाप है । जीवके मोहरागद्वेषरूप परिणाम ( वह आस्रव है ) तथा वे ( मोहरागद्वेषरूप परिणाम ) जिनका निमित्त हैं ऐसे जो योगद्वारा प्रविष्ट होनेवाले पुद्गलोंके कर्मपरिणाम वह आस्रव है । जीवके मोहरागद्वेषरूप परिणामका निरोध ( वह संवर है ) तथा वह ( मोहरागद्वेषरूप परिणामका निरोध ) जिसका निमित्त है ऐसा जो योगद्वारा प्रविष्ट होनेवाले पुद्गलोंके कर्मपरिणामका निरोध वह संवर है। कर्मके वीर्यका ( -कर्मकी शक्तिका ) 'शातन करने में समर्थ ऐसा जो बहिरंग और अंतरंग ( बारह प्रकारके ) तपों द्वारा वृद्धिको प्राप्त जीवका शुद्धोपयोग ( वह निर्जरा है ) तथा उसके प्रभावसे (-वृद्धिको प्राप्त शुद्धोपयोगके निमित्तसे ) नीरस हुए ऐसे उपार्जित कर्मपुद्गलोंका एकदेश 'संक्षय वह निर्जरा है । जीवके, मोहरागद्वेष द्वारा स्निग्ध परिणाम ( वह बंध है ) तथा उनके ( -स्निग्ध परिणामोंके ) निमित्तसे कर्मरूप परिणत पुद्गलोंका जीवके साथ अन्योन्य अवगाहन (-विशिष्ट शक्ति सहित एकक्षेत्रावगाह-सम्बन्ध ) वह बंध है । जीवकी अत्यन्त शुद्ध आत्मोपलब्धि ( वह मोक्ष है ) तथा कर्मपुद्गलोंका जीवसे अत्यन्त विश्लेष ( वियोग ) वह मोक्ष है ।१०८। १. शातन करना=पतला करना; हीन करना; क्षीण करना; नष्ट करना। २. संक्षय-सम्यक् प्रकारसे क्षय ।

१६८ पंचास्तिकायसंग्रह अथ जीवपदार्थानां व्याख्यानं प्रपंचयति । जीवा संसारत्था मिव्वादा चेदणप्पगा दुविहा। उवमोगलक्खणा वि य देहादेहप्पवीचारा ॥१०६॥ जीवाः संसारस्था निर्वचाः चेतनात्मका द्विविधाः । उपयोगलक्षणा अपि च देहादेहप्रवीचाराः ।। १०९ ॥ जीवस्वरूपोद्देशोऽयम् । जीवाः हि द्विविधाः, संसारस्था अशुद्धा, निवृत्ताः शुद्धाश्च । ते खलूभयेऽपि चेतनास्वभावाः, चेतनापरिणामलक्षणेनोपयोगेन लक्षणीयाः। तत्र संसारस्था देहप्रवीचाराः, निर्वृचा अदेहप्रवीचारा इति ॥ १०९ ॥ -- - अब जीवपदार्थका व्याख्यान विस्तारपूर्वक किया जाता है । गाथा १०९ अन्वयार्थ:-[ जीवाः द्विविधाः ] जीव दो प्रकारके हैं-[ संसारस्थाः निर्वचा:] संसारी और सिद्ध । [चेतनात्मकाः ] वे चेतनात्मक (-चेतनास्वभाववाले ) [ अपि च ] तथा [ उपयोगलक्षणाः ] उपयोगलक्षणवाले हैं । [ देहादेहप्रवीचाराः] संसारी जीव देहमें वर्तनेवाले अर्थात् देहसहित हैं और सिद्ध जीव देहमें न वर्तनेवाले अर्थात् देहरहित हैं । टीका:-यह, जीवके स्वरूपका कथन है । जीव दो प्रकारके हैं-(१) संसारी अर्थात् अशुद्ध, और ( २) सिद्ध अर्थात् शुद्ध । वे दोनों वास्तवमें चेतनास्वभाववाले हैं और 'चेतनापरिणामस्वरूप उपयोग द्वारा लक्षित होनेयोग्य ( पहिचानेजानेयोग्य ) हैं। उनमें संसारी जीव देहमें वर्तनेवाले अर्थात् देहसहित हैं और सिद्ध जीव देहमें न वर्तनेवाले अर्थात् देहरहित हैं । १०६ । १. चेतनाका परिणाम सो उपयोग । वह उपयोग जीवरूपी लक्ष्यका लक्षण है। जीवो द्विविध-संसारी, सिद्धो; चेतनात्मक उभय छ । उपयोगलक्षण उभय; मेक सदेह, क अदेह छे।। १०९ । , नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन १६६ पढवी य उदगमगणी वाउ वणप्फदि जीवसंसिदा काया । देंति खलु मोहबहुलं फासं बहुगा वि ते तेसि ॥११०॥ पृथिवी चोदकमग्निर्वायुर्वनस्पतिः जीवसंश्रिताः कायाः । ददति खलु मोहबहुलं स्पर्श बहुका अपि ते तेषाम् ॥ ११० ।। पृथिवीकायिका दिपंचभेदोद्देशोऽयम् । पृथिवीकायाः, अपकायाः, तेजःकाया:, वायुकायाः, वनस्पतिकायाः इत्येते पुद्गलपरिणामा बंधवशाज्जीवानुसंश्रिताः, अवांतरजातिभेदाद्ध- हुका अपि स्पर्शनेन्द्रियावरणक्षयोपशममाजां जीवानां पहिरङ्गस्पर्शनेन्द्रियनिचिभूताः कर्मफल- गाथा ११० अन्वयार्थः-[ पृथिवी ] पृथ्वीकाय, [ उदकम् ] अप्काय, [ अग्निः ] अग्नि- काय, [ वायुः ] वायुकाय [च ] और [ वनस्पतिः] वनस्पतिकाय-काया] यह कायें [ जीवसंश्रिताः ] जीवसहित हैं। [ वहुकाः अपि ते] (अवान्तर जातियोंकी अपेक्षासे ) उनकी भारी संख्या होने पर भी वे सभी [ तेषाम् ] उनमें रहनेवाले जीवों- को [ खलु ] वास्तवमें [ मोहबहुलं ] अत्यन्त मोहसे संयुक्त [ स्पर्श ददति ] स्पर्श देती हैं ( अर्थात् स्पर्शज्ञानमें निमित्त होती हैं )। टीका:-यह, ( संसारी जीवोंके भेदोंमेंसे ) पृथ्वीकायिक आदि पाँच भेदोंका कथन है। 'पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजःकाय, वायुकाय और वनस्पतिकाय-ऐसे यह पुद्गलपरिणाम बंधवशात् ( बंधके कारण ) जीवसहित हैं। 'अवान्तर जातिरूप भेद करने पर वे अनेक होने पर भी वे सभी ( पुद्गलपरिणाम ), स्पर्शनेन्द्रियावरणके .. १. काय=शरीर । (पृथ्वीकाय आदि कायें पुद्गलपरिणाम हैं; उनका जीवके साथ बंध होनेके कारण वे जीवसहित होती हैं।) २. अवान्तर जाति अन्तर्गत-जाति । (पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजःकाय और वायुकाय-इन चारमेंसे प्रत्येकके सात लाख अन्तर्गत-जातिरूप भेद हैं। वनस्पतिकायके दस लाख भेद हैं। ) भू-जल-अनल-वायु-वनस्पतिकाय जीवसहित छ । बहु काय ते अतिमोहसंयुत स्पर्श आपे जीवने ॥ ११ ॥ २२ १७.. पंचास्तिकायसंग्रह चेतनाप्रधानत्वान्मोहबहुलमेव सोपलंभ संपादयन्तीति ।। ११० ।। ति स्थावरतणुजोगा अणिलाणलकाइयां य तेसु तसा मणपरिणामविरहिदा जीवा एइंदिया गया ॥ १११ ॥ त्रयः स्थावरतनुयोगा अनिलानलकायिकाश्च तेपु त्रसाः । मनःपरिणामविरहिता जीवा एकेन्द्रिया ज्ञेयाः ॥ १११ ।। एदे जीवणिकाया पंचविधा पुढविकाइयादीया । मणपरिणामविरहिदा जीवा एगेंदिया भणिया ॥११२।। क्षयोपशमवाले जीवोंको वहिरंग स्पर्शनेन्द्रियकी रचनाभूत वर्तते हुए, कर्मफलचेतना- प्रधानपनेके कारण अत्यन्त मोह सहित ही 'स्पर्शोपलब्धि संप्राप्त कराते हैं ।११० गाथा १११ अन्वयार्थ:-[ तेषु ] उनमें, [ त्रयः ] तीन ( पृथ्वीकायिक, अप्कायिक और वनस्पतिकायिक ) जीव [स्थावरतनुयोगाः] स्थावर शरीरके संयोगवाले हैं [च ] तथा [ अनिलानलकायिकाः ] वायुकायिक और अग्निकायिक जीव [प्रसाः] 'त्रस हैं; [ मनःपरिणामविरहिताः] वे सब मनपरिणामरहित [ एकेन्द्रियाः जीवाः] एकेन्द्रिय जीव [ ज्ञेयाः ] जानना । १११ । १. स्पर्शोपलब्धि स्पर्शकी उपलब्धि; स्पर्शका ज्ञान; स्पर्शका अनुभव । [पृथ्वीकायिक ] प्रावि जीवोंको स्पर्शनेन्द्रियावरणका (-भावस्पर्शनेन्द्रियके आवरणका ) क्षयोपशम होता है और वे-वे कायें वाह्य स्पर्शनेन्द्रियकी रचनारूप होती हैं, इसलिए वे-वे कायें उन-उन जीवोंको स्पर्शकी उपलब्धिमें निमित्तभूत होती हैं। उन जीवोंको होनेवाली वह स्पर्शोपलब्धि प्रबल मोह सहित ही होती है, क्योंकि वे जीव कर्मफलचेतनाप्रधान होते हैं।] २. वायुकायिक तथा अग्निकायिक जीवोंको चलनक्रिया देखकर व्यवहारसे अस कहा जाता है। निश्चयसे तो वे भी स्थावरनामकर्माधीनपनेके कारण यद्यपि उन्हें व्यवहारसे चलन है तथापि- स्थावर ही हैं। त्यां जीव त्रण स्थावरतनु, त्रस जीव अग्नि-समीरना। अ सर्व मनपरिणामविरहित अक-इंद्रिय जाणवा ॥११॥ आ पृथ्वीकायिक आदि जीवनिकाय पाँच प्रकारना । सघणाय मनपरिणामविरहित जीव केंद्रिय कह्या ॥ ११२ ।।

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन १७१ एते जीवनिकायाः पंचविधाः पृथिवीकायिकाद्याः । मनःपरिणामविरहिता जीवा एकेन्द्रिया भणिताः ॥११२।। पृथिवीकायिकादीनां पंचानामेकेन्द्रियत्वनियमोऽयम् । पृथिवीकायिकादयो हि जीवाः स्पर्शनेन्द्रियावरणक्षयोपशमान शेपेन्द्रियावरणोदये नोइन्द्रियावरणोदये च सत्येकेन्द्रिया अमनसो भवंतीति ॥११२।। अंडेसु पवटुंता गब्भत्था माणुसा य मच्छगया। जारिसया तारिसया जीवा एगेंदिया णेया ॥ ११३॥ अंडेपु प्रवर्धमाना गर्भस्था मानुपाश्च मूर्छा गताः । यादृशास्तादृशा जीवा एकेन्द्रिया ज्ञेयाः ॥ ११३ ।। गाथा ११२ अन्वयार्थ:-[ एते ] इन [ पृथिवीकायिकायाः] पृथ्वीकायिक आदि [ पञ्च- विधाः ] पांच प्रकारके [ जीवनिकायाः] जीवनिकायोंको [ मनः परिणामविरहिताः ] मनपरिणाम रहित [ एकेन्द्रियाः जीवा: ] एकेन्द्रिय जीव [ भणिताः] ( सर्वज्ञने ) कहा है। टीका:-यह, पृथ्वीकायिक आदि पांच (-पंचविध ) जीवोंके एकेन्द्रियपनेका नियम है। पृथ्वीकायिक आदि जीव, स्पर्शनेन्द्रियके (-भावस्पर्शनेन्द्रियके ) आवरणके क्षयोपशमके कारण तथा शेष इन्द्रियोंके (-चार भावेन्द्रियोंके ) आवरणका उदय तथा मनके ( भावमनके ) आवरणका उदय होनेसे, मनरहित एकेन्द्रिय हैं ।११२॥ गाथा ११३ अन्वयार्थः-[ अंडेपु प्रवर्धमाना ] अंडेमें वृद्धि पानेवाले प्राणी, [ गर्भस्थाः ] गर्भ रहेहुए प्राणी [ च ] और [ मूछा गताः मानुषाः ] मूर्छा प्राप्त मनुष्य, [ यादृशाः ] जैसे ( वुद्धिपूर्वक व्यापार रहित ) हैं, [तादृशाः] वैसे [ एकेन्द्रिया: जीवा ] एकेन्द्रिय जीव [ ज्ञेयाः ] जानना । जेवा जीवो अंडस्थ, मूविस्थ वा गर्भस्थ छ । तेवा वधा आ पंचविध अद्रि जीवो जाणजे ॥११३।। .

पंचास्तिकायसंग्रह १७२ . एकेन्द्रियाणां चैतन्यास्तित्वे दृष्टांतोपन्यासोऽयम् । अंडांतीनानां, गर्भस्थानां, मूछितानां च बुद्धिपूर्वकव्यापारादर्शनेऽपि येन प्रकारेण जीवत्वं निश्चिीयते, तेन प्रकारेणके न्द्रियाणामपि, उभयेषामपि पुद्धिपूर्वकव्यापारादर्शनस्य समानत्वादिति ॥११३।। संबुक्कमादुवाहा संखा सिप्पी अपादगा य किमी। जाणंति रसं फासं जे ते बेइंदिया जीवा ॥११४॥ शंबूकमालवाहाः शङ्काः शुक्तयोऽपादकाः च कमयः । जानन्ति रसं स्पश ये ते वीन्द्रियाः जीवाः ॥ ११४ ।। टीका:----यह, एकेन्द्रियोंको चैतन्यका अस्तित्व होने सम्बन्धी दृष्टान्तका कथन है। अंडेमें रहेहुए; गर्भमें रहेहुए और मूर्छा पाए हुए ( प्राणियों ) के जीवत्व- का, उन्हें बुद्धिपूर्वक व्यापार नहीं देखा जाता तथापि, जिसप्रकार निश्चय किया जाता है, उसीप्रकार एकेन्द्रियोंके जीवत्वका भी निश्चय किया जाता है। क्योंकि दोनोंमें बुद्धिपूर्वक व्यापारका 'अदर्शन समान है। भावार्थ:-जिसप्रकार गर्भस्थादि प्राणियोंमें, ईहापूर्वक व्यवहारका अभाव होने पर भी, जीवत्व है ही, उसीप्रकार एकेन्द्रियोंमें भी, ईहापूर्वक व्यवहारका अभाव होने पर भी, जीवत्व है ही ऐसा आगम, अनुमान इत्यादिसे निश्चित किया जा सकता है। यहाँ ऐसा तात्पर्य ग्रहण करना कि-जीव परमार्थसे स्वाधीन अनंत ज्ञान और सौख्य सहित होने पर भी अज्ञान द्वारा पराधीन इन्द्रियसुखमें आसक्त होकर जो कर्मबन्ध करता है उसके निमित्तसे अपनेको एकेन्द्रिय और दुःखी करता है ।११३। गाथा ११४ अन्वयार्थ:-[ शंबूकमातृवाहाः ] शंबूक, मातृवाह, [ शंङ्खाः ] शंख, [ शुक्तयः] सीप [च ] और [ अपादकाः कृमयः ] पग रहित कृमि-[ये ] जो कि [ सं स्पर्श ] १. प्रदर्शन-दृष्टिगोचर नहीं होना। शंबूक, छीपो, मातृवाहो, शंख, कृमि पग-वगरना । -जे जाणता रसस्पर्शने, ते जीव द्वींद्रिय जाणवा ॥११॥ " . - - १७३ नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन द्वीन्द्रियप्रकारसूचनेयम् । एते स्पर्शनरसनेन्द्रियावरणक्षयोपशमान शेषेन्द्रियावरणोदये नोइन्द्रियावरणोदये च सति स्पर्शरसयोः परिच्छेचारो द्वीन्द्रिया अमनसो भवंतीति ॥११४॥ जूगागु भीमकणपिपीलिया विच्छ्यादिया कीडा। जाणंति रसं फासं गंधं तेइंदिया जीवा ॥ ११५॥ यूकाकुंभीमत्कुणपिपीलिका वृश्चिकादयः कीटाः | जानन्ति रसं स्पर्श गंधं त्रींद्रियाः जीवाः ।। ११५ ॥ त्रीन्द्रियप्रकारसूचनेयम् । एते स्पर्शनरसनघ्राणेंद्रियावरणक्षयोपशमात् शेषेन्द्रिया- वरणोदये नोइन्द्रियावरणोदये च सति स्पर्शरसगंधानां परिच्छेचारस्त्रीन्द्रिया अमनसो भवंतीति ॥ ११५ ॥ रस और स्पर्शको [जानन्ति ] जानते हैं [ ते ] वे-[ द्वीन्द्रियाः जीवाः ] द्वीन्द्रिय जीव हैं। टीका:-यह, द्वीन्द्रिय जीवोंके प्रकारकी सूचना है । स्पर्शनेन्द्रिय और रसनेन्द्रियके (-इन दो भावेन्द्रियोंके ) आवरणके क्षयोपशमके कारण तथा शेष इन्द्रियोंके (-तीन भावेन्द्रियोंके ) आवरणका उदय तथा मनके (-भावमनके ) आवरणका उदय होनेसे स्पर्श और रसको जाननेवाले यह ( शंवूक आदि ) जीव मनरहित द्वीन्द्रिय जीव हैं ।११४॥ गाथा ११५ अन्वयार्थः- [यूकाकुंभीमत्कुणपिपीलिकाः ] जूं, कुभी, खटमल, चींटी और [वृश्चिकादयः ] विच्छू आदि [ कीटाः ] जन्तु [ रसं स्पर्श गंधं ] रस, स्पर्श और गंध- को [ जानन्ति ] जानते हैं; [त्रीन्द्रियाः जीवा:] वे त्रीन्द्रिय जीव हैं। टीका:-यह, त्रीन्द्रिय जीवोंके प्रकारकी सूचना है । स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय और घ्राणेन्द्रियके आवरणके क्षयोपशमके कारण तथा शेष इन्द्रियोंके आवरणका उदय तथा मनके आवरणका उदय होनेसे स्पर्श, रस और गंधको जाननेवाले यह (जू आदि ) जीव मनरहित त्रीन्द्रिय जीव हैं । ११५ । जू, कुंभी, माकड, कीडी तेम ज वृश्चिकादिक जंतु जे । रस, गंध तेम ज स्पर्श जाणे, जीव त्रींद्रिय तेह छे ।। ११५ ॥ - पंचास्तिकायसंग्रह उद्दसमसयमक्खियमधुकरिभमरा पयंगमादीया । रूवं रसं च गंधं फासं पुण ते विजाणंति ॥ ११६ ॥ उद्देशमशकमक्षिकामधुकरीभ्रमरा: पतङ्गाद्याः । रूपं रसं च गंध स्पर्श पुनस्ते विजानन्ति ॥११६।। चतुरिन्द्रियप्रकारसूचनेयम् । एते स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुरिन्द्रियावरणक्षयोपशमा श्रोत्रेन्द्रियावरणोदये नोइन्द्रियावरणोदये च सति स्पर्शरसगंधवर्णानां परिच्छेचारश्चतुरिन्द्रिया अमनसो भवंतीति ॥ ११६ ॥ सुरणरणारयतिरिया वण्णरसप्फासगंधसद्दण्हू । जलचरथलचरखचरा बलिया पंचेंदिया जीवा ॥११७॥ ११७ गाथा ११६ अन्वयार्थ:-[पुनः] पुनश्च [ उद्देशमशकमक्षिकामधुकरीभ्रमराः] डाँस, मच्छर, मक्खी, मधुमक्खी, भंवरा और [ पतङ्गायाः ते] पतंगे आदि जीव [रूपं ] रूप, [रसं ] रस, [ गंधं ] गंध, [च ] और [ स्पर्श ] स्पर्शको [ विजानन्ति ] जानते हैं। ( वे चतुरिन्द्रिय जीव हैं। ) टीका:-यह, चतुरिन्द्रिय जीवोंके प्रकारकी सूचना है । स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय और चक्षुरिन्द्रियके आवरणके क्षयोपशमके कारण तथा श्रोत्रेन्द्रियके आवरणका उदय तथा मनके आवरणका उदय होनेसे स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णको जाननेवाले यह (डांस आदि ) जीव मनरहित चतुरिन्द्रिय जीव हैं ।११६॥ . , - मधमाख, भ्रमर, पतंग, माखी, डांस, मच्छर आदि ने । ते जीव जाणे स्पर्शने, रस, गंध तेमज रूपने ॥ ११६ ॥ स्पर्शादि पंचक जाणतां तिर्यंच-नारक-सुर-नरो। -जणचर, भूचर के खेचरो-चलवान पंचेंद्रिय जीवो ॥११७ ... १७५ नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन सुरनरनारकतिर्यञ्चो वर्णरसस्पर्शगंधशब्दज्ञाः । जलचरस्थलचरखचरा वलिनः पंचेन्द्रिया जीवाः ||११७॥ पंचेन्द्रियप्रकारसूचनेयम् । अथ स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुः श्रोत्रेन्द्रियावरणक्षयोपशमात् नोइन्द्रियावरणोदये सति स्पर्शरसगंधवर्णशब्दानां परिच्छेचारः पंचेन्द्रिया अमनस्काः । केचित्तु नोइन्द्रियावरणस्यापि क्षयोपशमात् समनस्काश्च भवन्ति । तत्र देवमनुष्यनारकाः समनस्का एव, तिर्यश्च उभयजातीया इति ॥११७॥ देवा चउण्णिकाया मणुया पुण कम्मभोगभूमीया । तिरिया बहुप्पयारा पेरइया पुढविभेयगदा ॥११॥ देवाश्चतुर्णिकायाः मनुजाः पुनः कर्मभोगभूमिजाः । तिर्यश्चः बहुप्रकाराः नारकाः पृथिवीमेदगताः ॥ ११८ ॥ गाथा ११७ अन्वयार्थः- [वर्णरसस्पर्शगंधशब्दजा] वर्ण, रस, स्पर्श, गन्ध और शब्दको जाननेवाले [ सुरनरनारकतिर्यश्चः ] देव-मनुष्य-नारक-तिर्यंच-[ जलचरस्थलचरखचराः ] जो जलचर, स्थलचर, खेचर होते हैं वे-[ वलिना पंचेन्द्रियाः जीवाः ] बलवान पंचेन्द्रिय जीव हैं। टीका:-यह, पंचेन्द्रिय जीवोंके प्रकारकी सूचना है । स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय, चक्षुरिन्द्रिय और श्रोत्रेन्द्रियके आवरणके क्षयोपशमके कारण, मनके आवरणका उदय होनेसे, स्पर्श, रस, गंध, वर्ण और शब्दको जाननेवाले जीव मनरहित पंचेन्द्रिय जीव हैं; कुछ (पंचेन्द्रिय जीव ) तो, उन्हें मनके आवरणका भी क्षयोपशम होनेसे, मनसहित ( पंचेन्द्रिय जीव ) होते हैं । उनमें, देव, मनुष्य और नारकी मनसहित ही होते हैं; तिर्यंच दोनों जातिके ( अर्थात् मनरहित तथा मनसहित) होते हैं ।११७॥ गाथा ११८ अन्वयार्थः- [ देवाः चतुर्णिकायाः ] देवोंके चार निकाय हैं, [ मनुजाः कर्मभोग- नर कर्मभूमिज भोगभूमिज, देव चार प्रकारना । तियं च बहुविध, नारकोना पृथ्वीगत भेदो कह्या ॥११८|| पंचास्तिकायसंग्रह १७६ इन्द्रियभेदेनोक्तानां जीवानां चतुर्गतिसंबंधत्वेनोपसंहारोऽयम् । देवगतिनाम्नो देवायुपश्चोदयाद्देवाः, ते च भवनवासिव्यंतरज्योतिष्कवैमानिकनिकायभेदाचतुर्धा । मनुष्यगति- नाम्नो मनुष्यायुपश्च उदयान्मनुष्याः । ते कर्मभोगभृमिजभेदात् द्वधा । तिर्यग्गतिनाम्नस्तिर्य- गायुषश्च उदयात्तिर्यश्चः । ते पृथिवीशम्बूकयू कोदंशजलचरोरगपक्षिपरिसर्पचतुष्पदादिभेदादनेकधा । नरकगतिनाम्नोनरकायुषश्च उदयानारकाः । ते रत्नशर्करावालुकापमतमोमहातम प्रभाभूमिज- भूमिजाः ] मनुष्य कर्मभूमिज और भोगभूमिज ऐसे दो प्रकारके हैं, [ तिर्यञ्चः बहुप्रकाराः] तिर्यच अनेक प्रकारके हैं [ पुनः ] और [ नारकाः पथिवीमेदगताः] नारकोंके भेद उनकी पृथ्वियोंके भेद जितने हैं। टीका:-यह, इन्द्रियोंके भेदकी अपेक्षासे कहे गए जीवोंका चतुर्गति-सम्बन्ध दर्शाते हुए उपसंहार है ( अर्थात् यहाँ एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रियादिरूप जीवभेदोंका चार गतिके साथ सम्बन्ध दर्शाकर उन जीवभेदोंका उपसंहार किया गया है ) । देवगतिनाम और देवायुके उदयसे ( अर्थात् देवगतिनामकर्म और देवायुकर्मके उदयके निमित्तसे ) देव होते हैं; वे भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिक ऐसे 'निकायभेदोंके कारण . चार प्रकारके हैं। मनुष्यगतिनाम और मनुष्यायुके उदयसे मनुष्य होते हैं; वे कर्मभूमिज और भोगभूमिज ऐसे भेदोंके कारण दो प्रकारके हैं । तिर्यंचगतिनाम और तिर्यंचायुके उदयसे तिर्यच होते हैं; वे पृथ्वी, शंबूक, जूं, डाँस, जलचर, उरग, पक्षी, परिसर्प, चतुष्पाद ( चौपाये ) इत्यादि भेदोंके कारण अनेक प्रकारके हैं । नरकगतिनाम और नरकायुके उदयसे नारक होते हैं; वे 'रत्नप्रभा- भूमिज, शर्कराप्रभाभूमिज, वालुकाप्रभाभूमिज, पंकप्रभाभूमिज, धूमप्रभाभूमिज, तमःप्रभाभूमिज और महातमःप्रभाभूमिज ऐसे भेदोंके कारण सात प्रकारके हैं । उनमें, देव, मनुष्य और नारकी पंचेन्द्रिय ही होते हैं । तिर्यंच तो कुछ पंचेन्द्रिय होते हैं और कुछ एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय और चतुरिन्द्रिय भी होते हैं। :-यहाँ ऐसा तात्पर्य ग्रहण करना चाहिए कि चार गतिसे विलक्षण, स्वात्मोपलब्धि जिसका लक्षण है ऐसी जो सिद्धगति उसकी भावना से रहित जीव भावार्थ:- १. निकाय समूह २. रत्नप्रभाभूमिज रत्नप्रभा नामकी भूमिमें (प्रथम नरकमें ) उत्पन्न ।

नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन १७७ भेदात्सप्तधा । तत्र देवमनुष्यनारकाः पंचेन्द्रिया एव | तिर्यञ्चस्तु केचित्पंचेन्द्रियाः, केचिदेक- द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रिया अपीति ।।११८।। खीणे पुवणिबद्ध गदिणामे बाउसे य से वि खलु । पाउण्णंति य अण्णं गदिमाउस्सं सलेस्सवला ॥ ११६॥ क्षीणे पूर्व निवद्धे गतिनाम्नि आयुपि च तेऽपि खलु । प्राप्नुवन्ति चान्यां गतिमायुष्कं स्वलेश्यावशात् ॥११९।। गत्यायुर्नामोदयनिवृत्त्वाद्देवत्वादीनामनात्मस्वभावत्वोद्योतनमेतत् । क्षीयते हि क्रमेणारब्धफलो गतिनामविशेष आयुर्विशेषश्च जीवानाम् । एवमपि तेषां गत्यंतरस्यायुरंतरस्य च कपायानुरन्जिता योगप्रवृचिर्लेश्या भवति वीजं, ततस्तदुचितमेव गत्यंतरमायुरंतरं च ते अथवा सिद्धसदृश निजशुद्धात्माकी भावनासे रहित जीव जो चतुर्गतिनामकर्म उपार्जित करते हैं उसके उदयवश वे देवादि गतियोंमें उत्पन्न होते हैं ।११८॥ गाथा ११९ अन्वयार्थः-[ पूर्वनिबद्धे ] पूर्ववद्ध [गतिनाम्नि आयुषि च ] गतिनामकर्म और आयुषकर्म [ क्षीणे ] क्षीण होनेसे [ ते यपि ] जीव [ स्वलेश्यावशात् ] अपनी लेश्याके वश [ खलु ] वास्तवमें [ मन्यां गतिम् आयुष्कं च ] अन्य गति और आयुष्य [प्राप्नुवन्ति ] प्राप्त करते हैं। टीका:-यहाँ, गतिनामकर्म और आयुषकर्मके उदयसे निष्पन्न होते हैं इसलिए देवत्वादि अनात्मस्वभावभूत हैं ( अर्थात् देवत्व, मनुष्यत्व, तिर्यंचत्व और नारकत्व प्रात्माका स्वभाव नहीं है ) ऐसा दर्शाया गया है । जीवोंको, जिसका फल प्रारम्भ हो जाता है ऐसा अमुक गतिनामकर्म और अमुक आयुषकर्म क्रमशः क्षयको प्राप्त होता है। ऐसा होने पर भी उन्हें 'कषाय- अनुरंजित योगप्रवृत्तिरूप लेश्या अन्य गति और अन्य आयुषका बीज होती है ( अर्थात् १. कषाय-अनुरंजित= कषायरंजित; कषायसे रंगी हुई। ( कषायसे अनुरंजित योगप्रवृत्ति सो लेश्या है।) गतिनाम ने आयुष्य पूर्वनिबद्ध न्यां क्षय थाय छ । त्यां मन्य गति-आयुष्य पामे जीव निजलेश्यावशे ॥११९।।

१७८ पंचास्तिकायसंग्रह प्राप्नुवन्ति । एवं क्षीणाक्षीणाभ्यामपि पुनः पुनर्नवीभूताभ्यां गतिनामायुःकर्मभ्यामनात्मस्वभाव- भृताभ्यामपि चिरमनुगम्यमानाः संसरंत्यात्मानमचेतयमाना जीवा इति ॥११९|| एदे जीवणिकाया देहप्पविचारमस्सिदा भणिदा । देहविहूणा सिद्धा भव्वा संसारिणो अभव्वा य ॥१२०॥ एते जीवनिकाया देहप्रवीचारमाश्रिताः भणिताः । देहविहीनाः सिद्धाः भव्या संसारिणोऽभव्याश्च ।।१२०॥ लेश्या अन्य गतिनामकर्म और अन्य आयुषकर्मका कारण होती है ), इसलिए उसको उचित ही अन्य गति तथा अन्य आयुष वे प्राप्त करते हैं । इसप्रकार 'क्षीण-अक्षीण- पनेको प्राप्त होने पर भी पुनः पुन: नवीन उत्पन्न होनेवाले गतिनामकर्म और आयुषकर्म (प्रवाहरूपसे )यद्यपि वे अनात्मस्वभावभूत हैं तथापि-चिरकाल (जीवोंके ) साथ साथ रहते हैं इसलिए, आत्माको न चेतनेवाले जीव संसरण करते हैं (अर्थात आत्माका अनुभव न करनेवाले जीव संसारमें परिभ्रमण करते हैं ) । भावार्थ:-जीवोंको देवत्वादिकी प्राप्तिमें पौदुगलिक कर्म विमित्तभूत हैं इसलिए देवत्वादि जीवका स्वभाव नहीं है । [ पुनश्च, देव मरकर देव ही होता रहे और मनुष्य मरकर मनुष्य ही होता रहे-इस मान्यताका भी यहाँ निषेध हुआ। जीवोंको अपनी लेश्याके योग्य ही गति- नामकर्म और आयुषकर्मका बंध होता है और इसलिए उसे योग्य ही अन्य गति-आयुष प्राप्त होती है । ] | ११६ । गाथा १२० अन्वयार्थः-[एते जीवनिकायाः ] यह (पूर्वोक्त ) जीवनिकाय [ देहावीचार- माश्रिताः ] देहमें वर्तनेवाले अर्थात् देहसहित [भणिताः ] कहे गए हैं; [ देहविहीना सिद्धाः ] देहरहित ऐसे सिद्ध हैं । [ संसारिणः ] संसारी [ भव्याः अभव्याः च ] भव्य और अभव्य ऐसे दो प्रकारके हैं। १. पहलेके कर्म क्षीण होते हैं और बादके अक्षीणरूपसे वर्तते हैं। आ उक्त जीवनिकाय सर्वे देहसहित कहेल छे ने देहविरहित सिद्ध छे संसारी भव्य अभव्य छे॥१२०।।

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन १७६ उक्तजीवप्रपंचोपसंहारोऽयम् । एते युक्तप्रकाराः सर्वे संसारिणो देहप्रवीचारा, अदेहप्रवीचारा भगवंतः सिद्धाः शुद्धा जीवाः । तत्र देहप्रवीचारत्वादेकाकारत्वेऽपि संसारिणो द्विप्रकाराः भव्या अभव्याश्च । ते शुद्धस्वरूपोपलम्मशक्तिसद्भावासद्भावाभ्यां पाच्यापाच्यमुद्वद- भिधीयंत इति ॥१२०॥ ण हि इंदियाणि जीवा काया पुण छप्पयार पण्णत्ता । जं हवदि तेसु णाणं जीवो त्ति य तं परूवति ॥१२१॥ न हीन्द्रियाणि जीवाः कायाः पुनः पटप्रकाराः प्रज्ञप्ताः । यद्भवति तेषु ज्ञानं जीव इति च तत्परूपयन्ति ॥ १२१ ।। . टीका:-यह उक्त ( -पहले कहे गए ) जीवविस्तारका उपसंहार है । जिनके प्रकार ( पहले ) कहे गए ऐसे यह समस्त संसारी देहमें वर्तनेवाले ( अर्थात् देहसहित ) हैं; देहमें न वर्तनेवाले ( अर्थात् देहरहित ) ऐसे सिद्धभगवन्त हैं-जो कि शुद्ध जीव हैं। वहां, देहमें वर्तनेकी अपेक्षासे संसारी जीवोंका एक प्रकार होने पर भी वे भव्य और अभव्य ऐसे दो प्रकारके हैं। 'पाच्य' और अपाच्य' मूंगकी भांति, जिनमें शुद्ध स्वरूपकी उपलब्धिकी शक्तिका सदुभाव है उन्हें 'भव्य' और जिनमें शुद्ध स्वरूपकी उपलब्धिकी शक्तिका असदुभाव है उन्हें 'अभव्य' कहा जाता है ।१२०॥ गाथा १२१ अन्वयार्थः-[ न हि इंद्रियाणि जीवा] व्यवहारसे कहे जानेवाले एकेन्द्रियादि तथा पृथ्वीकायिकादि 'जीवोंमें' ) इंद्रियाँ जीव नहीं हैं और [ षट प्रकाराः प्रज्ञता कायाः पुनः ] छह प्रकारकी शास्त्रोक्त कायें भी जीव नहीं हैं; [ तेषु ] उनमें [ यद् ज्ञानं १. पाच्य पकनेयोग्य; रँधनेयोग्य; सीझनेयोग्य; कोरा न हो ऐसा । २. अपाच्य=न पकनेयोग्य; रंधने-सीझनेकी योग्यता रहित; कोरा । ३. उपलब्धि प्राधि; अनुभव । रे! इंद्रियो नहि जीव, पडू विध काय पण नहि जीव छ । छे तेमनामां ज्ञान जे वस ते ज जीव निर्दिष्ट छे ।।१२।।

