Sanmati Library, Jaipur

Probhodyumarayudaya

Mishra, Umadayal · 2009/09

PDF Proofread

Front matter

३ ॥ इश्तहार॥ ".. . श्रीमद्भागवत भाषाटीका संयुक्त की०७) पु. इस ग्रन्थ के उत्तम होने में कदापि सन्देह नहीं है इसका भाषातिलक व्रज वोली में बहुतही प्यारा है श्राशय प्रत्येक श्लोकों का है क्यों न हो इसके तिलककार महात्मा बजवासी अंगदजी शास्त्री हैं-यह तिलक ऐसा सरल है. किं इसके द्वारा अल्पसंस्कृतज्ञ पुरुषों का पूरा कार्य निकल सक्ता है-संस्कृत पाठक.भी इससे श्लोकों का पूरा प्राशय समझ सक्ते हैं इसवार यह ग्रन्थ टैप . के अक्षरों में उम्दा काराज सफ़ेद चिकना में छापा. गया है और विशेष विज्ञान शात्रियों के - द्वारा शुद्ध कराया गया है जिससे वम्बई की छपीहुई पुस्तक से किसी काम में न्यून नहीं है उम्दा तसावीर भी प्रत्येक स्कन्ध में युक्त हैं-आशा है कि इस अमूल्यरन के लेने में महाशयलोग विलम्ब न करेंगे मूल्य भी इसका स्वल्प रक्खा गया है । चरकसंहिता सटीक मुजल्लिद की० ७॥) पु० यह वही चरकसंहिता, है जो कि वैद्यक ग्रन्थों में सर्वत्र मसिद्ध है व बड़े बड़े वैद्यराजों से अतिशय-माननीय है विद्वान्लोग अन्य ग्रन्थों में लिखी हुई ओपधियों का संग्रह इसके नाम से निर्भय हो करते हैं अब इस प्रसिद्ध ऋषि- प्रणीत ग्रन्थ की प्रशंसा करना केवल इवारत का चढ़ानाही है-इस यन्त्रालय में यह ग्रन्थ बहुत परिश्रम से वनवाया गया और छापागया है जिसमें रुपया भी विशेष व्यय हुआ है यह ग्रन्थ मूल श्लोकों के नीचे भाषा देवनागरी में टीका संयुक्त करके छापागया है यह टीका चरक के वंगला टीका से और मूल श्लोकार्थ दोनों से देखकर किया गया है इस टीका के उत्तम होने में कोई सन्देह नहीं है छपाई भी इसकी बहुत उम्दा है अक्षर उम्दा व काराज सफेद मोटा चिकना लगाया गया है. दो जिल्दों में यह पुस्तक छापीगई है एक जिल्द में सूत्रस्थान, निदानस्थान, विमानस्थान, शारीरकस्थान, इन्द्रियस्थान है और आदि में सूचीपत्र प्रत्येक रोगों का विस्तारसहित लगा है दूसरी जिल्द में चिकित्सितस्थान, कल्पस्थान, सिद्धिस्थान है तसवीरें भी लगाई गई हैं इत्यलम् ॥

JAIP
।
३म्
श्रथ मङ्गलाचरणमाह है
दो। एक अनूप अनाम अज अकल सकल गुण को
जाकें या जग में नरन धरे बहुत विधि नाम ।
चौपैयाछन्द ।।
शैव सकल जाको निशि वासर शिव शिव नाम पुकारें।
वेद तत्व के जानने वाले जाको ब्रह्म उचारें।
शक्ति उपासक जे जगमाहीं जाको दुर्गा जानें।
गाणपत्य सब लोग जासु को नाम गणेश वखाने ।
ध्यान वैष्णव जाको धरिके विष्णु विष्णु कर टेरें।
सौर लोग दिनमणि रवि कहिके जाको प्रतिदिन हेरें ।
बौद्ध लोग जाको वुध कहि के प्रेमाऽधिक उपजावें।
न्यायशास्त्र के जाननवाले कर्त्ता कहि कहि गावें ॥
जैनी सब अहंन्त नाम कहि जामें मनहिं लगावें ।
मीमांसा के पाठक जन सब जाको कर्म बतावें ॥
जे कवीर के शिष्य जगत में जाको साहित्र ‘बोलें।
नानकशाही जाहि रैन दिन वाह गुरू मुख खोलें।
जाको 'मुसल्मीन अल्लह अरु खुदा सदा बतलाते।
जांको इंग्लिस्तान निवासी गाड ईशु कहि गाते ।
महा प्रभू चैतन्ये. कृष्ण जिहिं बंगाली नित ध्यावें।
और बहुत प्रथाई जाको जो बहुं नाम बतावें ॥
जो जल थल नभ में परिपूरण तीनि काल के माहीं।
जाके बिन जाने दुनियां के लोग सदा भरमाहीं॥
ज्यों मृगनाभि मध्य कस्तूरी पर वे अनत ढढोरें।
तैसेहि जाके ज्ञान बिना नर-फिरत खात झक झोरें॥
4
--

२
प्रबोधामण्युदय का मङ्गलाचरण ।
जैसे कोउ मूर्ख अज्ञानी कामधेनु - गृह छोड़े।
दुग्ध काज जंगल में जाके अर्क पत्र को तोड़े।
ज्यों किरात, मुंजाफल बीने मुक्ताफल कहँ त्यागे।
तैसेहि जाहि छोड़ अज्ञानी विषय मुःख महँ पागे ।
सुत दारा धन कुटुम्बादि के लिये वृथा शिर फोरें।
जलचर नगचर जाबिन जाने अमृत छाँड़ि विष घोरें।
ज्यों कपि कीर बिना बंधन के बंधे आप को माने ।
त्यो जड़ जीव जाहि. बिन जाने माया मोह मुलाने।
ज्यों मछली आटाके . कारण तालू मध्य छिदावे ।
त्यों यह जीव जाहि-विन जाने लालच कर, दुख पावे ॥
थूल क्षीण जाको नहिं कहिये श्याम गौरहू नाही।
जाके मिले संधि नहिं रहती यथा, लवण जल माहीं ।
जो बिन पाणि कर्म बहुतेरे करें चरण बिन डोले ।
मुख विन खाय नयन बिन देखे बिन बाणी जो बोले ॥
श्रवण विना जो सुनै प्राण बिन {धै बास घनेरी।
खक रिन परस करै सबसे जो सचित् आनंद ढेरी॥
बाल कुमार तरुण वृद्धापा जाको नाहिंन कूतो।
व्यापक जो सब ठौर- एक रस ज्यों माला, में सूतो॥
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य शूद्र नर नारि नपुंसक नाहीं।
वटु गृहस्थ वनचारि यती नहिं स्वयं प्रकाश्य संदाहीं॥
कारी कुंजर महँ समान जो और कहां लग. गाऊँ।
उमा मिश्र मन वचन, कर्म से ताकहँ शीश नेवाऊँ।
इति मङ्गलाचरणम्॥

'ओम् सच्चिदानन्देश्वरायनमोनमः ॥ प्रबोधद्युमण्युदयकी भूमिका ॥ मैं अत्यन्त हर्षपूर्वक उस सच्चिदानन्द सर्व व्यापक जगत् उपादान कारण भक्तवत्सल सर्व शक्तिमान् सुर मुनिः वन्दित सहस्रार्क समप्रभ एकाधितीय परब्रह्म परमात्माको कोटिशः धन्य- चांद देताहं कि जिसने कृपादृष्टिकर मुझको इस सवर्णों पर • दुष्प्राप्य ब्राह्मणकुलमें जन्मदिया और जो प्रतिदिन प्रतिपल मेरी रक्षा करता है तदनन्तर-विदित हो कि संसार में ब्रह्म को खोज सवही करते आये हैं और करते हैं और अब जगत् में मत मता. न्तर इस आधिक्यतासे फैलगये हैं कि उनकी गणना करना एक साधारण काम नहीं है यद्यपि सर्व आस्तिक मतोंके मुख्य मुख्य नियम एकही हैं परन्तु उनमें अन्यान्य अन्तर इतनी बहुतायत से होगये हैं कि एकमत दूसरेका पूराप्रतिलोमसा मालूम पड़ता है और इसीकारण मत मतान्तर में विरोध भी प्रतिदिन"उन्नति ही करताजाता है-हिन्दू मुसल्मानों को म्लेच्छ-मुसल्मान हिन्दु. ओंको काफिर कहते हैं-आर्यसमाजी पण्डितों को पोप पण्डित आर्यसमाजियोंको लोप और गप्पाष्टकी पतलाते हैं. शैव वैष्ण- वों को और वैष्णव शैवोंको बुरा पुकारते हैं और यही कारणहै कि जगत् से भ्रातृस्नेह और प्रीति उठगई वास्तव में यदि पक्ष- पात छोड़ विचार कियाजाय तो निश्चय ईश्वरीय और सत्यमत एक है और सबकेलिये ईश्वरीय नियम वही हैं क्योंकि हमसब ईश्वर के पुत्र हैं और ईश्चर हम सबंपर समान प्यार करता है- हम सबको अतएव पक्षपात द्वेष ईर्षा छोड़ना उचितहै और सत्य अहण करनाही धर्म है-सवःमत तथा,पंथस्वीकार करते हैं कि सत्य भाषण करना उचितहै-अहिंसा परम धर्महै-किसीका मन दुखा. .. नाथुराहै यही ईश्वरके मुख्य नियम, और सत्यासत्यदर्शक हिता- हित ज्ञान Conscience. ईश्वर ने सब किसी को दिया है-किसी जाति किसी वर्ण तथा किसी देशवासी वा किसी रंगका मनुष्य क्यों न हो-फिर हम क्यों वेदके कहे धर्मसे मुँह छिपावें-क्यों हम पाइबिलका नाम सुनतेही मुँह बिदुकावें क्यों हम अपनेही को सचा और उत्तम समझें और क्यों औरोंको झूठाबूझें हमको उचितहै कि जिसप्रकार हम सब एकहीं माता पिता अर्थात् पर- मात्माके उत्पादित पुत्र हैं सबसे भ्रातृस्नेह करें और ईषौ देष पक्ष- ४ प्रबोधामण्युदयकी भूमिका। पात त्याग सत्यके ग्रहण करने को कटिबद्धहों-क्या आवश्यकता है कि हम मूड़ मुड़ा संन्यासी हों-क्या आवश्यकता है कि हम मुसल्मानहों औरोंको काफिर जानें क्या आवश्यकताहै कि हम अपने धर्मको छोड़ औरोंको पापी और अपने को सचाईसाई बखाने-हम सत्यको ग्रहणकर असत्यके बाल क्यों न मुड़ावें और हम सत्यका कलमा पढ़ मुसल्लम ईमान क्यों न हों अरे हम. पक्ष- पात और देष त्याग सत्यहीका वैपटिज़मा क्यों न ले। जहांतकं बुद्धि पहुँचती है मैं तो यही धर्म कर्तव्य और सत्य मंत जानताहूं कि सत्य ग्रहणकर असत्यका परित्याग करे-और अति हर्षपूर्वक प्रकट करताहूं कि श्री ६ विद्वद्धर्ष पण्डित गयांप्र. साद साहिब बी-ए और मुन्शी महावीरप्रसाद साहिब एक-ए साहिब वकीलके सत्संगतने उत्साह दिलाया कि मैं एक छोटी सी पुस्तक रचकर अपने अन्यान्य मित्रवर्गों और.देश वासियों; को यह उत्कृष्ट संम्मत प्रकाशं करूं और श्रीकृष्णमिन विरचित : संस्कृत प्रयोधचन्द्रोदय नाटकको अवलोकनकर यह मेरा सुंदर उ. त्साह बढ़कर इतना दृढ़हुआ कि आज यह प्रबोधद्युमण्युदय नामक नाटक मैं अपने मित्रवों और अन्यान्य गुण ग्राहकों के लाभार्थ रचकर प्रकाशित करताहूँ-इसके प्रथम अंकमें तो मैंने जीव (मनुष्य), अविद्या निशामें मोहवशहो कैसे मेरा मेरी कहती और मानताहै और कैसे अहंकार रज्जुमें बधाहै दर्शायाहै दूसरे अंकमें कामकी - बलता-तीसरेमें विवेककी प्रशंसाऔर चतुर्थ अंकमें मोहका वर्णन और संसारके दंभ आदिवर्णन किये हैं-पंचम अंकमें मोहकी विभव और परिवारका वर्णन है-षष्ठं अंकमें महामोहको राजा विवेकने कि- सप्रकार दमनकर पराजय किया है खाना है और सप्तम और अ- न्तिम अंकमें विवेक विजयपुरुषका अंविद्या निशामे जागना-प्रयो- धोदय और पुरुष प्रति उपनिषद् और सत्य के हितोपदेश हैं। आशाहै कि सर्व सज्जन पुरुष इस छोटीसीपुस्तकके गुण ग्रहण करेंगे और सम्पूर्ण जन अवलोकन कर केवलं कहींहीं कहीं मेरी धृष्टताको ध्यान में ला-मुझको व्यर्थ और अनुचित दोष न देखेंगे। १ सितम्बर सन् १८६२ ई. सर्व मित्रोंका हिताभिलाषी उमादयाल मिश्र.

