Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Gyan Tarag

Das,banshiramatamaj · 2011/01

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12 FORE 2424 Labs R३, पिन BIKANER PAJPUTAAS. जिसको ज्ञानतरङ्ग॥ धाहजहाँपोरीय सरहीग्रामनिवासि कायस्थ वंशो- द्रव बख्शीरामात्मज मंगलदास ने अत्युत्तम तीन खण्डों में निर्मित किया जिसके प्रथम स्वगड अर्थात् ज्ञानतरंग मन बुद्धि के सम्बाद द्वारा प्रश्नोत्तर की रीतिले संसार और तज्जनित प- दार्थ के अनित्यत्व का वर्णन-दितीय खण्ड अर्थात् मगलविनोदमे सगुणपक्ष निर्वाण शिक्षाका सविस्तार वर्णन-तृतीयखण्ड अर्थात् सर्वसिद्धात सप्तशतिकामें प्रकृति पुरुपका सम्यक् विचार वेदांत ज्ञान उत्तम २ छन्दों में वर्णित है वही आर्यजनपूजित वैदिकमततत्पर श्रीमान् मुंशी 'नवलकिशोरने आर्यावर्तनिवासि ज्ञानाभिलाषियों के हितार्थे लखनऊ स्वकीय यन्त्रालय में मुद्रित करवाया जन सन् १८८९ ई०॥ दूसरीवार ३००० इस मत्तबे में जितने प्रकार के वेदान्त माया की पुस्तक छपी हैं उनमें से कुछ इसमें लिखीहैं । १ + -- +' । योगवाशियभाया "दोभागोमें जिसमें वशिष्ठजीनेरामचन्द्रजीमे वैराग्य,मुमुक्षु,उत्पत्ति स्थिति, उपशम,निर्वाणादि छ प्रकरणोंमें आत्मयोग ब्रह्मज्ञानलखाव 'सन्देह दूरकियाहै, औरयहपुस्तक आदिकवि बाल्मीकि जीकी बना हुई है कि उन्होने भरद्वाजसे उपदेश किया है संस्कृतमै श्लोकवद्ध में पर पहले जब यह भापाग्रन्थ हमको मिलाथा भाप इसको ठीक नर्थ सोकारखाने की तरफ से पण्डित प्यारेलालजीसे इसकी बोलियां सुध रवाकर. और उनके पुनः अवलोकनमे छायागया जिससे यहग्रन्थ प्रात्यात सुगम होगया, पारसभाग जिसमें वेदान्तमतानुसार काम, क्रोध, मद, लोभ, मोहाहकार के नाशकाउपाय औरदान व्रत करनेकेलाभोरप्रीति दया,सत्यासत्याचार ईपीदि वहुतमेदेसम्बन्धी कमीका निर्णय, इतिहास, कथा औरदृष्टांत युक्त हैं जो छापेखानेको अयोध्यानियासि युगलानन्यशरणवैकुण्ठवासी के पुस्तकालयसे उनके स्थानापन्न महात्मा जानकीवर शरणजीक द्वारा वडे परिश्रममे प्राप्त हुई अब म थोडीसी बातें इसपुस्तकके अन्तर्गत विपयोकी महात्माओंको चिलिये लिखते हैं साधनके कालकावर्णन, आत्ममताके अभ्य सका वर्णन, जीवकीमेना, जीयकास्वभाव, जीवकी पराधीनताका बर्णन, भगवत्को पहिचान,भगवत्की निर्लेपताकाकथन, तत्व और नक्षत्रोंकाव्याख्यान, मायाकाविस्तार, छलऔरउसकाखगडन, परलोककी पहिचान, मृत्यकाकथन, नीवकी अखडताका वर्णन, प्राणा चेतना,चैतन्यकलाको कथा, यममार्गकेकष्ट, नास्तिकोंके मतकाखण्डन भगवतकी प्रतीति,आचारधर्म, ज्ञानदेने, दानयतकरने, पाठकरने ध्यान लगाने,म्मरणकरने, साधुमङ्गति, एकान्तमे भजन करनेकावर्णन,कठो वचनकेल्यागनेकाकथन, कामबासना औरइच्छाकत्यागकरनेकेशुभरणा अधिक बोलने के विघ्न, क्रोध,ई,मायाकी प्रीति, तृष्णा, कृपणता ,

।
माम
शथ ज्ञानारंग
सो० ॥ शीतनाथकीवाल तासुतनयघिरचन्द्रधर । बाधवता-
रककाल तिहुँपुरपूज्यसुविनहर ॥ बन्दत तवपढयूरि करो, कृपा
वारणमदन । उपजैवानंदभूरि देहुसुगति हरिकुमतितन ॥दो० ॥
हैअरवगड प्रविनाथजो पुरुषपुरातनईश । वेददेव मानसउरग
ध्यावत जाहिमुनीथ ॥१०॥ वेदचारि सबजगजानै । ऋगायजु
'साम अथर्व वरखानै ॥ जोऋगवेद लोऔरवताचे । यजुर्वेद कुछ
पोरसुनावै ॥ सामवेदकी अकथकहानी । समुझहिंचतुर न जाइ
वखानी॥ कहैअथर्वण श्वानप्रकारा । एकब्रह्मकृत चारिविचारा॥
दो०॥ नारौध्यावत एकही वरणतगुणगंभीर । जहिमारग संचु-
• पावज्यहि गहेसुमारगधीर ॥चौ०॥ नहिंआश्चर्य विबुधमनलावै ।
चारोमारग सत्यवतावे ॥उपयतपेश्वरादि संन्यासी। वैष्णवमु-
- डिया औरउवाती ॥ निजमति सरिसताहि सवगावै । कोङातामु
पार नहिपावै ॥ देवसुरेश गादि बुधिमाना । गाव हिंजासु प्रताप
प्रमाना ।। पतहतयुग रसनाजाही । वरणतजाहि नअन्तक,
'हाही ॥व्यातनादि मानन,तनुधारी । विविधभाति जिनेकधा
पसारी ॥ तिनहुनभेदपाव ज्यहिकेग। तपकीन्होसहिदंडघनेरा।
निशिचरत्रादि महावलवाना । यवनापिक जे अधिक सजाना ॥
जिनकी संज्ञा असुरन माहीं । वेदपन्यढोत्तते नाही"
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२ ज्ञानतरंग। । भांति तिनखोजलगायो । जाकरकतहु खोजनहिं पायो । अपरौ चतुर जगत बहुतेरे । यत्तनकिये ज्यहिहेतु घनेरे॥ पाव न जासु, खोज कहुंभांती । जासुनाम हरजप दिनराती॥दो०॥ जोपरमा- तम एकरस व्यापक जलयल माहि । अजयचनीह अमानज्यहि दैतभाव कछुनाहि ॥ तासुचरण बन्दोलमुद देहुसुमति करतार । नथैलकलयच कालिमा वाढ़ेबुद्धिबिचार॥चौ०॥ पुनिवंदौअजच- रण गुणाकर । कुमतितिमिरकह ज्ञानदिवाकर ॥ ज्यहिवहुभाति सृष्टिउपजाई । अतिश्रमरि रचिरुविर बनाई ॥ लेवतजालु कमल पट बानी । करतजो अज्ञानी कहानी ॥ सचराचरसम- स्ततनुधारी । रचेकमलभवसकल विचारी ॥ तामुपदारविंदशिर नाऊँ । हरेकुमति निर्मल बुधिपाऊँ।। पुनिप्रणवों गरुडारान स्वा- मी ॥ कृपाउदधि र अन्तर्यामी ॥ सदादान निजरक्षा करई। सुखद सदैव दुःयवहु हरई । जबजब असुर अनीति प्रचारें। धर्म क्रियाकर मूल उखारे ॥ निन्, वेढ विक्ष मखत्राधा । दुष्ट बनेक लगावै वाधा ॥ तबतब मनुजरूप करि धारा । मारिखलन पुनि धर्म प्रचारा ।। लक्ष्मीजासु चरणनित सेवै। महा अनद वदिपक लेवे ॥थावर जंगम जीवघनेरे। रक्षकरमानाथ सवकरे ॥दो० ॥ 'ताकारणमायापते विष्णु पुरातनरूप । बन्दौं पावसरोज तुव दे बुधि तिहुंपुर भूप ॥ चौ० ॥ पुनिवन्दौं शंकर सुखकारी । चन्द्र- 'भालजो उमाविहारी॥ भोलानाथ कृपागवकीजै । हरिदुखकुम- ति सुःश्यबुधि दीजै ।। फिरिविनवों शारदा भवानी। कुमतिनाश निर्मलकरा वानी॥ जाहिप्रसन्न गिरातू होई । यश भाजन जगमें भोलोई ॥दो०॥ इटदेवमम कीशपति महाबीर सुखदाया। हरौ विनदुख दालके सुमति देहु कपिराय ॥ लहो विभीपण राजभल अरु सुग्रीव कपीश तवदाया दायानिधे महावीर ममम ॥ चौ० ॥ वन्दी गुरू पिता अरु माता । ज्ञान सुमति अरु जन्मके दाता ।। मित्रादिजेममहितकारी। प्रणवांतिनकेचरणविचारी ।। कोविद भसर जेजगमाही। जिनकपत्र मित्रकोउनाहीं ॥ तिन, , -- . । ज्ञानतरंग। के चरणकमलं धरि धाता। निर्णयकरौं मनोहर ज्ञाना॥दो०॥ वर्तमान अरु भूतकवि होनहार जेकोय । प्रणवासबके पदपद्रुम कृपाकरौं अब सोर ॥ चौ० ॥ दुष्ट प्रकृति जिनको जगमाही। परभल जेनहि देखि सकाहीं ॥ और के यशहि जे दोष लगाँव 'झिा धर्मकथा पहँ भूलि न जीवहि ॥ जो.चोरी अपकारीपावहिं।- तौ निज देवहि अजा चढ़ावहिं॥ यहि प्रकार औरौ खलकेते। वर्णन करौं कहां लगि तेते ॥ वन्दौं ते सब निज हित लागी। होहुप्रनन राकल छल त्यागी। निजे कर्त्तव,ममहेतु बिसारी। देहु अगीपं मनोरथकारी ॥ विधि निर्माण सृष्टि जताई। प्रण- वो सबहि सुप्रेम बढ़ाई ॥ मोहिं प्रान्न चराचर होहू । आशिष देहु मुखद करि छोहू ॥ वो ॥ पुनि अब बन्दौं शारदा जो सुधि बुधिदातार । सदा सहायक होहु अब बरणौग्रन्थ विचार ॥ चौ०॥ " सक्त विक्रम करौ विधारा । हुनुमत पिता शत्रु पतितारा ॥ नि- रॉकार गामी महिधारौ ॥ अब शाकः कहँ अग्रबिचारौ । रावण पुि अरुदति समेता । अरय धरायुतं कवि गनिलेता माधव " अक्षयातीज पथिवाराातादिन ग्रन्थलीन अवतारा ।। अबहीनाम कहौं शुभ याको । कविजन अर्थ विचारौ ताको । चाहत जाहि 'सुभग योगीजन । प्रथमहि ताहि लिखो स्थिरमन ॥ तापाछेलै उदाधि हिलोरा। सुन्दर सुखद नाम कविजोरा । राज्य सुभग गौरद बिगजे। नीति सहित परजा सुखराजै ॥ दो० ॥ अवधरि ध्यान प्रवीणजन सुने। पुरातन ज्ञान । मनको बुद्धि प्रबोधजिमि मनमानी प्रमान ॥ एक समय मन बुद्धिद्वउ भयउ एकढिग धाय । मन पूछ तव बुद्धिसो कहुतू मोहिबुझाय ।। (मनउवाच.) चौ० । कबुधि करते ईश्वर भयऊ । कवते- सकल सृष्टि निर्म- यऊ । ब्रह्मा विष्णु सुशंकरजोई । की ईश्वर कहियतहैं सोई॥ (बुद्विरुवाच ) सुनमन ईश्वरकीन प्रमाणा । यापहिः प्रापभयो निर्माण । भेटकाहु पायोनहिं वाको। रूपरेखकहुगेह न ताको। अजय निरंजन गुण अपारा अंगजग दुहूवातते न्यारा । नहि - . .. । ज्ञानतरंग मानसानहि. पशु नहिं देवा । नहीं भुजंग करिय ज्यहि सेवा ।। व्यापक सकल सृष्टिमहँ ऐसे । शोणित सब. शरीर मह जैसे ॥ सबके गुण अवगुणसो देखै । पाप पुख्यकी ल्यखनी लेखे। पापी- नहिं धर्मातम सोई। चाहता लौन तुरतसो होई ॥ जोतुम ब्रह्मा विष्ण वखाने । शंकर कहें ईश्वर करिजाने ।। तेपरमातम पद - धिकारी । सो निर्णय सबकहब अगारी ॥ अव सुन, ज्यविधि सोयेभयऊ । जौनी विधि, ईश्वरपद लयऊ । अरु ज्यहिभांति सृष्टिनिर्माणा । करिचौरासीयोनि प्रमाणा ॥ जवनधरा ब्रह्माण्ड पत्तारासित रज तम गुख कोउ न प्रचारा ॥ ब्रह्मा विष्णु महे- श्वर नाहीं। गणपति फणपति कोउ न तहांही ॥ अग्नि घायु जलदेव न नागा। वेद ग्रंथ कोउ नहि धनुरागा ॥ नहिं मानस नहिंसर्प कराला । जीवजतु नहिंकाक मराला ॥ दो० ॥ विद्या चौदह तबनही नहिं हनुमत न सुरेश । नहिं नारद यारद चतुर नहींभये अनुरेशः ॥ चौ० ॥ वरुणकुबेर न तब यमराजा। जाति धौनहिं एकौसोजा तपीजपी नहि मुनि संन्यासी । उदय न चन्द्र सूर-सुखरासी ।। सकल पसार, तिहूंपुर जोई । तब न कळू जाना मनसोई -इन्द्रीआदि ज्ञान विज्ञाना । मोहक्रोध कछु नाहिं बरखाना ॥ तब निज एक चराचर साई। निराकार महूँ, बैठगुसाई ॥ स्वइ परब्रह्म वेद, जो गावै। बार बार ज्यहि शम्भु मनावै ॥ इच्छा कुच्छ ताके जो आईसोमायो यह.सागत कहा- ई। फिरिके सुखद शब्दयकबोला । ठोंकार यहमन्त्रनमोला ॥ दो ताते ब्रह्मा विष्णु अरु उपजे शुभत्रिपुरारि । निराकार मह वासलिया तीतोंजन सुखकारि ॥ चौ० ॥मायावहु विचा- -रिकरिहारी। तावश भयो न एक मुरारी॥ तब उौंकार वेदलै श्राई । तिन क] दै यहिविधि समुझाई । कह्यो सृष्टिकी रचना करहू। आज्ञावेद शीशंपर घरहू ॥ ब्रह्महि कीन्ह बनावनहारा। शंकरसघिरन्तक, पदधारा विष्णु महा ज्ञानी. गुणरासी। प्रतिपालका भो , रमाविलासी । पांच तत्त्वकारि सृष्टिउपाई।

-- ज्ञानतरंग। ५ बिबिध भाति कीन्हीनिपुणाईला तब गुण दिय वेद बताई। ब्रह्मा रजगुण लीन्हसिधाई ॥ तमगुण शिव किय अंगीकारा। सतगुण हरि तनु कीन्हप्रचारा ॥डो॥ यहि विधि तिहुगुण तिहुँ पुरुप एक एक.महँ लीन । ब्रह्मपुरी महँ बैठि पुनि विश्व रचन चित दीन (मनउवाच )॥चौ० ॥ जो तुम कहो वह्मपुरनामा जहा बिरचि कीन्ह निजधामा ॥ का सोयुरी रहे विधि आगे। बैठि जहाँ निज कारजालागे (बुद्धिरुवोच) प्रथम ब्रह्मपुर-लीन बनाई। तापाछे,पुनि सृष्टिउपाई वरुण कुवेरा इन्द्र यामराजा। अग्नि वायु शशि सूर समाजाला धरा पंताल स्वर्ग इत्यादी । रचे देव अरु दैत्यविमादी॥ मनुज उरगपशु खग.सुबनाये । वेदधर्म कहि सकल बुझाय?॥ जाकहँ लोन ठोमाविधि दयऊ । तहाँ सुशोभित सो पुनि भयऊ ॥ यहि विधि सृष्टि सकल उपजाई । बहुत भांति करि विधि निपुणाई (मनउवाच) दो० प्रथम कहा तुम कहाँपुनि विष्णु भयो निमिईश । सो अब मोहिं विचा- रि,कहु नावों तव पद शीश ('बुद्धिरुवाचा सामवेद यहकहतहै तीनिवातको ज्ञान । तत्त्व मसीये तीनि पदजानत कोडसुजान।। चौ ० ॥ तत्पद ईश महा सुखकारी।जीवभयोत्वंपद अधिकारी। असिपद ब्रह्मजो प्रथम बरखानात निर्गुण निराकार भगवाना। ज़ाहिजपहि हरि हरा विधि वेवा । निशिदिन जासु करे अति सेवा ॥ सवमें लिप्त सवनेते दूरी । सयुजीवनकर जीवनमरी ॥ दौठ॥ ये तीतो पुनिएकहें भेट नहींहै नेक । जिमि छायो द्रुम जगतमे कोकरि सके.विवेक ॥चौ०॥भयोपरन्तु मेदयहि तेरे । भापेकविन,सो लखेवनेरे॥ हरिमाया ज्यहिजगत नचायो काहू जीव जोतिनहिं पायो । भे मायावश विपय विलासी । तमगुग्य गहे भये दुखरासीमा यापुहिभूलि मया लपिटाने । मोह आदि जिनदेह समाने "सुनुमनते समजीव खाने की क्रिया कर्म । नहिं जाने ॥ज्यहि मायानिज बशफरि लीन्ही । विविध भाति भिप जीवहिदीन्ही । तमरसत्यागि गहोगुण साँचा । विपयाराग || ।

1 - ६० . ज्ञानतरंग। मन.जा न राँचौ ॥ कामक्रोध मोहादिक बांधे । अापनपद निज करतल सांधे ॥ सो सच्चिदानन्द गुणरासी। तत्पद-कहीं सो रमा बिलासी । यहिबिधि विष्णुई श पदपायो। ज्यहियाथ वेदपुराणन गायो । स्वइ अवतार सृष्टिम धरई । विविध भांति लीला सो करई॥ जब बहुपाप-धरा यतिलेई । सकेन भार पाप लोखेर्ड-।। तब नारायणे पास पुकारै । विविध भांति अस्तुति अनुसारै ।। टेरिसनि रमाविहारी,धरैमनुज तन जनदुख हारी ॥ ज्य- हि विपरीत वेदतेपावे. ताकहँ हति.यमलोक पठावे॥ देइँबताइ सुपंथ जीवकहँ । बहुज्ञानी गुणवानि जगतमह दो०॥ अब सुनु असिपद ब्रह्मको निर्णयमन चितलाय । जाहिसुने संदेहतुव बि- विध भांतिबहिजाय ॥ असिपद पूरणब्रह्म है निराकार"जुनिरहे । व्यापक सवजगमे रहै सत्येजानु मनयेह ॥ चौ। जीवईश दूनों मह व्यापै। ज्यहि बहुभांति सुवेदं प्रलापै ॥ ईशजीवजो'समकहि दीजैतो बडदीप शीशपरे लीजै। तत्पदमना सिन्धु परमाना। विदु समानःजीव अनुमाना । असि पद मनेो नीर बुधिमाना। दोनोंमाझ नमान समाना । अथवा तत्पदज्यों नरभूपा। त्वंपद है किसानकोरूपा ॥मानस अतिपद कहतसुजाना। यहि विधिती- नोपद परमाना॥ निजातमं खोजैजो भाई । सोनिरगुण पद महॅठहराई ।। श्रद्धा सहित विष्णु लवलावै । सोई सेर्गुण पथ कहावै ॥दो०॥दूनोंपंथ पुनीतअति भक्तिमुक्ति दातार । अब.जो मनसंदेह कछरुहुलो,कहौविचार (मनउवाच अधिक भयो संदेहम्वहि अंबतुर्नु बुधि मनलायः। फिरि विस्तार बताइये सब यंका मिटिजाया। भापोखबमें एकरमापारब्रह्मभगवान देत- भाव वाके नही सो मानी परमानः। अब कह रूपस्थूलते ईश धरेहैजोय। कैसेवाकी देहमे तिहुँपुर वर्तनहोयगा (बुद्धिरुवाचा) सुनुतोतों अवकहीं बुझाई । जिमिसस्थूल रूपकृत साई ॥.शीश तासुअाकाश विराजै। पवन श्वासमहँ शोभासाजैासिरज चंद्र नयन उजियारा । कालरूप ध्रुवेवकापसारामा पलकचालिनिशि M - ज्ञानतरंग। योस कहावै । अग्नि तानुमुख शोभापावै ।। मांसहिधरारुधिरजल धाग । पर्वत अस्थि वनस्पति वारा, ॥ चरण पताल हृदय कर- तारा । हेभुज हरिहररुप सम्हारा ॥मकललोफता उदरसमाने। माला मेप्रमुकता जाने । अलरव अरुप अनादि कृपाला । धरे विराट रूपकृत ख्याला ॥दोहोय विधाता भापुस्खइ रचै सृष्टि पंहुभांति । थावर जंगमजीव-जेन्बहुविधि नानाजाति । बहुरि त्रापुर रमापति रक्षत सबको धाय । शंकरसिंहारकृत सो प्रभु त्रिभुवनराय॥ (मनउवाच ) याविधि धरकेरूपको करतख्याल "बहुआहि । यहमोको समुझायकहु कवत्यागतहैं ताहि ॥ (बुद्धि- रुवाच ) च ॥ भलिपूछसितै वातविचारी । यह बात कह। निरधारी ।। विरलैसुनुतनि दुविधाजीकै । जसज़ानोंतसकहाँभली कै ॥ जाहि विरचि कहतःकवि ज्ञानी । तानु आयुपर घटितक- हानी ॥,आयुर्वीय वर्ष शतकेरी] पाई" विधि काली न घनेरी ।। मतयुग प्रेताद्वापर जाना । कलियुग राहित प्रमाण वरखाना स- वह लख बनुविण हजारा । कृतयुग की परमाण विचारा ॥ नहें चहुं चरण धर्मके राजै । सुखद चारि अवतार विराने ॥ सहलछा- निवे द्वादश लाखा प्रेतायुग-परमाणसुभारखा। तीनिपादशुभधर्म समेता अवतार धरे हरिप्रेता ।। चौमाठि सहस लक्षवसु जा- हीं। द्वापरयुग येवर्य सिराही | दिपट धर्म तहँ वेदवताय । दै स्वरूपहरि धरे सुहाये ॥पत्तिस सहस'लारखपुनि चारी । कलियुग की परमाण विचारी॥धर्म चरणतह एक कहोई । एकवार व-- सारसुहोई ।। जामह नरयुवतीहें जोई । मारग वेद चलत कोइ कोई ॥रहै नलीक धर्मकीभाई,महादुखित नरनारि तहाई ॥ निजनिज धर्म सबै परित्यागे पाय धर्मके मारग लागे॥दो०॥ तितालिमलव सहस, नखं वर्धे नवचलिजाय । एकचतुर्युग होत । 'तब कहत सफल फशिराय ॥ चो० ॥ जाय हजार.चतुर्युग बीती। होम ब्रह्म दिन तव नीती । कल्पकहत विधिक दिन काहीं।। चौदह इंद्रमरे ज्यहिमाही दिवस प्रमाण कही है जेती बरण- । .

