Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Udhav Shatak
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जगन्नाथदास रत्नाकर
कृत
उद्धवशतक
सम्पादक डॉ.विजयेन्द्र स्नातक
कन्द
प्रकाशन
१९८४
विभा जन
नई दिल्ली
द्वितीय सरफरण | मनकूट १६८९
प्रवाशक
श्रीमती विभाजन
कदप प्रकाशन
२१ दरियागज, नई दिल्ली २
मूल्य
१२०० छान सस्करण
३००० सजिल्द
मुद्रफ | नागरी प्रिंटस द्वारा
ग्रथशिल्पी, दिल्ली 32
Udhav Sbatak by Shri Jaganath Dass Ratnakar' Ed by Prof
Ds Vijyendra Soatak Published hy Kandarp Prakashan,
4662/21 Daryaganj New Delht 2
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प्रकाशकीय निवेदन आधुनिक व्रजभाषा के मूध य कवि स्वर्गीय श्री जगनाथ दास 'रत्नाकर' की कालजयी कृति 'उद्धव शतक बीसवी शताब्दी की अप्रतिम रचना है। ब्रजभाषा का स्थान आज यद्यपि खडी बोली ने ले लिया है किंतु 'उद्धव शतक' अपनी सरल भापा के लालित्य और लावण्य तथा भाव सौदय के माधुय एव मादवता के कारण हिन्दी काव्य जगत मे पूर्ण सम्मान के साथ प्रतिष्ठित है। पठन-पाठन परम्परा मे ही नहीं वरन कविता प्रेमी रसिक समाज में भी यह उत्तम कोटि की काव्य कृति के रूप मे समादत है। 'उद्धव शतक' का प्रथम सस्करण रत्नाकर जी के जीवन काल मे बडी सज धज के साथ रसिक समाज, प्रयाग से श्री रमाशर शुक्ल के सम्पादकत्व मे प्रका शित हुआ था। इडियन प्रेस, प्रयाग प्रकाशक था। रसालजी ने बत्तीस पष्ठो की विद्वतापूर्ण भूमिका लिखी थी। उस समय उनकी भूमिका छात्रोपयोगी थी और उद्धव शतर के मम को उद्घाटन करने वाली थी। आज समीक्षा क्षेत्र का विस्तार हो गया है । कुछ एसे बिदु काव्यालोचन मे उभरे हैं जो द्विवेदी-युगीन समालोचना मे नहीं थे । अत साठ वप के बाद 'उद्धव शतक' को नई समीक्षा के आलोक मे प्रकाशित करना हमे उचित प्रतीत हुआ। 'उद्धव-शतक' की आलोचना के लिए हमने सम्पादक महोदय स विस्तत भूमिका लिखने का अनुरोध किया था। हमारे अनुरोध को स्वीकार कर उद्धव- शतव के मम को उद्घाटित करने वाली भूमिका लिखकर इस नव सस्पादित उद्धव- शता को बीसवी शती के अन्तिम चरण में पुन पठनीय बना दिया है है । बज- भापा के साहित्यिक एव आचलिक क्लिष्ट शब्दो के अथ भी पुस्तक के अन्त मे दे दिए गए हैं। मैं अपनी प्रकाशन संस्था की ओर से विद्वान सम्पादक श्रद्धेय प्रो. विजयद्र स्नातक महोदय के प्रति आभार व्यक्त करती हूँ। उहोंने ब्रजभाषा की इस कालजयी कृति को पुन लोकप्रिय बनाने मे हमारा सहयोग किया है। --प्रकाश
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अनुक्रम
२०
४०
१ कविवर रलाकर का जीवन-वृत्त
२ आधुनिक बजभाषा काव्य और कविवर रत्नापर
३ भ्रमर गीत परम्परा और उद्धव-शतक
४ उद्धव शतक की कथावस्तु
५ उद्धव शतक मे चरित्र-चित्रण
६ उद्धव शतक मै दाशनिक विचार
७ उद्धव शतक की भापा
८ उद्धव-शतक मे रस पोजना
उद्धव शतकका काव्य रूप
१० उद्धव शतक मे अलकार योजना
११ आधुनिक युग मे उद्धव-शतक की प्रासगिकता
१२ उद्धव शतक मूल पाठ
१३शब्दाप
४५
५८
६४
६७
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१ कविवर रत्नाकर का जीवन-वृत्त वाबू जग नाथदास रत्नाकर के पूर्वज हरियाणा प्रान्त के पानीपत जिले के निवासी थे। पानीपत की प्रसिद्धि तो युद्धस्थली होने के कारण है किन्तु सफीदो गाव जहा रत्नाकर जी के पूर्वज रहत ५ पौराणिक आख्यान से जुड़ा हुआ है। सफीदा को सपदमन का अपभ्रष्ट रूप कहा जाता है । जनमेजय ने सप कुल विनाश के लिए यही नागयज्ञ किया था। पानीपत के सफीदो गाव से इनके पूवज कब बाहर निकले और कहा-वहा जाकर बसे, इसका पूरा विवरण तो उपलब्ध नहीं है किन्तु पारिवारिक किम्बदतियो के अनुसार सम्राट अकबर के समय यह वैश्य परिवार दिल्ली आ गया और मुगल साम्राज्य म उच्च पदो पर काय करता रहा। मुगल साम्राज्य के पतन होने पर इस परिवार वे लोग दिल्ली छोड पर लखनऊ आये । यहा पर भी इस परिवार के लोग धनी-मानी व्यक्तियो मे गिने जाते थे। इस परिवार के पूर्वज सेठ तुलाराम धनधान्य सम्पन होने के साथ कुशल नीतिज्ञ तथा दानवीर के रूप में प्रसिद्ध थे। जहादार शाह के दरबार मे सेठ तुलाराम का सम्मान था। जहादार शाह सेठ जी वो यानाओ म अपने साथ ले जाते थे और उह पूरा आदर देत थे। एक बार काशी यात्रा पर सठ तुलाराम इनके साथ गये और गगा का मनोहर दश्य देखकर इतन मुग्ध हुए कि शिवाला घाट पर मकान खरीदकर वही बस गए। उसी समय से यह वैश्य परिवार काशी वासी हो गया। आज भी इस वश्य कुल का शिवाला में ही निवास है। व्यापार मे लाभ होने पर सेठ तुलाराम तथा उनके पुत्र सगमलाल ने काशी मे और भी मकान खरीद कर प्रचुर सम्पत्ति अजित कर ली थी। इस प्रकार रत्नाकर जी के प्रपितामह, पितामह और पिता वैभवशाली परिवार से सयुक्त रहे हैं। सेठ तुलाराम वे पुत्र सेठ सगमलाल और सेठ सगमलाल के पुत्र पुरुषोत्तम दास और पुरुषोतम दास के पुत्र बाबू जगन्नाथ दास रत्नाकर है। बाबू जगन्नाथदास का जम विक्रमी सवत १६२३ (सन १८६६ ई०) की भाद्रपद शुक्ला पचमी को काशी मे हुआ। अपनी ज म तिथि का सकत रत्नाकरजी कविवर रत्नाकर का जीवन-वृत्त 8 ने स्वय विहारी रत्नाकर की टीया प्रय में लिया है। जगनाथदारा जिरा कुल मे उत्पन हुए थे, उसका चिरवालोन सम्बध मुगल राज-दरवारा से रहा था। अत फारसी का प्रचलन स्वभावत इस परिवार मे वशानुनम से चला आ रहा था। शशव म जगनाथ दास को भी फारमी भाषा का अभ्यास कराया गया। फारसी उदू भाषा के अध्ययन से इहें भाषा का यह सस्कार सुलभ हो गया जो उन दिनो की व्यवहार की भापा था। कचहरियो मे उटू-पारसी वा प्रयोग ज्यादा मात्रा में होता था। स्कूली शिक्षा प्रारभ होने पर गणित, अंग्रेजी, इतिहास आदि विपय पढने का मौका मिला। मैट्रिक परीक्षा उत्तीण परने के बाद पाशी के सुप्रसिद्ध क्वीस कालेज मे प्रवेश लिया और इसी कालेज से इटरमीजिएट तथा बी० ए० परीक्षा १८६१ ई० म उत्तीण की । उन दिनो वी० ए० तक पढ़न वाले छात्र कम ही होत थे। बाबू जगनाथदास को शेशन स ही कविता करने का शौक था, उहाने उद्धव- शतक के निवेदन में लिखा है-'कविता में रुचि सडवपन से ही थी। ४०-४५ थप हुए जब मैंने दो एक कवित्त उद्धव सम्बधी बनाए थे। वे कई मित्रा और उस समय के कवियो को रुचिकर प्रतीत हुए। पूज्यपाद स्वर्गीय पिताजी ने भी उन पर प्रसन्नता प्रकट की। इस प्रकार प्रोत्साहित होपर मैंने उद्धक विषयक ५७ कवित्त और बनाए और फिर यह विचार किया कि उद्धव शतक की रचना की जाय। विद्यार्थी जीवन मे ही इहाने उदू फारसी के साथ हिन्दी मे कवित्त लिखना प्रारभ कर दिया था। उदू शायरी म इनका उपनाम 'जकी' था। उदू फारसी की शायरी के लिए ये अपने उस्ताद मिर्जा मुहम्मद हसन फायज के प्रति ऋणी थे और उनका स्मरण बडे सम्मान के साथ करते थे। इनकी मा यता थी कि शायरी में इसलाह बहुत जरूरी है। और इसलाह के लिए काबिल उस्ताद का होना अनिवाय है। विना उस्ताद को इसलाह के शायरी लूली लगडी रह जाती है। यह बात सहोंने सन् १६२२ के बीसवें अखिल भारत वर्षीय हिंदी साहित्य सम्मेलग के सभापति भाषण म कही थी। 'उद् शायरी अच्छी होने का मुख्य कारण यह है कि उदू शायर बहुत दिनो तक उस्तादो स इसलाह लेत रहत है। जब वे कोई कविता बनाते है तो अपने गुरु के सामने सशोधनाथ उपस्थित करत है । और जब तक गुरु की स्वीकृति नहीं मिलती, तब तक वे उस कविता को मुशायरो मे नही पढ़त।" बाबू जगन्नाथदास ने जब फारसी शायरी छोड कर हिदी मे कविता लिखना शुरू किया तो स्वरचित छद वे अपने मित्र मथुरा निवासी श्री नवनीतलाल चतुर्वेदी को दिखाते रह। इसके साथ हो व अपनी मित्र मडली में भी सुनाते थे ताकि उसके गुण दोप ज्ञात हो सकें। मित्रो द्वारा सुझाय गय परिवतन भी वे सहर्ष स्वीकार कर लत थे। उदव-शतक जोयिका और नौकरी बाबू जगन्नाथदास को मम्मन होते हुए भी दो स्थानो पर नौकरी करनी पड़ी थी। यद्यपि ये दोनो स्थान राजघरानो से सम्बध रखते है, फिर भी नौकरी तो नौकरी ही है। बी० ए. पास करने के बाद कुछ वप तो साहित्यिक मनोविनोद म गुजार दिये कितु आठ-नौ वप साहित्य चर्चा करने के बाद जीविका की ओर उनका ध्यान गया। पहले एटा जिले की अवागढ़ रियासत मेट्रेजरी अफसर के पद पर आपकी नियुक्ति हुई। अवागढ छोटा सा एवं स्वा है । जलवायु की दृष्टि से वह वावूजी को अनुकूल सिद्ध न हुआ। मत दो यप बाद स्वयमेव त्यागपत्र दकर वहा से आ गये । काशी आने पर अयोध्या नरेश सर प्रताप नारायण सिंह ने इहे प्राइवेट सेक्रेटरी पद पर आमत्रित किया। कुछ समय बाद इनकी काय कुशलता से प्रस न हो इहे अपने राज्य का मुख्य सचिव बना दिया। महाराजा की मत्यु के बाद महारानी श्रीमती जगदम्बा देवी ने इहे अपना निजी सचिव बनाया। सन् १९२८ तक रत्नाकर जी इसी पद पर महारानी अयाध्या के पास काम करते रह । महाराजा की मृत्यु के बाद अयोध्या में कुछ पट्टीदारोने रियासत पर अधिकार करने का पडयन किया जिसे रत्नाकर जी ने अपनी सूझ- बूझ से विफल कर दिया। कोट म लम्बे अर्से तक रियासत के अधिकार को लेकर मुक्दमा भी चला जिसमे महारानी की जीत हुई । इस पडयत्र मे रत्नाकर जी को वदनाम करने का भी प्रयत्न किया गया। महारानी के प्रिय पात्र होने से उन पर आक्षेप भी लगाये गये कितु वे झूठे साबित हुए और रत्नाकर जी निर्दोष एव निष्कल होकर सच्चे सेवक सिद्ध हुए । उस समय के फैजाबाद के अग्रेज कमिश्नर ने रत्नाकर जी के चरित्र एव काय शली को मुक्त कठ से प्रशसा की और इहे बहुत अच्छे प्रशसा भरे प्रमाण पत्र दिये । सन् १९२८ मे रत्नाकर जी का स्वास्थ्य गिरने लगा था और इनसे कठिन परिश्रम नहीं बन पडता था। यत राज्य की सेवा से त्याग-पत्र देकर काशी आ गये। अयोध्या मे काय करत समय भी रत्नाकर जी की काय साधना निरन्तर अप्रतिहत गति से जारी थी। सन १९२० मे महारानी जगदम्बा देवी की प्रेरणा से इन्होन 'गगावतरण काव्य का प्रणयन किया। 'साथ ही बिहारी सई पर यथा समय टीका लिखने का काय भी करते रहे जो १६२५ में पूरी हुई और 'विहारी रत्नाकर' नाम से प्रकाशित हुई। य दोना पुस्तकें महारानी को समर्पित रत्नाकर जी को अपने यौवन काल में यात्रा और देश-देशातर भ्रमण का बहुत शौक था। सम्पूर्ण भारत का उहाने भ्रमण किया था। भारत के पवित्र तीथ स्थलो मे से किसी एक की याना वे वप म एक बार अवश्य करते थे। कश्मीर, नाथद्वारा, जगन्नाथपुरी, मथुरा और हरिद्वार उनके यात्रा स्थल थे गर्मी के दिनो मे मसूरी, ननीताल और शिमला जाते थे। गगा के प्रति भक्ति के - कविवर रत्नाकर का जीवन वृत्त पारण प्रतियप हरिद्वार जागा सो गा लिए आवश्य था। "पिहारी रत्नाकर' की टीया उन्हाने यघमीर प्रवास म पूरी की थी। पयटन | लिए समुद्री तटा पर पहुच जात थे। राजा महाराजाआ रो व्यक्तिगत परिचय ये पारण राजस्थान की रियासता मा भी य प्राय मण परत रहत थे। राजस्थान म ये राजा ये अतियि होकर ही जाते थे। राजस्थान को प्राय सभी रियासता मे उनका आना- जाना था। रत्नाकर जी वैभव-सम्पन घर म पैदा हुए थे। घर का रहन-राहन भी गेठा मी मर्यादा ये अनुसार था। बचपा से विद्याम्परान म पडने वाले रत्नागर जी पहले व्यक्ति थे। पढना लियना, दयिता और शायरी का शोर रचना इस गठ घराने के लिए नई यात थी। पिन्तु इस प्यसन वो विगी 1 बुरा नहीं माना, प्रत्युत प्रोत्सारान देवर बढाया। इनके पिता सेठ पुरषोत्तम दाम ने इनकी पहली कविता की प्रशसा करके इहें कविता करन की प्रेरणा दी थी। बचपन मे रलार जी को क्यूतर पालने का भी शौक था । उस दिनो रईम घराना में कबूतर, तीतर, खरगोश पुत्ता, बिल्ली आदि पसी और जानवर पालने का गौर रहता था। रत्नाकर जी ने कबूतरा या समीप से निरीक्षण किया था, उनके स्वभाव से वे परि- चित हो गये । उमी आधार पर उहोंने अपनी कविता म इसका वणन किया है। रत्नाकर जी अग्रवाल वश्य वश 4 सेठी का वस्त्राभरण मे भी अनुकरण करत थे । शेरवानी और घूडीदार पाजामा तो उनपी ठाट-बाट को पोशार पी। कभी पभी सेठा की पगडी भी पहन लेत ५। इत्र फुलेल का उह बडा शोर था। कपडो मे इन तो सभी शौकीन लोग लगात हैं। रत्नाकर जी बिस्तर म भी इत्र का प्रयोग करते थे। उनका वेश विन्यास, खान-पान, रहन-सहन सब सुरुचिपूर्ण था। राज दरबारोसे सम्बध रहन के कारण उसी प्रकार का शिष्टाचार भी उनके व्यवहार में सहज आ गया था। विद्याव्यसनी होने के कारण साहित्य, दशन, पुरातत्व, अध्यात्म, पुराण आदि विषयो वी पुस्तकें पढने मे उनका समय व्यतीत होता था। अयोध्या में रहत हुए उह वहा के राजनीतिक झगडो ओर कचहरी मामला म लगभग पद्रह वष तक निरतर फसे रहना पड़ा जिसके कारण काव्य-सजन वे नहीं कर सक। किन्तु स्वाध्याय मे यवधान नहीं आया। हिन्दी के प्राचीन कवियो की कविता उनकी स्वाभाविक रुचि का विषय थी। विशेषत रीतिकालीन देव, मतिराम, विहारी, घनान द, पद्यार, केशव आदि कवियो की सरस रचनाए उहे कठस्थ थी । नायिकाभेद और शृगार वणन म भी उनकी रुचि थी। सयोग शृगार का बहुत सुदर वणन उनकी काव्य-कृतियो म मिलता है। रत्नाकर जीका अयोध्या प्रवास का समय तो देश की राजनीति और समाज की स्थिति से कुछ क्टा रहा, किन्तु फाशी आन पर उन्हान राजनीति विषयक - १२ चदवशतक काव्य सुजन भी किया और सामाजिक तया साहित्यिक कार्यों में भी सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू पिया।याशी नागरी प्रचारिणी सभा से तो रत्नाकर जी उसके जम काल से ही जुड़े थे। वाशी आने पर सूरसागर ये सम्पादन का काम हाय म लिया और बाबू श्यामसुन्दर दास पे साथ सभा ये कार्यों में सहयोग दिया। एशियाटिव सोसाइटी के भी सदस्य बने । ओरियटल काऊंस मे भी योग दिया। काशी कवि समाज' की स्थापना मे रत्नाकर जी अग्रणी थे और यवि-समाज की बंठको में हमेशा उपस्थित रहत थे। स्वय पवितापाठ और समस्यापूर्ति भी किया करते थे। रसिव महल, प्रयाग की स्थापना में भी इनका हाथ था। इस प्रकार साहित्यिक गतिविधियो से जुट कर रत्नावर जी ने साहित्य और समाज की अच्छी सेवा की थी। रत्नावर जी का गृहस्थ जीवन विशेष सुखमय नही रहा । इनवे दो विवाह हुए थे और दोनो पलियो वा शीघ्र ही देहान्त हो गया। पहली पत्नी से दो सतान थी। एव पुष और एव पुत्री। पुत्र का नाम राधेकृष्णदास था। दूसरी पत्नी से दो रातान हुई और दोनो अकाल कवलित हो गई और पली भी स्वग सिधार गई। इनपे पुत्र राधेकृष्ण दास बा लालन-पालन इनकी विधवा भाभी ने किया था। रलार जी की काय प्रतिभा का सिक्का उस समय के विद्वाना पर पूरी तरह जम गया था। वायू श्यामसुदर दास, प० पदमसिंह पार्मा, श्री चद्रधर शर्मा, गुलेरी, नाथूराम शर्मा 'शकर' मादि साहित्य ममन इनके प्रशसव थे। सुप्रसिद्ध अग्रेज विद्वान् सर जाज नियसन भी इनकी प्रतिभा से परिचित थे। उहाने लाल चन्द्रिका की टीका मे इनका उल्लेख बडे सम्मानपूर्वक किया है। वायू देवकीनदन खत्री ये सहसम्पादयत्व में इन्होने 'साहित्य सुधा निधि' नामा मासिक पत्र निकाला था जो विद्वत्समाज मे लोकप्रिय था। समालोचनादश के कारण भी इन की ख्याति हिंदी जगत मे फैल गई थी। काशी मे रहते समय रत्नाकर जी का समय साहित्य-सृजन मे ही व्यतीत होता था। शारीरिक दृष्टि से कोई इहें शिथिल या सुस्त नहीं कह सकता था किंतु भीतर ही भीतर हृदय रोग ऐंजाइना ने इहे घेर लिया था। उहे स्वय भी इस रोग के कारण अपने अन्तिम समय का आभास होने लगा था। सन् १९३२ के जून मास मे जब हरिद्वार जाने लगे तो सूरसागर के शेप काय की उहें चिन्ता थी। श्री दुलारेलाल भागव से उहोंने इस काय के विषय मे अपनी चिंता प्रकट भी की थी। रत्नाकर जी गगा के परम भक्त थे, इसलिए हरिद्वार उनवा प्रिय स्थान था। जून मास मे हरिद्वार पहुच गये और वही २१ जून सन् १९३२ ई० को इनका देहावसान हुआ। रत्नाकरजी के निधन से व्रजभापा काव्य चा अतिम सबथेष्ठ कवि उठ गया उनके बाद क्सिी,अय कवि ने इतना उत्कृष्ट काव्य व्रजभाषा मे नही लिखा और सवतोभावेन ब्रजभापा को समर्पित कोई दूसरा कवि उनवे बाद पदा ही नहीं हुआ। । ०० कविवर रत्नाकर का जीवन-वत्त २ आधुनिक ब्रजभाषा काव्य और कविवर रत्नाकर हिदी साहित्य के इतिहास मे भक्ति तथा रीतिकालीन काव्य को प्राचीन कविता के नाम से अभिहित किया जाता है । इस कविता का अस्सी प्रतिशत भाग अजभाषा मे लिखा गया है । शेप वीस प्रतिशत मे अवधी, राजस्थानी, बुदेली, भोजपुरी आदि भाषाओ मे लिखा साहित्य है । गोस्वामी तुलसीदास रचित 'राम चरित मानस' जायसी रचित 'पद्मावत', सुपी रविया के प्रेमाख्यानक काव्य अवधी भाषा र कीर्ति स्तम्भ हैं पितु इनकी संख्या सीमित है। राजस्थानी मे इस काल मे श्रेष्ठ काव्य लिखे गये वितु उनको भी साहित्य मे गौण स्थान प्राप्त हुआ। अजभाषा मे काव्य सृजन करने वाले कविया की सख्या अपरिमेय है । स्वय तुलसी जैसे महाकवि ने दस ग्रन्थ ब्रजभाषा म लिखकर ब्रजभापा को स्थापित काय- भाषा स्वीकार किया है । मीराबाई की पदावली की भापा राजस्थानी होने पर भी वह व्रजी की छाप से बच नही सकी है। प्राय प्रत्यक पद का अधिकाश प्रज भाषा के माधुय से परिपूर्ण है। रीतिकालीन कवियो ने प्रान्तीय भापाओ का प्रयोग नहीं किया । उहें परि- माजित, प्राजल ब्रजभापा भक्त कविया द्वारा विरासत मे सुलभ हो गई थी। अत सभी श्रेष्ठ कविया ने प्रजभाषा को स्वीकार कर काव्य रचना की। देव, मतिराम विहारी, पदमावर, धनानद आदि कवियो ने प्रजभाषा के लालित्य और माधुय को जिस मनोहारी रूप म पल्लवित किया, वह ब्रजभापा को सावमोम काव्य भाषा बनाने में सहायक हुआ। ब्रजभाषा काव्य की यह अविच्छिन परम्परा भारतेन्दु युग तक बनी रही। भारत दु-युग को इतिहास लेखक आधुनिक युग और गधन्युग की सभा देते हैं किन्तु इस युग के प्रमुख कविया की काव्य भाषा परम्परा प्राप्त बजभापा ही है। भावबोध म अवश्य परिवतन आया, किन्तु अभिव्यजना के लिए प्रजभाषा पो ही भारते दु युगीन कवियो ने स्वीकार किया है। भारतन्दु के समय में प्रजमापा के विषय में कोई विवाद खडा नही हुआ। प्राय सभी कवि अपनी-अपनी शली मे ब्रजभाषा मे पविता लिखत रहे । भारतेन्दु स्वय ब्रजभाषा ४ उद्धव शतक - येथेष्ठ कवि थे। कविता के अतिरिक्त अन्य साहित्य विधाओ मे उहोंने खडी बोली को स्थान दिया है। द्विवेदी युग के प्रारभ मे ब्रजभाषा को लेकर विद्वानो मे कुछ विवाद का सूत्र- पात हुआ। जिस प्रकार गद्य मे खड़ी बोली का चलन हो गया था, उसी प्रकार पुछ लेखक कविता मे भी खडी भोली को स्थान देने का आग्रह करने लगे थे। उस समय विहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश मे 'घही बोली बनाम प्रजभाषा' का आदोलन शुरू हो गया था। प्रजभापा के पक्षपाती भारतेन्दु युगीन कुछ कवि थे। उनका काव्य-सस्वार अजभाषा का था अत वे खड़ी बोली को कविता के लिए अनुपयुक्त मानते थे। उनके मत मे घडी बोली मे ललित एव मधुर भावो की अभिव्यक्ति के लिए लोच लचक का अभाव है । श्रुति पेशलता का अभाव है। ब्रजभापा के स्वी- कृत छदो मे खडी बोली ढल नहीं सकती। अत कविता के लिए ब्रजभाषा का अस्तित्व अनिवाय है । भक्ति और रीति काव्य को जैसी समृद्ध परम्परा प्रजभापा के पास है, वैसी पडी बोली मे सम्भव ही नहीं है। इस प्रकार के तर्कों के आधार पर प्रजभाषा के पक्षधर अपनी स्थापना का प्रबल रूप से समयन करने मे लगे हुए थे। दूसरी ओर खही बोली को साहित्य की समस्त विधाओ मे समान रूप से प्रयोग में लाने वाले विद्वान प्रजभाषा से अपना सम्बध विच्छेद कर खडी बोली के पक्ष मे व्यावहारिक दृष्टि से युक्ति और तक प्रस्तुत करने मे तत्पर थे। खडी बोली गद्य के क्षेत्र मे तो स्थापित हो चुकी थी और उसका प्रभाव भी निरतर बढता जा रहा था । अत द्विवेदी युगीन कवियो का ध्यान भी ब्रजभापा से हटकर पडी बोली की ओर जाने लगा। प० श्रीधर पाठव, अयोध्यासिंह उपाध्याय, नाथू राम शर्मा 'शवर', गया प्रसाद शुक्ल 'सनेही', रामचन्द्र शुक्ल, भगवानदीन नादि कवियो ने अजभापा छोडकर खडी वोली को काव्य या माध्यम बना लिया था। खडी वोली के निरन्तर बढते प्रयोग और प्रभाव से जो दो सुकवि अछूते रहे, उनमे थी जग नाथदास रत्नाकर और प० सत्यनारायण कविरत्न का नाम उल्लेखनीय है । यो तो और भी अनक कवि थे जो ब्रजभाषा मे कविता लिख रहे थे कि तु उनकी स्फुट रचना का साहित्य मे महत्त्वपूण स्थान नहीं था। इन दो कवियो ने द्विवेदी युग मे ब्रजभाषा काव्य की पताका फहराने का श्रेय प्राप्त किया और ब्रजभाषा को समद्ध बनाने मे प्रशसनीय योग दिया। बाबू जगन्नाथदास 'रत्लावर' ने ब्रजभाषा को विसी आग्रह या हठ से स्वी कार नहीं किया था । वस्तुत ब्रजभापा उनके संस्कार की सहज भाषा थी। अपने शशव से उहोंने ब्रजभापा की कविता बड़े चाव से पढी थी। ब्रजभाषा के श्रेष्ठ सुकवियो के सैक्डोछद उहें कठस्थ थे। प्रेम और शृगार के कवित्त रत्नाकर जी जब सुनाने लगते तो उनका प्रवाह टूटता ही नहीं था । एक के बाद एक छद उनके मुख से इस प्रकार निक्लता, जैसे पवत से झरना निकल कर बहता है। एक ही आधुनिक ब्रजभाषा काव्य और कविवर रत्नाकर विषय के अनेक वियो के छदो की माला उनसे पण्ठ मे तयार रहती थी। ज. भापा का यह प्रगाढ प्रेम और पावन सस्कार ही उह ग्रजभाषा से याधे रहा। उत्तये समकालीन अय कवि प्रजभाषा छोडपर पडी बोली के जाल म फ्स गये वितु रत्नाकर जी अनय भाव स प्रजभापा की रावा म माजीयन तत्पर रह। ग्रजभापा ये साथ रत्नापर जी के प्रेम का दूसरा कारण उनका भक्ति- साहित्य का अध्ययन और प्रेम या। भागवत, सूरसागर, रासपचाध्यायी, अष्ट छापी कविया वी वाणी और पृष्ण भक्ति सम्प्रदाया ये कयियो की मनारम रचनाए उनके जनुशीलन या विषय थी। रहीम, रसपान और मीरा के छद एव पद उनकी जिह्वा पर विराजते थे। रसवान ये सवैये सो उनके मुख से एसे निर. लते जैसे वे रसपान ये नही रत्नाकर ये हो। रीतिकालीन पविया ने अज भाषा मे लालित्य, मादव, माधुय और प्राजलता का पुट दयर जो प्रवाह उत्पन्न किया था, उसे आत्मसात करने का भी रखाकर न भरसक प्रयास किया था। अज भाषा मे लोच-लचक के साथ श्रुति पशलता पा गुण भी रत्नावर जी को भायपर लगता पा। अत उहाने ग्रजभापा का दामन नहीं छोड़ा । खडी चोली के प्रचार प्रसार ने जो वातावरण उस समय बनाया था, रत्नावर जी उससे प्रभावित नहीं हुए। उहोने चातक प्रत लेकर व्रजभाषा मे साहित्य-सजन या सुख प्राप्त किया। यदि इस प्रकार वा प्रत धारण करने वाले विसी दूसरे कवि का स्मरण करना हो तो वह हैं प० सत्यनारायण पविरत्न । कविरत्न जी को ब्रजभाषा इसलिए भी प्रिय थी कि उनकी मातभापा ही नजभाषा ही थी । प्रज प्रदेश मे उनका जम हुआ था, शैशव से इसी भाषा मे बोलते और रचना करत थे। ब्रजभाषा ये ये दोनो महा कवि अग्रेजी शिक्षा प्राप्त, वी० ए० उपाधिधारी थे। दोनो कवियो को अग्रेजी, सस्कृत और फारसी का अच्छा ज्ञान था किन्तु इनकी काव्यनिष्ठा यजभाषा मे ही थी। रत्नाकर जी की मातृभाषा तो बनारसी भोजपुरी थी किन्तु अध्ययन और अभ्यास से अजित भाषा, ब्रजभाषा थी। यही दोनो पषियो मे अतर है। व्रजभाषा की समृद्ध परम्परा को स्वीकार करने वाले द्विवेदी युगीन पवियो मे सत्यनारायण कविरत्न के साथ प० वियोगी हरि, हरदयालु सिंह, रमाशकर शुक्ल 'रसाल' रामचन्द्र शुक्ल दुलारेलाल भागव रामेश्वर करण जादि का नाम आता है किन्तु रलावर इन सब मे श्रेष्ठ और मूधन्य है। 'बजभाषा बनाम खडी बोली' ने जब आदोलन का रूप धारण कर लिया और पक्षो से अपने समथन मे तक प्रमाण प्रस्तुत होने लगे तब श्री जगन्नाथदास रत्नाकार ने अपन पत्र 'समालोचनादश म इस विवाद पर दोबद्ध टिप्पणी की यो । उहोंने व्रजभाषा का पक्ष तो नही छोडा था, किन्तु खड़ी बोली अतुकान्त छन्दविहीन कविता से भी उनका परिचय हो गया था- - । उद्धव शतक - जात खडी बोली में कोऊ भयो दिवानी। कोउ तुकात बिन पद्य लिखन मे है अरमानो। अनुप्रास प्रतिबध कठिन जिनके उर। माही । त्यागि पद्य-प्रतिबधहु लिखत गद्य क्यो नाही। - जो लोग अनुप्रास, छन्द, यति गति को छोडकर कविता लिखने में लगे थे, उहें रत्नाकर ने यही परामश दिया था कि वे गद्य को स्वीकार करें। कविता के क्षेत्र मे धाधली पैदा न करें। उहे उस समय की खडी बोली की कविता 'अग-भग छवि छीन दिखाई देती थी। यह सब होते हुए भी खडी बोली के सतत बढते हुए प्रयोग और प्रभाव से रत्नाकर जी अपरिचित नही थे। उहोने कानपुर मे कवि- सम्मेलन के सभापति पद से जो भाषण दिया था, उसमे इस तथ्य का समावेश है। उहोने खड़ी बोली के बढते हुए प्रयोग को देखकर कहा था-'बजभापा कविता का हास होने पर पडी बोली म कविता की जाने की आवश्यक्ता समझकर कुछ लोगो ने उसमे भी अपनी प्रतिभा का परिचय देना आरम्भ दिया। