Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Pakrit Vyakarn-1

Pandit Bachardas G Dosi · 2011/08

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प्रकारका
कोठारी विट्ठलदास मगनलाल
गूनरात विद्यापीठ, अमदावाद.
卐
: मुद्रणस्थानः आदित्यमुद्रणालय :
:: रायसडरोद-अहमदाबाद.::
मुद्रकः गजानन विश्वनाए पाठक.

विनापन
गूजरातपुरातत्त्वमंदिग्नी प्रचंय ममितिना मंवत १७.५
ना भादग्या बद १३ नी वेटकना गद १ (परिमिट ) मदय
आ पुम्नक प्रसिद्ध करवामां आवे छे.
गृजरान विद्यापीट कार्यालय,
अमदायाद.
आमी वट १२.१०८..

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प्रवेश पाहतन्याकरणना शिक्षक अने शिष्य माटे आ पुस्तकना परिचय पूरनी थोदी माहिती आ प्रमाणे : अही नीचेना चार मुद्दाओ विष क्रमवार लखवानुं छे- । रचनादीली * সালাদ १. अर्धमागधी मारा १ प्राकृनमापानां व्याकरणी १ रचनाली সবা না দালান ৪াম ন সা ধুল लवामा आन्यु छ पण प्रमने करवामां आव्यो छे. हमचंद्रना प्राकृतयाकरणमा माया पहेलो प्राकृतभाषानु व्याकरण आपलं छ अने पर्स मे गाग्मेनी, मागधी, पैशाची-चूटिका पशाची अने घेटे अरमान व्याकरण आवामां आवेढुं छे न्यारे प्रस्तुत पुस्तरमा पब व्यफरने मागे माये मनाइवानां आन्यांचे एटने आ पुनरमा माननुं व्याकरण आरताने ने नियनमां शारमनी, मागधी, पैशाची-नलिका पैशाची अने अपशनी विशेषता होय ते पण माथे माय-मानापाना नियमानी मापे-ज आरवानां आरी नमो माहतमा मायरसने क.ग, च, न, न, द, पय अने यो मोर भाप: (ओर १ ) आ निपल अपवानी माये न सुटना पद के रचना मायके, गोर- मनमा मायभागी मनं ६. धाप मनमाय .' • 'पाय (१२ अंने ११) 1

आ रीने वर्णशिकारने लगता वधा नियमोने आपवामां आव्या
है. नियमोमा साथी पहेलो मी साधारण नियमोने आपवामां आन्या
के अने पी मिशेर ( आपवादिक) नियमोने मूकामा अव्या छे.
नाम अने आम्यातना प्रकरणमा प्राकृत, शौरसेनी वगेरेनां रूपोनी
साधना बताया पनी क्रमवार प्राकृत, शौरसेनी वगेरेना रूपाने
मुसामा आध्या हे अने केटलेक टेकाणे बघा रूपाने साये साये
एक न ओठमा पग मूछे (ो पृ० १२५-१२६-१२८--
१२९-१३०-११२-१३३ नामप्रकरण अने पृ. १४१ तया
१.२५१ आम्यान प्रारण)
ग्याम रिशेषता (विशेषताओने टिप्पणमा मूकेली)
(१) पालिनी साधे सरसामणी
मातभाताना वर्गविकाना नियमाने पालिमाषाना वर्णविकारना
नियमोन पाय मनातामा भागाचे अने केटले म्यते नो पालि
शोने पण मूसलामा माया ( पानिशब्दो माटे नभो ४० -
१५-१८ वगैरे)
नामना, यातुना, कृतना अने नसितना सोने पालिरापानी
माय मुरूमा मा छ भने केही र नायार पानिमा प्रन्ययो
भनि म परमानगी नापीछे (प्रत्ययो मारे जो पृ. २४८
श्री ३९५) मोगा ने चीन का मंगवित म मरमा.
मी माटे पालिया नियमाने आपसमा अगाछे. एकदा पालिनी
अमाननी मरमामी मनिष्टर दुर्गावतार्मा भागछ भने ने
घटना नमक, मानवी अभ्यामीमो मा पाटिने माशि

(B) वैदिक संस्कृत अने पाकचनो संबंध ननामां मना रत्रियी लेक छैटा नाकंडेय मुधीना क्या माहत्याकरणकारोर प्राकृतपोनो माधना माटे लौकिक (वैदिफतर) मंतनो न उपयोग करेलो, नानुसार मा पुनकलां गएन शेन्लीने मान्य राजवानां आवी छे. परंतु अत्यारनां विपुल साधनोयी एम नगाय छेके, प्राकृतमायानो मंच वैदिक संस्कृती माये पर छे (मको आयंविद्यान्यान्यानमाया पृ०१९४-२०९) तैयी प्रास्त- सोनी साधना माटे वैदिक शब्दोने पग महमून रावया ए, मर- खाननीनी दृष्टिन विशेष अगत्य छे. आ वातने सूत्रवत्रा वैदिक संस्कृतने मुठभूत राखीने पन सरस्थाननी करवामां आवी छ (नओ १०१९-९१-३०९) पाहतना एवा तो क्या य नियनो छे ने वैदिक मंन्लन पो माय मरता आवे है, [अनके मंचनवर (जूझी..नि. १) वैदिवासी पया ( पवाद) उन्ना (उदान्) नोंदा (नीचात्) देवकीनः (देववर्मना) या का दिल मां यजनों लोग परी. ': ''नी टोर (ो १६ नि: ५ दया : १५.नि. ४) न

यमन
संयुक्तनी पूर्व इस (ो पृ० ४ नि.)
रोदसिमा (रोदसीया)
(अमात्र)
''नो 'उ' (जूओ पृ. ७ नि०८)
बुन्द (वृन्द)
''नो 'इ' (भो पृ० ६८-६९-विकार)
पूरोदारा, पूगेश योरे.
उपर्युक्त उदाहरणोनां चैदिक स्पळो माटे अने विशेष उदाहरणो
मारे भूमो आर्यत्रि याव्याख्यानमाळा पृ. २०३ थी २०८)
पण पुग्ना वधी जाय अने प्रवेश करनारने कठण लागे एपी
एममा निययाने अहीं नथी आपवामा आत्या.
(३) आदेशो फरया करता मूळ शब्द उपरथी ज
विकृत शब्दने बताययो
जना वैयाकरणोए. संस्कृत शब्दोना आदेशो करीने प्राकृत
शब्दो मनापवानी रीत म्वीकारी , पण भाषानुं ऐतिहासिक अने
शाम्रीय दृदिए निरूपण करवु होय तो जे ने शब्दोनी सरतामणी
की माती होय त्या आदेशो करता करता ए मूळ शब्दोना न
उच्चारणनन्य वर्गविरागेने बनाया जाइए. नेमके
' और 'मषा प्राकृत • ओलि' शब्दनी सावना माटे
नका,, भारम, निर्यक, प्रामाणिक, वाडी, मधमानी, सनी, श्रेणि,
श्री, इट हो भने कुर पटया अर्थमा (अणे माटे नओ आप्टेनो
कोर) वागता • मालि' शब्द उरी पक्ति' अर्थमा
'ओति बनानी मगमग करती करना पति अपंगाया
+

.. , अ आवनि' शब्दन । आउनि ओनि' को बताने ओलि' शब्द अनावधानी नत एतिहासिक अने मापासवनी बहिर वारे मुसंगत लगे छे. मन' नानीकर्गने मन्ह न्य बनावका मुं सहन माद यतुं मन्ह प ज अधिक मंगत लागे छे. जान करवा उच्चारणोयी यता ऋमिक वर्गविकारो कळी सकाय छे बने न्याकरणमा आवनी गोन्पदोष पर अटकी . आ हकीकत नहीं मात्र एक उदाहरण हागन दीवाना आवी छे (नओ पृ० ५४) (2) आगमानां नहि समाएलो योनी साधना जन आगमोना केटन्त्रको अत्यार मुर्ग अगमाभ्यां हनां तेने पालिकापान रूपों द्वारा सावदानी प्रयत्न करवामां आन्यो है (ओ पृ० १३६ भने २६१) २ माजनमापा शौरसेनी अने मागधीन क्षेत्र एना नाम उजाया न नागितुं छे, पशाचीन क्षेत्र- "पान्य कैकय-वाहीक-सिंह-नाट-युतः। मुवेश-मोन-गान्धार-हेव-कलोमतान्तथा ॥ एत निशानदेशाः न्युदयो भन्। (पद्मापानविन ० १ को १९-३०) का लोकमां नगादे छे. सावरण पाहत अने आशा क्षेत्र ज्याक हे एले ए.माटे को देशने निशी काय नाह.

वैयाकरणोए शब्दशावनी दृष्टिर प्राकृतना प्रण प्रकार जणावेला छः १ संस्कृतनन्यप्राकृत, २ संस्कृतसमप्राकृत अने ३ देश्यप्राकृत. [१ जेनी व्युत्पत्तिनो क्यारे संबंध यने नकारना संस्कृत साथे छे ते संस्कृतजन्यप्राकृत. २ संस्कृतनी जेवं प्राकृत ते समस्कृतप्राकृत. नीचेना एक ज लोक द्वारा संस्कृतसममातनो परिचय यई जाय रे. "चारसमीरणरमणे हरिणकलङ्ककिरणावलीसविलसा । आवदराममोहा बेसमूले विभावरी परिहीणा"॥१॥ (महिकाव्य १३ मो सर्ग) ३ देश्यप्राकृतनो नमूनो आ प्रमाणे : “रे खेआलुअ सोसल इमाण खोहीण महामावडिओ। शुद्विरससि कह व नुमं अकुष्टिओ टकरादि फुर" ॥ (देशीनाममाला पृ. ९८ श्लो• ६५] प्रस्तुत व्याकरण पेला प्रकारने लगतुं छे. नीनो प्रकार तो संस्कृत व्याकरणथी न सिद्ध छे अने त्रीमा प्रकारचें प्राकृत हनु सुधी शास्त्रीय गवेषणानो विषय न बनेलं होवाची आमां तेनुं निरू- पण करई योग्य घायु नपी. एना बोध माटे देशीनाममाला वगेरे देशी भाषाना कोशोथी न चलावी लेबु पडे एम छे. ३ अर्धमागधी भाषा प्राकृत, शौरसेनी वगेरे भाषाओनुं व्याकरण लसता भामां क्यांय अर्धमागधी विषे लखवामा नयो आन्यु, एपी कोइ एम तो नज समनी ल्ये के, अर्धमागधी कोई भाषाज नथी. * महिकाव्यना आ सर्गमां समसंस्कृतम्राकृतनां आवां अनेक काव्यो . भ सर्गर्ने नाम ब 'माषासंनिवेश', . .. जनमुनामा केटीक टेकागे अर्धमागधीन भाषा तरीके नणाची में अन साये एम पण हवामा आन्यु छ के, ' भगवान महावीर অর্থ এখন তার বলা না अर्धमागधीने लगता ननमूत्राना उदगो आ प्रमाणे छः " भगवं मणं " भगवान् अर्धमागधीभाषा- अदमागहीए. भामाए. द्वारा धर्मन कहे ." धम्ममाइक्जद (समवाय--अंगसूत्र १०६० समिति) प्र.- देवा णं भने कयगए " हे भगवन् । देवो कह भासाए, मासंति ? भाषामां बोले छ? कपरा वा मासा अयवा बोलाती भाषामा শাধিস্লাগা कर भापा विशिष्टले! विसिम्मति ! उ.-गोयमा! देवा णं अद्ध हे गौतम ! देवो अर्ध- मागहार मासाए मासंति, मागधीमापामा बाले सा विय गं अद्धमागही अने बोलाती मापामां मासा मामिलनाण पण तेन भाषा-अर्ध- विसिम्स" मागीमापा-विशिष्ट छ। (मगवती--अंगसूत्र ४ पृ. १८१ प्रदन- २० राय० अने समिति पृ० २३१ .

१४ तए णं समणे भगवं "त्यार पछी भगवान महावीर महावीरे कूणिअम्स भंभमारपुत्र कोगिकने अर्थ भमसारपुत्तस्स मागधीमाशमां धर्म कहे " अद्धमागहाए भासाए भासति" (औपपातिक-उपांग- सूत्र०७७ समिति) प्र०-" से कितं मासारिया: "मापानी दृष्टिए आर्यो कोने कहेवा ! उ.--मासारिया जेणं ओ अर्धमागधीभाषामां अद्धमागहाए बोले छे तेओने मापानी दृष्टिए आर्यों समनवा (प्रज्ञापना-उपांगसूत्र पृ० ५६ समिति) आ उपरथी अर्धमागधी' ने भाषा तरीके अने महावीर अर्धमागधीमापामां उपदेश करता हता' ए वन्ने वातो स्वीकारी शकाय एवी छे पण 'अर्धमागधी' ना मापा तरीकेना उल्लेख मात्रथी न कांइ एनुं व्याकरण लखी शकाय नहि. व्याकरण लखवा माटे तो एना विपुल साहित्यने मामे राखq गोइए, पी बीनी भाषाओ करतां अर्धमागधीनी जे खास खास विशेषताओ होय ते बधी साधी शकाय. काइ ने चार रूपोनी विशे- पताने टीधे कोई एक भाषाने वीनी भाषाथी जुदी पाडी शकाय नहि नेम न ये चार रूपोने माधवा माटे जुदु व्याकरण पण लवी शकाय नहि, नो फक्त वे चार रूपोनी ज विशेषताने लीधे एक भासाए मासेंति"

मापाने वाले कमायी नदी मगाशे शकनी होय भने टुं व्याकरण
पन नही रहुं होय दो नातामोने 5 व्याकरगोनो कोन
केन आदन
आसंवा काचार्य चंद्रन वाहन पर श्रीहेनडे
प्राकृत, गौरमेनी, मागवी, पैशाची बने भागनं व्याकरणी
नन्यां नम माय माथे आवाहन पा लवू हे. साधारण
पाहल कन्नं आतावनों का विशेषता कल पन ते पली
नाले के नई व्याज क नेने योन्य नयी नगायु.
आजकारणी सापांनाहना पटानां आतन पग एलने
मेवी टीई है.
हेमचंद्र मानन देवान शामिनी, मानवी अंने पैशाची
दवी प्रायः नवरयानां वागली के नाक्रीय मानो व्याकरण
लवा गाय भने ननभागनानी नापा, व्याकन न ९ कर
भदिनानी दान नयी.
मनपरामा नगीना साहित्य तरीके. सिद्धि पार्नु
मनन्त कागनाहिं सनी नाम टुं, एविन माती भने
भावना एनी बयान पर गंभीर हलो छ य एम एमाहिल्यने
लगद एक मुटुं व्याकरण केम न लम्व्यं ! मदन एमने नाटे
वर्गमहल .
एपनी उदर भाचार्य हेमरंद्र पोनानी कृतिहागन आता
दावा है. न अगर नंद गय रे. आनिलम दं
न्याकन करवा ची दम दिपता
नदीम ने या
गहननद मगई ने महल्यन -
प्रकला कर गिर विपन :

एमणे ए मापाने ए पन्ने प्राकृतोमा भेळवी दीघी छे अने एज कार- णधी एर्नु मुटुं व्याकरण करवा तेओ मेराया पण नथी. एमना समयनुं धातावरण गोतां तो नरुर ए पाणिनिना वैदिक व्याकरणनी पेठे जैनागमोनी मापार्नु पण न्याकरण लग्नाने प्रेराया होत. जैनपरंपरामां आचार्य हेमचंद्र न एक एवा प्रतिष्ठापक पुरुष छ नेमणे जैनोनी साहित्यने लगती प्रतिष्ठा साचवानो भगीरय प्रयत्न सेव्यो छे. नबु व्याकरण, नवु छदःशास्त्र, नवु अलंकारशास्त्र, नई घातुपारायण, नवा कोशो, नवो नियंदु, नg पुराण अने नवु योग- शास्त्र वगेरे ए बधुं जैनोनी विशेषताने खातर नवु नवु लख्या छतां आगमोनी भाषाना ज प्रसंगमा एमणे वृद्धप्रवादनी सामे पण में मौन बताव्यु छे ते न आपणा ए प्रश्नना पूर्वोक्त उत्तर माटे पूरतुं छे. वळी, आचार्य हेमचंद पोते एम पण मानता लागे छे के, आगमोनी भाषा अर्धमागधी तो जरुर कही शकाय पण नो एमा । अर्धमागधी' नामने योग्य फेटलीक विशेषताओं मागधी भाषानी पण मळेली होय.आ विशेषताओ तपासतां एमने तो फक्त मागधीनी एक विशेषता मुरब्यपणे जणाणी छे. ते विशेषता-प्रथमाना एकवचनमा मागधीना 'ए' प्रत्ययनो प्रयोग, नेमके; भी, अनीवे, लोए, अलोए, आसवे, संवरे, वंधे, मोरखे वगेरे. पण आ एक ज विशेषताने लथे तेओ आगमोनी भाषाने अर्धमागी कहेवी योग्य धारता नयी अने प्राकृत के आर्षप्राकृतथी जुदी पण गणी शकता नपी. माटेज मणे आगमोनी मापाने माटे पोताना व्याकरणा कोई खास स्थान आपेलु नथी. साये साये एटलं पण नणावी देबु मोइए के, हेमचंदना १७ ध्यानमां आवेन्टी ए एक विशेषता पर फांद आगमोनी भाषामा व्यापक रीते आयेटी नयी, एमां तो 'ए'ना प्रयोगनी पेठे प्राकृतना 'ओ' प्रत्ययवान्दो पण पणां रूपोते पण आवारांग नेवा प्राचीन सुत्रमा य-मळी आवे छे. नेमके: निखतो, उद्देसो, अन्पमाओ, निरामगंधी, उवग्ओ, उवेहमाणो, आलीगगुतो, महिओ, नाणागमा, संयवो, दोमो, हलवाहो, दुरणुनरो, मगो वगरे (आचारांग मूत्र १०११-१२४-१२७-१२०-१५५-१६८-१८३-१८४- १८५-१९०-१९२ समितिनु). एमणे न आ मंबंधमा एम नगान्यु छे के, “प्रायोऽम्यव विधानात् न वक्ष्यमाणलक्षणम्य".(प्रा० व्या० ० १५९ मू० २८७) अर्थात् “ आप प्रवचनमा प्रायः मागीना 'ए' प्रत्ययतुं न विधान छे, पण मागीनां चीनां वीनां लक्षणोनु नथी." आ उडेखमां वपराएलो 'प्रायः' शब्द आग- मोमां 'ए' प्रत्ययनी वपराशनो पग संकोच बनावे छे अने एथी न एम नणाय छे के उपर्युक्त · ओ' प्रत्ययनी वपराशन आगमिक क्षेत्र पण कांइ हेमचंद्रना ध्यान वहार छे एम नी. मार आ छेके, आचार्य हेमचंद्र पोताने उद्भवेला जन आग. मोनी भापाने लगता प्रश्ननो बुलासो आम वे रीते करी बनान्यो छः एक तो जन आगमोनी कहलाती अर्धमागधीने पोतानी कृतिमा खास जुटुं स्थान नहि आपीन. वीजें, एमां जोइए तेटला प्रमाणमां मागधीनी विशेषताओ न होवार्नु जणावीने. आगमोनी भापा अर्धमागधी नयी पण प्राकृत के आप- मात ' एम स्पष्ट शब्दोमां कहेवा ने, जन समाजनुं वातावरण अत्यारे पण नथी तो संप्रदाय बारमा सेकामां तो शी रोते होय. छता-य.एक जवाबदार अने प्रामाणिक वैयाकरण तरीके आचार्य आ -

"
हेमचंदे उपर्युक्त सादी हकीकतने पण आगळ जणावेली भगिए
आबाद रीते जगावेली छे अने साये वृद्धप्रवादना अनुसंधाननी
युक्ति पण बतावेली छे. आ संबंधमा एमनो आखो उल्लेख आ प्रमाणे
"यापि पोराणमद्धमागहमासानियये हवइ मु" इत्यादिना
आपम्य अर्धमागधमापानियतत्वमाम्नायि वृद्धतदपि प्रायोऽस्येव
विधानात् न वक्ष्यमागलक्षणस्य
(प्राकृत व्या० पृ० १५९ सू०२८७)
१. आ उग निशीधनूर्णिमा के. जुभो लिखित प्रति पा०
२५२ पना मा. प्रा. वि०म० सं०. ए उगमांना 'अदमागइ
पानी प्यारया करता श्रीजिनदास महाचरे जणायुं छे के; " मगइदवि.
सभामानि भद्रमाग" अथ"अहारसदेसीमामाणियत अधमागध"
भान् एमगे 'अयागध' शब्दनी थे व्याख्या करी : पहेली-
मगर दशनी अदधी भाषामा निपत ने अर्धमागध. याजी-भटार
गतनी देसी भागमो नियत ते अर्धमागध.
वर्तमान भागमोनी भाषामा पहेली व्यारया सो घटती नयी एम
मन पाने की
.
योजी मामला पण जो थागमोनी भाषामां पटरी तेवी हो।
मोगर मैने प्रधानाद आपी मानार्य हेमचंद्र ए जि कारक पु
पर समान ममन कमा. पण एपमा येश.
काल ए. पासाफ समान रहा है, एयी जगाय छे के, ..
TET पर आगयोनी मागमा घटती नदि दोर अपरा. प्यास्यामा
कोटा अहार दंग क्या ममत्रया! एम गुंगवायी है.
गरमागंना मानना प्रसंगमा श्रद्वारमसीमामा गए'
राय:प्रां मळे हे, न्यानो अयं 'मटार (गानी !
देसी मासा free' थाt.
एना मारमियानी

फगानी दमदार नीने
अगंमा पानी पानी
'हामणगा'मा अनेर
जानिक गरमा
"नले गरे
सापरिपलायन राना पकामांप्रदी गयी भने
गिरनाire" मदार प्रशासनामा
नि यो
पतागून १.२८
माना मन प्रमाणे
मिति 'भार माननी मायामा नदिन
ठग पृ. ४२"
अहार माननी लिपिमा 'प्रचीन
भयो भाभदार मालनी गरिनो
और माना गयमा भने नंदा.
मत्रनां मरे
"तु मे ददने त्यार पी ने हटान
বৎ বাবস্থায় नामनी कुमार यौनेर पळान
अहमदमीमामाविमा
प्रवीन योजने अटार प्रकाग्नी
दोमानिक मूत्र १०९८
देही भागमा निपुन पो"
ममिति
मुत्रना जोगीना बहार देरने लगती बापनी ऐन
उपली उकटी नयी ५ एटटुं काली काय के, कदार था उले.
मान बहने ज श्रीनिवास मानो सोनानी ननिमा अदार अननी
देशी भागने 'मागी' नाम आन्यं होर.
श्रीहरिमटना विद्यार्थी संने ममममी तथा श्रीमान्दार अमर नाम
नत्यादिन्यना हिण्य श्रीदक्षिामांवहनरिए यनावटी 'प्रायन कुवलय
माला' ने डोठा अदा देखने लगी आगदान उकीर.

पण याद गरनु जोइप के प्रश्नुत अर्धमागधीनी चर्चा साथै गुयलय. मालामां आवता यदार देशने लगता एउगनो कमोज संबंध नथी. युवरायमालामा ५ देशोनी गथना था ममा करेगी। "साडा कनाडा चिय " खरदेश, फणांटकदेश मालविया कन्नुज-गोल्या । मालयदेश, कनोमोश, गोसदेश, करय मरहट्ट य सोरटा दफा करय (कारवा!) देश, महा. किरि अंग सेंधवया ॥ राष्ट्रदेश, सोरठदेश, दफदेश, कु. लि. प्रनि पृ०७५ किरदेश, थंगदेव भने सिंघदेस" पेली बाजु पं०५ पूना मां• प्रा. वि. मं० स. " था उवमा मात्र चार देशोने गणावयामां आया है परंतु मा पछीना एक बीजा उल्लेखमा (पृ.७६) एयी वधारे देदोने भूकेला. आ नीचेना उडेग्यमां देशोनां नामो साये तेने देशना मनुष्योनो स्वभाप अने भाषाना एक ये शब्दोने पण मूकवामां आया हे अने छेनटे उपसंहारमा जणावेटु छे के, " श्य अट्ठारसदेसी- भासाउ पुलइकण सिरिदत्ते । भन्ने द य पुलएनी जयस- पारस- बबरातीए ॥ ए प्रमाणे श्रीदत्त नामनो कोह गृहस्थ धदार देशनी भाषा- ओने जोहने (सांमळीने) बीजा- ओनी पण-एटले अनायों पैकी जयत, पारस अने बर कोनी पण-मापाने पुए छे (सांमळे " ग्रंथकारे उपसंहारमा आम अटार देशी भाषानो उालेख कयों छे भने देशोनो गणनाना प्रमंगमा मात्र सोळ देशोज जपावेला छे तेर्नु कारण समजा नथी. ने उलेमा ए देशोने जणावेग छे ते उल्लेस आ प्रमाणे छ।

२२ दत्य र पिसमा त्वां प्रवेश करता भने दिध संबटेममानलरिकर भनेर देगनी नागना जानकार टेनजिय। तं जमा- ते ने देशना बनियाने गया. कनिका निझुग्यो बहुपनमर (?) ने जेम्ये प्रथम गोड देशन्न मुजर बरहे । गोकोने गया, योको निर 'बन्द' नि उही अट नापी, पाया, ममामांनी () पेन्द गोदर दल्य ।। ने निलंड हाय के उया पनीममिन्दुर ददर अग्न्यु संलनाग होर के. पर पपईमा पछी मयदाना लोसोने टोया, एलोवो नय नीति, मध अने चिदमा ददर, सोला भने ने या बोलनाग ' देरे मेरे आड १ नीदग्दिनेह-बन- पली मगपना लोगोंने डोपा, माप मुग्पोलिन । पनीको दर्दन का माटा, 'मम' रंग देच्छा गिना, मुन्टनिय बने 'एन मारे गमगे। वंटनाग हार है. कदिने सिंगलनोपर न्टी दिना पटले. गंगा वादिनन्नर पारे (!)। मनन ना कांहे. दिने दिने निर नाने रंग, पदको अंदर पन्त, नाती अग्रता ने 'म'कोर नगर. माती काय न बोला, २२ 'मरि पारि जंपिरे कोरे गुमागे पोए॥ दभियनदाणपारेस-विनाण- दयाविवनिजयसगरे। 'एह तेह' चयने दके उग पेन्टर युमगे॥ अने जाही नासिकाबाळा, मार यइनारा अने 'भरि पारि' एवं बोलनारा होय. पछी ठक, देगना कोने जोया, ए लोको दाक्षिणप, दान, पौरप, विज्ञान अने दया स्निाना होय छे भने 'पर तेहै' एम पोलनारा होय छे. पछी सिंधना लोकोने सोया, ए लोको ललित, मृदु, गांधर्वप्रिय, स्वदेशपगयण, हसमुया अने 'बसे पणो ' एम योसनारा होय . मालियमितमदए गंधव्य. पिएसएमगयनिते। 'वमे दारो' मागरे मुहले भर संभो दिद्वे ॥ कोरडे (१) य जड़े यह मोरं कटिगपीणाणगे। 'अायो नुम्या 'मांगरे भद देकर कापर ततो॥ एक्लोशियाटुंगे धम्मपरे मबिगिनिजथे। 27 मार गिरे यह पेन्टर गुम्बो यो॥ पछी कारदेशना लोकोने जोगा, लको कपिजल (1) जायह भोजी, कठण बने पुर अंगवाय तथा 'अपां नपा' पम गोल- नागहोय. पग्री गुर्जरोने पास मेको पी अने मायामी पुत्र सुगरपाठा, धर्मपरायण, मंघि विप्रहमा निपुण अने 'न उरे मा' एम बोपनाग होय छे. भोकाने बोगा, पोको (मा)मयो पाटिनविरिने कीमत मारना कमर पटनाग, नारदो हो मनमा . मुमो. मिवारवाला बने 'मन्दं कार्ड दुर' म बोलनाग दोपहे. जी मारमाना लगाने सोचा, नोकः, काळा भने नाना दर- मात्रा, नांधी, अभिमानी, गंद अन माद २ नानी दुम्मे पन शेलनागर. पछी कीटकना लेकोने पा, र लोगो दवाळा, मोह- पाळा, गेट, चंचळ बने 'बाई- पाटि मरे বানান नाम कमायेहि। उमर किमानेर गद्दे पनी । 'अटिमटि मनावरे देच्छदादर यो। . तोर . कुप्पामवाउने मामन (!) पानमपनहि। 'अनि किमि मान मन. मागे अह पेच्छद नाहर बयं ॥ লাতন, নানী- श्रावने दिनदह। इन दर ले मामा घोसना नदए अपरे॥ ददमदामने यह नानकपनीले 'दिले गहियो' उल्ल. बिरे वत्य मन्द।। पली ताद लोकीने जोपा, लोक पहेरनाग बने 'असि किमि मात पम घोटनाग होय. पछी कोमलदेडना टोकाने बोचा, ए लोको मयंकवाहीन, मानी, कारी अन 'जल तल ले' एम बोटनाग हाय है. पछी महागष्टना लोकोने ोया, ए. लोको रं दृद्ध, नाना पने काळा डाव तया हितमा मानफलहाल अने सहिए

हद । वर्तमान जन आगमोने महावीर भापित सममीने कोई
ए आगमोनी न भाषाने अर्धमागधी कहे अने ए उपरथी न एनां
ध्याकरण अने कोप बनावे तो न बनी शके !'ए प्रभन समाधान
आचार्य हेमचंद्रे पोतानी कृतिद्वारा अने उपयुक्त उल्लेगद्वारा पण
करी नांख्युं छे एथी आ आगमोनी भापाने अर्धमागधी समनवी के
एम समनी-ए विपेनां पुस्तको लखवा ए भाषाना इतिहासमा गोटाळो
करवा सिवाय बोनुं शं होई शके!
आचार्य हेमचंद्रना पूर्ववर्ती अने अंगसूत्राना टीकाकार आचार्य
अमयदेवे पण अर्धमागधी नाम घरावनी मापाने प्राकृत लक्षणनी
बहुलतावाळी जणावी छे. तेमणे लम्ब्यु छे के:
'दिनले गहिपल्ले ' एम बोल.
नारा होय छे.
पियमहिलासगामे मुंदरगोत्तेय पछी आभना लोकोने जोपा,
भायणे गेहे।
ए लोकोने स्त्री अने संग्राम बने
'अहि मदि' भणति थवरे
प्रिय होय हे, एमना गोत्रो मुंदर
अधे फुमारो पलोएर।। होय, अने ए लोको गैद्र तथा
भयकर अने 'आदि मादि' एम
बोलनारा होय छे.
उपरना उलेगमा गोल्ल (गोड), मध्यदेश, मगध, अन्तवाद,
कोर, ढक, सिंध, कारु (कारसाइ), गूर्जर, लाट, मालप, कर्णाटम,
ताह(१) कोशल, महाराष्ट्र भने आंध्र एम सोळ देशोने जणावेला छे.
धुरग्यमालानो आ उल्टेप अहीं एटला मारे आप्यो छेके, एमा
ए देशोनी गणना ए गते करेली हे. (आचार्य जिनविजयजीनी एक
नोधद्वारा आ उगने हुँ 'कुवलयमाला मांधी मेळवी शस्यो ई)

- 4 “र-सोनी मागच्याम् ' इत्यादि यत् मागधमापालक्षण तेन अपरिपूर्णा प्रावमापामगबहुला अर्धमागधी " (औपातिक वा पृ० ७८ मामिनि ) अभयदेवे आगमोनी मापा उपरथी नको कोर्नु पर्थमाग- घान सपनोता तो अर्धमागधी' नाम 'देवादार 'ना - ओड' (भरने छोडनार ) नाम नेवू लागे छे. तेओ साफ सास कहे ले के, आगनोनी मापा प्राइललगनी बहुलतावाली एक लक सिवाय मागीनां बानो खास कोने एमां बांइ न्यान न्थी, व्यी न वाचनार मननी शकशे के, दर्तनान आगमानी मापाने अर्धमागधी कहती के प्राकृत कहेवी ! । आगो माइत एमत तो आन वगा समययो चान्यो आवे छे अने हेमचंद्र अने अपरदेव करता यप्राचीन अने प्रामाणिक आचारि मतने स्वीकारली. एसंबंधमा आचार्य हरिभद्र नगाद के, .: प्राकृतनिबन्योति बालादिमाधारण: " रनि १८मालिकनी गे साबारामद भाग भोग मारे "दादाला मानदेय स्ट दे दे, 'निक' किन कन्दा टुंगा देना मा भने दे. मला पटले मान- कारले बंपी ग.देना 'कालापन मार्नु "सरदाद मानक पद निममदद जय मालकानांना सामान न!' सारे dि Fr नन्दन:

म रुका रसपार “उ र" कहने
पेट बोका हक सभाटेर पोले-
मन परेको गन्।
चन्ह मिसा
(सौम्म ११३ पना)
*कर पोसार मोर के पो भाका
हररोज गोदा ने अपने
मोरील आपला जोगले (घरेशन
कसबे
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पर.
मरने-का....
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सो से भी
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२७
मिलान महानं यामिका न्यानपा ।
पावन पं.पाटलानिमापिनापि निगर
4
गदि (1) विभुगमा माणि: या संप्रदाया ।
पशारि पूनाणि संयमान gira || ११,
प्रतानिशयमा गानि
मानि |
अति मानिमागिता || ११८
मायादिकमानणार ।
माना गागितामा
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म सान संस्कृतम. घामा पर
पवर पासमा पनी म भण:५१ म
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६०. .

२६ आटलं लख्या पछी ए आनार्यवर " उक्तं च" कहीने. पोताना उल्लेखना पोपणमा एक जना संवादने टांकी बनावे छ- " पालखीमदमूर्याणां नृणां चारित्रकाशिगाम्। अनुग्रहार्थ तत्तः सिद्धान्तः प्राकृतः कृतः ॥" (दशवेकालेक टीका पृ० ११३ बाबु.) आ उपरथी आपणे नोइ शकीर छीए के आपणो आ मत हरिभद्र करता य नूनो ठरे छे. ने प्रसंगमा हरिभद्रे उपर्युक्त उल्लेखने भूकेलो छे ते न प्रसंगमा वादिदेवमूरिना गुरु आचार्य मुनिचंद्र पण एन उल्लेखने (हरिभदना धर्मनिंदुनी टोकामां) मूके छे. धर्माबंदु पृ० ७७, द्वितीय अन्याय आत्मानंद समानी आवृत्ति. आचार्य मलयगिरि पण प्रज्ञापनानी पोतानी टीकामां एवाज 'प्रसंगमा एन वातने नणावे छे-प्रज्ञापनासूत्र टीका समिति पृ०६०. हेमचंद्रनी पछी ययेला आचार्यों द्वारा पण ए न मनने टेको आपवामां आव्यो छे- आचार्य प्रभावंद्रे बनावेला अने श्रीप्रद्युम्नरिए शोघेला प्रभा- वकचरित्रमा (पृ० ९८-९९) नणान्यु छ के, " अन्यदा लोकवाक्येन जातिप्रत्ययतस्तथा । आचाल्यात् संस्कृताम्यासी कर्मदोषात् प्रबो(वा)धितः॥१०९ १ उपरना या उलेखोमां यपयएलो 'प्राकृत' शम्द प्राकृत- भाषानो सूचक , अनुयोगदारसूत्रमा 'पात' शब्द प्राकृतमापाना अर्थमा पपयएलो (पृ. १३१ स.) वैयाकरण वररुचिना सम- यथी सो ए शन्द ए अर्थमा वपरातो थान्यो छ, अने ए पीना आचायाए पण ए शदने एज अर्थमा वापरलो छे. माटे कोइए अहीं राहरने भरहवो नहि.

२७
मिदानं मन्नं कर्नुमिच्छन् मंचं व्यनितान् ।
माकन कंदलगानिमाप्तिासि निगदरः ॥११.
+
यदि (इद) विश्रुतनम्माभिः पूर्वपा मंदायतः ।
चतुर्दशाति पनि हतानि पुगऽमदन ॥ ११४
प्रमानियमाव्यानि नान्यन्त्रिानि हालतः ।
अवनकादायनि मुधमन्यामिमापिता ॥ १५
बनी मनमर्मादिनानुमानाय मः ।
पाहतां नामिहाकपादनाम्यापन कयं हि : " ॥ ११९
अन् "मिदन दिवाकर नामना मुअमिर नामाइन
*न आगनीने मंननमा कम्पनी इच्छा करो" आना
ग्रंपसर पनाना नारी यु नपादन कर के दे. .
अंम दोन मगदरताने मांटे पूर्व पुरमा-मुकावि-
भागनान प्रानमारच्या आशामांटे जनम्या बाई
पत उचला
अर्थात् • अगमन कर उ.
गाईने प्रोविनयादार पानता नवनियामा दर जा,
मुदत विग कालिद-उपनिमितं ।
महायान्य प.पय निजी
पट. .
---
भारताने होभनमा
समान
नाकार
ए.)
अनुदा .

२८ अर्थात् ' संस्कृत अने प्राकृत में मापामओ छ.' आ रछेरा गीतनी भापाना प्रसंगमा छे. आ उपरथी एटलं तो जरुर तारवी शकाय के, अनुयोगद्वारना समयमां. अर्धमागधीने प्राकृतथी नदी न गणवामा आवती होत तो मूत्रकार प्राकृतनी साये न पोताना प्रिय अने देवभाषा तरीके प्रसिद्धि पामेली अर्धमागधीने पण मनावी मूले खरा ! आ प्रमाणे एक नहि पण अनेक जैनाचार्योए वर्तमान आग- मोनी मापाने सर शब्दमा प्राकृत कहेली छे माटे अमे पण अहीं एन मतने स्वीकारेलो छ, अने तेथीज प्रस्तुत व्याकरणमां पण जैन आगमाना भेटलांक विशिष्ट स्पोने प्राकृतना व्याकरण सा न नोपली छे. आ तो जैनाचार्योनी न दृष्टिर आगोमा आवेली मापाना संबंधो गर्ना पद, तदुपरांत बीनी प्रण दिए पण अर्थमागवी भागानी पर्चा थर शर. छे. तेमां- पहेटी दृष्टि मरतना नाट्यशायनी, पानी शुष्टि प्राकृत मानां व्याकरणोनी अने प्रोत्री टि अशोकनी धमलिपिभानी. भरतना नात्यशायमा का है के, "टाना रानभाणां श्रेटिना यादमाग" भग्नना० अध्याय १७लो६० नाटकोमा पाप नर्गले आफ्ना मेटो, समयो अने दोटियाओ গান শপ ৰা , নানা সা সা সা লাফোন तेने पायोनी भाशादाग भामागीना मापने की शा. मकानी माना नमना-- (मास, प्रतिज्ञायोगंधरायण) भटः-को काळो अहं भहिदारिआए वासवदताए उदए कौनिद्ध- कामाए भद्दवदीपरिचारअं गत्तसेवों ण पेक्खामि । माव पुस्फ- दंत गत्तसेवण पेक्खामि । किं भणासि एसो गत्तसेवओ कण्डिळमुंटिगिणीए गेहं पविसिअ सुरं पिनदि वि० १०२ भट:----सन्वं दाव चिटु राउळे मदपीटिसं गणिकार्मिम कुरो अभं आहिदि ति । १० १०६ भट:-~-कि गुम्बु एवं + हो, इमं वुतंतं अमञ्चस्स शिवदेमि । पृ० १०६ (भासने चारुदत्त) चट:-अम्मो अध्यमेतेओ। चेट:-अम्मो मट्टिद्वारओ । पृ०६७ चेटः-सुहौदेषु पादेस मूमीए पद्विदन्छ । पृ० ६८ (मासर्नु स्वप्नवासवदत्त) मटी-उस्सरह उम्सरह अव्या उम्सरह । पृ०८ चेटी-एटु एटु मट्टिदारआ इदं अस्समपदं पविसटु । पृ० १५ चेटी-अत्यि राओ पजोदो णाम उजागीए सो दारअस्स कारणादो दसंपाद करेदि ० १७ (शूद्रकर्नु मृच्छकटिक) चेट:-अग्नुए निश्ट, चिइट। उताशिता गच्छशि अतिका में शंपुण्गपुच्छा विम गिम्हमोरी। ओवगदी शामिम मइटके में। वणे गडे कुक्कुरशावकेन्न । पृ० २७

चेट:-लामेहि अ लावल्हं तो साहिशि मच्छमंशकं ।
एदेहि मच्छमंशकेहिं शुणा मडण शेदि॥ ३० ३१
आ गधी भाषा घेटोनी छे.
रामपुत्रनी भाषा आ प्रमाणे हे।
(कालीदासन शाकुंतल)
वाल:-जिम निम दंदाणि ते गणइस पृ. २९५
वाल:-बळिअं भीद म्हि पृ० २९६
वाल:-इमिणा एन्व दाव काळिम् पृ० २९८
हवे शेठियाओनी भाषानो नमुनो-
(शुदकनुं मृच्छकटिक)
चन्दनदासः-जेटु अग्नो
चन्दनदास:--किं ण नाणादि अग्नो नह अणुचिदो उवआरो
परिहवादो वि महतं दुःख उप्पादेदि। ता इह य्येव
उचिदाए भूमीए उवविप्तामि।
चन्दनदास-अह इअम्मरस पसाएणअखण्डिदा वणिचा पृ०१४
चन्दनदासः--आणवेदु अग्नो कि केति इमादो नणादो इच्छी-
अदिति।
चन्दनदास:--अग्न अलिअं एवं केणवि अणग्नेण अन्नरस्त
णिवेदिदं । पृ० १५
चन्दनदासः-फलेण संवादिदं सोहदि दे विकस्थिदं । पृ. १७
नाट्यशासकार भरतना उल्लेख प्रमाणे चट, रानपुत्र अने शेठनी
भापाने अर्धमागधी कहवामां आवे छे. एना नमुना उपर आपवामा
आव्या छे. उपरना नमुनानी भाषा साये आपणे आगमोनी भाषाने
सरसावीए तो केवळ सांभळवा मात्रयी न शुं नयी जगातु के,

. ए नाटकोनां पात्रोनी मापामां अने भागमोनी माफमां केटलो यो तफावत छ। हवे आपणे जोईए के, प्राकृत व्याकरणोनी दृष्टिए आगमोनी मापाने अर्धमागधीन नाम आपी शकाय के केम ! प्राकृत व्याकरणो तो घणां छे, एघांनां नामो पण हवे पछी आपवानां छे. यघां प्राकृत व्याकरणोमां वररुचिनो प्राकृतप्रकाश वधारे प्राचीन जे. एमां 'मागधीनी प्रकृति तरीके शौरसेनीने कही छे अने शौरसेनी करतां ने विशेषता छे ते आ प्रमागे वतावी छे:- १ मागधीमांप' अने 'स' ने बदले ' वोलबो. २ 'न' ने बदले प्रायः 'य' बोलवो. चर्गना कोई अक्षानो टोप न करतां नम होय तेम न बोलबुं. र्य अने 'घ'नो व्य' बोलको. ५ ने बदले 'क' बोलको. अकारांन शदना प्रपमाना एक वचनमां दर अने 'ए' प्रत्यय वापरवी. मागधामा अागन्त मृतकृदनना श्यमाना एक. दननमां उपरना ये प्रत्ययो उपरांत 'प्रत्यय १ . ६ ७ " पण वापरयो. - m . पष्टांना एकाचनमा प्रत्यय वारदो. मोधनना एकवचनमा अन्य अनो'आ' कर दो. ने बदले महला दाराना विद्य' ना म्यानमाविष्ट धापालामे. - १० ११ " . ३२ ‘कृत' ने बदले कड" मृत' ने बदले मर्ड' अने गत' ने बदले गड रुपो वापरवा. १२ संबंधक भूतकृदंतने सूनावा 'वा' प्रत्ययने बदले 'दाणि ' प्रत्यय वापरवो. 'हृदय' ने मदले हडक,' 'अह' ने पहले हगे' • अहक ' अने 'शृगाल' ने बदले 'शिमाल' तया 'शिआलक' शब्दों वापरतो. वररुपिए रतावेलं मागधीनुं सरूप उपर प्रमाणे छे, आ सिराय 'शौरसेनीना जे नियमों वररुचिए आपेला छे तेमाना निरपवाद नियमो मागधीमां पण उमेरी लेवाना छे. आगमोनी मापाने नोतां तेमां फक्त वररुचिए बतावेली ही विशेषतानो य अमुक अंश ('ए'नी वपराश) नोवामां आवे छे, तो मागधीना एक न अंशनी वपराशने लीधे आगमोनी भाषा अर्धमागधी कहेवाय के नहि ! ए साक्षरोज विचारी ले. 'वर्तमान आगमोनी भाषामा मागीमापान सरूप कैटले अंशे देखाय छे । एप्रश्ननी परीक्षा करतो आपणे भास धोरेनां नाटो जोयां, प्राचीन वैयाकरण वररुचिने तपास्यो. हो अशोकनी धर्म- लिपिओनी भाषाने पग आपणे जोड नइए. ए लिपिओनी भाषाने कई भाषा कवी?' ए प्रश्न हनी विवादग्रस्त छे तो पण पने प्राचीनमागधी' कहेवामा कांइ दोष नणातो नथी-बौद्धोनां त्रिपि- १ भागधीने सगर्नु स्वरूप अने उदाहरणो मारे जुओ प्राकृत. प्रकार पृ. १२८ थी १३२ तथा १३२ थी १३७ भयका ११ मी परिच्छेद अने बाग्मो परिच्छेद. २ आगमोनी भाषानां उदाहरणो माटे जूओ “जैन आगम साहित्यनी मूळ भाषा कर 'ए लेस (न साहित्यसंशोधक पु.१ अं.१ पृ. ३१ थी १७)

टकनी मापा ए लिपिओनी साये मरसानगोमां आवी शके एवी के.
त्रिपिटकमां पग मागवी' मापानो उपयोग ययानुं नीनेनी गाया
नणावे.
अशोकनी धर्मलिपिजोमां वपराएली मापार्नु बंधारण तपासतां
आ नीचे जगावेला मुख्य नियमो उपनी शके छः
१ अहिर्याव ( वर्णनुं नहि वेवडावू)
संयुक्त असर अनादिमा होय अने मंयुक्त अक्षरमांनो एक
असर लोपाय त्यारे ने शेप अक्षर होय छे ते वेवढाय छे अयवा
संयुक्त असरनी पहेलांनो हल स्वर दीर्य याय छे'
प्राकृत मापाओनो आ एक साधारण नियम छे. अशोकनी
धर्मलिपिओनी भाषामां ए नियम कचित् न सत्रवाएलो गोवाय छे
पण जैन आगमोनी मापामां प्राकृतना नियम प्रमागे ए नियम बरा-
घर मचाएलो है.
लिपिओनी मापामां वपरारलां एवां द्विव विननां अने
दीवावर विनानां रूपों आ प्रमाणे :
लिपिओनी मापा आगममापा করলে
अन्य
कप
कम्प
शल्य
१
सा मागधी रमाश नरा पायाऽऽदिपि।
प्रमुनी दस्मुवालया संबुदा चारि मारे"
२ यामां योनी मम्मलिरिमांपी जेलो मायां के ते उदा.
हरम लेके, एने मां बौदा बनेक को है. पर क्या यहाँ पिस्टार
मरथी याया नथी. वीवीए एक यात समनां गुणवानी जरूर छे,
अशोकना प्रान्तीय पादपन केटलेक लेकाने डोके में दने लां
नुषी सर्व साधारण तो टयानो प्रयत्न कदा.

} ज युक्त निखम निक्तम कलाण कछाण कल्याग २.र'नो वैकलिकाल अशोकनी लिपिओमारना स्याने सर्वत्र 8 नो प्रयोग वैकल्पिक रोते यएलो देखायछे त्यारे मैन आगमोर्मा प्राकृत भाषाना धोरणनी पेटे २१ नो न प्रयोग कायम रहेलो छ: लि. आ. सं. आदिकले आइकरे आदिकरः आदिकरे आइगरे परिसा परिसा पर्पत पलिसा चरणं चरणं चरणम् चलने हिलन हिरण हिरण्य हिरंग मरणं मरणं मरणम् मलने ३ अनादि-असंयुक्त व्यंजननो लोप अशोकनी धमलिपिओमा अनादि-असंयुक्त क, ग, च, ज, त, द, प, ब, म अने व लोपाता नधी त्यारे आगमोनी मापामां प्राकृत मापानी पेठे ए क्या असरो छोपारला छः लि. सं. मुकतं मकृतम् मिए मृगः आ. सुक्यं मिगे

उचाउनदी
उमावयच्दो
নানান ममायम्मि समान
प्ले
एने
विवाद विदाओ विवादः
বানান पाउपर
मामानि
घर
४, स, पनो उपयोग
अशोकनी धर्मलिपिआमांश, प, अने सना उपयोग परको
से त्यारे आगमनी भाषामा प्राकृत भापानी पेटे मात्र एक. मी
न उपयोग पालोः
लि.
आ.
पर
पस
ए
सात
दार
म

३६ माण h } ५ विजातीय संयुक्त व्यंजननी चपराश अशोकनी धर्मलिपिओमा विनातीय संयुक्त ल्यननोनी के. कल्पिक वपराश घणी छे त्यारे जैन आगमोनी भाषामा प्राकृत मापाना बंधारण प्रमाणे ए वपराश न नयी. लि. आ० सं० पाण प्राण. पान दिव्यानि दिवाई दिन्याने दिवियानि सेढे सेस्टे अस्ति अत्यि अस्त्रि अत्यि सहसानि सहस्साई सहस्राणि सहस्रानि पुत्र पुत्त पुत्र पुत मित मित मित्र मित्र नास्ति नत्यि नास्ति नयि समण समण श्रमण থা धमेरे १६ 'ख' '' '' म' नोंह अशोकनी धर्मलिपिओमा स्वय' अने 'म' कायम -- ३७ रहे हे त्यारे नैन आगमोनी मापामां प्राकृत मापा प्रमागे ए चारेने स्याने ह' थएलो छः लि. आ. लिखित लिहि लिखित सं० वर - यया जहा यथा तया तहा तया बहुविध बहुविह बहुविध वह वध मादु माहु सावु आलभितु आलहिउ आलमतान् बंगरे ७ 'न' नोन अशोकनी धर्मलिपिओमा 'न' नो 'ण' नयी थरलो त्यारे नैन आगमानी भाषामा प्राकृतना नियम प्रमागे न'नो 'ण' एलो हैः आ. देवानं देवाणं देवानान् पियन पिदेश प्रियण अनुदियम अगुदिवस अन्नदिवस पनि नहनि बहनि दानं दागं दानम् महानतम महागमति महानम ८ नोन दि० ३८ अशोकनी धर्मलिपिओमा 'ण' ने स्थाने न' पण वपराएलो छे त्यारे आगमोनी भाषामां तेम नथी नणातुं: लि. आ. सं. गननास गणने गणने गणनसि ९ त'नोट अशोकनी धर्मलिपिओमा एकला 'त' नो के संयुक्त 'त' नोट' थएलो छे त्यारे जैन आगमोनी भाषामा एस्थळे प्राकृतनी प्रक्रिया प्रमाणे एकला 'त' नो 'ड' यएलो छ अने संयुक्त 'त नोत'थएलो छः आ. सं० पटिवेदना पडिविअणा प्रतिवेदना पटिपाति पडिवात प्रतिपति कड, कय कृत मड, मय मृत कटव कर्तव्य कटविय किति किति कोर्नि किटी वगेरे १० नोव अधोकनी धर्मलिपिओमा 'नो' नयी पएलो पण जैन आगमोनी भाषामा प्राकृतनी पेठे 'प' नो 'व' यएलो छः लि० सं. लिपि लिवि लिपि कृपा कूवा कपाः पा पावं पापम् कट मद कायन , प्रेरक प्रक्रिया आप आव ना प्रत्ययो आप आवे सामीप सामी समीपम् वगेरे ११ 'ए'नोप अशोकनी धर्मटिपिओमां '' नो 'य' यएलो छे त्यारे निन आगमोनी मापामां प्राकृतनी पद्धति प्रमाणे 'घ' नो 'ब' करवामां आवलो छः लि ज्यान उजाण उद्यान उयाम १२'ज'नो उपयोग अशोकनी धमलिपिओमा न्य, 'य' अनेज'ने स्थान 'नो पण उपयोग पएलो छे त्यार जैन आगमोनी भाषामा ए प्रणेने म्याने प्राकृतनी प्रमाणे 'न,' ण' के नोज व्यवहार यएलो छः मि० सं० हति हणंति, हन्नंति घ्नन्ति मन्नति मन्यते मनति . आ० अण, अन्य अन हिरन हिरण पुन, पुण्ण हिरण्य पुण्य

४२
लाजिना
रण्णा
राज्ञा
लानिने
रण्णो
राक्षे
लाजाने
स्नो
সী
रण्यो
राज्ञः
आ उपरात--
ए धर्मलिपिओमा अनादि •ट' नो 'ट' न रहेलो छे
(घटिते ) त्यारे नैन आगमोनी भाषामा प्राकृत प्रमाणे 'ट' ने
बदले 'ड' एलो छे ( घडिए)
ए धर्मलिपिओमा 'अहं' ने बदले • हक रूप पण वपरा-
एवं छे त्यारे आगमोनी भाषामा क्याय ए रूपनो उपयोग न
नयी थएलो.
आ रीते अशोकनी धर्मलिपिओनी प्राचीन मागधीन स्वरूप
पण वर्तमान आगमोनी मापामा एने अर्धमागधी कहेवराववा पूरतुं
य घटी शकतुं नमी, ए हकीकत उपर जणावेलां उदाहरणोगी न
जाणी शकाय एम छे.
ए आगमोनी छेडी संकलना यया पहेलो, एमां नेवी भाषा'
अत्यारे छे तेवी नहि होय ए हकीकत तो आगमामा रहेला केटलांक
नूनां रूपो उपरथी न भाणी शकाय एवी छे.
आगमोनी रचनासमयनी भापाना अने देवर्षिगणिनी संकलना-
समयनी भापाना अंतरने समनवा माटे गुजराती भाषानुं नीचेनुं
उदाहरण बस छः

४३
।
१७३९ नी भापा सं. १९४४ नी भापा
विसरगर्नु हुई रे मंडाण, । समवसरणनो हुओ रे मंदाण,
मेक हेम रमन मुप्रमाण ।
माणिक हेम रनत मुप्रमाण ।
हामनी वईटा मिनवीर, सिंहासन बेटा जिन वीर,
ई देशना धरय गंभीर ॥ . दीए देशना अर्थ गंभीर ।।
वेधुनमाली सुर निहां भावह, विद्युन्माली सुन तीहां आवे,
मन वांदी आनंद बहु पावड़। निन बंदी आनंद बहु पाये।
वरन केवली कुग प्रभु थाम्यह. चरमकेवळी कुण गुम थाशे,
श्रेणिक पूछ मन उदासह॥
श्रेणिक पूछे मन उदासे ॥
प्रभुकहइ मुणि श्रेगिक नृपचंद, गुम कहे गुण श्रेणिक नृपचंद,
ब्रयन्टोक मामानिक इंद । ब्रह्मलोक मामानिक इंद।
चउदेवीयुत विद्युनमाली, उदेवीयुत विद्युन्माली,
सातमदं दिनिए नवी शुभशाली। सातमे दिने रची गुमशाली
ऋपमदत मुत तुन पुर टापई, ऋपमदतमुत तुन पुर
टामे,
चम्म केवली नंबू नामई। चम्म केवली नंब नामे।
होस्या ते मुणि देव अनाढी, होस्ये ते मुणी देव अनादी,
हरपर परखई निम कुल आटी" हरखे परखी निनकुल आदी
(यशोविन्यनीए ग्नेली अने
(यशोविजयन रचेली ने
नेमनी हस्तनिषित प्रतिमांधी जबुम्वामिना नमनी पोपरी-
उतारली)
माथी उनांगी)
.
१ नोट्टी गूदगती हरितदनो - 20
नि पालिनीनो निप.

आ उपरणी बानो नानी शाया हो के, गारगोन अर्धमागणीनुं ने भाग ना करने आगमानी मापामा पोले के नहि ! मार्कंडेय वगैरए नशे करेल आमागान गा भागुम्नाम: शारसनीमा भने मागमा आम नाय छ, एमी पग अरी ओ- भाग/ने मारे प्राण रागामो नभी आगं. प्रतिर प्राकृतना केटलारव्याकरणानां अने तनी वृत्तिभीनां नामा नाम की संवाद १ प्राकृतप्रकाश वररानि २ माकाटक्षण मंह ३प्राकृतव्याकरण हेमनंद ४ प्राकृतमनीवनी वमंतरान आनो उन्लेस माकंडेयना प्राकृत सखि मांछे पृ०१ " १ मो. ३. " ५ प्राकृतकामधेनु लंकेवर ६प्राकृतव्याकरण समंतमद कृति त्रिविक्रमदेव ८ प्राकृत प्रक्रियावृत्ति उदयसामाग्य (दुटिका) ९ प्राकृतप्रबोध नरचंद्र १० प्राकृतकल्सतर रामतर्कवास प्रमिद्र प्राकृत रखुनायशर्मा १ प्राकृतनंद्रित कृष्णपंडित (शेषण) বাণনাথ १२ प्रातमनोरमा मामह भानो उद्देख मार हेयना मर्वन्च 'मांछे पृ० मो० १. १४ प्राकृन्तावतार सिंहरान प्रसिद्ध के १५ प्राकृतदीपिका चंदीवरामी १६ प्राकृतनगे জ্বাধন प्रसिद्ध १७ प्राकृतमर्वम्व मार्कडेय १८ प्राकृनानंद १९ प्राकृतप्रदीपिका नरसिंह २० प्राकृनमणिदीपिका चिन्नबोम्नभूपाल 'पड्मापाचंद्रिका नी प्रस्तावना पृ०१७ टि० पृ० १८टिल - দালালি अप्पयन्वन् २२ पभाषामनरी २३ पहभापावार्तिक २४ पट्मापाचदिका लामीधर प्रसिद्ध के २५ पड्मापाचंद्रिका मामकवि २६ पड्मापावंतादर्श २७ पदमापारुपमालिका दुर्गगाचार्य पड्मापाचंद्रिका २२-२-२-6 सूत्रनी वृति.

५० विषयानुक्रम " ४ प्रकरण १ लु गृ०१-३ वर्णपरिचय प्रकरण २ जुं पृ० ४-९ सामान्य स्वराविकार नियमोक उद्देश्य विषय पृष्ठ दीर्घस्वर हस्वस्वर दीर्घम्वर हम्वस्वर (पालि)टि.१+ ४ २ हवम्बर दीर्घश्वर हस्वस्तर दीर्घस्वर (पालि) टि०२ ३ ए. ए. (पालि) टि. १ ६ ६ ओ ओ (पाडि) टि०२ ४ ४ आ ६. ४ ६ M ME उ उ ७ १ . अ (पालि) दि.३ ८ ७ ७ रि रि (पालि) दि.१ ७ +' रिपरि इन्दि ७ ॥ प (पालि) टि०३ है ओ आ औ ८ ओ (पालि) टि० ३ इ (अपत्रंश) १ " ८ " ८ %3D अ " ८ । उ आ %D ८ ड " ८ ." ." ८ ॥ a . ८ ॥ जन ९ " ९ इ इलि. इ . ए har 11 आ ओ .

विषयानुक्रम प्रकरण १ लुं वर्णपरिचय प्रकरण २ नुं पृ०४-९ सामान्य स्वरविकार नियमांक उद्देश्य विधेय पृष्ठ दीर्घस्वर हस्वस्वर दीर्घस्वर हुस्वस्वर (पालि) टि.१+ १ २ इस्वम्बर दीर्घस्वर हुस्वस्वर दीर्घस्वर (पालि) टि. आ १ ४ %3D अ . ४ ६ ए ए (पालि) टि. १ १ ६ hy tor by bb %D ६ ६ ओ ओ (पाक्षि) टि०२ %3D ७ अ ६ अ (पालि) टि. ३ ऋ न ८ रि रि (पालि) टि०१ - ७ +'टि' एटले टिप्पण

.
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प्र.
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त प्रकरण ३ जुं पृ० १०-२८ सामान्य व्यंजनविकार नियमांक उद्देश्य विधेय पृष्ठ अंस्थव्यंजन लोप १० अंत्यव्यंजन लोप (पालि) टि.१ १० २ असंयुक्त कादि' लोप १० (१) त = द (शौरसनी, अपभ्रंश) १२ = द (पालि ) दि०१ १२ = य ( मागधी) १२ - य (पालि ) टि० ३ १२ (३) त = त (पैशाची) त ( १२ % त (पालि) टि०४ ૧૨ (४) ग = क ( चूलिकापैशाची) - क ( पालि) टि. = च (चूलिपैशाची) = च (पालि) टि०२ (१) क - ग ( अपभ्रंश) क ग (पालि ) टि०३ ३ संयुक्त कादि लोप १४ क्त * (पालि) टि. १ - त्य (1) १४ • 'क' वगेरे सयुक्त अवरोने स्थाने 'न' वगैरेने स्थापित करया मादे मामन्याकरणमा आगशरना सोपनी अने दिली प्रक्रिया वावेली अने एस दामने सार पालिकासमा 'क्त' वगेरेना 'स' वगेरे आदेशो करेला . ग X ११ 7 -..(,) =ग (..)५ 31.) टि. (पाटि ) टिका -म (..) दि.२ -(..) दि. ३ १५ --11 .,) , (..), -1 (..) टि .. ) १५ म - ( .,) ग.) गर मा(पालि ) दि०७ -म (..) टि-२ मंयुच मादित ४ %3D . १६ . मंयुक्त लादि' = दोर = कः ( पार्कि) टि.2 ) टि०५ ) 22 %3D टि. = क (..) टि.२ नमो आगटा दृश्न टिपन.