ज्ञानतरंग। त विबुध निशा पुनितेती॥ दिनभरिजोविधि सृष्टिबनावै। निगा समय, मायामह जावै ॥ जाक: प्रलय कहत कविज्ञानी ।। सो व्रह्माको रैनि घरवानी ॥ जादिन जन्म बिधातालेई । श्राज्ञा वेद ताहि दिनदेड ॥वाही दिनते जगउपजावै। विविधप्रकार सजीव बनावै ॥ पुनि जब अन्त होड विधिकेरा । तबहीं महाप्रलयकी बेरा ॥ तब न धरा इत्यादिक रहई । यहविधि सत्य सत्य श्रुति फहई । निगा दिवरा ब्रह्माको जोई । बहे जात तामें सवकोई ॥ दिवस जन्म निशिकालकलेवा । क्यहि विधिपारजायभवखेवा ॥ मानस कहो करकाभाई । आयुर्याय नेकतीपाई दो० ॥ विधिके उपबतहीं धरत तनविराट भगवान । तासु मरतही तजत त्यहि तेनिज जिया अनुमान ॥ (मनउवाच ) उतपति स्थिति नागलो. जगको वर्णनकीन । सोसमुझो भलिभांतिहीं रही न शंकापीनः ।। अनपरतु:समुझाय कहु मानस तनुको मेव । कौन तत्त्व करि सो वनो यह मेटै अहमेवः॥ (बुद्धिरुवाच) व्योम वायुः अरु यन्नि जलवीयुत पांच। इन तत्त्वनकरि तनु बन्यो बरणतबुधजन सांच पांच तत्त्वये जोकहे पांचतत्त्व गुणऔर शब्दस्परशरुरूप रस गन्धिकहत कविसौर ॥ चौ.०॥ नासानयन जीभ त्वकजानी॥ अतिसह, इन्द्रिय ज्ञान वखानी॥ गुदा लिंग कर पद मुखजोई। इंद्रिय पांव फर्मकी सोई प्राणश्नपानन्यानसमाना। और उदान मनो बुधि साना ॥ पांचतत्त्व मूक्षम तनुपाई। सत्रह थूल प्रकट ये भाई ॥ इनरि सब देहिनको शोभा । इनही ते नर तनु सुखदोभा ॥ इनकरिफाप सुकृततरकरई । इनारक्रिया कर्म अतुप्सराई। इनतेस्वर्गतरक्रपय धावै । इनकरि हरिपुरशोभा पावे।।।इनहीते ससार पसारो। पांच तत्त्व येप्रकेट निहारो। ((मनउवाच.) दो ॥ पांचतत्त्वरि जोभये सत्रह सूक्षमनाउ । फोनकहातेकासोगुणयहमोको तमुझाउ ॥ ( बुद्धिरुवाच चौ०॥ पायीकान व्योमतभाई एक कहै दूजे सुनिपाई ॥ त्वचा हस्त कै प्रकृति समीग दोउस्परपहिजानत धीरा ॥ नयनचरणइद्री, . . - ६. ज्ञानंतरंग। देजोई। प्रकटीअग्नितत्त्वतेतोई । नयनच, ज्यहिरूपहिदेखा। पाततहा पहुंचाव विशेखा ॥ लिगजीभ जलते बुधभाषै । दोऊ • इस विलास अभिलापै॥ गुदानाक पृथ्वी अनुमान । गन्धि करे यक दूजी जाने ॥ प्राण अपान समान बरखानो । व्यान उदान पांच ये जानो ॥ पाचठौर ते गुण पुनिपांचा । एकैपवन अंश यह सांचा ॥ दो० ॥धरातोयवाताग्निमिलि व्योमतत्त्वयेपाच ! पांचो के शुभ अशकरि मनबुधि उपजेसांच ॥ जेती इन्द्रो देहकी भोग करेकहुँकोय। स्वादनजानै तासुको मनबुधि जानेसोय ॥ मनहूँते पुनि चतुर जन बुद्धि महातिरदार । होइ सुमति जादेहमें करें ताहि भवपार ॥ ( मनउवाच) यह सूक्षम इन्द्रीनको वरवान किय जौन । धूलभई जाभांति सों वर्णनकीजै तीन (बुद्धिरू- वाच) चौ० ॥ पाचतत्त्व ऊपर जे गाये । तिनहीं ते तन धूल घनाये। एकएकके करिकरि पांवा । रचेपचीस भणतबुधसाचा॥ सोयहपचीकरणकहावै । भगवतगीताभलिकारिगावै॥ अस्थित्वचा रोमानसमासा । धरातत्त्वते करतमालास्वेदगोणपितलारकरे- ता। तत्त्वोदकरुषिपंचकहेता॥क्षुधातृयामुख कांतिकहावै । नींद और आलसबुध गावै ॥ इनकोउपपति तिखितेभावी । विदित करीकुछ गुप्तनराखी ॥ धाइकूदिचलि कुरिकरिबोई । चौर पसा- रनि पौनकहोई॥दो० ॥ भीध कठ हिय उदरकटि व्योम तत्व करि होइ' । यह समुझो पचीकरण कही पचीसौ जोइ ॥ कही पचीसो प्रकृति ये थूल जीव तन माहि ।सुनुतिनको पुनि भेद कछु जो तू जानत नाहि ॥ चौ०॥ यद्यपि पाच पांचफरि गाई तदपि कही जो ज्यहि अपनाई॥.चस्थि मुख्य पृथ्वीपल नीरा। अग्नि नाटिका त्वचा समीरा । रोम ब्योम जल रेत विचारी। 'पित तेज अरु स्वेद वियारीः ॥ रुधिर मही अरु लार अकासा । क्षुधा तेज पुनि पौन पियासा॥ सुखमा जल अरु चालनधरनी। नीट अकाग अंमतेबरनी ॥ धावनिवायु पसारनिनाका ।कूयनि लिरिव गावत कविबाका इला तक्रोच चलनि जलजानो। शिरा । -- १० ज्ञानतरंग। नभ स्वण्ड वायुपहिचानो ॥ हियसिखि उदर नोंदकटि घरनी जोज्यहि तत्त्व मिली सोबरनी ॥दो०॥ अस्तिरेत अरु भूख पुनि धावनि शिरये पांच हलानीर निखि पवन नभ क्रमते खालिस साच । याविधि थूल शरीरधरि जीवकरत बहुभोग । दुखसुख नरकरु स्वर्ग पुनि पावतरोग निरोग ॥ इनहींतेकरितुकृतनरमैटि देततन पाप । पारवलईश्वर भजत देखत प्रकटप्रताप ॥ सूक्षम धूल शरीरही कहे तोहि समुझाय । अबजोपूँछ सोकहौं श्रीहरि पद शिर नाय ॥ (मनउवाच) प्रथमकहे तुम तीनिगुण सत रज तमयेनाम । परख कहा जाविधिलहैं नरतनमे विश्राम (बुद्धि रुवाच ) चौ० ॥ सकलवस्तुकरहोवैज्ञाना । अतिसुशीलबहुभाति सुजाना ॥ निर्मल बुद्धिभजै भगवाना । मोहादिक जातननसमा ना ॥ मायाजाहि नसकै भ्रमाई । स्वई सतोगुण जानिय भाई। ज्ञानहोइ निर्मलतन जासू । सवविधि बिद्या विनयप्रकासू ॥लो भसहित पुनिसब व्योहारा ।सोरजगुण बुधकरतविचारा ॥ आपु. हिभूलि ईशविसरायो । कामादिक मदतें बौगयो । अयाचित महा कटुवानी । ज्ञानविवेक बातमहिनानी ॥ मायामोहलोभकै बाधा । रामभजनलगि कांधनकाधा ॥ अपरौदोप अधिक तनदे- खौ ताहितमोगुण चितमह लेखौ॥जो सतगुणको मारगगहई। चन्तसमय हरिपुरसोलहई॥रजगुणहूंकी यहगतिभाई। दृढ़मति रहै तौस्वर्गहिजाई॥तमतेकेवल नरकबसेरा। अपित वर्पलहुनहि निरबेरादो०॥निजबातम चीन्ह्योनहो रहोमोह आधीन । महा कृतनी जानियम डारिनिरै मनदीन (मनउवाच) मोहिभई शंका सुनत जीवनरको वास। प्रथमभन्यो तुमब्रह्मलव अवकातनरक निवास(बुद्धिरुवाच) चौ०॥श्रादिअन्त यत्रकहीं कहानी। करणी तुमली जो पहिचानी । मिति त्रियपुरुप अमादहुकेरा । उपजत सुतसुखदाय घनेरा ।। त्रियशरीर महँ मलजो रहई । अतिअप- वित्र वेब बुधकहई । पूरुषतन करकाम अधोरा । विधि सँयोग तियनर करजोरा ।। मिलि नरमल तियमल जमिगपऊ। हरि , । ज्ञांनतरंगों इच्श निर्मिततन भयऊ ॥ उदग्टेदय भुजकट धनायो । मुख 'नाग्निका नयन भुजभायो । गीथ सुडौलरच्यो जगनाथा। गुदा लिग इत्यादिक साथा ।। कीन्ह सजीव प्रभा निजडारी। नाटक विद्याकरि असुरारी॥दो० ॥वाधिअधोमुख दयीत्यहि नहिंपायो शवकास । निजसेवा यहखेलहित करिहरि चित्तहुलास॥ चौ०॥ श्रयमुख बंधे विकलभो जीवा । सघशरीर लिपटो मलपीवा। अतिदुर्गघि अन्नपच केरी। विह्वल प्राणन सकति निवेरी ॥ भक्ष मातुकटु जादिन काहू । उठीउदर ज्वाला तनदाहू ॥ जठरानल अतिकठिन बखानी । जावश विकलहोत सबप्रानी ॥ परवथ परोन मारगकोई। निजमन कृत विचारभो सोई ॥ विदित बात यहसवजग अहई । दंडपरे नरहरि हरि कहई ॥ नहिंरक्षक कउ गर्भवतेरे । सूझेपाप जन्म बहुकेरे ॥ कहै प्रथम जो पातक कीन्हा । ताकारण श्रीहरि दुखदीन्हा।। दो०॥ अवनारायण कृपा करियहिदुखते निरवारु । त्यागि सर्व भवकामना करिके ज्ञान विचारु । करिहौंसब जपयोग अरुभक्ति कृपानिधि तोरि । सत्य सत्य यहसत्य प्रभु करुरक्षा अबमोरि ॥ सुनिनिवन्ध दायानिधे प्रभुमानी परमान । तारक्षाहित आपुहीआये श्रीभगवान ॥चौ०॥ शीत उष्ण माता जोखावै । प्रभु निजकरसों ताहि परावै॥जो कछुकष्ट जीवकहँ होई । नाशैसकल कृपानिधि सोई ॥ रूपचतु- भुज धरे खरारी । सन्मुख तासुर, सुखकारी ॥ जस जननी पालै निजबाला । तसजीवहि रक्षक गोपाला ॥ देखाचहै भजन यहु करिहै । भक्तिहेतु जगसुख परिहरिहै ।। जयते ईश भयो रखवारा। तबते तन न.कलेश प्रचारा ॥गर्भदिवस यहि विधि चलिगयऊ । जन्मलेनकर अवसर भयऊ । व्यथित शरीरगई सुधिभूली । पच्यमानतनभेजिमिाली॥ दो०॥ मुर्शितभी क्षण- मात्रतव जन्मलेतकी धार । चेतसमय चहुंदिगनहीं देखा निज रखवार ।। अतिअधीरकै जीवतब कीन्हो कठिन-बिलाप । फहां कहां यहसन्दज्यों करैलाग निजजापाचौ०॥ धाइयाइ असनान N १२. 'ज्ञानतरंग। कराई । कीन्हो खच्छ शरीरहिजाई ॥ जवलगि नहिं कीन्होपय पाना । तवलगि नहिंमलो भगवाना॥ क्षीरपान कीन्ह्यो ज्यहि घेरा। मोहराज तनकीन्ह बरोरा ।। विसरि निवन्धरही सुधि नाही । माया जवहिंगही हितबाहीं ॥ तेल फुलेल शरीर ल- गा। जननी हलरावे दुलरावें ॥ उघटितनहिं चौतनि शिरढा- रहिं । सुभग पलॅगपर लै पौढारहि ॥ यापु काजगृह लागैसोई। सोहत घालंशुद्धि तनखोई ॥ स्वेदज जीवकीट इत्यादी । काट- हिंतन दुखदाय बिषादी। दो० ॥ जब भारीर कीटनगयो रोयो पाल अधीर । वैनकहै समरथनहीं जोभा निजपीराचौ०॥ करे बिलाप सुनैतहिं कोई । टुखद कोटलागे ततसोई ॥ कतहुमातु सुनिपाव जोवानी । लियोउठायहरो दुखानी॥क्षुधावंत याकुल तनभयऊ । मातु सदनकारज चितव्यऊ ॥ सूझत इतउत्त नयन पसारा । वैअधीर तबरोयपुकारा ।। सुनि सुतरुदनमातुचलिाई । सुरखी कीन्हपयपान कराई ॥ कुछ दिनवादि चले निजपायन । मातुपिताक: अतितुरख दायन ॥ जहॅतहॅ खेलनमह चितदयऊ। रूपाक्षुधा भूलत भयऊ। नहिंभावत गृहखेल बिसारी। फिरैसंग बालक वैचारी ॥दो०॥मातुपिता दिनशोधिकै गुरुपहॅ दीन्ह पठाः य । पढेलाग विद्यातहां नैकनैक चितलाय ॥चौ०॥जो उत्तमकुल भी अवतारा। तो विद्यागुण-कीन्ह विचारा ॥ जो नीचगृह ज- न्मत भयऊ । तो यहदमा खेलमहॅ गयऊ ॥ यहि विधि वालापन गावीती। नाकीन्ह्यक्ति जो प्रथम कहीती ॥ नर उपकार करत जोकोई । मानतसकल, जन्मभरिसोई ॥ महाकटते ईशवपायो। ताकहँ कतहुन शोधनवायो । तरुण अवस्था तनमहेंबाई, मैन व्यधाते तनतपाई ॥ ज्ञातबन्धु मिलिकीन्ह विवाहा । मनमल न्न तनवड उत्साहा.॥ बहुायाभरण सजेतनमाहीं । लरिषः निज रूपन धंगतमाहीं ॥दो० ॥ मनफूलो मारग चलतादेखत, अपनी छांहि । कहत महासुदरवने कोकहमसम नाहिं ॥चौ ॥ जो कुछ ज्ञान-चित्तमहायो । तो कारजमहँ जिय वहिलायो ॥ जोमूरुख ज्ञानतरंग।- १३ विद्यादिक हीना | कामविवश तो फिरै मलीना ताके परतिय लाजविसारे । धर्मकथाते चलहि नियारे॥ कहैजो कोउ यहकाज ननीका । तो सुनिवैन करें मुख फीका । जो कदाचि सम्पति विधि दयऊ । तौ फिरिअधिक गर्वउर छयऊ ॥ गालफुलाय चलें मगमाही । जनुतिहुँ पुरीभूपये जाहीं ॥ मित्रनहूसन मीठी वा- नौ। संपति मदन कहैअज्ञानी ॥ काहुइकहै न मधुरीवाता । श्र- हंकारवश उरन समाता ॥ दो० ॥ साधुसंतकहँ देखिकर करेहँसी तेमूढ़ । घाटिमुडायो मूडतुमलहोनअर्थअगूढ़॥ चौ०॥ज्यहि विधि जन्मदीन नरकेरा । त्यहिजग भोगरच्यो बहुतेरा ॥ तजिपाखण्ड फरौ जगभोगा। वे कारणयह सहोबियोगा। सुनतहि वचनसाधु मुसुकाही । जिनके क्रोधलोभ कछुनाहीं ॥ जोविधि जन्मरकगृह दयक । तौचिन्तावहुविधि तनछ्यऊ। प्रमदातनय सुताहितला- गी। फिरैजहां तह रंकअभागी ॥ करेकृपी अंथवा व्योपारा । पर सेवाकरि दिवस निवारा,॥ अथवा भिक्षाटन नितकरही। जग शुलिधूति उदरनिज भरहीं ॥ त्रिय सुत फॉसि मोह गलढारी । ' भजैन हरिपद भयोदुरखारी ॥दो० ॥ गई भूलिसवचतुरई चिन्ता अमितशरीर । मिलैनधन उरशातिनहिं जहँतह फिरैअधीर ॥ पेट खलाये जगफिरे त्रियातनय के हेत। हरिमाया अतिप्रवलज्यहि करयो सचेत अचेत ॥ प्रभुसों कियो निबंध जो भूलि गयो जड सोय । कहीजगतमहँ आइफिरि कसन दंडबुधहोय॥चौ ॥ भट- कतही घीती तरुणाई। जरादेह मधि तव नियराई ॥ तृष्णाधढ़ी धमलतन भयऊ । तब(नईश चरण मनदयऊ । अल्प दृष्टि पद दौर हरहीं। वैठिउठहि तव अतिवलकरही। इन्द्रीसफल भई घलहीना । कासादिकतनते भी क्षीना ॥ पौरुपविन उद्यमनहि होई। प्रिययाउक पूंश्त नहि कोई ।। क्रोधवढ़ो नहि घरणि ति- राही । कहैतीति त्यहिअति अलसाहीं ॥ बैठरहे जडरूप दुवारे। जातलिंकट कोउनाहिं पुकारे ॥,गयोबुढ़ाय:मिधिल तन भयऊ। ईश्वरचरण पित्तनहिं दसऊ॥दो ॥ पढ़ विकार जे देहमें बीती .

