Central Institute Of Higher Tibetan Studies

Goraksh Bodh Vani Sangrah

Ram Prakash Ji Maharaj · the date of scanning

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श्री गोरख बोध वाणीसंग्रह
है
卐
प्रकाशक:
फूलचन्द बुकसेलर
पुरानी मंडी, अजमेर (राज.)
सर्वाधिकार सुरक्षित

NARERARMANANATANATANA
VANNANANANANANANANAS
श्री गोरख बोध
भजनमाला
ANSARKETPRAKANANDANAaratiNARERENTIANARANAMASKARINAKEN
सर्वश्रो मच्छंद्रनाथजी और गोरखनाथजी महाराज का
प्रश्नोत्तर, श्री दत्तात्रेय स्वामी एवं गोरख संवाद
तथा अभूतपूर्व ज्ञान-रोचकता मय
भजनों का वर्णन है।
卐
लिपि अनुबोधक-टीकाकार
[भारतीय समाज दर्शन, पिंगल रहस्यादि ग्रन्थों के रचयिता]
स्वामी रामप्रकाशजी महाराज अग्रावत
त
जोधपुर (निवासी)
Scossion
05.0481
卐
Shantarakshita Library
*Tibetan Institute-Sarnath
फूलचन्द बुकसेलर
पुरानी मण्डी, अजमेर (राज.)
प्रकाशक
[तृतीय संस्करण]]
सर्वाधिकार सुरक्षित
[मूल्य ७)००

* विषय-सूची १ विषयांक विषय गुरु-शिष्य शंका समाधान २ गोरख दत्तात्रय संवाद ३ गोरख गणेश गोष्ठी-संवाद ज्ञान-तिलक ५ अभय मात्राकथन ६ & बत्तीस लक्षण-ज्ञान परीक्षा सृष्टि पुराण वर्णन चौबीस सिद्धि कथन पातम बोध कथन पंचाक्षरी कथन रहराशि कथन दया बोध कथन १० ११ १२ १३ १६ ज्ञान माला कथन रोमावली अंग कथन पंच मात्रा कथन पंच अग्नि शिक्षा दर्शन अष्ट मुद्रा प्रष्ट चक्र नरप बोध आतम बोध १७ १८ भजन माला का भजन भाग प्रारम्भ ८ श्री गोरखनाथजी का संक्षिप्त जीवन परिचय नाथ परम्परा के प्रादि प्राचार्य जलंधरनाथजी के शिष्य मतान्तर भेद से गुरुभाई कौल ज्ञानी योगीराज मत्स्येन्द्रनाथजी का अस्तित्व काल अनुमानतः विक्रम की दशवीं शताब्दी के आसपास में अपने प्रमुख शिष्य महान सिद्ध-योगी और प्रसिद्ध महापुरुष गोरखनाथजी (जिनके जीवन वृत्तान्त आदि के बारे में अनेकों धारणायें हैं) जिनका जन्म विक्रम संवत् की दशेवीं शताब्दी के अन्त में अथवा ग्यारहवीं शताब्दी के आदि में होना साहित्य-इतिहास साक्ष्य है। तर्क की सामयिक-कसौटी से इन कोल ज्ञान सम्प्रदाय के महापुरुषों का होना विक्रम संवत के प्रारम्भ से दशवीं या ग्यारहवीं शताब्दी में होना है क्योंकि प्रसिद्ध भर्तृहरि महाराज तथा गोपीचन्द आदि के राज-त्याग तथा योग शिक्षा ग्रहण करने का समत्व काल वहीं पाया जाता है। यह उन्हीं महापुरुषों की वाणी विक्रम संवत् १८३६ मिति आषाढ़ कृष्ण पक्ष ६ बृहस्पतिवार से श्री रामजीदासजी महाराज के पौत्र शिष्य, श्री तुलसीदासजी के शिष्य बीरम- दासजी के हस्ताक्षर द्वारा लिखित पाण्डु लिपि मुझे प्राप्त गोरख बोध वाणी संग्रह हुई जिसे प्राचीन लिपि-भाषा से अनुबोद्धन करके बड़े परिश्रन से टीका बनाकर परिवद्धित-संशोधित रूप में पाठकों के लाभार्थ प्रस्तुत किया। जिसे श्री "फूलचन्दजी" व्यवस्थापक :-आर्य ब्रदर्स, पुरानी मण्डी, अजमेर ने प्रकाशित किया। तदर्थ सर्वाधिकार प्रकाशक द्वारा स्वरक्षित है। -- आशा है आध्यात्मिक जगत में एक विशेष प्रमाणिक विशुद्धता के साथ साहित्य की समावृद्धि हुई है जिसे देखकर आप महानुभावों के हृदय में बड़ा सन्तोष-भाव उत्पन्न होगा। इसमें यथासाध्य शब्द पाण्डुलिपि के जैसे के तैसे रखने का प्रयास किया है ताकि आन्तरिक भाव की प्राचीनता-भाव-गांभीर्यता बनी रहे। तद्यपि कहीं-कहीं -हर्द = हृदय, निरभै निर्भय, अनुभै = अनुभव, बूझयां पूछयां, जोति - ज्योति आदि शब्दों की लिपि को समानार्थक माधुनिक-उत्तमता को ध्यान में रखते हुए रूप दिया है, ताकि पाठकों को भ्रामिक उलझन न हो सके । पर जैसे -- तथांत पाठकों के लाभार्थ कुछ भजन संग्रहित भो देकर पुस्तक को उपयोगी बनाने का पूर्णतः प्रयास किया गया है।

गोरखनाथजी का शास्त्र -उर्फ- गोरखबोध भजनमाला श्री गुरु शिष्य शंका समाधान गोरख उवाच (१) स्वामीजी तुम गुरु गोसाई, अम्हेज शिष शब्द एक बूझिबा दया करि कहबा, मन कुनि करि बाशेस? प्रारंभ चेला कैसे करि रहै ? सतगुरु होय सो पूछयां कहे ॥१ भावार्थ-गोरखनाथजी अपने श्री गुरुदेव से पूछते हैं कि स्वामीजी ! मैं एक शब्द शिष्य होकर पूछता हूं जिसका उत्तर कृपा कर कहो--यह मन कैसे वश में होता है ? शिष्य को प्रारम्भ में साधक अवस्था में कैसे रहना चाहिए ? शिष्य के प्रश्नों का सत्य उत्तर देवें वही सतगुरु है।

गोरख बोध वाणी संग्रह ur - - श्री मच्छन्द्र उवाच अवधू रहबा तो हाटा बाटा, रूख वृक्ष को छाया। तजि बातों काम क्रोध लोभ मोह संसार को माया ॥ आप सू गोष्ठि अनन्त विचार निंद्रा अल्प अहार । प्रारंभ चेला ऐसे रहै, गौरख सणो मछेन्द्र कहै ॥२॥ भावार्थ-हे शिष्य ! साधक को चाहिए कि प्रारम्भिक अवस्था में किसी एक जगह जगत-प्रपची पुरुषों में न रहे और मार्ग, धर्मशाला या किसी वृक्ष की छाया में विश्राम करे और संसार को संसृति, ममता, अहंता, कामना, क्रोध, मोह, लोभ वृत्ति का धारणाओं को त्याग कर अपने प्रात्म तत्त्व का चिंतन करे। कम भोजन तथा निद्रा पालस्थ को जीतकर रहे । गोरख उवाच (२) स्वामोजी! कोण देखना कोण विचारना, कोण तत्त ले धरिवा सार । कोण मस्तक मुंडाईया, कौण ज्ञान ले उतरवा पार ।। भावार्थ-हे गुरु ! साधक को क्या देखना ? क्या विचार करना, किस तत्व में वास करना, किसके लिये सिर मुड़ा कर- किस ज्ञान को लेकर पार उतारना चाहिए। श्री मच्छन्द्र उवाच अवधू आपा देखिबा, अनंत विचारवा, तत्त ले धरिवा सार । गुरु का शब्द ले मस्तक मुंडाइबा,ब्रह्म ज्ञान ले उतरबा पार ।।

गोरख बोध वाणी संग्रह
दम की
भावार्थ-हे शिष्य ! अपने आप को देखना, अनंत अगोचर
को विचारना और तत्त्व-स्वरूप में वास करना, गुरु-नाम सोहंशब्द
ले मस्तक मुंडावे तथा ब्रह्मज्ञान को लेकर भवसागर पार
उतरना चाहिए।
गोरख उवाच (३)
स्वामीजी मन का कोण रूप, पवन का कौण प्राकार ।
कोण दशा;
साधिबा कोण द्वार ।।
भावार्थ-हे गुरु! मन का स्वरूप क्या है ? पवन का
आकार क्या है ? प्राणों को दशा क्या है ? और किस द्वार की
साधना करनी चाहिए?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू मन का शुन्य रूप, पवन का निरालंब आकार ।
दम की अलख
दशा,
साधिबा दसवें द्वार ॥६
भावार्थ-हे शिष्य ! मन का शून्य रूप है, पवन का निरा-
कार प्राकार है, दम की अलेख दशा और दशवें द्वार की साधना
करनी चाहिए।
गोरख उवाच (४)
स्वामीजी ! कोण पड़े बिन डाल, कौण पंख बिन सूआ ।
कोण पाल बिन नार, कोण बिन कोल मूआ ॥७
भावार्थ-हे गुरु ! जड़ के बिना डाल क्या है, पांखों के
बिना पक्षी कौन है ? किनारे बिना नारि कौन है ? और काल
बिना कौन मर सकता है ?

८ गोरख बोध वाणी संग्रह ? श्री मच्छन्द्र उवाच अवधू पवन पेड़ बिन डाल, मन पंख बिन सूआ। धीरज पाल बिन नार, निद्रा बिन काल मूआ ॥८॥ भावार्थ-हे शिष्य ! वायु बिना पेड़ के डाल (टहनी) है, मन पक्षी बिना पांखों के धीरज बिना पाल (किनारे) को नार (नदी) और बिना काल रूप नींद है। गोरख उवाच (५) स्वामीजी! कोण बीरज कौण खैत्र, कौण श्रवण कौण नेत्र । कौण जोग कोण जुक्ति, कोण मोक्ष कोण मुक्ति ॥७ भावार्थ-हे गुरु ! किस खेत में बीज क्या है ? श्रवण क्या है ? नेत्र क्या है ? किस जोग में जुगती क्या है ? और मोक्ष किसको कहते हैं, मुक्ति किसको कहते हैं ? श्री मच्छन्द्र उवाच ! मंत्र बोरज मति क्षेत्र, सुरति श्रवण निरती नैत्र । करम जोग धूरम जुगति, ज्योति मो बिज्वाला मुक्ति ॥१० भावार्थ-हे शिष्य ! बुद्धि रूपी खेती में मंत्र-जप का बीज फल देता है। अन्तःकरण का सुरता रूप वृतो को श्रवण तथा निरति चक्षु दृष्टि को नेत्र कहते हैं। कर्तव्ययोग, धर्म ही युक्ति और त्राटक साधन से त्रिकुटी स्थान ज्योति दर्शन ही बिना ज्वाला को मुक्ति है। गोरख उवाच (६) स्वामीजी ! कोण मूल कौण बेला, कोण गुरु कौण चेला। कौरण खैत्र कोण मेला, कोण तत ले रमे अकेला ॥११ अवधू

९
गोरख बोध वारणी संग्रह
?
भावार्थ-हे गुरु ! वृक्ष का मूल को सहारा क्या है, गुरु
कौन है ? चेला कौन है ? स्थान क्या है ? मिलाप क्या है ? और
किस तत्त्व को धारण करके अकेला विचरण करता है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! मन मूल पवन बेला, शब्द गुरु सुरतो चेला।
त्रिकूटि क्षेत्र उलटि मेला, निरवाण तत ले रमो अकेला ॥१२
भावार्थ-हे शिष्य ! मन रूपी मूल का पवन सहारा है ।
शब्द सतगुरु, अन्तःकरण की एकांत सुरति वृति चेला है । त्रिकूटी
स्थान पर उलट कर जोव-ईश्वर का मिलाप होता है, निरवाण
ब्रह्म तत्व के आधार पर निवृति परका अकेला विचरण करो।
गोरख उवाच (७)
स्वामीजी! कोण घर चंद कोण घर सूर,
कोण घर काल बजावे तूर ।
कोण घर पांच तत्व सम रहे,
सतगुरु होय सो बूझयां कहै ॥१३
भावार्थ-हे गुरु ! स्वरोदय में चन्द्र कहां है ? सूर्य को
स्थान कहां है ? काल किस घर में नाद बजाता है ? पांचों तत
बराबर किस स्थान पर रहते हैं ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू मन घर चंद पवन घर सूर,
शुन घर काल बजावे तूर ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
ज्ञान घर पांचों तत सम रहे,
ऐसा विचार मछंद्र कहे ॥१४
भावार्थ-हे शिष्य ! मन के स्थान चन्द्र, पवन के संग में
सूर्य शून्य के स्थान में काल का नाद बजता है, ज्ञान के स्थान में
पांचों तत्व की समता रहती है।
गोरख उवाच (क)
स्वामीजी कोण अमावस कोण पड़वा,
कहां का महा रस कहां ले चढ़िबा?
कौण स्थान मन उनमुनि रहे,
सतगुरु होय सो पूछयां कहे ॥१५
भावार्थ-स्वर स्थान में अमावस का क्या है ? पड़वा
(शुक्ल प्रतिपदा) क्या है ? कहां का महारस आनन्द लेकर कहां
पर चढ़ता है। किस स्थान पर मन का अवधान अाध्यान
रहता है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! रवि अमावस चंद सू पडवा,
अर्ध का महारस ऊर्घ ले चढिबा ?
गगन स्थाने मन उनमुनि रहे,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहे,
भावाथ -गुरु मच्छन्द्रजी कहते हैं-हे शिष्य सूर्य स्वर
प्रमावस, चन्द्र स्वर प्रतिपदा, नाभी स्थान का प्राण रस लेकर
गगन स्थान चढ़ता और दश में मन अन्तान रहता है।

गोरख बोध वाणी संग्रह
भावार्थ-हे गुरु
गोरख उवाच (६)
स्वामीजी आदि का कौण गुरु, धरती का कोण भरतार ।
ज्ञान का कोण स्थान है, शुन का कहाँ है द्वार ॥१७
ज्ञान कौन है ? पृथ्वी का पति
कौन है ? ज्ञान का स्थान कौन है ? शुन का द्वार कहां है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! प्रादि का अनादि गुरु, धरती का अंबर भरतार ।
ज्ञान का स्थान चितन है, शुन का परचा द्वार ॥१८
भावार्थ-हे शिष्य ! प्रादि का. गुरु अनादि है, पृथ्वी का
पति आकाश है, ज्ञान का चितन में निवास है और शून्य का
स्थान परचा (ब्रह्म) है ।
गोरख उवाच (१०)
स्वामीजी कौण परचे माया मोह छूटे,
कोण परचे शशि सूर फूटे ।
गौण परचे लागे बंध,
कोण परचे अजरावर कंध ॥१६.
भावार्थ-हे गुरु, किस साधन से माया मोह बंधन की
निवृत्ति होती है, किस परचे (साधन) से चन्द्र-सूर्य स्वर की
सिद्धि होती है। किस साधन से योग-बंध की सिद्धि तथा किस
साधन से उजर बंध की सिद्धि होती है।

१२
गोरख बोध वाणी संग्रह
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू मन परचे माया मोह छूटे,
पवन परचे शशि घर फूटे ।
कान परचे लागे बंध,
गुरु परचे अजरावर कंध ॥२०
भावार्थ-हे शिष्य ! मन के परचे (साधे-वश करने) से माया
मोह की निवृत्ति, पवन वश करने से चन्द्र-स्वर-सिद्धि तथा ज्ञान
सिद्धि से योग बंध (जीव ईश्वर एकता) गुरु की प्रसन्नता से अजर
बंध (जीवन मुक्ति तत्व) सिद्धि की प्राप्ति होती है।
गोरख उवाच (११)
स्वामीजी ! कहां बसे मन कहां बसे पवन,
कहाँ
चंद ।
कौन स्थान ए तत रहे,
सतगुरु होय सो पूछयाँ कहै ॥२१
भावार्थ-हे गुरु ! मन का निवास कहां है ? पवन का
वास कहां है ? शब्द का निवास ? चन्द्र का निवास कहां है ?
किस स्थान पर तत्व का वासा है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! हृदय बसे मन, नाभी वसे पवन,
रूपे बसे शब्द गगन बसे चन्द्र ।
अर्ध स्थाने ए तत रहे,
ऐसा विचार मच्छंद्र कहै ॥२२
बसे शब्द
कहां बसे

गोरख बोध वारणी संग्रह
भावार्थ-हे योगो ! मन का वास हृदय में, पवन का नाभी
में, शब्द का प्रावास रूप में, चन्द्र-सिद्धि का वासा गगन (दशवें)
में तथा तत्त्व शब्द का वासा निम्न (नाभी) स्थान में है।
गोरख उनाच (१२)
स्वामीजी ! हृदय न होता तब कहां होता मन,
नाभा न होती तब कहां रहता पवन ।
रूप न होता तब कहां रहता शब्द,
गगन न होता तब कहाँ रहता चंद्र ॥२३
भावार्थ - हे स्वामी ! जब हृदय एक देश वाची स्थान नहीं
था तब मन का वासा कहां था ? नाभो वाचक स्थान नहीं
होने से पवन कहां रहता ? रूप की उत्पत्ति से पहले शब्द कहां
था ? गगन (दशवां) होने से पहले चन्द्र कहां रहता था ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! हृदय न होता तब शुन रहता मन,
नाभी न होती तब निरमल निरंकार होता पवन ।
न होता तब शुन्नि रहता शब्द,
गगन न होता तब अन्तरिक्ष रहता चंद ॥२४
भावार्थ-हे अवधु ! हृदयवाची स्थान में होने से मन
शून्यकार रहता, नाभी के अभाव में स्पंद निपंस्द अलंकार रहित
पवन रहता । रूप के अभाव में शब्द शून्य रहता, गगन न होने के
समय चन्द्र (सिद्धि) ब्रह्म-लुप्त रहता।
रूप

१४
गोरख बोध वाणी संग्रह
गोरख उवाच (१३)
स्वामीजी ! रात्रि होती दिन कहां ते पाया,
दिन होते रात्रि कहां समावे।
दीवा बुझाना ज्योति कहां लिया बास,
पिंड न होता तब कहां प्राण का निवास ६२५
भावार्थ-हे गुरुदेव ! रात्री थी तब दिन कहां से आया
और दिन (प्रकाश) होते ही रात्री (अंधकार) का लीन-भाव
कहां हो जाता है ? दीपक बुझने पर ज्योति कहां लय होती है ?
शरीर नहीं था तब प्रारण-शक्ति का निवास कहां था ?
श्रीमच्छन्द्र उवाच
अवधू रात्री होती दिन सहजे आया,
दिन प्रकाश रात्रि सहज समाया।
दिवा बुझाना ज्योति निरंतर बास,
पिंड न होता तब प्राण का शुन्न निवासा२६
भावार्थ-हे योगी! अज्ञानान्धकार भूल माया प्रकृति
स्वरूप अनिच्छा रात्रि में चेतनत्व-धन शक्ति प्रकाश
सहज ही समावेश हुआ तब ज्ञान-प्रकाश चेतन प्रभाव से अज्ञान
तिमिर जड़ भाव स्थिलत्व का विलीन हो गया। दीपक (मानव
शक्ति) के बुझने पर चैतन्य-ज्योति चिदाकाश कूटस्थ (निरन्तर)
में वास करती है। शरीर न होने पर प्राण का श न्याकाश में तत्व
रूप सूक्ष्मांश निवास था।
का

गोरख बोध वाणी संग्रह
गोरख उवाच (१४)
स्वामीजी! काया मध्ये के लख चंद,
पुहुप मध्ये कहां बसे गंध ।
दूध मध्ये कहां बसे घीव,
विड मध्ये कहाँ बसे जीव ॥२७
भावार्थ-हे गुरू ! शरीर में चंद्र का निवास कहां है ?
फूल में सुगंध का वास कहां है ? दूध में घी तथा शरीर में जीव
का आवास कहां-कहां पर है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू काया मध्ये बेला चंद्र, पुहुप मध्ये चेतन गंध।
दूध मध्ये निरंतर घोव, पिंड मध्ये सर्व व्यापक जीव ॥२८
भावार्थ-शरीर में स्वरोदय इडा नाडी तथा त्रिकूटी स्थाने
दो चंद्र स्थान, पुष्पों में चैतन्य-सामान गंध पूर्ण रहती है। दूध में
घी अन्तरहित व्याप्त तथा इसी प्रकार शरीर के प्रत्येक रोमांश में
जीवात्मा की
अव्यहृत
शक्ति रहती है।
गोरख उवाच (१५)
स्वामीजी कहाँ बसे चंद कहां बसे सूर,
कहां बसे नाद बिंद का मूर,
हंसा पोवे
पाणी,
कोण शक्ति प्राण घर आणी ॥२६
भावार्थ-हे गुरु ! अन्तरहित साधना-मार्ग में चन्द्र,
सूर्य तथा नांद, विद का स्थान कहां-कहां पर है । हंसा कहां
कहां चढि

गोरख बोध वाणी संग्रह
की उन्नति पद आरूढ़ता से शांति की बून्द पीता है और प्राणभवन
में किस शांति का केन्द्र-बिन्दु लाया जाता है ?
श्रीमच्छन्द्र उवाच
अवधू उर्ध बसे चन्द अर्ध बसे सूर,
हृदय बसे नाद बिद जो मूर।
गगन चढि हंसा पोवे पाणी,
उलटि शक्ति आप धरि प्राणी ॥३०
भावार्थ-हे शिष्य ! अन्तरहित साधना में गगन (दशवें)
स्थान चन्द्र (ज्ञान ध्येय) और निम्न नाभी स्थाने अग्नि-नागदि
नाड़ी में सूर्य का निवास है। शब्द का निवास हृदय में है जो
बिन्दु का मूल स्रोत केन्द्र है। जीवात्मा पवन-कसौटी से दशवें
चढ़कर शान्ति बून्द को प्राप्त करता है। अपनी शक्ति को उलटि
कर स्थिर की गई।
गोरख उवाच (१६)
स्वामीजी ! कहाँ उत्पत्ति ते नाद, कहाँ नाद समि भवते।
कोण ले स्थापिते नाद, कहां नाद विलियते ॥३१
भावार्थ-हे गुरु ! शब्द की उत्पत्ति कहां होती है । और
शब्द कहां समभाव, कहां स्थापन, एवं कहां विलय होता है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
प्रवधू औंकार उत्पत्ति ते नाद, नाद शुभ सम भवति ।
पवन ले स्थापिते नाद, नाद निरंजन विलियते ॥३२
.

