Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Prasan Prati Prasan

Dr. Laxmi Naaryan Nandvana · 2011/03

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प्रश्न
प्रति प्रश्न
--
-डॉ लक्ष्मीनारायण नन्दवाना

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प्रश्न प्रति प्रश्न
साहित्य/सस्कृति/समाज विपयक निवध, राजस्थान का आधुनिक
हिन्दी साहित्य एक सर्वेक्षण सहित
.

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दो शब्द लसर पाटर की प्रात्मीय रिनताने पे नि पुम्नर या महा होना भावश्यक है पुनर व महज हान में पाठर या पढ़ा और लपर ये बद्रीय विचार ममभन मरठिनाइ ही गती इसम भी अधिप महत्वपूग्ण वात या हाती है कि दग महजता स पाठप-लपर पा प्रविधिन मनध बनना है इसी तरह माहित्यिका यी विगदरी बनी मार सम्पन होती है प्राजपा इम बान की पारश्यकता ह मि पाटा यी कान मम्या ही न बढे पनि वह माहित्य के द्वारा स्वय का गमृद्ध और गम्पा अनुभव वर और उनर वीच पा अटूट मम्बध प्रगाड हा सहन हान के गितमिल म बहुा म प्रश्न और प्रतिप्रश्न हैं जिह समझना जरूरी है भापा, पाठकीय रचि बचारिक लगाव, लमन की प्रामगिरता हृदय की तरलता प्रादि अनव मुटे हैं जिन पर गभीरता स चिनन पार लखन अपभित ह निव घा डा लक्ष्मीनारायण नदवाना द्वारा लिखित प्रश्न प्रति प्रश्न, म भी मुभ एक महजता दष्टिगन हाती है विभिन विषया वे इन निवधा की भापा कृत्रिम नहीं है और ये द्रीय भाव कही भी अदृश्य नही होता है इसी पुस्तक मे श्री नवाना न राजस्थान का आधुनिक हिदी साहित्य एय मक्षण भी गोमित पृष्ठा म व्यापव' जानयारी सहित प्रस्तुन पिया है जो प्रशमनीय है मुझे विश्वास है पिडा नदवाना द्वारा लिखित इस कृति 'प्रश्न प्रतिप्रश्न का साहित्य जगत ये सुधि पाठका द्वारा हार्दिक स्वागत हागा प्रकाश पातुर प्रध्यक्ष राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर

क्रम
1
1
2
9
3
4
प्रति
मी मोर समाज पन मध
मम्बधा यी प्रगाना
पवि मम्मी प्रागपिता
पाठरपोर्गव
मध्ययुगीन परितम मानिर पुनजागरगा
प्रणीता गायि मातिान माम म
राजस्थान रामापुनिर नि मारिय एक गयेण
5
16
22
27
34
46
62
6
7
8
6

प्रस्तुति
'हकला। वाला की जबान से ही नहीं, बल्वि ऐसे
व्यक्ति की जवान से भी शव स्वरा कर निका
सक्ने है जो अधिक उचित अधिक आवश्यक और
बुद्धिमत्तापूरण शब्दा की खोज करता है अपनी
बुद्धिमत्ता स आश्चय चक्ति करन की ता मैं आशा
नहीं करता मगर हमला भी नहीं सक्ता हु
खोज रहा है' (मरा दागिम्तान -- रसूल हमजाताव)
मैं शब्द
दरअसल शब्ता की खोज की वेचनी और प्रस्तुति
एक विशिष्ट चेतना की प्रतीक है यह चेतना समाज
सापेक्ष और जीवन की अनिवायता है मनुप्य समाज
म विकसित होता है और समाज से ही नान व चेतना
ग्रहण करता है सहज वृत्ति, अनुभव तथा पयवेक्षण
से यह चेतना प्रभावित होती है यह चेतना मानव
अवलम्वित ह
अत मानव के दुख सुग्य की अनुभूति एव अभिव्यक्ति
ही एक थेष्ठ रचनाश्म का प्राधार हो सकती है
'प्रश्न प्रति प्रश्न विभिन्न प्रकार के आलेखी की
सग्रहीत कृति ह इन निबधो म साहित्य समाज,
सस्कृति विपयक वई प्रश्नो को प्रस्तुत किया गया है
भौतिक सुप सुविधा सम्पन वज्ञानिक उपलब्धिया व
कौशलयुक्त मनुष्य प्रपन अदर से रिक्त होता जा रहा
है इस प्रातरिक रिक्तता की पूर्ति साहित्य ही कर
सकता है मानव वो प्रतिष्ठा मिले उसके दुम सुख
में हिस्सेदार हा, उस प्रगति की ओर ले जाय ऐसा
साथ रचनानम अपेक्षित है सस्कृति और समाज,
7

सम्बधा की प्रगाढता पाठक की रचि, पविमम्मलना
की प्रासगिकता म एम ही प्रश्न प्रति प्रश्न है, जिना
साए हैं और उनके मदम म विचार प्रस्तुतीकरण है
म्यतत्रता प्राप्ति के पश्चात् राजस्थान म भी हिनी
साहित्य गृजन विभिन्न विधामा म यूनाधिक हो रहा
है गत् 35 40 वर्षों क माहित्य का सर्वेक्षण करन
पर परिनलित होता है कि पतिपय विधामा म ता
उलेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की है जबकि पतिपय
विधाए एसी हैं जिनम रचनाकम नाममान का भी नहीं
ह और यह चिंतनीय स्थिति है पविता कहानी,
उप याम आदि के क्षेत्र म प्रशसनीय साहित्य मृजन
हमारे यहा उपलब्ध है राजस्थान व आधुनिक
हिन्दी साहित्य का मक्षिप्त सर्वेक्षण भी इम कृति म
उपलब्ध है
ग्रातसा म सहजता व सरतता ह तथा कृत्रिमता
का सप्रयास कर रखा गया है
अपनी बुद्धिमत्ता स प्राश्चयचक्ति करन की प्राणा
मे भी नहीं करता तग्नि की जा खाज की है
अभिव्यक्ति प्रश्न प्रति प्रश्न के द्वारा यहा
रमत्री महज
प्रस्तुत है
हालिवामव 1984
लक्ष्मीनारायण नन्दवाना
8

सस्कृति और समाज अन्त सम्बन्ध जीवन का चरम उद्देश्य विपाद या व्यथा नहीं है हा, रसान द की प्राप्ति जरूर माना गया है मनीपिया न रस का यह म स्वीकारा है इसकी प्राप्ति मा सर्वोत्कृष्ट साधन साहित्य माना जा सरता है वस्तुत साहित्य स्वय ग्रह मर स्वरूप प्रान द स्वरूप है यह साहित्य लोरिक तथा पारलौरिष दानो ही प्रकार पे मानद एव मगल का माध्यम है इमीलिए मानव मानद की खोज म सतत मानव की इस यात्रा म साहित्य, धम तथा दर्शन उसर सहभागी हैं सायजनीन मुस्थिर शन राशि या नाम साहित्य है साहित्य या सर. लाथ जो हितयुक्न हा, है साथ ही महभाव, साथ होना, सम्मिलित हित घ मिना सहित भी इसवा अथ किया जा सकता है साहित्य मानव जीवन की सरस व्याख्या है वस्तुत यह मानव मात्र की कलात्मक और मान दप्रद रुचि पो टटोलता है और उसे परिणत कर समाजोपयोगी बनाता है मानव के जीवन को सरस, मुसी और पादित करन के लिए माहित्य एव महती भूमिया पा निर्वाह परता है साहित्य का मानव जीवन के साथ घिर तन सम्बध है साहित्य का सृष्टा मानव है और मानव पे लिए ही साहित्य की सृष्टि है साहित्य का उपादान और विषय वस्तु यही मानव जीवन है जो समाज साक्षेप है साहित्य के मूल में रागात्मक और त मयता के जो भाव है उसका भी एकमात्र कारण यही है कि मनुष्य अपने जीवन में सम्पूणता को चाहता है मानव जीवन के विविध रूपा की अभिष्यक्ति साहित्य म होती है इसी के कारण समाज मे पाये बदलावो के फलस्वरूप साहित्य में भी परिवर्तन प्राता है युगीन परिवेश और परि- स्थितिया का परिवतन और वपम्य साहित्य का आधार है इसलिए साहित्य 1 साहित्य की उपक्रमणिका प विशोरीदास वाजपयी, पृ 1 9 भ युग मानव का सुग दुम, हप विवाद, प्रेम प्रानि मनाना है और वह भागी दारो परता है मातव जीवन स जुडा हाना ही उसरा वैशिष्ट्य है यह जीवन चेतन हीनता का पर्याय नही अपितु उसकी सायक्ता गत्यात्माता और प्रवाह म है यही सक्रियता गाहित्य और गोवा की चेतना की जत्री शत है निराशा स श्रेष्ठ साहित्य का निर्माण नहीं हो सकता है प्रत विकास की अनिवायना व साथ प्रास्या यी अनिवायता भी है यदि उस अब हम चेतना की यात परेंग चनना जीवन की अनिवायता है यह चेतना की गहा स्थिति ही मानव का अय प्राणधारियो स अधिक महत्वपूण बनाती है मनुष्य सहज वृत्ति सम्पन है और वह समाज मे विकसित हाता ह समाज से पृथक कर दिया जाय तो वह असामाजिक, बवर व सभवत गूगा होगा लेकिन समाज म विकसित व्यक्ति समाज से नान व चेतना ग्रहण परता है प्रत्येर साहित्यकार की चतना पयवेक्षण तथा स्मृतिया से विकसित तथा समृद्धिशील होती है प्रत्यप सामाज्यि की चेतना म अन्तर हाना स्वाभाविक है सहज वृत्ति, अनुभव तथा पयवक्षण से चेतना प्रभावित होगी और प्रत्येर व्यक्ति की चेतना म बुनियादी अतर पदा करेगी इम प्रशार व्यक्ति की चेतना मे उमा निजत्व भी सम्मिनित हागा समाज तथा बाह्य परिवेश सघष का चेता पर प्रभाव पडता ह यानी चेतना समाज साक्षेप ही होगी दूसरी ओर जव कला चेतना की बात करत है ता पाते हैं कि क्सा चेतना के जितने गहन तल का छुयेगी वह उतनी ही थेप्ठ होगी इस गहन चेतना के द्वारा मानव प्रतजगत मे पहुच कर रम और मान द म लीन हो जाता है यही वह स्थिति है जिसमें वह रसान द का प्राप्त करता है धम, दर्शन या वाद के माध्यम स इह अलग अलग रूपो म परिभाषित किया जा सकता है लेकिन यह मनन याग्य है कि इस याह य परिवेश तथा प्रातरिक चेतना के अनुभव, मिलन और अभिव्यक्ति से एक भाव जगत का उदय तथा विकास होता है परिवेश का अतमन पर प्रभाव क्स पडता है तथा उमका सस्वारी मन अभिव्यक्ति क्स करता यह विचारणीय है इम वाहय वस्तु और स्प मिलकर भावाथित स्पधा सृपा हाता है साहित्य मे वस्तु और रूप से घनिष्ठ सम्बधा को समझना वस्तुत एक साधना है रूप और सौदय की सृष्टि द्वारा ही उच्चकोटि के मानद का उद्रेक होता है यह भावा- पित रुप ही साहित्य है इस भावाश्रित.स्प निर्माण मे मन व सस्वार सहयोगी है सस्तार पारमा का गुण है ये सस्तार अभिव्यक्ति के प्रकटीकरण में 10 अपेक्षित सहयोग देते हैं इस आत्माभिव्यक्ति में इस प्रकार सस्कारा का महत्व स्वीकारना होगा ये सस्कार सस्कृति की दन ह जो धीरे धीरे अमन में पठते है इस प्रकार सस्कृति की सवलता माननी ही पड़ेगी प्रत्येक सस्कृति अपनी अमिट निशानी छाडती है यह निशानी विभिन्न क्लामो माध्यम से प्रकट सभ्यता इस सस्कृति का ऊपरी रूप है सस्कृति के उनयन के साथ नलित क्लाम्रो नी भी श्रीवृद्धि होती है इस तरह सम्कृति और साहित्य के घनिष्ठतम सम्बध हैं यह साहित्य सास्कृतिक प्रकटीपरण ही ह होती है जव साहित्य के साथ सस्कृति की चचा की जाती है तो परिलक्षित हाता ह वि माहित्य का प्राधार सस्कृति रही ह मस्कृति को लक्षणो से जाना जा माता है कि तु उसकी परिभाषा देना दुरुह है यो मानवीय जीवन के दोघजीवी मूल तत्वा को सस्कृति समझा जा सकता है इसम ज्ञान, विश्वाम, क्लाए, नतिकता, रीतिरिवाज, नियम तथा वे सभी योग्यताए समाहित है जो एक व्यक्ति समाज का सदस्य होने के लिए ग्रहण परता ह अर्थात मनुष्यत्व के माधारभूत तत्वो को सस्कृति कहा जा सकता डा हिरे द्रनाथ दत्त के अनुसार जाति विशेप के प्रातरिक भावो की अभि- व्यजना सस्कृति ह दूसरे शब्दो म पशुत्व से मनुष्यत्व की यात्रा या मनुष्य की श्रेष्ठ साधनातो या रूपातर ही सस्कृति ह सस्कृति के साथ माथ सभ्यता का भी विकास होता है कई बार इनका स्वरूप इतना मिलाजुला होता ह कि उह अलग पर पाना आसान नहीं होता विद्वानो ने सभ्यता शब्द का सम्बध सभा से बताया ह पाणिनि के अनुसार सभा मे साधु माचरण परने वाले को सभ्य कहा जाता है सभ्य से ही भाववाचक सभ्यता बनी सस्कृति का प्रथ सम्यक करने का भाव अथवा श्रीडाह सम्वृति का प्रातरिक पक्ष से तथा सभ्यता का सम्बय वाह य पक्ष से ह डा हरयशलाल शर्मा लिखत हैं साराश यह है कि सस्कृति वह सूक्ष्म भावनात्मक तत्व ह जो हृदय की प्रेरणा से बाह य प्राचारा म प्रस्फुटित होकर भी सूक्ष्मता के निकट ही अधिक रहता ह और सभ्यता वह तत्व ह जो हृदय की अपेक्षा बुद्धि से अधिक सम्बध रखता है उसकी जड़ें सूक्ष्म की अपेक्षा स्यूल मे अधिक गहरी उतरी हुई होती है अर्थात् वह भौतिकता की मोर अधिक युकी हाती ह इसलिए - भारतीय सस्थति, श्री हिरेन्द्रनाथ दत्त, पृ4 मूर और उनका साहित्य, डा हरवशलाल शर्मा, परिशिष्ट 2 2 रानीप्रभा सम्पना प्रति परिवानगीर भी हर 1 हमारे विचार म गHITT मारा और गनिमान गए ह निगे किमी प्रमार की परि भारा, सीमा पपया या म पापर सरना भारित, पोर स्थापित मा यतामा में विपरीत मामिागे माय गगृति म सिमित होता प्राया ह यह ता frगी भी गमान में विराग मी निमिता गरहनिह मम्मृतिमीमाव जनी, उमसीमानासता, उन। प्रा प्रभाव विचारणीय ह मति गगी भावात्मर गता जिग गटित ही पिया जा माता ह मानय पी जीवन गतिया नया प्रणीत साधनामा वा पनीभूत स्वाप ह इसलिए गिी धन या स्थान विशष पी गति का उस महान भू भाग की महा। सस्थति या पग माना जाना चाहिए जब हम भारतीय सस्कृति की चिना पारा पा नाग सेन है ता भारा भूगर मान तथा मानव के विकास कम में सक्रिय सहयाग देन याने शाश्वत गिटाता और मूल्या की मार ध्यान पना गाता है जाग पिता धारा के वट वृष यो गीचत रह है इस प्रकार सस्कृति समाज की उपज है जिमम माराव गमाज म लोविय, पारलौकिक, भामिय राजनीतिक, यता सम्बधी और सामाजिप मन्युदय से अनुम्प मन बुद्धि अपार तथा सम्यार सम्मिलित हैं मस्तार इमरा प्राणतत्व है और समाज का प्राणतत्य सस्थति है साहित्य, कला, धम, न विमान पानि तव मस्कृति की पहुच है सस्थति मोर गम्यता पा रूपक मारमा और शरीर स दिया जा रायता है दोना या प्रयत्न और दोनो का प्रभाव अयोयाश्रित हाता है सस्कृति मानव जीवन की उन्नति व सभ्यता का प्राण तत्व है सास्कृतिक मूल्यो वा अवमूल्यन होन पर राष्ट्रीय अस्मिता पर गहरा प्रभाव पड़ता है और कलाए भी प्रभावित होती है सास्कृतिक दृष्टि सम्पन राष्ट्र का साहित्य निसदेह समृद्ध हो सास्कृतिक उनति के काल म साहित्य की श्रीवृद्धि भी होगी सस्कृति के अपने मूल्य हात हैं और ये मूल्य शाश्वत होत हैं उदाहरण के लिए सत् चित् प्रान' को ले सत्य को एक स्थायी मूल्य के रूप म स्वीकारा गया है आज भी सत्य की महता तो माननी पडेगी सत्य कास्पदल साता है युग के साथ यह कहा जा सकता है कि 'सत्य' यह है लक्नि परि- वतन की प्रक्रिया म सत्य की महता अस्वीकारी नहीं जा सकती है इसी प्रकार चित् या जीवन का अपना महत्व है मानद तो भारतीय संस्कृति का आधार है दया, करुणा, प्रेम, बघुत्व की महता भी सस्कृति व साहित्य में स्वीकारी सूर और उना साहित्य 12 इसी तरह समता और स्वतत्रता भी मुत्य है इस ममता और स्वतत्रता के मूल्य का रूप समयानुसार परिवर्तित होता रहा ह और इसन पर्याप्त विस्तार कर लिया है और राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिर समता व स्वतत्रता के लिए मानव सतत प्रयत्नशील है दरअसल भारतीय मस्कृति सामासिक सस्कृति है और मिन भिन्न जातियो की मानसिर एक्ता का प्रतिनिधित्व करती है यह भारतीय सस्कृति अपनी विशिष्टता, सावजनीनता, मावन मूल्यो और प्रतिमानो, प्राचीनतर, समयपरसता, गह्नता और गभोरता में विश्व की सवधेष्ठ सस्कृति मानव और मानववाद का अभ्युदय और विकास इसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति म मात्मसात करने की शक्ति है परिणामत विभिन देशी विदेशी समाजा पे रीतिरिवाज और परम्पराए इस सस्कृति में घुल गये हैं और विलग दृष्टिगत नहीं हात हैं प्राचीनकाल में ही अनक जातिया भारत मे आई और इस सस्कृति म मिल गई इम तोक्तातिर सम्वृति मे विभिन क्षेत्रो की सस्कृतिया भी हैं यह सस्कृति सहिष्णुता, स्माधीन चिंतन, वैयक्तिक स्वतत्रता व जीवनादश की प्रवल समथक है भारत ने विभिन्न विचारा मतो और धर्मों के मध्य पूरा सम वय विठा रखा ह यह समवित रूप ही हमारी सबसे वडी धरोहर है धर्म को लें आज घम को सकीर्ण अयं मे देखा जा रहा है वस्तुत धम या शब्द-सकोच हुआ ह और धम की चर्चा करत हो हयता, सीए मनो- वृति या सीमित सामथ्य का मनोभाव जागृत होता है लेकिन धर्म अपीम नहीं है धम को ऋपि परणाद ने इह लौकिक और पारलौकिक कल्याण की प्राप्ति के लिये बनाय गये नियम-समूह कहा है तो महपि धास ससार को धारण करने थाले नियम समूह कहते हैं डा राधाकृष्णन के विचार है कि अपने दनिर जीवन म और सामाजिक सम्बधाम जिन सिद्धाता की पालना करना पडे वे उस वस्तु द्वारा निधारित किए गए है जिस धर्म कहा गया है T स्पष्ट है कि मानव समाज को संचालित करने वाली मा यतामो या नियम समूह को धम कहा जा सकता है धर्म मानव कल्याण के लिए है सभी धर्मों घे मूल तत्वो व सिद्धातो का अध्ययन क्यिा जाय तो स्पष्ट लभित होता ह कि मानवीय मूल्यो की रक्षाथ तथा समाज की उचित व्यवस्थाथ पतिपय सिद्धात - घम और समाज डा राधाकृष्णन, पृ 120 घम मानव निधारित हात है जिह पम ये मरी अभिप्रेत दिया जाता है पायो मुमी मे नि प्रेरित गरता ह पठिनाई तर हानी है जपनि धम में पति पदार अपनी स्थिति या दुरया परत हुए धम मून सत्या यी भामा व प्रगत्य धाराप्रपा ता य ताम पे गिय करत है धमय सत्ता प्र1ि पर प्रहमारी ६ घमा पाटिया का सामन जमन पर ये प्रपा लाय पम मा दुराग रन उग जाते हैं पग्गिामत घम ये प्रतिमाना या अवमूल्यन हा जाता है मार उग धर्म र मूल्य पाउन याय नहीं रहत है अपथा धग पा मानय जीरा ग गहग पह गनि प्रश्यिा या माग निर्देशन म नाराजगी नी इगर पारा प्रनिताना म ममयानुकून परिवतन भी मारश्यय ह मनीयता न हान पर घम पर मापात हान लग जाते हैं अव दशन दे सम्बंध में विचार दशन पामरनाथ दे तत्वाव- लोचन सत्या पाह दशा मानय व ममक्ष गाावानी रामम्याना व ममा धान वा तत्पर रहता ह माहित्य गी गमाधान का सरम पटा में अभिव्यक्त करता है श्री वरदेव उपान्याय के शब्ता मशिन भारतीय मनीपिया के द्वारा अनुभूत सत्य का परिचय दने वाला साहित्य र दशा मुपत माव जीवन पी समस्पाना को सुलझान के लिए प्रपल करता है व माग निर्देशित करता ह उच्च व पादश जीवन के लिए जा तथ्य अपक्षित हाने ह व दशन उपलब्ध कराता है दशन नान प्राप्तिका माग ह दशन किमी भी गति या गष्ट्रा प्रध्यात्म चिंतन को नापने का पमाना ह धम की व्यारा दर्शन करना ह भारतीय धर्म दर्शन के सुनिश्चित प्राध्यात्मिक तथ्या वे ऊपर ही प्रतिष्ठित ह घम का प्रमाद खडा करन के लिए दर्शन उस नीव रखता ह काई भी धम तत्व तब तक विद्वानो का प्रिय नहीं बन सकता जब तक वह दशन की नीव पर खडा नही होता ह दशन एक प्रम बद्ध विचारधारा ह मानव चितन- शीन ह और दिव्य से दिव्यतर बनना चाहता ह और इस प्रयास म दर्शन उसकी निसदह मदद करता ह तपान जीवन की व्यास्था ही नहीं करता अपितु उसे एक दृष्टि सम्पन्न बनाता ह सभी कातिकारी पालना की पृष्ठभूमि म दर्शन (विचारधाराए) बाय करता ह भारतीय दशन सार, प बलदेव उपायाय पृ 47 14 इस प्रकार समाज या व्यक्ति समूहो को परिचालित करने का कार्य धर्म करता और उसकी व्याख्या व दष्टि समनता दशन या विचारधारा भी होती है प्राण हम पिसी भी साहित्य को दखें तो वह एक दृष्टि सम्पन या विचारधारा प्रधान दृष्टिगत होता ह साहित्य के माधम म दर्शा की रूबी व्यारया सरस ढग से प्रस्तुत की जा सरनी ह और वह भी अधिक प्रभावारमय ढग से साहित्य की पृष्ठभूमि म धम और दर्शन (वाद) रहता है मध्ययुगीन साहित्य के उत्प्रेरक तत्त्व धर्म और दशन रहे हैं और आज भी किसी न किसी रूप म है ही धर्म के तत्व वाध को पाठर तक पहुंचान और जन भावन' का विषय बनाने का काय साहित्य परता है इस प्रकार स्पष्ट लधिन है कि साहित्य या समाज से अविच्छिन सम्बध ह धम और दर्शन की मा यताए भी समाज से उत्पन हाती है मौर दूरगामी प्रभाव छोडती है मा यताया को प्रचारित करन तथा जन जन तक पहुचाने का सबल साधन साहित्य रहा है और माज भी है प्राग मा साहित्य को एक सशक्त हथियार के रूप म प्राति व पादोलनो के प्रणता व प्रचारक प्रयुक्त परत हैं वतगान युग मे ता इस जन हथियार का प्रयोग बहुत जोरशोर से हो अाज समता व स्वतनता के लिए साहित्य धारदार हथियार के रूप म प्रयुक्त हो रहा है इससे माहित्य भी प्रभावशीलता का विस्तार ही ज्ञात अाज इस दद्वारमक युग म जव विश्व सोमिट गया है और विज्ञान तथा बौद्धिकता का प्रसर प्रचार है, साहित्य का दायित्व भी बढ़ गया है उसका क्षेत्र विस्तार हुआ है तथा उस अनेक नये प्रश्नो दायित्वा वा गामना करना पड़ रहा है होता है सम्बन्धी की प्रगाढता पारिवारिप व वयक्तिव मम्मयो म बढ़ रह ननाया तथा मनुप्प पीर गनुप ये बीच टूटत सम्बधा यी चपा प्रशासगिय नही ह पई गमानार है असहाय वृद्ध मातापिता या शिक्षिा गमभार पुत्र प्रपनी पत्नी सहित उनस पितग हा जाता है और वह वृद्ध दम्पति मौत की प्रतीता परती ह एव भाई पता सम्पत्ति के विवाद म अपने भाई की निमम हत्या पर लाश गगा म यहा देता है सास बहू का या युद्ध क्रमश बढ़ता गया और उगी परिणति मध्यस्थ व्यक्ति थे हाट घटेप से होती है ग्यायालय म साक्षी देन से रावने २ लिए एक ही गाय के 11 वामा को मृगस हरया वरती जाती ह धमगुरु प निर्देश की पालना में प्रश्न पर पति पत्नी के सम्बध विच्छेद हो जात है या एक पुत्र अपने पिता की शव यात्रा में सम्मिलित होने की अपेक्षा हनीमून मनान चना जाता है धम के नाम पर गाव थे गाव जलादिए जाते है या बस से उतार पर यात्रियो को भून दिया जाता है आखिर सम्बधो म शिथिलता ही नहीं यह टूटन क्यो पटा हो रही है ? यह प्रश्न बराबर यचौटता रहता ह एक समय वह भी रहा है कि गांव म प्राया हुमा अतिथि किसी व्यक्ति विशेष का न होकर मम्पूण गाव २, अतिथि होता था प विशोरीवाल के जामाता उनके ही नहीं सम्पूर गाव व जामाता होत थे भाई अपने भाई लिए प्राण त्याग देता था घर, परिवार, समाज, गाव चयक्तिव सम्बध प्रगाढ थे लपिन यह प्रगाढता प्रमश समाप्त हो रही है सम्यधोको प्रगाढता म कमी व समाप्ति के अनेक पारण हो सवत है परियार पी इवाई टूट रही है पार उगम मूल्य परिवर्तित हा रहे हैं पहले गाव म एक ही परिवार म मुखिया के सभी पुष, पुत्रिया, पुत्रो की पस्निया 16 और लडके लडकिया सम्मिलित रूप से रहते थे और परिवार के अनुशासन का पालन करते थे कृषि या व्यवसाय में सभी भागीदारी करते और सम्मि- लित रूप से जीविकोपाजन करते थे परिवार का मुत्य सबके लिए समान था मुखिया के निर्देश की सभी को अनुपालना करती थी वयक्तिर सम्बधा की प्रगाढता थी सभी साथ साथ भाजन करते उठते बठते थे समान व्यवहार उनके मध्य था कभी यदि कोई बात भी हो गई तो मुखिया का निणय प्रतिम होता और उसकी पालना की जाती परिवार के बाद शिक्षा के क्षेत्र मे गुरु शिष्य सम्बन्धो की घनिष्ठ स्थिति थी शिक्षक का पूर्ण सम्मान किया जाता था तो छात्र को स्नेह मुझे स्मरण है कि मेरे विद्यालय म हिदी के भध्यापक प्रभाशर जी थे जिनका अनुशासन व सम्मान एसा हतप्रभ पर देने वाला था कि विद्यालय म उनके प्रवश में साथ ही सम्पूण विद्यार्थी वग को उनके पान की सूचना मिल जाती थी फिर न कही हल्ला गुल्ला और न कही ठहाक यह थोपा हुआ या प्रातकवारी अनुशामन नही था अपितु हृदय से स्वय का शासन था प्रभारावर जी जैसे लगनशील शिक्षक है और न शिक्षा प्रेमी विद्यार्थी प्रभाशयर जी का कौशल उनका प्रध्यापन तथा छात्रो के साथ वयक्तिक तादात्म्य था की स्थिति यह थी कि व्यक्तिया से मध्य वग भेदहीन भावात्मन सम्बध पे एक की तकलीफ सम्पूण गाव की तकलीफ थी प्रबनता गाव गोय मे विसी के घर विसी व्यक्ति को तवलोप हुई तो यह सम्पूर्ण गाय मी बदना होती एक परिवार म मृत्यु होने पर सम्पूर ग्राम शोगाकुल होता और शादी होने पर हर्पित माज परिस्थितिया परिवर्तित हो रही हैं परिवार को काई सीमित हो गई है परिवार छिन भिन्न हो रहे है यति सुविधाजीवी होता जा रहा है उसका मेरा सीमित हो गया है भापना की जगह पह मधिन तातिय हो गया है इस परिवतन म जीवन मपप तथा माथिव परिस्थितियां सपाधिष प्रभावित परती हैं सम्पूर्ण परिवार या धुटुम्ब का एक साथ पि या व्यवसाय परना या एक ही स्थान पर रहना सभव नहीं रहा है परिणामत हर व्यक्ति पोमपने जीविकोपाजन के लिए प्रपरन परना पड रहा ह परिवार या सम्य भिन भिन स्थानो पर पहुंच पर बयसाय, पृषि या नौररी करता है और फिर उसवा क्षेत्र यह, उसकी पत्नी मोर उसके मालवच्चे हो जात है ऐमी स्थिति में वह अपने माता पिता या प्रय रक्त सम्बधिया की चिन्ता को कम करते हुए वह उह भूला देता है फिर उसरी पीडा सिफ उम तक सीमित हो जाती है स्थिति यही नहीं है वलि वह इतना समीण तथा स्वार्थी हो जाता है नि उसरा क्षेत्र स्वय से प्रारम होता है वह, उसके बाद उसकी पली व फिर बच्चे न इससे आगे और न इससे पीछे उसका लक्या ग्रस्त भाई दूसरे शहर म विा वेतन के प्रकाश पर है और अपने ग्रह तथा नोकरी के लिए मधप पर रहा है तो उसे कोई चिना या द नहीं है उसे सम्बधा वा एहसास तो है लेकिन वह उमरे लिए चितिन नहीं है वह अपन और अपन सीमित घेरे में व्यस्त है परिवार म सदाधिक बटुस्थिति सास बहू के सम्बधा यो रोवर उत्पन हो जाती है हर सास यह तो महमूग करती है कि वह भी कभी बहू रही है लेकिन अपनी बह को दासी समझती है और सम्म वाम अतविराध प्रारम्भ हो जाता है साम घर की प्रतिष्ठा, अनुशासन और मालिकाना हक के लिये सघप करती है तो दूसरी ओर बहू अपना वचस्व कायम करने, अपने ग्रह का सुरक्षित रखने व स्वय को मालकिन को स्थिनि म मान के लिए सषष करती है वौद्धिकता उसकी मदद करती है वस्तुत यह दो पीदियो वा सघष होता है और यह शीतयुद्ध, वाक्युद्ध तथा कभी कभी प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति पदा हो जाती है इसकी परिणति दुखद होती है इस सघप मे मध्यस्थ हैं पास का पुत्र व बहू का पति वह पीडादायक स्थिति मे रहता है तथा मानसिक तनाव झेलता है उनकी नियति लाना और उपालभ खाने और अपने को हेय समझने की होती है इस मानमिर तनाव का कई वार बुरा असर हो जाता है भावुक व्यक्ति ज्यादा तकलीफ पाता है यह स्थिति सवधा को प्रगाढता को कम करती है और रिक्तता पदा कर देती ह पतृ विवादा से भी सबधा में कमी हो जाती है विषमतामो के फ्लस्नरूप जीवन सघप तीन हो रहा है और इस जीवन सधप में ए लडका पढ़ लिखकर नौकरी करता या व्यवसाय प्रारम्भ करता ह वह विवाह करत ही अपनी पत्नी को ले परिवार म विग हो अपने सुप स्वप्नो मे खो जाता है अब उसके सुख दुख से पत्नी के अतिरिक्त भय किसी पा सबध नही रहता ह दूमरी मोर पाहाय पिना अपनी वृद्धा पत्नी का ले एक टूटे फूट भवान मे चीत दिना की बातो को स्मरण करता है तथा अपने भाग्य या कोसता व ईश्वर का उपालभ देता है मैंने देखा है एर पिता ने अपने पाच पुत्रो को जीवन सघप के लायन 18 दिया, स्वय तकलीफें भोगी और रिसी बेटे को कष्ट न होने दिया लेकिन पुत्र होशियार होने पर अलग होत गये तथा अतिम दिन उस लकवाग्रस्त पिता न बडी करुणा व वेदना के साथ निकाले वह एडिया रगड रगड वर मरा तथा पाचो पुत्र उसके पास होते हुए भी उससे बहुत दूर रहे किसी ने उस वृद्ध असहाय की तकलीफ में भागीदारी करन का प्रयास नहीं किया वतमात राज नीतिक व आर्थिक परिस्थितियो मे उन पुत्रो के मानव मूल्यो या परिवर्तित स्प यही रहा होगा कि वे अपने व अपने वच्चा के हितो को दखें शहरी यानिव सस्कृति का पीडादायक रूप यह हो गया ह कि मनुष्य से उसकी सवेन्ना समाप्त हो गई है दया, करुणा, हप,विपाद वेदना सभी समाप्त हो गय है और उसका जीवन एक ढरे पर चलने लगा है प्राज पास पडोम के दुख दद से कोई रिश्ता ही नहीं रहा है सिफ पसा ही मूल्य रह गया है एक समय था कि गांव में किसी की मृत्यु हो जाने पर सम्पूर्ण गाव मे तव तक चूल्हा नहीं जलता था जब तक कि उस लाश का क्रियारम न कर दिया जाता लेकिन प्राग स्थिति यह है वि पडोम म मत्यु होने पर व्यक्ति तुरत खाना खावर कार्यालय जाता है उपस्थिति पत्रक मे हस्ताक्षर कर वापस शवयात्रा म सम्मिलित हो लच टाइम मे सामूहिक नास्ते पर पहुच जाता है उस व्यक्ति ये लिए यह एक सहज काय व्यापार है अाज हम समाचार पत्रो म सामूहिक हत्यामा व बच्चा की सामूहिक निर्मम मौतो ये समाचार नाश्ता करते हुए पड लेते हैं और हमारे लिए एव समाचार से अधिक उसरी योई प्रतिक्रिया नही होती हृदय मे न तो टीस उठती है और न पाखें भीगती है राजनीति ने प्रयतम के समान ही सम्बचो की प्रगाढता पर प्रभावी असर डासा राजनीतिक दलो के विवाद मवई परिवार छिन्न भिन्न हो गये हैं एक ही परिवार के व्यक्ति विभिन्न राजनीतिक दलो के कायक्ता होते हैं धीरे धीर पर बाहर अपनी विचारधारा का समर्थन दिया जाता है और फिर वह परिवार बिखर जाता है बेटा मा के यहां छापे डलवाता है तथा भाई अपने भाई वे यहां क्योकि राजनीति म घात प्रतिघात मनिवायता है घम के नाम पर भी सम्वधा म दूरी मा जाती है धम का प्रारम्भ कभी समाज के लिए पल्याणकारी रहा होगा भौर धम व राजनीति एक रह हांग विपिन धम के नाम पर किया जान वाला पांखड प्रोर अत्याचार पम की मृर भारना पर ही कुठारापात परते है परिवार का एक सदस्य प्रय धम के पान वी कल्पना ही नहीं कर सकता है और परने पर उसे परिवार त्यागना पडता है धम ग्राज वयक्तिर सम्बधो पर किस प्रकार प्रत्यक्ष और परोष प्रभाव डालता है इसका एक उदाहरण बोहरा सम्प्रदाय है वोहरा सम्प्रदाय की तीन चौथाई भावादी भारत मे है गत् कुछ वर्षों से इस सम्प्रदाय में सुधारवादी प्रादोलन प्रारम्भ हुमा जिमने मुरय धमगुरु द्वारा किए जा रहे अत्याचारो तथा प्रतिगामी कार्यों का विरोध भी किया इम पालन के कायक्र्तायो ने सामाजिक व पारिवारिक कार्यों मे घम गुरुपो के हस्तक्षेप का जबरदस्त विरोध किया पदा होने मे मरने तक धमगुरु की समूल्य स्वीकृति (टेक्म), कब्रिस्तान मे शव को दफनाने के लिए अनुमति, विद्यालया म प्रवेश और अय विकासात्मक कार्यो, चुनावा म वोट आदि के लिए स्वीकृति जसे अनुचित हस्तक्षेप का सशक्त विरोध शुरु किया इसका परिणाम धमगुर और उनके अनुयायियो द्वारा डराना, धमकाना, समाज से वहिष्कृत कराना आदि अनक अनियमित काय किए गए साथ ही परिवार मे विघटन भी हुए सम्वधा में एक कटुता उत्पन्न हुई घम गुरु का अनुयायी बेटा अपन सुधारवादी पिता की मृत्यु पर शवयात्रा म न जाकर पत्नी को लेकर हनी मा मनाने चला जाता है घायल पुत्र को देखने की अपेक्षा ताश खेलता है सुधारवादी विचारधारा के पति से, पिता के वहकावे मे पाकर पत्नी पथर हो जाती है चड मुल्ला की अनुमति न मिलने से विवाह नहीं होते है और फिर सामूहिक शिवाह बोहरा यूथ को प्रारम्भ करने पड़ते हैं श्री असगर अली इजिनियर, गुनाम हुमन, प्राबिद अदीय प्रमति सुधार वादी वोहरा ही वतायेंगे कि धर्म के नाम पर कितने पाखड हा सक्त है और उससे कितनी पाडा व यातना भोगनी पड़ती है तथा सम्बधो म टूटन कसे पदा हो जाती है ? मीनाक्षीपुरम मे हिदू से मुस्लिम बने व्यक्तियो के परिवारा की स्थिति क्सी होती है, वे ही मुक्तभोगी बता सक्त हैं लखनऊ में शिया सूनी दगे क्योलिन और प्रोटेस्टेंट के मध्य दगे आदि मूल्यो की टूटन ही दर्शाते है प्राज पजाब में धम के नाम पर बस से उतार कर विशेष धम के व्यक्तियो की नशस हत्या गोलियो से भून कर की जा रही है और मानवमून्यो व सम्बधा की चिंता विसे रही यह विचारणीय है एक व्यक्ति अपनी प्रेमिका की विवाह पर अमहमति की सुन हत्या कर देना है पोर उमती मृत देह के साय रमण करता है यह आधुनिक बोप 20 दूसरी मोर गुलेरी जी पागलपन है राम्रो की टूटन यहा विचारणीय है ची बहानी 'उगन पहा या दृष्टव्य है पार स्थिति इतनी बतर हो गई है कि महानगरो को बात छोडिये सामाप नगरों में भी व्यक्ति को यह पता नही है कि उसक पडोस म कौन रहता है ? उसै स्या सुमदुत है । कल उसके यहाँ आरटर पाया था तो क्यो माया था अथवा वह लगडापर यनसे क्या चल रहा है। इन सबसे प्राज कोई मतलब नहीं रहा है गभवत इसव मम्बध म यह भी नक निया जा सके रि पडामी के घर में भावने का स्वराव अम्चा नहीं है या वैयक्तिक स्वतंत्रता और समता की धान उठाई जा सकती है लेकिन इगम न तो वयक्तिक स्वतयता समाप्त होती है पोर न समता के चिरद्ध हो यह है वस्तुत' सत्य यह है कि मानव मूल्या की चिता कम होती जा रही है और सम्वधा को प्रगाढता अव नहीं रही है अब मनुष्य न तो पिसी ये दुस सुन पो चिना करता है और न इसम भागीदार बनना चाहता है मान विज्ञान का विस्तार, बौद्रिाता मौलिकता पानि के परसस्वरूप विश्व संकुचित हुआ है तो ध्यक्ति भी साबित हो रहा है प्रान प्रक्ति की दुनिया यहुन छोटी हो रही है और उस हप विपाट तुप दुम्स अपनस्व का घेरा सिप उसने पास सव सिमर करपा गया है भावनामा की अपक्षा वौद्विक्ता प्रभावी हो गई है यही स्थिति रही तो मनुष्य भीत हो राबोट(लौह यात्रिक पुरप) बन जायेगा यह समय शीन ही पा रहा है सम्पधा की प्रगाढ़ता म जो कमी पा रही है वह चितनीय है कविसम्मेलनों की प्रासनिकता पविता मानवीय चेतना का प्रतिविम्बन है चेतना का यह प्रतिविम्वन रचा प्रप्रिया से होती हुई प्राब्द बद्ध होती है यो कह पि कविता मे वस्तु और स्प दोनो है वाह य जगत का कवि की मानसिकता के साथ प्रकटीकरण कविता है समाज की चेतना का प्रारदा करिता के माध्यम से होता है इस प्रकार यविता समाज सापेक्ष है समाज के इतिहास के साथ ही कविता का इतिहास है यह चेतना कविलो के निर्माण तथा विकास के साथ साथ दृष्टिगत होती है मनुष्य सौढी दर सीढी सुसस्कृत हाता है और इसमे काम्य अपनी महती भूमिका का निर्वाह करता है कविता (काव्य) ने अपनी ऊर्जा ला जनजीवन से ग्रहण की है प्रारभिक काल मे जब मनुष्य श्रम से क्लात हो एक स्थान पर समूहबद्ध होता था पार उसमे से किसी के प्रत मन से जो वोन निझरित होते थे व समूह को प्रवाहित करते थे कभी कभी ऐसा भी हाता हागा कि उस व्यक्ति के साथ एक नित व्यक्ति भाव जगत की यात्रा साथ साथ करत होगे और यह समूहगीत प्रारभ हो जाता था एकत्रित समूह मे एक से अधिक व्यक्तियो द्वारा काव्य पाठ एक ही स्थान पर करना हो कवि सम्मेलनो की भूमिका हो सकती है तो जनजीवन में ऐस वई अवसर प्राते थे जर रसिक व्यक्ति अपने अन्त चेतना या प्रकटी. करण उपस्थित श्रोतामो के समक्ष करते थे त्यौहार पर्वो पर शादी ब्याह के अवसर पर या विजयोत्सव पर यह काव्य पाठ हाता या ये लोकगीत या सोव काव्य लोक सस्कृति का प्राधार थे उस युग की चेतना का प्रावट्य इन गीता मे मिलता है इस प्रकार कवि गीतकार अपने युग को प्रभावित करता रहा है लोर सरवृति से यह परम्परा नगरीम सम्वृति म प्रवेश करती है कि उम समय प याप्य म गयता का विशेप महत्व था और स्वर की मधुरता भी इमम अनि- 22 * चार्य तत्व था प्रत कपि गाया राजानों के यहा विशेष महत्व पाते थे राज- दरवारा म वाम गोष्ठिया होती थी इन गोष्ठिया का महत्व राजामा या शासको के लिए उनके मनोरजन के लिए विशेष था उनके इगित करने पर यह प्रारभ तथा ममाप्त हो जाती थी विद्वाना की सगोष्ठियो या सम्मेलना म याव्यमय शास्त्रार्थ होता था यह काव्य गोष्ठिया राजदरवारा से हटकर देवा लया में भी पहुची देव मदिरा या विशप स्थान पर वाघ पाठ होता था पगलीलामाया राम की बदना का गायन अनेक भक्त कवि करते थे और उपस्थित समुदाय मााद विभार हो उसे सुनता और आनन्दित होकर एक विशिष्ट भाव लोक म विचरण करता था इम वाव्य पाठ म एव विशिष्ट छाप होती थी लेविन मानवीय वार भी मिलता था और जनजीवन म इनया विशेष प्रभाव भी दप्ठिगत होता था समुदाय म होने वाले इस भजन पाठ वो कवि सम्मेलना की पीठिका कहा जा सकता है करने ला यह पाव्य पाठ की परम्परा वस्त्रा प नगरा न बढने लगी साहित्या- राग कुछ व्यक्ति एकत्रित होकर वस्त्रा या नगगे म काप्प पाठ का प्रायोजा विशेष उत्सवा, पर्वो या घोहारो दे अवसर एकाधिर विया या गायका को प्रामप्रित कर उनके गीता या विताना वा सुनना एक फैशन हो स्वतत्रता सग्राम म भी कविया ने स्वातत्र्य चेतना को प्रसारित करन म अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है और जनसमुदाय म किसी विशेष अवगर पर एकत्रित होकर, कविता पाठ क्यिा जाता था जिसमे अग्रेजो व शासनाने गुल्मा का वरणा तथा प्राजादी की तडफ्न होती थी दम तरह पवि सम्मलनो की परम्परा हमारे यहा बहुत पहन से चली आ रही है यया था कविसम्मेला म उपस्थित जन समुदाय को अपनी महती भूमिका है श्रोता की पम द पर ही कवि सम्मेलन चलता है प्रत यपियो को भी जन समुदाय की रुचि का पूरा ध्यान रसना परता रहा है कविसम्मलन के प्रचार के पीछे जनसमुदाय या ममूह का पाादित होना भी है कवि की मानमिक्ता के साथ सभी धातानो की मानसिकता स्वत जुड जाती थी घे एसे गीत, कविता पसन्द करत थे जो कण प्रिय सुमधुर हो गय हो और उनके मन को मानदित करें उनके दुपदद का भागीदार बन परिणामत कविसम्मेलनो पेमवियो की विशिष्ट पहचान वनती गई सिनेमा के प्रचार से यविसम्मलना म भी बदलाव ग्राया सस्ते मनो रजा का साधन सिनेमा बन गया और जनसमुदाय कुछ ही राशि व्यय कर ON प कहानी, ऐक्शन तथा गीत का मानद उठा साता था सिनेमा की व्यापाता का प्रभाव पवियों वे मानस पर भी पडा और एमे गीता या कवितामा को कवि- सम्मेलनो के मनो से गाये जाने लगा जिनकी लय सिनेमा के गानो पर आधारित हो या उनसे मिलती जुनती हो इसके साथ ही प्रौमत व्यक्ति को सहज बनान के लिए हास्य ये चुटाल पसद किय जान लगे और विमम्मलना का मच दो प्रकार के करियो के हाथों में आ गया एक वे जागीता या कवितामा को समधुर ढग स फिल्मी गीतो में समान गा गा कर या चटवारे लेसर सुना सक्त है, दूसरे वे जाहमोड सविताए, चुटकुले, पराडिया मुना सक्त हैं इस्पा परिणाम यह हुआ कि गभीर युग बाँध की कविता न तो मच स सुनाने का कवि साहस करता और न धोता उसे पमद मरता रविसम्मेलना के मन का माइस गलवाज व लटदै भट वैयविया ने परड लिया नीरज, बालकवि बरागी, साम ठाकुर, विश्यश्वर गर्मा वाका हाथरसी, विश्वनाथ विम- लेश, प्रभा ठाकुर प्रादि का मच पकड़न का आधार यहीं है इमरी पोर गभीर कविता या नई कविता का मच से पढना दुप्पा होन लमा ऐमी कविताए योता सराही जाने लगी और युग चेतना तथा मानव मूल्या के रूप म चर्चित हुई लकिन कविसम्मेलनो के मच पर उहे हूटिग मिलती इस प्रकार की अतुकात कवि- ताए कविमम्मेजना से बहिष्कृत हो गई पाश्चर्य यह है कि इस स्थिति को स्वीकार कर लिया गया लेकिन इस पर गभीरता से विचार किया गया हो, यह रप्टिगत नहीं होता हा, एक निबल टेवराव जरूर प्रारम्भ हो गया गोष्ठिय। म कभी कभी इस प्रमग पर घमा होती लेकिन उनकी सम्यकता समझ मे नह यहाँ एक प्रश्न कविसम्मेलन की प्रासगिरता और कविता को लेकर है क्या गीर युग की परिवेश की कविता की अपेक्षा सामा य अगभीर चुटक्ला आम आदमी पसद करता है ? क्या जनता की रुचि का अवमूत्यन हुआ है या कविता ही अपने माग स भटक गई है ? और नीरस व काव्यगुणविहीन हा गई हम यह मानते हैं कि साहित्य समाज सापेक्ष है और वह जनता के दुख- सुख से जुड़ा होता है दूसरे शब्दा म कवि यदि जनजीवन, युग परिवेश से सम्बद्ध नहीं होगा तो उसकी कविता जीवन्त नहीं हो सकेगी यह जुड़ने का कार्य कहने की अपक्षा गभीर और जटिल है जिसका जानना, समभना और अनुपालन परना कठिन है ऐसी स्थिति में कवि का दायित्व क्या है ? क्या वह कवि सम्मेलना ये श्रोतागो के लिए कविता लिखे अथवा युग बोध तथा अपने पास पास के मानव के दुस दद की काव्य गुणा युक्त रचना का सजन करे कवि सम्मेलनो में जनता की मानसिक्ता चुटकले या सामा य रचना सुनने की क्यो है? यहा रुचि का सवाल पुन सामने है मरे विचार से जन रुचि का समझना पठिन जरूर ह लेफ्नि असभव नहीं है मामा यतया यह माना जा सकता है कि इस मानसिकता या रचि के पीछे श्रोता को एक सहज होन का भाव हो सकता है वह पहले ही चितायुक्त है और एक बोभिल जिदगी जी रहा है ऐसी स्थिति म वह महज होना चाहता मन मस्तिष्क पर स वाव हटा कर वह थोडा प्रादित हो लेना चाहता है और उसे सहजता या सामायीकरण अपने परिवेश को पहचान कर या युग फे दुख दद म साभीदार बन कर भी हो सकते हैं रविना जीवन का अग है रचनासार अपनी मन स्थिति को मविता की रचना ही करेगा यदि यह ऐसा नहीं करता है तो अपने दायित्व से भटक जाता है अपने मृगनकम स चूक जाता है उमे युगीन परिवेश की रचना करते रहना चाहिये और जनता के एक बडे अग को भागीदार बनान के लिए प्रयत्नरत रहना चाहिए उसकी पविता का दत्तचित होकर नहीं सुना जान पर हताश होन की प्रावश्यक्ता नहीं है बस्तुन ऐसी गभीर और छदयुक्त कविताओ के रचनाकार का कविसम्मेलनो का मोह भी त्यागना चाहिए उसे ऐसी कविताए सगोष्ठिया म सुनान रहना चाहिए और धीर-धीर क्षेत्र विस्तार करने की आवश्यक्ता है उह पविसम्मलना की दुगति के लिए जिम्मेदार हास्य व चुटकुलेबाज पवियो को प्रावित नहीं करना चाहिये यह हद तो हागा ही मोर सपप स हताश होन या ह्वा में मुकर मारन की प्रावश्यक्ता नही र नौटकी का जमाना जा रहा है रटियो और टी वी ने इस युग म मानव की सवेदनामा को सुरक्षित रसना है प्रत नये माग तलाशना प्रावश्यक है गभीर बौद्धिक व अतुरात कवितामा को सुनना व सुनाना माहस का कार्य है मुझे स्मरण है कि भरतपुर मे सूरोत्सव रे अवसर पर राजस्थान साहित्य अकादमी ने हिंदी साहित्य समिति भरतपुर के सह्योग से कविसम्मेलन आयो- जित किया गया था पौर गम्भीर अतुवात कविताप्रो को सुनाने पर जब हल्ला हुमा तो तत्काल कविसम्मेलन समाप्त कर दिया गया और कुछ समय बाद पुन लघु कविसम्मेलन हुमा जिसमै श्रोतामो न गम्भीर बताए वहे ध्यान से मुनी .