पंचास्तिकायसंग्रह १८० व्यवहारजीवत्वैकांतप्रतिपचिनिरासोऽयम् । य इमे एकेन्द्रियादयः पृथिवीकायिका- दयश्चानादिजीवपुद्गलपरस्परावगाहमवलोक्य व्यवहारनयेन जीवप्राधान्यान्जीवा इति प्रज्ञाप्यते । निश्चयनयेन तेषु स्पर्शनादीन्द्रियाणि पथिव्यादयश्च कायाः जीवलक्षणभृतचैतन्यस्वभावाभावान जीवा भवतीति । तेष्वेव यत्स्वपरपरिच्छित्तिरूपेण प्रकाशमान ज्ञानं तदेव गुणगुणिनोः कथञ्चिद- भेदान्जीवत्वेन प्ररूप्यत इति ॥१२१॥ जाणदि पस्सदि सव्वं इच्छदि सुक्खं बिभेदि दुक्खादो । कुवदि हिदमहिदं वा भुजदि जीवो फलं तेसि ॥१२२॥ जानाति पश्यति सर्वमिच्छति सौख्यं विमेति दुःखात् । करोति हितमहितं वा भुंक्त जीवः फलं तयोः।। १२२ ।। भवति ] जो ज्ञान है [ तत् जीवः ] वह जीव है [ इति च प्ररूपयन्ति ] ऐसी ( ज्ञानी ) प्ररूपणा करते हैं। टीका:-यह, व्यवहारजीवत्वके एकांतकी 'प्रतिपत्तिका खण्डन है ( अर्थात जिसे मात्र व्यवहारनयसे जीव कहा जाता है उसका वास्तवमें जीवरूपसे स्वीकार करना उचित नहीं है ऐसा यहाँ समझाया है ) । यह जो एकेन्द्रियादि तथा पृथ्वीकायिकादि 'जीव' कहे जाते हैं वे, अनादि जीव-पुद्गलका परस्पर अवगाह देखकर व्यवहारनयसे जीवके प्राधान्य द्वारा (-जीवको मुख्यता देकर ) 'जीव' कहे जाते हैं । निश्चयनयसे उनमें स्पर्शनादि इन्द्रियाँ तथा पृथ्वी-अादि कायें, जीवके लक्षणभूत चैतन्यस्वभावके अभावके कारण, जीव नहीं हैं। उन्हीं में जो स्वपरकी ज्ञप्तिरूपसे प्रकाशित ज्ञान है वही, गुण-गुणीके कथंचित् अभेदके कारण, जीवरूपसे प्ररूपित किया जाता है । १२१ । गाथा १२२ अन्वयार्थः-[जीवः ] जीव [ सर्व जानाति पश्यति ] सब जानता है और देखता है, [ सौख्यम् इच्छति ] सुखकी इच्छा करता है, [ दुःखात् विभेति ] दुःखसे डरता १. प्रतिपत्ति-स्वीकृति; मान्यता। जाणे अने देखे वन्धु, सुख अभिलपे, दुःख थी डरे । हित-अहित नीव करे भने हित-अहितनु फल भोगवे ॥१२२॥ - नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन अन्यासाधारणजीवकार्यख्यापनमेतत् । चैतन्यस्वभावत्वात्कस्थायाः क्रियायाः ज्ञप्तेदृशेश्च जीव एव कर्ता, न तत्संबन्धः पुद्गलो, यथाकाशादि । सुखाभिलापक्रियायाः दुःखो- द्वेगक्रियायाः स्वसंवेदितहिताहितनिर्वर्तनक्रियायाश्च चैतन्यविवर्तरूपसङ्कल्पप्रभवत्वात्स एव कर्ता, नान्यः । शुभाशुभकर्मफलभृताया इष्टानिष्ट विपयोपभोगक्रियायाश्च सुखदुःखम्वरूप- - है [ हितम् अहितम् करोति ] हित-अहितको ( शुभ-अशुभ भावोंको ) करता है [ वा ] और [ तयोः फलं मुंक्त ] उनके फलको भोगता है । टीका:- यह, अन्यसे असाधारण ऐसे जीवकार्योंका कथन है ( अर्थात् अन्य द्रव्योंसे असाधारण ऐसे जो जीवके कार्य वे यहाँ दर्शाये हैं )। चैतन्यस्वभावपनेके कारण, कर्तृ स्थित ( कर्तामें रहनेवाली ) क्रियाका- ज्ञप्ति तथा दृशिका-जीव ही कर्ता है; उसके सम्बन्धमें रहा हुआ पुद्गल उसका कर्ता नहीं है, जिसप्रकार आकाशादि नहीं हैं उसीप्रकार । ( चैतन्यस्वभावके कारण जानने और देखनेकी क्रियाका जीव ही कर्ता है; जहाँ जीव है वहाँ चार अरूपी अचेतन द्रव्य भी हैं तथापि वे जिसप्रकार जानने और देखनेकी क्रियाके कर्ता नहीं हैं उसीप्रकार जीवके साथ सम्बंधमें रहे हुए कर्म-नोकर्मरूप पुद्गल भी उस क्रियाके कर्ता नहीं हैं। ) चैतन्यके विवर्तरूप (-परिवर्तनरूप ) संकल्पकी उत्पत्ति (जीवमें ) होनेके कारण, सुखकी अभिलाषारूप क्रियाका, दुःखके उद्व गरूप क्रियाका तथा स्व- संवेदित हित-अहितकी निष्पत्तिरूप क्रियाका ( -अपनेसे सचेत किए जानेवाले शुभ- अशुभ भावोंको रचनेरूप क्रियाका ) जीव ही कर्ता है; अन्य नहीं है । शुभाशुभ कर्मके फलभूत 'इष्टानिष्टविपयोपभोगक्रियाका, सुख-दुःखस्वरूप स्वपरिणामक्रियाकी भाँति, जीव ही कर्ता है; अन्य नहीं । इससे ऐसा समझाया कि ( उपरोक्त ) असाधारण कार्यों द्वारा पुद्गलसे भिन्न ऐसा आत्मा अनुमेय ( -अनुमान कर सकने योग्य ) है । भावार्थ:- शरीर, इन्द्रिय, मन, कर्म आदि पुद्गल या अन्य कोई अचेतन द्रव्य कदापि जानते नहीं हैं, देखते नहीं हैं, सुखकी इच्छा नहीं करते, दुःखसे डरते १. इष्टानिष्ट विषय जिसमें निमित्तभूत होते हैं ऐसे सुखदुःखपरिणामोंके उपभोगरूप क्रियाको जीव करता है इसलिए उसे इष्टानिष्ट विषयोंके उपभोगरूप क्रियाका कर्ता कहा जाता है।

- १८२ पंचास्तिकायसंग्रह स्वपरिणामक्रियाया इव स एव कर्ता, नान्यः । एतेनासाधारणकार्यानुमेयत्वं पुद्गलव्यतिरिक्त- स्थात्मनोद्योतितमिति ।१२२॥ एवमभिगम्म जीवं अहिं वि पज्जएहिं बहुगेहिं । अभिगच्छदु अज्जीवं गाणंतरिहिं लिंगेहि ॥१२३।। एवभिगम्य जीवमन्यैरपि पर्यायैहुकैः । मभिगच्छत्वजीवं ज्ञानांतरितैर्लिङ्गः ।। १२३ ।। जीवाजीवव्याख्योपसंहारोपक्षेपसूचनेयम् । एवमनया दिशा व्यवहारनयेन कर्मग्रन्थ- प्रतिपादितजीवगुणमार्गणास्थानादिप्रपञ्चितविचित्रविकल्परूपैः, निश्चयनयेन मोहरागद्वेष- नहीं हैं, हित-अहितमें प्रवर्तते नहीं हैं या उनके फलको नहीं भोगते; इसलिए जो जानता है और देखता है, सुखकी इच्छा करता है, दुःखसे भयभीत होता है, शुभ-अशुभ भावोंमें प्रवर्तता है और उनके फलको भोगता है, वह, अचेतन पदार्थों के साथ रहने पर भी सर्व अचेतन पदार्थों की क्रियाओंसे बिलकुल विशिष्ट प्रकारकी क्रियाएँ करनेवाला, एक विशिष्ट पदार्थ है । इसप्रकार जीव नामका चैतन्यस्वभावी पदार्थविशेष-कि जिसका ज्ञानी स्वयं स्पष्ट अनुभव करते हैं वह अपनी असाधारण क्रियाओं द्वारा अनुमेय भी है ।१२२। गाथा १२३ अन्वयार्थ:-[ एवम् ] इसप्रकार [ अन्यः अपि बहुकः पर्याय ] अन्य भी बहुत-सी पर्यायों द्वारा [जीवम् अभिगम्य ] जीवको जानकर [ ज्ञानांतरितः लिङ्ग] ज्ञानसे अन्य ऐसे ( जड़ ) लिंगों द्वारा [ अजीवम् अभिगच्छतु ] अजीवको जानो। टीका:-यह, जीव-व्याख्यानके उपसंहारकी और अजीव-व्याख्यानके प्रारंभकी सूचना है। इसप्रकार इस निर्देशके अनुसार ( अर्थात् ऊपर संक्षेपमें समझाए अनुसार ), .. वीजाय बहु पर्यायथी ये रीत जाणी जीवने । जाणो अजीवपदार्थ ज्ञानविभिन्न जड लिंगो वडे ॥१२३।।

नवपदार्थ पूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन १८३ परिणतिसंपादितविश्वरूपत्वात्कदाचिदशुद्धैः कदाचिचदभावाच्छुद्धैश्चैतन्यविवर्तग्रन्थिरूपैर्वहुभिः पर्यायैः जीवमधिगच्छेत् । अधिगम्य चैवमचैतन्यस्वभावत्वात् ज्ञानादर्थान्तरभूत रितः प्रपंच्य- मानर्लिङ्गीवसंवद्धमसंबद्धं वा स्वतो भेदबुद्धिप्रसिद्धयर्थमजीवमधिगच्छेदिति ॥१२३॥ -इति जीवपदार्थव्याख्यानं समाप्तम् । अथ अजीवपदार्थव्याख्यानम् । (१) व्यवहारनयसे 'कर्मग्रन्थप्रतिपादित जीवस्थान-गुणस्थान-मार्गणास्थान इत्यादि द्वारा 'प्रपंचित विचित्र भेदरूप बहु पर्यायों द्वारा, तथा (२) निश्चयनयसे मोहराग- द्वेषपरिणतिसंप्राप्त विश्वरूपताके कारण कदाचित् अशुद्ध ( ऐसे ) और कदाचित उसके ( -मोहरागद्वेषपरिणतिके ) अभावके कारण शुद्ध ऐसी चैतन्यविवर्तग्रन्थिरूप वहु पर्यायों द्वारा, जीवको जानो। इसप्रकार जीवको जानकर, अचैतन्यस्वभावके कारण, 'ज्ञानसे अर्थातरभूत ऐसे, यहाँसे ( अबकी गाथानोंमें ) कहे जानेवाले लिंगों द्वारा, 'जीव-सम्बद्ध या जीव-असम्बद्ध अजीवको, अपनेसे भेदबुद्धिकी प्रसिद्धिके अर्थसे . जानो ।१२३॥ इसप्रकार जीव पदार्थका व्याख्यान समाप्त हुआ। अब, अजीव पदार्थका व्याख्यान है। १. कर्मग्रन्थप्रतिपादित-गोम्मटसारादि कर्मपद्धतिके ग्रंथों में प्ररूपित-निरूपित । २. प्रपंचित-विस्तार-पूर्वक कही गई। ३. मोहरागद्वेषपरिणतिके कारण जीवको विश्वरूपता अर्थात् अनेकरूपता प्राप्त होती है। ४. ग्रंथि-गांठ। [जीवकी कदाचित् अशुद्ध और कदाचित् शुद्ध ऐसी पर्यायें चैतन्यविवर्तकी- चैतन्यपरिणमनकी--प्रन्थियां हैं। निश्चयनयसे उनके द्वारा जीवको जानो। ५. ज्ञानसे अर्थान्तरभूत ज्ञानसे अन्यवस्तुभूत; ज्ञानसे अन्य अर्थात् जड़ । [ अजीवका स्वभाव मचैतन्य होनेके कारण ज्ञानसे अन्य ऐसे जड़ चिह्नों द्वारा वह ज्ञात होता है। ] ६. जीवके साथ सम्बद्ध या जीवके साथ असम्बद्ध ऐसे अजीवको जाननेका प्रयोजन यह है कि समस्त अजीव अपनेसे ( स्वजीवसे ) बिलकुल भिन्न हैं ऐसी बुद्धि उत्पन्न हो।

१९४ पंचास्तिकायसंग्रह मागासकालपोग्गलधम्माधम्मसु णत्थि नीवगुणा । तेसि अचेदणत्तं भणि जीवस्स चेदपदा ॥ १२४ ॥ आकाशकालपुद्गलधर्माधर्मपु न सन्ति जीवगुणाः । तेषामचेतनत्वं भणितं जीवस्य चेतनता ।। १२४ ।। माकाशादीनामेवाजीवत्वे हेतूपन्यासोऽयम् । आकाशकालपुद्गलधर्माधर्मेषु चैतन्य- विशेषरूपा जीवगुणा नो विद्यते, आकाशादीनां तेपामचेतनत्वसामान्यत्वात् । अचेतनत्वसामान्य चाकाशादीनामेष, जीवस्यैव चेतनत्वसामान्यादिति ॥१२४|| सुहदुक्खजाणणा वा हिदपरियम्मं च अहिदभीरत्तं । जस्स ण विज्जदि णिच्चं समणा बेंति अज्जीवं ॥१२॥ - गाथा १२४ अन्वयार्थ:-[ आकाशकालपुद्गलधर्माधर्मेषु ] आकाश, काल, पुद्गल, धर्म और अधर्ममें [जीवगुणाः न सन्ति ] जीवके गुण नहीं हैं; ( क्योंकि ) [ तेषाम् अचेतनत्वं भणितम् ] उन्हें अचेतनपना कहा है, [ जीवस्य चेतनता ] जीवको चेतनता कही है। टीका:-यह, आकाशादिका ही अजीवपना दर्शानेके लिए हेतुका कथन है। आकाश, काल, पुद्गल, धर्म और अधर्ममें चैतन्यविशेषोंरूप जीवगुण विद्यमान नहीं है। क्योंकि उन आकाशादिको अचेतनत्वसामान्य है और अचेतनत्वसामान्य आकाशादिको ही है, क्योंकि जीवको ही चेतनत्वसामान्य है ।१२४। . छे जीवगुण नहि आत्म-धर्म-अधर्म-पुद्गल-कालमां । तेमां अचेतनता कही, चेतनपणु का जीवमां ॥१२४।। सुखदुःखसंचेतन, अहितनी भीति, उधम हित विपे । भने कदी होता नथी, तेने अजीव श्रमणो कहे ॥१२॥ - नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन सुखदुःखज्ञानं वा हितपरिकर्म चाहितभीरुत्वम् । यस्य न विद्यते नित्यं तं श्रमणा विदंत्यजीवम् ॥ १२॥ आकाशादीनामचेतनत्वसामान्य पुनरनुमानमेतत् । सुखदुःखज्ञानस्य हितपरिकर्मणो- ऽहितभीरुत्वस्य चेति चैतन्यविशेषाणां नित्यमनुपलब्धेरविद्यमानचैतन्यसामान्या एवाकाशादयोऽ- जीवा इति ॥ १२५ ॥ गाथा १२५ अन्वयार्थः-[ सुखदुःखज्ञानं वा ] सुखदुःखका ज्ञान, [ हितपरिकर्म ] हितका उद्यम [च ] और [ अहितभीरुत्वम् ] अहितका भय-[ यस्य नित्यं न विद्यते ] यह जिसे सदैव नहीं होते, [ तम् ] उसे [श्रमणाः ] श्रमण [ अजीवम् विंदति ] अजीव कहते हैं। टीका:-यह पुनश्च, आकाशादिका अचेतनत्वसामान्य निश्चित करनेके लिए अनुमान है। आकाशादिको सुखदुःखका ज्ञान, 'हितका उद्यम और अहितका भय-इन चैतन्यविशेषोंकी सदा अनुपलब्धि है ( अर्थात् यह चैतन्यविशेष आकाशादिको किसी काल नहीं देखे जाते ), इसलिए ( ऐसा निश्चित होता है कि ) आकाशादि अजीवों- को चैतन्यसामान्य विद्यमान नहीं है । भावार्थ:-जिसे चेतनत्वसामान्य हो उसे चेतनत्वविशेष होना ही चाहिए । जिसे चेतनत्वविशेष न हो उसे चेतनत्वसामान्य भी नहीं होता । अब, आकाशादि पांच द्रव्योंको सुखदुःखका संचेतन, हितके लिए प्रयत्न और अहितकी भीति-यह चेतनत्व- विशेष कभी देखे नहीं जाते; इसलिए निश्चित होता है कि आकाशादिको चेतनत्व- सामान्य भी नहीं है अर्थात् अचेतनत्वसामान्य ही है । १२५ । १. हित और अहितके सम्बन्धमें प्राचार्यवर श्री जयसेनाचार्यदेवकृत तात्पर्यवृत्ति नामक टीकामें निम्नोक्तानुसार विवरण है:- अज्ञानी जीव फूलको माला, स्त्री, चंदनादिको तथा उनके कारणभूत दानपूजादिको हित समझते हैं और सर्प, विष, कंटकादिको अहित समझते हैं। सम्यग्ज्ञानी जीव अक्षय अनंत सुखको तथा उसके कारणभूत निश्चयरत्नत्रयपरिणत परमात्मद्रव्यको हित समझते हैं और आकुलताके उत्पादक ऐसे दुःखको तथा उसके कारणभूत मिथ्यात्वरागादिपरिणत वात्मद्रव्यको अहित समझते हैं। २४ - पंचास्तिकायसंग्रह संठाणा संघादा वण्णरसप्फासगंधसद्दा य । पोग्गलदव्वप्पभवा होति गुणा पज्जया य बहू ॥१२६॥ अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागणमसइं। जाण अलिंगग्गहणं नीवमणिद्दिष्ट्रसंठाणं ॥१२७॥ संस्थानानि संघाताः वर्णरसस्पर्शगंधशब्दाश्च । पुद्गलद्रव्यप्रभवा भवन्ति गुणाः पर्यायाश्च बहवः ॥१२६।। अरसमरूपमगंधमव्यक्तं चेतनागुणमशब्दम् । जानीद्यलिङ्गग्रहणं जीवमनिर्दिष्टसंस्थानम् ।। १२७ ।। जीवपुद्गलयोः संयोगेऽपि भेदनिर्वधनस्वरूपाख्यानमेतत् । यत्खलु शरीरशरीरिसंयोगे स्पर्शरसगंधवर्णगुणत्वात्सशब्दत्वात्संस्थानसङ्घातादिपर्यायपरिणतत्वाच्च इन्द्रियग्रहणयोग्यं, तत्पु- गाथा १२६-१२७ अन्वयार्थ:-[ संस्थानानि ] ( समचतुरस्रादि ) संस्थान, [ संघाताः ] (औदारिक शरीर सम्बन्धी ) संघात, [वर्णरसस्पर्शगंधशब्दाः च ] वर्ण, रस, स्पर्श, गंध और शब्द-[ वहवः गुणाः पर्यायाः च ] ऐसे जो बहु · गुण और पर्यायें हैं, [पुद्गलद्रव्यप्रभवाः भवन्ति ] वे पुद्गलद्रव्यनिष्पन्न हैं । [ अरसम् अरूपम् अगंधस् ] जो अरस, अंरूप तथा अगंध है, [अव्यक्तम् ] अव्यक्त है, [ अशब्दम् ] अशब्द है, [ अनिर्दिष्टसंस्थानम् ] अनिर्दिष्ट-संस्थान है ( अर्थात जिसका कोई संस्थान नहीं कहा ऐसा है ), [ चेतनागुणम् ] चेतनागुणवाला है और [ अलिङ्गग्रहणम् ] इंद्रियों द्वारा अग्राह्य है, [जीवं जानीहि ] उसे जीव जानो। टीका:-जीव-पुदुगलके संयोगमें भी, उनके भेदके कारणभूत स्वरूपका यह कथन है (अर्थात् जीव और पुद्गलके संयोगमें भी, जिसके द्वारा उनका भेद जाना जा सकता है ऐसे उनके भिन्न-भिन्न स्वरूपका यह कथन है )। . संस्थान-संघातो, वरण-रस-गंध-शब्द-स्पर्श जे । ते बहु गुणो ने पर्ययो पुद्गलदरव निष्पन्न छे ।।१२६॥ जे चेतनागुण, अरसरूप, अगंधशब्द, अव्यक्त छ । निर्दिष्ट नहि संस्थान, इन्द्रियग्राह्य नहि, ते जीव छे ।।१२७॥

१८७ नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन द्गलद्रव्यम् । यत्पुनरस्पर्शरसगंधवर्णगुणत्वादशब्दत्वादनिर्दिष्टसंस्थानत्वादव्यक्तत्वादिपर्यायः परिणतत्वाच नेन्द्रियग्रहणयोग्यं, तच्चतनागुणत्वात् रूपिभ्योऽरूपिभ्यश्चाजीवेभ्यो विशिष्टं जीवद्रव्यम् । एवमिह जीवानीक्योर्वास्तवो भेदः सम्यग्ज्ञानिनां मार्गप्रसिद्धयर्थं प्रतिपादित इति ।। १२६-१२७ ॥ -इति अजीवपदार्थव्याख्यानं समाप्तम् । शरीर और 'शरीरीके संयोगमें, ( १ ) जो वास्तवमें स्पर्श-रस-गंध-वर्ण- गुणवाला होनेके कारण, सशब्द होनेके कारण तथा संस्थान-संघातादि पर्यायोंरूपसे परिणत होनेके कारण इन्द्रियग्रहणयोग्य है, वह पुद्गलद्रव्य है; और ( २ ) जो स्पर्श- रस-गंध-वर्ण गुणरहित होनेके कारण, अशब्द होनेके कारण, अनिर्दिष्टसंस्थान होनेके कारण तथा अव्यक्तत्वादि पर्यायोंरूपसे परिणत होनेके कारण इन्द्रियग्रहणयोग्य नहीं है, वह चेतनागुणमयपनेके कारण रूपी तथा अरूपी अजीवोंसे विशिष्ट ( भिन्न ) ऐसा जीवद्रव्य है। इसप्रकार यहां जीव और अजीवका वास्तविक भेद सम्यग्ज्ञानियोंके मार्गकी प्रसिद्धिके हेतु प्रतिपादित किया गया । [ भावार्थ:-अनादि मिथ्यावासनाके कारण जीवोंको स्वयं कोन है उसका वास्तविक ज्ञान नहीं है और अपनेको शरीरादिरूप मानते हैं। उन्हें जीवद्रव्य तथा अजीवद्रव्यका यथार्थ भेद दर्शाकर मुक्तिका मार्ग प्राप्त करानेके हेतु यहाँ जड़-पुद्गल- द्रव्यके और चेतन जीवद्रव्यके वीतरागसर्वज्ञकथित लक्षण कहे गए। जो जीव उन लक्षणोंको जानकर अपनेको स्वतःसिद्ध स्वतंत्र द्रव्यरूपसे पहिचानकर, भेदविज्ञानी अनुभवी होता है, वह निजात्मद्रव्यमें लीन होकर मोक्षमार्गको साधकर शाश्वत निराकुल सुखका भोक्ता होता है। ] । १२६-१२७ । इसप्रकार अजीव पदार्थका व्याख्यान समाप्त हुआ। १. शरीरी-देही; शरीरवाला (अर्थात् प्रात्मा )। २. अव्यक्तत्वादि-अव्यक्त आदि; अप्रगटत्व आदि । ३. विशिष्ट-भिन्न; विलक्षण, मुख्य प्रकारका ।

१८८
पंचास्तिकायसंग्रह
उक्तौ मूलपदाथौं । अथ संयोगपरिणामनिवृत्चेतरसप्तपदार्थानामुपोद्घातार्थ जीव-
पुद्गलकर्मचक्रमनुवर्ण्यते-
जो खलु संसारत्थो जीवो तत्तो दु होदि परिणामो।
परिणामादो कम्मं कम्मादो होदि गदिसु गदी ॥१२८॥
गदिमधिगदस्स देहो देहादो इंदियाणि जायते ।
तेहि दु बिसयग्गहणं तत्तो रागो व दोसो वा ॥१२॥
जायदि जीवस्सेवं भावो संसारचक्कवालम्मि ।
इदि जिणवरेहि भणिदो अणादिणिधणो सणिधणो वा ॥१३०॥
या खलु संसारस्थो जीवस्ततस्तु भवति परिणामः ।
परिणामात्मकर्म कर्मणो भवति गतिषु गतिः ॥ १२८ ।।
गतिमधिगतस्य देहो देहादिन्द्रियाणि आयते । .
तैस्तु विषयग्रहणं ततो रागो वा द्वेपो वा ॥ १२९ ।।
जायते जीवस्यैवं भावः संसारचक्रवाले ।
इति जिनवरैर्भणितोऽनादिनिधनः सनिधनो वा ॥ १३० ॥
दो मूलपदार्थ कहे गए । अब ( उनके ) संयोगपरिणामसे निष्पन्न होनेवाले
अन्य सात पदार्थोके उपोद्घातके हेतु जीवकर्म और पुद्गलकर्मके चक्रका वर्णन किया
जाता है।
गाथा १२८-१३०
अन्वयार्थ:-[य] जो [ खलु ] वास्तवमें [ संसारस्थः जीवः ] संसारस्थित
संसारगत जे जीव के परिणाम तेने थाय छ
परिणामथी कर्मों, करमथी गमन गतिमां थाय छे ।।१२८।।
गतिप्राप्तने तन थाय, तनथी इन्द्रियो वणी थाय छ ।
अनाथी विषय ग्रहाय, रागद्वेष तेथी थाय छे ॥१२९।।
मेरीत भाव अनादिनिधन अनादिसांत थया करे ।
संसारचक्र विपे जीवोने-अम जिनदेवो कहे ॥ १३० ॥

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन १८६ । इह हि संसारिणो जीवादनादिवंधनोपाधिवशेन स्निग्धा परिणामो भवति । परि- णामात्पुनः पुद्गलपरिणामात्मकं कर्म । कर्मणो नारकादिगतिषु गतिः। गत्यधिगमनाइहा देहादिन्द्रियाणि । इन्द्रियेभ्यो विषयग्रहणम् | विषयग्रहणाद्रागद्वेषौ । रागद्वेषाभ्यां पुनः स्निग्धः परिणामः । परिणामात्पुनः पुद्गलपरिणामात्मकं कर्म । कर्मणः पुनारकादिगतिः गतिः । गत्यधिगमनात्पुनर्देहः । देहात्पुनरिन्द्रियाणि । इन्द्रियेभ्यः पुनर्विषयग्रहणम् । विषय- ग्रहणात्पुना रागद्वेषौ । रागद्वेपाभ्यां पुनरपि स्निग्धः परिणामः । एवमिदमन्योन्यकार्यकारण- भृतजीवपुद्गलपरिणामात्मकं कर्मजालं संसारचक्र जीवस्यानाधनिधनं अनादिसनिधनं वा चक्रवत्प- जीव है [ ततः तु परिणामः भवति ] उससे परिणाम होता है ( अर्थात् उसे स्निग्ध परिणाम होता है ), [ परिणामात् कर्म ] परिणामसे कर्म और [कर्मणः ] कर्मसे [गतिपु गतिः भवति ] गतियोंमें गमन होता है । [गतिम् अधिगतस्य देहः ] गतिप्राप्तको देह होती है, [देहात् इन्द्रियाणि जायते ] देहसे इन्द्रियाँ होती हैं, [तैःतु विषयग्रहणं ] इन्द्रियोंसे विषयग्रहण और [तता रागः वा द्वेपः वा] विषयग्रहणसे राग अथवा द्वेष होता है। [एवं भाव.] ऐसे भाव, [ संसारचक्रवाले ] संसारचक्रमें [ जीवस्य ] जीवको [ अनादिनिधनः सनिपनः वा] अनादि-अनन्त अथवा अनादि-सांत [ जायते ] होते. रहते हैं- [इति जिनवरः भणितः ] ऐसा जिनवरोंने कहा है । टीका:-इस लोकमें संसारी जीवसे अनादि बंधनरूप उपाधिके वश स्निग्ध परिणाम होता है। परिणामसे पुद्गलपरिणामात्मक कर्म, कर्मसे नरकादि गतियोंमें गमन, गतिकी प्राप्तिसे देह, देहसे इंद्रियाँ, इन्द्रियोंसे विषयग्रहण, विषयग्रहणसे रागद्वेष, रागद्वेषसे फिर स्निग्ध परिणाम, परिणामसे फिर पुद्गलपरिणामात्मक कर्म, कर्मसे फिर नरकादि गतियोंमें गमन, गतिकी प्राप्तिसे फिर देह, देहसे फिर इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंसे फिर विषयग्रहण, विषयग्रहणसे फिर रागद्वेष, रागद्वेषसे फिर स्निग्ध परिणाम । इसप्रकार यह अन्योन्य 'कार्यकारणभूत जीवपरिणामात्मक और पुदुगलपरिणामात्मक . १. कार्य अर्थात् नैमित्तिक और कारण अर्थात् निमित्त । [ जीवपरिणामात्मक कर्म और पुद्गल- परिणामात्मक कर्म परस्पर कार्यकारणभूत अर्थात नैमित्तिक-निमित्तभूत हैं। वे कर्म किसी जीवको अनादि-अनन्त लौर किसीको अनादि-सांत होते हैं।

१६. पंचास्तिकायसंग्रह रिवर्तते । तदत्र पुद्गलपरिणामनिमिचो जीवपरिणामो जीवपरिणामनिमिचः पुद्गलपरिणामश्च वक्ष्यमाणपदार्थवीजत्वेन संप्रधारणीय इति ॥ १२८-१३०॥ कर्मजाल संसारचक्रमें जीवको अनादि-अनन्तरूपसे अथवा अनादि-सांतरूपसे चक्रकी भांति पुनः पुनः होते रहते हैं। इसप्रकार यहां ( ऐसा कहा कि ), पुद्गलपरिणाम जिनका निमित्त है ऐसे जीवपरिणाम और जीवपरिणाम जिनका निमित्त है ऐसे पुद्गलपरिणाम अव कहे जाने- वाले ( पुण्यादि सात ) पदार्थोंके वीजरूप अवधारना । भावार्थ:-जीव और पुद्गलको परस्पर निमित्त-नैमित्तिकरूपसे परिणाम होता है । उस परिणामके कारण पुण्यादि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जिनका वर्णन अगली गाथाओंमें किया जाएगा। प्रश्ना-पुण्यादि सात पदार्थोंका प्रयोजन जीव और अजीव इन दो से ही पूरा हो जाता है, क्योंकि वे जीव और अजीवकी ही पर्यायें हैं । तो फिर वे सात पदार्थ किसलिए कहे जा रहे हैं ? उचर-भव्योंको हेय तत्त्व और उपादेय तत्त्व ( अर्थात् हेय और उपादेय तत्त्वोंका स्वरूप तथा उनके कारण ) दर्शानेके हेतु उनका कथन है । दुःख वह हेयतत्त्व है, उसका कारण संसार है, संसारका कारण प्रास्रव और बंध दो हैं ( अथवा विस्तार पूर्वक कहें तो पुण्य, पाप, आस्रव और बंध चार हैं ) और उनका कारण मिथ्यादर्शन- ज्ञान-चारित्र है । सुख वह उपादेय तत्त्व है, उसका कारण मोक्ष है, मोक्षका कारण संवर और निर्जरा है और उनका कारण सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र है। यह प्रयोजनभूत बात भव्य जीवोंको प्रगटरूपसे दर्शानेके हेतु पुण्यादि 'सात पदार्थोंका कथन है । १२८-१३० १. अज्ञानी और ज्ञानी जीव पुण्यादि सात पदार्थों से किन-किन पदार्थोके कर्ता हैं तत्सम्बन्धी वाचार्यवर श्री जयसेनाचार्यदेवकृत तात्पर्यवृत्ति नामकी टीकामें निम्नोक्तानुसार वर्णन है :- अज्ञानी जीव निर्विकार स्वसंवेदनके अभावके कारण पापपदार्थका तथा आस्रवबंध- पदार्थों का कर्ता होता है; कदाचित् मंद मिथ्यात्वके उदयसे, देखे हुए-सुने हुए - अनुभव किए हुए भोगोंकी आकांक्षारूप निदानबन्ध द्वारा, भविष्यकालमें पापका अनुबन्ध करनेवाले पुण्य- नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन ११ अथ पुण्यपापपदार्थव्याख्यानम् । मोहो रागो दोसो चित्तपसादो य जस्स भावम्मि । विज्जदि तस्स सुहो वा असुहो वा होदि परिणामो ॥१३१॥ मोहो रागो द्वेषश्चितप्रसादः वा यस्य भावे । विद्यते तस्य शुभो वा अशुभो वा भवति परिणामः ॥१३१।। पुण्यपापयोग्यभावस्वभावाख्यापनमेतत् । इह हि दर्शनमोहनीयविपाककलुषपरिणामता मोहः । विचित्रचारित्रमोहनीयविपाकप्रत्यये प्रीत्यप्रीती रागद्वेषौ । तस्यैव मंदोदये विशुद्ध- अब पुण्य-पापपदार्थका व्याख्यान है। गाथा १३१ मन्वयार्थ:-[यस्य भावे ] जिसके भावमें [ मोहः ] मोह, [ रागः] राग, [ द्वेषः] द्वष [वा ] अथवा [ चिचप्रसादः ] चित्तप्रसन्नता [ विद्यते ] है, [ तस्य ] उसे [ शुभः वा अशुभा वा ] शुभ अथवा अशुभ [ परिणामः ] परिणाम [ भवति ] है । टीका:-यह, पुण्य-पापके योग्य भावके स्वभावका ( -स्वरूपका ) . कथन है। यहाँ, दर्शनमोहनीयके विपाकसे जो कलुषित परिणाम वह मोह है; विचित्र (-अनेक प्रकारके ) चारित्रमोहनीयका विपाक जिसका आश्रय (-निमित्त ) है पदार्थका भी कर्ता होता है। जो ज्ञानी जीव है वह, निर्विकार-आत्मतत्त्वविषयक रुचि, तद्विषयक ज्ञप्ति और तद्विषयक निश्चल अनुभूतिरूप अभेदरत्नत्रयपरिणाम द्वारा, संवर- निर्जरा-मोक्षपदार्थोंका कर्ता होता है; और जीव जब पूर्वोक्त निश्चयरत्नत्रयमें स्थिर नहीं रह सकता तब निर्दोषपरमात्मस्वरूप अहंत-सिद्धोंकी तथा उनका (निर्दोष परमात्माका) साराधन करनेवाले आचार्य-उपाध्याय-साधुओंको निर्भर असाधारण भक्तिरूप ऐसा जो संसारविच्छेदके कारणभूत, परम्परासे मुक्तिकारणभूत, तीर्थंकरप्रकृति आदि पुण्यका अनुबन्ध करनेवाला विशिष्ट पुण्य उसे अनीहितवृत्तिसे निदानरहित परिणामसे करता है। इसप्रकार अज्ञानी जीव पापादि चार पदार्थों का कर्ता है और ज्ञानी संवरादि तीन पदार्थोंका कर्ता है। के राग, द्वेष, विमोह, चिचप्रसादपरिणति जेहने । ते जीवने शुभ वा अशुभ परिणामनो सद्भाव छ ॥१३॥ - १६२ पंचास्तिकायसंग्रह . - परिणामता चिचप्रसादपरिणामः । एवमिमे यस्य भावे भवन्ति, तस्यावश्यं भवति शुभोऽशुभो वा परिणामः । तत्र यत्र प्रशस्तरागश्चित्तप्रसादश्च तत्र शुभः परिणामः, यत्र तु मोहद्वपाव- प्रशस्तरागश्च तत्राऽशुभ इति ।। १३१ ॥ सुहपरिणामो पुण्णं अतुहो पावं ति हवदि जीवस्स । दोण्हं पोग्गलमेत्तो भावो कम्मत्तणं पत्तो ॥१३२।। शुभपरिणामः पुण्यमशुभः पापमिति भवति जीवस्य । द्वयोः पुद्गलमात्रो भावः कर्मत्वं प्राप्तः || १३२ ।। ऐसी प्रीति-अप्रीति वह राग-द्वष है; उसीके ( -चारित्रमोहनीयके ही ) मंद उदयसे होनेवाले जो विशुद्ध परिणाम वह 'चित्तप्रसादपरिणाम (-मनकी प्रसन्नतारूप परिणाम ) है । इसप्रकार यह ( मोह, राग, द्वेष अथवा चित्तप्रसाद ) जिसके भावमें है उसे अवश्य शुभ अथवा अशुभ परिणाम है । उसमें, जहाँ प्रशस्त राग तथा चित्त- प्रसाद है वहाँ शुभ परिणाम है और जहाँ मोह, द्वेष तथा अप्रशस्त राग है वहाँ अशुभ परिणाम है। १३१ । गाथा १३२ अन्वयार्थः- [बीवस्य ] जीवके [ शुभ परिणामः ] शुभपरिणाम [ पुण्यम् ] पुण्य हैं और [ अशुभा ] अशुभ परिणाम [ पापम् इति भवति ] पाप हैं; [ द्वयोः ] उन दोनोंके द्वारा [ पुद्गलमात्रा भावः ] पुद्गलमात्र भाव [ कर्मत्वं प्राप्तः ] कर्मपनेको प्राप्त होते हैं ( अर्थात् जीवके पुण्य-पापभावके निमित्तसे साता-असातावेदनीयादि पुद्गलमात्र परिणाम व्यवहारसे जीवका कर्म कहे जाते हैं ) । [ यहाँ ज्ञानीके विशिष्ट पुण्यको संसारविच्छेदके कारणभूत कहा वहाँ ऐसा समझना कि वास्तवमें तो सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र ही संसारविच्छेदके कारणभूत हैं, परन्तु जब वह सम्य- ग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र अपूर्णदशामें होता है तब उसके साथ अनिच्छितवृत्तिसे वर्तते हुए विशिष्ट पुण्यमें संसारविच्छेदके कारणपनेका आरोप किया जाता है। वह आरोप भी वास्तविक कारणके-सम्यग्दर्शनादिके अस्तित्वमें ही हो सकता है।] १. प्रसाद प्रसन्नता, विशुद्धता; उज्ज्वलता। शुभ भाव जीवना पुण्य छे ने अशुभ भावो पाप छ । तेना निमित्त पौद्गलिक परिणाम कर्मपणु लहे ॥१३२।।

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन पुण्यपापस्वरूपाख्यानमेतत् । जीवस्य कर्तुनिश्चयकर्मतामापनः शुभपरिणामो द्रव्यपुण्यस्य निमित्तमात्रत्वेन कारणीभूतत्वाचदास्रवक्षणादूचं भवति भावपुण्यम् । एवं जीवस्य कर्तुनिश्चयकर्मतामापन्नोऽशुभपरिणामो द्रव्यपापस्य निमित्तमात्रत्वेन कारणीभूतत्वात्तदास्र- वक्षणावं भावपापम् । पुद्गलस्य कर्तुनिश्चयकर्मतामापन्नो विशिष्टप्रकृतित्वपरिणामो नीवशुभ- टीका:-यह, पुण्य-पापके स्वरूपका कथन है । जीवरूप कर्ताक 'निश्चयकर्मभूत शुभपरिणाम द्रव्यपुण्यको निमित्तमात्ररूपसे कारणभूत हैं इसलिए 'द्रव्यपुण्यास्रवके' प्रसंगका अनुसरण करके (-अनुलक्ष करके ) वे शुभपरिणाम 'भावपुण्य' हैं । ( सातावेदनीयादि द्रव्यपुण्यास्रवका जो प्रसंग बनता है उसमें जीवके शुभपरिणाम निमित्तकारण हैं इसलिए 'द्रव्य पुण्यास्रव' प्रसंगके पीछे- पीछे उसके निमित्तभूत शुभपरिणामको भी 'भावपुण्य' ऐसा नाम हैं। ) इसप्रकार जीवरूप कर्ताके निश्चयकर्मभूत अशुभ परिणाम द्रव्यपापको निमित्तमात्ररूपसे कारणभूत हैं इसलिए 'द्रव्यपापास्रवके' प्रसंगका अनुसरण करके (-अनुलक्ष करके ) वे अशुभ- परिणाम 'भावपाप' हैं। पुद्गलरूप कर्ताके 'निश्चयकर्मभूत विशिष्टप्रकृतिरूप परिणाम ( -सातावेद- . नीयादि मुख्य प्रकृतिरूप परिणाम )-कि जिनमें जीवके शुभपरिणाम निमित्त हैं वे-द्रव्यपुण्य हैं । पुद्गलरूप कर्ताके निश्चयकर्मभूत विशिष्टप्रकृतिरूप परिणाम (-असातावेदनीयादि विशिष्ट प्रकृतिरूप परिणाम )-कि जिनमें जीवके अशुभपरिणाम निमित्त हैं वे-द्रव्यपाप हैं । इसप्रकार व्यवहार तथा निश्चय द्वारा आत्माको मूर्त तथा अमूर्त कर्म दर्शाया गया। भावार्थ:-निश्चयसे जीवके अमूर्त शुभाशुभपरिणामरूप भावपुण्यपाप जीवका कर्म हैं । शुभाशुभपरिणाम द्रव्यपुण्यपापका निमित्तकारण होनेके कारण मूर्त ऐसे वे १. जीव कर्ता है और शुभपरिणाम उसका (अशुद्धनिश्चयनयसे ) निश्चयकर्म है। २. पुद्गल कर्ता है और विशिष्टप्रकृतिरूप परिणामं उसका निश्चयकर्म है (अर्थात् निश्चयसे पुद्गल कर्ता है और सातावेदनीयादि विशिष्ट प्रकृतिरूप परिणाम उसका कर्म है)।