. लोष ( अपभ्रश) लोप लोप (पालि) टि० २ भयगंनन' नो अ कादिमोय. ग(पालि)टि.५ = य ( पालि) दि. ५ . ८ . म . . १९ प म ह ( पालि) 2.३ *(.)2.४ (,)2.५ - प (शौरसेनी) -1 (लिकांपशानी) १९ १०. भ (१) (२)ग घ . म म २. •छ (") २१ ८ = उ (पालि)P.. - तु (पेशानी) -8 २१ २१ २२ •7 (पाल) • ? (टिकविली) 07 (पैसा) २ ९ = न ( पालि ) टि १ न = ण (पालि । टि. २ २३ २३ २३ २३ २३ २३ २१ tr tor ११ %3D व (पालि ; टि. ३ प = 2 ( अपनंग) (१) प २१ १७ (१)फ (१) व = भ ( अपभ्रंश) = प (चूलिकापशाची) = प (पालि ) टि०१ २५ त्र २८ = व (पालि) टि०२ व ( अपत्रंश) व %3D १९ (१) म य य (१) य = न (पालि) टि. १ = य (मागधी) =ल (मागधी, पैशानी) २६ = ळ (पैशाची) (६)ल । = स ( पाटिदि.१ ) स - श (मागधी) २७ प्रकरण ४ पृ. २९-४३ संयुक्त प्पननोना सामान्य फेरफारी निपाक जोय विधेय -गरा पृष्ठ २९-३० १॥ २९-३० -गा(पालि). १२९-३० २९-२० " १ मा (1) " (")..२ - क (मागी) 14 ३० •म, न(पादि). ३ - fl, HI (पानि?.३ , ( माग (पा.. . (माग (2.? 1 " 11 क न (पादि).. म -4(पाnि.!

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१८ २९ त (१) न्त न = 2 (पालि)टि०२ = न्द (शौरसेनी) ण, पण - न्न (पालि) टि.. 3 , पण = ण (पालि) टि०१ = म्न (मागधी) = न (पालि) टि०४ = म्ल (मागधी) न ३६ (१) ज्ञ ज्ञ " (१) ग्य प्य (१) न्य न्य = म्ञ (पालि) टि. ४ ३६ = स्ल (मागधी) - म (पालि) टि.४ - थ, त्य - य प (पालि) टि. १३० - स (मागधी) ३१ स्थ ए -ट, - 8 ( पालि)2.३ - है (पालि) दि.४ - 2 ( मागधी) 2 ३७ g - मर (पैशाची) = 7. ३३ म मम -इम (Ire) cिt-2 पर (..) -म (20 कम PR २९. .., ४५ (पानि - प., (..) दि.२ प छप्प प (पानि). २ ग्प प्प (,) " . भ, व्य -म (पानि)टि.३ = म्म (पालि) टि.४ ३९ 5 गुम (पालि) टि०५ १ . ४० = म्ह (पालि) दि.१ २० ) ४० - म्ह ( " (१) म्ह = म्म (अपभ्रंश) मह - ४० =ण्ह कण्ह = पह, ह (पालि )दि३ ४० " ४० " " AEEEEEEEEEEEEEEEntrewa Prets D एह ( पालि) टि०३ - ह (,) टि. ३ = एह (,) व्ह ) सिन (पेशाची) •४१ सिन (पालि) टि०१ ४१ ४१ हल (पालि) टि०२४१ (१) स्न ४० ११ - (पालि) टि०३ १२ %D ४३ - रह, रिह (पालि) टि० ४ ४१ - रिस रिस -रिस ( पाटि) टि. रिस (1) २ . " " १२ द. गंगा ... (पानि) दि.२ - . (१) म - ग्यि (पशाची) • पिया (पानि)RY 100(IN) १३ JAE मंगुकमा १७ 08-88 प्रकरण ५४४-६२ स्वरना विप पिकारी 'अविकार (क) १८ (ग) C प ओ - (२) अ (1) (3) (न) अ (1) - आइ ४५ . लोप = आ (पालि') टि.१ 31 (,) टि. १ टि. २ टि. १ १५ = (" ) %3D १२ उ 'आ' विकार १७-४९ (क) आ = (स) आ (ग) आ (1) आ (छ) आ (ज) आ (अ) आ ओ = अ (पालि) टि. २ ) टि. २ '१' विकार ४९-५१ (क) %3D . ५० -अ - . ओ (च)नि मो ३ = अ (पालि) दि.६ ४९ इ =3() टि.२ ६० इ ए(,) टि. १ ओ (1) टि०२ 'ई' विकार ११-१३ - ५१ - अ (स)ई - आ

६३
(1)ई
३
= अ (पालि) टि.१ ५१
'विकार
५२-१?
(क)
(ब)
(ग)
(घ)
॥
4 Non
॥
(ब)
= अ (पालि) टि.१
= ? (पालि) टि०२
= ओ (पालि) टि०१
5.' विकार
५१-१५
(क).
(स).
D
(ग).
(7)3.
ओ
५१
अ(ग) दि.३
(3)२
2

१५ ४ (क) . ओ - (D) - () - -(पेशानी) -१ (पानि)..३ -3(प).. -ए (पालि)2.२ 'ए' रिकार . १९ (त) ए A भो (पालि)?.२ 'ऐ' रिकार अम १९-१. 5 (क) (स)ऐ ई (प)ऐ ३ (पालि) दि.१ १०

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५५-५९ 'विकार -आ (क) (ख) (ग) (घ) ऋ (ड) (च) ऋ (छ) (ज) (म) (१) ओ रे ऋ ५६ इ(पैशाची) - इ (पालि) टि. ३ = उ (पालि) टि०१ = ९ (पालि) टि.२ 'ए' विकार ५७ ६९ (क) (स)ए ए - ओ (पालि) टि. २ 'ऐ' विकार ५६ ५९-६० - अ (क) ऐ (स)ऐ (ग) (घ)ऐ अइ -१ (पालि) टि.१ R 5

'यो' विकार
"
(ग) मा
(ग) आ
'श्री' विचार
() भी
A (प!ि
.
१
-
असंयुनः मीना पिपरपागे
एम एस दिर
११
T
।
r
६

'घ' विकार
घ
न'विकार
१९
न
न
= ल (पालि) टि.
'प' विकार
प
प
प
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प
= फ (पालि ).२
व' विकार
३
म
क
य
= म (पालि) दि.१
'भ' विकार
.
भ
'म' विकार
७.
म
व
'म' अनुनासिक

.
य' विकार
ग
आर
य
ग
य
य
ct
ग
*र (पा
ग
र
स
र
(
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'श' विकार
७२-७३
रा
श
= छ (पालि) दि.६
'प' विकार
८२
प
प
-७४
प
प
छ (पालि) दि.१
'स' विकार
स
स
'ह' विकार
७३-७४
ह
लोप
'क'लोप
ग' स्रोप
'ज' सोप
'द लोप
प्य' लोप
व लोप

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६ द ग्ध ke ॥ ॥ 66 6 64 6 6s 8(पालि ) टि०१ ध " घ . ९८ ण्ट, ण्ड, पण ७९-८० 206 lon (क) च (ख) त %3D Ino = ण न्त = ण्ट (पालि ) टि० २ ७९. ९९ त्थ =त्थ (क) त्स (ख)त्म - त्य १०० ट्र न्त, न्य ८० न्य हुन १०२ प्प, फ, फ स =प्प

७२
ज्न,
न्य
- म्न (पालि) टि. २
९२
घ
७V
७
।
(क)
(ग)म्त
-
- 2 (पालि) टि.२
१५
ठ
(स) स्त
(ग)स
ट
4
ܙܬ
है (पालि) दि.३
०८ पालि)2
४
य
(क)
१
.
(क)

७३
दू
न
(1)
Me Mo w waro
द
-(पालि) टि ?
२८
ट, प्ड, ण
०९-८
न्द
(प.)२
(1)
(ग)ह
= र (पालिटि.
त्य
= त्य
.
-

७२ . न्य - न्न (पालि) टि.२ प्झा ७७ न्ध ७७ ३ थि नु - २४ (क) त (ख) 2 (ग) स्त त - ट (पालि) टि०२ اوسی و ह ९५ (क) (ख) स्त (ग) स्थ स्थ र्थ - (पालि) टि.३ - 3 (पालि) टि. ४ -8) टि.४ وی स्थ (क)

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७२ " (छ) द्विर्भाव (क) जुदा जुदा शब्दोमां द्विवि (ख) सामासिक शब्दोमां द्विभाव शब्द-विशेषविकार ८१-८६ (पालि) टि. १ ८१ (पालि) टि. १ शब्द-सर्वधाविकार (पालि) टि. ३ ४-५-६ अन्तःस्वरवृद्धि ८८-९० (पालि) टि. १ ३-६-६-७ (पालि)टि. १-२ ३-४-१ १-८-९ (पालि)टि०२-३ अक्षर-व्यत्यय ९०-९१ (१) अपभ्रंश-आदेशो अपभ्रंशनां उमेरणो 'व' नो वधारो 'अ'नो वधारो 'र' ना धारो ८८ " ९ (१) " २ संधि प्रकरण ८ मुं १२-१०१ स्वरसंधि ९२-१३ (पालि) टि.२ (पालि) टि.१ २३ हम्प-दीविधान ९२-९५ हस्व 'नो दीर्य (वैदिकमं०) टि०१ ९४ (संस्कृत) टि० १ ९४ (पालि) टि.१ 'दीर्य' मो इस्व (वैदिक सं०)टि०२ ९४ (संस्कृत) टि.२ ९. २-४-५ संधिनिषेध "६-७-८-९-१० स्तरलोप " (पालि)टि०१-२ " " " " " " " " " ११-१९ विसर्ग १२-१३ म " " १४ पंजनसंधि ९७-१०१ ओ - अनुस्वार (पालि) टि०३ ९७ - अनुस्वार - अनुस्वार अनुस्वार - अनुस्वार आगम (शौरसेनी) (पारिटि. १ ९८ ज न (१) •ण' १५-१६ ९७ १७ . , अनुस्वारआगम (पालि) टि.१ आगम अनुनासिकविधान (पालि)टि.२ लोप १००-१० (पालि) दि०३ (संस्कृत) टि. ܘܐ अनुस्वार' ܙܘܐ १०० प्रकरण ९ मुं १०२-१२२ उपसर्ग-अव्यय-निपात उपसर्ग १०२-१०३ अव्यय निपात ११९-१२१ अपभ्रंशमां आवता केटलाक निपातो १२१-१२२ नामप्रकरण?० मुं नामना प्रकारो नामना अन्त्यस्वरनो फेरफार नामनी जातिओ वचन-विभक्तिओ प्राकृत भाषाना प्रत्ययो शौरसेनी भापाना प्रत्ययो मागधी भाषाना प्रत्ययो पशानी भापाना प्रन्ययो १२३-२३८ १२३ १२३ १२३ १२१ ७८ " " " अपभ्रंश मापाना प्रत्ययो १२१ प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो १२६ प्रत्ययो लागतो नामना मळ अंगमा थता फेरफारो १२७ शौरसेनी प्रत्ययने लगता नियमो १२८ मागधी प्रत्ययने लगता नियमो १२८ पैशाची अपभ्रंश १२९ अपभ्रंश प्रत्यय लागतां अंगमा यता फेरफारी १२९ स्वरांतरान्दो १३०-१८१ अकारांत शब्दनां रूपाख्यानो प्राकृत (पुलिंग) १३० " (पालिरूपाख्यानो पुंलिंग) दि. १ 'वध' शब्दनी विशेषता १३१ नतुर्थीनुं आपप्राकृतरूप वीर (शौरसेनीरूपो) वील ( मागधीरूपो) १३२ वीर (पैशाचीरूपो) १३२ वीर (अपभ्रंशरूपो) अकारात शब्दनां प्राकृत रूपाख्यानो ( नपुंसकलिंग) १३३ १२२ कुल प्राकृतरूपो कुल ( पालिरूपो) टि. २ मणसा' वगरे आर्यरूपो (दि. १) 'मनसा" पालिरूपी कम्मुणा ' वगेरे आर्परुपो (दि.) कम्मुना पालिरूपो (,) " . -

--
१२१
कुल (अभंग)
कुटभ (आबंशको)
अकारांत-सादि-गब्द
उवह (टि०२)
'त्या' मर्वनाम (पालि) टि. ४
ৰ কুলী
मन्त्र (पादिम्पा) टि. ३
सब (शारमेनारपी)
दाख (मागधीरूपो)
मन्त्र (पशानीपो)
मव, माह (अमरूपी)
न, ण प्रातरून
न. न (पानिरूपो) टि.
न(आग्रंशरूपो)
१२८
न (किमी).३
न (शहरी)
२. (पाली)
4., t... 1.5
इम (
पको
२

७८ " " " " " " " अपभ्रंश भाषाना प्रत्ययो १२६ प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो १२६ प्रत्ययो लागतां नामना मूळ अंगमा यता फेरफारो १२७ शौरसेनी प्रत्ययने लगता नियमो १२८ मागधी प्रत्ययने लगता नियमो १२८ वैशाची अपभ्रंश १२९ अपभ्रंश प्रत्यय लागतो अंगमा यता फेरफारो १२९ स्वरांतशब्दो १३०-१८१ अकारांत शब्दनां रूपाख्यानो प्राकृत (पलिंग) १३० (पालिरूपाख्यानो पुंलिंग) टि. व' शब्दनी विशेषता १३१ नतुर्थीन आर्पाकृतरूप १३१ वीर (शौरसेनीरूपो) वील ( मागधीरूषो) १३२ वीर (पैशाचीरूपो) १३२ वीर (अपभ्रंशरूपो) अहाररान शलना प्राकृत रूपाख्यानो ( नपुंसकलिंग) १३३ मुल पाहता कुल ( पाटिरूपो ) दि.२ ' मणमा' वगैरे आर्गरूपा । दि०१) • मनमा कम्मुगा ' वगैरे आपसो (20) कम्मना पानिरूपो (n) पालिसा १ " धन' टावहां नामांनी विशेषता (पारसनो वगेन्ना) दंहि इंदि। पानिको) टि? भागु माहनको ) :- भानु (पारिको) टि०२ हनु । नंनु । १३२ अभिभ ( १६१-१६५ महन ( पन्न । ) अन पाहता अमु (पालिकलो) टि.? कागंत उकागंन मदने लागत आश प्रत्ययो दास (आनंको) ) २ माननी ( दकारांन, उकारांन इन्दना कमान्यानो (म्मकालिंग) ११२ दहि पाहतो दावि ( पाटिन्स) टि. टि. नहु प्राकृतसो १० (पाटिओ) टि. १७ गोत्रम् (पालि) टि. १ १० দ হাবী अनु (पाटिला) टिक दहि (आशा) १७१ नहु । " एद, एअ ( अपभ्रंशरूपो) अकारांत सर्वादि (नपुंसकलिंग) तुम्ह प्राकृतरूपो तुम्ह ( पाटिरूपो) टि०३ अह प्राकृतरूपो अम्ह ( पालिरूरो) टि.३ तुम्ह ( अपभ्रंश) १५५ अम्ह (अपभ्रंश) आकारात शब्दना रूपान्यानो (पुलिग) हाहा पड्भापाचंद्रिकानो मत टि०१ इकारांत, उकारांत शब्दना रूपाख्यानो (पुंलिंग) १५७ प्राकृत भाषाना प्रत्ययो १५७ प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो इति प्राकृतरूपो १५९ इति ( पारिरूपो) टि.? अगि " टि. टि. मुनि ( आदि । " " मिरि ( रसि ( " सखि । " " गामनी( कुच्छिासि आपरूप टि.?

'इन्' छेडावाळां नामोनी विशेषता (शौरसेनी वनेमां) दाट ११२ इंडि ( पालिरूपो) दि.? १६२-२६३ भाणु प्राकृतरूपो भानु (पारिरूपो) टि.२ हेतु ( १६४ जंतु ( १६४-१६५ मह ( मन्वन् । ) ) ) " " अभिभू ( ) :: ." " अम प्राकृतरुपी अम ( पालिरूपो) टि.? इकागंत उकारांत शब्दने लागता अपना प्रत्ययो १६५ राति ( अपवंशरूपो) भाणु दकारान, उकारांन शव्दनां रूपाव्यानो (नपुंसकलिंग) १६९ दहि प्राकृताती दाधि (पालिम्पो) टि. २ १६९ ) टि०२ १६९ নঃ মালা १७० मनु (पालिम्पो) टि. १ गोत्रम् (पालिको) टि. १ ननु पाहतो अमु (पालिलो) टि-१ दहि (आशन्सो) मामनी ( ?..

'अन्' छेडावाळो नामोने लागता विशेष प्रत्ययो पूस प्राकृतरूपो महत अप्प " १९२ १९२ १९३-१९५ टि टि. R १९५ " १९७ १९८ अन, आतुम ( पालिरूपो) टि.? गय' शब्दनी प्रक्रिया अने विशेषता राम (पालिरूपो) टि० (२) ब्रह्म टि. अद्ध ( युव ( मुद्ध ( सा ( टि. राय प्राकृतरूपो राय (पेशात्रीरूपो) सुपूस प्राकृतरूपो (नपुंसकलिंग) मुअप्प मुअप्पाण" सुराय पूम, पूसाण (अपभ्रंशरू) मुपूस नपुंसकलिग) मुपसाण ( 'अस्' छैडावाळो नामो पुम (पालिसो) टि०३ स्त्रीलिंग आकारांत शब्दोनी प्रक्रिया " " " १९९ २०० " २०१ २०२ . २०३-२२८ २०३ २.९ कारांत नारिंगी नामोने न्यागता प्राशन प्रन्ययो प्रारून प्रत्ययाने लाना नियमो विशेषता স্বানা দাবা अपशना प्रत्ययोने लगता नियमो माला प्राकृतरूपो (पालिरूपो) टि. वाया प्राकृतरूपो মহ থাকুন रति (पालिरूपो) टि०१ येण प्राकृतरूपो याग (पालिरूपो) दि.१ नई प्राकृतल्पो नदी (पालिरूपो)टि. १ २०७ २०७ १०९ বহু মাঙ্কনী वच (पालिरूपो) टि. २ माला (अाधेशरूपो) मह २०९ २११ २११ २१२ २१२ २१३ २१३ २१५ २१५ पदही ( " श्रेणु " ) ~ २११ मर्यादि (स्त्रीलिंग) सला (पालिरूपो) दि.१ २१७. २१८ २१८ ८६ " २२१ २२१ तो, ता प्राकृतरूपो गी, गा ता (पालिलो) दि. ३ जी, ना प्राकृतरूपो की, का इमा, इमी, इमा (पाटिरूपो) ०२ एआ, एई प्राकृतरूपो एता (पालिरूपो) टि०१ अमु प्राकृतरूपो अमु ( पालिरूपो) टि०२ ऋकारात स्त्रीलिंग माआ, मायरा प्राकृतरूपो मातु (पालिरूपो) टि.२ पड्भापाचदिकानो मत (टि० १) धूआ प्राकृतरूपो धातु (पालिरूपो) टि० २ गउ प्राकृतरूपो गाई गोणी गो (पारिरूपो) टि.१ নাবা সানী संख्यावाचक शब्दो प्राकृतरूपो २२३ २२३ २२३ २२३ २२४ . २२१ २२१ २२६ M " २२९ २२७ २२७ २२७ २२७ २२८ २२९-२३८ २२९ २२९ उम (पारिरूपो) टि०१ दुप्राकृतरूपो द्वि (पालिरूपो)टि. १ ति प्राकृतरूपो ति (पालिरूपो) टि०१ चर प्राकृतरूपो चतु ( पाटिको) टि.१ पच प्राकृतरूपो पंच (पाटिरूपो) टि. १ २२९ २३० २३० २३१ २३२ २३२ २३२ २३३ २३३ २३४ २३४ कद प्राकृतरूपो कति (पानिपो) टि०१ संख्यावाचक शब्दोनी यादी २३४-२४८ : कारक-विभक्त्यर्थ प्रकरण ११ मुं० २३९-२४१. ना जुदा अर्थमा पष्टी विमचिनो प्रयोग २३९ (संस्कृत) टि०१ २३९ प्रयोग २३९ पंचनीने बदले तृतीया अने सम्मानो प्रयोग मनीने बदले द्वितीयानो प्रयोग २१० -तेगं कालेग तेगं समरण' नी विनचिनो " समी विचार टि०६ २४०-२११ " आख्यात प्रकरण १२ मुं २४२-२९८ संस्कृत, पालि अने प्राकृतमां पातुना प्रकार २४९ विभकिओ कतरिरूप २४४ व्यंननांत धानुनी प्रकिया स्वरांन धातुनी प्रक्रिया ३ उवणीत कवीत ५-२० धातुओने लगता केटलांक कार्यों वर्तमानकाळ वर्तमानकालना प्रत्ययो प्राकृत २४८ (पालि) टि०२ १-२-३ प्रत्ययोने लगतुं कार्य २४९ शौरसेनी-मागधी पैशाची अपभ्रंश व्यननांत धानुनां रूपाख्यानो २५१-२१४ २५० २५० हम् प्राकृतरूपो (शौरसेनीरूपो) " ) (मागधी " (पैशाची " (अपभ्रंश, ) २६४.२६१ सरांन धातुना रूपाख्यानो हो प्राकृतरूपो

(शौरसेनी )
(मागधी)
पैशाची )
( अपभ्रंश ,)
भूतकाळ
वरांन अने व्यंजनांत यातुने लागता प्रत्यय
पालि प्रत्ययो (टि०२-३)
हम् प्राकृतरूपो
हो
"
ने
"
हो (पालिरूपो) टि.
आप प्रयोगोमां आवता स्था, इत्य, इत्या, इंमु
अने अंसु प्रत्ययोनो पालिप्रत्ययो साथे संबंध टि०१२६४
गमे } ( पालिरूपो ) दि.
केटलांक आपरूरो
संस्कृत जन्य केटन्ट्रांक आपरूपो
भविष्यत्काळ
२१६-२७४
प्राकृत प्रत्यय
ए प्राकृत प्रत्ययोवाळा पान्दिरूपो (टि०१) २६६
शौरमनी अने मागधीना भविष्यकाळना प्रत्ययो २६७

" भण् प्राकृतरूपो ९. पालिना प्रत्ययो टि०२ पेशाचीना भविष्यकाळना प्रत्ययो अपनगना २६८ २६९-२७३ (शौरसेनी रूपो) (मागधी) (पैशाची) (अपभ्रंश) हो प्राकृतरूपो अने शौरसेनी वगेरेनां रूपो सम्पृतनन्य केटलांक आपरूपो २७४ क्रियातिपत्ति प्राकृत वगेरेना प्रत्यया २७५ आचार्य-विध्यर्थ २७६-२७९ प्राकृत वगेरेना प्रत्ययो २७५-२७६ आज्ञार्थ (पालि प्रत्ययो )टिक १ विच्यर्थ हम् प्राकृतरूपो हो शौरसेनी, मागधी अने पैशाचीनां रूपो अपनशनां रूपी " " ." " केटलक आपरूपो अनियमित रूपा अप (वर्तमान) २७९-२८३ (विध्यर्ष, आतार्थ अने भविष्यकाळ) ९८० २८ " " टि०१ अस् ( पालिरूपो) टि. कृ (भूतकाळ) २८१ , ( भविष्यकाळ) २८१ ( पालिरूपो) टि०२ २८१ दा (भविष्यकाळ) २८२ केटलाक आदेशो (भविष्यत्काळ) २८२ पालिअंगो २८२ प्रेरकरूपो २८३-२८० प्रेरक अंग वनावदानी रीत २८३ प्रेरक अंगों २८३ पादिनां प्रेरक अंगो (टि.१) २८३-२८१ उपांत्यस्वरवाळा प्रेरक अंगो २८५ वर्तमानकाळ भूतकाळ भविष्यवान क्रियानिपत्ति विध्यर्थ-आज्ञार्य २८७ २८८-२९० मत वोरेनां पालिरूपो (टि. १) २८८ सयभेद २९०-२२८ मबभेद (पालि टि.१) বাণী বিনা आशनी नवमंदी अंगो मानकाह २८१ नामधातु वगैरे २९० २९२ १२ विध्यर्ष आज्ञार्थ भूत (स्तन) प्रेरक सहमभेद २९३ २९३ २९४ " ना रुपो २९५ २९६ अनियमित सयभेदी अंगो -- " कृदंत प्रकरण १३ मुं २९९-२२२ वर्तमानकृदंत २९९-३०४ कतरिवर्तमानदंत २९९ कर्तरिवर्तमानदंत (पालि ) टि० २ प्रेरक कर्तरिवर्तमानकृदंत ३०३ सह्यभेदी वर्तमानकृदंत प्रेरक सह्यभेदी भूतकदंत ३०४-३०७ कतरिभूतकृदंत ३०४ सबभेदी भूतदंत भूतकृदंत (पालि) टि. १ प्रेरकभूतकृदंत केटलाक संस्कृतमन्य भूतकदंतो भविष्यत्कृदंत भविष्यकृदंत माकृत भविष्यत्कृदंत (पालि )कि, " ३२७ , हेत्वर्थकदंत ३०७-३११ हेत्वर्थदंत प्राकृत २० तु-दु-चए प्रत्ययो हेत्वर्थकृदंत (पालि) टि०२ अनियमित हेत्वयं कृदंत 'त्तए' प्रत्ययांत रूप • तवे ' अने तए ' प्रत्यय (टिक ३०९ हत्वकृदंत (अपत्रंश) ३१०-३११ संबंधकभूतकृदंत ३११-३१८ मंबंधकभूतकृदंत प्राकृत ३११ नु-अ-नूण-तुआग-इत्ता-दवाण-आय- आए प्रत्ययो मंयकभूतकृदन्त (शौरसेनी-मागधी) (पालि) टि-२ (पैशाची) (अपभ्रंश) अपवाद-शारसेंनी अपवाद-पैशाची अपवाद-अपत्रंश भापावार उदाहरणो ३२४-३१७ माछत शौरसेनी-मानवी এয়াৰ अपभ्रंश नियमित संबंधभूतदंत प्रान्त १३ " । M । ...

३१९-३२१ • केटलांक संस्कृतनन्य संबंधाभूतकृदंतो विध्यर्थकदंत विव्यर्थकृदंत प्राकृत (पालि ) दि०२ केटलांक संस्कृतनन्य विध्यर्थकृदंत ३१२ " ३२० ३२० ३२० अणित्र, अणी ३२१ ३२२-२२३ अनियमित विध्यर्थदत विध्यर्थदंत ( अपभ्रंश) फर्तरिकदंत फरिदत प्राकृत (पालि): (अपभ्रंश) " " " . तदित प्रकरण १४ मुं ३२३-११ इदमर्थक 'कर' प्रत्यय ( अपभ्रंश) १२३ ईय (पालि) टि? ३२३ भवाक • इल' • उल्ल' (पालि). ३ ३२३ ३२४ नत्मदायक ख' ३२४ भावार्थमा, ८, तण १२१ (भा) " .

शुद्धिपत्र अशुद- शुद्ध- पंक्ति- व्यन्जनन् पजनन् त २१ न-पृष्टद्युम्नः वट्टग्गुणो आ उदाहरण १६ अने ए उपy टिप्पण पृ०१६मा पं.१ म्न-ना उदाहरणमां को 'र' लोप १७ ५ मी पंक्ति पछी मधाळु वधार. अपनशमां (१) अपभ्रंशमा ध्य, शत्स प्स- ३२ १० मी पंक्ति पछी मयाळं पधार- टिपन टिप्पन ४७ २८ १०४५ २८ ३ उ-आ विद्रुतः विद्दानी ६३ २१नीति पनी वधारवं. . ? नन्ध १०१.न्तन आपजी या अंको मुभागने वाला.

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动:

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मा पुस्तकमां सरापला ग्रंथो अने देना संकेताना
अमरको
.
आ०
শলিরয়ানি
अमरकोश
आचारांगमूत्र
उत्तरान्ययनमूब
आसकदशांगसूत्रीका
काशिका
चतुर्विशनिम्नव
जीवविचार
पाणिनीय अष्टाध्यायी
नि
पागिनि
पगिनीय वैदिक प्रक्रिया
पालिकोश
पनि काय
वैदिक्या
पालीम
पलिया
पा-१०
पालिव्याकरण ( कात्यायन,
मालम्याग्रह
ভালবেলা
বাণু
गुनिदिनम्
रीतदिला लिन
सिमुगिन
यमन

《海
e' T
了
集非
事!
…

प्राकृत-व्याकरण.
प्रकरण 1
वर्णपरिचय
प्राकृत भाषाओमा नाप्रमाणे यगे भने व्यंनना गय.
अ. द. उ. (दम्ब)
आ.६, 3. ओ, (दान)
RIEमा 'नो विकार, के उ भार छ अने ''
नां विकार दिभार माटेचर नभी. 'ऐ'नो रिकार
•ए । भद माय भने भो'नो विकार 'भो' के 'अ'
भाव तेथी ए. पन स्वतत्र वर नमी.
२ को मध्या सोतं ' 'सो चित्र कोरे शब्दोमां थायला
• अने भो' एकमाटिक एन आचार्य गुमचंद्र जगाये छः
(-गुमनदनु प्राकृत व्याकरण य." -1-लिसित पृ.) भा
उमरथी एभने 'ओनी एकमानिता पन च्याजी जगाय छे.
उचाम्पनी दृष्टिए तो द्विभावन पामला यनननी पूर्वनो दिमात्रिक दर
एकनात्रिक ज होगी जोदप; अन्यथा एवं काणे आवेला दिनाविशनो
उचार द्विमात्रिकनी गने पद सकता नी. आचार्य हेमचंद्र जनाये छे
के, कोद याकरणी पाहतमा २ '' अंने 'ओ'ना अपोगने
दर गये है (८--- १ ) आचार्य हेमचद्र पन. अपिना प्राकृतरूप
गे' ने सम्मन गणे(८-1-12) तो पन तेमने ए सिवाय
अंने आनो अवहार दश नयी.
नाय.
१

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प्राकृत-व्याकरण.
प्रकरण १ ।
वर्णपरिचय
प्राकृत भाषामानां नीचे प्रमाग वगे अने व्यंजनो वप... छ.
अ इ. उ. ( हम्ब)
आ.,. ए. ओ, (दीर्य)
मानना नोविकार अ, इ, के उधार दे अने 'लू
नोविकार • टाट पार नाटेपन्यत्र वर नी. 'ऐनी विकार
बार बने 'नो विचार 'श्री' के 'अ'
थाय नेमी एन न्यत्र न्यानयो.
२ को मना मानं' मोमिनगरे इन्टानां याला
अने 'ओ' एकनाक म आचार्य गुमचंद्र सावं हैः
(-गुमनटन माल व्याकग्न अ.1..-:-लिदिन ?) आ
रखी अने ओनी एकनारिस्ता पन मात्रा मनाय है.
उगाननी टिर तो दिनविन मानेना बननी नो वित्रिक दर
कातिर त दोषी दर: अन्दया एवं मनं भांवटा दिनाविश्नो
उगर द्विनातिनी पद का नयी.आचावं हेमचंद्रमा
के.द चारमी पाहमा न
अनं । ओना अग्ने
दागने (८-१-१ आना देन्नद्रन अविना मानान
ने मनमोले। 2-1-::। दो मन र मार
ने भी रटनी
.

[ २ ] 'गनन- म. ग. ग. (कार्ग) न, ज, झन (ना) 'भाना माना जणा-या प्रमाणे पातमा रहिन भगननो VISI नमना नहम जिनपिसयुन पजगनो-म, न, मनोगतो नगीना पण 'ह' •ox' अने 'ह'नो Emait मच पण कायु: (ओ ८-२-31-- ....) Hura मगर होवान माना गीला ना-"पण अरमान म. आ.. - पनी 17. -"म.) मारमा पप म. ना. हा उपरान मागधीमा 'मना पण वाय. vf मन. माता भाम नापी, ए. tatt मानामा यसमा पान करता farm HAM ना मामा + +काणे गाव की मग पण मा ILM नगमाननान मामा भाला - n. ....... ना... " र ....

८,१,३१, (का
न, थ, द, ध, न ( नवर्ग)
प, फ, व, म. म (पा)
ल, व (अंत.न्य)
च..
म, है (अमातर)
'- अनुस्वार
दन क्याय न्यनत्र
प्रप्रयांबानो नी.कबुक, व्यान्टनन , न.
काय प्रयोगीनी के प्रानभा की. लन्टनं, उन्न
वंग प्रयोगी नव्यबहन है. नत्र पानीमा जाति ( झानि ),
नातान जान । डान ) वगैरे प्रयांनी नवना दुबै
जयान्टा मा. सन्तमा अने प्रावमा एकला चकना
सरपंचबुक जना प्रयोग विशेर प्रचलित छः अहिलनु (अनिनन्यु)
कुल (पुत्र). अमला (अयना ), मलली ( अलि )-नागी
अने लान (जान ) विज्लान (विज्ञान) यानी.
प्रयोगमा पाली, भागी भने हानी विर मनानदा गर्व है.-
(८-6-९३ नया ३.६)नमा (सालिया-८)
.
, पानीमा 'अनन्वन ने मनमा गनावाने नियत नी
नमा आली छ भने लालविलम्मानमा लो एने ( अनुवान्ने ।
भने विनाने वगनी नायं 3 बचा है. मा प्रपना दिली
.

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2-अन्यः आमा । विधमिति वसिमदा विश्वासः वीसासों
दश-दुश्शामनः दृमामणो । मनविदाला मणामिला।
प्य-पुप्या पृमो । मनुष्यः मणमो । शिष्यः सीसो ।
4- काकः कामओ । वर्ष: वामो । वर्षाः वामा ।
4- विचक वा । विघ्याण:-वीमाणो ।
प्प - - निष्पित्तः नीमिता।
म्य----कम्यनित् कामद । मन्यम् नाम ।
उय उ.मो । पियाम. वाममो।
म्व-निम्न नामी । विशम्पर विकागे।
म-निम्मद नीमहो।
आ-अ.
२. म पृतना बाया. कारान्त परिमी शब्दना आदिना
आ नो प्रातमा विलय में भाय 3. नमो:-
पार पयाग. पगं । प्रनार पसग. पयगे । प्रहारः पहागे,
पगे। पाहीं. पहो । नाय. पचाया. पी।
•. •i. girl ifi

3ऊ.
1. सस्कृत शब्दोमा रहेला 'स अने च्छ नी पूर्वना 'उ'नो
थाय छे:-
न्म-उन्मरति अमरइ | उत्सव उमा ।
उत्मिक्तः असित्तो । उत्सुक अमुओ।
रह-उच्नासति उसमइ । उच्छवाम. उसालो ।
उच्चस. उमओ।
उ.ओ.
६. मंकृतना मयुक्त व्यनननी रहला ·उ' नो प्राकृतमा
• पाय के. नेमके
'शिमम् कोहिम । कुण्ठ कोदो । कुन्त कोती ।
सुरक्षा ताई। पलम् पागल । पुष्करम् पोगर ।
पुस्तक पोपी। मुण्डम् मॉई। मुद्गर मोगग। मुम्ना मोत्या।
1. लोभी । व्युत्क्रान्तम् वति ।
'र
.. मत गन्दना मादिमागमा आगला • 'नो पालमा
तम् । पृतम् स । प. महा।
ट्रेशन न । मग: मो। मुटम् मा । TH. महा ।
भी मानामागनी-TRA. 11
इन 1.2.2.1-17)

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[८] कोचः काँचो । कौमुदी कोमुई। कौशाम्बी कोसम्बी । कौशिकः कोसिओ। कौस्तुभः कोत्युहो । यौवनम् नोवणं । उपर जणावेला वधा म्वरविकारो शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने चूलिकांपेशाचीमा पण एक मरवी रीते लागु थाय छे, अपभ्रंशमा ए नियमोनुं प्रदर्शन नियत रीते एटले ने रीते नणान्यं छेते राते यतुं नथी. तेमां न्याय क्याय 'अ'नो इ, ई, उ; 'उ'नो अ, आ, 'क' नो अ, आ, इ, उ, ऋ; 'ल'नो इ, इलि; 'ए'नो इ. ई; अने ओ'नो अउ अने ओ थाय छ: [स्वरविकारनी दृष्टिए आ प्रवर्तन सरखं छे, पण अनियतताने लीधे एने प्राकृतथी जूद पादी काय छे. प्रा. सं० वचनम् अणं ( वणं ) वेण । (बईणं ) वीणं । शयनम् सअणं (सइन ) सेनं'। नयनम् नमण नदण ( नइनं) नेन । नवनीतम् नमणीअं ( नउणी) लोणीभ । [ नुन आ सो र' अंने 'व' ना मप्रमाणवी बनला ले 3-अ.आ- धी) हा वाह बार वाह -अ, प्रा.इ.स ल्यन कि थि '3ामग्भग्ग "."

गम जि. नगग
मुकता दुई मुक्ति दिला
ल-..--
क्ल किरिना बि.लियो।
लिली. ह ।
गनी गर्ग नग. मार्ग।
बंगगिता प्रसंगमा दो या सात ऋग्वं
मनांमागची मानी निकासावी अंने आगनां विटी-
पतानने नकारना और.

. [6] काँगः कोनो । मुझ कोमुई। कौशाम्बी कोमम्मी। कौशिकः कोमिओ । कौस्तुभः कोत्नहो । योनिम् नोवण। उपर नगावला या मरविकारोबारसेनी, मागधी, पशानी अने नलिकांपेशानीमा पण एक मरमी रीने लागु गायके, भानामा ए नियमोनुं प्रवनि नियत ति एट ने रीने नगागु छेने रीने यतुं नयी. तेमा नयाय क्याय' 'नो इ, ई, उ'उ'नो अ, भा; 'क' नो अ, आ, इ, उ, * 'ल'नो इ, इलि; • ए 'नो इ. अने • औ'नो अउ अने ओ थाय छ: [स्वरविकारनी दृटिए आ प्रवर्तन सरखं छे, पण अनियनताने ली एने प्राप्तथी नद पाडी शाय छे.] अ-इ. ई, उ- अ० वचनम् वणं ( वइणं ) वेण । (वईणं ) वीणं । शयनम् मभण ( मइनं ) सेनं'। नयनम् नभण नइण ( नइनं ) नेन । नवनीतम् नअणीअ ( नउणीअं) लोणी । [ वस्तुत आ रूपी 'x' अने '4' ना सप्रसारणथी बनला छे] उ-अ, आ- वाहु ---वाहा (घी) वाहा, बाह. बाहु । ऋ-अ, आ, इ, उ, ऋ- कच, काच १ जूओ विमुदिममा पा• पृ: ०४ स० प्रा० कृत्यम् किच क-नायकरः निन्ययगा लीक: लाओ। ग-नाः नओ। नाग्म् नयां। गाङ्कः मयंको । च-कवग्रह कयनहो। शची मई। न-गनः गओ । प्रनापनि यावई। रजनन ग्यय । न-धात्री पती-चाई। यतिः नई । ग्मानलम ग्मायलं गत्रिः गति-गई। विनानम् विआगं। द-गदा गया । मदन. मयणो प-रिपु जि.। पुटप: मुग्मिा । व-विबुध विउहाँ। य-बियंग विनाओ। -वडवानलः कल्याणलो। लावण्यम् लायाणं। । आ बीना नियम अंने एवा वीना असंयुक्त व्यंजनना विकाग्ने लाता मामान्य के विशेष नियमा पशाची भाषामां लागता नथी. जमक; प. मकरकंतु.- मयरकंड... मकरकेन । मगरपुत्रवचनन---मयरत्तवरगं मगर पुतवचनां विजयमनन गपितम्-विनयमगण लवियं-- विजयमनन लपिन। पापम् पावं-- पाप- आयुधम् -- आउहं- आयुधं ।) पक्ति नियम द्वाग प्राकृतना के न अंनं • द नो लोप जणांवला, ना पण प्राकृतना पटाभदाप गाग्मनी. नागवी. पंगाची. नलिकोपशानी अंने अपनगम' ने वर्ग लोपाना पी. स्तुि बीना बीना वगना न्यमा कावा - मा०

प्रकरण ३.
सामान्य व्यंजनविकार.
'अंत्यव्यंजनलाप
'.. मन शनना ठेवटना व्यनननो प्राकृतमा लोप था.
अन्तर-उपरि अन्न-उपरि अंतोवरि ।
अन्नर-गतम् अन्न-गयं अंतगयं।
जन्मन नम्म-जम्मो। तमम् नम-तमो।
नावत् ताव । पुनर पुण। न पुनर न उण।
यशम् नम-नमो। गाव नाव ।
असंयुक्त काति'लोप.
२. वरी पर आपेला भने एक न पटमा रहेला असंयुक्त
स, ग, न, न, न, द. १. व. ग भने व-एटला यंननोना
प्रान्तमा प्राय लोप भई नाय . उदाहरणो क्रमश. नीने
प्रमाण
पापा
.
घि-11 नायर -11
मानिपम माना गम... पण ना. म मुमममम् । माग
बम कागज' | मुग- मुगभा । भार अगा सरन
मानम पत्रमुगम मुर। दिग।
TA 11 मार मात्र या दाना डालने
मानी पाना म..
1.
आगना माग कामगार संभ्रमन
गा!

. मं. " पार्वती मा० ...... भगवनी भगवई भगवती प.नाम म काम दामोदर दामादग मामानग। मनम शतम . ८) नलिकपमानीमा • नी• 'पाय . +. ' .. मं० r प्रा. गिग्निटम् गिरित किम्ति। नर भी नगरन् नयर नकर। नीमनः नाममा पा मागण मगाणी मनो। निमोनितम् नियामिन राया राना। निविदा - क'-ग. (५) अपभ्रंशमा नयाय ' क ' नोगपाय. विक्षोभकरः विच्छोरंगरो विक गरो । 'नो पा.प्र.प.५६ ( ग.' २ जुत्री पा...( ३ ओन... T- १२ 'त-द. (१) 'शौरसेनीमा भने क्याय अपभ्रंशमा त 'नोद' थाय छः सं० प्रा० शी.. अप० प्रा. कथितम् कहिलं मं० शो०, अप. कधिदं। प्रतिज्ञा पदण्णा पदिष्णा । तदो। मारुतिः मारुई मारूदी। पृग्दिो । मन्त्रितः मंतिओ मंतिदो । ततः तओ पूरितः पूरिओ ज-य. (२) मागधीमां आदिस्थित के अनादिस्थित 'ज'नो 'य' थाय छेः प्रा० सं. प्रा. मा० सं० मा० जनपद. जणवओ यणवदे। दुर्जन. दुञणो दुम्यणे। जानाति जाणइ याणदि । वर्जितः वजिओ वय्यिदे । गनित गनिओ गय्यिदे। त, 'द-त. ( ३ ) पेशा मा अने नृलिकार्पशाचीमा • न' कायम रहे छे द' नो पण · न ' यायल , नृा पा. प्र... (1) २ गोरमेनीन लगता दरेक नियमो मागधी, पंशाची. चूलिकापशादी अन अपभ्रममा पण मग यई सके, श्रा प्र ज-1) 2.3.0.२)

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न--धृष्टद्युम्नः घग्नुणो'। 'य-कुड्यम् कुड-कुहुँ ।
'नाः नग-नम्मो। व्याधः दाहो।
ला ला लम्गो।
श्यामा मामा ।
संयुक्त लादि लेप.
५. संयुक्त न्यननना पूर्ववर्ती वा परवी ल, व, व, विसर्ग अने
र नो प्रायः लोप पई नाय छे अने लोप यया पछी बाकी
रहेला अनादिना व्यंजननो द्विर्भाव थाय छे. उदाहरणः--
-उल्का उसा-उका।
-अब्दः अद-अहो ।
पगलम् वाल-वक।
लुब्धयः लुभभ-लुद्धओ।
-विक्ला विकल-विको। शन्सद- सदो।
रणम् माह।
म्नक-या-पढ़ी।
1.न -यो। निर्मा-दुःमितः दुनिभ-दुस्तिो ।
पतम् निक-पिका
दुःमहः दुमह-दुम्सही।
शेटक: महा।
नि सहम निसह-निम्महं।
शाटक मारी। निःमति निमर-निम्मरह।
अनः धनी।
. भासदमानो विमान तो नसी
३.भ... नि.
1.1.2.1
.fa..
.
1
का
त्र

अर-अज्ञ 'र-अक: वर्ग: वा-बनो। दांव: दिव-दिन्यो। पानां वता-वता। राषिः रनि-रती। मामीन मामध्य-मामत्य । पानी पति-पत्ती । शनां प्रायः परवर्ती र ना लेप विकल्ये थाय छ: प्रियः पिओ पिउ, पिड। ग्रहः नहीं। सन् २-चकं [मृचना-यां पूर्ववती अने परवर्ती एम व जानना व्यंगननो लो मान रोय त्यां प्रयोगा प्रमाणे टोपनुं विधान करवु नोईए. जेमके पूर्ववतीनो द्रोप- परवानी लोप- द--उदिन्नः उदिग-बिगी। य-कान्यम् कव-कलं । द्विगुगः विणो। माल्यन् मट-मल्लं। द्वितीयः पीओ। व-द्विनानिः दुआई। भयान समन-कम। द्विपः दिओ। गुल्दन् मुद-मुन्न । मन नप-क। वपनाने पदनी दाग करना लोप- -मदन-पति-अम्बिनी। -दिनः उचित-अविना। असा होना बीन, चोमो ने सचमी. एक नियर हानी नं. द-दाग्न बार। नतारन दार ..... (मि...)

-
लोप'
६. ''वाळा सस्कृत शब्दना द्र' नार' नो लोप
प्राकृतमा विकल्पे थाय छेः
चन्द्रः पन्द्रो, चंदो । द्रव.' द्रवो, दवो । दहः द्रहो,
दहो । द्रुमः द्रुमो, दुमो । भद्रम् भद्रं, भई ।
रुद्रः रुद्रो, रुहो । समुद्रः
ममुद्रो, ममुद्दो।
'अत्यव्यंजन' नो अ
केटलाक संस्कृत शब्दोना छेवटना न्यनननो 'अपाय
शरत् सरओ। भिषा' भिमओ रत्यादि.
कादि' नोय'
अवर्णयी पर आवेला, एक न पदमा रहेला, असंयुक्त अने
आणन्ति क, ग, च, न, त, ६, ब, य अन व-एटला
गंगनानो पारतमा मामान्य रीते 'य' थाय रे. उदाहरणो
आप्रमाणे के
-तीयंकरः तित्ययो । सरुटम् मया ।
ग-नगरम् नगर । मृगाः मयंको।
मनमः कगगह। । कात्रमणिः कायमणी।
-प्रनानिः पया। रनतम् रययं ।
१आनियम एक 'याद'मदन लामती नदीः बन्द्रम् ।
२०... १२ (नि. १५)
निरासी (पास)
यी • .. १६-( कन्य)
•....-(111)

त-नाटन पायाल । रसातलम् रमायलं ।
द-गहा गया । मदनः नयणो ।
ये-नयनम नयग । दयालु टगन्द ।
4-लावण्यम नायगं।
ग्वादिनी
स्वामी पर आकेला. एक ज पटमा ग्रंप ने अमन
म, २.५, य. अन म-एटला यगनीनो मामलामा '
शाय नम
ग्व-मबम् मुहं । मेवा मेला । लिपति निराशामा महा
पं-नना नहण| माय. माहो । । महो ।
मादा
थ-सपति कहा। आम भावनहो। नार नाही !
मिथुनन मिण
-रन्दनु पहा । पिर महिगे । स .
हो । मा: मह।
मागे । नमन ना ! माना
नमः।
..
..

m
-
१. प्रग मार राना ...!' या
माहामो पा
यो 4.1 1 हो
1 मो. मी । KE 4. { ।
ह. मो. मरो । मय: ममतो. महो।
अपम्पन'नी'
७. मन मोनानासाननो पा :-
शार मरीमियादि.
• कारि'नोप
प्रागंधी पर आला, पहन परमा रहेडा, अमयुक्त
प्रागन्तिक, ग, म, न, नअनेक-पटला
गंगनानी भारतमा मामान्य रीने 'य' पायजे. उदाहरण
भामाणे.
-तारः नित्ययरो । सम्सयां ।
ग-नगरम नपरं । मृगार मयंगे।
-करमहः कयमहो। कामणिः कायमणी ।
ज-अनापतिः पयाई । रनतम रयय ।
१ या नियम एक 'या' सामने लागतो नीः पदम बन्द ।
२३. पा... १२ (नि. १५)
मिरारभिषको (पालोगेश)
४ ओ पा.. पु. ५१-(क)
५२० पा..."-ज-7)

न-पानालम् पायालं । रसातलम् रमारलं । द-गदा गया । मदनः नयगो यं-नयनम् नयगं । दयालु दयाद । 4-ट्रावण्यम लायगं। खादिनी । .. बरसी पर आवेला. एकन पदमा रहला असं य, प. ५, थ, अने भ-एटला व्यननांनी मना र थाय उ.मरः ख-मुवम् मुहं । मेचना मेहना । लिखति निराशाबा माहा -नरनन् नह। माघः माहो । भर नहीं । महान लहर। ए-मयति कह । आयमा भानहीं। नाम नहीं । मिथुनन् मिहुणे। -इन्द्रधनुः इन्दाय । पिर. हिंगे । वाले कारः । व्या नाहो । माय: माह। -जननरः नगर । नमन नह । नना महा : महा। मन मोहा। m- ." " ।

. Ent, ", 1 44 1 unt प्रणा मीनी Althma ka HTATAR NA it. भीम भो भRT Fta म नार पाही। NE नार निम माहो IrAm. mi aml सपो। ~५, भ-' (२) तिकमा ... ... .' 'पायले नो गुम्मा मम्मो। मंस व्यायः नायो। मही जागो मा तो मरम मधुर। पंथयो। चान्चर १रला पैपाकरणाने मवेशदनी भादिमा मा निरन तो ना.

मं.
००
रममः रहमो
रंभा
भगवती भगवई
रफसो।
फकवती
(३) केटलाकने मने नलिकांपैशाचीमा 'स' नो 'उ' पाय :
मर्मरः प्रझरो
निरः निझरो
उच्छरो।
निच्छरो।
१०. म्वरथी पर आवेन्टा, एक न पदमा रहेटा अने असंयुक्त
' नो प्राकृतमां ट थाय के
ट-बटः घडो । घटने पडइ । नटः नहो । मटः महो।
(१) पैशाचीमा टु' नो 'तु' पण थाय छ:
मं०
प्रा. पंशाची.
कुटुम्बकम् कुटुंबकं कुतुंचकं, कुटुक्कं ।
कटुकम्
फड़ों
कतुओं, कटुभं।
पट्ट
पतु।
११. सरथी पर आवेला, एकपदन्धित अने असंयुक्त 'ट'
नां प्राकृनमा • पाय :
सालीनां तो क्यांप संयुन ? नो पन ''माय छ:-
दः लेड़। निषग्दुः निषाद । मा०प्र० प्र०५८ (27)

ठ-कर्मठः कमदो । कुटारः कुदारो। पटति पढइ । मटः महो। शटः सहो। ई-ल. १२. स्वरथी पर आवेला, एकपदस्थित अने असंयुक्त र नोल' थाय छः ट-क्रीडति कीलइ । गल्डः गल्लो । तहागन तलाये । वडवामुखम् वलयामुई। ट-ट (१) नलिकांपैशानीमां · ड' नो 'ट' थाय छे एम केटलाक वैयाकरणो माने छः सं. मा० डमरुका उमरुओ तडागम् तलाये प्रतिमा पडिमा मण्डलम् मंडल टमरुको। तटाकं । पटिमा। मंटलं । प्रा. स० (२) केटलाकने मने नृलिकापशानीमा 'नो' थाप छः सं. प्रा० ०० गाढम् गाद कार्ट। दाठा संटो संटो। टा। दंष्ट्रा दाम पण्डः १. पालीभाषामा भारः सर्वत्र इनोळ याय छे:-(ज. पा. १.१.४३ (८) .

૨૩
(३) पैशाचीमा 'ग' नोन' थाय छेः
सं०
प्रा.
पै.
गणः
गणो
गुनो।
न-ण
१३. स्वरपरवता, एकपदस्थित अने असंयुक्त •न' नो ण'
गुणः
गनो।
गुणो
थाय के
कनकम् कणयं । नयनम् नयणं । मदनः मयणो । मानते
माणद । वचनम् वयगं । वदनम् वयणं ।
१४. संस्कृतमा शब्दनी आदिमा रहेला असंयुक्त नि' नो
विकरपेण थाय छः
नदी गई, नई । नरः गरो, नरो । नयति णेइ, नेइ ।
'प-च
१५. स्वरपरवर्ती, असंयुक्त अने एकपदस्थित '५' नो
प्राकृतमा 'व' थाय छः
उपमा उवमा । उपसर्गः उवसन्गो । गोपतिः गोवई ।
प्रदीपः पईयो । महिपालः महिवालो।
-
'. ओ. पा. २००५८ (न)
२. न. पा. १०.६१ (न-ग)

ट-मंडः कमदो। कुटारः कुद्वारो। पठति पर । मतः मोश: सटो। - १२. मारपी पर आवेला, एकपदम्बित अने असंयुषः । र नो भाग. 1-मारति कीलद । गतः गहलो । तडागम तलायं । परवामुलम वलगामुई। (१) मलिशानीमा • ह'नोट'चाय एम फेदल देशकरणो माने छः म. प्रा. मक. मरुभा तडागम् प्रतिमा तन्लायं पहिमा टमरुको। तटाफ। पटिमा। मंटल। मगरलम महल .. टला ने मते पनि प्रापशामा 'T' •ठ' पाय । न.. प्रा. नारा गाउन त्या मा ភ្នំព័រ मंदी। १. MAITRin-(म.पा

(१) केटलाक वैयाकरणोने मते थलिकापैशाचीमा 'र' ने स्प.
प'थाय :
प्रा.
पालकः
बान्धवः
बालो
कन्धवो
पालो।
पन्धवो।
१८. स्वरपरवती, एक पदास्थित अने असंयुक्त २' नोव'
थाय :
अटान्ः अला । शलम् सवलं ।
(१) अपभ्रंशमा 'म' ने बदले 'ई' पण बोलाय :
प्रा.
कमटन
तथा
कलु,
नह नहा.
अमगे, भमली. मर्वरू,
नहा. निर्व,
तिवं.
कमलु।
निम।
गया
भमा
.
निम।
३
अन्ना अटाए।

११. भागंधी पर आला, भगुफ भने एकाशित '
यो प्रातमा न पायो
मा: । कपालम् गलं । कपिलम् का ।
HRI RANI Cणाम हुन । नानि तापापम् पा)
MRIT Hो।
(१) ममताने पण बोलायो
:
13. HORiver, Hign in In' को
गाणार...' ने भाग
TERNA
4-4-
MA ना।
k-4-it , PRE I BR AAR, HARI
untriti iraniमानिनामहारा
4

२७
न।
मां।
शीटम्
मनिलम्
नालं
मग्निं
मनिलं।
'श-स प-स
२०, संकृतां वराता ने 'नो प्राकृतमांस था।
श-कुशः कुमो । दश दन । नृशंमः निसंसो।
विशनि विसह । वंशः वो शब्दः महो।
दयाना लामा । शुद्धन मुद्धं । शोमते माहड़।
-कषायः कसायो। वापनि बाड़। निकपः निहमी।
पन्हः मंडो।
शप-विशेष. विममोशेष ममा ।
मन्थ
,, मागीमा
ना
हतः

'य-ज १९. संस्कृत शब्दनी आदिमा आवेलायनो प्राकृतमा जपाय ठे यमः नमो। याः नसो। यानि नाइ। पन्य (१)मागीमा 'र' नो 'न' न यता य न रहे छः सं. प्रा. मा० याति जाह यादि। यथास्वरूपम् जहासरुवं यधाशल्वं । यानपात्रम् जाणवतं याणवतं । . (१) मागधीमा 'नो 'ल' थाय छे अने पैशाचीमा तो विकरपे थाय छः सं० प्रा० मा० पै. करो कलो करो कलो। नरः नरो नलो नरो नलो। विचार विआरो विआलो विचालो विचारो। (१) पैशाचीमा 'ल' नो 'ळथाय : कमलम् कमल कमळ। कुटम् कुळं । , गवय गयो भवयो पाली प्र.१०६२ २ आ नियम केटलेक उकाणे तो लागतो पण नयी यथाख्यातम बामाय । यथा जानम अहाय । पृ. १०मा जणायलो बीजो नियम क्याय सहनी आदिमा ण गोह पी हा यधाम्त्यात यथा र ना आदिना + पाए ३ नोपप्र. ५.३()

वेदन:
भयः म::--
स्वाटक: बोडा
सनः'गो का
सार: आरो। सनिन्छ।
ची। तुम् गुहा । सुर: जुगेकर
सीयत शिजहा सांग ना
....
१० सा. प्र.पृ. १० (पच, 1-2-..
२ पानीमायामां चोय पण थाप :-(ज.ना.
१.१५-च)
३ नमान्दनी 'स' अर्थ होयत्यारे तनुं माय
अने समय अर्थ होय तो 'ख' रूप पाय .. पा...१..
(१०३, राणः खणी उणी)
४ मा नो 'पृथिया' वयं हाय त्यारे तेनु 'उमा'
भाय ऐ अने सम-धमाफम्बी अर्थमांना समाज सपाय.

૨૮
२१. संस्कृतमा अनुस्वारथी पर आवेला 'ह' नो प्राकृतमा विकले
थाय छः
संहारः-संघारो, संहारो । सिंहः-सिंबो, सीहो ।
। एवो पण एकाद प्रयोग मळे , म्या सरथी पर आवेला ।'
नो पण 'घ' थाप से शाह -दापो, दाहो।

प्रकरण ४
संयुक्त व्यंजनांना सामान्य फेरफारी
२२. संस्कृतनाक्ष नो विशेपे करीने प्राकृतमा 'ख' थाय छे अने
क्याप त्यांय तो प्रयोगानुसारे 'क्ष'नो 'छ' अने 'झ' पण पाय
तथा पदमध्यस्थित क्ष नोख' 'छ' अनेम थाय छः
क्षक्षक्षय
क्षयः खो। णिम् खीण | सीरम् खीरं । श्वेटकः खेडओ।
बोटक सोडओ।
क्षणः' उणो, वणो] । क्षतम् इयं । 'क्षमा उमा (खमा ।
क्षार: धारो। क्षीणम् छोणे । हारम् गरें । क्षुण्णः छष्णो । सुतम्
छीभी सुध् चुहा । पुर: छुरो। क्षेत्रम् उत्तं ।
क्षीयते मिजदा ताणम् मीणं ।
१.२.१.१० (एम, श) -शिष्यण
२समागम नोज धार छ:-(. काप्र.
''अन्दनी 'स' भयं पलारे तेनु र नया
ने र अयं ही मनपा ३.३. पा.१०.१५
(UPI,
Ed)
मानी पी' हॉर सारे तेतुं 'उमा'
भने स-मदना रायसे.

