Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Ath Vivah Paddhatti

Sharma,dayalu · 2012/08

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महनम्बर १६८।२४ १६१२३४ ११॥२८॥३२॥ ४१९०१२०१२३३१३३ १६ १२१९३३९४१२४१३१ ३५।९।१६।१७।१५ मकराणा ७.२११३० नोट हमने स्वदेशानुसार दिया है, विद्वान्लोग बाधा विचार करके मंडल वेदी ज्यादि तुसार बना लेंगे- निवेद. पं.दयालुचंद्रशी काष्टपाल लैया जिला मुजफरगढ़ जुन्कार प्रसताहै।

३ भूमिका श्रीमदानन्दकन्दप्रजचन्द्र श्रीकृष्णचन्द्र जीफे चरणकमलों में नमस्कार के मनंतर कोटिशः उनका धन्यवाद किया जाता है कि जिनकी असीम कृपासे मेरासंकल्पित मनोरथ बहुत दिनोंके अनंतर धाम पूराहुमा सनो मनोरथ था, कि एक ऐसा पुस्तक लिखा जाये जिससे अपनी योग्यताके अनुसार विद्वान्भी कार्यकरासके साधारण भी प्रतः मापामें रीति लिखी गई हैं यद्यपि बहुतसो पदवियें छपी हैं तथापि उनमें हमारे देशके अनुसारिणी रीति नहाने से उनका साधारण ब्राह्मण नहा लेते थे भोर जहां कहीं पूछते थे तो पही कि हमारे देश की रीतीवाली काई पद्धति छपनाव तो अच्छा है कि जैसे वैम करके पुस्तक छपवाद तो अच्छा होगा जिससे लेने वालों का मन्य योटा लगे भोर उपकार बहुत हो विशेषता इस पुस्तक में यह है कि शास्त्रीय पद्धति विधान को नहीं छोड़ा गया बल्कि उनको मुगम रीती से लिखागया है शेष रहा ग्रह पूजन उसको साधारण लिखा गया है क्युंकि १पूजन पर श्रद्धा लोगों की नहीं रही दूसरा जो करते हैं तो भी संक्षेपको पसद करते हैं इसलिये ग्रह पूजन साधारण लिखा गया है साधारण माह्मण देवताओं से प्रार्थना है कि विद्वान् वा भपनी बुद्धि से कार्य करा देंगे परतु भाप लोगां क वास्ते ही भापा रीवि लिखी गई है भाप सावधानी से यज मानों क गुरमें सस्कार फरावें ताकि यजमान का फल्याण हो और आपका यशो यदि भाप लोंगोने मेम दिखाया वो ऐसे स्वदेशानुसारि सर्वकमे कांट की पदवि मकाशित करांऊगा सब से विशेष सूचना यह है कि इसपुस्तक में वैदिक पत्रों पर स्वरांक नही लगाए गये मोर अनुस्वार के वर्गावर पर होने से वर्गात पणे नहीं किया गया क्युकि साधारण पुरुषां को भ्रम हो माता इस लिये में विद जनों से क्षमा मापी है कि इसक्षतिपर दृष्टि न दवे हुए इस पुस्तक को सादर लेकर मेरे मयत्र का सफल करेंगे और साथ हो यह मार्थना करता हूं कि जो भी इस पुस्तक में अटि रहगई हावो उनको आधार कर मुझे चित करेंगे जिससे दूसरे सस्करण में उनका संशोधन किया जायेगा और उनका नाम धन्यवाद सहित मकाधित किया भारंगा अपनी तर्फसे तो शुद्धिपत्र भी लिख दिया है फिर भी कहीं यंत्र, वा, लेख की मटि रह गई होतो क्षमा करना अलमनन्प लेखेन पीमत्स्तु आपका शुभचिंतक लेखक पं० दयालु चंदशर्मा काठपाल ज्योतिषी मुकाम लैया, निखा सबफर गा पंमार + (२) अथ विवाह पद्धति सामग्री गुड, भाटा, चावल, केपर मुवा, सतरं। ईवीर, कुँगु चिमकणा,सावारंग पीग, नीला रंग पीठा, रंग पीला पा हलदी, पीठो, सिंदूर, गोरी सरसों, चंदन चिटे दा पूरा, धूप ज्वाला,मौली, सुपारियां २५, ५ लाचियांनिक्या, परला, नरेल, फूल, घृत कपाह, तेल मिग वा घृत दीपक वास्ते, मांह, दधि, पाखी, विछड़े, दीकाठी,पत्र अय,पत्र यट,पत्र पिप्पज,पर आंवला, पत्र तुलसी,रामीपत्र जंडी,कुशा,बहनो, विल, ३ कतश २ बड़े १ छोटा, पूर्णपात्र ६वा ४ वा २ वा १, वस्त्र पूर्णपात्रा दे, मलमल १२ हाय, छाणे द्रियाई पीली १, अन्न सताना, गोहा, • चौकियां, चौकी प्रहां वास्ते, सूहा, काने वा दोगा ८, रेत नदो दी, दीपक, राम फटोरियां १०, शमी काट, यंत्र काट, छजली कागन वा रूसणी ही, सुवा, फलियां, चापले वान्या, शंख, सीहणी दा धागा, चावल पूर्ण पात्रा वास्ते, मेवा, खट, टके मेल पे गुयली, सुवर्ण शलाका १ मा., कटोरे कुटदे ५ वा ४ वा २, इल, पंजाली, सीर, वोशा ४ सेर, पूजा और नांदी मुख वास्ते, गंगा जल, वीच्यादा गोग, (माचिस), वस्तु चुंग वास्ते गुह, भाटा, चावल, लालदी दा गंदा, मुद, मौली, गोरी सरों, पोन्या, दले लोह दे ६, दक्षिणा, दाणे पूजदे, स्वकुला नुसार, रतीजु फार, फूली भट्टा पाती पूजा पाली, गोहा, पोल्यां, दीपक ४ मुखा, रसी लुकार. रसा, दक्षिणा । नाही ॥ याली पूजनको , फुल, दीपक, धूप, दक्षिणा- ॥.यही नवग्रही नांदीमुख के स्थान में हैं । देवां धामणी की वस्तु अपने २ कुला नुसार जाननी ॥ तेल नहीं। पूजा की थाली लसी १ गुड़ फुल तीन्या ७,परन माता दे वरदे समनां वाले भाडेमिट्टी दे कुंभारदे वेल भुंआता जबढोक वेले तथा दिरदे शकुनांदी सामिग्री लोग, लाया, सेजदामेवा, ११ शीशा,शाखदा, फजल, मुसाग,एलसी, खाख, फनारी, कंघी, गादणे, सगनाद, वलपत्रे,(लूण, दिल) त्रिपट, कपडे, सगना, परफन्यादे, .

SN
सामिग्री द्वितीय विवाहदी
कुनाली, छूणी, १०८दियाचा, १०८वटी, तेलमिठा,
चुन्नीवि वचडावे, चोचललुहाडविचउवाले, खंड, खीर, पहाजहीचांदीदी,
वर, त्रिमवावा, पागामौलीदा, कही, शृंगारदीपदी, गारणे, चालियां,
फंडण, नय, मणवर, मुद्रो, चले, कनारी, मुसाग, एलसी, कंघो, मुरमेदाणी,
पुरम, शीशा, दरली, माघदी, कज्जल ।
अथ गज दंत (चूडा) संकल्पः
डोमवेत्यादि० अमुकगोत्राममुकनानी मिमां कन्या
मलकर्तु काम कुलाचार रीतिज्ञातिवर्णलक्षितानिइमानिगजदंत
विनिर्मितवलयानिविश्वकर्मदेवतानि अमुकनाम्-यै कन्याय
श्री लक्ष्मीनारायण प्रीतयेदातुमहमुत्सृजे
दक्षिणा
जोमद्यततद्गजदत विनिर्मितवलयदान प्रतिष्ठार्थमिदं
दक्षिणाद्रव्यं श्रीलक्ष्मीनारायण प्रीतयेमुकनायकन्यायै
दातुमहमुत्सृजे कृतैतत्कर्मणा श्रीलक्ष्मीनारायणयोः प्रीतिरस्तु
पर बधू के वस्त्रों की प्रतिष्ठा कर के उनकोवन पहिनाकर दोनों के
सजे पलों में पुष्प अक्षत फल दक्षिणा रख कर प्रतिष्ठा करावे पनो पली
बांधे देखो पृष्ट ३७ पर संकल्प है।
चौकियों के नीचे दक्षिणा धारण करे
अथासन प्रतिष्ठा
अोमवेत्यादि. अमुकशर्मणो विवाहादो ववधोरा
सनप्रतिष्ठा शुभाभवतु।
:

वर उपानत (जोडा) उतारे। मंत्र॥ थों अग्नौहवो देवाघृतकुंभ प्रदेशायां चक्रुस्ततोवराहः संबभूवतस्मा दराहोगाव-संजानते तत्पशूनामेवैतदिशे प्रति छति तस्मादराह्या उपानहा उपमुंबते। वर वधू कुलगरु का स्मण फरके दक्षिण पाद क्रम से चौकी पर बैठे। पदि विवाह से पूर्व नांदीमुखबाद न कियां ऐ तो गणेशपूजन के भनंतर पकान दक्षिणा संयुक्त १२ वा ४ भोजन संकल्प करे- ब्राह्मण भोजन ३ वा १ ब्राह्मण भोजन पर पिता संकल्प करे श्रोमोत्यादि० अमुकशर्मणो विवाह कर्मणि विवाहाद्य गत्वेनकर्तव्यनांदीमुखाभ्युदयिकश्राद्धे अमुकगोत्राणां मातृपि- तामही प्रपितामहीनाम मुकदेवीनां अमुकगोत्राणां पितृपिता. मह प्रपितामहानाममुकशर्मणां अमुकगोत्राणां सपत्नीक मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमातामहानाम मुकशर्मणां याभ्युद- यिकश्राद्ध संबंधिनो विश्वेदेवा एतत्पकानंसदक्षिणवानमः पुनः ९ वा ३ ब्राह्मण भोजन संकल्प करे योमद्येत्यादि. अमुकशर्मणो विवाह कर्मणि विवा- हायगवनकर्तव्यनादीमुखाभ्युदयिकश्राद्धे मातृपितामही प्रपि. तामहीनाम मुकदेशीनां तथा च पितृपितामह प्रपितामहानां अमुकशमणां तथाच सपत्नीक मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमा- तामहानाम मुकशर्मणां प्रीत्यर्थ मिदंपकानं सदक्षिणं यथा संभवं वः स्वधा-इति-

चिमाज
S...
gand
LIBRARY
बापाला
पं० दयालुचन्द्र शर्मा ज्योतिषी
जन्म संवत् १९३८ ज्येष्ठ
चिरतीय केवल कृष्ण शर्मा ज्योतिषी
अन्म संवत् १९७७ पौष।

श्री गणेशायनमः अथ विवाह पद्धतिः घृत वा तिल तेल से रक्षा दीपक जगावे पुष्पाक्षत दक्षिणा पलोंमें रखें स्वकुलगुरु का ध्यान करें।। पढ़ें। चिन्तासन्तानहतारो यत्पादांबुजरेणवः।। स्वीयानांतान्निजाचार्यान् प्रणमामि मुहुर्मुहुः॥१॥ यदनुग्रहतोजन्तुः सर्वदुःखातिगोभवेत् ॥ तमहं- सर्वदावन्दे श्रीमहल्लभनन्दनम् ॥२॥ यदुक्तंतात- चरणः श्रीकृष्णःशरणंमम ॥ तत एवास्तिमचित्त- मैहिकेपारलौकिके॥३॥ ममचित्तस्यविश्वासः श्री- गोपीजनवल्लभे॥ यदातदाकृतार्थोहंशोचनीयोन- कहिचित्॥४॥ श्रीलाल जी कोजगज्जीवोभाक्ति- मार्गप्रदर्शकः॥जीवोद्धारायलोकेऽस्मिन्नाविरासी- स्वयंहरिः॥६॥ श्री लालकृपाल जगतविषे भृत की सदा सहाय कष्ट पडे सावधान जो सुमरे तत् क्षण आय॥६॥देश विदेश जल थल विषेजो नर हितचित्त ध्याय॥ मथुरा पति गुसाई श्री लाल जीमनवांच्छित फल पाय ॥७॥ सेवकतारे सिंधु में लीने राख जहाज ॥ दूलह श्री गोपीनाथ जी 1

विवाह पद्धति
करो अचिंत के काज॥ केवल अपने दास की
तऊ महाराजकोलाज॥८॥लाभस्तेषां जयस्तेषां
कुतस्तेषां पराजयः। येपामिंदीवरश्यामो हृदयस्थो
जनार्दनः॥९॥ मंगलं भगवान विष्णुमंगलं गरुड-
ध्वजः॥मंगलंपुंडरीकाक्षों मंगलाय तनोहरिः॥१०॥
ब्राह्मणों का पूजन करके प्रार्थना करे
ओं ब्राह्मणाः संतु मेशस्ताः पापात्पांतुसमा-
"हिताः॥ देवानांचैवदातारस्त्रातारः सर्वदेहिनाम्
॥१॥जपयज्ञैस्तयाहोमैर्दानैश्च विविधैः पुनः ॥
तुष्टास्तृप्तिं प्रयच्छति पितरस्त्रिदिवेश्वराः॥२॥
येपांदेहेस्थितादेवाः पावयंतिजगत्त्रयम् ॥ तेमां
रक्षतु सततं विवाहेऽस्मिन् व्यवस्थिताः ॥३॥
समस्तसंपत्समवाप्तिहेतवः समुत्थितापत्कुलधूम्र-
केतवः॥ अपार संसार समुद्र सेतवः पुनंतु मां
ब्राह्मण पादपांसवः ॥४॥ आपद्घनध्वांत सहस्र-
भानवः समीहितार्थार्पण कामधेनवः ॥ समस्त-
तीर्यावु पवित्रमूर्तयोरक्षतु मां ब्राह्मणपादपांसवः
॥५॥विप्रोघदर्शनात्क्षिग्रंक्षीयं तेपापराशयः॥वंद-
नान्मंगलावाप्तिरर्चनादच्युतंपदम् ॥६॥ आधि-
व्याधिहरन्नृणां मृत्युदारिद्र्यनाशनम् ॥श्रीपुष्टि-
कीर्तिदेवंदे विप्र श्री पादपंकजम् ॥७॥

HT BHAR PRERY. विवाह पद्धति अर्थ संपूजिता ब्राह्मणाः गौरसर्पपं सर्वतो विकार्य अक्षतानादोयम्। स्वस्ति वाचन मधुर स्वरेण कुर्युः ॥ अथ स्वस्ति वाचनम् वर और कन्या का पिता वर पिता और ब्राह्मण अक्षत (चावल) हाथ में लें ब्राह्मण स्वस्ति वाचन करें हरिः औ स्वस्ति नइन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्वेवेदाः स्वस्ति नस्ताक्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु ॥१॥ ओं पयः पृथिव्यां पयोषधीषुपयो दिव्यन्तरिक्षेपयोधाः ॥ पय- स्वतीः प्रदिशः सन्तुमह्यम् ॥२॥ ओं विष्णोर राटमसि विष्णोः श्नप्त्रस्थो विष्णोःस्यूरसि विष्णोध्रुवोसि वैष्णवमसिविष्णवेत्वा ॥३॥ ओं अग्निर्देवता वातोदेवता सूर्योदेवता चन्द्रमादेवता वसवोदेवता रुद्रादेवतादित्यादेवता मरुतो- देवता विश्वेदेवादेवता वृहस्पतिर्देवतेन्द्रोदेवता वरुणोदेवता॥४॥ ओं द्यौः शान्ति रन्तरिक्ष ७ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्ति रोषधयः शान्तिर्वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्ति रेखशान्तिः सामाशान्ति रेधिसुशान्तिर्भवतु॥५॥ओं विश्वा- .

विवाह पद्धतिः निदेव सवितर्दुरितानि परासुव यद्भद्रंतन्न- आसुव॥६॥ इमारुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्दीराय प्रभरामहेमतीः यथा शमसहिपदे चतुष्पदे विश्व पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम् ॥७॥ एतन्ते देव सवितुर्यज्ञप्राहुर्वृहस्पतये ब्रह्मणे । तेनयज्ञमवतेन यज्ञपतितेनमामव ॥८॥ मनोजूतिर्जुपतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्ठं यज्ञ ७ समिमं- दधातु विश्वेदेवास इह मादयंतामों प्रतिष्ठ एपवैप्रतिष्ठानामयज्ञो यत्रैतेनयज्ञेन यजन्तेसर्वमेव प्रतिष्ठितंभवति ॥९॥ कन्या पिता सगुल्पकर्यात कन्या का पिता गन्धाक्षत पुष्प जल लेकर प्रतिज्ञा डों तत्सदुब्रह्मणोन्हिहितीयपराढे श्री श्वेत- वाराहकल्पे जम्बुद्दीपे भारतखण्डे आर्यावर्ते कदेशान्तरगत कुमारिका नाम क्षेत्रे कलियुगे कलियुग प्रथमचरणे*ऽमुकसंवत्सरे, ऽमुकमासे, ऽमुकपक्षे, ऽमुकतिथी, ऽमुकवासरे, यथायोग- करण मुहूर्ते प्रवर्तमानेऽद्यतनदिने श्रुतिस्मृति- पुराणोक्तफलं प्राप्त्यै धर्मार्थ काममोक्ष वर्गचतुष्ट- पर्व अमुक के स्थान पर पर्नपान संवत् मास आदि को नाप लेना। सङ्कल्प करे।

विवाह पद्धतिः यसिध्यर्थे यथाचित्तहर्ष कन्यादान सांगता सिध्यर्थेच यथासंभवं श्रीगणेशादि पूजनं अमुक शर्माहं करिष्ये ॥ अथ वर कर्तृकः प्रतिज्ञा सं० यदि वर स्वयं पूजन करना हो तो संकल्प करे ओं मद्येत्यादिऽमुकसम्वत्सरेऽमुक पक्षे ऽमुक- तिथौ ऽमुकवासरे ऽमुकगोत्रस्याऽमुकशर्मणो मम विवाह कालीनलग्नतो निष्टस्थानस्थित सूर्यादि ग्रह दोषजन्य जनितजनिष्यमाणात्मक दोपत्रय- भिरास पूर्वक स्वकीय सुख सन्तान धनधान्या- धमिद्धि हेतवे श्रीगणेशादीनां यथा संभव पूजन ममुकगोत्रो ऽमुकशाहं करिष्ये।। वरपितृकर्तृक प्रतिज्ञा सं० यदि वर के पिताने पूजन करना हो तो पिता संकल्प करे यदि वर का पिता न हो तो ज्येष्ट भ्राता चाचा आदि अपना सम्न्धी पूजन करे ओं अद्येत्यादि० अमुक शर्मणोमत पुत्रस्य विवाह विधौनिखिलविघ्न दोपनिरासपूर्वक सुख सन्तान धनधान्याद्यमिद्धि हेतुक श्रीगणेशादि पूजनममुकगोत्रो ऽमुकनवरो ऽमुकशर्माहं करिष्ये विवाह पद्धति अथ श्रीगणपति पूजनम् पूजक चावल हाथ में लेकर श्रीगणेश का ध्यान करे। विनायकं महत्पुण्यं सर्वदेव नमस्कृतम् ॥ अविघ्नं सर्वकार्येषु विनायकमायाम्यहम् ॥१॥ अथातःसंप्रवक्ष्यामि गणेशयागमुत्तमम् ॥आदौ- गणपतिःपूज्यः सर्वकामफलप्रदः।।२।। येन पूजित मात्रेण सर्वविघ्नः प्रणश्यति ॥ एक दंतोत्कटोदेवो गजवक्रस्त्रि लोचनः॥३॥ नागयज्ञोपवीत स्तुतस्मै गणपतये नमः॥प्रणम्यशिरसा देवंगौरीपुत्रं विना- यकम् ॥४॥ भक्त्याच संस्तुवेन्नित्यमात्म कामा- थसिद्धये ॥ओं गणानांत्वा गणपतिण्हवामहे। प्रियाणांत्वा प्रियपति हवामहे । निधीनांत्वा निधिपति हवामहे वसोमम ।आहमजानिगर्भ- धमा त्वमजासिगर्भधम्॥६॥ओं नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्चवो नमो नमोबातेभ्यो व्रातपतिभ्य श्ववो नमो नमो गृत्सेभ्यो गृत्सपतिभ्यश्चवो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्चवो नमः॥६॥ गणेश्वरं विघ्न विनाशनं चलम्बोदरंमोदकवल्लभंच ॥ सुरासुरैर्वदितपूजितं च गणेश्वरं शरणमहं प्रप- द्ये ॥७॥ ओं सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गज- कर्णकः॥लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः विवाह पद्धतिः ॥८॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः॥ द्वादशैतानिनामानि यः पठेच्छणुयादपि।।९॥ विद्यारंभे विवाहेच प्रवेशेनिर्गमेतथा।। संग्रामे संक- टेचैव विघ्नस्तस्यनजायते ॥ १०॥ श्रीमन्महा- गणाधिपतयेनमः भगवन् गणाधिपते इहागच्छ इहातिष्ठ यावत पूजां करोमि तावत् सन्निहि- तोमव पाद्यं अयं आचमनीयं स्नानं समर्पयामि पुनराचनीयं समर्पयामि वस्त्रं (मांगलिक सूत्र)सम- र्पयामि गंध मालेपयामि । पुष्पाणि समर्पयामि। अक्षतान समर्पयामि। धूप माघ्रापयामि । दीपं दर्शयामि । नैवेद्यं निवेदयामि । पुनराचमनीयं. समर्पयामि । मुखशुध्यर्थं पूगीफलं एलापत्रं सम- र्पयामि। पूजासाफल्यार्थे दक्षिणाद्रव्यं समर्पयामि। नमस्कारं करोमि प्रार्थयामि ॥ * ओं वक्रतुण्ड महाकाय कोटिसूर्य समप्रम। अविघ्नं कुरुमेदेव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥ १॥देहिमे * सर्वत्र पोडशोपचार पूजाक्रमः १ पाच २ अर्घ ३ आचमन ४ तान ५ पुनरागमनीय ६ वख ७ गन्ध ८ पुष्प ९ अक्षत १० धूप ११ दीप १२ नैवेद्य १३ पुनराचमनीय १४ पूगीफल १५ दक्षिणा १६ नमस्कार इस तरह सर्व ग्रहो में १६ उपचार पूजन जानना और अन्त में नमस्कार करना जल्दी करना होतो पाद्यं अर्घ आचमनीय स्नानं पुनराव० वस्त्रं गं अक्षतान् पुष्प धूप दीपं नैवेद्यं पूगीफलं दक्षिणां समर्पयामि नमस्कार करोमि ८ विवाह पद्धतिः ऋद्धिसौभाग्यं देहिमे धनसंपदाम् । इच्छासद्धिं कुरुमेदेव दयादीनं गणेश्वर ॥२॥ भगवन् गण- पते अनयायथासंभवया पूजया पूजितस्त्वं ममो- परिकृषांकुरुरक्षांकुरुतेनमः इतिगणपतिपूजनम।। यदि नांदी मुखीयान्न संकल्प करना होतो करे- अथग्रहाणामावाहनम् कन्या का पिता और वर पतीय पूजन करने वाला वाम हाथ पर चावल लेकर अपने भागे चौकोण में वा ग्रह मण्डल में एक एक चावल प्रति श्लोकरखे ग्रहों का मावाहन करें। विनायकं महत्पुण्यं सर्वदेवनमस्कृतम् । अविघ्नं सर्वकार्येषु विनायक माह्वयाम्यहम् ॥ १॥आवा- हयेद्रुतं नागफणिशत समन्वितम् ॥ आगच्छो रंगराजत्वक्षेत्रे स्मिन्सन्निधौभव ॥२॥ आवाह- याम्यहंदेवी तिश्च लोकमातृकाः। गौर्यादिकाः पोडशकाः कुलदेवी समन्विताः॥३॥ दिवाकर सहस्राक्षं ब्रह्माचैरमरैःस्तुतम् ॥ लोकनाथं जगच्च- तुः सूर्यमावाहयाम्यहम् ॥ ४॥ हिमरश्मिन्निशा- नाथं तारापत्य मृतोद्भवम् ॥ ओपधीनांच राजा नंसोममावाह० ॥५॥ धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्तेजः समप्रभम् ॥ कुमारं शक्तिहस्तंच भौम मावा० ॥ ६ ॥ बुधं बुद्धि प्रदातारं सोमवं- . 5 विवाद पद्धतिः- शविवर्धनम् ॥ यजमान हितार्थाय बुध मावा. ॥७॥ बुद्धिश्रेष्ठांगिरःपुत्रंदेवानांच पुरोहितम् ॥ शक्रस्यमन्त्रिणन्नित्यं गुरुमावा० ॥८॥ प्रविष्ठं- जठरेशम्भोर्निष्क्रान्तं पुनरक्षतम् ।। पुरोहितंच; दैत्यानांशुक्रमावा० ।। १० ।। प्रदीप्तवन्हिवर्णाभं; भिन्नाञ्जनसमप्रभम् ॥ छायामार्तडसम्भूतं शनि मावा० ॥११॥ चक्रेणछिन्नमूर्धानं विष्णुनाभिनि:- रीक्षितम् ॥ मैहिकेयं महाकायं राहुमावा०॥१२॥ . ब्रह्मणःकुलसंभृतं दृष्टलोकभयावहम् ॥ शिखिन तुमहात्मानं केतुमावा० ॥१३॥ ब्रह्माणंशिरसा, नित्यमष्टनेत्रं चतुर्मुखम् ॥गायत्री सहितदेवं ब्रह्म आवा० ॥१४॥ केशवं पुंडरीकाक्षं माधवं मधुसूद- नम् ॥ रुक्मिणी सहितं देवं विष्णुमावा० ॥१५॥ शिवंशङ्करमीशानंहादशार्धाधलोचनम् ॥ उमया, सहितं देवं शम्भुमावा० ॥१६॥ रत्नसागरसम्भू- तांशरीरे विष्णुनाश्रिताम् ॥ यजमान हितार्थाय लक्ष्मीमावा० ॥१७॥ सर्वसौख्यप्रदां नित्यं वीणा पुस्तकधारिणीम् ॥ मातरंसर्वलोकानां वाणी मावा० ॥१८॥ हिमपर्वत सम्भूतांशरीरे शम्भु नाश्रिताम् ॥ यजमान हितार्थाय उमा मावा॥ ११॥ ऐरावतसमारूढं वनहस्तमहाबलम्।। प्रा-- .