११ । ज्ञानतरंग। तिनमहँपांच । छठी बाइ नियराइ रहि तवन हरिपद यांच ॥ (मनउवाच ) पट विकार कालो कहत कहौ मोहि समुझाय । जिन्हेंजानिकै मानिभय हौंसुमिरौं सुरराय (बुद्धिरुवाच) नौ०॥ जन्म होत यह प्रथम विकारा । दूग्नर तनकर बढ़त विचारां ॥ तीसर बालअवस्था भाई। चौथीभणत विवध तरुणाई ॥ पंचम जरा अवस्था सोई । पष्ठम अन्तकाल जोहोई ॥ पट विकार ये कहीबखानी। तेतुम सत्यलेहु मनमानी ॥ इनमह पंचम बीते लागी । भयो न जीव ईश अनुरागी ॥ बीती जरा अन्त नियराना ।जग्नगति भई सो करौं वरवाना ॥ वायो कफ लाग्यो ग़लतोई । अन्न पानि कह रुचि नहि होई ॥ ऊरधश्वासचली तन माहीं । चन्द्रसूर सन्मुख कउनाहीं ॥ जहँ तह कफ उगिलहिं उपकाहीं। पडेरहैं जल अन्न न खाहीं॥ प्रमदा पुत्र सकल अन- खाहीं। कहैं ईश अवये मरिजाही ॥ यह घिनौनपन अवन म- हाई । हारिगये करिवैद्य उपाई ॥ कठिनकराल दशायह भाई ! धर्मन करो जो होइ सहाई । जस माखी मधु जोरि न खाई। छोनेकोल मनहि पशिताई ।। तिमिसंपदा जोरि गृहमाहीं । दई वराटिक हरिहित नाहीं ॥ प्रथमजीव ऐसो अघखानी । तासु पाप किमि कहीं वखानी॥ जन्म समस्त वृथा जड खोयो। सं- पतिहित सुरखनीद न सोयो । दो० ॥जोदश दोषनसों भरी देह जीव ज्यहिवासु । समनचार करिकोप त्यहि चहै छडावनासु ॥ मुदगर फासी हाथलै आये यमके चार । तिनके देखतही विवुध रहीन नेकसम्हार ॥ चौ. ॥ द्वैभयभीत तुरत मलमोचा। ता- हूसमय न हरिहित भोचा ॥ हनि मुदगरन डाल गल फॉसी कायोजीव दशौदिशि गासी ॥ त्रियातनय सेवक परिवारा । ख- डे सकलकृत शोच विचारा । नेकन वश काहूको चाला । यमदू- तन कीन्हो बेहाला ॥ मारिकूटि यमत्यहि लैगयऊ । संगी तासु कोउनहिं भयऊ । जिनहित सिगरो जन्मगँवाया। प्रियसुतकोउ कामनहिं श्राया ॥ यमपुर भयो न्याय जवाई | रश्वक धर्मन ।

ज्ञानतरंग।
१५
ठहरो भाई ॥ नहिं हरिभजन न परउपकारा। तीरथ बत नहिं
'नेक अवारा ॥ दो० ॥ सतसंगति इत्यादिजे उत्तम जगमें काज।
तेनेकहु पायेनही तबशोचे यमराज.॥ चौ० ॥ महा अपम यह
जीव चडारा । हरिहित नेकन कीन्ह विचारा ॥ कहा दण्ड दीजै
यहशाचै । ताअवनमुझि नैनजल भोवै ॥ फिरिहरि मायहि शीश
नवायो । भीमरूप निजदूत वुलायो । कही डारु यहि कुम्भी-
पाका । हनै चोच शिर खुलतै काका ॥ धरि भुजदूत डार तह
जाई ।जामधिपरे जीवनकुलाई ॥ अमकरणी कीन्हीजगमाही।
कहौजीव कसनरक न जाहीं॥ यहिविधिजीव नरकमहँ बासा।
रक्षक तासुन कर दशाता ॥ ब्रह्मक्राति यहजीव वरखानो।
निजकरणीते नरकहि सानो ॥ दो० ॥ वरणि समस्तकही सुही
जीवनरक बास । अब जोपूछ सोकहीं छूटै भवभय प्रात ॥
(मनउवाच ) कहे दोपदश प्रधमतुम सो म्वहिकहो बुझाइ ।
संशय तनको जाइमिटि ज्ञान अधिक सरसाइ ॥(बुद्धिरुवाच )
चौ० ॥ सुनुदश दौर सहित विस्तारा । योगीजन जो करत वि-
चारा ।। प्रथम भौचभापत बुधियाना। द्वितियेतनहि अशुधता
साना ॥ तृतियेतन दुर्गन्धि कहावै। चौथे बहुत खण्ड बुधगावै ॥
पंचम रोगग्रसे तनयेहा । पटमजरै कारवत देहा ॥ सप्तम मरै
देह सबजाने । अष्टम शिथिलहोय पहिचानै ॥ नवम वहुरिहोवै
यहजानो । दशम स्थूलरूप अनुमाने। ॥ अब जो अपर चहेतो
गाऊँ । निर्मलमति विज्ञान सुनाऊं ॥ येदशदीप बसे तनमाही।
चन्तसमय समस्त मिटिजाही ।। (मनउवाच ) दो० ॥ क्यहि
विधिछूटै नृरकते कहुतू मोहि बुझाइ । कासाधै यहिदेहमें जासों
हरिपुरजाइ ॥ (बुद्धिरुवाच ) जो पटउर्मी जीतई मिटै सकल
तनताप। होवै जीवनमुक्तनर देखै आपाआप ॥ (मनउवाच)
सो० ॥ पट उर्मीका आहि यहमोको समुझाइ कहु । फिरिही
नोतो ताहि मेटौतनकी तापसव ॥ (बुद्धिरुवाच ) चौ.॥
प्रधमकाम अतिविबुध कराला। जावश सबजगजीव विहाला ॥

ज्ञानतरंग। द्वितिये क्रोध पापकरखानी । विकलहोत जावन, लवप्रानी ॥ तृतिये लोभ सहादुखरासी । सकल जगत गलडाल स्वफांसी ॥ मोह चतुर्थ वृजन गृहजानो। नरकजीव तावश अनुमानी ॥ पंचम भानबसै तनमाही। हरिचरित्र व्यहि कुछ न सुहीही॥ पष्ठमतन अपमान कहोई । ज्यहिते जीव हि अति दुखहोई ॥ ये पटउर्मीमंतवरखाने । समुझहि चतुर जेज्ञानहिजान । जीवन- मुक्तहोड इनजीते । नरक जाइ इनके हितहोते॥ (मनउचाच) दोहा ।। मोहादिक जे तुमको व्यापत सबकीदेह ; का उतपति किमि जीतिये क्रहिये सहित सनेह ॥ (बुद्धिरुवाच)॥ चौ० ।। सुनुउतपति इनकीचितलाई । सबैप्रसंग तुहिकहौं वुझाई ।। देश परीर बलैमन भूपा । तासुत्रिया हैमहा स्वरूपा ॥ एकप्रवृत्ति दु- भेगा नारी। द्वितिय निवृत्ति महासुखकारी ॥ मोहलोभ अरुक्रोध कराला । काम कुभोग दुष्टतबकाला ॥ अहंकार मिथ्या द्विजदो- पा हिंसा दम्भादिसहरीपा । पुनि अविवेककहो.पारखण्डा-। तृष्णा दुःयीलता प्रचडा ॥ मान अलज्जा आदिकजोई । भयेप्र- वृत्ति जातसव सोई॥ ज्ञान विवेकाचार विचारा । दान धर्म वै- पाग्य सम्हारा ॥ दो० ॥ शांति दया अरु शीलता समसंतोप अ- लोभ । लज्जा क्षमासु चातुरी मनजानिये अक्षोभ ॥तो०॥प्रणय न्याय अरु योगसुख इत्यादिक बसेतन, । निवृत्ति जातये लोग समुझतज्ञानी योगिजन ॥ (मनउवाच ) दो० ॥ माता यक पिताते भयेप्रकटयेतर्व । चैरभयो कारणकहा मेटौ समयरवर्व ॥ (बुद्धिरुवाच ) चौ० ॥ विदितवात यहसवजग अहई । वैर विमातनमे कुचरहई । और अधिक याते यहकारण ! चहै विवेक जीवकह तारण । मोह वहै निजपितु सुखदीन्हा । ताते वैरभाव उनलीन्हा ।। जो विवेकको पकरै धारणा । सोवै श्रीहरिके च- रणाचलमोह मारगजोभाई। धर्मरहित नरकहि चलिजाई॥ जे पडितजन जगतसयाने ते विवेककेमारगसाने ॥ अंतसमय पावै सोई पद । जो ऋपिराज वेद आराम घद ॥ चले मोहवशः .

१७ -- 'झानतरंगो सूरखजोई । अवशिहोहि नरकागमितोई ॥ दो० ॥ पिरवितकार सजि दुर्मतिहि सुनु विवेक की जीति । यहि विधि हात्यो मोह वल भाग्याह भयभीति ॥ चौ० ॥ पूरवं कहाँ बैरकर हेता । अरु उत्पत्ति सुप्रेम समेताना अब सुनु कथा रमाल सोहावनि । बि- मानिन काँ यति मनभावनि ॥ गही जीव जब पंथ विवेका। हारिहि मिलन हित टेक्यसि टेका त्याग्यरित सकलविषयपरि- वारा । ज्ञान धर्मकर कीन्ह पसारा ॥-तबहीं शौच मोह मन ठयऊ । काम कोधकह-बोलत भयऊ । श्रूंपारखंड शोक सता. पा लोभादिकजिन वषिर्क प्रतापासवसनमिलि यहसम्मत फीना।हतो विवेक दंडदै पीना ।। तासु सकलदल घोधिसुलेहू। अथवा देश निकारा देहू ॥ दो नाइवरण शिरमोहतों बोला सुभट पखंड । जीवकरौंहीं आवंग जीतिविवेक प्रंचड ॥ तो०॥ यापु धरौ उरधीर कितीवातं यह कृपानिधि । लै असत्यरणधीर जीतिसमर बाधौरिपुन ॥ चौ० ॥ असकहि चलो सुभटपारवडा । निज स्वरुप तव रचो अखंडी ॥झूठा शिष्य संग त्यहि ढोले। जो प्रतिक्षण असत्य पंच बोलै ॥ रचे विभूति सर्व तन माहीं। सुन्दर जटा सुशीश स्वहाहीं॥माला गले परी हे चारी। कान • पोश बहु माल सम्हारी ॥ मय दंड माला भुज छोरा । छाती कांध माल है जीरा ॥ दीपा लाल थीथपर सोहै। सुभग कम- हल कर मधि जोहै। धावत देखि जीव सतभावा । मध्यबाट मृगचर्म डसावा ॥ निज माया पाखंड पसारी । झूठशिष्यसो बैठ अगारी ॥ जिमि बक रंगे चेचिपद नैना । वनै हस कछुकहै न बैना ॥ निर्णय जल पथ जब परिजाई । तब सिगरे जग होइ हमाई तलपाखंड कीन यह माया। लखि स्वरूप 'जीवभिल भाया । कीन्ह दंडवत पदं शिरनाई। चहै कि चलि श्रासनटिंग साई। दो० ॥ कही तवहि ता गिप्यने सुनुरे मूढ़ गवार । पाडूं गुरु दिगजायनी प्रथमहि चरणेपरवार । नेकहु कीन्ह विचार नहिं निराकार तू याहि पदवी शिष्टाचारकी सौतूं जानत नाहिं ।। २ ज्ञानतरग। 1 - चौ ॥ ब्रह्म सभा शुभ देव समाजा। शोभित जहां दशौ दिगरा- जा ॥ एक समय तेहि सभा गये गुर । देखतहीउठठाढ़भयेसुर। ब्रह्मा बहु विचार उरलावा । इनहि योगनहिं अासनपावा ॥ तब पद बंदि दोन कमलासन । द्वौकरजोरि मांगि, अनुशासन । सो सुर पूज्यगुरू ममराजै । पुण्यस्वरूप महायवि साजै ॥ तिन ढिग बलपद बिना पखारे । तैमूरख अज्ञान,महारे ॥ यह सुनि जीव सत्यकरि जाना । तासुवचनकी कीन्ह प्रमाना ॥ भोचकरै शिक्षा यहिलेऊ। अपरवात सिगरीतज़ि देऊं ॥ दो॥जबजान्योजीवहि नमत तवपाल्यो सद्भाव । हारिविवेक-विचारिउर समुझिआपनो दाव ॥ चौ० ॥ सुनुरेजीव भूलमति भाई । जनियाकी वातनपर जाई ॥ शिष्य झूठ अरु गुरु पाखण्डी। लोकलाज सिगरी यहि गढी । जगतसकल एलिवेके काज़ा । कीन्हसम्हार देह करसा- जा ॥ जोलखिभूलि जाहिजग लोगा । सहैमहा दुखदाय वियो- गा॥ यहसुनि दम्भ यापुइमिकहई । बडसद्भाव छलीतूनहई ॥ प्रकट कहानी यह जगमाही । अापनसम कोउ दूसरनाही ॥सुनु तोकहँ भलिबात बताऊं। पुनिअपने मारगमहँ लाऊ ।। प्रथमहिं तनकहनीक सम्हारै । ता पाछे पुनि वेद पसारै ॥ दो० ॥ अशुभ. रूपजग जेवरे यद्यपिमहा प्रवीन । अादरतदपि.न करतकर करत समाते भीन ॥ चौ० ॥ यातेभल शरीरका साजै। विविध भांति आनॅटसो राजै ॥ दानदेव जग लहै बड़ाई। परधन हरै हेत गुरुताई ॥ बिनस्नान न जल मुखमेलै । करि पूजन पापन कहँ ठेले ॥ यज्ञकरै जपभांति अनेका । नेमसहित छूटैनहिं टेका ॥तू कुवेपअरु धर्मन जानै । कहुकहनी तोरीकोमान ॥ धनाचार तव संग नशाई । बिनहार वसनन विनुभाई ॥ काहि स्वहाइ ऐस दुखसाथा । सुनते वचन पीटिये माथा ॥ तव सद्भाव नीति मय बानी। कही विवेक विरागइ सानी ॥ दो०॥ सुनु कहनी मम ध्यानधरि क)तोहि समुझाय । भूपणवसन अनेकविपि त्रियतन अधिक सोहाय ॥ चौ० ॥ तनशोभा अरुअधिक हँगारा । कैयो 1 , - - . - 2 ज्ञानतरंग। भत नृपकै धनवारा ॥ दीन चनृप समतन साजा। निजे दिथि देखिलहै घडिलाजा ।। कहावसन भूपणवेपावे। जोशरीर नृपसम, सजिलावै ॥ नृपसोवत भलिसेज बनाई । दीनधरा पर प्यार - साई॥ भूपति सुखित जन्म सबकाटै। दुखिया तन चिन्तानित चाटै ॥ रहसदा स्वाधीन नरेशा । पराधीन परजातु कलेशा॥ वत मध्यभाग हरिदासा । नहिभूपैति नहिंदीन दुरासा ॥ जसमहिपरै सेज तससोवे । दुखसुख दुहूं वातको खोवे ।। दो० ॥ कवहूं भो. जनभूपसम कबहुंक फल आहार'। दुहूंबातते रहित कहु व्रतहरि हितअनुसार । चौ० ॥ 'कहु शुभ वस्त्र नग्नकहुं रहई । बस्कल कतहुं पहिरि मुब लहई ॥ दुखक सुख पावै जगमाहीं । मान अमान विचारत नाहीं ॥जवयह दशाजीव कहँ आवै। तव हरि मारगभललखिपावै ॥ जन्ममनुष्य भयोयहिहता। मजैईश करि- कै चितता ।। नहिंयहि हेतजो चहै बड़ाई। भूपण बसननस्वांग बनाई । निजशरीर कर करतःसन्हारा । ईशभजन सवभाति बि- सारा ॥ करिपारखण्ड जगत छलिपावै । सो प्रभुहिँ ठगनी महँ श्रावै ॥ देखै तिहूलोफ बिन अंजन । यहिकारण हरिनाम निरंज- नईश्वरनहिरीझतलखिरूपा मोहत लरिखनिज दासकुरूपा॥ रूपवंत धनवतनरेशा होत न संत समान विदेश ॥ जोपाखड़ पथतव गहई। निश्चय तनपक सोलहई ॥ पुनिकरिकोप कहै यहदम्भा। बलिहरि हितकिय यज्ञरंभा ॥ दो० ॥ दान दियो बहुयज्ञकरि बलिहरिचन्द नरेन । दशाभई सो विदित जग सुनि पाइयतकलेश ॥ चौ० ॥'व्याय अधम सहने गतिपाई । गृद्ध सेवरी, हरिपुर धाई ॥ गणिका अजामील अवरवानी । जिननं विवेक वात कउजानी ॥ कुजर पशु इत्यादि अनेत । लही •सुगति तजि पथ विवेका ॥ वेदयास्त्र सबकरै विवावा । तमुझत जीवहि होत विधाया ॥ कोऊ ईश शंभु कहँ टेरै । कोऊ जगत मात दिथि हरे ॥ विधिकोऊहरि गणपति भाखे । कोऊटक सूरपे राखै ॥ वसत जीवदेहीमहँ जोई। कस वेदान्त ईश है सोई॥ M -- २१ - ज्ञानतरंगा झगरा यह न होय निरुवारा ताते कुछ नहिं पंथ तुम्हारा ॥ दो० ॥महु पुनि गहि केहि पंथको लेवैई शरिझाइ । लवे स- झाव अनंदयुत कही ताहि समुझाइ ॥चौ॥ तजि इच्श अरु मान गुमाना। गहै वुद्धिकर, ज्ञान कृपाना ॥ काटि मोह' फांसी लिज, हाथा । ज्ञानी पुरुपनको करि साथा ॥ भजैश दुखसुम्प दौ त्यागी। दया धर्म सौहूं,अनुरागी ॥ योगाभाव यातम निज हेरे। बता सहित ईशकह टेरै ॥ यहि विधि तो तजिराबापा- खंडा। अन्त मुक्ति सोल है अखंडा ॥ सुनिपावंड घयनसद्भाया। लज्जायुत अब शीश नवावा ॥ बहुविधि मन बिचारकर सोई। लूझिपरा नहिं उत्तर कोई ॥ अतिदुख सह मृगचर्म उठावा। अमित भांतिकृत मन पछितावा ॥ दो० ॥ हारिपरा खलचला गृह मिल्यो मोहको जाय । समाचार सद्भावकर सर्व कहा समु- झाय ॥ मोहराज प्रति दुखित है कामहिं कहा बुझाया । जादु तात पौरुष करो जीव लेहु अपनाय ॥ जीव संग सगावइत फह विवेक सो गाध । हारि जानि पारखंड, की हर्पितभी संघ रााथ ।। सुनो वृतांत विवेकजू काम कीन्ह दल साज । तर विचारको प्र- बल लखि पठवा जानि अफाज ॥ चौ०॥ चला कामकरि पापु धनाया । सुमनबान निज पनुप चढ़ावा.॥ सँग ऋतुराज उर्वशी नारी । राग रागिनी ताल सम्हारी ॥ कोकिल पिक अरु तिहुँ गति पाता । मदन दाह उपजै लखि गाता॥देखि जीव भल ठाट बनाचा । त्यहि अवगर विचार तहँ धावा ॥ लति विचारि वोल्यो तब कामा । सुनरे जीव बचन सुखधामा ॥"सुना तु भी सझाव संगाती। तजि सुरेख संग घेठदुखपांती ॥ विधि तनदीन्ह भोग हित लागी । तू मतिमद दीन्ह त्यहि त्यागी,॥ तातेप्रवशि त्यागि सद्भावा । त्यहिं शिपदेन हेतुहौं भावा ॥ दो० ॥ ब्रह्मा विष्णु हरादि सुर सर्व करत.नियभोग । जाते अधिकन और कट' . सुखभापत बुधलोग ॥ चौ०॥॥ तब बिचार कह सुनु रतिना- यका प्रति निलज्ज तच संग कुभायक ।। जो वडनीक भोगतुम । ज्ञानतरंगी कहा जासु गर्व अति भूलत अहळ ॥ तासु वृतांत सुनौ वित लाई। पादू जीवहि देहु भमाई ॥ त्रियभग वितरक्तमोरहई। अरु मल मूत्रभरी बुध कहई ॥ जासु दधासुनि मन धिन पावै॥ परसतही नर नरक शिधावै ॥ ऋतु वसंत अरु तीनि वतासा। सुमन बाण लखि मोहिनत्रासा ॥ परतिय रमण करतजेपानी। दुहूं लोक कृत निज करहानी ॥ इत नृप सुनै तुरत धरि मारे। उत यमदूत नरक गहिहारै॥ दो० ॥ हँसीहोयदुहुँ लोकमें कहा भोग या माहिं । करै कही तुव जीवसो हमनहोहिज्यहिपाहिं ॥ यह सुनि खल निज हारि लखि गयो गेह अकुलाय । मोहराज सों हारि निज कही महा दुरखपाय ॥ चौ० ॥ बोला नृपतिक्रोध श्रपपासा। कहो मेटु श्वव मम परिहासा ॥ नीति चमू बांधिये विवेका। फरिय जीव निज बधरहै टेका। छूटै पिताकर बहुभो- गानितबियोग हिमरिहँलोगा ॥ चल्योक्रोध आज्ञातामानी। यदया हिसादिक मन, धानी ॥ समाचार यह पाव विवेका। घोलि क्षमा कह जोकर नेका ॥ क्षमा अहिंसा श्रादिक धाई। जहां जीव तहँ तुरतहि आई ॥ क्रोध क्षमालखि नवतरहई । मोदेखत तुवधर्म नरहई । अर्जुनधसज्ञानी जगरख्याता । निज कर धापन कुलहि निपाता ॥ दो०॥ परशुराम माताहनी ब्राह्म- रय मारो राम । शंकर सुत माथा हरो कीन्ह्यो वड़ो-कास ॥ सो०॥ यह पौरुप है मौर मोधिन जग जीवे न कउ । मारग 'चले न तोर मो सन्मुख कोटिहु किये ॥ चौ० ॥ तपसी मुनिहीं घने विडारे । धान जीव जग. फहा विचारे ॥ क्षणमहं क्षमा दयाधरि मारी ।पाधि विवेक घंदि गृहडारौं ॥ पलहित पण पक्षीपरहेता । द्रव्य लागि.मानस हनि लेता ॥ पौरुप, कोन जीव अपनायो। मोरं नाम कहुँ सुनि उनपायो॥ तबहि क्षमा क्रोधहि समुझायो । सत्य वचन तुममोहि सुनायो । जहँ हम जाहि तहाँ तुम नाहीं। विदितः पान्य सिगरे नगमाही॥ हरिश्चन्द्र क्रोधहिनहिं लावा। चांडाल गृहापु वेचाया ॥ मोर- - 4 - - । २२ ज्ञानतरंग। चज निज शीशचिरावा धर्मराखि तन क्रोधदुशवा ॥ जव-कर याय मुष्टिकामा । तासन लकुटी हनन प्रचारै ॥ जो दुरियाय देयकरि क्रोधा। जायपास बिनती करिवोधा ॥ सघसन माधुरी भाषेवाता । शत्रमित्र करलखैन नाता ॥ परदुख देखि दुःख मन लावै । सेवाकरिता दुखहि दुरावै ॥ दो० ॥ तपसीमुनि चण्डाल नर पशुपक्षी अरुकोट । येसमस्तहैं ब्रह्मलव हनयोगसुनुढीट ॥ नैनलालउर कोपबर्ड होरिचला गृहसूत । ज्योंपौरुष लघुकहैवडि लज्जालहैं कपूत ॥ चौ० ॥ जाइक्रोध निजहाल सुनावा । मोह राजमनभा पछितावा ॥ ताहीसमय लोभ हॅकरावा । काम, क्रोष वृत्तांत वतावा ॥ सुनतलोभ तनभा अति कोपा । क्षण महँ करौं बिवेकहि लोपा ॥ धाइचल्यो जीवहि अपनावै । अरु विवेक दल समर हरावै। जब बिवेकने यहसुधिपाई । सपदि दीन्ह सन्तोष पठाई । लखि सन्तोष लाभयह भारी मो तन्मुख तोकहँ को राखै । ब्रह्मचर्य वैरागीग्रही। लोभलालसा.लागि न केही । जब वराटिकाकी भैचाहां। ईश्वरकीन्ह लोपैसालाह। तबमुद्रायाभ- वानी । मुद्रास्वर्ण पावसुख खानी॥ नहितन्तोप सम्पदा चाहा। मिलै अधिक धनतो उरदाहा ॥ यद्यपि क्षयपतिपद मिलिजाई। तदपिन उर सन्तोप दृढ़ाई ॥ दुखियायह विचार नितकरई। परी मिले कीपरधन हरई ॥ दो० ॥ पशुपक्षी इत्यादिजे मोहितत्यागत प्रान । मोबिन सुखपवित नही तोहि तजतकहि पान ॥ ताते जाहुपराय गृह हानि आपनी जानि । जीवलियो अपनाइ-हम त्यागीतेरी कानि ॥ चौ० ॥ तव सन्तोपं कहैसुनु भाई । ऐसियहै तुम्हरी प्रभुताई!॥ बलिराजा पहँ गयउन भूले । रह्योतिराय भये अनमूले । हरिश्चन्द्र करदुख नहिलागा। लोभनारि सुततन जिन त्यागा । परशुराम कह नहि अपनाया । यक विशतिधा धरा बहा- वा ॥ स्वर्ण अतौल लड्डू रघुनाथा । दीन दान जग गावत गाथा ॥ फरणहि कम नहि आनि सिखाया। प्रात नित्य, अर्जुनहिं लुटा- वा ॥ मूरख अविवेकी अज्ञानी । तुव पथ चरण देतते पानी ॥ । ५ ज्ञानतरंग। २३ सपति दुख सुख लिखा लिलारा । पिषि-अक्षरको मेटनहारा ॥ दो० ॥वत ईश्वर लहत्तमो करत ईशतो होत । यांचतवाप्रभु सोनवा सकल हमारो गोत ॥ विपतिपरे सब धन न दुख उ-.. पजै भरपूरि । लोभ न लावै भलै प्रभु राम सनीवन मूरि । यह सुनि लोभ परायचल. विजय लही संतोप । गही जीव मारग सुभग जाते पावै मोप ॥ चौ० ॥ लोभ अजय सुनि मोह रिसा- ना। पठवीं अहकार बलवाना ॥ इतहु बिनये आपनदलसाजा। विजय विवेक होत मन भाजा ॥ को बहु बकै हार अहँकारा । त्राहि त्राहि ढिग मोह पुकारा ॥ अकथ दुःख पायो तब मोहा। निजदल सकल अवलफरि जोहा ॥ तवयापुहि उठिचला नृपा- ला। तासु चलत तन भूतल हाला ॥ सुन्यो विवेक मोह चलि धावा । प्रथमहि धीरजचाप पठावा ।। तापश्चात् भोचकृतापू। मोहराज कर अधिक प्रतापू ॥ अस न होड कधीरज हारै। करि प्रपंच भूपति त्यहि टारै ।। दो० ॥ उचित मोहि पाछे चलौं "हनों सकल धाराति । उत धीरज कहँ देखकर मोहराजमुसका- ति॥सो०॥ सुन धीरज ममबैन कहोजाय निजनाथतों । उचित बात यह हैन पायो पिता मनोति कहि ॥ चौ०॥ अस भणि ‘मोह कोह उरलायो । करिवल वनित लीव अपनायो । अरु धीरज प्रतिफहँ असि वानी । जाहु तात नतपैहौ हानी ॥ जो तुम्हार पयसग्रह करई। प्रियातनय निज धन परिहरई ॥ वा- । हन वसन विविधभंडारा । राज्य द्रव्य भूपण परिवारा ॥ सोदर यति प्रियसदन समाजा। मित्र पिता माता सुख साजा ॥ तुरी भूमिगजअस्त्रसमेता। दासीदास जेनितमुखदेता ॥ गोधन आदि विभूति अनेका'। इनतजिले काकरिय विवेका ॥ हिलिमिलि सबसन कीजियनेहा । कर्वजानिय छूटै यहदेहा ॥ दो० ॥ सब कर करि प्रतिपाल नित धनपरिवार बढ़ाय । निजधन सो अप- नाइये औरकोलेइपचाय ॥ सो०॥ मोहवचनसुन.जीव तामार- गसेवन चहत । त्यागन सुरखकी सीव तब धीरज यसकहतभो॥ ।