२१. संस्कृतमा अनुस्वारथी पर आवेला ह' नो प्राकृतमा विकले
'थाय छः
संहारः-संघारो, संहारो। सिंहः-सिंघो, सीहो ।
'पदो पण एकाद प्रयोग मळे , म्या तरथी पर आवेला ।
नो पग ' गाव दाह -दापो. शहो।

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'क्ष-ख, क्ष-छ, क्ष-उस
इक्षुः । ऋक्षः रिक्सो। ऋसम् रिक्स। मक्षिका मक्सिा।
सक्षणम् लाखणं । प्रक्षीणम् पक्खाणं । प्रक्षेपः पक्वेवो। सादृश्यम्
सारिक्वं।
अलि अच्छि । इक्षुः उच्छ् । उक्षा उच्छा | स: रिच्छो ।
ऋतम् रिच्छं । कक्षः कच्छो । कक्षा कच्छा । कुक्षिः कुच्छी।
कोशेयकम् कुच्छेभय । दक्षः दच्छो । प्रक्षीणम् पच्छीगं । मक्षिका
मच्छिा । लक्ष्मीः लच्छी। वक्ष. वच्छं। वृक्षः वच्छो । सक्ष:
सारिच्छो । सादृश्यम् सारिच्छं।
प्रक्षीणम् पझीणं।
क्ष%xक
(३) मागधीमा तो 'क्ष' नोक थाय छ:
यक्षः जस्तो
रक्सतो लक।
२३. सस्कृतना वस्तुवानक शब्दना 'क' अने 'स्क' नो प्राकृतमा
'ब' थाय छे तथा पदमध्यस्थित क अने 'स्क' नो भव'
य:के।
राक्षसः
थाय छः
'क-स, क्ख स्क-ख, क्ख
निष्कम् निक्ख। पुष्करम् पोक्सरं । पुष्करिणी पोखरिणी।
अवस्कन्द अवासंदो। स्कन्दः मंदो। स्कन्धो खंधो।
कन्यावारः मंचावारो।
१३.पा.प्र. ०१७-(सक्व, 8-3, क्षमा-टिप्पण)
• म अच्छी, इको । प्यासा धको । गालावा । पा.
प्र
...८
३. पा. ५.१.१६-१, (ब-य, सम्यग्य)

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क्ष-ख,
ख. क्ष-छ, क्षमा
इक्षुः इक्खू । ऋक्ष रिक्खो'। ऋतम् रिक्स।मतिका मक्खिा।
लक्षणम् लाखणं । प्रक्षीणम् पखाणं । प्रक्षेपः पक्वेयो। सादृश्यम्
सारिकसं।
अक्षि अच्छि । इक्षुः उच्छ् । उक्षा उच्छा । ऋतः रिच्छो ।
ऋक्षम् रिच्छं । कक्षः कच्छो । कक्षा कच्छा। कुतिः कुच्छी ।
कोक्षेयकम् कुच्छेअय । दक्षः दच्छो । प्रक्षीणम् पच्छीणं । मक्षिका
मच्छि भा। लक्ष्मीः लच्छी। वक्षः वच्छं। वृक्षः वच्छो । सरक्षः
सरिच्छो । सादृश्यम् सारिच्छं।
प्रक्षीणम् पझीणं ।
क्षक
(१) मागीमा तो 'क्ष' नोक पाय छः
जाखो
य:के।
राक्षसः
रक्तसो लकशे।
२३. सस्कृतना वस्तुवानक शब्दना 'क' अने 'स्क' नो प्राकृतमा
'ख' थाय छे तथा पदमध्यस्थित क अने 'क' नो व
यक्षः
थाय छः
'क-ख, यख स्फ-ख, वख
निष्कम् निसं। पुष्करम् पोत्सरं । पुष्करिणी पोक्खरिणी।
अवस्कन्द अनसंदो। स्कन्दः मंदो। स्कन्धो मंधो।
कन्यावार: संधावा।।
' ज. पा.प्र.३.१७-(अजय, शश,
सम्हा-टिपण)
सस अच्छी की। ध्यास धको मसाला पा.
३.पा. ५.१.३६-३७(4-म-ख, कम्बम)

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'क्ष-क्ख, क्ष-छ, क्षम
इक्षुः इक्ख । ऋक्षः रिक्खो। ऋक्षम् रिक्सा मक्षिका मक्सिा।
लक्षणम् लावणं । प्रक्षीणम् पक्खीणं । प्रक्षेपः पवित्रो। सादृश्यम्
सारिक्खं ।
अलि अच्छि । इक्षुः उच्छ् । उक्षा उच्छा | स: रिच्छो ।
अक्षम् रिच्छं । कक्ष: कच्छो । कक्षा कच्छा। कुतिः कुच्छी ।
कौक्षेयकम् कुच्छेभय । दक्षः दच्छो । प्रक्षीणम् पच्छीणं । मक्षिका
मछि भा । लक्ष्मीः लच्छी। वक्ष. वच्छं। वृक्षः वच्छो । सदृक्षः
सरिच्छो । साक्ष्यम् तारिच्छ।
प्रक्षीणम् पझीणं ।
क्ष-क
(१) मागधीमा तो 'क्ष' नोक पाय छः
यक्षः नक्खो
राक्षसः रसखसो लकशे।
२३. संस्कृतना वस्तुवानक शब्दना 'क' अने 'एक' नो प्रानमा
'म' पाय छे तथा पदमाध्यस्थित क अने 'क' नो म'
बाय छे.
'क-ख, क्ख स्क-ख, रख
निष्कम् निसं। पुष्करम् पोक्स। पुष्करिणी पोक्सरिगी।
अनकन्द अवामदो। मन्दः मंदो। सन्धी संयो।
मध्यावारः पंधावारो।
'३. पा. प्र.2.१७-(
शम, 1-3, मा-टिप्पण)
२ . अच्छी, इको । चारमा पो रामारा। पा.
.. १८
३३.पा... 11-11 (+- Kam,m)
य:के।

रस-उत्मनः उच्चयो । उत्साहः उच्चाही। उन्मुकः उच्छा। निफित्सति निदच्छद । ममरः मन्गे: संवत्मरः, संबच्छरो। प्स-अप्सग. अच्चरा। नगुप्सति नगच्छद । निम्मति लिचाइ। (१) प्राकृतमा '' नो 'छपाय के त्यागे मागीमा तो मी लिटु धाय हे एटले 'x' नो 'ध' यायः उन्उन्लनि उच्चरन्दर उअलदि। गच्छ गजर गधा नियक तिरिचित निरिधि पिच्छिन्नः पिचिलो विश्चिले । गृच्छति पुश्चदि । वत्सलः बच्चरला वघले। 'घ, ग्य, ये-ज २७. पदनी आदिमा रहला 'य', 'प्य' अने 'य' नोज' पाय छे तथा पदमध्यस्थित 'ध' च्य' अने 'य' नो ' पाय : द्य-द्युतिः-जुई । द्योतः-जोओ । घ-अवद्यम् अवज । मद्यम् मन्ज । वेद्यः वजो । व्य-जय्यः जन्नो । शय्या सेना । र्य-कार्यम् फर्ज। पर्याप्तम् पञ्जतं । पर्यायः पञ्जाओ। भाया भन्ना । मर्यादा मजाया । वयम् वजं | १ . पा.प्र.पृ. १८-(य-ज, यत्र)पालीमा केटलेक उकाणे 'नो 'ग्य' पण पाय है-गृ० १९-(उच्च, टिप्पण) .२ पालीमां नो 'नो 'पिर' 'य' के 'रिय' थाय ठे-(ज. पा. प्र. पृ. १५-१६) प्रा.

२९. प्रयोगानुसारे क्याय 'स्व' नो 'न, नो 'छ, 'द' नो
'ज अनेछनोनथाय छे तथा पदमध्यस्थित व नोच,
iya' नो 'छ,' 'T' नो 'ज' अने भन' नो 'जम थाय छे.
कृत्वा किच्चा। चत्वरम् चचर। ज्ञात्वा गचा। दवा दच्चा।
भुक्त्वा भोचा। श्रुत्वा सोचा।
ध्वच्छ
पृथ्वी पिच्छी।
ध्वनः प्रओ।
ध्वग्झ
विद्वान् विज्छ । बुला दुज्मा । साध्वसम् सज्मसं ।
२१. संस्कृतमा ह्रस्व वरथी पर आवेला ध्य', ', 'स' अने
•er' नो प्राकृतमा 'छ' थाय' छे.
५थ-पथ्यम् पच्छ । पथ्या पच्छा । मिथ्या मिच्छा।
मामर्थ्यम् मामथ्य-सामच्छ ।
'श्च-आश्चर्यम् अच्छेरं । पश्चात् पच्छा। पश्धिमम् पच्छिमं ।
वृधितः विडिओ।
१ जू० पा•• . ३० (टिप्पण-चरपरम् चघर)
२ पजः घजो-(पा.प्र.पृ. ३२-नि. ३८)
३ ज. प. प्र. पृ. २१ (क) • ३८-(भा)
• २९-(स] पृ. ३८-(प्म)
'एक मात्र निपट' शन्दने आ नियम सागतो नयी:
नि:निपलो, पानी-निधी
५

-मय. मागेमा T1 उपक माओ।
मितिमान भि 14.
का
R-SA अंगानानि गनिनिया।
(1) मालमा '' नोपाय खां मागनी
उन्ट माय एररेर नी !
गर
निमा
निति
निमिया
सिक्किम
चानि
आदि।
पत्तपत
'प, ग्य, २-न
२७. पनी आदिमा गहेन्टा-, ग' ने '
नभाय141
पदम गम्पिन 1 जननी भाग.
य-धुनि.-नई । यौन -नोभी।
ध-अवयम भव | मन मनं । यः वली
व्य-नच्या जीवाच्या मा।
4-कार्यम् कन। पर्यामन् पचतं । पर्याव- 43111
नायी भन्या । मर्यादा मनाया । र पत्र ।
१२.१२. • १८ -(%) मारक
को 'नीच' पन माप ई-7.१:-(म.in !
२ सामान दिर'' irr'70-11 .
२.१.१५-1)
1

३४ सुनो। अब (१) शौरसेनीमा 'य' नो विकल्पे 'प्य' थाय छे भार्यदुनः अज्जत्तो अय्यरत्तो, अजउत्तो। कार्यम् कय्यं, पर्याकलः पजाउलो रख्याकुलो, पञ्जाकुलो । सूर्यः मुजो सुम्यो, घ--ग्य' (१) मागधीमा 'ध' नो 'स्य याय छ: अध अय्य। मद्यम् मय्यं। विद्याधरः विजाहरो विय्याहले। 'ध्य, ह्य-श २८. पदादिभूत 'ध्य' अने 'ह्य' नो 'स' थाय छे अने पदमध्यस्थित 'ध्य' तथा 'ह्य' नो 'ज्म थाय छ: ध्य-ध्यानम् झाणं । ध्यायति झायइ । उपाध्यायः उवज्झायो । बध्यते बझा । विन्ध्यः विझो'। साव्यम् सज्झ । स्वाध्यायः सज्झाओ। -गुह्यम् गुज्म । नाति नन्झइ । मह्यम् मज्झं । सध. सझो। १ जूओ रिपण २ जु. ३३ । २ ओ टिपण १लु पृ. ३३ । ३ जू• पा०प्र० पृ. १९-(पश, पा) ४ अनुस्वारथी अने गुरु के दीर्घवरथी पर आवेला कोर पण न्यजनना स्थानमा अहीं जणावेला निरुत(स, झ वगेरे) विधानो यतां नयी. मारे ज 'विभ्यः' 'विमो' नदिपण विंधो' ययु. जूओ भा.प्र.पृ. १९रि• संध्या संझा। ५ पालीमा 'नो 'द' पाय ठे-(पार पृ. २२-मच्य)

न
१६ मा 'नेपालमा मामान्य
मर
काम नही। नतंकी। प्रीया
सपनाम माध्य। यना की। दस ल। यानी यह
मनम् महिला
{1; मा सय गायनमा भाग
अनरन् मन
निभिन्न सिवनी
निवा
महो।
माता
..नियम rint
.नी मन
समान: बीपी
नापी
मरनी।
मारनामा
सनन् ।
म उस
तो।
मनो।
।
वाचना।
सान ६.सना
१
२. 10:02. ५८ (नर)
...)

'म्नान-ण . . ३० "संस्कृतना न अने'ज्ञ' नो प्राकृतमा जथाय के अने पदमा यास्थित 'A' अने 'नो' थाय छः R-निम्नम् निणे । प्रद्युम्नः पज्नुष्यो । ज्ञ-प्रता पणा । विज्ञानम् विग्णाणं । आज्ञा आणा'। ज्ञानम् णाण सज्ञा संणा। न. न, ज्य, न्य-य (१) प्राकृतमा 'स' नोयाय छेत्यारे मागधीमो नो पाय भने नि,'य' अने न्यानो पण 'न्य थाय छः -भवता अण्णा अवजा। पण्णा समष्णू शमन्ने। #.-अन्न अन्जली अन्जली। चरम्जयः रणन्याए। प्रानन्दः पनलो 1-अप्राण्यम् सबम्हण्ण अयम्हन्ना तुध्यन् पुण्ण Tणतो --नि-य अस्मिन अदिमन्न् । स्त्रया न्याया। मानान मामन सामन्या 1.2.1.66 (HEAD it..पा.2.1. स पणनयो कुलं । ': ...1.20-2444 --X-103)

३
।
'स्तन्य
३. संस्कृतना स्तनो प्राकृतमा ' यार छ भने पदमध्यस्थित
त नोमय पाय :
यो । स्तम्भः थंभो । स्तम्यः पद्धो [उद्घो]
म्तुतिः युई। लोकन् थोत्रं । स्तोत्रम् यो । स्त्यानन्, यणं ।
अन्ति अन्थि । पर्यन्तः पल्लत्यो । प्रशस्तः पसत्यो।
प्रन्तर: पत्थरो । वस्ति सत्यि । हन्तः हत्यो।
य, स्थ~स्त
(२) यी अने या नो भागमा स्त' थाय छ:
अर्थपतिः अत्यवई
अस्तबदी।.
सार्यवाहः मत्यवाही
सातवाहे।
उपन्धिनः उवट्टिो
मुन्धिनः मुट्टिओ मृस्तिदे।
'ल
१२ संस्कृतनाट' नो प्राकृतमा ' थाय के अने पदमव्यन्वित
नोटु थाय
उवन्ति।
४
१३.प्र. पृ. २७-(लव्य, लय)
२ नमत अने 'लन् गदना 'ल'नो' पठो नयीः समस्तन
समन सन्यः बन्यो।
३३.ना.प्र१. २६ (४)
श, उ मन रद पवदना को पलो नीः इटा
रस | उहो । संदटन दहं । असो... २६ टिममा
4

अनिष्टम् अणिहूँ । इएः । कष्टम् क । काटन कई।
दएः दट्ठो । दृष्टिः दिट्ठी । पुष्टः पट्टो । मुष्टिः मुट्ठी। यष्टि नही ।
सुराष्ट्राः सुरहा । सृष्टिः सिट्टी।
(१) 'दृ' अने '' नो मागधीमा 'स्ट' थाय :
ह-पः पो पस्टे। भट्टारिका भट्टारिया भस्टालिका
भट्टिनी भट्टिणी भस्टिणी।
g--कोष्ठागारम् कोट्ठागार कोस्टागालं ।
शुस्टु।
(१) पैशाचीमा 'ट' ना स्थाने 'सर' चलाय छे:
कष्टम्
कसट।
दृष्टम् दिलु दिसटं।
'इम, 'म-प
३३ संस्कृतना 'म' अने 'कम'नो' प्राकृतमा पयायो अने पदम
ध्यम्पित"ड्म' अने 'क्म' नो प' थाय :
"कुङ्मलम् कुपलं।
रुक्मिणी रुप्पिणी।
१-२ पाटीमा ते'इम' नो 'दुम' भने 'मनो 'कुम थाप छे.
(जू. पा. पृ. ११)
गरपक ठेकाणे यम'नो म' पण यायले-दमी हम्मी,
कमलम् कसलं (पा.प्र.पृ. १३ टिप्पण )

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. 'इम, प, स्म, म, क्षा-म्ह. २८ संस्कृतमा प्रयोनाता 'एम', 'A', 'म', 'म' अने पश्मना 'म'नो प्रारतमा 'मह' 'पाय छे: म--कश्मीराः कम्हारा । कुश्मानः कुम्हाणो । म-उमा उम्हा । भीमः गिम्हो । स्म-अम्मादश. अम्हारिलो । विस्मयः विम्हओ। प्र-ममा रम्हा । ब्राह्मणः पम्हणो । ब्रानभ् म्हने मुना. मुम्हा। म--पकमलम पाहों । प:माणि पहाई। (१) अपभ्रंशमा 'स्म' ना स्थान म' पण बोलायचे. प्रीम गिम्भो, कोमा मिम्मो, 'इन, ण, स्न, छह, ण, क्ष्म-6 १९ मा प्रयोनाता 'इन', 'ग', 'न', 'म', '', 'ग' भने म:मना "दम'नी ' धाय : स-प्रश्न पहा । शिश्न मिहो । --उजीपम् उहीम । कृष्ण को । निष्णु निर गिम्हो। मिहो। मिम्रो मोना नोहा । प्रस्तुत पहुओ । म्नान हामी । नन वहिन वाही। 1ो पा• 2.7...-( , tuit, it' २ मा मिनरेगनी नगी --- । सम-धाम2.1.1-105) 14.2.7.नाम -41....." म.. ८im मिना ! सपना।

भरहः मही। वह दुखी
का- म नि म मन्दं।
म मा
'नि--मिन
१, मामा म ना "' माय गरम
बयार
बननन वय
-
पदा माnिti'. नमः ।
---
7HIERE:
.:
...'

श, पं-रिस ४३ संस्कृतना अनेक नो प्राकृतमा रिस' विकल्पे थाय छः श-आदर्शः आयरिसो, आयसो । दर्शनम् दरिसणं, दसणं । सुदर्शनः सुदरिसणो, मुदसणो । 4-वर्षम् वरिस, वासं । वर्षशतम् वरिसप्तय, वामसंग। वर्षा नरिसा, वामा । । ४४ संस्कृतना संयुक्त 'ल' नो 'इल' चाय छ: अम्टम् अविलं । कलाम्यति किलम्मइ । कलायत मिलतं । क्लिएम् हिनि। विलनम् किलिन्न । क्लेश' किलेसो । स्टायति मिलाइ । ग्लानम् गिलाणं । प्लुष्टम् पिलुट्ठ । प्लोपः पिलोमो । मटायनि मिलाइ । स्टानम् मिटाणं । ए सिलेसो। श्लेष्मा मिलि. म्हा । म मिलोभो । श्लिष्टा सिलिटुं । शुक्लम् मुलं । 'ये-रिश्र ४५ सम्हलना नननो प्राकृतमा 'रि' याय के आनाय. आयरिोगाम्भीर्यम् गंभीरिभा गाभार्यम महीरि। जोगिम् नोरिमा यम् पीरिन । मनर्यम सम्पनरिभ । भाया मारिगा । वयम् वरिभ । बागम् वरि । म्यम् परिभ । सूर्यः मुगिनी । मौन्दर्यम् मुरिभ । शायम मोरिअं । । । । ०५. " वि- प्रति मीन माग्मि। 8 . मानियन यायायो नानी -मो। स्टर मा.३३-निाम तुम ()t- मंत्र कादश गलांनां निहित 'नो याय के ने क्याय निन्य साय ने क्याय विकलं याय : उपत्र दाना उतनः उतिमी । कामः कमी । नचिकी। दत्तन दिय । परिव निन्निध्यनः नझिनो । द्रवः मुदंगी। दनमा वडिली। व्यन्नन् विज्ञाव्य विभावतःमिविनो बत उदाहनोः- अङ्गारः मारा, भगांगे। ललम निटानं, नडालें। पत्तन् नि, नई मनः मनिकनी, छदवसी। .. नं मोना रन्दना अब जो विचले पाय : हाः होंगे, मंत्र यात्रा गन्दानां चिह्नित '' नो 'ड' याय केले क्यांप नित्य पायो भने तय किचलो गाय : अन्तिः गवरः श्या। विन। विन्द्रः मंतः विपक : ११२-(अन्द) २ त्री-- संगमरमरो प्रकरण ५ उपर इटले प्रकरण २-३-४मा आपेला नियमो सामान्य नियमो काय छे एटले ज्या कोई बीनो खास नियम न लागतो होय त्यां प.न नियमो लागू थाय छे. आ नीचे ने नियमो आपवामां. आवे छे ते विशेष नियमो छ एटले ज्यां आ नियमोनी प्राप्ति थती होय त्यां सामान्य नियमो न लगाउतां प्रथम आ न नियमो लगाववाना। . स्वरना विशेप विकारो ४८ 'अ' विकार (क) 'अमआ--- नीचे नणावेला शब्दोमा आदिना ' अ 'नो विकल्पे ' आ थाय छः . अभियातिः आहिआई, अहिआई।प्रतिस्पर्धा पाहिफदी, पहिफली। अस्पर्श. आफमो, अफसो। प्रवचनम् पाययण, पण । चतुरन्नम् पाउरत, चउरत। प्ररोहः पारोहो, परोही । दक्षिण दाहिणो, दरिसणो । प्रवासी पावा, पाम् । परकीयन् पारफे, परकेर। प्रमिद्धिः पासिद्धी, पसिद्धी। परकीय पारक, परकं 1 प्रमता पामुत्तो, पमुखो। पुनः पुणा, पुण। मनन्त्री माणंमी, मगमी। पायर, पड। मनम्बिनी मागंमिनी, मणंपिणी । मतित् परिया, परिभा। समृदिः मामिनी, ममिली। तिमिन्द पाटिमिद्धी,परिमिती मरक्ष. सारियो, सरिच्छो इत्यादि। १. ग.. ५३-(मामा) (३) :- मय' प्रत्ययांत सादमा आधा मना मनी विकतो धार मा. गलमयम जलमा. विपनयन मिम विममा दुगमन दहमा । मन्दमयम मुहमा मरमा (ना? न पुन.-'उगाद, न उनो। पुन - एणार. णा। 'प) • अप आप्पा - itcoin 211-213.0 १६ आशियार- मनमा भने समाविको .. 'मा । माग म , १३ वैकल्पिक उदाहरणोः खण्डितः खुडिओ चण्डम् चुई, प्रथमम् पुढमं, पटुमं, पुटुमं, सडिओ। चंड। परमं । स्वपिति मुबह मोवइ । नीचे नणावेला शब्दोमां चिह्नित 'म' नो 'ए' थाय छ-ते क्यांय नित्ये थाय छे अने क्याय विकल्पे थाय छः एत्था बह्मचर्यम् वम्हचरं । अन्त पुरम् 'शय्या अन्तवारी सौन्दर्यम् मुन्दरं। अत्र सेना। अन्तउरं । अंतेआरी। गेन्दु। वैकल्पिक उदाहरणो- आचर्यम् अच्छेरं, अचरि। पर्यन्तः पेरतो, पनंतो। उत्करः उकरो, उकरो। यही वेली, वाली। (१) अ-ओ- परम्परम् परोप नीचे नणावला शन्दोमा निहिनत 'अ' नो ओ' थायरे-ते क्याय नित्ये थाय छ भने क्याय विरले थाय छ: नमस्कार. नमोकारो। पमम् पोम्म । धेकल्पिक उदाहरणो- असंयति ओप्पर, अपंद। स्वपिनि मोवर, मुगर । भाषितम् भोलि, अपि । १ पाली, ५२-(4-7) १८साम (सी) (3) अर- 'मय' प्रत्ययांन शब्दमा आवेटा म ना " ना विका याय ः भगमयम विपनयन : जन्दमदों, विनय, दृहम। मुखमयन मुहमय। : (न) *-भाई- न न:-न 'उतारन उनी। जन्दमयं। विनमा दहमदनं. मुहान (स) 5- अन-नं. अगर माया. अयाना १.आवित्रा नीच मुन्टन अमन थाय नवगछि. 'अनार्यः श्री राम कामियः मा पान्तः । पांनुः । किन .

-
कनिक उदाहरणो-
उत्खातम् उक्वयं, उत्खायं । पूर्वाण्डः षण्हो, 'मुवाहो।
फालकः कलओ, कालओ। क्लाका बलया, बलाया।
कुमारः कुमरो. तुमारो। ब्राह्मणः रम्हणो, बाम्हणो।
खादिरम् खहरं, ग्वाइर । स्थापितः टविओ, टाविओ।
चामरः चमरो, चामरो। (परिष्ठापितः पग्विविओ, परिवादियो।
तालवृन्तम् तलवेटे, तालवेटं । संस्थापितः संविओ, संताविओ।)
नारार: नराओ, नाराओ। हालिकः हलिओ, हालिओ इत्यादि.
प्राकृतम् पययं, पाययं ।
अन्ययो-
अथवा अहव, अहार तथा तह, तहा।
यथा नह, नहा । वा व, वा । हा हा हा इत्यादि ।
(स) आ-३
नागेना शब्दोमा निहित 'आ' नो विकल्प ' थाय छे:
आचार्यः आइरिओ, आयरिओ।
कूर्गम, कुप्पिसो, कुप्पासो।
निवासरः निसिभरो, निसागे।
(1) भाई--
खल्वाट. वल्ली।
म्न्यानम् टीण (भीण)।
(न) आ%D3-
आदम् उछ । माम्ना मुण्टा । नायक भुवी।
१ना ये स्पोजना मनने समन श्री प्रा. या.
८-.-.-7."
२.नि. ३१

(3) मा-- आर्या भन्नू। भासार: उसारो, आगे (वैकल्पिक) (न) आ-ए- ग्राह्यम्'मेझं। वैकल्लिक- असहाय: अनहेलो, अमहो । एतावन्नावन् एचिभमेन, एतिअमत्तं । मोननमात्रन मौभगत, भोमणमा । द्वारन् दरं, पारापतः पारेवओ, पागवगे। पश्चात्कम पच्छेकम्न, पच्छाकन्न । पुराकर्म पुरेकन्न, पुराकन्न । () आ-ओ- आईन् ओहं। आली ओली। दारं । इ-विकार - इनि' इन। निनिरि: नितिर-तितिरो । पयिन् पह- १ आ सको प्रयोग 'सानू' अमां व भार । २१. पृ० ५३ [आ-v] ३ वैदिक सपन' (भा. ३-१-११८) उपरथी प्रा. मिन्सं. नग्न विद्यर नुकर अनार है. मो०३३ नि२७ ..आ गदने पनि अनी ३ वान्यानो छेः ~ओली- म. भोर, मोर। ६ पाटी १८५३- (10) आ भव्याने वारपनी आदिनां व बारावा दे.

पहो । प्रपित हई। प्रतिश्रुत् पहभा। विभीतरः रहेर भो मपिः भूमी । हरिद्रा हलहा। वैकल्पिक- साम अंगु, सिपिलम् सिरिन। (प्रशिषितम् पसलिं, पमिलिं।] मारा। रिंशत् मिता विशति -- पासा तारा। साहो। निगहम माग नीसह निगम निसह। दिनित दक्षिहो। निन मा । मात्र मनो। हो। 11 पिनिगुमना निमान: गुमना। मगिन पाराग-पा aufnTagी। 141641 मान-1014 - .

सुधिष्ठिरः नहुदिलो, दुग्यो, द्वितीयः विनो। . विदओ। निरामेरा करितक- शिकन केमुश्र, किमुश्री दोक्यगं । द्विवचनम् वैकलिक- द्विधा (1) नि-ओ- वैतिक- 'दोहा, दुहा। आझरी, ५१ ई-विकार निझरो। हगनकी १ साली २०५३-(२) २ सनी २०:५३- (-ओ) ३ कारन में आ ने गन्दनो प्रयोग '' धानुनी पूर्व पार :- दिया कि दुहाविद, दोहारिन । द्विधा स्तम् दुहा द(क), दोहा हाकि) भं। ४ गरी ५३-म) हदी इतनी (पी) (स) ई-आ- करमाराः कम्हारा। नाना शब्दोमा 'ई' नो इ' थाय छे-ते त्यांय नित्ये अने क्याय विकसे याय छे:- अवसीदत् ओसिअंतं । द्वितीयम् दुइ। आनीतम् आणिों। प्रदीपितम् पलिवि। गभीरम् गहिरं। प्रसीद पसिना जीवतु निवउ । वल्मीकः वम्मिओ। तदानीम् तयागि। वीडितम् विलि। तृतीयम् तइभं। शिरीपः सिरिसो। धेकल्पिक--- अलीकम् अलिअं, अली। उपनानम् उपणि, उवणी। करीपः करिसो, नीवति निवड, जीवइ । पानीयम् पाणि, पाणी करीमो। - नाम् नुष्णं,' निम्। तीयम् १" (पाणे) २'ना' राख्दनु 'ह' रूप देना 'नो' पाकी मार, अजय-'!

वैकल्पिक- विहानः हीनः विरुणो. हो, विहीणो। होगा। शिः रिसो। आपाड: आमलो। कोशः करिसो। विर्भातकः पहेटओ। वैकयिक- नीडम् पायपन पेज। नई, " पीटम् पंट, नी। पटि। २२ 3-विकार नांचना शब्दोमां चिहिनन नो 'अ' थाय ठे-ते क्यांच नित्ये अने क्यांय विकल्ये थाय है: अगुरु अगई। गुडूची गलोड़। गुर्वी गई। मुक्टः मउगे। मुकुरम् मरं। मुकुलः मउलो। मुकुलम् मउलं। युधिष्ठिरः नहुहिलो। सौकुमार्यम् सोअमछं। पंकलिसक- उपरि अवार, उवार। गुल्लः गरुभो, गुरुओ। a)---- पुरुषः पुरिलो । पाल्पम् परिसं । भ्रुश्रुटि: मिउडी। १ नुकुलम् नकुलं (पाली ३.३.५३-3) २ साली प्र.५० (रन) ३

()-भा-
करमारा:
कम्हारा।
नीनेना शब्दोमा 'नो' पाय छे-ते क्या नित्ये
अन यांग किसे पाय छे:-
आमीरन मोसितं। द्वितीयम् दुइ।
आनीतम आणिभं। प्रदीपितम् पलिविश्रा
गभीम गहिरं। प्रसीद पसिना
भी नि। गल्मीकः वश्मिभो।
तहानीम् तयागि। मोदितम् विलि।
नृतीयम् तदा शिरीपः मिरिमो।
मलिक--
अटीम
अलि,
अनीता उपणि उपणी।
करीम करिसी,
जीवति नि
नी।
पानीया पाणि, पाणी
अन्तीमा
करीमा।
नागम्
एगा,'
निजा
न
14 (1)
२.imit'सा' ५ 'नो' पसी

५६ वैकल्पिक- कुतूहलम् कोडहलं, कोउहलं। मधूकम् महुअं, मह नूपुरम् नेउरं, नेउ। (च)-ओ-- नीना शन्दोमा 'नो 'ओ' थाय ने बयांय निन्ये अने क्यांय विकले थाय :- 'कर्षरम् कोप्परं । नाग्वृलम् नेवोलं । कूष्माण्डी कोहण्डी। तुणीरम् नोणीर। 'गुडूनी गलोई। मूल्यम् मोल्लं। म्युलम् वैकल्पिक- तृणम् तोणं, तृणं । 'धृणा थोणा. पणा । ५४ क-विकार (क)-आ- पृशा कासा, किमा। मृदुत्वम् माउकं, मउन्ण। मृदुकम् मारक, मउभं 1. (ब) 'का- नीना शब्दा नांग विर धारं । १. (-3) नी?.३ (कर)म मा.

मिआये कृम् किच्छ । कृति किई । कृत्ति. किच्ची । कृत्या कि फुपः कियो । कृपण. किरिणो । कृता किवा । रुपागम् किवा शः किसो। कृशानुः किमाणू । कृषित किमिओ। कमरा किन गृष्टिः गिट्टी । मृद्धि गिदी। पुरणम् अमिण । पृणा विन तृप्तम् तितं । दृष्टम् दिटुं । दृष्टि दिली । धृति लिई नप्तक नत्तिओ। नृप. नितो । नृशंम. निसंमो। पृथक् पिह पृथ्वी पिच्छी । वृहितः विहिनी । भृङ्ग भिंगो । भृङ्गार. भिंगा भृगुः भिऊ । मातृ माई ( मातृणाम् माईण) मृटन, मिली मृष्टम् 'मिह । वितृष्णः विडाहो ।वृधिकः विशुओ । वृतम् वित पृतिः वित्ती । वृद्धकविः विद्धई। वृष्टः विवो । वृष्टिः विट्टी वृती विसी । व्याहृतम् वाहिों (८) । शृगालः शृङ्गारः भिंगारो । सकृत् सइ । समृद्धिः समिद्धी । मृष्टम् सिद्ध । सृष्टिः सिट्टी । स्पृहा छिहा । हृतम् हिम । हृदयम् हिअय | वैकलिक- धृष्टः विडो, धहो । पृष्टम् 'पिटुं, पट्ठ । [ पृष्टिः पिट्ठी, पट्टी ] बृहस्पतिः विहफई, वहफई । महणम् ममिणं, ममगा, 'मानगृहम माइहर, माउहर । मातृमण्डलम् माइमंडलं, माउमंडलं! कण्डूयनम् कंडया मयको। १ पाली प्र• १.५४ (उओ) २ साली प्र. १. ५५ (-) सरसायो भ्रम कुटिः भ्रादिः। ३ 'सूक्ष्म ' अर्थने सूचवता'. -ने उतार विसर सरल लागे छे-("श्लल अमरको तृतीयकाः) Yी 'काय' पाउना यशं रूको - माइः मिश्रको।

२ भासा समागमा समरिक गपगारे,
नृत्युः मिच्चू, मच्चू । वृद्धः विद्धो, बुड्डो । वृन्तम् विंट,
शृङ्गम् सिंगं, संग।
नीचेना शब्दोमा 'ऋ'नो 'उ' थाय छे:
नुः उज । ऋतुः उऊ । अपभः उसहो
जामातृकः नामाउओ । नप्तृकः नतुओ। निभृतम् निहुअं
निवृतम निउभं । निर्वृतम् निन्छों । निर्वृतिः निबुई । परभृतः
परहुओ। परामृष्टः परामुट्ठो । पितृकः पिउओ। पृथक्
पह। प्रथिवी पटई 1. पती पुहुवी। प्रभृति पहुडि । प्रवृत्तिः
तम् पहुई । प्रावृतः पाउओ ।
कः भाउओ । मातृक: माउओ।
मृदङ्गाः मुइंगो। वृत्तान्तः वुत्तंतो।
। वृन्दावन: बुंदावणो। विवृतम्
पृष्टः पट्टो। संवृतम् संबु।
ना ''नो
३ मारे 'गा' मानगो लोग सारे
गली गरामहिला-मदिर(५) ।
भगाए रूप गपगनी.
१ मा शब्द, रगने गये है। गानो रस, रस.
मातृप्यासा मारमिया, माउसिंगा। ...
। बृहसतिः युहप्फई, वहफाई।
बुंदारया, वंदारया । वृपभः
~
.. पृ. २ (-3)
आली .. ३ (कर) पिन ।
ना.८

- (च) मी.- मृपा मोसा, मुमा। नृतम् वॉट विंट। (३०) (छ) अरि- दृतः दरिओ। (न) क-दि- आहतः आदिभो। (झ) -रि- नीना शब्दोमा मोरि' थाय छे-ने क्याय नित्ये अने क्याय विकल्पे थाय छः 'अन्यादृशः अन्नारिसो। अन्यादृक्षः अन्नारिच्छो। अन्यारा अन्नारि। अमूदृशः अमूरिमो । अमूदक्षः अमूरिच्छो। अमूहक् अमूरि । अस्मादृशः अम्हारिसो। अस्माक्षः अम्हारिच्छो । अला. हकू अम्हारि। ईदृशः एरिसो। ईदृक्षः परिच्छो। ईदृक् एरि। एतादृशः एआरिसो। एतादृक्षः एआरिच्छो। एतादृक् एआरि। कीदृशः केरिसो। कीदृक्षः केरिच्छो। कीदृक् केरि। तादृश. तारिसो। तादृक्षः तारिच्छो । तादृक् तारि। भवादृशः भवारिसो। भदाक्षः भवारिच्छो । भवादृक् भवारि। यादृशः नारिसो। यादृक्षः जारिच्छो। यादृक् नारि। युप्मादृशः तुम्हारेसो । युप्माक्ष: तुम्हारिच्छो । युप्माहक तुम्हारि । सदृशः सरिमो। सक्ष: सरिच्छो। सदृक् सरि। वैकल्पिक- ऋनुः रिज्जू, उज्नू । ऋणम् रिणं, अणं । ऋतुः रिक, उऊ । ऋषभः रिसहो, उसहो । ऋपिः रिसी, इसी। १ अहीं 'अन्याय' वगेरे शब्दोमा स्वतन्त्र 'ऋ' नथी किन्न 'ह' मा ''छे, 'द' गेप माटे जओ पृ० १.नि. २॥

(३) उपयुक्त अन्नाश या मांडी महा नवीना क्या शब्दोन 'नानो पेशाचीनां • थाय : अलाहदाः अन्दारिमो अन्हादिलो-अन्हातिमो । अन्याशः अन्नारिमा अनानिमो। ईशः एरिमो एनिमो। कोशः केग्मिो नादाः तारितो भवादशः मारिनो यादाः नारिमा युनाशः नुन्हारिमो तुम्हानिमो महाः मरिनो मनिमो ५५ ए-विकार (क) 'र=- केनरम् किमर, केसरं । वा विटा, वेडा । देवरः दिअरो, देवरी । वदना विभगा, वेगा। (व.) (ख)1-3- नेनः भूगो, मंगो । (व.) ५६ ऐ-विकार- इनिमो। नानिमी। भवानिमो। जातिमा। उछन् उवर्मा नाम नीचा मोद.१२ (न, द-न) २ साटीनां चोहराने नो 'श्रीभार दोनो- घा... ५५-रो) धीरं। शनधरः सणिच्छरो। मन्याम् मियां। सैन्यम् मिन्नं, मन्नं । (ये.) (ग) 'ऐ-ई-- धर्यम् पत्यान्दनम् चौवंदणं. नेहरादणं । (३०) (घ) ऐ=भर- नीना शब्दोमा ऐ नो 'अइ' थाय छः ऐश्वर्यम् अइसरि। केतवम् करआं । चैत्यम् च । देत्यः दइयो । दैन्यम् दन्नं । देवतम् द व । भैरवः भहरवो। वनवनः वनवणो । पैतालीयम् वइआली । वैदर्भः वदभो। कदेशः वइएसो । वैदेहः वइएहो । वैशाखः वइसाहो । वैशाल: वइसालो । वैश्वानरः वइस्सागरो । स्वैरम् सहरं । इत्यादि. वैकल्पिक- कैरवम् कदरवं, केरवं । केलासः कलासो, केलासो। चैत्रः चहत्तो, चेतो देवम् दरवं, देखें। वैतालिकः वरआलिओ, वेआलिओ। वरम् वदर वेर । वैशम्पायनः वइसंपायणो, वेसंपा- यणो । वैश्रवणः वेइसवणो, वेसवणो वैशिमम् वइसिभं, वेसिभी इत्यादि. ५७ ओ-विकार- (क) ओ=*- वैकल्पिक अन्योन्यम् अन्नन्नं, अन्नुन्नं । आतीयम् आव, आउ । प्रकोछः षट्टो, पउद्यो, । मनोहरम् मणहरं, मणोहरं । १ साली प्र. पृ. ४ (ऐ-१) २ पाली प्र. पृ. ४ (ऐ-1) . . ३ ज्यारे आ बे इन्दमा को नो 'भ' याय के त्यारेज वेना 'a' अने 'क'नो '' पण/ मृसामो। - शिरोवेदना सिरविभगा, मिरोविभगा। सरोहन सरलई, सरोव्हं। (६) ओ=3.- सोच्छवाः (1) ओ अउ, आन- ओ-3-जोक गउओ। गोतः गउआ । गो गउ-गजा ओ आभ-जो गाभ-गायो (पुंलिंग) गो गात्र-गाई (न्त्रीनिंग) ५८ औ-विकार- (क) =अउ- नोवेना शन्दोना ओ नो 'अ' थाय छ। कौशेयक कउच्छश्या पौरः कौरवः पोल्पन् परिमं। कौनः मौनन् पउगं। স্থায় कउसलं। मउली। सायन् सह। गौरवन् सौराः सउरा। (ब) 'आ-- गारवम् गारवन् १ साली ३.५ (मोना)निर. नांवर इसने 'ओ' को 'भन सा है: (श्री-ज)-पाटी टिमन, पउरो। कारखो। कालो। पोलिः गहो। गउरवं।

शनैश्चरः सणिच्छरो। सैन्धवम् सिंधवं । सैन्यम् सिन्न, सेनं । (वै०) (ग) 'ऐ-ई-- धीरं। चैत्यवन्दनम् चीवंदणं. चेइयवंदणं । (३०) । नीचेना शब्दोमा ऐ नो 'अ' थाय छ: ऐश्वर्यम् अइसरिअं। कैतवम् कइअब । चैत्यम् पर्छ । देत्यः दइयो । दैन्यम् ददन्न । देवतम् दइअव । भैरवः भइरवो। वैनवनः वइनवणो । वैतालीयम् वइआलीअं । वैदर्भः वदभो। पदेशः वइएसो । वैदेहः वइएहो । वैशाखः वइसाहो । वैशाल: घसालो । वैश्वानरः वइस्साणरो । स्वैरम् सहरं । इत्यादि. वैकल्पिक- कैरवम् कहरवं, करवं । कैलासः कालासो, केलासो। क्षेत्रः चहचो, चेतो।देवम् ददव, देव्वं । वैतालिका वआलिओ, आलिओ। वरम् वदर, वैर । वैशम्पायनः वइसंपायणो, येसंपा- यणो । वैश्रवण. इसवणो, वेसवणो । वैशिकम् वइसिों, वेसिया इत्यादि. ५७ ओ-विकार- (क) ओ=*- मासिक- अन्योन्यम् भन्ननं, अन्नुन्नं । आनोयम् आवलं, आउ । कोटः पट्टो, पउटो, । मनोहरम् मणहर, मशोहरं । १पाली ३. पृ. । (ऐ-1) पाली प्र. 7. ४ (ऐ) ध्यारे आव्दमा मोन' यायसारे जठेना 'व' ने 'नो'' पण यायचे.

शिरोवेदना सरोरुहम् सिरविअणा, सिरोविअणा। सररुई, (ब) ओ=3- सरोरुह। सूसासो । । सोच्छवासः (ग) ओ अउ, आभ- ओ अउ-गोकः गउओ। गोकाः गउआ । गो गउ-गा ओ-आज-गो गाभ-गाओ (पुलिंग) गो गा-गाई ( ग्रीलिंग) ५८ औ-विकार- (क) औ-उ- नीना शन्दोना औ'नो 'अ' पाय : कोशेयकम् फउच्छेप्रयं। पौरः कौरवः कउरतो। पीरुपन् पगरिस। कोल: कउन्टो। मानम् मउगं। कोरटम् कउमलं। मौलिः मउली। गउरो। सपिन् सउहं। गउरा मोराः पउरो। गौर: गौरपन् गारवर १.५ (मा)ine.मा करो' की 'अ' (ज) -11 (ग) और नीचेना शब्दोमां '' नो 'उ' थाय : दौवारिकः दुवारिओ। पौलोमी पुलोमी । मौनायनः मुंनायणो । शौण्डः सुंडो । शौद्धोदनिः सुद्धोभणी । सौगन्ध्यम् मुगन्धरणं । सौन्दर्यम् मुंदेरं । सौवर्णिकः मुवाष्णो । कॉलेयकम् कुच्छेअयं, कोच्छेअयं । (३०) (घ) औ आय- नौ: नावा।

प्रकरण ६ असंयुक्त व्यंजनोना विशेष फेरफारो ५९ क-विकार- कर्परम् खप्परं । कीलः खीलो। कीलकः खीलओ। कुनः खुनो। -- अमुकः अनुगों। कन्दुकम् गेंदुझं। अपुकः अनुगा। तीर्थकरः तित्यारो। आकर्षः आगरिमो। दुकुलन् दुगुलं आकारः आगा। मदकल: मरगलो। उपासकः उवामगो। मरकनन् मरगये। एकः एगी। आदरः मागो। पसलन् । . टोकः लोगी। 'किरातः दिलाओ। शांकरः नीमरो, मारो। (वे.) चन्द्रिका नदिमा। : 'a' 'हा' मा उसागर . . निरभिमां उपल 'प्रकोष्ठः पबहो, पउद्यो। निकुरः निहुरो। निकपः निहसो! स्फटिकः फलिहो । शोरुरः सीहरो, सीभरो।(३०) ६. ख-विकार- गृहलम संकलं । गङ्गला संकला। ६१ ग-विकार- नागानि नामाई । भागिनी भामिणी । पागा झालो । आगी डाली। दुभंगः 'हो । मुभगः मूहको। पिसानी पिसानी पिलाई। (३) भालनमा आशा विमान पिमला, विमाभार) २it!''' '' ना'यो नगीना' ''नानी-यो 7-11६10 (1) 1.51.५॥

सचितः खसिओ, खो। (३०)
६३ ज-विकार
.
-
जटिलः झटिलो, जटिलो।
(३०,
६४ट-विकार
2-3-टमः केटवो । शकटः सयहो। मटा सदा ।
'2-7-फटिकः फलिहो।
चोवा चविला, चविटा । (वे.)
पाटपनि फालेद,
६५ ठ-विकार
1-3-अडोटः अंकोटो।
अवोटतलम् अंकोल्डनेटं।
८-६-पिटरः पिहटो, पिटर (३०)
६६ ण-विकार
'ग-3-गुः वेन्ट, वेणु । (३०)
६७ त-विकार
तुच्छम
तुच्म
छछ।
3-2-नगर: टगरो । तवरः ट्वरो । अमरः दम ।
भीमा १.५८-(टन) माना टेलेफोकानी
सपार--(ट- पृ. ८)
को मार धानुनां का नजवानां ..
यी पृ. १.८ (+-) गुमो-
-

नाना शब्दोमा त नो थाय डे-ते वयाय नित्ये अ- क्याय विकसे थाय छे:-- मृतकम् मइय। सूत्रकृतम् सुत्त (मूअ) गई। पनाका पजाया। 'प्रति पडि। [प्रतिकरोति पडिकरह । प्रतिनिवृत्तम् पडिनिअ । प्रतिपत पहिवया । प्रतिपजम् पडियनं । प्रतिभासः पडिहासो । प्रतिम- पढिमा । प्रतिश्रुत् पहुंमुआ । प्रतिसारः पडिमारो। तिपय पाडिफद्धी । प्रतिहासः पडिहासो। प्रतिहारः पडिहागे।] प्रभृति पहुडि । प्राभृतम् पाहुई। व्यायतः वावडो। विभीतर बहेभो। हरीतकी हरडई। इत्यादि. पकल्पिक- अवहृतम् अवहई, अवयं । अवदतम् 'ओहर्ड, आहनम् कृतम् कर्य। दसतम् दुबई दुधय। मृतम् महं, मयं। बेतमः बेडिसो, सुकृतम् मुगडं ओहयं । आहयं। आहड, वेअमो। . मुकया १ प्रविटि- (1-2) प्र.१.५८.

न:- अनि तान् अनिय। माना मति: नन- अनमी अन्टमी। मानवाहनी कयिक... मानमान: माटाहणी- पन्टिनम आनाद्यम् पानटम पालन 'आपलं पीपलं, विनाम्नि. विदयी। काना काहली, यातः परही, मातुमि मालिंग, वर्मानः बमही, १८ ध-विकार रायगे। भाभी। मालिया प्रथन पदमा । मेधि. मदी। शिविरः (३) मिदि निमाहो। निशीथः निमांदी प्रथिवा पदवी पहा । नमो६१, ३ टिमका २ विलिः विदाय--2) ३ अधिवी ककसी-(47) मा २.५ १८ थ-ध- पिह। थर पिचं, ६९ द-विकार डम इत्यादि इत्यादि. वैकल्पिक कदनम् कडणं, कयणं । दग्यः डटो, दलो। दण्डः इंडो, दंडो। दम्भः इम्भो, दम्भो। दर्भः उभी, दभी। दटः इट्टो दट्ठो । दरः डरो, दरो । दशनम् इसणं, दमणा दाहः डाहो, दाहो । दोला डोला, दोला। दोहदः बहलो, दोहलो। द-दी' धीप, दीप् । दीप्यने विप्पइ, दिप्पइ। (वे.) (क) द=र--संम्ब्यापाचक शब्दना अनादिभूत, असंयुक्त अने एकपदस्थित एका 'द' नोरथाय : एकादश एआरह । द्वादश वारह । त्रयोदश नेरह । (ब) दर-कदली करली। गद्गदम् गगर । 3-प्रदीपयति पलीवेइ । प्रदीम् पलित दोहद. दोहन्द्रो। कदमः कलम्बो, कयो। (३०) द-न-कदापित कवदिओ। द-ह-कुदम् कउह। १ पाने ३. पृ.५९-(द) २ महीना ने धानुना था रूस समजनानां है. ३ नहीं 'दी' यानुना क्या तो समजमाना है. ४ आशन्दनो अर्थ 'वेळ' थनो नथी. ५पाली ...-(--दोहद दोइलो) मही 'महार' धानुना था पो समजवाना है.

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७२ म-विचार
म-विषमः विमटो, विमनो । (40)
म-व-मन्नयः बमहो।
अभिमन्युः अहिवन्न्, अहिलन्न् । (३०)
मास -भ्रमरः भसलो, मनरो। (कै.)
७६ म-अनुनासिक
नाना शब्दोमा • ना 'म' नो लोप याय के अने मना कर
यया पत्री शेष रहेल (मुना) '3' ने स्याने अनुनासिक उ' (२)
थाय :
Pr
अनिमुचकम् अगिचयं । कामुकः कात्री।
चामुण्डा बाउँण्टा । यमुना नउँणा ।
७७ 'य-विकार
य आह-कतिपयम् कस्याहं ।
य---उत्तरीयम् उत्तरिज, उतरी) (३०)
तृतीय तरजो, तरओ । द्वितीय विश्नो, बी01 (2
4-न--युप्मनीय: तुम्होरो । युप्मादृश.-
प्मद्-तुम्ह । इत्यादि।
'य---यष्टि लट्ठी।
ये-4-~कनिषयम्-कइ (३०)
१कोरकारमा 'य'नो ''ग
नायु -पार - [ पानी-मिने]
२ अ ामा पादना सी जाननां माने।
युग्मपुत्र नभनी दयादि
३ पा 3. प्र. पृ. ६३-:237)
पाटी11.51-4-7)
.

यह-माया नाही. या । मच्या मन्त्रागन मन • -- 5८-विकार 7- रिवी। दिदा विभाटा। ट! पगांणम् पटाण, पहाय। 1-01- करवीर कांगे। '.-नाना पटीन 'नीट' मायने ननांग निन्न अंने नयाय शिकलो भार : अपद्वान्न अवदालं। मा. समली। अङ्गार गाली। मुखरः नुहला। कना पटगी। युधिष्टिरः नहुट्टिलो। कानर काहलो गः नुको। किगत निलामी। वरुणः बलुनो। नाणः चली शिविर: मिदिया। दरिद्र दन्हि।। मन्त्रारः मकालो। दग्विानि दलिहाद। मुकुमारः मोमालो। दान्द्रिमा दालिई । परिन्दा फलिहा। न्यग्भद्रः मूलभट्टी। परितः परिहो। हन्द्रिः हलिहो। पारिभवः फ.लिद्दा। हरिद्रा हलिया। इत्यादि. सानो प्रय 'हात' मानले. २ दिन लादि::.पा दिनु नी:-.:-) ६ मत मागी कट (20) ४ मा नुर. न्यूरः चला। याउन .

७०
७५ म-विकार
म---विषमः विसो, विममो । ()
म-4-~-मन्मयः यम्महो।
अभिमन्युः अहिवन्न, अहिमन्न् । (३०)
मस --भ्रमरः भसलो, भमरो। (वे.)
७६ म-अनुनासिक
नीना शब्दामा • नाम नो लोप याय छे भने 'नो लोग
यया पछी शेष रहेल (मु' ना) '3' ने स्याने अनुनासिक 'उ' (3)
थाय छः
अतिमुर यस अणितयं । कामुकः काउँभो।
चामुण्डा चाउँण्डा । यमुना नउँणा ।
७७ 'य-विकार
य आहे--कतिपयम् कइयाहं ।
य-ज--उत्तरीयम् उपरिन, उत्तरीभी (३०)
तृतीय तहनो, तइओ। द्वितीय विनोबाओ। (३०)
4-7--युप्मदीयः तुम्होरो । युप्मादृशः तुम्हारिमो। 'यु:
प्मद्-तुम्ह । इत्यादि।
य-व---कतिपयम्-कइवे (.)
१ कोहरदमा 'य'नो .'
म्नायु-मार--[ पाली-सिन]
२ अहीं गुम साना रची जालना सीने पण समजाना रे.
युमपुर-नुम्स्युत्तो इत्यादि
३ पाले. प्र. पृ. ६३-(42)
४ पारी म.पू.१३-(4-7)

ह-इन आरह, आरम | दहा दह, दश । दाक्टः
दृहका, दमात्र। इसमुन्व. दहनुहो, दमनुहो। दशस्यः
दइरहो, दमाहो। द्वादश भारह, भाग्न । प्रयोदछ
देन्द्र नेम इत्यादि।
८२ प-विशार.
'--'पद पादः छानो । पम्ही छहो । पर:
छहो। पटी बट्टा
पद-नुपा नुहा-मा
पहागनाही. मानो। प्रत्ययः चूहोमो (२०)
८३ स-विचार
-7-मनी छवियो। नुवा गुहा ।
म-ह-दिवसः दिहो, किनोवि)
८१४-विशार
होगमा उलग. उच्चा।
८५नी
का दानां माला ने नर किती
प्रकार का, सगे।
१८-73)३।

'न' लोप-दनुजः दणू, दणुओ । दनुजवधः दणुवहो, दणुभवहो। भाजनम् भाग, भायणं । राजकुलम् राउल, रायउल। १' लोप-उदुम्बरः उम्बरो, उंबरो । दुर्गादेवी दुगावी, दुम्गादे (ए) वी । पादपतनम् पापडणं, पारदरगं । पादपीठम् पानि, पायवीरें। य' लोप-किसलयम् किमल, किसलयं । कालायसम् कालासं, कालायसं । हृदयम् हिअं, हिभयं। सहृदयः सहिओ, महिभयो । ३' सोप- भवटः भो, अवडो । आवर्तमानः अरमाणो, आवतमागो- एकमेव एमेय, एवमेय। जीवितम् नी, गीवि। तारत ता, सात । देवकुलम देउल, देवरलं । प्रावारकः पारओ, पावारओ । यावत् जा, जाय। लोग-- केटलेक टेकाणे शब्दना आदि व्यंजननो पण खोप पई नाय ः च भी चिह्नम् च । नः उणो इत्यादि।

प्रकरण
संयुक्त व्यंजनांना निमंर फरार
सुचना:- मीने मयुद्ध खननोना -
गन भगवाना आवदेने मायनने गन्दा वन
बच्चे की याय नभानुं मनुकाभ्यना रहे नारे नेने
पा मही आव: : मनां नगाली दी है.
1
-
मुचः मुझे नदी ल मच्चा। सटो।
(ब)--
लगा।
मृदुत्वन्
नाउन:।
दः
हन
इट्टो ।
८७ रव,ख
सन् विश्व : निन्दा
(ब) न--
ना
पिने
दरममा ( (:.दिन)

सा। (ग) स्थ:-ख- स्थाणुः (घ) क-ख- फेटक: स्फेटिकः सोटकः सेडओ। सेडिओ। खोडओ। ८८ गाह रत्तः रमो { रत्तो ] . (स) क-ग- गुल्कम् (मुंगी-हिं०) [ ] ८९ (क) 5-3- कृत्तिः किची। (स) थ्य-च- तथ्यम् तचं [ तच्छं] ९०च्छ, छ (क) स्थ-स्थगितम् छदा [थइभं] (ख) स-2-गृहा छिहा। (ग) सच्छ--निगृहः निच्छिहो । निपिहो]। ९१ज्ज, 'न्य, ज- अभिमन्यः अदिमान, दिमन्न । आदिमा १ आम 'माय' न चपली शेर यारे नु खानु' ने परल 'यागु'का पाय है। २एम मुक्क-(पा.३ ३.-2) । अभिमन्युः मामा (म-मानी प्र..

(धातु) इन्ध इझा (ममिन्य सनिनाद । यि विमाद)
न्ध-झा-
श्चि---
'वृश्चिकः विचओ, [विछिओ]
वहो।
(क) =~-पत्तनम् पट्टणं। मृत्तिका महिमा ।
वृतः
(ख ) कथितः कवहिओ।
(ग) स्त-~पर्यस्तः पल्लहो।
९५४,
'अहो
[ अत्यो]
चतुर्थः चउद्यो [घडत्यो]
(ख) स्त-----
स्तम्भ्यते
टभिनइ।
तब्धः टड्दो [पद्धो]
१धिकः पिटिको (पाली)
२पाली प्र. पृ०५८-(तच)
३ अर्थः अस्यो, अहो, अतो-(पीली प्र. पृ. १. किन)
४ 'बशब्दना प्रयोग 'प्रयोजन अधमां थायले भने 'अत्य
चन्दनो 'धन' अर्थमां थाय छे.
५स्तच्या पदो। सम्मा मंगो-य पाली म.१० २७)

उभो।
सम्म
(धातु)
स्तम्भः
स्त्यानम् टीणं । [बी]]
(ग) 'स्य–विसंस्धुलम् विसंतुलं ।
स्थ-g-- असि
अहिं।
(क) ---
गतः
गा।
की।
कपर्दः
गर्दभः
[ गदहो]
(धातु)
छर्दयति
छर्दिः
मर्दितः मडिओ।
विदः
दिच्छा।
वितदिः
विभी।
संमडो।
१ आ'सम्म'धातुने अही असदायक जलेयग्नो छ.
२'स्तम्भ 'शदनो अर्थ पण स्तम्भ' धातुनी जेसेज
समजवानो छे
३ पाली पृ. २८-(स्थान)
सरि ओह (गाणे ३० पु. २९-सन)

नीचे नणावेला शब्दोमां संयुक्त 'ना हर
पाय :-
-
(क) ध, दुग्न, व्ध-त्---
अम् अद
इट्टी,
दिदी
दग्धः हो ।
विदन्धः
विअट्टो
वृद्धः वृतो,
[विदो
वृद्धिः
वुट्टी!
घद्धाः सदा, [सदा]
तयः
ठड्डू।।
(ब) =z---मयां मुंदा, [ मुद्धा ]
ण्ड, पण
९८ ण्ट,
वृन्तम् वेष्टं ( तालवृन्तन तालबेण्ट)
कन्दरिका कण्डलिया।
मिन्दिपालः मिण्डिवालो।
(क) --
पश्चदया पण्गरह।
पवादात पगाना।
, दाली प्र. पृ. ८०- (इइन, ६-८, बन्द)
तार- प्र...... नट)

. (ख) Tam- 'दत्तन दिन (ग) - मध्याह्नः मःमणो, { मामहे ९९ त्य (क) स-स्थ- 'उत्साहः उत्यारो। (ब) त्महत्य- अध्यात्म अन्मत्य [ अम्मपं] ए-दू-आश्लिष्ट आलिदो। 'न्य-न्त- मन्युः मन्त। [मन्न हनन्य- नितम् विन्ध नि १०१ प, फ, फ *त्म-प्प- आत्मा अप्पा [ अत्ता] आत्मानः अप्पाणो ! अताणो] १ 'दन' दादनु 'द 'दित्त 'रूप नथी. २ उत्साह उम्साहो-(भाग प्र. पृ. ३.) ३ जूमो पृ. ३६, ने एनु चाधु टिप्पण | ४ पालीमासमा 'म' नो 'तुम' पत्तो अणाय दे.-आत्मा अनुमा, अत्ता-(पाली २.३...)

