Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sadhna
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साधना
राय कृष्णदास
साहित्य-सदन
चिरगांव (झांसी)
१९७४
प्रथमावृत्ति)
TH
इन्डियन प्रेस, प्रयाग, में अपूर्वकृष्ण बोस
द्वारा मुद्रित
--
.
परिचय
हमारा मानस शीघ्र ही तीरसागर की समता किया
चाहता है। तुम्हारी करुणा-वृष्टि से वह प्रति दिन अपनी सीमा
का विस्तार कर रहा है। हमारी एकान्त कामना है कि वह
असीम हो जाय और पृथ्वी के पार्श्व में लहराता हुआ उसे
अपनी मर्यादा का विश्वास दिलाता रहे। ससार के उपवन को
वह सरस बनाये रहे, किन्तु उससे निराला रहे। ऐसा न होने
से प्रलय की सम्भावना जो है।
जो हो, उसे भी आशा है कि तुम उसे अपनाने के लिए
आ रहे हो। इसी से वह तरङ्गों के रूप में अपने वाहु तुम्हारे
स्वागत के लिए बढा रहा है। कम्बु-राशि के रूप में अपनी
ग्रीवा उठा रहा है। शुक्तियो के रूप में उसने श्रवण खोल रक्से
हैं। उनमें मोतियो के आभूपय शोभित हो रहे हैं। और,
कमलों के रूप में उसने अपने सहस्र सहस्र नेत्र तुम्हारी शोभा
देखने के लिए उन्मीलित कर रक्से हैं। हे परमपुरुप, तुम
अपनी परा प्रकृति के साथ पाकर उसकी प्राशा और अभिलाषा
पूरी करो। उसे अपना निवास स्थान बनाओ और ऐसा करो
कि भावी सन्ताने उसे मथ कर सदैव अमृतपान करती रहें।
प्रहा । वह देसी, उसके हृदय से प्रेमाग्नि का धूम उठ
रहा है और एक छोटे से मेघ का आकार धारण करके अपने
अस्फुट किन्तु स्निग्ध निनाद से तुम्हारी अव्यक्ता को व्यक
करना चाहता है। यह मयूर उस पाराव को सुन कर
प्रानन्द से उन्मत्त हो नाच उठा है । क्या उस कृष्ण पयोद
।
की गम्भीर ध्वनि तुम्हारे चरणों तक पहुँच नसकेगी ? जोरस उसमे ओत प्रोत भरा है वह तो केवल उसी के हार्दिक भावो से सम्बद्ध है। इसी प्रकार उससे दीप्ति की जो उज्ज्वल रेसा प्रकट होती है वह भी उसी की साधना की स्फूर्ति है। क्या उस ज्योति से तुम्हारे अनन्त पथ पर कुछ प्रकाश पड़ सकता है ? इस बात को तुम्हीं जान सकते हो। वह कृष्ण पयोद न यह कहने का साहस करता है, न करना चाहता है, न कर मकता है। और न उसे इस बात का अभिमान है कि उसकी वृष्टि से हमारे मानस की सीमा का विस्तार होगा, अथवा वह उत्ताप का उपशम करके हरियाली को उत्पन्न करेगा। यह तो तुम्हारी करुणा-वृष्टि का ही काम है। हां, यदि उस पात्र के द्वारा भी तुम्हारी करुणा के दो चार कण बरस गये तो वह भी कृतकृत्य होकर अपने को धन्य समझेगा। तब वह चाहता क्या है ? केवल यही ही कि मयूर और कोकिलो के साथ अनुरागी चातक उसकी आकाता की पूर्ति के लिए एक बार अाफाश को गुंजा के-"पी कहाँ" कह कर तुमको पुकार उठे और उसकी क्षुद्र वारि-धारा तुम्हारे पाद्य के लिए गिर कर अपना जीवन सफल करे । इसी में उसकी सार्थ- कता है। और बस। श्रीकाशी जन्माष्टमी, ७४ मैथिलीशरण गुप्त सूची १ कृपालु कर्णधार प्रार्थना साधना सेवा २ २४ २६ कुटी और प्रासाद ६ २७ ७ अस्थायित्व में स्थायित्व श्रातुरता संसार की भूल कच्चे घट में अमृत वधन की श्रावश्यकता प्रारमन्रपा केवल तुम्ही सफल-काम क्रय-विक्रय २८ २१ निर्गुण धीणा लज्जा स्वप्न मात्र साहस व्यर्थ की खोज सहारा वास्तविक मूल्य अनुराग विराग प्रेम की प्रबलता मोहन संगटा १३ निरहेश परिश्रम की सफलता ३४ १४ असंभव संस्कार १७ जगत् का पागल तुम्हारी माया २० अमिसार ५० घकस्माद হাঙ্গা मानन्द गीत प्रकृति और कला प्रेम परिचय आकाशा २ ७२ . संकीर्ण पथ ७५ ८२ श्रोचाई और अगाधता दुरुपयोग अपना, पराया आनन्द की खोज पचित श्लाघनीय स्वार्थ कर्मो के अर्थ स्वयम् तुम्हारा पीछा चरण चिह्न मधुर मान Vप्रमाद अधूरी याचना तुम्हारी रुचि संताप की शीतलता Xअभाव में आविर्भाव Xअनादि सगीत Xतुम तो मेरे पास हो Xजागृति Xसमय की सहायता Xमिलन देक्षा Xचुम्बन Xस्वरा मान की नित्यता अभिमान ४४ प्रहरी ४५ प्रतिफल ४६ जागृत, स्वप्न, सुपुति अभीष्ट आदेश ४१ स्वत सिद्धि माबा तुम स्वय बारहे हो ५३ उद्देश की सफलता प्रतिविम्ब रुचि स्थान दूत-यागमन आकर्षण अशान्ति में शान्ति ६० स्वार्थ बिदा ६२ आंसू हीरा वन पाटल . ६४ पागल पथिक अध्यर्थ श्रावेदन मृग मरीचिका संदेह
साधना
प्रार्थना
अपने पद-पद्म-पराग से मुझे अपने घट को नित्य मांजने
दे और उसके मधु-मकरन्द से इसे पूर्णतया भरने दे, यही एक
मात्र प्रार्थना है।
साधना
हे नयनरख्जन नीरद, तू सन्तप्तों को शीतल करने के लिए
अपने आप को परस देता है। यह तन की साधना मैं
तुझ
से
सीखता हूँ।
हे मानस, तू निरन्तर मोती के समान उज्ज्वल,
निर्मल
और रम्य तरङ्गे उठाया करता है, जिनके सुस में मग्न होकर
सुवर्ण-सरोज झूमा करते हैं और निरन्तर तुझे मकरन्द-दान
देते रहते हैं। तू उसे सादर ग्रहण करके फिर उन्हीं के समूल
नाल पुष्ट करने में प्रयुक्त करता है। जव समस्त सर पड्किल और
राजहस विकल हो उठते हैं तब उन्हें तेरे सिवा कौन आश्रय
दे सकता है ? यह मानसी साधना मैं तुझ से सीसता हूँ।
हे पादप, फलो के वोझ से तू मुफ जाता है और तेरी
डाले टूटने लगती हैं। पर तू अपना नियम नहीं छोड़ता।
क्योकि बुभुतितो को तृप्त करके उनकी प्रासे सोलना तेरा प्रण
है। बुद्धि की सफलता भी यही है। और, तुझ
से
सोसता हूँ।
चातक, तू अपनी ज्वलन्त कामनाओ को सब ओर से एकत्र
करके एक स्वाति को वृंद पर लगाता है औरतू अपनी 'धुन' का इतना
पक्का है कि साल भर उसी फी रट लगाये रहता है और उसी
एक बंद से अमृत पान के समान छक जाता है । तेरी उस पर
इतनी अनुरागमयो प्रबल कामना है कि तू उसमे मिल कर
अपने अहम्भाव का प्रभाव नहीं कर देता । वरन केवल इसी
२
इसे मैं
।
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कुटी और प्रासाद कुटी बनाने के लिए मुझे कोई कष्ट नहीं करना पड़ता था। उसी स्थान से मिट्टी और घास-फूस लेकर मैं उसे बना डालता। पर बरसाव उसे अपने साथ बहा ले जाती । मुझे शान्ति का मन्जुल चित्र खींचते हुए प्रशान्ति की भयङ्कर मूति का सामना करना पड़ता। अव में गहरी नींव देकर प्रासाद बना रहा हूँ इस में कला और दृढता की चरम सीमा का अतिक्रमण किया जा रहा है। इसके लिए मुझ को अनेक कष्ट उठाने पड़ते हैं और ऐसा जान पड़ता है कि मैं अधम अशान्ति में पड़ा हूँ। पर इसी कष्ट और प्रशान्ति से मुझे प्रानन्द और शान्ति का अनन्त स्रोत मिलेगा, प्राणेश के सग इसी में तो नित्य विहार होगा। यह प्रासाद कुछ ऐसा थोडा ही बनेगा कि प्रकृति उसे नष्ट- भ्रष्ट कर दे। ६
भूल
मैं समझता था कि जिस प्रकार रग विरगे खिलौने देकर
माता-पिता पुत्रों को प्रसन्न करते हैं उसी प्रकार तूने भी यह
विचित्र सृष्टि हम सब को दी है।
फिर तू इससे मुझे अलग क्यों करता है? क्या सिलाने
छीन फर लडके विकल किये जाते है?
मैं भूल रहा हूँ ? इससे झुटा कर तू मुझे अपनी छाती
से लगा कर चूमना चाहता है।
सिलीना को स्वयं कर देते
या
--
.
निर्गुण वीणा
अनन्त काल से तुम्हारे बजाते रहने से इस बीणा के गुण
ढीले पड गये हैं । सो अव यह बेसुरी बजती है और उलटा
तुम्हारे धजाने की योग्यता पर सशय करती है।
प्रभो, इसके गुणों को कस दो, जिसमें यह लय से बजे और
इसका झूठा सशय जाता रहे।
नहीं, नहीं, ऐसा न करना। इसके गुणों को दूर बहामो,
जिसमे उनके ढीले पड़ने का प्रपञ्च एव इसके मिथ्या संशय का
कारण हो जाता रहे और, यह निर्गुण भाव से नीरव लय का
नित्य विस्तार करे और कृतकृत्य हो ।
लज्जा जब में देखवा हूँ कि तुम्हारे मन्दिर को मैंने ऐसा प्रशुचि और अस्वच्छ बना रक्सा है तब मैं लज्जित हो जाता हूँ। परन्तु जब मैं देखता हूँ कि तुम उसी में प्रेमपूर्वक प्रा विराजते हो तर तो मैं लज्जा से डूब जाता हूँ। जब मैं देखता हूँ कि तुम मेरे लिए सब कुछ करते हो और मैं तुम्ही से मुंह मोडता हूँ तब मैं लज्जा से नतशिर हो जाता है। परन्तु जर मैं देखता हूँ कि तुम मेरी उसी अवस्था में मेरे पास आते हो और पलटा मुझ को ही मनावे दो तव जब मैं देखता हूँ कि लज्जा के कारण मैं अपने भाव तुम से छिपाता हूँ तब मैं और भी लज्जित हो जाता है। परन्तु जब मैं देखता हूँ कि तुम मेरे उन भावों को जान गये हो तब तो मेरी लज्जा का पारावार नहीं रह जाता।
- स्वप्न मात्र हे प्रियतम, इसका क्या कारण है कि तुम स्वप्न में ही मेरे पास पाते हो और मुझे रिझाते हो, परन्तु ज्योंही मैं तुम्हे देखना चाहता हूँ, तुम छाया की भांति लोप हो जाते हो? हे प्रियतम, इसका क्या कारण है कि तुम स्वप्न ही में मेरे पास आते हो और अपना सङ्गीत सुनाने लगते हो, पर ज्योंही वह मेरे कानो में प्रवेश करने लगता है, तुम मुझे गभीर निद्रा मे निमन कर देते हो? हे प्रियतम, इसका क्या कारण है कि तुम' स्वप्न ही में मेरे पास आते हो और मुझे आलिङ्गन करने के लिए हाथ फैलाते हो, पर ज्यों ही मैं तुम्हारी ओर दौडता हूँ त्यों ही शरद-धन- खण्ड की भाँति न जाने कहां विलीन हो जाते हो ? हे प्रायोश, क्या मैं इसका यद्दी अर्थ करूँ कि तुम मुझे प्यार नहीं करते ? पर जब तुम स्वप्न तक में मुझ पर इतनी दया दिखाते हो तब मैं यह अर्थ कैसे करूँ? अथवा, क्या तुम्हारी यही इच्छा है कि मैं यही सम कि मैं सत्य हूँ और तुम मेरे स्वप्न मात्र हो ? , १०
साहस
हे मेरे दयालु स्वामी, तुम यह न समझना कि मैं तुम्हारा
मार्ग रोकने के लिए पडा हूँ। मैं केवल इस लिए पडा हूँ कि तुम
मुझे पददलित करते हुए चले जाओ और जिस प्रकार फाल के
संघर्ष से क्षेत्र उर्वर हो जाता है उसी प्रकार यह क्षेत्र भी उर्वर
होजाय।
हे मेरे दयालु स्वामी, तुम यह न समझना कि अपशकुन
के लिए मैं तुम्हारे मार्ग में रो रहा हूँ। वह धूल से भरा है और
तुम आरहे हो, इस लिए मैं उसे सींच रहा हूँ। जिस भाव से
पथिक उस मेघ को देखता है जो फुही बरसा कर धूल बैठा देता
है उसी भाव से तुम मेरी ओर देखते हुए चले जाओ, इसी
प्राशा से मैं उसे सींच रहा हूँ।
,