इसी प्रकार 27 नव 83 को भीलवाडा में मायोजित रविसम्मेलन म उपस्थित सीमित थोतानो ने नीरज के साथ-साथ भवानीप्रमाद मिश्र की गम्भीर कविताए अधिक तग्मयता के साथ सुनी न कोई हल्ला न कोई प्रावाज रहने वा तात्पर्य यह है कि रचि को परिप्त करने व जन मानस बनाने की सर्वाधिक मावश्यक्ता है रचनाकार को सतही कविता के लिए गम्भीर कविता को त्यागना नहीं चाहिए दरअमल सबसे बड़ी कठिनाई सुविधाजीवी हो जाने की है रचनाकार प्रपन को सुविधाजीवी व विशिष्ठ बना लेता है और समाज स पट जाता है तो वह अपने दायित्व और सामथ्य से भी चूक जाता है विशिष बनने पर उसे खतरा जनता म नही, अपने साथी कवियो से ही होगा अाज पवि और जनता एक दूसरे की रुचि को जाने और कवि अपन कम को गम्भीरता से ले परिवृत रचि होने पर उसकी कविता का महत्व बना रहेगा उसकी कविता अथवत्ता नहीं खायगी हा, वीच का माग तलाशना अघिय खतरनाक है कविसम्मेलन म सतही कक्तिा रहे यह सम्भव नही है कवि सम्मेलन की प्रासगिकता पर प्रश्न उठ सकते हैं लेकिन कविता पर नहीं कविता की महत्ता को कम नहीं किया जाना चाहिए 16 पाठक की रुचि माज फिर मैंने सजय के हाथो मे पर्नल रजीत का सद्य प्रकाशित जासूसी उपयास देखा दरअसल पाकेट बुक के जासूसी व यौन उप यासा को लेकर सजय और मेरे मध्य अनेक बार विस्तार से चर्चा हो चुकी है सजय वी । प्रथम वर्ष का छात्र है तथा मेरी बहिन का पुत्र है मैं उसे निरतर थेष्ठ माहित्यिक कृतिया के अध्ययन लिए प्रेरित करता रहा है लेकिन वह बार चार जासूसी उप यास, सत्य क्याए, रहस्य रोमाच व यौन विषयक कहानियो पी पुस्तकें ले पाता है और चटखारे लेकर पढता है किराये से पुस्तकें लाकर पढन का शौक उसे है मैं उसकी रुचि को देखता हूँ और मुझे अनेक प्रश्नो का सामना करना पडता है दरअसल पाठक की रुचि का एक व्यापक प्रश्न मामने पाठक की रुचि क्या है और माज पाठक पया पढना पसंद करता है। यह विचारणीय है पाठक पा सामाय अर्थ पढनेवाला है लेकिन यह पठन तो बहुआयामी है 'सत्यनारायण की कथा' पढने वाला पंडित, विद्यालय महाविद्यालय या छात्र घ अध्यापक समाचार पत्रो को पढने वाला मिल मजदूर, पताल क्या पढने वाला किशोर, सत्य कथाए, जासूसी और तिलस्मी उपयास तथा समोर रानू के सस्त रोमाटिक उप यास पढ़ने वाला युवक और हरीश भादानी की लम्बी गभीर कविता नष्टो मोह, डा विश्वम्भरनाथ उपाध्याय का 'जाग मछदर गोरख पाया' या पानू खोलिया का उपयास 'सतर पार के शिखर' को पढने वाला भी पाठक हो है फिर हमे कौन से पाठक की सर्वाधिक चिता है और क्यो है ? माज मनोहर कहानियां, सत्य कथाए य सस्ते रोमांटिक जासूसी उप यासो की चिन्ता सर्वाधिक की जा रही है दूसरी मोर ये अधिकाभिर' सख्या म बाजार मे मा रहे है, क्रय किये जा रहे हैं और पढे जा रहे हैं माश्चयजनक 27 तय्य ता यह है वि साहित्यिक गोष्ठियो म अयया कुलीना के मामन इन रामा टिम जासूसी व सत्य क्यानो पर तीव्र प्रहारसा छम रूप से यह पढत हैं या यात्रा म एसे ही नथ युग स्टाल पर क्य परत है और पाड जान पर वहत हैं समय व्यतीत करन के लिए यह पत्रिका नत्य क्या ठीन है प्रापिर यह दाहा मानदण्ड क्या है ? इन पुस्तका या पत्रिकामा पर विशारा या भडकाने या मौनाचार का प्रचारित करने का प्राक्षप लगाया जा सकता है तो माहित्यिक कृतिया म भा मनो विराग या भडगन वाल या ययाथ के नाम पर नग्न अश्लीत चित्रण का व्यापरता मिल सकती है प्राज की अनर कहानिया म ऐमे विकृत चित्रण मिलगे जो घर म पुत्र पुनिया के सामन पढन याग्य नहीं हैं प्राचलिर माहित्य के नाम पर मनमाना चित्रण कर उस पाठर व मम्मुख प्रस्तुत करना और रचि की बात करना कहा तक ठीक है? रुचि अनेक प्रकार स प्रभावित हाती ह सबसे पहले रचि पर स्वभाव का प्रभाव पड़ता है मनोवृत्तिया या ससार यहा कायरत है मनुष्य सुखा भिलापी है और उसे सुखप्रद लगे वह पसद करता है मुख व पान द की प्राप्ति का प्रयास उसका सहज स्वभाव है वह इस प्रकार के काय करता है या पसंद करता है जिमम मुख व आनद हो वह इसी प्रानन्द के वशीभूत ही ये वृनिया पढता है दम पठन मे वह सहजवृत्ति का अनुकरण करता है यह अनुवरण शिक्षा ससम और परिस्थितियो मे पभावित हाता है किशोर वय म हिंसा और सेक्स प्रधान कहानिया पढन का मुख्य कारण हो यह महज गृत्ति ही है वह परिस्थितिया का देवता है अपन प्रामपाम हो रहे परिवतना का पहचानन का प्रयास करता है और अपनी मूल इच्छाशक्ति काम' से प्रभावित होता है व उस यौन सम्बन्धी व पाशविक्ता प्रधान क्याए पसद आती है धीरे धीर उसकी मचि इस ओर अग्रसर हो जाती है वह युवर अपने म इस मनोवृत्ति से एक महज प्रातः प्राप्त करता है इस प्रकार वह अपने मन पस द इम माहित्य का अधिकाधिक पढता है यदि उस किगार के अभि भावा इसका प्रतिरोध करते हैं, उस इस प्रकार के उपन्यास क्याए पढने के लिए नकारत हैं तो वह चुपचाप रात्रि को अथवा अध्ययन की पुस्तका के मध्य रतकर इह पढता है वह चालाकी सीखता है तथा दढ़ सकल्पित हो यौन परक या हिंमापरव पुस्तकें अधिक पढता है अभिजात वग अभिभावक जा 28 स्वय इस प्रकार के कामुर या जासूसी उप पास या क्याए पटते हैं उनके यहा युवको योगह पढने स रोग नहीं जा सकता है उना तो सम्बार ऐसे 'सत् साहिएय' लिए उत्प्रेरित हो करते है यहाँ एक प्रति प्रश यह भी हो सकता है कि पुम्न पढन को प्रावश्यक्ता हो क्या है। क्यों वह प्रश्न अवतारोतर पुम्न में पढ़ता है इसका सामायसा उत्तर यह है कि पुस्तकें ज्ञान पिपामा की शाति के लिए, मनारजन के निमित्त तथा प्ररेलपा के अरमान को मुक्ति म महयोगी है पुम्न मिश्वत हैं जो पाठर यो मनोरजन देती हैं तथा घरेसपन व वाघ मुक्ति दिलाती हैं आज पा व्यक्ति मशीनीकरण व माथिप मास के क्तमान समय में बेहद व्यस्त है उसकी जिदगी भाग दौड़ में व्यतीत हा रही है यत्रा के पुर्जे के समान उसकी उपयोगिता रह गई है रह इम मशीनो युग म मपन का भी इस्पात कर समझता है ऐमी परिस्थितियों में समय मिलते ही उसरा मन सहज होन तथा मनो- रजन के लिए प्रेरित करता है और पामो प्रमोद के लिए वह माग तलाशता है ममय बम है लेकिन वह उसका उपयोग करना चाहता है चद्रवाता सतति या भूतनाथ जैरा अनेक खडा के चक्कर घर परकर के उप यासो यो पटन के मिए उमको फुरसत नहीं है और पुरसत मिलने पर चयन के लिए न तो सामग्री है और न समय ऐसी स्थिति म पाठक आमोदप्रमोद के लिए जो भो सुलभ हो उसे स्वीकार कर लेता है वह चलचित्र (सिनेमा) या टेलीविजन इसी पान द स प्रेरित होरर देखता है साहित्य की पुस्तकें उससे दूर हो जाती यात्रामा म भी ममय व्ययतीत करने के लिए वह हल्की फुल्की पत्रिकाए या पुस्तकें वुर स्टाल से कय वर पदता है और यतथ्य पर पहुंच कर उसे भूल जाता है होता है- एमी स्थिति में विशुद्ध साहित्य की पुस्तका के पाठा वर्ग का प्रश्न उत्पन जब ग्राज ग्राम प्रादमी म शिक्षित वग का प्रतिशत बहुत ही कम है और उसमे भी साहित्य के पाठक का प्रतिशत तो प्रत्यल्प है ऐस पाठक की रुचि का मवाल भी सामने है एवं प्रति प्रश्न यह भी कि साहित्य का पाठक क्या विशिष्ट है ? यहां इसका उत्तर हो मे ही होगा साहित्यिक पाठका का एक विशिष्ट वग है और उसको रचि अपने सीमित क्षेत्र से प्रभावित होती है सामाय पाठक फ्मिी पनिका को पय करता है, किराय से लाता है पथवा 40 निशुल्क देसता है तो सब प्रथम वह प्रापपप चित्रो यो देसेगा तत्पश्चात् चुट कले, हास्य व्यग्य की रचनाए, सास्कृतिक लसा, कौतुहल या रोचकतापूण विपया पर जाएगा तत्पश्चात् अपनी रुचि का विषय पीडा, विज्ञान, गृहविज्ञान, सिनमा प्रादि पर विचार करेगा और प्रत म गभीर माहित्यिक लेखा को याड ही देगा इस सामाय पाठय की रचि को देखत हुए प्राज की व्यावसायिक पनि काए और पत्र इस प्रकार की विविध मामग्री का प्रवाशन करते हैं जो बाल, युवक, वृद्ध, स्त्री पुरप प्रादि सभी के अनुपून हो ये पत्र पत्रिकाए अपनी प्रसार सध्या ग्राहत्व के आधार पर वटाती है और उह अपन मामा य ग्राहक पाठय वी रचि का पूरा स्मरण रहता है यहा ध्यातव्य है कि पाठन की रचि को चिता नहीं उसवा स्मरण रहता है प्रचार चटनी मुरब्बे से लेकर भविष्य पल का विवरण या फिल्म तारिकामा विस्मे इही कारणो से ऐसी पत्र पत्रिकामा म प्राप्त होत है धमयुग मा नाहित हिंदुस्तान नवनीत, गृहशोभा, मनोरमा आदि पत्र पत्रिकाए इनवे दृष्टा त हैं साहित्यिक पत्रिकामा की अकाल मृत्यु का कारण भी ऐमी ही रचि बननी है वित्तीय मक्ट तथा पाठक ग्राहक की कमी से अनव साहित्यिक पत्रिकाए क्षणजीवी हुई और जो गिनी चुनी प्रकाशित हो रही है वे भी अतिम सास ले रही है सीमित सस्या के साहित्य के पाठको की रचि के सम्बध म विचार करें विशुद्ध साहित्य में रुचि रखने वाला पाठक निसदेह सवप्रथम अपनी विधा की कृतिया या रचनाए पसद करेगा नयी कविता का पाठन है तो वह अपनी पस द की कृतिया ढू ढ लेगा कहानिया को पस द करन वाला श्रेष्ठ कहानी सक्लना की तलाश करेगा नाटर में रचि रणने वाला पाठन नाटको को पढने के लिए वचन रहेगा लोकसाहित्य का पाठ ऐसी रचनामा को ढू ढ निकालेगा लेकिन इस प्रकार के पाठको की सरया नगण्य है एसे पाठका की रुचि के बल पर पुस्तका की वित्री या पत्रिकामा वा नियमित प्रकाशन सदिग्ध है राजस्थान की साहित्यिक पत्रिकामो पर विचार करें तो नियमित पत्रिकाए क्तिनी हैं ? मधुमती के समक्ष वित्तीय सक्ट का प्रश्न नहीं है लेकिन आज इस पत्रिका के सम्पादक (जो अकादमी अध्यक्ष भी है) प्रकाश प्रातुर के निर तर श्रम करने पर भी मधुमती की ग्राहक सत्या 1500 तक ही पहुंच पायो है साहित्य के पाठा म भी साहित्य के वास्तविक 30 पाठमा यो सस्था तो बहुत कम है किमी भी पत्रिका की समस्त रचनाए पढने पाने गम्भीर धीर पाठ गायद ही हो क्योरि अधिरतर लेसर अपनी रच नाग्राम ही मधिर रुचि रखते हैं यह दुर्भाग्य की बात है कि प्राज हिती के अधिकाश लेसर अपनी रचनामा पाता बार बार पढत हैं तथा य अपेक्षा करते हैं कि उसकी रचना अधिका घिर पढे लेकिन वे प्राय लेसका की रचनाए न तो पढते हैं और न उमगी चर्चा करते हैं ये पत्रिकामो के निशुल प्राप्ति का अपक्षा तो करते हैं लेकिन प्रय कर पढ़न म उनकी बिलकुल रचि नहीं होती है हिंदी की माहित्यिय पत्रिकामो को सीमित मस्या अववा प्रमाल मत्यु की ये पीछे इसके साहित्यिक पाठव पाहो को सीमित सस्या अथवा सकोण दृष्टिकाण ही है यही स्थिति पुस्तको की है निशुल्क भेट स्वरूप पुस्तकें प्राप्त करा की माशा तो की जाती है लेकिन पुस्तका का य करना पसन्द नहीं करता है ऐसी स्थिति मे साहित्यिक पुस्तको की खरीद राजकीय सस्थाग्रो या पुस्तकालया मे ही होती है पाठ्यक्रम म पाने पर सरीद यो सभावनाए बढ जाती हैं और इस कारण पाठ्यत्रम समिनिया या खरीद मम्बधी सदस्मा की महता बढ़ जाती है और घेरावी प्रारम्भ हो जाती है यहा भी माहित्यिर पाठक की रुचि का ध्यान नहीं रहता है किसी साहित्यिक कृति की 1000 मरया का मुद्रित होना और उसवा 10 15 वर्षों तर नहीं विर पा पाठर की निराशाजनक रुचि प्रकट करती है प्रव पाठक की रुचि को प्रभावित करने वाले तत्वो पर विचार करें पाठक अपनी रुचि की कृतिया ढ ढता है और प्राप्त करता है पुम्न सहज सुलभ हो तो वह उसे प्राप्त कर लेता है अन्यथा अपनी रचि की पुस्तक न मिलने पर वह रुचि को अयत्र माड देता है इम सहज सुलभता के लिए दो स्थितिया हो सकती हैं उसे अपने समीप व शीघ्र मिल जाय और वह उसे अय कर पढ सके यदि पाठक के समीर के पुस्तक विनता के पास मिल जाती है तो वह पढ सक्ता है पुस्तक का मूल्य भी एमा हो जिसे चुकाया जा सके दरअसल प्राज पुस्तके इतनी महंगी हो गई है कि उसे खरीदना साहस का काय है यदि पाठक ने हिम्मत कर दो तीन पुस्तक खरीद ली तो उसका बजट प्रसतुलित हो जाएगा पाकेट बुक्स के प्रचार व लोकप्रियता का एक कारण उनकी कम कीमत या सुलभता भी है अत स्तरीय साहित्यिक पुस्तकें कम कीमत की होगी तो पाठन रुचि के अनुकूल होने पर उह खरीदेगा तथा अवश्य पढेगा इस ममप में एक महत्वपूर्ण तत प्रचार का भी है माज प्रचार का युग है पाठका तन पुस्तया की जानकारी विज्ञापन के माध्यम से पहुंचाई जा सकती है लेकिन ऐमा लगता है कि विनापन यो पुनर व्यवसाय म महता नहीं जय दतमजना य जूता वी पालिश या विमापन ग्राहना का प्रभावित कर राक्ता है तो | प्ठ पुस्ता या विशापन पाठमा मानस पर भी असर डालेगा और वह उक्त कृति के सम्बध म सरोदन पढन पर पिनार मरगा प्रियाविन करेगा पुस्तक प्रापित करने वाली भी हो मानव मन मा मुटर व बलात्मकता से प्रभावित होता है प्रत पुस्तका का प्रावर व कनात्मा गेट अप साय प्रकाशन होना चाहिए और एपी पुस्त- निमतेह एक बार ता पाठा की रुचि को प्रभावित कर देगी पुनर के बहिरंग पी अपेभा प्रतरग वा विशेष महत्व है पुस्तक अन्तरग पक्ष के कारण पाटर की रचि के अनुपूर हाती है पुस्तक की सामग्री कथा वस्तु भाव पक्ष व गिर प्रमुत्र होती ह साहित्य मन का प्रानदित करन के लिए पढ़ा जाता हैं वस्तुन यह मान- पुम्ना पाठक को सोचने के लिए विवश करती है, उसे एक स्फूर्ति या प्रेरणा देती है कृति को परत समय पाउन प्रादित होता है, और प्रेरणा प्राप्त करता है ता उसकी रचि उत्ती प्रकार की पुस्तकों के प्रति अधिर जागृत होगी इस रचि को जागृत करने म रोचकता की महत्वपूर्ण भूमिका है प्रातरिक राचक्ता से ही पाठा पुस्तक पता है रानाता ही रुचि जागृत करती है पाठन पुस्तक के क्थ्य स भी प्रभावित होगा पुस्तक युग बोध, उसके जीवन व समाज से जुड़ी हो उमो दुव 'द की भागीदारी होती उसे पढने की इच्छा वह अवश्य करगा परिया की कहानिया वह पस द नहीं करेगा सिव खुराक है अाज के इस समय म जब विश्व सीमिट गया है तथा प्राद्यौगियी मशीनी- करण के युग में मनुष्य स्वय एक कलपुजा बन गया है महानगरो के मानव बन म मानव को अकेलेपन का अहसास सा रहा है वह अकेला ही विभिन्न समस्याग्रो से द्वद कर रहा है ऐसे समय म मानसिक चितामा मे उलझे मनुष्य के मन को सहज होने की जररत है और यह सहजता उस पुस्तक दे सकती है इसके लिए उसम साहित्य के प्रति रुचि जागृत करनी होगी मानव मूल्या के प्रति प्रतिबद्ध साहित्य के लिए एक वातावरण निर्मित होना जरुरी है और एसा होने पर उस पाठा म साहित्य के प्रति रचि जागेगी 32 पह घर या बाहर जव भी अवसर मिलेगा तथा पढ़ने की आवश्यकता महसूस परेगा तव वह मूल्य बोध मौर अपनी पसद की स्तरीय कहानिया कविताए उपन्यास पढेगा इस प्रकार के निर्मित वातावरण म सजय (कोई भी पाटर) सस्त जानूसी उपयास या सत्य क्या नही पढ सकेगा इसलिए पाठ की रुचि के परिपत करन या प्रश्न प्रमुख और विचारशीर भी है मानवीय सत्य तथा समाज की विनियो को उजागर पर मानव मूल्या को प्रतिष्ठित परने पाली पुस्तम उसके चयानो प्रभावित कर सकेगी मध्ययमीन परिवेश सास्कृतिक पुनर्जागरण एतिहासिक राजनीतिक, धार्मिक प्राटि प्राधारा पर हम किमी बाल विशप मा जितनी मरलता स विभाजित कर सरते हैं, उनकी प्रासानी म साहित्येतिहास को युगा म विभक्त नहीं किया जा सकता है क्योरि साहित्य विहीं भौतिक घटनामा का अमितख मात्र नहीं होता वरन् उसम ता मानवीय जिजीविपा की शाश्मत यात्रा का अनुभव गम्य तमित पाख्यान निहित रहता है सरिताजल को रखा खीच कर जिस प्रकार सडी में विभाजित करना सभव नह! है ठोस वस ही साहित्य को विही सीमामा म खडित करना असभव है फिर भी, अध्ययन की सुविधा के लिए हिदी साहित्य के इस दीघकालीन इतिहास को काल की कारपनिक सीमानो म विभक्त करना ही होगा डा हजारी प्रसाद द्विवेदी, लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय प्रमति विद्वानी की धारणा है कि साहित्येतिहास को वाल पर विशेष को प्रमुख प्रवृतियो, चितन धाराम्रो तथा सदभित भापा भापियो के मनोभावो के आधार पर विभाजित पिया जाना चाहिए डा द्विवेदी का विचार है- असल बात यह है कि मध्य युग शब्द का प्रयोग काल के प्रथम उतना नहीं होता जितना एक खास प्रकार की पतनो मुख और दवती हुई मनावद्धि अथ में होता है मध्ययुग का मनुष्य धीरे धीर विशाल और असीम नान के प्रति ज्ञिासा का भाव छोडता जाता है तथा धार्मिक विचार और प्राप्त मान जाने वाल प्रमाणो का स्वत अनुयायी हाता जाता है । डा द्विवेदी न यद्यपि अपने इतिहास म अनेक स्थला पर मध्यकाल पूर्व मध्यकाल और उत्तर मध्यकाल जस कालवाची शदो का प्रयोग किया है तथापि उन्हान पाश्चात्य मत का प्रस्तुत . हिदी साहित्यमोश (ज्ञानमण्डल लि वाराणसी) 610 34 करते हुए यह भी इ गित किया है कि- 'साधारणत 476 ई से 1573 ई तर की कालावधि को मध्ययुग कहा जाता है। वे 5वी से लेकर 16वी शतानी तक समय को मध्ययुग मानते है प्राचाय रामघद्र शुक्ल 1375 से 1900 वि स तक की अवधि को मध्यकाल मानत हैं और इसका विभाजन पूर्व मध्यकाल 1375 से 1700 वि स तथा उत्तर मध्यकाल (1700 से 1900 वि स) म करते हैं। मिश्र चघु विनोद लेखक वि स 1445 से मध्यकाल का उदय मानते हैं आचार्य शुक्ल + मत के सदम म एक बात जरूर पैदा होती है कि यदि 1700 वि स तब पहुचते पहुँचते हिन्दी साहित्य की प्रवत्तिया, शलिया, चिताधाराए प्रेरणा स्रोत मादि प्रापातित बदल गए थे तो मध्यकाल नाम ही रखे रहने का आग्रह क्या है ? दूसरे माहित्येतिहासकारो की तरह वे भी इसे सीधा सादा भक्ति युग और रीति युग ही क्या नहीं कहते ? विद्वाना न 1700 वि स में पश्चात् गैलीगत परिवर्तन और रचना प्रक्रिया के आधार पर रीतिकाल अलकन काल या शृगार कात नाम दिया है अत मध्ययुग की सीमा सामा यतया 1375 वि स से 1700 वि स मानी जानी उचित है यह मध्ययुग हिदी साहित्य पे इतिहास म भक्ति युग का पर्याय माना गया है युगीन परिवेश (प्र) राजनीतिक --इतिहास साक्षी है कि समाट हपवर्द्धन (606 647 ई ) के बाद भारत वर्ष म राजनीतिक दृष्टि से एर ऐसी टूटन और विखराव पैदा हुआ कि विदेशिया को यहा की अपार सम्पदा लूटन और प्रपन शासन की स्थापना करन म विशेष कठिनाइया न हुई हपवद्धन के बाद छोटे छोटे राज्य स्थापित हुए परिणामत देश को सम्पन्नता और विकास की पोर ले जाने वाली राजनीति के स्थान पर क्षद्र स्वार्थों और वैयक्तिक उद्देश्यो की सहायिका तथापयित राजनीति का प्रभाव परिलक्षित हुआ देश की एकत्ता टूटने पोर के द्रीय नेतृत्व के निबल होने पर भारत पराधीन हुआ मध्ययुगीन इस राजनीतिक पराजय का मुम्य पारण राष्ट्रीय एकता या प्रभाव राजनीतिक चेतना की कमी और क्ष द म्यायौँ तथा गातिवाद का , वही, पृ 10 प्र हिदी साहित्य का इतिहास पृ 1 प्रावल्य है एक बात और भी ध्यान देने की है कि भारतीय मस्कृति और इतिहास मे हम ऐसे अवसर दृढन पर भी नहीं मिलते जहा भारत के शाम अपने देश की सीमानो से बाहर जाकर दूसरे देशो पर ग्राममण करत हुए नजर आए ऐसा लगता है कि भारतीय जन न मदेव ही रक्षात्मर युद्ध लड़ा और वे कभी प्रामामा न हुए लेकिन मध्य युग म जब केद्र ही न रहा तो रक्षात्मक युद्ध के लिए भी वह सामथ्य न रह पाई कि जिसमे धमाध इस्लाम के प्रावामका से पचाव पिया जाता तेरहवी शताब्दी स पूर्व नारत पर तुक, अफगान, अरव एव अय विटे शिया की ओर से अनर पात्रमण हुए भारत को अतुलनीय काल्पनिक घन सम्पदा का प्रलोभन प्रापातामा को लुभाता रहा मोहम्द विन कासीम द्वारा सि ध पर प्राममण 712 इ० म किया गया लेकिन यह पात्रमण भारतीय इनिहाम म माधारण घटना बन कर रह गयी यह अवश्य है कि भारतीय एश्वय व सम्पनता को मायाए बाहर प्रचारित हुई महमूद गजनवी न 1000 ई0 से 1026 ई० मध्य 26 वर्षों में 17 प्रारमण पिए पार अतुल सम्पति लूट के रूप मे प्राप्त की महमूद एक प्रचड तूफान के रूप में आया था और विनाश लीला फ्लावर चला गया भारत में मुसलमानी साम्राज्य की स्थापना का श्रेय मुहम्मद गौरी को है मुहम्मद गौरी ने दिल्ली सम्राट पृथ्वीराज को 1193 ई० मे तथा कनोज अधिपति जयचद को 1194 ई० मे पराजित किया तत्पश्चात् दास वश, खिलजी वश तुगलक वश, सयद वश व लादी वश के सम्राट सन् 1200 से 1525 ई0 के मध्य दिल्ली की गद्दी पर बठे राजनीतिक घात प्रतिधात वा सिलसिला जारी रहा और सुदृर शासन की स्थापना न हो सकी 1526 ई० मे मुगल सना नायक बाबर का पानीपत के मदान मे लोदी वशीय सम्राट इब्राहीम से युद्ध हुआ जिसमे इब्राहीम लोदी पराजित और मुगल सरदार बावर फलत भारत में मुगल शासन का श्रीगणेश हुमा म यही से मुस्लिम शासन को स्थायित्व प्राप्त होना है क्योकि कतिपय मुगल सम्राटो को छोड़ दे तो शेप सम्राटा की नीति भारतीय जन मन के अनुकूल और भारत देश को अपना समझने वाली थी इसी मनोभावना ने भारतीय इतिहास के मध्यकाल मे क्ला सस्कृति को प्रबल समथन दिया राजनीति का सुनिश्चितता प्राप्त हुई इसी स्थायित्व के परिणाम स्वरुप राजनीतिक, मामाजिक, सास्त निज एक्ता का युग शुरू होता है जो भारतीय इतिहास में महत्वपूण है विजयी हुमा सच्चे अर्थों - 36 साहित्य, वसा, मति को नए मायाम मिलने है हिद मुस्लिम सस्कृति व जन ममीप पाते है और धनिष्ठ होत हैं चादर की इम विजय म भारत म मुगल राज्य की स्थापना हो गई बाबर ये पश्चात् हुमायू और हुमार के पश्चात् मक्वर न शामन सभाला वस्तुत दृढ मुगल साम्राज्य की स्थापना का मरवर को है बीम वप में मेवाड के अतिरिक्त समम्न भारत म प्रकवर न अपनी प्रमुता स्थापित कर ली प्रवबर न भारत को सवथा ही अपना लिया उसन यहा को क्ला को कुछ ऐसा प्रोत्साहन दिया कि मारतीय इतिहास म राजनीति साहित्य व कला की दृष्टि से यह काल अभूतपूर्व बन गया प्रकवरी दरवार के नवरत्न इस समदि के ज्वलत निगान है दरमाल अपवर एक कुशल गजनता था उसने धार्मिक सहिष्णुता एव राजपूता का उच्च पद देन की उनार नीति अपना पर राष्ट्रीय राज्य रा निमारण किया उसर उत्तराधिकारी जहागीर के राज्यकाल म उसकी दूर- दशिता पूर्ण नोनिया का यथार्य प्रभाव परिलक्षित हुमा, उसन हो गया इतिहास में जहागीर एक न्यायप्रिय सम्राट के रूप म चर्चित है जहागीर के उत्तराधिकारी शाहजहा (1627-1558 ई०) ने राज्य के राष्ट्रीय रूप का बनाए रक्सा सास्कृतिक एव कता सम्बधी जागरण ज्यो वा त्या रहा लेकिन कालान्तर म राज्य के लिए व धुपा म हुए अनिष्टकारी युद्ध के पश्चात औरगजेब (1658-1707 ई०) दिल्ली के सिंहासन पर प्रारूढ हुमा राष्टीय राज्य को नीति परिवर्तित कर दी धामिर भनुदारता भार इस्लामी सिद्धाता के प्रतिपादन से औरगजेब ने धमतत्रवादी राज्य का निर्माण किया और औरगजब की धार्मिक कट्टरता और सकीरण दृष्टिकोण से मुगल साम्राज्य नष्ट सम्पूरण साम्राग्य उसके सामन ही छिन-भि । हो गया लगभग 400 वर्षों का यह बात राजनीतिय दृष्टि से बडा म्तब्धवारी रहा है मुसलमानो के प्रवेश के साथ ही इस देश के धामिर और सास्कृतिक जीवन को एक साघातिक भटका लगा फ्लत बौद्धो और निम्नवग की बहुत बड़ी सम्या न इस्लाम को अगीरार दिया इसमा परिणाम यह हुप्रा लि भारत मे हिंदू और मुसलमान ये दो प्रमुप सम्प्रदाय बन गए घशानुगत चेतनभोगी सैनिका पर ही देश की रक्षा का भार या गया कोई प होउ हम या हानि' की भावना सामाय जन ममाप्त हो गई थी यह राजनीति शू यता वा पारा है राजनीतिक चेतना का प्राय प्रभाव ही परिलक्षित होता है तलालीन समाज का जा चित्र हमारे सामने है उसकी विशिष्टता यह नहीं है कि मुसल- मानो ने यहा राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित किया तथा यहा के प्रचलित धार्मिक जीवन को आहत किया वरन् इम वाल मे जिम सास्कृतिर जागरण मोर धामिर चेतना को गति दी यह बात विशेष है इस युग के माहित्यकारा लावारो, दाशनियो और भवता को तत्कालीन शासका एव राज्याथय का मिचित भी माह नहीं था वे राज्याथय से दूर सामान्य जन जीवन के मध्य रहना अधिक प्रिय व गौरवयुक्त समझत मे मन्त का सिकरी सा का नाम ? धावत जात पनहिया टूटो विसरि गया हरि नाम (कु भनदास) या तुमी अव का होलिंग नर मनमवतार (तुलसी) इस युग को हिदू मुस्लिम संघष तप सीमित करना अथवा राजनीतिर पराभव का दशाना भी तत्कालीन राजनीतिक चेतना का प्रामक चित्रण होगो इस युग में एक और तो (ग) साहित्यिक परिवेश -इस युग का साहित्य पराभव और पस्त हिम्मती से उद्भूत साहित्य नहीं है यह भावना कि अपन इष्ट के प्रति निवन्ति दय विदेशी पाका ताना से भयभीत होकर साहित्यकाग के जीवन में व्याप गया था, इस काल में साहित्यकारा प्रति नयाय होगा इस्लाम की स्व ग्रासिनी प्राधी के समक्ष अपने समुचित स्वार्थों म लिप्त सामत यत्र तन शस्य तार बडे हात थे पार लड़त लडते जीवनाहुति दे रहे थे तो दूसरी पार इस्लामी विचारधारा का जो प्रभाव जनजीवन मे जा व्याप्त हो रहा था उसके प्रतिकार में हमारे में वधि भक्त सत भारतीय मनोभावना का सशक्त बना रहे थे इस तरह मध्य युगीन कामिक, धार्मिक, साहित्यिक सास्कृतिक सभी आदोलन एक शब्द से जुड़े हैं-प्रतिरोध, प्रतिकार मध्ययुगीन सामासिक सस्कृति का विकाम और समन्वय वादी काव्य वा मुखर स्वर इमी प्रतिरोधात्मक प्रभास का प्रतिफन है तुलसी, सूर, क्वीर, जायसी चडीदास, जमदेव, मानदेव प्रादि अविया म इस सम्म त्रय वादी प्रकृति मा स्पष्ट प्राभास होता है मध्यकालीन साहित्य को हम दो वर्गों म विभक्त कर सकत है-एक तो ये जो कट्टर पथी धम के विरोध म खडे हुए ये और दूसरे वे जो समवयवादी थे मर्यात नानमार्गी प्रेम मार्गी व भक्त व विया व लेखको द्वारा मृजित साहित्य हिंदुनो और मुसलमाना के मूलभूत मतभेदा के होने पर भी जीवन के विनिन क्षेत्रा म पारस्परिक मामजस्य और सहिष्णुता की शीतल सुखद म दा- विनी प्रवाहित होन लगी थी दानो समुदाया मे धीरे धीर साम जस्य सहयोग और सोहा की स्थिति बनती जा रही थी पारस्परिव एक दूसरे को जानने घ समझन की चेष्टा करन लगे परिणामत हिदू धम हिदू क्ला, हिदू साहित्य पार विनान से मुस्लिम तत्वो को अपनाया ही नही प्रत्युत हिंदू संस्कृति की मूल भावना व मनीपा में भी परिवतन हो गया इसी प्रकार मुसनमाना न भी जीवन के प्रत्यक क्षेत्र में खुले हृदय से प्रादान प्रदान किया हिन्दुनो के धार्मिक नेताना, मता व पविया ने समवय के लिए सतत् प्रयत्न किया तो मुसलमाना के सूफी सम्प्रदाय तथा उनके लखका व कवियो ने भी हिदू मिद्धातो परम्परामा व विपरो को ग्रहण किया सामजस्य और सामीप्य की मगल- कारिणी भावना का प्रभाव इस्लाम पर पर्याप्त पडा व उसके स्वरूप में भी परिवतन हुअा सूफी स त इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है हिन्दू मुसलमान दोनो इस सम्प्रदाय के सतो कविया का सम्मान करते उनके दद को अपना दद समभत मुस्लिम शासको न भी साहित्यिक श्री पृद्धि मे विशिष्ट योग प्रस्तुत किया हैं और उनके राज्याश्रय म उच्च काटि का साहित्य तयार हुमा साहित्य व विविधागो का विकास हुमा अक्बर एव जहागीर की माहित्यिक रचिव गुण ग्राहयता अनम ग्रथा के निमारण की प्ररणा दी सोलहवी व सनहवी शादी नान विकास का युग रहा है यह युग कल्पना की प्रचुरता और दिव्य अभिव्यक्ति का युग था कवियो विचारको, लेखिका और विद्वानो न विभि न भापापा के साहित्य को देदीप्यमान कर दिया हिदी संस्कृत, पारसी मराठी वगाल, गुजराती, उर्दू आदि भापाया म साहित्य का अनवरत सृजन हो रहा था साहित्य इतिहाम, दर्शन, के मशास्त्र आदि साधना की जा रही थी अक्बर घेरवार म राना बीरबल, राजा मानसिह, राजा भगवानदास एव वीराज राठौर प्रसिद्ध कवि थे अब्दुरेहीम खान ए साना (रहीम) नरहरि, करण हरीनाथ मग भी अकबर कालीन प्रसिद्ध हिदी लेखक कवि है वस्तुत सूर, तुलसी कबीर व जायसी का अभ्युदय टस काल की महतरी घटा है केशव व सेनापति न शाहजहा 39 औरगजेय के राज्यपाल म बाधवला यो व्यवस्थित बरन के मक्त प्रयल किए इमी काल के अन्य प्रसिद्ध कवि सनापति, भूपणा, देव विहारी प्रादि है मर्याग पुरुषोत्तम राम व रसिर शिरामणि लीना पुरुषोतम कृष्ण या चित्रण रिया गया इस युग म श्रीधर एयनाथ, दासोपात सुमाराम, मुक्तापर, वामन पग्नि, तुकाराम, रामदाम और मारोपत जम प्रतिभा सम्पन्न ररिया मराठी साहिल के मडार का अपनी बहुमूल्य रचनामा मे भरा इम युगीन गुजराती साहित्यायशि में प्ररया, प्रेमानन्द और सामल तीन देदीप्यमान नक्षत्र है इनव अतिरिक्त बालभ मुकुद, देवीदास, शिवनाम, विष्णुदास विश्वनाय, रत्नश्वर पान वधन व नमाविजय प्रादि ववि लसक हुए संस्कृत साहित्य मे शाहजहाँ कालीन पविराज जगन्नाथ, स्प गोस्वामी ३ गिरधारीलाल प्रमुख मृजर है अकबर य जहागीर न अमुवाद काय को महत्त्व दिया अमर फारसी ग्रन्या वा अनुवाद किया गया इस युग म मलादर्शी भक्त कवि जनहाय को मालाक्ति करने म तल्लीन हुए भक्ति की सरिता वै शीतल व पुण्य सलिल में हिन्द जनता ही नही सहत्य मुसलमानो न भी अवगाहन पर अपन को पय किया ईश्वर पाराधना मैं रूप, रग, वरण का भेद तिरोहित हुआ और 'हरि यो भजे सो हरि को होई' की परम्परा प्रवाहित हुई इस युग के साधनो का लक्ष्य लोग हृदय रहा है देशज भापाग्रा के साहित्य का यह विकास काल था सुधारवादी धार्मिय आदोलनो ने देशज भापानी के साहित्य को समग्रता के साथ प्रोत्म हित किया धार्मिक सुधारको और संतो का प्रत्यक्ष सम्पर्व जनता से या परिणामत उहाने उपदेश देशज भाषा म दिए और लेखन भी देशज भाया म दिया मूफी सना व पीरो ने भी इस सत्य को स्वीकार क्मिा कि देशज भापाम्रो के अभाव में उनके सिद्धान्तो का प्रचार असम्भव है उहोने बोलचाल की भाषा का उपयोग किया रामानन्द, क्वीर प्रादि ने हिली म उपदेश दिए कबीर ने सधुक्कडी (मिश्रित) भाषा का प्रयाग दिया है राधा कृष्ण भक्त कविया ने अज व मपने प्रदेश की भाषा को प्रयुक्त किया नानक व उनके शिष्यो ने पजाबी मोर गुरुमुखी को प्रोमाहित किया इसी युग म उदू का अभ्युदय और विकास होता है फारमी तुर्की शब्दो तथा सस्कृत में उदय हुई भापामा के सम्मिश्रण से उदू भाषा का प्रादुर्भाव हुमा इसमे फारसी, तुर्की, हिन्दी व दिल्ली प्रदेश की स्थानीय भाषा के शब्द ह धीरे धीरे आवश्यय तानुमार एवं समान भाषा का उदय होता है वस्तुत यह भाषा हि दुमा व मुसलमानो ये माहित्यिक समवय का परिणाम है वाला तर म इते राज्याश्रय मिला और इसका रूप रग निखरा और 18 वी शताब्दी म यह एक साहित्यिक भाषा हो गई सांस्कृतिक परिवेश बन गए भारत की प्राचीन हिंदू संस्कृति और सभ्यता म एकीकरण एव त मयना की सवग्राही शक्ति थी तथा प्रारभिक प्रामाता यथा यूनानी, शक, हूण फुशान आदि इस क्षेत्र में पान के कुछ ही वर्षों के पश्चात भारतीयो म पूरण रूपेण मिल गए और यहाँ के सास्कृतिक व सामाजिक जीवन के अविभाज्य अग अन यता व एकात्म्यता को यहा की सस्कृति म समाहित कर दिया भारत म मुसलमानों के साथ उनकी सभ्यता व सस्कृति तथा निर्दिष्ट मामाजिक व्यवस्था तथा धार्मिक विचारा का प्रवेश होता है जो प्रारभ म अपने अजग अस्तित्व पे सप्रयल रहे परतु जब भी दो विभि न प्रकार की समस्याए और सस्कृतिया निरतर सम्पर म आती है तो परस्पर एक दूसरे का प्रभावित परती ही है चौदहवी शताब्दी के पश्चात इस्लाम भारत के लिए विदेशी घम नही रह गया था और भारत का एक प्रमुख धम बन गया था इस प्रकार सुदीघवाल मे ससग, नवीन भारतीय मुसलमानो के समुदाया का विकास, पारस्परिक विवाह सम्पक एवं सहयोग, उदार आदोलना आदि के फलस्वरूप दोनो सस्कृति समीप आई और परस्पर प्रभाविन किया पलत एक नवीन सम वयात्मक सभ्यता का उत्वप हुआ जो न हि दू