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र जी ने भी कुछ छद उक्त भाषा मे लावनी के नाम से लिखे थे। उनके ऐसे छद 'फूलो का गुच्छा' तथा 'विनय प्रेम पचासा' ग्रन्थो मे पाये जाते है। xxx खेद का विषय है कि पडी बोली में कविता करने वाले नवीन उत्सा- हिया ने प्रजभाषा में कविता करना ही नहीं, प्रत्युत उसके ग्रयो का पठन-पाठन भी त्याग दिया। फल यह हुआ कि वे साहित्यिक सामग्री से, जो उसमे प्राचीन कवियो ने बडे थम से सचित की थी, वचित हो गये। बीसवें अखिल भारतवर्षीय हिदी साहित्य सम्मेलन के सभापति पद से भाषण करते हुए उहीन इस बात को पुन उठाया था । उहोंने अपना ब्रजभाषा प्रेम प्रक्ट बरत हुए कहा था-'इस बात को स्पष्ट शब्दो मे कहते हुए मुझे किंचित भी सोच नहीं होता कि मैं ब्रज- भापा का पूण पक्षपाती और समथक हू। उसकी कविता मै मुझे जो आनद मिलता है, वह अक्थनीय है और बहुत दूढो पर भी वह मुये दूसरी जगह नहीं मिलता। पर इसका यह तात्पय नही कि मैं खडी बोली की कविता का विरोधी हू xxx मुझे यह स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है कि इस कविता का सौभाग्योदय होने वाला है। x x x मैं ब्रजभाषा के सम्बध म कुछ कहना चाहता हू (खडी बोली की) जहा एक ओर सवतोमुखी उन्नति हो रही है, वहीं दूसरी जोर हमारी ब्रजभापा का क्षेत्र समुचित होता जा रहा है। जो भापा एक समर हिदी काव्य का प्रधान श्रीडाक्षेत्र और सवमाय थी, उसी की ओर आज हमारे नवयुवक पविगण उदासीन हो रहे हैं। जो अनक उन्धकोटि के प्रथ रत्ना की जननी थी, उसी के गौरव को नष्ट करने का आज जहा-राहा प्रयत्न देख पडता है। x x x जब षष्ठी बोली के पक्षपाती ववियो को अपने प्राचीन साहित्य अर्थात ब्रजभाषा की। । माधुनिक प्रजभाषा काव्य और ववि रत्नापर १७ उपेक्षा करते, उसे हीन-दीन तथा सवथा, घृणित बनाते हुए देखता हूँ तो मुझे आतरिक व्यथा होती है । इस सैकडो वष पुराने साहित्य के प्रति यह व्यवहार न होना चाहिए। जिस साहित्य ने आपको जीवन दान दिया है, आपको शक्ति सम्पन किया है,। विषम परिस्थितियो मे आपकी सहायता की है और सक्ट के समय आपका उद्धार किया है, उसके प्रति आपको कृतज्ञ होना चाहिए। आज प्राचीन साहित्य मे ऐसे ऐसे प्रथ विद्यमान हैं, जो पेवल हिंदी साहित्य के ही नहीं प्रत्युत वाङमय मात्र के भूपण कहे जा सकते है । महात्मा सूरदास और गोस्वामी तुलसीदास प्रभति कवियो को अपनाकर कोई भी देश अपने को घय मान सक्ता है। यदि इन महात्माओं की कृतिया हिंदी साहित्य से निकाल दी जाय तो फिर उसमे गौरव की वस्तु ही क्या रह जाती है । म य देशा मे भी प्राचीन साहित्य का अर्वाचीन साहित्य से कहीं अधिक जादर होता है। चौसर और फिरदौसी अवज्ञा नहीं, पूजा के पात्र समये जाते हैं।" उपयुक्त उद्धरणो से यह स्पष्ट हो जाता है कि रत्नाकर जी ब्रजभापा के प्रबल समथक थे। उनकी दष्टि मे कविता के लिए पडी बोली की अपेक्षा व्रज- भाषा ही उपयुक्त भाषा है । लेकिन यो ज्यो खडी बोली का प्रचलन बढता गया त्यो त्यो रत्नाकर जी का कठोर रुख कामल होता गया और उहोंने खडी बोली का विरोध करना बद कर दिया। खडी वोली के सम्बर मे उहोन अपने विचार चतुथ ओरिण्टल का फैंस के हिन्दी विभाग क सभापति पद से दिय भाषण मे व्यक्त किये है। उनके मत मे खडी बोली को सस्कृत के क्लिप्ट तत्सम प्रधान शब्दा मे भरना उचित नहीं है। भाषा म व्यजा शब्दा को मुख्य स्थान मिलना चाहिए । यदि तत्सम प्रधान क्लिष्ट पदावली को न रोका गया तो भविष्य मे हिदी जनसाधारण के लिए दुल्ह तथा सस्कृत प्राकृत के समान मृत भाषा हो जाएगी, बोलचाल की भाषा को किसी नवीन स्वरूप म बदल देना पडेगा । इस परामश के साथ ही उहोने अरबी फारसी के कठिन शो के प्रयोग को भाषा के लिए जनुचित ठहराया है। उनके मत मे बोलचाल की प्रातीय भापाओ के शब्दो का प्रयोग भाषा को व्यावहारिक एव प्रवाहपूण बनाने के लिए अनिवाय है । बडी बोली के सम्बन्ध मे उनका कहना था वि यह प्रयोग की परिमार्जित भाषा बन गई है, अत इरादा नाम भी सुन्दर होना चाहिए । उहांने इमवा भारती भापा' नाम रखने का सुझाव दिया था। कविवर रत्नाकर प्रजभाषा के अतिरिक्त खडी वोली से किसी रूप में कविता नही लिखी। यजभाषा की मधुरता सुकुमारता पेशलता, लावण्य और लालित्य के साथ वे आजीवन वधे रहे । इसका परिणाम यह हुआ कि उन सभी काव्य ब्रजभापा के उत्तृष्टतम आदश काव्य बन सके। रत्नाकर जी को पाथ्य कृतियाँ-स्नायर जी वी पाच काव्य कृतिया तो १९ उद्धव-गावक अति प्रसिद्ध हैं, उनमे हिंडोला, हरिश्च द्र, शृगार लहरी-प्रकीर्ण पद्यावली, गगावतरण और उद्धव-शतक । इनके अतिरिक्त समालोचनादश एक अनूदित रचना है जो रोला छद मे है क्लिकाशी उनका एक वणनात्मर प्रबध काव्य है, जिसे वे पूरा नहीं कर सके। इसमे काशी नगरी का वणन है। इस काव्य का अधिक प्रचार नहीं हो सका । काशी नगरी की तत्कालीन स्थिति को समझने के लिए यह उत्तम कोटि की रचना है। रत्नाष्टक तथा वीराष्टक नाम से इनके तीस अप्टको का सकलन है। वीराष्टक मे १४ धीर नर नारियो का रत्नावर जी ने स्मरण किया है। यदि इन समस्त काव्य कृतियो को रलावर प्रथावली के रूप में प्रकाशित कर दिया जाता तो उनके सभी छोटे बडे ग्रथा से पाठक का परिचय हो जाता। गगावतरण, हरिश्चन्द्र और उद्धव-शतक से तो ब्रजभाषा प्रेमी रसिक्वद परिचित हैं । शेप रचनाए अब उपलब्ध भी नहीं होती। अत' उनके काव्य सौष्ठव से पाठव" अपरिचित ही है। उद्धव शतक की रचना से रत्नावर जी को जो सुयश मिला, वह इस बात का प्रमाण है कि यह रचना भाव, भापा, शैली, अलकार, बिम्ब, प्रतीक जादि समस्त गुणो से परिपूर्ण होने के कारण बीसवी शती की सवथप्ठ व्रजभापा काव्य- कृति है और रत्नाकर आधुनिक युग के प्रतिभासम्पन सिद्ध कवि है। उनकी तुलना ब्रजभापा क्षेत्र मे किसी आधुनिक कवि के साथ नही हो सकती। इसम कोई सनेह नहीं है कि यदि रत्नाकर जी केवल एक ही कृति 'उद्धव शतक' लिखत तो भी वे हिन्दी साहित्य में अमर रहते और उनकी ख्याति आधुनिक ब्रजभापा के सर्वोत्तम कवि के रूप मे सदव बनी रहती। माधुनिक ब्रजभाषा काव्य और कविवर रत्नाकर १६ भ्रमरगीत परम्परा और उद्धव-शतक उद्धव-शतक, रत्नावर जी की सजक प्रतिमा का अप्रतिम निदशन है । इस काव्य को विद्वानो ने भागवत पुराण में वर्णित भ्रमर गीत परम्परा का तथा सूर- दास एव न ददास द्वारा रचित प्रमरगीत शैली का आधुनिक सस्करण कहा है। वस्तुत यह एक ऐसा सदभ है जिसका मूल बीज तो भागवत के दशम स्कद के छियालीस तथा सैतालीसवें अध्याय में उपलब्ध है कि उसका पल्लवन भक्त पवियो ने अपनी प्रतिभा द्वारा किया है । भागवत म यह प्रसग इस प्रकार वर्णित है भ्रमरगीत का मूल स्रोत-श्रीकृष्ण को अक्रूर मथुरा ले गये थे। कृष्ण के माता पिता और गापिया श्रीकृष्ण को मथुरा भेजने को तैयार ही चिन्तु अक्रूर थे विनम्र निवेदन और विश्वास भरे वचनो से आश्वस्त हो उहाँने मथुरा जाने की स्वीकृति दे दी। श्रीकृष्ण मथुरा मे रह तो रहे थे किन्तु उह बज की याद व्यथित करती थी। उहोने एक दिन अपन प्रिय सखा और सचिव वृहस्पति शिष्य उद्धव को बुलाकर कहा कि हे उद्धव तुम प्रज को जाा और मेरे माता पिता तथा विरह विधुरा गोपियो को मेरा सदेह सुनाकर सांत्वना दो । गोपियो का चित्त सदा मुझमे लगा रहता है। मैं उनका प्राण है। मेरे लिए उहोंने सवस्व परित्याग कर दिया है । मुझ प्रियतम के दूर चले आने से वे अत्यन्त विरह व्यथित है और मेरे वापस गोकुल मे आन के सदेश पी आशा में अप 'प्राण धारण किए मयि ता प्रेयसा प्रेष्टे दूरस्थे गोवलस्थिय । स्मरन्त्योड्ग विमुहभक्ति विरहोत्कठ विह्वला ।। धाग्यन्यति वृच्छेण प्राय प्राणा क्थ चन। प्रत्यागमनस शवल्लभ्यी मे मदात्मिका॥ भागवत पुराण-दशम स्कघ ४६ अ० कृष्ण का सदेश लेकर उद्धव रथ पर बैठकर सायवाल गोकुल पहुच गये। वहा पहुचकर पहले नद-यशोदा से कुशल क्षेम पूछा। प्रात काल होने पर गोपिया २० उद्धव-शतक निद्रा त्याग कर उठी और घर की देहली पर पूजा करके दधि मथन करती हुई अपने प्रिय कृष्ण की लीलाओ का गान करने लगी । प्रात काल सूय का प्रकाश फलने पर नाद के द्वार पर एक रथ खडा देखकर आपस मे पूछने लगी- यह रथ किसका है? कही अक्रूर तो नहीं आया है जो हमारे प्रियतम कृष्ण को मथुरा ले गया था यया अब हमे लेने आया है और हमे ले जाकर हमारे मास से अपने मत स्वामी कस का औध्व दैहिक कम करेगा? गोपिया जब आपस मे यह तक वितक कर ही रही थी कि उद्धव अपना रथ लेकर उसके पास पहुच गये। उद्धव श्रीकृष्ण के समान पीताम्बर धारण किये हुए थे। कठ में वैसी ही माला पहनी थी । गोपियो ने उदव से उलाहना भरी भाषा मे कहा, "हम जानते हैं तुम कृष्ण का सदेश क्सिके लिए लाये हो । अवश्य कृष्ण ने अपने माता पिता का स्मरण क्यिा होगा और तुम्हारे हाथ सदेश भेजा होगा। सभी अपने प्रिय जनो को याद करते हैं । हमको कोन याद करने लगा' गोपिया ने उद्धव से कहा--पुरुषो का स्त्रियो के साथ वैसा ही स्वाथपूण लगाव होता है, जैसा भ्रमरो का पुष्पो के साथ।" है r - । अन्येष्वयकृता:मत्री यावदथ विडम्वनम।। पुम्भि स्त्रीपुकृता यढत्सुमन स्विन पटपर्द भागवत, दशमस्कध,४७६ गोपिया उद्धव की बात सुनने को तयार नहीं हैं। उद्धव कृष्ण की प्रशसा करते हैं । कृष्ण के प्रेम को सच्चा बताते हैं किन्तु विरह विधुरा गोपिया सुनने को तयार नही हैं । उद्धव से स्पष्ट कहती हैं- हे भ्रमर । तू कृष्ण की यशोगाथा सुना कर हमारी चापलूसी न कर। ये सब बातें तो कृष्ण की मथुरावासी नयी प्रेयसियों को ही सुना ! भागवत पुराण में यह सदभ बहुत विस्तार से दडी ही भावुक्तापूर्ण शैली में लिखा गया है। इसे पढकर गोपिया की विरह व्यथा सवार सी प्रतीत होने लगती है। भागवत पुराण में गोपी-उद्धव सवाद को तक-वित्तक या कुतक की तरह प्रस्तुत नही किया गया है ।गोपिया अपना सच्चा प्रेम प्रकट करते हुए कृष्ण के प्रति उपालभ ही देती हैं, उद्धव के ज्ञान का उपहास नहीं करती। उद्धव भी ज्ञान का, योग और ध्यान का गूढ उपदेश गोपियो को नहीं देते । गोपिया ता इतना ही कहती हैं कि हम सब अपने प्रिय कृष्ण के विरहानल में जल रही हैं । क्या वे कभी आवर हमे जीवन-दान देंगे? यहा के पवत, नदी, वन, गाए, वशी की ध्वनि वार- वार हमे श्यामगुदर का स्मरण करा रही हैं। उनकी मुललित गति, उदार स्मित विचित्र लीला बाकी चितवन और मधुरवाणी ने हमारा चित्त चुरा लिया है। हम । उहें भूलें तो कसे भूलें। -- प्रमरगीत परम्परा और उदय शतर उद्धव न विरह विदग्धा गोपिया को शात भाव से कृष्ण का सदेश गुनाया । गोपिया आश्वस्त हुइ और उहाँने उद्धव का आदर सत्कार किया। उद्धव भी गोपिया के इस श्रीकृष्ण प्रेमो देघपर अपना स्परप भूल गये। उनका मन द्रवित हो उठा और उहें लगा कि विश्व के दधारियो मे गोपिया ही रावश्रेष्ठ हैं फ्याकि इनका चित्त सर्वात्मना कृष्ण म आसयत है । उद्धव पे मुग मे यरबस म शन निक्ल पडे-लहा ! क्या ही अच्छा हो यदि मैं वृदावन में इन बागनाआ वी चरण रज का सपन परा वाली कोई सता, झाडी या वनस्पति बन जाऊानद व्रण यी इन गोपागमा यी घरण रण को मैं पुन-पुन' प्रणाम करता हूँ। इस प्रवार प्रेमाभक्ति ये रग म रगपर उद्धव मयुरा वापस आए और प्रजागनाओ की प्रगाढ प्रेमामवित या उन्हान श्रीकृष्ण के सम्मुख वणन किया। भागवत का यह सदभ ही धमरगीत याव्य का स्रोत है । हसी के सहार मध्य 'कालीन भक्त कवियो न सगुण निग ण वा विवाद, गान माग और भक्ति माग या विवाद खडा पर भ्रमरगीत काव्य वा स्वैच्छापूवर प्रणयन किया है । भागवत में वाद विवाद का प्रश्न नहीं है। भक्ति और ज्ञान का भी सीधा सम्ब ध नहीं है। गोपियो की मार से शुद्ध प्रगाढ़ प्रेमभक्ति तथा श्रीकृष्ण के प्रति सर्वात्मना समपण मात्र है । इस प्रेमामक्ति में ही उद्धव भी डूब जाते है ।भागवत पुराण यही सिद्धात पक्ष दिखाता है । प्रतिपक्ष या विलोम की बात वहा नही है। भ्रमरगीत मे भ्रमर का स्थान-उद्धव के गोकुल थाने पर गोपियो को श्रीकृष्ण की प्रेम लीलाओ का सहसा स्मरण हो पाया और वे प्रेम विभोर हो उठी । उमी ममय एक भ्रमर उडता हुआ एक गोपी के घरणा के समीप आकर गुनगुनाने लगा । उस गोपी न श्याम वण ये भ्रमर को देखकर शान विमूढ होकर समझा कि यह भ्रमर नही, घनश्याम श्रीकृष्ण का दूत है जो उस मानिनी गापी वो मना और सात्वना दन आया है। गोपी विदग्धा थी। अपने प्रमी कृष्ण के वियोग मे वह मानवती भी थी अत उसने उस भ्रमर के ब्याज से ही उद्धव से अपनी उपालभपूण वाणी मे बात कहना शुरू कर दिया। भ्रमर फूलो पर महराता है गाता है । एक फूल स दूसरे फूल पर जा वठता है। यह समस्त त्रिया-व्यापार एसी प्रेमी का है जो अनय भाव से प्रेम नही करता। इसलिए प्रमर को उपालभ के रूप मे चुनना सगत लगता है । भ्रमर तो ब्याज मात्र है। उसके बहाने से गोपिया उद्धव स मनमानी बात कह लेती है। उद्धव को अज भेजने का कारण-श्रीकृष्ण ने उद्धव कोब्रज मे क्यो भेजा था, यह वात भागवत पुराण के सदभ मे स्पष्ट की जा चुकी है किन्तु हिंदी के भक्त कवियो ने तथा रत्नाकर जी ने उद्धव को ब्रज भेजने का कारण श्रीकृष्ण के मन में अज की स्मति का उदय होना ठहराया है। स्नह को प्रदीप्त करने मे स्मृति का बडा हाथ रहता है। विरह के क्षणो मे सबसे अधिक पीड़ा पहुचाने वाला भाव २२ ৪ৱৰ দ্বাৰক - 12 में प्रेमी विह्वल स्मृति ही है। उपाध्याय जी ने प्रियप्रवास में लिखा न विरह विधाता ने रचा विश्व मे था, तबस्मति रचने मे कौन सी चतुरी था। हो उठता है। प्रेमी के मन मे गहरी बेचनी पैदा होती है और वह अपने प्रिम के । पास जाने को आतुर हो उठता है। यदि पास पहुचना सभव नहीं हुआ तो सदेश भेजता है। भागवत पुराण मे उद्धव सदेश लेकर जाते हैं । उद्धव शतक मे यह स्मृति प्रसग बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है- 'एक दिन यमुना में स्नान करते समय श्रीकृष्ण ने लहरो के बीच बहते हुए एक कमल पुष्प को देखा जिसका नीचे-ऊपर का भाग अधिक मुरझाया हुआ था। कृष्ण ने उमग मे भरकर उस कमल को पकड लिया और सूधने की अभिलाषा से नाक से लगाया । ज्यो ही उसे नाक के समीप ले गये, त्यो ही चक्कर खाकर, हाय शब्द का उच्चारण कर, अचेत हो गये। उनके पैर उखड गये और मुख पर बेचैनी छा गई। उद्धव उह बडी कठिनाई से तट तक ला सके तभी एक तोते ने राधा' शब्द का उच्चारण किया (इस शब्द को सुनते ही उन्हे ब्रज की सुधि मा गई) स्मृति का कारण राधा नाम श्रवण ठहराया है। इस स्मृति जन्य वेदना से कृष्ण व्याकुल हो गये और उहोने उद्धव को व्रज भेजने का निश्चय दिया। भ्रमर की दूत रूप मे स्वीकृति-भ्रमर की कल्पना मे कई कारण बताये जाते हैं। भ्रमर को स्वार्थी, लोलुप, रसिक वृत्ति का प्रतीक ठहराया जाता है। प्रेम की "निष्ठा भ्रमर मे नही होती, वह अनय भाव से किसी पुष्प से प्रेम नहीं करता। कली-कली का रस लेता अमर रूप और गुण मे गापियों को कृष्ण सदृश प्रतीत होता है। अत थीकृष्ण के सदेश वाहक उद्धव को भ्रमर के समान रूप, गुण, शील का मानकर गोपिया उपालभ देती हैं। साहित्य में कुछ काव्य रूढिया बन जाती हैं। सदेश भेजने के लिए जड और चेतन दाना प्रकार के कवि-समय प्रसिद्ध हैं। मेघदूत, पवनदूत, कोक्ति दूत, हसद्भुत । मेघ को दूत बनाकर सदेश भेजने का काम तो कालिदास ने भी लिया है। नैपधचरित मे हस को सदेशवाहक बनाया गया है, जायसी ने तोते को सदेशवाहक बनाया है। सूरदास नददास आदि कविया न । भ्रमर की इस काय के लिए चुना है । भ्रमरगीत की एक विशिष्ट विधा ही बन गई है। इसे पवि समय मे रूढि के रूप मे स्वीकार कर लिया है। मुख्यत उपालभ हास्य, व्यग्य, कटाक्ष आदि के । सदभ मे भ्रमर का प्रयोग कवियो ने किया है। जो बात कवि प्रत्यक्षत स्वय नहीं कहना चाहता, वह भ्रमर के माध्यम से कह देता है। सूरदास और न ददास ने इस शैली का भरपूर प्रयोग किया है । दूत द्वारा सदेश और पत्र प्रेपण का भ्रमर- गीत काव्य मे प्रयोग होता है। भागवत मे पत्र प्रेपण का वणन नहीं है । वहा उद्धव मौखिक रूप से ही सदेश देते हैं । पाती संदेश मूरदास की मौलिक कल्पना है जिसे परवर्ती कवियो न स्वीकार किया है। उद्धव-शतक की गोपिया तो पत्र है 'प्रमरगीत परम्परा और उद्धव शतक को प्यार करती हैं और उद्धव से पूछती हैं कि हमारे प्यारे श्रीकृष्ण ने हमारे लिए क्या लिखा है, पढकर बताओ। सूरदास ने अपने भ्रमरगीत म भ्रमर प्रवेश वडे नाटकीय ढग म किया है । ज्यो ही प्रमर जाया, त्यो ही गोपिया उसमे आने का कारण पूछने लगी। व्यग्र हो उठी, कहने लगी-हे भ्रमर गया तुम्हें कुब्जा ने यहा भेजा है या श्यामसुदर का सदेश लेकर आया है- इहि अतर मधुकर इक आयो। निज स्वभाव अनुसार निकट ह, बे, गुदर शब्द सुनायो। पूछन लागी ताहि गापिका, कुबिजा तोहि पठायो। कीधी सूर स्याम मुदर को हमे सदेसी लायो । प्राय सभी भ्रमरगीतो म मुख्यत चार उल्लेखनीय पात्र हैं निह व्यास्यावार प्रतीक रूप में भी ग्रहण करते हैं। श्रीकृष्ण, गोपिया, उद्धव और भ्रमर । इनके अतिरिक्त व्यग्य कटाक्ष के लिए कुब्जा का भी वणन यत्र तत्र मिल जाता है । कृष्ण सगुण ब्रह्म के प्रतीक हैं । गोपिया प्रेमाभक्ति की प्रतीक हैं। उद्धव ज्ञान या निगण भक्ति के प्रतीक है और भ्रमर उद्धव के मन का प्रतीक है तथा कृष्ण की रस-लम्पटता का भी। कुब्जा प्रेमाभक्ति वे माग का व्यवधान या अविद्या है जो तमोगुण के प्रतीक रप में ग्रहण की जाती है। उद्धव शतक और भागवत पुराण मे भतर-उद्धव शतक मे श्रीकृष्ण, उद्धव और गोपियो का ही मुख्यत वणन है । उद्धव श्रीकृष्ण के प्रिय सखा और सचिव ये। भागवत मे उद्धव को नान या निगुण माग का प्रतीक या उपदेष्टा नहीं माना गया है। सूरदास ने उद्धव को ज्ञानी, योगी, निगणमार्गी बताकर प्रतीक बना दिया है । रत्नाकर जी ने इसी रूप को ज्यो का त्या स्वीकार कर लिया है। भक्त कवियो ने उद्धव को जान के महकार मे निमज्जित अभिमानी व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है और यह दिखाया है कि उद्धव श्रीकृष्ण के स्वरूप को न समझकर दर्पोद्धत रहते हैं । सगुण भक्ति का महत्व और गोपिया रसमयी प्रेमा भक्ति उनकी पक्ड से बाहर है। अत श्रीकृष्ण उह गोपियो के पास भेजते हैं और निगण भक्ति का उपदेश देने का आग्रह करते हैं। उद्धव शतक मे उनका यही काम है जिसमे वे बुरी तरह विफल होकर सगुण प्रेम भक्ति माग के महत्व को स्वीकार करते हैं। यह सारा प्रपच सूरदास और नददास ने प्रेमाभक्ति के प्रचार के लिए किया था जो परवर्ती कवियो ने भी स्वीकार कर लिया। रत्नाकर जी इन्ही कवियों के पदचिह्नो पर चले और उहोंने भी उदव को प्रेममार्गी भक्त बना दिया। २४ उद्धव शतक शतक परम्परा-उद्धव शता एक तरह से विरह काव्य है किन्तु विरह की तीवानुभूति के साथ गोपियो का उत्स्ट प्रेम भी इसमे पूर्ण रूप से अभिव्यक्ति हुआ है । अत इसे कुछ समीक्षर शृगार काव्य ही मानते हैं। विरहानुभूति शृगार रस का ही एक रूप है । गोपिया अपना प्रेम प्रकट करने मे तनिक भी सकोच नही करती, वरन नाना रूपो मे वे उद्धव के ममक्ष अपने प्रगाढ कृष्ण प्रेम की व्यजना करने मे तत्पर दिखाई देती हैं। रत्नाकर जी ने इस कृति का नाम 'उद्धव-शतक' रखा है। शतक लिखने की प्राचीन परम्परा रही है। अमरुन शतक सस्कृत का प्रसिद्ध शृगार-परक मुक्तक काव्य है। इसके अनुकरण पर परवर्ती काल मे और भी शतप लिखे गये हैं। मत हरि ने नीति शतक, शृगार शतक, वैराग्य शतक लिखे । मयूर कवि का सूर्य शतर, वाण का चडी शतक, उत्प्रेक्षा वत्लभ का सुन्दरी शतक और विश्वेश्वर ५ कवि का रोमावली शतक अति प्रसिद्ध है। पुरानी राजस्थानी मे जैनाचार्यों के शतक उपलब्ध हैं। हिदी मे मुबारक कवि के अलक शतक और तिलव शतक मिलते हैं । शतक के साथ शप्तशती का भी प्रचार हुआ जो हिन्दी मे सतसई नाम से जाना जाता है । रत्नाकर जी ने उद्धव शतक मे ११८ छद लिखे है किन्तु काव्य का नाम उद्धव शतक ही रखा है। यह शतक शब्द एक प्रचलित काव्य परिपाटी का पालन मात्र है। ०० प्रमरगीत परम्परा और उद्धव शतक २५ उद्धव-शतक की कथा-वस्तु 'उद्धव शतक मे कथा का विस्तृत वियास नहीं है। श्रीकृष्ण को अक्रूर मथुरा ल गय थे । गोपिया और न द यशोदा नहीं चाहते थे कि श्रीकृष्ण गोकुल छोडकर कही अयत्र जाए कि तु अक्र का आग्रहपूण अनुरोध वे लोग टाल नहीं सके और श्रीकृष्ण मथुरा चले गये । कस वध 'वाद मथुग का सारा राज-काज हो उनके ऊपर आ गया और उह राज्य व्यवस्था मे दिन रात व्यस्त रहना पड़ा। यह व्यस्तता इतनी बढ़ गई कि उहे प्रज की और ब्रजगोपिकाओ की सुध ही न रही । एक दिन यमुना में स्नान करते समय एक आधा मुरझाया फूल उनके हाप मे पड गया । यह कमल-पुष्प ऊपर और नीचे से मुरझाया हुआ था। इस मुरमाये कमल पुष्प ने अपनी विषण्ण और अवसास्थिति से विरह विधुरा वियादमानी राधा का ध्यान श्रीकृष्ण को करा दिया। कमल-पुष्प तो ब्याज मात्र था, जिस प्रकार वह मुरझाया हुआ था, राधा भी कृष्ण के वियोग से ऐसी उदास और विपण्ण होगी यह विचार कृष्ण के मन म कौघ गया और व मूच्छित होकर भूमि पर गिर पडे । इसी बीच एक तोता (पक्षी) राधा राधा नाम लेकर पुकार उठा और उन्हें ब्रज वीथियो और व्रज के कुजो म राधा के साथ विचरण का स्मरण राधा का स्मरण आते ही उन्होने अपने परमसखा एव विश्वस्त सचिव उद्धव को बुलाया और उनसे कहा कि 'मुझे व्रज का स्मरण बहुत पीडा पहुचा रहा है। नद-यशोदा वा वात्सल्य, गोपियो का माधुयपूर्ण प्रेम, ग्वाल बालो का स्नेह- औदाय सब एक साथ मेरे स्मृति पटल पर उभर पाया है। मैं इस स्मरण से बेचन और घिन हो गया है। जिन पेलि कुजो मे से गोपियो के साथ आठो पाम विच रण करता था व कुजवन अव मेरे नेत्रो म घूम रहे हैं । गोकुल की नवेली गोपियो कागोरस नेकर जाना गाना, बजाना, नाचना, मेरा बासुरी बजाना, ब्रज महल का यह समस्त सुख-सम्पत्ति साज आज किसी प्रकार भी भुलाये नही भूलता।' श्रीकृष्ण ने अपनी मानमिक व्याकुलता और विरह-वेदना उद्धव के समक्ष र विस्तार से प्रस्तुत कर दी। करागया। उधशतक उद्धव ने श्रीकृष्ण की इस व्याकुल मन स्थिति को देखकर पहले तो सोचा कि इहे समया-बुझा कर शान्त किया जाय लेकिन जब उहें लगा कि श्रीकृष्ण के मानस पटल पर स्मृति का जो गहरा निशान बन गया है वह अमिट है । अत श्रीकृष्ण की बात सुनना और तदनुसार काय करने की श्रेयस्कर है। श्री कृष्ण ने उद्धव से कहा, हे उद्धव । तुम एक बार गोकुल जाकर मेरा सदेश गोपियो तक पहुंचा दो। उसके बाद यदि कुछ और कहना चाहोगे तो मैं उसे अवश्य सुनुगा। इस समय तुम अपना ज्ञानोपदेश बद करो और सीधे गोकुल को प्रस्थान करो। उद्धव ने श्रीकृष्ण की बात मानकर पहले अपने ज्ञान माग का मम समझाना चाहा और कहा कि गोपियो का प्रम मिथ्या है, क्षण भगुर है, इस ससार मे केवल ब्रह्म ही सत्य है । पचभूतात्मर जगत् मे भेद बुद्धि रखना व्यथ है । ब्रह्म ही समस्त चराचर जगत् म समान भाव से व्याप्त है। अत इस भौतिक प्रपच मे नही पड़ना 'चाहिए । वेदात दशन का ज्ञान माग उद्धव ने बड़ी प्रखर प्रतिभा और विद्वता से श्रीकृष्ण को समझाया कि तु उहोंने उसे स्वीकार नहीं किया। उद्धव ने तो यहा 'तक कह दिया कि वे प्रजवासी किसी सुयोग की तलाश मे है, ये तुम्ह अपने कपट जाल मे फसाना चाहते हैं । गजराज के उद्धार कर्ता होकर तुम्हे गज नही बनना चाहिए। जिस प्रकार गज कपट जाल को न समझ कर जाल मे फस जाता है, वैसे ही तुम्हे ये लोग पसाना चाह रहे है । 'वारन कितेक तुम्ह, वारन क्तिक करें, 'धारनउवारन ह वारन बनी नही।' अपने ज्ञानी सखा उद्धव के वचन मुनकर श्रीकृष्ण का प्रेम प्रवाह शान्त नही हुआ वरन् और तीव्रगति से उनके भीतर प्रेमाग्नि तीव्र होकर प्रज्वलित हो उठी। श्रीकृष्ण ने उद्धव से कहा- मुझे शातिपूर्वक प्रेमाश्रु बहा लेने दो। मेरे हृदय का व्यथा भार प्रेमाथ बहाने से ही शात होगा। मेरे दग्ध अन्त करण को य आमू शीतल जल सीकर वा काम देंगे और मुझे मानसिक शान्ति प्राप्त होगी। हे उद्धव | तुम अपना ज्ञानोपदेश इस समय बद कर दो और कृपापूर्वक गोकुल चले जाओ। जब वहा से लौट कर वापस आओगे तब मैं तुम्हारा उपदेश ध्यानपूर्वक सुन लूगा। तुम्हारे उपदेश को मैं दाता द्वारा दिये गये दान के समान 'प्रहण करूगा। गोपियो की चर्चा चलने और उनका ध्यान आते ही मेरा मन अधीर हो उठा है। जिस प्रकार पवन से उद्धेलित होकर धूल वायु मडल मे उडने लगता है, वसे ही गोपियो की चर्चा से मेरा धैर्य धूल बनकर उड गया है।' वेदना और स्मति जय मनोदशा से विह्वल होकर श्रीकृष्ण का कठ अवरुद्ध हो गया । उद्धव के हाथ जो सदेश भेजना चाहते थे, वह भी स्पष्टत' नहीं कह सके । नेत्रो से अश्रु प्रवाह हो उठा और उन्ही अश्रुओ मे कृष्ण का प्रेम संदेश भी व्यक्त हो गया । जब वेदना या अतिशय होता है, मुख से शब्द नही निकलते, आधो से अविरल मश्रु प्रवाह जारी हो जाता है। 