गोरख बोध वाणी संग्रह
भावार्थ-हे शिष्य ! ओ३मकार बीजमन्त्र से शब्द की
उत्पत्त, शून्याकाश में नाद की समता पवन (वायु) के संग से
(शब्द ध्वनि) की स्थिरता और निरञ्जन (महाकाश गगन) एक्यता
में शब्द का विलय हो जाता है ।
गोरख उवाच (१७)
स्वामीजी! नादे न नादिबा बिदे न बिदवा,
गगने न लाईबा आशा ।
नाद बिंद दोऊ ना होईगा,
तब प्राण का कहां होइगा बासा ॥३३
भावार्थ-हे गुरु ! सृष्टि के प्रारम्भ अन्त में नाद तथा
शब्दाकाश, बिन्दु तथा वीर्य प्रजनन शक्ति नहीं थी। शून्याकाश
का आशाद्वार और नाद बिंदु दोनों के अभाव में प्राणवायु का
निवास कहां होगा।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू नादे भी नादिवा बिदवी,
बिदवा गगने दिलाईबा आशा।
नाद बिन्द दोऊ न होईगा,
तब प्राण पुरुष का विरंतरि होईगा बासा (३६
भावार्थ-हे अवधू ! शब्द, शब्दाकाश, बिन्दु-प्रजनन शक्ति
शून्याकाश-पाशाद्वार (नाद बिंदु) रहित सृष्टि में अणु-परमाणु
वाद सिद्धांतानुसार प्रारण चैतन्य शक्ति का महाकाश भूम में
निवास होगा।

१
गोरख बोध वाणी संग्रह
--
गोरख उवाच (१८)
स्वामीजी ! आकार छूटसी निराकार होवसी,
पवन न होसो पाणी।
चंद सूर दोऊ नहीं होसी,
तब हँस की कौण निशाणो ॥३५
भावार्थ-हे गुरु ! देहाध्यास सृष्टयाकार प्रलय होते समय
वायु जल चन्द्र, सूर्यादि, पांचों तत्व नहीं रहेंगे तब जीवात्मा का
निवास कहां होगा।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! सहज हंस का खेल भणीजे,
शुन्य हंस.. का
सहज ही आकार निराकार होसी,
परम ज्योति हँस का निवासा ॥३६
भावार्थ -- हे शिष्य ! साकार सृष्टि देह जीवात्मा की लीला
वपु ख्याल है, जब यह आकार विलय हो जाएगा तब स्थूल-सृष्टि
उत्पत्ति से पूर्व की स्थिति वत शून्याकार परम चैतन्य प्रभा स्वरूप
जीवात्मा रहेगा।
गोरख उवाच (१८)
स्वामीजी.! अमूल का कौणो मूल, कहां का बास ।
ता पद का गुरु कौण है पूछत यति गोरखनाथ ॥३७
भावार्थ -हे गुरु ! जो सृष्टि स्वरूप वृक्ष अमूल (बिना गौड,
जड़ के). हैं तो पद का गुरुत्व निवास कोण है ?
वासा।

गोरख बोध वाणी संग्रह
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! अमूल का शुन मूल है, मूल निरन्तर वास ।
ता पद का निरवाण गुरु, कथत मच्छन्द्रनाथ ॥३८
भावार्थ-हे शिष्य ! अस्थिर सृष्टि का मूल तत्व पिता
माकाश है, जिसका निवास अर्द्ध बिंदु तुरियगा में है। तिस का
गुरुत्व माया उपाधि रहित कल्याण स्वरूप है।
गोरख उवांच (२०)
स्वामीजी ! कहाँ ते उत्पत्ति प्राण, कहाँ उत्पत्ति ते मन ।
कहां उत्पत्ति ते वाचा, कहां वाचा विलोयते ॥३६
भावार्थ-हे गुरु ! प्रारण उत्पत्ति कहां से हुआ। मन की
और वाणी की उत्पत्ति कहां से होकर वाणी का विलय कहां हो
जाता है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! अवगति ते उत्पन्न प्राण, प्राण उत्पत्ति ते मन ।
मन उतात्ति ते वाचा, वाचा पन विलीयते ॥४०
भावार्थ-हे प्रश्नी ! आकाश की स्फन्द गति से वायु
(प्राण) प्राण से मन क्रमशः वाणी का उद्भव हुआ और वाणी का
मन में विलय हो जाता है ।
गोरख उवाच (२१)
स्वामीजो ! कोण सरोवर सनाल,
कोण मुखी बंचिवा जम का जाल ।
लोक अगोचर
कासों लहै,
मन पवना कैसे सम रहे ॥४१

गोरख बोध वाणी संग्रह
२.
भावार्थ-हे गुरु ! जो स्थिर तालाब बहता रहे वह कौण
है ? किस मुख से यम-जाल (भवचक्र) से मुक्ति होय ? प्राण
चैतन्य-पद (मुक्ति कैसे प्राप्त करे) और मन-पवन की संयमता कैसे
रह सकती है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! मन सरोवर अंगुल बारा बहे,
रोज करे जप थिरता गहे।
सहजे लोक अगोचर लहे,
मन पवना ऐसे सम रहे ।४२
भावार्थ-हे शिष्य ! मन स्वरूप तालाब बारह अंगुल स्वरोदय
चन्द्र स्वर में बहता रहता है और एकांत मनन (जप-स्मरण) करने
से स्थिर (सुषमना) भाव रहता है। साधना से प्राणी मुक्ति प्राप्त
करता है और ऐसे ही मन पवन एकता (संयम) रहता है ।
गोरख उवाच (२२)
स्वामीजी ! कौण सविषमी करै संधि,
कोण
लागे
कोण चेतन उनमुनि रहे,
सतगुरु होय सो पूछयां कहे ॥४३
भावार्थ-कठिनाई पूर्व स्थल-भूमि कोरण हैं ? और किस
बंध से चक्र सिद्धि होती है ? कोण चेतन है जो उनमुन में
रहता है।
बंध ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
२१
.
श्री मच्छद्र उवाच
अवधू ! अन विमली विषमी बंध चौकी ऊपर लागे बंध ।
सदा चेतन उनमुन रहे, ऐसा विचार मच्छन्दर कहे ।।४४
भावार्थ-हे शिष्य ! मल, विपेक्ष सहित दुःसाध्य भूमि हो
तो योग में कठिनाई है। नाभी के उडियान बंध से सिद्ध मूर्त तथा
साक्षी चेतन ही उनमुनि में रहता है ।
गोरख उवाच (२३)
स्वामीजी ! कहां ते उत्पना व्यापक कहां,
आदि का ऽस्तुति
तत गोसाई कहो समझाई,
जहां हमारी उत्पत्ति रहाई ॥४५
भावार्थ-हे गुरु ! जीवात्मा कहां से उत्पन्न हुआ, कहां
विलीन होगा अर्थात् व्यापक कहां है और समा कहां जायेगा। इस
तत को समझा कर आदि, मध्य,अंत जनक स्थिति में हमारी उत्पत्ति
समाई।
ए
को कहो।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! तिल मध्ये यथा तेल, काष्ट मध्ये हुतासन ।
पहुप मध्ये यथा बास, यू देही में देवता ॥४६
भावार्थ-हे शिष्य, जीवात्मा का व्याप्य-भाव सदैव इस
शरीर में तिलों में तेल, लकड़ी में सामान्य अग्नि, फूल में सुगंधी
की भांति सामान्य चैतन्य अवस्था से रहती है। जीवात्मा अनादि,
सत्य, अविनाशी है।

२२
गोरख बोध वाणी संग्रह
गोरख उवाच (२४)
स्वामीजी! श्रपणो कहौ के कौणे भाई,
बंक नाल है कौणे ठाई।
जब यह प्राणि निशि करे,
पिंड मध्ये प्राण पुरुष कहां रहे ॥४७
भावार्थ-हे गुरु ! योग वृत्ति में दुःसाध्य सर्पणी (नागिन)
क्या है, कहां निवास है, बंकनाल का स्थान कहां है ? प्राणी जब
विश्राम काले निद्रा मध्य निशि करे तब शरीर में प्राण-चैतन्य का
निवास कहां रहता है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू श्रपणी कहो के सहज सुभाई,
बंक नाल है नाभि ठाई।
जब यह
प्राण निशि करे,
पिड मधि प्राण पुरुष अपरछंद रहे ॥४८
भावार्थ-हे शिष्य ! साधना स्थल में एक नागनी नामक
गोलाकार नाड़ी है, जिसका मुख सदैव ऊपर रहता है, जिसे
पश्चिमोत्थान नामक प्रासन द्वारा जाग्रत कर निम्नोन्मुख कर के
योगी अमृत पान करते है। बंकनाल दो प्रकार की है जिसमें नाभि
स्थान मुक्त बंक है। जब प्राणी विश्राम करे तब शरीर में शक्ति
स्वच्छन्द व्यापक रहती है ।
गोरख उवाच (२५)
स्वामीजी ! कौण चक्र में दिन करि चंद,
कोण
में लागे बंध ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
३३
कौण चक्र
भावार्थ-हे गुरु
कौण चक में पवन निरोधे,
कोण चक्र में मन परमोधे ।
में धारे ध्यान,
कौण चक्र में लोजे विश्राम ॥४६
! प्रकाशमय ज्योति की प्राप्ति चन्द्र
किस चक्र में करता है ? किस चक्र के वध से अमृत प्राप्ति होती
है ? किस चक्र साधन से प्राण-वायु वशीकरण (स्थिर) होती है
और मन की शिक्षा किस चक्र साधन से प्राप्त होती है। किस
चक्र में ध्यान करना तथा किस चक्र साधन से चित विश्राम होता है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! अर्ध चक्र में दिनकरि चंद,
ऊधं चक्र में लागे बंध ।
नाभी चक्र. में पवन तिरोधे,
हिरदा चक्र में मन परमौधे ।
काष्ठ चक्र
ज्ञान चक्र में लीजे विश्राम ॥५०
भावार्थ-हे शिष्य ! मूलाधार से नाभी-प्रमाण चक्र सिद्धि
से चन्द्र-स्वर सिद्ध होकर ज्ञान प्रकाश करता है। जालन्धर बंध
लगाकर अमृत प्राप्त करना और नाभि स्थाने स्वाधिष्ठान सिद्धि से
प्राण-वायु का निरोध करना, हृदय स्थाने अनाहत चक्र में मन
को प्राध्यात्म शिक्षा मिलती है। कण्ठ स्थाने विशुद्ध चक्र में
जीवात्मा "सोहं" ध्वनि का ध्यान और ज्ञान चक्र (प्राज्ञा ) में
ज्योति दर्शनोपरांत ब्रह्म रन्ध्र में विश्राम की प्राप्ति होती है ।
में धारे ध्यान,

२४
गोरख बोध वाणी संग्रह
गोरख उवाच (२६)
स्वामीजी ! कौण उदै माया शुनि,
नवग्रह केसे पाप सु पुनि ।
कौरण ग्रह ले उनमुनि रहै,
सतगुरु होय सो पूछयां कहै ॥५१
भावार्थ-हे गुरु ! माया की हद किस शून्य तक है ?
नवग्रहों से पाप-पुण्य की प्राप्ति कैसे होती है ? किस ग्रह (देव)
को लेकर उनमुन (ध्येय-मग्न) रहें ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! बोलत से माया-
नवग्रह विचारे तो पाप न पुनि ।
शिव शक्ति ले उनमुनि रहे,
ऐसा विचार मच्छंद्र कहै ॥५२
भावार्थ-हे योगी! वाणी शून्य तक माया की हद है ।
विचार द्वारा साधना करने से नवग्रह का पाप और पुण्य दद
विलय होता है जैसे
रवि, मंगल, शनि प्रवर्तक पिङ्गला नाड़ी, सूर्य स्वर
समोगुण रुद्र ध्यान में कर्मों का विलय। सोम, बुध-स्वरूप
इडा नाड़ी चंद्र स्वर रजोगुण प्रधान ब्रह्मा-विधान स्थापन
शांति साधन । गुरु, शुक्र प्रणव सुषुमना सम स्वर सतोगुण
विष्णु प्रधान सात्विक स्थापना धारणा मय ध्यान से नवग्रह
जनित पाप-पुण्य द्वैष-ताप निवृत्ति होती है। शिव-शक्ति
-

गोरख बोध वाणी संग्रह
२५
(सुरता-पवन) के मानस संगम को लेकर मुर्दा स्थाने उनमुन
(समाधिस्थ) ध्यान में रहे ।
गोरख उननाच (२७)
स्वामीजी ! कौणे घर कोणे बास,
कोणे गर्भ रह्या दश मास।
कौण मुखि पाणी कौण मुखिता खीर,
कौण दिशा उत्पत्ति भया शरीर ॥५३
भावार्थ-हे गुरु ! किस घर में किस का निवास है ?
गर्भवास में दश माह कौण रहा
? किस
मुख से पाणी भी खोर
(दूध) के स्वाद में हो जाए तथा किस दिशा में शरीर की
उत्पत्ति हुई है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! अनिलु आतम बास,
आया गर्भ रह्या दश मास ।
नाभि कंवल मुखि पाणी खीर,
वायुकार शनतपति भया शरोर ॥५४
भावार्थ-हे योगी! अग्नि भवन स्थल पिण्ड आत्मा
ने निवास किया, कहो अपने अहता ममता करि संसार चक्र में
जन्म मरण पाकर वासना से गर्भवास में आया। नाभी स्थाने
नागनि मुख पलटने से मूर्धा-द्रवित जल ही दूध अमृत स्वरूप
प्राप्त होता है। प्राण-वायु के स्तम्भ बंध से स्थल शरीर की
स्थिति है।

गोरख बोध वाणी संग्रह
पीव ॥५५.
स्वामीजी कौणनाली होय शिवसंचरचा, कोण मुख पैठा जीव
कोण गर्भ वसंतड़ा, कोण नाली रस
भावार्थ-गोरखनाथजी मच्छन्द्रनाथजी से पूछते हैं कि
! किस नाड़ी से कल्याण (शिव) तत्व की प्राप्ति
होती है किस द्वार से जीवात्मा की स्थिति - वृत्त होती है।
गर्भवास में किसने निवास लिया और किस द्वार से गर्भस्थः
शिशु रस पीता है।
हे गुरु
रस
पोव ॥५६
श्रीमच्छन्द्र उवाच
अवधू! संखणी नाली होय शिव संचरया, सुषुमणि पैठा जीव।
माया गर्भ वसंतडा, बंकनाल
भावार्थ-हे शिष्य ! कनपटी स्थाने दश नाडियो में से
शंखरणी नाड़ी द्वारा कल्याण (समाधि तत्व) की प्राप्ति होती है,
सुषुमना नाड़ी से जीव ने शरीर में प्रवेश लिया और मेरी तेरी
ममत्व वृत्ति रूप मायाध्यास ने गर्भ में निवास लिया । युक्त त्रिवेणी
सनाल मुक्त बकनाल द्वारा पोषण रस पीता है।
गोरख उवाच (२६)
स्वामीजी कोण शून्य उत्पन्ना आई,
कौण शुनि सतगुरु. सु बुझाई ।
कोण
रह्या समाय,
ए तत गुरु कहो समझाय ॥५७
भावार्थ-हे गुरु ! किस श न्य में उत्पत्ति हुई ? किस श न्य
शुनि में

गोरख बोध वाणी संग्रह
३७.
का ज्ञान सतगुरु ने समझाया ? किस शून्य में उलट कर
समाया ? इस तत्व को समझा कर कहो
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! सहज उत्पन्न प्राई,
समि सुरत सतगुरु सु बुझाई ।
अतीत शुनि में रह्या समाय;
परम तत कहूँ समझाय ॥५८
भावार्थ-हे शिष्य ! स्वाभाविक क्रिया शून्य से कर्म क्षेत्र
से उत्पत्ति, समता श न्य वृति का दृढ़ात्म ज्ञान सतगुरु ने समझाया
पंचभूतात्मा का साक्ष्य महाश न्य में परिवर्तन समाय रहे, यही परम
तत्व समझाकर कहता हूं।
गोरख उवाच (३०)
स्वामीजी ! कौण मुख लागे समाधि,
मुख छूटे उपाधि।
कोण मुख जु तुरिया बंध,
कोण मुख अजरावर कंध ॥५६
भावार्थ-हे गुरु
! किस
वस्तु के अन्तहित होने से समाधि
लगती है ? किस अंतरहित से प्रपन्चोपाधि से निवृत्ति होती है ?
किस अन्तर्हित से साक्षी तुरीय बंध की सिद्धि होती है ? किस
अन्तहित से अजर-अमृत बिन्दू की प्राप्ति होती है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! मन सुखी वाला लागे समाधि,
पवन मुख बाला छूटे उपाधि ।
कोण मुख

गोरख बोध वाणी संग्रह
सुरति मुख बाला तुरिया बंध,
गुरु मुख बाला अजरावर कंध ॥६०
भावार्थ- हे शिष्य ! मन के अति होने से समाधि
लगती है, प्राण-वायु के अन्तहित होगे में प्रापंचिक माया उपाधि
से निवृति होती है । अंतस्थ श्रवणेन्द्रिय वृत्ति सुरति के अंतरमुख
होने से साक्ष्य-तुरीय बंध को सिद्धि तथा गुरुशब्द के अंतर्हित
साधन से अजर-अमृत स्वादु की प्राप्ति होती है ।
गोरख उवाच (३१)
स्वामीजी ! कोण सोवे कोण जागे, कौण दशंदिश धावे।
कहां ते उठत पवना, कवन कंठ तालिका बजावे ॥६१
भावार्थ-हे गुरु ! इस शरीर में अष्ट पहरी कौन जागे,
कौन सोचता है। कोन दशों दिशा में दौड़ता है ? प्राण-वायु
कहां से ऊर्ध्वगामी होता है, और कण्ठ तालिका की ध्वनिक
नाड़ियों को कौन बजाता है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! मन सोवे पवन जागे, कल्याण दशू दिशि धावे ।
नाभि ते उठत पवना, होठ कण्ठ तालिका बजावे ॥६२
भावार्थ-हे शिष्य ! सुषुप्तावस्था में मन ही अंतर्मुख
संकल्प-विकल्प रहित होता है मानो सोता है। प्राण-वायु
ही तीनों अवस्थाओं में जाग्रत रहता है। अंतस्थ कल्पना
ही जाग्रत विश्व जीव चक्षु स्थानों होकर तथा स्वप्नावस्था में
तैजस
जीव कण्ठस्थनो हिता नाम सूक्ष्म
रोमसहस्राणु भाग में दौड़ती है । पवन नाभी से उर्ध्वगामी
नामक

गोरख बोध वारणी संग्रह
२९
होकर चलता है। भाषा विज्ञान के सिद्धान्त से कण्ठ गत
ध्वनि-तंत्रियों को होंठ ही चलने की यान्त्रिक गति प्रदान
करता है।
कहां ते
गोरख उवाच (३२)
स्वामोजी ! कहां ते करे मन गुण घणा,
मन करे पावागवणा ।
कोण मुख चांदना कर करे,
का मुख काल निद्रा करे॥६३
भावार्थ-हे गुरु ! साधन को मन की स्थिति कहां पर रहने
से बहुगुण करें ? मन का आवागमन कहां से होता है ? किस
अंतहित से ज्योति स्वर चन्द्र का उदय होता है और किस अन्तहित
काल की सुषुप्तावस्था होती है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! हृदय ते करे मन गुण घणा,
नाभी ते पवन करे पावा गवणा।
मुख
चांदना
कर करै,
मन मुख काल निद्रा करे ॥६४
भावार्थ-हे शिष्य ! अनाहत चक्र हृदह स्थान को साधना
से मन वश होकर साधक का हित करता है । नाभी से प्राण ऊर्ध्व
गामी पुनः अपने अर्ध स्थान को प्राप्त करता है । अन्तहित चंद्र स्वर
अपने श्रम साध्य कसौटी से सुखानन्द तथा मन अंतर्मुख निश्चय
से काल का दमन होता है ।

३०
३
गोरख बोध वाणी संग्रह
गोरख उवाच (३३)
स्वामीजी ! कौन ज्योति ते पवना पलटे,
कौन शून्य ते वाचा फुरे ।
कौन शून्य ते त्रिभुवन सार,
कौन शुनि ते उतरिया पार ॥६५
भावार्थ-किस शून्य की ज्योति दर्शन कर पवन-प्राण
पलटे ? किस श न्य से वाणी का संस्फुर होता है ? किस श न्य से
तीनों लोकों का सार तत्व उद्बोधन होता है ? किस श न्य से पार
उतरना है?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! उग्र शून्य ते ज्योति पलटे,
अभय शून्य ते बाचा फुरे।
परम शून्य ते त्रिभुवन सार,
प्रतीत शून्य उतरिया पार ॥६६
भावार्थ-हे शिष्य ! उग्र श न्य से ज्योति पलट कर त्रिकुटी
में साधक को दर्शन होते हैं, अभय श न्य से वारणी का उपादान
कारण बनता है, परम श न्य ही तीनों लोकों का प्रावास उत्पत्ति
द्वार है, अतीत श न्य (भयावह-दृश्य) से पार उभरना है ।
गोरख उवाच (३४)
स्वामी! कहां ते उत्पन्नी बुध्यो, कहां ते उत्पन्ना पहार।
कहां ते उत्पनी विद्रा, कहां ते उत्पन्ना काल ॥६७

गोरख बोध वाणी संग्रह
-
-
भावार्थ-हे गुरु ! बुद्धि का जन्म कहां से, भोजनवृत्ति
(क्षुधा तृप्ति) युक्ति का जन्म कहां से हुआ ? श य्याकाले निद्रा
का जन्म कहां से होता है और काल (मृत्यु यम) का जन्म कहां
से होता है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! मनसा ते उत्पन्नी बुध्या, बुध्या ते उत्पन्ना अहार ।
प्रहार ते उत्पन्नी निद्रा, निद्रा ते उत्पन्ना काल ॥६८
भावार्थ-हे साधक ! मन को विवेक वृति से बुद्धि का,
बुद्धि की आवश्यकता पूर्ति बुद्धि पूर्ण खोज से आविष्कृत भोजन
(क्षुधा निवृति) का जन्म हआ। भक्ष्य, भोज्य, लेह्य, चौष्यादि
चतुर्विध भोजन से निद्रा (स्वप्न-सुषुप्ति) अवस्था की उत्पति और
निद्रालस्य से काल (मृत्यु जनक प्रवृति) का जन्म होता है ।
गोरख उवाच (३५)
स्वामीजी । दिव्य दृष्टि किम होइवा, किम होईबा ज्ञान विज्ञान
गुरु शिष्य काया के रहे, किसा उतरबा पारं ॥६६
भावार्थ-हे गुरु ! देवदृष्टि कैसे प्राप्त होती है ? परमेश्वर
का विज्ञान-ज्ञान कैसे प्राप्त होता है और गुरु-शिष्य के शरीर कितने
रूप में रहे ? भव-सागर से पार कैसे उतरना होता है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! दृष्टि ते दिव्य दृष्टि होइबा,
ज्ञान ते होय विज्ञान ।

३२ गोरख बोध वाणी संग्रह गुरु-शिष्य की एको काया, पार चाहो तो बहौर न जाया ७० भावार्थ-हे शिष्य ! त्राटक दृष्टिभेदन की साधना से दशिता या पारदर्शिता की दिव्य दृष्टि होती है, अध्यात्म ज्ञान से ईश-विज्ञान तथा भौतिक विज्ञान का बोध होता है, गुरु और शिष्य का भौतिक शरीर दो है किन्तु शब्द-मात्मा एक है और भव सिंधु पार होने की बहुरि जन्ममूल अज्ञात मूल वासना को करना चाहिये। गोरख उवाच (३६) स्वामीजी! कहां ते उठत श्वास उश्वास, कहां परम हंस का वास । मनवा निश्चल रहे, सतगुरु होय सो पूछयां कहे ॥७१ भावार्थ-हे गुरु ! स्वासोश्वास कहां से उठता है ? जीवात्मा का निवास कहां है ? मन स्थिर कैसे होता है ? श्री मच्छन्द्र उगाच प्रवधू प्ररध ते ऊठत श्वास उश्वास, ऊरधे परम हंस का बास । सहज स्थान मनवा निश्चल रहै, ऐसा विचार मच्छन्द्र कहै ॥७२ भावार्थ-हे साधक ! नाभी स्थान से श्वास उठता है, दशवें द्वार ब्रह्मरंध से जीवात्मा का प्रावास हैं। साधना से मन स्थित- एकान्त रहता है।

गोरख बोध वाणी संग्रह
३३
.
?
गोरख उवाच (३७)
स्वामीजी ! कसे आवे कैसे जाय,
कैसे जोया रहे समाय ।
कैसे तन मन सदा थिर रहे,
सतगुरु होय सो पूछयां कहै ॥७३
भावार्थ -प्रणात्मा शरीर में कैसे प्राता है, कैसे जाता है ?
शरीर निधन पर जीव कहां समा जाता है ? मन तथा सूक्ष्म
शरीर सामग्री कहां स्थिर रहती है ? गोरखनाथजी अपने गुरु
से
प्रश्न करते हैं।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अधू
शून्य
आवे शून्य ही जाय,
शुन हो जोया रहे समाय ।
सहज शुन तन मन सदा थिर रहे,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहे ॥७४
भावार्थ-हे साधु ! अणु परमाणु शून्य ही पाती जाती हैं
और तत्व-अंश सामग्री सुक्ष्माणु शून में ही समानती है । साधना
काल कर्मयोग में तन मन स्थिर आयु तथा प्राणान्ते भौतिक प्राकृ-
तिक मर्यादा को स्वाभाविक स्थिति में रहती है।
गोरख उवाच (३८)
स्वामीजी ! कहां नसे शक्ति कहां बसे शोव
कहां बसे प्राण, कहाँ बसे जीव ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
कहां होई इनका परचा लहै,
सतगुरु होय सो पूछयां कहै ॥६५
भावार्थ-हे भगवान! प्राकृतिक भूगोल खगोल में तथा
शरीर में प्रकृति-शक्ति, जीवात्मा-शंकर का कहां निवास है ? प्राण
और जीव कहां रहते हैं ? इन सबका संयोग कहां पर, कसे होता
है ? यह समझाकर कहिये ।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! अरध बसे शक्ति ऊरध बसे शीव,
भीतर बसे प्राण अंतरिक्ष बसे जीव ।
निरन्तर होय इनका परचा लहै,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहै ७६
भावार्थ-पृथ्वी-नाभी. तल पर. प्रकृति-शक्ति बसतो है ?
ऊपर गगन-अम्बर में कल्याण तत्व का वास है ? ब्रह्माण्ड-पिंड
क्रिया चालक प्राण भीतर रहता है और जो शून्य-मण्डल में रहे
वही जीव हैं। प्रलय-काल अथवा साधना-काल में इनका संयोग
होता है।
गोरख उवाच (३४)
स्वामीजी! कैसे बैठे कैसे चाले,
कसे बोले कैसे मिले।
कोण स रत में निर्भय रहे ।
सतगुरु होय सो पूछयां कहे ॥७७
भावार्थ-हे गुरु ! साधक को साधना पथ में उठना, बैठना