थी और न मुसलमान किन्तु दोना सस्कृतियो में श्रेष्ठ तत्वा या समक्ति रूप था हिंदू मुस्लिम सम वय की भावना के लिए अक्वर का शासन महत्वशाली है सामासिक सस्कृति और धामिव समय के लिए प्रक्वर ने प्रथम प्रयल रिया मुगला ने साहित्य एव क्ला की सेवा म साम्प्रदायिकता की बू को नहीं माने दिया मुगलकालीन आर्थिक समृद्धि और शातिमय जीवन ने इस सास्कृ- तिक समवय व विकास म पूर्ण सहयोग दिया इस युग मे एक सामासिक सस्कृति का उदय होता है जान हिदू हैं और न मुसलमान वरन् भारतीय है ग गुग में भाग I परशिया यो पिज्य को दृष्टि मATI प्रति उसे गारपि गिधी दृष्टि में जाना गादिया सागतिर प्रनिरार फलम्याप पुर्जागरण मा घौर पर मामा ६ भाषा व गति का उप हमा ग्वालियर प म रिद गदा पारतीय मगीत एक पापा पुगगहमा गोर बन वापरा, मारग, मा माहम्म- गौ7, तान मेन पर य गायने ग737 राजाTIT म मोगं गुजरा मारगी मला और ग्राम प्रयाप प्राी माधुयता वितरण म रानी होगा इस युग म गामागिय मानि पे अमुल्य २ सम्म गाय तार चन जुड गए ाि को यहा मी धामि पाम्याग व माविमा मुस्लिमा न स्वीर परली प्रौर शिप्रा मुगाना की प्रनस रम्मा का उदभून कर निया परिगान गाजी frया पाच पीर, पीर बटर, पाजा पी पूजा प्रच ति हुई पीर ग्राम दगा या गए, दशहरा या ग्ध यात्रा के जुगार मा मुहरम म ताजिया य जुग शिम नग श्राद ३ मा मृत्युभोर मुगल था दुिपा म पली बेश्वरवाट या प्रसार हुमा मगीत वा इनाम म प्रघा मा ज्यानिप, वया, शिल्प कला, गणित, वास्तुपा प्राटि मा उतगत्तर विभाग हराना गा मध्य युगीन सास्कृतिर पुन गिरण म भति पालन या भी मनत्वपूग्ण यागतान भारत म भक्ति यद्यपि प्रत्यात प्राचीन है तथापि मध्य युग म इस प्रादालन न तो महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उमने ममसामचिव ममाज को एक या जीवन दशन दिया एश्ययपग्यता मुक्त विलास, उमुर पाचरण प्रादि २ प्रति स्वभावत प्राप्त जनता को भक्ति या गटेग निया इस भति मा। न प्रत्य त उच्च नतिय परतु भावात्मा जीयन की व्यवस्था की और हिन्दू समाज वा पतन के गत म गिरन में बचा लिया दोना धर्मों की पारस्परिक निाटता से कइ समवयारी सम्प्रदाया था उदय हुग्रा मानो म भी प्रारभ प्रा धामिक परिवेश इस्लाम के भारा पवेश दे ममय धामिर जीवन के क्षेत्र म विभिनीररा और विश्लपरण की प्रवृत्ति गतिमान थी बौद्ध धम का हास हा रहा था और हिंदू धम अपन विविध सम्प्रदाया म विभन्न रहन हुए बौद्ध धम का स्थान लेगा जा रहा था वौद्ध धम का दुपद अन एक स्त पकारी घटना है महायान सम्प्रदाय की शाखा वज्रयान व तेयान वे कृत्म, बौद्ध सघा म घुसे हुए अध 42 विश्वास, भ्रष्टाचार, मतभेद, भोग एव मानद या जीवन तथा बौद्धधम विला- सिया का सामाय जन से निभेद और उनकी उदामीनता, ब्राह्मण धम का अम्यु सन व विशेगिमा ये प्राममा बौद्ध धम के पराभव व हाम के कारण है जन धम भी मयुचित हो राजस्थान, गुजरात व उनरी भारत के कुछ भागो म शव मत्त धम का प्रभाव क्षेत्र भी वणव धम के समक्ष सीमित होता गया ऐसे समय में एम्लाम का प्रवेश तथा प्रसार होता है धीरे धीरे दानो मम्प्रदाया म सत्याग व सामजस्य पी भायना प्रकट होन लगी यी मिमट माया इस्तान और हिंदू धम के मामीप्य से कुछ एसे मम्प्रदाया का प्रादुभाव हुआ जो जातिगत विभेदो को समाप्त कर विश्व व धुत्व एकेश्वरवाद और ईश्वर प्रेम या म देश देते हैं धम की सरलता आराध के प्रति पूण समपण य अन यता, मूर्तिपूजा वा और अस्पृश्यता वा विरोध धार्मिक चिंतन म मिलता है जनता ने पूण निष्ठा वे माथ इह समधन दिया य सुधारक उदार भक्ति मम्प्रदाय के पक्षधर थे रहांने जाति प्रथा की धार भत्सना व वाह याडम्बरा की निदा की और मोक्ष प्राप्ति के लिए भक्ति, श्रद्धा व विश्वास पर बल दिया नम के स्थान पर बम यो महत्व मिता हा मुधारया का स्पष्ट मत रहा गि सच्चाधम पापड और मिथ्या वारानुवाद म नहीं है वरन् ईश्वर के प्रति अन म भक्ति म है उहान मुक्ति का एक मान सावन भक्ति माना इम युग को प्रातिकारी घटना धार्मिक सुधार का भक्ति पादालन है रविण ये धार्मिक मुधार के नेता शकराचाय रामानुजाचाय, म वाचाय, विष्णु स्वामी सरेश्वर प्रादि थे वल्लभाचाय, रामान द, कबीर, नानव, शक्रदेव एनसी ग्रादि उत्तरी भारत के धम सुधारय थे भक्ति धम से विमुक्त नहीं है भक्ति के साधर जनहृदय को प्रकाशित वरने म स नद्ध हुए ईश्वर को मामन लावर भक्त कविया न हि दुनो और मुसलमाना दोना का मनुष्य के मामा य रूप म दिसाया और भेद भाव के दृश्या का पीछे कर दिया मध्य युग के इस भत्त कविया को डा विश्वम्भर नाथ उपाध्याय ने दो शिविरा म विभक्त क्यिा है-एक सत ३ वि और दूसरे शिविर में वाय कविर सत कविया ये प्रादिस्त्रोत ब्राह्मणवादी यवस्था के विद्रोही 1 हिदी माहित्य का इतिहास (रामचद्र शुक्ल) पृ 58 2 शिवीगी शिविरा से पाये है और इहें ज्ञान मार्गी, निगुण पथी मत कहा गया है डा उपाध्याय वैरणय कवियो के अधिक समन्वयवाद ये प्रवल पक्षपर है इहनि धार्मिक सहिष्णुता का पूरा परिचय दिया है वणव भक्ता म मर्यादा पुरुषो त्तम श्री रामचर एव लोकरजा सेश श्री कृष्ण को उपजीव्य बनाया मोर पूण निष्ठा व समग्रता से उनकी भक्ति मे तल्लीन हुए वत्तभ सम्प्रदाय, चैत य सम्प्रदाय, रामानी सम्प्रदाय, राधावल्लभी सम्प्रदाय निम्बाक सम्पदाय, वारक्टी व सहरिया वैष्णव सम्प्रदाय प्रादि अनेक सम्प्रदायो के भक्त व साधा सगुणोपासना कर रहे थे ता दूसरी पोर नाना , कवीर, नामदेव, दादू रदास प्रालि निगुण निराकार ईश्वर की प्राप्ति का प्रचार कर रह थे हिदू मुस्लिम के लिए ये कृत सकल्प दिखाई देत हैं मूर्ति पूजा, कमकाण्ड जातिवाद की मत्मना की और कहा कि ईश्वर के उच्च सिंहासन 2 समक्ष हिंदू मुस्लिम एस है कबीर समाज के दृढ सचेतक, निभय पालोचक, हिद मुस्लिम समवय के प्रथम प्रयासक, मागदर्शक हिन्दू मुस्लिम एकता के अग्रदूत, मानवतावाद के प्रचारक तथा महान धार्मिक मातिचेता सत पुरुप थे इस्लाम म भी एक नवीन धार्मिक विचारधारा सूफी मत के रूप म प्रस्यात ये प्रेमी पोर रे गायब थे और हाकीमा यता थी ईश्वर का नान विश्वास, भक्ति और ध्यान से प्राप्त हो सकता है प्रत्येक सूकी का उद्देश्य मात्मा का परमेश्वर म विलीनीकरण है ध्यान, भजन, नृत्य, गीत और प्रेम स मूफी साधक ईश्वर का साक्षात्कार करता है इसके मिद्धातो मे हिदू धम की गहरी छाप थी इस सूपी आदोलन को यह श्रेय है कि मध्य युग में हिंदू मुस्लिम एक स्थान पर परस्पर हिलमिल सकते थे भक्ति सम्प्रदायो में गहन अध्ययन से यह अच्छी तरह स्पष्ट होता है कि वस्तुन सभी भक्ति सम्प्रदाय एकेश्वरवाती है क्योरि भक्तगण राम कृष्ण विष्णु शिव गणेश, शक्ति रिसी की भी उपासना करते हैं तथा इह एक भनन ईश्वर के प्रतीर रूप में स्वीका रते हैं भक्ति ने मध्य युग म सवप्रिय लोग घम का रूप धारण कर लिया था हो रही थी इस युग को धार्मिक चेतना समग्रता के साथ प्रसारित हुई थी सेश कृष्ण लीलागान को सरिता के निमत जल से बज, वगाल, राजस्थान य गुजरात ही नहीं सम्पूण भारत मप्लावित हो रहा या कृष्ण व राम के चरित भार- तीय की धमप्रिय जनता के हृदय स्थल पर मक्ति हो रह थे सास्कृतिक समवय की भाति धामि प्रया किया था को भोर से भी किया गया इतिहास में 'अकबर महान' के रूप मे प्रसिद्ध मुगल सम्राट ने सब धमों का सामजस्य पर एक व्यापक धम बनाने का प्रयत्न "दिन ए-इलाही' ची कल्पना को यथाथ के धरातल पर प्रस्तुत करने के पीछे उमका 'लोक्धम' मम्थापन या उद्देश्य था वह हिदू व मुस्लिम धम व मम वय हेतु बेहद चिनिन रहता ग्रदुत पजल इम पाय म उसका सबसे वडा महयोगी था पट्टर पथी मुल्नामा व उलेमानो की और उनकी प्रातो चनामो की उन्होन विचित भी चिंता नहीं की धम और विचार की स्वतत्रता र मध्य प्रकवर एकेश्वरवाद को पकड रहा धार्मिर कट्टरता का प्रतिफल अक्बर जानता था मरयर की धामिर नीति पा ही प्रतिफल है कि उसका शासन काल इति- हाम म विशिष्ट स्थान रखता है वस्तुत मध्य युग सास्कृतिक प सामाजिक पुनर्जागरण, लोक धर्म चे उदय तथा धार्मिक समवय का काल है इस युग मे भक्ति आदोलन के फलस्वरूप उन मानव मूल्यो यो प्रतिष्ठा हुई जिनम साम- यिक समस्याग्रो के समाधान के माय जीवन के शाश्वत मत्य निहित थे मध्य युगीन सास्कृतिय पुनजागरण ने समाज, धम दर्शन, साहित्य एध क्लायो को नवचिन्तन और जीवन के नव मायाम दिए वैष्णव भक्ति आदोलन के प्रचार प्रसार स धार्मिक मा यतानो, दार्शनिक विचारधारामा तथा जनजीवन मे सव- धम परित्यागकर कृष्ण शरण म जान की वृत्ति पनपने लगी जनजीवन मे जो रिक्तता और हताश व्याप्त हो रही थी उसे भरने का सफल प्रयत्न इस भक्ति आदोलन न दिया सास्कृतिक सौहाद की दिशा मे तजी स कदम बढने लगे और एक सामासिक संस्कृति अभ्युदया मुखी हुई कृष्णलीला साहिल्य--मनोविज्ञान के संदर्भ में भारतीय धम दशन पार साहित्य का ताला पारा से स्पष्टत अनुस्यूर है वस्तुत य लीलाए भगवद् प्रेम तथा “ममय जीवनान द की प्रतीक हैं दम भगवद् प्रेम तथा जीवनान द की प्राप्ति का माधन पार साध्य यनाए ही हैं कण लीलाग्रा की बचा रमम्वरप ब्रह्मान द वी चर्चा है उपपदा से लकर प्राद्य त मक लीना साहित्य म रा रमप ब्रह्मानन्द का गुणगान ही किया गयाँ लीना माहित्य आपातत ग्माधारित नया मान दयुक्त है ग्रामद की गर्नुभूनि हाती है मन को अत लीना साहित्य का प्रथम और प्रत्यक्ष सम्बन्ध मन से है जहा तक लीना के मून म अवस्थित दशन और चितन का प्रश्न है वह युद्धिगम्य होन स चिनना शक्ति की परिधि म आता है मन का विषय होने में मनोविना और उसके सामयिक सन्दर्भो म लीला साहित्य पर विचार करना प्रासगिक है मारतीय मीपिया नै मन का महत्म प्रारम्भ से ही स्वीकारा है मन (इन्द्र) को द्रिया का स्वामी व समस्न त्रियामा का मूल कहा गया ह उपनि पदो मे मन को ब्रह्म कहा है गीता कहती है कि मन अत्यत चचल, प्रमयनशील, बलवान तथा वायु सदश अग्राह्य है । विद्वान मन । अत करण (हृत्य) वा एक भाग मानते हैं जो वाह्य प्रभावो को सग्रहित वर उह नात स्प दता है यह हृदय सस्कार या वासनामो का घर ह य वासनाए ही विभिन प्रभावा का ग्रहण तथा प्रस्फुठित कर मन वा गति देती है विद्वानो न दश्यमान कार्यों को भूत सृष्टि तथा सूक्ष्म ग्राह्या का भाव सष्टि कहा है तथा भाव और वृति का एक ही माना है यही वृत्ति या भाव प्रगाढ होर मश स्वभाव, महाभाव 1 श्रीमद् भगवदगीता 6/34 सम्मलन पत्रिका भाग 47 रा 4 श्री शिवशार अवस्थी का लेख पृष्ठ 43 2 46 और निविक्ल रस रप स्थिति में पहुचता है इम प्रसार एम वत्ति को रस स्प दशा तक पहुचन के लिए लम्बी यात्रा करनी परती है जिसमे मन उसका सबसे बडा साझोनर है इमोलिए मामिप तथा चिद् वृत्तिया मे मयुक्त माहित्य ही दोघजीवी, कालातीत व पार्वजनीन होता है इस प्रकार साहित्य चौ पप्ठभूमि में मनोवनानिक या मानमिक प्रेरणाए विद्यमान रहती है क्षण लोला साहित्य में ये स्थितिया स्पष्टत लक्षित हैं ये भरत रसिब साधक मानवे जीवन तथा म्वनार मच्चे परीक्षक ये विश्लेषण उपल धरे कृष्ण लीला साहित्य में मनोत्तिया तथा भाषा का सूक्ष्म और हृदयग्राही पुष्टि माग मे वात्मत्य मरय तथा मधुर लीलामो का चर्णन तो है ही लेकिा मधुर लोलायो को चरमत्व रूप दिया गया है । पुष्टि मातर अन्य सम्प्रदायो के लीला साहित्य म मधुर नीलाए ही सर्वाधिक है कृष्ण वात लोलायो के पदा मे गितु सामा य मनोवृत्तिया यथा भय, जिद्द, स्पर्दा श्रोडा, भूस, अनुकरण आदि की सुदर अभियक्ति है वाल लीलाना व पतो का सर्वाधिक मृजन पुष्टिमार्गीय भवता ने किया है मूर तथा परमान दास वाल लोलामा के पना के सूनन में सर्वाधिन सशक्त य ममयं कवि है बालय को स्वचालित वियानो (Automatic Actions) के मनोवानिक विम्ध यहा है । चालक के अकेलेपन का एहसास होने पर अवुला उठना या होठो का फपडाना भय मचार का परिणाम है । मनावज्ञानिक को मान्यता है कि शिशुमा मे प्रारम्भिक काल से ही भय मचार तथा सोदय विकास होता है चालक मे बाल्यकाल से ही दृष्टि, ध्वनि, स्पश घ्राण रमयल्पना का अम्पदय हो जाता है और इगम मा वृद्धि होती है । मधुर लारी श्रवरा स वालक का शात हो जाना या मा के सोरी गाते गात मौन हो जाती शिशु का स्वभावत मला ध्वनि चेतना का मनोवज्ञानिर परिणाम है। उठना T वान लीना के पदो म अगूठा चूसने, माखन चारी करने या मसन खाने आदि वे अनक सुटर मनावनापि भाप चित्र पुष्टिमार्गी बविया विशेपन मूर तया परमान ददास र काच्य मे हैं शिशु भूरा वी प्रतीति होन पर राता ह या हाथ 1 मोटा हरि पालन भुलाव । हराव दुनगह मल्हाव जोद मोद या गाय- पवार परक हरि मू द सेत है कबहु अधर परसाव (मूर सागर प + 661) T अधया पर या प्रगूठा गर्ने लगा है और एक काल्पनिक मान की प्राप्ति परता है साद्या नवपण प्राणी की मूल प्रति ( गम्बपित मवेग भूप) है frससे प्रेरित हार शिशु कृष्ण प्रगूठा चूमता है या परवर्ती गमय म मापन साता फिरता + मनोविज्ञान और चिरित्मा मिस पर्याप पयगणोपरान्न गिरा विकास वृत्त अग्रत प्रस्तुत करता है- एक मास रोशनी दपना, दा माग मुमगा (Srraling) तीन माम-सिर उठाना तथा मा का पहचानना छ माम-बठना दम माम-रेंगना (Crawling) बारह मास महारे से चलना, चौर मास-स्वय पहा हाना, पद्रह माम स्वय बना, वप स्वय भोजन वरना, तजी म चलना मादि वाल लीलामा ये मन्नगत शिशु कृष्ण ये वय-यम म य स्थितिया मा पाती है कृष्ण वा शिशु जीवन अत्यन स्वाभाविक सजीर तथा मनाविज्ञान मम्मत है मूर न शिशु वृष्ण म ग्रामीण शिशु की सहजना व स्वाभाविकता का पथाव स्पदत हुए मत प्रतियो का मनी वज्ञानिक चित्रण दिया है मूर क सदम म प्राचाय गमनद्र शुक्ल निसन हैं-शशव से लेकर योमाय अवस्था तर व क्रम म ला हुए न जान क्तिन चित्र मौजूद है उनम केवल बाहरी रूपा और चैप्ठापा का ही विस्तृत और सूश्म वरणन नहीं हैं कपि न वालों की प्रत प्रति म भी पूरा प्रवेश किया है और अनेक वाल्प भावा की सुदर स्वाभारिक व्यजना की है। शिशु कृपा का नर प्रागन म घुटना के बल चलना तथा माता पिता का हर्पित हाना, या हाथ म मक्खन लिए धूल घूसरित शरीर के साथ घुटना के वर रेंगना या विलयन हुए अपन ही 1 दृष्टव्य है-वर पग गहि, प्रगूठा मुख मेलत प्रमु पाढे पालने अकेले, हरपि हरपि अपन रग पेलत मूरसागर (सभा)पद 681 चरन गहे अगूठा मुघ मेलत सूरसागर(समा) पद स 682 मेगडुगल न समाज मनोविनान म 14 मूत प्रवृत्तिया और उससे सम्बधित 14 सवेग दर्शाए है इसम खाद्या नवेपण प्रथम प्रवृति है 2 3 सूरदास-प्राचाय रामच द्र शुक्ल, पृ०117 प्रतिबिम्ब को पकडना और माता पिता का हर्पित होना स्वाभाविक मानस जीडाए शिशु कृष्ण ये प्रमिक विकास तथा उसके मवागीण विकास म अभिभावको में सहयोग को भी बाल लीलामो मे चित्रित किया गया है कृष्ण के एक वप का हाने पर माता पिता उमे चलना सिखाते है- कभी कृष्ण का नहा हाथ छाड पर बालक को आत्मविश्वास के लिए सम्प्रेरित किया जाता है बालक को उच्चा- रण बोध भी कराया जाता है वालक की पीडामा का अवलोकन कर नाद यशोदा हर्षित होते हैं शिशु की सामाय मनोवृत्तियो और माता पिता के धात्सल्य को सूक्ष्म अभिषजना इन बाल लीना के पदा मे है इसी प्रकार प्रात्सुक्य स्रद्धा, जिद्द आदि के भावा का प्रस्तुतीकरण विभिन घाल लीला के पदो मे गण भक्ता ने किया है 3 तक 5 T 2 घुटमनि चनन स्याम मनि प्रागन, मातु पिता दोऊ देखरी सूरसागर (सभा) पद 716 क्लिकत काह घुटुरुवन प्रावत मनिमय कनक नद वे आगन निज प्रतिबिम्ब पकरिव धावत सूरसागर (सभा) पद स 728 गहे अ गुरियां ललन की नद चलम सिखावत मूर स्याम मुख लखि महर, मन हरप बढावत सूरसागर (सभा) पद स0 740 मया बहि बढेगी चोटी क्निी बार मोही दूध पियत भई अजहू है छाटी सूरसागर (मभा) पद सं 793 मया मोहि दाऊ बहुत खिझायो सूरसागर (सभा) पद सं 833 खेलत अब मेरी जाई बलया सूरसागर (सभा) पद स, 835 मै जयो यह मेरो पर है ता धोके मे आयो सूरसागर (सभा) पद स 897 दुहुन देहु पछु दिन अरु माको, तवकारी हो मो समसरि माई जब लो एक दुहामे, तब लौ चारि दुहाम न द दुहाई सूरसागर (पद) स 1286 मया मै तो चन्ह खिलौना हो ज हो लोटि धरनि पर अबही तेरी गोद न ऐहो सूरमागर(सभा)पद सं 8।। मया री मै चद ली होगे पहा करो जलपुर भीतर को, बाहर न्योकि गहोगी सूरसूगिर सभा पद 812 6 वाना की प्रिपा उगमा गाषिया गाय गान में प्रान' माता। दस पोरा प्रियाग प्रारमविश्याग, माग्न तया गाग्नि मरिम वृद्धि होती है और दूसरी पार कर पराय में गाना माहता। मागरण भी याना परसा पोर पर भी परा: मणगान म पाग उस से ही नृत्य राम जा17 मागागा, मागा गाग्ने यामर साहसिप पार्यो म य नृत्याग मियामा गिर्या परत यह मानवार स्यभाय मिना पा पापापिया । माा प्रमुपपा ग्यापिन र पता है य नतृत्व परना। TII À 719T PITI मागा पारी सीता, गोचर लीला दान ली या गग सीमा पानि म गृष्ण समरन कृष्ण प्राय गारिया पो मगम पार तथा मारिया (अनुयारिया) को साप या जाा हैं मागन पारो परसोराया पापट नीलाम व गापिया या गती पोगा यमुना किशार राम सेत , पौर पर पानी परत हैं कृष्ण उास यौवन गन मांगने हैं गृष्ण पो इग र व्यापी भूमिमा मे प्रभुत्व यामना मा हाना स्वाभाविरग मात्तिो हात हुए भी कृपा तया प्रय साथिया म समाय है, महत्व घनना मा बिलय है ' तीला म साम्म प्रावश्यक है 1 वृष्ण लीलामा म मधुर गायपरय लीलामा या बार य है चिरहरा लीला दानलीला पनघटलीला युगल विहार सोला, रासलीला, निकु जलीना, नित्य वैरि प्रादि प्रमुख प्रेम लीलाए हैं माखन चोरी ताला भी प्रेमलीला ही है न लीनामा या चूडात रुप रामलीला, नियुज लीला, यो नित्य येति है य लीलाए राधाकृष्ण के दिन प्रेम स भाप्लावित है I मागत दान ज्वाव नहिं दती, ऐमी तुम जावन की जारी उर नहिं मानति ननदन को, परति प्रानि भवभोरा भारी सूरसागर (सभा) पद स 2152 - ग्वालनि कर त कौर छुडावत जूठा रोत सवनि व मुस अपने मुस ल नावत पटरस के पक्वान घरे सब नितस रचि नही लावत हा-हा करि मागि लेत ह कहत मोहि अति भावत सूरसागर (पद) स 1086 प्रेमरा मानन जीयन से भटूट गम्य य है प्राणी मात्र के प्रति प्रेम २ भोर उदार दृष्टि ही भगवद्ग्रह का सशक्त अवलम्बन बनती है इसी प्रेम का विस्तार सवन हैं प्रेम तथा रानद वे कारण ही परब्रह्म का प्रास्ट्य (अवतार) होता है पार पे नर लीला परत हैं मानद ने सागर रसावतार की इन जौनामों का उद्दश्य पहेतुरी लीलान द ही है - नारामा मनोव नानिक दृष्टि से देखा जाय तो मनुष्य मात्र या सवाधिक व्यापक भाव रति है पोर मादिम प्रवृत्ति याम है मनुष्य यी प्रमुख्य प्रादिम प्रवृत्तिया महता (Ego) भय (Fear) और बाम (sex) कही जाती है भय नकारात्मक काम सारात्मर और उदासीन होता ह यानी ग्रह न तो मकारात्मक है और न इस प्रकार वाम प्रेम मवव्यापी भाव है वाम से ही अनेक चामनामा का अभ्युदय होता है इस प्रेम या स्थायी भाव रति है और चरम रूप मधुर भाव को पूण मभिष्यक्ति राधाकृष्ण की प्रेम लोलामा म है स्त्री पुरुषों के रागात्मक सम्बभा में पति पत्नी ये प्रेम म सर्वाधिक मारपण होता है इस प्रम म उल्लास, तीव्रता, गहनता, अन यता तथा मादकता है प्रेम मे रसोद्रेक की चरमावस्या यह हाती है जहा स्व और पर के बधन समाप्त हो जात हैं और युगल निविशेष प्रेम म लोग हो जाता है निकुज लीला तथा नित्य पेलि म वही प्रेम मूर्तिमान हो उठा है 1 (1) प्रीति के वस्य य है मुरारी । प्रीति पे बस्य नटवर सुमेपहि धर्यो प्रीति बस करज गिरिराज धारी ।। प्रीति ये वस्य व्रज भये माखन चोर, प्रीति के बस्य दावरि बधाई । प्रीति के वस्य गोपी रमण नाम प्रिय, प्रीति बस जमाल तरु मोच्चादई । प्रीति चम नद वधन वस्न गृह गए, प्रीति पे बस्य वनधाम कामी । प्रीति के वम्य प्रभु सूर त्रिभुवन विदिन, प्रीति बस सदा राधिका स्वामी । सूरसागर (सभा) पद स 2636 (स) पान द की निधि न दकुमार । प्रगट ब्रह्म नरमेप नराकृत जगमोहन लालावतार । स्वनन मानद लोचन मानद मन मे मानद । परमानन्द सागर (शुक्रा) पद स 29 10 11 51 वाला नोडा प्रिय होता है उसे अपने साथियो के साथ खेलन म प्रानट पाता है इस नीडा प्रियता से प्रात्मविश्वास, मनारजन तथा शारीरिक शक्ति म वृद्धि होती है और दूसरी पार निर तर पराजय से बालर' कुठा ग्रस्त होता है अनुकरण भी बालक करता है और नतृत्व भी करता है कृष्ण गाकुल म छाटी उम्र से ही नेतृत्व करन लग जाते हैं गायो मा चरान, मक्खन चोरी करने या अन्य साहसिक कार्यों में वे नेतृत्वकारी भूमिका का निर्वाह करत है यह मावीय स्वभाव होता है कि नता अपने अनुयायिण म अपन प्रभुत्व को स्थापित र पता है व नेतृत्व करता है नेताही नायक होता है माखन चोरी लीला, गौ चरण लीला, दान लीला या राम लीला आदि म कृष्ण नेतृत्व करत ह कृष्ण प्राय गापिया की मेराादी मे पाते हैं तथा साथिया (अनुयायिया) को साफ बचा जान हैं माखन चोरी के पश्चात दानलीना या पनघट लीला म वे गोपिया का गली चौराह! यमुना किनारे राम लेते है और छेड छानी करत है कृष्ण उनसे यौवनदान मागते हैं कृष्ण की इस नेतृत्व व्यापी भूमिका मे प्रभुत्व कामना का हाना स्वाभाविर है दस मनोवृत्तिके होत हुए भी कृष्ण तथा अय साथियो म समभाव है, महत्व चेतना का विलय ह लीला म साम्य आवश्यन है 1 कृष्ण लीलामो म मधुर भावपरक लीलामा का वाहुल्य है चिरहरण लीला, दानलीला पनघटलीला, युगल विहार लीला, गसलीला, निकु जलीला, नित्य केलि आदि प्रमुख प्रेम लीलाए है माखन चोरी लोला भी प्रेमलीला ही है इन लीलामा का चूडात स्प रासलीला निकुज लोला, या नित्य केलि है ये लीलाए राधाकृष्ण के दिव्य प्रेम से प्राप्लावित हैं . 1 मागत दात ज्वाव नहिं देती, ऐसी तुम जावन को जारी उर नहिं मानति नदनदन का करति आनि भभारा भारी सूरसागर (मभा) पद स 2152 में ग्वालनि कर त कौर छुडावत जूठा लेत सवनि के मुख अपने मुख ल नावत पटग्स के पक्वान घर मय नितस रचि नही लावत हा-हा परि मागि लेत ह कहत मोहि अति भावत मूरसागर (पद) स 1086 s प्रेम पा मानव जीवन से पटूट मम्बध है प्राणी मात्र के प्रति प्रेम पौर उतार दृष्टि ही भगवद्ग्रह का सात पयलम्बन बनती है इमी प्रेम या विस्तार सत्र में प्रेम तथा रामद र कारण ही परब्रह्म पाप्रापट्य (अवतार) हाता है पार ये नर लीला परत है भानत सागर रसावतार की इन पोलामा सो उद्दश्य महतुपी लीलान दही है । मनोरगानिक दृष्टि स दगा जाय तो मनुष्य मात्र या सर्वाधिर व्यापर भाव रनि है और मादिम प्रवृत्ति पाम है मनुष्य की प्रमुख्य भादिम प्रवृत्तिा पत्ता (Exo) भय (Fer) पोर याम (Ser) कही जाती है भय नारात्मक पाम मरारारमय मोर उदामीन हाना है यानी ग्रह 7 तो मारात्मर है और न नकारारमय इस प्रकार पाम प्रेम सयव्यापी भाव है काम से ही मन पामनामो का मभ्युदय होता है इस प्रेम या स्थायी भाव रति ह भौर चरम म्प मधुर भार की पूण मभिष्यक्ति राधाकृष्ण पी प्रेम लोलामो मे है स्त्री पुरुषो के रागारमा सम्ब घा म पति पत्नी के प्रेम म मर्याधिय' भारपण होता है इस प्रेम म उल्लास, तीयता, गहनना, मन यता तथा मादयता है प्रेम में रसोद्रेक पी परमावस्या वह होती है जहा स्व पीर पर ये बधन समाप्त हो जात हैं मोर युगल निविशेप प्रेम म ली हो जाता है निधु ज लीना तथा नित्य पेलि म यही प्रेम मूर्तिमान हो उठा है 1 () प्रीति के वस्य य है मुरारी। प्रीति पे वस्य नटवर मुमेपहि पर्यो प्रीति यस परज गिरिराज धारी ॥ प्रीति पे यस्य प्रज भय माखन चोर, प्रीति के वस्य दावरि वधाई। प्रीति के वस्य गोपी रमण नाम प्रिय, प्रीति बस जमाल तर मोच्चादई । प्रीति यस नद वधन बस्न पह गए, प्रीति पे पस्य वनधाम कामी। प्रीति मे चस्य प्रभु सूर त्रिभुवन विदिन, प्रीति बस सदा राधिका स्वामी। सूरसागर (सभा) पद स 2636 (ख) पान द की निधि नन्दकुमार । प्रगट ब्रह्म नरमेप नरात जगमोहन लीलावतार । खवनन मानद लोचन पानद मन मे मानद । परमान द सागर (शुक्ल) पद स 29 910-11 इन लीलामा म लीला रस प्रवाहित है इन लीलामा म रम स्स हाने व कारण दोनो ही समान है इसीलिए कृष्ण भक्तो म नित्यविहारी म्प अधिक मा य है प्रेम हरि रूप है इस नित्य विहार लीना मे अनुभूत प्रेम ही सवश्रष्ठ है जिसमे स्वकीया परकीया दोना प्रकार का प्रेम सयुत है इम नित्य विहार म युगल रमणलीला में सनद्ध रहते हैं इस लीला का न आदि है और न प्रत यह प्रम कालातीत व कारजयी होता है प्रेम की असडता ही उसको सर्वोत्तम विशेषता है I युगल लीला म तुत्सुखी भाव अपेक्षित है युगल मानम अपने प्रिय का सुखी तथा मानन्दित देखन की ही कामना करता है और उनके मानद म स्वय पादित होता है उसके मन म उल्लास का भाव ही रहता है तथा ईप्या ईप आदि भाव मन म नहीं आते हैं युगल लीला में राधाकृष्ण का पारस्परिक सम्बध घरिष्ठतम है य दोना ही बादल बिजली या जलतरग वत हैं तथा दानोमा मानस प्रिय के निष्पारित कार्यों के अनुकूल प्रतीति करता है मानस शास्त्रियो की भी यह 1 114 न आदि न अन्त विहार रे दोउ, लाल प्रिया में भई न विहारी। है नई (नई) भाति नई छवि काति नई नवला नव नह बिहारी॥ रहे मुह चाहि दिय चिन पाहि परे रम प्रीति सु सबस हारी। रह इन पास करे मदुहास सुनो ध्रुव प्रेम प्रस्थ क्यारी ।। बयालीस लीला भजन तृतीय शृखला लीला जोई जोई प्यारो रे सोई माहि भावे, भावे मोहि सोई साई करे प्यारे । (जश्री) हित हरिवश हस हसनि स्यामल गौर, कहो कौन करे जल तरगीनि यारे । हित चौरासी, श्री हितहरिवश हिडारो पूल ति है पिय प्यारी । धन रजनी दामिनी त डरप, पिय हिय लपटि सुकुमारी ज श्री भट निरवि दम्पति छवि देत अपनपा बारो। युगल शतर, श्री भट्ट प्रेम रसासव छवि दोऊ परत दिलास विनोद । चढत रहत, उतरत नहीं, गौर स्याम छ विमोट । बयालीस लीला रतिमजरी लीला, ध्रुवदास मा यता है कि प्रेम की चरमावस्था मे स्त्री पुरुष अत वाह य की परि- स्थितिया से विच्छिन्न होकर एक विशिष्ट भावलोक म विचरण करते है या दो मन एक हो जाते है भावना एक्य की यह स्थिति होती है प्रेमदशा का एक्त्व जल मे घुली हुई शकरा सदृश होता है यह वह मानस स्थिति है जब सवन प्रियतम की छवि ही दृष्टिगत होनी है यह लीलामो मे कृष्णमय या कृष्णीकरण की स्थिति है राम लीलाना मे कृष्ण सभी गोपिया के सामीप्य हात है व मोलह हजार गोपत्र यात्रा के साथ सोलह हजार रूप धारण कर नत्य करते है और रास ३ मध्य राधा के साथ ही शोभित होत हैं प्रिय के सामीप्य का आनन्द प्रत्यक गोपी प्राप्त करती है यह प्रेम की उत्कृष्ट स्थिति है T Z भारतीय मनोपियों ने प्रेम को जीवन का मूल भाव स्वीकार किया है लेकिन यह प्रेम या काम यौनेच्छा का रूपातरण नहीं है अपितु जिजीविषा का सूचर है काम या प्रेम को सचित अथ की अपेक्षा उदात्त रूप मे ग्रहीत करना अधिक उपयुक्त है राधा कृष्ण की प्रेमलीलाग्रो मे काम वृत्ति का रूपा तर हा जाता है और काम भाव वीर धीर लीलाभाव वन जाता है मानस शास्त्रियो की मा यता है कि सम्बच तीन स तीव्रतर होता जाता है और निर- नर सक्रिय रहता है पुष्टिमार्गी लीलामो म प्रेम के प्रारम्भ से लेकर प्रेम की चरमावस्था तर की विभिन स्थितिया का मनोवैज्ञानिक चित्रण मिलता है प्रारस्मिर मिलन और उससे उत्पन्न लरिमाई कर प्रेम' मन मे गहरा पठता है जाती है निरतर परस्पर प्रत्यक्ष मिलन, दर्शन सभापण की चाह बलवती होती मन प्रियतम से मिलने को प्रातुरित रहता है इस मिलन हेतु आवश्यक्ता पड़ने पर अनेक छद्म उपाय भी किए जाते हैं क्षणिक वियोग असह्यय होता है लौकिक मयादाए तथा समाजगत बधन छिन भिन्न हो जाते है T पटदस घोप सहस सुकुमारी पट दस सहम गुगल काहू सौं कुछ मतर नाही, करत परस्पर रयाल सूर सागर (सभा) पद स 1665 एक ही मूरति ललिन लाल पालात की नाई सबके असन धरि सावर बाह सो हाई नददास पदावली रासपचाध्यायो पांचवा अध्याय पद 67 68 ब्रजभाषा के कृष्णका य म माधुय भक्ति, डा स्पनारायण, पृ 223 53 एक ही पदम्य वामना रहती है-प्रिय मित्रन यह मिलन नित नूनन होना है 'रमण सुख' ही कृष्ण के बार बार प्राप प्य का कारण बनता है मूर ने प्रेम की प्रारभ म लेबर घरमावस्था ता की विभिन स्थितिया पा जीवन्त चित्रण पिया है मासन चारी लीना, चिरहरण लीना, पनघट लीना. दानलीला, गाम्ही लीला रास लीसा, युगल लीना प्रादि प्रेम की विभिन्न स्थितिया हैं प्रेम प्रारभ हार प्रामयित, व्यमन और फल प्राप्ति का मार बढकर चरमोत्वप पर पटवता है वृपण मम्प्रदाय द विहाना के अनुसार गोपिया (जीवात्मा) द्वारा रास प्रवश पत प्राप्ति (न्वापान या अगगितान) है यहा प्रिया प्रियतम का मिलन हो जाता है एप प्रमी प्रथया प्रेमिका के मन की विभिन्न स्थितिया व गतिमोल नित्र इन लीनामा म है मिलन पर मन हर्पित तथा मानन्दित हाना है और उमम व्याप्त ममम्न कुण्ठाए नष्ट हो जाती है वस्तुत यह मन स मन का मिलन हा जाता ह Σ इन लीलामो मे व्यक्तिगत घनिष्ठ सम्बघा की मन यता व नक्टय मिलता है तथा मानसिक सुख प्राप्त होता है स्त्रा मनाविधान के साथ साथ समूह मनो विज्ञान के नियों का सफल चित्रए इन तोलामा मह गापियारी काम द्वद से विमुक्ति चिरहरण लीला मे है अनिश्चय और भटगाव स मन को एक निश्चित माग मिलता है यह मनोदितान सम्मत है कि प्रभावर व्यक्ति व ही प्रभुत्व पाता है या कुछ ग्रहण कर सकता है प्रन तानलीलामों में कृष्ण और उनके सहयोगिया को नारीपात्रो से वह्म करनी पड़ी और उह समझाना पड़ा J आजु वनी दम्पति वर जोरी। सावल गौर वरन रूप निधि नद दिसौर व्रजभान किमोरी। अति प रग बढ्यो 'परमानद' प्रीति परस्पर नाहिन थोरी। परमानद सागर (शुक्र) पद स 246 दुलह दुलह्नि सुरग हिडारे भूलत प्रथम ममागम सो गठ जोरे । नददास प्रमु रस बरसत जहा नव धन दामिन के अनुहारे । नददाम पदावली (बजरत्नदास) पृ 326 बठे लाल नवल निकुज माही। प्रतिरस भरे दाऊ अग जारि के हिलि मिली दे गलबाहीं । भारत दु न यावती (दू भा) प्रेममालिका, पृ, 60 54 तनी प्रभावित हो वे दूध दही दान या यौवन दान करती है भावरमण भी दानलीला में मिलता है नारी-मन माची होता है वह प्रियतम स मिलना तो चाहती है लेकिन मामाजिर तथा लोपित वधना से वह विमुक्त नहीं हो पाती अतदद से मुक्ति के लिए कृष्ण गापियो म यमुना किनार, गाव की गलियो चौराहो प्रादि पर छैन घाट परत हैं उसे प्रेम र लिए प्रेरित करते हैं पनघट लीला मादि म मी तथ्य की पुष्टि होती है रामगीता पूर्व मूर प्रादिन गोपियो को लौकिक मागमा म रहन का रह पर ना मानस की स्थिति जाननी चाही है लेकिन गोपिया द्वारा सामाजिर वधना का अम्वीकार करने पर ये राम लीला करते हैं राम लीना के मंडित हा ये पश्चात महाराम होता है इसका भी एक मना. वैनानिक कारण है कि भावा म प्रवरोध पान पर व अधिक उत्तेजित व तीर होत हैं इसलिए महाराम मघनतम पोर तीयतम होता ह निफु ज लीला, हितलीला विहार लीला पारिम राधा कृष्ण की प्रणय लोलामा ये सजीव तथा ज्दाम चित्र है गवारण का प्रेम दिव्य है । वे परस्पर प्रेम मत हा रत्यानद का मानद लते हैं - प्रेम की प्यास निर तर बलवती हाती जाती है और सम अतृप्ति का भाव रहता है मनुष्य का मन प्रेम में प्रतृप्त रहता है दोना माय रिद्रा त्यागत हैं, नितनूतन प्रेम युक्त रहते हैं प्रग से प्रग मिलन पर भी बेचन हैं वे अधिकाधिर लोतानद की प्राप्ति के लिए प्रयत्न. उन्ह अपन प्रेम म अपनी युगल लीला के अतिरिक्त लोकादि की विल- कुन चिता नही रहतीन र ये सभी मानसिक क्रियाए है T 3 राधा माधव अद्भुत जोरी सदा सनातन दक्रम विहरत अविचल नवल किशोरी । युगल शतक, श्री भट्ट, 59 अाज दोऊ भूतत रति रम सानै । -वरलभ रसिल की वाणी सरस दिलाम गान अग अग लगने पारस म अरमान नना न प्रधान है । ययालीस लीला भजन तृतीय शुसला लीला, पृ 112 पाठो पहर रहे मतवार लोर वेद इन सब बिसारे। वल्लभ रसिक की वाणी, 76 1 सुरत लीला के चित्रा में प्रेम जनित अनरग व सूक्ष्मतम भावा का प्रस्तुती- वरण मिलता है सोदय के भी अनक भाव चित्र है सखी सम्प्रदाय के लीला साहित्य म तो राधाकृष्ण (निकुज विहारी तथा निकुज विहारिगी) निकु छोटकर एक कदम भी बाहर नहीं जात है यहा काम भाव के उदात्त रूप का प्रस्तुतीकरण है मखी सम्प्रदाय तथा राधावल्लभ सपदाय आदि की रास लीलामा में सखिया पुष्टिमार्गी रास लीलाग्रा की गोपिया के मदृश सम्मिलित नहीं हाती क्योकि ये लीलाए गाप्य है और मपी का वाय युगल की सेवा सुश्रुपा करना तथा उह मानदित करा के लिए प्रावश्यक सामग्री संग्रहीत करना है सखिया तो युगल को आनदित देख स्वय आनन्दित होती हैं यहा राधा कृष्ण का मिलन एक नारी का नर से मिलन (अध्यात्मिा अब म जीवात्मा का परमात्मा से मिलन) है वस्तुत प्रेम ही नर, नारी स्थान और प्ररणा है परब्रहम या कृष्ण के प्राद्य (अवतार) के पीछे भी मनोविज्ञान सम्मत प्राधार है निगुण, निराकार और सिविशेष ब्रह,म के साथ मनुष्य का रागा- त्मक सम्ब ५ जोडा जाना सभव नहीं है मानव रूपरेखहीन ब्रहम का अपने भावलोक में ग्राह य नहीं कर पाता है ग्रत प्ररूप को रूप देकर उसे इश्वर नाम दिया गया ईश्वर अर्थात समथ ऐश्वय बोध के कारण मनुष्य न उसे अपने से बड़ा और उद्धारक ममझा साथ ही वह ब्रहम को सवव्यापी भी समझता रहा अत इन दानो रूपो का अतिकात पर माधुय रूप प्रतिष्ठित हुआ और ब्रहम मूलत मधुर या रस रूप कहा गया इस प्रकार ईश्वर रूप धम सस्थापन, दुष्ट दमन तथा साधुप्रो की सरक्षा सम्बद्ध हुअा और ब्रहम का मूत्र मधुर रूप लोकानुजन तथा सर्वांगीण कुवर दोऊ सुरति समर रनधीर । मध्य सज पर विहार विहरत रही सुधी न शरीर । महावाणी-हरि व्याम देवाचाय (क) प्रम नाचवत नक्त सब जह लौ धामी घाम । सो नाचत हित नाम वस सेवक चित विश्राम मुधम वाधिनी, साडिलीदाम पृ (ख) नाइक तहां 7 नाइका, रस करवात खलि सखी उम सगम साम पियत नन पुट झलि । बयालीस लीना, रतिमजरी लीला, पृ. 