८ विवाह पद्धति ऋद्धिसौभाग्यं देहिमे धनसंपदाम् । इच्छासिद्धिं कुरुमेदेव दयादीनं गणेश्वर ॥२॥ भगवनं गण- पते अनयायथा संभवया पूजया पूजितस्त्वं ममो. परिकृपांकुरुरक्षांकुरुतेनमःइतिगणपतिपूजनम॥ यदि नांदी मुखीयान संकल्प करना होतो करे- अथग्रहाणामावाहनम् कन्या का पिता और वर पतीय पूजन करने वाला वाम हाथ पर चावल लेकर अपने आगे चौकोण में वा प्रह मण्डल में एक एक चावल प्रति श्लोकरखे ग्रहों का आवाहन करें। विनायकं महत्पुण्यं सर्वदेवनमस्कृतम् । अविघ्नं सर्वकार्येषु विनायक माह्वयाम्यहम् ॥१॥आवा- हयेद्रुतं नागफणिशत समन्वितम् ॥ आगच्छो रंगराजत्वक्षेत्रे स्मिन्सन्निधौभव ॥२॥ आवाह- याम्यहंदेवी तिश्च लोकमातृकाः। गौर्यादिकाः पोडशकाः कुलदेवी समन्विताः॥३॥ दिवाकर सहस्राक्षं ब्रह्माद्यैरमरैःस्तुतम् ॥ लोकनाथं जगच्च- तुः सूर्यमावाहयाम्यहम् ॥ ४॥ हिमरश्मिन्निशा- नाथं तारापत्य मृतोद्भवम् ॥ ओपधीनांच राजा नंसोममावाह० ॥६॥ धरणीगर्भसंभूतं विद्युत्तेजः समप्रभम्॥ कुमारं शक्तिहस्तंच भौम मावा० ॥ ६ ॥ बुधं बुद्धि प्रदातारं सोमवं- विवाह पद्धति शविवर्धनम् ॥ यजमान हितार्थाय वुध मावा. ॥७॥ बुद्धिश्रेष्ठांगिरःपुत्रदेवानांच पुरोहितम् ॥ शक्रस्यमन्त्रिणन्नित्यं गुरुमावा० ॥८॥ प्रविष्ठं- जठरेशम्भोर्निष्क्रान्तं पुनरक्षतम् । पुरोहितंच; दैत्यानांशुक्रमावा० ॥ १० ॥ प्रदीप्तवन्हिवर्णाभं; भिन्नाञ्जनसमप्रभम् ॥छायामार्तडसम्भूतं शनि मावा० ॥११॥ चक्रेणछिन्नमूर्धानं विष्णुनाभिनि: रीक्षितम् ॥ मैंहिकेयं महाकायं राहुमावा ०॥१२॥ ब्रह्मणःकुलसंभृतं दृष्टंलोकमयावहम् ॥ शिखिनं; तुमहात्मानं केतुमावा० ॥१३॥ ब्रह्माणंशिरसा नित्यमष्टनेत्रं चतुर्मुखम् ॥ गायत्री सहितंदेवं ब्रह्मः आवा० ॥१४॥ केशवं पुंडरीकाक्षं माधवं मधुसूद, नम् ॥ रुक्मिणी सहितं देवं विष्णुमावा० ॥१॥ शिवंशङ्करमीशानं हादशार्धाधलोचनम् ॥ उमया सहितं देवं शम्भुमावा० ॥१६॥ रत्नसागरसम्भू- तांशरीरे विष्णुनाश्रिताम् ॥ यजमान हितार्थाय लक्ष्मीमावा० ॥१७॥ सर्वसौख्यप्रदां नित्यं वीणा पुस्तकधारिणीम् ॥ मातरंसर्वलोकानां वाणी मावा० ॥१८॥ हिमपर्वत सम्भूतांशरीरे शम्भु नाश्रिताम् ॥ यजमान हितार्थाय उमा मावा०॥ ११॥ ऐरावतसमारूढं वज्रहस्तंमहावलम्॥ प्रा- - विवाह पद्धतिः च्यांदिशिसमाश्रित्य इंद्रमावा० ॥२०॥ छागपृष्ठ समारूढं शक्तिहस्तमहावलम् ॥ आग्नेय्यांदिशि ह्याश्रित्य अग्निमावा० ॥ २१ ॥ महिपेसुसमा- रूढं दंडहस्तंमहावलम् ॥ याम्यांदिशिसमा- श्रित्ययम मावाहयाम्यहम् ॥ २२ ॥ महाप्रेत समारूढं खङ्गहस्तमहावलम् ॥ नैर्ऋत्यां- दिशिद्याश्रित्य निति माह्वयाम्यहम् ॥२३॥ प्रेतटष्ठसमारूढं पाशहस्तं महावलम् ॥वारुण्यां- दिशि ह्याश्रित्य वरुणमाह्व० ॥२४॥ मृग पृष्ठ समारूढंध्वजा हस्तंमहावलम् ॥ वायव्यां दिशि- ह्याश्रित्य वायुमावा० ॥२५॥ महायक्षसमारूढं गदाहस्तमहावलम् ॥ उदीच्यां दिशियाश्रित्य कुवेरमाह्व०॥२६॥ वृपष्टष्ठसमारूढंशूलहस्तमहा- वलम् ॥ ऐशान्यां दिशियाश्रित्य शिवमावा ॥२७॥ आवाहयाम्यहं देवींदिव्याभरणभूपिताम् ॥ स्त्रीरूपा पृथिवींशान्तांब्रह्मस्थाने सुपूजिताम् ॥२८॥ आवाहयेतमाकाशं विष्णोःपदमनन्तकम् ॥ यत्रदेवास्तथायक्षाग्रहाः सर्वेप्रतिष्ठिताः॥२९॥ अत्र्यादीन्मुनिश्रेष्ठान्नरंधती युतांस्तथा ॥ विवाहयज्ञशान्त्यर्थ सप्तपीनाब० ॥३०॥ ब्रह्मज्ञ- मृपिराजं च परात्मानं परंपदम् ॥ आदित्यादि .

विवाह पद्धतिः ग्रहाधीशंध्रुवमावा० ॥३१॥ ब्रह्मांडे ऋष्टिराजहि- दक्षिणस्यां दिशिस्थितम्॥ महोदरं महावाहुमग- स्तिमाह्व०॥३२॥धर्माधर्म विचाराययाम्यांदिशि समाश्रितम् ॥ धर्मसिंहासनासनिं धर्ममावा० ॥ ३३॥ धर्मराज हितंभृत्यं धर्माधर्म विचारकम् ॥ चित्रगुप्तंमहावुद्धिं चित्रमावा० ॥३४॥ पक्षाः संवत्सरामासाऋतवश्चायनानिच ॥ कलाकाष्ठा- मुहूर्ताश्च सर्वानावा० ॥३५॥ लोकपालाः खगा नागा योगिन्यायक्षमातरः॥ यजमानस्यपुष्टयर्थ सर्वानावा० ॥ ३६॥ सिद्धाश्चकिन्नराश्चैव गंधर्वा प्सरसांगणाः ॥ विद्याधराश्चपुष्टयर्थं सर्वानावा ॥ ३७॥दिविभूम्यन्तरिक्षेच येचपातालवासिनः। तेसर्वेत्रसमायान्तु खस्ति कुर्वन्तुमेगृहे ॥३८॥ मरुद्भूतास्तथारुद्रा आदित्याहादशैवतु ॥ अनो- दिताहिये केचित्सर्वानावा० ॥३९॥ आगच्छन्तु सुराःसर्वेयेचान्येप्यंशभागिनः॥ सर्वेवपूजांग- गन्तुदत्वा शान्तिमहीतले*॥४०॥ इति सर्व- ग्रहाणामावाहनम् ॥ अथ ऋत्विजांवरणम् । आचार्य वरणसंभृ. तिमादाय संकल्पयेत् ।ओ मोत्यादि अमुकस्य ऐसे मब को अवाइन कर के सामान्य तया पूजन करा देना। .

१२ विवाह पद्धतिः विवाहकर्मणिएभिः पुष्पाक्षतादिमि राचार्यत्वे नामुक्गोत्रममुकशर्माणंब्राह्मणत्वा महंगो वरण 'सामिग्री विप्रायदद्यात * कंकण बांध कर व्यंगूठा ब्राह्मण का पकड़ कर प्रार्थना करे। आचार्यस्तु यथास्वर्गे शक्रादीनां वृहस्पतिः ।। तथाहिममयज्ञेस्मिन् आचार्यस्त्वंमेभवप्रभो।। "अहं भवामि । इति विप्रोवदेत् । वृतोस्मीतिच "उक्त मन्त्रं पठेत् ॥ में प्राचार्य हूं ऐसे कह कर वृतोस्मि कह कर ब्राह्मण मन्त्र पढ़े। वृतेन दीक्षामाप्नोतिदीक्षयाप्नोति दाक्षिणाम् ॥ दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥१॥ ऐसे ब्राह्मण वरण करे । क्रमएक हैं इस लिये मन्त्र लिखे जाते हैं शेप सर्वकृत्य पहले की तरह करना । यथा चर्तुमुखोब्रह्मा गायत्री सहितःप्रभुः । तथा त्वं ममयज्ञेस्मिन् एवंऋत्विकमवप्रभो ॥ २ ॥ औकातराक्षो यजुर्वेदस्टेष्ठ भोब्रह्मदैवतः।। -भार- द्वाज स्तुविप्रेन्द्र ऋत्विकत्वं मेमखेभव ॥३॥ सामवेदस्तु पिंगाक्षरेष्ठु भो विष्णुदैवतः॥ का- ध्यपेयस्तु विग्रेन्द्र ऋत्विक्त्वंमेमखेमव ॥४॥ 15 वर पक्षीय चरणसामिग्री. संकल्प करके ब्राह्मण को दे ।

विवाह पद्धतिः ग्रहाधीशंध्रुवमावा०॥३१॥ ब्रह्मांडे ऋष्टिराजहि- दक्षिणस्यां दिशिस्थितम्॥ महोदरं महाबाहुमग- स्तिमाह्व०॥३२॥धर्माधर्म विचाराययाम्यांदिशि समाश्रितम् ॥ धर्मसिंहासनासनिं धर्ममावा० ॥ ३३॥ धर्मराज हितंभृत्यं धर्माधर्म विचारकम् ॥ चित्रगुप्तंमहाबुद्धि चित्रमावा० ॥३४॥ पक्षाः संवत्सरामासाऋतवश्चायनानिच ॥ कलाकाष्ठा- मुहूर्ताश्च सर्वानावा० ॥३६॥ लोकपालाः खगा नागा योगिन्यायक्षमातरः ॥ यजमानस्यपुष्टयर्थ सर्वानावा० ॥३६॥ सिद्धाश्चकिन्नराश्चैव गंधर्वा प्सरसांगणाः ॥ विद्याधराश्चपुष्टयथै सर्वानावा० ॥ ३७॥दिविभूम्यन्तरिक्षेचयेचपातालवासिनः। तेसर्वेत्रसमायान्तु स्वस्ति कुर्वन्तुमेगृहे ॥३८॥ मरुद्भूतास्तथारुद्रा आदित्याहादशैवतु ॥ अनो- दिताहिये केचित्सर्वानावा० ॥३९॥ आगच्छन्तु सुराःसर्वेयेचान्येप्यंशभागिनः॥ सर्वेवपूजांय- हन्तुदत्वा शान्तिमहीतले*॥४०॥ इति सर्व- ग्रहाणामावाहनम् ॥ अथ ऋत्विजांवरणम् । आचार्य वरणसंभृ- तिमादाय संकल्पयेत् ।ओ मद्येत्यादि अमुकस्य *ऐसे सब को अवाहन कर के सामान्य तया पूजन कग देना ।

१२ "विवाह पद्धतिः विवाहकमणिएभिः पुष्पाक्षतादिमि राचार्यत्वे नामुकगोत्रममुकशर्माणंब्राह्मणत्वा महंगो वरण सामिग्री विप्रायदद्यात * कंकण बांध कर अंगूठा बाह्मण का पकड़ कर प्रार्थना करे। आचार्यस्तु यथास्वर्गे शक्रादीनां वृहस्पतिः।। तथाहि ममयजेस्मिन् आचार्यस्त्वंमेभवप्रभो।। 'अहं भवामि । इति विप्रोवदेत् । वृतोस्मीतिच उक्का मन्त्रं पठेत् ॥ में याचार्य हूँ ऐसे कह कर वृतोस्मि कह कर ब्राह्मण मन्त्र पढ़े। घृतेन दीक्षामाप्नोतिदीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् ॥ 'दक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥१॥ ऐमे ब्राह्मण वरण करे क्रमएक हैं इस लिये मन्त्र लिखे जाते हैं शेष सर्वकृत्य पहले की तरह करना । यथा-चर्तुमुखोब्रह्मा गायत्री सहितःप्रभुः । तथा त्वं ममयज्ञस्मिन् एवंऋत्विक्भवप्रभो ॥ ॥ ओं कातराक्षो यजुर्वेदत्रेष्ठु भोब्रह्मदैवतः।। भार- द्वाज स्तुविप्रेन्द्र ऋत्विक्त्वं मेमखेभव ॥३॥ सामवेदस्तु पिंगाक्षस्यैष्ठु भो विष्णुदेवतः ॥ का- ज्यपेयातु विग्रेन्द्र ऋत्विक्त्वंमेमखेभव ॥४॥ ० र पक्षीय चरणमामिग्री संकल्प करके ग्राह्मण को दे । -- विवाह पद्धतिः "बृहन्नेत्रोथर्ववेदोऽनुष्टु भोरुद्र देवतः ॥ खान- 'सगोत्रविप्रेन्द्र ऋत्विक्त्वंभेमखेभव ॥४॥ ॥ इति ऋत्विजांवरणम्॥ "ततो ब्राह्मणाः पुष्पाक्षतानि गृहीत्वा आशीर्वाद दधुरथच नद्दत्वा कंकणं-वनंति- फिर ब्राह्मण हाथ में पुष्पा क्षत लेकर आशीर्वाद के मन्त्र पढ कर वह यजमान को दें और कंकण यजमान को वाधे। ओं ऋग्वेदस्तु यजुर्वेदः:सामवेदोह्यथर्वणः॥ ब्रह्मवाक्यैश्चतै नित्यं हन्यते तवशत्रवः॥१॥ अपुत्राः · पुत्रिणः संतु पुत्रिणः संतु पौत्रिणः ॥ अधनाःसधनाः सन्तु सन्तु सर्वार्थ साधकाः॥२॥ विग्रहस्ताच गृहीयाद्यज्ञ पुष्पफलाक्षतान् ॥ च- "त्वार स्तव वढन्तु प्रायुः कीर्ति यशोवलम् ॥३॥ ग्रायु वृद्धिर्यशोद्धिः प्रज्ञाच सुखसंपदः ।। धन सन्तान वृद्धिश्च-सप्तैताः सन्तु वृद्धयः ॥४॥ अथ पंचोंकारपूजनम् आवाहयाम्यहंदेवमोंकारं परमेश्वरम् ॥अ- भरंत्रिगुणाकारं सर्वाक्षरमयंशुभम् ॥॥ त्रिमात्रं- ध्यक्षरं दिव्यंत्रिपदंचत्रिदैवतम् ॥ अणवंप्रणवं हसंस्रष्टारंपरमेश्वरम।।२॥अनादिनिधनंदेवमप्रमे- । P - विवाह पद्धति यंसनातनम् ।। परंपरतरं वीजं निर्मलं निष्कलं शुभम् ॥३॥ओं आब्रह्मन ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी- जायता माराष्ट्रराजन्यः शरइपव्योति व्याधीम हारथो जायतां दोग्ध्रीधेनुवादानढ़वानाशुःसप्तिः पुरंधिर्योपा जिष्णुरथेष्ठाः सभेयोयुवास्य यजमा- नस्यवीरो जायतां निकामे निकामनः पर्जन्यो वर्पतुफलवत्योन ओषधयःपच्यंतां योगक्षेमोनः कल्पताम् ॥ इति पंचोङ्कार पूजनम् ॥ अथा रक्षा विधानम् पुरोहित वर कन्या के सिर ऊपर हाथ रख खड़े। ओम् गणाधिपं नमस्कृत्य नमस्कृत्यपि- तामहम् ॥ विष्णुंरुद्रश्रियंदेवीं वंदेभक्त्या सरस्व- तीम् ॥ १॥ स्थानक्षेत्रं नमस्कृत्य दिननाथं नि- शाकरम्॥ धरणी गर्भसम्भूतं शशिपुत्रं वृहस्प- तिम् ॥२॥ दैत्याचार्य नमस्कृत्य सूर्यपुत्रंमहाग्रहम राहुंकेतुं नमस्कृत्य यज्ञारंभविशेषतः ॥ ३ ॥ शकाद्यादेवताःसर्वे मुनीश्चकथयाम्यहम् ॥ गर्गमुनि नमस्कृत्य नारदं ऋपि मुत्तमम ॥४॥ वसिष्ठं मुनि शार्दूलं विश्वामित्रं महा मुनिम् ॥ व्यासंकविंनमस्कृत्य सर्वशास्त्र विशारदम् ॥ ५॥ विद्याधिकान्मुनीश्चैव आ- विवाह पद्धतिः चायाँश्च तपोधनान् ॥ तान्सश्चिप्रणम्यादौ यज्ञारंभं करोम्यहम् ॥६॥ पूर्वे रक्षतु गोविन्द आग्नेय्यांगरुडध्वजः ॥ याम्यांरक्षतुवाराहोनार- सिंहस्तुनैर्ऋते॥णा केशवो वारुण्यां रक्षेद्वायव्यां- मधुसूदनः ॥ उत्तरे श्रीधरोरक्षेदीशान्यान्तु गदाधरः ॥ ८ ॥ एवंदशदिशोरक्षेद्वासुदेवोजना- र्दनः ॥ ऊर्ध्व गोवर्धनोरक्षे दधःस्थानेमहीधरः यज्ञाग्रे रक्षतांशङ्खः पृष्ठेपद्मन्तथोत्तमम् ॥९॥ वामपायेंगदारक्षेदक्षिणेच सुदर्शनः ॥ उपन्द्रः पातुब्रह्माणमाचार्यम्पातुवामनः ॥१०॥ अ- च्युतः पातुऋग्वेदं यजुर्वेदमधोक्षजः ॥ कृष्णो रक्षतुसामानं माधवो थर्ववेदकम् ॥ ११ ॥ उग्रहष्टाश्च विप्रास्ते तेनरुद्रेण रक्षिताः॥ यजमा- नःसपत्नीकः पुण्डरीकाक्षरक्षितः ॥ १२॥ रक्षा हीनंतुयतस्थानं तत्सर्वरक्षतां हरिः॥ वेदमंत्रैस्तु- कर्तव्या रक्षाशुभ्रस्तुसर्षपैः॥ १३ ।। औं 'मानः शसोरोअररुषोधूर्तिः प्राणाङ्मय॑स्य । रक्षाणो ब्रह्मणस्पते।यदावनन्दाक्षायणा हिरण्यशता नीकायसुमनस्यमानाः। तन्मआवध्नामि शतशा- रदायआयुष्मान जरदयिथासम् ॥१४॥ रक्ष रक्ष गोरी सर्पप चौफेर केरे।।

। विवाह पद्धति महादेवनीलग्रीवजटाधर ॥ रक्षतु देवताः सर्वे ब्रह्म विष्णुमहेश्वराः ॥ ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्चरक्षां कुर्व- न्तुते सदा ॥१६॥ इतिरक्षा विधानम् ॥ अथ षोडश मातृ पूजनम् उत्तर में पोडश मातृ पूजन करे गौरी पद्मा शचीमेधा सावित्री विजया जया ॥ देवसेना स्वधा स्वाहा मातरोलोकमा- तरः ॥ १॥ धृतिः पुष्टिस्तथा तुष्ठि स्तथात्म- कुलदेवताः ॥ भगवतीभ्यः पोडश मातृभ्यो नमः । इति॥ अथ वासुकि पूजनम् मुखपर दक्षिण में वसुकि पूजन अथातः संप्रवक्ष्यामि यदुक्तं वास्तु' पूज- नम् ॥ येन पूजा विधानेन कर्म सिद्धिस्तुजा- यते॥१॥ अनंतं पुडरी काक्षं फणाशत विभू- पितम् ॥ विधुइंधूक सदृशंकूर्मारूढं प्रपूज- येत्॥२॥ऑनमोस्तुसर्पेभ्योयेकेच पृथिवीमनु॥ र्येऽतरिक्षेये दिवितेभ्यःसर्पेभ्योनमोनमः॥ वासुका बष्टकुलनाग देवताभ्योनमः । पाद्यादिभिः समर्च: येतं ॥ इति वासुकि पूजनम्॥

विवाह पद्धतिः अथ योगिनी पूजनम् पहिले ४ मंत्रों से योगिनी का आवाहन करे आवाह याम्यहं देवीं योगिनी परमेश्वरीम्॥ योगाभ्यासेन संतुष्टांपरध्यान समन्विताम् ॥१॥ दिव्यकुंडल संकाशां दिव्य ज्वलित लोचनाम् ।। मूर्तिमतीममूर्ताचउग्रांचैवोग्ररूपिणीम् ।राअनेक भाव संयुक्तां संसारार्णव तारिणीम् ॥ यज्ञं कुर्वन्तु निर्विघ्नं श्रेयो यच्छन्तु मातरः ॥३॥ऋग्वेदो थय जुर्वेदो योगो योग युयुत्सवः॥योगिनी सामवेदस्तु योजये दप्यथर्वणम्॥४॥ एमिर्योगिनीमावाहयेत जयाच विजया चैव जयन्तीचापराजितानन्दा भद्रा तथा भीमा श्री देवी चाई विन्दुका ॥ १॥ हुंकारी भास्करीभीमा धूम्राक्षीकलहप्रिया ॥ ज्वालांगी कालिकादेवी तथा चण्डा पुरांतसी ॥२॥ दिव्ययोगी महायोगी सिद्धियोगी जने- श्वरी ॥ शाकिनी काल रात्रिश्च ऊईकेशानि शाकरी ॥३॥ गंभीरीभाषिणीचैव ज्वालांगी- नवपन्नगा ॥ राक्षसी घोररक्काक्षी विश्वरूपी भयंकरी॥४॥डाकिनी रौद्रवैताली कुब्जाकन्य- कभोजिनी ।। कोटराक्षी भीमभद्रा बुद्धिवेगीभयं- करी॥५॥ विरली हंसिनीयक्षी निर्जरातथ्य- .

विवाह पद्धतिः भापिणी ॥ सर्वसिद्धि प्रदातुष्टामनः सिद्धिप्रदायि- नी॥६॥ब्रह्माणी वैष्णवीरौद्री मांतगी नंदके- श्वरी ॥ दुर्जयाविकटाचैव तथाचविषलंधिनी ॥७॥ भैरवीचक्रिणीचैव दुर्मुखी प्रेतवासिनी ॥ कालोग्रा मोहनीचैव तथाच भुवनेश्वरी ॥८॥ चतुःपष्ठिः समाख्याता योगिन्योहि वरप्रदाः ॥ त्रैलोक्ये पूजितानित्यं देवमानुपयोगिभिः॥९॥ भगवतीभ्यश्चतुः पष्ठियोगिनीभ्योनमः पाद्यादि- मिः संपूज्य प्रज्वलित दीपसंयुक्त मिष्टान्नमय वलिंदद्यात् ।। पाद्यादि से पूजन कर के दीपक जागता और मिष्ठान्न दक्षिणा बलि दान करे मन्त्र। ओं ह्रीं ह्रीं महारवीं हुं हुं प्रचण्ड फेत्कार शब्दांनां नां घनघोर नंदिनी हां हां हां हसति उटटिभी भी भी भयानने हुं हुं हुं डमरुकहस्ते लां लां लल्हतिजिह्वे मां मांसादनिवलिप्रिये एहि एहि योगिनि वलिं गृहाण रक्ष रक्षमाम् ॥ पुनः योगी के वास्ते सीधा संकल्प करे । ओं मयेत्यादि० अमुकस्य विवाह नि- विघ्नहेतुकार्थकारितग्रह यज्ञान्तर्गत चतुः पष्ठि योगिनी प्रीत्यार्थकतासंपादक सर्वसुखसोभा- विवाह पद्धतिः ग्यादि संप्राप्तिकामना पूरकदास्यमानप्रजापति दैवताकमेतत्परिमित गोधूमानं घृतगुड साहितं चतुरधिक पष्टिकपर्दिका दक्षिणा संयुक्तमेतदा- मान्नभोजनं खेच्छासंप्राप्ताय विछिन्नकर्णायवा विच्छि नकय योगिनेहं दास्ये- अथ प्रताप तिलकम् पाठक वा पुरोहित यजमान को तिलक लगावें । आदित्या वसवोरुद्रा विश्वेदेवामरुद्गणाः।। तिलकं ते प्रयच्छन्तु सर्व कामार्थ सिद्धये ॥१॥ मंडल मध्ये सूर्य पूजनम् आकृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्न- मृतं मर्त्यश्च ॥ हिरण्य येन सवितारथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् १ श्री सूर्यायनमः ॥ पाद्यादिभिः संपूज्यनमस्कुर्यात् ॥ हाथ जोड़े प्रार्थना करे। पद्मासनः पद्मकरोहिवाहुः पद्मद्युतिः पद्म तुरंग वाहः ॥ दिवाकरो लोकगुरुः किरीटी मयिप्रसादं विदधातु सूर्यः १ अग्नि कोणे चन्द्र पूजनम् डों इमं देवा असपत्न ७ सुवर्द्धमहते तत्राय महते जैष्ठयाय महते जान राज्यायेंद्र- २० विवाह पद्धति स्यौद्रियाय इमममुष्य पुत्र 'ममुष्य पुत्रमस्यै विशएपवोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना राजा २ श्री चन्द्रमसेनमः॥ प्रार्थना- स्वेताम्बरः श्वेतविभूपणश्च श्वेतद्युतिर्दड- करोहिवाहुः ॥ चंद्रोऽमृतात्मा वरदः किरीटी श्रेयांसि मह्यं विदधातु देवः ॥ दक्षिणे मंगल पूजनम् * अग्निर्मूञ दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयमपा रेतासि जिन्वति ॥श्रीभौमायनमः रक्तांवरोरक्तवपुः किरीटी चतुर्भुजो मेप- गतो गदाभृत् ॥ धरासुतः शक्तिधरश्चशूली सदाममस्या हरदः प्रशातः ।। ईशान्ये बुध पूजनम् डों उहुध्यस्खाग्ने प्रतिजागृहि त्वमिष्टापूर्ते- स सृजेथामयं च अस्मिन् सधस्थअध्युतर- स्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत श्रीबुधाय- नमः॥ प्रार्थना पीताम्बरः पीत वपुः किरीटी चतुर्भुजो दंडधरश्चद्वारी ॥ चर्मासि धृक्सोमसुतः प्रशांतः मिहाधिरुढो वरदो बुधश्च ४ विवारपद्धतिः उत्तरे वृहस्पति पूजनम् आवहस्पते अतियदर्यो अर्हाद्युमाहिमाति ऋतुमजनेषु ।। यदीदयच्छवसऋत प्रजात तद- स्मासु द्रविणंधेहिचित्रम् । श्रीगुरवेनमः ॥ पीतांवरः पीतवपुः किरिटीचतुर्भुजो देवगुरुः प्रशांतः। विभ्रत्सुदंडंच कमंडलुंच तथाक्षसूत्रं वरदोस्तुमह्यम् ॥ पूर्वे शुक्र पूजनम् ॥ * अन्नात्परि श्रुतोरसं ब्रह्मणा व्यपिव- क्षत्रपयः सोमप्रजापतिः । ऋतन सत्यमिद्रियं विपान शुक्रमंधस इन्द्रस्योंद्रियमिदं पयोमृतमधु श्रीशुक्रायनमः ।।६।। प्रार्थना श्वेतांवरः स्वेतवपुःकिरीटी चतुर्भुजो दैत्य गुरुः प्रशांतः ॥ तथाक्षसूत्रंच कमंडलुच दंडंच विभ्रहरदोस्तुमह्यम् ॥ पश्चिमेशानि.पूजनम् डों शन्नो देवीरभीष्टय आपोभवन्तुपीतये। शंय्यो रमिस्रवन्तुनः ॥ श्री शनैश्चरायनमः॥ नीलद्युतिः शूलधरः किरीटी गृध्रस्थित स्त्रासकरोधनुष्मान् ॥ चतुर्भुजःसूर्यसुतः प्रशांतः सदास्तु मासवरप्रदोहि ॥ नैऋत्ये राहु पूजनम्- डोकयानश्चित्र आभुव हुतीसदावृधः + १२२ -- विवाह पद्धतिः सखा । कयाशचिष्टयारता ९ ॥श्रीराहवे नमः॥ नीलांवरो नीलवपुःकिरीटी करालवक्रः करवालशूली ॥ चतुर्भुजश्चर्मधरश्चराहुः सिंहास- नस्थः सवरप्रदः स्यात्॥ वायौ केतु पूजनम् रों केतुं कृण्वन्न केतवेपेशो मर्याअपेशसे । समुपद्भिरजायथा। श्री केतवेनमः ॥ प्रार्थना- धूम्रोडिवाहुर्वरदोगदाभृत् गृध्रासनस्थो विकृतासनश्च ॥ किरीटकेयूर विभूपितांवरः सदा स्तुमकेतुगणः प्रशान्तः॥ अथकेश (व्र०वि० महा० ) पूजनम् : डॉ ब्रह्मजज्ञानं प्रथम पुरस्ता दिसीमतः सरुचोवेनआवः । सबुध्न्या उपमा अस्यविष्ठाः सतश्चयोनि मसतश्चविवः ।। श्रीब्रह्मणेनमः ॥१॥ विष्णु पूजनम् * प्णिोरराटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्थो विष्णोःस्यूरसि विष्णोध्रुवोसि वैष्णवमसिविष्ण- वेत्वा ॥ विष्णवेनमः ॥ रुद्र पूजनम्- डॉ नमःशंभवायचमयोभवायच नमः शंकरायच मयस्करायच नमः शिवायच शिवत- रायच ॥ श्री शंकरायनमःइति त्रिदेव पूजनम् ॥