श्रीगणेगांगता अथ प्रबोधद्युमण्युदयः॥ . प्रथमअङ्कः. (रंगभूमि में एक मनुष्य आशीर्वाद पढ़ताहुआ आया) श्लो: । वेदान्तेपुयमाहुरेकपुरुपं व्यापस्थितरोदसी :: यस्मिन्नीश्वरइत्यनन्यविषयः शब्दोयथार्थाक्षरः। अन्तर्यैश्चमुमुक्षुभिर्नियमितप्राणादिभिर्मुग्यते . : सस्थाणुःस्थिरभक्तियोगसुलभो निश्रेयसायास्तुवः ।। वेदान्तों में जिसको एक पुरुष अर्थात अदितीय ब्रह्म कहते हैं जो पृथ्वी और स्वर्ग में व्याप्तहोकर स्थित है जिसमें ईश्वर यह शब्द अनन्य विषय अर्थात् एक मात्रका वाचक और यथार्थ अक्षरों से अर्थवान है जिसको मुक्तिके अभिलाषक जन प्राणआदि इन्द्रियों को नियमित करके अन्तःकरण में ढूँढ़ते हैं और जो स्थिर भक्ति योग करके सुलभ है सोई स्थाणु शिव तुम सबोंके लिये कल्याण कारीहो ::: (नीन्दी के पीछे सूत्रधार आया). सूत्रधार । बस वस अब.अति विलम्ब करने से क्या प्रयोजन- (नेपथ्यकी ओर देखकर ).मारिष यह सभा. अगले कवियों के . अनेक रसप्रबंधको देखचुकी है सो आज मैं भी इस में एक प्रति मनोरंजन (प्रबोधद्युमण्युदयः) नवीन नाटकः किया चाहताहूँ तुम पात्रवर्गसे कहदो कि वे सब सावधान होजायें ।।

प्रबोधामण्युदयः। (नटाया).. नट। जैसी आज्ञादीजै॥ सूत्रधार। इस समय बड़े बड़े पूजनीय पण्डित महाशयों से मैं : निवेदन करताहूं कि आपको हमपर कृपादृष्टिकरनाही होगी वा. उत्तम वस्तुको बहु आदरमान देताही पड़ेगा अब आप लोग स- चेतहो इस परमानन्ददायक नाटक को सुखपूर्वक अवलोकन कीजिये॥ (नेपथ्यमें यह शब्दहुआ) दो। मम धन ये पितु मातु मम यह सुन्दर मम ग्राम। ...मो अग्रज मो अनुज यह मम उत्तम यह धाम ॥ सूत्रधार। (अति आश्चर्यसे इधर उधर देखकर) हहैं यह कौन है जो यह मेराधन.ये मेरे पिता माता-मेरा ग्राम इत्यादि अज्ञानीक वचन कहता और: अतिः आनंदित होरहा है- कौनहै (कुछ सोच कर) हो हो जाना यह जीवहै जोकि अविद्या निशा में ज्ञानहीन निदा ले रहाहै और स्वमवत् दशामें होकर असत्यं को भी सत्यही मानरहाहै ।। (नट और सूत्रधार दोनों बाहर गये ॥ (मित्रवर्गोसहित जीवका रंगभूमि में प्रवेश:) जीव०। (अति आहादसे) ... दो। मम धन ये पितु मातु मम यह सुन्दर मम ग्राम । मो अग्रज.मो.अनु.ज यह मम, उत्तम यह धाम ।। कुण्डलिका । सुभग लमानी ग्राम इक गंगा के वा पार। भयो तहाँ श्री विप्रवर प्रकट सकल संसार प्रकट सकल संसार नाम तिहिं. बोधी जानो। सोइ लमानी मिश्रः आदि पुरुषा जिय ठानो। शून्य सिद्धिं शरभूमिभा पवार .संवतमुजगः। श्रीमबोधीमिश्र कियनिकेत . सुरपुरः सुभग ।।

प्रवोधामण्युदयः।
दो । कमलमिश्र तिहिं पुत्र गे तासुपुत्र गोपाल ।
...तिहिमुत गार्गिप्रसादमें चन्द्रदत्त जिहिलाल ॥
तासु तनय भे.चण्डिका मथुरा जिनकरपूत ।
जासु सुकृत जनु देहधरि माधोभे हरि दूत।
कुण्डलिकां। माधो के सुत होत मे कमल नैन सुखदैन ।
रम्य लमानी ग्राम महँ जिनके मधुरे वैन.॥
जिनके मधुरे वैन सात. गोशत. जिन कीन्हे।
सुन्दर वाग तडाग शिवालाहू.रच दीन्हे ।।
लोगन-कहँ उपदेश कियो हरिहर अवराधो।
तनमन.चित्तलगाव तबहिं मिलिहैं.श्रीमाधो ॥ .."
दो० । शररस मुनिक्षितिविक्रमी संवतं काशीवास ।
कमलनैनं तनु त्यांगकिय लैआतुर संन्यास ।।
तिहिं सुभाग्य ववंशमणि प्रागदत्त में आय।
तासु वंश. भूषणं. भये शंकर मिश्रसुकाय ।।
जायबसे शिवराज पुर शंकर मिश्र, सुजान।
भये दयानिधि पुत्र तिहिं वैभव वित्तमहानं ।।
तासुपुत्र मण्डन भये भगुंत नगरमहँ आय।
जासुतनयधनसूरजगसुयशरह्यो तिहिंछाय।।
भयो व्याह घन सूरको पुर रसूलमहँ जाय।
रहे तहाँ धन पायबहु मनमहँ अतिहर्षीय ॥
तहते उठपुनि प्रायके. बसे कालपी माहि।
ईश्वर आराधनकरतदिनसुखसहित सिराहि ।।
रामप्रसाद सुपुत्र तिहिं उपजे जगप्रख्यात । :::
रामदास जिनकर तनयः विष्णु भक्त भे तातः॥
सोरठा । मिश्रेश्वरी प्रसाद तिनकर सुत जगहोतभे।

प्रबोधद्युमण्युदयः।
रहें साहित आह्लादं देष मान मनः नेकनहिं
कुण्डलिका । मननिज कुलकर शीलनिधि मिश्रईश्वरीप्रसाद ।
विष्णु भक्त दृढ़ने भये रहैं सदा अविषाद ॥
रहैं सदा अविषाद करें निजवंश उजागर।
निशिदिन प्रफुलितवदन सदनातिमनहुप्रभाकर ।।
संवसन करें सुप्रीति नेहराखें सर्व तिनसन ।
भाष मधुरे वैन रहँ सदैवः अति स्वच्छमन ।।
दो। बाप रामनिधिशशिजबै संवत श्रावणमास ।
मिश्र ईश्वरीप्रसाद तब सुरपुर कीन्हों वास ।।
कुण्डलिका । राजत भासुरलोक महँ प्रफुलित तनुहर्षाय ।
तीनि पौत्र दैपुत्र नहिं जगत राखिसमझाय ।।
जगत राखि समझाय सिखावन बहुविधिदेई
सुतन पढ़ाय बनायं चतुर अद्भुत यश लेंई।।
बाग कूप.शुभभवन उच्च अंति तिहिकरभ्राजत ।
शहर कालपीमाहिं तासु अतिकीर्ति विराजत ।।
दो० । तासुतनय बै प्रकटजंग रवि शशि इव द्युतिमान ।
श्रीमत् मातादीन अरु मनीराम, गुणखान ॥
सो सुवंशः कात्यायनी सुत- श्री मातादीन।
उमामिश्र उतपत भयों सुनिय सुविज्ञः प्रवीन ।।
मित्र । अतिउत्तम तवः भवन-यह परम रस्य तवा ग्राम।
मनारम्य यह बांग:तव जो दायक आराम.)
जीव । आओ मित्र हम-संबं इस बांगमैं चलें और वह सामने
सुन्दर सघन दाडिमवृक्षकी शीतल छाया में बैठकर मि.
त्रविलसिका मुखप्राप्तिकरें।

& परबैठे। . - - प्रवोधामण्युदयः। सबवागमें जाकर इधर उधर टहलनेलगे) मित्र । आहाहा ! यहाँपर कैसी मंद मंद सुगंधितवायु आरहीहै आओ इसगुलावकी क्यारीके निकट उससचिकणशिला (सबबैठगये) मित्र । अच्छातो अब वाकविलास होने दीजिये। दूसरामित्र । हाँ अच्छीबात है होवे-और लीजिये प्रारंभकर्ता इसका मैं होताहूं। कवित्त । शीशपरगंगा घोटपीवै नितभंगा सबैकामतो कुढंगा हैं। मुंडनकीमाला नैनतीसरेमें ज्वाला भृगचर्मका दुशाला जाके मृत्यरणरंगाहैं । वैलपै विराजै पत्नी सिंहचढिगाजे जहँ मूपक.मयूर सर्प बसंत इकसंगाहें । होतनाहिं दंगा , मनीरामसंवचंगा शिवजीसदैवदीन कंजनपतंगाहैं । । तीसरामित्र । शरदऋतुआई तिथिपूनोंमुहाईभाई देखिकैजुन्हाई चित्तसुन्दरकन्हाईकोवाँसुरीवजाई छाईसारेब्रजमंडल में गो- ', पिकालुभाई धाई रागकीनिकाईके सिवन सुभानत्यागेमानै नाहिरोके कोऊपिता पुत्रभाईके । प्रगनके शीशबीच शीश के सुपायनमें धारअलकॉस्मनीराम पासआईशेषशाईके। अन्यमित्र । फूलतचमेली रातचाँदनी सुहाई देखि वाँसुरी बजाय 'नंदनंदन बुलाई.वाम । घाई सवधामछोड़ रोमरोमभल्लो 'काम आई वनबीच जहाँ गढ़े हैं गुपाल श्याम । सबनकी ओरनैनं जौरा चैनबोलेकान्ह रातसमय काननमें कहा है तिहारो काम । करोजायसेवापति आपनीसुधारौगति मानौ भनसीख घरै जाहु जाहु मनीराम ॥ जीव । वाह वाह कैसी आनंद वेला यहहै (-दूसरे मित्र प्रति) अब आप कुछ कहिये। 1-