1 1 14 उदव शतक की कपा-वस्तु २७ उद्धव'श्रीकृष्ण का आग्रहपूण आरोव स्वीकार पर व्रजगमन के लिए तैयार हुए, तभी श्रीकृष्ण के मन मे भी ब्रज-गमन की आतुरता व्याप्त हो गई। गले मे अवरोध से हिचकिया आने लगी, रोम कूपो से स्वेद प्रवाहित हो उठा । कृष्ण के मन की कोमल भावनाए कुछ मुख माग से निकलने लगी तो कुछ नेत्र रूपी खिड- क्यिो से प्रकट होो लगी। कहने का तात्पय यह है कि श्री कृष्ण का तन मन सब विभोर हो उठा और ब्रजगमन की इच्छा से पुलक्ति हो गया । लेकिन वे स्वय तो जा नहीं सकत थे, यत अपने सखा उद्धव को दूत बनाकर भेजना ही उहे उचित लगा । उद्धव शतक की क्या का यही आदि भाग है। उद्धव गोकुल के लिए रथ पर बैठकर प्रस्थान करने लगे तो कृष्ण कुछ कहने को समीप आते हैं किन्तु हृदय भावावेश से भरा है। कुछी कहते नही बनता, लौटते भी नहीं बनता। वातो के आवंश मे वे रथ के साथ साथ चलते रहते हैं। उहे याद ही नहीं रहा कि उह इस समय गोकुल नही जाना है। वे स्वय गोल नहीं जा हैं । वे तो उद्धर को गोकुल भेजने के लिए आये है। उद्धव बढे उत्साह और उमग भरे मन से गोकुल के लिए चले कि तु ज्या ही ब्रज प्रदेश का प्राकृतिक सौदय उनक सामने आया, वे अपनी ज्ञान की सम्पत्ति को भूलने लगे। गोकुल के समीप बन वाली यमुना कछारो मे उनका ज्ञान-दप खो गया । ज्ञान की जो पूजी लेकर वे निकले थे वह तमाल और करील के झाडो में बिखर गयो। उनके मन मे व्रज भूमि के प्रति रागात्मक भाव का उदय होने लगा और वे शुष्म ज्ञान माग से हट कर प्रेमाभक्ति की ओर अग्रसर होने लग । ज्ञान की गूढ गभीर गरिमा और योग की यम नियम से सुदृढ़ शृखला उद्धव के भीतर समाप्त होनी प्रारभ हुई। उद्धव का मन रूपी मानसर जिसे ज्ञान रूपी प्रखर सूर्य की किरणो ने सुखा दिया था, उस फिर काले बादल (घनश्याम) सजल और सुदर रागमय बनाने लगे। इस प्रकार को परिवर्तित मन स्थिति में उद्धव का व्रज मे प्रवेश हुआ। परम ज्ञानी उद्धव जो ब्रह्म की सत्ता मे विश्वास रखते हुए सवत्र ब्रह्म को ही देखते थे, ब्रजभूमि मे पहुचते ही प्रेम के प्रभाव से अधीर हो उठे। उनका मुख विवण हो गया शरीर शिथिल हो गया, कठ मे वाणी अवरुद्ध हो गई। बोलना सभव न हो सका । बरसाने मे कौन सी वायु बह रही थी जिस के प्रभाव से उद्धव रोमाचित होकर स्वेद से भीग गये कम्पायमान होकर मूच्छित हो गये । उद्धव की यह दगा जिस प्रभाव से हुई, वह उनके लिए अज्ञात पूर्व थी और वे इसका रहस्य स्वय समय नही सके । उद्धव के राज में आगमन का समाचार सुनकर गापिया लाख-लाख अभि लापाओ से भर कर सब काम-काज छोड कर भाग खडी हुई । अपने मनोभाव को दबा कर उद्धव के आनन पर अपनी भाग्य लिपि को पढ़ने की इच्छा से -उद्धव-शतक ३ अपनी सांस को रोक कर, भीतर ही भीतर उमड़ी झासुओ को रोक कर, नराम की मूर्ति गोपिया आशा भरे नेत्रो से उद्धव को निहारने लगी कि आशा थी कि शायद उद्धव श्रीकृष्ण के वापस आने का कोई समाचार उन्हें सुनायो, मनभावन कृष्ण का संदेश सुनने को जिज्ञासा और इच्छा इतनी प्रबल समोर बनाकर गोपियां नद के द्वार पर एकत्र हो गई। उपक-उचक, यो के बलड होकर उत्कठा भर मन से सदश सुनने को व्यग्र हो उठी। इसी व्यग्रता में उद्धव से पूछने लगी, बताओ हमको कृष्ण ने क्या लिखा है । हमारे लिए क्या सदेश हैं । गोपियो की इस आतुरता के देखकर उद्धव चकित रह गये। ज्ञान का समस्त चातुर्य समाप्त हो गया, देवल कुशल-सदेश की ही बात सुनते हैं, सदेश देना भूल जाते हैं। उद्धव की मन स्थिति से गोपिया माशकित तो होती हैं किन्तु उनके भीतर कही आशा का कण विद्यमान है जो कहता है कि कृष्ण ने कोई न कोई सदेश अवश्य दिया होगा। वे पूछने का साहस जुटाती हैं कि तु मुख से वचन नही निक्लत, केवल राह निक्ल कर रह जाती है। गोपियो की इस दशा से उद्धव भी हतप्रभ हो जात है। ज्ञान वा गव दूर हो जाता है। नेत्रो से अश्रु प्रवाह होने लगता है, कठ अवरुद्ध हो जाता है । वे मोचने लगते हैं कि मेरा ज्ञानोपदेश वडा है या इन गोपिया का प्रेम अपनी ज्ञान राशि को लुटता हुआ देखकर उद्धव स्वय विभम मे पड कर विकतव्यविमूढ हो जाते है। उद्धव अपन ज्ञान का सूय लेकर व्रज मे इसलिए आये थे कि ब्रज की गोपिया प्रेम के अधकार मे डूबी है, उहे ज्ञान का प्रकाश चाहिए लेकिन यहा आने पर उनको ध्यान ही नही रहा कि मैं क्यो यहा आया था। गोपिया की विरह वार्ता सुनते ही उनका ज्ञान का आलोय अस्त हो गया। ज्ञान दीप की वत्ती बुझ गई । एक हाथ में पन जिसमे श्री कृष्ण का सदश था पकडे रह और दूसरा हाथ अपने वक्ष पर रखकर इस दृश्य को देखते रह गये। -- इस कितव्यमूढ़ स्थिति से उबरने पर उद्धव को अपने दायित्व का बोध हुआ। उहे ध्यान आया कि मैं तो गोपियो को ज्ञान माग का उपदेश देने आया था। यत सचेत होते ही उन्होंने अपने कलव्य का निर्वाह गोपियो को ज्ञानोपदेश से प्रारभ किया। सबसे पहले उन्होने गोपियो को ब्रह्म का स्वरूप समझाया और कहा कि यदि "तुम भगवान कृष्ण को हृदय मे बसाना ही चाहती हो तो योग साधना से उसे अपने भीतर बसाने का प्रयास करो। अपनी आत्मा को परमात्मा में लीन कर जड चेतन भेद से मुक्त कर लो। यदि तुम यह कर सकोगी तो कृष्ण के बाह्य रूप के दशन की लालसा नहीं रहगी और तुम कृष्णमय हो जाओगी। तुम कृष्ण से वियोग का अनुभव कर रही हो वह तुम्हारा अज्ञान है। यदि जीव और ब्रह्म का एकत्व समान सको तो माया अथवा अविद्या का पर्दा हट जाएगा। ध्यान रहे कि समस्त पदार्थों और प्राणियों में पचतत्व की ही सत्ता है। कृष्ण मे और उद्धव शतक की क्या-वस्तु २६ 1 तुममे ये पांच तत्व ही व्याप्त हैं । ब्रह्म और जीव का अभेद समझ कर ही तुम कृष्ण से प्रेम करो। सासारिक भौतिक शरीर की कल्पना मन से हटा दो। तुम में और कृष्ण मे कोई भेद नहीं है, दोनो एक हैं, यही अद्वैत भाव तुम्ह समझना चाहिए। यह निगुण, निराकार ब्रह्म की सत्ता का सच्चा ज्ञान है। जब तक निगुण ब्रह्म का योग-साधना से ध्यान नहीं करोगी ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं होगा, मोक्ष नहीं मिलेगा, कृष्ण से सादात्म्य नहीं होगा।" उद्धव के इस शुष्क ज्ञानोपदेश को सुनकर कोमलागी प्रजागनाए काप उठी। अवाक् होकर स्तम्भित रह गइ। क्सिी क्सिी गोपिका यो बहुत क्रोध हो आया, कोई प्रस्वेद से भर गई, कोई अचेत हो गई। कहने का तात्पय यह है कि उहें यह उपदेश जरा भी प्रीतिकर नही लगा। वे तो कृष्ण का प्रेम सदेश सुनने आई थी। उहें आशा थी कि उद्धव गोपियो को कृष्ण के मयुरा से वापस आने की तिथि की सूचना देंगे। लेकिन उद्धव तो उल्टी-सीधी बातें कह कर गोपिया को कष्ट दने म तत्पर हैं। योग और ज्ञान माग उपदेश सुनने गोपिया नही आई थी। गोपियो के मन मे उद्धव के प्रति आक्रोश का भाव आया क्याकि वह ज्ञान- मूढ व्यक्ति नारी-मन को समयने मे असमथ था। प्रियतम से विमुक्त नारी विरह की दशा मे उपदेश नही सुनना चाहती, वह तो प्रियतम से मिलन की आकाक्षा रखती है। गोपिया सीधे तरीके से यही जानना चाहती हैं कि श्रीकृष्ण मथुरा से कब लौटेंगे? हमे निगुण ब्रह्म का उपदेश नही, कृष्ण का सुदर सलोना प्रत्यक्ष दशन चाहिए । उपालभ की भाषा मे यह भी कहन म नही चूक्ती कि मथुरा प्रवास के समय श्रीकृष्ण को सारे सुख सुलभ होगे, उह हमारी याद क्यो आने लगी । उद्धव के मुख से बार बार ब्रह्म की चर्चा सुनकर वे कहती है कि तुम कृष्ण के दूत हो या ब्रह्म के । ब्रह्मचर्या मे लीन होकर शायद तुम कृष्ण को भूल गये हो । तुम जीव और ब्रह्म की अभेदता तथा अद्वैतता का पणन करत हो। हम इस अद्वत भावना मे विश्वास नही रखती। तुम जो कुछ कर रहे हो वह हमारे लिए सवथा अग्राह्य है । जिस श्यामसुन्दर का हम अपने हाथो से शृगार किया करती थी, तुम उसे अरूप, अलेख और अशरीरी ही बताते हो। यह मिथ्या ज्ञान हम कभी मान नहीं सकते। तुम कहते हो हम योग-साधना करें, प्राणायाम से वायु निरोध करें, वितु यह भूल जाते हो कि वायु से तो अग्नि और अधिक प्रज्वलित होती है। हमारी वियोगाग्नि को यह प्राणायाम की वायु अधिक कुपित करेगी। यदि तुम्हारा ब्रह्म निराकार, निलेप है तो उसका ध्यान कैसे करें | योग शिक्षा देने आये हो तो कृष्ण से वियोग की बात क्यो करते हो? हमने तुम्हारा उपदेश मुन लिया, अब तुम चुपचाप मधुरा का सीधा रास्ता पक्डो और वापस चले जाओ। हम लोक-लाज छोड कर कृष्ण प्रेम मे निमग्जित हुई हैं। हमे अव नियम, व्रत, सयम का उपदेश देना उद्धव-शता - T - *- मूखता है । तुम अशरीरी कृष्ण का ध्यान करने को कहते हो, यह बात ऐसी है जैसे कोई कहे कि खरगोश के सीग पकड कर चलो। शश शृग की बात जितनी बेतुकी है उतनी बेतुकी ही बात निराकार की उपासना की है। हमारा कृष्ण तो गायो को परता था, उनका दूध निकालता था, तुम्हारा रूप रग, आवार होन ब्रह्म ये सब काम कसे करेगा? उदव ने गोपियो को जगत का मिथ्यात्व समझाते हुए कहा कि हे गोपियो, यह जगत स्वप्नवत् है, सत्य नहीं हैं। गोपियो ने तपाक से उत्तर दिया कि स्वप्न तो सोते हुए व्यक्ति को आते हैं । तुम जाग्रत अवस्था में नहीं हो। सोते हुए व्यक्ति की बात कोन सुने। तुम्हारा ज्ञान-माग टेढा है। हम सीधे प्रेम मार्ग पर चलने वाली हैं। हम ब्रह्म ज्योति मे लीन नहीं होना चाहती, हमे मुक्ति को पाह नहीं है। हम तो बार-बार जम धारण करना चाहती है ताकि हमे प्रत्येक जम में कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त होता रहे । हम कृष्ण वियोग जय दुख विधाता का विधान मान कर भोग रही हैं, हम इस दुख से 'मुक्ति नही चाहती ।' निराकार ब्रह्म की उपासना का उपहास तो गोपिया निरतर करती रहती है। उनका कहना है हमारा मन श्याम रग (कृष्ण) मे रग गया है। उस पर भगवारग (साधुओ का) नही चढ सकता। मगछाला विछा कर उस पर बैठना और योग-ध्यान करना भी हमारे लिए समय नही है क्योकि कृष्ण वियोग में सूख कर हमारा शरीर मृगछाल जसा जजर हो गया है। गोपियो ने उद्धव के सदेश से खीझ कर कहा कि जो बात ।तुम सदेश रूप में हम स बह रह हो वह श्रीकृष्ण-वचन नहीं है । ये तो दुबजाने सिखा-पढ़ाकर तुम्हें रटा दिये हैं और तुम हमसे उहें वृष्ण-सदेश के नाम से कह रहे हो। हमे तुम्हारा विश्वास नहीं है। हम तुम्हारी बताई सारी योग त्रिया, ज्ञान, ध्यान करने को तत्पर हैं किन्तु इतना तो बता दो कि यह सब करने से कृष्ण की प्राप्ति सभव होगी या नहीं? हम कृष्ण को पाने के लिए तुम्हारे बताये माग पर पलने को तत्पर हैं लेकिन जो चित्र कृष्ण का हमारे हृदय पटल पर अंकित है यदि तुम्हारा बताया ब्रह्म वैसा न हुआ तो हम उसे स्वीकार नहीं करेगी। हम भावुक नारिया हैं । सहृदयता हमारा सवल है। हम तक के नेत्रा से कृष्ण को नहीं देखती, हमारी दष्टि प्रैम और अनुरागसिक्त है। मथुरा के लोग तक प्रवीण होते है। मयूर पषधारी कृष्ण दशन के लिए सच्ची आखें चाहिए, नक्ली आख से मोरपष- धारी कृष्ण नहीं रिखाई देते। यदि तुम ने हमारी आखों से कृष्ण को देखा होता तो तुम निगु ण निराकार ब्रह्म ज्ञान की बात करने का साहस कभी न करते। हमारा प्रेम पारावार, अथाह और अगम है, यह वह सागर नहीं है जिसे अगस्त्य मुनि ने सोख लिया था। उद्धव ने अपने ज्ञान माग के विषय मे जो कुछ कहा, उसे गोपियो ने तर्क मुक्ति पूवक काट दिया। निगुण, निराकार, रूप, रेख विहीन ब्रह्म उदव शतक की कथा-वस्तु शान को लम्बी चौडी पर्चा उद्धव को स्वय निरथक प्रतीत होने लगी। उद्धव से गोपियो ने केवल अपनी विरह व्यथा ही नही कही, बल्कि उद्धव के ज्ञान मार्गी उपदेश का तुर्की-च-तुर्की उत्तर भी दिया। यहा क्या का मध्य भाग पूरा होता है । गोपियो के स्नेहसिक्त एव तकपूण वचन सुनकर उद्धव का मन भाव विभोर हो उठा । निगुण ज्ञान माग का उपदेश उन्हें स्वय निस्सार प्रतीत होने लगा और उन्होंने निणय पिया कि अब अधिक सवाद या वार्तालाप की आवश्यकता नहीं है। गोपियां अपने निश्चय पर अटल हैं, उ है किसी भी ज्ञानोपदेश द्वारा अपने निर्णय से विमुख नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति मे यही उचित है कि मथुरा लौट कर श्रीकृष्ण को गोपियो की मन स्थिति से अवगत करा दिया जाय । फलत' उद्धव ने गोपियो को बुला कर कहा कि मैं अब मथुरा वापस जाता है, यदि तुम्हे कोई सदेश श्रीकृष्ण के लिए देना हो तो दे दो। गोपिया उद्धव को विदा देने मे अपने को असमथ पा रही थी। फिर भी वे साहस बटोर कर उद्धव के समीप एकत्र हो गई। श्रीकृष्ण के लिए उपहार स्वरूप कोई गोपी मोरपख लाई थी, किसी के पास अजलि मे घुपचिया थी, किसी के पास स्वादिष्ठ मीठा दही था, किसी के पास छाछ थी। नद ने अपने लाडले पुत्र के लिए पीत पट दिया था, यशोदा माता ने ताजा नवनीत और राधा ने सुरीली बांसुरी भेंट की थी। किसी किसी गोपी का मन इतना भाव विह्वल हो उठा था कि वह कुछ कह नही पा रही थी। फिर भी जो कहना चाहती थी, वह इतना ही कह पा रही थी कि जरा हमारी बात सुन लो, हमारा निवेदन सुन लो। इस प्रकार मिन्नत-आरजू करती हुई गोपिया यहा इकट्ठी थी। पो गोपिया लिखित सदेश भेजना चाहती थी, उन्होंने पत्र लिखने का उपक्रम किया, किन्तु स्थिर चित्त से वे कुछ भी लिख नहीं पाती थी। विरहाग्नि उनके भीतर प्रज्वलित थी और उस विरहाग्नि के कारण स्याही सूख जाती थी, कागज झुलस जाता था। इस प्रकार गोपिया पत्र लिखना चाहती तो है पर सिपने में सफल नहीं होती। उद्धव इस दृश्य को देख रहे थे किन्तु यह मथुरा यापस आना था इसलिए ब्रजवासियो की योई सहायता ये पर नहीं सकते थे। ब्रजयासी विरह-वातर ये। उदय को वापस जाते दप कुछ उसके पीछे चल पड़े, कोई अपना सदेश महने को आतुर हो उठे। उद्धव ये प्रस्थान करते ही बज मडल म भयपर उपल-पुथल हो उठी । जड पदाप भी चलायमा हो एपे उनमे विचित्र प्रकार की हलचल देखने में आई। जय उदव गोकुस म आये थे तब उना मन मानोपदेश के लिए पूरी तरह तयार था।येगापियों को निगु म ग्रह की सत्ता या पान यरान याम थे। भिन्तु उनरा ज्ञान विषपर बहार जांगनाओ प्रेम को देखकर विलीन हो गया, वे गोपियोमी भाति प्रेम माग ये पथिव बन गये। सौटते ममय जाम मन प्रेम १२ उद्धव शता सरोवर की तरगा में डूबा हुआ था। उनके पैर उठ नही रहे थे। सारथी की सहायता से रथ का मगावर उद्धव चल तो पडे लेकिन उनके भीतर प्रेमाश्रु उमड रहे थे और बार-बार उनका मन गोकुल की बुज गलियो मे लौटने को करने लगा। उद्धव ने प्रजवासियो से प्रेमाश्रुपूरित गद्गद भाव से विदा मागी और मन मे घोर कष्ट का अनुभव करते हुए, उच्छवास पूरित वाणी मे वचन बोलते हुए निस्तब्ध, निश्चल भाव से चल पडे। उद्धव ने ब्रज माग मे यह अनुभव किया कि उनका मन निगु णोपासना मे मुक्त हो गया। जिस प्रकार आयुर्वेद शास्त्र में पार को शोधने के लिए गधक का रामायनिक गुण मिलावर शोधा जाता है । यहा पारा निगुण भक्ति का और गधक आदि पदाथ सगुण भक्ति के प्रतीक है। उद्धव के अन्त करण को गोपिया ने अपने प्रेम मदेश मे शुद्ध और निमल बनाकर ज्ञान- माा से हटा कर प्रेम माग पर आरूढ कर दिया । उद्धव के मन म ज्ञान दप से उत्पन्न अहकार दर हो गया । वे बहुत लज्जित हो कर वापस आये। उद्धव के आगमन का समाचार सुनकर श्रीकृष्ण बहुत शीघ्रता के साथ उनके पास पहुचे। उनके मन में उद्धव मे बजगमिया के कुशल क्षेम पूछने की इच्छा थी और उद्धव भी श्रीकृष्ण को बज का समाचार देन को व्याकुल थे किंतु दोनो की मानसिक स्थिति अशात थी। कोई भी भली भाति बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। उद्धव की ता मानसिक और शारीरिख दोनो ही स्थितिया चिता जनक हो रही थी। जावटुत स भेंट उपहार ब्रजवासिया ने कृष्ण के लिए दिए थे, उद्धव हे भी सम्भाल नही पा रहे थे । यशोदा ने श्रीकृष्ण के लिए मक्खन और राधा ने वासुरी भेजी थी। श्रीकृष्ण ने उद्धव की यह मन स्थिति देख कर सब कुछ समझ लिया और प्रेम से विह्वत होवर वे उद्धव से लिपट गये। उधर उद्धव की आँखो से अविरल अश्रु प्रवाह हो रहा था। इन अथुओ को कृष्ण अपने पीताम्बर से पोंछ कर अपने नेत्रो से लगा कर मुदित हो रहे थे। श्रीकृष्ण बज के समाचार जानने को बेचैन थे किंतु उद्धव कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थे। धीरे धीरे चित्त को स्थिर कर उद्धव ने कहना शुरु क्यिा-'हे वृष्ण मैं यहा मे ज्ञान की गठरी लेकर बडे अभिमान के साथ ब्रज को गया था । वहा पहुच कर मैंने गोपियो की विरह याकुल दशा देखी तो मेरा सारा ज्ञान गव समाप्त हो गया। मेरी मारी चातुरी अपने आप विलीन हो गयी। एसी विरहाग्नि की ज्वाला मैंने अपने जीवन मे कभी नहीं देखी थी। यह विरहाग्नि तो कालिय नाग की विपज्वाला से भी बढ कर है। बरसाने म वर्षा का पानी शीतलता नहीं पहुचाता वह तो जलाने और झुलसाने वाला जल है जिसमे गोपिया झुलस रही है।' उद्धव ने बडे स्पष्ट शदा मे श्रीकृष्ण से वहा कि जो नानोपदेश में ले गया था, वह ब्रज मे विसी को भी प्रीतिकार नही लगा। मैं तो अपना शान गवा कर ब्रज रज का साथ ले आया हूँ, यह ब्रजरज ही अब मेरी सम्पत्ति है। मैंने गोपियो उद्धव तक की क्या-वस्तु वे प्रेमाश्र प्रवाह को देखा है । लगता है कि यदि यह प्रवाह जारी रहा तो मथुरा नगरी भी इसम वह जायेगी । मैं तो इन प्रेमाश्रु प्रवाह म स्थिर नही रह सका' मेरे पैर उखड गये और मैं भाग कर मथुरा आ गया। मरी विनम्र प्राथना है कि गोपियो के कष्ट को दूर करने के लिए अविलम्ब बज गमन यरें और गोपिया की विरहाग्नि का शमन करें। तो मैं केवल गोपियो की विरह दशा बतान गाकुल स यहा आया ह । अयथा मेरी इच्छा तो वही कुटिया बना पर बसने की थी। आपके दशन की अभिलापा और ग्रज की दशा का समाचार दन ही मैं ज स वापस आया उद्धव की इस स्थिति का वणन करन वे वाद अन्तिम छद म रत्नावर जी ने साग रूप द्वारा गोपियो की दशा को मूयकान्तमणि के रूप म प्रस्तुत क्यिा है। जिस प्रकार शुद्ध क्यि हुए कांच का ढाल कर मूयकात मणि बनती है, उसी प्रकार निगु ण ज्ञान, नियम सयम आदि मलो से रहित प्रेम म डुवा वर सूयकान्त मणि बनाकर उद्धव को भेजा गया है । सम्पूण छद म मूयकात मणि तयार करन की विधि का वणन है और वह उद्धव + नये म्प का व्यक्त करता है । इस छ द पर उद्धव शतक' समाप्त हो जाता है। यही इस प्रथ का तीसरा और अतिम सोपान है। ००० उद्धव शतक ५ उद्धव-शतक मे चरित्र-चित्रण उद्धव शतक महाकाव्य या खण्डकाव्य वी शली का क्थाकाव्य नहीं है । इसम पात्रा का जमघट भी नहीं है। यह केवल भाव और विचार प्रधान मुक्तक शैली की रचना है। हा, केवल विचार और भाव वे वणन मे जिन पात्रो का उपयाग कवि ने किया है, उनके शील स्वभाव और व्यवहार का यहा निर्देश दिया जा सकता है। यदि पात्रा का उल्लेख करना आवश्यक हो तो तीन ही पात्र इसमे मिलेंगे। श्रीकृष्ण, उद्धव और ब्रजवामी गोप गोपियां । गोप गोपिया मनद यशोदा और गधा का नाम विशेप प स लिया जा सकता है कि तु उनकी क्सिी चरित्रगत विशेपता का उद्धव शतक मे वणन नहीं है। गोपिया की प्रेम साधना और सगुण भक्ति ही समस्त गाप गापिया की चारिशिव विशेषता है । इसके अतिरिक्त उनके किसी प्रिया कलाप का वणन नहीं मिलता, स्वभावगत अन यता जादि का वणन अवश्य है। श्रीकृष्ण उद्धव शतक काव्य में श्रीकृष्ण को जिस रूप में प्रस्तुत किया गया है, वह सामाय प्रेमी का रूप है । प्रजवासियो से विमुक्त हावर श्रीकृष्ण मथुरा आ गये और मथुरा भाकर राजवाज में व्यस्त हो गये। उस व्यस्तता म उ ह कुछ समय तर ब्रज का ध्यान नहीं आया। एक दिन यमुना में स्नान करत समय उनक हाथ मे एक कमल का फूल आ गया जिमका नीचे-ऊपर का भाग मुरझाया हुआ था। इस वमल के फूल को जैसे ही सूबने की इच्छा से श्रीकृष्ण न नाक से लगाया त्यो हो उह चक्कर आ गया और वे हाय वह वर अचेत हो गय। इस हाम के साथ उह राधा का स्मरण हो आया क्यामि उसी समय वक्ष पर बैठ एक तोत ने राधा शद वा उच्चारण किया था। यह स्मति जय प्रेम वा वणन है। श्रीकृष्ण ये मन में राधा और ब्रज के प्रति गहरा अनुराग था। यह भाव इस प्रथम दम पथि व्यक्त दिया है। कमल पुष्प वे गधा स सचेत हााकी यात नो टीकाकार उदय शवर मे चरित्र चित्रण यह कहकर राधा से जोडते हैं कि यह पूस राधा द्वारा सूप कर यमुना में फेंका गया था ताकि कृष्ण के हाथ पड़ने पर उह राधा या स्मरण हो जाय । यह तुल्या नुराग का घोतक है। श्रीकृष्ण के चरिम की दूसरी विशेषता उद्धव शतव मे प्रच्छन रूप से प्रस्ट की गई है । श्रीकृष्ण प्रेम माग म विश्वास करते थे। गोपियो के साथ ग्रज रास लील', दानीला, मानलीला आदि रचा कर उहीन सगुण गविन वा पथ प्रशस्त दिया था। उनके सपा उद्धव पानमार्गी थे। उह योग साधना, तप, सयम, नियम, यत, जप आदि मे विश्वास था। श्रीकृष्ण चाहत थे कि एक बार उद्धव ग्रज मडल जागर गोपियो के प्रगार प्रेम को देखें और अनुभव करें कि कौन-सा भक्ति माग वरेण्य है। इस विचार को क्रियापित परने की उन्होंने उद्धव को ब्रजभूमि म भेजा और अपना अभीष्ट पूरा किया। यह कृष्ण चरिन की एव चतुराई है । स्वय उन्होंने उद्धव से कुछ नही कहा वरन् उह गोकुल भेज कर अपने आप वस्तु स्थिति से परिचित होने का अवसर दिया । श्रीकृष्ण के चरित्र की तीसरी विशेषता जो उद्धव शतर में प्राट होती है वह उनका व्रज प्रेम है । ब्रज को श्रीकृष्ण मन प्राण मे प्यार करते थे। वन से वश, वन, निकुज, लता पत्र, गिरि नियर, भूमि, सब कृष्ण ये मन मे गहरे बमे थे। मथुरा में रहते हुए वहा का वभवमय वातावरण उहे नांध नहीं समा उनका मन बज की निकुज गलियो और वन वीथियो म समाया रहा। उद्धव को व्रज भेजते समय उनके मन में यह भाव था कि ब्रज का प्राकृतिक सोदय अवश्य उद्धव को मोह लेगा, और यही हुआ भी । उद्धव उद्धव शतक में सबमे प्रमुख भूमिका उद्धव की ही है । उद्धव को एक महाज्ञानी पुरुष के रूप मे भ्रमर गीत परम्परा म स्वीकार किया गया है। उदय बहस्पति के शिष्य थे । बहम्पति विद्या नान और विवेक के भडार माने जाते है । ऐसे नानी गुरु को पाकर उद्धव मे भी ज्ञान और विद्या वैभभ का होना स्वाभाविक है । उद्धव अपने वार्तालाप में श्रीकृष्ण को प्राय नानोपदेश दिया परत थे। सखा और सचिव होने के कारण श्रीकृष्ण को उद्धव का उपदेश सुनना पडता था। लेकिन श्रीकृष्ण के अतमन में यह बात बनी रहती थी कि केवल निगु णोपसना ही भक्ति का माग नही है । सगुणोपासक भक्त भी अपने इष्टदव की पूजा उपासना साकार रूप से कर सकत है । ब्रज की गोपियो की प्रीति को श्रीकृष्ण बहुत ऊचा स्थान देत थे । इसलिए उहान उद्धव को ब्रज भेजा था कि वह ब्रज म जाकर एक वार गोपिया की मानसिक स्थिति स परिचित हो सके और यह भी जान सके कि भक्ति का एक माग प्रेमाभक्ति भी है। उद्धव के चरित्र चित्रण में रत्नाकर जी ने यह प्रारम्भ के पदो म दिखाया है कि उद्धव पानी पुरेप है और श्रीकृष्ण ने सपा उद्धव शतक होने के कारण वे उहे समझाने का अपना अधिकार भी समझते है। श्रीकृष्ण को उद्धव ने बहुत ही चातुरी से समझाना चाहा है कि व गोपियो के प्रेम प्रपच में न फसे । उहोने हाथी को पकड़ने और जाल म फसाने की प्रक्रिया की बात कह कर कृष्ण को समझाया और कहा कि पचतत्वो से निर्मित इस संसार में ब्रह्म ही एक- मात्र वास्तविक सत्य है । वेद शास्त्र सब इसी ब्रह्म का निरूपण और प्रतिपादन करत है । सयोग और वियोग का दुख कल्पित है। ससार मिथ्या है, क्षण भगुर है, नाशवान है। यह उपदेश उद्धव के ज्ञान से प्रसूत ही थे किन्तु कृष्ण पर उनका कोई प्रभाव नहीं हुआ। उद्धव ने ब्रज मे पहुचकर गोपियो को भी यह ब्रह्म ज्ञान का निगुण उपदेश दिया । उद्धव के चरित्र की विशपता यह है कि वह ज्ञान माग को भक्ति का श्रेष्ठ भाग समशत थे और उसे तक प्रमाणो से सिद्ध भी करना चाहते थे। उनकी युक्तियो मे ज्ञान का मम है जो एक बार तो श्रोता को आकृष्ट करता ही है। कि तु उद्धव चरित्र की दूसरी एक और विशेषता है जो कविवर रत्नाकर ने उद्धव शतक मे स्पष्ट रूप से दिखा दी है । उद्धव ज्ञानी है, लेकिन सूरदास के उद्धव की तरह शुष्क और निमम नहीं है। रत्नाकर जी के उद्धव भावुक भी हैं, सहृदय भी है सरस भी है और विरहप्रेम के प्रशसक भी है । गापियो की विरह कातर स्थिति उहे गहर अन्तस्तल मे छू लेती है। वे सहृदय होकर पसीज उठते है। प्रेमाश्रु विगलित होकर गापियो की व्यथा को अपनी व्यथा बना लेत है। ब्रज से लौटते समय उनका ज्ञानदप विलीन हो जाता है और वे एक सहृदय प्रेमी व्यक्ति के रूप म श्रीकृष्ण को गोपियो की स्थिति से परिचित करात है। उद्धव शतक के अतिम छदम उद्धव का सामाय मानव स्प ही पाठक के सामने आता है। दोद्धत ज्ञानी रूप नही। यह महान परिवतन मानवीय गुण ग्राहता का ही परिचायक है। गोप-गोपी उद्धव शतव म ब्रजवासी गोप-गापिया के स्वभाव के चित्रण म रत्नाकर जी ने उनक उलट प्रेम और तुल्यानुराग को बडे विस्तार से वर्णित किया है। अक्रूर श्रीकृष्ण का मथुरा ल जान क लिए आये ता गोपियों ने उसका निषेध किया था। यह सदभ उद्धव शतर म प्रत्यक्ष रूप स कही नही आया है किन्तु उद्धव के आने पर गोपियो ने इस भाव का व्यक्त किया है। गोपियो ने पहले तो यह समझा नि उद्धव कोई अच्छा सदेश लेकर आये है वितु बाद म उहे शका हुई वि यह अकूर के भेजे हुए हैं । अनूर के कृत्य गोपियां मठोर समझती थी, इसलिए उद्धव र प्रति भी उनका मन सशव था। उद्धव-धता मे चरित्र चित्रण ३७ गोपिया श्रीकृष्ण प्रेम मे पूरी तरह डूबी हुई थी। श्रीकृष्ण के सगुण, माकार रूप से उनका अनय प्रेम था। निगुण, निराकार ब्रह्म रूप कृष्ण से उनका कोई सरोकार था । अत उद्धव के ज्ञान मार्गी उपदेश पर उहोन ध्यान नहीं दिया। निगुण ब्रह्म के अस्वीकार म गोपियों जा तक देती है, वे सब उनके प्रेम को प्रकट करने वाले तक है । गोपिया किसी भी प्रलोभन को स्वीकार नहीं करती, वे अन य भाव से श्रीकृष्ण का पाना चाहती है। उद्धव के मार उपदेश उनके आगे व्यथ माबित होत है । गोपियाँ निश्छल स्वभाव की है । भोली भाली है। ब्रज को छोड कर कही जाना नहीं चाहती । उनका प्रेम एकनिष्ठ है। श्रीकृष्ण के प्रति जिस निष्ठा-नास्था स वे प्रेम रखती है, वह उद्धव जस ज्ञानी व्यक्ति को भी द्रवित कर देता है । निगुणोपासना के खण्डन म व जो युक्ति-तक प्रस्तुत करती है व देखने मे स्थूल प्रतीत हात है वि तु उनम अपने विश्वास की दृढता है। उद्धव के सभी उपदेश उनके लिए थोये नानोपदेश है जो गापिया के मम स्थूल को छू नहीं पात। गापियो के स्वभाव में स्पगविता होने का भी सक्त है, श्रीकृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वणन करत समय वे अपने रूप सौदय की बात भी अस्फुट रूप से कह देती है । प्रेमविता होना तो स्त्री के लिए उचित है कि तु रूपगर्विता होना कुछ अच्छा नहीं लगता, कि तु नारी स्वभाव में यह गव प्राय पाया जाता है । संक्षेप म, चरित्र चित्रण की दृष्टि से उद्धव शतक मन तो पात्रो का जमघट है और चरित्रा का गहरा, दुर्योध और जटिल चित्रण । तीनो पार अपनी-अपनी विशेषता के साथ इस काव्य म पाठक के सामने आत है। सगुण और निगुण उपासना का द्वन्द्व भी पात्रो के सवादो से उभरता है। चारिनिक गुणो के प्रस्फुटन का इसम विशप जवकाश नहीं है क्यावि कथा का एक ही बिदु है। उपक्याए भी अवा तर प्रसग इसम नहीं है। कृष्ण का चरित्र तो प्रारभ के दस-बारह छदो म समाया है जहा व जपनी विरह विदग्ध मन स्थिति का वणन करते है । व्रज प्रेम को प्रदर्शित करन म ही उन चरित्र की उदात्त प्रेम भावना उदघाटित होती है। उद्धव अपन नान और उपदश के कारण एक विद्वान पडित के रूप मे पाठक के सामन जात है । पहल एसा लगता है कि बृहस्पति का यह शिष्य शुष्क नामार्गी होगा, हठी और दुराग्नही हागा लक्नि उद्धव शतक क अत म उद्धव सहृदय, भावुक और प्रेमी व्यक्ति का रूप धारण कर लेत है। उनफ हृदय का परिवतन कृत्रिम न हावर प्रेम के प्रभाव की स्वाभाविक परिणति है। गोपिया और अजवासी इम काव्य म उत्कृष्ट कोटि अनय प्रेमी के रूप में वर्णित है। गोपियां भोली भाली है वि तु उद्धव व नान और निगुण उपदश कान मानन म सर्वाधिन एय दृढ आग्रही है । उनमी अन यता निष्ठा आस्था इस काव्य म परम उसप पर है। इस प्रकार चरित्र चित्रण की दृष्टि स यूनावकाश रह्ने पर उद्धव शता भी कवि ने इन पात्रो चरित्र की विशेषताए अवश्य स्पष्ट कर दी है। गापिया के चित्रण म असूया और स्त्री सुलभ ईप्या का भाव भी रत्नाकर जी ने उभारा है । गोपिया श्रीकृष्ण के प्रति सशक होकर कुब्जा के प्रति आकषण के की बात कहती है। उनका आरोप है कि कुब्जा ने अपने प्रेमपाश मे श्रीकृष्ण को फंसा लिया है इसलिए वे मथुरा से वापस नहीं आ रहे है। इस बात को उपालभ शैली से गापियो ने पाच छह छदा म बडी मार्मिक शैली में व्यक्त क्यिा है । नारी स्वभाव की यह दुवलता गोपिया के चरित्र म स्पष्ट हो गई है। उद्धव शतक म चरित्र-चित्रण ६ उद्धव-शतक मे दार्शनिक विचार उद्धव शतक शृ गार प्रधान