भीमः निको। मासेजे [ मिलिन्हो] भन्म भयो भन्मो] ऊर्वम् उ उन्हें आत्रन् । तात्रन् तंत्र। (क) स-भ- कदमीराः कन्भारा [ कन्हारा] ब्राह्मणः वम्भणो ! वन्हणो] ब्रह्मचर्यम् चन्मना [वम्हचेरं] १०३ र आश्चर्यम् अच्छेरं । तृर्यम् तरं । धैर्यम् धीर, [पिजं] पर्यन्तः पेरतो । [ पञ्चतो ] ब्रह्मचर्यम् वम्हचेरं । साण्डीयम् सौदीरं । सौन्दर्यम् नन्द। (ख) हर- . दशाहः दमारो। (ग)-र-- धात्री धारी। , श्लेमा-मिलनुमा, सेन्हो-(पाली ३० पृ. ४९, म-उन्) २ पाली ३० : १-(न्य नि. १८) ना.१२

कृप्माण्डी मोहन [ कोहण्डी]
'पर्यम्तम् पछट्ट, [ पहत्य]
पर्याणम् पाण।
सौकुमार्यम् सोअमलं ।
१०५ स
वृहस्पतिः वहस्सई [रहप्फई ]
वनस्पतिः वणस्सई [वणफई]
(क) -ह- दक्षिण. दाहिणो [दक्षिणो]
(ख) ख-ह दुःखम् टुह [ 'दुवस]
दुःखितः दुहिओ [ दुविखओ]
(ग) 4-ह- तीर्थम् तूहं [ तित्थं !
(घ) ई-ह- दीर्घ. दोहो, [दियो]
(ङ) पं-ह- कापिणः काहावणो ।
(च) पह- 'बाप्पः बाहो
१ पर्यस्तिका पल्लस्थिका-(पाली ३० पृ. १६-टिपण)
२ वनस्पति' यनप्पवि-(पाली प्र. पृ० ३०-२५)
३ पाली प्र. पृ०८-नियम १० (ख)
४ आ शब्द, ये अर्थमा प्रसिद्ध छे-एक तो आमु अनेक
बाफ रोमा ज्यारे साफ-गरमी-नो याचक होय त्यारे तेनु 'बाह
बदले 'पफ' थाय ।

- 18) नद-कुम्नान्दी कोहन्दी। कुनालन कहा १०७ द्विभाव (क) नीचे नगाच्या प्रमाणे निहित यंदनाना दिनांव पाय- नयाय नित्ये अंने यांय विषय भाग:- का उन। यांचनम् तुन्दगी मेलम् नटं। विवकिलम् बढे। प्रभूनन बहु। मोटा विद्या इत्यादि। प्रेमपन्न। मन्टुकः मंट्टर। ऋतिक: अलदीयम् अन्हकरं अन्दर, अन्हके। एको, एो। कर्णिकारः कीमागे, कगिआरो। काहलम कोडहीं। चित्र "चित्र, नित्र (एव) कोहलं वा (एक) नांकः दुन्हिो दुन्हिा। देवन् इन्वं, दहवें। नखः नको, नहो। निहिनन् निहि। नाटन नांड। ,वित्र ने एक बयान नाक भन्स (ई. ८-२-१८४) अंने संन्यूदनां पागला . ये विरंप समानदा पावरे-अन्ना ने लीधर को कभी न 'सेव्वा थोरो। खाणू। हूअं इत्यादि। मूकः मुक्को, मूओ। मृदुकम् माउकं, माउ व्याकुलः वाउलो, वाउलो। व्याहृतः वाहितो, वाहिओ। सेवा सेवा। स्रोतम् सोनं, सोग स्त्यानम् विष्णं, थी। स्थूलः युल्लो स्थाणुः खष्ण, हूतम् स) समासमा आवेला उचरपदना आदिना व्यंनननो द्विर्भाव विकल्पे पाय छे:- आलान-स्तम्भः आणाल-खंभो, आणाल-पखंभो। कुमुम-प्रकरः कुसुम-पयरो, कुसुम-प्पयरो। दुः-सहः दु-स्सहो। देव-स्तुतिः देव-धुई, देव-स्थुई। नदी-ग्रामः नर-गामो, नइ-गामो। निः-सहम नि सह, नि-रसहं । हर-संदा, हर-वखंदा। १०८ शब्द-विशेप विकार ने शन्दोमां कोई पण सामान्य के विशेष नियम न लागु = विहिन भागना केटलाफ विशेष विकारो थाय छ, ते आ नापे वामां आवे के:- म्कार: एकारो। नम् अरं, अच्छरिअं, अन्धरि अच्छरी । १ श्री पृ. १-टिपन २७। २. भाषाय, अयान, अण्डर-(पानी . दु-सहो, :- केले कागेरो, चोत्यो, उद्खलः उलूखलम् कदलम् कदली कर्णिकारः कुतुहलम् चतुर्गुणः चतुर्थः चतुर्थी चतुर्दश चतुर्दशी चतुर्वारः जयन्त्रिंशत् प्रयोदश त्रयोविंशतिः त्रिंशत् नवनीतम् 'नवफलिका नवमालिका निपण्णः पृगफलम् पृगफली पृतरः प्रावरणम् ओहलो [उउहलो] ओक्खलं [उल्लं] [ कयलं] केली, [कयली] [कणिआरो] कोहलं, [ कोउहलं ] चोन्गुणो, [चउम्गुणो] [चउत्यो] चोत्थी, [चउत्थी] चोदह, [चउद्दह] चोदसी, [चउद्दसी] चोवारो, [चउन्नारो तेतीसा । तेरह । तेवीसा । तीसा नोणीअं, लोणी। नोहलिआ। नोमालिआ। गुमण्णो, [णिसम्यो] पोप्फलं। पोप्फली। पोरो। [पावरणं] प१रणं, पाउरणं, १प्रो-वासी प्र.नि...

बोरी। वीसा। थेरो। घदरम् बोरं । पदरी मयूखः मोहो, [ महो] रुदितम् रुपण। लवणम् लोणं (लवण ]. विचकिलम् वेइल। विंशतिः मुमारः सोमालो [सुकुमालो] 'स्थविरः १०९ शब्द-सर्वधाविकार- आ नीचे ते शब्दो आफ्यामां आवे छे ले केटलेक अंश के सर्वथा ( पोताना मूळ रूपथी ) अन्य रूपवाळा थई नाय :- अधस् हे। त्रस्तम् हित्य, तहं [तत्य] अप ओ. [ अव] दिश दिमा। अप्सरस अच्छरसा, अच्छरा। दुहिता धूआ, [दुहिआ] अधि दंगा दाता। अर ओ, [अ] भायुः आउभ, [ आ3] दूहका हरओ। आरब्ध. आदतो, । भारदो] धनुष धगुह, [ धणू] इदानीम् पहि, पत्ताहे, दाणि[भागि ति दिही, वि) दहः हरो। सी. दाणा १ यायेगे-(पाली) २ मा मिसाय TR'नो प्रयोग नो-(ओ 1-111) ८७ 'इपत् कर, [ इसि] वहिस् बाहिं, बाहिरं। उत ओ, [] बृहस्पतिः भयम्सई [ बहस] उप ऊ, ओ, [उव] भगिनी वहिणी, [ भइणी] उभयम् अवह. उवहं, [उभयं] मलिनम् मल[ मलिणं ] ककुम् कटहा। मातृप्वसामाउच्छा, माउमिआ। लिप्तम् छु [वितं] मानीरः मंजरो, बंजरो मिजारो]] क्षुध् हा । वनिता विलया, विणिआ] गृहम घरं । विट्टतः विदाओ। छुप्तः छिको [ छुसो] वृक्षः लखो, [दच्छो] तिर्यक तिरिआ, निरिच्छि। पैडुवम् वेलिअं, वेउन । पदातिः पादको पयाई] गुक्तिः सिप्पी, [ सुत्ती स्तोकम् थेवं, थोवं. थोकं थो 'पितृप्वसा पिउच्छा, पिउमिआ। वी इत्थी [थी] पूर्वम् पुरिमं पुव्वं । शी० पुरवं । श्मशानम् सीआणं, सुसाणं [मसा हृदयम् हिअयं पं० हितपं, हिता : पाप पाउसो। । १ विशेषगसूचक 'पत् गुदनु ज 'कर रूप थाय , किंत विशेष्यनूचकन नहि. २ 'गृहपान रदन परवद ने बटले गया कप भायो ३ विनियो-(पाली) पा.प्र.पृ. १६ नि०१९ ४ पितृष्पना रिनुच्छा--(पा. प्र. पृ. ३८ टिप्पा) ५ सोरम थोकं-(मना ५० पृ. २७) ६ ममानन मस.न. ननानं-(पा.प्र.पृ.५१-टिप्पण ११० अन्तः स्वरद्धि- नीचेना शब्दोमां चिह्नित संयुक्त व्यंजननी वधे नीचे नगाच्या प्रमाणे स्वरो उमराय छ:- उमेरानो स्वरः 'अग्नि अगणी [ अम्गी ] अईन् अरहन्तो अरिहंतो, अरहतो । अ, इ, उ 'अई अरह, अरिह, अरुह । कसिणो। कृष्णः कसणो, कसिणो [ किण्हो ] अ, क्रियाः किरिया [किया ] ३ मा छमा। त्यम् ३ उम छउम [उम्मे] उ अ इ। जीआ। ई " तप्तः तविभो [ तत्तो ] १ 'द्वारम् दुवारं [दारं] उ दुवालस। दिष्टया दिहिआ। पनम् पउम [पोम्मं] उ । प्रमि (ग, अग्गिनि, गिान-(पा.प्र.पृ.४९) २ ही ''भानुना बया तो समजवाना. म कमिणो, किलो, मियो-(पा. प्र....) । पापा वर्ग के ग अर्थमा जयगय. . ज्या विरा-(पा... 44-4) भर दुपार, द्वार (पा... ३. (24) पा... -- म म ११) उमेरातो म्वरः क पलक्खो। भविओ। [भवो] [मुक्खो] इ उ मुरुखो, 'प्लक्षः भन्यः मूर्खः रत्नं वनम् शाम् रमणं । [व] m . यहरं सारंग। Ary 'पः दुवे। सदाहा। 'स्निग्धन् सणिळ, सिणिलं, [निरं] अर स्नुपा "मनुमा [मुप्ता, हुमा मुना ] उ 'मक्ष्मम् माम, मुरमं । सणेहो नेहो। N ११. निमो- मा. ३. पृ. ३१ न.) : : मिग-(१.६.१६ नि ) . : fel-41. १३ ) ४. मुं, १० पु. ११:५४) : 1. Anirl-(६१) Fiयो-(.......) ---(••न) ::., .....

१० m . " उमरातो स्वरः स्याद्वादः सिआवाओ। सुधम् सुरुग्यं । सुवो। स्वे सुवे। सिविणो। हिलो [ म्हो ] ॥ हिरी ३ १११ अक्षर-व्यत्यय- आ नीचे ने शब्दोमा चिह्नित अक्षरोनो परस्पर व्यत्यय- पूर्वापरभाव-धर नाय छे ते आपवामां आवे छे:- अचलपुरम् अलचपुरं। आलानः भाणालो करेणूः महाराष्ट्र मरहई। लघुकम् हलु [स] "उलाटम् गडाट [णलारं] वाराणसी वाणारसी। हरितार इलिआसे हरिआसे दही हिरो १ समासाद 'स' 'मुर' ने परले 'स' ८५ थाय है। समानी २.बी, हिरे-(५. पू. २२ रण) पा... पत्र) कणेरू।

अपनंग-श्रादेशी (२) नीचे नगांवत्रा शन्दोनां आनंश नाप्रमाणे : अन्यात ('अनादि (३)२) अन्नाइस केह। नह। हक देश (दि (१)म) कीटक कोरमा (जीदि (३)म) रहम। तारक तारमा ( नादि (१)म) यार राहा (नादि (हम) वन विपन भरनंभूनां उपरणी (१) अपना र इरादमा कोद कंद भारती साग के उमंग पर नाव :- दुनं (1'नं वागे) पारं गरं आमेला (ो दागे। १. (र' नी सारी) विधा कुना ( ) ! RASTER रे मारेको - प RECर संधि प्रकरण ८ १ प्राकृतमां जूदां जूढो ये 'पदोना बरोना संधि यायचे अने ते पण प्रयोगानुसारे विकल्प थाय छः- स्वरसंधि- अ+आ-मगह+अहिवई-मगहाहिवई, मगहीहवई [ मग- धाधिपतिः ] दंर+अहीसो दंडाहीसो, दण्डअहीसो [दण्डाशि] अ-आ-आ--विसम+आयवो-विसमायवो,विसमआयवो [विपमातपः] आ+अ आ-रमा अहीणो=रमाहीणो, रमाअहीणो [ रमाधीनः ] आ+आ-आ-रमा+आरामोरमारामो, रमाआरामो [ रमारामः) इ+३=ई -मुणि+इणो-मुणीणो, मुणिइगों [ मुनीनः ] इ+ई-ई-मुणि+ईसरो-मुणीसरो, मुणिइसरो [ मुनीश्वरः ] दहि ईसरो--दहीसरो, दहिईसरो [ दधीश्वरः] १ जे से पदोना स्वयमा सघि यबानो छे, ते पदो सामासिक होय के असामासिक होय अर्थात् कोई प्रकारे जूदा ज्या होवो जोहए, जेमके; सामासिक-दड+महीसो दाहीसो, ६अहो ! असामासिक-दंडस+ईसो-डरसेसो, दस ईसो । - प्राकृत साहित्यमा विमोपे करीने सामासिक पदोना स्वरोमा सधि यएलो जणाय छे अने असामाक्षिक पयोमा तो तेनो प्रयोग पणो ज विरल यएलो छे. असामासिक पदोमा मधि करवा जता ने ठेकाणे अर्थोष दुर्लभ यई जाय छे मारे ज असामासिक फरतां सामासिक पदोमा संधि-प्रयोगनो प्रचार यधु यएलो लागे अने ए अनुसारे ही उदाहरणोमा पण सामासिक पदोनी जनॉध विशेष करेली छे. कोई काणे तो फक एक ज पदमां पग संधि थएो छ:-- काहि+र-काही, काहि करिष्यति ] सिरिओ-पीओ विभो [ द्वितीयः) २ भो पालिया संधिकाल नि. ३-१०५८ इ-ई-पानी इहानी-मानीहालो, गगननी हट्टानो [प्रानगीतिहासः] ई-ई-मणी इमरो-मानसरो, गामनीरो माननः] उ+1=3-माशु उबझायो-भागूझायो, मागुनझायो [ नानगा यायः] मार मयं-भाजय, साउउय [ स्वादकम् ] 3-5 साल्वो, साहस्त्रो, नाउमो मानवः ] 3-5-8 रं-वहार, वहां [वदग्न् ] 3-3-कर्णनि कोकिंगजनि कोच्छिन] अर-पास इसी वासनी, बालली [ब्यानपिः] भार-रामा-इसरो, मानेजरो गमाइझरो [रामनरः अदरकार इसरो-बापरेसने, रईसरो । [वारेवरः] आर-विच्याईलो-दिल्यो, वियाईको विनितशः] उमे-जूद होगा, उमर [मूहोदरम्। +-ओ-रमा विभ-रमोवधिभरमाउपविभरिमोचितम् ] -ओ-सासमामा-मासोलासा, मा.सावासोच्छवासी आ+3=ओ-विमुलानि बिन्दुलेसुनिविःनिर्म विदुइष्टमित] इल-झर्व विधान- २ मामा मामालिक पदानां प्रयोगानुसारे (सांप निये भने क्यांप विकले) इस बानो दविल्वर यायले अनेदीव सरनी इन्त स्वर पाय :- १सो मानिन पि.नि.२३३ 12-2-गामीमामा-गामाहामा, मामला इहामी [ग्रामीतिहामः] ३५१-६- गामणीमगे-गामासरा, गामणीमरो (ग्रामणीश्वरः] 3+7=T-भाणु यमायो-भावमायो, माणुटयमायो [ भानुराध्यायः] अयं-माऊ.अयं, साउअयं [ ग्वादकम् ] उ+उ.-3-माह 3.सयो, साहमयो, साहुउमयो [ माचन्मयः ] +3-3- पर-यहअरं, यहां [यधुदग्म्] 3+3-3-कर्णन मिश्र-कणेरुसिभकर्णरुडासिकरेणूरिङ्गतम्] अ+३=-वास एसी-यामेसी, वासरसी [स्यामर्पिः] भा+द-ए-रामा इरो, मेरो गमाइअरो [ रामेतरः] अई-ए-पासर इसरो-वासोमरो, वासरईसरो [पासरेश्वरः ! आन-ए-विलया+ईमो-विटयेमो, विलपाईसो विनितेशः अ+उ-ओ-गृह+अर-गदोअरं, गूदउरं [गूढोदरम्] मा+उ-ओ-रमा+अवचिों-रमावविरमाउवपिरिमोपषितम् ] अ+3-ओ-सास+सामा-सासोसासा,साHS.HIसा, श्वासोच्छवासी) आ+3=ी-विग्नुला+मंमिश-विग्नुलोसंमिश्र,विभुलाउ.मुंमिश्र विद्युल्लसितम्] इव-दीर्घ विधान- २ प्राकृतमा सामासिकान्दोमा प्रयोगानुसारे लयाय नित्य अने क्याय विकल्ये) हम्य स्वरनो दीर्घ स्वर थाय छे अने दीर्घ स्वरनो इस्व स्थर पाय छेः १ नमो भाले प्र. संधि नि. २ पृ. ५० 'स्वरोप- १ सर पर रहेता पूर्ववती स्वरनो प्रयोगानुसारै लोप थाय : तिअस+ईसो-तिअसांसो [ त्रिदशेशः] नीसास+उसासा-नीसासूसासा [ निश्दवासोच्छ्वासौ ] ७ पदधी पर आवेला 'अपि' शब्दना नो लोप विकल्प थाय : केण+अवि-केणवि, फेणावि [ केनापि ]. कह+अपि-'कहपि, कहमति [कथमपि ] कि+भषि-कि पि, किमवि [किमपि] तं+अपि-तं पि, तमवि [ तदपि ] ८. स्वरात पदवी पर आवेला इति' शब्दना 'नो शोष पर 'ति' ने स्थाने ति' थाय छः तहा+इति-तहात्ति, तहति तथेति ] पिओ+इति-विभो ति, विउवि प्रिय इति] पुरिसो इति पुरिसोति, परिसुति [पुरुष इति] ९ व्यंजनात पदवी पर आवेला इति' शब्दना 'इ'नो लोपपाय छः कि+नि-किनि [ किमिति] *नि-नंति [ यदिति ] Pटं+इनि-दिहति [ दृष्टमिति] न ननं+इनि-न जति [न युमिति] १. ज्यदादि अने अव्यगयों पर आवेला यदादि अने भयपना आदि मानो प्राय. लोग थई नाय :- न्यदादि-पदादिः म+इमो-गममो [पोऽयम् ] 'यो पनि.नि. ().५५ । भी " २६१.८१

स्यदादि-अन्ययः अम्रे' पय अम्हेन्य [ययमत्र ]
अन्यय- अत्ययः नद पप नहाय [यपत्र
सत्यय-त्यदादिः नद अहं नई ययग
नद मा गरमा गर्दीयम्
व्यंजनगंधि
विसर्ग-ओ
११ अकारणी पर आयेला 'विमर्ग'नो ओ भाय:-
अग्रतः अगाओ।
अन्तः+वियम्भ: तोवीसंभो।
पुरतः पुरओ।
मन:शिलाचाणोमिला।
मार्गत:-मगओ।
सर्वतः सव्वओ।
मअनुस्वार
१२ पदने अंते रहेला मकारनो अनुम्बार थाय छे:-
गिरिम्-गिरि । जलम् जलं । फलम् फलं । वृक्षग-पर्छ ।
१३ स्वर पर रहेता अन्त्य 'म' नो अनुस्वार विकल्पे थाय' छः
उसमम् अनि-उसमें अनि,उसभमनिअं ऋषभमजितम्]
११ालिप्र. सं. नि. १-(ख) पृ. ६५-ते+महंतेहैं।
२ कोई ठेकाणे टयल 'मा'नी आदिमा रहेला 'म्'नो पण
मनुस्वार पंई आय 2. जेम-वम्मिवर्णमि (यने)
३ यो पालि प्र० सं० पृ० ७७-य+माहु-यमा (यदाः)
धन एवम्धनभेव।
प्रा. १३

अम, ण, नअनुस्वार १५ न्यंगन पर रहेतो '', 'म', 'ण' अने 'न' ने स्थाने भनुस्वार पाय: } = जुनै गिर्य, जुर्त पूर्ण -- रु-पक्ति-पंति-पंती । परामुख-परंमुह-परंमुहो। म-कन्नुक-कमुक-कंनुओ । लान्छन-लंग-लंगणं । ग-पण्मुरा=मुन-उंमुहो। उत्कण्ठा-उठा। म-विन्य-विश-विझो । सन्ध्या संशा । (१) शौरसेनीमा ' अने 'ए' पर रहेता अन्य 'म' पछी विरुको । ' उमेराय छः जुत्त इणं युक्तम् इदम् সুনাম सरिस इणं सहसम इदम् सरिमणिण, सरिसंपूर्ण। सरिसमिणं f+ एभं = किंणेदं फिमेद। किम एवं भं एसम्पनन् = एवं दं, एसमे। मे अनुस्वार आगम. १५ मीने नणावेला दोना अन्य यनननो मोष या यसर टसा अनुम्मार पाय छ नभा रह । श्यका हरय । तत्तंपर पिह। यत् में। पिक बीम। मध्यर मम्मं । मासा मा। जयी पा...नि. २.१.८..-14 भाग-int बीमियते। किम् एतत् .. - १६ नाचे नगाना दादोना प्रथम वर उपर, द्वितीय वर उपर भने तृतीय पर उपर प्रयोगानुमारे (यिकस्से के नित्ये) अनुम्बार पायः प्रथम म्यर उपर-अधु अंगु । पकोटः कसोटो । फुदमन्दम् कुंपलं । गुलम् छ । गृष्टिः गिटी, गिट्टी। व्ययम् तंसं। दर्शनम् दमणं । पुच्छम् । पर्नुः पम् । युमम् धं । मानौर: मनागे, मजारो। मूर्धा मुंदा । यकम्पकं । वृश्चिक:-विविभो । मधु मम् द्वितीय वर उपर-दह रहे [इहमेगेमि ] प्रतिध्रुत् पहुंमुभा । मनम्बी-मणमी । मनस्विनी मणमिणी । मनःशिला मणसिन्दा, मणासिला । ययस्यः पयंसो। तृतीय सर उपर-अतिमुत्तमम्-अणितयं, अइ{नयं, अइमुक्षयं। उपरि--अवरि । फोइ स्थळे मात्र छंदनी पुरवणी माटे पण अनुस्वार पाय छे: देवनागमुवन्नकिन्नरगणम्सटभअभावच्चिए- देवनागमुवन्नकिलरगणमसभअभावधिए। [ देवनागमुवर्णफिलरगणसद्भुतमावानित ] १७ ने स्थळे स्वरथी शरु यतुं पद देवडायुं होय त्यां बचे 'म' विकले उमेराय हैः एक एक एकमेकं, एकेक (एककम् ) एफएकेण एकमेकेण, एककण (एककेन) अंग+अंगम्मि अंगमंगम्मि, अंगभंगम्मि १ अङ्गभङ्के) इत्यादि। १ जनो पा. प्र. मं. नि० २८ पृ. ७८, नि० २४-०८१ १.भुगरनयना हेला लोफर्नु या वाण है-- जो पुरजरपरदोबड़े-(पनिकमा) - अनुनासिफविधान- १८ कर्ग, पवर्ग, टवर्ग, तार्ग अने पार्ग पर रहेता अनुसारने स्थाने अनुक्रमे ड, न, ण, न भने म विले पाय छ:' कार्ग- -भगणम् अंगणं, अगणं । परः पंको, पड़ो । गइनम् लाग, लणं । शहः संसो, सहो । मार्ग-कन्गुरु. कंगुभो, फन्दुओ। लान्छनम् संगणं, लछगं। अन्निनम् अंनिभ, अन्निभं । संध्या संशा, सम्मा गर्ग-काटकः कंटो, कण्टओ । उत्कण्ठा उठा, उफण्ठा । काम फाई, काण्डं। पक्षः संमे, सगो। मार्ग- अन्तरम् अंतरं, अन्तरं । पन्यः पयो, पन्यो । गन्द, मो, गन्दो । मागत. मंगो, पन्धयो । पग-कणो कंप३, कपर, या काहनि) कदमः कलंबो, कन्दम्यो । भारम्भः आरभी, आरम्भो। 'भनुम्मार' लोप १०. नाग नगांवला राम्दीमा प्रयोगानुमारे ( विकलो के निर) अनुमान हो पाय वित्तीमा fन वीमा । मंटनम-मा। मनार-मांग। यादि। - 12ी शशि पत1,411 निमोनितो. ४

कथम् कद्द, कह।
कांस्यन् कासं, कंस।
किंकि, किं।
किंगुकम् केमुअं, किंमुळे
दाणि दागि, दाणि [इदानीम् ]
नूनं नूग, नणं ।
परिः पांम, पंसू ।
मांसलम् मासलं, मंसलं ।
मांसम् मासं, मंसं,
संमुखम् समुहं, संमुहं ।
सिंह:--सीहो, सिंयो।
इत्यादि।
.
-.

प्रकरण ९
उपसर्ग-अव्यय निपात
उषसग्गा-
-परवेइ (प्ररूपयति) पभासेइ (प्रभाषते)
परा-परा---पराधाओ (पराधातः) परामिणइ (परानयने)
मो, भन-अप-- ओसरह, अवसरह (अपसरति)
ओसरिअं, अवसरिभ (अपसतम्)
-सम्-संखिया (संक्षिपति) संलितं (संक्षिप्तम्)
भय, अनु-अनु-अणुमाणइ (अनुमानाति) अनुमई (अनुमतिः)
मो, आ-अल --ओभरह (अवतरति) ओआरो ( अवतारः)
ओआसो, अवयामो (अकाशः)
भो, नि, नी-नि-ओमलं, निम्मषं (निर्माल्यम् )
निग्गभो (निर्गतः) नीसहो (निम्सहः)
इ-दुर-दुन्नयो (दुर्नयः) दूह्यो (दुर्भगः)
भनि, महि-अमि-अमिहणा (अमिहन्ति) अहिपाओ (अभिप्रायः)
वि-H-दिना(
मिति )विणओ (विनयः) घेणइभा (वैनविकी)
भधि, अहि-अवि-अम्झायो (अध्यायः ) अहीर (अधीने)
मू--मुकर (मुकरम् ) मूहको (सुभगः)
उ-उन-उणया (उद्गग्यति) उपभो ( उद्गतः) उप.
निभा (भोयरिकी)
भा, अति-अनि-आंधी (भी) वकता (ध्यानकातः)
अतिमो (अतिनग ) मगन्नं (अन्यन्तम्)
गि, नि-न-नियमो (निस) सनियमो (मंनिश ) निति.
मद (नितिशत)
Imam's Tian, निमो भोगन.

पडि, पति, परि-प्रति-पडिमा (प्रतिमा), पतिट्टा (प्रतिष्ठा ) परिहा (प्रतिष्टा) परि, पलि-परि-परिवुडो (परिवृतः) पलिहो (परिधः) इ, पि, वि, अपि अवि-अपि-~~-पिहेइ (पिदयाति) पिहिता (पिघाय) किंपि, किमवि, किमपि (किमपि) कोद, कोवि (कोऽपि) ऊ, ओ, उव-उप-आयो, ओझायो, उवझायो (उपाध्याय) आ-आ-आवासो (आवास:) आयतो (आचान्तः). धात्वर्थ बापते कश्चित् कश्चित् तमनुवर्तते । तमेव विशिष्ट्यन्योऽनर्थकोऽन्यः प्रयुज्यते ।। अत्वयाई (अन्ययानि) अहो, हहो, हा, हे, नाम, अहह, हीसि,अहह अने अरिरिहो विगेरे अनेक अन्ययो के अने ते वधानो प्रयोग संस्कृतनी पेठे प्राकृ- तमा पण थाय छे. तो पण अहीं नीचे केटलाक विशेप अध्ययोनी नोध करीए डीए:- अति अतिशय. अइ अयि संभावना. भईव अतीव विशेष. अओ अनः आधी, एथी. अरह अकृत्वा नहि करीने. ग्गओ अग्रतः आगळथी. अगे अग्रे आधे, आगळ. अंग अङ्ग संत्रोधन. आन. , पात. 'स्या' धातुनो पूर्वना ज 'प्रति'नो 'कोर' थाय से. - .

निषेध. अन्योन्य. विपरीत. आतरा विना. -अण (नम्) अण्णमणं अण्णहा अणंतरं अतीय अत्यं अस्थि अत्यु अदु अदुवा अदुव अद्धा अंतरं अंतो अन्हा अन अन्योऽन्यम् अन्यथा अनन्तरम् अतीव अस्तम् अस्ति अस्तु अदर्शन, आयम. सत्तासूचक. विधिसूचक, निषेधसूचक अदः अथवा पक्षांतर. समय. आंतरूं. अद्धा अन्तरम् अन्तर् अन्यथा अंदर, पञ्चे. विपरीत अन्नु (अप०) अन्यथा अन्नह अप्पणो अपरनु अध्व अभिनख अमितो अम्मो अम्महे (शो०) आत्मनः अपरेघुः अप्येवम् সাং अमितः आपणे जाते-पोते. परमदिवसे. संशय. वारंवार. चारे यानु. आश्चर्य. 'एं है है 'हर्नु सूचना संभाषण. अरे एकदा एक वरखन. एकाआ एकदआ एकया एकमरि एकमृतम् ।) मंप्रति. एकामि। एकवार. दाम एक वक्षन. इम मि (अप०)एकमः एमामि "कदा एकामि इक्कासि एगइआ एकदा एगया एगया एकरनः एगनतो एकान्ततः एगझं एकत्यम् पतावना पतावना एक वचन. एक एक. एक नरफी. एकप्रकार. } एयाया। पत्य अत्र अही. एन्य एत्यु एत्तहे ( अप० )भत्र एतहे (अप०) नः . आथी, एथी, वाक्यारंभ. एवं नकी, न प्रमाणे. व्येव' (गा) 'गोय. s८ नि: १३ या+एक: वा यंद। रेनु एजेनु वेय। नपरन पर। से + एपने या नि (अप०) न "तामु नि" तेनो न. एम, एप्रमाणे. एवम् " एवं एम्ब (अर०) एवमेव एमेव एम्वद (अप०) एवमेव " एमन. " " " अयि संभावना. सूचना, पश्चात्ताप. क्यांयी. कुनः " ओ कओ कर कहनिहु कत्यह कल कुत्रनिन् कल्यम् कथम् कोइ ठेकाणे. काले. केम, केवी रीते. कह। कहं । केम, केव) " किप, फिम्ब किह, फिर )(अप०) कहि । कुत्र नया. कहि । " कालतः केत्यु (अप०) कालो काहे कि विनि गिनिन् कहिं (1) काले करीने, ववते. क्यारे. प्रश्न, गही, काई.

अरे . अनि । अद) निकलह मामी निपेय पुग्तुं. अलंहि नियामक निय. अन्नाहि अम्म अवमें अवम । अवी अनो ।'अप) अवदान " अवश्यम उपरि सूचना, प्रधानाप. मंभाषण, निम्मर.मनाप, आदर. भय, अगरग्वेद, दु.ख, आनंद. अनकनार. आरंभ. नीन. अमहत अमई अह अय अचम्नान अहब (अर०) अथवा पलांतर. अह्न । अर्थवा যখt अदा अह अहा अषः अही आम नीन. ओहो (आश्चर्य, म्चीकार. आम अवि आहन आहत्य आहानाहा(अ) पहिग्याहिरे ३ कान्कार আবাসা, पादरग्क. आयी. एग, वाक्याम. इनः संप्रति. इकमरिक इत्य इञ्चत्यो उपाणि पम्नहि अप०) रा एक.मृतम् (१) इत्यत्वम् इत्यर्थः इदानीम प.प्रकारे. पअयं. हमणां. " इह निश्चय. अही. सत्य. " प्रधा शरुत इस्था किम् गन् अन्यथा. प्रश्न, गही. नि उ तु उन उपदम (१०) उत्तिष्ठविश उनामा उत्तरता उनाम उतरच. उद उत उटा उदाही परि ता. पश्य-जो. उठनेश. उत्तरथी, उतरमा. आवती काल पड़ी. विकल्प, अपि. उप. . 7 गही निम्मय, ममना. पान T ण मंसी) ननु वाक्यालंकार. वितर्क नमस्कार. केवन्द अनंतर. नमः . णवर वरि वरं पनि विशेष. नवम्म विपरीनना, निषेध. नेव () जाइ णाई গা णिज नाना निन्यम् नृनन् जलुनढुं. नित्य, नकी. तर्क, " निषेध. तत् नद्यथा वाक्यारंभ, ते. नेमके. त्य रे, न्यारपछी. तथी. तदा ततः गुण पण जो नं नंजहा नए नमा नता नता नणेण (अ१०) तन्य ततह (अप०) नपमिद नह नहा तादथ्यमृचन. सां. तेमां. नत्र " " লম্বন नथा न्यारथी नम, तवी गंत } ११० जगि (अप०) जाण्ये, 'स्व'नुं सूचन. (अ) यत्र ज्यां-जेमां. ज्यां-जेमा. यत्र जा. यदि यदि यथा जत्य नेत्यु जत्तु । (अप०) मति जदि जह जहा जेम, जेम्ब, निम, निम्ब, (अप०) निह, निध नहेब जं नेम, गैरीने. " यथैव यन् यावत् जे, के. ज्यामुधी. " " नाम जाउं नामहिं )(अप०) जावजीव तुअनुभ नेश जे मगिति मति जे तरफ. यावजीवम् जीवना सुधी. युतंयुतम् (1) पृथस्थर-जलूजन येन पादपूरक, मप्रनि. झटिति शीघ्र-झट. निषेध अवधारणा ण न नई दिया दुरी चन्न कानुयी. चन्न गन.२ मांग, दुहा दे संमुखीकरण, मंत्रोधन. बाद. বৃষ্টি ध्रुवम् धृत, नोपय. धुवं ध्रुव (अप . न निष. गृ० नो. नाग्य, • व अनु सूचन. जायते (1) हिं० नांट. नी. नउ (7) नाद नावट नं नन्यि नहि नाहि (अप) निनं नृन লাল नहि निषेध. " नित्यम नुनम निन्य. विनक. नृनं नव नव ना नहि न. निषेध. অন্দন पनुभ पञ्चलिर (अ० ) पंग अंग प्रातःकाले.. पश्चाद पठी. .... . पच्छर ( अप०) प्रतिरूपम् म. पडिम्वं (पं)) पतिरुवं (पं) पटिरूवं ( परेयुः परम् परम दिवसे. परंतु. " पराइमुम्वम् परश्वः परितः परामुम्ब, विमुख. आवता परम दिवसे. नारे नाजु. परम्परम् परम्पर. (अप०) परन पर पर ( अप०) परंमुहं परसवे परितो परोप्परं परप्परं अवरोप्परं अवरुप्पर पमरह पादिक पाडिएका पातो पायो पाओ प्राउ प्राइव (अप०) प्राइव पम्गिम्ब पिन प्रत्येकम् हटात्. एकएक. " " प्रातः सबारे. प्रायः प्रायः, पणुं करीने. " " FREEEEE सरनु, नेबु. अपि+क्ष अपि पुनः पण. करीने. वली. पुण

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प्रनिरूपम् मा पडितं () पनिर (पं) पटिरवं (पं) परजु परेयुः परम् परम दिपमे. परंतु. " पर पर ( अप०) परंमुहं परसवे परितो पराइममम् परथः परितः पगमग. विमुग्न. आवता परम दिवमे. मारे बानु. परोप्परं परम्परम् परम्पर. (अप०) " परुप्परं । শুৰীণ अवरुप्परं पमह पाडिकं । पाडिएक पातो पायो प्रमा प्रत्येक हटात. एकएक. " प्रातः सवारे. पाओ प्रायः प्रायः, पणुं करीने. (अप०) " पाउ प्राइव प्राइम्ब पग्गिव पित पि पुण अपिस सरगुं, नेवु. पण. फरीने. वळी. पुनः न.की. (२०) कंगन, बी. भगन ELEEEEEEEE न सम्मान तोना ताना. सरः पर. निर्माण-नटी काट निधय. पहिला परिया बाहिरी बहिर :: भूयः भाः मागतः फगने. आमंत्रण. मग या९. मगाई (अल मंग मन माऽनि मामि विमो. निषेत्र. सीन मंचावन. जब मार मुना वाद.

प्रतिरूपम् मा. पडिम्वं पतिम्वं (पं) पटिरूवं (पं) परज्जु परं पर ( अप०) परंमुहं परसवे परितो परेयुः परम् परम दिवसे. परंतु. " " पराइमबम् परश्वः परितः पगमख. विमुम्ब. आवता परम दिवमे. नारे बाज. परोप्परं । परम्पर. " " हटात्. परम्परम् परप्परं । अवरोप्परं । (अप.) अवरप्पर पमण्ड प्रमा प्रत्येकम् पाडिग पानो प्रातः বাসা पाना प्रागः एफएक. " " मबारे. प्राय , यणु कर्गने. (प्रा.) " दाव प्रादन पग्गिन ति नि मामु, ने. अपि+क्ष अनि पुनः पण. फर्गन. पी.

पुगतं .: तकरण. पुनः फरीन, वटी. प्रय (अर०) पुगवि पुनरपि फरीपग, कळीपण. आगळ. पुग्न्या पुग्नः सुरवात पुग ध्यक् पहेलो, भनकाल. मिहं पंच प्रेन्य पग्लीक. निवारण-नटी काबु. निश्चय. बहिदा बहिया बहि बहिवा वहार. बहिः भुट्टो ." मगता मृयः माः मार्गनः फरीन. आमंत्रण. मगा (अप) मनार पाट. यामु. माई नानि मन শনি विमो. निव. सम्बीन मंत्रोचन. मित्र नमा मा बु. मोटुं.

१४ प्रतिम पम् मरखें. पडिस्नं (प.) पतिरुवं (पं) पटिरुवं (पं) परम दिवसे. परेद्युः परम् परंतु, " " परज्नु परं पर ( अप०) परंमुहं परसते परितो पराइमुवम् परश्वः परितः पराङ्मुख, विमुम्ब. आवता परम दिवमे. नारे बानु. परोप्परं । परम्परम् परम्पर परुप्पर अवगप्परं (अर०) " अवरूप्पर " पमह पाटिकं । प्रसध प्रत्येकम् हटात्. एकएक.. " " प्रातः समो. प्रागः प्रायः, पणुं करीने. पाडिएक पानो पायो पाओ प्रार मारन प्रादन पगिन शित नि पूण (प.) " मानु, ने. अपिस अपि पुनः पण. करीन. कही.

पुनः
अर्गन, बढी.
2
لی
गंग कटीप
हलं. इतकद
हं
नई
नियंग-नटी का
FE. He le k TETREE: HE
EEEEEE :
Krit... TE
..

ममा मृपा वारंवार. सोई. निषेध " म (भा.) मोग्रता मोमा 7 . ही मुधा. फोकट. गृपा अने. गई फाले. पादपूरक. गुप्ता संभाषण रति+इ=रे रतिकला. नादयंगमन, शीम. ना शिम्प, ने. रे गम, रेगि (भा.) " १ ना वरे अनुकंपा निधय, निम, मंभावना. परिल ( अ ) शापम् परमिट पोलं. रिम्प, मे अति पण. मे. FO( प्रा.) " पनि .

. मत निश्चय. आमंत्रण. भय. वागण. विवाद, आमंत्रग. मदा मनग्न एकवार. प्रत्यक्ष. शीर. माथ. बराबर माम " मत मासान मद्यः शनः माधम् माक्षम् सप्रतिदिन ममम् ममानम् मन्य स्वयम् मदा सर्वनः सर्वत्र राणियं मार्टि मपकिन मपटिदिमि मम ममाणु (अप) ពុជុំ मयं মুম্বা मत्व माय. . ठीक. सा. जाते. पान. सदा धे, संधी चे. मह साये. मबन्य मवचहे, (अप) मह सह (अप०) मदसा माय सहसा सायम् अविमर्श, शीय त्वरा. संध्या, मान, गदान. मिय (अ) म्यान . नपर ही. पागो गागन 4. भारपाका 177m. Amar jre नामा सम्म नाम गामुनि ग गरर पा मातीमा INT तगा Aणा Prant (क) पन. मित्र पनीर सिद्धि पी. विरा गनु नियम निटानम् पर पदों पर: मम: पघातग्णा যথা पान. पणाना पली कपाम. *परिमिली। प्रनिम्पर्धा पाहिसिनी निमोगे हिमोर. बालो महिमा भर्तृत विष्णु. भानिमानीरारा गो माग सम्बोसाये ममानता धगरे हे. " " འ

।
नी
बहिदा
भवानी
मथुन, बहि.
उहानि
मानवनीनी छट.
विनो
वामिन
वन्दलो
वटुर
दी
व्युन्मनः
युनननन
व.
अपनगमा भावना केटाक निशाना-
देय मन्दी
कंह
नंदु
बीटा
राशि
भाकद दददद

१२१
नवरु
नवव
ना. न. हि. अनोगा
नालिस
म
निवह
(नित्यम्ग-निचट्ठ) गाद.
ममीम
मा नीश-मयन पान.
रवण्ण
रमण
वट
(वट !)
विद्याल
वटाळ, वटलाई.
अमाधारण.
(हे आले!) हे समी.
आ उपरात बीना पण देश्यप्राकृत शब्दो छे अने ने अनेक
छ. ते माटेनी विशेष माहिती, हेमचंद्रन देशीनाममाया' ने
जोगायी मळी शके तेम . आवा केटलाक शब्दो षट्मापानंदिका'
मां पण नापाएला छे.
१ आ गन्दनो गिर पंध स. रिक्त परिवा मागे
र राके. पदया, पररातु अने वटाई पनी उत्पनि एक
साम्दीगगे के.

नाम प्रकरण १०
व्यं-
नामना प्रभारी
मंस्कृत भाषामां नामोना वे विभाग नेमके-वरांन नाम
अने व्यंगनांन नाम. पण प्राकृतमायामां तेम नथी. कारण के,
मनांत नाममात्र कोड़ गते स्वरांत यया मिवाय पाहतसापामां
प्रयोनातुं ज नथी, एयी प्राकृतमां वां नामो स्वरांन होय , माटे
प्राकृत नामानी विमाग आ प्रमाण है।
अकारांन, आतगंन. इकागंन. ईकारांत: उकारांत, जकारांत.
एकारांत अने ओकागंत. [ मंस्कृत ऋकारांन नामो प्रारतमा नपा-
म्यानने प्रसंग अकारांत, आकारांन, एकारांत के उकारांत यनां
हावार्या एन उपग्नी गणत्रीमा नदां गण्यां नथी.]
नामना अन्न्यस्वरना फेरफार.
१ ग्रामणी,' खलः एन प्रकारना बीना अनेक शब्दो
(सेनानी, मुघी; कारभ, कटपू वगैरे ) नो अन्न्य स्वर स्पान्यानने
प्रमंग इन्त्र याय छे.
२ नान्यतानातिमां वपरानां नामोनो अन्त्य दार म्बर
हस्व दाय छे.
नामनी जातिश्री
प्राकृत नामानी नातिओ संस्कृत नामानी नेवी छे. विशेषता
छेते आ प्रमाणे :
५ नकारांत अने मकागंत नामो प्राकृतमा नगमानिनां गाय .
२ नगि, मावृष्ट बने मन ए वग नामा ग्राहनमा नरनानिमः
रहे छे.

३ नेत्रवाना शन्दी नेनी साम नाति उपरांत नग्नानिमां पर पररायचे. ४ वमन, विद्युत्, मुल, छन्दम् माराम्य, दुग अने मानन को सदा पोत पानानी माम नानि उपरान नरनानिमा पा रहे थे, ५ गुण, देश. विंदु, गद्ग, मण्डलाम, करह अने वृक्ष वगैरे शब्दो पोतानी नातिन उपगंन नान्यतरनानिमा पण वागय छे. ६ गरिमन, महिमन् वगेरे इमन् ' छेडावाला नामोने अने पीगिमा (पीनन्य), पुष्किमा (पुत्र) वगरे • इमा डावाटो नामोने तेओनी गाम जाति उपरान नारीनातिमा पग समनवाना छे. ७ अमलि, पृष्ठ, अति, प्रश्न, मार्य, कुक्षि, बलि, निधि, विधि. रश्मि अने प्रन्धि वगेरे नामो पोन पोनानी नानि उपरात नारी- जानिमा पण वराय छे. वचन -विभक्तिो .१ गुमरातीनी पेठे प्राकृतमा द्विवनननो प्रयोग न नथी, तेने नदले मत्र बहुवननधी काम नलावाय अने - द्वित्व अर्थनी विशेष स्पष्टता माटे बहुवचनात नामनी साये तेना विशेषणरूप विभकन्यत द्वि' शब्दनो व्यवहार याय छे. २ चतुर्थी अने पष्ठी ए पन्ने विभक्तिना प्रत्ययो एक मरखा होवाथी चतुर्थी विभक्ति, पष्ठी विभक्तिमा समाई जाय छे नो पण कोइ म्थळे अर्थविशेषमा नाममाग्नु भतुर्थीन एकवचन संस्कृतनी जेवू पण यतुं होताथी ए नन्ने विभक्तिओने दी दी गणावेली छे एयी विभत्तिोनी संख्यामा प्राकृत अने संस्कृतनी समानता छ. .

. प्रन्यया नीचे नाव प्रन्ययो नानातिना अने नान्यनग्नानिनादरक शासन नामाकी योनी काय. माकुन भाषाना मत्ययो विभरि पवयनन. वापनन. पत्रमा ग ज हि, हिंहि नकी . राही पंचमी तो. श्री, उ.हि. मो, ओ, उ.हि. हिनी, मुंनी. मत्तमा मि, म्मि, संबोहण ( मनोधन) आ } हिनी.. ० . शॉरमनी. मागधी, पेशानी अने अपभ्रंशमा प्रायोनी विशे. पना मा प्रमाणे शौरसेनी पंचमी दो, दु. मागधी ० पउभी छडी । है .........- पमाची तो, तु. पंचमी अपभ्रंश .. .. परमा गांभा महा पउली ण, म् हिं. - मु, मु, हो, ० पंचमी मतमी གiཀ हिं. हो.. बा- माकुन प्रत्ययान मगना नियमा ज्या ज्या प्रातप्रत्ययोमा न्या आ प्रमाण मनमान. पामा--निंगी प्रत्येक भागत नामनु प्रपमान एकामान ओरा. मत पायो, भने बचपन आकागत थायणे. -मी का नामनु दिनांगानुं बहुत भाग भने पशागत वाय. परी-मात्र नागने मनमा माटे आगत नामनुं गोची, कान माननी पण गाय. मात्र एका सली मादणं अगंमा मानना • आग 'प्रत्यावी कागती • मा 'यय पण मागेमात्रामा नोकर ग. आभार बजे • आर.' प्रया का पाग प्रयन Ft.

,
--
पंचमी-अकागंत नामनु पंचमीन मकवचन आकागंन पण थाय के.
मचमी-अकागंत नामर्नु माना एकवचन एकागंन पण याय के.
मोहण-मुलिंगी अकागंत नामर्नु संत्रायननु एकवचन आकारांन
ने ओकागंन याय के नया वयनमा विभति
विनानु र कागंत नाम पर वाय अने मंत्रोधननां
बहुवचननां को प्रथमा (परमा )नी जेवा पाय .
अन्ययो लागनां नामना पुन अंगमां यना फेन्फागे
नव्या-तृतीया विमतिना प्रन्ययों पर हेली कागंन नामना
अन्य मनोरथाय.
पंचमी-पंचमीना एकवचनी पुर्वना अनार्गन नामना अन्य
अनी • आ' थाय छ भने बहुवचनना स्वरादि
प्रत्ययों पर रहना पण अन्य अ'नो 'आ' यार छ,
पंचाना बहुवचनना 'म' अने ही शान या प्रत्ययो
पर हितां अकागंन नामना अन्य अ' ना 'आ' अने
•याय छे.
नहया
नृतीयाना पकवचनना '' उपर अंन पष्टीना
खट्टी
मत्ती
नया मीना बहवनन उपर अनुसार विश्य थाय .
अट्टी-ट्टीना बहुवचन्नी प्रत्यय पर हितां पूर्वना नामनो कोद
पण अन्य खादा भाय ,
मी मर्माना पकवाना मि प्रत्यय सागतां मुल अंगना
दटनामा पर अनुदार साय छ. आ.मि प्रन्ययवाई
का विशेष करीने 'आर्पाहतमा दरग छ.
! "पावती ममावती गम-आ..
गाम परमदंकी

१२८ सप्तर्माना बहुवचननो प्रत्यय पर रहेना अकागंन नामना अन्त्य : अ'नो'ए'वाय छे. शौरसेनी-प्रत्ययने लगता नियमो पंचमी-प्राकृतमां पंचमीना एकवचनना प्रत्ययो लागतां मूळ अंगनो जे फेरफार जणाव्यो छे ते शौरसेनीमा पण लागु थाय छे. बाकी बघा शोरमेनीनां रूपान्यानो प्राकृतनी प्रमाणे छे. मागधी-प्रत्ययने लगता नियमो पदमा–ज्यां शून्य छे त्यां मागधीमां पुंलिंगी अकारांत, नामर्नु प्रथमानुं अने संबोधननु एकवनन 'एकारान' थाय छे. माग- धीन आ एकारांत रूप आपप्राकृतमा पण वपराएलं छे अने आ एक ज रूपनी वपराशने लीधे ए आपप्राकृतन पण • अर्धमागधी ' तरीके सणाववामा आवेलुं छे.' नउत्थी। मागधर्धामा चोथी अने छठ्ठी विभक्तिमां अकारांत के छट्टी आकारात नामथी एकवचनमा 'ह' अने बहुवचनमा हैं' प्रत्यय विकल्प लागे थे अने ते ने प्रत्ययो लागता पूर्वना म्वरनो दीर्घ थाय छे. नाकीनां बधा मागधी रूपो शौरसेनी प्रमाणे समनी लेवाना छे. उपर जणावेलो बहुवचननो ' है ' प्रत्यय प्राकृतमा पण वापरी शाय छे. पैशाची-प्रत्ययने लगता नियमो पंचमी-शोरमेनीमां पंचमीना एकवचनमां ने फेरफार जणाव्यो के ते पैशाचीमा पण समनवानो के. नाकी मघा पेशामीना x रूपान्यानो शौरसेनी प्रमाणे समजवाना छे. १ जो ३० प्रा० न्या. अ.८, पा. ४, सू० २८. . x x

अपभ्रंस-प्रन्ययने लगता नियमो
पदमा । ज्यां शून्य छे त्यां अपभ्रंशमां प्रथमा अने द्वितीया
बीआ विमत्तिमा ( एकवचन अने बहुवचनमां ) अकारांत नाम
आकारांत यइने वपराय छे अने एमने एम पण वपराय
छे. तया प्रथमाना एकवचनमां पुंलिंगी अकारांत नाम
प्राकृतनी पेठे ओकारांत थड़ने पण वगय हे.
उत्यी। न्या अन्य छे त्यां मृळ अंग मनुं नम वपगय
छट्टी छे अने दीर्धान थड़ने पण वपराय छे.
सत्तमी-ज्या मृन्य छे न्यां मूळ अंग कागंन अने एकारांत थइने
वपरायले.
संबोण-ज्यां शून्य छे न्यां मंत्रीधननां क्या रूपान्यानो प्रथमा
विभक्ति वा समनवानां छे.
अपभ्रंश-प्रत्यय लागनां अंगमां यता फेरफारी
तइया-तृतीया विभक्तिना प्राकृत प्रत्ययो लागनां मूळ अंगमां के
प्रत्ययोमा जे फेफार थाय छे ने न फेरफार अपत्रंशना ए
प्रत्ययो लागनां पण समनवानो छे अने ए टपरांत तृतीयाना
बहुवचनना प्रत्यय लागतां मृळ अंग आकागंत थाय
अने एमनु एम पण वपराय छे.
वउत्यो । चोयी
पांचमी अंने उट्टी विमक्तिना एकवचनना
अने बहुवचनना प्रत्यया लागतां मूळ अंगना अंन्यस्वरनो
दीर्य विकल्प याय छे तथा मातमीना बहुवचननो
प्रत्यय लागतां पण मूळ अंगमा पूर्वात फेरफार थाय छे.
हिण-अपभ्रंशन (एकवचन अने बहुवचन ) संवोधनी रुप
प्रथमानी पेठे समनदानुं छे अने बहुवचननी 'हो' प्रत्यय
लागतां मुळ अंगना अन्य स्वानो दी विकल्प थाय .
के
चमी
झी
उनी

पुलिंग अने नपुंसकलिंग अकारांत शब्दनां प्राकृत रूपाख्यानो (लिंग-नरजाति) वीर' एकव० वहुव० वीरो, (वीरे) वी. 'वीरं वीरे, वीरा. वीरेण, वीरेणं वीरेहि, वीरेहि, वीरेहि. च००० वीरस्म वीराण,वीराण,(वीराह.) ता० च० वीराय, वीरम्स प. वीरा. त० " " १ , ५ 'घोर'नां पालिरूपो वीरो दौरा ( वीरसे). ૨ वीर वीरे, ३ बीरेन वीरेहि, वीरेभि. वराय, वीरानं. वीरस्म बीग, वीरस्मा, वारहि, वीरोभ. वीरमहा बीरस्म वीरान वीरे, वांगम्मि, वी ८ स. बीर, वांग वांग. जुमा पालिए नामकल अकागत 'बुद्ध गब्द भने ते म्पो उपरना रिमो. ()आ निगानमा आपला रुपो सालिक ३ वीर+ म - वार (नो प्राण ८, म - ६ ७ वारेमु. मनुस्मार-१२) -

ग.ग.
नगः
सागतिकी.
बागमनमुनी
नारा
.
.
.
दनी नाम
( अ ) शब्दना पा
ममनी वा विपना प्रमाणे.
ना पहाय. पहाट. वहम्म (वयरन ।
आपनमा ने गदने ना० अनुभीनो मना • आए.'
अन्यय लागली नन मप आ प्रमाण ।
ना २० मार-मांवनाए,' मानवाय. मोलम्म एकवचन)
हिश्रय-हिअयाए' हिअयाय, हिमयम्म
..
११ मा २. दोकाया-'.
श्री प्रकरण 4. मभनुन्धार...(पिन)
भो बहनांगमय : श्र... गाः-
"उस नियामिना शाखा" लाटि.
८ श्री भाचागंगा ...... मिः
अभी जिना यानि, गनिमा
पिलादि

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. ३ वीर (अपभ्रंगमा) एक्व० वहुव० 'वीरु. वीगे, वीर, वीग. चीर. वीरा वीरु, वीर, वीरा. वारा, वीरण, वीरेणं, वीरेहि, बीगहि, वीरहिं. वीरम्म, बीगम, वीगह. वीरह, वीरसु बोर, वीग. वीराहो. वीरहो. वीर. वीरा वागडु, वीरहु, वीराहुं, वीरहुं. वीराहे, वाह वीरि, धीरे वीगाह, वीरहिं. (40) वीर : वारी! वागहो! बीरहो! चीर : नीरा ! वीर : वारा! 'वीर शदनां उपर नणावलां थी जाननां रूपो प्रमाणे प्रत्येक पुंलिंगी अकारांत शब्दना शौरसेनी रूपो, मागधीरूपो, पशाची रूपी अंने अपनेशन्पो समनी लेवानां छ. -- अकागंत गन्दना माकुन रूपान्यानो (नपुंसकलिंग- नान्यनरजाति) कागंन नमक नामांना कधी नानना स्पान्यानो बनाववानी मपली प्रक्रिया उपर प्रमाण छे. कांड मास भई ते आ प्रमाणे छ: १ वीर+Tr-प्रो बन्लोर-६१.६.

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गुदा (कुन्द्रक)
कुटाई, युल.
"
-
बाकी बधा सपो वीर 'ना अपभ्रंश स्पोनी पेटे ममनी
देवानां ,
-
अकारांत-सर्वादि-शब्द
ननिना शब्दोंने • मर्यादि' तरीके गणवामां आवे छः
सत्व-अप० साहु, सव्व (सर्व), वीस ( विश्व ), उह, उभ (उभ),
अवह, वह, उभय (उभय), अण्ण, अन्न (अन्य), अण्ण (न) यर
(अन्यतर), अर (इतर), कयर (कतर), कदम (कतम), णेम, नेम
(नेम), सम, सिम, परिम, पुल्च (पूर्व ) अवर (अपर), दाहिण,
दनिषण (दक्षिण), उधर, अवर. अहर (अधर), स,मुव (स्व),
अंतर, ते (तत्), ज ( यद् ) अमु ( अदस् ), इम (इदम् ), एत
१ कुलअ + = कुलडं-थो बरटोप-६ पृ० ९६.
२ उपह' रूप आ० हेमचंद्रने
मत नयीहे. प्रा.
८-२-१३८ पृ. ६५. आमाकृतमा 'उभयोकालं ' प्रयोगमा उभय
ने बदले 'उभयो' के 'उभयो ("उमभोकालं पि अजिअसतिथय"--
अनितांतिस्तवन गाय ३१) र नवपराएलं है.
३ जूश्री १०८७ शब्द-सर्वथा रिकार.
४ जेम संस्कृतमा 'तद्नी जेचं 'त्य ' पण एक सर्वनाम के
तेम ए सर्वनाम गालिमा पाछे, एनां रूपांत'नी जेयां थाय है।
.
..
न्य
त्ये -पालिम०पू०१४३ नु है
टिप्पण, प्राकनमा तो आ 'त्यं सर्वनाम मन नथी.
५ आ गदनां म्पो उकारांत दोना प्रसंग आवनारा.

रूपाख्यानो १ 'कुलु, कुल, कुला कुलाई, फुलई. २ " " " म.ट.ए. मातो म.ए. मनमि म.5.ए. मनसो म. ए. मणसि (मनमः) (ममि) कम्म ( कर्मन्) पानि आपत्रा. .. कम्मना, पम्मुना २. ए. पम्मा,कम्मका (कमगा) 4.5.1. कम्मनो म. छ. ए. कम्मुणो (क्रमशः) 4...मना, कामना ५. प. कम्मणा, कम्मुनो (मंगा) म.सम्मान म.ए.क.म्मान rrm "मामा, मगला मायाण शामि"-मुभिवादनमय. मजामि कर लिया गार" मारतकमामा-उदयननी (मांगे) "मला मोहोर कम्ममा होरपानी"-- जनगण्ययन प्र.७.गा. ३५. श्रा भनी मिनिमारेआम "M सपनपत मि' (.-.-.) रनमा. सामन्यांना पागिनी माता मा.सोमा अशा trent'नागे

कुल (कुलक)
कुलआई, कुलआई.
१
"
बाकी मांसपो । वीर'नां अपभ्रंश स्पोनी पेठे समनी
लेवानां है,
-
अकारांत सर्वादि-गब्द
ननिना शब्दाने 'मादि' तरीके गणवामां आवे छः
मन्त्र-अप० माहु, सन्त्र ( सर्व ), वीस (विश्व ), उह, उभ (टभ),
अवह, उवह, उमय (उभय), अण्ण, अन्न (अन्य), अण्ण (न) यर
(अन्यतर), अर (इतर), कयर (कतर), कदम (कतम), गेम, नेम
(नम), सम, सिम, 'पुरिम, पुन (पूर्व) अवर (अपर), दाहिण,
दक्षिण (दक्षिण), उचर, अवर. अहर (अधर), मामुव (स्व),
अंतर, नं (तत्). ज ( यद्) अमु ( अदम् ), इम (इदम् ), एत
१ सुरक्ष+3 कुलट-ट्टओ दन्लोर-६ पृ० ९६.
२. उपरमर पास हमवंद्रनं मस्त नयी है. मा.
८-२-१३८ पृ. ६५. भाभानमा 'उमगोपालं' प्रयोगमा उमय
सदले • उमपो के 'उमा' ("उमयोका निभजिधर्मतिपयं"-
अन्तिशतिस्तपन गा० ३.) गएट है.
३ दो ८ द-या विचार,
र उनसनमा 'नद नो यु '' एक नाम है
तेन नामनि, पनी 'नो या पाप
2 -पाभिम १.१८३न नं.
Far.रमन ने का काम करत ना.
ना Fi सान मा.प.

(एतद् ), इक्क, एक, एग, एअ (एक), ई (द्वि) तुम्ह (युप्म), अम्ह ( अस्मद् )कि, अप० काई, कवण (किम् ), भवन्त ( मदतु). १ सर्वादि शब्दो विशेषणरूप होवायी प्रणे लिंगे वापरी शकाय छे. २ 'अमु' अने 'टु' शब्द सिवाय ए वघा सर्वादि शब्दो अकारांत छ, तेथी तेना बधी जातना वघां रूपाख्यानो पुंलिंगमा 'वीर' अने नपुंसकमा 'कुल' नी नेवां समनवानां छे. ज्यां ने विशेषता छे ते आ प्रमाणे छः ३ प्रथमाना बहुवचनमा सर्वादि शब्दोना अन्त्य 'अ'नो 'ए' थाय छे अने ए एक न रूप प्रथमाना बहुवचनमां वपराय छे. ४ सर्वादि शब्दोने उट्टीना बहुवचनमा । एसि' प्रत्यय विकल्प लागे छे. ५ मर्यादि शब्दोने सप्तमीना एकवचनमा 'त्य' 'मि' हिं' अने ‘म्मि' प्रत्यय लागे छे. रूपान्यानो (नरजाति) 'सन्च (प्राकृत) एकव० बहुव० प०-सम्बो (सन्चे) सवे. बी०-सव्वं मवे, सव्वा. १ सरन्यायानक शरदोना प्रकरणमा 'उम' अने 'दु'शब्दना पो आवशे. २ जूभोपु. १२१ भवतो। ३ सय ' शब्दना पालि रूपो माटे भो पृ० १३० उपरनु पर्छ टिपग. स्वाम भेद आहे. ९० तथा स. बहुव० मध्ये. सोस, सन्चेसान. ना पवमीना एक्यचनमा वीगनी पेठे 'सच्चा सने सप्तमोना ए. वचननां धीरे'मी पे 'कनेकर यहा नथी. छ. "

न-पयेण, मवेणं
1080पयर
पं.मान्यता.
मकाउ मन्यानो
मोहि. मोहि. सन्नेहि
मन्वेसि, मत्वाण, मन्याणं,
(मावाह).
मलतो.
पबाट मनाया
मल्लाहि. मवेहि.
मत्वाहितो, सन्वेहिनो
सन्दातो, मन्वेमतो.
मन्चेसु, सन्चेमुं.
मन्वाहि,
मत्वाहिलो.
-
म०-मन्वय, गम्मि, सम्वहिं.
मन्वम्मि
मच (गौरसेनी)
शारमेनीमां • सव' शब्दनां बयां रूपो मन्त्र 'नां प्राकृत
रूपो जवां छे. पंचमीना एकवचनमा विशेषता हे ते 'बार' ना
झारसनारूप प्रमाणे ममनवी.
शव्य (मागधी)
प्रथमाना एकवचनमा अने लट्टी विभक्तिमां शब' ना मागधी
सुपो वीरगना मागधी रूपो जेवां नाणवा अने वाकी धां सन्त्र'
नां शौरसेनी पो प्रमाणे समनवां,
, ओ पृ. १३२,
२. ओ पृ० १३२.