प्रबोधामण्युदयः।
मित्र। बहुत अच्छा तो लो मैं आपको राग सोरठ एक सुनाताहूं।
कोयलिया छूकत आधीरात ।.....
कारी कारी घटा देखिकै निशिं दिन जिय घबड़ात १
चैन देत नहि पापी पपीहा पीपी के जात
ताके बोल शूल से लागत करमलमले पछितात
विरहा देह जरावत निशिं. दिन करत नये उतपातः
सूखोमांस श्वास नहिं निकसंत पीरोपरिगयो गात ३
मोको करत मोर पिक, दादुर दुर दुर दुर दिनरात
पी बिन सब बैरी भये मेरे कोउ न बूझत वात ४
हाइ, दई निर्दई तुहूँ, अब लग्यो करन मम धात
'पियहिं छुड़ाय बनायःवियोगिनि लाडारी गुज़रात ५
हे बलदेव पियारे तुम बिन छिनछिन जियः अकुलात
"शीघ्र दर्शदेदारहु सब दुख आयगई बरसात ६ ॥
अन्य सर्वमित्रा आहाहा कैसा सामयिकराग मित्रं । तुमने गायाहै
(दूसरे मित्र प्रति) अच्छा अब आप कोई राग सुनाइये ।।
मित्र । मैं एक रागिनी आलापनी गर्किग्रा:-सुनिये ।
जब से पियने बिसारी मुहिनिशिदिन मारत काम कटारी
विरहानले दिन रातः जरावत देह भस्म करडारी
सूनीसेज शूलसमा लागत विषसम : भई उजारी
चन्दनः चन्द चाँदनी मोको आवतः दृष्टि अँगारी
जवतें पियः परदेश सिधारे यह गति भई हमारी
रोय रोय अखियाँ लालभई हैं देहः पीतभई सारी
सगुनः गिनत घिसगई: अंगुरिया मंत्र यंत्रः करहारी,
कोउ न छोड़ो जोशी: पंडितः ढूंढ़ फिरी दिशि चारी
अरे दई निर्दई दई क्यों विपति मोहिं यह भारी
ह

-
प्रबोधामण्युदयः।
११
भीतमको परदेश पढ़ के घोट घोट मोहिं मारी
वेगि पिया से मोहिमिलाओ जाउँ तुमपै. बलिहारी
जन्म जन्म में दासीरहूँगी शालिग्राम तुम्हारी
मित्र । आहाहा आपने तो आनंदही वरसादिया ॥ :-
( इसीवीच छोटे बड़े सब वृक्षों के पातहिलनेलगे मानों
तो इसआनंद को देखा इन जड़ वृक्षोंकाभी मन हर्षसंयुक्त
होअधीरहों डुलगया और आकाशसे मेघगन छोटीछोटी
बूंदों से पानी बरसानेलगा-सबमिन्न आनंदितहो एक
दूसरेंके गलेमें हाथ डाले सघन कुंजोंमें लहरानेलगे)
और एक तरुणावस्था मित्रने मधुर वाणी से उच्चारण किया)
मनोरागस्तीनं विषमिवविसर्पत्यविरतं प्रमाथीनिधूमो
'ज्वलतिविधुतः पावकइव । हिनस्ति प्रत्यंग ज्वरइव गरी
यानितइतो नमांत्रातुंतातः प्रभवतिनचाम्बा न भवती
इसीवाणी से सम्मुखलताओटसे दूसरे मित्र ने मधुरध्वनिकी)
शरीरंक्षामंस्यादसति दयितालिंगनसुखे भवेत्सालंचक्षुः
क्षणमपि नसादृष्यतयदि तयासारंगाक्ष्यात्वमसिन कदा.
चिदिरहितं प्रसक्तेनिर्वाणे हृदयपरितापंवहमिकिम् ॥
जीव । वाहमित्र ! आज परमानंद रहा ।।
आओ अबदेखो वह सम्मुख कैसी सुहावी लताकुंजहै वहां
चलें देखो वहाँ कैसे वृक्षपुष्पवर्षा कररहे हैं:विविध वयार
सुगंधके भारसे मंद मंद चलरही है मानो मदमत्तगयंद.
निर्द्धन्द वलाजाता है। और कभी कोयलका मधुर मधुर
शब्द दूरसे सुनाई आता है वह अमृतरूपी मोर और को-
पकिला का बोल अमोल मनको मोल लिये लेता है।

१२ - - प्रबोधामण्युदयः। मित्र। अहामित्र ! यहबड़ा आनन्ददायक बाग है-इसमें आकर बहुत हर्षहुआ। (नेपथ्यमें) दो० । होतपराजयमोंअछत किहिविधि स्वामीमोह। गणनाकहा विवेककी क्रोध भ्रातके सोंह एकमित्र । देखो देखो यहदेदीप्त मुख कामदेव श्राताहै-जिसनेसं: सार :वशकरलिया है. और मनको आसक्त करताहै-मत्त होनेसे नेत्ररक्त हैं वहदेखो विधुवदनी, मनहरणी प्यारी रतिको संगलिये अतिहर्षके कारण कंपायमानहोरहाहै- अहाहा वह देखो शरीर पुलकायमानहो. रोमांचित भुजों के बीच कठोर कुचवती. नवयौवना प्यारी रतिको छाती सें लगाताहै । वह प्राताहै देखो कामदेव भाताहै-आओ हमसब एकऑरहो. इसआन्दोलनको मुखमाप्ति करेंगे । (संव बाहरंगये इति प्रथमअङ्कः ।। in । अथ द्वितीयअङ्कः॥ (काम और रतिका रंगभूमिमें प्रवेश) कामा(कोषसे) दो। होतपराजयमोंछते किहिविधिस्वामीमोही गणनाकही विवेककी क्रोध भ्रातके सोंह ।। शास्त्रोतन्नविवेकनिश्चित केवल बुधजनोंके हृदयमें तभी तररहताहैजबलौं इन्दोवराती कमलनयनी की विशिष दृष्टि वाणसरिस, भृकुटी धनु में उनपर नहीं पड़ती है ।। सुन्दर रम्यस्थानः-सुनयनी मनमोहनी नवयौवनास्त्री छोटे छोटे पौधे जिनपर मदमत्त गुंजार करते हुए भ्रमरः ।

१३ . प्रबोधामण्युदयः। शोमंदिरहेहैं-मल्लिंका इत्यादि नानाप्रकारकी. मनोहर लतायें--और सुगंधित मन्द मन्द वायु-और मुन्दरचाँदनी रात्रि-ये सब मेरेशस्त्र हैं जिनके वश सर्व संसार होता है तो फिर विवेककी क्या सामर्थ है.?॥..: . रति । विवेक-महाराजाधिराज मोहकाशत्रु बुद्धिवर बहुत है। काम । मेरीप्राणप्यारी तेरास्वभाव-तेरे स्त्रीहोने के कारण भीरहै अरे अरे तूं विवेकसे क्योंभयकरती है- यद्यपि मेरा. धनुष और बाणपुष्पके हैं तथापि प्रिया सर्वसंसारदेव और दानव दोनोमिलके संग्रामभूमिमें मेरी सोही एकक्षण भरंभी नहीं ठहरसक्ने । देवप्यारी जगद्गुरु ब्रह्मा अपनीही पुत्रीपर आसक्तहुआ--सुरराज इन्द्रने अहल्यासे भोगकिया-चन्द्र- मानें अपनी गुरुपत्नी से संभोगकिया ऐसा कौन है जिस ने मेरे वशंहोकर वर्जितमार्ग में पंदनहींरक्खा मेरे बाणों का तीवेधन क्या संसारको बुद्धिभ्रष्टनहीं करदेतीहै ? ॥ रति । सत्यहै--परन्तु जिसकी सहायतामें हमारे अनेकवलवान् शत्रुहैं वह अवश्य भयंकरने के योग्य हैं।' कॉम । उह: इनसाको विनाश बो केवल हमारे उनमें जामिल- नेहीसें होनीयगा-क्रोधके सम्मुख-शीलक्याहै-मेरीसोंही ब्रह्मचारी कौन हैं और लोमके साम्हने दृढ़ता-पवित्रता और अपरिग्रहरि ईमान्दारी ) क्या वस्तु हैं । इसप्रकार इन्द्रियजित होनी--यम-संयम-आसन-प्राणा- याम-प्रत्यार-ध्यान-धर्म और समाधि जिनं सबकी उत्पत्ति मनकी स्थिरतासे है-शीघ्र अदृश्य और लोपहो- जायँगे स्त्रियाँ विनाशकरसती हैं और वे सर्वदा मेरी भ्रू. विलासनीही है-अवलोकन-मधुरभापण-विलास-आलि-

प्रबोधामण्युदयः।
गन और भाव किन्तु केवल उनका स्मरणमात्रही मनको
चलायमान और विकल करनेको समर्थ है-पुनः ये सत्र
: हमारे राजमंत्री अधर्म से जामिलेंगे:जिसके मद मत्सर
और दम्भ सदैव आज्ञानुवर्ती सुहृद्. हैं ।।।
रति। हमसुनती हैं कि तुम्हारी और शमदमः विवेक इत्यादिकी
: उत्पत्ति एकही स्थानसे है।
काम। एकहीस्थान-प्यारी हमसब किन्तु एकही मातापितासे
उत्पत्तिहैं परमात्मा और. मायाके संयोग से प्रथम लोक
प्रसिद्ध पुत्रमन उत्पत्ति हुआ जिसने कि त्रिलोकीकी रचना
करके हमारेदोपुरुषाओं मोह और विवेककोउत्पादन किया-
मनके दोपत्नीथीं प्रवृत्ति जिसकापुत्रमोह हमारावंशकर्ता
उत्पत्ति हुआ और दूसरी निवृत्ति जिसकापुत्र विवेकहुआ
जिससे दूसरा हमारा शत्रुवंश चला.॥
। रति । प्रीतम!तौतुममें और उनमें भ्रातृस्नेहके प्रतिलोम इतना
वैर क्यों है ?॥
काम । प्रिया ! यद्यपि हमसब एकही पुरुषासे उत्पत्तिहैं तथापि
दोनोवंशों में जगत् प्रसिद्ध वैरचला आता है जिसप्रकार
कौरव और पांडवों में रहा और जिससे कि भुवननाशक
युद्ध महाभारतकाहुआ-हमारे पिताने यहसर्वजगत् वि-
रचा और उनके हमपर पाक्षिक स्नेहसे सब हमारेही वशी-
। भूतहुआ और विवेक विभवरहितः अकेला भ्रमताफिरता
है इस द्वेष से वह हमारे पिता और हमें निर्मूल करनेकी
इच्छामें रहता है।
रतिः। (समय) प्रीतम बड़ा भय-तौ हैं।
काम । मेरी प्राणप्यारी-डरैमत्त क्योंकि उनसबका निरीशपुरुषा
.