पंचास्तिकायसंग्रह परिणामनिमिचो द्रव्यपुण्यम् । पुद्गलस्य कर्तुनिश्चयकर्मतामापन्नो विशिष्टप्रकृतित्वपरिणामो जीवाशुभपरिणामनिमिचो द्रव्यपापम् । एवं व्यवहारनिश्चयाम्यामात्मनो मूर्तममूर्त च कर्म प्रज्ञापितमिति ।। १३२ ॥ जम्हा कम्सस्स फलं विसयं फासेहि भुजदे णियदं । जीवेण सुहं दुक्खं तम्हा कम्माणि मुत्ताणि ॥ १३३ ।। यस्मात्कर्मणः फलं विषयः स्पशेर्भुज्यते नियतम् । जीवेन सुखं दुःखं तस्मात्कर्माणि मूर्तानि ॥ १३३ ।। मूर्तकर्मसमर्थनमेतत् । यतो हि कर्मणां फलभूतः सुखदुःखहेतुविषयो मूर्तो मूतैरिन्द्रि- पुद्गलपरिणामरूप ( साता-असातावेदनीयादि ) द्रव्यपुण्यपाप व्यवहारसे जीवका कर्म कहे जाते हैं । १३२ । गाथा १३३ अन्वयार्थ:-[ यस्मात् ] क्योंकि [ कर्मणः फलं ] कर्मका फल [ विषयः ] जो ( मूर्त ) विषय वे [ नियतम् ] नियमसे [ स्पशः] ( मूर्त ऐसी ) स्पर्शनादिइन्द्रियों द्वारा [ जीवेन ] जीव द्वारा [ सुखं दुःखं ] सुखरूपसे अथवा दुःखरूपसे [ भुज्यते ] भोगे जाते हैं, [ तस्मात् ] इसलिए [ कर्माणि ] कर्म [ मूर्तानि ] मूर्त हैं । टीका:-यह, मूर्त कर्मका समर्थन है । कर्मका फल जो सुख-दुःखके हेतुभूत मूर्त विषय वे नियमसे मूर्त इन्द्रियों द्वारा जीवसे भोगे जाते हैं, इसलिए कर्मके मूर्तपनेका अनुमान हो सकता है । वह इसप्रकार:- जिसप्रकार मूषकविष मूर्त है उसीप्रकार कर्म मूर्त है, क्योंकि ( मूषकविषके फलकी भांति ) मूर्तके सम्बन्ध द्वारा अनुभवमें आनेवाला ऐसा मूर्त उसका फल है। [ चूहेके विषका फल (-शरीरमें सूजन आना, बुखार आना आदि ) मूर्त है और मूर्त शरीरके सम्वन्ध द्वारा अनुभवमें आता है-भोगा जाता है। इसलिए अनुमान हो सकता है कि चूहेका विष मूर्त है; उसीप्रकार कर्मका फल ( -विषय ) मूर्त है और मूर्त इन्द्रियोंके के कर्मनु फल विषय, तेने नियमथी अक्षो वडे । जीव भोगवे दुःख-सुखे, तेथी करम ते मूर्त छे ॥१३३।।

१६५
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नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन
यैर्जीवन नियतं भुज्यते, ततः कर्मणां मूर्तत्वमनुमीयते । तथा हि-मूत कर्म, मूर्तसंबंधेनानुभूय-
मानमूर्तफलत्वादासुविषवदिति ॥ १३३ ।।
मुत्तो फासदि मुत्तं मुत्तो मुत्तेण बंधमणुहवदि ।
जीवो मुत्तिविरहिदो गाहदि ते तेहिं उग्गहदि ॥१३४॥
मूर्तः स्पृशति मूतं मृतॊ मूर्तेन बंधमनुभवति ।
जीवो मूर्तिविरहितो गाहति तानि तैरवगाह्यते ॥१३४॥
मूर्तकर्मणोरमूर्तजीयमूर्तकर्मणोश्चबंध प्रकारसूचनेयम् । इह हि संसारिणि जीवेऽना-
दिसंतानेन प्रवृत्तमास्ते मूर्तकर्म । तत्स्पर्शादिमत्त्वादागामि मर्तकर्म स्पृशति, ततस्तन्मूतं तेन सह
स्नेहगुणवशाद्वंधमनुभवति । एष मूर्तयोः कर्मणोर्बन्धप्रकारः। अथ निश्चयनयेनामूर्ती जीवो
संबंध द्वारा अनुभवमें आता है-भोगा जाता है। इसलिए अनुमान हो सकता है कि कर्म
मूर्त है । ] । १३३ ।
गाथा १३४
अन्वयार्थः-[ मूर्तः मूर्त स्पृशति ] मूर्त मूर्तको स्पर्श करता है, [ मूर्त: मूतेन ]
मूर्त मूर्तके साथ [बंधम् अनुभवति ] बंधको प्राप्त होता है; [ मूर्ति विरहितः जीवः ]
मूर्तत्वरहित जीव [ तानि गाहति ] मूर्तकर्मोको अवगाह देता है और [तैः अपगाह्यते ]
मूर्तकर्म जीवको अवगाह देते हैं ( अर्थात् दोनों एक-दूसरेमें अवगाह प्राप्त
-
करते हैं )।
टीका:-यह, मूर्तकर्मका मूर्तकर्मके साथ जो बंधप्रकार तथा अमूर्त जीवका
मूर्तकर्मके साथ जो बंधप्रकार उसकी सूचना है ।
यहाँ ( इस लोकमें ), संसारी जीवमें अनादि संततिसे (-प्रवाहसे )
प्रवर्तता हुआ मूर्तकर्म विद्यमान है । वह, स्पर्शादिवाला होनेके कारण, आगामी मूर्त-
कर्मको स्पर्श करता है। इसलिए मूर्त ऐसा वह उसके साथ, स्निग्धत्वगुणके वश
(-अपनी स्निग्धरूक्षत्वपर्यायके कारण ), बंधको प्राप्त होता है । यह, मूर्तकर्मका.
मूर्तकर्मके साथ बंधप्रकार है ।
मूरत मूरत स्पर्श अने मूरत मूरत बंधन लहे ।
मात्मा अमूरत ने करम अन्योन्य अवगाहन लहे ॥१३४॥

१९६ पंचास्तिकायसंग्रह - ऽनादिमूर्तकर्मनिमिचरागादिपरिणामस्निग्धः सन् विशिष्टतया मूर्तानि कर्माण्यवगाहते, तत्परि- णामनिमिचलब्धात्मपरिणामैः मूर्तकर्मभिरपि विशिष्टतयाऽवगाह्यवे च । अयं त्वन्योम्यावगाहा- त्मको जीवमूर्तकर्मणोधप्रकारः । एवममूर्तस्यापि जीवस्य मूर्तेन पुण्यपापकर्मणा कथञ्चिद्रंधो न विरुध्यते ।। १३४ ॥ -इति पुण्यपापपदार्थव्याख्यानम् । अथ आस्रव पदार्थव्याख्यानम् रागो जस्स पसत्यो अणुकंपासंसिदो य परिणामो। चित्तम्हि पत्थि कलुसं पुण्णं जीवस्स पासवदि ॥१३५॥ रागो यस्य प्रशस्तोऽनुकम्पासंश्रितश्च परिणामः । चिचे नास्ति कालुण्यं पुण्यं जीवस्यास्रवति ।। १३५ ।। पुनश्च ( अमूर्त जीवका मूर्तकर्मों के साथ बंधप्रकार इसप्रकार है कि ) निश्चयनयसे जो अमूर्त है ऐसा जीव, अनादि मूर्तकर्म जिसका निमित्त है ऐसे रागादि- परिणाम द्वारा स्निग्ध वर्तता हुआ, मूर्तकर्मोंको विशिष्टरूपसे अवगाहता है ( अर्थात एक-दूसरेको परिणाममें निमित्तमात्र हों ऐसे सम्बन्धविशेष सहित मूर्तकर्मोंके क्षेत्रमें व्याप्त होता है ) और उस रागादिपरिणामके निमित्तसे जो अपने ( ज्ञानावरणादि ) परिणामको प्राप्त होते हैं ऐसे मूर्तकर्म भी जीवको विशिष्टरूपसे अवगाहते हैं ( अर्थात जीवके प्रदेशोंके साथ विशिष्टतापूर्वक एकक्षेत्रावगाहको प्राप्त होते हैं ) । यह, जीव और मूर्तकर्मका अन्योन्य-अवगाहस्वरूप बंधप्रकार है । इसप्रकार अमूर्त ऐसे जीवका भी मूर्त पुण्यपापकर्मके साथ कथंचित् ( -किसी प्रकार ) बंध विरोधको प्राप्त नहीं होता । १३४ । इसप्रकार पुण्य-पापपदार्थका व्याख्यान समाप्त हुआ। अब मात्रवपदार्थका व्याख्यान है । गाथा १३५ अन्वयार्थः-[ यस्य ] जिस जीवको [प्रशस्तः रागः] प्रशस्त राग है, छ रागभाव प्रशस्त, अनुकंपासहित परिणाम छ। मनमा नहीं कालुष्य हे, त्यां पुण्य-आस्रव होय छे ।।१३।।

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन १९७ पण्यास्रवस्वरूपाख्यानमेतत् । प्रशस्तरागोऽनुकम्पापरिणतिः चिचस्याकलुषत्वं चेति प्रयः शुभा भावाः द्रव्यपुण्यास्रवस्य निमिचमात्रत्वेन कारणभूतत्वाचदास्रवक्षणाचं भाव- पण्यासवः । तन्निमित्तः शुभकर्मपरिणामो योगद्वारेण प्रविशतां पुद्गलानां द्रव्यपुण्यासव इति ॥ १३५ ॥ अरहन्तसिद्धसाहुसु भत्ती धम्मम्मि जा य खलु चेट्ठा । अणुगमणं पि गुरूणं पसत्थरागो त्ति वुच्चंति ॥१३६॥ अर्हसिद्धसाधुषु भक्तिधर्मे या च खलु चेष्टा । अनुगमनमपि गुरूणां प्रशस्तराग इति त्रुवन्ति ॥१३६।। [ अनुकम्पासंश्रितः परिणामः ] अनुकम्पायुक्त परिणाम है [च ] और [चिचे कालुष्यं न अस्ति ] चित्तमें कलुषताका अभाव है, [ जीवस्य ] उस जीवको [ पुण्यम् आस्रवति ] पुण्य प्रास्रवित होता है। टीका:-यह, पुण्यास्रवके स्वरूपका कथन है । प्रशस्त राग, अनुकम्पापरिणति और चित्तकी अकलुषता—यह तीन शुभ भाव द्रव्यपुण्यास्रवको निमित्तमात्ररूपसे कारणभूत हैं इसलिए 'द्रव्यपुण्यास्रवके' प्रसंगका 'अनुसरण करके ( -अनुलक्ष करके ) वे शुभ भाव भावपुण्यास्रव हैं और वे ( शुभ भाव ) जिसका निमित्त हैं ऐसे जो योगद्वारा प्रविष्ट होनेवाले पुदुगलोंके शुभकर्मपरिणाम . (-शुभकर्मरूप परिणाम ) बे द्रव्यपुण्यात्रव हैं । १३५ । गाथा १३६ अन्वयार्थ:-[ अर्हसिद्धसाधुपु भक्तिः] अहंत-सिद्ध-साधुओंके प्रति भक्ति, [ धर्मे या च खलु चेष्टा ] धर्ममें यथार्थतया चेष्टा [ भनुगमनम् अपि गुरूणाम् ] और गुरुत्रोंका अनुगमन, [प्रशस्तरागः इति त्रुवन्ति ] वह 'प्रशस्त राग' कहलाता है। १. सातावेदनीयादि पुद्गलपरिणामरूप द्रव्यपुण्यास्रवका जो प्रसङ्ग बनता है उसमें जीवके प्रशस्त- रागादि शुभ भाव निमित्तकारण हैं इसलिए 'द्रव्यपुण्यासव'-प्रसङ्गके पीछे-पीछे उसके निमित्त- भूत शुभ भावोंको भी 'भावपुण्यासव' ऐसा नाम है । अर्हत-साधु-सिद्ध प्रत्ये भक्ति, चेष्टा धर्ममां । गुरुमओ तणु अनुगमन-अ परिणाम राग प्रशस्तना ।।१३६।।

१६८ पंचास्तिकायसंग्रह - प्रशस्तरागस्वरूपाख्यानमेतत् । अर्हसिद्धसाधुपु भक्तिः, धर्मे व्यवहारचारित्रानुष्ठाने वासनाप्रधाना चेष्टा, गुरूणामाचार्यादीनां रसिकत्वेनानुगमनम्-एपप्रशस्तो रागा टीका:-यह, प्रशस्त रागके स्वरूपका कथन है । 'अहंत-सिद्ध-साधुओंके प्रति भक्ति, धर्म में-व्यवहारचारित्रके 'अनुष्ठान में- भावनाप्रधान चेष्टा और गुरुपोंका-आचार्यादिका-रसिकरूपसे अनुगमन, वह 'प्रशस्त राग' है क्योंकि उसका विपय प्रशस्त है । 3 १. अहंत-सिद्ध-साधुनोंमें अर्हत, सिद्ध, प्राचार्य, उपाध्याय और साधु पांचोंका समावेश हो जाता है, क्योंकि 'साधुओंमें प्राचार्य, उपाध्याय और साधु तीनका समावेश होता है । [ निर्दोष परमात्मासे प्रतिपक्षभूत ऐसे प्रार्त-रौद्रध्यानों द्वारा उपाजित जो ज्ञानावरणादि प्रकृतियां उनका, रागादिविकल्परहित धर्म-शुक्लध्यानों द्वारा विनाश करके, जो धादि अठारह- दोष रहित और केवलज्ञानादि अनन्त चतुष्टय सहित हुए, वे अहंत कहलाते हैं। लौकिक अंजनसिद्ध धादिसे विलक्षण ऐसे जो ज्ञानावरणादि-अष्टकमके अभावसे सम्यक्त्वादि- अष्टगुणात्मक हैं और लोकाग्रमें बसते हैं, वे सिद्ध है। विशुद्ध ज्ञान-दर्शन जिनका स्वभाव है ऐसे प्रात्मतत्त्वकी निश्चयरुचि, वैसी ही ज्ञप्ति वैसी ही निश्चल-अनुभूति, परद्रव्यकी इच्छाके परिहारपूर्वक उसी प्रात्मद्रव्यमें प्रतपन अर्थात् तपश्चरण और स्वशक्तिको गोपे बिना वैसा ही अनुष्ठान-ऐसे निश्चयपंचाचारको तथा उसके साधक व्यवहारपंचाचारको-कि जिसकी विधि आचारादि शास्त्रोंमें कही है उसे अर्थात् उभय श्राचारको जो स्वयं प्राचरते हैं और दूसरोंको उसका आचरण कराते हैं, ने प्राचार्य हैं । पांच अस्तिकायोंमें जीवास्तिकायको, छह द्रव्योंमें शुद्धजीवद्रव्यको, साततत्त्वोंमें शुद्धजीव- तत्त्वको और नव पदार्थों में शुद्धजीवपदार्थको जो निश्चयनयसे उपादेय कहते हैं तथा भेदाभेदरत्नत्रयस्वरूप मोक्षमार्गकी प्ररूपणा करते हैं और स्वयं भाते ( -अनुभव करते ) हैं, वे उपाध्याय हैं। निश्चय-चतुर्विध-अाराधना द्वारा जो शुद्ध अात्मस्वरूपकी साधना करते हैं, वे साधु हैं। ] २. अनुष्ठानमाचरण; आचरना; अमल में लाना। ३. भावप्रधान चेष्टा भावप्रधान प्रवृत्ति; शुभभावप्रधान व्यापार । ४. अनुगमन= अनुसरण; आज्ञांकितपना अनुकूल वर्तन । [गुरुओंके प्रति रसिकरूपसे ( उल्लाससे, उत्साहसे, रुचिपूर्णक ) आज्ञांकित वर्तना वह प्रशस्त राग है। ] १९६ मवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन प्रशस्तविषयत्वात् । अयं हि स्थूललक्ष्यतया केवलभक्तिप्रधानस्याज्ञानिनो भवति । उपरि- तनभूमिकायामलब्धास्पदस्यास्थानरागनिषेधार्थ तीव्ररागन्चरविनोदार्थ वा कदाचिज्ज्ञानिनोऽपि भवतीति ।। १३६ ॥ तिसिदं व भुक्खिदं वा दुहिदं दट्ठण जो दु दुहिदमणो। पडिवज्जदि तं किवया तस्सेसा होदि अणुकंपा ॥१३७॥ तृषितं घुभुक्षितं वा दुःखितं दृष्ट्वा यस्तु दु:खितमनाः । प्रतिपद्यते तं कृपया तस्यैषा भवत्यनुकम्पा ॥ १३७ ॥ अनुकम्पास्वरूपाख्यानमेतत् । कश्चिदुदन्यादिदुःखप्लुतमवलोक्य करुणया तत्प्रति- यह (प्रशस्त राग ) वास्तवमें, जो 'स्थूल-लक्षवाला होनेसे मात्र भक्ति- प्रधान है ऐसे अजानीको होता है; उच्च भूमिकामें ( -ऊपरके गुणस्थानोंमें ) स्थिति प्राप्त न की हो तब, 'अस्थानका राग रोकनेके हेतु अथवा तीन रागज्वर मिटानेके हेतु, कदाचित् ज्ञानीको भी होता है । १३६ । गाथा १३७ अन्वयार्थः-[वृषितं ] तृषातुर, [चुभुसितं ] क्षुधातुर [ वा] अथवा [ दुःखितं ] दुःखीको [ दृष्ट्वा ] देखकर [ यः तु] जो जीव [ दुःखितमनाः ] मनमें दुःख पाता हुआ [तं कृपया प्रतिपद्यते ] उसके प्रति करुणासे वर्तता है, [ तस्य एषा अनुकम्पा भवति ] उसका वह भाव अनुकम्पा है । टीका:-यह, अनुकम्पाके स्वरूपका कथन है । किसी तृषादिदुःखसे पीड़ित प्राणीको देखकर करुणाके कारण उसका प्रतिकार ( -उपाय ) करनेकी इच्छासे चित्तमें आकुलता होना वह अज्ञानीकी अनुकम्पा है । ज्ञानीकी अनुकम्पा तो, निचली भूमिकामें विहरते हुए ( -स्वयं निचले गुणस्थानों में १. अज्ञानीका लक्ष्य ( -ध्येय ) स्थूल होता है इसलिए उसे मात्र भक्तिकी ही प्रधानता होती है। अस्थानका-अयोग्य स्थानका, अयोग्य विषयकी ओरका; अयोग्य पदार्थों का अवलम्बन लेनेवाला। दुःखित, तृषित वा क्षुधित देखी दुःख पामी मन विषे । करुणाथी वर्ते जेह, अनुकंपा सहित ते जीव छे ।।१३७॥ २ .

२०० पंचास्तिकायसंग्रह चिकीर्पाकुलितचिचत्वमज्ञानिनोऽनुकम्पा । ज्ञानिनस्त्वधस्तनभूमिकासु विहरमाणस्य जन्मार्णव- निमग्नजगदवलोकनान्मनाग्मनाखेद इति ।। १३७ ।। कोधो व जदा माणो माया लोभो व चित्तमासेज्ज । जीवस्स कुणदि खोहं कलुसो त्ति य तं बुधा बेंति ॥१३॥ क्रोधो वा यदा मानो माया लोभो वा चिचमासाद्य । जीवस्य करोति लोभ कालुष्यमिति च तं बुधा वदन्ति ॥१३८॥ चिचकलुपत्वस्वरूपाख्यानमेतत् । क्रोधमानमायालोभाना तीवोदये चिचस्य सोमा कालुष्यम् । तेषामेव मंदोदये तस्य प्रसादोऽकालुष्यम् । तत् कादाचित्कविशिष्टकपायक्षयोपशमे वर्तता हो तब ), जन्मार्णवमें निमग्न जगतके अवलोकनसे ( अर्थात् संसारसागरमें डूबे हुए जगतको देखनेसे ) मनमें किंचित् खेद होना वह है । * १३७ । गाथा १३८ अन्वयार्थ:-[ यदा ] जब [ क्रोधा वा ] क्रोध, [ माना ] मान, [ माया ] माया [वा ] अथवा [ लोमा ] लोभ [ चित्तम् आसाद्य ] चित्तका आश्रय पाकर [ जीवस्य ] जीवको [ क्षोभं करोति ] क्षोभ करते हैं, तब [२] उसे [बुधाः] ज्ञानी [ कालुष्यम् इति च वदन्ति ] 'कलुषता' कहते हैं। टीका:- यह, चित्तकी कलुषताके स्वरूपका कथन है । क्रोध, मान, माया और लोभके उदयसे चित्तका क्षोभ सो कलुपता है। उन्हींके ( -क्रोधादिके ही ) मन्द उदयसे चित्तकी प्रसन्नता सो अकलुषता है। वह अकलुषता, कदाचित् कषायका विशिष्ट (-विशेष प्रकारका ) क्षयोपशम होने पर, . इस गाथाकी प्राचार्यवर श्री जयसेनाचार्यदेवकृत टीकामें इसप्रकार विवरण है:-तीन तृषा, तीन क्षुधा, तीव्र रोग आदिसे पीड़ित प्राणीको देखकर अज्ञानी जीव 'किसी भी प्रकार मैं इसका प्रतिकार करूं' इसप्रकार व्याकुल होकर अनुकम्पा करता है। ज्ञानी तो स्वात्मभावनाको प्राप्त न करता हुआ ( अर्थात् निजात्माको अनुभवको उपलब्धि न होती हो तब ), संक्लेशके परित्याग द्वारा (-अशुभ भावको छोड़कर ) यथासम्भव प्रतिकार करता है तथा उसे दुःखी देखकर विशेष संवेग और वैराग्यकी भावना करता है। मद-क्रोध अथवा लोभ-माया चित्त-आश्रय पामीने । जीवने करे जे लोभ, तेने कलुषता ज्ञानी कहे ।। १३८ ।। , नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन २०१ सत्यज्ञानिनो भवति । कपायोदयानुवृत्तेरसमग्रव्यावर्तितोपयोगस्यावांतरभूमिकासु कदाचित ज्ञानिनोऽपि भवतीति ।। १३८ । चरिया पमादबहुला कालुस्सं लोलदा य विसएसु । परपरिदावपवादो पावस्स य पासवं कुणदि ॥ १३६ ॥ चर्या प्रमादबहुला कानुष्यं लोलता च विषयेषु । परपरितापापवादः पापस्य चास्रवं करोति ।। १३९ ॥ पापासवस्वरूपाख्यानमेतत् । प्रमादबहुलचर्या परिणतिः, कालुष्यपरिणतिर, विषय- लौल्यपरिणतिः, परपरितापपरिणतिः, परापवादपरिणतिश्चेति पञ्चाशुभा भावा द्रव्यपापासवस्य अज्ञानीको होती है; कषायके उदयका अनुसरण करनेवाली परिणतिमेंसे उपयोगको 'असमग्ररूपसे विमुख किया हो तब ( अर्थात् कषायके उदयका अनुसरण करनेवाले परिणमनमेंसे उपयोगको पूर्ण विमुख न किया हो तब ), मध्यम भूमिकाओंमें ( -मध्यम गुणस्थानोंमें ), कदाचित् ज्ञानीको भी होती है । १३८ । गाथा १३९ अन्वयार्थ:-[प्रमादबहुला चर्या ] बहु प्रमादवाली चर्या, [ कालुष्यं ] कलुषता, [ विषयेषु च लोलता ] विषयोंके प्रति लोलुपता, [ परपरितापापवादः ] परको परिताप करना तथा परके अपवाद बोलना-वह [ पापस्य च आस्रवं करोति ] पापका आस्रव करता है। टीका:-यह, पापास्रवके स्वरूपका कथन है । बहु प्रमादवाली चर्यारूप परिणति ( -अति प्रमादसे भरे हुए आचरणरूप परिणति), कलुषतारूप परिणति, विषयलोलुपतारूप परिणति, परपरितापरूप परिणति (-परको दुःख देनेरूप परिणति) और परके अपवादरूप परिणति-यह पाँच अशुभ भाव द्रव्यपापास्रवको निमित्तमात्ररूपसे कारणभूत हैं इसलिए 'द्रव्यपापास्रवके' प्रसंगका १. असमग्ररूपसे-वपूर्णरूपसे, अधूरेरूपसे; अंशतः। चर्या प्रमादभरी, कलुषता, लुब्धता विषयो विषे । परिताप ने अपवाद परना, पाप-आस्रवने करे.॥१३९।। २६ २०२ पंचास्तिकायसंग्रह निमिचमात्रत्वेन कारणभूतत्वाचदास्रवक्षणादूर्ध्व भावपापात्रवः । तनिमित्तोऽशुभकर्मपरिणामो योगद्वारेण प्रविशता पुद्गलानां द्रव्यपापासव इति ॥१३९।। सण्णाम्रो य तिलेस्सा इंदियवसदा य अट्टरुद्दाणि । गाणं च दुप्पउत्तं मोहो पावप्पदा होंति ॥१४०॥ संज्ञाश्च त्रिलेश्या इन्द्रियवशता चातरौद्रे । ज्ञानं च दुःप्रयुक्तं मोहः पापप्रदा भवन्ति ॥ १४० ॥ पापास्रवभृतभावप्रपश्चाख्यानमेतत् । तोत्रमोहविपाकप्रभवा आहारभयमैथुनपरिग्रहसंज्ञाः, तीत्रकपायोदयानुरंजितयोगप्रवृचिरूपाः कृष्णनीलकापोतलेश्यास्तिस्रा, रागद्वेषोदयप्रकर्षादि- - 'अनुसरण करके (-अनुलक्ष करके ) वे अशुभभाव भावपापास्रव हैं और वे (अशुभभाव ) जिनका निमित्त हैं ऐसे जो योगद्वारा प्रविष्ट होनेवाले पुद्गलोंके अशुभकर्मपरिणाम (-अशुभकर्मरूप परिणाम ) वे द्रव्यपापास्रव हैं ।१३।। गाथा १४० अन्वयार्थः-[संज्ञा च ] ( चारों ) संज्ञाएँ, [त्रिलेश्या ] तीन लेश्याएँ, [ इन्द्रियवशता.च ] इन्द्रियवशता, [ आतरौढ़े ] आर्त-रौद्रध्यान, [ दुःप्रयुक्तं ज्ञानं ] दुःप्रयुक्त ज्ञान ( -दुष्टरूपसे अशुभ कार्य में लगा हुग्रा ज्ञान ) [च ] और [ मोहः ] मोह- [पापप्रदाः भवन्ति ] यह भाव पापप्रद हैं। टीका-यह, पापात्रवभूत भावोंके विस्तारका कथन है । तीन मोहके विपाकसे उत्पन्न होनेवाली आहार-भय-मैथुन-परिग्रहसंज्ञाएं तीव्र कषायके उदयसे 'अनुरंजित योगप्रवृत्तिरूप कृष्ण-नील-कापोत नामकी तीन १. असातावेदनीयादि पुद्गलपरिणामरूप द्रव्यपापासवका जो प्रसंग बनता है उसमें जीवके अशुभ भाव निमित्त कारण हैं इसलिए 'द्रव्यपापासव' प्रसंगके पीछे-पीछे उसके निमित्तभुत अशुभ । भावोंको भी 'भावपापासव' ऐसा नाम है । २. अनुरंजितरंगी हुई । [ कषायके उदयसे अनुरंजित योगप्रवृत्ति वह लेश्या है । वहाँ, कृष्णादि तीन लेश्याएं तीव्र कषायके उदयसे अनुरंजित योगप्रवृत्तिरूप हैं। ] संज्ञा, त्रिलेश्या, इंद्रिवशता, मातरौद्र ध्यान वे | वणी मोह ने दुयुक्त ज्ञान प्रदान पाप तणु करे ।।१४०॥ .

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमाप्रपंचवर्णन - , न्द्रियाधीनत्वम्, रागद्वेषोद्रेकात्प्रियसंयोगाप्रियवियोगवेदनामोक्षणनिदानाकांक्षणरूपमार्तम् , कपायराशयत्वाद्धिसाऽसत्यस्तैयविषयसंरक्षणानंदरूपं रौद्रम्, नैष्कयं तु शुभकर्मणश्चान्यत्र दुष्टतया प्रयुक्तं ज्ञानम् , सामान्येन दर्शनचारित्रमोहनीयोदयोपजनिताविवेकरूपो मोहा,-एषः भावपापासवप्रपञ्चो द्रव्यपापासवप्रपञ्चप्रदो भवतीति ॥१४॥ -इति आस्रवपदार्थव्याख्यानं समाप्तम् । अथ संवरपदार्थव्याख्यानम् । इंदियकसायसण्णा णिग्गहिदा जेहिं सुठु मग्गम्हि । जावत्तावत्तेसि पिहिदं पावासवच्छिदं ॥ १४१॥ लेश्याऐं; रागद्वेषके उदयके 'प्रकर्षके कारण वर्तता हुआ इन्द्रियाधीनपना; रागद्वेषके उद्रेकके कारण प्रियके संयोगकी, अप्रियके वियोगकी, वेदनासे छुटकारेकी तथा निदानकी इच्छारूप प्रार्तध्यान; कषाय द्वारा क्रूर ऐसे परिणामके कारण होनेवाला हिंसानन्द, असत्यानन्द, स्तेयानन्द एवं विषयसंरक्षणानन्द रूप रौद्रध्यान; निष्प्रयोजन (-व्यर्थ ) शुभ कर्मसे अन्यत्र ( -अशुभ कार्यमें ) दुष्टरूपसे लगा हुआ ज्ञान; और सामान्यरूपसे दर्शनचारित्रमोहनीयके उदयसे उत्पन्न अविवेकरूप मोह;-यह, भावपापास्रवका विस्तार द्रव्यपापास्रवके विस्तारको प्रदान करनेवाला है ( अर्थात् उपरोक्त भावपापास्रवरूप अनेकविध भाव वैसे-वैसे अनेकविध द्रव्यपापास्रवमें निमित्तभूत हैं ) । १४० । इसप्रकार आस्रवपदार्थका व्याख्यान समाप्त हुमा । अब, संवरपदार्थका व्याख्यान है। . १. प्रकर्ष-उत्कर्ष, उग्रता। २. उद्रेकबहुलता; अधिकता। ३. क्रूर=निर्दय; कठोर; उग्न । मार्ग रही संज्ञा-कषायो-इंद्रिनो निग्रह करे । पापासरवनु छिद्र तेने तेटलु रुंघाय छे ।। १४१ ।।

२.४ पंचास्तिकायसंग्रह इन्द्रियकषायसंज्ञा निगृहीता यः सुष्टु मागें। यावचावतेषां पिहितं पापास्रवछिद्रम् ॥ १४१ ।। अनन्तरत्वात्पापस्यैव संवराख्यानमेतत् । मार्गों हि संवरः तन्निमिचमिन्द्रियाणि कषाया संज्ञाश्च यावतांशेन यावन्तं वा कालं निगृह्यन्ते तावतांशेन तावन्तं वा कालं पापासव- द्वारं विधीयते । इन्द्रियकषायसंज्ञाः भावपापास्रवो द्रव्यपापासवहेतुः पूर्वमुक्तः । इह तन्निरोधो भावपापसंवरो द्रव्यपापसंवरहेतुरवधारणीय इति ॥१४१।। जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व सम्वदन्वेसु । णासवदि सुहं असुहं समसुहदुक्खस्स भिक्खुस्स ॥१४२॥ गाथा १४१ अन्वयार्थ:-[ यो] जो [ सुष्ठु मार्गे ] भली भांति मार्ग में रहकर [ इन्द्रिय- कषायसंज्ञाः ] इन्द्रियां, कषाय और संज्ञाओंका [ यावत् निगृहीताः ] जितना निग्रह करते हैं, [ तावत् ] उतना [ पापास्रवछिद्रम् ] पापास्रवका छिद्र [ तेषाम् ] उनको [पिहितम् ] बंध होता है। टीका-पापके अनन्तर होनेसे, पापके ही संवरका यह कथन है ( अर्थात् पापके कथनके पश्चात् तुरन्त होनेसे, यहां पापके ही संवरका कथन किया है)। मार्ग वास्तवमें संवर है; उसके निमित्तसे (-उसके हेतुसे ) इन्द्रियों, कषायों तथा संज्ञाओंका जितने अंशमें अथवा जितने काल निग्रह किया जाता है, उतने अंशमें अथवा उतने काल पापास्रवद्वार बन्ध होता है। इन्द्रियों, कषायों और संज्ञाओं-भावपापास्रव-को द्रव्यपापास्रवका हेतु (-निमित्त ) पहले (१४० वीं गाथामें ) कहा था; यहाँ ( इस गाथामें ) उनका निरोध (-इन्द्रियों, कषायों और संज्ञाओंका निरोध)-भावपापसंवर-द्रव्यपापसंवर- का अवधारना (-समझना ) । १४१ । सौ द्रव्यमा नहि राग-द्वेष-विमोह व जेहने । शुभ-अशुभ कर्म न आसवै समदुःखसुख ते भिक्षुने ॥१५२।।

२०५
नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन
यस्य न विद्यते रागो द्वेषो मोहो पा सर्वद्रव्येषु ।
नास्रवति शुभमशुभं समसुखदुःखस्य भिक्षोः ॥१४२।।
सामान्यसंवरस्वरूपाख्यानमेतत् । यस्य रागरूपो द्वेषरूपो मोहरूपो वा समग्रपरद्रव्येषु
न हि विद्यते भावः तस्य निर्विकारचैतन्यत्वात्समसुखदुःखस्य भिक्षोः शुभमशुभं च कर्म नास्रवति,
किन्तु संवियत एव । तदत्र मोहरागद्वेषपरिणामनिरोधो भावसंवरः । तन्निमिचा शुभाशुभकर्म-
परिणामनिरोधो योगद्वारेण प्रविशतां पुद्गलानां द्रव्यसंवर इति ।।१४२॥
जस्स जवा खल पुण्णं जोगे पावं च त्थि विरदस्स ।
संवरणं तस्स तदा सुहासुहकदस्स कम्मस्स ॥ १४३ ॥
गाथा १४२
मन्वयार्थ:-[ यस्य ] जिसे [ सर्वद्रव्येषु ] सर्व द्रव्योंके प्रति [ रागः ] राग,
[द्वेषः ] द्वेष [वा ] या [ मोहः ] मोह [ न विद्यते ] नहीं है, [ समसुखदुःखस्य मिक्षोः ]
उस समसुखदुःख भिक्षुको (-सुखदुःखके प्रति समभाववाले मुनिको ) [शुभम् अशुभम् ]
शुभ और अशुभ कर्म [ न आस्रवति ] प्रास्त्रवित नहीं होते।
टोका:-यह, सामान्यरूपसे संवरके स्वरूपका कथन है।
जिसे समग्र परद्रव्योंके प्रति रागरूप, द्वेषरूप या मोहरूप भाव नहीं है, उस
भिक्षुको-जो कि निर्विकारचैतन्यपनेके कारण 'समसुखदुःख है उसे-शुभ और अशुभ
कर्मका आस्रव नहीं होता, परन्तु संवर ही होता है । इसलिए यहां ( ऐसा समझना
कि ) मोहरागद्वेषपरिणामका निरोध सो भावसंवर है, और वह ( मोहरागद्वषरूप
परिणामका निरोध ) जिसका निमित्त है ऐसा जो योगद्वारा प्रविष्ट होनेवाले पुद्गलोंके
शुभाशुभकर्मपरिणामका (-शुभाशुभकर्मरूप परिणामका ) निरोध सो द्रव्यसंवर
है। १४२ ।
१. समसुखदुःख=जिसे सुखदुःख समान हैं ऐसे। इष्टानिष्ट संयोगोंमें जिसे हर्षशोकादि विषम परिणाम
नहीं होते ऐसे । [ जिसे रागद्वेषमोह नहीं है, वह मुनि निर्विकारचैतन्यमय है अर्थात् उसका
चैतन्य पर्यायमें भी विकाररहित है इसलिए वह समसुखदुःख है। ]
न्यारे न योगे पुण्य तेम ज पाप वर्ते विरतने ।
त्यारे शुभाशुभकृत करमनो थाय संवर तेहने ॥ १४३ ॥