सच (पैमाची) पंचमार्नु एकवचन ' 'वीर' ना पशाचाम्प प्रमाणे अने बाकी बांसव ' नांदगारमेनी रूपो प्रमाणे, १ सम्वु, सवो. २ ३ सच, माह (अपभ्रंश) एकव० बहुव० सम्दे, मन्व, सन्या. सद, सत्रा सन्बु, मन्त्र, मन्व, सम्वा. सवा सम्वेण, सन्वेणं, सोहिं, मन्वाहि. सञ्चहि. सत्यम्सु. सव्वासु. सल्वेमि. सब्वमु. पव्वहं, सब्वाई. सबहो, सवाहो. मन्व, सव्वा. मत्व, सवा मवहा. सम्वाहा सबहु. मवा. सन्चाहिं, मन्वाहिं मञ्चहिं, मन्वाहिं. ६ ७ बाकी बीना बघा सर्वाटिओनां रूपो पण ए ' सत्य (प्राकृत, शौरमेनी ) पाव ( मागधी) अने सच ( अपभ्रश ) नी पेठे करी लेवाना है. तो पण केटलाक प्रसिद्ध प्रमित मर्यादिनां रूपो नीचे प्रमाणे आपीए छीएः १जी १३०. २ अपभ्रगमा 'मथ'ने म्याने साह पना रांगे 'मन' नां अपना योनी पेठे याय के. ब्द पण समयदे अने न. ( नन्) म, मो ( मा० । १ ३ ग.ग. निगा श (पं० नेन। १-६ नम्न. नाम (मार नाह) ते .. ने, ता, णा. नहि, नहिं, नहि. हि. हि. हि.. में नाम नमि, नाग तागं, जमि. जाग. पागं. मि ( मा० नाहं . ९ नो, नन्हा: नाओ. नाउ ततो. नतो. नाओ. नाउ. नाहि. नाहितो नाहि. नेहि. नाहिंनो, तेहितो. नानी. नेमुंनो. (गौ मा० नादी, नादु (पै० नातो. नातु) , केटनार पोगोने अनुम- ' दबढा, ' केः प्रायाः ८-:-:-..'. नागिन्तीम ओ पालियः-१४ ते (नद ) आमेटी में १४२ णतो. पत्तो, णाओ, पाउ, गाओ. णार, माहि, णाहि, हि, শাহিনী, णाहितो, हिना, णा जातो. णेमुंनो. तोह, ताला, तइआ तेमु, तेमुं. तम्मि, तम्सि. तहि, तन्य, जन्मि, गम्मि, हि, णत्य मुं. • त 'शब्दना प्राकृतरूपो साथै शोरमेनी, मागधी भने पेशानीना पण विशेष म्पो नणावलो छ. • सन ' ना आनंशरूपोनी पेठे । त' शब्दना अपभ्रंशम्पो पण ममनी लेगा. मे फेरर ने आ प्रमाणे: प.प. सो, म.सा, अं.' बी० ० मु, स, मा, प्र. मु, जं । यन्) यो । मा० ) ने नेण, निणा जम्म, नाम (मा. नार) ने. ना, ने. नहि हि kि. नैमि, नाश, नाणं, ( मा. ना. ना श्रम, ' नागेमा प..

जम्हा, नत्ती. जत्तो, जाओ, नाड, जाओ जार नाहि. नाहितो, ना (शा. मा० भादो. माद) (१० जातो. जातु) जम्मि, नाम्म जहि, जत्य जाहे बाला, जइआ. नाहि, जेहि, माहितो. हितो, जातो. नेमुनो. मु. मुं. - 'ज'नां अपनशम्पा सन्न' नां अपभ्रंशस्पोनी पेठे करी लेबां. विशेषता आ प्रमाणे. ५० ए०-जु. जो. न, ना, ध्रु बी०ए०- -- '(क) किम् १०-को (मा० के) के. त्री०- काका. १०-केश, केण, किणा केहि, केहिं, केहि. म०७०-कम्म, काम काम, कैमि, काण, काणं. (मा. काह) (मा० काह) १ आ ऋो मायदा'मा अर्थमां जयगरहे. या नुन लिंगमा सरसुं है, ३ जेयां' मञ्चना पालिका नेवानां पर छे. विशेषता एटली के, दहकिम, म एक किमि, विहि-मालो ववागनां यार-मन.१४. ..

पं०-कम्हा, किणो, कीस, कत्तो, कतो, काओ, काउ, काओ, काउ, काहि, काहिंतो, का (शा. मा० कादो, कादु) (पै० कातो, कातु) स० कम्मि, कस्सि, कहिं, कत्य 'काहे, काला, कइआ काहि, कहि, काहितो, केहिंतो, कासुंतो, केमुंतो. केमु, केमुं. - . क, कवण, काई (किम् ) अपभ्रंश अपभ्रंश रूपाम्ब्यानने प्रसंगेक'ने स्थाने 'कवण' अने काई' शब्द पण वपराय छे. 'क'ना अपभ्रंशरूपो अने सव्य ' नो अपभ्रंशम्पो बन्ने सरता छ. जे विशेषता छे ते आ प्रमाणेः प० ए० कु, को, के, का कवणु, कवणो, कवण, कवणा बी० ए० कु, क, का कवणु, कवण, कवणा पं० ए० किहे कहा, काहा कवणिहे, कवणहा, कवणाहां १. आ ण रूपा 'कदा' मा अर्गमा व पगय . २ 'कार' (वार)ना रुपाल्पानी सागर नामना मशनी वा जागवाना है. अप -

'इम (इदम् )
१०-जय, इनो (मा. ले)
वी-दम, इन
उने, इमा, ने, पा.
त-उमंगइमंग, निगा मेहि, इमहि, इमेहिं.
नन
(पहि, पहि. पहि)
(१० नेन)
नहि हि नहि.
च० छल-दमन, अन्ना में
(मा० इनाह)
इनान, इनानं.
(मा० इमाह)
मटो, दमाउमाओ इमदी, इमाउ, इनाओ,
माहि, माहिती माहि नहि.
इमाहिती. महिंतो
( मा- समादी, दमाह) नानी, मती.
(६० माती. दनाद)
मिम्मि, मिनि, अम्मिा र
(प. मुं).
म ने 'मन' नम्रतं.
पं०-
.
,,,.
...-:().

आय (इदम् ) अपभ्रंग 'सध्य' ना अपभ्रंश रूपीनी पेठे आय 'नां अपभ्रंश रूपो समनी लेवा. १०----आयु, आयो आये, आय, आया. आय, आया बी०-आयु, आय, आया आय, आया. आयेण, आयेणं, आयेहिं, आयहि, आयादि आयें वगेरे. 'एअ (एतद्) १०-एस, एसो, एए (शी० मा. एदे) इणं, इणमो (मा० एशे, एश') (पै० एते) बी०-ए एए, एआ. (गौ० मा० एदं) (सी० मा० एदे, एदा) (पै० एतं) (१० एते, एता) त०-एएण, एएण, एइणा एपहि, एएहि, एएहि. १ आ 'ए'शब्दने शौरसेनी अने मागधीमा रूपाख्यानने प्रसंगे 'एद ' शब्द समजरानो से अने पैशाचीमा 'एत' शद समजवानोंठे. एत' ना पालिस्मो ' सञ्च' ना पालिरूपोनी जेया छः प. एसो एते. बी. एत एने यगेरे. ओम संगतमा अन्यादेशने सूचश्या 'त'ने बदले 'एन' रूप यपराय हे तेम पाहिमा पर है-ओ पालिन. पृ. 16 (पद्) र अने ए. उपरन टिपन. २ पस-ए-अभी स-स .. २० .

(शो० मा एदेण, एदेणं, (चौ० मा० एदेहि, एदेहि, एदिणा) एदेहि ) (पै० एतेन, एक्दिा) (२. एतेहि, एतेरि, एतेहि) २०३० से, एमन्स मि, एएसि, एआणः एआणं. (गी० एटम्स) (शा० एदेसि, एटाण, एदाणं) (मा० शे, पदाह) (मा० शि, एदाह, (पै० एतम्स) एदाण, एदाणं) (१० एतेसि, एतान) पं०--एतो, एताहे, एअतो एआउ, एमाओ, एआहि, एआहितो, एआ एआहि, एएहि, (शौ० मा० एटादु, एदादो) एआहितो, एएहितो, (१० एतातु, एतातो) एआसुतो, एएसतो. स०-एत्य, अयम्भि, ई अन्मि एएम, एएमुं. एअम्भि, एअम्मि एअतो, एआउ, एआओ, n पद, एम (एतत् ) अपवंश 'सन्न 'नां अनंश पानी पर्ने: एट' के एम' ना आ- भ्रंश रूपोकरी लेवां ने फेरफार हे ते आ प्रमाणे: ५०-पटो बी०- अकारांत-सादि-शब्द (नान्यतर नाति) सर्वादि शब्दनां वधी जातनां नपुंसकलिंगी रूपाख्यानो पुंलिंगी सर्वादि प्रमाणे छे. मात्र प्रथमा अने द्वितीयामां ने विशेष के ते कुल' नी पेठे समनी लेवानो छे. जेमके सव्य (सर्व) सवं सवाणि, सव्वाइँ, मलाई. बी.- पाकीना, 'सय नां प्राकृत, शौरसेनी, मागधी अने पेशाची रूपो प्रमाणे. सय ( अपभ्रंश). मन्यु, सत्य, सन्या सम्बाइ, सन्नई. प.- ०- " ५०- मो०- " " " सव्या (सर्वक-अपभ्रंश) सया, मलभाई, सवभई. बी.- " " वाकीना, 'मन्त्र 'ना 'अपभ्रंश स्पो प्रमाणे. न (तत्) १०- न वाणि, ताई, ताई. गाणि, णाई, णाई. " " . " न बाकी का गिी 'न' प्रमाणे. यो पृ.११.२ असो ?. 11-1... शो. १...ग्री....

न (अपभ्रंश)
', तु, त, ता
ताई, तई.
ची०-
तब (तक-अपभ्रंश)
प०- , त
तआई, तमई.
बी०-
नाकी रवां, 'त' नां अपभ्रंश रूपो प्रमाणे.
"
ज (यत्)
प० जं
जाणि, जाइँ, जाई.
वी.- जं
जाणि, जाई, जाई.
बाकीनां, पुंलिंगीज'प्रमाणे.
ज (अपभ्रंग)
ध्रु, जु, ज, ना माई, नई.
बी०-
जय
J, नई
प०-
नआई, नभई
नी-
बाकीना, ज'ना अपभ्रंश रूपो प्रमाणे.
"
.
१ जो पृ. १४२. २ मो. १४२. ३ दो
१४२-१४३.४ उभी . १४३.५ उमा पु. १४३.

प०- कि " " " कि काणि, काई, काई. मी०- पानां, पुंलिंगी 'क'नी पेठे किं ( अपभ्रंश) १०- किं, 'काई, कवणु, कवण, कवणा काई, कई, कवणाई, कवणई, काई, काइ, कीई', कि. बी०- कि, काइ, फरणु, करण, कवणा . " " " " " " " माकी बधा, 'क' मा 'अपभ्रंश रूपो प्रमाणे. इम (इदम्) इण, इणमो, इद इमाणि, इमाई, इमाई. " " " " शेष, पुलिंगी म ' नी मेना. इम, इमम (आभ्रंश) आयाई, आयई. बी0- .. . " बाकीना, 'इम 'ना 'अभ्रश कपोनी पेटे. १ मी. 11-11 . अयो, १४. ३ का + -मो.मरमर गयो ... पो. १.जी...

एअ (एतन्) १०- एम, एअं, रणं, इणमो एआणि, एआई, एआई. बी०- एक शेप, पुंलिंगी एअनी पेटे. पद, एअ (अपभ्रंश) एईई, एट. प०- वी0- शेप 'ए'नां 'अपभ्रंश रूपोनी पेटे. . युप्मद ' अन . अम्मद' ना रुपो प्रणे लिंगमा एक सरसा थाय ले अने ए आ प्रमाणे के 'तुम्ह (युप्मद् ) ५- एकव०-तं, तुं, तुव, तुह, तुम (त्वम्) १ अमओ पृ० १४६. २ जुभो पृ० १४७. ३ तुम्ह (युप्मद )-पालिरूपी तुम्हे (यो) तुब २ स्वं (नुम्ह) तुम्हे, तुम्हाफ (तुम्हं) नुवं (यो) तवं त ३-५ त्वया, तया (पं. त्याहा ) तुम्हदि, नुम्हेमि (त-बो) (तने) ४-६ तच, मुलं, नुम्हं (ते) तुम्हाक ( ७ त्यपि, तमि -जयो पालिया पृ० १५१.

.
बहुव०-भे, 'तुभे, तुझ, तुम्ह, तुम्हे, उरहे ( यूयम् )
दु- एरुव०-तं, तुं, तुम, तुवं, तुह, तुमे, तुए ( त्वाम् )
बहुव०-वो, तुझ, तुम्भे, तुम्हे, उन्हे, भे (युष्मान्-वः)
त- एकव० -भे, दि, दे, ते, तइ, तए, तुम, तुमइ, तुमए, सुमे,
तुमाइ (वया)
बहुव०-भे, तुम्मेहि, उज्ोहिं, उन्हेहिं, तुम्हेहिं,
ठम्हेहि-(युप्माभिः)
पं-- एकव०-तुरह, तुभ, तहितो,
(त्वन्)
तइत्तो, तइओ, तदउ, तईहितो.
सुबत्तो, सुवाओ, तुवाउ, तुवाहि, तुहितो, वा.
तुमत्ती, तुमाओ, सुमाउ, तुमाहि, सुमाहितो, तुमा.
दहतो, तुहाओ, तुहाउ, सुहादि, तुहादितो, तुहा.
तुझमतो, तुम्माओ, तुमाउ, तुम्माहि,
तुम्माहिंनो, तुमा.
बहुव-तुभत्तो, तुम्माओ, तुभाउ, तुम्माहि,
तुम्भेहि, तुमाहितो, तुमेहितो, तुम्भामुंनो,
मुभमुंनो.
(युमन )
तुम्हनो, तुम्हाभो, तुम्हाउ, तुम्हाहि, तुम्रेहि,
नुहाहिनो, तुम्हेहितो, नुशमुनो, तुम्हेतो.
उम्हनी, उहाओ, उहाउ, उहाति, उपरेहि,
उहाहितो, उम्हेरिना, उपहामनी, उरहेमतो.
उम्हना,
उन्हार, उहाहि उम्मीद
अम्हार्दिनी, उमली. उम्दागुनो, उता.
युमद-नाममा भोग' मोरिया
धने ''परतुन .

,
च० छ०-एकव०-तइ, तु, ते तुम्हें, तुह, तुहं, तुब, तुम, तुमे,
तुमो, तुमाइ, दि, दे, इ, ए. तुम, उन्म, उपह
(तुभ्यम्-तव-ते.)
बहुव०---तु, वो, मे, तुम्म, तुम, तुम्माण, तुम्माण,
तुवाण, तुवाणं, तुमाण, तुमार्ग, तुहाण, तुहागं,
उन्हाण, उम्हाण, तुन्हाहँ
(युप्मभ्यम्-युस्माकम्-वः )
स०- एकल -तुमे, नुमए, तुमाद, तड़, तए (त्वयि)
तुम्नि. तुवन्मि, तुमन्नि, नुहन्मि: तुम्मन्नि
वहुवः-तुमु, तुवेमु, तुमेसु, तुहेनु, तुभेनु (युनाम)
'तुबमु, तुमस, नुहमु, नुब्ममु, 'तुम्मामु,
'अम्द (अन्नद्)
प- एकव०-मि, अम्मि, अम्हि हं, अहं, अयं (अहम् )
(मा० हने)
१.२ मा रुषो का मिदंदनां मटे पटां नयी-हे. प्रा.
मा. ८-३-१०३,१.१०२.
२ सन्द (दाम)-पालिरुपी
१ पर
वं, अ (ना) (नो)
मर्म (म) मनापं, बने (माई) (मा)
(नो)
३-.-मपा () स, सम (ट-नो)
धान, अन्ना (२०-नो)
मर, अ

१५४
-अम्ह,
बहुव०-
अम्हे, अम्हो, मो, वयं, में (वयम् )
(मा० हगे)
दु- एकव०---णे, ण, मि, अम्मि, अम्ह, मम्ह, में, ममं, मिमं,
अहं-(माम्-मा)
बहुव०-अम्हे, अम्हो, अम्ह, गे. (अस्मान्-नः)
त- एकव०--मि, मे, मम, ममए, ममाइ, मइ, मए, मयाइ, णे (मया)
महुव०-अम्हेहि, अम्हाहि, अम्ह, अम्हे, णे (अम्माभिः)
पं- एकक०-मइयो, मइओ, महउ, मईहितो. (मन)
ममतो, ममाओ, ममाउ, ममादि, ममाहितो, ममा.
महतो, महाओ, महाउ, महाहि, महाहितो, महा.
मातो, मझाओ, मम्झाउ, मशाहि, मजाहितो,
मझा.
यहुव०-ममत्तो, ममाओ, ममाउ, ममाहि, ममेहि,-(अम्मन्)
ममाहितो, ममेहितो, ममासंतो, ममेसुंनो.
भाहत्तो, अम्हाउ, अम्हाओ, अम्हाहि, अम्हेहि,
आवाहितो, अम्हेहिलो, अम्हामुंनो, अम्हे मुंतो.
च, छ- एकय.-मे, मइ, मम, मह, महा, मदा, अह, अम्हं
(मधम्-में-मम)
बहुव-, गो, मझ, अाद, अम्हं अम्हे, अमो,
अशाणा-ण, ममाण-गं, महाण, प्रमाण
अम्हाहै ( अम्मभ्यम्-अम्माकम्-नः)
म- ए-मि, मा, ममाद, मा, मे (मगि)
अहमि, ममम्मि, महाब, मजामि.

बाय.--'अम्हेनु, ममेमु, महेमु, मलेमु (अस्मासु ) 'अम्हमु, मममु, महमु, मझम, अम्हामु. तुम (गुप्मद् ) अपभ्रंग ५०-तुएं तुम्हई, तुम्हे. बी०-पई, तई तुम्हेटिं. १० छ०--तउ, तुज्या तुध तुम्हह. त०, " पं0- " " स०--पई, तई . हासु, तुम्हामुं अम्ह (अस्मद् ) अपभ्रंश प०--हउँ अम्हई, अम्हे. बी०-~मई त०-मई अम्हेहिं. १० छ०-महु, मझु अम्हह. पं०-, स०--मई, अम्हासु, अम्हामुं. आकारांत शब्दनां प्राकृत रूपाख्यानो (नरजाति) आकारांत नामोनां रूपाख्यानोनो प्रयोग विशेप विरल छे तो पण प्रसंगवशे तेनां रूपाख्यानोनी प्रक्रिया जणावीए छीएः १ जूओ पृ. १२७-तइया 71 सत्तमी. २-३ ओ पृ० १५३ नं टिप्पण, हे० प्रा० व्या० ८-३- २१७, पृ. १०४.

१५६ २ १. अकारांन नामने लागता प्रत्ययो आकारांत नामने लगाडवायी तेनां रूपाख्यानो तैयार थाय छे. मात्र एक पंचमानो 'हि' प्रत्यय आकारांत नामने लागतो नयी. प्रत्यय विनाने स्थळे एटले ज्यां शून्य छे त्यां मूळ अंगने न रूपाख्यान तरीके समजवु. ४ संबोधननां रूपो प्रथमानी जेवां थाय छे. ३ हाहा . हाहा. " ५०-हाहा बी०-हाहा त०-हाहाण, हाहाणं 1.छ.-हाहस्स [ता. च० हाहे, हाहम्स पं०-हाहतो, हाहाओ, हाहाउ, हाहाहितो हाहाहि, हाहाहि, हाहा. हाहाण, हाहाणं. - " " हाहतो हाहाओ, हाहाउ, हाहाहितो. हाहामुंतो. हाहासु, हाहामु. म०-दाहा (है) मि स.-हे हाहा ! पगते किल्लालया ('किलालपा) गोवा (गोपा) अने सोमवा (सोमपा ) वगैरे शोना रूपी समनवां. पड्माणाद्रिकाने मते पदतथी यनेया नामनो श्रत्य स्वर दूत माय से एथी 'बिलाटा''गोरा'थने ' सोमपा' प्राकृत नान्यतर जातिमां तो कोई शब्द आकारांत होतोज नयी (जूओ पृ० १२३-नामना अन्त्यम्वरनो फेरफार-नि० २) आकारांत शब्दनां शीग्मेनी, मागधी अने पैशाचीनां रूपो हाहा 'नां प्राकृत रूपो जेवां थाय छे, ज्यां ने विशेष के ते 'वीर' नी पेटे समनवानो छे. आकारांत शब्दनां अपभ्रंशनां रूपो वीर नां अपभ्रंश रूपोनी जेवां प्रायः बनाववानां हे.. इकारांत, उकारांत शब्दनां प्राकृत रुपाख्यानो (नरजाति) प्रत्यया. नरनातिनां अने नान्यतरनातिनां दरेक इकारांत अने उका- रांत नामोने नीचे जणावेला प्रत्ययो लगाटवाना छे. प्राकृत भापाना प्रत्ययो. एकवचन वहुवचन अओ, जो.. बी०- अर, สนใจ कर पिलाकर' 'गो' ने 'गेम' ने भने बाम पर्नु होपानीए ने दोनों कुपो बगर 'दीनी जेवां पाप है: २-२-४७. पृ. ८५ पदमाराद " ." पहना ५०ए. रिलालयी. २० ८. पिछलया. मालो. मोम्यो. पदमागमा गनिम्न ले लिदं निबो मोज १२-- मंदाने रंगर-दर १. :

त०- + च.छ०- णा णी, + गो. + + पं०- + + स०- सं०- असं, अओ, णो, . प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो. १ ज्या ज्या . त्या मूळ अंगने, अंते दीर्घ करीने वाप- रवानु छे. . २ ज्या ज्या + छे त्यां अकारात नामने लागता 'प्रत्ययो पण समनवाना छे. मात्र पंचमीनो एक 'हि' प्रत्यय लेवानो नथी. ३ ज्या * छे त्यां (संबोधनना एकवचनमां) मूळ अंगने अंते विकल्पे दीर्घ करवानो छे. ४ पंचमीना स्वरादि, सकारादि अने हकारादि प्रत्ययो पर रहेता अंत्य 'इ' अने 'उ'नो दीर्घ थाय छे. ५ तृतीया, पष्ठी अने सप्तमीना बहुवचनना प्रत्ययो पर रहेतां अंत्य 'इ' अने 'उ'नो दर्घि थाय छे. ६ उकारांत नामोने प्रथमाना बहुवचनमा एक अवो' प्रत्यय पण वघारे लागे छे:-माणु + अवो-माणवो (सं० भानवः) -- १ जूश्रो पृ० १२५. 'प्राकृत प्रत्ययोने लगता नियमो' ना मयाळा नीचे (पृ. १२६ मां) जगावेलु कार्य अहि-दकारांत अने उकारातमां-यतुं नथी, १० पाल्पानो इसि (भषि) इसर, इसओ, इमिगो, इसी. दामि इसिनो, इसी. इसिगा इसीहि, इसीहि, इसीहि इसिगो, इसिम्म इर्माण, इर्माणं. न १ पाइने मते मागंत ने स्वागंत दोन प्रयनान एक- क्दन द्वितीयाना एकवचनी न पाय :-जमक-दमी, इति । बिह, विहुँ। हेमा न्या. ८-३-१९, १.४. इकारांतनां पालिरूपो. १. राम धार्मि दमी, दमयो. दमी, इसपो. मीहि, इसीमि. इनीन. ३ इरिना ४-६ रसिनो, हरिम इमिना, इसिरमा, इमिन्दा इमिलि, मन्दि सं० इमि !, दमे ! इनाही, इमि. इनिनु, दीनु. दी!, इस्यो! , .. पानना 'पोप्रन्स्पनी पाटिमा प्रयमाना बने हिती- पाना बहुवचननां 'नो' प्रत्यय पागलो हेः " सारमनिनो, मम्मद हिनो, निन्दादिहिनो, जिदिनो, आपतिनो, जनितिनो" वगरे. पालिमा अग्गि (अमि), मुनि, आदि, गिरि,मि (लि) भाप (ससि) भने गामनि (मामलो) मोनां रोमां विटा है - या मां एकव. 1 [ता. १० इसये, इसिणो, इसिस्स इसीण, इसणिं ] १० छ०- (माग इशिह) (मा० इशिहैं) पं० इसिणो, इसित्तो, इसीओ, इसितो, इसीओ, इसीउ, इसीउ, इसीहिन्तो इसीहिन्तो, इसीसुतो. अग्गि. याब. प.-अग्गिनि, गिनि अग्गियों (यघारानां स्पो) स.-अग्गिनि सं.-अग्गि! मुनि छ.-मुने (मुनेः) (यधारानां रूपो) आदि म.-आदो (आदौ) (यधाराना रूपो) आदु आदि आदिनि गिरि (यधापना रुपो) रेमि (बधागना पो) . म.- गिर मम्मा, सानो, भनिनो, मला. मागानो, अमिलो, स्वाय, सी.

पं०-(गौर० इसिदो, इसिद्ध )
(माग० इशिदो, इशिद्ध)
(पेशा० इसितो, मितु)
म० मिसि, इमिन्नि इमी, इसी.
सं० हे इमि : इमी : हे टमः : हे टमओ : है
उमिणा : हे इमी :
द.६०-गिना (S-पान, मवाना) मद,
माम; मगर्ने, मार्गम.
च -मन्दिन्म
मन, मागगन.
मन्बिनी
मसानो:
गामनी
मान्न, मानिनी.
९० माननी
पी.कामनन, सामान
.
सन नि
राकोमो
इग्नो वि.
...., मनममिका मगर
"गिरा :
टिमका

. [ता० न०-भाणवे भाशुणो, भाणुस्स] (माग० भाणुह) (माग० माणुहँ) ५०-भाणुणो, भाणुत्तो, भाणभो, भाणुगो, भाणूओ, भाण्ड, भाहितो भाण्उ, भाणहितो भाणतो. (शौर० माणुदो, भाणुहु) (माग. भाणुदो. भाणुद) (पैशा० भानुतो, मानुतु) भानुम्मि, मानुदि मानूग. म. भानु ! ७ मान् । भानोमानी! प्राातनाणो' प्रयगनी पठे पालिम पण प्रपमाना भने दिनीयाना यावभनमा 'नो' प्रत्यय यपगएको छः "हेतुनो, जन्तुनो, गानो " योगरे, पारिमा देव, जन्न, भगिन, सदभ, मयन्यू माणदोना रूपमा सिरताते था प्रमाणे- हैनु, अनु . दियो, त्या (वधागनां म्यो) २ " , नामा (हेनो) (4सगना ) अभिम् । यसमा गो) अमिन, निरी म

स०-माणुसि, मागुम्मि माणूमु, माणूमुं.
मं०-माणु ! माण :
माणुणो ! माणवी ! भागओ!
माणउ ! माणू :
ए प्रमाणे नर (य). धन्माणु (धर्मत), सन्वागु (सर्वज्ञ),
दवाणु (देवन), गुरु, गड (गो): साहु ( माधु), बन्धु, वपु
(वपुर् ); मेरु. कार, पशु (धनुष्), मिथुः केड (केतु ), विनु
(विद्युत् ), राहु, मंकु (शदुः), उच्छु (४). पयाम (प्रवामिन् ),
वेलु (वेणु), मेड (मेतु), मच्चु (मृत्यु), 'खलषु ( खन्टप् ),
गोरस (गोत्र), मग्भु (शरयू ), अभिभू ( अभिभू ), अन मयंमु
(म्वयंम) वगैरे शब्दोनां प्राकृत, शारमेनी, मागधी अन पैशाचीनां
सुपो ममनवानां छे.
५. सनिनना
अनि अभिन्यो।
सनांना माने.
महमू, मन्य
(ग)
1-:-- दलन
.
मानित ::-...
सर''.
'पंच नोटा बदन में है
कमरमर : ng: ग्रे

'अमु ( अदम् ) [ आ शब्द सादिमांछे उतां एना रूपी विशेष करीन भाणु' नां रूपो साथे मळतां आवे छे माटे एने । भाणु' ना रूपी पछी मूावामां आव्यो छे.] प०- अह, अम्, 'अमो अमुणो, अमयो, अमउ, अमओ, अमू. मी०- अमुं अमुणो, अमू. स०- अयम्मि, अमूमु, अमूमुं. इम्मि, अमुग्मि शेष रूप • भाणु ' नी नेता १ अमु (अदम) नो पालिरूपी अम, अमुगा " २ भम् ३ अमुना - अमनो अमुम्ममा प्रमुथ्य) अमुनि, अमाभ अमम, अमूमान. . अनुना, महि, अमि. भनम्मा (म. अमामात) अरण , अगंम्म (म. श्रीमन) अनुम- अमर श्री पारि..... २ वा श्रागार म. • श्रमा' सीरी.. fa... श्री." माय .. मि' ने 'भानुशलन मारत नजानी माये न गोर- मनी. मागधी अंने मानानां यमागन मोकांवडे. आनगम ने विशेषतानाप्रमाणे: अपभ्रंशभापाना प्रन्यया. पक्य बहुवर . का०- हिं. " पं0- है म.- हि हि, हुं. मं0- हो, ०. ज्या ज्या . छे त्या मुलानं न अंने विकले दीर्य करीने यापरवाई. अनंगना क्या प्रत्ययो पर हिनां मूल अंगन भने विकल्ये दीपं यायचे. अपभ्रंग-रूपाख्याना इसि मि, इमी इमि, इमी. वी- न०- इमिहि, इमर्माहि. इमिन, मिनी इसीग, इर्माग: इमिर, इमाएं. इमि, मी १०२०-इसि, इसी 'इसिहं, इसी इसिहं, इसीहं. पं०- इसिहे, इसीहे इसिहं, इसीहुं. स०- इसिहि, इसीहि इसिहि, इसीहि (इमिहुं, इसीई) सं०- इसि ! इसी ! इप्तिहो ! इसीहो! इसि ! इसी! ए. प्रमाणे दरेक इकारात पुंलिंगी शब्दना अपभ्रंश रूपो समनवाना छे. माणु. শান্ত, মা माणु, माण. " মা, মা, माणूहि, माणूहि. माणूण, भाणूण, माणूए, माणएं, भाणु, भायूं प० छ०-माशु, पाण भाणुहूं, भाण्ड भाणुहं, माणूहं. १०- माशुहे, भागृहे भाणुह, मागा. भाणुहि, माहि माणुहि, माहि, (मागाई, माग९) माणु ' माण: भाणुहो ! मागृहो! माशु : भागू ए प्रमाण दोक टागन लिगी सदना अपभ्रंश का म.- ममनराना है.

इकारांत अने उकारांत शुन्दनां प्राकृत रूपाख्यानो
(नान्यतर जाति)
'दाहि (दधि)
दहीणि, दही, दहीई.
सं०-दहि!
बाकी बघां ते ते मापा प्रमाणे इकारांत पुलिंगी इमि नी नेवां.
.
१ जूमो भारांत नमक नामान प्रकरम अने तेने लगता
प्रथलो सपा नियमो--० १३३-२३४
२ पोरने मते इकारांत अने उपारांव नमक नामानां अपमाना
अने द्वितीयाना एपबचनमा आचां को पार के
दहि, ह (म० दधि, दधि )
-का-८-३-२५, १०८५.
बाद मां न्यदना पने म 'दनि' (प्ले)
भने 'मन' (मधुने) पर है.
नपुंसकलिंगी इकारांगनां बने उकारांना पालिरूपी
रदिर
१ दधि (दक्षि) दी, नि,
हमान नती ''.
गामनी नदी
गमतीगरीन
करानं निी मान्न मनाने

'ए प्रमाणे सथि (सक्थि), वारि, अच्छि (असि), मुरि
(सरि ), अइरि (अतिरि) अने गामणि (आमणी) वगेरे शब्दोनों
रूपो पण समनवां.
"
"
"
"
महु (मधु)
महूणि, मह, महूई.
२
सं० महु !
भाकी पर्धा ते ते मापा प्रमाणे उकारांत पुंलिंगी
भाशु' नी जेवा,
ए प्रमाणे दारु, पत्थु (वस्तु), निरगु (चित्रगु), मुगु,
वमु. अंनु, अमु-अस्मु (अश्रु ) भउ (मतु), महु अने लहु
(स) वगेरे शब्दोनां रूपो पण समजवा.
.
१
'मधु'
मभ, मधूनि.
शेष, उकागत लिंगी 'भानु'प्रमाणे,
'गोत्रम्ना पादिरूपो
गोत्रम्, गोत्रनि.
मोत्रम्, गोत्रभून.
प, टकाया गिी 'मि' प्रमाणे:-
यो पा. ११३-११५ अने एना यिन.
गोत्र
गोरभु

५- अह अ
अई. अरे, अनि
मामशं पुलिंगी अनुनी पेठे.
दह (आधा)
दही, दार्ति
दहि
4
पाही पाइमिनो आग्रंश रुपानी मेगा.
मह (अपक्ष)
मह महुई
बाकी बयां 'मागु' मा अनिश सोनी नेवां.
ऋकारांत शुन्दनां प्राकृत रूपाख्यानो (नरजाति)
ऋकारांत नामोनी में नात सेकेटन्द्रांक ऋकारांन नाम
विशन्यपे वपराय अंने केटलांक ऋकारांत नाम विशेषगप
वरराय :
१ 'अनु'नां पालिका
-
और पुलिंगी ' 'या'-जुओ पालियर
२ो पृ. १६६
३ मी. १२१ नामना माये.

૭૨
विशेप्यरूप-जामायर (नामातृ), पियर (पितृ), भायर
(भ्रातृ) वगेरे।
विशेषणरूप-कतार (कर्तृ), दायार (दातृ), भचार (भर्तृ)
वगेरे।
[आ भेदने लीये एक नातनां पण ए बने नामोनां रूपोमा
विशेष अंतर छे.]
अकारांत (विशेष्यवाचक).
१. प्रपमार्नु अने द्वितीयानुं एकवचन बाद करतां मधी विभक्ति-
ओमां विशेष्यवान ऋकारांत नामना अन्त्य ' र 'नो
विकल्प ' थाय छे.
२. प्रपमाथी लइने बधी विभक्तिओमा विशेष्यवाचक महारांत
नामना अन्य प्रनो' अर' पाय छे.
३. प्रथमाना एकवमना विशेष्यतामा प्रकारांत नामर्नु आकारांत
सर पग विकल्प वपराय छे.
४. मंबोधनना एकवचनमा विशेष्यवाना प्रकारांत नामना अत्य
नो 'अ' भने 'आ' विकलो थाय छे.
[मूमना-उपर नणाच्या प्रमाणे प्रथमाथी लदने पधी विभक्तिोमा
कागत नाम मागत अने उभारोत बने छे माटे सेना
पाम्यानांनी प्रक्रिया, 'निण' अने ' माशु' नाममा
म्याननी प्रक्रिया नेवी ममनमानी छ. अही तो मात्र
माटता माटे नेना मपाम्यानी आपी. सी.,

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१७४ रिभरचो, पिअराओ, पिरतो, पिभराओ, पिभराज, पिभराउ, पिअराहि, पिमराहि, पिअरेहि, पिअराहितो. पिमराहिंतो, पिभरेहितो, गिभरा पिपरामुतो, पिभरेमुतो. ( शी० पिभरादो, पिअरादु) ( मा० पिअलाटो, पिअलादु) । १० पिभगतो. विभगतु) गिरे, पिभोस. विभरेम, मिममि. पि भामि, पिऊम, विम. पिउमिपिम्मि, लिपिमा 'पिग' पिभाग ' पिउणी । पिभयो. पिम मिश्रा पिभी, पिउ. पिछ। नामान, भागाभार (भ्रातृ। का मनवाना, म माया नमाउ THd - मिमि. . . + -1 । नम * - 11. ग 41 11 4 + 4.

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दाउणो, दाउनो, दाउतो, दाऊो, दाऊ, दाऊो, दाऊत, दाऊहिंनो दाहितो, दाउमुनो. (शी० दायारादो, दायारादु) (मा० दायालादो, दायालादु) (१० तायारातो, तायारातु) स०- दायारे, दायारंसि, दायारम्मि, दायारेमु, दायारे, दाउंसि दाउम्मि दाउमु, दाउमुं. सं0- हे दाय !, दायार!, दायारा, दाउणो, दायवा, दायारो:, दायारा! दायओ, दायउ, दाऊ. ए रीते कतार, कतु, ( कर्तृ), भत्तार, भत्तु (भर्तृ) वगेरे शब्दोनां रूपो सपनवानां छे. ऋकारांतना प्राकृत रूपाख्यानोनी सायेन (तेना) शौरसेनी, मागधी अने पेशाचीनां पण विशेषतावाळा रूपाख्यानो आपेलां छे. ऋकारातना अपभ्रशरूपाख्यानो आ प्रमाणे छः आगळ कन्या प्रमाणे दरेक ऋकारांत अंग, अकारांत अने उकारात थया पछीज प्राकृतमा धापरी शकाय छे. तो ए-मूळ अरका- रांतना-अकारात अगना अपभ्रंशरूपी वीर 'ना अपभ्रंशरूपो नेवां करवाना है अने प उकारात अंगनां, 'माणु'ना अपभ्रंशरूपो जेवा समनवाना छे. कढाच कोई मूळ ऋकारात अंग प्राकृतमा आवतां इकारात यतुं होय तो तेना अपभ्रशरूपो । इसि' ना अप- भ्रंशरूपो जेवा जाणी लेवा

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नेमके-सं० मुरे-प्रा० मुरे'। स० म्ली-प्रा• गिलोज । यादि। मुरेम मुरेओ मुरेआ। मुरे, मुरेए, मुरेआ। मुरेपण, मुरेएणं सुरेपहि, मुरेपार्ह, सुरेएहि । शेष रूपो, ते ते भाषा प्रमाणे पार' नी समान छे. ४-६ गावरस गोनं, गुन्न, गवरप्त गय. ५ गाया, गावम्मा, गोहि, गोभि. गावदा गवा, गवरमा, गवम्हा गवेदि, गोमे. गावे. गावरिम, गावम्हि गायेमु गये, गवरिम, गर्वाद गवेमु गोमु. स०-गो! गायो, गवो- श्रो पालिए. पृ. ९७-१८ आर्षप्राकृतन उदाहरण-"अबले होद गवं पचोइए"- सूत्र. प्र.श्रु० अ०२,उ०३ गा०५. " गो-महिस-गवेलयप्पभूया • भगव० शत० २, उ. ५ तुंगियानो अधिकार. (पृ. २७७ रा. जि.) औकारात 'नौ' शब्दनु प्राकृत अंग 'नाव' बने छे (जभो पृ. २ औ आव) " एग महं नाव सयासर्व *मा : ( ना )वा तेहि "= गव० दा० १, उ६ ६ (प्रश्नोत्तर-२२७ पृ. १७१ रा. जि.) २ जूओ षड्भापाच. पृ. ९६.

गिलोय
गिलोओ
गिलोआ।
गिला
गिलोए, गिलांना।
गिलोएण, गिलोएणं, गिलोएहि, गिलोपहि
गिलोएहि ।
शेष रूपो, ते ते मापा प्रमाणे वीर' नी समान ले.
२. केटटेक टेकाणे एकारांत अने आंकारांत नामोन
সাদ, মনা মিত্ব উষশী সনাবানা আর
के मुराहि (सं० मुरामिः ) मुरासु (मं० मुग़म)
इत्यादि.
व्यंजनांन मन्दी
प्रतम पायाननं प्रमग कोद गन्न व्यंजनान मंभवी
शा..'
न कम पान, म्यान
--
पदमाहिद'...

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संपाइअवं (संपादितवान् ) संपादिदवं रूपाख्यानो 'भगवंत (मगवत् ) भयवंत १ भगवंतो भगवंता. (शां० मा० पै० मगर्व) (मा० भगवते) २ भगवंत भगवते, मगवंता. अत्' छेडावाळां नामनां पालिरूपोः १ मगत मगतो, मगयंता. २ भगवं मगते. मगदहि, भगतनि. भगवंटेन ४-६ मायदा भगवत, भगवंतानं. भगवंढत्म भगवंटा भगवंटहि, भगतमि. भगवंतत्मा, भगवतन्हा भगत, भगन मगनंदु. भनयंन्नि भगवान्द . ३ ५ भगवता, -प्रा पारित ૧૮ ३ भगवतेश, भगवनेश भगवतेहि, भगवतेहि मगवंतेहि. सं०- भगवंता, भगवंता. भगवंता !, भगवंतो! (गौ० मा० दे० भगवं, भगव !) ए प्रमाणे बघा, ते ते भाषा प्रमाणे 'वीर' नी प्रमाणे. 'भवंत (भवतु) भवतो भरते. (चौ० मा० पै० भवं) (मा० भवंते) २ भवन भवंत, मवंता. ३ भतेण, भवतेग भवतेहि, भवतेहिं भवतेहि. सं० भवन्त, भवंता! भवंता, भवंतो १ पालिमा 'भवंत ' शदनां विशेष रूपो आ प्रमाणे छ। १ भपतो, मोतो, भवता (बहुवचन) ३ भवता, भोता, भक्तेन (एकवचन) ४-६ भवतो, भोतो, भवतस्त ( सं०-भो !, भंते !, भोत ! ( " भवतो, भातो, भयंता, भोता (बहुवचन) 'संत' शब्दन पालिमां (सं० 'सन्दिः' उपरथी)' समि' रूप पण वपराय छे.--जूओ पालिय. पृ० ११८-१९९-१२० अने तैना दिपों. " )

(गौ० मा० पै० भवं, भव )
( मा० भवते, भने)
ए प्रमाणे घा, ते ते भाषा प्रमाणे 'सलनी पेठे.
'भवन (भवत-वर्तमानदंत)
१ मतो
সবা,
(मा० मते)
२ भवन
भवते, भवंता,
३ मतेण, मवंतेणं
मवतेहि, मवतेहिं,
भर्वतहि.
सं. मवन्त : मर्वतो!
मवंता.
मना।
(मा० भवन !)
ए प्रमाणे रवाने ने माया प्रमाण वीर'नी वां.
मन' ,दाबाळां धनमानदंतनां पालिका
.
-
.
१
-

.
tri.... • ' मी ती Hind.
.....
witth, m.
.
,
"
"
.
.."
7
.
.
4-ur

শান্ত (সি)
. .
মাস,
.
গণ
শা, শান,
, ,
সা
দা? ? • গণ 'না ভারী গো,
• গৰু চৰাত নামা (সনানি)
• শুল, নানা নাদানা না না বলো
। শুলনা • * নিৰ খাৰ :
সন্তা, অল্প {}, ৩া, সব (মন),
অণ, ত (উশন , মাথাগ, শাবি (মাহর) কাল, নয়
যান, বন্যা, না (নান, মাতা, (} না,
বৎ { লশন }, শান্তা, মহা (মন), মুয়া, সুর (মূরন)
স্থা, মা (বানর, , ম (অপু), মুফ, মুম
( সুমন। ন্যা,
• ৩ন না • পাড়া অষ্য ও ৫। মাস এবান্না
নানান মা নন না। প্রশ্ন : মা ' ন ন সত্যনা, নমন,
মঃ
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集
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- पूसा, प्रसो ३. णो' प्रत्यय पर रहेता पूर्वना स्वरनो दीर्घ थाय रे. ४. 'इणं' प्रत्यय पर रहेतां पूर्वनो स्वर लोपाय हे. पूस (पूसन् ) पूसाणो, पूसा। (मा०-पृशे) बी०- पूसिणं, पूर्व पूसाणो, पूसे, पूसा। त०- पूसणा, पूमेण, पूणं पसेहि. पूसेहि, पूसेहि। ५०, ७०-पूसाणो, पूसम्स पूसिणं, पूसाण, पूसाणं। (मा० पूशाह) (मा० पृङ्गाह) पं०- प्रमाणो, पूसतो, पूमाओ, पूसाउ, पुसाओ, पूसाउ, पूसाहि, पूमेहि, पूसाहितो, पूसाहितो, पूसेहितो, पृसामुंतो, पूसमुंनो। (चौ० प्रसादो, प्रसाद) (मा० पृशादो, पृशादु) (पै० पूमातो. पूमातु) पुसेमु, पसे पूसतो, पूसाहि, पूसे, पूसन्नि मंति हे पुसा ! हे पूसो, हे पुसाणो, हे पमा । पुस! मद्दव २ महवा, महतो (गोल 'महा ) (मा० महा) मपर मारह.भा आमनागरलं महवागो, महवा. १ सवंगगटारने"-पत्न.

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अप्पाणो, अप्पा। अप्पेहि । अपा, अप्पो (मा० अप्पे) बी० अप्पिणं, अपं अप्पाणो, अप्पे, अप्पा। त. अप्पणिआ, अप्पणइआ, अप्पेहि, अप्पेहिं, अप्पगा, अप्पेण, अप्पेणं च०,30-अप्पाणो. अप्पम्स अप्पिणं, अप्पाण, अप्पाणं । (मा० अप्पाह) (मा० अप्पाह) इत्यादि वयां रूपो ते ते भाषा प्रमाणे · पूम' नी समान है. २ राय ( राजन् ) १. तृतीया, पंचमी, षष्टी अने सप्तमीना बहुवचनमा ‘रानन्' शब्दनो 'राई' आदेश विकल्ये थाय रे. ५ ७ अननेदि, पत्तनम, अनला, अनन्हा, अनार, अत्तेमि, आदुनरमा, भानुभन्दा कानुहि, आनुमेनि अचान, अत्ते, अचनेनु अनरिम, अचन्दि आटुमेनु यानुमे, भानुमरिन, भानुनन्दि ८ स० पत्त ! अता ! अचानो ! यत्ता! यातुन! आतुमा! भानुनानी! २ राज (गउन् ). राना गानो, गडा. गजानं गुज गदानो. ग्जा. गडेन. गति, गमि, गांजना गम, गम १ २

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2. ने मनमीना एकवचनमा गाना 'लनी
गरदा मिली यार.
विशेषताः
गानी. मागी. पहा ने मां • अनु शा.
शान नामाना जर 'नो बोधनना परमानना विकली
अनुम्मार पाय.
३
मा (नी)
पुराना पुवाना
गुयाने, मु.
याना, पुपान्न,
सुमार, नंग.
पुन
मुंवार, पैनि.
गुलानाम, सुदाम पुरानानं, पुरान.
दुदाना, पानामा, युवान. युगनीम.
पुटि, पुनि.
मुपाने, युवानम्मि, पुकानेनु
समान,
युचे, युवन्मि, युद युगानु, युयनु.
८ में दुक, पुरा,
বোনা
থান, না
[ 'मय' (मरसन्न म्नी 'युच' या धने 'मन'
(मपयन् ) ना को 'गुगन नी जयां.]
नदा
द (मनन्द्रा नंदा ।
मद्वा, नदना.
म्दाने.

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गयागी. गाणी, गया. गया: गयो (मा० न्याय) वी०- गहन गयं त० गरणारख्या गयेग, रायेणं च० छ०-प्यो, राहणी गचम्म (ता०-गाणे) (मा० लायाह) पं.- ण्यो, राणो, रायचो, गया, गयाउ, गयाहि, गयाहिंनो, राया गयागो, 'गइयो, गये, गया. राईहि, गईहिं, राइहि. रायेहि, सयहिं, रायहि राईग, राईगं. रायागः रायागं. . . “(मा० लायाहँ) राइतो, राईओ, राईड, गहि. राईहिनो, राई मुंनो, रायची, रायाओ, रायाउ, रायाहि, रायहि, रायाहिंनो, रायहिंनो, रायातो, रायेतो. (अन्)नी यां यार है, 'दिल्लकामयी 'अहदन' दुर्धाना अन्दानां को 'वीरनी उवां याय से बने साक्षी म्हेन्टा 'दयान' बने 'वचनां ताना बोटी विरला ते पानिप्रनाउथी ममी लेबी-इओ पारिता. १२-१२९ नेप्नां टिपना. , मंगष्ठः' उत्रयी 'नो' कर न थाय है- न्न, : -०३६ तथा इ... दिन-त्रो.

. अन्' (शो० रायादो, रायादु) (मा० लायादो, लायादु) (पं० रायातो, रायातु) स०- राइंस, राइमि राईमु, राई, रायसि, रायम्मि, राये रायेमु, रा. सं0- राया, रायो, राय, रायाणो, रावणो, राया. (शो० ० राय, राय, राया, रायो) (मा० लायं, लाय, लाया, लाये) ' छेडावाळो नामोनां प्राकृत रूपोनी साथै न शौरसेनी, मागधी अने पैशाचीना साधारण रूपो आपेला छे फर · रानन्' शब्दना पेशानीपोमा आ एक नाम विशेषता छे: पैशाची एकतनन बहुचन स.-'गनिना, रम्गा' (राक्षा) बी०-रागिनी, रम्मी (राज्ञः) म०१०-रानिनो, रन्मो (रानः) पं0- गनिनि, गन्न (गर्डि) নানান • अन ' डावाळा नामानां सीनिंगी रूपो प्रथमा अनं द्वितीयामा बराबर कुल' नी नयां पायो भने नाकी गाने ने भाषा प्रमाग मुलिंगी पानी को पायले. नमरे सायो 'गत्र ' मा पालियो-१. १९ • श्री मी (7.१६)मापीनी नामा ''अने'म'मी'पाप " " " उपा नगावेग . प, --

मुझम, मुघमाण (मान)
मन में मापाप्रमाने मनी रे.
मुत्रप्प मुमपाण (मभमन्)
मुन्नानि मुममा
मुत्रमारानि जनालाई
मुभमानि. मुनमाई.
मुभनागानि मुगाना.
मुमताजा.
प. इलिगी • अनमी पडे

मुपूस, मुपूसाण (मुखूपन् )
१ 'सुपूर्म,
मुपमाणि, मुपुमाई
मुपमाणं
मुपमाई
सुपमाणाणि, मुपूसागाइँ
२ नुपूर्व,
मुपुमागाई
मुपमाणं
सुपमाणि, मुपसाई
मुपुमाई
सुप्माणाणि, सुपूसाणाई
शेष म्पो, ते ते भापा प्रमाणे - पुस 'नी पेठे.
सुपमाणाई
मुअप्प मुअप्पाण (मुआत्मन्)
? मुअपं
सुअप्पाणि, सुअप्पाई,
मुअप्पाणं
सुअप्पाई
मुअप्पं
मुअप्पाणाणि, सुअप्पाणा,
सुअप्पाणाई.
मुअप्पाणि, मुअप्पा,
मुअप्पाई
मुभप्पाणाणि, मुअप्पाणा,
मुअप्पाणाई.
शेप, पुंलिंगी अपनी पटे
मुअप्पाणं
१ नुनं गयां.
२ मुभष्यं कुर्द,

: ( शौ० रायादो, रायादु) (मा० लायादो, लायादु) (पं० रायातो, रायातु) स०- राइंसि, राइम्मि राईमु, राई रायसि, रायम्मि, राये रायेमु, रायेमुं. सं०- राया, रायो, राय, रायाणो, राइणो, गया. (शो० पै० राय, राय, राया, रायो ) (मा० लायं, लाय, लाया, लाये) । अन् ' छेडावाळां नामोनां प्राकृत रूपोनी साथे न शौरसेनी, मागधी अने पैशाचीना साधारण रूपो आपेला छे फक • रानन्' शब्दना पेशानीरूपोमा आ एक खास विशेषता: पैशाचीः एकतनन बहुवचन -'गचिना, रम्ना' (राजा) बी०-राचिनो, रम्नो (राज्ञः) च. ३०-गनिनो, रम्नो (राज.) पं0- मं.- गचिनि, न्नि (गति) नान्यतरजाति उपर नणावा • अन् । छेडावाळा नामोना लीलिंगी रूप प्रथमा अने द्वितीयामा घरावर 'कुल' नी नेवा पाय अने बाकी कशते ते भाषा प्रमागे पुलिंगी सोनी ने पाय छे. मरे . सरम्यागगन 'ला पारिलो- १९३ २ श्रोत्र मागी (. १६) मागीनी रे पंचावीमा पन'' 'प्य' बने ''नो 'म' यार . त.- " " २०१ १-६ पूसा, पूमनु, पूमन्तु पूसाह, पूनहं पमाहो, पूनहो, पून, पूमा पून, पूना, प्रमागासु, मागनु, पूसागाई, पूसागहं पुमागन्म, पूमागाहो, पूसागहो, पूमाग, पनाणा. पूनाग, पूनागा पुनाह, पूनहु, पृमाई, पूनहुँ पूताहे. पूमहे पुमागाहुं, पूसागहुँ प्रमागाहु, पूमागहु, पूनागाहे, पूनागहे नि, से पूमाहि, पूनहिं पमानि, पुमान पुमागाहि, पुमागदि. ८ (२०) पनु. पुमो, पुमाहो, पुमहो पून, मा पून, मा पूनागाही, पमानही, पूमाण, पूनाना पुमाग, पूनागा. प्रमागु, प्रमागो, मुपूस, मुसाण (नान्यतरनाति) मुसाई, मुरमई सुमन, मुरमा मुसाई, मुमई मुपमा पुामा वाती यां: 'म'नं आ नो प्रनागे. २ २०० मुराय, सुगयाण (मुराजन् ) १ मुराय' सुरामाणि, सुराया, सुरायाई सुरायाण सुरायागाणि, सुरायाणा, मुरायाणाई. २ मुगयं मुरायाणि, सुराया, मुरायाई मुरायाणं मुरायाणाणि, मुरायाणाई, सुरायाणाइ. शेष बधा पुंलिंगी • रानन् ' नी जेवां . अपभ्रंशरूपी ए नामोना अपभ्रंशरूपो पण · वीर' अने • कुल ' नी । पाय छे. नेमके पूम, पूसाण (पन्-नरजाति) १ पमु, पमो, पम, पूम, पूसा पूमा, प्रमाण. पूमाणा. प्रमाणु, पूमाणा, एमाण, पूमाणा २ पूम, पुम, पूमा पुम, मा पूमाणु, ण, प्रमाणा प्रमाण, रमणा ३ संग, पूमेश, में प्रमाद, पूमाहि, महि দাগ, গুনাগগ पूमाहि, पमाहि प्रमाण प्रमाणादि. १ भगांना r १-६ पुमान, पुममु, पमन्नु पूमाह, पूमहं पमाहो, पूमहो, पून, पूमा पूम, पुमा, प्रमाणामु, पूमागनु, पुमागाह, पूसाणहं पुमागम्म, प्रमाणाहो, पूसाणहो, पूमाग, प्रमाणा. प्रमाग, पूमागा पुमा, पृतह, पुमाई, महुं पूमाहे, पमहे पुसागाई, पूसाण पनामाहु, पूमागहु, प्रमाणाह, पमाहे पृमि, पुरे पूमादि, पूमाहिं पुमागि, पमाणे पृमागाहिं, पुमाणहिं. ८ (सं०) पमु. पमो, पूमाही, पृमहो पून, पूना पुन, पूमा पुमागाही, पृमाणहो, पूमाण, पूमाणा पुमाग, पूताणा. पमाशु, पमाणो, मुस, सुपूसाण (नान्यतरजाति) सुपन, मुपसाई, मुपमई मपन, मुपमा २ हपृन मुसाई, मुपुमई मुपस, सुपमा वाली वयां; 'पृम 'नां आत्रंश यो प्रमाणे.

२००
मुराय, सुरायाण (सुराजन् )
१ मुराय'
मुरायाणि, सुराया,
सुरायाई
मुरायाण सुरायागाणि, सुरायाणा
मुरायाणाई.
२ मुगयं
मुरायाणि, सुरापाई,
मुरायाई
मुरायाणं सुरायाणाणि, मुरायाणाई,
मुरायाणाइ.
शेष क्या पुंलिंगी रानन् ' नी जेवा
अपभ्रंशरूपी
ए नामोना अपभ्रंशम्पो पण 'वीर' अने 'कुल' नी 1.
शाय छे नेम
पूम, पूसाण (पूपन्- नरनाति) .
प्रमु, मो, म,
पूमाण. पूमाणा.
माणु, प्रमाणा
माण, प्रमाणा
म, म, पमा
एम, पूमा
प्रमाण, माण, पुमाणा प्रमाण, प्रमाणा
माह, पूमाहि, महि
माण, प्रभाग पूमाहि, पमादि
पमा
गणादि.

२०० मुराय, मुगयाण (मुरानन्) १ मुराय सुरायाणि, सुराया, सुरायाई सुरायाण सुरायाणाण, सुरायाणा, मुरायाणाई. २ मुगयं मुरायाणे, सुराया, मुरायाई मुरायाणं मुरायागाणि, मुरायाणा, सुरायाणाइ. शेष मया पुलिंगी • रानन् ' नी वां . আহস্থা ए नामाना अपभ्रंशम्पो पण · वीर' अने । कुल ' नी थाय छे नेमके पूम, पूगाण (पन्-नरनानि) पमु, मो, पम, पूम, पूमा पमा, प्रमाण, पूमाणा. माणु, पूमागा, प्रमाण, प्रमाणा पम, पूल, पमा पृग, पुमा प्रमाण. पण, पूमाणा प्रमाणा, मणा मंग, पमंग, में महि, माहि, मार गुमागण, माग माहि, पमा पगाणे गाणा. २

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२०२ एम प्रमाणे राय, अप्प वगैरे ' भन्। छेडापाली नामोना जो अपभ्रंश रूपो करी लेवानां छे. [पूस, अप्प, राय यगेरे शब्दोनो शारसेनीरूपोनो पण भाभंशमा उपयोग भइ शके छे] • अस्' उहावा नामो ('नरमाति) प्राकृतमा अने पालिमा अत् । छेडापाव्य नामोनो रूपो अकारांत शब्दोनी नेवा थाय छे.' जेमके; सुमण (सुमनस्) १ सुमणो मुमणा २ सुमणं मुमणे, गुमणा मुमणेण, मुमणेणं सुमोहि, सुमणेहि, सुमणेहैं इत्यादि वर्धा ते ते भाषा प्रमाणे । वीर' मी जेवा समनवा. १ भी पृ. १२३ (नामनी आणिो) २१.१.-धन्यव्यंजनलोप. ३ गारिमा 'गुमस् ' (. घुम) शम्दना स्पोमा विसरता ते आप्रमाने १ पुमा पुमा २ पुमान म ३ पुमानो पुमानी पाने मे पुमानो प्रमानेत्रि पौर मुना

९प्रमाणे मुक्य ( मुवचम् ) मुभेद (घ) (मुमेधम् ) विमण
(विमनम् ) पचय (प्रययम् ) अने दुव्यय (दुर्वनम् ) वगेरे शब्दोनां
रुपो ममनयां
4
वीलिंग
नीलिंग नामी पनि प्रकारनांके, नेमके-आकारांन, इकारांत,
कारांत, उकारांत, उकारांत ।
आकारांत
१ प्राकृतमा आकारांत नामो नातनां छे, जमके-केटलांक
आकारांत गामानुं मूलरूप (संस्कृतमां ) अकारांत होय छे ते अने
पेटलांक आकारांत नामोनु मूलप (संस्कृनमा ) अकारांत नयी
-
मरस
पुमाना
पुमानेदि, पुमानैमि
पुमा, पुमरमा
पुमेटि, पुमेमि
पुमानेनु
पुमाद, मेनु
पुमाने
मे
पुमरिंभ, पुमन्दि
८ सं.--धर्म,
पुम
पुमानो
१
चन्द्रमा पर्नु प्रथमाना एकवचनमां 'चौदमा
थाय दे सने पाकीनां कुलो यकारांनी या चार भोपा
पृ. १३०-१३१ बने एना टिपनो.

