Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Gharfield

2011/01

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गारफील्ड
अर्थात्
जेम्स एवरम् गारफ़ील्ड
का
जीवन-चरित
प्रकाशक
इंडियन प्रेस, प्रयाग
व पार]
सर्वाधिकार रपित
[मूल्य

1
Printed and published by Apnrya Krishna Boso,
at the Incun Press, Allahabad

stur
भूमिका
श्वर ने ससार भर के मनुष्यों को प्राय
समान बुद्धि, घल आदि सद्गुण दिये हैं।
उन्हीं सद्गुणो का जो मनुष्य सुगमता से
व्यवहार करता है वही अन्त में विजयी
होकर प्रतिष्ठा लाम करता है । जो उन
गुणो को काहिली और बेपरवाही से सोता है वही अन्त मे
गली गली ठोकर साता है। ऐसे ठोकर साने वाले प्राय अपने
भाग्य और अपनी अवस्था को दोप देकर अपने को बचाते हैं,
परन्तु मैं समझता हूँ कि वेपरवाही और काहिली हो उनके कष्ट
का मूल कारण है। यदि ये लोग अपने भविष्य के विषय में दिन
में एक बार भी सोचते और अपने कर्तव्यो को पूरी तौर से
पालन करते रहते तो कदाचित् उनका जीवन ऐसा दुखमय न
होता जैसा ऊपर लिखा गया है । बहुत से आदमी प्राय ऐसा
कहते हैं कि गरीब के घर जन्म लेने के कारण हमारा लिखना-
'पढ़ना नहीं हुआ। ऐसा कहना भी माना अपनी दुर्बलता का
परिचय देना है। इस बात की पुष्टि करने के लिए जेम्स गारफील्ड
की जीवनी आपके सामने रक्सी जाती है।
जेम्स गारफील्ड का जन्म एक बहुत ही निर्धन किसान
के घर हुआ था, परन्तु उसने अपने परिश्रम, अध्यवसाय और

( २ ) 3 सकल्प के कारण ससार में वह काम कर दिखाया, नसका वर्णन इतिहास के पन्नो मे चिरकाल तक बना रहेगा। ति दरिद्र के घर जन्म लेकर, धीरे धीरे उन्नति करते करते, न्त में युनाइटेड स्टेट्स का प्रेसीडेंट (जिसका पद दुनिया र के बड़े बडे महाराजामों से किसी प्रकार कम नहीं है) न जाना जेम्स गारफील्ड के लिए कुछ कम सौभाग्य की त न थी। ( उन्नति करने वाले के लिए एक बात को याद रसना ति आवश्यक है । वह यह कि जब उसमे भला बुरा समझने 7 शक्ति आ जावे वब वह अच्छी तरह सोच विचार कर इस त को सिद्ध कर ले कि उसके जीवन का मुख्य उद्देश क्या १ वह हमेशा उस उद्देश को सिद्ध करने में लगा रहे और च तक वह सिद्ध न हो जाय तब तक मानो उसको "शरीर- सन वा मन्त्र ही साधन" का व्रत धारण किये रहना चाहिए । व उसका सकल्प सिद्ध हो सकता है, और तभी वह उन्नति र सकता है । जेम्स गारफील्ड ने ग्रेजुएट (Graduate) बनने सकल्प किया था। उस सकल्प को सिद्ध करने के लिए न्होंने कितना कष्ट सहा था यह इस पुस्तक के पाठ करने मालूम होजायगा। इस स्थान पर इस बात का उल्लेस करना कदाचित् अनु- वतन होगा कि

(William Af Thiver) की" From Log Cabin to White
House" नामक पुस्तक के प्राशय पर लिसी गई है।
भारत के भावी कर्मवीर नवयुवको को पढने के लिए यह
पुस्तक बडे काम की है । यदि इस पुस्तक से हमारे देश के
वालको का कुछ भी उपकार हुआ तो हम इतने से ही अपना श्रम
सफल समझेंगे।
यदि लिसने मे कोई त्रुटि रह गई हो तो पाठको से निवे-
दन है कि वे उसे क्षमाप्रदानपूर्वक सुधार कर पढने की
कृपा करें।
प्रकाशक
-

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गारफील्ड पहला परिच्छेद SRQ008 सने मे आता है कि इसससार मे सब लोग उन्नति करने ही में लगे हैं। कोई तो किसी विषय में 8800008 उन्नति करता है और कोई किसी में। छोटे छोटे पेड, पौधे, कीट, पतङ्ग से लेकर मनुष्य तक को देखिए तो यही मालूम होगा कि मानो ईश्वर ने इन सबको उन्नति करने ही के लिए पैदा किया है। पेड को देखिए । वह प्रारम्भ-अवस्था में बीजरूप ही रहता है। फिर, मिट्टी, धूप और पानी का ससर्ग पाने से धीरे धीरे वह वढने लगता है। बढते बढते उसकी यह दशा हो जाती है कि वह फल-फूल देने लगता है। उसके फूलो की सुगध से समस्त ससार सुवासित हो जाता है और उसके फल सा कर जीव प्रसन्न होते हैं । फिर उसी पेड को शासा-प्रशासाये जो निक- लती रहती हैं वे गर्मी के दिनों में सूर्य के प्रचण्ड उत्ताप को . , २ गारफील्ड। अपनी ही सुविस्तृत छाती पर रोक लेती हैं और थके मांदे पथिको को अपनी शीतल छाया तले (विश्राम लेने के लिए) आश्रय देती हैं। ध्यान देने का विषय है कि इन बुद्धिहीन जड पदार्थो मे परोपकार और सहानुभूति की कैसी अनोसी चाह है। फिर कीट-पतङ्ग आदि जन्तुओं की ओर ध्यान दीजिए तो यही देखने में आता है कि वे भी किसी न किसी प्रकार से ससार को लाभ पहुँचाने ही मे लगे हैं। कोई तो हल जोतने में उपयोगी है, कोई दूध देने मे, कोई सवारी खींचने में और कोई अपनी मीठी आवाज ही सुना कर दूसरो के चित्त को प्रसन्न करते हैं। निदान इमसे यही सिद्ध होता है कि ये लोग सर्वदा ससार को फायदा पहुंचाने ही में तत्पर हैं । और, ससार को फायदा पहुँचाना ही, ससार को सुसी रखना ही मानो उन्नति का मुख्य उद्देश है। यह तो बुद्धिहीन जीवों की बात हुई । अब यदि मनुष्य, जो बुद्धिमान, विचारवान्, और सब जीवों में श्रेष्ठं गिना जाता है, उन्नति करे तो आश्चर्य ही क्या । परन्तु उन्नति करने के पहले यह जानना चाहिए कि उन्नति करने के लिए किन किन गुणों के होने की आवश्यकता है। उन्नति करने वाले में असीम उत्साह, प्रचण्ड साहस और दृढ सकल्प आदि गुणो का रहना अति आवश्यक है । यदि मनुष्य में ये गुण वर्तमान हो तो वह अति दीन दरिद्र अवस्था से भी बडी उच्च पदवी को प्राप्त कर सकता ।

पहला परिच्छेद।
है। यदि ससार के बडे बडे इतिहास ध्यान से पढे जाये तो
देखने में आवेगा कि सहस्रों यनुष्य इन्हीं उत्साह, साहस
और
सकल्प के कारण इतने बड़े हो गये हैं कि यद्यपि उनको मरे
सैकडो हजारो वर्ष बीत चुके तथापि उनकी कीर्ति और उनका
ताम अभी तक वर्तमान है और जब लो ससार रहेगा तब लो
उनकी अक्षय कीर्ति का इतिहाम अटल बना रहेगा । अब मैं
पाठको के सामने एक महापुरुप की जीवनी उपस्थित करता हूँ
जिसके पढने से लोगो को मालूम हो जायगा कि उद्यमशील
पुरुप इस ससार मे क्या नहीं कर सकता।
अमरीका का नाम तो तुमने सुना ही होगा। यह एक देश
। है जो कि शान्त महासागर के पूरव की ओर बडी दूर है । चार
सौ वर्ष पहले कोई इसका नाम तक नहीं जानता था-
कोई
नहीं जानता था कि भूमण्डल पर ऐसा महा देश कोई है
या नहीं । सन् १४६२ ईसवी में जिनोआ नगर का निवासी
कोलम्बम नामक एक साहसी पुरुप एटलाण्टिक महासागर होकर
भारतवर्ष का मार्ग हुँढता हूँढता एक द्वीप के पास था पहुँचा ।
इस द्वीप के समीप आने पर उसको मालूम हुआ कि इस द्वीप
के निकट अवश्य कोई देश होगा-यह सोचकर उसने जहाज
के कप्तान को और भी पश्चिम की ओर जाने की प्राज्ञादी । जाते
जाते उसने फूल-पत्तो और लतामों से मण्डित एक देश देखा।
उसने भूगोल अथवा इतिहास में कभी उस देश का विवरण
नहीं पढ़ा था, इसलिए उसको देसने का बडा कुतूहल हुआ।

गारफील्ड ।
जहां तक हो सका उसने भलीभांति देस-भाल की। अन्त में
लौटकर उसने अपने देशवासियो तथा योरप-निवासियो को
इसका पूरा हाल सुनाया। योरप वाले वहां गये और उस देश
को उन्होंने बसाया और उसका नाम अमरीका रक्खा । इसी
अमरीका के उत्तर प्रान्त के युक्त प्रदेश नामी देश में ओहियो नाम
का एक सण्ड है। खेती के लिए यहां की जमीन और स्थानो से
अच्छी समझी जाती है। जब अमरीका-निवासियो को मालूम
हुआ कि ओहियो नामी सण्ड में सेती का काम अच्छी तरह हो
सकता है तव दूर दूर के किसान वहां जाने और वसने लगे।
परन्तु जिस समय का हाल लिखा जाता है उस समय वहाँ
की आबादी बहुत थोडी थी। जो घोडे किसान वहां थे उनमें से
एवरम गारफील्ड भी एक था। उसके दो पुत्र और दो कन्याये
थीं। वह लिसा-पढा तो बहुत न था परन्तु था बडा बुद्धिमान,
साहसी और उद्यमशील । उसने अपनी बुद्धि और बल के
कारण ओहियो से १७ मील दूर पर आरेंज नामी एक सण्ड में
६०-७० बीघा जमीन सस्ते दाम पर खरीदी थी और उसी में
सेती-बारी किया करता था । आरेंज में आकर उसने लकडी और
फूस का एक मकान रहने के लिए बना लिया था। जिस समय
वह यहाँ पाया उस समय उसके एक पुत्र और दो कन्याये
थीं । यही आरेंज में फूस की कुटी में इनका छोटा लडका
१६ नवम्बर सन् १८३१ ईसवी को पैदा हुआ। उम लडके का
नाम जेम्स गारफील्ड था। यही जेम्स गारफील्ड इस पुस्तक का
।

,
पहला परिच्छेद।
नायक है । इनकी माता एलीजा गारफोल्ड अपने धर्मशास्त्र में बडी
पण्डिता थीं। इनके गुणो का हाल लिसने में प्राय आधी पुस्तक भर
जायगी, इस कारण केवल इतना ही कहना काफी होगा कि यह
सर्वगुण सम्पन्ना नारी थी और वास्तव में माता होने के योग्य थीं।
ये दम्पति अपने पुत्र-कन्याओं को लेकर गरीनी हालत में
किसी प्रकार अपने दिन काटा करते थे। खेत में जो थोडा
अनाज उपजता उसी में अपने को सन्तुष्ट रखते थे । इनको ज्यादा
पाने की अभिलाषा ही न, होती थी, क्योंकि उस जगह सभ्यता
इतनी बढी चढी न थी जैसी कि शहरो में थी। शहरी लोगो
की अपेक्षा ये लोग किसी किसी विषय में अधिक सुसी थे।
ऐसी सुख-दुख की अवस्था में ये अपना जीवन व्यतीत करते
रहे कि अकस्मात् एक दिन सुनने में आया कि लोग अपना
अपना मकान छोड कर भाग रहे हैं क्योकि जगल में आग लग
गई थी और वस्ती की ओर चली आती थी। एवरम गारफील्ड
के लिए अपने मकान और सामान को आग के मुंह में छोड
कर भाग जाना बहुत कठिन काम था क्योंकि उन्होंने उस
मकान और सामान को बडे परिश्रम से इकट्ठा किया था। उनको
यकायक छोड जाना बहुत दु सदायक था। जब उन्होने देसा
कि आग अपने सामने की सारी चीजों को निगलती हुई उन्हीं की
झोपडी की ओर चली प्रारही है तब उन्होंने मनही मन निश्चय
कर लिया कि जैसे वने इस प्रचण्ड शत्रु का नाश करना ही
चाहिए। यह सोच कर वे अपनी स्त्री और पुत्र-कन्या को साथ

'६
गारफील्ल ।
लेकर वहाँ गये । वडी कन्या की उम्र १३ वर्ष की और पुत्र को
११ वर्ष की थी। इन लोगों के वहां पहुंचते ही उस प्रचण्ड शत्रु
से घोर युद्ध प्रारम्भ हो गया। बडी देर तक युद्ध होता रहा ।
अग्निदेव अपने ससार को नाश करने हारे फूत्कार से चारी
ओर मब कुछ दग्ध कर रहे थे, और पवन देव भी इनकी
सहायता करते रहे । दोनो प्रबल शक्तियों के सयोग से
अमि-शिसाये ऐसा भयङ्कर रूप धारण कर रही थी कि ऐसा
प्रतीत होता था, मानो महाप्रलय उपस्थित हो गया है ।
ऐसा अनुमान होता था कि ये चारो प्राणी पल भर में रास
हो जायेंगे। ये लोग साहस पर कमर वांधे और ईश्वर पर
अटल विश्वास किये हुए उस आग को बुझाने का यत्न कर रहे
थे और पृथ्वी को दूर तक सोदने, वृक्षादिकों को काटने और
आग का बढना रोकने मे लगे थे। वे भगवान से प्रार्थना करते
रहे कि किसी प्रकार इस विपत्ति से रक्षा करे । यह बात
सदा से सत्य मानी गई है और चिरकाल तक मानी जायगी कि'
यदि कोई मनुष्य अन्त करण से ईश्वर की प्रार्थना करे तो
उसकी प्रार्थना सुनीही जाती है । भगवान् की क्या ही विचित्र
लीला है। बडे बडे ऋषि-मुनि भी इस लीला के गृढ तत्त्व को नहीं
समझ सके। देखते ही देसते उस मेघशून्य आकाश मे कहां से
काले वादलो ने आकर सूर्य को ढक लिया, अँधियारी छा गई
और पानी बरसने लगा। पानी के बरसने से आग बुझ गई,
धरती शान्त हुई और ये लोग घर लौट आये।
.
।

७ " पहला परिच्छेद । जुलाई के महीने में सूर्य और भाग के सामने बहुत देर तक फठिन परिश्रम करने के फारया एवरम गारफील्ड अत्यन्त धक गये थे।भार पसीने के उनका सारा शरीर भीग गया था। प्रांस, कान, नाक, मुँह से आग की चिनगारियां छूट रही थी। इस कारण उन्होने बाहर खुले मैदान में एक चारपाई डाल दी और कपड़े उतार कर वे पमीने में डूबे हुए उसी पर लेट गये। बाहर मैदान में मृदु, मन्द पवन यह रहा था। उस वक्त उनको वह हवा यहुत ही प्यारी मालूम हुई, परन्तु उनको यह न सूझो कि सर्दी गर्मी का असर शरीर पर बैठ जाने से बहुत अनिष्ट होना सम्भव है इस कारण वे वहीं लेट गये। रात को उन्हें मालूम हुआ कि उनके सांस लेने की नाली वन्द हो गई है और उनसे बात नहीं करते वनता। प्रारेंज के कई मील इधर उधर फोई डाकूर नहीं रहता था, परन्तु एक पडोसी, जो थोडा बहुत चिकित्सा का काम किया करता था, बुलवाया गया । उसके आते ही रोगी उसके हाथ सीप दिया गया। उसने रोगी को पहले ही एक ऐसा पलस्तर दिया कि उसके देते ही उसकी पीडा बहुत बढ गई और जीने की प्राशा धीरे धीरे जाती रही । एलीजा गारफील्ड ने अपने स्वामी की घडी सेवा की, परन्तु उसका सब श्रम व्यर्थ गया। देसते ही देसते प्राण वायु उस शरीर से निकल गया और घर में रोना-पीटना मच गया। घर के छोटे बड सब लोग हृदय विदारक विलाप से भूमण्डल को कँपा रहे थे, परन्तु १८ महीने का शिशु जेम्स गारफील्ड के

1
गारफ़ोल्ड ।
चेहरे पर शोक का कोई चिह्न नहीं दिखाई पडता था, क्योकि
शोक अथवा सुस के समझने या प्रकाश करने की उसमें शक्ति
ही न थी। वह अपने स्वाभाविक रूप से हँसता सेलता था।
दूसरे दिन सुबह को आस पास के जो घोडे बहुत पडासी
थे वे विधवा एलीजा और उसके बच्चो को शान्ति देने के लिए
आये और उनकी सहायता से मृतदेह गेहूँ के सेत के एक किनारे
गाड दिया गया । एबरम गारफील्ड के मर जाने पर यद्यपि
उनके परिवार के लोगो को बडा ही शोक हुआ परन्तु ससार के
नियम के अनुसार ज्यों ज्यों समय बीतता गया त्यों त्यों वह
शोक घटने लगा।
इस दु सदायी घटना के बाद, ५० वर्ष के बीतने पर भी,जब
उनकी स्त्री बुढिया हो गई थीं तब भी, उस शोक का चिह्न इनके
चेहरे से साफ झलकता था।
उन जङ्गलो में शीत ऋतु बडा ही भयकर होता है और विशे-
पत उस अवस्था में जब कि वह मनुष्य जिस पर भरण-पोषण
निर्भर है मृत्यु से अलग कर दिया गया हो तो वह कठोर शीत
इतना दु सह हो जाता है कि वह समझने ही के लायक है, वर्णन
के नहीं । एक तो भयकर शीत, दूसरे तन पर कपड़ों का न
होना, तिस पर निना किसी आश्रय के जीवन व्यतीत करना और
फिर भूखे बच्चो को आहार देने का सामर्थ्य न होना-ये सब
दुखडे मिल कर बडे बडे साहसी पुरुषों के छक्के छुडा देते हैं।
बेचारी एलीजा गारफील्ड तो एक अवला नारी ही थी। उसकी
-
।

,
पहला परिच्छेद ।
मानसिक अवस्था कैसी भयानक और शोचनीय थी यह
वर्णनातीत है।
वह क्या ही भयकर शीत था । घनी धर्फ से सब धरती
ढक गई थी। यहाँ तक कि गेहूँ के सेत वाली कत्र भी इन बर्फी
के तले गड़ गई थी, और तेज हवा जो सनसनाती हुई वह रही
थी उससे ऐसा प्रतीत होता था कि मानो वह भी उस मुर्दे
के लिए शोक कर रही थी। चारो ओर सन्नाटा छाया हुआ
था। रात को सिवा हिसक जन्तुओं की चिल्लाहट के और कोई
शब्द नहीं सुन पडता था। इनकी आवाज सन्नाटे से मिल
फर और भी सन्नाटा पैदा करती थी। लोग यह सोचने लगे
थे कि वसन्त ऋतु अब न आवेगा और वह उनसे सदा के लिए
विदा ले गया है। परन्तु बहुत दिनों तक शीत का कष्ट भोग
फरने के बाद वसन्त ऋतु फिर आया। फिर वर्फको उसने
पिघला दिया। फिर नदी नाले अपने मधुर मधुर गीत गाते गाते
बहने लगे और फिर जङ्गल और खेतो के पेड-पौधे जीवित हो
गये। सव जीवित हुए, परन्तु गेहूँ के सेत वाले मृत देह में ,
जीवन-सचार होने की कोई आशा न दीस पडी । वह जैसा
तैसा उसी कन के नीचे ही गडा रह गया ।
का

दूसरा
परिच्छेद
।
।
ETT
रफील्ड की विधवा मावा के पास रुपया कुछ
भी न रह गया था । सेव पर कुछ कर्जा भी
हो गया था और गांव में अनाज की भी बहुत
autre.
की थी, सो ऐसी अवस्था में क्या करना
चाहिए-यह सोच कर वह मिस्टर घाइटन
के पास राय लेने गई । मिस्टर वाइटन इनके बडे मित्र थे और
गारफील्ड से इनसे कुछ 'नातेदारी भी थी । एनरम के मरने
के बाद उनकी विधवा पत्नी प्राय इनके पास राय लेने जाया
करती थी, क्योकि मिस्टर बाइटन को छोड दूसरा कोई इनकी
सहानुभूति करने वाला न था । मि० वाइटन ने पूरा हाल सुनने
के बाद कहा कि आप अपने तमाम सेत को बेच डालिए और
उस रुपये से कर्जा चुका दीजिए और बच्चो को लेकर किसी
दोस्त के मकान पर चली जाइए। गारफील्ड की विधवा माता
ने कहा-"क्या मैं अपने स्वामी को अकेला छोड किसी दोस्त
के सर पर बोझा बढाऊँगी? ऐसा नहीं हो सकता। मैं अपने
स्वामी ही के पास रहूँगी और किसी तरह अपना जीवन
व्यतीत करूँगी । जो अनाथो के नाथ, अनाश्रितो के आश्रय हैं

दूसरा परिच्छेद। उनको दृष्टि तो मेरे ऊपर है ही। उनकी आज्ञा निना पेड से एक पत्ता तक नहीं गिर सकता, तो उन्हीं की प्राज्ञा विना में अपने घयों को लेकर अनाहार अनिद्रा में दिन रात काटूगी-यह भी असम्भव है। हमे विश्वास है कि वे ही हमारे लिए यहीं कोई रास्ता निकाल देंगे।" उसके बाद मि० वाइटन ने कहा-"यदि समस्त सेत येचने की तुम्हारी राय न हो तो उसका कुछ घोडा मा अश बेच कर फर्जा चुका दो।" इस बात पर वे सहमत हो गई , और उस घोडे अश को बेचने का भार मि० घाईटन ही पर रस दिया । मि० वाइटन ने जब इस प्रस्तान को स्वीकार कर लिया वर गारफील्ड की माता उठी और अपने घर की ओर चली । जाते समय रास्ते ही मे गिर्जा-घर पडता था । उसी गिजें में गई और एकाग्र चित्त से ईश्वर की प्रार्थना करने लगी। प्रार्थना करते समय मानो उनको देववाणी हुई कि "तुम किसी विषय की शङ्का न करो । मैं सर्वदा तुम्हारे साथ रहता हूँ। मैं तुम्हें संव विपत्तियों से बचाता रहूँगा"। प्रार्थना समाप्त होने पर वह गद्गद होकर घर लौटी और टामस को, जो बडा वेटा था, जिसकी उम्र प्राय ११ वर्प की घी, सारा हाल कह सुनाया । टामस ने सुनते ही घडी दृढता से उत्तर दिया--"माता, मैं हल जोत सकता हूँ, बीज बो सकता हूँ, दूध दुह सकता हूँ और भी अनेको काम कर सकता हूँ।" इन बातो को सुनते ही मावा का जी भर पाया और बेटे को छाती से लगा कर उसका मुखचुम्बन करके कहा, "वेटा, तुम्हें ।

१२ गारफील्ड । बहुत अधिक परिश्रम करने की कोई आवश्यकता नहीं है । केवल मेरी सहायता करने ही से सब काम अच्छी तरह हो जायगा" उस समय दूर दूर प्रान्तों से लोग ओहियो में वास करने के निमित्त आ रहे थे। इस कारण उनको जमीन की बडी आव- श्यकता थी। उन आनेवालो में से एक को मि० वाइटन के द्वारा पता लगा कि गारफील्ड की माता अपनी कुछ जमीन बेचा चाहती हैं। उस आगन्तुक ने तुरन्तही बन्दोबस्त करके प्रायः ३० बीघा जमीन खरीद ली और उसका रुपया भी तुरन्त ही दे दिया । रुपया पाकर गारफील्ड की माता ने तमाम कर्जा चुका दिया । वसन्त ऋतु के प्रारम्भ में ही जमीन वेची गई थी, अतएव सेत जोतने बोने का समय काफी था। इस कारण टामस ने एक पडोसी से विनय-पूर्वक एक घोडा मांगा । पडोसी भी बडा दयालु था। उसने तुरन्त ही एक घोडा हल जोतने के लिए दे दिया । घोडे को पाकर उस वीर वालक ने अपनी माता और बहन की सहायता से सेत को खूब अच्छी तरह जोता वोया । यद्यपि वह ११ ही वर्ष का चालक था परन्तु उसने ऐसी दक्षता से इस काम को किया कि मालूम होता था, आगामि शरद ऋतु में बहुत अच्छी फसिल होगी। आदमी के ऊपर जन कोई विपत्ति आती है तब एकही विपत्ति से उमका छुटकारा नहीं होता। एक के बाद दूसरी, दूसरी के याद वीसरी विपत्ति प्राती रहती है । गारफ़ोल्ड की माता पर भी एक

दूसरा परिच्छेद।
और विपत्ति आही पडी। उन्होंने देखा कि घर में जो अनाज है वह
दूसरी फसिल तक न चलेगा और न घर में कुछ रुपया ही है
कि उससे कुछ अनाज सरीद ले । इस कारण उन्होंने हिसाब
लगा कर देखा कि यदि स्वय एक वक्त का आहार त्याग कर दे
तो कदाचित् उसी अनाज से छ महीने काम चल जायगा। इस
लिए उन्होंने बिना किसी को बताये तीन वक्त के साने में से एक
वक्त का साना बन्द कर दिया और केवल दो ही वक्त के आहार
से वे अपने को सन्तुष्ट रखने लगीं। कुछ दिन इसी अवस्था में
चलने के बाद उन्होंने फिर हिसाब लगाकर देखा कि इस प्रकार सर्च
करने से अनाज फसिल तक के लिए काफी न होगा। इस कारण
उन्होंने और एक वक्त का साना बन्द कर दिया और केवल एक
ही वक्त आहार करके अपना जीवन धारण करने लगी।
शेप महीने इसी प्रकार बीत गये। फिर सेत काटने का दिन
आया । टामस बड़ी मुस्तैदी और दृढता से सेत काटने के काम
में लग गया। वह सेत काटता था और अपने मन मे आनन्दित
होता था क्योंकि फसिल बहुत अच्छी हुई थी।
इसके कुछ दिन बाद एक आदमी पारेंज में आया और इन्हीं
के पड़ोस में टिका । उसको सीने का काम करने के लिए एक
स्त्री और हल जोतने के लिए एक बालक की आवश्यकता थी।
इस कारण गारफील्ड की विधवा माता और उनका वीर पुत्र
टामस दोनो उन कामो में नियुक्त किये गये। इस नये काम के
पाने से उनकी आमदनी कुछ अधिक बढ गई। पहले ही दिन जब
।

गारफील्ड ।
-
टामस अपनी मेहनत की कमाई घर लाया तब उसने अपनी मां
से कहा, "माता, अव जेम्स के लिए एक जोडा जूता बनना
चाहिए।" माता भी इस बात पर सहमत हो गई । तुरन्त एक
मोची बुलाया गया और जेम्स के पैरो की नाप उसे दी गई।
जूते की नाप दिये जाने पर जेम्स को बडा ही आनन्द हुआ।
श्राज-कल की तरह उस समय वहां मोचियो की कोई
दुकान नहीं होती थी। जब कभी किसी को जूवा वनवाने की
आवश्यकता होती तव वह किसी मोची को बुलवाता और अपने
ही मकान मे उसे भोजन करावा और रहने के लिए एक स्थान
देता । जेम्स का जूता बनाने के लिए भी एक मोची बुलवाया
गया । वह गारफील्ड ही के मकान में रहता और इन्हीं लोगो के
साथ भोजन भी करता था। कई दिनो के बाद जूता तैयार हो
गया । पहले पहल उस जूते को पहन कर जेम्स के मन मे इतना
अधिक आनन्द हुआ था कि उतना अानन्द उसको ३० वर्ष
के बाद जातीय महासभा के सभापति बनाये जाने पर भी न
हुआ होगा। जेम्स की उम्र उस समय साढे तीन वर्ष की थी
सच है, दरिद्धावस्था में पहले पहल अपनी अभीष्ट वस्तु पाने से
अन्तरात्मा को पडी प्रसन्नता प्राप्त होती है।
-
-
।
१

तीसरा परिच्छेद स गांव में गारफील्ड के परिवार के लोग रहा करते थे वहां वालों के चित्त मे यह विचार जि उठा कि उस गांव में उनके मकान से डेढ मील दूर एक पाठशाला सोली जाय । गारफील्ड की माता इस बात को सुन कर वडी प्रसन्न हुई, क्योंकि वह चाहती थी कि उसके लडके किसी पाठशाला में भेजे जायें। टामस ने आकर माता से कहा, "मां, गांव मे एक पाठशाला खुलने- वाली है। अतएव अब जेम्स और दोनो बहिनो को वहां भेजना चाहिए।" माता ने कहा, "सिर्फ वही लोग क्यो, बेटा, तुम भी न जाओगे ?" टामस ने उत्तर दिया, "माता, मेरे भाई- बहिन लिखना-पढना सोसेंगे और मैं सेती-बारी के काम में रह कर रोजी कमाने का काम-धदा करूँगा ।" माता ने इस बात का कुछ उत्तर न दिया । वह टामस ही की राय पर सहमत हो गई। पाठशाला जाने को राय तो ठीक होगई, परन्तु साढे चीन वर्ष का वालक जेम्स डेढ मील जाय तो कैसे जाय-यही प्रश्न सबके मन में उठा । तब बडी बहन ने घडे उत्साह से कहा, .

खुशी होती और
१६
गारफील्ड।
"मैं जिमी को पीठ पर लाद कर ले जाऊँगी । लोग इस धात
को सुनकर हँसने लगे, पर उसने अपनी ही वाव कायम रक्सी।
जव पाठशाला जाने का दिन आया तव तीनों भाई-बहन
हँसते सेलते वहां गये । पहले ही दिन जेम्स ने अँगरेजी में एक
अक्षर आर । पहिचाना था। जेम्स को उसकी माता ने
घरही में वाइविल अच्छी तरह पढाई थी, इस कारण वह पाठ
शाला में अपने शिक्षक से उसी विषय पर तरह तरह के प्रश्न
पूछा करता था। इससे विद्यार्थियों को वडी
शिक्षक भी प्रसन्न होते थे।
बचपन ही से जेम्स का चित्त सव विपयो को अच्छी तरह
समझने की ओर आकर्पित होता था। इसी कारण वह अपने
शिक्षक से हमेशा तरह तरह के प्रश्न पूछा करता था। कोई प्रश्न
तो निरा निरर्थक, कोई अर्थयुक्त और कोई जैसा तैसा हुआ
करते थे । इतने छोटे बालक के मुंह से इतने प्रभो की बौछार
निकलते देस कर सबको अनुमान हो गया था कि यह एक
अद्भुत लडका है और कदाचित् भविष्य में यह एक महापुरुप
होवे।
उसी स्कूल के किसी बडे लडके ने, जिसका नाम जेकब
लैण्डर था, आफर एक दिन जेम्स से कहा-"जेम्स | आज तुम
शिक्षक बनो और इन लोगों (अपने दर्ज के लडको) से प्रश्न
करो, और ये लोग उत्तर दे ।" जेम्स झट तैयार हो गया और
शिक्षक की कुर्सी पर जा बैठा और कहा-लडको । अपनी अपनी
,

तीसरा परिच्छेद ।
१७
जगह पर बैठो । जय सन प्रसन्न होकर बैठगये वन जेम्स प्रश्न
करने लगा और कई बडे लडके किनारे सड होकर सुनने लगे।
प्रव-पार्क को किसने बनाया ?
कई विद्यार्थियों ने उत्तर दिया, "हजरत नूद ने।"
"किसने उनको आर्क बनाने के लिए हुक्म दिया था ?"
कई लडको ने कहा, "ईश्वर ने।"
"ईश्वर ने क्यों चाहा कि नूह आर्फ को बनायें ?"
कुछ काल तक सय लोग चुप हो रहे । किसी ने कुछ उत्तर
न दिया। आखिरकार उम बडे लडके ने कहा, यह प्रश्न बहुत
फठिन है ऐसा प्रश्न तुम्हे न करना चाहिए था, क्योंकि गुरुजी ने
नहीं बताया है। यह सुन कर जिमी सडा हुआ और बोला-
"जिससे कि नूह अपने को और अपनेवाल-बच्चो को बचाले?"
जेकब ने पूछा, "किमसे बचा ले ?"
जेम्स ने कहा, "वूडा और तूफान से ।"
फिर जेम्स ने पूछा, "सबसे बूढा आदमी कौन था ?"
कई लड़को ने कहा, "मेथ्युसालेह सबसे बूटा था।"
"उसकी क्या उम्र थी?"
फिर किसी ने उत्तर न दिया, वर जेम्स ने स्वय ही उत्तर दे
दिया और फिर पूछा
"सबसे अधिक मुलायम प्रकृति का मनुष्य कौन था ?"
सपने तुरन्त कहा,
"मोजेज,
"किसके पास कई रङ्ग का एक कुर्ता था ?"
।
२

-
-
-
१८
गारफोल्ड।
तुरन्त सबने कहा, "जोजेफ के पास।"
"रेडसी ( एक समुद्र का नाम है) में कौन डूब गया था ?"
किसी ने उत्तर न दिया, इसलिए उसने स्वय ही दे दिया
चार वर्ष से भी कम उम्र का वालक प्राय दस पन्द्रह
मिनट तक इसी प्रकार के प्रश्न करता रहा और दर्जे के सत्र
लडको को अपनी ओर सींचे रहा । मास्टर सडे सडे इस दृश्य
को देख रहे थे। दृश्य बडा ही मधुर, वडा ही गम्भीर और बडा
ही मनोहर था। जेम्स की स्मरणशक्ति बचपन ही से बर्ड
तीक्ष्य और दृढ थी, क्योकि जिस विषय को वह सुनता उस
घडे ध्यान से सुना करता था। छोटी छोटी कहानी अथवा
किसी का कोई व्याख्यान सुनते ही वह उसे कण्ठ कर लेत
था। दुनिया की हर चीज की ओर उसकी दृष्टि आकर्षित होती
थी। जैसे-भापा, दूसरो से बर्ताव, कपडे लत्ते आदि, काम
फाज करने के नियम, दूसरो से बातचीत करना कोई ऐसा
काम न था जिसको वह बड़े ध्यान से न देसता हो ।
एक दिन बडी लडकी ने पाठशाला से लौट कर अपनी में
कहा, "माता, हम लोगो की पाठशाला दो तीन हफ़ के लि
जाडे मे बन्द रहेगी और फिर दिसम्बर के महीने में खुलेगी।"
माता ने कहा, "मुझे बडी खुशी हुई कि तुम लोग उन
समय पाठशाला जानोगी। तुम सब जाना, केवल जेम्स
जावेगा, क्योंकि उसे जाडे में इतनी दूर जाने में बडा क
दोगा।"
-

तीसरा परिच्छेद । Au लडकी ने पूछा, "तो क्या टामस भी जायगा ?" माता ने कहा, "मैं आशा करती हूँ कि वह भी जायगा। इतने में टामस वहां आ पहुँचा, और उन लोगो की बातचीत सुनकर उसने कहा, "मुझे गायो को देखने से, लकडी काटने और घर के और और काम करने से छुट्टी तो मिलेहीगी नहीं, मैं पाठ- शाला कैसे जाऊँगा । मैं शाम को सब कामों से छुट्टी पाकर घर ही में पढूँगा और पाले के दिनो मे भी पढ सकता हूँ। मुझे पाठशाला जाने की कुछ आवश्यकता नहीं है।" अन्त में यही सिद्ध हुआ कि जेम्स और टामस दोनो भाई घर पर रह कर अपनी माता की सहायता से पढ़ेंगे। दोनो भाई अपनी माँ की सहायता से पढने लगे। जेम्स ने जाडे के दिनो मे पढने और शब्दों के हिज्जे करने में वो उन्नति की । एक दिन एक पुस्तक से उसने किसी एक वाक्य के हिज्जे करके जोर से सबको सुना कर पढा और उसका अर्थ भी उसने समझ लिया। उस दिन से जेम्स के चित्त मे एक नई शक्ति का उदय हुमा, अर्थात् सोचने की शक्ति उत्पन्न हुई । पुस्तक के शब्दों को पाठ करने से उसके चित्त में विचार उत्पन्न होता था। वह उन शब्दो को सोचा करता था। उस समय से उसने पुस्तक-पाठ करने में अपना तन मन अर्पण कर दिया और पुस्तक में उसको जो मजा मिलता था वह और कहीं न मिलता था। "इँगलिश- रीडर" एक पुस्तक थी जिसको वह यहुत पसद करता था।

गारफोल्ड। दिन दिन भर उसी "इंगलिशरीडर, को वह अपना साथी बनाये रहता था। जेम्स अपने घर की जमीन पर चित लेट कर' अथवा गर्मियो के दिनो में किसी पेड तले बैठकर उसी इंगलिश- रीडर को पढा करता, उसकी युक्तियो को विचारा करता और उससे लाभदायक उपदेश लिया करता था । उसकी यह हालत पांच ही वर्ष की अवस्था में होगई थी। छठे वर्ष के । प्रारम्भ में उसने उस पुस्तक का बहुत सा हिस्सा कण्ठ कर लिया था। उसी अवस्था में वह उस पुस्तक के बाद, और भी कई पुस्तके पढा करता था, किन्तु और पुस्तको को छोड केवल इंगलिशरीडर ही का नाम लिया गया है। इसका कारण यह है कि उसको औरो की अपेक्षा अधिक उस पुस्तक से प्रीति थी। जेम्स की विधवा माता अपने बालक को अवस्था देस मानो अपने मन ही मन आकाश-कुसुम की कल्पना करती और पुत्र के मङ्गलार्थ सदा भगवान् से प्रार्थना किया करती थीं।

चौथा परिच्छेद FONED इस विषय को जेम्स को विधवा माता बहुत काल से जि सोच रही थी उसी को सिद्ध करने के लिए एक दिन वह मिस्टर वाइटन के मकान पर गई । वहाँ जाकर उन्होंने कहा, "मिस्टर बाइटन, यदि हमारे गांव में एक छोटी मोटी पाठशाला सोलने का प्रयत्न किया जाय तो क्या हर्ज है ?" उन्होंने कहा, "हर्ज तो कुछ भी नहीं, परन्तु इसका होना कैसे सम्भव है ?" जेम्स की माता ने कहा, "यदि आठ या दस परिवार के लोग इस बात पर तैयार हो जायें तो आश्चर्य ही क्या है। एकमत होकर यदि कोई काम किया जाय तो चाहे वह कितनाही कठिन क्यों न हो पर तो भी सफ- लता होती ही है, केवल हम लोगो में एकता होनी चाहिए। जिस देश के लोगो में, अथवा जिस गांव के लोगो में, ऐक्य नहीं है, उस प्रान्त के लोग अकेले चाहे कितने ही शक्तिशाली और दिग्वि- जयी क्यों न हों, परन्तु उन्नतिशील ससार की दृष्टि में वे निर्जीव जडपदार्थ के सिवा और कुछ भी नहीं हैं। इन घावों को कर मिस्टर बाइटन ने बडी दृढता से कहा, "मैं आपकी सहा- यता से इस पाठशाला को जारी करने का प्रवन्ध अवश्य ही । २२ गारफ़ील्ड । करूँगा।" इस बात-चीन के समाप्त होने पर गारफील्ड की विधवा माता अपने मकान को लौट गई । मिस्टर बाइटन ने दूसरे पडोसियो से मिल कर इस विषय को पक्का कर लिया, और जाडे के शुरू में ही उस गांव में एक पाठशाला स्थापित हुई । गारफील्ड की विधवा माता ने अपनी जमीन में से थोडी जगह मकान बनाने के लिए गाँव में दे दी। मतलब यह कि सभी लोगो की थोडी घोडी सहायवा से उस गांव मे स्कूल बन गया। लडके पढने लगे। एक शिक्षक भी न्यू हैम्पशायर से बुलाया गया। जिस समय का हाल लिसा जाता है, उस समय शिक्षक- मण्डली प्राय अपने विद्यार्थियो के मकान में उन्हीं के साथ पारी बांध कर रहा करती थी, अर्थात् पाठशाला में जितने विद्यार्थी होते थे उनकी संख्या के अनुसार वर्ष दिन मे किसके यहां कितने दिन रहना होगा इसका हिसाब लगाते और उसी हिसान से चलते थे। मिस्टर फास्टर शिक्षक का नाम था। पहले पहल गारफील्ड की विधवा माता ही के मकान पर रहे। क्योंकि ये उन्हीं के देशवासी थे। विधवा का जन्म इसी न्यू हैम्पशायर में हुआ था। शिक्षक महाशय देखने मे तो वडे भहें थे, परन्तु उन्होंने बिना किसी पाठशाला में पढे हुए भी कुछ विद्या सीख ली थी और लिसने पढ़ने के काम में बडे चतुर थे। उनके आते ही जेम्स उनका बटा प्रिय शिष्य हो गया। उन्होंने एक दिन जेम्स से कहा, "यदि तुम अच्छी तरह लिसो पढी तो फदाचित् तुम जनरल अर्थात् सेनापति हो सकते हो।" वे .