२०६ पंचास्तिकायसंग्रह यस्य यदा खलु पुण्यं योगे पापं च नास्ति विरतस्य । संवरणं तस्य तदा शुभाशुभकृतस्य कर्मणः ॥ १४३ ॥ विशेषेण संवरस्वरूपाख्यानमेतत् । यस्य योगिनो विरतस्य सर्वतो निवृत्तस्य योगे चाङ्मनाकायकर्मणि शुभपरिणामरूपं पुण्यमशुभपरिणामरूपं पापं च यदा न भवति तस्य तदा शुभाशुभभावकृतस्य द्रव्यकर्मणः संवरः स्वकारणाभावात्प्रसिद्धयति । तदत्र शुभाशुभपरिणाम- निरोधो भावपुण्यपापसंवरो द्रव्यपुण्यपापसंवरस्य हेतुः प्रधानोऽवधारणीय इति ॥ १४३ ॥ -इति संवरपदार्थव्याख्यानं समाप्तम् । अथ निर्जरापदार्थव्याख्यानम् । गाथा १४३ अन्वयार्थ:-[ यस्य ] जिसे ( -जिस मुनिको ), [ विरतस्य ] विरत वर्तते हुए, [ योगे] योगमें [ पुण्यं पापं च ] पुण्य और पाप, [ यदा ] जव [ खलु ] वास्तवमें [न अस्ति ] नहीं होते, [तदा] तव [तस्य ] उसे [ शुभाशुभकृतस्य कर्मणा ] शुभाशुभभावकृत कर्मका [ संवरणम् ] संवर होता है। टीका:-यह, विशेषरूपसे संवरके स्वरूपका कथन है। जिस योगीको, विरत अर्थात् सर्वथा निवृत्त वर्तते हुए, योगमें-वचन, मन और कायसम्बन्धी क्रियामें-शुभपरिणामरूप पुण्य और अशुभपरिणामरूप पाप जव नहीं होते, तब उसे शुभाशुभभावकृत द्रव्यकर्मका ( -शुभाशुभभाव जिसका निमित्त होता है ऐसे द्रव्यकर्मका ), स्वकारणके अभावके कारण, संवर होता है। इसलिए यहाँ ( इस गाथामें ) शुभाशुभ परिणामका निरोध-भावपुण्यपापसंवर-द्रव्यपुण्य- पापसंवरका 'प्रधान हेतु अवधारना ( -समझना ) । १४३ । इस प्रकार संवरपदार्थका व्याख्यान समाप्त हुआ। अब निर्जरापदार्थका व्याख्यान है। १. प्रधान हेतु= मुख्य निमित्त । [ द्रव्यसंवरमें 'मुख्य निमित्त' जीवके शुभाशुभ परिणामका निरोध है, योगका निरोध नहीं है । ( यहां यह ध्यानमें रखने योग्य है कि द्रव्यसंवरका उपादानकारण- तो पुद्गल स्वयं ही है। ] निश्चयकारण २०७ प्रवपदार्यपूर्वक-मोक्षमार्गपंचवर्णन संवरनोगेहि जुदो तहिं जो चिट्ठदे बहुविहिं। कम्माणं णिज्जरणं बहुगाणं कुणदि सो णियदं ॥१४४॥ संवरयोगाभ्यां युक्तस्तपोभियंश्चेष्टते बहुविधैः । कर्मणां निर्जरणं बहुकानां करोति स नियतम् ।।१४४।। निर्जरास्वरूपाख्यानमेतत् । शुभाशुभपरिणामनिरोधः संवरा, शुद्धोपयोगो योगः। ताभ्यां युक्तस्तपोभिरनशनावमौदर्यवृचिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासनकायक्लेशादि- मेदाद हिरङ्ग प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यस्वाध्यायव्युत्सर्गध्यानमेदादन्तरङ्गश्च बहुविधे- गाथा १४४ अन्वयार्थः-[संवरयोगाभ्याम् युक्तः] संवर और योगसे ( शुद्धोपयोगसे ) युक्त ऐसा [य] जो जीव [ बहुविधैः तपोमिः चेष्टते ] बहुविध तपों सहित वर्तता है, [स] वह [ नियतम् ] नियमसे [ बहुकानाम् कर्मणाम् ] अनेक कर्मोकी [ निर्जरणं करोति ] निर्जरा करता है। टीका:-यह, निर्जराके स्वरूपका कथन है । संवर अर्थात् शुभाशुभ परिणामका निरोध, और योग अर्थात् शुद्धोपयोग; उनसे ( -संवर और योगसे ) युक्त ऐसा जो ( पुरुष ), अनशन, अवमौदर्य, वृत्ति- परिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन तथा कायक्लेशादि भेदोंवाले बहिरंग तपों सहित और प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग तथा ध्यान ऐसे भेदोंवाले अंतरंग तपों सहित-इसप्रकार बहुविध 'तपों सहित वर्तता है, वह (पुरुष) वास्तव में १.. जिस जीवको सहजशुद्धस्वरूपके प्रतपनरूप निश्चय-तप हो उस जीवके, हठ रहित वर्तते हुए अनशनादिसम्बन्धी भावोंको तप कहा जाता है । उसमें वर्तता हुआ शुद्धिरूप अंश वह निश्चय-तप है और शुभपनेरूप अंशको व्यवहार-तप कहा जाता है । ( मिथ्यादृष्टिको निश्चय-तप नहीं है इसलिए उसके अनशनादिसम्बन्धी शुभ भावोंको व्यवहार-तप भी नहीं कहा जाता; क्योंकि जहां यथार्थ तपका सद्भावं ही नहीं है, वहां उन शुभ भावोंमें आरोप किसका किया जाए? ) जे योग-संवरयुक्त जीव बहुविध तपो सह परिणमे । तेने नियमथी निर्जरा बहु कर्म केरी थाय छे ।। १४४ ॥

२०८ पंचास्तिकायसंग्रह - यश्चेष्टते स खलु वहूनां - कर्मणां निर्जरणं करोति । तदत्र कर्मवीर्यशातनसमर्थों वहिरङ्गान्तरङ्गतपोभिवृहितः शुद्धोपयोगो भावनिर्जरा, तदनुभावनीरसीभूतानामेकदेशसंक्षया समुपाचकर्मपुद्गलानां द्रव्यनिर्जरेति ।। १४४ ॥ जो संवरेण जुत्तो अप्पटुपसाधगो हि अप्पाणं । मुणिऊण झादि णियदं गाणं सो संधुणोदि कम्मरयं ॥१४॥ यः संवरेण युक्तः आत्मार्थप्रसाधको ह्यात्मानम् । ज्ञात्वा ध्यायति नियतं ज्ञानं स संधुनोति कर्मरजः ॥१४॥ अनेक कर्मोंकी निर्जरा करता है । इसलिए यहाँ ( इस गाथामें ऐसा कहा कि ), कर्मके वीर्यका ( -कर्मकी शक्तिका) 'शातन करनेमें समर्थ ऐसा जो बहिरंग और अंतरंग तपोंद्वारा 'वृद्धिको प्राप्त शुद्धोपयोग सो भावनिर्जरा है और उनके प्रभावसे (-वृद्धिको प्राप्त शुद्धोपयोगके निमित्तसे ) नीरस हुए ऐसे उपार्जित कर्मपुद्गलोंका एकदेश संक्षय सो द्रव्यनिर्जरा है। १४४ । गाथा १४५ अन्वयार्थ:-[ संवरेण युक्तः ] संवरसे युक्त ऐसा [य] जो जीव, [ आत्मार्थ- प्रसाधका हि ] वास्तवमें आत्मार्थका प्रसाधक ( स्वप्रयोजनका प्रकृष्ट साधक ) वर्तता १. शातन करना-पतला करना हीन करना; क्षीण करना; नष्ट करना। २. वृद्धिको प्राप्त बढ़ा हुमा; उग्र हुआ। [ संवर और शुद्धोपयोगवाले जीवको जव उग्र शुद्धोपयोग होता है तब अनेक कर्मोकी निर्जरा होती है। शुद्धोपयोगकी उग्रता करनेकी विधि शुद्ध प्रात्मद्रव्यके वालम्बनकी उग्रता करना ही है। ऐसा करनेवालेको, सहजदशामें हठ रहित जो अनशनादि सम्बन्धी भाव वर्तते हैं उनमें ( शुभपनेरूप अंशके साथ ) उन-शुद्धिरूप अंश होता है; जिससे अनेक कर्मोंकी निर्जरा होती है । ( मिथ्याष्टिको तो शुद्धात्मद्रव्य भासित ही नहीं हुआ है। इसलिए उसे, संवर नहीं है, शुद्धोपयोग नहीं है, शुद्धोपयोगकी वृद्धिकी तो बात ही कहां रही ? इसलिए उसे, सहज दशा रहित हठपूर्वक-अनशनादिसम्वन्धी शुभभाव कदाचित् भले हों तथापि, मोक्षके हेतुभूत निर्जरा बिलकुल नहीं होती। )] ३. संक्षय-सम्यक् प्रकारसे क्षय । संवर सहित, यात्मप्रयोजननो प्रसाधक आत्मने । जाणी, सुनिश्चल ज्ञान ध्यावे, ते करमरज निर्जर ॥१४॥ - २०६ नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन मुख्यनिर्जराकारणोपन्यासोऽयम् । यो हि संवरेण शुभाशुभपरिणामपरमनिरोधेन युक्तः परिशासवस्तुस्वरूपः परप्रयोजनेभ्यो व्यावृत्त वुद्धिः केवलं स्वप्रयोजनसाधनोधतमना: आत्मानं स्वोपलम्मेनोपलभ्य गुणगुणिनोवस्तुत्वेना मेदाचदेव ज्ञानं स्वं स्वेनाविचलितमनास्स- चेतयते स खलु नितान्तनिरस्नेहः प्रहीणस्नेहाभ्यङ्गपरिष्वङ्गशुद्धस्फटिकस्तम्भवत् पूर्वोपाचं कर्मरजः संधुनोति । एतेन निर्जरामुख्यत्वे हेतुत्वं ध्यानस्य द्योतितमिति ॥१४॥ हुआ, [ आत्मानम् ज्ञात्वा ] आत्माको जानकर ( -अनुभव करके ) [ज्ञानं नियतं ध्यायति ] ज्ञानको निश्चलरूपसे ध्याता है, [स:] वह [कर्मरजः ] कर्मरजको [संधुनोति ] खिरा देता है। टीका:-यह, निर्जराके मुख्य कारणका कथन है । संवरसे अर्थात् शुभाशुभ परिणामके परम निरोधसे युक्त ऐसा जो जोव, वस्तुस्वरूपको ( हेय-उपादेय तत्त्वको ) बराबर जानता हुआ परप्रयोजनसे जिसकी बुद्धि 'व्यावृत्त हुई और मात्र स्वप्रयोजन साधने में जिसका मन उद्यत हुआ है ऐसा वर्तता हुआ, आत्माको स्वोपलब्धिसे उपलब्ध करके ( -अपने स्वानुभव द्वारा अनुभव करके ), गुण-गुणीका वस्तुरूपसे अभेद होनेके कारण वही ज्ञानको-स्वको-स्व द्वारा अविचल परिणतिवाला होकर संचेतता है, वह जीव वास्तवमें अत्यन्त 'निःस्नेह वर्तता हुआ-जिसको 'स्नेहके लेपका संग प्रक्षीण हुआ है ऐसे शुद्ध स्फटिकके स्तम्भकी भाँति-पूर्वोपाजित कर्मरजको खिरा देता है। इससे ( -इस गाथासे ) ऐसा दर्शाया कि निर्जराका मुख्य हेतु ध्यान है। १४५ । १. व्यावृत्त होना= निवर्तना; निवृत्त होना; विमुख होना। २. मनमति; बुद्धि, भाव; परिणाम । ३. उद्यत होना= तत्पर होना; लगना; उद्यमवंत होना, मुड़ना। ढलना। ४. गुणी और गुणमें वस्तु-अपेक्षासे अभेद है इसलिए प्रात्मा कहो या ज्ञान कहो-दोनों एक ही हैं। ऊपर जिसका 'मात्मा' शब्दसे कथन किया था उसीका यहाँ 'ज्ञान' शब्दसे कथन किया है। उस ज्ञानमें-निजात्मामें-निजात्मा द्वारा निश्चल परिणति करके उसका संचेतन-संवेदन- अनुभवन करना सो ध्यान है। ५. निःस्नेह स्नेह रहित; मोहरागद्वेष रहित । ६. स्नेह तेल; चिकना पदार्थ, स्निग्धता; चिकनापन। ७. यह ध्यान शुद्धभावरूप है। २७ पंचास्तिकायसंग्रह ३१० जस्स ण विज्जदि रागो दोसो मोहो व जोगपरिकम्मो । तस्स सुहासुहडहणो झाणमओ जायदे अगणी ॥१४६ ।। यस्य न विद्यते रागो द्वेषो मोहो वा योगपरिकर्म । तस्य शुभाशुभदहनो ध्यानमयो जायते अग्निः ॥१४६|| ध्यानस्वरूपाभिधानमेतत् । शुद्धस्वरूपेऽविचलितचैतन्यवृचिहि ध्यानम् । अथास्यात्म- लाभविधिरभिधीयते । यदा खलु योगी दर्शनचारित्रमोहनीयविपाकं पुद्गलकर्मत्वात् कर्मसु संहृत्य, तदनुवृत्त व्यावृत्त्योपयोगममुह्यन्तमरज्यन्तमद्विषन्तं चात्यन्तशुद्ध एवात्मनि निष्कम्पं निवेशयति, तदास्य निष्क्रियचैतन्यरूपस्वरूपविश्रान्तस्य वाल्मनाकायानभावयता . गाथा १४६ अन्वयार्थ:-[ यस्य ] जिसे [ मोहा राग द्वेषा ] मोह और रागद्वेष [न विद्यते ] नहीं हैं [ वा ] तथा [ योगपरिकर्म ] योगोंका सेवन नहीं है ( अर्थात् मन- वचन-कायाके प्रति उपेक्षा है ), [ तस्य ] उसे [ शुभाशुभदहनः ] शुभाशुभको जलाने- वाली [ ध्यानमया मग्निः ] ध्यानमय अग्नि [ जायते ] प्रगट होती है । टीका:-यह, ध्यानके स्वरूपका कथन है । शुद्ध स्वरूपमें अविचलित चैतन्यपरिणति सो यथार्थ ध्यान है। वह ध्यान प्रगट होनेकी विधि अब कही जाती है:-जब वास्तवमें योगी, दर्शनमोहनीय और चारित्रमोहनीयका विपाक पुद्गलकर्म होनेसे उस विपाकको ( अपनेसे भिन्न ऐसे अचेतन ) कर्मोंमें समेट कर, तदनुसार परिणतिसे उपयोगको व्यावृत्त करके ( -उस विपाकके अनुरूप परिणमनमेंसे उपयोगका निवर्तन करके ), मोही, रागी और द्वेषी न होनेवाले ऐसे उस उपयोगको अत्यन्त शुद्ध आत्मामें ही निष्कपरूपसे लोन करता है, तब उस योगीको-जो कि अपने निष्क्रिय चैतन्यरूप स्वरूपमें विश्रांत है, वचन-मन- नहि रागद्वषविमोह ने नहि योगसेवन जेहने । प्रगटे शुभाशुभ वाणनारो ध्यान-मग्नि तेहने ।।१४६॥

२११ सवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गपंचवर्णन स्वकर्मस्वव्यापारयतः सकलशुभाशुभकर्मेन्धनदहनसमर्थत्वादग्निकल्पं परमपुरुषार्थसिद्धय पायभूतं ध्यानं जायते इति । तथा चोक्तम्-"अज्ज वि तिरयणसुद्धा अप्पा झाएवि लहइ इंदचं । लोयंतियदेवचं तत्थ चुआ णिव्वुदि अंति" | "अंतो णत्थि सुईणं कालो थोमो वयं च दुम्मेहा । कायाको नहीं 'भाता और स्वकर्मोंमें व्यापार नहीं करता उसे सकल शुभाशुभ कर्मरूप ईंधनको जलानेमें समर्थ होनेसे अग्निसमान ऐसा, 'परमपुरुषार्थसिद्धिके उपायभूत ध्यान प्रगट होता है। फिर कहा है कि:- "अज्ज वि तिरयणसुद्धा अप्पा झाएवि लहइ इंदत्तं । लोयंतियदेवत्तं तत्थ चुआ णिव्वुदि जंति ॥' "अंतो णत्थि सुईणं कालो थोमो वयं च दुम्मेहा । तण्णवरि सिक्खियन्वं जं जरमरणं खयं कुणइ ॥" [ अर्थ:-इस समय भी त्रिरत्नशुद्ध जीव ( -इस काल भी सम्यग्दर्शन- ज्ञान-चारित्ररूप तीन रत्नोंसे शुद्ध ऐसे मुनि ) आत्माका ध्यान करके इन्द्रपना तथा लोकांतिक-देवपना प्राप्त करते हैं और वहांसे चयकर ( मनुष्यभव प्राप्त करके ) निर्वाणको प्राप्त करते हैं। श्रुतियोंका अंत नहीं है (-शास्त्रोंका पार नहीं है, ) काल अल्प है और हम "दुर्मेध हैं; इसलिए वही मात्र सीखनेयोग्य है कि जो जरा-मरणका क्षय करे । 1 इन दो उद्धृत गाथाश्त्रोंमेंसे पहली गाथा श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत, मोक्षप्राभृतकी है। १. भाना=चितवन करना; ध्याना; अनुभवन करना । २. व्यापार प्रवृत्ति। [स्वरूपवित्रांत योगीको अपने पूर्वोपार्जित कर्मों में प्रवर्तन नहीं है, क्योंकि वह मोहनीयकर्मके विपाकको अपनेसे भिन्न-अचेतन-जानता है तथा उस कर्मविपाकके अनुरूप परिणमनसे उसने उपयोगको विमुख किया है।] ३. पुरुषार्थ पुरुषका श्वर्थ; पुरुषका प्रयोजन; आत्माका प्रयोजन; आत्मप्रयोजन । [ परमपुरुषार्थ अर्थात् प्रात्माका परम प्रयोजन मोक्ष है और वह मोक्ष ध्यानसे सघता है, इसलिए परमपुरुषार्थकी (-मोक्षकी ) सिद्धिका उपाय ध्यान है। ] ४. दुर्मेष प्रल्पबुद्धिवाले; मंदबुद्धि ।

२१२ पंचास्तिकायसंग्रह तण्णवरि सिक्खियव्वं जं जरमरणं खयं कुणइ" ॥१४६|| -इति निर्जरापदार्थव्याख्यानं समाप्तम् । भावार्थ:-निविकार निष्क्रिय चैतन्यचमत्कारमें निश्चल परिणति वह 'ध्यान है । यह ध्यान मोक्षके उपायरूप है। जिसप्रकार थोड़ी-सी भी अग्नि बहुत-से घास और काष्ठकी राशिको अल्पकालमें जला देती है, उसीप्रकार मिथ्यात्व-कषायादि विभावके परित्यागस्वरूप महा पवनसे प्रज्वलित हुई और अपूर्व-अद्भुत-परम-आह्लादात्मक सुखस्वरूप घृतसे सिंची हुई निश्चलआत्मसंवेदनरूप ध्यानाग्नि मूलोत्तरप्रकृति-भेदवाले कर्मरूपी ईंधनकी राशिको क्षणमात्रमें जला देती है । इस पंचमकालमें भी यथाशक्ति ध्यान हो सकता है। इस कालमें जो विच्छेद है वह शुक्लध्यानका है, धर्मध्यानका नहीं । आज भी यहांसे जीव धर्मध्यान करके देवका भव और फिर मनुष्यका भव पाकर मोक्ष प्राप्त करते हैं और बहुश्रुतधर ही ध्यान कर सकते हैं ऐसा भी नहीं है; सारभूत अल्प श्रुतसे भी ध्यान हो सकता है। इसलिए मोक्षार्थियोंको शुद्धात्माका प्रतिपादक, संवर-निर्जराका करनेवाला तथा जरामरणका हरनेवाला सारभूत उपदेश ग्रहण करके ध्यान करने योग्य है [ यहां यह लक्षमें रखने योग्य है कि उपरोक्त ध्यानका मूल सम्यग्दर्शन है । सम्यग्दर्शनके बिना ध्यान नहीं होता, क्योंकि निर्विकार निष्क्रिय चैतन्यचमत्कारकी ( शुद्धात्माकी ) सम्यक् प्रतीति बिना उसमें निश्चल परिणति कहाँसे हो सकती है ? इसलिए मोक्षके उपायभूत ध्यान करनेकी इच्छा रखनेवाले जीवको प्रथम तो जिनोक्त द्रव्यगुणपर्यायरूप वस्तुस्वरूपकी यथार्थ समझपूर्वक निर्विकार निष्क्रिय चैतन्यचमत्कारकी सम्यक् प्रतीतिका सर्व प्रकारसे उद्यम करनेयोग्य है; उसके पश्चात् ही उस चैतन्य- चमत्कारमें विशेष लीनताका यथार्थ उद्यम हो सकता है। ] १४६ । इस प्रकार निर्जरा पदार्थका व्याख्यान समाप्त हुआ। १. मुनिको जो शुद्धात्मस्वरूपका निश्चल उन पालम्बन वर्तता है उसे यहां मुख्यतः 'ध्यान' कहा है। (शुद्धात्मावलम्बनकी उग्रताको मुख्य न करें तो, अविरति सम्यग्दृष्टिको भी 'जघन्य घ्यान' कहने में विरोध नहीं है, क्योंकि उसे भी शुद्धात्मस्वरूपका जघन्य मालम्बन तो होता है । ) , नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचक्कन मथ बंधपदार्थव्याख्यानम् । जं सुहमसुहमुदिण्णं भावं रत्तो करेदि जदि अप्पा । सो तेण हववि बद्धो पोग्गलकम्मेण विविहेण ॥१४७॥ यं शुभमशुभमुदीर्णं भावं रक्तः करोति यद्यात्मा । स तेन भवति बद्धः पुद्गलकर्मणा विविधन ।। १४७ ॥ बन्धस्वरूपाख्यानमेतत् । यदि खल्वयमात्मा परोपाश्रयेणानादिरक्तः कर्मोदयप्रभाव- सादुदीर्णं शुभमशुभं वा भावं करोति, तदा स आत्मा तेन निमित्तभूतेन भावेन पुद्गलकर्मणा विविधन बद्धो भवति । तदत्र मोहरागद्वेषस्निग्धः शुभोऽशुभो वा परिणामो जीवस्य भाववन्धा, तन्निमिचैन शुभाशुभकर्मत्वपरिणतानां बीवेन सहान्योन्यमूर्छनं पुद्गलानां द्रव्यवन्ध इति ॥ १४७॥ अव बंधपदार्थका व्याख्यान है । गाथा १४७ अन्वयार्थः-[ यदि ] यदि [ आत्मा ] आत्मा [ रक्तः] रक्त ( विकारी ) वर्तता हुआ [ उदीर्ण ] उदित [ यम् शुभम् अशुभम् भावम् ] शुभ या अशुभ भावको [ करोति ] करता है, तो [ सः] वह आत्मा [ तेन ] उस भाव द्वारा (-उस भावके निमित्तसे ) [ विविधेन पुद्गलकर्मणा ] विविध पुद्गलकर्मोसे [ पद्धः भवति ] बद्ध होता है। टीका:- यह, बंधके स्वरूपका कथन है । यदि वास्तवमें यह आत्मा अन्यके (-पुदुगलकर्मके ) आश्रय द्वारा अनादि- कालसे रक्त रहकर कर्मोदयके प्रभावयुक्तरूप वर्तनेसे उदित (-प्रगट होनेवाले ) शुभ या अशुभ भावको करता है, तो वह आत्मा उस निमित्तभूत भाव द्वारा विविध पुदुगलकर्मोंसे बद्ध होता है । इसलिए यहाँ ( ऐसा कहा है कि ), मोहरागद्वेष द्वारा स्निग्ध ऐसे जो जीवके शुभ या अशुभ परिणाम वह भावबंध है और उनके (-शुभाशुभ परिणामोंके ) निमित्तसे शुभाशुभ कर्मरूप परिणत पुद्गलोंका जीवके साथ अन्योन्य अवगाहन ( -विशिष्ट शक्ति सहित एकक्षेत्रावगाहसम्बन्ध ) वह द्रव्यबंध है ।१४७॥ जो आतमा उपरक्त करतो अशुभ वा शुभ भावने । तो ते वडे मे विविध पुद्गलकर्मथी बंधाय छे ।। १४७ ॥

२१४ पंचास्तिकायसंग्रह जोगणिमित्तं गहणं जोगो मणवयणकायसंभूदो । भावणिमित्तो बंधो भावो रदिरागदोसमोहजुदो ॥१४८॥ योगनिमिचं ग्रहणं योगो मनोवचनकायसंभूतः । भावनिमित्तो बन्धो भावो रतिरागद्वेषमोहयुतः ।। १४८ ॥ वहिरङ्गान्तरङ्गबन्धकारणाख्यानमेतत् । ग्रहणं हि कर्मपुद्गलानां जीवप्रदेशवर्तिकर्म- स्कन्धानुप्रवेशः । तत् खलु योगनिमित्तम् । योगो वा मनःकायकर्मवर्गणालम्बन आत्मप्रदेश- परिस्पन्दः । बन्धस्तु कर्मपुद्गलानां विशिष्टशक्ति परिणामेनावस्थानम् । स पुनर्जीवभावनिमित्तः । जीवभावः पुना रतिरागद्वेषमोहयुतः, मोहनीयविपाकसपादितविकार इत्यर्थः । तदत्र पुद्गलानां गाथा १४८ अन्वयार्थ:-[योगनिमिचं ग्रहणम् ] ग्रहणका (-फर्मग्रहणका ) निमित्त योग है; [ योगा मनोवचनकायसंभूतः] योग मनवचनकायजनित (आत्मप्रदेशपरिस्पंद) है। [ भावनिमिचा बंधः ] बंधका निमित्त भाव है; [ भावः रतिरागद्वेषमोहयुतः ] भाव रतिरागद्वेषमोहसे युक्त (आत्मपरिणाम) है। टीका:-यह, बंधके बहिरंग कारण और अंतरंग कारणका कथन है । ग्रहण अर्थात् कर्मपुद्गलोंका जीवप्रदेशवर्ती (-जीवके प्रदेशोंके साथ एक क्षेत्रमें स्थित ) कर्मस्कन्धोंमें प्रवेश; उसका निमित्त योग है । योग अर्थात् वचनवर्गणा, मनोवर्गणा, कायवर्गणा और कर्मवर्गणाका जिसमें आलम्बन हो ऐसा आत्मप्रदेशोंका परिस्पंद ( अर्थात् जीवके प्रदेशोंका कंपन )। बंध अर्थात् कर्मपुद्गलोंका विशिष्ट शक्तिरूप परिणाम सहित स्थित रहना ( अर्थात् कर्मपुद्गलोंका अमुक अनुभागरूप शक्ति सहित अमुक काल तक टिकना); उसका निमित्त जीवभाव है । जीवभाव रतिरागद्वेषमोहयुक्त ( परिणाम ) है अर्थात मोहनीयके विपाकसे उत्पन्न होनेवाला विकार है । - छे योगहेतुक ग्रहण, मनवचकाय-आश्रित योग छ । के भावहेतुक बंध, ने मोहादिसंयुत भाव छ । १४८॥ ~ - नवपदार्यपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन २१५ ग्रहणहेतुत्वादहिरंगकारणं योगः, विशिष्टशक्तिस्थितिहेतुत्वादन्तरङ्गकारणं जीवभाव एवेति ।। १४८ ॥ हेदू चदुन्वियप्पो अढवियप्पस्स कारणं भणिदं । तेसि पि य रागादी तेसिमभावे ण बज्झति ॥१४॥ हेतुश्चतुर्विकल्पोऽष्टविकल्पस्य कारणं भणितम् । तेपामपि च रागादयस्तेषामभावे न बध्यन्ते ।। १४९ ॥ इसलिए यहां ( वन्धमें ), बहिरंग कारण ( -निमित्त ) योग है क्योंकि वह पुद्गलोंके ग्रहणका हेतु है, और अन्तरंग कारण ( -निमित्त ) जीवभाव ही है क्योंकि वह ( कर्मपुदुगलोंकी ) विशिष्ट शक्ति तथा स्थितिका हेतु है। भावार्थ:-कर्मवन्धपर्यायके चार विशेष हैं : प्रकृतिवन्ध, प्रदेशबन्ध, स्थितिबन्ध और अनुभागवंध । इसमें स्थिति-अनुभाग ही अत्यन्त मुख्य विशेष हैं, प्रकृति-प्रदेश तो अत्यन्त गौण विशेष हैं। क्योंकि स्थिति-अनुभागके विना कवन्धपर्याय नाममात्र ही रहती है । इसलिए यहां प्रकृति-प्रदेशबंधका मात्र 'ग्रहण' शब्दसे कथन किया है और स्थिति-अनुभागवन्धका ही 'वन्ध' शब्दसे कथन है । जीवके किसी भी परिणाममें वर्तता हुआ योग कर्मके प्रकृति-प्रदेशका अर्थात् 'ग्रहण का निमित्त होता है और जीवके उसी परिणाममें वर्तता हुया मोहरागद्वेषभाव कर्मके स्थिति-अनुभागका अर्थात् 'वन्ध'का निमित्त होता है; इसलिए मोहरागद्वेषभावको 'वन्ध'का अन्तरंग कारण (अंतरंग निमित्त ) कहा है और योगको-जो कि 'ग्रहण'का निमित्त है उसे-'बन्ध'का बहिरंग कारण ( वाह्य निमित्त ) कहा है ।१४८। गाथा १४९ मन्वयार्थ:-[ चतुर्विकल्पः हेतुः ] ( द्रव्यमिथ्यात्वादि ) चार प्रकारके हेतु [ मष्टविकल्पस्य कारणम् ] आठ प्रकारके कर्मोंके कारण [ भणितम् ] कहे गए हैं; [तेपाम् अपि च ] उन्हें भी [ रागादयः] ( जीवके ) रागादिभाव कारण हैं; [तेपाम् ममावे ] रागादिभावोंके अभावमें [न वध्यन्ते ] जीव नहीं बंधते । हेतु चतुर्विध अष्टविध कर्मों तणां कारण कह्या । तेनाय छे रागादि, ज्या रागादि नहि त्यां बंध ना ॥१४९।।

२१६ पंचास्तिकायसंग्रह मिथ्यात्वादिद्रव्यपर्यायाणामपि चहिरङ्गकारणद्योतनमेतत् । तन्त्रान्तरे किलाट- निकल्पकर्मकारणत्वेन बन्धहेतुर्द्रव्यहेतुरूपश्चतुर्विकल्पः प्रोक्तः मिथ्यात्वासंयमकपाययोगा इति । तेषामपि जीवभावभूता रागादयो बन्धहेतुत्वस्य हेतवः, यतो रागादिभावानामभावे द्रव्यमिथ्यात्वासंयमकपाययोगसद्भावेऽपि जीवा न वध्यन्ते । ततो रागादीनामन्तरङ्गत्वानिश्चयेन वन्धहेतुत्वमवसेयमिति ।। १४९ ।। -इति वन्धपदार्थव्याख्यानं समाप्तम् । अथ मोक्षपदार्थव्याख्यानम् । टीका:-यह, मिथ्यात्वादि द्रव्यपर्यायोंको ( -द्रव्यमिथ्यात्वादि पुद्गलपर्यायों- को) भी ( बंधके ) बहिरंग-कारणपनेका 'प्रकाशन है । ग्रन्थान्तरमें ( अन्य शास्त्रमें ) मिथ्यात्व, असंयम, कषाय और योग इन चार प्रकारके द्रव्यहेतुओंको (द्रव्यप्रत्ययोंको ) आठ प्रकारके कर्मोंके कारणरूपसे बन्धहेतु कहे हैं । उन्हें भी बन्धहेतुपनेके हेतु जीवभावभूत रागादिक हैं; क्योंकि रागादिभावोंका अभाव होनेसे द्रव्यमिथ्यात्व, द्रव्य-असंयम, द्रव्यकषाय और द्रव्ययोगके सद्भावमें भी जीव बंधते नहीं हैं । इसलिए रागादिभावोंको अन्तरंग वन्धहेतुपना होनेके कारण निश्चयसे बन्धहेतुपना है ऐसा निर्णय करना ।१४६। इसप्रकार वन्धपदार्थका व्याख्यान समाप्त हुआ। अब मोक्षपदार्थका व्याख्यान है । १. प्रकाशन प्रसिद्ध करना; समझाना; दर्शाना। २. जीवगत रागादिरूप भावप्रत्ययोंका अभाव होनेसे द्रव्यप्रत्ययोंके विद्यमानपने में भी जीव बंधते नहीं हैं। यदि जीवगत रागादिभावोंके अभावमें भी द्रव्यप्रत्ययोंके उदयमात्रसे वन्ध हो तो सर्वदा बन्ध हो रहे (-मोक्षका अवकाश ही न रहे ), क्योंकि संसारियोंको सदैव कर्मोदयका विद्यमानपना होता है। ३. उदयगत द्रव्यमिथ्यात्वादि प्रत्ययोंकी भांति रागादिभाव नवीन कर्मवन्धमें मात्र बहिरंग निमित्त नहीं हैं किन्तु वे तो नवीन कर्मबंधमें 'अन्तरंग निमित्त' हैं इसलिए उन्हें 'निश्चयसे बन्धहेतु' कहे हैं।

सवपदायपूर्वक-मोममार्गप्रपंचवर्णन . हेदुमभावे णियमा जायदि णाणिस्स पासवणिरोधो। पासवभावेण विणा जायदि कम्मस्स दुणिरोधो ॥१५०॥ कम्मस्साभावेण य सव्वण्हू सव्वलोगदरिसी य । पावदि इंदियरहिदं अव्वाबाहं सुहमणतं ॥१५१॥ हेत्वभावे नियमाज्जायते ज्ञानिनः मास्रवनिरोधः । आस्रवभावेन विना जायते कर्मणस्तु निरोधः ॥ १५० ।। कर्मणाममावेन च सर्वज्ञः सर्वलोकदर्शी च । प्राप्नोतीन्द्रियरहितमव्याबाधं सुखमनन्तम् ॥१५१ ।। द्रव्यकर्ममोक्षहेतुपरमसंवररूपेण भावमोक्षस्वरूपाख्यानमेतत् । आस्रवहेतुर्हि जीवस्य मोहरागद्वेषरूपो भावः । तदभावो भवति शानिनः । तदभावे भवत्यास्त्रवभावाभावः । आस्रव- गाथा १५०-१५१ अन्वयार्थ:-[ हेत्वभावे ] ( मोहरागद्वेषरूप ) हेतुका प्रभाव होनेसे [ शानिनः ] ज्ञानीको [ नियमात् ] नियमसे [ आस्रवनिरोधः जायते ] प्रास्रवका निरोध होता है [तु ] और [ आस्रवभावेन विना ] आस्रवभावके अभावमें [कर्मणः निरोधः जायते ] कर्मका निरोध होता है । [च ] और [ कर्मणाम् अभावेन ] कर्मोंका अभाव होनेसे वह [ सर्वज्ञासर्वलोकदर्शी च ] सर्वज्ञ तथा सर्वलोकदर्शी होता हुआ [इन्द्रियरहितम् ] इन्द्रिय रहित, [अव्यावाधम् ] अव्याबाध, [ अनन्तम् सुखम् प्राप्नोति ] 'अनन्त सुखको प्राप्त करता है। टीका:-यह, 'द्रव्यकर्ममोक्षके हेतुभूत परम-संवररूपसे भावमोक्षके स्वरूपका कथन है। १. द्रव्यकर्ममोक्ष द्रव्यकर्मका सर्वथा छूट जाना) द्रव्यमोक्ष । (यहां भावमोक्षका स्वरूप द्रव्यमोक्षके निमित्तभूत परम-संवररूपसे दर्शाया है।) हेतु-मभावे नियमथी मानवनिरोधन शानीने । भासरवभाव-अभावमा कर्मो तणुरोधन बने ॥१५०॥ कर्मो-अमावे सर्वज्ञानी सर्वदर्शी थाय छे। ने मक्षरहित, अनंत, अव्यावाध सुखने ते लहे ॥१५॥ २८ २१८ पंचास्तिकायसंग्रह भावाभावे भवति कर्माभावः । कर्माभावेन भवति सार्वज्ञं सर्वदर्शित्वमन्यावाधमिन्द्रिय- व्यापारातीतमनन्तसुखत्वं चेति । स एप जीवन्मुक्तिनामा भावमोक्षः । कथमिति चेत् । भावः खल्चत्र विवक्षितः कर्मावृतचैतन्यस्य क्रमप्रवर्तमानज्ञप्तिक्रियारूपः । स खलु संसारिणोऽनादिमोहनीयकर्मोदयानुवृत्तिवशादशुद्धो द्रव्यकर्मास्रव हेतुः । स तु झानिनो मोहरागद्वेषानुवृतिरूपेण प्रहीयते । ततोऽस्य आस्रवभावो निरुध्यते । ततो निरुद्धास्रवभावस्यास्य मोहलयेणात्यन्तनिर्विकारमनादिमुद्रितानन्तचैतन्यवीर्यस्य शुद्धज्ञप्तिक्रियारूपेणान्तर्मुहूर्तमतिबाह्य युगपज्ज्ञानदर्शनावरणान्तरायक्षयेण कथञ्चित् कूटस्थज्ञानत्वमवाप्य ज्ञप्तिक्रियारूपे क्रमप्रवृत्य- आस्रवका हेतु वास्तवमें जीवका मोहरागद्वेषरूप भाव है। ज्ञानीको उसका अभाव होता है । उसका अभाव होनेसे आस्रवभावका अभाव होता है। प्रास्रवभावका अभाव होनेसे कर्मका अभाव होता है । कर्मका अभाव होनेसे सर्वज्ञता, सर्वदर्शिता और अव्यावाध, 'इन्द्रियव्यापारातीत, अनन्त सुख होता है । सो यह जीवन्मुक्ति नामकां भावमोक्ष है। "किसप्रकार?' ऐसा प्रश्न किया जाए तो निम्नानुसार स्पष्टीकरण है:- यहाँ जो 'भाव' विवक्षित है वह कर्मावृत ( कर्मसे आवृत हुए ) चैतन्यकी क्रमानुसार प्रवर्तती ज्ञप्तिक्रियारूप है । वह ( क्रमानुसार प्रवर्तती ज्ञप्तिक्रियारूप भाव ) वास्तवमें संसारीको अनादि कालसे मोहनीयकर्मके उदयका अनुसरण करती हुई परिणतिके कारण अशुद्ध है, द्रव्यकर्मास्रवका हेतु है । परन्तु वह ( क्रमानुसार प्रवर्तती ज्ञप्तिक्रियारूप भाव ) ज्ञानीको मोहरागद्वेषवाली परिणतिरूपसे हानिको प्राप्त होता है इसलिए उसे आस्रवभावका निरोध होता है । इसलिए जिसे आस्रवभावका निरोध हुआ है ऐसे उस ज्ञानीको मोहक्षय द्वारा अत्यन्त निर्विकारपना होनेसे, जिसे अनादि कालसे अनन्त चैतन्य और ( अनंत ) वीर्य मुंद गया है ऐसा वह ज्ञानी (क्षीणमोह गुणस्थानमें ) शुद्ध ज्ञप्तिक्रियारूपसे अंतर्मुहूर्त व्यतीत करके युगपद् ज्ञानावरण, १. इन्द्रियव्यापारातीत-इन्द्रियव्यापार रहित । २. जीवन्मुक्ति = जीवित रहते हुए मुक्ति; देह होने पर भी मुक्ति । ३. विवक्षित-जिसका कथन करना है।