अनुराग-विराग जब मैं कोई फूल देखता हूँ तब मेरा हृदय तुम्हारा गुण गान करने लगता है । एक छोटे से फूल को तुमने इतने प्रेम से बनाया है। उसमें कितना सौन्दर्य भर दिया है और उसे कितनी सजीवता प्रदान की है। मैं उसे देसते देखते उसको तथा अपने को भूल जाता हूँ और तुम्ही तुम रह जाते हो । अहा ! तुम्हारी बातें भी कैसी निराली हैं । तुमने दया के मारे अपने मिलने के कितने द्वार बना दिये हैं। पर यह कौन है जो प्राकर मुझे चौका देता है और मुझे हटाता है ? वह कहता है कि-"हटो, भागो । यह विश्व तो माया का जाल है, इसमें फंस कर तुम नष्ट हो रहे हो। इससे बची। वह ठगिनी तो तुम्हें उससे दूर लिये जा रही है जो सब जगह है।" फैसी उलटी बात है। जब सब जगह तुम्ही हो तब कोई तुम से दूर कैसे जा सकता है ? और, यदि कुछ काल के लिए उसी की बात मानलें कि यह विश्व माया का जाल है, तब भी तो इसके बाहर जाने का उपाय नहीं। हे नाथ । यह वाटिका तुम जिसके माली हो और जिस पर तुम्हारा इतना वात्सल्य है कि इसका समस्त अशिव अपने ऊपर मोहन सन्ध्या कोजव दिनभर की थकी मांदी छाया वृत्तों के नीचे विश्राम लेती है और पक्षिगण अपनी चहचहाट से उस की थका- वट दूर करते हैं वथा मैं भी श्रान्त हो कर अपना शरीर भार पटक देता हूँ तब तुमने, मधुर गान गुनगुना फर मेरा श्रम दूर करके, और मेरे बुझे हृदय को पुनरुज्जीवित कर के, मुझे मोह लिया है। वर्षा की रात्रि में जब प्रकृति अपने को सारे ससार से छिपा कर सम्भवत अभिसार करती है तन तुमने मृदङ्ग के घोर में मेरी ही हृदय-गाथा सुना सुना कर मुझे मोह लिया है जब शान्तिवसना कुमुदमालिनी प्रकृति पर चन्द्र अमृत बर- साता है और में विशाल दृग्गोचर की ओर देखता देखता अपने ज्ञात विचारो में अज्ञात हो जाता हूँ वष तुमने मुझे अपनी बसी के तानतरङ्ग के पीयूप से प्लावित करके मोह लिया है। प्रात काल, जब सूर्य अपने राग से कमल-वन को तथा पतिगण अपने राग से स्तब्ध प्रकृति को जगाते हैं तब तुमने भी अपने राग से मेरे हृत्कमल और प्रकृति को जगा जगा कर मुझे मोह लिया है। १७ २ प्रेम की प्रबलता तुम उस पार हो मैं इस पार हूँ। बीच में अपार पारावार है किन्तु मैं तुम से मिलने के लिए अपनी टूटी फूटी डोगी छोड देता हूँ। मुझे भय नहीं। भय की परिधि सङ्कीर्ण है, प्रेम की विस्तृत । वह इस में समा जाती है। जिस प्रकार सूक्ष्मवीक्षण यन्त्र से देखने में दृश्य- वस्तु और ही रूप में दिखाई पड़ती है उसी प्रकार प्रेम की दिव्य दृष्टि से ये सब पदार्थ स्वर्गीय रूप में दिखाई पड़ते हैं । भय का अन्त लौकिक अवलोकन के साथ हो जाता है। मेरी डोगी आगे बढ़ती जाती है। वे ही लहरें जो बडे बडे पोतो फो डुवा देती हैं, मेरी होंगी को थपकियां दे दे कर बढा रही है और प्रतिक्षण तुम्हारी दूरी मुझसे दूर होती जाती है। Ow ६ मोहन सन्ध्या कोजव दिनभर की थकी मांदी छाया वृक्षों के नीचे विश्राम लेती है और पतिगण अपनी चहचहाट से उस की थका- वद दूर करते हैं तथा मैं भी आन्त हो कर अपना शरीर मार पदक देता हूँ तब तुमने, मधुर गान गुनगुना कर मेरा श्रम दूर करके, और मेरे बुझे हृदय को पुनरुज्जीवित कर के, मुझे मोह लिया है। वर्षा की रात्रि में जब प्रकृति अपने को सारे ससार से छिपा कर सम्भवत अभिसार करती है तन तुमने मृदङ्ग के घोर मे मेरी ही हृदय-गाथा सुना सुना कर मुझे मोह लिया है। जव शान्तिवसना कुमुदमालिनी प्रकृति पर चन्द्र अमृत घर- साता है और मैं विशाल दृग्गोचर की ओर देसता देखता अपने ज्ञात विचारो में अनात हो जाता हूँ तय तुमने मुझे अपनी वसी के तानतरङ्ग के पीयूप से प्लावित करके मोह लिया है। प्राव काल, जब सूर्य अपने राग से कमल-वन को तथा पक्षिगण अपने राग से स्तब्ध प्रकृति को जगाते हैं तव तुमने भी अपने राग से मेरे हृत्कमल और प्रकृति को जगा जगा कर मुझे मोह लिया है। १७
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सङ्गठन
हे नाथ, मुझे पूर्ण, अगाध और अनन्त सागर पना दो।
मुझ में नित्य प्रानन्द की तरॉ उठा करें और मैं अपनी असीम
सीमा में बंधा रह कर स्वतन्त्रता से कमोल किया करते।
नद, नदियाँ जो कुछ मुझ से मिले , मुझ में लीन होजायँ
पर मेरा स्वरूप ज्यों का त्यों रहे, तथा वडवा के निरन्तर दहन
से भी मेरी पूर्णता, अगाधवा और अनन्तता विलकुल कम नहो ।
हे पार्वण चन्द्र, जब तुम अनुराग पूर्ण होकर मेरे वक्ष पर
उदित हो तन हर्ष और अभिमान से मच हो कर मैं फूला न
समाऊँ और रजत हास्य हँसता हुआ नाचने लगें तथा तुम्हारे
कोमल करों से रञ्जित वेला को प्रेम-विह्वल होकर बार बार
चूमने लगूं।
प्रभो, मुझे रत्नों का आकर बना कर अपने लावण्य से
भर दो।
१८
श्रानन्द-गीत मेरे गीत प्रानन्द-सौरभ से बसे हुए हैं। तुम्हारे पाद-पद्धव के स्पर्श से मेरा मन-अशोक लदवदा फर फूल उठता है और उसके बोझ से नत होकर प्रानन्दामोद बग- राने लगता है । वह आमोद, जिससे मैं स्वय मत्त हो जाता हूँ। तुम्हारा नसचन्द्र देस कर मेरा मानस, रत्नाकर हो जाता है और असण्ड आनन्द के गीत गाने लगता है। और तुम्हारी कृपा का क्या कहना । तुम उसपर पीयूप वर्पण करके उसे अमृतमय बना देते हो। मित्र, भला जब तुम अपने करो से मेरे हत्कमल को खोलते हो तब वह कैसे न सिल कर प्रानन्द-मरन्द बहावे और सारे सर को उसमें मग्न कर । ऋतुराज, तुम कुसुमो के कोप और सौरम के सागर से सज कर मेरे मन पिक से मिलते हो। फिर वह आनन्द से पागल होकर पञ्चम-गान की धुन बांध के अपने प्राण की पर्युत्सु- कता को पस दिये बिना कैसे रह सकता है ? मयूर तो मेघ को विलोक कर केवल इतना ही प्रसन्न होता है कि उसे अपने नृत्य और गीत से प्रकट कर देता है । पर इसका भानन्द इतना अपार है कि अपने गीत के नृत्य से उसका कुछ परिचय देने की चेष्टा करके यह अपने को धन्य धन्य सम- झता है।
प्रकृति और कला
मैंने तुम्हें अपनी प्रकृति अर्पित कर दी है। तो भी मैं
तुम्हारे पास अपने प्राकृतिक रूप में नहीं पाता । मैं सज कर
तुम्हारे पास पाता हूँ। क्या लोकलज्जा से नहीं । कला के
सहारे मैं तुम्हें और भी मोहित करना चाहता हूँ।
परियाम उलटा होता है। तुम मेरी ओर तो ध्यान नहीं
देते, उसी के देखने में लीन हो जाते हो। और उसी की
आलोचना में समय बीत जाता है।
हे प्रियतम, अब मुझे अपना मिथ्या-विश्वास मालूम हो
गया। अब मैं तुम्हारे पास निस्सज्ज होकर आऊँगा। तुम
मेरा प्रकृत रूप देखो और उसी की आलोचना करो ।
प्रेम-परिचय
जब मैं तुम्हारे सामने नाचने लगता हूँ तब तुम मेरी ओर
एकटक देखते हुए मुझ पर अमृत बरसा कर मुझे ऐसा मत्त
क्यो कर देते हो कि मेरी गत बिगडने लगती है और मेरे पैर
ठीक नहीं पडते । क्या तुम्हें इसी में सुख मिलता है ?
तुम्हारा चेटक कैसा विलक्षण है कि मैं तो तुम्हें मोहित
करने को नाचता हूँ पर तुम उलटा मुझे ही मोहित करके
अपना मनमाना नाच नचाते हो।
मैं समझा । मुझ पर तुम्हारा प्यार मेरे प्रेम से कहीं बढा
हुप्रा है। इसी से तुम मेरा मन बार बार अपनी ओर खींच
।
लेते हो।
पर, हे प्रियतम, इसकी क्या आवश्यकता ? मैंने तो तुम्ह
आत्मसमर्पण कभी का कर दिया है। बस अब तो मुझे छाती
से लगा लो।
२१
श्राकांक्षा
हे नाथ, मेरी बुद्धि को ऐसा पलट दो कि मैं घृणित जीवों
में मोद और दुसियो में सुस पाऊँ।
हे नाथ, मुझे वह वल दो कि मैं निर्वलो का साथ दूं।
हे नाथ, मुझे वह दृष्टि दान करो कि मैं नीचो को
ऊँच देखू।
हे नाथ, निर्धनो को मेरा धन बनाओ और-राजायो
का नहीं-दरिद्रों का मुझ सेवक बनाओ।
हे नाथ, मुझ पराधीनो का अधीन बनाओ।
साथ ही हे नाथ, मुझे वह गर्व भी दो जिसके कारण
तुम हो।
२२
कृपालु कर्णधार हे मेरे नाविक, यह कैसी बात है कि जब मेरी नाव मॅझ- धार में थी तब तो तुम्हें हटा कर मैंने डांड ले लिये थे और सगर्व तुम्हारे आसन पर आसीन होकर बड़ा भारी सिवैया वन बैठा था। पर जन वह धार से पार होकर गम्भीर जल में पहुँची तब मैं हार कर उसे तुम्हारे भरोसे छोडता हूँ। तब तो नाव धार के सहारे बह रही थी, खेने की आव- श्यकता ही न थी। इसी से मेरी मूर्खता न खुली । पर अब ? प्रय तो इस गम्भीर जल से चतुर नाविक के बिना और कौन नाव निकाल सकता है? परन्तु मैं तुम्हारी वडाई किस मुख से करूँ। तुम मेरी मूर्खता और अभिमान तथा अपने अपमान की ओर नहीं देखते और सप्रेम डांट लेकर नाव किनारे की ओर चलाते हो। २३
अस्थायित्व में स्थायित्व
तुम खडे रहते हो और मैं अपनी क्रीडा मे मस्त रहता हूँ।
तुम्हारी ओर ध्यान ही नहीं देता। परन्तु तुम मुझे छोडते नहीं।
मेष-वृन्द अमृत बरसाता है और पृथ्वी लहलही हो जाती
है। चातक तथा कोकिल गान की होड करते हैं, जिससे
पुलकित हो कर उन का गान सवहन करने वाले पवन को
सुरभित कर देता है।
दिन बीतता है, रात होती है। फिर भगवान् अशुमाली
धरा को अपने अशुओं का अशुक पहनाते हैं। पुनार रजनी
चराचर के विश्राम के लिए अन्धकार-मिस निद्रा की चादर
उढा देती है।
प्रकृति अपने काम को नहीं छोडती । मैं अपनी धुन में
मस्त हूँ और तुम मेरे सग रहने मे पके हो।
अचानक प्रतिघात होता है और मैं अपनी क्रीडा से विमुख
होता हूँ । तब मैं क्या देखता हूँ कि तुमने मेरे उन्हीं क्षणिक
खेलो की एक दृढ और नित्य शृङ्खला बना दी है जिस की हर
फडी पर तुम्हारी छाप है।
मेरे आनन्द का ठिकाना नहीं रहता।
अातुरता मुझे तुम्हारे पास पहुँचने की जल्दी भी पडी है और मैं तुम्हारे मन्दिर के मार्ग पर कब से चल भी रहा हूँ। फिर भी मैं तुम्हारे पास अब तक पहुँचा नहीं। इसका कारण है। औत्सुक्य के मारे में बार बार पीछे फिर कर देखने लगता हूँ कि कितनी राह कटी और इसमें समय नष्ट होता जा रहा है। परन्तु इसमें एक उपकार हुआ । ज्यों ज्यों समय घोतता है त्यो त्यो मेरी विरहव्यथा भी वढती जा रही है । अव मुझ से एक क्षण भी तुम्हारे विना रहा नहीं जाता । मैं अपनी आंखें बन्द करके तुम्हारी ओर बढता हूँ। २५
है
श्रस्थायित्व में स्थायित्व
तुम सडे रहते हो और मैं अपनी क्रीडा में मस्त रहता हूँ।
तुम्हारी पोर ध्यान ही नहीं देवा । परन्तु तुम मुझे छोडते नहीं।
मेघ-वृन्द अमृत बरसाता है और पृथ्वी लहलही हो जाती
। चातक तथा कोकिल गान की होड करते हैं, जिससे
पुलकित हो कर उन का गान सवहन करने वाले पवन को
सुरभित कर देता है।
दिन बीतता है, रात होती है। फिर भगवान् अशुमाली
घरा को अपने पशुओं का अशुक पहनाते हैं। पुनार रजनी
चराचर के विश्राम के लिए अन्धकार-मिस निद्रा की चादर
उढा देती है।
प्रकृति अपने काम को नहीं छोडती । मैं अपनी धुन में
मस्त हूँ और तुम मेरे सग रहने में पके हो ।
अचानक प्रतिघाव होता है और मैं अपनी क्रोडा से विमुख
होता हूँ। तब मैं क्या देखता हूँ कि तुमने मेरे उन्हीं क्षणिक
खेलो को एक हद और नित्य शृङ्खला बना दी है जिस की हर
फडी पर तुम्हारी छाप है।
मेरे प्रानन्द का ठिकाना नहीं रहता।
२
अातुरता मुझे तुम्हारे पास पहुँचने की जल्दी भी पडी है और मैं तुम्हारे मन्दिर के मार्ग पर कब से चल भी रहा हूँ। फिर भी मैं तुम्हारे पास अब तक पहुँचा नहीं। इसका कारण है । औत्सुक्य के मारे मैं बार बार पीछे फिर कर देखने लगता हूँ कि कितनी राह कटी और इसमे समय नष्ट होता जा रहा है। परन्तु इसमे एक उपकार हुआ । ज्यों ज्यों समय बीतता है त्यो त्यो मेरी विरहन्यथा भी बढती जा रही है । अब मुझ से एक क्षण भी तुम्हारे विना रहा नहीं जाता । मैं अपनी आंखें बन्द करके तुम्हारी ओर बढता हूँ। २५ भारी भूल . जनपर हल रहा है कि तुम उसकी तुलना प्रा और के सहारे उसे पाना चाहते हो। सोही इसका उचर मैं क्या दूं १ क्या हो कि पह महति है किस की। विश्व किसकी रानी है। रिपोदे मैं तुम्हारी तुलना तुम्हों से करता और सारे ही सहारे उन्हें पाना चाहता हूँ तो क्या भूल A- ES उदी पाटे इससे इतर और कौन अवस्था हो सकती पुन सब सो प्रकृति में लिपटे हो तब हम कैसे सारे हैं? यह भी तुम्हारो लीला है कि ससार के सुपा करके उसे बे राह की राह पर लगा
.