विवाह पद्धतिः स्याभ्युदयं कुरु एषदधि माषाक्षतवलिस्तेनमः३ नभृत्य कोणमें निति पूजाकरे उौं असुन्वंतमयजमान मिच्छस्ते नस्येत्याह मन्विहितस्करस्य।अन्य मस्म दिच्छसात इत्या- नमो देवि नितेतुभ्यमस्तु ॥ निर्ऋतयेनमः ॥ बलिदानकरे भो नितिदेववलिंमक्ष दिशंरक्ष मम यज- मानस्याभ्युदयं कुरु एपदधि मापाक्षत वलिस्ते नमः पश्चिम में वरुण पूजा करे ॥ डों वरुगास्योत्तं मनमसि वरुणस्यस्कम सर्जनीस्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्यत्र- तसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद ॥ श्री वरुणायनमः भो वरुण देववलिंमत दिशरक्ष ममय जमानस्या भ्युदयंकुरु । एपदधि मापाक्षत वलिस्तेनमः॥५॥ वायु कोण में वायु देव पूजे ॥ आनोनियुद्भिः शतनीभिरध्वर ७ सह त्रिणीभि रुपयाहियज्ञम् ।। वायो अस्मिन्सवने मादयस्वयात स्वस्तिभिः सदानः श्रीवायवेनमः। . भो वायी बलिमक्ष दिशंरक्ष मम यजमानस्या विवाह पद्धतिः- भ्युदयंकुरु एषदधि माषाक्षत बलिस्तेनमः ॥ उत्तर में कुबेर पूजन करे ।। औं वय ७ सोमव्रते तवमनस्तनूषुविभ्रतः प्रजावंतः सचेमहि ॥ श्री कुवेरायनमः॥७॥ भो कुवेर वलिंभक्ष दिशंरक्ष मम यजमानस्या भ्युदयंकुरु एपदधि मापाक्षत वलिस्तेनमः॥ ईशान में रुद्र पूजा करे ॥ ॐ तमीशानंजगतस्तस्थुषस्पर्तिधियं जि- न्वमवसेहूमहे वयम् । पूपानोयथा वेदसामसदृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये । श्री रुद्रायनमः । भो ईशान वलिंभक्ष दिशंरक्ष मम यजमानस्या भ्युदयंकुरु एषदधि माषाक्षत वलिस्तेनमः ॥ नेम्रत्य पश्चिम के मध्य में आकाश पूजन करे । ॐ यावांकशा मधुमत्यश्विना सूटतावती तया यज्ञमिमिक्षताम् ॥ श्री अनन्तायनमः॥९॥ भो अनन्त वलिंमत दिशंरक्ष मम यजमानस्या भ्युदयं कुरु । एपदधि मापाक्षत बलिस्तेनमः ।। ईशान पूर्व के मध्य में पृथ्वी पूजा ॥ ॐ स्योनापृथिवीनो भवानृक्षरानिवेशनी यच्छानः शर्मसप्रथाः॥ श्री एथिव्यैनमः ॥१०॥ भोपृथिवि वलिंभक्ष दिशंरक्ष मम यजमानस्या विवाह पद्धतिः- भ्युदयंकुरु एपदधि माषाक्षत वलिस्तेनमः ॥ उत्तर में कुबेर पूजन करे । ओं वय ७ सोमव्रते तवमनस्त नूषुविभ्रतः ग्रजावंतः सचेमहि ॥ श्री कुवेरायनमः॥७॥ भो कुबेर वलिंभक्ष दिशंरक्ष मम यजमानस्या भ्युदयंकुरु एपदधि मापाक्षत वलिस्तेनमः॥ ईशान में रुद्र पूजा करे॥ ॐ तमीशानंजगतस्तस्थुषस्पतिंधियं जि- न्वमवसेहूमहे वयम् । पूषानोयथा वेदसामसदृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये । श्री रुद्रायनमः । भो ईशान वलिंभक्ष दिशंरक्ष मम यजमानस्या भ्युदयंकुरु एपदधि माषाक्षत बलिस्तेनमः ॥ नैर्ऋत्य पश्चिम के मध्य में आकाश पूजन करे ।। ॐ यावांकशा मधुमत्यश्विना सून्तावती तया यज्ञमिमिक्षताम् ॥ श्री अनन्तायनमः॥९॥ मो अनन्त वलिंभत दिशंरक्ष मम यजमानस्या भ्युदयंकुरु । एपदधि माषाक्षत बलिस्तेनमः ॥ ईशान पूर्व के मध्य में पृथ्वी पूजा ।। ॐ स्योनाप्रथिवीनो भवाक्षरानिवेशनी यच्छानः शर्मसप्रथाः॥ श्री पृथिव्यैनमः ॥१०॥ मो एथिवि वलिंभक्ष दिशंरक्ष मम यजमानस्या २६ विवाह पद्धतिः भ्युदयंकुरु । एपदधि मापाक्षत वलिस्तेनमः।। इति दशदिक्पाल पूजनम् अथ क्षेत्रपाल वलिः माह तेल दक्षिणा बलि तेल में मुख देखे ॥ शांत्यर्थ पूजितोयस्तु देवैर्यज्ञक्रियासुच ॥ व्यंकः खेचरोनित्यं क्षेत्रपाल माह्वयाम्यहम्॥ डॉ नहिस्यश मविदन्नन्य मस्माद्वैश्वानरा त्पुर एतारमग्नेः एमेनमधन्न मृताअमत्र्य वैश्वा- नरं क्षेत्रजित्यायदेवाः ॥ भो क्षेत्रपाल एपदधि मापाक्षत बलिस्तेनमः॥ अथ सप्तर्पि पूजनम्। ॐ सप्तर्षयः प्रतिहिताः शरीरे सप्तरक्षति मदमप्रमादं सप्तर्पयः स्वप्तो लोकमीयुस्तत्र जा- ग्रतो अस्वप्नजी सत्रसदौचदेवी.॥ डॉ अत्रिभृगु मिष्टश्च पुलस्त्यः पुलह क्रतु, अंगिरेण समा- युक्ताः सप्तर्पयो बुधःस्मृताः ॥ अरुंधती सहित सप्तर्पिभ्योनमः।। इति सप्तर्पि पूजनम् ॥ अथाष्ट चिरंजीवि पूजनम् ॐ अश्वत्थामा वलिासो हनुमांश्व विमीपणः ॥ पशुरामः कृपाचार्यः सप्त ते चिर- जीविनः ॥ मार्कडेयोष्टमः प्रोक्तः सर्वे कल्पांत विवाह पद्धविर जीविनः॥ डों अश्वत्थाम्नेनमः १ डों बलिराजाय- नमः २ डों व्यासायनमः ३ उौं हनुमतेनमः ४ डों विभीपणायनमः ५ डों पशुरामायनमः ६ डॉ कृपाचार्यायनमः ७ डों मार्कडेयायनमः ॥८॥ इत्यष्ट चिरंजीवि पूजनम् उत्तरे ध्रुव पूजनम् आवाहयाम्यहं देवं ध्रुवेशंदेवमुत्तमं वैष्णवं विष्णु रूपं च पूर्ण ब्रह्म सनातनम् १ विश्वात्मा विश्वरूपश्चदयावान शुभलक्षणः॥ अक्रोधनस्तपः श्रेष्ठो दृढ़ासनो दृढ़वतः २ ध्रुवक्षितिर्भुवयोनि- ध्रुवोसि ध्रुवंयोनिमासीद साधुर्या उर्वस्य केतुं प्रथमं जुषाणाश्विनाध्वर्युस्तयतामिहत्वा ३ इति ध्रुव पूजनम् अथ दक्षिणोऽगस्त्य पूजनम् ॐ अगस्तिकुंभो वनिष्टुनिता शचीभि- यस्मिन्नग्रे योन्या गंमों अन्तः प्लाशिय॑क्तः शतधार उत्सो, दुहेन कुंभी स्वधां पितृभ्यः ॥१॥ ब्रह्माडे · ऋषिराजोयमगस्त्यो हि महामुनिः। महोदरो “महाबाहुमहाज्ञान पराक्रमः ॥२॥ वातापि भक्षकश्चैव तेजवांश्च महातपः॥ ईदृशः शिवरूपोहि विष्णु भक्ति परायणः ॥ ३॥ निर्गु- विवाह पद्धतिः णो गुण संपन्न उग्रतपोधरस्तथा ॥ उत्तम कुल संजातो महामुनेनमोस्तुते ॥४॥ अथशान्यां कलश पूजनम् अव्रणमकाल मूलवाहिभागं दध्यत्तत पवित्र अश्वत्थादि पत्र संयुक्तं फल वस्त्र पूगीफल पंच- रत्न संयुक्त निर्मल जल पूर्ण कलशं ईशान्यां दिशि धान्यो परिस्थापयेत् ॥ अथ संक्षिप्त पूजन प्रकारः ईशान्य में न फटे कालिमा रहित दधि अक्षत पवित्र अश्वत्थादि पत्र सुपारी पंचरत्र वस्त्र श्रीफल निर्मल जलपूर्ण कलश को धान्य पर रखे। अथ भूमिस्पर्शः ॐ भूरास भूमिरस्यादितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्यधात्री टथिवीयच्छ पृथिवीण्ह पृथिवीं माहिण्सीः॥धान्य स्पर्शः ॐ धान्य ममिधिनु हिदेवान् प्राणायत्वोदा दानाय त्वाव्यानाय त्वादीर्घा मनुप्रासिति मायुषेधां देवोवः सविताहिरण्यपाणिः प्रतिगृहात्वछिद्रे णपाणिना चक्षुपे त्वा महीनां पयासि ॥ १ विशेष पूजन विपान अन्यत्र देखें।

. विचार पद्धति कलशंस्टशेत् ॥ डों आजिघ्र कलशं मह्यात्वा विशत्विदवः।- पुनरूर्जानिवर्तस्वसानः सहस्रं धुक्ष्वो रुधारापय- स्वती पुना विशतादयिः॥कलशेजलंक्षिपेतु डों वरुण स्योत्तैमनमसि वरुणस्य स्कंभ सर्जनीस्थो वरुणस्य ऋतसदन्यास वरुणस्यऋत सदनमसिवरुणस्य ऋतसदनमासीदवरुणायनमः श्वेतवस्त्र धारयेत में सुजातो ज्योतिषासह शर्म वरूथमासदत्वः वासोअग्ने विश्वरूपसव्ययस्व विभावसो।। ॥श्रीफलंधारयेत् ॥ डॉ श्रीश्चते लक्ष्मीश्चपल्या वहोरात्रे पार्श्वे नक्षत्राणि रूपम श्विनौ व्याप्तम्। इष्णन्निषाणा मुंमइषाण सर्वलोकं मइषाण ॥इति ॥ रक्त वस्त्रधारणम् डों युवासुवासः परिवीत आगातसउश्रेयान्भ वति जायमानः॥ तंधारासःकवयःउन्नयंति स्वाध्यो मनसादेवयंतः ॥ इति ॥ कंकण बंधनम् ।। ॐ यदूद्वध्य मुदरस्यापवातियआमस्यक विषगंधो स्तिसुकृता तच्छ मितारः कृण्वन्तुतमेध ७शतक्रतो ॥ इति॥

वाइविपद्धति कलशके पूर्वभागमें हाथ रखे ऋग्वेद को स्थापन करे डॉ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्वि जंहोतारं रत्नधातमम्॥दक्षिणे यजुर्वेदस्थापयेत्॥ * इपेत्वोजत्वा वायवस्थदेवोवः सविता प्रार्पयतुशेष्ठतमाय कर्मण आप्यायध्व मग्न्या इंद्राय भागं प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मामा वस्ते- नईशत माघश सोध्रुवा अस्मिन् गोपतौस्यात्त वह्वीर्यजमानस्य पशनपाहि ॥ इति ॥ ॥ पश्चिमे सामवेदं स्थापयेत् ॥ तों अग्नआया हिवीतये गृणानो हव्य दातये निहोता सत्सु वर्हिपि ३ ॥उतरे अथर्ववेदंस्था पयेत डों शन्नो देवी रभीष्टय आपो भवंतु पीतये शंयो रभिस्रवंतुनः *४ पुनः अक्षतानादाय प्रत्येकं कलशे तिलक दत्वा नमस्कतिरक्षता दिभिः पूजयेत् ॥ डों ऋग्वेदायनमः १ डों यजुर्वेदायनमः २ जो सामवेदायन०३ डों अथर्ववेदायन० ४ डों कलगायनमः ५ों रुद्रायन०६ डॉ गंगायनमः ७ डौँ यमुनायेन० ८ डॉ सरस्वत्यैन उग नर्म- * इन ४ मत्रोंसे पृथक् चतुर्वेद पूजन कराना ३१ स विवाह पद्धति दायैनमः १० इत्येकैकं संपूज्यं कलशं पूजयेत् ॥. डों तत्वायामि ब्रह्मणा -वंदमानस्तदाशास्ते यजमानो हविमिः ॥ अहेड. मानो वरुणो हवोव्युरुश समानआयुः प्रमोपीः ॥ अनेन पाचादिभिःसंपूज्य प्रार्थयेत् ॥ डों ब्राह्मणै निर्मि तस्त्वं हिमांत्रिकैश्चामृतोपमः॥ प्रार्थयामिचत्वां कुंभवांछितार्थ प्रदेहिमे १ देवदानव संवाद मथ्य माने महो दधौ। उत्पन्नो सितदाकुंभविधृतोवि ष्णुनास्वयम् २ त्वत्तायैसर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः॥ त्वयितिष्ठतिभूतानि त्वयिप्राणाः प्रतिष्टिताः३ शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वंच प्रजापतिः ॥ आदित्या वसवो रुद्रा विश्वे देवाः सपैतृकाः ४ त्वयि तिष्ठति सर्वेपियतः कामफलप्रदः ॥ त्वत्प्र- सादादिमंयज्ञं कर्तुमीहेजलोद्भव ॥ सान्निध्यं कुरुमे देव प्रसन्नो वरदो भव ५ अथ कलशोत्पत्तिः अथातः संप्रवक्ष्यामि कलश प्रसवो यथा॥ हेमाद्रे रुत्तरे पार्श्वेक्षीरोदोत्तन सागरे १ प्रारब्धं मंथन-तत्र देवैः सर्वेः सवासवैः॥ दानवैवलि विवाह पद्धतिः मुख्यैश्च वलिभिर्बलदर्पितैः २ मंथानं मन्दिरं कृत्वा नेत्रं कृत्वातुवासुकिम् ॥ मूले कूर्मतुसं स्थाप्य विष्णोर्वाहू च मंदिरे ३ एकत्र देवताः सर्वे वलिनो दानवास्तथा ॥ मथ्यमाने तदा तस्मिन् क्षीरोदेदेव दानवैः ४ उदपयंत रत्नानि लोके स्मिन्प्रथितानिवै ॥ विमानं पुष्करंचैव उत्पन्नं हंसवाहनम् ५ नागऐरावतश्चैव वीणा वादित्रक तथा ॥ स्वर्गस्य भृपणंचैव रंभा सर्व गुणान्विता ६ कौस्तुभं मणिरत्नंच वालचन्द्रस्त- स्थैवच ॥ कुंडलानि मखंचैव गावः पुण्याश्च उर्वशी ७ लक्ष्मीः सुरूपा सुभगा सुशीलाच सर- स्वती ।। उच्चैःश्रवा हृयश्चैव उत्पन्नंचा मृतंविषम् ८ धन्वंतरि धनुःशंखं पांचजन्यं सुदर्शनम् ॥ तत्र संस्थ्याप्यतं सर्व विश्वकर्मा व्यचिन्तयत् । स्थापयित्वातु रत्नानि लोकेस्मिन्नथोसुरान् । चिंतयित्वा बहुविधं धनमासाद्य निर्मलम् १० भूमोचाश्रम पूर्वाणि वासांसि भाजनानिच ॥ बहुरक्षाणि रम्पागि सृज्यंते विश्वकर्मणा ११ कलशं कामरूपेण सर्व संपत्ति कारकम् ॥ पठि- नव्यंच मांगल्ये यज्ञ काले विशेषतः १२ यजमान हितार्थाय कलश स्थापयेहुधः ॥ सर्व देव मयं विवाह पद्धति कुम्भंतदेव कथयाम्यहम् १३ कलशस्य मुखे ब्रह्मा ललाटे वृषभध्वजः ॥ आदौमूलेस्थितो विष्णुमध्ये मातृगणांस्तथा १४ कुक्षौर्वेसागराः सप्तचन्द्रभागासरस्वती ॥ कावेरी कृष्णवेणी च गंगाचैवमहानदी १५ तापी गोदावरी चैव नर्मदाचवहिष्कृता ॥ विध्यपादे धृतानद्यः श्रीपर्वतवनाश्रिताः १६ बटेश्वरंत्रिमूर्त च गंगासागर संगमे ॥ पृथिव्यां यानितीर्थानि कलशेऽस्मिन्न्यसे दुधः१७अत्र शांति प्रपुष्ट्यर्थ गायत्रीं चैव विजपेत् ॥ ऋग्वेदश्चयजुर्वेदः सामवेद स्तथैवच १८ अथर्व सहिताःसर्वेकल शेऽस्मिन् समाश्रिताः॥ यत्फलं कपिलादाने का- तिके ज्येष्ट पुष्करे १९ तत्फलंलभ्यते सर्व कलशो त्पत्ति पाठतः॥ ब्राह्मणोलभतेविद्यां पार्थिवोलम तेमहीम २० वैश्यश्च लभतेलामंशद्रश्च गतिमुत्त- माम् ॥ वंध्याचलमते गर्म पुत्रार्थी पुत्र मुत्तमम २१ एतेनापिच मंत्रेणयः कुर्यादभिषेचनम् ॥ लभते वांछितं सर्वलभेत्कामांश्चपुष्कलान् ॥राज द्वारे भयं नैव सर्वबंध विमोचनम्॥२२॥ इति. १ यापर गायत्री पदना विवाह पद्धतिः पुनः मन से सबको नमस्कार करे । डों सूर्यायधिदेवप्रत्यधिदेवाताभ्यो नमः ॥ डों पंच लोकपाले भ्योनमः।। धर्मराज चित्र गुप्ताभ्यां नमः ॥ डों संवत्सरादिवत्सरपंचके भ्यो नमः ॥ डों वसन्ता दिपऋतुभ्यो नमः ॥ डों चैत्रादि द्वादश मासेभ्यो नमः ॥ ओं प्रति पदादितिथिभ्यो नमः ॥ ॐ ख्यादि सप्तवासरे भ्यो नमः ॥ ॐ अश्विन्यादि सप्तविंशति नक्षत्रे भ्यो नमः ॥ ॐ विष्कुंभादि अष्टा विंशति योगे भ्यो नमः ॥ॐ ववादि एकादश करणेभ्यो नमः ॥ ॐ मेपादि द्वादश राशिभ्यो नमः ॥ ॐ सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः ॥डों सर्वेभ्यस्तीर्थेभ्यो नमः। डों पूर्णाः संतुमनोरथा ममामुकशर्मणोयजमानस्य- इति ग्रहपूजनपद्धतिः समाप्ता विवाह पद्धति अथ विवाह पद्धतिः *तत्रादौ शुद्धासनो परिस्थितौ कन्यावरौ निरीक्ष्य कन्याप्रदो दक्षिण हस्त तर्जन्यंगुष्ठयो- मध्ये ताम्रमयीं दक्षिणांधृत्वा तस्तं कन्योपरि धृत्वा वाचा बंधनं करोति ॥ अथवर्णः प्रणीयसे बलभद्रयसे देवग्रहस्य होमशान्तिच कारयेत् तस्मादिति सरतिद्वयं द्वि- जवर्यायतस्मै यथागौरीमो मधुपतिः ईश्वरोयश्च पतंगानां अश्वादीनां दासीनां प्रवालानां मान्यो भवति नहोराणां तस्यपर्जन्यस्यगौरी सौरिरिति वाचा-ऐसे दाता कहे। सुवाच वाचा-वर कहे। . ऐसे फिर भी दो बार दाता और वर कहें। अथ कन्या प्रदआचार्यो वा कन्या मुपदिशति ॥ दाता वा बाह्मण कन्या को उपदेश दे। अवंध्ये ॥आनंद वादिनी । जीवत्पुत्रवती। सत्यवादिनी। अनुत्तरवादिनीमव । पुरुषेण वाचं पालय- • यह रीति हमारे देश की है। कन्या दाता कन्या वर को शुद्धासन पर देख कर दक्षिण हाय की तर्जनी अंगुष्ठ के मध्य में दक्षिणा धारकर हाय कन्या पर रख कर बाचा बंधन करे॥

वाहविपद्धति
पुनः वरं प्रत्युपदेशः
फिर वर को उपदेश दें।
भो पुरुप कन्ययामातात्यज्यते पिता
त्यज्यते कुटुंवस्त्यज्यते कस्यार्थेपत्युरर्थे-
तद्यथा ॥ यथा इंद्रस्य इंद्राणी ॥ यथा गौतमस्य
अहिल्या ॥ यथा दशरथस्य कौशल्या ॥ यथा
रामस्य सीता ॥ यथा रावणस्य मंदोदरी॥ यथा
नलस्य दमयन्ती ॥ यथा र्जुनस्य सुभद्रा॥ यथा
भीमस्य हिडंबा ॥ यथाशंतनोगगा ॥ यथा
सूर्यस्य छाया ॥ यथा चंद्रस्यरोहिणी ॥ यथा
वैश्वानरस्य स्वाहा॥ यथा वनमालिनो लक्ष्मीः ॥
यथेश्वरस्यपार्वती ॥ एवंकर्मसहवाचा ब्रह्मवाचा
विष्णुवाचा रुद्रवाचा वाचा विचाल्यते येन
सुकृतं तेन हारितम् ॥ इति ॥
पडा भवन्ति ॥ आचार्यः १ ऋत्विक
वैवाह्यः३ राजा ४ प्रियः ५ स्नातकः६ षट्
ऋषयो भवन्ति । पडाचार्याश्च ॥ यथा ॥
प्रथमे ईश्वरेण गौरी विवाहिता ब्रह्मा
आचार्योऽभवत् १ द्वितीये प्रजापति ना सावित्री
विवाहिता गणपतिराचार्योऽभवत् २ तृतीये
१ यह लेख भी इस देश में प्रचलित होने से लिख दिया है।

विवाह पद्धतिः सूर्येण छाया विवाहिता पराशर आचार्योऽभवत् ३ चतुर्थे हिरण्यकशिपुना महिषी विवाहिता व्यास आचार्योऽभवत् ४ पंचमे विष्णुना लक्ष्मी विवाहिताबाल्मीकप्राचार्योऽभवत् ५ षष्ठे श्री रामेणसीताविवाहिता वशिष्ठआचार्योऽभवत् ६ सप्तमे वरेण कन्या विवाह्यते वृहस्पति रूपोह आचार्यों भवामि ॥ अथ वरवध्वोर्वस्व ग्रंथि बंधनम् वर के वस्त्र में दक्षिणा अक्षत पुष्प कन्या के वस्त्र में दुर्वाक्षत दक्षिणा फल पुष्प धार कर प्रतिष्ठा करे । * अद्येत्यादि अमुकस्य विवाह कर्मणि श्रीगणेशादि पूजनपुरस्सरा वरवध्वोर्वस्व ग्रंथि प्रतिष्ठा शुभाभवतु ॥ गांठ देता हुआ मंत्र पढ़े । गणाधिपं नमस्कृत्य उमां लक्ष्मी सरस्व- तीम् ॥ दंपत्यो रक्षणार्थाय ग्रंथि बंधं करोम्यहम् १ यंब्रह्मवेदात० इत्यादि मंगल श्लोकानपि पठेत ।। कन्या का पिता संकल्प करे । डों अद्यति अमुकस्यमम देवपितृ ऋणा- पनुत्यर्थ च एतस्याः कन्याया देव्या भर्ना सह धर्मप्रजोत्पादनगृह्य परिग्रहधर्माचरणेष्व- । विवाह पद्धतिः धिकारसिध्यर्थे श्री लक्ष्मीनारायणप्रीतये विवाह संस्कारकर्माहं करिष्ये ॥ तदादौतदंगत्वेन वर पूजनादिकमहं कुर्वे ॥ अथ वरार्चन विधिः वर ऊजानु हो वैठे अर्थात् शासन के नीचे पैर रख कर बैठे कन्या दाता वर के जानु को स्पर्श करके कहे। ॐ साधुभवा नास्तांअर्चयिष्यामो भवंतम्॥ ओं अर्चय ॥ वरकहे ॥ दात्ता कहे ओं विष्टरो विष्टरो विष्टरः ॥ब्राह्मण कहे ओं विष्टरः प्रतिगृह्यताम्॥ दाता कहे ओं विष्टरं प्रतिगृह्णामि ॥ वर कहे वर विष्टर हाथ में लेकर मन्त्र पढ़ कर अपने शासन पर विष्टर मुत्तराय रखकर उस पर बेठे । ओं' व ष्मास्मिसमानानामुद्यता मिव सूर्यः॥ इमंत मभितिष्ठामियोमांकश्वामि दासति॥१॥ ओं' पाद्यं पाद्यं पाद्यम् ब्राह्मण कहे दाता विवियोग करे १ ओ३म् साधु भवानास्तामिति प्रजापतिः ऋपिः ब्रह्मा देवता यजुः छन्दो परार्चने विनियोग २ ओं वोस्मी पायर्यण ऋपिः विष्ठरो देवता अनुष्टुप्छन्दः उपरेशने विनियोगः ३ जल पुष्प अक्षत गंध सर्वोपधि लाजा । विनियोग विना मन्त्रः पके गौरिवसीदति।

विवाह पद्धतिः ओ पाद्यं प्रति गृह्यताम् ॥ दाता कहे वर पाद्य लेकर अपने पादों पर जल डारे दाता धोवे ब्राह्मण वर होतो दक्षिः वाम क्षत्रियादि होतो वाम दक्षिण क्रम से धोवे। ओं' विराजो दोहोसि विराजो दोहम- शीय मयि पाद्यायै विराजो दोहः ॥२ वरः पठेत अथ २ विष्टर दानम् ॥ औं विष्टरो विष्टरो विष्टरः॥ब्राह्मण कहे ओं विष्टरः प्रति गृह्यताम् ॥ दाता कहे ओं विष्टरं प्रति गृह्णामि ॥ वर कहे वर विष्टर लेकर मंत्र पढ़ के अपने पादों के नीचे उतराय रखे ॐ वष्र्मोस्मिसमानानामुद्यता मिवसूर्यः ।। इमंतमभितिष्ठामि योमांकश्चाभि दासति ३ ओं अर्को अर्को अर्घः, ब्रह्मण कहे ओं अर्घः प्रति गृह्यताम् । दाताकहे वर विनियोग करे १ॐ विराजो दोहोसीति प्रजापतिः ऋपिरनुष्टुप्छंद आपो देवता यजुः पाद प्रक्षालने विनियोगः। २ॐ वर्मोस्मीत्पाथर्वण ऋपिः विष्ठरो देवता अनुष्टुप्छंदः उपवेशने विनियोगा। अर्थपात्र में जल पुष्प मात गंध कुशा ३ ४० विवाह पद्धति ऑ अर्घ प्रति गृह्णामि । वरकहे वरयपात्र से पुष्प यक्ष कुशा निकालकर सिरपर धारण करे ओं' आपः स्थ युप्माभिः सर्वान् कामान अवाप्नुवानि ४ वर थर्घपात्रके जलको गेरताहुया पात्रको ईशान्य में छोडदे डॉ समुद्रंबः प्रहिणोमि स्वां योनिमभि गच्छत ॥ अरिष्टा स्माकं वीरामापरा सेचि मत्पयः॥५॥ डॉ'आचमनीयं आचमनीयं आचामनीयम्। ब्राह्मणकहे डॉ आचमनीयं प्रतिगृह्यताम् । दाताकहे डॉ आचमनीयं प्रति गृह्णामि । वरकहे अथ-मधुपर्क विधानम् वरमंत्रपट कर १ भाचमनकरके पुनः२ याचगन तूप्पी करे * आमागन यशमा म मृजवर्च सा तं मा कुम प्रियं प्रजाना मधि पतिं पशुना मरिष्टिं तन्नाम्६ प्रधम्क वर विनियोग करें ही भारा ति मंत्र ग्य सिएटिए प्राशि अनुष्टपटअर्या गदि भाजशिनि । २ मिनि०करे मम ल्याण अपि घाती करणो देवता मामराई पिनि योगः | युद्ध नमः । शारिनियोग बरे में मामा गमिति पम्पष्टी ऋषिः यूटनीदः आपो आदरण सामने विनियोगः।

