Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Sindur Prakar Sukti Muktavali Gadh Padh Sahit
Front matter
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पू० स्व० शा त मूर्ति श्रीमती ई श्रीजी महाराज
साहबा के स्मरणार्थ पीनस
श्री मत्सुख सागर सद्गुन
16
सिन्दूरप्रेकर
PN
सूक्ति मुक्तावली
सस्कृत गद्य पद्य हिन्दी युक्त सग्रह
खरतर गच्छ शिरोमणी पू० स्व० गणाधीश विद्वद्वर्य श्रीमान्
सुखसागरजी म.सा. के वर्तमान पट्टवर प० प्र० शा त.
गणीघर हेमेद्र सागरजी म सा की आज्ञानुयायिनी
पू० गु० प्र० स्व० श्री लक्ष्मीश्रीजी म. सा. की
स्व. शि.वि. शिव पीजी म. सा. की शिक
स्व०वि० विमल श्री म. सा. की आज्ञा
वर्तमान प्रधान वि० श्री प्रमोद खोजी
महाराज साहेब की विदुषी शिष्या
श्री चम्पक श्रीजी म. के सदुप
देशात् ।
प्रकाशिका और द्रव्य सहायिका
भक्त मण्डल
विक्रम
सं० २०२३)
धीर स. २४६३
मूल्य-पठन पाठन
प्रथमावृत्ति
१०००
(46464666E- - ELECTREAKCE- दानदाताओं की नामावली HEACHECE निम्नांकित महानुभावों ने इस पुस्तक के प्रकाशन में सहायता दी है। अत: वे धन्यवाद के पात्र है:- । - ३५०) १. श्री मोहनलालजी वालिया यहमदाबाद २. श्री मूलचन्दजी बोहरा १००) न्यावर, बैंगलोर ३. श्री चंपालालजी अलीजार, ब्यावर ३०) ACHCHECK- -सम्पादिका KKHREEEEEEE -"
सम्पादिका
विपी पश
श्री चम्पक श्रीजी महाराज साहब ।
m
वि० ५० १६५६ ज्येष्ठ शुमा तृतिया ।
.
दीदा सि. १८१पल्गुन शुगातीया।
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8 प्राक-कथन ® सूक्त मुक्तावली एवं सिंदूर प्रकर को दो तीन विभिन्न प्रतियों का मैंने अध्ययन किया और मुझे लगा कि इस प्रकर में जो महत्व पूर्ण भाव प्रथित हैं उन्हें अधिक से अधिक धर्मानुरागी गण अध्य- यन करें तो मानव समान में जो वर्तमान में सकीर्ण भाव भरे पड़े है उनका निराकरण हो सके । इसी भावना से प्रेरित होकर मैंने इस मथ का सम्पादन करना आरश्यक समझा। भी प. पनारसीदासजी ने सस्कृत पद्यावली को हिदी पद्या घली में अनुदित कर सुषण में सुगध का कार्य किया है। मत मैंने उनकी हिन्दी पद्यावली को भी इस प्रथ में स्थान दिया है। आशा है कि भषिक जन इस अधिक लाभ उठायेंगे। द्वितीय भाग मे लोक हिताय कतिपय सूक्तिया एष भय उपाध्याय भी क्षमाफल्याणकजी महाराज और महाकषि पुगप भी शोमन मुनिजी प्रणीत मस्त पैत्यवादन स्तुति का समावेश भी किया है। --सपादिका
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पिनो युनोत स्मृति
म
यह प्र . उपस्थित किया जा रहा है वे हैं-
परम पूज्या माधीनी
श्री पार्श्व श्री जी महाराज साहब
1
मोता
fa म०११६३ चैत्र शुमा चतर्ग
वि. स. १९९८ शाम्व वृष्णा मामी
वि.003 में शुमा थमा
गगमन
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श्रीसोमप्रभाचार्यविरचित सूक्तमुक्तावली भाषापद्यानुवाद और अर्थसहित । धर्माधिकार। यादू लविक्रीहिता सिन्दरप्रकरस्तप करिशिरकोडे कपायाटनी- दावाविर्निचयः प्रबोधदिवसप्रारम्मसूर्योदयः । मुक्तिस्वीकृचकुम्भकुडकुमरस. श्रेयस्तरोः पत्र प्रोप्लास: क्रमयोनेखातिभरः पार्श्व प्रभोः पातु व ॥१॥ छप्पया शोभित तपगजराज, सीससिंदर पूरछवि। बोधदिवस प्रारंभ, करण कारण दोन रषि॥ मगलतरुपाक्षर, कपायकोतारवासन । बहुगुणरननिधान, मुक्तिकमलाकमलासन ॥ इडिविधि अनेक उपभासहित, अरुण धरण संतापहर। जिनराय पानखज्योविभर, नमत 'बमारसि जोर कर || मन्वयार्थी-(सप फरिशिर कोडे) सपरूपी हाधीरे मस्तक के में (सिन्दूरपकर ) सिन्दूर के पुत्र के . मध्यमाम [२] ( कपायाटवीदाबगचिनिचय.) पायपी बनगो दनाने वाले दावानल के समान, ( प्रबोधदिवसप्रारम्भसूर्योदयः ) मानन्धी दिवम के प्रारम्म के सूर्योदय के समान, (मुक्तिलीकुचकुम्भकुमरस: ) मुक्तिरूपी स्त्री के कुचकुम्भों पर लगे हुए केशर के रस के समान थोर (थे यन्नरो.) कल्याण- रूपी वृक्ष की (पल्लवप्रोल्लामः ) निम्नती हुई नई मोरनी के समान (पार्श्वप्रभो.) श्रीपाच नाथ भगवान के (क्रमयोः ) टोनों चरणों के (नखा तिभरः) नखों की कान्ति का समूह, (व:) तुम्हारी ( पातु ) रक्षा करो। भावार्थ-पार्वनाथ भगवान के चरणो के लाल और चमकते हुए नख सम्पूर्ण भव्यनीवों का कल्याण करें। सन्तः सन्तु मम प्रसन्नमनसो राचां विचारोद्यता: सूतेऽम्भः कमलानि तत्तरिमलं वाता वितन्वन्ति यत् किं वाभ्यर्थनयानया यदि गुणोऽस्त्यासां ततस्ते स्वयं कारः प्रथने न चेदय यशःप्रत्यर्थिना तेन किम् ।।२।। टोधकान्तवेमरीछन्द । से कमल सरोवर वासे । परिमल तामु पवन परकासे । त्यों कवि भाषहि अक्षर जोर ! संत सुजस प्रगटहि चहुंओर ॥ जो गुणवन्त रसाल कवि, ती जग महिमा होय । जो कवि अक्षर गुणरहित, ती श्रादर न कोय ॥ २ ॥ अन्वयार्थी-(मम ) मेरे (चाचा) बचनी के (विचारोद्यताः) विचार करने में उद्यत हुए ( सन्तः ) सज्जन पुरुष (प्रसन्नमनसः ) प्रसन्न चित्त (सन्तु) होयो । ( यत् ) क्योंकि ( कमलानि ) कमलो को (सूते) उत्पन्न तो करता है (अम्मः ) जल और, (तत्सरिमल ) उनकी [३] सुगधिको (वित गरिन) चारों ओर फैलाता है (वाताः) वायु । (षा) अथवा (धनया ) इस ( अभ्यर्थनया) प्रार्थना से (किम् ) क्या ? अर्थात् 'इस प्रथ को देखने वाले सुत्रन प्रसन होवें मेरी इस प्रार्थना से कुछ लाम नहीं । क्याकि ( यदि ) यनि (श्रासाम् ) इस वाणी में (गुण ) गुण (अस्ति) हैं, (तत ) तो (ते) वे सजन पुरुष (प्रथने ) उन गुणा के प्रसिद्ध करने में ( स्त्रय ) अपने आप (कार ) कर्ता हो जायेंगे। अर्थात् वे स्वय उनको प्रसिद्ध करेंगे। (अथ ) और यदि (न चेत् ) मेरे इन वचनो में अथात् इस प्रथ में गुण नहीं हैं तो ( तेन ) उस (यश प्रत्य र्थिना ) गुणों के अभाव रूप अपयश से (किम ) क्या लाम है ? . भावार्थ-जिस तरह कमलों को उत्पन्न तो करता है जल, परन्तु उनके सौरभ को सब ओर फैलाता है वायु । इसी तरह यद्यपि इस प्रथ को बनाता हूँ में परन्तु इसका प्रचार करेंगे सजन पुरुष ही। इसलिये वे मुझ पर प्रसन्न हावें । परन्तु एक तरह से इसके लिये उनसे प्रार्थना करने की आवश्यकता नहीं दौरती है। क्योकि यदि इस ग्रन्थ में गुगण हागे, तो वे स्वय उहें प्रकशित करेंगे और यदि नहीं है-रोष ही दोष हैं, तो इसके प्रचार करने से जो अपयश होगा, उसमे क्या लाम? । ३द्रना। त्रिवर्गममाधनमन्तरेण पशोरिवार्षिफल नरस्य । तत्रापि धर्म प्रवर नदन्ति न त निनायड्वतोऽर्थकामी ।। त वाहित काग उड़ावन कारण, डार महामणि मूरख गये । त्यों यह दुर्लभ देह 'बनारसि', पाय अजान अकारथ खोवे ।। अन्वयाथो-( यः ) नो (प्रमत्तः ) प्रमादी वा मूर्स पुराण ( दुप्पापम ) कठिनता से प्राप्त होने वाले (मत्वजन्म ) मनुष्यजन्ममो (मुधा) व्यर्थ ही (गमयति ) खोना है सः) वह पुरुष मानों (स्वर्णस्थाले ) सुवर्ण के थाल में ( रज.) धूल (क्षिपति ) रखता है, ( पोयूपेण ) अमतसे (पादशीचम् ) पाद प्रक्षालन (विधत्ते ) करता है- अर्थात् पैर धोता है, (प्रवरकरिणम् ) श्रेष्ठ हाथीपर ( पधभारम ) ईधन का बोझा (बाहयति ) ढोता है और ( वायसोडायनार्थम् ) कौवे के उडान के लिए (चिन्तारत्नम् ) चिन्तामणि रत्न को (करात् ) हाथ मे ( विकिरति ) फेंकता है। भावार्थ--मनुष्यजन्मको व्यर्थ खोनेवाला मनुष्य उक्त कार्य करनेवालो के समान मूर्ख है । इसलिये उसको धर्मसेवन करके उमल करना चाहिये। शार्दूलविक्रीडित । ते धत्तुरतरु वपन्ति भवने प्रोन्मूल्य कल्पद्रु मं चिन्तारत्नमपास्य काचशकलं स्वीकुर्वते ते जराः । विक्रीय द्विरदं गिरीन्द्रसदृशं क्रीणन्ति ते रासभं ये लब्धं परिहत्य धर्ममधमा धावन्ति भोगाशया ॥६॥ कवित्त (३१ मात्रा) ज्यों जरमूर उखारि कल्पतरु, बोषत बोषत मूढ 'कनकको खेत। ज्यों गजराज वेच गिरिवर सम, कूर कुबुद्धि मोल वर लेत ।। १ परेका । २ गर्दभ ( गघा )।
-
[७]
जैसे छाडि रतन चिन्तामणि, मूरख काचसड मन देत ।
से धर्म विसार 'नारसि', धावत अधम विषयसुखहेत ॥ ६ ॥
अन्वयार्थी--(ये ) जो (अधमा ) नीच पुरुष (लब्धम् ) प्राप्त
हुए (धर्मम् ) धर्म को ( परिहत्य ) छोडकर ( भोगाशया) मोगोपभोगों
के मेवन करने की श्राशा करने से ( धावन्ति ) दौड़ते हैं-मक्ते हैं, (ते)
वे (कल्पद्रुमम् ) कल्पवृक्ष को (श्री मूल्य ) उखाड़ कर ( भवन ) अपने
घर में ( धतूरतरूम् ) धत्तर के वृक्ष को (धपन्ति ) बोते हैं, (ते) वे
(नडा ) मूर्ख ( चितारत्नम् ) चिन्तामणि रन को (अपास्य) छोडकर
(काचशकलम) काच के टुकडे को (स्वीर ') स्वीकार करते हैं। और
(ते ) वे ( गिरीन्द्रसदृशम् ) सुमेरु पर्वत के समान (द्विरदम् ) हायी को
(विक्रोय ) बेचकर (रासमम) गदहे को (क्रोणत) खरीदते हैं।
भावार्थ -जो पुरुष किमा तीव्र शुभ कर्म के उदय और अशुभ कर्म के
क्षयोपशमादिक से प्राप्त हुए जैन धर्म को छोड़ देते हैं श्रयया उसके सेवन
करने में शिथिलता करते हैं, उ ऊपर कहे हुए काम करने वाले मूरों के
समान समझना चाहिये।
शिखरिणी।
अपारे ससारे कथमपि समामाघ नृभर
न धर्म य कुर्याद्विषयसुसतुष्णावरलिता।
अइन्पारावारे प्रवरमपहाय प्रवहण
स मुस्यो मूर्खाणामुपलमुपलभ्यु प्रयतते ॥ ७॥
[८] सोरठा। व्यों जल बृढत कोय, बाइन तन पाहन गहै। त्यों नर मूरख होय, धर्म छांडि सेवत विषय ॥ ७ ॥ अन्ययाथों-(य: ) जो (विषयसुखतृष्णातरलितः ) विषयों के सेवन करने से प्राप्त हुए सुख की तृष्णा में मम हुश्रा नीव (अपारे) (ससारे) इस अपार ससार में ( कथ अपि) किसी तरह से (नृभवम् ) मनुष्य जन्म को (समासाद्य ) पाकर (धर्मम ) धर्म सेवन ( न ) नहीं ( कुर्यात् ) करता है, ( सः ) वह ( मूर्खाणाम ) मूखों में ( मुख्यः ) मुख्य अर्थात् अतिशय मूर्ख । पारावारे ) समुद्र में (व्र डन् ) डूबते समय ( प्रवरम् ) भीष्ठ (प्रवहणम् ) जहान को (अपहाय) छोडकर ( उपलम् ) पागण के ( उपलन्धुम ) पकड़ने के लिये (प्रयतते ) प्रयत्न करता है। भावार्थ-लो धर्म को छोडकर विषय सेवन में लीन होता है, वह उस मूर्ख के समान है, जो समुद्र में डूबता हुअा भी नहाज को छोड़कर पाषाण पकडने का प्रयत्न करता है। द्वार गाथा। शार्दूलविक्रीडित । मक्ति तीर्थकरे गुगै जिनमते संघे च हिंसानृत- स्तेयाब्रह्मपरिग्रहव्युपरम क्रोधाधरीणां जयम् । सौजन्यं गुणिसङ्गमिन्द्रियदमं दानं तपोभावनां राग्यं च कुरुष्व नितिपदे यद्यस्ति गन्तुं मनः ।।८।। छप्पय। जिन पूजहु गुरु नमहु, जैनमतवैन बखानहु । सघभक्ति श्रादरहु, जीवहिंसा न विधानहु ।।
।
[]
भूठ प्रात्त कुशील, त्यागि परिप्रह परमानहु ।
क्रोध मान छस लोभ जीत, सजनता ठानहू ॥
गुणिमा करहु इन्द्रिय दमह,देहु दान ठप भावजुत ।
गहि मन विराग इहि विधि चहहु जो जगमें जीवनमुकत,1८
अध्यार्थी श्रामन् ( यदि ) यदि (मन) तेरा मन (नि.
निपदे) मोक्ष में (गतु अस्ति) नाना चाहता है, तो त् । तीर्थकरे)
तीयकरमें (गुरो) गुरुमें, (जिनमते) बिनमतमें और (सघे ) मुनि
अर्जिका धावक और श्राविका इनके समूहरूप सघर्म, (भक्ति कुरुष्व ) मलि
कर (घ ) और ( हिंसानृतस्ते याब्रह्मपरिप्रत्युपरमम् ) हिंसा झूठ चोरी
अना और परिग्रहका त्याग, (क्रोधाधरीणाम् ) कोध मान माया लोमरूप
शत्रुओं का ( जयम् ) विजय, (सौज यम् ) सुजनता, (गुणिसङ्गम् )
गुणी पुरुषों की सङ्गति, (इन्द्रियदमम् ) इन्द्रियों का दमन, ( दानम्) दान
(तपोभावना ) सपो भावना और (पैराग्यम् । वैराग्य अर्थात् ससारदेव
मोग से उदासीनता (कुरुष्व) कर।
भावार्थ-यदि । मोक्ष जाने की इच्छा हो, तो ऊपर लिखे कार्य करना
चाहिये।
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पूजाधिकार
पाप लुम्पति दुर्गति दलपति व्यापादयत्यापद
पुण्य संचिनुते श्रिय वित्तनुते पुष्णाति नीरोगताम् ।
सोमाग्यं विदधाति पलपति प्रीति प्रस्ते पर
स्वर्ग यच्छवि निति च रचपत्यचाईता निर्मिता ॥६॥
[१०] - कवित्त (३१ मात्रा)। लोपै दुरित हर दुख संकट, 'भाप रोगरहित नित देह । पुण्यभंडार भरे जस प्रगटे, मुकति पंथ सों कर सनेह ।। रचै मुहाग देय शोभा जग, परभव पँहुचावत सुरगेह । कुगतिबंध दलमलहि बनारसि, वीतरागपूजाफल एह || अन्वयार्थी-(अर्हताम् ) श्रीवीतराग सर्वज्ञदेवकी (निर्मिता ) की हुई(अर्चा ) पूजा ( पापम् ) पापका (लुम्पति ) लोप कर देता है, ( दुर्ग- तिम्) नरकादिक दुर्गतियों को (दलयति ) नष्ट कर देती है, (आपदम् ) आपदाओं का (व्यापादयति) दलन करती है, (पुण्यम् ) पुण्य को (संचिनुते ) सचित करती है, (श्रियम् ) लक्ष्मी को (वित्तनुते ) बढ़ाती है, (नीरोगताम् ) नीरोगता को (पुष्णाति ) पुष्ट करती है, ( सौभाग्यम् ) सौमाग्य को (विदधाति ) अटल रखती है, (प्रीतिम् ) प्रीति को ( पल्लव- थति ) पक्षवित करती है, (यशः) कीति को (प्रसूत ) उत्पन्न करती है, (स्वर्गम् । स्वर्ग को (यच्छति ) देती है (च) और (नितिम् ) मोक्ष को ( रचनति ) रचती है अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर देती है। भावार्थ-अरहंतदेवकी पूजा करनेसे अशुभ कर्मों का उपशम होता है और शुम कर्मों का उदय तथा वृद्धि होती है । - - स्वर्गस्तस्य गृहाङ्गणं सहचरी साम्राज्यलक्ष्मी: शुभा सौभाग्यादिगुणावालविलसति स्वैरं वपुर्वेश्मनि । २ दे।
[ ११ ॥ ससारसुतरः शिवं करतलकोडे उठत्यामा - jr.m या श्रद्धाभरमाजन जिनपते पूजां विधवै जनः ॥ १० ॥ देवलोक ताको घर आँगन, राजद्धि से तमु पाय । साके तन सौभाग्यश्रादिगुन, केलि विलास करें नित पाय ॥ सो नरातुरत तिर भवसागर, निर्मल होष मोक्षपद साय । द्रव्य-भाव-विधिसहित बनारसि, जो जिनवर पूजे मन लाय अन्वयार्थी-(य) जो (जन ) मनुष्य (जिनपते । जिनेन्द्र देवकी (श्रद्धामरमाजनम् । अत्यन्त श्रद्धा पूर्वक ( पूजाम् ) पूजा (विधत्ते) करता है, (तस्य ) उसको (स्वर्ग ) स्वर्ग (गृहाङ्गपम् । पर का श्रागन' है और ( साम्राज्यलक्ष्मी ) गज्य सम्पदा ( शुमा) अच्छी ( सहचरी) ली है, (पपुश्मन) उसके शरीर रूपी घर में (सौभाग्यादिगुणा- बलि ) सौभाग्य प्रादिक गुणों के समूह ( स्वरम् ) स्वतन्त्रता पूर्वक (बिल- सति ) विलास करते हैं, { संसारः) परिभ्रमणरूप ससार (सुतर ) उसके लिए सुनर है अर्थात् वह उसके पार सहन ही हो सकता है । और (शिवम् ) मौत तो (अक्षसा) TIM ही (करतलकोडे ) रहा हथेली पर आकर (लुठति) लौटती है। भावार्थ:-निनेन्द्रदेवकी पूषा करने वाले को स्वर्गादिक सम्पदाए सहज ही मिल सकती हैं। . । 1 शिखरिणी। कदाचिन्नातक कुपित, इव पश्यत्यमिमुखं विदूरे दारिद्य चकितमिव नश्यत्यनुदिनम् ।
AR -वादे देवर 1 T च्या माई हुई ईव इंद पन्न कालेज में . न्दिर, स- A - an T- नवरत जाने P an -- २ जानते हवनः ने [१३], यस्त स्तौति परत्र वृत्रदमनस्तोमेन स स्तूयते । यस्त ध्यायति लसकर्मनिधनः स ध्यायते योगिभिः ॥१२॥ - D - 7 । ३ जो जितेंद्र पूजै फूलनसों सुरनैनन पूजा तिस होय । बहे भावसहित जो जिनवर, वंदनीक त्रिभुवन में सोय ॥ जो जिन सुजस करें जन ताकी, महिमा इन्द्र करें सुरलोय । जो जिन ध्यान करत पानारसि, ध्या मुनि ताके गुण जोय ॥१२॥ अन्वयार्थो-(य ) को (जिनम् ) लिने द्रदेव ,फो (पुष्पै ) पुष्पों से (अर्चति-) पूजता है, ।। स ) , वह पुरुष (स्मितसुरखी लोध ) मुस्कुराती हुई। देवांगनाओं के नेत्रोंद्वाराः (अर्यते) पूजा जाता है, (य), जो (तम) उनकी (एकश ) 'एकवार बिन्ते । च दना करता है, (स') वह पुरुष (त्रिजगता ) 'ठानी लोकों के द्वारा (अहर्निशम) रात दिन (पन्द्यते) पन्दना किया जाता है, (य ) बो पुरुष (तम् ) उनकी (स्वोति) स्तुति करता है (स ) वा (परन) परलोक में (वृत्रदमनस्तोमेन) द्रों के समूहद्वारा अर्थात् सौ इन्द्रोंके द्वारा हस्तूयते) स्तुति किया जाता है और (य') बो (वम् ) मिनेद्र देव का (ध्यायति) ध्यान करता है, (स ) षह (सप्तकर्मनिधन ) समस्त फर्मों से रहित होता हुश्रा (योगिमि ) योगियों द्वारा (ध्यायते) चितवन किया जाता है। भाषार्थ-मिने द्रदेव की पूना पन्दना ध्यानादिक फरने वाला पुरुप द्रादिकों द्वारा पूजा पदा'और ध्याया जाता है। . , । - । १४ ] 4 ६ भ गुरु अधिकार। वंशस्थविलम् । भवद्यमुक्त पथि यः प्रवर्तते प्रवर्त्तयत्यन्यजनं च निस्पृहः । स सेवितव्यः स्वहितैषिणा गुरुः स्वयं तरस्तारयितुं क्षमः -परम् ।। १३ ॥ "अडिल्ल छन्द। पापपंथ परिहरहिं, धरहिं शुभपंथ पग। पर उपगार निमित्त, बखानहिं मोक्षमग ।। सदा अवांछित चित्त, जु तारन तरन जग। ऐसे गुरु को सेवत, भागहिं करम ठग ॥१॥ अन्वयार्थी-(यः) जो (अवद्यमुक्त ) पापरहित (पथि ) मार्ग में ( प्रवर्तते) स्वयं प्रवर्तता है (च) और (निस्पृहः सन' ) निस्पृह होकर. अर्थात् बिना किसी श्राशा के ( अन्यजनम् ) दूसरे मनुष्यों को (प्रवर्त्तयति ) प्रवर्तन कगता है, इसी प्रकार जो स्वयं तरन् ) संसार रूपी समुद्र से श्राप तरता हुश्रा (परम् ) दूसरो को (तारयितुम् ) तारने के लिये (क्षमः) समर्थ है, (सः) वह (गुरुः) सद्गुरु (स्वहितैषिणा) जो अपना मला चाहते हैं, उनके द्वारा - ( सेवितव्यः ) सेवन करने के योग्य है । भावार्थ-आत्मकल्याण करनेवाले प्राणियो को ऐसे गुरुका सेवन करना चाहिये कि, जो मोक्षमार्ग. में स्वयं चले और दूसरों को चलावै । तथा संसार रूपी समुद्र से श्राप तरै और दूसरो को तारै । भ मालिनी। विदलयति कुबोधं बोधयत्यागमार्थ सुगतिकुगतिमार्गों पुण्यपापे व्यनक्ति ।
i[१५]
.
2
अगमपति कृत्याकृत्य भेदं गुरुयों
मवजलनिधिपोवस्तं विना नास्ति कश्चिद ॥१४॥
हरिगीतिका छन् ।
मिथ्यातदलन सिद्धात-साधन, मुकतिमारग वानिये।
करनी अकरनी सुर्गात दुर्गति, पुण्य पाप पलानिये ।।
ससार सागर तरनतारन, गुरु जहाज विशेखिये।
बगमाहिं गुरुसम कह बनारसि, और कोउ न देखिये ॥१४॥
अन्वयार्थी-(य)
बो (कुबोधम् ) मिथ्याशान में
विदलयति) दलन करता है, (भागमार्यम् ) शिान्त
शास्त्रों के अयो (बोधयति) प्रकाशित करता है, (सुगतिकुग-
तिमा) स्वर्गादिक सुगति और नरकादिक दुर्गति के मार्ग रूप
(पुण्यपापे) पुरय और पाको (ज्यनक्ति) प्रकट करता है,
और ( कृत्याकृत्यभेदम् ) कृत्य अकृत्य अर्थात् करने योग्य और
न करने योग्य कार्य के भेद को (अवगमयति) बनाता है (0)
(पिना) उसके विना (कश्चित् ) और कोई (भवलनिधित
पोतः) ससार रूपी न्द्र से पार उतारने के लिये बाब (न.