कच्चे घट में अमृत
तुम अमृत को बार बार कच्चे घटों में भरते हो और मैं उन्हें
गलते देखता हूँ।
मुझे अचरज होता है कि अमृत के पात्र बन कर भी वे
क्यो नष्ट होते हैं और मैं पुकार उठता हूँ कि तुम्हारा अमृत
झूठा है।
तुम कुछ बोलते नहीं और मैं समझता हूँ कि तुम निरुत्तर
होगये।
पानी बरसने से मैं मिट्टी को गलते देखता हूँ। पर वही
गली मिट्टी जब हरी हो जाती है तब मेरी आंखें खुलती हैं। मैं
जो उन गले हुए घटों की ओर देखता हूँ तो मुझे मालूम होता
है कि उनके प्रत्येक कण को वेध फर सुधा ने उसे अमरता
प्रदान की है।
२७
वन्धन की आवश्यकता
यह न कहो कि मृदङ्ग भीतर से शून्य है । इसमें अनन्त
तत्त्व भरा है।
कैसी विचित्र इसकी बनावट है। एक सोसले दारु-राण्ड
पर दोनो ओर चमडा मढा है, और वह गुणों से भली भांति
जकडा है।
तुम्हारी थपकियो से के बार इसने ससार को मोहित नहीं
किया और फौन ऐसा मधुर घोर है जो इससे नहीं निकला ?
किन्तु अव तुम कर क्या रहे हो । कहीं इसके गुणों को न
निकाल डालना । नहीं तो यह किस काम का रह जायगा।
उन्हीं में बंधे रहने से तो यह अपनी मर्यादा में स्थित है।
।
श्रात्म-रक्षा
मैं अपने प्राणों की प्रेमपूर्वक रक्षा इस लिए नहीं करता
कि मुझे तुमसे मिलने की आशा है । तुम्हारा पाना तो निश्चित
है, फिर पाशा कैसी ?
उन पर मेरा ममत्व इस लिए है कि मैं उन्हें तुम्हारे अर्पण
कर चुका हूँ और वे तुम्हारी वस्तु हैं।
इसी से मैं इस भाँति उनकी रक्षा करता हूँ।
तुम जर औचक प्राफर अपनी धरोहर मांग बैठोगे धब
और परिश्रम प्रकट होगा।
तुम्हे मेरा
२६
क्रय-विक्रय जिन मणियो को मैंने बडे प्रेम से कृत्याकृत्य, सभी कुछ करके सग्रह किया था उनको उन्होंने मोल लेना चाहा। यदि दूसरे ने ऐसा प्रस्ताव क्रिया होता तो मेरे चोभ का ठिकाना न रहता । अपने शौक की चीज वेचनी ? कैसी उलटी बात है। पर न जाने क्यों उस प्रस्ताव को मैंने श्रादेश की भाँति अवाक होकर शिरोधार्य किया। मैं अपनी मणि-मञ्जूषा लेकर उनके यहाँ पहुँचा पर उन्हे देखते ही उनके सौन्दर्य पर ऐसा मुग्ध हो गया कि अपनी मणियो के बदले उन्हे मोल लेना चाहा । अपनी अभिलाषा उन्हें सुनाई । उन्होंने सस्मित स्वीकार करके पूछा कि किस मरिश से मेरा बदला करोगे ? मैंने अपना सर्वोत्तम लाल उन्हें दिखाया। उन्होंने गर्व-पूर्वक कहा-अजी, यह तो मेरे मूल्य का एक अश भी नहीं। मैंने दूसरी मणि उनके आगे रक्सी । फिर वही उत्तर । इस प्रकार उन्होंने मेरे सारे रन ले लिये । तब मैंने पूछा कि मूल्य कैसे पूरा होगा १ वे कहने लगे कि तुम अपने को दो तव पूरा हो । मैंने सहर्ष आत्म-अर्पण किया। तब वे खिलसिला कर आनन्द से बोल उठे-लो, तुम मुझे मोल लेने चले थे, पर मैंने तुम्हीं को मोल ले लिया । मैं गद्गद हो उठा । आज परम मङ्गल हुआ। मुझे अत्या- चार में सुख मिला, जिसे मैं अपनाना चाहता था उसने स्वय मुझे अपना लिया। ५ ,
वास्तविक
मूल्य
मेरी वस्तुओं को वे मुहमागे दामों पर ले जाया करते
और मैं नित्य सब बेच कर लौटता ।
सभी मेरे भाग्य की सराहना करते । पर किस भाव से,
कह नहीं सकता । अन्तर का हाल जानने का सामर्थ्य मुझमे
कहाँ ? मैं तो उनकी बातो को सच ही समझता ।
एक दिन वे न आये । सन्ध्या हो गई। सूर्य अपनी अन्तिम
स्वर्ण-किरणों को अन्धकार के हाथ घेच कर विश्रान्त हुआ।
मैं
हाथ पर हाथ दिये बैठा था। पर विचलित न हुआ था।
समस्त निर्मूल्य वस्तुओं को प्रतिदिन मन-चाहे दामों पर बेंच
कर एक दिन विना विक्रो के सन्ताप न होना अचरज की
बात है।
फिर भी उन्हें लेकर घर लौटना मुझे भारी जान पडा।
आज मैंने उन्हें वास्तविक मूल्य, निर्मूल्य, पर बेचने का
उपक्रम किया, पर किसी ने भी न लिया । तब मैंने उन्हें वहीं
विखरा दिया और अपनी आँखा, उन्हे प्रकृति को सस्नेह
अपनाते देसा।
.
३
निरुद्देश परिश्रम की सफलता मैं एक सूनी नदी के किनारे निरुद्देश बैठा था। जी घब- राने लगा सो मैंने इधर उधर फैले पत्थर के दोके उठा उठा कर उसमें इस पार से उस पार तक रखना प्रारम्भ किया । कुछ समय तक यही क्रम चला । अन्त को मैं, थक कर विरत हुआ। आज, बरसात में, वह नदी वेग से बह रही है। कगारे पर के वृक्ष प्रथम क्षण में हिलते, दूसरे मे झुकते और तीसरे में धार मे बहते दिखाई पड़ते हैं। पानी प्रति पल बढता जा रहा है, पर मुझे उस पार जाना आवश्यक है । और आज मुझे वही निरदेश चुनी हुई पत्थर की पक्ति सेतु का काम । ३४ श्रसम्भव मैंने तुमसे जो कार्य अपने ऊपर लिया है एक ओर तो उसे पूरा करना मेरा कर्तव्य है और मुझे उसे पूरा करने की जल्दी भी पडी है, दूसरी ओर उसका करना मुझे असम्भव जान पड़ता है। जितना बडा यह काम है मैं उतना ही छोटा हूँ औत्सुक्य के मारे मेरा हृदय उछल रहा है। अव तुम्हीं वताओ, मैं क्या करूं? तुम कहते हो-"असम्भव का नाम न लो, इस सम्भव विश्व में असम्भव कहाँ।" मैं निरुत्तर हो जाता हूँ और नत- शिर होकर प्राणपथ से काम में लग जाता हूँ।
मैं
संस्कार
हिमालय की चोटियो पर मुझे अमूल्य रत्न विखरे हुए
दीख पड़े । मैं उन्हें बीनने लगा। कुछ घडी दो घडी का काम
तो था नहीं, कितने ही दिनो में मैंने सारे रन वीन पाये।
अब १ अब लालसा प्रवल रूप धारण करके संस्कार में
परिणत हो गई थो। मुझसे, उस समय, विना वीने बन न
पड़ता था। पर कुछ रत्न तो पडे न थे, में शियर के
पत्थर ही वीना करता था।
देवताओं को मेरी दशा पर दया आती थी । एक दिन
उन्होने कहा ही तोक्यो उद्देश-रहित होकर उपल-खण्ड
सञ्चित करते हो ? इस सरकार ने मेरे हृदय का इतना भाग
अपना नीड बनाने के वास्ते सोखला कर डाला था कि वह इस
कथन की गुरुता सँभाल न सका। क्रोध से मैंने उत्तर दिया-
आकाश-मण्डल में नक्षत्र भी तो निरुद्देश घूम रहे हैं, उनसे
क्यो नहीं पूछते ।
इसी समय मेरे कान में एक भनक पडी--पर क्या तुमने
यह काम निरुद्देश होकर प्रारम्भ किया था ?
मेरा मोह भङ्ग हुआ।
६
, महत्ता उन्नत आकाश-स्थित दिनकर पानी के निम्नग स्वभाव की ओर तनिक भी ध्यान न देकर उसे अपने करों से उठा कर हृदय पर स्थान देता है और अपने राग से रजित, सरस नील नीरद बना देता है, एव इन्द्र-धनुष का मुकुट पहना कर तथा पवन के पालने पर बिठा कर, उस मराल-मुक्ता-माल्य- मण्डित, चपला-पीताम्बर-धारी घन को धनश्याम का उपमान बना देता है। इतना ही नहीं, वह उसे इस योग्य कर देता है कि वह अपनी शीतल स्निग्ध छाया के नीचे सन्तप्त ससार को सुसी करे और पृथ्वी पर भूरि भूरि जीवन-वर्षा करे । हे प्राणवल्लभ, इसी भांति तुम भी मेरी नीचता की ओर न देख कर अपनो उच्चता से, करुण-कर पसार कर इस क्षुद्र जन को अपनी छाती से लगा के, कुछ और ही बना देते हो। ३७ जगत् का पागल तुम कुछ जानते हो ? सारा जगत् मुझे पागल कहता है । और कहे कैसे न ? यदि मुझे उसका पूरा भरोसा होता तो मैं उसी के मार्ग पर चलता । पर उसमे तो मुझे सहारा देने वाला कोई है ही नहीं। मुझे विश्वसनीय प्राश्रयदाता तो तुम्हीं मिले, इसलिए मैं तुम्हारे ही मार्ग पर चलता हूँ। जानते हो, सब स्वार्थी होते हैं। पर तुम्हारे मार्ग में ऐसी क्या बात है कि उस पर चलने से मैं पागल कहा जाता हूँ। मेरे स्वामी, तुमने तो अपनी सभी रीति जगत से उलटी रक्सी है। हे विश्वात्मा, ऐसा क्यो ? हे दयानिधे, मुझे बतला दो कि ससार को इस सुख से वञ्चित रखने की निठुराई तुमने क्या की है।
तुम्हारी माया मैं तो अपना सरवस तुम्हे दिखा चुका फिर तुम अपने को मुझसे क्यों छिपावे हो। क्या तुम्हें इसी में सुख मिलता है कि मैं तुम्हारे लिए उद्योग करूँ और तुम बैठे बैठे देसो ? किन्तु नहीं, मैं भूल कर रहा हूँ। तुम्हारा और मेरा सम्मि- लन तो अनादि है। यह तो तुम्हारे मोहन मन्त्र का प्रभाव है कि मैं तुम्हें दूर समझता हूँ और मिलने का उपाय करता हूँ। मैं विमल प्रभा के पास कितने काल लो रहा हूँ। परन्तु तुमने मेरी प्रांखो पर ऐसी पट्टी बांध दी है कि अब यदि उसकी एक रश्मि भी उसमें पैठ जाती है तो मेरी आँसो में चकाचौंध होने लगती है। और उसे सोलने में तो मैं इतना डरवा हूँ जिसका ठिकाना नहीं । तुम्हारे इन्द्रजाल ने मुझ में यह सशय उपजा दिया है कि इसके सोलते ही आभा के मारे मेरी असे फूट जायेंगी। तुमने मुझ पर न जाने कौनसा आवेश कर दिया है कि जिस रगपटी के पीछे के दृश्यों पर मैं जान देता हूँ उसी को हटावे उरता हूँ। भला, इस सब से तुम्हें कौन आनन्द मिलता है ? ३६
अभिसार
मेरा अभिसार भी कैसा अनोखा है।
भादो की अँधेरी रात है। काले काले बादलो ने आकाश
को श्राच्छादित कर लिया है, वे मानो अन्धकार में मार्ग न
पाने से यहीं जम गये हैं। विजली तक का कहों पता नहीं।
क्या वह इन आले वादलो मे ठढी पड गई है या अन्धकार के
मारे चञ्चला चपला को भी घन-पटल से निकलने का साहस
नहीं ?