विवाह पद्धतिः डों मधुपर्को मधुपर्को मधुपर्कः। ब्राह्मण कहे डॉ मधुपर्कः प्रतिगृह्यताम् । दाताकहे डों मधुपर्क प्रति गृह्णामि । वरकहे वर दाता के हाथ में स्थित मधुपर्क को देखे 'मित्रस्य त्वा चक्षुषा प्रतीक्षे ७ वर इस मन्त्रसे मधुपर्क को ले "डों देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे श्विनोर्वाहु भ्या पूष्णो हस्ताभ्यां प्रति गृह्णामि ८ वर इस मन्त्र से ३ वार अनामिकांगुष्ठ से पृथिवी पर गेरे। डों नमः श्यावास्यन्निश नेयत्त आविडं तत्ते निष्कृतामि ॥ ९॥ १. (मधुपर्क दधि मधु घृत)-कां स्य पात्र में हो ऊपर कांस्य पात्रहो दध्यलाभे पयः कार्य मध्वलाभे तथागुडः। घृत मतिनिधिं कुर्यात्पयो वा दधिवा बुधः २ (दाता विनि०करे)-डों मधुपर्क इतिमधुन्छंद ऋषिः बृहती छंदो मधुभुक् देवता मधुपर्क दाने विनि० ३ (वरविनि करें): मित्रस्य त्वै तिप्रजापतिः ऋपिः पंक्तिः छदो मित्रो देवता मधुपर्क दर्शने विनि० ४ (वरविनि० करे)-0 देवस्येति ब्रह्मा ऋपिा गायत्रीछंदः सविता देवता मधुपर्क ग्रहणे विनियोगः ५ (वर विनि० करे) डों नमः श्यावेति प्रजापतिः ऋषिःगायत्री छंदः सविता देवता मधुपर्का लोडने विनियोगा। - ४२ विवाह पद्धतिः वर मधुपर्क को इस मन्त्र से ३ वार भक्षण करे यदि समग्र न खासरे तो शेष अमंचर देश में गरे। डों यन्मधुना मधव्यं परम रूपपन्ना- द्यम् ॥ तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण रूपेणा- नायेन परमो मधव्योन्नादोऽसानि ॥ १० ॥ वरस्विराचभ्य अंगानिस्पृशति ओं वाड़मे आस्येस्तु । मुख स्पर्श करे डों नसामे प्राणोस्तु । नासिका स्पर्श करे. डॉ अक्षणोमें चक्षुरस्तु,। नेत्रों को स्पर्श करे डॉ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु ।रकानों को स्पर्श करे डों वाह्वोर्मे वलमस्तु।२भुजाओं को स्पर्श करे * ऊर्वोमें ओजोस्तु । २ जंघा को स्पर्श करे डॉअरिष्टानिमे अंगानि तनूस्तन्वासहसन्तु दाता वर के समीप उदगम दर्भ धारकर वर के हाथ में दक्षिणा देकर गौः ३ वार पढ़े । दक्षिणागोशाला में दे। डों माता रुद्राणां दुहिता वसूनां खसादि- त्या नाममृतस्य नाभिः प्रनुवोचं चिकितुपे जनाय मागामनागामदितिं वधिष्ट मम चामुष्य यजमानस्य पाप्माहत ॥ उत्सृजततृणान्यत्तु।। (वर विनियोग करे) रों यन्मन इत्यस्य कौत्स ऋपि: जगती छन्दः मधुपर्को देवता मधुपर्व प्राशने विनियोगा।

विवाह पद्धति ५ 'अथाग्नि स्थापनम् ततो वेदिकायां तुषकेशशर्करा भस्मादि रहितां चतुरस्री हस्तमिताभूमि कुशैःपरिसमू- ह्यतान्कुशोनशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेनोप लिप्य स्फ्येनस्रवेणवा प्रागग्रंपादेशमात्रमु- त्तरोत्तरक्रमेणत्रिरुल्लिख्य उल्लेखनक्रमेगाना- मिकांगुष्ठाभ्यां मृदंमुद्धृत्यतंदेशं वारिणाभ्युक्ष्य तत्र तूणीं कांस्य पात्रपिहितं वन्हिमानाय्य प्राङ्मुखः प्रत्यङ्मुखंवह्निमुप समाधायतद्र- क्षार्थ कंचत्पुरुषंनियुज्य कौतुका गारात्कन्यामा- नीय तस्यै वरः वासः परिधापयति ॥ . दाता वस्त्र ४ वा मौली वर को दे वर २ कन्या को पहिरावे २ भापपहिरे। डों' जरांगच्छ परिधत्स्व वासोभवा कृष्टी- अग्नि का स्थंडिल बनावे उनको कुशों से पोंछ कर कुशाओं को ईशान्य में फेंके गोमय से लेपन को स्क्या वा सब से ३ रेखा उत्तरोत्तर देकर उनपर से अनामिकांगुष्ठ से मृतिका अपर फेंके उस स्थान को जल से सींचे ऊपर काष्ठ रखकर अग्नि स्थापन करे अग्नि के रक्षा के लिए किसी को नियुक्त कर के पुन' कन्या को वर वस्त्र पहिनावे । १ वर पिनि० करे ओं जरांगच्छेति मन्त्राय प्रजापतिः ऋपिः त्रिष्टु- प्छन्दः पासोदेवता वख परिधाने विनिः । पर इस मन्त्र से नीचे का बख मा मौली कन्या को दे।

विवाह पद्धतिः नामाभि शस्तिपावा ॥ शतंचजीवशरदः सुवर्चा रयिंच पुत्राननुसंव्ययस्वायुष्मतीदंपरिध- स्ववासः ११॥ बरं इस मंत्र से उपर का वस्त्र कन्या को दे। डों याअर्चा तन्नवयन् याअतन्वत याश्च देव्यस्तं तनभित स्ततंथ ॥ तास्त्वा देवीर्जरसे संव्यय स्वायुप्मतीदं परिधत्स्ववासः १२॥ पर इस मन्त्र से नीचे का वस्त्र पहिरे । ग' परिधास्य यशोधास्यै दीर्घायुष्ट्वाय जरष्टिरस्मि ॥ शतंच जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोप मभिसंव्ययिप्ये १३ ॥ घर इसमन्त्र से ऊपर का वस्त्र पहिरे। ओं' यशसामाद्यावाप्रथिवी यशसेंद्रावृहस्पती॥ यशो भगश्चमाविदद्यशोमाप्रति पद्यताम् ॥१४॥ फिर वधू वर २ याचमन करें पुनः दाता दोनों को मंमुस करे। ततः कन्या प्रदो वधू वरौ परस्परं समंजेथा पर शिनि को २३ यानिन्निति मन्त्रम्य प्रजापति ऋषिः जग- मीदः पिगम्पो देखता यात्र परिधाने विनिः । शिनिकरे ३ तो पग्गिामा इति पत्रस्यार्पणमपि स्त्रिष्टुपछदः पापी देवता वात्र परिधाने विनियोगः। पर शिनि को भो यममेनि मन्त्रम्य मनापति। प्रापिः जगनीछन्दः विनोदता बाष परिमाने शिन।

। विवाह पद्धतिः मित्यमि मुखीकोत॥ ओं' समंजंतु विश्वेदेवाःसमापो हृदयानिनौ॥ संमातरिश्वा संधाता समुद्देष्ट्री दधातुनौ ॥१५॥ "अथहस्त लेपनम् मं० ओं तत्सदद्येति श्री लक्ष्मी नाराय: ण प्रीतये ऽमुक शर्मणो विवाहांग भूतपाणि ग्रहण प्रतिष्ठा श्री गणेशादि पूजन पूर्विका शुभास्तु ॥ हथलेवा माटे का पेडा कन्या वर के हाथ के मध्य मे रख कर प्रतिष्ठा करे वर का हाथ नीचे हो शेप रीति देशानुसार करे वर हथलेवा लेकर मन्त्र पढ़े। डों गृभ्णामिते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथा सः ॥ भगोर्यमा सविता पुरधिमात्वादुर्गार्हपत्याय देवाः १ अमोह मस्मि सात्व ७ सात्व मस्यमो अहं सामा हम स्मि ऋक्त्वं धौरहं पृथिवीत्वम् २तावेव विवहाव है सहरेतो दधावहै । प्रजां प्रजनयावहै पुत्रान् विद्यावहै वहून् ३ ते संतु जरदष्टयः संप्रियो रोचिष्णू सुमनस्य मानौ ॥ पश्येम शरदः शतं जीवेमशरदः शतशृणुयाम शरदः शतम् ४ १ वर विनि० ओं समंत्विति मन्त्रस्य अथर्वण सपिः अनुष्टुपन्दः रिषेदेवा देवता परस्परं मंत्री करणे विनियोगः । २ इथलेचा अटेका पेड़ा घृत गुड हल्दी मौली ।

विवाह पद्धति अथ कन्या दान प्रशंसा अश्वमेधेषु यत्पुण्यं यत्पुण्यं मेपगेरवा ॥ यत्पुण्य कार्तिके स्नाने कन्यादाने पितद्भवेत् १ गीयते सर्वशास्त्रेषु वदंति मुनयः सदा । दुर्लभ सर्वधर्मेषु कन्या दानं कलौयुगे ०२ *अष्टवर्पा भवेद्रौरी नव वर्पा च रोहिणी ॥ दशवर्पा भवेत्कन्या तत ऊर्ध्व रजस्वला ३ गौरी विवाहिता येनब्रह्मलोकंमजेन्नरः ॥ रोहिण्या प्राप्नुयात्वर्ग कन्यया लभते यगः ॥ येनकनाप्युपायेन नकर्तव्या रजस्वला ॥४॥ अथ यौतक वर्णनम् पिता अस्यै कन्याय कुसुम्भ वस्त्र वेष्टितायै सुभूपितायै दायं दद्यात् मणि मुक्तापवालानिराजतं हाटकं तथा।कांस्य लोहंतथातानंपात्राणि विविधानिच अश्वाख्य महिपी धेनु गजदंतं महाधनम् ॥ कंठस्य भूषणं *आज कल माया लोग अष्ट इस श्लोक को नहीं मानते मेरी सम्मति इसके विरुद्ध है जिस दिन से इसके विरुद्ध आचरण हुआ तभी से स्त्रियों मेंतशन्नन का रोगउदय हुआ क्यों कि यह रोग रजो विकार से होता है ऋतु शुद्धि पुरष संयोग से बिना नहीं होती इस लिये अधिकावस्था होने से पातो दुराचार फैलता है या पूर्वोक्त रोग होता है अतः यह प्रमाण निपिद नहीं।

विवाह पद्धतिः चापि ताटकं मणि मुद्रिका २ दासिका मेदिनी चैव मिष्टान्नं बहुधा कृतम् ॥ द्रव्य शक्त्या प्रदा तव्यं वेदिकायां वरायबै ३ कुरुक्षेत्र समावेदी कथिता कविभिः पुरा ॥ यत्किंचिद्दीयते दानंत सर्व सफलं भवेत् ॥४॥ अथ कन्या दाना धिकारी पिता पितामहो भ्राता मकुल्यो जननी तथा। कन्या प्रदः पूर्वनाशे प्रकृतिस्थः परः परः। अथ कन्यादान विधानम् कन्या' प्रदो यदि सपत्नी को भवेत्तदास पत्नी दक्षिणतः संस्थाप्य तहम्तेन शंखमध्ये दूर्वा क्षत फल पुष्पजलान्यादाय जामातृ दक्षिण करो परि कन्या दक्षिणा करं निधाय स्ववाम हस्तं कन्या दक्षिण 'करोपरि शिरसिवा धृत्वा वर मभि मुखीकृत्य पठेत् ॥ दाता की स्त्री से वस्त्र ग्रंथि पाधे स्त्री दक्षिण पेठे दाता स्त्री के हाथ से शंख में दुर्गा क्षत फल पुष्प जल लेकर कन्या के हाय को जामाता के हाथ पर रख कर कन्या के हाथ पर चा सिर पर अपनाराम दायपर कर दान करे स्त्री के दक्षिण पैठने में प्रमाण-चम्म्य दक्षिणे कन्या कन्यायाः दक्षिणे पिता पितुश्च दक्षिणे माता मातुने मात्र दक्षिणे अन्यत् गीमंतेर विवाहेच चतुथ्या सह भोजने मते दाने मग्वे आदे पनी स्तिति दक्षिणे। कन्यादान २ कन्या शीया करे दान चन्द्रिका ।

वाहविपद्धतिः ओं दाताहं वरुणो राजा द्रव्यमादित्य दैव- तम्।। 'विप्रोसौ विष्णु रूपेण प्रतिगृहात्वयं विधिः एवं समुच्चार्य दाता संकल्पं कुर्यात् ॥ सं. ओं मद्येत्यादि० ऽमुक संवत्सरे ऽमुक मासे ऽमुक पक्षे ऽमुक तिथी अमुक वासरे एवं यथायोग करण मुहर्ते प्रवर्तमाने ॥ आदौ देवविनायकः सुरगुरु ब्रह्मा शिवः के- शवः सूर्यश्चन्द्र ग्रहादि तीर्थ ममलंनद्यश्च शैला वनम् ॥ नागाद्याःकुलदेवता मुनिवरा गंधर्व यक्षादयः सिद्धा भैरवयोगिनीः प्रतिदिनं कुर्वन्तु वो मंगलं १ अमुक गोत्रस्या मुक प्रवरस्या मुकशाखा- ध्यायिन. अमुकर्मणः प्रपौत्राय ॥ अमुक गो- वस्या मुक प्रवरस्या मुक शाखाध्यायिनः अमुक गर्मणः पात्राय । अमुक गोत्रस्या मुक प्रवरस्या मुक शाखाध्यायिनः अमुक शर्मणः पुत्राय ॥ ओं गौरीश्री कुलदेवताच सुरभि भूमिः प्रपूर्णा शुभा सावित्रीच सरस्वतीच सुभगा सत्य १ शादिपस में 'वरो सौं' पटना। २ गोत्रोचार में २८, २०, ८, शोर योले जाते है यह विद्वानों की गति है मर से मुगम रीति ८ गोरों वाली इस लिसने है, क्षत्रियादि के दिशा में स्थान वर्म पट उभारण करे।

. । विवाह पद्धति व्रतारुंधती ॥ स्वाहाजांववती सुरुक्म-भगिनीदुः स्वप्न विध्वंसिनी वेलाचांबुनिधेःसमीनमकराः कुर्वन्तुवो मंगलम् २ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्यामुक शाखा ध्यायिनः अमुकर्मिणःप्रपौत्रीम् ॥ अमुकगो- त्रस्यामुकप्रवरस्यामुकशाखाध्यायिनः अमुक शर्मणः पौत्रीम् ॥ अमुकगोत्रस्यामुक प्रवरस्या- मुक शाखाध्यायिनः अमुक शर्मणः पुत्रीम ॥ अश्वत्थोबदरीसचंदनतरुर्मदारकल्पद्रुमाज- बुनिंबकदंवचूतसरला वृक्षाश्चये क्षीरिणः ॥ सर्वे ते वनमाश्रिताःफलयुता विभ्राजिता राजिता रम्यं चैत्र रथं सुनंदन वनं कुर्वतु वो मंगलम॥३॥ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्यामुक शाखा ध्यायिनः अमुकशर्मणःप्रपौत्राय ॥ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्यामुकशाखाध्यायिनः अमुक शर्मणः पौत्राय ॥ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवर- स्थामुक शाखाध्यायिनः अमुक शर्मणः पुत्राय।। वाल्मीकिश्च सनन्दनन्दनमुनिासो वशिष्ठो- भृगुर्जावालिर्जमदग्निरामजनकागगांगिरोगोतमाः॥ माधाता भरतोपश्चसगरो धन्यो दिलीपो नलः पुण्यो धर्मसुतो ययाति नहुपो कुर्वन्तु विवाहपद्धतिः वोमंगलम् ॥४॥ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्यामुकशाखा ध्यायिनः अमुकशर्मगाः प्रपोत्रीम् ॥ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्यामुक शाखाध्यायिनःअमुक शर्मणः पौत्रीम् ॥ अमुकगोत्रस्यामुक प्रवरस्या- मुक शाखाध्यायिनः अमुक शर्मणः पुत्रीम् ।। ब्रह्मज्ञान रसायनंस्वरधरंवेदास्तथा ज्योतिष व्याकरणंचधनुर्धरंजलतरंवीणाचिकित्साकरम्॥ कोकवाजितवाहनं नटतंसामुद्रिकं लक्षणां विद्या- नांचचर्तुदशं प्रतिदिनं कुर्वन्तुवो मंगलम् ॥५॥ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्यामुकशाखाध्या यिनः अमुक शर्मणः प्रपौत्राय अमुक गोत्र- स्यामुकप्रवरस्यामुकशाखाध्यायिनःअमुकशर्मणः पौत्राय अमुक गोत्रस्या मुकप्रवरस्यामुक शाखा- ध्यायिनः अमुक शर्मणः पुत्राय ॥ लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुराधन्वं तरि- श्चंद्रमा गावः कामदुधाः सुरेश्वरगजोरभादिद- वांगनाः॥ अश्वः सप्तमुखस्तथा हरिधनुः शंखो विपंचामृत रत्नानीति चतुर्दश प्रतिदिनं कुर्वन्तु वो मंगलम् ६ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्यामुक शाखा .

विवाह पद्धति ध्यायिनः अमुक शर्मणः प्रपौत्रीम् ॥ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्यामुकशाखाध्यायिनः अमुक शर्मणः पौत्रीम् ॥ अमुक गोत्रस्यामुक प्रवरस्या मुक शाखाध्यायिनः अमुक शर्मणः पुत्रीम् ॥ गंगाचव सरस्वतीच यमुना गोदावरी नर्मदा कावेरी सरयूमहेंद्रतनया चमएवती वेदिका ॥क्षि- प्रावेत्रवती महासुरनदी ख्यातागया गंडकी पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः कुर्वन्तुवो मंगलम् ॥७॥ अमुक गोत्रायामुक प्रवरायामुक शाखाध्या- यिनेअमुक शर्मणेवराय ब्राह्मणाय पात्रश्रेष्ठाय कन्यार्थिने- ब्रह्मावेदपतिः शिवः पशुपतिः सूर्यो ग्रहा- णांपतिः शक्रोदेवपतिर्यमः पितृ पति स्तारा- पतिश्चन्द्रमाः ॥ विष्णुर्यज्ञपतिहविर्हतपतिः स्कंदश्च सेना पतिः सर्वे ते पतयः कुवेर साहिताः कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥८॥ अमुकगोत्राममुकरवराममुक नाम्नीमिमाकन्या सालंकारां परालंकार वर्जिता वस्त्रयुगलाछन्नां प्रजापति देवतां पुराणोक्त शतगुणी कृत- ज्योतिष्ठामातिरावादियज्ञसम फलप्राप्तिकामाज्ने ५३ विवाह पद्धतिः' नवरेणास्यां कन्याया मुत्पादयिष्य माणसंतत्या हादशावरान हादश परान् पुरुपान्पवित्री कर्तु मात्मनश्च श्रीलक्ष्मी नारायण प्रीतये भार्यात्वेन तुभ्यं अमुक गोत्रः अमुक प्रवरः अमुक शर्मा संप्रददे ॥ दाता शंखव ला कुशाक्षत जल और कन्या का दक्षिण हाथ वर को दे वर स्वास्ति ऐसे कहकर द्यौस्त्वा. यह पढ़े। डोद्यौस्त्वा ददातुष्टथिवीत्वा मनुगृह्णातु ।। ॐ अद्यकृतै तत्कन्यादान कर्मणः यथोक्त फलप्राप्तये कन्यादान प्रतिष्टार्थ इमां गां। (वादास्यमानां) सपरि कराम् अमुक गोत्राय वराय दातुमहमुत्सृजे॥ इदं ' सुवर्णमयमंगुलीयकं अग्निदेवतं । इदं ' दक्षिणाद्रव्यं चंद्रदैवतम् ॥ ततो वरः पठेत ओं कोदात् कस्माअंदात् कामोदात् कामा- यादात् कामोदाता कामाप्रति गृहीता कामैतत्ते ।। ततो वर आसना दुत्तीर्य पुरोहित पादप्र- क्षालनं कृत्वा दानं दद्यात् ॥ अथ सावधान गोदान संकल्प ॐ मयेत्यादि० श्री लक्ष्मी नारायणप्रीतये १ यदि पत्रियादि हो नो दगारमन् ददापरान कहे।रंगो मुद्रिका ४ दक्षिणा विवाह पद्धतिः लक्ष्मीनारायण प्रीति द्वाराऽमुकशर्मणोमम गृहीत मानुषीपत्नी दान भारापनु त्यवछिन्न निखिल दुरित दुःस्वप्नदुःशकुनदौर्य शांत्युत्तर मुख सौभाग्य धन सन्तान समृद्ध्यार्थे इमांगां॥ वादास्य मानी गां सवत्सां ' दोग्ध्रौं ' घंटाचामरभूषितांपंच- रत्न पुच्छां सुवर्णशृंगीरौप्यखुरीताम्रप्टष्ठां कांस्य पात्र दोहन संयुक्त खाद्यवस्तु वातदक्षिणा संयुक्तां मुपृजिता'अमुक गोत्रायामुक प्रवरायामुक शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमह संप्रददें । ओ मद्यकृतेतत् लक्ष्मीनारायणप्रीतये गो- दान प्रतिष्ठार्य मिदंदक्षिणा'द्रव्यममुकदैवतममुक गोत्रायामुक शर्मणेदातुमह मुत्सृजे- गो प्रतिनिधिभूतं दक्षिणा'दानम् ओं 'भद्येत्यादि 'अमुक शर्मणोममगृहीत मानुषीपत्नी दानभारापनुत्यर्थ करणीय गोदान प्रतिनिधि भूतं 'गोदुग्ध निष्क्रयी भूतम्- पंचविंशतिपरिमितें राजकीयमुद्राद्रव्यं एवं २०विंशति-१५पंचदश-१०दश ५) पंच २॥) साई मुद्राहयं 11) सपादरजतं-एततपरिमितं P- गौ यदि पीछे देनी हो तो यह पहे।

विवाह पद्धविर दक्षिणा द्रव्यं चंद्र दैवतं सुवर्ण अग्निदेवतं-चा- श्रीलक्ष्मीनारायण प्रीतयेऽमुक गोत्रायामुक शर्म- णे ब्राह्मणायदातुमहमुत्सजे- पूर्ववतकृतैतत् दक्षिणामपिदद्यात् नगरवासिभ्योथच विदेशिजनेभ्यश्चदानं देयमथ च कुरुदोत्र समावेदौतिवाक्याचप्रतिगृह वाप्रतिजनं दक्षिणा (नांवा) दानसं० ओमद्येत्यादि० श्रीलक्ष्मीनारायण प्रीतयेत स्त्रीतिद्वारा सभार्यस्यामुक शर्मणोमम अद्यदिना दारभ्यसर्वापच्छांति पूर्वक दीर्घायुर्विपुलधन धा- न्य पुत्रपौत्राद्य वच्छिन्न संतति द्धिस्थिर लक्ष्मी कीर्तिशत्रुपरा जयसदभीष्टसिद्ध्यार्थस्वकीयोहाह लग्नगतदुर्ग्रहनिखिलदुरितदुः शकुनदौर्भाग्य दुर्नि मित्तदुः स्वप्न परकृताभिचारकादिजनित दुष्फलत्वशां त्युत्तर विवाहविध्ययथा वस्तुप्रति पादनजन्य सकलपापक्षयपूर्वकविश्वमंगलावाप्ति कामः एतन्नगरस्थित स्वदेशीय विदेशीय ब्राह्म- गााद्य धिकारि जनानां 'प्रत्येकं ॥वा एतन्न गरावस्थित ब्राह्मणानां प्रति गृहं ॥वा इदानी कालत आरभ्य 'सायं यावत् ॥ वा हर एक देशी विदेशी फेल्येि २मगर के ब्राह्मणों के घर अब मे संध्या तक

विवाह पद्धतिः
'अधुना येके च स्थिता अधिकारिणस्ता-
न्प्रत्येकं॥
एतत्परि मितम् १) रजतं वा ।।) अष्टनेत्र
परिमितं वा ।) चतुर्नेत्र मितं वा) हिनेत्र परि-
मितं वा-) एकनेत्र परिमितं वा ४) अर्डनेत्र
परिमितं दक्षिणा द्रव्यं अमुक दैवतं दातु मह
मुत्सृजे॥
गोशालार्थ दानम्
ॐ मद्येत्यादि० श्री लक्ष्मीनारायण प्रीतये
तत्प्रीति द्वारा सभार्यस्य ममअमुकशर्मणः सर्वा
पच्छांति पूर्वक धनसन्तान सुख समृध्यार्थ
एतद्देशस्थित गोशालार्थ एतत्परिमितं दक्षिणा
द्रव्यं दातु महमुत्सृजे ॥
अमुक स्थान स्थित अनाथालयाय इदं
दक्षिणा द्रव्यं ॥
'अमुक स्थान स्थित पाठशालायां प्राप्त
विद्यार्थि जनेभ्यः॥
वरः आसनो परितिष्ठेत
अथ भार्या कर्तृक दान संक०
ॐ मद्येत्यादि० पाणिग्रहण परतो भार्यया
स्वर्णदानं कर्तव्य मिति प्रमाण मनुमृत्य देशाचार
कुलरीतितश्च श्रीलक्ष्मीनारायण प्रीतये तत्प्रीति
१ जो इस वक्त मौजूद है २ अनाथालय को दान । ३पाउशाला को दान

विवाह पद्धति
५६
द्वारा समर्तृकाया अमुक देव्या मम निखिला
रिष्टनिरास पूर्वक सुखसौभाग्यधनसन्तान
समृध्यर्थ स्वर्णरक्तिकासमसंख्याकवर्षशता
वच्छिन्न स्वर्लोकवास कामनया एतत्परिमितं
सुवर्ण सपादमापं साईमापदयं पएमापपरिमितं
द्वादश मापपरिमितं वा सुवर्णमूल्योपकल्पितं
दक्षिणा द्रव्यं वा अमुक गोत्राया मुक्शर्मणे ब्रा०
दातु महमुमृत्सृजे कृतैतदक्षिणामपिदद्यात् ॥
अत्र भूयसी दक्षिणादानम्
तदाचारात् अस्मिन् समये वा हवनां ते
करणीयम् ॥
नाम करणम्
वरस्तां पत्नी पाणीगृहीत्वा पठेत
ॐ यदै पिमनसा दूरं दिशोनुपवमानोवा ॥
हिरण्वपर्णो वैकर्णः सत्वामन्मनसांकरोतु श्री
अमुकी देवी इति पठेत् ॥ पुनर्न ।
ततो वैदि दक्षिणस्यां दिशि उत्तरस्या वा
वारि पूर्णकलशं पुष्पाक्षतचंदन कुशाम्र पत्री-
पवि समन्वितं ऊध्वं तिष्ठती मोनिनः पुरुपस्य
स्कंधे अभिषेक पर्यंतं धारयेत् ।।