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन २१६ भावाद्भावकर्म विनश्यति । ततः कर्माभावे स हि भगवान्सर्वज्ञः सर्वदर्शी व्युपरतेन्द्रियव्यापारा- व्यावाधानन्तसुखश्च नित्यमेवावतिष्ठते । इत्येष भावकर्ममोक्षप्रकारद्रव्यकर्ममोसहेतुः परम- संवरप्रकारश्च ।। १५०-१५१ ॥ दसणणाणसमग्गं झाणं णो अण्णदव्वसंजुत्तं । जायदि णिज्जरहेदू सभावसहिदास साधुस्स ।।१५२।। दर्शनज्ञानसमग्र ध्यानं नो अन्यद्रव्यसंयुक्तम् । जायते निर्जराहेतुः स्वभावसहितस्य साधोः ॥१५२।। दर्शनावरण और अंतरायका क्षय होनेसे कथंचित् 'कूटस्थ ज्ञानको प्राप्त करता है और इसप्रकार उसे ज्ञप्तिक्रियाके रूपमें क्रमप्रवृत्तिका अभाव होनेसे भावकर्मका विनाश होता है । इसलिए कर्मका अभाव होने पर वह वास्तवमें भगवान सर्वज्ञ, सर्वदर्शी तथा इन्द्रियव्यापारातीत-अव्यावाध-अनंतसुखवाला सदैव रहता है। इसप्रकार यह ( जो यहां कहा है ), 'भावकर्ममोक्षका प्रकार तथा द्रव्यकर्ममोक्षका हेतुभूत परम संवरका प्रकार है । १५०-१५१ । गाथा १५२ अन्वयार्थ:-[स्वभावसहितस्य साधोः] स्वभावसहित साधुको (-स्वभाव- परिणत केवलीभगवानको ) [ दर्शनज्ञानसमग्र] दर्शनज्ञानसे सम्पूर्ण और [नो अन्य- द्रव्यसंयुक्तम् ] अन्यद्रव्यसे असंयुक्त ऐसा [ ध्यानं ] ध्यान [ निर्जराहेतुः जायते ] निर्जराका हेतु होता है। १. कूटस्थ सर्व काल एकरूप रहनेवाला; अचल । [ ज्ञानावरणादि घातिकर्मोंका नाश होने पर ज्ञान कहीं सर्वथा प्रपरिणामी नहीं हो जाता; परन्तु वह अन्य-अन्य ज्ञेयोंको जाननेरूप परिवर्तित नहीं होता-सर्वदा तीनों कालके समस्त ज्ञेयों को जानता रहता है, इसलिए उसे कथंचित् कूटस्थ कहा है।] भावकर्ममोक्ष= भावकर्मका सर्वथा छूट जाना। भावमोक्ष । ज्ञप्तिक्रियामें क्रमप्रवृत्तिका प्रभाव होना वह भावमोक्ष है अथवा सर्वज्ञ-सर्वदर्शीपनेकी और अनन्तानन्दमयपनेकी प्रगटता वह भावमोक्ष है।) ३. प्रकार-स्वरूप, रीति । दृगज्ञानथी परिपूर्ण ने परद्रव्यविरहित ध्यान जे । ते निर्जरानो हेतु थाय स्वभाव परिणत साधुने ।। १५२ ।।

पंचास्तिकायसंग्रह द्रव्यकर्ममोलहेतुपरमनिर्जराकारणध्यानाख्यानमेतत् । एवमस्य खलु भावमुक्तस्य भगवतः केवलिनः स्वरूपतृप्तत्वाद्विश्रान्तसुखदुःखकर्मविपाककृतविक्रियस्व प्रक्षीणावरणत्वादनन्त- ज्ञानदर्शनसंपूर्णशुद्धज्ञानचेतनामयत्वादतीन्द्रियत्वात् चान्यद्रव्यसंयोगवियुक्तं शुद्धस्वरूपेऽविचलित- चैतन्यवृचिरूपत्वात्कश्चिद्धयानव्यपदेशाहमात्मनः स्वरूपं पूर्वसंचितकर्मणां शक्तिशातनं पतनं वा विलोक्य निर्जराहेतुत्वेनोपवर्ण्यत इति ॥ १५२ ।। टीका:-यह, द्रव्यकर्ममोक्षके हेतुभूत ऐसी परम निर्जराके कारणभूत ध्यानका कथन है। इसप्रकार वास्तवमें यह (-पूर्वोक्त ) भावमुक्त (-भावमोक्षवाले ) भगवान केवलीको-कि जिन्हें स्वरूपतृप्तपनेके कारण 'कर्मविपाककृत सुखदुःखरूप विक्रिया अटक गई है उन्हें-आवरणके प्रक्षीणपनेके कारण, अनन्त ज्ञानदर्शनसे सम्पूर्ण शुद्धज्ञानचेतनामयपनेके कारण तथा अतीन्द्रियपनेके कारण जो अन्यद्रव्यके संयोग रहित है और शुद्ध स्वरूपमें अविचलित चैतन्यवृत्तिरूप होनेके कारण जो 'कथंचित् 'ध्यान' नामके योग्य है ऐसा आत्माका स्वरूप ( -आत्माकी निज दशा ) पूर्वसंचित कर्मोंकी शक्तिका 'शातन अथवा उनका पतन देखकर निर्जराके हेतुरूपसे वर्णन किया जाता है। भावार्थ:-केवलीभगवानके आत्माकी दशा ज्ञानदर्शनावरणके क्षयवाली होनेके कारण, शुद्धज्ञानचेतनामय होनेके कारण तथा इन्द्रियव्यापारादि बहिर्द्रव्यके आलम्बन रहित होनेके कारण अन्यद्रव्यके संसर्ग रहित है और शुद्धस्वरूपमें निश्चल चैतन्यपरिणतिरूप होनेके कारण किसी प्रकार 'ध्यान' नामके योग्य है। उनकी ऐसी आत्मदशाका निर्जराके निमित्तरूपसे वर्णन किया जाता है क्योंकि उन्हें पूर्वोपार्जित कर्मोंकी शक्ति हीन होती जाती है तथा वे कर्म खिरते जाते हैं ।१५२। १. केवलीभगवान निर्विकार-परमानन्दस्वरूप स्वात्मोत्पन्न सुखसे तृप्त हैं इसलिए कर्मका विपाक जिसमें निमित्तभूत होता है ऐसी सांसारिक सुखदुःखरूप (-हर्षविषादरूप) विक्रिया उन्हें विरामको प्राप्त हुई है। २. शावन-पतला होना; हीन होना; क्षीण होना। ३. पतन =नाश; गलन; खिर जाना ।

२२१ सवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन जो संवरेण जुत्तो णिज्जरमाणोध सव्वकम्माणि । ववगदवेदाउस्सो मुदि भवं तेण सो मोक्खो ॥१५३॥ या संवरेण युक्तो निर्जरनथ सर्वकर्माणि । व्यपगतवेद्यायुष्को मुश्चति भवं तेन स मोक्षः ॥१५३।। द्रव्यमोक्षस्वरूपाख्यानमेतत् । अथ खलु भगवतः केवलिनो भावमोचे सति प्रसिद्धपरमसंवरस्योचरकर्मसन्तती निरुद्धायां परमनिर्जराकारणध्यानप्रसिद्धी सत्या पूर्वकर्मसंतती कदाचित्स्वभावेनैव कदाचित्समुद्घातविधानेनायुःकर्मसमभूतस्थित्यामायुःकर्मानुसारेणैव गाथा १५३ अन्वयार्थी-[ या संवरेण युक्तः ] जो संवरसे युक्त है ऐसा (केवलज्ञानप्राप्त) जीव [ निर्जरन् अथ सर्वकर्माणि ] सर्व कर्मोंकी निर्जरा करता हुआ [ व्यपगतवेद्यायुष्का ] वेदनीय और प्रायु रहित होकर [ भवं मुञ्चति ] भवको छोड़ता है; [ वेन ] इसलिए ( इसप्रकार सर्व कर्मपुटुगलोंका वियोग होनेके कारण ) [ सा मोक्षा] वह मोक्ष है। टीकार-यह, द्रव्यमोक्षके स्वरूपका कथन है । वास्तवमें केवलीभगवानको, भावमोक्ष होने पर, परम संवर सिद्ध होनेके कारण 'उत्तर कर्मसंतति निरोधको प्राप्त होकर और परम निर्जराके कारणभूत ध्यान सिद्ध होनेके कारण पूर्व कर्मसंतति-कि जिसकी स्थिति कदाचित् स्वभावसे ही आयुकर्मके जितनी होती है और कदाचित् ' समुद्घातविधानसे प्रायुकर्मके जितनी - A १. उत्तर कर्मसंतति-बादका कर्मप्रवाह; भावी कर्मपरम्परा । २. पूर्व= पहले की। ३. केवलीभगवानको वेदनीय, नाम और गोत्रकर्मकी स्थिति कभी स्वभावसे ही ( अर्थात् केवलीसमुद्घातरूप निमित्त हुए बिना ही ) आयुकर्मके जितनी होती है और कभी उन तीन कर्मोंकी स्थिति वायुकर्मसे अधिक होने पर भी वह स्थिति घटकर आयुकर्म जितनी होनेमें केवलीसमुद्घात निमित्त बनता है। संवरसहित ते जीव पूर्व समस्त कर्मों निर्जरे । ने आयुवेधविहीन भई भवने तजे; ते मोक्ष छे ।।१५३।।

२२२ पंचास्तिकायसंग्रह निर्जीयमाणायामपुनर्भवाय तद्भवत्यागसमये घेदनीयायुर्नामगोत्ररूपाणां जीवन सहात्यन्तविश्लेषा कर्मयुद्गलानां द्रव्यमोक्षः ॥१५३।। -इति मोक्षपदार्थव्याख्यानं समाप्तम् । समाप्तं च मोक्षमार्गावयवरूपसम्यग्दर्शनज्ञानविषयभूतनवपदार्थव्याख्यानम् ।। * अथ मोक्षमार्गप्रपञ्चसूचिका चूलिका । जीवसहावं गाणं अप्पडिहददंसणं अणण्णमयं । चरियं च तेसु णियदं अत्थित्तगिदियं भणियं ॥१५४॥ होती है वह–आयुकर्मके अनुसार ही निर्जरित होती हुई, 'अपुनर्भवके लिए वह भव छूटनेके समय होनेवाला जो वेदनीय-आयु-नाम-गोत्ररूप कर्मपुद्गलोंका जीवके साथ अत्यन्त विश्लेष ( वियोग ) वह द्रव्यमोक्ष है ।१५३। इसप्रकार मोक्षपदार्थका व्याख्यान समाप्त हुआ । और मोक्षमार्गके अवयवरूप सम्यग्दर्शन तथा सम्यग्ज्ञानके विषयभूत नव पदार्थोंका व्याख्यान भी समाप्त हुआ। * * * अब 'मोक्षमार्गप्रपंचसूचक 'चूलिका है। १. अपुनर्भव-फिरसे भव नहीं होना । ( केवलीभगवानको फिरसे भव हुए बिना ही उस भवका त्याग होता है। इसलिए उनके प्रात्मासे कर्मपुद्गलोंका सदाके लिए सर्वथा वियोग होता है । २. मोक्षमार्गप्रपंचसूचक = मोक्षमार्गका विस्तार बतलानेवाली, मोक्षमार्गका विस्तारसे कथन करनेवाली। ३. चूलिकाके अर्थके लिए पृष्ठ १५१ की टिप्पणी देखें। आत्मस्वभाव अनन्यमय निर्विघ्न दर्शन ज्ञान छ । दृरज्ञान नियत अनिंद्यःजे मस्तित्व ते चारित्र के ॥१५४|| नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचक्यांन २२३ जीवस्वभावं घानमप्रतिहतदर्शनमनन्यमयम् । चारित्रं च तयोनियतमस्तित्वमनिन्दितं भणितम् ॥१५॥ मोक्षमार्गस्वरूपाख्यानमेतत् । जीवस्वभावनियतं चरितं मोक्षमार्गः । बीवस्वभावो हि मानदर्शने अनन्यमयत्वात् । अनन्यमयत्वं च तयोर्विशेषसामान्यचैतन्यस्वभावजीवनिर्वृत्त्वात् । अथ तयोर्जीयस्वरूपभृतयोनिदर्शनयोर्यनियतमवस्थितमुत्पादव्ययध्रौव्यरूपवृचिमयमस्तित्वं रागादिपरिणत्यभावादनिन्दितं तच्चरितं तदेव मोक्षमार्ग इति । द्विविधं हि किल संसारिषु चरितं-स्वचरितं परचरितं च स्वसमयपरसमयावित्यर्थः । तत्र स्वभावावरि स्तित्वस्वरूपं गाथा १५४ अन्वयार्थः-[ जीवस्वभावं ] जीवका स्वभाव [ ज्ञानम् ] ज्ञान और [मप्रतिहतदर्शनम् ] अप्रतिहत दर्शन है-[ अनन्यमयम् ] जो कि ( जीवसे ) अनन्यमय हैं । [ तयोः ] उन ज्ञानदर्शनमें [ नियतम् ] नियत [ अस्तित्वम् ] अस्तित्व- [ अनिन्दितं ] जो कि अनिंदित है-[ चारित्रं च भणितम् ] उसे (जिनेन्द्रोंने ) चारित्र कहा है। टीका:-यह, मोक्षमार्गके स्वरूपका कथन है । जीवस्वभावमें नियत चारित्र वह मोक्षमार्ग है। जीवस्वभाव वास्तवमें ज्ञानदर्शन हैं क्योंकि वे (जीवसे) अनन्यमय हैं । ज्ञानदर्शनका (जीवसे) अनन्यमयपना होनेका कारण यह है कि 'विशेषचैतन्य और सामान्य चैतन्य जिसका स्वभाव है ऐसे जीवसे वे निष्पन्न हैं ( अर्थात् जीवद्वारा ज्ञानदर्शन रचे गए हैं ) । अब जीवके स्वरूपभूत ऐसे उन ज्ञानदर्शनमें 'नियत-अवस्थित ऐसा जो उत्पादव्ययध्रौव्यरूप वृत्तिमय अस्तित्व-जो कि रागादिपरिणामके प्रभावके कारण अनिंदित है-वह चारित्र है; वही मोक्षमार्ग है। संसारियोंमें चारित्र वास्तवमै दो प्रकारका है:-(१) स्वचारित्र और (२) परचारित्र; (१) स्वसमय और (२) परसमय ऐसा अर्थ है । वहीं, स्वभावमें अवस्थित अस्तित्वस्वरूप ( चारित्र ) वह स्वचारित्र है और परभावमें १. विशेषचैतन्य वह ज्ञान है और सामान्यचैतन्य वह दर्शन है। २. नियत =अवस्थित; स्थित; स्थिर; दृढ़रूप स्थित । ३. वृत्तिम्-वर्तना) होना। [ उत्पादव्ययध्रौव्यरूप वृत्ति वह अस्तित्व है। --

२२४
पचास्तिकायसंग्रह
स्वचरितं, परभावावस्थितास्तित्व स्वरूपं परचरितम् । तत्र यस्मभावावस्थितास्तित्वरूपं
परमावावस्थितास्तित्वव्यावृवत्वेनात्यन्तमनिन्दितं तदत्र साक्षान्मोक्षमार्गत्वेनावधारणीय-
मिति ॥ १५४ ॥
जीवो सहावणियदो अणियदगणपज्जोध परसमयो।
नदि कुणदि सगं समयं पब्भस्सदि कम्मबंधादो ॥१५॥
जीवः स्वभावनियतः अनियतगुणपर्यायोऽय परसमयः ।
यदि कुरुते स्वकं समयं प्रभ्रस्यति कर्मवन्धान ॥ १५५ ॥
अवस्थित अस्तित्वस्वरूप ( चारित्र ) वह परचारित्र है । उसमेंसे ( अर्थात् दो प्रकारके
चारित्रमेंसे ), स्वभाबमें अवस्थित अस्तित्वरूप चारित्र-जो कि परभावमें अवस्थित
अस्तित्वसे भिन्न होनेके कारण अत्यन्त अनिंदित है वह यहां साक्षात् मोक्षमार्गरूप
अवधारना ।
[ यही चारित्र 'परमार्थ' शब्दसे वाच्य ऐसे मोक्षका कारण है, अन्य नहीं-
ऐसा न जानकर, मोक्षसे भिन्न ऐसे असार संसारके कारणभूत मिथ्यात्वरागादिमें लीन
वर्तते हुए अपना अनंत काल गया; ऐसा जानकर उसी जीवस्वभावनियत चारित्रकी-
जो कि मोक्षके कारणभूत है उसकी-निरन्तर भावना करना योग्य है। इसप्रकार
सूत्रतात्पर्य है । ] । १५४ ॥
गाथा १५५
अन्वयार्थ :-[ जीवः ] जीव, [ स्वभावनियतः ] ( द्रव्य-अपेक्षासे ) स्वभाव-
नियत होने पर भी, [ अनियतगुणपर्याय: अथ परसमयः ] यदि अनियत गुणपर्यायवाला
हो तो परसमय है । [ यदि ] यदि वह [स्वकं समयं कुरुते ] (नियत गुणपर्यायसे
परिणमित होकर ) स्वसमयको करता है तो [ कमबन्धात् ] कर्मबन्धसे [प्रभ्रस्यति ]
छूटता है।
निजभावनियत अनियत गुणपर्ययपणे परसमय छ ।
ते जो करे स्वकसमयने तो कमबंधनथी छूटे ॥ १५५ ॥

२१५ नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन स्वसमयपरसमयोपादानव्युदासपुरस्सरकर्मक्षयद्वारेण जीवस्वभावनियतचरितस्य मोक्षमार्गत्वद्योतनमेतत् । संसारिणो हि जीवस्य ज्ञानदर्शनावस्थितत्वात् स्वभावनियतस्याप्यनादि- मोहनीयोदयानुवृतिपरत्वेनोपरक्तोपयोगस्य सतः समुपाचमाववैक्यरूप्यत्वादनियतगुणपर्यायत्वं परसमयः परचरितमिति यावत् । तस्यैवानादिमोहनीयोदयानुवृत्तिपरत्वमपास्यात्यन्तशुद्धोपयोगस्य सतः समुपाचभावैक्यरूप्यत्वानियतगुणपर्यायत्वं स्वसमया स्वचरितमिति यावत् । अथ खलु यदि कथञ्चनोदिनसम्यग्ज्ञानज्योतिर्जीवः परसमयं व्युदस्य स्वसमयमुपादचे तदा कर्मवन्धादवश्यं भ्रश्यति । यतो हि जीवस्यभावनियतं चरितं मोक्षमार्ग इति ।।१५।। टीका:-स्वसमयके ग्रहण और परसमयके त्यागपूर्वक कर्मक्षय होता है- ऐसे प्रतिपादन द्वारा यहाँ ( इस गाथामें ) "जीवस्वभावमें नियत चारित्र वह मोक्षमार्ग है" ऐसा दर्शाया है । संसारी जीव, ( द्रव्य-अपेक्षासे ) ज्ञानदर्शनमें अवस्थित होनेके कारण स्वभावमें नियत ( -निश्चलरूपसे स्थित ) होने पर भी, जब अनादि मोहनीयके उदयका अनुसरण करके परिणति करनेके कारण 'उपरक्त उपयोगवाला ( -अशुद्ध उपयोगवाला) होता है तब ( स्वयं ) भावोंका विश्वरूपपना (-अनेकरूपपना ) ग्रहण किया होनेके कारण उसे जो अनियतगुणपर्यायपना होता है वह परसमय अर्थात् परचारित्र है; वही ( जीव ) जब अनादि मोहनीयके उदयका अनुसरण करनेवाली परिणतिको छोड़कर अत्यन्त शुद्ध उपयोगवाला होता है तब (स्वयं) भावका एकरूपपना ग्रहण किया होनेके कारण उसे जो नियतगुणपर्यायपना होता है वह स्वसमय अर्थात् स्वचारित्र है। अब, वास्तवमें यदि किसी भी प्रकार सम्यग्ज्ञानज्योति प्रगट करके जीव परसमयको छोड़कर स्वसमयको ग्रहण करता है तो कर्मबन्धसे अवश्य छूटता है; इसलिए वास्तवमें ( ऐसा निश्चित होता है कि ) जीवस्वभावमें नियत चारित्र वह मोक्षमार्ग है ।१५५॥ १. उपरक्त= उपरागयुक्त। [ किसी पदार्थमें होनेवाला, अन्य उपाधिके अनुरूप विकार (अर्थात् पन्य उपाधि जिसमें निमित्तभूत होती है ऐसी नौपाधिक विकृति-मलिनता-अशुद्धि ) वह उपराग है।] २. मनियत-अनिश्चिन, अनेकरूप; विविध प्रकारके । ३. नियत-निश्चित एकरूप, अमुक एक ही प्रकारके । २९

१२६
पंचास्तिकायसंग्रह
1
जो परदव्वम्हि सुहं असुहं रागेण कुणदि जदि भावं ।
सो सगचरित्तभट्ठो परचरियचरो हवदि जीवो ॥१५६ ।।
या परद्रव्ये शुभमशुभं रागेण करोति यदि भावम् ।
स स्वकचरित्रभ्रष्टा परचरितचरो भवति जीवः ।। १५६ ॥
परचरितप्रवृत्तस्वरूपाख्यानमेतत् । यो हि मोहनीयोदयानुवृत्तिवशाद्रज्यमानोपयोगः
सन् परद्रव्ये शुभमशुभं ना भावमादधाति, स स्वफचरित्रभ्रष्टः परचरित्रचर इत्युपगीयते; यतो
हि स्वद्रव्ये शुद्धोपयोगवृत्तिः स्वचरितं, परद्रव्ये सोपरागोपयोगवृचिः परचरितमिति ॥१५६।।
.
.
गाथा १५६
अन्वयार्थः-- [य] जो [रागेण] रागसे (-रंजित अर्थात मलिन उपयोगसे)
[ परद्रव्ये ] परद्रव्यमें [ शुभम् अशुभम् भावम् ] शुभ या अशुभ भाव [ यदि करोति ]
करता है, [ सः जीवः ] वह जीव [ स्वकचरित्रभ्रष्टः ] स्वचारित्रभ्रष्ट ऐसा [ परचरितचरः
भवति ] परचारित्रका आचरण करनेवाला है ।
टीका:-यह, परचारित्रमें प्रवर्तन करनेवालेके स्वरूपका कथन है ।
जो ( जीव ) वास्तवमें मोहनीयके उदयका अनुसरण करनेवाली परिणतिके
वश ( अर्थात् मोहनीयके उदयका अनुसरण करके परिणमित होनेके कारण )
रंजितउपयोगवाला ( उपरक्त-उपयोगवाला) वर्तता हुआ, परद्रव्यमें शुभ या अशुभ
भावको धारण करता है, वह ( जीव ) स्वचारित्रसे भ्रष्ट ऐसा परचारित्रका आचरण
करनेवाला कहा जाता है; क्योंकि वास्तवमें स्वद्रव्यमें शुद्ध-उपयोगरूप परिणति
वह स्वचारित्र है और परद्रव्यमें 'सोपराग-उपयोगरूप परिणति वह परचारित्र
है ।१५६॥
१. सोपराग=उपरागयुक्त; उपरक्त, मलिन, विकारी; अशुद्ध। [उपयोगमें होनेवाला, कर्मोदयरूप
उपाधिके अनुरूप विकार ( अर्थात् कर्मोदयरूप उपाधि जिसमें निमित्तभूत होती है ऐसी
श्रीपाधिक विकृति ) सो उपराग है । ]
जे रागथी परद्रव्यमा करतो शुभाशुभ भावने ।
ते स्वकचरित्रथी भ्रष्ट, परचरित्र आचरनार छ ॥१५६||

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन २२७ पासवदि जेण पुण्णं पावं वा अप्पणोध भावेण । सो तेण परचरित्तो हवदि त्ति जिणा परूवेति ॥१५७॥ स्त्रवति येन पुण्यं पापं वात्मनोऽथ भावेन । स तेन परचरित्रः भवतीति जिनाः प्ररूपयन्ति ॥१७॥ परचरितप्रवृत्तेर्वन्धहेतुत्वेन मोक्षमार्गत्वनिषेधनमेतत् । इह किल शुभोपरक्तो भावः पुण्यास्रवः, अशुभोपरक्तः पापास्रव इति । तत्र पुण्यं पापं वा येन भावेनास्रवति यस्य जीवस्य यदि स भावो भवति स जीवस्तदा तेन परचरित इति प्ररूप्यते । ततः परचरितप्रवृत्तिर्वन्धमार्ग एव, न मोक्षमार्ग इति ॥१५७|| - गाथा १५७ अन्वयार्थ:-[येन भावेन ] जिस भावसे [ आत्मनः ] आत्माको [ पुण्यं पापं वा] पुण्य अथवा पाप [ अथ यात्रवति ] आस्रवित होते हैं, [तेन ] उस भाव द्वारा [ सः ] वह ( जीव ) [ परचरित्रः भवति ] परचारित्र है-[इति ] ऐसा [ जिनाः] जिन [ प्ररूपयन्त ] प्ररूपित करते हैं । टीका:-यहां, परचारित्रवृत्ति बंधहेतुभूत होनेसे उसे मोक्षमार्गपनेका निषेध किया गया है (अर्थात् परचारित्रमें प्रवर्तन बंधका हेतु होनेसे वह मोक्षमार्ग नहीं है ऐसा इस गाथामें दर्शाया है ) । यहां वास्तवमें शुभोपरक्त भाव ( -शुभरूप विकारी भाव ) वह पुण्यासंव है और अशुभोपरक्त भाव (-अशुभरूप विकारी भाव) पापास्रव है । वहाँ, पुण्य अथवा पाप जिस भावसे आस्रवित होते हैं, वह भाव जब जिस जीवको हो तब वह जीव उस भाव द्वारा परचारित्र है-ऐसा ( जिनेन्द्रों द्वारा ) प्ररूपित किया जाता है । इसलिए ( ऐसा निश्चित होता है कि ) परचारित्रमें प्रवृत्ति सो बंधमार्ग ही है, मोक्षमार्ग नहीं है ।१५७। रे ! पुण्य अथवा पाप जीवने आसवे जे भावथी । तेना वडे ते 'परचरित' निर्दिष्ट छ जिनदेवथी ॥१५७|| २२८ पंचास्तिकायसंग्रह जो सव्वसंगमुक्को णण्णमणो अप्पणं सहावेण । जाणदि पस्सदि णियदं सो सगचरियं चरदि जीवो ||१५८।। यः सर्वसङ्गमुक्तः अनन्यमनाः आत्मानं स्वभावेन । जानाति पश्यति नियतं सा स्वकवरितं चरति जीवः ॥१५८॥ स्वचरितप्रवृत्तस्वरूपाख्यानमेतत् । यः खलु निरुपरागोपयोगत्वात्सर्वसङ्गमुक्तः परद्रव्यव्यावृत्तोपयोगत्वादनन्यमनाः आत्मानं स्वभावेन ज्ञानदर्शनरूपेण नानाति पश्यति गाथा १५८ अन्वयार्थ:-[य] जो [ सर्वसङ्गमुक्तः ] सर्वसंगमुक्त और [ अनन्यमनाः ] अनन्यमनवाला बर्तता हुआ [ आत्मानं ] आत्माको [ स्वभावेन ] ( ज्ञानदर्शनरूप ) स्वभावद्वारा [ नियतं ] नियतरूपसे (-स्थिरतापूर्वक ) [ जानाति पश्यति ] जानता देखता है [ सः जीवः ] वह जीव [ स्वकचरितं ] स्वचारित्र [ चरति ] भाचरता है । टीका:-यह, स्वचारित्रमें प्रवर्तन करनेवालेके स्वरूपका कथन है । जो ( जीव ) वास्तवमें 'निरुपराग उपयोगवाला होनेके कारण सर्वसंगमुक्त वर्तता हुआ, परद्रव्यसे व्यावृत्त उपयोगवाला होनेके कारण अनन्यमनवाला वर्तता हुआ, आत्माको ज्ञानदर्शनरूप स्वभाव द्वारा नियतरूपसे अर्थात् अवस्थितरूपसे जानता- १. निरुपराग=उपराग रहित; निर्मल; अविकारी; शुद्ध । [ निरुपराग उपयोगवाला जीव समस्त बाह्य-अभ्यन्तर संगसे शून्य है तथापि नि:संग परमात्माको भावना द्वारा उत्पन्न सुन्दरमानन्द- स्यन्दी परमानन्दस्वरूप सुखसुधारसके प्रास्वादसे, पूर्ण कलशकी भांति, सर्व प्रात्मप्रदेशमें भरपूर होता है। २. व्यावृत्त=विमुख हुमा पृथक् हुआ; निवृत्त हुआ; निवृत्त ; भिन्न । ३. अनन्यमनवाला=जिसकी परिणति अन्यके प्रति नहीं ऐसा। [मन=चित्त; परिणति; भाव।] सौ-संगमुक्त अनन्यचिच स्वभावथी निज आत्मने । जाणे अने देखे नियत रही, ते स्वचरितप्रवृत्त के ॥१५८|| .

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन २२६ - नियतमवस्थितत्वेन, स खलु स्वकं चरितं चरति जीवः । यतो हि दृशिज्ञप्तिस्वरूपे पुरुषे तन्मात्रत्वेन वतनं स्वचरितमिति ।। १५८ ।। चरियं चरदि सगं सो जो परवव्वप्पभावरहिवप्पा । दसणणाणवियप्पं अवियप्पं चरदि अष्पादो ॥१५॥ चरितं चरति स्वकं स यः परद्रव्यात्मभावरहितात्मा । दर्शनज्ञानविकल्पमविकल्पं चरत्यात्मनः ॥१५९ ।। शुद्धस्वचरितप्रतिपथप्रतिपादनमेतत् । यो हि योगीन्द्रः समस्तमोहव्यूहवहि- देखता है। वह जीव वास्तवमें स्वचारित्र आचरता है; क्योंकि वास्तवमें 'दृशिज्ञप्तिस्वरूप पुरुषमें ( -आत्मामें ) तन्मात्ररूपसे वर्तना सो स्वचारित्र है। भावार्थ:-जो जीव शुद्धोपयोगी वर्तता हुआ और जिसकी परिणति परकी ओर नहीं जाती ऐसा वर्तता हुआ, आत्माको स्वभावभूत ज्ञानदर्शनपरिणाम द्वारा स्थिरतापूर्वक जानता-देखता है, वह जीव स्वचारित्रका आचरण करनेवाला है; क्योंकि दृशिज्ञप्तिस्वरूप आत्मामें मात्रदृशिज्ञप्तिरूपसे परिणमित होकर रहना वह स्वचारित्र है । १५८ । गाथा १५९ अन्वयार्थ:-[:] जो [ परद्रव्यात्मभावरहितात्मा ] परद्रव्यात्मक भावोंसे रहित स्वरूपवाला वर्तता हुआ, [ दर्शनज्ञानविकल्पम् ] ( निजस्वभावभूत ) दर्शन- ज्ञानरूप भेदको [ मात्मनः अविकल्पं ] आत्मासे अभेदरूप [चरति ] आचरता है, [स] वह [ स्वकं चरितं चरति ] स्वचारित्रको आचरता है । टीका:-यह, शुद्ध स्वचारित्रप्रवृत्तिके मार्गका कथन है। . १. दृशि-दर्शनक्रिया; सामान्य अवलोकन । . ते के स्वचरितप्रवृच, जे परद्रव्यथी विरहितपणे । निज ज्ञानदर्शनभेदने नीवथी मभिन्न ज माचरे ।। १५९ ॥

- - २३० पंचास्तिकायसंग्रह भूतत्वात्परद्रव्यस्वभावभावरहितात्मा सन् , स्वद्रव्यमेकमेवाभिमुल्येनानुवर्तमानः स्वस्वभावभृतं दर्शनज्ञानविकल्पमप्यात्मनोऽविकल्पत्वेन चरति, स खलु स्वकं चरितं चरति । एवं हि शुद्धद्रव्याश्रितमभिन्नसाध्यसाधनभावं निश्चयनयमाश्रित्य मोलमार्गप्ररूपणम् । यत् पूर्वमुद्दिष्टं तत्स्वपरप्रत्ययपर्यायाश्रितं भिन्नसाध्यसाधनभावं व्यवहारनयमाश्रित्य प्ररूपितम् । जो योगीन्द्र, समस्त 'मोहव्यूहसे बहिर्भूत होने के कारण परद्रव्यके स्वभावरूप भावोंसे रहित स्वरूपवाले वर्तते हुए, स्वद्रव्यको एकको ही अभिमुखरूपसे अनुसरते हुए निजस्वभावभूत दर्शनज्ञानभेदको भी आत्मासे अभेदरूपसे आचरते हैं, वे वास्तवमें स्वचारित्रको आचरते हैं । इसप्रकार वास्तवमें 'शुद्धद्रव्यके आश्रित, अभिन्नसाध्यसाधनभाववाले निश्चयनयके आश्रयसे मोक्षमार्गका प्ररूपण किया गया। और जो पहले ( १०७ वीं गाथामें ) दर्शाया गया था वह स्वपरहेतुक पर्यायके आश्रित, "भिन्नसाध्यसाधनभाववाले १. मोहव्यूह मोहसमूह । [ जिनमुनीन्द्रने समस्त मोहसमूहका नाश किया होनेसे 'अपना स्वरूप परद्रव्यके स्वभावरूप भावोंसे रहित है' ऐसी प्रतीति और ज्ञान जिन्हें वर्तता है, तथा तदुपरान्त जो मात्र स्वद्रव्यमें ही निर्विकल्परूपसे अत्यन्त लीन होकर निजस्वभावभूत दर्शनज्ञानभेदोंको प्रात्मासे अभेदरूपसे पाचरते हैं, वे मुनीन्द्र स्वचारित्रका आचरण करनेवाले हैं।] २. यहाँ निश्चयनयका विषय शुद्धद्रव्य अर्थात् शुद्ध पर्यायपरिणत द्रव्य है, अर्थात् अकेले द्रव्यकी (-पर निमित्त रहित ) शुद्धपर्याय है; जैसे कि, निर्विकल्प शुद्धपर्यायपरिणत मुनिको निश्चयनयसे मोक्षमार्ग है। ३. जिस नयमें साध्य और साधन अभिन्न ( अर्थात् एक प्रकारके ) हों वह यहाँ निश्चयनय है जैसे कि, निर्विकल्पध्यानपरिणत ( -शुद्धात्मश्रद्धानज्ञानचारित्रपरिणत ) मुनिको निश्चयनयसे मोक्षमार्ग है क्योंकि वहाँ ( मोक्षरूप ) साध्य और ( मोक्षमार्गरूप ) साधन एक प्रकारके अर्थात् शुद्धात्मरूप ( -शुद्धात्मपर्यायल्प ) हैं। जिन पर्यायोंमें स्व तथा पर कारण होते हैं अर्थात् उपादानकारण तथा निमित्त कारण होते हैं वे पर्याय स्वपरहेतुक पर्यायें हैं। जैसे कि छठवें गुणस्थानमें (द्रव्याथिकनयके विषयभूत शुद्धात्मस्वरूपके आंशिक अवलम्बन सहित ) वर्तते हुए तत्त्वार्थश्रद्धान ( नवपदार्थगत श्रद्धान ), तत्त्वार्थज्ञान ( नवपदार्थगत ज्ञान ) पौर पंचमहाव्रतादिरूप चारित्र-यह सव स्वपरहेतुक पर्याय हैं। वे यहां व्यवहारनयके विषयभूत हैं। ५. जिस नयमें साध्य तथा साधन भिन्न हों (-भिन्न प्ररूपित किए जाएं) वह यहां व्यवहारनय है; जैसे कि, छठवें गुणस्थानमें (द्रव्याथिकनयके विषयभूत शुद्धात्मस्वरूपके आंशिक मालम्बन सहित । वर्तते हुए तत्त्वार्थवद्धान (नवपदार्थसम्बन्धी श्रद्धान), तत्त्वार्थज्ञान और पंचमहाव्रतादि- रूप चारित्र व्यवहारनयसे मोक्षमार्ग है क्योंकि ( मोक्षरूप ) साध्य स्वहेतुक पर्याय है और ( तत्त्वार्थश्रदानादिमय मोक्षमार्गरूप ) साधन स्वपरहेतुक पर्याय है। ४.

