Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mysteries Of Figures

Prasad,jaganath · 2011/01

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अपितास
[३६]
१२३१००
२४३१
३४१२-३६
४३१ गमल
४४१२८४५
२१६मलग ३
३
४२१३
४४१२८१८
:
२१३ मलग-३
..
साराश यह है कि मिथिताम मे एक के नियम दूसरे को उपयुक्त नहीं । जे
उपरोक्त नियम घ टप्त करने के लिये १२३७७ को १२३४४ मानना पड़ेगा । पतद
केवल सिद्धांत समझ लेना अलम है निशेष गोरख धंधे में पड़ने की आवश्यकतानहीं
मिश्रिताको के नष्टोदिए ध्रुवाक की रीति से ऊपर बताये गये है एरन्तु मुख्यत इज
सूची और प्रस्तार भेद की गति ही समझ लेना पर्याप्त है।
इति श्रीप्रकविलासे भानुफान विरचित मिश्रिताफ नोदिष्ट
वर्णनन्नाम त्रयोदशो विलास ।
--

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153VERSESED
2424
॥ श्री ॥
अङ्क विलास
OR
MYSTERIES OF FIGURES
जिसमें
अकपाश विद्या विषयक सूची, प्रस्तार, नष्ट और उद्दिष्ट के नियम
और उदाहरण अत्यन्त सरलतापूर्वक दिये हैं और १ अक से
लेकर परार्ध (शग्व) सव्या तक ज्यातिष, गणित,
पुगण, भूगोल तरा व्यवहार सम्बन्धी अनेक मनोरंजक
उदाहण भी विद्वजनों के विनोदार्थ लिखे है ।
15
EIR
जिने
छदःप्रभाकर प्रणेता
साहित्याचार्य जगन्नाथप्रसाद रायबहादुर उपनाम "भानु"कवि
रिटायर्ट इ० ए० कमिभर न निज यवालय जगन्नाथ प्रेस
पितामपुर (म० प्र०) मे छाप कर प्रकाशित किया।
HEREEEEEEEEEEE
AuntaITATUTILAtuliSTALE
प्रथम बार
सन् १९२५
मूल्य २)
१००० प्रति
न प्रथकामवाधिकार विजेचा कसापान है।
SELETERNET
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समर्पण
I
श्री गुरु पिडल ज्ञाननिषि, सुगम सुझायो बंथ ।
वारवार पद वंदि प्रभु, करहुं समर्पण अंथ ।।
करहुं समर्पण ग्रंथ, स्वापि भव करुणालागर ।।
अंकविलासहिं करहु सुफल, जरा छंट प्रभाकर ।
भेद सकल दरसाय, जगत से कीन्ह्यो माल ।
सदा रहो अनुकूल 'मानु, श्री गुरु हित ॥
दीन्दास,
जगन्नाथप्रसाद-'भानु।
1

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INTRODUCTION. am vēly grateful to tho Hıdı loving public for their lind appreciation of my $100tises on Hindi Rhetoua (Kavya pinblinkar) and on Hindi polsification (Chhanda- Plablakul) Thio foinen, a bully book, has found place in almost all the important lıblalles in India, while tho latter has been finally prescribed as a text book for the B A course by tho Palna Unirousity Chhanda-Prabha- Lar contains the simplest formulae foi finding out the combinations and permutations of ranous metrical quantities and syllables Eseu suce its jublication, I have been thuling as to whethar santlı tl formulae could also be dovised for the cardinal numbers 1 tu 9 and then yıllous combinatious, either by repetition ÓL omission and I am glad to say that my attempts have been crowned with success 3 2 The old mathematicians have confined their qules only to the finding out of the total number of combinations and the total number of permutations, but beyond this thoy have not fwrnod any rules ou devised any method for finding out the exacta' position of any particular permutation desized 01 fol stating the exact number of a particular permutation given In the abseuce of any dèfinite or fixed iule, the permutations are generally worked out at randon oz in u haplizzard minuei Foi mstance, if 2 persons sit together to work out permutations of the foui figuies 1, 2, 3, 4, each may have a tablo OC different odon, although the results of both may happen to be the same. Vuless the wholo odei 19 umfonly maintained, it is impoguble to find out the przticular position loquired or to stuto the number of any particular position gisen 4 This is quite evident from tho fact that even the distinguished inathematicians of the past paid httlo 0400atteuliou to this important and interesting subject For instance, I find a very small combination of 1, 2, 3, worked out in different order in. Lilawati and the highel Algebra of Hall and Knight now taught in the English Colleges I 2 Serial no Lilar ati. Ny merliodor Higher \lgebra 13.377111 Siddhant Remarks In figures In "JP 1-'In 100 letteri'yurcsletters figures lett is 1 f 1 389 128 wbo 123 abc 223 abc 398 132 aob 132 acb 132 acb $ 3 893231 ber 931** ba2 213 Luc *lho v arrangomelits around in in Scionuifio order 10 tothor 839* 213 bno 213* bac 031 bca imipreosop 2011 "ATPL0367 5 OS3 331 oba 3123 cab 319 cib G 1938 312 cab 321 cl2 321 cba ܚܝ 1 - 1 + - 5 Thns in Lilniati, th3 314), 4th, 5th, and oth positions nad iu tha huyol t'zu'na tha 3.1 n ? 4tl positions alo not in xin viscientifis Iolls., while the beginmug in buth 19. correctie Suol 1- the unlanes condition of thy sunllogt combivation of 3 figaros 31oring ouly o per njutations, nat to sponk of noro figures inxulving por urututiva: uumbeuing hundreds of thousands - OL Pole - ; 0. Vy nothod is based on fired ulos which clearly indicata th3 orict positie 11 of each ordou so tilat nothor the 5th ain ever bo the Atli odai i on thb 4th CiU OI Ql be the 5th ordai, and so on, 'Tac's poin utition has its owy five position It will also ba obsaused that the last outler according to iny method, is just tha roro14g of the first order anıl this 19 quite a natulul prgc099 in nokiug out a'i tho possible perniutatious, 7 My method will be found quito in confiimity with tho simple and natural older alld 15 di-penses with the necessity of tas vary complicated Algebraic eystom It 19, thoroforo, a step further in advanco 'of tho discoveries hithoi tomado 'in' the mithimatio il reso vroes and it may also prove useful in 'musicas į salvace as well as'ın ré zinontal or academical amuşoments, 1 men 8 Mited numbers have also beon doalt with by rondopt ing the simplost founo I have iso addod other jutoiesting mutter consisting of alious poems and proverbs con octod with matbonatıcal puzzles, astropony, mythology, yeography, morala and practico in orory sphere of lifu to wako tho book as attructra and instructivo as possible 9 With these few remarks, I renture to place this humbla noik, Anl. Vilus" befoio the learned pablic for their kid Acceptanco Bilaspur, CP JAGANNATH PRASAD 'BHANU Retied EC Bilaspur, CP. The Oth March 1921

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भूमिका । - व मे मैने पर प्रभाकरादि प्रथो की रचना की है तब से में इस वात का ज विचार कर रहा था कि जैसे छदो के प्रस्तारादिक के नियम रियर किये गये है वैमेही नियम अको के भी स्थिर होसके हैं या नहा । परन्तु अनावकाश के कारण इधर पूर्णरूप से ध्यान नही देसका । साम्प्रत कुन अवकाश मिला तो विचार करतेही श्रीगुरु पिंगलाचार्यजी महाराज की पूर्ण करा रष्टि हुई और ये सब नियम सरलतापूर्वक बन गये जिन्हें अब में ग्रन्थ के रूप में सजाकर विद्वानों की सेवा म उपस्थित करता है। २ आजकल पाठशालायो में जो अकगणित और वीजगणित की हिन्दी या अंगरेजी पुस्तक पढ़ाई जाती है, उनमें इस माफ पाश विद्या की ओर ध्यानही नही दिगा गया है। हा, इतना तो अवश्य है कि अमुरु अझ-समूह के इतने भेट हो सक्त है। इसका उनमें विधान है। परन्तु उनका प्रस्तार कैसा निकाला जावे, प्रस्तारातर्गत अमुक भेर का रूप केसा होगा या दिये हुये रूप की अनुक्रम सख्या क्या है, इन बातो का कहीं उल्लेख नहीं पाया जाता । सबसे प्राचीन अथ लीलावती में भी प्रस्तारादि के नियम नहीं दिये गये है।हा, एक स्थान पर तीन अफी का प्रस्तार मिलता है। परन्तु वह भी क्रम पूर्वक नहीं है । सभव है कि यह टीकाकार की करामात या कल्पनाहो क्योकि मूल लोक मे तो उसफा पताही नहीं। अस्तु, इसी प्रभाव की पूर्ति के लिये यह ग्रथ लिखा गया है यदि कोई गणितज्ञ महाशय इससे भी और कोई सुलभ रीति निकाल कर प्रकाशित करेंगे तो वे अपश्य धन्यवाद और सुयश के भागी होगे। प्रकपाश विद्या द्वारा सगीत विषयक सप्तस्वरा के भेदोपभेद तथा उनके भिन्न भिमा रूप भी तत्काल ज्ञात हो सक्ते है। पाठशालायो में भी मनोरजनार्थ नाना प्रकार की शिक्षाप ( कवायद ) हो सक्ती है। ३ इसमथ में गढ़ वैज्ञानिक शवों के बदले सर्व साधारण के समझने योग्य सरल शब्दो का प्रयोग किया गया है, जैसे अगरेजी वैज्ञानिक इस अथ में Product Combinations Poimutations Quotient Direct Converse घात एकादि भेद मक पाश भजनफत अनुलोम प्रतिलोम, विलोम व्यतिक्रम, उत्तम गुणनफल अरु समूह या मूलाक मूलाक के प्रातरिक भेद सन्धि सरलगति विपमगति अंत में पाठको के मनोरजनार्थ नय अक का माहात्म्य, अगरेजी तारीखों से पार निभानने के नियम कुछ कौतुकाक और एक वरन् अ पानी भी सम्मिलित फरदी गई, जिसमें प्रासेलेरपराध (आधुनिक शस)सयातरु गणित प्योतिष, पुराग भूगोल त्या व्यवहार सम्बधी अनेक मनोर तक और शिक्षाप्रद उदाहरण दिये है जो विद्यार्थियों के लिये अयन्त उपयोगी है इनके पठन-पाठन मे योहान थोड़ा विनोद अवश्य होगा और अंक सम्बन्धी कविता फठस्थ करने से विद्यार्थिाद्धि भीती होगी। प्रश करने पर जोजिलनेअधिक पर इस प्रथ सेवा इसके अतिरिक्त अपनी कल्पना रो और भी कहोर जिस मफेगा बाद दूसरे की अपेक्षा अनादी अधिक प्रीण और समा चतुर समझा जायेगा । इन्हीं समस्त वालो को विद्यारकरने इस प्रथका नाम"नांकविलास' रखा है। यदि इससे पाठको की कुछ भी जाम होगा तो ने अपने को हर-हर समूगा। इत प्रथ को हरभिक अवस्था में साहित्य प्रेमी श्रीयुत गोगनवाम की अगरवाला, पी ५ जिस्यूटर जनियर मध्यप्रदेश ने मुझे संक्षायता की एतदर्थ जनको प्रने धन्यवाद देता। , । पिलासपुर } दिनीत, जगन्नायासाद (भानु) लाः ६ मार्च १६२७ सूचीपत्र। विलास सख्या विषय पृष्ठ १ ६ २ ३ ur ८ ह ११ समर्पण और भूमिफा आदि में भिनाक परतार प्रस्तार सिद्धात नोदिए नष्टोदिष्ट प्रदर्शन चल प्रश्न प्रस्तार चक ૨૨ मिश्रिताक सुचीभेद मिथितारु प्रस्तार खड प्रस्तार ध्रुधाक अनुकम सख्या योग प्रस्तार भेदान्तर्गत सख्या योग मिश्रिताक नष्टोदिष्ट गृहीत मुक्त रीति कौतुकाक एकाकीय करण ४५ की विशेषता नव के अफ का महत्व ४७ अग्रेजी तारीखो के दिन ५२ दत्तिण वाम गणित नारगी प्रश्नविनोद श्रायु कथन सख्या प्रमाण अक यत्र अफमयजगत प्रकपदावली से परार्ध (आधुनिक शख) सख्या तक ६७-१५१ परिशिष्ट म सरहत सख्यावली २५२१५४ ४० ४४ --- ... २१ ૨૨ २३ २४ .

- * ។ ។ - ॥ श्रीगणेशायनमः ॥ अङ्कविलास - मंगलाचरणम् श्री गुरु पिंगलरायके, चरण यदि अभिराम । भानु मुदित अफित करत, यक विलास ललाम ॥१॥ अंकमयी यह जात है, अकहि परम प्रकाश । अजान विन जगत में, नाहिन बुद्धि विकाश ॥२॥ भक उखटि अफहि हरो, 'तो मायां अलगाय । 1 शुद्ध ब्रह्म नवः रूप मे, दरगत हिय हरपाय ||शाँ यथा-७३-३७७३६६ ना व्यापक सब अज मे, ब्रह्म जीव सम लेख । ज्ञान चक्षु लखि लीजिये, चर्म चक्षु नहिं देख ॥४॥ इक नव मिलि उन्नीस है, निनके दस रहिज़ात । इसके पुनि एकहि रहत, 'एकैदि एक, लखात ॥५॥ यथा,११६ ०,१०१ काव्य प्रभाकर में लिख्यो, नव महिमा उल्लास । अंक विलासहि प्रा लिखत, युजन बुद्धि विलास ॥६॥ अंक शास्त्र ; मर्मज्ञ. हिस, 'हुइहै! परम प्रमोद । काच्य रसिक गुणवन्त कर, सहजहि बुद्धि विनोद ||७|| राम नाम इक अंक है, सब साधन है. मन'। अक, गये कछु हाथ नहि, ग्रा रहे दसगून' ॥८॥ मर्म सु अक विलास को.. समुसतं परमानन्द । भाग्यान्त" वृश्चिन्त "लह, भक्ति सचिदानन्द ।।६।। -- न Final [२] अंकविलास। सरनांक प्रस्तार लिखने के पूर्व मात्रायो, वर्णा और अझो के भेदोपभेद का नीचे एक तुलनात्मक कोष्ठक लिखते हैं - १ ३ ५ w ७ ८ मात्रा २ ३ ५ ८ ३४ वर्ण २ ४ ८ १६ | ३२/६४ १२८ २५६ प्रक १ २ ur ६ २४ १२०/७२०५०४०/४०३२०३६२८८० मायानो और वर्णो के भेदोपभेदो का ज्ञान पिगल के प्रथो से वा मेरे रचित छंद प्रभाकर प्रथ के देखने से हो सकता है और अंको के शानार्थ यही प्रक विलास ग्रंथ आपकी सेवा में उपस्थित है अकसमूह वा मूलांक (Combination) अकपाश वा भातरिक भेद (Permutations) भिन्नाङ्क प्रस्तार भेद अक १ से लेकर ६ तक है । शून्य की गणना अको में नहीं है। (१) सूची (Index or Indicator of Permutations ) प्रत्येक अक समुहके जितने भेद हो सक्ते है उनके जानने की विधिको सचो कहते है एक, एक, दो दो रहै, त्रय पट, चौ चौवीस | पंच एक सौ बीस पुनि, छहो सात सौ वीस ।। सात अफ के भेद है, पंच सहस चालीस । पृथक पृथक् सव अंक की, सूची भल जगदीस ॥ भक २ ३ ६ १ २ भेद सख्या ६ २४.१२०७२०/५०४० ऐसेही-%3D४०,३२०, ६-३,६२,८८०। (१) एक अक के भेद को, अगले ते गुनि लेव । गुणन फलाहिं सम जानिये, सफल भेद के भेव ॥ जैसे.-३ के २४३-६ तो ४ के ६x४-२४ क अफार्षिजाता (३) । २ मिमांसी के भेद २ २ 'जग (लघु गुज) (२) २ गत (गुय जा) ३ भिन्नाको के भेद ६ (२) श्लोक:--लोमंग लुग्म मालागम् । मगलं गुल्म गोमलम् ।। 'अत्रय विभिन्नच । प्रस्तारादिपु योजयेत् ॥ (सक्ताक्षर) लन्न अफ । ममध्यम अरू । ग-गुरु घ्यया । जसारो जघु ससस्स्यात् । मझारो मध्यमरता॥ गारी गुरु मतव्यः । प्रस्तारादिक सुचका।। (१) १ २ ३ लोमग जघु, मध्यम, गुरु । (२) .१ ३ २ लुग्म-लघु, गुरु, मध्यम । (३) २ १ ३ मालांगम-मध्यम, लघु, गुरु । (४) २ ३ १ मगजम्मभ्यम, गुरु लघु। (५) ३ १ २ गुल्म-गुरु, लघु, मध्यम । (६) ३ २ १ गोमलम्-गुरु, मध्यम, लघु । लोमग प्रथम मन्ये, लागमञ्च द्वितीयकम् । मालागतु तृतीय स्यात्, मगलच चतुर्थकम् । गुल्लच पचम प्रोक्त, गमल पष्ट सूचकम् । अत्रय विभिन्नच, पइभेदाः कथिताः क्रमात् । (५) भ्यान रहे कि तीनो अक. पृथक पृथक् हा, ऐसे तीन प्रमो में जो सबसे "लघु हो उसे "ल" समझो, जो सध्यम हो उसे " म" समझो, और जो सब से बडा अर्थात् गुरु हो उसे "ग" समझो । तीनो अक सहित जो सबसे छोटा रूप बन सकता हो वही सरल अर्थात् प्रथम भेद होगा ।नीचे बहो भेद लिखते है। भेद अफ प्रक प्रक प्रक संगानुसार भेद १ १२३ ४७६ ५८७ ७४६ ७५८ २१३ ४२३१ ३८६ २७६ ३९८ ६२७ ६७२- ८९३, ७२६ ६३८ ७६२ ६७६ लमग (पहिला) ६६७ लगम (दुसरा) मलग तीसरा) मगल (चौथा) गलम (पाचवा गमल (छटा) ७हट ७८५ " इट७ ८५७ "३२१, १८३' ६७४ ८७ [] अमितास। - - (4) एक अंक दोयार न हो-जैसे-११२ या १२२ । (७) प्रथा भेद का उल्टा अतिम भेद होगा। (८) यदि को के सिपाय किन्हीं अक्षरों, फूल, फ्ल, राधा अन्य वस्तुओं का प्रस्तार करना हो तो प्रत्येक में १, २, ३ इत्यादिक मूल्य निर्धारित करना होगा। (e) पहिला पति में जो ऊपर से नाचे जाती है ल, ल, म, म, ग, ग अवरण क्रमानुसार पायेंगे अर्थात् १, १, २, २, ३, ३ । उपरोक्त नियनों को दूसरी कार से समझाते हैं। (१) १२ ३ लमग-लोमागो इक प्रभु पद प्रीति । (२) १३ २ लगम-लोगोमें दुविधा अनरीति ॥ (३) २१३ मलग-मालग त्रिभुवन पति उपकार । (४) २३ १ मगल-मगल चारो फल, दातार ॥ (३) ३ १२ गलम-गैलमजु पचन की धार। (६) ३ २ १ गमल-गोमाला पट् हरै विकार ।। पुनथ (१०) अंग अंग लीला मम गग, विपम घटै सम बढे तरंग । तीन अक प्ररतार प्रसंग, नष्टोद्दिष्ट एकही संग। अंग-वेद क छै भंग, अग अग प्रत्येक अग । लीला ममगग आदि पति जो ऊपर से नीचे की ओर जाती है उसमे क्रमानुसार ल, ल, म, म, ग, ग होते हैं । विपस घटेवियम मेदो में (१, ३, ५। तरंगें घट जाती है और सम बड़े-सम भेदो में (२, ४, ६) तरर्गे बढ़ जाती है यया.- १पिम मे २३, तो २ सम मे उलटकर ३२ ३ विषम मे १३, तो सम में उलटकर ३१ ५ विपम मे १२, तो ६ सम में उलटकर २१ विपन और सम मे सदाह का अन्तर रहता है यथा.- २३, ३२ अन्तर-६ १३, ३१ अन्तर--१८,१+८ १२, २१ अन्तर- नष्टोहिट-इन्हीं तीन अंको के प्रस्तार प्रसंग मे 'लीलामम गंग' रूपी सून या मप्र के प्रभाव से नष्ट और उद्दिष्ट भी एकही साथ सिद्ध होते है जिनका विस्तृत वर्णन आगे लिखा जायगा। मए-रूप न देकर पूछना कि अमुक भेट का रूप फैसा होगा। इदिध-रूप देकर पूछना कि यह कौनसा भेद है। पुनश्च शीन योधार्थ अव आदि के दो दो अक्षरों में भी तीन श्रको के छौ भेद लिखते है। लमेक, बगद्वै, मजत्तीनजान, मगयौ, गजप्पच, गमच्छ, प्रमान लम १, लग२, गत, गम६॥ ८ निलस। [५] - (२) प्रस्तार Expansion (f l'ennut itsins मन अंक गति विषम लग्वाय, तिनको लिखो सरल गति भाय । राग्ल गती कर, यहै प्रमान, वायें लघु दाये गुरु जान । * जेतिक अंक, तितेई अश, भिन्न अा कर उज्ज्वल यश । अतिन तजि मूवी शिर भार, मूची क्रम लगि अंक सुधार । मधन पक्ति अंशन-प्रति अक,-कम तेलखि लखि लिखो निशंक ! अन्य पक्ति में पूर्व विहाय, अक भूचि क्रम तें लिख जाय । चार गती सर अक निहार, तयही जान अंत मस्तार । अनि । कर जला प्ररंग, विपग घटै, सम बट्टै तरंग । मिकिन कोरिसरलगति प्रामारली ही सश धम मेन है । जित्ने भिक उतने, प्रशदोगे क्य ३ अरु केती प्रशाके अशी के प्रश होगे। प्रस्तार करने के कितने प्रमो का प्रस्तार करना हो सके ऊपर प्रतिस रथन छोडार पास गति से स्त्रीले लिखी यथा , - . 1- - प्रब १ की जो प्रथम पति हे उसके ऊपर ६ का अक है इसलिये १ के नीचे पदिले अश मे अर्थात् इयन तक १, १ फिर दूसरे अश मे (अर्थात् ७ से १२ तक) २ फिरतीसरे अंग मे १३ से १८ त९) ३,३और चौधे अश में (१६ से २४ तक) ४४ भर जाद, पहिली पकि भर गई। अन दूसरी पक्ति में २ है और के ऊपर सूचीअकभीर है। प्रथा पक्तिम परिने अंक आगया है इसलिये १ को छोड़कर दूसरी पक्कि पारित अंश २-२, ३-३, ६-८ लिखा पहिली पक्ति के दूसरे अश, पहिले राउका है श्रतएव २ को वोहार दूसरी पति के दूसरे प्रश में १-१,३-३, ४-४,लिखो, एलिी पक्ति के तीसरे अंश म पहिले ३ा अंधुका है इसलिये ३ को छोड़कर दूसरी पति के तीसरे अश स १-१,२२, -इतिखा, पहिली पक्ति के चौथे अश मे पहिले. ट प्राचुका है इसलिये ४ा छोडकर दूसरी पति ने चोथे प्रश में ११, २२,,३-३ लिखा प्रब दूसरी एक्ति भी भर गई । दिपमगति सरलगति (प्रेमभेद) - है “२ ५३२४ -पक्ति वह है जा ऊपर से नीचे की पोर पाता है चतुधाश तृतीयाश द्वतीयाश प्रथाश NNN 16.xCvd0.mimxx CWWW भद 04 لم ل ل ل ل ل ل لسع س له سم سم ه ه ه ه ه ه प्रपम पंक्ति 40 . avornmar CCWWWW मरी पक्ति .000WWWCWC. ل 8 س و ر س س ه ا ه م له तामरी पक्ति WWWWWWW0000 به س ه ا س ا م ع ه م س م चौथी पक्ति प्रथम पक्ति दृमरी पक्ति ma/42441 UPERHEARNEAAAABSP WEDNESDAp2WARE 4 회 서 있다 4 최 वा में तीसरी पक्ति मिसन दो का भाग नग जाय जैसे २४, चार अंकों का प्रस्तार जैसे १२३४ प्रतिम भेद सदा पहिले भेद के विपरीत होगा ऐसही सर्व जानी । विपणा है जिसमे दो का भाग न जास जैसे २३ और समाक दे पहले विपना में होगा यही पलार अर्थात् ४३ होकर दूसरे समाक में प्रायेगा। विषाक काभ और वृद्धिंगत को सताक काम रखा यथा-३४ यह न्यूनगत है पर मातीसरी और बोथी पक्ति का मरना है, दो शेशन में से न्यूनगत को अंकत्रिल.स। चौथा पक्ति bothe प्रश्नांक प्रथम भेद सरल गति १२३४ अतिम भेट उलटी गति इनमा प्रस्तार किन कुन भेद श्री के अनुसार निकाला जायगा ૨૪. १२३४ सकमाक " ५६७८ ३४२१ ४३२१ ८६६५ ४३०१ अकमाक १२३४ " ५७८ २४ १२० ४६१७ १४६७८ । अफपित्तामा अंश अंक जिते अगहु तिते, पृथक् पृथक् यदि अफ। प्रथम पनि मे अश पति, क्रम तें धरहु तिशक ।। अंक १ २ ३ ४ ६ ७ प्रश १ ३ ४ ५ ur अश विभाग १ १ wr २४ २ २ १२० १२० ७२० प्रति प्रश सख्या ७२० तथा १ १ ६ ०४ तथा ७२० ७२० १२० तथा ७२० तथा १२० १२० ७२० तथा तथा जोड़ २ २४ | १२० ७२० ५०४० - प्रति श्री प्रकविलासे भानुफवि विरचिते भिन्नांक सूची प्रस्तार वर्णननाम प्रथमोविलास.॥

a (2) 1 " में छोडकर से २-२ अन्य प्रस्तार सिद्धांत (१२०) ३ २७ असो तक का प्र तार न त । (७२०) '२|३/४/५/१२.३/४० ५/६/१/२/३ | ४|४६ ७ । (५०४०) -- .. G मट कर विषम में कम, सम में अधिक । प्रति प्रश में १-२-३-४-५-६ के प्रत्येक अक क्रम से १२०-१२० वाय २-३-४-५-६ क्रम से २४-२४ वार ३-४-५-६ मम से ६-६ वार छोड़कर ४-५-६ ग्राम से २-२ बार अतिम ५-६ वा अन्य शेषाः उलट पुलट कर विपम में कम सम में अधिक। प्रति प्रश में १-२-३-४-५-६-७ के प्रत्येकमसे७२०-७२०वार २-३-४-५-६-७ कम से १२०-१२० वार ३-४-५-६-७ क्रम से २४-२४ वारे पूर्वीक ४-५-६-७ कम से ६-६ वार छोडकर ५-६-७ नम से २-२ दार रिम ६-७ वा अन्य शेपीक उलट पुलट करें] -विषम में कम, सम में अधिक। प्रस्तार के प्रत्येक भेट में अन्त के दो अंकों की विधि- (विषम संख्या में म) (सल सस्या में अधिरू) ही २० में ३१ तो २४.ग.२१. | EDUE' -- - - व्याख्या। [-] الها و به #steel ا ل ه ع م م 1 m ہم ؟ 생생 مه مه पाहेला अश ل ل ل ل لع ل س ل ل ه ه ه ه ه يوم* * * * * * لي ع ه ه * * ه ه ه * 8 ع ع ل ل ل ي ل ه * » * لله س & نور له * ه ه لته رو ولس له ه ه ه ه ه مره ي ع لل مره * له لم ل ل ه سره لمر د ا و نه به د ۸ مه ی عمر م م दूसरा अश مه س س س ل لس لس ه ه ه ه ه ه م * * * * ل س ه ه ه ه ه ه * ر م لی فلم * را له الله اللي = = هه له لسو نه * * * * ده س س ه م ه م لي * ه ل ی س * هر م س x و سرم سر ته به لبم م * * ۱ ۱۸-hh .YAT Th+h + sm | 37 | 384 38 ५ प्रोका प्ररूवार, प्रत्येक अश २४, २४ के, कुल भेद १२० तीसगअश या - س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س له م م م م م م م ه ه ه ه ه ه ه ت * * * * ه ه ر مه . » » » » سم م ع ل م م ا ل سه * م ه ه م م م ة * و هه به سر به سه ر ه * ه م م م ملی 1 1 ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه ه به هه م له له ا م س س س س س س س ع ي ر ر الم لسم سم * و و لسع ل 8 x م س ل ل x م ع ل ل ا * X ا س ، ا س سر به ر به ها په هره ده هه له هر سه به م ن س ع * «ه ر م xxx x x x x x - M * * * * * * * * * * पाचवा प्रश الله الله له د نهه نه . ا س س س ه ه م مه سه له نه به له هه م ل س سر د ا ر س س ه م ه لي و ه م ه م ل ا د ه س , سوره ی ال سی سده لم [१०] अकविलास। ५ MAGmkCUUN IN www DVMov mr.mp.mmmm.ammxsxxxxtarCorccuWWWW KFCCWWaman occuWmomxxww.mmxKCC SWWWK CCmmmmm.ckmmmwx.ccc.mmcc000 WCW8CXCw.mmac.m.wwwmorxcmxm. m س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س س ImmmmmmmmcxxxxxCCCCCCUWWWom xxc0m.amCCWW.SKWW.mammxx OCC cwxwxcombacx.mmmxxcmocmx cuccxNCommuxum.xcxcm.com Bu rmwX090 श्रकोंकाप्रस्तार प्रत्येकश १२०,१२०के,कुलभेद ७२०/७ अकोंका प्रस्तार,प्रत्येक प्रश ७२०,७२० के, कुलभेद ५०४० ६और ७ अकों के प्रस्तारों का दिग्दर्शन । Movo س س س س س ع سد الي سي سي سي سه له في سد س س س س س س سي سي Gmmm.mm.orammmxxkcxcccccE Lom.mcwCGGxSC CGG.mammcc.G.mmmmxxx xcmc.omxSCGC GK.C6CGmammxGRG GKGcMCGMGx.mmxGm. 3XG XNKruary CCCCCCCCCCCCCCC CCCCCCC mmmmmmm.xxxxxXWWWWWW Ge 06G.mmmwWGGmanks xw.mmmxxxwGWGxamGGImmeGRGm WWomxmwK06x6WMmmGGcmmeGm tU विस्तार भय से आगे के भेद नहीं लिखे गये। स० भ्यान रहे कि प्रत्येक भेद एक दूसरे से अधिक संख्या में रहे। इति श्रीप्रकविलासे भानुरुवि विरचिते प्रस्तार सिवातवर्णननाम द्वितीयो विलास.॥