वाध्य है । गोपिया र कृष्ण प्रेम को उदात्त भूमि पर स्थापित कर नान, योग, निगु ण आदि साधनो से श्रेष्ठ सिद्ध किया है। अत क्सिी दाशनिक मतवाद या गद तक विचारधारा का वणन करना इसका मूल उद्देश्य नही है । जितु प्रेमाभक्ति की उत्कृष्टता और निगु णोपासना से श्रेष्ठता सिद्ध करने के सदभ मे दाशनिक विचारा का इस काव्य मे समावेश हुआ है। भ्रमरगीत परम्परा मे सूरदास और न ददास वे भ्रमर गीता में भी यह दाशनिवता पूरी तरह लक्षित की जा सकती है । न ददास की गोपिया की तक्पद्धति तो दशन की भित्ति पर ही आश्रित है और वे उद्धव को अपनी सगुणोपासना की श्रेष्ठता सिद्ध करत समय ब्रह्म जिनासा की चर्चा दशन के परिप्रेक्ष्य में ही करती है । सूरदास की गोपियो मे वैसी तीक्ष्ण तक बुद्धि तो नहीं है वितु उद्धव वे ब्रह्म ज्ञान को अस्वीकार करत समय वे भी दशन की मर्यादा का पालन करती है। वस्तुत यह सदभ भागवतपुराण से जुड़ा हुआ है और इसम दाशनिर विचारा का समावेश अय कवियो द्वारा किया गया है । उद्धव शतक का कवि भी इस परम्परा से जुड़ा रहा है और उसने भी जनेक कवित्त। म उद्धव के द्वारा दशन की गहन गभीर बाते कहलाइ हैं। उद्धव शतक में जिन दाशनिक विचारा का समावेश कवि ने किया है उसका मूलाधार निगु णापासना ही है । निगुण ब्रह्म की जिज्ञासा मे जो योग, ध्यान, जप, तप आदि विहित है उनका भी वणन उद्धव ने दिया है। वेदान्तदशन के अनुसार इस दश्यमान् जगत मे एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है । जो चक्षुगोचर है वह मिथ्या है। जज्ञान, अविद्या या माया के कारण जीव को इस पदाथ जगत की सब बातें मिथ्या प्रतीत होती है । वास्तविक दष्टि से ब्रह्म और जीव, ब्रह्म और जगत पथक् अस्तित्व नहीं रखत । 'ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या, ब्रह्ममाजीववनाऽपर । सवखल्विद ब्रह्म नह नानास्ति विचन। के अनुमार उपासना के लिए विसी सगुणसाकार ईश्वर या देवता की कोई आवश्यक्ता नही । यह ठीक है कि जीव को अपने चम चक्षुओ से प्रत्येक पदाथ का पृथक अस्तित्व भासमान होता है कि तु तत्वत यह पथकत्व है नहीं। जो दश्यमान् जगत् हमारे सामने है वह क्षणभगुर है नाश वान है, प्रतिपल परिवतनशील है, अस्थायी और अयथाथ है। यह दाशनिक चितन निगुणोपासना का मूलाधार है और यही ज्ञानी उद्धव द्वारा इस प्रकार व्यक्त कराया है पाचो तत्व माहिं एक सत्व की ही सत्ता सत्य याही तव ज्ञान को महत्त्व श्रुति गायी है। तुमती विवर रतनावर कही क्यो पुनि भेद पचभौतिक के रूप में रचायौ है। गोपिन मैं, आप मै, वियोग और सजोगहू मैं, एवं भाव चाहिए सचा ठहरायो है । आपु हो सो आपुको मिलाप और विछोह कहा मोह यह मिथ्या सुख-दुख सब ठायो है। इस कवित्त म दाशनिक विचार को सम्पूणता के साथ व्यक्त करवे रत्नाकरजी न स्पष्ट कर दिया है कि कृष्ण और गोप-गोपिया दो पथक् सता वाले जीव न होकर एक ही ब्रह्म के रूप है, दोना मे अभेद है अत वियोग और सयोग की बात करना ही व्यथ है । यह दाशनिक विचार अद्वैत वेदात का हो सार है। इसी दाशनिक तथ्य को उद्धव ने गोपिया के सामने भी प्रस्तुत किया है। विचार यही है कि तु मात्र शब्द भेद है । वित्त सख्या ३१ मे यही भाव है- पच तत्व मैं जो सच्चिदानद की सता सो तो म तुम उनमैं समान ही समोई है। कहै रत्नाकर विभूति पच भूत हूँ की एक ही सी सक्ल प्रतिभूतिन मैं पोई है। माया के प्रपच ही सो भासत प्रभेद सबै काच फलकनि ज्या अनक एक सोई है। देखो भ्रम पटल उधारि ज्ञान आखिनि सौ पाह सवही मैं काह ही मैं सब कोई है । अद्वत प्रशन की तात्विक दृष्टि यही है कि समस्त पचभौतिक पदार्थों में जीव और जड जगत् म सच्चिदानद ब्रह्म की सत्ता समान रूप स व्याप्त है। माया का अपच, जिस दाशनिक शब्दावली में, अभ्यास कहते है, भ्रम उत्पन करके एक को अनेक रूप मे प्रतिभासित करता है। काच फ्लक में जैसे एक मूर्ति अनेक रूप मे दृष्टिगत होती है वम ही एक् ब्रह्म इस जगत् म अनेक रूप में लक्षित होता है। यदि ज्ञान की आंखें खोल कर हम इस माया ये भ्रम पटन को हटावर देखें तो कृष्ण म ही सब दिखाई देंग और समस्त गोचर जगत् मे कृष्ण होगे। यह दिव्य उद्धव शतर मे चरित्र चित्रण न भेद - दष्टि ययाय गान ग्रहा जिससा म हो मुलभ हो साता है। इसी भार को अगर यक्ति म रसापर जो न और अधिक स्पष्ट शाम व्यक्त किया है- साई काह, सोई तुम सोइ सवही है लगो, घटघट अनत स्पामधन को। पहे रत्नावर भावना सौ मरी वारिधि जो बूद व विचारि विधुरन यो जपिपल चाहत मिलाप तो विलाप त्यागि जोग जुगती करि जुगावी नान धन को। जीव-आतमा को परमात्मा में लीन करो छीन करो तन पो, न दी परी मना। मूल भाव की दष्टि स यह कवित्त भी उसी दाशनिक विचार का समय है जो पहले पवित्त का है पितु उदाहरण म कुछ अतर है। समुद्र और समुद्रजल को बूद म वास्तविक भेद नहीं होता, दोना ही समुद्रजल हैं। यदि वास्तव में गोपिया वृष्ण के साथ मिलन की आकाक्षी है ता उह वियोग विलाप त्यागार योग ध्यान द्वारा नान माग से अपनी आत्मा का परमा मा मे लीन करन का उप नम करना चाहिए। वियोग के कारण शरीर को क्षीण परना और विलाप करके मन का हीन बनान की कोई आवश्यक्ता नहीं है। यही दशन-पथ गोपियो को श्रीकृष्ण से मिला सकता है। प्रेम और शृगार की लोविक भूमि पर मिलन मिथ्या है। उद्धव के ब्रह्म नान विषयक दाशनिक विचार उद्धव शतक मे पूवपक्ष मे ही गहीन है । गोपिया इस ज्ञान माग के दशन यो अस्वीकार कर देती है। उनके पास श्रीकृष्ण मिलन का अपना दशन है, अपनी जास्था, निष्ठा और अन य प्रेम का माग है जो उह इन उपदेशो के ग्रहण करने से रोकता है । गोपिया नानी नही, प्रेममार्गी है। प्रेमाभक्ति का अपना सगुण दशन है और उस मगुण भक्ति के दरान को गोपिया उद्धव के समक्ष प्रस्तुत करते में जरा भी हिबविचाती नहीं। प्रेमाभक्ति का यह माधुयभाव का दान ही वास्तव म उद्धव शतक का सिद्धात पक्ष है । इस सिद्धात पथ के दशन का गोपियो ने बडी ताधित शली से प्रति पादित किया है। गोपिया पहल तो उद्धव के नानमार्गी ब्रह्मनान का सतक खडन करती है । सडन के उपरात वे अपन सगुण भाव की स्थापना करन म तत्पर होती है । गापिया उद्धव के नानोपत्श के दाशनिक मन्न य वो सुनकर भी अनसुना सा कर देती हैं । वे यह बताना चाहती है कि जिस गूढ-गभीर ब्रह्मज्ञान की बात तुम कह रहे हो वह हमारी अपर बुद्धि के लिए दुर्बोध है। हम नहीं समझ सकी कि 'तुम किस दशन की हमसे चर्चा करत रह हो । बहुत ही अबोध वनार मापिया अपा आराध्य प्रमी कृष्ण के विषय म एक सीधा प्रश्न उद्धव के सामन रख देती है। उद्धव शतक । हे उद्धव ! यह बताओ कि हमारे प्यार कृष्ण मथुरा से कब लौटेगे और कब हम उनका मुख देख सकेंगे हम यह भी बताओ कि कृष्ण मथुरा म क्या करत रहत है? क्या कभी वह यमुना तट पर जाकर, घट वक्ष की छाया मे बैंठ, प्रफुल्ल मन से वासुरी बजात है ? यह प्रश्न सीधा सादा है कि तु सगुण-साकार श्रीकृष्ण की प्रेम- मयी भक्ति का आधार है। इस प्रश्न के बाद गापिया अपनी तब-बुद्धि का प्रयोग करती हुई उद्धव के दाशनिक म तव्या का सयुक्तिर शली स खडन करना प्रारम्भ करती है। उद्धव में समुद्र और बूद का उदाहरण देकर दोनो का अभेद सिद्ध करना चाहा था। गापिया इस अभेद को अपने तक से काटती हुई कहती हैं कि यदि समुद्र और वूद मे अभेद मान भी लें तो समुद्र (कृष्ण) की असीमता म तो काई अतर नहीं पडता कि तु अकिंचन तुच्छ बूद (गोपी) तो समाप्त हो जाती है। अपना अस्तित्व खोकर हम एस अभेद को कैसे स्वीकार कर सकती है। अपन पथक् अस्तित्व की बात गोपिया ने कवित्त सख्या ३७ में स्पष्टत कह दी है। यह विचार शुद्धाद्वैत दशन के मेल म है, अद्वत के नहीं। उद्धव न गोपियों से कहा था कि श्रीकृष्ण तो साक्षात ब्रह्म है जो रूप, रम, गुणहीन हैं, उनका नेत्र मूदकर ध्यान ही किया जा सकता है, उनका स्पश सभव नहीं है । गोपिया इसके प्रत्युत्तर म उद्धव स कहती है मि जिस कृष्ण को तुम रूप रसहीन कहते ही उसी के रूप का ध्यान और रसा स्वाद की बात करना स्वय विरोधाभास है । इस विशाल विश्व मे व्याप्त जिस ब्रह्म को तुम भगोचर, अदश्य और अलक्ष्य कहत हो उस हम किस प्रकार अपनी त्रिकुटी म समट कर ध्यान का विषय बना सकती है । यह निगण तो हमारे लिए कष्टसाध्य ही नही असभव है। उद्धव न गोपिया को मुक्ति प्राप्ति का साधन निगुणापासना बताया था। गोपिया इस मुक्ति को भी कामना नहीं करती। व स्पष्ट शदा म बहती है- 'मुक्ति मुक्ता को मोल माल ही कहा है जब, मोहनलला प मन-मानिक हो वारि चुरी।' यहा मोती और माणिक्य का श्लप भी चमत्कार उत्पन करने वाला है । उद्धव ने ब्रह्म को स्प रगहीन अनग वहा था, गोपिया यहा अनग शब् म वामदेव का अथ ग्रहण करती हुई कहती है--एक ही अनग साध सव पूरी अब, और अग रहित अराधि क्री है कहा उद्धव ने जिस ब्रह्म का निरूपण किया था गोपिया उस अस्वीकार करती हुई जो युक्तिया देती है वे उतनी सीधी, सरल और सापक है कि उद्धव वा गूढ दशन उनपे समक्ष ठहर ही नहीं पाता। निरासार ब्रह्म हो यदि श्रीकृष्ण है तो वे बिना हाय के गाया वा दूध बस दुगे, पैरा के विना घिर थिरख कर नाचेंगे कैस बिना मुख के मक्वन कैसे पायेंगे, बासुरी क्स बजायेंगे, विना आप और कान के ग्रजवासियो वी विपत्ति का क्मे देखें और मुनेंगे । हे उद्धव । तुम उदय-पातर मनिष विचार - 7 हमे योगी बनाना चाहते हो लेकिन वियोग के भोग के भोगी हम किस प्रकार क्मे है । यह साधना भी तो कष्टपूण ही है। इतना स्पष्ट कह देने के बाद कुछ आवश और क्रोध की मुद्रा मे भी गोपिया उद्धव को फटकारती हुई-सी कहती हैं- जोग को रमावं औसमाधि को जगावं इहा दुख सुख साधनि सौं निपट निवरी है। + + + + चेरी हैं न ऊधो | काहू ब्रह्म के बवा की हम सूधौ कहे देति एक काह की कमेरी है। गोपिया का दशन प्रेमाभक्ति पर आधृत सगुण-साकार भक्ति का दशन है । इस दशन को किसी एक खास दाशनिक मतवाद म बाधा नहीं जा सकता। वल्लभाचाय ने जिस शुद्धाद्वत दशन का प्रतिपादन किया है वह भी गोपिया द्वारा कही स्पष्टत वर्णित नहीं है । इतना स्पष्ट है कि गोपिया अद्वैत दशन का खण्डन पूरी निष्ठा और दढता से करती है। उनके पास तक, युक्ति और प्रमाण का सबल है । उद्धव के नानोपदश से वे तनिक भी भ्रमित नही होती वरन प्रत्येक निगण साधन का सटीक रूप से खडन कर देती हैं। उद्धव को समझाने के लिए उहोने बडे अनुनय विनय भाव से कहा है कि तुम ब्रह्म सत्कार की लम्बी चौडी गूढ बात तो करते हो कि तु एक बार हमारी आख से यदि तुम कृष्ण के रूप माधुय को देख लेत तो शायद ऐसी बेतुकी बात न करते- ऊधो ब्रह्म ज्ञान को बखान करत न नंकु देख लेत काह जो हमारी अखियान सौं।" उद्धव की दाशनिक विचारधारा मे पातजल योगदशन का भी यत्र-तत्र पुट है। चित्तवत्तियो के निराध का उपदेश, अभ्यास और वैराग्यसाधन का उपदेश, चित्त का वीतराग बनाने का उपदेश, अविद्या, अस्मिता राग-द्वेष का अभिनिवेश ही क्लेशजनक है आदि सम कयन योगशास्त्रनुकूल ही हैं। सक्षेप में, उद्धव शतक में दो प्रकार की दाशनिक विचारधाराए मिलती हैं। पहली दाशनिक विचार धारा में समयक उद्धव हैं जिस हम पूर्वपक्ष की विचारधारा कह सकते हैं । यह विचारशन मतदशन-परक है। निगण निराकार ब्रह्म का इसम उपदश है। दूसरी विचारधारा गोपिया की है। इसका दाशनिक आधार तो इतना पुष्ट नही है परन्तु भक्तिमाग वो सगुणोपामना की प्रतिष्ठा अति सवल रूप से की गई है। यह सगुण भक्ति ही दशन का रूप ग्रहण कर सती है। अत इम हम रखव शतक का सिमान्तपक्षीय दशन रह सकते हैं । ०० उद्धव-शता उद्धव-शतक की भापा उद्धव शतक आधुनिक युग की रचना है कि तु उसकी भाषा मध्यकालीन ब्रजभाषा है। आधुनिक युग मे ब्रजभाषा को स्वीकार कर पाव्य रचना करने वाले कवियो मे रत्नाकर जी का स्थान मूध य है। रीतिकालीन कवियों ने ब्रज- भापा कोपरिष्कृत और प्रांजल बनाकर जो रूप दिया था उसे रत्नाकर जी ने और अधिक परिमाजित, ललित, श्रुति मधुर एव पवाहपूण बनाया इसमे तनिक भी सदेह का अवकाश नहीं है। रीतिकालीन केशव, देव, बिहारी, मतिराम, धनानद, पदभाकर आदि कवियो द्वारा जो ब्रजभाषा रत्नाकर जी को विरासत म मिली थी उसे अपनी प्रतिभा से और अधिक ललित एव लावण्यपूण बनाने मे इनका योगदान भुताया नहीं जा सकता । उद्धव शतक की यजमाया मे सौष्ठव को दष्टि से जो सुघडता लक्षित होती है वह रत्नाकर जी की प्रतिभा का ही सुफल है। जिस समय रत्नाकर जी काव्य रचना मे प्रवत्त हुए उस समय हिदा मे भाषा के स्तर पर खड़ी बोली को स्थापित करने का आदोलन सफल हो चुका था। श्री अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' का प्रसिद्ध खडी बोली-काव्य 'प्रिय प्रवास' प्रकाश मे आ चुका था। मुक्तक रचनाओ म खडी बोली स्वीकृत भाषा के रूप में अपने परजमा चुकी थी । ब्रजभापा म रचना करने वाले भी ब्रजभापा छोड कर खडी बोली की ओर खिचने लगे थे। ऐसे भाषा-सत्रान्ति के समय रत्नापर जी ब्रजभाषा की पताका फहराते हुए अडिग भाव से जमे खडे थे और ब्रजभाषा को और अधिक सक्षम भाषा के रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। उस युग मे रलावर जी ही एकमात्र रचनाकार थे जो ब्रजभाषा का दामन थामे अविचल भाव से प्रजभापा मे काव्य-सृजन करने म पूरी निष्ठा के साथ तल्लीन थे। ब्रजभाषा अपने पदलालित्य, अथगौरख, माधुय और श्रुति पेणलता के कारण मध्य युग में भरत और सतो द्वारा रीतिकाव्य प्रणेता आचाय कविया द्वारा तथा स्वछ दतावादी शृ गारी पविया द्वारा समान रूप मे समाप्त हुई। रलापरजी उद्धव शतक की भापा ने इसी रिक्थ को ग्रहण किया और व्रजभापा को अधिकाधिक सवारने-सजाने का भरसक प्रयत्न क्यिा। कना न होगा कि उनके भाषा विषयक प्रयत्नो से ब्रज भापा मे और अधिक लोच, लावण्य तथा सम्प्रेपणीयता आई। रत्नाकर जी का प्रयास निर तर यह रहा कि परम्परागत प्रजभापा को साहित्यिक धरातल पर पूरी तरह स्थापित करने के साथ लोकप्रिय बनाया जाय। रीतिकालीन कवियो ने व्रजभाषा को प्रौढ अवश्य बनाया था वितु उम समय के कवियो न शब्द चयन, वाक्यवियास वतनी और प्रिया कारण प्रयोग मे एकरूपता पर ध्यान नहीं दिया । भाषा मे प्रौढता और परिपक्वता आने पर भी साहित्यिक स्तर पर एक- पता का अभाव खटकता रहा । रत्नाकर जी ने इस भाव को दूर करने का स्तुत्य प्रयास किया। यदि शुद्ध, सुसस्कृत, परिमार्जित एव प्रांजल ब्रजभाषा का रूप देखना हो तो रत्नाकर जी की ब्रजभापा म वह देखा जा सकता है। उसका भी सवश्रेष्ठ रूप उद्धवशतफ मे लक्षित होगा। रत्नाकर जी भाव प्रकट करने भाषा की शक्ति को प्रमुख स्थान देत हैं। उहोंने हिदी-साहित्य सम्मेलन के सभापति पद स दिय गये भाषण मे भाव और भाषा के पास्परिक सम्बध को इस प्रकार व्यक्त किया है 'काव्य के विषय मे यह निर्विवाद मत है कि वह ऐसा वाक्य है जिसने सुनने अथवा पढने मे सहृदय को एक अलौकिक आनद की प्राप्ति हो । उसमे रमणीयता के मुख्य दो कारण होते है । एक तो किसी ऐसे विषय या भाव का वणन होना जो स्वभावत ही मनुष्य जाति को अलौक्वि जान दप्रद है, दूसरे क्मिी विषय या भाव के व्यक्त करने का कुछ ऐसा ढग जिससे सुनने वाले का चित्त प्रसन हो जाय । जिस काव्य मे यह दोनो बातें हो, वह परम श्रेष्ठ है, पर जिसमें इन दोनो मे मे एक भी न हो उमे तो काव्य कहना ही व्यथ है।' क्थन की शली भाषा पर निभर करती है और भापा मुष्ठु प्रयोग, व्याकरण और शब्दचयन पर । रत्नाकर जी ने इसका निर तर ध्यान रखा है। यह ठीक है कि ब्रजभापा रत्नाकर जी की मातभाषा नही थी। रत्नाकर जी ने पूर्व रचित काव्यो वा अनुशीलन कर अभ्यास द्वारा इसका अजन किया था। अजित भाषा होने पर भी इमम निपुणता प्राप्त कर रचना-कौशल से भापा को असकृत और व्यवस्थित बनाने का श्रेय रत्नाकर जी को है। 'अपने अध्ययन के वल पर रत्नाकर जी ब्रजभापा की नसर्गिक प्रकृति से इतना अधिक परिचित हो गये थे कि मस्कृत अरबी, फारसी तया बनारसी वोली गदा की ब्रजभापा म दालन म उह कठिनाई नहीं होती थी। उनकी रचनाओ म विभिन्न भाषाओ के दासी गवीस आये हैं कि उनके कारण प्रजभाषा वी प्रवृति में वही अन्तर नरी पड़ा है । विमी भाषा विशेष की प्रकृति को अक्षुण्ण रयत हुए उगम अन्य भापामा के शब्दा या गफलतापूर्वक समावेश कर देना माधारण वात नहीं है, उद्धव शतक परतु रत्नाकर जी के लिए यह कटिन वाय भी सस्था यो ग्रहण करके भी उनकी भाषा क्लिष्ट नहीं हुई है। और क्ला प० २३४) रत्नाकर जी के घर की भापा वनारसी थी। प्रजभापों समय काशी की बोली में प्रचलित शब्दोको रत्नाकर जीन किया है। उद्धव शतक में भी ऐसे बोलचात वे शब्द मिल जाते है । पवारि, उदवासना, उधराना, अगजना आदि शब्द बनारसी बोली के है जिन्हे प्रजभापा म रत्नाकर जी ने पूरी तरह खपा दिया है । भाव और भाषा का प्रत्यक्ष सबध है। यदि कोमल भाव है तो रत्नाकर जी कोमलका त पदावली का प्रयोग करते है और यदि पुरुप भाव है तक वितर या क्षाशनिक चि तन है तो भापा भी तदनुसार गूढ और गम्भीर होन के साथ कठोर हो जाती है। गोपिया उद्धव की उपदेश वार्ता सुनकर जिस स्थिति में पहुंच गई वह घबराहट और व्यथा की स्थिति है। इस दशा के वणन मे कोमल शब्दो का ही प्रयोग समीचीन माना जायगा। रत्ला पर जी के जनेक छद उद्धव शतक मे इसी भाषा मे लिखे उपलब्ध है सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान कोऊ थहरानी, कोई थानहिं थिरानी है। कहै रतनावर रिसानी बररानी कोऊ कोऊ विलखानी, बिफलानी, विथकानी है। इम कवित्त म सगीत का प्रवाह शब्दा की लोच द्रष्टव्य है। समस्त क्रियापद एक ही लय-ताल में बधे प्रवाह मे बह जाते प्रतीत होत है। कणक्टु श दो का पूण बहिवार है। ब्रजभाषा की नैसर्गिक प्रवृति के अनुकूल शब्दो का चयन और वियास के लिए उद्धव शतक अप्रतिम निदशन है--- चिंता मुनि मजुल पवारि धूरि धारनि मे काच मन मुकुर सुधारि रखिबौ कही। X एते बडे बिम्ब माहि हेर हूँ न पये जाहि ताहि त्रिकुटी मे नन मूदि रखिवी कही। सगीतात्मक अनुप्रास विधान का चातुय तो रत्नाकर जी के काव्य-कौशल का एक उत्कृष्ट गुण है । जनुप्रास श दालकार है रितु उद्धव शतर मे वह भाषा का सहज प्रवाह बनकर प्रयुक्त हुआ है। रत्नाकर जी की प्रजभापा का मौष्ठव उसके व्याकरण सम्मत, लौकिक दष्टि म प्रयोगानुकूल और अभिव्यजना सोदय के कारण वेजोड कहा जा सकता है । उद्धव शतक' म एम अनेक शब्दो का प्रयोग है जिसमें सौ दय को सृष्टि रत्ना कर जी की पदयोजना के कारण ही हुई है । यदि उन श दा को उलट फेर के साथ उद्धव शतक की भापा इधर से उधर कर दिया जाय तो काव्य सोदय नष्ट हो जायगा। प्रजमण्डल की प्रशसा करते रत्नाकर जी ने उद्धव के मुख से यह कवित्त कहलाया है । इसका भाव-सोदय शब्द सम्पत्ति से ही निखरा है । उद्धव कहते है--- छावते कुटीर कहू रम्य जमुना के तीर गौन रोन रेती सो कदापि करते नही। कहै रतनावर विहाय प्रेम-गाथा गूढ स्रोत रसना मे रस और भरते नही। गोपी ग्वाल बालनिके उमडत आमू देखि लेखि प्रलयागम हू नंदु डरते नहीं। होती चितचाव जो न रावरे चितावन की तजि अज-गाव इत पाव घरते नही ।। उद्धव ने ग्रज मे पहुच कर गोपिया की विरहज य स्थिति को प्रत्यक्ष देखा तो वे स्वय स्त घ एव चकित रह गये । समझ ही नहीं सके वि इनसे किस भापा मे श्या बात की जाय । उस स्थिति का शब्द चित्र द्रष्टव्य है-- दीन दशा देखि प्रजवालनि की ऊधव को गरि गो गुमान मान गौरव गुठाने से। कहै रतनापर न आए मुप बन नैन नीर भरि ल्याए भए सकुचि सिहाने से मूमे में समे से सपबफे म सके से थवे भूल मे ध्रमे से भभरे से भक्वाने से। हौले से हले से हूले-हले से हिये मे हाय हारे स हरे से रह हेरत हिराने मे । उपप षत पवित्त म रेणाक्ति शब्दाम प्रजभाषा की छटा लगित करने योग्य है। ये सभी शब्द मामा य बोलचाल को मापा के हैं। साहित्यिक चमर इनमे नही है वितु अय को पूरे सदभ रे माय उजागर करो की इनम विलक्षण शक्ति है। गुठाने, मिहाने सबके, सवे, भगरे, भग्वाने, होो हूले-टूने, हिराने आदि शब्द ठेठ प्रजभाषाये हैं। इनका अपना सहज सौदय है जो आभिजात्य वे मेल म न होन पर भी अभिव्यक्ति को भाव के सदभ मे सम्प्रेषणीय बना देता है । प्रजभाषा का माधुय इसी आंचलिपना को व्यापक आयाम देता है। मुक्ति मुक्ता को मोन माल ही रहा है जब माहन लला ५ मन मारिप ही वारि चुवो। मगार र अनुभास की स्टा को जितना महज, स्वाभाविप इन पक्तिया म रत्नावर जीन बना दिया वर प्रजमापा ये प्रवाह म ही ममय है । मगर यी मात बार आवृत्ति न सा प्रतिम लगती है और न आरम्परपूण अलति ही इस पहा उदयशवम जायगा। यह तो ब्रजभाषा की नैसर्गिक प्रकृति है । उद्धव को मीठो फटकार लगाते हुए गोपिया कहती हैं-चेरी है न ऊधा । काहुँ ब्रह्म के वबा की हम धो कहे देति एक कान्ह की धमेरी है । कान्ह की कमरी तो ब्रजभाषा में ही सगत हैं, खड्डी बोली या किसी अय बोली म वह मेरी शब्द खपेगा ही नही । दासी, सेविका आदि के साथ कमेरी को बिठाने का चातुय रलावर जी की मलम.म ही है। रत्नाकर जी ने परिचारिका-जसे अभिजात शब्द का भी इसी अर्थम प्रयोग किया है कि तु कमेरी-जैसी अभिव्यजक्ता उसमे नही है । उद्धव गोपियों से मिलकर मथुरा वापस जाने लग । उहीन गोपियों से आग्रह किया कि वे सब अपना सदेश कृष्ण के नाम लिखकर उ ह द दें। गोपियाँ पत्र लिखने बठी किन्तु किसी को भी लिखने का उपनम नहीं सूझा । मन म कोई वात स्फुरित नहीं हुई, हाथ रुक गया । विरहातप स जलती हुई गोगियो की विचित्र दशा हुई, उसका वणन ऊहात्मक पद्धति से कवि न किया है । उहात्मय पद्धति यद्यपि रत्नाकर जी का प्रिय नही थी वितु बजभाषा के अनुकरण स वे विहारी को सवश्रेष्ठ मानते थे और बिहारी उहापद्धति के चमत्कारी कवि है जत उना प्रभाव उहात्मा शैली पर पड़ना स्वाभाविक है । दाबि दावि छाती पाती लिखन लगायो सबै व्यात लिखिवं को पन कोऊ करि जात है। कहै रतनाकार फुरति नाहिं बात क्छु हाथ धर्यो ही तल थहरि थरि जात है। ऊधा के निहोर फेरिनबु घार जोरै पर ऐसो अत ताप को प्रताप भरि जात है। खि जाती स्याही तेखनि के नकुडक लागे अब लागे नागद वररि परि जात है। रत्नाकर जी ने अजभापा के शब्दो को रीतिकालीन पवियो की भाति तोडा मरोडा और स्वच्छा से लघु गुरु नही किया है । हो, शब्दो की घिमाइ अवश्य की है । पिसाई से तात्पय है शब्द की भणपटुता का परिहार पर उसे श्रुतिमधुर बनाना । जैसे अलक्ष्य को अलच्छ, गुणवाली को गुनीली, निवत्त को निवरी स्परित को फुरत प्रत्यक्ष का प्रतन्छ,स्थापन को थापन भाव या भाय, मक्षिााको मखियो, रोदनमयो को रुएदी सुस्वरवाला को सुधारी, गवण को सौन, दृष्टि को दीठि, मचित वो सचि अहमेव को हमव, हास को ह्रास, हृदयतल वाहीतल आदि शब्दा का रूप गढा है । इसी प्रकार प्रजभाषा की प्रकृति का ध्यान में रयत हुए कुछ गियापद भी बना लिय है, जग-अनुमा धरना को अनुमान, उमग म भरखर पो उमहि गिराता है का गार, निहोरा परतावा पिहोरि, बाहर करन या उदव-पात की भाषा ४३ बहिराइ, मोलनोत्मीलन को मदुराने, शीतल करना को सिराइ आदि मियापद बनाये है। रत्नावर जी ब्रजभाषा माधुय गुण से परिपूर्ण है तीन चार छदा में ओज गुण का भी आभास मिलता है, कि तु उद्धव शतक का मूल गुण माधुय ही है । माधुय गुण मे कोमल कात पदावली तथा सरस शब्दा का प्रयोग होता है । श्रुतिमधुरता मी उसम रहती हू । अथवोध को दष्टि स माधुय गुण वाले छद मिलप्ट नही होने । प्रसाद गुण का पुट देकर रत्नावर जी ने माधुय गुण का मचार किया है। उद्धव शतव में कवि ने पडऋतु वणन को भी स्थान दिया है । बसत से शिशर ऋतु तक छहा ऋतुओ की सुपमा छह यविनो में वर्णित है । यह ऋतु वणन माधुय गुण से ओत प्रोत है। माधुय की नसी छटा इस ऋतु वणन मे है वैसी रीतिकालीन कवि सेनापति और पद्माकर को छोडवर किमी अय कवि म नहीं मिलती। यदि रीति और वत्ति की दष्टि से उद्धव शतक की भाषा पर विचार किया जाय तो यह वैदी रीति के अतगत स्थान पाएगी। वैदर्भी रीनि मे भापा ललित और कोमल होने के साथ मसण और रिन व शब्द पापा हानी पाहिए। उद्धव शतर की भाषा इसी प्रकार की है। सक्षेप म, उद्धव शतक की भाषा मावुप गुग समति, प्यावरणानुमादित, लोक व्यवहार की दृष्टि से प्रयोगानुकूल एव सुव्यवस्थित है । ऐती ललित मामले कात पनावली वाली प्रजभापा आधुनिक युग मे किसी बय कवि ने नहीं लिखो। रोतिवाल मै घनान द, पद्मावर और विहारी म ऐसो मधुर भापा लक्षित की जा सकती है। रत्नावर जी का प्रिय कवि बिहारी था। बिहारी की समास शैली पर मुग्ध थे। विहारी वे श द चया को आदश मानते थे। इसी कारण कही कही बिहारी मतसई के दोहा की झनप उसकी रचाआ मे मिल जाता है । प्रजभाषा के निवप पर तो रत्नावर जी आधुनिक काल म बेजोड है। वे ००० ५० उद्धव शतक उद्धव-शतक मे रस योजना उद्धव-पाता एक मुक्तक पाव्य है जिसका प्रत्यय छ द स्वत य है अत समग्र स्प से रस योजना का निर्धारण परना और निणयात्मक मत व्यक्त करना सरल नहीं है। यदि छदो के प्रतिपाद्य को अलग-अलग वरचे निणय दिया जाय तो दो प्रकार के छद इस काव्य मे उपलब्ध होते हैं। अधिकाश छद गापिया कृष्ण प्रेम और विरहानुभूति से परिपूर्ण हान के कारण विप्रलभ गार ये अतगत रम्म जा सकते है। दूसरी कोटि के छद वे है जिनमे निगुण भक्ति का प्रतिपादन है। यदि भक्ति का रस माना जाय तो इन छदो को भक्ति रस के अतगत परि गणित किया जाएगा। इस प्रकार उद्धव शतक की रम योजना का विश्लेषण विवेचन दाना रसाचे आधार पर वरना उचित है । विप्रलभ शगार का शास्त्रीय दष्टि स विवचन सस्कृति व भाचार्यों ने विस्तार पूवक् पिया है । मम्मटाचाय २ मतानुसार विप्रलभ शृगार पाच भेद हैं। अभिलापा-हेतुन, ईर्ष्या-हेतुन, विरह हेतुप, प्रयास हेतुय और शाप हेतुप । (अभिलापा विराप्रवामशाप हतु इति पच विध)। रत्नाार जी ने उद्धव शतक में विप्रलभ शृगार का वणन अभिलाप, विरह और प्रवास पर किया है। ईया के लिए विशेष स्थान नहीं है । पाँच सात छदा म बुब्जा प्रेम की बात अवश्य आई है, उस ईप्यहितुन विप्रलभ के मतगत रखा जा सकता है । शापहतुक विप्रलभ का उद्धव शतक मे कोई सदभ नही है। विप्रलभ शृगार म विरही जन की दस अवस्थाए स्वीकार की