ऐसे समय में प्राणनाथ से मिलने निकला हूँ। न तो मेरे
पास दीपक है न मुझे मार्ग मालूम है न उनका निवासस्थान
ही । पृथ्वी पङ्कपूर्ण है, वह मेरे पैर पकड कर और प्रवल पवन
पल पल पर, मेरे कानो मे, मुझे ऐसा दुस्साहस करने को मनां
करता है।
पर मैं चल पडा हूँ।
प्राणेश कहीं बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनकी
चिन्तना की प्रतिध्वनि मेरे हृदय मे हो रही है, जो मुझे स्थिर
नहीं रहने देती और सागर की ओर भागीरथी की भॉति में उसी
ओर आकृष्ट हुआ चला जा रहा हूँ।
मुझे सूझ नहीं पडता पर मेरे पैर ठीक ठीक पड़ते हैं
४०
अकस्मात् यह पथ सुन्दर दृश्यो से घिरा हुआ है। सुहावने स्निग्ध सधन वृक्ष अपने करो को इस पर छाया किये हुए हैं। पर मेरा ध्यान इन सव की ओर नहीं जाता। मैं अपनी धुन में आगे बढता जाता हूँ। का मैं चला, कव प्रात काल का स्वागत पक्षियो के कोमल और मधुर कण्ठ ने किया, कर दोपहर की सूचना पवन की सनसनाहट ने दी, कव स्निग्ध पत्तियो को अपने करो से स्पर्श फरके उन्हें अनुराग से किसलयो के सदृश बनाता हुआ सूर्य विदा हुआ, मुझे कुछ मालूम नहीं । कय उसके विदा होते ही नभस्सर में लाखो नलिनी सिल उठी, कत्र चन्द्रमुखी रजनी आई, इसका भी ज्ञान नहीं। अकस्मात् मुझे रोमाञ्च होता है। मैं पुलकित हो जाता हूँ। प्रस्वेद-कण के आविर्भाव से मेरा शरीर चन्द्रचुम्बित चन्द्र- कान्त की भांति हो जाता है। तन मानो मेरी आँखे सुलती हैं और मैं अपने को तुम्हारी बाहों में, तुमसे चुम्बित होता हुआ, पाता हूँ।
दुरुपयोग
जब मैं तुम से विदा होने लगा तब तुमने प्रेमपूर्वक मुझे
अपना लीला-कमल, स्मृति-चिह्न में दिया।
जब मैं बढता हूँ तब मुझे ऐसा भासित होता है कि वह
तो चक्र है, जिसके सहस्रों आरो की चमक से मेरी प्रासो में
चकाचौध हो रही है।
मार्ग सघन था । कितने ही वृक्ष आनन्द से झूम कर मुक
रहे थे। पर मैं अपने गर्व मे कहता कि ये मार्ग-अवरोध का
उपक्रम कर रहे हैं । और, उन्हें चक्र से काट देता।
अब मैं तुम्हारे मन्दिर के पास पहुँच कर, असमजस में
पडा हुप्रा, रुक गया हूँ।
तुमने तो मुझे अपना लीला-कमल दिया था, मैं तुम्हें
रुधिर-दिग्ध चक्र किस मुंह से दिखाऊँगा ।
-
अपना, पराया कांदेदार झाड को देखते ही मैं काटने पर कटिबद्ध होता हूँ। पर गुलाब, केवडा और कमल भी तो कांटेदार हैं, फिर मैं उन्हें नष्ट क्यों नहीं करता ? उलटे जी जान से उनकी सेवा करता हूँ। क्या उनके क्षणभङ्गुर फूलों पर मेरा इतना प्रेम है ? नहीं, सो बात भी तो नहीं । यदि पराई फुलवारी में उन्हीं गुलाब, केवडा वा कमल को मुरझाते देखता हूँ तो निश्वासपूर्वक माली को प्रमत्त कहने में मेरा इति-कर्तव्य होजाता है। अरे, यह कैसा ज्ञान है जो हम से ऐसे अज्ञानमय और सोर्ण काम कराता है। बुद्धि के अधिष्ठातृ देवता, क्या मेरी यह न्यायप्रसङ्गन-बुद्धि ज्यों की त्यो धनी रहेगी? ४५
मानन्द की खोज
श्रानन्द की खोज में मैं कहां कहां न फिरा ? सब जगह
से मुझे उसी भांति कलपते हुए निराश लौटना पड़ा जैसे चन्द्र
की ओर से चकोर लडखडाता हुआ फिरता है।
मेरे सिर पर कोई हाथ रखने वाला न था और मैं रह रह
कर यही बिलसता कि जगन्नाथ के रहते भी मैं अनाथ कैसे
रहता हूँ, क्या मैं जगत् के बाहर हूँ।
मुझे यह सोच कर अचरज होता कि आनन्द-कन्द मूलक
इस विश्व-वल्लरी में मुझे आनन्द का अणु मात्र भी न मिले।
हा । आनन्द के बदले मैं रुदन और शोच को परिपोषित कर
रहा था।
अन्त को मुझ से न रहा गया । मैं चिल्ला उठा-आनन्द,
आनन्द, कहां है आनन्द [ हाय । तेरी खोज में मैंने व्यर्थ
जीवन गँवाया। बाह्य प्रकृति ने मेरे शब्दों को दुहराया, किन्तु
मेरा पान्तरिक प्रकृति स्तब्ध थी । प्रतएव मुझे अतीव आश्चर्य
हुमा । पर इसी समय ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण सजीव होकर
मुझसे पूछ उठा-क्या कभी अपने आप में भी देखा था ? मैं
अवाक था।
सच तो है । जब मैंने उसी विश्व के एक अश-अपने
आप तक मे न मोजा था तब मैंने यह कैसे कहा कि समस्त
सृष्टि छान डाली १ जो वस्तु मैं ही अपने आप को न देसका
वह भला दूसरे मुझे क्यों देने लगे ?
7
है
श्लाघनीय स्वार्थ
मैं कैसे कहूँ कि तुम से प्रेम करता हूँ।
अपने सुख की प्राप्ति के लिए, अपने को ही यातना से
बचाने के लिए मैंने आत्मसमर्पण कर डाला
कोयल अपने बच्चों का पालन-पोषण कराने के लिए उन्हे
दूसरे नीड मे रख प्रावी है, कुछ दूसरी पक्षिणी को पुत्रवती
बनाने के लिए नहीं।
तन तो मैं स्वार्थी और प्रात्मप्रेमी मात्र ठहरा। तुम्हारे
प्रति मेरा प्रेम कहाँ रहा । परन्तु जब तुम मेरे हृदय से पूछ
बैठते हो कि क्या हम तुम दो हैं, तब मैं निरुत्तर हो जाता हूँ।
वञ्चित
मेरे पास एक रत्न था। वह ऐसा नेत्र-रञ्जक था कि उसके
देसने से जीन भरता था। मैं उसे दिन-रात देसा करता । पर
किसी को दिखाता न।
ऐसी रूजक वस्तु को देसने से समार वन्चित रहे, मैं हो
उससे बढा रहूँ, इस भावना के अभिमान से मैं फूला न
समाता था।
अन्त को एक दिन मेरा जी भर गया। मेरे लिए उसमें
कोई नवीनता न रह गई और मैंने उसे राज-पथ पर फेंक दिया।
अब,
जो उधर से निकलता वही उसे देखता रह जाता
ओर भूरि भूरि प्रशसा करता । प्रत्येक जन उसमें एक न एक
विशेपता निकालता और यही कहता कि इसके मालिक के भाग्य
धन्य हैं।
मुझ मे भी नई भावनाओ का आविर्भाव हुआ । बिलकुल
भिन्न दृष्टि से उसे मैं देखने लगा और प्रतिक्षण मुझे उसकी
वास्तविक नवीनताएं मालूम होने लगी। मेरे आनन्द की सीमा
न थी।
रह रह कर सोच होता था तो बस यही कि इतने दिनो
इसे जगत् से छिपा कर मैं कितने प्रानन्द से वञ्चित रहा।
४८
श्लाघनीय स्वार्थ
मैं कैसे कहूँ कि तुम से प्रेम करता हूँ।
अपने सुख की प्राप्ति के लिए, अपने को ही यातना, से
बचाने के लिए मैंने आत्मसमर्पण कर डाला है।
कोयल अपने बच्चों का पालन-पोषण कराने के लिए उन्हे
दूसरे नीड में रस आती है, कुछ दूसरी पक्षिणी को पुत्रवती
बनाने के लिए नहीं।
तव तो मैं स्वार्थी और प्रात्मप्रेमी मात्र ठहरा। तुम्हारे
प्रति मेरा प्रेम कहां रहा । परन्तु जब तुम मेरे हृदय से पूछ
बैठते हो कि क्या हम तुम दो हैं, पर मैं निरुत्तर हो जाता हूँ।
कम्मों के अर्थ
तुमने अपनी मुरली की मधुर तान से मुझे मोह लिया
और जो जो मन में आया मुझसे कराया। मैं ऐसा मोहित हो
रहा था कि जो कुछ करना पडा उसका कुछ भी अर्थ न
समझ सका।
ससार मेरे उन कर्मों का मनमाना अर्थ करता है। किसी को
उनमें सौन्दर्य और सूक्ष्मता दिखाई देती है और कोई उन्हें
वीभत्स और भद्देपन का नमूना समझता है। परन्तु जब उनका
अर्थ मैं ही नहीं समझ सकता तब दूसरे क्या समझेगे ? तुम
उनके नियन्ता हो, तुम्हीं उनके अर्थ जानो।
खामी, मुझे उनका अर्थ और हेतु समझने की दरकार
नहीं । मुझे तो उस तान की चसक पड़ी है, वही सुनाते रहो
और जो जो मन में आवे वही काम लो।
-
स्वयम्
हाट का समय बीत जाने पर मुझे वहां जाने की सुध
आई। कितनी ही प्रावश्यक वस्तुएँ लेनी वेचनी थी । मैं
विफल हो उठा।
अब क्या हो सकता था । सन्ध्या वेला थी । प्रतीची ने दिन
भर के थके मौदे सूर्य का स्वागत किया और उसने उसका आतिथ्य
अनुरागसे अगीकार करके विश्राम लिया। सब अपना धापना काम
करके लौट रहे थे । देख देख कर मैं तडपने लगा। मेरी दशा
बस वह पत्तो जान सकता है जो बसेरे के लिए अपने घोसले
को नहीं लौट सकता।
अव मेरी कुन्डी सडकी । मैंने द्वार खोल तो दिया, पर न
जानें क्या बडबडाते हुए।
लो, यह क्या । स्वय हाट के प्रधान, मुझे जो वस्तुएँ
लेनी थीं उन्हें देने तथा जो बेचनी थीं उन्हें लेने के लिए
सडे हैं।
,
तुम्हारा पीछा . जिस प्रकार प्राची के कुड्कुमाम अनुराग का पीछा पार्वण चन्द्र, जिस प्रकार सुखद घटना का पीछा स्मृति, जिस प्रकार मेघध्वान का पीछा मोर की कूक, जिस प्रकार प्रथम वर्षा का पीछा पृथ्वी का सुरभित उच्छवास और जिस प्रकार पर्वत स्थली के सिहनाद का पीछा प्रतिध्वनि फरती है उसी प्रकार व्यर्थ मैंने तुम्हारा पीछा किया । क्योकि मेरे देखते ही देखते तुम अश्य हो गये। अस्तु, मैं हतोत्साह होकर बैठ गया। मेरी आंखें बन्द थीं। मैं तुम्हारे ध्यान मे मग्न था। अकस्मात् पपीहा 'पी कहां, पी कहां' बोल उठा । जानें वह मेरा समदु सी था या मुझे सिमा रहा था ? चाहे जो रहा हो, मेरा ध्यान उचट गया। मैंने सिन्न हो कर जिधर से उसका शब्द आया था उधर देखा । पर आश्चर्य । देसता क्या हूँ कि तुम मेरी बगल में बैठे हो । -- , २ । चरण-चिह्न सवेरा हुआ। दिन का प्रागमन जान कर तमो-भुजङ्गम उदयाचल की सुनहली फन्दराओं में जा छिपा । जल्दी में उस का मणि छूट गया । मै भी तुमसे मिलने के लिए घर से बाहर निकल पडा। जिधर देसता, तुम्हारे चरण-चिह्न दिसाई पडते । मैं जाता तो किधर ! अन्त को मैंने सामने का मार्ग लिया। दोनो ओर सघन वृत्तों की पक्ति सडी घी । नीचे सुकोमल दूर्वादल शोभायमान हो रहे थे। मुझे चलने में श्रान्ति नहीं मालूम होती थी । पर मन मे कुछ भ्रान्ति सी हो रही थी । क्यो ? इस लिए कि तुम्हें किधर पाऊँगा। वृत्तों के पत्तों के बीच से समीर मेरे कानो के समीप हो हो कर निकल जाता था । उसका शब्द तो मेरे हृदय में पैठ जाता था पर अर्थ समझ मे न पाता था। इसी प्रकार मैं एक निर्जन कानन मे जा पहुँचा। न तो उसकी सीमा दिसाई पड़ती थी न तुम्हारे पद-चिह्नो का अन्त ही। तव मैंने घबरा कर एक बार ऊँचे स्वर से तुम्हें पुकारा। साथही मुझे जान पडा कि किसी ने मेरे कन्धो पर पुलकित करने वाले हाथ रख दिये । एक मीठी खिलसिलाहट भी सुनाई पडी । मैंने चौक कर पीछे देसा, तुम कह रहे थे- एक धार लौट कर तो देसा होता।
मधुर मान
अहा । यह सुख कैसा महान है। प्रायानाथ के मधुर मान
का कारण मैंने जान लिया । हृदयेश ने किसी बात पर मान
नहीं किया है। भला वे मुझसे कभी वाम हो सकते हैं ?