अस्ति)ना है।
(
1
सिलरिती।
पिता माता माता प्रिपसहचरी अनुनिवहा
सुनवामी माधत्तरिमटरधाव परिकरः ।
निमअन्त वन्तु नरककुइरे रधितमत
गुरोधर्माधर्मप्रकटनपरान्कोरिन परः ॥१५॥
[१] मरंगयन्दा मात पिता सुत बन्धु सखीजन, मीत हितू सुख कामिनि पीके। सेवक साल मतंगज बाज, महादल राज रथी रथ नीके || दुर्गति जाय दुखी विललाय, परे सिर श्राय अकेलहि जीके । पंथ कुपंथ गुरू सममावत, और सगे सब स्वारथ हीके ||१५|| अन्वयार्थी-(नरककुहरे ) नरकरुपी - कुहर में (निमज. न्तम् ) हूबते हुए ( जन्तुम् ) प्राणी को ( धर्माधर्मप्रकटनपरात् । धर्म अधर्म के प्रगट करने में तत्पर ऐसे ( गुरोः ) गुरु से (परः) भिन्न अर्थात् गुरुको छोड़कर अन्य ( पिता माता भ्राता प्रिय- सहचरी सनुनिवहः सुहृत्स्वामी माद्यत्करिभटरथाश्व परिकरः) पिता, माता, भाई, प्यारी सहचरी अर्थात् स्त्री, :पुत्र, मित्र, स्वामी, मदोन्मत्त हाथी, योद्धा, रथ, रथ, घोड़े, और परिकार आदि १ कः अपि ) कोई भी ( रक्षितुम् ) रक्षा करने को ( अलम् ) समर्थ ( न ) नहीं हैं। भावार्थ-नरकमें पड़ते हुए प्राणीको धर्म और अधर्म का स्वरूप समझा कर गुरु ही रक्षा कर सकते हैं और कोई नहीं। शार्दूलविक्रीडित । किं ध्यानेन भवत्यशेसविषयत्यागैस्तपोभिः कृतं पूर्ण मावनयालमिन्द्रयजयैः पर्याप्तमाप्तागमैः । किं त्वेकं मवनाशनं कुरु गुरुप्रीत्या गुरोः शासन: सर्व येन विना विनाथ बलवत्स्वार्थाय नालं गुणाः॥१६॥ वस्तु छन्द ध्यान धारन ध्यान धारन, विषेमुखत्याग । करनारस भादरन, भूमिसन इन्द्रीनिरोधन ।
-- व्रत प्रजम दान तप, भगति भाष सिद्धातसाधन ये सत्र काम न आवहीं, व्यौं बिन नायक सैन । शिवमुखहेतु बनारसी, कर प्रतीत गुरुजैन ॥ १६ ॥ अन्वयार्थी-(ध्यानेन ) ध्यान करने से (किम् भरति ) क्ग होता है? अशेषविषयत्यागै कि भवति ) समस्त विषयों के त्याग से क्या होता -उससे कुछ सिद्धि नहीं, (तपोभि कि कनम् भवति ) तप करने से क्या होता है ? (भावनया किं पूर्णम् ) भावनाओं मे क्या पूरा पड़ता है ? और इसी प्रकार (इद्रियजय श्रलम्) इन्द्रियों को जीतने से क्या ? और (आप्तागमै पर्याप्रम् ) सर्वज्ञ प्रणीत श्रागम के अध्ययन से क्या १ अर्थात् केवल इनसे कुछ लाम नहीं । (कि तु) किंतु (एक) एक (भवनाशन) बसार के नाश करनेवाली (गुरो शासन) गुरु की श्राशा को (गुरुप्रीत्या) गाट भक्ति से (फुरु) पालन करो, ( येन विना ) जिसके विना (विनाय बलयत् ) विना स्वामी की सेना के समान ( स गुणा ) पूर्वोक्त ध्यानादिक समस्तगुण ( स्वार्थाय ) अपने अपने फनकी सिद्ध करने के लिये (नालम्) समर्थ नहीं हैं। भावार्थ-वैसे नायक के बिना सेना जय प्राप्त नहीं कर सकती, उसी प्रकार गुरु परम्परा से प्राप्त किये बिना ध्यानादिक सिद्धि के दावा नहीं होते। जिनमताधिकार शिखरिणी। न देव नादेव न शुभगुरुमेन न कुगुरु न धर्म नाधर्म न गुणपरिषद्ध न विगुणम् ।
[ १८ ] न कृत्यं नाकृत्यं हितमहितं नापि निपुणं विलोकन्ते लोका जिनवचनचक्षुर्विरहिताः ॥ १७ ॥ कुण्डलिया छन्द देव अदेव नहीं लखें, सुगुरु कुगुरु नहिं सूझ । धर्म अधर्म गर्ने नहीं, कर्म अकर्म न बूझ ।। कर्म प्रकर्म न बूझ, गुण रु औगुण नहीं जानहिं । हित अनहित नहीं सधैं,निपुणमूरख नहीं मानहिं ।। कहत बनारसि ज्ञानदृष्टि, नहिं अंध अवेवहिं। जैनवचनहगहीन, लखें नहिं देव अदेवहिं । १७ ॥ अन्वयार्थी-(जिनवचनचक्षुर्विरहिताः ) जिनेन्द्रदेवके वचन रूपी चक्षुओं से रहित (लोकाः ) लोग (न ) न ( देवम् ) देवको (विलोकन्ते) देखते हैं (न अदेवम् ) न अदेव को, (न एनं शुभगुरुम् ) न इन श्रेष्ठ गुरुको देखते हैं ( न कुगुरुम् ) न कुगुरुको, ( न धर्मम् ) न धर्म को देखते हैं (न अधर्मम् ) न अधर्म को, (न गुणपरिणद्धम् ) न गुणी देखते हैं (न विगुणम) न निर्गुण को, (न कृत्यम् ) न करने योग्य देवते हैं, (अकृत्यम् ) न करने के अयोग्य, ( न हितम् ) न हित देखते हैं, । न अहितम् ) न अहित (अपि ) और (न निपुणम् ) न निपुण को देखते हैं, न मूर्ख को। भावार्थ--जो जिनमत धारण नहीं करते हैं, वे अपना हिताहित कुछ भी नहीं जान सकते। - शार्दूलविक्रीडित । मानुष्यं विफलं वदन्ति हृदयं व्यर्थं वृथा श्रौत्रयो. निर्माण गणदोपभेदकलनां तेषामसंभाविनीम् ।
. [ १६ ] दुर्धार नरकान्धकूपपतन मुक्तिं बुधा दुर्लमां सार्वज्ञः समयो दयारसमयो येषां नकर्णातिथिः ।। कवित्त ताको मनुज जनम सब निष्फन,मन निष्फल निष्फल जुग कान । गुण र दोष विचार भेदविधि, ताहि महा दुर्लभ है ज्ञान ।। ताको सुगम नरक दुख सकट, अगमपथ पदवी निर्वान । । जिनमतवचन दयारसमित, जे न सुनत सिद्धातबखान ॥१८॥ अन्वयार्थी-( येषाम् ) जिन पुरुषों के ( दयारसमय ) या रूपी रस से पूरित ( सार्वज्ञ ) सर्व देवका कहा हुश्रा ( समय ) शास्त्र (कर्णा तिथि ) कणगोचर ( न ) नहीं हुआ है, (बुधा ) पण्डितलोग ( तेषाम् ) उनका (मानुष्यम् ) मनुष्यजन्म (विफलम् ) निष्फल (बदन्ति ) कहते हैं, (तेषाम् ) उनके (हृदयम् ) हृदय को (व्यर्थम् ) व्यर्थ ( वदन्ति ) बतलाते हैं, (श्रोत्रयो निर्माणम् ) उनके पर्णो के बनने को (वृथा ) व्यर्थ कहते हैं, (गुणदोपभेदकलनाम् ) उनके गुण और दोषों के मैद करने का विचार (असम्भाविनीम् ) घसम्मय है । उनका (नरकान्धकूपपतनम् ) नरक रूपी अधकूप में पड़ना ( दुर्यारम् ) रुक नहीं सकता और उन्हें (मुक्तिम् ) मोक्ष (दुर्लभाम् ) अत्यन्त दुर्लम है । पीयप पिपजल ज्वलनवत्तेजस्तम स्तोमव- मित्र शात्रववत्सज भुजगचिन्तामणि लोष्ठवत् । ज्योत्स्ना ग्रीष्मजधर्मवत्म मनुते कारुण्यपण्यापण जैनेन्द्र मतमन्यदर्शनसम यो दुर्मतिर्मन्यते ॥१६ ।।
[ २० ]
पटपट ।
अमृतको विष कहें, नीरको पावक मानहिं ।
तेज तिमिरसम गिनहिं, मित्रको शत्रु बखानहिं ॥
पहुपमाल कहिं नाग, रतन पत्थर सम तुल्लाहिं।
चंद्रकिरण श्रावपस्वरूप, इहि भांति जु भुल्लहि ॥
करुणानिधान अमलान गुन, प्रगट 'बनारसि जैनमत ।
परमत समान जो मन धरत, सो अजान मूरख अपत ||१६॥
अन्वयार्थी-(यः) जो ( दुर्मतिः ) मूर्ख पुरुष ( कारुण्यपण्या-
पणम् ) करुणा के निधान (जैनेन्द्रम् मतम् ) जिनमतको (अन्दर्शनसमम्)
अन्य मतों के समान ( मन्यते ) मानता है, (सः ) वह पुरुष (पीयूषम् )
अमृतको (विषवत् ) विष के समान (मनुने ) मानता है, (जलम् )
नल को ( ज्वलनवत् ) अमि के समान, ( तेजः) तेजको (नमःस्तोमवत् )
अन्धकार के समूह के समान, (मित्रम् ) मित्र को (शात्रववत् ) शत्रु के
समान, (जम् ) माला को (भुजगवत् ) सर्प के समान, (चिन्तामणिम्)
चिन्तामणि रत्न को ( लोष्ठरत् ) मिट्टी के ढेले के समान और ज्योत्स्नाम्)
चन्द्रमा की चांदनी को (ग्रीष्मजधर्मवत् ) ग्रीष्म ऋतु की धूप के समान
(मनुते ) मानता है।
धर्म जागरयत्यचं विघटयत्युत्थापयत्युत्पथं
मिन्ते मत्स-मुच्छिनत्ति कुनयं मथ्नाति मिथ्यामतिम् ।
वैराग्यं वितनोति पुष्पा त कृपा मुष्णाति तृष्णां च य-
तनं मतमचेति प्रथयति ध्यायत्यधीते कृती ॥२०॥
[ २१ ] मरहटा छन्द । शुभधर्म विकाश, पाप विनाश कुपथ उथप्पनहार । मिथ्यामत खडे, कुनय विहडे, मडै दया अपार ॥ तृष्णा मद मारे, राग विडारे, यह जिन आगम सार । जो पूर्जे ध्या, पढ़ें पढावें, सो जगमाहिं उदार ।। २० ।। अन्वयार्थी-(यत् ) नो (धर्मम् ) धर्म को (जागरयति) जगाता है अर्थात् अात्म धर्म का प्रकाश करता है, (अघम् ) पाप को (विघटयति ) विनाश करता है, ( उत्पथम् ) खोटे मार्ग को (उत्थापयति) उठाता है, ( मत्सरम् ) ईर्षा को (भिन्ते) खड खड करता है (कुनयम् ) मिथ्या एकात य को ( उच्छिनत्ति) उखाड़ कर फेंकता है, (मिथ्याम- तिम् ) मिथ्या शान को (मथ्नाति) मिटाता है, (वैराग्यम्) वैराग्य को वित- नोति ) चढाता है, ( गम् ) दया को (पुष्णावि ) पुष्ट करता है (च) और ( तृष्णाम् ) तृष्णा को (मुष्णाति ) चुराता है, (तत् जैन मतम् ) उस जैन मत को ( कृती ) चतुर पुरुष (अर्चति ) पूजते हैं, (प्रथयति ) प्रसिद्ध करते हैं, (ध्याति ) ध्याते हैं, और ( अधीते ) पढ़ते हैं। घिधिकार। रत्नानामि रोहणक्षितिधरा ख तारकाणामिव स्वगः कल्पमहीरुहामिव सरः पङ्क रुदाणामिव । पाथोधिः पयसामिवेन्दुमहसा स्थान गुणानामसा- वित्यालोच्य विरच्यता भगवतः सघस्य पूजाविधिः ।।
[ २२ ]
कवित्त (३१ मात्रा)
जैसै नभमंडल तारागण, रोहनशिखर रतनकी खान ।
न्यौ सुरलोक भूरि कलपद्र म, ज्यों सरवर अंबुजवन जान ।।
ज्यौं समुद्र पूरन जलमंडित, ज्यौं शशिकविसमूह सुखदान ।
तेसैं संघ सकल गुणमन्दिर, सेवहु भावभगति मन आन ॥ २१ ।।
अन्वयार्थी-(रत्नानां रोहणक्षितिधरः इव ) जैसे रोहणपर्वत
रत्नो का स्थान है, (तारकाणां खं इत्र ) जैसे आकाश तारागों का स्थान
है, ( कल्पमहीरुहाणां स्वर्गः इव ) जैसे स्वर्ग कल्पवृक्षो का स्थान है,
(पके रहाणाम् सरः इव ) जैसे तालाब कमलो का स्थान है, और (पयमां
पाथोधिः इव ) जैसे समुद्र पानी का स्थान है, उसी प्रकार से ( असौ ) यह
चार प्रकार का संघ (इन्दुमहसां गुणानां ) चन्द्रमा के समाल उज्जबल गुणों
का (स्थानं ) स्थान है, ( इत्यालोच्य ) ऐसा विचार करके ( भगवतः
संघस्य ) ऐश्वर्यशाली सघ की ( पूजा विधिः ) पूजा विधि (विरच्यते )
की जाती है।
.
यः संसारनिरासलालसमतिमुक्त्यर्थमुत्तिष्ठते
यं तीर्थ कथयन्ति पावनतया येनास्ति नान्यः समः ।
यस्मै स्वर्गपतिनमस्यति सतां यस्माच्छुमं जायते
स्फूर्तिर्यस्य परा वसन्ति च गुणा यस्मिन्स संघोऽय॑ताम्
जो संसार-भोग-आशा तज, ठानत मुकति पंथ की दौर ।
जाकी सेव करत सुख उपजत, जिहि समान उत्तम नहिं और ॥
इन्द्रादिक जाके पद वदत जो जंगम तीरथ शुचि ठौर ।
नामैं नित निवास गुन मंडन, सो श्रीसंघ जगत शिरमौर ॥ २२ ॥
[ २३ ] अन्वयार्थी-(य ) जो ( ससारनिरासलालसमति सन्) बम मरण रूप ससार के नाश करने की लालसा करता हुश्रा (मुक्तयर्थम् ) मोक्ष जाने के लिये ( उत्तिष्ठते ) उद्यत होता है, उमे ( स संघ बय॑ताम्) वह सघ पूजना चाहिये (यम् ) जिसको (पाश्नतया ) पवित्रता के कारण (तीर्थम् ) तीर्थ अर्थात् ससार से तिरनेका कारण (फथयन्ति ) कहते हैं, (येन ) जिसके ( सम ) समान (अन्य ) और (न अस्ति ) कुछ नहीं है, ( यम्मै ) जिसके लिये ( स्वर्गपति ) इद्र मी (नमस्यति ) नमस्कार करता है ( यस्मात ) जिसमे ( सताम् ) सजनों का (शुभम् ) कल्याण ( जायते ) होता है. ( यस्य) जिसकी ( परा) उत्कृष्ट ( स्फूर्ति ) दीप्ति है, (घ) और (यस्मिन् ) जिसमें ( गुणा ) अनेक गुण (वसन्ति ) निवास करते हैं। . लक्ष्मीस्त स्वयमभ्युपैति रमावत्कीर्तिस्तमालिद्गति प्रीतिस्त भजते मतिः प्रयतते त लन्धुमुत्रएठया । स्व. श्रीस्त परिन्धुमिच्छति मुक्तिस्तमालोक्ते या संघ गुणसघकलिसदन अयोरुवि सेवते ॥ २३ ॥ साको आय मिले सुम्बसपति फोरनि रहे ति जग छाय। जिनसों प्रीति पढे साफ घट, दिन दिन धर्मबुद्धि घधिकाय ॥ हिनधिम ताहि लई शिपमुन्दरि, सुग्गसंपदा मिले सुभाय । मानारस गुनरासि संघकी, जो नर भगति करै मन लाय ||२३|| अभयाथा-(य ) भो (मेयोपि ) मा सार गाने [ २४ ] बाला पुरुष (गुणसघके लिसदनम् ) गुणसमुदायके कीड़ा करने के स्थानभूत ( संघम् ) संघ का ( सेवते ) सेवन करता है, (तम् ) उस पुरुष के समीप (लक्ष्मीः ) लक्ष्मी ( स्वयम् ) अपने श्राप (अभ्योति ) श्राकर उपस्थित हो जाती है, ( कीर्त्तिः ) कीर्ति (तम् ) उस पुरुष को (रभसात् ) बड़ी शीघ्रता से ( प्रालिङ्गति ) श्रालिंगन करती है, (प्रीतिः ) प्रीति ( तम् ) उसका (भजते ) सेवन करती है, (मतिः ) बुद्धि ( तम् ) उसके (लब्धुम् उत्कण्ठया) मिलने की उत्कंठासे (प्रयतते ) प्रयत्न करती है, ( स्व: श्री) स्वर्ग की लक्ष्मी ( तम् परिरन्धुम् ) उससे रमण करने की ( इच्छति ) इच्छा करती है और (मुक्तिः ) मुक्ति ( तम् ) उसको (मुहुः ) वार वार (आलोकते ) देखती है। यद्भक्तः फलमहँदादिपदवीमुख्यं कृपेः सस्यव- चक्रित्वत्रिदशेन्द्रतादि तृणावत्प्रासङ्गिक गीयते । शक्तिं यन्महिमस्तुती न दधते वाचोऽपि वाचस्पतेः संघः सोऽघहरः पुनातु चरणन्यासैः सतां मन्दिरम् ।। जाके भजत मुकतिपदपावत, इन्द्रादिक पद गिनत न कोय । ज्यों कृषि करत धानफल उपजत, सहज पॅयार घास भुस होय ।। जाद गुन जस जंपन कारन, सुरगुरु थकित होत मदखोय। सो श्रसंघ पुनीत बनारसि, दुरित-हरन विचरत भुविलोय ॥२४॥ अन्वयार्थी-(कृपेः सस्यवत् ) जैसे खेती का मुख्य फल धान्य वा अनाज होना है, उसी तरह ( यद्भक्तो फलम् ) संघ की भक्ति करने का फल (अईदादिपदनीमुख्यम् ) अरहंत सिद्ध श्रादिक मुख्य मुख्य पदवियोका प्राप्त होना है, (चक्रित्वत्रिदशेन्द्रतादि) चक्रवती इन्द्र श्रादिक पदवियां [२५] (तृणवत ) भूमा के समान (प्रामगि तम् ) प्रासंगिक (गीयो ) गिनी माती है । (य महिमस्तुती) और निसकी महिमा की स्तुति करने में (वाचस्पते ) बृहस्पति के { याच अपि ) वचन भी ( शक्तिम् ) शक्ति (न । नदी ( दधते ) रखते हैं (म ) ऐसा (अघहर ) पाप का नारा करने वाला (संघ ) सघ (मताम् ) सज्जनों के ( मन्दिरम) घरों को (चरपन्यास), अपने चरणों से (पुनातु ) पवित्र करो। भावार्थ--सेती करने का मुख्य फल धान्य उत्पन होना है, पाय के साथ घास भूसा श्रादिक तो स्वय उत्पन्न हो जाते हैं इसी तरह स की मति करने से श्ररहतानि पदवियां मिलती है। नदी इन्द्र चकता कि की पदविया को प्रसगानुसार तय मिल जाती हैं । अभिप्राय यह कि -घर की भक्ति गने वाला हद्र चक्रवर्ती श्रालि के सुव भागता हुया मोक्ष को प्रात होता है। । अहिंमा अधिकार । क्रीडाभूः सुकृतस्य दुष्कृताज सहारवात्या भयो दन्वन्नीसनानिमेघपटली सतिदनी श्रियाम् । नि.णिखिदियोम प्रियसपी मुक्त कुगत्यर्गला सम्वेपु क्रिया कव मन्तु क्लेशशिपः परे ॥ २५ ॥ धनायी। मुफ्त की मानपुरी की नमनी जान, । पापरजम्बन को पोनरातिपखिए।
[३०]
श्रेयः संवननं समद्धिजननं सोजन्यसंजीवन
की केलिवन प्रभावभवनं सत्यं वचः पावनम् ।। २६ ॥
घट्पद ।
है
गुण निवास विश्वास दारिददुखखडन ।
देवअराधन योग, मुकतिमारग, मुखमंडन ।।
सुयशकेलि-श्राराम, धाम सजन मनरजन ।
नागवाघवशकरन, नीर-पात्रक-भयभंजन ।।
महिमा निधान सम्पतिसदन, मगल मीत पुनीत मग।
सुखगमि बनारसिदास भन, सत्यवचन जयवत जा ॥२८॥
अन्वयार्थी-( सत्यम् वचः ) सत्यवचन ( विश्वासायतनम् )
विश्वास का घर है, (विपत्तिदलनम् ) विपत्तियों को दूर करने वाला है,
(देवैः कृतागधनम् ) देवों से मी पूजित है, ( मुक्तः पथि अदनम् )
मुक्ति के मार्ग में कलेवा है, ( जलाग्निशमनम् ) जल और अग्नि को शान्त
करनेवाला है, (व्याघ्रोरगस्तम्भनम् ) सिंह सादिकों को स्तंभन करने वाला
ई, (श्रेय.संवननम् ) कल्याणो को वश करने वाला है. (समृद्धिजननम् )
ऋद्धियों को उत्पन्न करने वाला है, ( सौजन्यसंजीवनम् ) सुजनता को
जीवन देनेवाला है, (कीर्तेः केलिवनम् ) कीर्तिके क्रीड़ा करने का बगीचा है,
(प्रभावभवनम् ) प्रमाव का मन्दिर है और ( पावनम् ) पवित्र है।
शिखरिणी
यशो यस्माद्भस्मीभवति वनवोरिव वनं
निदानं दुःखानां यदवनिरुहाणां जलमित्र ।
न यत्र स्थाच्छायाऽतप इव तपःसंयमकथा
कथंचिचन्मिध्यावचनममिवत् न मतिमान् ॥३०॥
कवित (३१ मात्रा)। जो भस्मत कर निज कीरति, व्यो वन अग्नि दह बन सोय । जाके सँग अनेक दुख उपजत, बढे वृक्ष व्यों सींचत तोय ॥ जामैं धरमकथा नहिं सुनियत, ज्यौं रविवीच छाहिं नहिं होय । सो मिथ्यात्र पचन बानारसि, गहत न ताहि विचक्षण कोय ३० अन्वयार्थी--( यस्मात् ) जिस मिथ्या वचन से (वनबहे ) दावानल अमि से (धनम् इव ) वन के समान ( यश ) पश (भस्मीम- पति ) भस्म हो जाता है. (यत् ) जो (अवनिराहाणाम् ) वृक्षों को (जलमें २) जल के समान (दु खानाम् ) दुखों का (निदानम् ) कारण है, अर्थात् जिस तरह जल से वृक्ष उत्सान होते हैं, उसी तरह झूठ से दुख होते हैं ( यत्र ) और जिसमें (प्रातपे) धूप में (छाया इव) छाया के समान (तप सयमकथा) तप सयम श्रादि की कया (न) नहीं ( स्यात्) हो सकती, (तन्मिा यायचनम् ) ऐसे मिथ्या वचन को (मतिमान ) बुद्धिमान पुरुष ( कचित् ) किसी तरह (न अभिधत्ते) धारण नहीं करते, यांत बुद्धिमान् झूठ नहीं बोलते। वशस्थविलम्। असत्यमप्रत्ययमूलकारण कुवासनासम समृद्धिवारणम् । विपनिदान पालनोर्जितं कृतापराध कृतिमिर्विवर्जितम् ॥ रोहक छन्द । कुमति कुरीत निवास, प्रीत परतीत निधारन । रिद्धिसिद्धिमुखहरन, विपत-दारिद-दुखकारन ।
[ ३२ ]
परवंचन उत्तपत्ति, सहल अपराध कुलच्छन ।
सो यह मिथ्यावचन, नाहिं आदरत विचच्छन ।। ३१ ।।
अन्वयार्थी-(अप्रत्ययमूल कारणम् ) अविश्वास का मूल कारण,
(कुबासनासम) बुरी वासनाओं का घर, ( समृद्धिवार रणम ) सम्पत्ति का
रोकने वाला, ( विपन्निदानम् ) विपत्तियों का कारण, ( परवचनोनितम् )
दूसरों को ठगने के लिये किया जाने वाला, और ( कृतापराधम ) अनेक
अपराधों का कराने वाला ( असत्यम् ) मिथ्या वचन ( कृतिभिः) धर्मात्मा
पुरुषों के द्वारा (विवजितम् ) वर्जित है । अर्थात् ऐम वचन को धर्मात्मा
मी नहीं बोलते।
.
शार्दूलविक्रीहित।
'तस्याग्निर्नलमर्णवः स्थलमरिमित्र सुराः किङ्कारः
कान्तारं नगर गिरिगृहम हिर्माल्यं मृगारिमृगः ।
'पातालं बिलमस्त्रमुत्पलदलं व्यालः शृगालो विष
पीपं विषमं समं च वचन सत्याञ्चितं वक्ति यः ॥३२।।
घनाक्षरी।
पावरत जल होय वारिधते थल होय,
शस्त्रत कमल होय ग्राम होय वनत ।
कूपत विवर होय पर्वततै घर होय,
वासवत दास होय हितू दुरजनतें ।।
सिंघतै कुरंग होय व्याल स्यालअङ्ग होय,
विपतें पियूष होय माला अहिफनते।
विपमते सम होय संकट न व्याप कोय,
एते गुन होय सत्यवादी के दरसते ।। ३२ ।।
.
[३३ ]
अन्वयार्थी--("य) नो पुरुष (सत्याञ्चितम् ) सत्य (वचनम् )
वचन (यक्ति ) बोनता है, ( तस्य ) उसको (अग्नि ) अमि ( जलम् )
जल ( 'भवति' ) हो जाती है और (अर्णव ) समुद्र ( स्थलम् ) स्थल हो
नाता है । ( अरि ) शत्रु (मित्रम् ) मित्र, ( सुरा ) देवता ( किछुरा )
किङ्कर, ( का तारम् ) वन (नगरम् ) नगर, (गिरि ) पर्वत (गृहम् )
घर, ( अहि ) सर्प ( माल्यम् ) माला, ( मृगारि ) सिंह (मृत) हरिण,
(पानालाम् ) पाताल (बिलम् ) वित, (अस्त्रम् ) शस्त्र ( उत्पलदलम् ।
कमल के दल, (व्याज, ) दुष्ट हाथी (शृगाल ) शृगाल, ( विषम् )
विप ( पीयूपम् ) अमृत ( च ) और ( विपमम् ) विरम (समम्। सम
हो जाते हैं।
भावार्थ-सत्य बोलने वाले को जितने दुख देने गले पदार्थ है, वे
सर सुख देने वाले हो जाते हैं ।
अदत्तादान अधिकार।
मालिनी ।
तमभिलपति सिद्धिस्त घृणीते समृद्धि-
स्तममिसरति कीर्तिर्मुचते त भवातिः ।
स्पृहपत्ति सुगतिस्तं नेक्षते दुर्गचिस्त
परिहरति विपत्त यो न गृहात्यदत्तम् ।। ३३ ।।
रोहक छन्द ।
ताहि रिद्धि अनुसर, सिद्धि अभिलाप धरै मन !
विपति संग परिहरे, जगत वितरे मुजस धन ॥
भवन ती तिहि सज, युगति यछ न एक छन ।
सो पुरसम्पति लहै, गहे नहिं जो अदत्त धन ॥ ३३ ।।
.