विवाह पद्धतिः परस्परं समीक्षेथामिति दाताबदेत वरः पठति- • अघोरचक्षुर पतिघ्न्येधिशिवः पशुभ्यः सुमनाःसुवर्चाः॥१॥ वारसूर्देव कामास्योनाशन्नो भवद्दिपदेशं चतुष्पदे ॥ डॉ सोमः प्रथमोविीवदे गंधर्वो विविद उत्तरः॥ तृतीयोग्निष्टपतिस्तुरीयस्ते मनुष्यजः ॥ २॥ उौं सोमोददद्गंधर्वायगंधर्वोदददग्नये। रयिंच पुत्रांश्वा दाद निर्मामथो इमाम् ॥ ३ ॥ डॉ सानः पूषाशिवतमामारय सानःउरू उशती विहर । यस्यामुशन्तः प्रहरामशेर्फ यस्यामुकामा बहवो निविष्ट्यै ॥४॥ ततो निंप्रदक्षिणी कृत्य पश्चादग्ने रहत वस्त्र वेष्टितं तृणा पूलकं कटं वानिवेश्य तदुपरिदक्षिण चरणं दत्वावधूं दक्षिणतः उपवेश्य स्वयमप्यु पविश्य संकल्पयेत् * मद्ये त्यादि० प्रति गृहीताया अस्यामा- र्यायाः पत्नी त्वसिद्धये वैवाहिकहोममहंकरिष्ये- एतद्दारा वा कारयिष्ये- १ वरअग्निकी प्रदक्षिणा कर अग्निके पश्चिमतर्फ वस्रवेष्टितं कुटीमुंभ पर दाहिना पादधरकर वैदे पत्नी को दक्षिण में वैगकर संकल्प करे २ यदि हवन औरसे कराना होतो यह विवाह पद्धतिः ततः पुष्प चंदन वस्त्र दक्षिणा आदाय ब्रह्माणं दृणुयात ॐ अद्यकर्तव्य विवाहहोमकर्मणि कृताकृता वेक्षण रूप ब्रह्म कर्मकर्तृत्वेन एभिः पुष्पाक्षता दिभिः अमुक गोत्रममुकशर्माणं ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृयो। वरण. सामिग्री दत्वातत्कर मूले कंकणं वध्वा तदंगुष्ठं गृह्णीयात् ब्राह्मणाः पठेत् वृतोस्मि ॥२॥ हतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम्॥ दाक्षिणा श्रद्धामाप्नोति श्रद्धयासत्य माप्यते ॥ यथा विहितं कर्म कुरु इतिदाता वदेत ॐ करवाणीति ब्राह्मणो वदेत् ततोन्यवरण संभृतिमादाय संकल्प *मद्य कर्तव्य विवाह होमकमणिकृताकृता वंक्षण रूप हवनकर्मकर्तृत्वेन एभिः पुष्पाक्षतादिभिः अमुक शर्माणं त्वामहं संयो॥ वरण सामिग्री ब्राह्मण करेदत्वाकंकणवध्वा ब्राह्मणांगुष्ठं गृहीयात् ॥ ततो ब्राह्मणः पठेत् वृतेनदीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् दक्षिणा श्रद्धा माप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते २ विवाहपदावर यथा विहितं कर्म कुरु-यजमान कहे अह कर वाणि-ब्राह्मण कहे अग्ने : दक्षिणतः शुद्ध मासनं धृत्वा तदुपरि प्रागग्रान कुशानास्तीर्य ब्रह्माणमग्निप्रदक्षिण क्रमेणानीयात्रत्वमेब्रह्माभवेत्यभिधाय उदङ्मुखं कल्पितासने समुपवेशयेत् ॥ ततः प्रणीता' पात्रं पुरुतः कृत्वा वारिणा परिपुर्य १६ कुशै राच्छाद्य ब्रह्मणो मुख मवलो क्यअग्नेरुत्तरतःप्रणीतापात्रंकुशोपरिनिदध्यात ततः परिस्तरणम् वहिपश्चतुर्थ भागमादाय आग्नेय्यादीशानां तं ४ ब्रह्मणो अग्नि पर्यंत ४ नत्याद्दायव्यातम् ४ अग्नितः प्रणीतापर्यंतम् ४ धारयेत- अग्नि से दक्षिण में शुद्धासन पर पूर्वाग्र कुशा रख कर ब्रह्मा को अग्नि की परिक्रमा करा कर तू मेरा ब्रह्मा हो, ऐसे कह उत्तर मुख ब्रह्मा को पेठ देवे। २ मणीता पात्र को आगे धर कर जल से भर कर १६ कुशा उनके ऊपर रख फिर ब्रह्मा को देख उस के सन्मुख अग्निके उत्तर कुशा पर रखे। ३मणीता पात्र के ऊपर वाली १६ कुशा में ४ कुशाऽनियोण से ईशान। 'पर्यंत ४ कुशा ब्रह्मा से अग्नि पर्यंत ४ कुशा नत्य से नायु कोण पर्यंत ४ कुशा अमि से प्रणीता पात्र पर्यन्त धारण करे पूर्वाग्र- विवाहपद्धतिः पश्चिमतः पूर्वे पूर्वे 'वस्तुधारणम् १ पवित्रछेदनार्थ कुशवयं २ पवित्र करणार्थ साग्रमनन्तरगर्भ कुशपत्र द्वयम् ३ प्रोक्षणी पात्रं ४ आज्य स्थाली ५ संमार्जनार्थ कुशेत्रयं ६ उप यमनार्थ वेणी रूपकुशत्रयं ७ समिधास्तस्रः ८ स्त्रुवः९ आज्यं १० पटपंचा शदुत्तर शतदयमुष्टि पूर्णतडलपूर्णपात्रंक्रमेणासादनीयम तस्यामेवदिशि अन्यवस्तू निधारयेत् शमीपत्रमिश्रालाजा-दृश- दुपलं कुमारी भ्राता दृढ़पुरुपः-अन्यान्युपयुक्ता निवस्तुनिधारयेत ततः पवित्र छेदन कुशैः पवित्रे छित्वा ॥ १-पश्चिम से पूर्व वस्तु रखे प्रम से अग्नि से उत्तर पश्चिम से पूर्व २ वस्तु रखे । परिनछेदनार्थ कुशा ३ पवित्र बनाने के लिये मध्य पत्र से रहित २ कुशा । २-मोक्षणी पात्र ३-घृतपाना ४-संमार्जनके लिये ३ कुशा। ५-उपयमन के लिये वेणी रूप ३ कुशा।६-छिड़े की ३ लकड़ी।७-सुव । ८घृत । ९-पूर्ण पात्र । १८-शमीपत्र से मिली हुई फुलियो । ११-पत्थर १२ कुमारी का भ्राता । १३-दृढ पुरुष और मी वस्तु रखे । २-पवित्र छेदन ३ कुशा मे पवित्र को छेदन कर मूल भाग छोड़ कर ऊपर वाले भाग मे पवित्रा यनारे पवित्र युक्त हाय मे प्रणीता के जल को ३ वार मोसणीपात्र में फेंके अनामिका अगुष्ठ से उत्तराय परिने लेकर ३ यार मोक्षणी जर को अपर फेंक मोक्षणी पात्र हाय में ले ३ वार जल ऊपर फैरे प्रणीना के जल में प्रोक्षणी प्रो.ण करे-प्रोक्षणी जल से वस्तु सींचे अग्नि प्रीता के माय में प्रोक्षणी रखे आज्य पात्र में घृन डाले-घृत तपावे विवाह पद्धतिः ततः सपवित्रकरण प्रणीतोदकत्रिः प्रोक्षणी पात्रे निधाय ॥ अनामिकां गुष्ठाभ्यां उत्तराग्रे पवित्रे गृहीत्वा ।। त्रिरुत्पवनम् ॥ ततः प्रोक्षणीपात्रस्य सव्यहस्तेकरणम् ॥ त्रिरुदिंगनम् ॥ प्रणीतोदकेन प्रोक्षणी प्रोक्षणम् ॥ प्रोक्षणीजलेनयथाऽऽसादित वस्तुसेचनम् ॥ ततोग्नि प्रणीतयोमध्ये प्रोक्षणी निधानस ॥ आज्यस्थाल्यामाज्य निर्वापः ततो- धिश्रयणं । ततोज्वलत्तृणादिनाहविर्वेष्ट यित्वा प्रदक्षिणक्रमेण वन्हौतत्प्रक्षेपः । ततः स्रुवप्रत- पनम्॥ सम्मार्जन कुशानामग्रैरंतरतामूलैवाह्यतः स्रुवसंमृज्यप्रणीतो दकेनाभ्युक्ष्यपुनः प्रतप्य सुवं दक्षिणतो निदध्यात्॥ 'तत आज्यस्याग्नेरवतारणम् । तत आज्ये फिर जलते ३ तृणों से घृत को वेष्टनकर प्रदक्षिण क्रम से अग्नि में डाले फिर सुर को तपाचे सम्मान कुणों के अग्रभाग से अंदिर मूलो से वाहिर को खुप को संमार्जन करे प्रणीता के जल से सुर को सीचे पुनः खुव को तपा कर दक्षिण हाथ की तर्फ धारण करे- १ फिर धृत को अग्नि से उतारे घृत को प्रोक्षणीवत् ऊंचा फेंके घृत निषिद्ध वस्तु होतो निकाले पुनः मोक्षणी वत् ऊंचा फेंके फिर उपयमन कुशा- ओं को लेकर उठखड़ा हुआ मजापति को मन से ध्यान करता हुआ विनामंत्र ३ छिछड़े की लकडी घृताक्त करके अग्नि में डाले फिर बैट पर पवित्र सहित मोक्षणी के जल से प्रदक्षिण क्रम से अग्नि को निचे प्रणीता पात्र में पवित्रा रख कर दक्षिण जानु पृथिवी पर लगा कर अग्नि को जा कर अमिका पूजन करे। . में .

६२ विवाह पद्धतिः प्रोक्षणी वदुत्पवनं ॥ अवक्ष्य सत्यपद्रव्ये तन्निर रसनम् ॥ पुनः प्रोक्षणीवत उत्पवनम ॥ तत उपयमन कुशानादाय । उत्तिष्ठन् ॥ प्रजापति मनसाध्यायन् ॥ तूष्णी मग्नौधृतातास्तिस्रः समिधः क्षिपेत् ॥ तत उपविश्य सपवित्र प्रोक्ष- ण्युदकेन प्रदक्षिण क्रमेणाग्निंपर्युक्ष्य ॥ प्रणीता पात्रे पवित्रं निधाय । पातित दक्षिणजानुः ॥ अग्निं प्रज्वाल्य पूजयेत्॥ ॐ आवाहयेतं पुरुपं महातं सुरासुरैरर्चित पादपद्मम् ॥ इंद्रादयोयस्य मुखे विशंति कुण्डे विशत्वं सुरलोकनाथ ॥१॥ अग्निंदूतं पुरोदधे हव्यवाह मुपत्रुवे॥ देवॉ आसादयादिह ॥२॥ तदे वाग्निस्तदा दित्यस्त वायुस्तदु चन्द्रमाः। तदेव शुक्रतद्ब्रह्मता आपः सप्रजापतिः॥३॥ अग्नयेनमः पाद्यादीनि समर्पयामि आग्निं संपूज्य पुनः॥ स्रुवं संपूजयेत् आवाहयाम्यहं देवं स्रुवं संसिद्ध मुत्तमम् ॥ स्वाहाकार स्वधाकार वपट्कार समन्वितम् ॥१॥ अष्टां गुलं त्यजेन्मूले अग्रेत्यक्त्वादशागुलम् ॥ कर्तव्यं गोपदाकारं दण्डस्याग्रेतु कंकणम्॥ इति सुव पूजनम् ॥

विवाह पद्धतिः
अथ कुशेन' ब्रह्मान्वारब्धः समिडतमेग्नो
स्रवेणा ज्याहुतीर्जुहोतितत्राघारादारभ्य द्वादशा-
हुतिषुतत्तदाहुत्यनंतरंखुवावस्थित हुतशेषघृतस्य
प्रोक्षणी पात्रे प्रक्षेपः॥
डों प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापये
न मम ' (इति मनसा त्यागमपि)
डों इंद्राय स्वाहा ॥ इदमिन्द्राय न मम २
इत्याघारौ (यह आधार संज्ञक है )
ग अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये न० ३
डों सोमाय स्वाहा ॥ इदं सोमाय न०४
इत्याज्यभागौ (यह श्राज्य भाग हैं)
डों भूः स्वाहा ॥ इदमग्नये न०५ डों
१ कुशा से ब्रह्मा के साथ अन्वारम्भ कर के अग्नि में सुबा से घृताहुति
दे उन में आधार संज्ञक १३ आहुति में हुतशेष घृत को प्रोक्षणी पात्र में फेंके
यहां पर कुशमय ब्रह्मा को बैठाते हैं वह यथा संभव साक्षात् ब्रह्मा हो या
कुशमय हो उसके साथ कुश ग्रंथि देकर लंबी कुशा वा मंगल सूत्र अपने जानु
के साथ रखे।
२ मनसा त्याग का मतलब न मम है इस लिए प्रत्येक आहुति के
साथ न मम कहना हम सिर्फ न० ऐसे संकेत लिखेंगे।
३ 0 प्रजापतये इत्यादि चतुर्माणां ब्रह्मा कपिर्यायी
उंदोमिदेवता होमे रिनियो.
४ जो व्याहतीनां जमदनि भरदान भृग व ऋपयो गायम्युष्णिगनुभ
छदांसि अनिर्वायुः म्यों देवता होमे विनिः

विवाह पद्धतिः भुवः स्वाहा ॥ इदं वायवे न०६ डों स्वः स्वा० ॥ इदं सूर्याय न मम ॥७॥ ऐता महा व्याहृतयः 'त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्य हेडो अवयासिसीष्ठाः। यजिष्ठोवन्हितमः शो- शुचानो विश्वाउपासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इद- मनी वरुणाभ्यांन०॥ सत्वन्नो अग्नेऽवमोभवोतीने दिष्ठो अस्या उपसो व्युष्टौ ॥ अवयवनो वरुण रराणो- व्रीहि मृडीक सुहवोनएधि स्वाहा ॥ इदमग्नी वरुणाभ्यां न मम ॥ 'डौं अाश्चाग्नेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्य- मित्वमयाअसि ॥ अयानोयज्ञवहास्ययानोधेहि- भेषज स्वाहा इद मग्नयेनमम ।। * येतेशतंवरुणयेसहस्रयाज्ञियाः पाशा- वितता महान्तः॥तेभिर्नो अद्य सवितोत विष्णु 1-जो त्वन्नोग्ने-सत्तन्नो-इति द्वयो मदेर ऋपि त्रिष्टुप् छन्दः अग्नि वरुणो देवते सर्व प्रायश्चित्त होमे विनियोगः २-ओं अयाश्वाने इत्यस्य वाम देव ऋपित्रिष्टुप्छन्दः अनिर्देवता सर्व प्राय- श्चित्त होमे विनि. ३-ओं ये ते गतमिति मंत्रस्य वामदेव ऋपि विष्ट उन्दः वाण सचित्रादिलि- गोक्ता देवताः सर्व प्रायश्चित्त होमे विनि.

१ विवाह पद्धतिः विश्वे मुंचन्तु मरुतः स्वर्काः स्वा०॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वकें भ्यश्च न मम ॥११॥ डॉ उदुत्तमं वरुण पाशमस्मदवाधम विमध्य म श्रथाय ॥अथा वयमादित्य व्रतेतवानागसो अदितये स्याम स्वा० इदं वरुणाय न० ॥१२॥ ततोऽन्वारंभ विना डों प्रजापतयेस्वाहा। इदं प्रजापतये न०१३ डॉ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा ॥ इद मनये स्विष्ट कृते नमम १४ उदकोप स्पर्शनम्. ॥ एताः सर्वाः प्रायश्चित्तसंज्ञकाः॥ ॥ अथराष्ट्रभृद्धोमः ॥ डों ऋतापाट् ऋतधामा ग्निगंधर्वःसन इदं ब्रह्म क्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा वाट् इदमृत साहे '-ओं उदुत्तममि त्यस्य शुनाशेफ ऋपित्रिष्टुप् छन्दः वरुणो देवता वारणी य पाशोन्मोके होमे विनि. २ यहां प्रणीता के जल को स्पर्श करे, जहां उदकोपस्पर्शन लिखा हो वहां प्रणीता के जल को स्पर्श करना । ३ राष्ट्रभृत्संज्ञकानां तापा डित्यादि द्वादश मंत्राणां विश्वेदेवा ऋषयः पुजुष्टान्नछंदो नियमास्वस्वमंत्रोक्त गुण विशिष्ट गंधर्वाप्सरसो देवता आम्यहो पे विनियोगः।

६६ विवाहपद्धतिः ऋतधाम्ने ऽनये गंधर्वाय ॥ नमम ॥ १॥ डॉ ऋतापाइ ऋतधामाग्निगंधर्वस्तस्यौ पधयो ऽप्सरसो मुदोनामताभ्यः स्वाहा इदमोप विभ्यो ऽप्सरोभ्यो मुदभ्यः न०२ सहितो विश्व सामा सूर्यो गंधर्वः सनइदं ब्रह्म क्षत्रपातु तस्मै स्वाहा वाद ॥ इद सहिताय विश्व साम्ने सूर्याय गंधर्वाय न०३ डॉ सहितोविश्वस्वामा सूर्यो गंधर्वस्तस्य मरीचयो ऽप्सरस आयुवो नामताभ्यः स्वाहा ।। इदमरीचिम्यो ऽप्सरोभ्य आयुवोभ्यः॥ न०४॥ उरों सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चंद्रमा गंधर्वः सनइदंब्रह्म क्षत्रं पातुतस्मै स्वाहा । वाट् ॥ इदं सुषुम्णाय सूर्यरश्मये चंद्रमसे गंधर्वाय न०॥ ५ ॥ डों सुषु म्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गंधर्वस्तस्य नक्षत्राण्य प्सरसो भेकुरयो नामताभ्यः स्वाहा ।। इदंनक्षत्रे भ्योप्सरोभ्योमेकुरिभ्यः न० ॥६॥ इपिरो विश्वव्यचावातो गंधर्वः सन इदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मैस्वाहा ॥ वाट् ॥ इदमिपिरायविश्वव्यच सेवाताय गंधर्वाय न० ॥ ७॥इपिरोविश्वव्य चावातो गंधर्वस्तस्यापो ऽप्सरस ऊों नामता विवाह भ्यः स्वाहा। इद मद्भ्यो ऽप्सरोभ्य ऊभ्यःन. ॥८॥ों भुज्युः सुपर्णोयज्ञो गंधर्वः सन इदं ब्रह्मक्षत्रं पातुतस्मै स्वाहा ॥ वाट् । इदं भुज्यवे सुपर्णाय यज्ञायगंधर्वायन० ॥ ९॥ ॐभुज्युः सुपर्णो यज्ञो गंधर्वस्तस्य दक्षिणा अप्सरसः स्ता वानामताभ्यःस्वाहा ॥ इदं दक्षिणाभ्यो प्सराभ्यः स्तावाभ्यान० ॥१०॥ ॐ प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनो गंधर्वःसन इदं ब्रह्मक्षत्रं पातुतस्मै स्वाहा॥ वाट् ॥ इदं प्रजापतये विश्वकर्मणे मनसे गंधर्वा- यन० ॥११॥ॐ प्रजापति विश्वकर्मा मनोगंध- वस्तस्थ ऋक् सामान्यप्सरस एष्टयो नामताभ्यः स्वाहा ॥ इदमृक् सामभ्योऽप्सरोभ्य एष्टिभ्यःन. ॥१२॥ इति राष्ट्रभृत होमः ॥ अथजया संज्ञक होमः ॐ 'चित्तंच स्वाहा इदं चित्तायन ॥१॥ ॐ चित्तिश्च स्वाहा ॥ इदं चित्यैन ॥२॥ ओं आकूतंच स्वा० । इदमाकूतायन० ॥३॥ ओं आकूतिश्च स्वा० ॥ इदमा कूत्यैन० ॥४॥ ओं विज्ञातंच स्वाहा ॥ इद विज्ञातायन०॥५॥ जया संज्ञकानां चित्रं चेत्यादित्रयो दशानां विषेदेवा पयः पनु- छान्न छन्दो नियमः, मयम पदोक्ता देवता आज्य होमे विनिः ।

६८ विवाह पद्धतिः ओं विज्ञातिश्च स्वाहा ॥ इदं विज्ञात्यनः ॥६॥ ,ओं मनश्च स्वाहा ॥ इदमनसेन० ॥ ७ ॥ ओं शक्कर्यश्च स्वाहा ॥ इदशक्करीभ्यः न० ॥ ८॥ओं दर्शश्च स्वाहा ॥ इदंदर्शाय न० ॥९॥ ओं पौर्णमासंच स्वाहा ॥ इदं पौर्ण- मासायन० ॥१०॥ओं वृहच्च स्वाहा। इदंबहते न० ॥११॥ओं रथंतरं च स्वाहा । इदं रथंतरा- यन०॥ १२॥ओं प्रजापति जयानिंद्राय वृष्णे प्रायच्छदुग्रः पृतना जयेषु तस्मैविशः समनमंत सर्वाः सउग्रः सइहव्यो बभूव स्वाहा ॥ इदं प्रजा- पतयेनमम ।। १३ ॥ इति जया संज्ञकहोमः ।। अथाभ्यातान होमः औं' अग्नि भूताना मधिपतिः समावत्व स्मिन् ब्राह्मण्यास्मिन् क्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यां पुरो धायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या ७ स्वाहा । इद मग्नये भूताना मधिपतये नमम ॥ ओं इंद्रोज्यष्टानामधिपतिःसमावस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्झनेस्यामा शिष्यस्यां पुरोधायाम स्मिन् कर्मण्यस्यां देवहत्यां स्वाहा।इदमिन्द्रा- ' अभ्यासान मंडराना अग्नि नाना पियादि अष्टादमानो विपदेवा अस्य यमुष्टामदो नियमा प्रथम पदाता देवना आग्य होमे विनियोगः।

विवाह पद्धतिः यज्येष्ठानामधिपतयेनमम ॥२॥डायमः पृथिव्या अधिपतिःसमावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽस्या माशिष्यस्यांपुराधायामस्मिन् कर्मण्यस्यांदेवहूत्या स्वाहा॥इदंयमायप्रथिव्याअधिपतयेनमम॥३॥ अत्र प्रणीतोदकस्पर्शनम् डों वायुरंतरिक्षस्याधिपतिः समावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यांपुरोधायाम स्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा ॥ इदंवाय वेंऽतरिक्षस्याधिपतयेनमम ॥४॥ डों सूर्यों दिवाअधिपतिः समावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायाम स्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्याणस्वाहा ॥ इदं सूर्या यादिवाअधिपतये ॥५॥ डों चंद्रमानक्षत्राणामधिपतिःसभावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यां पुरोधायाम स्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा ॥ इदंचंद्रमसे नक्षत्राणामधिपतयेन ॥६॥ ओं वृहस्पतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिःसमावत्वस्मि न ब्रह्मण्यस्मिन् तत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधा- याम स्मिन्कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहाइदं वृह- मणीता के जल का स्पर्श करे ७० विवाह पद्धतिः स्पतयेब्रह्मणोधिपतयेन० ॥७॥ औं मित्रः सत्यानामधिपतिः समावत्व स्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेस्यामाशिष्यभ्यांपुरोधा यामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा ॥ इदै मित्राय सत्यानामधिपतयेन l ओं वरुणोऽपामधिपतिः समावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यां पुरोधाया मस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा ॥ इदं वरु- जायअपामधिपतये न०॥९॥ ओं समुद्रः स्रोत्यानामधिपतिः समावत्व स्मिन् ब्रह्मण्य स्मिन् क्षत्रे श्यामा शिष्यस्यां पुरो धायाम स्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा।। इदं समुद्रायस्रोत्याना मधिपतयेन ॥१०॥ * अन्नं साम्राज्यानामधिपतिः समा- वत्तस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा ।। इदमन्नायसाम्राज्यानामधिपतये न मम ॥11॥ * सोमओपधीनामधिपतिः समावत्व- स्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रे ऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या स्वाहा ॥ इदं सोमायोपधीनामधिपतये न० विवाह पद्धति ॥१२॥ओं सविता प्रसवाना मधिपतिःसमावत्व- स्मिन ब्रह्मण्यस्मिन् भत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरो धायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या ७ स्वाहा। इदं सवित्रे प्रसवानामधिपतयेन० ॥ १३॥ ओं रुद्रः पशनामधिपतिःसमावस्वस्मिन् : ब्रह्मण्य- स्मिन् क्षत्रेऽस्यामाशिष्यस्यां पुरोधोयामस्मिन कर्मण्यस्यां देवहूत्या ७ स्वाहा ॥ इदं रुद्राय पंशुनामधिपतयेन ॥१४॥ अत्र प्रणीतोदक स्पर्शनम् प्रणोता के जल को स्पर्श करे। डॉ त्वष्टारूपाणामधिपतिः समावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रेऽस्यामाशिष्यास्यां पुरोधायाम स्मिन् कर्मण्यस्यांदेवहूत्या स्वाहा ॥ इदं त्वष्ट रूपाणामधिपतये न० ॥ १५॥ डॉ विष्णुः पर्वतानामाधिपतिः समावत्यस्मिन् ब्रह्मण्य- स्मिनक्षत्रे स्यामाशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहूत्या ७ स्वाहा ॥ इदं विष्णवे पर्वतानामधिपतयेन० ॥ १६॥ ओं मरुतो गणाना मधिपतय स्तेमावंत्वस्मिन्ब्रह्मण्य- स्मिन् क्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन कर्मण्यस्यांदेवद्वत्या ७ स्वाहा ॥ इदमरुद्भ्यो विवाह पद्धतिः गणाना मधिपतिभ्यःन०||१|| ओं पितरः पिता महाः परेऽवरेततास्ततामहाइहमावंत्वस्मिन्ब्रह्मण्य स्मिन क्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यांपुरोधायामस्मिन कर्मण्यम्यां देवहूत्या ७ स्वाहा ॥ इदं पितृभ्यः पितामहेभ्यः परेभ्योवरेभ्यस्ततेभ्यस्ततामह- भ्यःन० ॥ १८॥ अत्र प्रणीतोदक स्पर्शनम् यदि हवन कर्ता ऽन्यः पुरुषः स्यात्तर्हि स्व यं पंचा हुतीर्वरो जुहुयात्। अथाज्यसंज्ञकहोमः ॐ आग्नि स्तुप्रथमो देवताना सौस्यै प्रजा मुंचतु मृत्यु पाशात्। तदय ७ राजावरुणो नुम न्यतां यथेय ७ स्त्री पौत्रमघनरोदात् स्वाहा ॥ इदमग्नये न० ॥१॥ों इमामग्नि स्त्रायतांगाहप त्यः प्रजामस्यै नयतुदीर्घमायुः अशुन्योपस्था जीवतामस्तुमाता पौत्रमानंद मभिप्रबुध्यता मिय १७ स्वाहा ।। इदमग्नये न०॥२॥ १ पद्धति यों में इसी मन्त्र से कही २ परवधू के मध्य में वस्त्र तानना लिखा है ।। यदि हवन करने वाला दूसरा हो तो यह ५ आहुति आप वर करे मंत्र पढ़े ॥ २ ॐ अनिरंतु इत्यादि चतुर्मनाणां प्रजापतिः ऋषिविटुप्छदः मत्रोक्ता देवता आज्यहोमे विनियोगः- । विवाह पद्धति डों स्वस्तिनो ऽग्नेदिवा पृथिव्या विश्वानि- धेह्ययथायजत्रा॥ यदस्यां महिदिवि जातंप्रशस्तं तदस्मा सुद्रविणधेहिचित्र स्वाहा। इदमग्नयेन०३। डों सुगन्नुपंथाप्रदिशन्नएहिज्योतिष्मदेह्य जरन्न आयुः ॥अपैतुमृत्युरमृतंन आगाद्वैवस्वतो • नो अभयंकृणोतुस्वाहा ॥ इदमग्नयेन ॥४॥ पद्धतिष्वस्मिन्मत्रेऽतर्पट विधिः ओं परंमृत्योअनुपरेहिपंथायस्तेऽन्य इतरी देवयानात् ॥ चक्षुष्मते शृण्वते तेब्रवीमिमानः प्रजा रीरिषो मोतवीरान्स्वाहा ॥ इदं वैव स्वताय न०॥६॥ प्रणीतोदकस्पर्शः। अत्र प्राङ मुखौवधूवरी-वरांजलि पुटोपरि संलग्नवध्वंजली शूर्पस्थित घृताभिघारितशमीपत्र मिश्र लाजानु वधूभ्राता प्रक्षिपति वधूर्वरांजलौ प्रक्षिपति वरः जुहोति। डों अर्यमणंदेवंकन्याअग्निमयक्षत ॥ सनो- १ पद्धति यों में इसी मंत्र से वर वधूके मध्य में यत्र तानना लिखा है । २ डों परं मृत्यो इति मंत्रस्य सकर्पण ऋपि त्रिष्टुप्छदः मृत्युदेवता आज्य होमे विनि। ३ शूर्प (ऊनली) में घृता भिधारित शमीपत्र और फुलियां हों। ४-जो अर्यमण मित्यादि मंत्राणां दध्यड्डा थर्पण ऋषिः अनुष्टुपछंदः अमिदेवता आज्यहोमे विनि० ७४ विवाह पद्धतिः ऽयंमादेवः प्रेतो मुंचतु मापतेः स्वाहा ॥ इद मर्यम्णे न०॥5॥ इयंनार्युपवते लाजानावपं- तिका । आयुष्मानस्तु मेपतिरेधंतांज्ञातयोमम स्वाहा ॥ इदमग्नयेन ॥२॥ डॉ इमल्लाजानावपाम्यग्नोसमृद्धिकरणंतव। ममतुभ्यंचसंवननंतदीग्रनुमन्यतामियणस्वाहा॥ इदमग्नयेनमम ॥३॥ ततोवरः सांगुष्टवधूदक्षिणहस्तंगृहीत्वा मंत्रपठेत् डों गृभ्णामितेसौभगत्वाय हस्तंमया पत्या जरदष्टियथासःभगोर्यमासविता पुरंधिर्मांत्वादुर्गा हयत्याय देवाः॥१॥ अमोहमस्मिसात्व सात्व मस्यमोऽहं सामाहमस्मिऋक्त्वंद्योरहंटाथिवीत्वम् ॥२॥ तावेवविवहावहैसहरेतोदधावहैप्रजांप्रजन- यावहै पुत्रान्विद्यावहैवहून ॥३॥ तेसंतुजरदष्टयः संप्रियौरोचिष्णूसुमनस्यमानी । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदःशतं शृणुयामशरदःशतम् ।। वर पूर्व मुख होय पूर्व रखे पत्थर परे वधू को दक्षिणपाद से चढ़ावे। रों आरोहेममश्मान मश्मेवत्वणस्थिराभव ।। , फिर वर अंगुष्ट सहित वधू का दक्षिण हाथ पकड़ कर मंत्र पढे। २-नों आरोहे ममित्य स्याथर्वण ऋपि रनुष्टुप्छदः बघूदेवता अश्मा रोहणे विनियोगः।

विवाह पद्धतिः अमितिष्ठटतन्यतोऽववाधस्व पृतनायतः ॥३॥ वधू पत्थर पर पांव रखे तब वरे मंत्र पढ़े। डों सरस्वती प्रेदमवसुभगे वाजिनीवतीयां खा विश्वस्य भूतस्यप्रजायामस्याग्रतः ॥ यस्यां भृतसमभवद्यस्यां विश्वमिदंजगत् । तामद्यगा थांगास्यामि यास्त्रीणामुत्तमं यशः ॥१॥ फिर आगे वधू पीछे वर प्रणीता ब्रह्मासहित अग्नि को परिक्रमा करे। उगे तुभ्यमग्नेपर्यवहन् सूर्या वहतुनासह ।। पुनः पतिभ्योजायांदाग्ने प्रजया सह ॥१॥ एवं सर्वकर्म-लाजाहोम सांगुष्ठ हस्त ग्रहणा श्मारोहण गाथागानाग्नि प्रदक्षिणानि पुनर पिद्दि स्तथैव कर्तव्यानि एतेन नवलाजाहुतयः सांगु- ष्टहस्त ग्रहणत्रयंच संपद्यते॥ तत तृतीय परिक्रमांते आसन विपर्य- यःकार्यः ॥ ततो भ्रातृदत्तलाजाभिर्वधूर्जुहोति ।। १-ौं तुभ्यमग्ने इति मंत्र स्याथर्वण ऋषि रनुष्टुप्छंदोअनिर्देवता परि- झमणे विनियोगः २ऐसे लाजाहोम सांगुष्ठ हस्त ग्रहण अश्मा रोहण गायागान अनि प्रदक्षिणा दो बार ऐसे करे इस से ६ लाना होम हस्तग्रहण ३ होते है। ३ तीसरी परिक्रमा के अनन्तर वधू के स्थान वर और घर के स्थान पर बधु बैठे।