२३१ अत नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन चैतद्विप्रतिषिद्धं निश्चयव्यवहारयोः साध्यसाधनभावत्वात्सुवर्णसुवर्णपाषाणवत् । एवोभयनयायत्ता पारमेश्वरी तीर्थप्रवर्तनेति ।। १५९ ॥ व्यवहारनयके आश्रयसे (-व्यवहारनयकी अपेक्षा से ) प्ररूपित किया गया था। इसमें परस्पर विरोध आता है ऐसा भी नहीं है, क्योंकि सुवर्ण और 'सुवर्णपाषाणकी भांति निश्चय-व्यवहारको साध्य-साधनपना है; इसीलिए पारमेश्वरी (-जिनभगवानकी ) 'तीर्थप्रवर्तना दोनों नयोंके आधीन है ।१५६ । . १. जिस पाषाणमें सुवर्ण हो उसे सुवर्णपाषाण कहा जाता है। जिस प्रकार व्यवहारनयसे सुवर्णपाषाण सुवर्णका साधन है, उसी प्रकार व्यवहारनयसे व्यवहारमोक्षमार्ग निश्चय- मोक्षमार्गका साधन है; अर्थात् व्यवहारनयसे भावलिंगी मुनिको सविकल्प दशामें वर्तते हुए तत्त्वार्थश्रद्धान, तत्त्वार्थज्ञान और महाव्रतादिरूप चारित्र निर्विकल्प दशामें वर्तते हुए शुद्धात्म- श्रद्धानज्ञानानुष्ठानके साधन हैं। २. तीर्थ= मार्ग (अर्थात् मोक्षमार्ग); उपाय ( अर्थात् मोक्षका उपाय ), उपदेश; शासन । ३. जिनभगवानके उपदेशमें दो नयों द्वारा निरूपण होता है। वहीं, निश्चयनय द्वारा तो सत्यार्थ निरूपण किया जाता है और व्यवहारनय द्वारा अभूतार्थ उपचरित निरूपण किया जाता है। प्रश्नः-सत्यार्थ निरूपण ही करना चाहिए; अभूतार्थ उपचरित निरूपण किसलिए किया जाता है? उत्तर:-जिसे सिंहका यथार्थ स्वरूप सीधा समझमें न पाता हो, उसे सिंहके स्वरूपके उपचरित निरूपण द्वारा अर्थात् बिल्लीके स्वरूपके निरूपण द्वारा सिंहके यथार्थ स्वरूपकी समझकी ओर ले जाते हैं। उसी प्रकार जिसे वस्तुका यथार्थ स्वरूप सीधा समझमें न पाता हो उसे वस्तुस्वरूपके उपचरित निरूपण द्वारा वस्तुस्वरूपकी यथार्थ समझकी ओर ले जाते हैं और लम्वे कथनके बदले में संक्षिप्त कथन करनेके लिए भी व्यवहारनय द्वारा उपचरित निरूपण किया जाता है । यहां इतना लक्षमें रखने योग्य है कि जो पुरुष बिल्लीके निरूपणको ही सिंहका निरूपण मानकर बिल्लीको ही सिंह समझ ले वह तो उपदेशके ही योग्य नहीं है, उसी प्रकार जो पुरुष उपचरित निरूपणको ही सत्यार्थ निरूपण मानकर वस्तुस्वरूपको मिथ्या रीतिसे समझ बैठे वह तो उपदेशके ही योग्य नहीं है। [ यहां एक उदाहरण लिया जाता है :- साध्य-साधन सम्बन्धी सत्यार्थ निरूपण इस प्रकार है कि-'छठवें गुणस्थानमें वर्तती हुई आंशिक शुद्धि सातवें गुणस्थानयोग्य निर्विकल्प शुद्ध परिणतिका साधन है।' अब,

२३२
पंचास्तिकायसंग्रह
धम्मादीसद्दहणं सम्मत्तं गारणमंगपुव्वगदं ।
चेट्ठा तवम्हि चरिया ववहारो मोक्खमग्गो त्ति ॥१६०॥
धर्मादिश्रद्धानं सम्यक्त्वं ज्ञानमङ्गपूर्वगतम् ।
चेष्टा तपसि चर्या व्यवहारो मोक्षमार्ग इति ॥१६०||
निश्चयमोक्षमार्गसाधनभावेन पूर्वोद्दिष्टव्यवहारमोक्षमार्गनिर्देशोऽयम् । सम्यग्दर्शन-
ज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः । तत्र धर्मादीनां द्रव्यपदार्थविकल्पवतां तत्त्वार्थश्रद्धानभावस्वभाव-
गाथा १६०
अन्वयार्थ:-[धर्मादिश्रद्धानं सम्यक्त्वम् ] धर्मास्तिकायादिका श्रद्धान सो
सम्यक्त्व, [अङ्गपूर्वगतम् शानम् ] अगपूर्वसम्बन्धी ज्ञान सो ज्ञान और [ तपसि चेष्टा चर्या ]
तपमें चेष्टा ( -प्रवृत्ति ) सो चारित्र;-[इति ] इस प्रकार [ व्यवहारः मोक्षमार्गः ]
व्यवहारमोक्षमार्ग है।
टीका:-निश्चयमोक्षमार्गके साधनरूपसे, पूर्वोद्दिष्ट ( १०७ वी गाथामें
उल्लिखित ) व्यवहारमोक्षमार्गका यह निर्देश है।
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र सो मोक्षमार्ग है। वहां, ( छह ) द्रव्यरूप और
( नव ) पदार्थरूप जिनके भेद हैं ऐसे धर्मादिके तत्त्वार्थश्रद्धानरूप भाव (.-धर्मास्ति-
'छठवें गुणस्थानमें कैसी अथवा कितनी शुद्धि होती है-इस बातको भी साथ ही साथ समझाना
हो तो, विस्तारसे ऐसा निरूपण किया जाता है कि 'जिस शुद्धिके सद्भावमें, उसके साथ-साथ
महाव्रतादिके शुभ विकल्प हठ बिना सहजरूपसे प्रवर्तमान हों वह छठवें गुणस्थानयोग्य शुद्धि
सातवें गुणस्थानयोग्य निर्विकल्प शुद्ध परिणतिका साधन है।' ऐसे लम्बे कथनके बदले, ऐसा
कहा जाए कि 'छठवें गुणस्थानमें प्रवर्तमान महाव्रतादिके शुभ विकल्प सातवें गुणस्थानयोग्य
निर्विकल्प शुद्ध परिणतिका साधन है, तो वह उपचरित निरूपण है । ऐसे उपचरित निरूपणमेंसे
ऐसा अर्थ निकालना चाहिए कि 'महाव्रतादिके शुभ विकल्प नहीं किन्तु उनके द्वारा जिस छठवें
गुणस्थानयोग्य शुद्धिको बताना था वह शुद्धि वास्तवमें सातवें गुणस्थानयोग्य निर्विकल्प शुद्ध
परिणतिका साधन है।']
धर्मादिनी श्रद्धा सुदृग, पूर्वांगवोध सुबोध छ ।
तपमाही चेष्टा चरण-से व्यवहारमुक्तिमार्ग छे ॥१६०॥

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन भावान्तरं श्रद्धानाख्यं सम्यक्त्वं, तत्वार्थश्रद्धाननिवृत्तौ सत्यामङ्गपूर्वगतार्थपरिच्छिविर्शनम् , आचारादिसूत्रप्रपश्चितविचित्रयतिवृत्तसमस्तसमुदयरूपे तपसि चेष्टा चर्या-इत्येषः स्वपरप्रत्यय- पर्यायाश्रितं मिन्नसाध्यसाधनभावं व्यवहारनयमाश्रित्यानुगम्यमानो मोलमार्गः कार्तस्वरपाषाणा- र्पितदीप्तजातवेदोवत्समाहितान्तरङ्गस्य प्रतिपदमुपरितनशुद्धभूमिकासु परमरम्यासु विश्रान्तिमभिन्ना कायादिकी तत्त्वार्थप्रतीतिरूप भाव ) जिसका स्वभाव है ऐसा, 'श्रद्धान' नामका भावविशेष सो सम्यक्त्व, तत्त्वार्थश्रद्धानके सदुभावमें अंगपूर्वगत पदार्थोंका अवबोधन (-जानना ) सो जान; आचारादि सूत्रों द्वारा कहे गए अनेकविध मुनि-आचारोंके समस्त समुदायरूप तपमें चेष्टा ( -प्रवर्तन ) सो चारित्र;-ऐसा यह, स्वपरहेतुक पर्यायके आश्रित, भिन्नसाध्यसाधनभाववाले व्यवहारनयके आश्रयसे (-व्यवहारनयकी अपेक्षासे ) अनुसरण किया जानेवाला मोक्षमार्ग, सुवर्णपाषाणको लगाई जानेवाली प्रदीप्त अग्निकी भाँति, 'समाहित अंतरंगवाले जीवको (अर्थात् जिसका अंतरंग एकान-समाधिप्राप्त है ऐसे जीवको ) पद-पद पर परम रम्य ऐसी ऊपरकी शुद्ध भूमिकाओंमें अभिन्न विश्रांति ( -अभेदरूप स्थिरता ) उत्पन्न करता हुआ-यद्यपि उत्तम सुवर्णकी भांति शुद्ध जीव कथंचित् भिन्नसाध्यसाधनभावके अभावके कारण स्वयं ( अपने आप ) शुद्ध स्वभावसे परिणमित होता है तथापि-निश्चयमोक्षमार्गके साधनपनेको प्राप्त होता है । मावार्थ:-जिसे अंतरंगमें शुद्धिका अंश परिणमित हुआ है उस जीवको तत्वार्थश्रद्धान, अंगपूर्वगत ज्ञान और मुनि-आचारमें प्रवर्तनरूप 'व्यवहारमोक्षमार्ग १. समाहित एकाग्र; एकताको प्राप्त अभेदताको प्राप्त; छिन्नभिन्नता रहित समाधिप्राप्त शुद्ध, प्रशांत । इस गाथाकी श्री जयसेनाचार्यदेवकृत टीकामें पंचमगुणस्थानवर्ती गृहस्थको भी व्यवहार-मोक्षमार्ग कहा है। वहां व्यवहारमोक्षमार्गके स्वरूपका निम्नानुसार वर्णन किया है:-'वीतरागसर्वज्ञप्रणीत जीवादिपदार्थो सम्बन्धी सम्यक् श्रद्धान तथा ज्ञान दोनों, गृहस्थको और तपोधनको समान होते हैं। चारित्र, तपोधनोंको आचारादि चरणग्रन्थोंमें विहित किए हुए मार्गानुसार प्रमत्त-अप्रमत्त गुणस्थानयोग्य पंचमहाव्रत-पंचसमिति-त्रिगुप्ति-षडावश्यकादिरूप होता है और गृहस्थोंको उपासकाध्ययनग्रन्थमें विहित किए हुए मार्गके अनुसार पंचमगुणस्थानयोग्य दान-शील-पूजा-उपवासादिरूप अथवा दार्शनिक-व्रतिकादि ग्यारह स्थानरूप (ग्यारह प्रतिमारूप) होता है। इस प्रकार व्यवहारमोक्षमार्गका लक्षण है।' ४०

२३४
पंचास्तिकायसंग्रह
निष्पादयन् , जात्यकार्तस्वरस्येव शुद्धजीवस्य कथंचिदिनसाध्यसाधनभावामावात्स्वयं
शुद्धस्वभावेन विपरिणममानस्यापि, निश्चयमोक्षमार्गस्य साधनभावमापद्यत इति ॥१६०॥
णिच्छयणएण भणिदो तिहि तेहिं समाहिदो हु जो अप्पा ।
ण कुणदि किंचि वि अण्णं ण मुयदि सो मोक्खमग्गो त्ति ॥१६१॥
निश्चयनयेन भणितस्त्रिभिस्तैः समाहितः खलु या आत्मा ।
न करोति किंचिदप्यन्यन्न मुञ्चति स मोक्षमार्ग इति ।। १६१ ।।
व्यवहारमोक्षमार्गसाध्यभावेन निश्चयमोक्षमार्गोपन्यासोऽयम् । सम्यग्दर्शनधानचारित्र-
समाहित आत्मैव जीवस्वभावनियतचरित्रत्वानिश्चयेन मोक्षमार्गः।
अथ
विशेष-विशेष शुद्धिका व्यवहारसाधन बनता हुआ, यद्यपि निर्विकल्पशुद्धभावपरिणत
जीवको परमार्थसे तो उत्तम सुवर्णकी भांति अभिन्नसाध्य साधनभावके कारण स्वयमेव
शुद्धभावरूप परिणमन होता है तथापि, व्यवहारनयसे निश्चयमोक्षमार्गके साधन पनेको
प्राप्त होता है।
[ अज्ञानी द्रव्यलिंगी मुनिका अंतरंग लेशमात्रभी समाहित न होनेसे अर्थात
उसे ( द्रव्यार्थिकनयके विषयभूत शुद्धात्मस्वरूपके अज्ञानके कारण ) शुद्धिका अंश भी
परिणमित न होनेसे उसे व्यवहारमोक्षमार्ग भी नहीं है । ] १६०।
गाथा १६१
अन्वयार्थ:-[य: आत्मा ] जो आत्मा [ तैः त्रिभिः खलु समाहितः ] इन तीन
द्वारा वास्तवमें समाहित होता हुआ ( अर्थात् सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र द्वारा ) वास्तवमें
एकाग्र-अभेद होता हुआ ) [ अन्यत् किंचित् अपि ] अन्य कुछ भी [ न करोति न
मुश्चति ] करता नहीं है या छोड़ता नहीं है, [ सा] वह [ निश्चयनयेन ] निश्चयवयसे
[ मोक्षमार्गः इति भणितः ] 'मोक्षमार्ग' कहा गया है ।
टीका :-व्यवहारमोक्षमार्गके साध्यरूपसे, निश्चयसोक्षमार्गका
कथन है।
यह
जे जीव दर्शनशानचरण वडे समाहित होइने ।
छोडे-ग्रहे नहि अन्य कई पण, निश्चये शिवमार्ग छे ॥१६॥

२३५ नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन कथञ्चनानाधविद्याव्यपगमाद्व्यवहारमोक्षमार्गमनुप्रपन्नो धर्मादितत्त्वार्थाश्रद्धानाङ्गपूर्वगतार्थाज्ञाना- तपश्चेष्टानां धर्मादितत्त्वार्थश्रद्धानाङ्गपूर्वगतार्थज्ञानतपश्चेष्टानां स्यागोपादानाय प्रारब्धविविक्तभावव्यापारः, कुतश्चिदुपादेयत्यागे त्याज्योपादाने च पुनः प्रवर्तितप्रतिविधानामि प्रायो, यस्मिन्यावति काले विशिष्टभावनासौष्ठववशात्सम्यग्दर्शनधानचारित्रः स्वभावभृतः च सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्र द्वारा समाहित हुआ आत्मा ही जीवस्वभावमें नियत चारित्ररूप होनेके कारण निश्चयसे मोक्षमार्ग है । अब (विस्तार ऐसा है कि ), यह आत्मा वास्तवमें कथंचित् (-किसी प्रकार, निज उद्यमसे ) अनादि अविद्याके नाश द्वारा व्यवहारमोक्षमार्गको प्राप्त करता हुआ, धर्मादिसम्बन्धी तत्त्वार्थप्रश्रद्धानके, अंगपूर्वगत पदार्थों सम्बन्धी अज्ञानके और प्रतपमें चेटाके त्याग हेतुसे तथा धर्मादिसम्बन्धी तत्त्वार्थश्रद्धानके, अंगपूर्वगत पदार्थोसम्बन्धी ज्ञानके और तपमें चेष्टाके ग्रहण हेतुसे (-तीनोंके त्याग हेतु तथा तीनोंके ग्रहण हेतुसे ) 'विविक्त भावरूप व्यापार करता हुआ, और किसी कारणसे ग्राह्यका त्याग हो जाने पर तथा त्याज्यका ग्रहण हो जाने पर उसके प्रतिविधानका अभिप्राय करता हुआ, जिस काल और जितने काल तक विशिष्ट भावनासौष्ठवके कारण स्वभावभूत सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रके साथ अंग-अंगीभावसे परिणति द्वारा * समाहितसातवां गुणस्थान वाला। १. विविक्त- विवेकसे पृथक् किए हुए (अर्थात् हेय और उपादेयका विवेक करके व्यवहारसे उपादेयरूप जाने हुए)। [ जिसने अनादि अज्ञानका नाश करके शुद्धिका अंश प्रगट किया है ऐसे व्यवहारमोक्षमार्गी ( सविकल्प ) जीवको निःशंकता-निःकांक्षा-निविचिकित्सादि भावरूप, स्वाध्यायविनयादि भावरूप और निरतिचार व्रतादि भावरूप व्यापार भूमिकानुसार होते हैं तथा किसी कारण उपादेय भावोंका (-व्यवहारसे ग्राह्य भावोंका ) त्याग हो जाने पर और त्याज्य भावोंका उपादान अर्थात् ग्रहण हो जाने पर उसके प्रतिकाररूपसे प्रायश्चित्तादि विधान भी होता है।] २. प्रतिविधान-प्रतिकार करनेकी विधि, प्रतिकारका उपाय; इलाज । ३. विशिष्ट भावनासौष्ठव= विशेप अच्छी भावना (अर्थात् विशिष्ट शुद्ध भावना); विशिष्ट प्रकारको उत्तम भावना । ४. श्रात्मा वह अंगी और स्वभावभूत सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्र वह अंग - पंचास्तिकायसंगत सममङ्गाङ्गिभावपरिणत्या तत्समाहितो भूत्वा त्यागोपादानविकल्पशून्यत्वाद्विश्रान्तमावव्यापारः सुनिष्प्रकम्पः अयमात्मावतिष्ठते, तस्मिन् तावति काले अयमेवात्मा जीवस्वभावनियतचरित- त्वान्निश्चयेन मोक्षमार्ग इत्युच्यते । अतो निश्चयव्यवहारमोक्षमार्गयोः साध्यसाधनभावो नितरामुपपन्न इति ।।१६।। 'उनसे 'समाहित होकर, त्यागग्रहणके विकल्पसे शून्यपनेके कारण (भेदात्मक ) भावरूप व्यापार विरामको प्राप्त होनेसे ( अर्थात् भेदभावरूप-खंडभावरूप व्यापार रुक जानेसे ) सुनिष्कपरूपसे रहता है, उसकाल और उतने काल तक यही आत्मा जीवस्वभावमें नियत चारित्ररूप होनेके कारण निश्चयसे 'मोक्षमार्ग' कहलाता है। इसलिए, निश्चयमोक्षमार्ग और व्यवहार-मोक्षमार्गको साध्य-सावनपना अत्यन्त घटित होता है। भावार्थ:-निश्चयमोक्षमार्ग निज शुद्धात्माकी रुचि, ज्ञप्ति और निश्चल अनुभूतिरूप है । उसका साधक (अर्थात् निश्चयमोक्षमार्गका व्यवहार-साधन ) ऐसा जो भेदरत्नत्रयात्मक व्यवहारमोक्षमार्ग उसे जीव कथंचित् ( -किसी प्रकार, निज उद्यमसे ) अपने संवेदनमें आनेवाली अविद्याकी वासनाके विलय द्वारा प्राप्त होता हुआ, जब गुणस्थानरूप सोपानके क्रमानुसार निजशुद्धात्मद्रव्यको भावनासे उत्पन्न १. उनसे स्वभावभूत सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रसे। २. समाहित सातवां गुणस्थानमें । ३. यहां यह ध्यानमें रखनेयोग्य है कि जीव व्यवहारमोक्षमार्गको भी मनादि अविद्याका नाश करके ही प्राप्त कर सकता है। अनादि अविद्याका नाश होनेसे पूर्व तो (अर्थात् निश्चयनयके- द्रव्याथिकनयके-विपयभूत शुद्धात्मस्वरूपका भान करनेसे पूर्व तो) व्यवहारमोक्षमार्ग भी नहीं होता। पुनश्च, 'निश्चयमोक्षमार्ग और व्यवहार मोक्षमार्गको साध्य-साधनपना अत्यन्त घटित होता है' ऐसा जो कहा गया है वह व्यवहारनय द्वारा किया गया उपचरित निरूपण है । उसमेंसे ऐसा अर्थ निकालना चाहिए कि 'छठवें गुणस्थानमें वर्तते हुए शुभ विकल्पोंको नहीं किन्तु छठवें गुणस्थानमें वर्तते हुए शुद्धिके अंशको और सातवें गुरणस्थानयोग्य निश्चयमोक्षमार्गको वास्तवमें साध्य-सावनपना है।' छठवें गुणस्थानमें वर्तता हुआ शुद्धिका अंश बढ़कर जव और जितने काल तक उग्र शुद्धिके कारण शुभ विकल्पोंका सभाव वर्तता है तब और उतने काल तक सातवें गुणस्थानयोग्य निश्चयमोक्षमार्ग होता है ।

अषपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गपंचवर्णन
जो चरदिपादि पेच्छदि अप्पाणं अप्पणा अणण्णमयं ।
सो चारित्तं गाणं समिति णिच्छिदो होदि ॥ १६२ ।।
यश्चरति जानाति पश्यति मात्मानमात्मनानन्यमयम् ।
स चारित्रं ज्ञानं दर्शनमिति निश्चितो भवति ॥ १६२ ।।
आत्मनश्चारित्रज्ञानदर्शनत्वद्योतनमेतत् । या खल्वात्मानमात्ममयत्वादनन्यमय-
मात्मना चरति-स्वभावनियतास्तित्वेनानुवर्तते, यात्मना बानाति-स्वपरप्रकाशकत्वेन
नित्यानन्दलक्षणवाले सुखामृतके रसास्वादकी तृप्तिरूप परम कलाके अनुभवके कारण
निजशुद्धात्माश्रित निश्चयदर्शनज्ञानचारित्ररूपसे अभेदरूप परिणमित होता है, तब.
निश्चयनयंसे भिन्न साध्य-साधनके अभावके कारण यह आत्मा ही मोक्षमार्ग है ।
इसलिए ऐसा सिद्ध हुआ कि सुवर्ण और सुवर्ण पाषाणकी भांति निश्चयमोक्षमार्ग
और व्यवहारमोक्षमार्गको साध्य-साधकपना ( व्यवहारनयसे ) अत्यन्त घटित होताः
है। १६१ ।
गाथा १६२
अन्वयार्थ:-[य] जो ( आत्मा ) [ अनन्यमयम् मात्मानम् ] अनन्यमय
आत्माको [मात्मना ] आत्मासे [चरति ] आचरता है, [जानाति ] जानता है,
[ पश्यति ] देखता है, [स:] वह ( आत्मा ही ) [चारित्रं ] चारित्र है, [ ज्ञानं ]
ज्ञान है, [ दर्शनम् ] दर्शन है-[ इति ] ऐसा [ निश्चितः भवति ] निश्चित है।
टीका:- यह, आत्माके चारित्र-ज्ञान-दर्शनपनेका प्रकाशन है ( अर्थाद आत्मा
ही चारित्र, ज्ञान और दर्शन है ऐसा यहाँ समझाया है। )।
जो ( आत्मा) वास्तवमें आत्माको-जो कि आत्ममय होनेसे अनन्यमय है
उसे-आत्मासे आचरता है अर्थात् 'स्वभावनियत अस्तित्व द्वारा अनुवर्तता है
१. स्वभावनियत= स्वभावमें अवस्थित; ( ज्ञानदर्शनरूप ) स्वभावमें दृढ़रूपसे स्थित । [ 'स्वभाव-
नियत अस्तित्वकी' विशेष स्पष्टताके लिए १५४ वीं गाथाकी टीका देखो।]
जाणे, जुबे ने आचरे निज मात्मने यात्मा वडे ।
ते जीव दर्शन, बान ने चारित्र के निश्चितपणे ॥१६२॥

२३८ पंचास्ति कायसंग्रह - चेतयते, आत्मना पश्यति—याथातथ्येनावलोकयते, स खल्वात्मैन चारित्रं ज्ञानं दर्शन मिति ककर्मकरणानामभेदान्निश्चितो भवति । अतश्चारित्रज्ञानदर्शनरूपत्वाजीवस्वभावनियत्चरित- स्वलक्षणं निश्चयमोक्षमार्गत्वमात्मनो नितरामुपपन्नमिति ।। १६२॥ जेण विजाणदि सव्वं पेच्छदि खो सेण सोक्खमणुहदि । इदि तं जाणदि भविप्रो प्रभावियसत्तो ण सद्दहदि ॥१६३॥ येन विजानाति सर्व पश्यति स तेन सौख्यमनुभवति । इति तज्जानाति भव्योऽभव्यसत्त्वो न श्रद्धये ॥ १६३ ।। (-स्वभावनियत अस्तित्वरूपसे परिणमित होकर अनुसरता है), (अनन्यमय प्रात्माको ही) आत्मासे जानता है अर्थात् स्वपरप्रकाशकरूपसे चेतता है, (अनन्यमय आत्माको ही) आत्मासे देखता है अर्थात् यथातथरूपसे अवलोक्ता है, वह आत्मा ही वास्तव में चारित्र है, ज्ञान है, दर्शन है-ऐसा 'कर्ता-कर्म-करणके अभेदके कारण निश्चित है। इससे ( ऐसा निश्चित हुआ कि ) चारित्र-ज्ञान-दर्शनरूप होनेके कारण आत्माको जीवस्वभावनियत चारित्र जिसका लक्षण है ऐसा निश्चयमोक्षमार्गपना अत्यन्त घटित होता है (अर्थात् आत्मा ही चारित्र-ज्ञान-दर्शन होनेके कारण आत्मा ही ज्ञानदर्शनरूप जीवस्वभावमें दृढ़रूपसे स्थित चारित्र जिसका स्वरूप है ऐसा निश्चयमोक्षमार्ग है)।१६२ । गाथा १६३ अन्वयार्थ:-[ येन ] जिससे (आत्मा मुक्त होने पर ) [ सर्व विजानाति ] सर्वको जानता है और [ पश्यति ] देखता है, [ तेन ] उससे [स] वह [ सौख्यम् अनुभवति ] सौख्यका अनुभव करता है;-[इति तद् ] ऐसा [ भव्यः जानाति ] भव्य जीव जानता है, [ अभव्यसत्त्वः न श्रद्धचे ] अभव्य जीव श्रद्धा नहीं करता। १. जब आत्मा आत्माको प्रात्मासे पाचरता है-जानता है-देखता है, तब कर्ता भी प्रात्मा, कर्म भी. आत्मा और करण भी आत्मा है; इसप्रकार वहाँ कर्ता-कर्म-करणको अभिन्नता है। जाणे-जुबे हे सर्व तेथी सौख्य-अनुभव मुक्तने । आ भाव नाणे भव्य जीव, अभव्य नहि श्रद्धा लहे ॥१६३।। - ..

२३६ नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन सर्वस्यात्मनः संसारिणो मोक्षमार्गाहत्वनिरासोऽयम् । इह हि स्वभावप्रातिकूल्याभाव- हेतुकं सौख्यम् । आत्मनो हि दृशि-ज्ञप्ती स्वभावः । तयोविषयप्रतिबन्धः प्रातिकूल्यम् । मोक्ष खल्वात्मनः सर्व विजानतः पश्यतश्च तदमावः । ततस्तद्धेतकस्यानाकुलत्वलक्षणस्य परमार्थसुखस्य मोक्षेऽनुभूतिरचलिताऽस्ति । इत्येतद्भव्य एव भावतो विजानाति, ततः स एव मोक्षमार्गार्हः । नैतदभव्यः श्रद्धचें, ततः स मोक्षमार्गानह एवेति । अतः कतिपये एव संसारिणो मोक्षमार्गाही, न सर्व एवेति ।१६३। - - टीका:-यह, सर्व संसारी आत्मा मोक्षमार्गके योग्य होनेका निराकरण (निषेध) है। वास्तवमें सौख्यका कारण स्वभावकी 'प्रतिकूलताका अभाव है। आत्माका 'स्वभाव' वास्तवमें दृशि-ज्ञप्ति ( दर्शन और ज्ञान ) है । उन दोनोंको विषयप्रतिबन्ध होना सो 'प्रतिकूलता' है। मोक्षमें वास्तवमें आत्मा सर्वको जानता और देखता होनेसे उसका अभाव होता है (अर्थात् मोक्षमें स्वभावकी प्रतिकूलताका प्रभाव होता है)। इसलिए उसका अभाव जिसका कारण है ऐसे अनाकुलतालक्षणवाले परमार्थसुखकी मोक्षमें अचलित अनुभूति होती है । इसप्रकार भव्य जीव ही 'भावसे जानता है, इसलिए वही मोक्षमार्गके योग्य है; अभव्य जीव इसप्रकार श्रद्धा नहीं करता, इसलिए वह मोक्षमार्गके अयोग्य ही है। इससे (ऐसा कहा कि ) कुछ ही संसारी मोक्षमार्गके योग्य हैं, सर्व नहीं। १६३ । १. प्रतिकूलता-विरुद्धता विपरीतता। २. विषयप्रतिवन्ध विषयमें रुकावट अर्थात् मर्यादितपना। ( दर्शन और ज्ञानके विषयमें मर्यादितपना होना वह स्वभावकी प्रतिकूलता है।) ३. पारमार्थिक सुखका कारण स्वभावकी प्रतिकूलताका अभाव है। ४. पारमार्थिक सुखका लक्षण अथवा स्वरूप अनाकुलता है । ५. श्री जयसेनाचार्यदेवकृत टीकामें कहा है कि उस अनंत सुखको भव्य जीव जानते हैं, उपादेयरूपसे श्रद्धते हैं और अपने-अपने गुणस्थानानुसार अनुभव करते हैं।

२४. पंचास्विकायसंग्रह दसणणाणचरिताणि मोक्खमग्गो त्ति सेविदवाणि । साधूहि इदं भणिदं तेहि दु बंधो व मोक्खो वा ।। १६४ ॥ दर्शनशानचारित्राणि मोक्षमार्ग इति सेवितव्यानि । साधुभिरिदं भणितं तैस्तु वन्धो वा मोक्षो वा ॥ १६ ॥ दर्शनशानचारित्राणां कथंचिद्वन्धहेतुत्वोपदर्शनेन जीवस्वभावे नियतचरितस्य साक्षान्मोक्षहेतुत्वद्योतनमेतत् । अमूनि हि दर्शनज्ञानचारित्राणि कियन्मात्रयापि परसमयप्रवृत्त्या संवलितानि कृशानुसंवलितानीव घृतानि कथञ्चिद्विरुद्धकार्यकारणत्वरूढेवन्धकारणान्यपि गाथा १६४ अन्वयार्थः-[ दर्शनज्ञानचारित्राणि ] दर्शन-ज्ञान-चारित्र [मोक्षमार्गः] मोक्षमार्ग है [ इति ] इसलिए [ सेवितव्यानि ] वे सेवन योग्य हैं-[ इदम् साधुमिः मणितम् ] ऐसा साधुअोंने कहा है; [ तु] परन्तु उनसे [ वधः वा] वंध भी होता है और [ मोक्षः वा ] मोक्ष भी होता है । टीका:-यहां, दर्शन-ज्ञान-चारित्रका कथंचित् बंधहेतुपना दर्शाया है और इसप्रकार जीवस्वभावमें नियत चारित्रका साक्षात् मोक्षहेतुपना प्रकाशित किया है। यह दर्शन-ज्ञान-चारित्र, यदि अल्प भी परसमयप्रवृत्तिके साथ मिलित हों तो, अग्निके साथ मिलित घृतकी भांति (अर्थात् 'उष्णतायुक्त घृतकी भांति ), कथंचित् 'विरुद्ध कार्यके कारणपनेकी व्याप्तिके कारण बंधकारण भी हैं और जब वे १. घृत स्वभावसे शीतलताके कारणभूत होनेपर भी, यदि वह किंचित् भी उष्णतासे युक्त हो तो, उससे ( कथंचित् ) जलते भी हैं; उसीप्रकार दर्शन-ज्ञान-चारित्र स्वभावसे मोक्षके कारणभूत होने पर भी, यदि वे किंचित् भी परसमयप्रवृत्तिसे युक्त हों तो, उनसे ( कथंचित् ) बन्ध भी होता है। २. परसमयप्रवृत्तियुक्त दर्शन-ज्ञान-चारित्रमें कथंचित् मोक्षरूप कार्यसे विरुद्ध कार्यका कारणपना (अर्थात् बंघरूप कार्यका कारणपना ) व्याप्त होता है। हग, ज्ञान ने चारित्र के शिवमार्ग तेथी सेवां । संते कयु, पण हेतु छे में बंधना वा मोक्षना ॥१६॥ - - २४१ नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन भवन्ति । यदा तु समस्तपरसमयप्रवृचिनिवृत्तिरूपया स्वसमयप्रवृत्त्या सङ्गच्छते, तदा निवृचकृशानुसंवलनानीव घृतानि विरुद्धकार्यकारणभावामावासाक्षान्मोसकारणान्येवं भवन्ति । ततः स्वसमयप्रवृत्तिनाम्नो जीवस्वभावनियतचरितस्य साक्षान्मोक्षमार्गत्वमुपपन्न- मिति ॥ १६४॥ अण्णाणादो णाणी जदि मण्णदि सुद्धसंपयोगादो। हवदि त्ति दुक्खमोक्खं परसमयरदो हवदि जीवो ॥१६॥ अज्ञानात् ज्ञानी यदि मन्यते शुद्धसंप्रयोगात । भवतीति दुःखमोक्षः परसमयरतो भवति जीवः ॥१६॥ (दर्शन-ज्ञान-चारित्र ), समस्त परसमयप्रवृत्तिसे निवृत्तरूप ऐसी स्वसमयप्रवृत्ति के साथ संयुक्त होते हैं तब, जिसे अग्निके साथका मिलितपना निवृत्त हुआ है ऐसे घृतकी भाँति, विरुद्ध कार्यका कारणभाव निवृत्त हो गया होनेसे साक्षात् मोक्षकारणों ही हैं । इसलिए 'स्वसमयप्रवृत्ति' नामका जो जीवस्वभावमें नियत चारित्र उसे साक्षात् मोक्षमार्गपना घटित होता है ।१६४। गाथा १६५ अन्वयार्थः-[ शुद्धसंप्रयोगात् ] शुद्धसंप्रयोगसे ( शुभ भक्तिभावसे , [ दुःखमोसः भवति ] दुःखमोक्ष होता है [ इति ] ऐसा [ यदि ] यदि [ अज्ञानात् ] [ शास्त्रोंमें कभी-कभी दर्शन-ज्ञान-चारित्रको भी, यदि वे परसमयप्रवृत्तियुक्त हों तो, कथंचित् बन्धका कारण कहा जाता है; और कभी ज्ञानीको वर्तते हुए शुभभावोंको भी कथंचित् मोक्षके परम्पराहेतु कहा जाता है। शास्त्रोंमें आनेवाले ऐसे भिन्न-भिन्न पद्धतिके कथनोंको सुलझाते हुए यह सारभूत वास्तविकता ध्यानमें रखना चाहिए कि-ज्ञानीको जब शुद्धाशुद्ध- रूप मिथपर्याय वर्तती है तब वह मिश्रपर्याय एकान्तसे संवर-निर्जरा-मोक्षके कारणभूत नहीं होती अथवा एकान्तसे भासव-बन्धके कारणभूत नहीं होती, परन्तु उस मिश्रपर्यायका शुद्ध अंश सवर-निर्जरा-मोक्षके कारणभूत होता है और प्रशुद्ध अंश पालव-बन्धके कारणभूत होता है।] इस निरूपणके साथ तुलना करनेके लिए श्री प्रवचनसारकी ग्यारहवीं गाथा और उसकी तत्त्वप्रदीपिका टीका देखिए। जिनवरप्रमुखनी भक्ति द्वारा मोक्षनी माशा धरे । 'अज्ञानथी जो ज्ञानी जीव, तो परसमयरत तेह छे ।।१६।। -- ३" २४२ पंचास्तिकायसग्रह सूक्ष्मपरसमयस्वरूपाख्यानमेतत् । अहंदादिषु भगवत्सु भगवत्सु सिद्धिसाधनीभूतेषु भक्तिभावानुरञ्जिता चित्तवृचिरत्र शुद्धसंप्रयोगः । अथ खल्वज्ञानलवावेशायदि यावत् धानवानपि ततः शुद्धसंप्रयोगान्मोक्षो भवतीत्यभिप्रायेण खिद्यमानस्तत्र प्रवर्तते तदा तावन्सोऽपि रागलबसझावात्परसमयरत इत्युपगीयते । अथ न किं पुनर्निरङ्कुशरागकलिकलङ्कितान्तरङ्गवृच्चि- रितरो जन इति ॥१६शा अज्ञानके कारण [ ज्ञानी ] ज्ञानी [ मन्यते ] 'माने, तो वह [ परसमयरतः जीवः] स्यरतं जीव [ भवति ] है । 'अहंतादिके प्रति भक्ति-अनुरागवालो मंदशुद्धिसे भी क्रमशः मोक्ष होता है' इसप्रकार यदि अज्ञानके कारण ( -शुद्धात्मसंवेदनके प्रभावके कारण, रागांशके कारण ) ज्ञानीको भी (मंद पुरुषार्थवाली) झुकाव वर्ते, तो तबतक वह भी सूक्ष्म परसमयमें रत है। ] टीका:-यह, सूक्ष्म परसमयके स्वरूपका कथन है । सिद्धिके साधनभूत ऐसे अहंतादि भगवन्तोंके प्रति भक्तिभावसे 'अनुरंजित चित्तवृत्ति वह यहाँ 'शुद्धसंप्रयोग' है । अव, 'अज्ञानलवके आवेशसे यदि ज्ञानवान भी 'उस शुद्धसम्प्रयोगसे मोक्ष होता है' ऐसे अभिप्राय द्वारा खेद प्राप्त करता हुआ उसमें ( शुद्धसम्प्रयोगमें ) प्रवर्ते, तो तब तक वह भी रागलवके सदुभावके कारण "परसमयरत' कहलाता है। तो फिर निरंकुश रागरूप क्लेशसे कलंकित ऐसी अंतरंग वृत्तिवाला इतरजन क्या परसमयरत नहीं कहलाएगा? ( अवश्य कहलाएगा ही। ) 1 १६५ । १. मानना-मुकाव करना; विचार रखना आशा रखना; इच्छा करना; गणना करना; अभिप्राय करना। २. अनुरंजित-अनुरक्त; रागवाली; सराग । ३. अज्ञानलव-किंचित् अज्ञान; अल्प प्रज्ञान । ४. रागलव-किचित् राग; अल्प राग । ५. परसमयरत-परसमयमें रत; परसमयस्थित; परसमयकी ओर भुकाववाला; परसमयमें पासक्त। ६. इस गाथाकी श्री जयसेनाचार्यदेवकृत टीकामें इसप्रकार विवरण है:-कोई पुरुष निर्विकार- शुद्धात्मभावनास्वरूप परमोपेक्षासंयममें स्थित रहना चाहता है, परन्तु उसमें स्थित रहनेको २४३ नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन मरहंतसिद्धचेदियपवयणगणणाणभत्तिसंपण्णो। बंधदि पुण्णं बहुसो ण हु सो कम्मक्खयं कुणदि ॥१६६॥ अर्हसिद्धचैत्यप्रवचनगणज्ञानभक्तिसम्पन्नः । बध्नाति पुण्यं बहुशो न खलु स कर्मक्षयं करोति ॥१६६॥ उक्तशुद्धसंप्रयोगस्य कथञ्चिद्वन्धहेतुत्वेन मोक्षमार्गत्वनिरासोऽयम् । महदादिभक्ति- संपन्ना कथञ्चिन्छुद्धसंप्रयोगोऽपि सन् जीवो जीवद्रागलवत्वाच्छुभोपयोगतामजहब बहुश: गाथा १६६ अन्वयार्थः- [ अर्हत्सिद्धचैत्यप्रवचनगणशानभक्तिसम्पन्नः ] अहंत, सिद्ध, चैत्य ( -अहंतादिकी प्रतिमा ), प्रवचन ( -शास्त्र ), मुनिगण और ज्ञानके प्रति भक्तिसम्पन्न जीव [ बहुशः पुण्यं बध्नाति ] बहुत पुण्य बांधता है, [ न खलु सा कर्मक्षयं करोति ] परन्तु वास्तवमें वह कर्मका क्षय नहीं करता। टीका:-यहां, पूर्वोक्त शुद्धसम्प्रयोगको 'कथंचित् बंधहेतुपना होनेसे उसका मोक्षमार्गपना निरस्त किया है ( अर्थात् ज्ञानीको वर्तता हुआ शुद्धसम्प्रयोग निश्चयसे बंधहेतुभूत होनेके कारण वह मोक्षमार्ग नहीं है ऐसा यहाँ दर्शाया है)। अशक्त वर्वता हुआ कामक्रोधादि अशुभ परिणामोंके वंचनार्थ अथवा संसारस्थितिके छेदनार्थ जब पंच परमेष्ठीके प्रति गुणस्तवनादि भक्ति करता है, तब वह सूक्ष्म परसमयरूपसे परिणत वर्तता हुआ सराग सम्यक्दृष्टि है। मोर यदि वह पुरुष शुद्धात्मभावनामें समर्थ होने पर भी, उसे ( शुद्धात्मभावनाको ) छोड़कर 'शुभोपयोगसे ही मोक्ष होता है' ऐसा एकान्त माने, तो वह स्थूल परसमयरूप परिणाम द्वारा अज्ञानी मिथ्यावृष्टि होता है। १. कथंचित् किसीप्रकार, किसी अपेक्षासे ( अर्थात् निश्चयनयकी अपेक्षासे)। [ ज्ञानीको वर्तते हुए शुद्धसम्प्रयोगको कदाचित् व्यवहारसे भले मोक्षका परम्पराहेतु कहा जाए, किन्तु निश्चयसे तो वह बन्धहेतु ही है क्योंकि अशुद्धिरूप अंश है।] २. निरस्त करना खण्डित करना; निषिद्ध करना; निकाल देना। जिन-सिद्ध-प्रवचन-चैत्य-मुनिगण-ज्ञाननी भक्ति करे । ते पुण्यबंध लहे घणों, पण कर्मनो क्षय नव करे ॥१६६।। - २४४ पंचास्तिकायसंग्रह पुण्यं बध्नाति, न खलु सकलकर्मक्षयमारभते । ततः सर्वत्र रागकणिकाऽपि परिहरणीया परसमयप्रवृचिनिबन्धनत्वादिति ॥१६६।। जस्स हिदएणुमेत्तं वा परदवम्हि विज्जदे रागो। सोण विजाणदि समयं सगस्स सव्वागमधरो वि॥१६७।। यस्य हृदयेऽणुमात्रो वा परद्रव्ये विद्यते रागः । स न विजानाति समयं स्वकस्य सर्वागमधरोऽपि ॥१६७॥ स्वसमयोपलम्माभावस्य रागैकहेतुत्वद्योतनमेतत् । यस्य खलु रागरेणुकणिकाऽपि अहंतादिके प्रति भक्तिसम्पन्न जीव, कथंचित् "शुद्धसम्प्रयोगवाला' होने पर भी, 'रागलव · जीवित (विद्यमान ) होनेसे 'शुभोपयोगीपने'को न छोड़ता हुमा, बहुत पुण्यं बाँधता है, परन्तु वास्तव में सकल . कर्मका क्षय नहीं करता। इसलिए सर्वत्र रागको कणिका भी परिहरनेयोग्य है, क्योंकि वह परसमयप्रवृत्तिका कारण है। १६६ । गाथा १६७ अन्वयार्थ:-[ यस्य ] जिसे [ परद्रव्ये ] परद्रव्यके प्रति [ अणुमात्रः वा ] अणुमात्र भी ( लेशमात्र भीः) [ रागः ] राग [ हृदये विद्यते ] हृदयमें वर्तता है [स] वह, [ सर्वागमधरः अपि ] भले सर्वआगमधर हो तथापि, [स्वकस्य समयं न विमानाति ] स्वकीय समयको नहीं जानता ( अनुभव नहीं करता)। टीका:-यहाँ, स्वसमयकी उपलब्धिके अभावका, · राग एक हेतु है ऐसा प्रकाशित किया है .( अर्थात् स्वसमयकी प्राप्तिके अभावका राग ही एक कारण है ऐसा यहाँ दर्शाया है)। १. सिद्धिके निमित्तभूत ऐसे-जो महंतादि उनके प्रति भक्तिभावको पहले शुद्धसम्प्रयोग कहा था। उसमें 'शुद्ध' शब्द होने पर भी वह 'शुभ' उपयोगरूप रागभाव है। [ 'शुभ' ऐसे पर्थमें जिसप्रकार 'विशुद्ध' शब्दका कदाचित् प्रयोग होता है उसी प्रकार, यहाँ 'शुद्ध' शब्दका प्रयोग हुआ है। ] २. रागलव=किंचित् राग; अल्प राग । अणुमात्र जेने हृदयमां परद्रव्य प्रत्ये राग छ । हो सर्वमागमधर मले, जाणे नहीं स्वक-समयने ॥१६॥ .