२३ चौथा परिच्छेद । जेम्स को यह बात सुन कर बडा आश्चर्य हुआ कि सेना- पति कौन चीज है, परन्तु उसने अपने मन में सोचा कि सेना- पति अवश्य ही कोई अच्छी चीज होगी, नहीं तो मास्टर साहय न कहते । वह दिन भर पाठशाला मे इसी बात को सोचता रहा कि सेनापति क्या चीज है। जब ठीक ठीक न समझाकस तन उसने विचारा कि अपनी मां से पूछंगा। अवश्य ही बता देंगी। ज्याही पाठशाला से छुट्टी हुई, वह तुरन्त ही दौड कर मां के पास गया और उससे पूछने लगा-"मां, सेनापति क्या चीज है । मास्टर साहब कहते हैं कि यदि तुम अच्छी तरह लिसो पढो तो तुम सेनापति होगे। मां, सेनापति क्या चीज है ?" इन बातों को सुन कर माता ने जेम्स को गले से लगा लिया । उसका मुसचुम्बन किया और उम वालक का हृदय मातृस्नेह से भर दिया । जेम्स ने फिर पूँछा, "माता, बताओ, सेनापति किसको कहते हैं ?" तब माता ने बालक का कुतूहल शान्त करने के लिए अमरीका के राष्ट्र-विश्व का पूरा हाल बयान किया और बताया कि कैसे उस महायुद्ध में इम देश के बडे बडे सेनापतियों ने शत्रुओ के सिर काटे थे, कैसी वीरता के साथ अपने देश की रक्षा करने के लिए वे लडे थे और बहुत दिनो के घोर युद्ध के अनन्तर उन्होंने शत्रुओं पर कैसे विजय प्राप्त किया था इत्यादि उन सेनापतियो का नाम और काम सब बताया और कहा, "बेटा अब हमारा देश शान्ति में है और .

, गारफील्ड । यद्यपि अब शत्रुओ के सिर काटने की आवश्यकता नहीं है तथापि यदि तुम अच्छी तरह लिख पढ़ लो तो कदाचित तुम्हारा नाम भी ससार में ऐसा प्रसिद्ध हो सकता है जैसा कि एक सेनापति का विधवा माता ने ऊपर की वस्तृता में यह भी कह दिया था कि इसी गारफील्ड के पुरसा भी उस महा युद्ध में शरीक थे। माता ने जेम्स का हाथ पकड कर और अपनी और उसे घसीट कर कहा, “बेटा, अब तो तुमने समझ लिया न,कि सेना- पति किसे कहते हैं। देसो, उस महायुद्ध के समाप्त होने पर तुम्हारे प्रपितामह सोलोमन गारफील्ड न्यूयार्क की रियासत मे चले गये। वहां उनको एक पुत्र हुआ जिसका नाम टामस था । टामस के बडे होने पर उसका विवाह हुआ और उसको एक पुत्र हुआ जिसका नाम एवरम था, और यही एवरम तुम्हारे पिता थे । अब बेटा, तुम्हें अच्छी तरह स्मरण रहेगा कि सोलोमन गारफील्ड जो कि अमरीका के राष्ट्र-विप्लव के समय एक सिपाही थे वे तुम्हारे प्रपितामह थे। न्यूयार्क के निवासी टामस गारफील्ड तुम्हारे पितामह थे और भोहिया के रहने वाले एमरम गारफोल्ड तुम्हारे पिता थे। तुम्हारे पुरखों में से कोई सेनापति नहीं हुआ था परन्तु कोई कोई उनमे से प्रतिष्ठा में सेनापति ही के वरावर थे । यदि तुम कदाचित् सेनापति हो जाओ तो तुम इतने उन्नत होगे कि तुम्हारे पुरसे स्वर्ग लोक से तुम्हारे ऊपर पुप-वृष्टि करेंगे क्योकि उनमें से कोई भी इस उच्च -

चौघा परिच्छेद।
२५
पद को नहीं प्राप्त कर सका था। तुम अपने कुल का मुस
उज्ज्वल करके अपनी प्रतिष्टा घढाओगे और ससार भर में
तुम्हारा नाम फैल जायगा।"
सारी वक्तृता को जेम्स ने बडे प्राश्चर्य के साथ सुना।
उसको आश्चर्य इस कारण हुआ कि ससार के और लोगो से
भी उसका कुछ कुछ सम्बन्ध है, और उसी के पूर्व पुरुष इम
देश को बसाने के मुखिया थे और किसी समय में उन्होने
धहुत बडे घडे काम भी किये थे। अब तक उसको इस बात का
ज्ञान न था कि ओहिया के बाहर रहने वालो से उसका कोई
सम्बन्ध है या नहीं। इस नई बात को सुनकर उमके चित्त में
घडे बडे काम करने की इच्छा उत्पन्न हुई और उसके मस्तिष्क मे
इन बातों का दीप्तिमान चित्र अकित हो गया जो चिरकाल लो
धना रहा, मिटा नहीं।
जेम्स और उसके शिक्षक मे घडा सद्भाव था। दोनो
में परस्पर विश्वास और सहानुभूति भी खून थी। एक दिन
शिक्षक महाशय ने पाठशाला में एक कठोर नियम प्रचलित
किया। वह नियम यह था कि कोई विद्यार्थी अपनी पुस्तक को
छोड पाठशाला में इधर उधर न वाफे । यह नियम पालन करना
विद्यार्थियों के लिए कुछ कठिन था, और विशेप कर जेम्स ऐसे
चञ्चल-चित्त वाले विद्यार्थी के लिए तो बडा ही कठिन था,
क्योंकि उसके दोनो कान और प्रासे उसके लिए पुस्तक का
काम देती थीं । इसलिए उन आँसो और कानो को बन्द करके

. गारफील्ड। बैठना उसके लिए वडा दु सदायक था, परन्तु उसने मन ही मन इस बात को ठान लिया कि वह इस नियम को यथासाध्य पालन करेगा क्योंकि उसको विश्वास था कि ऐसा करने से वह सेनापति बनेगा। इस नियम को पालन करने का वह यत्न तो बहुत करता था परन्तु ज्योंही कोई नई बात होती त्योंही तुरन्त उसके कान सडे हो जाते और वह इधर उधर ताकने लगता। शिक्षक महा शय भी तुरन्त ही ठोकते और वह सिर झुका लेता। थोडी देर वाद फिर वह इधर उधर देसता और शिक्षक उसे डाटते और तव वह चुप बैठ जाता । तात्पर्य यह कि दो सप्ताह तक लगातार- शिक्षक ने उसे ठीक करने का प्रयत्न किया, पर उनकी सब चेष्टा निष्फल हुई। दो सप्ताह के बाद शिक्षक को दूसरे विद्यार्थी के यहां जाने की बारी आई । तब उन्होंने उसकी विधवा माता से एक दिन कहा, "महाशया, आपका पुत्र बहुत अच्छा लडका है, परन्तु-" माता ने कहा, "आप 'परन्तु' कहके चुप क्यों होगये ? सकोच क्यों करते हैं, कहिए जो कुछ कहना है।" शिक्षक ने कहा, "आपका लडका अच्छा तो है सही, पर वडा चञ्चल है, एक मिनिट भी स्थिर नहीं बैठ सकता। माता ने ठडी सांस भर कर कहा, "वेटा जेम्स, यह क्या बात है ? जेम्स ने इन बातो को सुन कर मां के आंचल मे अपना मुंह छिपा लिया और रोते रोते उत्तर दिया, "मैं अब स्थिर रहूँगा और अच्छा लडका बनूंगा।" , - ,

-
क्योंकि वह
चौथा परिच्छेद
कोई मनुष्य चाहे कितना ही विद्वान और ज्ञानी क्यों न हो
परन्तु वह साधारण माध्याकर्पण-शक्ति को किसी प्रकार नहीं
दवा सकता । यहाँ शिक्षक महाशय भूल से इसी शक्ति के दयाने
का प्रयत्न कर रहे थे तो इसका दवाना भला कैसे सम्भव था।
माता ने शिक्षक महाशय से कहा, "महाशय, हमे
मालूम
होता है कि कदाचित् वह चुप बैठ ही नहीं सकता,
अपनी जिन्दगी भर में कभी चुप नहीं रहा ।"
शिक्षक ने कुछ काल तक चिन्ता करने के अनन्तर कहा,
"पाप ठीक कहती हैं, मैं इस बात को नहीं समझ मका था ।
मैं देखता हूँ कि पहले की अपेक्षा उसमें कुछ दुबलापन भागया
है । उसका कारण यह है कि अब वह अपनी प्रांग प्रार, int
को ठीक रसने में पहले से बहुत अधिक ध्यान रमा
उसकी प्रांगो और कानो को स्वाधीनता दी जाय मा म
लाभ ही होगा। मैंने अपनी भूल समझ ली।"
लडके को रोते देस शिक्षक का दिन Patri TRA
उन्होंने उसके सिर पर हाथ धर कर कहा, "मप, nir
मत, अव से हम दोनों एक दूसरे के मित्र धन #g
फिर से पढाऊँगा । उठो, हँसो, बोलो और gam
शिक्षक ने अपनी भूल समझ ली घी, truth
मावा ने उनकी प्राय सोल दी थी | Rite
घात का विचार कर लिया था कि पप tre's

२८
गारफील्ड।
अपने स्वाभाविक रूप ही में चलने देंगे और साथ हो साथ
कोई दूसरा और उपाय सोचेंगे।
शिक्षक महाशय ने अपनी भूल का सगोधन करने के लिए
जेम्स को उसकी इच्छा के अनुसार ही सब काम करने की
आज्ञा देदी। कुछ दिन ऐसी स्वाधीनता की अवस्था में रहने के
अनन्तर सभी ने देसा कि इसका परिणाम बहुत ही अच्छा
हुआ। जेम्स अपनी प्रांसों और कानों को पूर्णरीति से प्रयोग
करता और इस प्रकार से तरह तरह का ज्ञान लाम करता था।
कुछ दिन मे उसका नम्बर स्कूल के सब विद्यार्थियों से
ऊँचा होगया। शिक्षक इस बात को देख कर बहुत ही प्रसन्न
हुए । उसकी माता के हर्प को द्विगुणित करने के विचार से
उन्होंने एक दिन उससे मिलकर कहा-"आपका पुत्र बहुत
अच्छा काम कर रहा है। सारे स्कूल में उसके समान वीत्र,
बुद्धिमान और साहसी दूसरा कोई विद्यार्थी नहीं है । उसके
सद्गुणों का परिचय देने में हमे
भी बडा गौरव जान
पडता है।"
माता ने इन बातो को सुनकर शिक्षक को धन्यवाद दिया
और भगवान के चरणो मे पुत्र के मङ्गलार्थ प्रार्थना करके प्रणाम
किया।
एक दिन शिक्षक ने पाठशाला में सब विद्यार्थियों के सामने
हाथ मे एक पुस्तक लेकर कहा -"लडको, देसी हमारे हाथ
एक पुस्तक है । इस पुस्तक का नाम न्यू टेस्टमेट है। यह पुस्तक
में

चौथा परिच्छेद।
मैं उस विद्यार्थी को इनाम दूंगा जिसका चाल-चलन, रीति-
नीति, प्राचार-व्यवहार, लिसना-पढना दूसरे विद्यार्थियों से
अच्छा समझा जायगा । अतएव तुम सर लोग इसके पाने की
कोशिश करो । देखें किसको मिलता है ?"
इनाम का नाम सुनते ही सब लडके बडे उत्साहित हुए
और बडी मुस्तैदी के साथ परिश्रम करने लगे। परन्तु दो ही
चार महीने के बाद मालूम होगया कि जेम्स को छोड
दूसरा
कोई उस इनाम के पाने का अधिकारी न होगा । अतएव वर्ष
के अन्त मे जन स्कूल बन्द होने को था तर शिक्षक ने जो एक
दिन जेम्म को पास बुलाकर सब विद्यार्थियों के सामने वह
पुस्तक इनाम में दी तब किसी को ईर्ष्या द्वेप अथवा आश्चर्य नहीं
हुआ क्योंकि सभी ने उसकी योग्यता स्वीकार कर ली थी।
जबसे जेम्स को अपने सारे काम-काज के करने में स्वाधी-
नता मिल गई तभी से मानो उसकी अवस्था दिन दिन उन्नत
होती गई। पाठशाला के समस्त शिक्षक उसका बडा आदर
फरते थे, और उसकी असाधारण बुद्वि की प्रशसा किया करत
थे। पाठशाला के ममस्त विद्यार्थी भी उसके गुणों को देखकर
उसकी ओर चुम्बक पत्थर की नाई आकर्षित होते थे। मतलब
यह कि जो जो इसके ससर्ग में आते वे ही इसको जी से प्यार
फरते थे।६ ही वर्ष की अवस्था में उमने गांव भर में जितनी
किताबें मांग मूंग कर पाई सक्को आद्योपान्त पढ डाला। इसके
अतिरिक्त जन कभी उसे अवसर मिलता था वह सेती के काम

गारफोल्ड । करने में अपने भाई टामस की सहायता किया करता था। जब पाठशाला खुली रहती तव वह पाठशाला जाता और केवल लिसने पढने ही में अपना समय व्यतीत करता परन्तु जब पाठ- शाला चन्द रहा करती तब वह घर पर पाठ याद करता और अपने भाई की सहायता किया करता था। एक कहावत है कि "दोनहार बिरवान के होत चौकने पात" अर्थात् जो वृक्ष अच्छी तरह उपजने वाला होता है उसके पत्ते पहले ही से चिकने मालूम होते हैं। हमारे जेम्स महोदय में भी कई एक ऐसे ही सुलक्षण दिखाई पडने लगे। पहली बात तो यह है कि इसकी मानसिक भूख-प्यास कभी मिटती ही न थी, अर्थात् चाहे कितनी ही नई चीजें वह क्यो न जान ले पर तो भी और अधिक जानने की अभिलापा चित्त में बनी ही रहती थी। नई चीजों के जानने से उसकी तृप्ति ही न होती थी। जेम्स के ही परिश्रम से उस समय उस गांव मे गारफील्ड' और बाइटन के लड़कों ने मिल कर एक समिति कायम की जिसमे दोनों परिवार के लडके पाते और शब्दों के उच्चारण तथा ठीक ठीक हिज्जे करने का अभ्यास किया करते थे । फल उसका यह हुआ कि वे लडके स्कूल के और लडकों से इस विषय में बहुत बढे-चढे हो गये। 7 पॉचवॉ परिच्छेद प्राया ठ वर्ष की उम्न मे जेम्स रोज अपने भाई के या साथ खेत में काम किया करता था, और जन कभी टामस जाया करता तब जेम्स ही प्रकला सेत का सारा काम- काज किया करता था । वह लकडी काटने, गाय दुहने, खेत काटने तथा और भी बहुत से कामों के करने में बडा कुशल था। । एक दिन उसकी माता ने कहा, "वेदा जेम्स, देखो, जब तुम्हारे पिता की मृत्यु हुई थी तब टामस की उम्र ११ वर्ष की भी न थी। उसने उसी समय खेत का सारा भार अपने ऊपर ले लिया था। अब तुम्हारी उम्र ८ वर्ष की है। तुम्हें भी उस काम के लिए प्रस्तुत होना चाहिए।" जेम्स ने तुरन्त उत्तर दिया, "मैं कर सकता हूँ" माता ने पूछा, "क्या विना सीसे ही तुम यह काम कर सकते हो? इस बात को सुनते ही उसने तुरन्त उत्तर दिया, "अगर

.
३२
गारफील्ड ।
टामस' इस काम को कर सका था तो मैं निश्चय जानता हूँ कि
मैं भी कर सकूँगा।"
"हां यह तो ठीक, पर कर ? जब तुम भी टामस की उम्र
को पहुँच जाओगे।"
"हां हां, ठीक है। मैं भी यही कहता था। सैर, अब गायों
को दुहने का समय आ गया है" यह कहता हुआ जेम्स वहां से
चला गया और अपने काम मे लग गया, क्योंकि उसमें एक
घडा भारी गुण यह था कि अपने जरूरी काम को छोड़ कर
कभी वह सेल-कूद में अपना समय न गवाता था।
एक और गुण उसमें यह भी था कि वह किसी काम
करने से मुँह नहीं मोडता था । कोई काम उससे कहा जावे,
तुरन्त उसका उत्तर वह यही देता था, कि "मैं कर सकता हूँ।"
कर सकता हूँ, के कारण एक बार उसकी घडी हँसी
हुई थी । सुनिए -
एक दिन वह अपने साथी के साथ, जिसका नाम एडविन
मेप्स था, मुर्गी का अण्डा हुँढने जाता था। उस समय उसकी
उम्र आठ वर्ष की थी । एकाएक मेप्स को एक छोटी मुर्गी का
अडा मिल गया और उसने उसे उठा कर कहा, "क्यों जेम्स,
क्या यह बहुत छोटा नहीं है ?"
जेम्स ने तुरन्त ही उत्तर दिया, "मैं इसे निगल जा
सकता हूँ।"
"क्या सब का सव ?"
इसी मैं
,
,

पांचवां परिच्छेद। ३३ "हां, सवका सन "तुम नहीं निगल सकते।" "मैं उसे जरूर निगल सकता हूँ।" इतना कहते ही जेम्स उसे अपने मुंह में डाल लिया और उसे निगलने की कोशिश , परन्तु उसके गले के छेद से अडा अधिक वडा था इस रण वह उसे पहली बार न निगल सका। पहली बार काम- न होने के कारण उसने फिर से उसे निगलने की कोशिश 1, परन्तु अडा वडा था और गले का छेद छोटा--जाय तो से जाय । अन्त में वह अडा उसके मुंह मे ही टूट गया और दबू जो मालूम हुई तो उस टूटे अडे को मुँह में लिये हुए वह र की ओर भागा । घर पहुँच कर उसने तुरन्त एक टुकड़ा रोटी कर उसी अडे की सहायता से उसे चवाने लगा। थोडी देर बाने के बाद वह किसी तरह नाक मुँह बन्द करके तुरन्त उसे नगल गया। मेप्स जो इनके साथ साथ दौडता हुआ आया था उसने माम किस्सा जेम्स की मां, बहन और भाई से कह दिया और जव लोगो ने इनकी खूब हँसी उडाई और इन्हे वेरकृफ बनाया परन्तु माता ने केवल यही कहा, "अरे वेवकूफ लडके ।" इमी "अरे वेवकूफ लडके" के भीतर एक ऐसी बात छिपी दुई थी जिसको माता ने कदाचित् कभी अनुभव ही न किया होगा । अक्सर ऐसा देखने में आया है कि ऐसे बेवकूफ लडके ससार में ऐसे बडे बडे काम कर जाते हैं कि जिनको देख कर २

और
उस
लगते थे कि जब उसने लिखना-पढना सीस लिया तब, उसन
याद हो गये थे। यहां तक कि कौन सा किस्सा किस परे
उसकी माता वाइबिल को ईश्वर की किताब कहा करती
३६
गारफोल्ड।
जेम्स ने पूछा-"लेकिन क्या घटों का वजना इन जङ्गलो
में बहुत मधुर न मालूम होगा ?"
मावा ने कहा -"घटों की आवाज न केवल मधुर, गम्भीर
ही मालूम होगी वरन् इनके वजने से सुनसान जङ्गल भी हरा
भरा मालूम होगा।"
उस दिन से गारफील्ड के बच्चे सैवेथ को मानने लगे,
चाहे कोई सभा हो चाहे न हो, परन्तु भगवान का भजन.
दिन होता ही था और सब काम-काज बन्द रहा करता था।
जेम्स की विधवा माता ने ऐसा नियम बना रक्सा था कि बाइ
बिल के चार परिच्छेद प्रति दिन गिर्जे मे पढे जायेंगे और चार
से अधिक परिच्छेद सैवेध के दिन पढे जायेंगे।
जन वाइविल पढा जाता था तब सब बालक तरह तरह
के प्रश्न पूछा करते थे । वाइविल के किस्से जेम्स को इतने प्यार
इस पुस्तक को कई बार पढा और उसके तमाम किस्से उसे
में है यह भी वह कह सकता था।
.
"माता तुम्हे
-
थी। इस कारण एक दिन उसने माता से कहा
कैसे मालूम हुआ कि यह ईश्वर की किताब है?"
मावा ने कहा - "क्योंकि मनुष्यों ने जितनी किताबें लिख
हैं फोई भी इसके तुल्य नहीं है।"

-
।
छठा परिच्छेद।
"लेकिन तुमने एक दिन कहा था कि मूसा, ऐशा, डेभिड,
मैथ्यू, पाल इन सभी ने इसको लिसा है।"
"हां ठीक है, उन्हीं लोगों ने इसको लिखा, परन्तु जैसा जैसा
ईश्वर ने उनको आदेश किया वैसा ही वैसा उन्होंने लिखा है।
कुछ अपने मन से नहीं लिसा । वे इसको विता सहायता के नहीं
लिख सकते थे।"
जेम्स ने पूछा, वो "क्या तुम इसे इसी लिए ईश्वर की
किताब कहती हो?"
"हां ठीक है । वे ही इसके लेसक हैं। यह दूसरी बात है
कि उन्होंने इसको मनुष्यों के द्वारा ही लिखवाया ।"
"क्या इसकी सब कहानियां सच्ची हैं ?",
"हां सब सधी हैं।"
"क्या यह भी सच है कि जोजेफ के पास एक कुर्ता कई रन
काथा"
"हां, मैं समझती हूँ कि यही घात है।"
"उसके पास एक रन का कुर्वा क्यों न था। क्या इसका
इनाना सहल न था ?"
"उसका बाप उसे और वचों से अधिक प्यार करता था
इस कारण उसने उसके लिए एक ऐसा कुर्ता यनवा दिया था।"
"तो क्या एक लडके को अधिक प्यार करना चाप के लिए
उचित था ?"
नहीं, उचित तो न था ।"

३८
गारफील्ड।
,
-
"क्या उसका बाप नेफ आदमी था ?"
"हां, नेक आदमी तो था, परन्तु कोई कोई नेक आदमी भी
किसी किसी समय भूल कर जाते हैं।"
"अगर नेक आदमी भूल करे तो तुम उन्हें बुरे आदमियां
से कैसे पहचान सकते हो?"
"वे इतने अधिक सराव काम नहीं करते जितना बुरे
मनुष्य करते हैं।"
"क्या अच्छे आदमी बुरा काम करना छोड नहीं सकते ?"
"हां, ईश्वर की सहायता से छोड़ सकते हैं।"
"क्या, ईश्वर सर्वदा उन्हें सहायता नहीं देते ?"
"नहीं।"
"क्यो नहीं ?"
"शायद वे सहायता पाने के योग्य नहीं हैं।"
"क्या मनुष्य उनकी सहायता विना अच्छे नहीं हो सकते १
"नहीं । वे अच्छे नहीं हो सकते, और न कभी होंगे।"
"क्यो न होंगे ?"
"क्योंकि ये बडे दुष्ट हैं।"
"तो फिर वे अच्छे कैसे हो सकते हैं "
इस कथोपकथन से जेम्स की चित्तवृत्ति और ज्ञान-लार
करने की इच्छा का परिचय भली भांति मिलता है। कभी कभी
ऐसा होता था कि इसके लडकपन के प्रश्नों का उत्तर देने में
माता के दांत खट्टे हो जाते थे। परन्तु इस घाव को अवश्य ही
-
।

छठा परिच्छेद ।
मानना पडेगा कि माता के उपदेश जेम्स के लिए इतने उपकारी
कि चालीस वर्ष की अवस्था में जब वे किसी सभा में
याख्यान देते थे तब उनकी बचपन की उपदेशपूर्ण वक्तृतायें
तनी मधुर और मनोहारिणी होती थी कि लोग उनको कान
जगा कर सुना करते थे और उनका असर उनके दिलो पर
बहुत दिनो तक बना रहता था ।
जब जेम्स की उम्र आठ वर्ष की थी उस समय मदादि
दोपो के निवारण करने के लिए एक समिति बहुत प्रयत्न कर
रही थी इसका असर चारो ओर फैल गया था। ओहियो में भी
जब तन इसकी चर्चा हुआ करती थी। एक दिन जेम्स की
विधवा माता ने अपने पुत्र से कहा -"मदिरा पान करना
बहुत बडा पाप है। मैं इस बात से बडी प्रसन्न हूँ कि तुम्हारे
पिता का भी ऐसा ही मत था।"
-"क्या वे रम या भिस्की कुछ भी नहीं
पिया करते थे ?"
"योही कभी कभी । क्योंकि वे मववाले आदमियों की सगत
कभी करते ही न थे।
-"यदि इससे नुकसान पहुँचता है तो
लोग मद्य पीना छोड क्यों नहीं देते ?"
"यह कहना बहुत कठिन है कि वे क्यों नहीं छोडते । कोई
कोई तो ऐसा कहते हैं कि वे छोड ही नहीं सकते।"
बहुत आश्चर्य में होकर जेम्स ने पूछा-"छोड नहीं सकते ?"
जेम्स ने पूछा
--
जेम्स ने पूछा

-
नाई स्वय वह सकती है। अन्त में यह माप की तरह काटता
गारफील्ड ।
"ऐसा कहा जाता है कि वे छोड नहीं सकते क्योकि व
इसमें इतने आसक्त हो जाते हैं कि विनाइसकेरही नहीं सकते।"
जेम्स ने बड़ी दृढ़ता से कहा:-"मैं इसे अवश्य ही
छोडूंगा।"
"इस बुरी चीज का न छूना ही अच्छा है ।"
"लोग मद्य क्यो पीते हैं ?
"मैं समझती हूँ कि यह कहना कठिन होगा कि लोग इस
क्यों पीते है। ज्यादा आदमी इसे पीते हैं क्योकि कदाचित् ।
इसे पसन्द करते होगे।"
"क्या इसका स्वाद अच्छा होता है ?"
"मैं समझती हूँ कि इसका स्वाद उन्हें अच्छा लगता है जो
इसे पसन्द करते हैं।"
जेन्स ने कहा.-"मैं भी इसे एक बार चीस कर देगा
कि कैसी लगती है।
"हे मेरे प्यारे बेटे, मैं कहती हूँ कि तुम उसे चीखों ही
नहीं। यदि तुम उसे कभी न चीसो तो इतना तो निश्चय है कि तुम
मतवाले कभी न होगे । देसो, बाइबिल में लिसा है "तुम ।
की , ओर मत देखो जब कि यह लाल है और जवकि
रङ्गत् प्याली में दीस पडती है और जवकि यह तरल पदार्थ की
.
है और बिच्छू की वरह उक मारती है।"
-

,
छठा परिच्छेद।
जेम्स ने पूछा-"रम मे कौन सी ऐसी चीज है जो
आदमी को नुकसान पहुँचाती है"
"उसमें एक नशीली चीज होती है, इसी कारण लोग
मतवाले हो जाते हैं। देसो, दूध या पानी पीने से किसी को
कुछ नुकसान नहीं पहुँचता।"
"नहीं, ऐसा तो नहीं होता।"
"हां, इन बलकारक चीजों के पीने मे और मादक वस्तुओं
के पीने में बडा भेद है । दूध या पानी मे मादक द्रव्य कुछ
नहीं है।"
"यदि मादक चीजों के देने से लोगो को नुकसान होता है
तो क्यों वे इन चीजों को इसमें छोडते हैं।"
जेम्स की विधवा माता से जहां तक बन पडा भलीभांति इस
अन्तिम प्रश्न का उत्तर देकर उसने अपने पुत्र को शान्त किया ।

वजी इत्यादि सामान इकट्ठा कर रक्खा था। परन्तु रुपये।
सौभाग्यवश थोडे ही दिन बाद सुनने में आया कि पारे।
जेम्स इस बात को सुन कर बहुत खुश हुआ और बोला,
। “भैया, तुम मिचिगन जाओ, और मैं यहां रद्द कर अपने खेत में
फावकारी करूँगा । तुम कितने दिनो के लिए वहां जाओ
सातवॉ परिच्छेद
हुत दिनो से टामस की इच्छा थी कि वह किसी
व
प्रकार बन्दोवस्त करके रहने के लिए' पारे।
में एक अच्छा मकान बनवावे । इस कारण
धीरे चार पांच साल के बीच मे उसने कुछ लकडी, लट्ठा, बास
प्रभाव से कोई वढई नहीं लगाया जा सकता था,
को बना दे। इस कारण उसे अव रुपया कमाने की बड़ा
चिन्ता हुई।
से २०, २५, मील दूर पर मिचिगन नामी एक गाव मे जगन
की सफाई करने के लिए कुछ लोगो की जरूरत है । टामत
इस बात के सुनते ही तुरन्त वहां जाने का विचार पक्का
लिया, और उसने अपने छोटे भाई से अपना मतलब
सुनाया।
जो मकान
।
।
और वे तुम्हे कितनी तनख्वाह देंगे।
1

॥
सातवां परिच्छेद ।
टामस ने उत्तर दिया कि वहां में कम से कम छ महीने
रहूँगा, और ज्यादा भी रद्द सकता हूँ। वे हमको प्राय ३०
रुपया मासिक देंगे।"
जेम्स ने भी अपने भाई के साथ जाना चाहा परन्तु उसके
गाने से खेती-बारी का काम कौन करता, माता के पास कौन
हता । जब यह युक्तिपूर्ण चिन्ता उसके दिमाग में आई तर वह
सुप रह गया । उस समय जेम्स की अवस्था १२ वर्ष की थी और
मस २१ वर्ष का था। पहले ही से माता और पुत्रों में यह
त त हो गई थी कि टामस २१ वर्ष की अवस्था में बाहर
नाकर रुपया कमावेगा और जेम्स १२ वर्ष में सेती करेगा।
नडकपन में टामस ही ने ऐसा प्रस्ताव किया था। अतएव मौका
आने पर जर टामस ने माता से अपने जाने का पूरा हाल कह
सुनाया तब यद्यपि उनके चित्त में पुत्र के विच्छेद का कष्ट
अनुभव होने लगा परन्तु तो भी वे इनकार न कर सकी, क्योकि
पहले तो वे वचन हार चुकी थीं, और दूसरे यह कि वहां
जाने से लडके को कुछ अधिक अनुभव प्राप्त होगा और कुछ
रुपया भी कमा लावेगा—यह सोच कर वे टामस की बात पर
सहमत हो गई और उसे मिचिगन जाने की अनुमति दे दी।
इधर टामस मिचिगन जाने की तैयारी कर रहा था और
उधर जेम्स अपनी नई जिम्मेदारी की चिन्ता कर रहा था, और
इनकी माता दोनो को अपने परिश्रम और बुद्धि-द्वारा सहायता
कर रही थीं।
-

-
-
जेम्स और उसकी माता को बडा दुस हुआ क्योंकि इन 9
प्रारम्भ किया । सेती करना उसके लिए बिलकुल नया काम
काम को देख भाल किया करता था और इस कारण, उर
इस काम में बहुत सा अनुभव प्राप्त किया था।लडकपन
जब जेम्स खेत पर काम किया करता था तब लोग उसे किर
बालक कहा करते थे, परन्तु अव उसने पूरे तौर से किसान
४४
गारफील्ड ।
दूसरे दिन टामस ने अपनी माता को प्रणाम करके और
अपने भाई-बहनों का हाथ चूम कर उनसे विदा मांगी और सीचे
मिचिगन की राह ली। उसी दिन से जेम्स ने भी अपने खेत
का सारा भार अपने ऊपर लिया। किन्तु टामस के चले जाने पर
भाइयो में बडा ही प्रेम और सद्भाव था । वह इन्हीं
मुँह ताक के अपने वैधव्य का कष्ट सहन करती हुई किट
प्रकार जीवन धारण करती थी ।
यद्यपि जेम्स को अपने भाई से छूट जाने पर बडा ही छ।
हुआ किन्तु तो भी उसने बडी गम्भीरता से खेती का
था, क्योंकि चार वर्ष से बरावर वह अपने भाई के साथ उस
कर इस काम को प्रारम्भ कर दिया।
एक दिन किसी पड़ोसी ने पाकर गारफील्ड की
माता से कहा -"आपका लडका अपने औजारों को लेकर
खूबी से सेत पर काम करता है।"
मावा को यह घाव सुन कर घडा आनन्द हुआ
कहा--"हां, हमें भी ऐसा ही मालूम होता है।"