विदाईपटांत ॐ भगाय स्वाहा ॥ इंदभगायन ततश्चतुर्थ परिक्रमणस्वस्थानेस्थित्वा वरोजुहोति ओं ग्रेजापतये स्वा० । इदं प्रजापतये न० १ ततं आ लेपनेनो त्तरकृत सप्तमण्डले सप्त पदा क्रमण वरः कारयेत॥ १ ॐएकमिपे विष्णुस्त्वानयतु धन धान्यंचमिष्टान्नंव्यंजनाचंच यद्गृहे ॥ मदधीनं च कर्तव्यं वधूराद्यपदेऽब्रवीतं १ यहां- सुख दुःखांनि सर्वाणित्वयासहवि भुज्यते॥ यत्र त्वंतदहत्वकन्यकैकंपदेऽब्रवीत ॥ २ ॥ २ॐ हे ऊर्जे विष्णुस्त्वा नयतु कुटुंबै पालयिष्यामि तेसदामंजुभाषि- जी॥ दुःखें धीरां सुखे हृष्टा द्वितीये सा ब्रवी- दरम् ॥१ ३ उ त्रीणिरायस्पोपायविष्णुस्त्वानयतु ॥ ऋतौकालेमुचिःनाताक्रीडयामित्वयासह ॥ १ भाई से टीराजा हुति परे कोण से वधू आहुति दे २ आगे वर पीछे वयू चुपचाप चतुर्थ प्रदक्षिणा पर अपने २ आसन पर पेटें घर मा मे कुभारभ कर फे घृत मे हवन करे हुत शेष प्रोक्षणी में राले। १-पटरे पर ७ हल्दी मंडल करके सप्त पढी करे ।

विवाह पद्धतिः नहिपरंपतियाया तृतीयेसाब्रवीदरम् ॥ १ ॥ भर्तुर्भक्ति परा नित्यं सदैव प्रियवादिनी ॥ मविष्यामि पदेचैव तृतीये साऽब्रवीदरम् ॥२॥ ४ ॐ चत्वारिमायोभवायविष्णुस्त्वानयंतु लालयामि च केशांतं गंधमाल्यानुलेपनैः।। कांचनै भूपणे स्तुभ्यं तुरीयेसाऽब्रवी दरम।।१॥ आर्ते मुदितेदृष्टाप्रोपितेमलिनाकृशा ॥ मृतेचैव मरिष्यामि साचतुर्थे पदेऽब्रवीत ॥२॥ ५ पंचं पशुभ्यो विष्णुस्त्वा नयतु । सखी परि तानित्यं गौर्याराधनतत्परा ॥ त्वयिभक्ता भविष्यामि पंचमेसाऽब्रवीदरम् ॥ ॐ षट् ऋतुभ्यो विष्णुस्त्वा नयतु ६ यज्ञे होमे च दानादौ भवेयंतववामतः॥ यत्रत्वं तत्रतिष्ठामि पदेषष्ठे ऽब्रवीदरम् । १ यद्दा त्वयाहं संयुतानित्यं नापिवंच यितुंक्षमा॥ उभं- योः प्रीतिसंभूतिः पदेषष्ठेब्रवीदरम्॥२॥ ७ औं सखेसप्तपदा भवसामामनुव्रताभव विष्णुस्त्वानयतु ॥ १ होमयज्ञादिंदानेषु भवतश्चसहायिनी ॥ धर्मार्थ कामकार्येषु सप्तमे साब्रवीदरम् ॥ यहा- सहसखाचनौ विष्णुर्ममत्वंभर्तृतां व्रज | ब्रह्मणा विवाह पद्धतिः कृतपूर्वेण विधानेन कुलोत्तम ॥ ॥ वरवाक्यम्॥ ॐ मदीयचित्ता नुगतंचचित्तं सदामदाज्ञा परिपालनंच ॥ पतिव्रताधर्म परायणात्वकुर्याः सदा सर्वमिदं प्रयत्नात् ॥७॥ इति सप्त पदी विधानम् ततो वर उपविश्य पुरुष स्कंधे स्थिताकुं मादाम्रपल्लवेन जलमानीय तेनैववधूं मूईन्य भिपिंचेत- * आपः शिवाःशिवतमाःशान्ताःशान्त तमास्ते कृण्वंतु भेषजम् १ । फिर और जल लेकर वधू औरअपने पर सिंच डों प्रापो हिष्ठामयो भुवः १ डों तान ऊर्जे दधातन २ ® महेरणायचक्षसे ३ डों योवः शिव तमोरसः ४ डॉ तस्यभाजयतेहनः ५ों उशती रिव मातरः ६ों तस्मा अरंग मामवः७ डों य स्य क्षयायजिन्वथ८ ग आपोजनयथाचनः१० १फिरवर घेट र पुरुषकंध पर स्थित कुंभ से आम्रपत्र से जललेकर वयूके मस्तक पर सिंच २ जो आपा भिवा इति मंत्रस्य मनापनि ऋपिायजुः उदाआपोदेवता मानने विनि योगः ३ जो आपोरिष्ठे त्यादि पृत्स्य सिंधुद्वीप अपि गायत्रीछंदः आपो देव ता मानने तिनि०१४ पृथिवी पर सिंन । अपने उपर सिंचे।

७३
विवाह पद्धतिः
यदि दिन में विवाह होतो सूर्य को देख ऐसे वर कहे
सूर्यउदीक्षस्वेति संवोधयति वधूमंत्रं पठित्वा
सूर्यपश्येत् ॥
ओं तचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् पश्येमश
रदः शतजीवम शरदः शत शृणुयाम शरदः
शतंप्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः
शतम्भूयश्च शरदः शतात ॥
रात्री विवाहश्चेत् । ध्रुवंउदीक्षस्वशति संवोध
यति वरः ॥ वधूम॑त्रं पठित्वा ध्रुवपश्येत्।
डों ध्रुवमसि ध्रुवं त्वा पश्यामि ध्रुवधि पो
ष्यामायमह्यं त्वादादृहस्पतिर्मया पत्याप्रजावती
संजीव शरदः शतम् २
अर्थ वरो वधू दक्षिणांसस्योपरिहस्तंनीत्वा
तस्या हृदयमालभेत ॥
१ कन्या मंत्र पढे वा उस के स्थान वर वा आचार्य ।
२ जो तच्चक्षुः इति मंत्रस्य दध्यढाथर्वण ऋपिरसरातीतपुर उणिक
छंदा मूर्यो देवता सूर्य दर्शने विनियोगः ।
३ यदि रात्रि में विवाह हो तो वर कहे ध्रुवकोदेख-बघूध्रुव को देखे ।
४ डों ध्रुवमसीतिमत्रस्य परमेष्ठी ऋपिः पंक्तिः छन्दः मजापतिर्देवता
ध्रुवदर्शने विनियोगः।
५-चर वधू के कंधे पर हाथ लेजाकर पुनः हृदय को स्पर्श करे।
।

विवाह पद्धति ही लिखा गया सिर्फ जहां से हवन को रम होता है उस ही प्रकार को लिखा गया है यदि चतुर्थ रात्रि में विधान चतुर्थी कर्म कराना हो तो-विद्धान भिन्न चतुर्थी कर्म पद्धति के अनुसार करायें ॥ यदि चतुर्थी कम नकराना हो तो भी. गे का कार्य पृष्ठ से पूर्णपात्र दानादि-कर्म करना , अथचतुर्थीकर्म ॥ युग्मकाष्ठोपरिवरउप- विशेत् । भर्जित तण्डुलान् प्रणतिाजलेन प्र- क्षाल्य पुनरन्यपात्रेदुग्धेपाचयेत-सिद्धेपाकेउत्तार्य पवित्रेण त्रिरुदिंगनम् : पृथूकदकपात्रं (प्रणीता' पात्र) अग्नरुत्तरतः संस्थाप्य स्थालीपाकं खपुर तो निदध्यात् ॥ ' मु प्रतिज्ञा संकल्प IT T' ॐ मद्येत्यादि० अमुक शर्मणो ममास्या भार्यायाः सोम गंधर्वाग्न्युपभुक्तदोष परिहारार्थं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थ विवाहांगभूत कर्तव्य चतुर्थी कर्माहं करिष्ये ॥ ब्रह्म वरणं तथा होतृवरना * मद्योत० अमुक शर्मणो ममाविवाहां- १हलपनाली परबर बैठे फुलियां मणीता के जल से धोकर और पात्र में दूध में पकावे. फिर उतार कर पवित्र से ३ वार; ऊपर फेंके फिर प्रेणीता पात्र को अग्नि के उत्तर रखे फुलियां वाला पात्र अपने आगे रखे । '२ पुनः प्रतिज्ञा संकल्प करे, ३ ब्रह्मा तथा दाता का वरण करे अथवा पूर्वकल्पित ब्रह्मा तथा होती .. . की पूजा करें।

विवाह पद्धतिः गभूत चतुर्थी होमकर्मणि कृताकृतावेक्षण रूप ब्रह्मकर्मकर्तुं ब्राह्मणं त्वामहं वृणे तथा चहोतृकर्म कर्तृत्वना मुकशर्माणं ब्राह्मणं त्वामहंणे वृतो- स्मीति प्रतिवचनं॥ कुशा से ब्रह्मा से भन्वारंम करे माहुति शेष प्रोक्षणी में डरे । ओं प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतये नमम ॥१॥ ओं इंद्राय स्वाहा। इदमिंद्राय न० ॥२॥ इत्याघारौ ॥ओं अग्नये स्वाहा ॥ इदमग्नये न० ॥३॥ओं सोमाय स्वा० ॥ इदं सोमाय न०॥४॥ इत्या ज्यभा०॥ घृत की ५ याहुति करे और शेप प्रोक्षणी पात्र में डारे ब्रह्मा से अन्वारंभ न करे। औं अग्ने प्रायश्चित्ते त्वं देवानां प्रायश्चित्ति- रसि ब्राह्मणस्त्वानाथकाम उपधावामियास्यै पति नीतनूस्ता मस्यै नाशय स्वाहा ॥ इदमग्नये नमम ॥१॥ डॉ वायो प्रायश्चित्ते त्वंदेवानां प्रायश्चित्ति रासि ब्राह्मण स्वानाथकाम उपधावामियास्यै प्रजानी तनूस्तामस्पै नाशयस्वाहा ॥ इदं वायवे न० ॥२॥ डों सूर्यप्रायश्चित्ते त्वंदेवानांप्राय श्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वानाथकाम उपधावामिया विवाह पद्धति स्यै पशुम्नी तनुस्तामस्यैनाशय स्वा० ॥ इदं सूर्याय न० ॥ ३ ॥ डों चंद्रप्रायश्चित्तेत्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मण स्वानाथकामउपधावा मि यास्यै गृहन्नी तनूस्तामस्यैनाशय, स्वाहा ॥ इदं चंद्रमसेन ॥४॥ों गंधर्व प्रायश्चित्ते त्वं देवानांप्रायश्चित्तिरसिब्राह्मणस्त्वानाथकाम उप- धावामियास्यैयशोनी तनुस्तामस्य नाशय स्वा०॥ इदंगंधर्वाय न०५। फुलियां को तप्तकरे फुलियां से १ आहुतिकरे जो प्रजापतये स्वाहा ॥ इदं प्रजापतयेन०६ फिरब्रह्मासे अन्वारब्ध हो सातवीं माहुति घृत फुलियां से करे ओं अग्नयेस्विष्टकृतेस्वाहा॥इदमनये स्विष्टकृतेन:७ फिर ६ पाहुति घृतसे करे हुतशप प्रोक्षणीमें डारे ब्रह्मासे अन्यारंभकरे ओं भूःस्वाहा ॥ इदमग्नयेन०१ ओं भुवःस्वाहा इदं वायवे न ० २ ओं स्वःस्वाहा। इदं सूर्याय न. ३ओं त्वन्नो अग्ने वरुणस्य विहानदेवस्यहेडो अवया सि सीष्ठाः ॥ यजिष्ठो वन्हितमःशोशुचा नो विश्वादेषासिप्रमुमुग्ध्यस्मत्वा ०॥ इदमग्नी वरुणाभ्यां न०॥४॥ डों सत्वन्नोअग्नेऽवमोभवोतीने दिष्ठोअस्या विवाह पद्धतिः उपसोन्युष्टौ ॥ अवयक्ष्वनो चरुणु रराणो ब्रीहि मृडीकाहबोनएराधिस्वा ॥इदमनयेन: ॥५॥ डों अयाश्चाग्नेस्यनभिशस्तिपाश्चसत्यमित्वमयाअसि॥ अयानोयज्ञवहास्ययानो धेहिभेज स्वा०॥ इदसंग्नयेन०॥६* येते शतंवरुणये., सहस्र- यज्ञियाःपाशाविततामहान्तः । तेभिर्नो अद्यस वितोवविष्णुर्विश्वे मुंचंतुमरुतःस्वाः स्वामी इदं वरुणायसावित्रविष्णवे विश्वेभ्योदेवेभ्यो मरुद्भ्यः स्वभ्यान,०॥७॥डॉ. उदुत्तमंवरुणपाशमस्म दवाघमं विमध्यम::श्रयायः॥ अथावयमादित्य व्रतेतवानागसो अदितयेस्याम स्वाहा ॥ इदंवरु: "णाय नमम ॥८॥ । प्रजापतये स्वा. इंदं प्रजापतयन:॥8॥1 फिरे सवे से उस वृत को सूंघे भाचमन करके ब्रह्मा होता ऋत्विजनों को पूर्ण पात्राचा दक्षिणा/दे:::::: जोमद्यकृतैतविवाह कमांगभूतचतुर्थी होम कणि कृताकृतावेक्षणारूपब्रह्मकर्म.प्रतिष्ठार्थमिदं पूर्णपात्रं प्रजापतिदैवतं. अमुकगोत्रायामुकशर्म णे ब्राह्मणांया दक्षिणां तुभ्यमहसंप्रददे एवमन्ये भ्योपिदद्यात्॥ तितास्वस्तीविप्रतिवचनं ब्राह्मणाःवदतु ॥ v

विवाह पद्धति
ततोब्रह्मग्रंथिविमोकः
ब्रह्मा की गांठ छोड़ें
ततआम्रपल्लवेन प्रणीताजलेनवरः स्वशिर
सिमार्जयेत
प्रणीता के जल से भापत्र से अपने सिरपर सीचे
'ओं मुमित्रियान आपओषधयः सन्तु ॥
फिर प्रणीता पत्रि को ईशान्य' में उलटा करे मन्त्र ।
ikऔदुर्मित्रिया स्तस्मै संतु योऽस्मन्दृिष्टि
यंचवयंहिष्मः इति ॥
फिर जो पूर्व ४६ कुशा औरंतरण की थी उन्हें उठाकर
घृत से मिलाकरहिाथ सेहवन करे ।। . . ?
ओं देवागातु-विद्रोगातुं विवागातुमित ॥
मनसस्पत इमदेवयज्ञ स्वाहा बातेधाः स्वाहा ॥
इदं वाताय नमम ।।
वर जल लेकर पान के पत्र से वधू के सिर पर अभिषि-
ओं याते पतिनी प्रजानी, पशुघ्नी गृहन्नी
यशोनी निंदितातनूर्जारनी तंत एनां करोमि
१-यो समित्रियान् इति मन्त्रस्य विश्वामित, ऋषिः अनुष्टुप्दा मित्रो
देवता मार्जने विनि
'ओं देश इति मनसस्पतिः अपि पिराट् छन्दः वायुदेवता यहिहोंगे
नियोगः।
चन करे।
ए
11
।
f
।

विवाह पद्धति साजीर्यतं मयासह- श्रीअमुकी देवी इति। वर फुलियां में से थोडी २ चरु वधू को खोवे । ॐ प्राणैस्तेप्राणान्संदधामि ॥१॥ ॐअ- स्थिमिस्ते अस्थीनिसंदधामि ॥३॥ ओत्वचाते त्वचंसंदधामि ॥४॥ वर वधू के हृदय को स्पर्श कर के मन्त्र पढ़े। ऑयत्तेसुशीमे हृदयदिवि चन्द्रमसिश्रियम् वेदाहं तन्मांतद्विद्यात॥ पश्येमशरदः मशरदःशत ७ शृणुयाम शरदःशतम् ॥ यदि चतुर्थी कर्म किया हो तो पागे पृष्ट ८५ से पूर्णाहुति ततो ब्रह्मणेपूर्णपात्रं दद्यात् ओं मधेत्यादि कृतेतबिवाह है कृता कृतावेक्षणरूप ब्रह्मकर्म त. पात्रं सोपकरणं प्रजापतिदैवतं । शर्मणे ब्राह्मणाय मा ऐसे होता आचार्य ऋतिक जनों को . दान करे में स्वस्तिऐसे ब्राह्मण कहें वर पवित्र सहित प्रणीता के जलसे अपने डों सुमित्रियान आपओपधयः

विवाह पद्धति
फिर प्रणीता पात्र को इशान में उलटा करके रखे
ओ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तुयोऽस्मान्दृष्टि
यंचवयं द्विष्मः॥
फिर ममि के चौफेर रखी कुशा ले घृत से भिगो कर
हाथ से हवन करे।
१ ओं देवागातु विदोगातुं वित्त्वागातु मित
मनस्पत इमदेवयज्ञस्वाहा वातेधाःस्वाहा॥ इदं
वातायन०॥
फिर वर उठ कर वधू से स्पर्श की हुई पूर्णाहुति करे
धृत पुष्पलाल दरियाई श्री फल वा पूगीफल से पूर्णाहुति करे
डोमू नदिवो अरतिष्टथिव्यावैश्वानरमृत
आजातमाग्निम् ॥ कविसंम्राजमतिथिंजनाना
मासन्नापात्रंजनयंतदेवाः स्वाहा॥ इदमग्नयनमम
श्री फल के ऊपर घत धाग देवे
ओं वसोः पवित्रमास शत धारंवसोः पवि
त्रमसि सहस्रधारं । देवस्त्वा सवितापुनातु वसोः
पवित्रेण शतधारेण सुष्वः काम धुक्ष्वः १
१ डों देवाइति मनसस्पतिः ऋपिः विराट् छन्दः वायुदेवता पहिडॉमे
विनियोगा।
३ डों मूर्दानमिति मन्त्रस्य भरदान ऋपिः वैश्वानरो देवता त्रिष्टुए
छन्दः पूर्णाहुति होमे विनियोगः ।

विवाह पद्धतिः साजर्यितं मयासह- श्रीअमुकी देवी इति । बर फुलियां में से थोडी २ चरु वधू को खब। ॐ प्राणैस्तेप्राणान्संदधामि ॥१॥ ॐअ- स्थिभिस्ते अस्थीनिसंदधामि॥३॥ ओत्वचाते त्वचंसंदधामि ॥४॥ वर वधू के हृदय को स्पर्श कर के मन्त्र पढ़े। ऑयत्तेसुशीमे हृदयंदिवि चन्द्रमसिश्रियम्॥ वेदाहं तन्मांतद्विद्यात॥ पश्येमशरदः शतंजीवे- मशरदःशत ७ शृणुयाम शरदःशतम् ॥ यदि चतुर्थी कर्म किया हो तो मागे पृष्ट ८७ से पूर्णाहुति करनी। ततो ब्रह्मणेपूर्णपात्रं दद्यात ओं मद्येत्यादि कृततबिवाह होमकर्मणि कृता कृतावेक्षणरूप ब्रह्मकर्म प्रतिष्ठार्थमिदं पूर्ण पात्रंसोपकरणं प्रजापतिदैवतं अमुकगोत्रायामुक शर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मरूपिणेतुभ्यमहं संप्रददे॥ ऐसे होता आचार्य ऋत्विक् जनों को पूर्णपात्र वा दक्षिणा दान करे डों स्वस्तिऐसे ब्राह्मण कहें वर पवित्र सहित प्रणीता के जल से अपने सिर पर सिंचे डों सुमित्रियान आपओपधयः संतु ॥

८७
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विवाह पद्धति
फिर प्रणीता पात्र को इशान में उलटा करके रखे
ओ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तुयोऽस्मान्दृष्टि
यंचवयं द्विष्मः॥
फिर अमि के चौफेर रखी कुशा ले घृत से भिगो कर
हाथ से हवन करे।
ओं देवागातु विदोगातुं वित्त्वागातु मित
मनस्पत इमदेवयज्ञस्वाहा वातेधाःस्वाहा॥ इदं
वातायन० ॥
फिर बर उठ कर वधू से स्पर्श की हुई पूर्णाहुति करे
घृत पुष्पलाल दरियाई श्री फल वा पूगीफल से पूर्णाहुति करे
उगमूढीनदिवो अरतिपृथिव्यावैश्वानरमृत
आजातमग्निम् ॥ कविण्सम्राजमतिथिंजनाना
मासन्नापात्रंजनयंतदेवाः स्वाहा॥ इदमनयेनमम
श्री फल के ऊपर घृत धाग देवे
ओं वसोः पवित्रमास शत धारंवसोः पवि
त्रमसि सहस्रधारं । देवस्त्वा सवितापुनातु वसोः
पवित्रेण शतधारेण सुष्वः काम धुक्ष्वः १
१ 0 देवाइति मनसस्पतिः ऋपिः विराट् छन्दः वायुर्देवता वहिटोंमे
विनियोगः।
३ जो मूर्दानमिति मन्त्रस्य भरद्वाज ऋषिः वैश्वानरो देवता निष्टुए
छन्दः पूर्णाहुति होमे विनियोगः।

८८
विवाहपद्धतिः
बैठकर खुवको माहुतिकी भस्म लगाकर अंगोंपरलगावे दक्षि
पहाथकी अनामिका से लगावे
अथ व्यायुपम्।
दक्षिणहस्ता नामिकयाभस्म धारणम्.
ॐ त्र्यायुपं जमदग्नेः इतिललाटे कश्यप
स्यव्यायुपंइतिग्रीवायां यदेवेषुत्र्यांयुपइतिदक्षि
णांस ॐ तन्नोअस्तुत्र्यायुपं इतिहृदिः
ऐसेवधूकाभी व्यायुप करना : मना
अथ घृत संकल्पः
डोमवेत्यादि अमुकमिणः विवाह वि
धिसाफल्यायकृत (वाकारित) एतंडवनकर्म
प्रतिष्ठार्थ अॅग्निदेवप्रीतये घृतएतत्परिमता यथा
नामगोत्रायब्राह्मणायदातु महमुत्सृजे :
यहां मुठी भरावे और भी दान करे-
पुनः आचार्यायदक्षिणां दद्यात् ।
ओमद्यत्यादि अमुक शर्मणः विवाहविधि
समयसंपादनार्थ निमंत्रिताधिकारि वेदपाठकवि:
प्रकृताति प्रयत्न जन्यश्रमनिरत्यर्थ मिदंविवाहांग
भूतविवाह पाठककर्तव्यता दक्षिणााद्रव्यममुक
देवतं श्रीलक्ष्मीनारायण प्रीतये यथानामगोत्र
ब्राह्मणायदातु महमुत्सृजे॥
१ मस्तक पर २ गर्दन पर ३ सने कंधे पर ४ हृदय पर काले पड़ती

C8
विवाह पद्धति
यहां पर कंकण मोचनादि कर्म देशाचार के अनुसार
करना
'बघूपरि पुष्पादीक्षता रोपणं ब्राह्मणाः शिष्टाश्च कुर्युः
डों गायत्रीचविधीय लक्ष्मीर्देवपतौयथा
उमायथामहेशाने तथा त्वंभवमर्तरि सुदक्षिणा
दिलीपेचराघवेचविदर्भजा ॥ वसिष्ठऽरुंधती
यहत्तथा त्वंभवभर्तरि२ सुवर्चलायथा चार्केयथा
चंद्रेच रोहिणी ॥ मदनेचरतिर्यहत्तथात्वंभव
भर्तरि३ राघवेंद्रेयथासीता विनताकश्यपेयथा ॥
पावकेचयथा स्वाहा तथात्वंभव भर्तरि४ अनिरु
हेयथैवोषादमयंतीनलेयथा ॥ श्यामलीऋतुपर्णे
चतथा त्वंभवभर्तरि पुलोमजाचदेवेंद्रे वसुदेवेच
देवकी। लोपामुद्रायथा गस्त्ये तथात्वंभवभर्तरि
शंतनौचयथा गंगासुभद्राचयथार्जुने ॥ धृतराष्ट्र
चगाधारीतथात्वंभव भर्तरि ७ गौतमेचयथा
हिल्या द्रौपदीपांडवेषुचायथावालिनिताराचतथा
त्वंभवभर्तरि ८ मंदोदरी रावणेच रामेयहत्त
जानकी॥पांडुराजेयथाकुंतीतथात्वंभवभर्तरि ९
भास्करस्य प्रभायद्रोहिणी सिंधुजस्यच।।
१ सिर्फ वधू के ऊपर पुष्प और आई अक्षा ब्राह्मण और शिष्ट
पुरुष डारें।
।

80 विवाह पद्धतिः कुजेतेजोमया यहत्तथात्वंभवमर्तरि१० अत्रेर्य थानुसूयाच जमदग्नेश्चरेणुका ॥श्री कृष्णेरुक्मि- णीयहत्तथात्वंभव भतरि११ यथाचवोधिनी सौम्येभारतीवापतेस्तथा। भार्गवेवलिनीयहत्त थात्वंभवमर्तरि१२सूर्यपुत्रेयथासौम्यातमसस्ताम सीयथा ॥ केतीभोगवती यहत्तथा त्वंभवभर्तरि १३ वासवस्ययथेंद्राणी कालीवैश्वानरस्यच ।। धर्मिणीधर्मराजस्यतथात्वंभवभरि नैर्ऋतेश्च धृतिर्यवहारुणीवरुणस्यच ॥ वायोवा युवती यह तथात्वंभवभर्तरि१५ यक्षिणीधनदेयहत्पार्वती शकरेतथा सावित्री वेधसोयहत्तथा त्वंभवतरि १६ शेवरेतपनी यदुःष्यंतेचशकुन्तला ॥ मेरुदेवीयथानाभौ तथात्वंभवभर्तरि १७ रेवती वलभद्रेचसांवेचलक्ष्मणायथा ॥ रुक्मिसुताकृष्ण पुत्रेतथात्वंभवभर्तरि १८ अनंतस्ययथा लक्ष्मी रूर्मिलालक्ष्मणे यथा ॥ कुशेकुमुद्दतीयहत्तथा त्वंमवमर्तरि १६ धनपुत्रवतीसाध्वी सततं- मर्तृवल्लभा ॥ मनोज्ञा जानसहितातिष्ठत्वं श- रदाशतम् २० जीवसूरिसूभद्रे 'मवसौख्य समन्विता ॥ सुभगामौख्य संपन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता २१ अतिथी नागतान्साधून वालान् १ विवाह पद्धति बृद्धान् गुरूंस्तथा ॥ पूजयंत्या यथान्यायं शश्वद् गच्छंतुतेसमाः २२ पृथिव्यां यानिरत्नानि गुण- वंति गुणान्विते॥ तान्याप्नुहित्वं कल्याणि सुखि नीशरदांशतम् । २३। 'ततो वरवध्वोईयोरुपरि अत्रिकश्यपवसिष्ठ गौतमा व्यासगालव पुलस्त्यकोशिकाः ॥ गाधिशौनकमरीचि नारदा मंगलंदधतु तेऽभिषेकजम् २४ सूर्यसोमकुज चंद्र नन्दनाजीव शुक्रशनि राहुकेतवः ॥ विष्णुकंज- सुतशंकरादयो मंगलंदधतु तेऽभिषेकजम् २५ ब्रह्मावेदपतिः शिवःपशुपतिः शक्रःसुराणांपतिः प्राणोदेहपतिः सदागतिरयं ज्योतिष्पतिश्चंद्रमाः॥ विष्णुर्यज्ञपतिहविर्हतपतिः स्कंदश्चसेनापतिः सर्वे तेपतयः कुबेरसहिताः कुर्वन्तुवोमंगलम् २६ मत्स्यःकूर्मतनुर्वराहहरी श्रीवामनो भार्गवो रामोदाशरथिश्च यादवपति वुद्धोथकल्किहरिः ॥ अन्येचापिसनत्कुमार कपिलाद्याये कलाशाहरेः सर्वेतेकलिकल्मपन्नचरिताः कुर्वन्तुवोमंगलम् २७ आदित्योपनियुतः शशीसवरुणोभौमः कुमारा- न्वितः सौम्योविष्णुयुतोगुरुःसमघवा देव्यायुतो १ फिर वर और वधू के ऊपर फेंके।