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन
२.४५
जीवतिः हृदये न नाम स समस्तसिद्धान्तसिन्धुपारगोऽपि निरुपरागशुद्धस्वरूपं स्वसमयं:
चेतयते । ततः स्वसमयप्रसिद्धयर्थं पिजनलग्नतूलन्यासन्यायमधिदधताऽहंदादिविषयोऽपि क्रमेण
रागरेणुरपसारणीय इति ॥१६७||
धरिदु जस्स ण सक्कं चित्तुन्भामं विणा दु अप्पाणं ।
रोधो तस्स ण विज्जदि सुहासुहकदस्स कम्मस्स ॥१६८॥
धर्तुं यस्य न शक्यम् चिचोद्भामं विना.त्वात्मानम् ।
रोधस्तस्य न विद्यते शुभाशुभकृतस्य कर्मणः ॥ १६८ ॥
रागलवमूलदोपपरंपराख्यानमेन्त् । इह खल्वहंदादिभक्तिरपि न रागानुवृत्चिमन्तरेण
भवति । रागाद्यनुवृत्तौ च सत्यां वुद्धिप्रसरमन्तरेणात्मा न तं कथंचनापि धारयितुं शक्यते ।
जिसे रागरेणुकी कणिका भी हृदयमें जीवित है वह, भले ही समस्त
सिद्धान्तसागरका पारंगत हो तथापि, 'निरुपराग-शुद्धस्वरूप स्वसमयको वास्तवमें नहीं
चेतता ( अनुभव नहीं करता )। इसलिए, "धुनकीसे चिपकी हुई रूई का न्याय लागू
होनेसे, जीवको स्वसमयकी प्रसिद्धिके हेतु अहंतादि-विषयक भी रागरेणु (-अहंतादिके
ओरकी भी रागरज) क्रमशः दूर करनेयोग्य है ।१६७॥
गाथा १६८
अन्वयार्थ:-[ यस्य ] जो [चिचोद्भामं विना तु] ( रागके सदुभावके
कारण) चित्तके भ्रमण रहिततया [ आत्मानम् ] अपनेको [धर्तुम् न शक्यम् ] नहीं
रख सकता, [ तस्य ] उसे [ शुभाशुभकृतस्य कर्मगा ] शुभाशुभ कर्मका [रोधा न विद्यते ]
निरोध नहीं है।
टीका:- यह, रागलवमूलक दोषपरम्पराका निरूपण है ( अर्थात् 'अल्प राग
जिसका मूल है ऐसी दोषोंकी संततिका यहां कथन है)।
१.. निरुपराग-शुद्धस्वरूप उपरागरहित (-निर्विकार ) शुद्ध जिसका स्वरूप है ऐसा।
२. जिसप्रकार धुनकीसे चिपकी हुई थोड़ी-सी भी रूई, धुननेके कार्यमें विघ्न करती है, उसीप्रकार
थोड़ा-सा भी राग स्वसमयकी उपलब्धिरूप कार्यमें विघ्न करता है।
मनना भ्रमणथी रहित जे राखी शके नहि आत्मने ।
:.शुभ वा मशुभ कर्मों तणो नहि रोध छे ते जीवने ॥१६८॥

२४६ पंचास्तिकायसंग्रह बुद्धिप्रसरे च सति शुभस्याशुभस्य वा कर्मणो न निरोधोऽस्ति । ततो रागकलिविलासमूल एवायमनर्थसन्तान इति ॥१६८॥ तम्हा णिवृदिकामो णिस्संगो जिम्ममो य हविय पुणो। सिद्धसु कुणदि भत्ति णिवाणं तेण पप्पोदि ॥१६॥ तस्मानिवृचिकामो निस्सनो निर्ममश्च भूत्वा पुनः । सिद्धेषु करोति भक्ति निर्वाणं तेन प्राप्नोति ।। १६९ ।। यहाँ ( इस लोकमें ) वास्तवमें अहंतादिके ओर की भक्ति भी रागपरिणतिके बिना नहीं होती। रागादिपरिणति होनेसे, आत्मा 'बुद्धिप्रसार रहित (-चित्तके भ्रमणसे रहित ) अपनेको किसी प्रकार नहीं रख सकता; और बुद्धिप्रसार होनेसे -चित्तका भ्रमण होनेसे ), शुभ तथा अशुभ कर्मका निरोध नहीं होता । इसलिए, यह अनर्थसंततिका मूल रागरूप क्लेशका विलास ही है । भावार्थ:-अहंतादिकी भक्ति भी रागरहित नहीं होती। रागसे चित्तका भ्रमण होता है; चित्तके भ्रमणसे कर्मबन्ध होता है । इसलिए इन अनर्थोंकी परम्पराका मूल कारण राग ही है । १६८ । गाथा १६९ अन्वयार्थ:-[तस्माद ] इसलिए [ निवृत्तिकामः ] मोक्षार्थी जीव [ निस्सङ्गः] निःसंग [च ] और [निर्मम: ] निर्मम [ भूत्वा पुनः] होकर [ सिद्धेषु भक्ति ] १. वुद्धिप्रसार-विकल्पोंका विस्तार; चित्तका भ्रमण! मनका भटकना; मनकी चंचलता। २. इस गाथाकी श्री जयसेनाचार्यदेवविरचित टीकामें निम्नानुसार विवरण दिया गया है:- मात्र नित्यानन्द जिसका स्वभाव है ऐसे निज भात्माको जो जीव नहीं भाता, उस जीवको माया-मिथ्या-निदानशल्यत्रयादिक समस्तविभावरूप बुद्धिप्रसार रोका नहीं जा सकता और वह न रुकनेसे (अर्थात् बुद्धिप्रसारका निरोध न होनेसे ) शुभाशुभ कर्मका संवर नहीं होता; इसलिए ऐसा सिद्ध हुआ कि समस्त अनर्थपरम्परामोंका रागादिविकल्प ही मूल है। ते कारणे मोलेच्छु जीव मसंग ने निर्मम बनी। सिद्धो तणी भक्ति करे, उपलब्धि जेथी मोसनी ॥१६॥ - नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन २४७ रागकलिनिःशेषीकरणस्य करणीयत्वाख्यानमेतत् । यतो रागाद्यनुवृत्तौ चिचोभ्रान्तिः, चिचोद्धान्तौ कर्मबन्ध इत्युक्तम्, ततः खलु मोक्षार्थिना कर्मबन्धमूलचिचोद्धान्तिमूलभूता रागाद्यनुवृचिरेकान्तेन निशेषीकरणीया । निम्शेषिताय तस्यां प्रसिद्धनैःसङ्गयनमम्या शुद्धात्मद्रव्यविश्रान्तिरूपां पारमार्थिकी सिद्धभक्तिमनुविभ्राणा प्रसिद्धस्वसमयप्रवृचिर्भवति । तेन कारणेन स एव निःशेषितकर्मवन्धः सिद्धिमावाप्नोतीति ।। १६९ ॥ सिद्धोंकी भक्ति ( -शुद्धात्मद्रव्यमें स्थिरतारूप पारमार्थिक सिद्धभक्ति) [करोति ] करता है, [ तेन ] इसलिए वह [ निर्वाणं प्राप्नोति ] निर्वाणको प्राप्त करता है। टीका:-यह, रागरूप क्लेशका 'निःशेष नाश करनेयोग्य होनेका निरूपण है । . . रागादिपरिणति होनेसे चित्तका भ्रमण होता है और चित्त का भ्रमण होनेसे कर्मवन्ध होता है ऐसा ( पहले ) कहा गया, इसलिए मोक्षार्थीको कर्मबन्धका मूल ऐसा जो चित्तका भ्रमण उसके मूलभूत रागादिपरिणतिका एकान्तसे निःशेष नाश करनेयोग्य है । उसका निःशेष नाश किया जानेसे, जिसे 'निःसंगता और निर्ममता प्रसिद्ध हुई है ऐसा वह जीवशुद्धात्मद्रव्यमें विश्रांतिरूप पारमार्थिक सिद्धभक्ति धारण करता हुआ 'स्वसमयप्रवृत्तिकी प्रसिद्धिवाला होता है। उस कारणसे वह जीव कर्मबंधका निःशेष नाश करके सिद्धिको प्राप्त करता है ।१६६। १. निःशेष सम्पूर्ण; किंचित् शेष न रहे । २. नि:संग आत्मतत्त्वसे विपरीत ऐसा जो बाह्य-अभ्यन्तर परिग्रह उससे रहित परिणति सौ निःसंगता है। ३. रागादि-उपाधिरहित चैतन्यप्रकाश जिसका लक्षण है ऐसे आत्मतत्त्वसे विपरीत मोहोदय जिसकी उत्पत्तिमें निमित्तभुत होता है ऐसे ममकार-प्रहंकारादिरूप विकल्पसमूहसे रहित निर्मोहपरिणति सो निर्ममता है। ४. स्वसमयप्रवृत्तिको प्रसिद्धिवाला= जिसे स्वसमयमें प्रवृत्ति प्रसिद्ध हुई है। [ जो जीव रागादिपरिणतिका सम्पूर्ण नाश करके निःसंग सौर निर्मम हुआ है उस परमार्थसिद्धभक्तिवंत जीवने स्वसमयमें प्रवृत्ति सिद्ध की है इसलिए स्वसमयप्रवृत्तिके कारण वही जीव कर्मबन्धका क्षय करके मोक्षको प्राप्त करता है, वन्य नहीं। ] २४८ पंचास्तिकायसंग्रह सपयत्थं तित्थयरं अभिगदबुद्धिस्स सुत्तरोइस्स । दूरतरं णिव्वाणं संजमतवसंपउत्तस्स ॥ १७० ॥ सपदार्थ तीर्थकरममिगतवुद्धः सूत्ररोचिनः । दूरतरं निर्वाणं संयमतपःसम्प्रयुक्तस्य ॥ १७० ।। अहंदादिभक्तिरूपपरसमयप्रवृत्तः साक्षान्मोक्षहेतुत्वाभावेऽपि परम्परया मोक्षहेतुत्व- सद्भावद्योतनमेतत् । यः खलु मोक्षार्थमुद्यतमना समुपार्जिताचिन्त्यसंयमतपोभारोऽप्यसंभावित- गाथा १७० अन्वयार्थ:- [ संयमतपःसम्प्रयुक्तस्य ] संयमतपसंयुक्त होने पर भी, [ सपदार्थ तीर्थकरम् ] नव पदार्थों तथा तीर्थकरके प्रति [ अमिगतबुद्धेः ] जिसकी बुद्धिका झुकाव वर्तता है और [ सूत्ररोचिन: J सूत्रोंके प्रति जिसे रुचि (प्रीति ) वर्तती है, उस जीवको [निर्वाणं ] निर्वाण [ दूरतरम् ] दूरतर ( विशेष टीका:-यहाँ, अहंतादिकी भक्तिरूप परसमयप्रवृत्तिमें साक्षात् मोक्षहेतुपनेका अभाव होने पर भी परम्परासे मोक्षहेतुपनेका 'सद्भाव दर्शाया है। १. वास्तवमें तो ऐसा है कि-ज्ञानीको शुद्धाशुद्धरूप मिश्र पर्यायमें जो भक्ति-प्रादिरूप शुभ अंश वर्तता है वह तो मात्र देवलोकादिके क्लेशको परम्पराका ही हेतु है और साथ ही साथ ज्ञानीको जो ( मंदशुद्धिरूप ) शुद्ध अंश परिणमित होता है वह संवरनिर्जराका तथा ( उतने अंशमें ) मोक्षका हेतु है । वास्तवमें ऐसा होने पर भी, शुद्ध अंशमें स्थित संवर-निर्जरा-मोक्षहेतुत्वका प्रारोप उसके साथके भक्ति-मादिरूप शुभ अंशमें करके उन शुभ भावोंको देवलोकादिके क्लेशकी प्राप्तिकी परम्परा सहित मोक्षप्राप्तिके हेतुभूत कहा गया है। यह कथन आरोपसे ( उपचारसे) किया गया है ऐसा समझना। [ ऐसा कथंचित् मोक्षहेतुत्वका आरोप भी ज्ञानीको ही वर्तते हुए भक्ति-पादिरूप शुभ भावोंमें किया जा सकता है। अज्ञानीको तो शुद्धिका अंशमात्र भी परिणमनमें न होनेसे यथार्थ मोक्षहेतु बिलकुल प्रगट ही नहीं हुआ है-विद्यमान ही नहीं है तो फिर वहां उसके भक्तिमादिरूप शुभ भावोंमें भारोप किसका किया जाए? ] संयम तथा तपयुक्तने पण दूरतर निर्वाण छ । सूत्रो, पदार्थों, जिनवरो प्रति चित्तमा रुचि जो रहे ॥१७०॥ - २४६ - नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन परमवैराग्यभूमिकाधिरोहणसमर्थप्रभुशक्तिः पिञ्जनलग्नतूलन्यासन्यायेन नवपदार्थः सहाईदादि- रुचिरूपां परसमयप्रवृत्ति परित्यक्तुं नोत्सहते, स खलु न नाम साक्षान्मोक्षं लभवे, किन्तु सुरलोकादिक्लेशप्राप्तिरूपया परम्परया तमवाप्नोति ।। १७० ॥ अरहंतसिद्धचेदियपवयणभत्तो परेण णियमेण । जो कुणदि तवोकम्मं सो सुरलोगं समादियदि ॥१७॥ जो जीव वास्तवमें मोक्षके हेतुसे उद्यमी चित्तवाला वर्तता हुआ, अचिन्त्य संयमतपभार संप्राप्त किया होने पर भी परमवैराग्यभूमिकाका मारोहण करने में समर्थ ऐसी 'प्रभुशक्ति उत्पन्न न की होनेसे, 'धुनकीको चिपकी हुई रूई के न्यायसे, नव पदार्थों तथा अहंतादिकी रुचिरूप ( प्रीतिरूप ) परसमयप्रवृत्तिका परित्याग नहीं कर सकता, वह जीव वास्तवमें साक्षात् मोक्षको प्राप्त नहीं करता किन्तु देवलोकादिके क्लेशकी प्राप्तिरूप परम्परा द्वारा उसे प्राप्त करता है । १७० । १. प्रभुशक्ति प्रबल शक्ति; उग्रशक्ति प्रचुर शक्ति। [ जिस ज्ञानी जीवने परम उदासीनताको प्राप्त करनेमें समर्थ ऐसी प्रभुशक्ति उत्पन्न नहीं की वह ज्ञानी जीव कदाचित् शुद्धात्मभावनाको अनुकूल, जीवादिपदार्थोंका प्रतिपादन करनेवाले आगमोंके प्रति रुचि (प्रीति ) करता है। कदाचित् ( जिसप्रकार कोई रामचन्द्रादि पुरुष देशांतरस्थित सीतादि स्त्रीके पाससे आए हुए मनुष्योंको प्रेमसे सुनता है, उनका सन्मानादि करता है और उन्हें दान देता है उसी प्रकार ) निर्दोष-परमात्मा तीर्थंकरपरमदेवोंके और गणधर-देव-भरत-सगर-राम-पांडवादि महापुरुषोंके चरित्रपुराण शुभ धर्मानुरागसे सुनता है तथा कदाचित् गृहस्थदशामें भेदाभेदरत्नत्रयपरिणत आचार्य-उपाध्याय-साधुके पूजनादि करता है और उन्हें दान देता है-इत्यादि शुभभाव करता है । इसप्रकार जो ज्ञानी जीव शुभ रागको सर्वथा नहीं छोड़ सकता, वह साक्षात् मोक्षको प्राप्त नहीं करता परन्तु देवलोकादिके क्लेशकी परम्पराको पाकर फिर चरम देहसे निर्विकल्पसमाधि- विधान द्वारा विशुद्धदर्शनज्ञानस्वभाववाले निजशुद्धात्मामें स्थिर होकर उसे ( मोक्षको ) प्राप्त करता है।] जिन-सिद्ध-प्रवचन-चैत्य प्रत्ये भक्ति धारी मन विषे । संयम परम सह तप करे, ते जीव पामे स्वर्गने ।। १७१ ।। ३२ पंचास्तिकायसंग्रह . अहंसिद्धचैत्यप्रवचनभक्ता परेण नियमेन । या करोति तपाकर्म स सुरलोक समादचे ।। १७१ ॥ महंदादिभक्तिमात्ररागजनितसाक्षान्मोक्षस्यान्तरायद्योतनमेतत् । यः खल्बर्हदादिभक्ति विधेयधुद्धिः सन् परमसंयमप्रधानमतितीव्र तपस्तप्यते, स तावन्मात्ररागकलिकलङ्कितस्वान्ता साक्षान्मोलस्यान्तरायीभूतं विषयविषद्रुमामोदमोहितान्तरङ्ग स्वर्गलोकं समासाद्य, सुचिरं रामाङ्गारैः पच्यमानोऽन्तस्ताम्यतीति ॥१७१।। तम्हा णिचुदिकामो रागं सम्वत्थ कुणदु मा किंचि । सो तेण वीदरागो भविमो भवसायरं तरदि ॥ १७२॥ गाथा १७१ अन्वयार्थः-[ यः ] जो ( जीव ), [अर्हसिद्धचैत्यप्रवचनभक्तः ] प्रहंत, सिद्ध, चैत्य (-अहंतादिकी प्रतिमा) और प्रवचन ( -शास्त्र ) के प्रति भक्तियुक्त वर्तता हुआ, [ परेण नियमेन ] परम संयम सहित [ तपाकर्म ] तपकर्म ( -तपरूप कार्य ) [ करोति ] करता है, [सः] वह [ सुरलोकं ] देवलोकको [ समादचे ] सम्प्राप्त करता है। टीका:- यह, मात्र अहंतादिकी भक्ति जितने रागसे उत्पन्न होनेवाला जो साक्षात् सोक्षका अंतराय उसका प्रकाशन है । जो ( जीव ) वास्तवमें अहंतादिकी भक्तिके आधीन बुद्धिवाला वर्तता हुआ 'परमसंयमप्रधान अतितीव्र तप तपता है, वह ( जीव ), मात्र उतने रागरूप क्लेशसे जिसका निज अन्तःकरण कलंकित ( -मलिन ) है ऐसा वर्तता हुआ, विषयविषवृक्षके 'आमोदसे जहां अन्तरंग ( -अन्तःकरण ) मोहित होता है ऐसे स्वर्गलोकको-जो कि साक्षात् मोक्षको अन्तरायभूत है उसे—संप्राप्त करके, सुचिरकाल पर्यंत (-बहुत लम्बे काल तक ) रागरूपी अंगारोंसे दह्यमान हुआ अंतरमें संतप्त (-दुःखी, व्यथित ) होता है। १७१। १. परमसंयमप्रधान-जिसमें उत्कृष्ट संयम मुख्य हो ऐसा। २. आमोद- (१) सुगन्ध; (२) मौज । तेथी न करवो राग जरीये क्यांय पण मोक्षेच्छु। वीतराग थईने ये रीते ते भव्य भवसागर तरे ॥ १७२ ।।

नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन २५१ तस्मानिचिकामो राग सर्वत्र करोतु मा किश्चित् । स तेन वीतरागो भव्यो भवसागरं तरति ॥ १७२ ॥ साक्षान्मोक्षमार्गसारसूचनद्वारेण शास्त्रतात्पर्योपसंहारोऽयम् । सामान्मोलमार्गपुरस्सरं हि वीतरागत्वम् । ततः खल्वहंदादिगतमपि रागं चन्दननगसङ्गतमग्निमिव सुरलोकादिक्लेश- प्राप्त्याऽत्यन्तमन्तर्दाहाय कल्पमानमाकलय्यसाक्षान्मोक्षकामो महाजनः समस्तविषयमपि रागमुत्सृज्यात्यन्तवीतरागो भूत्वा समुच्छलज्ज्वलदुःखसौख्यकल्लोलं कर्माग्नितप्तकलकलोद- भारप्राग्भारभयङ्करं भवसागरमुत्तीर्य, शुद्ध स्वरूपपरमामृतसमुद्रमध्यास्य सद्यो निर्वाति ।। . गाथा १७२ अन्वयार्थ-[ तस्मात् ] इसलिए [निर्वचिकामः] मोक्षाभिलाषी जीव [ सर्वत्र ] सर्वत्र [ किश्चित् रागं ] किंचित् भी राग [ मा करोतु ] न करो; [ तेन ] ऐसा करनेसे [ सा भव्यः] वह भव्य जोव [ वीतरागः ] वीतराग होकर [ भवसागरं तरति ] भवसागरको तरता है । टीका:- यह, साक्षातमोक्षमार्गके सार-सूचन द्वारा शास्त्रतात्पर्यरूप उपसंहार है (अर्थात् यहां साक्षात्मोक्षमार्गका सार क्या है उसके कथन द्वारा शास्त्रका तात्पर्य कहनेरूप उपसंहार किया है)। साक्षातमोक्षमार्गमें अग्रसर सचमुच वीतरागपना है। इसलिए वास्तवमें 'अहंतादिगत रागको भी, चन्दनवृक्षसंगत अग्निकी भांति, देवलोकादिके क्लेशकी प्राप्ति द्वारा अत्यन्त अन्तर्दाहका कारण समझकर, साक्षात् मोक्षका अभिलाषी महाजन सबकी भोरके रागको छोड़कर, अत्यन्त वीतराग होकर, जिसमें उबलती हुई दुःखसुखकी कल्लोलें उछलती हैं और जो कर्माग्नि द्वारा तप्त, खलबलाते हुए जलसमूहकी अतिशयतासे भयंकर है ऐसे भवसागरको पार उतरकर, शुद्धस्वरूप परमामृतसमुद्रको अवगाह कर, शीघ्र निर्वाणको प्राप्त करता है। १. अर्हतादिगत राग-महंतादिकी पोरका राग अहंतादिविषयक राग, अहंतादिका राग । [ जिसप्रकार चन्दनवृक्षकी अग्नि भी उग्र रूपसे जलाती है, उसीप्रकार अहंतादिका राग भी देवलोकादिके क्लेशकी प्राप्ति द्वारा अत्यन्त अन्तरंग जलनका कारण होता है। ] २५२ - पंचास्तिकायसंग्रह अलं विस्तरेण | स्वस्ति साक्षान्मोक्षमार्गसारत्वेन शास्त्रतात्पर्यभूताय वीतरागत्वायेति । द्विविधं किलतात्पर्यम्-सूत्रतात्पर्य शास्त्रतात्पर्यवेति । तत्र सूत्रतात्पर्य प्रतिसूत्रमेव प्रतिपादितम् । शास्त्रतात्पर्य विदं प्रतिपाद्यते । अस्य खलु पारमेश्वरस्यशास्त्रस्य, सकलपुरुषार्थ- सारभूतमोक्षतत्त्वप्रतिपचिहेतोःपञ्चास्तिकायषड्द्रव्यस्वरूपप्रतिपादनेनोपदर्शितसमस्तवस्तुस्वभावस्य, नवपदार्थप्रपञ्चसूचनाविष्कृतवन्धमोक्षसंवन्धिबंधमोक्षायतनवन्धमोलविकल्पस्य, सम्यगावेदित- निश्चयव्यवहाररूपमोक्षमार्गस्य, साक्षान्मोक्षकारणभूतपरमवीतरागत्वविश्रांतसमस्तहृदयस्य, -विस्तारसे बस हो । जयवंत वर्ते वीतरागता जो कि साक्षात्मोक्षमार्गका सार होनेसे शास्त्रतात्पर्यभूत है । तात्पर्य द्विविध होता है : 'सूत्रतात्पर्य और शास्त्रतात्पर्य । उसमें, सूत्रतात्पर्य प्रत्येकसूत्रमें ( प्रत्येकगाथामें ) प्रतिपादित किया गया है; और शास्त्रतात्पर्य अव प्रतिपादित किया जाता है:- सर्व 'पुरुषार्थोंमें सारभूत ऐसे मोक्षतत्त्वका प्रतिपादन करनेके हेतुसे जिसमें पंचास्तिकाय और षड्द्रव्यके स्वरूपके प्रतिपादन द्वारा समस्त वस्तुका स्वभाव दर्शाया गया है, नव पदार्थोंके विस्तृत कथन द्वारा जिसमें बन्धमोक्षके सम्बन्धी ( स्वामी ), बन्ध-मोक्षके आयतनं ( स्थान ) और बंध-मोक्षके विकल्प ( भेद ) प्रगट किए गए हैं, निश्चय-व्यवहाररूप मोक्षमार्गका जिसमें सम्यक् निरूपण किया गया है तथा साक्षात् मोक्षके कारणभूत परमवीतरागपनेमें जिसका समस्त हृदय स्थित है-ऐसें इस यथार्थ पारमेश्वर शास्त्रका, परमार्थसे वीतरागपना ही तात्पर्य है । सो इस वीतरागपनेका व्यवहार-निश्चयके अविरोधः द्वारा ही अनुसरण किया जाए तो इष्टसिद्धि होती है, परन्तु अन्यथा नहीं ( अर्थात् व्यवहार और निश्चयकी १. प्रत्येक गाथासूत्रका तात्पर्य सो सूत्रतात्पर्य है और सम्पूर्ण शास्त्रका तात्पर्य सो शास्त्रतात्पर्य है । २. . पुरुषार्थ-पुरुष-अर्थ; पुरुष-प्रयोजन । [ पुरुषार्थों के चार विभाग किए जाते हैं : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष; परन्तु सर्व पुरुष-वर्थों में मोक्ष.ही सारभूत ( तात्त्विक ) पुरुष-अर्थ है।] ३. पारमेश्वर-परमेश्वरके; जिनभगवानके; भागवत; देवी; पवित्र । छठवें गुणस्थानमें मुनियोग्य शुद्धपरिणति निरन्तर होना तथा महाव्रतादिसम्बन्धी शुभभाव यथायोग्यरूपसे होना वह निश्चयव्यवहारके अविरोधका ( सुमेलका) उदाहरण है. पांचवें गुणस्थानमें उस गुणस्थानके योग्य शुद्धपरिणति निरन्तर होना तथा देशवतादिसम्बन्धी शुभभाव यथायोग्यरूपसे होना वह भी निश्चय-व्यवहारके भविरोधका उदाहरण है।

२५३ नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन परमार्थतो वीतरागत्वमेव तात्पर्यमिति । तदिदं वीतरागत्वं व्यवहारनिश्चयाविरोधेनैवानुगम्यमानं भवति समीहितसिद्धये, न पुनरन्यथा । व्यवहारनयेन भिन्नसाध्यसाधनभावमवलम्ब्यानादिभेद: वासितवुद्धयः सुखेनैवावतरन्ति तीर्थ प्राथमिकाः । तथा हीदं श्रद्धेयमिदमश्रद्धेयमयं श्रद्धातेदं श्रद्धानमिदं ज्ञेयमिदमज्ञेयमयं बातेदं ज्ञानमिदं चरणीयमिदमचरणीयमयं चरिदं चरणमिति कर्तव्याकर्तव्यककर्मविभागावलोकनोल्लसितपेशलोत्साहा: शनैशनर्मोहमल्लमुन्मूलयन्ता, सुसंगतता रहे इसप्रकार वीतरागपनेका अनुसरण किया जाए तभी इच्छितकी सिद्धि होती है, अन्य प्रकारसे नहीं होती )। ( उपरोक्त वात विशेष समझाई जाती है:-) अनादि कालसे भेदवासित बुद्धि होनेके कारण प्राथमिक जीव व्यवहारनयसे 'भिन्नसाध्यसाधनभावका अवलम्वन लेकर 'सुखसे तीर्थका प्रारम्भ करते हैं ( अर्थात सुगमरूपसे मोक्षमार्गकी प्रारम्भभूमिकाका सेवन करते हैं )। जैसे कि-"(१) यह श्रद्धेय ( श्रद्धा करनेयोग्य ) है, (२) यह अश्रद्धय है, (३) यह श्रद्धा करनेवाला है और (४) यह श्रद्धान है; (१) यह ज्ञेय ( जाननेयोग्य ) है, (२) यह अजेय है, (३) यह ज्ञाता है और ( ४ ) यह ज्ञान है; (१) यह आचरणीय ( आचरण करनेयोग्य ) है, (२) यह अनाचरणीय है, (३) यह आचरण करनेवाला है और (४) यह आचरण है;"-इंसप्रकार ( १) कर्तव्य ( करने- योग्य ), (२) अकर्तव्य, ( ३ ) कर्ता और ( ४ ) कर्मरूप विभागोंके अवलोकन द्वारा जिन्हें कोमल उत्साह उल्लसित होता है ऐसे वे ( प्राथमिक जीव ) धीरे-धीरे मोहमल्लको (रागादिको) उखाड़ते जाते हैं; कदाचित् अज्ञानके कारण (-स्वसंवेदन- १. मोक्षमार्गप्राप्त ज्ञानी जीवोंको प्राथमिक भूमिकामें, साध्य तो परिपूर्ण शुद्धतारूपसे परिणत आत्मा है और उसका साधन व्यवहारनयसे ( आंशिक शुद्धिके साथ-साथ रहनेवाले ) भेदरत्न- अयरूप परावलम्बी विकल्प कहे जाते हैं । इसप्रकार उन जीवोंको व्यवहारनयसे साध्य और साधन भिन्न प्रकारके कहे गए हैं । ( निश्चयनयसे साध्य और साधन भिन्न होते हैं।) २. सुखसे सुगमतासे, सहजरूपसे, कठिनाई विना । [ जिन्होंने द्रव्याथिकनयके विषयभूत शुद्धात्मस्वरूपके श्रद्धानादि किए हैं ऐसे सम्यग्ज्ञानी जीवोंको तीर्थसेवनकी प्राथमिक दशामें (-मोक्षमार्गसेवनकी प्रारम्भिक भूमिकामें ) शांशिक शुद्धिके साथ-साथ श्रद्धानचारित्र सम्बन्धी परावलम्बी विकल्प ( भेदरत्नत्रय.) होते हैं, क्योंकि अनादि कालसे जीवोंको जो भेदवासनासे वासित परिणति चली पा रही है उसका तुरन्त ही सर्वथा नाश होना कठिन है । .

. -- २५४ पंचास्तिकायसंग्रह कदाचिदज्ञानान्मदप्रमादतन्त्रतया शिथिलितास्माधिकारस्यात्मनो न्याय्यपथप्रवर्तनाय प्रयुक्त- प्रचण्डदण्डनीतयः, पुनः पुनः दोषानुसारेण दत्तप्रायश्चिचाः सन्ततोद्यताः सन्तोऽथ तस्यैवात्मनो भिन्नाविषयश्रद्धानज्ञानचारित्ररधिरोप्यमाणसंस्कारस्य भिन्नसाध्यसाधनमावस्य रजकशिलातल- स्फान्यमानविमलसलिलाप्लुतषिहितोपपरिष्वङ्गमलिनवासस इव मनाङ् मनानिशुद्धिमधिगम्य निश्चयनयस्य भिन्नसाध्यसाधनभानामावादर्शनशानचारित्रसमाहितत्त्वरूपे विश्रान्तसकलक्रिया- काण्डाडम्बरनिस्तरङ्गपरमचैतन्यशालिनि निर्भरानन्दमालिनि मगवत्यात्मनि विश्रान्तिमासूत्र- ज्ञानके अभावके कारण ) मद ( कषाय ) और प्रमादके वश होनेसे अपना आत्म- अधिकार (आत्मामें अधिकार ) शिथिल हो जानेसे अपनेको न्यायमार्गमें प्रवर्तित करनेके लिए वे प्रचण्ड दण्डनीतिका प्रयोग करते हैं; पुनः पुनः ( अपने आत्माको ) दोषानुसार प्रायश्चित्त देते हुए वे सतत उद्यमवंत वर्तते हैं; और 'भिन्नविषयवाले श्रद्धान-ज्ञानचारित्र द्वारा (-आत्मासे भिन्न जिसके विषय हैं ऐसे भेदरत्नत्रय द्वारा) जिसमें संस्कार आरोपित होते जाते हैं ऐसे भिन्नसाध्यसाधनभाववाले अपने आत्मामें- धोबी द्वारा शिलाकी सतह पर पछाड़े जानेवाले, निर्मल जल द्वारा भिगोए जानेवाले और क्षार ( साबुन ) लगाए जानेवाले मलिन वस्त्रकी भांति-कुछ-कुछ विशुद्धि प्राप्त करके, उसी अपने आत्माको निश्चयवयसे भिन्नसाध्यसाधनभावके अभावके कारण, दर्शनज्ञानचारित्रका समाहितपना ( अभेदपना ) जिसका रूप है, सकल क्रियाकाण्डके आडम्बरकी निवृत्तिके कारण ( -अभावके कारण ) जो विस्तरंग परमचैतन्यशाली है १. व्यवहार-श्रद्धानज्ञानचारित्रके विषय आत्मासे भिन्न हैं। क्योंकि व्यवहारश्रद्धानका विषय नव पदार्थ हैं, व्यवहारज्ञानका विषय अंग-पूर्व हैं और व्यवहारचारित्रका विषय आचारादिसूत्रकथित मुनि-प्राचार हैं। २. जिसप्रकार घोबी पाषाणशिला, पानी और साबुन द्वारा मलिन वस्त्रकी शुद्धि करता जाता है, उसीप्रकार प्राक्पदवीस्थित ज्ञानी जीव भेदरत्नत्रय द्वारा अपने प्रात्मामें संस्कारको आरोपण करके उसकी थोड़ी-थोड़ी शुद्धि करता जाता है ऐसा व्यवहारनयसे कहा जाता है । परमार्थ ऐसा है कि उस भेदरत्नत्रयवाले ज्ञानी जीवको शुभभावोंके साथ जो शुद्धात्मस्वरूपका आंशिक मालम्वन वर्तता है वही उग्र होते-होते विशेष शुद्धि करता जाता है। इसलिए वास्तवमें तो, शुद्धात्मस्वरूपका आलम्बन करना ही शुद्धि प्रगट करनेका साधन है और उस मालम्बन की उग्रता करना ही शुद्धिकी वृद्धि करनेका साधन है। साथ रहे हुए शुभभावोंको शुद्धिकी वृद्धिका साधन कहना वह तो मात्र उपचारकथन है । शुद्धिकी वृद्धिके उपचरितसाधनपनेका आरोप भी उसी जीवके शुभभावोंमें आ सकता है कि जिस जीवने शुद्धिकी वृद्धिका यथार्थ साधन (-शुद्धात्म- स्वरूपका यथोचित पालम्बन ) प्रगट किया हो।