[ ३४ ] अन्वयार्थी-( यः ) जो पुरुष ( अदत्तम् ) बिना दी हुई वस्तु , ( न गृह्णाति ) ग्रहण नहीं करता है, ( सिद्धि. ) सिद्धि ( तम् ) उस पुरुप की ( अभिलपति ) अभिलाषा करती है, (समृद्धिः ) समृद्धि ( तम् ) उसको ( वृणीते ) स्वीकार करती है, ( कीर्तिः ) कीर्ति (तम् अभिसरति) गुप्त रूप से उसके समीप अाती है, (भवातिः ) संसार के दुःख ( तम् ) उसको ( मुञ्चते ) छोड जाते है, (सुगतिः) स्वर्गादिक उत्तम गति ( तम् ) उसकी (स्पृहयति ) स्पृहा करती है, (दुर्गतिः ) नरकादिक दुर्गति ( तम् ) उसको ( न ईक्षते ) देखती ही नहीं है और (विपत् ) विपत्ति (तम् ) उसको (परिहरति ) छोड़ देती है । शिखरिणी। अद नादचे कृतसुकृत कामः किमपि यः शुभश्रेणिस्तस्मिन्वसति कलहंसीव कमले । विपत्तस्माद्दूरं व्रजति रजनीवाम्बरमणे- विनीतं विद्य' त्रिदिवशिवलक्ष्मीभजति तम् ॥३४॥ कविच ( ३१ मात्रा)। ताको मिलै देवपद शिवपद, ज्यौं विद्याधन ल है विनीत । तामै प्राय रहै शुभ सम्पति, ज्यौ कलहस कमलसों मोत ॥ ताहि विलोक दुरै दुख दारिद, ज्यौ रवि श्रागम रैन विदीत । जो अदत्त धन तजत वनारसि, पुण्यवंत सो पुरुष पुनीत ॥ ३४ ॥ अन्वयार्थी-(या) नो (कुतसुकृतकाम.) पुण्योपानन की इच्छा करने वाला पुरुष (किमपि ) कुछ मी ( अदत्तम् ) बिना - [ ३५ ] दी हुई वस्तु (न पादत्ते) प्रहण नहीं करता (तस्मिन् ) उसमें,- (कमले) कमल में ( कल हमी इव) सुन्दर सिनी के समान (शुभोणि ) शुम सम्पतियां ( वसति ) निवास करती हैं, ( तस्मात् ) उससे ( अम्बरमणे ) सूर्य से ( रजनी इव ) रात्रि के समान ( विपत् ) विपत्तिया ( दूरम् । दूर { व्रजति ) भागती हैं, (तम् ) और उस (विनीतम् ) नम्रीभूत पुरुष को (विद्याइ ) विद्या के समान (त्रिदिवशिवलक्ष्मी ) स्वर्ग और मोक्ष की लनी (भजति ) प्राप्त होती है । भावार्थ-निस तरह कमल में हसिनी रहती है, उस तरह चोरी के त्यागी के सारी सम्पत्तिया रहती हैं, जिस तरह सूर्य से रात मागती है, उस तरह चोरी के त्यागी से विपत्तियां दूर भागती हैं और जिप तरह विनयवान् पुरुष को विद्या शीघ्र प्राप्त होती है, उसी तरह अचौर्यवतीको स्वर्ग और मोक्ष की लक्ष्मी प्राप्त होती है। शार्दूलविकाहित । यनितितकीर्तिधर्मनिधन सर्वागमा साधन प्रोन्मीलद्वधनन्धन निरचितमिष्टाशयोन्दोधनम् । दोर्गत्यैकनिवन्धन कृतसुगत्या पसरोधन प्रोत्सर्पत्प्रधन जिघृक्षति न तद्धीमानदत्त धनम् ३५ मटा छद जो कीरति गोपहि, धरम विलोपदि, करहि महाअपराध । जो शुभगति तोरहि, दुरगति लोरहि, जोरहि युत उगध ॥ जो सफ्ट आनहि, दुगति ठानहि, यधयधनको गेद। सब नौगुणमस्ति, गहे न पंदित, धन प्रदत्तसो येह ॥ ३५ ॥ - । ३६ } अन्वयार्थी-( यत् ) जो विना दिया हुआ धन (निर्वतितकी- तिधर्मनिधनम् ) पूर्वोपार्जित कीर्ति और धर्म का नाश करने वाला है, ( सर्वागसाम् ) समस्त पापों का (साधनम् ) कारण है, (प्रोन्मीलद्वध- बन्धनम् ) वधवन्धन को प्रगट रूप से करने वाला है, (विरचिलिष्टा- शयोद्बोधनम् ) अनेक क्लेशों को देने वाला है, ( दोर्गत्येकनिबन्धनम् ) दुर्गतियों का मुख्य कारण है, ( कृतमगत्याश्लेषसंरोधनम् ) सुगतियों को दृढ़तापूर्वक रोकने वाला है और जो ( प्रोत्सर्पत्प्रधनम् ) युद्द कराने वाला है, (तत् ) ऐसे ( अदत्तम् ) विना दिये हुए (धनम् ) धन को (धीमान) बुद्धिमान् पुरुष (न जिघृक्षत्ति ) ग्रहण करने की इच्छा कभी नहीं करते हैं। हरिणी। परजनमनःपीडाक्रीडावनं वधमाना. भवनमवनिव्यापिव्यापल्लतावनमण्डलम् । कुगतिगमने मार्गः स्त्रायवर्गपुरागलं नियतमनुपादेयं स्तेयं नृणां हितकांक्षिणाम् ।। ३६ ॥ कवित्त (३१ मात्रा )। जो परजन-सताप-के लियन, जो वध बंध कुबुद्धि नियास । जो जग विपतिवेलधनमंडल, जो दुर्गति-मारग-परकास } नो सुरलोक द्वार दृढ पागल, जो अपहरण मुक्तिसुखवास । सो अदत्त धन तजत साधु जन, निजहितहेत वनारसिदास,३६ ।। अन्वयार्थी-(परजनमनः पीडाक्रीडावनम् ) वो दूसरों को मानसिक पीड़ा की क्रीड़ास्थान है, (वधभावनाभवनम् ) हिंसा करने की भावनाओं [ ३७] का घर है, ( अवनिम्यापिण्यापल्लताधनमण्डलम् ) समस्त भूमडल, पर फैलने वाली विपत्ति रूप लताओं के लिये मेघमडल है, (कुगतिगमने,) कुगति में जाने के लिये ( माग ) मार्ग है, (स्वर्गापवर्गपुरार्गलम् ) और स्वर्ग श्रोर मोक्ष के मार्ग को रोको के लिये अर्गन है ऐसा (स्तेयम् ) चौर्य कर्म ( हितकाक्षिणाम् ) अपना कल्याण चाल्ने धाले (नृणाम ) मनुष्यो, को (नियतम) अवश्य ही ( अनुपादेयम् ) छोड देने योग्य है । - शीलाधिकार। शार्दूलविक्रीहित । दत्तस्तेन जगत्यकीर्तिपटहो गोत्रे मपीकूर्चक- चारित्रस्य जलालिगुणगणारामस्य दावानलः । सकेत. सकलापदा शिवपुरद्वारे कपाटो दृढः शील येन निज विलुसमसिल पैलोक्यचिन्तामणिः ३७ कवित्त । ३१ मात्रा)। सो अपयशको डक बजावत, लावत कुल फलक परधान । सो चारितको देत जलाजुलि, गुन वनको दावानल दान । सो शिवपथ फिवार बनावत, श्रापति विपति मिलनको थान । चितामणिसमान जग जो नर, शील रतन निज करत मलान ३७ अवयार्थी-(येन ) जिस पुरुष ने (त्रैलोक्यचिन्तामणिः तीनों लोकों की वस्तुत्रा को प्राप्त करा देने वाले चि तामणि रन के समान (निजम्) अपना ( अखिलम् ) समस्त (शीलम् ) शीलवत (विलुपम् ) खो दिया, (तेन ) उसने ( जगति ) समार में (अकीत्तिपटह ) अपयश का हका [ ४० ] तोयत्यग्निरपि सजत्यहिरपि व्याघ्रोऽपि सारङ्गति व्यालोपि श्वति पर्वतोऽप्युपात वेडोऽपि पीयुपति । विघ्नोऽप्युत्सवति प्रियत्यरिरपि क्रीडातडत्गायपा. नाथोऽपि स्वगृहत्यटव्यपि नृणां शीलप्रभावाद्ध्वम् ४० छप्पय । अग्नि नीरसम होय, मालसम होय भुजंगम । नाहर मृगसम होय, कुटिल गज होय तुरंगम ।। विप पियूपसम होय, शिखर पापानखड मितु । विघन उलट आनंद होय, रिपु पलट होय हितु ॥ लीलातलाब सम उदधिजल, गृहसमान अटवी विकट । इहि विधि अनेक दुख होहिं सुख, शीलवंत नरके निकट ॥४०॥ and ३ । अन्वयार्थों-(शीलप्रभावात् ) शील व्रत के प्रभाव से (ध्रुवम् ) निश्चय से (नृणाम् ) मनुष्यो को (अग्निः अपि ) अग्नि भी ( तोयतिः) बल के समान हो जाती है, (अहिः अपि ) सर्प भी (खजति ) माला के समान हो जाता है (व्याघ्रः अपि) व्यान मी (सारङ्गति ) हरिण के संमानहा जाता है, (व्यालः अपि) दुष्ट हिसकपशु भी ( श्वति ) कुत्ते के समान हो जाता है, (पर्वत: अपि: ) पर्वत भी (उपलति) पाषाण के समान हो नाता है (क्ष्वेडः अपि ) विष मी (पीयूपति ) अमृत के समान हो नाता है, ( विघ्नः अपि ) विन भी ( उत्सवति) उत्सव के समान हो जाते है, (परिः अपि ) शत्रु मी (प्रियति ) मित्र के समान हो जाता है ।
1 ४१ ] (अपा नाथः अपि) समुद्र भी ( मीडातडागति) क्रीड़ा करने के सरोवर के समान हो जाता है और अटवी अपि ) वन मी (स्वगृहति) अपने घर के समान हो जाता है। परिग्रहाधिकार। कालुप्य जनयन् जडस्य रचयन्धर्मद्रु मोन्मूलन निश्नन्नीतिकृपाक्षमाकमलिनी लोमाम्बुधिवर्द्धयन् । मर्यादातटमुद्रु जन्छुभमनोहसप्रवास दिश- कि न क्लेशकरः परिग्रहनदीपूरः प्रमृद्धि गतः ॥४१॥ फक्ति । ३१ माना) अतर मलिन होय निज अपन, विनसे धर्मतसेयरमूल । किलम दयानीतिनलिनीवन, धरै लोभ मागर तन थूल ॥ उठे बाद मरजाद मिट सय, सुजन हसनहीं पाहि मूल । पढत पूर पूरे दुख संकट, यह परिग्रह सरितासम तूल ॥ ४॥ अन्वयार्थी--(जडस्य) मूों को या बलको ( कालुप्यम् ) क्लपित (जनयन ) करता हुश्रा, (धर्मद्रमो मूलनम रचयन् ) धर्म रूपी वृक्षको मूल से उखाहता हुआ, ( नीतियपाक्षमापमलिनीम् ) नीति कृपा क्षमा रूपी कमलिनियों को (सिभा) पहुँचाता हुश्रा, (लोभाग्धिम् ) लोम रूपी समुद्र को (बर्द्धयन् ) बढाता हुश्रा, (मर्यादातटम ) मा रूपी किनारे को (उदजन ) उत्साहाता हुश्रा, शुभमनोहमप्रयासम ) जन स्पी का प्रवास करने का (दिशन ) उपदेश देता हुआ अनि उ उखादा सुधा और (प्रवृद्धिम गत ) निरप बसता दुग्रामो (परिपहनीपूर) [ ४२ ] परिग्रहरूपी नदी का पूर है, सो (किम् ) क्या (लेशकरः ) क्लशों का करने वाला ( न ) नहीं है ? भावार्थ - जैसे नदी का पूर अनेक दुखो को देने वाला है, उसी तरह परिग्रह भी अनेक दु:खों का देनेवाला है। मालिनी कलहकलभविन्ध्यः कोपगृध्रश्मशानं व्यसनभुजगरन्ध्र द्वषदस्युप्रदोषः । सुकृतवनदवाग्निदिवाम्भोदवायु- नयनलिनतुपारोऽत्यर्थमर्थानुरागः ॥४२॥ मनहरण । कलह गयन्द उपजाइवेको विधगिरि, कोप गीधके अघाइवेको समशान है। संकट भुजंगके निवास करिवेको बिल, वैरभाव चोर को महानिशा समान है ।। कोमल सुगुन धन खडवेको महा पौन, पुण्यवन दाहिवेको दावानलदान है। नीत नय नीरज नसाइवेको हिमरासि, ऐसा परिग्रहराग दुखको निधान है ।। ४२ ॥ अन्वयाथों-अत्यर्थम् अर्थानुरागः ) परिग्रह में अत्यन्त अनुराग फरना ( कलहकलभविन्ध्यः ) कलह रूपी हाथी को उत्पन्न करने के लिए विन्ध्याचल पर्वत है, (कोपगृध्रश्मशानम्) क्रोध रूपी गीध के लिए श्मशान- भूमि है, (व्यसनभुजगरन्ध्रम् ) द्यूतादिक व्यसन रूपी सों के निवास करने के लिए बिल है, (द्वेषदस्युप्रदोषः ) द्वेष रूपी चोर के लिए रात्रि है, [ ४३ ] (सुकनवनवानि ) पुण्य रूपी वन को जलाने के लिए दावानल है (मार्दवाम्भोदघायु ) मार्दव रूपी बादलों को उठाने के लिए वायु है और (नयमलिनतुपार ) नाति रूपी कमल को नष्ट करने के लिये तुषार है । शार्दूलविक्रीडित। प्रत्यर्थी प्रशमस्य मित्रमधृतेर्मोहस्य विश्राम। पापानां खनिरापदा पदममध्यानस्प लीलावनम् । व्याक्षेपस्य निधिर्मदस्य सचिवः शोकस्य हेतु कले: केलीवेश्म परिग्रहः परिहतेोग्यो मिरिक्तात्मनाम् ||४३॥ प्रशमको अहितू अधीरजको बाल हितू , महामोहराजाकी प्रसिद्ध राजधानी है। भ्रमको निधान दुरभ्यानको विलासवान, विपत को थान अभिमान की निशानी है " दुरितको सेत रोग सोग उतपत्ति हेत, फलइनिफेन दुरगतिको निदानी है। ऐसो परिमहभोग सपनको त्याग जोग, भातम गवेपी लोग याही भाति जानी है ॥ ४३ ॥ अन्वयार्थी-नो (प्रशमस्य) प्रथम अर्थात् यात मां का (प्रत्यी शत्रु है. ( अधृतेः) श्रीर्य का ( मित्रम् ) मित्र है (मोहस्य) मोह के ( विमासम् ) विनाम करने का स्थान है, (पापानाम् ) पाओं की (खनि ) तमिरे, (आपदाम् ) भापतियों का (पम् ) स्थान है, (असद्धपानस्य ) प्राय रोद्रादिफ लोटे यानों के (लोलायनम् । कोस [ ४४ ] करने का वन है, (व्याक्षेपस्य ) मन ह का (निविः ) खजाना है, (मदम्य) अभिमान अयथा उन्मचता का ( सचिवः) मन्त्री है, (शोमस्य ) शोक का ( हेतुः ) काग्गा हैऔर ( कले ) कलियुग के ( केलीवेगम) हा करने का घर है, ऐसा ( परिग्रहः ) परिग्रह ( विविक्तात्मनाम) श्रात्मा को छन्वेषण करने वाले मनुष्यों को (परिहतः ) छोड़ देने के ( योग्यः) योग्य है। भावार्थ- -~-यात्मा का कल्याण करने वाले मनुष्यों को परिग्रह छोट देना ही रचित है। चन्हिम्नु पति नेन्धनरिह यथा नाम्भोमिरम्मोनिधि- स्तहल्लोंभवनो धनरपि धननन्तुर्न संतुष्यति । न त्वेवं मनुते विमुच्य विभत्र निःशेपमन्यं भवं यात्यात्मा तदहं मुधैव विदधाम्येनासि भृयासि किम् ४४ छप्पया कयौं नहिं अग्नि अघाय, पाय ईधन अनेक विधि। का सरिता घन नीर, तृपन नहीं होय नीरनिधि !! त्या असंख धन बढ़न, मूढ़ सतोष न मानहिं । पाप करत नहीं डरत, बंधकारन मन आनहिं ।। परतब विलोक जन्मन मरन, अधिररूप संसार क्रम । समुझे न आप परताप गुन, प्रगट बनारसि मोह भ्रम ॥४४॥ अन्वयार्थी-(यथा) मे ( (इह ) इस लोक में (इन्धने:- वन से ( वह्नि)' अभि (न तृष्यत्ति ) तृप्त नहीं होती, (अम्भोभिः) चन से (अम्भोनिधिः ) समुद्र (न ) तप्त नहीं होता, (तद्वत् ) उसी तरह [ ४५ ] (लोभन ) श्रत्य त लोभी (जन्तु ) प्राणी (धन अपि धनै । अधिक से अधिक धन होनेपर भी (न स तुप्यति ) सतुष्ट नहीं होता है (तु) और (आत्मा) मेरा यह श्रामा (नि शेषम् ) यहाँ की सारी (विभवम् ) विभूति को (विमुच्य ) छोड कर (अयम् ) दूसरे (भवम् ) मव में ( याति) चला जाता है (तत्) इसलिए (अहम् ) मैं (मुधा एष ) भ्यर्थ ही ( भूयासि) केक घोर (एनासि ) पापों को (किम् ) क्यों (विदधामि ) करता हूँ ! (एवम् न मनुत्ते ) ऐसा कमी विचार भी नहीं करता है। ब्रोधाधिकार। यो मित्र मधुनो शिकारकरणे समाससपादने सर्पस्य प्रतिबिम्बमङ्गदहने सप्तापिः सोदरः । चैतन्यस्य निषूदने विपतरोः सब्रह्मचारी चिर स क्रोधः कुशलामिलापकुशलैनिमूलमुन्मूल्यवाम् ॥४५॥ गीता छन्द । सो सुजन चित्त विकार-कारन, मनहु मदिरापान । जो भरम भय चिता बढायत, असित सर्प समान ।। जो तुजीयनहरन विपतरु, बनदहन दप दान । सो फोपरास विनास भविजन, लहहु शिव सुखवान ॥४॥ अन्वयार्थी-(य) नो कोष (विकारकरणे) विच के विकार करने में (मधुन ) मया (मित्रम् ) मित्र है ( समाससम्पादने) मय उत्पन करने में ( सर्पस्य प्रतिविम्यम् ) सर्पका प्रतिविम्व है, (बगाहने) शरीर के जलाने में (साचिप) अमि का (सोरा) माई है, (पैत यस्य- [ ४६ ] निषूदने ) और चैतन्य शक्ति को नष्ट करने के लिए ( विपतरोः ) विष वृक्ष का (चिरम् सब्रह्मचारी) चिरकाल का साथी है, ( सः क्रोधः ) ऐसा नो कोध है सो (कुशलाभिलापकुशलै:) श्रात्मा को कुशल रखने में चतुर पुरुषों को (निर्मूलम् ) जड़ से ( उन्मूल्यताम् ) उखाड़ डालना चाहिए अर्थात् क्रोध बिल्कुल नहीं करना चाहिये । हरिणी। फलति कलितश्रेयाश्रेणीप्रसूनपरम्परः प्रशमपयसा सिक्तो मुक्तिं तपश्चरणद्रुमः । यदि पुनरसौ प्रत्यासत्तिं प्रकोपहविर्भुजो भजति लभते भस्मीभावं तदा विफलोदयः ४६ कवित ( ३१ मात्रा) जब मुनि कोइ बोइ तप तरुवर, उपशम जल सींचत चित खेत । उदित जान साखा गुण पल्लव, मंगल पहुप मुकतिफलहेत ॥ तब तिहि कोप दवानल उपजत, महामोह दल पवन समेत । सो भस्मत करत छिन अंतर, हाहत बिरखसहित मुनिचेत ॥४६॥ अन्वयार्थी-(प्रशमपयसा) शान्त परिणाम रूपी जल से ( सिक्तः) सींचा हुआ ( तपश्चरणद्रमः ) तपश्चरणरूपी वृक्ष (कलित श्रेयःश्रेणी- प्रसूनपरम्परः) अनेक कल्याण रूपी पुष्पो की परम्परा से सुशोभित होता है और (मुक्तिम् फलति) मोक्ष रूपी फल को फलता है। (यदि ) यदि (पुनः असौ) यह वृक्ष (प्रकोपविभुजः ) क्रोध रूपी अग्नि से ( प्रत्या- सन्ति ) सम्बन्ध को (भजति ) प्राप्त होता है. (तदा) तो (विफलोदय: 'सन्' ) बिना फल दिये ही ( भस्मीभावम् लभते ) भस्म हो जाता है।
[४७ ] शार्दूलविक्रीडित । संताय तनुते भिनत्ति विनय सौहार्दमुत्सादय- त्युदंग जनयत्यवधवचन सते विधत्ते कलिम् । कीर्ति कृन्तति दुर्मति वितरति व्याहन्ति पुण्योदय दत्तं यः कुगति स हातमुचितो रोपः सदोपः सताम् ४७ वस्तु छन्द । कलह मडन कलह मदन करन उद्वेग। यशखरन हित हरन, दुखविलापसतापसाधन || दुग्न समुच्चरन, धरम पुण्य मारग विराधन ! विनय दमन दुरमति गमन, कुमति रमन गुणलोप॥ ये सब लक्षण जान मुनि, तजहि ततक्षण कोप ॥४७॥ अ क्याथों-(य ) जो क्रोध (सन्तापम् ) सताप को (तनुते ) बढाता है, (पिनयम् ) विनय को (भिनत्ति) नष्ट कर देता है, (सौहार्दम् ) मित्रता को ( उत्सादयति ) उखाड़ कर फेंक देता है, ( उद्वेगम् । उद्वेग को (जनयति ) उत्पन्न करता है, ( अवद्यरचनम् ) मिथ्या वचनों को (सूते) उत्पन्न करता है, ( कलिम्) कलह (विधत्ते) करता है, ( कीर्तिम् ) कीर्ति को ( कृ तति ) काट डालता है, (दुर्मतिम् ) कुबुद्धि को (वितरति) देता है, (पुण्योदयम् । पुण्योदय को (व्याहन्ति ) नाश करता है, (कुगतिम् ) कुगति को (दत्ते ) देता है और ( सदोष ) अनेक दोषों से भरा हुआ है, (स रोप ) ऐसा जो क्रोध है सो (सताम् ) सजन पुरुषों को (हातुम् उचित ) छोडने ही योग्य है।
[४८ ]
यो धर्म दहति द्रु मं दव इवोन्मथ्नाति नीति लता
दन्तीवेन्दुकला विधुतुद व क्लिश्नाति कीति नृणरम्
स्त्रार्थ वायुरिवाम्बुदं विवटयत्युल्लासयत्या पद
तृष्णां धर्म वोचितः कृतकृपालोपः स कोपः कथम् ४८
छपप्य।
कोप धरम धन दहे, अग्नि जिम विरख बिनासहि ।
कोप सुजस पावरहि, राहु जिम चंद गगसहि ।।
कोप नीति दलमलहि, नाग जिम लता विहंडहि।
कोप काज सब हरहि, पवन जिम जलघर खंडहि ॥
सचरत कोप दुख ऊपजे, व
तृपा
जिम धूपमहें।
য
गोप
जुत,
कोप निपेय महत-कहे ।। ४८ ।।
करुणा विलोप
अन्वयार्थी-( यः ) लो क्रोध (मम् दव इत्र ) वृक्ष को दावानल
अग्नि के समान (नृणाम् ) मनुष्यों को (धर्मम् ) धर्म को (दहति )
गला देता है, (लताम् दन्ती इत्र ) लता को हाथी के समान ( नीतिम् )
नीति को उन्मथ्नानि) उखाड़ कर फेंक देता है, (इन्दुक्लाम् विधुतुदः
व) चन्द्रमा की कला को गहु के समान (कीतिम् ) कीर्ति को (लिभाति)
टक लेता है, ( अम्बुदम् वायुः इत्र ) गदल को वायु के समान
(स्वार्थम् ) अपने स्वार्थ को ( विघटयति ) नष्ट कर देता है, (तृष्णाम्
धर्मः इव) प्यास को धूप के समान (श्रापदम् ) आपत्तियों को (उल्लासयति)
उननित करता है और (कृतकृपालोप:) करुणा का सर्वथा
[४] सोप कर देता है (स कोष ) ऐ] क्रोध करना (कथम् ) किस प्रकार (चित् ) उचित हो सकता है। M - मानाधिकार मनाकाता। पम्मादाविर्भपनि पितति स्तरापनदीनां यस्मिभिष्टामिरुरितगुणग्रामनामापि नास्ति । यश्च व्याप्त वहति वधधाधृम्पया क्रोधदार व मानादि परिहा दुरागेहाचित्पवृत्तः ॥ ४६ ।। कविता मात्र ३१)। जानिकमि मिति सरिता सय, नगमें फैज रही पहुं ओर । जाके दिग गुणमाम नाम नहीं, माया कुमतिगुफा पति घोर ॥ हैं यधन्द्ध धूमरेम्बा सम, उदित फोप दावानल तोर । मोअभिमान पदार पटदर, तजत साहि मस्तिो ॥१॥ अप्रयाग-(यामात् । रिम हार रूपी पर्वत से (सुस्तर दीनाम Ranनि नयों के (वितति) (प्राविभपति) नियरिमन Bra में (शिष्टाभिरितगुरापामनाम अपि) for ml पार पोप गुरूपी मास नाममी (मास्ति) (१) और (य) (पषधीयया) हिला करने से वार RTE मा (BAF ) का मोर को हुए (म पदासम्) सगरो (पति ) पारन vat, (गम्) (दुगो म.) से दो पोर (मानादिम् ) REER : .