प्रबोधद्युमण्युदयः।
१५
कासा चिन्तमनहै कि हमारे वंशमें कालरात्रि के समान
घोरकर्मणी विद्यांनामक एक राक्षसी उत्पन्न होवेगी--
रति । ( भयसंयुक्त) हाय हमारे कुलमें राक्षसी उत्पत्ति होवेगी.
... (कांपने लगीं)
काम प्राणवल्लभा ! डरैमत। डरैगत । डरैमत । ऐसेकहतेहीहैं।
रति । यह राक्षसी का करेंगी।
काम। सरस्वती का वचन है कि मनसे विद्यानामक पुत्री उत्पन्न
होवेगी और यह अपने माता पिता और भाई इत्यादि
सर्वकुलका भक्षणंकरलेगी।
रति । (भयंसे काँपतीहुई)मुझेवचाओ (उसकीगोदमें गिरपड़ी)
काम। (आलिंगनका सुखप्राप्तिकर अलगहो) आहास्त्रीका
आलिंगन कैसा आनंददायक है-आह-इनके चंपलनेत्र
: कैसे तारों से अधिक शीघ्रता करतेहैं-मेरे शरीरमें लपटीहुई
कोमलभुजाओं परके कंकणं कैसा मनोहर मधुर मधुर
शव्द करते हैं-आहा-इनउच्च और कठोर कुचोंकास्पर्श
कैसा आनंद देता हैं-(अतिप्यारसे हृदयलगाकर और
..कमलवत् कपोलोंको वारवारचुम्बनकर) भयमतकर भय
मतकर हमारे रहते विद्याकी उत्पत्ति कैसेहोसक्ती है ।
रति। तो प्राणपति निश्चय यह राक्षसीकी उत्पत्ति होवेगी।
काम् । हाँ--निश्चय--विवेक और उपनिषद्लै विद्या और उसके
भाई प्रवोधकी उत्पत्ति होगी और शम दम इनकी परि-
चा करेंगे।
रति । तौ शम दमइत्यादि इनकी उत्पत्ति से क्यों प्रसन्न होते हैं
वह राचसीतो इनसबकामी विनाश करसक्ती है और इन
सबकाभी अवश्ये विनाश करदेगी।
*LAN

१६ प्रबोधामण्युदयः। काम । प्यारी ! दुष्ट पुरुप जो संसारका नाश करना चाहते हैं पापका कोई विचार करते हैं ? इन दुष्ट प्रकृति पुरुपोंका कर्म देख कि जिनसे उत्पत्ति हुए हैं उन्हींका नाश कर- नेको कटिबद्ध हैं और फिर आपभी नष्ट होजायँगे-जैसे कि धुआँ अग्निही से उत्पत्ति होकर और अग्निको नाश करदेताहै और फिर स्वयंभी नष्ट होजाता है ।। (नेपथ्यमें) दोहा।रे पापी रे दुष्टजन हर्महि कहत तू क्रूर। अहंकार अविवेक गुरु तजहिंधर्म रतिशूर।। स्ठान,सोइ अहं वश होइ मोर पिता मन मोहनें। बाँध्यों जमपति जोइ अहंकाररजुसुदृढ़ के। काम । (रतिप्रति) यह देखो विवेक प्यारी: मंति सहित आताहै। यह मति देवीभी हमारेही कुलमें उत्पन्न हुईथी-यह देखो विवेक जोकि अतिनीच और जिसका सव अनारदरही कर- तेहैं-कैसाकश शरीर स्वयं छबिछीन-किंचितमतिकी का- न्तिसे प्रकाशित जिस मतिकी स्वयंशोभा स्वइच्छानुचारी मोहादिने मंद करदी है जैसा कि चन्द्रमाका प्रकाश सघन घन में दुरिजाताहैः॥:::: अब हमारा इस स्थानमें विलम्ब करना उचित नहीं है चलो चलें (दोनों बाहर गये। इति द्वितीयअङ्कः॥ . . अथ तृतीयअङ्कः ।। (राजाविवेक और मतिका प्रवेश.) विवेक । (विचिन्त्यः) प्यारी ! इस दुविनीत दुष्टपुरुषके अभिमान

१७
प्रबोधामण्युदयः।
संयुक्त बचन तुमनेसुने ? हमको वह पापकर्मी कहताथा॥
मति । पार्यपुत्र ! अपनो दोष कौन देखतुहै ।।
विवेक । देखो प्यारी! अहंकार और अन्योन्य अभिमानयुक्त पुरुषों
ने सच्चिदानंद निरंजन जगत्पभु परमात्माको पाशद्ध
करके दीन और आनंद शून्य दशामें कररक्खा है । सो
प्रिया! ये सवतो पुण्यात्माहैं और हम जोकि उस बंधनसे
परमात्माको छुड़ाने में तत्पर हैं सो पापात्मा है-इन
दुरात्मनोंने संसार वश करलिया है।
मति । प्राणपति ! हमतौ सुनती हैं कि जगत् प्रभु सर्व व्यापक
परमेश्वर तो सहजानंद स्वयं और नित्य प्रकाशस्वरूप
है--फिर वह परमात्मा इनके बंधन में कैसे आयो और
महामोहसागर में किस प्रकार व्यो ? ॥
विवेक । प्रिये ! जिस प्रकार स्त्रियों के भाव और चरित्रके वशहों
मनुष्य अपनी धैर्यताको छोड़देता है और मूढ़ होजा-
ताहै इसी प्रकार सर्व शक्तिमान्-शान्त--तेजस्वरूप
सत्य-अनंत और ज्ञानस्वरूप परमात्मा--माया के संयोग
होनेपर अपनीदशा और अपने को विसारदेताहै ।।
मति । प्रीतम ! यदि सहस्र किरण संयुक्त सूर्य को एक काली
रेखा छिपासक्तीहो तो सम्भव है--माया भी महापूकाश
सागर ईश्वरको स्ववश करलेतीहोगी।
विवेक । प्यारी ! माया अविचार सिद्ध है-वह वारविलासनी
सदृश है--भावको वह इस प्रकार उत्तमतासे दर्शाती है
किन्तु असत्यको पूर्ण सत्यहीकरदिखाती है कि उससर्वो
परि पुरुषकोभी वञ्चन करलेती है।
३

प्रबोधामण्युदयः। मति । प्राणपति ! तो यादुर्विदग्धा माया उदारचरित्र परमेश्वर को किस प्रकार उगती है ? ॥ विवेक प्राणप्यारी ! माया अप्रयोजनं और अकारण कर्म करती है वञ्चना,त्रियों का स्वाभाविक्रधर्मह-निस्संदेह स्त्रियां पि- शाचिनीही समान होतीहैं--प्यारी देखो ! जब कोई का- मिनी किसी मनुष्यके मृदु हृदयको अपनी वञ्चक कटाक्षसे बेधन करती तो कहो. कौनसीशक्ति उसमें नहींहोती है ? ॥ दोहा। मोहंति हैं वा रमतिसह करत मत्त सो ताहि । विकल शिथिलकर मदनयुत देतविडम्वनिवाहि ।। पुनि एक और कारण है। मति । प्रीतम ! सो क्या.?॥ विवेक । इस दुराचारिणी मायाने यह विचारा कि अब मैं वृद्धहुई- मेरी युवाअवस्था होचुकी-और यह पुरुष (आत्मा) हू वृद्ध है और स्वाभाविकही शान्ति है-अतएव में अपने पुत्र को पारमेश्वर पदपर स्थापित करूंगी--और मनने जोकि अपनी माता मायाके अभिप्राय को भलीभाँति जानता है और उससे बड़ी प्रीति करता है और उससे उत्पन्न होने के कारण स्वाभाविकही उसीके सदृश सों उस मनने यह नवदार शरीर वनाये और यद्यपि एक है उसने अपने को अनेक किया और इन शरीरों में निवास किया-माया ने पुनः अपनी चेष्टा उसमेंदी और स्फटिकमणिके सदृश उसमें भी वैसाही आभास होनेलगा। मति । (दोहा) मातुपितहिं अनुहरहिंसुत यहैलीक मतिधीर। वृक्कर सुत वृक होतहै खात मांस नहिं खीर ।। विवेक। अपने पौत्र अहंकारकी उपाधिवशहो परमात्मा ने कहा

।
.
प्रबोधामण्युदयः।
१४
"मैंहूं" और इस प्रकार मायावशहो अविद्या निद्राले
परब्रह्म परमात्मा अपनी सघदशा भूलंगया और अपने
को मनकी चेष्टानुवर्ती दशामें किया और नानापूकारके
स्वप्न देखनेलगा कि मैं उत्पन्न हुआहूँ-यहं मेरो पिताहै यह
मेरी माताहै-मेरो कुटुंम्ब-मेरी स्त्री-मेरे पुत्र-मेरे मित्र यह
मेरो शत्रु ये सुकर्म ये कुकर्म ये मेरे भाई यह बहिन, मेरो
गृह, मेरोग्राम और यह मेरोनाम इति आदिह माननेलगा।
मंति। आर्यपुत्र ! (दोहा) सोसतचित आनंदघन ईश प्रबोध
स्वरूप। या निद्रातें जागहहि किधिविधि कवजगभूप ॥
विवेक। ( लज्जितहो नीचाशिरडाल मौनहो बैठा)
मति। आर्यपुत्र! हैं हैं कैसे लज्जितहो नीचाशिरडाल अवाक्
होगये॥
विवेक। स्त्रियां स्वाभाविकही वैरोधक और देषकारिणी होती
हैं-अतएव मैं प्यारी ! असमंजस में हूं-कि क्याकरूं ॥
मति। प्राणनाथ ! नहीं नहीं मैं देष से यह नहींपूंछतीहूं किन्तु
धर्मानुचारिणी स्त्रियां अपने पति के सुधार्मिक विचारके
पूर्ण होने में सहायता देती हैं।
विवेक। प्यारी ! प्रबोधका उदय तब होवेगा जब देवीउपनिषद्
हमारे दोनोंके चिरकालके विछोहसे जो द्वेषमानरहीहै और
अपसन्न है मुझसे फिर आमिलेगी और यहमिलापतबहोगा
कि जवशान्तिइत्यादि मेरी आज्ञानुसारिणी होंगी और तू
पदार्थज्ञानछोड़ स्थिरहों जाग्रत् स्वम सुषुप्तिअवस्थाओं से
भिन्नहों तुरीय में प्राप्तिहोगी।
मति। चाहै अहंकारके बंधनसे सवमोक्षपाजावें परंतु यहअहंकार तो.
मायाके सदैव नित्यानुबंधहे और सदैवहै और सर्वदारहेगा।