गोरख बोध वाणी संग्रह
.
और बोलना, मिलना, चलना तथा निर्भय कैसे रहना चाहिये ।
श्रीमच्छ द्र उवाच
अवधू ! स रत मख बैठे स रत मुख चाले,
स रत मुख बोले स रत मुख मिले।
निरति स रति में निर्भय रहें,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहै ॥७८
भावार्थ-हे शिष्य ! साधक को पथ में महान सावधानी
से सदैव साधनोन्मुख तत्पर रहना, चलना, उठना, मिलना,
बैठना आदि क्रिया करते हुए पूर्णतः-अन्तर्मुखी निर्भयता में रहना
चाहिये।
गोरख उवाच' (४०)
स्वामीजी ! कोण है शब्द कोण है स रति,
कोण से बंध्यो काया से निरति।
ई बंध्या मिटो कैसे रहै,
सतगुरु होय सो पूछयां कहै ॥७६
भावार्थ-हे गुरु ! शब्द कौन है, सुरति क्या है ? शरीर के
बंध क्या है ? और यह बंधन कैसे मिटे ?
श्रीमच्छन्द्र उवाच
अवधू ! शब्द अनाहद सु रति स रुचि,
निरति निरालंब लागे बंध ।

गोरख बोध वाणी संग्रह Bround- कूब्ध्या मिटे सहज में रहे, ऐसा विचार मच्छंद्र कहे ।।८० भावार्थ-हे शिष्य, शब्द सोमा-आकार रहित है, श्रेष्ठ साधन प्रवृत्ति मुमुक्ष-वृत्ति ही सुरति है। अन्तर्मुख वृत्ति प्राशा ही शरीर और जीव का जड़-चेतन बंध है। बहिरङ्ग विषय भोगिणी इच्छाओं आशाओं को बांध कर मांधना साधना में लगा रहे तो जीव के बंध निवृत्त होकर मुक्त स्वरूप स्थित रहे। गोरख नाच (४१) स्वामीजी ! कौण सु प्रासन कोण सुजान किहि विधि बाला धारे ध्यान कैसे अवगति का सुख लहै सतगुरु होय सो बूझया कहै ॥८१ भावार्थ-हे गुरु ! किस आसन से कैसा ज्ञान ले, साधक किस प्रकार ध्यान धरे। परमानन्द की प्राप्ति कैसे होय ? श्री मच्छन्द्र उशच अवधू ! संतोष सु आसन सुविचार सुज्ञान काया करि धरिबा गुरु मुख अवगति का सुख लहै; ऐसा विचार मच्छन्द्र कहै ॥८२ भावार्थ-हे साधक ! संतोष का प्रासन, विशेष-ज्ञान, शरीर से प्रासन । प्रत्याहारादि साधना सहित ध्यान करे और गुरु उपदेश निष्ठ स परमानन्द की प्राप्ति होती है । ध्यान

गोरख बोध वाणी संग्रह
३७
भावार्थ- हे गुरु
गोरख उनाच (४२)
स्वामीजी ! कोण संतोष को कौण विचार,
कोण सु ध्यान काया के पार ।
कैसे मनवा इनमें रहे।
सतगुरु होय सो बूझयां कहे ॥८३
! संतोष. कैसा विचार कैसा? शरीर से
पार ध्यान कैसा? इनमें मन कैसे रहे ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! निरभै संतोष अनुभं विचार;
दशो में ध्यान काया के पार ।
गुरु मुख मना
इनमें रहे।
ऐसा विचार मंच्छन्द्र कहे ॥८४
भावार्थ- हे शिष्य ! निर्भय संतोष, अनुभव विचार और
ब्रह्मरन्ध्र (दश) द्वार का ध्यान काया के पार का है। गुरुमुखी
सुगरा शिष्य मन इन में अन्तर्हित रहता है ।
गोरख उवाच (४३)
स्वामीजी ! कोण पांव बिन मारग3B
कोण चक्षु बिन दृष्टि ।
कौण कर्ण बिन श्रवण
बिन शब्द ॥८५
कौण मुखः

गोरख बोध वाणी संग्रह
m
कौन है ? जैसे-पांव बिना मार्ग, नैत्र बिना दृष्टि, कानों के बिना
सुनना और मुख के बिना बोलना।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! विचार पांव बिन मारग, निरति चक्षु बिन दृष्टि ।
सुरति करण बिन श्रवण लौ मुख बिन शब्द ॥८६
भावार्थ-हे शिष्य ! विचार मार्ग पांव बिना है, अन्तस्थ
ज्योति चक्षु बिना है। अंतर्भाव-मध्ये गूंज सुनने की क्रिया कानों
बिना है । अन्तःकरण की लौ ही बिना मुख के शब्द है ।
गोरख उवाच (४४)
स्वामीजी ! कौण धौवता कौण प्राचार,
कौण जाप मन तजे विकार ।
कोण भाव में निरभय रहे,
सतगुरु होय सों पूछयां कहे ॥८७
भावार्थ-हे गुरु ! अंतस्थ मल को कौन धोता है ? प्राचार
कौण है ? किस जप से मन की शुद्धि होती है ? किस भाव से
निर्भय रहे।
श्री मच्छन्द्र उवाच
प्रवधू ! ध्यान धौवता विचार आचार,
अजपा जाप मन तजे विकार।
अनुभव भाव में निरभय रहै,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहै ।।१८
भावार्थ-हे शिष्य ! मन विक्षेपादि अंतस्थ दोषों को
निरावर्ण का ध्यान है, विचार ही उत्तम प्राचार-संहिता है ।

.
गोरख बोध बाणी संग्रह
मानस (सुरति स्वाहा. एवं मन से एकीकरण से किया गया)
जप ही मन को शुद्ध करता है। अनुभव स्थिति में निर्भय रहना
चाहिये।
गोरख उवाच (४५)
स्वामीजी! कोण स वोऊ कौण स आप,
कौण स माई कौण स बाप ।
कैसे मन में दरिया रहै।
सतगुरु होय सो बूझयां कहै ॥८६
भावार्थ-हे गुरु ! ओ३म्कार कौन है ? आप कौन हैं,
माता कौन हैं ? पिता कौन है ? मन में सदैव शीतलता समुद्र
सम्पूर्ण भरा कब रहे ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! शब्द बोऊ ज्योति स आप,
चेतन बाप ।
निश्चल मन में दरिया रहे,
ऐस विचार मच्छन्द्र कह ॥६०
भावार्थ-हे अवधू ! शब्द ही ॐ है, ज्योति स्वयं अपना
स्वरूप है । शून्य मय प्रकृति को सब ही माता है, चेतन सता ही
पिता है|| मन का ध्येयाकार निश्चय बनने से शीतल-सिंधु पूर्ण
रहता है।
गोरख उवाच (४६)
स्वामीजी ! कौण छ चेतन कौण छ सार,
कौण छ उत्पत्ति कोण छ काल ।
शुन्य. स माई

गोरख बोध वाणी संग्रह
?
कोण महिं पंच तंत जरि रहे।
सतगुरु होय सो पूछयां कहे ॥६१
भावार्थ-हे गुरु ! चेतन कौन है ? सार तत्व क्या है ?
उत्पत्ति क्या है ? काल (विनाश) क्या है ? पंच तत किस में
विलय होकर रहते है ?
श्री मन्छन्द्र उवाच
अवधू, ज्योति छ चेतन निर्भय सार,
जागिवा उत्पत्ति निद्रा काल ।
ज्योति में पंच तंत जरि रहै,
ऐसा विचार मच्छेन्द्र कहै ॥६२
भावार्थ-हे योगी ! ज्योति चेतन है, निर्भय तत्व सार
है। जाग्रत काल उत्पत्ति है, निद्रा-सुप्त काल ही मृत्यु (विनाश)
है। ज्योति (चेतन) में पांचों तंतों का विलय होता है।
गोरख उवाच (४७)
स्वामी, कोण बोले कोण सोवे,
कोण रूप में आपा जुग जोवे ।
कोण रूप में जुग रहे,
सतगुरु होय सो बूझयां कहै ॥६३
भावार्थ-हे गुरु ! सोता कौन ? जागता कौन ? अपना
स्वरूप कहां देखे ! किस स्वरूप में युगान्तर-काल तक अटल
रहे।

गोरख बोध वाणी संग्रह
?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू! शब्द बोले शक्ति सोवे,
प्रदेख रूप में आपा जोवे ।
अरूप रूप में जुग जुग रहे,
ऐसा विचार मच्छंद्र कहे ।।६४
भावार्थ -हे साधु ! शब्द जाग्रत है, शक्ति सुप्त है, अदृष्ट
अमुष्ट स्वरूप में आपको ज्ञान मार्ग से समहाष्ट से देखें और अटल,
रूप वर्ण रहित युगान्तर काल तक स्थिर रहता है।
गोरख उवाच (४८)
स्वामीजी ! कोण मुख रहणा कोण मुख ध्यान ?
कोण मुख अभिरस कौण मुख पान ?
कौण मुख छेदी देही रहे,
सतगुरु होय सो बूझयां कहै ॥६५
भावार्थ-हे भगवान् ! किसके सन्मुख रहना, किसके
सन्मुख ध्यान, अमृत, प्राप्ति, पीना तथा किस सन्मुखता को छेदने से
शरीर रहे सो कहिये।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! सहज मुख रहना, भक्ति मुख ध्यान
गुरु मुख
अमीरस चित्त
आशा मुख छदिवा देहि रहे,
ऐसा विचार मच्छंदर कहे ॥६६
मुख पान ।

४२
गोरख बोध वाणी संग्रह
खाय ।
भावार्थ-हे शिष्य ! साधना के सन्मुख रहणा, भक्ति
(उपासना) के सन्मुख रहकर ध्यान करना । गुरु के सन्मुख से
ज्ञान अमृत चेतन (सावधान) सन्मुख रहकर पीना और आशा
मुख के दर्शन करके अमर रहिये ।
गोरख उवाच (१६)
स्वामीजी ! कोण मुख आवे, कोण मुख जाय,
कोण मुख होय काल को
कौण मुख होय जाति में रहे,
सतगुरु होय सो बूझया कहे १६७
भावार्थ-हे गुरु ! किसके सम्मुख आवे, जावे और काल
को खावे, ज्योति में समाया रहे ।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! सहज मुख होय प्रावे,
सहज मुख होय सो जाय,
निरपख होय काल कू खाय ।
निरास मुख होय ज्योति रहे।
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहे ॥६८
भावार्थ-हे साधु ! साधना सन्मुख आवे जावे बहिरंग
क्रिया तथा प्राणायाम क्रिया भेद में साधन सन्मुख निरपक्ष होकर
मृत्यु का अपधन करे और निराशा सन्मुख होय ज्योती (चेतन) में
समाय रहे।

गोरख बोध वाणी संग्रह
४३
गोरख उवाच (५०)
स्वामीजी ! कोण हैं काया कोण है प्राण,
कौण पुरुष का धरिए ध्यान ।
कौण स्थान मन काल सूदूरि रहे,
सतगुरु होय सो बूझयां कहे ॥६E
भावार्थ-हे गुरु ! वस्तुतः शरीर कौन है ? प्राण कौन
है ? किस पुरुष का ध्यान करना चाहिये ? किस स्थान पर
मन मृत्यु भय से दूर रहता है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! मन है काया पवन है प्राण,
परम पुरुष का धरिए ध्यान ।
सहज स्थान मन काल सू दूरि रहे,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहे ॥१००
भावार्थ-हे शिष्य ! मनोमय सृष्टि साधक के प्रयाण
में मन ही शरीर हैं और प्रारण पवन है, परमात्मा का ध्यान करना
चाहिये । साधन स्थान स्थिति मन मृत्यु-अवधान से दूर
रहता है।
गोरख उवाच (५१)
स्वामोजी! कौण है कूची कोण है ताला,
कोण. है बूढ़ा कोण है बाला।
कोण स्थान मन उनमुनि रहै,
सतगुरु होय सो बूझयां कहै ॥१०१

गोरख बोध वाणी संग्रह
कौन बूढ़ा
भावार्थ-हे गुरु !
ताला, कूची कौन है ?
कौन बालक है ? किस स्थान पर मन ध्येयाकार आनन्दमय
रहता है ?
श्रीमच्छन्द्र उवाच
अवधू ! शब्द ही कूचो शब्द हो ताला,
अचेतन बूढ़ा चेतन बाला।
ज्ञान स्थान मन उनमुनि रहे,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहे ॥१०२
भावार्थ-हे शिष्य ! शब्द मय बन्धन (ताला) को निवृति
शब्द वेद वाक्य ही चाबी है, जर है सोई वृद्ध है, चेतन ही बालक
है। ज्ञान-भूमिकारूढ़ मन ही आनन्दमय रहता है ।
गोरख उवाच (२५)
स्वामीजी ! कौण समाधि कोण है सिद्ध,
कौरण समाया कोण है रिद्ध ।
कैसे मन की भ्रांति नशाय,
सतगुरु श्याम कहो समझाय ॥१०३
भावार्थ-हे गुरु
समाधि क्या है ? सिद्ध कौण है ?
कौन समाया है ? कौन अक्षय रिद्ध है ? मन की भ्रांति कैसे
निवृत्ति हो?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! सुरत समाधि शब्द सु सिद्ध,
आप समाया परा है रिद्ध ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
४५
-
दशों के मेटे भ्रांति नशाय,
ऐसा वचन कहे गुरु राय ।।१०४
भावार्थ - मच्छन्द्रनाथ जी कहते है कि हे गोरख ! अन्तवृति
समाधि है, वेद-गुरु वाक्य शब्द स्वतः सिद्ध हैं। श्राप लय रूप है, वाणी
रिद्धि स्वरूप है। पांच (कम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) बैरी
तथा पांच क्लेश (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) इन
देशों के निवृति से भ्रान्ति नामक संशय की निवृति होती है ।
गोरख उवाच (५३)
स्वामीजी ! कोण है सांचा कौण से रंग,
कोण ग्राभूषण चढ़े सुरंग।
नामें निश्चल कैसे रहै,
सतगुरु होय मो बूझया कहै ॥१०५
भावार्थ-हे गुरु ! सांचा कौन है ? जिसमें ढलने वाला
द्रव कौन है ? कैसा आभूषण है ? जिस पर सदैव रंग की कसौटी
चड़े।
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! ज्ञान है सांचा प्राण सुरंग,
ज्योति आभूषण चढ़े सुरंग ।
तामें निश्चल ऐसा रहे,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहे ॥१०६
भावार्थ-हे अवधूत ! ज्ञान स्वरूप द्रवण (सांचे) में
प्राण द्रव्य पदार्थ ढलता है तब साधक की त्राटक प्रोढ़ावस्था में

गोरख बोध वाणी संग्रह
!
ज्योति के दर्शन होते हैं वही ज्योति अनमोल गहना है । जो
कसौटी (परख) पर चढ़ने योग्य है उसमें निश्चय कर निश्चल
होकर रहे ।
गोरख उवाच (५४)
स्वामीजी ! कोण है मन्दिर कौण है देव,
कहां बैठ करि कीजे सेव ।
कोण है पाती कैसे रहे,
सतगुरु सोई बूझया कहे ॥१०७
भावार्थ-हे गुरु ! साधक के लिये कौनसा मंदिर है ?
कौनसा देव है ? कहां बैठकर सेवा करें, भेंट में क्या चढ़ावें ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! देही मन्दिर चेतन देव,
मन सरोवर बैठ निरंतरि सेव ।
प्रेम पाती उनमुन रहे,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहे ॥१०८
भावार्थ-हे साधक ! श्रेष्ठ मंदिर शरीर है, इसमें निवासी
चैत्यन्यात्मा ही श्रेष्ठ देवता हैं, मनन तालाब के किनारे बैठकर
उपासना करनी चाहिये, प्रेम पुष्प-पत्ती चढ़ाकर आनन्द-मग्न
रहना चाहिए।
गोरख उवाच (५५)
स्वामीजी! कोण है मन्दिर कौरण है देव,
कोण है मूरति कोण अपार ।
.

गोरख बोध वाणी संग्रह
i
कौण रूप में निर्भय रहै,
सतगुरु होय सो बूझयां कहे ॥१०९
भावाथ-हे गुरु ! सिद्धावस्था में कौन मंदिर है ? कौन
देवता ? कौन मूरति जो अपार है ? किसकी उपासना करके
निरभय रहें?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! शुन है मंदिर शब्द है देव,
ज्योति है मूरति ज्वाला अपार ।
अरूप रूप में उनमुनि रहे,
ऐसा विचार मच्छन्द्र कहे ॥११०
भावार्थ- हे शिष्य ! सिद्धावस्था में शून्य ही विशाल मंदिर
है, प्रोउकार शब्द ही धार्मिक देवता हैं। त्राटक साध्य ज्योति ही
साक्षात दृश्य मूर्ति तथा अपार तेजस्वी है, माया उपाधि का रूप
स्थ ल रहित आत्म में निर्भय रहना होता है।
श्री मच्छन्द्र उवाच
स्वामीजी ! कौण है दीवा कोण प्रकाश,
कोण है बाती तेल निवास ।
कैसे दीवा इन में रहे,
सतगुरु होय सो बूझयां कहे ॥१११
भावार्थ-हे गुरु ! दापक कौन है ? प्रकाश कैसा है ?
बाती क्या है ? तेल क्या है ? इनके होते भी दीपक अटल
कैसे रहे ?
.

गोरख बोध वाणी संग्रह
श्रीमच्छन्द्र उवाच
अवधू ! ज्ञान हैं दीव शब्द प्रकाश,
संतोष तेल प्रम निवास ।
दुविधा मेखि अखण्डित रह,
ऐसा विचार मच्छंद्र कहै ॥११२
भावार्थ-हे शिष्य ! ज्ञान दीपक का शाब्दिक प्रकाश,
संतोष तेल में प्रेम की धारा बाती लगी रहे । दुविधा (द) को
वायु से वंचित करके लौ को अखंडित रखें।
गोरख उवाच (५७)
स्वामोजी ! कौण बैठा कोण चल्या,
कोण किरया कोन मिल्या।
कोण घर में निरभय रहे,
सतगुरु होय सो बूझयां कहें ॥११३
भावार्थ-हे गुरु ! साधक अवस्था में क्या बैठा? क्या
चल्या ? क्या फिरया, क्या मिल्या और घर में निर्भय रहे ?
श्री मच्छद्र उवाच
अवधू ! बैठा धीरज चल्या विकार,
सुरति स फिरया जिल्या स सार
सदा अतीत घट निर्भय रहै,
ऐसा विचार मच्छंद्र कहै ॥११४

नोरख बोध बालो संग्रह
भावार्थ-हे योगी ! धैर्य बैठा हैं, विकार चले गये अंतष्टि
सुरति से चौदह लोकों के पिण्ड-ब्रह्माण्ड ज्ञान का विचार करना
ही फिरना है जिस से तत्व ज्ञान रमझ मिली और सबसे एकांत
(अतीत) होकर निर्भय रहना ।
गोरख उवाच (५८)
स्वामीजी ! कौरण जोगी कैसे रहे,
कौण भोंग कैसे लहै ।
सुख मैं कैसे
उपजे पार,
सता में कौण बंधावे धार ।११५॥
भावार्थ-हे गुरू ? वस्तुत: योगी कौन है ? कैसे रहता है ?
कैसा भोग कैसे भोगता है ? कैसे सुख पाता है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू मन जोगी जो उनमुन रहै,
उपजे महारस शुब्द सु लहै ।
रस ही मांही प्रखण्डित
सतगुरु शब्द बंधावे धार ।११६
भावार्थ-हे शिष्य ! मन रुपी जोगी ध्येयस्त मौन में रहता
है, मूर्द्धा ध्यान के महारस शब्द-अनहद बाजा सुनकर अखंडित
आनन्द में रहता हैं, ऐसा परमानन्द साधन युक्ति द्वारा सतगुरू
ही दरशाते है।
गोरख उवाच (५६)
स्वामी ! कौरण प्रात्मा भावे जाय,
कौरण प्रात्मा शुन्य साय ।
पार,

५०
गोरख बोध बांगों
बार ॥११७
--
कोरण आत्मा त्रिभुवन प्यार,
कौरण का परचा . बावन
भावार्थ-हे गुरु
! आने जाने वाली आत्मा कौनसी है
शुन्य-विभु में विलय होने वाली आत्मा कौनसी है ? तीनों लो
का प्रेम रस लेने वाली कौनसी आत्मा है ? किस को शनि
साधना बावन (अनेकों) बार प्रदर्शित होती है ?
श्री मच्छन्द्र उवाच
अवधू ! पवन प्रात्मा आवे जाय,
मन प्रात्मा
शुन्य समाय ।
प्रात्मा त्रिभुवन प्यार,
गुरु का परचा बावन बार ॥११८
भावार्थ--हे शिस्य ! वायु मैं अंश प्राणात्मा आती जाती
मनशील आत्मा शून्य में बिलय हो जाती है । विशेष अध्या
ज्ञान प्रातमा तीनों लोक में व्यापक रस है । गुरु की महिमा-श
ही बारम्बार उद्यत रहती है।
गोरख उवाच (६०)
स्वामीजी ? मन का कौरण जीव,
जीव का कौरण में बास ।
का कौरण प्राधार,
कहो . आधार का कारण रूप ॥११६
भावार्थ-हे गुरु ! मन का चैतन्य कौन है, उस जीव
निवास कहां है ? उस निवाम का यावास प्राधार क्या है अ.
उस आधार का स्वरूप क्या है ?
जे श्वास

गोरख बोध धारणी संग्रह श्री मछन्द्र उवाब अवधू ! मन ! मन का पवन जीव, पवन का शुन्य : में बास । शुन्य का . . ब्रह्म प्राधार है, ब्रह्म का अचित रूप ।१२०॥ भावार्थ-हे शिष्य ! मन का जीव (शक्ति) प्राण है, प्राण का शुन्याकाश में निवास है शुन्य का आधार ब्रह्म है ब्रह्म का स्वरूप अचिन्तनीय है। गोरख उवाच (६१) स्वामीजी ? कौरण चक्र शिर के कंध, कौरण चक्र अगोचर कौरण चक्र में हंस निरोधे । कौरण चक्र में मन परमोधे। कौरण चन में काल है सवाधि, कौरण चक्र में लगे समाधि ॥२२२ भावार्थ-हे गुरु ! किस चक्र की साधना से कुडलिनी-शक्ति की जागृति होती है ? किस चक्र से तीनों योगिक क्रिया बंध सिद्धि होती है ? किस चक्र में प्राण-हंस अवरुद्ध होती है ? किस चक्र में मन को शिक्षा मिलती है ? किस चक्र गति रुकती है ? किस समाधि की परिपक्व बनती है ? बंध। में काल चक्र में धारणा

५२
गोरख बोध वाणी संग्रह
श्री मछन्द्र उवाच
अवधू ? मूले चक्र थिरके कंध,
गुगो चक्न अगोचर बंध ।
मरिण चक्र में हंस निरोधे,
अनाहद चक्र में मन परमोधे ।२२२॥
मिशुद्ध चक्र में काल समाधि,
चन्द्र चक्र में लगे सबाधि, ।
ए षट् चक्र का जाणे भेव,
सो प्रापहि करता प्रापहि देव ।२२३॥
पवन पवना साधते योगी,
जरा पलटे काया हा निरोंगी।
साधो
योग
निश्चय साधे होये भला ।२२४॥
भावार्थ-हे शिष्य ! मूलाधार चक्र से नागिन जाग्रत होती
है मूलबन्ध से ही मूल, जालन्धर, उड़ियान बंध की सिद्धि होती
है तथा मणिपुर चक्र से प्राण वायु वश होती है अनाहद चक्र
से मन को शिक्षा, विशुद्ध चक्र में जराव्याधि मृत्यु भय निवारण
होकर चन्द्र चक्र में समाधि धारण होती है। इन षट चक्रों का
भेद पहिचानने साधने वाला योगी अद्वत निष्ठ. मुक्तात्मा होता
है शरीर के रहते आरोग्य, अवृद्ध सबल रहे।
अवधू
कला,
।। इति गुरु-शिष्य शका समाधान समाप्त ।।