जाती है। अभिलाषा, चिन्ता स्मरण, उद्वेग, गुण वथन, प्रलाप, उमाद, व्याधि, जडता तथा मरण । इन दस दशाओ म से पाच का स्पष्ट रूप से उद्धव शतक म वणन है। उमाद, व्याधि, जडता, प्रताप और मरण दशा वा वणन नहीं मिलता । मचारियो म औत्सुक्य, चिता, शमा, प्रबोव और मद का वणन है । इस प्रकार विप्रलभ 7 गार की स्थिति पूर्ण मे सम्पन्न हो जाती है । विप्रलभ ” गार की पूर्णता के लिए विरही व्यक्ति व मन मे प्रबल प्रेमावेग के होने पर छटपटाहट होना आवश्यक है। प्रिय समागम के अभाव म विरहीजन उद्धव शता मे रम योजना की मनोदशा व्याकुल-व्यथित स्थिति मे होती है । उद्धव-शतक मे प्रवास हेतुक विरह है । कृष्ण प्रयास मे मथुरा गये हुए है । गापिया गोकुल मे प्रतीक्षारत हैं। चिता और औत्सुक्य से वे पीडित है। उधर श्रीकृष्ण भी पिंजरे मे बद तोने के मुख से राधा का नाम सुनकर व्यापुल है । उ ह गोपियो का स्मरण हो आता है, अतीत की स्मतियो से उनका मन विभोर हो उठता है, गला भर आता है, वाणी अवरुद्ध हो जाती है मन की बात स्पष्टत कहने की शक्ति उनमे नहीं रहती और वे हिचकियाँ लेकर अपनी विरह व्यथा उद्धव के समक्ष प्रक्ट करत है विरह बिथा की क्या अक्थ अथाह महा कहत बने न जा प्रवीन सुक्वीनि सौं । कहै रतनाकर वुझावन लग न काह ऊधौ को कहन हेतु ब्रज जुवतीनी सौं। गबरि आयो गरौ भभरि अचानक त्यौं प्रेम परयो चपल चुबाइ पुतरीति सौ। ने यही बननि, अन' की नानि साँ रही सही साऊ पर दीनी हिपकोनि सौं। श्रीकृष्ण ने व्रज में निवास करत हुए गोपिया के साथ भनेव प्रकार की लीलाएँ की थी । गोकुल पी गलिया मे दधि मक्खन के लिए छेपागी की थी। नाच गान किया था । चामुरी बजा पर गोपियो का मनोविनोद किया था। व सव कृत्य प्रवास के समय उह रह रहकर याद आने लगे। उनके स्मति-पटल पर ब्रज विनोद सहमा उभर आया और मगरण म विभोर होकर उहोन उद्धव से कहा गोत की गन-गल, गन-गल ग्वालिन की गो रम के काज लाज-वस के बहाइबो। कहै रतनागर रिझाइयो नवेलिनि पौं गाइवो गवाइवो और नाचिवौ पचाइयो। कीबो समहार मनुहार व विविध विधि मोहिनी मृदुल मजु वागुरी बनाइयो। ऊधो मुग्र सम्पत्ति समाज व्रज मडन के भूल हूँ न भूल भूले हमका मुलाइयो । उद्धव के व्रज बागमन मा ममाचार मुनकर गोपियां जानद विभोर होकर अपने घरो मे भाग पडी हुइ और उद्धव के पास पहुंच गद । उद्धव न उह बताया कि में कृष्ण का सदेश पत्र लेकर आया हूँ । य मुनत ही गोपियो 1 जा ओल्गुवय वह रत्नागर जी वाणी म इस प्रवार है उपवि उपवि पर-यानि मे पजनि प पगि-नखि पाती छाती छानि छव लगा। प्रस्ट दिया ५२ उद्धय शतर हमवौं लिख्यो है यहा, हमको लिग्यो है वही हमकों लिस्यो है वहा, कहन सब लगी। गापिया र मन म श रा है वि कृष्ण मयुरा म बस कर हम भूल गय है । शायद कृष्ण का मन बुज्जा म रम गया है । इसी कारण कृष्ण हमे भूल गय है । इस सदेह- शका के वातावरण में गोपियो का मन ईर्ष्या स भर जाता है । ईर्ष्या हतुक विप्रलभ साथ जमूया सचारी भाव उना मन म आता है । तीन चार छदा मे कवि ने ईया भाव या वणन किया है। ईर्ष्या का विषय कुब्जा है सुनी गुनी समझी तिहारी चतुराई जित्ती वाह की पढाइ परिताई कुबरी की हैं। कहै रतनकर निकाल हूँ रिलोक हूँ मैं आन जननकु ना विदव की कही की है। वहहि प्रनीति प्रीति नीति हू निवाचा वाधि ऊधौ सांच मन की हिय की प्ररुजी की है। वे तो है हमार ही हमार ही हमारे ही और हम उनही की उनही की उनहीं की है। दूसर छद मे पुन कुब्जा का लाच्छन व्यक्त किया है और कहा है और ऐसा प्रतीत होता है कि उद्धव तुम्ह कुष्ण ने नहीं कुवरी ने भेजा है-- रसिक सिरामनि को नाम बदनाम करो मरी जान ऊधौ क्रूर कुबरी पठाए है। तीसर छदम भी कूबरी के प्रति उपालभ की चर्चा करते हुए गोपियों ने असूया का सक्त क्यिा है- याही साप माहि हम होती दूवरी क कहा कूवरी ह हाती न पतोह नदराय की।' यदि इन छदा को विप्रलभ शृगार की कसौटी पर कमा जाय तो यही प्रतीत होगा कि गोपिया विरहानुभूति स पीडित आग्य है और कृष्ण (नायक) उनके प्रेम के आलम्बन है । नायक और नायिका के स्तर पर इस विप्रलभ शृगार को भली- भांति समझा जा सकता है । गोपियो की वाणी उपालभ की है और उनकी वेदना वियोगजनित दग्ध हृदय की है । विरह रणन में प्राय ऊहात्मक उक्तियो का कविगण प्रयोग करत है। जहा का प्रयोग अतिशयोक्ति व्यापार हो है। कितु अहात्मक उक्ति में कथन-सौ दय अपेक्षित है जो अतिशयोक्ति के लिए अनिवाय नही है । रताकर जी ने गोपिया के विरह वणन म ऊहात्मक-पद्धति का भी यत्र- तत्र प्रयोग रिया है किंतु यह रीतिकालीन कविया के समान प्रचुर मात्रा म नहीं है। महा वा विरल प्रयोग ही उद्धव शतव म मिलता है। उद्धव गोपियो से मिलकर मथुरा वापस जाने लग तब गोपिया ने अपना प्रेम पत्र उनके हाथ कृष्ण उद्धव शतकमरस-योजना ५३ के पास भेजने का उपप्रम फिया पितु विरहताप के कारण स्याही मुस गई, लेखती को डक लग गया और अक्षर बनते बनते कागज ताप से झुलस गया ! यह वर्णन ऊहा का उदाहरण है। बिहारी में तो ऐसे वीसियो प्रयोग मिलते है रत्नावर जी ने बडो सूझ बूझ से इस उहा को पत्र लेखन सदभ म प्रयुक्त किया है ऊधो के निहार फेरि नंदु धीर जोर पर एमी अग ताप की प्रताप भरि जात है। सुखि जात स्याही लेखनी के न डक लागे जक लाग कागद वरि बरि जात है। उपयुक्त वणना से यह स्पष्ट हो जाता है कि रत्नाकर जी न उद्धव शतकम विप्रलभ शृगार को उमक पूरे परिवश में चित्रित किया है। श्रीकृष्ण और गोपिया दोना ही प्रेमातिरव मे डूबे हैं और दोनो को समान रूप मे वियोग व्यथा साल रही है। इस वियोग-व्यथा न विप्रलभ शृगार को पूरा आयाम देवर काव्य को शृगाररस मे निमज्जित कर दिया है। दूसरी ओर जो विद्वान भक्ति को भाव न मानकर रस मानते हैं और उसके विभाव, अनुभाव और सचारी आदि भी स्वीकार करत है, वे उद्धव शतर में भक्ति रस की चर्चा करते हैं। चर्चा स अभिप्राय सक्त से ही है। व्यवस्थित रूप से किसी विद्वान न उद्धव शतर मे भक्ति-रस की स्थापना नहीं है। श्रीपण गापियो में साराध्य है, पृज्य है, इप्टदेव है। दूसरे शब्दा म श्रीकृष्ण विष्णु के अवतार है। गोपिया जीवात्मा है । जीवात्मा का प्रयत्न इश्वर प्राप्ति द्वारा मुक्ति कामना है । श्रीकृष्ण को भक्ति रस आलम्बन, गोपियो को आश्रय तथा स्मरण, कीतन, गुणश्रवण नामस्मरण आदि को सचारी मानकर भक्ति रस का सकेत किया जाता है। इस सम्ब व मे विचारणीय यह है कि गोपिया जिस श्रीकृष्ण को जपनी भक्ति भावना या मालम्बन बनानी है वह सगुण सातार है निगु ण, निराकार नहीं। उद्धव जिस परग्रहा की चचा भक्ति सदभ म करत है, वह म्प रखाविहीन निगुण नियर जद्वत ब्रह्म है। इस प्रकार भक्ति रस मानन वाले पाठक के समक्ष भगवान में दो रूप उपस्थित हात होत है । प्रश्न है कि उद्धव शतक मे यदि भक्ति रम की स्थापना करनी है तो पिम प्रसार के भगवान को स्वीकार किया जाना चाहिए। तो प्रकार की भविन पद्धतिया मे विरोध होन पर भक्ति रस की स्थापना के मदम म बडी उलझन उत्पन होगी। इस विवादास्पद विषय के कारण भनिन रम का पूर्ण परिपाक गभव ही नहीं है, हा भाव १५ म सगुण भक्ति को उदय शतक म स्वीकार किया गया है भक्तिरम पम उसकी पूर्ण प्रतिष्ठा नहीं है। निगुण और सगुण दोना प्रकार इष्टदव (ब्रहा और विष्णु) इसमे वर्णित है। गोपिया अपने गगुण ईश्वर का वणन रित समय सप्रमाण मता सयुक्निर पद्धति से निगुण ब्रह्म वापहन करती है एमी स्थिति में भक्ति रम की स्थापना सभव रही है। अत उद्धर शतर यो विश्लम शृगार या वाव्य ही मानना अधिक युक्तिसगत, तर प्रमाण मम्मत और दुदिगम्प प्रतीत होता है। 1 ००० - उद्धव-शतक का काव्य-रूप उद्धव शतर के काव्य स्प के सम्बधम किसी प्रकार के विवाद की सभावना नहीं है । यह एक मुक्तर काटि का काव्य है । किन्तु मुक्तक का कौन-सा रूप इसमे कवि ने स्वीकार किया है यही विचारणीय है। मुक्तक् को सस्कृत के आचार्यों ने इतर की अपेक्षा न रखने वाला काव्य रूप ठहराया है-'मुक्तक मितरानपेक्षमेक सुभाषितम् ।' इसमे सुभापित का अनुबध परवर्ती कारा मे भनिधाय नही रहा । दूसरी परिभाषा में सुभापित की शत नहीं है-'मुक्तक वाक्या तर निरपेक्षीय श्लोक' अर्थात वाक्यातर निरपक्ष श्लाप ही मुक्तक है। मुक्तक कुलक कोश संघात इति तादश' भी मुक्तक की परिभाषा है । जान दवधन ने ध्व यालोक मे मुक्तक के सम्बध म विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि 'मुमतको मे रस निवधन में जाग्रहशील कवि के लिए रसाथित जोचित्य नियामक तत्व है। प्रबध काव्य के समान मुक्तको म भी रस का अभिनिवश करने वाले कवि पाय जाते है । कविवर रत्नाकर इसी वग में कवि है । उहाने रसाभिनिवेश का अपने उद्धव शतक म जाद्योपात ध्यान रखा है। मुक्तक की उपय वत परिभाषाओ को ध्यान में रखते हुए यदि हम मुक्तक के तत्वो का मधान करता हम चार पक्ष लक्षित होगे। मुक्तक जयनिरपेक्ष होता है, अनिबद्ध अथात कथा प्रबध में रहित होता है रस चवण म रस निवधन के कारण चमत्कारपूर्ण होता है । तथा छद विधान की दृष्टि से समान अर्थात् एक ही छद म निबद्ध होता है। आचाय रामचद्र शुक्ल ने मुक्तक को पुप्पो वा सुव्यव- स्थित गुलदस्ता पहा है। प्रबध काव्य विस्तत बनस्थली है। मुक्तक म एक ही मामिन, रमणीय खडदश्य या कथ्य का वणन हाता है। विषय की दष्टि मे कवि सुदर एव मनोहारी क्था प्रबंध के किसी अश को भी चुन सकता है कि तु वह खड काव्य के सदश क्या सम्बद्ध नहीं होता। मुक्तक का छद कुछ क्षणो के लिए पाठक के मन म आनन्द और चमत्कार उत्पन कर मन को रस म निमज्जित करने वाला होता है। उद्धव शतक बाकाव्य-रूप राजशेखर ने मुक्तक वे पान भद स्वीकार क्यि है । शुद्ध, चित्र, थोत्य, सविधानकम, आप्यानक्वान । उद्धव शतक वे मुक्तव स्प पर विचार करत समय चित्र और जाग्यानववान वा प्रभाव देखा जा सकता है। पाश्चात्य साहित्य म मुक्तक वे समशील लिरिव पोइट्री को माना जाता है। लिरिक पोइट्री यद्यपि मुक्तक काव्य को सम्पूणत नहीं समेटती फिर भी गयता, स्वछ दता, निरपक्षता आदि तत्वो म एक मीमा तक यह समशील कही जा सकती है। लिरिव कविता, विचार-कविता (रिफ्लेक्टक) और भावात्मक कविता (इमोशनल) होती है। यदि मुक्तक मोटे तौर पर भेद क्यि जाए ता विशुद्ध मुक्तक, सयात मुक्तक और प्रबध मुक्त तीन प्रमुख भेद हाग । उद्धव शतक को प्रवध मुक्तक के अत गत रखा जा सकता है। लिरिव पाइट्री म यह विचारात्मक कविता के अधिक समीप है। उद्धव शतक के काव्य रूप पर विचार करते हुए डा० रमाशवर शुक्ल रसाल ने लिखा है कि उद्धव शत व चित्रोपम काव्य है जिसम प्रवधात्मक मुक्तक या प्राधा य है और जिसमें जभिधा लक्षणा तथा व्यजना तीना का अच्छा उत्वप मिलता है । सरसता, रसात्मवता, अथ गौरव और ललित मदुल पदावली की मधुरता ता कूट कूट कर भरी हुइ है।' इसम प्रवधात्मकता तथा चित्रोपमता दो शब्द ध्यातव्य है । चित्रोपम कोई काव्यरूप नहीं है। मुक्तक म ही चित्रोपम सो दय सनिहित रहता है । इस काव्य को प्रवध मुक्ता की कोटि में रखने के लिए तीन तक दिय जा सकते है। इही तीन तक प्रमाणा से हम उद्धव शतक को प्रबध मुक्तक ठहरा सक्त है। पहला तत्व है प्रत्यक छद मे स्वतन होने पर भी सूक्ष्म कथासूत्र का समावेश ! भागवत पुराण की क्था का अति मूक्ष्म-सा ततु प्रत्यक छदम याप्त है जो कृष्ण गोपी विरह के प्रसग का जाडकर क्था का रूप दे देता है । दूसरा तत्व है सम्याद । सम्वाद वा प्रत्यक्ष रूप उत्तर प्रत्युतर का न होन पर भी छ द म ही गोपी और उद्धव र वातालाप की झाकी पाठक को मिल जाती है । गोपियाँ अपनी वात जिम शैली से कहती है उसम सम्वाद या क्याप कथन का पुट बना रहता है जो प्रबध वाव्य का एक तत्व है। तीसरा तत्व है विचार जो सगुण निगण विवचन मे उभरता है । विचारतत्व मुक्तक म भी रहता है किंतु प्रत्यक् छद में विचार गुम्फित हाकर जगले छद को योजना में भी बना रह तो प्रवधात्मक्ता का समावेश हा जाता है। उद्धव शतक में का पूर्ण निर्वाह हान व साय इन तीनो तत्वो का समावश उस प्रबध मुक्तक की कोटि मे स्थान दिला देता है। कुछ समीक्षका ने उद्धव शतक को उपालभ काव्य लिखा है । वास्तव म उपा लभ काव्य रूप नहीं है। यह तो वयन शली है । उद्धव शतक म जाद्योपात उपा लभ नहीं है । यत्र-ता कुछ प्रसगो म गापियां कृष्ण के प्रति उपालभ वी भाषा मुक्तक परम्परा उद्धव शतक - - का प्रयोग करती है । उपालभ मे बुब्जा की चचा भी कर देती है । यह सब उपा लभ की कथन शैली मात्र है। इसे काव्य रूप ठहराना असगत और अनुचित है । किमी भी शास्त्र में उपालभ को काव्य रूप या काव्य विधा नहीं माना गया है। अत उद्धव शतक को उपानभ वाध्य कहना शास्त्र सम्मत नहीं है। यह भी ध्यातव्य है कि उद्धव शतक म भ्रमर मधुकर, मधुप आदि शब्दों का प्रयाग गोपियां नही परती, वे सीधा उपालभ दती है। मधुप शब्द का प्रयोग केवल एक बार हुआ है। उद्धव शतक ये ११७ छदो मे कवि ने मुख्यत वृष्ण गोपी विरह को उद्धव के द्वारा व्यजित किया है। उद्धव दूत है, कृष्ण के सदेशवाहक है किन्तु उनका अपना भी दशन है जा ज्ञान और योग से प्रेरित है। उसका आधार निगुण ब्रह्म की उपासना है । अपनी निगणोपासना को सतक, सप्रमाण प्रस्तुत करन म उद्धव ने कोई कमी नहीं की है । यह स्थापना क्थ्य की दृष्टि से प्रबध का ताना याना बुनती है गोपिया सगुणोपासक है। उनके पास भी अपना क्थ्य है जा व प्रमाण की भित्ती पर सुदृढ है, फलत दोना के वीच सवाद या वाद विवाद की सप्टि हो जाती है। इसलिए उद्धव शतक शुद्ध मुक्तक नहीं रह पाता। उसका आधार उप जीय भागवत पुराण का एक सदभ हो जाता है जो न तो पूण प्रबध भाब्य है और न खडबाय । अत मुक्तक काव्य म ही प्रबध सदभ का समाहार करके कविवर रत्नाकर ने उद्धव शतक की रचना की है। छद विधान छद की समानता भी उद्धव शतक मे बनी रही है । घनाक्षरी (कवित्त छद) म ही उद्धव-शतक लिखा गया है । यह छद शृगार और वीर दो रसो म प्राय प्रयुक्त होता रहा है। यह वर्णिक वृत्त है इसमे १६ और१५ पर विराम देते हुए ३१ वण लिखे जाते हैं, कवित्त छद म गति पर कवि को विशेष ध्यान देना होता है । गति और लय दोना को दृष्टि म रखकर जब कवित्त की रचना की जाती है तो कवित्त सुपाठय बनता है। रीतिकालीन कविया ने कवित्त छद को खूब परिमार्जित किया था। दव, मतिराम, घनान द, ठाकुर और पद्माकर कवित्त लिखने मे सफल हुए है । रीतिकाल के बाद सवश्रेष्ठ कवित्त छद की रचना रत्नाकर जी ने ही की है। उद्धव शतक इन मुदर कवित्तो का अप्रतिम उदाहरण हैं । रत्नाकर जी ने गति, यति लय और वण चयन की साधना की थी। उनके छद सरल शैली म, प्राजल भापा म शब्द चयन की चारुता में और पदबंध के सौष्ठव में अनूठे है । रलाकर जो के बाद किसी अय कवि ने घनाक्षरी कवित्त का ऐसा मनाहारी प्रयोग नहीं किया । रलावर जी ने इस छन्द का अमरत्व प्रदान किया है। ०० उद्धव शतक मे काव्य रूप १७ १० उद्धव-शतक मे अलकार-योजना काव्य का अलकृत करने वाल उपादान के रूप मे जिन तत्वा की गणना की जाती है उनम अलकारो का विशेष स्थान है । जलवार का सस्कृत काव्य-शास्त्र म महत्वपूर्ण स्थान मिलन से एक सम्प्रदाय ही 'अलकार सम्प्रदाय बन गया जिसम भामह, दडी, वामन और स्टेट नामक चार आचार्यों का प्रमुख स्थान है । शब्द और अथ के वचिव को अलवार मानन वाल आचाय भामह ने इस सम्प्रदाय को सर्वोपरि माना है । दडी पे मत म काय को सोदय प्रदान करन वाले घम ही अलकार है । वामन के मत मे अलकार द्वारा ही काव्य ग्राह्य होता है और सौदय ही जलकार है । द्रट भी क्थन के प्रकार विशेप को अलवार मानत है । अलकार के इस महत्व का हिदी के कुछ रीतिकालीन कविया न भी यथावत स्वीकार दिया है। आधुनिक युग य समीक्षक जाचाय रामचद्र शुक्ल ने अलकार की परिभापा इस प्रकार दी है 'भावा वा उत्क्प दिखान और वस्तुआ के रूप गुण और क्रिया वा अधिक तीन जनुभव करान म कभी कभी सहायक होन वाली युक्ति जलकार है। वास्तव म जलवार बाह्य एव जाभ्य तर शाभा विधायक काव्य तत्व है जिसवे दा मुस्य भद है, शब्दालकार तथा जलकार। उद्धव शतक म रत्नाकर जीन जलकार का प्रयोग काव्य भापा का उत्लप सिद्ध करन और भावा की तीव्रता के लिए ही किया है। रीतिकालीन कविया की भाति अलकारो का ऊपर स लादा नहीं गया है । जयन्व की भाति रत्नाकर जी अलकार का काय का नित्यधम नहीं मानत । आचाय मम्मट की भांति रस भाव आदि क उत्क्प के लिए अलकारा का अपने काव्य म प्रयाग किया है । शब्दा लार तथा जलकार दानो प्रकार के मुदर अलकार उद्धव शत म प्रचुर मात्रा मे उपलब्ध हात है। शदालवारा म अनुप्रास तो रत्नाकर जा की रचनाआ म जनायास नसगिक भाषा के रूप म समाया रहता है । विना किसी आयास के अनुप्राग का प्रवाह इनका स्वभाव है । अनुप्रास व लिए कोश कामधान बरना और शदा का चयन करना रत्नाकर जी के स्वभाव म नहीं है । सिद्ध कवि रूप ५८ उद्धव शतक k मे अनुप्रास पूर्ण शब्द उसकी रचना मे स्वत दोडे चले जात है । वाणी उनी वश मे होकर उनके पीछे चलती है, भाषा उनकी वशतिनी होकर वाव्य मे स्थान पाती है । अनुप्रास, यमक, श्लप, वीप्सा, पुनरुक्तिपकाश आदि अलवार उद्धव शतक म प्रचुर मात्रा म मिलत है- उद्धव शतक का मगलाचरण का पद अलवार प्रयोग की दृष्टि स बहुत महत्वपूर्ण है । इम पद म श दातकार और अर्यालवार दोनो का कवि ने प्रयाग किया है । कवित्त के प्रथम चरण म अनुप्रास की छटा जासों जाति विषय विषाद को विधाई नए चोप चिकनाई चित्त पार गहि वो + + जयति जसो मति क लाडिले गुपाल, जन रावरी कृपा सौ सा सनेह पेंहियो पर इसी पद म सनेह शब्द मे श्लेष भी स्पष्टत लक्षित किया जा सकता नुप्रास और बत्यनुप्रास तो पूर पदम अनुस्यूत है। दूसरे पद म भी इसी प्रकार अनुप्रास और यमक की छटा है । स्मरण नामक अर्थालकार भी है। "हात जमुना मे जल जात एक दस्या जात जाको अध अरध अधिक मुरझायो है। कहै रत्नाकर उहि गहि स्याम ताहि वास वासना सौ नै नासिक लगायो है। यदि उद्धव शतक के समस्त पदो पर अनुप्रास, श्लप, यमन, वीप्सा मादि शब्दाल बारा की दृष्टि म विचार किया जाय तो इन जलकारा का कोई न कोई रूप प्राय प्रत्यक पद म लक्षित किया 1 सकता है। निम्नलिखित कवित्त म अनप्राम को छटा द्रष्टव्य है। कोऊ धल कापि सग कोऊ उर चापि चले कोऊ चले क्षुक अलापि हरबल मे। कहै रतनाकर सुदेश तजि कोऊ चल कोऊ चले कहत सदस अविरल स। आस चल पाहू के सुकाहू दे उसास चल वाहू के हिये पंचद हास चल हल से । ऊधव के चलत चला चल चलो यो चल अचल चल औ अचल हू भय चल से ।। रत्नाकर जी का प्रिय अर्यालकार साग पक है। यो तो स्पर के सभी भेद इस काव्य में मिलते है वितु साग स्पका की छटा कवि की कल्पना शक्ति का प्रमाण प्रस्तुत करती है। कृष्ण अपनी व्यथा का वणन करते हुए उद्धव स कहत है कि उद्धव शतक म अलवार-योजना ५६ परम धार धिमटी मेर मा म वाली मरम्मति दिरा गर जसो यती रासी। योट पो परारया सागापा ग सखार जो ग प्रकार प्रस्तुत पिया है। योटा निवासा ये लिए गिटी माम म आती है, यह गाह पा भिमटी याया है। आय या दूध लगाार पोटासिमाला जाता है यहा पहा अर-दूध है। चलन पारपो भारिपाटिनि विगारमो सक दायि-गनि हार यो पा टारपो टगरत है। गहोली यमुनय-दयपी पी मिली ? सो मा गराक्त है। ढा 7 या हाप विपने उपाय सय धीर जार और हूँ | धार घसरत है। उधो पापाग पिलानि पा ध्यान धामो निशि दिन पार्ट को परेजो पाया है। इस विस म 34 भी है, यमय भी व्यक्तिरन भी है अनुप्रास और परमत्रो तो रत्नाकर जी की वाणी यी शामा है। इस प्रकार यह श्रेष्ठ मग म्पन है। इम म्पद म ग्रजसस्कृति की सना यांटा निवाउन की क्रिया में है। ग्वाल-चाल जगल म घूमत हुए कांटा लगन पर इसी प्रिया पा उपयोग करत है। इसी प्रकार साग म्पप या दूगरा मुदर उदाहरण है जिसम श्रीकृष्ण " राधा के मुग्रवद्र या ध्यान आत ही उनके हृदय म प्रेम या समुद्र उमडन लगता है झज्ञावात उठ पहा होता है और विचार स्पीयवट परिश्रम पर हार जाता है। वेक्ट विचार को विचारी पचिहारि जात हात गुनपाल सतवाल नभगत है। करत गभीर धीर लगर न वाम पडू मा को जहाज डगि डूबन लगत है। एक ही पत म अनव जलारा की छटा ता रत्नाकर जी की शलीमा प्रसाधन है । यदि एस वविन सकलित क्यि जाएँ तो तीन दजन से अधिक हाग ।एक पद नीचे दे रहे है जिसम एप अलकार के साथ रूपर, दहरी दीपक, असगति और अनुप्रास एक साथ विद्यमान है सीलसनी सुरुचि सु वात चल पूरव की और औप उभगो दनि मिदुराने न । + नीरको प्रवाह काह नननि कतीर वह्यो धार वह्यो उधौ उर अचल रसाने त । (१२) साग रूपक की एक भय उदाहरण हत खेत माहि माद खाई सुद्ध स्वारथ की, प्रम तन गोपि राय्यौ ताप गमनौ नहीं' पद म है । यह हाथी का फ्साने की क्यिा 1. उद्धव शतक के साथ कृष्ण को ब्रजवासियो द्वारा अनुराग के जाल मे फसाने का वणन है। समस्त पद मे हाथी पक्डने वी "पिया भी है और वृष्ण पेम का भी वर्णन है। इसी पद में अनुप्रास की छटा भी देखी जा सकती है। वारनि कितेक तुम्ह बारन क्तेिव वर बारन उबारन ह्र वाम बनौ नहीं। साग म्पक, यमक, परिव राकुर और अनुप्रास का इस पद में अच्छा प्रयोग पवि ने दिया है। उद्धव शतक का चित्रोपम काव्य वहन वाले समीक्षक इस काव्य मे अनेक एसे स्थल देखत है जिनमें वस्तु या भाव को कवि ते शब्द के माध्यम से साक्षात मूत रूप देकर प्रस्तुत किया है। कृष्ण की विरह-व्यथा को कवि ने यह कहकर मूत किया है--'विरह विथा की कथा अक्थ अथाहमही-और प्रेम पर यो चपल चुचाइ पुतरीन सौ' नादि द्वारा जो चित्र खडा किया है वह अदभुत है । यह चिनोपम नो शब्द साधना द्वारा ही सभव हो सकती है। पुनरुक्ति, वीप्सा, यमक और श्लेष के ता बीसिया सुदर उदाहरण उद्धव शतक में भरे पडे है । विरोधाभास काव्यलिंग स्मरण, विपम, दण्टा त, लोकक्ति, परिक्राकुर, उत्प्रेक्षा, उपमा जादि अनेक अलकारो का भडार है उद्धव शतक । यदि उद्धव शतक के प्रत्येक वित्त मे अलवार का अनुसधान किया जाय ता को भी वित्त ऐसा नहीं मिलगा जिमम शब्गलकार अथवा अथालार वा सो दय लक्षित न किया जा सके। शदातकार की योजना म वण मनी और शब्द मत्री पर भी रत्नाकर जी ने पूरा ध्यान रखा है । एक-एक वण जोर शब्द TT तौल कर उसके साथ मेल रयने वाला उमी वजन का वणन या शब्द रखना रतावर जी की शब्द-योजना का चमत्कार है । उदाहरणाथ-- पाचा तत्व माहि एक तत्व ही मी सत्ता सत्य या ही तत्व नान को महत्व स्तुति गायो है । इसी प्रकार दूसरा उदाहरण है- कहै रत्नावर न आए मुख बन नन नीर भरि ल्याए भए मयुधि सिहाने से। सूखे से स्रमे से सकवके से थके भूले से भ्रमे से भभरे से भक्वाने से। सक्षेप में उद्धव शतव ा अनुशीलन इस तथ्य को सप्रमाण सिद्ध करता है कि रत्नावर जो की अप्रस्तुत योजना बाहर से लादी हुई वृतिम अलकार योजना नहीं है। उनकी अप्रस्तुत योजना भाव और भाषा के साथ तालमेल रखती हुई स्वत स्फूत योजना है जो उनके काव्य यो चमत्वारपूण और गुजिपूण वनान म उद्धव-शतव ने अलकार योजना सफल है। रीतिकाल के तीन चार कवि ही ऐसे है जो रत्नाकर जी की अलका योजना के माय एक श्रेणी मे रखे जा सकते है । यदि पद मंत्री के लिए, लोरोक्ति और मुहावरे के लिए इनकी कविता पर ध्यान दिया जाय तो आश्चय होता है कि रत्नाकर जी ने कितने महज रूप म लोकोक्तियो को अपने काव्य म स्थान दे दिया है। ठिन साले परे लाले परे प्रान के। छार हगइ धौं विरहानल की झार मे। + ज्ञान गयो लहित गुमान गिरि गाठी त । + नानी बहू राधे आधे कानि मुनि पावै ना। + जहै तीन-तेरह तिहारी तीन-पांच है। + + आपु वह उनके गुरु है विधौ चला है। + पारी वाह तरनी हमारी मझधार ले। + + लौटि-कोटि यातयो बवडर बनावत पयो । T उधौ वहिब को बम यात रहि जायगी। + पात यो मिठाई में लुनाई ल्याइ त्याए हैं । ऊधौ हाय हमको बयार भषिको कही। यदि मुहावरे और नोक्निया का मक्लन पिया जाय तो लगभग चालीस तक की मध्या में उपलब्ध हैं। अप्रस्तुत याना के मदभ म रत्नाकर जी की बहुनता की चर्चा कराा भी हम आवश्यक ममहत हैं। नेप, यमन विभावना, स्पातिशयोपित, असगति आदि अनवारोपाप्रयोग परत समय रत्नाकर जी ने अपन विविध विषयावे अमित शान पा भी उपयोग पिया है । रत्नापर जो दशनशास्त्र, आयुवेत शास्त्र गणित-ग्यातिपशास्त्र, योगाशन, तथा विमान अपनी वविता म स्थान देवर अपनी बह गता या अरछा परिचय दिया है। तब आयुर्वेद म पिम ज्वर की चिकित्सा के लिए मुदशन चूण का प्रयोग लाभप्रद माना जाता है। उद्धव शतव के कवित्त सख्या ३४ म इम ज्वर का वणन गोपिया के विरह प्रसग म कवि न दिया है और श्लेप द्वारा इमका वणन है। गोपिया वहती है कि हम तो वियोग रूपी विपम स्वर से पीडित हैं, हम मुदशन (श्रीकृष्ण दशन) चाहिए । मालूम नही यह क्सि रोग की दवाई हमारे लिए भेजी है । वैद्यक मे पारे का भस्म तैयार करने का विधान है। रत्नाकर जी ने इस प्रक्रिया का भी कवित मस्या १०१ म वणन किया है। प्रेम रसायन बनाने की विधि वैद्यक शास्त्रानुसार ही है । यह पूरा मदभ वैद्यर की प्रक्रिया से जुडा । रविन सख्या १०४ म इसका पूरा वणन है। वेदा त दशन के तो कई उदाहरण उद्धव शतक मे हैं। उद्धव स्वय वदान्ती निगु ण मार्गी भक्त थे अत उसके सिद्धात प्रतिपादन म उन्हान इस शास्त्र का पूरा समर्थन किया है । इसी प्रकार विज्ञान के भी सिद्धातो का यत्र-तत्र वणन है । दपण म देखते समय जब स्थान की दूरी होती जाती है तब एसा प्रतीत होता है कि मूर्ति भुपुर म धस गई है। यह विज्ञान वार्ता उद्धव शतर म उपलब्ध है ज्यो-ज्यो बमे जात दूरि दरि प्रिय प्रान रि। त्यो त्यो धसे जात भन मुवुर हमारे में। संक्षेप मे, रत्नावर जी का जिन विषयो की अच्छी जानकारी थी उनका उहोने अपनी रचनाआ मे सफेत अवश्य दिया है। द्विवेदी युगीन काव्यधारा को समीक्षका न इतिपत्तात्मक ठहराया है, अर्थात उस समय की पविता धारा सपाट वयानी और यथातथ्य वणन से ऊपर नही उठ सकी थी रितु रत्नाकर जी उसी युग में इन दोनो स्थितिया से ऊपर थे। रत्नाकर जी के काव्य को इतिवतात्मक काय नहीं कहा जा मक्ता । वह वाव्य की 'प्टि में भक्तिकालीन तथा शैली शिल्प की दष्टि मे रीतिगालीन काव्य के अधिक समीप है। द्विवदी युग की नैतिकता और आदशवादिता का उसमें कोई आग्रह नही है। उद्धव