[५.] (औचित्यवृत्तेः ) उचित वृत्ति से अर्थात् समुचित कार्यों और श्राचरणों के द्वारा (परिहर ) छोड़ दे। शिखरिणी। शमालानं भजन्त्रिमलमतिनाही विघटय. किरन्दुर्वापांशूकरमगणयन्नागमणिम् । भ्रमन्नुर्यों स्वैरं विनयवनवीथीं विदलयन जनः के नानर्थ जनयति मदान्धो द्विप इव ॥५०॥ रोड़क छन्द । भंजहिं उपशम थंभ, सुमति जंजीर बिहडहिं। कुत्रचन रज संग्रहहिं, विनयवनपंकति खडहिं ।। जगमें फिरहिं स्वछन्द, वेद अंकुश नहीं मानईि। गज न्यौं नर मदअन्ध, सहज सब अलरथ ठानहिं ॥५०॥ अन्वयार्थी-(शमालानम् ) शान्तता रूप बालानको ( भजन ) उखाड़ता हुअा, (विमलमतिनाडीम् ) निर्मल बुद्धि रूपी संकल को (विघटयन ) तोड़ता हुश्रा, (दुर्वाकांशूकरम ) दुष्ट वचन रूपी धूलि- समूह को । किरन ) उड़ाता हुश्रा, (श्रागम्हरिणम् ) शास्त्र रूपी अकुश को (श्रगण्यन् ) नहीं मानता हुश्रा, ( उाम् ) संसारमें (स्वैरम् ) स्वच्छन्द ( श्रमन् ) फिरता हुअा, (विनयवनवीयीम् ) विनय रूपी निकुंजों को (विदलयन् ) कुचलता हुश्रा, (मदान्धः) अहंकार से अन्वा (जनः) मनुष्य (मदान्धः) मदोन्मच (द्विप इत्र) हाथी के समान (कम् अनर्थम ) कौन कौन से अनर्थ (न जनयति) नहीं करता ? अर्थात ऐसा को उपद्रव नहीं है, जिसे अभिमानी न कर डाले।
[ ५१ ] शार्दूलविक्रीडित । औचित्याचाण विलुम्पति पयोवाह नमस्त्रानिद प्रध्यस विनय नयत्यहिरिव प्राणम्पृशा जीवितम् । कीर्ति करविणी मतगज इव प्रोन्मूलयत्यजसा मानो नीच इवोपकारनिकर हन्ति त्रिवर्ग नृणाम् ॥५१॥ करिखा छ । 2 मान सब उचित आधार भजन कर पवन संचार जिम घन विहंडहि । मान श्रादर तनय विनय लौव सकल, भूर्जग विष भीर जिम मरन मंडहि ।। मानके उदित जगमाहीं विन सुयश, कुपित मातग जिम कुमुद खडहि । मानकी रीति विपरीति करतूति जिम, अधमकी प्रीति नर नीवि छह ।।१।। अन्वयार्थी-(नमस्वान् पयोबाहम् इव ) जैसे वायु बादल को नष्ट कर देता है, उसी तरह ( मान ) अभिमान (ोचित्याधरणम् ) समु चित श्रावरणों का (बिलुम्पति) लोप कर देता है, ( प्राणस्पृशाम् । प्राणियों के ( जीवितम् ) बीवन को (अहि इव) जैसे सर्प नष्ट कर देवा, है, मे ( विनयम् ) विनय का ( प्रध्यसम्) नष्ट (नयति ) कर देता है, (रविणीम् ) कमलिनी को (मतनम इस ) जैसे मस्त हाथी उपाइ डालता है वैसे (कीर्तिम् ) कार्तिकी ( अम्जसा ) शीघ्र ही (प्रोन्मूलयति) उखाड़ कर फेंक देता है, (उपकारनिकाम् ) और उपकारों के समूह को (नीष इव) से नीच नष्ट कर देता है-भूल बावा है, वैसे । ५२ ] (नृणाम् ) मनुष्यों के ( त्रिवर्गम् ) धर्म, अर्थ और काम इन तीनों पदावी को (हन्ति ) नष्ट कर देता है। १ + वसन्ततिक्षका। मुष्णाति यः कृतसमस्तसमीहिताथ संजीवनं विनयजीवितमङ्गभा जाम् । नात्यादिमानविपनं विपमं विकार तं मार्दवामृतरसेन नयस्व शान्तिम् ॥ ५२ ॥ चौपाई ( मात्रा १५) मान विषम विष तन संचरें । विनय विनाशें वांछित हरे ॥ कोमल गुन अम्रत संजोग । विन्शे मान विषम विषरोग ||५|| अन्वयार्थी-है भन्यो, ( यः ) जो ( अङ्गभाजाम् ) प्र.णियो के (कृतसमस्तसमीहितार्थम) सारे वांछित पदार्थो के देने वाले और (सजीवनं ) · संजीवन स्वरूप (विनयजीवितम् ) विनय जीवन को (मुष्णाति ) चुरा लेता है, (तम् ) उस (जात्यादिमानविषजम् ) बाति, कुल, बल, द्धि तप, शरीर, ज्ञान और एश्वर्य के अभिमान करने रूप विषसे उत्पन्न हुए (विषमम् ) विषम (विकारम् ) विकार को (माईवामृतरसेन ) मार्दवरूपी अमृत रस से ( शान्तिम् ) शान्त (नयस्त्र) . J करो। , मायाधिकार। मालिनी कुशलजननबन्ध्यां सत्यसूर्यास्तसन्ध्या कुगतियुवतिमाला मोहमातङ्गशालाम् ।
{ ५३ ] शमकमलदिमानी दुर्यशोराजधानी व्यसनशतसहाया दातो मुश्च मायाम् ।। ५३ ॥ रोहक छन्द कुशल जननकों बाँझ, सत्य रवि इरन सांझथिति। कुगति युवतिउर माल, मोह कु जर निवास छिति ॥ शम पारिज हिमराशी, पाप संताप सहायनि । अयश खान जग जान, मजहु माश दुखदायनि ॥५३॥ अन्वयार्थी--(कुशलजननय ध्याम् । बो कुशलता के उत्पन्न करने में बध्या है, ( सत्यसूर्यास्तस ध्याम् ) सत्यरूपी सूर्य के अस्त होने के लिये सध्या है, (कुगतियुपतिमालाम् ) नरकादिक दुगविरूप वरुणी की वर माना है, ( मोहमातङ्गशालाम् ) मोहरूपी हाथी के रहने के लिये शाला है, (शमकमलहिमानीम् ) उपशमरूपी फमलों को नष्ट करने के लिये हिमकी (तपारकी) राशि है, (दुर्यशोराजधानीम् ) अपयश की राजधानी है और ( व्यसनशतसहायाम् ) को व्यसनों को सहायता देने वाली है, ऐसे (मायाम् । माया को ( दूरत ) दूर से ही ( मुश्च ) छोड़ दो। उपेन्द्रवद्रा । विधाय मायां विविधरूपायैः परस्य ये वचनमाचरन्ति । ते पञ्चपन्ति त्रिदिवापवर्गसुखान्महामोहसखाः स्वमेव ५१ देसरी छन्द। मोहमगन मायामति संचाहिं । कर उपाय औरनको चहि । अपनी हानि लस नहिं सोय। सुगति हर दुर्गति दुख होय ४४ .. [५४ ] अन्वयार्थी- ये ) जो पुरुष (विधिधैः उपायः ) नाना प्रकार के उपायों से ( मायाम् ) कपट ( विधाय ) करके (परस्यवञ्चनम् श्राचरन्ति) दूसरे लोगों को ठगते हैं, (ते ) वे ( महामोहसखाः) मोह के प्यारे मित्र (स्वम् एव ) अपने को हो (त्रिदिवापवर्गसुखात् ) स्वर्ग और मोक्ष के सुख से ( वश्चयन्ति ) वंचित रखते हैं । अर्थात् दूसरों को माया चार से ठगने वाले वास्तव में पूछा नाय, तो श्रापही को ठगते है । क्योंकि उस माया चार से वे स्वर्ग मोक्षादि के सुख नहीं पा सकते हैं। - वंशस्थविलम्। मायामविश्वासविलासमन्दिरं दुराशयो यः कुरुते धनाशया। सोऽनर्थसार्थ न पतन्तमीक्षते यथा विडालो लगुडं पयः पिबन् ।॥ ५५ ॥ पद्धरी छन्द । माया अविसासविलासगेह । जो करहि मूढ जन धन-सनेह । सो कुगतिबन्ध नहिं लखें एम । तज भय बिलाव पय पियत जेम ५५ अन्वयार्थी-( यः ) जो (दुराशयः ) खोटे परिणामों वाला मनुष्य (धनाशया) धन की इच्छा से ( अविश्वासविलासमन्दिरम् ) अविश्वास के क्रीड़ा करने की शालारूप (मायां ) माया को (कुरुते) करता है, (सः) वा ( पनन्तम् ) ऊपर से पड़ते हुए (अनर्थसार्थम् ) अनर्थों के समूह को (न) इस प्रकार नहीं ( ईक्ष्यते ) देखता है, ( यथा) जैसे कि
[ ५५ ]
(पय ) दूध) (पिबन् ) पीता हुश्रा (विडाल ) बिलाव (लगुदम् )
ऊपर से पड़ती हुई लकडी को नहीं देग्यता है ।
वसन्ततिलका।
मुग्धप्रतारणपरायणमुनहाते
यत्पाटन कपटलम्पटचित्तवृत्तेः।
जीर्यत्युपप्लवमवरपमिहाप्यकृत्वा
नापथ्यभोजनमिवामयमायती तत् ॥ ५६ ।।
श्रमानक छन्द।
ज्यौं रोगी कर कुपथ, यहा रोग न ।
स्वादलपटी भयो, कहै मुम जनम धन ।।
त्यों कपटी कर कपट, मुगधको धन हरहि ।
करहि कुगतिको पध, हरप मनमें धादि।। ५६ ॥
अन्वयार्थी-(पटलम्पचित्तवृत्ते जिनके विचार सदा कपट
करने में ही तत्पर रहते हैं, ऐसे कपटी पुरुषों का (यत् ) षो (मुग्धप्रतारणप
रायण ) मोले पुरुषों के ठगने में तत्पर (पाट ) चातुर्य (उजहीते)
उशासित होता है, (तत्) वह कपट चातुर्य ( अवश्य ) निभय समझो कि,
(प्रायती ) फलदान काल में (अपध्यभोजन घामयमिव ) बैठे अपप्प
भोनन योग उत्पन्न किये बिना नहीं पचता, इस तरह (इहापि) इसी छोक में
( उपलय प्रफुत्वा) निा कुछ उपद्रव किये (न जीति) नष्ट नही
होता है।
भावार्य-जैसे अपप्य मोवन करने से कुछ न कुछ रोग होवादी,
रिना रोष हुए श्राप भोजन पचा नहीं, इ मापापी पुष्पा
[ ५६ ] कपट चातुर्य भी बिना कुछ उपद्रवादिक फल हिये नहीं रहता। लोभाधिकार । शादू लविक्रीडित । यदुर्गामटवीमटन्ति विकटं कामन्ति देशान्तर गाइन्ते गहनं समुद्रमतनुक्केशां कृषि कुर्वते । सेवन्ते कृपणं पतिं गजघंटासंघट्टदुःसंचरं सर्पन्ति प्रधनं धनान्धितधियस्तल्लोभविस्फूर्जितम् ५७ मनहरण । सहै घोर संकट समुद्रको तरंगनिमें, कंपै चित भीत पंथ गाहै बीच वनमैं । ठाने कृषिकर्म जामें शर्मको न लेश कहूँ, संकलेशरूप होय जूझ मरै रनमैं ।। तजे निज धामको विराजि परदेश धावे, सेवै प्रभु कृपण मलीन रहै मनमैं । होले धन कारज अनारज मनुज मूढ, ऐसी करतूति करै लोभकी लगनमैं ॥२७॥ अन्वयाथों-(धनान्धितधियः ) जिनकी बुद्धि धन से अधी हो रही है, ऐसे पुरुष ( यत् ) जो (दुर्गाम् ) दुगम् (अटवीम) अटवी में (अटन्ति) भटकते फिरते हैं, (विकटम् ) विकट ( देशान्तरम् ) पर देश में (क्रामति) गमन करते हैं, (गहनम् ) अत्यन्त गहरे (समुद्रम् ) समुद्र का ( गाइन्ते ) अवगाहन करते हैं, (अतनुक्त शाम् ) अत्यन्त क्लेश देने वाली (कृषिम् ) सेती (कुर्वते) करते हैं, (कृपणम् ) कृपण (पतिम् ) स्वामी की (सेवन्ते) [ ५७ । सेवा करते हैं और ( गजघटासघट्टदु सञ्चाम् ) अनेक हाथिया के सबसे जहाँ चलना मुश्किल होता है ऐसे (प्रधनम् ) घोर युद्ध में (सर्पति) लार युद्ध करते हैं, (तत् ' सो सब (लोभविस्फूर्जितम् ) लोभ के वशी भूत होकर करते हैं। भावार्थ-लोम के वशीभूत होकर लोग कठिन से कठिन कार्य तथा अकार्य करते है। मूलं मोहविपद्रु मस्प सुकृताम्मोराशिकुम्भोद्भवः कोधाग्नेरणिः प्रतापतरणिप्रच्छादने तोपदः । क्रीडामा कलेभिवेकशशिना स्वर्भानुरापनदी- मिन्धु' कीर्तिलताकलापकलभो लोमः पराभूयताम् ॥१८॥ पूरन प्रताप रवि रोकवेको 'धाराधर, सुकृत समुद्र सोखवे को कुम्भनद है। पोप व पायक जननको प्राणि दारु, मोह विप भूरुहको महा दृढ कर है ।। परम विवेक निशिमणि प्रासवेको राहु, कीरविलतालाप लिन गयद है। कलहको केलिमीन मापदा नहीको सिंधु, सो लोभ याहूको विपाक दुम्ब द्वंद हे ॥५८।। अन्ययार्थी-(मोहविपद्रुमस्य) को मोह रूपी विश मृक्ष की (मूलम) नट है, ( सुकृताम्भोराशिकुम्भोद्भय ) पुगप रूपी समुद्र के घोषने के लिए अगस्त्य मुनि है, (कोधाम्रो) फ्रोध रूपी अमि को बढाने के लिये (आणि ) लकड़ी है, ( प्रतापतरणिपन्छादने) प्रतार रूपी १वादल । २ भगरयति । इषर । ४ चद्रमा ।
[ ५८ ]
सूर्य को श्राच्छादन करने के लिये ( तोयदः ) बादल है, ( कले: ) कलह के
(क्रीडासन) क्रीडा करने का स्थान है, ( विवेकशशिनः ) विवेक रूपी
चन्द्रमा के लिए | (स्वर्भानुः ) राहु है, ( प्रापनदीसिन्धुः ) विपत्ति रूपी
नदियों के प्राकार मिलने के लिए समुद्र है और (कातिलताकलापकलभः)
कीर्चि रूपी लत्तानों के समूह को उखाड़ने के लिए हाथी का बच्चा है,
(लोभः) ऐसा लोम (पराभूयताम् ) तिरस्कार करने योग्य है । अर्थात्
उसे छोड़ देना चाहिये ।
वसन्ततिलका।
निःशेपधर्मवनदाहविजम्भमाणे
दुःखौषभस्मनि विसर्पदकीर्तिधूमे ।
बाढं धनेन्धनसमागमदीप्यमाने
लोमानले शलभतां लभते गुणोधः ॥५६।।
छप्पय ।
परम धरम बन दहै, दुरित अंबर गति धारहि ।
कुयश धूम उदगर, भूरि भय भस्म विद्यारहि ॥
दुख फुलिंग फुफर, तरल तृष्णा कल कादहि ।
धनईधन पागम सँजोग, दिन दिन अति बाढहि ।।
लहलहै लोभ पात्रक प्रबल, पवन मोह उद्धत बहै।
दन्महि उदारता आदि बहु, गुण पतंग 'कँवरा' कहे ||५||
अन्वयार्थी-(निःनेषधर्मवनदाइविजृम्भमाणे ) जो समस्त घम
रूपी वन को बलाती हुई बढ़ती है, (दुःखीवभस्मनि ) अनेक दु.खों का
समूह ही जिसकी मस्न है, (विसर्पदकोत्तिधूमे ), जिसका अपयश रूपी
[ ५६ ] धूश्रो चारों ओर फैलता है और जो (प ढवनेन्धनममागमदीप्यमाने ) यथेष्ट धन रुपी ईधन के मिलने से देदीप्यमान होता है, ऐसी (लोमानले) लोम रुपी अग्नि में (गुणोघ ) गुणों के समूह (शलभताम् लभते) पतगे हो जाते हैं। अर्थात् जिस तरह अग्नि में गिरकर पतगे जल नाते हैं, उसी तरह लोम में पडकर सारे गुण नष्ट हो जाते हैं । शार्दूलविक्रीडित । जातः कल्पतरु पुरः सुरगवी तेपा प्रविष्टा गृह चिन्तारत्नमुपस्थिन करतले प्राप्तो निधि सनिधिम् । विश्व वश्यमवश्यमेव सुलभा. स्वर्गापवर्गथियो ये सतोपमशेपदोपदहनघसाम्बुद विभ्रते ॥६० ।। पवित ( ३१ मारा )। विलसै कामधेनु नाके घर, पूरै पल्पवृक्ष सुखपोप । अखय भंडार भरे चिंतामणि, तिनको सुलभ सुरग श्री मोप ।। ते नर स्वयश फरै त्रिभुवनको विनस त्रिमुम्ब रहे दुम्ब दोप। समें निधान सदा तिनक दिग, जिनके हृदय पसत संतोष ॥६॥ अन्ययार्थी -( ये ) मो पुरुष (अशेपदोपहनध्वंसाम्बुरम् ) समस्त दोषों को यस करने के लिये बालों के समान ( सन्तोषम् ) स्टोर को । विभ्रते) धारण करते है, (तेपाम् ) उनके (पुरा) सम्मुनी (कल्पतरु ) पल्पवृक्ष (जाता) उत्तम होता है (मुरगयी) कामधेनु (तेपाम् गृहम् प्रविष्टा ) उनके पर प्रवेश करती है, (चितारतम् । विधामणि रस (परसले उपस्थितम् ) उनको हपेशी पर मा रिपत्र [ ६० ] होता है, ( निधिः ) निधि ( सन्निधिम् प्रातः ) उनके सन्निकट ही छा जाती है, ( स्वर्गापवर्गश्रिय.) स्वर्ग और मोक्ष की लक्ष्मी (सुलभाः ) सहज ही प्राप्त हो जाती है और (विश्वम् ) ससार (अवश्यम् एष वश्यम् ) अवश्य ही उनके वश हो जाता है । सज्जनाधिकार। शिखरिणी। वरं क्षिप्तः पाणिः कुपितफणिनो वक्रकुहरे वरं झम्पापातो ज्वलदनलकुण्डे विरचितः । वरं प्रासप्रान्तः सपदि जठरान्तर्विनिहितो न जन्यं दौर्जन्य तदपि विपदा सद्म विदुषा ॥६१।। चौपाई (१६ मात्रा)। बरु अहिषदन इत्थ निज डारहिं । अगनिकुण्डमैं तन परजारहिं । दारहिं उदर कर हि विष भच्छन । पै दुष्टता न गहहिं विचच्छन ६१ अन्वयार्थी-(कुपितफणिनः) क्रोधित हुए सर्प के ( वक्रकुहरे) मुख में (पाणिः क्षिप्तः वरम् ) हाथ डालना अच्छा है, (ज्वलदनलकुण्डे) मलते हुए अग्नि कुण्डों में (विरचित. झम्पापात: वरम् ) पड़जाना अच्छ। है और (जठरान्तः सपदि विनिहित. प्रासप्रान्तः वरम् ) शीघ्र ही विष क्षा लेना अच्छा हैं, (नदपि) परन्तु ( विदुषा ) विद्वानो को (विपदाम् ) आपत्तियों का (सद्म) घर ( दौर्जन्यम् ) दौर्जन्य ( न जन्यम् ) करना अच्छा नहीं है । अर्थात् दुर्लनता नहीं करनी चाहिये ।
[ ६१ 1 वसन्ततिलका। सौजन्य मेव विदधाति यशश्चय च स्वयसं च विभव च भवक्षय च । दौर्जन्यमावहसि यत्कुमते तदर्थम् धान्येऽनल क्षिपसि तज्जलसेकसाध्ये ॥६२॥ मत्तगयन्द (सपैया) त्यो कृषिकार भयो चित 'चातुल, मो कृषि की करनी इम ठाने बीज बन कर जल सिंचन, पावकसौ फल को थल माने । स्यौं कुमती निज स्वारथ के हित, दुर्जनभाव हिये मह श्राम सपति कारन बध विदारन, सज्जनता सुखमूल न जाने ॥६॥ अवयार्थी-(हे कुमते) अरे अशानी (सौजन्यम् एष) सुजनता से (यशश्वयम् ) यश का सम्पादन (च) और (स्वश्रेयसम् ) श्रात्मकल्याण (च) या (विभवम ) विभूति (च) और (भवक्षयम् ) न म मरण रूप समार का नाश (विदधाति) करती है। (यत्) यदि तू ( तदर्थम् ) यश कल्याण विभूति श्रादि के लिये ( दौर्जन्यम् ) दुर्जनता (आयसि ) धारण करेगा, (तत्) तो समझना चाहिये कि त् (जलसेकसाध्ये) जल से सींचने योग्य (धान्ये ) धानों में (अनलम्) अमि (क्षिपस) डालता है। - पृथ्वी। वर विमववन्ध्यता सुजनभावमा नृणा- मसाधुचरितार्जिता न पुनरूजिताः सपदः ।
[६२ ] कृशत्वमपि शोमते 'सहजमायती सुन्दरं विपाकविरसा न तु श्वयथुसंभवा स्थूलता ॥६३|| अमानक छन्द वर दरिद्रता होय, करत सज्जन कला । दुराचारसौं मिले, राज सो नहिं भला il च्यौं शरीर कृश सहज, सुशोभा देत है । सूज थूलता बढे, मरनको हेत है ॥६॥ अन्वयार्थी-(सुजनभावभाजाम् ) सुबनता को धारण करने वाले अर्थात् सज्जन (नृणाम् ) मनुष्यों को (विभववन्ध्यता) दरिद्र रहना (वरम्) अच्छा है (पुन:) परन्तु (असाधुचरिताजिताः) दुर्जनता से कमाया हुश्रा (अर्जिताः ) बहुत ( सम्पदः ) धन होना (न) अच्छा नहीं है । (श्रायतौ) दीप शरीर में (सहजम् ) स्वामाविक (कृशत्व अपि ) दुबलापन तो (सुन्दर ) सुन्दर मालूम होता है (तु ) परन्तु (विपाकविरसा ) जिसका कल बुग है, ऐसी (श्वयथुसम्भवा ) सृजन से है ने वाली (स्थूलता) स्यूलता (न शोभते ) शोमायमान नहीं होती। । भावार्थ-दरिद्र रहना अच्छा है, पर दुर्लनता से बहुत सा धन कमा कर धनाढ्य होना अच्छा नहीं । वैसे कि, दुवज्ञा रहना अच्छा, परन्तु सूजन से मोटा हो दाना अच्छा नहीं। शार्दूलविक्रीडित : न ते पादूषणं परगुणं वक्त्यल्पमप्यन्वहं संतोपं बहते परदिपु पराबाधासु धने शुचम् ।
[१३] वश्लाघा न करोति नोज्झति नय नौचित्यमुलइय प्युक्तोऽप्यनियमक्षमा न रचयत्येतच्चरित्र सताम् १६४|| षट्पद नहिं जपें दोप, अल्प परगुण बहु मानहिं । हृदय धरै सतोप, दीन लखि करुणा ठानहिं । अचित रीत प्रादरहि. विमल नय नीति न घडहिं। निज सराहना हिं, राम रचि विषय विहहिं ।। मडहिन कोप दुरवचन सुन, सहज मधुर धुनि उच्चरहिं ।। कहि कॅवरपाल जा जाल बसि, ये चरित्र सज्जन करहिं ॥४॥ अन्वयार्थी--(परदूपणम् न व्रते ) दूसरों के दोष प्रगट नहीं करते, (अल्पम् अपि परगुणम अन्वहम् वक्ति) दूसरों के थोडे से गुणों को भी रात दिन कहते हैं, (परदिपु सन्तोपम्पहते) दूसरों की ऋद्धि की वृद्धि देखकर तोप धारण करते हैं, ( परवाधासु शुचम् धत्ते) दूसरों के दुख में दुखी होते हैं, ( स्वश्लाघाम् न करोति ) अपनी प्रशसा नहीं करते, ( नयम् न उज्झति ) नीति नहीं छोड़ते (औचित्यम् न लन्यति ) श्रौचित्य का उल्लघन नहीं करते अर्थात् उचित कार्य ही करते है, (अप्रियम उक्त अपि अक्षमाम् न रचर्यात ) और कोई गाली गलौन श्रादि दुष्ट वचन कहे, तो मी झोषित नहीं होते, (एतत् ) ये सर ( सताम) सज्जनों के (चरित्रम् ) चरित्र हैं। अर्थात् जो सज्जन पुरुप होते हैं, वे उक्त कार्य करते हैं। गुणिसङ्गाधिकार । धर्म वस्तदयो यशश्च्युतनयो विच प्रमत्तः पुमा काव्य निष्प्रतिभस्तपः शमदमैः शून्योऽल्पमेधाश्रुतम् ।
[ ६४ ] वस्त्वालोकमलोचनश्चलमना ध्यानं च वाञ्छत्यसो यः सङ्ग गुणिनां विमुच्य विमतिः कल्याणमाकाङ्क्षति ।। मत्तगयन्द ( सवैया ) सो करुणाविन धर्म विचारत, नैन विना लखिवेको उमाहै। सो दुरनीति धरै यश हेतु 'सुधी विन श्रागमको अवगाहै ।। सो हियशून्य कवित्त कर, समता विन सो तपसौं तन दाहै । सो थिरता बिन ध्यान धरै शठ, जो सतसग तजे हित चाहै ६५ अन्वयार्थी--( यः ) जो ( वितिः ) मूर्ख पुरुष (गुणिनाम् ) गुणवान पुरुषों का (सङ्गम् ) साथ (विमुच्च ) छोडकर ( कल्याणम आकाट क्षति ) अपना कल्याण करना चाहता है, (अस्सी ध्वस्तदय पुमान धर्मम् वान्छति) वह पुरुष बिना दथा किये धर्म करना चाहता है (च्युतनयः यशः वान्छति ) नीति के बिना ही यश फैलाना चाहता है, (प्रमत्त. वित्तम् वाञ्छति ) श्रालसी होकर धन कमाना चाहता है, (निष्प्रतिभः काव्यम वान्छति ) बिना प्रतिमा के कविता करना चाहता है, (शमदमै शून्यः तपः वाञ्छति ) इन्द्रियटमन और शान्तता के बिना ही तप करना चाहता है, (अल्पमेधः श्रुतम् वञ्छति ) थोड़ी सी बुद्धि के द्वारा ही शास्त्र का पारगामी होना चाहता है, (अलोचनः वस्त्वालोचम् वाञ्छति ) नेत्रो के बिना ही वस्तुओं को देखना चाहता है, (च) और (चलमना. ध्यानम् पान्छति ) चंचलचित्त होकर ध्यान करने की इच्छा करता है। भावार्थ-जैसे दया आदि के बिना धर्मादि नहीं हो सकते हैं। उसी प्रकार सज्जनों की संगति के बिना कल्याण नहीं हो सकता है ।
[ ६५ ]
।
हरिणी।
हरति कुमति मिन्ते मोह करोति विवेकिता
वितरति रति सूने नीति तनोति विनीततम् ।
प्रथयति यशो धत्ते धम व्यपोहति दुर्गति
जनयति नृणा किं नाभीष्ट गुणोत्तमसगमः ।। ६६ ।।
धनावरी।
कुमति निकद होय महा मोह मद होय,
जगमगै सुयश विवेक जगे हियेसों।
नीतको दिवाव होय गिनैको बढाव होय,
उपजे
उछाह ज्यों प्रधान पद लियेसौं॥
धर्म को प्रकाश होय दुर्गनिको नाश होय,
घरतै समाधि में पियूप रस पियेौ।।
तोप परि पूर होय, दोप दृष्टि दूर होय,
एत गुन होहिं सतसगतिके कियेसौं ।। ६६ ।।
अन्धयार्थी-( गुणोत्तमसगम ) गुणवान् पुरुषों की सगति
(कुमतिम हरति ) कुबुद्धिका नारा करती है, ( मोहम् भि ते ) माह को
छिन्न भिन्न कर डालती है, (विवकिताम् करोति ) विवेकी बना देती है,
(रतिम् वितरति ) उत्साह बढाती है, (नीतिम् सूते) नीति को उत्पन
करती है, (विनीतताम् तनोति ) नमसा वा विनयशीलता भढाती है,
( यश प्रथयति ) कीर्ति फैनाती है, (धर्मम् धत्ते ) धर्म सेवन करती है,
(दुर्गतिम् व्यपोइति ) नरकादिक दुर्गतियों को नष्ट कर देती है और
(नृणाम् किम् अभीष्टम् न जनयति ) तथा मनुष्यों को कौन कौन से
वचित पदाधों को नहीं देती ? समी देती है।
[ ६६ ] भावार्थ-गुणवान् पुरुषों की संगति करने से सारी इच्छाएं पूर्ण हो सकती है। शार्दूलविक्रीडित । लन्धु बुद्धिकलापमापदमपाक विहाँ पथि प्राप्त कीर्तिमसाधुतां विधुवितु धर्म समासेवितुम् । रोद्ध पापविपाकमाकलयितु स्वर्गापवर्गश्रियं चेचं चित्त समीहसे गुणवता सङ्ग तदङ्गीकुरु ॥६७|| कुण्डलिया। 'कोरा' ते मारग गहैं, जे गुणिजन सेवंत ज्ञानकला तिनके जगै, ते पावहिं भव अत ।। ते पावहिं भव अत, शांतरस ते चित धारहि। ते अध प्रापद हरहि, धरमकीरति विस्तारहिं। होहिं सहज ते पुरुप, गुनी बारिजके भौंरा ते सुर संपति ल हैं, गहे ते मारग 'कोरा' ।। ६७ ।। अन्वयार्थों-(हे चित्त ) हे अन्तःकरण, यदि (त्वम् ) तू ! बुद्धि- कलापम् लब्धुम् ) नाना प्रकार की बुद्धि प्राप्त करने के लिए, (श्राप- दम् अपाकत म्) विपत्तियो को दूर करने के लिए,(पथि विहत्त म् ) श्रेष्ठ मार्ग में यथेष्ट विहार करने के लिए, ( कीर्तिम् प्राप्तुम् ) यश फैलाने के लिये, (असाधुताम् विधुवितुम् ) दुष्टता को दूर करने के लिये, (धर्मम समासेवितुम् ) धर्म सेवन करने के लिये ( पापविपाकम् रोद्धम् ) पापों के फल दुःखादिकों के रोकने के लिये और ( स्वर्गापवर्गप्रियम् आकलयितुम् ) स्वर्ग तथा मोक्ष की लक्ष्नी को बुलाने के लिये (गुणवताम् ) गुणवान [७] पुरुषों का ( सङ्गम् ) साथ ( समोहसे चेत् ) चाहता है तो (तत् ) उसे अर्थात् गुणीजनों की गति को (अङ्गीकुरु } स्वीकार कर । हारिणी। हिमति महिमाम्भोजे चण्डानिलत्युदयाम्दे द्विरदति दयागमे क्षेमक्षमाभूति वनति । समिति कुमत्यग्नौ कन्दत्यनीतिलतासु य: किममिलपता येयः श्रेयान्स निगुणिसङ्गमः ॥ ६८।। षट्पद । जो महिमा गुन हनहि, तुहिन जिम पारिज धारहि। जो प्रताप सहरहि, पवन जिम मेघ विहारहि ।। जो शम दम दलमलहि द्विरद जिम उपचन वएडहि जो सुलेम छय करहि, वन जिम शिखर बिहढहि ॥ जो कुगति अग्नि ई धनसरिस, कुनयलता दृढ मूल जग । सो दुष्टमग दुख पुष्ट फर, तजाहिं विचक्षण तासु मग ॥ ६८॥ अन्वयार्थी-(य ) बो (महिमाम्मोजे हिमति ) महिमा रूपी कमल के नाश करने के लिए हिम के समान है, (उदयाम्बुदेचण्डानिलति) भाग्योदय रूपी मेष के उड़ाने के लिए सीव यायु के समान है, (दयारामे दिग्दति) च्या रूपी बाग उमाहो के लिये हाथी के समान है, (मध मात फार ) पल्प ए रूपी पयत के लिये यन पे समान है, ( पुमत्यमी समिla ) द्धि रूपी अमि पे प्रज्वलित करने के लिये सी के समान है और । श्री लतास कदात) अयय रूपी लत में १८ करने के लिए ब (मूल) के समान है, (मानणुगमनम) निष -
[६८ ]
मनुष्यों का साथ (श्रेय अभिलपनाम् ) श्रग्ना ग्ल्याप चाहने वाले
पुरों को (दिम् श्रयान ) क्या ग्ल्याणकारी हो सकता है? कभी नहीं !