219 & भान दायक सिद्ध हुआ यह माना गया कि मूल पुरप मामा यतया उभय लिंगी है वह द्विधाविभक्त होकर नारी की उत्पत्ति करता है तथा उसके साथ रमण करता है शुनि भी कहती है कि 'स एकाकी ा रमत एकोऽह वहुम्या प्रजायम्' - एक स ही अनेक वनन तथा रमण करन की उमका वाछा है गुह्य साधनासा ने शब्दा मे उम पुरष की स्थिति अद्वय, युगनद्व, मिथुन, युगल, समरस, महज याति की है परात्पर तत्व के द्विधात्मर स्प को शक्ति और शिव, प्रकृति और पुस्प राधा पार कृष्ण, सीता और राम, लक्ष्मी और नारायण आदि कहा जाता ह -सी साटम में यह लक्ष्य परन याग्य है कि प्रत्या पुरप के वाम भाग म नारी और दक्षिण भाग म पुम्प तत्व विद्यमान कहा जाता है अद्ध नारीश्वर का परिकल्पित रूप भी मी मा यताधारित है यह मूल पुरुप निरन्तर रमण क्रीडा करता रहता है कहने का तात्पय यह है कि भारतीय मनीपिया अनुमार ब्रह्म का मूल भार प्रेमयुक्त हे और प्रेम के द्वारा ही ब्रह्म स साक्षात्कार हो सकता है अत ब्रह्म से प्रेम सम्मध स्थापित करन की परिक्रपनाए की गइ भगवद् प्रेम को नौविक प्रेम का चरमोस्प रूप ही कहा जा सकता ह लौकिय प्रम के अनिवाय तत्व तया भावदशाए स्पातरित हो भगवद् प्रेम के तत्व व भाव दशाए बन जातो है इस प्रकार लोकित प्रेम ही चरम स्थिति में श्रात्मोत्मग की सीमा तक पहुंच कर आध्यात्मिक प्रेम म परिवर्तित हो जाता है भारतीय मनीपिया के अनुमार भगवान मानव कल्पित, रम स्प, प्रेम रूप या मानद रूप है कृपण यो सच्चिदानद कहा जाता है जा प्रेम लीलाए करत हैं पाश्चात्य मनोविचारक थाउलेस के मतानुसार ईश्वरी प्र म लोविन प्रेम का प्रच्छन रूप है तथा ईश्वर कामिया क द्वारा परिकल्पित अपन प्रिय का रूप है विसर आदि पाश्चात्य विद्वान भी एम ही विचार अभिव्यक्त करते हैं और भक्ति भावना का पालम्बन 'काम भाव का मानत है वणव मनीपिया व रसिक साथमा ने मन व मनोवलिया को अत्यधिर महत्व दिया है वे मनशुद्धि का I श्रोडर, I भारतीय भापायो म कृपण काव्य मे सालित टा द्रजेश्वर वर्मा का पालख 317 2 3 Introduction to Psychology of Religion Thouless P 128 भागवत रस वा भाक्ता 'रसिक' भी कहा गया है "पियत भागवत रसमालय महुरहो रसिका मुवि नागा' श्रीमद् भागवत 1 1 3 प्राथमिकता देते हैं उ होने वासनाप्रो के दमन को उचित नहीं माना और मानव हृदय को उद्वेलित करने वाली वासनामो की शुद्धिकर कृप्तीपरण करने पर बल दिया इसी प्रक्रिया में माथा भक्ता न वामनाना या वृरिया को उना तीकृत किया और जि ह लोर मे अनुचित, ह्य, त्याज्य या मयादा विपरीत समझा जाता था उह ही भगवद्गीला का आधार बनाया शृगार मन से माचित विषय है और मनुष्य को य हो सासारिक्ता मे लिप्त ग्यते हैं कृष्ण लीलाना में इन विपया को कृष्णीकरण दिया गया म रागात्मा मवध वयक्तिक भाना या सग्व वा के पादश पर आधारित हाना है राग, भोग और समार इन लीलाग्ना मे कृष्ण स व्यक्तिर सम्बवित स्थापित किय गय हे कृष्ण मव भाव म भजनीय है पुष्टिमार्गीय लीलाग्रा में कृष्ण के साथ बालवत् मित्र वत् और कातवत् तथा अ य गम्प्रदायो की नीलामा म कातवत् प्रगाढ सम्बधित स्थापित विय गय तथा हृदय के सभी मनोभावा का वृष्णापित रिया गया है इन नीलामी में रागात्मक सम्बधा से निवत्त नहीं है और न भावा का दमन ही है इस सोन्य वत्ति इस प्रसर 'काम' तथा वासनापा का रूपा नर कृष्ण लीलामा का दर प्राधार है काम की उच्च स्थिति को प्रेम भ परिकल्पित किया गया है इस प्रम भाव के साथ मानव की सौदय वृत्ति भी सद्धि है दमन वा भी ये समथन नहीं करत है क्याकि दमन नकारात्मक होता है और उमम लाभ वी अपेक्षा हानि की सम्भावनाए अधिक है काम का मदव्याची भाव स्वीकारत है यौन या कामवत्ति का पाश्चात्य मानस शाम्बी अधिक महत्व देत ह इस प्रकार य रसिक मनाचिपि सक फ्रायड का कहना है कि अचेतन मन स्थित लिविडो' मूत वामवत्ति है मनुष्य इस वत्ति द्वारा प्राप्त शक्ति का उपयोग अनुचित इच्छाप्रा का निरोध पर उदात्तीकरण (Sublimation) की प्रक्रिया द्वारा 1 मायड मा तीन विभाग मानता है- (1) चेतन (2) पूर्व चेतन (3) अचेतन । डा वाटसन एन उसके अनुयायी मन की सत्ता में ही सदेह करने ह युग अचेतन ये चार म्प बताता है-प्रात्मा एनिमा(नारीभाव) एनिमम (नरभाव) और दाया 58 श्रष्ठ कार्यों की ग्रोर लगा सस्ता हे फायड जीवन के समस्त काय व्यापारा म पाम वत्ति (लिबिडा) को ही प्राधार मानता है फायड ईश्वर या ब्रह्म के अस्तित्व का अस्वीकारता है फायडीय धारणा मुरपत अचेतन मन पर आधा- रित है ह विलियम मेग्दुगल याम भावना यो मूत्र वत्ति के स्थान पर मुख्य वृत्ति मानता है पार सभी प्रेम (रागात्मक) सम्म यो म इस प्रागपित नहीं करता है मग्दुगल काम भावना का उ नया सामाजिक दृष्टि स अत्यावश्यक नमझता ह युग 'लिविडा' को तो स्वीकारता है लेकिन उस काम वत्ति का केद्र नहीं कहता युग के अनुसार काम भावना का स्पातर ही होता है, उदात्तीकरण नही युग ईश्वर को अचेतन मन ना मानवीन प्रतीकात्मक रूप मानता है युग तीन वत्तियो की चर्चा करना है-- (1) रन्द्रिय दत्ति (2) रूपात्मक वत्ति और (3) नीडा वृत्ति इन्द्रिय उत्ति जीवन, रूपात्मक वत्ति, रूप और प्रीडा धत्ति आन द या अनुरजन को मचालित करतो है वह गीडा वत्ति यो मूल यत्ति मानता है जो दोना धुरिया को सयुक्त विय हुए रहती है परती है यही वृत्ति मनुष्य का दमन क्रिया स मुक्त करती है और पूणानद प्रदान यहा दृष्टव्य है पि भारतीय मनीपिया ने भी नीन प्रतिया की चचा कृष्णलीलामा के सदभ म को है-(1) मिसृथा (सृजनच्छा) (2) रम गच्छा (रमण की इच्छा या विलास की इच्छा) (3) युयुत्मा(युद्धावस द्वद्ध की रच्या) रमरणेच्छा या पिलासच्छा ही स्थायी वत्ति है और यही पूणानद या लीला का प्राधार है कृष्ण लीलामो का बिलासच्या माध्यम मन से है लीला का उद्देश्य ही रमण मुप या रत्यान द की प्राप्ति है प्रत्यक्ष व स्पष्ट मनव शृगार T नाद न दन वस की हे रामा, भवन गए चित नदु न लागन । स्याम स्यामा रूप मा सुख, अतर नेसो न कुन यागत ॥ जा वारन वकुण्ठ बिसारन, निज स्थल मन मे नहीं भावत । राधा काह देह धरि पुनि पुनि,जा सुग्व का वादावन पावत ।। विछुरन मिलन विरह मभोग-सुख नूतन दिन दिन प्रीति प्रवासत । मूर स्याम स्यामा विलास रस, निगम नेति पहि-वहि निन भाषत ।।* सूर सागर (सभा)पद स 2803 को पूर्णता भी मिथुन भाव म है मुम, प्रान द तथा मोरय भाव मन को माला दिा करत है इस प्रकार लौकिक प्रम काही स्पातर लोला म है लौरिय प्रेम चरम स्थिति म पहुचार प्रणवृत (मगनमय) हो जाता है यह रूपाना मी प्रक्रिया ह जिगम पूब भाव या पूर्णतया भगवद् गति म परिवतन हो जाता है मनो वनानिक दृष्टि स लीलामो म मनायत्तिया य उदात्तीकरण की अपेक्षा म्पान्तर (Conversion) होता है क्यारि सासारिष विषयानुगति भगवद् लीलाप्रा म पूर्णतया ममाप्त हो जाती है मानर मन के ममम्त मनाविरार यहा कृष्णापित काम प्राय का मृजनात्मव तथा प्रान नानुमू यारमर उध्वामुगी व्यापार न लीलामा म ह शृगार की समस्त लोपित चेप्टा राधाभाव या गोपीभाव म कृष्णापित हैं कृष्ण साक्षात् मूतिमान ” गार एव म मथ ममथ हैं व काम दहन की अपक्षा म यो मोह लते हैं लीलाप्रा मे वृष्ण मदनमान है इहीं कृपए का प्रेम 'अपित पिया गया है राघा भाग सा रम रीनि वढी । सादर करि मेटी नद नदन दून चाउ पढी ।। वृदावन म पीडत दोऊ जसे युजर पीडत परिणी । परमानन्द स्वामी मन मोह्न ताहू को मनहिनी ॥ परमानद सागर पद 243 पृ 76 . 1 सोई पिय वेगर लपटाई सीस धुजा दे पिय के हिय सो कसि के हियां लगाई। निधरक पियत अधर रस उमगी तऊ न नं प्रधाई हरिच द रस सिधु तरग न अवगाहत सुख पाई। भारते दु ग्रयावली भाग 2 मधुमुकुल, पृष्ठ 403 प्रेम तथा सामाय लौकिक सुख काम मे अतर हे स्व सुख की प्रवत्ति होती है लेकिन प्रेम मे प्रिय सुग्न सर्वोपरि है * आत्मेद्रिय प्रीति इच्छा तार काम नाम । श्रीकृष्णेर प्रीति इच्छा तार प्रेम नाम । अतएव काम प्रेमे बहोत अतर। काम अघतम प्रेम निर्मल भास्कर । चतय चरितामृत आदि लीला चतुथ परिच्छेद- काम मै व्यक्ति की 60 इम प्रगर राधाकृष्ण की ये प्रेम लोलाए अगणितान द का आधार हैं और सच्चिदानद वनने को महायात्रा है प्राणीमान म प्रेम उदार दृष्टि और परमानद का मान जागृत करना इस लीना साहित्य का उद्देश्य है ये लीलाए मनुष्य को प्राग्रह से मुक्त कर सर्वागीण मानद के लिये सम्प्रेरित करती हैं कृष्ण निर तर अाग्रह पर प्रहार करत हैं और उद्घोषित करते हैं कि जीवन से उच्च न कोई दशन है और न काई शास्त्र है, न कोई परम्परा है और न कोई व्यवस्था ही है लौविक जड मा यताए गतिशील जीवन म बाधक नही होनी चाहिये मनुष्य की मतोवत्तिया का दमन उमरे जीवन को स्थिर (जड) बना देती है प्रत उनका उचित प्रकाशन अपेक्षित है यह जीवन सर्वोपरि है और पूणानद प्राप्ति के लिय मनुष्य का निरन्तर प्रयत्नरत रहना चाहिये इस प्रकार कृष्ण ने लीलाया के माध्यम स मानव तथा मानववाद की महत्ता का भी प्रतिपादन किया है जब लगि @ मन बीच क्छु स्वरिय को हित होइ। शुद्ध सुषा क्से रहे, परे जो तामे तोइ । ध्यासोल लीला-प्रति चौरनी लीला-ध्र वदास पृ 64 काम जड विषयक अनुराग है और प्रेम भगवद् विषयक अनुराग है मध्यकालीन धम साधना गे हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृ213 राजरथान का आधुनिक हिन्दी साहिल्य एक सर्वेक्षण गजस्थान हिंदी माहित्य की परम्परा पुष्ट तथा समद्ध रही है वीरगाथाकालीन भक्तिशतीन तया रीतिकालीन साहित्य प्रचुर मात्रा म उप लब्ध है और हिदी साहिता को राजस्थान का प्रदेव उल्लेखनीय है भारतीय स्वतग्रता संग्राम में भी राजस्थान के साहित्यकारा का योगदान म्मरणीय ह अाजादी की लडाई म उहान जनचेतना जाग्रत करन का महत्वपूर्ण काय किया है आधुनिककाल म भी यहा माहित्य मृतन अनवरत हो रहा है राजस्थान में आधुनिक हिंदी साहित्य की चर्चा करत समय काल की गणना का प्रसग आ सकता है यानि प्रावुनिक हिन्दी लेपन का प्रारम्भ कब से माना जाय गद्य पद्य म यह कालसड अलग अलग हो सकता है लगिन यहा परम्परा तथा कालगणना की अपक्षा वतमान लसनो सदभ म विचार रिया जाना अधिक प्रासगिक है ? एक प्रश्न राजस्थान निवासी लेस में प्रसग म भी उठ सकता है इस सम्ब च म राजस्थान म निवास कर रह ल वर को तो सम्मिनित रिया ही जाना पाह्येि साथ ही वह सब जो राजस्थान स जुदा रहा है और व्यवसाय सेवा या मय सारण से अभी राजस्थानतर है-प्रवासी है उसे भी सम्मिलित करना समीचीन ही होगा ऐसा करने पर हम अपनी दृष्टि का विस्तार ही करेंगे इसम कोई अतिरिक्त मोह नहीं है बल्कि हमार यहा कृतित्व के सम्यक मूल्याकन को यह अपक्षा है काव्य राजस्थान या प्राधुनिक बाय, याम्य सोदय सहज अभिव्यक्ति और मूल्यबोध यो दृष्टि म विचारणीय है मौर राजस्थान के काय की उपलब्धिया 62 यो रयांरित किया जाता है हिदी पार को Tी प्रतिया प्रयवा प्रसार पहा उपलव्य है कविता, नयी य विता, प्रारिता, गीति कविता प्रादि हम यहा सविप्न म स्फुट तथा प्रवध काम की प्टि म विचार परेंग पहल प्रवध काव्य कोल . . मानित हिदो प्रयामा म मानवीय नव नाना प्र नमन के दद अनुभून मवदामा और गुगीन ममस्यामा को मफत अभिव्यक्ति दृष्टिगत हानी प्राज रे ग नायपूण पोर व्यम्न समय मे प्रवध काव्य लेखन एव दुरूह पाय है लक्षित गम्मान न गफर हिप्रिय बाघ रामपित किए हैं प्राधुनिक प्रवप पाव्याग व हाम टा गधेय राघर, श रामान द तिवारी भारतीन दन', परमरवर रिप डा रामगाराल शमा 'दिनश, डा दयाकृपण विजय मा नाम रेसारित किए जा सयते है माधुनिय हिदी प्रवध काव्य- चारा पे सवाधिर महत्वपूरा नाम डा रागय गपन का है डा रागय राघव बहुप्रतिभा सम्पन्न मन लपा है प्रय काव्य गृजन के क्षेत्र म इहाने महा- पान और सटवाव्य गा लिये ह मानवीय चेतना को रूपाक्ति करन, मस्थति मार सभ्यता के विभिन्न चरणा का प्रस्तुन परन का बौद्धिा प्रयाम 'मेघावी' महाकाव्य है भारतीय मस्कृति की उच्चता तथा राष्ट्रीयता के सदभ म यह महापाव्य महत्वपूर्ण है लग्नि पात्रा य चयन में दुरस्ता भी है पर वद्रित ह डा रागेय राघव के उत्तरायण' और 'महाविजय' अपूण महाकाव्य है उत्तरायण की रचना पलश चैक' पद्धति से की ह और कथानर भीष्म पितामह यह अपूरण महामान्य 21 ख म है 'महाविजय भी अपूण है और महाप वि क प्रतिम दिना की रचना प्रतीत होती है डा रामाद तिवारी 'भारतीन टन प्रणीत 'पावती' महाकाव्य क प्य प्रतिभा भाव सौ दय, क्सा शिल्प, प्रवधात्मक ग्रार रम परिपार पी दष्टि से उल्लेखनीय है डा निवारी मास्कृतिक मूल्यों के प्रति समर्पित है और यह दष्टि इस महाकाव्य मे भी है डा तिवारी की भारतीय धम मस्कृति व दशन के प्रति प्रास्था है जो रस महाकाव्य में प्रकट होती है श्री परमेश्वर द्विरेफ को 'मीरा' महाकाव्य भी उल्लेखनीय है मत्स्थल मदाकिनी 'मीरा' उज्ज्वल परित यो ग्राधार बनाकर लिखे गए इस महाकाव्य म यो द्विरेफ ने मौलिक उद्भावनाए भी की ह नारी चेतना के म्वर महा- रम परिपाक की भी विशिष्टता है द्विरेफ ने दूसरा महा- काय मे सवत्रह 63 काव्य प्रेमचन्द के जीवन प्रसगा पर प्राधार वनारर 'युगद्रष्टा प्रेमच द' लिखा ह प्रेमच द के जीवन के समस्त उतार चढाव यहा चित्रित ह श्री द्विरफ ने श्रीमती कमला नेहरू पर भी 'कमला' महाकाव्य रचा है डा रामगापाल शमा 'दिनश' क महाकाव्य 'सारथी' का क्यानर भी पौराणिक ही ह चिरतन जीवा मूल्या 4 प्रति चि ता महारवि वरावर परता ह मूल्या का मघप महासाव्य म वरावर ह स्निान भी अध प्रवृत्ति तथा समस्त मानवता को महारवि उजागर करता है भापा शनी महाकाव्य अनुकूल ह राष्ट्रीय व मास्कृतिर धागा प्रमुत्र रवि डा दिनश की जीवन्त दप्टि इस महाकाव्य मह युग पुरुप महात्मा गाधी व जीवन का लेकर देवपुम्प गाधी महाकाव्य की रचना थी रमेशचद्र शास्त्री न की ह अति उत्साह के माय श्री शास्त्री न गाधी को अवतारी रूप स चिनित किया है परिणामत मूल्य की अपक्षा विचार व भावनाए प्रबल हो गई ह दमसे काव्यगत मूल्या का हानि पहुची है और भावपक्ष व क्लापक्ष नाना प्टिया से महामाव्य अपना विशिष्ट योगदान नहीं द पाता है तथा एक सामाय रनना ही यह वन मका है टा दयाकृष्ण विजय द्वारा रचित पाजनय' महाकाय म अजनिपुत्र पवनसूत हनुमान की यशोगाथा है इम महापाय के हनुमान धीरातात्त' नायर है कथा शिल्प, रस परिपाक, शली सग रचना आदि विशिष्ट है तया साम्वृ- तिक मूल्यो के प्रति महाकवि अत्यधिक चितित लगता है वह महानाय प्रका- दमी के सर्वोच्च पुरस्वार मीरा पुरस्कार म पुरस्कृत है इन महाकाव्या के अतिरिक्त प्राग और प्रामू (शकु तला भागव प्रचना) रामकथा कल्पसता (श्री नित्यान द शास्त्री) हनुमाच्चरित' (रणवीर सिंह) शक्ति शस्त्रनाथ (प लक्ष्मीच द मिश्र) वसुमती (श्री दौलतसिंह लोढा) प्रहलाद (डा पुष्करदत्त शर्मा) प्रवाधायन (नाथूराम भारद्वाज) आदि भी प्रकाशित है अधिक्तर महाकाव्य के नायक तथा वथाना प्राचीनधम ग्रथों म प्राय हैं खडकाव्य की दृष्टि से डा रागय राघव की काव्य कृतिया अजेय खडहर, पाचाली, मादि उपलब्ध है प्रयम खडकाव्य म हिटलर के रूस पर प्रारमण तथा उसके प्रतिरोध का वरणन है ता पाचाली म पौराणिक इतिवृत है अभिव्यजना और शली की दष्टि स पाचालो उल्लेखनीय खडसाय ह 64 श्री सुधीद्र का सुप्रसिद्ध सडकाव्य जोहर है यह पदमिनी ये जीवन चरित्र पर पाधारित है सुधीद्र राजस्थान के हिंदी काव्य जगत के उज्जवल नक्षन है भावपक्ष व क्लापक्ष की दृष्टि से यह एस सुदर रचना है ढा रामगापाल शर्मा दिनेग' में लगभग चार पाच सडकाव्य उपलब्ध हैं "हिम प्रिया राष्ट्रीय चेतना पा पदकाव्य है जिसम चीनी पाश्मण तथा भारतीय जन के स्वदेश प्रेम से मोतप्रोत है शली शिल्प रप व भाव की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ रचना है इनका एक भय खड काव्य 'उत्सग' है जिसम भाई बहिन की रक्षा के लिए उत्सग करता है 'दुर्वामा पौराणिक इतिवत्तात्मा पडकाव्य है प्रगतिशील पवि जुगमदिर तायर की रचना युद्विष्ठिर ह तायल न युद्ध पारण वग वपम्य तथा वग भेद माना है वैचारिक प्रोता तथा भापा शली की सहज मप्रेपरपीयता इसकी विशिष्टता हैं डा शाति भारद्वाज राकेश द्वारा रचित परीक्षित' सडाव्य इतिवत्तात्मर है यह पुराण यथा पर आधारित ह भाषा, मरचना, वचारिप गरिमा अनुभव को प्रामाणिकता की दष्टि से यह उल्लेखनीय पदयाव्य है . इनके अतिरिक्त पय महत्वपूग्ण खटकाव्य ह गाधारी (डा मनाहर प्रभाकर) ममता की ममाधि (डा त्रिभुवन चतुर्वेदी) शूपणवा (प्रीतमसिंह बागरेचा), पहिल्या (माधव शर्मा), मागर सतरण (डा रामगोपाल गोयल) जनवजा अशोर वासिनी (गणेशचन्द्र जोशी म वतर), शान (क्लाश तिवाडी विद्रोही), प्रतिपदा (डा सरनामसिंह शर्मा अरण), प्रेरणा, पाभाम, मृत्युज्जयो (मारणच द रामपुरिया) वधन नूरजहा, यजिन देश (शकुतला नागव अचना) मादि - म्फुट काव्य की दृष्टि से राजस्थान पे प्रचुर माना म सजन हो रहा है राजस्थान के वतमान साहित्य मजन को देखे तो लगता ह कि सर्वाधिक रचनाएँ 'कविता' में उपलब्ध ह प्राधुनिक कविता क्षेत्र के प्रारभ मे डा गगेय राघव, डा सुधीद्र और श्री मेघराज मुकुल का उल्लेख किया जाना अप्रासगिव न होगा सुधीद्र की कवितामा का स्वर छायावादी राष्ट्रीय चेतना युक्त तथा मानववादी रहा है सुधीद्र युग की पहचान थे डा प्रकाश प्रातुर राजस्थान की आधुनिक हिंदी पविता का प्रारभ डा सुधीद्र से मानत हैं डा सुधीर ने राजस्थान के वाव्य को एक दिशा दी है पाव्य येक्षन म प्रथम सहवारी प्रथाम 'सप्त विरग' पान्य सरलन है इम सक्लन म राजस्थान के चचित सात पविया की रचनाए ह य कवि है- सवश्री यमनापर, वपू ग्याद पुलिश व त्यानात सेठिया, न दचतुर्वेदी प्राश आतुर मुधी द्र और तान भारि म माना ये प्रकाशन स पूर्व ही मुगेद्र या देहात हा गया सुधीद्र का दहात राजम्याा के हिती काव्य ससार ३ लिए गहर। प्राधात था म मप्त विरगा व साता पविया न राजस्थान के प्राधुनिक हिन्दी काव्य मडार की प्रपन सृजन म पर्याप्त पूर्ति की है निमदेह ये सभी राजस्थान के समस्त व प्रगणी हस्ताक्षर है सुधीर की प्रमाशित याव्य कृतिया शसनार मर गीन जौहर प्रलय वीणा, अमत नस प्रेयम प्राति है सुधीद्र का काय युग का स्वर था जिसम पामा निराणा प्रेम, राष्ट्रीय भावना जन जाति प्रतिवाद सभी भाव सम्मि लित है राष्ट्रीय चेतना छायावादी प य मागवीर मूत्या के लिए सुधोद्रका काव्य प्रशसनीय है डा रागय गधव सभी काव्यानोरना स सम्बद्ध रह हैं प्रयोगवादी और प्रगतिवादी प्रवृत्तिया का गहरा प्रभाव इन काव्य पर परिलश्रित है इनके काव्य म दाशनिक चिंतन मानववादी सूम दृष्टि, और महज अभिव्यक्ति ह पूणकलश' रागेय राघव की एक महत्वपूर्ण कृति है डा रागय राषव का देहात भी राजस्थान के साहित्य जगत के लिए एक गहरा प्राधान था वयोवृद्ध पीढी के सिद्धहस्त पवि श्री जनादनराय नागर की अपनी अलग ही एक शली है भावुक नागरजी की कवितामा म जीवन सघप की मामि अभिव्यक्ति है इनक काय का मेरा स्वर उत्साह है दाशनिक चितन, प्रेम की अभिव्यक्ति तथा राष्ट्रीय विचार इन काय के स्वर है इहान विपुल मात्रा म काव्य सृजन रिया है श्री शभूदयाल सक्सेना के काव्य सम्लन रत्नरेणु व अनागता प्रकाशित है इनमे कथा शिल्प का नयापन है प्रयोगवाती डा कहेयालाल सहल की काय वृतिया प्रयोग क्षरणा के धागे तथा समय की सीढिया है भरतव्यास ने ऊट सुजान, राष्ट क्या, मरुधरा और रिमझिम काव्य सकसन दिए हैं प्रोजस्वी कवि मागे फिल्मक्षन म चते गये और फिल्मी गीत लिपने लगे राजस्थान की हिदी कविता को प्रचारित करने म श्री मेघराज मुकुल उल्लेखनीय है ओजस्वी गीत कार मुकुन की सेठानी ने अखिल भारतीय रयाति दी है उमग, अनुगू ज आदि 66 चचित काव्य कृतियां हैं रम, स्प 2 मधुर पवि नद चतुर्वेदी राजस्थान के परिप्ठ पवियो म है और क्लाशिल्प, भ वाभिव्यक्ति तथा मूत्यो के लिए निर तर मचेत रहते है अनुभूति और अभिव्यक्ति वा घनिष्ठ सम्बध श्री चतुर्वेदी के काव्य म है ब्रजभाषा ये सवयो म र ग्राज की कविता तक की इनकी पाव्य यात्रा समाजवाद तथा मानववाद के प्रति कवि समर्पित है श्री व हैया साल सेठिया की लगभम 14 15 काव्य कृतिया प्रकाशित हैं जिनम प्रमुख है अग्निवीणा, दीपकिरण, प्रणाम चौडे राम्त निग य आदि प्रेम, राष्ट्र भक्ति का रवि ह परमश्वर द्विरण मूरत गोनगार है और प्रकृति के चितेरे हैं पनि सम्मेलना म भी जमत रह है मा व टोले धूल के ५ प्रादि में इनये भावचिन उपलब्ध है पुरानी पीढ़ी के मशक्त हस्ताक्षर गणपति चन्द्र भण्डारी है रक्तदीप एनकी महत्वपूग प्रकाशित कृति है राष्टीयचेतना तथा जीवन सघप "नरे काव्य या स्पर है डा रामगोपाल शर्मा दिनश' बहुप्रतिमा सम्पन कलाकार है टनकी अनेक कृतिया महत्वपूरण है जिनमे प्रमुख है जयघोप मधुरजी अह मरा गेय, स्पगधा, गौरवगान, गायाम प्रालि रनके पाध्य में विविध विषय है वथ्य एव शिल्प दाना पप्टिया ग अनप कीर्तिमान कवि ने स्थापित किए हैं अनर कृतियाँ विभिन्न स्थाना स पुरुम्वृत है राष्ट्रीय चेतना व जीवन की अनुभूनिया इनो काम का मुप स्वर है शलभ (घनश्याम शलभ) प्रमुख गीतकार व रोमाटिर पवि है मामाजिक चेतना र युग बोध कगितामो म परिलक्षित है धरती का सरगम अधर के जुगनू, वादन और वासुगे इसी काव्य कृतिया है श्री गम गोपाल विजयवर्गीय ने 'अभिसार निशा' म प्रति सौन्य के भय चित्र प्रस्तुत लिए है यह साहित्य अकादमी से पुरस्टन पाव्य कृनि ह पति कमलारर की मेरे गीत तुम्हारे चरण' एका हम दी और दिलनश दौर प्रकाशित कृतिया है स्प, रस, प्रेम और मान्य माथि चमलावर है यह मूतत गीतकार ह मान भारि माल र दनादा कवि है ज्वार, प्राकाश, कुसुम, माझ उतरी प्रापित गट fय गीता म अवाध मुक्तता, प्रात्मानुभूति वयमितरता, rrrrtz, व गगीता- स्मक्ता है श्री हरीश भादानी के वाध्य सकतन, रगी, एक उजली नजर की सूई सुलगते पीड, स नाट? 7 हरीश भादानी यथाध मे जीता, ममता च गीतवार है खुले अलाव और ईटा Trform परपनाशीलता है नष्टोमोर इनकी पचित लम्त्री याविना है प्रति या गीतार हा ताराप्रकाश जोशी है पल्पना य स्वर, जलत प्रक्षर, गमाधि में प्रश्न, शयों ये टुपडे प्रादि ययि ये गालन प्रमाणित हैं गगाराम पवित प्रायोशी पीड़ी रा रचनाकार है पपिप पा साय्य सता धुमा उठ रहा है" प्रपाशित है एर लघु याय्यसक्ला 'बाल जलालत जिन्दावाद' भी प्रकाशित है श्री मगन सक्सेना सशवा गीतवार व भावुर यदि है जिगी यो वेदना य मानय य दुरादर यदि तामा य विषय हैं इनवरा याव्य गगनन में तुम्हारा म्वर' प्रगमनीय रहा है यही भावबाघ अचिन शमा म है इनका वाव्य सता 'गीता या ाण' चचित है डा प्रकाश मातुर की कवितामा का सर राष्ट्राय चेतना प्रेम मौर मोदय पा रहा है नयी पविता य मगात हस्तारो म नद चतुर्वेदी, डा रणजीत, डा शाति भारद्वाज डा प्रयाश मातुर डा जयसिंह नीरज गुगमनिर तायल, विजेद्र पातुराज यमर मवाडी, डा न - विशोर प्राचाय, भागीरथ भागय डा सुधा गुप्ता मणि मधुार योगेन्द्र रिगलप, रामदेव भाचाय प्रालि महत्वपूर्ण हैं डा जयसिंह नीरज यी पविता की समाजा मुगी प्रगतिशील दृष्टि है नील जल भरी परछाइयां, दुसान समाराह डा नीरज य महत्वपूण घचित काव्य सक लन ई विजेट का पाम , डा रणजीत ये मक्लन जमती यफ सोलता खून मार इतिहास का दद, ऋतुराज का काव्य सक्लन 'एम मरण धर्मा और माय' पुल पर पानी व अवेकस रमेश शोल की कविताएँ जुगमदिर तायल की धूप भरी सुबह गेशनी का रथ सूरज सब देखता है, जगल स गुजरते हुए, न दविशोर पाचाय का वह एक समुद्र था राम जसवाल का विम्ब प्रतिबिम्ब, डा सावित्री डागा के ममिट निशानी एक प्यास जिन्दगी कविता की मौत पर सदर्भो स क्टे हुए रामदेव प्राचाय का प्रक्षरा का विद्रोह, रेगिस्तान से महानगर तक, हरिराम प्राचाय का खुले पिरणपाल, भगवतीलाल व्याम का शताब्ग निरूतर है, लाश जोशी का चेतन अवचेतन व अजुरी भरवन डा सुधा गुप्ता का अनची हा परिवेश और चेतना के पूत, मरिगमधुकर का खड खड पाखड, वलराम के हजारा नाम मादि भागीरथ भागव का हथेलिया म ब्रह्माण्ड और शाही सवारी श्रीकात मजुत का दपण कदरा, तारादत निविरोध का गीत यात्रा दद का सौदागर, वयक्तिक सतही पर हम, डा रामगोपाल शर्मा दिनेश' का ग्रह मेरा गेय रूपगधा आदि अफजल खा का अजाने स्वर डा मनोहर प्रभावर का इद्रधनुप, विदा की साम डा रमा सिंह वा समुद्रोन चशोर अहमद 'मयूख' का सूय बीज, स्वणरेव श्री हप का 68 ममय से पहले, मरुधर मृदुल का शब्दो का घू घट, कमर मेवाडी का चाद के दाग, बहस भी जारी है, प्रातिर कब तक, हेमतशेप का घर बाहर डॉ महेद्र भानावत का कोई कोई औरत, श्री मधुमून पाटया का दो घूट प्रीत, सुरेन्द्रदत्त बहुगुणा का गधीयायी माटी, डा मरे द्र भारत का प्रादमा कुर्सी और मोहर प्रादि महत्वपूरण काव्य मरलन प्रकाशित ह - विभिन रचनावारा की रचनायो के सम्लनो म राजस्थान के हिन्दी कवि भाग 1 (नद चतुर्वेदी) राजस्थान के हिंदी कवि भाग 2 (योगेद्र क्सिलय) अकादमी से प्रकाशित हैं सवदन इति (नद विशार प्राचाय) प्रतकपोत परिवेश में, राजस्थान के हिंदी कवि (मधुवर गोड) राजस्थान के प्रतिनिधि कवि (शरद देवडा) अजानी सलीवा पर (डा मदन अगा) प्रादि प्रकाशित ह विभिन पत्र पत्रिकामा मे विभिन्न वविया की रचनाए प्रतिदिन छप रही है राजस्थान के कविया को रचनामा म प्रवृत्ति सौदय प्रमानुभूति, युगबोध युगीन चेतना, द्वद्वात्मक्ता, पात्रोश, रम्य आदि प्राप्त है राजस्थान का सजनशील कवि अपने कर्म व प्रतिष्ठा के प्रति साग है आधुनिक हिदी काव्य म राजस्थान का योगदान उल्लेखनीय है कथा साहित्य ऐतिहासिक शोय, त्याग बलिदान प्रेम, साहस न्या की पहानिया तथा लौकिक अलौक्षिक पात्रा ये चिराग की प्रचुर कहानिया राजस्थान मे बात, रयान प्राति के रूपो में प्रचलित रही है तथा ग्राज भी है ऐतिहासिक पात्रो तथा उनके चारित्रिक गुणा की कहानिया का प्रभाव आज भी परिलक्षित है या कहना और 'कहानी लिखना मे वडा मतर है उपन्यास कथा साहित्य में उप यास और कहानी मम्मिलित है पहले हम उपन्यास और बाद मे कहानी पर चर्चा करेंगे प्राधुनिर हिली साहित्य की पहली यथा ति यू दी के श्री रामप्रताप शर्मा द्वारा रचित नरदेव है। इस कृति का प्रकाशन मन् 1903 ई० है जो एर उपदशात्मत्र प्रथ है वशिष्ट्य यह है कि उपयागवार तत्वातीन एग्यारी कथा साहित्य से भिन्न इम उपन्यासका 1 राजस्थान महिनी क्या व नादर गाहित्य में मौ वप, रॉ नव क्शिोर 3 - सामाजिक कथानक को लेकर है, यू दी ये ही थी लज्जाराम महता ने 'स्वतन रमा और परतर लक्ष्मा' हिंदू ग्रहस्थ', 'बादश हिद', 'बादश दम्पति' पारि हिदी के प्रारभिक उपयास रचे है श्री महा के उपयामा मे सयुक्त परिवार प्रथा का विघटन, पाश्चात्य प्रभार, भारतीय जीवनादश आदि भक्त है मुशी देवीप्रमात जोधपुर का स्ठी गनी एतिहामिक उपयाग है विधवाना के पीडा मय जीवन पर म्पूर्णा देवी न अवताग्रा का इमाप' लिया म्वात यात्तर हिती उप यामा ६ प्रारभिक वात म साम ती प्रथा व माम्राज्यवाद का विराब मा अत्याचार तथा य मम्मा का पाफाश है तो दूसरी पार जन जाति यी पनि है श्री यादद्र शर्मा चद्र न अपन अनेक उप ग्रासा म साम IT 2 अत्याचारा पातर नर दमघाट वातावरग का चित्रण क्यिा है जानी ड यादी दीया जला दीया बुझा, खम्मा अनदाता ठकुरानी रक्त का मिट्टी का कलन धरती पी पीर ढालन दु जमली आदि उप घाम सके प्रमाण है दी रियासता म उभरती जन जागृति का चित्र श्री द्वारसाप्रमाद पुरोहित व दद्रधनुप' उपन्यास म है टा रागेय राघव का प्रदेश के क्था तयका म मर्वोपरि स्थान है निसदह रागेय राघव हिंदी साहित्य के तिहास का प्रतिष्ठित व मशक्त हस्ताक्षर है रागय राघव ने प्रगतिशील चिंतन को स्वीकार स्यिा है और उनके साहित्य में यह वरावर ध्वनित हाता है रागेय राघव का कृतित्व विपुल है वे उच्च- कोटि के माहित्यकार ये रागय गधव का सुप्रसिद्ध उप याम कर तब पुकार' (प्रकाशन वर्ष 1957) है इस मालाचका न ग्राचलिक उपनाम कहा है लकिन यह पयाग पचन विशेष की अपक्षा नटा के जीवन से सम्बधित अधिर है मटा की जि दगी मामानित रम्य मम्मार आदि का विस्तार म उपयास म चिनण है इसम मुखराम की जीवन क्था ह और गहन प्रेम की सायक अभिव्यक्ति मिलती है “म उप यास को लसक न रहस्य रोमाच युक्त बनान का भी प्रयास किया ह यह क्यो मिया और एमके पीछे उनकी क्या दृष्टि थी पना नहीं है लेकिन रहस्य रोमाच की उपक्था भी इसम साथ साथ सभव है राचक्ता की दष्टि स यह प्रयास हो चलती है डा गगय राघव का टूमरा उप यास है मुझे ना टीला' यह एक ऐतिहामिक-सस्कृति प्रधान उप याम है जो मान जोदडो की संस्कृति का चिन प्रस्तुत करता है ध्यम चमत्वारपूण क्था वि यास अद्भुत रहस्यपूर परिस्थितिया और स्मानी प्रेम फिर भी यह हिदी के श्रेष्ठ व महत्वपूर्ण 70