- ज्ञानतरंग। चौ० ॥ सुन हमार मत मोहसयाने । ममदखत तुमाशुपराने॥ पूरन सग सदा हम डोलें। मोहलीन जे वचन न बोली। काकी त्रियकाको सुतगेहा । समरभूमि त्यागत निजदेहा ॥ कायरकूर तुम्हारसँगाती। जेहमरी पावत नहिंभांती॥सतीशरीर हमारच- वासा । भस्मकरत तनतजि सबासा ॥संपतियटै बढेचहुंभाई। मनहमार. नहि कछुअकुलाई ॥ यहि विधि धीरमोह बतलाता.। एक एक की सुनतन बाता । त्यहि अवसर विवेकहिँ आयो.! विविध भांति जीवहि समुद्रायो॥ दो० ॥ जन्महोत तननग्नहीं अंतहु चलतउचार । ध्यानधरौ 'ममवचने पर नशेमोहव्योहार । चौ० ॥ जवरण शत्रुनसो कठिनाई । प्रियातनय सब छूटतभा ई॥धीरजही तथा आवतकामा। सपति भवनर है सबदामा ॥ श्रतसमय जब यमचर आवै। मात पिता दासीन पचावा- हन तुरीगयन सबस्ट। पटभूपण आपुहिते टूटे ॥ यमचर बा- घि दशौ दिशिधेरी। दुर्गतिकरै जीव सुनतेरी॥ जिन्हेंमोह आफ्नो बताये। तेतिगरे यहने छुटिजावै ॥ आपनि नारि बतावत जाही। पुत्रकहत माता निजवाही ॥ तासोदर निज भगिनि बतावै। तासुपिता कन्याकरि गावै ॥ ऐस्यइ पितुमाता सुतहाला । कात तुम्हार साझिनकर जाला ॥ सदन अपिनो जाफहँ भापौ। की- टालय ताकहँ अभिलापौ ॥- पशुजानत निजगृह करि ताही। पक्षीश्वान सूपबंध जाही। मंजारी आदिकजे देही। निजघर स- मते सकल सनेही ॥दो० ॥ कही तुम्हारा कैस गृहा ये समस्त सझियार, त्यागि मोह 'ताते चतुर करु हरिमिलन बिचा- २॥ मोहपराजयप्राप्तभी भैविवेककीजीत । जीवगहो तबसत्य पर्य हरिसों बाढ़ी प्रीत (मनउवाच) ॥चौ०॥ गहो जीवजवमारग साँचा। पुतिकसकीन्ह कहौ मतराँचा ।। (बुद्धिरुवाच)जब विवेक जीवहि अपनायो। तत्र ताकहँ निजपन्य बतायो,कहिनि सा- धनाचारि विचारी योगी जन जेफरत नियारी॥प्रथम विरा- गरूमतिसरावा। तापाले निज नंग वतावा ॥ शम, दम कहि - 1 । ज्ञानतरंग। २५ मुमुक्षु पदढयऊ । जीव कृतारथ असकरि भयऊ॥ पुनिमनप्रश्न कीन्ह गिरनाई । सकल वृतांतकही समुझाई ॥ का विराग का अहै विवेका । का, शमदम मुमुक्षु का टेका ॥ करै साधना,ये नर नोई । पररवकहा लक्षणकहु सोई। ॥ दो० ॥ सुनो तात दृष्टान्त शुभ परख साधनाचारि । अस्तव्यस्त निर्णयनकछु कही सकल, निरधारि ॥चौ० ॥ ब्रह्मादेव राज अहिराजा । यक्षप वरुण सूर, 'यम भ्राजा ।। भूपति रकधनी सुखखानी । कामी कुटिल गुणी, अज्ञानी ॥ तिहुँपुर देहधारि जे प्रानी। जो कृतभोग अधिक सुख, मानी ॥ सो समस्त दुखदा अनुरागी । काकविष्ट सम-लखै वि- रागी॥ अप्तिमति जासु देखियभाई । सो वैराग्य योग स्थवका- ई-॥ देहअनित्य सदा छलकारी । आतम नित्य स्वछंद बिहारी॥ सारासार शुभाशुभ जानै । सो विवेक मारग पहिचान ॥ सकल वासना-त्तजिससारी। शम दम दान-दया अधिकारी ॥ दो० ॥ विपयदोप निरखैनहीं दुखसुख लरबैसमान । आज्ञा गुरु श्रुति शोथरि विचरै जगत सुजान । अति श्रद्धा यक चित्तकै ध्यान समाधि लगाय । ताहि समाधी कहतज़ग योगिराज सुखपाय॥ चौ०॥अावागमन त्यागहितभाई। बहुविधि करैयोग चितलाई । वासररैनि ईशपद घ्यावै। सोमुमुक्ष पदधारि कहावै ॥ यहि विधि, सकल साधनासाथै भिजैआपु प्रातमनिरूपाधै । पूंछि.बहुरि मन- यहबुधिपाहीं। चित्तबहमन बुधितन माहीं। बसतसकल गावत कविराजा । निर्णयकरि बरणौ तिनसाजा ॥ सुनोतात तिहुँपुरकर ज्ञाना । बसतचित्त बुधकरत वरखाना ॥ प्रथमहिं जो विचार कछु श्रावा । चित्तवह ज्यहिजीव चितावा ॥ करिलेहौं देहौं मैयेही। शोचत यहै अहंकहु तेही ॥ दो० ॥ बहुविधिक विचारजो.काज सिद्धिकेहेत । सोहै मनमन जानिये वरणत बुद्धिनिकेत ॥ सर्व को धिरकरिदेइजो सुन्दरसिखदेतात । सोबुधि जाउपदेशते काज सिद्धि जात ॥ येई अतःकरणमन भापत बुधजनचारि । अन्य भावना होयजो सोवरणौं निरपारि (मनउवाच ) लोगकहत.सं- 1 र 1 ज्ञानतरंग ।। . प है सारके करयोग तिथिवार । ऋक्षसहित पंचांगशुभ करतसुसिद्धि विचार ॥ चौ० ॥ जवपंचांग अशुभ यहहोई । सिद्धिकाज तबहो- यान कोई तहां कौन विधि कारंज करई। होड न हानि लाभ संधरई ॥ सोविचार वहिकहौ कृपाकरि । प्रसन्न उस्अधिक दयाधरि ॥ दिशाशल योगिनी बतावै । चन्द्र राहु शुभ अशुभल- खावै ॥ करै न गौन हानि अनुमानी । जबये अशुभल जगत्रा- नगे॥ विष्टमुहूर्त विचारत पंडित । कारज कृतलाह सगुन अरव- डित ॥ योगीजनन विचारत सोई।। गौन सिद्धि कारज सिंधि होई ॥ यह सिद्धांतकहौ समुझाई। ममदुविधा सघजाईनाई ।। दो० ॥ गेहीजन रोगहिलहत औपधि करत अनेक रुष्टपुष्टयोगी रहत विनऔषधि गहिटेक ॥ मज्जन भोजन शैन लघुशका शंका जौन । इनहीके विपरीतता होत रोग गृह तीन ॥ इन सबको सिद्धान्त जो मोम्वहिंकहो बुझाय। पांचतत्वको रमणतन ताहि, व्ह समुझाय(बुद्धिवाचे)ची पूंछसि भलविचार सुखरखानी। कहिही सकेल सुमिरि पदवानी ।। यहचांग सत्यकरि जॉनों। शुभअरु अशुभहिये अनुमानों ॥ ज्योतिपमंत न योगमतभाई। संबविधि सिद्धिसिद्धि मनपाई । तिथि अरुवार योगशुभहोई। सकल सिद्धिदा अशुभ न कोई ।। सबहि उचित सबकरें विचारा। ग्राहीकर विशेष निरधारा ॥ ज्यहि मतयेन शुभाशुभ भापै। सब विधि मंगलसिद्धि प्रकाशे। तो सुरज्ञान सुखद सवभांती । ध- रियध्यान तापर दिनरांती । वरणों सुरज्ञानहि बिस्तारी। निज मतिसम लखियय पारी ।।दो॥ यह समुद्रवत ज्ञानहै बीच श्वासको गौन । निर्णय कारज जगतको जलजीवन समतौन॥ तत्त्वनको निरधारजो सो अगाधता जानु । बहु प्रकारके भेदते मिलत सरितवत मानु ॥ तासमुद्र के पारको जानचहै नरकोये । बोहित विन आरुढभे-पारंजाय किमिसोय ॥ चौ० ॥ एकपरतु मोहिं बलुभाई । करैस्वामि गुरुमौरि सहाई । आशिप तरणि आपुकै बारा । बनैतो वेगिहि होइ उतारा । करिहै सो सहाइ । 7 , - ' जानतरंग। २७ जनजानी । म्वहिंभरोल यहमनक्रम वानी ॥ तातो बन्दिनलज पद गुरुकै । निर्णयकरौं ज्ञान सुरफुरकै ॥ सुनो गुरोदय ज्ञान रसाला । कहो उमापति, शंभु कृपाला ॥ नाडी वित बहुविधि तनमाहीं । जानतबुध मूरख जननाही ॥ नाभि अधोखग अंड समानी । सवनांडिनकर स्वडअस्थाना ॥ अब ऊरध तिर्थी पहुं घाई । सहन बहत्तरि नाडि सिधाई। दो० ॥ तिनमहं दशति श्रेष्ठहैं प्राणस्थित सोजानु । दशमहं सुखदा इडा पिगल सुख- मनमानु ।। चौ ॥ चौथी गंधारी अनुमानो । हस्त जिता पुनि पूपाजानो ॥ यशस्वनी सातवीं बरखानौ । अलंयुपा अरु कूहू मानौ ।। और शखिनी कहत सुजाना । येदशनाडी सहित प्र- माना ॥ अब इनकर विश्राम बताऊ। जगत काजहित ज्ञानल- खाऊ ॥ इडानाम नासा घुटमाहो । बमत पिगला देक्षिणताही। दोसुर पूरणकरै प्रवाहा । रो सुखमनों कहत कॅबिनाहा ॥ गधारी वामक्षि निवासी । हस्त जिह्वा दक्षिण इंगवासी ॥ पूपा दक्षिण श्रुत विधामी । वामेकरण यशस्वंनि धामी ॥ दो० ॥ अलंबुषा मुख बातिनी कूहूलिग विराम । शरिवनि मूल स्थानबेस देश नाडी दशेपाम ॥ नाही अतियेष्ठजे प्रथम हि कही पंखानि । तिनहीको सबख्यालहै शुभविचार अनुमानि ॥ चौ० ।। गायत्री अजपा सुखदाई । मोहहमः दुविध वताई। नित प्रतिगौन श्वास मगहोई । यफइस सहस छसौ कहु सोई । निरंगम श्वानहँकार बिचारे । सहितबिन्दु कोजैनिरधारे। वितरंगसहितसकारप्रवेगा। शुभगमत्रयह यह गवेगा। यहिसम मत्रन जपनहि ज्ञाना । तपन कर्मविद्यानहिं ध्याना॥ सफल भैरमनालेजगमाही । जपत मत्र ते सर्व बिलाहीं ॥ सोतात कहिहीं कछुआगे । सुनोतातज्यहि हित अनुरागे । इडा पिंगला सुखमन जोई । सफल सिद्धि वा., यफ है तोई ॥ दो० ॥ इडावाम पिगलहिन नासारंध्रनिवास । दोनो सुरपूरण चलै तवं तुखनना प्रेमात ॥ चौ ॥ इडा चन्द्र पिर कारज दायक । पिगल रविचर कारज लायक ।'सुखमन । - - + । १ - -- ज्ञानतरंग सकल काजकी भंगिनि। केवल ईश भजन की, संगिनि ॥ जब सुखमना श्वासमग होई. तब न काजकीजोज़गकोई।।सुखमन ध्यानअग्नि थितरहई। कारज थिर चरसब सो दहई । इडाचंद्र समरूप वखानी,। पिंगल भानु बिपम,पहिचानो। इडा,नारि पिंगला पुमाना। सितशथि अतितारूपसो,भाना ॥अबसुनुइडा काज चितलाई । थिरकारज की जिय सुखपाई ॥ आभूपण गढ़ गढ़ी बनावै । यात्रादान विवाह करावै॥दो० ॥ अलंकार मणि बस्त्रको बनवाउब तनधार । दानदेव प्रेतिककरम काटकर्मनिर- धार ॥ चौ०॥ स्वामिदरश कीजिये मिताई। वणिज वित्त गृह . प्रविशिय भाई ॥सेवा कर्म कृपी श्रारंभा। बीज ववन,मरखकर प्रारंभा ॥ दिक्षादेइ :मंत्रक जपई । विद्यारंभ गेहनिज थपई ! दरभ वन्धुअरु बारि बधाउव। 'रस-साधन शुभ बाग लगावः।। वापीकूपसमहल तड़ागा। करु शशिचार सहित अनुगगा॥ गीत वाद्य नृत्यादिक कीजै । निधिमाहि थापि सकल सुख लीजै॥ भूमिलेष अरु नगर बसाउब । बहु-प्रकार जग धर्म चलाउब- ॥ अपरौकाज़ लखोथिर जोई । चन्द्रप्रवाह कीजिये सोई॥दो० ॥ इडाकाज वर्णन किये सुनु पिंगलके काम । दूरि होय भ्रम जगत हिय होवैज्ञान विराम ॥.चौ ॥ शास्त्रारथपुनिकरिय विवादा। चोरीअरु अखेट परसादागजबाजी रथवाहनलीजै। दक्षिणचार प्रयोगहि कीजै ॥ पाट पटाम्बर शस्त्र मँगावें । भेषज करि विप भूतहटावें ।। युद्धगमन-दक्षिण सुरकरई । निश्चय जीति पत्रुपद हरई ॥ त्रिय प्रसंग करु भानु-प्रवाहा । सोवन भोजनादि, सुख लाहा ॥ क्रय विक्रय सुपुण्य अस्नाना। भयमारग व्योहार सु- नानागमोहन उच्चाटन वशकर्मा । अस्तंभन मारणजे धर्माखर उष्ट्रादि महिप असवारी | गज अश्वारोहण सुखकारी ॥ दो० ॥ तीरथवत इत्यादिजे चरकारज जगमाहि । रबिनांडी:महँ सिद्धि ते होवत संशयनाहि ॥ सो० ॥ जवसुखमना प्रवाह होवै दोनो सुरनमहँ । तबनकाज कहजाह अर्थहानि जिय हानिलखि ॥ 1 ८ २८ 1 - ज्ञानतरंग। चौ. • ॥ शुभअरु, अशुभ चरस्थिरकाजा। सुखद दुखद दुहुँ भांति समाजा ॥ काजन प्रश्न न.गौनियभाई । जव सुखमना बाह द- रशाई ॥ कहुँदक्षिण सुर वायों कवहीं । लखु सुखमना रुपयह तत्रहीं। केवलकीजिय प्रातम ध्याना।उठिन थान ते करिय पयाना ॥ दूरिपन्था स्वारथ अनुरागे। चन्द्रचारलखिचलो संभागे। होमसिद्धि सब विन्ननगावै । अर्थसहित निज गृह फिरि अावे॥ वामकि दक्षिण जोसुर चलई । ताहि बिचारि विवुध, मन गुणई। बाम वामपद दक्षिण दाहिनि । देइप्रथम सब दिशि दुखनाहिन। दो० ॥ ॥ वामचार समपदधरै जैसेदै अरु चारि । भानु विपम जिमि तीनिशर यात्रासिद्धि बिचारि ॥ बामकि दक्षिण जैौन सुर पूरण होवै तात-तौनी दिशि पूंछैचतुर काजसिद्धिढ जात. चौ० वामय ऊरध दिशिहोई । वहैचन्द्र सुरपूछ कोई ॥ कारजसकल सिद्धि पहिचान । शुभकारी इमि ताहि वरखानै ॥ पृष्ठ: पोर दक्षिण अथ- आया। प्रश्न- 'करै मुर भानु प्रकाथा ॥ सिद्धि सर्व ताकहँ कहिदीजै। मगल समुझि सुरोदय लीजै। चहुंदिशि गौनकरिय क्रमयेही। योगिराज वरणत हैं तेही, ॥ पूरब, उत्तर रबिकीनाही। गमनकर तोहोय सुखारी । पश्चिम दक्षिण शशि परवाहा ।-जाय पुरुप उपजै सुखलाहा ॥ यहि विपरीत गुमन जोकरई । प्राणजायकै संकट परई । दो० ॥ भिमें सम अक्षर कहै जिमि दश द्वादश्यीय । वाही दिशिङ प्रश्नकृत होय कहईश ॥ विपमवरण बोलैचतुर ज्यों नव ग्यारह सात ! भानु उदय दक्षिणदिया सकल सिद्दिकहु तात ॥ उदय सुखमनाहोय जय तवपूछे जोकोय । अफलहोय कारजसबै कहकवि ग्रन्थनि टोय.॥चौ ॥ अव तिथियादि लग्न अरुबारा। चन्द्र सूरसँग करौं विचांग ॥ शुक्लपक्ष प्रतिपदा जोपावै । तादिनते शथिउदयं घताच ॥ तीतिदिवस मामिउदय प्रधाना। पुनि रवि बहुरि चंद्र फिरिभाना ॥ यहि विधि कृष्णपक्षं दिनतीनी । परिवाते रविति- पि गनिदीनी ॥ फिरि चन्दा पनि भानु प्रकासी । समुंझत यो- 1