भावार्थ--निगुण पुरुष की संगति मे कमी किसी तरह का मी
कल्याण नहीं हो सकता है।
..
इन्द्रियाधिकार।
शार्दूलविक्रीडिन ।
आत्मानं कुपयेन निर्गमयितु यः अषलावायते
कृत्याकृत्यविवेकजीवितहतो यः कृष्णमायते ।
खण्ड यः पुण्यद्रुम खण्डनविधौ स्फूर्जत्कुठागयते
तं लमव्रतमुद्रमिन्द्रिपगणं जित्वा शुभंयुभव ।। ६६ ।।
हरिगीतिका
जे जगत जनको कुपथ डारहिं, वक्र शिक्षित तुरगसे ।
जे हरहिं परम विवेक जीवन, काल-दारुण उरगसे ।।
जे पुण्यवृत्तकुठार तीवन, लुप्र व्रतमुद्रा करें।
ते करन सुभट प्रहार भविजन, तब सुमारग पग धरै ।। ६६ ।।
अन्वयार्थी-हे छात्मन् ( यः) लो इन्द्रियों का समूह ( प्रात्मानम् )
श्रारमा को । कुष्येन ) कुमार्गों में (निर्गमयित्म्) ले जाने के लये
(शूकलाश्वायते ) अशिक्षित घोड़े के समान है, ( य: ) तथा बो
(कृत्याकृत्यविवेकजीवितहती ) कृत्य और कृत्य ज्ञान रूपी नीवन के
नाश करने के लिये ( कृष्णासीयते ) काले मर्प के समान हैं, (य.)
और नो ( पुण्यद् मखण्डखण्डनविधौ ) पुण्य रूपी वृक्ष के काटने
लिये (स्फूर्जकुठारायते ) तीत्र कुठार के समान है, ( तम् ) उम
[६] (लुमवतम् ) चारित्र को लुस करने वाले ( उद्रम) वेगशाली (इन्द्रिया- णम् ) इन्द्रियों के समूह को (जित्रा) बीत कर (शुभयु भव) मोक्षगामी । शिखरिणी। प्रतिष्ठा यनिष्ठा नपति नयनिष्ठा विघटय- त्य कृत्येप्वाधत्ते मतिमतपसि प्रेम तनुते । विवेकस्योत्सेक विदलयति दत्ते च विपद पद तद्दोपाणा करणनिकुरुम्ब कुरु वशे ॥ ७.।। मनहरण ये ही हैं कुगतिके निदानी दुखदोषदानी, इनहीकी सगतिमौ संग-मार पहिये। इनकी मगनतासौं विभीको विनाश होय, नहीकी प्रीतसा अनीत पथ गहिये । ये हो तपभावी बिडार दुराचार धार, इनहोकी तपत विवेक भूमि दहिये। ये ही इद्र। सुभट इनहिं जीते सोई साधु, इनको मिलापी सो तो महापापी कहिये ॥७.1 . अन्वयार्थी-('यत्') बो (प्रतिष्ठाम् निष्ठाम् नयति ) सारों प्रतिक्षा को ले लेता है, (नयनिष्ठाम् ) न्यायपरायणताको (विघटयति ) नष्ट करता है, (अकयेषु) कुकायों में (मतिम् । यदि (आपत्ते। लगाता है, (अतपसि ) प्रसयम में (प्रेम) प्रेम (सनुते ) बनता (विवेकरयोत्सेकम् ) शन के उत्लाद को (विदलयति ) दसन बसा है, (घ) और (विपदम् ) शिपतियों को (दत्ते) देता है, (1) [ ७२ ] ( दोषाणाम् पदम् ) अनेक दोषों के स्थान ( करणनिकुरम्बम् । इन्द्रियों के समूह को हे भाई, तू ( वशे ) वश में (कुरु ) कर ! शार्दूलविक्रीडित । धत्तां मौनमगारमुज्झतु विधिप्रागल्भ्यमभ्यस्यता- मस्त्वन्तर्गणमागमश्रममुपादत्तां तपस्तप्यताम् । श्रेय.पुजनिकुञ्जनभजनमहावातं न चेदिन्द्रिय- जातं जेतुमवैति भस्मनि इतं जानीत सर्व ततः ॥७॥ मौनके धरैया गृहत्यागके करैया विधि, रीतके सधैया परनिन्दासौं अपठे हैं। विद्याके अभ्यासी गिरकंदराके वासी शुचि, अंगके अचारी हितकारी वैन छूटे हैं । आगम के पाठी मन लाय महा काठी भारी, कष्टके सहनहार रामाइसौं रूठे हैं। इत्यादिक जीव सत्र कारज करत रीते, इन्द्रिनके जीते बिना सरवंग झूठे हैं ।। ७१ ॥ अन्वयार्थी-(मौनम् धत्ताम् ) मले ही मौन धारण करो, (अगारम् उन्मनु ) गृह का त्याग करो (विधिप्रागल्भ्यम् अभ्यस्यताम् ) विधिवि- घान में चतुराई का अभ्यास कगे, (अन्तर्गणम् अस्तु ) किसी भी गच्छा. दिक में निवास करो, (आगमश्रमम् उपादत्ताम् ) श्रागम पढ़ने में परिश्रम को. (तपः तप्यताम् ) तप करो,परन्तु यदि (श्रेयःपुजनिकुञ्जभजनम- हावातम् इन्द्रियबातम् ) कल्याण रूपी निकुञ्जों को उखाड़ देने में तीन के समान इन्द्रियों के समूह को (जेनुम् न अति चेत ) जीतना नहीं - [ ७१] मानते हो, (तत } तो ( सर्वम् भस्मनि हुतम जानीत } यह सर मस्म में होम देने के समान है। भावार्थ--यदि इन्द्रियों पर विजय नहीं किया है, तो मौन धारण एरत्याग थादि सब क्रियाएँ वृथा है। HD- - धर्मध्वसधुरीणमनमरमावारीणमापत्प्रया- लङ्कर्माणमशर्मनिर्मितकलापारीणमेकान्ततः । सर्वानीनमनात्मनीनमनयात्पन्तीनमिष्टे यथा- कामीनं पथावनीनमजयन्नक्षौषमक्षेममा ।।' २॥ धर्मरुभजनको महा मत्त कु जरसे, थापना भण्डारके भरनको फरोरी हैं। सत्यशील रोकवे को प्रौढ परदार जैसे, दुर्गतिके मारग चलायवे को धोरी हैं। कुमति के अधिकारी कुनैपथके विहारी, भद्रभाव ईन्धन जराययेकी होरी हैं। मृपारे सहाई दुरभाषनाके माई से, विपयाभिलापी जीर अधके अघोरी है ॥७२॥ अन्वयार्थी-(धर्मध्वंसधुरीणम् ) धर्म के नाश करने में प्रधानमत, (अभ्रमरसावारीणम्) सत्यशान को श्राच्छादन करने वाले, (पापमपाल फर्माणम् ) श्रापनियों के विस्तार करने में समर्थ, (घशर्मनिर्मितिलारी गम् ) दुखों के उरन करने में चतुर, (एका त सनोनम् ) सरया समस्त श्रन को भतरण करने वाले, (अनारमनीनम् । अात्मा का परित फरने वाले, (अनयात्य वोनम् ) सोरी नीति में अधिक प्रीति रणने यारो, १ कुमवेत्यारिपाठ । - [ ७२ ] ( इष्टे यथाकामीनम् ) अपने इष्ट कार्यों में स्वेछापूर्वक रहने वाले, श्रीर ( कुपथाध्वनीनम् ) खोटे मार्ग में चलने वाले (अक्षौघम् ) इन्द्रियों के समूह को (अजयन ) जो पुरुप विजय नहीं करता है (अक्षेमभाक् ) वह कल्याण का भाजन नहीं हो सकता है। भावार्थ-जो पुरुष इन्द्रियो को वश नहीं करता है, उसका कल्याण नहीं होता। कमलाधिकारी निम्नं गच्छति निम्नगेव नितरा निद्रव विष्कम्भते चैतन्यं मदिरेव पुप्यति मदं धूम्येव धत्तेऽन्धताम् । चापल्यं चपलेव चुम्बति दवज्वालेव तृष्णां नय- त्युनासं कुलटाङ्गनव कमला स्वैरं परिभ्राम्यति ॥ ७३ ।। मत्तगतयन्द । नीचकी श्रोह ढरै सरिता जिम, घूम बढावत नींदकी नाई। चचलता प्रगटै चपला जिम, अन्ध करे जिम धूमकी झाई ।। तेज कर निसना दव ज्यौ, मद ज्यौ पोषित मूढ़के ताई । ये करतूति करें कमला जग, डोलत ज्यो कुलटा विन साई ।। अन्वयार्थी--( कमला ) यह लक्ष्मी ( निम्नगा इव ) नदी के समान ( नितराम् ) निरन्तर (निम्नम् गच्छति ) नीच की ओर ही अर्थात् नीच पुरुषों के समीप हो जाती है, (निद्रा इव ) निद्रा के समान (बैतन्यम् विष्कम्भते ) चेतना को लुप्त कर देती है, ( मदिरा इव ) शुगर के समान (मदम् पुष्यति) मद बढ़ाती है (धूम्या इत्र) सघन धूमके ३ [७३] समान (अन्धताम् धत्ते) अन्धा करती है, (चपला इत्र ) बिजली के समान ( चापल्यम चुम्बति ) चचलता प्रग' करती है, (दरबाला इव ) दावानल अमि के समान (तृष्णाम उल्लामम् नर्यात ) तृष्णा बढाती है और ( कुलटागना इस ) वेश्या स्त्री के समान ( स्वरम् पग्भ्रिाम्यति । स्वतत्रता पूर्वक चारों और फिरती है। दायादाः स्पृहयन्ति तस्करगणा मुस्णन्ति भूमीभुजो गृहणन्ति च्छलमाकलय्य हुतभुग्भस्मीकरोति क्षणात् । अम्भ सावयते क्षिती विनिहित यक्षा इरन्ते हठा- दुत्तास्तनया नयन्ति निधन धिनहुधीन धनम् ॥७४॥ बधु विरोध करें निशवासर, दहनौ मावै छल जो पावन दाइत नीर बहावत, है गोद निशाचर दोवे ।। भूतलरक्षित जक्ष हरै, करके दुरवृति कुमतति खोवे । ये उतपात न धनके दिग, दामधनी कहु क्यौं सुम्व सोवै ॥७४।। अन्वयार्थी-(दायादा स्पृहयन्ति ) भाई बधु श्रादिक कुटुम्चीजन इसके लेने की इच्छा करते हैं, (तस्करगणा मुष्पनि) चोर इसको चुरा ले जाते हैं, (छलम् थाक्लप्य भूमीभुज गृह्णन्ति ) किसी बहाने से गमा लोग छुड़ा लेते हैं ( हुनभुक् क्षणात भस्मीकरोति ) अनि क्षणमर में पला देती है (अम्भ साययते ) पानी इसको बहा ले बाता है, (चिती विनिहितम् यक्षा ठाम् हरन्ते ) पृथिवी में गढे हुए धन को १ राजा। २ चोर।
[.७४ ] यक्ष देवता बलात्कार इर लेते है और (दुवृत्ताः तनयाः निधनम् नयन्ति) दुराचारी पुत्र नष्ट कर डालते हैं, इसलिये ( बह्वधीनम् धनम् धिक् ) अनेक पुरुषों के श्राधीन रहने वाले इस धन को धिक्कार है । . नीचस्यापि चिरं चटूनि रचयन्त्यायान्ति नीचैनति शत्रोरप्यगुणात्मनोऽपि विदधत्युच्चैर्गुणोत्कीर्तनम् । निदं न विदन्ति किञ्चिदकृतज्ञस्यापि सेवाक्रमे कष्ट किं न मनस्विनोऽपि मनुजाः कुर्वन्ति वित्तार्थिनः ।। मनहरण। नीच धनवन्त ताहि निरख असीस देय, वह न विलोकै यह चरन गहत है । वह अकृतज्ञ नर यह अज्ञता को घर, वह मद लीन यह दीनता कहत है। यह चित्त कोप ठान यह वाको प्रभु माने, वाके कुवचन सब यह प सहत है । ऐसी गति धार न विचार कछु गुण दोष, अरथाभिलाषी जीव अरथ चहत है ॥ ७५ ॥ अन्वयार्थी- ( नीचस्य अपि चिरम् चटूनि रचयन्ति ) नीच पुरुषों की भी चिरकाल तक खुशामद करते रहते हैं, (शत्रोः अपि नीचैः नतिम् श्रायान्ति ) शत्रु को भी सादर नमस्कार करते हैं, (अगुणान्मनः अपि उच्चैः गुणोत्कीर्तनम् विदर्धात ) निर्गुणी मनुष्यों के भी खूब गुण पर्णन करते रहते हैं, (अकृतस्य अपि सेवाक्रमे किञ्चित् निर्वेदम् न पिदन्ति) और कृतन मनुष्य की सेवा करने में भी विरक्त नहीं होते हैं, इस तरह .
( मनम्पिन अपि वित्तार्थिना मनुना रिम्न कुर्वन्ति ) मनखी पुरुष भी धन के लिये क्या क्या नहीं करते हैं ? सब कुछ करते हैं । ('अहो' कष्टम) पद बडे दुस का विषय है। - लक्ष्मी सर्पति नीचर्णपयः सङ्गादिवाम्भोजिनी- ससर्गादिव कण्ट काकुलपदा न क्यापि धत्ते पदम् । चैतन्यं विषसनिधेशि नृणामुज्जासयत्यनसा धर्मस्थाननियोजनेन गुणिभियि तदस्याः फलम् ॥७६।। नीचही की ओरको उमंग चले कमला मो रिता सिन्धु सलिलस्वभाव याहि दिया है । रहे न सुथिर ह सकाक घरन याकी, षमी कनमाहिं फज केसी पद किया है । नाको मिले हितमौ अचेत कर दार ताहि, विपकी यहिन तात विष कमी हियी है ऐमी ठगहारी जिन घरमके पय डारी, फरके सुकून तिन याकी फन लियो है ॥७६ ॥ अन्वयार्थी-(सदमी ) या लपी (अर्णवपय मात्र) मानो समुद्र के बस के समय से हो (नोचम् मर्पति ) नीच की ओर नमन करती है, ( अम्भोजिनीसंसात् इस ) मानो कमनिन के गंगे। (पएकाकुलपदा) में कटे चुमने की नीम से श्रालित वा हुई ( कापि पदम् न पत्ते) ही मी Rud नहीं गलती है चोर (विपन्निधे इस ) विश पे गनिहा रही है इस [ मानो (Zणाम् ) मनुष्यों की पेत पम् ) पेट र शक्ति को (ARB) यादी (उज्ञासपति)
[७६ ]
अचेत कर डालती है । ( तत् ) इसलिये ( गुणिभिः ) गुणवान् मनुष्यों को
(धर्मस्थाननियोजनेन ) धर्म कार्यो में खर्च कर देने से ही ( अस्याः ) इस
लक्ष्मी का ( फलम् ) मल (ग्राह्यम् ) ग्रहण करना चाहिये ।
भावार्थ-यह लक्ष्मी समुद्र से उत्पन्न हुई है, इस लिसे नल के समान
नीच की योर ही जाती है,तथा कमल में रहती है इस लिये पैरो में कांटे चुम
भाने से कहीं स्थिर नहीं रहती और विष की बहिन है, इसलिये मनुष्यों को
अचेतन कर देती है, अतएव इसको धर्मकार्यों में लगाकर ही इसके पाने का
फल प्राप्त करना चाहिये।
.
F
दानाधिकार ।
चारित्रं चिनुते तनोति विनयं ज्ञानं नयत्युन्नति
पुष्णाति प्रशमं तपः प्रवलयत्युल्लासयत्यागमम् ।
पुण्यं कन्दलयत्यघं दलयति स्वर्ग ददाति क्रमा-
निर्वाणश्रियमातनोति निहितं पात्र पवित्रे धनम् ॥७७।।
सवैया ( ३१ मात्रा)।
चरन अखण्ड ज्ञान अति उज्जल, विनय विवेक प्रशम अमलान ।
अनघ सुभाव सुकृति गुन सचय, उच्च श्रमरपद बन्ध विधान ॥
आगम गम्य रम्य तपकी रुचिं, उद्धत मुकतिपथसोपान ।
ये गुण प्रकट होय तिनके घट, जे नर देहिं सुपत्तहिं दान ।। ७७ ।।
अन्वयार्थो -(पवित्रे पाने निहितम् धनम् ) पवित्र सत्पात्र को
दिया हुमा धन ( चारित्रम् चिनुते ) चारित्र बढ़ाता है. (विनयम् तनोति)
विनय बढ़ाता है, ( ज्ञानम उन्नति नयति ) ज्ञान की वृद्धि करता
है, (प्रशमम् पुष्णाति )
को पुष्ट
है,
-
शान्तता
करता
[ ७७ ] (तप प्रचलयति ) ता को प्रबल करता है, (श्रामम् उल्लास यति) शास्त्र को उसयत करता है-शास्त्र ज्ञान को बढाता है, (पुण्यम् क दल यत्ति ) पुण्य की बड़ जमाता है, (अघम् दलयति) पापों का नाश करता है (स्वर्गम् ददाति) स्वर्ग को देता है और ( क्रमात् ) मम से (निर्वाणप्रियम् मातनोति) मोक्ष शमी को प्राप्त कर देता है। DOD- रिषदाद न तमीक्षते न भजते दौर्भाग्मालम्बते नाकी तिर्न पराभवोऽभिलपते न व्याधिरास्कन्दति । दैन्य नाद्रियते दुनोति न दरः विश्नन्ति नैवापदः पात्रे यो वितरत्यनर्थदलन दान निदान श्रियाम् ॥७॥ पट्पद। . सो दरिद्र दलमलहि, ताहि दुर्भाग न गजहि । सो न लहै अपमान, सु तो विपराभय भजहि ॥ तिहि न कोई दुश्च देहि, तासु तन व्याधि न यड्ढइ, ताहि कुयश परहि, सुमुग्व दीनता न कड्ढइ ।। सो लहहि उचादजगतम, अघ अनाय नासहि सरष। कहै 'घरपाल' सो धन्य नर, जो सुसेव यौवे न दरष - अन्धयार्थी-(य ) जो मनुष्य ( पाने ) पात्र के लिये (प्रियाम् नितानम् लक्ष्मी बढाने का कारण और (अनर्थदल नम् ) श्रनयों को दलन करने वाला ( दानम् वितरति ) दान देता है, (तम् ) उसको (दारिद्रपम् न ईक्षते ) दरिद्रता कमी नस देखती, ( दीर्भायम न भरते ) दुर्भाग्यता कमी उसकी सेवा नहीं करती, (श्रकीर्ति न पालम्यते) अपकीवि उसका पालम्बन नही लेती, (परामय न अभिलपते) विरस्कार --
[ ७८ ]
उसको नहीं चाहता (व्याधि न श्रास्कन्दति ) श्राटि व्याधि कभी उनके
एमीप नहीं पाती, (दैन्यम् न शाद्रिय ) दीनता भी उसका अादर नहीं
करती, (दरः न दुनोति ) मय क्षोम पैदा नहीं करता और ( आपदानेव
लिश्वन्ति) विपत्तियां उसको कभी कैश नहीं देती।
लक्ष्मीः कामयते मति मृगयते कीर्तिस्तमालोकती
प्रीतिश्च म्मति सेवते सुभगता नीरोगतालिङ्गति ।
श्रेयः संहतिरयुपेति घृणुते स्वर्गोपभोगस्थिति-
मुक्तिर्वाञ्छति यः प्रयच्छति पुमान्पुण्यार्थमर्थ निजम् ।।
मनहरण ।
ताहिको सुवृद्धि वरं रमा ताकी चाह करे,
चंदन सरूप हो सुयश ताहि चरचे।
सहज सुहाग पाच सुरग समीप श्रावे,
बार-बार मुकति रमनि नाहि अरचे ॥
ताहिके शरीरको अलिंगति अरोगताई,
मगल कर मिताई प्रीत कर परचे ।
जोई नर ही सुचेत चित समता समेत,
धरम के हेतको सुखेत धन खरचे ।। ७ ।।
अन्वयार्थी--( यः पुमान ) जो मनुष्य (निजम् अर्थम् ) अपना
पन ( पुण्यार्थम् ) पुण्य कार्यों के लिए (प्रयच्छति ) अर्पण कर देता है,
(तम् ) उसको (लक्ष्मीः कामयते ) लक्ष्मी चाहती है, (मति:मृगयते )
सुबुद्धि दृढ़ती है, ( कीतिःआलोकते ) कीर्ति देखती है, (प्रीतिः चुम्वति)
प्रीति उसका चुम्बन करती है, (सुभगता सेवते ) सुन्दरता उसकी सेवा
..
[ ] करती है, (निरोगता आलिङ्गति ) नीरागता उसका श्रालिंगन करती है, (भेय संहतिः अभ्युपति ) कल्याणपरम्परा स्वय श्राकर मिलती है, (स्वर्गापभोगस्थित वृणुते ) स्वर्ग के भोगोपमोग की सामग्री उसको स्वय स्वीकार करती है, तथा (मुक्तिः वाग्छति) मुक्ति उसकी इच्छा . मटामाता । तस्णमन्ना रतिरनुचरी कीर्तिरुत्कण्ठिता श्रीः स्निग्या बुद्धि. परिचयपरा चक्रवर्तित्वऋद्धिः । पाणी प्राप्ता त्रिदिवकमला कामुकी मुक्तिसम्पत् सप्तक्षेव्यां वपति विपुल पित्तपीज निज यः ॥ २० ॥ - पद्मावती। ताकी रति कीरति दासी सम, सहसा रानरिद्धि घर आये। सुमति सुना उपजै ताके घट, सो सुरलोक सम्पदा घायै ॥ ताको दृष्टि लखे शिष मारग, सो निरवध भावना भावे । जो नर त्याग फपट 'फुपरा' कह, विधिसों सप्तसेत धन पाये ॥० अन्ययार्थी--(य ) नो पुरुष (निजम् विपुलम् वित्तवीनम् ) अपना बहुतसा धन रूपी भीम ( समतेथाम् वपति) मानदेनों में चोता है अर्थात् चैत्य, चैत्यालय, भ्रुतशान, मुनि, अर्जिका, पावक और माविका इनके उपकारार्थ खर्च करता है (रति तस्य प्रासन्ना) प्रीति उसके समीप रहती १, (कीर्ति अनुचरी) कीर्वि उसको दायौ नी रहती है, (ो उत्कण्ठिना) [ ८.] लक्ष्मी उसके सिए उत्कठित रहती है, (बुद्धिः स्निग्धा ) वुद्धि उससे स्नेह रखती है, ( चक्रवर्तित्वऋद्धिः परिचयपरा) चक्रवती की ऋद्धिणं उसमे सदा परिचय रखती है, (त्रिदियकमला पाणी प्राप्ता ) स्वर्ग की लक्ष्मी उसके हाथ में रहती हैं, और (मुक्तिसम्पत् कामुकी ) मुक्ति रूपी लक्ष्मी उससे रमण करने की इच्छा रखती है । तपप्रभावाधिकार। शालवीक्रीडित । यत्पूर्वार्डितकर्मशैलकुलिशं यत्कामदावानल- ज्वालाजालजल यदुग्रकरणगामाहिमन्त्राक्षरम् । यत्प्रत्यूहतमासमूहदिवसं यल्लब्धिलक्ष्मीलता- मूलं तद्विविविधं रथाविधि तपः कुर्वीत बीतस्पृहः ॥८१॥ पट्पद । जो पूरवकृत कर्म, पिंडगिरि दलन वज्रधर । जो मनमथ-दव ज्वाल, माल संदरन मेघझर ।। जो प्रचण्ड इन्द्रिय भुजंग, थंभन सुमन्त्र वर । जो विभात्र सन्तम सुपुंज, खण्डन प्रभात कर ॥ जो लब्धि वेल उपजंत घट, तासु मूल दृढ़ता सहित । सो सुतप अंग बहुविध दुविध, करहिं विवुध वांछारहित ।। ८१ ॥ अन्वयार्थी-( यत् ) जो पूर्जितकर्मशैलकुलिशम्) पूर्व कालके संचय किये हुए कर्म रूपी पर्वत के लिए वज्र के समान है, ( तत् ) बो ( कामदावानलबालाजालजलम् ) कामदेव- रूपी दावानल की ज्वालाग्रो को शान्त करने के लिए नल है, ( यत् ) त [८१ ] यस्माद्विघ्नपरम्परा विघटते दास्य सुराः कुर्वते कामः शाम्यति दाम्यतीन्द्रियगणः कल्याणमुत्मपति । उन्मीलन्ति महर्द्धयः क्लयति धसं च यः कर्मणा स्वाधीन त्रिहिव शिव च भाति श्लाध्य तास्तन किम् ।। मनहरण। जाके आदरत महा रिद्धिसौं मिलाप हो, मदन अव्याप होय कर्म बन दाहिए। विषन विनास होय गौरवाण दास होय, ज्ञानको प्रकास होय भौसमुद्र थाहिए ॥ देवपद सेल होय मगजमी मेल होय इद्रिनिकी जेल होय मोखपथ गाहिए । जाकी ऐसी महिमा प्रगट कहै 'नौरपाल" तिहुलोक तिहुँकाल सो तप सराहिए ॥ २ ॥ अधयार्थी--( यस्मात् ) जिस से (विनपरम्परा) विनों की परम्परा नष्ट हो जाती है, (सुरा, दास्यम् कुर्यते ) स्वर्ग निवासी देव सेवक हो जाते हैं, (शाम शाम्यति ) कामदेव शान्त होता है, (इन्द्रिय गण दाम्यति ) निखिल इन्द्रियों का दमन हो जाता है, (कल्याणम् उत्सर्पति ) कल्याण पढता रहता है, ( महर्द्धय उ मोलन्धि ) बड़ी बड़ी ऋद्धियां प्राप्त होती है, (घ) और (यत) जो कर्मों का पिनारा करता है (च) तथा (त्रियिम् शिवम् स्वाधीन भवति) जिसके प्रतार से स्वर्ग और मोक्ष स्वाधीन हो जाते हैं (तत तप किम् न इनाम ) ऐमा तप क्या प्रशसा करने योग्य नहीं है। अवश्य है। , - [ २ ] कान्तारं न यथेतरो ज्वलयितु दक्षो दवाग्नि विना दावाग्नि न यथापरः शमयितुं शक्तो विनाम्भोधरम् । निष्णातः पवनं विना निरसितु नान्यो यथाम्भोधरं कमाघ तपसा विना किमपरो हन्तुं समर्थस्तथा ।। ८३ ॥ मत्तगयन्द । स्यौं वर कानन दाइनकौं, दव.पावकमौं नहिं दूसरो दीसे । ज्यों दवभाग वुम न ततच्छन, जो न अखण्डित मेघ वरीस ॥ च्या प्रगटे नहीं जौलग मास्त, तोलग घोर घटा नहीं खोसे । त्यों घटमैं तपवज्र विना बढ़, कर्मकुलाचल और न पीसें ।। ८३ ॥ अन्वयार्थी-(यथा ) जैसे ( कान्तारम् ) वनको (बलयितुम.) जलाने के लिये (दवाग्निम् विना ) दावानल अनिके बिना (इतर. न दक्ष और कोई समर्थ नहीं हैं । ( 'यथा' ) नैसे ( दावाग्निम् ) दावानल को पूर्ण शान्त करने के लिये ( अम्भोघरम् विना ) विना मेघ के (अपरः न शक्त) अन्य कोई शक्तिमान नहीं है, और ( यथा ) जैसे ( अम्भोधरम् ) मेघ को (निरसितुम् ) छिन्नभिन्न करने के लिये (पवनम् विना ) वायु के बिना (अन्यः न निष्णातः ) और कोई कुशल नहीं है ( तथा ) उसी प्रकार ( कधिम् ) कर्म समूह को ( हन्तुम् ) नाश करने के लिये (विना तपसा) तप के बिना (किम् अपरः समर्थः) क्या कोई अन्य समर्थ है ? भावार्य-कर्म तपसे ही नष्ट हो सकते हैं । उनके नष्ट करने के लिये और कोई उपाय नहीं।
[ ८३ : स्वग्धरा। मन्तोपस्थूलमूल' प्रशमपरिकर स्कन्धबन्धप्रपञ्च! पञ्चाक्षीरोधशास. स्फुरदमयदल' शीलमम्पत्प्रवालः । श्रद्धाम्मःपूरसेकाद्विपुलकुलपलेश्वर्यसौन्दर्यमोग- स्वर्गादिप्राप्तिपुण्य. शिवपदफलद म्याचपः पादपोऽयम् ॥ खट्पद । । सुदृढ मूल सन्तोप, प्रशम गुन प्रयल पेड़ धुय । पचाचार सु शाख, शील सम्पति प्रवाल व ॥ मा दलपुज, देवपद पहुप सुमण्डित । सुकृतभाव विस्तार, भार शिव सुफल प्रवरित ॥ परतीत धार जल सिच किय, अति उतग दिन दिन पुपित । जयवन्त जगत यह सुतपतरु, मुनि विहग सेवहिं सुखित ।।४।। अ ययार्थी - (अय तप पादप ) यह तरूपी वृक्ष (संतोपरयून मूल ) जिसमें कि सन्तोषी मोटी मह है (प्रशमरिकर धन्ध प्रपन्च ) प्रशम सवेगादिरूप पाडोका फैलाव है, (पम्चातीरोधशाख ) पाची इन्द्रियों का निगेघ रूप शाचा समूह है, (स्फुरदमदल ) श्रमयादि अंगरूपी पत्ते लग रहे हैं, (शौनसम्पत्मशाल ) और शीतल सम्मचि रूपी कॉपले हैं, ( श्रद्धाम्भ परमेकात् ) पदा रूपी नल के सींचने से ( विपुल पुलश्वर्यसीयभोगस्वर्गादिप्रातिपुष्प ) उच्चकुल, विपुन ऐश्वर्य उत्कृष्ट सादर्य, और नाना प्रकार के भोग युक्त स्वर्गादिरूप न शकर (शिप फलम ) मोक्षपद रूप पाल फालता है। १ तर अल्प वर इत्यापि पाठ ।
[ ८४ ] भावनाधिकार । शार्दूलविक्रीडित । नीरागे तरुणीकटाक्षितमिव त्यागव्यपेतप्रभोः सेवाकष्टमिवोपरोपणमिवाम्भोजन्मनामश्मनि । विष्वग्वर्षमिवोपरक्षितितले दानाहंदर्चातपः स्वाध्यायाध्ययनादि निष्फलमनुष्ठनिं विना भावनाम् ।। पद्मावती छन्द । व्यौं नीराग पुरुषके सन्मुख, पुरकामिनि कटाच्छ कर ऊठी । ज्यौं धनत्यागरहित प्रभु सेवन, ऊसर मैं वरषा जिम छूटी ॥ व्यौं शिलमाहिं कमल की बोवन, पवन पकर जिम बांधिए मूठी। ए करतूति होय जिम निष्फल, त्यौं विनभाव क्रिया सब झूठी ८५ अन्वयार्थी--( नीरागे तरुणीकटाक्षितम् इव) जैसे विगगी पुरुष के सन्मुख तरुण स्त्रीके कटाक्ष निष्फल हैं, (त्यागव्यपेतप्रभो सेवा. कष्टम् इव ) जैसे प्रतिकलरूप धन न देने वाले स्वामी की सेवा करना कष्टमात्र है अर्थात् व्यर्थ है, (अम्भोजन्मनाम् अश्मनि उपरोरणम् इव ) जैसे पाषाण में कमलों का बीज बोना व्यर्थ है, (ऊपर क्षितितले विष्वग्वर्षम् इव) और जैसे ऊसर भूमि में वर्षा होना व्यर्थ है, उसी तरह (भवानाविना ) शुममावों के बिना अथवा अनित्य अशरण श्रादि बारह भावनाओं के चिन्त- वन के बिना ( दानाईद तपः स्वाध्यायाध्ययनादि अनुष्ठानम् ) दान देना, अरहन्त की पूजा करना; तप करना, स्वाध्याय करना और अध्ययन श्रादिक अनुष्ठान करना निष्फल है। .