शतक इसीलिए प्रौढ शिल्प का पचिय देन वाली श्रेष्ठ काव्यकृति है। ००० उद्धव शतक मे अलकार-योजना ११ आधुनिक युग मे उद्धव-श तक की प्रासगिकता आधुनिक युग मे प्रत्येप परम्परावादी रचना के विषय मे यह प्रश्न प्राय उठाया जाता है कि युगवाध की दष्टि मे उद्धव-शतक जसो पोगणिय पथावस्तु मूलर रचना को क्या उपयोगिता है । क्या उद्धव शतक का शिल्प-मौष्ठव ही इस कृति को जीवित रखने और ग्रहण करने के लिए पर्याप्त है अथवा इस रचना में ऐसे भी तत्व हैं इम वैज्ञानिक युग मे इस काव्य को मानर-सवेदना के स्तर पर ग्राहा बनाते है ? यह प्रश्न भक्तिकालीन सूरदास, मीरा, न ददास, रसखान तथा रीति काल के देव बिहारी, मतिराम, धनान द, पद्माकर आदि कवियो की रचनाओ के विषय मे भी पूछा जा सकता है। वस्तुत कालजयी कृति के सदभ मे जब यह प्रश्न उठता है तो वह कवि की समग्र रचनामिता को स्वीकार कर ही उठता हैं । यदि यह प्रश्न सूरदास की रचनाओ को लेकर पूछा जाय तो लोकरजक पक्षा का आग्रह रखो वाले समीक्षक यही उत्तर देंगे कि भक्ति की सीमा मे रहते हुए कवि ने जो भाव प्रकट क्यि है शे किसी एक कालावधि तक ही सीमित नहीं है । सूर की भक्ति शाश्वत धम से सम्पक्त है । जर्थात सूर ने अपने आराध्य श्रीकृष्ण की भवित के लिए जो पद लिये है वे आज में पाच सौ वष पहले यदि भक्ति को भगवान के सामीप्य का लाभ पहुचाने मे समथ थे ता वे पद जाज भी भक्त को उसी मनोभूमि म ले जाने मे समथ है । सूर की प्रासगिक्ता केवल भक्ति भावना का वातावरण बनाने मे नही है वरन वह चचल मनोवत्तियो के परिष्कार में भी योग देने वाला साधन है जत वह आज भी प्रासगिक है। मीरा और रसखान की कविता के विषय म भी यही तक प्रस्तुत किया जा सकता है। उद्धव शतब पी क्यावस्तु के विषय म भी यह तर दिया जा सरता है। उद्धव शतक की कथावस्तु का तरग तत्व भक्ति ही है। भक्ति विषय सगुण निगु ण विवाद की भूमि पर यह कृति खडी है । यदि निगुण भक्ति का प्रत्या प्यान अभीष्ट माना जयि तो इस कृति वी साथरता सगुण भक्ति के प्रतिपादन म स्पष्टत स्वावाय हागी । भक्ति-सीमासा आज के युग में सत्रया समाप्त हा गई है उद्धव शतक एसा नहीं कहा जा सकता । सगुण भक्ति को स्वीकार करने वाले भक्त गण के लिए उद्धव शतक की कथावस्तु आज भी बहुत प्रासगिक मानी जायगी। गोपियो के तक वितक, खडन मडन आदि क्वल मनोविनोद के विषय न होकर एक वस्तु सत्य के समथक है । ईश्वर भक्ति म आस्था न रखने वाले व्यक्ति को यह सब व्यथ का झमेला प्रतीत होगा और वह इस कृति का आधुनिक सदभ म अप्रासगिक ठहरा देगा किन्तु इस काव्य कृति का एक दूसरा पहलू भी है जो मानव मात्र के साथ जुडा हुआ है। प्रेम एक रागात्मिका वत्ति है । प्रेम मे मनुष्य को अपनी चित्त वत्ति के लिए रजक एव आह्लाद भाव वस्तु प्राप्त होती है । उद्धव शतक म इसी रागात्मिका प्रेम भावना का वर्णन । गोपिया श्रीकृष्ण से प्रेम परती है, श्रीकृष्ण भी उनके प्रेम से जाकृष्ट होकर उनका स्मरण करते है। दोना ओर पेम की तीव्रता है। इस प्रेम की तीव्रता की रत्नाकर जी ने उद्धव-शतक म पूरे विस्तार से वर्णित किया ह। प्रेम के दोनो पक्ष-सयोग और वियोग -इस कृति मे उभर है। सयोगावस्था या म्मरण है और वियोगावस्था की तीतानुभूति का विस्तत वणन । आज के मदभ मे मानव को प्रेमानुभूति से रहित नही माना जा सकता । प्रेम के आलम्बन उद्दीपन और सचारी उद्धव-शतव में पूरे आयाम म चित्रित किए गए हैं। जा इमकी प्रासगिक्ता को स्वीकार करना होगा। प्रेम, शृगार और राग आज भी प्रासगिक है। भक्ति और प्रेम शृगार के अतिरिक्त उद्धव-शतव की भाषा और अभि- व्यजना को भी प्रामगिकता के निरप पर परखना आवश्यक है। कहा जाता है कि उद्धव-शतव ब्रजभापा की रचना है। यह भाषा जाधुनिक युग की भाषा नही है । अत इसे भाषा के स्तर पर प्रासगिक नहीं कहा जा सकता। किंतु भाषा और अभिव्यजना का प्रश्न कृति की प्रासगिकता मे कोई सरोशर नहीं रखता । यदि भाषा के स्तर पर ही प्रासगिाता का निणय भोप्ट हो तो सस्कृत के वाल्मीकि व्यास, कालिदास, भवभूति, बाणभट्ट आदि सभी पालजयी महावि अप्रासगिक हो जाएगे। कितु किसी भी समीक्षक न इन कविया को जपामगिक नहीं रहा है। भक्ति और रीतिकाल के कवियो की भाषा भी ब्रज और अवधी है वितु वे भाषा के कारण अप्रासगिव नहीं है। प्राकृत और अपभ्र श के कवि भी भाषा के वारण अप्रासगिव नही कहे जा सकत। प्रासगिता की परीक्षा भाव और विचार के निरप पर ही होती है। भापा तो विचारो का वाहन मात्र है। वाहन का महत्व अवश्य है किन्तु वाहन भाव और विचार से उपर नहीं होता । अपढ कवि के पास यदि भाव और विचार सम्पदा है तो वह महृदय की नेता म लहर उत्सन रन में समय होता है। रत्नाार जी ने भाषा का एक अभिशात म्प प्रस्तुत किया तथा भावाने आधुनिक युग म उदव गतर वी प्रासगिरता उदात्तीकरण के लिए एक पौराणिक क्याश मा प्रयोग किया। वह यथाश एक दाशनिक मनवाद (सगुण भक्ति) से जुडा हान के साय भक्ति मीमासा का भी एक पक्ष उजागर करने वाला है। लत उसे आधुनिक युग म भी प्रासगिक माना जाना चाहिए। मध्ययुगीन भक्ति-काव्य का भी इसी स्तर पर मूल्यापन दिया जाता है और उस युग विशेष की देन न मानार मानाय सवेदना का शाश्वत रूप माना जाता है। मनुष्य की चिनत्ति चचल हाती है। स्थिरता का अभाव उम एक स्थान पर टिक्ने नहीं दता । गोपिया इसका अपवाद है उनकी चित्त वत्ति पूर्णतया श्रीकृष्ण म डूबी हुई है । स्थिर चित्त स वे येवल वृष्ण का ही ध्यान करती है । उही को अपना जाराध्य मानती हैं। इस प्रकार यह मुक्तक काव्य भक्ति और प्रेम, तत्वो का सम वय करने वाला कालजयी का य है। इसकी प्रासगिक्ता इही दा तत्वा के साथ जुनी हुई है । जव तक मनुष्य भक्ति गरि प्रेम साथ अपना रागा- स्मक सम्बध रखेगा तब तक उद्धव-शतक भी अपनी प्रासगिक्ता का बनाए रखेगा। विनान ने भौतिवता को प्रप्रय दिया है, भावुक्ता को अस्वीकार किया है पितु मनुष्य की मूल वत्तियो को जभी वह नष्ट नहीं कर सका है। जब तक मनुष्य अपनी मूल वृत्तिया में सम्पक्त रहेगा तव तव उद्धव-शतक जैसी रचनाएँ अपना प्रभाव समाज पर डालतो रहेगी, और व अप्रामगिक नहीं होगी। । - शाश्वत ००० उद्धय-शतव उन्द्वव-शतक
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॥ओ॥
थीगणशाय नम
मगलाचरण
जासों जाति विषय विषय की विवाई वेगि
चोप-चिकनाई चित्त चारु गहिबौ करें।
कहै रतनाकर कवित्त-बर-व्यजन मैं
जासौ स्वाद सौगुनी रुचिर रहिवो करै ।।
जासौ जोति जागति अनूप मन-मदिर मैं
जडता - विषम-तम-तोम - दहिबी करें।
जयति जसोमति के लाडिले गुपाल, जन
रावरी कृपा सो सो सनेह लहिबी कर।।
उद्धव शतक
श्री उद्धव को मथुरा से ब्रज भेते समय के कवित्त न्हात जमुना में जलजात एक देख्यौ जात जाको अव-ऊरध अधिक मुरझायौ है । कहै रतनाकर उमहि गहि स्याम ताहि वास-वासना सो नैकु नासिका लगायो है ।। त्यो ही कछु घूमि झूमि वेसुध भए के हाय पाय परे उखरि अभाय मुख छायो है। पाए घरी द्वैक मैं जगाइ ल्याइ ऊधौ तीर राधा-नाम कीर जब औचक सुनायौ है ।। पग आए भुज-बध दए ऊधव-सखा के कध डग-मग पाय धरत धराए है। कहै रतनाकर न बूझ कछु बोलत औ योलत न नैन हू अचैन चित छाए हैं। पाइ बहे कज मैं सुगच राधिका को मजु ध्याए कदली बन मतग लौ मताए है। काह गए जमुना नहान पं नए सिर सो नीक तहा नेह की नदी मैं न्हाइ आए हैं। ( ३ ) देखि दूरि ही ते दोरि पौरि लगि भेटि ल्याइ आसन दै सासनि समटि सकुचानि ते। कहै रतनावर यौं गुनन गुविंद लागे जौलो क्छु भूले से भ्रमे से अकुलानि ते ।। पहा हैं ऊधौ सौ कहैं हूँ तो कहा लो करें कैसे कह कह पुनि कोन सी उठानि ते । तौलों अधिकाई त उमगि कठ आइ भिचि नीर ह वहन लागी वात असियानि त । उद्धव-शतक
विरह-विथा की कथा अक्थ अथाह महा
कहत वन न जो प्रवीन सुकवीनि सा।
कहै रतनावर जुझावन लगे ज्या कान्ह
उधों का कह्न हेत व्रज-जुवतीनी सा ।।
गरि आयौ गरौ भभरि अचानक त्यौं
प्रेम पर्यो चपल चुचाइ पुतरीनि सौ।
नयु कही बैननि, अनेक कही नैननि सी,
रही-सही सोऊ कहि दीनी हिचकीनि सौ ।।
नद औ जसौमति के प्रेम-पगे पालन की
लाड-भरे लालन की लालच लगावती।
कहै रतनाकर सुधाकर-प्रभा सौ मही
मजु मृगननिनि के गुन-गन गावती ।।
जमुना पछारनि की रग-रस-रारनि की
विपिन-विहारनि की हौस हुमसावती।
सुधि ब्रज-बासिनि दियया-मुख रामिनि की
ऊगी नित हमको गुलाबन को आवती।
चलत न चार्यो भाति वोटिनि विचार्यो तऊ
दावि दापि हार्यो पै न टार्यो टसक्त है।
परम गहीली बसुदेव-देवकी की मिली
चाह चिमटी हूँ सा न खैची ससक्त है।
क्ढत न क्यो हूँ नि हाय विथके उपाय सबै
धीर आर छीर हूँ न धारं धसक्त है।
ऊधौ जज बास के लिसानि को ध्यान धंस्यौ
निसि दिन काटे लौ क्रेजो कसकत है ।।
उद्धव शतक
स्प रस पीवत अधात ना हुते जो तय
मोई अब स ह उवरि गिरिवी करें।
कहै रतनावर जुदात हुते देगे जिन्ह
याद किए तिनको अवा सो पिरिवी करें ।।
दिननि के फेर सो भयो है हेर फेर ऐसी
जाकी हेर फेरि हरिवोई हिरवी पर।
फिरत हुते जु जिन युजन मैं आठौ जाम
नैननि मैं अब सोई कुज फिरिवौ करें।
गोकुल की गैन गैल गैल गैल ग्वालिन की
गोरस के काज लाज बस के बहाइवो।
कहै रतनाकर रिमाइनौ नवेलिनि कौं
गाइवी औ नाचियो नचाइबौ ।।
कीवी महार मनुहार के विविध विधि
मोहिनी मृदुल मजु बासुरी बजाइबौ।
ऊधौ सुग्व सपति समाज ब्रज मडल के
भूल है न भूल भूलें हमको भुलाइयो ।।
मोर के पखौवनि को मुकुट छबीलो छोरि
क्रीट मनि मडित धराइ करिहै कहा।
कहै रतनावर त्यो माखन-सनेही बिनु
पट रस व्यजन चबाइ करिहै कहा ।।
गोपो ग्वाल बालनि को झौकि बिरहानल मैं
हरि सुर ब द की बलाइ करिहैं कहा।
प्यागै नाम गोविंद गुपाल को बिहाइ हाय
ठाकुर निलोक के कहाइ करिहैं कहा।
७२
उद्धव शतक
(१०)
कहत गुपाल माल मजु मनि पुजनि की
गुजनि की माल की मिसाल छवि छावै ना।
कहै रतनाकर रतन-मै किरीट अच्छ
मोर पच्छ-अच्छ-अच्छ असदू सु भावे ना॥
जसुमति मया की मलेया अरु माखन को
काम धेनु गोरस हूँ गूढ गुन पावं ना।
गोकुल की रज के कनूका और तिनूका सम
सपति निलोक की विलोकन मैं आवै ना।।
(११)
राधा-मुख मजुल-सुधाकर के ध्यान ही सौ
प्रेम रतनाकर हियै यो उमगत है।
त्यो ही विरहातप प्रचड सौ उमडि अति
ऊरध उसास को झकोर यो जगत है।
केवट विचार को विचारी पचि हारि जात
होत गुन पाल ततकाल नभ गत है।
करत गभीर धीर लगर न काज कछू
मन को जहाज डगि डूबन लगत है।
(१२)
सील-सनी सुरुचि सु वात चल पूरव की
और ओप उमगी दृगनि मिदुराने त ।
कहै रतनाकर अचानक चमक उठी
उर घनश्याम के अधीर अकलाने ते॥
असाछन दुरदिन दीस्यो सुरपुर मोहिं
व्रज मे सुदिन वारि बूद हरियाने ते।
नीर को प्रवाह कान्ह-नैननि के तीर बह्यो
धीर बह्यो ऊधौ-उर अचल रसाने ते ।।
उद्धव शतव
(१३)
प्रेम भरी कातरता काह की प्रगट होत
ऊधव अवाई रहे ज्ञान ध्यान सरके।
कहै रतनाकर बरा को वीर धूरि भयो
भूरि भोति भारनि फनिंद फन रखे।
सुर सुर राज
सुद्व स्वारय मुभाव मने
ससय ममाए वाए धाम विधि हर के ।
आई फिरि ओप ठाम ठाम ब्रज गामनि के
विहिनि बामनि पे नाम अग फरवे॥
(१४ )
हेत पेत माहि खोदि खाई सुद्धम्वारय की
प्रेम तन गोपि राग्यो ताप गमनौ नहीं।
करनी प्रतीत काज करनी वनावट की
राखौ ताहि हेरि हियँ हौसनि सनी नहीं।
धात में लगे है ये विसामी जबासी सबै
इनके अनोखे छल छदनि छनो नहीं।
गारनि कितेव तुम्हे वारन वितेक करै
वारन उवारन हबारन बनौ नही ।।
( १५ )
पाचौ तत्त्व माहि एक सत्व ही को सत्ता सत्य
याही तत्त्व-ज्ञान को महत्त्व स्र ति गायौ है ।
तुम तौ विवेक रतनाकर कही क्यो पुनि
भेद पञ्चभौतिक के रूप मैं रचायौ है ।।
गोपिनि में, आप में, वियोग और सजोग हूँ मैं
एक भाव चाहिए सचोप ठहरायो है।
आपु ही सौ आपुको मिलाप और विछोह कहा
मोह यह मिथ्या सुख दुस सब ठायौ है ।।
७४
उद्धव शतक
दिपत दिवाकर को दीपक दिखाव कहा
तुमसम ज्ञान पहा जानि कहिबी कर।
कहै रतनावर पे लौकिक लगान मानि
मरम अलोपिक की थाह यहिवी करै ।।
असत असार या पसार मै हमारी जान
जन भरमाए सदा ऐस रहिवौ कर ।
जागत औ पागत अनेर परपचनि मैं
जैस सपने में अपन को लहिबी कर ।।
( १५ )
हा ।। इह रोकन को टोक न लगायौ तुम
विसद विवेक ज्ञान गौरव दुलारे ह्र।
प्रेम-रतनाकर कहत इमि ऊवव सौ
थरि करेजी थामि परम दुखारे है।
सीतल करत नैक हीतल हमारी परि
विषम वियोग ताप समन पुचारे ह्र।
गोपिनि के नैन नीर यान नलिका है धाइ
दृगनि हमारे आइ छूटत फुहारे है।
( १८ )
प्रेम नेम निफल निवारि उर अतर त
ब्रह्म ज्ञान आनद निवान भरि लैहैं हम ।
कहै रतनाकर सुवाकर मुखीन ध्याव
आँसुनि सौ घोइ जोति जोई जरि लैहे हम ।।
आवो एक वार धारि गाकुल-गली की धूरि
तब इहिं नीति को प्रतीति धरि लहै हम ।
मन सौ, करेजे सौ, सवन सिर-आखिनि सौ
अचव तिहारी सीख भीस करि लैहैं हम ।।
उद्धव शत
.
(१६)
बात चलै जिनकी उडात धीर धूरि भयो
ऊधो मय फूकन चले हैं तिन्हें ज्ञानी हूं।
कहै रतनाकर गुपाल के हिये मैं उठी
हूक मूक भायनि की अवह कहानी ह्र ।।
गहवर कड ह न कढन सदेश पायौ
नैन मग तोलौं आनि वैन अगवानी ह।
प्राकृत प्रभाव सौ पलट मनमानी पाइ
पानी आज सकल सवार्यो काज वानी ह।
(२०)
ऊवव के चलत गुपाल उर माहि चल
आतुरी मची सो पर कहि न कबीनि सौं।
कहै रतनाकर हियौ हूँ चलिवै को सग
लाख अभिलाप ले उमहि विकलौनि सौं ।
आनि हिचकी ह गरे बीच सक्स्योई पर
स्वेद हू रस्यौई परै रोम झझरीनि सौ।
आनन दुवार ते उसाँस ह बढयौई परै
आस ह्र कढयौई परै नैन खिरकीनि सौ ॥
०००
उदव शतक
श्री उद्धव के मथुरा से ब्रज जाते समय के मार्ग के कवित्त । (२१) आइ बज-पथ रथ ऊधौ को चढाइ कान्ह अकथ कथानि की व्यथा सौं अकुलात हैं । कहै रतनावर बुझाइ कछु रोक पाय पुनि कछु ध्याइ उर धाइ उरझात हैं। रससि उसासनि सौ वहि-बहि आँसनि सौं भूरि भरे हिय के हुलास न उरात है। सीरे तपे विविध सँदेसनि सो वातनि की धातनि की झो क मै लगेई चले जात हैं। ( २२) लै के उपदेस-औ-संदेस पन ऊधौ चले सुजस-कमाइ उछाह-उदगार में। कहै रतनाकर निहारि कान्ह कातर पै आतुर भए यो रह्यो मन न सभार मैं'। ज्ञान-गठरी की गाठि छरिक न जान्यौ कब हरे-हरे पूजी सव सरकि कछार में। डार मैं तमालनि की क्छु विरमानी अरु कछु अरुझानी है करीरनि के झार में ॥ (२३) हरे-हरै ज्ञान के गुमान घटि जानि लगे जोग के विधान ध्यान हूँ ते टरिब लगे। नैननि मैं नीर रोम सकल शरीर छ्यौ प्रेम-अदभुत सुख सूझि परिब लगे। गोकुल के गाव की गली में पग पारत ही भूमि क प्रभाव भाव और भरिव लगे। ज्ञान मारतड के सुखाए मनु मानस को सरस सुहाये घनश्याम करिब लगे। उद्धव शतन
श्री उद्धव के ब्रज मे पहुचने के समय के कवित्त
( २४)
दुख सुख ग्रीपम और सिसिर न व्याप जिन्ह
छापं छाप एवं हिय ब्रह्म ज्ञान-माने में।
कहैं रतनाकर गभीर सोई ऊव को
पीर उघरायो आनि ज के सिवान मैं ॥
और मुस रग भयो सिथिलित अग भयो
बंन दवि दग भयो गर गरवाने में।
पुलकि पसीजि पास चापि मुरझाने पापि
जाने कौन वहति यारि बरसाने मैं ।।
(२५)
धाई धाम धाम ते अवाई सुनि ऊधव की
वाम घाम लाख अभिलापनि सो भ्वं रही।
कहै रतनाकर 4 विकल विलोरि ति है
सकत करेजो थामि आपुनपी रवै रही।
लेखि निज भाग लेख रेप नित आनन की
जानन की ताहि आतुरी सौ मन म्वं रही।
आँस रोकि सास रोपि पूछन हुलाम रोकि
मूरति निरास बी सी आस भरी ज्वै रही।
(२६)
भेजे मनभावन के उद्धव के आवन की
सुधि व्रज गावनि में पावन जवै लगी।
कहै रतनाकर गुवालिनि की झौरि झौरि
दौरि-दौरि नद पौरि आवन तब लगी।
उझक्-िउझवि पद क्जनि ने पजनि4
पेखि पेचि पाती छाती छोहनि छवे लगी।
हमको निख्यो है कहा, हमको लिग्यो है कहा
हमका लिख्यौ है कहा कहन सबै लगी।
७८
उद्धव शतक
(२७)
देखि-देखि आतुरी विकल ब्रज-वारिन की
अधव की चातुरी सकल वहि जाति हैं।
कहै रतनाकर कुसल कहि पूछि रहे
अपर सनेस की न बाते कहि जाति है ।।
मौन रसना ह जागि जदपि जनायो सबै
तदपि निरास वासना न गहि जाति हैं।
माहस के क्छुक उमाहि पूछिये का ठाहि
चाहि उत गोपिका राहि रहि जाति है।
(२८)
दीन दशा देखि वज वालनि सी ऊश्व को
गरि गौ गुमान ज्ञान गौरव गुठाने से।
कहे रतनाकर न आए मुप बन नैन
नीर भरि ल्याए भए सवुचि मिहारो से।
स्खे से समे से मकवके से सो से थके
भूले से भ्रमे भभरे से भकुवाने से।
होले मे हले से हल हूले से हिये मैं हाय
हारे से हरे से रहे हेरत हिराने से ॥
(२९)
मोह-तम रासि नासिवे को स हुलास चले
क्कौ प्रवास पारि मति रति माती पर।
कहै रतनाकर पै सुधि उधिरानी सबै
धूरि परी वीर जोग-जुगति मघाती पर ।।
चलत विपम ताती बात ज वारिनि की
विपति महान परी प्रान घरी पाती पर।
लच्छ दुरे सकल विलोक्त अलच्छ रहे
एक हाथ पाती एक हाथ दिये छाती पर।।
उद्धव शतक
श्री उद्धव-वचन ब्रजवासियो से
(३०)
चाहत जो स्ववस संजोग स्याम-सुदर को
जोग के प्रयोग में हियो तो बिलस्यौ रहे।
कह रतनावर सु-अतर मुखी है ध्यान
मजु हिय यज-जगी जोति मैं वस्यो रहै ।।
ऐसे करौ लीन आतमा का परमात्मा मैं
जामें जड चेतन विलास विकम्यो रहै।
मोह-वस जोहत विछोह जिय जागौ छोहि
सो तौ सव अन्तर निरतर वस्यो रहै ।।
(३१)
पच तत्त्व मैं जो सच्चिदानद की सत्ता सो तो
हम तुम उनमें समान ही समोई है।
कहै रतनाकर विभूति पच भूत हू की
एक ही सी सकल पभूतनि मे पोई है।
माया के प्रपच ही सौ भासत प्रभेद सवै
काच फलकनि ज्यो अनेक एक सोई है।
देखौ भ्रम पटल उघारि ज्ञान आखिनि सौ
काह सब ही मे कान्ह ही में सब कोई है ।।
(२२)
सोई कान्ह सोई तुम सोई सबही है लखौ
घट घट-अतर अनन्त स्यामधन कौं।
कहै रतनाकर न भेद-भावना सौ भरौ
वारिधि औ बूद के विचारि विठुरन कौं ।
अविचल चाहत मिलाप तो विलाप त्यागि
जोग जुगती करि जुगावी ज्ञान धन कौं।
जीव आतमा कौ परमातमा मैं लीन करो
छीन करौ तन को न दीन करो मन को।।
CO
उद्भव शतक
सुनि सुनि ऊधव की अकह कहानी कान
कोऊ थहरानी, कोऊ थानहिं थिरानी है ।
कहै रतनाकर रिसानी, बररानी कोऊ,
कोऊ बिलखानी, विकलानी विथकानी है।
कोऊ सेद-सानी, कोऊ भरि दृग-पानी रही
कोऊ घूमि-धूमि परी भूमि मुरझानी है।
कोऊ स्याम-स्याम के बहपि बिललानी कोऊ
कोमल करेजी थामि सहमि सुखानी है।
०००
उद्धव-पातक
गोपी-वचन उद्वव-प्रति
(३४)
रस के प्रयोगनि के सुसद सु जोगनि के
जेते उपचार चार मजु सुम्वदाई हैं।
तिनके चलावन की चरचा चलावे कौन
देत ना सुदशन हूँ यौं सुधि सिराई हैं।
करत उपाय ना सुभाय लखि नारिनि को
भाय क्यो अनारिनि को भरत कन्हाई हैं।
ह्या तौ विषमज्वर-वियोग की चढाई यह
पाती कौन रोग की पठावत दवाई हैं ।
(३५)
ऊधौ कहौ सूधौ सौ सनेस पहिलै तो यह
प्यारे परदेश तै क्वै धौ पग पारिहैं ।
कहै रतनाकर तिहारी परि वातनि मैं
मीडि हम फवलौं क्रेजो मन मारिहैं ।
लाइ-नाइ पाती छाती कव लौं सिरहैं हाय
धरि-वरि ध्यान वीर कब लगि धारिहैं ।
वननि उचारिहै उराहनी क्वै धौ सर्व
स्याम को सलोनी रूप नैननि निहारिहैं ।
(३६)
पटरस न्यजन तो रञ्जन सदा ही कर
ऊधौ नवनीत हूँ स-प्रीति कहूँ पाव हैं ।
कहै रतनाकर विरद तो वखान सबै
साँची कही केते कहि लालन लडावे हैं।
रतन-सिंहासन विराजि पाक्सासन लौं
जग-चहुँ-पासनि तौ सासन चलावै हैं ।
जाइ जमुना-तट पै कोउ वट-छाहिं माहि
पाँसुरी उमाहि कवौ बासुरी बजावै हैं ।।
८२
उद्धव शतक
(३७)
कान्ह-दूत कंधौ ब्रह्म-दूत व पधारे आप
धारे प्रन फेरन को मति ब्रजवारी की।
कहै रतनाकर पंप्रीति रीति जानत ना
ठानत अनीति आनि नीति लै अनारी की।।
मान्यौ हम, कान्हब्रह्म एकही कह्यौ जो तुम
तौहूँ हमे भवति ना भावना अन्यारी की।
है पनि बिगरिन बारिधिता बारिधि की
बूदता विलहै ब्द विवस विचारी की।
(३८)
चोप करि चदन चढायौ जिन अगनि प
तिनपै बजाइ तूरि धूरि दरिवो कही ।
रस रतनाकर स नेह निरवार्यो जाहि
ता कच को हाय जटा जूट वरिवो कही ।।
चद अरविंद लौं सराह्यौ ब्रजचद जाहि
ता मुख को काकचञ्चवत करिवी कही।
छेदि-छेदि छाती छलनी के वैन-बाननि सौ
तामै पुनि ताइ धीर-नीर धरिबौ कही ।।
(३६)
चिंता मनि मजुल पवारि धूर धारनि मैं
काँच मन मुकुर सुधारि रखिबौ कही।
कहै रतनाकर वियोग-आगि सारन को
ऊधौ हाय हमकौं बयारि भखिबी कही ।।
रूप रस-हीन जाहि निपट निरूपि चुके
ताको रूप ध्याइवौ जो रस चखिवी कही।
एते बडे विस्व माहिं हेरै हूँ न पैये जाहि,
ताहि विकुटी मैं नैन मूदि लखिबौ कही ।
उद्धव शतक
८३
(४०)
आए ही सिखावन को जोग मथुराते तोपे
उचौ ये बियोग के वचन वतरावो ना।
कहै रतनावर दया करि दरस दीन्यो
दुख दरिवं की, तोप अधिक बढावी ना ।।
टूक टूक ह्व है मन मुकुर हमारौ हाय
चूकि हूँ कठोर बैन पाहन चलावी ना।
एक मनमोहन तो वसिके उजार्यो मोहिं
हिय मैं अनेक मनमोह वसावौ ना ॥
-
(४१)
चुप रहो ऊधौ सूधौ पथ मथुरा को गही
कही न कहानी जौ विविध कहि आए हौ।
कहै रतनाकर न बूझिहैं बुझाएँ हम
करत उपाय वृथा भारी भरमाएँ हो ।।
सरल स्वभाव मृदु जानि परौ ऊपर तै
पर उर घाव करि लौन सौ लगाए हो।
रावरी सुधारी मैं भरी है कुटिलाई कूटि
बात की मिठाई मैं लुनाई लाइ ल्याए हो।
(४२)
नेम प्रत सजम के पीजरें परे को जन
लाज-कुल-बानि प्रतिवहिं निवारि चुकी।
कौन गुन गौरव को लगर लगावं जव
सुधियुधिही का भारटेक परि टारि चुकी।
जोग रतनाकर मैं सास घूटि बूड कौन
ऊधौ हम मूधो यह वानक विचारि चुकी।
मुक्ति-मुक्ता को मोल माल ही कहा है जब
मोहन ललाप मन मानिव ही वारि चुयी।
उद्धवगता
ल्याए लादि वादि ही लगावन हमारे गरे
हम सब जानि कही सुजस कहानी ना।
कहै रतनाकर गुनाकर गुविंद हूँ के
गुननि अनत वैधि सिमिटि समानी ना ।।
हाथ बिन मोल हूँ विकी न मग हूँ मैं कहूँ
ताप वटमार-टोल लोल हूँ लुभानी ना।
केती मिली मुकति वधू वर के कूवर मैं
ऊरर भई जो मधुपुर में समानी ना ।।
(४४)
हम परतच्छ मैं प्रमान अनुमाने नाहिं
तुम भ्रम भौर में भले ही वहिवौ करो।
कहै रतनाकर गुविंद ध्यान धार हम
तुम मनमानौ ससा सिंग गहिवो करौ ।
देखति सो मानति हैं सूधौ यावजानति है
ऊधौ । तुम देखि हूँ अदेख रहिवी करो।
लपि प्रज भूप-स्प अलख अरूप ब्रह्म
हम न कहेंगी तुम लाख कहिवो करो।
(४५)
रग रूप रहित लपावत सवही है हम
वैसो एक और ध्याइ धीर धरिहै कहा।
कहै रतनाकर जरी है विरहानल में
और अव जोति को जगाइ जरिहै कहा॥
राखौ धरि ऊधौ उतै अलस अरूप ब्रह्म
तासौ काज कठिन हमारे सरिहै कहा ।
एक ही अनग साधि साध सव पूरी अव
और अग रहित भरावि करिहै कहा ॥
-
1
उद्धव शतक
कर बिनु कैसे गाय दूहिहै हमारी वह
पद विनु कैसे नाचि थिरकि रिझाइहै ।
कहै रतनावर बदन विनु कैसे चापि
मासन वजाइ बैनु गोधन गवाइहै ॥
देखि सुनि कैसे दृग सवन विनाही हाय
भोरे ब्रजवासिनि को विपति वराइहै ।
रावरौ अनूप कोऊ अलख अरूप ब्रह्म
ऊधौ कही कौन धौ हमारे काम आइहे ।।
(४७)
वे तो वस वसन रँगावै मन रेंगत ये
भसम रमावै वे ये आपुही भसम है ।
साँस-साँस माहिं बहु बासर वितावत वे
इनवे प्रतेक सास जात ज्यौं जनम हैं ।।
ह के जग-मुक्ति सौ विरक्त भुक्ति चाहत वे
जानत ये भुक्ति मुक्ति दोऊ बिष-सम है।
करिक विचार ऊधौ सूधो मन माहि लखौ
जोगी सौ वियोग भोग भोगी कहा कम हैं ।।
(४८)
जोग को रमाव औ समाधि को जगावै इहा
दुख-सुख सधाधि सौ निपट निबेरी हैं ।
कहै रतनाकर न जाने क्यो इतै धौ आइ
साँसनि की सासना को बासना बखेरी हैं।
हम जमराज की धरावर्ति जमा न क्छू
सुर पति सपति की वाहति न ढेरी है।
चेरी हैं न ऊधौ । काहू ब्रह्म के बवा की हम
सूधो कहे देति एक कान्ह की कमेरी हैं।
उद्धव शतक
(v)
सरग न चाहैं अपवरग न चाहँ सुनो
भुक्ति-मुक्ति दोऊ सौं विरक्ति उर आन हम।
कहै रतनाकर तिहारे जोग-रोग माहिं
तन मन सासनि की सासति प्रमाने हम ।।
एक प्रजचद कृपा मद मुसकानि ही मै
लोक परलोक को अनद जिय जान म ।
जाके या वियोग-दुख हूँ सुख मैं ऐसौ क्छु
जाहि पाइ ब्रह्म-सुख हू मैं दुख मान हम ।।
(५०)
जग सपनौ सौ सव परत दिखाई तुम्है
तातै तुम ऊधौ हमैं सोवत लखात हो ।
कहैं रतनावर सुनै को बात सोवत को
जोई मुह आवत सो विवस वयात हो।
सोवत में जागत लखत अपने को जिमि
त्यो ही तुम आपही सुज्ञानी समुझात हो।
जोग-जोग कवहूँ न जान कहा जोहि जको
ब्रह्म-ब्रह्म कबहू वहकि बररात हौ ॥
ऊधौ यह ज्ञान को वयान सब वाद हमैं
सूधौ वाद छाडि बक्वाहि वढावै कौन ।
कहै रतनाकर बिलाय ब्रह्म काय माहि
आपने सौ आपुनपो आपनो नसावै कौन ।
काहू तो जनम में मिलेगी स्यामसुन्दर का
याहू आस प्रानायाम-सास मै उडावे कौन ।
परि के तिहारी ज्योति ज्वाल की जगाजग में
फेर जग जाइवे की जुगती जरावै कोन।
उद्धव शतक
८७
(५२)
वाही मुख मजुल की चहति मरीचे सदा
हमकौं तिहारी ब्रह्म-ज्योति करिवो कहा।
कहै रतनाकर सुधाकर-उपासिनि को
भानु की प्रभानि के जुहारि जरिवो कहा।
भोगि रही बिरचे विरचि के सजोग सबै
ताके सोग सारन को जोग चरिवौ कहा।
जब ब्रजचद को चकोर चित चारु भयौ
बिरह चिंगारिनि सौ फेरि डरिबौ कहा ।।
(५३)
ऊधौ जम-जातना की वात न चलावी नैकु
अब दुख सुख को विबेक करिवो कहा।
प्रेम-रतनाकर-गभीर पर मीननि कौं
इहिं भव-गोपद की भीति भरिबौ कहा।
एक बार लेह मरि मीच की कृपा सौ हम
रोकि-रोकि सास विनु मीच मरिबो कहा।
छिन जिन झेली कान्ह-विरह-बलाय ति हैं
नरक निकाय की धरक धरित्री कहा ॥
(५४)
जोगिनि की भोगिन की विक्ल वियोगिनि की
जग में न जागती जमात रहि जाइंगी।
कहै रतनाकर न सुख के रहे जो दिन
तो ये दुख-द्ध द की न रात रहि जागी।।
प्रेमन्नेम छाडि छम जो वतावत मो
भीति ही नहीं तो वहा छात रहिं जाइंगी।
घात रहि जाइगी न वान्ह की कृपा ते इती
ऊधौ कहिले कों वम वात रहि जाइंगी।
བ
उदम शतक
कठिन करेजो जो न करक्यो वियोग होत
तापर तिहारी जन मत्र कँचिहै नहीं।
कहै रतनाकर बरी है बिरहानल मैं
ब्रह्म की हमार जिय जोति अँचिहै नही ।।
ऊधौ ज्ञान-भान की प्रभानि ब्रजचद विना
चहकि चकोर चित चोपि नचिहै नहीं।
स्याम-रंग-रॉचे साचे हिय हम ग्वारिनि के
जोग की भगौही भेष-रेख रँचिहै नही ।
(५६)
नैननि के नीर औ उसीर सौ पुलकावलि
जाहि करि सीरौ सीरी बातहिं बिलास हम ।
कहै रतनाकर तपाई विरहातप की
आवन न देति जामै बिपम उसास हम ।।
सोई मन-मन्दिर तपावन के काज आज
रावरे कहे तं ब्रह्म-जोति लै प्रकासै हम ।
नद के कुमार सुकुमार को वसाइ यामै
ऊधौ अब आइ कै बिसास उदबास हम ।।
(५७)
जोहैं अभिराम स्याम चित का चमक हो मैं
औ कहा ब्रह्म को जगाइ जोति जोहेगी।
कहै रतनाकर तिहारी वात ही सौ रुकी
सांस की न सासति के औरौ अवरोहेंगी ।।