'प्रबोधयमण्युदयः। विवेकी यदि यह सत्य है तो प्राणप्यारी ! मेरा मनोरथसिद्ध होने में अभी बहुत अवकाश और चिरकालहै परन्तु प्यारी! वे जो कथनकरते हैं कि वही अद्वितीय जगतका परमेश्वर अनादि और अनंत परमात्मा वहुतों में विभाजितहोगया है और इसप्रकार ईश्वरको शरीरधारी मान जो उस पर- मात्माको बद्धय जन्म मरणइत्यादि अवस्थाओं में मान- तेहैं-उनपुरुषोंको में उत्कृष्टकरदूंगा कि जिससे उनकी इस प्रकारकी कल्पना उनके आयुके साथही नष्टहोजायगी और तब फिर मैं ब्रह्मकी ऐक्यता स्थापित करूंगा ।। (नेपथ्यमें) दोहा । जाडं अवहिं करिहौं यतन नृपायसु जो दीन्ह । यहि विवेक सहअनुचरन शमदमजीतहुँचीन्ह ।। मति । (आश्चर्य).प्राणनाथ! यह कोहै ? ॥ विवेक । प्यारी ! यो महामोहको अनुचर अहंकारके पुत्रलोभ का प्रियपुत्र दम्म आवतहै आओ इन दुरात्मानों का और कर्म तुमको दिखलाऊं- चलो वहां चलें। (दोनों वाहरगये). इति तृतीयअङ्कः ॥ अथ चतुर्थअङ्कः॥ (दम्भका रङ्गभूमि में प्रवेश) दम्भ । राजा महामोहने जो मुझको आज्ञा दीहै कि विवेक और उसके मंत्री सुधर्मके भेजे हुए शम दम इत्यादिको जो सर्व तीर्थस्थान और धर्मक्षेत्रों में प्रवोध उदय करनेकी इच्छासे गयेहँ-तुम उन सबको वहां जाकर रोको और धर्मकर्मीको 4- प्रवीधामण्युदयः। जोकि इस प्रिय संसारके स्नेह और मोह से मोक्ष पानेक अर्थ किये जाते हैं सबको वर्जन करो-सो मैं जाताहूं--रात्रि समय तो हमसब मित्र सहित वेश्याओंके रमणीकभवनों में रहैं और निर्भयता से भोगविलास करें और दिनको बड़े महात्मा-सर्वज्ञानी-अग्निहोत्री-वेदवक्ता और नाना प्रकार के अनेक सत्यमार्गदर्शक-ब्रह्मज्ञानी बनजाया करेंगे। ( देखकर ) आहा वह कौन रक्तनेत्र किये ऊपरको मुंह उठाये दक्षिणदेशसे आताहै जिसकपीछे वह एकमनुष्य हसता चलाआताहै ? देखूतो चलकर । (अहङ्कार और विदूषककाप्रवेश) अहंकार । (दोहा)व्यापरह्यो अज्ञानजगसत्यमार्ग नहिंध्यान । हितउपदेशन कोउसुनै गहै. न कोउ ममज्ञान॥ (इधरउधरदेखकर) इन पुरुषोंको देखो जोकुछ वे पढ़तेहैं उस का अर्थ भी नहीं समझतेहैं। विदूषक हि हि-क्या तोता जो कुछ वह पढ़ता है सभीका अर्थ समझताहै ?॥ अहंकार । (औरोंके निकटजाकर) यह देखो इन के चारोंओर. पुस्तकों का तो बड़ा ढेर लगाहै और चारोंवेदों को काँख में दावेहैं परन्तु समझते कुछ नहीं । विदूषक । (हँसकर) वाह वृषभ और गर्दभ क्या पुस्तकें लाद कर नहीं ले चलते हैं। अहंकार । (दूसरीओर जाकर) ये देखो आसन बिछाये कर्म- काण्डी वने बैठे हैं परन्तु जो कुछ इस इनकी हाथकी पु- स्तकमें लिखाहै छोड़ बुद्धिका परिश्रम सब व्यर्थ और इन की.जान असत्यही है ॥

२२. . प्रबोधामण्युदयः। विदूषक । (मुसक्याकर) तभीतो एकस्थानमें श्राद्ध करातेसमय इन महात्माजीने एक प्राचीन छोपेकी पुस्तक में "पिण्डो परि सूत्रं दद्यात्" इसवाक्यकी सकारकी टांग उड़जाने के कारण "पिण्डंपरि मूत्रंदद्यात्" पढ़कर पिण्डों को मूत्र स्नान करवायेथे ॥ अहंकार। (औरोंकी ओर जाकर)(आपहीआप ) क्या कहिये (प्रकट) ये देखो संन्यासी बने बैठे हैं:-मैलेवेष-बड़े बड़े केश किये आंखें निकाले ऐसे बैठे हैं मानों साक्षात् तप देह धारण किये विराजमान हैं। विदूषक । वाह क्या कहनाहै ( मुँह बिदुकाकर ) अभी थोड़े दिन की बात है कि येतो कोल्हू चलाकर तेल पेरतेथे और ये.. महात्मा जो इनकी बाईओर ध्यान लगाये बैठे हैं मिट्टीके सुन्दर.घड़ा बनाकर बेंचतेथे--परन्तु देखो ईश्वरकी महि- मा ज्योंही इनकी गृहपत्नी तिलिनियां और कुम्हरिनि- यां मरी त्योंही सब सम्पत्ति नाश होनेपर इनको अनुभव हुआ और कला जगउठी ॥ अहंकार । (अन्य ओर जाकर ) ये देखो महात्मा निर्द्धनकारक : :: जी हैं ये कैसे गंगाजी में शिलाडार उसपर शालिग्राम स्थापित किये रुद्राक्ष सटकाते हैं और यजमानका धनहर अपनी तर्जनी अंगुलीसे उनको बैकुण्ठमार्ग बताते हैं कि देखो वह है-चलेजाओ। विदूषक । (धीरे से ) परन्तु वह तर्जनी यजमानके घरकी ओरको करके कहते हैं अर्थात् कहते हैं कि तुम्हारे घरकी वह रास्ता है चलेजाओ॥ अहंकार । ये देखो त्रिडंडी बने बैठे हैं-कोई दैतवादी कोई अद्वैत- . -.

--
प्रबोधामण्युदयः।
३
चादी वनगये हैं किन्हींका औरभी निराला हाल है- (आगे
जाकर) आहाहा ये देखो मानों तो दम्भहीरूप धरे हैं-वाह
यहतो बड़ा ध्यानलगाये गोमुखी में हाथडाले हजारिया
सटकारहे हैं (उसकेपासजाकर ) कल्याणहो ।
(दम्भ अनादरसहित हुंकारसे उसे निवारण करताहै और
तब दम्भका एक शिष्य आताहै)
शिष्य । ब्राह्मण ! मार्गकर--प्रथम पादप्रक्षालन करले फिरआ।
अहंकार। (क्रोधसे.) हम ? ॥
दम्भ । (हायसे उसे ठहरनेको कक्षा)
शिष्य । लीजिये-पादप्रक्षालन कीजिये-यह जलपात्रह ।।
अहंकार । हिं । इसका क्या फल । अच्छा ला॥
दम्भ ! (ओष्ठ काटकर ) उँह दूरहो हमारे ऊपर तेरे छुये हुए
अपवित्र जलके कण वायुसे गिरते हैं।
अहंकार बाह बड़े आश्चर्य का ब्राह्मणत्व यहहैं ।।
शिष्य । हाँ हमारा इसप्रकारका ब्राह्मणत्वहै-अत्यन्त पवित्र पुरुप
और महान् आचारी भी हमारे वैठने का आसन कभी
नहीं छूते हैं।
अहंकार । अरे तो मैं क्या जिसकी परमपवित्रता सर्वत्र प्रकटहै इस
आसनपर नवै। रे अज्ञान सुन--मेरीमाता अवश्य उच्चकुल
की न थी--परन्तु मैंने एक अग्निहोत्र बामण की पुत्रीसे वि-
वाहकियाहै और अतएव अपनेपितासे उत्तम और उचहूं ॥
विद्रूपक । क्यों नहीं।
अहंकार । मेरे सालेके मित्रके मामाके लड़केको मूंगही दोप
लगाया गयाथा तौभी मैंने अपनी प्यारी स्त्रीको इस सम्बन्ध
होने के कारण परित्याग दिया ।।
-

प्रबोधामण्युदयः। दम्भ । सत्य है । परन्तु तू हमारे आचारको नहीं जानता है एक समय हम ब्रह्माके आश्रम को गये तो सर्य मुनि उठ बैठे और ब्रह्माने मेरी बड़ी विनतीकर गौके गोबरसे अपनी सर्व वस्तुएँ पवित्र कर मुझे उनपर स्थापित किया ।। अहंकार । ( क्रोधितहो) इसीपर इतना अभिमान-इन्द्र और ब्रह्माका क्या महत्त्वहै-एकने अपनी गुरुपत्नी पर कुदृष्टि कर उसके संग व्यभिचार किया और दूसरेने जो इच्छा अपनीही पुत्री सरस्वतीसे की वह सब संसारमें प्रख्यात है और ऋषि उत्पत्तिका क्या महत्त्व है--धीमरकन्या से ऋषि श्रेष्ठ व्यास और हरिणीसे शृंगीऋषि उत्पत्ति हुए- परन्तु मेरी प्रभुता ऐसी है कि मेरी उत्पत्ति होतेही सहस्रों इन्द्र सहस्रों ब्रह्मा और बड़ेबड़े ऋषि मुनि अदृश्यं होगये।। दम्भ । (हर्षसे उसकीओर देखकर) अहा ये तो हमारे पितामह अहङ्कारहैं (पैरोंपर गिरकर.) मैं दम्भ--तृषणा और लोम का पुत्र प्रणाम करताहूं। अहंकार । आयुष्मानभव पुत्र ? तेरा प्रियपुत्र अनृत कुशल है ? | दम्भ । अनृत विना तो मुझे क्षणभरभी चैन नहीं है। अहंकार । तेरे माता पिता कृष्णा और लोमभी प्रसन्न हैं ?।। दम्भ । हा सर्व कुशल हैं और वेभी सव यहीं हैं। अहंकार । वत्स ! मैंने सुनाहै कि विवेकने मोहको बहुत दुःखित कररक्खा है ? सो मैं इसीकारणसे आयाहूं। दम्भ । हां-अच्छाहुआ जो आपभी आगये। हम सब इसीकार्य में तत्परह-इन विवेकादि दुष्टपुरुषोंने बड़ा उपन्च किया है ।। अहंकार। वत्स ! धीरजधर-कोई भयकी वार्ता नहीं है अरे। इन दुष्टपुरुषों को अब उपद्रव करनेकी सूझीहै । (हाथमीड़ प्रबोधयुमण्युदयः। कर.) और (ओष्ठकाटकर) अरे इनको स्वामी महामोह का प्रताप विस्मरण होगया-रेइन दुराचारियों को मेरीबड़ी भुजाओंका बल क्यों भूलेंगगा-अरे मैंतो सारा ब्रह्माण्डलौट पौटकर सक्ताहूँ-क्या क्रोध और कामइत्यादि सुभट ऐसे ब- लहीनहोगये हैं कि विवेकको उपद्रव करनेका उत्साहबढ़ा ।। (नेपथ्यमें): अरे देखो महाराजाधिराज महामोह आवतहैं कोई है ? कौ- न है ? उठो उठो चलो शीघ्र चमचमातीहुई स्फटिकमणि- की चौड़ी चमकतीहुई सड़कोंपर चोआ चन्दन छिड़को और सर्व मागौंको कनछाओ-अरे शीघ्र बड़े बड़े धजा पताका और शोभनीक निशानोंको सबजगह सजवादो-- देखो-शीघ्रताकरो-शीघ्रता करो-स्वामी का आगमन है ।। दम्भ । महाराज आते हैं-चलो हमसब अगाऊ बढ़कर उनको लेआवें।। अहंकार । हाँ चलो। सब बाहरगये), इति चतुर्थशङ्का अथ पञ्चमअङ्कः॥ (राजामहामोहका बड़ी विभव और परिवारसमेत प्रवेश), राजामहामोह । (मुस्कराताहुआ) अरे-ये- पुरुष कैसे निरंकुश और जड़बुद्धि हैं कि ये विचारते हैं कि आत्मा शरीर से कोई वस्तु भिन्न है और इस जीवको पुनः दूसरीअवस्था में पापपुण्यका फल भोगना पड़ता है-छिह-यहतो आ: काशमैं उगेहुए. वृक्षों से फलोंकीसी अभिलाषा करना है:-जीवको शरीरसे भिन्न अवस्था में किसने देखाहै क्या