[ ८५ ] सर्व ज्ञीप्सति पुण्यमीप्सति दयां धिसत्त्यध भित्सति क्रोध दित्सति दानशीलतपसां साफल्यमादित्सति । कल्याणोपपचय चिकीपंति भवाम्भोधेस्तट लिप्सते मुक्तिस्त्री परिरिप्सते यदि जनस्तद्भावयेझारनाम् ।। ८६ ।। घनाक्षरी। पूरव करम दहै सरवग्य पद लहै, गहे पुन्यपथ फिर पाप में न आवना । करूनाकी फला जागे कठिन कपाय भागे, लागे दानशील तप सफल सुहावना ।। पाचे भवसिंधु तट खोले मोखद्वार पट, शर्म साध धर्म की धरा में फर धापना । एते सम काज कर अलखकी अगधरे, चेरी चिदानन्दको अकेली एफ भावना ॥८६॥ अययार्थी--(यदि ) यदि (जन ) मनुष्य ( भायनाम् ) मायना को (भावेयत् ) मावे अर्थात् श्रात्मचिन्तवन करे, तो वह (सर्वम् क्षीप्सति) सबको जानने पाला अर्थात् केवली होता है. (पुण्यम् ईप्सति ) पुण्य उपार्जन करता है, ( दयाम् धित्सति ) दया का पाशन करता है, (अधम् मित्सति ) पापा को नष्ट करता है, (मोधम् दित्सति) कोष को रण करता है. ( दानशीलनपमाम् साफल्यम् श्रादित्सति) दानयोग वपको समन करता है, ( कल्याणोपचयम् चिकीर्पति ) निरन्तर कल्याण की यदि करता रहता है, (भवाम्बोधे। तटम लिप्सते) सार रूपी समुद्र के किनारे लग जाता है और (मुक्तिस्नोम् परिरिप्सते ) मति रूपी स्त्रीको शालिंगन करता है। - [ ८६ ] . पृथ्वी । विवेकवनसारिणी प्रशमशर्मसंजीवनी भवार्णवमहातरी मदनदाव मेघा क्लीम् । चलाक्षमृगवागुरां गुरुकषायशलाशनिं विमुक्तिपथवेसरी भजत भावनां किं परैः ॥ ८७॥ प्रशम के पोषवेकौं अम्रतकी धारासम, ज्ञानचन सींचवेकौं नदी नीर भरी है। चंचल करन मृग बांधवेकौं वागुरासी, कामदावानल नासवेको मेघझरी है। प्रवल कषायगिरी भजवेकी वज्र गदा, भौ-समुद्र तारवेकौं पौढ़ी महा तरी है। मोखपथ गाहवेकौं 'वेसरी विलायतकी, ऐसी शुद्ध भावना अखंड धार ढरी है ।। ७ ।। अन्वयार्थी-भो भव्य हो (विवेकवनसारिणीम् ) विवेकरूपी वन के सिचन करने के लिये नदी के समान, (प्रशमशर्मसजीवनीम् ) प्रशम सुखको नीवित रखने के लिये संजीवनी श्रौषधि के समान, (भवार्णवम- हातरीम ) संसार रूपी समुद्र के तिरने के लिये चड़ी नौका के समान, (मदनदावमेघावलीम् । कामदेवरूपी दावानल के शान्त करने के लिये मेघमण्डल के समान, ( चलातमृगबागुराम् ) चंचल इन्द्रियरूपी इरिणों के बांधने के लिये जाल के समान, (गुरुरुषायशैलाशनिम् ) प्रबलकषायरूपी १. अश्वतरी अर्थात् खच्चरी । " [७] पर्वत को नष्ट करने के लिये वज्र के समान और ( विमुक्तपथवेसरीम) मोक्ष के मार्ग में ले जाने के लिये नहीं थकने वाली खचरी के समान जो (भावनाम) श्रात्मा की भावना है, सो ( भजत) चिन्तयन करनी चाहिये। (परे विम् ) अन्य से क्या प्रयोजन ? शिखरिणी धनं दत्त वित्त जिनवचनमभ्यस्तमखिल क्रियाकाण्ड चण्ड रवितमवनी सुप्तमसकत । तपस्तीव तप्त चरणमपि चीण चिरतरं न चेचित्त भावस्तुपवपनवत्सर्वमफलम् ।। ८८ ॥ श्रमानक छन्द । गह पुनीत अचार, जिनागम जोषना। कर तप संजम दान, भूमिका सोचना ।। ५ करनी सपनिफन, होय पिन भाषना। ज्यों तुप पोए हाथ, कडू नहिं प्रायना ॥८॥ अश्यार्थी-(धनम् वित्तम् दत्तम् ) बहुत से पन का दान दिवा (अखिलम् जिनयानम् अ-पस्तम् ) नितिन जैनशास्त्रों का अभ्यास किया, ( परदम् मियामालम् रचितम् ) उम्र पारिन पारण किया, (अपनी प्रमफन समम् ) | भूमि पर शयन किया, (सोनम कप तमम् ) HAR किया, घोर (चिरतरम् चरणम् अपि वीर्णम् ) चिर मानपतपम भी पार किया रिन्तु (भाषा पिते न घेत ) यदि हम
[ ८८ ]
में माव न हो अर्थात् ये कार्य श्रात्मचिन्तवन पूर्वक न किये हों, तो ( तुषवप.
नवत् ) धान के छिलके के बोने के समान (सर्वम् अफलम् ) सत्र
निष्फल हैं।
.
विरागाधिकार ।
हारिणी।
यदशुभरजः पाथो दृप्लेन्द्रियद्विरदानुशं
कुशलकुसुमोद्यानं माद्यन्मनःकपिशृङ्खला ।
विरतिरमणीलीलावेश्मस्मरज्वरभेपनं
शिवपथरथस्तद्वैराग्यं विमृश्य भवाभयः ।। ८६ ।।
घनाक्षरी।
अशुभता धूर हरवेको नीर-पूर सम,
विमल विरति-कुलवधूको सुहाग है ।
उदित मदन जर नासवेकौं जुरांकुश,
अच्छगज थंभनको अकुशको दाग है ।।
चंचल कुमन कपि रोकवेकौ लोहफन्द,
कुशल कुसुम उपजायवेकौं बाग है।
सूधो मोखमारग चलायवेकौं नामी रथ,
ऐसो हितकारी भयभंजन विराग है || ९ ||
१
अन्वयार्थी--( यत् ) नो वैराग्य (अशुभरजःपाथः ) अशुभरूपी
धूलिको शान्त करने के लिये जल है, (हप्तेन्द्रियद्विरदाङ्कुशम् ) उन्मत्त
[९] इद्रियरूपी हाथी को वश करने के लिये अकुश है (कुशनकुसुमोद्यानम् ) कल्याणरूपी पुष्पों के उत्पन होने के लिये उद्यान ( वाग) है, (माद्यमन कपिथसजा मदो मत्त मन रूपी बन्दर के बांधने के लिये लाहे की सकल है, (विरतिमणोलीलावेश्म् ) विरति रूपी सुन्दर स्त्री के कीड़ा करने का भवन है, (स्मरज्जरभेषजम् ) कामदेव रूपी ज्वर के दूर करने के लिये श्रौषधि है, और (शिवपदरथ ) मोक्ष में जाने के लिये रथ है, (तत् बंगग्यम) ऐसे वैराग्य को (विमृश्य । चिन्तवन करके हे भयो, तुम (अभय भव) निडर होयो। वसन्ततिलका। चण्डानिल. स्फुरितमन्दचय दवार्चि- वृक्षनज तिमिरमण्डलमर्कविम्बम् । वन महीध्र निवह नयते यथान्त वरात्यमेवमपि कर्म तथा समग्रम् ।। ६० ।। श्रमानक छद। क्यों समीर गभीर, सघन घन छय करें । बम विदार शिम्बर, दिवाकर तम हरे ॥ यो दय पायक पूर, दहै धनकुजों । ज्यौं भजे पैराग, करम के पुनको ॥६. ॥ अन्वयार्थी-( यथा) जैसे (चण्डानिन ) तीव्र पावन (स्फुरितम् भाषयम् । छाये हुए मेष मंडल का (अन्त नयते) नाश करता है, - [ २ ] अन्वयार्थी--(विरक्त पुमान ) विरक्त मनुष्य (भोगान ) ससार के भोगों को ( कृष्णमुजङ्गभोगविषमान् विदित्वा काले सर्प के फरण के समान विषम जानकर, (राज्यम् ) राज्य को ( रजः सन्निभम् ) धूलि के समान जानकर, (वधून ) माई बगैरह कुटुम्बी जनों को ( बन्धनिबन्धनानि ) बंध के कारण जानकर, ( विषयग्रामम् ) इन्द्रियों के विषयों को (विपानोपमम् ) विष मिले हुए अन्न के समान जानकर, (भूतिम् ) हाथी घोड़े स्थादिकी विभूतिको (भूतिसहोदराम् ) भस्मकी बहिन जानकर और ( स्त्रैणम् ) स्त्री सुखको (तृणतुलम विदित्वा ) तृण के समान जान कर (तेषु ) उनमें अर्थात् भोगोपभोग राज्य बन्धु विषय विभूति और स्त्री में (श्रासक्तिम् त्यजन् ) श्रासक्ति छोड़ कर (अनाविलः 'सन्' ) अतिशय शुद्ध होता हुश्रा ( मुक्तिम् विलभते ) मोक्ष को प्राप्त होता है । उपदेशगाथा। उपेन्द्रवज्रा। जिनेन्द्र पूजा गुरुपयुपास्तिः सचानुकम्पा शुभपात्रदानम् । गुणानुरागः श्रुतिरागमस्य नजन्मवृक्षस्य फलान्यमूनि ॥१३॥ मत्तगयन्द । के परमेसुरकी अरचा, विधिसौं गुरुकी उपसर्पन (?) कीजै । दीन विलोक दया धरिए चित, प्रामुक दान सुपत्तहिं दीजै ।। गाहक हो गुनकौं गहिए, रुचिौं जिन आगसको रस पीजै । ए करनी करिए घरमैं बस, यो जगमैं नरमी फल लीजै ।। १३॥
[ ९३ ] अवयार्थी-(जिनेन्द्रपूजा) जिने द्रदेव की पूजा करना, (गुरु पर्युपास्ति ) गुरु की उपासना करना, ( सत्त्वानुकम्पा ) प्राणीमात्र में दया रखना, (शुभपात्रदानम् ) पात्र सुपानों को उत्तम दान देना, (गुणा- नुराग ) गुणों में प्रीति करना, (भागमस्य शुति ) और जैन शास्त्रों का सुनना, (अमूनि) ये सब (नृजन्मवृक्षस्य फलानि ) मनुष्य नाम- रूपी वृक्ष के फल हैं। भावार्थ - जिनेन्द्र पूजा श्रादिक करने से ही मनुष्य नाम सफल होता है। शिखरिणी। त्रिसन्ध्यं देवार्चा विरचय चय प्रापय यश: श्रियः पात्रे वाप जनय नयमार्ग नय मनः । स्मरक्रोधाधारीन्दलय कलय प्राणिपु दयां जिनोक्त सिद्धान्त शृणु घृणु जवान्मुक्तिकमलाम् ।। हरिगीता छन् । जो करै साध त्रिकाल सुमरन, जास जग नस विस्तरै । जो सुनै परमानहि सुरुचिसौं नीति मारग पग धरै ॥ जो निरख दीन दया प्रजु, कामक्रोधादिक हरे । जो सुधन सप्त सुखेत खरचे, नाहि शिषसंपति परै ॥१४॥ अषयार्थी-भो भन्यो, (निसन्ध्यम्) प्रात काल मध्यादकाल ओर सार्यकाल में (देवार्चाम् विरचय) देव पूना फरो, ( यश चयम्
[६४ ]
प्रापय ) यश-समूहको प्राप्त कगे, (पात्रे श्रिय वापम जनय ) पात्री को
दान देकर लक्ष्मी का बीज बोयो, (मन, नयमागम नय) मन को नीति.
मार्ग पर लायो, ( स्मर क्रोधाद्यारीन ) काम क्रोध श्रादिक शत्रों को
(दलय ) दलन करो, (प्राणिपु दयाम वलय प्राणियो में दया धारण
करो, ( जिनौतम् सिद्धान्तम् शृणु ) जिनेन्द्र देव के कहे हुए शास्त्री को
सुनो, और ( जत्रात् ) शीघ्र ही ( मुक्तिव मलाम् ) मुक्ति रूपी लक्ष्मीको
(वृणु ) स्वीकार करो।
शार्दूलविक्रीडित ।
कृत्वाहत्पदपूजनं यतिजनं
नत्वा विदित्वागमं
हित्वा सङ्गमधर्मकर्मठधियां पात्रेषु दत्वा धनम् ।
गत्वा पद्धतिमुत्तमक्रमजुषां जित्वान्तरारित्र
स्मृत्वा पञ्चनमस्क्रियां कुरु करकोडस्थमिष्टं सुखम् ।।
वस्तु छन्द ।
देव पुजहिं देव पुजहिं, रचहि गुरुसेव ।
परमागमरुचि धरहिं, तजहि दुष्टसंगत ततच्छन
गुणि सगति आदरहिं, करहिं त्याग दुर्भच्छ भच्छन ।
देहिं सुपात्रहिं दान नित, जमैं पंचनवकार ।
ए करनी जे आचरहिं, ते पावें भवपार !! ६५ ।।
अन्वयार्थी-हे भव्य (अर्हत्पदपूजनम् कृत्वा ) अरहंत देव के
चरण कमलों की पूजन करके, ( यतिजनम् नत्वा) प्राचार्य उपाध्याय और
साधुलों को नमस्कार करके (आगमम् विदित्वा ) शास्त्र की जान करके
(अधर्म कर्मठधियाम सङ्गम् हित्वा) निरन्तर अधर्म करने वाले दुष्ठ मनुष्यो की सगति छोड़ करके, (पात्रेपु धनम् दत्वा ) पान सुपात्रों को धन देकर के, ( उत्तमक्रमजुपाम् पद्धतिम् ग 1 ) श्रेष्ठ कार्य करने वाले गुणी मनुष्यों के मार्गानुसार चल करके, (अरारिव्रजम् जित्या ) कामक्रोधादिक अन्तरग शत्रुओं को जीत करके और (पञ्जनमस्क्रियाम् स्मृत्वा) णमो अरहताणम्' इत्यादि पच नमस्कार मन्त्र का जप करके ( इष्टम् सुखम् ) अपने इष्ट मोक्षादिक के सुखको (करकोडस्थम् कुरु ) हाथ में ले । भावार्थ-श्रह पूजनादिक करने से इष्ट मोक्षादिक के सुखकी प्राप्ति होती है। हरिणी। प्रसरति यया कीतिर्दिन क्षपाकरसोदरा भ्युदयजननी याति स्फीति यथा गुणसन्ततिः क्लपति यथा वृद्धिं धर्मः कुकर्म हतिक्षमः सलसुलभ न्याये कार्य तथा पथि वर्तनम् ।। ६६ ॥ दोहा। गुरु अरु धर्म सुथिर रहै, यश प्रताप गभीर। कुशल वृक्ष जिम जिम लहलहै, तिहि मारग चल पीर ॥६६॥ अषयार्थी-(अया) से (सपाकरसोदराकीर्ति ) चन्द्रमा की चौनी के समान निमंस कार्ति (दिसु) चारों दिशाओं में (प्रसाति) फेले, त्या (यथा । जैसे (अभ्युदय जननी गुणसन्तति ) अनेक .
[ १६ ]
.
कल्याणों के देनेगले गुणों के समूह (म्फीनिम् याति ) स्फुरायमान हो,
( यथा) और जैसे (कुकर्मतिक्षमः धर्म.) समस्त पापों के नाश करने
वाला धर्म (वृद्धिम् कलयति ) वृद्धि को प्राप्त हो, ( तथा ) उसी तरह
(कुशलसुलभे न्याय्ये पथि वर्तनम् कार्यम् ) सुलमता से कल्याण करने
वाले न्याय्य मार्ग में अपना वर्ताव करना चाहिये।
शिखरिणी।
करे श्लाध्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणमनं
मुखे सत्यावाणी श्रतमधिगतं च श्रवणयोः ।
हृदि स्वच्छा वत्तिर्विजयि भुजयोः पौरुषमहो
विनाप्यैश्वर्येण प्रकृतिमहतां मण्डनमिदम् ।। ९७ ॥
कवित्त छन्द ।
वदन विनय मुकट सिर ऊपर, सुगुरुवचन कुण्डल जुग कान ।
अन्तर शत्रुविजय भुजमण्डन, मुकतमाल उर गुन अमलान ।।
त्याग सहन कर कटक विराजत, शोभित सत्य वचन मुख पान ।
भूषन तजहिं तन तऊ मन्डित, यातौं सन्तपुरुष परधान ।। ६७ ||
अन्वयार्थी-(अहो ) श्राश्चर्य है कि (प्रकृतिमहताम् ) स्वभाव
से ही बड़े सज्जन पुरुषो के ( करे श्लाघ्यस्त्यागः ) हाथो में प्रशंसनीय दान
देना, (शिरसि गुरुपादप्रणमनम् ) मस्तक में निर्ग्रन्थ गुरु के चरणारविन्द
को नमस्कार करना (मुखे सत्या वाणी) मुख में सत्य वचन बोलना,
( श्रवणयोः अधिगतम् श्रुतम् ) कर्णो में प्राप्त हुश्रा भ तज्ञान (हृदि
[ १७ स्सन्छ। वृत्ति ) हृदय में निर्मल प्राचरण अथवा निर्मल विचार (च) और (भुजयो विजयि पौरुपम् । भुजाओं में सबको विलय करने वाला पौष । इदम् ) ये सब ( ऐश्वर्येण विना) बिना ही ऐश्वर्य के (मण्डनम् ) भूपण हैं। भावार्थ --सजन पुरुष बिना ही ऐश्वर्य के हाथ में दान देने रूप फरुण मस्तक में शास्त्र सुनने रूप कुएटस, हृदय में स्यछ अाचरण रूपी मुक्ता माला और मुजाओं में पौरुष इत्यादि श्राभूषणों से सदा भूपित रहते हैं। नोट- नीचे लिखे तीन कविता के मूल श्लोस नहीं मिले। घनाक्षरी। गहें जे सुजन रीत गुणोस निषाई प्रोत, सेषा साधं गुरू को बिनसों कर जोर है विद्याकी विसन पर परतियसंग हरै, दुर्जन की संगति सी पैट मुख मोर है। वजे कोकनि ध फाज पूर्जे देव जिनरान, फर ने करन शिर उमग यहोर तेई नीष सुम्बी होय तेई मोबमुम्बी होय, तेई होंय परम करम फन्द तो ॥1॥ पर निदा त्याग कर मन में आग पर, कोष मान माया लोम पा परिहा रे॥ हिरदे में तो गहु समतामी सोरो रा. परम कला भेद गेर में न पर रे ॥ । 4 [८] फरम को वश खोय मुकतिको पंथ जोय, सुकृति को वीजयोय दुर्गतिने डर रे । अरे नर ऐसो होहि बार बार कहुं तोहि, नहिं तो सिधार तू निगोद तेरो घर रे ॥२॥ ( कवित्त ३१ मात्रा)। बालस त्याग जाग नर चेतन, बल सभार मत कर हु बिलम्ब । इहां न सुख लवलेश जगतमहि, निंब विरखमैं लगै न अब ।। तात तू अन्तर विपच्छ हर, कर विलच्छ निज अच्छ कदम्ब । गह गुन ग्यान चैठ चारितरथ, देहु मोव मग सन्मुख वन ॥ ३ ॥ 'भवारण्यं मुक्त्वा यदि जिगमिपुमुक्तिनगरी तदानीं मा काविषयविषवृक्षपु वसतिम् । यतश्छायाप्येपा प्रथयति महामोहमचिरा- दयं जन्तुर्यस्मात्पदमपि न गन्तुं प्रभवति ।। ६८ ॥ अन्वयार्थी-हे. मन्य, ( यदि ) यदि तू (भवारण्यम् मुक्त्वा) संसार रूपी महा अटवी को छोड़ कर ( मुक्तिनगरीम् जिगमिषुः) मुक्ति रूपी नगरी में जाना चाहता है, (तदानीम् ) तो (विषयविषयक्षेषु वसतिम् मा कार्षीः ) इन्द्रियो के विषय रूपी, विषवक्षो पर निवास मत कर । ( यतः) क्योंकि (एषाम् छाया अपि ) इन सक्षों की छाया भी ( चिरात् महा- मोहम् प्रथयति ) बड़ी शीघ्रता के साथ महा मोह उत्पन्न कर देती है (यस्मात् ) कि जिस महा मोह से (अयम् जन्तुः) यह प्राणी ( पदम् अपि गन्तुम् न प्रभवति ) एक पैर भी श्रागे नहीं चल सकता। २. इस मूल श्लोक का पद्यानुवाद किसी भी प्रति में नहीं है ।
[ ] भावार्थ-दद्रियों के विषय शिशों के समान है। इनके सेवन करने से मुक्तिनगरी कदापि नहीं मिल सकती। इसलिये मोक्ष लाने की का रसनेवालों को विषयों का ससग कदापि नहीं करना चाहिये। मालिनी अमजद जितदेवाचार्यपट्टोदयाद्रि- घु मणिविजयसिंहाचार्यपादारविन्दे । मधुकरसमा यस्तेन सोमप्रमेण व्यरचि मुनिपनेत्रा सूक्तिमुक्तावलीयम् ।। ९९ ।। कसि। जैन यस सर हम दिगमा, मुनिपति अजितदेव पति पारस । ताके पर पादोमदमनन, प्रगटे विनयसे7 प्रापार || साके पट्टमए मोमप्रम, तिन एमय दियो दिसार । मारे पद मुनत अवधारना है मुझपने पुरुष भनारम ॥ ९९ ॥ भन्ययायों--(य) वा (पशिदेवापार्यपटोरयाटिएमति विशयमिहापार्यपापिण्दे महरसमाम् पादेयापार महापात पाप मान Ar- ार के पानी कपा में भाको emenा, ( मेन मुभिरनामोमा)स मयम चामे (इयम् मूति गुमायमी) (Br २ ) (रधि) ant [ १.] इन्द्रवजा। 'सोमप्रभाचार्यप्रभा च लोके वस्तुप्रकाशं कुरुते यथाशु । स्थायमुच्च पदेशलेशः शुभोत्सवज्ञानगुणांस्तनोति ॥१०॥ अन्वयार्थी--( यथा) जैसे (लोके) लोक में ( सोमप्रभा ) चन्द्रमा की प्रमा () और ( प्राचार्यप्रभा) श्राचार्यों की प्रभा वा प्रतिमा (आशु वस्तुप्रकाशम् कुरुते ) शीघ्र वस्तु का प्रकाश करती है, ( तथा ) रासीतरह (अयम् उपदेशलेशः ) यह थोड़ा सा उपदेश ( उचः शुभोत्सव- खानगुणान् ) उत्कृष्ट कल्याण, श्रानन्द और ज्ञानादि गुणों को (तनोति चढ़ाता है । इस श्लोक में मन्थकर्ता ने अपना 'सोमप्रभाचार्य' नाम व्यक्त किया है। इति मोसोमामाचार्यविरचिता सिन्दूरप्रक्शपरपस्या सूक्तिमुक्तावली भाषाछन्दानुवादसहिता समाप्त । Admin १. इस श्लोक का भी भाषा चन्द नहीं मिला।
। १०२ ] * २-धर्मफल धर्मों महामङ्गलमङ्गभाजां, धर्मों जनयुद्दलिताखिलार्तिः । धर्मः पिता चिन्तितपूरिताथों, धर्मः सुहृद्धितनित्यइर्षः ॥१॥ भारोग्यभाग्याभ्युदयप्रभुत्वं, सत्त्व शरीरे च जने महत्त्वम् । तत्त्वं च चित्ते सदने च संपत् संपद्यते पुण्यशेन पुसाम् ।।२।। धर्मोऽयं धनवल्लभेपु धनदः, कामार्थियु कामद, सौभाग्यार्थिषु तत्प्रदः किमपरं पुत्रार्थिनां पुनरः । राज्यार्थिष्वपि राज्यदः किमथवा नानाविकल्पनृणां तकि ? यन करोति किं च कुरुते स्वर्गापवर्गावपि ॥ ३॥ धर्माजन्म कुले शरीरपटुता सौभाग्यमायुर्वल, धर्मेणेव भवन्ति निर्मलयशोविद्यार्थसंपत्तयः । कान्ताराच महाभयाच सततं धर्मः परित्रायते, धर्मः सम्यगुपासितो, भवति हि स्वर्गापवर्गप्रदः ॥ ४ ॥ पत्नी प्रेमवती सुतः सविनयो भ्राता गुणालकृतः, स्निग्धो बन्धुजनः सखाऽतिचतुरो नित्यं प्रसन्नः प्रभुः । निर्लाभोऽनुचरः स्वचन्धुसुमुनिप्रायोपयोग्यं धनं, पुण्यानामुदयेन सततमिदं कस्यापि सपद्यते ।। ५ ।। रम्य रूपं करणपटुताऽऽरोग्यमायुर्विशालं, कान्ता रूपा विजितरतयः सूनको भक्तिमन्तः । पटखण्डोतिलपरिवृढत्वं यशः क्षीरशुभ्र, सौभाग्यश्रीरिति फलमहो धर्मवृज्ञस्य सर्वम् ।। ६ ।। .. . . - - . [ १०३ ] ३-धर्मप्रभाव घने रणे शत्रुनलाग्निमध्ये, महार्णवे पर्वतमस्तके पा। सुप्त प्रमत्त विपमस्थित वा, रक्षन्ति पुण्यानि पुरावानि ॥१॥ 'धम्मेण कुलपसूई, धम्मेण य दिव्वरूत्रसपत्ती। धम्मेण धमिद्धि, धम्मेण सवित्रा कित्ती ॥ २ ॥ ताप्रबद्रपल ततो प्रवल तारापल भूवल. तावसिद्धपनि वान्छितार्थमसिल तापजन सजन । मुद्रामएदलतन्त्रमन्त्रमहमा तापत्कृत पौरुष, यावत्पुण्यमिद सदा विजयते पुण्यक्षये क्षीयते व्यसनशतगताना मलेशरोगादुराणा, मरणभयहताना दुवशोकार्दितानाम् । भगति बहुविधाना व्याकुलाना जनाना, शरणमशरणाना नित्यमेको हि धर्म न देवतीर्थन पराक्रमेण, न मत्रत औन सुपर्णाने । न घेनुचिन्तामणिकल्पवृक्ष विना स्वपुण्यैरिह पान्छितार्था ॥ ५ ॥ पश्चिमाभिमुख याति, त्यक्त्वा विपुत्तमम्परम् रवि शूर इति ख्यातो, यश पुण्यैरवाप्यते मासि मासि समा ज्योत्स्ना, पक्षयोरुभयोरपि । सत्रैक शुक्लपक्षोऽभूधश पुण्यैरवाप्यते पमेण कुलप्रति , धर्मेण व दिव्यरूपच । धर्मेण पनसमृदि, मेण पिस्ता कति ॥
[ १०५ ]
५-विधि
येनोहितेन कमलानि विकसितानि,
तेजासि येन निखिलानि निराकुनानि ।
येनाधिकारलिकर प्रसरो निरुद्ध
सोऽप्यस्तमाप हतदैववशादिनेश
यन्मनोरथशतैरगोचर, यस्पृशन्ति न गिर कवेरपि ।
स्वप्नवृत्तिरपि यत्र दुर्लमा, लीलयैव विदधाति तद्विधि ॥ २ ॥
अघटितघटितानि घट्यति, सुघटितघटितानि जर्जरीकुरुते ।
विधिरेव तानि घटयति, यानि पुमान चिन्तयति ।।
छित्वा पाशमपास्य कूटरचना भक्त्वा बलाद्वागुरा,
पर्य तानिशिखाकलापटिलान्निर्ग य दूर वनात् ।
व्याधाना शरगोचण्यतिजवेनोल्लध्य धावन मृग,
कूपान्त पतित करोतु विधुरे कि वा विधौ पौरुपम् ॥ ४ ॥
यद्भग्न धनुरीश्वरस्य शिशुना यजामदग्न्यो जित,
स्त्यक्ता येन गुरोगिराषसुमती पद्धो यदम्भोनिधि ।
एकैफ दशक धरस्य जयकृद्रामस्य किं वएयते !