। सातवा परिच्छद । ४५ . पडोसी ने कहा-"हम अगुआओ की जिन्दगी हमेशा कलीफ से भरी रहती है। गारफील्ड की विधवा माता ने भी इसी बात को स्वीकार कया और इन दोनो मे कुछ देर तक इसी तकलीफ के विषय मे वात-चीत हो ही रही थी कि इतने में जेम्स वहां आ पहुंचा। पडोसी ने तुरन्त पूछा-"क्यों जेम्स, इस विषय मेतुम्हारी क्या राय है " जेम्स ने पूछा -"किस विषय मे ?" “यही कि साधारण लोगो की अपेक्षा अगुआओं की जिदगी हमेशा ज्यादा तकलीफ से भरी रहती है।" जेम्स ने कहा--"जन और लोगों की तकलीफ के विपय में मैं कुछ जानता ही नहीं तब भला मैं कैसे कह सकता हूँ कि किन लोगों की तकलीफ प्यादा है। हम लोगों की या शहर वालों की । मैं समझता हूँ कि हम लोगो की मेहनत है, तक- लीफ नहीं है, क्योकि मेहनत एक चीज है और तकलीफ दूसरी चीज । मेहनत को कभी तकलीफ नहीं कह सकते । जो मेहनत को तकलीफ कहा जाय तो हमारी समझ में शहर के अमीरो की मेहनत तकलीफ देनेवाली है, क्योंकि उनको अपने रुपयों का हिसाब-किवाव, और उसकी मबरदारी के लिए हमेशा फिक्र करनी पद्धती है, इस कारण उन्हें रात रात भर नींद नहीं आती । नींद न आने से साना नहीं हजम होता, दस्त म्खुल कर नहीं होता... और इस कारण शरीर नीरोग नहीं रहवा । इस -ि । -

-
J
निकाला है। वह यह कि "काम के बदले काम न कि काम के
ने प्रसन्न होकर कहा-"यह तुमने बहुत अच्छा काम किया।
गारफील्ड ।
यदि देखा जाय तो कहना पडता है कि अमीरो की मेहनत
वकलीफ देनेवाली है, हम लोगों की नहीं।"
जेम्स कभी मेहनत को तकलीफ नहीं कहा फरवा,
घल्कि मेहनत को वह इतना पसन्द करता था कि उसके
के चले जाने पर जब वह सेत पर जाता और कठिन ।
फरता तब वह पहले से कहीं अधिक प्रसन्न होता ।
एक दिन जेम्स हँसता हुआ अपनी माता के पास आप
कहने लगा -"मां, मैंने काम करने का एक नया ही
घदले दाम।" अर्थात् यदि तुम हमारा कुछ काम करदो तो मैं भी
तुम्हारा कुछ काम कर दूंगा, उसके लिए न तुम मुझे कुछ
दाम दोगी न मैं तुम्हें कुछ दूंगा और मैने मिस्टर लेम्पर से इसका
बन्दोबस्त किया है। मैं उनका थोडा बहुत काम कर दूंगा और
वे मुझे अपने वैलो को देंगे, जिससे मैं अपना काम करूँ।" मात
इससे तुम्हारी भी भलाई होगी और तुम्हारे साथी की भी
तुम्हारे साथी बूढे आदमी हैं। उनकी राय तुम्हारे लिए यह
लाभदायक होगी।
काम करने का नया तरीका जो जेम्स ने जारी किया उस
दोनो को बडा लाभ पहुँचा । जेम्स को घेलों से बहुत घर
मिली, और मिस्टर लैम्पर भी जेम्स सरीखे बुद्धिमान ।
सहायता पाकर बहुत सुश हुए । जेम्स में .
--

सातवां परिच्छेद।
एण यह था कि वह हर काम को बडी चतुराई से कर सकता
1। इस कारण लैम्पर साहव उसकी सहायता से बहुत
सन्न थे।
पाठक, तुमने कदाचित् जार्ज स्टीफनसन का नाम सुना
शेगा। इन्होने रेल चलाने के इंजन का आविष्कार किया था।
वे कहा करते थे --"मैंने कलों के विपय में किसी गुरु के
पास कुछ भी नहीं पढ़ा था वरन् कल ही मेरा गुरु था।"
ये एक पुतलीघर में काम किया करते थे । सनीचर के दिन
जब आधे दिन की छुट्टी हो जाती और सब कुली मजदूर पुतली-
घर से बाहर चले जाते तब ये अफेले वहां रह कर कलो को
जोला करते और उनके पुों को साफ किया करते थे
और हर एक विषय को अच्छी तरह समझने की कोशिश किया
करते थे। ऐसा करते करते इन्होंने स्वय एक नये प्रकार की
फल प्राविष्कृत की और इसी फल के द्वारा इन्होंने रेल चलाई ।
इनके विषय में जव मालोचना की जाती है तब यही कहना
पडता है कि फल ही इनका गुरु था। इसी प्रकार यद्यपि जेम्स
ने किसी पाठशाला में नहीं पढ़ा था, तोभी हमेशा उसको उसके
खेत से सबक मिलवा रहा था । उस खेत ने उसको बहुत सी
अच्छी अच्छी पाते सिखाई थी। उस सेत के कठोर परिश्रम
के साथ रह कर उसमे प्रीटता प्रागई थी। उसकी मेधाशक्ति
प्रवल हो गई थी और उसका चरिनगठन हो गया था।
इस काम के करते समय उसको पढ़ने के लिए बहुत घोडा

४८
गारफील्ड ।
समय मिलता था, परन्तु जो कुछ समय मिलता था उसी में वह
कुछ न कुछ पढा करता था। पर तोभी उसकी विद्यादृष्णा
कभी शान्त न होती थी।
जेम्स की माता प्राय कहा करती थो-"बेटा, तुम्हारे
लिए केवल खेत जोतने का काम करना ठीक नहीं है। तुम्हार
लिए विद्या-उपार्जन करना भी उचित है।"
इस बात के उत्तर में जेम्स कहता था.-कि यदि ईश्वर को
यही मजूर है कि मैं विद्वान् वनें और अच्छा काम करूँ ते
वे ही कोई न कोई उपाय निकाल देंगे, परन्तु ऐसी , अवस्था में
विद्या का उपार्जन करना कठिन मालूम होता है।"
"
-
4
-

अाठवॉ परिच्छेद र्य नारायण डूबने ही पर थे। पश्चिमी आकाश में लालिमा छा गई थी। गडरिये अपनी भेड- बकरियो को जगल से चरा कर लौट रहे थे। चिडियां अपने दिनभर की सैर के अनन्तर सेरा लेने को जा रही थी । वेचारे गरीब कुली मजदूर भी दिन नर के कठोर परिश्रम के बाद अपने अपने घर लौट रहे थे। इतने में जेम्स नाचता, कूदता, चिल्लाता घर आया और वोला ---"मां i, टामस आ रहा है।" इतना कह कर वह फिर निकल गया पौर टामस से मिलने को दैोडा । माता ने इन बातो को सुन कर वाहा कि वह भी जेम्स की तरह दौड कर टामस से मिलने जाय परन्तु उसके बुढापे ने इस उमङ्ग को रोक दिया । वह दौड कर वाहर न जा सकी किन्तु घर के बाहर आकर सडी हो ई और टामस की राह देसने लगी। थोड़ी देर बाद क्या देखती है कि दोनों भाई परस्पर एक दूसरे का हाथ पकडे हुए म से बाते करते करते चले आ रहे हैं। जब वे घर पहुँचे वन माता ने तुरन्त टामस को अपनी छाती से लगा लिया और बडी देर तक दोनो मां-बेटे उसी अवस्था में खडे रहे। दोनों भावाक ४

-
-
लाने के लिए गये, और दो दिन बाद इन चीजों को लेकर लोन
गारफील्ड ।
थे। किसी के मुँह से कोई वात नहीं निकली। केवल जमा
जब तव अपने लड़कपन की बातों से उस समय के
को दूर कर देता था। सात महीने के वियोग को 'जेन्स Ut
एक मुहूर्त में बिलकुल भूल गया। उसके चित्त में शान्ति
गई । माता को भी कुछ कम आनन्द नहीं हुआ।
जब सब लोग भीतर गये वव टामस ने अपनी जेब से
दो तीन मुट्ठी सोने के सिके निकाल कर मां की गोद में डाल
दिये । जेम्स' इन सिकों को देख कर बहुत खुश हुआ
मारे खुशी के चिधा उठा और बोला, "माता, अब हम ।
का नया मकान बन जायवा।"
टामस ने कहा
--"अब एक वढई मुकर्रर करना चाहिए
क्योंकि वढई वगैरा का काम ठीक-ठाक करके मैं फिर चल
जाऊँगा । मिचिगन में अभी बहुत काम है।"
दूसरे दिन एक होशियार वढई, जिसका नाम मिस्टर द्रा
धा, बुलवाया गया और काम करने के लिए नियत किया गया
जेम्स और टामस दोनो भाई लोभलैण्ड मे ईट, चूना -
।
T
प्राये और देसा कि मिस्टर ट्रीट अपने काम को बड़ी
और होशियारी के साथ कर रहा
जेम्म जब तब इस बढई के पास पाता और उसके का
फो घर्ड गौर से देसता और उसके औजारो को टटोला करता

-
आठवां परिच्छेद ।
ह देस कर मिस्टर ट्रीट ने एक दिन कहा -“जेम्स, मालूम
ता है कि तुम हमे मदद दिया चाहते हो।"
जेम्स ने तुरन्त उत्तर दिया -"अगर कोई काम मुझे दो तो
करने को राजी हूँ।"
मिस्टर ट्रीट ने कहा -"अच्छा इस रुसानी और घोडे
तो लो और इस तस्ते को छील कर उसमे
गड्ढा
करो जैसा
करता हूँ।"
जेम्स ने बहुत जल्द उसमें गड्ढा कर दिया और कहा
'मिस्टर ट्रोट, मैंने इसको कर लिया है और अब मुझे
मरा दो।" मिस्टर झोट ने चकित होकर पूछा-"इतनी
ल्दी कर लिया । देखें।" यह कह कर उस तस्ते को लिया श्रीर
सको अच्छी तरह जांचा और कहा
हुत अच्छी तरह किया है । मैं भी इससे अच्छा न कर सकता
गा। अच्छा लो । दूसरा वनाओ।"
इसी तरह एक एक करके उसने ६ तस्तों में
दया और हर एक गड्ढे बडी सफाई से बने हुए थे।
ना देने के बाद शाम हो गई और बढई घर चला गया
दूसरे दिन जब चढई आया तब उसने जेम्स से
'तुमने सूरास बनाना सीख लिया है
सो।
"शावाश रे यहादुर,
गडढा
1 प्रत
जेम्म ने पहुत खुश
करूँ"

- Ir -- - और ५२ गारफील्ड। वढई ने पूछा.-"तुम इन तस्तों को सफाई से गढ हो जैसा कि मैं करता हूँ?" जेम्स ने तुरन्त उत्तर दिया- मैं जरूर गढ सकता हूँ ये तखते जब गढने ही के लिए बनाये गये हैं तव में जरूर सकूँगा। मुझे दीजिए।" वढई ने दो तसते जेम्म को दिये, और उसने उन्हें शुरू किया। उस समय रन्दे का रिवाज बहुत कम था, आरेंज के गांव मे तो था ही नहीं। रन्दे का काम वसूले ही लिया जाता था, इस कारण रन्दे का काम बहुत मामूली. का हुआ करता था। मकान भी बहुत मामूली तौर के जाते थे। आज कल जैसी सफ़ाई समय कोई इतनी सफाई पर ध्यान न देता था। रहने के। जैसा तैसा मकान बना लेते थे। जिस समय बढई तसतों को गढ रहा था उस ने उस काम को अच्छी तरह गौर से देखा था और उसे सीर था। इस कारण वह इस काम को भी आसानी से लगा। कप्तान सामुयेल ब्राउन जो कि बड़े प्रसिद्ध पुल वाले थे ट्वीड नदी के किनारे रहा करते थे। वे चा उसी ट्वीउ नदी के पार पार झूलों 'वा कि वे इसी विषय को सोच रहे थे। काम लिया जाता है समय M.A .

आठवाँ परिच्छेद ।
ो समय एक दिन सुवह को घूमते घूमते वे अपने बाग की
र गये । वहाँ अकस्मात् उन्होंने एक मकडी का जाला देसा ।
। जाले को उन्होंने अच्छी तरह जांचा और समझा कि वह
से बनाया गया है । उस जाले को देन कर उन्हें पुल बनाने
| उपाय सूझ गया। उन्होंने समझ लिया कि लोहे की जजीर
र लोहे के रस्सो को जोड जोड कर बनाने से वे भी एक
ले का पुल बना सकते हैं। ऐसे जाले कदाचित् हम लोग
ज देसा करते हैं, किन्तु उन्हें देख कर हमे पुल बनाने की
त नहीं सूझती । कारण इसका यह है कि हमारी प्रासें अन्धी
। ऐसा होने के लिए आँसों की दृष्टि तीक्ष्ण होनी चाहिए,
द्धि में तेजी होनी चाहिए । जेम्स की दृष्टि भी ऐसी ही तीक्ष्या
। इस कारण बढई को गढने का काम करते देस कर उसने
रन्त गढना सीस लिया । जव वह दो एक तख्तों को गढ चुका
[ब उसने कहा-"मिस्टर ट्रीट, इस काम में मुझे बडा मजा
प्राता है । यह बहुत अच्छा काम है।"
मिस्टर ट्रीट ने कहा -"हां ठीक है, परन्तु जब तुम्हें
देन दिन भर इसी काम में लगा रहना पडेगा तन तुम्हें मजा न
मावेगा क्योंकि इस काम को अच्छी तरह करने में चोटी से एडी
तक पसीना आता है।"
जेम्स ने कहा --"सिर्फ पसीने ही की जरूरत नहीं वरन
और भी किसी चीज की आवश्यकता होती है, अर्थात् बुद्धि की
जरूरत होती है।"

गारफील्ड ।
जेम्स ने कहा
-
मिस्टर ट्रीट इस उत्तर पर बहुत खुश हुआ
बोला-"तुमने ठीक समझ लिया है और तुम इस
जरूर अच्छी तरह कर सकोगे। हमें आशा होती है कि
एक अच्छे वढई हो सकते हो।"
जेम्स ने दु सित होकर कहा'-"लेकिन हमारे लिए
बनना कुछ सहज काम नहीं है क्योकि हमे मौका नहीं है।
मिस्टर ट्रीट ने कहा -"तुम ठीक कहते हो, परन्तु
कहावत है-'जो चाहता है वह पाता है।"
"मां भी ऐसा कहा करती हैं।
कहावत से इतना लाभतो अवश्य ही होता है कि बहुत से का
काम सहल हो जाते हैं।
जन तसते रन्दे के जरिए साफ हो गये तब मिस्टर ट्री
कहा-"जेम्स, तुम्हारे लिए एक दूसरा काम है, करोगे।
जेम्स ने बडी सुशी से पूछा-"वह काम क्या
दीजिए।"
ट्रीट ने कहा -"तरसतों में कांटा ठोकना है। इस काम
ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं है। केवल एक बात का
रसना कि कांटे के ठीक सर पर हथौडा मारना चाहिए।
इधर उधर पडने से ठीक न होगा ।"
इतना कहने के बाद मिस्टर ट्रीट ने दो तस्ते निकाल
और कहा -"इनमें जैसे मैं कील ठोकता हूँ वैसे ही तुम ठो-
.

-
-
आठवां परिच्छेद।
उन तख्तो को जोड कर जब जेम्स ने कील ठोकी तब उसका
निशाना कुछ तिरछा पड़ने से कांटा मुक गया, और मिस्टर ट्रीट
हसने लगे, और कहा --जेम्स, इसमे होशियारी चाहिए।"
दूमरी वार तसवों को जोड़ कर और कांटा ठीक स्थान पर
रस जेम्स ने कहा --मिस्टर ट्रीट, अव मेरी होशियारी
देखिए ।" इतना कहते उसने ऐसा हटौडा मारा कि कांटा,उन
तस्तो में धंस गया।
यह देख कर ट्रीट बहुत खुश हुआ और बोला ---जो लडके
प्रपनी हार पर लज्जित नहीं होते वरन् दूनी मुस्तैदी से काम
करते हैं वे ही अन्त में जीतते हैं और दिग्विजयी पुरुप होते हैं।
देखो, क्यूरेन, जो कि आयरलैण्ड का रहने वाला था, एक बडा
प्रसिद्ध वक्ता हो गया है। वह लडफपन में बडा तुतला था।
जिस दिन वह पहली वक्तृता देने के लिए उठा उस दिन वह
इवना तुतलाया कि उसके मुंह से बात तक न निकली। यह
देख कर लोग इसने और ताली बजाने लगे। इन अपमान-सूचक
पातों ने उस बालक के अन्तरात्मा को हिला दिया और उसने
कहा-"अाज तुम लोग जितना चाहो इस लो, परन्तु मैं इस
तुतलेपन को अवश्य ही दूर करूँगा और तब तुम हमारी वत्ता
सुन कर दातां में उङ्गाली दयाओगे।" क्यूरेन ने जैसा कहा
घोडे दिन में वैसा ही कर दिसाया। इसका कारण यह है कि
यद अपनी द्वार पर लग्जित नहीं हुआ वरन् तुतलापन को दूर
फरने पर प्रवित हो गया और अन्त में वह जीत गया।"
,
.
।
-1

गारफील्डा
.
--
-
उसके बाद जेम्स ने कई वख्ता में कीलें लगाई और उस
काम को पूरा कर दिया।
मकान पूरा हो जाने पर बढई घर चला गया, परन्तु जेम्स
के चित्त में यह बात समाई कि वह बढ़ई का काम करके कुछ
रुपया कमावे। उसने अपने मन की बात किसी से प्रकाशित
नहीं की । वह दिन रात चुपचाप सोचा करता था।
जब बहुत दिन बीत गये और वह इस बात को छिपा न सका
तब उसने एक दिन अपनी माँ से कहा
"मैंने रुपया कमाने
का एक उपाय सोचा है। यदि अनुमति दो तो कहे।"
माता ने कहा
-"वह क्या है, कहो बेटा।"
है। उसने कहा -"वढई का काम करके रुपया कमाऊँगा।
मिस्टर ट्रीट के पास जाने से वे हमे कुछ न कुछ काम अवश्य ही
दे देंगे।" इसके पहले वह मिस्टर ट्रीट से काम का बन्दोबस्त
कर आया था। ज्योंही माता इस बात पर राजी हुई उसने
तुरन्त कहा -"मैं कल सवेरे काम करने जाऊँगा। मिस्टर ट्रीट
ने मुझे काम दिया है।"
माता इस बात को सुन कर बहुत चकित हुई और कहने
लगी, “तुम काम करने तो जाओ परन्तु दो तीन घण्टे से अधिक
काम कदापि न करना। दो तीन घंटे में ही लौट आना।"
जेम्स ने कहा-"मावा, यदि कल मैं दो तीन घटे में लौट
पाऊँ तो तुम समझना कि या तो मेरा कोई अङ्ग भन्न हो गया

-
आठवां परिच्छेद।
है अथवा वह काम पूरा हो गया है, इस कारण लौट आया
हूँ। दो तीन घटे मे लौटने का कोई दूसरा कारण न होगा।"
दूसरे दिन सवेरे जेम्स मिस्टर ट्रीट के पास गया। उसने
उसको रन्दा फरने के लिए तस्ते निकाल दिये और कहा
"मैं तुम्हे पचास तख्ते रन्दा करने के लिए एक रुपया दूंगा।"
ये वाते ते हो जाने पर जेम्स ने अपने कपड़ों को उतार
कर रन्दा करना प्रारम्भ किया और वह दिन भर बराबर वही
काम करता रहा।
उसने शाम को कहा
" मिस्टर ट्रीट" मैंने सौ तखते
छील डाले हैं।"
ट्रीट को यह बात सुन कर बडा आश्चर्य हुआ, परन्तु गिन
कर जब देखा तो पूरे सौ तसते छिले हुए मिले । उसने कहा
"देखो जेम्स, इतनी मेहनत तुम्हारे लिए अच्छी नहीं है क्योंकि
इससे तुमको वडी हानि होगी । तुमने जितना काम प्राज किया
है उसका आधा भी करना उचित नहीं है।"
जेम्स ने इन बातो पर कुछ भी ध्यान न दिया । अन्त मे दो
रुपया पाकर हँसवा कूदता अपनी मां के पास गया और झट
१ पट दो रुपये निकाल कर मां की गोद में डाल दिये।
मां इन रपयो को पाकर कुछ बोल न सकी। चुप रह गई।

-
नवाँ परिच्छेद ।
-
100008
।
स्टर वाइटन नाज रसने के लिए एक खत्ता बनवाना
मि
चाहते थे, और उन्होंने मिस्टर ट्रीट को इस
काम के लिए मुकर्रर किया था । जब मिस्टर ट्रीट
E000005
ने काम करना आरम्भ कर दिया उसके दो तीन
दि नके बाद वह एक दिन जेम्स की विधवा माता से मिलने
गया। उनसे मिलकर उसने कहा -"यदि जेम्स को काम करने
का अवसर हो और काम करने की इच्छाभी हो तो कृपा करके
उसे मेरे पास भेज दीजिएगा, क्योंकि मेरे पास खत्ता बनाने का
एक काम पाया है।"
इस बात के समाप्त होते न होते जेम्स वहां आ पहुँचा और
उसने बडी प्रसन्नता से कहा -"मिस्टर ट्रीट, मुझे अवसर भी
है और काम करने की इच्छा भी पूरी है। क्या मैं कल से
काम करने आऊँ ?"
हाट ने कहा "हां कल सवेरे से तुम आना । मैं तुम्हें
एक रुपया रोज दूंगा।" इतना कह कह कर मिस्टर ट्रीट वहां से
चला गया।
जेम्स की मां ने कहा -"देसो बेटा, तुम इस काम को
नहीं जानते । इसे तुमको सीखना होगा । एक वाव याद रखना
-

-
नवां परिच्छेद ।
कि जिस किसी काम को तुम करो उसे पूरी तौर से सीस कर
करो । अधूरा काम अच्छा नहीं होता।"
जेम्स ने इन बातो को मान लिया और मां ने जैसा कहा
वैसा ही किया।
दूसरे दिन सबेरे वह मिस्टर ट्रीट के मकान पर गया और
जाते ही उससे कहा - "मिस्टर ट्रीट, मुझे क्या करना होगा।
कृपा करके बता दीजिए और एक बार दिसा दीजिए ताकि मैं
उसे अच्छी तरह सीस लूँ और तन करूँ।"
मिस्टर ट्रीट ने कहा
-"मैं जिस काम को कर रहा हूँ उसे
तुम गौर से देखो और समझने की कोशिश करो । जहां समझ
में न आवे वहां हमसे पूछ लेना । मैं तुमको सब बातें बताता
रहूँगा।"
जेम्स ने वैसा ही किया और ट्रीट भी उसे दिन भर काम
दिसाता, बताता और सिसाता रहा । अन्त में उसने दिन भर में
काम को अच्छी तरह सीख लिया, और दूसरे दिन काम करना
शुरू किया ।
चालीस दिन के बाद काम समाप्त हो गया । तर मिस्टर
ट्रीट ने प्रसन्न होकर कहा
चालीस रुपये कमाये हैं उनको लो और घर जाओ, और फिर
जब कभी काम लगेगा मैं तुम्हें बुला लूंगा।"
मिस्टर ट्रीट को सलाम कर जेम्स उद्धलवा-कूदता अपनी
-
"जेम्स, तुमने चालीस दिन में

।
1
गारफ़ील्ड ।
मां के पास गया और सव रुपये उनकी गोद में रस दिये । मां
भी बहुत खुश हुई।
जाडे के दिनों में जब स्कूल खुला तब उसने भी और लडकों
के साथ स्कूल जाना प्रारम्भ किया । छुट्टियो में उसने घर पर
गणित शास्त्र को अच्छी तरह पढा था । इस कारण उसमें
उसने घडी निपुणता प्राप्त कर ली । पाठशाला के लडको का
यह सयाल था कि जेम्स उन लोगो के शिक्षक से भी अधिक
जानता है।
एक दिन ऐसा हुआ कि मास्टर साहब ने क्लास में एक
सवाल दिया जिसको कोई लडका न कर सका। तर मास्टर
साहेव ने स्वय उसको किया परन्तु उनका भी जवाव किताब से
न मिला । तब उन्होंने कहा -"किताव में जवाव गलत है।
सैर, मैं इसे कल फिर करूँगा।"
दूसरे दिन मास्टर साहब ने फिर लडको से पूछा-तुमने
सवाल किया है ?" लडको ने उत्तर दिया-"सवाल तो
किया है परन्तु जवाब किताब से नहीं मिलता।"
तब मास्टर साहब ने बडी दृढता से कहा
"किताव का
जवाब अवश्यही गलत है।"
इतने मे जेम्स सडा हुआ और बोला -"मैंने उस सवाल
को किया है और मेरा जवाब किताब से भी ठीक मिलता है।"
मास्टर ने उसकी स्लेट को अच्छी तरह जांचा और देखा कि,
जवान ठीक है । तब उनको वडा क्रोध हुआ और वे कुछ
.
-

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।
और
६२
गारफील्ड।
एक दिन वह अपनी छोटी विल्ली को साथ लेकर बाग में
घूमने गया। वहां उसका मित्र डेभिड भी अकस्मात् आ पहुंचा।
डेभिड ने वहां जाते ही उस विल्ली पर ईट फेंकना प्रारम्भ
किया। यह देख कर उरके मारे विल्ली घर भाग गई । तब
जेम्स ने डेभिड से कहा -"पशुओं पर अत्याचार करना तुम्हारे
लिए उचित नहीं है। वे अनबोल जानवर हैं, थोडे ही मे डर
जाते हैं।
डेभिड ने कहा -"मैं नहीं जानता था कि यह बिल्ली तुम्हारी
है। नहीं ढेला न फेकता। मैंने उसको मारा तो नहीं ।"
जेम्स ने कहा--"मारा नहीं, परन्तु उर तो दिसाया,
दूसरे यह कि वह चाहे मेरी बिल्ली हो और चाहे किसी को हो
तुम्हे उन पर अत्याचार करना ही न चाहिए।"
डेभिड इस उत्तर पर बहुत लज्जित हुआ और जेम्स की
बातो पर मजाक करता हुआ घर चला गया।
चाहे मजाक करके डेभिड ने अपनी लज्जा प्रकट न होने दी
परन्तु उसने अपनी मूर्यता अवश्य ही प्रकाश की ।
जेम्स की विचारशक्ति और सहानुभूति की भी वानगी देख
लीजिए
जिस पाठशाला में जेम्स पढा करता था उसी में एक छोटा
लडका भी पढता था। उस बेचारे का पाप न था और कोई बड़ा
भाई भी उसकी मदद के लिए न था। पाठशाला के लडके प्राय
उस बेचारे को छेडा करते थे।
-
,

नवां परिच्छेद। जेम्स.या तो केवल १३ वर्ष का बालक, परन्तु उसके हाथ- पैर आदि अग बडे लम्बे चौडे और बलिष्ठ थे, देसने में वह एक बढ युवा मनुष्य मालूम होता था। एक दिन उसने लडको से कहा -"देखो, उस बेचारे अनाय को छेडना तुम लोगों को उचित नहीं है। उसका कोई वडा भाई भी नहीं है कि जो उसकी मदद करे । अतएव आज से तुम लोग उसे मत छेडना । यदि उसे छेडना हो तो मुझे छेड लेना।" इतना सुनते ही लडको ने हँसी दिवगी करना प्रारम्भ किया । उनमें से एक ने कहा-"तो क्या आज से तुम उसके 'याप और भाई का काम करोगे।" जेम्स ने उत्तर दिया-"कम से कम जब तक वह स्वय अपनी सहायता नहीं कर सकता तब तक मैं उसकी सहायता फरगा । घडी देर तक हँसी-दिल्लगी करने के बाद सब लडके मान गये । उस दिन से सबने उसको छेडना यन्द कर दिया । छुट्टियों में उसने अँगरेजी की कई किताबे पढी थी । उनमें से राविन्सन क्रूसो को वह बहुत पसन्द करता था । और कई बार उसने उसको पढा था। एक और पुस्तक जिसका नाम "एलोनजी मेलिसा था उसको भी उसने कई बार पढा था, परन्तु वह कहा करता था कि वह पुस्तक राविन्सन क्रूसो के तुल्य न थी। -

-"यदि
4
1
।
।
गारफील्ड।
मिस्टर ट्रीट को फिर एक खत्ता बनाने की जरूरत हुई।
इस कारण उसने एक दिन जेम्स से मिल कर कहा
काम किया चाहते हो तो कहो, मेरे पास काम है।"
जेम्स ने कहा -“जरूर करूँगा, कबसे करना होगा,
बताइए।"
"जवसे तुम्हारा जी चाहे।"
"अच्छा, कल से आऊँगा।"
मिस्टर ट्रीट ने इतना कह कर उनसे विदा ली और जावे
समय कह दिया कि तुम्हारा मेहनाता उतना ही होगा जितना
पहले था।
दूसरे दिन से जेम्स काम पर जाने लगा और एक महीने
में काम समाप्त होगया।
अवकी वार मिस्टर ट्रीट को कुछ बताना नहीं पडा । जेम्स
ने स्वय ही सव काम कर लिया।
काम के पूरा होने पर मिस्टर ट्रीट ने तीस रुपये निकाल कर
जेम्स को दिये और जेम्स उनको लेकर वैसा ही नाचता-कूदता
घर गया, और उसने सब रुपये मां को जा दिये।
इसी प्रकार जेम्स लिसता-पढता भी था और साथ ही
बढई का काम करके रुपया भी कमाता था।
एक और घटना का उल्लेख करके इस परिच्छेद की
समाप्ति की जायगी।
।
-
-

नवा
एक दिन एडभिन मेपस ने उससे कहा -"भाई, मैं अपने
पाप से भेंट करने कोमलैण्ड जाऊँगा और चाहता हूँ कि तुम
भी मेरे साथ चलो।"
जेम्स सम्मत हो गया और बोला--"मैं इस बात को मां
से पूँछ लूँ।"
उसकी माता ने कुछ रोक टोक न की और दूसरे दिन सबेरे
दोनो मित्रों ने अपने अपने घोडों पर सवार होकर लोभलैण्ड की
ओर यात्रा प्रारम्भ कर दी।
दोनो निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच गये और काम समाप्त करने के
वाद लौट भी आये । इन दोनो के घोडे बहुत तेज थे, इस कारण
जब वे बडी तेजी से चले आ रहे थे तब रास्ते में एक और
आदमी इनके पीछे पीछे प्रारहा था । वह किसी तरह इनके आगे
नहीं वढ सकता था, इसलिए इन लोगो को गालियां देता था कि
तुम लोग हट जाओ। भला ये लोग कब हटनेवाले थे। एडमिन
मेपस ने कहा -"यदि सामर्थ्य हो तो आगे बढ जाओ,
-
.
रास्ता
तो पड़ा है।
इस बात पर वह और मुँझला गया, परन्तु कर कुछ न
सका।
रास्ते में एक पडाव आया। वहां दोनों मित्र उतरे और
थोडी देर तक पाराम करते रहे। इतने में वह प्रादमी भी घोडा
दौडावा वहां आ पहुँचा । पाते ही उसने इन दोनो को गालियां
५

६६
गारफील्ड ।
देनी शुरू की और कहा - "बदमाश लडको, जी मे आता है
कि तुम लोगो को एक एक चाबुक मारूँ"
इतने में जेम्स आगे बढ आया और बोला--"यदि मारने
का इरादा करते हो तो पहले मुझे मार लो तव उसे मारना।"
जेम्स के बलिष्ठ हाथ-पैरों को देख कर वह डरा और उसने
कहा-"तुम्हे नहीं, तुम्हे नहीं, उसको मारूँगा।"
तब जेम्स ने घुडक कर कहा "तुम उसे क्यों मारोगे।
दोष तो तुम्हारा ही है । तुम्हारे लिए रास्ता बहुत था, तुम गये
क्यो नहीं । तुम्हारा घोडा तेज नहीं दौड सकता था। अतएव
गलती तुम्हारे घोडे की है, न कि उसकी । तुम उसे व्यर्ध
गालियां दे रहे हो । सबरदार, अव गाली मत वको। यदि अपनी
भलाई चाहते हो तो घर लौट जाओ।"
इतना सुनते ही वह डर गया और तुरन्त घोडे पर सवार
हो निकल भागा।
इसके बाद दोनो मित्र हँसते हुए घर लौट आये।
।
-
-
"

1
दसवॉ परिच्छेद ।
-
क किसान, जिसका नाम मिस्टर स्मिथ था और
जो पोदीना की सेती किया करता था, एक दिन
जेम्स को विधवा माता से मिला और बोला
"पोदीना धोने का समय आगया है। इस कारण
मैंने वीस लडकों को उस काम के लिए नियत
किया है। मैं चाहता हूँ कि जेम्स को भी उसी काम में लगाऊँ,
क्योंकि मैंने देसा है कि जेम्स लडको से बहुत अच्छी तरह
काम ले सकता है। उसकी सहायता मिलने से हमारा काम
बहुत अच्छी तरह हो जायगा। यदि आप प्राज्ञा दीजिए तो मैं
उससे इस विषय में बातचीत करूँ।"
जेम्स की माता ने कहा
-"आज कल वह अपनी सेती
के काम मे ऐसा फंसा हुआ है कि उसको विलकुल फुर्सत
मिस्टर स्मिथ ने बहुत कुछ विनती की और कहा
"श्राप
कृपा करके किसी तरह उसको मेरे काम में नियुक्त करा दीजिए,
नहीं तो यह काम रुक जायगा ।"
इसके बाद दोनों में बहुत तर्क वितर्क हुआ परन्तु अन्त में
-

गारफील्ड।
वह राजी हो गई और जेम्स को वहां काम करने को प्रामा
दे दी।
दूसरे दिन जेम्स काम पर गया और जाते ही उसने लडकों
से दोस्ती कर ली और अपनी स्वाभाविक मुस्तैदी से काम प्रारम्भ
किया, और थोढे ही दिनो में काम पूरा कर दिया।
जब जेम्स की उम्र १५ वर्ष की थी तब वह मिस्टर ट्रीट के
साथ एक गोदाम बनाने के काम में लगा हुआ था । गोदाम का
मालिक इस लडके का रंग-ढग, चाल-ढाल देस कर बहुत
मोहित होगया था और चाहता था कि उसको अपने काम में
लगा ले।
जब उन लोगों का गोदाम बनाना पूरा होगया तब गादाम
के मालिक मिस्टर वार्टन ने एक दिन जेम्स से कहा
"यदि
तुम हमारे कारखाने में काम करना स्वीकार करो तो मैं तुम्हें,
२८) रुपये मासिक दूंगा, और लोगो को यद्यपि २४) ही रुपये
देता हूँ, परन्तु तुम्हें चार रुपये अधिक दूंगा।"
जेम्स ने कहा -"मैं अपनी माता से बिना पूछे इस बात
का कुछ भी उत्तर नहीं दे सकता।"
मिस्टर वार्टन ने कहा
-"अच्छा तुम अपनी माता से पूछ
फर बहुत जल्द इस बात का उत्तर देना क्योंकि मैं बहुत चिन्तित
रहूंगा।"
जेम्स ने कहा-“यदि मैं काम करूं तो आगामि सोमवार
-
1

दसवां परिच्छेद ।
को अवश्यही आपके पास उपस्थित हूँगा और यदि न करूं तो
न आऊँगा।" यह कह कर जेम्स वहां से घर चला गया।
मिस्टर वार्टन एक सौदागर थे जो सज्जी मिट्टी का कारो-
चार किया करते थे। रास खरीद कर उससे सज्जी निकालना
उनका व्यवसाय था।
जेम्स ने जब अपनी माता से उस नये काम के विषय में
कहा तब उन्होंने उत्तर दिया कि वह काम तुम्हारे लिए अच्छा न
होगा, क्योंकि उस काम में अनपढे नीच लोगही रहा करते हैं।
यदि तुम उनकी सगत में पडोगे तो तुम्हारा चरित्र भी दूषित
हो जायगा।
।
--
यह वात जेम्स के जी में खटक गई और उसने कहा
"मैं वहां काम करने जाऊँगा या अपना चरित्र बिगाडने । जिस
समय काम न रहेगा उसी समय चरित्र विगाडना सम्भव हो
सकता है, और वहां जाकर मैं इस बात को भी जानना चाहता
हूँ कि मेरा चरित्र उस सगत में भी रह कर वैसा ही निर्मल और
पवित्र रखेगा जैसा कि अब है।"
मावा ने उत्तर दिया-"बेटा, मनुष्य की विचारशक्ति
हर घडी ठीक नहीं रहती, किस समय विचलित होती है कोई
नहीं कह सकता। इसलिए घुरों से दूर रहना ही अच्छा है।"
जेम्स ने कहा- "माता, मेरे वहां जाने के दो कारण हैं।
पदला --मासिक २८ रुपये का प्रलोभन, और दूसरा यह कि मैं
संसार को यह दिखा सकूँ कि यदि मैं अपने कर्ता पर अटल