२५१ . - तथा नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन यन्तः क्रमेण समुपजातसमरसीभावाः परमवीतरागभावमधिगम्य; साक्षान्मोक्षमनु- भवन्तीति ॥ मथ ये तु केवलव्यवहारावलम्बिनस्ते खलु भिन्नसाध्यसाधनभावावलोकनेनाऽनवरतं नितरां खिद्यमाना मुहुर्मुहुर्धर्मादिश्रद्धानरूपाध्यवसायानुस्यतचेतसः प्रभृतश्रुतसंस्काराधिरोपित- विचित्र विकल्पजालकल्मापितचैतन्यवृत्त्या, समस्तयतिवृत्तसमुदायरूपतपप्रवृत्तिरूपकर्मकाण्डोड- मराचलिताः, कदाचित्किञ्चिद्रोचमानाः, कदाचित् किश्चिद्विकल्पयन्ता, कदाचित्किञ्चिदाचरन्तः, तथा जो निर्भर प्रानन्दसे समृद्ध है ऐसे भगवान आत्मामें विश्रांति रचते हुए ( अर्थात दर्शनज्ञानचारित्रके ऐक्यस्वरूप, निविकल्प परमचैतन्यशाली भरपूर- आनन्दयुक्त ऐसे भगवान आत्मामें अपनेको स्थिर करते हुए ), क्रमशः समरसीभाव समुत्पन्न होता जाता है इसलिए परम वीतरागभावको प्राप्त करके साक्षात् मोक्षका अनुभव करते हैं। [ अब केवलव्यवहारावलम्बी ( अज्ञानी ) जीवोंका प्रवर्तन और उसका फल कहा जाता है :-] परन्तु जो केवलव्यवहारावलम्बी ( मात्र व्यवहारका अवलम्बन करनेवाले ) हैं वे वास्तवमें .'भिन्नसाध्यसाधनभावके अवलोकन द्वारा निरन्तर अत्यन्त खेद पाते हुए, (१) पुनः पुन: धर्मादिके श्रद्धानरूप अध्यवसानमें उनका चित्त लगता रहने से, (२) बहुत श्रुतके ( द्रव्यश्रुतके ) संस्कारोंसे उठनेवाले विचित्र ( अनेक प्रकारके ) विकल्पोंके जाल द्वारा उनकी चैतन्यवृत्ति चित्र-विचित्र होती है इसलिए और ( ३ ) समस्त यति-आचारके समुदायरूप तपमें प्रवर्तनरूप कर्मकाण्डकी धमारमें वे प्रचलित रहते हैं इसलिए, ( १ ) कभी किसीकी ( किसी विषयकी ) रुचि करते हैं, ( २ ) कभी किसीके ( किसी विषयके ) विकल्प करते हैं और ( ३ ) कभी कुछ १. वास्तव में साध्य मोर साधन भिन्न होते हैं । जहाँ साध्य और साधन भिन्न कहे जायें वहाँ "यह सत्यार्थ निरूपरण नहीं है किन्तु व्यवहारनय द्वारा उपचरित निरूपण किया है"-ऐसा समझना चाहिए । केवलव्यवहारावम्बी जीव इस बातकी गहराईसे श्रद्धा न करते हुए अर्थात् "वास्तवमें शुभभावरूप साधनसे ही शुद्धभावरूप साध्य प्राप्त होगा" ऐसी श्रद्धाका गहराईमें सेवन करते हुए निरन्तर अत्यन्त खेद प्राप्त करते हैं। [विशेषके लिए २३३ वें पृष्ठकी पहली तथा चौथी टिप्पणी देखें। ] २५६ पंचास्तिकायसंग्रह - , - .. - दर्शनाचरणाय कदाचित्प्रशाम्यन्तः, कदाचित्संविजमाना, कदाचिदनुकम्पमानाः, कदाचिदास्तिक्यमुद्वहन्ता, शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्सामूढदृष्टितानां व्युत्थापननिरोधाय नित्यबद्ध- परिकराः, उप हणस्थितिकरणवात्सल्यप्रभावनां भावयमाना वारंवारमभिवर्धितोत्साहा, ज्ञानाचरणाय स्वाध्यायकालमवलोकयन्तो, बहुधा विनयं प्रपञ्चयन्तः, प्रविहितदुर्घरोपधानाः, सुष्ठु बहुमानमातन्वन्तो निहवापचि नितरां निवारयन्तोऽर्थव्यञ्जनतदुभयशुद्धौ नितान्तसावधानार, चारित्राचरणाय हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहसमस्तविरतिरूपेषु पञ्चमहाव्रतेषु तन्निष्ठवृत्तयः, सम्यग्योगनिग्रहलक्षणासु गुप्तिषु नितान्तं गृहीतोद्योगा, ईर्याभाषणादाननिक्षेपोत्सर्गरूपासु समितिष्पत्यन्तनिवेशितप्रयत्नाः, तपाचरणायानशनावमौदर्यवृचिपरिसंख्यानरसपरित्याग- विविक्तशय्यासनकायक्लेशेष्वभीक्ष्णमुत्सहमानाः, प्रायश्चित्तविनययावृत्त्यव्युत्सर्गस्वाध्याय- ध्यानपरिकरांकुशितस्वान्ता, वीर्याचरणाय कर्मकाण्डे सर्वशक्त्या व्याप्रियमाणाः, कर्मचेतना- आचरण करते हैं; दर्शनाचरणके लिए-वे कदाचित् प्रशमित होते हैं, कदाचित् संवेगको प्राप्त होते हैं. कदाचित् अनुकम्पित होते हैं, कदाचित् आस्तिक्यको धारण करते हैं, शंका, कांक्षा, विचिकित्सा और मूदृष्टिताके उत्थानको रोकनेके हेतु नित्य कटिवद्ध रहते हैं, उपवृहण, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावनाको भाते हुए वारम्बार उत्साहको बढ़ाते हैं; ज्ञानाचरणके लिए-स्वाध्यायकालका अवलोकन करते हैं, बहु प्रकारसे विनयका विस्तार करते हैं, दुर्धर उपधान करते हैं, भलीभांति बहुमानको प्रसरित करते हैं, निह्नवदोषको अत्यन्त निवारते हैं. अर्थ, व्यंजन और 'तदुभयकी शुद्धिमें अत्यन्त सावधान रहते हैं; चारित्राचरणके लिए-हिंसा, असत्य, स्तेय, अब्रह्म और परिग्रहकी सर्वविरतिरूप पंचमहाव्रतोंमें तल्लीन वृत्तिवाले रहते हैं, सम्यक् योगनिग्रह जिनका लक्षण है (-योगका वरावर निरोध करना जिनका लक्षण है ) ऐसी गुप्तियोंमें अत्यन्त उद्योग रखते हैं, ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेप और उत्सर्गरूप समितियोंमें प्रयत्नको अत्यन्त युक्त करते हैं, तपाचरणके लिए-अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तशय्यासन और कायक्लेशमें सतत उत्साहित रहते हैं, प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्त्य, व्युत्सर्ग, स्वाध्याय और ध्यानरूप परिकर द्वारा निज अन्तःकरणको अंकुशित रखते हैं; वीर्याचरणके लिए-कर्मकाण्डमें सर्व शक्ति द्वारा व्याप्त रहते हैं। ऐसा करते हुए कर्मचेतनाप्रधानपनेके कारण- १. तदुभय= उन दोनों (अर्थात् अर्थ तथा व्यंजन दोनों) २. परिकर-समूहा सामग्री। ३. व्यापृत= रुके; गुथे; लगे; मशगूल) मग्न ।

२५७ - नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन प्रधानत्वादरनिषारिताऽशुभकर्मप्रवृत्त्योऽपि समुपाचशुभकर्मप्रवृत्तयः, सकलक्रियाकाढाडम्बरो- चीर्णदर्शनशानचारित्रक्यपरिणतिरूपा ज्ञानचेतना मनागप्यसंभावयन्तः, प्रभूतपुण्यभारमन्थरित- चित्तवृत्तयः, सुरलोकादिक्लेशप्राप्तिपरम्परया सुचिरं संसारसागरे भ्रमन्तीति । उक्तं च- "चरणकरणप्पहाणा ससमयपरमत्थमुक्कवावारा । चरणकरणस्स सारं गिच्छयसुद्धं ण जाणंति ॥" यद्यपि अशुभकर्मप्रवृत्तिका उन्होंने अत्यन्त निवारण किया है तथापि-शुभकर्मप्रवृत्तिको जिन्होंने वरावर ग्रहण किया है ऐसे वे, सकल क्रियाकाण्डके आडम्बरसे पार उतरी हुई दर्शनज्ञानचारित्रकी ऐक्यपरिणतिरूप ज्ञानचेतनाको किंचित् भी उत्पन्न न करते हुए, बहुत पुण्यके भारसे 'मंथर हुई चित्तवृत्तिवाले वर्तते हुए, देवलोकादिके क्लेशकी प्राप्तिकी परम्परा द्वारा अत्यन्त दीर्घकाल तक संसारसोगरमें भ्रमण करते हैं । कहा भी है कि-चरणकरणप्पहाणा ससमयपरमत्थमुक्कवावारा। चरणकरणस्स सारं पिच्छयसुद्धण जाणंति ॥ [ अर्थात् जो चरणपरिणामप्रधान हैं और स्वसमयरूप परमार्थमें व्यापाररहित हैं, वे चरणपरिणामका सार जो निश्चयशुद्ध (आत्मा) उसे नहीं जानते । ] १. मंथर=मंद; जड़; सुस्त । २. इस गाथाकी संस्कृत छाया इसप्रकार है:-चरणकरणप्रधानाः स्वसमयपरमार्थमुक्तव्यापाराः । चरणकरणस्य सारं निश्चयशुद्ध न जानन्ति ।। ३. श्री जयसेनाचार्यदेवकृत तात्पर्यवृत्ति-टीकामें व्यवहार-एकान्तका निम्नानुसार स्पष्टीकरण किया गया है:- जो जीव विशुद्धज्ञानदर्शनस्वभाववाले शुद्धात्मतत्त्वके सम्यक्षद्धान-ज्ञान-अनुष्ठानरूप निश्चय. मोक्षमार्गसे निरपेक्ष केवलशुभानुष्ठानरूप व्यवहारनयको ही मोक्षमार्ग मानते हैं, वे उसके द्वारा देवलोकादिके क्लेशकी परम्परा प्राप्त करते हुए संसारमें परिभ्रमण करते हैं; किन्तु यदि शुद्धात्मानुभूतिलक्षण निश्चयमोक्षमार्गको माने और निश्चयमोक्षमार्गका अनुष्ठान करनेकी शक्तिके पभावके कारण निश्चयसाधक शुभानुष्ठान करें, तो वे सराग सम्यग्दृष्टि हैं और परम्परासे मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसप्रकार व्यवहार-एकान्तके निराकरणकी मुख्यतासे दो वाक्य कहे गये। [ यहाँ जो 'सराग सम्यग्दृष्टि' जीव कहे उन जीवोंको सम्यग्दर्शन तो यथार्थ ही प्रगट हुना है परन्तु चारित्र-अपेक्षासे उन्हें मुख्यतः रागका अस्तित्व होनेसे 'सराग सम्यग्दृष्टि' कहा है ऐसा पंचास्तिकायसंग्रह. २५८ येऽत्र केवलनिश्चयावलम्बिनः सकलक्रियाकर्मकाण्डाडम्बरविरक्तवुयोऽर्धमीलित- विलोचनपुटाः किमपि स्वबुद्ध्यावलोक्य यथासुखमासते, ते खन्यवधीरितभिन्नसाध्यसाधनभावा मभिन्नसाध्यसाधनभावमलभमाना अन्तराल एव प्रमादकादम्बरीमदभरालसचेतसो मचा इव, [ अब केवलनिश्चयावलम्बी ( अज्ञानी ) जीवोंका प्रवर्तन और उसका फल कहा जाता है :- अब, जो केवलनिश्चयावलम्बी हैं, सकल क्रियाकर्मकाण्डके आडम्बरमें विरक्त बुद्धिवाले वर्तते हुए, आँखोंको अधमुदा रखकर कुछ भी स्वबुद्धिसे अवलोक कर 'यथासुख रहते हैं (अर्थात् स्वमतिकल्पनासे कुछ भी भासकी कल्पना करके इच्छानुसार-जैसे सुख उत्पन्न हो वैसे-रहते हैं ), वे वास्तवमें भिन्नसाध्यसाधन- भावको तिरस्कारते हुए, अभिन्नसाध्यसाधनभावको उपलब्ध न करते हुए, अंतरालमें ही ( -शुभ तथा शुद्धके अतिरिक्त शेष तीसरी अशुभदशामें ही ), प्रमादमदिराके मदसे समझना । और उन्हें जो शुभ अनुष्ठान है वह मात्र उपचारसे ही 'निश्चयसाधक ( -निश्चयके साधनभूत ) कहा गया है ऐसा समझना। ] १. यथासुख=इच्छानुसार; जैसे सुख उत्पन्न हो वैसे, यथेच्छरूपसे। [ जिन्हें द्रव्याथिकनयके (निश्चयनयके ) विषयभूत शुद्धात्मद्रव्यका सम्यक् श्रद्धान या अनुभव नहीं है तथा उसके लिए उत्सुकता चाह या प्रयत्न नहीं है, ऐसा होने पर भी जो निज कल्पनासे अपनेमें किंचित् भास होनेकी कल्पना करके निश्चितरूपसे स्वच्छन्दपूर्वक वर्तते हैं, "ज्ञानी मोक्षमार्गी जीवोंको प्राथमिक दशामें आंशिक शुद्धिके साथ-साथ भूमिकानुसार शुभभाव भी होते हैं"-इस बातकी श्रद्धा नहीं करते, उन्हें यहां केवलनिश्चयावलम्बी कहा है। २. मोक्षमार्गी ज्ञानी जीवोंको सविकल्प प्राथमिक दशामें ( छठवें गुणस्थान तक ) व्यवहारनयकी अपेक्षासे भूमिकानुसार भिन्नसाध्यसाधनभाव होते हैं अर्थात् भूमिकानुसार नव पदार्थों सम्बन्धी, अंग-पूर्व सम्बन्धी और श्रावक-मुनिके आचार सम्बन्धी शुभभाव होते हैं। - यह बात केवल- निश्चयावलम्बी जीव नहीं मानते अर्थात् (प्रांशिक शुद्धिके साथकी) शुभभाववाली प्राथमिक दशाको वे नहीं श्रद्धते और स्वयं अशुभ भावोंमें वर्तते होने पर भी अपनेमें उच्च शुद्ध दशाकी कल्पना करके स्वच्छन्दी, रहते हैं। .

२५६ . - नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन मूछिता इव, सुषुप्ता इव, प्रभूतपतसितोपलपायसासादितसौहित्या इव, समुल्वणवलसञ्जनित- जाडया इव, दारुणमनोभ्रंशविहित मोहा हव, मुद्रितविशिष्टचैतन्या वनस्पतय इव, मौनीन्द्रीं कर्मचेतना पुण्यबन्धभयेनानवलम्बमाना मनासादितपरमनष्कम्यरूपज्ञानचेतनाविश्रान्तयो व्यक्ताव्यक्तप्रमादतन्त्रा परमागतकर्मफलवेतनाप्रधानवृत्त्यो वनस्पतय इव केवलं पापमेव वध्नन्ति । उक्तं च-"णिच्छयमालम्बंता णिच्छयदो णिच्छयं अयाणता। णासंति चरणकरणं बाहरि- चरणालसा केई" ॥ भरे हुए आलसी चित्तवाले वर्तते हुए, मत्त ( उन्मत्त ) जैसे, मूच्छित जैसे, सुषुप्त जैसे, बहुत धी-शक्कर-खीर खाकर तृप्तिको प्राप्त हुए ( -तृप्त हुए ) हों ऐसे, मोटें शरीरके कारण जड़ता (-मंदता, निष्क्रियता ) उत्पन्न हुई हो ऐसे, दारुण बुद्धिभ्रशसे मूढ़ता हो गई हो ऐसे, जिसका विशिष्टचैतन्य मुद गये हैं ऐसी वनस्पति जैसे, मुनीन्द्रकी कर्मचेतनाको 'पुण्यवन्धके भयसे न अवलम्बते हुए और परम नैष्कर्म्यरूप ज्ञानचेतनामें विश्रान्तिको प्राप्त न होते हुए, ( मात्र ) व्यक्त-अव्यक्त प्रमादके आधीन वर्तते हुए, प्राप्त हुए हलके ( निकृष्ट ) कर्मफलकी चेतनाके प्रधानपनेवाली प्रवृत्ति जिसे वर्तती है ऐसी वनस्पतिकी भांति, केवल पापको ही बांधते हैं। कहा भी है कि:- णिच्छय- मालम्बंता णिच्छयदो णिच्छयं अयाणंता । णासंति चरणकरणं बाहरिचरणालसा केई ।। [ अर्थात् निश्चयका अवलम्बन लेनेवाले परन्तु निश्चयसे ( वास्तवमें ) निश्चयको न जाननेवाले कुछ जीव बाह्य चरणमें आलसी वर्तते हुए चरणपरिणामका नाश करते १. केवल निश्चयावलम्बी जीव पुण्यवन्धके भयसे डरकर मंदकषायरूप शुभभाव नहीं करते और पापबन्धके कारणभूत अशुभभावोंका सेवन तो करते रहते हैं। इसप्रकार वे पापबन्ध ही करते हैं। २. इस गाथाकी संस्कृत छाया इसप्रकार है:-निश्चयमालम्बन्तो निश्चयतो निश्चयमजानन्तः । नाशयन्ति चरणकरणं बाह्यचरणालसाः केऽपि ।। ३. श्री जयसेनाचार्यदेवरचित टोकामें ( व्यवहार-एकान्तका स्पष्टीकरण करनेके पश्चात् तुरन्त ही) निश्चय-एकान्तका निम्नानुसार स्पष्टीकरण किया गया है:- और जो केवल निश्चयावलम्बी वर्तते हुए रागादिविकल्परहित परमसमाधिरूप शुद्ध श्वात्माको उपलब्ध न करते होने पर भी, मुनिको ( व्यवहारसे ) आचरनेयोग्य षड्नावश्यकादिरूप २६० पंचास्तिकायसंग्रह । ये तु पुनरपुनर्भवाय नित्यविहितोद्योगमहामागा भगवन्तो निश्चयव्यवहारयोरन्यतरा- नवलम्बनेनात्यन्तमध्यस्थीभूताः शुद्धचैतन्यरूपात्मतत्त्वविश्रान्तिविरचनोन्मुखाः प्रमादोदयानु- [ अव निश्चय-व्यवहार दोनोंका 'सुमेल रहे इसप्रकार भूमिकानुसार प्रवर्तन करनेवाले ज्ञानी जीवोंका प्रवर्तन और उसका फल कहा जाता है:-] परन्तु जो, अपुनर्भवके ( मोक्षके ) लिये नित्य उद्योग करनेवाले 'महाभाग भगवन्तों, निश्चय-व्यवहारमेंसे किसी एकका ही अवलम्बन न लेनेसे ( केवल निश्चया- अनुष्ठानको तथा श्रावकको ( व्यवहारसे ) आचरनेयोग्य दानपूजादिरूप अनुष्ठानको दूपण देते हैं, वे भी उभयभ्रष्ट वर्तते हुए, निश्चयव्यवहार-अनुष्ठानयोग्य अवस्थान्तरको न जानते हुए पापको ही बांधते हैं ( अर्थात् मात्र निश्चय-अनुष्ठानरूप शुद्ध अवस्थासे भिन्न ऐसी जो निश्चय-अनुष्ठान और व्यवहार-अनुष्ठानवाली मिश्र अवस्था उसे न जानते हुए पापको ही बांधते हैं ); परन्तु यदि शुद्धात्मानुष्ठानरूप मोक्षमार्गको और उसके साधक भूत ( व्यवहारसाधनरूप ) व्यवहारमोक्ष- मार्गको मानें, तो भले चारित्रमोहके उदयके कारण शक्तिका अभाव होनेसे शुभ-अनुष्ठान रहित हों तथापि-यद्यपि वे शुद्धात्मभावनासापेक्ष शुभ-अनुष्ठानरत पुरुषों जैसे नहीं हैं तथापि- सराग सम्यक्त्वादि द्वारा व्यवहारसम्यग्दृष्टि हैं और परम्परासे मोक्ष प्राप्त करते हैं। इसप्रकार निश्चय- एकान्तके निराकरणकी मुख्यतासे दो वाक्य कहे गये। [ यहाँ जिन जीवोंको 'व्यवहारसम्यग्दृष्टि' कहा है वे उपचारसे सम्यग्दृष्टि हैं ऐसा नहीं समझना परन्तु वे वास्तवमें सम्यग्दृष्टि हैं ऐसा समझना । उन्हें चारित्र-अपेक्षासे मुख्यतः रागादि विद्यमान होनेसे सराग सम्यक्त्ववाले कह कर 'व्यवहारसम्यग्दृष्टि' कहा है। श्री जयसेनाचार्यदेवने स्वयं ही १५०-१५१ वीं गाथाकी टीकामें कहा है कि-जब यह जीव आगमभाषासे कालादि- लधिरूप और अध्यात्मभाषासे शुद्धात्माभिमुख परिणामरूप स्वसंवेदनज्ञानको प्राप्त करता है तव प्रथम तो वह मिथ्यात्वादि सात प्रकृतियोंके उपशम और क्षयोपशम द्वारा सराग-सम्यग्दृष्टि होता है। ] १. निश्चय-व्यवहारके सुमेलको स्पष्टताके लिये पृष्ठ २५८ की द्वितीय टिप्पणी देखें। २. महाभाग-महा पवित्र; महा गुणवान; महा भाग्यशाली। ३. मोक्षके लिए नित्य उद्यम करनेवाले महापवित्र भगवन्तोंको (-मोक्षमार्गी ज्ञानी जीवोंको) निरन्तर शुद्धद्रव्याथिकनयके विषयभूत शुद्धात्मस्वरूपका सम्यक् अवलम्बन वर्तता होनेसे उन जीवोंको उस मवलम्वनकी तरतमतानुसार सविकल्प दशामें भूमिकानुसार शुद्धपरिणति तथा शुभपरिणतिका यथोचित सुमेल (हठ रहित ) होता है इसलिये वे जीव इस शास्त्र में ( २६४ वें पृष्ट पर) जिन्हें केवलनिश्चयावलम्बी कहा है ऐसे केवलनिश्चयावलम्बी नहीं हैं तथा ( २६० र्वे पृष्ठ पर ) जिन्हें केवलव्यवहारावलम्बी कहा है ऐसे केवलव्यवहारावलम्बी नहीं हैं।

नवपदार्थपूर्वक-मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन
२६१
वृचिनिवर्तिका क्रियाकाण्डपरिणति माहात्म्यानिवारयन्तोऽत्यन्तमुदासीना यथाशक्त्याऽऽत्मान-
मात्मनाऽऽत्मनि संचेतयमाना नित्योपयुक्ता निवसन्ति, ते खलु स्वतत्त्वविश्रान्त्यनुसारेण
क्रमेण कर्माणि संन्यसन्तोऽत्यन्तनिष्प्रमादा नितान्तनिष्कम्पमूर्तयो वनस्पतिभिरुपमीयमाना
अपि दूरनिरस्तकर्म फलानुभूतया कर्मानुभूतिनिरुत्सुकाः केवलज्ञानानुभूतिसमुपजाततात्त्विकानन्द-
निर्भरतरास्तरसा संसारसमुद्रमुचीर्य शब्दब्रह्मफलस्य शास्वतस्य भोक्तारो भवन्तीति ॥१७२।।
मग्गप्पभावणटुपवयणभत्तिप्पचोदिदेण मया।
मणियं पवयणसारं पंचत्थियसंगह सुत्तं ॥ १७३ ॥
वलम्बी या केवलव्यवहारावलम्बी न होनेसे ) अत्यन्त मध्यस्थ वर्तते हुए, शुद्धचैतन्यरूप
आत्मतत्त्वमें विश्रान्तिके 'विरचनकी ओर अभिमुख ( उन्मुख ) वर्तते हुए, प्रमादके
उदयका अनुसरण करती हुई वृत्तिका निवर्तन करनेवाली ( टालनेवाली ) क्रियाकाण्ड-
परिणतिको माहात्म्यमेंसे वारते हुए ( --शुभ क्रियाकाण्डपरिणति हठ रहित सहजरूपसे
भूमिकानुसार वर्तती होने पर भी अंतरंगमें उसे माहात्म्य न देते हुए ), अत्यन्त उदासीन
वर्तते हुए, यथाशक्ति आत्माको आत्मासे प्रात्मामें संचेतते ( अनुभवते ) हुए नित्य-
उपयुक्त रहते हैं, वे (-वे महाभाग भगवन्तों), वास्तवमें स्वतत्त्वमें विश्रान्तिके
अनुसार क्रमशः कर्मका संन्यास करते हुए ( -स्वतत्त्वमें स्थिरता होती जाये तदनुसार
शुभ भावोंको छोड़ते हुए ), अत्यन्त निष्प्रमाद वर्तते हुए, अत्यन्त निष्कंपमूर्ति होनेसे
जिन्हें वनस्पति की उपमा दी जाती है तथापि जिन्होंने कर्मफलानुभूति अत्यन्त निरस्त
( नष्ट ) की है ऐसे, कर्मानुभूतिके प्रति निरुत्सुक वर्तते हुए, केवल ( मात्र )
ज्ञानानुभूतिसे उत्पन्न हुए तात्त्विक आनन्दसे अत्यन्त भरपूर वर्तते हुए, शीघ्र
संसारसमुद्रको पार उतरकर, शब्दब्रह्मके शाश्वत फलके ( -निर्वाणसुखके ) भोक्ता
होते हैं ।१७२।
१. विरचन=विशेषरूपसे रचना; रचना।
में मार्ग-उद्योतार्थ, प्रवचनभक्तिथी प्रेराईने ।
का सर्वप्रवचन-सारभूत पंचास्तिसंग्रह' सूत्रने ॥१७३॥

२६२ पंचास्तिकायसंग्रह . मार्गप्रभावनाथं प्रवचनमक्तिप्रचोदितेन मया । भणितं प्रवचनसारं पञ्चास्तिकसंग्रहं सूत्रम् ॥१७३।। कर्तुः प्रतिज्ञानियू ढिमूचिका समापनेयम् । मार्गो हि परमवैराग्यकरणप्रवणा पारमेश्वरी परमाज्ञा; तस्याः प्रभावनं प्रख्यापनद्वारेण प्रकृष्टपरिणतिद्वारेण वा समुद्योतनम् । तदर्थमेव परमागमानुरागवेगप्रचलितमनसा संक्षेपतः समस्तवस्तुतत्त्वमूचकत्वादतिविस्तृतम्यापि प्रवचनस्य सारभूतं पञ्चास्तिकायसंग्रहामिधानं भगवत्सर्वज्ञोपज्ञत्वात् मूत्रमिदमभिहितं मयेति । गाथा १७३ -- अन्वयार्थ:-[प्रवचनभक्तिप्रचोदितेन मया ] प्रवचनकी भक्तिसे प्रेरित ऐसे मैंने [ मार्गप्रभावनार्थं ] मार्गकी प्रभावनाके हेतु [प्रवचनसारं ] प्रवचनके सारभूत [ पञ्चास्तिकसंग्रहं सूत्रम् ] 'पंचास्तिकायसग्रह' सूत्र [ भणितम् ] कहा । टीका:- यह, कर्ताको प्रतिज्ञाकी पूर्णता सूचित करनेवाली समाप्ति है (अर्थात् यहाँ शास्त्रकर्ता श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव अपनी प्रतिज्ञाकी पूर्णता सूचित करते हुए शास्त्रसमाप्ति करते हैं ) । - मार्ग अर्थात् परम वैराग्य करनेकी ओर ढलती हुई पारमेश्वरी परम आज्ञा (अर्थात् परम वैराग्य करनेकी परमेश्वरकी परम आज्ञा ); उसकी प्रभावना अर्थात् प्रख्यापन द्वारा अथवा प्रकृष्ट परिणति द्वारा उसका समुद्योत करना; [ परम वैराग्य करनेकी जिनभगवानकी परम आज्ञाकी प्रभावना अर्थात् (१) उसकी प्रस्याति- विज्ञापन करने द्वारा अथवा (२) परमवैराग्यमय प्रकृष्ट परिणमन द्वारा, उसका सम्यक् प्रकारसे उद्योत करना; ] उसके हेतु ही (-मार्गकी प्रभावनाके हेतु ही ), परमागमकी ओरके अनुरागके वेगसे जिसका मन अति चलित होता था ऐसे मैंने यह 'पंचास्तिकायसंग्रह' नामका सूत्र कहा-जो कि भगवान सर्वज्ञ द्वारा उपज्ञ होनेसे (-वीतराग सर्वज्ञ जिनभगवानने स्वयं जानकर प्रणीत किया होनेसे ) 'सूत्र' है, और जो संक्षेपसे समस्तवस्तुतत्त्वका ( सर्व वस्तुओंके यथार्थ स्वरूपका ) प्रतिपादन कर्ता नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन मथैवं शास्त्रकारः प्रारब्धस्यान्तमुपगम्यात्यन्तं कृतकृत्यो भूत्वा. . परमनैष्कर्म्यरूपे शुद्धस्वरूपे विश्रान्त इति श्रद्धीयते ॥ १७३ ॥ इति समयन्याख्यायां नवपदार्थपुरस्सरमोक्षमार्गप्रपञ्चवर्णनो द्वितीया श्रुतस्कन्धः समाप्तः ॥ स्वशक्तिसंसूचितवस्तुतत्त्वै- ाख्या कृतेयं समयस्य शब्दैः। स्वरूपगुप्तस्य न किंचिदस्ति कर्तव्यमेवामृतचन्द्रसूरे ॥ ८॥ होनेसे, अति विस्तृत ऐसे भी प्रवचनके सारभूत है (-द्वादशांगरूपसे विस्तीर्ण ऐसे भी जिनप्रवचनके सारभूत है)। इसप्रकार शास्त्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेव ) प्रारम्भ किये हुए कार्यके अन्तको पाकर, अत्यन्त कृतकृत्य होकर, परमनैष्कर्म्यरूप शुद्धस्वरूप, विश्रान्त हुए (परम निष्कर्मपनेरूप शुद्धस्वरूपमें स्थिर हुए )-ऐसे श्रद्ध जाते हैं ( अर्थात् ऐसी हम श्रद्धा करते हैं)।१७३। इसप्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत श्री पंचास्तिकायसंग्रहशास्त्रकी श्रीमदु अमृतचन्द्राचार्यदेवविरचित ) समयव्याख्या नामकी टीकामें नवपदार्थपूर्वक मोक्षमार्गप्रपंचवर्णन नामका द्वितीय श्रुतस्कन्ध समाप्त हुआ। [ अब, 'यह टीका शब्दोंने की है, अमृतचन्द्रसूरिने नहीं' ऐसे अर्थका एक अन्तिम श्लोक कहकर श्री अमृतचन्द्राचार्यदेव टीकाकी पूर्णाहुति करते .. [ श्लोकार्थ:-अपनी शक्तिसे जिन्होंने वस्तुका तत्त्व (-यथार्थ स्वरूप ) भलीभांति कहा है ऐसे शब्दोंने यह समयकी व्याख्या (-अर्थसमयका व्याख्यान अथवा पंचास्तिकायसंग्रहशास्त्रको टीका) की है। स्वरूपगुप्त (-अमूर्तिक ज्ञानमात्र स्वरूपमें गुप्त ) अमृतचन्द्रसूरिका ( उसमें ) किंचित् भी कर्तव्य नहीं है। [८] २६४ पंचास्तिकायसंग्रह इति पश्चास्तिकायसंग्रहामिधानस्य समयस्य व्याख्या समाप्ता । इसप्रकार (श्रीमद्भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यदेवप्रणीत ) श्री पंचास्तिकायसंग्रह नामक समयकी अर्थात् शास्त्रकी ( श्रीमद् अमृतचन्द्राचार्यदेवविरचित समयव्याख्या नामकी ) टीकाके (श्री हिंमतलाल जेठालाल शाह वी. एस. सी. कृत ) गुजराती अनुवादका हिन्दी अनुवाद समाप्त हुआ।

श्री पंचास्तिकायसंग्रहको वर्णानुक्रम गाथासूची गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ स उवओगो खलु दुविहो उवभोज्जमिदिएहि उवसंतखीणमोहो ८२ १३१ मगुरुपलघुगेहि सया मगुरुलहुगा अरणंता अण्णाणादो गाणी अण्णोपणं पविसंता अत्ता कुरणदि सभावं अभिवंदिदूण सिरसा अरसमरूवमगंधं अरहंतसिद्धचेदिय अरहंतसिद्धचेदिय अरहन्तसिद्धसाहुसु अविभसमणण्णत्त अंडेसु पवढंता ८४ १३४ ३१ ६२ १६५ २४१ १६ ६५ १०८ १०५ १६१ १२७ १८६ १६६ २४३ १७१ २४६ १३६ १६७ एको चेव महप्पा एदे कालागासा एदे जीवणिकाया एदे जीवणिकाया एयरसवण्णधं एवमभिगम्म जीवं एवं कत्ता भोत्ता एवं पवयणसारं एवं भावमभावं एवं सदो विणासो एवं सदो विणासो ७१ ११६ १०२ १५५ १२० '१५८ ११२ १७० १ १३. १२३ १८२ ६६ ११४ १०३ १५७ २१ ४४ १६ ३६ १५ ११३ १७१ मा ओ आपासकालजीवा आयासकालपुग्यल आगासं अवगासं आदेसमेत्तमुत्तो पाभिणिसुदोधिमण आसवदि जेण पुण्णं ९७ १४६ १२४ १८४ १२ १४४ ७८ १२४ ४१ ७५ १५७ २२७ मोगाढगाढरिणचिदो ६४ १०७ क इंदसदवंदियाणं इंदियकसायसण्णा १४१ २०३ कम्ममलविप्पमुक्को कम्मस्साभावेण य कम्म कम्म कुव्वदि कम्मं पि सपं कुम्वाद कम्म वेदयमाणो जीवो कम्मारणं फलमक्को कम्मेण विणा उदयं कालो त्ति य ववदेसो कालो परिणामभवो कुव्वं सगं सहावं २८ १५१ ११७ ६३ १०६ ६२ १०४ ६९ ३८ ७१ ६६ १०१ १५४ १०. १५३ ६१ १.३ उ उदयं जह मच्छाणं उदयेण उवसमेण य उद्दसमसयमक्खि उत्पत्ती व विणासो २५ १३५ ५६ ६७ ११६ १७४ २६ पंचास्तिकायसंग्रह . गाथा पृष्ठ केचित्तु अण्णावण्णां कोधो व जदा माणो १३८ २०० गाथा पृष्ठ १०८ १६६ ६७ ११० २२ ४६ १० ९१ १४३ ९८ १५० १०६ १६८ 43 खंघ सयलसमत्थं खंधा य खंधदेसा खीणे पुनरिणबद्ध ७४ ११८ ११६ १७७ पदिमधिगदस्स देहो १२६ १८८ च जीवाजीवा भावा जीवा पुग्गलकाया जीवा पुग्गलकाया जीवा पुग्गलकाया जीवा पुग्गलकाया जीवा पुग्गलकाया जीवा संसारस्था जीवो त्ति हवदि चेदा जीवो सहावरिणयदो जूगागु भीमक्कण जे खलु इदियगेज्मा जेण विजाणदि सव्वं जेसि अस्थि सहामो जेसि जीवसहावो जो खलु संसारत्यो जोगणिमित्तं गहणं जो चरदि गादि पेच्छदि जो परदवम्मि सुह जो सव्वसंगमुक्को जो संवरेण जुत्तो जो संवरेण जुत्तो चरियं चरदि सगं १५६ २२६ १३६ २०१ चरिया पमाद बहुला छ १५५ २२४ ११५ १७३ ६४ १५१ १६३ २३५ १३ ६७ १२८ १८८ १४८ २१४ २६२ २३७ १५६ २२६ १५८ २२८ १४५ २०८ १५३ २२१ क्कापक्कमजुत्ता पण ज नदि हदि यमरणहेदू जदि हवदि दव्वमण्णं जम्हा उवरिट्ठाणं जम्हा कम्मरस फलं जस्स जदा खलु पुण्णं जस्स ण विज्जदि जस्स ण विज्जदि रागो जस्स हिदयेणुमेत्तं जह पउमरायरयणं जह पुग्पलदव्वाणं जह हवदि धम्मदवं जं सुहमसुहमुदिण्णं जाणदि पस्सदि सव्वं जादो अलोगलोयो जादो सयं च चेदा जायदि जीवस्सेवं नीवसहावं गाणं जीवा अणाइरिगहणा १४ १४६ ८२ १३ १४५ १३३ १६४ १४३ २०५ १४६ २१० १४२ २०४ १६७ २४४ ३३ . ६४ ६६ १०६ ५६. १३० १४७ २१३ १२२ १८० ८७ १३७ २६ . ५६ १३० १८८ १५४ २२२ ६८ २६ १८ १३६ ४३ ५१ १२१ १७६ -- ण कुदोचि वि उप्पण्णो पत्थि चिरं वा खिप्प ण य पच्छदि धम्मत्थी ण वियप्पदिणाणादो ण हि ईदियाणि जीवा ण हि सो समवायादो णाणं धणं च कुव्व दि रगाणावरणादीया भावा रणाणी णाणं च सदा रिगच्चो णाणवकासो ४६ . २० ४१ १२८ पाथासूची. २६७ गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ १६१ २३४ १६ पिच्छयाणयेण भरिणदो गरइयतिरियमणुमा ३० पाणेहिं चदुहिं जीवदि पुढवी व उदगमगणी ११० १६६ त ब ६८ ११३ वादरसुहुमगदाणं ७६ १२१ भ तम्हा कम्मं कत्ता तम्हा घम्माधम्मा तम्हा रिणबुदिकामो तम्हा रिणवुदिकामो ति स्थावरतणुजोया तिसिदं बुभुक्खिदं ते चेव मत्यिकाया १६६ २४६ १७२ २५० १११ १७० १३७ १६४ भावस्स पत्थि णासो भावा जोवादीया भावो कम्मरिणमित्तो भावोजदिकम्मकदो ३४ १६ ३६ ६० १०२ ५६ १०१ ur म द ६ मगप्पभावणटुं मणुसत्तणेण गट्ठो मुरिणऊण एतद? मुत्तो फासदि मुत्त मोहो रायो दोसो १७३ २६१ १७ ३७ १०४ १५६ १३४ १३ १३१ १६१ दवियदि गच्छदि दव्वं सल्लक्खायं दव्वरण विणा रण गुणा दसणणाणचरित्तारिण दसणणाणसमग्गं दसणणाणाणि तहा दसणमवि चक्खुजुद देवा चउणिकाया १० २६ ३१ १६४ २४० १५२ २१६ १२ ६१ ४२ ७३ रागो जस्स पसत्थो १३५ १६६ व ११८ १७५ ध २४ . ५५ वण्णरसपन्धफासा ववगदपरणवण्णरसो ववदेसा संठारणा विज्जदि जेसि गमरणं धम्मत्थिकायमरसं धम्मादीसद्दहणं धम्माघम्मागासा धरिदु जस्स ण सक्कं ८३ १३३ १६० २३२ १६ १४७ १६८ २४५ ८९ १४१ स १४० २.२ प सण्णाओ य तिलेस्सा सत्ता सव्वपयत्था सद्दो खंघप्पभवो सपयत्थं तित्थयरं पज्जयविजुदं दवं पठिढिदिअणुभाग १२ ३० ७३ ११७ २० ७६ १२६ १७० २४८ २६८ पंचास्तिकायसंग्रह गाथा पृष्ठ गाथा पृष्ठ १३ ४७ ५० २ ७ . ५० संठारगा संघादा संवुक्कमादुवाहा संवरजोगेहि जुदो सिय अस्थि रणतिय उदयं सुरणरणारयतिरिया सुहदुक्खजागरणा वा सुहपरिणामो पुग्णं सो चेव जादि मरणं सम्भावसभावाणं समओ णिमिसो कट्ठा समणमृहुंग्गदमट्ठ समवत्ती समवानो समवाओपंचण्हं सम्मत्तणारगजुत्त सम्मत्त सद्दहणं सव्वत्थ अस्थि जीवो सवे खलु कम्मफलं सव्वेसि खंधाणं सव्वेसि जीवाणं सस्सदमघ उच्छेदं १२६ १८६ ११४ १७२ १४४ २०७ ३२ ११७ १७४ १२५ १८४ १३२ १६२ ३ १०६ १६२ १०७ १६३ ३४ ६६ ३६ १८ ho ७७ १२३ ६. १४२ हेदुमभावे रिणयमा हेदू चदुन्वियप्पो १५० २१७ १४६ २१५ ३ .. XXX

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Shreepanchastikay Sangrah

Author
Jain, Maganlal
Title
Shreepanchastikay Sangrah
File name
Shreepanchastikay Sangrah
Text
OCR done
Citation
1975
Published
2009/11
Publisher
Madanlganj, Nemichand Panchulal Jain
Language
Sanskrit
Pages
306
Library
Sanmati Library
DLI number
322297
Barcode
99999990248872.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
taslFVq9rnb
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