२६
२
:
प्रबोधद्युमण्युदयः।
तत्त्वमिलकर शरीर नहीं बना है और इसीमेल से क्या
शरीरमें जीवकी उत्पत्ति नहीं होतीहै? तो फिर किसप्रमाण
से ये दुर्विचारी-मनुष्योंमें जो सवइन्हीं पंचतत्त्वोंसे वनेहैं--..
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य इत्यादि भिन्नता स्थापित करते हैं।
अरे ये दुर्बुद्धि क्यों अपनी और पराई स्त्रियों में भिन्नता
करतेहैं ? अरे ये बुद्धिभ्रष्ट यह नहीं समझते हैं कि
श्लोकं । यावज्जीवनसुखंजीवेन्नास्तिमृत्योरंगोचरः ।
भस्मीभूतस्यदेहस्य पुनरागमनकुतः ।।
अंग्निरुप्पोजलंशीतं शीतस्पर्शस्तथाऽनिलः।
केनेदंचिह्नितंतस्मात् स्वभावात्तव्यस्थितः ।।
यावज्जीवेत्सुखंजीवेदपकवाघृतंपिवेत् ।
भस्मीभूतस्यदेहस्य पुनरागमनकुतः॥
यदिगच्छेदपरलोक देहादेपविनिर्गतः।
कस्माद्योनचायातिबन्धुस्नेहसमाकुलः ॥
दुष्टये-अरेये सुखसे रहने के लिये कम्मोंमें सुकर्म और कुकर्म
का विचार क्याकरतेहैं । निस्संदेह बड़ेही अल्पबुद्धिहें ।।
है कोई ? अच्छा-मंत्रीको बुलाओ।
(एक अनुचर आया)
अनुचर जो आज्ञा महाराजकी। (वाहरगया और अधर्मको
साथलेकर फिर आया)
अधर्म जय जयजीव-क्या आज्ञा है ? ॥
राजा । भैया मंत्री आओ। ( अपनी वाईओर बैठारलिया)
मंत्री! देखो अंब हमको सावधानतासे रहना उचित है।
नहीं तो विवेककी सेना दृढ़ता पकड़ती जाती और फिर
उसको पराजय करना सांधारण न होगा।

-- प्रबोधामण्युदयः। २७ अधर्म। स्वामीका बड़ा आतंक है तथापि हम सब बड़ी सावधा- नतासे रहेंगे और देखिये मैं अभी सब योद्धाओं को बुला कर युद्ध की तैयारीकी आज्ञा देताहूं कि विवेकके परिवार को बीन बीनकर मारंडालें--एकभी न बचनेपावे । स्वामी का बड़ाः प्रताप हे-देखिये कैसा कौतुक होता है और अभी बातकी वातमें दिग्विजयका डंका बजता है ।। दम्भ । स्वामी ! आपके प्रतापसे--यद्यपि मैं वृद्धहूं--तथापि विवेक के लिये केवल मेंही सामर्थ्यहूं। देखिये सहस्रों पुरुषों को मैंने वश करलिया है--मेरी सूरत देख: बुद्धि दूर भागतीहै.आप आज्ञादीजिये-मैं सब कौतुक करदिखाऊं। तृष्णा। महारोज ! मुझेही क्यों न आज्ञा दीजिये मैं सब कार्य कर सक्ती हूं। लोभाप्यारी! हमारे रहतें तेरे परिश्रम करने की क्या आवश्य- कता है?॥ काम । राजन् ! इस इतने छोटे कार्यके लिये सेनाकी आवश्य- कताही क्याहै ? ॥ क्रोध। मैं जाकर संबः विवेककी सेनाको नाशं कर आताहूं तब तक तुमसव योही विचार बांधो । राजा । (अतिप्रसन्नहो) तो मैं देखताहूं कि तुमसब स्वतःसावधान हो-अच्छा मंत्री तुम जाकर देष अभिमानइत्यादि अन्या- न्य सब योद्धाओंको मेरीआज्ञा सुनाकर सावधान करदो।। अधर्म ।जो आज्ञा महाराज की ॥ (सब बाहर गये) इति पञ्चमअङ्कः॥

२८
प्रबोधद्युमण्युदयः।
अथ षष्ठअङ्कः
(राजांविवेक विचार करता सेनापति और एक अनुचर सहित)
आया
राजा । जग सुबुद्धि में पुरुष वर तेउवश कीन्हें मोहें।
योपापी अब छलनचह चिदानन्द संदोह ।।
ये सर्व सांसारिक जीव जो अज्ञान दशा में भ्रमितहो
रहे हैं महासागर तरंगावली. चिदानन्द अमृत जल को
छोड़ जोकि सर्वदा उपाधिरहित शान्त है। इस मोक्षको
त्याग कैसे सांसारिक मृगतृष्णाके जलसुखको ग्रहण
करनेको बड़ाबड़ा परिश्रम उठातेहैं वे इस मृगतृष्णा
जलको पानकरते हैं उसमें स्नान करते हैं और कीड़ा
करते हैं किन्तु उसीही में दिन रात्रि हुने रहते हैं के
पुरुष इस मोक्ष के आनंद और उसकी बहुमूल्यताको
नहीं जानते हैं अज्ञानही महामोहका कारण है ।।
श्लोकोनवेत्तियोयस्य गुणप्रकर्ष संतस्यनिन्दांसततंकरोति :
यथाकिरातीकरिकुम्भजातांमुक्तांपरित्यज्यविभर्तिगुञ्जाः॥:
और इसीसे वे उसके पानेको उत्साहित नहींहोते हैं:
अज्ञानही इसअनित्य मृत्युदंशाको स्थापित किये है।
..,परन्तुः अज्ञान तव दूरहोजाता है. कि जब जीवको विदिः
i. : होजाताहैं कि तत्व क्या है।
दोहा। सोहंसोहं स्टल नित यह शरीर की श्वास।
तदपि.जीवनहिं ध्यानकर जेहिते पाव निकास ॥
.. अच्छा कोई है ?
(एक भृत्यआयाः)
भृत्य । महाराजकी जय-क्या आज्ञाहै ? ॥
..

२६ प्रबोधद्युमण्युदयः। सेनापति | स्वामी की आज्ञा हैं कि बस्तुविचार को बुलाओ ॥ भृत्य । जोआज्ञा । (वाहरगया और बस्तुविचारको लेकरआया) बस्तुविचार। (आगेबढ़कर) महाराजकी जयहो । राजा। मोह हमसे युद्ध करनेको उपस्थितहै-सो मैं तुमको उसके मुख्य योद्धाकामसे युद्ध करनेकीआज्ञादेताहूं-परन्तु कहोतो तुमकिन अस्त्र शस्त्र और कौनप्रकार उसको परास्तकरोगे? वस्तुविचार । जो आज्ञा- स्वामी- येही अस्त्र और शस्त्रहैं कि मैं प्रतिक्षण विचार करूंगा कि देखो इससंसारको काम- देवने कैसा वशकिया अरे यह निर्विचार सौन्दर्यताके अभिमानको वर्द्धनकर कैसा आकाशपर चढ़ाताहै-इस कामने और मोह ने जगत् को उन्मत्त कररक्खा है कि अतिबुद्धिमान पुरुषभी स्त्रीको जो कि अविमलता और अपवित्राईकी पुत्रीहै देखकर कैसे. मधुर बचनों से भाष- करते हैं कि "हे मोहनी! तेरे कमलवनेत्र:तेरेंबिम्बा- फल से -अधर तेरे. सुन्दर कपोल और तेरी धनुसम मनोहर भूकुंटी अधिक शोभा देतीहै--प्यारी ये तेरे को- 'मलकर हाय ये तेरे उठेहुए दाडिम से कुच-ये तेरी सुन्दर कटि मेरे मनको विकल करती है आपंमिनी प्यारी एकबार तो तू मेरी छाती से लंगकर मुझे परमान्द देदे-प्यारी यदि ये नहीं करती तो एकबार अपने सुन्दर कपोलों का : चुम्बन तो देहीदे-फिर मैं तेरा जीवनपर्यन्त आज्ञाकारी रहूंगा" इसप्रकार.चे,त्रियों को देख मोहितहो मदन अभिलाषा वशहो विकलहोते हैं परन्तु वास्तव में जैसी मनोहर वे दिखाई पड़ती है नहीं हैं-वे केवल मांस और हाड़ोंका समूहहैं और नवीनवस्त्र और सुन्दर आभूषणादि ..