।
-
-
4
गारफील्ड ।
बना रहूँ तो बुरी सगत भी मेरे ऊपर कोई असर नहीं बान
सकती"
अन्त मे माता ने पुत्र की वात मान ली और उसे वहां जाने
की आज्ञा दे दी।
सोमवार के दिन प्रात काल जेम्स ने अपना सामान इकट्ठा
करके घोडे पर सवार होकर लोभलैण्ड की ओर यात्रा की और
दस मील रास्ता तै करके वह दो तीन घटे में वहां पहुंच गया।
वहाँ मिस्टर वार्टन जेम्स की राह देख रहे थे। अतएव
उसको ठीक समय पर पाकर वे बहुत खुश हुए । उसके
रहने के लिए उन्होंने कमरा बता दिया और उसका सामान उसी
कमरे में रखवा दिया और तब उसे साथ लेकर कारखाने में गये।
कारखाना बहुत ही मैला कुचैला था। चारो ओर राख,
धुआँ और कारिख से भरा हुआ था, परन्तु जेम्स को उस मैने
धुआंदार कारखाने मे बैठ कर काम करने की जरूरत न हुई।
मिस्टर वार्टन ने उसको हिसाब-किताब रखने के काम में नियुक्त
किया। बेचने-सरीदने का काम भी वही किया करता था।
इस काम को उसने बहुत ईमानदारी और होशियारी से
निवाहा । थोड़े ही दिन में मिस्टर वार्टन को विश्वास हो गया
कि यह बहुत ईमानदार लडका है। इस कारण कारखाने का
सब काम इसी के अधीन कर दिया।
एक दिन एक आदमी कई वोरो मे भर कर राख लाया
।

।
जेम्स ने कहा
दसवां परिच्छेद।
और बोला -"इनमें २५ मन रास है । इनको आप ले लीजिए
और मुझे दाम दीजिए"।
-"इनको उतारो । मैं पहले उन्हें तोल कर
देस लू तर दाम दूंगा।"
जेम्स के इस काम पर पाने के पहले रास वाले जितना
कहा करते मिस्टर वार्टन उतना ही विश्वास करके दाम दे दिया
करते थे। अब जेम्स के पास एक नई बात सुन कर सपके सप
वकित हुए, पर कुछ बोल न सके । बोरे तोले गये और २५ गन
की जगह २२ ही मन निकले । जेम्स इनको २२ मन रास का
दाम देही रहा था कि इतने में मिस्टर वार्डन वहां आ पहुँचे । पे
सर हाल सुन कर बहुत प्रसन्न हुए और जेम्स फी पडी प्रशंसा
करने लगे।
जेम्स जिस कमरे में रहा करता था उसी कमरे की एप
आलमारी में कई पुस्तकें थीं । जव वह कारखाने का काग गगार
करके घर पाता तब उन्हीं पुस्तको को पढा करता और गगिरा
के सवाल लगाया करता था।
मिस्टर चार्टन तो पढे लिसे न थे पर इनकी एक युवती
लडकी थी । यह अच्छी पढी लिसी थी। ये पुस्तके प्रण की
खरीदी हुई थीं। वह लडकी भी प्राय इनके पास मा बेटती
और कहती "तुमने फलानी किताव पढी है । वह किगाम भी
है उसको पढो।" ऐसी ऐसी बातें वह प्राय' कहा की घो।

गारफील्ड ।
प्रति दिन जेम्स १२ बजे रात तक पढा करता था और जब
घर के सब लोग सो जाते तब वह सोता था।
एक दिन ऐसे ही पढते पढते रात के बारह बज गये और
प्राय एक बजने के लगभग था कि वह अपनी चारपाई पर,
गया, परन्तु उसे नींद न आई । कई एक चिन्ताये उसके मन को
विकल कर रही थीं। वह अपने मनही मन सोचता था कि
कितने दिन तक मैं इसी सज्जी बेचने के काम में लगा रहूँगा।
दुनिया में कितनी नई चीजें हैं, कितने नये काम रोज हुआ करते
हैं, मैं उनको कुछ भी नहीं देखता। उनके विषय में कुछ भी नहीं
जानता । मैं केवल एक अँधेरी कोठरी में बन्द हूँ। मुझे यहां से
बाहर जाना ही होगा और जैसे बने दुनिया को देखू गा। यह
सोचते सोचते उसने अपने मन मे कहा कि मैं जहाज का मलाई
बनूंगा। इस सयाल ने उसके चित्त को ऐसा अधीर किया
कि उसे नींद नहीं आई । वह रात भर योही करवटे बदलता
रहा । उसने अपने मन मे सकल्प कर लिया कि जितनी जल्दी
हो सकेगा मैं यहां से निकलूंगा और माह धनूंगा।
इसके बाद बहुत दिन तक उसे वहां रहना न पडा । एक
घटना ने उसके चित्त को ऐसा दु सित किया कि उसे वहां से
चला जाना पडा । यह घटना यह है-"मिस्टर वार्टन की
लडकी का विवाह नहीं हुआ था। विवाह का पदोवस्त होरहा
था। एक लडका इस लड़की से मिलने के लिए आया करता
था। इसी के साघ विवाह का धन्दोवस्त होरहा था। एक दिन

दसवां परिच्छेद।
७३
वह लडका रात को पाया और एक चडे कमरे में बैठ कर उस
लडकी से बातें कर रहा था। उसके माता-पिता भी उसी कमरे
में एक कोने में बैठे बातें कर रहे थे, और जेम्स भी उसी कमरे
में बैठ कर गणित का हिसाब लगा रहा था। जब रात बहुत
वीव गई वन माता-पिता, वहां से उठ कर चले गये पर जेम्स
बैठा हुआ अपना हिसाव ही लगाता रहा। उस नव-दम्पति को
जेम्स का वहां रहना बहुत बुरा मालूम होता था। इस कारण
लडकी ने घृणापूर्वक कहा -" वेतन-भोगी नौकरी के लिए
इतनी राव तक बैठे बैठे पढना अच्छा नहीं है । अब तुम जाओ,
सोओ।" जेम्स को यह कटाक्ष घहुत ही असह्य मालूम हुआ ।
वह चुपचाप उठ कर वहां से चला गया और अपने बिछौने पर
लेट गया । नींद नहीं आई-आई केवल वही एक चिन्वा वेतन
मोगी नौकर । जेम्स ने दृढ संकल्प किया कि आज से अब मैं
वेतनभोगी नौकर न रहूँगा। ऐसी दुश्चिन्ता में किसी तरह राव
कटी । सुबह होते ही उसने मिस्टर वार्टन से कहा-"आप
मेरी तनख्वाह चुका दीजिए। मैं अब यहां न रहूँगा, मैं घर
जाऊँगा।" मिस्टर वार्टन ने कितना ही समझाया पर उसने एक
न सुनी । वह रुपया लेकर घर चला ही गया ।
.

ग्यारहवाँ परिच्छेद
.
।
म्स ने घर लौट कर अपनी माता से कहा-"अब
में नौकरी न करूँगा । बहुत हो चुका। अब मैं
और कुछ करने की कोशिश करूँगा जिससे
ससार में हमारी भी कुछ प्रतिष्ठा हो ।"
माता ने आश्चर्य में होकर पूछा
-"क्यों । क्या हुआ?
इतने नाराज क्यो मालूम होते हो ? क्या रुपया नहीं दिया १".
जेम्स ने ११२ रुपये निकाल कर मां के सामने रस दिये और
कहा ---"रुपया तो हमको पूरा मिल गया और मिस्टर वार्टन
वडे नेक आदमी हैं। उन्होने हमारे साथ बहुत अच्छा बर्ताव
किया, परन्तु उनकी लडकी के व्यवहार से हमारा चित्त बहुत
दुसी हुआ है।"
यह कह कर जेम्स ने उस रात का सारा हाल कह सुनाया।
जेम्स की माता ने कहा
-"बेटा, तुमने इस काम मे बहुत जल्दी
की।"
जेम्स ने कहा-"जल्दी या देरी मैं कुछ नहीं जानता, परन्तु
मैंने नौकरी छोड दी।"
"तुम्हें मिस्टर ? पार्टन की कृपाओं पर अधिक ध्यान रसना-

ग्यारहवां परिच्छेद ।
चाहिए था, उस लडकी की बातों का नहीं । वेतनभोगी नौकर
झाने में कोई बेइज्जती नहीं है।"
जेम्स ने कहा- मैं जानता हूँ कि वेतन लेकर नौकरी करने
में कोई बेइज्जती नहीं है, परन्तु जिस रीति से उस लडकी ने
कहा था वह बहुत अपमानसूचक है। सैर जो हो, मैने भी ठान
'लिया है कि मैं भी ससार में कोई बड़ा काम अवश्य ही करूँगा।"
माता के साथ इतनी बात-चीत करके जेम्स को अपनी
सेती का ध्यान आया और वह तुरन्त उठ कर सेत देखने के
लिए चला गया । वहाँ पहुँच कर उसने सेत का काम-काज
अच्छी तरह देसा भाला और फिर घर लौट आया । दूसर
-दिन सवेरे उठ कर प्रात क्रिया समाप्त करने के बाद जेम्स अपने
सेत पर गया और उस दिन से अपनी सेती के काम में जी-जान
से लग गया।
-
बाद
कुछ दिन तक अपने खेत पर काम करने के उसने
सुना कि उसके एक चाचा जो कि न्यूवर्ग में रहा करते हैं वे
एक जगल कटवा रहे हैं और इस कारण उन्हे लकडी चीरने
वालों की जरूरत है। जेम्स ने सर पाते ही तुरन्त अपनी मां
से इस विषय को कह सुनाया और कहा कि मैं वहाँ जाऊँगा।
माता ने इस बात को सुन कर कहा
हो, क्योंकि तुम्हारी यहिन भी वहीं व्याही है। वहां रहने में तुम्हे
किसी प्रकार का कष्ट न होगा।"
-"तुम वहां जामकते

गारफील्ड ।
दूसरे दिन जेम्स ने न्यूवर्ग की राह ली और वहां पहुँच कर
उसने अपने चचा से भेंट की और अपना मवलव कह सुनाया।
चचा ने इस बात को सुन कर कहा-"मैं तुम्हारे पाने
से बहुत प्रसन्न हुआ। तुम देखने में पूरे एक जवान आदमी
मालूम पडते हो और हमें आशा होती है कि तुम इस काम को
अच्छी तरह कर सकोगे, परन्तु यह बहुत कठिन काम है। कदा
चित् तुम इस काम को करते करते ऊब उठोगे, और फिर सामने
ही गर्मी का मासिम आने वाला है । उस समय तुम काम न कर
सकोगे।" जेम्स ने कहा -"मैं इस काम को बहुत आसानी से
कर सकूँगा पर इतना कहना अपना ठीक है कि गर्मी में मैं
न कर सकूँगा, परन्तु दो महीने तो अवश्य ही कर सकूँगा।
श्राप कितना काम कराना चाहते हैं ? "
मैं सब मिला कर सौ कुन्दे चिरवाया चाहता हूँ। हर एक
कुन्दे आठ फुट लम्बे, चार फुट चौडे और चार ही फुट
होगे।"
जेम्स ने पूछा- "इस काम के लिए आप कितनी मजदूरी
मोटे
देंगे"
.
चचा ने कहा-"एक रुपया फी कुन्दा चिरवाई दूंगा।"
"तो मैं पचास दिन में इस काम को समाप्त कर दूंगा।"
जेम्स की बात सुन कर चचा को बड़ा आश्चर्य हुआ और
उन्होंने कहा-"दो कुन्दे रोज चीरना कुछ सहल काम नहीं है।

-
ग्यारहवां परिच्छेद।
जो लोग हमेशा लकडी चीरने का काम किया करते हैं वे भी
मुश्किल से दो कुन्दे रोज चीर सकते हैं।"
जेम्स ने कहा- "मुझे विश्वास है कि मैं इतना काम रोज
आसानी से कर लूंगा।"
इतना कह के जेम्स वहां से चला गया और अपनी बहिन
के पास गया और सब हाल कह सुनाया।
छोटे भाई को बहुत दिन के बाद देखने से बहिन बहुत खुश
हुई और उसने उसका बडा आदर-सत्कार किया।
दूसरे दिन सवेरे से जेम्स ने काम करना शुरू कर दिया ।
जिस मैदान में लकडियां चोरी जा रही थीं उसी के सामने
कुछ दूरी पर एक प्रशान्त सागर था। उसकी बडी बडी लहरे
श्रा पा कर किनारे पर टकराती थीं, और छोटे बडे सैकड़ों
हजारो जहाज वहते हुए देख पडते थे । उन जहाजों को देस कर
जेम्स का जी प्रानन्द के मारे नृत्य किया करता था और वह सोचा
करवा था कि वह दिन कब आवेगा जन में भी इसी तरह जहाज
पर सवार होकर विदेशों में भ्रमण करूँगा । वह घटों इसी सोच
सडा रहता और उन जहाजों की ओर देसा करता।
हने भर के वाद देखा कि उसके एक साथी ने भी उतने
हो कुन्दे धीरे है जितने कि उसने चीरे है । और उसकी
कुल्हाडी भी उतनी तेज नहीं चलती थी जितनी कि जेम्स की ।
प्रतएव उसने अपनी बहिन से इसका कारण पूछा।

७८
गारफोल्ड ।
बहिन ने कई एक कारण बताये पर उसको एक भी पसन्द
हुआ ! अन्त में उसने स्वय ही इसका कारण स्थिर करके बताये
कि मेरा साथी सुबह से शाम तक वरावर अपना काम ही कर
रहता है, समुद्र अथवा जहाज प्रादि उसके चित्त को आकर्षि
नहीं करते । यही कारण है कि वह इतने कुन्दे चोर सका
उस दिन से जेम्स होशियार हो गया और पचास दिन में का
पूरा कर दिया और सौ रुपये लेकर बहन को अपने साने-पी
का खर्चा देकर मकान लौट गया और बाकी रुपये मां
जा सौंपे।
है।
4
-
-
.
-
।

वारहवाँ परिच्छेद।
SNEHEALकडी चोरने का काम पूरा करके जन जेम्स घर लौटा
ल
वनसे उसका चित्त बहुत दुसी रहा' करता था।
किसी काम में उसका जी न लगता। अपनी माता
से भी अधिक वात-चीत न किया करता था। चित्त का परि-
वर्तन देख कर माता सोचा करती थी कि कदाचित् उसका
पुन समुद्र-यात्रा के लिए व्याकुल है और इसी कारण वह किसी
से बात-चीत नहीं करता, परन्तु इस विषय को पुनरुत्थापन करने
का माहस माता में न था इस कारण वे भी चुप साधे थीं।
कुछ दिन ऐसी अवस्था में बीतने के बाद जेम्स ने एक दिन
कहा -"माता, तुम नहीं जानती हो कि समुद्र-याना के लिए
हमारा चित्त कितना व्याकुल है, और जब मैं तुमसे इस विषय
को कहता हूँ तभी तुम इन्कार कर देती हो और नाराज हो जाती
हो। इससे हमारा मन बहुव दुसी होता है। आज तुम हमसे
फहो कि तुम हमें समुद्र-याना के लिए जाने दोगी या नहीं ।"
माता ने पूछा-"कहां जाओगे?"
“कहाँ जाऊँगा इसका पता नहीं है, परन्तु जहाज में नौकरी
फरके देश-भ्रमण करने के लिए अटलाटिक महासागर के पार
'जाऊँगा।"

-
.
जेम्स ने कहा
मां ने कहा
८०
गारफील्ड।
माता ने कहा -“यही तो पागलपन है । कहाँ जाओगे।
उसका पता नहीं और कहते हो जायेंगे।" ऐसी दशा में भला
तुम्हारा जाना कैसे सम्भव हो सकता है। मेरी बात याद रखो
कि समुद्र की नौकरी तुम्हे कभी अच्छी न लगेगी और तब तुम'
सोचोगे कि मां का कहना मानते तो अच्छा होता।"
-"यदि समुद्र की नौकरी हमें अच्छी न
लगेगी तो मैं नौकरी छोड कर घर लौट आऊँगा।"
समुद्र की नौकरी क्या ऐसी वैसी थोडी ही
होती है कि जव जी चाहा घर लौट आये । समुद्र की नौकरी
मे आज तुम यहां हो, दस दिन बाद हजार मील दूर पर जा
पढोगे । और, मान लो कि यदि तुम जहाज में सवार होकर
चीन देश में पहुँच गये और वहां जाकर तुम्हारा जी घबराया
और तुमने घर आना चाहा तो क्या तुम किसी तरह तुरन्त
घर पा सकते हो ? तुमको घर लौटने में महीनो लग जायेंगे
और सैकडो रुपये खर्च हो जायेंगे । यदि तुम समुद्र की नौकरी
करना ही चाहते हो तो यहां पास ही आएरी नामक एक झील
है। वहां जाकर किसी जहाज़ में नौकरी कर लो ताकि जब जी
चाहे घर लौट पा सको।"
कुछ काल तक सोचने के बाद जेम्स ने कहा
-"अच्छा,
मैं वहीं जाऊँगा। तुम हमें वहां जाने की आज्ञा देती हो न?".
माता ने कहा-"हां, वहां जा सकते हो।"
-

वारहवां परिच्छेद।
८१
माता की अनुमति पाकर जेम्स बहुत खुश हुआ और
अपना सामान बांध कर ठीक ठाक करने लगा।
दूसरे दिन सूर्योदय के पहले उसने आएरी झील की ओर
यात्रा कर दी और वारह बजते बजते वह वहाँ पहुँच गया।
आएरी झील उसके मकान से १७ मील दूर थी।
' वहाँ पहुँच कर उसने देखा कि एक जहाज उसी किनारे
पर लगर डाले हुए खडा है।
उसने एक आदमी से पूछा- क्यों भाई, जहाज के कप्तान
साहव कहाँ हैं ? मैं उनसे कुछ वात किया चाहता हूँ।"
उस आदमी ने उत्तर दिया--"कप्तान साहब जहाज की
दूमरी ओर गये हैं। अभी आवेंगे। आप ठहरिए।"
यह सुन कर जेम्स ने उसे धन्यवाद दिया और वहीं सडा
रहा।
थोडी देर बाद एक आदमी जहाज की दूसरी ओर से
गरजवा हुआ, गालियां बकता हुआ आता मालूम हुआ। उस
जहाज के आदमी ने जेम्स से कहा "वे कप्तान साहब प्रा
-
-
और जव
कप्तान साहब से मिलने के लिए जेम्स आगे बढा,
कप्तान साहब सामने आये तब उसने उन्हें सलाम किया ।
कमान साहब ने अपने स्वभावानुमार भी चढा कर गालियां
यकते वकते पूछा-"तू कौन है ये, क्या चाहता है ?"

८२
t
।
।
गारफील्ड।
जेम्स ने बडी नम्रता से पूछा-"क्या आपको अपने
जहाज के लिए कुछ और श्रादमियों की जरूरत है ? '
कप्तान ने कहा.-"अबे है तो सही, पर तेरा क्या। यहां
से भाग, नहीं तो ऐसी लात मारूँगा कि याद करेगा।"
जेम्स इन बातों को सुन कर भौचक सा रह गया और
चुपके से वहां से ससक गया । उसको इतना दु स हुआ कि
वह वहां ठहर भी न सका, तुरन्त वहां से हट गया और एक
पेड तले जा बैठा और अपनी मुसीवत की बात सोचने लगा।
बडी देर तक सोचता रहा कि अब क्या करना चाहिए। इतने
में पीछे से किसी ने पुकारा-"जिमी जिमी "
यह सुन कर जेम्स चौक उठा और पीछे फिर कर जो देखा
तो क्या देखता है कि उसका चचेरा भाई एमोस फ्लेचर एक
डोंगी पर सवार चला आ रहा है। उसने आते ही पूछा-
तुम यहां कैसे पाये ?"
-"तुम कैसे पाये ?"
-"मैं पीटस्वर्ग से कच्चा तांबा
लाने जाता हूँ। पर तुम कहां आये थे "
जेम्स ने अपना सारा किस्सा कह सुनाया।
तत्र फ्लेचर ने कहा -"जहाज के कप्तान प्राय ऐसी ही
प्रकृति के लोग हुआ करते हैं। खैर जो हुआ सो हुआ । क्या
अब तुम नौकरी किया चाहते हो"
-"जेम्स
जेम्स ने कहा
एमोस फ्लेचर ने कहा
-

--
घारहवां परिच्छेद।
जेम्स ने कहा--"हां नौकरी करने ही के लिए यहां पाया
हूँ। क्या तुम हमें नौकर रक्सोगे ? कितनी तनख्वाह दोगे ?"
फ्लेचर ने कहा-"२४) रुपया मासिक दूंगा, यदि मजूर
दो वो चले आओ।"
जेम्स राजी होगया और तुरन्त डोगी पर जा पहुंचा।
ये डोगियां सच्चरो के द्वारा सींची जाती थीं । डोगियो में
बडी बडी रस्मियां बांध कर दो दो सच्चर जोते जाते थे और
वे झील के किनारे किनारे डोंगी को सींचते हुए चलते थे । इन
- सच्चरी को ठीक तौर से चलने के लिए हांकने वालो की जरूरत
होती थी । जेम्स इसी काम में नियुक्त किया गया ।
कुछ दूर तक जाने के बाद जेम्स ने चाहा कि खच्चरो को
तेज चलावे । उसने वैसा ही किया । सच्चर बहुत तेज भागने
लगे । अन्त में ऐसे एक स्थान में प्रा पहुंचे जहां सामने ही एक
पुल था । जेम्स ने चाहा कि उस पुल से बचा कर डोगी और
सच्चरो को ले जाय परन्तु ऐसा न हो सका । रस्सियां पुल से
टकरा ही गई और उस धक्के से दोनों सच्चर और उनके
सवार पानी में गिर गये । तुरन्त डोंगी पर से कई आदमी उतर
आये और उन तीनो जीवों को पानी से निकालने में लग गये।
अन्त में जेम्स और दोनों सच्चर पानी से बाहर निकल आये ।
वय जहाज के लोगों ने बडी इंसी उडाई और सभी ने मिल
कर जेम्स को बेवकूफ बनाने की कोशिश की । जेम्स बेचारा
अकेला क्या बोलता । वह भी बेवकूफ बन गया।
प

८४
गारफील्ड ।
एक दिन फ्लेचर ने जेम्स से कहा:-"भाई जेम्स, हमने
सुना है कि तुमने अच्छी विद्या हासिल की है, तो तुम किसी
पाठशाला में शिक्षक का काम क्यो नहीं करते ?" यह कह कर
फ्लेचर ने जेम्स से कहा- मैं तुमसे भूगोल, इतिहास, गणित
व्याकरण आदि मे कुछ प्रश्न पूछा चाहता हूँ ! तुम उनका उत्तर
दो"
जेम्स ने कहा -"पूछिए, परन्तु बहुत कठिन प्रश्न न
पूछिएगा।"
मिस्टर फ्लेचर ने तीन साल तक शिक्षक का काम किया
था और इस कारण उन्हें अपनी विद्या का बडा अहकार था।
उन्होने कई प्रश्न जेम्स से पूछे ।
जेम्स ने भी उनका उत्तर खूब विस्तारपूर्वक दिया।
मिस्टर फ्लेचर बहुत खुश हुए।
तब जेम्स ने कहा - "अव मैं आपसे कुछ प्रश्न पूढू और
आप उनका उत्तर दीजिए।"
जेम्स ने कई प्रश्न पूछे पर वे एक का भी उत्तर न दे सके ।
तब वे बहुत लजित हुए । वास्तव मे फ्लेचर से जेम्स घहुत
अधिक जानता था।
फ्लेचर ने इनकी वडी प्रशसा की और कहा -"तुम्हारे
लिए समुद्र की नौकरी करना और अपनी विद्या को समुद्र
जल में फेंक देना उचित नहीं है । तुम ससार में रह कर लोगों
के

बारहवां परिच्छेद।
को बहुव लाभ पहुँचा सकते हो। घर लौट जाओ और किसी
पाठशाला में शिक्षक का काम करो।"
जेम्स ने कहा-"हमारी माता भी ऐसे ही कहा करती हैं
और हमें समुद्र में नहीं जाने देतीं, परन्तु हमे दुनिया
देखने की बडी इच्छा है।"
फ्लेचर ने फिर कहा-"ऐसे विद्वान् पुरुप के लिए मनाह
का काम करना कदापि उचित नहीं है। तुम्हारी माता ठीक
कहती हैं। तुम जरूर उनकी बात मानो।"
इन बातो को सुन कर जेम्स बहुत खुश हुआ और सोचने
लगा कि कदाचित् हम में कुछ विद्या अवश्य ही है, नहीं
तो फ्लेचर ऐसी बात न कहता ।

--
11
.
इतना कहनाथा कि कप्तान फ्लेचर का माझी लडने को खडा
हो गये। उधर दूसरी डॉगी वाला माझी भी अपने साथियो को
तेरहवाँ परिच्छेद ।
नडी घडी नहरो में, जहां किश्ती और डोंगी चला
व करती हैं वहां, प्राय जगह जगह पुल बने रहते
हैं और उन पुलों में डोंगियो के आने जाने में
लिए फाटक बने रहते हैं।
उन फाटको से एक समय में केवल एक ही डोंगी जा
सकती है ज्यादा नहीं। मिस्टर फ्लेचर की डोगी रात दस बज
के लग भग ऐसे ही एक पुल के पास पहुँची । कप्तान फ्लेचर ने
तुरन्त माझी को फाटक खोलने की आज्ञा दी । माझी भी तुरन्त
फाटक पर पहुँच कर फाटक सोलने ही को था कि अन्धेरे में
“फाटक मत छुओ, हम लोग यहां
पहले आये हैं अतएव ही लोग पहले भीतर जायेंगे।"
हो गया और उसकी देखा-देखी उसके सब साधी भी तैयार खडे
।
.
किसी ने चिल्ला कर कहा
-
इकट्ठा कर सडा हो गया और दोनो मे गाली-गलौज होने लगी।
ऐसी लडाइयां प्राय हुआ करती थीं और कप्तान भी कभी
कुछ न कहा करते थे। अतएव कप्तान फ्लेचर चुप-चाप
तमाशा देख रहे थे । इतने में जेम्स वहाँ आ पहुँचा और उसने
सडे

८७ तेरहवां परिच्छेद। कप्तान साहब के कन्धे पर हाथ धर कर कहा-"कप्तान फ्लेचर, यह क्या मामला है। क्या तुम ही इस फाटक के अधिकारी हो जो उन चारों को जाने नहीं देते और मुफ उनसे लडते हो ?" काप्तान फ्लेचर ने उत्तर दिया-"यदि न्याय-पूर्वक देसाजाय तो यह फाटक हमारा नहीं है लेकिन हम लोगों में ऐसा रिवाज है कि जो यहाँ पहले पहुँच जाय वही पहले भीतर जा सकता है। इसके सिवा जब कभी दो डॉगीवाले एक साथ यहां पहुँचते हैं तब उन दोनो में लडाई होती है क्योंकि दोनों यही कहते हैं कि मैं पहले आया हूँ । इस कारण मुझे पहले जाना चाहिए।" जेम्स ने कहा -"यदि यह फाटक तुम्हारा नहीं है तो व्यर्थ लडना उचित नहीं है। उन लोगो को पहले जाने दो और तुम - यहां रुके रहो।" कप्तान फ्लेचर ने जेम्स की बात समझ ली और उसी की बात पर अपनी सम्मति दी, और जोर से चिल्ला कर माझी को आज्ञा दे दी-"फाटक छोड़ दो। उन लोगो को जाने दो। लडो मत" डॉगी के सब लोग कप्तान के ऐसे आदेश पर बहुत प्राच- र्थित हुए, परन्तु सिवा फाटक छोड देने के कुछ करही न सकते थे, क्योंकि कप्तान की प्राज्ञा थी। इस कारण उन्होंने फाटक' छोड दिया और दूसरे डॉगीवालों ने जाने की' तैयारी की।

1
1
में रस्सी इधर आई थी उससे तुम्हारे बचने की कोई सम्भावना
गारफ़ील्ड ।
कप्तान फ्लेचर की डोगी एक किनारे खडी थी 1 डोगी के
लोग अपना अपना काम बन्द करके हँसी-दिल्लगी में लगे हुए,
थे । डोंगियो के नौकर बिलकुल जगली होते थे इस कारण
दिवगी भी वेतुकी किया करते थे। उधर दूसरे डोंगी वाले फाटक
के भीतर डोंगी ले जाने की तदवीर कर रहे थे कि इतने में
अकस्मात् उस डोगी से छिटक कर एक रस्सी मारफ़ी के सिर
में लगी और उसकी टोपी पानी में गिर गई। कप्तान फ्लेचर के
एक मांझी का नाम मारफी था। वह बडा लडाका और क्रोधी
स्वभाव का आदमी था। जब टोपी पानी में गिरी तब जेम्स ने
अफ़सोस करके कहा
-"मिस्टर मारफी, क्या करोगे, भगवान्
को धन्यवाद दो कि तुम्हारी जान बच गई। केवल तुम्हारी
टोपी हो पानी मे गिर गई । तुम वच गये । नहीं तो जिस झोके
,
न थी।"
भेट
इन बातों को सुन कर मिस्टर मारफी ने सोचा कि जेम्स
उनसे दिल्लगी करता है। इस कारण मारे गुस्से के वहं प्रार
बबूला हो गया, और वहां से ऐसी तेजी से गरजता हुआ
कि मानो एक ही धक्के मे जेम्स को उसी टोपी के पास
देगा, परन्तु ज्योंही वहां पहुँच कर उसने जेम्स पर हाथ उठाय
उसी दम जेम्स ने उसको पकड कर ऐसे जोर से पछाडा Eि
यह सभी के सामने चारों कोने चित्त गिर गया और जेम्स उसक
छाती पर चढ़ बैठा और उस पर सवार हो गया।

परन्तु शराब पिया करता था। इस कारण उसका स्वास्थ्य
८६
।
।
तेरहवां परिच्छेद ।
फ्लेचर ने चिन्ता कर जेम्स से कहा "अब इस बदमाश से
गाली देने का बदला क्यो नहीं लेते ?"
जेम्स ने उत्तर दिया--"अब मारफी तो मेरे काबू मे है । मैं
इसे जिधर चाहूँ उधर ही घुमा सकता हूँ! यह मेरा कुछ भी
नहीं कर सकता। इस कारण मैं इसे मारूंगा नहीं क्योकि
हमारी राय में किसी को मारना उचित नहीं है । दूसरो से अपने
को बचाना चाहिए, परन्तु बचाने के माने यह नहीं हैं कि उसी
को पकड कर पीटा। मैंने अपने को बचा लिया है। अब इसे
पारना कायरपन होगा।"
इन बातो को सुन कर सब लोगो ने समझ लिया कि जेम्स
कापुरुष नहीं है वरन् वह एक बड़ा साहसी वीर लडका है।
यद्यपि वह एक बालक साही है तथापि उसकी शारीरिक शक्ति
किसी युवा पुरुप से कम नहीं है । इस कारण उस दिन से सब
लोग उसकी इज्जत करने लगे। मारफी ने जब अपनी हार मान
ली तब जेम्स ने उसे छोड़ दिया और उठ कर उससे हाथ
मिलाया और उसी समय से उन दोनो में बडी मित्रता हो गई।
कप्तान फ्लेचर की डोंगो पर एक और माझी था। उसका
नाम था देरी। वह घेचारा वडा सीधा साधा आदमी था।
।
॥
भच्छा न था। वह जेम्स को बहुत प्यार किया करता था।
एक दिन जेम्स ने उससे कहा -"प्यारे हैरी, यदि तुम शराब
M

---
उसे ज्वर की बीमारी हो गई और कई दिन तक वह, बिछौन से
बैठी है और सामने एक पुस्तक खुली हुई है। जेम्स ने सोचा
कि माता पढ रही है, परन्तु दूसरे ही मुहूर्त में उसने देखा कि
वे कुछ पढ नहीं रही हैं वरन् सामने बाइविल खुली हुई है
गारफील्ड ।
जब जेम्स घर लौटने की बात सोच रहा था उसी समय
हिल न सका । जब अच्छा हुआ तब बहुत ही दुर्वल हो गया
था । उसने कप्तान फ्लेचर से घर जाने की छुट्टी मांगी । कमान
फ्लेचर ने विना रोक टोक के उसे छुट्टी तो दे दी पर उसे छोड़
कर वे बहुत दुसी हुए और डोंगी के सब लोग बहुत शोका
कुल हुए।
जेम्स ने एक डोंगी पर सवार होकर लोभलैण्ड की ओर
यात्रा की और सूर्य अस्त होने के पहले ही वह वहां पहुंच
गया। वहां से घर की ओर पैदल ही चला। रात के ग्यारह
बजे तक वह घर पहुँच गया। वह चुपके से घर के भीतर
गया और देसा कि उसकी माता एक कोने मे घुटना टेके हुए
-
निश्चल चित्त से ईश्वर के पास पुत्र के मङ्गलार्थ प्रार्थना कर रही
हैं । हाय रे माता का हृदय । तू क्या ही स्नेहपूर्ण है। यदि
ससार के सारे पदार्थों को और सारे भावों को एक ओर रक्खे
और मातृहृदय को दूसरी ओर तो भी वे सब मिल कर इस
विशाल हृदय की बराबरी नहीं कर सकते।
जेम्स ने मां के कधे पर हाथ धर कर कहा-"मां, मां,
क्या कर रही हो?"
-

1
चौदहवां परिच्छेद ।
भेट हो गई थी और उसकी डोगी पर नौकरी मिली थी और कैसे
ग्रह १७ बार पानी में डूबने से बचा था।
माता ने उसका सारा वृत्तान्त चुपचाप सुना और अन्त में
तना ही कहा--"ईश्वर ने तुमको सदा बचाया है और उसने
मारी प्रार्थनाओ को भी मजूर किया है जो तुम्हें घर भेज दिया।"
जेम्स ने कहा - "सत्य है, माता, उस दिन रात को ईश्वर
तो ने मुझे इवने से बचाया था । मैं तो मरही चुका था।"
पुत्र के मन में ईश्वर पर विश्वास देस माता का हृदय
नानन्द से प्रफुल्लित होगया। उन्होंने जम्स से कहा - "बेटा,
राव बहुत हो गई। अब तुम विश्राम करो । कल सवेरे और
और बातें सुनूंगी।"
मां, बेटे दोनो अपने अपने विछानों पर गये। जेम्स तो जाते
ही सो गया, पर उसकी माता की प्रांसो में नींद न पाई। वह
सारी रात जागती रही। उस रात को विधवा माता अपने
छोटे पुत्र की भूत, वर्तमान तथा भविष्य जीवन की समा-
लोचना कर रही थी और ईश्वर को धन्यवाद देवी थी कि उनकी
प्रार्थनाये दिन पर दिन पूरी होती जाती हैं। माता का चित्त
बहुत प्रसन्न था । एक तो प्रिय पुत्र का बहुत दिन वाद मावा की
गोद को शीतल करने के लिए घर लौट आना, दूसरे उनकी
प्रार्थना का मफल होना और तीसरे पुत्र के मन में ईश्वर पर
भक्ति यही सब पातें मिल कर माता के हृदय-सागर में आनन्द
की लहरें उठा रही थीं।

--
जहाज पर तुम्हें अन्तरा ज्वर होगया । समुद्र में यह बीमारी
तव जेम्स ने माता से सब घटनाओं का पूरा पूरा इतिहास
कसान से घुडका गया था, कैसे एमोस फ्लेचर से प्रकस्मात
चौदहवाँ परिच्छेद
जेम्स ने अपना सिर माता की गोद से हटा लिय
ज
तब उसकी माता ने उससे पूछा
"बेटा तुम्
इतने दुर्वल क्यों मालूम होते हो?"
जेम्स ने कहा -"हां मां, मैं बहुत दुर्वल हो गया हूँ
मुझे अन्तरा ज्वर आता था। और इसी कारण मैं घर लौ-
आया हूँ"
जेम्स की विधवा माता ने कहा - "बहुत अच्छा हुआ
तुम घर लौट आये परन्तु एक वडे आश्चर्य की बात है कि
प्राय नहीं होती।"
जेम्स ने कहा -"मैं समुद्र पर नहीं गया था। मेरी डोगा
नहर में ही थी। अब तक मैं नहर ही की नौकरी करता रहा।"
माता ने बडे आश्चर्य में होकर पूछा -"तुम नहर
-क्या तुम आयरी झील पर नहीं गये ?"
कह सुनाया और यह भी कह दिया कि कैसे वह जहाज
कि
1
में घे
के