उपन्यासा मे से एक है 'पतभर' उपयाम म जगनाथ पौर मोहिनी की मनो
न थियो का मनो वनानियतापूग पिवचन है सू: शिल्प विधान व भाव
रावलता की अनुपस्थिति म यह एक मामा य वृति ही है प्रापरी आवाज में
ग्राम जीवन के स्तर पर व्याप्त सप्टाचार का सफल चित्रण है अधरे के डान्,
चीवर, गह न रूमी आदि नव अप उप वास है अयाम की दृष्टि से डॉ
रागय राघव का उलेसीय यागदान है
श्री गोपान प्राचाय का उप याम मजु (प्राग 1952) अगवान
भादुक्तापूरण कथा कृति है यह मा शवादी उपन्यासा की श्रेणी म पाने है
श्री प्राचाय का दूसरा उप यास निवसना' है जिसम सामाजिक बाटी
एक नारी का चित्रण है यह भी भावुकता युक्त सुधारवारी दृष्टिन-है.
श्री शम्भून्याल सक्सना ग्रादावादी विचारा के समर्थक हैं. हम
वृहासर उप याम मगरमच्छ है इसम नर नारी शमीने
को प्रक्ट किया है इसम जीरन व गननीतिक मामाका
नी क्षेत्र म प्रवरा क्या न किया जाय इन मग मच्टा ग - -
विवश होना पडता है सौम्यता के अवतार मग
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श्री परदेशी के लगभग एक दान पकान है
उप यास भगवान बुद्ध की प्रात्मस्या का "दा
च यशाधरा की क्या है
अतीतमा-
का एक अय उपन्यास जय महाका' गदा - ---
अकादमी मे पुरस्कृत है
इनके अजमा-~-
माधवसिंह दीप ने भी तलवार की 71-------
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि म लिस
TH