२०४
.
होतुं ते. [ए बन्ने जातनो आकारांत नामोनों रूपोमो थोडं अंतर
छे माटे ज अहीं ए विभाग नणाव्यो छे.]
२ स्त्रीलिंगे यनार (संस्कृत ) अकारांत नामना वदना
'अ'नो • आ' थाय छेः रमरमा इत्यादि।
३ : विद्युत् ' शब्दने वर्गाने स्त्रीलिंगी व्यंजनांत शब्दना
छेवटना व्यंजननो 'आ' के 'या' थाय छः वाचवाआ, वाया इत्यादि।
४ स्त्रीलिंगी रकारांत शब्दना छेवटना रनोरा' याय
के: गिर-गिरा । धुर-धुरा । पुर-पुरा इत्यादि ।
५ नाना संस्कृत नामोना प्राकृत रुपो आ रीते थाय छः
'अप्सरस्-अच्छरसा । आशिप्-आसिसा । दुहित-दुहिआ,
ঘুমা ननान्द-नणंदा । नौ-नावा । पितृश्यमृ-पिउसिआ,
पिउच्छा। याहु-बाहा । माता-माआ', 'माय (अ) रा ।
मातृप्यम -माउमिश्रा, माउच्छा । बम-ससा ।
ईकारांत
१ सीलिंगे धनारा विशेषणयाचक अने व्यक्तिवाचक शब्दो
प्राकृलमा आकारांत अने ईकारांत बने छः
नीला, नीली (नीला ), हममागी. हममाणा (हममाना)
मन्त्री, मन्वा (गई ) सुप्पणही, मुप्पणहा (गनसा ) इत्यादि।
२ मम्तमा में शब्दो आ जणावेला (हेम० २-४-२०
अने पाणि• ४-१-१५ (मृत्रा ४७०) मूत्रथी इंकार
बनेने दादाने प्राकृतमा आकारांत अने शागत ममनवाना छे
, या गोमाना टाक सन्दो तो धागळ मानी गया
ओमकार 4८४-८६ नि. १०८-1..
• आगो माप-जननी-भरे.
३ मा मदनी देव यथं से,

सीप पा (अपनी... पदी, मया ( अविन्द्र मिश्रा पनी, श्रेणा (ही. (पानी). माह (पानी) पुराना बना दिया। प्रामासान मोरया (जागा : ..टा (स्किा) सीनिंगी नामांन बागना मान प्रत्यको ० . बी.-म न- अ, आ,,ए १०,२०-अ, आ, इप आ. ?.. ना, आ, उ, हिनी 'आ, उ ... हिहिहि पं0- प. , ची, ओ. 3, हितो, . . प्राकृत प्रत्ययान लगना नियमा है की अने • म्' मिायना प्रन्ययो पर रहेता पूर्वनी हस्व म्वर दीव थाय . म् ' प्रत्यय पर ना पूर्वनी दीर्घ म्वर हव थाय छे. ३ च्यां दान्य (०) हे त्या शब्दानु मृतनाप पण वपराय छ अंने नी मृटप हनान होय नो नेने दीवान कंगन वापरवान छे. २ १ साललयागन नाम्नी है. २ मा प्रत्यय आपागंन नागने लगाटयानी नयी.

४ संवोधनना एकवचनमा ईकारांत अने उकारांत नामोनी अस्य स्वर हस्व, थाय छे अने बहुवचन, प्रथमानी जैवु थाय छे. ५ संबोधनना एकवचनमा इकारांत अने उकारांत नामोना अंत्य स्वरनो दीर्य विकल्पे थाय छे अने वहुवचन प्रथमानी सर थाय छे. ६ ने आकारांत शब्दोचें मूळ (संस्कृत ) रूप अकारांत होय छे, ते शब्दोना अंत्य आ ' कारनो, संबोधनना एकवचनमा 'ए' विकल्पे थाय छे अने बहुवचन प्रथमानी सरखं थाय छे. ७ संवोधनना एकवचनमा, बीना 'आकारांन शब्दोचें मूळ- रूप ज वपराय छे अने बहुवचन प्रथमानी सरखं याय छे. विगेपता शौरसेनी, पेशाची अने मागधीमां पण स्त्रीलिंगी नामोने प्राकृतना ज प्रत्ययो लगाडवाना छे. मात्र मागधर्धामा छट्ठी विभक्तिमा फेर छे अने ए आ प्रमाणे छः फक्त आकारांत नामोने मागीमा छट्ठीना एकवचनमा 'ह' प्रत्यय अने बहुवननमा ' हैं ' प्रत्यय लागे छे नेमो, मालाह मालाह स्त्रीलिंगी नामोने लागता अपभ्रंश मत्ययो एकव. बहुव. उ, ओ,. बी०- १ भो पृ. २०४ मि० ५. . . उ, ओ,

२०७
हिं
च००-
.
हि
हिं
हो.
अपभ्रंश प्रत्ययने लगता नियमोः
१ अपनाना प्रत्ययो लागतां नामनो अंत्य म्वर इस्व अने
दीर्य थाय हे.
२ ज्यां शून्य छे त्यां पण उपरनो नियम लागु थाय छे.
माकत रूपाख्यानो
'माला
मालाड, मालाभो, माला
बी.- मालं
मालाड
मालाओ, माला
९ याकारांत स्त्रीलिंगी अदनां पालिस्मोः
-
माला, माटालो.
३-५ मालाप
मालाहि, मालाम.
मालानं.
मायाय
८ संपाटे
माटायो.

मालाअ, मालाइ, मालाए च०,00- माला, मालाइ, मालाए मालाहि, मालाहिं मालाहिं 'मालाण, मालाणं (मा० मालाह) पं०- मालाभ, मालाद, (मा० माला]) मालतो, मालाओ, मालाउ, मालाहिंतो मालामुंतो , मालाए, मालतो, मालाओ, मालाउ, मालाहिंतो मालाअ, मालाद, मालाए सं०- माले !, माला ! मालासु, मालामुं मालाउ !, मालाओ! माला! ए रीते नावा (नी) गउआ (गोका ) सद्धा (श्रद्धा ), मेहा (मेधा) पण्णा (प्रज्ञा ), तण्हा (तृष्णा), विजा (विद्या), पुच्छा (पृच्छा ) निंता. छुहा (क्षुध-जुह ) करहा (ककुम्-कउह), निसा (निशा ) अने दिमा (दिशा) वगेरे आकारांत शब्दोनां रूपाख्यानो • माला' नी पेठे छे. १ याकारात सीलिंगी सोने पष्ठीना पहुवचनमो मागधीनो है' प्रत्यय पण लागे छे. नेमके-सरित्रा+ सरिआणं, सरिआहे । মা মা, মাল। २ 'अम्मा' शहरतुं संबोधन कपचन 'अम्मो' पण माय छे.

२०१ चाया ( वाना) पाया वायाउ, वायाओ, वाया. वाया वायाउ, वायाओ, वाया. शेप रूपो 'माला' नी जेवां. परीने अच्छरसा ( अप्सरम् ), आसिसा (आशिप), धूआ, दुहिआ ((दुहित), नणंदा (ननान्ड ), नावा (नौ), पिउच्चा. पिउसिआ (पितृप्वन ), नाहा (बाहु), माआ,माअ (य) रा, (मात) माउसिआ, माउच्छा (मातृप्वम) अने ससा (ग्वस ) वगेरे आकारांत शब्दोनां रूपाख्यानो समनवानां छे. . . ५०- गई 'गइ (गति) गईउ, गईओ, गई गईड, गईओ, गई १ इकारांत स्त्रीलिंगी वादनां पालिरूपो: रत्ति (रात्रि) १ रत्ति : २ रत्ती, रत्तियो ५ रतिया गत्तया ग्त्तीहि, रत्तीभि. रत्तिया नियं रत्तीनं रत्तीमु यो पालिन० पृ. रत्ती, नियो

२१०
4
गईहि, गडहिं
गई हि
गईण, गर्दणं
गाईभ, गईआ,
गईइ, गईए
च०,०- गईअ, गईआ,
गईइ, गईए
पं.- गईअ, गईआ,
गईइ, गईए
गदत्तो, गईओ,
गईउ, गईहितो
स०- गईअ, गईआ,
गईई, गईए
सं०- गई ! गइ।
गइतो, गई ओ, गई,
गईहितो, गईसंतो
गईमु, गईसु
('गइसु, गइमुं)
गईउ, गईओ. गई
ए प्रमाणे जुति ( युक्ति) माइ (मातृ ) भूमि, जुवइ (युवति)
धूलि, रइ (रति ), बुद्धि, मइ (मति), दिहि, घिद (धृति )
अने सिप्पि, सुति (शुक्ति ) वगेरे इकारांत शब्दोना रूपाख्यानो
समनवाना छ
[सं० 'गा.' उपरथी पालिमा 'रत्यो,' 'रात्र्या' अने
राव्याः' उपरथी 'रत्या,' 'राभ्याम्' उपरथी रस्य यने 'ति'
तथा 'रात्री' उपरथी 'रनो' म्पो पण बने छ ]
१ ओ हे. प्रा-या. ८-३-१६

.
णु (धेनु)
घेणू
घेणूड, घेणूओ, घेणू
बी०- घेणं
घेणूड, घेणूओ, घेणू
त०- धेशभ, घेणूआ, धेहि, धेहि, धेहि
धेड़, घेणूए
च०,२०- घेणूअ, घेणूआ, धेतृण, वेणूगं
धेइ, धेशृए
पं०- गृअ, घेणूआ,
धेगृह, धेगृए.
धेठो, घेणूओ, घेणूतो, घेणूओ, घेणूड,
घेणूड, घेहितो घेगृहितो, घेणूमुंतो
स०-- घेणूभ, घेणूआ, घेणूम घेण
घेगृह, घेए
सं- घेण ! घेणु! घेउ, घेणूओ, धेगू
१ उपागंत ग्रीलिंगी गानां पालिकपी
पाग (पवाग)
यागु
पाय, पापी.
२ पागं
३-५ पानुपा
पा, पानि.
४-६ पाया
पानुपा
१
८
कामपो.
...६-१७

२१२
ए प्रमाणे गउ, कन्तु, विनु (विद्युत् ), उनु (मन),
पियंगु ( प्रियङ्ग) माउ (मातृ) दा (दहु) पड्डु (पटु), गुरु,
लाहु (म) अने का वगेरे उझारीत शब्योना स्पो • घेणु'मी
पेठे समनाना.
.
१०-
'नई (नदी)
नईआ, नईउ. नईमो, नई
नईभा, नईउ, नईओ, नई
10- नईम, नईभा, नईहि, नई हि, नई हि
नई, न
बी०- न
कागतीगी शठदना सिपी:
नदी
नदी, नारगो (नत्रो)
नदि, दिगं
नदिया (मना)
नहीं, नदीन
दिवा (नत्रा।
नदीन
.
""
1 नदियो (नात्रो)
... ना ना अन नाम भी si ort Trian
a, Rr, A प्रन नत्र

म.30-नन
नं..
पं. न.
नमो.न.ट.
म.
न
मं०--
नंगा नई नईओ, नई
प्रमागाई (गो) वापी (पी), कपटी (बदली),
नारी, कुमार्ग. नरीममणी (अमी). मावी. 'माही( मात्री),
पुढवी ( वी ), यागगमी. नगुनी ( नन्दी ! यी भी (बी) अने
परिणी ( भगिनी ) र कागन शब्दांना पाण्यानो • नई नी
नी- यह
'वह (वधू)
५०-
याउ, यहओ. वह
वहउ, व्हओ, वह
१ उनी १० ८३-बी-टाने के उपरम टिप्पर.
• अपागंन मिनिमी:दना पारितो:
वथ (माका)
पी.
१.
वधू
वया
वद्धिवान
नं.

मइहे, मईहे मद, मइहु. मद, मई. मह, मई. माहि, मईहि ८० मह, म महि, महि. माहो, मईहो, मइ, मई. पट्टी (प्रविष्टा-परिहा) १ पाढी, पति पहिउ, पढीउ, पहिलो, पडीओ पाढी, पति पट्टी, पक्ष पदविउ, पट्टीउ, पाहिभो, पाही भो, पाढी, पहि. ३ पण, ही पहिदि, पहीहि. पाटिल, पाटी, 2 . पति पहि म. पद पट्टी पनि नदी पहिलं पाहीहि पठिती, पाहाशे पार्टी पहि गग गु?, ? वी, मी , 'मा'मा 21-1 गनी १३ मा, मग २१७ २ घेणु, घेणू ३ घेणुए, धेणूए ४-६ घेगुहे, धेगृहे घेणु, घेणू घेणुहे, घेणूहे वेणुहि, धेहि ८ सं०-घेणु, घेणू घेणु, घेणू. घेणुउ, घेणूड घेणुओ, घेणूओ. घेणु, घेण. घेणुहि, धेहिं. घेणुहु, घेण्हु, घेणु, घेणू . घेणुहु, धेहु. घेणुहि, धेहि. धेणुहो, धेहो, घेणु, घेण. ५ वह १ वह, वह २ वह, वह वहुउ, वह बहुओ, वहओ, बहु, वह. वहुउ, यह बहुओ, पहओ, वहु, ह. वाहि, वाहि. वटुहु, वहद, वहु, वहः वर वह २ रहए, वह ४-६ काहे, वाहहे. गहु, यह ६ पाहवहहे प्रा०२८ ૨૧૮ ७ वहुहि, वहि ८ सं०-वहु, यहूँ वहुर्हि, वहि. वहो, वही बहु, वहू, ए प्रमाणे बंधा आकारांत, इकारात, इंकारांत, उकारांत अने "ऊकारांत शब्दोनां अपनंशम्शे वनावी लेवानां छे. 'सादि (स्त्रीलिंग) स्त्रीलिंगी सर्वादि शब्दोनां प्राकृतरूपा, शौरसेनीरू, माग- धीरूपो, पैशानीरूपो, अने अपभ्रशम्पा पूर्व जणावेला साधारण स्त्रीलिंगी शब्दो प्रमाणे समजवाना के. केटलाक स्त्रीलिंगी मवादि शब्दोना प्राकृत रूपोनी विशेषता आममाणे, [स्रोलिंगी सर्वादि शब्दोना · आकारात ' अंगना रूपों 'नी नेवा करवाना है. ईकारात अंगना रूपो नई नी नेवा करवाना के भने उकारान अंगना रूणे · धेणु' नी भेवा करवाना छ। माला क । मोलिगी सवादि शब्दोना पालिरूपो~- मध्या । सर्ग)ना वधागना पोः ४.६ म पम्मा (म० मया ) समास (सं० सर्वासाम् ) सव्वासानं ७ सबस्स (#. म म्याम)-ओपानिप्र. पृ. १४० अने टिपण. बाकी या मायना पालिरुपा जेवा.

'नी, ना, नी, णा (नन्) नाभा, नी, नीओ, सी. नाउ, नामो. ना. १ पनी ने बाईना म्यनना नया एट्टीना बस्दननांमा गंन गो ग भनी नमी. २ बी १.१८१ हैं ''सानु टिप्पा. ना (नद) ना यागना रुपीः नाम्ग (मं नरवाः) नादि, तानि. नाहि, नामि. दम्माय, नत्मा दाय नन्यादानं (मं. सामान्) नन्याः (तामानं नन्माद, नामा नाय नाम, नाम्गन अलाप, धमा दिन्माप, दिन उन्म (मनस्यान) तामा आनं, बामगनं ७ मानं नम, अन्न, यस्ता तिम, निन्ता नावं, टाय नावं, नाय याकी बयां 'माला'नी . -इनो पालिया १४३धने हिपा.

૨૨૪ कारांत (म्रीलिंग) ऋकारांत स्त्रीलिंगी 'मातृ' शब्दनां माआ' अने मायरा' आवां वे रूपो जूदा जूदा अर्थमां थाय छै ए आगळ जगावे छे, एयी एनां शौरसेनी वगेरेना बघां रूसो वाया'नी जेवा समजवानां छे, नेमके, माआ, मायरा (मान) प० माआ, माआउ, माआओ, माआ. मायराउ, मायराओ, मायरा. मायग ७ अमय अमूम थमुस्तं -~-वृनो पालिय. पृ. १४८ १ अओ १० २०४, नि. ५-'मायर' ने बदले 'माअर' पण यह शकेले २ प्रकारात स्त्रीलिंगी 'मातृ' शब्दमा पालिस्पो. मानु (मातृ) १ माता माता, मानगं. माता, मातरे. ૨ শান मावरा मातरेदि. मातरेमि. मातुया माहि, मानूमि. मत्या मानु मातरानं, मालान, मानुया मातून मत्या मातरि मातरेम, मातुया मान्मु. मत्या मातुर्य, मत्वं ८ सं.-मात, माता --ओ पानि १०८-१०९-११. अने एनां टिप्पण, माता, मातगे. nam २६५ त्री०- मान माआउ, मांआओ, माआ, मायर मायराड, मायरामो, मायरा. त०- माआअ, माआइ, माआहि, मामआहि, मामादि, मायराहि, मायराहि, मायराहि. मायराअ, मायराइ, मायराए ०८०-माआजा माआइ, माआण, माआणं माआए. ('माईणं) मायराअ, मायराइ, मायराए मायराण, मायराणं. पं0- माआध, माआइ, माआए, माअत्तो, माआओ, माअची, माआओ. माआउ, माआहितो. माआजा माआहिंनो. माआमुतो, मायराअ. मायगर, मायरत्ती, मायराओ. मायगण, मायगड, मायरतो, मायगओ, मायराड, मायराहितो, मायराहिती मायरामतो. सल- माआअ, माआई माआए, মাসাম্ব, মালা मायगअमायराइ,मायराए मायरा, मायराम. मं०- माआ. माआड, मामाओ, माआ, मायग मायगड. मायगओ,मायग. [माआ (मातृ-माना+माला) हुँ । 'माया' बनाने का माानी नेशनरूपी पनावी शाशर . . १ श्री १०५५ मातृ-भारमा ( मातृनाम् ) २ को प० १८ 'मादिमोदय २९ ['मातृ' शब्दना 'माइ' अने 'माउ' एवा पण ने अंगो बने छे, पण रुपाख्यानने प्रसंगे ते बन्नेनो प्रयोग विरल नगाय छ', सं० "दुहित'नुं प्राकृत रूप 'घूआ ' थाय छे ए आगळ अणावेर्नु छ एपी एनां बघां रूपो 'माला'नी नेवां थाय छे. " १ ओकारात • गो'शब्दनां नीलिंगी अंगी त्रण थाय छे नेमके *गोणी, गाई अने गउ. एमांना 'गउ'नां शौरसेनी वगेरेनां बघा १ जो हेप्रा० व्या०८-३-४६-"माईण" "माऊए मनिअं वंदे "'षड्भावाचंद्रिका'मा तो ए बने अंगोने रूपा- ख्यानने प्रसंग बधी विभक्तिओमा वापरेला छे-"इदुद् मातुः १-२-८३ पृ. १०८. 'माइ नां रूपो 'गा' नी जेवां अने 'माउ'ना रूपो धेणु 'मी जेवा थाय छे. २ धातु ( दुहित) ना पालिरूपो धीता धीता, धीतरो. २ धीतर, धीत धीतरी, धीवरे. ३-५ धीतरा, धीतरेहि, धीतरेभि धीहि, घीमि. धीतून धीतानं, घीतरानं धीतूम, धीनुयः धीतरेम. धोनुर्य जो पालिए. पृ. २१०-१११ ३ जूओ पृ०२०४नि ५. ४ 'गो' शब्दना प्राकृत रूपातरोमा 'गावी' 'गोणी' 'गोता' अने 'गोपोतलिकाने पण गणालांडे-महाभाष्य पृ० ५. धातुया धीतु, धीनुया धीतरि, , पो बराबर ' धेणु' नी वां थाय से अने • गोणी' गाई' नां पण शौरसेनी वगेरेनां धां रूपो बराबर नई नी नेवां रने नेमके, गउ (गो) प.- गऊड, गऊओ, गऊ. बी०- गट गऊ, गउआ गठहि, गडहिं, गऊहिं. गऊओ, गऊ. गण, गणं. गठनो, गऊओ, गऊउ, गउहितो, गऊमुंतो. १०१०- गऊ, गऊआ. गऊ, गऊए पं0- गऊ, गउआ गह, गऊए गऊतो, गऊओ गऊड, गाहिंतो गऊ, गऊआ गऊद, गऊए सं0- गऊ, ग, गउसु, गऊम. गड. गउओ. गाई, 'गाई, गोणी गाईआ, गाईट, गाईओ, गाई. , प्रीलिंगी 'गो' शब्दना पाठिापोः .. गो, गावी २. गार्षि, गाव, गवं गावी. गायो, गर्ने गावी, गायो, गवं गोणी गोणीमा. गोणीउ, गोणीओ, गोणी. वी- गाई, गाईआ, गाईट, गाईओ, गाई. गोणि गोणीआ, गोणीउ, गोणीओ, गोणी. गाईअ, गाईआ, गाईहि, गाईहिं, गाईद, गाई गाईहिं. गोणीअ, गोणीआ, गोणीहि, गोणीहि, गोणीइ, गोणीए. गोणीहि इत्यादि बयां नई 'मी जेवा. नो' शब्द्धनु बीलिंगी प्राकृत अंग · नाबा' थाय छे अने एनां बधा रूपो बराबर माला' नी जेवा बने छे, जेमके नावा नावार, नावाओ, नावा बी०- नावं नावाउ, नावाओ, नावा नावाअ, नावाइ, नावाहि, नावाहि, नावाहि नावाए इत्यादि वधा • माला'नी जेवा. प.- . ३ गावि, गाव, गय गोहि, गोभि. गापि, गाव, गव गर्य, गोनं, गुन्न. गाविं, गाव, गवं गोहि, गोभि. ६ गावि, गाव, गव गव, गोनं, गुन्न. गवं गोमु. ८ सं० गो!, गाय, गव गावी, गावो, गवो. --जो पालिप्र. पृ. १११.नु टिपण गावि, गाव, -~-

.
मंख्यावाचक गन्दो
विपनाः
? अट्टारम (अष्टादा) मुधीना मंत्र्यावाचक शहोने पटीना
बहुवननमा 'व्ह अंने प्हं. प्रत्यय लागे : महपगाहं ।
दुष्ह, दुन्दं । उभयन्त उपयर्ट वोर.
रक. पक, पग. पत्र ( पक,
आगन्दनां ने ने मापाना पुलिंगी रूपा • मन्त्र नी नवा गाय
मीनिंगी सो माया'नी नेवां थायरे अने नामकान्तिगी रूपी
नसकी मन्न' नी नेवा थाय छे. प.प्रमाण सा मंन्यादानक.
शब्दोमां यथासंभव ममनवान रे.
'उभ, उर (उभ)
आग्रन्दना नपो वा वननमां न गाय ये अनेमन्न 'नी
पट.
, मंण्यावामानां पालिम्पो
(या ५५.६८ वर्ष भारदर
नागमो भाग.)
'म नगर
उ. उभा
:

२३०
बी०- उमे, उमा।
तक-- उमेहि, उमेहि, उभेहि ।
न०,०-उमण्ह, उमण्ह ।
पं०- उभतो, उभाओ, उभाउ,
उमाहि, उभेहि,
उमाहितो, उभेहिता,
उमासुतो, उभेमुतो।
उभेसु, उभेहुँ ।
उम' नां अपभ्रंश रूपो सव्व 'नां अपभ्रंश रूपोनी पेठे छे.
प०-
'दु (द्वि) त्रणे लिंगना रूपो
आ शब्दना रूपो बहुवननमा न थाय छे.
दुवे, दोण्णि, दुणि, वेष्णि, विष्णि, दो, वे ।
बी०- दुवे, दोष्णि, दुण्णि, पेण्णि, विष्णि, दो, वे ।
त०- दोहि, दोहिं, दोहि,
वेहि, वेहि, देहि ।
'हि'ना पालिरूपी
१-२ दुवे,
३-५ दीहि, दीभि ।
दुविन, द्विग्नं ।
दी।
जओ पालिप्र. १. १७६

.
१०,०-दोह, दोण्हं, दुण्ह, दुष्हं,
वेण्ह, वेण्हं, विव्ह, विण्डं ।
५०- दुटो, दोओ, दोउ, दोहितो, दोसुतो,
वितो, वेओ, वेड. वेहितो, वेतो ।
म०- दोसु, दोमुं,
वमु, वेमुं।
'दु 'ना अपभ्रंश वगेरेनां रूपो । भाणु 'नां बहुवचनांत रूपो
मेवा के.
'नि (वि) त्रणे लिंगनां कुपो
मी०- } तिष्णि।
तिम्ह, तिहं।
शेष रूपो ते ते भाषा प्रमाणे ' इसि' नां बहुवचन रूपो नेवां थे.
दयो।
, पाटिमां नो 'ति' (वि) गन्दनांक पुलिंगमां, स्त्रीलिंगमा
सने नपुंसकलिंगमा हुदां पुदां गाय है, जम्के.
ति (पुंलिंग) ति (श्रीलिंग) ति (नपुटपटिग)
वित्तो।
तानि
चोदि,
दीहि
दीनि।
(निस) विन
तिन।
टीनु
तीनु
-जयो मात्र पृ० १५७
टोकि
४-६
तीनु।

.
Prime (Nimmune (ITA) अने अgt
m. सर (ATM) Tet सयोमा गोलीको
Prart.
कर (कनि)
( नाम मोर भाग)
14 In साणे :m मा ATTAlt ri
Im HTTA1 भाint wil
harat Timilain
mhin
If (नि)

'मनीमा । पानामा नमान) बानीमा (हणितानि नामा (प्रयोविनि) (मान) गामा (ममिति) पनी (पंचविंशतिः पनामा सीमा (पारित) (पद्रविशनि सीमा । पत्रित) मत्तामा (माविधानि मानीमा भवानीमा अहवीमा (जावितात) अहतीमा अटवीमा ੧॥ है । अधिशन्। पगगनीमा (योनत्रिशत) गणवलालिमा एकानमन्वाचित) नामा (मिगत) नतानिमा (नवाग्दिान) एगीमा एमनतान्टिमा एनीमा (एकत्रिशन्। पनतालिमा एकनीमा) पपत्तालिमा (एकनवाशित) वतीमा (द्वात्रिंशन्) गयाचा (मनतिगत) , पामिनापामा चीमा न अपनाk करनन नदीम ' याय (जो पानिमः १० १६. नि १२) अंग परुष मानदिल्यमापन गए है. म; " नाम पिडिता' (भनुचिनिनर) आनामचंद्र चवीम' को दिनीया विनियान्द मम अने उपयुन वास्यमा दिनाना अयं पटनी नयी ५० प्रथमा 'नायटेद थी "क्याय मानक दिनीया पण मगर .-(था। :

छचतालिसा } (पट्चत्वारिंशत) बेआलिसा चोदण्णा वेआला (द्विचत्वारिंशत्) चउपण्णासा (चतुप्पश्चाशत्) दुनत्तालिसा) पणपण्णा तिनचालिमा) पणपण्णासा नेआलिमा (विनत्वारिंशत्) नावण्णा (पञ्चपधाशत्) आला छप्पण्णा उनतालिमा छप्पणासा पट्पचारात्) मोआलिसा नोआला नतुश्चत्वारिंशत्) सत्तावन्ना चउआला सतपण्णासा सप्तपश्चाशन्) पणनतालिसा (पश्चन्वारिंशत्) अट्ठावन्ना पायाला अडवन्ना (अष्टपश्चाशन्) अट्ठपण्णासा छायाला एगूणसद्धि (एकोनषष्टि) मतनत्तालिमा (मप्तचत्वारिंशत्) सष्टि (पष्टि) मगयाला एगमहि अचवालिसा (एकपष्टि) (अष्टनस्वारिंशत्) इगमट्टि अड्याला बासद्वि (द्विपटि) एगगपणाम्मा (एकोनपमाशत) तेसद्धि (त्रिषष्टि) पगामा ( पचाशत्) एगपणामा । (चतुप्पष्टि) करण्यामा एकपधान) पणसद्धि एक्पष्णामा ( पसषष्टि) বা। छामहि (पट्पष्टि) बावणा ससहि (सप्तराष्टि) } (द्विषधाग) टप्पागामा नवगा अमहि। (अपष्टि प्रणमनार (एफोनमप्तनि) मउमहि। मोमहि अरमहि। नियामा(विशाशन) २३७ एग'सतरि । मतरि (माति) मत्तामीट (मप्ताशीति) अहामीट (अष्टानीति) विमति (एकसमनि) নার্মা (नवाशीति) ना(विरासस पणनवर ( एकोननवति) (द्विमानि) मावतरि न (नवति) तिमतरि (त्रिसमति) শেয়ার (एकनपति) नोमतरि इगणवह (चम्ममति) नरमतरि ( विनवति) पण्णसत्तरि (पञ्चमति) नेणवह (विनवति) ਤਰ (पटसप्तति) घउणयह चतुर्नवति) नाणवट मत्तमचरि (सप्तसमनि) पष्णणवह असतरि (अष्टसप्तति) (पश्चनवति) বস্থা: एगणासीर (एकानाऽशांति) . प्रणवद (पष्णवति) असीट (अशीति) मन(चा)गवद (सप्टनवति) पगासीर (एकाशीति) अट्ट(ट)णवद (अष्ट नवति) वासीह (द्वपशीति) ण(न)वणव (नवनवति) तेमी (ज्यशोनि) एगणमय ( एकोनशन) चउरामीइ मय चांगमांट (चतुरशीति) दुमय (द्विशत) पणसीर ( पधाशानि) निमय त्रित) छामीद । पहशीति) वे मयाई-ब- (द्विशन । मत्तार ने बदले 'हनार - नन्द पम प्रयोगमनुमारे वसाय है.

निष्णि सयाई-अगसँ (त्रिशत) | लक्स
पवारि सयाई-नारसे (नतुश्शत) दप्त(हालकाय
इत्यादि.
पयुभ(त)
महम्म (सर)
दर(स)सहस्म (दशसहय)
कोडि
अयुम(त) (अयुत)
(नक्ष)
(दशलक्ष)
(प्रयुत)
(कोटि)
(कोटाकोटि)
| कोडाकोडि

प्रकरण ११ कारक-विभक्त्यर्थ नेम संस्कृतमा छ कारक छे तेम अहीं प्राकृतमां पण छे अने तेनी बधी व्यवस्था मंस्कृतने अनुमारे समनी लेवानी छे. परंतु अकेटलाक साम विभक्त्या छेतेने अही जणावी दईए छीएः १. प्राकृनमां केटलेक टेकाणे द्वितीया, तृतीया, पंचमी अने मतमाने स्याने पण पष्ठीविभक्ति वपराय :- सीमावरमा वंदे [ सीमाधरं वन्दे! धणम्म लद्धो [धनेन लब्धः ] चौरम्स बाहह चौराद् निभेति ] अंडरम्म रमिदं आओ [अन्तःपुरे रन्नुमागतः ] २. कोई कोई टेकाने द्वितीया अने तृतीयाने बदले ममी दप- राय :- " सानां नमः । १ मंन्द्रामा पन ही विनिनो आयो इ.उपग पराली है। মন মান नेवी मानुः स्मरनि। अन्नं नाहि अन्नसनी देह। काटेरनमः अगदसति गरसार गतां मिले। " (:.:-:-५०) मा "" (१०:२८ . मनु निगर "

'नयो न जामि [ नगरं न यामि ]
तमु अलंकिआ पुहवी [तरलंकृता पृथ्वी ]
३. त्यांय क्याय पंचमीने बदले तृतीया अने सप्तमी वपराय छे:--
नोरेण बीहड [ नौराद् विभति]
अनेउरे रमिउं आगओ राया [अन्तःपुराद रन्ता
आगतो राना]
४. कोई ठेकाणे तो सप्तमीने म्याने द्वितीया पण पराय छ:-
विजुजोयं भरइ रतिं । विधुदुद्योते स्मरति रात्रिम् ]
१ मंस्कृतनी रोते पण आ याक्यमा नगर'ने कर्म'
कही शकार भने 'आधार' पण ही कार एटले नगरे न यामि'
अने'नगरं न यामि' ए बग्ने यात्यो नियमन ,
२ आ यास्यमा जो 'ते सत्म' ('प्रोमा विद्यमानतामा')
एवो अर्थ विभिन होय नो संस्कृनमा पण 'ते: अलंकना पृषी' मा
वासन यदने, 'तए अपना पी' आवु समीयान्दु वाम था
क.
३-४ अहा जा नौर ने भगना करण तरीके भने
अंत:पुर' ने मनाना आगर' के पदयानो आश्यपतो
मत'माग
र अन्त पो गया' वगेरे यार
* आशाम ढम या निकालन समरग'
भाग वायो, पनी से स्म' थाय रे,
गोधा मन जावा योगा प्रसंगमा 'निने
'दली 'नि. वसीम अाधा हम नये है.
-(भयो ... ८-३-१३.१ १.८) मारेर

विवरण करतां नवांगी टीकाकार आचार्य चमदेव एप्रयोगमा आवेरा वास्पालंकारस्पेमानी एप्रयोगने 'सानी 'वितियाये न जनाये.आचार्य अमपदवी हि ए पदोनो पदद याप्रमाणे : ते काले भ, ते समए - 'ते' इति प्रातलीयत् 'तरिमर'xxx'' पारोऽन्यप्रारि वासाकाराय:, xx पाले ४ अपरमिनीचनुविभागलधने, xxx सो पारस्पैर विहि मागे " -ओ भगवती सूत्र रा०पृ० १८ टीका, शटा. दर टॉस १ मिति एमासदार टीका ११ समिति, एममोग दिपरप करता आचार्य र माग मनपदेपनी मेटे पूर्व प्रमाणे उसाचे ऐः-सूया सूत्रादिना टोरा ५. आप अनदेव ए दो संरहता 'टेन कालेन तेन स्मन' पल को अनेभा पना देखा था पापमा तृतीयानो यमं पा 'टीस' में रयान 'ग' रोशनी मुचना पाला नई अपामृत चन्द, रतः 'हन पाटन दिन्टेन, हर रपरेन रेट्दैन"- मास्ट: एक पृ० १८ र mo- -

२४२
प्रकरण १२
आख्यात
संस्कृतभाषामा धातुओना अनेक प्रकार छ, नेमके, पेला
गणना, बीमा गणना, मोथा गणना, छहा गणना वगेरे. तेमा पण
प्रत्येक गणमा धातुओना प्रण पेटा प्रकार छः परस्मैपदी, आत्मनेपदी
भने उभयपदी. आम होवाची संस्कृतमा घातुना रूपाख्यानो अनेक
प्रहारना थाय. कारण के, सेमा प्रत्येक गणनी निशानीओ
(वितरण प्रत्यगो) नदी नदी छे, प्रक्रियाभो जुदी जुदी के,
आत्मनेपद तथा परम्मैपदना प्रत्ययो पण जुदा जुदा छे.
पालिमा केटला संस्कृननी ने छ पण तेमा वैदिक संस्कृतनी
पं? आत्मनेपद भने परम्मैपदनो नियम अमोकस छे. प्राकृतमा तो
भात्मनेपद भने परम्मैपदनो कोई नियम ज नथी. जो के प्राकृतमा
वर्तमानकाटना केटसार प्रत्ययो मस्कृतना आरमनेपदी प्रत्ययो साये
मटना आगे पण प्रत्ययो दोक पातुने लगाडी काय छे.
पालिमारगम'' आपैया नियमो उपाधी ममनी शाप से
से, मतली पेट गणभेदने ली पालिमा । ते यातुनो को न
जाने पण प्रात या रणना निगमोमा नेम नथी. प्राका
VIE TRAI नपाना नापा गणना बानुनी एक मराणी प्रक्रिय
14 नामामालिन
दी आपण ममतमा माता तुना गणना की nir.'
.
* 43 44 45 44 44-44
.
म..

एकंदर रीते संस्कृत करता पालिनी आम्यानप्रक्रिया मरत के अने प्राकृतमां तो ए मविशेष मग्न. विभक्तिी पर्वमाना, समी, पंचमी, यस्तनी, अद्यतनी, परोक्षा, आशी: (आशिरर्थ), श्वस्तनी, भविष्यन्ती अने क्रियातिपत्ति एम 'दस विमतिओ संस्कृतमा छे, पालिमा आशिरर्थ अने श्वम्तनीनो प्रयोग नथी भने प्राकृतमां पंचमी अने सप्तमी एक मरखी छे, ह्यालनी, अद्यतनी अने परोक्षा एक मरग्बी छे, बननी अने भविष्यन्ती एक. सरखी छे पटले वर्तमाना, आज्ञार्थ-विध्यर्थ, भूतकाळ, भविष्यकाळ अने क्रियातिपति ए पांच न विभक्तिओ क्रियापदने लगती छे. आख्यातने लगतो विमतिपयोग मंस्कृतमा ने मीणवटधी करवामां आवे छे तेवी प्राणवट पालि के प्राकृतमा नथी. पालिमा ए दरेक विमचिना प्रत्ययो नुदा जुदा छ पण प्राकृतमां तो आगळ नणान्या प्रमाणे ए पांच विमक्तिओमां न मननी वषी विभक्तिमओ समाएटीहे. आ चालु प्रकरणमां आम्न्यात विस अने केटलांक वृदंत विपे समजाववानुं छे पण धातुओधी बननां दरेक नामो विपे कोई कहेवानु नधी माटे ज धातुना उपयोगनो विमाग करतां अही नणावबामा आवे छे के साहित्यमा धातुओनो उपयोग खास करीने में प्रकारे परलो छः क्रियापदरूपे अने कृदंतम्पे, ২ ঢাণিনিনা ৰুন এমাণ ৮ ও বিপণিমালা নাম গা प्रमाने थे लट् ,विधिलिद, लोट, रदः, दिट, थायोलिंद, दुर, - २४४ - . क्रियापदरूपे वाराता पातुना पाम्यानचें नाम 'मान्यात छे अने पतरूपे वाराता घातुना रूपाम्गानने 'नाम' कहेवामा आये, आम्यातरूपे वाराता धातुना पाम्याननी विशिवता आ, प्रमाणे करिरूप, कर्मणिरूप, भावरूप (सहामेद), प्रेरककरिब, प्रेरककर्मणिरुप, प्रेरकमावेरूप (प्रेरक सम्बभेद) इत्यादि । कृदंतरूप वपराता धातुना रुपाम्यानना अनेक प्रकार आ रीते छः वर्तमानदंत, प्रेरकवर्तमानपदत, कर्तृभूमकरूप, कसरि भविष्यत्कृढ़त, प्रेरकमवियत्कृदंत । कर्मणि अने वर्तमानकृदंत, मविप्यत्कृदंत, प्रेरकवर्नमानदंत, प्रेरकभविष्यत्कृदत, भूतकदंत, विध्यर्षकदंत, प्रेरक मावे-सबभेद भूतकृदंत, प्रेरकविव्यर्थमृदंन । भावरूप } हेत्वर्थकृदंत अने संबंधकभूतकृदंत । आ प्रकरणमा अही जणावेला क्रम प्रमाणे रूपाख्यानोनी सम- जूती आपवानी छे. फर्तरिरूप प्राकृतमा धातुओनी ने भात छः व्यंजनांत धातु अने स्व. रांत धातु १ व्यंजनात धातुना छेक्टना व्यंजनमा 'अ'कार उमेराया परीन तेनां रूपाख्यानो थाय छे अने एउमेरातो अकार विकरण- रूप लेखाय छ। .

२४५
.
भग् + अ-मण-पगड़ (मगनि)
कट् + अ-कह-कार (कथयनि)
मम् + अ-मम (शाम्पति)
हम + -हस रसद (एमति)
आव + अ-आव-आवट (आमोति).
सिंच + अ-सिंघ-सिंच? (सिधति)
रन्यू + अन्ध-कन्वर (रगदि)
मुम् +अ-मुस-मुमर (मुष्णाति)
तण + म-नग-नगर (तनोति)
२ भकारांत सिवाय बाकीना स्वरांत धातुओने पग विकरण 'भ'
विकासे टागे ः
..
.
नम्म
पा+ अ-पास-पाअइ, पाइ (पाति)
ना + अ-नाम-माअइ, जाइ (याति)
घा + अ--धाअ-धाअड़, धाइ-(धयति, धावति, दधाति)
सा + अ-माअ-माअइ, माह (ध्यायति-)
अ-मम्माम-जम्माइ (नृग्मते)
वाअ अ-वाम-वाअइ, वाइ.(वाति)-
मिला + अ-मिलाम-मिलाअह, मिलाइ-(म्लायति)
विकी+वि + विकेम-विकार, विक्केर (विक्रीणाति)
हो+अ-होअ-होअड़, होइ (भवति).
हो + अ-होम-होइऊण, होऊण (मृत्वा)
३. उवात धातुना अंत्य उवर्णनो 'अन्' थाय :
पह-हबू+अ-प्हव-हबद (हनुते)
निम्हवद (निनुते)

२१
हु-हव्- हव-हवइ (जुहोति)
निहवइ (निनुहोनि)
चु-च-चव-चवइ (च्यवते)
-रव-रव-रवइ (रौति)
छ-फ-कव-कवइ (कौति)
स-सव्-सत्र-सवइ (सूते)
पसकइ (प्रसूते)
. ऋषोत धातुना अंत्य ऋवर्णनो अर' पाय छैः
कृ-कर-कर-करइ (करोति)
धृ-घर-घर-घरइ (घरति)
मृ-मर-मर-मरइ (प्रियते)
ह-वर-पर-वरह (वृणोति, घृणुते )
स-सर-सर-सरइ (सरनि)
ह-दर्-हर-हरह (हरति)
ह-तर-तर-तरह ( तरति)
तृ-जर-मर-नरइ (जीर्यति)
५ उपांत्यमां ऋवर्णवाळा घातुना ऋवर्णनो अरि' थाय छः
क-करिम–करिस-कारसइ (कर्षति)
मृप्-मरिस्-मरिसइ (मृप्यते)
दृष्-परिस्-परिसइ (वर्षति)
हप्-हरिस्-हरिसइ (हप्यति)
१ धातुना 'इवर्ण' अने 'उवर्ण'नो अनुक्रमे 'ए' अ 'ओ' पाय :
नी-नेह (नयति)
नेति (नयन्ति)

उही-उहेइ (उइयते)
उति (उपन्ते)
नि-जेऊण (नित्वा)
नी-नेऊण (नीत्वा)
७ केटसाक घातुना उपांत्य सरनो दीर्घ पाय छे:
रुप-कम-कस-कसर (रुपति )
तुप्-तस्-नूस-तुमइ (तुप्यति )
गुप्-सूस-मस-ससह (शुप्यति )
दुप्-म्-इस-टूमर (दुष्यति)
पृ-पम्-पृम-पृसद (पुन्यति)
सीसद (शिष्यते ) इत्यादि ।
८ धानुना नियत स्वरने म्याने प्रयोगानुमारे बीनी दर पर
-
पाय :
विल-दा-हिया ( भवति)
विर-चुना (चिनोनि)
मदरण-महान (प्रदानन)
पादर-दर (पादति)
रह-रोवर (रोदीति) इत्यादि।
नित-दा-दे-देद (दपाति, दानि. ए)
रा-रे- (लनि.)
विश-दिट-हिर (दिति, मिनति)
-मि (दर) त्यादि।
(केयर ने अन्य गोगाटार बदल
R.- पुस (एट')
पाटा)

ર૮ पमीलइ पमिल्लइ (प्रमीलति) , . ):.. लिमीलइ, निमिल्लइ (निमीलति) :, . ) संमीलद, संमिलइ, (संमीलति)): उम्मीलइ, उम्मिल्लद (उन्मीलति) इत्यादि। नि०-निम्मद (भेमति) परिअट्टा (पर्यटति) सकर (शक्नोति) पलोट्टर (प्रलोटति) लग्गइ (लगति) सुइ (घुटति) मग्गह (मृगयते)। नदृइ (नटति). नस्सइ (नश्यति) सिन्वर (सीव्यति) कुप्पद (कुप्यति) इत्यादि। १० केटलाफ धातुओना (प्रायः संस्कृतनो विकरण उमेराया पछी ' छेडावाब धातुओना ) अंत्य व्यंमननो प्रयोगानुसारे 'ज' थाय छः संपजइ (संपघते) सिजद (विद्यति) खिबर (खिद्यते) 'सिजिरी (स्त्री, स्वेदयित्री) इत्यादि। ११ उपरना नियमोयी तैयार थएला थातुना अंगने वर्तमानकाळया नीचे जगावेला कर्तृवोधक प्रत्ययो टांगे है। १ जूभो ०३३-द्य, य, ये-ज (नि. २७) २ गलिमा 'वर्तमामः 'ना प्रत्ययो आप्रमाणे : • आत्मनेपद वार , . . . परस्पत. य यति सो पालिया -MA.

२८९ बहुव०- एकव०- 'मि, १ पुरुष मो, मु, म. इत्या, ह. मो', , न्ति, न्ते, हरे'. सर्वपुरुष-मर्ववचन-ज, जा. १ 'मि' प्रत्यय पर रहेता धातुना अकारांत आना अत्य नो विकल्प • आ' याय छे. ' अने 'म' प्रत्यय पर रहतां धातुना अकारांत अंगना अत्य : अ'नो विकल्प 'आ' अनेइ' थाय छे. ३ उपर मणावेला वधा प्रत्ययो पर रहेतां धातुना अकारांत अंगना अंत्य 'अ'नो विकल्प 'ए' थाय छे. [नामनां रूपोमा पालिमा अने प्राकृतमा सविशेष . समानता है तेथी नाना प्रकरणमा स्पळे स्थळे समानता यवावया पाटिनां रूपी पिस्तर मूकलां है पण धानुनी रूपोमा तेम नयी, तेयी आ प्रकरणमा ज्या जांजेटली समानता है तेटलो उदार करवामां आवो पण धातुन पालिरूपोनी घागतयी नोध नहि करवामां आवे] १.केटलेफ ठेकाणे 'मि. प्रत्ययने बदले 'म्' प्रत्यर पर यर. राएलो छे:-मरं, ममि (प्रिये) । सर्क, समामि (शस्नोम)। २ से सने 'ए' तथा शारसेनीनो''अने पेशाचीनी प्रत्यय, धानुना अकारांव संगनेज लगारवाना अधात् सकारांट सियायना धानुना अंगनेए बने प्रत्ययो लागता नमी:- पा-सि-शासिपा+-पाद (मासे, अने पाए, रूप धार नह). ३ कोई वाण भा 'दस्या' प्रत्यरत्रीचा पुरसना एफपवनमः पण परराएगो मोहत्या, रोयर, गेयए-(रोचते). ४.आय.व्यचित सचिन्दा राम नयां न पराएतो हे. उमफे-यूसद, सूमर-(एमति).' - M - - पा०३२

२५०
४ ज' अने 'I' प्रत्यय पर रहेता तो धातुना मारांत अंगना
अंत्य 'अ'नो'ए' पाय छे.
शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभशमापामा वर्तमान•
कालने लगती शेषतावाळी प्रक्रिया आ प्रमाणे :-
शीरानी-मागधी
मि
इस्था, घ, ह)
मो, मु, म ।
पैशाची
भारसेनी प्रमाण
"
२१. नि, ते गौग्मेनी प्रमाण
प्राश
रु, मो. मु, म ।
3, घ, इत्या ।
नामा मानराना प्रयया यागद पाना मने
मायने शोरमनी, मागी पनी अंने
का पतमानाना प्रथयो लागता पग समनी गन.
माने भारत की पग त्यो सपो .
भादन rian (4m नी )

नणावी छे ते बची शौरसेनी, पेमाची, मागी अने अपवंशमां समनी देवानी है. व्यंजनांत घातुनां रूपाख्यानो एकवचन प्राकृतर- शारमनीर- पंशाचीनः- अपभ्रंशन- 'मागीन०- १ पुरुष-हसमि, प्राकृत प्रमाणे प्राकृत प्रमाणे हसामि, हमे. हममि, हम, हमेत्र, हमेना। हसमि. हमामि. हसेमि, इसेत्र, २ पुरुष-दससि, प्राकृत हसेसि. प्रमाणे हमसे, हसेजा। प्राकृत प्रमाणे हसेसे, हमेन, हसहि, हसेहि, हससि, रसेमि, हमसे, हसेस, हसेज, होना। ३ पुरुष हसह, हमेजा। हमाद, हसनि, हमदि हसेड हसदि, हमति, १ सोम-. २०नि()समि वगेरे. हसदि, हमते, होते, हसदे, हमेर, हमार, हसे, हसेन. हमेज, होना। हसेजा। संत्र, हसेजा। हसेर, हसप हमेज, हसेना। पहरापन मामा- शौरसेनी- पैशानी०- अपगम- मागधीम०- १ पुरन-मो, प्राकृत प्रात हमामो, पो प्रमाणे हमिमी, प्रमाणे हामी, हमेमाः इमामो, हमिमी, हमेमो, हमिम, एमा, रममा गेम, हमामा इसम, हमपा मामा मेट मिस, एममा प्रगमन रमना। प्रमा -- १-माया, ममा, 'मिया, हमित्या. हत्या, हमेमा, एमा, मेर हमेध. एमेड रमेना। हमेर, मेड हमेना। एमात्या, रमित्या, एमेचा, एमा, हमेध, . हसेट हम, हमेज, মান पुरुप-रसन्नि, हमेंनि, हमिति, हमेजा। म्पो प्रमाण सारनी रुपो प्रमाण हमने, हमहि, हमेहि, संनि, हमनि, मो. ९६ स्वग्टोर निदम + इत्यादरिया । २ मानना हमति, भंते यारे स्पो टपरी औरसनीमां हमीद, बगेरे म्यो पर मायः ययाममय ५४ जमी नि० (१)न्तन्दा ३ जयो पृ. ४ नि: ?-वति + एसिनि ।

होना २६. होएइत्या होएइत्या होएबेह, होएजेर होएजइत्या होएग्जरत्या होएजाह, होएबाप होएजेइत्या होएग्जेइत्या होग्नह, होग्नध होएग्नाइत्या होएग्नाइत्या होग्नेह, होज्नेष होग्मात्या होग्नेइत्या হলা, মীনাথ होग्नेहाया होग्नहत्या होह, होप शेग्नाइत्या होग्नाइत्या होभइत्या होइत्या (होत्या') होइत्मा होएहत्या होम होम्ज, होना होएग्नइत्या होएग्नेहत्या होएग्नाइत्या शेग्नहत्या होनहाया रोनाइत्या होत्या । पुरन-होभन प्राकृत शौरमेनी हामहिं होपनि गी प्रमाणे होह भन प्रमाणे होपान होपातहि होगामा हंपी होम पनि १ श्राप WomartAn'stu Trt- . ...

होएजेंति होरमते होरो होनहरे होएज्नेहरे होएम्नांति होएते होएग्नाइरे हानि (हुनि) होते (हुने) होड़ने होन्नति, होति होते, होग्नते होनहरे, होम्नेदरे होनाहिं होहिं होनि, होएति होते, होईते होअरे, होररे होएग्मंति, होएडति होएग्नते, होएनते होएज्नहरे, होएम्नेहरे होएम्मानि होएगाते होएग्माइरे हॉति (हुति) होते (हने) होहरे होम्नति, होग्नेति होत, होन्नने होग्नहरे, होग्नेहर होनाते होन्नाइरे होना। होम्मांत हाम्जाइरे होग्न होना गने दरक स्वरांत धातुनी (दा, पा, नी, ना, वू दरेनी) परनी की प्रक्रिया 'हो'नी पेठे समनवानी .

२६२ भूतकाळ (स्वरांत अने व्यंजनांत धातुने लागता प्रत्ययो) १ संस्कृतमा भूतकाळना प्रण प्रकार छे, नेमके-धस्तनभूत, अद्यतनभूत भने परोक्षभूत. ए प्रणे काळना प्रत्ययो भने प्रक्रिया पण संस्कृतमा तद्दन जूदां नूदा छे. परंतु प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची के अपभ्रंश भाषामा तेम नथी. तेमा तो ते त्रणे काळ माटे एक सरखा न प्रत्ययो छे. एटलंज नहि पण ते त्रणे काळना. त्रणे पुरुषोना अने प्रणे वचनोना पण एक सरखा ज प्रत्ययो छे अर्थात् भूतकाळनी प्रक्रिया के रूपमा प्राकृत, शौरसेनी वगेरे भाषामां क्यांय कशो भेद जणातो नथी. प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रंशमा भूतकाळना ए प्रत्ययो आ प्रमाणे छ:- (व्यंननात धातुने लागतो प्रत्यय) ३ पु० 'सी, ही, हीअ (स्वरांत धातुने लागता प्रत्ययो) " १ कोईनो मत एको छ के, यर्तमानकाळनी पेठे भूतकाळमा पण 'ज' अने 'जा' प्रत्यय वपराय छ:-होज, होत्रा-(अभून्) २ पालिमा श्रीजा पुरुषना एकवचनमा 'ई' अने 'एम 4 परस्मैपदी प्रत्ययो छे अने ए, प्राकृतमा 'अ' प्रत्यय साये मळता आरे छे. पालिन.. २१७ नि. १७६ ३ पालिमा श्रीडा पुरुषना अने बीजा पुरुषना एक्यचना पर. स्मैपदी 'सि' श्यय पराएलो हे अने ए, प्राकृतना • सी' प्रत्यय माथे मळतो आये . जेम प्राकृतमा ऋणे पुरुषमा एक सरमो 'सी' प्रत्यय स्वगन धातुने लगाइगमा आये छ तेम पालिमा चणे पुरुषमा एक मरम्यो सि' प्रत्यय स्वगन धानुने गादयामा आये छे. मात्र पालिनो एभि ' प्रत्यय प्रथम पापना पकानमा अनुस्वारपाठी (सं.) वर , एटोज भेद | पाणिन. २१८ नि० १७९

गंननांन पान-मन-सीर ।
कर+अकागजा
भाभ-मी।
पगने ग्यमनांत धादनां मृतकालना स्पो साधयानां .
म्परांन धातु-मो+मा-होमी हो+ही-रोही होहीम-होरीभ
होगी होभरी होमहीम
पा+मीयामी) पा+ही-पारी पा + होम-पाहीभ
पामी पामही पाही
टा+सी-टामी टाही-टाहीटा + होमटाही
टाअमी टामही दामही
ने मी नेमी / ने + ही-नेही / ने + हीअ-नेहीम
नेअमी नेही
टासी, दाही, लाहीअ, लाअसी, लाभही, लाभही।
उ+ मी उद्देसी, उद्वेअमी, उदेही, उडेभही, उदेहीम,
उद्धेअही।
ए रोते स्वरांत धातुनां भूतकाळनां रूपी साधवानां .
[उपर जणावेला मूनकालना प्रत्ययो करतो केटलाक जूदा
प्रत्ययो पण आपग्रंथोमां वपराएला छे, आपापोमा विशेष करीने
पाटिलो
एकता
, हामि
नेअही

२६५ छे त्या, इत्य, इत्था, इंसु अने अंसु, ए चार मत्ययो वपराएला छे. तेमा 'त्या' अने · इत्या, ' घणे ठेकाणे एकवचनमा वपराया छे अने इंसु ' तथा असु' घणे ठेकाणे बहुवचनां वपराया छे. ए जातनां केटलांएक आपरूपो जोवायी एवं अनुमान बांधी काय छे के, श्रीना पुरुषना एकवचनमा 'त्या' अने ! इत्या' वपराया अने बहुवचनमा · इंमु' अने · अंसु' वपराया छे. नेमकेः- 'हो + त्या-होन्या (अमक्त्, अभूत्, बभूव) भु + इत्या-मुन्नित्या (मुक्तवान् ) १ था ' होत्या 'पहारित्य' 'विपरित्या ' वगेरे एकवचनी रूपोनी अने 'करिमु“ पुल्छिस्' 'माहसु' वगेरे बहुवचनी रूपोनी साधना पालिव्याकरण द्वारा शोधी शुक्ाय छे. पालिभाषामा श्रीजा पुरु- पना एकवचनमा धात्मनेपदी 'इत्य' अने यहुवचनमा परस्मैपदी ईमु,''इसं,' अने 'अमु' प्रत्ययो घपराएलाये. उपर्युक्त आपल्पोमा यपगएलो 'त्या' पालिना ए 'इत्य'चं रूपांतर जणाय से, 'पहा. रित्य' समां हो पाटिनो जेयोने सेयो 'इत्य' प्रत्ययल बपराएलो के अने पालिना 'इंमु' भने 'अमु' ९ ये प्रत्ययो एमने एम र भा. रूपोमा पपराया छे. जेम संस्कृतमा झस्तनी, अपतनी अने क्रियातिपत्तिनां रूपाख्यानोमा धातुनी पूर्व 'अ' उमेराय में तेम पालिमां पण प्राकृनमा नथी. पालिरूपो मू एकव. ३ अमवित्य ('त्य' प्रत्ययवाछु) बहुव३ अगमिमु, अगममु ('सु' भने 'अमु' प्रत्ययवाई) यो पाटिया • २१७ नि. १०६-१७० तथा ?. २२. 'गम'को रूपये अने टिपण, + ल्यान्या (बरिट) विहर दरया-वितरित्या (विनवान्) मे - रत्ग-मेवित्या ( मेयिनयान ) पान + रत्नपारेल (प्रचारितवान्) मम्-मुशिम (अगच्चन, अगमन् , जम्नुः) प्रच्य-पुस - मु-पुस्लिमु (परन्नः ) हकर - मु-कनिमु ( अश्वन • अाईः, सः) नृत्य-नय + मु-नधिम् । नृतवन्तः) -आह + अमु-आरंमु (आहुः) महलमा मृतकाळनों में सपाग्यानो नयार थाय है, ने उप- स्या नवी रोने पर वर्गविकारना नियनी द्वारा प्राकृतम्पान्यानो बना शावडे.नेमके:- मैं- अनवीन्- अन्बी (प्रा०) अकापीन्- अकाली (1) अभून् अह अवाचन- अबान (,) अदक्त () अकार्षम् अकरिम्मं () इत्यादि प्राचीन प्राकृतमां-आफ्नयामा-आवां रुपान्यानी प्रणां वर- राएटांहे. था आरपो १ महिमचं पांवाना प्रानच्यावरणमा मादे को मानो उल्लेख कों जनाती नयी. मा २६६ भविष्यत्काल संस्कृतमा भविष्यत्काळना प्रण प्रकार छे, जेमके-धस्तन- भविष्य, अद्यतनमविष्य अने परोक्षमविप्य ( क्रियातिपचि). ए प्रणे मवियना पुरुषत्रोधक प्रत्ययो अने प्रक्रिया पण जूदां जूदां छे. परंतु प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची के अपभ्रंशमां तेम नया-तेमा तो मात्र परोक्षमवियना न प्रत्ययो अने प्रकिया नोसा नोसां छे अने श्वस्तन तथा अद्यतन मविप्यनी प्रक्रिया, प्रत्ययों तो तद्दन सरखां छे. भाकृतना भविष्यत्काळना प्रत्ययोः १ पु० सं, सामि, हामि, हिमि' सामो, हामो, हिमो, स्सामु, हामु, हिमु; म्साम, हाम, हिम, हिम्सा, हित्या १ भविष्यत्काळना उपर जणावेला प्रत्ययो धातुमानने लागे के त्यारे पालिमा तो एया प्रत्ययो मात्र 'भू' धानुनेज लागेला छे:- म् पालिरूपो (भविष्यकाळ) १ होहामि, होशम, होरिस्मामि होहिस्साम. २ दोक्षिति, होहिरमाम छोदिस्मथ. ३ ोहिनि, होहिति, होहिस्मनि होहिरसंति. यः गयो पालिप्र. ० २०६ ‘होरिति ' योरे पो. होहिय, 1

4.TV
२० हिमि, हिम'
हिन्या: हिह
हिंति, हिने हिर
..
รรรรร
मोरनी अने मागपीना भविष्यकाटना प्रत्ययाः
परभनीना वर्तमानाना प्रत्ययोनी आदिमां 'मि. उमे-
रायी तेक्वा प्रत्यया भविश्यकाटना याय में. गंत पहेन्दा
पृल्पना एकवचनना एक 'म' प्रत्यय नुदो पन छे. नेमके
मिलो, नि: मिना
मिह, मित्र, मिहत्या।
३ पु मिडि. मिट
मिति, म्मिने, म्बिहरे।
जाट, जीना में' ''न्या है'
मटेडक्र.२४:,हिर
२बटन नलाग्नबनेमानपत्राला
कन्द

पेशाचीना भविष्यकाळना प्रत्ययोः
शौरसेनी प्रमाणे
"
एय्य
शौरसेनी प्रमाणे
A
अपभ्रंशना भविष्यत्काळमा प्रत्ययोः
अपभ्रंशना वर्तमानकाळना प्रत्ययोनी आदिमा 'स' अने 'सि'
उमेरवाथी ते नधा प्रत्ययो भविष्यत्काळना थाय छे. जेमके,
सउँ, सिसउं, समि, सिमि सहुं, सिहं,
समो, सिमो,
समु, सिमु,
सम, सिम।
२ पु. सहि, सिहि,
सहु, सिसह,
ससि, सिससि,
सह, सिह,
ससे, म्सिसे
सध, मिसघ,
सइत्या, स्मिइत्पा।
३ पु० सदि, सदे,
सहि, संति,
सई, सए
संते, सइरे।
सिदि, सिदे,
मिसहिं, सिने,
स्मिद, म्मि
सिने, रिसइरे,
उपर मणावेला मविन्यन्कालना मघा प्रत्ययो पर रहेता पूर्वना
'अ'नो' अने ५' याय के.