प्रार्थनाये दिन पर दिन पूरी होती जाती हैं। माता का चित्त
प्रार्थना का सफल होना और तीसरे पुत्र के मन में ईश्वर पर
चौदहवां परिच्छेद ।
ट हो गई थी और उसकी डोगी पर नौकरी मिली थी और कैसे
ह १७ वार पानी में डूबने से बचा था।
माता ने उसका सारा वृत्तान्त चुपचाप सुना और अन्त मे
तना ही कहा -"ईश्वर ने तुमको सदा बचाया है और उसने
मारी प्रार्थनाओ को भी मजूर किया है जो तुम्हे घर भेज दिया।"
जेम्स ने कहा -"सत्य है, माता, उस दिन रात को ईश्वर
ी ने मुझे डूबने से बचाया था। मैं तो मरही चुका था।"
पुत्र के मन में ईश्वर पर विश्वास देस माता का हृदय
गनन्द से प्रफुछित होगया। उन्होंने जम्स से कहा -“बेटा,
ति बहुत हो गई। अब तुम विश्राम करो । कल सवेरे और
मां, बेटे दोनों अपने अपने बिछौनो पर गये। जेम्स तो जावे
ती सो गया, पर उसकी माता की प्रासो में नींद न आई। वह
सारी रात जागती रही। उस रात को विधवा माता अपने
काटे पुत्र को भूत, वर्तमान तथा भविष्य जीवन फी समा-
चना कर रही थी और ईश्वर को धन्यवाद देती थी कि उनकी
बहुत प्रसन्न था । एक तो प्रिय पुत्र का बहुत दिन बाद माता की
गोद को शीवल करने के लिए घर लौट आना, दूसरे उनकी
गर यातें सुनूंगी।"
भक्ति-येही सब बातें मिल कर माता के हृदय-सागर में आनन्द
की लहरें उठा रही थी।

फिर
वे बडे धार्मिक, विद्वान् , और दयालु थे और जवान लड़कों
जेम्स की विधवा माता ने इनसे मुलाकात की और अपने
पुत्र के विपय में बहुत कुछ कहा । उसने उनसे कहा कि उनका
गारफील्ड ।
सवेरा होते ही विधवा माता जेम्स के कमरे में गई और देखा-
कि वह गहरी नींद मे सोरहा है। कुछ काल तक बाहर सड़ी बात
करती रहीं । अन्त में जब दिन चढ गया तब वे उसके कमरे में
फिर गई तो देखा कि जेम्स जाग उठा है। मां को पास देख
उसने कहा -मैं आज खूब सोया । ऐसी नोंद मुझे हफ्ते
भर में नहीं आई थी। आज मैं पहले से कुछ अच्छा भी हूँ।"
अन्तरा ज्वर का नियम है कि एक रोज बाद ज्वर होता है
और तब रोगी को विकल कर देता है और फिर दूसरे ही दिन,
रोगी चगा हो जाता है।
वह दिन तो खुशी खुशी मे कट गया। दूसरे दिन,
ज्वर आया तव जेम्स की माता ने उस की राय लेकर एक
डाकर बुलाया । डाकुर की चिकित्सा प्रारम्भ हो गई। परन्तु
कई हफ्ते तक वह वीमार रहा और बिछौने से हिल न सका।
जिस समय जेम्स बीमार पड़ा रहा उसी समय आरेंज का
स्कूल खुला। वहां के शिक्षक मिस्टर चेट्स वडे योग्य थे ।
का चित्त आकर्षण करने में बडे ही चतुर थे
पुत्र है तो बहुत जहीन परन्तु उसका चित्त समुद्र-यात्रा के लिए
व्याकुल है और इस कारण लिखने-पढने की ओर ध्यान नहीं
देता । यदि किसी प्रकार उसका चित्त लिसने-पढने की प्रोप
--
-

-
चादहवा पारच्छद।
एक बार खींचा जा सके तो कदाचित् समुद्र-यात्रा से उसका
जी हट जावे।
मिस्टर घेट्स इन बातों को सुन बहुत खुश हुए और
उन्होने कहा-"मैं जेम्स से शीघ्र ही किसी दिन मिलू गा और
इस यात की कोशिश करूँगा कि उसका मन लिसने-पढने
।
में लगे।"
विधवा अपने मकान को लौट गई और जेम्स की
सेवा करने लगी। उन्होंने कहा -"बेटा, बहुत अच्छा हुआ
कि इस बीमारी के समय तुम घर पर उपस्थित हो, नहीं तो
कौन जानता है कि तुम कैसी विपत्ति में पडे होते ।"
जेम्स ने कहा -"यदि मैं बीमार न पडता तो कदाचित
मैं हल भर पहले ही मकान पर आ जाता।"
माता ने पूछा-"क्यों ? क्या तुमने समुद्र की नौकरी छोड
देने का विचार किया था ?"
-"मिस्टर फ्लेचर कहते हैं कि तुम्हारी जैसी
विद्या-बुद्धि है उसको समुद्र के पानी में फेंक देना उचित नहीं
है, तुमको चाहिए कि तुम और कुछ दिन तक विद्याभ्यास
करो और ज्ञान-लाम करने के बाद किसी पाठशाला के
अध्यापक बनी । तभी तुम्हारी विद्या बुद्धि का उचित सम्मान हो
मकता है।"
मावा ने कहा -"मैं फ्लेचर की राय खूब पसन्द करती
हूँ, और तुम भी जानते हो कि मैं तुमसे हमेशा यही कहा करती
जेम्स ने कहा

-
में जो रुपया कमाओ उसी की सहायता से तुम फिर पढना
गारफील्ड ।
हूँ। क्या तुमने फ्लेचर की राय मान ली और समुद्र-यात्रा का
सकल्प त्याग दिया ?"
जेम्स ने उत्तर दिया-"मैंने समुद्र-यात्रा का सकल
बिलकुल तो नहीं छोडा है किन्तु मैं उस विषय को , अभी तक
सोच रहा हूँ।"
माता-पुत्र में इस तरह बातचीत हो ही रही थी कि इतने में
जेम्स से मिलने के लिए मिस्टर वेट्स उनके घर पर आपहुँचे
उन्होंने जेम्स से बहुत देर तक बातचीत की परन्तु पहली
मुलाकात मे लिखने-पढने के सम्बन्ध में उन्होंने कुछ भी चचा
नहीं की।
जव मिस्टर बेटस चले गये तव माता ने कहा
तुम्हारी क्या राय है ? मिस्टर बेट्स बहुत नेक आदमी हैं न ?
मैं समझती हूँ कि लडके उनको बहुत प्यार करते होंगे।"
जेम्स ने कहा – “हां वे बहुत अच्छे आदमी हैं और
चाहता हूँ कि उनके साथ स्कूल जाया करूँ।"
"यदि तुम चाहो तो अवश्य ही जा सकते हो । देखो, यदि
तुम कुछ दिन और पढ लो तो तुम कुछ दिन के लिए किसी
स्कूल में शिक्षक का काम कर सकते हो। और इस काम
।
"क्यों बेटा
-
.
प्रारम्भ कर सकते हो। इस तरह तुम्हारा पढना-पढाना दोनों
साथ साथ हो सकता है। तुम रुपया भी कमा सकते हो पाय
प्रविष्ठा भी प्राप्त कर सकते हो।"

६६ चौदहवां परिच्छेद। जेम्स ने कहा-यह तो सब ठीक है, परन्तु समुद्र का पानी, उसकी वडी घड़ी लहरें और उन पर बहने वाले पड़े घडे जहाज ऐसे जी लुभाने वाले हैं कि जब कभी मैं उनके विषय में सोचता हूँ तभी मेरा जी भीतर से नाचने लगता है, इस कारण मैं कहता हूँ कि एक वार मुझे समुद्र में और जाने दो।" मावा ने कहा-"परन्तु अब तो तुम समुद्र अथवा नहर में, लौट जाना पसन्द नहीं करते। मैंने सोचा था कि तुमने समुद्र जाने का सकल्प बिलकुल छोड दिया है।" निदान मां-बेटे में बहुत देर तक इसी विषय में तर्क- वितर्क होता रहा । जव माता ने देखा कि लडका किसी तरह नहीं मानता तब बुद्धिमती माता ने सोचा कि ऐसे समय में पुत्र को एकदम रोकना अच्छा न होगा, बल्कि समुद्र-यात्रा में भी कुछ न कुछ उत्साह देना चाहिए । यह सोच कर उन्होंने कहा -"जो तुम नहर का काम करने जाओ अथवा किसी जहाज में मल्लाह का काम करो तो तुम पूरे साल भर तो काम कर नहीं सकते, कुछ दिन तक तुम्हें चुपचाप बैठा रहना पडेगा। क्योंकि जाडो में जहाज फा काम बन्द रहेगा, अतएव इस समय तुम स्कूल मे जाओ और शिक्षक का काम करो और गर्मियों में जहाज चलाना, इस तरह तुम दोनो काम कर सकोगे। जेम्स की विधवा माता को डर था कि जेम्स को समुद्र- यात्रा के विचार से एकदम रोकना कदाचित् असम्भव होगा,

।
मिस्टर वेट्स ने फिर कहा-"तुम मेरे साथ पहली मार्च
१००
गारफील्ड
इस कारण उन्होंने उससे कहा था कि जाढो में तुम स्कूल में
पढाओ और गर्मियो मे जहाज चलायो। इस आशा पर कि वादि
एक बार वह पुस्तको के प्रेम में पड जाय तो उसका समुद्र
जाने का सारा विचार जाता रहेगा।
मिस्टर बेट्स प्राय जेम्स से मुलाकात करने आया करते
थे। एक दिन पात यात में दोनों में बड़ी बहस छिड गई,
-"मैं जहाज चलाऊँगा ।" और बेट्स कहते
थे, "तुम पढाने का काम करो।" अन्त में मिस्टर वेट्स ने
कहा -"देखो, विद्यार्थी और माह मे इतना भेद है जैसा कि
जमीन और आसमान में। अतएव यदि तुम यह
कि ससार में लोग तुम्हारा सम्मान करे तो विद्यार्थी बनो और
नहीं तो जैसा चाहो वैसा करो।"
-
जेम्स कहता था
चाहते
से स्कूल चलो। पहले तुम इस बात को तै कर लो कि उस
दिन से तुम मेरे साथ स्कूल जाओगे। इसके बाद और धाते
आप से श्राप ठीक होती जायेंगी।"
जेम्स ने बडे दृढ स्वर से उत्तर दिया -"मैं अवश्य
स्कूल जाऊँगा
-
.
मिस्टर वेट्स ने कहा -"शावाश, यही तो बहादुरों
सी बात है लेकिन याद रक्सो कि तुमने कहा है कि स्कूल
जायेंगे अगर तुम अपनी बात पर कायम रहोगे तो जरूर तुम
-

चौदहवां परिच्छेद। पने भविष्य जीवन में सफलता-लाम करोगे क्योंकि यहीं से म्हारे जीवन का परिवर्तन प्रारम्भ होगा।" इन पावों ने जेम्स के चित्त मे घडा असर पैदा किया और ह स्कूल जाने के लिए दृढ संकल्प होगया। स्कूल जाने के पहले सने अपने चचेरे भाई विलियम और हेनरी को भी साथ ले नाने का प्रवन्ध किया। । जिस ममय जेम्स का स्कूल जाना ते होगया उसी समय शक्टर राविन्सन एक वडे नामी डाकृर पारेंज में किसी रोगी को देखने आये थे। जेम्स ने बिना किसी को बताये हुए चाहा के डाक्टर साहब से मुलाकात करके पूछे कि उसके दिमाग में ऐसी शक्ति है या नहीं कि वह पठन-पाठन का काम कर सके। इस कारण चुपके से वह एक दिन डाकूर साहव से मिलने के लिए निकल गया। ~ 'डाकुर साहब के पास पहुँच कर उसने उनको सलाम केया। - -"तुम कौन जेम्स ने कहा - डाकुर साहब ने सलाम का उत्तर देकर पूछा हो ? कहां से आये हो और क्या चाहते हो ? "मेरा नाम जेम्स गारफील्ड है। मैं प्रारेंज से आया हूँ और श्राप से अकेले में कुछ वात पूछा चाहता हूँ।" डाकुर साहब ने कहा-मैं तुम्हारे माता-पिता को पह- चानता हूँ और तुमको भी मैंने बचपन में देखा था। अव तुम जवान हो गये हो । क्या कहा चाहते हो, बोलो।" ।

,
.
और उसको पूरी तौर से विश्वास होगया कि वह विद्याभ्यास,
जाने की राय पकी होगई, और उसकी विधवा माता
जेम्स ने कहा-"प्रारम्भ में इवना रुपया काफी होगा।
१०२
गारफ़ोल्ड ।
जेम्स और डाकुर साहब एक कोठरी में गये। वहां आकर
जेम्स ने कहा--"डाकुर साहव, कृपा करके आप मेरे सब
अङ्ग-प्रत्यगों को अच्छी तरह परीक्षा करके देसिए तो सही कि
मेरे दिमाग में इतनी शक्ति है या नहीं कि मैं पठन-पाठन का
काम अच्छी तरह कर सकूँ।"
डाक्टर साहव इस विचित्र प्रश्न को सुन कर बडे आश्चर्य
में हुए। लेकिन उन्होंने जेम्स की नाडी, दिल, फेफडे, गुर्दा,
मस्तिष्क आदि सब अड्डो की अच्छी तरह परीक्षा की और
अन्त में कहा --"मिस्टर जेम्स, केवल तुम्हारे मस्तिष्क ही में
अजीब शक्ति नहीं है बल्कि तुम्हारे हाथ पैर भी ऐसे मजबूत
हैं कि तुम जैसा काम चाहो कर सकोगे, और बडी सफलता
से कर सकोगे । तुम काम करने से कदापि मत डरो । काम
सदा करते रहो । कोई काम तुम्हें हरा न सकेगा।"
डाक्टर साहव की बात सुन कर जेम्स बहुत खुश हुमा
फरने के योग्य है।
ने २२) रुपये इकट्ठ किये।
इसके बाद मैं और कमा लूंगा।"
1
--

और हेनरी बाइंटन है। हम लोग मारेंज से पा रहे हैं।" !
पन्द्रहवाँ परिच्छेद
हली मार्च को चेस्टर फा स्कूल खुल गया। प्रारेंज
से चेस्टर प्राय १० मील दूर था। जेम्स और
Xxxx उसके चचेरे भाई, विलियम और हेनरी, स्कूल
खुलने पर, अपने अपने लिसने पढने और खाने-पीने का सामान
कन्धो पर लाद कर ले चले । दस मील रास्ता उन्होंने पैदल ही
त किया और चेस्टर पहुँच कर वहां के अध्यापक से भेंट की।
अध्यापर्क महाशय, जिनका नाम मिस्टर प्रांच था, किसी किसी
विषय मे घढे विद्वान् थे, परन्तु कुछ थोडे बहुत सनकी भी थे।
ये तीनो लडके मिस्टर बेंच से मिले और जेम्स ने उनसे
कहा -"हम लोग आपके स्कूल में पढने के लिए आये हैं।"
मिस्टर बेंच ने उनका नाम-वाम पूछा।
जेम्स ने उत्तर दिया और कहा-"मेरा नाम जेम्स ए
गारफील्ड है। ये दोनों मेरे चचेरे भाई हैं। इनका नाम विलियम
मिस्टर मेंच ने कहा - "वाह ! मैं तुम लोगों को देख कर
बहुत खुश हुआ।"
-

-
जेम्स ने कहा
,
मिस्टर बेच ने पूछा--"तुम लोग अपने साने पीने और
जेम्स ने कहा--"जी हाँ, हम लोग अपना बन्दोवस्त पाप
बस्त कर लो। हमें श्राशा है, कि वहाँ तुम लोग आराम
दूसरे दिन उन्होंने स्कूल में नाम लिखाया। शिक्षक
जेम्स के पढने के लिए चार कोर्स ठीक किये-पदार्थ-विज्ञान
गारफील्ड।
उन लडको के फटे पुराने कपडो को देख कर उन्होंने
कहा-“मालूम होता है कि तुम लोग किसी अमीर के लड़के
नहीं हो।"
-"जी हां महाशय, हम लोग बहुत गरीब
हैं। हम लोगो को झोलियो मे रुपये-पैसे अधिक नहीं हैं, खाने
पीने और लिखने-पढने का सामान ही है।"
रहने का बन्दोबस्त तो स्वयं ही करोगे न "
ही करेंगे, लेकिन क्या आप कृपा करके हम लोगो को कोई
जगह रहने के लिए बता दीजिएगा ?"
अध्यापक महाशय ने एक बुढिया का मकान दिसा दिया
और कहा ---"उसी बुढिया के साथ रहने का तुम लोग बन्दो
रहोगे।"
लडकों ने बुढिया के साथ रहने का बन्दोवस्त कर लिया
और वे वहीं रहने लगे।
(Natural Philosophy) व्याकरण (Grammar), गणि
(Anthmetic) और बीजगणित ( Algebra)
-
से
-
+

+ पन्द्रहवां परिच्छेद । १०५ उस स्कूल में लड़के और लड़कियां मिला कर प्राय सौ विद्यार्थी पढा करते थे। इतने विद्यार्थियों के साथ पढना जेम्स के लिए एक नई बात थी। मिस्टर बेंच विद्यार्थियो को व्याकरण पढाया करते थे । पहले बता चुके हैं कि जेम्स जिस किसी विषय को सीखता था, उसको विना अच्छी तरह समझे न छोडवा था, चाहे वह कितना ही कठिन क्यों न हो। यहां व्याकरण पढते पढते एक कठिनाई आपडी । अंग्रेजी में एक शब्द घट (but) है जिसका अर्थ है "परन्तु"व्याकरण में यह शब्द अव्यय (अर्थात् Conjunc. tion ) है । अध्यापक महाशय ने इसको क्रिया (अर्थात् Verb) धवाया था। इस कारण जेम्स ने एक दिन मिस्टर बेंच से पूछा-"महाशय, क्या वट (but) अव्यय (Conjunction) नहीं है " उन्होने कहा -"नहीं, यह क्रिया है।" -"व्याकरण में इसको अव्यय ही कहते हैं।" -"तुमने कौन सा व्याकरण पढा है ?" कर्कमैन साहब का बनाया हुआ व्याकरण जेम्स को कण्ठ "मैंने कर्कमैन का व्याकरण पढा है।" ५ अध्यापक ने कहा -"फर्कमैन का व्याकरण विलकुल गलत है।" जेम्स ने कहा- मैंने इसके पहले जिन जिन शिक्षकों के पास पढा है वे सब यही कहा करते थे कि यह अव्यय है।" Y जेम्सने कहा अध्यापक ने पूछा - था। उसने कहा - .

-"उन लोगो ने चाहे जिस किसी १ , -"अवश्य, वह भी क्रिया है, क्योंकि यह सुन कर जेम्स हँस पड़ा और उसने दूसरे विद्यार्थियों विश्वास नहीं हुआ । उन्होंने फिर कहा-"देखो, and के लेकिन अध्यापक महाशय घहुत चिढते थे। परन्तु इवना उन्होंने १०६ गारफील्डं । मिस्टर बेंच ने कहा व्याकरण से पढाया हो परन्तु मैं अपना ही बनाया हुआव्याकरण पढाता हूँ।" तिस पर जेम्स ने कहा.-"यदि 'वट' क्रिया है तो ऐण्ड (and) जिसके माने हैं, 'और' वह भी क्रिया है।" । अध्यापक ने कहा इसके माने हैं जोडना।" की ओर देखा। अध्यापक ने समझ लिया कि जेम्स को उसकी बात पर माने केवल और ही नहीं है वरन् इसके माने जोडना भी इस बात को मैं अभी प्रमाण से सिद्ध किये देता हूँ।यह कह कर "जैसे तुम और हेनरी दो लडके हो, और मैं कहता हूँ कि तुम और हेनरी दोनो मिल कर फलाने काम को करो! इसका मतलब यह होगा कि हेनरी तुम में जोड दिया गया है, इस कारण 'और' क्रिया है, अव्यय नहीं है।" जेम्स चुप हो गया और कुछ बोला नहीं। व्याकरण के घटे में जेम्स और अध्यापक से प्राय' ऐसा ही वर्क हुआ करता था। इस तर्क से लडके बहुत खुश होते थे । है । उन्होंने कहा

पन्द्रहवां परिच्छेद।
अवश्य हो। समझ लिया था कि जेम्स एक साधारण लडका
नहीं है। इस कारण उसको पढाने में वे कुछ हिचकते भी थे।
जेम्स के भाइयों ने जब देखा कि अध्यापक और जेम्स मे
प्राय तर्क वितर्क हुआ करता है और अध्यापक महाशय ठीक
'वोक, उत्तर न दे सकने के कारण चिढते भी थे तव उन लोगो ने
जेम्स, को राय दी कि वह व्याकरण छोड कर कोई दूसरा
कोर्स ले ले।
जेम्स ने व्याकरण छोड कर दूसरा कोर्स ले लिया । अध्या-
पक भी इस बात पर बहुत खुश हुए।
कुछ दिन बाद जेम्स ने देखा कि उसके २२ रुपये प्राय
चुकने पर हैं, तब उसने अपने भाइयो से कहा-"यदि मैं इस
समय कुछ रुपया न कमाऊँ तो मेरा दिवाला निकल जायगा
अव
मेरी थैली खाली हो चली है।"
-"भला यहां क्या काम करोगे ?"
जेम्स ने कहा--"यहां बढई का काम करूँगा। मिस्टर
उडवर्थ नामी एक बढई यहां रहते हैं। मैं उनसे मिल कर कुछ
काम करने का धन्दोवस्त करूँगा जिससे कुछ रुपया कमा
क्योंकि
विलियम ने पूछा
11
सकूँ।"
-
यह राय ते होने पर जेम्स ने मिस्टर उड्वर्थ से मुलाकात
को और अपना मतलब यान किया।
चड्वर्थ ने पूछा
"तुमने कभी इस काम को किया है।

+
।
१०८
गारफील्ड।
यदि तुमने कभी किया हो तो कल स्कूल के बाद भाना मैं,
देखू गा कि तुम्हे कुछ काम दे सकता हूँ या नहीं।"
जेम्स ने कहा- मैंने मिस्टर ट्रीट के पास कुछ दिन
काम किया है और मैं इस काम को अच्छी तरह जानता हूँ और
कर सकता हूँ। आप मुझे काम दीजिएगा । मैं अगर अच्छी तरह
न कर सकूँ तो मुझे छुडा दीजिए । मैं यह नहीं चाहता कि
मुझे मुकर्रर करने मे आप मुझ पर कुछ मेहरवानी कीजिए!
मेरा काम देसिए । यदि काम अच्छा हो तो दाम दीजिए । नहीं
तो मत दीजिए।"
मिस्टर उड्वर्थ ने इन बातो पर बहुत खुश हो कर
"तुम कल से यहां आना । मैं तुम्हे काम दूंगा।"
जेम्स घर लौट गया और उड़वर्थ के कथनानुसार दूसरे
दिन से सुबह शाम वहां जाने लगा और काम करने लगा। नतीजा
उसका यह हुआ कि स्कूल से छुट्टी होने पर लिखने-पढने, साने-
पीने और रहने में जो कुछ खर्चा हुआ सब उसने अपनी ही
कमाई से किया और घर जाते समय पांच छ रुपया साथ भी
लेगया था।
स्कूल का नियम ऐसा था कि प्रत्येक विद्यार्थी को सव शिक्षकों
और विद्यार्थियों के सामने खडे होकर हफ़ मे दो दिन वक्तृता
देनी पडती थी। वक्तृवा का विषय कभी तो अध्यापक महाशय
स्वयं चुन देवे और कभी विद्यार्थी ही अपने आप लिख लाते थे।
कहा
।

T
-
' हेनरी ने पूछा
विश्वास होगया था कि भविष्य में जेम्स एक बहुत बडा प्रसिद्ध
पन्द्रहवां परिच्छेद।
१०६
"जेम्स को जिस दिन पहली वक्तता देनी पडी उस दिन
उसकी विचित्र दशा घी । हाथ-पैर कांपते थे, जीम लडखडाती
थी और गला घुटता सा था, परन्तु किसी प्रकार उसने अपनी
वकृता समाप्त की । घर पहुँच कर अपने भाइयो से कहा
"हमारे भाग्य अच्छे थे कि जिस स्थान पर सडा होकर मैं
वत्तता दे रहा था वहां मेरे पैर के सामने एक पर्दा पडा हुआ
था नहीं तो सबको पता लग जाता कि मेरे पैर कांप रहे थे।"
-"क्या तुम घबरा गये थे ?"
जेम्स ने कहा -"हां, मैं बहुत घबरा गया था।"
"लेकिन तुम्हारी वक्तृता बहुत अच्छी हुई थी। लोगों को
वडा आश्चर्य हुआ था कि इस फटे चिथडे के भीतर इतना
मसाला भरा हुआ है।"
स्कूल के विद्यार्थियो ने मिल कर तर्क-वितर्क करने की एक
साधारण सभा कायम की थी । जेम्स भी उस सभा का एक
मेवर था। उस सभा में प्राय वक्तृता और बहस आदि हुआ
करती थी । जेन्स की आदत थी कि वक्तृता देने के पहले वह
उस विषय को अच्छी तरह सोच लेवा या। इस कारण उसकी
वकृता सव लडकों से अच्छी हुआ करती थी। लड़कों को
.
।
।
वक्ता होगा। जेम्स की रुचि और वृत्ति देस कर शिक्षक गण भी
ऐमी ही बात कहा करते थे।

और इस कारण वे उनसे अधिक विद्वान होते हैं। इसका प्रमाण
।
A
काटूगा । इसमें हमारा खर्चा भी कम होगा, और स्वास्थ्य भी
जेम्स ने कहा-"मास खाने वालों की अपेक्षा दूध पीने
जेम्स की बाते सुन कर हेनरी और विलियम दोनों ने
मजाक करना प्रारम्भ किया। पर जेम्स ने कहा--"तुम लोग
गारफील्ड ।
स्कूल के पुस्तकालय से जेम्स ने "हेनरी सी राइट" की
जीवनी पढी थी। पढते समय उसके जीवन व्यतीत करने का
नियम जेम्स को बहुत पसन्द आया था। उसने एक दिन अपने
भाइयो से कहा -"मैं हेनरी राइट की तरह अपना जीवन
व्यतीत किया चाहता हूँ।"
हेनरी ने पूछा--"सो कैसा ?"
जेम्स ने कहा -"केवल दूध और रोटी सा कर दिव
अच्छा रहेगा।"
हेनरी ने कहा-"दूध पीने से खर्चा तो अवश्य कम हो
सकता है परन्तु स्वास्थ्य कैसे अच्छा रह सकता है।"
1
-
वालों का मस्तिष्क और उनका शरीर अधिक बलिष्ठ होता है
हमें मिल चुका है।"
-
चाहे मजाक करो और चाहे हँसो । लेकिन मैं तो केवल दूध ही
पीऊँगा।"
जेम्स ने वैसा ही किया।
---

।
T
और विज्ञान की सहायता से तुम कोठे को पहले से भी ज्यादा
सोलहवाँ परिच्छेद ।
HAMAR मे गर्मियों की दो महीने की छुट्टी हुई, जैसा
हर जगह हुआ करता है । छुट्टियों में जेम्स
अपने भाइयो के साथ घर गया । टामस भी घर
पर था, और वह चाहता था कि अपनी मां के रहने के लिए
एक कोठा वनावे । इस कारण धीरे धीरे कई महीनों में उसने
बाँस बद्धी इत्यादि सामान इकट्ठा कर रखा था। जब जेम्स घर
-"जेम्स, तुम तो कोठे का ठाट बांध
जेम्म ने उत्तर दिया -"यदि वोजगणित ( Algebra )
और विज्ञान (Philosophy) ने मेरे दिमाग से कोठा और
डाट बनाने का ज्ञान मिटा न दिया हो तो मैं अवश्य ही बना
"मुझे आशा होती है कि गणित
माया तब उसने कहा
सकोगे न, क्योकि तुमने बहुत बनाया है ?"
सकता हूँ।" टामस ने कहा
अच्छी तरह बना सकोगे।"
कुछ काल तक दोनों भाइयों में इसी प्रकार की बाते होती
हीं । अन्त में इन्हीं दोनों ने मिलकर बिना किसी और आदमी

15 । ७ -- - और भी काम किया, और इन कामों के परा होने के साथ साथ उसके लिसने-पढने की ओर अनुराग देस-कर उसका विधवा माता को अनुमान होगया कि कदाचित् उसके पुत्र । भूली हुई बात की चर्चा नहीं छेडती थी, जैसे जेम्स ने समुद्र- यात्रा के विषय में कुछ नहीं कहा वैसे ही उसकी माता ने म को तैयार हुआ। माता ने कहा.--"बेटा, तुम विदेश जार- ११२ गारफील्ड। की सहायता के कोठा तैयार कर दिया। अब मां के रहने, के लिए एक दूसरा मकान बन गया। कोठे का बनना समाप्त होने पर जेम्स दूसरा कोई काम कर की चिन्ता करने लगा । काम भी तुरन्त ही मिल गया। उसके पडोस में एक किसान रहता था। उसको खेत धोने के लि किसी आदमी की जरूरत थी । इस कारण उस किसान ने तुरा जेम्स को नियत कर लिया । जेम्स ने बडी मुस्तैदी के साथ के किया और थोडे ही दिनों मे उसका काम पूरा कर दिय उस काम के पूरा हो जाने पर जेम्स ने दो एक जगह, उसकी छुट्टी भी पूरी हो गई। छुट्टियो मे जेम्स दिन भर तो काम किया करता था रात को गणित विज्ञान आदि पुस्तकों को पढा करता था। मन से समुद्र-यात्रा का सयाल दूर हो गया है। वह भी, उस कुछ नहीं कहा। स्कूल की छुट्टी पूरी हो गई और जेम्स फिर चेस्टर जा और 1 - . 1 - ले जानो।" जेम्म ने कहा जेम्स ने कहा . अतिरिक्त यदि तुम शिक्षक हो जाओ तो तुम इतना रुपया कमा- मोगे कि दूसरे साल तुम अपने पढने और साने-पीने का सर्चा मी से चला सकते हो। सोलहवां परिच्छेद। ११३ हो, और तुम्हारे पास केवल एक अठन्नी ही है, कुछ रुपये और -"मैं अपने साने-पीने और लिसने-पढने का बन्दोबस्त चेस्टर ही में ठीक कर लूंगा। मुझे कुछ रुपये फी जरूरत नहीं है।" माता ने कहा "प्रारम्भ में साली हाथ जाने की अपेक्षा कुछ थोडा रुपया ले जाना अच्छा है ।" --"प्रारम्भ में कुछ रुपया लेके जाने और अन्त में साली हाथ लौटने की अपेक्षा साली हाथ जाना और अन्त में पाकेट गरम करके लौटना अच्छा होगा।" माता ने कहा --"इस बात से तो ऐसा मालूम होता है कि तुम घर लौटते समय कुछ रुपया साथ लेके लौटोगे।" जेम्स ने कहा-"जरूर कुछ रुपये लाऊँगा। अगर रुपये लाऊँ तो जाडे में शिक्षक का काम कैसे करूँगा।" माता ने सुश होकर पूछा "क्या तुमने शिक्षक बनना स्थर कर लिया है।" -"इच्छा तो ऐसी ही है, इसके बाद हर- च्छिा ।। माता ने कहा--"यदि शिक्षक बनने की तुम्हारी इच्छा हुई तो भगवान् तुम्हारी इच्छा अवश्य ही पूरी करेंगे। इसके ८ - जेम्म ने कहा

-
११४
गारफ़ोल्ड ।
दूसरे दिन सवेरे जेम्स और उसके दोनों चचेरे भाई चेस्टर
को रवाना हुए । चेस्टर पहुँच कर जेन्स ने अपने भाइयो ।
कहा -"मेरे पास केवल एक अठन्नी है। यह बेचारी जेब में
अकेली घबराती है। झट पट इसका कोई साथी ठीक कर देन
चाहिए।"
इस बात के कहने के दो दिन बाद हो सैबेथ डे (Sabuatl
Day) आ पहुँचा, और जेम्स कोई काम न कर पाया था।
सैवेथ के दिन सब लोग गिर्जे मे बैठे हुए भजन सुन र
थे । जेम्स भी वहां था । भजन पूरा होने पर पादरी साहेब ।
चन्दे का वास सब लोगों के पास भेजा। जिस से जो दे
बना उसने उतना ही दिया। जेम्स के पास केवल वही अठन्न
थी। जब उसके पास बक्स आया तव उसने भी चुपके से वह
अठन्नी निकाल कर बस मे डाल दी।
जेम्स और उसके दोनों भाई पहले की तरह मिस्टर राइट
की नाई , दूध पीकर ही जीवन बिताने लगे। ऐसा करने से
उनका सर्चा बहुत कम होगया, परन्तु विलियम और हेनरी
दोनों भाई ऐसे भोजन से असन्तुष्ट थे। इस कारण इनरी में
एक दिन कहा -"देखो भाई, यह भोगन कुछ बुरा नहीं है।
पर हम देखते हैं कि इससे हमारी शक्ति दिन दिन मानो घटती
जाती है।"
"तुम्हारी शक्ति घट रही है परन्तु
-
जेम्स ने कहा
मेरी

सोलहवां परिच्छेद। ११५ शक्ति दिन दिन दूनी हो रही है । मैं अभी तुम दोनो को दवाये रख सकता हूँ।" विलियम ने कहा . दो - जेम्स । हेनरी ने कहा -"ईश्वर ने तुम्हारे शरीर को ऐसी काठी बनाई है कि तुम यदि मिट्टी के लड्डू बना के साओ तब भी तुम्हारा शरीर बलिष्ठ होता रहेगा।" - यह सब तो हमी की बात छोड । परन्तु हम लोगो को अपने साने पीने का सामान कुछ अच्छा करना ही होगा।" हेनरी ने भी इस बात पर जोर दिया। इस कारण जेम्स आहार बदलने पर लाचार हुआ । नये आहार मे उन लोगो का एक एक रुपया प्रति सप्ताह हर एक का लगता था। सुबह शाम उसी उवर्थ वढई के यहाँ काम किया करता और अपना सर्चा चलाता । जेम्स ने अपने अध्यापक से शिक्षक धनने का अभिप्राय कुछ भी न बतलाया था, लेकिन मिस्टर बेंच जेम्स को बहुत प्यार करते थे और वे चाहते थे कि वह कुछ दिन तक विद्या पढे । वे यह भी जानते थे कि जेम्स बहुत गरीब का लडका है। इस कारण उन्होंने एक दिन जेम्स को पास बुला कर कहा "तुम शिक्षक का काम करना पसन्द करोगे ?" जेम्स ने घडी खुशी से कहा " मेरी मावा मुझे इस काम को करने के लिए बहुत दिनों से कह रही हैं और मैं भी चादवा हूँ कि मैं इसे करूँ।"

-
जेम्स ने पूछा
११६
गारफील्ड।
मिस्टर बेंच ने कहा
-"तुम जो अपनी माता की बात
मानते हो, इससे मैं बहुत खुश हुआ | अच्छा लडका इसी का'
नाम है और अच्छे लडके का यही काम है। विद्या पढाने से
तुम्हारी दूनी भलाई होगी । इससे तुम्हारी आर्थिक उन्नति होगी
और दूसरे लडके भी तुम से उपकृत होगे ?"
-"क्या मैं ऐसा काम पा सकता हूँ ?"
" दस वर्ष पहले स्कूल भी कम घे, पढ़ने-पढाने वाले भी
कम थे, परन्तु अय यह वात नहीं है। अव स्कूल भी बहुत हैं।
पढने वाले भी बहुत हैं और शिक्षको की भी बहुत जरूरत होती
है, परन्तु हर आदमी इस काम में सफल नहीं होता, लेकिन
हमें आशा है कि तुम इसको अच्छी तरह कर सकोगे और इस
काम में कृतकार्य होगे।"
"आपको कैसे मालूम हुआ कि मैं इस काम में कृतका
हूँगा।"
-"पहली बात तो यह है कि तुम
अच्छी विद्या पाई है, और शिक्षक के लिए इसका होना बहुर
जरूरी है। दूसरे यह कि तुम में विचारशक्ति बहुत तेज है
और तुम किसी विषय को सुन कर गूढ तत्व को विचारने के
कोशिश करते हो । शिक्षक में इस गुण का भी होना बहु
जरूरी है। और तीसरे यह कि तुम विना किसी कठिनाई के स्कूल
को अच्छी तरह चला सकोगे । और नासिर वात यह है कि जे
मिस्टर बेंच ने कहा
।

अपनी दुष्टता से कष्ट में पड जाय तो मैं उसकी सहायता न शिक्षक हो सकता है।" पूछा--"क्यो भाई, यदि कोई लडका अपराध भी करे तो वेल के मित्र ने कहा--"मैं समझता हूँ कि यह उस पडोसी का कमीनापन है जो वह एक विद्यार्थी के नाम नालिय- सोलहा परिच्छेद। F लडका अपने सहपाठियों में मिलनसार होता है वही अच्छा । 'जिस ममय जेम्स स्कूल में पढता था उस पीच की एक घटना उल्लेख योग्य है । स्कूल के किसी दुष्ट लडके ने पडोस के किसी लड़के को मारा और गाली दी। इस कारण लडके के बाप ने अध्यापक महाशय से इसकी नालिश की। अध्यापक महाशय उस अपराधी लडके को निकाल देने का दण्ड देना विचार रहे थे। उस समय उस अपराधी लडके के कई साधी भी इकट्ठे होकर यही परामर्श कर रहे थे कि यदि बेल (लडके का नाम ) निकाल दिया जाय तो हम लोग भी उसी के साथ साथ स्कूल छोड देंगे। यह वात जेम्स के कान में पहुंची। तब उसने उन लडको से भी हम लोग उमका साथ देंगे ?" उन लडको ने कहा लिए हम लोगों को ऐसाही करना चाहिए।" । -"अपना सम्मान स्थिर रखने के जेम्स ने कहा -"कभी नहीं। यदि मेरा कोई मित्र करूँगा।" -- -