'एक इन्मान का जन्म एक इमान की मृत्यु में स्थानक दाहराना प्रतीत होता है यह एक यान क्या है जा विशेष प्रभावित नहीं करती है 'एक और मुख्यमत्री में मम मामयिक राजनीतिक जीवन की विद्रूपता का चित्रण है सत्ता और कुर्मी की भूख तथा पावले नारो की यह तस्वीर है युग देवता में भी यह विद्रूप क्या है श्री चन्द्रका एक चचित उपास हजार घोडा का सवार है जिस पर इह राजस्थान माहित्य अकादमी का सर्वोच्च पुरसार मीरा पुरसार मिला है पांव पै पाप तल में महानगरीय जीवन बदटत गावन प्राग्वा में मनावृत्तिया या चित्ररा है श्री पान नारिल्ला पहना उपायाम प्याम म्यग हिरन' म लापक व्यजित करता है कि प्रणय के क्षेत्र म प्रतप्त पर जान का भाग्य ही प्रादमी का इस दुनिया म मिलता है इसके पश्चात् निरिया पुगारे' 'योति पुरष कुभा। 'साक्षी है शिप्रा और शाह और शिल्पी' प्रमाशित हुए हैं श्री मान भारिल्ल वावि तथा भावुक ह और यह भावुरता दनर उप पामा म बरावर छायी रहा परिणामत उप यासा के मनिवार तत्वा मी उपक्षा होती रही मार सफल कृतियां य नहीं बन मरी पया, वियाम भी र मनना की अपेक्षा भावुर विवचन होता गया है चम्बल के श्री नुमरसिंह दईया उप यास "7ग उठा इसान' और किनार' बाली सुरग तथा श्री परमीशन बारहठ मा 'नाई या धागा' प्रयापित है इसम मध्य वित रग की समस्यामा पो उठाया गया है श्री शचीद्र उपाध्याय के उप पासा के नाम हैं- मिट्टी मा सिंदूर बावरी, हराए हुए लोग जलपर और मांगन की मीमार थी शचीन्द्र न माम प्रादमी या जीयन चित्रित रिया हसति उपयामा म मोर जगी विशिष्टता दष्टिगत नही हाती rain भारद्वान राम का उपयाग गूपारा राजम्यान साहित्य प्रसादमी ग पुरस्मत है यह उपयाम नापुरता प्रधान तथा पर उपयाग प्रति श्री निसमा मा उपयाम तट की मार प्रापित है rf विस्यम्भरनाय उपाय पा उपमाग गैध यार उपयाग है पर rrrपापान उपयाग है स्था रियाग पारो तो रोम भरायर मिलता। आप्याय 1 प्रपन मूया तपा मापा मोरीपर माप्पम मा मामाथी उपनामसारीपाट विचारधारा उपयाग १ मे बोलती है अतिरजना, भावुक्ता, नतिक आग्रह, समाज के जीवन की गहरी जानकारी व सूक्ष्म दृष्टि इस उप यास मे है पक्षधर डॉ उपाध्याय को प्रतिष्ठित करने वाला दूसरा उपयास ह डा विश्वम्भरनाथ उपाध्याय का एक उपयास जाग मछदर गोरख पाया (सन् 1983) सद्य प्रकाशित है इस उप यास में भी डॉ उपाध्याय ने नाय पथी गोरख के माध्यम से अना विकृतियो वा सफल उद्घाटन किया है डॉ उपाध्याय ने जीवनानुभवा को लेकर परम्परित प्रकार से उप पाम लिखा है न दक्शिोर प्राचाय का उप यास तथागत (1966 ई०) मे बुद्ध के विचारा तथा उनके जीवन का ब्यौरा है इसम उनका चिनव रूप बरावर प्टिगत होता है पानू खोलिया के उप यास जो अपन थे, जीव हस की रात, टूटे हुए सूय विम्ब और सत्तर पार वे शिखर प्रादि है पानू खोलिया वा उपन्यास सत्तर पार ये शिखर राजस्थान माहित्य अकादमी के सर्वोच्च पुरस्कार मीरा पुरस्कार से पुरस्कृत है अतद्वद्ध, क्था वियाम, भाव सबलता तथा औत्सुक्यता उप यास में है और इसे जावतता देत हैं मध्यवर्गीय जीवन की विडम्बनायो घ विसगतिया का सफल चित्रण है रिक्त हुए प्रादमी की क्या व दाम्पत्य जीवन की उलझना का यह दस्तावेज है 'म्री मणिमधुकर याज बहुचचित उपयासकार ह इन प्रमुख उप यास सफेद ममन (प्रका 1971) म राजस्थान के पश्चिम क्षेत्र के रेगिस्तान के एक गाव की जिन्दगी का चित्रण है पत्ता की विगदरी (सन् 1980) पाकिस्तान वे मीमावर्ती क्षेत्र के लोगो की मानसिक्ता प्रवाल और उसके नाम पर होने घाले घपला तथा गाव की दयनीय जिदगी को उजागर करता है श्री मरिण म लेखन क्षमता है और उसे उहोने वरावर उजागर किया है एक स्त्री श्री शरद देवडा का 'टूटती इकाइया' म प्रेम का त्रिकोण र और दो पुरुष या दो स्त्री और एक पुरष का यह त्रिोण अनेक उप यासा व क्थानो का आधार बनता है और न उप यासो वा तो है ही श्री सत्येद पारी ने नारी की विषम स्थिति का चित्रण एव और दायरा म किया है इसमे सामाजिक साखलेपन को भी उजागर किया गया है सुमेरसिंह दईया के माधी के अवशेष म मनोग्र थियो का प्रस्तुतीकरण ह डॉ नारायण दत्त श्रीमाली की 'एव डाल रजनीगधा को' में उच्च वग वी विलासिता मोर वाम ठामो या चित्रण है 73 ह मन्नू भडारी या उपयाग प्रापया बटी (1971 ई ) हिनी का महत्वपूण व पति पत्नी की पापसी टरगट्ट व बच्चे की उपक्षा का गमस्यामूर उप याम उपन्यास मे बच्चे के कारण म यथा प्रस्तुत है मम मत दृष्टि सहजना, विम्बात्माता और सम्प्रेषण की ममयना इस उप पाम म है जा स महत्ता प्रदान करते है दूसरी ति महामाज (1979 ई ) राजनीति के बैबुनिया पाचरणा यो प्रस्तुत करती है यह भी ए7 उत्कृष्ट कृति है ल मीना शमा न य अकुर' और 'चटरती बलिया उभरत पाट' म नद चेतना वा जामृत बरने की बात यहीं य मिशारापयागी उपयाम है श्री जनादनराय नागर न शयगचाय में जीवन और उनके दशन का प्राधार वा पर 'शाराचाय' के नाम स वृहदार उपयास लिखना प्रारम्भ किया है इस महत्याकाक्षी उपयाम वा अभी एक सद प्रकाशित हुआ है उपयाम के इस भाग म कथा विस्तार, दारा निस्ता व भावुकता अधिन है इनके पहले के उप यारा है-चीचड या कमल व मातभूमि प्रो घनश्याम शलभ वे उपयास- अधरी चादनी उजलो छाय, अग्निका की पखुडिया फौलाद को मोमबत्ती म पवित्र तथा भावुक्ता छायी हुई है परिणामत कृतिमता आ जाती है प्रौढ लेखन यहा दप्टिगत होता है श्री शुभू पटवा के 'उम दिन' म पूजीवादी व्यवस्था के प्रति प्रामोश है और वग मघष की बात है करणीदान बारहठ के कुहरा और किरणो मे एक शिक्षक की मानसिकता तथा सघपशील जीवन की क्था है कमर मवाडी ने 'वह एक' मे पारस्परिक प्रतिस्पद्धा को चित्रित किया है प्रकाश माधुरी का कुमारी सलीव, उल्लेखनीय कृति ह श्री शरद देवडा या वात स्टीट के मसीहा एक बहुचचित उप यास है इसमे युवा पीढी की मानसिकता को प्रस्तुत किया कया है उपयास में सामाजिक व मनोवनानिक परिस्थितियो वा सफ्त चित्रण किया है इनके अतिरिक्त श्री उमेश शास्त्री मधु माधवी ताल आवाश पील ग्ल, डॉ प्रेम भटनागर भ्रात जीवन वशीलाल यादव टूटा तारा, प्रहलाद शर्मा बात की परते, प्रेमच द गोस्वामी मुबह का भूना, राधाशरण जोशी उलझन, हतु भारद्वाज का वनती बिगडती लकीरे, डा पुरुषोत्तम प्रासापा का पप्पू प्रादि 74 उन्लेगनीय ह पप्पू मनोव मानिर शली युक्त चचित कृति है श्री हबीब बंफी का एय चचित उपयास ह--मनायर इनयी विशिष्ट शनी व अभिव्यक्ति कौशल है श्री पुरपोत्तम पोयल या उपग्यास और सूरज बन गया है युवा कथागर श्री प्रफुल्ल प्रभावर का उपयास गलत सदम (1980 ई) म प्रायातीत प्राधुनिकता और भारतीय मानमिक्ता का सघप है समाज वे दद्वात्मक रिश्तो पो उजार दिया गया है राजेद्र भटनागर का 'एप प्रतहीन युद्ध' विशेष प्रभावित नही करता, पया विस्तार जरूर है अशोक शुक्ल ये सेवामीटर व प्रापेमर पुराण व्यंग प्रधान है * राजानन्द का कौन वह' मे मध्य वित्त वर्गीय जीवन की पामदी है राजस्थान के हिदी उप यासकारा का प्रदेव चाह नगण्य नही हो फिर भी उपलब्धि या दयत हुए बहुत ममृद्ध नहीं है फहानो राजस्थान म लोक कथा तथा वात साहित्य की एक मुदीघ परम्परा रही है लेकिन अाधुनिक हिंदी कहानी की प्रथम उपलब्धि श्री च द्रधर शर्मा गुलेरी चित 'उरान वहा था' (प्रकाशन सन् 1915) ह वस्तुत यह हिदी की श्रेष्ठ मानिया म अग्रणी है हम एर कहानी न श्री गुरी वो अमर कथाकार बना दिया गुलगे जी के पश्चात् राजस्थान के सर्वाधिक समय पताकार है-रागेय राघव रागय राघव की कहानिया म प्रगतिशीन चिंतन व लेपकीय स्वातश्य पर बल दिया गया है रागेय राघव का कथा लेखन विपुत मात्रा मे (लगभग 200 कहानियाँ) है रागय राघव की सर्वाधिक चर्चित व प्रशसित कहानी 'गदल' है जिसमे नाटकीय क्यानर व मारावीय मवेदना की मूक्ष्म अभिव्यक्ति है राजस्थान के कहानी साहित्य की चचा के लिए प्रकाशित कहानिया ही प्राधार बन सकती है और वह भी रहानो सकलना के आधार पर ही चर्चा की जा सकती है क्यापि विभिन्न पन पनिवाग्राम प्रकाशित प्रत्येक कहानी या पहानीकार या विवचन न तो सभव है और न प्रासगिक ही इससे अनावश्यक विस्तार की सभावना भी है ध्यावमायिक पत्रिकामो के अतिरिक्त राजस्थानी से प्रकाशित मधुमती, मधुमाधवी, लहर, सम्बाधन आदि पनिकायो म समय समय पर कहानिया प्रकाशित होती रहती है इनके अतिरिक्त कहानिया के सम्पादित प्रकाशित मक्लन भी है यया राजस्थान के कहानीकार भाग 1 (स डॉ रामचरण महेद्र तथा श्री यादवेद्र शर्मा चद्र) ये कथारूप (स चद्र) रेखाए (स कृष्ण जन सेवी) जगलपुरी का हेड मास्टर (स चौवरी मानसिंह) प्रस्थिति (म नान भारिल्ल व प्रेम सक्सेना) हम तुम और वह (म जगदीश माथुर कमल) एक टुक्डा आकाश (प्रफुल्ल प्रभार) राजस्थान क बहानीकार भाग 2 (डॉ पालमशाह सान) ग्रादि जो विवेचन मे सहायक हो सकते है गुलेरी जी तथा रागेय राघव के पश्चात् स्वगवासी कहानीकारा म ग्राकारनाथ दिनकर व शभूदयाल सक्सेना प्रमुग हैं श्री प्रोकारनाथ दिनकर की कहानिया नाटकीयता भावुक्ता पूण तथा प्रादशवादी है दिनकर की प्रमुख कहानिया समस्या और ममाधान अपने अपने दायर, साझ का सत और बारात लौट गयो आदि विष्णु अम्बालाल जोशी के प्राचाय कालक और मजदूरिन कवि का स्वप्न गुमटी वाला और पगली कथा संग्रह हैं ये भी भावुक्ता पूण पादशवादी लेखन को अपनाये हुए है कहानी का कथ्य व शली पुराने ढग को है श्री शम्भूदयाल सक्मना की कथा कृतिया लगभग 5-6 ह कहानिया की विषय वस्तु समाज परिवार की है चरित्र में प्रात्म सघप को कमी है भावुक्ता व प्रादश की बाते मिलती है भगिनी का भाग्य, धूपछाह, मानवता का पुजारी, एश्वय का त्याग आदि सकलनो के शीपक ही कहानियो की जान कारी दे देत है डा हेतु भारद्वाज इन लेखका को 'प्रमाद स्कूल' का कहानी कार मानते हैं श्री सक्सेना की अधिकतर आदशवादी व भावुक्ता पूर्ण कहानिया हैं कहानी के क्षेन म एक उत्लखनीय नाम श्री जनादनराय नागर का है प्रेमचद वी शिष्य परम्परा म श्री नागर की चर्चा की जाती है इनकी कहानिया की शली और विषय वस्तु की अलग पहचान है जनादनराय नागर की कहानियो के दा सक्ला जनादन की कहानिया शीपक से प्रकाशित हैं अधिकतर कहानियो म आदश की परिकल्पना है और राष्ट्रीय भावना प्रधान है कहानी क्षेन म भी यादवेद्र शमा चन्द्र सवाधिक परिचित नाम है उनके 8-10 क्या सग्रह प्रकाशित है कहानिया मे विषय की विविधता है तो रोच क्ता भी है राजस्थान के जन जीवन को उजागर चन्द्र की कहानिया वरती है चन्द्र को कहानियो पर मुस्य आक्षेप पानो म अतद्वद्व की कमी, नुसखेबाजी, कृतिम स्थितिया का निर्माण और अनुभूति की प्रामाणिकता को लेकर है 76 लेकिन कुछ भी हो प्राज श्री यादवेद शर्मा बद्र हिन्दी साहिय का जाना 'पहचाना नाम है तथा पाटर इनकी प्रयामा ही करते है श्री परदेशो ने लगभग 350 कहानिया निवी है तथा 100 के लगभग अनुवाद की ह श्री परदेशी मनोरजक क्यानक देने का प्रयाम करते है तथा ऐतिहामिक पात्रो का लेकर उत्सुकता पैदा करते है लोजत्रिय क्थाकार हैं श्री सुमरसिंह दईया ए समलन दो भाई प्यास की प्यास है इनकी कहानियो वे उदश्य पर डा नवलविशार प्रचारात्मकता का आरोप लगाते है जो अधिकतर कहानिया म मिलता ह दलित एव शोपित वर्ग का चित्रण कहा निया म मिलता ह मा कला का पुरस्कार, ममता के पास मार्मिक कहानिया हैं मनू भण्डारी हिन्दी के शीर्षस्थ कहानीकारों मे है मूल्यों के परिवर्तन मे आय मघप का तथा अपने परिवेश को ईमानदारी के साथ मनू भण्डारी । कहानिया मे उजागर किया है अन्तद्व भाव सबलता सफल अभिव्यक्ति कहानियो की विशेषताए हैं मकेनी क्षय, नशा यही सच है प्रादि चचित कहानिया ह शचीद्र उपाध्याय के कहानी मालन कापती सिदूर रेवाए आदि प्रकाशित है य प्रगतिशीन परम्परा के रचनाकार हैं इनकी कहानिया एक विशेप दृष्टि लिए एरे जगदीश वोरा का कहानी मालन ढस्को पर सुदे नाम में 12 रहानिया है जो जीवनानुभव युक्त हैं डॉ आलमशाह की वहानिया के दो सकलन प्रकाशित है परायी प्यास का सफर व विराय की कोख एक और मौत, मनार आदि टा खान को चचित कहानिया है डा खान की कहानियो के पात्र मध्य वर्गीय और निम्न वर्गीय क्षत्र क हैं नया अपनी जिदगी का सफर पूरा करते हैं भापा शली उनकी अपनी प्रग ही पहचान स्थापित करती है डा रणजीत की कहानियो का मकलन गर्म लोहा उडे हाय प्रकाशित है इमम वहानीकार वचारिक प्राग्रह प्रबल है रहानिया गजनीतिक विचारधारा का स्पष्ट करती है प्रेमच द गोस्वामी की कहानियों मे गम्भीरता है लेरिन सस्ती नायुक्ता भी ह एक वृत्त प्रौर मुस्खगट क्लयो प्रमुग यहानी माला है धर्मश शर्मा का कहानी सक्लन मेर ाहर के लोग है दनको हानियो म प्राम पास वे सिर विभ्या या प्रक्टोबरण है पोर मिपम पीनता नहीं है श्री स्वयं प्रकाश की पहाडिया म जीवन, चिंतन व मृजन के प्रति प्रास्या मनाती रचना में ताजगी, तेवर व व्यग्य है और भाषा नराशी हर है पानी म निजी अनुभूतिया है मुख्य पानी मग्रह ह मारा और मा, गरज र निक्लगा, प्रासमा कसे बस शुगू पत्या का पहानी मेबला गरज या पाटा, मम्मी एमी क्या थी थी यहानिया उनयी विकसित या दृष्टि यो प्रस्नुन बरती है डॉ वाण विजय की यहानियां प्राशयादी भानुमनापूरग है जीवन का स्पा मात्र मिलता है मनोहर वमा को पतानिया म गली की अपनी विशिष्टता है ता पथ्य प्रस्तुतीकरण भी गभीरता म है पारिवारिक मामाजिर जीवन से सम्बद्ध इनकी कहानिया है घाट वा वाट, गाती माहिमा की शादी, पासा पलट गया श्रादि म व्यग्य प्रधान श्री ईश्वर चदर पहानी मरसन | मरन या दुग्न पातर, यार का धौनापन, क्सम पुरान की प्रादि है थी ईश्वर चनर ये पहानिया ये पात्र मध्यम यास प्राय मध्यवर्गीय जीवन की घुटन, तप या य प्रक्ट भरत है राम जमवान गजानन अशा प्राय, मणिमधुकर गवनालाल ध्यास, कमर भगाडी चद्रकाता RTI क्षमा चतुर्वेदी, अरनी रावट स पुष्पलता पश्यप, श्रीमती पावती जाशी प्रानि को कहानिया ग्राम प्रातमी व मामाजिक परिवेश में जुड़ी हुई है मणिमधुकर तजी स अपना स्थान बना लिया है उनकी यहानियां पसट की जाती है कहानिया मान सम्वधा के अतविरोधा को प्रकट करती है व सुप दुम्न की साझीटार है परिव को प्रस्तुन वग्न की कला मरिग मधुवर म है सुतमान, भरतमुनि वोट बल, बारहसिंघा प्रानि उनकी चचित कहानिया है मरिणमधुकर व पाम अशुभव मा विस्तृत ससार है तो कहन की विशिष्ट शनी भी हेतु भारद्वाज का तीन कमरा का मका, चीप साहा था रह । तीययात्रा था सम्लन प्रकाशित है सामाजिर अनविरोध को प्रस्तुत करने तथा जीवन से जुड़े हुए मवाला का उत्तर दन म इनरी क्गनिया सहायक है इनकी कहानिया म मध्यम वग का ग्राम प्रादमी वारता है श्री चमर मेवाडी , वहानी मक्लन राशनी की तलाश व लाशा का जगल है जिसम ग्राम प्रादमी के उमी मजहिया के सनीव चित्र है पानू खोलिया न गभीर तथा महत्वपूण कहानिया के साथ चालू कहानिया भी लिखी है ऊघ इनकी चचिन प्रशसित कहानी है सामाजिक परिवश का वहानिया में प्रस्तुत किया है 'अश अश दश' हसन जमाल की युग परिवश की चचित कहानिया र श्रीमती पावती जाशी या वह गुलाव , हरदशन सहगल का टेढे मुह वाला दिन, क्षमा चतुर्वेदी का सुवह वन स पहले यहानी सकलन उल्लेखनीय है या गिनान म ता बहुत मारे नाम हैं जिनकी एकाधिक कहानिया प्रकाशित है लेकिन जब हम क्या ससार का विश्लपण करत है तो स्पष्ट रोता है कि राजस्थान के अनेक बहानीकार ऐस ह जिहान अपनी पहचान अखिल भारतीय स्तर पर बना लोह गुलरी और रागय राघव के अलावा अाज चर्चित नामा म सर्वश्री जनादनराय नार, यादवेद्र शमा चद्र, सुमरसिंह दईया, मरिणमधुकर, डा पालमशाह खान, डा हेतु भारद्वाज, स्वयप्रकाश, पानू गोलिया, कमर मेवाडी आदि प्रमुग्म है राजस्थान का कहानी लापन अपन परिवश की गध लिए हुए आम आदमी के सघप व सनास का अभिव्यक्त करता है तथा मानव मूया के लिए प्रतिबद्ध है गद्य काव्य पाच्य गुणों से युक्त गद्य को गद्य काव्य कहा गया है गद्य काव्य को अलग विधा के रूप म आजक्ल दशा जान लगा है लेकिन गद्य काव्य धावात्मक ललित निबध तया अनुबाल कविता के मध्य की स्थिति प्रतीत होती है डॉ रामचरण महेद्र राजस्थान के गद्य यायकार (मरलन) की प्रस्तावना म लिखते हैं वि गद्य-काव्यकार भी मूलत कवि होता है पर वह छत पिंगल इत्यादि क कृत्रिम नियत्रण म न रह कर उ मुक्त शली म हृदयगत अनुभूनिया को प्रकट करता है इस प्रकार गद्य काव्य भावात्मा अभिव्यक्ति है जो पोमल वाग्यो की धारामा मे प्रवाहित होता है हृदयस्पर्शी अभिव्यक्ति प्रचुर कल्पना व रसाधारित गद्यात्मा स्प गद्य काव्य अतगत प्राता है स्पष्टत इगमे भावपक्ष की प्रधानता है एक प्रकार म यह गद्य पद्य वा समन्वित रूप है राजस्थान में इस प्रकार के गद्यारका सुजन मा प्रचुरता स हुमा है राजस्थान के आधुनिक हिदी गद्य काव्य का प्रारभ श्री हरिभाऊ उपाध्याय स माना जा मरता है। श्री उपाध्याय जी ने अनिल गद्यसाध्य 'त्यागभूमि' मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं गावीवारी श्री हरिभार उपाध्याय काय गीत भाव प्रचार व नाशनिक्ता युक्त है श्री भवरमल सिपी यो रचनाए माधुरी, जागरण, हस आदि विभिन पत्र पत्रिकामा म प्रकाशित होती रही है इनका 'वेदना' (प्रकाशन 1937) पयम गयाय्य मह है दानिपता न गद्य गीतो म भी पक्षित है गमाव्य पर दायावाली प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है रहस्यमय मनात सत्ता स भावात्मर सम्ब घ, अभिव्यक्ति अनक पता में अमीम चेतना को च्यापरता प्रादि प्रसग गधगीता म मिलते है गद्यवाय र क्षेत्र म नगाधिर चचिन व महत्वपूरग नाम श्रीमती निश नंदिनी डालमिया काह "हान गद्ययाय पी दिशा ही वाली जोशिप्रेम सौदर्य व प्रकृति के रम्य चित्रण दन गद्यकाव्य की विशिष्टता है इनक गीतो म प्रेम की पुनव सरसता कामाता सीतात्मरता और उदात्त शन चयन है श्रीमती डालमिया व अनर गद्यगीत विभिन पत्र पत्रिकामा म प्रकाशित हुए है इनर गद्य काव्य संग्रह ह मौक्तिरमाल, भारतीया, दुपह- रिया के पून, वीरव उमन स्पटन चितन प्राटि विह और बदना, प्रम और मिलन के इन गीता म प्रतीर याजना मानिाता व शिल्प मौष्ठर प्रशसनीय है वेदात दशन से प्रभावित शपुतला कुमारी रेणु या गद्य वार सकतन 'उमुक्ति' प्रकाशित है सोधे, सच्चे व मरग भाषागार रणु वै गद्यमाघ म ह श्री शम्भूयाल मक्मना मी समय लेंसनी गद्य काव्य म भी चली और उनर स्फुट गद्यगीत पर पत्रिकामा में प्रकाशित है श्री रामसिंह तथा श्रा मूयकरण पारीक न गद्य काव्य संग्रह 'मघमाता' प्रकाशित हुआ है इसरा पद लालित्य विशिष्ट है श्री विष्णु अम्बालाल जोशी में गद्य गीता का एक सक्लन सीधी रेखाए द्रकाशित है विष्णु दा को अनेक रचनाए विभि न पत्र पत्रिकामो में प्रकाशित है इनकी भाव सबलता उल्लसनीय ह श्री देवीलान मामर के गद्य गीता में भारतीय मस्कृति व अध्यात्म की गूज है ममस्पर्शी अभियजना गधगीता म उपलब्ध है लेकिन श्री सामरजी का कोई मक्लन देखन म नहीं पाया है श्री जनार्दनराय नांगर के गद्यगीतो का विपय प्राध्यात्मक प्रेम, राष्ट्रीयता, राजनीतिक जागरण, असीम सत्ता आदि रहा है इनका एक गद्यकाव्य सक- लन 'एक शान्त पालोर में प्रसन्न' राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित है श्री नागर गद्यकाध्य क्षेत्र मे विशिष्ट पहचान रखते हैं ब्रिजलाल बियाणी का मार्मिक गद्यकाव्य है कल्पना कानन श्री नरेन्द्र भानावत के गद्यगीता मे जन दर्शन का प्रभाव परिलक्षित होता है आध्यात्मिक्ता इन गीता मे भी अधिक है डा भानावत ने सामाजिक घपम्य को लेकर भी गद्यगीत लिखे हैं जो विभिन पत्र पत्रिकामा में प्रकाशित है श्री अमरसिंह को गद्यकाव्य संवलन तुतली वाणी स्वप्न शेवरि, दिवाभास प्रकाशित इनम सोमाजिर वैषम्य, अदृश्य व जागरण मादि के गद्यगीत है भापा र शब्द चयन प्रभावोत्पादक है हा दयावृष्ण विजय के गद्यगीत भावपूरण व प्रभावोत्पादक है भारतीय दर्शन व सस्कृति निरपण इनके वाव्य मे मिलता है डा त्रिभुयन चतुर्वेदी के गद्यगीतो मे प्रकृति का सौ दयं तो है ही साथ ही मानव के दुस दद की व्यथा भी है सामाजिक व परिवेश को भी इन्होंने गद्य गीतो मे चित्रित किया है इनके अतिरिक्त सर्वश्री भारयाद्र गोस्वामी प्रसर, लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत, राधश्याम कोशिन व्रजेग चचल, विशन शर्मा, राजेन्द्र सक्सेना, दुर्गादत्त शर्मा, मगल सक्सेना, कमलाकर, मनोहर वर्मा, बशीलाल यादव, उमानद चतुर्वेदी, सत्येन्द्र पारीक, डा रामचरण महेद्र आदि की रचनाए भी समय समय पर विभिन पत्र पत्रिकामा में प्रकाशित होती रही है लेकिन अब गद्यकाव्य का सजन दृष्टिगत नही होता है राजस्थान के गद्यकाय की शीप पति म श्रीमती दिनेश नन्निी डालमिया श्री जनार्दनराय नागर श्री विष्णु अम्बालाल जोशी और श्री हरिभाऊ उपाध्याय के नाम लिए जा सक्त हैं नोटक नाट्यकर्म व नाट्य लेखन वो अलग अलग रचना प्रक्रिया है राजस्थान मै नाटका को अप। इतिहास है वत मान मे नाट्य लेखन के सम्बध में विचार करें तो विदित होता है कि राजम्योन में आधुनिक नाटक साहित्य पविता और क्या विधी की अपेक्षा कम परिमारण म उपलब्ध है नाटक लेसने के क्षेत्र में गिन गिनाये नाम लिए जा सकते हैं और प्रकाशित नाटकापी गणना मगुलिया पर की जा सकती है जहा तक विस्तार से विवेचन का सम्बध है प्रवृत्ति, शिल्प स्प, विषयवस्तु प्रादि का लेटर ग्रय लिये जा सकते हैं यहा यह चचा भप्रामगिर है अाधुनिक हि दी नाटक साहित्य पर विचार करें राजस्थान के नाटक वारा की पुरानी पीढी म श्री शम्भूदयाल सक्सना, श्री भागारनाथ दिनपर तथा श्री देवीलाल सामर प्रमुख हैं शम्भूदमाल सक्सेना के नाटका म आदर्शों , सास्कृतिक मूल्या और नवीन सामाजिक राजनीतिक पुनर्जागरण के प्रति प्रेरणा है बापू न वहा था, नहरू वाद, विजया और यारणी प्रादि म राजनीतिर चेतना की बात है ता सास्कृतिर नव निमाण तथा प्रादर्शी के प्रति मोह चीवर धारिणो प्राय माग, साधना पय, नदरानी मग्रह, पचवटा, विद्यापीठ प्रादि म है सास्कृतिक व राजनीतिक मूल्य लिए ये नाटय हैं जिनम नाटककार नाटर के तत्वा के प्रति भी सचेत ह श्री प्रोकारनाय दिनकर का भी मतीतकालीन मादशों के प्रति तीन मोह रहा है तथा यह उनके सभी नादवा म प्रक्टा राजस्थान के परिवेश का सफलता के साथ चित्रण प्राकारनाथजी के नाटका म प्राप्त है हिंदी नाटय लेखन के क्षेत्र मे दिनकर का यागदान महत्वपूर्ण है दिनकर के नाटक मुजदेव, भगवान बुद्धदेव पवनजय, विग्रहराज, विशालदेव, धारेश्वर भोज, मयूर फिर नाच उठे, जोहर ज्योति मादि प्रमुख हैं देवालाल सामर गजस्थान के लोकनाटा व लोक कलाकारों के प्रेरक सामर जी स्वय नाटक लिसत थे और मचन कराते थे राजस्थान में नाटको व लोक्लामा की महत्ता स्थापित करन देवीलाल सामर का योगदान सराहनीय व महत्वपूर्ण है कठपुतली नाटक के क्षेत्र मे अनेक प्रयोग सामरजी ने किए हैं दलित क्या महान वलिदान राजस्थान का भीष्म मादि महत्वपूण नाटक लिसे हैं नाटका के कथानक महत्वपूण व प्रेरक हैं सधियो प्रादि का उपयुक्त प्रयोग है नृत्य नाटिकाया वे सफल प्रयोग भी हैं भारतीय लोककला मडल की स्थापना सामरजी की विशिष्ट दन है श्री देवीलाल सामर ने राजस्थान का अतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित क्यिा उनके नाटक रगमच की दृष्टि से अनुकूल होते थे नाटक के आवश्यक तत्व, सधिया आदि मनिवाय गुण श्री सामर के नाटका म उपलब्ध है लोककथामा व लोगीता पर आधारित अन नाटक इहान लिमे और मचित कराये ये एक समपिन 82 पलाकार, नाट्यकर्मी, निर्देशक थे श्री जनादनराय नागर के नाटको मे सांस्कृतिक व श्रादश मूल्य हैं प्राचार्य चाणक्य, पतित का स्वग, ऊदा हत्यारा प्रादि इनकी प्रमुख नाद्य कृतिया हैं डॉ सरनामसिंह शर्मा अरूण कृन साधना स्वर्ग पतन, तपस्विनी ग्रादि एकाकी संग्रह हैं सुधीद्र जी का भी 'राम रहमान' एकाकी सग्रह प्रकाशित है जिसम छ एकाकी है ज्वाला और ज्योति सामाजिक विचारधारा का प्रतीक है ही रामगोपाल शर्मा दिनेश के धरती का देवता, मोमनाथ, विजय पव, शाति के प्रहरी, द्रोण या शिल्प आदि नाटक एकाकी प्रसिद्ध हैं ाटको, एकाक्यिा मे युगीन चेतना के स्वर है यादवेद्र शमा चन्द्र के 'हम सब एक हैं' राष्ट्रीय चेतना युक्त रगमचोय एकाकी है और पान का दावेदार रेडियो रूपमा पा संग्रह है ताश का घर श्री चन्द्र की एक चचिय नाट्य कृति है भारत की सामयिक समस्यामा यादर्शवादी रुझान को लेकर लिखे गये नाटक एकाकी हैं सतरगिणी (गोविन्दलाल माथुर) अमर आत्माए, सस्कृति धरोहर सिंह सपूत, इन्सानियत जिन्दावाद, सिंह शावक (डॉ रामचरण महेद्र) धरती जागी, अमर सेनानी, (डॉ चन्द्रशेखर भट्ट) पुप्पाजति, दहेज (विट्ठल- दास कोठारी) विष से अमृत की पोर (डॉ नरेन्द्र भानावत) एकाकिनी (डॉ दयाकृष्ण विजय) मादि रेडियो नाटय नो द्वारे का पीजरा महावीर सिंघल कृत है सातये और पाठवें दशक के महत्वपूर्ण हस्तार हैं-हमीदुरला, मणि मधुकर, रिजवान जहीर उस्मान, राजेश रेड्डी, उमेश उपाध्याय, शिवराम शमा, डॉ राजानग्द, नन्दकिशोर पाचाय, स्वयप्रकाश बद्रीप्रसाद पचोली प्रादि इन दशको का नाटक मूलत प्रतीकात्म प्रस्तुति का है दरिदे एक और युद्ध (हमीदुल्ला) रस गधव, खेला पोलमपुर, पुलबुल सराय हे भानमती (मणि मधुकर) नमस्कार माज शुमावार है (रिजवान जहीर उम्मान) पेपरवेट, सफाई चाल है (रमेश उपाध्याय) घर कद, फीनिक्षम (स्वयं प्रवाश) इन नाटको में धौद्धिकता हावी है परिणामत एन खास वर्ग तब ये मीमित हो गये मध्यवर्गीय समाज की परिस्थितियो, सत्रास, घुटन भादि वो अभिव्यक्ति भी मिलती है उलझी प्राकृतियां, घर बंद, इमरा पण, उत्तर उवशो अपना अपना दर्द (हमीदुल्ला) रग रग बहुरग (स डॉ राजान-) मादि म मामाजिक समस्याएं प मूल्यों की सराहट है नुक्कड नाटका की शली भी पाठवे दशक मे चचित हुई जिनमे रमेश उपाध्याय का हरिजन दहन, शिवराम वर्मा का कूबडूक, जनता पागल हो गई, विकल्प भवरा मील प्रादि है श्री मगल सक्सना राजस्थान के नाट्य अान्दोलन म महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं लेकिन उनकी प्रकाशित नाट्य कृति देखन म नही आई है इस प्रकार हम वतमान म राजस्थान के लब्धप्रतिष्ठ नाटककारो की चर्चा करत है तो थी हमीदुरला, श्री मणिमधुकर श्री शिवराम, श्री रमेश उपाध्याय, श्री पार जेड उस्मान से प्राग ही नही बढ पात हैं रगमच तथा नाट्य लेखन से घनिष्ठ सम्बध होना सिनेमा का प्रभाव तथा एक खास बग तक आज में नाटक का जुडा होना सम्भवत नाटक के सीमित क्षेत्र का कारण हो सकता है साहित्य की यह महत्वपूरण प्रयत्ति भी पल्लवित हो इस हतु क्या किया जा सकता है यह विचारणीय है निबन्ध पालोचना राजस्थान म हिदी आलोचना की प्रगति विशेष उत्साहवद्ध क नहीं है पालाचना के क्षेत्र म जो काय हाना चाहिय वह दष्टिगत नहीं होता है आखिर इस स्थिति के क्या कारण हैं या ऐमी निराशा की वात करता अनुचित है 'मालाचना का अपना महत्त्व है मालोचता पर द्वितीय कोटि का काय दूसरी थाली से ग्रहण मौलिक्ताहीन, मजदूरी का साहित्य प्राति के भगभीर आक्षेप लगाये जाते है इस सम्बध मे अपन को चदाटीवा लगाने की बात भी कही जाती है लेकिन गभीरता से विचार करें तो ये सभी प्राक्षेप बैमान मालाचना को महता स्वीकारनी होगी मालोचर का सजनारमा मौलिक माय है वह क्सौटी पर यस वर रिमी रचना का मूल्याक्न करता है और उस पालोचना से रचनाकार असहमत होता है तब वह अपनी रचना को श्रेष्ठता के स दम मै पालोचर की प्रति मानाचना करन लग जाता है इमलिए पालोचना रासन का विशिष्ट वाय परन का साहस बहुत कम रचनाकार कर पाते हैं और जा भी यह ग्रालाचता लेपन वाय करता हैं उनम स प्रविस्तर मालोचा रचना को प्रशशा हो नही करते हैं अपितु उस रचना को डाम घोषित कर यह स्थिति अधिक चितनीय हाती है 84 रचना का मूल्याकन उसमे निहित मूल्यो, वथ्य, शैलो भाववोध व युग चोध को लेकर करना चाहिए न कि रचनाकार के व्यक्तिव के आधार पर कृतिकार की अपेक्षा कृति का सम्यक मूल्याक्न हाना चाहिये पालोचना का याधार कृति में उपलब्ध तत्त्व, मूल्यों की प्रामाणिकता अादि हो सरता है जाना जा सकता है राजस्थान में साहित्यिा ग्रालोचना का प्रारभ रामकृष्ण शुक्ल 'शिलीमुग' से शिलीमुख प्राचाय रामरद्र शुक्ल के समकालीन थे और सामयिक साहित्यिक ग्रालोचना के समय में शिनीमुख माहित्य मे जीवनादर्श को सहज होगर अरन के समर्थक हैं उहोने आरोपित प्रादर्शो का हमेशा विरोध किया है शिलीमुख ने पालोचना के क्षेत्र म निभिवता से लेखन किया ह प्रेमचट, कबीर आदि पर इनकी पालोचनात्मक रचनाए सवविदित है पला प्रौर सौदय और विजय द स्नातक द्वारा सम्पादित शिलोमुसी मे इनकी आलाचना समीक्षा सवधी रचनाए हैं चद्रधर शर्मा गुलेरी ने भी निराध तथा आलोचनात्मक रचनाए की हैं च द्रवर म्पमा गुलेरो व्यक्तित्व एव वृतित्व (स० डॉ प्रकाश प्रातुर) दष्टच है शिलिमुख के साथ सूयवरण पारी का नाम भी आलोचना क्षेत्र म महत्वपूण है सूयकरण पारीक ने राजस्थानी और हि दो दोना म निवध तथा पालोचनात्मक रचना प्रस्तुत की हैं राजस्थान साहि य अकादमी द्वारा प्रकाशित 'सूर्यकरण पारीक निबधावलो' (स टॉ मदन फेवलिया) म पारीजी के विशिष्ट हिन्दी निबध सग्रहीत है बहुप्रतिभा सम्पन टॉ सुधीद्र ने आलोचना क्षेत्र में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह पिया है हिदी पविता का प्रातियुग मे हिदी का यधारा था विशिष्ट विवेचन किया है हिंदी वविता म पुग तर दा सुधौद्र की दूसरी चचित पालोचना कृति है थी मोहनकृष्ण बोहरा विश्वविद्यालयो पालोचना का प्रारभ प्रो नरोत्तम दास स्वामी से मानते है मध्ययुगीन कविया मोर लेखको पर स्वामीजी ने टीका पालोचनाए लिखी है रासो परम्परा और परवीराज रासा, मूर समीक्षा, कचोरदास, मोरा माक्तिी, वेलि वी टीका पारि चचित रचनार हैं विश्वविद्यालयीय पालोचको मे डॉ सोमनाथ गुप्त भी है पालोचना वे मिदार हिदी नाटर साहित्य का इतिहास डों गुप्न की मलपूण चचित कृतियां हैं जो एक विवचन प्रस्तुत करनी है डा भोलाशकर व्यास पालोचना क्षेत्र के अधिकारी विद्वान है हिदीदश स्पक, ध्वनि सम्प्रदाय और उसके सिद्धात, भारतीय शाहित्य की रुपरेखा प्रालि इनकी शास्त्रीय ढग की पालोचना वृतिया हैं . डा कन्हैयालाल सहल की समीक्षाजलि, समीक्षायण, प्रारंभिक पालोचना (मक कृतियां है डा सहल समन्वयवादी आलोचर रहै है अनुसंधान और पालाचना डा सहल की चचित वृतिह डा सहल की कठिनाई यह है कि ये विवेचना मात्र करते हैं निष्पपों की बात ही नहीं करते हैं डा सरनामसिंह शर्मा अरूण ने क्वीर कृतित्व एव सिद्धान्त म क्वीर पर विशद प्रकाश डाला है इसी प्रकार डा रामचरण महद का मान हिदी एकाकी नाटका की प्रालाचना को पार अधिक रहा डा महेद्र की वृति हितो एकाकी उद्भव और विकास म हिदी एकांकियों का विशद मवक्षण है डा जनश शर्मा कनक ने मनोविज्ञान तथा सौदय शास्त्रीय दप्टिकाए। स पालोचना लिखी हैं कामायनी का प्रतिपाद्य इस दृष्टि से मनन योग्य है इनकी सद्य प्रकाशित कृति साहित्य और क्ला की पहचान है नात्मक निब यह उसम मालोच- डा सूयप्रसाद दीक्षित ने छायावादी कवियों विशेपत पंत, निराला, प्रमा, महादेवी पर मामग्री प्रस्तुत की है डा रामगोपाल शर्मा दिनेश ने पालोचना के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण वार्य किया है हिंदी शिव काव्य, हिंदी काव्य मे नियति, कामायनी का नया अवैपण प्रादि म डा दिनेश न गम्भीरतापूर्वर मारभित वियेचना प्रस्तुत भी है डा रामानन्द तिवारी भारती न दन कवि और दार्शनिक हैं मास्कृतिक मूल्या के प्रति चिता तथा दाशनिकता डा तिवारी की मानौचनात्मक रचनामा म भी बराबर लक्षित होती है तानिय पृष्ठभूमि म साहित्य के स्वरूप का सैद्धान्तिक चितन है डा तिवारी के लेखन म दोहरापन अधिक मिलता है सत्य शिवं सुदरम्, अभिनव रस मीमामा मादि डा तिवारी की महत्वपूर्ण कृतियां हैं मनौवनानिक मालोचना क्षेत्र में डा देवराज उपाध्याय का विशिष्ट स्थान है रोमानिय साहित्य शास्त्र, आधुनिक हिन्दी कथा साहित्य और मनो।