उनके मान का एक मात्र कारण मेरे मनाने के हाव-भावो का
आनन्द लेना है।
क्या यह अवमर सोच का है ? अरे मुग्ध, सुख में दुख
की भावना । यह सुयोग तो परम भाग्य से प्राप्त हुआ है।
इस समय तो अपनी मनाने की कला के प्रानन्द से पावित
करके उन्हें और भी मोह लेना चाहिए।
प्रमाद
तुम्हें लुभाने के लिए मैं सूर सज सजा कर घर से बाहर
निकला । राजपथ पर भीड थी इससे मुझे रुकना पडा । लोग
मेरी ओर देखने और सजावट की प्रशसा करने लगे। भला,
प्रशसा किसे पागल नहीं कर देती ? मैं भी अपना प्रकृत उद्देश
भूल कर उन्हे अपनी सजावट दिखाने लगा। आनन्द से मेरा
हृदय नाच रहा था।
यहां तक कि अभिमान ने मुझे अन्धा बना दिया । तुम
भी आकर उसी भोड में सडे हो गये और मुझे देखने लगे, पर
मैंने तुम्हें न देखा।
सन्ध्या को भीड छंट गई और तुम्हारे दान के बोझ से
दवे मगवे लौटने लगे, तब मेरी प्रांखें खुली।
परन्तु अब हो क्या सकता था। हाय । इस दिखावे में मैं
तुम्हें न देख सका।
1
५५
अधूरी याचना
तुम चाहे अपने चरण मुझे न चांपने दो पर हे नाथ
मुझे उनकी धूल में लोटने से न हटाना । मुझे उस मे निरन्तर
उसी भांति सना रहने दो जैसे पद्म-पराग मे मधुप और केतकी-'
रज में करिवर सना रहता है।
मैं
कुछ यह नहीं चाहता कि तुम उस पर ध्यान देना । मुझे
इस की आकाक्षा ही नहीं । वस, मुझे इस अपार सुख से हटाना
भर मत, इतनी ही याचना है।
५६
- अभाव में आविर्भाव मैं अपने प्रलाप का गर्व कैसे न करूं, जिसने तुम से मेरा सलाप कराया है, और मैं अपने अनमिल जीवन को कैसे अहो- भाग्य न समस्, जिसने मुझे तुम से मिलाया है। मैं अपनी अन्धता को कैसे न सराहूँ, जिसने मुझे विश्व- चक्षु दे कर छिपा मार्ग दिखाया है, और मैं अपनी अकिञ्चनता को फैसे धन्य न समझू , जिससे मुझे परम निधि प्राप्त हुई है। मैं अपने रुदन पर कैसे नाज न करूँ, जिसने मुझे वह गान सिखाया कि मैंने उसे वशीभूत और मुग्ध कर लिया है जिस की चाह मात्र मेरे जीवन की एकमेव वासना थी। .
। सन्ताप की शीतलता हे प्रियतम, मैं अपने हृदय के ताप से तुम्हें कदापि न्यथित न करेगा। हे मेरे प्राण, भला मैं तुम्हें कभी कष्ट दे सकता हूँ? अथवा अपने कारण दु.खित होते देख सकता हूँ? उसे और तप्त होने दो । वह ताप, मैं आनन्दपूर्वक सहूँगा। मेरा आनन्द इस कारण दूना हो जायगा कि मैंने तुम्हें व्यथित नहीं होने दिया। और जब वह पिघल कर प्रासों से बहेगा तब मैं उन ठढे प्रांसुओं से दिन-रात तुम्हारे पादाम्बुज सींचंगा । ।
अभाव में आविर्भाव मैं अपने प्रलाप का गर्व कैसे न करूँ, जिसने तुम से मेरा सलाप कराया है, और मैं अपने अनमिल जीवन को कैसे अहो- भाग्य न समर, जिसने मुझे तुम से मिलाया है। मैं अपनी अन्धता को कैसे न सराहूँ, जिसने मुझे विश्व- चक्षु दे कर छिपा मार्ग दिसाया है, और मैं अपनी प्रकिञ्चनवा को कैसे धन्य न समझू , जिससे मुझे परम निधि प्राप्त हुई है। मैं अपने रुदन पर कैसे नाज न करूं, जिसने मुझे वह गान सिखाया कि मैंने उसे वशीभूत और मुग्ध कर लिया है जिस की चाह मात्र मेरे जीवन की एकमेव वासना थी। "
अनादि सङ्गीत
कौन कहता है कि सङ्गीत अस्थायी कला है ? देखो तो,
अनन्त में तुम्हारा प्रत्येक स्वर निरन्तर लहरा रहा है। पत्ता
पत्ता उसे ताल दे रहा है।
तुम्हारे विश्व के किसी भी प्रश में यदि किसी समय
ताल,स्वर और नृत्य, देसने में, बन्द हो जाता है तो वह अश
मृत समझा जाता है। भला तुम्हारे इस सरस सङ्गीत विना
यह विराट् साम्राज्य चल कैसे सकता है ?
तुम मुझसे कहते हो कि मैं तुम्हारे गान पर विह्वल और
विमुग्ध न होऊँ । यह कैसे हो सकता है ?
इस एकान्त सधन कुञ्ज में तुम गा रहे हो। चारो ओर
सरोवरो में कमल फूल रहे हैं। गुलाव की क्यारियां सिली
हुई हैं। बीच बीच में प्रफुल्ल वेले की वलियों हैं। मानो नवेली
प्रकृति के सौंधे पोठो मे दशन-पक्ति दमक रही है। भ्रमर
मॅडरा रहे है । परन्तु सब स्तब्ध हैं। तुम्हारे गान के
जादू
उन्हें मोहित कर रक्सा है।
पर मैं ही शान्त नहीं हूँ। शान्त फैसे रहूँ। न जाने कैसे तुम
मेरी हृदय-गाथा जान गये हो और उसी को गा रहे हो । मेरा मन
तोमरोर मरोर उठता है। फिर मैं विह्वल और विमुग्ध कैसे न होऊँ ?
आज मेरे अहोभाग्य हैं। तुम्हारे गान की बदौलत मेरी
हृदय-गाथा अनन्त में निरन्तरता और नित्यता पा रही है।
प्राणेश, तुम मेरे हृदय की समस्त गाथा इसी प्रकार गा डालो।
चूर था।
तुम
तो मेरे पास हो
मैं कुटी वन्द करके प्रासन पर सगर्व बैठा था। उस कुटी
को मैं विश्व समझता था और अपने को उसका महाराज ।
अपने
मद
न जानें कैसे तुम भीतर आगये। मन्त्र-मुग्ध की भांति
आसन का एक कोना मैंने तुम्हारे लिए छोड दिया । तुम बैठ
गये। मैं धीरे धीरे ससकने लगा । उस पर तुम्हारा अधिकार
बढने लगा। मैं भूमि पर आगया । तुम प्रासन पर पूर्णत
आसीन हो गये।
मैं निर्निमेप नयनो से, अवाक् होकर, तुम्हारी सुन्दरता
निरसने लगा। मुझे उसमें प्रतिक्षय नवीनता मिलने लगी।
इधर मेरे हाथ तुम्हारे पैर पलोटने लगे।
अकस्मात् प्रचण्ड पवन चलता है। कुटी हिलने लगती है।
घनघोर घटा घिर कर बरसने लगती है। विद्युत्पात होने
लगते हैं। प्रलयकाल उपस्थित होता है। पर मैं अशान्त,
विचलित या भीत नहीं होता हूँ। क्योकि तुम तो मेरे पास हो।
जागृति
हे नाथ, मुझे उस लोक में जागृत करो जहाँ मैं सारे संसार
के दुस को अपने ऊपर ले लेने के सुस में मत्त हुआ विचरूँ।
निखिल विश्व का ताप जहां मेरे रक्त की ऊमा बनाये रक्खे
और अनन्त विश्व-वेदना मेरे सङ्गीत की सामग्री बने ।
जहाँ एक मात्र तुम्हीं मेरे सगो हो, और सब प्राणियो की
कामना मुझमें एकत्र होकर तुमसे प्रणय करने की शक्ति दे।
जहाँ भुवन का भुवन मेरा भवन हो और ससीम जीवन के
बदले असीम जीवन पाकर मैं तुम्हारे साथ नित्य नई नीडा
किया करूँ।
६२
समय की
सहायता
जिस समय तुम देसते हो कि सूर्य की ज्वाला वरसाने
वाली रश्मियों से ससार भस्म हुआ चाहता है, उस समय तुम
अपनी करुणा से द्रवित हो कर मेघ रूप में वरस कर सारी
पृथ्वी को जीवन प्रदान करते हो । उसी प्रकार जब तुम देसते
हो कि सन्ताप से मेरा हृदय भस्म हुआ चाहता है, उस समय
तुम मेरी असों से सावन-भादो की झडी लगा देते हो और
मेरा हृदय शीतल हो जाता है।
जिस समय तुम देसते हो कि विशालकाय गजराज किसी
परस लघु उद्वेग से हार कर विचलित हो रहा है, उस समय
तुम उसके गण्डस्थलों से मद बहाने लगते हो और वह प्रकृतिस्थ
हो जाता है। उसी प्रकार जिस समय तुम देखते हो कि मेरा
मन क्षुब्ध हो रहा है और क्रुद्ध सागर पहे पोत सी मेरी
दशा हो रही है उस समय तुम मेरे प्रांसू बहाने लगते हो और
मैं शान्त हो जाता हूँ।
६३
E
Ti
.
मिलन बेला
प्रियतम से मिलने की बेला आगई।
रागवती उपा आकाश से मिल कर उसमें लीन हो रही है,
और सौभाग्य-सूर्य का उदय हो रहा है।
दिनकर के लिए पद्म अपना हृदय खोल रहे हैं। भ्रमर
गान कर रहे हैं और निस्तब्ध पवन तरङ्गित हो रहा है।
ससार प्रसुप्त है और प्रियतम खडा हुआ है। चलो,
मिलने का ऐसा अवसर भला कहां प्राप्त होगा?
६
।
चुम्बन
दिन भर मैं उनके लिए अपने को सजाने और गर्वपूर्वक
दर्पण मे देसने में लगा रहा।
सन्ध्या हुई और सूर्य के वियोग से प्रकृति निस्तब्ध हो गई।
सारे दृश्य बदल गये। मैं भी थक कर सो गया।
वे कृपापूर्वक आये पर ममता के कारण मुझे जगाया नहीं ।
केवल मेरा चुम्यन किया और चल दिये।
उस कोमल चुम्बन से मेरी कठोर निद्रा भग हुई । मैं आँखें
मल कर चकित-सा देखने लगा। उनके चरणों की चाँप सुनाई
पडती थी। मैंने उनके पीछे दौडना चाहा । पर चुम्बन ही के
श्रानन्द में मैं इतना विहल और कृतकृत्य हो रहा था कि मेरे
पैर न उठे।
स्वरा
प्राणेश के लिए प्रस्तुत हो कर मैं आंगन में बैठा हूँ। में
हाथो मे सजी हुई भारती का थाल है। पर अभी तक
पाये नहीं।
जिसे समाचार देने को भेजा था वह भी नहीं लौटा
ममय चला जा रहा है। आरती के दीपक मन्द पडे जा रहे
हैं। क्या जाने कब वे बुझ जायें ।
माला के फूल एक एक करके खिल रहे हैं और उन
सुगन्धि को पवन चुराये लिये जा रहा है। नूपुरो के धुंघरू बज
बज कर एक एक करके झडे जा रहे हैं। कुछ ही समय में
नीरव हो जायेंगे।
चित्त की मन्जुल भावनाएँ उद्वेग वन बन कर विनष्ट होत
जा रही है । पर अब भी समय है। मैं ही उनके पास क्यों
न चलूँ।
गान की नित्यता मैं अपने गीत सुनाने की याञ्चा करता हुआ, ससार भर में धूमा । पर किसी ने सुनने की प्रभिलापा प्रफट न की । मेरा एक मात्र उद्देश्य था प्रशसित होना। अन्त को में निराश होकर घर लौट रहा था कि राजपथ में एक नवीन सजीवता आगई । विदित हुआ कि सम्राट् आ रहे है। मैं स्तम्भित होकर सडा हो गया। देसता क्या हूँ कि वे पांवपियादे मेरी ओर आ रहे हैं। पास प्रा जाने पर नम्र हो कर मैंने आज्ञा पूछी। वे इस फर बोले-"ससे, मैं तुम्हारे पीछे सारे ससार में घूमा हूँ, पर तुम्हारा को ध्यान ही मेरी ओर न था। इससे अब तक तुमसे अपनी यह याचना न कर सका कि मुझे अपना गान सुनायो। याचक से याचना । जिसके लिए सारे ससार ने मुझे विमुग्न किया उसकी याचना खय सम्राट करें । अहोभाग्य । पुलकित होफर मैंने गान प्रारम्भ किया। प्रेम के मारे मेरा कण्ठ भर रहा था, इससे मैं प्रति शब्द पर रुकता था। मुझे सँभालने के लिए सम्राट ने मेरा साथ दिया। उनके नव- नीरद निर्घोष-निन्दक निनाद मै मेरा स्वर मिल कर समस्त ब्रह्माण्ड में गूंज उठा। सारे अण्ड-पिण्ड उसी की प्रतिध्वनि करने लगे। वव सम्राट ने मुझसे धीरे से कहा-"यह प्रतिध्वनि तो अनन्त काल लो होती रहेगी । आओ, हम तुम चलें ", - अभिमान मैं महाराज की वाटिका में फिर रहा था। देखता क्या हूँ कि एक जन सुमन चुन रहा है । मैं ने क्रोध और दर्प से कहा- जानते नहीं, यह महाराज की वाटिका है। यहाँ ऐसा दु साहस तुमने कैसे किया १ वह पेचारा निरुत्तर होगया। और, उसके फम्पित करों ने उन फूलों को मेरे चरणों पर गिरा कर मुझ से तमा सो मांगी। पर मेरा क्रोध शान्त न हुआ। मैं ने विकृत स्वर में कहा-फिर इधर आने का नाम न लेना। वह चुप चाप चला गया। वह तो गया, पर मेरा क्रोध न गया। मैं बडबडाता हुमा महाराज की ओर चला। चलने को तो मैं चला, पर उस क्रुद्धा- वस्था में भी, मेरे हृदय में कोई पूछ रहा था कि तुम भी तो उसी श्रेणी में के हो। प्राज महाराज के कृपापान हो जाने से उसका यह निरादर । महाराज तुम पर मोहित हुए सही, पर तुम्हारे जान बूझ कर कोई हाव-भाव करने से थोडे ही । तुम भी तो कुछ ऐसा ही ऊत सूत करते थे। महाराज ने उसमे न जाने कौन सी अदा देखो कि तुम्हें अपना लिया। किवा, तुम डरते हो कि तुम्हारा पद न छिन जाय, अत यह सारी लीला कर रहे हो। मैंने कुछ ध्यान न दिया। कहा-उँ यह तो हृदय- दाबल्य है। क्रोध का भार न सँभाल सकने से मैं लडखडाता हुआ उन तक पहुँचा। ६८