.
३०
प्रबोधामण्युदयः।
से शोभा पाती हैं और विचारकर कि स्त्रियांही मनको
चलायमान करती हैं-मैं मनको स्थिर करलूंगा और तब
निस्सन्देह कामवश होजायगा।
विवेक । अत्योत्तमः अच्छा जाओ और सावधान रहो।।
वस्तुविचार । जो.आज्ञा महाराजको ।।
(प्रणामकरके बाहरगया):
विवेक । अव क्षमा को बुलाओ।
सेनापति । जो आज्ञा। (एक अनुचर क्षमा को साथले कर आया)
क्षमा। (प्रणामकर) महाराज की जय ।।
राजा । क्षमा ! इस हमारे और मोहके युद्धभूमिमें मैं तुमको क्रोध
से युद्ध करने और उसे परास्त करनेको आज्ञा देताहूं
...सावधानहो ।
-क्षमा । जैसी आज्ञा महाराज की ।।
सेनापति । अच्छा किसप्रकार तुम क्रोधको पराजय करेगी।
क्षमा । (हाथ जोड़कर). स्वामी के प्रताप से-और ऐसा कहते
सवैया। क्रोधउठे ललकारजवै तव शीलरहे करजोर विचारे ।
क्रोधने वातें अनेककहीं तवंशीलने नीचेको नैननिहारे ।।
क्रोधकही उठजारे यहाँते जाउँकहाँतज चरपतिहारे ।
शीलपै जोर कछूनचल्यो तवलौटके क्रोधजू आपुहिहा।।
विवेक । सर्वोत्कृष्ट । अच्छा मोहकादल जाकर नाश करों।
क्षमा। जो आज्ञा-: (बाहर गया)
राजा । सेनापति ! यही मेरी आज्ञा संतोष इत्यादिसे प्रकट करदो
और कटक संजवाः सारथी को आज्ञादो कि मेरा युद्धस्थ
तैयारकरे हम अभी प्रस्थान करेंगे।
..
:-
14

१ प्रबोधामण्युदयः। सेनापति जो आज्ञा ॥ (वाहरगया और कटक साज फिर आया) सेनापति । (एक उच्चस्थानपर खड़ाहो- सावधान करनेका विगु- ल बजाकर) चौपाई । सुनु संकल्प क्षमादिक योधा । शमंदय दया बिराग पूवो. धा। कहकर्तव्य हृदयमहँ ठान्यो । कौन ठाम तव ज्ञान हिरान्यो ॥ जाते भै कुत्सित मति तुम्हरी। अति विपत्ति जिहि स्वामिहिं परी । दिनप्रति सुयश अधोगति होई । तवनहियो बैटू का जोई ।। खोवतपतिः जिन लाज न आई। को निर्लज्ज तुमहिं सम भाई ।। उठहु उठहु अब जागहु ताता । होत अंकांनं नं सोबहु प्राता ॥ दम्भ मान मद मत्सर मोहा। तृष्णां काम अश्रद्धाकोहा॥ पक्षपातपादि- क सब अवगुण । जीतहुसमरहि.प्रायसु श्रुण ।। दोहा । यही करन अब उचित प्रिय उठि कटिबध किनहोहु । जीतहु ईपी ढेप..भ्रम परमधर्मः निजः जोहुः ।। चौपाई । साजहु कटक बजावहु बाजा । भेरि ढोल सुनि आयमु राजा ॥ पहिरहु कवच अस्त्र संबंधारू । सजहु.मत्त गज मारहु मारू ॥ सजहु बाजि रणधीर सुयाना । सावधान है करहु पयाना ॥ लै लै सन्मुख भिरिहहु भैया। धरेहु सीख स्पार्टी मैया ॥ जो सिखवत निज सुतन पियारे । देखति नहिं संग्राम तयोरे।। सुनहु सुपुत्र प्राणते प्यारे । सहि अग- णित दुख सेये बारे। प्रौढ़ भये अब तुम मम ताता । होहु उऋण किन निज प्रिय माता ॥ लेहु ढाल यह हर्षित है कर । चिरंजीव मम आशिष उरधरः।। दोहो। यह समेत सुत आइयो नतु समरहिं जिय खोय।

३
.
રૂર
प्रबोधद्युमण्युदयः।
याहि छोड़ जनि आइयो दूध लाज़ जिहिं होय ॥
(सेनापतिका यह वचन सुनतेही सब योद्धा सावधान
होगये और ज्योंही पूस्थानके विगुलका शब्दहुआ तो)
कवित्त । धरा थरथरानी और कूर्म कुल्मुलान लाग्यो ससकन
लाग्यो शेष हियोहालो दिग्गजको । रविगयो दवि और
पौन मौन माहि दुरयो जल जलन लाग्यो और भयभयो
रतिको॥कालीकाली आंधीसी उठनलागी चारोंओरवा-
दुलसे गर्जरहे नमभयो रजको। जासमै रिपुदलपे चढ़ोहै:
कटकसाज़ बांकुरो सुरण सेनापति राजा, विवेकको ।।
(उससमय मारूका भयानक शब्द होताथा और तल
वारें उस मेघ गाजनके साथ दामिनिसी दमकती थीं--
इस प्रकार कटक ने प्रस्थान किया तिस पीछे एक अति
सुंदर रयपर चढ़ जिसमें सुधैर्य घोड़े जुतेहुएथे राजा
विवेकने पयान किया)
विवेक सारथी ! घोड़ों की बाग छोड़दों और रथको अतिशीघ्रता
:: से चलायो।
सारथी ।, (रथको अतिवेगसे चला )जो आज्ञा स्वामी की ।
(सब बाहर गये.)
इति षष्ठअङ्कः ।।
.
अथ सप्तमअङ्कः॥
विनीत वेषकिये पुरुषका प्रवेश)
पुरुष.। (अतिहर्षसे)
दोहा । अगमघोर संग्राममहँ भी परास्त नृपं. मोह.।
दम्भमान कामादि सब नश्यो. द्रोह. अरु कोहः॥
•:

प्रबोधयुमण्युदयः।
३३
जगतभयो आनंद अंब चहुँदिशि शान्ति लखात ।
निशा अविद्या मिटगई मयो प्रबोध प्रभात ।।
दृश्य अदृश्य विचारमहँ आयसकै पुनि जौन।
पुनि विचारहू बाह्य जो ईशछोड़ ककौन ॥
आही आज मुझे कैसा मानंद हुआ है-गोहपाश से छूट आज
मेरे हृदयकी तीक्ष्ण ज्वाला जो बड़वानलसी जलतीथी
बंदहोगई अंब मैं शान्तिहूं ॥
(ततः उपनिषदका प्रवेश)
उपनिपद आह.आज मेरी शिक्षा मानी गई और अब मेरी सब
मनोरथे. सुफल हुई-वत्स !.आज .शत्रुरहित तुझेदेख मुझे
बड़ाहर्ष हुआहै. (पुरुषको छातीसे लगाकर.) और क्य
मनोरथ अब तेरे है। कह ॥
पुरुष। माता ! अब मेरे कौनसी मनोरथ रहगई तेरी कृप
से अव सुझ सर्वानन्दहै-जिसपर. तू कृपादृष्टि करती
है उसके फिरो याचना की इच्छाही नहीं होती है ।
मुझे तेरी कृपा कटाक्षही. अब चाहिये और कुछ नहीं ।
उपनिषद । ( अतिगनिन्दितहो)तथास्तु-प्रियपुत्रः!
पुत्रादोहा केवल विद्याते छुटत महामोह दृढ़ ग्रंथ ।
कठिन अविद्या नहिंटरत कल्पे कोटिकपथं ।।
पंथं कल्पना प्रचंतितें प्रचति अविद्यापीत:।
तिहिकारण प्रियपुत्रतू कर सुनिवृतिहिं मीत॥
पुरुष। (हाथजोड़) माता ! तेरे हितोपदेश बिन ऐसा आं.
नन्द-कहां ॥
उपनिषद् । वत्स मैं तो सदा सर्वदा से उपदेशही के कारणहूं।

प्रबोधंद्युमण्युदयः।
(नेपथ्यमें).
दोहा । सकल कुतर्कहिं छोड़ जो लेत सुआश्रय मोर
मिटन मुकुर मनअमलता शुद्धिहोत हियतोर ।।
(सत्यका प्रवेश).
सत्य । यद्यपि महाराज वैशम्पायनने स्पष्ट लिखदिया है कि
"ऋषीणांभारतीभाति सरलागहनान्तरा। धीरास्तत्तत्वमृ
च्छन्ति मुह्यन्तिप्राकृताजनाः ॥ अर्थात् महानभाव ऋषि-
योकी सरलवाणीका प्राशयं अतिगुप्त होताहे--कोई कोई
अति बुद्धिवर पुरुप समझते हैं और प्राकृतजन तो उसमें
मोह वशीभूत होजाते हैं । तथापि सव. उनकी सरल
वाणी को बिसर जाते हैं और फिर भ्रम में फँस व्याकुल
फिरते हैं।
उपनिपद् । वत्स ! देख मेरा परमस्नेही और तेरा हिताभिलाषी
सत्य पाया है।
(पुरुष दोनों भुजा पंसारकर सत्यसे जा लपटा )
पुरुष । मित्र ! बहुत दिनों में मिले ॥
सत्य । मित्र! क्या करूं तूतो मुझको देख दूर भागता था।
उपनिषद् । तब यह असत्यकी दृढ़पाश में जकड़ाथा॥
पुरुप । हाय मैं किस मुख से आपसे. क्षमा मांगू-अवतो हे माता!
मुझे तेरीही कृपाका और इस मित्र संत्यहीका आश्रय
मैंने लिया है।
उपनिपद् । पुत्र!
दोहा । पहिचानहु तिहि ईश्वरहिं जो व्यापक सब और।
मानिय आज्ञा तासुकी जो मंत्रन शिरमौर ।।
सबके सत्यासत्यमार्गदर्शक हिताहितज्ञान ( Conscienoe :)

प्रबोधद्युमण्युदयः।
३५
है जो इसकी आज्ञा बिरुद्ध कर्म करते हैं वेही असुरहैं ।
अर्थात् “असू- नामतेलोका अन्धेन तमसा वृताः।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति येकेचात्महनोजनाः ॥ अर्थात्
आत्माका हिंसन करनेवाला अर्थात् जो परमेश्वरकी
भाज्ञाको तोड़ताहै और अपने आत्मा के भयसे विरुद्ध
करता है और मानता है वही असुरहै ।।
वत्स ! दोहा । माननीय नहिं पुरुष वह जो केवल विद्वान ।
पर कुकर्म अरु दुष्टता जामें लखौ सुजान ।।
तनै दुष्टता द्वेष, अरु. गर्व उपद्रव · जोय ।
तदपि ताहि सनमानिये अविदान.किनहोय ।।
सावधान रहिये सदा नहिं बिगरे जिहिकाज ।
पापकर्मकर समयकोउनियतनाहि महराज ॥
ईश कोप नहिं. करत है. पुत्रसीख मम मान।
किन्तु दंड जो देत है ताहि सुशिक्षा जान ।।
तब उतपतके पूर्व तुम रहे कहा मम तात ।
मृत्यु अन्त पुनि होहुगे का पदार्थ विख्यात ।।
कर स्मरण' सुबुद्धिवर सो.पदार्थ सत भाय।
जोतेहोइ न गर्व तुर्हि फेर मोक्ष जिहि पाय॥
काहूको जनि दीजिये अपने आप कष्ट ।
प्रभुता भव या जंगत कर अवशि होयगो नष्ट ।।
अतिअभाग्यतिहिपुरुषकर जानियतातसुजान।
जहिंस्मरण न अंतकर पुनिजु पापकर खान ।
जनि चाहौ तिहि याचना अतिदरिद्र है जोय ।
किन्तु दीजिये प्रथमही तव यांचक जब होय ॥
आज्ञी है न पुरुष सो लै संसारिक सुःख ।

:
प्रबोधशुमायुदयः।
अतिमोदित जो होतहै पुनिसहिरकत नसा।
सत्य ग्रहण मद त्यागयो अल-बोरी व्यभिचार ।
जीवघात हिंसा त्यजन पंत्र सुमग आचार ।।
पुन येही महान् कर्तव्य परमधर्म है येही ईश्वर
:: की आज्ञा सब पुरुषों के लिये है।
पुरुष । (पैरोंपर गिरकर )
दोहा। धन्य धन्य प्रिय मातु मम धन्य धन्य गो मातुः।
परमः हर्प मा आज अन सर्वानन्द ललात ।।
सत्य । भाजा तेरी. अविद्या; निशा मिद परगंशोमनीक देदी.
समान प्रबोध प्रभाकर का उदय यह तुझे आनन्द देहा
: है जैसे शुमणि का उदय सर्व अंधकार मेट कमलोंको
प्रफुल्लित करताहै-जबतक अविद्या दूर नहीं होती है तबतक
दुःख महासागर से पुरुष निकास पानाही नहीं। और ।।
दोहा । जग पदार्थ. स्नेह ते :उपज अविद्या तात ।
नहिंकोउ पिता न मातु सुत कोउनहितवयांबात
असमुविवेकः विचारतें मिटत जीव अज्ञान ।
तब पदार्थ ज्ञानहु मिटत दशा तुरीय बखान ।।
जग जीवना है स्वमवतः कुविषय होहिं अपार ।
नींद अविद्याते जगे, सो दर्शातः असार ।
जग असत्य दर्शात सतः रजत सीपवतः मास ।
पूरण ब्रह्मविचार ते पर सवः तत्व प्रकास ॥
चित्र विचित्र पदार्थ जो सकल अौ आधार ।
जिमि जग सुबरणतें वनत भूषण बहुंतःप्रकार ।।
एक अनादि अनंत: प्रभु सर्व व्यापक शान्त ।
सोइ माया कुचिकारते: सविकारितवत भ्रान्त ।।
.