।
११८
गारफील्ड।
करता है केवल इस वजह से कि वह उस समय अपनी
दुरुस्त न रस सका था।"
जेम्स ने कहा- मैं तुम्हारी वात नहीं मान
क्योंकि मैं समझता हूँ कि वेल को अपनी जबान का उतना
भाव से व्यवहार करना चाहिए जितना कि वह अपने ह
को करता है।"
वेल के दोस्त ने कहा -"हां, यह सब ठीक है, परन्त
वह वे जाने धोखे में पड जावे तो उसकी मदद करना जरूरी
जेम्स ने तुरन्त कहा
-"उस हालत में उसकी जरूर •
काँगा । पर कब ? जब वह अपने किये पर लज्जित
दु सित हो।"
"तो मैं समझता हूँ कि तुम मदद करने पर नाराज
हो वरन् हम लोगो के ढंग पर नाराज हो।"
जेम्स ने कहा -"हां ठीक है। यदि बेल उस पडोसी
मुअाफ़ी मांगे और मिस्टर बेच के पास इस बात की शप
करने को राजी हो कि वह भविष्य में कभी ऐसा काम न करे
वो मैं पहले उसके लिए कहूँगा।"
वेल ने वैसा ही किया और उसका अपराध क्षमा हो गया
।
-
।
-

।
-
-
-
है और हम लोग लडकों को शिक्षक नहीं बनाया चाहते।" .
निराश होकर जेम्स वहां से निकल आया। बाहर निकल
फर फिर आगे बढ़ा। जाते जाते फिर एक और व्यवस्थापक से
शीग सेमिनरी उसका नाम है जहाँ जेम्स पढ़ा करता था। सेमिोरी
सत्रहवाँ परिच्छेद।
9889र पहुँचने के दूसरे ही दिन जेम्स किसी स्कूल की
घा नौकरी ढूँढने निकला । जाते जाते एक स्कूल
के व्यवस्थापक से भेंट हुई । उनके पास जाकर
जेम्स ने अपना मतलब वयान किया।
व्यवस्थापक ने कहा -"तुम्हारी उम्र बहुत थोडी है और
तुम स्कूल का काम न कर सकोगे।"
जेम्स ने कहा -"गीग सेमिनेरी ! के अध्यापक,
मिस्टर
बेंच का सार्टिफिकेट मेरे पास है। आप उसको देसिए।"
सिकत्तर ने कहा -"मैं मानता हूँ कि तुमने अच्छी विद्या
प्राप्त की है और तुम बहुत कुछ जानते हो, परन्तु हम लोग
तुम्हें नियत नहीं कर सकते, क्योंकि तुम्हारी उम्र बहुत थोडी
पहल को कहते हैं और गीग उस जगह का नाम है ।
1
,
भेंट हुई।

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उपाय सोच रक्सा है। हमें वो कुछ भी नहीं सूझवा।" सत्रहवां परिच्छेद । १२१ स्कूल में वहां के एक विद्यार्थी थे। वे बडे लायक आदमी थे और बड़े नेक भी थे। 1 दोनों में बात चीत करते करते रात हो गई। इस कारण मिस्टर नेलमन कहा-"पाप आज रात को मेरे ही मकान पर रह जाइए। कल सुवह को जहां जी चाहे जाइएगा क्योकि । अब रात ज्यादा हो गई है और आपको बहुत दूर जाना पडगा। जेम्स ने इस निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया और रात को वह वहीं रह गया । सवेरा होते ही जेम्स उठा और अपने शिकार की तलाश में निकला। तमाम दिन घूमता रहा । पर कोई शिकार हाथ न लगा। अन्त में निराश होकर घर लौट गया और अपनी माता से कहा --"स्कूल की नौकरी मिलनी हमें असम्भव मालूम पड़ती है क्योकि प्राय शिक्षक नियत हो चुके हैं, और एक-आध जगह जो साली भी है तो वे हमे रखना नहीं चाहते क्योंकि हमारी उम्र बहुत सव स्कूलो में कम है।" माता ने लडके को उत्साहित करके कहा-"बेटा, घब- राग्री नहीं । ईश्वर ने अवश्य ही तुम्हारे लिए कोई उपाय सोच रक्सा है, और वह उपाय क्या है इस बात का भी पता तुम्हें बहुत जल्द लग जायगा।" जेम्स ने नैराश्यजनक वचन में कहा -"देसे ईश्वर ने क्या For

A
१२२
गारफ़ोल्ड।
माता ने कहा -"तुम बहुत थक गये हो। अब सा-पीकर
सोओ। कल जो होगा देखा जायगा।"
मां बेटे दोनों खा-पीकर सो गये । दूसरे दिन प्रात काल के
समय दरवाजे पर किसी के पुकारने का शब्द सुनाई पडा।
उसकी आवाज सुनते ही जेम्स की विधवा माता बाहर निकल
आई और उससे पूछा-"पाप क्या चाहते हैं ?"
उस पडोसी ने कहा- मैं आपके कनिष्ठ पुत्र जेम्स को
चाहता हूँ। क्या वह हमारे स्कूल में शिक्षक का काम करेगा ?"
जेम्स उस समय सो रहा था अपने नाम के साथ स्कूल
का नाम सुनते ही वह उठ खडा हुआ और उस आगन्तुक के
।
सामने गया ।
उस पडोसी ने जेम्स से पूछा--"क्या तुम हमारे स्कूल
मे
शिक्षक का काम करना पसन्द करोगे? हम लोग २४ रुपया
मासिक वेतन और खाना देगे।"
जेम्स ने कहा--"मैं ऐसी ही नौकरी ढूँढ रहा था । परन्तु
शाम को मैं इसका जवाब दूंगा।"
पडोसी चला गया और माता-पुत्र दोनों घर के भीतर गये।
जेम्स ने कहा-"मावा, तुम तो जानती हो कि उस स्कूल
के लडके कितने दुष्ट हैं। वहाँ का शिक्षक होना कितना कठिन
है। पहले तो यह कि कोई शिक्षक वहां टिकने नहीं पाता और
दूसरे यह कि यदि पहले ही पहल
उस काम को करूं और

'उस पडोसी से कह पाया कि मैं आपके स्कूल में पढ़ाऊँगा।
,
जेम्स ने उसी स्कूल में पढाना स्वीकार किया और शाम को
गारफील्ड जाडे में पढ़ाने का काम करेगा। लडके जब कमी
प्रापस में मिलते यही कहते-"जिम बहुत अच्छा आदमी है।
सत्रहवां परिच्छेद।
१२३
थोडे ही दिन में मुझे भी छोड कर भागना पड़े तो बडी लज्जा
को वात होगी और इसमें हमारी वडी बदनामी होगी।"
मावा ने कहा -"यह तो ठीक है, परन्तु स्कूल के सब
ड़के तुम्हें अच्छी तरह पहचानते हैं और सब तुम्हारी प्रतिष्ठा
रते हैं । इस अवस्था में यदि तुम एक धार उन लोगों को अपने
नू मे कर लो और उनके बुरे अभ्यास को छुडा दो तो निश्चय
गनो कि तुम्हारी प्रतिष्ठा जम जायगी और सब लोगो को ऐसा
मनुमान हो जायगा कि तुम एक अच्छे शिक्षक हो। मेरी तो यही
राय है कि तुम इस काम को कर लो, परन्तु एक घार तुम अपने
पेचा ऐमोस बाइटन से भी पूछ लो । देसो वे क्या कहते हैं।"
दुपहर को साने पीने के बाद जेम्स ने मिस्टर बाइटन से
मुलाकात की और अपना सारा हाल कह सुनाया।
मिस्टर वाइटन ने बहुत देर तक सोच-विचार कर वही कहा
जो उसकी माता ने कहा था ।
चचा और माता की राय जय एक सी मिल गई तब
दो तीन दिन मे यह घात चारो ओर फैल गई कि जिम
हम लोग उसके पास बहुत खुशी से पढ़ेंगे।"

-
१२४
गारफील्ड ।
जिस दिन स्कूल सुला उस दिन जेम्स ने अपनी मां से,
कहा-"मैं स्कूल जाता हूँ। लेकिन शायद दोपहर तक मुझे
लौट आना पडेगा।"
माता ने कहा -"नहीं बेटा, हमें विश्वास है कि तुम इस
काम को बहुत सफलता से करोगे।"
जेम्स ने अपने मन में ठान लिया था कि वह स्कूल में जहां
वक घन पढे किसी लड़के को घेत न मारेगा और कोई कठिन
नियम भी जारी न करेगा। वह चाहता था कि स्कूल में उसकी
हुकूमत मजबूत हो परन्तु यह नहीं चाहता था कि किसी पर
कुछ अत्याचार हो, इस कारण उसने आते ही लडको से अपना
मतलब वयान किया और कहा
-"लडको, मेरे यहां आने काम
उद्देश यह है कि मैं तुम लोगो को तुम्हारे लिखने-पढने में, जहाँ
वक सम्भव हो, सहायता करूँ, जिससे तुम लोग अपने काम में
उन्नति करो । तुम सब लोग बडे लडके हो और सब बुद्धिमान
हो । इस कारण तुम अपनी और अपने स्कूल की भलाई-बुराई
अच्छी तरह समझते हो । मैं हर तरह से इस बात का प्रयत्न
करूँगा कि यह एक अच्छा स्कूल हो जाय, और जो तुम लोग
भी मेरी सहायता करो तो कदाचित् थोड़े ही दिनो में इस गांव
भर में यह स्कूल मबसे अच्छा हो जायगा।"
लडको ने जिम गारफील्ड की बात मान ली। बडे बडे
लडके आपसे आप उसके काबू में होते गये, और जिन जिन
घदमाशियो के लिए स्कूल पहले से बदनाम था वे बदमाशियां
.
.
1
-

प्रारम्भ किया। कुछ दिन में उसने उस विपय को अन्दी वरद पढना चाहा । जेम्म ने कुछ दिन उसे टाला और इसी बीच में उमने रेसागणित की एक पुस्तक सरीद कर रात को पढा सत्रहवां परिच्छेद। १२५ धीरे धीरे दूर होने लगी। लड़को ने धीरे धीरे बदमाशी छोड लिखने-पढने की ओर ध्यान देना आरम्भ किया । जेम्स लडको के खेल-कूद मे वैसा ही शरीक होता था जैसा कि उनके लिसने- पढने में होता था । तात्पर्य यह कि थोडे ही दिन में जेम्स की प्रतिष्ठा अच्छी तरह जम गई। जेम्स भी पारी बाँध कर विद्यार्थियो के घर में रहा करता था। इस कारण नहीं कि वह केवल लडको ही को अपनी बात चीत से मोहित करता था वरन् उनके पिता-माता भी उनके -व्यवहार पर लट्ट हो गये थे। जाडा बीतने पर जब जेम्स ने स्कूल छोडा तव स्कूल के कार्य- कर्ताओं और विद्यार्थियो के माता-पिता ने मिल कर एक सार्टि- फिकेट दिया जिसमे लिखा था कि “जबसे यह स्कूल कायम हुआ है तनसे हम लोगो ने मिस्टर गारफील्ड से बढ कर कोई । शिक्षक नहीं पाया। स्कूल खुलने पर वह फिर गीग सेमिनेरी लौट गया और फिर पढने लगा । वहाँ की पढाई पूरी होने पर उसने दूसरे जाडे में दूसरे स्कूल में मास्टरी को। वहां उसको ३२) मासिक वेदन और साना मिलता था । इम स्कूल में एक बडे लडके ने रेखागणित ( Geometry )

"
१२६
गारफील्ड।
पढ़ लिया और तब उस लड़के को उसने पढाना शुरू किया।
उस लडके को इस बात का पता न लगा कि उसका शिक्षक
उस विद्या को नहीं जानता था।
जेम्स जव तब कहा करता था-"जव कोई आदमी किसी
काम को करता है तब उसको जान लेना चाहिए कि वह उस
काम को न करने वालो से ज्यादा जानता है।
एक दिन लड़कों के साथ सेलते खेलते जेम्स गिर पडा
और उसकी पतलून फट गई । इस कारण वह बहुत दु सिक
हुआ। उस समय वह मिसेस स्टैलस के यहां रहा करता था
मिसेस स्टैलस ने इन्हें दुखित देख कर कारण पूछा ।।
तव जेम्स ने कहा
"मेरी पतलून फट गई है; और में
पास दूसरी पतलून भी नहीं है।"
मिसेस स्टैलस ने कहा-इसके लिए दुसी मत हो । रा
। जब तुम सोनोगे तब मैं तुम्हारी पतलून सी दूंगी -
किसी को न मालूम होगा कि यह फटी थी।
स्कूल बन्द होने पर जेम्स घर लौट गया।
-
1
१

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"
१२६
गारफील्ड ।
पढ लिया और तब उस लड़के को उमने पढाना शुरू किया।
उस लड़के को इस बात का पता न लगा कि उसका शिक्षक
उस विद्या को नहीं जानता था।
जेम्स जब तब कहा करता था-"जब कोई आदमी किसी
काम को करता है तब उसको जान लेना चाहिए कि वह उस
काम को न करने वालो से ज्यादा जानता है।
एक दिन लडकों के साथ सेलते खेलते जेम्स गिर पड़ा
और उसकी पतलून फट गई । इस कारण वह बहुत दुखित
हुआ। उस समय वह मिसेस स्टैलस के यहां रहा करता था।
मिसेस स्टैलस ने इन्हें दुसित देस कर कारण पूछा।
तब जेम्स ने कहा -"मेरी पतलून फट गई है; और मेरे
पास दूसरी पतलून भी नहीं है।"
मिसेस स्टैलस ने कहा -इसके लिए दुसी मत हो । रात
को जब तुम सोओगे तब मैं तुम्हारी पतलून सी दूंगी और
किसी को न मालूम होगा कि यह फटी थी।
स्कूल बन्द होने पर जेम्स घर लौट गया ।
-
-

अठारहवां परिच्छेद।
१२६
भविष्य वाणी करना शुरू किया था कि जेम्स एक बहुव
बडा वक्ता और धर्मशितक होगा।"
गीग सेमिनरी के अध्यापक महाशय, मिस्टर फ्रेंच, भी यही
कहा करते थे कि एक दिन वह एक बडे समाज में वक्तृता
लडके भी यही कहते थे कि जिमी बहुत बडा
शिक्षक होगा। सब लोगो को मानो ऐसा विश्वास हो गया था
कि भगवान् ने उसको धर्मशिक्षा देने ही के लिए बनाया है।
गीग सेमिनरी में गर्मी की छुट्टी होने पर जेम्स घर लौट
गया और छुट्टी बिताने के लिए काम हूँढने लगा । अव की
पार गीग सेमिनरी का एक लडका उसके साथ काम करने
की इच्छा से आया था।
दोनों काम की सोज में निकले । जाते जाते एक किसान
से मुलाकात हुई और जेम्स ने उससे अपना मतलब कह सुनाया
और पूछा - "तुम्हें किसी आदमी की भी जरूरत है ?"
उम किसान ने पूछा-"तुम लोग क्या काम कर सकते
हो ? तुम लोग तो विद्यार्थी मालूम होते हो।"
जेम्स ने कहा -"हां, हम लोग विद्यार्थी हैं, और हम लोग
इसी तरह काम करके विद्या-उपार्जन करते हैं। जो काम आपका
जो चाहे हम लोगो को दीजिए, हम लोग उसे कर देंगे।"
किसान ने पूछा-"तुम लोग क्या वेतन लोगे ?"
-

--
--
१२८
गारफील्ड ।
इन बातो को सुन कर जेम्स बहुत खुश हुआ और उसने
कहा -"अन तो मैं देखता हूँ कि कालेज में पढना मेरे लिए
सम्भव मालूम होता है क्योकि मैं बहुत तरह के काम कर सकता
हूँ और काम करने में मैं न धकता हूँ, न ऊवता हूँ।"
फिर जेम्स ने पूछा-"कितने दिन में मैं बी० ए० पास
कर सकता हूँ और कितना मेरा सर्चा पडेगा ?"
विद्वान् ने कहा ---"चार वर्ष मे तुम वी० ए०, पास कर
सकते हो, और ४००) वार्षिक से कम मे किसी तरह सर्चा
नहीं चल सकता।"
जेम्स ने कहा - "मुझे वी० ए० पास करने मे कदाचित्
अधिक समय लगेगा क्योंकि मैं स्कूल में मास्टरी भी करूँगा
और कालिज मे भी पढूँगा, परन्तु यदि १२ वर्ष मे भी बी०
ए० पास कर सकूँ तो भी मैं विना पास किये न छोडूंगा।"
उसने और भी कई उपाय बतलाये जिससे जेम्स वहाँ
जरूर पढ सके। जेम्स ने भी कालेज में पढ़ने का दृढ सकल्प
कर लिया और इस कारण उसने लैटिन और ग्रीक दो भाषाये
सीसनी प्रारम्भ कर दी क्योंकि कालिज मे ये दो भापाये पढाई
जाती हैं।
उसी समय जेम्स ने “कृस्तान-धर्म-महा-मण्डल" मे अपना
नाम लिसाया और धर्म के विषय में उसने कई एक वक्तताये दी।
उसकी वक्तृतार्य ऐसी लुभावनी और युक्तिपूर्ण हुआ करती थीं
कि लोग दूर दूर से सुनने आया करते थे। तब से लोगो ने
--
-

किसान ने पूछा-"तुम लोग क्या वेतन लोगे" - . देगा। जी चाहे हम लोगो को दीजिए, हम लोग उसे कर दंगे।" अठारहवां परिच्छेद । १२६ भविष्य वाणी करना शुरू किया था कि जेम्स एक बहुत बडा वक्ता और धर्मशिक्षक होगा।" गोग सेमिनरी के अध्यापक महाशय, मिस्टर बेंच, भी यही कहा करते थे कि एक दिन वह एक बडे समाज में वकृता लडके भी यही कहते थे कि जिमी बहुत बडा धर्म- शिक्षक होगा। सब लोगो को मानो ऐसा विश्वास हो गया था भगवान ने उसको धर्मशिक्षा देने ही के लिए बनाया है। गीग सेमिनरी में गर्मी की छुट्टी होने पर जेम्स घर लौट गया और छुट्टी बिताने के लिए काम हूँढने लगा। अव की चार गीग सेमिनरी का एक लडका उसके साथ काम करने दोनों काम की खोज में निकले । जाते जाते एक किसान से मुलाकात हुई और जेम्स ने उससे अपना मतलब कह सुनाया और पूछा-"तुम्हें किसी आदमी की भी जरूरत है ?" उस किसान ने पूछा- "तुम लोग क्या काम कर सकते हो ? तुम लोग तो विद्यार्थी मालूम होते हो।" जेम्स ने कहा --"हाँ, हम लोग विद्यार्थी हैं, और हम लोग इसी तरह काम करके विद्या-उपार्जन करते हैं। जो काम आपका की इच्छा से आया था।

गारफील्ड ।
जेम्स ने कहा-"जितना आप ठीक समझेगे उतना ही
दीजिएगा।
किसान ने उनकी बात मान ली और वह उन लोगो को
खेत मे ले गया। खेत में तीन आदमी काम कर रहे थे। उन
आदमियो से किसान ने कहा-"ये दो लडके तुम्हारी महा-
यता करेंगे। तुम इनको काम बता दो, और इन से काम लो।"
जेम्स और उसके साथी ने काम करना शुरू किया और
उन्होंने चाहा कि उन तीन आदमियो को हरा दे । इस कारण
उन्होंने बहुत शीघ्रता से काम करना शुरू किया। उनका
मालिक भी वहीं सडा तमाशा देख रहा था। घटे भर वाद जक
उसने देसा कि उन आदमियो की अपेक्षा इन दो लडकों ने
बहुत काम किया है तब उसने चिल्लाकर कहा "रे काहिलो
घडी लज्जा की बात है कि दो वालको ने तुम तीनों को हेरा
दिया ।" उन लोगो ने इस बात पर कुछ भी ध्यान न दिया।
चुपचाप अपना काम करते रहे। किसान वहां से चला
-
दे
गया।
जब काम पूरा हो गया वय किसान ने सभी को दाम देन
के लिए बुलाया और जेम्स और उसके साथी से कहा
"लडको, तुम लोग कितना दाम लोगे ?"
जेम्स ने कहा -"जो कुछ आप ठीक समझे वही दीजिए।
उसने कहा-"तुम लोग प्रासिर लडके ही हो, इस कारण
तुम को लडको, का सा दाम मिलना चाहिए।"
,

"यह सब ठीक है, परन्तु दाम ते करते समय मैने पापम कहा था कि जो दाम आप ठीक समझेंगे वही दीजिएगा। किसान इस बात पर लज्जित हुआ और आदमियों की मी मजदूरी देकर उनको विदा किया। उन लोगों के जात ममय दो तो मुझे सपर देना मैं तुम्हारी वक्तृता सुनन आगा" या -"यदि तुम इस बीच म कार बनता कह कर उन दोनों को आशीर्वाद देकर किसान न विदा जेम्स ने अपने साथी से कहा-"हम बहुत भाग्यं मालूम हाता है कि क्यों लोग यह कहते हैं कि में बना या धर्म- उसके साथी ने कहा-"क्याकि वचन , कि तुम वक्तता देने के गुण उपस्थित हैं।" उस समय दासत्व निवारिणी सभासवान चारो ओर नित्य ऐसी सभाये अठारहवां परिच्छेद। १३१ जेम्स ने कहा -"लेकिन हम लोगों ने काम आदमियों का सा किया है, बल्कि उनसे भी ज्यादा। इसलिए दाम पाद- मियो का सा मिलना चाहिए।" "वाजे लडके आदमियो का सा काम करते हैं परन्तु वे नडके ही कहलाते हैं।" अव जो दाम आप दे रहे हैं क्या वह ठीक है। यदि आप ठीक समझे तो हमे लेने में कोई इनकार नहीं ।" . . लमने जेम्स से कहा किया 1. . शिक्षक होऊँगा।" में स्थापि यी

गारफील्ड।
१३२
-
जेम्स ने कहा
इस बात की कोशिश करते थे कि किसी प्रकार ससार से
दासत्व की प्रथा उठा देवें । गीग सेमिनेरी के शिक्षक और
विद्यार्थी गण भी इसी की चर्चा किया करते थे । एक दिन
-"बडे शर्म की बात है कि जिस देश के
लोगो ने ब्रिटेन-निवासियो की अधीनता से छूटने का इतना
प्रयत्न किया था वे ही लोग अपने देशवासियो पर इतना अत्या-
चार करें कि उनके अमूल्य जीवन को नीच दासत्व की
शृङ्खला में जकड के उनकी स्वाधीनता और सुस-सम्पचि सद
के लिए छीन लेवें। यदि दासत्व दूर न किया जाय ते
इस देश का कल्याण होना असम्भव है। यदि अब भी हम लोग
इस विषय पर ध्यान न दे तो फिर यह देश सदा के लिए
प्रज्ञान की गोद में पड़ा रहेगा।"
इससे यह मालूम होता है कि जेम्स लडकपन ही से दासत्व
की प्रथा से बडी घृणा रसता था।
तीन वर्ष तक गीग सेमिनेरी में पढ़ने के बाद जब जेम्स
स्कूल छोड कर घर लौटने को था उसी समय उस स्कूल के
वार्षिक प्रदर्शिनी होने वाली थी। उस प्रदर्शिनी में जेम्स ने एक
वक्तृता दी थी। स्कूल में वही उसकी अन्तिम वक्तता हुई। उE
को
सुन कर लोगों ने उसकी बडा प्रशसा की और बड़े
ने पाशीर्वाद दिया कि वह अपने भविष्य जीवन में प्रत्येक कार
में पूरी सफलता लाभ करे ।
स्कूल का पाठ समाप्त करके जेम्स घर गया। वहाँ पहुँ-
वक्तता

चात याद आई। परन्तु उसने कुछ कहा नहीं।
।
जेम्स राजी हो गया और मां-बेटे दोनों ने क्लोमलैण्ड के
अठारहवां परिच्छेद ।
कर देसा कि उसकी माता अपने किसी कुटुम्बी से मुलाकात
करने के लिए जाने की तैयारी कर रही है। इनके कई कुटुम्बी
'मस्किंगम नगर में रहा करते थे । आरेंज से मस्किंगम प्राय
३०-४० मील दूर था। जब जेम्स घर पहुंचा तब उसकी
माता ने कहा - "तुम भी हमारे साथ मस्किगम चलो । वहां
में तीन चार महीने रहूँगी। तुम अपने पढने की किताबें ले
चलो। उन्हे पढना और इसके सिवा यदि और कोई काम मिल
जेम्स ने खुश होकर कहा - मैं चाहता हूँ कि मैं तुम्हारे
साथ वहां जाऊँ और दूर दूर के मुल्को को देखू, परन्तु
कालिज मे पढने का विचार भी किया है और हमे उसके लिए
जन जेम्स की माता ने सुना कि जेम्स कालिज में पढना
चाहता है तब उसका हृदय आनन्द से गद्गद हो गया ।
उन्होंने कहा - "तुम वहां जाकर अपना समय व्यर्थ न खोना।
अपने पढने की किताबें ले चलो। वहां पढा करना । यदि कोई
काम मिल जाय तो उसे करना।"
जाय तो वह भी करना ।"
'बन्दोबस्त करना होगा।"
-
लिए यात्रा कर दी। लोभलैण्ड पहुँच कर जेम्स को उस जहाज
के कप्तान की बात याद आई । और, अपनी नहर की नौकरी की

-
१३४
गारफोल्ड ।
क्लोभलैण्ड से रेल पर जाना पड़ता था। जेम्स ने इसके
पहले रेल कभी न देखी थी। उसको रेल देख कर बहुत आनन्द
हुआ। रेल पर वे जाते जाते कोलम्बस पहुंचे। वहां पहुंच कर
जेम्स ने राजदरवार और सरकारी विचारालय देसे। उन्हे देख
कर उसका चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। वहां पर उसने यह भी
सीखा कि राज्य-शासन किसे कहते हैं और राज्य का काम कैसे
किया जाता है। उसने अपनी माता से एक दिन कहा
"मेरे
परम भाग्य थे कि मैं तुम्हारे साथ आया, नहीं तो इन सब बाते
को न देख पाता । एक महीना स्कूल पढाने से हमे जितना
प्रानन्द मिलता उससे बहुत अधिक आनन्द इनके देखने से हमें
मिला है।"
इन सब दृश्यो को देखते हुए मां-बेटे दोनो जेनेसवेली
पहुँचे । वहां से नाव भाडा करके वे मस्किगम पहुँचे । इनके
कुटुम्बी इनको देख कर बहुत खुश हुए ।
चार पांच दिन तक बडे आनन्द मे समय बिताने के बाद
जेम्स का चित्त काम करने के लिए व्याकुल हो उठा।
उसकी चची ने कहा -"तुम्हें यहां मास्टरी का काम
मिल सकता है। तुम्हारे चचा आवे तो तुम्हे वतावेंगे कि कहां
वह स्कूल है और किसके पास अर्जी भेजनी चाहिए।"
चचा ने जब पता बता दिया वर जेम्स ने एक अर्जी भेज
दी। अर्जी मजूर हो गई, और जेम्स ने २४) मासिक वेतन

उनीमा परिच्छेद।
१३
नदी वह अच्छी तरह झाड़ नहीं दे सकया । जेन्म ने उन दोनों
कामों को मढी सफाई में निवाहा ।
एक दिन उसके एक मावी ने कहा -"तुम पढने में
जितना परिश्रम करते हो झाडू देने में भी उतना ही परिश्रम
करते हो। इसका क्या कार? प्राय लइको का नियम
हाता है कि अच्छे काम में जितना परिश्रम करते हैं, नीच और
भरे काम में उतना नहीं करते।
-"तुम्हारे विचार बडं मदे हैं। हर आदमी
को चाहिए कि जिस काम को वह करे उमी को सफाई से करे,
चाहे वह कितनाही भद्दा क्यों न हो । भदा हो लेफिन बुरा काम
न हो, क्योंकि पुरा काम किसी को करना ही न चाहिए।"
उस साधी ने जेम्स की बात मान ली और अपनी हार
-
जेम्स ने कहा
खाकार की।
उस इलेक्ट्रिक इन्स्टीट्यूट में बहुत से विद्यार्थी पढा करते
थे। उनमें एक स्त्री भी पढ़ती थी जिसका नाम मिस यूध था ।
उसके साथ जेम्स फी घडी प्रोति थी क्योंकि वद्द लिखने-पढने में
बड़ी वेज थी और जेम्स से किसी किसी विषय में अधिक जानती
थी। जेम्स ने उस स्त्री से बहुत सहायता ली।

१३८
गारफील्ड।
सभापति महाशय ने पूछा -"अच्छा, हमें इस बार
कैसे पता लगे कि तुम झाडू देने और घटा बजाने
अच्छी तरह कर सकोगे "
जेम्स ने कहा -"मुझे आप दो हफते
देस लीजिए । अगर मैं कर सकू तो वाह
चुपचाप यहां से चला जाऊँगा।"
जेम्स की बात पर सब लोग प्रसन्न हु
कर लिया गया।
"थोडे ही दिनों में शिक्षको और
गया कि जेम्स एक असाधारण लडका
एक दिन उसने प्रिन्सिपल से
कृपा करके बता दीजिएगा कि मैं
मुझे अधिक लाभ हो "
प्रिन्सिपल ने कहा -"अभी
जाता है वही पढो । दूसरे साल
P
।
-

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जेम्स ने कहा में भर्ती J १३८ गारफील्ड । सभापति महाशय ने पूछा -"अच्छा, हमे इस बात का कैसे पता लगे कि तुम झाडू देने और घटा बजाने का काम अच्छी तरह कर सकोगे" -"मुझे आप दो हफते तक परीक्षा करके देख लीजिए । अगर मैं कर सकूँ तो वाह वाह और नहीं तो मैं चुपचाप यहां से चला जाऊँगा।" जेम्स की बात पर सब लोग प्रसन्न हुए। वह स्कूल कर लिया गया। "थोडे ही दिनों में शिक्षको और विद्यार्थियो को मालूम हो गया कि जेम्स एक असाधारण लडका है।" एक दिन उसने प्रिन्सिपल से कहा कृपा करके बता दीजिएगा कि मैं कौन सा कोर्स पहूँ, जिससे मुझे अधिक लाभ हो ?" "अभी तो जो कोर्स स्कूल में पढाया जाता है वही पढो । दूसरे साल देखा जायगा कि कौन मा कोर्स तुम्हें दिया जाय ।" घटा बजाने का काम किसी काहिल और सुस्त लडके के लिए बहुत कठिन काम था क्योंकि उस काम में एक मिनट इधर उधर होने से सारे काम बिगढ जाने की सम्भावना थी ! झाड देना भी कोई सहल काम नहीं है क्योंकि उसमें सफाई का ध्यान रहना चाहिए। जिस आदमी के चित्त मे सफाई का ध्यान क्या आप मुझे प्रिन्सिपल ने कहा -

-
-
उन्नीसवां परिच्छेद।
१३६
नहीं वह अच्छी तरह झाडू नहीं दे सकता । जेम्स ने उन दोनो
कामों को बड़ी सफाई से निबाहा ।
एक दिन उसके एक साथी ने कहा -"तुम पढने में
जितना परिश्रम करते हो झाडू देने में भी उतना ही परिश्रम
करते हो । इसका क्या कारण है ? प्राय लडको का नियम
होता है कि अच्छे काम में जितना परिश्रम करते है, नीच और
'भद्दे काम में उतना नहीं करते।"
जेम्स ने कहा -"तुम्हारे विचार बड़े भद्दे हैं। हर आदमी
को चाहिए कि जिस काम को वह करे उसी को सफाई से करे,
चाहे वह कितनाही भद्दा क्यो न हो । भद्दा हो लेकिन बुरा काम
न हो, क्योंकि बुरा काम किसी को करना ही न चाहिए।"
उस साधी ने जेम्स की बात मान ली और अपनी हार
खीकार की।
उस इलेक्ट्रिक इन्स्टीट्यूट में बहुत से विद्यार्थी पढा करते
थे। उनमें एक स्त्री भी पढती थी जिसका नाम मिस बूथ था ।
उसके साथ जेम्स को बड़ी प्रीति थी क्योंकि वह लिखने-पढने में
बड़ी तेज थी और जेम्स से किसी किसी विषय में अधिक जानती
थी। जेम्स ने उस स्त्री से बहुत सहायता ली।
एक साल तक दरवान का काम करने के बाद जेम्स की
तरक्षी हुई और वह उस विद्यालय का शिक्षक बनाया गया । वह
इस स्कूल में किसी किसी दर्जे को पढाया करता और स्वय भी

।
-
१४०
गारफील्ड।
पढा करता था । उसी समय उपरिलिखित मिस बूथ
मित्रता हुई।
मिस बूथ पहले पहल जेम्स से दर्जे में कुछ बढी हुई थी
परन्तु थोडे दिनों में जेम्स उसके साथ होगया और दोनों साथ
पढने लगे। दोनों एक दूसरे की सहायता पाते और पढने की
उन्नति करते थे।
एक दिन प्रिन्सिपल साहव ने जेम्स को व्याख्यान लिसने के
लिए कहा । आज्ञा पाते ही जेम्म तुरन्त मिस यूध के कमरे में
गया और कहने लगा-"मैं आपकी सहायता चाहता हूँ।"
मिस बूथ ने पूछा
"किस काम में सहायता मांगते हो?
मैं देने को राजी हूँ।"
"एक व्याख्यान लिखने में।"
वह राजी हो गई । दोनों मिल कर उस व्याख्यान को
लिसने बैठे। उस विषय का व्याख्यान बनाने और लिखने में दोनों
"इतने डूबे हुए थे कि उनको समय का कुछ भी सयाल न था।
लिखते लिखते सारी रात बीत गई। अन्त मे जब प्रात कालीन
सूर्य की किरणों की सुनहरी छटा कमरे के झरोखों से झांकने
लगी तब दोनों चौक उठे और देसा तो सबेरा हो गया था। दोनों
प्रात क्रिया समाप्त करके फिर लिसने बैठे और लिसना समाप्त
करने के बाद भोजन आदि किया।
जेम्स को अपने धर्म मे बहुत बडा अनुराग था। इस कारण
हिराम के पादरी साहव जब कभी कोई व्याख्यान देते तभी
+
-

उसको जाने दो। वह लडका अवश्य ही किसी न किसी दिन उन्नीसवां परिच्छेद। १४१ जेम्स को अपने पास बुला लेते और कभी कभी उससे भी कोई कोई वक्तता दिलाते थे। जब कभी पादरी महोदय गांव मे उपस्थित न रहते थे तब वे जेन्स ही को अपना आसन ग्रहण करने के लिए निमन्त्रण करते और जेम्स भी उस काम को बहुत अच्छी तरह निवाहता था । सुनने वाले बहुत प्रसन्न होते और पादरी साहब भी बहुत मानन्दित होते थे। एक दिन पादरी साहब उससे व्याख्यान दिलाने के लिए उसे गिर्जे मे ले गये थे, और जिस समय पादरी साहव व्याख्यान दे रहे थे उसी समय कई आदमियो ने आकर जेम्स को पकड "आप कृपा करके हम लोगो की सभा मे एक राष्ट्रीय वक्तृता देने को चलिए क्योकि आज वहां के व्याख्यान- दाताओं की चेष्टा निष्फल हो रही है और लोग असन्तुष्ट होकर उठ उठ कर चले जा रहे हैं।" विना कुछ कहे जेम्स उठ सडा हुआ और उन लोगो के साथ चल दिया । जब कई सीढी उतर गया तर पादरी साह्य ने देखा और कहा -"जेम्स, मत जाओ, लौट आयो।" फिर क्या सोच कर उन्होंने श्रोताओं की ओर फिर कर कहा-"सैर कर कहा - 'युनाईटेड स्टेट्स का प्रेसीडेन्ट' * होगा।" -जेम्स जिस समय चेस्टर के गीग सेमिनेरी में पढता था * युनाईटेड स्टेट्स के राजा को प्रेसीडेन्ट कहते हैं ।