प्रहरी
सारी रात मैं जागा हूँ। नोंद का गुरु भार मेरी हलकी
पलकें नहीं सँभाल सकती । रात भर पहरा देते देते मेरे अङ्ग
शिथिल हो रहे हैं और अन्धकार मे दृष्टि की समस्त शक्ति एकत्र
कर के देसने से मेरी माँखें थक गई हैं।
इस परम निधि के रक्षण का भार मेरे ऊपर था और उसे
सफलतापूर्वक पूरा करने का मुझे अभिमान और हर्ष है।
सब समस्त ससार जागृत है । न कही तम है, न चोर चाई
का डर । तनिक तनिक से भी सटको को, समस्त निशा, सुनने
के लिए मेरे कान पूर्ण रीत्या लगे रहे हैं । इस लिए वे सुस्ता रहे
हैं और सारे ससार का कोलाहल भी उन्हे चौका नहीं सकता।
मैं सुस से साऊँगा।
,
प्रव
सुध
सम्राट् की सभा जुडी । सब अपने अपने आसन पर आसीन
हुए । केवल मैं ही न गया था। सोचा था कि इतने समारोह में
किसका ध्यान जायगा।
सम्राट भी सिहासन पर आ विराजे । यदि पूर्णचन्द्र के साथ
नभोमण्डल के सब तारे भी जगमगाये तो उस शोभा की उपमा
मिले।
एक बार ष्टि दौडा कर उन्होने प्रत्येक व्यक्ति को देस लिया
और मुझे न पाकर पूछने लगे।
दूत दौडाये गये । मुझे सम्राट के सौन्दर्य निरखने का काम
सौंपा गया था। विगत सभाओं में मैंने उनकी जो छटाएँ देखी
थो उन्हीं को चित्राङ्कित कर रहा था।
मुझे बांध कर दूतो ने सम्राट के सामने उपस्थित किया ।
दण्ड में प्राज्ञा मिली कि अब तुम अहर्निशि मेरी छटा निरखा
फरो।
प्रहरी
सारी रात में जागा हूँ । नींद का गुरु भार मेरी हलकी
पलकें नहीं संभाल सकती । रात भर पहरा देते देते मेरे अङ्ग
शिथिल हो रहे हैं और अन्धकार में दृष्टि की समस्त शक्ति एकत्र
कर के देसने से मेरी प्रॉखें धक गई हैं।
इस परम निधि के रक्षण का भार मेरे ऊपर था और उसे
सफलतापूर्वक पूरा करने का मुझ अभिमान और हर्प है।
अव समस्त ससार जागृत है । न कहीं तम है, न चोर चाई
फा उर । तनिक तनिक से भी सटको को, समस्त निशा, सुनने
के लिए मेरे कान पूर्ण रीत्या लगे रहे हैं। इस लिए वे सुस्ता रहे
है और सारे ससार का कोलाहल भी उन्हें चौंका नहीं सकता।
अब मैं सुख से सोऊँगा।
प्रतिफल
आधी घडी मैंने सोना चाहा था । पर, अन मैं उठ कर
देसता हूँ कि यह तो सन्ध्या हो गई है। सब समय सोने में नष्ट
हुआ। सोने के पहले जैसे मुझे उससे अनुराग था उसी प्रकार
इस समय प्रकृति को सोने से अनुराग है और कुछ काल में वह
भो मेरे समान तिमिराच्छन्न हुआ चाहती है।
सम्पुटित होने वाले सरोजों के साथ साथ मित्र-मण्डल
भी सड़कुचित हो रहा है।
मेरे सहयात्रियों की कितनी ही वस्तुएँ मेरे पास हैं । पर
विना पूछे वे उन्हें ले नहीं गये । अब सारी रात उनकी रक्षा
फरके प्रात काल जैसे बनेगा उन वस्तुओं को मुझे उन तक
पहुँचाना पड़ेगा।
--
७०
जागृत, स्वप्न, सुपुप्ति
जब मैं जागता रहता हूँ तब मेरा मन सोता रहता है और
प्रियतम के स्वप्न देखा करता है।
जब मैं निद्रित होता हूँ तब मेरा मन जाग जाता है और
उनके साथ विहार करने लगता है तथा मैं उसके सुखद स्वप्न का
अानन्दोपभोग करता हूँ।
परन्तु जब सुपुप्तावस्था आती है तब मैं और मेरा अन्त करण
दोनो ही तद्रूप हो जाते हैं। क्योंकि उस समय प्राणेश के गाढा-
लिङ्गन का सुख मुझे मेरे सर्वस्व सहित मूर्च्छित कर देता है।
मेरी एकान्त कामना है कि मैं नित्य उसी दशा में रहूँ।
1
अभीष्ट आदेश
इन मालाओं का मेरे आदर करने से क्या लाभ, तुम्हारी
और अपनी रुचि का अन्तर मैं क्या जानूं ?
फूलों के कुछ पौधो की सेवा मुझे सौंपी गई है । अत मैं
जी जान से अपने कर्तव्य में लगा रहता हूँ। एव उनके फूलो
को लोढ लोड कर मै ये मालाएँ बनाता हूँ।
मैं माला बनाने में अपनी कोई कला उठा नहीं रखता।
अपने स्वार्थ से ऐसा करता हूँ। तुमसे पुरस्कार लेना है न ।
माला भरी डाली लेकर मैं तुम्हारे सामने वैसे ही प्रणत
होता हूँ जैसे प्रपात, सुमन लेकर पर्वत के पद पर गिरता है।
नाथ, तुम्हें इसमें से जो हार रुचे उसे लेकर, पुरस्कार में
मुझे वैसी ही माला नित्य भेट करने की आज्ञा दो।
सङ्कीर्ण पथ
मुझसे तो इस मार्ग पर नहीं चला जाता।
चारों ओर स्निग्ध, श्यामल दूर्वादल-मण्डिव मैदान के रहते
भी इस रूसी सूसी और उबड सावड पगउडी पर चलना भला
कोई बात है।
बहुत दिनो से चलती रहने के कारण वह एक लीक सी बन
गई है। उसके ऊँचे किनारों से टकरा कर पैर चुटीले हो जाते हैं,
और उन किनारों पर की ठूठी घास पार बार चुभ फर क्रोध से
कहती है कि प्रान्तर से चलो और मुझे हरी तो होन दो।
यह पगडडो इतनी सकुचित है कि इसमें पैर सीधे और खुले
पडते ही नहीं, पथिक पार बार लडसडाता है एव वेग से आगे
नहीं बढने पावा । कडी यह इतनी है कि थोडी दूर चलने से ही
पैरों में छाले पड़ जाते हैं।
जान पडता है, प्रशस्त प्रान्तर से ईर्ष्या कर के ही यह टेढी
भेढी हो कर घूम गई है । जो हो, मैं तो खुले पैरों प्रान्तर प्रान्तर
राज-भवन की सीध में चल पडता हूँ।
७५
माला
भीष्म की दोपहरी में मैं माला बनाने बैठता हूँ।
तटिनी अपने आश्रयदाता तटों को बार बार जलदान से तृप्त
करना चाहती है, पर भगवान् अशुमाली उसे छीन लेते हैं।
वृक्ष अपने लम्बे लम्बे रोते हाथ उठाये इन्द्र से वर्षा की
प्रार्थना कर रहे हैं।
ताप से बचने के लिए प्राणी निद्रा का प्राश्रय लेते हैं। उस
समय नीरखता से ऐसा प्रतीत होने लगता है कि जीवन-स्रोत भी
गरमी के मारे सूस गया।
ऐसे समय में माला बनाने बैठता हूँ। क्योकि न तो मुझे
किसी का सङ्कोच करना पडता है, न मेरा मन विचलित करने
के लिए कोई कोलाहल है न वा, कोई टोफने वाला।
इन पुष्पो को मैंने इन्हें प्रबोधित करने वाले प्रभात काल में
लोढा था। तब से, इस ऋतु मे । इन्हे मैंने अपने प्रेमाश्रुओं से
सींच सींच कर टटका और हिम-सदृश शीतल परन्तु जीवि.
तोष्मा-पूर्ण बनाये रक्सा है।
एकाग्र एव निस्मकोच भाव से मैं इन्हें गुण में पिरोता जाता
हूँ। उधर इनकी सिँचाई ज्यों की त्यों जारी है।
मुझे जल्दी पडी है कि जिसके निमित्त यह विडम्बना है
उसके गले मे इसे डाल कर कर कृतार्थ हो जाऊँ।
तुम स्वयं प्रारहे हो मेरा मन अबने लगा, मुझे चलने की चिन्ता हुई। समय कटना भारी हो गया । एक एक करके मैंने अपने सब उपकरण समेटे और उन्हें पांधा। निश्चिन्त होकर मैं इष्टमित्रो से विदा हुआ। उनकी आंसू- भरी चितरनो ने मुझे तनिक भी विचलित न किया । वरन चलने का समय ज्यों ज्यो निकट आने लगा त्यो त्यो मेरी प्रस- मता बढने लगी। क्योकि तुम्हारे पास पहुँचने की लालसा प्रबलतम थी। पर यह क्या ? जब चलने का समय आया तब मेरा हृदय क्यो धडकने लगा। मेरा मन क्यो मचल गया। मेरे पैर बेही मे जकडे-से क्या हो गये । देवता क्या हूँ कि तुम स्वय आरहे हो। ७६ उद्देश की सफलता प्रात काल में वाटिका में पहुँचा । चिडियो की चहचहाट, भारो की गुजार और कलियो की चटकाली के सम्मिलन से वहाँ अपूर्व सङ्गीत होरहा था । सुरभित पवन उसी सङ्गीत को गव पर अपनी चाल साध कर चल रहा था। बालाताप भिन्न भिन्न रगो के फूलो पर पड कर नये नये रगों की रचना कर रहा था । मैं उद्देश-हीन होकर फूल चुनने लगा। मेरी टोकरी भर गई। तब मैं माला बनाने बैठा । इस में भी कोई उद्देश न था। पर, कह नहीं सकता, शायद मुझे मालाकारी का गर्व रहा हो । दो पहर के साथ सूर्य की किरणे प्रसर हुई । पर वाटिका के कोमल कुसुमो पर उनका असर न हुआ । क्योकि उनकी सुकुमारता स्वाभाविक थी । वीच बीच में कोयल की कूक से वाटिका को नि स्तब्धता भङ्ग होने लगी। अब धीरे धीरे लोग आने लगे और मुहॅमांगा मोल दे दे कर मेरी मालाएँ ले जाने लगे। सन्ध्या हो चली । पूर्व का सूर्य पश्चिम में आ गया । उदय- काल को जिस अनुराग से उसने अङ्गीकार किया था अस्वकाल को भी उसी अनुराग से अपनाया । पक्षी अपने अपने नीडों को लौटने लगे। सुप्त बालक के मुद्दे पर जिस तरह हँसी झलक जाती है उसी तरह दिन चीत गया । शिखर को जिस भांति धीरे धीरे कुहरा आच्छादित करता है उसी भाँति अँधेरा बढने लगा। मेरी टोकरी कभी की साली हो चुकी थी पर न जाने क्यों मैं अब तक वहां बैठा था। Co इसी समय वे आये और मुझ से माला मांगने लगे। मालामों से टूट टूट कर टोकरी में पड़ी हुई पसडियो को मैंने यन्त्र की भांति इकट्ठा किया और मन्त्र-मुग्ध सर्प की नाई उन्हें अर्पण किया। उन्होने मुझे छाती से लगा लिया। तत्काल ही मुझे वहाँ जाने और ठहरने का उद्देश मालूम हो गया। चूम कर वे चोले-'तुम्हारे पास तो देने को इतना भोघा, मेरे पास तो इसके सिवा कुछ नहीं' । मुझे प्रात्म तक विस्मृत होगया और मैं उसी चुम्बन-सुधा के अथाह सागर में निमम हो गया । 58
,
प्रतिविम्व
निर्मल, नील आकाश में विमल धवल चन्द्र स्निग्ध गति से
चल रहा है।
नाले की यह विस्तीर्ण घाटी उसके मृदु प्रकाश से पालो-
कित हो रही है। प्रत्येक सैकत-कण मे सजीवता सी आगई है।
दूर दूर पर अकेले वृक्ष सडे हैं, जिनकी छाया चन्द्रमा के
साथ अपनी गति बदल रही है। उन पर बैठे पपीहे कभी
कभी, उनके आत्मा की भाँति, वोल उठते हैं।
गुजार करते हुए भृङ्गी इधर उधर उड रहे हैं और उनके
पारदर्शी पवा से छन छन कर भूमि पर पड़ने वाली चांदनी की
सुपमा का क्या कहना ।
यह लो, चन्द्र पीयूप-वर्षा करने लगा, और समस्त घाटी
उसमे भर गई।
भृङ्गी उसकी मन्द धारा पर बैठ कर कुछ दूर तक वहने
फा खेल करके प्रसन्न हो रहे हैं। चातक असमय ही में, अपना
व्रत छोड कर, छक रहे हैं और स्वय चन्द्र इस स्वर्गीय दृश्य
पर मोहित हो कर, प्रतिबिम्ब के मिस से, उत्तर फर उसमें
जलकेलि कर रहा है।
पर क्या यह दृश्य बाह्य प्रकृति का है ?