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ज्ञानतरंग
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गिराज सुखवासा । परिवा शुक्लपक्ष शशिराजा। वहै चंद्र उपजै
सुखसाजा ॥ कृष्णपक्ष परिवा रविं बहई । सकलानंद दायक
कवि कहई । अथितिथि रबि रवि तिथि शशिचारा अतिकलेश
तबचतुर विचारा ॥ दो० ॥ बहै क्षपाकर बैजतिथि शुक्लपक्षभरि
पूरि मंगलमत नुरज्ञानके सुख उपजै तनभूरि ॥ चौ०॥ प्रात
समय शशिनाडि प्रकाया । अरु मध्याह्नहु चन्द्र विलाशा ।।
संध्याकाल दिवाकर चारा । सवविधि सुखद मिटै दुखभारा॥
रहै दिवस भरि शशि सुरमाही । अन्यभाव डोलै जब नाही ॥
निशिभरि उदय भानुकर होई । अल्पकाल नाशक है सोई॥
यह संयोग जानि परिहरई । सहि दुख अल्पकाल नर मरई ।
पूरुबवत शेशि सूर चलावै। पूरण प्रायुहोय सुखपावै ॥ पांच
तत्त्व पूरव जेगायें। जिनकरि सब जीवन तनपाये ॥ क्रम क्रम
बहत श्वासमह सोई । महिजल पवने शिरखी नमजोर्ड दो० ॥
प्रहनिशि दादर्श वारतन संक्रम होवते भाय । जगत काजहित
हेत संघकहीं सर्व समुझाय ॥ चौ. द्वादश राशि जगत सब
जाने । उदितहोत रवि चतुर बखानै प अरु कर्क 'कन्येका
जोई । वृश्चिक मकर मोनयुतसोई ॥ इनपट लग्ननमहँ शशि
चासो । करिय काजलंखि लग्न प्रकासा । मेप मिथुन हरितुला
वरखानौ । धन घटराज भानु जियानी ॥'जो निर्णय आछी
विधि करई तो येराशि त्रिधा उच्चरई । मेपलं कर्क तुला खग
जानी। इनमहँ रविकर योग बखानी ॥ तृप केशरी कुम्भअलि
जोई। योग निशाकर शुभट्टा सोई॥ मीन मिथुन कन्या धन
राशी। विस्वभाव सुखमना निवासी ॥ दो० ॥ चन्द्रयोग धिर
काजकरु भानुयोग चरसाधु । सुखमनमें सव त्यागिकै निजा-

- ज्ञानतरंग। भूगु शशिदिन सितपाखा। चन्द्रउदय उपजै सुरखंलाखा ॥ असित पक्ष रविशनिमहि वालक । डोले भानु भनौं दुखघाले कं॥ यहि विधि लग्नबार तिथि जानी। रवि शंशियोग सोकही बखानी ।। कान शुभाशुभ जगके जेते। पूरवयोग जॉनि करुतते। होईन हानि काजकहु भाती। श्वास निरत जोरह दिनराती ॥ मूरख नरहि न यहमतदीजै । प्राणहानि धनहानि सहीजै। दो। लघुशंका वामेसुरेहि शंका देहिने माहिं । भोजन सुरपिंगल विपे कीजिये संशय नाहि ॥ बामे करवट पर्यनित कीजै चतुर विचार । यहि विपरीत किये विबुध होय रोग अधिकार ॥ देश दिनेके विपरीतते अधिक रोग तनहोय । सो विचार उराखिये हानि लहै नहिं कोर... जौनराशिंके होहिं रैघि तास उदय पहिचानि । लग्न बिचारै सहजमत मंगलदास बानि ॥ चौ०। श्रवसुनु तत्त्वं विचार रसाला । कहोजौन विधि शंभुकृपाला ।। पांचौतत्त्व श्वासमग बहई। सुखद 'दुखद दोनों विधिअहई ॥ परखब कठिनयोग विनुजाने । सरल परख जो कहत संयाने । सोही वेदत सुनो चितलाई । तजि दुबिधा देखा सुर भाई ॥ द्वादश अंगुल जबसुरंडोलै। तवमहितत्त्व भली विधि बोले। पोईशगुल होर्य प्रवाहा । श्वास तत्त्व जल कह कविनाहा ।। गुलाम मारुत निरधारा ॥ चतुरंगुल सुरअग्नि विचारा । पूरण दौसर बाहिरनाहीं। गगनतत्त्व' कवि भणत तहांहीं ॥ दो० ॥ अपरोपरख जो योगमत ताहिसुनौ चितलाय । तत्त्वपरखि पुनि काजफरु हानिनहोवै भाय।। चौ॥ मध्यमगौन भूमिसुरमाही अयोगौन सुरनीर लखाहीं ॥ ऊर्थ गौन श्वास शिखि बासा। त्रिजगवायु अरु शन्य अकाया। महिजल तत्त्व दुवी शुभ भाई। । मध्यमफल शिविचार वताई ॥ गगनमरुत अतिशुभ वखाने । हानि मृत्युदायक पहिचाने ॥ मध्य अर्चल' सुखदा सुरजाना। अमे अानन्द रूप अनुमानौ । ऊरधश्वास निधनकी दाता । ति- र्यगमे उन्नाट कहाता ॥ गगन सदा सबै कोज नयावत । कोनों - ३२ ज्ञानतरंग। सिद्धि न जगकउ पाचता। यहि विविजानितत्त्व कृतकाजा । लह हानि.कोउरंकन, रोज़ा-॥ दो०॥ शीशबास नभकंधशिखिः वाय नाभिमहँ बास । जानुदेश महभूमिजल पादेशसविलासासो० ॥ गगनतत्त्व जबजानुसकलंकाज तव त्यागिबुध । मनथिरकरिधरि ध्यानु भजुपरमातम परमनिधि-॥दो० ॥ मगल शिरिखमय रवि धरा शनिजलमय जलराह । दक्षिणनाडी योगेशुभ भणतसर्वकवि नाह ॥ सोमनीर मयइलाबुध गुरुमय पवनसुजान । शुक्र अग्नि मयकहत बुध वामनाटिका जान ॥चौ० ॥ तत्त्वपरख अव सूनु भाई । कहौंबहुत विधि त्वहिं समुझाई.॥ चतुष्कोण डोलैरॅगपी: ता। मधुरस्वाद भोगदा अभीता ॥ यहगति, धरातत्त्वकी होई। कहो उमा.प्रति शंकरसोई-॥ रक्तरंग-कटुस्वाद वखानोः । ऊरध गौन अग्नि पहिचानो ॥ श्वेतबरण अरु स्वाट सुखारा , वर्तुल गौन जानुजलधारा। रंगसितासित, मिल सुस्वादर । तिर्यगगा- न पौन सुरनादा-जलकल स्वाद रंगतस जाको। सर्वगार्न सुर तभकहुवाको । यहिप्रकार लखि तत्त्वन भाई। सर्व काज तजु गगनहि पाई ॥ दो० ॥ महिगुरु गुरु जलेशनिमृगौ-शिखि-गुरुर- विमहितात । पवनकोगुरुबुध गगनकेशनिअरु राहुकहातः ॥ पूरुव जानंतचतुर समुझौयाहि बहोरि । पुनिकारज कछुकीजियेमि- विघ्नं शतकोरिणतो. ॥ आगमकहत बिचारि योगीजनजे योग वित! कहींसकल निरधारि सुनो चतुर जनयन्ध लखि ॥-चौ॥ चैतशुक्ल परिवाजेब,आवै ॥ प्रातसमय निजसुरचितलावै ॥ लगे मेप संक्रांतो जवहीं, बेलाप्रातः विचारै तबही ॥ संबत भरिकै कर्मवतावै । विनायोग लखि कोउ न पावै ॥ यहिप्रकार योगी- जन जानत । ते निजश्वास निरंतसुख मानत ॥.एथ्वीतत्त्व जो बहे प्रभाता । तो यहि भांति चतुर कहु वातां ॥ जग सुर्भिक्षवृद्धि, नृपहोई । अधिक वृष्टिं सुख पूरणं सोई ॥ उपजे अधिक अन्न जग माहीं । सकल उपद्रव रहित तहाहीं । वामेसुर विशेषफल वायक । दक्षिणचार समा, सम लायक ॥, श्वासां मर्ग जलतत्व . -- - ज्ञाततरंग। ३३ विलोकै । समयसुखद-सुख उपजै लोकै ॥ होयवृष्टि, बहु विधि जाभाई।अरु सुर्भिक्ष-निरोगहि पाई । गृहगृह मगल चार ब. तावै। जब-जले तत्त्व चन्द मग पावै॥ मध्यम फल सुर भानु प्रवाहाभापत सकल विबुध कविनाहा ।। दो० ॥ डोलै श्वास जी-अग्नि मया रोजसंग तबजानु । कालपरै भयभीत जग रोग मलित अनुमानु गल्पवृष्टि अन्नादिहू उपजे, अल्पजहान । समय निषिद्ध विचारिये गावतयोगि सुजान ॥ चौ०॥ होयप्रात: सुर पक्न अवारा । ईति भीति जलअल्प विचारा ॥ अति उत्पात नगतमह होई । समये दुखद कहुँ सुखदान-सोई ॥ बहमेपा सं- क्लाति-अकाया । शत्य फलहु अन्नादिफ नाशा -अतिहि कराल समय तब जानियही दुखद समस्त भाति अनुमानिय ॥नीरमही सुखदायक दोई । अन्य तत्त्व नहिं सुखकर कोई । यहमत क- ठिन न सबसन होई ,चतुरसुजान लखत कोइकोई गावागे पुनियान विचारा। करिही निजमति सरित. पुकारा जाकेमन श्रावै तो कोजो। योग कर्म करिताहि लखीजो-॥ दो० ॥ श्वास निरतबहि निपिरहै-समुझै सो सुरज्ञान ,साधन बिन गुहवित चतुर खोजौ-सकलजहान ॥ मंगलजानत योगनहि लोग कहत स्वइबाता मोमन में विश्वासनहि धौरनके मनतात ॥ चौ०॥ सुनो जगतके काज अनेका । चितधिर करिपुनि सहित,विवेका। जेल महि तत्त्व बामसुरपाई । थिरकारज कृतसंब सुखदाई.॥ पावकपवन संगरविनारी । चरकारन करिहोड सुखारी ॥ तस्व घार तिथि.राशि गनाई। सुरअरु पक्ष होइ यकठाई ॥ चन्द्रयोग अथवा रवियोगा। घिरचरकाज करेंजंग लोगा ॥ सिदि समस्त सर्व सुखहोई हानिकांहु-विधि लहैन कोई । जापर कृपा करें जापालक । यहि बिधि लावै युवाअरु बालक ॥ तजि मान्यता घाई घाईही कहो न जानि सरोदय कोई दो ॥ जब बाछी विधि योगमत जानिलेहुयहिभाया। तबचहुकाहूचतुरको बुधजन देहुवताय । सकल सिद्धिकी सिद्धिहै सबयोगनको योग । मूरु- 3 ज्ञानतरंग। खं त्यहि जानतनहीं लेख त सुलक्षणेलोंग। ची मरुत तस्व महँगर्भजो रहई । दुरखीविदेशी उपज कहई विहितत्व के यो. गहिपाई। अगर्भ सुतजिसन भाई ।। धरातत्त्व मधिगर्भ प्रवे शा उपजै बालकं सुखंदधनेश । भौगवन्त सुन्दर तन होई। प्रीति करै वासँग सब कोई ॥ नीर मध्या भांगी धनवाना हो पोलम चतुर सुजाना ॥ प्रगट 'धिनाशक व्योम वरवानी । सरखे- मन सिर्गहि जानो ॥ आंदित राजसुवन कर योगावगपति राजसताकिथे लोगा ।। सुरखेंमन मध्य नपुंसक भापता'जेजिन योगधर्म अभिलापता दो यहि विधि भौगिय नारि निज सनया सुत हित लॉगि । तत्वे विशेपि विचारिये देखियहियं नि- अजागि ॥ प्रश्नगर्भी करैक्कउ प्रथम श्वास निजदेयु तापीछे उत्तरकहिये सरमधिज्ञान विशेषु ।। चौ आपूिवीजल सुत योग प्रकाश ॥मरुत सता शिखि गर्भ विनाश लीव गगन श्रथवा सुकुमारी अधनिर्णय सुनुचतुरंगोंरी निक्षिण सुरप्रच्छक दाहिन । नृप समसुत उपजै भ्रम नाहिन प्रच्छकचंद स्वच प्रधानों । कन्यांविदित करो बुधियाना निजसरी हार निशाकर बाकी । होयकुमार सहदकहु तोको वॉकरभानु क्षपाकर बापू । पतन जन्म ते शोक संतापू । निजाको एकैसुर होई सुखेद बिचार भनीवुध सोई । गुरुबिन कठिन जीतनहिं जानौ । गुरु गमसकल परत पहिचानों ॥ दो ॥ ऊरपसमदरशी भणत धातु जीव हिंयहेर । अधोमूल इस्थिरमनी चतुरबखानत टेर । धरा मूले मणि उदक हरि जीवरुप पहिचानु तजेधातु नभु चतुष्पद जानिःस्वतेत्त्व बखानु ॥ चौ० ॥ पूरण सुरपूछे नर कोई शून्य और नहिंकारजे होईन्यि समय पूछे हितकारी । पुनि पूरण सुर सुखद विचारी ॥ कहै विदेश गर्यो ममनेही बहुत्त विवसतु- घि लहीन तेही ।। दिशावार तिथि अक्षर जोनोग सर सयोगहि पायावानी ॥सुभंगयोग सर्व सुखद वताइयायहि विपरीत प्रयोग लखाईय ॥राकलयोग सूरनकर होई । प्राची दिशि उपर .