रूपाख्यानो- मण एकवचन प्रातः- चौरसेनी-- पैशाचील-- आनंश००- मागील- १ पुष-मगिरलं, शौरसेनी मानिसलं, मगेम्म, मोन्स प्रमाणे मंगेस, मनिम्मामि, भगिन्सिनि मणिनि मोन्मानि, मम्मिनि मंगेनिस मगिहानि, मगिमनि मनहानि, मोमामि सर्व वचन मंगेन्सिमि म पुरुष बने मगेन मना पुल-मगिहिलि मनिम्मिनि पोरमेनी प्रमाने मगिमहि महिने मगम्निमें मनिम्मिहि मनिमामि मणेसदि भणिस्सिसे मणेस्सिसे ३ पुरुष-मणिहिइ मणिसिदि मनेथ्य भणिसदि मोहिह भणेसिसदि भणिहिए भणिस्सिदे मणिसदे मणेहिए मणेस्सिदे मणेसदे भणिसइ भणेसह भणिसए मणेसए मणिस्सिदि मणेस्सिदि भणिस्सिदे भणेस्सिदे मणिसिह भणेम्मिद मणिस्सिए मणेस्सिए वहुवचन प्राकृतरु०- शौरसेनीरू.- पैशाचीरू०- अपभ्रंशरू०- मागधीरू०- १ पुरष-मणिम्सामो मणिम्सिमो शौरसेनी मणिमहुं मणेम्सामो मणेसिमो प्रमाणे भगेसई मणिहामो मणिम्सिमु भणिसिह भणेहामो मगेम्सिमु मणेम्मिएं १ जो पृ. २३ नि. (१) २७१ भणिसमो मणेसमो मणिस्सिमो भोसिसमो मणिममु भन्मेसमु मणिस्सिमु भणेस्सिमु भणिहिमो भणिस्सिम भणेहिमो भणेस्सिम भणिस्सामु मणेस्सामु मणिहामु मोहामु भणिहिमु भणेहिमु भणिम्साम भणेसाम मणिहाम भणेहाम मणिहिम मणेहिम भणिहिम्मा भणेहिम्सा मणिहित्या मोहित्या २ पुरुष-भगिहित्या भणिसिसह भगेहित्या भगेमिसह भणिहिह भणिस्सिय भणेनिध मगिम्सिदत्या भगेम्मिहत्या भणिसम भमेसम मणिम्सम मणेम्सिम शौरसेनी प्रमाणे भगिसहु मगेरित मगंसह मगिम्सिाहु मंगम्मि मणिमह भगेमद्द मनिम्सिर ર૭૨ ३ पुरुप-भणिहिति मणिमिति शौरसेनी भणेहिंति मणेस्सिति प्रमाणे भणिहिते मणिसिते मोहिते मणेसिसते मणिहिहरे मणिसिइरे मणेहिहरे भणेस्सिरे भगेरिसह भगिसब मणेसव 'मणिम्सि मम्मिय भणिसइत्या मणेसइत्या मणिस्सिइत्या 'भगेम्मिहत्या मणिसहि मणेसहिं मणिम्सिहिं मस्सिहि भणिनि मोति मणिम्मिति भणेम्मिति भणिसते मणेसने मणिम्सिने मणेस्सिते भणिसरे मणेसहरे भणिसिहरे भगेस्सिहरे [ra' अंने 'हामो उपयोग माकृतनी पेढे गारमेनी दोधी मापाभीनां करवानो छ। परीन, त्यंननांत घाटुनी मविन्यकाटनांनी मातनां लो मानदानां छे अने प्राकृतस्पोनी (मनिहिल वगेरेनो) उपयोग জার্মান নাম ঃ ক ৪. हो (भू) म्दरांत धातृ अने पुरुषसेवक प्रत्यय-नी-वग्रे भविन्यका- मां 'a'ने 'विलये आये है. आगढ नणावेला नियमी प्रमाणे 'हो' धातुनां (बघा म्वगंत वातुना) अंगो याय छे अने से , अंगाने भविष्यकाटना पुरुषोषक प्रत्ययो लगावाची अने ए प्रत्ययनिनित्तक यो फेरफार ए अंगोमां करदार्थी म्बरांत धानुनां धां म्पान्यानो तैयार थाय छे. छ अंगोः हो-हो, होस, होएब, होएडा, होज, होजा. पा-पा, पाम, पाएज, पाएला. पान, पाळा. नी-नी, नीम, नोएब नाएला, नित्र, निका. [चा स्वरांत घातुनां छछ अंगो उपयुक्तरीत का टेवानां छे] मेरीत मानावी मातनां सो आगळ बतावबामा माया के तेज रोने आ छ ए अंगनां प्रत्येकनां धी नानां रूपा बनादी लपानां छे. जमके .. , - प्राकृत . मारसेनी:- पैशाचीह०-- मशह मागीne- होम्मिमि शारमनी होम होइन्सिनि होहम १ पुरुष दोन्स होदर २७ 7 . होएम्स होएरिसमि होएसई होएजिसं होएलिसिमि होएजिम होएजेम्स ' होएजेरिममि होएनेस होएजार (जम्म) होएजा (ब)सिमि होएज्जास होलिम्स होजिसिमि होजिमउं . होजेस्म होजेस्सिमि होजेस होजारसं (कास) होजा (ज) स्तिमि होजामई [प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रंशनो मात्र एकम प्रत्यय लगादीने नमूनारपे 'हो' मा ए छए अंगनो रूपो उपर आपेठो छे, एग प्रकारे दरेक प्रत्यय लगाडीने होना (मरान पातुना ) धो रूपो समनी सेवानो छ.] पसरीने होना पेठे पा, ला, दा, मिला, मिला अने वा वगैरे वगन भावभीना दरेका छ छ अंगो करी मो रूपाण्यानो बनाती मेवानां छे. मतिकाटना मंस्कृत मिदमोने पण वर्णविरना नियमो भगाडी प्रारतमा वालरी शााय छे. नेमके:- म.- मोरयामः भोक्मामी (प्रा.) भविष्यनि-भकिम (,) परियनि-नसिपः (..) परियनि-परिणय (1) भरिप्यामि-मविणानि) इत्यादि. पमा कालो म प्रारना पापा. . - कियातिपात-परातमा१प्य) - . माण ज्यारे शरतवाळां वे वाक्यो- एक संयुक्त वाक्य बनेलं होय अने तमां देखाती बन्ने क्रियाओ कोई सांकेतिक क्रिया नेवी भणाती होय त्यारे आ‘कियातिपति'नो प्रयोग भाय छे. प्राकृत, शौरसेनी, मागधी, पैशाची अने अपभ्रंशना प्रत्ययोः सर्व पुरुष, सर्व दचन }ब, जा, अन्त, माण धातुने 'न्त, प्रत्यय लान्या पछी तयार यएल अकारांत अंगना ते ते भाषा प्रमाणे नामनी प्रथमा विभक्ति नेवां न रुपाख्यानो थाय छे. व्यंजनांत-भणेज, मणेना, भणतो, भणमाणो सर्व पुरुष, सर्व वचन, स्वरांत---होज्न, होज्ना, होतो, होमाणो } 'आनार्य मो . " " - १ पालिमा वायना भामार्य भने विप्प प्रत्यो कामना आचार्य विध्यर्थ १नि म. श्यामि (मास एग्जामि), एप्पाम(मा०एम). परमेर २१ ५. एयासि (मा० एनासि), एयाय(मामा). (तु तु. एम (मा० ए), पच्यु. १५ थानसे. भान्मनेर मो. एका ६ अं. -मोret: २९५ करमी मार:- mat. . एप २ पुरुष- माइग्नमु, इग्नहि, इन्ने, हि (अप०३,3,ए) ३ पुस- उ (चौ. दु) से पुरुष, सर्व वनन-उम, मा उपरना नपा प्रत्ययो पर रहेता पातुना आरोत अंगना अत्य • अ'मोर' पाय . 'मु' अने • मो' प्रत्यय पर रहता धावना भकारोत भंगना भत्य 'अ' मो आ' अने' विकल्पे पाय छे. भारत अंगने लागेला हि' प्रत्ययनो लोग पापणे. हमामु, हसिमु, हसामो, हसिमो, हमेमु, हसमु. हसेमो, हसमो. सह, होह- हममु, रसेपु, HTRY, हमेनहि हमान, हम. ३१.- मा, मे. हम हमें HiT. मान-हमान, हमेमा, 4fmiianो परिमाणे मानमा पानमा माना Tristatem' 'नो अंग Hit wifeat ou'ने 'on'amirarart . अन प्रपणे भाग को . प्रासको पालामालगने. , antarran(1) हो- १ पु०- होआमु, होइमु. होआमो, होइमो, होएमु, होममु, होपमो, होअमो, 'होएनामु, होएग्निम, होए नामो, होएन्निमो, होएग्नेमु, होएगमु, होएग्जेमो, होएज्नमो, होनामु, होजिनमु, होज्नामो, होज्जिमो, होग्नेमु, होजमु, होज्नेमो. होउनमो, होमु, होज्न, होग्ना. होमो, होज्न, होज्ना. पूर्व प्रमाणे 'हो' ना छ अंगो बनावी आतार्थनां वां रूपा- स्यानो 'हस'नी पेठे साधवानां छे. अने ए रीते बघा स्वरांत धातुनां (दा, ला, पा वगेरेना) रूपान्यानो समनवानां छे. शिौरसेनीनो प्रत्यय मागधी, पैशाची अने अपनंशमां पण वापरवानो छे] गौरसेनी, मागधी अने पंद्याचीनां रूपाख्यानो . १ पु० हसामु वगेरे प्राकृत प्रमाणे हसामो वगेरे प्राकृत प्रमाणे. २ पु० हसमु दोरे ३ पु० हसद, होटु " " हसह पोरे हमंतु वगेरे अपभ्रंशनां रुपान्यानो १ पु० हसामु वगेरे प्राकृत प्रमणे हमामो वगेरे प्राहल प्रमाणे २ पु० हसि, हसु, हले, हममु वगरे माहल प्रमाणे हसह वगेरे १ नमो. २५४ बनेमानी कायम

३ पु. 'हसा, हसेठ,
हसंतु यगरे
माहत प्रमाणे
हमउ, हसेउ
प्राकृत प्रमाणे
प्राकृत प्रमाणे
प्राहल प्रमाणे
होभामु वगेरे
होभामो नगेरे
माहत प्रमाणे
होर होउ, होए,
२ पु. होभा वगेरे
होमह वगेरे
माहत प्रमाणे
५ पु. होभा, होड होभंतु मेरे
होभर, रोप
गते दोर म्यननात अने मत धातुओना भगोकरी
मेमानो.
मिथ्यानी की प्रक्रिया मामाना मेनी थे, शिरसे के,
मगुए भने तिनमा एक नई' प्ररयण पगारे भागे,
• नद' प्रत्यय पाहतां पूना • अ' 'पागछ.
माल (हान होत होला ( मात्)
मनमानद मेन, हमेमा (हमेत )
-
( भागप्रमोम मन केरलाकी आओ
• riat warriage,

मिया (ध्यान) (चरेत् ) पटे (पटेन्) अच्छे (आच्छिन्धात्) अन्भे (आभिन्द्यान्) आ रूपो विध्यर्पमूनक मंस्कृत सिद्ध रूपो उपरथी सीधी रीते वर्णविकारना नियमो द्वारा मधापलां छे. ते हकीकत तेने पटखे () आ निशानमा आपेलां रूपो टपरथी नणाइ आवे हे. एरीते बीनां संस्कृतरूपो उपरथी पण प्राकृतरूपो साघी शकाय छे.] अनियमित रूपाख्यान अस्-थई वर्तमानकाळ अत्थि, म्हि, 'असि अत्यि, म्हो, म्ह. अत्यि, सि अत्थि. अत्यि अत्यि. १ पुरुष २ पुरुप , १ पालिमां पण प्रगे पुरुएना एक्यचनमां विध्यधसूचक 'ए' प्रत्यय यगएलोहे (यो पृ० २७५ १ मिन)ए अनुसार पग आ थापरयो साधी सान है. - २ प्राकृतमा 'अस्' धानुनां धनां योटा रूपो थाय छे, भूतकाळ सिवाय योजा अर्थमा एक मात्र 'अत्यि' रुपची पण काम चाली से है. पालिमा यस्' नां दरेक काळयार नोसां नोखां रूपो पार हे मने पारिना ए रूपो, संस्कृत रूपो साये मां मळती थावे हे - भूतकाळ पुरुष, मां बनन } आसि, अहेसि। विध्यर्थ, आनार्थ, भविष्यकाळ मा पुरुष, सा वमन } अपि। अ (पालिस्पो) भरम, मा (अहन ). धर्तमाना-१ अरिम, अग्नि २ अमि, स्ि ३ अपि मामी-१ अम्म (Fral) २ भान ३ अम्म, आसाम भरमय. भर, मी-अम्मि, अहि अम्म,भार. (मामार्ग)२ आदि, मंग मगतनी-१ मामि आभिड (a) मान भाग, भाषिन (भाग) - पारित. . ११८-१९८-१९२-११ अम'मा यो मानानो माम- 'माग दिमामो मानणे मो. rrier treatured.

क- मात्र मनात अने भविश्यकालमा 'पानी का' आशपाय भूनकान यानी, काही का, या अमी. काही कामहील. भविष्यन्यान. परा, पम पुराना एम.मनमा कायां मी, बाकी का रूपी धानुनी म कारित काटिमि. मारिमित्यादि। . . -- . मात्र भगिधालाकामा प्रथम पुरपना पकाननमा • दा' धातुन • दार' रूप वधारे भाग, नवी यो म्पी हो' धातुनी मरवां दाई, दारिमि, दारिसि, दारिद, इत्यादि। १ 'मुं भूतपाळगूनम 'म' अ 'घकासिं ' (पीजा गुम्पनु एफयान अंने प्रथम पुरुष एकवान) पपालिमा भार, ए, प्रामतना याण' सायं मर गाय रा:-जो पापिय १. २२५ 'ए'ना स्पो. २ प्रारूपो पाये मळता जापता 'क' ना भविष्यकानां पादिरूपी आप्रमाणे १ काहानि कारिसि पाहिय. ३ फाहिति पाहिति. -ओ पाटिम पृ. २०९'पू' नां रूपो २ प्रा०३६ २८२ मात्र भविष्यलाळमां नीना धातुओना नीने प्रमाणे आदेश थाय: भुन्-भोच्छ। 'श्रु- सोच्छ । दृश-दच्छ। मिद्-भेच्छा गम- गरका मुन-मोच्छ । वन-योच्छ। वि- वेच्छ। छिद-छेच्छ। आ धातुओना भविष्यकाळ संबंधी रूपाम्यानो भण' धानुनी नेता पाय . विशेषताएछे थे, आ पातुओने लागता भविष्यमा १ पासतमा 'x' यगेरे भानुभोना 'सोय' योर भंगो बने म पालिमा पण बने। पालिअंगो AAR पुरान एकामन- सौरभ. गानामि. " " नतीय पुरुष -दिमात. मुन पी. " भाग अनी पा1ि.1.1-२... [artiminaram RUN Pintin mznim2014 Trah TAML.TA. Pr, Mat, Nato14 (1) wh- ती mamft.1.1.M.RA... 1.३२ प ''• ५]

२८३
,
ढना नेटला प्रत्ययो 'हि' आदिवाळा छ तेमांना 'हि'नो लोप
विकल्पे थाय छे तया प्रथम पुरुषना एकवचनमा ए बधा धातुओर्नु
एक अनुस्वारांत रूप पण वधारे थाय :
१ पुरुष-सोच्छ, सोच्छिमि, सोच्छेमि, सोच्छिहिमि, सोच्छहिमि,
सोच्छिम्स, सोच्छम्मं, सोच्छिम्मामि, मोच्छेम्सामि,
सोच्छिहामि, सोच्छेहामि ।
२ पुरुष-सोच्छिसि, सोच्छेसि, सोच्छिहिसि, सोच्छहिसि,
सोच्छिसे, सोच्छेमे, सोच्छिहिसे, सोच्छेहिसे ।
३ पुरुष-सोच्छिद, सोच्छेइ, सोच्छिहिइ, सोच्छेहिइ ।
सोच्छिए, सोच्छेए, सोच्छिहिए, सोच्छेहिए । इत्यादि ।
.
"
-
,
[सूचना-आख्यातने लगता बधी मापाना (प्राकृत, शौरसेनी,
मागधी, पैशाची अने अपभ्रंशना) प्रत्ययो आगळ नणावेला छे, आ
नालु प्रकरणमां प्रेरकभेदी, सह्यभेदी वगेरे आग्ज्यातने लगती हकी-
कत जणाववानी छे, तेमा मात्र प्राकृतना ज एक एक प्रत्ययद्वारा
वघां उदाहरणो देखाटेलां थे तो अभ्यासीए पोतानी मेळे प्रेरकभेदी,
साह्यभेदी वगेरे अंगोने शौरसेनी, मागधी, पशाची अने अपभ्रंश
भाषाना प्रत्ययो लगाडी ते ने मापानां रूपो बनापी लेवा ]
प्रेरकल्प
प्रेरक अंग बनाववानी रीत
१ धातुने अ, ए, मात्र अने आवे 'प्रत्यय लगाढवाची तेनुं प्रेरक
अंग तैयार थाय छे.
१ पाटिमां पण साधारण रीते प्रेरणाना अर्थमा ',' '५,'
मार' अने 'आप' लगायायी घानुमानना चार संगो बने है:-
.

२८५
परीते तेयार थाल प्रेरक अंगोने ते ते पुरुष रोपा प्रत्ययो
लगाडापी तेनी दरेक प्रकारना रूपान्यानो तैयार थाय छ-ए
कपास्यानो बना पानी प्रक्रिया आगळ आवेल कर्तरिम्पाधिकारी
आती गई छे. तो पण अही उदाहरण तरीके केटलांक. पायानो
दशमो आने से
মৰমানা
११.-गामेमि, नामामि गामामो,-'मु, म, लामिमो, मु, म.
माममि, मामेमि मामेमो, मु,-म, गाममा, मम।
गामेमो-मु,-म,
गमामि, समानामि, समायामो, मु, म, रामामो-मुम,
Fমাল, পানি समाोमो,-मु, म, समातमी-म-म,
नमामो, मु, म. इत्यादि।
नामेत, मामेजा, समाज, लमाना।
भूतका
4प, मनन-नोनि-मी,की, हीम, तोपगी,-ही-हीन,
नाम मी-ही-हीम, तीमार-पीहीहीम,
तांगानगी, हीहीमा
एयादि।
मगिरका
11.-पादित, मान रिक, मोहित, माn-fir,
भामा हि
एगा।
''प्रोमणा मोम nो
mमामी '
ना'माग' नामा: 'मागे
writainा प्रोत्री या आ मामा

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२८८ नामधातु प्रेरकमकिया सिताय संस्कृतमा नीनी पण अना प्रक्रियाभो के, मेमो-ससंतप्रक्रिया, यहतप्रक्रिया, यइलुनप्रक्रिया अने नाम- धातुप्रकिया. परंतु प्राकृतमा ए प्रक्रियाओ माटे कोई पाप्त विशेष १पालिमा पण मानत, यहन्त, यड्रत भने नाममातुनी प्रक्रिया संतानी थाप :- अनंत- शुभुमति (भुनने) मानि (जिति) पिवामान (पिपामति) जिनिमनि (जिगीति) (जिहानि) (निमित) धीमंमते मन्मनाक- गुमान मायापनि नानि 141 नामति (मीमामने) (मुनि) (मामयते) (जायगा) (प) (अनमी) (ale) (पग-4) (arty) (अगितामा पनि पना, (वा) ૨૮૧ - विधान तो नपी अने प्राकृत साहित्यमा ए प्रक्रियानां रुपान्यानो उपरब्य याय छे एयी कल्सी शकायछेके, ते ते प्रक्रियाना(संस्कृत) सिद्ध रूपोमां, आगळ नणावेल वर्णविकारना नियमानुसार फेरफार करी ते रूपोनो प्रयोग करवामां आवे (ल) के. नेमके- संस्कृत शुश्रूपति- सुम्मसह । (मन्नत) लालप्यते- लालप्पर । (यहत) चंकमह । (यड्न्टुवंत) चक्रमीनि- चंकमणं । (चक्रमणम्) इत्यादि। मात्र नामधातु माटे विशेषना आछे: नामधातुओने लागेल 'य' प्रत्ययनो लोप विकसे थाय छे. गुरुकायते--- गरुआइ, गल्भाअइ (गुलरिव आचरति-गुरुनी ने आचरण करे छे) दमदमायत-दमदमाइ दमदमाद ( दम दम थाय छे) लोहितायत- लोहिआए-द, लोहिआअरदालाल याय छे) हंसायते हंसाए-द, हंसाभर-द। (हंसनी नेम आचरे छे) तमायते- तमाए.-३, तमाभए-द । (अंधारा मेंदु है) अप्सरायते- अच्छराए, द, अच्छगए-द। (अप्सरानी जम आवरे ) उन्ननायते- उन्मगाए हैं, उन्मगाभए,-३(उन्मनाथाय छे) कायते- कट्टाए, ई, कहाभरा। (कटने माटे क्रमण करे - - :२९. धूमायते मुखायते शब्दायते धूमाए-इ, धूमाभए-३ । (धूमने उद्वमे छे) मुहाए-३, सुहाअए,-इ। (सुखने अनुभवे छे) सद्दाए, इ, सद्दाभए-है। (शब्दकरे छ-बोलावे छे) इत्यादि. सह्यभेद वर्तमानकाळ, विध्यर्थ, आज्ञार्थ अने (ह्यम्तन) भूतकाळमां धातुने । 'ई' अने इज' प्रत्यय लगाडवाथी तेनुं सह्यभेदी अंग १ पालिमा सहभेदी अंग बनाक्वा माटे 'य' 'य' अने 'ई' तथा क्याय । इय्य' (प्रा० ईश्र, इत्र) प्रत्ययनो व्यवहार . थाय छे:- ये- पचते, पञ्चति (पच्यते) बुझते, बुवाति (बुध्यते) बुन्चते, धुन्चति (उच्यते) य अने इय- नुस्मते, नुत्तियति (नुष्यते) पुच्छते, पुन्छियनि (पृष्ठपते) मंजियति (मज्यते) करिय्यति, करिय्यते (क्रियते) मदीयति (मद्यते) मथीपनि (मण्यते) कीयति (फियते) পনি कपिरति -यो पायि.. २३४-२३५ बने भने ने अंगने प्राकृत, शाग्मेनी. मागी, पैशानी अने अप- भ्रंश भाषाना ने ने पुस्पायर प्रत्ययो माटकाची नेनां कामयानी मायहे पक्षाचीनी विशेषता पंचानन पाटनं मादी अंग बनाय, रोय नो पुरनायक, प्रत्ययो गगाटना परम भातुने ' 'a', बदले । च्य' प्रत्यय टमाटदो नोए. नमक, सं० पे. मीयते मिनदे गिरने दीयते दिनंद दिव्यने न्यते मिनिटे समिप्यते এমন पहिर पटिनंद पहिच्यते मो० मा. . 'कृ' धातुनुं मायमेटी अंग बनावq हाय नो पुरुषोधक प्रत्ययो लगाटता पहेला एने ('कृ' धातुने ) न • रव्य' ने बदल र' प्रत्यय न्यगारवा नोए. सं० क्रियते प्रा. करिन्नर, गा०मा० 'करिम्न १० कोन्ते कगभर कर्ग अपभ्रंपनी विपना मस्कृतमा यता प्रथम पुयना क्रियेपने बदल आनंमां कीनु ' पण वश्गय छे अन पो यथाप्रा. - - १ कटिारदे, राम-जा२६ र २.

२९२ साधारण सद्यभेदी अंगो धातु सह्यभेदी अंग धातु सह्य मेदी अंग मण्- मणीअ, माणिज्न । पाईअ, पाइन । हस् हसीअ, हसिज्ज । दा दाईभ, दाइज्न । कथ्-कह- कहीअ, कहिग्न । ला- लाईभ, लाइज्ज । पत्-पड्- पडीअ, पडिज्न । घ्या-झा- झाईभ, माइज्न। कम्-बोल- बोल्लीअ, बोल्लिग्न । हो होईअ, होइन । सूईअ, सदब। इत्यादि। ए रीते धातुमात्रनां सह्यभेदी अंगो बनावी लेवानां छे. आ अंगोनों रूपाख्यानो बनाववानी प्रक्रिया, कर्तरिरूपाधिकारमा जणावेल प्रक्रिया मेवी छे. जेमके- वर्तमानकाळ ( भण्यते ग्रन्थः) ३ पु०-(गंयो) भणीभइ, एइ, अए, एए, एज, एजा भाणजइ, जेइ, जए, जेए, लेग्न, जेना। (मण्यन्ते मन्थाः) (गंथा ) भणीअंति, ते, एंति, एते, मणीअइरे, एहरे भणिज्जति, ते, ति, जेते, जइरे, जेइरे, मणीएज, एना, भणिजेन, जेना । इत्यादि। (कथ्यमे त्वम्) २ पु०-(तुर्म) बोली अमि, एसि, अमे, एमे, मोलिबमि, बेसि, समे, जैसे - . (कथ्यचे यूयम् ) (तुन्हे ) बोलीमह, एह वोल्टीएमृत्या, अइत्या । (त्वया अहं मये) वया वयं समहे १ पु०-(अहं) सूईआमि, एमि, अमि, (अन्हे) मूईआमो, मु, म, मुजामि, बेमि जमि सूईमो, मु, म, मईएन, एज्ना मईएमो, मु, म, मानेन देना मुईअमा, मु, म, सूहलामो, मु, म, मुजिमो, मु, म, सुलेमो, मु, म, मृजमो, मु, म, सूईएन, दा, सहजेव, जा। विध्यर्थ मगीअड, एक मशीभतु. तु । मणिबर, जेट मणिबनु, नु। मगीएन, बा, बद মাছি मणिनेत्र, भनिन, डा, बद। मशिनद्र आचार्य भीमर, एक मनीअंतु, तु। भागामार मगिग्ननु, नेतु । मनीएन, मा मारन, अना। भागनेन, ना। १

भूत-(बस्तनभूत)
भणीभमी, ही, ही
मणिग्नसी, ही, ही।
१ जे काळमां सह्यभेदमूत्रक ईअ' अने 'इज्न' प्रत्यय धातुने
नधी लागता ते काळमां तेनां सह्यभेदी रूपो करिरूपो नेवां
समनवानां छे, नेमके-
(अद्यतन ) भूतकाळ-भण-भणी ।
भविष्यत्काळ-मण-मणिहिइ, भणिहिए, इत्यादि ।
क्रियातिपत्ति-मण-भणेज्न, उमा, मणंतो, भणमाणो, इत्यादि।
प्रेरक सबभेद
१ धातुन प्रेरक सह्यभेदी रूप करवु होय त्यारे घातुने प्रेरणा-
मूनक एक मात्र · आदि । प्रत्यय लगाडी, ते तयार पएल अंगने
सह्यभेदसूनक ईम' अने 'इग्न' प्रत्यय पूर्वोत्त काळमा लगाडी
प्रत्येक घातुन प्रेरक सम्बभेदी अग बनाववार्नु छे.
२प्रेरणामूचक कोइ पण प्रत्यय लगाया विना मात्र उपत्य
'म'नो दीर्घ करी अने मयभेदसूनक अ' अने इन्न' प्रत्यय पूर्वोत्तर
कालमा लगाडीने पण प्रत्येक पातुर्नु प्रेरक मयभेदी भग तैयार
थाय छे.
(आ मित्राय बानी ने प्रेरक सयभेदी भंग पनी शकतुं नसी)
परीते तयार पएल प्रेक सबभेदी आना स्वाथ्यानोनी
प्रक्रिया करि सास्यानोनी प्रक्रिया मेवी हे.

- - -- मा० ०म० अंग- कर+आविकरावि + अ करायाम- करावीअर, ए, सि, से, इत्यादि. कार + ई- कागअ- कागअर, ए, सि, में, इत्यादि. कर+आयि-कगवि+दान-कगविन-कगविग्नद, ए, सि, मे, इत्यादि. कार + इन- कारिग्न- कारिनइ, ए, सि, में, इत्यादि. हम+आवि-हसावि+अ- हसावीअ- हमा भइ, ए, सि, से, इत्यादि. हास + ई- हामीज- हासीअमि, आमि, एमि इत्यादि हसन हमावि+दान-हसाविश्न-हसावित्रित्या, विजेह, पनह, इत्यादि. हस+ हास + रज-हासिग्न-हासिग्नंति,न्ने, उनहरे, इत्यादि. एरीत धातु मात्रनां प्रेरक सयभेदी अंगो तैयार करी सर्व काळनां रूपाख्यानो समनी देवानां हे. ज्या प्रेरक अंगने 'ई' अने इन प्रत्यय नयी लागता त्यां प्रेरक अंगयी सीधा पुरुपयोधक प्रत्ययो गाही कर्तरिरूपाख्यानोनी पेटे प्रेरक सायभेदी रूपाख्यानो समनवानां छे. नमक-मविष्यकाळ प्रेक कर+आवि-करावि-कराविहि-द, ए, मि, से, मि, विहामि, विस्सामि, विसं का "

कर कार -कारेहि-इ, ए, सि, से, -मि,
रेहामि, रेस्सामि, रेस्सं
हस+आवि-हसावि-हसाविहि-न्ति, -न्ते, हरे-त्या, ह,
विस्सामो, विहामो, विस्सामु, विहामु,
विस्साम, विहाम, विहिमो, विहिमु,
विहिम, विहिस्सा, विहित्या
हास -हासेहि-इ, ए, सि, से, मि,
सेहामि, सेस्सामि, सेसं। इत्यादि.
क्रियातिपति
कराविज्न, ज्जा, करावंतो, करावमाणो ।
कारिज्न, कारिग्ना, कारंतो, कारमाणो। इत्यादि.
सध.
अनियमित सयभेदी अंगो
दृश- 'दीस- दीसर, दीसिग्नइ, दीसउ, दीसप्ती, ही, ही।
वच- 'बुच- बुधइ, वुचिज्जइ, वुघउ, वुचसी, ही, हीभ ।
प्रे० प्रे.
त्रि- चित्र- निवइ, चिब्रिहिह, चिन्याविइ, चिच्याविदिइ, इत्यादि.
चि- निम्म-चिम्मइ, निम्मिहिह, चिम्माविइ, चिम्माविहिर, इत्यादि.
लू- हम्म हम्मद, हम्मिहिए, हम्माविइ, हम्माविहिर, इत्यादि.
बन्- खम्म-मइ, सम्मिहिद, खम्माविइ, सम्माविहिए, इत्यादि.
दुर- दुम-दृटमइ, दुमिहिर, दुभाविद, दुम्माविहित, इत्यादि।
१ वर्तमानमा, विध्यर्थमा, पारामां अने घस्तनभूता जथा
ने आदेशो बरगर है.
२ मा बधा प्रदेश वैकल्पिक अने माय भेदनी जमे
पटनी रचनामा वरार.

२९७ . . . - . . , , . लिह-लिन्म-लिम्भइ, लिन्भिहिइ, लिकमाविइलिभाविहिइ,इत्यादि, वह- वुध-बुमइ, वुमिहिइ, कुम्माविइ, वुमाविहिह, इत्यादि. रुध्- रुख्म-लभइ, रुम्मिहिइ, रुम्भाविद, रुल्भाविहिइ, इत्यादि. दह- उज्झ-इज्झइ, उझिहिइ, उज्झाविइ, उज्झाविहिइ, इत्यादि. वन्ध-बझ-बझइ, बझिहिइ, वज्झाविद, बझाविहिड़, इत्यादि. सं+रु संरुझ-मरु-झइ,संरुझिहिद, संरुज्झाविइ,संरुझाविहिइ,इत्यादि. अणु+रुध्-अणुरुन्झ-अणुरु अइ, अणुरुज्झिहिद, अणुरु झाविद, अणुरु झाविहिइ, इत्यादि. उप+रुध-उवरुझ-उवरुझइ, उवरुझिहिद, उवरुज्याविड़, उवरुझाविहिद, इत्यादि. गम्- गम्म-गन्मइ, गम्मिहिद, गम्माविद, गम्माविहिह, इत्यादि, हम्- हम्म हम्सइ, हस्सिहिड़, हरसाविइ, हम्साविहिद, इत्यादि. भण्-भण्ण-मण्णर, भगिहिद, मण्णाविद, मण्णाविहिद, इत्यादि. छुप्-टुप्प-टुप्पद, टुप्पिहिद, टुप्पाविद. छुप्पाविहिए. इत्यादि. रुद्-रुब्व-रवट, रुन्विहिद, ल्वाविद, रत्वाविहिद, इत्यादि, • लभ-भ-भट. निहिह, सम्भाविइ, भाविहिद, इत्यादि. • कथ्-कत्य-कत्थइ, कधिहिह, कत्यापिइ, कत्याविहिद, इत्यादि. भुज-भुज-मुह, भुग्निहिइ, मुनाविद, भुनाविहिद, इत्यादि. है- हीर-हीरह, हरिहिद, हीराविइ, हीराविहिद, इत्यादि. न- तीर-तीरइ, तारिहिह, ताराविह, ताराविहिद, इत्यादि. -कीर-कीरद, कोहिद, काराविद, कीराविहिद, इत्यादि. [प्राकृतमा 'कृ' ना मायभेदी अंगो व थाय ठे- 'कार' अने 'करीअ' करिज, त्या पशाचीमा तो न छार' अंग नवपराय कीरत कीरति ] . . . . . - प्रा०३८ लू-नीर-जीरइ, भीरहिह, नीराविइ, जीराविहिद, इत्यादि. अन-विठप्प-विदम्पइ,विनप्पेहिह, विडप्पाविइ, विदप्पाविहिह, इत्यादि. ज्ञा-णव-गवद, णन्वेदिह, णवाविइ, णयाविहिर, इत्यादि, ज्ञा-णग्न-णज्नइ, गज्जेहिइ, णनाविइ, णग्जाविहिद, इत्यादि. वि+आ-व्या+ह-वाहिप्प-वाहिप्पड़, वाहिप्पेहिह, वाहियाविइ, वाहिप्पाविहिद, इत्यादि. ग्रह-येप्प-घेप्पद, पेप्पेहिइ, घेप्पाविइ, घेप्पाविहिद, इत्यादि, स्पृश-छिप्प-छिप्पइ, छिप्पेहिह, छिप्पाविइ, छिप्पाविहिइ, इत्यादि, सिप्प-सिप्पए, सिप्पेहिए, सिप्पाविइ, सिप्पाविधि, इत्यादि, आरभ्.-आढप्प--आढप्पेइ, आढप्पेहिए, आटप्पाविद, आइप्पाविहिह, इत्यादि. नि-निव्व-निव्वए, निव्वेहिए, जिवाविद निवाविहिद इत्यादि. शू-सुन्व- सुन्वए, सुब्वेहिए, मुब्वाविइ. मुन्चाविहिह. इत्यादि. हु-हत्व- हुन्वए, हुनेहिइ, हुलाविइ, हुव्वाविहिइ,: इत्यादि. स्तु-युव-युबइ, थुबेहिह, थुत्याविइ, थुत्वाविहिद, इत्यादि. लु --लुब्व- लुब्वइ, लुहिर, लुब्वाविइ, लुक्वाविहिद, इत्यादि. पू -पुत्व- पुवइ, पुन्बेहिद, पुवाविइ, पुत्वाविहिइ, इत्यादि. धू-धुव्व-धुन्वए, धुविदिइ, धुनाविद, भुन्याविहिह, इत्यादि. सिन् । स्नि

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'मणेतो, मणेमाणो। मणेर्न, मणेमाणं । मर्गेनी, मणेना।
मणमाणी,मगमाणा।
मणेमाणी,मणेमाणा।
मगई, मणेई।
पा- पाअंतो, पाप्रमाणो। पाअंतं, पाप्रमाणं। पाअंती, पाअंता ।
(शो० मा० पाअंदो)
पाएंतो, पाएमाणो। पाएंतं, पाएमाण । पाएंती, पाएंता ।
पांतो, पामाणो । पति, पामाणं । पांती, पाता ।
पाप्रमाणी,पाअमाणा।
पाएमाणी,पाएमाणा।
पामाणी, पामाणा।
पाअई, पाएई।
पाई।
रु-रवतो, (शो० मा० 'वंदो) रवमाणो रवंत, समाणी रवंती,रवंता ।
खेतो, खमाणो । रवंत, रवेमाणं । रवैती. खेता।
रखमाणी, रवमाणा।
खेमाणी, सेमाणा।
सई, वेई ।
ह.हरतो (शौ०मा हरदो)हरमागोहरत, हरमाणं । हरनी, होता ।
हरतो हरमागो । हरतं हरेमागं । होती. हरता ।
हरमाणी, हरमाणा।
हरेमाणी, हरमाणा।
हरई, हरेई।
१ मणितो-अओ दस्सिर स्वस्वर पृ०४
२ खनो + संदो जूमो पृ० ३५ न्तन्न्द,

।
३०१
प्-वरिसंतो. (गो०मा०वरिमंदो) वरिममाणो । परिसन. वरिसमाग।
वरिमंती-बरिसंता।
वरिसतो.बरिमेमागो । परिमंतं वरिमेमाणं । वरितेती बरिता ।
वरिसमाणी,
परिममागः।
वरिसेमाणी,
वरिसेमागा।
वरिसई, परिसेई ।
नतो. नंदो ग्रो०मा०) नेमाणोनितनेमागं । नती, नंता ।
नेमाणी नेमाणा।
नेई ।
नम्-संतो, (योमा नृसंदो) तुसमागो । तूमंतं; तूसमार्ण ।
संती, तृसंता ।
नृमेंनी, तुसमागो । तूमनं. तमेमागं । नूसेती, नुसता ।
तूममाणी: तूममाणा।
तूमेमाणी, तसेमाणा।
तुमई, नसेई ।
दा-देनो (गोमाटो ) देमाणो | देतं, देमागं | देती देना ।
देमागी, देमागा।
, परिमंतो+ परिमंदो - डमो पृ. २७ स-7,
८ प्रमाने दादो,
गुग्यूशंदी,
शोविंदो वगेरे।
२. जुलो पृ० २४६ नि०६
३ दा+टोदा-बो देतो।
टा+मानोदानगोम्देलानो।

३०२
चल्-चाहनो, चल्लमाणो निलंत, चल्लमाणं । नलंनी, नलंता ।
(शो० मा० नलंदो)
चलंतो, चल्लेमाणो । चलंतं, मल्छेमाणं । चलंता चलता ।
बहमाणी,चल्लमागा।
चल्लेमाणी,चल्लेमाणा।
चलई, चलेई।
खिट्-मिजतो, खिनमाणो। निबंत, विनमाणं । खिचनी, मिजंता ।
(शौ०मा०खिचंदो)
मिन्नतो, विजेमाणो । विजेत, खिचेमागासिजेतीमिता।
तिन्नमाणी, खिन्नमाणा।
सिनेमाणी, निलेमाणा।
सिद्धई, सिजेई ।
खर तुर-'तुरंतो, तुरमाणो । तुरंतं, तुरमाणं । तुरंती, तुरंता ।
तूर (शी०मा० तुरंदो)
तुरंतो, तुरेमाणो। तुरतं. तुरेमाणं । तुरेती, तुरता ।
तुरमाणी,तुरमाणा।
तुरेमाणी,तुरेमाणा।
तुरई, तुरेई ।
शुश्रूप्--सुस्मसंतो, (शौ० मा० सुस्संदो) 'सुम्मूसमाणो।
लालप्य्-लालप्पतो, (शो० मा० लालप्पंदो) लालप्पमाणो ।
(पै० 'काळप्पंतो)
गुरुकाय-गरुभंतो, (शौ० मा० गरुअंदो) गरुअमाणो ।
१ 'तुरतो'नी पेठे 'नूरंतो' वगैरे रूपो पण करी लेवा.
२ मुस्सूमंतं, मुस्सुमंती वगेरे रूपो पण करी लेवा.
३ जूओ पृ. २६ ल-ळ.
'गुरुकायते' नामधातुनुं रूपडे, ए उपरथी 'गुरुत्राय' ए
वर्तमान पदतन अंग यन्युं है.
४

.
करावंतो,
कर-कारतो', (शी मा० कारंदो) कारमाणो ।
कारतो,
कारमाणो।
करावमाणो।
करावेतो,
करावमाणो।
शुप-~सोसवितो, (बी०मा० सोसविंदो ) सोसंतो, सोसतो,
सोमावतो, सोसावतो
सांसविमाणो, सोसमाणो, सोमेमाणो, सोसावमाणो,
मोसावेमाणो इत्यादि.
२
सादभेदी वर्तमान कृदंत
भण-भणिज्जता, भणिजमाणी, भणीअंतो, भणीप्रमाणो। पुं०-
(शौ० मा० मणिकंदी) (प० भनिय्यतो)
मणिजंतं,-जमाणं. मणीअंत, अमाण ।
भणिज्जती,-ता, जई; भणीअंती,-ता, -जीआई
भणिजमाणी-णा; भणीभमाणी, मणीप्रमाणा।
स्त्री-
इंतुहम्मतो, हन्ममाणो; हम्मतं, हम्मगाणः हम्मंती, ता,
हन्ममागी,णा हाई।
.
कार' संग उन्धी कान्ती, कारे, पारमानी, कारतं वगरे.
रूप उपजाची देवा.
२ श्री पृ१११ पंशावनी पिता.
३ भो. २३५-ना

३०४
प्रेरक सदभेदी कृदंत
(प्रेरक सह्यभेदी अंग बनाववानी प्रक्रिया 'प्रेरकसह्यभेद' ने
जणावतां जणावी छे.)
कर-करावि +ईअ-करावीअंतो, अमाणो, इत्यादि।
(शी० मा० करावीअंदो) (पै० कराविश्यंतो)
र-करावि + इज्ज- काविलंतो, कराविजमाणो, इत्यादि ।
कर-कार + ईअ-- कारीअंतो, कारीअमाणो, इत्यादि ।
कर-कार + दन- कारितो, कारिजमाणो, इत्यादि।
चि- चिव्व + आवि- निजातो, चिन्वाविजमाणो. इत्यादि ।
प्राकृत अने पैशाचीमा वर्तमान कृदंतनां रूपो सरसां थाय
छे, शौरसेनी अने मागधीमां ने विशेषता छे ते उदाहरणो साये
जणावी छे, अपभ्रंशमां शौरसेनी अने प्राकृत प्रमाणे समनवानु
छे.
शौरसेनी, मागधी के पैशाचीनां उदाहरणो मात्र एक ज
लिंगमा मूकलां छे पण अभ्यासिए एनां प्रणे लिंगी रूपो पोतानी
मेळे समजी लेवा.
पैशाचीना सह्यभेदी वर्तमान कृदंतनी विशेषता नणावेली छे.
(कोइ पण भापानुं रूप करती वखते । वर्ण-विकार ' ना
नियमो लक्ष्यमा रासवा)
भूतकृदंत
कतार भूतकृदत-सयभेदी भूतकृदंत
१५ओपृ. २१४Rसह्यभेद,

- . - . , १ घातुना अंगने अद' अने 'त' लागवायी तनुं (बन्ने नातनुं ) भूतकृदंत बने छे. २ 'द' अने 'न' प्रत्यय पर रहेतां पूर्वना 'अ'नो 'इ' याय छे. ('द' गौरसेनी, मागधी अने अपभ्रंशमा वए- रायचे अनेता पक्षाचीमा वपराय छे.) कतरि भू०१०-गम+अजामिओ गमिदो, गमितो (गनः) चल अचन्टिओ चलिदी, चलितो(चलितः)दत्यादि. सबभेदी भू००कर अकरिओ करिदा, करिनी कडो (कृतः कटः) पर+अ-पदिओ पदिदी, पदिनो गया (पदिनो ग्रन्धः) इत्यादि. हस+अहसि हमिद, हमितं (हमितम् ) लम+सि रसिद, लमिन (ग्लसितम्) तुर+अन्तरि हरिद, तुरिन (स्वस्निम) इत्यादि. मुम्सम अ-मुम्भमि मुम्मान, सम्ममित (शुभूपिनम्) नंकम+कमिभ कमिदं, चकमितं (चरमितम्) झा+झायं माद, जानं ध्यानम् ) १ मामांनादने मामा ()' या काय t, fair '' ''नीटे Trans लु +अ-लु लुदं, लुतं . (लूनम् ) हू +अ-हूभं इदं, हूतं (भूतम् ) प्रेरक भू० कृ०- १ धातुने प्रेरणासूचक • आवि' प्रत्यय लगाड्या पड़ी अथवा धातुना उपान्त्य 'अ' नो दीर्घ कर्या पछी भूतकृदंतनो 'अ' प्रत्यय लगाइयाथी तेनु मेरक भूतकृदंत बने छे. कर- करावि+अ-कराविभं कराविद, करावितं (कारितम् ) कारि+ अ-कारिअं कारिदं, कारितं हम- हसावि+अ-हसाविभहसाविदं, हसावितं ( हासितम्) हासि+ अ-हासिअ हासिद, हासितं इत्यादि आप ग्रंथोमा के अर्वाचीन प्राकृतमा केटलेक स्थळे संस्कृतनां सिद्धरूपो उपरथी पण भूतकृदंतनां रूपो बनाववामां आन्यां छः गतम्- गयं । मतम् मयं । कृतम्- हृतम्- ह। मृतम्- मई।- जितम्- तप्तम् तत्तं । वगेरे भविन्यत्कृदंत- धातुना अंगने । 'म्सन' स्ममाण' अने गमई' प्रत्यय लगा. १ सभी पार्नु ६६-त. २ रम + अंत = स्मंत । स+माग% रममाण । र + = tet. ओ पृ. २९९ वर्तमानात. 'कर्ड। नि।

३०७
दवाशी तेनुं भविष्यत्कृत' बने :
करिप्यन्-करिस्संतो (शी० मा० करिस्संदो ) इत्यादि ।
करिष्यमाणः-करिम्समाणो इत्यादि ।
.
.
हेत्वर्थकदंत
१ धातुना अंगने 'तुं'९' अने ' त्तए' प्रत्यय लगाडवाथी
तेनुं हेत्वर्थकदंत' बने छे.
२ उपर जणावेला प्रणे प्रत्ययो ('तुं' 'ढुं' अने 'तए')
पर रहेता पूर्वना · अ'नो । अने 'ए' थाय छे.
(टुं शौरसेनी, मागधी अने अपभ्रंशमा - वपराय छे अने
प्राकृत तथा पैशाचीमा 'तुं' वपराय छे.)
१ भविष्यत्कृदंतनां पालिरूपो आ प्रमाणे छः
-गमिस्सं (गमिप्यन्) स्त्री-गमिस्सती
गमिस्संती
करिस्सं (करिष्यन्)
चरिस्सं (चरिष्यन्)
'गमिप्यन्' वगेरे सिद्धरूपाने छेटे रहेला 'न् 'नो अनुस्वार कर.
याथी पालिनां. 'गमिस्सं' वगेरे रूपो तेयार ययेलां छे-पालिप्र.
पृ. २४८-२४८
२ पालिभाषामां हेत्वर्थकृदंत करवाने माटे धातुने '
तुंतये'
'ताये' अने 'तुये' प्रत्ययो लगाडवामां आवे छे:
मंतुं । कातवे ( कर्तुम् ) नेतवे (नेतुम् )
दक्खिताये (द्रष्टुम् ) गणेतुये (गणयितुम् ) वगेरे.
-
नया मालिा.

३०८ मण्-मण+तु-भगिउं मणे, मणि, भनितुं (मगितुम्-मणाने माटे) हस्-हसत-हमिर्ड, हसेउं हामि, समितुं (हमितुम्-हमराने माटे) हो-होभ-तु-होइउं, होएउं होइदु, रोइनु (मपितुम्-याने माटे) भण्-मणावि-मणाविउं भगाविद्, मनापितु (भणावा माटे) कर-कराति+तुं-कराविउं करायिदु, करानि ( कगवा माटे) कर-कार+तु-कारिलं, कारेउं कारिद, कारितु ( कगवा मारे) हम-हास+तु-हासिउ, हासेउं हामिद, हामितु ( हसातवा माटे) शुथप्-सम्सूस+तुं-सुम्ममिङ, सुम्सुमेउं मुम्मसिद, मुस्मसितुं (शुश्रूषा करवा माटे) महम्य-चंकम+तु-नकमिडं, मंझमेउं कमिढ़, मरुमितुं (नग्रमण करवा माटे ) इत्यादि. - %3D (ग्रहीतुम्) तुरि } (त्वरितुम अनियमित हेलकदंत कृ+ तुं का + उ काउं ग्रह् + तुं घेत् + तु घेतुं त्व + तुं तुर् + इ तुरेनें दृश् + तुं भोत् + तुं मोतुं मोत् मोतुं रुद् + तुं रोत् + तुं रो वच् + तुं वोत् + तुं वोत्तुं १ प्रेरकहेत्वर्थदतनी रचना प्रेरक भूतकृदंतनी जेबीज छे. तुर् + ए- दह +5 - भुन् + तुं तुं (द्रधुम) (मोक्तुम् ) (मोक्तुम् ) (रोदितुम् ) ( वक्तुम् ) - - - कर D } सि - - - विहा 'पाम् + करतए कर्तुम् ) करितए मिडर + ता. = मिझिता (मेद्धम् ) उपवन उपवन+ तए - उपवाचितए (उपपतुम्) विहर + हुए = विहरितए (विहर्तुम् ) पास + ए = पामित्तए (द्रष्टुम् ) गम् गम उप = गमित्तए (गन्तुम्) 'पन्यन् पवन + नए = पन्वइतए (प्रत्रमितुम् ) आहर - आहार + चा = आहारितए (आहर्तुम् ) + हत्तए = 'दलहत्तए (दातुम् ) 'अचासाद- अचासाद + तप अचामादेवए ( अत्याशात- यितुम् ) १. विछोरे कर्गने या प्रन्ययनो उपयोग याप्रयोमा यएलो . वैदिक संस्कृतना मने पालिना नुमर्थक. 'तवे' प्रत्ययनी साये जा 'तए, ' प्रत्यपनी विशेष समानना है (जो पाणिनि-३-४-९ वैदिक प्र० तथा पृ. ३०७ नी ? टिप्पनी. " यंतं करेत्तए." सिझित्तए देवचाए उपयत्तिए" भुजमाने विहरित्तए"-भगवतीसू. २० ७,३०७० ३११ स० ३ स्थाई पासित्तए" देवलोगं गमिचए-मगवतीम. शु० ७,०७०३१२ स०. पवनाए पश्यइत्तए यापणा याहारिनए ""-सुग- यानं दलाए "-मगवती. २० ३,८०२ १० १७१ १०. ५ थापताने लीये 'हर' नो 'हार' ययो के. ६ वारंवाने टीघे यहीं ''बागमपे पयो के. मयमेव पच्चासादेत्तए."-मगवती० ० ३, उ० २ पृ. १७२ १०. .. " , 'सममिन्टोर- समभिटोक + तए समभिन्लोपतग (सममियो- कितुम्) अपभ्रंश . - + + + + - धातुना अंगने ' एवं ' अण' । अणहं । अहि' एप्पि' • एप्पिणु ' एवि ' अने एविणु' प्रत्यय लगाडवाथी अपभ्रंशद्वं हेत्यर्थदंत ने छे. एवं- भर एवं = धएवं (त्यक्तुम् ) एवं देव (दातुम्) भण- अण भुंगण ( मोक्तम्) अण करण ( कर्तुम् ) अणई- से + अणहं सेवणहं (सेवितुम्) + अहं मैंनणहं (मोक्तम्) अह-. अहि मुंपणहिं ( मोक्तम् ) भंत + अहिं मुंनहिं (मोगम) एप्पि- সি परेणि (कर्तुग) + प्रणि जोषि (मेनुम) ८"दिमि मममियोश्नर "-भगवती.. , ३... ११८.., म + , %3D ॥ चय - C पाल + C एप्पिणु- + एप्पिणु करेप्पिणु (कर्नुम् ) + एप्पिणु पपिणु (त्यतुम् ) एवि- यरेषि ( कर्तुम् ) एवि पालेवि ( पालयितुम् ) एविणु- कर + एविणु करेविण (कर्तुम् ) + एविणु लेविण (लातुम् ) केटलेक स्थळे संस्कृतनां सिख रूपो उपरथी पण हेत्वर्थकृदं- तनां रूपाने बनावेला : लन्धुम् लढुं। रोद्धम् योद्धम् जोदं। कर्तुम् वगेरे संबंधकभूतकृदंत- १ धातुना अंगने ' तुं'अ' ''तुआणता' १ यो पार्नु ३५ - नि० २९ - 'ना', 'इत्ताण', 'आय' अने' आए' प्रत्ययनो उपयोग म्यास करीने आपणाकृतमा पालो . पालिमा मा अर्थमा । { क्याय ' दवा' (आपग्रा०-' इसा') ( क्याय अने (प्रा० उन क. 'जण ') प्रत्ययनो उपयोग थाय - न्या कन्या, रिया ( आपणा. करिता) (कन्या ) (गन्या ) रोद्ध। 'तण . न्यान ) (आप) ट्रेन 6 , - इत्ताण 'आय 'अने आए' प्रत्यय गाडवाथी तेनु संबंधक भूतकदंत ने छे. शौरसेनी अने मागधीमा संबंधभूतकृदंत करवा माटे घातुने 'अने दूण ' प्रत्यय लागे छे तथा प्राकृतना त 'कागदि प्रत्ययो पण 'द 'कारादि करीने लगाडाय छे भने 'ता' इंस्था (हत्या) अहिरवार (हिन्या)- (हत्या) जिदिन्या ( भाग छिदित्ता) (ioन्या) मुगित्ता) जिणित्ता) (मित्या) पाणित्या (आमा • पापुणिता) (प्राय) स्यान-दान गंन्यान इत्यान जदित्यान (आया. हत्ताण) नि मुणित्वा (" जिनित्या (, न 4141 itA4"निमा' 2441 tu aft मनोका नियम ar...1 , - al . गया . -पासपो माग ३१३ 'इताण' प्रत्ययो पण वपराय छे. पैशाचीमां ए अर्थमां ' तून ' प्रत्यय वपराय छे. अपभ्रंशमा ए अर्थमा 'इ'इट' 'इवि' अने : अवि' तया ' एप्पि,' ' एप्पिणु,' एवि' अने 'एविणु' प्रत्ययनो व्यव- . हार याय है. . - . . २ अपभ्रंशु सिवायना उपर जणावला वीजा प्रत्ययो पर रहेतां प्रयोगानुसारे पूर्वना 'अ'नो' अने 'ए.' थाय छे. ३ क्रेटलेक ठेकाणे प्राकृतना त कारादि प्रत्ययोना त' नो लोप पण थइ गाय छे (नओ असंयुक्त ' कादि' लोप पृ० १०नि०२) १ उपर नगावला प्रत्ययोमा जे प्रत्ययो ' छेडावाळा छे तेने अते विकल्प अनुस्वार याय छे. अपवाद-शौरसेनी शौरसेनीमा 'कृ' अने 'गम्' धानुनुं संबंधक भूतदंत कडअ' अने 'गडम' बने ः (कृ+ अहअ = कटुअ-कृत्वा (गम् + अ = गहुअ-गत्वा) अपवाद-पशाची 'वा' छैटाबाळां संस्कृत रूपोर्नु संबंधक, भूतहंदन करवा माटे पशाचर्चामा ए 'A' ने बदले 'दून' अने ' त्यून' वाप- रवामां आव नदून, नत्थून (सं० नंदः) तसून, तत्यन (म० तहा) वगैरे अपवाद-अपभ्रंग मात्र एक गम्' धातु, मंचर तल्लंन बरसा में

३१४
भ्रेशना उपयुक्त प्रत्ययो टगाडवा उपरोत : प्पि' अने : प्पिणु
प्रत्ययो पण दगाइवाना छः
गम् + प्पि = गम्प्पि गत्वा।
गम् + प्पिणु = गम्प्पिणु- गत्वा ।
भाषावार उदाहरणो
प्राकृत
हस-- हस + तुं = हसिउँ, हसेउं, ( हसित्वा)
हो होतुं = होइउं, होएउं, (भूत्वा )
हम्- हस + अ = हसिअ, हसे, (हसित्वा)
हो- होअ = होइअ, होएअ, (भूत्वा)
हम्- हस + तृण = हसिऊण, हसिऊगं, हसेऊण, हसेऊणं
(हसित्वा)
.
हो- होम + तूण = होइउण, होइउण. होएउण, होएउणं
(भूत्वा)
हम्- हस + तुआण-हसिउआण. हमिठआणं, होउआण, हसेउआणं
(हमित्वा)
हो- होम+नुभाणोइउआण, होइउआणं, होएउआण होएउभाणं
(मूत्वा)
मर-मणावि + तुं = भणावि ( माणयित्वा)
+ अ = भणाधिन
भगाविउण, मगाविऊणं
+ तुआण-मणाविउभाग, मणाविउआणं
१ या प्रेरक सबंधक भूतात हे अने एनी रचना प्रेरक भून
इदतनीसेकी छे,
"
+ तू
"

"
"
मण-माण + तुं माणि, माणे
+ अ = माणि, माणे
+ तूण= भाणितण, माणिजण; भाणेजण, माणेषण
+ तुआण, - माणिउआण, माणिउआणं, माणेउआण,
माणेउआणं
कर-करावि+ तु = कराविडं ( कारयित्वा )
+अ% करावि
+ तृण- कराविऊण. कराविजणं
+तुआण कराविउआण, कराविउआणं
" कार + तुं 3 कारि, कारेड
+ अ. कारिअ, कारे
+तूग * कारिउण:कारिऊणं, कारेऊण, कारेऊणं
तुआणं कारिडआण कारिउआण कारेडआण,कारेउआणं
शुश्रूष-मुस्सूस + तुं = सुम्सूसिडं, मुम्मसे
+ अ = मुस्मृसिअ, सुम्मसे
+ तूण- सुम्सूसिकण मुस्ससिउणं, सुम्यूसऊण,
मुम्मूसेऊणं
" +तुआण=युस्मृसिउआण, सुस्मृसिउआणं. मम्ममेडआण
सुस्यूसेउआणं.
चक्रम्य-चंकमा तुं चंकमिडं, चक्रमे
" + अ = चंकामिन, चंक्रमे
" + तूण = चंकामिण, चंकमिण कमेडण, कमेडणं
"+तुआण-चंकमिटआण, चंकमिरमाणं, कमेडआण,
"
"
:

(कथपिला) (गत्वा) कर-इत्ता -करिता कर- दत्ताण = करिताण, पारिताणं कहिता, कह- साण = रहिताण, कहिताणं गमिवा, गम- इताण गमित्ताण, गमिसाणं गह आग - संपेहाए आगा+आए आयाए शौरसेनी, मागधी-- (गृहीस्वा) मोह आग (आदाय) हो + होणा (भूसा) " दूण हरिया होण परिय, परिदूण मिया पदिशा (पटिला) पर + रंता (सा) रंदेश . पैगानी- + 4 गम +तून • गतून (गया) मितृत (मिमा) परिन (परिया) कवितुन (कामिया) म.ग.:.13.2-lam he ३९७ क " ~ ~ ) ( अपभ्रंग- लाहि (लवा) करिड (कृत्वा) कर + इवि करिषि (. कर + अवि करवि कर + एप्पि = करोप्पि (" कर + एप्पिणु= कोप्पिण (" ) फर + एविणु = कविशु (" कर + एवि : करवि अनियमित संबंधक भूनकर्दन (प्राकृत) १. + तुं कार्ड, - काउण, काउणं, + तुआणन्काउआण, काउआणं. ग्रह + तुं - घेखें, पेतून. तूग, * तुभाण पत्तभाग, घेत्तभाग. + = दुरिलं, नगे, + अ = दुग्भि. दुरेश + ऊ - लुम्डिन, दक्षिण टोडम रेडम. ., +उभाउ र दुर. आ.ग. %3D " + दून , %3D %D .. " . B + क + ३१८ " 2 " " + ताण + तुं + तुभाण - द8 + उआणठाण, ददुआगं. भुंन मोत् + तुं भोतुं, * तूण + तूण मोत्तण, भोपूर्ण, " +तुमाण +तुआण- भोत्तुआण, मोतुभाणं. मन् मोत् + तुं - मोतुं सूण + तूण . मोतूण, मोतूणं " + तुआण - मोतुण, मोतुआण. रोत् + तुं - रोतुं + तण " रोत् + तूण रोण, रोत्तूगं * तुभाण- रोत् + तुआण - रोतुभाण, रोतुभाणं. वोत्तुं, + तू • वात् + तूण - योग, योपूर्ण, •तुमाण- गोत् + तुभाण - बोनभाण, वोरामाणं. बन्द +7 - दिनु, पदित. [ मतना गिद्ध प्रबंधक मृतदतो पण पोरा फार मारे प्राकृतमा गाया है अटार-भाषाय बन्दिरमा--दिना. निहाय-विषमहाय, तुं नोत् + " गन्नाना, श्रुला-पोवा. मुख्या-ना. मंडयामा ए-ता मा-भाना.

ATTA 'विष्य-कृदंत- ६. दिव्यर्य वृदननी साधना विध्यर्थ वृद्धतना संस्कृत सिद्ध रूपो उपापी करवानी है, तो पण तेने लगता केटलाफ प्राकृत प्रत्ययो मारते ः १ धातुने तत्व, (बी०'दन्न') अणिज' अने अगोम 'प्रत्यय लगाटवाथी नेनुं वियर्थ-दंत बने छे. २ तल ' अने 'दल ' प्रत्यय पर रहेतां प्रायः पूर्वना 'अ' नोद तथा 'ए' याय छ. १किययं दंटो मारभेदी होय है. वियप दंत माटे पालिमा ‘दव्य, यने 'नीय ' प्रत्यय यपराय :- भवितव्यं (भवितव्यम्) दुन्सिव (बोदव्यम्) মানুল (गदितव्यम्) जातय्यं (सातव्यम् ) पत्तव्य (मानव्यम्) (व्यम्) (देयम्) मे (मेपम् ) कच्च (कृत्यम्) मन्दी (नत्यः) वृदियालो (कारिवं (कार्प). हारि (हार्य) बनीद- भवनावं सपनीयं पापनी (मारीपन) -पाटिम पृ.