८२
रुचि
देवता के उस मन्दिर में जहां पूर्ण राजस विभव है, यदि
मुझसे कोई गाने के लिए कहता है तो मैं स्वीकार नहीं
करता । लास लास आग्रह करने पर भी मैं अपने हठ से
नहीं हटता।
पर उस देव मन्दिर में जहां बहुत दिनो से कोई प्राता जाता
भी नहीं, अर्चा की कौन चर्चा ? जो जीर्ण हो कर भग्न हो रहा
है, जिस पर दया कर प्रकृति काई से उसकी मरम्मत किया
करती है, जिस पर छाया करने वाले वट-वृत्त की भी कमर
झुक गई है और जिसके सामने का सरोवर क्या जाने कितने
दिनों से सूसा पडा है तथा पानी में सडी और दीमको फी
खाई उसकी लाट उसके अस्थि-पञ्जर के समान अब लो खडी है,
उस देवालय में विना किसी के कहे, स्वय अपनी इच्छा और
प्रसन्नता से, अश्रु-अर्ध्य प्रदानपूर्वक अपनी हृदय-तन्त्री की
उत्तम से उत्तम और करुण से करुण तान सुना कर मैं कृतार्थ
होता हूँ।
स्थान एक दिन मैंने तुमसे घर बनाने के लिए स्थान माँगा । दूता को आज्ञा हुई कि इसे उचित और रमणीक स्थान दिखा कर मेरे पास लाओ । जो इसे अधिक रुचेगा, दिया जायगा। मैं दूतो के सङ्ग चला। पहले वे मुझे पर्वत-शिसर पर ले गये। बोले-"फैसा उत्तम स्थान है। दूर दूर तक के रमणीय दृश्य यहां से दिखाई पडते हैं। वह देखो, सम भूमि पर की नदियां और जगल कैसे भले मालूम होते हैं। मानो वसुन्धरा ने अपनी अलको को मोतियो की लडो से अलङ्कृत किया है । क्षितिज में रंग-बिरंगे वादल उसकी साडी की भांति शोभित हो रहे हैं। वह, पश्चिम दिशा दिवाकर को अनुरागपूर्वक निमत्रित कर रही है और वह उसे नत होता हुमा सादर स्वीकार कर रहा है। चारो ओर देसते रहिए और प्राण-पूर्य पवित्र पवन पान करते जाइए, पर जी नहीं अघाता।" अब वे एक कन्दरा के पास ले गये-"अहा । इस भूमि को तो देखो। प्रकृति ने मानो इसे सारे ससार से छिपाने के लिए हरियाली में छिपा दिया है। ये निर्भर अपने हिमफयो से यहां छिडकाव किया करते हैं और ये पुष्प इसके पद पर फैले हुए हैं । त्रिविध समीर की इस स्थान से इतनी लगन है कि वह इसे छोड कर जाता ही नहीं। इसके बीच में यह कन्दरा ८४ स्थित है। पर इसमें दोष यही है कि यहां तुम्ही तुम रहोगे। अपने सिवा और दृश्य नहीं देस सकते " उन्होंने कहा । इसी प्रकार अनेको स्थान दिखा कर वे मुझे तुम्हारे पास लाये। तुम्हारे पूछने पर मैंने कहा-"प्रभो, मैं तो कन्दरा लूँगा। जहाँ मैं अपने प्रहवार में मस्त रह सकूँ और अन्य चिन्ता न होने से प्रात्मरति चढे । यो तो पर्वत-शिसर मुझे बहुत रुचा । पर वहाँ हदय की अशान्ति और बढती है। जैसे जैसे नये और, दूर के दृश्य दिसाई पडते हैं वैसे वैसे गोचर के प्रस्तार की फामना बढती जाती है, और " तुमने वीच ही में रोक कर कहा--"तो आओ, मेरी हृदय-दरी में रमो।" ८५
स्थान
एक दिन मैंने तुमसे घर बनाने के लिए स्थान माँगा। दूतो
को आज्ञा हुई कि इसे उचित और रमणीक स्थान दिखा कर
मेरे पास लाओ । जो इसे अधिक रुचेगा, दिया जायगा।
मैं दूतो के सङ्ग चला।
पहले वे मुझे पर्वत-शिसर पर ले गये । बोले-"फैसा
उत्तम स्थान है । दूर दूर तक के रमणीय दृश्य यहां से दिखाई
पड़ते हैं। वह देसो, सम भूमि पर की नदियां और जगल कैसे
भले मालूम होते हैं। मानो वसुन्धरा ने अपनी अलको को मोतियों
की लडो से अलङ्कत किया है। क्षितिज मे रग-बिरगे बादल
उसकी साडी की भांति शोभित हो रहे हैं। वह, पश्चिम दिशा
दिवाकर को अनुरागपूर्वक निमत्रित कर रही है और वह उसे
नत होता हुआ सादर स्वीकार कर रहा है। चारो ओर देखते
रहिए और प्राय-पूर्ण पवित्र पवन पान करते जाइए, पर जी
नहीं अघाता।"
अब वे एक कन्दरा के पास ले गये-"अहा ! इस भूमि
को तो देखा । प्रकृति ने मानो इसे सारे ससार से छिपाने के
लिए हरियाली में छिपा दिया है । ये निर्भर अपने हिमकणो से
यहां छिडकाव किया करते हैं और ये पुष्प इसके पद पर फैले
हुए हैं। त्रिविध समीर की इस स्थान से इतनी लगन है कि
वह इसे छोड कर जाता ही नहीं। इसके बीच में यह कन्दरा
।
अाकर्षण दयामयो प्रकृति ने थके मांदे ससार के विश्राम के लिए उजाला दूर हटा दिया है और नीरवता फैला दी है। मैं भी दीपक बढा कर अन्धकार मे विश्राम कर रहा हूँ। यदि कहीं जुगनू भी चमक जाता है तो प्रांसो में आग सी लग जाती है । अचानक मेरा मन उस धुंधली लौ की ओर जाने को क्यों मचल उठता है जो इस विशाल नदी के उस सुदूर किनारे पर टिमटिमा रही है और जिसकी छाया सुवर्ण-मान- दण्ड का रूप धर के उसकी थाह ले रही है। मैं अपने साज वाज समेट कर चुपचाप बैठा था । परन्तु यह क्या, इस ललित स्वरावली के सग, जो नि स्तब्ध पवन पर हस-गति से चल रही है, मैं तान क्यों लेना चाहता हूँ? और उससे अपने साज क्या मिला रहा हूँ?
-
।
तुम्हारे दूत की प्रतीक्षा, मैं कितनी देर से कर रहा था ।
अपना सदेसा भेजने को मेरे हृदय में मरोर उठ रही थी।
और, अपने संदेसे को वह बार बार बना कर विगाड रहा था।
जो भावना उठती थी उससे जी न भरता था। यही होता था
कि इससे भी बढा हुआ सँदेसा हो। इसी तर्क-वितर्क-मयो
कल्पना के आनन्द में मैं निमन हो रहा था।
तुम्हारा दूत आ पहुँचा । पर यह क्या, मैं उसे देसते ही
अपनी सारी कल्पना और सव सँदेसा भूल भाल कर यही
पूछता हूँ-कहो, प्रियतम ने कुछ कहा है।
.
1
८६
आकर्षण दयामयी प्रकृति ने थके मांदे ससार के विश्राम के लिए उजाला दूर हटा दिया है और नीरवता फैला दी है। मैं भी दीपक चढा कर अन्धकार में विश्राम कर रहा हूँ। यदि कहीं जुगनू भी चमक जाता है तो प्रांसो में आग सी लग जाती है । अचानक मेरा मन उस धुंधली लौ की ओर जाने फो क्यों मचल उठता है जो इस विशाल नदी के उस सुदूर किनारे पर टिमटिमा रही है और जिसकी छाया सुवर्ण-मान- दण्ड का रूप धर के उसकी थाह ले रही है। मैं अपने साज याज समेट कर चुपचाप बैठा था । परन्तु यह क्या, इस ललित स्वरावस्ती के सग, जो नि स्तब्ध पवन पर इस-गति से चल रही है, मैं तान क्यों लेना चाहता हूँ ? और उससे अपने साज क्यों मिला रहा हूँ ? ८७
,
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अशान्ति में शान्ति
कलपती हुई श्यामा भ्रमराली, स्वयवरा कुमारी की भांति
इधर से उधर भटक रही है जिस सुमन-वर की उसे सोज है,
मिलता ही नहीं।
समीरण रसिक के सदृश इधर से उधर मारा मारा फिर
रहा है । वह एक स्थान पर ठहरता ही नहीं । एक ग्रामोद को
हृदय से लगा कर कुछ ही क्षण बाद दूसरे को अपनाता है।
किस आमोद को पाकर उसे चिरशान्ति मिलेगी, इसका पता
ही नहीं।
पुष्करिणी, प्रमदा की भांति अपनी तरंगो से, मर्यादा के
बाहर जाना चाहती है । वह इस पद्म-चन के मधु से छकी ही
नहीं । सरसी हो कर भी वह रस के लिए क्षुब्ध हो रही है।
मचलने वाले बच्चे की तरह कोकिल कूकता है। इससे
उसकी हृदय-वेदना कुछ देर को रुक जाती है। पर वह फिर
खडी होती है और वह फिर हाय हाय कर उठता है।
परन्तु मैं अपनी खिडकी पर बैठा यह सब देख रहा हूँ
और मुझे इस अशान्ति में पूर्ण शान्ति मिलती है।
।
स्वार्थ पाटल, मैंने तुमको इतने प्रेम से अपनाया । तुम्हें तुम्हारे स्वजनो से निलगा कर छाती से लगा लिया । तुम्हारे काटो की कुछ परवाह न की, क्योंकि तुम्हारी चाह थी। कहां मेरा मन इसी चिन्ता मे चूर रहता था कि तुम्हारी पखुरियां दव न जावे । सारे संसार से समस्त चित्तवृत्तियां खिच कर एक तुम्हीं में समाधिस्थ होकर रही थीं । कहां आज वही, मैं, तुम्हे इस निर्दयता, उदासीनता और घृणा से भूमि पर फेंफ रहा हूँ, क्योंकि तुम्हारे रूप, रङ्ग, सुकुमारता और सौरभ सब देखते देखते नष्ट हो गये हैं। कहां तो मैं तुम्हें हृदय का फूल बना कर अभिमानित होता था, कहां आज तुम्हें पद-दलित करने में डरता हूँ कि कहीं कांटे न चुभ जायें। अरे, यह प्रेम कैसा । यह तो स्वार्थ है। क्या इसी का नाम प्रेम है १ हे नाथ, मुझे ऐसा प्रेम नहीं चाहिए। मुझे तो वह प्रेम प्रदान करो जो मुझे भेद-सुद्धि-रहित पागल बना दे। ६
बिदा
मित्रो, जब मैं तुम लोगों से विदा होने लगू तब मुझे परम
प्रसन्नता से विदा करना । मुझे सच्चे जी से आशीर्वाद देना कि
मैं अपनी साधना में सिद्ध होऊँ।
यदि तुम मुझे खुले जी से आज्ञा न दोगे तो मेरे पैर बंधे
से पडेंगे, मेरा जी तुम में अटका रहेगा और मैं एकचित्त से
अपने अभीष्ट में प्रवृत्त न हो सकूँगा। फिर उस की सिद्धि की
.
कौन आशा।
एव,
यदि तुम मुझे सच्चे जी से आज्ञा दोगे तो उस के
मन प्रभाव से मेरा हृदय और भी घढ हो जायगा और मुझे
निस्सन्देह सफलता होगी।
मित्रो, क्या तुम यह नहीं चाहते कि तुम्हारे दीन सखा
की लगन पूरी हो जिससे उसे नित्य और निरन्तर तुम्हारी सेवा
और सङ्गति का सौभाग्य मिले ?
ऑसू
मेरे प्रांसुओ, तुम मेरे हृदय ही में बने रहो, वाहर न
निकलो।
बाहर आकर प्रांतों में वसी उस मञ्जुल मूर्ति को धुंधली
न करो । हृदय ही मे रह कर उसे धोया करो।
वाहर आकर ससार की रूसी हसी का कारण न गनो
हृदय ही में रह कर उसे आई बनाये रहो।
बाहर आकर सूसी धूल मे मिलने के लिए न गिरो । हृदय
ही में रह कर उन पवित्र स्मृतियो को सींचा करो।
तुम मेरे परमनिधि हो, भावरत्नाकर हो-तुम मेरे हृदय से
अलग न हो।
हीरा
हीर, तेरे हीरक होने का क्या यही फल है कि तू वा
बने और अपने साथियो से अलग हो । तू अपना वर्ण सोकर
निवर्ण हो जाय और जैसी छाया पडे वैसे ही रङ्ग का दीख पडे ।
तू फाटा छांटा जाय और उस धनवान् के पाले पडे जो
तेरे समान रिक्त है।
नहीं, तू कोयला ही बना रह और दूसरों के लिए जल कर
उन्हें ऊष्मा और प्रकाश प्रदान कर ।
१२
वन पाटल हे प्रकृति के पुत्र, प्रिय होने के कारण उसने तुझे अपने क्रोडा-कानन में स्थान दिया है। कृत्रिमता में तू नहीं फूलता । तत्त्व तेरी सेवा में नियुक्त हुए हैं,-विशाल आकाश तुझ पर छाता लगाता है और उन्मुक्त पवन तुझे प्राण प्रदान करता है। सूर्य का कर्तव्य तुझे ऊष्मा एव वर्ष देना है और सजल जलद नम्न होकर तुझे रस अर्पित करता है । धरणी-पर्वत की कठोर- हृदया धरणी-तक को तुझे अपने हृदय में स्थान देना पड़ता है। शिशिर में तुझे शीत से बचाने के लिए तुषार तेरे अङ्ग प्रत्यङ्ग को सुदृढ बना देता है, जिससे तू वसन्त पाते ही लह- लहा उठता है। मधु-मक्षिकाए अपना मधुर गान सुनाती हुई तुझे अपने, मधु बहाने वाले होठों से प्रेमपूर्वक बार वार चूमा करती हैं। न तुझ में प्रांसों को दुसाने वाला चटकीला वर्ग है न मस्वक को पीडित करने वाली उग्र गन्ध । हे स्वभाव के सन्तान, न तुझ में सुमन का सहज सौन्दर्य ढकने वाला पर्दा-सडियों का पटल-समूह-ही है। ६
अव्यर्थ श्रावेदन
अकिञ्चन किसान, तू समझता है कि अपने क्षेत्रपति से
तू ने जो आवेदन किया है उस पर उसने ध्यान भी न दिया
होगा । सारी रात तू ने करवटें बदल बदल कर काटी है और
वेदना के मारे तू छटपटा रहा है। ऐसे महान के मन मे ऐसी
छोटी बात स्थान भी नहीं पा सकती, यही चिन्ता तुझे मारे
डालती है।
परन्तु कदाचित् तुझे यह ज्ञात नहीं कि वह ऐसी ही ऐसी
अनेक लघु याचनाओं के बोझ से गुरु बना है। तेरे जैसे कितने
ही उससे, निवेदन करते रहते हैं और वह सब की सुनता है
एव उन सब पर उचित विचार करना उसी का सामर्थ्य है
विना उसकी दशा देखे ही कोई बात निश्चित न करले ।
तनिक प्रासें सोल कर देस तो। पानी के भार से नत मेघ की
नाई वह सदैव अपनी प्रजा को आच्छादित रसता है और जहाँ
जितने की आवश्यकता होती है वहां उतनी बूंदो के रूप में वह
उच्च प्राकाश से भूपतित होता है।
क्या यही तेरा सौभाग्य नहीं कि तेरे आवेदन पर वह
विचार करता है और तेरे लिए अपने उच्च प्रासन से नीचे
उत्तर प्राता है।
तू इसका गर्व कर।
मृग-मरीचिका
अरे, तू धैर्य क्यो नहीं धरता, चिन्तित होने की क्या
बात है?