विज्ञान, रागेय राघव के उप यास मेरी मा पताए प्रादि आपकी महत्वपूर्ण कृतिया हैं जिनमे मनोविश्लेपण, पालोचना सिद्धात तथा सामग्री उपलब्ध है इसके अतिरिक्त अालोचना वैदुप्य और अनुसंधान, ऐतिहासिक उपन्यास, सापेक्षतावादी आलोचना मादि महत्वपूर्ण कृतिया है डा उपाध्याय ने चिता मे नये प्रायाम प्रस्तुत किए है डा प्राची। भारतीय दर्शन और समाज व्यवस्था का गहन चिंतन तथा युगानुकूल लेसन की बात हा रागय राघव की कृतियो मे भी है रागेय राघव असाधारण प्रतिभा सम्पन लेखक थे भारतीय परम्परा और इतिहास, भारतीय पुनजागरण की भूमिका उनकी उल्लेखनीय कृतिया है डॉ विश्वभरनाथ उपाध्याय उन प्रखर मालोचको मे है जो भारतीय प्राचीन साहित्य को युगीन परिवेश म वैचारिक प्राग्रह व द्वद्वात्मक विश्लेपण के साथ प्रस्तुत परत हैं इनकी मालोचना म वैचारिक प्रतिवद्धता अधिक मिलती है हिन्दी लेखत्रा मे अपना विशिष्ट स्थान बनाने वाले डॉ नरपिशोर मानववादी दृष्टिकोण के पक्षधर है डा नवलकिशोर की आलोचनामा म मानववादी म्वर सवा मिलेगा ये मानववाद को दाशनिक और साहित्यिव रूपा मे विवेचित बरत हैं डॉ नवलकिशोर की मालोचनामा म वैचारिक चिंतन व बौदिक्ता प्रबल हा जाती है कृति व मूल्याकन मे डा नवलकिशोर निमम है लेखक से लखन की अधिक चिता इह बररावर सताती है मानववाद और साहित्य, कृति और सदम, आधुनिक हिदी उप यास और मानवीय अथवत्ता मादि इनको चचित वृतिया है टा नवलकिशोर दिदी रे शीर्ष मालोचका में है डॉ कृष्णकुमार शर्मा (चचित नाम si क के शमा) शंतो मानिर घालोचना के अधिकारी विद्वान है डॉ शर्मा न पालोना का नती वित्रान वी दृष्टि से देखा है मालोचना म कथा वस्तु शिम्प मादि का प्रमुपता देने के प पर डॉ समा उसम मल्या की बात का वरायर स्त्रयान रखते है शैली विनान की रूपरेखा सिद्धि और परम्परा, धनिमिदात का कापशास्त्रीय सोय शास्त्रीय मोर मनोवैमानिक अध्ययन, शैली वनानिक पातोचना र प्रतिपाटि प्रशमित कृतिया है - डा महावीर दाधीच अप्रतिबद्ध पालोचर्चा में हैं जो कृति को कृति की दृष्टि से देखते है आधुनिकता और भारतीय परम्परा में विचारोत्तेजक निबध है अस्तित्ववाद भी चचित कृति है डानदक्शिोर प्राचाय न वडी तेजी से प्रखर मालोचन म सपना स्थान बना लिया है सहजता सुचितित विश्लेपण और पालाच विषय में प्रति पूण गम्भीरता और ईमानदारी के प्राचाय पक्षपर ह व गम्भीर पाला- चनाए निखन म ये दस ह अनेय को काव्य तितीपा' एर' प्रमुप कृति है डा भातुर राजस्थान के हिदी कविया पर गम्भीरता से चितन लेपन व विवेचन डा प्रकाश पातुर वी पनि राजस्थान की हिी रयिता म है पवि है लेकिन साथ ही सफ्त पालोचर भी उनकी मालोचना दृष्टि काव्य का प्रतजगत है श्री नन्द चतुर्वेदी पवि के साथ साथ पालोचक भी हैं उनका छाया कवि तथा समाजवादी चितन मालोचना पर हावी नहीं होता है अपितु वे रचना व प्रतजगत को गम्भीरता स दवत परवन है सृजन के धर्म तथा मूल्या पनि उनका करार प्राग्रह ह थी सुरेन्द्र उपाध्याय की मालोचना का क्षेन वहानी रहा है घर प्रा घनश्याम शलभ अप्रतिवद्ध मालोचक है और कृति के सौ दयं के पक्ष वस्तु मुखी तटस्य लेखन शलभ दा ने किया है सृष्टि की दृष्टि, मवाना और सौन्दयवाध आदि महत्वपूर्ण कृतिया है डा रमाकात शर्मा की एक अालोचना कृति कवितामा के बीच म सद्य प्रकाशित हुई है जिसम शमसेर, मुक्तिबोध नागाजुन आदि महत्वपूण कविया की कवितामा को समझा व विवेचन करने का पयाग है इसी प्रकार डा भेलाल गग न माज की हिदी कहानी पर सफलता पूर्वर लिखा है और उनकी आलोचना कृति प्रकाशित प्रत में यह विचारणीय है कि राजस्थान में हिन्दी मालोचना के क्षेत्र म अधिक गम्भीरता से काय अपक्षित हैं शिलीमुख, रागेय राघव सूयकरण पारीक को रहने दें तो वतमान म मालाचना क्षेत्र म महत्वपूण चचित नाम बहुत वन हैं और ले देकर डा नवलकिशोर टा विश्वम्भरनाथ उपायाय, डा के के शर्मा, नदक्शिार प्राचाय और बस वाल साहित्य - बाल साहित्य की पहवान वीसवी प्रतानी के तीसरे दशर के यार बन सकी है वस्तुन हिी का बाल साहित्य 40 वर्षों से अधिक प्राचीन नहीं है फिर भी अपित भारतीय स्तर पर बाचा के लिए 88 बहुत लिखा जा रहा है यहा यह प्रश्न विचारणीय है कि परिमाण की दृष्टि से लिखा जा रहा बाल साहित्य गुणवत्ता की दृष्टि से क्सा है? यह सही है कि बाल साहित्य की दिशा में राजस्थान में गिने चुने कुछ ही लेखको के नाम सामने आ सके हैं और इस क्षेत्र में भी भभी उल्लेसनीय काय करने की प्रावश्यकता है बाल साहित्य का तात्पर्य वालको के लिए लिखा गया साहित्य है और घालको मे शिशु और किशोर दोनो वग सम्मिलित है राजस्थान में बाल साहित्य के क्षेत्र मे सीमित नाम है श्री शम्भूदयाल सक्सेना की ऋपिया की कहानियां, दवताप्रो की पहानिया, श्री शवर सहाय सक्सेना की वीरता की कहानिया, डॉ रामचरण महेन्द्र कृत अमर आत्माए किशोर वय के बालको के लिए है मनोहर प्रभाकर के पप्पू के गीत और इन्द्र धनुप प्रकाशित हैं जो शिशु व किशोर वय के लिए उपयुक्त है श्री यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र की कृति झूठी पान प्रकाशित है राजस्थान के बाल साहित्य के क्षेत्र म सर्वाधिक चचित नाम है श्री मनोहर वर्मा तथा श्रीमती लक्ष्मीकुमारा चू डावत वा श्रीमती लक्ष्मीयुमारी चूडावत का लेखन काय मूलत राजस्थानी म है उनको पुस्तक टावरा री पाता राजस्थानी म है श्री मनोहर वर्मा हिन्दी के प्रत्यात घाल साहित्य के सजक है श्री धर्मा इम क्षेत्र में निरतर सजनरत हैं उनकी चचित प्रससित कृतिया ह-वधन का मोल हम सब एक हैं, भुलपाड दिनी डॉ चम्पर मोर मचन, जीवन निर्माण की कहानिया गरीर के नौ रत्न प्रादि श्री हमीदुल्ला न बाल साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय वृति दी ह-जोनेगे हिम्मत वाले यह पुरस्कृत कृति है तयो पाल मुनभ जिनाा की पूर्ति हतु श्रेष्ठ कहानियां सग्रहीत हैं एनको प्रय उल्लेखनीय पृति है हरियत तोतो इनको बाल साहित्य की अय कृतियां भी प्रकाशित हैं डा हरीश के नौनिहालो ये गोत, उमान दन चतुर्वेदी को नह मुन की चम्बल यात्रा, शाता गुप्ता वी अमृत नगर हाँ पुरपोत्तम प्रामोपा वृत्त भैम फा अडा, पौराणिष गाथाए मोदि उल्लेखनीय कृतिया है, मोमू यो मर उडन तस्तरी से मदन वैष्णव द्वारा लिखित विशोर वय के बालका हेतु वैमानिस उपपास है इसी प्रकार चम्पालाल राकानी पृति मोहन ने महात्मा पारि प्रमुग बाल साहित्य की कृतिया ह इस विधा म मय प्रतिकार हैं-टॉ मनाहर शमा, भगाती प्रसाद गौतम, वासुदेव चतुदी, श्री नदन चतुदी आदि यह दुभाग्यपूर्ण है कि राजस्थाr से वाला ये लिए एन भी पत्रिका प्रकाशित नहीं होती है हास्य, व्यग्य, रेसाचित्र, सस्मरण, जोवनी आदि - रवर्ग हास्य और व्यग्य भी साहित्य यो महत्वपूर्ण विधाए हैं विद्वान हास्य पार व्यग्य को एक साथ लत है लक्ति दाना म स्पष्ट अतर है हाम्य निमल मन वा स्वच्छ प्रवाह है और हास्य के द्वारा मन महल और म्यच्या हाना है हसना और हमाना सहज नहीं है और पाज के इस वपम्य और समाति के युग म हास्य की आवश्यकता है जा मानव या मानव के ममीप रख उमे सहज किए हास्य म सहजता ह ता व्यग्य म तीक्ष्णता ध्यग्य बरसा मनुप्य का सहज स्वभाव ह लकिन व्यग्य लपन वटा टिन कम है व्यग्य सदा साद्देश्य हाता है और उपहास व द्वारा ताडना दना है उसम तीन वटुता और गभीर चमत्तार होता जव कोइ यात सहज ग स प्रभावित नहीं करती है तब “यग्य ही यह सबन शम्य है जा ममभेदी होता ह प्राज इम आर्थिक सत्रास समय में जब मानव वे दुखदद व रिश्ता को दद्वात्मर जीवन म भुलाया जा रहा है व्यग्य ही सशक्त व धारदार हथियार है जो सामाजिक, राजनीतिक या माथिक परिस्थितिया म सही समय पर अचूक प्रहार करता है मच्चाई और नश्वर का पनापन यग्य की विशिष्टना है टी ऊ गली से घी निकालना ही इसकी क्षीप्र प्रहार गति है सवन्नामा की है हास्य और व्यग्य की दप्टि स राजस्थान ही नहीं अखिल भारतीय स्तर पर बहुत कम काय हुमा है राजस्थान म तो अत्यल्प रचना कम हुमा है और जा लिसा गया ह वह भी हास्य की अपेक्षा व्यग्य अधिक है दाना का एक ही सात म डाला जाता रहा है यह सजन कम भी विभिन पत्र पत्रिकामो मे ही अविम प्रकाशित प्रा मिश्रीताल जन तरगित हास्य यग्य के क्षेत्र म उल्लसनीय नाम है इनकी चचित कृतिया व्यग्य सतसई, चुटोले चुटकुल पुतभडिया, टनस मिलिए आदि है डॉ पुरपात्तम आसोपा का सजय उवाच श्री अशोर शुक्ल को प्रोरसर पुगण, मेरा पैतीसवा ज म दिन हडताल, हरिक्या महत्वपूर्ण कृतिया हैं मरा पंतीमवा ज म दिन राजस्थान साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कृति है , 90 उनके प्यग्य बुद्धिप्रपाश पारीक, विश्वनाथ विमलेश प्रादि ये पाव्य में हास्य और ध्यप या पुट उपलब्ध है इसी तरह श्री लक्ष्मीचद चितारा की व्यग्य वी सुट रचनाए विनिन पत्र पत्रिकामो में प्रवामित हैं यतमान व्यग्यकार! म श्री मालीराम शर्मा, डा शियकुमार शर्मा, श्री पायात पोगरी, श्री मान पुशवाहा, पुषिोत्तम प्रामोपा, प्रशोर शुक्ल, डा मान वेयलिया, घाराज चौधरी, डा प्रेमरद गोस्वामी, डा यशगोपाल प्रादि प्रमुम है श्री निरंजननाथ भाचार्य एप रागपत रचाापार थ पा भार प्रहार है राजीतिर व सामाजिक जीवन की विसंगनिया को उहान उजागर किया है राजनीति को पपकी म उनका पतिपय ध्यग्य पचनाए मिलती हैं श्री यशवत मोठारी की घुमी मूत्र, पमपा मूब और हिदी यी मासिरी रिसाव, डा मंजुगुप्ता की वेनसाय मत्य, श्री जुगमदिर तायल पा विस्सा पांचवे दरवेश का धनराज चौधरी या गौतम बुद्ध और दुवी पारमा, टा प्रमपद गोस्यामी का पुत्ते भौर रह हैं मादि चर्चित मक्लन है दरप्रसल वतमान गतानी पोहा सशपन विधामा म जो काय होना पाहिए पह परिलक्षित नहीं होता है उ म निपा हुअा सहज हास्य और महारव याय हिन्दी में विशेपत राजम्यान वे हिन्दी साहित्य म प्रभी उपलब्ध नही है यही स्थिति साहित्य, इतिहास लपन संस्मरण, रेवाचित्र जीवनी, यात्रावत, रिपोर्ताज प्रादि की है किमी भौतिय वस्तु व्यक्ति या स्थान के स दम लखप या प्रास्मीयता पूर्ण विवेचन मस्मरण मे पायेगा जिसम स्मति पा महत्व है सम्मरण म रचनाकार वो मानसिकता मयुक्त हो जाती है जबकि रेखाचित्र शन्ग का मित्र है शब्दा या ऐगा चित्रग जो स्मिो ध्यक्ति विशेप पे बिम्ब को प्रबट पर दे रेखाधिन म मायगा ये जीवनी स अलग हागे यात्रामो का ललित गद्यात्मक विवरण पायावृत्त म सम्मिलित किया जा सकता है ये सभी विशिष्ट विधाए है न विविध विधामा म अनेक रचनाकारा न समय समय पर रचनाए पो हैं गिनम प्रमुख है श्री शम्भूदयाल सक्सना, हरिभाऊ उपाध्याय, सूर्य करण पारोर निरजननाय प्राचाय नाबरमत्त शर्मा, देवीलाल सामर, अमरसिंह चतुर्वेदी, राजे दगार भट्ट, जवाहिरलाल जन, क्पू रच द बुलिश, मावित्री राया, जगदीश वोरा ग्रागि श्री भावरमरल शर्मा सुप्रसिद्ध पवार, सम्पाय थे उन्हान सस्मरण घ जीवनी सेसन का महत्वपूर्ण काय भी दिया है अमर शहीद श्री गणन शकर विद्यार्थी भारतीय देश भरतो मो पारावाम की कहानी, राजस्थान और नेहरू परिवार, तिलक माया, अरविद चरित मादि पडित जी को उल्लेखनीय कृतियां हैं श्री शवर सहाय सबसना को महत्वपूण चचित प्रशसित कृति पथिर (विजयसिंह पथिक ) की जीवनी है श्री हरिभाऊ उपाध्याय न युगधम च म्यत पता की ओर कृतिया म सस्मरण ललित निवध व रिपोर्ताज का सम्मिश्रण कर दिया है राजे दशवर भटट की सुभाषचंद्र बास महाराणा प्रताप सवाई जयसिंह जीवनिया है तो कश्मीर चित्रण शन्द चित्र है कश्मीर चित्रण राज्य अयादमी से पुरस्कृत कृति है जवाहिर जन की दिल्ली म दिल्ली तक यात्रा वत्स है विभिन पत्र पत्रिकामो म विद्वानो क वृत्तान मस्मरण रेखाचित्र रिपाताज प्रकाशित हात रहन ह और उनकै अाधार पर विश्लेषण का ठिा है लोक साहित्य साहित्य में साथ नोक विशेषण तगार इमरा पाथक्य प्रकट किया गया है लोक साहित्य म मानव हृदय की सरस व सरत अभिव्यक्ति सवाधिक पाई जाती है यह लार चेतना स निर्मित साहित्य है और इसका विकास मानव मन की अतमुखी प्रवत्तियो से हुआ है इसमे लायकथा, लोकगीत, लोक नाट्य प्रादि सम्मिलित है वहा जा सकता है कि यह प्रात्मा का साहित्य है मौखिक परम्परा म प्रचलित साहित्य लोक साहित्य को परिधि मे आता है समाज साक्षेप लाक माहित्य के अध्ययन अनुशीलन, सग्रह व सरक्षण का काय भी इन दिनो राजस्थान मे हुमा है तथा विद्वाना ने अपने अध्ययन रम म सम्मिलित किया है मुशी देवीप्रसार कविराजा मुरारीदान, रामारण श्रासोपा सूयकरण पारीक, नरोत्तमदास स्वामी ठाकुर रामसिंह आदि ने लोक साहित्य के क्षेत्र म महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया है तथा एक भाग प्रशस्त किया है मुसो देवीप्रसाद का इस क्षेत्र में सक्लनात्मा व अध्ययनात्मक काय मह वपूण है इस मक्लनात्मक काय को अनेक विद्वाना ने जारी रखा प्रादेशिक लोकगीतो के सक्लन का जाय खेताराम मानी, सौभाग्यसिंह शेखावत मदनलाल वैश्य, जगदीश सिंह गहलात आदि ने किया भी विश्वेश्वर नाथ रेऊ का लार साहित्य में अध्ययन की दिशा म महत्वपूर्ण योगदान है उनका सास्कृतिक अध्ययन विश्लेषण परक है राजा भोज तथा ऋगवेद 92 मा सामाजिर साम्प्रतिर मार पुणगों मतिरिक्त दना अनेर निवर इस दिशा म प्रकाशित चौगानर वे मूय रग पासेर ठाकुर राममिह तर तथा नरोत्तमदास स्वामी की प्रयो ने लोग माहित्य अनुशीनन य क्षेम म उल्लपनीय योगदान दिया है हान 230 गारगोता पा लन उम्पारन तथा विवेचन दिया है इनवे अतिरिक्त श्री विद्याधर शास्त्री टा परथ शर्मा यगरच द नाहटा नवरतार नाहटा, मुरती पर ध्यान पुरुषोत्तम म्वामी, डा मनोहर शमा, दौनानाथ मयी श्रीमती ल मीमारी नू डावन गोविद अग्रवाल, पद्रदान चारण, राउत सारम्बन डॉ यानान सहन, विजया देथा, कोमल चोठारी गोडाराम मा डॉ मत्यद्र, पतराम गौड, श्रीलाल मिथ जिनविजय, जगदीशप्रसार माथुर मनोहर प्रापर देवीलाल सामर सुमनश जोशा डा व त्यानरल शर्मा डा नरद्र भानावत डा महेद्र भानारत सौभाग्यसिंह शेखावत, डॉ अजमोहन जावलिया दीनदयाल प्रोभा सत्यनारायण स्वामी आदि का उल्लेखनीय कार्य तोर माहित्य के क्षेत्र म है इहान अपन अपने ढग से लोकगीत, लाग्नत्य लोमानुरजन लावला प्रादि विषयो पर शोध ग्रथ तथा निवध खेसन दिया है साथ ही ला साहित्य सालन का कार्य भी दिया है डॉ कहैया नान महन न पिनानी को मास्कृतिक पद बनार इस लोक साहित्य के क्षेत्र म अपना विशिष्ट योगदान दिया है श्रीमती लक्ष्मीकुमारी च् डायत या लोक साहित्य के अध्ययन मालन सम्पादन के क्षेत्र म उल्लेखनीय योगदान है इनकी विभिन पुस्तकें लोग साहित्य विषयक प्रकाशित है जिसम वगडावन महा गाथा, मूमल हुकारो दो सा आदि प्रमुख हैं श्री झावरमल्ल शर्मा ने खेडी व जयपुर म रहार इस लोक साहित्य व सस्कृति को बलुमूल्य सवाए की है श्री सीताराम लालस पा योगदान भी उल्लेखनीय है श्री मुरलीधर व्याम तथा थी मोहनलाल पुरोहित ने विभिन लोककथानो के हिटा रूपातर प्रस्तुत किए है विजयदान देथा तथा कोमल कोठारी चोदा में लोकसाहित्य सरक्षण प्रकाश मे सनद्ध है राजस्थानी वाता का महत्वपूण काय विजयदान देथा ने रिया है राजस्थान के लोक संगीत, राजस्थानी लोकात्सव, राजस्थानी लोक्नत्य, राजस्थान के लोकानुरजन, लोक पला निवघावली, राजस्थानी लोरजीवन मादि भारतीय लोककला मडल से प्राशित पुस्तक है जो देवीलाल सामर व डॉ महेंद्र भानावत के अथक प्रयासों स तैयार हुई है लोर साहित्य के क्षेत्र में चूरून में सुबोध अग्रवाल व गोविंद अग्रवाल प्रयलरत हैं लार माहित्य के अध्ययन, अनुशीलन में सक्लन की दृष्टि से विभिन्न सस्थामा का योगदान भी उल्लेखनीय है इनमे प्रमुप हे भारतीय नोककला मण्डल (उदयपुर) स्पायन सस्थान (बारदा), साहित्य संस्थान राजस्थान विद्यापीठ (उन्यपुर) भारतीय विद्या मन्दिर शाय प्रतिष्ठान (बीकानेर), शादू ल राजस्थानी रिसन इस्टीट्यूट, प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान (जाधपुर), हाडोती शाय प्रतिष्ठान (पाटा) प्रादि मरू मारती शोध पत्रिका, मीरा राजस्थान गारती, मरयापी, वरना, लाव साहित्य लोन कला रंगायन विश्वम्भरा परम्परा प्रादि प्रमुग पत्रिकामा वा उल्लेखनीय योगदान भी इस क्षेत्र म रहा है राजमान म सस्कृति व राष्ट्रीय विशाम को दृष्टि से तोर साहित्य में क्षेत्र मजा यहा रहा है वह मह वपुरण ₹ साहित्यिक पत्रिकाए साहित्यिस जागृति उत्पन्न करने, सर पर ये मध्य जीयत सम्पर स्थापित करन तथा साहित्यिका यो उपयुा मच दने में साहित्यिक पप्रियामा या यागदान महत्वपूर्ण होता है राजस्थान का माहित्यिक पत्रि- पामा पा सगरण मर ता पिरित होता है कि राम को प्रथम साहिरियर पनिया सन् 1881 म नायद्वारा से नदार विष्णुमार पत्या न मम्मान म हरिनाद दिया और मान चदिरा व नाम म प्रारम हुई यो मार मुर गमय बाद मरा प्रराशन बदहा गया तति प्रयम साहिरियस पविया हाने पाय पनी तामी पत्रिकामा है म्यनयता पूर्व राजम्यान थी उसे नीम शाहिरियम पत्रिका पी- भारत माता (पपुर, 189%), गमालाचर (जयपुर, सन 1902), भारत सर्वस्व (मन् 1905), विद्या नागर (माराटन, पर 1907) निराधमाना (भरतपुर 1915६), मौरन (मापान 1920), राग नमि (परभर, 1928 1), माग (जयपुर, 19396) मापाता (ar. 1.