भोरख बोध वाणी संग्रह अथ गोरख दत्तात्रेय संवाद अंग गोरख उवाच [१] स्वामीजी तुम ब्रह्मा कि ब्रह्मचारी, तुम बान पुस्तक कि दण्डधारी। तुम जोगी कि जोग जुगता, कोण प्रसाद रमो स्वच्छंद भुगता ॥१ भावार्थ-हे भगवान! आप गृहस्थ हो या ब्रह्मचारी, ग्रंथ- धारक वानप्रस्थ था सन्यासो कौन है ? सिद्ध योगी है ? अथवा साधना प्रदेशी साधक ? आप किसी की कृपा से मुक्त-स्वतन्त्र विचरण करते हो? उवाच अवधू ! न हम ब्रह्म न हम ब्रह्मचारी, न हम वान पुस्तक ना दण्डधारी। हम जोगी न जोग जुगता, प्राय प्रसाद रमो स्वच्छंद मुमता ।। भवार्थ-हे साधु ! ब्रह्मचर्य ग्रहस्थ, वानप्रस्थ इन चारों आश्रमों से रहित सिद्धि सिद्ध, साधक भी नहीं। स्वयं अपनी कृपा स्वतन्त्र मुक्त हूं। गोरख उबाच [२] स्वामीजी ! प्रापा भेटणा सतगुरु थापणा, प्रण परचे जग श्री दत सन्यास खाया।

गोरख बोध वाली संग्रह I- ? गौरख कह सुणो हो स्वामी, तुम कौरण पुरुष कहां से आया ।।३ भावार्थ - हे भगवान ! अहंकार रहित होकर सतगुरु शरण जाकर साधना करनी चाहिए । बिना साधना संसार नष्ट कर देगा । आप कौन है ? कहां से आए श्री दत्त उवाच अवधू ! हों हूं गुप्त गुप्त ते प्रकट, पुरुष को दत्त कहै सुगौ सत गोरख, मैं गैब. पुरुष गैब से आया ॥४ भावार्थ-हे साधू !. मैं गुप्त से गुप्त हूं प्रकट से प्रकट हूँ। चैतन्य अनादि पुरुष (माया का प्रतीक) हुं और शुन्य पुरुष शुन्य से आया हूं। गोरख उवाच [३] स्वामीजी ? अजर बिंदु अगाध ब ৰিলৰ की माया। गोरख कहै... सुणो हो स्वामी, क्यू शांति जल बिन की काया ॥५ भावार्थ-स्पष्ट हैं। श्री दत्तात्रेय उवाच अवधू ! ! कड्यो न बाई अप्रबलो न माया, आकार न निराकार सुधमो न काया । की छाया

dehat
गोरख बोध वाणी संग्रह
जलो न जल बिदोऽयनो न झाया,
दत्तो न गोरखो न काया न छाया ॥६
अर्थ स्पष्ट है-
गोरख उवाच ४.
हवामी कौरण जु आवे कोरण जु जाय,
बोले सो कहां समाय ।
गम होय सो कहाए भेव,
गोरख भणे सुरणो दत्तदेव ।।७
श्री दत्त उवाच
अवध ! न कोई आवे न कोई जाय,
कांसा नाद माहि समाय
एके सूत्र पोयो
सांभल गोरख कहै विचार
गोरख ऊवाच ५.
स्वामीजी ! कौरण है माता कौरण पिता,
कौरण गुरू उपदेश सिखाता है
कौरण सु आसन करऊ. विश्राम,
सुरण हो स्वामी प्राठों याम ||
श्री दत्त ऊवाच
अवध ! धीरज भात संतोष पिता,
ज्ञान गुरू उपदेश सिखाता ।
--

गोरख बोध वाणी संग्रह विश्राम, अनिश प्रासरण तहां सांभल गोरख प्राठों याम ।१०॥ गोरख उवाच ६. स्वामीजी ! कौरण है मुक्ता कौरण हंस सहै, कौरा बिनसे कौन अजर रहै। जो गम होय सो कहिये भेव, गौरख भाखें सुणो दत्तदेव ॥११॥ श्री दत्त उवाच अवधू ! ब्रह्म मुक्ता प्रकृति सदृश सहै, प्रकृति विनसे ब्रह्मा नजर रहै । गुप्त ज्ञान कथि गम अपार, सुनले मोरख कहूं विचार ।१२। गोरख उवाच ७. स्वामीजी कौग है सूक्ष्म कौण है स्थूल, कौण है डाला कोण है मूल । जो गम होय तो कहिये भेव, गोरख भणे. सुणो दत्तदेव ।१३ श्री दत्त उवाच अवधू ! ब्रह्म सूक्ष्म तत स्थूल, पवन डाल है मन है मूल ।

रख बौध बाणी संग्रह ब्रह्म कैवल गृह्य ज्ञान कथ लेहु अपार, सुन ले गोरख कहूं विचार ॥१४ गोरख उवाच ८. स्वामीजी कोण गुरु है कौरण चेला, किहि विधि अनंत सिद्धो से मेला । का कहिये मेव, गोरख भणे सुनो दत्तदेव ॥१५ श्री दत्त उवाच अवधू परमातम गुरु आतम चेला, सहज सुरत होय अनंत सिधों से मेला। ब्रह्म कंवल उरध मुख खेला, सांभल गोरख उनमुनि केला ॥१६ गोरख उगाच स्वामीजी कौण है उनमुन कोण है कला, किस विध संले त्रिकुटि ताला । माद बिंद का कहिये भेव, गोरख भरणे सुरगो दत्तदेव ॥१७॥ श्री दत्त ऊवाच अवध उनमुन ध्यान पवन मुख कला, नाद मुखं खूले ताला Patro '. ५६ गोरख बौध वाणी संग्रह दशवें द्वारे बिन्दु बिन्दु का साभल गोरख नाद प्रकाश ॥१८ गोरख ऊवाच १०. स्वामीजी ! कौरण है कंटक कोरण उचाट, किहि विधि . खुले ब्रह्म कपाट । अगम पंथ का कहिये भेव, गोरख भरणे सुरगो दत्त देव ॥१६॥ श्री दत्त ऊवाच प्रवधू ! कंटक सोई जिहि. अचिन्तित क्रोध, उचाट सोई प्रातम विरोध । गुरू मुख खले ब्रह्म कपाट, सांभल गोरख प्रजबा बाट ॥२०॥ गोरख ऊवाच (११) स्वामीजी कौरण है दया कौरण धरण, कौरण है बूढरण कौण है तरण । कहा कर्म कहा ज्ञान को भेष, गोखर भरणे सुरणों दत्तदेव ॥२१॥ श्री दत्त ऊवाच अवधू ! प्रातमा दया ध्यान है धरण संशय बूडरग ज्ञान है तरण ।

.
५४
गोरख बोध वारणी संग्रह
किया जाल सोई है करम,
ज्ञान सोई बिजिस जो करम ॥२२
गोरख उवाच [२२]
स्वामीजी कोण है बंध्या कौण है भुगता।
कौण है जोगी कोण है जुगता।
देव कला का
कहिये भव,
गोरख भणे · सुणों दत्तदेव ॥२३
श्री दत्त उवाच
अवधू ? बंध्या सोई करम ही बंध,
मुक्ता
सोई . रहे निरदद।
जोगी सोई
सोई जुगति मन रहे,
गोरख सुणो दत्त यूं कहे ॥२४
गोरख उवाच (१३)
स्वामीजी कोरण है मुक्ति कौरण है जोग
काया लागे
रोग।
इनका हम सू कहिये भेव,
गोरख भणे सुणो दत्तव ॥२५
श्री दत्त ऊवाच
अवध मुक्ति सोई जो जुगति कर पाली,
जोग सोई जो विषय निराली ।
कौण है

मौरखे बोध धारणी संग्रह रोग सोई मन भ्रमत रहे, गोरख सुणो इत्त यूं कहे १२६। गोरख उवाच १४. स्वामीजी कोण है भ्रम कौन है धर्म, कौन है निश्चय कौण है अधर्म । अगम ज्ञान का कहिये भेव, गोरख भणे भणे सुणो दत्तदेव ॥२७॥ श्री दत्त उवाच प्रवधू भ्रम सोई जो ब्यापे संशय धर्म सोई दर्शन प्रा दिशय । निश्चल सो जो लौ मैं रहे, अधर्म सोई जो मिथ्या कहे ॥२६ गोरख उवाच १५. स्वामीजी कोण है मिथ्या कौण है सांचा, कौण है सारा कोण हैं कांचा । कोण कहे शब्द का भेब, गोरख भणे सुणो दत्तदेव ॥२६॥ श्री दत उवाच अवधू माया मिथ्या ब्रह्म है सांचा, शब्द सु सारा पिन्ड जु काचा ।

गोरख बोध वाणी संग्रह शब्द विचार जहां मन रहे, गोरख सुणो दत्त यूं कहै ॥३०॥ गोरख उवाच [१६] स्वामीजी कोरण है काया कौरण है माया, कौरण भ्रम जग धंधे लाया । अपार धंधा का कहिये भेव, गोरख भरणे सुरणो दत्तदेव ।३१॥ श्री दत्त उवाच अवधू अन कल्पंता लागी माया, प्राचार तहां लौ काया । ज्ञान बिना जग धन्धे सांभल गोरख भेद बताया ।३२॥ गोरख उवाच (१७) स्वामीजी कोरण ज्ञान है कौरण सु ध्यान, कौरण मन कोन है प्रासन । का कहिये भेव, गोरख भरणे सुनो दत्तदेव ॥३३॥ श्री दत्त उवाच अवधू ध्यान सोई ब्रह्म मूले है, सोई ज्ञान गल लहै । लाया, ध्यान सब

६२
गोरख बोध वाणी संग्रह
प्राप
प्रकाश
मन सोई तहां मन ही समान,
आप सु जाने सोई प्रासान ॥३४
गोरख उवाच (१८)
स्वामीजी ज्ञान समान कौरण है जान,
शशि हर सूर सब को पान ।
अगोचर भेव,
गोरख भरणे सुरगो दत्तदेव ।।३५
श्री दत्त उवाच
अवधू ! जाणे
जाणे सो परचे है ज्ञान,
गुरु मुख लेता भेद पिछान ।
शशि
अगोचर
सुरण हो गोरख कहूं प्रकाश ॥३६
गोरख उवाच [१६]
स्वामीजी ! कौण अगोचर कौरण प्रकाश,
कौरण घर खेले आप निरास ।
कौरण द्धि का कहिये भेव,
गोरख भणे सुरणो दत्तदेव ।।३७
श्री दत्त उवाच
अवधू ब्रह्म अगोचर मन प्रकाश,
परचे घर खेले माप निरास ।
वास,

मन गोरख बोध वाणी संग्रह परम ज्योति तहां सिद्ध गम रहै, गोरख सुरणे दत्त यूं कहे ॥३८॥ गोरख उवाच २० स्वामीजी ! कौरण है परचो कौण है प्रतीत, कैसे अस्थिर चंचल चित्त पवना का कहिये भेव, गोरख भरणे सुरणो दत्तदेव ॥३६॥ श्री दत्त उवाच प्रवधू गुरु परचे तो मन परतीत, निश्चय स्थिर चंचल चित्त । पवन स्थिर ता मन थिर रहै, गोरख सुरणे दत्त यूं कहे ॥४०॥ गौरख उवाच २१. स्वामीजी कोरण निश्चय ले बंधे बंध, जरा मरण अजरावर कंध। कहिये भेव, गोरख भरणे सुरगो दत्तदेव ॥४१॥ श्री दत्त उवाच अवधू निश्चय ले सो जौन पड़े काया, त्रिगुरण रहे तमो गगन समाया ।

गोरख बोध वाणो संग्रह
पद
परम
सहज
निरवारण,
सांभल गोरख ए परमारण ।४२।
गोरख उवाच [२२]
स्वामीजी कोरण शक्ति है कौरण शिव,
कौरण तीन भुवन का जीव ।
कौरण है आशा पूरा भेव,
गोरख भरणे सुरणो दत्तदेव ।४३।
श्री दत्त उवाच
अवधू शक्ति सोई जो सब ही सोवे,
शिव सोई सबही को पौषे ।
जीव सोई तीन भवन का नाथ,
सोई संगी सो पुरवे आस ।४४।
गोरख ऊवाच (२३)
स्वामीजी कोरण तत्व ले कथिबा ज्ञान ।
कौरण तत्व ले धरिबा ध्यान ।
कौरण समाधि तुम लागे भेव,
गोरख भरणे सुरणो दत्तदेव ।४५।
श्री दत्त उवाच
अवधू प्रातम चिन्ह ने कथिवा ज्ञान,
तत्व विचारिबा धरिबा ध्यान ।

गोरख बोध वाण मंग्रह ६५ समान . प्राय प्रवधू ज्ञान तत्व दत्त कहे हम सहज सांभल गोरख पद निरवान ।४६ गोरख उवाच (२४) स्वामी जी कौरण तत्व तुम रहो समाय, कोरण तत्व तुम मध्ये कौरण परचे तुम कहते भेव, गोरख भरणे सुरणो दत्तदे ।।४७॥ श्री दत्त उवाच तत्व मैं रहूं समाय, चैतन मो मैं त्रिगुण परचे गुरु गम कोई, निश्चय धर्म ज्ञान गम सोई ।४। गोरख उवाच (२५) स्वामीजी तुमेव दत्त तुमेव देव, प्रादि तुम जागो भेव । तुम नारायण तुम कृपाल, तुम हो सकल विश्व के पाल ।।४।। श्री दत्त उवाच अवधू तुम हो गोरख तुम रक्षपाल, अनन्त सिद्धों में तुम मध्य भूपाल ।

गोरख बोध वाणी संग्रह देव, अन्त तुम ही शंभूनाथ निवारण, प्रणवे दत्त गोरख प्रणाम ॥५०॥ गोरख उचाव (२६) स्वामीजी दरशन तुम्हारा प्रादि. पाया भेव । गोरख भणे प्रणाम, भोग योग में परम निधान ।।५१॥ ।। इति दत्त-गोरख संवाद ज्ञान प्रदीप समाप्त: ।। अथ गोरख-गणेश गोष्ठी-संवाद स्वामीजी तुम कहां से आये, कहा तुम्हारा नाम । अवधू निरंतरि ते पाये, योगी हमारा नाम ।। स्वामीजी जोगो तो बोलाए, जिन अनेक महरम खेल रचाए। ब्रह्मण्ड रचाया, तुम्हे तो कोरण जोगी दरशाया । अवधू मैं निरंजन जोगी, शब्द अतीत ना चेला मैं सौ योगी । स्वामीजी निरंजन योगी, शब्द अतीत ना चेला । कैसे करि जागिये, कैसे करि प्रमाणिये ।। प्रवधू रहित करि जारिगये, ए शब्द करि प्रवारिगये । स्वामीजी रहित ते का बोलिये, शब्द ते का बोलिये । अवध रहित त्रिगुरण रहत बोलिये, शब्द ते बोलिये सर्व विजित । .

गोरख बोध वाणी संग्रह
६७
स्वामीजी सर्व ते विवजित ते का बोलिए ?
त्रिगुरण रहित ते का बोलिए ।
प्रवधू सर्व ते विजित सूक्ष्म विगुण बोलिए,
सत्व, रज, तम।
स्वामी जी
सूक्ष्म ते का बोलिए,
सत, रज, तम ते का बोलाए ।
अवधू सूक्ष्म बोलिए दृष्टि न देख्या जाय ।
मुष्ठि न गया जाए, एता एक सूक्ष्म बोलिए ।
सत्वगुण-विष्ण, रजोगुरण-ब्रह्मा, तमोगुरग-रद्र ।
तीन गुण-पांच तंत, पच्चीस प्रकृति का अदम बोलिए।
स्वामीजी ! त्रिगुरण ते का बोलिये ?
पांच तन्त ते का बोलिये ?
पच्चीस प्रकृति ते का बोलिये ?
उत्तर :
-
! तीन गुरग
नवधू
ते राजस, तामस, सात्विक बोलिये।
पांच तंत पृथ्वों आप (जल), अग्नि, वायु, नाकाश बोलिए
(१) पृथ्वी की प्रकृति-अस्थि, मांस, त्वचा, नाडी,
रोमावली ए बोलिए।
(२) प्राग की प्रकृति-लार, रूधिर, मूत्र, शुक्र, पसीना
ए डोलिए।

६८
गोरख बोध वारणी संग्रह
क्रोध,
(३) तेज की प्रकृति-निद्रा, तृषा प्रालस्य,
थुधा ए बोलाविए ।
(४) वायु की प्रकृति-चालणा, धारणा, बलावरणा,
संकोचण, प्रसारण, बोलाविए ।
(५) प्रकाश की प्रकृति-लज्जा, माया, मोहः काम,
भय ए बोलाविए।
..
(१) पृथ्वी का कोण वरण (२) प्रा पका कौण बरण
(३) ' तेज का कौरण बरण (४) वायु का कौरण वरण
(५) आकाश का कौरा वरण बोलाविए ।
उत्तर :--अवधू
(१) पृथ्वी का पीत वर्ण (२)पाप का श्वेत वर्ण (३)तेज रक्त
(४) वायु हरा ( ५ ) आकाश श्याम ए वरण बोलाविए
प्रश्न :
(१) पृथ्वी का कोरण स्वाद ( २ ) पाप का कोण स्वाद
(३) तेज का कोरण स्वाद
( ४ ) वायु का कौरण स्वाद
(५) आकाश का कौण स्वाद बोलाविए !
(१) पृथ्वी का मीठा ( २ ) पाप का खारा ( ३ ) तेज का
तीखा
( ४ ) वायु को खाटा (५) आकाश का मिजला
प्रश्न :-स्वामीजी !

गोरख बोध वाणी संग्रह
६६
(१) पृथ्वी का कौण स्वभाव ! (२) जल का कौण स्वभाव !
(३) तेज का कौण स्वभाव ! (४) वायु का कौण स्वभाव !
(५) आकाश का कौण स्वभाव !
उत्तर :-अवधू !
(१) पृथ्वी बैठी (२) आप शीतल ( ३ ) तेज ताता
(४) वायु चलता (५) आकाश ऊभा
प्रश्न :-स्वामीजी !
(१) पृथ्वी का कोण गुरु ! (२) पाप का कोण गुरु !
(३) तेज का कौण गुरु ! ( ४ ) वायु का कौण गुरु !
(५) आकाश का कौन गुरु ?
अवधू
(१) पृथ्वी का गुरु मन देवता वाचा स्वरुपा
(२) प्राप का गुरु चन्द्र देवता बुद्धि स्वरुपा
(३) तेज का गुरु सूरज देवता अग्नि स्वरूपा
(४) वायु का गुरू ईश्वर देवता आनन्द स्वरूपा
(५) आकाश का गुरु गोरख (निरंजन-व्यापक ) देवता
अविगत रूपा
प्रश्न :-स्वामीजी !
(१) पृथ्वी का कौण घर ? कोण द्वार ! कोण आहार !
कौंण निहार ! कौण व्यौहार !
उत्तर:-

गोरख बोध वाणी संग्रह
?
?
(२) जल का कौण घर ? कोरण द्वार ? कोरण आहार ?
कौण निहार ? कोण व्यौहार !
(३) तेज का कारण घर ? कौग द्वार ? कोण आहार ?
कौरण निहार ? कौरग व्यौहार ?
(४) वायु का कारण घर ? कोण द्वार कोण पाहार ?
कौण निहार कौरण व्यौहार ?
(५) प्रकाश का कौण घर ? कौरण द्वार ? कौरण पाहार ?
कौरग निहार ? कोरण ब्यौहार ?
उत्तर :--अवधू !
(१) पृथ्वी का कलेजा घर, गुदा द्वार, खाई पौवे प्रहार,
अमरी बजरी निहार, लोभ लालच व्यवहार ।
(२) जल का ललाट घर, इन्द्रि द्वार, त्रिया आहार, बिन्दु
निहार, भोग-मैथुन व्यवहार ।
(३) तेज का पोता घर चक्षु द्वार, दृष्टि माहार, हरष
निहार, मोह व्यवहार ।
[४] वायु का नाभी घर. नासका द्वार, बासना [गंध]
प्राहार: निरवासी निहार पिन्ड खण्ड व्यवहार ।
[५] आकाश का ब्रह्मड घर, श्रवण द्वार, नाद आहार,
जिभ्या निहार अहं-क्रोध व्यवहार ।
प्रश्न :--स्वामीजी !
[१] पृथ्वी को कोरण भारजा? [२] पापको कारण भारजा?
?