श्रागिनास। [१] (३) नष्ट वर्णन। (Negative Demonstration) (अमुक भेद को रूप किमि, प्रश्न कहावै नष्ट) नष्ट जिते अकन को पेख, तितने अक सरल गति लेख । सूची तिन पर लिखौ सुजान, अतिम छाडि वाम गतिमान ॥शा वाम अत जो सूची बेक, प्रथम तिहित भाजि निशक । जव लग शेष रहै तर लागि, सूचि क्रमहि ते दीजे भाग ॥ २॥ शेप जहा लब्धी जुर एक, लब्धि शून्य तउ लीजे एक । जो जो अंक लब्धि सो सिद्ध, क्रमते तिनही लिखौ प्रसिद्ध ॥३॥ लिये अफ चिन्हित करि देव, श्रागिल क्रम में उन्है न लेव । अथवा शेप अंक लिखि लेव, आगिल क्रम मे परै न मे ॥४॥ अपवीचही भाग जह पूर, शेष अंक उलटी गति पूर । सावधान है पाली रीति, सुयश लही जो हरि पद प्रीति ॥५॥ विषम प्रश्न उत्तर के अन्त, दोय सरल गति अंक लखत । * सम प्रश्नहिं उत्तर के अंत, विपम गती दो अंक लसत ॥ ६ ॥ (४) उदिष्ट वर्णन। (Positive Demonatration) (दिये अक को भेद कहु, सोई है उद्दिष्ट ) सुनिये उदिष्टहि की रीति, जासो मन में होय प्रतीत । जयते अधिक अंक के भेद, अंतिम तीन तजौ पिन सेद ॥१॥ ये हैं वोध करावन हार, इक ते पट लगि गति अनुसार। अतिम तजि सूची सिर धार, क्रमते इकदै छ अनुसार ॥२॥ (विपगाक भेद) १, ३, ५, ७ इत्यादि (समाक भेद) २, ४, ६, ८ इत्यादि सरलगति-यथा-२७, १७, २८, ३६ (लग) विषमगति-~-यथा-~७२, ७१, ८२, ६३ (गल) प्रमाण विषम घटै सग ब? तरंग।

[१२] कपिलास। चहु में पहिले । इकहीन, शेप सचि ते गुण प्रवीन । पच सीधे रवि उलट महेश, दोय अक को इत आदेश ||३|| छैसो नवलगि एकहि रीति, सीधे रवि उलटे हरप्रीति । अंतल इंक अत्तम पुनि दोय, अंतग तीन जानिये सोय ॥४|| चौलो पचा अरु पट अंक, वामे लघुतर गिनी निशंक ।' गिनती माहि अधिक इक लेव, ताही अक तरे परि देव'॥५॥ जहां शून्य तह एकहि धार, शेहि गुनौ सूचि अनुसार। लममादिक सूत्राहि को अंग, जोरि उदिधहि लहौ उमंग ॥६॥ नादिष्ट उभय की रीति, प्रश्नहिं जाचो होय प्रति ।। इकत नव लगि संख्या जानु, सब उद्दिष्ट कहे कवि भानु |७|| उदिष्ट के नीचे घटने वाले अंको की दूसरी सुलम रीति. आदि अंक ते एक घटाव, दाहिन के पुनि सुनहु प्रभाव । वाम ओर जेतिक लघु देख, दिन मह जोरिय एक बिसेख ॥ वाम ओर एकहु लघु नाय, तोहू एक घटैये भाय। शेष नियम पहिले कहि दीन, थोरे मॅह समुझिहैं मवीन ।। सवा-शेगो रीतियों का परिणाम पलही है । ध्यान रहे कि जहाही से अधिक बहा अन्त के तीन अंक सर्वदा त्यता है इनकी सरुमा 'लमग' सुधानुसार पीछे से जोड लीजाती है । . ܫܝ . -- " इति श्रीमादिलासे भानुकवि विचिते नटोदिष्ट वनितम तृतीयो विलास । J - 1 * आदि के तीर मकों मे जहा अन्त मे लघु हो वहा १ जहा अन्त में मध्यम हो वहा २ और नहा अन्त मे गुरु हो वहा ३ घटायो । - अरुविलास। प्र०-५ प्रको मे १५ भेद कैमा होगा? २०६२ उद्दिष्ट प्र०-५ अको में ४५३१२ कौनसा भेद है ? . ४ ५३१२ ४ १२३४५ २४) ६५ (३+१४ चौथा अफ ૭૨ (रहे १२३४) ६) २३ (३+२-४ चोथा अझ १८ (रहे १२३) ७२ ३४२४%3 ३४६%3 ३१२-गलम- ३ २) (२+२-३ तीसरा प्रक (रहे १२) १) १ (१= १ पहिला प्रक ६५ प्र०-पहिले दो अको से १२ क्यों घटाये? उ०-सीधे रवि ६.या उत्तर-४५३१२ ६ अंकों के ७२० भेद ३६० प्र०-६ अकों में ४७५ों भेद कैसा होगा? प्र०-६ अफो में ४६५१२३ कौन भेद है? १२०२४६२१० १२०२४६२१० ३ १२०) ४७५ (३+१-४ चौथा अंक ४ (रहे १२३५६) २४) ११५ (४+२=५ पांचवा अक ६ ३४१२०% ३६० (रहे १२३५) ४४२४%3 ६) १९ (३+१-४ चौथा अंक ५ १२३-जमग १ (रहे १२३) २)१(०= १ पहिला प्रक १] प्र०-तीसरे अक से २ क्यो घटाये? (रहे २३) उ०-पहिले ती प्रा में ५ मध्यम, १ पहिला प्रक प्रतम-२ उत्तर- ७५ १६ ४७k - । ४६५१२३ [१४] अकपिलास। ५ अंक के-१२० भेद प्रभ-५ अंको में त्वा भेद कैसा होगा? प्रश्न-* अफो में ४३५१२ कौनसाभेद है! २४६२१० ४३५१ ७२ 4 १२३४५ २४) ८९ (३+१४ चौथा प्रक ७२ (रहे १२३५) ६) १७ (२+१-३ तीसरा प्रक (रहे १२५) २) (२+२-३ तीसरा प्रक (रहे १२) १) (32 पहिला एक ३२ ३४२४- २४६ ५१२-गलम: ३ ८६ प्र०-एरिले दो अको से ११ क्यो घटाये? उ०-उलट हा-११ उत्तर: ८६मा -- १ १ शप रह . ३५२२ -- प्र०-५ अको में ६०वा भेद कैसा होगा? ro-५ प्रकों मे ३२५४१ कौनसा भेद है। २४६२१० २४६२१ ३ १२३४५ १ ४८ २४) ६० (२+२-३ तीसरा अंक है ३ (रहे १२४५) ६) १२ (२८२ दूसरा अंक है २ (रहे १४५) २x२४- ५४-गमल- ६० शून्य र पूरा भाग। लगा, उलटा क्रम ६०वा उत्तर- ३२५४१ प्रकविलास। [१७].. T १ ६ - १ २ ५ r अंकों के ४०३२० भेद - अफो में २७२११वा भेद कैसा होगा। प्र०-८ प्रकों में ६३४८४२१७ कौन भेद है ५०४० ७२० १२०२४६२१० ५०४० ७२० १२०२४६२१० ૨ ३ ४ ५६७८० :०४०) २७१११. (५+५= छटा अफ ६ २५२०० (रहे १२३४५७८) २ ३ ७२०) १९११ (२+१=३ तीसरा प्रक ३ ५४५०४०-- २५२०० १४४० (रहे १२०५७८) । २४७२०%3 .१५४० -) ३४१२०%3 १२०) ४७१ (३+२-४ चौथा अंक ५ ४४.83 १६ ३६० (रहे १२४७८) २४) १२१ (४+१= पाचया अक ८ २१७-चालन " (रहे १२४७) २७१११ ६) १५ (२+१-३ तीसरा प्रक४/०-पहिले दो प्रको से ११ क्या घटाये? (रहे १२७) उ०-उलटे हर-११ प्र०-तीसरे से २ फ्यो घटाये? २) ३ (१+१=२ दुसरा अरु २ उ०-पहिले ३ में मध्यम अतम-२ २ (रहे२७) प्र०-चौथे,से ४ फ्यो घटाये? १) १ (१= १ पहिना अक १ | उ०-चौथा अक ८ है उसके पूर्व ५, ३ शेप और ६ तीन लघुतर अक है तीन में १ जोड़ा ४ हुए इसलिये घटाये? प्र०-पाचधैं अफ से २ फ्यो घटाये? उ०-पांचर्चा अंक है,इसके पूर्व ही लघु है अर्थात् ३, लघु मै १ और जोड़ा २ हुए इसलिये २ घटाये। उत्तर ६३५८४२१७ २७१११ - 3 -- '- -- - [१६] अरुविलास। प्र०-६ अ-को मे १४ भद कैसा होगा प्र०-६ प्रफी में २३१४५६ कोन मेद है १२०२४६२१० १२०२४६२१० १ २.३४५६ १२०) १५५ (१+१%3 २ दुसरा प्रक २ १२० (रहे १३४५६) - - २४) २५ ॥१+१% २ दूसर। अक । ३ १४१२०%3D (रहे १४५६) १४२४-3 २. ४५६-लमग%3D १ पदिजा प्रक १ (रहे ४५६) २)१ (०= १ पहिता अक ४०-तीसरे प्रक से १ क्यों घटाया? उ०-पहिले तीनो में वही लघु हे घेतल- पहिला प्रक १ उत्तर १४५ - - ए ज्ञप,। - ५ . J उत्तर २३१४५६ ७ अंकों के ५०४० भेद नष्ट उद्दिष्ट प्र०-७ अको में ३५७१यां भेद कैसा होगा? प्र०-७ अकों में ५७४६१२३ कौन भेद है ? ७२० १२० २४६२१० ७२०१२०२४६२१० ४६१२३ १७२०)-३५७१ (४+१ पाचवा अक ५ २८८० (रहे '१२३४६७) ४x७२०%3 २८८० १२०) ६९१ (५+६=६ छठा प्रक .x१२०० ६०० (रहे १२३०६) ३४२४२ ७२ ३४६%3D. २४) ११ (३+१-४ चौथा अफ (रहे १२३६) । १२३-लमग १ ३५७१ ६) १६ (३+१४ चौथा प्रक ६ प्र०-पहिले दो प्रको से १२ क्यो घटाया (रहे ९२३) उ०-क्योकि सीवा का है सीधे रबि १२ २) १ (03 ..१ पहिला प्रक प्र०-तीसरे अरू से १ फ्यो-घटाया (रहे २३) उ०-क्योकि पहिले तीन प्रक्षों में वही १५.१० १).१ (= १ पहिला अक २ लघु है, अतल-१ शेष, ३ प्र०-चौथे अफ से ३ क्यो घटाया ? उ०-उस अफ के पूर्व २ लधु है अर्थात् ४और ५२ में १ और जोड़ा तो ५७८६१२३ ५३ हुए इसलिये ३ घटाये। उत्तर ३५७१वा । ७२ १ . ? - . - ।

प्रकविलास। [१७]... १ ६ रे ४ २ . -V ८ अंकों के ४०३२० भेद ०-८ अको में २७२११वां भेद कैसा होगा ? | प्र०-८ श्रकों में ६३४८४२१७ कौन भेद है। ५०४० ७२० १२०२४६२१० ५०४०७२० १२०२४६२१० २ ३ ४ ५ ६ ७ ८० १०४०) २७१११० (५+५=६ छटा अंक ६ १ २ २५२०० (रहे १२३४५७८) ७२०) १९११ (२+१-३ तीसरा प्रक३ 2x080---२५२०० १४४० (रहे १२४५७८) २४७२० १४४० ") ३४१२० ३६० १२०) ४७१ (३+१-४ चौथा अंक ४४३४- (रहे १२४७८) २४६- २१७चालग- २४) १११ (+१= पाचवा प्रक (रहे १२४७) २७१११ ६) १५ (२+१=३ तीसरा अफ ४ प्र०-पहिले दो अंको से ११ फ्यां घटाये। १२ (रहे १२७) उ०-उलटे हर-११ प्र०-तीसरे से २ क्यों घटाये? २) ३ (३+१-२ दुसरा अरु २ उ०-पहिले ३ में ५ मध्यम अतम-२ २ (रहे १७) प्र०-चौथे से ४ यो घटाये? पहिला अक १ उ० चौथा अझ ८ है उसके पूर्व ५, ३ और ६ तीन लघुतर अफ है तीन में ११ जोड़ा 'हुए इसलिये ४ घटाये? प्र०-पावचे अक से २ फ्यो घटाये? उ०-पांचवां अक है इसके पूर्व ही लघु है प्रर्थात् ३, १ लघु म १ और जोड़ा २ छुए इसलिये २ घटाये। उत्तर ६३२८४२१७ २७१११ - ३) १ (१८ शेष ७ -- G . ।

+ [१] प्रकाविलासा १ १२००६० १४४० ६ अंकों के ३६२८८० भेद नष्ट उद्दिष्ट प्र०-६ अंको मे १५७५६५वाभेद कैसा होगा | प्र०-६ अको मे ४७३५६२१८६वा भेद ४०३२०५०४०७२० १२०२४ ६२१० कौन है? १ २ ३ ४५६७८६४०३२०५०४०७२० १२०२४६२१ ४०३२०) १४७८६५ (३+१८४ चौथा अक ४ ३ १.१२०९६० (रहे १२३५६७८६) ३ ४१ ५०४०)२६९३५ (५+२-६ छठा अंक ७ ३ ५ २ २१ २५२०० (रहे १२३५६८६), ३४४०३२०= ५४५०४०- २५२२० ७२०)-१७३५ (२+१-३ तीसरा अंक ३ २४७२०%-3 १४४० (रहे १२५६८६) २४१:० .२४२४- १२०) २६५ (२+१-३ तीसरा अंक ५ १४६%3 २४० (रहे १२६८६) १८६-लमग- २४) ५५ (२११३३तीसरा प्रक६ १४७८६ ४५ प्र०-पहिले दो अको के नीचे १२ क्या रखे ६)७(१+१२ दूसरा अक २ ६ रहे १८६) उ-सीधे रवि १२ प्र०-तीसरे के नीचे १ क्यो? २) १ (०३ १.पहिला प्रक, उ०-अंतन ? प्र०-चौथे के नीचे ३ क्यो ? १ पाहला, अक उ०-चौथे अक ५ के पूर्व दो लघुता शेष' अक है दो में १ और जोड़कर ३ ४६ (रहे १२८६) (रहे ८६) १९९८ , रखे। प्र०--- प्र०-पाचचे के नीचे ४ क्यों ? उ०-पाचवें अंक ६ के पूर्व तीन लघुतर अक हैं उनमें १ और जोड़कर रखा। -कठे के नीचे १ क्यों ? उ०-छा अक २ है उससे लघुतर अरू पूर्व में कोई नहीं। शेष शून्य। इसलिये १ रखा। ४७३५६२१८६ उत्तर: प्रभऊपर जो नियम भिनांक नष्टोदिष्ट के दिये हैं वे तो सब सम्मांको के है वेही पदि विना क्रम के हुये तो उनके नष्टोदिष्ट कैसे निकलेंगे? उत्तर- १४७८६५ व धेसरिल सा FRE] जर-- नमो को परले सप्लगति से लियो यथा--- भेद प्रश्नाक ३४२५ ७५३५ सरलगति २३४५ ३५७८ नयशीमालो के लिये तो वही नियम है जो ऊपर कहलाये है हा उद्दिष्ट निकलने के लिये सरलगति म से सरलाक क्रमपूर्वक घटाना चाहिये जिगर श्रो के नीचे जोक शेष रहे उस अतर को ध्यान में रखें। उहिष्ट निकालाने के लिये तस में से जो जो पक ऊपर कंह हुए नियमानुसार घटाया जाता है उस जिम प्रक का जो अन्तर हे वह भी मिलाफर घटावे शेप गुणन किया. पूर्व-तही हे यथा বৰাৰ २३४५ ३५७८ १२३४ १२३४ - घर ये अंतर २३४४ देश प्रश्न-उतानो २३४५ मे ३४२५ कोरसा भेद है ? नरकिरा सहित-या चार अंको का उद्दिष्ट है अन्त के तीन अक तो सदा छोड़ही दिये जाते हैं यहा प्रथमाक ३ है साधारण नियमानुसार तो प्रथमाक मे से १ घटता है यहां पर ३ के नीचे का अन्तर है इमलि+१-२ प्रथमारु.३.मे से घटाये तो शेष १ रहा । उदिष्ट नए २३४५ का स्वा भेद कैसे होगा? ६) ६ ( १२ दूसराश्रक (रहे २४) ६ १ ३ २)३.१-२ दूसरा अंक २ (रह २५) ४२५ मनग- ३ २०१५- पहिला श्रम ०६ उत्तर- त्या भेद उत्तर- ३४२२ [२०] अकविलास। नष्ट - दूसरा उद्दिष्ट प्रश्न ३५७८ में ८३५७ कौनसा भेद है ३५७८ का १८यां भेद कैसे होगा। ६) १९ (३-४ था अंक (रहे ३५७) ८ ८३५७ घटाया +8% १ २१ (०-१ ३४६% १८ .३५७ लमग-१ प्रथमांक (रहे ५७) 7 १ 4 प्रधपाक ७ रत्वां भेद । 4 - - T इति श्रीप्रकविलासे भानुकवि विरचिते नोद्दिष्ट प्रदर्शनम्नाम चतुओं विलास ॥

1 अकविलासा [1] -भिन्नांक- छल प्रश्न वर्णन । प्र०-चतायो पांच अको में १२७वा भेद कैसा होगा? उ०-यह प्रश्नही अशुद्ध है ५ अंको के १२० से अधिक भेद नहीं होते। प्र०-बताओ ६ अको में यह कौनसा भेद है.१२७४५३ * उ०-यह प्रश्नही अशुद्ध है , अको के भेदो में १ से लेकर ६ तकही अक आगे ७ फा अफ नहीं प्रासका । शुद्ध प्रश्न यो होसका है १२६४३५ । * प्र०-धताओ ६ अको में १२६६३४ कौनसा भेद है ? उ०-यह प्रश्न भी अशुद्ध है एक अक दोबार नहीं प्रासमता, जितने प्रकों का प्रश्न हो उसमें उतनेही अक पूरे चाहिये चाहे ये किसी क्रम से हो यथा १२६६३४ अशुद्ध और १२६५३४ वा १२५६३४ शुद्ध * यदि पृच्छका महाशय प्राग्रह करें कि कहो अक भिन्न है छैन सही छै के बदले ७ तो है तो उद्दिष्ट में साधारण नियम से एफ और अधिक अफ लेना होगा फ्योकि और ७ मे १ का अन्तर है जैसे.- १२०२४६२१० १२०२४६२१० है। २ २३ 1 ३४६%3 ४३५ मलग ३ ३४६%3 ४३५ सलग ३ ३ 1 A. १२३४५७ में २१वा भेद कैसे होगा? १२० २५६२१० १२०) २०१० रहे २३४५७ -२४) २१ (०-१- रहे ३४५७ ६) २१ (३-४ चौया अक -१८ रहे ३४५ 4 ३ ...२).३ (१८२ दुसरा अफ रहे ३५ ग्रंयम अफ ५ उत्तर- '१२७४३५ पति श्रीप्रकविनासे भानुषि विरचिते छन प्रभ वर्णननाम पचमी विलास. ॥

G स्थान सब भिन्न * बार सम शेप भिन्न ११११ २३४ १५०४०२५२०/४० २१० ५ १२०, ६० / २० टो सम शेष भिन्न तीन सम शेष भिन्न . . 6 . चार सम शेष भित्र प्रोच सम २४ . ० ५०४० शेष भिन्न के मम . . . शेप भिन्न ० . . मात सम १२६० 03 . दो सम, दो मम शेष भिम १ से ७ अको का प्रस्तार चक्र प्रस्तार चक्र दासम, दोसम,दो समः . ० ६० ० . शेप मिस ४२० ६० 6 दो सम, तीन सम शेप भिन्न * तीन सम, दो सम, दो सम १२१ २२ ३३ = ५०४० ५ १४० २० तीन.सम, तोन सम शेष मिन ६४ २५ २ २४ दो सम, चार मम र लिन तीस समाचार सम दो सम, पांच सम २१० - व्याख्या (१) बायें लघु दायें गुरु (मेज। प्रधान भेद (२) व्यतिकम (उला) अतित भेट इति धीग्रमालाने भानु कवि - विरत्रिते प्रस्तार चारवन्नाम पठो दिलामः॥ [2] 4 अविलम। [२३] मिश्रितांक सूची भेद वर्णन। दो वा अधिक तुल्य जहें अक, भिन्न अस सह श्रित अक' । तुल्य अझ सब लेहु निहार, तिन तर भेद भिन्नवत् धार । गुणनफलहिं सो भाजि अखेद, प्रश्न क के पूरे भेद । लन्धि समान भेद उर लाव, उत्तर ली इरि के गुण गाव ॥ जिप्स अक समुह मे मिनाका के साथ दो ना अधिक तुल्यांक होघे मिश्रिताक कहाते है। भिन्नाको के साथ दो वा अधिक तुल्याक एक वा अधिक स्थानो में हो तो मिनाफात् उनके सम्पूर्ण मे उसके नीचे लिसो यदि पेमे भेद दो वा अधिक स्थानो में हो तो उन सबों का परस्पर गुणा करी जो गुणनफल हो उसका भाग प्रश्नाक के श्रको को भी भिन्न मानकर उनके सम्पूर्ण भेदो में दे देर जो लब्धि हो वही उत्तर होगा यथा - ११ २२ - %3D ६ २x२ १२ ३३-२४ ०४२ ११ २२२ १२० २४६ १११२२२२. ७२० २४ २४ D ८ ११२२३३ ५५०४० ६३० २x२x२४० १११.२२२२-५०४० EX २४ १४४, ११ २२२२२ - ५०४१ २४१२० २४० ११ इति श्रीप्रकविलासे भानुकपि विरचिते मिश्रितांक सूची मेद वर्णननाम सामो विलास.

-- [२४] अंकविलासा मिश्रितांक प्रस्तार वर्णन । मिश्रितांक कर सरल विचार, · तिनको, करिय खंड प्रस्तार । गुरु अंकनि क्रमते धरि वाम, शेप अंक प्रस्तार ललाम । 'कष्ट साध्य प्रश्नहिं के अंक, खंड अनेक करिय विन शंक। उनके धरिय भिन्न सब रूप, भानु भनत प्रस्तार' अनूप । प्रथम भेद गति, सरलहिं देख, दूजो मध्य भिन्न अवरेख। तीजी अतिम की गति वक, एक भिन्न दो सम जहँ अंक । 5 : वाये लघु 'दायें गुरू, प्रथम . सरल गति । मान, मध्य भिन्न दूनो अहै, तृतिय ' व्यतिक्रम 'जान । . - - . (३) १-१२२ २-२१२ D १-१२२ २-१२१ ३ ३ १ (४) (४) (४) १-११२२ २-१२१२ १-११२३ ७२-११३२ ३-१२१३ ३-१२११ १-१२२२ २-२१२२ ३-२२१२ ४-२२२१ ४-२११२ ५-२१२१ "५-१३१२- ४ ६ ७-२११३ '८-२१३१. ६-२३११ १०-३११२ ११-३१२१ १२-३२११ अकविलास [२] १ १२३४४ २ १२४३४ ३ १२४४३ ४ १३२४४ ५ १३४२४ ४१ ४१४२३ ४२ ४१४३२ ४३ ४२१३४ ४४ ४२२४३ ४५ ४२३१४ ७ १४२३४ ८ १४२४३ ६ १४३२४ १० १४३४२ ११ १४४२३ १२ १४४३२ २१ २४३१४ २२ २०३४१ २३ २४४१३ २४ २०४३१ २५ ३१२४४ २६ ३१०२४ २७ ३१४४२ २८ ३२१४४ २६ ३२४२४ ३० ३२४४१ ३१ ३४१२४ ३२ ३४२४२ ३३ ३४२१४ ३४२२४१ ३५ ३४४१२ ३६ ३४४२१ ३७ ४१२३४ ३८ ४१०४३ ३६ ४१३२४ ४० ४१३३२ ४७ ४२४१३ ४८ ४२४३१ ४६ ४३१२४ ५० ४३१४२ ५१ ४३२१ ५२ ४३२४१ ५३ ४३०१२ ५४ ४३२१ ४४१२३ ५६ ४४१३२ ५७ ४४०१३ ५८ ४४२३२ ५६ ४४३१२ ६० ४८३२१ २४ २२४३४ १५ २१४४३ १६ २३१४४ १७ २३४१४ १८ २३३४१ १६ २०१३४ २० २४१८३ ८ १ ११२२२ १ १११२२ १ ११२२२२ १ ११२२२२२ १२१२२ २ ११२१२ २ १२२२२२ २ ११२१२२ २ १२१२२२२ ३ १२२१२ ३ ११२२१ ३ १२२१२२ ३ ११२२१२ ३ १२२१२२२ द १२११२ ४ १०२२१२ ४ ११२२२१ ४ १२२२१२२ २०११२२ ५ १२१२१ ५ १२२२२१ ५ १२११२२ ५ १२२२२१२ :१२१२ ६ १२२१२ ६ २११०२२ ६ १२१२१२ ६ १२२२२२१ २१२२१ ७ २१११२ ७ २१२१०२ ७ १२१२२१ ७ २११२२२२ २११०१ २१२२१२ ८ १२२११२ ८ २१२१२२२ ६ २२१२१ है २१२११ ६ २१२२२१ ६ १२२१२१ ६ २१२२१२२ २२२११० २०१११ १० २२११२२ १० १२२२११ २० २१२५२१२ २२१२१२ ११ २१११२२ ११ २१२२२२१ १२ २०१:२१ १२ १११२१२ १२ २२११२२२ १३ २२२१११ १३ २१२२२१ १३ २२१२१२२ १४ २२२१२१ १४ २१२११२ १४ २२१२२१२ १५ २२२२२१ १५ २१.१२१ १५ २२२२२२२ १६ २१२२११ १६ २२२११२२ १९७ २२१११२ १७ २२२१२१२ १८ २२११२१ १६ २२२१२२१ १६ २०१२११ १६ २२२२११२ २० २२२१११ २० २२२२१२१ २१ २२४२२११ [२६] अंकविलास। उ० प्रश्नांक सू० ध्यान रहे कि प्रत्येक भेद की सख्या एक दूसरे से अधिक रहे। प्र०-नीचे लिखे मिथिताको के प्रथम और अतिम भेदों के रूप कैसे होगे और उनके समस्त भेदों की संख्या कितनी है ? प्रथमभेद अतिमभेद समस्तभेद (सरलगति) (उल्टीगति) सख्या ११३४ ११३४ ४३११ १२ ११४३ ११३४ ४३२१ १२ १५२२७ १२२५७ ७५२२१ ६१६३८ १३९६६ ११८३१ ७३११२२ ११२२३७ ७३२२११ १८० इति श्री प्रक विलासे भानुकवि विरचिते मिथिताक प्रस्तार वर्णनन्नाम अष्टमी विलास ॥

प्रमविलास। २) खंड प्रस्तार प्रदर्शन। ७ अल-२१२२२२-३५ भेद ७ प्रक-१२२२२२२२२ भेद १-१२२२२२२५ (१) १-१००००२% २-१९१२२२%20 २-११२२०२-१५ ३५ ૨૨ (२) ११-२२२०२-१ १२--१.२०२०१० १२-१२२२२% ५ .१--११०२०१० २१-१२२२०%3 ५ २२-१.१२२-१० २२-११२२२%310 (३) ११२~२२२२-१ ३) १११-२२२२२ ११२---१२२५-४ १२१--१२२२-४ १२२-१२२२-६ २११-१२२२% २१२--११२२६ २२१--११२२६ १२२-१२२२-३ २१२-२०२०-१ २१२-१२२२-३ २२१-१२२२ २०२~~-१९०२-६ २१ ३५ (४) ११०-२२२-१ ११२१-२०२-१ . १२११-.-०२२-१ १२१२---१२२८३ १२२१-१२२-३ १२२२-१२२-३ २२१२--२२२-१ २२१२-१२२-३ २१२१-१२२-३ २१२२-२१२-३. २२११-१२२-३ २२१२--११-३ २२२१-११२-३ २२२२-२१११ (४) ११२२-२२२-१ १२१२-२२२%D१ १२२१--२२२१ १२१२ -२०१३ २०१२-२२०%3D २१२१-०२० २१२५--१२०-३ २२१२-२२२-१ २२१२-~~१२२-३ २२२१-१२२८३ २२२२---११२-३ सवो का परिणाम एक समान है। इति श्री प्रकविलासे भानुकवि विरचिते खड प्रस्तार प्रदर्शननाम नमो क्लिास ।

वारावेगा १ भिन्नाक १२.१२.३,३ आदि मे ३ भेद ३१॥ [२८] अकविलास ध्रुवांक। ( Rudimental figurea) प्रशांक में जितने श्रक है, उनमें से प्रत्येक भक प्रस्तार के आदि में fact भिन्न अंक इक इक तैलेव, सम सम अंक पृथक् गिनि लेव । गुणि भेदन सों भाजि सुचित्त, प्रश्न अंक संख्या सो मित्त । आदि अंक सब भेदन केर, सहहिं मिल न लागै बेर । इनहिं ध्रुवांक जानिये तात, सोई सकल भेद प्रगटात । १भिन्नाकर३ (१) १२२-३ भेद -१, १आदि मे--१ मेद २समानाक:३ -२,२ आदि में--२ भेद प्रशाक ३ (२) ११२३-१२ भेद २ समानाक४१३ -२४-६, १ आदि मे ६ भेद ११९ १ भिन्नाक४१२ --३, २ आदि मे-३. भेद १२३१ २१२ प्रश्नाक४ २समानाकर१०.२० (३) ११२२२-१० भेद १४, १ प्रादि में-४ भेद ११ १२२ १२२ अशलिस। , मिश्रिमांक उद्दिष्ट तथा नष्ट वर्णन । मिश्रिताक के लिखिये भेद, पुनि ध्रव अनि केर विभेद । धुरवाफन गत भेद जितेक, क्रमों जोरिय सहित विक ॥१॥ भेद ग्रादि जैह एक लखाय, तह तह शून्य धरौ हाय । यतिम त्रय के भेदहुँ जोरि, उदिष्टाहै कहिगे विन खोरि ॥२॥ * उलट किया ताकी कह नए, लहिये भेद मीत विन काट। जय ते अधिक प्रश्न के अंक, अतिम तीन तनौ विन शक ॥३॥ तीन भिन्न छै भेद अभग, ध्यान धरे "लीला यम गग"। तीन तुल्य तह शून्य प्रमान, सरल भेद इक गिनौ सुजान ॥४॥ मय भिन्न दूसर गनि लेव, व्यतिक्रमहिं तीसर कहि देव । कछुक उदाहरण इनके दीन, योरहि में समुझिहै प्रवीन ॥५॥ प्रश्न नष्ट अथवा उद्दिष्ट सा कर और सदा निर्दिष्ट । भानु भनित यह रीति उदार, जग मॅह कीर्ति बहावनहार ॥६॥ उदिष्ट प्रश्नाक ११२२, भेद ६४ १के ३,२ के ३ प्र०-११२२ का ४था भेद कैसा है ? प्र०-१९२४ मे २२१२ कोनसा भेद है ? ४श्रको मे ३ के परे २ के पूर्व भेद ११२ सरल ११२ सरल ४ शेष ३ १ उत्तर २११२ प्रनाक ११२३, भेद १२, ध्रु १ के ६, २के ३३ के३ प्र०-११२३ में ३११२ कौनसा भेद है? ३ के पूर्व भेद ११२ सरल प्र०-२२२३ मे १०वा भेद कैसा है ? ४ प्रको मेके परे ३ शेप १ सरल १९२ १० ह उत्तर ३११२ * १०वा (उदिष्ट में) (१) ध्रुवाक पूर्व (२) १%30 (३) अतिम तीनकी सख्या (नष्ट में) ध्रुवाकोत्तर o%D१ भतिम तीनके रूप की रचना [३२] प्रतविलस। (७) १९२१ ग १२४७ -=२१-२१ २१ २१ २३३३१ उत्तर २३३३१ (0) १२३४ भेद २४४१० ६० ६६६६० = उत्तर ६६६६० (१) १२३७ मेद २४४.३ ७८ ६५८ = उत्तर ८६६५८ इति श्रीश्रकविलासे भानुकवि चिरचिते प्रस्तार भेदान्तर्गत सख्या योग वर्णनन्नाम द्वादशो विलासः।