वाच्यम् - वर्ष । वायम् - मन्यम् - जन्न । -- भियो। - - । - ३शिध्यर्थ-दंतने लागेल संस्कृत • य' प्रत्ययने स्पाने प्रार तमा जपण लागे छे. सिद रूपो उपरथी यनता विध्यर्य-कृदंतो~- कार्यम् - का। फरगम् - किन। प्रायम् - गेछ। गुलम् गुर्शी पार्यम् - ना भार्या मजा। वचम् अर्थः - अनो भगम् म। आर्यम् - अ आचम्- आचा पारयम् - प । इत्यादि। तन-म-मिम, हमेभात, हमितव्य, हसेतयं । हमाविमरे, हतावित। जी हमिद, हमेदव, रमाविपूर्ण । गुग्गमितलगूगल, गुणमिमल, गुमणारेला मामिनी, मेराय, मि, चामेमा । कोय। -निविन मिले, मानातर्यनायरा मिपिन, नियत अगित इमगिन, रमणी में, हमाणिन, हमारणी में, मी, करणी मुम्मगि, सागपणा, मगित, मणी, मगित गीगादि। गान, पी पंगा-गंगा, पंथा। नत्र, गदाता - -अनियमित विध्यर्थ कृदंत-- ग्रह-तन्न-घेतलं । द-तव-रोत्तन। भुन्-तब-मोचलं । कृ-तब-कातवं वच्-तन्व-वोतन्वं । काय मुन्-तन्त्र-मोतन्त्र । त्वर-तन्व-तुरिअन्वं, तुरेअन्वं । दृश-तत्व-ट्ठन्वं । तुरितवं, तुरेतन्वं । विध्यर्थ कृदंत (अपभ्रंश)- प्राकृतमा वपराता 'तन्च' प्रत्ययने बदले अपभ्रंशमां 'इएल्बउ,' एव' अने ' एवा' प्रत्यय वपराय छः + इएन्वर्ड करिएव्व कर्नव्यम् । + एव्य करेवलं करेवा मर + इएव मरिएन्व मर्तव्यम् । मर + एल्बई मरेब मर एवा = मरेवा मह + एल्ब महिएल्वर मोटव्यम् । सह + एवं महल मुह महवा मो मोएवा म्वन्यन् । एवा नादा नागरिकन्या + एवा - + " + एवा + %3D - प्रा० ४६. Rad ३२० -ना ३शि-कृदंतने लागेल संस्कृत • य' प्रत्ययने स्पाने प्रार- तमोसपण लागे छे. सिद्ध रूपी उपरथी घनता विध्यर्थ-कदंती-- कार्गम् – कर्म। वाच्यम् - १। पम् -किगं। वातयम् - पक प्राणम् - गेसं। जन्यम् -न। गुपम् - गुश। मृत्यः - नियो। पार्थम् - राज । भार्ग भना। गया अर्गः - अजो। मन्यम् - पर्य। आर्गम् - म ।। आयम्- आना पारया - प । इत्यादि। नाग-म-मिभर, सेभय, हशितव्य होता हमानिभात, हसारित। गी. निदान, होदय, मानिन । गुमानिन, मुगल शम्सुलिभपुगत। नयमित, का, मि, मामेभा । होतात, हा नि- निभात, हिमान, समानA, नाया मिलिगिता अतिमिल, मणी, हमायमिन, एमावणी, भीग, करणीमा मुगामित्र, मामी, मामगितामणी ११- पादि। गमगारा पंगा। मरगा . - -अनियमित विध्यर्थ कृदंत- ग्रह-तत्व-येतत्वं । रद-तन्नोत्तलं । भुज-तम्ब-भोचलं । ह-तन्न-कातत्व वन्-नन्य-बोचन्न । काय मुन्-तन्द -मोचन वर-तन्य-तुरिअव्वं, तुरेअन्वं । दृश्-तव्य-दट्टव्यं । तुरितन्वं, तुरेतव्वं । विध्यर्थ कृदंत (अपभ्रंश)- प्राकृतमा पराता तब' प्रत्ययने बदले अपभ्रंशमा इएवउ,' 'एबई' अने एवा' प्रत्यय वपराय छः कर + इएल्वर करिएल्वर कर्नव्यम् । + पट्य करेन्व कर करेवा मर + इएन्वर मरिएवढं मतव्यम् । मर + एव मरेवडं मर मरेवा सहं + इएल्व सहिएन्वर मोदन्यम् । सह + एम्बई सहेल्बर्ड सह एवा मो एवा सोएवा स्वप्तव्यम् । एवा जगोवा जागरितव्यम् । + एवा - C + एवा " " + -, सहेवा + C जगा + प्रा०६१

३२५
'पुरिष्टं (पुरे मवम् ) ग्री• पुरिष्टी ।
अभम् +rem = हेटिलं (अगो भतम् ) सी. हेदिल्ली ।
उपरि+इल -
उपरिलं (उपरि भाम्)
उ7-आत्म+उ० अप्पुहर (आत्मनि भाम्)
रार (सरी भाम् )
नगर +उल नयरलं (नगरे माम् )
इत्यादि।
. . तेनी मे.प अर्गमा नामने ।' प्रत्यय लागे छे.
गरम पानिपुगे पासाया (मथुराका पाटलिपुणे प्रासादाः)
४ . प ' आमा नामने 'इमा'' अनेवण' प्रत्यय
लागे भने भाशमा 'पण' प्रत्यय पण लागे छः
पीण + मा - नीणिमा (पानलम् )
पीण + तण.
पाणतणं, पीण + क्त-पीगत ।
TT + मा • गुरिफमा (पुपरयम्)
तुक न कर्ण, गुफ +पुकतं ।
HTA. पण - पशु, परतणु वगैरे
(पदसम्)
fir+Mण-पिण, विहाराणा वगरे (भुतम् )
२ जत' मा परिमा'म' प्रगप श्रा.-
पथान 1. मिमी। उपर जात:-
।
of भगे T-gो
प्रो-
एगा.
.
भा wrint or apni' (m)
Hit (TET)

३२५ . ६ मतु' प्रत्ययने ५ वार' अर्थमां नामने 'हुत्त ' (आर्प-नुत्त) प्रत्यय लागे छे: एक + हुत्त = एगाहुत्तं (एककृत्व:-एकवारम् ) हि + हुत्त - दुहुचं ( द्विवारम् ) त्रि + हुत = तिहुतं (त्रिवारम् ) शन +हुत = सराहुरं (शतवारम् ) सहन + हुत सहम्मत्तै (सहन्त्रवारम् ) वाळं' अर्थमा आवता नामने लागता स्थाने आल 'आलु' 'इन'हर ' इल्ल' उल्ल' मण' मंत' अने 'वंत' प्रत्यय वपराय छः आल- रस + आल - रसालो ( रसवान्) + आल - नडालो (जटावान् ) ज्योत्स्ना आल 3 जोहालो ( ज्योत्सावान् ) शब्द + आल सदालो (शब्दवान् ) फटा १० कृत्यम्-कुत्त युत्त-हुत्त-जओ म्यादिनो 'ह'पृ० १९. २ 'वार' अर्थमा पालिमा 'क्खतुं' (सं० कृत्वम् ) प्रत्यय वपगय । एकरवत्तुं (एकबारम् ) द्विक्यत्तुं (द्विवारम् ) तिरस्वतं (त्रिवारम्) पालिप्र. पृ. २६१ आपप्राकृतमां आ वर्थमा 'खुत्त' (पादि-खत्तु) प्रत्यय पण आवे तिम्वुत्तो- तिस्युत्तो आयाहिणपाहिलं करेह "- मग रा० १०२३५ पं०२ "महावीरं निक्युनो मायाहिणपयाहिप करे - (२० दि. ० १.७० ४२५५० २ स०) " पदो अनंतरवुत्तो" जीयविचारनी रेल्ली गाया. + आल फटालो (फटावान् ) . " ૨૨૮ पितृ + उ = पिउझो, मिश्रा (पिता) हत्युलो, हत्यो विशेषता पेशामा सार्षिक अ' ने बदले संस्कृतनी पेठे 'क' . + भ मं० पानफम्-प्रा. वणयं-१० पान। ॥ तनोवतन समप्पेतून " मा० व्या० पा० २ मू. १९४१०७० अपयशमा हगामा • अ,' । अड.' उल • रम', •ा' ने उस ' प्रत्ययो' वाराय: () दोग + दोसड़ (दोपकः) (गुटिका) अनुभ- हिअद (दयाम्) दाम गाभो (गुडा) कारबल • उपाहमालडा ( मातुमरर) ११ मतमा ताराना 'गण' अर्गताला (11, तद) प्रयो भगमन E की गार पालन नामने माया एता पत्र प्रम- मदत ममापना. Jआता मानना मरणका Part-TAL REET.' 4:' '' 'rsury' + - .

एक+मि + मया } (5) शनः इभ अनियमित तद्धितांत रूपा एक्कासि एक + सि = एकासि (एकदा) एक इआ - एचआ भुमया । भमया मणि (शनः ) उपरिह - अवरिलो (टपरि) ज एति जेति जेतिलं (यावत् ) एदह जिद्द अप० वटु, तुला त + एति - तेति एतिल ततिलं (नाव) न + एदह नंदहं न - (प्लायत्) (त्यन) अप० नेबदु, नेतुन्टो एत त्तिम पतिम एन - एटिट - पनिट दहं अप- ए. पी पनि देदिक पशिल - दे कर अपः पेट, केगमा (शियत्) .

.
arrकिनदिन RT 1
पर + - परकं (परकीयम्)
राइक (रानीयम् )
अम्ह + एथय- अम्हेवयं (अस्मदीयम् )
तुम्र + एचय - तुम्हेवयं (युप्मदीयम्)
मांग+इभ -सगिओ (साङ्गीणः)
पह + इम म पहिमा (पान्यः )
अ+य अगण (आत्मीयम्)
कल्पिक रूपो
+8 नालो, नमो
(HI)
" rm प.तो, एका (एककः)
मनाए + अग मण
मनार ३५ - मणिगं, मगा
मिश्र + आलिम - मोगादिभ, मीन (मिश्र)
दोही, दाह (दम्)
वित 7 कि.मि (गु1)
पन, पा (पम् ।
प्रायो, मग ( भाग.)
ना
} (मना)
पापी (पी)
THE Iाति
पति
Data

نت زنی)
ا ا ، ان "اثن : 1
: ه ے
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من ن ن ن ن ن ن ش
الغاء لنا ؟
مه
ت =نين إن) = ا ا
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३३२ जगप्म् प्रा० मुउगम गुण ५ प्रा० मुहाग गान ६ या प्रा. ग गीत योना सा गाण मुण 31+ 'मा उनुमा .. +चा पाप्रा. गहर २. 31+14T1 - आरम्मा लगमा आशीर वि +टामा निमा 41 + प्राप्रा. RITE मारा गा. अमन . " म नि: fam(प ३ १७ उत् + न्या { मैले प्रा० मिन्ना उट्ठ उकुकर वा १९ निर + मा पवाय २० क्षिप्रा०शि निम्माण निमिव णिज्जर २१ डाद प्रा० छाय णुम नम, म सन्नुम - ओम्वाल २२ नि + वृ-निवार प्रा० निवार पवाल णिहोर पात प्रा० पाड २३ द " २४ चवन्ट दूम २५ २१ विरेच प्रा०विरम दुम, दूम ओहाम ओलंड ताड २८ मिश्र प्रा. ਦਵੰਦ पल्हत्य आहोड विहोट वीसाल मेलव मीस मिम्म

उन् + भाप्रा० उद्ल
गुंठ
भाम प्रा. भाम
सान्दिर
तमार
नाशप्रा. नाम
उर
नासा
हात
पगाम
Llab
२२ दर्शादी
दास
दंग
३
31+ पा.मा. उगाट
उम्म
wia
पिह
मा+मार
भामा
71+नम्मा.श्रा
hit
TE
+गाना. पदा
14
bano Lacetti
--

२९ अब प्रा० अप्प अद्विव चच्चुप्प पणाम 22 यापमा० नाव प्टान प्रा० पाव - ओन्वाल ४२ विकाश प्रा० विक्रम १३ रोमन्य पन्नाल पक्खोड ओग्गाल वगोल गिहुव १४ कम प्रा० काम प्रकाशमा० पयाम १६ ४७ आरोप प्रा० आरोव १८ दोल णुन्न विच्छोल वन्द रंखोल 28 घ:मा. वड १२ वेष्ट प्रा०देड ५२ को परिवाड परिआल किण विककी प्रा० विधी ५३ । विक्षिय मा ५४ आरटी वाह अही Pre १५ नि+ गिर्गम सा ५१ ली विग SEEEEEEEEEEE. रुप्राम रुन ५८ शुभा० मुण ५९ ५ मा० पुग शुष टुव (शौक भ, भु) १२ " णिन्वर (पृथग्भवने, स्पष्टमयने म) हुप (मभवने) प्रा० कर गिभार ( काणेक्षित- फरणे) गित (नियों) संदाग (अष्टम्भे) पावफ (असारण) णिबोल (फ्रोषपूर्व ओठमालिन्ये) पयत शैकियारणे कृ ७० ह - ६ र " लम्बने) " प पातुंछ (निपाते आच्छोटने च) कम्म (सुरकरणे) गुलल ( पाटुकरणे) पर मूर ७४ म्मर प्रा० सर मर विम्हर मुमर पयर पम्हह पम्हुस ७५ वि+म्म विम्हर ७६ व्या+ह प्रा० वाहर वासर कोक, कुक पोक ७७ प्र+प्रा० पसर ९ निसप्रा० नीसर पयट उवेल्ट महमह (गन्धप्रसरणे) पीहर नील घाट वरहाड मग जारमा नागर ८१ स्थामा. बार # + प्रा० मार आमा मार सारह आमा मनाम आदर ८४ प्रहमा० पहर अप + + ओभर मार ओह औरस . नय तर पार मच वेअद सोल्ल पन अवड मेटल उम्सिक रेअव णिलंध धंसार णिचट (दुःखमानने) [ हा बन्दर नग्न मन्छ नि जगह अवह विटविट्ठ ममा+रन उवहत्य मारव मुमार केटाय ९६ मिन --- मिच मिप प्रच्छ पुच्छ ९८ गर्न बुर्कः दिव (वृपगर्नने) अन्य मह रेह मरन आउट्ट गिउद्ध वृड पुष्प ३४२ ११७ पूर्ण गल शुम्भ पहल दस ११८ वि + वृत् प्रा. विव ११९ वष प्रा० कट १२० अन्य मन्य अट्ट गण्ठ १२१ घुसल विरोल अवअच्छ १२२ हाद १२३ नि+ सद १२४ छिद प्रा० छिंद णुमन दुहाव णिच्छल्ल णिझोड णिन्वर गिल्लूर लूर ओअंद उद्दाल मल मढ परिहट्ट १२५ आ + छिद" { १२६ मड्डु पन्नाइ

રે
१२७ स्पन्द प्रा० फंद
१२८ निर + पर प्रा० निष्पन्न
१२९
चुलबुल
निव्वल
विमं+वद
विअह
विलो
१३०
अड
पक्वोट
आ+ ऋन्द
१३२ खिद
णीहर
जूर
विमुर
२३३ रुव प्रा० रुंध
३४ नि+पेष
उत्यं
३५ कुषमा० कुन्न
S
नट
नह
गि
मन
मंत
सिअप
पिप्प
अडिम

३५४ २४३ शिप अहात सोल पेल्ल णोल । घव १४४ उत् + शिप गुलगुन्छ उत्पंध अल्लत्य उन्मुख उसिक हाखन णीरव कमवस लिस लोह आ+ क्षिप स्वप १४७ वेप लोह आयझ झंख वडवड १४८ वि + लप १४९ लिप गुप लिप विर ड

१५१ कृप
अवताव
१५२
प्रदीप
प्रा० पलीय
처해적
मंथुध
१५२ लभ
अभा
मंभाष
१५४
शुभ
१५५
पपुर
१५६ मा + लम
गर
१५७ सम्म
विजम्भ (4)
१५८
मिल (

+य श्री संघपट्टका सर्वज्ञपणुं पण प्राप्त थर्बु जोइए ने ज्यारे सर्वझपएं प्राप्त ययुं त्यो तो आपणुं वांञ्चित सर्वे सिक थयु त्यारे तो मुक्तिने अर्थे वोतरा- गनां वचन खोळवानी जरुर न रही. केमजे जो श्राकमानां फुधः मांथी मधनो स्वाद मळ्यो तो मध खोळवा पर्वतमां कोण जाप! तेम पोतानो वांचित अर्थ सिद्ध थयो तो पठी कोण विद्वान पुरुष तेने वास्ते प्रयत्न करे? ए प्रकारे लौकिक न्याय ए देवमाटे.वी शृं? तो तेमणे करेलो परोपकार जेते पण संसारने तारण करनार संनवतो नथी. केमजे रागादि दोष युक्तपणावमे प्रापणी पेजते पण योगक्षेम करे ये एटसे श्रापणी पेठे ते पण रागादि दोष न. रेसा वे ते पोतेज तरता नथी तो तेमने विपे वीजानु तारणपणु तो क्पांधीज सिफ थाय ! लोकमां पण जे नोका प्रमुख पोते त रती होय तेज वीजाने तारती देखाय ठे ए हेतु माटे. टीकाः-ननु स्यादेतचदिरागादिम जयेत्तदेकयाम्पतपा सकसपार्थिवादिविचारचतुरमधानपुरुपपूज्यतान्यथानुपपत्या ते. पामसिहमिति चेत् न । तत्प्रतिप्वंगनादि घटनायपोकनेन तसिः॥ तेशं रागादीमंतरेण तत्प्रतियिषु ताक्षणापारोग संजवात् ॥ इतरया तव्यतिर्षियत्वानुपपनैः ॥ उपक्षादिना सा सतनुस्याकार निर्मापां हि तत्प्रतिषियं नाम तानूनं ते रागार मंत इति । अर्थः-या जगाए यन्यदर्शनी थाहांका को भी अमारा गादि देव दोर सहित दोय तो जे समस्त पीयाrtta +पय श्री संघपट्टका २७) पदार्थनो विचार करवामां चतुर पुरुपो ने तेमां पोतार्नु प्रधान पुरु- पपणुं ठे, जेथी पूजनीकपणुं ते पोतानां कहेलां वचननी एक वा. क्यताए ठे ए हेतु माटे, एटले पोतानां वचनमां परस्पर वाधा नथी माटे. तथा अन्यथानुपपत्ति वे ए देतु माटे, एटले एमणे करांतेवांज पृथ्वी आदि पदार्थ वे माटे तेमर्नु पूर्वे कयु एवं असिझप नथी एटले सिकपणुं . जावार्थः-जे धमारा देव रागादि दोप युक्त नथी माटे तेमनु कहे सत्य ते. हवे सिद्धांती तेमने जवाब दे ते जे तमारे एम न बोस. केमजे तमारा देवनी प्रतिमाने विपे अथवा प्रतिमा. नी जोमे स्त्री प्रमुखनी संघाथे घटना करेसी । तेने जोतां एमने विषे रागादि दोपनी प्रत्यक्ष सिद्धि थाय ने तेमने जो रागादि दोप न होय तो तेमनी प्रतीमाउने विषे रागादि दोपने जणावनार एवां अक्षणनो धारोपं को ठे ते संनवे नहि. रागादि दोप लक्षण विनानी तेमनी प्रतिमान घमातीज नथी. पापाणादि प्रतिमायोने विपे पापाणादिकना आकार प्रगट रागादिकने जणावनारा ते जेवा एमां दोप नरेखा तेवा श्राकारनी तेमनी प्रतिमायो वे माटे .निधे ते देव रागादि दोप सदितज . टीका:-~॥ यमुक्तं ॥ सक्ष्यते ससनांगसंगमविधे रागोपरागोपगा, पलेपनुजो जुजोर्जित मदास्ते च शखमहात् ॥ श्रेयःकरूपतनास्त्रशास्त्ररचनान्मोदारोदस्पृशो, ये देवा ननु संतुमंतु सहितास्तेवोतरागाः कथं ॥

(५९८) अय श्री संपपटक अर्थ:-ते वात शास्त्रमा कही ये जे अन्यदर्शनीना', स्त्रीनो अंगसंग राखे ते तेथी रागरुपी ग्रहवमे गळायेला जपाय के वळी नहत मदने जणावनार हस्तमुना तेथी तथा हाथमा . ग्रहण करे ठे तेथी पवाळा ए देवठेएम जणाय ठे. वळी कस्याश- रुपी कल्पलताने नाश करे एवी शास्त्रनीरचना करवायी मोहवाळा ठे एम जगाता ए देवो क्रोधी होय तेथी ते वीतराग केम कहेबाप. टीकायदपि पार्थिवादिपुरुषपूज्यतान्यथानुपपत्त्या तेषां वीतरागत्वप्रसाधनं तदप्यविद्याविलसितं ॥ यतो यत एव तेषा मध्यक्षेण रागादिलक्षणं लक्ष्यंतोऽपि ते तान् वीतरागतयाध्य • वसाय पूजयंत्यत एवैतन्मिथ्यात्वमुच्यते ॥ अर्थ:-ए देवोने विपे वीतरागपएं स्थापन करे लेतेश -वोसे ले जे जो ए देवमां वीतरागपगुंठे तो राजा प्रमुख पुरुषो पू -डे नहि तो केम पूजे? ते माटे ए प्रकारना अनुमान प्रयोगवझे बी तरागपणु साधे ठे तोपण ते सर्व अविद्यानो विलास ठे एम जापाई जे माटे तेमनां रागादि लक्षण प्रत्यक्ष जणाय ने तोपण तेमने दि वीतरागपणानो निश्चय करी पूजे ले एज हेतु माटे एने मिथ्याद कहीए वीए. टीका:-अतस्मिंस्तदिति प्रत्ययस्येव तम्सदाणत्वात् ।। तस्मान रागादिमंतो देवाः किंतु संप्रत्यपि विवादिषु रागादिस. रुपविरदर्शनेन वीतरागतयानुमीयमानएव देव इति ॥

* अप श्री संपपरका
(५६९)
। यमुक्कं ॥
यस्य संक्लेशजननो, रागो नास्त्येव सर्वथा ॥
न च पोऽपि सत्वेषु शौधनदवानलः॥
अर्थः--जेमांजे वस्तु नधी तेमां ते वस्तुनो निश्चय करवो
तेने मिथ्यात्व कहीए. ए प्रकारे मिथ्यात्वर्नु सक्षण ए हेतु माटे
रागादि दोपवाळा होय ते देव न कहीए. त्यारे कोने देव कहीए ?
तो तेनो उत्तर पोतेज करे जे दालमां पण प्रतिमादिकने विपे.
रागादि सपनो विरद देखवे करीने वीतरागपणे जे अनुमान क'
रेखा तेज देव कहीए. ते वात शास्त्रमा कही ते जे, क्लेशने उत्पन्न
फरनार एयो रागादिक दो जेमा सर्वथा नथी. शांतीरूपी काटने
पाळचा दावानल अनि समान एवो ऐप पण जेने को प्राणीमात्र
प्रत्ये नधी.
टीका:-नच मोहोपिसंझाना छादनोऽशूरूवृत्तरत् ॥
खोकल्यातमदिमा, महादेवः स उच्यते । एवं विधश्चमहादेवो
ऽहमेव ॥
यकम् ॥
थईनेव च सक्षसक्षषगयो रागादिसकते
देवः केवलमृद्धकेवलपसः स्याहीतरागस्ततः ॥

(५२)
+भाभीस
सरूपत्तररुपेशापि सन्चात्तपापत्या स्वरुपापगम प्रसंग:मन
रुपवान्युपगमे वा जगविण्यनंगप्रसंगात्॥
अर्थ-दो सिझांती अन्यदर्शनीना एकांतमतने सन
रेले एकांत मत एज अति भेध एम तमारे न मोशन
जे जी एम कदेतो दोय तो तारा वोजितने जपानार में NिT
7. ते कया. तो पा मार सपने प्रयास
सनले का वीर बीए. तेमा जो सपन पदार्थ मार एक
FRIEगिकार करे तो मा प्रकारे
दूपण प्रा मार
समर पार्य को पटना रारुपनी पेरे पटना राग
नेतेपी सरपागमनामा दोसीमातिमशे पाने
पर एसपणे यशेजो थोक पपणानो निक
मानचित्रपणे लेगा नाशनो प्रसंग भोए
ईसा-गागात पटाः गंगहाणी
भिटी राप्रापान ft
माना ॥ नागिनी ॥
पगारांना
महारगारमंगात नानांनी प्रगत
मन ममता कातिलाना
वर्ग: पानी REE रानी

+प भी संपा () कारणनाव सिझ थशे. वळी घट जेम जळ लाववारुपी कार्य ने करे तेम उढवा पहेरवा प्रमुख पटादिकनुं पण कार्य करे. पण ते कार्य तो पटची यतुं नधी, माटे सद्रूप एवाज पदार्थ ठे एम एकांत पन सिझन ययो. हवे बीजो विकल्प जे पदार्थ मात्र एकांतपणे • सहप ठे ते पण सिक घतो नथी. केमजे जो एकांत असपनो अंगिकार करीए तो घटने पररूपर्नु असत्पणुंठे तेमज पोताना रूपर्नु पण असत्पणं प्राप्त यशे. त्यारे गर्दनना शिंगमानी पेठे थ. त्यंत थन्नावनो प्रसंग थशे. त्यारे जन जरवान जेने प्रयोजन ने ते पटने अर्धे नदि प्रयत्न करे. केमजे ते घटना स्वरूपनो अत्यंत नाव ,माटे समस्त अर्थ क्रियानो विरद प्राप्त थयो ए हेतु माटे. टीका:-तस्मादेकांतेन सदसत्वान्युपगमे जावस्यार्थक्रिया नुपपत्तेरुजयरूपं वस्त्वन्युपगंतव्यम् न च सदसत्वयोरन्योन्य विरोधेनका समावेशानावानोनयरुपता जावस्य संगचत इति. वाच्यं नावस्य स्वरुपेण सदसत्वान्युपगमे हि स्याविरोधःखरू- पपररूपाच्या तु तदन्युपगमे कानुपपत्तिः॥ अर्थः-एकांतपणे पदार्थ- सम्पपणुं अंगिकार करे तो अथवा एकांतपणे पदार्थ- सप अंगिकार करे तो पदार्थ मा. अनी अर्थ क्रिया न थाय. माटे वस्तु मात्रनुं सद्रूप तथा अस. प अंगिकार करवू. त्यारे प्रतिवादी घोल्यो जे जो एक वस्तुनुं सदपपणुं तथा थसद्रूपपणुं ए वे अंगिकार करशो तो एक पोजा साथे विरोध थवाथी एक वस्तुने दिपे वेनो समावेश नहि थाय मोटे वेय रुपनो प्रत्यंता नाव प्राप्त थशे. त्यारे सिमांतो बोल्यो जे

भब भी संपणाम
एम तमारे न वोस. केमजे पदार्थनुं स्वरुपे करीने सापपार्नुस
मसापपहुं अंगिकार करीए तो तारो कदेसो विरोध प्राप्त
पर स्वरूप तथा पररुप ए बेबके सदूपपणुं तथा प्रसरूपरशुरा
अंगिकार करीए तो शो असिरियाय? पटसे शो होने
कोइन थावे.
टीकाः-तपादि ॥ घटः स्वरूपेण अव्यतः पार्थिान
सनाचादिना केवत इदान न माधुरसारिना ॥ कामले
বদনান নামীয়াসিকান নাম: মানন
गनपानिति ॥ शरयाप्यवादिनापि रारूराले नेकपा
गरिसोगे पामराम्येत ॥ तस्मात् रादरा-पं पस्तिति ॥
अर्यः--जदेखापट या परीने पापी पूर्ण
Rinा धन्यपणे नी. तयायी मा क्षेत्रो!
पर गगरिय संधी नयी. तया काळगी यमानहाउगये
पर धमाका नमीतमा नापयो सागपणे पर
नपी. एमन कठीन पीजी न कहीर मामा
[ অং সান it নাহা মণ #
रेट मला त्या थप Airat
रंकाहांतता गदगतीal Talk
दिन्टानां रिगान मंत्र गया अपना लिया।
बन्द । दर मतान जयंत arilan .

भी संपामा सांतात् ॥ सतधोरपादानुपपनेः ॥क्षणिकेकांतिवादिनामपि सोगताना मते श्वसते यसतापि कारणेन कार्य न जन्येत अस देचकारणे कार्य मित्यन्युपगमात् ॥ तथा च कारणे सर्वथा कार्यानन्यपान्मृस्पिंगादपि घटोनोत्पयेत ॥ उत्पादेवातंत्वाविन्यो- (युत्पद्यत ।। अकारणत्वा विशेषादिति ॥ अर्थः--वळी एकांतपणे वस्तुनुं सापपर्ण तथा थसदूपर पा थंगिकार करनारने मते को प्रकारे विशेषनो प्रसंग नी. एटस ए ये मतमां वरावर स्वदोपनो प्रसंग थावे ठे, तेज देखामे . ने नित्य एकांतवादि एवा सांख्यमतने विपे जेम असत् ऐवा मृति. काना पिंगवमे घट नधी उत्पन्न यतो तेमज विद्यमान एवा पण मृत पिंभवमे घट नदि उत्पन्न घाय. केमजे सत् एवेंज कार्य कारण एवो ते सांस्यमतयाळानो सिद्धांत के. ने जे सत् । तेनी उत्प तिनी प्रसिद्धि ए हेतु माटे ६षिक एकांतवादि एवा पण बो. मतने विपे असत् यकीज जेम कार्य उत्पन्न नथी थ] एम स.. कारणयी पण कार्य नहि उत्पन्न घाय. केमजे कारणने विषे असत् एज कार्य ठे एम तेमनुं अंगिकार करवापर्यु . वळी कारणने विप सर्वथा कार्यनो अन्वय नथो एवो तेमनो मत ठे माटे मृ. तिकाना मिची पण घटनी उत्पत्ति नदियाय अथवा तो तंतु ममु. खची पण घटनी उत्पत्ति यवी जोशए. केमजे अकारणमा विशेषण तेमना मतमां नथी माटे. टीकाः-अत्र च बहु वक्तव्यं ॥ तचामकृतत्वानोष्यते ॥ एवं चाप्रमाणिकैकांतविषयतयोपपद्यते तत् ज्ञानस्याऽज्ञान।

4. अप श्री संपपटक- G तथा नवहेतुत्वयादृछिकोपसंजत्वनिष्फलत्वेन्योति ॥ यदाह ।। सदसदविसेपणानपदे जद चिनवसंजाना नाणफसानावाटी मिउदिहिस्सथनाणं॥ अर्थः-श्रा जगाए घणी वात ए संबंधी कहेवाय वे पर था प्रकरण वीजी वातनुं चाले ते माटे ते वातनो विस्तार नयी कहेता. हवे जे श्रप्रमाणिक एवा एकांत मतने अंगिकार करनारर्नु जे ज्ञान ते श्रझान कहीए. केमजे ए झानने संसारर्नु कारणपर्यु ठे तथा पोतानी श्चामां थावे तेम अंगिकार करवापर्यु एमां रद्यु वे ए हेतु माटे. तथा ए झानतुं निष्फळपणुं वे ए हेतु माटे ए प्रणे कारणे पण मिथ्या दृष्टिनुं ज्ञानते थज्ञानज . ते वात शास्त्रमा कही ने जे मिथ्या दृष्टिना ज्ञानमा वस्तुनुं एकांत सद्रूप मानवामां तथा कांश असदुप मानवामां विशेष नथी. तथा ते ज्ञान संसार कारण ठे तथा ते झान पोतानी श्छा प्रमाणे कल्पेखु ले तथा ते ज्ञाननुं फळ नथी माटे ए ज्ञान ते अज्ञानज वे. टीका:-एवं च सिहं तेषां वस्तुतो मुर्खत्वं ॥ तथा च तेषु सर्वज्ञात्वाध्यारोपो मिथ्यात्वमिति ॥ तत्वज्ञ समस्तशास्त्ररहस्य वेदिनं परमाईत पंचमहात्रतधारिणं सर्वज्ञप्राय सितांबरसूरि अझीयति मूर्खयति ॥ एवं च तत्वज्ञे गुरावज्ञत्वारोपो मिथ्याव. विज॑नितं ॥ अर्थः--ए प्रकार वस्तुताए तेमनु मुखपणुं सिद्ध थयुं. बळी - मप श्री संघपका- (५७) तेमने विपे सर्वज्ञपणानो थारोप करवो तेने मिथ्यात्व कहीए. ने तत्व पटले शास्त्र रहस्यनो जाण ने उत्कृष्टो पाईत एटले अरिहं- तनां वचन प्रमाणे रदेनारो ने पंच महानतधारी ने सर्वज्ञ जेवो जे श्वेतांवरसूरि तेने मूर्ख जेवो जाणे माटे तत्वना जाण एवा गुरुने विपे अज्ञानीपणानो आरोप करवो ते सर्व मिथ्यात्वनुं प्रकाशपणुं . टीका:--एतावता चागुरौ गुरुनावना गुरो चागुरुधारिती मिथ्यात्वं लक्षितं ॥ जन्मार्गीयति उत्पथत्वेन मन्यते जनमार्ग। थपथं कुतीर्थिकमतं सम्यक् पघीयति सन्मार्गीयति॥अत्र च॥ जैनमार्गस्योन्मार्गत्वं त्रयीवाहत्यादिना कुतीर्थ्यपथस्य च सत्पथत्वं तदंत वादिनान्युपगच्छंति मिथ्यादृशः ॥ अर्थः एणे करीने श्रगुरुने विपे गुरुपणानी नावनाने गु. रुने विपथगुरुपणानी बुद्धि एने मिथ्यात्व कहीए एम देखामपुं. जैनमार्गने सन्मार्गमां माने ने कुतीर्थी सोकोना मतने साचो मार्ग जाणे . था जगाए मिथ्पादृष्टिन जैनमार्गने उन्मार्गपर्दा स्थापन करे ते वेदघी बालपणुं ए मतनुं वे इत्यादि कारणवमे ने कुतीथिनो जे उन्मार्ग वे तेने सन्मार्गपणुं स्थापन फरे नेते कुतीर्थीनो मारग वेदने मळतो श्राये ए देतु माटे. टीका:-एतथासुंदरं । प्रपाः मामाएयेन हि तद्वाय. तया जेनपघस्योत्पधत्वं स्थान चैवमस्ति तस्यालोकसोकोत्तर- विरुझार्थप्रतिपादकत्वेनामामाएयात् ॥ तपादि धर्ममार्गस्य मस दया सर्वदर्शनेषु गीयते ॥ यदाद ॥ पंचेतानि पविनाशि, (१७८) - अब श्री सपंपरी सर्वेषां धर्मचारिणां ॥ अहिंसा सत्यमस्तेयं, त्यागो मैयुनवर्जना प्रय्याश्च यागादिषु ठागादिहिंसामुपदिशत्याः कथं धर्ममार्गत।। अर्थः- वात असुंदर ते एटसे श्रघटती ठे केमजे जो वेदन प्रमाणपणुं होयतो तेणे करीने निश्च वेद बास जैन भर्मनु उन्मार्गपणु होय पण एम तो नधी केमजे लोक विरुद्ध तथा सोको- सर विरुद्ध एवा अर्थ- प्रतिपादन करवापर्यु ले माटे वेदतुं श्रम माणपणुं ते ए हेतु माटे तेज देखामे . जे धर्म मार्गर्नु मूल सर्व दर्शनमा एक दयानेज कछु . ते वात शास्त्रमा कही जे धर्मना आचरण करनार सर्वे पुरुषोने या पांच वानां पवित्र एटले कर वा योग्य ते, ते कयां? तो एक अहिंसा, वीजें चोरी न करवी, बोर्ड सत्य नापण कर, चौथु दान आप, पांच, ब्रह्मवर्य राखवू. माटे यज्ञादिकने विये बकर प्रमुखनी हिंसा करवानुं उपदेश करनार वेदमार्गने धर्ममार्गपणुं केमज होय ? टोका:--अथ त्रयी विहितत्वातहिंसाया धर्महेतुत्वेन स्वर्ग: फलत्वादव्याहृतं तस्याधर्ममार्गस्वमिति चेत् न ॥ तस्या एवा प्रामाण्यात्।।तथाहि त्रय्याः प्रामाण्यं यदायुपेयते नवता तस्कि- मोरुपेयत्वात् अहोईश्वरकर्तृकत्वात् उताब्याहतार्यप्रतिपाद- कस्वात् श्रादोस्तिव्यनिचारिप्रमाजनकत्वात् ॥ अर्थः-इवे श्रन्यदर्शनी आशंका करे ले जे वेदमां कहेसी हिंसा ते धर्मर्नु कारण माटे निबंध एवु स्वर्ग फळ ते हिंसापी माप्त थशे माटे वेदमां कहेली दिसा ते धर्म मार्ग ठे एम जोतारं - बर भी संषपका * कहेवं होय तो ते न कहे, कमजे तेनुं अप्रमाणिकपणुंज ए हेतु माटे. तेज कही देखामे जे वेद-प्रमाणिकपणुं तमो अंगिकार करो बो ते शुं वेदवचन पुरुपे नधी कहां एम अपौरुषेय वचनपणुं एमां ठे ए हेतु माटे. अथवा वेद ईश्वरे कर्या ठे ए देतु माटे. अथवा वेदमां परस्पर विरुद्ध अर्थ प्रतिपादन कयों नयी ए हेतु माटे.अथवा अव्यभिचारी प्रमाणनुं उत्पन्न करवापर्यु एमां रडं ए हेतु माटे. टीकाः-न तावदायः ॥ किस पुरुषाणां रागादिमत्वेन तम्चनस्य प्रतारकवाक्यवदोपवत्ताशंकया दानोपादानादि. पयत्वेन प्रय्यास्तदन्युपगमो नवतः ॥ एतचासंगतं ॥ वचन स्य पौरुषेयरवासिः।उच्यते इति वचनमित्यन्वर्थस्य विवक्षाप्र- यत्नोदीरितकोप्टवायनिहन्यमानतावादिकारणकशाप मंत- रेणानुपपत्तेः तावादीनां च पुरुपमंतरेणासंजवात् ॥ अर्थः-इवे ए:प्रकारे चार विकल्प उत्पन करी तेनुं खं. मन करे ठे जे प्रथमनो विकल्प पुरुपे वेद फर्या नधी सेतुं संगन. जे पुरुषोने रागादि सहितपणुंठे तेणे करीने तेनां पचनने ग पुरुषां वाक्यनी पेठे दोप सहितपणानीमाशंकायम तमारे ते वेदन थंगिकार करयापणुं नधी ए पाश्चर्य वे. केमजे तमारे तो हितका. रीना वचननी पेठे अंगिकार करवापणुं माटे ए पात प्रसंगत वे. वेदवचन अपुरुपनां कहेला ठे ए पात सिद्ध यती नपी. पुरुषनांज कहेलां . फेमजे यचन शब्दनो ए अर्थ ते जे बोलीए सेने वचन कदीए. ए प्रकारे ए शब्दनोज घटतो भर्थ तेनी फदेवानी इटावरी प्रयानची उधारण पतो ने हृदयादि थान स्थानमा अफसानोज (५८०) शब्द तेनुं तायु श्रादिक जे नचारण स्थान ते प्रमुख जे कारकले समूह ते विना तेन सिकि नथी. माटे पुरुष बिना तामु आदि 'स्थाननो संजय नबी ए हेतु माटे श्रपुरुषनो कहेलो वेद के ए वात व्यर्थ पमी. टीकामानिहितीयः ॥ तस्य रागादिमलेन ताकन स्याप्रामाण्याशंकाकलंकितत्वात् ॥ रागादिमत्त्वं तस्यातिक मितिचेन्न अंगनादिसंबंधातदुपपत्तेः ।। अर्धागवस्थायां तदुप- पनावपि परावस्थायां तदजावान वचनस्य प्रामाएयमितिवन । अर्थः-इवे बीजो विकल्प जे वेद ईश्वरे करेलो ने तेनु खमन ॥जे ते तमारा ईश्वरने रागादि सहितपणुं वे माटे तेनुं वचन अप्रमाण वे एवी श्राशंकावो कलंकित .त्यारे तमे कद्देशो जेव. मारा, ईश्वरने रागादि नथी, तो एमन योस. केमजे स्त्रीयादिकना : संबंधथी रागादिक वे एम पोतानी मेळेज सिद्ध थाय वे. त्यारे तमे कद्देशो जे ए तो पूर्व अवस्थामा रागादिकनी उत्पत्ति उते पण पर अवस्थामा ते रागादिकर्नु असिझपणुं वे माटे ईश्वर वचनरुपी वेदt प्रमाणपणुं वे. तो एम न कहे. टीका:-जवदन्युपगमेन तस्यानादिसिझत्वावर्वापरा- वस्थानिधान विरोधात् ॥ जयतु वा कथंचिनस्यावस्थाम्यं तथा- पिपरावस्थायामपि शरीरपरिग्रहमंतरेण तावादि कारणानावेन तस्य त्रयीप्रतिपादनासंजवात्कयं तस्यास्ततकर्तृकत्वं सिहोता ।

पप श्री संघका अर्थ: केमजे तमारा मतने थाश्रिते ईश्वरनी पूर्व श्रव. स्था तथा पर अवस्था तेनुं जे कहेतुं तेमा विरोध के. केमजे तमो ईश्वरने अनादि सिद्ध मानो वो ए हेतु माटे. श्रथया कोई प्रकारे ते ईश्वरनी वे अवस्था होय तो पण परावस्थामां पण शरीर परिमह कर्या विना अक्षरर्नु उच्चारण करवामां कारणरूप तानुयादि स्थान विना बेदन प्रतिपादन करवानो संजय नथी. माटे वेदर्नु ईश्वर कापणुं कम अंगिकार करीए? टीका:- नापि तृतीयः। न दिस्यात्सर्वनूतानीत्यनेना विशे- पेण हिंसानिपेधमनिधायानीप्टोमीयं पशुमासनेत वर्गकाम इत्यादिना तहिधिमुपदिशंत्यास्तस्याः परस्पर विरुकार्थमतिपा- दनात् ॥ अथ स्वर्गादिफल विशेपोदेशेन हिंसाविरुपदेशा. न तेन सामान्यविधिविहिताहिंसानिषेधव्याघातः ॥ अपवाद विपयं परिहत्योत्सर्गप्रवृते रितिचेन विकल्पा सहवात्।। अर्थ:--हवे त्रीजो विकल्प जे परस्पर विरोध जणायनार तेनुं खंमन करे ते. जे वेदमा एम कj ते जे 'कोइ जीव प्राणी मा. प्रनी हिंसा न करवी.' ए प्रकारे हिंसानो निषेध कदीने वळी का जे 'जने स्वर्गनी इचा होय ते अग्नि तथा सोम ठे देव जेमनो एटले यहा संबंधी पशु थासंयन करे.' इत्यादि वचनवमे हिंसानो विधि देखामनार वेदने परम्पर विरोधी श्रर्थने प्रनिपादन करवापणुं ए देतु माटे. न्यारे अन्य दर्शनी बोध्या जे म्बर्गादि फळ विशेष उ. शीने हिंसा विधिनो उपदेश । नया सामान्य विधिवमे करेला जे हिंसानो निवेध तं प्रत्ये विरोध नधी, माटे अपवादनो परिदार करी

(१८२)
मग मी संपा
उत्सर्गनी प्रवृत्ति यो. त्यारे सिद्धांती वोट्या जे एम तमारे नरे
सवं, कमजे विकल्प बने सहन घाय एम नयी. एटसे विरोध
उत्पन करी एनुं खंमन थाय वे.
.
टीकाः-न हिंस्यादित्यादिका हिश्रुतिःकि फसवती ना
न चेत् किमनयाऽजगलस्तनकरपया फलोदेशानाये प्रेक्षाला
त्पनुपपत्तेः॥प्रयोजनमनुदिश्य न मंदोऽपि प्रवृर्तत इति न्याय
त् ॥ फसवती चेत् केन फसेन किं स्वर्गादिना श्रादो भेहिकेन।
तोनयेन ॥
अर्थ:-जे न हिंसा करवी इत्यादिक जे श्रुति ते एक
गाडी थप नयी? जो नथी तो बोकमीना गले स्तन पापो
ने ते निरर्थक नेना जेपी निरर्थक एवी ए श्रुति शुं प्रपोगन
गने पारे फानो परेश नथी पटलो ए अति फरणातुं फळ मी
पारे पस्मिाननी प्रतितो पप थानार यशे, येमने प्रपोजगने
रोश का रिना गादियाळी पाण नयी प्रतितो. ए प्रकारको पा.
परेपतु माट. ने जो पश्रुति फळपाटी एम कर्दशी तो कीया
पटवारी ? गादि फल्याळी ? यथा या दोकना पर
नारी ट? या याताकपातीक संबंधी फलने कनारो !
टीका:-न प्रथमतृतीया ॥ विहितमादिका
निकर नयेत माध्यमिक कृतं निmrTran.
दिना प्रतनाशिनीयः॥ नदादिप्रतिनितार

- मप भी संपपरका (५१.) विषयतयोगयोरपि श्रुत्योः सामान्यविधिस्वं विशेषविधित्वं वा प्रसज्येत ॥ विनिगमनायां प्रमाणानावात् ॥ अर्थः-प्रथमनो तथा त्रीजो ए ये विकल्प न महण कर. केम जे श्रागळ कदेसी जे श्रुति तेघीज था लोक परलोकन फळ सिद्ध घशे. माटे अपराध विनाना पशुना वधने कहेनारी पीजी श्रुति ते वो सयु. एटखे पीजी श्रुति कद्देवा शुं प्रयोजन गवळी पीजो विकल्प परा नघी घटतो. केम जे पे श्रुतियोर्नु फळ बरोबर नियमाये ये तो ये श्रुतियोनो पण सामान्य विधि थंगिकार करो अथवा विशेष विधि अंगिकार करो. केम जे एक श्रुति अंगिकार करवी एवा निश्वयनो अनाव . टीका:-नचेतद् नवतोप्यनिमतगतस्मान्न दिस्यादित्यादि- श्रुत्यैव सकलसत्वालयदानप्रतिपादनलखितया ऽनायाससा- ध्यार्थयास्वर्गादिफलसिद्धः किमनया यागकारिणां विशितलोलता मात्राभिव्यं जिकयाऽमुत्र नरकपातकारिपया वहुवित्तव्ययायात साध्यार्थया पशुवधश्रुत्येति ॥ अर्थः-एक श्रुति एटले न हिंसा करवी कोनी, अथवा यज्ञमां हिंसा करवी, प श्रुति ए पेमांधी एक मानवी एक न मानवी एवो तो तारो पण मत नथी. ते माटे समस्त प्राणी मात्रने अनय. दान थापवानुं जे प्रतिपादन करखं तेमां दरिअ एटखे सर्वथा थनय दान कहेवा न समर्थ यती एवी ने प्रयास विना साध्य अर्थ जेनो एवी ने हिंसा करवी झ्यादि श्रुति तेणे करीनेज स्वर्गादि फलनी अर्थः-चोयो विकदर पण घटतो नथी केमजे यज्ञाशि (१८४) - अप भी संघपट्टका - सिकि थशे माटे यज्ञ करनारने मांस नक्षपनी सासच मात्रने व पावनारी ने परलोकमां नरकपात करावनारी ने घणा धननोहर चने महा प्रयास तेणे करीने साध्य पदार्थने जणावनारी पशुमार वा श्रुतिर्नु शुं प्रयोजन ? टीकाः-नापिचतुर्थः ॥ यागादिविहितायां हिंसापान- प्यहिंसायुध्युत्पादनेन रागादिमत्तयाऽनाप्तेप्यप्पाप्तबुझ्युत्ता नेन च विपर्ययज्ञानजननात् ॥ तथा चोकं विप्रोत्तमेन परीक्षा पुरस्सरमन्युपेतजिनशासनेन श्रुतीनां परस्पर व्याहतार्यरत- दिकं मीमांसमानेन प्रमाणिकचक्रचूमामणिना पमितधन विप करेसी जे हिंसा तेमां पण यहिंसा बुद्धिने उत्पन्न करना श्रुति ले माटे. तया पोतामा रहेखा राग गादि दोप तेणे का यहितकारी एटसे यज्ञने पिपे हिंसाने कहेनार पुरुषो तेमने । हितकारी पगानी यदि उत्पन्न करतो ते मी विपरीत ज्ञानने करवाएं वेदमा रघु ठे, ए हेतु माटे ग्राह्मणमां श्रेष्ट परीक्षा जिनशासननो थंगीकार ने श्रुतिपार्नु परस्पर विचार्य श विचार करनार ने प्रमागिक पुरुपना समुदनो मुकुटमशि हम पंमित धनराम तेणे या प्रकारे कम्युं . पालेन ॥ टीकाः समप्यनुना गवामपदी यंपा विजा अप श्री संघपटक १५८५) स्वर्ग गधाछिनोति च पितन् विप्रोप्रनुक्काशनम् ॥ थाप्ता उद्मपराः सुराः शिखिहुतं मीणाति देवान् इति , श्रेत्यं वल्गु च फल्गु च श्रुतिगिरांकोवेत्ति लीलायितं ॥ अर्थ:--अपवित्र वस्तुने लक्षण करनारी गायोनी स्पर्श पापने नाश करे , तथा संझा रहित पीपला प्रमुख वृक्ष वंदनीक के, तथा बकरा मारवाथो स्वर्ग मळे ठे, तथा ब्राह्मण लोकोए नोजन करेसं जे अन्न ते पित्रिलोकोने तृप्ति करे ठे, तथा कपटी देव ते हितकारी , तथा थनिमा होम्युं जे हुतप्रव्य ते देवताने प्रसन्न करे.ए प्रकारे सुंदर थने वळो निष्फळ एवं वेदवाणीनुं सीखाचरण कोण जाणे ठे? टीकाः-एवं च त्रय्या थप्रामाएये कथं तस्या धर्ममार्ग- खं ॥ तथा च सति तन्मूलस्य कुतोर्थिकपथस्यापि सन्मार्गत्व मपास्तं ॥ जिनमतस्यैव वनेकांतरूपतया प्रवृनिनिवृत्यादिरुप सकससोकव्यवहारप्रवर्तकस्वेन प्रामाण्यं तत्प्रामाण्यान्युपग: ममंतरेण वस्तुतस्तस्याप्यनुरपतेः॥ अर्थः-५ प्रकारे वेदनुं अप्रमाणपणुं उते धर्म मार्गपणं तेनुं केम होय? नज होय. ज्यारे वेदनुं श्रप्रमाणपणुं थयुं त्यारे वेद ने मूळ जेनुं एवो कुतीर्थिक एटसे अन्यदर्शनी तेना मारगर्नु पण खंगन थयु ने जिनमतने तो अनेकांतरूपपणुं माटे प्रवृति तथा निवृत्ति इत्यादिरूप जे तकल लोक व्यवहार तेनुं प्रवर्तकरणुंठे

अर्थः-पटी जनमतमांपूर्व कहेसो तयापलीकडे सोजमा
तेर्नु निर्वाधपरोपपरपणुं वे पहेतु माटे, तथा प्रादिमध्य ने धन
'अयं भी संघपटक
तेणे करीने प्रमाणिकपणुं वे लोक व्यवहारतुं प्रमाणिकपणुं का नि
पस्तुताए 'प्रमाणनु पण अप्रमाणिकपणुं थाय.
टीका-यमुक्तं ॥
जेण विणा लोगस्स वि, ववहारो सबहा न निवना ।
तस्स वषेक गुरुषो, नमो भगंतवायस्स ॥
अर्थ:-जेबनेकांत विना योगनो व्यवहार सर्वथा ना
'नीपजतो,ते जगद्गुरु परमात्मानुं अनेकांत वाक्य तेने नमस्कार करा
टीकाः--तथा च पूर्वापराऽव्याहतार्थमज्ञापकल्यादादि
मध्यावसानेपु दोश्वर्जितवानिःश्रेयसपथवाञ्चेतरप्रतिदेय
तस्पैवसन्मार्गत्वं ॥
N
पक्कं ॥
स्याचब्दयुग्नयसमुथपसीढसर्व ।
जावायनासनमधोरप वर्गमार्गम् ॥
पूर्वापरत्यतिहतिच्युतमत्रिकोटि ।
दो मतं तु कुपयोयति कोऽत्र जैनम् ॥
-
विदोप रहित ए हेतु माट,नया योजामारगर्नु छगन का हो
करीन पोतानुन सत्रमागरणं प्रनिरादन क वे गाटे मोक्ष मारण

--- movi. Vard. Rikanir, अथ श्री संघपहका (५८७) पणुं जिनमतनुंज . ते शास्त्रमा कचुंठे जे शब्द सहित जे नयनो समूह तेणे करीने व्याप्त एवा जे सर्वनाव तेनुं प्रगट करनार मो. क्षमारगरूप तथा पूर्व तथा श्रपर जे व्यवधान तेणे रहित तथा जेमां को प्रकारनो दोप नथी एवा जिनमतने श्रा.जगतमां कोण.कु. मार्ग कद्दी शके ठे? 1 टीकाः-एवं च वास्तवे जैनमार्गे वास्तवत्वारोपः ॥ अवास्तवे च कुतीर्थ्यपथे वास्तवत्वसमारोपो मिथ्यात्वमहिम्ने, तिएतावता च तत्वे ऽतत्वयुझिरतत्वे च तत्वबुद्धिरिति मिथ्यात्व सक्षणमावि वितं ॥ स्वमगुणाग्रएयमित्यादि तु पूर्ववत्॥ तदा- श्चर्यमेतन्मिथ्यात्वोपहता यदेवं विपर्ययेण सर्व मवसाय गुणिनो'. हिपंतीति वृत्तार्थः॥ अर्थः--ए प्रकारे सर्वथा सत्य एवो जैन मार्ग तेने विषे असत्यपणानो जे थारोप करवो तथा श्रयथार्थी एटले असत्य एवो अन्यदर्शनीनो जे मार्ग तेने विपे सत्यपणानो जे थारोप ते.मि. थ्यात्वना महिमावमे ठे. एणे करीने तत्वने विषे अतत्वनी बुद्धि करवी तथा श्रतत्वने विपे तत्वबुद्धि करवी एज मिथ्या. त्वनं सक्षण प्रगट कर्यु तथा पोते गुण रहितना शिरोमणि तो पण पूर्वे कर्पु ते प्रमाणे माने रे ए मोटुं थाश्चर्य . पोते मिथ्यात्व वमे दणायेखा तेथी एम विपरीतपणे सर्व जाणी गुणी पुरुपोनो वैप करे...ए प्रकारे.या काव्यनो अर्थ थयो. ॥ ३२॥ टीका:-ननु किमिदानी युणिनिःप्रयोजनं संघ एव-ज-:.

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+ अब भी संपरा सातलोलुपः साधुसाध्वीश्रावकश्राविकासमवायो भूयानिह संघ उच्यते स एव वसिष्टत्वात् क्रूरत्वात् व्याघः॥ शार्दूसस्तछ- शस्य तदधीनस्य दासवयत्रतत्र नियोज्यस्येति यावत् ॥ अर्थः--धर्मना अर्थी एवा अन्य प्राणीरूपी जे मृगनो स- मूद, नव्य प्राणीने मृग जेवा शाथी कह्या? तो तेमनी नोळाशथी तथा घस रहितपणाथी, ते मृगने संघरूपी मोटा वाघे काल्यो . ते संघ कीयो? तो जेनमार्ग मुकी उन्मार्गे चालतो, तथा उत्सूत्रनी प्र. रुपणा करतो, तथा शास्त्रनी थाज्ञानी अपेक्षा न राखतो, पोतानी नजरमां आवे तेम चासतो, तथा शातासुखनो सालची एवो साधु साध्वी श्रावक श्राविकानो घणो जे समूह तेने संघ कहीए. तेज व- ळवानपणाधी तथा क्रूरपणाधी वाघ समान ४ तेने आधीन थयेलो एटले दासनी पेठे ज्या त्यां मोफखवा योग्य एवो जे पुरुष तेनो मोक क्यांची होय ए प्रकारे संबंध . टीकाः-द्वितीयपके पासविषयीनूतस्य ।। मोक्ष इति .. श्लिष्टं पदं ॥ तेन जंतुपक्षे मोको निर्वाणं ॥हरिणपके च लुटनं व्याघ्रात्पसायनमिति यावत् ॥ कुतःकस्मानकथं चिदित्यर्थः । ननु मुक्त्यनुगुणानुष्टानानावानस्य मोकानावः किमायातं सं. घस्येत्यत आह ॥ अर्थ:-हवे. बीजोःपक्ष एटले जेम कोइ पुरुपने वाघे मज- बत कास्यो होय तेक्यांथी मूकाय?तेम नव्य प्राणीरुपी हरिण संघरुपी

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१५१ कृप १५२ प्रदीप प्रा० पलीय अपहाव तेभर संदुम संधुकः ਅੰਮੂਹ संभाव १५४ शुभ खर १५५ आ+रम आरभ आढव जा+लभ अंख पचार पेलव १५७ शम्भ जम्मा विजृम्भ (अम्म) १५८ नम णिसुद (भारपूर्वकनमने) णिया १५९ वि+श्रम प्रा० वीसाम आ+ क्रम ओहाव उत्थार प्रा०४३

भ्रम
टिरिदिल
नहम
मम्मड
भमड
भमाड
तलअंट
झंट
अंप
भुम
गुम
दुम
दुस
परी
पर
१६२ गम्
अई
अइच्छ
अणुवन
भवजस
उकुस
अक्कुप्स
पच्चड्ड
पच्छंद.
णिम्मह
॥
जी

१६३ आ + गम्
१६४ सम् + गम्
अन्या + गम
१६९
प्रत्या+गन्
१६७ शम
१६८ रम

३०८ अन्याड अग्यव अंगुम अहिरेम तुवर त्वर अड सिर झर पञ्चद णिचल णिष्टु उत्पल्ल चिप्प उत् + छल १७५ वि+गल गिदुद विसह वंफ वल १७७ भ्रंश फिट्ट १७८ भुल [णिरणास नश णिवह ... अवसेह पडिसा अवहर आवास अवकाश १८० सं+ दिश दा १८१ अप्पाह [ निमच्छ पच्छ अवयच्च अवयझ सचव देवल ओभक्त अवस अवअक्ख पुरोन पुल अवपास पास पान श फरिम शिव व्हि आदत आलिह रित्र १८३ प्र+ विश १८४ प्रश प्र+मुप १८५ पिष [ गिवह णिरिणास गिरिंगज मप १८७ कृष् भुक कट्ट साअड अंच अणच्छ अयश्च आइन्छ अक्खोड ( असिफर्पणे) १८९ गवेष १९. लिप प्रा०सिलेस १९१ १९२ म्रक्ष काङ दंदोल गमेस घर सामग अवयास परि अंत चोप्पड आह अहिलंघ अहिलंख वच वंफ मह सिह विलुप १९३ प्रति + ईश् सामय विहीर विरमाल १९४ तक्ष पच्छ १९५ वि+ कम कोआम { वाम हज गुंज रिहम १९७ १९९ नि, अस डर वोत्र वन गिन णुन पलोह प्टोह २०० परि + अम् २०१ निःधन २०२ उत्+स उसल उनुन गिद्यस गुनाह आरोत्र १८६ पिप [ शिवह णिरिणास गिरिगञ्ज रोन्न नहु १८६ भष १८७ कृष् साअड अंच अणक्त अयञ्च आइञ्छ अक्खोड (असिकपणे) " १८९ गवेप १९० स्लिप प्रा० सिलेस १९१ म्रक्ष दंदोल गमेत घत सामा अवयास परिअंत चोप्पड आह अहिलंघ अहिलंख वच वफ मह १९२ का विलुप १९३ प्रति + ईक्ष सामय विहीर विरमाल १९४ तक्ष नच्छ रथ वि+कम न कोआम वासह गुंज रिहस डिम १९७ म १९८ वस १९९ नि+अस डर वोन वच णिम गुम पलोट्ट फ्ट्रा पाहत्य झंख २०० परि + अम् २०१ निः+वस २०२ उत् + लस उसल ऊमुंभ णिटस पुलआ गुनोट आरोग २०३ भास भिस घिस . ग्रस ओवाह अब+गाह २०६ आ+रुह यला गुम्म गुम्मड अहिऊल आलुख २०९ ग्रह वल मेह पंग निरुवार (आंहपच्नु युग प गच प मिा तुम जुम्मा गिन सिन दस २१९ सद मढ पड २२१ वेष्ट सं+ ३९० क्वय कट्ट वर्थ वड वेट संवेद्य मागधीना धातु पक्ष =क्ष प्रा० पेक्त मा० पेक आक्ष प्रा० आयतमाआवक केटला अपग धातुओ हुच्च (पयांती) अव मन वुन श प्रस गृह तक्ष मेल देदय यातुनी गृ० खटक बुड " बाई अटक ., मांपवू ३९२

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Pakrit Vyakarn-1

Author
Pandit Bachardas G Dosi
Title
Pakrit Vyakarn-1
File name
Pakrit Vyakarn-1
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2011/08
Publisher
Ahamdabad,surya Prakashan Press
Language
Sanskrit
Pages
477
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313816
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Banasthali University
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Pakrit Vyakarn-1