१४२
गारफील्ड।
उस समय एक लडकी वहां पढती थी जिसका नाम ल्युकि-
शिया रुडाल्फ था । वह बडी नेक और बुद्धिमती थी। लिसने-
पढने में भी वह बडी तेज थी। जेम्स उस लडकी की नम्रता,
भद्रता और बुद्धिमत्ता की वडी प्रशसा किया करता था। जब
जेम्स हिराम के विद्यालय में शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ', का
काम करता था उस समय उस लडकी के माता-पिता हिराम में
आये थे जिसमे कि उस लड़की को अच्छी शिक्षा दे सके ।
ल्युक्रिशिया रुडाल्फ ने इसी इलेक्ट्रिक इन्स्टीट्यूट में नाम
लिसाया। जेम्स भी एक ऐसे तेज विद्यार्थी को पाकर बहुत
खुश हुआ। वह उसको लैटिन और ग्रोक पढाया करता था
और उसको उसके पाठ में बहुत सहायता करता था। उस
समय जेम्स यह न जानता था कि उससे और उस लडकी से
गुरु-शिष्य का सम्बन्ध छोड कर और भी कोई सामारिक
सम्बन्ध होगा या नहीं । परन्तु जब जेम्स ने स्कूल छोडा उस
समय उस लडकी ने कहा - "जब तुम कालिज की पढाई समाप्त
करके कोई नौकरी पाओगे तब मैं तुमसे विवाह करूँगी ।"
गुणवती मिस ल्युक्रिशिया रुडाल्फ के अनुपम सौन्दर्य ने
जेम्स के हृदय पर अधिकार जमा लिया। लोग इस अधिकार
को असामयिक अधिकार समझ कर यह प्राशङ्का किया करते
थे कि कदाचित् जेम्स के लिसने-पढने की यही इतिश्री न हो
जाय । उनका ऐसा सोचना अनुचित न था क्योकि प्राय
देखने में आता है कि यदि छात्रावस्था में कोई विद्यार्थी प्रेम के

।
उन्नीसवां परिच्छेद।
१४३
बन्धन में बंध जाता है तो उसका लिखना-पढना चौपट हो
जाता है, परन्तु जो लोग ऐसा सोचा करते थे उनको जेम्स की
चित्त-वृत्ति और सकल्प-सिद्धि का पूरा पूरा हाल मालूम न था।
प्रेम-शून्य-हदय निर्जीव जड पदार्थ के तुल्य है। जेम्स के जड
शरीर में जब मिस रुडाल्फ की प्रेमरूपी जीवनी शक्ति पैठ गई
तब उसका शून्य हृदय सिल गया और उसने अपनी जिम्मेदारी के
भार को पूरी तौर से समझ लिया। उस जीवनी शक्ति के
उकसने से जेम्स दिन पर दिन उन्नति करता रहा और दो ही
वर्ष में कालिज़ का पाठ समाप्त कर लिया ।
एक बार जून के महीने में जब स्कूल में एक मही की छुट्टी
हुई तब सब लड़को ने मिल कर रुडाल्फ जाना चाहा जो कि
२५ मील दूर था। जेम्स भी उनके साथ था । वह सब लडको
को इसाता खिलाता जाता था, और सभी को तरह तरह के
किस्से, बडे लोगो की जीवनी और तरह तरह की कवितायें
सुनावा हुआ मार्ग का परिश्रम दूर करता हुआ जाता था। इन
सन कारणों से सब लोग उसको प्यार करते थे ।
एक वार ऐसा हुआ कि छोभलैण्ड का रहने वाला एक वकील
हिराम में आकर रहने लगा। वहुत दिनों तक वहां रहने से
। परिवार के लोगो से भेंट नहीं हुई थी । इस कारण घर के लिए
उसका मन बहुत घबराया हुआ था। वह लिखता है -"जब
मेरा जी बहुत घबराया हुआथा, उस समय में एक दिन इलेक्ट्रिक
इन्स्टीट्यूट देखने के लिए गया। वहां पहुंच कर मैंने देखा कि

--
१४४
गारफील्ड।
जेम्स ने कहा
1
एक जवान आदमी एक दर्जे मे वीजगणित पढा रहा था। वह
मेरी शोचनीय अवस्था देख कर मेरे पास आया और मेरे कन्धे
पर हाथ धर कर मेरा हाल पूछने लगा। मेरे कन्धे पर उसके
हाथ रखते ही मेरी व्याकुलता दूर हो गई।":
इलेकट्रिक इन्स्टीट्यूट मे पढना समाप्त होने के बाद प्रिन्सि-
पल साहब ने एक दिन जेम्स से पूछा. -"क्या तुम बेधनी
कालिज में पढोगे ?"
-"पहले हमारा यही विचार था, परन्तु अब
मैं सोचता हूँ किसी और कालिज मे पहूँ।"
प्रिन्सिपल के कारण पूछने पर जेम्स ने कहा-"वेधनी
कालिज की पढाई बहुत थोडी होती है।"
"तो तुम अधिक विद्या पढना चाहते हो ?"
"वेधनी कालिज हमारी ही मण्डली के
लोगो ने स्थापित किया है, और मैं चाहता हूँ कि अपनी मण्डली
के बाहर क्या है, उसको भी सीखू और विद्या भी कुछ अधिक
पर्दू और तीसरा कारण यह है कि बेथनी कालिज के लोग
दासत्व के बड़े पक्षपाती हैं । इन्दो तीन कारणों से मैं चाहता
हूँ कि न्यू इंगलैण्ड के किसी कालिज मे पहूँ ।"
"तुमने न्यू इंगलैण्ड के किस कालिज में पढ़ने का विचार
किया है ?"
"मैंने अभी ठीक तौर से स्थिर नहीं किया कि किस कालिज में
पढूंगा, परन्तु में वहां के तीन बडे बडे कालिजों को लिखनेवाला
जेम्स ने कहा
-
।

उन्नीसवां परिच्छेद।
१४५
हूँ। वहां से जवाब मिलने पर मैं बता सकता हूँ कि मैं किस
कालिज में पढूंगा और कितने दिन मुझे पढना पडेगा।"
जेम्स ने तीनो कालेजो के प्रिन्सिपलों को चिट्ठी लिख दी।
थोडे दिनों में सब कालिजों से जवाव आ गया। सब लोग
उसे अपने यहां लेने को राजी थे और सभी को यही राय थी
कि दो वर्ष में वह कालिज की पढाई समाप्त कर लेगा।
विलियम कालिज के प्रिन्सिपल, डाकूर हापकिन्स ने जेम्स
को लिसा था - "तुम यहां आओ और तब मैं तुम्हारे
लिए जो कुछ कर सकता हूँ, करूँगा।"
जेम्स उस चिट्ठी को पढ कर बहुत खुश हुआ और उसने
विलियम्स कालिज ही जाने का विचार किया।
विलियम्स कालिज जाने के दो तीन हफ पहले जेम्स के
भाई ने उससे पूछा -"तुमने विलियम्स कालिज में पढने के
लिए रुपये का क्या बन्दोबस्त किया है ?"
-"रुपये का कुछ बन्दोबस्त तो नहीं किया
है, परन्तु मैंने सोचा है कि वहां भी कोई काम करूँगा और उस
काम को करके जो रुपया कमाऊँगा उसीसे अपने पढने का सर्व
जेम्स ने कहा
चलाऊँगा।"
उसके भाई ने कहा -"तुम्हें वहां काम करने की फुरसत
नमिलेगी।
जेम्म ने कद्दा
-"स्कूल में पढ़ाने का काम करके दो पाई
बई का काम करके हो, जैसे हो, मैं जरूर रुपया कमाऊँगा।"

।
-
१४६
गारफील्ड ।
भाई ने कहा--"तुम मुझसे कुछ रुपया उधार लो,
और
उनसे अपने पढने का खर्चा चलाओ।"
"उधार लेना तो बडी बात नहीं है, परन्तु चुकाऊँगा कैसे
और कब "
"जब तुमसे देते बने तभी दे देना।"
जेम्स ने कहा.-"यदि देने के पहले मैं मर जाऊँ तो, क्या
होगा।
"वह नुकसान तो मेरा होगा।"
"नहीं मेरे लिए तुम्हारा नुकसान क्यो हो । परन्तु यदि तुम
मुझे रुपया दिया ही चाहते हो तो मैं एक उपाय कर सकता
हूँ। मैं हजार रुपये का अपना जीवन बीमा करा लूँ। अगर मैं
मर जाऊँ तो वह रुपया तुम्हें मिल जायगा और यदि जीवित
रहा तो मैं स्वय ही तुम्हारा रुपया अदा कर दूंगा।"
इस बात पर भाई राजी हो गया और जेम्स ने अपना जीवन,
धीमा १०००) का करा लिया ।
-

-
डेंट साहब को बडा आश्चर्य हुआ। वे अपने मन में कहने लगे
वीसवॉ परिच्छेद
लियम्स कालेज में गर्मी की छुट्टो समाप्त हो चुकी
वि थी और कालिज खुलने पर नये लडके भरती
किये जा रहे थे। जेम्स भी ठीक समय पर वहां
पहुँचा और डाक्टर हापकिन्स से मिला और
अपना नाम-धाम बताया।
यह कहा जा चुका है कि जेम्स गारफील्ड वहुव ही सादी
चाल-ढाल से रहता था। पढने-लिखने के सामने उसको अपने
खाने-पीने और कपडे-लत्ते का किसी प्रकार का भी शौक न
था। जब वह जेम्स हापकिन्स से मिलने गया तर भी वह वही
साधारण फटे-पुराने कपडे पहने हुए था। उसके बलिष्ठ शरीर,
गॅवारों का सा चेहरा और फटे-पुराने कपडो को देस कर प्रेसी-
कि "जिसकी भाषा मे इतना माधुर्य, इतना लालित्य है उसकी
वादरी वनावट कुछ भी नहीं।"
जेम्स ने अपनी भरती के लिए जो पत्र प्रेसीडेंट साहय को
लिखा वह अत्यन्त सुललित भाषा में लिया गया था। उसको
पद कर प्रेसीडेंट साहब का चित्त भाकर्पित हो गया था और

१४८
गारफील्ड।
इसी कारण उन्होंने लिखा "कि यदि तुम यहां आओ तो. जो
कुछ मैं तुम्हारे लिए कर सकता हूँ खुशी से करूँगा ।" फिर
प्रेसीडेंट साहब ने सोचा कि यह लडका शौकीनी करने मे उतना
समय नहीं विताता जितना कि वह अपने लिसने-पढने में
विताता है।"
उस समय विद्यार्थियो को भरती करने के लिए परीक्षाये
हो रही थीं। जेम्स की भी परीक्षा ली गई। उसने उस परीक्षा
को बहुत अच्छी तरह पास किया और वह कालिज में भरती
कर लिया गया। उसको जूनियर वास के विद्यार्थियों के
साथ पढना पड़ा। अमरीका के कालेजो में चार वर्ष पढाई
होती है। तीसरे वर्ष का नाम जूनियर छास और चौथे या
अन्तिम वर्ष का नाम सीनियर क्लास था। सीनियर क्लास
पास करने से ग्रेजुएट ( Graduate ) की पदवी मिलती है।
जेम्स इसी पदवी को प्राप्त करने के लिए वहां गया था।
उस कालेज में एक बहुत पड़ा पुस्तकालय था । डाक्टर हाप
किन्स ने एक दिन जेम्स से कहा - "यदि गर्मियों की छुट्टी में
तुम अपने घर या और कहीं न जाओ तो तुम्हारे लिए यह
पुस्तकालय खुला रहेगा और जो पुस्तक तुम्हारा जो चाहे पढ़
सकते हो । सिर्फ यही नहीं बल्कि कालेज खुले रहने पर भी जो
पुस्तक चाहो तुम पढ़ सकते हो।"
उस समय जेम्स को अपना सर्चा चलाने के लिए रुपयों
को चिन्ता न करनी पड़ती थी, क्योंकि उसके सत्र के लिए

--
को विना समझे छोडता नहीं और कभी किसी प्रश्न का उत्तर
बीसवां परिच्छेद ।
१४६
उसका भाई उसे रुपये दिया करता था। इस कारण गर्मियो
की छुट्टियो में उसने खूब जी लगा कर पढा ।
बहुत दिन से उसकी इच्छा थी कि वह शेक्सपियर के सारे
अन्ध पढजाय परन्तु अवसर न मिलने के कारण उसकी इच्छा
मन ही मन मे रह गई थी। यहां कालेज के पुस्तकालय
में उसने शेक्सपियर के कुल ग्रन्थो को अच्छी तरह पढ लिया।
उन अन्थों को उसने कई बार पढा और बड़े ध्यान से पढा।
यहां तक कि उसकी बहुत सी कविताये उसने कण्ठ कर
ली थी। जब तन वह उन्हे दोहराता और अपने साथियो
को खुश करता था।
यहाँ जेम्स को बढई या खेती का काम न करना पड़ा। इस
कारण उसे और किसी प्रकार के व्यायाम की आवश्यकता
'हुई । सामने ही एक बहुत ऊँचा पहाड आकाश की ओर सिर
उठाये हुए सडा घा। पहाड के ऊपर जङ्गल और जङ्गलों के
वीच में कहीं कहीं झरने भी थे। उन्हीं की शोभा देखने के
लिए जेम्स शाम के वक्त वहां जाया करता और पहाड की
उतराई चढाई पर निर्मल स्वच्छ वायु का सेवन किया करता था।
जेम्स के भरती होने के घोडे दिन बाद दो विद्यार्थी उसके
विषय में आलोचना कर रहे थे । एक ने कहा-"मैं देखता
हूँ कि जेम्स बहुत होशियार लडका है, वह कभी किसी विषय
देने में घूफता नहीं।"

--
१५०
गारफील्ड।
दूसरे ने कहा:--"उसका कारण यह है कि वह प्रत्येक
विषय को अच्छा तरह जानता है। एक बार उसने मुझे बताया
था कि कैसे वह अपने पाठो को पढा करता है। यदि कमा
किसी विषय को वह समझता नहीं तो वह उसमें पिल जाता है
और बिना समझे उसे नहीं छोडता। उसका नतीजा यह है कि
आज वह हमारे कालिज में सबसे ज्यादा पढा हुआ लडका है।
"हां, तुम ठीक कहते हो । सनीचर के दिन उसकी बहस
सुन कर सबको मालूम होगया था कि वह बहुत पढा हुआ
लडका है।"
"वह बहस भी खूब कर सकता है और वक्तृता भी अच्छी
दे सकता है। ऐसा मालूम होता है कि वह जन्म हा से वक्ता
है। मैं तुमसे उसके विषय मे भविष्यवाणी कह सकता हूँ कि
थोडे ही दिनो मे वह इस कालेज के सब विद्यार्थियो से, बढ
जायगा और सवका शिरोभूषण बन बैठेगा।"
उन लडको का विचार ठीक ही निकला । क्योंकि २५ वर्ष
के बाद उसके एक साथी ने लिसा है कि "एक क्लास जिसमें
प्राय ४० विद्यार्थी पढा करते थे उसमे वह तुरन्त सभी से हर
विषय में आगे बढ गया और विशेषत लिसने, बोलने और
वहस करने में कोई उसकी बराबरी न कर सकता था। उसमें
विशेष गुण यह था कि प्रत्येक विषय के गृढ तत्वों का वह
अनुसन्धान किया करता था और उन से एक नया, मतलब
निकाला करता था जो मतलव साधारण लिखने-पढने वाले,नहीं
,

घोसवां परिच्छेद। निकाल सकते । इस कारण उसके लेस सब विचारयुक्त और ज्ञानपूर्ण हुआ करते थे। उसमे एक गुण यह भी था कि यद्यपि वह इवना पढता था परन्तु तो भी वह पुस्वको का कीडा नहीं बना रहता । बल्कि वह बडा मिलनसार, प्रफुल्ल-चित्त और आमोदप्रिय लडका था। उसकी बातों में ऐसी मोहनी शक्ति थी कि जन कभी वह किसी से बाते करता तब उसका मन मोह लेता और वह उसका साथ न छोड सकता था।" जेम्स ने हिराम में लिसने-पढने में बहुत परिश्रम किया। उसका फल यह हुआ कि उसने ६ वर्ष की पढाई तीन ही वर्ष में समाप्त कर ली। यहां कालेज में भी आकर उसने परिश्रम करना शुरू किया। उसने यहां जर्मन भाषा सीसी और साल भर में इतनी सीस ली कि वह उस भाषा में अच्छी तरह पात- चीत करने लगा। जब कालेज में छुट्टी हुई तब उसके एक साथी ने उससे एक दिन पूछा -"जेम्स, तुम अव की छुट्टी मे क्या करोगे ?" -"मैंने अभी कुछ स्थिर नहीं किया है कि क्या करूँगा, परन्तु मैं सोचता हूँ कि लिसना सिखाने की एक शाम जारी करूँ। तुम्हारी क्या राय है ? यहां यह काम जेम्स ने कहा , चलेगा " उस मित्र ने कहा - अवश्य ही चलेगा। तुम इस बात का चारो ओर प्रचार कर दो। लडके माप से आप प्रा जायेंगे।"

।
१५२
गारफाल्डा
जेम्स ने वैसा ही किया और लिसना सिखाने की एक
लास सोल दी । इस काम के करने से उसकी छुट्टी भी अच्छा
तरह बीती और कुछ रुपये भी उसको मिल गये ।
कालिज से ६ मील दूर एक गिर्जा था जहां के पादरी
साह्य जेम्स का धर्मानुराग देस कर उससे बहुत प्रसन्न थे।
एफ वार सैवेथ के दिन उन्होंने जेम्स को अपना आसन ग्रहण
करने को दिया और उस दिन जेम्स ही से वक्तृता दिलाने का
अनुरोध किया। जेम्स ने स्वीकार कर लिया और अपने उसी
मधुर कण्ठ स्वर और सुललित भाषा में उसने व्याख्यान दिया।
लोग सुनकर बडे प्रसन्न हुए और उन्होंने फिर उससे व्याख्यान
देने के लिए प्रार्थना की।
वहां के स्कूलों के बहुत से शिक्षको और प्रतिनिधियों से
जेम्स की जान-पहचान हो गई थी। एक बार मिस्टर ब्रुक्स ने,
जो कि वहां के किसी सर्कारी स्कूल के प्रतिनिधि थे, जेम्स से
कहा -"क्या तुम हमारे स्कूल में नौकरी करोगे ? हम तुम्हे
चार सौ रुपये देंगे?"
"नौकरी करने से हमें कालिज छोडना
जेम्स ने कहा
पडेगा।"
उन्होंने कहा
"कालेज तो तुम्हें जरूर ही छोडना होगा।
लेकिन मैं समझता हूँ कि यह काम तुम्हारे लिए अच्छा'
होगा।"

-
यीसवां परिच्छेद।
१५३
जेम्स ने कहा-"आपकी नौकरी करने के लिए मुझे
लोभ तो अवश्य ही होता है.क्योंकि उम नौकरी के करने से मैं
अपना सारा भूण एकदम चुका सकता हूँ परन्तु ऐसा करने
से हमारे जीवन का उद्देश सफल न होगा। मैं यहां प्रेजुएट
धनने के लिए आया हूँ। वह काम असम्पूर्ण रह जायगा। यह
ठीक नहीं, और फिर इसके सिवा एफ घात यह है कि मैंने
हिराम छोडते समय वहां के कर्ताओं से कहा था कि कालिज
का पाठ समाप्त करने के बाद में प्रापही के स्कूल मे लौट
प्राऊँगा और यहां पढाऊँगा । मैं जानता हूँ कि मुझे वहां
इतने रुपये न मिलेंगे जितने कि आप देते हैं तथापि मैं वहां
जाना चाहता हूँ। उसका कारण यह है कि एक तो मैंने वहाँ
जाने की प्रतिज्ञा की है और दूसरे यह कि वह एक नया स्कूल
है। उसकी उन्नति कराना हमारा धर्म है क्योंकि वहां से हमने
यहुत कुछ सीसा है
मिस्टर ब्रुक्स ने कहा-“खैर, आप इस बात को सोचि-
एगा और तब मुझे इसका जवाब दीजिएगा। जल्दी की कोई
जरूरत नहीं है।
जेम्स ने कहा --"मैं आपको धन्यवाद देता हूँ कि आप मेरी
अवस्था पर इतनी सहानुभूति रसते हैं और मैं ईश्वर से प्रार्थना
करता हूँ कि आपका स्कूल सूव उन्नति फरे । परन्तु बडे
अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि मैं आपके में
-

, - - १५२ गारफाल्ड। जेम्स ने वैसा ही किया और लिखना सिखाने की एक शास खोल दी । इस काम के करने से उसकी छुट्टी भी अच्छा तरह बीती और कुछ रुपये भी उसको मिल गये । कालिज से ६ मील दूर एक गिर्जा था जहाँ के पादरी साहप जेम्स का धर्मानुराग देख कर उससे बहुत प्रसन्न थे एक बार सैबेथ के दिन उन्होंने जेम्स को अपना आसन ग्रहण करने को दिया और उस दिन जेम्स ही से वक्तृता दिलाने का अनुरोध किया। जेम्स ने स्वीकार कर लिया और अपने उसी मधुर कण्ठ स्वर और सुललित भाषा में उसने व्याख्यान दिया। लोग सुनकर बडे प्रसन्न हुए और उन्होंने फिर उससे व्याख्यान देने के लिए प्रार्थना की। वहाँ के स्कूलों के बहुत से शिक्षको और प्रतिनिधियो से जेम्स की जान-पहचान हो गई थी। एक बार मिस्टर बुक्स जो कि वहां के किसी सर्कारी स्कूल के प्रतिनिधि थे, जेम्स से कहा -"क्या तुम हमारे स्कूल में नौकरी करोगे ? हम तुम्हे चार सौ रुपये देंगे?" जेम्स ने कहा -"नौकरी करने से हमें कालिज छोडना । पडेगा।" उन्होंने कहा-"कालेज तो तुम्हें जरूर ही छोडना होगा। लेकिन मैं समझता हूँ कि यह काम तुम्हारे लिए अच्छा होगा।" ५ - --

वीसवां परिच्छेद।
१५३
जेम्स ने कहा-"आपकी नौकरी करने के लिए मुझे
लोभ तो अवश्य ही होता है क्योंकि उस नौकरी के करने से मैं
अपना सारा ऋण एकदम चुका सकता हूँ परन्तु ऐसा करने
से हमारे जीवन का उद्देश सफल न होगा । मैं यहां ग्रेजुएट
बनने के लिए आया हूँ। वह काम असम्पूर्ण रह जायगा। यह
ठीक नहीं, और फिर इसके सिवा एक बात यह है कि मैंने
हिराम छोडते समय वहां के कर्ताओं से कहा था कि फालिज
का पाठ समाप्त करने के बाद मैं आपही के स्कूल मे लौट
आऊँगा और यहां पढाऊँगा । मैं जानता हूँ कि मुझे वहाँ
इतने रुपये न मिलेंगे जितने कि आप देते हैं तथापि मैं वहां
जाना चाहता हूँ। उसका कारण यह है कि एक तो मैंने वहां
जाने की प्रतिज्ञा की है और दूसरे यह कि वह एक नया स्कूल
है। उसकी उन्नति फराना हमारा धर्म है क्योकि वहां से हमने
बहुत कुछ सीखा है।
मिस्टर
बुक्स
ने कहा-"सैर, आप इस बात को सोचि-
एगा और तब मुझे इसका जवाब दीजिएगा। जल्दी की कोई
जरूरत नहीं है।"
जेम्स ने कहा
"मैं आपको धन्यवाद देता हूँ किपापी
अवस्था पर इतनी सहानुभूति रखते हैं और मैं ईश्वर से प्रार
करता हूँ कि आपका स्कूल सूब उन्नति फरे । मान गई
अफसोस के साथ कहना पडता है कि मैं आपको बत

M- 4 १५४ गारफील्ड। समय नहीं पढा सकता । मैंने स्थिर कर लिया है । तुझे चम् कीजिए।" उस समय जेम्स का भाई जिसने उसको रुपया उधार दें की प्रतिज्ञा की थी वह कुछ विपत्ति में पड़ने के कारण रुपय न दे सकता था, और उसके ऊपर ऋण भी बहुव चद गया था इसलिए ऐसी अवस्था में उस नौकरी को स्वीकार न करने में उसने बडो वीरता दिखाई क्योंकि नौकरी कर लेने से उसको रुपया तो मिल जाता परन्तु उद्देश सिद्ध न होवा, हम लोग जानते हैं कि जेम्स के पास कपड-लत्त बहुर थोडे थे और वे भी सब फटे हुए थे । अव उसको एक कोट और पतलून की वडी जरूरत हुई । लेकिन उसके पास रुपया न था कि उससे कोट-पतलून धनवाये । इस कारण उसके एक मित्र ने एक दिन एक दर्जी से कहा -"मिस्टर हेसकेल,हमारे कालेज में एक बहुत गरीब लडका है। वह वडा तेज लडका है और बहुत ईमानदार है। लेकिन उसके पास कपडे-लत्ते कुछ भी नहीं हैं। क्या तुम उसकी कुछ सहायता कर सकते हो ?" दर्जी ने कहा -"मैं जरूर उसके लिए कपडे बना दूंगा। आप उसे मेरे पास भेज दीजिएगा" दूसरे दिन जेम्स दर्जी से मिलने गया और अपना सारा हाल कह सुनाया। और कहा.-"आप यदि मेरा कपडा बना दें तो मैं आपका दाम जितना जल्दी हो सके चुका दूँगा। परन्तु मैं ठीक ठीक नहीका कि 1.

।
.
बीसवां परिच्छेद।
१५५
दर्जी बडा नेक आदमी था। उसने कहा-"इसके लिए
आप कुछ चिन्ता न कीजिए । जब आपके पास रुपया हो और
जय आपको कोई दूसरा खर्चा करने की जरूरत न हो उस
वक्त मुझे दीजिएगा।"
दर्जी ने कोट-पतलून तैयार कर दिया ।
फालेज में छुट्टी हो गई । एक वर्ष बाद. वह अपनी माता
से मिलने के लिए घर गया। माता-पुत्र का मेल कैसा हुआ,
पाठक महाशय स्वय ही अपने अपने विचारानुसार इसका
निर्णय कर लें, क्योकि भाषा में इतनी शक्ति नहीं है कि उस
भेंट का दृश्य वर्णन करे । छुट्टियों के बाद जब जेम्स फिर
कालेज लौट आया तन उसने देखा कि ऋण के भार से वह
चारों ओर से लदा हुआ है और रुपया मिलने का कोई उपाय
नहीं देस पडता। ऐसी दशा में उसको उस डाकूर राविनसन
का सयाल आया जिसने उसको इमतिहान करके बताया था
कि तुम खूब पढो और सूब काम करो। याद आने पर उसने'
उनको एक पत्र लिखा ताकि वे कुछ रुपये दे । उसने यह भी
पत्र में लिस दिया था कि उसने १००० रुपये का जोनननीमा
किया है और कालेज से निकलने पर हिराम में नौकरी मिलने
को आशा है क्योंकि उन लोगो ने वादा किया है । इसके
लिखने का मतलब यह था कि यदि डाकृर रानिनसन रुपया
दे तो उनको मालूम हो जाय कि उनका रुपया मारा न
जायेगा।
-
।
.
-

4
।
१५६
गारफील्ड।
डाकर राविनसन ने चिट्ठी पाते ही जेम्स को कुछ रुपया
भेज दिया।
रुपया पाते ही उसने अपना सब ऋण चुका दिया और
बाकी रुपया अपने सर्चे के लिए रस लिया।
ठीक उसी समय पारलियामेण्ट महासभा मे दासत्व के
विरुद्ध बडे जोर-शोर से तर्क-वितर्क हो रहा था और बडे बडे
लेस लिसे जाते थे । मिस्टर चार्ल्स समर इस हलचल
के नेता थे । वे पारलियामेण्ट और खुले मैदानों में इसी विषय
पर व्याख्यान दिया करते थे जिससे दासत्व की प्रथा इस देश
से उठ जाय । मिस्टर प्रेस्टनब्रुक इस सयाल के घडे विरोधी
थे। वे चाहते थे कि दासत्व-प्रथा बनी रहे। इस कारण
वे मिस्टर चार्ल्स पर बहुत घृणा रसते थे । जिस समय,
मिस्टर चार्ल्स समर की वक्तताओं का जोश देश मे चारो,
ओर फैला हुआ था उस समय मिस्टर ब्रुक्स ने चाहा कि
मिस्टर चार्ल्स समर को किसी तरह मार डाले । इस कारण
एक दिन जब मिस्टर चार्ल्स समर पारलियामेण्ट मे बैठे हुए कुछ
लिस रहे थे उसी समय ब्रुक्स ने उन्हे एक ढेला फेंक कर मारा
इस खयाल से कि उन्हें एक दम मार ही डाले । उसका मनोरथ
पूरा भी हो जाता, लेकिन ईश्वर ने बचा दिया।
जब यह सनर विलियम्स कालिज मे पहुँची तब वहां के
विद्यार्थी मारे गुस्से के आगबबूला हो गये। विद्यार्थियों ने

घीसवां परिच्छेद।
१५७
मिल कर सभा की जिसमें जेम्स वा नियत किया गया। जेम्स
ने मिस्टर ग्रंक्स फी नीचता पर ऐसी जोर-शोर और कडाके की
वालवा दी कि उसकी प्यास के विद्यार्थी, अध्यापकगण और
श्रोतागण सबके सब दङ्ग हो गये और जब वफ यह वक्तता दे
रहा था वन क सब लोग सन मारे बैठे
घे
यात तक मुंह से नहीं निकाली ! अन्त में जब उसकी वक्तृता
समाप्त हुई वन लोगो ने चारो ओर से उसके ऊपर फूल-माला
फेंकी और दर्प-ध्वनि से समस्त मैदान, जगल, पेड-पौधे फँपा
दिये। कितने लोगों ने कितनी भविप्य वाणियां की। यहुव से
लोगो ने उसे आशीर्वाद दिया।
। किसी ने एक
।
जेम्स ने सन् १८५६ में प्रेजुएट की पदवी प्राप्त की। उसने
उस परीक्षा को घडी प्रतिष्ठा के साथ पास किया। कालेज के
प्रारम्भ में डाकूर हापकिन्स ने एक पारितोपिक नियत किया
था जिसको उन्होंने सन से अच्छे लडके को देने का वादा किया
था। जेम्स ने उस पारितोपिक को भी प्राप्त किया।
डाकुर हापकिन्स ने जेम्स के ग्रेजुएट होने के आठ वर्ष बाद
उसके विषय मे यह लिसा था---
-"जनरल गारफील्ड की
उन्नति ऐसी अनोसी हुई है कि प्रत्येक लडके को उसकी घरापरी
की कोशिश करनी चाहिए। उसकी उन्नति सरकारी और
फौजी काम मे इतनी तेज हुई है कि आज तक हमारे मुल्क मे
किसी की नहीं हुई। सब विद्याये उसने अपने ही परिश्रम से

१५८
गारफील्ड।
प्राप्त की थी, किसी से कुछ भी सहायता नहीं ली। उसमें धर्म
का पूर्ण अनुराग था और वह अपने काम और ज़िम्मेदारी को
अच्छी तरह समझता था। वह सच्चा, साफ, बहादुर
और
मिलनसार प्रकृति का था।"

इक्कीसवाँ परिच्छेद । म्स अपने कालेज की पढाई समाप्त करने के पाद हिराम लौट आये। उसके आने के पहले ही वहां के कर्ताओ ने उसको "पुरानी भाषाओ और साहित्य" का शिक्षक चुन रक्खा था। उनके आते ही हिराम के अध्यापको और कार्यकर्ताओ ने वडा आनन्द प्रकट किया और बडे आदर से उनका सत्कार किया। जेम्स महाशय भी अपने पुराने स्कूल में शिक्षक की पदवी पाकर लोट आने से कुछ कम आनन्दित नहीं हुए। उन्होंने एक दिन अपने एक मित्र से कहा "मेरी सब आशाये पूरी हो गई । मैंने न्यू इंगलैंड के कालेज से ग्रेजुएट का डिप्लोमा प्राप्त किया है और अब मैं यहां शिक्षक की पदवी पर नियुक्त हूँ। अव मैं चाहता हूँ कि अपनी सारी मुस्तैदी इसी काम में लगा दूँ। वे नहीं चाहते थे कि इस स्कूल को छोड कर वे कहीं भी जायें, चाहे कहीं उनको कितना ही रुपया क्यो न मिले, परन्तु उनको यहां वार्षिक १६००) रुपयों पर ही सन्तोष था। विलियम्स कालेज के प्रेसीडेंट डाकूर हापकिन्स इनके गुरु थे। उनकी वे बहुत प्रतिष्ठा और भक्ति किया करते थे, क्योंकि

-
१६०
गारफील्ड।
एक तो यह इनके गुरु थे, दूसरे बहुत बडे विद्वान थे। विलि-
यम्स कालिज से लौट आने पर इनकी गुरु-भक्ति कुछ कम नहीं
हुई थी। उनके उपदेशो से उन्होंने बहुत लाभ उठाया और
उन्हीं के उपदेशो के अनुसार काम करने से इन्होंने भी अपने
परिश्रमो का फल बहुत अच्छा पाया।
मिस्टर गारफ़ील्ड ने अपने काम-काज में हिराम-विद्यालय
के कार्यकर्ताओ को इतना सन्तुष्ट किया कि एक वर्ष बाद उन
लोगो ने मिल कर इन्हें "Chairman of the Board of
Instructors" अर्थात् शिक्षक-मण्डली का सभापति नियत
किया, और दूसरे साल के अन्त में इनको प्रधान अध्यापक
(Principal) बना दिया।
ओहिओ और पेनसिलवेनिया नहर को छोडे हुए ११ वर्ष
बीते थे जब कि वे इतने बडे इलेकट्रिक इन्स्टीट्यू ट के प्रधान
अध्यापक बनाये गये। इन्हीं ११ वर्षो में उन्होंने बहुत कष्ट
उठाये, बहुत परिश्रम किया और अन्त मे इतनी सफलता-लाम
की कि अन्य मनुष्यो के इतिहास मे कम देस पडती है ।
इनमें एक बहुत बडा गुण यह था कि यह जहीन और तेज
लडको को चुना करते थे और पढाने की कोशिश किया करते
थे। कभी कभी ऐसा होता है कि जहीन लडको के माता-पिता
गरीब होने के कारण अपने लडको का लिखना पढ़ना बन्द करा
देते हैं। यह उन लोगो को अपनी युक्ति और कौशल द्वारा
समझा देते थे कि लडको का लिखना-पढना बन्द न करावें ।
1
,

इकोसा परिच्देद।
यदि मिस्टर गारफील्ड इतना परिश्रम न करते वो प्राज फल
से विद्वानों का नाम तक हम लोग न सुन पाते।
प्रेसीडेंट दिन्सडेल जो कि वर्तमान समय में इलेक्ट्रिक इन्स्टी-
ट्यूट
के सभापति है वे इस मच पदवी को प्राप्त न किये होते
यदि मिस्टर गारफील्ड ने इनको पढाने का पन न किया होता।
मिस्टर गारफील्ड स्वय लिखते हैं कि "ऐसे लड़कों को
पकड़ने में मुझे घडा आनन्द मिलता था और यद्यपि उन लडकों
में से किसी किसी को ऐसे पकडे जाने पर पहले पहल बडा
दुख होता, परन्तु अन्त में उनके प्रानन्द की अवधि न रहती
थी । विशेषत दो लडकों के पकडने का हाल मुझे अच्छी तरह
याद है। उन दो लडकों में से एक लडका वसन्त मातु मे
स्कूल
चन्द होने पर मेरे पास आया और चुप-चाप इधर उधर घूमता
रहा । मैंने समझा कि वह कुछ कहा चाहता है, इस कारण मैंने
उसको बुला कर पूछा--"हेनरी, तुम स्कूल खुलने पर यहां
मानोगे न?"
1 "उसने कुछ उत्तर नहीं दिया। थोड़ी देर बाद जब मैंने
अपनी गर्दन उठा कर देखा तब क्या देखता हूँ कि उसकी प्रासो
से आंसू टपक रहे हैं। यह दृश्य देख कर मुझे बडा दुख
हुआ। मैंने उसे पास बुला कर पूछा-"हेनरी, तुम रोते क्यों
हो ? तुम्हारे रोने का क्या कारण है ? मुझे बताओ।" लडके ने
रोते रोते जवाब दिया कि "मैं स्कूल खुलने पर न पाऊँगा
.