, अंतीलस। [३३] मिश्रिमांक उद्दिष्ट तथा नष्ट वर्णन । मिश्रिता के लिसिये भेद, पुनि ध्रन अनि केर विभेद । धुरवाकन गत भेद नितेक, क्रम जोरिय सहित विवेक ॥१॥ भेद आदि जैह एक लसाय, तह तह शून्य बरौ हाय । अतिम त्रय के भेदहुँ जोरि, उदिष्टहिं कहिये विन खोरि ॥२॥ * उलट क्रिया ताफी कह नए, लहिये भेद मीत विन कष्ट । जय ते अधिक प्रश्न के प्रक, अतिम तीन तजौ पिन शक ॥३॥ तीन भिन्न छै भेद अभग, ध्यान धरे "लीला यम गग"। तीन तुल्य तह शून्य प्रमान, सरल भेद इक गिनौ सुजान ॥४॥ मध्य भिन्न दूसर गनि लेव, व्यतिक्रमहि तीसर कहि देव । कछुक उदाहरण इनके दीन, योरहि मे समुझिहै प्रवीन ॥५॥ प्रश्न नष्ट अथवा उद्दिष्ट सर कर और सदा निर्दिष्ट । भानु भनित यह रीति उदार, जग मॅह कीर्ति बढावनदार ॥६॥ . उदिष्ट नष्ट प्रश्नाक ११२२,भेद ६,६ १ के ३,२ के ३ प्र०-११२२ का ४या मेद कैसा है ? प्र०-१९२४ मे २२१२ कोनसा भेद है ? ४को मे ३ के परे २ के पूर्व भेद ૨ ११२ सरल ११२ सरल ४ शेय१ उत्सर २११२ प्रश्नाक ११२३, भेद १२, ध्रु १ के ६, २ के ३३ के ३ प्र०-२१२३ मे ३११२ कौनसा भेद है? ३ के पूर्व भेद ११२ सरल प्र०-११२३ मे १०वा भेद कैसा है ? ४ को मेके परे शेप १ सरल ११२ १० ६ उत्तर ३११२ उत्तर १० वा (उदिष्ट मे) (१) ध्रुवाक पूर्व (२) १० (३) अतिम तीनकी मल्या (नष्ट में) ध्रुवाकोत्तर o=? भतिम तीनके रूप की रचना [१] अापिलास। 7 उशिष्ट प्रशांक ११२२२, ५ मा भेद १०, १ के प्र०-११२२२ मे या भेद कैसा है ? प्र०-१९२२२ मे २२१२१ कौनसा मे है ? ११२२२ मे ४के परे २२१२१ मे २पूर्व भेद ११२२ मे ३ के परे (बा ११२३ भेद ६६० १ के ३,२ के३) १२१ २१२१ मे २ के पूर्वध्रु० भेद ३ ह शेष १२१ मध्यप भिन्न उत्तर उत्तर २२१२१ शेष२, १२० का -- स्वा प्रश्नाक १११२२भेद १०,७०१ के ६, २ के ४ | प्र०-१११२२ में या भेद कैसा होगा? प्र०-१११२२ मे २१११२ कौनसा भेद है? १११२२ में ६ भेदो के परे २ २१११२ में र के पूर्व भेद ६ ११२२ मे के परे १ १११२ मे १ के पूर्व शेष १,सरल = शेप ११२ १ सरल उत्तर ज्या उत्तर २१११२ प्रश्नाक १२२२२२ भ१५,६ १ के ५,२ के १० प्र०-११२२२२ मे १३वा भेद कैसा होगा? प्र०-११२२२२ मे २२२११२ कौनसा भेद ११२२२२ में ५ भदो के परे २ ११२२२ में-४ गत २ २२२११२ में २-के पूर्व ११२२ में ३ गत -२ (२२११२ के भेद १० ६ १३, २के) ११२ २२११२ मे २ के पूर्व धु २११२ वा के भेद ६,६ १के ३, २ के ३) २११२ में २ के पूर्व सरल शेप १सरल = शेप ११२ उत्तर १३वों उत्तर २२२११२. -- --- ।

"यशालामा [३५] उद्दिष्ट नष्ट प्रमाक १११२२२ भेद २०फे २२० प्र०-११९२२२ २२१२१२ कौनसा भेद । प्र०-१११२२२ में २७वा भेद कैसा हे? ६ अको में १० के परे २२१११२ मे २ के पृष्य भेद ५ अफो में ६ को परे (२१९१२ वा १११२२ के १० भेद ४श्रका में ०के पर फे ६,२४) शेप २०१२ मे २ के पूर्व भेद १७ २११२ म के पूर्व भेद शेप १२सरज ६ ० उत्तर १ज्या उत्तर । २२२२२२ प्रश्नाक ११२२२२२ भेद २१ धुके ६, प्र०-१२२५२२ मे २२२२११२ फोनमा भेद है? प्र०-२१२२२२२मस्या भेद कैसा होगा? ७ प्रको में ६ के परे ६ भकी में ५ अको में। ४ अको में शेष १सरज- ११२ " ६ शी " २२२२११२ मे २के पूर्व भेद (२२२११२२ १५ भेद ध १ के ५, २०) २२२११२ में २ के पूर्व भेद (२२.२२ के १० भेद 5 १ के ४,२ के६) २२११२ में २ के पूर्व भेद (२१३२ के ६ भेद ध्रु ? के ३, २३) २११२ म के पूर्व भेद ३ सरल उत्तर १श्वा उत्तर २२०२११२ अकपिलासा १ केबल पांच मिश्रिताको फो ही लीजिये तो उनके भेद कई प्रकार के होते है यथा-२ और ३ भिन्न के ६० भेद, ३ सम और २ मिन के २० भेद, ४ सा और भिन्न के भेद, २ सम र सम और १ भिन के ३० भेद तथा २ सन और सम के १० होगे वैसेटी सम परिमाणिक रूप से ( Proportionately ) उनके सन्या मी पृध पृथक होगे यथा ५ मिनाको के १२० परतु र सम और ३ मिकों के उनके अ अर्थात् ६० भेद होगे (देखो प्रस्तार पृट २२) इनक सनी कमी सेती अाधेहोजायें- ५ भिन्नां की सूची २४ ६ २ १ ० १२३४५ २ सम और ३ भिन्नाको की सूची १२३४४ . A मिश्रिताक सूची और प्रस्तार के नियम तो स्पष्ट हैं परन्तु उन्के प्रवान्त अनेक भेदापभेदो के कारण उद्दिष्ट दि नियम कस व्यहोजाते है उसमें भी सताना- और मिनाक निकासी न होकर दूरपतीं हुए तो और मिवार की अपेक्षा रस्ती यथा- १२३४४ निकटवर्ती १२३७७ दृरवर्ती यहां सूच्यकानुसार १२३४५ के ६० भेदो के कुछ उद्दिशोदाहरण लिखते है:- पाच अंको के उद्दिष्ट में अहिले केवल दो अतो काही विचार होता है । ३ के भेद की सख्या जोड लो जाती है श्रादि के दो प्रको में से किस प्रकार अब चटाये जायेंगे वे नीचे लिखे है. 18 २१ २३ ३२ ३ ४१ १२ ४३ -१२ १२ १२ १२ १२ १२ १ १० ०३ मिनाकवस् सरलगानि मे १२ श्रोर विषमगति मे घटेगे परन्तु ४२ से १० ५० से ०३ और ४६ मे ०२ घटेंगे, इनमे कुछ उदाहरण नीचे रेत है - १०३१०० २१३४४ १४१%१२ ३४मधगभर- १२३१०० ३४२४१. २४१२-२४. - २ २४१ मगत्तः-४ अकपिलाम। [३६] १२३१०० ४२४३३ ० ३४१:३६ २४:3 ४३१ गमल ४४०२:४९ २दमलग-३ ४ ४२२१३१ ४४० ४४१२१९ २१३ मलग-३ सारारा यह है कि मिश्रिताम में एक के नियम दूसरे को उपयुक्त नहीं। जैसे उपरोक नियम घटत करने के लिये १२३७७ को १२३४६ मानना पड़ेगा । पतदर्थ केवल सिद्धांत समझ लेना अलम् है विशेष गोरख धधे में पड़ने सो पारश्यकता नहीं। मिथिताको के नष्टोदिए ध्रुवार की रीति से ऊपर बताये गये है एरन्तु मुख्यत उनके सची और प्रस्तार भेट की गति ही समझ लेना पर्याप्त है। इति श्रीप्रकगिलासे भानुकनि विरचित मिश्रिताक नष्टोदिष्ट वर्णनन्नाम प्रयोदशो गिलास । .

अकविलासा और - गृहीत मुक्त रीति वर्णन। प्रश्नाको में से कुछ अफ त्य गरना और शेष लेकर उनके मूनाक रूपान्तर (भेद) बतादेने की रीति को गृहीत मुक्त रीति कहते है। गृहित मुक्त अंकन की रीति । गृहित भेद लहि होयः प्रतीत ॥ मुक्त अंक के भेद जितेक । पूर्ण- भेद भाजिय सविवेक ।। गृहित मुक्त द्वउ भेद मिलाय । भाजिय पूर्ण भेद मन लाय ।। मूल अक संख्या प्रगटात । जाहि लहे जिथ अति हुलसात ॥ प्र०-१२३४ में प्रत्येक वार दो दो अफ लेव तो कितने भेद होगे? मुक्तांक २ के २ भेद-पूर्ण भेद २१-१२ भेद गृहिताक के २ भेद २५२-५ : मृजांक 4 १२४ " T 1- है ६४२-१२ दूजी रीति सुलभ सुनि लेव । वाम गती गृहितहिं गुणि देव ।। मुक्त गृहित मेदन सो भाजि । मूल अक सख्या ले साजि ।। प्र०-१२३४ में प्रत्येक वार दो दो मंक लेव तो कितने भेद होगे? वामगति से पिछले दो अंक ४-३-१२ भेद: मुक्त २ के २ भेद, गृहीत २ के २ भेद पूर्ण भेद२४ ६ मुलांक अन्योदाहरण 2०-२२३५ में प्रत्येक चार तीनता तो (पहिली रीति M ? - मुक्काक १ का १० कुन गृहीताक । ।

अमरिनारा। [४] १२३ रूपान्तर १२४ " २३ " २४ xx६-२४ - (दुसरी रीति) गृ०४४३४२%3 २४ कुल भेद मुक्ताक १ का १ भेद गृहीताक ३ के ६ भेद मूलाफ पूर्ववत् y . २४-४ - ४ S " १२० =१० मूलाक १३५ ३४५ प्र०-१२३४५ में प्रत्येक वार तील तीन अफ ले तो कितने भेद होगे? (पहिली रीति) मुकाक २ के २ भेद, पूर्ण भेद १२०-६० कुल भेद गृ० ३ के भेद मु० २ के २ भेद ६४२=१२ १२० --१० १२. मूलाक ४६% ६० (दूसरी रीति) गृ. ५४४४३६० कुल भेद १२४ २३४ गृOxमु० १२५ २३५ ६ २०१२ १३४२४५ १२ ०-१२३४५६ में प्रत्येक वार चार चार अफ लिये तोकितने भेद होंगे। (पहिली रीति) २ मुक्ताक के २ भेद ३६० कुल भेद २ मु० के २ भेद ४ गु० के २४ भेद २४२४८४८ १५ मूलाक४२४-३६० १२३४ १३४५ २३५६ १२३५ १३४६ २४५६17 5 १२३६ १३५६ ३४५६ १२४५ १४५६ (" ५१२४६२२४५ ॥ १२४६ २३४६ पूर्ण भेद ७२० -1 २ ७२० • ४६ . T " । १ ।

[१२] अकपिलाम। दूसरी रीति) गृ० ६x४४४३% ३६० कुल मेद मूलाक १५ पूर्ववत प्र०-१२३४५६७८६ में प्रत्येक धार पांच पाच अक लिये तो कितने भोगे? (पहिली रीति) ३६२८८० -१५१२० कुज भेद . मुक्ताफ ४ के २४ भेद पूर्ण भेद ४ मु० के २४ भेद ५ गृ० के १२० भेद २४४१२०=२८८० ३६२८८० १२६ मूलाक २८८० १२६४१२०-१५२२० (दूसरी रीति) गु० Exaxsx६४५ २५१२० फुल भेद मूनाक १२६ मूलांक प्र०-१२३४५६७८६ मे से प्रत्येक वार छै के अक लेते जाव तो कितने भेद होगे? (पहिली रीति) ८४ मूलाक ३ मुक्ताक के ६ भेद, पूर्ण भेद ३६२८८० --६०४८० फुल भेद ३ मु० के ६ भेद ६ गृ० के ७२० भेदः ६४७२०-४३२० ३६२८८० ४३२० ८४४७२०-६०४८० (दूसरी रीति) TO EX=X9X&xxe ६०४८० कुल भेद पूर्ववत् ८४ मूलाक विस्तारभय से १२६ और ८४ मूलांको के रूप नहीं लिखे, सुक्ष पाठक स्वयही समझ लेंगे। अपने पाठको के विनोदार्थ ३ से लेकर अंको तक के गृहीताक, मूलाक मेद, प्रत्येक मूलाको के उपभेद, समस्त भेद और मुक्तांकों (त्यक्तांको) के भेदों का एक कोएक मीचे जिसे देते हैं.

अपिलस। [ ER] प्रयेक यार गृहीताया पृया पृथक् मूलाक प्रत्येक मुलाय. समस्त आतरित मुक्तान नक प्रत्येक वार गृहीतात पृथक पृथक मूलारू प्रत्येक मुलाक के समस्त प्रातरिक भद मुनाफ १ २ ३ moro १ is is .. 4TAT MrmpX409 ૨ ००nax mG NCCC H.mam १२ HI १०० ६७२० ७२० /२०१६० ५०४०४०३२० ४०३२०१४०३२० tro २४ २० ३ ४ ३ २ 2 ५०४ ६ xwww १० १२० १२० mM6mkum १ १२० ० ६ ७२ ६ ३०२४ १०६ १२० १५१२०/४ ७२०६०४८०३ ३६५०४० १८१४४०० २०३२०३६०८८०१ १ ३६२८८०३६२८८० . ६ 4+ २० ३ ४ १२० ३६० ७२० ७२० १२० ७२० ama अपाश विद्या ललित, निकलक निनात । ० देखि गुणीजनरीमिई,सरल मानु सिद्धात। ७ C ormx409 ولد لكم لي به ६ ४२ २१० ८४० १२० २५२० ७२० ५०४० ५०४० १४० e प्रति धीमविजासे भानुरूषि विरचिते गृहसतमुक रीति पनाम चतुर्दशा दिलास ॥ है [ ४४] अंगविलास। कौतुकांक। नाम चेढ गुण वाण युत, द्विगुण वमू हृत शेष" । "राम मयी यह जगत है, पंडित जान विशेष" || टीनामाक्षरों को ४ ले गुणा करके उसमें ५ जोडो, जो योगफल हो उसका ना फरो और ८ से भाग देव, सदैव २ वचेंगे यथा:- १४४+५%3D६४२-१८ शेष २४४+४=१३४२२२६ ३xs+५=१७४२-३४ ४४४+५:२१४२-४२ ८ ५४+५:२५४२-५० ६x४५-२६४२५८ ७xs+५:३३४२-६६ ८४४+५-३७४२-७४ x's+५:४१४२८८२ ८ १०x2+५:४५%B2 r साधु संग नव अंक सम, सदा एक रस लीन । दुष्ट सग पुनि पाठ सम, दिन दिन गति अति छीन । तऊ लहत सयोग नव, नवहि रूप हजात । पारस परसि कुधात जिमि, देखत सवहि सुहात ॥ Ex-७२-६ स्थिर (एक रस) घटत ६४१%3 ८x१%3 ६४२-१५-६ ८४२-२६-७ ६४३-२७-१ ८४३-२४-६ Ex४-३६-३ ८४-३२-५ ६४५-४५%D8 x38038 ६x६-५४%D8 ८४६-४८-३ ६४७-६३32 ८७-५६-२ Ex-७२६ ८४८-६४-१ Ex-५११ इति श्रीकविलासे भानुभवि विरचिते कौतुकांक घननाम पचदशो विलास ।। 5 अंकविनामा 1 ४५] एकांकीय करण। (१) पन्द्रा वादम सुन्न सात, कीजे पंडित सातइ सात । गुणि निरदत्तर एफहि पाय, चाहि जिते गुण ताहि वहाय ।। १५२२०७ ११११११११ सात सात अंक-पथ -७३४५११ १५२२०७ १५२२०७ ७६१०३५ ७७७७७७७७ - (२) पन्द्रा पाठ तिरसर काईि, सात गुणा कर एक लावाहि । सातहि गुणा जाहि सो तात, सोद गुणं सब अंक लखात ॥ १५८७३ तीन तीन अक-यथा-७४३-२५ ११८७३ २१ १५८७३ ३३३३३३ इति धीग्रालिलामे मानुरवि विरचिने एकाकीय कर पन्नाम गोदशी विकास [४६] विजाम। ४५ संख्या की विशेषता। व पोश पचे पीसेहि दोय । धन ऋण गुगा भनि दस इस होय ।। - १२ २०-२- मृग १८७६५४३०१ १२३४५६७८६ =136 २६४१३७५३२ २४५८ । इति धीमरिलासे माइकानि विरचिते पचरसारिशन् सख्या विशेषता नशारा सादशा विलास ॥ - - - ܐ - असविलास [४७] नवांक महत्व। गनके भरका महत्व वतया देना भी उपयोगी होगा । गुसाईतीने करा है, nि.- तुलना अपने रामकर, भजन करहु निश्शक । आदि अन्त 'निरवाहि है, जैसे नव को अक ।। दुगुने -तिगुने चोगुने, पचमः पट अरु सात । आगे से पुनि नव गुने, नव के नव रहिजातं ॥ नव के ना. रजिात है, तुलसी किये विचार । रम्पो राम इमि जगत में, नहीं द्वैत विस्तार । जगते रह छत्तीस है (३६), राम चरन छत्तीन (६३) । तुलसी देख विवार दिय, है यह मतो प्रवीन ।। निस्सन्देह नब का अक बड़ा विचित्र है। उसे चाहे जितनेसे गणित दीजिये। उसमें नपं का प्रभात रहेगा । हा भी है। जैसे घटत न अंक नव, नव के लिखत पवार ।। अर्थात् नरपाड़ा लिखकर देखिये, सा मे नत का असन्धिम्मन रहता है यथा -गव दूने १८, नव तिया २७ और न चौक ३६ आदि। इन गुणित अफों का योग परस्पर में (१+८, २५७, ३६) कीजिये, उत्तर प्रापको नही मिलेगा। इसी प्रकार और भी चाहे जितने से गुणा कीजिये, ज्व का 'मक विद्यमान रहेगा । गीचे नर के विशेष महत्व का सक्षिप्त में वर्णन किया जाता है। जिन्हें विशप जानने की इच्छा हा, वे हमारी दनाई "नव पचामृत रामायण" को देखें। (१) इकसों नव लगि संख्या जोर । पैतालिस चौभाग बहोर ॥ वारा पाठ पाच अरु वीस । मृण धन गुण भाग सरीस ।। भा०-१+२+३+४+४+६++++६=४. हुए, इसमें ४ और * दो अल है, कि, जिाफा योगफल रहता है। अब इसर्फ इस प्रकार से चार राड फीजिये। कि १++५+२०-४५, इन प्रत्येक विगतभाग िम कमश दो के अफ का भूग, धन, गुणा भोर भाग कीजिये उत्तर समान ह! यथा-- 1. २२-२८११, १२-१०, k४२८१०, और २०-२=१० । (२) सख्या ते हर संरया योग । शेष शुद्ध नव अंक सुयोग । }} माया के जिमि होतहिं दूर । शुद्ध नाम लखिये भरपूर ।। भा०, कोई भी मन माती सख्या लिझकर उसके योग का उसी में से यदा दो, शेप अशोका योग नयागा। या - । -- [४६ ] श्रमविलास। ४५,संख्या की विशेषता। वसु वीरेश पचे वीस हि दोय । वन ऋण गुण भजि दस दस होय ॥ ८.२८ मा १८७३५४०१ १२३४५. 388 ४५- 2136 ८६४१६७१३२ L इति श्रीग्लिासे भानुकरिनिरचिते पचचरसारिशन् संख्या विशेषता वर्णानाम् सप्तदशी दिलास ॥ . - अरुरिलास। [४] नवाक महत्व। - गर्क अंगका महत्व वतता देना भी उपयोगी होगा । गुसाईनीने कर है, जि.-- तुलती अपने रामकर, भजन करहु निश्क । आदि अन्त निरवाहि हैं, जैसे नव को अक। दुगुने तिगुने चोगुने, पचम पट अरु सात । आठने से पुनि नब गुने, नव के नव रहिजात ।। नव के ना रजिात है, तुलसी किये विचार । रम्पो राम इमि जगत में, नहीं द्वैत विस्तार । जगते रह छतीस ह (३६), राम चरन छत्तीन (६३) । तुलसी देख विचार हिय, है यह मतो प्रवीन । निस्सन्दे नर का प्रका बड़ा विचित्र है। उसे चाहे जितनेसे गुणित कीलिये उसमे नर का अमाप्त रहेगा। सा भी है जैसे घटत न अफ नव, नव के लिखत पवार । अर्थात् नस का पाना लिखकर देखिये, सब में वन का अरु विद्यमान रहता है यथा नव दूने १८, बतिया २७ और नन्द चौक ३६ अादि गुणित मां का योग परस्पर में (१८, २७, ३+६) फीजिये, उत्तर आपको नहीं मिलेगा। इसी प्रकार श्रोर भी चाहे जितने से गुणा कीजिये, नम का प्रक विद्यमान रहेगा। नीचे नघ के विशेष महत्व का सतिप्त में वर्णन मिया जाता है। जिन्हें विशेष जानने की इच्छा वे हसारी दनाई "नव पचामृत रामायण" का देखें । । (१) इकसों नव लगि संख्या जोर । पैतालिस चौभाग वहोर ॥ चारा पाठ पाच अरु बीस । मुख धन गुण भाग सरीस ।। भा०-१+२+३+४+४+६+७+++६=४५ हुए, इसमें ५ प्रौरः * दो अल है कि । निाका योगफल हाता है। अब इसके इस प्रकार से बार राट कीजिये कि १२++५+२०-४५, इन प्रत्येक विभक्तभागों में क्रमश दो के अक का सण, धन, गुणा भोर भाग कीजिये उत्तर समान होगा। यथा २२-२८१, 5=१०, ५४२-१%, और २०-२८१०॥ (२) सख्या ते हर सख्या योग । शेष शुद्ध नर यक सुयोग ।। माया के जिमि होतहिं दूर । शुद्ध ब्रह्म लखिये भरपूर ।। कोई भी मन मानी सख्या लिखकर उसके योग को उसी में से यटा दो शेष प्रमो का योगना होगा। यया: T -- भाग- ब [४] प्रकाविलास। - ७२५ इनोसको +२+ का योग १४ हुना, अब ७५-१४-७११ प्रधान ७.१+१=३ । इसी प्रकार पार भी जाना । सख्या उलटि हरै जो अंक । नव के नव पुनि लहौ निशंक । घट घट में प्रयु रयो समाय । मदिमा भानु कहे किमि गाय ॥ स--किसी भी संख्या को लिख र उसी की उलटी संख्या को उसी.म मे घटाना शेष का योग नव होगा, यथा-- ३४६१ इसकी उलटी लख्या १६५३ हुई । पूर्व सज्या ३४६१ मे से १६५३ को घटाया हो १९०८ वचे, निसके को+cto+r का योग १८ अर्थात् १६ दुमा इसी प्रकार और भी जानो। (४) शेप सकते हरिये जौन । नव मह घरी जानिये लौन ।। तव यही हिय् माही लाय । मेरो अंकहिं भानु वताय ।। भा० - नियम दुसरे अनुसार यह सिद्ध कर दिया गया है कि किसी अंक सम के नोग को उसी में में घटाने पर कवल : (पकक्षी प्रक में बा अनेक मिलकर ) पर रहते है। इस तल को ध्यान में रखकर किसी से कहो, कि श्राप कोई सख्या नीजिये, और उसके प्रश को जोड़कर उसी में से प्रग दीजिये । जो शेष रहे उतने से कोई भी एक अंक जैसी च्छा हो भेट दानिय शेष अक क योग का अावे, उसमें के लिये जितनी कमी. हो, यही प्रक कद दीजिये । जैसे किसी ने ११६ सध्या ली । तो दूसरे नियम के उसे जोडकर +2+FF, उनमें से घटायेगा, यथा -११६-८-१०८ शेष बच्चे। पृछा चाहे १ का अरु मेटेगा अथवा ८ का मेटेगा, यविर का मेंटेगा हा रहगे, प्रामें के लिये केज की घटी है। अतएव यही उत्तर है। अति पृच्छक ने शून्य मेटा है, तो पहिलेदी कर देना उचित है । कि शून्य कोई प्रक नहीं है। सूचना -यदि शेष सख्या का योग र याये, दो कह सकते हो, कि अापने ९ मेटा है। यदि वे शून्य मेटकर हठ फरें तो कर सकते हो, कि आपने या तो शून्म है, प्रथना मेटा है। उल्टी वोही के अधिकाय । संख्या योगहि देय घटाय ।। (६) वा गुरुतातें लघुताहीन । कीजै हरि चरणन चित लीन ।। क)-किसी भी कगित सममा फो उनट कर लिया। और उसके योग को उसी में से पटा दो, तो घरी हुई मख्या का योग होगा । अनुसार यह । - . 04 लिसा [४] यथापित सख्या २३७ है, तो इसकी उलटी सख्या ७३० हुई। इसके अको का योग ७+३+२%१२ छु । १२ को ७३२ में से घटाया, ता ७३२-१५-७२० बचे इसके अफों का योग +2+05 मा । य)-किलो भी कल्पित सध्या को उलटा फगे, यदि उलटा मान अधिक है, तो उसम से विरत सख्श घटादो, शेप के प्रकों का योग होगा, नथा.-तिरत सम्म १३' इसका उलटा ६३.-११६४६५ हुए, इस सख्या के मनी का गोग+k+R===2+4- हुए । ग)-और यदि उसा मान फल्पित सभा में न्यून है, तो भी उता किया कगे। अर्थात् अधि ससा मे से न्यून फा घटादा, शेष सख्या के प्रको का योग ही होगा। यथा फलित सहा है, इसके उशंटे १७ हुए, तो इस ७१ म से १७ का घटादो, (७१-१७८४) ता५४ बचेंगे, जिसके प्रकों का योग t+d= सुआ। इसी प्रकार और मी जानो। नव व्यापक सब अफ में, ब्राह्म जीव सम लेख । ज्ञान चतु लसि तानिये चर्म चक्षु नहिं देख ॥ इक नव मिलि उनीस हैं, ताके दश रहि जात । १६%D१+६=१०=१ दश के पुनि एकहि रहत, एकहि एक लखात ॥ सोइ नियम सर अक मे, निश्चय घटत समान । नर महिमा की मित नहीं, कहा कहै लघु भान । नीचे नव के प्रककामच तथा उसकी व्याप्ति सक्षेत्र में और भी पताई जाती है। सल्या के अक (मुख्य) एक से लेकर नर तफही हैं। (1) १०) नय प्रह (१३) (७) (6) नव खड मय निधि नव रक्ष नवरात्रि (१७) । नय रस नवधाभक्ति नयनाड़ी (२०) नव द्रव्य (२१) नर विप्रकर्म (२२) नय शक्ति (२३) ना रस व उनके नव स्थायी भाष (२४) राग रागिणी राग ६ और रागिणी ३०, दोनो का योग ३५ होता है, ,) प्रत ३६६ ग्रामविलासा (३०) (३२) " - " " अथर्ववेदकी, । प्रतौहिणी सध्या-२१८७४०-२+१++७-१८%2+८=r. (०६) युग वर्ष सक्ष्या कलियुग ४३२०००-४+३+२=1 द्वापर ८६४०००+६+d-१८१८ त्रेता १२१६०८०%D1+२+६+६=१८=2+4 सतयुग १७२८०००-१+७+२+८=१-१+६ (२७), चारोयुग के वर्षों का योग दिव्ययुग) ४३२००००-४+३+२६ (२८) मन्वन्तर (७१ दिव्य युग) ३०६७२००००=३+६+७+२=25:1+st (08) कर (१४ सन्धन्तर ४२६४०८००००-४+२+६+४+२७-१७-t वारहसड़ी में गुरु नव हे-का, की, फू, के, मे, को, को, क, क (8) (३१) नायिका भेद प्रत्तार ४७८८४+s++=२७%D२.७% वा १०० काव्य भेद ३४०६२३६००-३+४+६+२+३+5=२७-२1538 (३३), चारो चेडो की मन संख्या-7६४०४-2+8+४+d==+८=8 मृग्वेद की मत्र सत्पा-२०१८ यजुद की। चारिहु वेद मंत्र विस्तार सामवेद को, उभिस सहस चारसीचार ।। ५८४७ (३४) रामजन्म तिथि-नयमी (6) नवमी तिथि मधु मास पुगीना। एक पक्ष अभिजित हरि प्रीता ॥ (३५) तुलसीकृत रामायण की छन्द सख्या-६६६०%8+8+९-२७-२+७२६ तुलसीकृत रामायण में शकर प्रति पार्वतीजी के प्रश्नो फी सख्या- यथा--प्रथम सु कारण कहहु विचारी । निर्गुण ब्रह्म सगुण वपुधारी ॥१॥ पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा ॥२॥पाल चरित पुनि कहहु उदारा ॥३॥ कहहु यथा जानकिर्हि विवाहा ॥४॥राज्य तजा सो दूपण काहा ॥५॥ वन वसि कीन्हे चरित अपारा॥६॥ कहहु नाय जिमि रावण मारा || राज्य वैठि कीन्ही बहु लीला । सकल कहहु शकर शुभ शीला ||८' बहुरि कहहु करुणायतन, कीन्इ जु अचरज राम । प्रजा सहित रघुवंश मणि, किमि गवने निजधाम ॥९॥ (२७) तुलसीकृत रामायण की रचना तिथि नवमी १ 'नवमी भौमवार मधु मासा, (३८) विप्रगुण यथा-अजु (सरल), तपस्या, सन्तोष, क्षमा, अतृष्णा, जितेंद्रिय, दातव्य, ज्ञान, दया, (३६) पुराण-१%+cs (४०) व्यसन-१८+R T . ++ H I अंकविलास। १२) १३) ३४) नक्षत्र-२७-१७ अयमाला की गुरिया-१०८%t+Ket लेखन व्यवहार में पूज्यों की श्री सख्या-१०-१+ वर्णमाला के वर्ण-६३-६६३१ यथा-हस्य , दीर्घ ८, प्लुत है ? कार्ग ५, चयर्ग ५, टबर्ग ५ तवर्ग५, पवर्ग, प्रतस्थ ४ ६३ ऊम ४, अयोग पाइरूप ८ भवार्थ मप्र पथा-एं ही क्लीं चामुण्डायै विधे ॥इति।। ४५) ति भीकरितामे मातुफवि निरनिते नवाकमाहात्म्य वर्णनमाम अष्टादशो विलास.। ।