देव वर्णय येन सोऽपि सहसा नीत कथाशेषताम् ॥ ५ ॥
जेता यस्य वृहस्पतिः प्रहरणं यन्न सुरा किकरा,
स्वर्गो दुर्गमनुपह खलु हरेरावणो वाहनम् ।
इत्याश्चर्यबलान्वितोऽपि वलभिद्भग्न पर सगरे,
तयुक्त ननु देवमेव शरण धिग धिग वृथा पौरुपम् ॥ ६ ॥
स्थान त्रिकूट परिखा समुद्रो, रक्षासि योद्धा धनदाच विचम् ।
संजीवनी यस्य मुखेच विद्या स रावण कालपशादिपन्न ॥७॥
[ १०६ ] ॥ ६-कर्म यदुपातमन्यजन्मनि शुभ,-मशुभ वा स्वकर्मपरिणत्या। तच्छक्यमन्यथा नव कत्तं देवासुरैरपि हि प्रचलति यदि मेरु. शीततां याति वह्नि,- रुदयति यदि भानुः पश्चिमायां दिशायाम् । विकसति यदि पद्म पर्वताने शिलायां, तदपि न चलतीयं भाविनी कर्मरेखा नवाकृतिः फलति नैत्र कुलं न शीलं, विद्यापि नैव न च जन्मकृनापि सेवा । कर्माणि पूर्वतपसा किल सहिचतानि, काले फलन्ति पुरुषस्य यथेह वृक्षाः ३ ॥ 'उइअमि सहस्सकरे, सलोयणो पिच्छइ सयललोगो। जं न उलूओ पिच्छइ, सहस्सकिरणस्स को दोसो ? ॥ ४ ॥ यद्वंज़मयदेहास्ते, शलाकापुरुषा अपि । न मुच्यन्ते विना भोग, स्वनिकाचितकर्मणः सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता, परो ददातीति कुबुद्धिरेषा। पुराकृतं कर्म तदेव भुज्यते, शरीरहेतोस्त्यर या त्वया कृतम् ॥६॥ वैद्या वदन्ति कफपित्तमरुद्विकार, नैमित्तिका ग्रहकृतं प्रवदन्ति दोषम् । भूतोपसर्गमथ मन्त्रविदो वदन्ति, कमेव शुद्धमतयो यतयो.गृणन्ति १. उदिते सहस्रकरे, सुलोचनः पश्यति सकललोका। यत् न न उलूकः पश्यति, सहन्तकिरणस्य को दो || -- । .
[ १०७ ७-भाग्य दवेन प्रभुणा स्वय जगति यदु यस्य प्रमाणीकृत, सत्तस्योपनयेन्मनागपि सदा नैवाश्रयः कारणम् । सर्वाशापरिपूरके जलधरे पर्पत्यपि प्रत्यह, सूक्ष्मा एव पतन्ति चातकमुखे द्वित्रा पयोविन्दव ॥१ यद्धात्रा निजभालपट्टलिखित स्तोक महता धन, तत्प्राप्नोति मरुस्थलेऽपि नितरा मेरी च नावोऽधिकम् । सद्धीरो भव वित्तवासु कृपणा वृत्तिं वृथा मा कृथा, कूपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृहणाति तुल्य जलम् ॥२॥ औषधं मवाद च, नक्षत्र गृहदेवता । भाग्यकाले प्रसीदन्ति, अभाग्ये यान्ति विक्रियाम् ॥ ३ ॥ पोप्पा पञ्च शरा सरासनमपि व्याशून्यमदणोलता, जेतव्य च जगत्तय प्रतिदिन जेताऽप्यनङ्ग किल । ईहतेऽपि वशीकृत निमुवने जानेऽस्मि तत्कारणम्, तेजो यस्य विराजते स बलवान् स्यूजेपु क प्रत्यय १॥ ४॥ सेवितोऽपि चिर स्वामी विना पुण्यं न तुप्यति । भानोराज मभक्तोऽपि, पश्य निश्चरणोऽरुण ॥५॥ दोपे प्रालिते प्रणश्यति तम कि दीपमान तमो, बजेणामिहता पतन्ति गिग्य किंषयमात्रा नगा ? इस्ती स्थूलतनु म पास शवश किंदस्तिमाोश, विरानते स पनवान स्थूलेपुर प्रत्यय ? ॥ ६॥ उद्यम कुर्वता पुसा, भाग्य सर्वत्र कारणम् । समुद्रमथनाल्लेमे, हरिलक्ष्मी से पिम् ॥७॥ . यश्य
१०८ ]
८-सत्त्व
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचे,
प्रारभ्य विघ्नविहिता विरमति मध्या ।
विघ्नः सहस्रगुणितैरपि हन्यमानाः,
प्रारब्धमुत्तमगुणा न परित्यजन्ति
अद्यापि नोन्झति हरः किल कालकूट,
कूर्मो विभर्ति धरणि किल चात्मपृष्ठे ।
अम्भोनिधिर्वहति दुःसहवाडवाग्नि-
मङ्गीकृतं सुकृतिनः परिपालयन्ति ॥२॥
एकोऽहमसहायोऽहं, कृशोऽहमपरिच्छदः।
स्वप्नेऽप्येवविधा चिन्ता,मृगेन्द्रस्य न जायते ।। ३ ।।
विजेतव्या लङ्का चरणतरणीयो जलनिधि
विपक्ष. पौलस्त्यो रणभुवि सहायाश्च कपयः ।
तथाप्याजौ रामः सकलमवधीद्राक्षसकुल,
क्रियासिद्धिः सत्त्वे वसति महतां नोपकरणे ॥ ४ ॥
रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्रतुरगा,
निरालम्बो मार्गश्वरणविकलः सारथिरपि ।
रवियत्येवान्त प्रतिदिनसपारस्य नभसः,
क्रियासिद्धिः सत्त्वे सति महतां नोपकरणे ॥ ५ ॥
कदाथितस्यापि हि धैर्यवृते न शक्यते सत्त्वगुण, प्रभाष्टुम् ।
अधोमुखस्यापि कृतस्य वह्न, धिः शिखा यान्ति कदाचिदत्र ॥६॥
अप्रार्थितानि दुःखानि, यथैवायान्ति देहिनः ।
सुखान्यपि तथा मन्ये, देन्यमत्रातिरिच्यते ॥ ७ ॥
[ १०६ ] E-सत्पुरुष विदि धैर्यमयाभ्युदये क्षमा, सदसि वाक्पटुता युधि विक्रम । यशसि चाभिरुचिर्व्यसन श्रुती, प्रकृतिसिद्धमिद हि महात्मनाम् ।।१।। येषा मनासि करुणारसरक्षितानि, येपा वचासि पादोपविवर्जितानि । येषा धनानि सलार्थिजनाश्रितानि, तेपा कृते वदति कूर्मपतिधरित्रीम् मनसि बसि काये पुण्यपीयूपपूर्णा, खिभुग्नमुपकारश्रेणिमि प्रीणयन्त । १रगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्य, निजहदि किस त सन्ति सन्त कियन्त चेत सातर बच सुमधुरं दृष्टि प्रसन्नोज्वला शक्ति, क्षान्तियुता मति भितनया मोदीनदे-यापहा । रूप शीलयुत श्रुत गतमद स्वामित्वमुत्सेकता,- निमुक्त प्रकटान्यहो नषसुधाकुण्डान्यमू युत्तमे नम्रत्वेनोनम त परगुणनुतिभि स्वान् गुणान ख्यापयन्त , पुणन्त स्सीयमथ सततकनमहारम्भयत्ना परार्थे । ज्ञान्त्यैवाक्षेपलक्षाक्षरमुखरमुखान दुर्मुखान खर्वयाता, मन्त माश्चर्यचर्यास्त्रि भुवनमरने पन्दनीया जयति ॥ ५ ॥ बदन प्रसादसान सदय हश्य सुधामुचो पापा । करण परोपकरण येषा केपा न ते पद्या १ ॥ ६ ॥ यथा वित्त तथा पाचो, यथा पाचस्तथा मिया । धन्यारते त्रितये येषा, विसंवादो न विद्यते ॥
[ ११० ] •. १०-उपकार अस्ति जलं जलराशी, तरिक क्षारं विधीयते तेन ? लघुरपि वरं स कूपो, यत्राऽऽकण्ठं जनः पियति ॥ १ ॥ हे हेलाजितबोधिसत्त्व ! वचसा किं विस्तरैस्तोयधे !, नास्ति त्वत्सदृशः परः परहिताधाने गृहीतप्रतः । तृष्यत्पान्थजनोपकार घटना वैमुख्यलब्धायशो,- भारप्रोद्वहने करोषि कृपया सहायकं यन्मरोः ॥२॥ करीरो मरुमार्गवर्ती, यः पान्यसार्थे कुरुते कृतार्थम । कल्पद्रमैः किंकनकाचलस्थै, परोपकार प्रतिलग्भदु स्थै ॥३॥ अर्का:-किं फलसंचयेन भवतां किं व प्रसून नवैः, किं वा भूरिलताचयेन महता गोत्रेण कि भूयसा ? । येषामेवातमो बभूव स पुनर्नवास्ति कश्चित्कुले, छायायामुपविश्य यस्य पथिकास्तृप्नि फलः कुर्वते ॥४॥ न चन्द्रमा प्रत्युपकारलिप्स या, करोति भाभिः कुमुदावबोधनम् । म्वभाव एवोन्नतचेतसामय, परोपकारव्यसनं हि जीवितम् ॥ ५ ॥ किं चन्द्रेण महोदधेरुपकृतं दूरेऽपिसंतिष्ठता, वृद्धौ येन विवर्द्धते ब्रजति च क्षीणे क्षयं सागरः । श्राः ज्ञातं परकार्यनिश्चितधियां कोऽपि स्वभावः सतां, स्वैरंगैरपि येन यान्ति तनुतां दृष्ट वा परं दुःखितम् ॥ ६ ॥ परोपकारः सुकृतैकमूलं, परोपकारः कमलादुकूलं । परोपकारः प्रभुताविधाता, परोपकारः शिवसौख्यदाता ।। ७ ।। : - [११] . १ ११-गुण दोपमपि गुणवति जने, दृष्ट्या सुणरागिणो न खिद्य ते । प्रीत्यैर शशिनि पतितं, पश्यति लोक कलमपि ॥१॥ विषमस्थितोऽपि गुणावन् , स्फुटनरमाभाति निजगुणैरेष । जलनिधिजलमध्येऽपि हिदीयन्ते किं न रत्नानि ॥२॥ गुणा यत्र न पूज्यते, का तत्र गुणिना गति 1? नम्रतपणकमामे, रजक कि करिष्यति ? गुणैरुत्तु गना याति नोच्चैरासनसस्थित । सुमेरुशिखरस्थोऽपि, काक कि गरुदायते १ ॥४॥ गुणहोणा जे पुरिसा फुलस्स गन्ध पति ते मूदा। यसूपन्नेवि धणु, गुण होणे नत्यि टवारो ॥५॥ जन्मस्थान न खलु महिमा वर्णनीयो न पों, दूरे शोमा पपुपि निहिता पङ्कशवा करोति । याप्येये सालसुरभिद्रग्या धापहारी, को जानीते परिमलगुण पस्तुफस्तूरिकाया ? ॥६॥ कोशेयं कृमिज सुवर्णमुपलादर्यापि गोनोमत , पात्तामरस शशाङ्क होरिन्दीवर गोमयान् । काष्ठादमिरहे फणादपि मणिगोपित्ततो रोचना, पाकाश्य स्वगुणोदयेन गुणिनो गच्यन्ति जिमना ? ॥७॥ गुणेष्वादर कार्य, किमाटोपे प्रयोजनम् ? विमीयन्ते न पएटाभित्र चौरविजिता ॥८॥ १ गुणाहीना पुरुषा , पुनस्य गई यान्यि ते महा । पशोप नेवि धनुषि, गुणीने नास्ति यार 1 1
[ ११२ 11
1
11.
-
१२-सत्संग
धनाढ्यता राजकुलेऽभिमान, प्रियानुकूला तनया विनीताः ।
धर्मे मतिः सज्जनसंगतिश्च, स्वर्गाः षडेते जगतीतलान्तः ॥ १ ॥
नेवास्वाद्यरसायनस्य रसनात्पीयूपपानाञ्च नो,
नो साम्राज्यपदाप्तिः, प्रतिदिनं नो पुत्रलाभादपि ।
नेवायत्नसुरत्नलाभवशतो नेवान्यतोऽप्यस्ति सा,
1. " या संप्रीतिरुदेति सज्जननृणां सद्भि. समं संगमात् ।।२।।
संतप्तायसि संस्थितस्य पयसो नामापि न ज्ञायते'
'मुक्ताकारतया तदेव नलिनीपस्थितं राजते ।
स्नाती सागरशुक्तिसपुटगतं तज्जायते मौक्तिकं,
प्रायेणाधममध्यमोत्तमगुणः संवासत' संभवेत् ॥
गुणवज्ञ नसंसर्गाद्याति, स्वल्पोऽपि गौरवम् ।
पुष्पमालानुषंङ्गण, सूत्रं शिरसि धार्यते
॥४॥
उन्नतघनमध्यगतं, निर्गुणमपि वहति सुरधनुः शोभाम् ।
तेन महद्भिः सार्द्ध, संवासः प्रार्थ्यते सद्भिः ॥ ५ ॥
नीचोऽपि परिगृहीतो, महात्मभिः परमुपैति परभागम् ।
स्फटिकोपलोऽपि रक्तः कुशलर्माणिक्यमनुकुरुते ॥ ६ ॥
चन्दन शीतलं लोके, चन्दनादपि चन्द्रमा: ।
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये, शीतलः साधुसंगम ॥७॥
महिमानं महीयांसं, सङ्गः सुते महात्मनाम् ।
मन्दाकिनीमृदो वन्द्या,-त्रिवेदीवेदिनामपि ॥ ८ ॥
संसारकटुवृक्षस्य, द्वे फले एमृतोपमे ।
सुभापितरसास्वादः, संगतिः सुजने जने ॥ १ ॥
[ ११३ । . ८ १३-दान पानेन भूनानि प्रशोभवति, लानेन वैराण्यपि यान्ति नाशम् । परोऽपि वधु-समुपैति दाना,-ततः पृथिव्या प्रघरं हि दानम् ॥१॥ दानेन पक्रित्वमुपैति जन्तु, दानेन देवाधिपतित्समुच्चे । । दानेन निशेषयशोऽभिवृद्धि-दान शिवे धारयति कमेण ॥२॥ दान मानवदानवे द्रपदधीविस्तारण प्रत्यल, दान पासमुन्दरीसरभसकोडाकलाकौशलम । दाम मोक्षपाटपाटनविधी स्फूर्जत्सुरेन्द्रायुध, दान विष्टपजन्तुपुण्यनिरहमासादमिहध्वज पाने धर्मनिय धन तदितरे प्रोद्ययारयापक, मिने प्रीतिविध रिपुजने वैरापहारक्षमम् । भृत्ये भक्तिमरावह नरपती सन्मानपूजाप्रद, भट्टादौ च यशस्कर वितरण न फाप्यो निष्फनम् ॥ ४ ॥ देवाना सदन सुपर्णशिखरी सर्व सहा मेदिनी, रत्ना निलयश्च कुम्भतनयोऽनन्तस्तथाऽपति । स्वर्माणुनिशित सुदर्शनमयो ज्येष्ठ फर फेशव , सोऽयं मोपुरुषोत्तमोऽपि यालना दानेन मिनुः फन ॥५॥ जीपति स जीवलोके, यास्य गृहाधान्ति नार्थिनो विमुखा । मृतकवदन्यजनोऽसौ दिनानि पूरयति फालस्य ॥ ६ ॥ पावित्र्य मोतन्य, सति विभवे सचयो न फस्य । पश्येह मधुकीणा, सचितमय परत्यन्ये मा मस्या हीयते पिस, दीयमान कालाधन । पारसमणवादीनां, ददलामेय सपद 1 [ ११४ ] १४-काम दृश्य वस्तु पर न पश्यति लगत्यन्धः पुरोऽवस्थितं, कामान्धस्तु यदस्ति तत्वरिहरन् यन्नास्ति तत्पश्यति । कुन्देन्दीवरपूर्णचन्द्रकलशश्रीमल्जतापल्लवा,- नारोप्याशुचिराशिपु प्रियतमागायु यन्मोदते ॥१॥ क्रिमु कुवलयनेत्राः सन्ति नो नाकनार्य- खिदशपतिरहल्यां तापसी यत्सिपेवे । इयतृणकुटीरे दीप्यमाने स्मराग्ना- कुचितमनुचित वा वेत्ति कः पण्डितोऽपि ? ॥२॥ शम्भूस्वयम्भुहरयो हरिणेक्षणाना, येनाऽक्रियन्त सत्तं गृहकर्मदासा: । वाचामगोचरचरित्रपवित्रिताय, तस्मै नमो बलवते कुसुमायुवाय मत्तेमकुम्भदलने भुवि सन्ति शूराः केचित्प्रचण्डमृगराजवधेऽपि दक्षाः । किं तु ब्रवीमि बलिनां पुरतः प्रमा, कंदर्पदर्पदलने विरला मनुष्याः भये चेतोमत्स्य ! भ्रमणमधुना योवनजले, त्यज स्वच्छन्दत्वं युवतिजलधौ पश्यसि न किम ? वन्जालीजालं स्तनयुगलतुम्बीफलयुतं, मनोभूकैवतस्तत्र मरण हेनोभ्रंमयति दिवा पश्यति नो घूकः, काको नक्तं न पश्यति । अपूर्वः कोऽपि कामान्धो, दिवानकं न पश्यति ॥ ६ ॥ ! A * [ ११५ ] १५-स्त्री संसारे' हयविहिणा, महिलारूवेण मदिन पास। অলনি আমায, অ্যামাৰি বৰি मानो म्लायति पौरुप विगलति क्लेश समुमोलति, स्थय जीर्यति धैर्यमेति विपद गम्भोरिमा भ्रस्यति । बुद्धिधाम्यति न प्रशाम्यति रुजा चेवोऽधिक ताम्यति, क्लाम्यवि कामिनीमदिरया मत्स्य पु सो रहा स्मितेन भावेन मदेन लत्रया, पराद मुखैरर्द्धकटाक्षवीक्षित षयोभिर्या लहेन लीलया, समन्तपार्श खलु धा खिय ॥३॥ समोहयति मदयन्ति बिटम्बयन्ति, निर्मर्सयन्ति रमयन्ति विपादयति । एका प्रविश्य सदयं हृदय नराणा, किनाम वामनयनान समाचरन्ति ! दुरितषनधनामी शोककासारपाली, भवकमलमराली पापतोयप्रणाली। विकटकपटपेटी मोहमूपालचेटी, विषयषिषभुमही दुखसारा की सन्पुरालक्तपादवाटितो, दुमोऽपि यास विकसत्यचेतन । तपद गयस्पशरसाद्यीकृतो, पिलीयते यन्न नरस्तभुवम् ।।६।। - . १ ससारे हतविधिना, महिलारूपेण मंरित पाया। बम्पन्ने थानाना, अबानाना भरि सप्पन्वे ।।
[ ११६ ] 3 । ॥ 11 ॥ ३ ॥ ।४ १६-प्रकीर्ण 'सव्व विलवित्र गीलं, सन्वं न विडवणा। सम्वे श्राभरणा भारा, सम्वे कामा दुहावहा भोगे रोगभयं सुखे क्षयमय वित्त च भूभृद्भयं, माने म्लानिभय जये रिपुभयं वंशे कुयोषिद्भयम् । दास्ये स्वामिभयं देहे कृतान्तद्भयं, सर्व नाम भयं भवेदिदमहो वैराग्यमेवाभयम् विकम्पत्ते हस्तयुग वपुः श्रीः, प्रयाति दन्ता अपि विद्रवन्ति । मृत्यावुपागच्छति निलिम्बं. तथापि जन्तुर्विषचाभिलाषी भत्रिदितपरमानन्दो, वदति जनो विषय एव रमणीयः । तिलतैलमेव मिष्टं, येन न दृष्टं घृतं क्यापि वनेऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिणां, गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः । अकुत्सिते कर्माणि यः प्रवर्तते, निवृत्तरागस्य गृहे तपोवनम् ॥ ५ ॥ कुरङ्गमातङ्गभृङ्ग-मीना हताः पञ्चभिरेव पञ्च । एक: प्रमादी स कथं न हन्याधः सेवते पंचांभरेव पंच वृक्षं क्षीणफलं त्यजन्ति विहगा:शुष्क सरःसारसा., पुष्पं पयुर्पितं त्यजन्ति मधुपा दग्धं बनान्तं मृगाः । निद्रव्यं पुरुष त्यजन्ति गरिएका भ्रष्टं नृप सेवकाः, सर्व स्त्रार्थवशाजनोऽभिरमते नो यस्य को बल्लभः रजा दवे होइ मई अहवा नरुणीसु रूवतीसु। सा जइ जिणवरधम्मे, करयलमज्ज्ञ ठिा सिद्धी ॥८॥ १ सर्व गीतं विलपित, सई नृत्य बिडम्बना । सर्वाण्यामरणानि माराः, सर्वेकामा दु.खाबहाः ॥ २--या द्रव्ये भवति मतिपयवा तरुणीषु रूपवतीपु । सा यदि जिनवग्ध करतलमध्ये स्थिता सिद्धिः । ॥ १ M .