गोरख बाँध वाणी संग्रह
७१
(३) तेज को कोरण भारजा ? (४) वायु को कोरण भारजा ?
५) प्राकाश की कौरण भारजा ?
उत्तर :-
[१] पृथ्वी की भारजा साध नवता
[२] आप को भारजा मनसा-चोरटा
[३] तेज को भारजा कल्पना- चन्डाली
[४] वायु की भारजा चिता-डाकरण
[५] आकाश को भारजा प्रसाधन-वृति
प्रश्न :-स्वामीजी !
[१] पृथ्वी कोण गुरणी ? [२] जल कौरण गुरणा
[३] तेज कौरण गुरगा? [४] वायु कोण गुरणा
[५] आकाश कौरण गुरणा
-अवधू
१] पृथ्वी मूल गुरणी [२] जल वृद्ध गुणा
[३] तेज रूप गुरगा (४) वायु अमल गुणा
[५] आकाश मैथुन गुरणा?
?
?
पांच तन्त का बरण, स्वभाव, गुण भी कह्या,
गुरु घर द्वार. अहार, व्यवहार कह्या ।
पांच तंत को उत्पति कहां ते कहो-तोषपति ।

७२
गोरख बोध वाणी संग्रह
उत्तर :-अवधू ।
अविगत ते उत्पत्ति प्रोऊं,
प्रोऊं उत्पपति ते प्राकाश,
आकाश उत्पति ते वायु, वायु ते उत्पत्ति तेज,
तेज उत्पत्ति ते तोया, तोया ते उत्पत्ति पृथ्वी ।
मही प्रासं ते तोया, तोया ग्रासं ते तेज
तेज ग्रासं ते वायु, वायु ग्रासं ते आकाश
प्राकाश ग्रासंते अविगत रहत प्रावते न जावन्ते ।
निरंजन देवता पाणी जिद, अग्नि पूठ, पवन का थंभा
सुरत निरत को सोधि शुन में समाया हो देवता !
।। इति पिण्ड-ब्रह्माण्ड का निवारण बोलिये ।।
* अथ प्रातम बोध वर्णन *
ॐ शब्द ही ताला, शब्द ही कूची,
शब्द ही भया उजियाला
कांटा सेती कांटा टूटे, कूची सेती ताला ।
सिद्धि मिले तो साधक निपजे. जब घट होय उजाला ॥१॥
अलख पुरुष मेरो दृष्टि समाना, संशय गया अपूठा ।
जब लग पुरुष तन मन नहीं खोजे. कथे बदे सब झूठा ।
सहज स्वभाव मेरो दृष्टि में फोटो, सींगी नाद संग मेला ।
अमृत पिया विश्य रस टारया. गुरु गारडू अकेला ॥२॥

गोरख बोध वाणी संग्रह
अमरा भरया भरया
सर्प मरे बांबीऊ विनास कर बिन डमरू बाजे ।
कहै नाथ जो इहि विधि जोते. पिंड पडे तो सतगुरु लाजे ।।
दरशण गांहि दरशण देख्या, नीर निरन्तर झाई ।
प्रापा मांहि पाप प्रकटियाः लखे तो दूर न जाई ।४।
चकमक वर के अग्नि जरे, यूं दधि मथ घृत कर लिया।
प्रापा मांहि प्रापा प्रकटया, तब गुरु संदेशा दिया
सुरति गहो संशय जिमि लागो, पूंजी ज्ञान न होई ।
एक शरण सतगुरु
की रहवा, टारया टरे ना कोई ।६।
गम करिके, गुरु चरणों में रेण ।
परचा ले तो तापर निपजे, नहीं तो सहवे न वेरणा १७॥
जे लूटयां ते खबर न पाई, कसि कसि डाई डांडी ।
तन मन को कछ ख पर न पाई, सुरत विगोया रांडी।
बिद और भग बानि और बिन दांतां नहीं खाया ।
प्र ण पुरुष का मन भर पाया, छोड़ विगूते माया ।।
सोद्यो लाकड़े ज्यू धुरण लागे, लोहे लागे: काई ।
बिन परतीती कहां गुरु कोजे, काल हूं ग्रास्या जाई ।१०।
राडो तज्या नपुरिया जोवे, पुरुष तज्या नाहीं नारी ।
कहे नाथ ए दीनू विनसे, धोखा को असवारी ।११।
बैद सर मुख ब्रह्म होता सुझायाऊं प्रा बानी ।
अश्वमेघ ब्रह्मा जिग निपजे, जुगत जमाया पानी ।१२।

भोरक्ष बोध वाणी संग्रह
तो जगराड्यां जोंगेश्वर ब्याया, संगे शक्ति सूफेरा ।
जा पद मंदिर पुरुष विलू व्या, वही मंदिर घर मेरा ।१३।
या रहणी मैं घर घर वासा, जोग जुगति से पाया ।
सिद्ध समाधि पंच घर में ला गोरख तहां समाया ।१४।
हाली भीतर खेती निपजे निणे, बैगु में ताल समाई ।
बरखे मौर कहूं कैसा वेणा, नहीं अफूटी प्राई १५
गनपद मांहि पेहों कर फंद के दादुर भरयाई लारे ।
चातक में चौमासा बोले ऐसा समा है मारे ।१६।
प्राशा तृष्णा थिर है बैठी पद परचे सुषमो दाया ।
सूखा तरुवर कपल मेलही, इस विधि निपजे काया ।१७॥
पूरब देश पछांही घाटी, जनम लेख्या हमारा जोग ।
गुरु हमारो नावेगर केही, ए मेटे भ्रम वियोग ।१८।
नव ग्रह मार अग्नि में झोंक्या, इन्द्र लाग्या रह डोरी ।
परम पुरुष पिंजरे में विलुम्ब्या, भई अगम गति मोरी ।१६।
अकथ कथाय मन अक्षर बाच्या, अगम गमन करि लिया ।
हंस विलूज्या बूद न ढलके, बहि सरवर बंध दिया ।२०।
बोले नाथ गगन घर वासा, अन्तर बसिया नाई।
परम पुरुष मेरे कागज मांडया, दिन दिन कला सवाई ।२१
ऐसो रमझ जैसे नख सिख भेदे शंक्या शरीर न लूटे ।
चलत फिरत पद मांहि समाया जनम मरण भय छूटे ।२२।
-

गोरख बोध वाणी संग्रह
मरि मरि जाई सु संशय मांही, तन काम जग दाझया।
धोखे जनम गमावे प्रारणो सो पद पंथ न सूझया ।२३।
अटल साधन निर्मली जोगी, ता पुरुष की रहनी ।
या रहनी अमृत रस निपजे, लोहां के उन पद मैं दहनी ।२४।
नीर नीर अमीने मुख
बरणे, सींचे बाग हमारा।
या रहनी ते पय के दर निपजे. तिसियां मरे संसारा ।२५॥
इन्द्र मिल्या ते धरणी निपजे, इन्द्री
बरषे देहीं ।
गुरु हमारा वारणी बोल्या, मारिणक चुरण चुरण लेही ।२६॥
पारस से पत्थर अविनाशी, ज्यू अष्ट धातु मैं सोना ।
यूं सब जग मांहि समझ अविनाशी, ता घट पापन पूना ।२७।
बहती नदी भाव घर थांभी, सूरज देखी पछांही ।
दुर्लभ देवल मन अगोचर, ता बेल्यां फल खाही ।२८।
नवलख किरण अफूटो प्रकट, कोटि किरण मुख आगे।
कहे नाथ धरम का पैंडा, संशय बूंद न लागे ।२६।
गिरही के घर जनम हमारा संगत सूरति दिढाणी ।
कहे नाथ जीव ब्रह्म एके, जब शिव घर शक्ति समाणो ।३०।
अनहद धुनि में रहे निहपारा, तत्त देखि मन लागा।
प्रापा माहि पापा प्रकटयाः तच जाय धोखा भागा ।३१॥
जे नर योनि अयोनि शंभू सिद्ध पुरुष से मेला ।
जा रहनो में थानहमारा. ता घटि पुरुष अकेला ॥२३॥

७६ गोरख बोध वाणी संग्रह ऊरध भरे सो थिर व जीवे सूधे घटे संवारी । अंधे लोचन सब जग सूझे, सालिम सब अंधियारी ।१३। तूबो मैं इह लोक समाना, त्रिवेणी रहि चन्दा । बूझत है कोई ब्रह्म ज्ञानी, अनहद नाद प्रभंगा ।१४। आवा गमन भरम का मारग, पुरुषां पन्थ बताया । शब्द अतीत अनाहद बोले, अन्तरगति समाया ।१५॥ विमल पंथ बिजली जहां चमके, घर हरता घर गाजे । ता रहनी से जोगी का घर, अनहद बाजा बाजे ।१६। जा पद मंदिर ध्वजा फरहरे, मढ़ी सँवारे चेला । कोटि कला जहां की अनहद बानी, गावे पुरुष अकेला ॥१७॥ नौ लख पातर आगे नाचे, पीछे सहज अखारा । ऐसे मन ले जोगी खेले, तब अन्तर बसे अडारा ।१८। ज्ञान गहे तो तृष्णा हारे, सूरत देखि पछांही । सतगुरु मिले तो संशाय भागे, मूल विचारया मांही ।१६। अंजन मांही निरंजन भेट्या, तिल मधि भेंट्या तेल । मूरति मांहि अमूरति परस्या, भया निरंतरि खेल ।२०। जहां नहीं तहां सब जग देख्या, कह्या न कोई भ वे । सब जग भ्रमत भूला डोले, गुरु की गति समावे ।२१। हमरी डिबिया अजब अनोखी, अंगानि बल मुलतान । हीरे में हम जोगेश्वर, जिपना अपगा पद निरशान ।२२!

गोरख बोध बालो सग्रह
८७
बाफ न निकले बूद न ढलके, सहजे अंगोठी भरि २ रांधे ।
सिद्ध समाधि जोग अभ्यासो, तब गुरु परचे सर सांधे ।४३।
धीरज पद भज डोरी झेली, धुनि समानि असमान ।
अटल उलीचा अखै पद, तह गोरख दीवान ४४॥
।। इति ज्ञान तिलक समाप्त ।।
* अथ अभय मात्रा कथन *
ॐ प्रकल पथ अकल का मारग सति, भूमि सेज अपारण ।
प्रारणानाथ जोगी पवन गोटिका,
निज भंवर गुफा सहज संयम को पीन ।
मरजादा मेखली, निह केवल जो गोटिका ।
जुगति उड़ारणी शील कंथा, क्षरा टोपी, जरणा आधारी।
अंतरगति झोली सांच मूझा, प्रकल पत्र प्रामिति डाबी ।
त्रिगुरण डाहा अल्हाद कपाली, संतोष तिलक धीरज दंड ।
बमक पहाड़ी तप चक्र, मूल कमंडल मन उदिक ।
महा अमृतभाजन कलस, पात्र त्रिपति सिद्ध दिया रहैगसि ।
विचार पुस्तक जिभ्या रसायरणी ।
सरबंगी कला वैद्या काल बंचरणी ।
निर्भय नगरी अमरपुर पटरण, प्रकल बन खण्ड ।
अभग तरवर, अचल छाया अमर मूल ।
जग पलवे अमी कली सू सील, संतोष फल ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
निराकार कल्प वृक्ष, सिंभ सरोवर, निरास मढ़ी।
प्रतीत देवता ज्ञान दीपक, अकल प्रहरी, अयाचिक भिक्ष्या
शब्द सींगी अनाहद किंगुरी, पवन अधारी अष्टांग जोग,
अमृत प्याला, निश्चल रिद्धि, सत करामात ।
अजपा जाप, अलख दरशरण, निरंतरि ध्यान, अटल समाधि
सार मात्रा तत्सार, अलख निरंजन निराकार ।
कथत गोरखनाथ जोगी, सतसत भाखत बाबा मच्छंद्र नाथ ।
।। इति अभय मात्रा समाप्त ।।
* अथ बत्तीस-लक्षण, ज्ञान-परीक्षा *
निरलोभी, निश्चल, निर्वासी निह शब्द ।
विचार पारख्या, निरमोही निरबंध ॥
निशंक निरवारण, विवेक पारख्या ।
सरवंगी सावधान, सतसार ग्राही ।
संतोष पारख्या, अयाचिक अवांच्छिक ।
प्रमानिक प्रथोर न बल पारख्या ॥
निष्प्रपंच निःउदीन, निरालेप निरमजहब ।
पारख्या दया सत्य, सारक निष्कपट अडान ।।
पारख्या शुचि संयम श्रोत, शांत दांत तितिक्षा मनः ।
भक्तिकाल वर सिद्धां पाई, साधिका पाई जो जन उतरे पार ।
।। इति ज्ञान पारख्या लक्षण कथन ।।

गोरख बोध वाणी संग्रह
७६
* अथ सृष्टि पुराण वर्णन *
एक ऊपर लेखा नाहि, दोई पाछे सृष्टि नाहिं।
प्राण पाछे परजा नाहि, गुरु पाछे ज्ञान नाहि ।
दया ऊपर धर्म नाहि, शील ऊपर शुचि नाहिं ।
जप ऊपर तप नाहि, सांच ऊपर शास्त्र नाहि
नासिका ऊपर' गंध नाहिं, नैत्रा ऊपर दृष्टि नाहि ।
श्रवण ऊपर श्रुति नाहि, गर्भ उपरांत नर्क नाहि ।
खल उपरान्त हानि नाहि, घार उपरांत जाय नाहि ।
चंदन उपरान्त काष्ठ नाहि, शिव उपरांत देव नाहि ।
काया ऊपर क्षेत्र नाहि, शब्द ऊपर बारण नाहिं ।
निरभय ऊपर भय नाहि, संयम ऊपर पाक नाहि ।
संतोष ऊपर सुख नाहि, अमृत ऊपर सिद्ध नाहि ।
अनुभव ऊपर करामात नाहि, माता उपरांत जन्म नाहिं।
चिन्ता उपरांत रोग नाहि, काल उपरांत बैरी नाहि ।
वृद्ध ऊपर मृत्यु नाहि, ज्ञान ऊपर ग्रन्थ नाहिं।
अजपा ऊपर जाप नाहि, नारायण ऊपर इष्ट नाहि ।
निरंजन ऊपर ध्यान नाहि, संत
ध्यान नाहि, संत सभी कथ्या याहि ।
विद्या ऊपर मति नाहि, बोद्ध ऊपर बाध नाहिं।
क्रोध ऊपर अग्नि नाहि, शील ऊपर शान्त नाहिं ।
!! इति मष्टि पुराण समाप्त !!

८० गोरख बोध पाखो संग्रह * अथ चौबीस सिद्धि कथन * प्रथम चौबीस सिद्धि बोलिए, पृथ्वी ऊपर ते कोण-कोण ? प्रथम अणिमा सिद्धि को लक्षण, माया शुन सूके ॥१॥ महिमा सिद्धि को लक्षण, लघु दोघ देह दिखावे ॥२॥ गरिमा सिद्धि को लक्षण, ब्रह्मा का स्वरुप दिखावे ।३। लधिमा सिद्धि को लक्षण, अनेक रूप देव धरे ।४। प्राप्ति सिद्धि को लक्षण, स्वेच्छा रूप काम करे ।५। प्रकाशित सिद्धि को लक्षण, सर्व तत्व को वश करे ।६। असत्या सिद्धि को लक्षरण, उपावे वस्तु को खपावे ।७। आवेश्या सिद्धि को लक्षण, ब्रह्मादिक प्राज्ञा में रहे ।। ।। इति अष्ट भूतनाथ सिद्धि कथन ।। मनोज सिद्धि के लक्षण, सबै कामना को जारणे ।। छछ मुक्ता सिद्धि के लक्षण, मनमाने तहां घर छोड़े ।१०। अनुराग सिद्धि के लक्षण, शीतल करे सभी को भरे ।११॥ परकाया प्रवेश सिद्धि के लक्षण और काया में प्रवेश करे ।१२। भूमि सिद्धि के लक्षण, भूमि प्राज्ञा में रहे ।१३। जल सिद्धि के लक्षण, जल प्राज्ञा में रहे ।१४॥ दूर श्रवण सिद्धि के लक्षण, दूरी की बात सुना करे ।१५॥ दूर दर्शण सिद्धि के लक्षण, दूरी वस्तु का दर्श करे ।१६। काम कामोद सिद्धि के लक्षण, कामना इच्छे सो करे ।१७। अप्रहता सिद्धि के लक्षण, मन माने तहां जाय ।१८।

गोरख बोध वाणी संग्रह ८१ देविता सलि सिद्धि के लक्षण, सर्व देवता सूकेलि करि प्राय ।१९। रूपता सिलि सिद्धि के लक्षण,सर्व देवता को रुप धरे ।२०। विजय सिद्धि के लक्षण, कहूं हारे नाहि विजय करे ।२१। त्रिकाल सिद्धि के लक्षण, छः मास आगे की कहे ॥२२॥ अग्नि सिलि सिद्धि के लक्षण, अग्नि में जले नहिं काय २३॥ शब्दा सिलि सिद्धि के लक्षण, सत्य शब्द कहे सो हो जाय ।२४। इति चौबीत सिद्धि, ब्रह्मज्ञानी के प्राडी आवे ॥२५॥ इति चौबिस सिद्धि, प्राई होय तो सतगुरु. प्रसाद ॥२६॥ ते त्यागे सोई जोगेश्वर, सोई ब्रह्मज्ञानी बसत । अपार संशय खोय, यति गोरख समझावे ।२७। इति चौबीस सिद्धि को त्यागे, सोई परम ज्योति को पावे ।। इति चौबीस सिद्धि कथन ।। * अथ प्रातम बोध वर्णन * सा तो सालिगराम उपाया, टांकी घड़या न किन हूं उपाया। के घर जाया, प्रापे आप जु अपरम्पार । योनि संकट नाया प्रवशि नहीं, उद्म नाहिं करता । मनसा करि आप उपाया, जोरनि हारे लिया न जाई । न काहू ८२ गोरख बोध वाणी संग्रह ताका मन क्यों जाय, मनाई दास भाव कहा लौ काजे । कैसी सेवा भावे सब दास कर आप ही सबका भला मनावे । सालिगराम सो मन ही मांही निशि दिन सेवा होई। पार ब्रह्म सू मन लपटाया, जानेगा जन सोई । मन के भीतर अलख निरंजन, .. परम ज्योति प्रकाशी। मन ही मांही देखन लागा, तब उलटि मिल्या अविनाशी । जब लग दूजा भावे भरम है, सूक्ष्म देत दिखाई। पतिव्रता को बड़े दशरावे करे तो फिरे बुराई । मन ही मांही सहज सपूता, मूरति देश दिखाई । शब्द अगाध अनाहद लू ब्या, सतगुरु दिया बताई। हाथ न पांवे कान न नैना, बिन जिभ्या ही गावे । पूरण एक इसी घट चेतन, गुरु गम दर्श लखावे । पाया सोई पाप लखाया, गुरु बिन ज्ञान न पावे । सतगुरु ज्ञान लखाया, चेतन, गोरख कहि समझावे । ॥ इति प्रातम बोध समाप्त ।। * अथ पंचाक्षरी कथन * गोरखनाथ गोरखनाथ लिव स्वरूप, गो इन्द्रिय पालन । अगोचर हर गंभीर, गकाराय हर नमो नमः ॥१॥ रहत निरालम्ब अस्थंभ भवन त्रिय राख राख श्रवण भूतानां, रकाराय नमो नमः ।। - -

गोरख बोध वाणी संग्रह
८३
नाना
खकाराय इक्कीस ब्रह्मण्ड, खेचर जगत गुरुन ।
क्षेत्रपाल खरंग बसे, खकाराय नमो नमः ।।
सास समुदाई, नाना रूप प्रकाशांत ।
नाद बिंद समो जोशी, नकाराय नमो नमः ।।
थापित तल संसार, ब्रह्म अलख अपार
थावर जंगम सचराचर, थकाराय नमो नमः ।।
गकार ज्ञान संयुक्त रकार रूप लक्षणम् ।
खकार इक्कीस ब्रह्मण्ड, नकार नाद विदये ।
थकार थान मन यो ।।
।। इति षडक्षर समाप्त ।।
* अथ रहराशि कथन *
प्रौऊ प्रादेश प्रादेश अलख अतीत
तदा न होसी धरती आकाश ।
तदाकाले भू भई हमारी उत्पत्ति,
माता न लेवो दश मास भार ।
पिता न करिबा प्राचार विचार,
योनि न पाइबा नाभिन कटाइबा।
पोथी पुस्तक ब्रह्मा न बचाइबा, तहां अलेख पुरुष पटरण ।
अनुपम शिला, तहां बैठे गोरख राई
तुम दमड़ी चमड़ी का संग्रह करो,
गुरु का शब्द ले ले दो जग भगे।
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८४
गोरख बोध वाणी संग्रह
गुपति चक्र चलानो हथियार, पंडित बुद्धि बहुत अहंकार ।
ऊभा ते सिद्ध बैठा ते पाषाण, गोरखनाथ वाचा प्रवाण ।
अनंत सिद्धों में रह राशि कही, गोदावरी के मेले ऐसी भई ।
।। इति रहराशि कथन समाप्त ।।
* अथ दया बोध कथन *
प्रावो सिद्धो खोज बताऊँ, प्रादि नाथ का पूत कहाऊं।
योगारम्भ की याही वाणी, घट नाथ एक करि जारणी ।
योगारम्भ हृदय में मांडों, दया उपावो जूती छांडो ।१।
नागा पावां जे जन मूत्रा, तांका कारज पेली हुआ ।
प्राप स्वारथ चालों धूई, तामे चिऊँटी केतो मुई।२।
तजो कहर नजर बटवा, जिन शान्ति लो हाथ ।
एता प्रारम्भ पर हरो, यू कथे यति गोरखनाथ ।।
मारग चलता जो धरणि दृष्टि राखे,
तो ताके काज कोई न भागे।
पहली प्रारंभ हम भी करतो, जीव जन्तु बहुतेरा हततो।४।
आरम्भ खोय योगी हो धाया,
लावो निरत सुद्धि मारग जोया ।
अविनाशी गम लाला रंग, रिद्धि सिद्धि ताही के संग ।।
रिद्धि तो गौरां के साथ, सिद्धि है शंकर के हाथ ।
छांडो अकल सकल की गाथ, एसे कहे यति गोरखनाथ ।।

गौरख बोध वाणी संग्रह प्रासन तजि अनंत जनि जावो, प्रकल्प भिक्षा बैठा खावो । नातर पांच घर चिताइवा, एकान्त वास रहिबा ।७। करण करण पकड़े कोरो नकेल, प्राई रिद्धि को योगी बेले । हरया सैरणा को सतावे जीचे, सो जोगी कहिये प्रत्यक्ष सीवे ।। चकमक कफ का नाम न धरो, पर प्रातम का परला जिन भांडो। अग्नि न बालो धूनां ना थोटों, भिक्षा बार कर पात्र ले वोटो ।। गवाड़ा बिच प्रासन जिन मांडो, मोह लगाये प्रापा जिन माहो । बाई बावड़ी को मन नहीं दीजे, देखत दृष्टि काया तन छोजे ।१०॥ पंडित पढ़ गुरण करे न पाशा, देखि एकांत रहे निरासा । काहे को पढ़ गुरण भला कहावे, जब लग हृदय दया न पावे ॥११॥ जब लग हृदय दया नहीं पाई, कहिए शुद्ध कसाई। कन कन पकड़े शब्द न बावे, जोगी कागद कहां ते लावे ।१२। तब गौरख बौध वाणी संग्रह - - तन में पोथी मन में लेखिनि, एती निज है सहै तंतनि । साधन शुद्ध पाले संपति, यू कथत है गोरख जति ।१३। उहां चलिबे का करो विचारा, निद्रा अल्प रसुलष माहारा । घट का देव औघट गावे. तहां जोगेश्वर लागी सेवे ।१४। पंच चेला मिल पूरया नाद, धरण गिगन बिच भई आवाज । दीपक एक अखंडित बाती तहां ज्योगेश्वर थाप न थापी।१५। अगम अगोचर सकल ब्रह्मड, ता दीपक के चरण न पिंड । श्रवण शीश चरण नहीं हाथ सो दोपक देख्या गोरखनाथ ॥१६॥ ता दीपक के डालन मूल, ता दीपक के कली न फूल । ता दीपक के रंग न रूप, ता दीपक के छोह न धूप ॥१७॥ ता दीपक के शब्द न स्वाद, ता दीपक के विद्या न बाद । ता दीपक के मोह न माया सो दीपक शुन्ये सून्य समाया ।१८॥ ।। इति दया बोध समाप्त ।। अथ ज्ञान माला कथन औऊँ संतोष सारिषा न पिता क्षमा सारषी न माता । दशा सारिषी न भगनि, क्षुधा सारिषी न अगन ।। प्रारम्भ सारिषा न भ्राता, निरंजन सारिषी न दाता। कूरूप सारिषा न रतना जत सारिषा न जतन ।।

गौरख बौध वाणी संग्रह ८७ बैराग सारिषा न ज्ञान, निराकार सारिषा न ध्यान । पुनिता सारिषी न शांति निशी सारिषी न राति ।३। जाग्रत सारिषी न ज्योति, संवाद सारिषी न बाति । दीदार सारिषी न ज्योति, काया सारिषी न पोथी ।४। दया सारिषी न छाया, प्रहार सारिषी न माया । क्षमा सारिषी न रूप जत सारिषा न अनूप ।। सतगुरु सारिषी न विद्या, हरि नाम सारिषी न रक्ष्या । प्रकाश सारिषा न पण्डिता, मन सारिषा न पुछिता ।। मंत्र सारिषा न जाप, बालक सारिषा न निहपाप । भाव सारिषी न सेवा प्रतीत सारिषा न देवा ।७। शब्द सारिषी न बारण, क्रोध सारिषा न पारण । मुक्ति सारिषा न पद, रहत सारिषा न हद ।। प्रारण सारिषा न प्राधार, जोग सारिषा न सार । स्वप्न सारिषा न छल, बुद्धि सारिषा न बल ।। गुरु सारिषा न अलख, आप सारिषा न लख । रहत सारिषा न अपार जोग सारिषा न सार ।१०। वाचा सारिषा न बंध, काया सारिषा न संध । अस कथी श्री शंभूनाथ, ताही सार कह गोरखनाथ ॥११॥ ।। इति ज्ञान माला समाप्त ।।

गोरख बोध बासी संग्रह
-: अथ रोमवलि अंग कथन :-
मख सख पिता रज तात तम गाडे पारों
लोही मांस त्वचा नाड़ी, ए चार धातु माता की बोलाए ।
बीरज हाड गोंदा मीजी, ए तीन धातु पिता को बोलाए ।
ए सप्त धातु शरीर की बोलिए, दोई हाथ दोई पैर छाती।
लिलाट बट अष्टांग जोग बोलिए ते जोग जोगो।
बिंदु भेद मुद्रा, तिन साधे ते सिद्ध बोलिए ।
तो स्वामी कौरण बंध बांधिये ते कौरण भेद भेदिये ?
कौरग मुद्रां मूदिये, ए घट बोलिये ते कौरण कौरण ?
अवधू मन बंध बांधिये, पवन भेद भेदिये ।
बिन्दू मुद्रा मूदिये।
तो स्वामी कौरण विमल विचारे, कौण करे कौरण केरे ?
तो अवधू मन विमल विचारे, सूर करे चन्द्र केरे ।
तो स्वामी हिन्द पोर क्या बोलिये ?
जिद पोर क्या बोलिये?
तो अवधू हिन्द पीर मन बोलिये, जिद पीर पवन बोलिये।
तो स्वामी खैचरी भौचरो गुप्त प्रकट बोलिये ते कौरण कौरण ?
तो अवधू खैचरी बोलिये मन, भौचरी बोलिये पवन ।
गुप्त बोलिये तो लीला ज्ञान प्रकट बोलिये भोतिक शरीर ।
तो स्वामी शरीरार्थ परमार्थ
गूढार्थ ए घट बोलिए ते कौरण कौरण