[५] शविलामा - - - " , - - (२४) अक्षौहिणी सश्या-२१८७१ 02+2+4+७=१८+ युग वर्ष सत्या कलियुग ४३२०००-४+३+२८१ द्वापर ८६४०००22+4+8-22+08 वेता १२६६०००%82+२+६+६-१-१5ES सतयुग १७.८०००-१+७+२+८=१२८ (२७. चारों युग के वर्षों का योग- दिग्युग) ४३२००००-४+३+२% (२८) मन्वन्तर (७१ दिव्य युग) ३०६७२००००-३+4+3+2=24-1+ कर (१४ मन्वन्तर। ४२६४०८००००-४+२+४+४+२७-२t (३०) वारस खड़ी में गुरु नब हे-का, की, के, फे, को, को, ह (8) (३१) नायिका भेद प्रस्तार ७८८-४+++=२७-२+ वा १० (३२) कान्य भेद ३४०६२३६००=३+४++२+३+8=२७-२+9:38 चारो बेहो की मन सख्या-१६४०४%2+8+8+8-१८+5 मृग्वेद की मंत्र सख्या-२०१८ यद की, चारितु वेद मंत्र विस्तार ! सामवेद की। २०६४ निस सहस चारसौचार ॥ अथर्ववेदकी, (३४) रामजन्म तिथि-नवमी (8) नवमी तिथि मधु मास पुनीता। शक्ल पक्ष अभिजित हरि प्रीता ॥ (३५) तुलसीकृत रामायण की छन्द सख्या=KEE=3&+S+६=२७-२+GE (३६) तुलसीरुत रामायण में शकर प्रति पार्वतीजी के प्रभो की संख्या यथा-प्रथम सु कारण कहहु विचारी । निर्गुण ब्राह्म सगुण वपुधारी ॥१॥ पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा ॥२॥वाल चरित पुनि कहहु उदारा ॥३॥ कहहु यथा जानकिहि विवाहा ॥४॥राज्य तजा सो दूषण, काहा ॥५॥ वन वसि कीन्दे चरित अपारा॥६।। कहहु नाय जिमि रावण मारा ||७|| राज्य बैठि कीन्ही बहु लीला । सकल कहहु शकर'शुभ शीला || वहुरि कहहु करुणायतन, कीन्ह जु अचरज राम.।' प्रजा सहित रघुवंश मणि, किमि गवने निजधाम ॥६॥ (३७) तुलसीकृत रामायण की रचना तिथि नवमी १ 'नवमी भौमवार मधु मासा (३८) विमगुण यथा-जु (सरल), तपस्या, सन्तोप, क्षमा, अतृष्णा, जितेंद्रिय, दातव्य, शान, दया, (३६) पुराण-१८-१२ (४०) व्यसन-१८+4 - . , - 1३] अफपिनास। भावार्थ। (२) सन् का उत्तराई जेसे १८६६ का (२) उत्सर, सन्मी चौधाई केवल लब्धि से ६६ की २४ (३) पूरी ई तारीख जैसे मानो (8) प्रचार महीने कामाभिक कजिसका भान होगा जिसे सितम्बर के लिये १ (५) पूने सुप शतक का अक जिस जान मागे होगा। ऐसे १८१६ के लिये . पाचों का योग १३३ १३३ ५७का माग दिया शेष बचे. शून्य मे ना माकि शनिवार होगा। इसका शान छागे होगा। उक्त किया से बजाय किती सियर सन् १८६६ को शनिवार पड़ेगा। साधिक अंक विचार। सेप दिमन्बर एक है. अपर जुलाई दोय । जनू पार तीन है, मे नौ अग पच होय ॥१॥ माई नगर फरवरी, पट धहि गुनि लेव । जून न मन गालिये, पूछो डिन कहि देव ॥२॥ घि ने फरवरी, मास अफ है पाच । 7 जानुरी जानिये, जारिप मत यह साच ॥३॥ मार्य , साधारण दर्शक। लीप र्थात् अश्लिपांक १ . A ३ .xAWUNU ५ विचार। सुन्न बचे तो चार। 7 लादिय मुगम विचार । , [ ५२] प्रकदिलासा श्राग्लतारीख बार कथन । अंगरेजी महीनों की तारीखों के पार (दिन) जानने की रीतिः- , महीनों के नाम और दिन-जनरी ३३, फरवरी २८, २९, माई ३१, अप्रैल मई ३१, जून ३०, झुलाई ३१, अगस्त ३१, सितम्बर अम्र ३१, नवम्बर ३० और दिसम्बर ३१ दिन । जित सन में चार का माग पूग जावे उस सन की फरनरी २६ दिन की जाती है और जिन सती में चार का भाग पूरा न जावे उन सनो तो फरवरी २८ की होती है। इस प्रकार का योग पत्येक बोधेवाग्राता रहता है। जिस सा फरवरी का मास २६ दिन का माना जाता है उस साल को अगरेजी मे लीडर है । परन्तु पूर्ण शनादी के वर्षों के लिये चार भाग का निधन चरिनाय नहीं हो शताब्दी के चर्या मे जव चारसौ का भाग पूरा लग जावे ता वे वर्ष लीपइयर होस है। यथा - - सन् १३०० इन वर्षों में पूरे चारसौ का भाग नहीं लगता धानएच ये साध सन् १४०० वर्ष कहे जाते है। सन् १५०० सन् १६०० में पूरे चारसौ का भाग जाता है प्रत लीप इयर है सन् १७०० इन वर्षों में पूरे चारसो का भाग नहीं लगता अतएन ये साध सन् १८०० वर्ष कहे जाते है। सन् १६०० सन् २००० में पूरे चारसौ का भाग जाता है अनपर यह लीप इयर है। इसते पाया गया कि साधारण वाचार का भाग जब लग जाती है तब लीप इयर होता है और शतान्ड़ी के वर्प में जब चारसौ का भाग ल है तब वह लीप इयर होता है। तया सन् १८८५ इन वर्षों में चार का भाग लग जाता है अत ये लीप इय सन् १८९२ अर्थात् इन सनो में फरवरी का महीना २६ दिनो का मानागया सन् १८६६ सन २००० में चारसौ का भाग पूरा जाता है अतएव इस सन् की फरवरी लीप: की मानी जायगी और उसके २६ दिन होगे। इन नियमो के स्मरणार्थ निम्न लिखित दोहा कंठ कर लेना समुचित होगा. साधारण अधिवर्ष स्था, भाग चार जहें पूर । पूर्ण शतक अधि जानिये, भाग चारसौ पूर ।। पूयी हुई तागेस के दिन वताने की नीचे एक विचित्र रीति लिखी जाती है उत्तराई सन चौथ फल, पुनि तारिख मासक । जुरि शतक के सप्त करि, शेप वार निःशक ॥

1.४३] + विमास। भावार्थ । (२) सन् ा उत्तगई जैसे १८६६ का ६६ (0) उत्तरई सन्की चौथाई केवल लब्धि जैसे ६६ की (३) पूरीएई तारीख से मानो (४) पूछेदारीने कामाभिक कजिसका जान अहोगा ससेसितम्बर के लिये १ (४) पूरे हुप शतक का अक जिसका जान मागे होगा । जैसे १८६६ के लिये . पाची का योग १३३ १३३ मा भग दिया शेष बचे . शून्य मेनन गतिमानिकार हो । उनका मान शागे होगा। उक्त बिना सेयर नय किमी सिमर सन् १८६६ को शनिवार पडेगा सासक अंक विचार । सेप दिसम्बर एक है, अपर शुलाई दोय । जन जानार तीन है, गे पो अग पच द्वाय ॥१॥ मा नायर फरवरी, पद पद गुनि लेन । जन जन मन नालिये, पूछो दिन कहि देव ॥२॥ ऋषि फरवरी, मास अक है पाच । दोर मानुरी जानिये, जोतिष मन यह साच ॥३॥ भावार्य साधारण वर्गका जीप अर्थात् अस्तिपात मित्र दिसम्बर १ २ प्रोल . ३ जारी ३ भई अगरत मार्च नजर फरवरी जून YOxwwx. ५ शतकांक विचार। पूर्जाई सन चौथ करि, सुन्न पचे तो चार । इक है, दै सुन, पीन पच, लहिये भुगम विचार ।

[४] अकषिलासा भावार्य । पृद्धि अर्थात् सन् के पहिले दो अक जेलेवे और उसमें चार का भाग देवे यदि.शेष.- ० पचे तो १ बचे तो २ २ घथे सो ३ बच्चे तो ५ १७६८ का १७ शेष १ शतकांक २ १८६२ का १८ शेप २ . " १९४५ का १६ शेष३ " 10 - २०२२ का २० शेष ० १२० २११३ का २१ शेष १ " २ २२२२ का २२ शेष २ " शेषांक विचार। शनी शुन्य रवि एक है, सोम दोय कुज तीन । बुद्ध चार गुरु पच त्या, शुक्र पठलो चीन ॥ . भावार्थ । "" " ६ " शेष रहे तो शनिवार रवियार सोमवार मगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार इस पति से चाहे जिस शतक और सन की तारीख का दिन सहजही म निकल सकता है, परंतु इस बात का ध्यान रखना 'प्रवश्य है कि योरोप खत में सन १७५२ के पूर्व वारीयो के मारने में बड़ी ही गड़बड़ थी । सन् १७५२ के प्रत में इस पात का निचय हुआ तब से अर्थात् १४ सितम्बर सन् १७५२ से तारीखो के दिना सवा निकलेगे। इसके पूर्व तागज के दिन निकालना चाहो तो उत्तर वह निकलेगा जोहारियर लिए नियमों के अनुसार होना चाहिये था । परन्तु यह म निकलेग तो उस राबर यथार्थ म मान लिया गया था। नीधे पाठकों के शालार्थ सन १७५३ मे सन १७२ तक की १ जवी नारीखो [५५ । अकविलासो के दिन की दी जाती है जिसके द्वारा प्रत्येक मास की झोनसी तारोक्ष को काग दिन पड़ता है सहज मे ज्ञात होताता है। सन १७५३ से १९५२ नक के प्रत्येक महीनो की पहिली तारीखो के दिनो की जंजी। साधारण वर्ष जनवरी | फरवरी } अप्रेशर प्रगस्त | सितम्बर दिसम्बर १७६१,६७,७८,८६,६५ २८०१,७,१८,२६,३५, ४६,५७,६,७४,८५, ६१,९६०३,१४,२५,३९, गुर र वुशु सोवु श में गुरम १७६२,७३,७६,६०, १८०२,१३,१६,३०,४१ ४७,५८,६६, ७५, ८६, ६७ १६०६,१५,२६,३७, शु सो सो गु शमगुरवु शुसो यु १७५७,६३७४,८५,६१, १८०३,१४,२५,३१,४२, ५३,५६,७०,९१,८७, ६८,१६१०,२१,२७,३८, म मर'शु सो गुश | म गु १७६४,६५,७२,२,६३, EE,12०५,११,०२,३३ ३६,५०,६१,६७,७८,८६ १५,१६०१,.७,१८,२६, मांशु शु सोधु ण सो,गु र १७५४,६६,७७,५३,६४, १८००,६,१७,२३,३४, ४५,५१,६२ ७३,७६,६०, १६०२,१३,१६,३०,४१, मगुरम शु/सो पुश सो १७५८,६८,७५,८६,६७, १८०६,२५,२६,३७,४३, ५४,६५,७१,८२,९३,६३, १६०५,१९,२२,३३,३६, ७५३,५३,७०,८१,८७, १८,१८१०,११,२७ ३८, १२००,६,२७,२३,३२, ४५.५१ सो गुग र सो गुश - अमारितास। लीप वर्ष (पररी के दिन INE जुला २ सिर नदर दिसम्बर म A १७६३९, ५०४,३२, वु श सो| शुश १७.८९८०३६ शु सोम 'शु धुशु सोश सगु F९२,१८१२,४०,६८, बुश वुशु सो वुश । ७६ ,८६,४४,७२, १९१०,४० सो गु शु सो बुश रोगु सशु २७९०,१८००,४८,७६, I उश, सो गुमशु 1.६,८३,८२४,५२, शु सो शुभ पशु सो 'दु १७१०,८८,८२८,५३, ८७,२६२३५ शीशम सशुसो 'शासो म उदाहरण (१) ४ जनारी १७६८ ६८+९७**+२= रोष २८सोमवार (२) २२ फरवरी १८५६ ५६+ +२२+५+0=६७ शेर-शुरुगर (३) ८ अगस्त १८५३ ५६+४++2-0८६ शेप - सोमवार (४) १ जनवरी १६०० ००००+१+3+४= शेष रसोमबार (५ १३ फरवरी १९२४ २४+६+२३+५+५= रोप-युधवार इति श्रीनापिला भानुकवि विरचिते यांग्ज तारीत प्रवचनाम पदोगामी विल स ।

प्राविलासा दक्षिण वाम गरिन कथन । दांग राय चाली तीनऽ तावा चार, रॉय न पा लिगुला गर । समकर दहिने चादी जान, विषा अक त ताना मान ॥ (य-झाना, परम्भापा। किती पृच्छ र सो दो चीजें दे से और उनका मूल्य निमारित कर दे से बला चाली और एक छल तारे झा, चादी के छठे का मृत्य नि गोर नाये रहेका चार निरित प्रदेशका से ही नि रिसी पक रहेको पाब पौर दूसरे को दूसरे हाथ में गुप्त ररा लें। फिर उसने कहा कि जो परतु नदिने में हो उसका दुगना अक लो जो वायें हाथ में ही उसमातिशुराक लर ने गा जोडतर में रो, ता अरू कदै लो वाहने लाथ में चादी होती, म अरु कहे तो दाहिने हाथ मे तावा होगा। यया (२) (२) शादिया वाया दाहिना वाया चादी ताधा तावा चादी ३४२ + ४४३315 ४४२ + ३x3-२७ जर भा तो शाहिने हाथ में चादी जानो। विपम अफ हो तो चाहिने हाथ: ताया जाना। प्रति धीमकविलासे भानुकाव विरचिते दत्तिण वाम गणित कथननाम विंशतितमो विलास ।

प्रशक्लिास। नारंगी गणित कथन । प्र०-एक स्त्री के पास कुछ सतरे थे वह तीन घरो में गई पहिले घर में उसने आई सारे और एक प्राधा सतरा वेचा, दूसरे घर में जो बचे थे उनका प्राधा और एक श्राधा सतरा बेवा, तीसरे घर में भी वैमाही किया पर कहीं सतरे को तोड़ा नहीं जब अपने घर वापस आई तर उसके पास ३६ सारे बच रहे तो बताओ उसके पास कुल कितने सतरे थे? फुल संतरे २६५ दिये १४८ अर्थात् - अधिक दिया शेष १४७ दिये ७४ अर्थात् . अधिक दिया शेप ७३ दिये ३७ अर्थात् । अधिक दिया शेप ३६ (उलटी किया) ३६ के दुने से कुछ अधिक बिना टूटे ३६४२-७२+९७३ ७३४२-१४६+१-१४७ १४७४२-२१४+१-२६५ ७३ " इति श्रीफपिनासे भानुकवि विरचिते नारगी गणित कनमाम पविंशो विज्ञासा ant अक्षरितासा • [५६! प्रश्न विनोद। -- (१) प्र०-18 म२ इस प्रकार मिलाओ कि योग २० से गम हो। M (२) प्र०-६EC में इस प्रकार मिलायो कि योग १०० से अधिक न हो। उ0-26 (३ प्र०-पम वृक्ष में २० पत्ती बैठे थे एक शिकारी ने यन्दूक से एक को मार गिराया प्रव वृक्ष में जितने पत्ती रहे? उ०-एक भी नही शेष सब उड गये। (४) R०-पाठ गज की एक प्रयाल है, एक प्राग्गी एक दिन में एक गज फाट.साता है तो वतायो पूरी मयाल काटने को कितने दिन लगेगे? उ०-सात दिन। (४) प्र०-एक जहाज को एक स्थान से दसरे स्थान को खाने में १० दिन लगते हैं तो एक साथ दस जहाज जाने में कितने दिन लगेगे? १०-दस दिन। 11 प्र०-एक नदी की गहराई कार्वी २ का ३ कहीं ४ और फी ७ फुट है घिसफा ग्रोसत ४ फुट गहराई पड़ता है तो बतायो दिला नाव के पार जाने में प्रादमी दखेगा या नहीं? TO-ऐसे प्रसग में औसत से काम न निकलेगा जहा अधिक गहरा है यहां न तर सके तो अवश्य इन जावेगा।। ७) प्र०-एक साधारण कुमा खोदने और ईट और चूने से वाधने में पाच भादमी प्रतिदिन दस घटे के मान से तीस दिन मै तयार कर सक है तो ३०० भादमी एक साथ भिड़ जाये तो उसी कुए को खोदार फितने दिनों में तैयार कर लेवेंगे? साणित से तो प्राधे दिन मे-परन्तु काल्पनिक और म्यमहारिफ गपिन में विशेष अन्तर है यहा काल्पनिक गणित से काम न निकलेगा ध्यरकारिफ गणितही काम प्रावेगा इस छोटे से काम में ३०० भादमी लगाना निरया कई तो निठल्लू वेठे रहेंगे और तथा व्यय होगा सोदाई और जोड़ाई म रित समय अवश्य लगेगा इसलिये आधे दिन म या जाना प्रसन्मय दिस भादमी नगाने से काम कुन अन्नीहो सकेगा। - - .

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प्रकविलास। श्रायु कथन । (पाय बताना) मास दुगुगा धन पाच करि, तिहि पुनि गुणौ पचास । भायु जोरि हृत वर्ष दिन, इक पन्द्रा जुरि खास ॥ वाम अक सोद मास है, शेष अक वय जान । पृच्छक भापत अंकही, मापुन कहिय विधान ।। प्रश्नकर्ता को अपना जन्म मदीना और अपनी उमर पहिले से ही मालूम होनी पाहिये उत्तरदाता पृच्छक के ही हाथ से गणित करावे और अंतिम संख्या देशवा सुन कर महीना और उमर कर देवे। ८४२-२६१५-२१४५०%8D१०५०+६५-१९१४-३६५=UUR+९१५-१६ बाम अफ-८ (अगस्त) शेषाकम् (प्रायु इससे शात हुआ कि पृच्छक फा सन्म अगस्त में हुमा मोर उमर ६४ घर्ष की है। २) केंद्राश संख्या त्रिगुणी विधाय राहार सख्यांक कृतो विहीनम् अायुः प्रमाणं कथित मुनीन्द्रश्चिरतलैज्योतिपिकः स्मृतानि । र्थ-जन्म कुंडली के केंद्रस्थानीय ( अर्थात् १,३,७,१० घरों में ) जो जो प्रक हो उनको जोड़कर तिगुना करे और जहां राहु और पार { मगल) बैठे हों उनके सफो हो जोड़कर त्रिगुणिताक से पटा देवे जो शेप रहे यह प्रायु फा प्रमाण पणा यर स्थूलमान है। " अन्धमते दिग मृतु नख सर योग हग, नख रस दिग मन राम । बेद महाकनि जोरि के, भायुः कहिय ललाम ।। जन्म कुण्डली में जिस जिस घर में प्रव हो यहां के ग्रंक उपरोक कम से सोई गो प्रहन हा यहां बोड़ देवे जहाँ एक से अधिक प्राह हो वहां उसी घर के ARE भक बड़ा क्षेचे ती माय का स्कुलमान निकलेगा किसीर का मत है कि जिस पर [६] अफविलास। 1 । - - रामगल या शनि पोहों उनके प्रको को योग में से घटा देवे जो शेष रहे बार मासु मा स्यूलामाल होगा, गया १ के मक में जो महो वहां १० ७प्रल में जो प्रहबोकहो २० ६ व " ३ २० 8 - " ... ५ " ३ " જિ १०८ std श्रीधविनास भानुकवि सहित श्रायु कथमनाम धादिशा निजासा 1 - 1 Fr अफरिलासा संख्या प्रमाण। एक दश शतं चैव सहसम्युत तथा । लाच प्रयुत चैव कोटिरबुदमेवच ॥ टन्द सर्वो निखर्वश्च शरव पद्मश्च रागरः । अत्य मध्य पराईच दश वृद्धया यथाक्रमम ।। सध्या प्राचीन नाम माधुकिनार सवना . श १ १०००० शू य प्रमा पण प्राचीन प्रथा रुघल दश ही समानों को है २/सो, सरुडा अर्जाने जमसे सदन ३ सान्न, जार १६ मजली जोन्याप अयुत्त ४ दस हजार सात नहीं है यदि ५ लाख १० शख मनी साधे ६ दस लाख तो १०० शरमों का कोटि ७ मारोड़ पया नाम होगा यथार्थ अद ८ बस करोड़ में अर्म से अागे गिने मे भ्रम गिरा है शख खर्व घा महा शख कुबेर निखर्व । ११ खर्व की निधि है और एक शख १२ दस वर्ष शख दस निखर्व फा ोता है इससे अधिक सगर १४ दसनील सपत्ति के स्वामी केव- अत्य ज लक्ष्मीनाप । मध्य १६ दस एम पराई | १७ शप * परार्द्ध मिति चरम सख्या। १०००००० 10000000 १०००००००० १००००००००० १०००००००००० १00000000000 १०००००००००००० १००००००००००००० १०००००००००००००० २००००००००००००००० १०००००००००००००००० १००००००००००००००००० १० दसर्व प्रति धीप्रकाग्निासे मानुफवि सहित सख्या प्रमाण वर्णमयाम चतुर्विशी पिकास ।

अममिणान। अंक मय जगवर्णन। अंक मय जगत का एक छोटा सा उदाहरण । यदि विष्ट कर देखो तो जगत मी स्याही विचित्र है, कोई प्रानन्द से त पजाता है तो कोई दुख से ६ पटाता है किसी को सोने के लिये ४पाई भी नहीं तो किसी को पर खट पर भी नींद नहीं कोई १००वागरी में मस्त, कोई अना४ में लस्त कोई १०० भाग्यवती सुखी है तो कोई वाला वैधव्य से दुखी है कोई विज्ञापन पा रहा है तो कोई ६प्पय सुना रहा है कोई धर्म प्रहक है तो कोई समा प्रकाशक है कहीं बर७ फी बहार है तो कहीं प्रजा अनावृष्टि से ला है की २रे पहर पूरी ईन रही है तो कहीं २०रे पर भग ईन रही है कोई पाठ में चूर तो काई प्र५ में भरपूर कोई जात का सर ५ है तो कोई बुहा ख२० सालय है कही २००त १००त का झगड़ा है तो कहीं ३-१३ लाई भाई का रगड़ा है कहीं किसी का धन ६ होता है तो कोई प्रम राग में मस्त होता है कई १०मी १०हरे का त्यौहार है तो कहीं दुखित रोगियों का उप४ है कहीं राजा की आरती है तो कहीं प्रजा दुखित हो अपनी वि७ भर विनय करती है कोई विरप भू पहा है तो कोई परप में अड़ा है, कोई अपनी नयी १००० दास्ता सुना रहा है तो काई प्रपनी ३०मारखानी वघार रहा है कोई १,००,००० वा १,००,००,००० यन करने पर भी सहज नहीं होता किलो को ईश्वर विना प्रयतही पर फाइलर देता है यथार्थ में उसका मन किसी ने न पाया |x प्रति श्रीप्रकविलासे भानुकवि विरचिते श्रममय जगत यनिमाम पदिशो विलास. । यात ४१ईश्वर श्रकावत्तास। (अक)* अकानाम् वायतो गतिः अंक गुण प्रासर सगुण, समुझत उभय प्रकार । खोये रासे प्राप भल, तुलसी चारु विचार ।। रामायुध अकित गृह, शोभा वरणि न जाग । 'नव तुलसी के द्वन्द बहु, देखि वर्ष कपिराय ॥ मंन गहा मणि विषय व्याल के, मेटन काठेन कुअफ भाल के । तुप सन टिहिं कि विधि के मका । मातु या जनि लेहु कलका ॥ सीय राम पद अंक बराये । लखन चलत मग दाहिन बारे ॥ एकहि त्रांक यही मन माही । प्रात काल चलिहौं प्रभु पाही । हरपहि निरखि राम पद अका । मानहु पारम पायउ रका ॥ गहि पद लगे सुमित्रा अका। जनु भेटी सम्पति अति रका ।। अब भरि अक भेटि मोहि भाई । लोचन सफल करहुँ मै जाई ।। सू०-इस सम्बध मे मगलाचरण भी देखिये। यक-गिातीके प्रक, चिन्द, गोद, सख्या, नाटकाश, अन्याश, गव सख्याका संकेत । अंक पदावली कथन। , १ २ श्लोफेन गा तदर्दन तदर्भातरणमा । अवन्ध्यन्दिवसा दानाध्ययन कर्मभिः । अर्ध वसति कैलासे, अर्थ गायक मदिरे । सम्पूर्ण वणिजागारे, यो जानाति स पडितः । अजीण भेपज वारि, जीणे वारि पल प्रदम् । अमृत भोजनाधेतु, भुक्तस्योपरि तद्विपम् । सर्व नाशे समुत्पन्न, वा राजति पडितः। अर्धेन कुरुते कार्य, सर्व नाशो न जायते ।

-- अफविलासा 1 शूली जातः कदशन चशाइँदा योगाकपाली । वखाभावाद्विगत वसनः स्नेह शून्यो जटावान् । इत्य राजस्तव परिचया दीश्वरवं मया । नाद्यापि त्वं मम नरपते ह्यर्द्ध चन्द्रं ददासि । अंर्द्ध दानव वैरिणा गिरिजयाप्यर्थ हरस्याहृतं । देवेत्यं सुवन त्रये स्परहरा भावे समुन्मीलति । गंगा सागर मम्बरं शशि कला शेपश्च पृथ्वी तल । सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्व मग मत्त्वामा भिक्षाटनम् । अर्व मात्रा लाघवेन पुत्रोत्सवंमन्यन्ते वैयाकरणाः । , अवे भाग कोणत्यहि दीना, उभय भाग अाधेकर कीन्हा । गिरा मुखर तनु अर्ध भवानी, रति अति दुखित अतनु पतिजानी । सकुची तात कहत इक वाता, अर्थ तजहिं बुध सर्वस जाता। अब राति पुर द्वार पुकारा, वाली रिपु वल सहै न पारा | अर्ध राति गइ कपि नही आवा, राम उठाय अनुज उर लावा। आपा झटक कपिन संहारा, कहहु बेग का करिय विचारा। इहा निशि रावण जागा, निज सारथि सन खीझन लागा। अर्थ निशा वह पायो भौन, सुन्दरता वरण कहि कौन । निरखतही मन भयो अनन्द, यो सखि सज्जन ना सखि चन्द श्राधा कैलासहिं बसे, आधा गायक हाथ । पूरण वनिया घर रहे, जाने सोइ सनाथ । (हरताल) श्राधा दूलह आधा रोग, वीच बाग में भा सजोग । (वरगद) पूरा है पर प्राधा नाम, औपधि के वह आवे काम । (नीम) अब जल गगरी, छलकत जाय । ग्रार सेर के पात्र में, कैसे सेर समाय ।। प्रापी छोड़ एक को याये, ऐसा डूबे थाह न पाये । प्राधा तीतर बाधोपटेर। ग्रा माघे, कामरि काये। ग्रा गाय दिवारि है, आधे में है फाग। एक घडी पानी घड़ी, आधिउ में पुनि श्राध।, लसी साति साधु की, हरै कोटि अपराध ॥ . .

अकरिलास। [६] खाय के पान विद्यारत नोट है पैठि सभा में बने अलवेला। धोती किनारी की माडी सी ग्रोढत पेट बाय किये जस थैला। वंश गुपाल पावानत है यह भूप कहाय बने फिर छैला। सान करे बड़ी साडिवी की अरु दान में देत न एक गोला । एक मेवाक्षरयस्तु, गुलः शिप्प प्रयोधयेत् पृषिव्या नारित तद्रव्यं, यहत्वाचानृणी भवेत् । एकाक्षर प्रहातारं, यो गुरु नाभि वंदति । श्वानयोनिशत भुगवा चाण्डाले प्यभिजायते । यथा होकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् । एवं पुस्पकारेण पिना दे न सिध्यति ॥ एको देवः केशवो वा शिवाचा, एकानारी सुन्दरी पादरीवा । एक मित्र भूपतिका यतिवर्वा, एको वासः पत्तने वा वनेवा । अनन्तरत्नमभवस्य यसा हिमनसोभाग्य विलोपि जातम् । एकोहि दोपो गुण सनिपाते निमनतीन्दोः किरणेप्विवाकः । एकोहि दोयो गुण सविपाने, निमनतीन्दोरिति योन भाषे । न तेन दृष्ट करिनारापस्त, दारिद्य मेक गुण कोटि हारि। एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो, दशाश्वमेवार भृथेन तुल्यः । दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म, कृष्ण मणापी न पुनर्भवाय । श्रुतिविभिन्नास्मृतिरेस भिन्ना, नेको मुनियस्य वचोऽप्रमाणम् । धर्मस्य तल निहित गुहाया, महाजनो येन गतः सपथाः । सर्व धर्मान्परित्यज्य, मामेक गरण ब्रज । अहत्वा सर्व पापेभ्यो, मोक्ष विष्यामि माशुचः। एक एव सुहद्धर्मो, निश्नेप्पनुयातियः । सर्व मन्यद्धि गछति। एके नापि सुपुत्रेण, पवित्र गुण गालिना । सुरभिः क्रियते गोत्रञ्चन्दने नेव काननम् । ओस्विकाक्षरब्रह्म, व्याहरन्मागनुसरन । यः प्रयाति त्यजन्देश, सयाति परमागतिम् । चला लक्ष्मीश्चला: प्राणाचले जीवित मदिरे। चला चलेच संसार, धर्म एकोहि निश्चलः शरीरेण समन्नाश, HTTE --- [७०] अकक्लिास। एकस्य दुःखस्य न यावदंत, पारंगमिष्यामि अथावस्य । वाव द्वितीय समुपस्थितम्मे, छिपना पहली भरति । १-२-३-३ एक मानोभवेद् हस्खो द्विगात्रो दीर्घ उच्यते । त्रिमात्रस्तु प्लुतोशेयो ब्रजनं चाई मात्रकम् । १-२-३-४ प्रथमे नार्जिता विद्या, द्वितीये नानित वनम् । तृतीये न तपस्तप्त, चतुर्ये किं करिष्यसि । १-२-३ (एकस्तपो द्विरध्यायी, त्रिभिर्गाने चतुष्पयः । ४-५-७ 1 पच सप्त कृपिश्चैव, संग्रामो बहुभिर्जनः । १ से ३ प्रथम शैल पुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चंद्र घण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् । पंचमं स्कंदमातेति पालुकात्यायनीतिच । सप्तमं काल रात्रिश्च महागौरीतिचाटमम् । नवमं सिद्धि दानीच नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः । १-१० एके नैव सुपुत्रेण, सिंही स्वपिति निर्भया । सदैन दशभिः पुत्रैऔर वहति गर्दभी। १-१०० (एकोहि गुणवान्पुत्रो, निर्गुणैश्च शतैर्वरः । १००० एकश्चद्रस्तमोहन्ति, नचताराः सहरशः । एक अनीह अरूप अनामा, अज सचिदानन्द परधाना ।। भरन सभार सु शीतल ताई, सदा एक रस बसि न जाई ।। आश्रम एक दीस मग माही खग मृग जीव जन्तु कछु नाही । बन्दो सन्त असजन चरणा, दुख प्रन उभय वीच कछु बरणा ।। ग्छिरत एक प्राण हरि लेही, मिलत एक बाणा दुख देही ।। एकहि वाण प्राण् हरि लीन्हा, दीन जानि तेहिं निज पद दीन्हा ।। एक निमेप वर्ष सम जाई, यहि विधि भरत नगर नियराई। एक बार चुनि कुसुम सुहाये, निजकर भूपण राम बनाये ।। एक धर्म एक व्रत नेमा, काय वचन मन पति पद प्रेमा ।। मुनु सुग्रीन में मारिहा, वालि एकही वाण । ब्रह्म न्द्र शरणागत, गये न उपरहि माण ।। एक वागिण कला निभान की, सो प्रिय जाके गति न आन की। सग नारि इक देवि अनूपा, परणि न सकाई शेप तेहि रूपा ।