पुर, 1940 ई), हितैषी (जयपुर, 1940 ई ), अरावली (अलवर, 1944 ई), भाई बहिन (जयपुर, 1946 ई), राजस्थान भारती (बीकानेर 1946 ई) चानी (जयपुर, 1946 ई), शोध पत्रिका (उदयपुर, 1947६), पामना (काटा, 1947 ई), मारवाडी (जोधपुर, 1947 ई ) . - - स्वतंत्रता के पश्चात साहित्यिक पपिरानो म मुख्य है-झरना (जोधपुर), वसाधर (पाली), राष्ट्रपा(जयपुर), लहर (जोधपुर), राष्ट्रवारयो (अजमेर), किलकारी (जोधपुर), भारत दु (कोटा), लालिया (भरतपुर), विकास (कोटा), विजयी (जयपुर), साहित्यिा प्रवाह (जोधपुर) ज्योति (अजमेर), प्रेरणा (जोधपुर), मरभारनी (पिलानी), नवनिमरिण (जोधपुर), राजस्थान साहित्य (उदयपुर), जामा (अजमेर), परम्परा (जोधपुर), निष्ठा (जयपुर), समीक्षा (प्रलयर), शेफालिरा (जयपुर), कविता (अलवर), वातायन (वो नेर), सोमात (भु दगा), माहित्यिकी (अवर), समितिगणी (भरतपुर), श- (अलवर), साहित्य सरिता(वोकनर), घगतल (जयपुर), भारतीय चिंतन (भरतपुर), प्रावद (जयपुर), सम्प्रेषण (जयपुर) हाडोती वाणी (कोटा), विदु (उन्यपुर), लहर (अजमेर), सम्बोधन (काकरानी), मधुमती (उदयपुर), परदा (बिसाऊ), विश्वम्भरा (चौवानर) मयुनाधवी (जयपुर), क्षत्रा (जयपुर), प्राय (जयपुर) लोकमाहित्य (जोधपुर) अ वेपणा (उदयपुर) शोधपनिका (उदयपुर), क्थालाक (जयपुर) मरदि , . अाज वित्तीय माट ग्रादिक स्वरूप अधिकार पत्रिमाग वर हो गई हैं और कुछ रियमित प्रकाशित हो रही हैं अाज विनम्ब म ही सही प्रकाशित होने वाली प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाए है--विश्वम्भरा (मासिक) बीकानर, वरदा (मामिर) विसाऊ, शोध पनिका (भमासिक) उत्यपुर, सम्बाधा (मासिक) याकरालो, लहर (मासिक) अजमेर मधुमाधवी (मासिक) जयपुर मधुमती राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका है और नियमित प्रकाशित हो रही है इसकी नियमितता का कारण चाह वित्तीय स्थिति को सुदढता हो चाह सम्पाटन कौशल लक्नि समय पर प्रकाशित एक प्रसारित होने चाली मात्र माहित्यिक पत्रिका अभी मधुमतो है साहित्यिर पत्रिकामो का मस्ट राज्य की साहित्यिक सचेतना के लिए पाता है राजस्थान म हो रही अपितु भारत भर में साहियिर पत्रिकामो को गत् 20 म गहरा प्राधात लगा है परिणामन ये पत्रिकाए न शन बद हो रहे है इग म्पिति पर मभीर चितन अपति है सम्पादन साहित्यिक पत्र पत्रिकामो से अनेक हिदी साहित्य के सजनकर्मी समय समय पर जुडते रहे हैं इनम प्रमुख हैं-सवधी झावरमल्ल शर्मा, विद्याधर शास्त्री, डॉ कन्हैयालाल सहल, हरिभाऊ उपाध्याय जयनारायण व्यास, नरोत्तमदास स्वामी, डा कन्हैयालाल शर्मा डॉ मनोहर शर्मा, चन्द्रगुप्त वार्णेय, रामलाल सोवल, जनादनराय नागर, डॉ मोतीलाल मेनारिया, रामनिवास शर्मा, डॉ सामनाथ गुप्त, चन्द्रमान चारण, डॉ नारायणसिंह भाटी, सौभाग्य सिंह शेखावत देवीलाल सामर, क्पू रचन्द कुलिश, कनक मधुकर, चद्रेश व्यास, नेमीच द जन भावुक, गिरीश शर्मा, मिश्रीताल जन तरगिता बुद्धिप्रकाश पारीक शिवपूजन त्रिपाठी, राजेन्द्र सक्सेना, डॉ मनाहर प्रभाकर, डॉ नेमनारायण जोशी, डॉ प्रकाश प्रातुर गिरधारीलाल शमा, विश्वदेव शमा डॉ शाति भारद्वाज श्री मगल सक्मना डॉ जयसिंह नीरज, डॉ भंवरलाल जोशी डा प्रेमच द विजयवर्गीय जुगदिर तायल, डॉ नविशोर प्राचाय रामदेव प्राचाय हरीश भादानी, सरल विशारद, डा पूनम दईया, राजन शकर भट्ट प्रोम शर्मा जयसिंह एस राठोड भागीरथ भार्गव प्रकाश जना डॉ विश्वम्भग्नाथ उपाध्याय, शरद देवडा जुगमदिर तायल मजुन उपाध्याय, ईशमघु तलवार, नलिनी उपाध्याय, कमर मेवाडी, टॉ दिवारर शमा, डा नरेद्र भानावत च द्रभानु भारद्वाज, प्रेमी प्रेम, मनाहर कात मनमोहिनी, डin देव याठारी, गजेद्रसिंह सोलको मानसाल मपुर डॉ महेन्द्र भानावत पारि इस सभिप्त लेकिन समग्र विश्लेपण मे यह स्पष्ट है कि राजस्थान में हिंदी साहित्य के अतर्गत करिता प्रार क्या विधा मे लेखन प्रचुर मात्राम दिया जा रहा है और गुणवत्ता की दृष्टि स वह म तोपप्रद भी है मालोचना तथा नियघ प्रादि के क्षेत्र म भी उल्लेखनीय काय हुप्रा है लेकिन हास्य, व्याय, रेखाचित्र, संस्मरण, जीवनी, माशालार, यात्रावत, वाल माहित्य प्रादि विधामा पीपार पर्याप्त ध्यान देन की आवश्यकता है साहित्यिक पत्रिकामा स्थिति भी प्रसन्नतादायव नहीं मानी जा मवती है फिर भी, राजस्थान का माहित्य का उन्लेखनीय यागान है और राजस्थान सन्ध प्रतिप्टिन साहित्यकार हिदी मसार ना नि है जिन पर गौरय निक जा सकता है

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Prasan Prati Prasan

Author
Dr. Laxmi Naaryan Nandvana
Title
Prasan Prati Prasan
File name
Prasan Prati Prasan
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Salesh Prakashan Udaipur
Language
Sanskrit
Pages
102
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551578
Barcode
4990010032304.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
tzJvZlH57sf
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