जानतरंगन
शुभसोई पषिचात दक्षिणशशि संयोगा। बाइहि साहितसमाज
सभोगावा यहि विपरीत दुखद घुधभापत । जेनिजसुर निवा
करि राखत ॥ दो॥धरातत्त्व अस्थिरसुजल श्रावन थोरे फ़ाला
पवनपयान कृतेशिवी गगननाथ तनेवाल॥चौ०॥ गमनहतपूछे
इंडचाई तिथिदिन सुरविचार चित्तलाई । दक्षिण पश्चिमाधि
जलभूमै । फलदसुखद्रकोउ दुखद न दूमै ॥भानुयोग पूरुबउत्तर
दिभि । देहवताइ बिचारि दिवानिशिाअवधागे रणभूमिविचारा।
कहिहौं हौनिजमति अनुसारा ॥ चन्द्रयोग सब विधि शुभहोई ।
वरण वार तिथि पसौ सोई॥ ऐसेभानु योग ज़वपाइयपति
युद्ध माहिसकल बताइय। दोनों दिशिके पूरुप,आई । फरैप्रश्न
कायुधःजताई। पूरणासुर ज्यहि दिशि निल होई।.प्रथम
प्रश्न तिहि विधिकृत जोई ॥ दो ॥ समर भूमि सो जीति है
या संशयनाहि । शून्य स्थलके औरही,पून दुहुंजन जाहि॥
जो पाछेते पूछि है विनय तासुकी होइ । यामें लगाय: नाहि.
कह-हर निज, मुख सोइ ॥ चौ० ॥ वामेतम अक्षर जयकारक।
दक्षिण चिपस चरण पार जारक॥ सुखमन, अमितकष्ट रणदा-
यक काहू विधि.नहिं सो रण लायक । दक्षिण बाम जो पूरैण
होई । त्यहिदिपिर पलैजीतै सोई॥जो आपुहिरणकाज पधारे।
तो दक्षिणासुर बिजय विचार ॥ शशि सुरवाह प्रथम गहता।
विजय लहै-निज भूमि समेता ॥ अग्नि तत्त्व दिन तिथि रवि
केरा पाइ:युद्ध गमनै कविटेरा ॥ द्वैवोग अस योगहि पाये।
भन्नु नीति सहजै घरआवै ।। बामदहिन ज्यहि दिशि कहकोई।
बहै न निज सुरतिहि दिणिसोई ।।दो० ॥ मही तत्त्व जो होइ
तहँ उदर पात तब भापु। पात चरजल अग्नि, उर त्योसमीर
अभिलावा लो० ॥ गगन मांझ शिर घात होवैकुछ संदेह नहिं ।
पांच तत्त्वकी धात सुर बिचारि रणभूमि कहु.॥ चौ० ॥घहै जौन
सुर त्यहि-दिशि-श्राई। पूछ समर धीर सुखपाई ॥ तंघ विजनुर
मह तत्व विचारी। कहु सिद्धांत योग सुखकारी ॥समता धरा
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4 ज्ञानतरंगा रसुजान प्रकेट ग्रहदेखौ। सुरते परेन. लगकुछ लेखौ, दो। उदय होय विपरीतासर, एकपक्ष, लगुतात । रोगग्रसैतव आय तन सुरमता भापत वात ॥ चौ०॥ एकमास इमि जव सुरडोले। सुदद बंधुको बिपति तोलेगा पक्षतीति में ततः नशिजाई। प्रकट परत विपरीतालवाई ॥;कैचन्दा कैसूरजकोई ॥ यह रेनि दिन पूरणजाई तीनवर्पलग कालनावै । पाळूअंत होयबुध गा। बहौपिंगला दै दिन राती, युगुल वर्ष पीछे मरिजाती। तीनि दिवात निशिको सुर पहई। वर्षअयंत आप तना रहई ।। प्रोड़ा अहि तिथि, सूरप्रवाहा मास-एकलरिख जीवन:लाहा॥ मातप्रयंत चलै सुरभाना दिवस होईभरि लीचना जानाः। सुः खमनं उदयरहोय घटि पांचा-। छुदैशरीरं जानियेसांचा चन्द्र सूरीसुखमनानपाई आनन पवन चाहदरगाईला वारिदण्डल: गिकामा रहई पाळू प्राण-शमन वराहई ।। तत्त्वाकाश तिगा दिनतीनी मीचुवर्षपीछे कहिदीनी ॥ दो० ॥, दिनसूरजनिशि, चन्द्रमा एकामासकृत गौन जीवरहै;पटमास लगि-सत्यसत्य लखुतौन । जानिकाल-योगीचतुर प्रथम, शून्य ग्रहनायतों काल धाइ फिरिजाहातवालेइ .समाधि-जगाया। लोग कहो सुरो दृय ज्ञान, जसकुछमें समुझोहिये । अवसुनु सहित प्रमान श्रेजः पाको व्योहार कछुः॥ चौ॥ प्रथम सत्र अजपा-जोभापो वहै मंत्र दृढ़ जिया अमिलापो| अमिन बहुत योग मजगाये, साकार ध्यान लगाये॥ तिनमहँ पद्म सिद्ध जोई। एकलगा- यमंत्र जप सोई॥ पद्मासन विशेष फुलवाता शुचिर्त मन्त्रजपै उठि.प्रातामौताज ज्यहि सुनैन कोई प्रतिफलप्रदजानि यबुधरसोई॥ दृष्टि नातिका अमलगावै । सुमन जपैमन आनन आवै। चहुँजसमीत क्रिया पिनहोई । तद्वपिन तासन, भापिय सोई॥ जन्मांतर लगिजो यहसाधे । जन्म-मरण की मेटवाधे।। दोका तीनिकाल,तिहुलोकमे विवित्त मंत्रयह. आहिक साधक याको कौन अस सुगतिमिली नहिंजाहि ॥ चौरी शंकर विधि r , । ज्ञानतरंग ३४ अवतार 'मुरारी । यह मंत्रजपिभये सुरखारी । वरु हनुमो- ने परमपदगामी । जपियह मित्रभये अधिनामी- 'ध्रुवप्रह- लाद जयोचितलाई । 'शुभगतिं लहीपुरानन गाई ॥ नारद सनकादिक विज्ञानी भये स्वेच्छाचार' प्रमानी ॥ ज्ञानी गु- यो मुनी संन्यासी जपतमन यह परम उदासी ॥ कलिमहै बहुतजीव जपियेही । 'पायसुर्गति में परम सनेही ॥ रामानन्द कबीर गोसाई । सूरसधन पीपा गतिपाई ॥ और अनेक-जपीय हिफेरे । पसेपुरुष ते हरिकेनेरें । दो० ॥ ताकारण अहनिशियन तुर एकबारनित साधु । सुमनध्यान धरिदुचिततजि निजधानस धाराधु ।। रोनसुखमना कोलह निभानाथ रविनाहिन फंजासन वारूद है तैपविशेष जपुयाहि ॥मोक्षद्वारो जीवकहासुखसुख- भनी जानु अपरनाटिका मोक्षदा मगलेहदयन आनु (मन: उवाच) बातमवासे शरीरमहँ सोकैसोहै भाखु पदांस आपनी लानिकै जैनिंदुराव कछुरावु ॥ (धुद्धिरुवाच) चौ०॥ प्रातम कम्भरीर महवासा । लिप्तोलित दुहू विधि भासा जिमि नत जलपट अगणितभरई । सन्मुख दिनकर केसो धरई। पुनिसब पटनि बिलोकैनाई रविक्तरुप संक्न महमाई रवि समान सौरवितेन्यारा । इमिशरीरातम बिस्तारा, अथवा जिमि दर्पण मुखदेवै। दुविधा भाव बदन नहि लेखै ऐसेइ आतम घसत शरीरा। लखत सुदुधी परम गभीरा ॥ इन्द्रीसकल सोइ घोरावे | सुधिर श्राप कहुँजाइन आवै।। नैतादृश्य श्रवण बिन सुनई रसनारसन चारिखसुख गुनई। दो० ज्ञानेद्रियले पाँचहें कमेन्द्रिय जेवाण । तिनकरि सोनहिं जानियतः सुनुमन सहितप्रमाण । (-मनवाचोज्ञानेंद्रिय कर्मेन्दिजे तिनकरिलखो न जाय । फिरिकैतोहै सौ कही भ्रमणासकल नशायः ॥ (बुद्धि रुवाच) चौ० ॥सुनुप्रमाण तोहिंकहीं बुझाई लिखिधातसगति रहुअरगाई ॥ रूपाक्षेनिरखै रविकासात तावित निधि-बुध करत, प्रकासो ॥ सूकुचनहि नैपसारे । संघकालवै सूरबिनकारे ॥ - . ज्ञानतरंग। रविदेखनहित रविनहिं चाहिय। इलित्रातम स्वभास तनाहि यगा औरवस्तुखोजै लगिनाई। दीप प्रकाश कीजियत-धाई। प्रज्वलितदीप खोजिकाजहि । कोप्रकाश दायक सुखभाजहि ॥ वस्तु समस्त नैन यो देखे। नैनलखन हितक्यहि अवरे ॥ है प्रकार्य निधि धातमऐसो । दीपकत्यक्ष,भानुभन जैसो - दो० ॥ रविरविदीपक दीपसों नैना नैनसोदे। और वस्तुनहि चाहिये इमित्रातम निजलेखु ॥ चौ० ।। मैं तूचित अहँकार कहावे ! चारों एकरूप जावे ॥यफमति यकगति बजबढ्दै । तव निरुपाधि लरगतिगूढ़े ॥ इन्द्रीसूर्य सोमन अाधीना मनतो बुद्धिअधीन प्रवीना । जीवाधीन बुद्धिबुध, कहई। विन, सूक्षमधी-अलखन गहई तजिनमणी-दुधिधासंसारी, मारगज्ञान लस्वैनुखकारी॥ उदयज्ञान होतैतनसाहीं। दुखदासकल व्यकार नशाही,॥ याय- द्रमणा नणे न भाई । तावद्मोह.यणी न नशाई;॥ मोह नशे- विनसुबुधि न होई । 'बुधिबिन मातम लवैन कोई दो॥ प्रातम निजचीन्हे विनी जरामरखननशाय जन्ममृत्यु-केत्ताश विनुलि है न ईश्वरसाय(मनउवाच) सो०॥ ब्रह्मसोकसोआहि यहमाको समुझायकहु । निर्गुणगुण अवगाहि तूसमर्थ सम भाति बुधिनी (बुद्धिरुवाचा) चौ० ना कहीं कौन विधि ब्रह्मस्वरूपहि। कहतबनत ने हिरंकन भूपहि ॥ प्रजाकहौतौ भूपतिः कोहै। भूप कहतपुनि प्रजोनसोहै । अलखकहीं तो लखकोउ ,औरैः। लख किमिकहों अलख शिरमौरै। जोअरूप भाषौं भगवाने । रूपपान कोउदूसरनाने । गुणनिधि-कहीं अगुणकहि कहा- गुणकहत फिरिगुणनहिं लहऊगावरणिकहौं कर्ताहैसोई। तौपुनियहै अ- कीकोई यनुभावभनत भेदसंभवमें। संभववर्णता गुणअनुभव में निरीकोरजो वाकोभापतौकार गृहकहिाअभिलापों ॥ दोध्या कहाँवसतवैकुंठमें अथवाश्वेतदीप तौलहिज्ञानी मानि है। घरेह्रदयबुधिदीप । चौानारिकहाँतो.त्ययशमहाना। सुरुष कहाँतो दुबिधा ताना,॥ कहाँनपुंसक लिंगगवेशा। तो फिरिज्ञानी । ज्ञानतरंग! करिहि देगा । सांख्यशास्त्र जोकर्मवतावै। प्रथमचतुर तिनम- हँ मन, लावै ॥ योगगास्त्र पुनि खोजै,कोई । समुझे हृदय रूप हरिसोई ॥ कबि कोविद कर अस न जहाना,॥ परमात्माकर करै बखाना ॥ वेदशास्त्र कहि नेति पुकारै । और कहा जग जन अब भारै ॥ ईश्वर सब जीवन तनवासी। विमल बुद्धि यह भ- णत उदासी ॥ आपनपा चीन्हे जो चातुर । समुझे ईशरुप वह सातुर ॥ दो० ॥ आतमही परमातमा याको जानकोय । मिले ईश कै ईशमें जलनिधि जलतम ज़ोय ॥ ज्ञान विना तिहुँलोक में ताहि न मान,कोय । जोकर ज्ञानी हियलखै कहिनसकेगो सोय ॥ देत.भावते रहित है उपमा दीजिय कौन । उपमा बिन संसारमें समुझिसकै बुधतौन ।। चौ० ॥ जबद्दउ सूक्षम धूल श- रीरा । हचैतन्यगहै सुखपीरा ॥ अरुजव स्वप्नमांझ धसिजाई । मन भ्रमाय निज भ्रमणा पाई ॥ पुनि सुरखोप्ति जबहोय जीव कह । तोनि बहिक्रमकरि बिचार गह ॥ इन तीनोंमहँ आपुहि माही । लिप्तरहै सब भ्रम मिटिजाहीं ॥ तववेहोय तुरिय हरि लीना । जहाहोय मन सुख दुखहीना ॥ प्रथमावस्था तीनि ब- ताई । हरिपद प्रीति रहै,लवलाई॥ जपैमत्र पूरुष जो भापो । सदृढ़ बुद्धि आतम अभिलापो॥ तब-मिटिजाय अवस्था भूरी। तुरियः, पदहिरहै गति पूरी॥ दो० ॥ कठिनज्ञान मारगर, बि, रलो कोउ ठहराय । जोसमर्थ पूरबतपी गहै सोय चितलाय ॥ जानव श्रीजगदीश को खोउब मनों अपान । को ऐसो समरथ जगत फ़िरिकैकरै घरखान ।। चौ०॥ जिमिपूतरी लौनकीभाई ॥ नीर सिधुमहँ ,जाय मिलाई ।। सो हज़ाय मिलितकीलाला। कही बहुरिको कहैहिवाला ॥जो, कोउकहै कि मै त्यहि देखा। सो. मिथ्या पुतरी दधिलेखा ॥ दूरि,दरश करि बहुरि जोश्रावै । करि अनुमान-सोरूपवतावा कहिनहिसकहिरूप संबताको । दशदिशि भेद लहो नहिं जाको, जोयेपंथ जगत महँ नाना। तिन सबकर मन सुनुवारख्याना ॥ जसबहु अंधगहें गजधाई + १२ ज्ञानंतरंग.। भिन्नभिन्न तनकी हरपाईकउ कटिं गहे कांधाकडलांगो।उ. दरतले कोई पद वभागो॥ दो० ॥ कोऊगयो सुपूछ त्यहिकोऊ पांजरलागें। हाथी ठूटो करणते लगेचित्त, धनुरागें। चौडा ये- कठामये वाद प्रतिवादालगोहीय तिनमहं संवादा. जोकरि लगी सोकरि सम कहई। कांधगही सोकांध सम लहई । उ- दरंगहों तो कहै छति ऐसे। विरणस्परशस्तंभसुजैसे | पूज्ञ गहे सी,सर्पलम वादै। पांजर पर सोभीति विवाद ॥ काहू लखो न सो संब नागा। झूठ कह न सत्य अनुरागी । मान कोउ न कहे काहूके। द्रष्टा फहैं देखि ताहू के ॥ कैलेफिरि समुझेंगे अधे। लगे न देह मथनके धंये। निज निज साँचु वाद सोभा । रूप समस्त लो यों अभिलायें दो तजि विवाद गजराजको. बहुरि जीय लंपिटाय । भिन्न भिन्न तन गहतही मन भ्रमउपजें भाय || सोतिब सो घोचै हीय पूंछ गहीं तव पदाहि'अव ।। कोर कर गह निज जीय उदर दुईकर छुवतहीं ॥ चौorn इमि विपरीत ठामकेपरसे। भ्रमभयकार उठेनिज घरसे ॥ तवत मतलब करेंविधाला''द्रहासों पूछे गजहाला ॥ जानि भ्रमित द्रष्टा समुझावै। सहित सुन मनधम बहिरा भ्रम वहिरात होय समधीते । लहँभले शुभ मारगहीते ॥ पुनिवहोरिभ्रमणा तिनपाहीं। चतुरसुजान जातु लघु नाहीं ॥ समधी होत ज्ञान मलपावें। साव्यशास्त्र तवद्ध करिभाचे । सांख्ययोग इकमत द्वौचहई । साधक दुवो मुक्त पदलहई ।। र्थवद्रष्टीके लक्षण कह ऊ। भ्रमणा.सकलतर्ककी देह ॥ दोज्यहि सर्व विधिगज- राजको परखों होवैतात धागेपाछे दशौ दिशि द्रष्टाताहि कहात। चौ०॥ धबोध होयमन बूझेंग ज्ञाननैन सो गर्न न सूझे ॥ ऐस्यचतुर साधुजन जानौं । द्रष्टावेद गुरुकह मानौः॥ पारब्रह्म परखवा कठिनाई । परखतही गूंगाह लाई धिरहोय-नि 'लुनत नाहतासमुझि सिमुझि निजमना अवगाहता नहि स- मर्थनीविरणिवंतावै। यहिकारण गूंगा समभावै॥ मूकहि माहुर, 11 .