जिस तृष्णा के कारण तू भटकता फिरता है वह यद्यपि
बुझी नहीं है परन्तु उसके लिए भटकने में तुझे क्या सुस नहीं
मिलता?
जिस समय पसेरू अपने अधजले तरुकोटरों में प्रचण्ड
पिपासा को किसी प्रकार दवा कर पुट-पाक की तरह पक से
रहे हैं, उस समय भी तू जीवन के लिए इतनी दौड धूप कर
रहा है, क्या यह घोडा है ?
जो तुझे इस मरुभूमि में लाया है, जिसने तेरे मृगनयनो
के तारो में अपनी विमल ज्योति से समा कर तुझे यह मरी-
चिका दिसाई है, इस मरीचिका का कारण भी जिस का प्रकाश
ही है, वही तेरी दारुण तृपा बुझा कर तुझे पार लगावेगा।
. पूर्ण-चन्द्र हे अमृत बरसाने वाले पूर्ण चन्द्र, हे ससार को शीतल करने वाले पूर्ण चन्द्र, हे कृष्ण-आकाश को उज्ज्वल करने वाले पूर्ण चन्द्र, हे रत्नाकर को आनन्दोन्मत्त करने वाले पूर्ण चन्द्र, हे दिन भर के व्यथित कमलो को विश्राम देने वाले पूर्ण चन्द्र, हे धरणी के कुमुद नेत्रों से देखे जाने वाले पूर्ण चन्द्र, हे उपल को द्रवित करने वाले पूर्ण चन्द्र, हे मल्लिका को हँसाने वाले पूर्ण चन्द्र, हे नलिनी से मकरन्दाय॑ पानेवाले पूर्ण चन्द्र, हे प्राची के शिरोरत्न पूर्ण चन्द्र, हे पृथ्वा को अपने करो से लपटाने वाले पूर्ण चन्द्र, हे चन्द्रिका का वितान तानने वाले पूर्ण चन्द्र, श्यामपन-पटल में सुनहली किनार लगाने वाले पूर्ण चन्द्र, हे अङ्गार चुगने पर भी चकोर को जीवित रसने वाले पूर्ण चन्द्र, तुम अमृत-वर्षा से मेरे मानस को भर दो और अपनी छाया द्वारा निरन्तर उसमे सेला करो। मैं केवल यही चाहता हूँ। हे तुम्हारे लिए ग्राम के लोगो को बहुतेरी वस्तुओं की प्रावश्यकता पडती और वे मांगने मेरे पास आते । मैं द्वार बन्द करके बैठा रहता और वे मटखटा कर लौट जाते। दूसरे दिन, मार्ग में, यदि वे उलहना देते तो मैं कह देता कि "मैं ने तो समझा था कि पवन होगा। यदि कभी भूल से कपाट खुले भी रह जाते तो उनके पैरो की चांप सुनते ही मैं व्याज-निद्रित हो जाता। या दिया बुझा देता। जन वे इसकी शिकायत करते तो कह देता कि-"दिन भर का हारा थका रहता हूँ, पडते ही सो जाता हूँ।" किवा "चिन्तावश दीपक वालने की सुध ही न रही।" अगर कोई और भी पका हुआ तो वह, जन, जहाँ सामना होता, अपेक्षित वस्तु मांगता । पर मैं गिडगिडा कर कह देता--"वह मेरे पास नहीं, घर देस लो । हाय । तुम्हारी सेवा फरने से वञ्चित रहने का मुझे दुस है।" इस प्रकार ससार पर मैं ने अपनी कपट-वृत्ति का क्षय और व्यय करके अपने निष्कपट-भाव एव सर्वस्व का रक्षण तथा पोपण किया है। जिससे आज मैं तुम्हारे सामने अपना, सुर- क्षित, शुद्ध हृदय से सञ्चित और परिवर्द्धित सर्वस्व लेकर उप- स्थित हुआ हूँ। , , १०१
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चिर समाधि
जिन आँसो ने बहुत कुछ देखा है उन पर तुमने परदा
डाल दिया है। जो दृश्य उनमें बसे हैं वे निकल न जायें, इस
लिए उन्हे तुमने बन्द कर दिया है।
मेरे सम्पुटित हृत्कमल को तुमने प्रस्फुटित कर दिया है,
और जो भ्रमर उसमें वध कर गुनगुनाया करते थे वे उह
.
गये हैं।
मेरे हाथ में जो दीप था उसे समीर बुझा चुका है अत मैंने
उसे अलग रख दिया है।
मेरी प्रास चन्द है, हृदय खुला हुआ, हलका और नीरव
है, तथा दोनों हाथ साली हैं।
अब तो मैं उन्हीं घश्यों के देखने में निमग्न हूँ।
१०२
मृत्यु
मृत्यु । तुझसे बढ कर ससार मे मेरा और कौन है, तू
मुझे अनन्त जीवन प्रदान करेगी।
जब सारा ससार मुझे छोड देता है तब तू मुझे अपनाती
है, और मुझे जर्जरित पिञ्जर से छुडा कर नये नये दृश्य
दिसाती है।
आधि व्याधि की असीम यातना से छुडाने के लिए तू ममता
के मारे चिरशान्ति का विशाल वितान तानती है।
जन जन तू मेरे पास आई है तब तब मैं ललक कर तुझसे
मिला हूँ। और अपने प्रेम की पूरी परीक्षा दे चुका हूँ। तूने
उसमे मुझे पका पाया है और फल में क्या इस धार तू सदैव
के लिए मुझे वन्धन-विमुक्त न कर देगी ?
१०३
उद्धार
दुस से उद्विग्न होकर मैंने निश्चय किया कि ऐसे जीवन
से मरण भला।
पावस मे नदी बढ कर असीम हो रही थी। महानद भी
उसकी प्रतिस्पर्धा न कर सकता था । उसके प्रवल वेग और तुमुल
तरङ्गों का क्या कहना। मैंने अपनी नाव सोली और सोचा कि
आज जल-समाधि लगेगी।
नाव पलक मारते धारा में पहुंची और वहां भंवर मे
चकर खाने लगी। लहरो के थपेडो ने उसका पेंदा तोड दिया
और शीघ्रता से उसमे पानी भरने लगा। अब मैं अधीर हो
उठा । पानी में दम घुट कर प्राण निकलने की कल्पना को भी
न सह सका।
आज मुझे जीवन का मोल ज्ञात हुआ । उसमे दुख
कहाँ ? दु ख तो जीवन के प्रभाव मे, अकर्मण्यता में है।
मैं कर्मो मे भागता था अत इतना दु सित था। वाध्य
होकर, किसी प्रकार शरीर-यात्रा करनी पड़ती थी, इससे ताश
दुस नहीं जान पड़ता था, जितना आज उस यात्रा से विरत
होने के प्रस्ताव मान से हुश्रा ।
मैंने हृदय से चिल्ला कर तुमसे कर्म करने का प्रण किया।
जो सव शक्ति मुझमें न जाने कहाँ छिपी हुई थी, प्राज
प्रकट हुई। और, मैं नाव को से कर किनारे की ओर लेही तो
१०४
श्राधाराधेय
हम कितनी ही वस्तुओं को शब्द द्वारा सोचते हैं और
कितनी ही ऐसी हैं जिन्हें हम कल्पना-चित्रों द्वारा ही देख सकते
हैं। परन्तु और भी कितनी ही ऐसी भावनाएँ हैं, जहां शब्द या
दृष्टि की गति नहीं है परन्तु नीरवता और प्रदर्शन सदैव उन
वृत्तियों में विहरते रहते हैं और हमें वे तभी ज्ञात होती हैं जब
उनकी आवश्यकता पड़ती है।
विद्युदग्नि सदैव जलधर के साथ ही रहती है, पर उसे उस
का ज्ञान नहीं रहता । सयोग से यह प्रकट हो जाती है।
यदि तुम न होते तो मेरा अगाध प्रेम कैसे प्रकट होता।
क्या वह म्लान कलिका के सौरभ की भांति मेरे ही सग नष्ट न
हो जाता?
१०७
समुद्र-तट समुद्र-तट पर बैठ कर मैंने क्या देखा? मेरे सब साधो डोगियो पर बैठ कर मोती निकालने चले गये थे, पर मैं आलस्य और कायरता से समुद्र-तट पर ही रह गया था। एक तो मैंने यह देसा कि सागर प्रतिक्षण सौवर्ण-सकत- वेला को अपनी तरङ्गों से सींचा करता है तो भी उसकी पिपासा नहीं बुझती । दूसरे मैंने यह भी देखा कि वह रत्नों के गजरे के समान, इन्द्रधनुष के वर्णो से रञ्जित, फेन-माला उसे पह- नाया ही करता है, किन्तु देसते देसते वह रुचिर माला अपना विचित्र वर्ण सो देती है और टूट फूट कर उसी बालू में विला जाती है। चित्र-विचित्र सहस्रों शुक्ति-शड्ढों को वद्द तट पर छितरा देता है और कुछ ही क्षणो वाद उन्हें फिर वटोर ले जाता है। परन्तु सब से बढ़ कर मैंने यह देसा कि मैं क्रीडावश सागर को कभी कभी अपने हाथों से लहरा देता और यह समझता कि वे लीला-लहरियां उसको लोल कनोल-मालाओ मे उसी क्षण लीन हो जायेंगी किन्तु देखता कि उनका आन्दोलन क्रमश मन्द होता हुआ भी ठेठ दूसरे तीर पर जाकर ही शान्त होता ।
श्राधाराधेय
हम कितनी ही वस्तुओं को शब्द द्वारा सोचते हैं और
कितनी ही ऐसी हैं जिन्हें हम कल्पना-चित्रों द्वारा ही देस सकते
हैं। परन्तु और भी कितनी ही ऐसी भावनाएं हैं, जहां शब्द या
दृष्टि की गति नहीं है परन्तु नीरवता और प्रदर्शन सदैव उन
वृत्तियो में विहरते रहते हैं और हमें वे तभी ज्ञात होती हैं जब
उनकी आवश्यकता पड़ती है।
विद्युममि सदैव जलधर के साथ ही रहती है, पर उसे उस
का ज्ञान नहीं रहता । सयोग से वह प्रकट हो जाती है।
यदि तुम न होते तो मेरा अगाध प्रेम कैसे प्रकट होता।
क्या वह म्लान कलिका के सौरभ की भांति मेरे ही सग नष्ट न
हो जाता ?
क्रीडास्थल जानते हो, नींद के सेलने का स्थान कहाँ है ? बच्चों की उन खिलवाडी आंसो में जो समदर्शी हैं और जिन मे अलौकिक प्रेम भरा है। जो समग्र विश्व को स्वर्गीय दृष्टि से देखती है और जिन से आनन्दमय मुसकराहट की किरणें सदा फुरा करती हैं। जानते हो, पवन ने अपने खेलने के लिए कौन स्थान चुना है ? उन उपवनो में जहां उसके पहुँचते ही हर एक कली खिल उठे और उसे अपने प्रामोद से भर दे। जहां वह मधुपान से झूमता हुआ और लताओं के अटपटे जालों में अटकता हुआ एव उनसे पुष्पाञ्जलियां पाता हुआ चल सके । जहाँ भ्रमरावली उस के आगमन से चञ्चल होकर उस का गुण गान करने लगे और जहां कमलरजोरञ्जित सरोवर के कण उड उड कर उसे शीतल एवं अनुरक्त करे। जानते हो, चन्द्र ने अपने सेलने का कौन स्थान बनाया है ? उस निसरे नीलाकाश में जिस में से उसका सौन्दर्य फटा पडता है । जहाँ वह जगमगाती तारकाओं की प्रभा मन्द करता है। जहां तक पहुँचने का उद्योग चकोर वारवार करता है पर न पहुँच कर आशा के सुख से जीवन धारण किये रहता है। और जहाँ से वह ससार मात्र पर अमृत बरसाता है। नदियो ने अपने खेलने का स्थान अपने जन्मदाता पहाडो की गोद में रक्खा है। जहाँ वे एक चट्टान से कूद कर दूसरी पर जाती हैं। जहां वे ढोकों के सग सेल कूद मचाती हैं और छींटे १०८ उडाती हैं तथा प्रसन्न हो कर फेन-हास्य हँसती हैं। जहां वे अपनी ओर झुकी लतालियो का हाथ पकड कर उन्हें अपने सग ले दौडना चाहती हैं। जहां उनके बाल-सघाती तुप उन्हें अपनी अङ्कुराङ्गुलियो से गुदगुदाते हैं और वे तनिक सा उचफ कर तथा वक हो कर बढ जाती हैं। जहां वे लडकपन के भोले भाले मन- माने गीत गाती हैं और उनके पिता उनके प्रेम से उन्हें दुहराते हैं । और जहां वे पूरी उँचाई से वेग के साथ कूद कर गढों में आती हैं और आप ही अपना दर्पण बनती हैं। और जानते हो, मेरे मानस ने अपने सेलने का स्थान कहाँ रक्सा है ? जिनका विलास-स्थान भी मानस ही है उन चरण- कमलों मे । जिन्हें मेरा मानस सदैव अपनी तरङ्गो से चूमा करे । जिनके मधुर मधुपान से यह छका रहे। जिन के पराग से यह पविल बने और जिनकी रतनारी छाया से यह रनाकर की छवि को मन्द करे। १०६
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