१६२
गारफील्ड ।
क्योंकि हमारे पिता अब हमसे सेती का काम करावेंगे। वे
कहते हैं कि तुम्हारा पढना बहुत हो चुका।"
"वह एक बहुत तेज लडका था। मैंने उससे पूछा
"तुम्हारे पिता यही हैं ?" उसने कहा-"जी हां, यहीं हैं। कल
यहां से चले जायेंगे ।" मैंने उससे कहा-"तुम अपने पिता
को मेरा सलाम दो और उनसे कहो कि मिस्टर गारफील्ड प्रापसे-
मिलना चाहते हैं। उनसे यह न कहना कि तुम्हारे विषय में मैं
उनसे कुछ कहूँगा, बल्कि उनसे ऐसा कहो कि आप से केवल
मिलना चाहते हैं।"
लडके ने अपने बाप से जाकर कहा और आधे घटे ही मे
वे मुझसे मिलने को आगये । मैंने समझा कि हेनरी का पढना
बन्द करने का कारण यह है कि उनके पास रुपया नहीं
और वे इसकी मदद से रुपया कमाया चाहते हैं। इस कारण
मैंने उनसे कहा -"आप हेनरी का पढना क्यो धन्द कराते
हैं ? देखिए, यदि आप उसको यहां से ले जाइए और उससे
सेत जोतने बोने का काम लीजिए तो वह कितना कमा
सकवा है-बहुत कम । इससे अच्छा तो यह होता कि आप
उसे यहीं छोड जाते और यह जाड़ों में यहां स्कूल में पढाता
और भी पढता। पढाने से उसको जो रुपया:
उससे वह अपना भी खर्चा चला सकता है और मापको भी
कुछ दे सकता है।"
++
मिलेगा

-
इकोसा परिच्छेद।
१६३
"इस बात को सुन कर हेनरी के पिता बहुत खुश हुए
और उन्होंने कहा -"अच्छा, मैं इस विषय को सोचूंगा। उस
घावचीव का फल यह हुआ कि हेनरी वहां भेजा गया और उसने
पढना आरम्भ किया। जाडों में वह स्कूल में पढाया भी करता
था। इस तरह पढते पढाते उसने न्यू इंगलैण्ड कालेज के
प्रेजुएट का डिप्लोमा प्राप्त कर लिया ।"
"दूसरे एक लडके ने इसी तरह अपने घर से हमें पर
लिसा कि हमारे पिता अन हमारा पढना धन्द कराया चाहते
है। मैं जानता था कि उस लडके के पिता वडे धार्मिक पुरुष थे
और धर्म-सम्बन्धी विषयों पर पहुत ध्यान दिया करते थे।
इस कारण मैंने उस लडके को एक पत्र लिख भेजा कि तुम
यहां के गिर्जे में उपदेशक नियत किये गये हो । उस पत्र के पाते
ही उसके पाप ने तुरन्त लडके को छोड दिया । लडका यहां के
गिर्ने में उपदेश भी दिया करता और अपना पाठ भी पढ़ा करता
था । अन्त में उसने भी न्यू इगलैण्ड कालेज से प्रेजुएट की
पदवी प्राप्त की और तन पढना समाप्त किया।"
मिस्टर गारफील्ड अपने विद्यार्थियो से कैसा व्यवहार करते
थे इसका भी घोडा सा वृत्तान्त सुनिए ।
एक बार एक विद्यार्थी ने दर्जे में कुछ गल्ती की । मिस्टर
गारफील्ड ने उस लड़के को ऐसे एक स्थान में खडा कर दिया
जहां की जमीन पानी गिरने से भीगी हुई थी और बहुत मैली
थी। इसको देख कर लडके हँस पडे और वे भी मुसकराये।
-
,

,
.
।
१६४
गारफील्ड।
ऐसा करने से लडके को घडी लज्जा हुई और तब से वह' सचेत
हो गया।
एक बार उन्होंने दर्जे के एक लड़के को कुछ काम करने के
लिए कहा। उस लडके ने उत्तर दिया -"यह काम बहुत
कठिन है । मैं उसे न कर सकूँगा।"
मिस्टर गारफील्ड ने कहा.-"वडी लज्जा की बात है।
जो तुम कहते हो कि तुम उस काम को न कर सकोगे। मुझे
आज तक कोई काम कठिन मालूम ही नहीं हुआ,
और जब
कोई काम कठिन मालूम हुआ तभी मैंने उसे बिना किये कमा
न छोडा।"
सत्य है, यही साहस जेम्स की उन्नति का मूल
एक बार मिस्टर गारफील्ड पडोस मे कहीं एक वक्तता
देकर लौट रहे थे । इस कारण स्कूल पहुंचने में कुछ देर होगई
थी। अतएव उनके दर्जे मे एक दूसरे शिक्षक पढा रहे थे। जब
वे दर्जे के पास पहुंचे तब देखा कि शिक्षक महाशय ने किसी
विद्यार्थी से कोई प्रश्न पूछा है । जैसे ही उस लडके का उत्तर
समाप्त हुआ उसी समय तुरन्त मिस्टर गारफील्ड ने उसी.प्रश्न
के लगाव में एक और प्रश्न उससे पूछा जिससे यह मालूम
होता था कि पहला प्रश्न भी मानो उन्हीं ने पूछा था। इस
चतुराई को देख कर सब हँस पडे ।
मिस्टर गारफील्ड प्राय अपने विद्यार्थियों, को नये नये ।

इकोसवां परिच्छेद । १६५ विपयो पर व्याख्यान सुनाया करते थे। एक दिन वे मनुष्य- जीवन के परिवर्तन के विषय में व्याख्यान दे रहे थे। उन्होंने कहा -"तुम लोग जानते हो कि पोरटेज कौन्टी की राजधानी रैवेना में है। उस रैखेना की कचहरी की छत पर की कन्धी ऐसे मौके पर है कि वर्सात का पानी जो उस पर गिरता है उसकी जो बूद कन्धी के दक्सिन ओर गिरती है वह गल्फ माफ मेकसिको में जाता है और जो बूँद कन्धी के उत्तर ओर गिरती है वह गल्फ आफ सेन्ट लारेन्स में जाता है । देखो, जो वूद दक्सिन की ओर जारही हो उसमें यदि हवा का एक थपेडा लग जाय तो उत्तर की ओर चला जायगा और इस कारण वह गल्फ आफ मेकसिको में न गिर कर गल्फ आफ सेन्ट लारेन्स' में गिरेगा। इसी तरह मनुष्य के भाग्य का नियम है। किसी जगह एक थोडे से उसकाने से उसका भाग्य बहुत अच्छा हो जा सकता है, और न उसकाने से कदाचित् उसका भाग्य ऐसे कठोर नरक की यन्त्रणा भोग करता है जिसका वर्णन करना कठिन है, अतएव तुम लोग सदा उस मौके की ओर ध्यान रक्सो जो तुम्हारी उन्नति का सहायक होने वाला मालूम पडे, क्योंकि फर वह मौका आवेगा-इसका कुछ निश्चय नहीं है, और यदि तुम उस मौके पर चूक जाओ तो यस समझ लो कि तुम्हारी उन्नति का मार्ग बन्द हो गया।" मिस्टर गारफील्ड ने इस अवस्था में अनेक विषयो पर वक्तृवायें दी । जब फभी वह किसी समिति में वक्तृता देते

।
।
1
,
गारफील्ड ।
तभी अपने विद्यार्थियो से उस व्याख्यान को लिस लाने के लिए
कहते थे । दूसरे दिन जब लड़के लिस लाते तब वे उसे क्लास में
सब लडको के सामने पढ़ते और उनका मतलव सुनावे । प्राय
लोग उन्हें किताब हाथ में ले जाते देखते । एक दिन एक लडके
ने देखा कि पानी घरस रहा था और मिस्टर गारफील्ड दस
चारह पुस्तको को हाथ और बगल में दवाये लाइब्रेरी की ओर
चले जारहे हैं और एक विद्यार्थी उनके ऊपर छाता लगाये हुए
जाता है।
उन्होंने वकालत की परीता भी पास की थी। इसलिए नहीं
कि वकालत करें, किन्तु इस लिए कि राजनियमो को जान लें।
उन्होंने मिस ल्युक्रिशिया रुडाल्फ से ११ नवम्बर सन् १८५८
ई० को विवाह किया और उसकी सहायता से उन्होंने बहुत बडे
बड़े काम किये।
वे सब लडको का नाम लेकर पुकारते थे, चाहे वह कितना
ही बडा लडका क्यों न हो । वे लडकों के साथ खुले मैदान
सेलते थे। वे उनसे यथावसर हँसी-मजाक भी करते थे, परन्तु
काम के समय वे बहुत गम्भीरभाव से काम लिया करते थे।
काम के समय उनके पास शोर-गुल कुछ भी न होने पाता था।
बडे बडे दुष्ट लडके उनसे बहुत डरते थे। दूसरे शिक्षकों के
पास चाहे वे धूर्तता करें भी, पर उनके पास आकर वे वियो
की तरह चुपचाप बैठे रहते और कुछ भी धूर्तता न करते थे।
-
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-
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वाईसवाँ परिच्छेद
-
"
म्स गारफील्ड सरीसे एक प्रसिद्ध वक्ता के लिए
यह कब सम्भव था कि वे राष्ट्रीय पक्ष का
साघ न दें और उसके लिए कुछ काम न
फरें । वह चाहे कितना ही मने करते रहें
परन्तु लोग उन्हें कर छोडतेथे।लोगों ने उन्हें
देश-हित के लिए राय देने और समय समय पर व्याख्यान देने
के लिए मजबूर किया । शरदऋतु मे हिराम लौट आने पर जब
उन्हे अपने ही काम से बिलकुल फुरसत न मिलती थी उसी
समय प्राय उन्हे राष्ट्र-सम्बन्धा वक्तृताये देने के लिए पांच,
साव और कभी दस दस मील दूर जाना पडता था । जाते
समय वह अपने साथ किसी एफ विद्यार्थी को लेजावे और रास्ते
भर उसे हितकर उपदेश देते जाते थे।
एलफोन्सो हार्ट नामक एक डेमाक्रेट * ने हिराम में पाकर
दासत्व के सम्बन्ध मे बहुत से झूठे इतिहास इकट्ठा करके एक
जिस देश का राज्य छोटी बड़ी सब श्रेणी की प्रजा के द्वारा चलाया
जाता है उसको 'डेमाक्रेटिक राज्य" कहते हैं, और उस समा के प्रतिनिधि
गण जो राज्य का काम करते है उन्हें "देमाटस' कहते हैं।"

१६८ गारफील्ड जोर शोर का व्याख्यान दिया, जिसको सुन कर सब लोगो की क्रोधाग्नि धधक उठी। सबो ने मिल कर मिस्टर गारफील्ड से कहा- "इस मूर्स डेमाकेट की बातों का जवाब देना चाहिए और इसकी युक्तियो फो काट कर इसे अच्छी तरह परास्त करना चाहिए।" मिस्टर गारफील्ड ने कहा -"परास्त करना कुछ बहुत कठिन काम नहीं है, परन्तु ऐसा करना क्या बुद्धिमानों का काम होगा " "भूठे को दण्ड देना सदा बुद्धिमानों का काम है।" किसी ने कहा-"प्रापही उसकी युक्तियो को काट सकते हैं।" किसी ने कहा-"सब लोग यही चाहते हैं कि आपही इस काम को करे । कई रईसो ने मिल कर कहा-"बस आप चलिए और सर्व-साधारण की इच्छा पूर्ण फीजिए, सब लोग आपका मुंह ताक रहे हैं।" मिस्टर गारफील्ड को अन्त में राजी होना पडा । तब उन्होंने डेमाक्रटिक इतिहास को अच्छी तरह पढा और दासत्व के सम्बन्ध में जितनी युक्तियां घी उन सबको अच्छी तरह हृद- यड्गम किया । जब पूरी तौर से लडाई का सामान इकट्ठा कर लिया तब उन्होंने एक दिन एक लम्बा चौडा व्याख्यान दिया

वाईसवां परिच्छेद।
१६८
जिसमें उन्होंने मिस्टर हार्ट को एक भी बुरी घात न कही, केवल
उनकी भूठी युत्तियों को प्रमाणसहित काटना शुरू किया।
जब सब युक्तियां तोड दी वन उन्होंने अपनी वपता समाप्त
की । इस तरह मिस्टर गारफील्ड की प्रतिष्ठा और भी घढ गई।
फिर तो चारों ओर से उनकी चाह बढने लगी।
मिस्टर गारफील्ड की इतनी फीति फैल गई कि एक वर्ष
वाद "लेजिसलेटिव कौन्सिल" ( Legislative Council ) के
मेंबरो ने इनको अपने यहां बुलाया। कई बार इनको पर लिसा
कि वे इस काम को करे परन्तु उनका यही जवाब था कि
"मेरा काम इलेक्ट्रिक इन्स्टीट्यूट में है। मेरा मन इसी काम
में लगा है, और मेरा धर्म भी यही कहता है कि मैं इस काम
को करूं।"
इसके थोडे ही दिन बाद विलियम्स कालिज के लोगो ने
इन्हे प्रथम दिन एक वक्तृवा देने का अनुरोध किया । थे वहां
गये और लोगो ने इनका बडा आदर किया। वहां का काम
समाप्त करने के बाद जब ये लौट आये तन (Senate) सेनेट में
मेम्बर चुनने का समय आ गया। लोगों ने इन्हीं को एक मेम्बर
चुना । जब लोगो ने उनसे उनके चुने जाने का प्रस्ताव किया तन
उन्होंने कहा -"मैं जानता था कि मिस्टर प्रेस्टन चुने जायेंगे।"
लोगो ने कहा -“मिस्टर प्रेस्टन अभी थोडे दिन हुए
--
मर गये।"

१७० गारफील्ड। मिस्टर गारफील्ड ने कहा-"आप लोगो को मैं धन्यवाद देता हूँ कि आपने मुझे स्मरण किया है परन्तु बडे खेद के साथ कहना पडता है कि मैं उस काम को स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मैं अभी एक काम कर रहा हूँ। यदि मैं आपका काम स्वीकार कर लूँ तो मेरा इलेकट्रिक इन्स्टीट्यूट छूट जायगा।" लोगो ने कहा-"आप अपने स्कूल वालों से राय लीजिए । यदि वे आपको कुछ दिन के लिए छोड़ सकें तो आप यहाँ का काम कीजिए।" उस आदमी ने यह बात इसलिए कही कि उसको मालूम था कि स्कूल वाले चाहते हैं कि मिस्टर गारफील्ड सेनेट का काम करे । मिस्टर गारफील्ड ने इस बात को स्वीकार कर लिया और जब स्कूल वालो से उन्होंने पूछा तव सवो ने एकमत होकर राय दे दी कि अाम जरूर उस काम को कर लीजिए। सवको वात पर मिस्टर गारफील्ड को स्कूल छोड कर सेनेट का काम करना पड़ा। उस समय देश में घडी हलचल मच रही थी। दक्षिण देशवासी राष्ट्रविप्लव पर कमर वांधे थे और उत्तर प्रान्त के लोग दासत्व-निवारण करने के लिए कटिबद्ध थे। ऐसे समय में मिस्टर गारफील्ड सरीखे मनुष्य की जरूरत थी जो इस हल- चल को शान्त करने के लिए सेनेट की कुर्सी अधिकार करे .

बाईसवां परिच्छेद। १७१ सेनेट में इनके ही समान एक और मनुष्य थे जिनका नाम जेकव डी काक्स था। ये दोनों बडे मित्र थे और सदा मिल- जुल कर काम किया करते थे। मिस्टर गारफील्ड का नाम तुरन्त सबसे अच्छे वक्ताओं में हो गया। प्रेसीडेंट हिन्सडेल लिखते हैं कि -"जब कभी कोई पेचीदा काम आ पडता घा तब युनाइटेड स्टेट्स के प्रेसीडेंट उस काम को ठीक करने के लिए इन्हीं को बुलाया करते थे।" मिस्टर गारफील्ड फो सेनेट का काम प्रारम्भ किये एक ही वर्ष हुआ था कि वह भयकर समस्या उपस्थित हुई। लिनकन साहब प्रेसीडेंट चुने गये । दक्षिण की रियासतों ने राष्ट्र का काम छोड़ने की तैयारी की और एक विप्लव की सम्भावना देख पड़ी । मिस्टर गारफील्ड के मन मे अनेक चिन्ताये उदय होने लगी। उन्होंने सोचा-"क्या ओहिओ के लोग युद्ध करेंगे " "क्या कोई रियासत भी देश का फाम छोड सकती है?" "क्या रियासत पर कोई सख्ती की जा सकती है ? "क्या अपराधियो को दण्ड देना उचित होगा ?" ऐसी ऐसी चिन्ताये जेम्स के चित्त फो सदा व्याकुल किया करती थीं। इन कठिना- इयो को हल करने के लिए वे दिन दिन भर पटा करते थे और रात को भी ग्यारह बारह और कभी फमो एक एक बजे तक पढा करते थे। उन्होंने उस हल-चल को शान्त करने के लिए फई वक्तृवाय दी और उन नेताओं की निन्दा की जो रियासतों को राष्ट्र का काम छोडने के लिए उसकाते थे और अन्त में ।

१७२
गारफील्ला
उन्होंने सेनेट के मेम्बरो को स्वदेशानुराग और देशभक्ति के
कामो में दीक्षित किया और दासत्व को दूर करने का प्रयत्न
किया।
.
जव जातीय महासभा ने अपने सम्मेलन में यह प्रस्ताव ।
किया कि "सर्कार दासत्व के सम्बन्ध में और कोई कठोर
नियम न जारी करे" तव मिस्टर गारफील्ड ने उत्साहित होकर
यह लिसा कि जब तक मेरे हाथ पैर मजबूत हैं और जब तक
मेरी बुद्धि ठीक रहेगी तब तक मैं ऐसा प्रस्ताव न चलने दूंगा
क्योंकि ऐमा करने से हमारा देश स्वाधीनतारूपी महारत्न खो
बैठेगा और फिर वह एक बार दासत्व की शृङ्खला
में सदा
के
लिए बंध जायगा।"
इसके बाद और भी बहुत सी घटनाये हुई जिनसे यह प्रतीत
होगया कि लडाई नहीं टल सकती । एक रोज रात के समय
मिस्टर काक्स और मिस्टर गारफील्ड दोनों एक ही कमरे में सो
रहे थे कि इतने में गारफील्ड ने कहा-"मिस्टर काक्स, युद्ध
अनिवार्य है।"
काक्स ने कहा -"यह तो ठीक ही है।"
मिस्टर गारफील्ड ने कहा
में
-"हम तुम दोनों युद्ध
जायेंगे और अपने देश की रक्षा करने के लिए हम लोग अपना
प्राण अर्पण करेंगे।"
यह कह कर दोनों मित्रों ने एक दूसरे को प्रालिङ्गन किया
और इस बात की प्रतिज्ञा की कि दोनों युद्ध में जायेंगे।

-
-
याईसवां परिच्छेद।
१७३
दूसरे दिन प्रेसीडेंट लिनकन ने सेनेट में हुक्म भेजा कि
२५०० आदमी साथ लेकर सम्पटर फा दुर्ग अधिकार में करना
चाहिए।
गवर्नर डेनिसन ने मिस्टर गारफील्ड को ५००० हथियार
लाने को मिशारी भेज दिया। वहां से वे हथियार लेकर बहुत
जल्द लौट आये।
वहां से लौट आने पर गवर्नर डेनिसन ने उनको सातवीं
और पाठवा फौज का बन्दोबस्त करने के लिए उन्हें छोमलैण्ड
भेजा । उनका बन्दोबस्त कर लेने पर गार्नर ने उन्हें उन फौजों में
से एक का कर्नेल (Colonel) धनाना चाहा, परन्तु उन्होंने उस
पदवी को ग्रहण करने से इनकार किया क्योंकि उन्होंने कहा कि
फौजी काम में वे बहुत प्रवीण नहीं हैं।" इस कारण गवर्नर
ने उन्दे लेफटिनेन्ट कर्नेल (Lieutenant Colonel) बना कर
पश्चिम में फौज इकट्ठा करने के लिए भेजा । जब फौज इकट्ठा
करके वे लोटे तब तक कोई कर्नेल नहीं ठीक हुआ था, इस
कारण सन लोगो की प्रेरणा से मिस्टर गारफील्ड ही उस फौज
के सेनापति बनाये गये और बागो जनरल मारशेल से युद्ध करने
के लिए छोमलैण्ड भेजे गये।
जनरल मारशेल की सेना यद्यपि बहुत अधिक थी परन्तु
तोभी गारफील्ड ने बडी वीरता से युद्ध किया और जनरल
मारगेल की सेना को मैदान से बाहर भगा दिया और उनको
पूरी तौर से परास्त किया। इसके बाद और भी कई एक युद्ध

१७४ गारफील्ड । हुए । उन सभी में मिस्टर गारफाल्ड ही की विजय हुई। उनकी बहादुरी और सेनापरिचालन-शक्ति को देख कर वाशिङ्गटन के लोगो ने उनको ब्रोगेडियर जनरल ( Brigadier-General ) की पदवी प्रदान की। यह पदवी उनको १० जनवरी सन् १८६२ ईसवी को मिली । इसके बाद फिर कई एक युद्धो में वे शरीक हुए और थोडे ही दिन में इनको मेजर जनरल (Mayor-General) की पदवी मिली । वे डेढ ही साल के बीच में लेफटिनेन्ट कर्नेल से मेजर जनरल हो गये थे। जैसा कि लिसने-पढने के काम मे मिस्टर गारफील्ड ने अपनी प्रतिष्ठा लाभ की थी वैसे ही फौजी काम में भी उनकी सुप्रसिद्धि हुई । उनकी ख्याति दिन दिन चारो ओर फैलने लगी। जिस समय उनकी प्रसिद्धि इस तरह चारो ओर फैल रही थी उसी समय जातीय महासभा (National Congress) के लोगो ने इनको अपनी सभा में लेने की राय प्रगट की। उस समय मिस्टर गारफील्ड की यह इच्छा थी कि अपनी मात्र भूमि को उद्दण्ड देशद्रोहियो के अत्याचार से रक्षा करे और उन अपराधियो को दण्ड देकर देश में शान्ति का प्रचार करे और अपना जीवन तथा सर्वस्व इस महान कार्य में लगा दे , उस समय वे नहीं चाहते थे कि ऐसी जिम्मेदारी के बडे काम को छोड कर वे कामेस वालों से जा मिले । उनके काप्रेस न जाने का एक और कारण यह भी था कि काग्रेस में इनको जो वनस्वाह मिलती उससे दुगुनी तनन्याह इनको फौज में मिल - .

बाईसवां परिच्छेद। रही थी, इस कारण काग्रेस जाने का सयाल वे अपने पास न प्राने देते थे। पाठक, आप समझ सकते हैं कि ऐसे समय में फौज छोड़ कर काप्रेस में जाना कितना बड़ा स्वार्थ-त्याग का काम है। प्रेसीडेण्ट लिनफन ने अपनी राय इस भांति प्रकट की कि काग्रेस में एक ऐसा आदमी नियत किया जाना चाहिए जिसमें फौजी काम का भी तजरिया अच्छी तरह वर्तमान रहे । इस कारण मिस्टर गारफील्ड को यह काम स्वीकार करना ही पड़ा। दो वर्ष और तीन महीने फौज में काम करने के बाद इन्होंने 'सन् १८६३ ईसवी में दिसम्बर के महीने काग्रेस का काम प्रारम्भ किया। मिस्टर गारफील्ड ने बहुत से प्रोहदों पर काम किया था और जहां जहां वे थे सर्वत्र उनका काम इतना हृदयमाही और स्वार्थशून्य रीति से होता था कि लोग आप से आप हर घडी उनको घेरे रहा करते थे। जिधर देखो उधर ही मिस्टर गार- फोल्ड की मांग है। लोग मनुष्यों के सुन्दर मुस को अथवा सुन्दर शरीर को नहीं प्यार करते बल्कि उनके सुन्दर काम और रीति- नीति को प्यार करते थे। मिस्टर गारफील्ड के काम ही ऐसे थे कि लोग उन्हें बिना प्यार किये न रह सकते थे। कोलम्बस में सर्कारी कानून बनाने वाले की सभा में प्रधान मन्त्री की जरूरत थी। लोगों ने मिस्टर गारफील्ड ही को चुनना चाहा । इस कारण उनके दो एक मित्रों ने उनसे कहा "आप . । गारफोल्ड। कोलम्बस जाइए क्योंकि वहां लोग आपही को "स्टेट लेजिस- लेचर" ( State Legislature ) में चुनने वाले हैं।" उन्होंने उत्तर दिया:-"मैं अपनी नौकरी हूँढने के लिए स्वय कहीं न जाऊँगा। मैंने समस्त जीवन भर मे सिवा इलेकट्रिक इन्स्टीट्यूट के दरवान की नौकरी ढूंढने के स्वयं और कोई नौकरी नहीं हूँढी और न भविष्य में ऐसी कोशिश करने की मैं इच्छा रसवा हूँ । यदि हमारे मित्र हमें चाहेंगे तो वे खुद ही मुझे बुलावेंगे।" उन मित्रों ने कहा-"आप जो कहते हैं वह सच है। हम लोग आपको वहाँ इस वास्ते नहीं भेजा चाहते कि आप वहाँ जाकर हाथ फैला कर नौकरी की प्रार्थना करें वरन इस वास्ते भेजते हैं जिससे हम लोग सर्वदा आपको वहां देख पावे और प्रापसे बातचीत कर सकें। जो कुछ करना धरना, होगा वह हमी लोग करेंगे । आप केवल वहां उपस्थित रहेंगे।" उन्होने कहा-"मैंने आप लोगों का मतलब समझ लिया। परन्तु वहां उपस्थित रहना ही मुझे बुरा मालूम होता है।" कोलम्बस में जव सभा बैठी तव सभों की राय से मिस्टर गारफोल्ड ही उस सभा के प्रधान मन्त्री चुने गये। सन् अट्ठारह सौ अस्सी ईमवी के जनवरी महीने में मिस्टर गारफील्ड उस उच्च पदवी पर नियुक्त किये गये। मिस्टर गारफील्ड केवल अपने ही परिश्रम, बुद्धिमत्ता और साइस के कारण इस उच्च पदवी पर पहुँच गये थे । उनको - बाईसा परिच्छेद। उन्नति की सीढी की चोटी पर पहुँचने के लिए केवल एक ही पद बाकी रह गया था। यदि वह एक सीढी भी किसी तरह पहुँच जा सके तो यह कहना बहुत ठीक होगा कि मिस्टर गारफाल्ड ने अत्यन्त दरिद्रावस्था से अत्यन्त उच्च- तर बल्कि सव से ऊँचे पद को प्राप्त किया । गारफील्ड की भाग्यलक्ष्मी ऐसी सुप्रसन्ना थी कि उनके उस पद के भी प्राप्त करने में अधिक दिन न लगे। इनके मन्त्री होने के पांच ही महीने बाद "रिपबलिकेन पारटी * ( Republican Party ) ने अपना एक प्रेसीडेण्ट चुनने का प्रवन्ध किया। मिस्टर गारफाल्ड भी उस पारटी के एक मेम्बर थे। उनकी उपस्थिति से लोगो के हृदय में घडा आनन्द और उत्साह उत्पन्न हुआ । यद्यपि अभी वे उस पदवी के लिए चुने जाने के अधिकारी न हुए थे परन्तु तो भी जब कभी वे उस सभा में किसी विषय पर व्याख्यान देते तो लोग उनका बडा आदर और सम्मान करते थे। लोगो की दृष्टि में वे पद्ध चुके थे और सव की निगाह उन्हीं की ओर लगी हुई थी। । *जिस राज्य का काम ऐसी एक सभा के द्वारा होता है जिस सभा का मुख्य उद्देश यह होता है कि हर विषय में प्रजा को फायदा पहुँचाये और उनको सुख और शान्ति दे इस राज्य को "रिपलिकेन राज्य" कहते हैं और जो लोग मिल कर ऐसी सभा स्थापित करते हैं उन लोगों को "रिप चलिकन पारटी" कहते हैं।

१७८
गारफील्ड ।।
दूसरे आदमी के प्रेसीडेण्ट चुने जाने के लिए ३४ वार
सम्मतियां ली जाने की निष्फल चेष्टा के बाद ३५ वीं वार जय
५० मनुष्यों ने जेम्स ए० गारफील्ड के नाम सम्मतियां दी
तव तुरन्त वहां का दृश्य परिवर्तन हो गया। जिस स्थान में
सभा होती थी वह एक बहुत बडा कमरा था। उस कमरे में
डेमाटिक और रिपबलिक के पार्टी के प्राय ७०० मनुष्य
उपस्थित थे। सभी ने गारफील्ड का नाम सुनते ही अपने अपने
झण्डे खडे किये और एक तान मे सुर मिला कर सबने
यही कहा - "आज से हमारे दो दलो का विच्छेद और
विरोध दूर होगया। आज से हम दोनों दलो के लोग मिन
भाव से परस्पर व्यवहार करेंगे क्योकि जनरल गारफील्ड के
राज्य मे शत्रुभाव का रहना असम्भव है।" इन सात सौ
प्रतिनिधियो को जेम्स गारफील्ड के नाम उत्साह, मनाते देस
कर १५००० दर्शक जो उस कमरे में उपस्थित थे उन सबों ने
उन्हीं ७०० मनुष्यों के स्वर में अपना स्वर मिलाया और
गारफील्ड पर पुष्पवृष्टि प्रारम्भ की । इन १५७०० मनुष्यों
की आवाज कमरे की दीवारो से टकरा कर प्रतिध्वनित हुई
और कमरा हर्पध्वनि और जयध्वनि से गूंज उठा। उस
कमरे के बाहर एक फौज सडी थी। फौजी सिपाइयो ने भी
उस प्रानन्द-कोलाहल के साथ अपना कण्ठस्वर मिलाया और
सन मिलकर जयध्वनि करने लगे। वह दृश्य वडा ही मधुर,
यहा ही गम्भीर और बडा ही मनोहर था। ऐसा मनोहर दृश्य

पाईसवां परिच्छेद।
१७६
कभी किसी ने प्रेसीडेन्ट चुने जाते समय न देखा था और
फदाचित् भविष्य में कभी देगे-ऐमी सम्भावना भी न थी।
यह सब उसी चेतनस्वरूप लीलामय भगवान की कीर्ति है जो
अमीर को गरीब और गरीव को अमीर बनाता है और जो हर
एक देशवासियो को दुष्टों के अत्याचार से बचाने के लिए समय
समय पर ऐसे मनुष्य उत्पन्न करता है जो सच्चे जी से देश की
सेवा करते हैं और प्रजा का पालन करते करते अपना काम
पूरा करते हैं । धन्य है प्रभु, तुम्हारी लीला तुम ही समझ
सकते हो । मूढ मनुष्य भला क्या समझेगा।
इस धूम-धाम और आनन्द-कोलाहल के बीच में २ नवम्बर
सन् १८८० ईसवी को जेम्स ए० गारफील्ड युनाइटेड स्टेट्स के
प्रेसीडेंट चुने गये । वे उक्त तारीख को उन्नति की सीढा की सब
से ऊँची चोटी पर पहुँच गये ।
॥

१७८
गारफील्ड ।
दूसरे आदमी के प्रेसीडेण्ट चुने जाने के लिए ३४ वार
सम्मतियां ली जाने की निष्फल चेष्टा के बाद ३५ वीं बार जर
५० मनुष्यों ने जेम्स ए० गारफील्ड के नाम सम्मत्तियां दी
तब तुरन्त वहां का दृश्य परिवर्तन हो गया। जिम स्थान में
सभा होती थी वह एक बहुत वडा कमरा था। उस कमरे में
डेमाक्रेटिक और रिपनलिक के पार्टी के प्राय
७०० मनुष्य
उपस्थित थे। सभी ने गारफील्ड का नाम सुनते ही अपने अपने
झण्डे खडे किये और एक तान में सुर मिला कर सपने
यही कहा --"आज से हमारे दो दलो का विच्छेद और
विरोध दूर होगया। आज से हम दोनों दलो के लोग मित्र
भाव से परस्पर व्यवहार करेंगे क्योकि जनरल गारफोल्ड के
राज्य में शत्रुभाव का रहना असम्भव है।" इन सात सौ
प्रतिनिधियों को जेम्स गारफील्ड के नाम उत्साह मनाते देस
कर १५००० दर्शक जो उस कमरे मे उपस्थित थे उन सबों ने
उन्हीं ७०० मनुष्यों के स्वर मे अपना स्वर मिलाया और
गारफील्ड पर पुष्पवृष्टि प्रारम्भ की । इन १५७०० मनुष्यों
की आवाज़ कमरे की दीवारो से टकरा कर प्रतिध्वनित हुई
और कमरा हर्षध्वनि और जयध्वनि से गूंज उठा। उस
कमरे के बाहर एक फौज खडी थी। फौजी सिपाइयो ने भी
उस आनन्द-कोलाहल के साथ अपना कण्ठस्वर मिलाया और
सब मिलकर जयध्वनि करने लगे। वह दृश्य बडा ही मधुर,
वडा ही गम्भीर और बड़ा ही मनोहर था। ऐसा मनोहर दृश्य
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बाईसा परिच्छेद।
कभी किसी ने प्रेसीडेन्ट चुने जाते समय न देसा था और
कदाचित् भविष्य में कभी देखगे-ऐमी सम्भावना भी न थी।
यह सब उसी चेतनस्वरूप लीलामय भगवान की कीर्ति है जो
अमीर को गरीब और गरीब को अमीर बनाता है और जो हर
एक देशवासियो को दुष्टों के अत्याचार से बचाने के लिए समय
समय पर ऐसे मनुष्य उत्पन्न करता है जो सच्चे जी से देश की
सेवा करते हैं और प्रजा का पालन करते करते अपना काम
पूरा करते हैं । धन्य प्रभु, तुम्हारी लीला तुम ही समझ
सकते हो । मूढ मनुष्य भला क्या समझेगा।
इस घूम धाम और प्रानन्द कोलाहल के बीच मे २ नवम्बर
सन् १८८० ईसवी को जेम्स ए० गारफील्ड युनाइटेड स्टेट्स के
प्रेसीडेंट चुने गये । वे उक्त तारीख को उन्नति की सीढा, की सब
से ऊँची चोटी पर पहुँच गये ।

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तेईसवाँ परिच्छेद
न १८८१ ईसवी की ४ मार्च को जनरल गार
फील्ड को युनाईटेड स्टेट्स के प्रेसीडेट की
पदवी देने का महोत्सव हुा । प्रात काल से
दस बजे तक खूब हवा चली और बदली भी
थी । दस बजे के समय हवा बन्द हो गई । आज शहर में बडा
कोलाहल था । दूर दूर से भी बहुत से मनुष्य इस महोत्सव
को देखने के लिए उपस्थित हुए थे । गारफील्ड के सहपाठियो
की सख्या भी २० से कम न थी। गलियो मे दस लास मनुष्य,
जुटे थे। कैपिटोल नामक स्थान मे महोत्सव होने वाला था।
लोग हाइट हाउस से साढे दस बजे बडी धूम-धाम के साथ
प्रेसीडेंट हेईज और भावी प्रेसीडेट गारफील्ड समेत निकले ।
मार्ग के लोगो ने बहुत जयध्वनि को। सव समाज के लोग
उपस्थित थे । गारफील्ड को विधवा माता और गारफील्ड
की स्त्री भी उपस्थित थी। मिस्टर गारफील्ड ने बहुत मधुर
और मन भावन शब्दों मे वक्तृता देकर लोगो के चित्त को
मोहित कर लिया । व्याख्यान की समाप्ति पर बेट साहब जज
ने शपथ करने के लिए उसे वाइविल धमाई । गारफील्ड
ने वाइविल को चूम कर बेट का हाथ फेर दिया । गारफील्ड
-

तेईसवाँ परिच्छेद। १८१ की माता और स्त्री के आनन्द की सीमा न रही । महोत्सव समाप्त हुआ । गारफील्ड ने प्रेसीडेण्टे का कार्य-भार अपने ऊपर ले लिया। कार्य के प्रारम्भ में एक बखेडा देख पडा । किसी स्थान पर एक अफ्सर नियुक्त करने में नवीन प्रेसीडेण्ट ने प्रचलित रीति की उपेक्षा करके अपने मन से मनुष्य नियुक्त किया । इस कार्य से सेनेटर ककलिङ्ग अप्रसन्न होकर गारफील्ड का द्रोही हो गया। कुछ सम्भव नहीं कि इसी मनुष्य के बहकाने से चार्ल्स जे गिटो नामक मनुष्य ने अचानक प्रेसीडेंट पर गोली चला कर दूसरी जुलाई को उसे घायल किया हो । प्रेसीडेंट के साघातिक चोट लगी । डाकृरो की सावधानता और चतुराई से १६ सित- म्बर तक गारफोल्ड किसी तरह जीते रहे । इसी दिन रात मे दस बज कर पैंतीस मिनट पर डाक्टर विल्स को विदित हुआ कि युनाइटेड स्टेट्स का प्रेसीडेंट, अपनी विधवा माता का प्रिय पुत्र, प्रसिद्ध विद्यार्थी और राजकर्मचारी इस प्रसार ससार से कूच कर गया। देश भर में हाहाकार मच गया। ॥ इति ॥

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Gharfield

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Not Available
Title
Gharfield
File name
Gharfield
Text
OCR done
Citation
1917
Published
2011/01
Publisher
Indian Press Prayag
Language
Sanskrit
Pages
192
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546432
Barcode
4990010024907.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
tjx4d1ZkN0E
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