[७१] , कविलास। निशिनर एक रिन्धु मह रहई, करि माया नभ के सग गई ।। गैल विशाल देखि इक पागे, तापर कूदि चढेउ भय त्यागे । पति जीतन इक गयउ पताला, राखा बाध शिगुन हय शाला ।। एक होरि सहस भुज पेखा, धाइ धरा जनु जन्तु विशेखा। एक कढ़त गहि सकुच अति, रहा पालि की काख । तिन महें रापण करन त, सत्य कहहु तजि मारव ।। एकहि वा काटि सर माया, जिमि दिन कर हर तिमिर निझाया। लीन्ह एक तेहि शैल उपाटी, रघुजल तिलक गुजा सोड कार्टी । निज जननी के एक कुगारा, तात तागु तुम प्राण नगारा । एक नारि त रघुपर केरा, लखन सुयश तुन सुनेहु बनेरा । रहा एक दिन प्राधि प्रभारा, समुमत मन दुस भयउ अपारा । रहा एक दिन प्राधि कर, अति भारत पुरलोग । जह तह गोचहिं नारि नर, कृरा तनु राम वियोग । कलियुग योग यश नदि ज्ञाना, एक अधार गम गुण गाना । कलिकर एक पुनीत प्रतापा, मानस पुग्य होइ नहि पापा । यदि कलिकाल न पर्म विवेकू, राम नाम अबलम्बन एकू । एक हाथ वाजे नहि तारी। इक ते एक दई के ताल। इकलो चना भाड नहिं फोडे । एक गरीवी आटा गीला । इक मछली सर गधित करै । एक तवे की रोटी, क्या छोटी क्या मोटी। इक नागिन अरु पख लगाय । एक पूत जनि जनियो माय, घरै रहै की वाहर जाय । रे भन साहसी साहस राग्व, मु साहस से सब पर फिरगे। ज्यो पदमाकर या सुख में दुख त्यो दुख में सुख सेर फिरेंगे । वैसही वेणु वजारत श्याम सुनाम हमारहू टेर फिरेंगे । एक दिना नहि एक दिना कवह फिर वे दिन फेर फिरेंगे । 'कह कृपाराम सब सीखयो निकाम एक पोलिगो न सीख्यो सब सीरयो गयो घर में। काजर की कोठरी में केतेहु बचाये चलो एक रेख काजर की लागिहे पै लागिहै। है [ ७२] अंकविलासा , - पल जने से दोय भले। एक पथ दो काज। एकै साधे सर सबै, सब सारे राव जाय । जो गहि सेवै मूल को, फूलै फलै अवाय ।। कार गरजे चूदन एक। ताहि सो यह लहो विवेका, सब ते प्रगत जगत मह एका ! चलिये भतो न कोस को, दुहिता भली न एक । मगिनो भलो न बाप सो, जो, विपि राखै टेक ॥ भले गनुस की एक बात । भूमि एक बिस्वा नी, नाप पन्चो भूपाल । सब चूमने अाठा एक तू न रूटा चाहिये । है जो की जोय को, एक सहायक था । सिंह लगन सु पुरुष वचन, कलि फरै इम्बार । तिरिया तेल हीर हठ, चढू न दूजी बार ।। ब्रह्म, चन्द्रमा, भूमि अर, रद गनेश है एक । गज मुकता त्यो शुक्र चख, एक कहे सविवेक । टका करै कुलहूल टका रिग वजारे। टका चहै सुखपाल टका सिर छत्र धरायै ॥ टका माइ अरु वाप टका भैयन को भैया। टका सामु अरु ससुर टका सिर लाड लडैया ॥ सो एक टका बिन टुक टुका होत रहत नित रात दिन । चैताल कई विक्रम सुनो पिक जीवन इकटके विन ।। १-२ चलो सखी तहँ जाइये जहा वस व्रजराज । गोरस वेचत हरि मिले एक पंथ दो काज ॥ १-२ इक दूवर अरु दोय असाह । इक तो है ही करू करेला, दूजे नीम चहो । १-२ एकहि वार ग्रास सब पूजी, अब कछु कहर जीह करि दी। इक तो गुढिया नाचनी, दूजे घर भा नाति । १-२.. एकदि म्यान माहि द्वै खाडे । १-२ लेना एक न देना दाय। 1 अंकपिलासा [ ७३ . एक क्षत्र इक मुकुट मणि, सव वर्णन पर जोइ । तुलसी रघुवर नाम के, वरण पिराजत दोट । १-४ एक दत दयावंत चार भुजा धारी, माथे सिदूर लस मूपक असवारी । १-४ गृहिन दरिद्र गृह त्यागिन विभूति दीन्दी प्रेगिन वियोग धुण्यक तह छलो गयो । ग्रहन नहेश कियो शनी को सुचित्त लघु व्यार न अनद शेव भारन दलो गयो । फेरन फिरास्त गुणीन द्वार द्वार नीच गुणन विहीन घर भैठेही भलो भो। कौन कौन चूक कहो तेरी एक ग्रानन तें नाम चतुरानन पै चूकतो चलो गयो । १-४-५ । गावत गजानन सकुचि एक आनन तें, जात चतुराननहू दि वण ६-१००० लाज के । मौन गहि रहे शभु कहि पच आनन तें, भापत पडानन ना सामुहे समाज के ॥ कहौ पुनि कौन विधि गाइये गुणानुवाद, 'भानु' लघु आनन ते देव सिरताज के। शेष जर गावे सह- सानन ते तोह गुन, गाये ना सिरात ब्रजराज महराज के । एक मुख गागे नाते पाच मुख पाये अब पाच मुख गाइहौ तो ते मुख पाइहो ( गगालहरी) १-६ देव एक गुण धनुप हमारे, नव गुण परम पुनीत तुम्हारे । १से तोसो तुरी क कृण प्रिया, नहि जि लखी जयलोक मझारी । चारितु वेद धके गुण गाय, तिया पच वाणा की छरिहारी। राग छटो गनुराग भरी, सत सिन्हु ना ग्रम रत्न निहारी । आठहु सिद्धि नवौ निधि देत, सदा जन को सुपभान दुलारी। एक एक तो वात है, लगी नो नो हाथा १-१० राम नाम इक अक है, सव साधन है मन । अफ गये कछु हाय नहि, अक रहे दसगून । १-१००, शेर पूत एकै भलो, सौ सियार के नाहिं । (१सहस) एक वार तरवार को सहस्र वार' अहसान। १कोटि जोलो एक तारेको हो रचत कवित गग तौलो तुमकेतिक करोर तारि डारती (-गगालहरी.) - . -- [७] अंकविलास। । (९ डेढ पायली रमतिला, मिरजापुर की हाट | (२) " शोकाराति भय त्राणं, प्रीति विश्रम्भ भाजनम् फेन रन मिदं सृष्टं मित्र मित्यक्षर द्वयम् । रामादपिच मर्तब्य, मर्त्तव्य रावणादपि उभयोर्यदि मर्तव्य, वरं रामो न रावणः । संसार विप वृक्षस्य, द्वे एव रस वस्फले काज्यामृत रसा स्वादः, संगमः सुजनैः सह । संग्रामे सुभटेन्द्राणा, कवीनां कवि मंडले दीप्तिर्वा दीप्तिहानिर्वा, मुहूर्तादेव जायते । नवेदाच पर शास्त्रं, न देवः केशवात्सरः । २-३ खादन गन्छामि हसन्न जल्पे, गतं न शोचामि कृतंनमन्ये द्वाभ्यां तृतीयो न भवामि राजन् किं कारणं भोज भवामि मूर्खः । २-४-६-८ स्वीणा द्विगुण ग्राहारो, लज्जा चापि चतुर्गुणा साहस पद् गुणंचैव, कामश्चाष्ट गुणः स्मृतः । २-६-३ न गन्छेता पिता पुत्रौ न गन्छे त्सोदर द्वयम् नव नार्योन गच्छेयु ने गच्छेद् ब्राहाण त्रयम् । । २ , पक्ष, नदीतट, धार असि, श्रुति उरोज, चख, हाथ । राम पुत्र अरु हस्ति रद, चक सारस ? साथ ।। ग्राखर मधुर मनोहर दोऊ, वरण विलोचन जन जिय जोऊ । सिया राम मय सब जग जानी, करौं प्रणाम जोरि जुग पानी । कह दुई कर जोरी प्रस्तुति तोरी, केहि विधि करौ अनन्ता । माया गुण ज्ञानातीत अमाना, वेद पुराण भनन्ता । तेहि अवसर आये दोउ भाई, गये रहे देखन फुलवाई । राम लपन दोउ वन्धु वर, रूप शील बल धाम मख राखेउ सब साखि जग, जीति असुर सग्राम । - , 1 प्रकल्पिाला (51 मुनि पद कमल वैदि दोउ भ्राता, चले लोक लोचन सुखदाता। निरखि सहज सुन्दर दोउ भाई, होहिं सुखी लोचन फल पाई। सहज मनोहर मूरति दोऊ, कोटि काम उपमा लघु सोज। प्रभु दोउ खंड चाप महि डारे, देखि लोग सर भये सुखारे। सुनहु गहीपति मुकुट मणि, तुम सम धन्य न कोउ । राम लपण जिनके तनय, विश्व निभूपण दोउ ॥ वन्यु दोउ हृदय लगाये, पुलक अग लोचन जल छाये। दुइ बरदान भूप सन थाती, मागहु आशु जुडावा छाती। दुइकि होइ इक सग भुग्रालू, इसब ठठाइ फुलाउव गालु । तुलसी या जग प्राइक, करि लीजे दो काम देवे को टुकडा भलो, लेबे को हरि नान । भइ मति कीट भृग की नाई, जहें तह में देवहु द्वै भाई। गुण ते गलो होत, नहिं संपति न सहायते, पूनोचन्द उदोत, दुतिया की सम्बर नहीं । जग में साचे दो जने, एफ राम अरु दाम । इक दाता है मोक्ष के, एक सुधारै काम ॥ लाल लाल सवही कहत, लाल जगत में दोय. इक सागर में-दूसरो, मातु कोख में होय ।। दुविधा में दोऊ गये, माया मिली न राम । ये कपहूं नहिं देवर होत रसोई के विम कसा के कूता। योनो ओ सुगन्ध नो में दोनो हैसियतु है। . १ - [४] अंकविलासे। डेढ पायली रमतिला, मिरजापुर की हाट | (२) शोकाराति भय त्राणं, प्रीति विश्रम्भ भाजनम् केन रत्न मिदं सृष्टं मित्र पित्यक्षर द्वयम् । रामादपिच मय, मर्त्तव्य रावणादपि उभयोर्यदि मर्तव्य, वर रामो न रावणः । संमार विप वृक्षस्य, द्वे एव रस वस्फले फाव्यामृत रसा स्वादः, संगमः सुजनैः सह । संग्रामे सुभटेन्द्राणा, कवीना कवि मंडले दीतिर्वा दीप्तिहानिर्वा, मुहूर्तादेव जायते । नवेदाच परं शास्त्र, न देवः केशवात्परः । २-३ खादन गन्छामि हसन्न जल्पे, गतं न शोचामि कृतनमन्ये द्वाभ्यां तृतीयो न भवामि राजन् कि कारण भोज भवामि मूर्खः । २-४-६-८ वीणा द्विगुण ग्राहारो, लज्जा चापि चतुर्गुणा साहस पट् गुणंचैव, कामश्चाष्ट गुणः स्मृतः । २-६-३ न गन्छेता पिता पुत्रौ न गन्छे त्सोदर द्वयम् नव नार्योन गन्छेयु ने गन्छेद् ब्राहाण त्रयम् । 1 । पक्ष, नदीतट, धार असि, श्रुति उरोज, चख, हाय । राम पुत्र अरु हस्ति रद, चक सारस है साथ ॥ पाखर,मधुर मनोहर दोऊ, वरण विलोचन जन जिय जोऊ । सिया राम मय सब जग जानी, करौं प्रणाम जोरि जुग पानी । कह दुहु कर जोरी प्रस्तुति तोरी, केहि विधि करौं अनन्ता । माया गुण ज्ञानातीत अमाना, वेद पुराण भनन्ता । तेहि अवसर पाये दोउ भाई, गये रहे देखन फुलवाई। राम लपन दोउ वन्धु वर, रूप शील बल धाम मस राखेउ सच साखि जग, जीति . असुर संग्राम।

" प्रशमिजास। [७]-- मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता, चलें लोक लोचन सुखदाता । निरखि सहज सुन्दर दोउ भाई, होहिं सुखी लोचन फल पाई। सहज मनोहर मूरति दोऊ, कोटि काम उपमा लघु सोज । प्रभु दोउ खड चाप महि डारे, देखि लोग सब भये सुखारे । सुनहु महीपति मुकुट मणि, तुम सम धन्य न कोउ । राम-लपण जिनके तनय, विश्व विभूषण दोउ ।। इपि बन्धु दोउ हृदय लगाये, पुलक अग लोचन जल छाये । दुइ बरदान भूप सन थाती, मागहु या जुड़ावहु छाती । दुइकि होइ इक संग भुबालू, डॅसव ठठाइ फुलाउन गालू । तुलसी या जग.आइकै, करि लीजे दो काम देवे को 'टुकडा भलो, लेवे को हरि नाम । भइ मति कीट भृग की नाई, जहें तह में देखा ? भाई। गुण ते गरुवो होत, नहिं संपति न सहायते, पूनोचन्द उदोत, दुतिया की मरवर नीं। जग में साचे दो जने, पफ राम अरु दाम । इक दाता हैं मोक्ष के, एक मुधारें काम ।। लाल लाल सवही कहत, लाल जगत में दोय । इक सागर में दूसरो, मातु कोस में हत्य ।। दुविधा में दोऊ गये, माया मिली न राम । ये काहू नहि दर होत रसोई के पिम कसा के योनो मो सुगन्ध तो में दोनो भियतु है। . , 1- - [७६] अप्लपिमास। , वेद पुराण संत मत येह, सीय राम पद सहज सनेह । अथरा मागे दुइ पारखी। दोइ हांथ सों वाजे तारी। -- - दोय घरों का पाहुना, भूखो ही रहि नाम । खूब गुजरेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो। हो तुम नीति निधान खला, परमारथ स्वारय साधत दोऊ । २-३ राज को दूसरो छेरी को तीसरो, रेह को मूसरो खासर खूसा ।। २-३ दो जन की तकरार में, तीजे की है मौज । २-४ श्याम गौर सुन्दर दोउ जोरी, निरखहि छवि जननी त्रण तोरी । चारिउ शील रूप गुण धामा, तदपि अधिक सुख सागर रामा । २-६० वोले नल दोउ भुजा उठाई, योजन साठि मोर गति भाई । २-४-जामें दू अधेली चार पावली दुअन्नी पाठ, तामें पुनि आना १६-३२ सोरह समात है । बत्तिस अधन्नी जामें चवसठ पैसा होत, एकसौ- २५६-५१२ अठाइस सुधेला गुनमात है । जुग सत छप्पन छदाम तामें देखियत, दमरी सु पाच सत बारह लखात है । कठिन समैया कलिकाल को कुटिल दैया, सलग रुपैया भैया कापै दियो जात है। (२६) ढाई अक्षर प्रेम के, पदै सो पडित होय । घोडाह शतरंज को, चलै अढ़ाई चाल । बाई चावल खीचड़ी, पके मिया की भित्र । दरहा राजा बाई दिन का। 1. लखो - । . - प्रकापिलासा 12 । - (३) अधमा धन मिच्छति, धन मानव मध्यमाः उत्तमा मान मिन्छति, मानोहि महतां धनम् । असारे खलु संसारे, सारमेत लय स्मृतम् काश्या वासः सता सेवा मुरारेः स्मरण तथा । उपना कालिदासस्य, भारवे र्य गौरवम् टगिडनः पदलालित्प, माघे सति यो गुणाः । तमाल विविध प्रोक्तं, कली भागीरथी यथा कचिद् धुक्का कचि त्युक्का फचिन्नासाम गामिनी । : मदाने विम पीडास्तु, पुत्र पीडास्तु भोजने शयने पनि पीडास्तु, त्रि पीडास्तु दिने दिने। दूरस्थाः पर्वता वेश्याच मुख महने युद्धस्य वार्ता रम्याच, त्रीणि रम्याणि रतः। पृथिव्या त्रीणि रवानि, जल मन सु भापितम् मृदैः पापाया खरडेपु, रत्न सम्रा विधीयते । पुष्प एप्ट्वा फल दृष्ट्वा, दृष्यास्त्रीणाच यौवनम् त्रीणि रत्नानि दृष्टौ कस्यनो चलते. मनः । पिता यस्य शुचिर्भूतो, माता यस्य पत्तित्रता सभाभ्या यश्च सभूतो, तस्य नोचलित मनः । सकजल्पति राजानः सकृजल्पति पण्डिताः सत्कन्या मदीयन्ते, त्रीण्येतानि सत्सछत् । मकारः कुम्भकर्णेच, भकारश्च विभीपणे सयोर्येष्ठ कुलश्रेष्ठ, भकार:कि न विद्यते । (राषय, राभण) ३-६-११ त्रिपद एकादशे राहुः त्रिषट् एकादशे शनिः विष्ट एका मौमः सारिष्ट निवारणम् । रम्या, . - [७] अमविवास। ३ जानहिं तीन काल निज ज्ञाना, करतल गत आमलक समाना । त्रिविध ताप त्रासक त्रिमुहानी, राम स्वरूप सिन्धु रागुहानी । त्रिकालज्ञ सज्ञि तुम, गति सर्वत्र तुम्हारि । कहहु सुता के दोप गुण, मुनिवर हदय विचारि ॥ सौरभ पल्लवं मदन विलोका, भयउ कोप कांपेउ त्रय लोका। तव शिव तीसर नयन उघारा, चितात काम भयउ र छारा। चली सुहावनि त्रिविध वयारी, फाम कृशानु वढावन हारी । तुम त्रिकालदर्शी मुनि नाथा, विश्व वदरि जिमि तुम्हरे हाथा । त्रिविध समीर वहै सुखदाई, निरखत वन शोभा अम्किाई । उभय वीन सिय सोहत कैसी, ब्रह्म जीव विच माया जैसी । राम कृपा मतुलित बल तिनहीं, त्रण समान त्रय लोकाई गिनहीं । सचिव वैद्य गुरु तीन जो, गिय बोलहिं भय पास । राज्य धर्म तन तीनि कर, होइ गरी नास ॥ विनय न मानत जलधि जड़, गये तीनि दिन वीति । योले राम सकोष तव, भय विन होय न प्रीति ।।।। देहिक दैविक भौतिफ तापा, राम राज्य काहू नहिं व्यापा। स्प में फसर नाहीं राग में कसर नाहि लाग में कसर नाहिं लाजह की घेरी है | रंग में कमर न, कसर है उपगहू में प्रण के प्रसगहु में परम घनेरी है ॥ बाल कवि हाव में न भाव में कसर यहा चाव में कसर ना चलाक बहुतेरी है । तीन है कसर उधौ काहू के न कूद इहा नाइन न जाति ग्रह काह की न चेरी हैं ।।- राज, निया, अरु दास इठ, तीन प्रपंख इठ जान ! 1 - ।

अंकपिलासा [७६ १ . चढे रगतीमरिवार के योरे। पडी बहाई गांड की, तीन कोस को कोस मन जमीन जर तीन ये, सन झगड़ों के मूल कौड़ी न हो जो पास तो कौड़ी के तीन तीन तीन कौर भीतर तो सुम देव पीतर । तीन लोक ते मधुरा न्यारी। यही ढाक के तीनहिं पात। नौका दूती वैद प्रवीन, काम सरे पुछियत नहिं तीन । भट भटयारी बेसवा, तीनो जाति फुजात। पाये को, पादर कर, जात न पूछे वात ॥ : . मूल गये राग रंग, भूल गये चकरी । तीन चज याद रही, नून तेल लकरी ॥ मुये चाम ते चाम कटावे, भुइमा सकरे सोवै । घाघ कहै ये तीनो भकुवा, उढरि जाय भर गई ।। सभा विगारे तीन जन, चुगुल चूतिया चोर । तीन तिकार मला विचार । लीक लीक गाडी चल, लीरूहि चलै कपूत । लीक छाडि तीनो चल, शागर सिंह सपूत ।। भोरा भूतऽरु साप कहानी, तीनों में पहुं झट समानी । तीनों पन नहि एक समान । श्रोता विविध समाज पुर, प्रान नगर दुइ फूल । सन्त सभा अनुपम , सफल सुनगल मृल । - ।

--- अकविनास। ५० । की तुम तीन देव मह कोऊ, नर नारायण की तुम दोज । ३-४ ऋतु वसन्त वह विविध वयारी, सब कहँ स्लम पदारथ चारी . ३-४ तीन दिना तक पाहुना, चौथे वेईमान । ३-१३ तीन माहि नहिं तेरा में, दोल वजावे डेरा में। ३-१३ तीन वुलाये तेरा पाये, देखो घर की रीति । बाहर वाले खागये, घर के गा गीत ।। ३-१३-१-१८ तीन तेरा नौ अठारा, जानिये घर फूट । -- (३६) साढ तिहत्यी मानुष देह । पाये हरि सों करौ सनेह । साढ़े तीन यार का किरसा । है नव शौकीनो का यह हिस्सा। रहे पेशवा राज्य में, साढ़े तीन सयान । सखा देव विठ्ठल विदित, प्राधे नाना जान । १ सखाराम पंत १ देवाजी एत १ विठ्ठलरान ३ नाना फडनवीस चक्र सुदर्शन वन इफ, इन्द्र बज्र विख्यात। इनूमान वजाग पुनि, अर्ध भीम को गात । सारंग श्री भगवान धनु, पुनि पिनाक शिव जान । गाडीवहु अर्जुन धनुप, अर्ध इन्द्र धनु मान | चींटीहूं टीडी कहूं, पुनि जलंधर जल पीन । . मम अपिलि क्ले प्रयल, कड़ियत साढ़े तीन । 1 + प्राविलासा - - सुरभी मधु माखी बहुरि, पाट कीट सुनु मित्र । अर्थ सख गुद जानिये, साढ़े तीन पवित्र । वर्प परीगा दशहरा, अरु पचमी यसत । अकती अर्ध मुहूर्त मिलि, साढ़े तीन कहत । (४) ४ काव्येषु नाटकं रम्य, तत्रापिच शकुतला। तत्रापिच चतुर्थोऽस्तत्र श्लोक चतुष्टयम् । चतुर्भुजस्य पतीच, महालक्ष्मीः सरस्वती । गंगाच तुलसी चैव, देवी नारायण प्रिया । तत्र मित्र न वस्तव्य, यत्रनाऽस्ति चतुष्टयम् । । ऋण दाताच वैद्यश्च श्रोत्रियः सजला नदी। । नराणा नापितो धुर्तः पक्षीणा चैव वायसः । चतुप्पदा शृगालस्तु, श्वेत भिक्षुस्तपस्विनाम् । यौरन न सम्पत्तिः प्रभुत्वमविवेकता। एफै कमप्यनय, किमु यत्र चतुष्टयम् । असतुष्टा द्विजा नष्टा, सतुष्टश्च महीपतिः सलज्जा गणिका नष्टा, निर्लज्जाच कुलांगना । ४ चातुर्वण्य मयासृष्टं गुण कर्म विभागशः । ४-२ प्रचतु वदनो ब्रह्मा द्विराहुरपरो इरिः । प्रभाल लोचनः शंभुर्भगवान्वादरायणः । ५-२-३ न गच्छे च्छ्द्ध चातुष्क, न गच्छे द्वैश्य पचकम् न गच्छे द्युग्म राजानौ, न गच्छेद् ब्राह्मण त्रयम् । ४ मधुम्नो श्री कृष्ण अरु, सकर्पण अनिरुद्ध ! । चतुर पिलि प्रमये, रूपचारि सम शुद्ध, . । . - - { ८२] प्रकविलास। 17 विधि मुख, हरिभुज, घेद, फल, वर्ण अवस्था चार । सुरपति, इस्ती दन्त, युग त्यौं आश्रम निर्धार ।। सुनि समुमहिं जन मुदित मन, मजहिं अति अनुराग । लहहिं चार फल पछत तनु, साधु समाज प्रयाग । वंदउ चारिउ बेद, भव वारिधि वोहित सरिस जिनहि न सपनेउ खेद, वरणत रघुपर पिशद यश । सुठि सुन्दर संवाद वर, विरचउं बुद्धि विचारि । तेइ यह पावन सुभगसर, घाट मनोहर चारि ॥: रामभक्त जग चारि प्रकारा, सुकृती चार अनय उदारा। चारिउ शील रुप,गुण नामा, तदपि अधिक सुससागर रामा । जाकी सहज श्वास श्रुति चारी, सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी । पुनि चरणन मेले सुत चारी, रामदेखि मुनि पिरति विसारी। चौथे पन पायउ सुत चारी, विभ वचन नहि कहेउ विचारी। चिरजीवहु सुत चारि, चक्रवर्ति दशरथ के । धीरज धर्म मित्र अरु नारी, ग्रापद काल परखिये चारी । ." मुदित अवधपति सकल सुत. वधुन समेत निहारि । जनु पाये महिपाल मणि, क्रियन सहित फल चारि । चारि पदारथ करतल ताके, प्रिय पितु मातु प्राण समजाके। जग पतिव्रता चारि विधि अहीं, वेद पुराण सन्त असा कहीं। अनुज वधू भगिनी सुत नारी, सुनशठ ये कन्या सम चारी। इनाई कुदृष्टि विलौकै जोई, ताहि वर्षे कछु पाप न होई ।. तौ पर नारि ललाट गुसाई, तजहु चौथ चदा'की नाई। -- धापिलासा । [३] सेवक शठ नृप लपा जुनारी, कपटी मित्र शत्रु समचारी। तासु एकुट तुम चारि चलाये, कहहु तात करनी विपि पाये । कहा पालि सुत सुनहु सरारी, मुकुट न हाहिं भूप गुण चारी। लंका बका चारिहु द्वारा, केडि विधि लापिय करहु पिचारा। एक मोर वारि वेद, एक पोर चातुरी। चारि दिना की चांदनी, फेर अधारी रात । माटो सुही चौथ को लख्योरी मृग भा यातें, भूउद्द कलंक मोईि लागियो चहत है। नानि नीच की अति दुखदाई, जिमि कुश धनु उरग विलाई । सांचहि ताको न होत भलो, जु न मानत है कहि चार जने की। अपधेश के बालक चारि सदा, तुलशी मन मन्दिर में विहरैं। चोपदार चाकर चमू पतिचर दार, पदिर मतगये तमाशे चारि दिन के। पान पुरानो घी नयो, अरु कुलवी नार । चौथे पीठि तुरग की, स्वर्ग निणानी चारि । । B . इन्दावन सों वन नहीं , नन्द गाव से गाम । घशी पट से. बट नहीं, पृष्ण नाव से नाम । रास पिलासी घट घट बासी, यरज सुनैया तुम्हीं तो हो । चार जुगन में नाम सुना है, कृष्ण कन्हैया तुम्हीं तो हो। अवध विलासी शिर हिय वासी, अरज सुनैया तुम्ही तो हो । चार जुगन में नाम सुना है, राम रमैया तुम्ही तो हो ।। राग्वी है सौहार द्विज, क्षत्रि दशहरा होय । गीप मासिका वैश्य की, शूद्र भोलिका जोय ।। - [२४] मनिवासी अंतर अंगुरी चारिको साच झूठ में होय, सब माने देखी भई. न माने कोय। चारि जने चारिह दिसातें चारों कोन गहि मेरु को इलाय के तो उखरिजाय। नाखे चार, जी में प्यार। इय गयरय पदचर सहित, सेना के चतुरंग । कोविद कवीशन को कृष्ण मानि भेट देत, अंगीकार कीजे चाउर सुदामा के। चारि चारि दिना को चवाव चाहे कोऊ करें अत लुटि जैहै पूतरी बरात की। केशवदास के भाल लिख्यो विधि रंक को अक बनाय रेवायो। धुवे नहिं छूटो छुटै वहु तीरथ जाय के नीर पखायो। कै गयो राव तबै जब वीर बली नृप नाथ निहायो । भूलि गयो जा रचना चतुरानन बाय रह्यो मुख चान्यो। ४-१ राजा चंचल होय मुल्क को सर करि ल्यावै । पडित चचल होय उत्तरदै आये। हाथी चचल होय समर में सूड़ि उठाये । घोडा होय झपटि मैदान दिखावै । ये चारो चचल भले राजा ' गजतुरी । वैताल कहै विक्रम सुनो एक नारि चचल पुरी ।। ४-५ विष्णु चारि भुज विपि मुख चारी, विकट वेप मुख पंच पुरारी ॥ ४-६-२ चौबे छब्बे होनगे, आये खे होय । ४-८४ आकर चार लाख चौराली, जात जीव नभ जल थल वासी। (५) ५ पाञ्चजम्प दृषी केशो देवदत्त धनञ्जयः। ॥

प्रावधासा [६ मायुः पारव वित्तप, विद्या निधन मेवच पर्वतानिहि सध्यते, गर्गस्थस्यैर देहिनः । मामाता जठरं गाया गात वेदो गलाशयः पूरिता नैव पूर्यन्ते, जकाराः पच दुर्भराः । जननी जन्म भूमिश्च, जान्हवीच जनार्दनः जगतः पचपश्चैव, जकाराः पच दुर्लभाः ! देशाटने पंडित मित्रनाच, पारागना राज सभा प्रवेशः अनेक शास्त्राणि विलोकितानि, चातुर्य मृतानि भाति पच । भरदिमशोकच चूतच नव मल्लिका । नीलो पलच पचते, पच पागस्य सायकाः। अहल्या द्रौपदी तारा, कुती मन्दोदरी तथा पच कन्या स्मरेनित्य, महा पातक नाशनम् । तिथि वारश्च नक्षन, योगः करण मेषच पंचागस्य फल मुला, गगा स्नान फलं लभेत् । सर्गश्च प्रति सर्गश्च, वंशो मन्वन्नगणिच वशानु चरितचैव, पुराण पच लक्षाम् । मधमासतथामत्स्यो मुद्रामैथुन मेवच मकार पचक देवि ! देवा नामपि दुन। (यामतत्र) पचभिः सह गन्तव्य स्थातव्य पचभिः सह पचभिः सह वक्तव्य न दुःख पत्रभिः सह । काकचेष्टा कोध्याने श्वान निद्रातथैवच अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पचलेक्षणम् । सावित्वपचघायूहि पर्तिदेहीति व्याकुला पंचेन्द्रारच इरेसा भविष्यन्ति भियास्तर ।