आपुहि भई है मृगछाला ब्रज-लाला सूखि
तिनपै अपर मृगछाला कहा सोहेंगी।
उधौ मुक्ति-माल वृथा मढत हमारे गरे
कान्ह विना तासो क्हो काको मन मोहेगी।
उद्धव-शतक
(५८)
कीजै ज्ञान भानु को प्रकास गिरि-सू गनि पं
व्रज में तिहारी कला नैकु पटिहें नहीं।
कहै रतनाकर न प्रेम-तरु पैहै सूखि
याकी डार-पात तृन-तूल घटिहैं नहीं।
रसना हमारी चारु चातको वनी है उधौ
पी-पी की विहाइ और रट रटिहै नहीं।
लौटी-पोटी बात को ववडर वनावत क्यो
हिय तै हमारे घनश्याम हटिहै नहीं।
(५६)
नैननि के आगे नित नाचत गुपाल रहै
रयाल रहै सोई जो अन य-रसवारे है।
कहै रतनाकर सो भावना भरीय रहै
जाके चाव भाव रचे उर मै असारे हैं।।
ब्रह्म हूँ भए प नारि ऐसिय वनी जो रहैं
तौ तौ सहैं सीस सर्व जैन जो तिहारे हैं।
यह अभिमान तो गव हैं ना गये हूँ प्रान
हम उनकी है वह प्रीतम हमारे है।।
६०
सुनी गुनी समझी तिहारी चतुराई जिती
कान्ह ही पढाई कविताई कुवरी की हैं।
कहै रतनाकर त्रिकाल हू त्रिलोक
आन अननकु ना त्रिदेव की कही की हैं।
कहहिं प्रतीति प्रीति नीति हू निवाचा वाधि
ऊधौ साच मन की हिये की अरुजी की हैं।
वै तो हैं हमारे ही हमारे हमारे हो और
हम उनहीं की उनही की उनही की हैं।
उद्धव-शतक
नेम व्रत सजम के आसन अखड लाइ
सांसनि को घूटिहै जहा लौगिलि जाइगौ।
कहे रतनाकर धरंगी मृगछाला अरु
दरगी जऊ अग छिलि जाइगो॥
पाच आचि हूँ की झार लिहै निहारि जाहि
रावरौ हू कठिन करेजी हिलि जाइगौ।
सहिहैं तिहारे कहैं साँसति सर्व पं वस
यती कहि देहु के कन्हैया मिलि जाइगौ।
धूरि हू
साधि लैहैं जोग के जटिल जे विधान ऊधौ
बांधि लेह लकनि लपेटि मृगछाला हू ।
कहे रतनाकर सु मेलि लहैं छार अग
झेलि लैहैं ललकि धनेरे घाम पाला हू॥
तुम तो कही और अनकही कहि लीनो सबै
अव जी कही तो कह कछु ब्रज-बाला है।
ब्रह्म मिलिव ते कहा मिलव बतावो हम
ताको फल जव लौ मिल ना नन्दलाला हू ।।
साधिहै समाधि ओ अराधिहे सने जो कही
आधि-व्याधि सकल स-साध सही लहै हम ।
कहे रतनाकर पं प्रेम-प्रन-पालन को
नेम यह निपट सछम निरबैहै हम ।।
जैहे प्रान-पट लै सरूप मनमोहन को
तातै ब्रह्म रावरे अनूप को मिलहे हम।
जौप मिल्यो तो धाइ चाय मी मिलगी पर
जो न मिल्यौ तौ पुनि इहा ही लौटि ऐह हम ।।
उद्धव शतक
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(६७)
धरि राखौ ज्ञान गुन गौरव गुमान गोइ
गोपिन को आवत न भावत भडग है।
कहै रतनाकर करत टाय-टाय वृथा
सुनत न कोउ इहाँ मुहचग है।
और हू उपाय केते सहज सुढग ऊधौ
सांस रोकिने को कहा जोग ही कुढङ्ग है।
कुटिल कटारी है उतङ्ग अति
जमुना-तरग है तिहारौ सतसङ्ग है।
(६८)
प्रथम भुराइ चाय-नाय पे चढाइ नीकै
न्यारी करी कान्ह कुल-कूल हितकारी ते ।
प्रेम रतनाकर की तरल तरङ्ग पारि
पलटि पराने पुनि प्रन-पतवारी ते॥
और न प्रकार अब पार लहिने को कछू
अटक रही है एक आस गुनवारी ते ।
सोऊ तुम आइ वात विषम चलाइ हाय
काटन चहत जोग कठिन कुठारी तें।
(६८)
प्रेम-पाल पलटि उलटि पतवारी-पति
केवट परान्यो कूब-तूंवरी अधार ले।
कहै रतनाकर पठायी तुम्हे ताप पुनि
लादन कौं जोग को अपार अति भार लें।
निरगुन ब्रह्म कही रावरौ बनैहै कहा
ऐहै कछु काम हूँ न लङ्गर लगार ले।
विपम चलावी ज्ञान-तपन-सपी ना बात
पारी कान्ह तरनी हमारी मझधार लै॥
उद्धव शतक
(४)
कान्ह हूँ सौं आन ही विधान करिवे को ब्रह्म
मधुपुरियान की चपल कखियाँ चहै।
कहै रतनावर हस के कहौ रोवे अव
गगन-अथाह-थाह लेन मखिया चह ।।
अगुन-सगुन फद-वन्द निरवारन कौं
वारन को न्याय की नुकीली नखियाँ चहें ।
मोर-पखियाँ को मौर-वारी चारु चाहन को
ऊधौ अखिया चहै न मोर-पखियाँ चहै ।
(६५)
ढोग जात्यौ ढरकि परकि डर सोग जात्यौ
जोग जात्यो सरकि स-कॅप खियानि ते।
कहै रतनाकर न लेखते प्रपञ्च ऐंठि
बैठि धरा लेखते कहूँधी नखियानि ते ॥
रहते अदेख नाहिं बेप वह देखत हूँ
देखत हमारी जान मोर पँखियानि ते।
ऊधौ ब्रह्म ज्ञान को वखान करते न नैकु
देख लेते काह जो हमारी अंखियानि ते॥
चाव सौ चले हौ जोग-चरचा चलाइने को
चपल चितौनि त चुचात चित-चाह है।
कहै रतनाकर पै पार ना वसैहै कछू
हेरत हिरेहै भर्यो जो उर उछाह है ।।
अडे लौं टिटेहरी के जैहै जू विवेक वहि
फेरि लहिवे को ताके तनक न राह है।
यह वह सिंधु नाहिं सोखि जो अगस्त लियौ
ऊधौ यह गोपिन के प्रेम को प्रवाह है ।।
-
६२
उद्धव शतक
(६७)
धरि राखौ ज्ञान गुन गौरव गुमान गोइ
गोपिन को आवत न भावत भडग है।
कहै रतनाकर करत टाय-टाय वृथा
सुनत न कोउ इहाँ मुहचग है।
और हू उपाय केते सहज सुढङ्ग ऊधौ
सास रोकिटी को कहा जोग ही कुढङ्ग है।
कुटिल कटारी है उतङ्ग अति
जमुना-तरग है तिहारौ सतसङ्ग है।
(६८)
प्रथम भुराइ चाय-नाय पे चढाइ नीकै
न्यारी करी कान्ह कुल-कूल हितकारी ते ।
प्रेम रतनाकर की तरल तरङ्ग पारि
पलटि पराने पुनि प्रन-पतवारी त॥
और न प्रकार अब पार लहिले को क्छु
अटकि रही है एक आस गुनवारी ते ।
सोऊ तुम आइ वात विषम चलाइ हाय
काटन चहत जोग कठिन कुठारी ते ।।
(६६)
प्रेम-पाल पलटि उलटि पतवारी-पति
केवट परान्यो कूव-तूवरी अधार ले।
कहै रतनाकर पठायी तुम्है तापै पुनि
लादन को जोग को अपार अति भार ले।
निरगुन ब्रह्म कहौ रावरौ वनहै कहा
ऐहै क्छु काम हूँ न लङ्गर लगार ले।
विषम चलावी ज्ञान-तपन-तपी ना बात
पारी कान्ह तरनी हमारी मझधार लै॥
उद्धव शतक
.) (७० प्रथम भुराइ प्रेम - पाठनि पढाइ उन तन-मन कोन्हे विरहागि के तपेला है। कहे रतनाकर त्यो आप अव ताप आइ सासनि की सांसति के झारत झमेला है ।। ऐसे-ऐसे सुभ उपदेश के दिवयनि की ऊधौ वजदेश मै अपेल रेल-रेला है। वे तो भए जोगी जाइ पाइ कूवरी को जोग आप कह उनके गुरू है किधौ चेला है। (७१) एते दूरि देसनि सौ ससनि-सदेसनि सौ लखन चह जो दसा दुसह हमारी है। कहै रतनाकर पं बिपम वियोग-विथा सवद-विहीन भावना की भाववारी है।। आ उर अतर प्रतीति ताते हम रीति नीति निपट भुजगनि की यारी है। आँखिनि ते एक तो सुभाव सुनिने को लियौ काननि तै एक देखिौ की टेक धारी है। (७२) दौनाचल को ना यह छटक्यो क्नूका जाहि छाइ छिगुनी पै छम-छत्र छिति छायो है। कहै रतनाकर न कूबर वधू-बर को जाहि रच राच पानि परिस गॅवायो है। यह गरु प्रेमाचल दृढ-व्रत धारिनि को जाक भर भाव उनहूँ को सकुचायो है। जान कहा जानि के अजान ह सेजान कान्ह ताहि तुम्है वात सौ उडावन पठायो है ।। १४ उद्धव शतक
सुधि बुधि जाति उडी जिनकी उसास निसौ
तिनको पठायौ कहा धीर धरि पाती पर।
कहै रतनाकर त्यों विरह-बताय ढाइ
मुहर लगाइ गए सुख-थिर-थाती पर ।
और जो कियो सो कियौ ऊधौ पैन कोऊ वियो
ऐसी घात धूनी कर जनम-सँघाती पर।
कूबरी की पीठ ते उतारि भार भारी तुम्हे
भेज्यो ताहि थापन हमारी छीन छाती पर।
(७४)
सुधर सलोने स्यामसुंदर सुजान कान्ह
करुना-निधान के बसीठ बनि आए हो।
प्रेम-प्रनधारी गिरधारी को सनेसो नाहिं
होत हैं अंदेश झूठ बोलत बनाए हो ।।
ज्ञान-गुन गौरव-गुमान-भरे फूले फिरौ
वचक के काज पै न रचक बराए हो।
रसिक-सिरोमनि को नाम बदनाम करौ
मेरी जान ऊधौ कूर-कूवरी-पठाए हौ ।
(७५)
कान्ह कूबरी के हिय हुलसे सरोजनि ते
अमल अनन्द मकरद जो ढरार है।
कहै रतनाकर, यो गोपी उर सचि ताहि
ताम पुनि आपनौ प्रपञ्च रच पार है।
आइ निरगुन गाइ व्रज मै जो अब
ताको उद्गार ब्रह्मज्ञान रस गार है।
मिलि सो तिहारौ मधु मधुप हमार नेह
देह में अछेह विष विपम बगार है ।।
उद्धव-शतक
७६
सीता असगुन को कटाई नाक एक वेरि
सोई करि कूव राधिका पै फेरि फाटी है।
कहै रतनाकर परेखौ नाहिं याको नैकु
ताको तौ सदा की यह पाकी परिपाटी है ।।
सोच है यहै कै सग ताके रंगभौन माहिं
कौन धौ अनोखौ ढङ्ग रचत निराटी है।
छाँटि देत कूबर के आटि देत डाँट कोऊ
कानि देत खाट किधौ पाटि देत माटी है।
(७७)
माए कसराइ के पठाए वे प्रतच्छ तुम
लागत अलच्छ कुब्जा के पच्छवारे हो।
कहै रतनाकर वियोग लाइ लाई उन
तुम जोग बात के बवडर पसारे हो ।
कोऊ अवलानि पै न ढरकि ढरारे होत
मधुपुरवारे सब एके ढार ढारे हौ।
ले गए अक्रूर क्रू र तन से छुडाइ हाय
ऊधौ तुम मन तै छुडावन पधारे हो।
(७८)
आए हौ पठाए वा छतीसे छलिया के इत
वीस बिसै ऊधौ वीरवावन क्लाँच ह।
कहै रतनाकर प्रपञ्च न पसारो गाढे
वाढे पै रहोगे साढे वाइस ही जांच ह।
प्रेम अरु जोग में है जोग छठ-आठ पर्यो
एक ह रहै क्यो दोऊ हीरा अरु कांच ह।
तीन गुन पाच तत्त्व बहकि बतावत सो
जैहै तीन-तेरह तिहारी तीन-पाय ह्व।
उदवशतक
(७६)
कस के कहे सौ जदुबस को वताइ उन्हें
तैसे ही प्रससि कुब्जा पै ललचायौ जौ।
कहै रतनाकर न मुष्टिक चन् आदि
मल्लनि को ध्यान आनि हिय कसकायौ जौ।।
नद जसुदा को सुखमूरि करि धूरि सबै
गोपी ग्वाल गेयनि पैगाजलै गिरायो जो।
होते कहूँ क्रूर तौ न जाने करते धौ कहा
एतो क्रूर करम अङ्क र ह्व कमायौ जौ।
(८०)
चाहत निकारत तिन्है जो उर-अतर ते
ताको जोग नाहिं जोगमन्तर तिहारे मै ।
कहै रतनाकर बिलग करिबे मैं होति
नीति विपरीत महा कहति पुकारे में।
ताते तिन्हे ल्याइ लाइ यि ते हमारे बेगि
सोचिये उपाय फेरि चित्त चेतवारे मैं।
ज्यौ ज्यो बसे जात दूरि दुरि प्रिय प्रान मूरि
त्यो त्यो धंसे जात मन-मुकुर हमारे मैं ॥
(८१)
ह्या तो ब्रजजीवन सों जीवन हमारौ हाय
जाने कौन जीव ल उहाँ के जन जनमै ।
कहै रतनाकर बतावत कछू को कछू
ल्यावत न नैकु हूँ विवेक निज मन में ।।
अच्छिनि उघारि ऊधो करहु प्रतच्छ लच्छ
इत पसु पच्छिनि हूँ लाग है लगन मैं।
काहू की न जीहा कर ब्रह्म की समीहा सुनौ
पीहा पीहा रटत पपीहा मधुवन मैं।
उद्वशतक
(२)
बाढयौ बज पै जो ऋन मधुपुर-वासिनि कों
तासौ ना उपाय काहूँ भाय उमहन को।
कहै रतनाकर विचारत हुती सी हम
कोऊ सुभ जुक्ति तासौ मुक्त आँ रहन को ।।
की यो उपकार दौरि दोउनि अपार ऊधौ
सोई भूरिभार सौं उवारता लहन कौं।
लै गयौ अक्रूर क्रूर तव सुप मूर कान्ह
आए तुम आज प्रान-व्याज उगहन कौं।
(८३)
पुरती न जोपै मोर चद्रिका किरीट काज
जुरती कहा न काँच किरचे कुभाय की।
कहै रतनाकर न भावते हमारे नैन
तौ न कहा पावते कहूँधौ ठाय पाय की।
मान्यौ हम मान के न मानती मनाऐ वेगि
कीरति कुमारि सुकुमारी चित-चाय की।
याही सोच माहिं हम दूवरी के कहा
कवरी हू होती न पतोहू नदराय की।
(८४)
हरि तन पानिप के भोजन दृगचल ते
उमगि तपन त तपाक वरि धावै ना।
कहै रतनाकर त्रिलोक ओकमडल म
बेगि ब्रह्मद्रव उपद्रव मचावै ना।
हर को समेत हर गिरि के गुमान गारि
पल म पतालपुर पठन पठावै ना।
फैले बरसाने मन रावरी कहानी यह
वानी कहूँ राधे आधे कान सुनि पावै ना।।
१८
उद्धव शतर
(८५)
आतुर न होहु ऊधौ आवति दिवारी अबै
वैसिय पुरदर-कृपा जौ लहि जाइगो ।
होत नर ब्रह्म ब्रह्म-ज्ञान सौं बतावत जो
कछु इहि नीति की प्रतीति गहि जाइगी।
गिरिबरधारि जो उवारि व्रज लीन्यो बलि
तौ तौ भाति काहूँ यह वात रहि जाइगी।
नातर हमारी भारी बिरह-बलाय सग
सारी ब्रह्म-ज्ञानता तिहारी वहि जाइगी।
(८६)
आवत दिवारी बिलखाइ ब्रज-वासी कहै
अब हमारे गाव गोधन पुजैहै को।
कहै रतनाकर विविध पकवान चाहि
चाह सौ सराहि चख चचल चलैहै को॥
निपट निहारे जोरि हाथ निज साथ ऊधौ
दमकति दिव्य दीपमालिका दिखैहै को।
कवरी के कूबर ते उपरि न पावै कान्ह
इन्द्र-कोप-लोपः गुवधन उठेह को ।
(८७)
विकसित बिपित वसतिकावली को रग
लखियत गोपिन के अग पियराने में।
बौर बृद लसत रसाल बर बारिनि के
पिक की पुकार है चबाव उमगाने मैं ।
होत पतझर
झार तरुनि-समूहनि को
बहरि बतात ले उसास अधिनाने में।
काम-विधि बाम की कला मैं मीन-मेप कहा
ऊपी नित बसत बसन्त बरसाने मैं।।
उद्धव शतक
ठाम ठाम जीवनविहीन दीन दीशै सर्व
चलित चवाई-बात तापत घनी रहै।
कहै रतनाकर न चैन दिन-रैन पर
सुखी पत-छीन भई तरुनि अनी रहै ।।
जारयो अग अव तौ विधाता है इहा को भयो
तातं ताहि जारन की ठसक ठनी रहै ।
बगर-बगर व पभान के नगर नित
भीपम प्रभाव ऋतु ग्रीपम बनी रहै ।।
रहित सदाई हरियाई हिय-धायनि म
ऊरध उदास सो झकोर सो पुरवा की है।
पीव पीव गोपी पीर-पूरित पुकारति है
सोई रतनाकर पुकार पपिहा की है।
लागी रहै नैनहि सौ नीर की झरी औ
उठे चित म चमक सो चमक चपला की है।
विनु घनस्याम धाम धाम ब्रज मण्डल में
ऊधौ नित वसति बहार बरसा की है ।।
(१०)
जात घनस्याम के ललात दृग कज पांति
घेरी दिख-साध भोर-भीर की अनी रहै।
कहै रतनाकर बिरह बिछु बाम भयौ
चन्द्रहास ताने घात घातल धनी रहै ।।
सीत-घाम वरपा-विचार विनु आने व्रज
पचवान-बाननि की उमड ठनी रहै।
काम बिधना सौं लहि फरद दवामी सदा
दरद दिवया ऋतु सरद बनी रहै ।
उद्धव शतक
(११)
रीते परे सकल निपग कुमुमायुध के
दूर दुरे कान्ह पै न ताते चले चारौ है।
कहै रतनाकर बिहाइ बर मानस को
लीन्यौ है हुलास-हस वास दूरिवारौ है।
पाला पर आस पैन भावत बतास बारि
जात कुम्हलात हियो कमल हमारी है।
पट ऋतु ह्र है कहूँ अवत दिगतनि मैं
इत तौ हिमत को निरन्तर पसारौ है।
(१२)
कापि-कांपि उठत करेजो कर चापि-चाँपि
उर ब्रजवासिनि के ठिठुर ठनी रहे।
कहै रतनाकर न जीवन सुहात रच
पाला की पटास परी आसनि धनी रहै ।।
बारिनि मै बिसद बिकास ना प्रकास करे
अलिनि विलास मै उदासता सनी रहै।
माधव के आवन की आवति न बात नकु
नित प्रति तात ऋतु सिसिर बनी रहै ।।
(६३)
माने जव नकु ना मनाऐ मनमोहन के
तोप-मन-मोहिनि मनाए कहा मानो तुम।
कहै रतनाकर मलीन मकरी लौ नित
आपुनोही जाल अपने ही पर तानो तुम।।
कबहूँ परे न नैन-नीर हूँ के फेर माहिं
पैरिबो मनेह मिंधु माहिं कहा ठानो तुम।
जानत न ब्रह्म हूँ प्रमानत अलच्छ ताहि
तोपै भला प्रेमको प्रतन्छ कहा जानौ तुम॥
उद्धव शतक
हाल कहा यूशत विहाल परी वाल सर्व
वसि दिन हूँव देपि दृगनि सिधाइयो।
रोग यह कठिन न ऊधी याहिने जोग
सूधौ सौ सन्देस याहि तू न ठहराइयो ।
औसर मिल औ सर-ताज पछु पूर्हि तो
कहियो यछू न दसा देयी सो दियाइयो।
आह के पराहि नन नीर अवगाहि वछू
पहिवे को चाहि हिचकी ले रहि जाइयो।
(६५)
नद जसुदा औ गाय गोप गोपिका की कछु
वात वृषभान-भौन हूँ को जनि कोजियो।
कहै रतनाकर कहति सव हा हा पाइ
हाँ के परपनि सो रच न पसीजियो।।
आस भरि ऐहै औ उदास मुख ह्र हाय
अज-दुख-त्रास की न तातै सांस लीजियो।
नाम को बताइ औ जताइ गाम ऊधौ बस
स्याम सौ हमारी राम-राम कहि दीजियो।
(६६)
ऊपी यहै सूधौ सौ सदेस कहि दीजो एक
जानति अनेक न बिवेक प्रज-बारी हैं।
कहै रतनाकर असीम रावरी तौ क्षमा
छमता कहाँ लौ अपराध की हमारी हैं।
दीज और ताजन सबै जो मन भाव पर
कीज न दरस रह वचित बिचारी हैं।
भली हैं बुरी हैं औ सलज्ज निरलज्ज हू हैं
जो कहै सो हैं पै परिचारिका तिहारी हैं।
*
१०२
उद्धव शतक
उद्धव के ब्रज से बिदा होते समय के कवित्त
(६७)
धाई जित-तित ते बिदाई-हेत ऊधव की
गोपी भरी आरति सँम्हारति न साँसुरी।
कहै रतनाकर मयूर-पच्छ कोऊ लिए
कोऊ गुज-अजलि उमाहे प्रेम आसुरी।।
भाव-भरी कोऊ लिए रुचिर सजाव दही
कोऊ मही मजु दावि दलकति पाँसुरी।
पीत पट नद जसुमति नवनीत नयौ
कीरति-कुमारी सुरवारी दई बाँसुरी।।
(६८)
कोऊ जोरि हाथ कोऊ नाइ नम्रता सौ माथ
भापन की लाख लालसा सौ नहि जात है।
कहै रतनाकर चलत उठि ऊधव के
कातर व प्रेम सौ सकल महि जात है।
सबद न पावत सो भाव उमगावत जो
ताकि-ताकि आनन ठगे से ठहि जात है।
रचक हमारी सुनो रचक हमारी सुनौ
रचक हमारी सुनो कहि रहि जात हैं ।।
(९)
दाबि-दाबि छातीपाती-लिखन लगायौ सर्व
व्यौत लिखिवै कोपन कोऊ करि जात हैं।
कहे रतनाकर फुरति नाहि वात कछु
हाथ धरयो ही तल थहरि थरि जात है ।।
अधों के निहोर फेरि नकु घोर जोरै पर
ऐसो अन्त ताप को प्रताप भरि जात है।
सूखि जाति स्याही लेखिनी के नै डक लागे
अक लागे कागद वररि वरि जात है ।।
उद्धव-शतक
(१००)
कोऊ चले कापि सग कोऊ उर चापि चले
कोऊ चले कछुक अलाहि हलवल से।
कहै रतनाकर सुदेश तजि कोऊ चले
कोऊ चले कहत सन्देस अविरल से।
आँस चले काहू के स काहू के उसास चले
काहू के हिय पं चन्दहास चले हल से।
ऊधव के चलत चलाचल चली यो चल
अचल चले औ अचले हू भए चल से ।
(१०१)
दीन्यौ प्रेम-नेम-गरुवाई गुन ऊधव को
हिय सौ हमेव-हरुवाई बहिराइ के।
कहै रतनाकर त्यो कचन बनाई काय
ज्ञान-अभिमान की तमाई विनसाइ के।
वतानि को धोक सो धमाइ चहूँ कोदनि सौ
निज विरहानल तपाइ पधिलाइ के।
गोप की बधूटी प्रेम-बूटी के सहारे मारे
चल चित-पारे की भसम मुरकाइ के ।।
उद्धवे-शर्व
उद्धव के ब्रज से लौटते समय के वित्त
(१०२)
गोपी, ग्वाल, नद, जसुदा सौं तौविदाह उठे
उठित न पाय पै उठावत डगत है।
वहे रतनाकर सभारि सारथी प नीठि
दीठिन वचाइ चाल्यौ चोर ज्यो भगत है।
कुनि की कूल की कलिंदी की रुएँदी दसा
देखि-देखि आँस ओ उसाँस उमगत हैं।
रथ तै उतरि पथ पावन जहाँ ही तहा
विक्ल विसूरि धूरि लोटन लगत हैं।
भूले जोग-छेम प्रेम-नेमहि रिहारि ऊधौ
सकुचि समाने उर-अन्तर हरास लो।
कहै रतनाकर प्रभाव सब ऊने भए
सूने भए नैन बैन अरथ-उदास लो।।
माँगी विदा मांगत ज्यो मीच उर भीचि कोऊ
की यो मौन गौन निज हिय के हुलास लौ।
विथकित सास-लो चलत रवि जात फेरि
आँस लौ गिरत पुनि उठत उसाम लौं।
उद्धव शतक
१०५
परत न मारम में दो दरि मे।।
गुनीली ले।
उद्धव के मथुरा लौट आने के समय के कवित्त
(१०४)
चल-चित-पारद की दम्भ कचुली क दूरि
ब्रज-मग धूरि प्रेम-मूरि सुभ-सीली ल।
कहै रतनाकर सु जोगनि विधान भावि
अमित प्रमान ज्ञान गन्धक
जारि घट-अन्तर ही आह-धूम धरि सबै
गोपी विरहागिनि निरन्तर जगीली ल ।
आए लोटि ऊधव विभूति भव्य भायनि की
वायनि की रुचिर रसायन रसीली ॥
आए लौटि लज्जित नवाए नैन ऊधो अव
सब सुख साधन को सूधौ सौ जतन ले।
कहै रतनावर गवाए गुन गौरव औ
गरव-गढी यो परिपूरन पतन
छाए नैन नीर पोर-यसय कमाए उर
दीनता अधीनता के भार सौ नतन ल ।
प्रेम-रस रचिर विराग-तूमडी में पूरी
शान-गूदही में अनुराग सो रतन ले।
आए दौरि पौरि लो अगाई गुन उधर पी
और ही विनोमि दमा दृग भरि लेत हैं।
पहे रतनापर पिलोपि विसयान उन्हें
पेज पर पपा परेज धरि मेत ॥
याशिमपूर पूधिरे औ महिये यो मा
माना उदाम गांग मरि उरगोपरि
मोमरि पनि तो है पति मा ।।।
(१०७)
प्रेम-मद-छाके पग परत कहाँ के कहाँ
थाके अग नननि सिथिलता सुहाई है।
कहै रतनाकर यो आवत चकात उधौ
मानौ सुधियात कोउ भावना भुलाई है ।।
धारत धरा पैना उदार अति आदर सो
सारत बहोलनि जो आस-अधिकाई है।
एक कर राजै नवनीत जसुदा को दियो
एक कर व सी वर राधिका पठाई है।
(१०८)
ग्रज-रजरजित सरीर सुभ उधव को
धाइ बलवीर हं अधीर लपटाये लेत।
कहे रतनाकर सु प्रेम-भद-माते हेरि
थरकति वाह थामि यहरि थिराए लेत।।
कीरति कुमारी के दरस-रस सद्य ही की
छलकनि चाहि पलकनि पुलकाए लेत।
परन न देत एक बेद पुहुमी की कोछि
पाछि-पोछि पट निज नैननि लगाए लेत॥
।
ब्रज से लौटने पर उद्धव-वचन श्री भगवान्-प्रति
(१०६)
आँसुनि की धार औ उभार कौं उसासनि के
तार हिचकीनि के तनक टरि लेन देहु ।
कहै रतनाकर फुरन देहु वात रच
भावनि के विपम प्रपच सरि लेन देहु ।।
आतुर ह्व और हू न कातर वनावी नाथ
नैसुक निवारि पीर धीर धरि लेन देहु ।
कहत अवै हैं कहि आवत जहाँ लौ सर्व
नैकु थिर कढत क्रेजो करि लेन देहु ।।
रावरे पठाए जोग देन को सिधाए हुते
ज्ञान गुन गौरव के अति उद्गार मै।
कहै रतनाकर पं चातुरी हमारी सर्व
कित धौं हिरानी दसा दारुन अपार मैं ।।
उडि उधिरानी किधो उरध उसासनि में
वहि धौ विलानी कहू आसुनि की धार मैं ।
चूर ह्व गई धौ विरहानल की झार मे।
छार ह्व गई धौ विरहानल की झार मै॥
सीत घाम-भेद खेद सहित लखाने सर्व
भूले भाव भेदता-निषेधन विधान के।
कहै रतनाकर न ताप ब्रजवालनि के
काली मुख-ज्वाल ना दवानल समान के ।।
पटकि पराने ज्ञान गठरी तहाँ ही हम
थमत वन्यो न पास पहुचि सिवान के।
छाले परे पगनि अधर पर जाले परे
कठिन कसाले परे लाले परे प्रान के ।।
उद्धव-शतक
१०६
(११२)
ज्वालामुखी गिरि ते गिरत द्रवे द्रव्य कंधो
बारिद पियौ है बारि विप के सिवाने मै ।
कहै रतनाकर के काली दाव लेन-काज
फेन फुफकार उहि गावै दुख-साने मैं ।।
जीवन बियोगिनि को मेघ अचयो सो किधो
उपच्यौ पच्यौ न उर ताप अधिकाने में।
हरि-हरि जासो बरि बरि सब बारी उठे
जाने कौन बारि बरसत बरसाने मैं।
लैके पन मछम अमोल जो पठायौ आप
ताको मोल तनक तुल्यौ न तहा साँठी ते।
कहै रतनाकर पुकारे ठौर-ठौर पर
पौरि वृषभानु की हिरान्यौ मति नाठी ते॥
लीजै हेरि आपुहिं न हेरि हम पायौ फेरि
याहि फेर माहि भए माठी दधि आँठी तं ।
ल्याए धूरि पूरि अग अगनि तहाँ की जहाँ
ज्ञान गयो सहित गुमान गिरि आठी ते ।।
(११४)
ज्योही कछ कहन सन्देश लग्यो त्यौहि लख्यो
प्रेम पूर उमगि गरे ली चढयौ आव है।
कहे रतनाकर न पांव टिकि पावै नेकु
ऐसौ दृग-द्वारनि स-बेग वढयो आवै है।
मधुपुरि राखन को वेगि कछु ब्यौत गढी
धाइ चढी बट न जोपं गढयो आवे है।
आयो भज्यो भूपयिभगीरथ लौं हों तो नाथ
साथ लग्यो सोई पुन्य-पाप वढयो आव है ।।
उदय-शतन
१०६
जैहै व्यथा विषम विलाइ तुम्हें देखत ही
तात कही मेरी कहुँ झूठि ठहरावी ना।
कहै रतनाकर न याही भय भाप भूरि
याही कहैं जावो बस विलम्ब लगावो ना ॥
एतौ और करत निवेदन स वेदन हैं
याको कछु बिलग उदार उर ल्यावौ न ।
तब हम जान तुम धीरज धुरीन जव
एक बार उधौ वनि जाइ पुनि जावो ना ॥
छावते कुटीर कहुँ रम्य जमुना के तीर
गौन नौन-रेती सौ कदापि करते नहीं।
कहै रतनाकर बिहाइ प्रेम गाथा गूढ
स्रोन रमना मे रस और भरते नही ।।
गोपी ग्वाव वालनि के उमडत आंसू देखि
लेखि प्रलयागम हूँ नैकु डरते नहीं।
होतो चित चाव जौ न रावरे चितावन को
तजि ब्रिज-गांव इतं पाव धरते नहीं।
(११७)
भाठी के बियोग जोग जटिल लुकाठी लाइ
लाग सो सुहाग के अदाग पिघलाए हैं।
कहै रतनाकर सुवृत्त प्रेम-साँचे माहिं
काचे नेम सजम निब त के डराए हैं।
अव परि वीच खीचि विरह मरीचि-बिम्ब
देत लव लाग पी गुविंद उर लाए हैं।
गोपी-ताप-तरुन-तरनि किरनावलि के
ऊधव नितात कान्त-मनि यनि आए हैं।
इति श्री उद्धव-शतक
उदवशतव
शब्दार्थ मगलाचरण जामों-जिससे । जाति = चली जाती है । विषय सासारिक= विषय वास- नाए । विपाद = धुप । चो - चाव, उत्साह । चारु =सुदर । गहिवो रग्रहण क्यिा करता है। कवित्त=काव्य । वर श्रेष्ठ । व्यजन-व्यजनवण, भोज्य पदाथ । रुचिर-सुदर । जागति= प्रज्वलित होती है । अनूप - अनुपम । जडता -माया-मोह निश्चेतनता । तोम= समूह । दहिवो कर भस्म हो जाता है। जयतिः जय हो । रावरी आपकी । सनेह-स्नेह, तेल घत । लाहिवो करें प्राप्त क्यिा करें। १ जल जात-कमल । अध-नीचे का भाग। ऊरध- ऊपर का भाग। उमहि = उमग म भरकर । गाहि = पकडवर । वास~~वासना= सूचने की इच्छा नै-थोडा । पाय परे उखारि लडखडाकर गिर पडे । अभाय-विक्लता। है। =दा एक । जगाइ- चतन्य । कीर-तोता। औचर-अचान। २ भुज-बध= भुजावेष्ठन, हाथो को गले में डाले हुए। कदली वन -वेली का वन । मतग- हाथी । मताए =मतवाले होकर। लों-समान ! नए सिर सौं = नतमस्तक होकर, फिर से । नीकै भली भांति । नेह-प्रेम । ३ पौरि-पोरी, द्वार, डयोढी। गुनन=सोचना । जोला-जब तक । अकुलानि व्यग्रता। उठानि-प्रारम्भ। उमगि उमडकर । भिची रूद्ध हाना। है-होना । ४ विथा-वेदना । अक्थ =अक्थनीय । अथाह अगाध । प्रवीन= चतुर । सुक्वीन - सुकवियो । वुझावन = समझावें। गह्वरि आयो गयो गला भर आया। भमरि-उमडकर । वैननि: वाणी। नैननि सौ-नेत्रो से। ५ प्रेमपग-प्रेम से युक्त । लाड-दुलार । सुधार-चद्रमा। प्रभा- जाभा । मढी-मडित । मृगनननि मग के समान सु दर नत्र वाली गोपिकाए । पछारिन नदी किनारे की हरी भरी भूमि । रग= उत्सव । रस=आनद- वेलि। रारनि=सक्रार । बिपिन विहारिनि -वदावन विहार । हौस तीव्र इच्छा । दुयसावती - उत्तेजित करती। सुधि =स्मृति। सुख रासिनिः भण्डार । नित-नित्य । ६ चलन न चरियो-कोई उपाय नहीं चलता। कोटिनिकरोडो। हारयो थक गया। टारयो-इधर-उधर हिलना । टसक्त-हिलता । गहीली ग्रहण D - सुख का शब्दाथ । करने वाली । चिमटी-परडकर, पीचने का औजार (वासुदेव और देवकी जिसके दो पक्ष हैं) कढ़त=निफ्लता है। विथे थक गए। आक-अक, अपोआ। धीर-क्षीर, दूध । विलसानि - सुखोपभोग । धस्यो-घुसना । क्रेज हृदय म लौं-समान । ७ रूप रस- गोपिया के रूप-सौ दय का मधुरामृत । अपात - तप्त हाना। हुते-होत। आंस=अश्रु । जुडात शीतल हाना, तुष्ट होना । अंवा = मिटटी के बतन पकाने की कुम्हार की भटटी । अपां सौ घिरवीवा की तरह चारा आर से जलना असह्य दाह का अनुभव करना। हर = देखना। हरिबोई= देखन की शक्ति को। हिरिबो कर= भूल जात है, खो जात हैं। जाम-प्रहर । घिरिबी और-धूमा करते है। ८ गल-गैल = गली-गली । गैल गैल =साथ-साथ । गोरस-१ दूध, दही, मट्ठा २ इद्रिय-आन द । काज=लिए । रिझाइबौ=आकर्षित करना । नवेलिनि -- नवयुवती, मुग्धावाला । स्ममहार-परिश्रम अथवा रति आदि से उत्पन शिथिलता को मिटाना । कीवी-करना । मनुहार-क्सिी का मान छुड़ाने और प्रसन करने के लिए की गई अनुनय विनय । ६ मोर के पखौवनि कोमयूरपखो का। छबीलो= शोभायुक्त, सुदर श्रीट = किरीट, राजमुकुट । माखन-सनेही-माखन से प्रेम करन वाली गोपिया, स्निग्ध == नवनीत । पटरस व्यजन-छ प्रकार के रसा से युक्त (मधुर, लवण, तिक्त, कटु, कपाय तथा अम्ल)। विरहानल-वियोगाग्नि । हरि-हरण कर। सुर-बद-देवगण । बलाइ-विपत्ति, वप्ट । गोविन्द गोपो का स्वामी। गुपाल= गायो का पालन करने वाला। बिहाइछोडकर । त्रिलोक = तीन लोक । १० मजु-सुन्दर । मनि-पुजनि= मणि-समूह । गुजति =घुघुची । मिसाल उदाहरण, उपमा । छावनाधारण नहीं कर सकती, अच्छी नहीं लगती। रतन-मैं- रत्न जडित। अच्छ-अच्छा। अच्छ-अक्ष, आख । लच्छ-असइ- लाख बार के बरावर भी। वाम धेनु-पुराणो के अनुसार वामधेनु चौदह रत्नो के साथ समुद्र-मथन के समय निकलती हुई गाय है जो प्रत्येक अभिलषित वस्तु प्रदान करती है । गूढ = गम्भीर छिपा हुआ । क्नूकावण। विलोक्न देखने मे । मलया-मलाई को मटकी। ११ रतनावर=समुद्र, कवि का उपनाम । उमगत-उमडता है। विर- हातप=विरह की उष्णता । पच-=भयकर तीय। उसास =उच्छवास । सवोर - झझावत, आधी-तूफान । जगत-जगना, उठना । वेवट-नाविक । पचि = परिश्रम करये । गुन-पाल= रम्सी तथा पाल विदेश आदि गुण । अवगत आकाश में उड जाना, लुप्त हो जाना। लगर-जहाज या नाय का रोक्ने का एक साधन । डगि डगमगावर। उद्धव-शतक १२ सोल सनी प्रेम भरी, आर्द्रता-युक्त। सु-बात-सुदर बातें, सुदर वायु । पूरब की-पूर्व दिशा की, पुरानी। औरे-विलक्षण, अय ही। ओप- चमक, दीप्ति । दृगनिमैन, दिशाए । मिदुराने-अधनिमीलित, घिरना, छा जाना । चमक- टीस एकाएक उठने वाला दद, बिजली की चमक । उर- हृदय, मध्य । धनश्याम-कृष्ण, काले काले बादल । अधीर अस्थिर। जकुलाने- व्याकुल । आसाछन- आशा भग्न हो जाने से, दिशाए आच्छादित हो जान से । दुरदिनः बुरे दिन, मघाच्छन दिन । दीस्या-दिम्राइ पडा। सुरपुरमाहि-देव लोक मे, आकाश में । बारिवालाएं, वाटिकाएँ। हरियान त-प्रसन होने से, हरा भरा होन से । नीर को प्रवाह = अथुधारा । तीर-किनारा। अचल पवत। रसाने त-धीरे-धीर बहने या टपकने से, द्रवीभूत होने से। १३ कातरता--व्याकुलता, विकलता। अवाइ=अवाक, मौन । सर = खिसक गए। भूरि-अत्यधिक । भोति - भय । फनिद- फणीद्र, शेपनाग। करके - कडक गए चटक गए। सुरराज - देवताओ का राजा, इद्र। धाए - दोडवर जाना । धाम = घर । बिधि ब्रह्मा । हर=महादेव । बामनि-स्त्रिया । बाम-बाएँ। १४ हेत-प्रेम । खेत क्षेम । गापि-छिपाना, रखना। गमनी नहीं जाना नही, चलना नहीं । करनी हथिनी। प्रतीति काज-विश्वास के लिए। करनी-काय । ताहि = उसके । घात =मौके की तलाश । बिमामी = विश्वास- पाती । छनौ नही=मत फसा । वारनि क्तिक--क्तिनी बार। बारनि कितक पर क्तिना निषेध करें। बारन उबारन-गण उद्धारक । वारन =हाथी। १५ पाँची तत्त्व-पच तत्त्व = क्षिति, जल पावव, गगन, समीर। सत्व सार-तत्त्व (ब्रह्मा)। तत्त्व ज्ञान - सृष्टि विनान ब्रह्मज्ञान वेदात के अनुसार अविद्या का नाश और वस्तु का वास्तविक स्वरूप पहचानना ही तत्त्व ज्ञान है। श्रुति == वेद, निगम आदि । गायौ - विस्तार से वणन करना । भेद रहस्य । पच भौतिक-क्षिति, जल आदि सष्टि रचना के मल उपकरण । एक भाव-समभाव अर्हता भावना। सचोप- मोल्लास । आप ही सौ आपुको स्वय का स्वय से ब्रह्म का ब्रह्म (जीव) से क्याकि दोनो मे एक तत्व विद्यमान है। विछोह-वियोग। ठायौ = गहराई। १६ दिपत प्रकाशमान । दिवाकर-मूय । तुमसन-तुमसे। थाह - महराई । असत-मिथ्या । पसार-प्रसार, सष्टि । जागत = जाग्नतावस्था म । पागत - लिप्त होना। परपचनि प्रपच, सासारिख झमेरी । लहितो पर समझते है, प्राप्त करते है। १७ टोक रोग, बाधा । विशद विशाल । इमि= इस प्रकार । अहरि- अंचकर सागर के समान चचल, हृदय को स्थिर करके । हीतर हृदय तल । शब्दाथ समनशमन करना, शात करना । पुचारेलेप, सारवाना देना, पुचकारना। नालिकाली। १८ प्रेम नेक-प्रेम का व्रत 1रिवारि-हटावर। उर अतर ते हृदय के भीतर से । निधान सागर । जोति-ब्रह्म ज्योति । जोइ देखकर । जरि लह जल लेंगे, पष्ट सहन कर लेंगे । सवन-वान 1 सीख उपदेश । सुधार मुखीनि च द्रमुखिया । १६ यत्र पूर्वाम्मर फूलना, जान डालना। मत्र चार प्रकार के वताय गये है-मारण, मोहन, उच्चाटण और वशीकरण । यहाँ अतिम से अभिप्राय है। हसक । भावनि- भम्बा । गहवर - अवरद्ध, गह्वर । वढन निकलना, अभिव्यक्त होना । नन मग- नेत्र माग से। अगवानी है- पहले ही। भारत- नमगिक, स्वाभाविक । पानी- जल, अथु । पलट-परिवर्तित होकर। २० हियो-हृदय ।