गौरख बीध वाणी संग्रह
ज्ञान।
तो अवधू शरीरार्थ बोलिए, ते शरीर प्रक्रिया जान ।
परमार्थ बोलिए प्रारण भेद, गूढार्थ बोलिए
तो स्वामी चार पीर बोलिए, घट भीतर ते कौरण कौरण ?
तों अवधू मन छिद्र, शरीर ईश्वर, चित चोरंगो, ज्ञानगम ।
ए चार पीर बोलिए।
तो स्वामीजी चार तत्त प्रबल, घट कौरण कौरण ?
तो अवधू चक्षु द्रिष्टी कहे क्यू लीजे दोजे ।
श्रवण सुरति कहे क्यू बोलाए।
नासिका कहे सुगंध वासना अमलादिक लीजे।
जिभ्या कहे क्यू खारो, मीठो खाइए।
तो स्वामी हिशा चार बोलिए, पेट भीतर ते कोण कोण ?
तो
अवधू शब्द उत्तर, पवन पश्चिम,
इन्द्रिय दक्षिण, सुरत पूर्व ।
तो स्वामी चार उपदिशा बोलिये घट ते कोण कोण ?
तो
अवधू (१) ऊरम (२)करम (३) ज्योति (४) ज्वाला।
अवधू (१) ऊरम बोलिए, पवन, (२) करम बोलिए मन ।
(३) ज्योति बोलिए नैत्र, (४) ज्याला बोलिये श्रवरण ।
तो स्वामीजी चार खाणी बोलिये,
सेरज, जेरज, इन्डज, उद्धिन ।
सो स्वामीजी सेरज कोण बोलिये ! जेरज कोण बोलिये ?
इन्डज, कौण बोलिये ? उद्धिरज कौरण बोलिये ?
१

गौर च बोध वाणी संग्रह तो अवधू सेरज बोलिये हाड, जेरज बोलिये वीरज । इंडज बोलिए नैत्र, उद्भिज बोलिये रोमावली । तो स्वामी चार वाणी बोलिए, घट भीतर ते कोण कोण । अवधू सो देह बोलिये, शरीर संयम बोलिए पवन । सुपाव बोलिए प्रारण, अतीत बोलिए परम पद । महासमुद्र में हाड, जेना न ग्रामदा महा अजोना । शम्भू बोलिए खाणी, बारणी विचारते निराकार बोलिए। प्रोऊंकार मध्ये ज्योति जारिगए, ऊरम धूरम ज्योति ज्वाला भेद । रवी की चार कला मन का, हस्ती बिब जल पीवे । दोई पक्ष चीन्हे सोई, ले कला जीधे । बारह कला सूरज की सोलह कला चन्द्रमा की। गुरु जिसको नहिं लखावे, चेला तिसका अन्ध । तो स्वामी बारह कला सूरज, की ताके गुण घट भीतर कौरण ? अवधू ! बारह कला के नाम सूरज को बोलिए- (१) चित (२) तरंग (३) दम्भ (४) भ्रमाया (६) प्रपंच (७) हेत (८) बुद्धि (६) काम (१०) क्रोध ११) लोभ (१२) दृष्टि इति बारह कला सूरज की बोलिए। स्वामीजी ! सोलह कला चंद्रमा की, ताके गुण घट में कोण? - (५) प्रगहन पौरखं बौध बाणी संग्रह अवधू ! चन्द्रमा की सोलह कला के नाम ए बोलिए- १. शांति २. निवृति ३. क्षमा ४. निरमल ५. निश्चल ६. ज्ञान ७. स्वरूप ८. पद ६. निरवारण १०. निरविष ११. निरवासिक १२. निरंजन १३. अहार १४. निद्रा १५. मैथुन १६. बोद्ध, सोलह कला चंन्द्रमा को बोलिए। चार तन की, चार मन की, चार वाणी की, चार अन्तरगति की कला शोडष चंद्रमा की पावे । ।। इति रोमावली समाप्त ।। । अथ पंच मात्रा कथन * प्रोऊं अनादि बोलत, खरतर पंथ, जिभ्या इंद्रि दीजे बंध । जोग जुगति में रहे समाय, सो जोगेश्वर जय कराय । द्वादश मंदिर शिव स्थान, वहां उत्तम ब्रह्म गियान । द्वादश निश्चल एक मैं रहे, ते जोगी सिर टोपी दहे। देखो ए तत शुन्य प्राकाश, पंच तंत महापुरुष का बास । पांच तंत ले उनमुन रहे, इच्छा होय दूजो गंद कहै । पांच तंत का करहूं विचार, बहर भीतर एकंकार । भिक्षा मांगे नगरी द्वार, माया मोह तजे जंजार । एता एक अवधू पंच तंत मात्रा का, विचार वदत गोरख एककार । सुरण हो जोगी अध्यात्मक जोग, अर्ध उर्ध मधि कमली भोग।

है.
गौरव बोध वाणी संग्रह
मन सूडे, तो मस्तक मूड, नहीं तो परे नरक का कुण्ड ।
प्रादि संख अनिल उपाया,
अनंत सिद्धां ले मस्तक लगाया।
कान सुणाय गुरु दीनी दीक्षा, नवखंड पृथ्वी मांगे भिक्षा।
भिक्षा मांग निरंतरी रहे, तो जोगी काने मुद्रा बहे ।
औऊँ हाथ गल कंथा पाय चंद सूर थेगला लगाय ।
प्रऊठ कोटि दशा धागा भरे, गुरु प्रसाद दुस्तद तरे ।
कोया कड़ासन मन जो गोटा पांचों इन्द्री करो कछोटा।
जत सत किया शब्द चलाबो, ऊंडा लाग डीबा पावो ।
दक्षिण उत्तर पश्चिम पूर्व पावा ते जोगी जे गोटा चलावा ।
माथे जट्ठा दर्शण विकाल, अवध जोगी बचो काल ।
सोंगो संलो अरु जप माला, बांई फेरो गगन मकारा ।
नवे बहतर पवना मूल षट चक्र गोरी त्रिशूल ।
अलख पुरुष तहां को ध्याया, नगर कर्ट ऊर्ध ते पाया।
चित चक्र में जे पवना गहे, ब्रह्म अग्नि प्रकटे जल रहे ।
विषम २ करे सब कोय, बिना निरंजन मुक्ति न होय ।
मूल चक्र तहां सहस्त्र दल बाट मन पवना ले खोल कपाट ।
गोरख विषम लागां बाद, गोरख ले बजाया नाद ।
वृषभ लिया मृग का रूप, मारया मृग भया अवधूत ।
पूर्व जाता पश्चिम हंस, मारया मृत भीख ले मंस ।
अपना दर्शन देख्या जाय, वाही के संग रहे समाय ।

मोरख बोध वाली सग्रह
३
अंतरगति को जोगी बोय, सींगीनाद गगन धुनि होय ।
प्रातम रूप कों पाया पाय शक्ति चंदन गगन समाय ।
पांचों इन्द्रिय पूरे नाद, ते अंग अरधे जा सोंगी नाद ।
अनहद नाद ऊर्ध का मूल, चंद सूर सूक्ष्म अस्थूल ।
वारि गंगा, पारि गंगा, भधि जोगटा ध्यान ।
गंग जमुन ले मेरू चढ़ाई, तहां प्रकटया ब्रह्म का ज्ञान ।
सैली सींगी और षडासण, अनंत सिद्धों लीना जाय ।
द्वादश डीबी उधर का मेला,
अलख मटी तहां गंग न समाय ।
सोना रूपा गिरहा कूदीना,
यो जोगारंभ तहां सिद्ध समोय ।
आदि पत्र ले ईश्वर को दिया, प्रावि धर्म स्वर्ग तप नाय ।
बारह वर्ष का मूहा मसान, गोरखनाथ जगाया।
चौसठ योगिनी भिक्षा पूरे, अनंत सिद्धां आदि पत्र पाया।
प्रादि पत्र आदि उत्तम अनादि धर्म शंकर कूपेश ।
नुगरा • गड़बड़ बोलिए, सुगरा कूौं उपदेश ।
एता एक अवधू पंच तंत मात्रा का विचार ।
अनंत सिद्ध तहां सुनिया विचार ।
मच्छंद्र प्रताप यति गोरख कहे,
अवधू पंच भू प्रातमा लहे।
ते

६४ गोरख बोध वाणी संग्रह जे जोगी पंच मात्रा का जाणे भेव, सो प्राये करता प्रापे देव । पंच मात्रा जोगी बूझे, ताकू सकल देवता त्रिभुवन सूझे । ।। इति पंच मात्रा समाप्त * अथपंच अग्नि कथन * प्रोऊँ मूल अग्नि का रेचक नाव, सो पीले रक्त पात अरु भाव । पेट पूठि दोऊ सम रहे, ते मूल अग्नि यति गोरख कहे ।१। भूयंगम अग्नि का भूयंगम नाम, तजिबा भिक्षा भोजन गाम । मूल की मूल अमीरस धीर, तिस को कहिये सिद्धों पवन शरीर ।२। ब्रह्म अग्नि ब्रह्म नाला, धरि लेऊँ जान लठत पवना । रवि शशि गगन समान ।। ब्रह्म अग्नि मधि सिकबा कपूर, तिस को देखि मन पवन जोईबा दूर । शिव घर शक्ति अहि निशी रहे, ब्रह्म अग्नि यति गोरख कहे ।४। काल अग्नि तीन भुबन प्रवीनी, उलटत पवन सोखत पानो । खाया पीया वाक हो रहे, काल अग्नि यति गोरख कहे ।। रुद्र अग्नि का त्राविक नांव, सोखि लेय नदी सिंध जल गांव । उलटत केश पलटे चाम, योगाग्नि हैं ताका नाम ॥६॥ .

गोरख बोध वाणी संग्रह
६५
ज्ञान अग्नि को उलटि अबाध,
संयम खिवत योग युक्ति का साध ।
ज्ञान अग्नि भरपूर रहे, सिद्ध संकेत यति गोरख कहे ।।
पूरब को पीवत वायु कुम्भ को काया शोधन ।
रेचक तजत विकार, त्राटिको आवागमन विजित ।।
सिद्ध का मरन कोई साधु जाणे पंच अग्नि गोरख बखाणे ।
पांचों अग्नि सम्पूर्ण भई,
अनन्त सिद्धों में यति गोरख कही है।
॥ इति पंच अग्नि समाप्त ।।
* अथ शिक्षा दर्शन *
अवगति ते उत्पत्ति प्रोऊ, औऊँ उत्पत्ति ते आकाश ।
प्राकाश उत्पत्ति ते वायु, वायु उत्पत्ति ते तेज ।
तेज उत्पत्ति ते तोया, तोया उत्पत्ति ते पृथ्वी ।
मही रूप देवी का रंग, जल रूप ब्रह्म का वरण ।
तेज रूप विष्णु को माया, पवन रूप ईश्वर की काया ।
आकाश रूप नाद की छाया, नाद रूप अवगति उपाया ।
शून्य निरंजन भूचर देव, भूचर का नहीं पाया भेव ।
अकल अगोंचर अनंत साखी सा राम भेद,
परम भेद भेदानि भेद ।
आत्मा ध्यान ब्रह्मज्ञान खेचरी मुद्रा,
भूचरी सिद्धि चाचरी निद्धि ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
अगोचरी बुद्धि उनमुनो अवस्था,
अभय करामात अतीत देवता ।
अवगति पूजा अनिले प्राश्रम,
अध्यात्म विद्या पद्य प्रासन ।
अमृत प्याला, मनसा माई, पंच भूचेला, मन रावल ।
पवन भोगी, दशवें द्वार, प्राणनाथ जोगी,
सहज प्रांवरणा अवधू ।
संयम जीवरणा, समता नदी,
निः केवल जल, त्रिवेणी स्नान ।
त्रिकालक संध्या अजपा गायत्री,
अनूप मन्त्र, निरंजन माला ।
निराकार ज्वाला छः सौ सहस्त्र इक्कीस करि मेला ।
नख सिख पवना वाधिवा भेला ।
नाद अनाहद निः शब्द वाणी,
जोवते शीव ब्रह्म होइबा प्राणीं ।
देही विदेही अविचल धीर, रुधिर पलट फिर होइबा खीर ।
दृष्टि वदिष्ट जोईया नैन, पवन निरञ्जन बोलिबा वैन ।
शब्द निः शब्द होईबा थूल, प्रादि का अनादि होइबा मूल ।
नाद जिंद गाईबा गगन प्राकाश,
ना बढ़े घटे ना होई विनाश ।
धरणी गगन पर मारग न कोई,जे चले तहां काल न होई ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
६७
अखण्ड मढ़ी जहां जोइबा ध्यान,
जुग जुग तालि कथिवा ज्ञान ।
मूल चक्र तहं पलटे जिंद, पलट काया थिर होई कन्ध ।
मूल बंध वन कछोटा पकड़िबा धीर,
मति उडीरणो बंधिबा बीर ।
जत जो गोटा आसन पूर, अमृत धारा कमण्डल होइबा सूर ।
ओं भया ने पाया नीर, चेतना विभूति अंग शरीर ।
अजर कंथा नहिं वाद विवाद, अनहद बाद महारस स्वाद ।
संतोष तिलक महर निरवाण, करि एकता हरिबा प्रारण ।
मन बैरागी मन जोइबा रूप, बइत गोरख ९ तत अनूप ।
दया दण्ड तहां त्रिकुटी ध्यान, क्षमा लाठी टेकेबा मान ।
चन्द सूर दोई जाइबा धार, फेर गगन तहां से मति वार ।
ते जोगी जग जुगता, अविचल सार स्वछद मुगता ।
भै भ्रम पार बोई पीछे ब्रह्मण्ड बंदिया पूर,
गुरु शब्द अनाहद मानव सूर ।
अनन्त सिद्धां तहां सारमसार ।
निश्चल थिर तत निराल, अयाचिक भिक्षा अईबा थान ।
गुरु मच्छंद्रनाथ शिक्षा पदरिबा कान ।
प्रकल पडी बीभोली निरास, संजीवन मात्रा बीज नास ।
एकंत रहबा बंचवा सूल, पावा गवन का न होई वा मूल ।

गौरख बोध वारसो संग्रह बारा कला देवी सोलह कला देव, सुषुम्ना नाड़ी बंधिवा भेव । नौं सौ जौगरण चलाइबा साथ, बुरजि बहतर जगाइबा नाथ। नव खण्ड पृथ्वी मांगवी भिक्ष्या, त्रिलोक मेदिनी होइगों ऊपक्ष्या। चौदह ब्रह्मांड जहां जोइवा हार, षट दर्शन ए पंथला सार । दार बहनी ज्यु होइबा मेद, असंख पंखुड़ी गगन करी सेव। वदत गोरखनाथ अविचल जाप, लिपे नहीं तहां पुण्य न पाप । शून्य ध्यान सोलह कला माला प्रापन शंभू गोरखनाथ बाला ॥ ॥ इति शिक्षा दर्शन समाप्त ।। * अथ प्रष्ठ मात्रा कथन * - स्वामीजी अष्ट मुद्रा बोलिये, घट भीतर ते कौरण कौरण ? उत्तर- अवधू मूलनी मुद्रा ई का नाम, ब्रह्मा ले उतपनो काम । पार ब्रह्मा समोकृत्वा मुद्रा तो भई मूलनी । नाभी मध्ये जलश्री मद्रा काम क्रोध ले उत्पनि, काम क्रोध समोकृत्वा मुद्रा तो भई जलश्री ।१।

गोरख बोध वाणी संग्रह
हृदय मध्ये खौरनी मुद्रा ज्ञान दीप ले उत्पत्ति ।
ज्ञान दीप समोकृत्वा, मुद्रा तो भई खोस्नी ।२।
मुख मध्ये खेचरी मुद्रा,
स्वाद विस्वाद ले उत्पति ।
स्वाद विस्वाद. समोकृत्वा, मुद्रा तो भई खेचरी ।।
नासिका मध्ये भूचरी मुद्रा, गंध विगंध ले उत्पति ।
गंध विगंध समोकृत्वा, मुद्रा . तो भई . भूचरी ।४।
चक्षु मध्ये चांचरी मुद्रा, दिष्टि विदिष्ट्री ले उत्पति ।
दिष्टि विदिष्टि समोकृत्वा, मुद्रा तो भई चांचरी
श्रवरण मध्ये अगोचरी मुद्रा, शब्द कुशब्द ले उत्पति ।
शब्द कुशब्द समोकृत्वा, मुंद्रा तो भई अगोचरी ।।
ब्रह्मण्ड मध्ये उनमनि मुद्रा परम ज्योति ले उत्पति ।
परम ज्योति समोकृत्वा, मुद्रा तो भई उनमनि i७।
इति अष्ट मुद्रा जाणे भेव, पापे करता आपे देव ।
॥ इति अप्ट मुद्रा समाप्त ।।
* प्रथ प्रष्ट चक्र कथन *
अोऊं गोरखदेव अष्ट चक्र घट भीतर बोलिए ते कौरण कौरग?
प्रवधू प्रथमे प्राधार चक्क बोलिए,
गुदा स्थाने चतुर्दश कंवल, षट् शत स्वास ।१।
तिस चक उपरि इष्टि चक्र,
लिंग स्थाने षट् दल कंबल षट् सौं स्वांस १२॥

१०० गोरख बोध वाणी संग्रह तिस चक्र ऊपर मणिपुर चक्र, नाभि स्थाने, दश दल कवल । षट् सौ स्वास ।। तिस चक्र ऊपर अनाहद चक्र मध्य स्थाने द्वादस कँवल । षट् सौ स्वास ।। तिस चक्र ऊपर विशुद्ध, चक्र, कण्ठ स्थाने, षोडस कॅचल । सहस्त्र अजपा गायत्ती. पारब्रह्म ध्यान ।। तिस चक्र ऊपर अग्नि चक्र नैन स्थाने, षोडस दल कॅवल । सहस्त्र स्वास ॥६॥ तिस चक्र उपर गिनान (ज्ञान) चक्र ब्रह्मण्ड स्थाने, एक सहस्त्र दल कमल एक सहस्त्र स्वास । अजपा गायत्री पारब्रह्म ध्यान । तिस चक्र ऊपर सूक्ष्म चक्र, शुन्य स्थाने, इक्कीस सहस्त्र कॅवले । इक्कीस सहस्त्र स्वास एवं अष्ट कॅवल का जाणो भेव, सो प्रापे करता प्रापे देव ।। ।। इति षटचक्र वर्णन समाप्त ।। यहां पर रात-दिन के स्वासा प्रमाण से षट् चक्र साधना विधि से भिन्न चक्र सिद्धि कम से दैनिक साधना की प्रणाली देते हुए दर्शाया कि नित्य प्रात: साधक को नियम से नियत जप से चक्र जागृति होती है। टीकाकार treet गोरख बोध वाणी संग्रह १०१ * अथ नरंप बोध कथन * सुरण हो अवधू शुद्ध बुद्ध का विचार, पांच तन्त ले उत्पना संसार । पहले प्रारम्भ घट परचा करो, निस्पति नरपै बोध कथत यति गोरखनाथ ॥१॥ दूजे प्रारंभ काम क्रोध अहंकार, मनसा माया विषय विकार । हंसा पकड़ गात जिन करो, तृष्णा तजो लोभ पर हरों ।२। छांडो द्वंद रहो निरद्वंद, लजो अलंगन रहो प्रबंध । •सहज जुगति ले प्रासरण करो, तन मन पवना हद करि धरो ।३। संयम चितवों जगति प्रहार, निद्रा तजो जीवन का काल । छोड़ तजू लत मन बदंत, मंत्र मोटे का घात पाखंड १४। जड़ी बूटी का नाम न लेस्यू, राजा दरबार पाव जिनि देस्यूं। न्यू भ्रम लोह न बस कर छाड़ो, सकल आभरण स्वर कर मांडो ।५। सकल विद्या वा जग दास, ब्रह्म विधि ला टारंभ वास । अपना मनवा उलटा धारे काम क्रोध अहंकार जारे ।। जिन महार: फिरो जिन जिन देश, जटा भार बांधों मत केश।

गोरख बोध वाणी संग्रह रूख बूटी जड़ी ना करो गिरी पर्वतां चढि प्रारण जिन हरो । पूजा जप तप कू जिन.जापे, जोग मांहि बैठादो प्रापे । वेद विरगज छांडे कुव्यवहार, पढ़िबा गुरिणबा, लोकाचार ।। बंधु चेला का संग निवार, अणिमादि मसारण बाद विव टार । एको एका रमो भूपाल, एता कहिए ए प्रति काल ।। सभा देखि मांड झूजनि ज्ञान, गूगा गहला हो दूर अजान । राव रंक की छाड कू पास, भोजन भिक्षा भयऊ उदास ।१०॥ सींगीनाद पयाणा देंझू देव कला काल खिन ले । बग ज्यू ध्यान माडि सद रहो, श्वान जति को निशि गहो ।११॥ रस रसायन गोटिका निवारो, रिद्धि पर हरो सिद्धि लेऊं विचारो । पर हरों सुरापान अरु भंग ताते उपजे रंग बिरंग ॥१२॥ नारी सारी की गरी, ए तीन सतगुरु परहरी । इति नरप बोध कथत, यति गोरख यूं भखत ।१३॥ ।। इति नरप बोध समाप्त ।। १ अथ प्रात्म बोध कथन * प्रोऊँ प्रासन करि पद्यासन बांधि, पछिले पासन पवना सांधि ।

गोरख बोध वाणी संग्रह १०३ tost मन मुरछावे लावे तारा, गिगन शिखर जले अंगारा ११॥ प्रथम बैठ वायु परि धंध पवना खैले चौसठ संघ । नव दरवाजा लाचे ताला, दशवां मध्ये होय उजाला ॥२॥ ऐसा भूयंगम योगी करे, धरती सौषे अंबर भरे । गगने स्वर पबले स्वर तारणी, धरती का पारखी ले नंबर पारणी ॥३॥ ता जोगी की जुगति पिछारणी, मन पवना ले उनमुनि पारणी । मन पवना ले उनमुनी रहे, तो काया गरजे गोरख कहे ॥४॥ चढे महारस अमरा भरे, भारंभ योगी अमृत झर हरे। योग रीति खेले ब्रह्मण्ड, मन पचना संग खेले खण्ड ॥५॥ उलटे चंद राहु कू गेहे, सूरज उलट केता संग देहे ३ चंद धरा सूरज थिर रहे, तत जारण योगेश्वर कहे १६॥ वृति योंग चंद उरथ गहे, द्वादश पवना उनमुन रहे । अनहरू सवाई धुनि बाजे, पश्चिम द्वारे पवना गाजे १७॥ प्रमि अंतर ब्रह्म अनि प्रजारे, पंच चोर ले ज्ञान संभारे । जोगी अनुभव धर दिवला दिए, ता जोगी की काया काल न छिपै।। हलि हलि पवना काया गरजे, सूरा होय अमि अंतर जूझे । जूकबा द्वार, अजीत जीतबा पंच गहि सार ।। ज्ञान खडग

१०४
गोरख बोध वाणी संग्रह
अष्ट पर्वत असाधि साधिबा,
नौ दरवाजा दृष्टि करि वांधिबा।
दरवाजे दश कंची सार. मैं मत हस्ती बोध्या बार ।१०।
भीतर राजा जूझरण हार, चहूं दिश जाता राख्या मार।
राजा झुके विषमी घाई, मन पवना ले रह्या समाई १११॥
मन पवना को विषमी संधि, चंद सूर दोऊ सम करि बंधि ।
नो सै निवासी सायर सोखे,
जोगी सोखि सदा भरि पोखे ।१२।
बिन पुस्तक बांचिबा पुरान, सरवस्ती उचरै सों ब्रह्मज्ञान ।
अजरा सौखे बजर करे, सर्व दोष काया ले हरे ।१३।
खेरे सौखे लावे बंध, तो अजरावर थिर होय कंध ।
सोखे पोखे जाले बाले, अहिनिशि ब्रह्म अग्नि प्रजाले ।१४।
ब्रह्म अग्नि पाप को खाय, संधे संध पवन लुकाय ।
मन होय धीर धार लहे पवना,
शिवपुर जाता बरजे कवना ।१५॥
ब्रह्मसार सोखे बंधई जिद खीर सागर सोखे अजरावर कंध ।
अजरा सोखे बजर करे, रोग व्याधि क्षुधा सव हरे ।
।१६।
जड़ी बूटी भूलो मत कोय, पहले रांड वैद्य को होय ।
जड़ी बूटी जे अमर करे, वैद्य धनवन्तरी काहे मरे ।१७।
सोने पे सोझ
राजा छोड़े राज।
काज, तो क्यों