विवाह पद्धतिः भार्गवः॥ सब्रह्मारविजोगगोश्वर युतोराहुस्तथा सेश्वरो मांगल्यं सुखदुःखदाननिरताः कुर्वन्तुस- वेंग्रहाः२८ (अथवरो परिभिपेयुः ॥ आयुट्टैण- सुते श्रियोदशरथे शत्रुक्षयोराघवे ऐश्वर्यनहुपे- गतिश्च पवने मानंच दुर्योधने ॥ शोर्यशान्त- नवे वलंहलधरे सत्यंच कुन्तीसुतेविज्ञानविदुरे भवन्तु भवतः कीर्तिश्चनारायणे २९ आयुष्मान् भवपुत्रवान् भवश्रीमान् यशस्वी म वऐश्वर्याभवभूरि भृति करुणोदानकनिष्ठाभव ॥ तेजस्वी भववैरि दर्पदलने व्यापारदक्षोभव श्री शंभोर्भव पादपुजनरतः सर्वोपकारीमव ३० श्रा युर्वलं विपुलमस्तु सुखित्वमस्तु भाग्यलमस्तु वि शदातवकीर्तिरस्तु ॥ श्रेयोस्तुधर्म मतिरस्तुरिपु क्षयोस्तुसंतान वृद्धिराभिवांछित सिद्धिरस्तु ३१ यावदिन्द्रादयोदेवा यावचन्द्र दिवाकरौ॥ यावद्ध मक्रियालोके तावद्भूयात्स्थितिस्तव ३२. । । पुनर्वधू परिक्षिपेयुः- पद्मामाधवयोनगेंद्रतनया , नागेंद्रकेयूरयोः स्वाहा पावकयोरमर्त्यतटिनीकल्लोलिनीनाथयोः पौलोमीपुरुहूतयोरथरतीपंचास्त्रयोंःप्रेमवई पत्यो १ फिर वरके ऊपर २ वधू के ऊपर। ।

विवाह पद्धति युवयो श्चिरंभवतु तत्सौभाग्य सौख्यान्वितम् । लक्ष्मीः सकलदेवगणा रिशत्रौ गौरींयथा पशुपतौ च शचीसुरेंद्रे ॥ गायत्र्यापिचपरमेष्ठिनिसंप्रसक्ता तद्वंद्वत्वमपितरि नित्यरक्ता २ यदृल्लक्ष्मीमधु मथनयोः पत्रिणी चक्रनाम्नोर्यदृन्नित्यं कुमुदश शिनोः पद्मिनीसूर्ययोश्च ॥ गाढप्रेम्णोगिरिश शि वयोः सुप्रसिद्धिश्चयहजायापत्योर्भवतुभवतो स्त ईदेव त्रिलोके ३ अविधवा भववर्षाणिशतंसाग्रंतु सुव्रता।। तेजोयुक्ता यशोयुक्ता धर्मपत्नी पतिव्रता ४ जनयेहहुपुत्रांश्च माचंदुःखलभेतंकिंचित्॥मर्ता ते सोमपानित्यं भवेद्धर्मपरायणः५ अष्टपुत्रा भव त्वंच सुभगाच पतिव्रता॥ भर्तुश्चैवापितुर्धातु ई देयानदिनीसदा ६ इंद्रस्यतुयथेंद्राणी लक्ष्मीः श्रीधरस्य च ॥शंकरस्य यथागौरीतहत्त्वं भव भर्तरि ॥७॥ अंथं पुनर्वरो परि यं पालयसि धर्म वं प्रीत्या चं नियमेन च । सबै पुरुप शार्दूल धर्मस्त्वाममि रक्षतु ॥ १ ॥ येभ्यः प्रणामसेवीह देवाचायतनेषुच ॥ तेंचत्वामभिरक्षतु सर्वेसहमहर्षिभिः ॥२॥ १ फिर घर के ऊपर विवाह पद्धति पितृ शुश्रूपयानित्यं मातृ शुश्रूपया तथा ।। सत्ये नचमहावाहोचिरंजीवाभिरक्षितः समित्कुश पवित्राणि वेदाश्चायतनानिच ॥ स्थंडिलानांच विप्राणां शैला वृक्षानदाह्रदाः ४ पतंगाः पन्नगाः सिंहास्वां रक्षतु नरोत्तम ॥ स्वन्ति साध्याश्च विश्वेच मरुतश्च महार्षिभिः ५ खस्ति धाता विधाता च स्वस्ति पूपामगोर्यमा ः॥ लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा ७ ऋतवःपट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः ।। दिनानिच मुहुर्ताश्च स्वस्ति कुर्वतु ते सदा ८ श्रुतिःस्मृतिश्च धर्मश्च पांतुत्वां ते च सर्वतः ॥ स्कंदश्च भगवान्देवः सोमश्च स वृहस्पतिः ९ सप्तर्पयो नारदश्च ते त्वां रक्षतु सर्वतः॥ ते चापि सर्वतः सिद्धादिशश्च सदिगीश्वराः ९ शैलाः सर्वे समुद्राश्च राजा वरुण एव च । द्यौरंतरिक्ष पृथिवी वायुश्च स चराचर १० नक्षत्राणि च सर्वाणि ग्रहाश्च सहदेवतैः ॥ अहो रात्रे तथा संध्ये पांतु त्वां च सुदक्षिणाः ११ मृतवश्चापि पश्चान्ये मासाः संवत्सरास्तथा ॥ काष्ठास्तथा कलास्तह- त्तवशमंदिशन्तुते १२ प्लवंगारश्चिका दंशामश- काश्चैव सर्वतः ॥ सरीसृपाश्च कीटाश्च मा ९५ विवाहपद्धतिः भूवन्दुः खदास्तव १३ महाद्विपाश्च सिंहाश्च व्याघ्रा ऋक्षाश्च दंष्ट्रिणः ॥ महिषाः शृंगिणो रौद्रानतेगुह्यन्तु सर्वतः १४ आगमास्ते शिवाः सन्तु सिध्यतु च पराक्रमाः ॥ स्वस्ति ते स्त्वंत- रिशेभ्यः पार्थिवभ्यः पुनः पुनः १५ सर्वेभ्यश्चैव देवेभ्योयेच तेपरिपंथिनः ॥ शुक्रः सोमश्चसूर्यश्च धनदोथयमस्तथा १६ अग्निर्वायुस्तथा धूमो- मंत्राश्चर्षिमुखाच्च्युताः ॥ सर्वलोकप्रभुर्ब्रह्मा भूतकर्तृतथर्पयः १७ यन्मंगलं सहस्राक्षे सर्व- देवनमस्कृते ॥ त्रनाशे समभवत्तत्ते भवतु- मंगलम् १८ यन्मंगलं सुपर्णस्य विनताकल्प यत्पुरा ।। अमृतंप्रार्थयानस्य तत्तेमवतुमंगलम् १९ अमृतोत्पादने दैत्याननतो वज्रधरस्ययत् ॥ अदितिःमंगलं प्रादात्तत्तेमवतु मंगलम् ॥ २० ॥ त्रिविक्रमान्प्रक्रमतो विष्णोरतुलतेजसः ॥ यदा- सीनमंगलंनित्यं तत्तेभ मंग०२१ सरितःसागरा- दीपा वेदाःलोकादिशाश्चताः॥ मंगलानि महा- वाहो दिशंतुशुभमंगलम् २२ करोतुस्वस्तिते ब्रह्माब्राह्मणाश्चद्विजातयः॥ सरीसृपाश्चये श्रेष्ठा स्तेभ्यस्ते स्वस्तिसर्वदा २३ ययातिनहुपश्चैवधुंधु- मारोभगीरथः ॥ तुभ्यंराजयः सर्वस्वस्ति कुर्व- 7 विवादपद्धतिः । तुतेसदा २ स्वस्तितेऽस्त्वेकपादभ्योवहुपादेभ्य- एवचस्वस्त्यस्त्व पादकेभ्यश्च नित्यंतवमहारणे २५ स्वाहास्वधा शचीचैव स्वस्ति कुर्वतुतेसदा ॥ लक्ष्मीररुंधतीचैव कुरुतास्वस्तितेऽनघ २६ असितोदेवलश्चैव विश्वामित्रस्तथांगिराः वसिष्ठः कश्यपश्चैव स्वस्ति कुर्वन्तुतेसदा २७ धातावि- धाता लोकेशोदिशश्च सदिगीश्वराः॥स्वस्तितु- भ्यंप्रयच्छंतु कार्तिकेयश्चषण्मुखः २८ विवस्वा भगवान्स्वस्तिकरोतु तवसर्वशः॥ दिग्गजाश्चैव चत्वार क्षितिश्च गगनंग्रहाः २९ अधस्तारणी योऽसौसदाधारयतेनृपः ॥ शेपश्च पन्नगश्रेष्ठः स्वस्तितुभ्यं प्रयच्छतु ३० इति श्रीवधूवरोपरि आर्द्र पुष्पाक्षतारोपणम् ॥ समाप्तम् ।। ॥ अथाभिषेकः॥ अथ कलशाजल मानीय पंचपल्लवैःकुशैर्वा वरं वधूंच ब्राह्मणा अभिपिंचेयुः सुरास्त्वामभिपिंचन्तु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः॥ वासुदेवोजगन्नाथस्तथा सकपणोविभुः१ प्रद्युम्नश्चा निरुद्धश्चभवन्तु विजयायते ॥ आखंडलोग्निर्भ गवान् यमोवेनितिस्तथा २ वरुणः पवनश्चैव धाताध्यक्ष स्तथाशिवः ॥ ब्रह्मणा सहितः शेपो १ कलश से जल लेकर ५ पत्रों वा कुशों से वर वधू को गाम्मण सींचे । 7.

चरत्नानि कालस्यावयवाश्चये ८ सरितःसागराः विवाह पद्धति दिपालाः पातु तेसदा ३ कीर्तिर्लक्ष्मीतिर्मेधापु ष्टिःश्रडाक्रियामतिः ।। बुद्धिर्जातिपुद्धिस्तुष्टि हृष्टिश्चमातरः ४ एतास्त्वामभिषिचंतुदेवपत्न्यः समागताः ॥ आदित्यश्चंद्रमा भौमोबुधजीवसि तार्कजाः ६ ग्रहास्त्वाममिचितुराहुः केतुश्चत र्पिताः ॥ देवदानव गंधर्वायक्ष राक्षसपन्नगाः ६ ऋपयो मुनयो गावो देवमातर एवच॥ देवपत्न्यो टुमानागा दैत्याश्चाप्सरसांगणाः ७ अस्त्राणि चैवशस्त्राणि शतशो वाहनानिच ॥ उौषधानि- शैलास्तीर्थाणिजलदानदाः ॥ एतेत्वा मभिषि- चतुधर्मकामार्थसिद्धय।। ५ सुरास्त्त्वामभिपिंचतु पंचसिद्धाः पुरातनाः ॥ ब्रह्मा विष्णुश्च शंभुश्च- साध्याश्चसमरुद्गणाः१० आदित्यावसवोरुद्रा अश्विनी चभिपग्वरी॥अदितिर्देवमाताचस्वाहा सिद्रिःसरस्वती११ कीर्तिलक्ष्मीर्युतिःश्रीश्चसिनी वाली कुहूस्तथा। दितिश्चमुरसाचैवविनताकद्रुरेव च१२ देवपल्यश्च याः प्रोक्ता देवमातरएव च ।। सर्वा स्वामभिपिचन्तु शुभाश्चाप्सरसांगणाः१३ नक्षत्राणि मुहुर्ताश्च पक्षाहोरात्र संधयः ॥ संवत्मरो दिनशश्च कलाः काष्टाः क्षणालवाः१४

९८
..
विवाह पद्धते
सर्वेत्वामभिषिचंतु कालस्यावयवाःशुभः एते
चान्येचमुनयोवेदव्रतपरायणाः १५ सशिष्यास्ते
मिचिन्तुसदाराश्चतपोधनाः ॥ वैमानिकाः
सुरगणाःसरित सागरैःसह १६ मुनयश्चमहा
भागानागाः किंपुरुपाः खगाः ॥ वैखानसामहा
भागा द्विजावैहायनाश्चये १७ सप्तर्पयः सदारा
श्चध्रुव स्थानानियानिच ॥ मरीचिरत्रिः पुलहः
पुलस्त्यः क्रतुरंगिराः १८ भृगुःसनत्कुमारश्चसन
कोथसनंदनः। सनातनश्चदक्षश्च जैगीपव्योमगं
दनः १९ एकतश्चद्वितश्चैवत्रितोजावालिकश्यपौ
दुर्वासा दुर्विनीतश्चकण्वः कात्यायनस्तथा २०
मार्कंडेयोदीर्घतपाः शुनाशेफोविदरथः ॥ उौर्वः
सांवर्तकश्चैवच्यवनश्चपराशरः २१ द्वैपायनोय
वक्रीतोदेवराजः सहानुजः ॥ पर्वतास्तरखोवल्यः
पुण्यान्यायता नानिच २२ प्रजापतिर्दितिश्चैव
गावो विश्वस्यमातरः॥ वाहनानिदिष्टानिसर्वे
लोकाश्चराचराः २३ अग्नयःपितरस्ताराजीमूताः
खदिशोजलम्।।एतेचान्येचवहवीवेदव्रतपरायणाः
२४ सैंद्रादेवगणाः सर्वेपुण्यश्रवणकीर्तनाः॥ तोय
स्वामभिापंचंतु दुःखात्यन्तनिवर्हणे॥ यथाभिषि
तो मघवास्त्वेतर्मुदित मानसेः २५
इति वारुण कलशा भिपेकः

विवाइपद्धतिः
अथ पुण्य पाठरूपाश्रीसीतारामील
डॉ पुरुपाणांतु पुरुषो यथापुरुप पुरुपोत्तमः॥
यथा सत्यवादीहरिश्चंद्र ॥ धनुर्धारीतोअर्जुन ।
यथावाचा पतियुधिष्टिर सीता पति श्रीराम ॥
विद्या पति विनायक ॥ मतिमान् वासुदेव॥ भूत
पति महादेव ।। महावली भीमसेन ॥ अहंकारी
अहिरावण ॥ यथास्वरपति नारद । अचलोंपति
ध्रुव अटल ॥ यथातपतां पतिसूर्य ॥ यथा कपि
ल आदिऋपीश्वर ॥ एवंगुरोर्ममानुज्ञा ॥ देवतो
विश्वनाथ । श्रीपार्वतीपतिव्रजनाथ ॥ क्षेत्रतो
कुरुक्षेत्र ।। महाक्षेत्र वनारसी ॥ वेदमंत्रीतोब्रह्मा
ब्रह्मचारीतोशुक्र ॥ गीतांपति नारद ॥ यक्षपति
कुवेर ॥ देखवॉश्रीकृष्णपेर ।। स्वर्गपतिइंद्र ॥सं
तोंपतिगोविन्द ॥ नगरीतोअमरावती॥ हस्तीतो
ऐरावती ॥ उत्पत्तितो प्रजापतिकी ।। पुरुपतो
स्वस्त्ररित।। वृद्धतोकल्पवृक्ष । गोकुलतो गौअन
में ।। विधनालिख भौअनमें ।।दावनकृष्णरूप
महाअद्भुतस्वरूप ॥ श्रीमथुरामें भक्तिधर्म ॥ का
शीमक्रियाकर्म ।। नाथतोश्रीगोवर्धन धर॥ राखे
जन अपनाकर ॥ श्रीवल्लभकुल पुष्टिमार्ग । पावे
जनवडोभाग ॥भक्तिश्रीभगवंतकी ।सुन्दरगति

१०४ विवाह पद्धतिः मुक्ताकी॥सारहेश्रीगाताने।मंगलरसरीतामें॥मत्र श्रीगायत्रीका ॥ व्रततो एकादशीका ॥ शीत- लतातो चन्द्रमाकी ॥ वक्रतो मंगल का॥ बुद्धितो श्रीशारदाकी॥ जपतप शुचिपारदाकी । लेखनी तो गणेशकी ॥ पुरोहितीतो शुक्रकी । प्रतिपदा अन्नकूटकी ॥ द्वितीया यमकी ।। तृतीया अक्षय- की॥ चतुर्थी गणेशकी ॥ पंचमीतो वसंतकी॥ पष्ठीतो चंदनकी ॥ सप्तमी अंचलाकी। अष्टमी जन्माष्टमी ॥ नवमीश्रीरामनवमी॥दशमी विज- यदशमी ॥ एकादशी हरिप्रवोधिनी॥हादशीतो वामनकी॥त्रयोदशी माधेपुष्ये ॥चतुर्दशीतो श्री नृसिहकी॥ पूर्णिमाकार्तिककी ॥अमावस्या दीप- मालाकी ॥ राशिता द्वादशानक्षत्रतोअठावीस। कर्णतो एकादश ॥ वेदचार। युगचार॥ पुराण अष्टादश भारतोगी का । श्री कपिलाक्षी ॥ स्नान कर्म सूर्यसाक्षी ॥ सत्यतो सत्ययुग ॥ कथाकी- नितो कलियुग ।। स्नान श्रीगंगाजीका॥ शीतल जल श्रीयमुनाजीका ॥ जोलीलारस कृष्णकी। विश्वपाल श्रीविष्णुकी॥ आयातो मार्कडेयकी ।। रचनातो ब्रह्माकी ॥ क्रोधियोंपति परशुराम ॥ मर्यादियोंपति श्रीराम ॥ लालीतो पानकी ।।

विवाह पद्धति
सुघडतो सुजानकी ॥ गावन मधुरतानकी ॥ सप्त
स्वरसंधानकी ॥ देशतो काश्मीर । पहिनतो नस
वीर॥पीवनको मधुरक्षीर॥ वोलनहरिकीर्तिका ॥
दानतो करनका । ज्ञानतो धरनका ॥ कर्मतोतर
नका ॥राखवों सरनका ॥ पतिव्रततो घरनका ॥
भूषणतो सुवर्णका ॥ सत्यतो श्रीसीताका ॥ पाठ
तोश्रीगीताका॥ नारायण जैसे चरित्र ॥सुदामा
जैसे मित्र ।। भगीरथ जैसे पुत्र ।। यज्ञोपवीत जैसे
सुत्र । गुणवंतीगुणवंतम्॥ हनुमंती हनुमन्तम् ॥
स्थानतोशारदाका ॥ ज्ञानतोपारदाका ॥ निर्म
जलगंगाका॥ आनंदतोतरंगका॥यज्ञतोश्रीलाल
जीका । देखवोंश्रीगोपालजीका॥नियमराजेवलि
का ॥ द्यूतराजेनलका ॥ पुष्पतोकेतकीका ॥ फल
तोअमृतफल ॥ नर्मदाकासुंदाजल ॥ सत्ययुगम
ध्येगौरीसत्यवती॥ त्रेतायुगमव्यसीतासत्यवती॥
द्वापरयुगमध्येद्रौपदीसत्यवती ॥ कलियुगमध्येक
न्यासत्यवती ॥ पुरुषोंपतिवाचा ॥ अर्जुन पति
वाण ॥ देवतोंपतिइंद्र ॥ तारापतिचंद्रमाः॥वन
स्पतिपतिपिप्पल ।। पत्रपतितुलसी ॥ देवोंपति
ध्रुवअटल ॥ नदियांपतिसमुद्रभलो ॥ सत्ययुग
मध्येधर्मअचल ॥ कन्यापतिवरअटल इच्छावंती

विवाहपतिः दयावन्ती ॥ पुत्रवन्ती ॥ इष्टवन्ती ॥दुग्धवन्ती ॥धर्मवन्ती ॥शर्मवन्ती ॥ ज्ञानवन्ती॥ ध्यान- वंती। दानवती । सुखवन्ती। आनन्दवन्ती । सुहागवन्ती । भागवन्ती॥ पतिसहितहरिभक्ति वन्ती । परमधर्मकृष्णचंद्र । सदारहोक्षीरखंड ।। ब्रह्मपाठवेदशुद्ध ॥ राजपाठप्रजाशुद्ध । पतिव्रता सुकन्याशुद्ध ॥ वरुणवसंतरसाक्षी ॥ श्रीश्रीश्री सिद्धगणापतिप्रसादा चतुरशीतिदोपाहन्यते । प ठंते । सुणते । श्रीगंगाजी । गोदावरी । सिंधु । सरखती। यमुनाजीका । स्नानकरते । सर्वतीर्थ फलंलभते ॥ इति श्रीमद्गोस्वामिवंशावतंसश्री लालजीकृतासीतारामी शुभा अथास्या अनुवाद रूपासंस्कृते श्रीसीता रामी लिख्ते ॥ 'द्रव्यहस्तौ वधूवरी शृणुयाताम् पुरुषाणां तुपुरुपो यथाहि पुरुपोत्तमः ॥ सत्यवादी हरिश्चन्द्रोधनुर्धारी तथार्जुनः १ सीता पतिर्हि श्रीरामः पतिर्वाचां युधिष्ठिरः ॥ विनाय- कोहि विद्यानां पतिरेव स्मृतोबुधैः २ मतिमान्या सुदेवश्च भूतपतिर्महेश्वरः। महावलीभीमसेनोऽहं कारीत्वहिरावणः ३ अंचलानां ध्रुवोनाथऋपी- १ संस्कृत सीतारामी । २ वधू वर दक्षिणा हाथ में लेकर मुनें। s विवाह पद्धति णांनारदःपतिः।तपतांतुपतिःसूर्यःकपिलाहिपति- गंवाम् ४ ऋषीन्गुरुन्नमस्कृत्यविश्वनाथं प्रणम्यच ॥ तेषामाज्ञांसमादायमहादेवोमहेश्वरः५ देवनाथो विश्वनाथः पार्वती पतिरुच्यते ॥ क्षेत्राणांतुकुरु- क्षेत्रमहाक्षेत्र वाराणसी ६ तीर्थराजाप्रयागस्तु ब्रह्माहिवेदमंत्रवित्॥ब्रह्मचारीभृगोःपुत्रःस्वभार्या रतपुरुषः७पतिमरुगिरीणांहिगायकेशोहिनारदः।। यक्षपतिः कुवेरोहि वाद्यानां भेरिकापतिः ८ इंद्रः स्वर्ग पतिः प्रोक्तो गोविन्दश्च सता पतिः ॥ दर्शनीयेषुसर्वेषु कृष्णपादः प्रकीर्तितः ९ ऐरावतो गजेन्द्राणां पुरीणाममरावती ।। प्रजापतिः सृष्टि कर्ता श्रीकृष्णो विश्वपालकः १० वृक्षाणां कल्पवृक्षस्तुदेवलोकोंतरिक्षगः ॥ गोकुले तुशु- भागावः विधि लेखो ललाटके 11 वृन्दावन कृष्ण रूपं महाद्भुत स्वरूपकम् ॥ मथुरायां भक्तिधर्मः काश्यांकमक्रियामता १२ श्री गोव- धनधरोनाथः स्वकीय जनपालकः ॥ श्री- वल्लभकुल जातानां दासत्वे नैवसर्वदा १४ पुष्टिमार्गविधानेनसेव्यते स्नेहतोहरिः ॥ मर्या दयाप्रवाहेण तद्भाग्यवर्ण्यतेकिमु १५ भक्ति भगवतीश्रेष्ठागीतायाःपाठमुत्तमम् ॥ इंदावने १०४ विवाह पद्धविः गोकुलेचमथुरायां तथैवच१६ कृष्णलीलागायका- नांसुखमुक्त्याधिकंस्मृतम् ॥ काश्यांहिप्राप्यतेमु- क्तिस्तारकस्योपदेशतः सुंदरताहिमुक्तानामीदृशी नैवदृश्यते ।। गायत्री सर्वमंत्राणां वेदानां पठनं तथा १७ दिजानांमुक्तिप्राप्त्यर्थं सर्वशास्त्रेषु भएयते॥पूर्वाचरितरीतीषु दृश्यतेमंगलोरसः १८ एकादशी व्रतं पुण्यं महाभाग्यैःप्रधार्यते ॥ इंदोः शीतलताप्रोक्ता वक्रोमोमस्यकथ्यते १९ शारदा सर्वजीवानांश्रेष्ठावुद्धि प्रदामता ॥ जपनस्य फलं श्रेष्ठं तपसांशुचिकर्मणाम् २० परलोकेइहै वापि मुक्तिभुक्ति प्रर्दस्मृतम् ॥ शुक्रः पुरोहित श्रेष्ठोलेखकानां गणाधिपः २१ प्रतिपदन्न कूट- स्य द्वितीयातुयमस्यवै ॥ तृतीयाचाक्षया श्रेष्ठा- चतुर्थीगणपस्यच २२ वसंतपंचमीश्रेष्ठा पष्ठीतु- चंदनस्यच ।। अचला सप्तमीश्रेष्ठा श्रीकृष्णस्य जन्माष्टमी २३ नवमी रामचंद्रस्य दशमीविजया- स्मृता॥ एकादशी तिथिः श्रेष्ठा कार्तिके हरि बोधिनी २४ द्वादशी वामनस्यैव माघे पुष्ये त्रयोदशी॥ चतुर्दशी नृसिंहस्य पूर्णिमा कार्तिकी वरा २५ दीपावलीयमावस्या संप्रोक्ता तिथि रुत्तमा ॥ द्वादश संख्या राशीनां तेतुमेपहपा-

१०५
विवाहपद्धतिः
दयः २६ अश्विन्यादि नक्षत्राणामष्टाविंशतिसं
ख्यकम्॥ कर्णेकादश संख्याका वववालवकादयः
२७ सत्यंत्रेता द्वापरंच कलिश्चोति चतुर्युगम् ॥
ऋग्यजुः सामाख्या वेदाश्चत्वारउद्धृताः
२८ अष्टादश पुराणानि ब्राह्मादीनिस्मृतानि ।
भारतादीतिहासानि तथैवोपनिषच्छतम् २९
व्याकरणा दानिशास्त्राणि वेदागानि तथैवच ॥
साक्षी स्मृतोबुधैः सूर्यःस्नानादि पुण्यकर्मणाम्
३० सत्यं सत्ययुगे प्रोक्तं त्रेतायां तप उच्यते
॥ द्वापरे यज्ञसेवादि कलौ मुक्ति प्रसाधनम् ३१
कथाकीर्तनदानादि भगवन्नामकीर्तनम् ॥ पंथा
गंगादितीर्थानां शीतलंयमुनाजलम् ३२ श्रीकृष्ण
स्यरसालीला कलौमुक्तिप्रदायिनी ॥ विष्णुदेवो
विश्वपालःकर्तानारायणः स्मृतः ३३ मार्कंडेयो
महाभागो महदायुर्युतोमुनिः ॥ रचनाकारको
ब्रह्मासंहताश्रीशिवः स्मृतः ३४ मर्यादाधिपती
रामोजामदग्न्योहिकोपनः।। पानेचारक्तताप्रोक्ता
सुज्ञस्यसुज्ञतास्मृता३५सप्तस्वरेणसंवडमधुरताल
गायनम्।। देशःकाश्मीरकःश्रेष्ठः शारदास्थान मु
त्तमम् ३६धारणेवस्त्रभूपादि वचनेहरिकीर्तनम् ॥
क्षीरंमधुरसंयुक्तंपाने स्वादप्रदपरम् ३७ दानिनां