मास्योई-- निकल पड़ना । रस्यौई-बूद-बूद टपकना रोम झिंझरीनि सौ-राम-कूपो से लोमद्रिा से ) जानन मुख । दुवारद्वार। २१ रससिरिसती हुई । भूरि- अधिक । हुलास =इच्छाएँ । उरात है--समाती है । सीरे शीतल, सुखद । पाता-१ धक्का २ सुयोग। २२ पन-प्रण, सकरप २ पण, सौदा सुजस - मुकीर्ति उछाह- उत्माह सभार मनियत्रण म छरवि -छल हरे धीरे धीरे। पजी-१ ज्ञानोपदेश २ धन । तमाननि= यमुना के किनारे या-पवता पर मिलने वाला एक विशेष यक्ष । विरमानी अटक गई फम गइ । अरु और । करीरनि: वरील, पतो रहित थाडी । झारि-झादो। २३ गुमान =गा । घटि घट । पटि जानि लग--म जान पड़ने लगा जाग के विधान- योग की प्रियाए अथवा अग~~यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि । पगपारत ही-पैर पडते ही। नान मारतड-ज्ञान रूपी मूय । मानस-१ मन २ मानस राकर । सरमः सजल । सुहाए- शोभायुक्त । धनश्याम-१ कृष्ण २ मघ । २४ छाप अक्ति है । छाप- मुद्रा। छाप छाप एव = जिनके हृदय म एक ही ब्रह्म की मूर्ति अक्ति है । सान-मयुक्त, अभिभूत । सोई-वही। आनि मार सिवान सीमा। सिथिलित-शिथिल, मालस्ययुक्त । गर-गला । गरवाने -- अवरुद्ध होना । पुनकि-प्रेम, हप आदि से रामाचित हाना । पसीजि द्रवित होना। पाम पाश्व, छाती। चापि-- दवावर ! चयारिम्हवा। बरसान - वरमाना, राधा का निवास स्थान । २५ भ्व रही-आतप्रोत हो गई। बिलावि-देशपर । स्वं रही-खो दिया, भूल गई । लेगिमन ही मा हरहगरायलिपि । तिन - उना। ज्व रही-देय रही हैं। उद्धव शतक - - 25 २६ झौरि झौरि- झुण्ड के झुण्ड । उझवि = उचक्कर । पद कजनिः चरण कमल । पजनि पै=पजा पर। पातीपत्र। छोहनि उत्कण्ठा। छवै -भरना। २७ अपरजोर । सनस-सदेश । रसना =जिह्वा । जोग =भावी मिलन अवसर । निगस वासना=निराशा का भाव, निगु ण भावना । उमाहि = उत्साहित होकर । साहि-निश्चय करके, स्थिर करके। उत-उधर । कराहि - कराहना, पीडा से आह भरना। २८ गरि गौः गल गया । गुमान गव । गुणने स-कुण्ठित हो जाने से । सिहरने स=सहमे से। सम-शिथिल। सक्वक हक्के-बक्के स। सके = शक्ति । भमरे - घबराये हुए। भकुवान में वित्त व्यविमूढ स, बौखलाये से । होले से = धीरे से । हल=पित । हल = लाठी जादि का सिरा। इते- मारे । हूल हूले से लाठी जादि के गिरे का धरका (बाएँ से)। हरे से लुट से, खोए से । हिराने सखाए हुए से। २६ नासिब नष्ट करने । पारि डालकर । मति-बुद्धि । रति माती- प्रेम मे निमग्न । उधिरानी-नष्ट हो गई। विषम=१ दुखपूण २ विपरीत । ताती-१ कष्टदायक २ तप्त । बरी-प्रज्वलित । बाती-१ वार्ता २ बत्ती। अलच्छ जलस्य । दुरे-छिप गए। ३० विलस्यो रहै =आनद के साथ सलग्न रह, ध्यानावस्थित रह । ध्यान --योग के आठ जगाम से एक जिसमे वित्त के प्रत्यय की धारणीय वस्तु के साथ एकाग्रता हो जाती है। सुनन्तरमुखी है ध्यान बाह्य ध्यान को अतरमुखी साधना द्वारा अत करण में ले जाकर । हिय कज-हृत्वमल, सिम ब्रह्म स्वरूप नान ज्योति प्रज्वलित होती है । जगी-प्रकाशित । मजु हिय कज जगी हृदय म सुदर कज क्ली खिल उठी, महस्त्र कमल ब्रह्म ज्योति जल उठी। धस्यो र= लीन रह । जड चेतन विलास-जड और चेतन का जान द, सायुज्य मुक्ति को और सकेत है, ब्रह्म और सष्टि का सल । जाहत =देखत हो। विक्स्यो रहे प्रगटित होता रह । विक्षोभ, ब्रह्म के हृदय म विक्षोभ हाने पर मष्टि की निर्माण प्रक्रिया चलती है । छोहि-क्षुब्ध हावर । ३१ समोई =व्याप्त। विभूति-वैभव, वह धूलि जिसे योगी लगात है तथा सामाय जना को लगाने के लिए ब्रह्म के प्रसाद रूप में देत है। -भी। प्रभू तनि-प्राणिया म । पोई = गुथी हुई है पिरोई हुई हैं।माया=अविद्या । प्रपच % घाखा । भासत-प्रतीत होता है । प्रभेद-भेद, विभिनता, ब्रह्म एव जीव म तथा जीव जीव म जा भेद प्रतीत होता है वह वास्तव मे भेद नहीं है अपितु भेद बुद्धि के कारण परिलक्षित होता है। फलकनि-टुक्डे । भ्रम-पटल-भ्रम का आवरण, परदा। शब्दाथ यो देखोघट हृदय । पारिधि यो बूद सागर और बूद, ब्रह्म बार जीव, कृष्ण और गोपी । अविचल नित्य स्यायो । विनापरुदन । जुगती = उपाय, युदिनी जगावी समित करो, एकत्र करो। छीन क्षीण । ३३न्थहगनी - काँपने लगी। थानहिं - अपने स्थान पर थिरानी - स्थिर हो गई । रिसानी-योधित हुइ । वररानी बडबडाने लगी। चितखाने विलाप करने लगी। विथकानी-शिथिल हो गई। सेद साना- प्रस्वेद युक्त हो गई। विललानी-तडपन लगी। सुखानी - मुख गई। ३४ रस-१ आनाद,प्रेमरस २ भस्म, पारद आदि औषधिया । प्रयागनि -१ प्रसग, प्रेमालाप २ रासायनिक पयोग । सुपद -१ सुष देने वाले २ आराम देने वाले। जागनि । सयाग के २ रासायनिक पधिया के योग । उपच र १ उपक्रम २ इलाज । चलावन की-१ चलान को २ प्रयोग करन की । मुटशन-- १ सुदर दशन २ विषम ज्वर अचूक औपधि माने जान वाला घूण विशेष । सुधि सिराइ है - १ स्मृति भूल गए है २ ध्यान भुला दिया है। उपाय-१ उपचार २ उपाय । सुझाव-१ स्वभाव २ गति । लपि १ देख कर २ परीक्षा पर । नारिन १ स्त्रिया २ नाडी । अनारिनि-१ अकुशल प्रेमी २ अनुशल वैद्य। पाती -१ पत्र २ चिट्ठी । विषम ज्वर ज्वर विशेष, जिसके चढने का समय नियत नही होता और इसमे तापमान तथा नाडा की गति परिवतिन होता रहती है। ३५ बौक्ब थव । वरेजोल्य । उराहनो-उलाना, उपालम्भ । सलोना-लावण्य युक्त । ३६ रजा-१ आनदित करना . रजन करने वाले अर्थात कृष्ण । नवनीत -मक्सन । विरद यश । पाक्सासन-इन्द्र। पासनि-दिशामा म, पार्यो म पांसुरी उमाहि- पसलिया उभारकर, पसली फुला पुलावर । कबी कभी। ३७ कधा अथवा । आनि-विपरीत । अनारी-१ अनाडी जो नारी वी न हो। अयारी अभेदता । बिलहै = विलीन हो जाएगी। ३८ चोपि करिमोत्साह । चढायो आलेपन विया । रितुरही, सिपादरिवो कही- मलन के लिए कहत हो । रस रत्नाकर-१ रस के सागर कृष्ण २ रत्नावर कवि का उपनाम । सन्नेह- १ प्रेमसहित २ तेल लगाकर । निवाग्यो - मुलझाया । ता-उन । बच वेशा का। अरविद-कमल । जटा जूट वरिवो यही जटाआमा जूडा बनावर लपटने के लिए कहन हो । कार चचुवत = वौए की चाय के समान (समद्विबाहु त्रिभुजाकार) विवृत आकार चाला । ताइ गम पिए हुए। धीर-नीर-धय पी नीर। अजवादपद्रमा की तरह ब्रज का शीतल करने या अर्थात वृण उदव थत Krman ३६ चितामणि चितामणि एक कल्पित रत्न है जो समस्त अभिलापाओ को पूर्ण करने वाता माना जाता है। यहा पर सम्पूर्ण कामगालो को पूण करने वाले श्रीकृष्ण से अभिप्राय है। पंवारि फैक्कर। धूरि धारनि मे == धूलि की धाराओ म । कांच मन मुतुरमन रूपी काच का दपण । सास- बुयाने को। वयारि भखिबौवायु का भक्षण करना, प्राणायाम करना । रूप रस हीन अरूप, निपुण । निरपि चुके -निरूपण कर चुके । पैय-पाइए । निकुटी दोनो भौहो के बीच कुछ ऊपर का स्थान, त्रिकुट चव का स्थान । ४० जोग:-१ याग २ सयांग । दरस-दशन । दीयो-दिया। दरिब नष्ट करने को। टूक टूक -टुकडे टुकड़े। चूकि हूँ- भूलकर भी । बैन पाहन - वचन रूपी पत्थर । उजारयो-उजाड दिया है। ४१ बुझाएँ - समझाने से । वथा = व्यथ । घावकरि घाव करके । लोन नमक । सौ-सा । कूटि-कूट कूटकर । लुनाई- नमक । लाइ-मिलकर । सुधाई सीधापन। ४२ पीजर-पिंजडे में । कानिमयादा । गुन १ गुण २ रस्सी। लगर -- नाव या जहाज को रोकन वाली भारी लोहे की बनी हुई वस्तु, बधन । टेक करि -प्रण करके । सास भूटिमास रोककर, प्राणायाम से आशय है । बानवेश, माग । मुक्ति मुक्ता-मुक्तिस्पी मोती। माल = तत्व । मानिक =माणिक्य । वारि चुकी= यौछावर कर चुकी । ४३ बादिव्यथ । गुनाकर-१ गुणो के समुद्र २ रज्जु राशि (रस्सी) मग--माग । बय्यार-माग मे लूटन वाले, डाकू । टालटोली । लोल-चचल उत्सुक । मुाति = १ मुक्ति २ माती । बधूबर श्रेष्ठ दुलहिन, कूबरी से आशय है । ऊबर भई-शेप बची रही। मधुपुर-मथुरा। ४४ परतच्छ-प्रत्यक्ष । प्रमान-प्रमाण ,प्रमाण चार प्रकार के मान गए है -~-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द । ससा मिग-खरगोश के सीग, अस्तित्व हीन वस्तु । भ्रम भौर-भ्रम रूपी भवर । भूप-राजा । अलख - अलक्ष्य, अरूप- रूप रहित निराकार। ४५ लखात-दिखाई देत है । ब्रह्मजोति = योग साधना के अतगत पचाग्नि । जगाइजलाकर । तात्यो उससे । सरि है- सम्पन होगा । अनग:- कामदेव, वामदेव वे सदृश्य सौन्दयशाली श्रीकृष्ण । साधि- साधना करपे । साध -कामनाए । अग-रहित वामदव, निराकार ब्रह्म । अराधि- उपासना करके। ४६ बदन-मुख । गोधन गवाइहै = गोधन के गीत गवायेगा, दीपावली के दूमरे दिन गोवधन पूजा होती है तथा स्त्रियों और पुरुष मण्डली बनाकर गोधन के गीत गाते हैं । यह प्रथा ब्रज में आज भी प्रचलित है । भोर-सरल स्वभाव वाल। बराइहै-दूर करेगा। %ES शब्दाच %E ४७ वसन = वस्त्र । वामर -दिन । रमा रगना, रग लगाना । भुक्ति - भोग, विषय भो। ४८ समाधि -याग का चरम फल, इस अवस्था म योगी प्राय पद्मासन लगाकर ने मूदकर बैठ जाता है। उसका शरीर गनिहीन रहता है और ब्रह्म म अवस्थिति हो जाती है । यह चार प्रकार की कही गई है-१ सम्प्रज्ञात २ सविता ३ सविचार, ४ आनद । निपट: नितातानिबेरी-निवत, मुक्त। इतधौ - इधर को। साधना=शासन : जमा-पूजो, धरोहर । सुरपति इद्र। कमेरी-दामी। ४४ अपबरग-मोक्ष। आन लाना। सासनि-प्ट। 10 जग सपनौः अद्वत वेदात के अनुमार जगत स्वप्न है, मिथ्या है । परत -प्रतीत होता है । वयात हा-बक रहे हा । जिमि जिस प्रकार । जको- घकना, रट लगाना। ५१ वा व्यथ । सुधौवाद-सीधा माग । काय ~ वाया, स्वरूप । नसाव फोन नष्ट कौन कर । ज्याति ज्वाल को नहा ज्योति की अग्नि म । जगाजग चकाचौध। ५२ वाही- उसी। मरीच-किरणें। भानुभूय । जुहारि प्रणाम करके । विरचे-बनाए हुए । बिरचि ब्रह्मा, विधाता । सास= शाति । चरिबी -आचरण करन को। ५३ प्रेम रतार-१ प्रेम रुपी गभीर एव अथाह ममुद्र २ कविका उपनाम है। मीननिमछलिया । इहि-इस । भव ससार । गोपद गाय के गुरास बना हुआ गदा। मीच --मृत्यु । विनु मीच अकाल मत्यु । बलाय :- विपत्तिया। निकायममूह । घरक-डर, आशका । ५४ जमान-समूह । भौति-भित्ति, दीवार । छात-छने । पालप्ट ज्ञान छैम-ज्ञान के द्वारा कुशल मगल ५५ करक्या-कडवर टूटना। भगोही -भगवा रंग की।भंप रख- वस्था की ग्या । रचिहै रग हुए। ५६ उमीर =UT : पुलकावलि रोमाथि। सीरी-शोनल । उसास- ५७ चम-१ टास २ प्रकाश । अवरोगी अवरत करेगा। माहगी--- शाभा दगी। मदत -धोखा दार मूल्यहीन यस्तु का मूल्यवान वतार जबरदस्ती दूमर का सापना। ५८ गिरिस गनि-१ पवत का चाटिया, २ मन्न, महात्मा, यागा आदि। तिहारी तुम्हारी। पता-१ गिरणे २ चतुराई। यटिहै = १ हटगी, उदव गतव २ चलेगी। तन-तूल = तिनके के वरावर भी। रसना-जिह्वा । विहाइ-छोड कर । घनश्याम =१ कालेबादल २ कृष्ण। ५६ ख्याल-१ ध्यान २ श्रीडाए । अनय-रसबारे-१ अन यरसिम श्रीकृष्ण २ अयधिक रमपूण । असारे = अखाडा~यहा मचित होने में अभिप्राय धूप और ६० मुनी-गुनी समझी-श्रवण मनन और चितन कर। जिती = जितनी । कविताई--कविता, अथहीन बाते। त्रिकाल - तीन बाल =' भूत, वतमान तथा भविष्य । त्रिलोय =तीन लार = स्वगलोत्र, मत्ययताक तभा पाताललोक । आने = स्वीकार करना । आन= जयवात । निदव तीन देवता-ब्रह्मा,विष्णु महेश । प्रतीति-विश्वास ! निवाचा निवचन, बल देने के लिए, विसी बात को तीन बार कहना । जी-हृदय । ६१ २८ करके । गिलि जाइगो-निगला जायेगा । दरगी-मलेंगी। पाधि-आचि-पचाग्नि--एक प्रकार का तप जिसम ग्रीष्म ऋतु में तपत सूय के नीचे बटकर योगी अपने चारा आर आग जला लेता है। झर= जलन । एती- इतनी। ६२ लवनि - कमर मे । मलि लहै =मल लेगी । छार= राय भस्म । ललवि = उत्साह से भरकर। घनेरे-धना, गम्भीर । घाम पाला- शीत, यहा कष्ट और विपत्तियो स अभिप्राय है । इभी । ताकी उमका, योग साधना का। ६३ साधिह साधना करेगी। अराधिहै = आराधना करेगी। आधि :- मानसिक व्यथा । व्याधि= शारीरिक कष्ट । निरबह --निवाह करेंगी। पट- परदा, वस्त्र । मिलहै = तुलना करेंगी। चाय-चाव । ६४ मधुपुरियान मथुरावाले । अगुन = निगुण । बद - गाठ। निरवास -सुलथाना । याय = १ सत्य २ तक । नखिया = नाखून बुद्धि । मौर-बारी- मुकुट धारण करने वाला (श्रीकृष्ण) । मोर पखिया = मयूर पख अथवा मयूर पख की आखें, ज्ञान की बनावटी आखें। ६५ ढरकि- ढलाना । परकि= द्रवीभव होना । कखियानि-बगलें। लेखते =देखत । त =से बहूधा=क्सिी स्थान पर । वखान वणन । ६६ चपल-चचला । चितौनि चितवन । चुवात= टपका पडता । पारे न बसह-चश नहीं चलेगा। हिरहै-खो जाएगा। टिटेही-जल के किनारे बसने वाली एक छोटी चिडिया जिसका सिर लाल गदन मफेद पख चितकबरे, पीठ खरे रग की दुम मिल-जुले रगा की और चाच वाली होती है। तनव = जरा भी। अगस्त -अगस्त्य = ऋषिविशप:-इनके पिता का नाम मिनावरुण था, उहाने उवशी को देय काम पीडित हो वीयपात दिया, जिममे अगस्त्य का जम शब्दाथ हुआ। तपस्या ये बल से इहोने एक ही घूट मे सागर का मारा जल पी लिया था। छिपाकर । भडा-भाडपत । टाय-टापबवास । मुह चा - डफ की तरह एक बाजा, व्यथ की बातचीत ! सास रोक्वि - सास रोक्ना -१ मरने को २ प्राणायाम करने को । उतग-ऊचा । सतसग -अच्छा साथ - यह कुमग के प्रति व्यग्योक्ति है। ६८ मुराइ भुलावा देकर ! नाय नाव ! नीक भली प्रकार यारी को अलग कर दिया। पूत- किनारा मर्यादा । पारि डालकर पगने- पलायन कर गए । पतवारो-नाव के पिछले भाग की जर वा एक अग जोकि तिकोने आकार का होता है। यह आधा जल म और आधा बाहर रहता है तथा बाहर वाले भाग मे एक डडा पडा रहसा है जिसे एक्डकर नाव घुमाई जाती है। गुनवारी= रम्मी २ गुणवान कृष्ण कुठारी---कुल्हाडी। ६६ पाल एक लम्बा चौडा कपडा, जिसे नाव वे मस्तूल से लगाकर इस लिए जाना जाता है ताकि उसमे हवा भर जाये और नाव को आगे बढ़न मे सहा. यता मिले। पतवारी तलवार। पति-मर्यादा । पतवारी-पति-मर्यादा का रक्षक (कृष्ण) । केवट-मल्लाह । परायो- भाग गया । कूब - कूबड़ । तूबरी-तबी तरने में सहायक होती है। निरगेन- १ निर्गुण २ रस्सी रहित । लगार रस्सी, बधन । पारी डाल दी है। तरनी-नाव। ७० तपेला भट्टी । अपेल मदेव बना रहने वाला। रेलगेला भीड भाडा ७१ एते-इतने । भाव-वारी- गुण अपवा घम वाली, अनुभूति में जानी जान वासी । भुजगनि- सपो की टेढी गति, शलो की, श्याम रप बाली की। देवप्रतिमा। ७२ दोनाचल-द्रोणाचल, पक्त विशेष । छिगुनी सबसे छोटी उगमी। छाछत्र रक्षा का छिति-पध्वी। रव-पोडा। रा-अनुरक्त होने पर पानिहाय । पशिश पर । जान पहा-क्या जाने। यजान नासमझ । गुजान-चतुर । पुरुभारी प्रेमाचल-प्रेमरवत । ७३ मुहर लगाइ गए-रक्षित घर गए। पाती बम्पति वियोः दूसरा। धूनी पटपूण । जनम मपाती-जम पे यापी। पापन - म्यापना मे लिए। ७४ गुपर - मुदर । गलाने सारण्ययुत । बगीठ -दूत । देश गरेशा पूरे फिगै उत्गार म धूमा। चा=पायरी, पून राग, पाडा बराा-सरिजनोर बना। गिरगिरीमनि - गवय रसित, पृष्य । परमपूर । पटरए -भेना।
७५ सरोजनि- कमलो। मकरद-पराग, पुष्प रस । दरारं-बहता है। सचि-एकत्र करके । पार है =डालते है । गार-गिरता है । मधुप-१ भ्रमर • उद्धद । नेह =१ २ प्रम । अछेह असह्य । बगार है-फलाता है। ७६ अमगुन-अपशकुन । कटाई ना लक्ष्मण द्वारा सूपणखा की नाय कटाई । बरि कूब कूबड करवे । फेरी फाटी है-पुन फट पड़ी है। पारेखो खेद । पाकी-पक्की, निश्चित । रगभौनरग महल । पाटि देत= बराबर कर - ७७ राइराजा । पच्छवारे-पक्ष वाले । लाइ-अग्नि । लाई लगाई। जवलनिस्त्रिया । ढरारे= कृपालु । ढारसाचा । ढारे= दले हुए । अर १ जो निदय न हो। एव यादव विशेप। ७८ छतीसे= छतीस विद्या जानने वाला, धूत । छलिया-छली । बीस बिस --निश्चय ही । बीर बामन = बामन भगवान । क्लोच-अशभूत, अवतार, छलाग । साढे बाइस-- बहुत छोटा । जोग छठ-आठ = पडाष्टक योग ज्योतिष अनुसार वर की राशि से यदि क्या की राशि छठी या आठवी हो तो उसे पडाष्टिव योग कहते हैं । इस योग का विवाह वमनस्यकारी माना जाता है । हरी प्रेम । काच- योग । तीन गुण = सत्त्व, रज, तम-त्रिगुण । तीन तरह- तितर बितर होना। तीन-पांच-चार मे डालने वाली बातें करना । ७९ प्रससि-प्रशसा करके । मुष्टिक चनूर-मुष्टिक और चाणूर नामक दो याद्धा, जिनका कृष्ण से मल्ल युद्ध हुआ था। मल्लनि योद्धाओ, पहलवानो। क्सकायो - पोडा उत्पन्न हुई। सुख मूरि- मुख की जड, जज मे कृष्ण की उप स्थिति से आशय है । गाजबजाघात । ८ जोग मतर-जोग मत्र, मतर शब्द से जादू-टोन की ध्वनि निक्लती है । विलग-पथा । चेतवारे सावधान । प्रानमूरि-प्राणाधार। मुकुर - दपण । १ ब्रज जीवन कृष्ण । जच्छिनि आखा के । उघारि--खोलकर । लच्छ- देखो। लागअनुरक्त है । जीहा =जिया ! समीहा - समीक्षा । १२ काह माय =विसी भी तरह । उमहन उऋण होना । हुती ही थी। जुक्ति = युक्ति । भूरि-प्रचुर। लहन-प्राप्त करना । उगहन वसूल - करना। ८३ पुरती - पूरी पडती। विरोट काज- मुकुट बनाने हेतु । किरच टुकडे । कुभायकीवुरे भाव की। भावते-पम द आते । कीरति-चुमरि- वपभानु सुता, राधा 1 दूवरी-दुबली । पता-पुन वधू । ८४ हरि-१ कृष्ण २ विष्णु। पानिप-१ काति २ जल। भाजन- १ आधार २ बरतन । दगचलम्जाखो वे कोर । तपारवंग पूवक । त्रिलाद = स्वग, मत्य, एव पाताल लोक । ओर मडल-ग्रह तथा नक्षत्रावा मडल। शब्दाप १२१ ब्रह्मद्रव-१ कृष्ण की काति से युक्त अश्रुजल २ गगा की धारा । हर शकर। हरगिरि-कैलाश पर्वत । पठन-प्रवण करने के लिए।आधे कान-रचमात्र भी। ८५ वसिय वसी ही। पुरदरइद्र । कृपा विपरीत लक्षणा से राप ! बलि-मखी, सखा ! नातरुनही तो। ५६ बिलखाइ-बिलखकर। गोधन गोवधन । चख- नेत्र । निहोरि- आग्रह करे । दमाति-जगमगाती हुई। दिव्य-भव्य । इद्रकोप लोपक-इन्द्र के त्रोध को लुप्त करने वाला। ५७ विपिन --- वन, वनस्थली । वमन्तिकावली-बसन्त ऋतु की शोभा। पियराने -पीले पड़े हुए। बोर-१ बौर से युक्त २ पागल । वद समूह । लसत-शोभित होन है। रसान-१ आम २ रमवती। पिर-कोयल । बारिनि-१ कडिया, २ बाला । चवावचचा चुगली। पतझार १ पत्ता वा झडना - लजान रहना । तति-१ वृक्ष २ स्त्रिया । वरि- बीहड । बतास वायु ! काम निधि - वामदेव रूपी विधाता । बाम-विपरीत । क्ला- सष्टि । मीन मेप-१ अटि निकालना २ मीन तथा मेप गशियो मे ही बसत ऋतु होती है। ८८ जीवन-१ जल २ प्राण । दीन-१ उरलासहीन २ दुनित । दीखें दिपलाई पडता है । चबाई वान - १ तीव वायु २ निदारी परतें। पार्यो अग-१ अगो को जलाने वाला अर्थात सूप २ जिमपा अग जल गया है अर्थात कामदेव । विधाता-१ स्वामी २ व्यवस्था करने वाला। टमय अभिमान। बगर बगर-घर घर । वपभानु- १ वप राशि का मूय, वप राशि म तीब गर्मो पत्ती है २ राधा के पिता के नाम जा बरमाना राजा थे। ८६ पुरवा -पुरवंया हवा । पीव-पीव-पी-पी, प्रियतम प्रियतम । चपना -विजली। १० ललात-१ मिना २ ललचाता। जमला दिय-गाधर दशावी अभिलापा । विरह विधु --विरह पी चद्रमा। पालत धनी रहै-- गहरी चोट मारता रहता है। परनवामदेव । उमड ठनी रहै - उमडन रहत हैं । फरद -पट्टा, खा । दवामी स्थायी । ६१ रीत = साली नियंग तरस्म । बुगुमायुध - पामदव । हरे-हिरे। ताते इसलिए । पारी- उपाय । मानम-१ मानसरोवर २ हृदय । पाला- तुपार। मारा १ दिशा २ आशा। यारि१ जर २ एप गार। जनत- अपत्र । दिगतनिम-दिशाओम। १२ चापि चापि - दया दमादिर-गोन। पटामपन, आवरण । अलिश -१५मरिया २ सगिया | मनी -वी । पापत-१ कृष्ण २ गत। ६३ मा माहिनीमा माहन पानी गापियो। मसी1 -गी। जाम ૨૨૨ उदय शम जाला, मान योग आदि के प्रपच । परिबो-तैरना। प्रमानत-सिद्ध करते हो । प्रतच्छ-प्रत्यक्षा ६४ विहात-व्याकुल । सिधाइयो चले जाइए। सिरताज शिरोमणि, ६५ जनि-मत । हान्हा खाइ-बिलखकर । नास-पष्ट । सास तीजियो सोस लना, चर्चा करना। ६६ ताजन ताडना, पप्ट । रस-आनन्द । परिचारिका-दासी। विवेक मान, यहाँ छल कपट की बातो से आशय है। १७ गित तित-जहां-तहाँ । आरति पीडा । गज =घुघुची । सजाव दही जामन लगाया हुआ दही। मही=मट्ठा) दलकतिम्कापती हुई। पासुरी: पसलिया। पीत पट-पीताम्बर । नवनीत=मक्खन । सुरवारि-सुरीली। ६८ नाइ = झुकापर। भापन की-बहन की। महि जात है:-भूमि पर गिर जात हैं । ठाह जात हैं-स्थिर, जडवत हो जाते है । १६ ग्योत-उपाय ! फुरति-फूटती। होलत हृदयतल । लागै स्पश होत हो, लियत हो। १०० अलापि वक्त हुए। हलवल से= हडबडाए मे । सुदेश स्वदेश (ज) । अविरलगातार । चदहात तलवार । चल-अचल-जड चेतन । १०१ गरयाई-गुरता। हमेव- अहवार। हावाइ हल्कापन । बहिराई निवासरर । तमाई-१ त वापन २ तमोगुण । विनसाह क नष्ट करणे धौ-धौवनी। धमाइ-फूलवर । कोदनिदिशाआ । गोप की वधूटी- गोपियो। मार- सारण किए हुए । पारम्पाराएक चचल पदाथ । मुरवाई न -टिहार, डाला। १०२ सारपी-रष चलान वाला । नीठियाटिनता स । दीटिन-दप्टि गो।एन-नारा । कलिनी यमुना । ऐंदी-हांसी । रिमूरिफायवर । १०३ हाम-हताशा । उनवम । सून-भूप। अरथ-उदास अय गय । गोन-गमन। १०४ अली-अधिकातिमा, पारे के मल वेंचुल कहे जान हैं । भरि नही। गुभ-गोली-वल्याण को तरलता स युक्त । जोगनि-रामायनिए समाग । भावि: भावना, दोष दूर करने तथा गुण-वृद्धि के लिए क्याथ, स्वरस आदि राजा पोटने की क्रिया होती है उमे भावना रहते हैं । अमितः यधिर, पपए । प्रमान माना। घट-अतर-हृदय म्पी घडे म । धूम पमा रमापन - औषधि । १०१ नवाए गए। गुन-गौरव-गुण की गरिमा । गरव-गदीगर पाEिTAIनाम: नहर महीतूबी। गूदटी-पिपडे, फट. - । .4s पा । - पुराने कपड़े १०६ पारि मुटेयधारदरित हैं-दवा लेते हैं। आनन मुख उक्सी हैं = ऊपर करके मो. सामने करने । निचौह - नीचे । १०७ चकात=चविता सारतपोछते, मम्भालत। वहोलिनि-कुर्ते की बांह । राजे-सुशोभित है। १०८ रज-धूल । वलवीर-श्रीकृष्ण । सद्य-ताजा । पुहुभी-पथ्वी । वाछिगोद मे। १०६ तार-तारतम्य । सरि लेन देहु-शात हो जाने को। पुरन देहु -- स्फुरति होने दो। नसुक= थोडा । वढत-वाहर आत हुए। ११० हिरानी-खो गइ। दाम्न भीपण । दररनि-धक्के मे, टकराने मे। झारपट। १११ निपेधन =१ वज्य आत्तय २ मना करना, सगुणोपासक को मना करना। विधान --१ क्त्तव्य २ निगु णोपासव का प्रतिपादन करना । काली: कालियनाग। दवानल-दावाग्नि । सिवान--सीमा। अघर-ओष्ठ । जाले -पपडी पड गई, सूख गए। साले-कष्ट । लाले पर प्रान के प्राण रक्षा कठिन हो गई। ११२ द्रव्य-पदाथ । बारिद-मेघ । वारि=जल । अचयो-१ पिया २ आचमन किया । उपच्यौ - उलटना, उलटी होना। हरि हरि-१ धीरे-धीरे २ कृष्ण-कृष्ण । बरि-बरि- जल-जलवर। ११३ पन-१ प्राण, नान तथा योग का प्रचार करने का प्रण २ सौदा, सूक्ष्म । तुल्यो- तुल सका। साठी - १ सरकण्डा २ पूजी। हिरायो-खो गया। नाठी-नष्ट हो जाने पर। माठी- मट्ठा। आंठी - दही का थक्का । पूरि- रमना, मलना। ११४ जोप-यदि । वट वक्ष विशेष पुराणो के अनुसार वटवक्ष का नाश प्रलय मे भी नहीं हाता। भूपति-राजा। पुयपाथ-पुण्यजल गगाजल। ११५ एतौ-इतना। स वेदन-दुख के साथ । विलग-बुरा, दुख । धुरीन-धुरी, आधार। ११६ कुटीर-कुटी। रम्यसुदर। तीर-किनारा। रोनरमणीक । चितावनः-सजग करने, चेतावनी देने। इत-यहाँ। ११७ भाठी-भट्टी। लुवाठी-जलता हुआ कपडा वधी लकडी । लाग= १ धातु को गलाने हेतु दिया जाने वाला ताला पुट ।२ सम्बघ । मुहाग- १ सौभाग्य सुहागा । अदाग== शुद्ध । मुवत्त-मुदर बताकार परि-पफ्ड करमरीचि-किरण । लाव-लो, लगन । लाग-प्रेम । तम्न-तरण, प्रजड से जाशय है । तरनि-सूय । पाति मनि-सूयकान्तमणि । - - उद्धव शतक ૨૨૪
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