मूरख मरे। गोरख बोध वाणी संग्रह १०५ पसवा होय जपे नहीं जाप, सो पसवा मोख क्यूं हो जात ।१८। रिद्धि सकेले रोलानी धरे, गुरु न खोजे रोलानी आगे बैठा फूल, गुरु का वाचा गयाँ जु भूल १६ अकल पूर सके सकल निपाव, मीठा बोले झूठा भाव । सत बोले सतवादी लोग, झूठ बोले महापापी। देखत भोंदू विषया खाई, झूठा बोले मर मर जाई । जैसा करे तैसा फल पाय इकोतर से पराया नरक ले जाय । एक पुरुष बहु भांति नारी, सर्व निरंतर प्रातम सारी ॥२१॥ सर्व निरंतर भरपूर बहिया, प्रातम बोध सम्पूर्ण कहिया । पापे पुण्ये लिये नहिं कोई, गोरख साधे मुक्ति होई ।२२। ।। इति आत्म बोध कथन समाप्त ।। * इति श्री गोरख बोध ग्रन्थ समाप्त * २०॥ * अथ भजनमाला प्रारंभ * * राग कान्हड़ा -तिथि योग वर्णन * बन्दे गोरख एकंकार, सोलह तिथि का करू विचारः ।टेर। अमावस प्रासन दृढ़ होई, मातम परचे मरे न कोई । मूल सहस्त्र पवना फिरे, बंक नाल नव बहतरि भरे ।।

गौरख बोध वाणी संग्रह पड़वा बहे प्रापछि को श्रादि, सतगुरु शब्दा सहज समाधी । गगन मंडल मैं रहे समाय, चारों युग हेली टल जाय ।२। द्वितीया है दोऊ कुल उधरण धीर, उनमुन पत्रना अचल शरीर । बाहर भीतर एकंकार, गुरु प्रसाद भये निधि पार ।। वितिया त्रिवेनी करो स्नान, पाप पुण्य दोऊ देवो दान । तब योग युगति पावो विश्वास, जरा मरण नहीं कंध विनास ।४। चौथ चंचल निश्चय करो, काल विकाल दूरी पर हरो। जम जोरा का मरदां मान, सतगुरु कथिया पद निरवान ।। पांचम पंच तंत की संध याता मंगल रालो बंध । अमीरस धारा छिन छिन पीवो, गुरु प्रसादे जुग जुग जोवो ॥६॥ छ? पटचक्र विचारो रिद्धि सिद्धि बुद्धिमती अखिल भंडार । अर्थ द्रव्य की छांडो श्रास, काया कामनी भोग विलास १७॥ सातम सत रज तुम गुरण बंध, पावो जनम मरण का संध । अबोहड़ अजर अमर पद लहो, मन पबना ले. उनमुन रहो।। पाठमप्रष्ट भैरों नौ नाथ, अनंत सिद्धां सूमित्या सवारणी बात ।

गोरख बोध बागी समह १०७ अगा धीर जव प्राछे थीर, अनंत सिद्ध तहां गोरख पीर । प्रो अचंभा कथ्या न जाय, करत महारस गगन समाय ।। नवमो नव सिद्धि काया मंझारि, पाप पुण्य देखो पटतारि । बूढ़े पाप तिरे सत धरम, काया बाहर जात न जनम ।१०। दशमी दश दिश लागे बंध, जत सत संयम थिर होय कंध । धरम करम गुरु वाचा चीन, ज्ञान विचक्षण वारणी बीन ।१॥ एकादशी एकादश रंग, रुद्र इंद्रियां पाया काया संग । भेंटया देव दरस्या देवा, आप पुजारी प्राप ही देवा ।१२। द्वादशी तिथि कर पूरे द्वार, द्वादश दिनकर तप सूझे सार । तेरस विकुटि सम करि भेल, चंद दोऊ धुनि करि भेल । एक सिद्ध रूधा नव घाट, सतगुरु खोजे ऊभा बाट ।१४। चवदश चवदह रतन विचार, काल विकाल आवे ताहि निवार । प्रापै पाप देखो पटतारि, उत्पति प्रलय काया मकारि ॥१५॥ पूनम पूगी मन की प्रास, प्राया मोह तजि भये उदास । सोलह कला सम्पूर्ण चंद, गुरु प्रसादे थिरके कंध ।१६। सोलह तिथि कला की संध, मच्छंद्र प्रसाद थिर भया कंध । ॥१७॥ तहां चढि भैरू रहा समाय, सतगुरु. कथ्या ज्ञान प्रभाय ।१३।

पौरख बोध बाझो संग्रह
राग कान्हडा, चौपाई सप्तवार (२)
जोग सुलग ही बारम्बार, सतगुरु शब्दां सहज विचार टेर।
आदि ते शोधो पावागमन, घट में राखो दृढ़ करि पवन ।
दसवें तो शिव पूजा द्वार, तो गुरु पावो पादित वार ।१।
सोमवार मन धरिबा शुनि, निश्चल काया पाप न पुनि ।
शशिहर दर्षे अपरम्पार, सोमवार गुरण दूताकार ।२।
मंगल विषमी माया बंध, चंद सूर दोऊ सम करि संध ।
जरा मरण बचो भौ काल, तो गुरु पावो मंगलवार ।३।
बुद्धवार गुरु दीनी बुद्धि, ब्यारो काया पावो सिद्धि ।
शिव घर शक्ति पारणी भरे, तो बुधवार गुरण एता करे ।४।
बृहस्पतिवार विषम मन धरो, पांचू इन्द्रिय निग्रह करो।
शंखरणी शोधो पवना द्वार, तो गुरु पावो बृहस्पतिवार ।४।
शुक्रवार शोधिबा शरीर, कहां बसे हंस कहां बसे खीर ।
नव बहतर पवना बहे, शुक्रवार कोई बिरला लहे ।६।
थावर थिर करि प्रासन देय, बारह सोलह मन करि लेय ।
शशि हर के घर आवे भान, ता दिन थावर गंग समान ।७।
सातों वार पार के , राशि, काला भैरू
घाल्या पाशी
पेड़े प्राणी परचा भया, सप्तवार यति गोरख कह्या ।।
राग चौपाई नोग्रह कथन (1)
सात वार ग्रह नौ का खोज,
प्रापा लखे फकर अनुभोज ।टेर।

गोरख बोध वाणी संग्रह थिर थावर शनिश्चर बार, काया भीतर सातों बार। वेद पुराण पढ़े चित लाई, विद्या ब्रह्म कहां थिर थाई। मछंद्र प्रताप यति गोरख कहे, सप्तवार कोई विरला लहे। प्रादित प्रख्या सोम श्रवण, मंगल मुख प्रवारण । १० प्रादितवार ज्ञान का ताप, आप ब्योरत पुण्य न नाप । दोउं पक्षां सूप्रारंभ करे, अनुभव करि जमपुर पर हरे ॥१॥ सोमवार से संगठन भरो, सतगुरु खोजो दुस्तर तरो। दशवे द्वारे दोजे बंध, अजराबर थिर होय कंध ।२। मंगलवार म्हें पाया भेव, प्रातमा पाछे निरंजन देव । पंच पुहुप ले पूजा करे, मति बुद्धि ले शिवपुरी संचरे ॥३॥ बुधवार मति बुद्ध प्रकाश, अहिनिश रहबा जोग अभ्यास । दृढकर लोचन अन पाशा पाश, सिद्ध साधो अमरापुर वास ।४। बृहस्पतिवार विषम गढ लिया, ज्ञान खड्ग ले विहंगं किया । अझूठ कोट दल दिया पयाना, यम मस्तक बाजे निशाना ।५। शुक्रवार सूक्ष्म जल साधि, लहर न परसे सहज समाधि । माया मार कर अस्थिर होय, अात्म परचे भरे न कोय ।६। सतगुरु खोजो उतरो पार, सुषुम वेद सुषुमना विचार ॥७॥ बुद्ध हृदय बृहस्पति नाभि, शुक्र ते इन्द्रि जारणय ।।

११०
गोरख बोध वाणी संग्रह
शनि गुदा वायु राहु ते मन केतु ते नासिका रहे ।
सप्त वार नौ ग्रह देवता, काया भीतर कहे ॥१०॥
राग आसावारी पद (४) कान्हड़ा चौपाई
मारो मारो सपनों निरमल जल पेठी
त्रिभुवन डसतां गोरख दीठी ।टेर।
मारल्यो सर्परणों जगाई ल्यो भंवरा,
जिन मारी सर्परणों ताको कहा करे जोरा ।।
सर्पणी कहे मैं अमला मलिया,
ब्रह्मा विष्ण महादेव छलिया ॥२॥
माती २ सर्पणी दशूदिश धावे,
गोरखनाथ गारंडू पवन बिगलावे ।।
सर्पणी कहे झू परी निगूती, जाज्ञा गोरख झूपड़ो सूती ॥४॥
प्रदिनाथ नाती मच्छंदर नपूता,
सर्पणी मारी गोरख अवधूता ।।
राग कान्हड़ा-चौपाई पद आशा (५)
बांधों २ बच्छड़ा पीयो २ खीर,
कलि अजरामर होई शरीर टेर।
बारह बच्छड़ा सोलह गाई, धेनु दुहावत रेण बिहाई ॥१॥
अचराचर धेनु कचरा न खाई,
पांच ग्वाला या मारणं धाई ।२।
आकाश का धेनु त्रिभूवन का राया,
सींग न पूछ वाके खूर नहीं काया ॥३॥

गोरख बोध वाणी संग्रह
इन सुरही का दूध जु मीठा,
पावे गोरखनाथ गगन बैठा ॥४॥
राग आशावरी (६)
मनवा राजा जायलों कौनसी घाटी,
आगे है भरम की टांटी टेर।
कौन दिशा न आई मन पवना, कौन दिशा को जासी ।
कौन दिशा न भजन उबरिया, कौन दिशा रम जासी ॥१॥
अगम दिशा से आई मन पवना, पश्चिम दिशा ने जासी ।
बंकनाल से भजन उबरिया, रणकार मैं रम जासी ।२।
ऊंची नीची सुरता कर न, चंदा जोत रहवासी।
तत्व नाम को तेल पूर ले, जगा करे दिन रातो ।।
बारह प्रांगुल
सींवता; सोलह
अंगुल फाटी।
सवा हाथ रो. भंगवा चोलो, त्रिवेणी री घाटी ।४।
दीरक में एक दीपक दरशे, दीपक मैं एक झांई ।
झांई में परछाई दरशे, वहां ही है मेरा सांई ॥५॥
भरगत मच्छंदर सुरण जती गोरख, जात हमारी तेली।
तेल तेल सो काढ़ लिया, है, खल बलदां ने मेली ।६।
राग पद (७)
बोलता नजर नहीं आया गुरुजी
ज्यां के चोंच पांख नहीं काया ।टेर।
बिन पाल इक सरवर भरिया, नीर नजर नहीं आया।
मेरे सतगुरु ऐसे सैलानी, वहां बैठ मल २ न्हाया ॥१॥

गोरख बोध वारणो संग्रह बिना पात एक तरूवर देख्या फूल नजर नहीं आया । मेरा सतगुरु ऐसा सैलानो, वहां बैठ फल खाया ।२। बिना पांव एक हस्ती देखा, शीश नजर नहीं आया । मेरा सतगुरु ऐसा बहुरंगी, अंकुश मार हटाया ॥३॥ एक जोगी के पांच पुत्र है, पच्चीस जोगरण लाया । एक अचम्भा ऐसा देख्या, बेटी ने बाबल जाया ।४। जोगी एक किले से उतरा, संग लिए चारू चेला । चारों ने यों जग भरमाया, जोगी रमे अकेला ॥५॥ धरती जाजम तम्बू असमाना, सत का सूरज बरणाया । कहे मछन्द्र सुरण जती गोरख, दुनियां दुरंगी बरगाया ।६। राग पद.८ चौसठ कला में खेल हमारा, और वारता सब झूठी ।टेर हर भज हर भज हीरा परखले, समझ पकड़ थारी मजबूती । लागी लगन मत छोड़ो साधो, गांठयां धुली है रेशम की ।। सत सुमरण का सेल बरणाले, ढाल बरणाले धीरज की । काम क्रोध ने मार हटादे, जद जारण तेरी रजपूती ।२। पांचू चोर बसे काया में, उनकी पकड़ो शिर चोटी। पांचा ने मार पचीसू बस कर, जब जारण तेरी बुद्ध मोटी ।। इन्द्र घटा ले सतगुरु प्राया, अमृत बूदां हद बूटी। त्रिवेणी का रंग महल मैं हंस ले लाला हद लूटी।४।

भोरख बोध वाणी संग्रह
११३
.
रुणझुरण रुणझुरण बाजा बाजे,
झिलमिल झलके वा जोतो ।
ॐकार का सोहंगकार मैं, हंसला धुगता निज मोती।५।
पक्की घड़ी का तेल बरगाले, कारण न राखो एक
कहे मछंदर सुरण जति गोरख,
अलख लखा सो खरा जती।।
राग आशावरी (8) पद
साधो भाई ! गगन घटी चढ़ जारणी ।
सहजे सुमरण करो अलख का सोई अमर कहारणा टेरा
मूल कंवल में गणपति देखों, नाभि संभल शक्ति बाणा ।
षट् चक्र में निरंतर बासा, सावित्री का जाणा ।१॥
त्रिकुटी पे सुमरण कोना उनमुन तार लगेना ।
उलटो षट् कर्मन को सोधे, योगी युक्ति लखे १२।
मेरु दंड जहां च सुधाना, जाको लखला संत कोई ज्ञाना ।
प्रेम भक्त प्रानंद में राचे, लख लख्या सोई ध्यानां ।३।
त्याग करो तो ऐसा कीना, वचन मान परवीना ।
झीरणा झीरमा बाजा बजता, लखता संत सुजाना ।।
अर लोक एक है काया में, जोगारंभ सारख लखादया ।
निर्भय आप अमर कर दिया, तब हो देश दिखाणा ।५।
कहे मच्छंद्र सुरण यति गोरख, मोहि भर २ प्याला पाना ।
जनम मरण कछ व्यापे नाहीं, नहीं काल भय खाना ।६।

गोरख बोध वाणी संग्रह ॥४॥ राग पद (१०) नगर में रमता जोगी पाया, ज्यांकी पारख बिरला पाया टेर। रंगां न रेखा पाव न भेखा, उनमुन ध्यान लगाया ११॥ किरा घर आता किण घर जाता, किरण घर फेरी देता ।। कुरण संत ज्ञान ध्यान में बैठा, जोगाभ्यास बतलाया ।३। पांचू पुरुष पचीसों नारी, एक जोंगरणी जाया शुन्य शिखर पर बालूडो खेले, सम्मुख दरशरण पाया ।। मच्छंद्र शरण जती गोरख बोल्या, अगम संदेशा लाया ।६। राग कोयारी (११) का बूझे प्रवध गगन धरणी, चंद न सूर दिवस ना रहणी ।टेर। ऊंकार निराकार सूक्ष्म स्थूल, पेड़ न पत्र न फूल ।। ज्ञान ध्यान जोग न जुक्ता, पाप न पुण्य न मोक्ष न मुक्ता ।। उपजे न विनसे न अखेह न जाई, जरा मरण ना व्यान न माई।३। गोरख भरणे मच्छंद्र दासा, भाव भक्ति और आसरण पासा ।४। राग पाशावरी (१२) देखो मेरे साहब ने कुदरत कोनी, काया विच बाग लगाया है !

गोरख बोध वाणी संग्रह
११५
ऐसा ऐसा भरत भरायो सतगुरु,
सप्त धातु पिंगलाया है ।टेर।
सात आठ क्यारी जो धोश, बाग जुगत कर पाया है ।
बागवान बागां मैं बैठा कली कली रंग न्यारा है ।।
इंद्रलोक से घटा घिर आई, शब्द पियाले गुरु लाया है ।
बंकनाल बरसाई मेरे सतगुरु, सोपां समुद्र भराया है '२॥
बाया बीज सकल मैं वरता, बीजां बगरा छाया. है ।
रणूकार का सींचा गेला, जब छेड़या गरणाया है ।३।
जिस घर मांही हंसा आया, उसका ही गुण गाया है।
मच्छंद्र शरणे जति गोरख बोल्या,
एक अखंडी ध्याया है :४।
राग आसावरी (१३)
अवधू ! मन मेरा मतवाला।
उनमुन चढयो गगन रस पीचे, है त्रिभुवन उजियाला टेर।
गुड़ कर ज्ञान ध्यान करि महुआ. भौरो माटी भारा।
सुषमरण नारी सहज समाना, पीवेगा, पीवन हारा ।१॥
दोऊ कर जोड़ चिताई मारी, चुवे महा रस भारी ।
काम क्रोध दोऊ किया पलीता, छूटी ममता सारी ।२।
विकूटी कोट मैं मृदग बाजे, तहां मेरा मनवा नाचे ।
गुरु प्रसाद अमर फल पाया, सहज सुषुमना क'छ ।३।

गोरख बोध वाणी संग्रह पूरा मिले सभी सुख उपजे, तप को तास बुझागी । गोरख कहे भव बंधन छूटे, जोत में जोत समारणी ।।। राग आशावरी (१४) छोड़दे मनवा मन मस्ती, सोहं शिखर गढ़ है बस्ती टेर। इला पिंगला अर्घग नारी चांद सूरज घर रह लगती। गंगा जमना बहे सरस्वती, स्वास स्वास, को वहां गिरगती।१ प्रष्ट कमल में अलख बिराजे, रंग महल में रहे सगती । चौबारा में दीपक जलता, वहां पे सुरता रहे जगती ।२। हिये उतार हाथ धर लेगा, शीश उतार करो कुश्ती । पांच तन्त गुण, तीनू भेला राखो, जबर धरिणयांरी है जपती ।। इसी नगर में डंका लागे, साध सुरणे कोई विरला सती । झालर शंख पखावज बाजे, जि बिक्ष केलि करे हलती।४। गोरखनाथ मुक्ति दाता, पल पल सुमरे पारवती । शरण मच्छंद्र गोरख बोल्या, अलख ला सो खरा जती ।। राग पद (१५) प्रवधू ! भरया समुन्द्र में मगर रहत पियासा । साध बूझे योग युक्ति, कहां है जल रा मासा ।टेर। एक अचम्मा देख्या इसड़ा, मिनी फिर फिर बूझे है मीठा ॥१॥ एक अचंभा देख्या दूजा, देवल आहे कहां चढ़ती पूजा ।।

गोरख बोध वाणी संग्रह
११७
एक अचंभा देख्या तोजा, बादल में कहां रहती बीजा।३।
एक अचम्भा देख्या चौथा, दादा गोत मिल पूछे है पोता।४।
गोरख बोले मच्छंद्र पूता, ममता मार भया अवधूता ॥५॥
राग पद (१६)
अब गुरुजों मिले महा ज्ञानो,
ज्यासू पाई में अमर निशानी टेर।
उपजे न जिनसे आवे नाहि जावे, नहीं जूझे नहीं हारे ।
जल की तरंग लो जल रलिया,
प्रब कोरण तिरे कोण तारे ।
जल मैं कुम्भ कुम्भ मैं जल है, बाहर भीतर पाणी ।
जिलश्या कुभ जलो जल रलिया, प्रा गत बिरला जाणी।।
सई सूरत ने सेज पर पारगी, सायर लहर समारणी ।
जीबर जाल डाल कर कलवे, मीन हुआ गल पाणी ॥३॥
गुरु बिन ज्ञान अनुभौ दिन कयरणी,
ए सब मिथ्या कहाणी ।
कहे गोरख गूगे की सेना, गूगे होय कर जारणी ।४।
राग पद (१७)
सेवा हारी शानो गणपति देवा,
खोलो म्हारे हृदय का ताला ।टेर।
जल तो चढ़ाऊँ देवा नहीं है अछूता,
जल मछलियां विटोरिया ॥१॥

गोरख बोध वाणी संग्रह फूल तो चढ़ाऊं देवा नहीं है अछूता, फलों ने भंवरा बिटोरिया ॥२॥ दूध तो चढ़ाऊं देवा नहीं है अछता, दूधां ने बच्छड़ा बिटोरिया ।। भोजन चढ़ाऊं देवा नहीं है अछता, भोजन ने माखियां विटोरिया।४। शोश तो चढ़ाऊं देवा नहीं है अछत्ता, शीश को शक्ति ने बिटोरिया ।५॥ दोय कर जोड़ यति गोरख बोल्या, शब्द चढाऊं देवा यही है छूना ।६। . राग पद (१८) कर गूजरान गरीबी में रेणा है ।टेर। चार खूट में फिरो भलाई, दिल रा भेद नहीं देखा है। गगन मंडल मैं गऊ बियाई, धरती मही जमारणा है। माखरण माखरण साधो खायो, छाछ सकल बरतारणा है ।१॥ मरदां संदी बांध दोस्ती, क्या तिरिया संग लागो है। पल में राजी पल में बैराजी, पल पल नार पराई है ।२। नैरण बांध समझाऊं जीव ने, पर घर पांव न देरणा है । उरण पारणी से रतन नोपजे, एला नहीं गमारणा है ।३। फिर रह्या प्याला प्रेम का, प्यासा होय सो पोरगा है। गुरु शरणे जति गोरख बोल्या गगन मंडल घर करण है।४

गोरख बोध वाणी संग्रह
११६
टेरा
राग आरती (१६)
हरि हरि हरि हो रही भारती,
जय जय बोलो योगी पालम।
निर्भय नगारा बाजे. अघड़ बम बम्
तू ही है पटेल तू मेरो पटवारी,
तू ही मेरो मजीदा हाकिम १३.
तू ही मेरो साहब तू ही मेरो सूबो,
मेरा भेद की तुझे मालम ।२।
चार खूट चवदा भवन में सांची फिरे है तुम्हारी कलम ।३।
चार चरण यति गोरेख बोल्या,
आपका हुकम मैं रहूं हरदम ।४।
राम मंगला (२०)
में थाने सिमरु गजानन देवा,
सरस्वती माय शारदा सिमरु, हृदय करों उजियाला जी।
निद्रा निवारो भोला नाथ जी टेर।
जननी नहीं जायो उदर नहिं प्रायो,
गवरी को पूत कहायों जीरो ।।
पानी से पतलो पवन से झीणो,
शोभा बरणी न जावे जीमो ।२।
हाथ घालतो म्हारे हाथ न प्राबे,
मुठियो में नाहि समावे जीरो ।।

१२०
गोरख बोध व रणो संग्रह
मच्छंद्र प्रताप यति गोरल बोले,
पत बाने वाली राखो जत्रो॥
राग आशावरी (२१) आशा पद
साधो भाई ! योग मति अति झीनी ।
लखे कोई सतगुरु का बाला, रमज भेद कर चीनी टेर।
चार योग है कौन गुरुजी कहा योग फल कोनो ।
शास्त्र सार सिद्धान्त लखाओ, बंध भेद लख भीनी ।।
हठ मंत्र राज लय चारों, वृति निरोध सुख लोनी ।
मूल लंवर अन्ध साधते, सो, उडियान नवीनी ।।
प्राणायाम. युक्ति भेद को कहो, रीति परवीनो ।
कहा साधक का साधन मूल है ? समझ कहो मलहीनो।
पूरक कुम्भक रेचक भेद ले, अभ्यास वैराग वरीनी ।
रामप्रकाश गोरख मम गाढी, हो गोरख लख तोलो ॥४i
राग आशावरी (२२) आशा पद
साधो भाई ! युक्ति योग कर जाना
मेरा महरम अटल अगोचर, योग रोति पहिचाना ।टेर।
यम नियम शासन कर युक्ति, प्राणायाम बखाना ।
प्रत्याहार धारमा घरकर, ध्यान रहस्सा का याद है
निविकल्प खोज समाधी पूरस्म, मेद विविध कर माना।
जीव ईश्वर की करि एकता, साधन अष्ट चित्त लाना ।२६
अन्तस्थ चित वृति का संयम, दश देव दरशाना ।
मन पवना की गति विलानी, शब्द स्वरूप समाना ।३॥