॥ॐ नमोऽहंदयः । ऐं नमः॥ - उपाध्यायजी श्रीक्षमाक्ल्यणाजी प्रणीत- त्रैलोक्यप्रकाशाख्या- श्रीचैत्यवन्दन-चोवीशी । aani श्रीऋषभदेवजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (1) (शार्दूलविक्रीडित छन्द) सद्भक्त्यानतमोलिनिर्जरवरम्राजिष्णुपौलिप्रमा-- समियाऽरुणदीविशोभवरणाम्भोजदयः सर्वदा । सर्वज्ञः पुरुषोत्तमः सुचरितो धर्मार्थिनां प्राणिनां, भूयाद् भूरिविभूतये मुनिपनि, श्रीनामिमनुजिनः ॥१॥ सद्बोधोपचिताः सदैव दधता प्रौढप्रतापत्रियों, येनाऽज्ञानतमोवितानमखिल विक्षिप्तमन्तःक्षणम् । श्री जयपूर्वशैलशिपर मारवानिवोदासयन्, । भव्याम्भोजहित स एप जयतु श्रीमारदेवमाशा -- -- [ ११८ ] यो विज्ञानमयो जगत्रयगुरुयं सर्वलोकाः श्रिताः, सिद्धिर्येन वृता समस्त जनता यस्मै नतिं तन्वते यस्मान्मोहमतिर्गता मतिभृतां यस्यैव सेव्यं वचो, यस्मिन् विश्वगुणास्तमेव सुतरां वन्दे युगादीश्वरम् ॥३॥ श्रीअजितनाथजिनेन्द्र--चैत्यवन्दनम् (२) (मालिनी-छन्दः) सकलसुखसमृद्धिर्यस्य पादारविन्दे, विलसति गुणरक्ता भक्तराजीव नित्यम् । त्रिभुवनजनमान्यः शान्तमुद्राऽभिरामः, स जयति जिनराजस्तुणतारङ्गतीथें ।। १ ।। प्रमवति किल भव्यो यस्य निर्वर्णनेन, व्यपगतदुरितीघः प्राप्तमोदप्रपञ्चः । निजबलजितराग पविद्व पिवर्ग, तमजितवरगोत्रं तीर्थनाथं नमामि ॥२॥ नरपतिजितशत्रोर्वेशरत्नाकरेन्दुः, सुरपति-यतिमुख्यक्तिदः समर्व्यः । दिनपतिरिव लोकेऽपास्तमोहान्धकारो, जिनपतिरजितेशः पातु मां पुण्यमूर्तिः ।। ३ ।। -- [ ११९ ] श्रीसंभवनाजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् ( ३) (खग्यरा-छन्द) पद्भक्त्यासक्तचित्ताः प्रचुरतरमानान्तिमुक्ताम नुष्या, सजाता: साधुमागोलसितनिजगुणान्वेपिणः सद्य एव । स श्रीमान समवेशः प्रशमगसमयो विश्वविश्वोपकर्ता, सद्भर्ता दिव्यदीप्तिः परमपदकृते सेव्यता मव्यलोकाः || शुक्लन्यानोदकेनोज्ज्वलमतिशयितस्वच्छभावाद्भुतेन, स्वस्मादात्य वृत्त शिवपद निगम क्मंगप्रपञ्चम् । नोरन्ध दूरयित्वा प्रकृतिमुपगति निकित्यस्वरूपा, सेवयस्ताक्ष्यध्वजोऽमी जगति जिनपतिवीतगणः सदेव ॥३॥ बाधौं विद्योतिरत्नप्रकर इव परिम्राजते सबकाले, यस्मिनि शेषदीपव्यपगमविशदे श्री नितारेस्तनूजे । दुष्पारो दुष्टसचे स्फुटगुणनिकाः शुद्धबुद्धिशमादित, कन्गण पीनिवासः स भवति वदताऽम्पचनीयो न केपाम् ॥३॥ श्रीअभिनन्दनजिनेन्द्र- चैत्यवन्दनम् (४) (द्रतषिलम्पित छन्द) विशदशारदसोमम्मानन:, कमलको मलचारुविमोचन शुचिगुण सुतराममिनन्दन । जय सुनिर्मलवाञ्चतभूवनः ।। १ ।।
[ १२० ]. नगति कान्तहरीश्वरलाञ्छित- क्रमसरोरुह ! भूरिकृपानिधे! । मम समीहित सिद्धि विधायक, स्वदपरं कमपीहन तर्कये ॥२॥ प्रवरसंवर ! संवरभूपते- स्तनय ! नीति विचक्षण ! ते पदम् । शरणमस्तु जिनेश! निरन्तरं, रुचिरभक्तिमयुक्तिभृतो मम ॥ ३ ॥ श्रीसुमतिनाथजिनेन्द्र- चैत्यवन्दनम् ( ५ ) (उपेन्द्रवज्ञा-छन्दः) सुवर्णवर्णो हरिणा सवों, मनोवनं मे सुमतिर्वलीयान् । गतस्ततो दुष्टकुदृष्टिराग- धनोपमा गर्जति मानसे मे। अहो गुरुद्वेषहुताशन ! त्वा- मसो शमं नेष्ययति सद्य एव ।। २ ॥ इता सुदूरं ब्रज दुष्टबुद्धे !, समं दुरात्मीयपरिच्छदेन ।
११]
सुधुद्धिमा सुमतिर्जिनेशो,
मनोरमः स्वान्तमिवो मदीयम् ॥३॥
श्रापद्मप्रभजिनेन्द्र--वैत्यवन्दनम् (६)
(मुजङ्गप्रयात-चन्द)
उदारप्रभामण्डले समान,
कृताऽत्यन्तदुर्दान्तदोषापमानः ।
सुसीमाना। श्रीपतिर्देवदेव,
सदा मे सदाऽभ्यर्चनीयस्त्वमेव ॥१॥
पदीय मनः पङ्कज नित्यमेव,
त्वपालकत ध्येयरूपेणदेव ।।
प्रधान स्वरूप उमेवाऽतिपुण्य,
मगनाथ ! नानामि लोके सुधन्यम् ॥२॥
अतोऽघीश! पयप्रभाऽऽनन्दधाम,
स्मरामि प्रकाम तवैवान नाम ।
मनोवाञ्छितार्थप्रद योगिगम्य,
यथा चकवाको स्वेर्धाम रम्यम् ॥३॥
[ १२३ । उदारचारित्रनिघे जगत्प्रभो।, तवाननाम्भोजविलोकनेन मे व्यथा समस्ताऽस्तमितोदित सुख, यथा तमिस्रा दिवमतेजसा ॥२॥ सदैव मसेवनतत्परे जने, भवन्ति सऽपि सुरा सुदृष्टयः । समग्रलोके समचित्तवृत्तिना. स्त्येव सजातमतो नमोऽस्तु ते ॥३॥ श्रीसुविधिनाथ जिनेन्द्र-चैत्यवदनम् (8) (बसन्ततिलका-छन्द) विश्वामिवन्य मकराङ्कितपादपद्म !, मुग्रीवजात जिनपुङ्गव शान्तिसम ।। भव्पात्मतारणरोचमयानपात्र 1, मा तारयम्व भववारिनिर्विरूपान् ॥ १॥ नि.शेषोपविगयोद्भवमोक्षमार्ग, मन्या पन्ति मवदाश्रयतो मुनीन्द्र ! मसेचित्त. सुरमणिबहुधा जनानां, किं नाम नो भवति कामिवसिद्धिकारी १ ॥२॥ विज्ञ कपारसनिधि सुविधे! स्वपभू- मता भवन्तमिति विज्ञपयामि वावन् ।
[ १२६ ]
पार्थिवेशवसुपूज्यवेश्मनि, प्राप्तपुण्यजनुपं जगत्प्रभुम् ।
वासुपूज्यपरमेष्टिनं सदा, के स्मरन्ति न हि तं विपश्चितः१ १३॥
श्रीविमलनाथजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१३)
(मन्दाक्रान्ता-छन्दः)
-
संसारेऽस्मिन् महति महिमाऽमेयमानन्दिरूपं,
त्वां सर्वशं सकलसुकृतिश्रेणिसंसेव्यमानम् ।
दृष्ट्वा सम्यग्विमलसदसज्ज्ञानधाम प्रधान,
संप्राप्तोऽहं प्रशमसुखदं संभृतानन्दधीचिम् ॥ १ ॥
ये तु स्वामिन् ! कुमतिपिहितस्फारसद्बोधमूढाः,
सौम्याकारां प्रतिकृतिमपि प्रेक्ष्य ते विश्वपूज्याम् ।
द्वेषोद्भुतेः कलुपितमनोवृत्तयः स्युः प्रकामं,
मन्ये तेषां गतशुभदृशां का गति विनीति ॥ २ ॥
श्यामासूनो ! प्रतिदिनमनुस्मत्य विज्ञानिवाक्यं,
हित्वाऽनार्य कुमतिवचनं ये भुवि प्राणभाजः ।
पूर्णानन्दोलसितहृदयास्त्वां समाराधयन्ठि,
श्लाघ्याचाराः प्रकृतिसुभगाः सन्ति धन्यास्त एव ॥३॥
। १२७ ]
श्रीअनन्तनाजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१४)
(स्रग्विणी-छन्द)
यस्य मव्यात्मनो दिव्यचेतीगृहे,
सर्वदाऽनन्तचिन्तामणिधोतते ।
पान्ति दूरे स्वतस्तस्प दुष्टापदो,
विश्वविज्ञान वित्त मवेदक्षयम् ॥१॥
यस्तु सवज्ञरूप स्वरूपस्थित,
वीक्ष्य मद्धावता सिंहसेनात्मजम् ।
अद्भुताऽऽमोदमदोहमपूरितो,
मन्यते धन्यमात्मीयनेत्रद्वयम् ॥२॥
सोऽपवर्गानुगामित्वमागेज्ज्वला,
व्यूढमिथ्यात्वविद्रापणे तत्पराम् ।
पन्धुगत्मानुभूतिप्रकाशोधता,
शुद्धसम्पत्यसपचिमासम्बठे ॥ ३ ॥ (युगम्मम्)
श्रीधर्मनाजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१५)
( कामकोटा-छन्द)
माम्बन्जान शुद्धात्मान धर्मशान मयान,
शक्त्या युक्त दोपोन्मुस्त सुचामक्त सद्भक्तम् ।
शश्वछान्त कीया शान्त घस्तधान्त विश्राम,
क्षिप्तावेश सतपदेश थी धर्मश वन्दधम् ॥ १ ॥
[ १२६ ]
महिमधाम भजामि नगरये,
वरमनुत्तरसिद्धिसमृद्धये ॥३॥ (त्रिमिविशेषकम् )
-
श्रीकुन्थुनाजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१७)
(गीतपद्धति छन्द)
जय जय कुन्युजिनोत्तम सत्तमतत्वनिधान !
धर्मिजनोज्ज्वलमानसमानसहससमान ।।
ज्ञानाच्छादवमुख्यमहोद्धतकर्मविमुक्त !,
विपमविषयपरिमोगविरक्त शुमाशययुक्त ! ॥१॥
जप जय विश्वजनीन मुनित्रजमान्य । विशुद्ध-
चेतन चारुचरित्रपविनितलोक विबुद्ध !
निरुपममेरुमहीधरधीर 1 निरन्तरमेव,
गविवर्जित सर्वसुपर्पविनिर्मितसेव
जय जय सूरनरेश्वरनन्दन चन्दनकम्प 1,
जिनेश विश्वविमावविनाशक वीतविकल्प।।
निर्मलपलबोधविलोक्तिलोकालोक 1,
प्रादुर्भूतमहोदयनिति नित्यविशोक ! ॥३॥
[ १३० ]
श्रीअरनाजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (१८)
( रामगिरिगगेण गीयते)
दिव्यगुणधारकं भव्यजनतारकं,
दुरितमतिधारकं सुकृतिकान्तम् ।
जितविषमसायकं सर्वसुखदायक,
जति जिननायकं परमशान्तम् ॥ १ ॥
स्वगुणपर्यायसंमीलितं नौमि तं,
विगतपरभावपरिणतिमखण्डम् ।
सर्वसंयोगविस्तारपारंगतं,
प्राप्तपरमात्मरूपं प्रचण्डम् ।।दिव्यगुण ।। २ ।
साधुदर्शनवृतं भाविकः प्रस्तुतं,
प्रातिहार्याष्टकोद्भासमानम् ।
सततमुक्तिप्रदं सर्वदा पूजितं,
शिवमहीसार्वभौमप्रधानम् ॥दि०॥ (त्रिभिर्विशेषकम् )
श्रीमल्लिनाथजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् १९)
(गोतनी चाल)
कुम्भसमुद्भव संमदाकर मुणवर !
हेमल्लिजिनोत्तमदेव !, जय जय विश्वपते ! ॥ १ ॥
[ १३१ ] कृत्याकृत्यविवेकिता जिन समुचिता । हे त्वयि जागति जिनेश 1. जय जय विश्वपते । ॥२॥ नित्यानन्दप्रकाशिका भ्रमनाशिका । हे तव शुभदृष्टिरनीश !, जय जय विश्वपते ! ॥३॥ शुद्धिनिबन्धनमन्निधे सद्गुणनिधे ।। हे वर्जितसर्वविकार , जय जय विश्वपते ॥४॥ निजनिपाधिकमपदा शोमित सदा । हे निर्मलधर्मधुरीण !, जय जय विश्वपते ! ॥ ५ ॥ श्रीमुनिसुव्रतजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (२०) (अन्यगेयपद्धति-रंग उत्तमचतन धर्मसमृद्ध जगत्पते !, नित्यानित्यपदार्थनिचय विलसन्मते । । निज विक्रमजितमोहमहोटभूपते !, श्रीपातनात सुजातहरिद्युते ! ॥ १ ॥ श्रीमुनिसुनत सुव्रतदेशक ! सजना, कृतसद्गुरुशुभनाक्यसुधारसमजनाः। ये प्रणमन्ति भवन्तमनन्तसुसाश्रित, केवलमुजालमावमखण्डमनिन्दितम् ॥ २ ॥ ते नि:सशयमेव जगप्रयवन्दिवार, सद्भावेन भवन्ति सुदृष्टयानन्दिताः।
[ १३२ ] कृत्यं स्त्रोचितमेव यतः किल कारणं, जनयति नात्मविरुद्धमिहाऽसाधारणम् ।। ३ ।। (त्रिभिर्विशेषकम् ) श्रीनमिनाथजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (२१) (पश्चचामर-छन्दः) नमीश निर्मलात्मरूप सत्यरूप १ शाश्वतं, परोर्ध्वसिद्धिसौधमूर्ध्नि सत्स्वभावतः स्थितम् । विधाय मानसाब्जकोशदेशमध्यवर्तिन, स्मरामि सर्वदा भवन्तमेव सबदशिनम् ।। १॥ प्रफुल्लकोञ्चलाञ्छन ! प्रभूततेजसोऽद्य ते, दिवाकरस्य वा महेश्वराऽभिदर्शनेन मे। प्रमादवर्धिनी सुदुर्मतिनिशेव दुर्भगा, गता प्रणाशमाशु हत्कजे विनिद्रताऽभवत् ॥ २ ॥ निरस्तदोषदुष्टकष्टकार्यमर्त्यसंस्तकी, भवे भवे भवत्पदाम्बुजैकसेवकः प्रभो ! भवेयमीदृशं भृशं मदीयचित्तचिन्ततं, तव प्रसादतो भवत्ववन्ध्यमेव सत्वरम् ।। ३ ।। , १ Relan
-
.
[ १३३ ]
श्रीनेमिनाथजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् [२२]
( उपजाति-छन्द)
विशद्धविज्ञानभृता वरेण, शिवात्मजेन प्रशमाकरण ।
येन प्रपासेन रिनैव काम, विजित्य विक्रान्तनर प्रकामम् ॥१॥
विहाय राज्प चालस्वभाव, रानीमती राजकुमारिका च ।
गत्वासलील गिरिनारशैल, भेजे नत केवलठनियुक्तम् ॥ २ ॥
निःशेपयोगीश्वरमौलिरत्न, जितेन्द्रियत्वे विहितप्रयत्नम् ।
तमुत्तमानन्दनिधानमेक, नमामि नेमि विलसद्विवेकम् ॥३॥
(त्रिभिर्विशेषकम् )
श्रीपार्श्वनाथ जिनेन्द्र -चैत्यवन्दनम् [२३]
( पचचामर-छन्द )
श्रयामि जिन सदा मुदा प्रमादवर्जित,
सकीयवाग्विलासतो जितोरुमेघगर्जितम् ।
जगत्प्रकामकामितप्रदानदक्षमत,
पद दधानमुच्चकैरक्तयोपलक्षितम् ।। १ ।।
सतामवद्यभेदक प्रभूतसपदा पद,
क्लक्षपक्षमगत जनेक्षणक्षणादम् ।
सदैव यस्य दर्शन विश विमदितैनसा,
निहन्त्यशातजातमात्ममनिरक्तचेतमाम् ॥ २ ॥
[ १३४ ] अवाप्य यत्प्रसादमादितः पुरुत्रियो नरा, भवन्ति मुक्तिगामिनस्ततः प्रभाप्रभास्वराः । अजेयमाश्वसेनिदेवदेवमेव सत्पदं, तमुच्चमानसेन शुद्ध बोधवृद्धिलाभदम् ॥ ३ ॥ श्रीमहावीरजिनेन्द्र-चैत्यवन्दनम् (२४) (पृथ्वी-छन्दः) वरेण्यगुणवारिधिः परमनिवृतः सर्वदा, समस्तकमलानिधिः सुरनरेन्द्रकोटिश्रितः । जनालिसुखदायको विगतकमवारो जिनः, सुमुक्तजनसंगमस्त्वमसि वर्धमानप्रभो ! ॥१॥ जिनेन्द्र ! भवतोऽद्भुतं मुखमुदारविम्बस्थितं, विकारपरिवर्जितं परमशान्तमुद्राङ्कितम् । निरीक्ष्य मुदितेक्षणः क्षणमितोऽस्मि यद्भावनां. जिनेश जगदीश्वरोद्भवतु सर्व मे सर्वदा ॥२॥ विवेविजनवल्लभं भुवि दुरात्मनां दुर्लभं, दुरन्तदुरितव्यथाभरनिवारणे तत्परम् । तवाङ्ग पदपद्मयोयुगमनिन्द्यवीरप्रभो !, प्रभूतसुखसिद्धये मम चिराय संपद्यताम् ।। ३ ।।
महाकवि-श्रीशोमनमुनिप्रयोत- चतुर्विंशतिजिनेन्द्र-स्तुतयः। श्रीऋषभदेवजिनेन्द्र-स्तुति. (१) ( शार्दूलविक्रीडित वृत्तम् ) भव्याम्भोजविवोधनकतरणे विस्तारिकर्मावली- रम्भासामन नाभिनन्दन ! महानशापदाभासुरैः । भवत्या वन्दित गदगद पिदुपा सपादय प्रोज्झिता- रम्माऽमाम जनाभिनन्दन महानष्टापदाभासुर ॥१॥ ते व पान्तु जिनोत्तमाः क्षतरुनो नाचिक्षिपुर्यन्मनो, दारा विभ्रमरोचिता सुमनमो मन्दारवा राजिता । यत्पादौ च सुगेज्झिता सुरभयाचक्र पतन्त्योऽम्बरा- दाराविभ्रमरोचिता सुमनमो मन्दारवाराऽजिना ॥ २ ॥ शान्ति वस्तनुतान्मिथोऽनुगमनाद् यन्नैगमायनय- रक्षोम जन हऽतुला छिनमदीदोणोङ्गजाल कृतम् । तत् पूज्यर्जगता जिन प्रवचन दृप्यत्वाधावली- रक्षोभञ्जनहेतुलाञ्छितमदो दीपांशमाऽलकतम् ॥ ३॥ शीताशुविपि यत्र नित्यमदघा गन्धादयधुलीकणा- नाली केसरलालसा समुदिताऽऽशु भ्रामरीमासिता । - [ १३६ ] पायाद् वः श्रुतदेवता निदधती तत्राञकान्ती कमी, नाली के रसलालसा समुदिता शुभ्रामरीमासिता ।। ४ ॥ - श्रीअजितनाथजिनेन्द्र -स्तुतिः। [२] (घुष्पिताग्रा-वृत्तम् ) तमजितमभिनौमि यो विराज- बनघनमेरुपरागमस्तकान्तम् । निजजननमहोत्सवेऽधितष्ठा- वनघनमेरुपरागमस्तकान्तम |॥ १ ॥ स्तुत जिननिवहं तमर्तितप्ता- ऽध्वनदसुरामरवेण वस्तुवन्ति । यममरपतयः प्रगाय पार्श्व- धनदसुरामरवेणव' स्तुवन्ति ।। २ ।। प्रवितर वसतिं त्रिलोकवन्धो ! गमनययोगतताऽन्तिमे पदे हे । जिनमत विततापवगवीथी- गमनययो! गततान्ति मेऽपदेह ।। ३ ॥ सितशकुनिगताशु मानसीद्धा- तंततिमिरंमदमा सुराजिताशम् । १ व्यत्यये लुग्वा (सिद्धहेम १-३-५६ ) इत्यनेन रेफस्य लुकि कृते विसर्गामावः।
[ १३७ ]
वितरतु दधती पवि क्षतोद्य-
तततिमिर मदभासुराऽजिता शम् ॥ ४ ॥
श्रीसभवनाथ जिनेन्द्र-स्तुतिः [३]
(श्रार्यागीशि-वृत्तम् )
निर्मिन्नशत्रुभवभय !, श भवकान्तारतार तार ! ममाऽरम् ।
वितर त्रातजगत्रय !, शभव ! कान्तारतारताऽरममारम् ॥२॥
श्राश्रयतु तव प्रणत, विमया परमा रमारमानमदमरी।
स्तुव रहित जिनकदम्बक! विभयाऽपरमार मारमानमदमरी ॥२॥
जिनराज्या रचित स्ता टसमाननयानया नयायतमानम् ।
शिवशर्मणे मत दध दसमाननयानयानया यतमानम् ॥३॥
शृङ्खलभृत् कनकनिभा, या तामसमानमानमानवमहिताम् ॥४॥
श्रीवनशृङ्खला कन-पातामसमानमाऽनवमहिताम् ॥४॥
श्रीअभिनन्दनजिनेन्द्र-स्तुतिः (४)
(नविम्बित-वृत्तम्)
त्वमशुमान्यभिनन्दन नन्दिता-
GONDO
सुरवधूनयनः परमोदरः।
स्मरकरीन्द्रविदारणकेसरिन् ।
पुरव धृनय नः परमोदरः ॥१॥
[ १८ ] जिननराः प्रयतध्वमितामया, मम तमोहरणाय महारिणः । प्रदधतो भुवि विश्वजनीनता- ममतमोहरणा यमहारिणः ॥ २ ॥ असुमनां मृतिजात्यहिताय यो, जिनवरागम नो भवमायतम् । प्रलघुतां नय निर्मथितोद्धता- जिनवरागमनोभवमाय तम् ||३ ।। रिशिखशङ्खजुपा धनुषाऽस्तसत्- सुरभिया ततनुन्नमहारिणा। परिगतां विशदामिह रोहिणी, सुरभियाततनुनम हारिणा ।। ४ ॥ - श्रीसुमतिनाथ जिनेन्द्र-स्तुतिः । (५) (श्रार्यागीति-वृत्तम् । मदमदनरहित नरहित, समते समतेन कनकतारेतारे ! । दमदमपालय पालय, दरादरातिक्षतिक्षपातः पातः ! ॥ १ ॥ विधुतारा विधुताराः, सदा सदाना जिना जिताघाताऽघाः । तनुताऽपातनुतापा, हितमाहितमानवनवविभवा विभवाः ||२|| मतिमति मिनराजि नरा-हितेहिते रुचितरुचि तमोहेऽमोहे । मतमतनूनं नूनं, स्मराऽस्मराधीरधीरसुमतः सुमतः ।। ३ ।।
[ १४० ] . श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्रनाथ-स्तुतिः। (७) ( मालिनी-वृत्तम् ) कृतनति कृतवान् यो जन्तुजातं निरस्त- स्मरपरमदमायामानवाधाऽयशस्तम् । सुचिरमविचलत्वं चित्तवृत्तेः सुपाश्व, स्मर परमद माया मानवाधाय शस्तम् ।। १ ।। व्रजतु जिनततिः सा गोचरं चित्तवृत्तेः, सदमरसहिताया वोऽधिका मानवानाम् । पदमुपरि दधाना. वारिजानां व्यहापीत्, सदमरसहिता या बोधिकामा नवानाम् ।। २ ।। दिशदुपशमसौख्यं संयतानां सदैवो- रु जिनमतमुदार काममायामहारि । बननमरणरीणान् वासयत् सिद्धवासे- ऽरुजि नमत मुदाऽरं काममायामहारि ॥ ३ ॥ दधति रविसपत्नं रत्नमाभास्तभास्व- नवधनतरवारिं वा रणारावरीणाम् । गतवति विकिरत्याली महामानसीटा- नव धनतरवारिं वारणारावरीणाम् ॥४ ।। - - -
[ १४२ ]
श्री सुविधिनाजिनेन्द्र-स्तुतिः । (E)
(उपजाति-वृत्तम)
तवाभिवृद्धिं सुविधिविधेयात् , स भासुरालीनतपादयावन् ! ।
यो योगिपंक्त्या प्रणतो नभःसत्-सभासुरालीनतपादयाऽवन् ।।१।।
या जन्तुनाताय हितानि राजी, मारा जिनानामलपद् ममालम् ।
दिश्यान्मुदं पादयुगं दधाना, सा राजिनानामल पद्ममालम् ।।२।।
जिनेन्द्र भंगैः प्रसभं गभीरा-शु भारती शस्यतमस्तवेन ।
निर्नाशयन्ती मम शर्म दिश्यात्, शुभारतीशस्य तमस्तवेन ॥३॥
दिश्यात्तवाशु ज्वलनायुधाऽल्प-मध्या सिता कं प्रवरालकस्य ।।
अस्तेन्दुरास्यस्य रुचोरुपृष्ठ-मध्यासिताऽकम्प्रवरालकस्य ||४||
श्रीशीतलनाथजिनेन्द्र-स्तुतिः । [१०]
[द्रतविलम्बित-वृत्तम् ।
नयति शीतलतीर्थकृतः सदा,
चलनतामरसं सदलं धनम् ।
नवकमम्बुरुहां पथि संस्पृशत,
चलनताऽमरसंसद लंघनम्
स्मर जिनान् परिणुन्नजरारजो-
जननतानवतोदयमानतः ।
परमनिवृतिशर्मकृतो यतो,
जन नतानवतोऽदयमानतः
॥ २ ॥
{ १४३ } जयति कल्पितकल्पतरूपम, मतमसारतरागमदारिणा। प्रथितमत्र जिनेन मनीपिणा- मतमसा रतरागमदाऽरिणा ॥३॥ धनरुचिर्जयताद् भुवि 'मानवी, गुरुतराऽवितामरसगता। कृतकगत्रवरे फलपत्रमा- गुरुतराविह तामरस गता ।। ४ ।। श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्र-स्तुतिः । (११) (हरिणी- वृत्तम् ) कुमुमधनुपा यस्मादन्य न मोहवश व्यधुः, कमलसदृशा गोताराम बलादयि वापितम् । प्रणमततमा द्राक् थेयास न चाहत यन्मन', कमलसदृशाङ्गी तारा वायला दयितापि तम् ॥१॥ जिनवरततिन वालीनामकारणवत्सला- ऽसमदमहिताऽमारादिष्टाममाननाराऽजय।। नमदमृतभुक्पक्त्या नूना तनोतु मति ममा- ऽसमदमाहितामारादिया समानरराजया ॥२॥ - १ 'मानसी' इति पुस्तकान्तरे पाट ।
[१४६ ॥ २॥ नयनरवरदेभ्यः सारवादस्तुतेभ्यः। ममधिगतनुतिभ्यो देववृन्दाद्गरीयो- नयनावादेभ्यः सारवादस्तु तेभ्यः स्मरत जगतमुद्र जैनचन्द्र चकासत्- कपिपदगमभङ्ग हेतुदन्त कृतान्तम् । द्विग्दमिय ममुद्यदानमार्ग धुताधे- कपिपट गमभङ्ग हे तुदन्त कृतान्तम् प्रचलचिोचितश्वारुगात्रे समुद्यत्- मदमिफलकरामेऽभीमहासेऽरिमीते । मपदि पुरुपदत्ते ते भवन्तु प्रसादाः, सदमि फलकरा मेऽभीमहासेरिभीते ॥४॥ श्रीअरनाथ जिनेन्द्र-स्तुतिः। [१८] मगमुचच्चक्रवर्तिलक्ष्मीमिह तमिव यः क्षणेन तं, मन्नमदमरमानसमारमनेकपराजितामरम् । द्रुतकलधौलकान्तमानमतानान्दतभूरिभक्तिभाक्- सनमदमरमानम सारमनेकपगजिताऽमरम स्तौति समन्तत स्म समवसरणभूमौ य सुरावलि., सकलकलाकलापकलिताऽपमदाऽमुखकरमपापदम् । त जिनराजविसरमुजासितजन्मजर नमाम्यह, सक्लकला कलाऽपकलितापमदारुणकरमपापदम् ।। २ ।।
[ १५४ । . श्रीपार्श्वनायजिनेन्द्र -स्तुतिः । [२३] (सरचरा-वृत्तम् । मालामालानबाहुर्दधददधदर यामुदाग मुदारा- ल्लीनाऽलीनामिहाली मधुरमधुरसां सूचितोमाचितो मा। पातात्पातात्स पावों रुचिररुचिग्दो देवराजीवगजी- पत्रापत्रा यदीया तनुरतनुरवो नन्दको नोदको नो राजी राजीववक्त्रा तरलतरलसत्केतुरङ्गत्तरङ्ग- व्यालव्यालग्नयोधाचितरचितरणे भीतिहृयाऽतिहृया । सारा साराज्जिनानामलममलमतेत्रोंधिका माधिकामा- दव्यादव्याधिकालान नजननजरात्रासमानाऽसमाना ।। २ ॥ सद्योऽसयोगभिवागमलगमलया जैनराजीनगनी- नूता नूतार्थयात्रीह ततहततम.पातकाऽपातकामा । शास्त्री शास्त्रो नराणां हृदयहृदयशोरोधिकाऽवाधिका वा- ऽऽदेया देयान्मुदंते मनुजमनु जरा त्याजयन्ती जयन्ती ||३|| माता या तारतेजाः सदसि सदसिभृत् कालकान्तालकान्ता- ऽपारिं पारिन्द्रराज-सुरवसुरवधूपूजिताsरं जिनारम् । सा त्रासात्रायतां त्वामविषमविपद्धपणाऽभीषणा भा- हीनाऽहीनाग्रयात्नी कुवलयबलयश्यामदेहाऽमदहा ।। - - -