अकारलामा - com , पंचभिः कापिता कुती तह रथ पचभिः सती पदति लोकोऽय यशः पुण्य रथाप्यते । धनिकः श्रोत्रियो राजा, नदी वैद्यस्तु पचमः पंच या न वियन्ते न तत्र दिवसं वसेत् । राज पक्षी गुरोः पनी, सिन पली तथैवन पत्नी भातास्वमाताच पचता मातरः स्मृताः। शनैः पन्थाः शनैः कंथा शनैः पर्वत मानने । शनैर्विया शनैर्निचं पचैतानि शनैः शनः । जनिता चोपनेताच यश्च विद्या प्रयति 'अन दाता भय नाता पचैते पितरः सानाः । -७ ] भारतः पचमो घेदः सुपुत्रः सहमोरस: १०-१५ धाता पवदश रज, जामाता दशमो मदः । ४५-१०-१६ लातयेत्पंच वर्णशि दश वर्षाणिताइन् मासेतु षोडशे वर्षे पुने मिन्न पदाचरेत् ५-१०० भन्यैः साकं निरोधेन, पं पपोतर शतम् १०५ (परस्पर विरोधेन, पग पंचच ते शनाम् । भरमाकरि शिवेतु, क्य पंच शमयो पर मह विरोधेतु व्य पचाधिक शनम् । ५-१० गद पच इस्तेल दश इस्तेन वाजिनम् २००१ । दन्ती हस्त सदस्खेण देश त्यागेन दुर्जनः । ५ पाण्डव, शिपमुख, भूत, गो, गव्य कन्यका, माया महापाप, गति, वर्ग त्यो, पच यज्ञ अरु वाण ॥ टोल गवार शूद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकागे । पुलमी या ससार में, पच रतन है सार साप मिशन अकमरि मगन, क्यानान उपकार " अनविज्ञासा [471 मदा भवानी दाहिनी, सन्मुख र गणेश । पाच देव रक्षा करे, ब्रह्मा विष्णु महेश । पंच शब्द ध्वनि मगल नाना, पट पावडे परहि विशी नाना। पच कडे शिव सनी विवादी, पुनि अबडेरि मरादन नाही। पच कपल करि जेवन लागे, गारि गान सुनि मनि अनुगगे। अगहन की सित पचनी, पभ लग्न भृगुवार । सुखद रामय गोधूलिका, राम विवाह विचार । तहा कोरवा मेरे वैरी, धरि दो पच भतारू नाम (प्रौपदी) गो पांचढि मत लागै नीका, करहु वर्षि हिय रामा नका। है प्रभु परम मनोहर ठाऊ, पावन पचनी तेलिना। वनियक सखरच ठकुरफ हीन, वैद्यक पूत व्याधि नही चीन । पहित चुप चुप विसयाल, प? पार पाचौ घर मल । पाच पच मिलि कीजे काज, हारे नीते साय न लाम । मिर्गचिरोजी दाख पुनि, सुरमा और बदाम । मेवा एई पच जे, आवे जग में काम । पाय कौर भीतर, तो मम देव पीतर । पांचौ अगुरी घी में तर। पानी अगुरी इफसी नाहि । पंचन के मुख है परमेश्वर । पानि तजे अपने कुलकी तुरफैन मो लीये की सान चलाने । एकरि देत दिलासा प्रसन्न ह एक सो मोटरी लै घर मारे। है परमेश्वर पचन में पर नेक दया उर माझन लावै। नर्क परे तिनके पुरखा परपच करें घर पच कटार । ८८ अझविनाम। 1-२५-३० पाच ग्राम पधीसे महुवा, तीस परस में इमरिक महना। (६) माधुर्यातजन पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।। पैर्यलय समायुक्तो पद्गुणैः पाठकोत्तमः ।। ऐश्वर्गस्य समग्रस्य, वीर्यस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्य योव पणाभग इतीगना ।। धपिटो गरदश्चैव, शस्त्रपाणि धनापहः । क्षेत्रदारापहवेच, पदेते आततायिनः । अनियष्टिरनावृष्टिः शलभाम्पकाः शुकाः । प्रत्यासबाथराजानः पडेते ईतयः स्मृताः । उपाध्यायश्च वैद्यश्च, ऋतु काले वरागना। सूतिका दृतिका नौका, कार्यान्ते तेच शप्पात् । मौन फाल दिलम्बश्च, प्रयाण भूमि दर्शनम् । भृहव्यन्य मुखी वार्ता, नकारः पइ विधः स्मृतः उद्यनं साहस पर्यम्बलम्युद्धिः पराक्रमः पढेते यस्य विधन्ते, तस्मादेवोऽपि शश्ते । मस्कृत प्राकृतचैव, शौरसेनीच मागधी । पारसीच अप भ्रशं, भाषा पट्कंच लक्षणम् । रिक्त पाणिर्न पश्येच राजान देवना गुरुम् । दैवज्ञ भिपजे मित्र, फलेन फल मादिशेत । शुष्कमास नियोगदा, वाला स्तरणदधि प्रभाते मैथुननिद्रा, सद्यः प्राण्डगणिपट् । सयोमास नवान्नंच, पालासी क्षीरभोजनम् घृत मुष्णोक्फ चब, सद्यः । 2 -- + सर अफकिनास। [१६ ] राजीधी गिर कन्नी, म्दती लिखित पाटकः । अनाजपाठीच, पडेते पाठकाधमा । सधि विराह यानानि सस्थितिः सश्रयस्तथा । वैधीभावधभूपाना, पद्गुणाः परि कीर्तिताः । ६-४-२ पट फर्णे भिधत्ते मंत्रश्चतुष्कर्ण स्थिरो भवेत् । द्विकर्णस्यच मंरस्य अशाप्यत न गछति । ६ जग जान पट मुख जन्म कर्म प्रताप पुरपारथ महा। तिहि हेतु मैं वृपकेतु सुत कर चरित सक्षेपहि कहा। कीरति सरित छहू ऋतुरूरी, समय सुहावनि पावनि भूरी । छरे श्रवण यह परत कहानी, नारा तुम्हा' सत्य मम पानी। शारद मेरि तासु मति फेरी, मागेमि भाद मास पट फेरी । महानद गगन कपि, सर करें प्रक्षु पद प्रीति जात न जाने दिवस निशि, गये मास पट वीति । पट रिकार तजि अनघ प्रकामा, सकल अकिंचन शुचि सुख वामा । भाइ भतीजा भानजा, भाट भिक्षु मुस्हार । पट भकार को त्यागि के, तुलसी रुहार ।। पडतरा गायत्री जानो। माधुरि अक्षर भोज अरु, पदच्छेद स्वर शुद्ध धीरज लय ये पट गुमानि, कह पाठक गुण बुद्ध । शीघ्र राग युत गिर इलदि, केवल पउन उलेख मनर्वा स्वर मन्द पट, अवगुण पाठक लेख । मीठा खट्टा चिरपरा, खारा.कड्या आहि । सहित कसैला स्वाद के, पटरस भोजन माहि ॥ .

। ६० । अकारजासा दर्शन, रस, ऋतु, याहुज्वर, कार्तिकंय मुख, इति । शास्त, राग, त्रिशिरा नयन, अपर चरगा सोइ गति ।। धन कोण, वेदाग, अर, तर्फ इनदि सब जान । पट सरच्या हित वर्मती, कदिवर सहित प्रमान || छठे छमासे मी मग आये, आप हिले अरु मोहिं दिला । नाम लेत मुहि लागत शका, क्यों सास सज्जन ना सखिपसा । ६-५-४ श्री लिखिये एट गुरुन को, पाच स्वामि रिचार। ३-२-१ नत्रि मृत्य को, एक पुत्र अरु नारि ॥, । 2 (७) . ७ अयोध्या मथुरा माया, काशी काची अमरिका पुरी द्वारापती चैर, सप्तता शतायशाः । अश्वत्थामा बलियासो हनुमाश्च विभीषणः कृपः परशुरामश्व, सप्तते विरजीविनः । मामीच वैश्णपी चंद्री, रौद्री वाराहिकी नथा फोवेरी चैर कौमारी, मातरः सप्त कीर्तिताः। प्रादों माता गुरोः पत्नी, ब्राह्मणी राजपलिका गावी धात्री तथा पृथ्वी, सप्तता मातरः स्मृताः। सुधित स्तृपित कामी विद्यार्थी कृषिकस्तधा भाण्डागारी प्रवासीच सप्त सुप्तान्मनोधयेत् । । अहिपति शालौ वरटि र्यालकस्तथा परश्वानंच मूर्खच सप्तसुप्तान बोधयेत् । सप्तैतानि न पूर्य्यन्ते पूर्वमाणान्यनेकशः प्रामणोऽग्निर्यमोराजा पयोधिरुदर गृहम् । , . अकविनास मुनि, पताल, रवि तुरंग, स्वर, अग्निशिखा, गिरि, वार । द्वीप, सिन्धु, पुरि राज अँग, सप्त कहहु सविचार ।। सत प्रबंध सुभग सोपाना, ज्ञान नयन निरखत मन माना। त्यहि अवसर नारद सहित यो अपि सप्त समेत । समाचार सुनि तुहिन गिरि, गवने तुरत निकेत । सत द्वीप मुज बल वश कीन्हा, लै लै दड' छोडि नृप दीन्हा । बलि बापत प्रा बाढेउ, सो तनु वरणि न जाय । उभय घरी मह दीन्ह में, सात प्रदक्षिण वाय । सप्तावरण भेद करि, जहँ लगि रहि गति मोरि । गयो तहा प्रभु भुज निरखि, व्याकुल भयो वहोरि ।। इश्क मुश्क खासी सुनस, खैर खून मद पान । सात छिपाये ना छिपे, परगट होहि निदान। राजा कन्या ज्योतिपी, वैद्य गुरू सुर सिद्ध । भरेहाथ इन पै गये, होय काय सव सिद्ध। सात भावरी पूरो ब्याह । सातो सिंधु सातो लोक सातों रिपि है सु सोक सातो रवि घोरे योरे देखे.न डरात मै। साती दीप सातों इति कापाई करत मोर सातों मत रात दिन मान है न गात मैं । सातो चिरजीव परराइ उठे वार वार सातो सुर हाइ २ होत दिन रात में । सातह पतारा काल सबद कराल राम भेदे सात ताल चाल परी सात सात मैं॥ ७-१ सप्त ताल ये कृपा निपाना, वे सहि पकहीं बाना। ७-५-१ सात पाच की लाकरी, एक जने का घोम। ७ से १० सात मास सत मसा' कहावै, आठ मास जीपत नाहीं । न मास अति रगा-चगा, दस मास चल-तन माहीं।। ..मदिम कोक में पूर्व में पूर परिस J M अकवितास। 1 ७१ सजि प्रतीति बहु विध गइछोली, अवध साढ़ साती जनु बोली। (८) मृगराजो पो नागः कलशो व्यंजन तथा वैजयन्ती तथा भेरी, दीप इत्यष्ट मगलम् । राजा वेश्या यमचाग्नि, स्तस्करो वालयाचकौ । पर दुःखन जानाति, अष्टमो ग्राम कटकः । मूर्खत सुलभं भजस्व कुमते मूर्खस्य चाटौ गुणा निश्चिन्नो बहुभोजको- तिमुखरो रात्रिदिवं स्वप्नभाक् । कार्याकार्यविचारणान्धपधिर मानापमाने समः प्रायेणामयवर्जितो दृढवपुर्मुर्खः सुखं जीवति । -७ अष्ट कुला चल सप्त समुद्रा ब्रह्म पुरंदर दिनकर रुद्राः । नवं नाई नायं लोक स्तदपि किमर्थ क्रियते शोकः ।। ८-९-१० अष्ट वर्षा भवेद् गौरी, नववर्षाच रोहिणी । दश वर्षा भवेत्कन्या, ततऊर्ध्व रजस्वला I/ श्री दामा सुखधाम कृष्ण को परम प्राण प्रिय, वसुदामा शुभ नामदाम मणि मय जाके हिय, सुवल प्रवल परिहास रसिक मंगल मधु मंगल, तोक सुखद ब्रज लोक कृष्ण अनुरूप कृष्ण कल, अरजुन पालक गो वत्स बहु ऋषभ वृपभजूयादि पति, हरि जू के आठ सखा सदा सुमिरत मगल होत अति । । श्री वल्लभ आचार्य के, चारि शिष्य सुखरास । परमानन्दऽरु सूर पुनि, कृष्णरु कुंभनदास । विठ्ठल नाथ गुसाइ के, प्रथम चतुर्भुजदास । छीत स्वामि गोविन्द पुनि, नन्द दास सुखरास । (ब्रज के अष्ट छाप) अगहन शुक्ला अष्टमी, सेन सहित भगवान । उत्तर फाल्गुनि नखत में, लंकहिं कीन पयान ।

अफायिल्पस। अति सुन्दर है रुकमिणी, लक्ष्मी को अवतार । सरा भाना को मान है, जाम्बवती सो प्यार । कालिंदी नागिन जिती, भद्राजी सा हेत | मित वृन्दा अरु लक्ष्मणा, कुलको शोभा देत । निरसि राम उवि विधि हरखाने, आवहिं नयन जानि पछिताने । नारि स्वभाव सत्य कवि कहई, अवगुण आठ सदा उर रहई । साहस अनृत चपलता माया, भय अविवेक अशौच अदाया । अष्टाध्यायी पाणिनि जानो। पार्न गाठ कुम्मेत। भाग पहर काल सिर नाचे । मयरस तजभन आठ गण, पिंगल माहि प्रधान । अक्षर पाठ अनुष्टुप् पढ मे। रैन दिन आठो जाम गम राम राम राम, सीताराम सीताराम सीताराम कहिये। गीत कवित नाचत पढत, युद्ध वाद ससुरार। अरु अहार व्योहार में, लज्ना पाठ निवार ।। योग अग, वसु, सिद्धि, अहि, विधि श्रुति, दिग्गज, याम । अष्ट और वैयाकरण, भापहि कवि अभिराम ॥ हाली नाली बरदिया, कटकैया कुतवाल । ये पाठौ रक्षा कर, काना चोर छिनाल ॥ पौर के किवार देत घरै सवै गारि देत साधुन को दोप देत प्रीति ना चद्दन है । मागने को ज्वार देत बात कई रोय देत लेत देत भाग देत ऐसे निवहत हैं । पागहू के बंद देत वारन की गाठ देत परदान की काछ देत देतइ रहत है। एते ५ सबहिं कहैं लाला कछु देत नाही लालाजी तो ग्रागै जाम देतह रहत है ।। V [१४] अझविलामा नौ। ८-९ अष्ट सिद्धि ना निधि के दाता, ग्रस पर दीन जानकी माता । ८-६ पाठ कनोजी ८-१६ ग्राजु जो कह तो आठ मास लौ न लाग ठीक कालिगो करेंगो ५-२५१४० मासासोरह चलावही | पाच दिन कई पाच बग्स विताय देहि पाख जो कई तो लै पचास पहुं वावडी । भनत प्रधान जा पता पै न त्याग द्वार प्रापना लनात फेर वाहू को लगा। ऐसे सत्यादी सरकार है दिवेषा जदा काहे को पाया तहा जीवत ले पावही ।। (६) ६ धन्वन्तरिक्षमाण कामर सिंह गानाल भट्ट पट वर्णर कालिदासा ख्यातो वराहमिहिरोनृपतेः सभाया रत्नानिरपराचिनव विक्रमस्य । , आयुर्वितं गृहन्छिदं रहस्य मन पोपमम् । तपोदाना व मानीच नव गोप्यानि फाग्येत् ।। मुक्ता माणिक्य पैदूर्य गोमेदान्वन पिट्ठयो पदारागं मरकतं, नीलचेति यथा क्रमात् । प्रथा, शैल पुत्रीति, द्वितीयं ब्रह्मचारिणी तृतीयं चन्द्र घटेति, कूष्माडेति चतुर्थकम् पंचम स्कद मारोति, पष्ठं कात्यायनीतिच सप्तम काल रात्रिश्च, महा गोरीति चाटणम् नाम सिद्धि दात्रीच, नव दुर्गाः प्रकीर्तिताः । अपणं कीर्तिन विष्णोः, स्मरणं पाद सेवनम् अर्चन चन्दनं दास्य, सख्य मात्म निवेदनम् । (नवधाभक्ति) याचारो विनयोविद्या प्रतिष्ठा तीर्थ दर्शनम् निप्रायत्तिस्तपोवान नधाकत ना।

कविनाम। पानन्दः कारी भास्तवतमः सीमल अग्यो गुरु वक्षो जावधरः सचाव निजनिः तुई सुनारि बाप काव्यमय गनैश्चरगतिर्प यस्तु साम्योऽपरः सावचेत्तुरुने कृपा मपि तदा सोनुरुला महाः । ( नवग्रह ) अगरन्य, निधि, भक्ति, यह, और इन्ग, भूसंड । दुर्गा, नाड़ी, यक, सह, नव में होत अखड । नगी मोमगार मधुमासा, अवधपुरी यह चरित प्रकासा । नवमी तिथि मधुमास पुनीता, शुक्ल पक्ष अभिजित हरि प्रीता। तर मारीच हवय अनुमाना, नाहि विरोधे नहि कल्याना । शस्त्री मत्री प्रभु शद धनी, चेय यदि कवि मानसगुनी । श्रीपभानु कुमारि हेतु श्रृंगार रूपमय, वास हास रस हरे मात बधन करुणामय, केशी प्रति अति रौद्र वीर मारोत्सासुर, मयदावानलपान पियोरीभत्स-वकी उर, अति अद्भुत, पच विरचमृति-शात सतते सोचचित, कहि केशव सेवहु रसिक जन नव रस में नज राज नित । नवधा भक्ति कही तोहि पाही, सामान सुनु धरु मनमाही । मारकंड ना सडस पुराना, आदि शक्ति सद हरि गुण गाना। मानिक मुक्ता चिमऽह, पन्ना पुनि पुरखगज । हीरा नीलक लहसुनी, पिरोनादि ना साज ।। नर मन तेल न नारि लिंगार। गज भर कर लडैया नो गज की है पूछ । जगली किलनी नौ मन काजर। १-२ नो दो ग्यारा सबसे न्यारा । ६२॥ ना दिन चले ग्रहाई कोस ।

अकविलासा ६-१३ नव नगढी ना तेरा बाकी। १-१३ नव की लकडी तेरा खर्व । - (१०) १० वेढानुद्धरते जगन्निवहते भूगोल मुविभ्रते । दैत्यदारयते बलिछलयते क्षत्रं तयं कुर्वते । पौलस्त्यजयते इलकलयते कारुण्यमातन्वते । म्लेच्छान् मूर्छयते दशा कृतिकृते कृष्णाय तुभ्यनमः ॥ मनो मधुकरो मेघो मानिनी मदनो मरुत् मा मदोमर्कटो मत्स्य मकारा दश चंचलाः । लग्ने शुक्रो बुपोयस्य, यस्य केंद्रे वृहस्पतिः दशमोऽडगारको यस्य, सजात कुल दीपकः । सदा वक्रः सदा रुष्टः, संदा पूजामपेक्षते कन्या राशिस्थितो नित्य, जामाता दशमो ग्रहः । धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं, शौचमिन्द्रिय निग्रहः धीविद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्म लक्षणम् । काली तारा महा विद्या, पोदशी भुवनेश्वरी भैरवी छिन्नमस्ताच, विद्या धूमावती तथा । वगला सिद्ध विद्याच, माती कमलात्मिका । एता दश महा विद्याः, सिद्ध विद्याः प्रकीर्तिताः । दशकूप समावापी दशवापी समोहृदः दश हृदसमः पुत्रो दश पुत्र समोद्रुमः । एवं दशदिशो रक्षेच्चामुडाशववाहना । - 1 अन्नादश गुणं. पयः - पयसोऽट .

प्रकाविलासा १७ २०-११ अन्याय्योपार्जित द्रव्य, दश वर्षानितिष्ठति प्राप्ते चैका दशे वर्षे, समूलंच विनश्यति । १० प्रभु निमिप मह रिपु शर निवारि, प्रचारि डारे सायका दश दश विशिख उर माझ मारे, सफल निशिचर नायका दश मुख देखि शिरन की बाढ़ी, विसरा मरण भई रिस गाढ़ी । मारेसि दश दश विशिख उर, परे भूमि सब पीर सिंह नाद करि गर्जे तब, मेघनाद रणवीर । रहे दसहु दिशि शायक छाई, मानहु मघा मेघ मरिलाई । दिन दश करि रघुपति पद सेवा, तव फिरि चरण देखिहो देवा । मय रस तज भन गल सहित, दश अक्षर इन सोहि । सर्व्व शास्त्र व्यापित लखौ, विश्व विष्णु सो जोहिं ।। दिन दस आदर पायके, करले आप वखान । जौलो काग सराव पख, तौलग तो सन्मान ॥ -१ राम राम सब कोउ कहै, दशरथ कहै न कोय । दि एक बार दशरथ कहै, कोटि यज्ञ फल होय ।। -२० हम कुल घालक सत्य तुम, कुल पालक दशसीस । अधउ बधिर न कहहि अस, अवण नयन तव वीस ॥ -२० मैंना ने मैना कही, मोल भयो दस पीस ।।। चकरी ने जो मैं कही, तुरत कटायो सीस ॥ - -- (११) ११ एका दश दाणामेकागौरीत्य नौचितीमला। राघवनृपतव यशसादशापिगोरी कताहरितः। (दशापि हरितः दसों दिशा) प्रकविलास . एका दशस्ये गोविंदे सर्वप्येकादशे स्थिताः किं कुर्वन्ति यहाः सर्वे, शनिरंगारको गुरुः । एका दशैतें कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः । हरि दिन कामद गिरि प्रभु पाये, समाचार सुर संतन पाये। हरि दिन पहुंचे अवर सुमंता, देखि नगर दुख भयो दुरन्ता ! ग्यारा सहसहि लिंग पुराना, विविध कथा कर ललित विधाना। इक पर एक होत हैं ग्यारा। ग्यारा वर्णिक त्रिष्टुप् कहिये। एक तो देवैया होय दूसरे रिमैया होय तीसरे सरूपवत सुघर सलं गात। चौथे चतुराई पाचे परखै हमारो गुन छटये छलीन सातें सो निबाहै पात। पाठे ऐडदार नो' निपट' निगाइ राव दसे वाज नाही ज्या गरू सुहात । पाखन गुणज्ञ ढिग ताही केरहता ऐसे गुण ग्यारहो समाज में सराहे जात । (१२) नामोदक सादानं, न तिथि द्वादशी समा। न गायत्र्याः परो मत्रो, न मातुः पर देवतम् । नूपुर निछियाकिणी नीवी चपन सोय । कर सुदरी ककण वलय, वाजू वॅद भुज दोय । वाजू वॅद भुज दोय कंठ श्री दुलरी राजै । नासा असर 'सुभग श्रमण ताटक विगजै । भगवत उदा भाल माग मोती गुह ऊपर । द्वादश भूपण अग नित्य प्यारी पगनूपुर । (द्वादश भूषण) द्वादश अवार' मंत्र वर; जपहिं सहित अनुराग । वासुदेव पद परुइ, दम्पतिमन अति लागे। -(ओं नमो भगवते वासुदेवाय) ~~ अंकाविलासा [६] सुर सेनप उर अधिक उछाहू, विधित डेवढे लोचन लाहू। नींद नारि भोजन परि हरई, वारह वर्ष तासु कर मरई । द्वादश दिन वीते मगमाही, पहुंचे जाय जमुन तट पाहीं। यह विधि द्वादश वर्ष विताये, पुनि प्रभु पंचवटी पहँ पाये । चारा सहस केर परमाना, अहै प्रगट ब्रह्माड पुराना । बारा बरसे दिल्ली रहिके, काम कियो भरभूजे को। चैते गुड वैसाखे तेल, जे पैठ अपाढे वेल । सारन सागऽरु भादो मही, कार करेला कातिक दही । अगहन जीरा पूसे धना, माहे मिसरी फागुन चना । इन वारह कर बचे जो भाई, ता घर वैद्य न सपने जाई। गाडौ स्वान पुच्छ इक जुगलों जब देखौ तव टेढी । पौ वारा जिनके पड़े, करती मौज वहार =६+६+१ (युवा नायक) मेरे यर कच्चे पडे, भये गले के हार । =६+५+१ (अनभिज्ञ नायक) मानुष्यं पर पश जन्म विभवो दीर्घायुरा रोग्यता । सन्मित्र सु सुतः सती प्रियतमा भक्तिश्च नारायणे । विद्वत्व सुजनल मिद्रिय जयः सत्पात्र दानेरति स्ते पुण्येन विनायो दशगुणाः ससारिणा दुर्लभाः । ताल कटु तिक्त मुप्ण मधुरक्षार कपायान्वितम् । वातघ्न कफ वारण कृमिहर दुर्गधि निर्नाशनम् । वस्त्रस्याभरण विशुद्धि करणं कामाग्नि सदीपनम् । तावूलेहि सखे त्रयोदश गुणाः स्वर्गेऽपिते दुर्लभाः। चर्प त्रयोदश भयो प्रपेशा, खर दूपण वध कीन रमेगा । त्रयोदशी दृढे हनुमाना, पुनि अशोक वन माहि समाना। कुभ निकुभ दैत्य बलवाना, तेरस तक मारे भगवाना। - .

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प्रकविलास। [१०१ , देखहु यानि भुवन दश चारी, कह अस पुरुष कहा अस नारी । कातिक बदी चतुर्दशि पारा, शनि के दिन भामगट कुमारा (हनुमानजी) कह प्रभु मुनु मुग्रीव हरीसा, पुर न जाउँ दश चार वरीसा । चौदह भुवन एक पति होई, भूत द्रोह तिष्ठे नहि सोई । यह जो पावत अचल समाना, चौदह ताड ऊच परमाना (अंगद) सुनु गिरजा कोधानल जाम, जारै भुवन चारि दश पाम् । भुनाल जीति लोक वश कीन्हे, चौदह भुवन भोग करि लीन्हे । चैत्र शुक्ल चौदश जन आई, मरो दगानन जग दुखदाई । कौल काम पण कृपण विमूढा, अति दरिद्र अजसी अति बूढा । सदा रोग वश सतत कोपी, विष्णु विमुख अति सत विरोधी । तन पोपफ निन्दक अघ खानी, जीवत शव सम चौदह मानी । चौदह दिवस युद्ध करि भारी, वाधि लियो अहिराजप्रचारी (मेघनाद) चौटा सहसहि मत्स्य पुराना, सोड भविष्य जान परमाना । रतन मयी नव नारि रमा सम सुन्दर कहिये। घूघट हय भू बनुप अमिय रिप मद चख पइये ॥ मुख शशि ग्रीवा कम्यु सदा सुखदा सुर नरुसी । रम्भासी सुकुमारि चतुर अति धन्वन्तरसी ।। । गज गामिनि धनि लेखिये सुरभी सम शुचि शील तन । सुरन वृथा वारिधि मथ्यो तिय तन में चौदह रतन । देरी चौदह ते गुनो, ताशहिं देव घटाय । वचे हुए को जोडकर, टिपी देहु वताय ॥ ताश के ५२ पत्तो मे से यह खेल चाहे जितने ताशा म होसफता है. किसी,से कहिये कि उसके हाथ में जितने पत्ते हो उन्फी तेरा तेरा दिपकियो की देरिया जितनी बन सके बनाये असे पहिले (३) नहला । १०२ देव (क) निकला तो उसपर कोई भी ४ चार ताश के और रख अठा निकला तो उसपर कोई भी पांच ताश के पत्ते और रलदेव और हाथ में बचे हुए ताशो से और देरी न बन सके तो उनको हाथही मे रखे रहे यह क्रिया यह आपके विना देखे गुप्त रीति से करे अव आप पूछे कि (१) कितने ताशो से खेला (२) कितनी देरियां हैं और (३) हाथ में कितने ताश वचे है बस नीचे के सब ताशो की टिपकियो का योग कहदेव यथा १६ ताशो से पेला है ३ देरी है हाथ में २ ताश वचे है तो ३४१४-४२-१८-२४५२-२६ रिपकिया है. टिपकियो के लिये गुलाम की १२, रानी की १२ और राजा की १३ दिपकिया मानो। प्रथम असील होय दूजे नैनसील होय तीजे वड़ो डील होय चौथे चोप ठानेगा। पाचयें प्रवीन होय छठयें छली न होय सातये सरस गाउँ ओज् पर आनेगा। कहैं भुवनेस नित नवयें निगाह राखे दसवें दिमाक ग्यारे गुन पहचानेगा । वारद बिमल चित तेरहे तरहदार चौदहै चतुर सो हमारे तई मानेगा। (१५) यसु मुनि यति रिति, मणि गुण निकरः । 4+७=१५ वर्ष पंचदश के भगवाना, सीय वर्ष 2 की जग जाना वर्ष पंचदश माहिं सुहाये, विश्वामित्र बुलावन नाये। पन्द्रह दिवस सग मुनि नाथा, काज सँवारे श्री रघुनाथा । शंकर राम रूप अनुरागे, नयन पंचदश अति मिय लागे । भये पासदिन सजत समाज, तुम सुधि पाया मोसन आजू । परखेहु मोहि एक पखवारा, नहिं प्रावहु तो जानेहु मारा ! कई पक्ष मह ाव न जोई, मोरे कर ताकर वय होई। पंद्रह वर्ष लागि हम मागे, एकौ दिन नहि रहिहै भागे । (अभिमन्यु) पन्द्रा सहसा कछु अधिक, अग्नि पुराण वखान ।

अंकविलासा 11०31 पल पखवारा घड़ी महीना चौघडिया का साल, जिसको लाला काल कहै फिर उसका क्या अहवाल । - (१६) अमाप्त यौवना नारी, न कामाय न शातये संप्राप्ते पोडशे वर्षे, गर्दभी चाप्सरायते । श्रादौ मज्जन चारु चीर तिलकं नेत्राजनं कुडलम् नासा मौक्तिक हार मेव कुसुमंतुद्रावली कचुकी । अगे चन्दन लेप कुकुम वरं केयूरक नूपुर ताम्बूल कर करुण चतुरता शृगार रूप स्त्रियः । शासन स्वागतं पायमध्यमाचमनीयकम् । मधुपर्काचमस्नानं वसनाभरणानिच! गध पुष्पे धूपदीपौनैवेद्य वेदन तथा । - भूम्यासन जल वस्त्र प्रदीपोऽनं ततः परम् । ताम्बूलच्छन गन्धाश्च माल्यं फलमतः परम् । शल्याच पादुकागावः काश्चनं रजत तथा । दानमेतत् पोडशक प्रेत मुद्दिश्य दीयते । L.. चाारे चतुष्पद चारि खग, पारि फूल फल चार । राधा जू के तन लसे, ये सोरह शृंगार। हय धूघट गण गामिनी, केहरि लफ समान । मृगलोचनि फूली फिर, जे पशु लच्छन जान । भय मोहें मुर कोकिला, कद कपोत सुधार । खजन कैसी चपलता, पछिन लच्छन चार । कर कमलह चपक वरगा, सान फूल मनुहार । दुपहरिया सी झिलमिली, फूलन लच्छन चार । अधर सिदाहिम दशन, कदलि जर परमान । श्री फल कैसी तरुणता, जे फल लच्छन नान ।

1१०४) अंकविलास। शुचिता शील सनेह गति, चितवनि बोलनि हासि । कच गूयन श्रीवन्त 'शुभ, भाल तिलक सुखरासि । भाल तिलक सुखरास, द्वगन अजन अति साहै । वीरी नदन सुदेश चिनुक, मसकन मन मोहै । या विधि मेंहदी अगराग, भगवत मन रुचिता । ये सोरह शृगार मुख्य तामे वर शुचिता । जहॅ तहॅ यूथ यूथ मिलि भामिनि, सजि नव सप्त सकल द्युति दामिनि । चलि ल्याइ सीतहिं सखी सादर सजि सुमंगल भामिनी । नव सप्त साजे सुन्दरी सव मन्त कुंजर गामिनी। रामापति पोड़श उगहि, तारागण समुदाय । सफल गिरिन दव लाइये, रवि विनु राति न जाय । सोरह गोर्य चौसर केरी, सोरह कौड़ी ज्वारिन केरी । सोरह कला जान चौपाई। पोडश कोश कोट चहु अोरा, मणि माणिक लागे नहि थोरा (नरातक) १६-३१ संवत सोरा सौ इकतीसा, करौं कथा हरि पद धरि सीसा । १६-३२ सोरह योजन मुख तेहि ठयऊ, तुरत पवनसुत वत्तिस भयऊ । १६-८० सवत सोग मौ असी, असी गंग के तीर । श्रावण शुला सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर । - . । (१७) रसे स्ट्रैछिन्ना यमनसभलागः शिम्बरिणी। (यमनसभ लग) ६+११-१७ ततः सप्तदशे जातः सत्य वत्या पराशरात, चक्रपेद तरोः शाखा दृष्टवापुसोऽल्पमेसा ।