गोरख बोध वाणी संग्रह उत्तम गुरु गम उत्तम योग की, उत्तम सार परमाना । 'रामप्रकाश' लखो गम गोरख, सो गोरख निरवाना ।।। राग पासावरी (२३) पाशा पद साधो भाई ! सो गोरख निरधारा । गोरख को गन गोरख जाने, हो गोरख मतवारा ।टेर। गो इन्द्रिय का रक्षक सोई, अपना प्राप लख प्यारा। गोरख को गोरख चेतःचे, गोरख गम विचारा ।। गोरख साधक गोरख साधल, गोरख भेद अचारा । मोरख उलट. समावे गोरख, गोरख का विस्तारा ।२। गोरख रामप्रकाश अखण्डित, जो जाने मुक्त मझारा । रामप्रकाश को लखता गोरख, और न जापन हारा ॥३॥ रामप्रकाश गोरख गति चीन्ही, भया गोरख अवतारा । गोरख मो में मैं गोरख में, प्राधागमन विडारा ।४। राग आशावरी (२४) साधो भाई ! या विध योग विचारा । शील शौच एकान्त धारणा, संयम नियम अचारा ।टेरा गुरु श्रद्धा कर युक्ति लाधी, बांधी पांच पसारा । पूरक अोहं सो कुंभक धीरज, रेचक पवन उतारा । इड़ा पलट के पिंगला लाया, सुषुमण भेद अट्ठारा। पिंगला उलट इडा सम बैठी, किया स्वास गम धारा २१ पल विपल बोटक धुन साध्या, सरकार र प्यारा । युक्त त्रिवेणी मुक्त निवेशी, बंध त्रिवेणी सारा १३॥

,
१२२
गोरख बोध वाणी संग्रह
युक्त बंक से उतरया सीधा, मुक्त बंक चढ़ मारा ।
मुखौं अमृत अखंडित धारा, पो अमृत निरधारा ।।।
नाभी नागनि मुख पलटाया, दशवें मैं रणकारा ।
भंवरा गरज्या गगन मंडल में, जीव शीव इकसारा ।५।
जनम मरण का संशय काटया, मन पवना गम हारा ।
अपना आप निजानन्द परस्या, रामप्रकाश निज न्यारा ।।
राग प्राशावरी (२५)
साधो भाई ! योग युक्ति कर शोधा ।
साधन धारण दृढ़ कर धारी, उपज्या जीवन बोधा टेर।
मन पवना का संग कर सुरता, त्रिकुटी महल में रोधा ।
ज्ञान-साधना शस्त्र साध्या, काम मार मद योधा ।।
महा प्रबल मन वश करने में, गज कठिन नहीं गोधा ।
शब्द अंकुश अभ्यास सींकदे, लाया घर घर खोधा ।२।
भया निशंका निर्भय डंका, लागा गमनां पौधा ।
फब कर बंका रावन रंका, पी रस मस्ता प्रौधा ।।
रामप्रकाश पहुंच्या घर पाहू योग योग में सौधा ।
प्रादि आदि अनादि अपना, द्वैत भ्रम भवरोधा ।४।
राग कान्हड़ा तिथि योग वर्णन
राग आशावरी (२६)
साधो भाई ! योग युक्ति कर जोई ।
फूल फकर का मारग चीन्हे, बेहद की गम सोई ।टेर।
पांचों साधे पांचो बांधे पांचों राधे खोई।
सुद्रा साधे इन्द्रिय बांधे, मल कामादिक धोई ॥१॥

गोरख बोध वाणी संग्रह
१२३
तो बंध प्राण गम तीनू, नाड़ी तीन विलौई ।
युक्त मुक्त और बंक त्रिवेणी, लखे संत अनुभोई ।।
गोरख की गम गोरख जाने, और न जाने कोई।
संत लखे कोई फकर शूरमा, गुरु गम गोरख होई ।।
अकथ कथे अनप्रक्षर बांचे रामप्रकाश निरभोई ।
सतगुरु
मिले ते संशय तूटे, गूढ़ गति कहुं तोई ।४।
राग पाशावरी (२७) पद .
अवधू ! गगन हमारा वासा ।
इंड पिंड ब्रह्मड पार में रहूं आप अविनाशा ।टेर।
षट् चक्र को वेधे शोधे, पहुंचे शिखर प्रवासा ।
कर्म भर्म मैं भूले डोले, मैं व्यापक सुखराशा ।१॥
अकथ कथे कोई गुरु का बाला पावे स्वयं प्रकाशा।
प्रन अक्षर का भेद पिछाने, द्वैत अद्वत विनाशा ।।
गगन मंडल मैं वास निरन्तर नहीं दूर नहीं पासा ।
योगी योग करे बेहद मैं, त्रिगुरण तोड़ दिलासा ।।
अखंड अनामी बेरंग पूरण, नहीं ठाकुर नहीं दासा ।
रापप्रकाश परमानन्द चेतन नहीं तृप्त नहीं प्यासा ।४।
राग आशावरी (२८)
साधो भाई ! योगी योग कमावे ।
योग योग में रमझ अपेची, लख परमानन्द पावे ।टेर।
भूल भ्रम का संशय धे, साधन लगन लगावे ।
पापा लखे खोज कर आपा, पावा गमन नहीं प्रावे ।१॥

१२४
गोरख बोध वाणी संग्रह
देहद अनहद हद को छोड़े, उलटा पँथ चलावे ।
पांव बिना पथ चले अफूटा , नैन बिना दर्शावे ।।
कान बिना बामा सब सुणता, रणुकार गरणावे ।
जिभ्या बिना गगनामृत अचवे, अभरा समर भरावे ।।
गावे ज्ञान ध्यान से ध्यावे, मरहम अपना लाये ।
रामप्रकाश गोरख घट सही, बंधन सभी विलावे १४॥
राग मांड पाशा (२६) पद
योगी ! सो घर प्रादू मेरा ।
पहुंचे बिरला सतगुरु का वाला, करे अगम घर डेरा टेर।
धरण गिगन बिन अधर सधर है, नहीं गुरु नहिं चेरा ।
भरिया ताल सदा भरपूरा, नहीं मेरा नहीं तेरा ।
दृष्ट पुष्ठ बिन शुन धन नाहीं, नहीं माया का घेरा ।
अपना आप और नहीं बरशे, नहीं दूर नहीं नेरा श
गूगा बैन लखे कर सोजो,
सुरत शब्द कर हेरा ।
पूरण अपेजी अराधड़ चेतन, सो अनुभव निरभेरा ।।
ध्यान योग को गति दिलावे, योग होय जब सेरा।
रामप्रकाश प्राप लख गोरख, . नहीं चौरासी फेरा ।४।
राग आशाबरो पद (३)
साधो भाई! सत संगत कर पाया।
भेद कल्पना दूर बिडारी, अभय अमाप प्रथाया टेर।
गुरु कृपा कर साधन सोजी, अविद्या त विलाया ।
ईश्वर जीव ब्रह्म रुप पिछाण्या, अविद्या उपाधी भाया ॥१॥

गोरख बोध वाणी संग्रह १२५ सत का सत से योग अनादि, दुर्मति दूर हटाया । असत असत का संशय मेटया मेटयां आप अजाया ॥२॥ ज्ञान ध्यान के ऊपर डंका, निर्भय निशान घुराया । सदा निशंका रेख न अंका, अविगत अक्षय अकायां ।६। त्रिगुण त्रिकटी भ्रम मिटाया, सब थां पूरण थाया। रामप्रकाश शुद्ध तत निर्मल, गया रह्या ना पाया ।४। राम छंद भैरवी (३.१) पद कोई शोध मन हित लाय के षट् चक्र कर्म विचारा ।टेर। गुदा स्थान में चक्र अधारा दल है चार अक्षर पुनि चारा । रंग तेज गणपति इष्ट प्यारा, जप संख्या छः सौ गायके । सतगुरु से भेद निहारा ।। उपस्थ बास चक्र अधिष्ठाना। षट् दल अक्षर षट् परमाना, रवि सम रंग ब्रह्मा पति जाना । गुरु का बाल जपाय के, जप संख्या छह हजारा ।। नाभी स्थान मरिणपुर जानो, दल दश अक्षर दश ही मानो। रक्त वर्ण विष्णु पति प्रानो, जप सहस्त्र छह ठाय के । लख भिन्न भिन्न खेल प्राचारा ।। हृदय स्थान अनाहद देखो। दल प्रक्षर द्वादश सब लेखो, स्वर्ण रंग महादेव सुपेखो। जप सहस्त छह पाय के तन मंदिर सोधो प्यारा ।४।

१२६
गौरख बोध वाणी संग्रह
चन विशुद्ध का कंठ में वासा, दल अक्षर सोलह सुखराशा।
शशि सम रंग जीवात्मा पासा, जप एक हजार प्रचार के ।
लख कली कली रंग न्यारा ।४।
प्राज्ञा चक्र भृकुटी स्थाना, दो दल अक्षर दोय सुजाना।
रंग लाल गुरुदेव परमाना, जप एक हजार अथाय के ।
कर सुरत शब्द इकधारा १५॥
ब्रह्मरंध्र है दश में द्वारा, बिन अक्षर दल एक हजारा।
स्फटिक मणी रंग लख प्यारा, परब्रह्म का ध्यान लगाय के ।
जप एक हजार उचारा।६।
मन पवना सुरति संग बांधे, कोटि जप युक्ति कर साधे ।
ज्ञान ध्यान पथ इष्ठ प्राराधे, संत रामप्रकाश मनाय के ।
सोई योगी हो निरधारा ७॥
राग छंद भैरवी (३२) पद
कोई पूरा योगी गम पाय है, अष्ट साधन योग बिचारा टेर।
अहिंसा सत्य अस्तेय सुधारे, ब्रह्मचर्य अंग भेद निहारे ।
अपरिग्रह विधि कर धारे, तब यम साधन सुखदाय है ।
सिद्ध होवे काम हजारा ।१।
शील शोच तप कर्म प्रचारा।
सत स्वाध्याय प्रेम अंग प्यारा,
हो प्रणिधान नियम पंच धारा ।
गुरु गम साधन सजाय है, नित इष्ट जपे हरिद्वारा ११

गोरख बोध वाणी संग्रह साधन प्रासन भेद निहारा, विधि लाभ युक्ति पथ धारा । चौरासी में मुख्य उचारा, सिद्ध पद्मासन गाय है। कर पश्चिमोत्थान अपारा ।। इडा पींगला सूषुमरण सोधे । पूरक कुभक रेचक रोधे, मूल उडियान जलंधर बंधे । लख पल विपल मनाय है, सब युक्ति भेद प्राचारा ।४। खान पान निद्रा सम धारे, आलस्य औवासी दूर निबारे । युक्त प्रहार बिहार विचार, कर प्रत्याहार जचाय है । सत साधन संगत धारा ।५। गुरु मूर्ति पद इष्ट संभारे । सोहं शब्द में दृढ़ता धारे, निश्चित समय प्रासन थिर मारे । नियमित योग उपाय है, घर साधन धररणा प्यारा ॥६॥ नाटक मानस धुनि है संभारे, अक्षय शून्य प्रभा पति सारे । प्रातम चेतन एक विचारे, गति चढ़े क्रम कर प्राय है । कर ध्यान-इष्ट उजियारा ७ षट् चनयुक्ति कर साधे । षट् क्रिया गम मारग ला, पांच क्लेश निवृति बांधे । निरबिकल समाधि ध्याय है, कोई सविकल समाधी न्यारा उत्तम क्रम उत्तम विधि युक्ति, उत्तम गुरु ले परमा भक्ति ।

१२८
गोरख बोध वाणो संग्रह
रामप्रकाश तब पावे मुक्ति, सत शास्त्र लक्षरण सजाय के ।
भ्रम मावा गमन विडारा।
राग छन्द भैरवी (२३)
इण्ड पिण्ड प्राधार है, ब्रह्मण्ड माया विस्तारा टेर।
पांव तले तल लोक कहावे, वितल लोक चरणों पर गावे ।
सुतल लोक जानू मैं लावे, महातल साथल सार है।
पिण्ड माहीं ब्रह्मण्ड प्यारा ।
सांथल
मूल
में तलातल जानो।
गुह्य देश मैं रसातल मानो, काटि में लोक पताल प्रमानो।
यह सात लोक संसार है, सो नीचे भुवा पुकारा ।२।
भूतलोक नाभी में वासा, भूव; लोक का उदर आशा ।
स्वर्ग लोक का हृदय निवासा, महर लोक कण्ठ धार है ।
जनलोक मुख
मैं धारा ।३.
मस्तक में तफ्लोक पुकारे ।
सत्यलोक ब्रह्मरन्ध्र उचारे, पुरण सिद्धांत वेदांत रू सारे ।
रामप्रकाश लख विचार है, सप्तलोक ऊपर के पारा १४।
राग छन्द भैरवी (३४) पद
सप्तद्वीप शरीर विधान ले, लख गुरु मुख भेद उचाग ।टेर।
त्रिकोण
हृदय
में पर्वत मेरु,
नीचे मन्दराचल जानो सेरु ।
दक्षिण कौरण कैलाश उमेरु, बाम हिमाचल जान ले ।
तन भोतर ब्रह्माण्ड सारा ११

गोरख बांध वाणी संग्रह १२६ उर्द्ध रेखा निषध को मानो। दक्षिण दिशा गंधमादन जानो, रमरण वाम रेखा मैं अनो। यह पर्वत सात परमान ले लख संत सिद्धांत विचरणा ॥२॥ अस्थि जम्बुद्वीप पर वासा, मज्जा शाक द्वीप प्रकाशा । मांस मांहि कुश द्वीप निवासा, नाड़ी कोच परधान ले। सत रोम लक्ष उचारा ।। त्वचा शाल्मलि दीप कहावे. । नख में पुष्कर द्वीप रहावे सात द्वीप ब्रह्माण्ड सजावे । 'रामप्रकाश' अधिष्ठान ले, तत्व वेता करे पुकारा ।४। राग छन्द भैरवी (३५) पद मैं फूल फकीरी पाय के, अब प्राप भया मस्तानां ।टेर। गुरु गम निश्चल साधन शरणा, शील सजाय धरी घट जरणा। भव मांहि प्रब जनम न मरणा, सब अविधा द्वत मिटाय के । शुद्ध प्राप लख्या अधिष्ठाना। ।११ खेल प्रकृति करे करावे । गुरगवंत इन्द्रिय देव उपावे, कर्म कला तन उपे खपावे । वपु प्रारब्ध खेल खिलाय के, नहीं हर्ष शोक का म्याना १२॥ गिरि तरु मंदिर वन घर वासा, फाके चने मोदक मिठियासा । .

.१३० गोरख बोध पाणी संग्रह चीर दुशाले नगन निवासा, नहीं मान मर्यादा धाय के । अब निर्भय निशंक अवाना ॥३॥ राम प्रकाश सब घट में जान्या । राम प्रकाश अखण्डित मान्या, राम प्रकाश संत शास्त्र परमान्या। अब धन धन वेद फरमाय के, दरशावे मग कल्याना ॥टेर।। राग सोरठ (३६) फकीरी! या विध तपस्या ताप । शूरा संत फकीरी तापे, कठिन विरह की भाप टेर।। ज्ञान गुफा प्रेम कर पलथी, प्रासन आशा दाप । नेजा नाम धर्म कर धामा, जाग्रत ज्योति प्रताप ॥१॥ शील शिला साधन कर सुर का, पिंड पतर मैं नाप । निरभय नेम सिंहासन साधित, छतर सोहं की छाप ॥२॥ स्मरण श्रद्धा सतचित प्रानन्द, चेतन देव श्रमाप । चित लेतन ब्रह्म व्यापक सोहं, दरशे प्रापहि आप ॥३॥ कष्ट कल्पना काठ कंकाली, वजित विकार प्रलाप । अचल प्रखण्ड अकर्ता प्रातम, जोरू जोर नही जाप ॥४॥ अनंत अनादि ज्ञान निर्मला, भ्रांति नाहिं ख्वाप । 'रामप्रकाश' फकर का पूरण उत्तमराम अनाप ॥५॥ राग फकीरी, सोरठ (२७)दप फकीरी ! संत सक्षा गलतान । मन को जीत मरजीवा डोले, नित सांचा स्तान ।टे।

पौरख बोध वाली संग्रह Aana साधन सहित काट जग संशय, हर्ष शोक कर हान । हरदम चितन चेतन पूरण अपना प्राप पिछान ।१॥ इच्छाचारी अहंता ममता तज, निर्विकल्प निरवान । माया जाल विकार विडारचा, शुद्ध लखा अधिष्ठान ॥२॥ तीन शरीर अवस्था तीनू, पांच तंत तज मान । गुण तज तीन कोश पंच झूठा, आप रूप कल्यान ।३। 'उत्तमराम' फिकर तज फरणा, पाय फकर निज ज्ञान । 'रामप्रकाश' सच्चिदानन्द केवल, निज का निज सुजान ।।। राग सोरठ (३८) फकीरी? करे संत बड़भाग । आशा ममता मन की मारे, दृश्य दूत को त्याग टेर।। पांच तीन का झगड़ा सब ही, फरणा को सज माग । मोह भनन संसृति तज सारी, पापा लखिया जाग टेर। हंस संग साधन उर धारे, लक्षण - काटया काग । एक अद्वत रमझ को समझी, तोय तंरग वत झाग ३२॥ अनन्य चेतन व्यापक सब ठी, ज्यू माला में साग । निष्ठा शुद्ध लक्ष पुनि पूरण, नहीं माया का दाग ।३। अनाशक्ति वपु कर व्यवहारा, त्रिगुरण को नहीं फाग । 'रामप्रकाश' अटल अधिष्ठाना चेतन शुद्ध अलांग ।४। सग आसावरी (३६) पद साधो भाई ? कटक घड़ी पुकारे । पल पल घड़ी प्रायु को बीते घन्टे चोट उचारे ।टेर।

३२ गोरख बोध वाणी संग्रह किंड साठ का एक मिनिट हो, वृथा स्वास क्यूं हारे । ताठ मिनिट का एक घंटा हो, तब घड़ी यूं ललकारे ॥१॥ बीती ऊमर सो फेर न पावे, क्यों तू गर्व करे सुरण प्यारे । शिर पर काल गिनत स्वासा को, जो टकटक घड़ी धारे। चार सैकण्ड में स्वासा एक हो, पंद्रह होय मिनिटारे । नौ सौ स्वासा एक घण्टे में विरथा नहीं गमारे ॥३ गई स्वासा की नाहीं प्राशा, कर शुभ कर्म सुधारे । धर्म ज्ञान हरि स्मरण गुरु का, घड़ी उपदेश प्रचारे ।४। सत गुरु कहे सुरणे शिष्य सांचा, कर पुरुषारथ चारे । 'रामप्रकाश' घड़ी की सुनलो, प्रकट जिज्ञासु सारे ॥५॥ राग हेली (४०) हेलीए ! अनंत महिमा गुरुदेव की, कहे न पावे पार ।टेर ज्ञान सुनावे ब्रह्म का काटे द्वत विकार । सत संगत निज देत है, दुर्गुण भ्रम विडार ॥१॥ महा पापी अध जीव को, करता भव से पार । मोक्ष धाम परसावता, उत्तम गुरु दरबार ॥२॥ अनन्त ऋषि मुनि संतगरण, कवि कोविद षट् चार । गुरु महिमा गा गा थक्या तोरया अनंत हजार ।।३।। एक जिभ्या मम-गुरण घणे कहां तक कहुं पुकार । 'रामप्रकाश' समरथ गुरु, गये शेष शिव हार ॥४॥ ॥ इति ॥

गोरख बोध वाणी संग्रह राग टोडी पद (४१) अब मेरी ! लगन हरि से लागी। सब ठां ईश्वर व्यापक जाम्या, श्राप भया अनुरागी ।टेर। कर से करुं सोई हरि पूजा, लगन मगन. रूचि जागी। पद से चलू सोई तीर्थांगम, पूर्ण रुप बड़भागी ।१। मुख से कहूं सोई हरि स्तवन, अष्ट पहर धुन लागी । श्रवण शब्द सुने सो मंत्र, पाठ परम रुचि प्रागी ।२। देखे चक्षु सोई हरि दर्शन, अन्तर वृति बागी । भजन सोई प्रसाद हरि का, पावे संत वैरागी ॥३॥ पांव पसार दण्डवत हरहम, सोवत चलत सभागी ।४। चितन करे सोई तत चेतन अबना रही अभागी । प्रारण लेत सो पूजन बासना और वासना त्यागी । रामप्रकाश हरि मय हम हो द्वैत दुर्मति दागी ॥५॥ ।। इति गोररू नाथ भजन माला समाप्त ।। मुद्रक :-भवानी प्रिन्टर्स, नया बाजार, अंजमेर

पौरख बोध वाली सह
हमारे यहां मिलने वाला साहित्य
हरी सागर
हरिरामजी महाराज जोधपुर वालों को धारिणयों का
संग्रह है । ३० बाल बाद यह पुस्तक छपकर तैयार हुई
है। मूल्य १०)०० डाक खर्च २)५०
वाणी प्रकाश
अचल आश्रम द्वारा प्रकाशित पांच संतो की वारिणयों
का संग्रह बंडा ही उत्तम है, मूल्य १३)०० डाक खर्च २)५०
प्रचलराम भजन प्रकाश
स्वामी अचलरामजी महाराज के ४०० भजनों का
संग्रह है। बड़े ही उत्तम भजन हैं । मूल्य १०)०० डाक
खर्च २)५० अलग।
उत्तमराम अनुभव प्रकाश
श्री स्वामी उत्तमरामजी महाराज स्वामी अचलरामजी
के शिष्य हैं । उनके भी करीब ४०० भजनो का संग्रह है।
मूल्य १०)०० डाक खर्च २)५० अलग ।
पता--प्रार्य अदर्स बुकसेलर, पुरानी मण्डी, अजमेर ।

गोरख बोध वाणी संग्रह
१३५
उमाराम अनुभव प्रकाश
स्वामी उमारामजी के स्वअनुभव को वारिणयों के
रूप में जनता को उपदेश दिए हैं वह पुस्तक रुप में छपकर
तैयार है । मूल्य ८)०० डाक खर्च २)०० ।
रामप्रकाश भजनमाला
स्वामी रामप्रकाशजी उत्तमरामजी महाराज के शिष्य
हैं। आपने भी जनता को भजनों के रूप में एक तोफा
पेश किया है। आध्यात्मिक विषय को भजनों के रूप में
पेश किया है करीब १२५ भजन है मूक्ष्य ३)५० डाक
खर्च २)००।
ब्रह्मज्ञान भक्ति प्रकाश
स्वामी जीवादासजी महाराज
ने बड़े ही परिश्रम से
इस पुस्तक को तैयार की है वैदांत के गूढ़ रहस्यों को लेखनी
द्वारा तथा भजनों के रुप में दिया है। बड़ी ही उत्तम
पुस्तक है मूल्य ८)०० डाक खर्च २)५० ।
अनुभव प्रकाश बनानाथ
इस अनुभव प्रकाश में स्वामी बनानाथजी महाराज
की बारिणयां है । बहुत ही अच्छी पुस्तक है । मूल्य ६)००
डाक खर्च २)०० अलग ।
पता-प्रार्य ब्रदर्स बुकसेलर, पुरानी मण्डी, अजमेर ।

प्रात्म विवेक
साधू प्रतापरामजी महाराज की लिखी यह पुस्तक
वेदान्त प्रेमियों के लिए बड़ी ही उत्तम है ! मूल्य ४)५०
डाक खर्च २)०० अलग है ।
इनके अलावा निम्न पुस्तकें भी तैयार है
अवधूत ज्ञान चितामरणी
मूल्य.३)००
नशा खंडन दरपरण
मूल्य ३)५०
प्रादर्श शिक्षा
मूल्य २)००
भारतीय समाज दर्शन
मूल्य १२)००
पिंगल रहस्य (छंद विवेचन)
मूल्य ८)००
उत्तमराम अनुभव प्रकाश
मूल्य १०)००
देवीदान सुगम उपचार दर्शन
मूल्य १५)००
नोट : पुस्तक मंगाने के लिए ५)०० मनीगार्डर से अवर ।
भेजें अन्यथा लिखा-पढ़ी न करे ।
पता:
-
* आर्य ब्रदर्स बुकसेलर *
पुरानी मंडी..अजमेर।

Goraksh Bodh Vani Sangrah

Author
Ram Prakash Ji Maharaj
Title
Goraksh Bodh Vani Sangrah
File name
Goraksh Bodh Vani Sangrah
Text
OCR done
Published
the date of scanning
Publisher
Phoolchand Book Saleer
Language
Sanskrit
Pages
137
Library
Central Institute Of Higher Tibetan Studies
Classification
Buddhist Philosophy
DLI number
486745
Barcode
1010010094460.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
Digital publisher
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