ܐܙܪ विवाहपद्धतिः वतार श्रीगोस्वामि श्रीलालजीककृता सीतारामी विवाह समये श्रावणीयाशुमा इस देश (जिला मुजफ्फरगड । डेरागाजीखां डेरास्माई- लखां मियां वाली ) में सर्व ग्रह और भमिकी ४ परिक्रमा वर वधू करते हैं सो ३ परिक्रमा के अन्त में ग्रासन बदल कर वरवधू बैठते हैं और चतुर्थ परिक्रमा के अन्त में आपने २ भासन पर बैठते हैं दोनों समय में ब्राह्मण वर वधू के सिर को भापस में मिलावे मन्त्र पढ़े-यों मंगलं भगवान् विष्णु मंगलं गरुड़- धजः।मंगलं पुण्डरी कानो मंगलाय तनोहरिरा-इसके अनं- तर वर वधू अन्दिर जावें अपनी कुल के अनुसार रीति कराव-इस परिक्रमा के स य में इस देश में स्त्रिये वा ब्राह्मण लावा मंगल गाते हैं सा मंगल गाना लावां लिखा गया है विद्वान् लोग इस पर उपहास न करेंगे। अथलांवां मंगल रंगरस तां लांवां पहिली के मंगल गाईया। गोपीतें गोकुल कान्हवाला कृष्ण व्याहवण भाईया । सिरसेहरा सिर मुकट सोहवे छन्दकांचन चालणारावीतां पूजोलांवां पहिली मुख से अमृत बोलणा ॥ १॥ रंगरसतां लांवां दुझडी कि श्याम पियारिमा । भैयाते रुक्मिण राम धुनुप सिंहारिया। संहार धनुप श्रीराम चडिया नाल साठसहेलियां ।। श्रीकृष्ण तुसी थेन्दिर ल्यावो ल्यावो राजगहेलियां ॥ श्रीकृष्ण देहथ गीना सोहवे बूंदभिन्नां चोलपा ॥ रावीतां पूजोलावां दूझी मुख से अमृत बोलणी ॥ २ ॥ रंगरस तालावां त्रीझडी के विवाह पद्धति लमगणाईया । ब्रह्मातें इन्द्रलग्नगणियों वेदपढ़ने आईया । जा आईकरो विकाई अंगणे रसलीजिये ॥ रावीता पूजो लावांत्रीझी मुख से अमृत बोलिये ॥ ३ ॥ रंग रस तालावां चौथड़ी के खारा अड्डिया ॥ यंचले से पकिड़ वहावो बहावे वीरावडिया ॥ अंचले तें पकिड वहावों तेरा धर्म बेला आईया । गगा दें कोल्हे बनारसी कुरुक्षेत्र घावण आईया ॥ कुरुक्षेत्र नाहत्यां बड़ा पुण्य है कुछ दान बेटी मंगियां ॥ छत्री तो घड़ियां काज होया पर नावे बाबल चंगियो । दे वे बाबल हर बरदानं तेरा धर्म बेला आईया ॥ रावी तां पूजो लावा चौथी रुक्मिणी बर पाईया ॥ ४ ॥ रंग रस तालांवां पंजवी के राधा रुक्मिणी ॥ ठुमिक ठुमिक पेर धरती हे के चाल चलंती हे ॥ गलहार कृष्ण अवतार सौहे मुख से नाम जपती हे ।। रावी ता पूजो लांवां पंजवीं कुछ हाथ से दान करती हे ॥५॥ रंग रस तालावों कींहवीं के हरिखर पाईया ॥ सहस्र वेदी रूप वाला सेज पर सण आइया ॥ तखत बैठी मान लिया अंग अंग रलाईया ।। रावीती पूजो लोवां छीहवीं रुक्मिणी वर पाईया ।। ६॥ रंग रस तालांवां सतवीं के लांच पूरियां ॥छनकने वर लटक बोल्या विधना ने बधियां चूड़ियां ॥ विधना ने वधियां चूड़ियां कुछ सचियां कुछ कूड़ियां ।। रावी तां पूजो लावां सतवीं लावां श्रीकृष्ण दी पूरियां ॥७॥ इति लावा विवाह पद्धार अथ ग्रहाणा विसर्जनम् ग्रहागावो नरेन्द्राश्च ब्राह्मणाश्च विशेषतः। पृजिताः प्रतिपूज्यंते सावधानाभवन्तुते १ देवता देवलोकेच ब्रह्माद्या ऋपयस्तथा ॥ गणेशो गणपु- वै कलशो गच्छतु सागरे २ सो गच्छ तु पाताले योगिन्यः सर्प पठिके।मातरोमातृपुर्या- वै स्वस्थाने सकलाग्रहाः३ गच्छत्वं भगवन्नने स्व- स्थानं कुंडमध्यतः॥हव्यमादाय देवेभ्यःशीघ्रं देहि प्रसीदमे ४ गच्छगच्छ सुरश्रेष्ठस्वस्थाने परमेश्वर। यत्रब्रह्मादयो देवा स्तत्रगच्छहुताशन५ आगता- स्तु यथा न्याय पूजितास्तु यथाविधि ॥ कृत्वामयि कृपांदेवा यत्रासंस्तत्रगच्छत६ यजमान हितार्थाय पुनरागमनायच ॥ शत्रूणां बुद्धिनाशाय मित्राणा मुदयायच ७ यथाशस्त्र प्रहाराणां कवचं पारणं भवेत् ॥ तहदेवामि घातानां सिद्धिर्भवति वारणं ८ अग्निमीले गणेशाद्या न्देवानुत्थापयेत्ततः ॥ विवाहेच तथा नाम्निक्षौरेच व्रतबंधने ९ गृहादीनां प्रतिष्ठासुनवशांतिरुदाहृता ॥ वापीकूपतडा- गादौ सर्व स्थानेषुकारयेत् १० ॐ प्रमादात्कु- र्वता कर्मप्रच्यवेता ध्वरेषुयत॥स्मरणादेव तदि- व्णोः संपूर्णस्या दितिश्रुतेः ११ इति ग्रहविस० विवाह पद्धतिः अथ पारिवह (दाज) संकल्पः ॐ तत्सब्रह्मोत० अस्याः कन्यायाः उद्दा- हकर्मणि श्रुतिस्मृति पुराणेतिहासे त्यादिप्रतिपा- दित फलावाप्तिकामो ऽवगता नवगत सकलदुरि- तोपदुरितक्षय कामश्च नाना पटतंतु संख्याका- नेककल्पा वच्छिन्न वैकुंठलोक प्राप्तिकामः श्री लक्ष्मी नारायण प्रीति जनक वह्वश्वमेध यज्ञ फलसूचक स्वपुत्रीविवाहांगभूतां सतलोपधा- नादि संस्कृतांसपीठखट्वांउत्तानां गिरोदैवतांच वृहस्पति देवताकासतरक्त पीताद्यनेकविध सुव- गरजत तंतुभिः संसूत्रितां विश्वकर्म दैवताकैः यथापरिमितैः रीतिलाहकांस्यमयपात्रैः सपा- त्रितंच चन्द्राग्नि समुद्र दैवताकानेक विधि विरचित रत्नरजतसुवर्णभूपण भूपितं प्रजा- पतिदैवताक विविधपक्वान्नाद्यधि करणकं सूर्य चंद्रदेवताकयथापरिमितताम्ररजतमय द्रव्यैःसद- क्षिकममुकगोत्रायै अमुकनाम्न्यै कन्याय इमं परिवहतुभ्यमहं संप्रददे॥ स्वस्तीतिप्रतिवचनम्॥ ॥ दक्षिणासंकल्पः ॥ अद्यकृतेततपारिवहदान प्रतिष्ठार्थमिदं दक्षिणाद्रव्यममुकंदवतं अमुकगोत्रा ये अमुकनाम्न्येकन्याय दातुमहमुत्सृजे ।।

विवाह पद्धतिः अथ कन्यागमन विधिः कन्या क्षिप्तधान्यानिगृहीगृह्णीयात्सवाधवः।। गमनसमयेकन्याहारेस्थित्वाधान्यानिक्षिपेत॥ अथ धान्यक्षेपे मंत्राः॥ विश्वामित्रोजमदग्नि वसिष्ठोगौतमस्तथा ॥ कश्य पोत्रिभरद्वाजो विष्णुब्रह्मादयश्चये ।। तेसर्वेत्वांप्रय च्छंतु धनधान्यादिसंपदम् ॥ १॥ सनकःसनंदन श्वधेनवोमातरस्तथा ॥देवाःसर्वेप्रयच्छंतु धनंधा न्यसदागृहे ॥२॥ चिरंजीवतुमेमाता चिरंजीवतु मेपिता ॥ चिरंजीवतुमेभ्राता चिरंजीवतुवांधवाः ॥ ३ ॥ दिवारक्षतुसूयॉय रात्रौरक्षतुचंद्रमाः॥ वंशरक्षतुभौमश्च धनधान्या दि संपदम् ४ पितृ- वंशंबुधोरक्षेन्मातृवशं गुरुस्तथा ॥ बंधु वर्ग- चरक्षेत्तुभृगुदैत्य पुरोहितः २ अश्विन्यादीनि- ऋक्षाणि योगाविष्कुंभकादयः॥ तिथयःप्रतिपदा- द्याःशुभंयच्छतुतेसदा ६ गतेजोराद्धर्यशोद्धि वैशद्धिस्तथैवच ॥ लोकेकीर्तिर्भवेत्तातधनधान्यं सदागृहे ७ गंगाद्याः सरितः सर्वाः शोणाद्याश्च नदास्तथा ॥ कृतंपापप्रशाभ्यतु प्रयच्छंतु सुखं चते ८ ततो यजमानः श्रीसूर्यायायं दद्यात् ॥ इति कन्या गमन विधिः ॥

विवाह पद्धतिः 'द्वितीय विवाहे पूर्व कर्तव्य गायत्री तथा चामतंडुल वस्त्र सुवर्ण दान संकल्पः डॉ अद्यत्यादिश्री लक्ष्मी नारायण प्रीतये तत्प्रीतिहाराऽमुक शर्मणो मम जन्म कालीन ग्रहसंसूचित मृतभार्यात्व दोषनित्रयेप्राजापत्य- व्रतेंदवव्रतस्थानीयविद्वज्जन संस्थापितप्रतिनिधि स्थानापन्नगायत्री.जपनममुक संख्या परिमितं अमुक गोत्रब्राह्मणहाराऽहंकारयिष्ये।। तथा च ॥ वस्त्र सुवर्णान्विताम तंडुलानि यथा नाम गोत्र ब्रह्माणायाहं संप्रददे ।। कृतैतत् कर्मणा श्री लक्ष्मी नारायण प्रीतिरस्तु ॥ द्वितीय विवाह में उत्तर कर्म विवाह से पीछे वर नेत्रों पर वस्त्र बांध कही से खारें के स्थान में वा किसी अन्य स्थान में वा नदी तीर में जानु प्रमाण गर्त करके उनमें चड़े चावलों सहित कुन्नी रखे ऊपर १०८ तिल तैलसे जागते दीपक संयुक्त कुनाली उलटी करके गर्त को मिट्टी से भरे फिर मिटी को पैर से दवाता हुआ पहिली स्त्री को याद करे मंत्र पढ़े फिरे नेत्रों पर बंधे हुए अष्ठोत्तर शतैर्जाग्र दीपकैरन्विता मिमाम् ॥ १ द्वितीय विवाह से पूर्व गायत्री और घस प्रवर्ण कधे चावलों के दान का वस्त्र को छोड़ दे। सकल्प करे।

११४
विवाह पद्धतिः
कुनालिकांगृहीत्वातु देहिमे चिरजीविनीम् ।।
सुभाग्यां पुत्रजननी कुलदेवी प्रसादतः॥१॥.
सुवर्ण वा चांदी की पहाजडी की मूर्ति को दूध से स्नान
कराकर गंधादि से पूज कर क्षीर चावल १ विष्णु के निमित्त
४ पहाजड़ी निमित्त दान करे।
वधूःसपत्नीमूर्ति सपत्न्यैअमुकायनमःइतिदुग्धे
नानापयित्वांगधादिभिः संपृज्यतंडुलान्नेनपंचक
न्यकाभोजनं संकल्पयेत्-तत्रैकं विष्णुनिमित
संकल्प्यसपत्नी निमित्त भोजनचतुष्टयं सदक्षिणं
संकल्पयेत् ॥ डों मोत्यादि० पूर्वसपत्नीनिमित्तं
इदंतंडुलान्नंकन्याकाभोजन चतुष्टयंदातुमहमुत्सृ
जेतस्यैस्वधा
फिर पच्छी भोर ३ वस्त्रपहाज के निमित्त संकल्प करे
उोमद्येत्यादि० पूर्वसपत्नीप्रीत्यर्थ इमांगा
रपिटिकांयथासंभववस्तु संयुक्तांवस्त्रसमन्विता म
मुकब्राह्मण्यैदातुमहमुत्सृजे
फिर पहाजडी की मूर्तिको वधू गलमें धारण करे
वरमृत्युंजय जपूसंकल्पकरे
उोमवेत्यादि० श्रीमृत्युंजयदेवप्रीतयेतत्पी
तिद्वाराऽमुकमिणो ममजन्मलग्नाददु स्थानगत

विवाह पद्धतिः दुग्रहयोग संसूचितमृतभार्यात्वदोषनिवृत्त्युत्तर अधुनापरिणति भार्योयाश्चिरकालंयावस्थित्यर्थ चं सुपुत्रमंतीनधनधान्यस्थित्यर्थचामुकसंख्या रिमितमृत्यु जयजपन ममुकब्राह्मणद्वाराअहंकार यिष्ये ॥ 'डो मद्येत्यादि० श्रीमृत्युंजयदेवप्रीतये तत्पीतिहाराऽमुकदेव्याः सभर्तृकायामम पतिस हितमुखसंतान सौभाग्यवृद्ध्यर्थं मृत्युंजयजपन ममुकगोत्रब्राह्मणद्वारा ऽहंकारयिष्ये फिरअपने देशकुलकेअनुसारकर्मकरे इति श्रीविवाह पद्धतिः समाप्ता ॥ अथ मंगलश्लोका लिख्यते गंगागोमति गोपती गणपतिर्गोविंद गोवई- नौगीतागोमय गोरजोगिरिसुतागंगाधरोगौतमाः ॥ गायत्री गरुडोगदागिरिगया गंभीरगोदावरी गंधर्वाग्रहगोपगोकुल गणा-कुर्वन्तुवोमंगलम् । यन्मंगलंप्रवरशंखगंदाधरस्यरामस्यरावणजयाय समुद्यतस्य ॥ जित्वानिशाचरपुरी पुनरागतस्य तन्मंगलंभवतुवाविजयायनित्यम्यन्मंगलंत्रिद- शमौलिकिरीटरत्नचंद्रप्रभापटलधौतपदांबुजस्य॥ गौरी विवाहसमयेशशिशेखरस्वतन्मंगलं भवतु १पघूमत्युजय नपसंकल्पकरे विवाह पद्धात वोविजयायनित्यम् ३लक्ष्मीर्यस्यपरिग्रहःकमलभूः सूनुर्गरुत्मांस्तथापत्रंचंद्ररवीक्षणसुरगुरुः शेपस्तु शय्यासनः ॥ ब्रह्मांडंवरमंदिरंसुरगणायस्यप्रभोः सेवकाः सत्रैलोक्यकुटुंवपालनपर कुर्यात्सदामंग- लम् ४ ब्रह्मावायुगिरीशशेषगरुडादेवेंद्रकालीगुरु- श्चंद्रार्कोवरुणा निलौमनुयमौवित्तेशविद्येश्वरी॥ नासत्यौनितिर्मरुद्गणयुताः पर्जन्यामत्रादयः सत्रैकासुर पुंगवाः प्रतिदिनंकुर्वतुवोमंगलम् ५ मांधातानहुपोऽवरीपसगरौराजाप्टथुखैहयः श्रीमा- न्धर्मसुतोनलोदशरथोरामोययातिर्यदुः॥ इक्ष्वा- कुश्चीवभीषणश्चभरतश्चोत्तानपादोध्रुव इत्याद्या भुवि पार्थिवाः प्रतिदिनं कुर्वन्तुवोमंगलम् ६ श्चीमरुहिम वांश्चमंदर गिरिः कैलासशैलस्तथा माहेंद्रोमलया द्रिविंध्यनिषधाः सिंहस्तथारैवतः॥ सह्याद्रिवरगंध मादनगिरिमैनाकगोमन्तका इत्याद्याभुविभूभृतः प्रतिदिनंकुयुः सदामंगलम्॥७ विश्वामित्रपरशरौचभृगवोऽगस्त्यः पुलस्त्यः ऋतुःश्रीमान्नत्रिमरीचिकौत्सपुलहाः शक्तिर्वसिष्टों- गिराः ॥ मांडव्योजमदग्निगौतमभरद्दाजादय- स्तापसाः श्रीविष्णोगुणराशिकीर्तनपराः कुर्युः सदामंगलम् ८ वेदाश्चोपनिषद्गणाश्चविविधाः विवाहपद्धतिः सांगाः पुराणान्विता वेदांता अपिमंत्रतंत्रसहिता स्तर्काःस्मृतीनांगणाः ॥ काव्यालंकृति नीतिनाट- कगणाः शब्दाश्चनानाविधाः श्रीविष्णोर्गुणराशि कीर्तनपराः कुर्युःसदामंगलम् ॥९॥ आदित्या- दिनवग्रहाः शुभकरा मेषादयोराशयो नक्षत्राणि सयोगकाः मतिथयस्तद्देव तास्तद्गणाः॥मासाब्दा ऋतवस्तथैवदिवसाः संध्यास्तथारात्रयः सर्वेस्था वरजंगमाः प्रतिदिनंकुर्युः सदामंगलम् ॥ १० ॥ शक्तिःशंखमथां कुशध्वजसितच्छत्रप्रदीपप्रभा- श्चाष्टौचामरतोय कुंभसहिताः सन्मंगलाः सर्व- दा॥ सत्पीताक्षत जीरसैंधवनिशाः पुगीफलैला- गुडश्चैतेपातु सदासुलग्नसुमुखाः कुर्वतुवोमंग- लम् ॥ ११ ॥ घण्टा नादमृदंग दुंदुभिरवैर्डक्वाण- शब्दादयो नानामंगलगीत नृत्यनिनदैनिक्वाणवे- णुध्वनिः ॥ विपाशीर्वचनानि वेदनिनदः संपूर्ण शास्त्राब्धयश्चैतेपांतु सदासुलग्न सुमुखाः कुर्व- न्तुवो मंगलम् ॥ १२ ॥ दूर्वाग्रं मधुपञ्च- गव्य सहितं गोरोचनं श्रीफलंकर्परादि सुगंधवस्त्र निचयाः श्रीचंदनानीतिच ॥ तांबूलं फल पुष्प पुर्णकलशाः पुण्यांगनाभिश्ताश्चैतेपातु सदासुल- ग्नसुमुखाः कुर्युः सदामंगलम् ॥१३॥ मन्वादि- विवाहपद्धति स्मृतयः पुरोणतंतयः काव्यप्रवंधादयः पटकक्षाः श्रुतयश्च तत्रविधयः सूत्राणि भाष्याचि ॥ सिद्धांतायमनेम जातकशो गर्गादिकाः संहिता श्चैतेपांतुसदासुलग्नसुमुखाःकुर्वन्तुवोमंगलम १४ दिङ्नागा गिरयस्त्वनर्यमण यस्त्रेधाविभक्ताग्नयः क्ष्मापालामुनयः प्रसन्नकवयः संपूर्णशास्त्राब्धयः॥ संकल्पद्रुम कामधेनुसहित श्चिंतामणिः कौस्तुभ- श्चैतेपातु सदासुलग्नसुमुखाः कुर्वतुवोमंगलम् ॥१५॥ श्रीमत्पंकजविष्टरी हरिहरौवायु महेंद्रो- नलश्चन्द्रो भास्करवित्तपाल वरुणाः प्रेताधिपा- द्याग्रहाः ॥ प्रद्युम्नोनल कूवर सुरगज श्चिंतामणिः कौस्तुभः स्कंदःशक्तिधरश्च लांगलधराः कुतुबो मंगलम् ॥ १६॥ अंगुल्याकः कपाटं प्रहरतिकु- टिलो माधवः किंवसन्तो नोचक्रीकिंकुलालोनहि धरणीधरः किंडिजिह्वः फणीन्द्रः ॥ नाहंघोराहि मर्दीकिमुतखगपति नोहरिः किंकपीशइत्थंराधा विवादेप्रतिवचनजितः पातुवश्चक्रपाणिः॥ १७॥ कस्त्वंशुली मृगयभिपजं नीलकण्ठःप्रियेहं केका- मेकाकुरुपशुपति नॆवदृष्टविषाणे ॥ मुग्धेस्थाणुः सचलति कथंजीवितेशः शिवायागच्छाटव्यामि तिहतवचाः पातुवश्चन्द्रचूडः ॥१८॥ भिक्षुःवस्ति- विवाह पद्धतिः बलेर्मखेपशुपतिः कुत्रास्त्यसौ गोकुलेकासौपन्नग भूषणः शृणुसखेशेतेचतस्योपरि ॥ मुग्धेमुंचवि- पादमत्रबहुलंनाहंप्रकृत्याचलाइत्थं जलधिसुखा धरेंद्रतनयाव्यग्रागिर:पांतुवः॥१९॥कोयंहारिहरिः प्रयायुपवन शाखामृगस्याकिंकृष्णाोहंदयितेवि भेमिसुतरांकृष्णादहंवानरात्॥ मुग्धेहमधुसूदनो ब्रजलतांतामेवतन्वीमले इत्यनिर्वचनीकृतोदायत, याहीणोहरिःपातुवः२० दोषोमेत्वदुपेक्षयाबहुभुजः किंनैवभूमीतलेविद्यान्मामघनाशनं प्रियतमैना शित्वनाघोननु । कुत्रासंचपलायितो हमघनेसा- यत्रतेवल्लभायां सिछलशृंखलावितनुतांगोविंद गोप्योरियम् २१ मंगलालेखनेनालमलंकृत्यदया लुना॥समाप्तिनीयतेचैपादिजोदहनपद्धतिः॥२२॥ इति श्रीभारद्वाजकाष्टपालजातिजदयालुशर्म ज्योतिर्वित्संगृहीताविवाहपद्धतिःसमाप्ता॥ , मे० ० का . विवाह पद्धतिः श्री गणाधिपतये नमः ॥ अथ विवाह कालीन कन्यानामकरण सारिणी अधिनो के पहिले ३ पाद वाले का अश्विनी के ३ पादों मे मन्वियेपूर्व में पाद भिन्न मृग० के पिछले २ पाद पू० फा० उपा के ३ पाद पिछले ३ पा० श्र.ध. में नामधरे मे अधि० ४ | अधिक चतुर्य पादवालेका मृ०के पिछ०२ पाद पू०फा० पाद उ०पा० के पिछ० ३ पाद श्र० घ० में धरे मे० भरणी वाला भरणी में पाद भिन्न ३० फा० का • भर०४ पहिला • १ पाद उ०पा के पहिले २ पादों मे कृ० के पहिले पादवाला ५०० चित्राके पिछले २ पाद पादोंमें १. कृ०३ पा कृ. के पिछले ३ पाद वाला ३ पादों में भिन चि० दघिरते पहिले २ पाद शव० में १० रोहि. पूर्व रोहि० के प्रथम पादवाले को पू० भा० के पहिले ३ पादों में १० रोहि० के रोहि० के पिछले ३ पादवाला पादभिन्न उ० फा० क पिछ० ३ पाद | पिछ. ३ पाद पू. भा के पहिले ३ पादों में हामृग पहि मृग के पहि० २ पादवाना पादभिम उल्फा० के पिछ : ३ पाद पू० भा. के पहले ३ पादों में मृग• पिछ २ पाद वाला पादभिन्न रोहिफा पाद पिच पिछले ३ पाद ह० पू० भा० में आई पाला पद में पाद भिम धारण करे ।। अन्य मत से म० पू० फा० १० मा० रेव. पुन० पहले ३ पादपाला पादभित्र मृग. पिछले २ पादों में विद्या. स्वाती में १पाद २पाद मि. मृग०२ मि० आई ४ मि पुना३पाद . सिं०म० सिं० पू० फा सिं उफाश्पाद विवाह पद्धतिः १२.. कपुनश्पाद पुन० के चतुर्थ पाद वाला पुष्य० भ० रो० वा. ऽनु० उ० पा० पिछ. ३ पादों में क.पुष्य३पाद पुष्य पहि० ३ पाद वाला पाद भित्र पुन मृग० पिछ. २पाद स्वाम. क. पुष्परपाद : पुष्य चतुर्थ पाद वाला-ह० १० उ० फा० प.पा. के पिछ० ३ पाद अधि० म. रो. में का अश्ले० अश्लेया पाला पादामिन चि० ज्ये० पनि परित २ पादों में मघा वाला पाद भिन्न चि. पहिः पाद शत.पि.३पादोंमें पू. फा. वाला पाद भिन्न उ० फा) के पहि० १ पाद में अन्य मत से रो० मु. स्वा. ज० में च. फा. पहि० १ पाद वाला रो० सपा. पहि.. पाद. पू. फा. में फ०७० फा० उ० फा० के पिछले ३ पाद बाला ३ पाद भिम २ ३पाद उ० पा० पिछ ३ पादा में क. ह. हस्त वाला पाद भिन्न उपा • के पिछ• ३ पाद श्र. में क० चि०२ चित्रा के पहिले २ पाद वाला पाद भिम रखे भन्य पाद मत से रले. विशा० विछ० १ पाद पे० म० २०२० तु० चि. २ चित्र के पिछ. २ पाद वाला पादभिम विशाखा पाद पहिले ३पादों में। तु०स्वा० स्वाती वाला पाद भिम पू० मा० में मन्यम० भ० पुप्प. पू. फा० पनि पूर्वाद्ध। दु०वि० ३सद विशारा पहले ३ पाद वाला पाद मिन रखे । अन्य परिव पुप्प चित्रा २ पिछले पाद म पनि पूर्वाप । १० विशा १. विशाखा पिछले १ पाद पाला प° शव पये में। मजा ४ भनुराधा पाला पाद भिमन्यापू० मा में। .

४ १२२ विवाह पद्धति ज्येष्ठा वाला पाद भिन्न म. विशा' के चतुर्थ पाद में चित्रा पहि० २ पाद घ. में घ. मृ०२ मूला पहि २ पाद वाला पाद मिन्न क. १ पहिले पाद विशाखा पहिले ३ पाद चिघ पिरले २ पादों में घ. मू. मूला पिछले २ पाद वाला पाद भिन्न क. १ पहिला पाद विशाखा ३ पहिले पाद चित्रा घ. पिछले २ पादों में ५० पू०पा० पू० पा पाद भिन्न पू. भा. उ० फा' पिछ २ पाद पू पा के द्वितीय चतुर्य पाद घ. द. वाला मात्र में रखे ५.३० पा.१ ज पा पहिले पाद वाला पू. पा. पू. भा. भर में माउ०पा-३ उ पा के पिछ. ३ पादवाला पाद भिन्न अन्य पुष्प अनु पृ. भा• पिछ? १३० मा में श्रवण वाला पाद भिन्न मृग में अन्य धनिष्ठा के पहिले पादवाला पाद भिम अन्य। अश्वि ऽरलेसावि- ज्ये. धनि के पिछले २ पाद वाला पादभिन्न अन्य अश्विम ज्ये. म् शव शतभिषा वाला पाद भिम प्रायः कृ मृग० माघ०२ का पूर्वार्ध ऽनु कुं० पू० मा० ३ मी० पू०मा० पु. भा. पहिले ३ पादवाला पाद मिन मन्य० रो. मा० पूर्वाधै पपा० ३० पा० पहि० १ पाद में १० भा० चतुर्य पाद बाला पू० पा० ३० भा० ३० पा० रो०३ पादों में। १० मा० के प्रथम चतुर्थ पादवाला ३० फा° ३० मा. पिछ ३ पादों में १० पा• पिछ०३ पादों में मी० उ०मा०

विवाह पद्धतिः
१२३
मो० उ०मा० उ. मा.के द्वितीय तृतीय पाद वाला रो प्रथम पाद :
भाई उफा पिचले ३ पादों में।
मी. रेव. २ रेवती पहिले २ पाद वाला पाद भिन्न मृग पहिले
२पाद पुष्य में।
मी० रेव. २ रेव. पिछ. २ पाद वाला मृग. पिछ. २ पाद-१०
पुन पुप्या पपा आदी में।
नाम करणविधान और सूचना
असल में वर्ग वर्णादि विचार में नामकरण होता है उस को भाल.
स्यवश विद्वान् न देख फर केवल उसी नक्षत्र के पाद भेद पर बनता नाम
रख देते हैं यदि नहीं बनता तो अमुक नाम लिखदेते हैं । अतः हमने पूर्व
विद्वानों से संमत यह सारिणी प्रकाशित कर दी है इस में रीति यह
है, जिस नक्षत्र का जन्म घर का हो उस की पंक्ति में लिखे नक्षत्रों में
कन्या का नाम धारण करना उस समय उस नाम पर गुरु शुद्धिका विचार
करना या सारणी बहुत करके शुद्ध की गई है वो भी किसी स्थान में
मशुद्धि रह गई होतो शुद्ध करलेना इसमें शेष देखना यह होगा-वर्गबेर
और पडटक का ध्यान करना - फिसी २ स्थानपर संदेह है ब्राह्मण के
लिये नातत्रिक वर्ण विचार की आवश्यकता नहीं-
कन्या केलिये गुरुमल १। ३ । ६ । १० गुरुधूना
४।८।१२ एरुः नेष्टा
शेष २।५।७।६।११ गुरुः श्रेष्ठः

४
अथ शुद्धि पत्रम्
पं० ऽशुधम् शुभम
पं० भभुवं शुभम्
वरपिता बर ६.
भाज मा
सवितु
सवित
२३
१६ साथ साथ
फल
निरास
सवार एवंदर
धमि
२१ विशिष्ट विनि
सम्धी
सम्बन्धी
एवं
६८
प्राध
१५ देव देव s૨
अर्यात
विशं ७. rine
११ यमि
१४ दिश

Ath Vivah Paddhatti

Author
Sharma,dayalu
Title
Ath Vivah Paddhatti
File name
Ath Vivah Paddhatti
Text
OCR done
Citation
1928
Published
2012/08
Publisher
Mujjafar Garh.,dayalu Chandra Sharma Asa Nand Sharma
Language
Sanskrit
Pages
133
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311611
Barcode
99999990320481.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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