अफपिलास। [10] सत्रा सहसहि कूर्म पुराना, सुनत अपण मुद मंगल नाना । १७-१०० सत्रह योजन जाघ लॅवाई, शत योजन तनु वरणि न जाई (कुभकर्ण) (१८) अष्टादश पुराणानि कृत्वा सत्यवती मुत्तः । यद्वैतामृत वर्पिणी भगवती मष्टादशा ध्यायिनी मवत्वामनु सदधामि भगवद् गीते भवद्वेपिणीम् । १८-२ अष्टादश पुराणानां व्यासस्य वचन द्वयम् परोपकारः पुण्याय पापाय पर पीडनम् । १८ अठरा ,सहस भागवत जानो, हिन्दुन को सर्वस यह मानो । रोमावलि अष्टादश भारा, अस्थि शैल सरिता नसजारा । वैवर्तहु जो ब्रह्म पुराना, अठरा सहस केर परमाना । १८-१० वर्ष अठारा दिन दश जाही, वेइ ग्रहण पुनि पुनि परि जाहीं । १८-२७ वर्ष अठारा की सिया, सत्ताइस के राम । कीन्हीं मन अभिलाप तर, करनाहै मुर काम ।। १८-१०० दिना अारा अस रण रन्चऊ, शत पाधव म: एकन वन्यऊ । . सूर्या धर्मसजस्तता सगुरवः शार्दूल विक्रीडितम् । (मस जस ततग) १२+७=१६ इक नव मिलि उन्नीस है, ताके दश रहि जात दश के पुनि एकहि रहत, एकहि एक लखात । १६ उन्नीस, १+६=१०,१+७=१ ईसर । उन्निस वर्णिक अति धृति वृत्ता।

1101 अंकवितासा उन्निस सहसहि गरुड़ पुराना, ज्ञान तत्त्व कर ललित विधाना। सम्बत में चौ जोरि के भाग देव उन्नीस । शेप अक सो जानिये अधि मास जगदीस । दोय कार त्रय चैत्र पुनि, पच नभ, नभ अठ जेठ । शिव विसाख तेरा भदै, सोराऽसाढ़ सु ठेठ । अठरा कबहुं फाल्गुन, मास लौंद है आठ । /शेप लौंद नहिं क्षय विना, जिनके अड़बड़ ठाठ । ११ वचै तो वैसाख ३-चैत्र १३-भाद्रपद श्रावण १६-ग्रापाढ़ ० वा ८-जेष्ठ १८-फाल्गुन (कालप्रबोध) (२०) २ वच तो कार 7 ५. सोनर क्या दशका, वालि बधेउ जिहि एक शर । वीसहु लोचन अर, विग तव जन्म कुजाति जड़ । वोले विकट सुनह युवराजू, योजन वीस उलंघहु आजू । कहै करि हेम हम नीके के विचारि देख्यो, मेरे भाये चीसों विस्वा, दामही में राम है। - मम भुज सागर बल जलपूरा, जहें घुड़े बहु सुरनर शूरा । पीस पयोधि अगाध अपारा, को अस वीर जो पाइहि पारा । २०-१० पीस मुजा दश मस्तक जाही, यातुर चला जात मग माही । (२१) तव एकविंशति र म विन छन की पृथिवी रची (रामचद्रिका) इपिस वणिक महती वृत्ता अंकरिजास। [१०७], (२२) सप्त भकार युतक गुरु गदितेय मुदारतरा मदिरा। ७ भगण १ गुरु-२२ वाइस वर्णिक आकति वृत्ता। बाइस योजन पाहु अनाना (कुंभकरण) सनै धान वाईस पसेरी। वाइसगढ अदनि ने जीते, तेइस विजय कीन मलिखान (सिरसा) (२२) अटफल पच्चू साढे वाइस। (२३) भक्षोहिणि तेइस कइ वारा, जरासंध लै हरि सनहारा । तेइस सहसहुँ विष्णु पुराना, श्रवण किये मुद मंगल नाना। तेइस वर्णिक विकृति वृत्ता। (२४) सगणैरिह वृत्तवर वसुभिः किलदुर्मिल मुक्त मिदं कविभिः । ८ सगण-२४ वर्ण अवतारहुं चौविस कहे, निष्ठाहू चौबीस चौविस अर्बुद इनकर यहा, सहस वृन्द सम कोटि समूहा । (१ अर्बुद-१० कोटि) (१ इन्द-१ अर्ग) चतुर्विशदिन युद्ध महाना, अव नृप कहौं सुनौ दैकाना (भीष्प, परशुराम) , [१०] प्रकविलासा , - -~- दत्तात्रय गुरु चौविस कीन्हे ।। शिव पुराण चौवीस हजारा, स्वइ वाराह केर निरधारा। चौविस वर्णिक संस्कृति वृत्ता। रोला की चौवीस, कला यति शंकर तेरा । (२५) पच्चिस वर्णिक अतिकृति वृत्ता। पंच तत्त्वसों प्रकृति पचीसा , सिरजनहार जान जगदीशा । नारदीय पचीस हजारा, भक्ति तत्त्व दरशावनहारा । मोसी कन्या लाख पचीसा, ऐसे वचन न कहो मुनीसा । सो शर अर्जुन काटि निवारे, बाण पचीस शल्य उर मारे । (२६) छब्बिस वर्णननि ते अधिक, दंडक वृत्त प्रमान । छच्चिस पर्णिक उत्कृति वृत्ता। (२७) वर्ष सताइस में रघुनाथा, वन गमने सिय लछमन साथा। लख चौरासी योनि में, थावर सत्ताईस.। नक्षत्रहु अरु योगहूं, है पुनि सत्ताईस । भीम जरासयहिं हन्यो, लड़ि सचाइस योस । (२-२६) 'अभिनित अंतर्गत सहित, उड़गण श्रष्ठाईस। - 1 । - J । । - 1 ।

अकपिलास। [ १०६ अठाइस दिन फरवरी, चौथ वर्ष उन्तीस । है अष्ट विंशति मत्त दै वसु भानु कर हरिगीतिका । जाम्यात अरु कृपण सो, हाइस दिन भो युद्ध । जाम्बवती कृष्णहिं दई, बुद्धि भई जा शुद्ध । (३०) मास दिवस कर दिवस भा, मर्म न जानै कोय । रथ समेत रवि थाकेउ, निशा कवन विधि होय । मास दिवस तह रहेर्ड खरारी, निसरी रुधिर धार तह भारी । मास दिपस मढे कहा न माना तो मैं मार कादि कृपाना । पोला विकट सुनह युपराजू, योजन तीस उलया आजू । तीस तीर रघुपीर पंवारे, भुजन समेत सीस महि पारे । तीस दिवस अमेल के, तीसढि जानो जून । सपटेमर नोवेंबरहु, जान तीन पर सून । तीसमारखां नाम, मायो इक मूसी नहीं । (२१) आफउ धनु श्रवण लगि, छाडे सर इकतीस । रघुनायफ सायफ चले, मानहु काल फणीस । इकतिस दिनकी जनवरी, मार्च मई जूलाय, पुनि अगस्टा अक्टवरह। दिसबरहु मुग्वदाय। अाठ पाठ पाठ पुनि, सात चरणनि सजि, रचिये कविच इमि, गुरुहि सुमिरिक । । t-t+७=३१. - अंकविलास। वसु बसु तिथि सानंद सवैया, यारौ वीर पंवारो गाव । (३२) तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ । वत्तिस लक्षण शुभकहे, कीर्ति बढ़ावन हार । सुनहु पवन सुत रहनिहमारी, जिमि दशनन्दि मैंह जीभ विचारी (३२ दांत) परी वतीसों दात विच, जीभ विचारी एक । पैसा रहो न पास में रहे बतीसी काढ़ि। दस बसु वसु संगी जन रस रंगी छंद त्रिभंगी गंत भलो । (३३) तंतिस कोटि देव सुमिरन फ्र, कहिहौं वीर पवारो गाय । तैतिस वर्णिक देव घनाक्षरि। (३४) चौतिस योजन की चकलाई, अति प्रकार तन चितै न जाई (कुंभकरण) (३५) पतिस की कहनूति कहीजे, तीन पाच हमसों नहिं कीजे । मोर बस तुम कीन सहारा, कृष्ण लीजिये शाप हमारा। त्रिंशत पद संपत यदुराई, तव कुल आपस म कटिनाई । (गाधारी) सब जावन मे नाउ छतीसा । , 1 फक्सिास। छत्तिस व्यजन पनी रसोई। राग छतीसौ गावन लागे, जिनमें उठे वीर वैताल (माडौं) रासो पृथ्वीराज में, छनी बस छतीस । सिपहगरी के छत्तिस फन । ३६.६३ जगत रहु छत्तीस है (रामवरण छत्तीन) (३६) (३७) त्रय पर सात विराजत कैसे, त्रिकालज्ञ मुनि नायक जैसे । (३८) तीन याठ यो भेद लखावत, तीनहु ताप योग विनसावत । अष्ट निशशर पूर तुणीरा, धरे स्यन्दनदि सो रणधीरा । (अतिकाय) (३६) तीन रु नौ यो कहै विचारी, तीनहु काल भक्ति हरि प्यारी । (४०) नील कहा चालिस मैं जाऊ, मागे परत मोर नहिं पाऊ। जाड़ा चिल्ला दिन चालीस, धन के पदा मकर पचीस ।। १०-१३ चालिस योजन तेरस वासर, रच्यो सेतु नल नील उजागर । १० बकरी पाव, गाय दुइ सेर, भैस दूध देती पच सेर । चालिस पशु मिलि चालिस सेर, भेद' पशुन के कहु पिन देर ।

प्रकविलासा तीन भैरा नव गाय है, चकरी अठाईस । चालिम पशु गिलि देत है, दूध सेर चालीस ।। ३भैंसx५सर-१५ सेर है गाय ४२-१८ सेर २८ नकरी- १ पाय ७ सेर , - ४० (४१). ४१-३२ उतालिस नई में, रामचन्द्र भगवान । आयुः बत्तिस वर्ष की, जनकसुता गुणखान ।। (राजतिलक) (४२) कोटि वियालिस तमीचर, नारातक कर घात राम कृपा बल इति खलनि, कपिन विताई रात । घाट वयालिस हम छुटयेहै, मरिहै फौज पिथौरा क्यार । (नदियावित) (४३) चौ पर तीन विराजत जैसे, चारि वेद त्रय कालहुँ जैसे । (४४) चारि चारि के फहिये भेदा, चारि वेद चारहिं उपवेढा। (४५) चारि पाच ये कहत पुकारे, चारि वेद प्राणहु ते प्यारे । । 1 चौ पर छै भेदहि कहु माता, चारि वेद छै अम पुनीता। (४७) चारि सात के सुनहं विचारा, चारिदि ऋषि जगत -" अकविलास। [११३- दोहा के सर होत है, मात्रा अडतालीस, दो दल तामें होत है, प्रतिपढ पल चौगीस । (४६) हरि मेरित त्यहि अवसर, वहीं परन उनचास, अट्टहास करि गर्जही, कपि वढ़ि लाग अकास । - . (५०) लघु सवत जीवन पचदसा, कल्पान्त न नाश गुमान असा । (५१) पांच एक को सगम कैसे, पच माण ईश्वर में जैसे । (५२) सवतें लघु है मॉगियो, यामे फेर न सार। बलि पै जाचतही भये, वावन कर करतार । बावन तोले पान रती। लका में जो छोट है, वावन गज को सोउ। ताश माहि पत्ते है वावन । (देखो अक १४) घरस माहि वाचन सप्ताह । देखी तेरी कालपी, वायन पुरा उजार । बावनगढ़ के राजा जीते, जीते वडे बड़े सरदार ॥ (चदेल) पाचरु त्रय इक सग विराजत, पच यज्ञ त्रय नाप नसावत ।

[१४] कविलासी (५४) पाच चार है बड़े सयाने, पाच देव चारिहु युग माने । उपगीती है चौवन मत्ता। (५५) पचपन सहसहि पद्म पुराना, पानामि लीला गुण गाना। पांच पांच पर राजहि कैसे, पंचायतन राम शिव जैसे। (५६) छप्पन भोगी हैं नारायण, तिनकी कथा करिय पारायण । छप्पन कोटि यादवा जेते, कृष्ण भक्त सब जानिय तेते । छप्पन कोटि कपिन लै साथा, करत मणाम चलेउ कपि नाथा । (श्रीखंड) पट पंचाशिका ग्रंथ हिय भावत, प्रश्नोत्तर ज्योतिष भगटावत । अप्पन छुरिया हनि हनि वाधै औ गुजराती यांधि कटार । (५७, बुधजन कहत सुनहु खग राजा, अयुत सतावन वाजहिं वाजा । भार्या की सत्तावन मत्ता। - इसवी सन सत्तावन जोरे, संवत विक्रम लहिये। (ई. १८९८+५७-संवत् १९५५) -(५८) 1 पांच भाठ की छवि अति छाजी, पच देव योगहि ते राजी। , अकविलासा --- (५). 1 पाचऽरु नोनें शिक्षा लीजे, पंचदेव की भक्ती कीजे । . (६०)) ६०-१-६ पष्टि योजन विस्तीर्णा लंबोष्टी दीर्घ नासिका । एक वक्रा नव भुजा सक्रातिः पुरुषाकृतिः ।। ६० बोले नल दोउ भुजा उठाई, योजन साठि मोरि गति भाई। पष्टिं वाण भीपम उर मारा, मानहु वज्रपात फटकारा । सवत्सरहू साठ प्रमाणो, प्रभव विभव इत्यादिक जानो। साठा सो पाठा। m (६१).. - ॐ पर एक विराजत कैसे, पट दर्शन में ईश्वर जैसे । (६२) छै पर दो शोभा के धाम, पट रिपु नाशक सीताराम । (६३) रामचरण छत्तीन, जगत रए छत्तीस है। १ शुद्ध वर्ण मालाहि म, त्रेसठ वर्ण सुजान । .. तंन कला अरु योगिनी, चासठ जान प्रमान । मतरजहु चौमठ यरा, जानन सर मुनान ।

अंकविलास। भयो भयंकर खेत अति, अर्जुन कीन मसान | नाचत चौंसठि योगनी, करि करि शोणित पान । चौंसठ बुजे चारि नव खंडी, जिन पै वैठि स्वर्ग दिखराय (सिरसा) (६५) छै पर पांच विराजत हैं कस, पट कर्मन में पंच देव जसः । - 1- -1 छै छै संगम कहौ सुहावन, पट ऋतु में पट रस मन भावन । (६७) छै पर सात विराजत कैसे, पट दर्शन में ऋपि गण जैसे । (६८). छै पाठई के कहौ विधाना, पट कर्मन में योग प्रधाना। अड़सठ तीरथ करके आई, तजना गइ तुमड़ी करुवाई । (६६) के पर नौ राजत हैं फैसे, रस पर कान्य रसामृत जैसे । 1- धरणी धसकि धरन जव उडेऊ, सत्तरि योजन ते पुनि फिरेऊ (कुमुद) सत्तर चूहे खाय के विलारी चली इज्ज को। सख वजे सत्तर बला, घरतें भागै दूर । सत्तरगज वा पच-नने पग, कहियत इक एकड़ के लगभग अढतालिस सौ चालिस गजवा, नौ सहसा पग होत मुरव्या ।

प्राविलासा -- चतुर्युगी इक दिव्य भनंत, दिव्य इकत्तर कर मन्वंत । (मन्वंतर) छप्पय के सर मेद मीत इकहत्तर लेखो। ! । (७२) . लड़े बहत्तर दिन समामा, वार्नर राक्षस विन विश्रामा । सूप तो सूप भला चलनी कहें देखहु जामें वहत्तर छेद हैं। - (७३) सात तीन राजत हैं कैसे, मुनि गण पूज्य त्रिकालहुजैसे । (७४) सातऽरु चार विराजत कैसे, अपिंगण वेद प्रचारक जैसें। सार्थ चहोचर शपय पुरानी, खोल पर न'दसर मानी। १७॥ 2 (७५) सातऽरु पाच विराजत कैसे, सप्त स्वरो में पंचम जैसे। (७६) सातरु छ को करिय वखाना, सप्त स्वरनि छै राग प्रथाना । सात सात के फदिय विचाग, सात द्वीप सत पुरी उदारा। (७८) सात भाव यह फहत पुकारी, भूपि गण अष्ट सिद्धि अधिकारी।

प्रकविलास। 7. 1 rr y शके माहिं अठहत्तर जोरे, सन इसवी पहिचानो। शक १८२०+७८-ईसनी १८९८ ।। (७६) सातऽरु नौ को संगम कैसे, अपिगण भक्ति प्रवर्तक जैसे । ... (८०) . आठ-शून्य-महिमा नहिं गोई योगेश्वर-सो-वड़ो न कोई (श्री कृष्ण) असी वाण मारेहु हनुमानहिं, शर अनेक घाले भगवानहिं । (८१)- सहस इकासी एक सौ, ललित स्कंद पुरान । पाठ एक-यह भेद बतावत, योगहि व्रत्म रूप दरसावत +: नव नक गुणित होत नयासी, तदपि-पाठ इक नव मुख रासी । अगुण सगुण इमि भेट न भाई, तजि संभय भगिये रधुराई । (८२) आठ टोय है अंक ललामा, अष्ट सिद्धि दाता शिय रामा। (८३) पाठ तीन कर मर्म महाना, गष्ट योग प्रयलोक माना । 7 (८४) ( 7 ग्राफर चारि लाख चौरासी, जात जीप नभ जल थल वासी । वार्ता-श्री वैष्णर चांगसी, जा महें-मनटी-कला लतासी ! ' -- अफारिजास। चांगसी ग्रासन हैं जेते, योग जग सा जानिय नेते । बन चाराती सोस की, महिमा,परम पुनीत । फेरि साडियन को मनवायो, गत चारासी की झनकार । (युग्वार युद्ध) हैहय वसी कीरत, खासी, मति गढ़ रहे गाव चोगसी । : आठ पाच या कहत पुकारे, योग पच प्राणन रखवारं । , (८६) रौरव आदिक नरक की, सस्या छचासी जान | (८७) दपि मुख कह अम्पी उपरता, योजन सात जाउ लपन्ता । (८८) मूत कयो हरि चरित पुनीश, सरस अठासी ऋपि सन माता। (८६) श्राऽ नोको मर्म महाना, योग माईि हरि भक्ति प्राना। 1 (६०) नर पर रूप शून्य को कैसे, नाके पर अफ नहिं गैस । (H ना पर एक कहत अस टेरी, करिय भक्ति इक ईश्वर केरी।

[३०] अपाविलासा . नव पर दोकर कहहु विधाना, नव रस सिया राम गुण गाना ! (६३) नव पर प्रय कर सुनहु हवाला, दुर्गा पूजा शुभ प्रयकाला । (६४) नव पर चारि कहत अस वाता, भक्तिहि चारि पदारथ दाता । (६५), नव पर पांच विराजत कैसे, भक्ती पचदेव की जैसे। (१६) चौसर पल्ला घर चौवीसा, छियानबे चारो में दीसा । , (१७) ना सातह कर कीजे गायन, नव रस सप्त काड रामायन । (१८) नव अरु माठ संवारत काजा, भक्ति योग को जुरो समाजा। (68) नर पर नव की शोभा कैसी, रघुवर भक्ति परम निधि जैसी । लोहिं में सर जन्म गो, सरो न एको काम । पड़े फेर निन्यानो, माया मिली न राम । (१००) २००-३०० अप शब्द शतं माघे, भारचौच शत त्रयम् । कालिदामेन गरायन्ते, कपिरेका शतं जयः । - . धेकरितासा १००-२०००शतेषु जायते शूरः सहस्रेषुच पडितः । १०००० वक्ता दश सहस्रेषु, दाता भवति वा नवा । सौ हजार शतं विहाय भोक्तव्य, सहस्र स्नान माचरेत् । जाख,कोटि लक्ष निहाय दातव्य कोटिं त्यक्त्या हरि भजेत् । सौ हजारो तालस्य गुणाः सति, सखे शत सहरूशः एकोपिच महान्दोपो, यस्यदानाद्विसर्जनम् । शाक खाय शत वर्ष गॅवाये (पार्वती) कमल नाल जिमि चाप चढाऊ, शत योजन प्रमाण शत योजन आयउ छन माही, तिन सन बैर किये भल नाहीं। प्रथम दिवश नल सेतु सुद्दावन, चौदह योजन कीन सुपावन । द्वितिय दिवम शुभ योजन वीसा, तीजे दिन इकिस फिय कीसा। दिवस चतुर्थ सु वाइस योजन, पचम तेइस कियो मुदित मन । दश योजन अायत अति सुन्दर, शत योजन विशाल शोभाधर ।। (१४-२०-२१-२२-२३-१००) जो लाथै शत योजन सागर, करै सो राम काज प्रति नागर । शत योजन तेहि ग्रानन कीन्हा, अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा । लै धाऊ। तव शत वाण सारथी मारेसि, परा भूमि जयराम पुकारसि । कनक कनकर्ते सौ गुणी, मादकता अधिकाय । यह खाये वौरात है, वह पाये बौराय । (धतूरा, मुरार्थ) सौऽपराव शिशुपाल के, छमा कीन जगदीस । अधिक भये पर चक्रसो, काटि गिरायो सीस । धोये हु सौपार के, काजर होत न सेत। सौ युग पानी में रहे, मिटै न चकमा भाग। , [१२] अकविलास। - वरवशिश सौ सौ, हिसाव जो नौ । सौ दिन चारन, इक दिन साह । सौ गाथा सुग्गा प?, अत विलाई खाग । मो कोवे में बगुला राजा। सौ ऐवों का ऐच गरीनी । सो नकटन में एक है, नक्कू जाके नाक । सौ मन सोना, रती हुकूमत । सौ में सती लाख में जती । , . सौ सौ तोपन की कर मसकै, महुबे दगन सलामी लाग । सौ अजान नहिं एक सुजान | सौ सौगदे खाय भूलि नहिं ताहि पतीजे । सौ सयान को एफै मत । १००-१ सौ कोसा अरु एक मसोसा। सौ सुनरा की, इक लुहरा की । सो दडी इक बुदेलसडी। सौ,हजार-सौ की हानी, सहस बखानी । सौ.हजार चले वाए कवि सकहिन भापन, जास शत ते सहस सहस ते लाखन । ( कर्णार्जुन संग्राम ) सो में फुली सहस में काना, सवालाख में ऐंचा मान ऐंचा ताना कर पिचार, मैं मानी फैरा सा हार । + ग ।

अकरितास। उद्धरेत्सप्तगोत्राणि, कुरुमेकोत्तरगतम् । (गया) श्रीगापारी के भये, इक कन्या सौ पूत । , . (१०५) अन्यः साक विरोधेन, वय पचोत्तर शतम् । परस्पर विरोधन, वय पचचते गतम् । पाच पाडु शत कौरवा, वधु एकसौ पाच । नसे कौरवा कुति सो, पाडुन लागी पाच । व एक शत पाच सो, निसि दिन चढे सनेहु, कहो हमारो मानिये, पाच ग्राम दै देहु । (कृष्ण) (१०८) शताष्टोत्तर संख्याकाः सामन्तास्तत्रजज्ञिरे, पोडशानाशततेपानभूपुः शूरसंज्ञकाः(पृथ्वीरा जप माला में पाइये, गुरिया इफसौ आठ, राजा अझ प्राचार्य कह, श्री लिख इक सौ आठ । (श्री १०८) अष्टोत्तर शत हाथ की, शिला लेय अनिरुद्ध, वाणासुर को दल हन्यो, कियो घोर तहँ युद्ध ! महिसो इक सौ आठ गुण । (११०) तेहिक शतसुत अरु दस भाई, खल अति अजय देव दुखदाई (कालक्त) (१२०), गंजीफा में जानिये, पान एक का गीत, है दशावनागे वही, रसिक ननन भेदीस । - है सूरज को व्यास, , [१२] प्रकदिलागा बरमशिश की लौ, हिसानो नौ । सौ दिन चारन, इक दिन साहु । सौ गाथा सुग्गा पहै, अत विलाई खाग । , सो कौवे में बगुला राजा। सो ऐगों का ऐच गरीची। सौ नम्टन में एक है, नक्कू जाके नाफ। सौ मन सोना, रती हुकूमत । सौ में सती लाख में जती । सौ सौ तोपन की कर मसक, महुवे दगन सलामी लाग । सौ अजान नहिं एक सुजान । सौ सौगदे खाय भूलि नहिं ताहि पतीजे । सौ सयान को एफै मत । १००-१ सौ कोसा अरु एक मसोसा । सौ मुनरा की, इक लुहरा की । सो दी इक देलसंडी। सौ,हजार-सौ की हानी, महस वखानी । सौ,हजार चले वाण कवि सकहि न भापन, लाख Jशत ते सहस सहस ते लाखन । ( कर्णार्जुन संग्राम ) सौ में फुली सहस में काना, सवालाख में ऐंचा ताना । ऐंचा ताना कर पिचार, मैं मानी कैग सो हार । - .

अंकविलास। [१] - . शत पच चौपाई मनोहर, जानि जे नर उर धरै, दारुण अविद्या पच जनित, विकार श्री रघुवर हरे। इसवी सन पच बियासि घटे, हिजरी सन शुद्ध तवै प्रगटै। (ई. १८९८-५८२=हिजरी १३१६ )/ (६००) कष्ट सहित छ सो हय पाये, ते सब कौशिक टिग पहुचायें(गालवमृपि) रावण पुरीत दिशा माची, कोश शतरस चलि गये, वैठे जलधि महँ पाइ थल, वर शसु चरणन चित दये । (नरांतक) छै सौ चालिस एफड़ जानो, पूरो एक मुरब्वा मील । (६४०) (७००) सत्सद जग में परम पुनीता, श्री दुर्गा अरु भगवत गीता । तुलसी सतसद भक्तन प्यारी, रसिक जनन को चै विहारी । सतर इ ओरह रचना प्यारी, रितु पिहरी की छवि न्यारी । If 1 7 (८०) । देने हित गुरु दक्षिणा, गालव बहु हट कीन । ... कौशिक मागे आद सौ, श्याम वर्ण हय पीन । सन्य आठ सौ दसरिकी, एक वाहिनी जान । (९००) - नौसौ हाथी के हलका में, झूम आदि भयंकर ठाद् (पृथ्वीराज) दगी सलामी चदेली में नोसो तोप दई दगवाय (मदोरा) नौसे चूहे ग्वाय के बिलारी चली इन्न को। - [१२४) अंगविलासा (१३५) शक पॅह जोरे इक सौ पैतिस, संवत विक्रम लहिये । (शक १८२०+१३५ संवत १९५५) V (२००) . दुइ शत मिले न तेहु पर, तव मुनि मानि गलानि, रोये विश्वामित्र ढिग, अस है हठ दुख दानि । (गालव मृपि) महा कोपि लंकेश कुमारा, तीक्षण ,शत वाण प्रहारा । दुइ सौ जोड़ी वजै नगाांडा, कड़के तुरही औ कडाल । (महोवा) (२५०) योजन ढाई शत चकलाई, चौसठ कोस उतग सुहाई (विव्हावलपुर) (२७०) । सेना दो सौ सत्तर जहवा, प्रक्षोहिणि में इक गुण तहवा । (३००) पूर्ण तीनसौ पैसठ दिन जस, एक वर्ष में प्राही, तीर्थ तीनसौ पैंसठ है तस, कुरुक्षेत्र के माही। शतक त्रय भरथरि मन भावन । (४००) पूर्ण शतक अधि जानिये, भागे चार सौ पूर । (काल प्रवोध) शत योजन को सेतु वह, रह्यो चार सौ कोस । (सेतुबंध) (५००) व पाच शत निज कर नीचा, हुतै शीस पावक के वीचा (रावण) - 1 7 -- अंकविजासा । , F-1 - । " . 1 शत पंच चौपाई मनोहर, जानि जे नर उर घर, दारुण अविद्या पच जनित, विकार श्री रघुवर हरे। इसवी सन पच चियासि घदै, हिजरी सन शुद्ध तवै प्रगटै। (ई. १८९८-५८२-हिजरी १३१६)/ (६००) कष्ट सहित है सो हय पाये, ते सप कौशिक डिग पहुचाये। (गालवपि) रायण पुरीतं दिशा प्राची, कोश शतरस चलि गये, वैटे जलधि महँ पाइ थल, वर शभु चरणन चित दये। (नरातक) छ. सौ चालिस एकड़ जानो, पूरो एक मुरब्बा मील । (६४०) (७००) सत्सद जग में परम पुनीता, श्री दुर्गा भगवत गीता । तुलसी सतसइ भक्तन प्यारी, रमिक मनन को चै विहारी । सत्र इ औरहु रचना प्यारी, रितु विहारी की छवि न्यारी । (८००) दे हित गुरु दक्षिणा, गालव बहु हट कीन । कोशिक' मागे माद सौ, श्याम वर्ण हय पीन । सन्य आठ सौ दसहिफी, एक वादिनी जान । (६०) लोसौ हाधी के इलका मे, स्मै प्रादि भयंकर ठगद् (पृथ्वीरान.) दगी सलामी चदेली में नोसो तोप दई दगवाय (महोना) चौसे चूहे खाय के गिलारी चली इन को।। 2 [१२६ ॥ शविलास। नौसौ छयासठ वर्ष दुखारी, रही विपिन मह जनकदुतारी । जस नौसौ तस एक हजार, छोडौ गापस की तकरार । -- सहस्र शीर्पा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । राम रामेति रामेति, रमे रामे गनोरमे। सहस्र नाम तत्तुल्य, राम नाम वरानने । अश्व मेघसहस्रच सत्यंच तुलया धृतम् । अश्वमेध सहस्रादि सत्यमेव विशिष्यते ॥ सहस नाम सम सुनि शिव वानी, जपि जेई पिय संग भवानी । वंदौ खल जस शेष सरोपा, सहस बदन वरण पर दोपा । सवत सहस मूल फल खाये। (पार्वती) वर्ष सहस वीते यहि भाती, जात न जाने दिन अरु राती । मुनहु राम जो शिव धनु तोरा, सहस बाहु सम सो रिपु मोरा । सहस वाहु सुरनाथ त्रिशकू, किहि न राज्य मद दीन कलकू । जानी मैं तुम्हार प्रभुताई, सहस वाहु सन परी लराई । एक बहोरि सहस बुज देखा, धाइ धरा जनु जन्तु विशेषा । जब लगि जाकी अवधि है, पूजा नहीं करार | तब लगि नाकी माफ है, अपगुण कर हजार ॥ दौरौ कोस हजार लौ, से लक्ष्मी पास । विना दिये रघुनाथ के, मिलै न तुलसीदास । नाम हजारी लाल है, पैसा एक न पास । , -- , " 14 अपिलासा [ १२७/ (११००) ग्यारह सौ है लिंग पुराना, ग्यारा सहस कह परमाना । ग्यारा से बढ़ई संग लीन्हे, चढन तहा पहुंचो जाय । (माहो) ग्याग सौ सत्ताइस शासा, मुनिजन चेदन की करि राखा। (१२००० प्रति कलियुग में सुरन के, बारह सौ है वर्ष हाथी जूझ है वारास, पैटर चार लाख गिरि जायें (जैचद) (१३००) सन अउरा सौ व्यासी रूरे, तेरा सौ हिजरी के पूरे । (१४००) सन उन्निस सौ व्यापी जवहीं, चौदह सौ दिन सपही।। (१५००) कहिले को लोकोक्ति हजारा, पर यथार्थ म डे हमारा । (का० प्र०) (१६००) पोडशानाशत तेपा बभूवुः शूर सबकाः (पृथ्वीराज) सवत सोरा सौ इकतीमा, कगै का हरिपद धरि सीमा । सवत सोरा सौ असी, अप्सी गग के तीर । सावन शुला सप्तमी, तुलसी तज्यो सरीर ।। (१७००) सतरा सौ है कूर्म पुराना, सतरा सहस कह परमाना । गज सतरा सौ साठ को होत एक है मील ।