३७
प्रबोधामसयुदयः।
जिमि धन सूर्यप्रकाशतें अगणित रंग अकास।
सन्ध्यासमयलखाततुहि तिमि सो आत्मामास ।।
भिन्न नाम लक्षण चरित भिन्न भिन्न बहुजात ।
अद्वितीय सो आत्महिं रोपत माया तात।।
पञ्चतत्त्व से रचित तनु नाशमान जो जान ।
पुनि गृह हर्ष विषाद कर सो अस्थूल बखान ।।
पञ्च प्राण बुद्धीन्द्रि मन ये मिल सूक्ष्म शरीर ।
जिहितें. ज्ञान पदार्थ कर होत. हर्ष भरु परि ॥
अकथ असत्य विकारगृहः भादिहिते पुनि जोय।
आच्छादित ब्रह्माण्ड पुनि माया जानहुँ सोय ॥
थूल सूक्ष्म तनु भिन्न पुनि मायाहूँते जौन ।
सदानन्द चैतन्य सत आत्मा जानहु तीन ॥
या जीवन के विषय वश है सो आत्मा तांतं ।
निर्विकार यदि स्वतः सो कुविषय करत जनांत ॥
शम दम कर पीड़ित तनुहि जवसुविवेकसहाय ।
तब तन्दुल जिमि धानतें सो आत्मा बिमलाय।
जगअनेकयदि योनि प्रिय अगणित बर्ण स्वरूप।
पर सो आत्मा एकही अमल अनादि अनूप ॥
मनं संकल्प विकल्पते. यदपि सर्व जग कर्म ।
अज्ञलगावत आतमर्हि जिमि नभनील्यो मर्म ॥
सूर्य प्रकाशित शीतजल स्वतः तप्स जिमि आग।
तिमि स्वाभाविक आंतमा सदानन्द अबिभाग ॥
बुद्धि बोध. अज्ञान वश. रोपि.आतमहिं तात् ।
पुरुष अहंइत्यादि कह ,सोव अविद्या रात।
इमि आत्मातें भिन्नकोउ आपुहिं मानत जीव ।
-

*
प्रबोधामण्युदयः ।
होत दुखित अरु हर्षयुत मृगतृष्णा जल पीव ।।
उपनिषदः । पुत्र!
सो आत्मा नहिं अन्य तू तोहिं ताहि नहि भेद
जिमिजल अरुजलवीचिमहँ नहिं अन्तर कहवेद।।
महिनहि नहि जरा सत्य नहिं किनसोहं विश्वास।
जीव आतमा ऐक्यता करतः अविद्या नाश ॥ :
सत्य। एक अनादि अनंत जो शान्तः सचिदानन्द ।
निर्विकार सर्वत्र पुनि अप्रमाण सुखकन्द ।।
अलख निरंजन ब्रह्म जो सर्व शातिक तात।
ताहि छोड़े नहिं अन्य कछु जोज़हँ तोहि लखातः॥.
पुरुषः। ( प्रेम में मग्नहो उपनिषद्के सोही दंडवत गिरपड़ा)
माता। प्यारी माता!
उपनिषद् । ( पुरुषको उठा छांतीसे लगालियां)
पुरुष । माता ! अब प्रसन्नहो आशीर्वाददे कि सर्व पुरुष नानाभकार
की अनेक पंथ कल्पना छोड़ इसपरमानन्दको प्राप्तिहों और
सर्व जगत् आनन्दपरिपूर्ण हो-परमानन्दहो आनन्दमयहो-
आनन्द आनन्द- परमानन्दहोः परमानन्द परिपूर्णहो ।
उपनिषदः । तथास्तु
(सब बाहर गये.)
इति सप्तमअङ्कः॥
समाप्तश्चायंप्रबोधांमएयुदयोनामनाटकः
:-
मुंशीनवलकिशोर (सी, आई, ई.) के छापेखाने मुक्काम लखनऊ में छपी
अक्टूबर सन् १६०५ ई० ॥
इंकनसनी महफूज है बहक इसछापेखाने के।

श्रीमद्बाल्मीकीय रामायण भाषा, किताबनुमा कागज रस्मी ५) व कागज गुन्दा ६) 'पूरे सातोकाण्ड अयोध्यापाठशाला के तृतीयाध्यापक पण्डित. महेशदत्तकृत भापा-यह वही पण्डितजी महाराज हैं, जिन्होंने पहिले देवीभागवत्त और विष्णुपुराण का उल्था क्रिया है दोभागों में याथातथ्य सुगमरीति से परिपूर्ण श्लोक के अनुसार हुआ है कोई शब्द भी छूटने नहीं पाया और श्लोक जानने के लिये अंक भी लगादिये हैं कि भ्रम न पड़े अक्षरं पके बहुत पुष्ट अबकी बार बड़ी होशियारी से छापींगई है ।। तथा पत्रानुमा की० १५) ... विदित हो कि यह पत्रानुमा वाल्मीकीयरामायण जो कि अबकी बार मालिक मतबाने छपाकर मुद्रित की है वह बहुतही अनुपम होकर संदर्शनीयहै . कि जिसका भाषानुवाद धनावली ग्रामनिवासि रामचरणोपासि पण्डित -महेशदत्त ने किया न जिसका संशोधन भी संस्कृतं प्रति से उन्नाम प्रदेशान्त- गैत गुण्डाग्रामनिवासि पण्डित सूर्यदीनजी ने किया है. इसमें मत्येक श्लोकों का अर्थ अन्वयरीतिसे कहागया व प्रत्येक पदों व अक्षरों का जैसा अर्थ होना चाहिये था वैसाही हुआ है यद्यपि मुम्बई.आदि नगरों में इसके बहुत से अनुवादहुए. हैं तो भी वह इसके समान नहीं होसक्ते हैं क्योंकि उक्त नगरोंके छपेहुए अनुवादों में कहीं. २ अन्वय रीतिसे अर्थ मिलता व कहीं २ मनमाना देख पड़ता है इस भेद को विद्वान्लोगही समझसंक्ते है इस हमारे अनुवादमें शुद्धता, छपाई, रोशनाई, कागज आदि बड़ी सफाई के साथमें हैं, इसकी सरल हिन्दी भाषा सर्व देशवासियों के समझ में आसक्ती है जिसकी भूमिका सके- लजनतोषिका बनी है व जिसके प्रत्येक सर्गों का सूचीपत्र भी बहुत ही उत्तम .रचाया है केवल इसीसेही सर्वसाधारण जन रामायण की पारायण वांचसक्ते हैं-इसकी उत्तमता लेखनी से बाहर है.अहो ग्राहकगणो ! इसके खरीदने में विलम्ब मेतकरी क्योंकि विलम्ब होने में सिवाय पछिताने के और कुछ हाथ, नहीं लगता है आशा है कि सर्व महाशयजन अवश्यही इसको देखेंगे और इसकी एक २ प्रति खरीदकर अपने घरको सुशोभित करेंगे अग्रेकिमधिक बहुवित्यलम् ॥

. . '" सरित्सागर भाषा की० ३)) पु... हिन्दी भाषा के परमहितैषी भार्गववंशावतंस मुंशीनवलकिशोर (सी, आई, ई.) ने विद्वानों के मुख से इस कथा सरित्सागर नाम ग्रन्थरत्न की प्रशंसा तथा सदुपंदेश भरी अत्यन्त मनोहर कथाओं को सुनकर अपनी मातृभाषा हिन्दीका गौरव बढ़ाने के लिये हमलोगों को यथोचित धन देकर इसका अनुः घाद करवाया इस अनुवादं में हमलोगों ने यथाशक्ति यह उद्योग किया है कि श्लोक के किसी शब्द का अर्थ न रहने पावें और यथा संभव भापाका प्रबन्ध भी न बिगड़ने पावे. इसमें जहां २ नीति के श्लोक आगये है वह भी अनुवाद सहित कोष्ठक में लिख दिये गये हैं ।। हमलोग आशा करते हैं कि जैसे इस. ग्रन्थकी कथाओं के प्राशयों को लेकर संस्कृत के कवियों ने नागानन्द कादम्बरी हितोपदेश मुद्रा राक्षस तथा वेताल पंचविंशतिका आदि अनेक ग्रन्थ वनाये हैं इसीमकार इस अनुवाद को देखकर हिन्दीभाषा के सुलेखकगण भी इसकी कथाओं के प्राशयों को लेकर अनेक नवीन ग्रन्थ बनाके अपनी मातृभाषाके गौरव को वदावेगे हमलोगों को यह भी दृढ़ विश्वास है कि यदि इस यन्त्रालयाधिपति की आज्ञानुसार इस ग्रन्थ की छोटी छोटी कथाओं को लेकर दो चार छोटे छोटे ग्रन्थ वनवाकर पाठशालाओं के दशमं नवम अष्टम तथा सप्तम आदि वर्गों के विद्यार्थियों को पदाने के लिये नियत किये जायें तो उनको विना प्रयासकेही सदुपदेश का , लाभ होगा और इससमय यह ग्रन्थ विशेष शुद्धता के साथ उम्दा हरूफ में छपाहुआ तैयारहै मूल्य बहुतही न्यूनहै ग्राहकलोग विलम्ब करने में पछतावैगे । .. 1 मैनेजर अवध अखवार प्रेस लखनऊ हजरतगंज

No text on this page.

Probhodyumarayudaya

Author
Mishra, Umadayal
Title
Probhodyumarayudaya
File name
Probhodyumarayudaya
Text
OCR done
Citation
1905
Published
2009/09
Publisher
Lakhnow, Munshi Navalkishor
Language
Sanskrit
Pages
42
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Natak
DLI number
345516
Barcode
99999990233855.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
trb4M1j2Las
Download PDF

Probhodyumarayudaya