[१२८] अफविलास . - - (१८००) अठरा सी है पत्स्य पुराना, अठरा सहस कहू परमाना । (१६००) सन उनिस सी में परो, महा घोर दुष्काल । फिर मत अइयो जगत में, वा छप्पन को साल || सन १८१६, १९००, संगत १६५६ । • (२०००) जो करणी समुझ प्रभु मोग, नहिं निस्तार फल शतकारी.। शेषहि जिव्हा दोय हजार, निसि दिन राम नाम उच्चार । एक बार हरिनाम उवार शेर लई फज दोय हजार।' : " कहत व्यास अब चंद सुगील, इक्सि सौ साठक है मील, (२१६०) लगभग चौगुन पृथ्वी जान, आठ हजार मील परमान । धनु गुण काटे तव पारय, दाय सहस मारे रथ सारथ! (अनमेर) दो हजार तोपे सनवाई, हाथी सजिगे पाच हजार । (मदोगा) दाय सहस्र चारसौ तीस, सेना पृतना कह 'जगदीस। (३०००) बेल पत्र महि परे सुखाई, तीन सदस सवत सो खाई । सुनि प्रमु वचन निगान अपारा, तीन सहस्र हने इक बारा । (शत्रुप्त) तीन सहस्त्र लिये रण गोढ़, पाइ-सुबाहु सामुहे ठाढ़े। तीन सहस दल गसिरसा को, बलिपुर रहो छावनी डारि। (सिरसा) . -- -- - - अंकवितास। (१०००) विष्णुनाम द्वार विचार, शेष लहत फल चार हजार। युग सहस्र जे विश्वर, सुन्दर पाम प्रवीन, जानहिं अति कर मत सरल, गहि मख सग अनीन । (रामाश्वमेय) (५०००) - , युद्ध महा भारत भये, पच सहस मे । कलियुग तरही ते लग्या, फियो देश अपकर्ष । पाच हजार काउली घोडा, छै सौ शुतुर माल लढवाय । मलिखे भेज दिये सिरसा को, बहुतक बजारही फहराय । (सिरसा) पच सहस दो सौ असी, फीट केर इक मील । ५२८० । (६-७-१०हजार) इहि विपि पीते वर्ष पट, सहस पारि आहार । सपत सस सहस्र पुनि, रहे सभीर अधार । वर्ष सहस दस त्यागेउ सोऊ, बाहे रहे एक पग दोक। (७०००) सप्त सहस्र शिव्य संग लागे, भोजन आय द्वार है मागे । (दुर्वासा) सात सहस दो सो नगे की, सरया का चभू परमान । रपिजप सात हजार प्रमाना। (८०००) अटो शोक सहस्राणि, अष्टौ श्लोक शतानि । अह नि शुकोवेत्ति, सनयोयेत्तिवानवा । (व्यास करन माटि पा) ६८०°, अंकविलासा आठ सहस्रक मील के, है पृथ्वी को व्यास | " आठ सहस जप बुध परमाना। आठ सहस्र प्यादे सौ हायी दुइसौ शुतर सहम असार । (सिरसा) (१०००) नव सहस सरत चलि गयऊ, ता नृप के मन विस्मय भयका (दशरथ ना सहस नौसे नवे, तुलसीकन विस्तार । अष्टा दश पट चारि को, सब ग्रथन को सार ॥ ६६६०॥ (१००००) शालग्रामो हरेर्मूगिना गन्नाथश्चभारतम् कलेर्दशसहस्रान्ते ययौत्यक्त्वाहरेःपदम् । कलौदश सहस्रानि हरिस्त्यजति मेदिनीम् तदर्भ जाहवीतोयं तदर्यग्राम देवता। भूप सहस दस एकहि वारा, लगे उठावन टरइ न टारा। होहिं सहस दश शारद शेपा, करहिं कल्प कोटिन भरि लेखा । मोर भाग्य राउर गुण गाथा, कहिन सिराहिं सुनहु रघुनाथा । मस सहस दस सिंधुरसाजे, जिनहि देखि दिसि कुंजर लाजे । अयुत नाग बल भीम शरीरा, रूप भयंकर अति रणधीरा । दस सहस्र पुनि ब्राह्म पुराना, वामन केर स्वई परमाना। दस हजार वे शिशुइते, गंधर्वन के पुत्र । तिनकी धनुही छीनि कै, तोरी हती सुमित्र ।। मगल जप ठस सहस प्रमाना।

अकपिलास। ( १३१] . --(११०००) दश वर्ष सहवानि दश वर्ष शतानिच, रागोराज मुपासित्वा ब्रह्मलोक प्रयास्यति । ग्यारा सहस वर्ष भगवाना, कीन्हो गजधर्म विधि नाना । (राम) सहस इकादरा जाप चन्द्र को। (१२०००) - " 77 वारा सहस केर परमाना, अहै प्रगट ब्रह्माड पुराना । (१३०००) तेरा सहसहिं ब्राह्म पुराना, श्रीपुरुषोत्तम चरित वखाना । "दस हजार कहं मिलत प्रमाणा, कल्प भेद करि याहि वखाना ॥ (१४०००) मुर डरत चौदह सहस निशिचर, एक श्री रघुकुलमनी । चौदह सहस सुभट लै धाये, छण म प्रभु तुम मारि गिराये । चणा बीर आगे महल में गया, सु चौदह सहस नारि देखत भया । (१५०००) - । पद्रा सहस ते कछु अधिक, अग्नि पुराण खान । पद्रा पाठ तिरत्तर कादि, सात गुणाकर एक लखाहि। १५८७३४७ (१६०००). जमुना जल कीड़त नदलाला, सोलह सहम सग नरवाला। र-(10) .... में HEN I २५६स ५ [१३२] ग्रंकाविलासा पसु नभ शशिरस भूमि सुहानी, कृष्णचन्द्र की जानिय रानी । १६१० सोरह सहस अठोत्तर सौघर, यहां तहां सुंदरि सँग गिरिधर । सोला सहस शुक्र जप जानो। (१७०००) सन्ना सहसहिं कूम पुराणा, सुनत भवणमुद पंगलनाना । सहस सत्तरा जप केतू को। (१८०००) अठरा सहस भागवत जानो, हिंदुन को सर्वस यह मानो । दैलख सेन पदातिहने, गज सहस अगरा (राम रावण) योजन अष्टादश सहस अरु पट सत मित भूप, जाहिर जम्मू दीप है अति रमणीय अनुप । सहस अगरा जप राहू को। (१६०००) उन्निस सहसहिं गरुड़ पुराणा, शान तत्व कर ललित विधाना । चारिह वेद मंत्र विस्तार, उन्निस सहस चारसौ चार (का. म.) सुर गुरु जप उन्नीस हजारा। पीस सहस्त्र (२००००) वर्ष तप कीन्हा, भालयज्ञ में पुनि मन दीन्हा । (रावण) (२१०००) इकिस सहस पाउसौ सत्तर, संख्या एक अनी की दृढतर । २१८७० JA अफविजाला इपिस सहस माठसौ सत्तर, प्रक्षोहिणि प्रति रथ निकुंजर ।२१८७० भ्यासोन्यास किया निसि वासर, सहसइकीसऽ छै सौ तापर २१६०० " (२२ हजार) नारदीय वाईस हजार, सहस पचीस फीन विस्तार । (२३ हजार) तेइस सहस जाप शनि जानो। (२४ हजार) शिव पुराण चौबीस हजारा, स्वइ वाराह केर निरधारा। (२५ हजार) पविशतिसासवशिति सिदिपुर । ( कालीतत्र पाउ) नारदीय पचीस हजारा, भक्ति तत्व दरशावन हारा । पृथ्वी परिधिदि कहाँ सुजान, सहस पचीस मील अनुमान । (व्यासपरिधि) (३० हजार) तीस सहस सरत करि राज, लयो दिलीप लोक सुर राजू । (३२ हजार) पत्तिस सहस वर्ष तप कीना, अशुमान तब हरि पद लीना । (४० हजार) सप्त क्षोरिणी फौज सँवारी, चालिस सहस के पारी (पाटव) ६ .

F १३४-]. अफबिलास. (५० हजार) अर्द्ध लक्ष सुनियत लख पद मूर के, प्राधेहु मिलते नाहि । मिले तिनहिं पै भक्त जन, वार वार वलि जाहि । भीष्म हने दिन पांच मे, ' स्थपति सहस पंचास । आ एकड़ भूमि में, कड़ियां सहस पंचास । - 1 (६० हजार) सगर पुत्र में साठ हजारा, जिन बहुतक पृथ्वी खनिडारा । पन्यो तहा गंगा-जल जाई, सागर नाम भयो तव भाई । . वालखिल्य ऋषि साठ हजारा, इक अगुष्ट तुल्य तनु वारा। पट सहस्र दस शूर जुझारा, लवणासुर सँग अनी अपारा । हस्ती साठि सहस्र बल, सदा धर्म की सीव । श्वेत छत्रशिर शोभित, यह राजा सुग्रीव । दुःशासन रथ याजियो मौं भाइन त साथ । साठि सहस नृप छत्र धर चढ़े साजि कुरुनाथ । 1 . (६५ हजार) पैसठ सहसऽरु छै सौ दस पुनि, अक्षोहिणि प्रति हय हिय में गुनि । (६५६१०) (७० हजार) सत्तरि सहस नाग पल जाही, इन मह एक कहौ मै ताही (गधमादन) पाछे खुढे जेहि सहस सत्तर प्लवग अति यल सीव है, रघुवीर सन्मुख हैं विराजित पीर सो सुग्रीव है।।। - ' , - अपिलान [१३४ ७६ हजार सहस बहतर मील है, शनि को व्यास प्रसिद्ध । (८० हजार) योजन अयुत अष्ट नभ जाई, दपि वल सुमिरि हदय रघुराई । (८१ हजार) सहस इकासी एक सौ, ललित कद पुरान । - (८७ हजार) बीते संवत सहस सतासी, तजी समाधि शभु अरिनासी । (८८ हजार) स्वत कयो हरि चरित पुनीता, सहस अगसी सपि सन मीता । सहस अठामी मील है, व्याम टहस्पति जान । (लाख) तामूलस्य गुणाः सति, ससे शत सहस्रशः एको पिच महान्दोपो, यस्यदानाद्विसर्जनम् (देखो १००) नृप पे पहिचानि गुरु, भ्रम वश रहा न चैत । वरे तुरत शत सहस वर, सिम'कुटुर समेत । लक्ष लक्ष वर धेनु धन, पूजि पूजि दिन पाय | एक एक मिन दई, हर्पित कोशतराप। तुरंग लाख रथ सहस पचीसा, सफल सारं नस मम सीसा । उलट वासी तासु पति, सौ हजार मनसत्य, एक सून रय तनय कह, भजसि न मन समस्त्या (रामलमर) । - -- अनिलासा इक लख पूत सवा लख नाती, सो रावण घर दिया न गती । ता बसुदेव हरपि तिहि गही, लक्ष धेनु मनसी मन माहीं । गैया लक्ष सवत्स तुहाई, वादी ध नवीन मॅगाई । सब विधि साहिं अलंकृत कीनी, करि संकल्प द्विजन कह दीनी । लास कडी एकड गुनो, पग हैं नौ हजार, नब्बे पग डिसमिल भयो, पैमायश को सार । एक लाख इक सठ सहस, असी वाल इक सार, भये कृष्ण के पुत्र ये, गुण वल रुप पार । एक लक्ष भारत अघि माही, ध्यास प्रणीत विदित सब काहीं । एक लक्ष नौसहस पर, त्रयशत और पचास, अक्षोहिणि प्रति जानिये, पैदल सह उलास (१०६३५०) लाख तदनीर करो तो क्या होता है, नही होता है जो मंजूरे खुदा होता है । मुई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, विगडी बन जाती है जब फजले खुदा होता है। लाखन में कोउ एक सपूत । लाख जाय पं साख न जाय । चॅधी मूठ है सवा लाख की। (२ लाख) दोय लक्ष पर जान, सहस अठारा सात सौ, परणत सबै सुजान, सख्या इक अक्षोहिणी । इक गज, इक रथ, तीन तुरगा, पदचर पच, इक पत्ती संगा। सेनामुग्य गुल्मऽरु गुण कहिये, वाहिनि पृतना चमू अनी ये ।

अंकरिनामा [१७॥ निगुगा गुण पत्ती ते गिनिने, सख्या एक अनी की लहिये । दस अनीक अक्षोहिणि जानो, नम नभ मुनि वसु शशि भुज माना । गज पक्चर %3D १ ३ ह ३ ३ ३ %3D %3D २७ %3 २७ ८१ सयाग = पत्ती ३० सेनामुस ६० गुत्म २७० ८९० वाहिनी पृतना ७२३० चर २१८७० श्री % 3D %- ८१ २२३ ४५ ६३५ ४०५ १२१ ३६॥ १०९३५ - २४३ ७०३ २१५७ ६५६२ %3D %3D २१८७ % 3D २१८७० २१८७० ६५६१० १०९३५० २१८७०० - यक्षोहिणी दोय लक्ष अढतिम सहस, मील चढ़ है दूर । (३ लाख) लक्षत्रया वर्तनात्तु महादेव विजेष्यति (कालीतत्र) सेना तीन लाख दिल्ली की सो कनवज में पहुंची जाय। तीन लाग्य को टीका लैके सो नेगिन को दो सौंपाय (नैनागड) (४ लाख) वारि लक्षवर धेनु मॅगाई, काम सुरभिसम शील मुहाई । लख चौरासी योनि मे, चौ लख मानव जान । चारि लाख बत्तीस हजार, कलियुग वर्ष केर निरधार । चारि लाख से सुरज पाये, रहिगे तीन लाख सब ज्वान (पथरीगढ़) (५ लाख) - - पचमावर्त्य कला पचक सयुतः (काली तंत्र) तन्त अंकविलास। पाच लाख से माहिल चलि भये, हाहाकारी बीचत जाय । पाच लक्ष हैं पत्थर के घर, नौ ना लास काष्ठ के सुंदर (लका) (६ लाख) संख्या त्रय अतोहिणी, है ताख प्रमान । र.हस छपन अरु एक सौ, तापर गिनी सुजान । (६,५६,१००) (७ लाख) सात लाख संख्या केशन की, भापत सुन्दर गरुड़ पुराण । सात लाख से चढो पिथौरा, लस्कर कूच दीन करवाय, राह पकर लइ गढ़ महुवे की दल में, रही ग्रारिया छाय ।। (८ लाख) चौसठ सहस, मील भानु को व्यास ! * आठ लक्ष चौंसठ सदस, द्वापर युग के वर्प । आठ लाख से सजे चदेले, अगणित बजा रही फहराय । आठ लाख + । (६ लाख) नवलख गऊ,जाहि सो नदा, पचलक्ष जिहि सो उपनदा । नव लक्ष सग तब, हाथी, सकल करौं तारागण साथी (भीमप्रतिज्ञा कलिग प्रति) अन्य ग्रहो का व्यास भी यहा स्थूल मान से एकत्रित ही लिखा जाता है- पाठ लक्ष है.व्यास सूर्य को, सहस अठासी गुर को जान ! शनी छहत्तर सहस मील है, आठ सहस पृथ्वी अनुमान । पौने पाठ सहन शुरुकर, मगल चार सहन सुजान । बुद्ध तीन शशि दोय सहस है, व्यासक शूल मान हिय -- -- ज.

प्रकाविलामा लख चौरासी योनि में, नव लाख जलपर जान। जाके घर में नौ लख गाय, सो यो नाक पराई खाय । मुख दिखराई मे बेला को,,मल्हना दियो नौलसाहार। T (१० लाख) दशलक्षवर्तनात्तु दशविद्याप्तिरत्तमा । (कालीतत्र) दस लस गऊ जाति प भाना, कोटि जाहि नंदरांज महाना। लास मिले दस लाख की, तृमणा वाढत जान, जब भारत सतोपरन, तला जात नसार । लरा चौरासी योनि में, दश लख पक्षी जान । (११ लाख) . लख चौरासी योनि में कृमि एकादश लक्ष । (१२ लाख) द्वादश लनहरु सहम छानवे, नेता युग में वर्ष प्रमाण । (१३ लाख पक्षी ते पशु योनि है, तेरा लाख विशेष । (१४ लाख) चौदा लक्ष पिंट पृथ्वी के, इक सुरज के पिढ समाईि, अदात रचना जगढी-पर की, कहत मान्दा रोग ल्जादि । भारत चौदह लता दे, मग करा.का.

[१४०] अंकाविलासा (१५ लाख) भारत,पंद्रा लत है, दिव्य पितृके लोक । (१६ लाख) दस पट लाख हरी हर वोलत, चले जाहिं गिरि कंदर तोलत । (१७ लाख) - पक्षी थिरयोनि है, सवा लाख विशेप (१०, २७) लक्ष सत्तरा सहस अठाइस, वर्ष होत सतयुग के माहिं । (१८ लाख) जलचरतें थिर योनि है, अठरा लक्ष विशेप (६,२७) व्योम तीन रस गुण वसु एका, अक रीति लिखि गुणी विधेका । (नरातक सभा में गुणी १८,३६,०००) सहस छतीसह लक्ष अगरा, गुणी नरातक सभा मॅझारा । (१६ लाख मानव तें पशु योनि है, उन्निस लाख विशेष (४,२३) (२० लाख) वह कपि अंगद वालि कुमारा, वीस लक्ष जाकर परिवारा। (२३ लाख) लख चौरासी योनि में, पशु है तेइस लाख । (२४ लाख) संख्या ग्यारा नोडिगी लख चौविस अनुमान (२४,०५,७००) अकविलास। [१४] (२५ लाख) पचविशति लक्षस्तु दश विद्येश्वरो भवेत् (कालीतत्र) मोसी कन्या लाख पचीसा, ऐसे वचन न कहौ मुनीसा । (२७ लाख) लख चौरासी योनि में, थिर लख सत्ताईस । भानु परिधि अब कही सुशील, लगभग लक्ष सताइस मील । (२७,१५,४२८) (३० लाख) तीस लाख दल साठि हजारा, पवन पुत्र सब कीन जुहारा (पलवीर) तीस लक्ष भारत अमर, पद्रा पिट सुलोक, चौदह पुनि गधर्व दिग, एक लक्ष भुपि लोक । (महाभारत के शोक ६० लाख) ३० लक्ष देव लोक में १५ लक्ष पितृ जोक में १४ लक्ष गधर्व लोक में १लत मये लाक में (४३ लाख) लस तैतालिस बीस हजार, वर्ष दिव्य युग एक मझार । चारि जाख दत्तीस हजार, कलियुग इते वरस निर्धार । द्वापर दुगुन सुनेता तीन, सतयुग चौगुन सख्या फीन । चतुर्युगी इक दिव्य भनत, दिव्य शत्तर र मन्दत । चोवा मयतर कर पल्प, नर कह अमित देव फह स्वल्प। कलियुग ४,३२००० द्वापर ८६४००० २२९००० सतयुग १७,२८००० ४३,२०००० %3D२ दिययुग - ता ।। १४२ बरकविलाला ---- (५० लाख) पंचाशल्लक्ष पाहत्त्य, महाकाल सनो भपेत् (काली तंत्र) - - । " (६० लाख) दश पट लाख हरीहर बोलत, चले जाहि गिर कदर तोलन । श्लोक महाभारत विदित, साठ लाख परमान । (८० लाख) असी लाख अरु सात शत, कपि दल वर वरवंड, नौ मारग कूदत चले, गय गवाक्ष बलिदह । आये मगह राज भगदत्ता, असी लक्ष जाके मदमता। (८४ लाख) ग्रासनानि कुलेशानि यावन्तो जीव जन्तवः चतुर्शीति लक्षाणि चैकेकसमुदाहृतम् । प्रारर चारि लाख चौरासी, जात जीव नभ जल थल वासी। (कोटि) गो कोटि दानं ग्रहणेषु काशी, प्रयाग गंगाध्युत करूपवासः यज्ञा युत मेरु सुवणे दान, गोपिन्द नाम स्मरणेन तुल्य । भरणेति भंगलं माग यस्य वाचि प्रवर्तते भस्मी नाति राजेन्द्र ! महा पातक कोटयः ।। जन्म मोटि लगि रगर हमारी, दरौ शधु नतु रही कुमारी। सुन्दरता मर्याद गवानी, जाइन कोटिहु बदन वसानी। महर्षि परपर वचन समीती. सखि उन कोटि काम छवि जीवी। . - 14 . " - सहज मनोहर मूरति दोऊ, कोटि काम उपमा लघु सोऊ । कोटि मनोज लजाक्न हारे, सुमुखि कहौ को ग्रहहिं तुम्हारे। कोटि विप्र वध लोगहिं जाहु, माये शरण तनौं नहि ताइ । फाटे पै कदली फरे, कोटि जतन कर सीच । गिरि सम होहिं कि कोटिक गुजा । कोटि कॅगरन चहि गये, कोटि कोटि रणधीर । सादर शिर कह शीस चढाये, एक एक के कोटिन पाये। गमचन्द्र के चरित सुहाये, कल्प कोटि लग जाहिं न गाये। दान विन दरस निदान ठहरान कौन ज्ञान दिन' जस अपजस कर करिगे। कविराय सतन सुभाय सुने सुमन के धरम विधान पन रा याधरिगे । काम प्राय काहू के न दाम दुह दीनन के वाम गाडे गाडे सर गप गरि गरिगे । बोरिवोरिरिद पहाइ पेपर देत जारि जोरि कृपिन रोर मरि गरिने। कोटिन दाख स्वधाय मरौ पर उट है काठ करोद भावै । कोटिन रग दिवारत है,जस अग में ग्रासत मंग भवानी । (२ कोटि) कोटि द्वयस्य लाभेऽपि नत सदशज धनुः । असदश्यः शरः स्तव्यो लक्ष लाभाभि काक्षगा ॥ (मोटि-मरोड़, किनारा) (लक्षम्लास, निशाना) (३ कोटि) तिस कोटयोऽद कोटीच, रोमावि बाहारिरी (साढे तीन कोटि) सप्त लक्षाणि केशाः स्युनखाः मोक्तास्तु यिंगतिः (गरड़ पुराण) - .

[ १२४ प्रकविलास। सार्वत्रिकाटि नाईना मालयञ्चकलेवरम् । साढ़े तीन कोटि तीरथ की संख्या भापत वायु पुरान । सोइ स्वर्ग स्वह अन्तरिक्ष मे, साढ़े दस कोटी सब जान । (वायु पुराण अर्थात् ब्रह्माड पुराण) तीन करोड़ रहे गधब्या, हनुमान सहायो सा ।। सग सचिव त्रय कोटि महाना, नाम सुषेण वैद्य वुपियाना । वय कोटि रत प्रधान तेहि दिन हने लक्ष्मण वीर । मानुप तन में रोम राजहीं, साढे तीन कोटि परमान । रोम कूप उतनेही जानो, अस वरणत है गरुड़ पुरान । भौम भूमि लिंग तर अति दूर, सार्ध त्रिकोटि मील भरपूर ( मगल (१ कोटि) मूरज से बुध दूर सुजान, मील चार कादिक परमान । (५ कोदि) तीन कोटि कुंजर मतवारे, पंच कोटि रथ सरस संवारे (पांडव) पाच कोटि मीलहुं ते आगर, नेत्रफलहि पृथ्वी अनुमान । सम वृत्त के क्षेत्रफल निकालने की सुलभ रीति- व्यास अर्द्ध को धर्म करि, वाइस ते गुणि देय । भाजि सातसो वृत्तफर, क्षेत्रफलहि लसि लेय ॥ यया- एक वृत्त का ध्यास ८, न्यासार्ध ४,१४१६ वर्ग १६४२२ क्षेत्रफल ५० ७ - इस रीति को इस प्रकार भी लिख सकते है.- ८.८.२२-१२ X-X ७ यह ऊपरी क्षेत्रकल हुआ यदि गोल पृष्ट का फल लेना हो तो इसका चौगुना और गोलातर्गत घन फल लेना हो तो पांच गुणित होगा । (७ कोटि.) सात कोटि हैं ताम्र के, चादी के श्रुति कोट (श्रुति ४) जात रुप केह इते, माणिक कोट सुकोटि ॥ (लका) सप्तकोटि निशिचर सँगताके, असित मेरु सम खल भटमाके (बिंदुराक्षस) रवि से शुक्र दर ढिय जान, मील सात कोटिक अनुमान । (८ कोटि) आठ लारस शत पार गनाई, लै सँग सेन पपपुर जाई । (दुर्गध) ( कोटि) नव करोर स्फटिक सुहाये, सहस कोटि मणि नील मुहाये । (लका) नव करोर मीलहुँ तें दूर, पृथ्वी ते राजत है सर । (सूर्य) पति सेकड ज्योति गति शील, इक लख सहस छयासी मील (१० कोटि) अर्बुद दश करोर वानर सँग लैके, चले सकल प्रभुपद चित देके । दश करोरि नर लाख अझ, वीस सहस सत एक । चले केसरी संगले, करत चरित्र अनेक ।। सजे कोटि दश मत्त मतगा, वीस कोटि लिय सग तुरगा। (मेघनाद) स्वर्ग भूमि अरु अन्तरिक्ष में, तीरथ है साढे दस कोटि । गगाजी में सवही राजत, महिमा गग न गिनिये छोटि । (१३ कोटि) कोदि त्रयोदश लक्ष इकीस, चौविस सहसऽरु नो सौ दीस। रथ गज हय अरु पदचरमान, महाऽक्षोहिणी सग्या मान । रथ १३२१२४६० गज १३०१२४९० हय४२२३७४७० पदचर ६२५६२४५० योग १३,२१,२०,९०० अविनाम , (१४ कोटि) रवि से मगल दूर सुजान, चौदह कोट मील अनुमान ।' ( १६ कोटि) पुनि वसंत शत धीर बुलाये, कहो जाहु पश्चिमहिं सिधाये, सोलहु कोटि कीश लै भारी, उठे तमकि जय राम पुकारी । ( २० कोटि) वीस कोटि सग सेन सुहाई, रले सकल जय कहि रघुराई (सीताशरोध चीरा कोटि वर कीश, रक्षा करत गवाक्ष ।' 7 ' पीस कोटि असनार महापल, तीरा कोटि सत लेखी पैदल (पाडय) ( २१, कोटि) 1 - + nua 7 . . इकिस कोटि वनचर'ले साथा, परन कुमारहिं नायउ माथा । (मयद) an -- - . . ... ( २५ कोटि) शेल शूल असि मुदगर बारी, कोटि पचीस चले रथ चारी (मेघनाद) ( ३० कोटि) 1 एक नील दल तीस करोरा, धावत ,एक एक वर-जोरा।। तीस कोटि को बहु खंडो, नाम वीर धूवात । ( ३३ कोटि) तेनिस कोटि देव सुमिरन कर, कहिहौं वीर पंवारो गाय ।

१७] - छपन कोटि बनचर ल साया, करत प्रणाम चले कपिनाया (श्रीखह) अंकविलास ( ३६ कोटि) पद् त्रिशत् कोटयदैव हरस्य सफला गणाः । उत्तर दिशि दश शीस, रहेउ स्वयं सज्जितवली। सग कोटि छत्तीस, लिये मुख्य सेनापती । (४२ कोटि) कोटि वयालिस तमीचर, नारान्तक कर घात । राम कृपा बल हति खलनि, कपिन विताई रात । (४८ कोटि) कितक मील रवि से गुरु दूर, अढतालिस कोटी भरपूर । ( ५० कोटि) कोटि पचास खड़े कपि घेरे, बहु शर भंग निपुण रण केरे । (५६ कोटि) छपन कोटि यादवा जेते, कृष्ण भक्त सम जानिय तेते। (६६ कोटि) कादि छियासठ गउन को, अवरीय नर नाह, निय सहित रिमन दई, कीरति रही प्रवाह । (६७ कोटि) सप्त पष्टि हताः कोथ्यो वानराया तरविनाम् पश्चिमे नाह गोगेण मेघनादेन सायक - - [1 अंकविलासा मख्या ऋमिक मख्या सख्या कामिक सख्या एकजवतः परगवता हिनत्रता ससनबता ६१ एकनवतिः १२ छिनपतिः ६३ घिनवतिः ६४ चतुर्नयति ६५ पवनवतिः ९६ पगणपति. ९७ सप्तनवति १८ अष्टनवतिः ६६ नवनवतिः त्रिनवतः अपनवतः , चतुर्नवतः मशनरतः पचनवतः १०० शत शवतमा विशेष विवरण (१) एकसौ से अधिक संख्या मे अविरुवा उत्तर शब्दो का प्रयोग होता है यथा.- 7 १०१ एकाधिक शतं अथवा एकाधिकशतं । एकोतरं शतं अथवा एकोत्तरशत । (२) प्रकार अर्थ में सख्यावाचक शो के पश्चात् धा प्रत्यय होता है । यथा द्विपा-निधा-अष्टधा-नवया इत्यादि । (३) 'अनेकवार के अर्थ में शस् अर्थात् श. प्रत्यय होता है । यथा:- बहुशः अल्पशः शतशः सहसशः लक्षगः कोटिशः। (४) विशति धादि शब्दो से पूर्ण अर्थ में तम प्रत्यय होता है अथवा ति फालाप होजाता है । यथा- विशतितमः अथवा विणः । - ॥ इति ॥ ......... निवेदन प्रकविलास के पूफ का सयोधन यथासभव सावधानी से किया गया है तथापि मेरी वा छापे की भूल से कही अशुद्धि रह गई हो तो उधारचेता महानुभाव रुपया सुधार ले। ग्रंयकर्ता। रोदार - ४] अंकविलासा क्रमिक सख्या सख्या कामिक सख्या १ एकनवतिः एकनवतः १६ पराणपति परागवता २ डिनवतिः हिनवतः ९७ सप्तनवतिः सतनवतः ३ जिनवतिः निनवतः १८ अष्टनवतिः एनवतः ४ चतुर्नरति. चतुर्नवतः १६ नवनवतिः मानवत. ३५ पसननतिः पचानवतः १०० शत शततमः विशेष विवरण (१) एकसौ से अधिक संख्या में अविरुवा उत्तर शब्दो का प्रयोग होता है। यथा.- . १०१ एकाधिकं शतं अथवा एकाधिकणतं । एकोत्तरं शतं अथवा एकोत्तरशतं । (२) प्रकार अर्थ में सख्यावाचक शो के पश्चात् धा प्रत्यय क्षेता है । यथा.- विवा-विधा-अष्टधा-नया इत्यादि । (३) अनेकवार के प्रर्य मे शस् प्रात् श. प्रत्यय होता है । यधा:- बहुशः अल्पशः शतमः सहस्रशः लक्षगः कोटिशः। (४) विमति प्रादि दो से पूर्ण अर्थ में राम प्रत्यय होता है प्रथवा ति फालोप होजाता है। यथा- विशतितमः अथवा विशः। - ॥ इति ।। निवेदन अकरितास के प्रफ का सशोधन यथासभव सायधानी से किया गया

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Mysteries Of Figures

Author
Prasad,jaganath
Title
Mysteries Of Figures
File name
Mysteries Of Figures
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2011/01
Publisher
Jaganath Press Bilaspur Madhay Pradesh
Language
Sanskrit
Pages
166
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546645
Barcode
4990010025099.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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