ज्ञानतरंग। देई मिठाई । किमि केहिसक मृदुता कटुताई । जो माया कृत होयन तिहुँपुर । उपमा योगाईशी सोफुर ॥ माया कृत, तिहुँ लोक बतावत । वेदव्यास्त्र सब मत समझावत ॥ दो० ॥. माया पतिके रूपको कहिनलकत यहित ॥ चतुर-विबुध कवि कुशल जगे'चलखताहि कहिदेत ॥ होतः अनाहत विनि चतुर यकस्तुरे रागश्तीत । सातौसुर वामें उठताकिमिफहिसकतगवीस ॥ राग वैपके सुनतको बधिरमी होतसजान । निर्णयलख अरुअलखको सुनुमन सहित प्रमान ॥ चौ०॥ पांच ज्ञान इन्द्रिय जोगाई। -निर्णय फस्केि प्रथम बताईवाणीकरि जोशब्द उचारा. सु- मंतवण सो चैनपुकारा । नैना ज्योति.सों लपत जो भाई । घाणेन्द्रिय सौगन्धिलेखाई बसों परश ज्ञान जोहोता। सो संबलख मायाकर घोताअपरएक वृत्तांत महावर । कहतसंत अरुवेद जानिफुर ॥ मनकार जो समझत बुधिसेती? मायाधर्म कहोलखि नेती॥ जोसिमस्त तिहुँपुरकर ज्ञाना । सोलवरूप घरे मंगवाना लखविस्तारतो अपरम्पारी। घरेमिराटरूपकर- तारा दो० ॥ कहीं अलरव भवथोचित्रहु अन्य सारख्या प्रयोग। रामुझोचतुरन प्रथमही अवनि समुझे लोग ॥ चौ० ॥ माया यहअपार कृतजाकी । समुझत हिय मेरी मति चाकी ॥'फिरि फिमिकही अलखलख नाहीं। लखमें अलख लखालखमाहीं॥ भूतस्तेमस्त आदिहै माया । ज्यहिनिज बलसवनग उपजाया ॥ या यादि रूपहजोई। वह अलखलखि परतनसोई । जोकोड लखैसुष्टुपी ढूढ़े । तौसमुझे शुभअलख अगूढ़े ॥ ज्ञानकर्म इदिय सोंजोई। परखि सकतअलभयो न कोई ॥ ज्ञानेन्द्रिय कसे न्द्रिय जोसो। परखि परैतो अलख नहींसो ॥ अलखै लखत अलख मेक यापू । जिमिजानत नभनिज परतापू॥ दो० ॥ यहि तेसोहै लखालख परमातम यकभांति मिगुणगुण लखलखें है भ्रमविन हृदयसमातिना कहो योग सिद्धांत यह निजमति सरस विचारि प्रबजो पूंछेसोबहुरि कहींसहित पिस्तारि (म: - - १४ ज्ञानतरंग। नउवाच) कहौवरणि नवभक्तिजे.सतसंगादिक तात । अरु नव विधिको भजनजो सोकहिये विख्यात (बुद्धिरुबाच) चौ० ॥ सुनुनव भक्तिकहौं, मनतोहीं। पूछ्योभल प्रियलाग्यो मोहीं ॥ जवसिद्धांतयोगनिपुणाई । होयनप्रथमकरैयहभाई ॥ नवधाभ- तिफलप्रा जोई। तिनकेकरत,अचलमनहोई ॥ सतसंगतिकृत प्रथमतयाने । भलीभक्तिनिज जियअनुमाने ॥ द्वितियेहरि,की चर्चाकरहीं। स्वपनों अानधर्मनहिंधरहीं ॥ तृतियेगुरुवरणन सों प्रीती नेमसहित पूजतश्रुतिरीती ॥ हरिगुणगानअझलनिर्मोहा। भक्तिचतुर्थसुगतपरद्रोहा । वेदपाठहरिमंत्रसुजापा। पंचमभजे- नभक्तिहरतापा । सज्जनधर्म निरंतरधारे । शीलवतपष्टम हरि प्यारे ॥ भूतसमस्त ब्रह्ममयदेवै। सप्तमसंत ईशलमलेरवै॥ला- भालाभतोसमसंतोषीं। अष्टमहोयनबुधपरदोगी॥तजिप्रपत्री हरिशरणाई । नवमगहै दुबिधाइवहाई॥' दो० ॥, यहि विधि करिनवभक्तिबु, लहैज्ञानसिद्धांत । लहेज्ञानसिद्धांतकेपावैमोक्ष नितांत ॥ मोक्षपरेनहिानसुख जानत हैं बुधराज । सारख्यधर्म घरयोगरत चहतमोक्षकोताज ॥चौ० ॥ अबसुनुभजन भावन- वजाई । करिविस्तार कहौहौंनोई ।। सुमिरणकृत, हरियशहित लेती। प्रथम भजन यह भणत सनेती ।। पूजन क्रम वाणी मन जोई। भाव द्वितीय लहै अब खोई॥ करें वंदना प्रभु पद केरी। तीजी भजन भणत बुधटेरी ॥ प्रीतम निज हरि कह जे जाने भावचतुर्थ हृदय अनुमान ॥ श्रवणहरि यशलहीना । पंच- मभजन धर्म मतदीना ॥ जो दासत्व भाव हिय परई । पष्टस भजन भाव भवतरई ॥ निशिदिन हरि चरणन अनुरागी । सप्त- महरिहित होयविरागी ॥दो०॥ कीरंतनहरियशकरैदुविधाभाव, हित्यागि । अष्टम भजन प्रसिद्ध यह कहत बिबुध युति पागि ॥ चौ० ॥ आतमध्यानकरै त्रुतिरीती। नवम भजन.यह सदृढ़स- प्रीती ॥ यहिकृत नरामरण की फासी । मुक्तहोय यह भणत उदासी । भक्ति भजन द्वौ भाववतायें करि विवेकहों तोहिं - - ४५ जानतरंग। लखाये ॥ दोनोपद निर्वाणहिं पायक । दोनोंचहु अाश्रमकेला- यक ॥ प्रथमहिं ब्रह्माचार वखानो । द्वितियाश्रमसुगृहस्थीजा- नो॥ तृतिये वानप्रस्थ बुधगावै। चौथेसंन्यासहि समुझावै ॥ अ- बचारोके कर्म बताऊं । सुनुसचेत तोहि सुमति लखाऊं ॥ जब किशोरराषयहोवै भाई । ब्रह्माचार तबहिं मनलाई दो०॥ समु. झैसब शुभ अशुभजे धर्मपाप जगमाहि । त्यागासस भवमें हुलै तज निज धर्महि नाहि ।। चौ० ॥ ब्रह्मविचार हृदय, निजगुणई। भानधर्म सघहितसो सुनई ॥जब दुविधा भ्रमणामिटि जाई । रहै, आपमें आपु समाई ॥ पूरण प्रथमात्रम इमिहोई । द्वितिया 'अमहि गहै बुधसोई॥ कहे पुराण रोड तिहासा । करै गृहस्थी धर्मप्रकासा ॥ पुत्रत्रियापरिवारहि मिलिकै। प्रीति रीति सहर- हिये हिलिकै ॥ एक परन्तुकरै चतुराई । त्रिय सुत लहि न जा- इबौराई । प्रथम विचार-रैन दिनराखै। गेहात्रम अहनिशि अभिलाखै ॥वानप्रस्थ फिरि होइ सयानो । त्रिय सँग रहै न प्रिय रत सानो ॥ दो० ॥ बहुरि धरै सन्यास को त्यागि सकल परिवार । ब्रह्मभजन में रतरहै कृतः श्रातमा विचार | चौ० ॥ : कतहुक चतकाल कै जाई । शमनचार सक निकट न पाई॥ स्वर्ग नर्क दोनों ते छूटै । वह समर्थ हरि मिलि सुखलूटै॥जुपै । गृहस्थी में सनिजाई। तो वह ब्रह्मविचार नशाई ॥ ब्रह्मविचार नयत सुनु ताता। इन्द्रभवन यमसदन" सो जाता ॥ लो दृढ़ धर्म गृहस्थीरह्यऊ । अन्तकाल सो सुरपुर गयऊ ॥ दृढ़ता रहित गेह आयक्ता । वानप्रस्थ है भौन विरक्ताः॥ रविसुत दूतवाधि त्यहि भाई । नर्कबार दीन्हों ठढ़िआई.॥ ब्रह्माचार प्रथम जो कीन्हा । ताते नर्कवास नहिं दीन्हा । दो० ॥ बहुरि मनुष्यहि योनिमें जन्मत भी संहताप। यानयोनि ते रहित भो ब्रह्मवि- चार प्रताप ।। स्वर्गहु ते तपक्षीण भे पुनर्जन्म जगहोई । उत्तम कुल आनन्दमय ब्रह्मचार रसोड । तब पुनि द्वितिये जन्म में भजन प्रातमा ठानि । लहै मोक्ष हरिमे मिले पुनि नहिं जन्मै . F मंगलविनोदी । " मा 2 कर्म निरवार१३ सचित पातक नशत सब उपजत अनुभवज्ञान।। क्रीयमान निकाम सब होत कहत गुणवान १४ पाप पुण्य प्राधा रहित; योगी कर्म कमातस्वर्गनरक मग परिहात अत सुब्रह्म समात१५फलित कर्म प्रारब्धिवत याभव दुखसुखरूप।। समजातन सन्तोष मति ध्यावत पुरुप अनूप १६ कोटि भार. हाटक दयो मोक्ष होन हितताहः॥ अंत चासना,पाप की लैगई नरकनिमाह १७ कियेजन्म भरि कर्मखल.निंदनीय संसारभाका- ललमय ध्यायोप्रभुहि पायो स्वर्गविहार-१० स्वर्गवसै निज सु- कृत सम जन्म होइ-परिणाम, जरा मरण नाश्यो,नहीं। यहिते स्वर्ग निकाम १६ निरैवास पापी लहतापापातुल्य सुनुमीतः ॥ नीच योनि महँ जन्म पुनि वदतावेह यहगीत२०स्वर्ग-नरकहर समसयो जन्म मरणके माहिं ।। गर्भ, क्लेशनाश्यो नहीं मृत्युाहीत जन्माहि २१- अध ऊरध जे योनिमें जन्मतजीव अपार ॥ शोक भोग समता बिपया कोपटिवढि संसार २२ जाके ध्याये क्षणक यक कलिमल सचित जात ॥ देहनगर मन भूप तहँपावनंसुरवहि, दृढ़ात २३,मनइन्द्रिनको भूपहै त्वचा करण चषयाका घाणादि- कजानत नका विषयमांत मन काक२४-प्रथम जाहि निज वश करै परमातमाराधिमिटैसकलचिता तिमिर ज्ञानसूरनिरव्या- घि२५ योगविना अजपाजपे मनवशावतानाहिरागपि त्यागे बिना मा न बसैमनमाहि २६. दृढ़ बुधिज्ञानपसारिक सनशिक्षा देत्यागि ॥गुह्यस्थल अनुभवउदयं जायचांतिरसपॉगि२७ अर्धकूप पर अंधजिमि कहू दिखायोदीपापंथ नाहरो मूढ़मति जवलगि' गोन, समीप.२८ जिमि-पिपील मिष्टान में लपटी, श्रीयापास॥ मुक्ततनहि अतिवल करत तथा विषया ढ़बास, २६ अन्नाभापक्षी यथा परयो-वधिकके.जाल ॥ तिमि प्राणी भोगाय करिमायाषण प्रैकाल ३०-निद्रा क्षुधा, तपादि ने मैथुनादिकृतवान नर पक्षी पशु कीटहूजानतसो मतिमान ३१-जडतावश वृक्षादि जे रहेपिर- त्वहिपाय॥ मनुजणय,चैतन्यता तापदवीलोजाय ३२ सिद्धांतन - . -- ] . . मंगलविनोद। ५३ को अन्तमें प्रापासोक्रियकार पानिजवम जीवन-मरणहै जन्मत किमिससार३३-मानामान निरादरी श्रादर समताभाव | शुचि बार्सनचासताकुरुचिसुरुचिप्सी, ऐकस्वभाव-३१-ई जगकीतीन तजि पटकर्मी अपनाय॥ दोष थोकभय सव-तजै अंतबह्मपद पाय-३५ जन्म मरण निदतजि जीवईशःह जाय-॥ कर्माकर्म 'दुवौन] ,आपुहि आपु नशायः३० बहभावना परिहरै-युक्तबन्ध कउनाहि ॥ अकल-अमेय यनीहअन निज उरल्यावै ताहि-३७ अफअंक संघातकरि सिद्धि प्रथम, हरुअंक ॥ोषवस्तु अनसिद्धि जो सोईरहत,निशंक:३८ऐसो पुरुप असिद्धि जो ताजानन के हेत ॥ सतमारग यावत नहीं-साधत कर्म, लुखेत,३६ मेघसुधा घरपै विवुध कदलीफल न दुवारः ॥ तथा मोक्षपद पायकिमि कर्म न भवासंसार :कर कत्यो संसार यह रचि त्रैचरभव जीव ॥ क्षीण वृद्धि प्रापकनही भयो धर्मको सीव ४१ सिन्धुप्र- सादाहि पायजिमि होत मेवपय रेवानि ॥ तथा ब्रह्मते जीवसव को पूरणता हानि १२ अरु जिमि सरिता जगतकी मिलिन बढ़त जलराशि ॥ तिमि देहीमिलि ब्रह्मनहिं बढ़त परत - बुध भाति १३ जाने बिन जारूपके रूप, न पावत-जानि ॥ बूझतही निरवाणपद होतगुणनकी खानि:४४को निस्गुण- सरगुणकहा दुविधा भ्रमणा भूला-निगुण आफमायासगुण , यहै, ज्ञानको 'मूल १५ आवत जानत लखिपरत जीव अफर्ताकार अलख यह नहि दूसरा लखुकरि ज्ञान विचार, ४६.ज्ञानमूल सतसगहै समुझिपरत करतारना अव्ययज, अविनाश प्रभुनातु अंश अवतार ४७ ज्ञानी जो कर्मनिकर तजैसो. फलको काम, ॥ अज्ञानी फैल ग्राश करि-लहत्त यत फलबाम १६ ज्ञानवानको कर्म कउ तिद्वक पक ताहि जगत-धर्म दृढ़तालहै फरत हेत यहि पाहि १६ कर्म सकल धार्मिकनके फेरै जगतहित लागि-॥ मो-जॉनी ससारमें रहे. अमीरस पागि:५०, यजत देवकरि ला- ला देवतपत फलदेतः। याही जगमें दुःखसुख पुनिप्राणीहि मंगल विनोद लेते श्रीपनपी भूलेफिरत तिमिर अज्ञरशायः॥ ज्ञानदीप उदयतं नहीं तजते न दुबिधा भाये पराजित जितजीवाण विवर्गजन्मत्तचर माहि कर्मलिंग तन सँग रहतायामहँ सं. शयनाहि शतष्णा कृष्णारातितम ज्ञानप्रकाश विहीना सत्य वस्तु बुधि'चपनसौं लखिकिं लिसकत प्रवीन ५४ चतुर्वरण पून रणहिये बाहिरीमूढ़तमान गा डोलत महिनी रहतसवको ल- खत प्रमान ५५ ऊपरसें कछु कार्जनहिं अंतर प्रेमप्रकागाइंद्रिय निग्रह शुद्धमति करत विद्यानाशा५६ संसारी प्यारीदयो सब हिनको जोतारमा सोजानब अतिकठिन बुध जानत वृद्ध सिंगार पूज प्रतिम भेव भुलायके भये योगमें लीन ॥ तो पूरण पावत नहीं अतस्थान मलीन ५४ गुरूवाक्य पूरणवद्यो ओंकार अन- मोला खोजत तापद को न हद को बाह्मण को कोल५६वाम- की पदवी पिक चतुरामके माहि॥ विनाधर्माबाह्मण्यके बणि पदवीनाहि कहतवर्ण ब्राह्मण्यको वेदवाक्या परमाना। ज्ञानमुकुट धेिविना सौ नहिं होत सुजान ६१ रोग रहित राषि शोभिजै दृष्टिप्रेम पैदलीन ।। हंसं वरण नर नारिकृत सुष्टुकर्म छलक्षीनतत्व दरश पावत मिटतामोह क्रोध मद कामगा अतिमहाँ होवत नहीं सौंधक बुद्धि लेलामा६३ाभावशुद्धा प्रथमें करै विदान सिद्धांत । साधारण दुर्बुद्धिविनु सेवत प्रेपुर कांत ६ प्रातमम लिप्तहैं अतर एकहि भाव तिपूरुप जीवत सुने धार िसत्य स्वभावानजामताप्रतिम भावको पहिचानत निर- वान | तापदके संयोगते रहत नजीचे प्रमान यज्ञभरवाह कोटिमन काहमिंदिर वीचें ॥ एक निष्क लखि परेखिों भ्रस नहिरही नगीच ६७ ब्रह्मक्रांति यह आतमा वदत वेदवेदान्त चीन्हे निजातम चतुर लहै ब्रह्म सिद्धान्तका साभारहीन सु. ढेरुहे अतिमान धीमान ।। निज स्वारथसो पाइहै बुधव्यमनपर मान छागाल्यामशिलोलिये प्राण प्रतिमा कीन्हें वैष्णव सांचेभावसा तापूजन मनदीन्हलोपमाणसवीगहै। निष्टाशुद्ध । मंगलबिनोद। प्रताप स्वर्गवास दायक भयो अंत विवर्जित ताप-७१. सुस्व- दाता निर्जीवभो,जीव मुक्तिको दाति ।. जनका कहो शुरुदेवसों अहर्बुध धर्म बखानि १२ श्रीराधापतिाधर्जुनै कीन्हज्ञान उपदेश। यातम पूजा कर्म बहु जो निःकाम निदेश ७३ तत्त्ववस्तु धातम फहो क्षर अक्षर विस्तारि ॥ लिंगाधूल वस्तत्त्वमिति बुधजन लेहि बिचारि ७४. चतुर्वाहुप्रैचर चतुर वदनम्न मायाईश ॥ये पूरण अायुपलहे तजत नपुप बिसबीस ७५"जन्मभयो बोकार ते बद्रत वायु पौरान ।। नन्मजासुको मृत्युत्यहिायहबुध विदित प्रसान ७वापुनि वशिष्ठ पूछाजवै शकरसो यहभेव । मापोतूही देववतहों नहि पूरणदेव ७७ ब्रह्म अन्यही भानहीं देखु सामंत्रु- तिजाय । तत्वं प्रतिवर्णन कस्यो प्रिविधि जीव दुविधाया ७८ अकल, निरीह निबंध पिनु निर्मलब्रह्म सुभाति । जाइञ्छाते देव नर त्रिपुर विभूतिदिखाति-चिदानद पूजो चितहि बुद्धिचा- सुरीत्यागि।। शुभाव घ्यावो विवुध निजातम मतिपागिट पावनपद पावत चतुर भातम ज्ञान प्रताप यानभांति युंगचोरि लगि नयतान जन्म सँताप.८१ योगामार्ग अष्टांगहै सोधकांतीनि प्रकार काव्यभाव खोजत फिरत,कर्मन-रहित पसार ८२ यक- टक, निरखै नासिकानासा-ध्यान लगाया अश्रुपात परमाणबुध. रहे अमीरत पाय ८३ नित्यक्रिया साधन करै देह धनित्य विचा- रि॥ आतम पातीहोइ नहि स्वयंब्रह्म-उरधारि-८१ ब्रह्माविष्ण महेशजो फर्ना पालकहारि तेसमाधिकरि बलको ध्यावतकोनर नारि-८५ युगात जा,क्षणकनहिं जातुन अायु प्रमान ॥ज्योति निरंजन-बाहै सदा स्वतंत्र सुजान :१६॥भयो स्वतंत्र न दिस--- कत वेदाभेदको तात ॥ अलखश्वगोचर-ब्रह्म बुध भ्रम घिनुबुद्धि समात ८७.माया जासु अपारहै; पार लहती नहि काइ॥ प्रश्रम माया-भेद: लखुपाछे आतम सोइ बतातीरप' अर्चादि जे ते नामुक्तिपद दाति स्वर्गादिक दायक अहूँ ढ़ता मूलबखानि ६. ज्ञानदीप उर गृहधरी मोह तिमिर बहिनाय सारावस्तु .

मंगलविनोद। निज खोजिले क्यों फिरि आवै जाय निरगुण मत 'सरगुण सुमत प्रातम ज्ञान प्रधान ।। आतम विनुजाने विधामोक्षान तीनि समान सारख्य यजेत योगहि करत मोक्ष हेतु सज्ञान) मोक्षपरे सुख अपर नहिं भोग योग कल्यान १२ मनुज-योनि सब योनिमें उत्तम मोक्ष सुपान. ॥ याहित्यागि पुनि कोटि विधि लहैन पद निरवान८३ आपु आपुको भूलियो पदवीं पूरणरूपं ।। क्यों'चीन्है माया बिवश प्रकट न ज्ञान अनूप ६४ समता छष्टि सुचेता बुधि मन वेगता मिटाय ।। पद अापन तापनःविना कसं न चीन्हु मुदपायं ५.शील क्षमा दाया धरै परउपकार सुकाज ॥ उचित गृहस्थी धर्म यह अतिथि तोप शुभ साज ब्रह्माचार विचार युत निराचार निईन्दै ॥ध्यावत धर्म निरंतरै पुरुप पुराण स्वछन्द-१७ मन,मिक्षा मम माति, नितं तीरथ उरमें न्हाया सत्यहि ज्ञान प्रतापते आशुमुक्तहलायरीजोंन त्यागिहै। व्यं- गतातौ न पाइहै।मोपण मोक्षविना उतपति मरण लगारहहि नहिं तोप मंगल मनकोबोधकृत महामोद उर आनिः। शिक्षा पदानिर्वाणको प्रथमहिं स्वर्गबखानि १० ॥ 'इतिश्रीमत्सकलअज्ञानहायासवागनुबुद्धितियामंगलयिनोदकोया मंगलदासविरचितायां निर्माणपदवर्णनानीमप्रथमश्थतक । दो ॥ परिपूरणेधर्मज्ञता परिपूरण विज्ञान ॥ परिपूरण के त्यांणमय पारब्रह्म शुभ ध्यान बाह्मण होवै ब्रह्मविद समद- से शुचि साधु ॥ तेजि त्रिद्वीप निज वातानिज जावै 'ओराधुर एक लोकदै भूपहैं संगुणसार निष्कामगा समता दोनों क्यों लहै लाम हानिदा बामा३ अखिल लो आशा विध्योन्तुनिले उत्तम ज्ञान ॥ याहि निवारै शुद्ध मति शांति स्वरूप सुजान ४ उत्तम मति देखतफिरी कर्म विकर्म समाजगा-निज मन करतल निज किये यथा रंक तिमिरज तीनि तीनिमें तीनिर्धार केला प्रश को आहि ॥ पूरण पुरुष अनादिको आदि चत बुध नाहि ६ काम . 4 मंगलविनोद वासनों घर्मि मंग जीव चलत धनचेत ॥ नरकासना जीवको तिकचर बुध देत क्रोष संग पदयाँ रहत हिंसकतालों नेह ।। हिंसादायक अधोगति मूढधर्म नासदेह ८ मदमदता संभहकिये नीचऊँच नहिंजान ।। यहंभावदानिरयपद धदत गूढविज्ञान में लोभसंग वसलालसा होतसोपूरणनाहि ॥ जीवनध्यावत यात- मा चन्तसत अपमाहि १.० मोहमहा पर्जितकरत सतमारगते बीरगातिापशा नित्यानन्द जी जीवसों होताअधीर, ११ येपांर्घा वटेपार, सतमारंगके तात ॥ तूप्रथमै इनतेवचै कहभूपति सों घौत १३ रक्षकयाको अापतट सुन्दररूप विराग ॥ भट विवेक सन्तोपत्र क्षमीदया अनुराग-१३ जोगरीरधारी त्रिपुर सो श- सर विनुहोई ॥ संशययामें बुधकहा ध्याउब्रह्म पदसोइ जी नभयो उत्पन्न है धरुनमरैगोअन्ता वीकीसुधिको कोकहै प्रहेनि रादि निरन्तर निकायोनि चहुँखानिमे चिपहिरहा समाय ॥ कोद्वितीय ज्ञानीवदत पैनाहीं दरगाय १६ पूपणकर सयोगधन विन्दुधनु बहुरंग । उपजततिमि मायीगों भयेजीव पहुस- ग:१७-धनुनय बौझूठहैं धनमाया नथिजात ॥भानुउदयपूरए सदा तपान ईशषपात १८ कालपीय नायतनही जन्मतहू न वतंत्रयोंजान निजइन्दको बाधेमायायंत्र.१६ इच्छाजाके ततकी ब्रह्मतौरव्य, पदमाहि ॥ सोचीन्है, निज आतमा तासुअश सोत्राहि २० कैमलबसत जलमध्यजिमिपातमिलित पयहोत ॥ भेदत्त कैसो ताहि नहि भीतर वाहिरपोत २१ चञ्चरीक योजन बहुतायत काज सुगन्यि प्रीति-सत्य त्यागतनहीं,जातरैनि सहयन्धिारर जलचर जीव-पार जल वरातमीन अहि-मेक। भेदन जानतंगन्धिको क्योंकर करैः विवेक २३ लोकरीति.ज्ञानी करते धर्मरहै जगशय ॥ तिनहि न बांधत कर्मते जेनिकर्म स. वाम र ज्योतिनिरीहानसान है देखिपरत, परिपूर ॥ ज्ञानीचारों दिशिलावत देखिसिफत नहिंदूर-२५ को स्वार है,दीपको धारें कजल-भीमा टेकगही सगृहेतुहित-तैसेकर्मऋपीयर ६ मारगमें मंगलविनोद रज रजेत जिमि रहत निरादरनित्त ॥ सतसंगतिपवमानको - ची चढे अमित्त २७ को कविता जानत, सुजन जो सवितान- प्रकाश ॥ निरालंब निरधार मग चलतसदा दशाश२८ दुविधा दोहाअर्थफी ज्ञानबिना न नथाय ॥ सज्ञानी दुविधा रहित कहत ज्ञानगुण हाय २८ महापुरुप सोबापहै महत्तेजबहुभानना महा- शक्ति इच्छा कहताशटो परमान ३०-तजै शुभाशुभाघासत्ता रहै एककेपास ॥ द्वैतभाव विनु जानिहै शुद्ध चितानंद भास ३१ कर्मप्रधानी जगत' यह कर्म न त्यागै बुद्धः॥ जासुःकर्मलखि म: नुज जग गहै सकल मगशुद्ध ३२ अखिल धर्मखोजे,प्रथम तजि हठमत मतिमान ॥ सत्यगहै,तजिमूल भव ताहि कहत-विज्ञान ३३ निज धर्मन त्याग नही जोअतिवत कृतकर्म ॥ अानमनुज ज्ञातिज सकल गहें सत्य निज धर्म ३४ घडेकर्म कर्ताभयेनामी कामीनाहि ॥ फलकी तृष्णा चित्त नहिं ते ज्ञानी भवमाहिं । सतमारग वेदांतको ताहि निधाहै कोइ ॥ बंधनाता संसारतेमा- चिजायनर सोड ३६, नीवन सूले स्वश्वास है या नहीं होती। ना को जानै सिद्धांत नित बदत सत्य है जौना३७४गमन होत अक्षर सुभग प्रविशे पूरण वानि । यहजानै जोजी तौपहियाने अनुमानि ३८ जन्मसकल अर्चाकरी मूरतिमयी-सुदेव । स्वर्ग. भीग फल तानु भो रहो मुक्तिको 'भेव ३८ तीरथाच्या आयु. भरि अन्तबसे सुरलोक ॥ मोक्ष पदारथ हाथ नहिं आयो भेन विशोक ४० विष्णु भुहित बतकिये रविवत साधि पार ।। दृढ़ताबंशफललोकदा मोक्षन भी करतार ४१ काठ्याधना न्मभरि देव पक्षबहुभांतिः। देवलोकभो अंतमेमोक्षनही देरशान ति ४२ प्रतिषितोप नितप्रतिकरै दयायुक्तनिरदोष ॥ पाराधे निज घातमा अंत सुपावै मोव ४३ प्रीतिसत्यप्रतिपालिये निर: गुणमत उरचारि ॥ वेद वाक्यसत्यात सो जाय जन्म निरवारि ४४ चौरासी लख योनिमहँ चारिखानिके जीव तू भरमा निन । मेंसंटो कहां मुक्तिको सीव.४५ उद्भव भोनिन कर्मवगंधदतवेद -4 - " मंगलधिनीद। ५८. विज्ञान वर्ग नरक कर्तव्यवत होत मोक्षधीमान ४६ ज्ञानवि- नाबूझत नही पूरण पदको भाव ।। बूझेबिनु सूझत नही मोक्ष होनको दांव.४७ जगत प्रीतिमह. बँधिगयो जीव ब्रह्मकोय । कठिनमुक्ति सतसग बितु पढ़त नहीं हरिवंश १८ नित प्रतिक- रत पुकार यह हौं परमातम यापु॥मानत नहि शिक्षा विना कृन विपरीत अलापु ४८ राम राम,ध्यावत सदा मर्म नामको श्रीनालोजाने बिनु स्वर्गमग जात कहत बुधिमान ५० नाम भेउवानिकै जपै सदा चितलाय ॥ पूरण ज्ञान प्रताप सों नापमिल द्वै जाया ५१ जीव खोज मिटिजाय जब होड-ब्रह्म- पद लीन ॥ जन्मामरणके दण्डते मौचि जायसुप्रवीन ५२ कहै भेद नहि काहु प्रति लीनरहै सबमाहिं ।। आतमही को ध्यान उरी मुक्तहोडाभ्रम नाहि ५३ निष्प्रेही जगतण लखत सर्वासार • प्रभुत्वं । लीनरहतं निज आतमा प्रकटत अमी मृदुत्व ५४ जि- मिविरक्त वामन लखत दाताधननाम्वहात ॥ तिमिज्ञानीत्रैलो- क्यको लखिनिज माहिं समात ५५ कर्म शुभाशुभबंधहै जबल- गिफलमों हेता निरफल कीन्हे कर्म सब अतमुक्ति लहि लेत पद संभव काको नामहै अनुभवकोसंसार । जन्म मोक्षद्वौजा- ति में यहसचौग विचार ५७ यमबासन रौनियम कृतप्राणायाम प्रवीनमा प्रत्याहार सुधारणा ध्यानसमाधि पक्षीन ५८ यहा- टांगयोगह सिद्धियोग विज्ञान । जाकेउपजत चित्तमे जात अ- विद्यामान ५८ मायासपिनि सर्वदा उसेजीव सबधाय ॥ पिन माहुरि विज्ञानगुरु कोजगसकत जियाय ६० मालबिना मिलि जातहै वस्तुअमोल पुरान ॥ यादेहोके भेटमें कृत नित महा- न११ परमहलपद पायमन बस्योहदय महँयाय ॥'अतिचाच- रजको प्रश्नयहें दुविधाकथीन जाय १२. संन्यामी मंतिमानजे त्यागेभवको भूला लिप्तजगत नहिहोतते गहेज्ञानतरुमूल ६३ मारगयो भ्रमिगयो निनमति भ्रमसे तात.। जबलगि मगढ़- नमिले तबलगि मनभरमात ६४ सत्यसिंधु. सर्वज्ञशुचि पार- - 1 म मंगलबिनोद । ब्रह्म सदभाव ॥ दोपशोकते रहितहै पूरित त्रिपुरे प्रभाव 'ज्ञानिनके तनत्राणको भेदतकाम प्रतन ॥ वैनघाव घातकलगत जिमिनव कीन्हेदूंन ६६ लोभकोष वितहृदय करत निरादर तास ॥ सद्भावी ससारमें मनंहदकृत निरासा ,६७ समदर्गी विज्ञानमय परमहंमा सुरवरूप ॥ कीदवल्ल समकरि लाखत ध्या- वततत्व अनूप.६८ किमेतीनगुणामयत्रिपुर तीनदेवपरधानः। अहंकार मे अतते नामिलत विज्ञान ६८ पंचतत्वमय जीव- संत्र देहधरेतिहुँधाम ॥ नाशवान यो सफलहै तूभजुअातम - म ७० कल्याणोतिहुँकालमेंसंतप्रतियादानि ॥ सगुणगुणसभंग मत करतसत अनुमानि ७१ तपसावुनपट जन्ममलि पाप मैल हरिलेत ॥ धोयशांति जलस्वापुति सकल भांति करिदेत ७२ संजमडली बोधटा सतमारंग सोपान:॥ सेइयज्ञानी कपटतज़ि पाइयपद निर्वान ७३, इन्द्री दिनु जीतेकवौं द्रवत न अनुभव वस्त ॥ महाकारण भावशुभ.जायकज्ञानासमस्ता७४:जीतिय इन्द्री आपनी निजब मनचललाय। परमातम निज यातमा भजिये चित्तलगाय ७५ अजिती बझज्ञानरत पावतकटग्रलेखा। तत्त्वलहतं नहिकोटि विधि कृतघहु कर्मविशेख७६ कर्मसाधना करिगह्यो ब्रह्मज्ञानसुपन्थः॥ मनवशा भोनेन्द्रिय सकल-भ्रामिक नानानन्ध ७५ एकपरन्तु विशेषता ब्रह्मजानकी प्राहिः। अन्त नरकनिवसतनही अजिती स्वर्गबसाहि ७८ पुण्यवान धनवान शुचि सुकुलसुबुधि सुविचार ॥ ब्रह्मज्ञानी, भ्रष्टतप जरयतप अवन तार ७६.ब्रह्मज्ञान समानतप-जपविद्या कड़नाहिं मोक्षदात घननीरसंम व्यापक सबधरमाहिविष्याभक्तिसांचीकर पर प वैष्णवकोइ ॥ तीनजन्म के योगों मुक्ति लहंगांसोइ ११: निन्दादूसरि धर्मकी करतवैष्णव जौन, सोतो कोटिहु जन्मल- गि भोले होत कौन ८२ भक्तिमय नरौलहै स्वर्गवासदभक्ति सकलवैष्णव धर्मको सारभाव, शुभशक्ति-१३ विख विष्णुमय: नानिकै भक्तिसढ़ता साथ ॥ करतवैष्णव रैनि दिन तेजुध होत:

-- मंगलबिनोवा ६२ सनाथ:८४ गैवीहूयाविधि करै शक्ति उपासक जौनमा सत्यभाव भवतेतरै जन्मएफ द्वै तौन ८५ ब्रह्मज्ञान सुअग्नि है जराजन्म तणरूप ।। भस्मतनिकटहि जीतही यह सिद्धांत अनप८६ को- टिएक महमनुज कउ उधारत विज्ञान ॥ अनुभव दर्शनं ब्रह्म लव घातम तत्त्वसुजान ८७ धिपणादृढ़-करियापनी कमठ तु- त्यगोखींचि ॥ निजयातमको उद्धरै लखैन.गतिकविनीचि टर पवनसधिमें पातपरि आपहिचढ़तत्यकाश ॥ ब्रह्मज्ञानाहँ जीव परि ऊरधकरतप्रकाश शभरोसविहाय जग ब्रह्मज्ञानवि- चारु॥उपासीन, पथसेइकै निज जन्मांतनिवारुघटघर्टब्रह्म अव्यक्त है अव्ययप्रकट लखात ॥ ब्रह्मज्ञानसुदृष्टिमग दुष्ट प्रकृति नहितात ११ जाकेडच्श मोक्षकी सोयहकर उपाय-गृहका- ननसमताधरै मानसनेह विहाय ६२ कोटि जन्मवन बलिम अर्जिती श्रद्धाहीन ॥ आवागमन नपरिहरै यह. सिद्धांत क्षी- न ३ घालवामा:घंधुयुत प्रसैभवन मतिधीर ॥ उदासीन अन्तरभजै भातम मुक्तिसथीर ६४ जाकीमाया अति प्रबल धि- स्चै चौदह धाम । सो प्रातम तन ब्रह्मविद योगगम्या परिणाम ८५ समुझत बनतअनेकविधि कहतवनतनहिंसोड ॥ ब्रह्मज्ञान परसादत्ते गुरुमुखबूझै कोइ-१६ यथा भामिनी भोग सुख कैसे सकै बताय ॥ करवाये-धिनु कर्म सो यो समुझे चिंतचाय ६७ सोवतमें जोहै दया ताहि वतावन काज॥ कोसहाय करि सकत बुध सोयो बुद्धिसमाज, ६८ मोक्षदगाकोसौख्ययह जानियप्रक' टनं तात ॥ वहितारण कउ कोटि महँ. यामगमहँ ठहरातः । मंगल सांचाातमा जग, असत्यःसाभांति ॥सतसगति जानित करत सेइयत्ताफीपाति:१०॥!'; RAFFICE इतियोमत्सकन प्रजानहायां संबोगसुद्धिकर्तायांमंगलविनोदकाया 'मंगलदासविरचितायानिणिपदवर्गानो नामद्वितीयप्रशतक. ३॥ * दो० ॥ जोपै ब्रह्मज्ञानमें बुधिः न लगैभरि पूरि तो पुनि --" P - Tra , मंगलविनोद भक्ति सुमल्य करि गहै.ज्ञानकी मूरि १ सत्य सनेह लगाइक्ररि ध्याचे श्रीभगवान-॥ आदिअंत.यकरसरहे लहै परम विज्ञान र भक्तहोइ सद्भाविका चलहठ त्यागी सत्य ।। अत विष्णुपुरवास लहि मेटै भव आपत्य ३ान ओरहेरै नहीं प्रीतम सांचात्या गि पूरणभये निघाहके रहे तासुतट लागि ४ वाणी' परिहरि कपटको दंभ भावना हीन ॥ आराधै।शारगवर होड न यमदुख दीन फिकर लौंजोभावहै सोमन रवैनित्त ॥ अहकार ममता तजै सबदिन वित्तावित : ६ मित्रमानि सबनेह तजि वादी सों करु नेह ॥ अंतप्रीति वय-वासना लैनैहै वा गेह ७ जाफोरूपन- दृश्यहै दृश्यमान किमि होड ॥ सत्य प्रीतिकी रीति यह अप- नावै त्यहि सोइ ८ प्रीति प्रतीति स्वचित्त धरिध्यावै शारंगपा- निः॥ मुक्तिपदारथ करलगै योकवि कहत बरखानि करै प्रीति हठ भावतों तजै न कोटि कलेश ॥ नारायणकी कृपाते बसैनो वाहीदेश १० विन्न भयकर देविमा तजैन कर असिः प्रीति ।। मारिचलै निज प्रेमपथ यहै मित्रकी रीति ११ ऊपर ते हितकी बदत अंतर प्रान बिवार ॥ सत्य प्रीति भामीन उर कौननिवा- हन हार १२ मंगल प्रियतम सत्य जोगह टेक सेतोयगाथा: दिअंतन्यकामावासों ताहि मित्र दरशाय १३ मंगल दलोदक्ष ज्यों हठ तजि फलन दुवार ॥ मत्यव्रतीत्यो साधुजन नाहिंधरत अवतार १४ सहन कोटिभर पंथमें मृगवन सुन्यो अलापु ॥ प्रीति विवश श्रावत भयो प्रण घश नहि संतापु १५ अहि सुनि वाणी वेणुको निकत्यो भवन बिहीया यदपि गह्यो अहियधिक स्वहिदि दण्ड समुदाय १६ दशन भर्जिकिय बंध त्यहि बहुरि वजायो बेनु ॥ सुनैलग्योमानन्दही प्रीतम'चाणि सुरखेनु-१७का' लकाल का करि सकत पूरण पुरुष अनूप ॥ तासु प्रीतिते अभय मन पावैगो निजरूप १८ तन ते पूजत देवता मनत्ते विषयी ध्यान ॥ प्रीतिसत्य लायन नहीं क्योंहोवे कल्यान ११ एका- दशी बत्तेरहेन्नारायण बतजानि॥ उराशा भव भोगकी क्यो म है मगठबिनोद। होवेल दानि,२० जगन्नाथको जातभेमन त्रिय तनयसनेह ।। मन निराग-आयो नही क्यों बसिहै सुरंगेह -२१ ककर: सेजब- नाइनित सोवत दुखित शरीर ।। लाभ, लालसाः उरघसै क्यों मिटिहै भव-भीर २२ अग्निचोरि दिशि ज्वलित मधि वैठितप. तनित दण्डः ॥ भक्तिभावमन शुद्धनहिं क्योसुखहोइ अरवण्ड २३ बिनुन्हायोनल पाननहिं -विनुभिल भौगन भोग-ना तृपा क्षुधाउर मालिनी कहामुक्ति, सयोग:२४ कोमलबचन मयूरवत निर्णय ज्ञात अनेकता कामलोभाअंतर वसे कस यह भक्ति धिवेकर भीषकेश अज जोरिक भूतिमर्दि निजे अंग ॥.मौन गहे मगधा- मिनित निदहि तीरथ गंग.२६ श्राप वडाई नित चहत निदत धान सुजीन ॥ प्राध्या वासी अजित मन कहांमोह-कल्याना२७ बहुत-हारी भक्तनहि निराहार नहि संता सत्या प्रेमको मरा गहै सुख समाज,त्यहिश्रत २८ालानत याननं नापसम गुचिके मारगमाहि-॥ अहंभाव दुख दानि भवः अंतहु सगर्य नाहि रट प्रीति रज्जु महँ घाधि मन संतमंग देहचलाय ॥ज्यों नटवाया- खामृगहिासहां चलै लैजाय ३० कामी सेवत नारि ज्योम्यान प्रीतिकोत्यागि-॥ तूंमगलमन तौन विधि रहुप्रीतमरसपागि ३९ दोनवस्तु बिनधिशिरम ज्योदिनकरहिनिहार ॥त्योमगलमन तूकर-पूरणप्रोति विचार.३२ मनते तनते वचनते क्रियाकर्मधनं ग्राम-सब विधिलेवै मीतपग जगसुरव पुंनिहरिधामा३३कोप- हित कविकीन है फोज्ञानी गुणरूप॥ नीतिविना निजानाधकी पतिबिन नारिश्चनपा३४ भूपप्रतापी प्रीतिमवाचाहतासघनंग लोग ॥ शिन्न विभव पुनिता हिसब-कहत महीपंचयोग-३५ नेकले जमात स्वारथमयी-अनस्वास्थहितुहोइ। मगलमन संसारमहँ ने- हनियाहत सोइ ३३मृगबपियधिकस्तहेतुगिर मृतक चलोध- रितात मूरख-वनधानी कहै मनुजगीमा मृगजात को फराल को सुगम को शुद्धि ममारक कौन ॥ मत्यनेह शारंगधरे जरलोवैबुधतीन-३८ जो साचामारग वद्रत ताहि कहत हैं दम ।।

६.४ मंगलैबिनोद पूजत इलमयादेवता फोन्ही कॅपटारंभ ३९ जबलोंग प्राभाभी गझी तबलगि मीक्षन होत ॥ प्राथमिटे भवकाम की अनुभव करत उदोत ४० मातपिती तियराँत सखा तजिकैघनेंभिखारि गृहगृहमान गमाइयो क्यानो, अविचारि ४१ कैमर्माक्षरलोपत नहीं कोटिउपाय:प्रवीन । यतिमएक विचारबिन जन्म जन्म दुखपीन ४२ ज्योस्वपने महदीननर नरपति पदवीपधि । जा गेरचक सुख विवुध तथाजगतको भाया चारिपाच गुणवीचमें । विविधजन्मातले । विषयवासना प्रवलमना अमितदंड त्यहि देहाट मायाब्रह्मा अपारचौघातपपूपर्णदेव ।। प्रतिप मित्र पि. हीननहिं यहै द्विपदकोभेव ४५ दोन दिये धनलोभ है तृष्णांवृद्धिक साता ज्ञानदीप प्रचरितनहीं व्यापारीकी बात ४६ देशभेदकों जानिमन बणिकभार भरिवस्त ॥बेच्यौदने दामलगि तैसेंदाम समस्ता४७ नरमेधावी कर्मकृत लाभहानि तजिदोइ ।। पापपुर रायभायातजे लहत मुक्तिपदरसोई गुरुसा पूच्यो सत्यवत कहइन्द्री निजसाधु पूजनसाचे देवको अतिमही भाराधु मूरखजडलौं रहे जानतज्ञानन भक्ति ॥ नाममनुष्य निवासि है अंतनरैक बिनुशक्तिीपूज्यातंत्रफ निजउदरते तंतुसमूहबनाया प्रधानाचारसों जीतअतपुनिखाय शऐसे निजवा राखि कौगरेलमस्त मतयुक्त गवाहरभीतर कर्मकृत जीवत सोनरमुः संस्कमठाप इन्द्रीसकल स्वबशपसारत वीर ॥ पुनिकपत्त निजागो तथानिमंतिधारन्यू ३. खोजाचीहै ब्रह्मपद अनुभ वकोशुभदेशान्तौसतमारगावितधरू सुनिसतगुरु उपदेशनमा वित्त सिद्धांतकाकर्मफे सेयेनिनुगुणपाया मुक्तहोई मंगला नहीं जन्मथनंत श्रमाया५५ जानतंत्रातमागमति जानेापान: शायजाव्यधादुरधापविदुजलामिलततरगलवायद तीनलोक यापकविरूज देखतसबकेकाज त्गुिप्तप्रकटा सवठामः प्रभु भर्नु कितमान निर्यात पूछनारिपुरुप कहिलेकत को अलख अदृश्य अकायाज्ञानदृष्टिबूझत यदपिाको बुधसंकत बताया उपमा .

मंगलविनोद। ताकी कौन लोन बिलोकोदेव ॥ चकल, अभेद अद्वैतको क्यों करिभा भेया ५८ ज्ञानसूर उदयत हृदयाबुद्धिनयन सौ देखु ॥ धर्म ज्योति प्रविनाश सो पूरण- शब्द अलेखु ६.०..शब्द अनाहत नित करतः सोवत जागतएक, ॥ सुनत होइ मतवार बुधजनुमधु प्रिये अनेक बार जोजो रेख ,संसारके सोसव-तामेंजानुः॥ मगल मन चितादेत नहिं यहधौं कौन-प्रमानु, १२ सात स्वर्ग:वसि जन्मालहिापावै कर्म विभाग । सुख दुख मान श्रमानभव, विधु आतमाभनुरीगः ६३ कोटि, भार हाटक,धरयो रत्तीएकपरखाये। जानों र्सवको मोल तिमि ब्रह्मजीवके भायें द४ अक्षर एकै रूप है मानारूप अनेका। सोमाया गुण तत्व बुध.अक्षर ब्रह्म विवेक दुध पीरबती रणचढ़ि लरत पद पाछे नहिदेत ॥ तथा प्रज्ञस- 'वोग मतं दृढ़ता करि गहिलेत ६६ निज पति मरण, विलोकि -तियामोह विवश सतिनेह- समुझायोमानत नहीं ज़ारत पति -सँग देह-६७ज्ञानवान गहि सत्य मत तैसे त्यागत नाहि.। हद करियावत मातमहिं पूरण पहिसमाहि. ६६,मेरमित निरगुण, सगुणादोनों प्रातम ध्यान-गुणन होत. तोगनिगुण फोझो पूरणेज्ञान ज्ञानीको ज्ञानविद विनतम सुवि- चार:॥ अनुभूवे तिद्धि स्वभावहै कलौ कर्म विहार ७० जानिा तमा योधवा बहुरि भुलानेश्न ताहिप्रवोम्योज्ञानमत हौध- जान प्रज्ञा वृक्ष षदरिफल कोरगहि-काननगयोकुडोय, वीजगिरे जामतभयो सूर भूमिजलपाय ७२ जेपियन चीज में परमातमकोत्तातं तौकस बायो फलफल्योयों सबजग दरगात, मीनउदकते रहिताफ़िरि जियत-न-कोटि उपाया, मंगल नई जडता क्विय हिततजिअहित भुलाय ७४म्बक देखे, लोहके कस्तचेशभाव ॥ मंगलमनलिहिज्ञान हितु लग्यो न नीच स्वभाव ७५ लिइतेऊ प्रीतम गुणन सुनत न देखतदेहता शुचि इन्द्रीपाये मनुज वसत, पकेगेह ७६ काम क्रोध लोमा- दिपोजानत सुरवदा मिना क्यों समुझा जीव कयमिक ६ २ " मंगलभिनोहा रोत चरित्र ७७ मोहपिंजरा दुःखसुख छैकपाट भ्रमयंत्र जीव- लिहताव परपोतारता होइ स्वतंत्राटास्वाद विषयको विष तरसवात मीठ गुणाल जानि, चैवत सूजीव कयों ध्याउ देव पाल विषयवाद भाक्त रदय जैवलगि जीवहि था- हिा ब्रह्मसुरवहि. निररवत चतुर तबलगि कैसेहुनाहिटि कोटि बानवे श्वासकी नर आप परमान अिधिक क्रिश्वासामनुज जीवत नाहि-तुजान : म.स्वाताको एकपली गुशी दिवस निशिश्वासाप्रंटयत सहत इकोसमेंगत श्वासा विश्वासादर भंतादियाविधिवहै जीर्वतनैं जादेहनाजीव यगतं घीसंही वर्ष चतुर नसँदेहाश्मनमधि व्यंग विचारकृत दूपत शास्त्र भिदेश मुक्ति चिहिते कर्तव्य विनुत्तन विभूति शिर केश ६४ पापीपपिन परिहरै धर्मासंगको हेरितदीप दुवितई चितरह। चिततप्रापहि रिटरद्वाधिन पूजननहीं जपने विनाअनु- मागीश मोक्षन अतिमध्यानपिनु मायााईपविभाग और- नको शिक्षा करत निजकोणी परित्यागिशिक्षक अंधविहीन. वाघोटबित्तावतान्जागि ८७ लघुतागुरुताकारगहुँ एकशब्द की रीतिमा दीविचार ज्ञानमयः पूरणब्रह्म प्रतीतिदाद सुस्प नहिं मंत्र शुभ गायत्रीढ़ नाहि प्रम बुद्धिमय, मन्दसी मझज्ञान के माहि कलिमला तूल समान है। शब्दाधनंजय लिहिताझिानामामतांशब्द में लवलायो हितविलापजन्म भर मग विचस्यो नरमपुपायता ।

- ITTE मंगलवितो। • सम्पफ-विधि तिजामातमा कत-ऊपमा निन्न दाजी योगी निज भन्दकी परखि रंगाति लेइ-सावीव महाँ धतुरबुंध सो न सत्यापम देह बाह्मण क्षत्री वैश्यधरु शूनावरण चारित। वैको दुविधा जानसत पंडितलेहि विचारि विष्णुमयी जग लॉनिकै गहै वैष्णव पात्र सत्य शब्दध्यावनकरै त खपद फोभावर यो सिद्धांतहि जांनिकै मगलमन आजाराम । इति इतदोनों पोरसुख पूरिपुरणावित्रीम-१ply. इतिश्रीमत्सकलसानहत्तीयोसागसबद्धिकतीयामगलविनोंद्र कार्यामग- लदासविरचितीयोभत्तिमार्गानवार्णपदवर्णनानामतृतीयश्यतक। ई. HTTTTPM .? दो कोटि जन्म तीरप यजै लाख जन्म-पिल ध्यान । मंगल नहि बिश्वास रढ़ कहा:लहै,कल्यात १. विन, सँतिभाव न-सिद्धि कोट पूजन लप-जगहोत ॥ सत्यभाव: मंगल सदा मंगल फिरत उदोतर काठ मृत्तिका उपलकी: मूरति महँ नहि देव को शुद्धभाव विश्वास दृढ़ कालवा सदगुरुभव-३ वर्षण पूपण-दिणि लखत उगिलत-ज्वाल समूहः॥ तिमि-मन-मातम और लखि स्यांग-ना विषयक जूहँ । विषय वासना चंचला यथा स्वेरिणी बाम। कोटि पतिव्रत धर्म सुनि, परपति निरखिसका- म. छल प्रपञ्चकृत गुप्तही प्रकदत कालहि पाया। प्रीति भंग तब होतिहै विष्णु पौंड्रकनायकाकवेप करणी सुकुल पावन था-मराल परमातम घर, हंसफल पावन बायस घाल-७ जिमि किसान-निजखेतमें जोवोवता सौहोत ॥-ऐसे काया खेत में करणीरुरत-उदोत ८ मिनदोहपरतिय रमण मिथ्या साखि अलाज । आनपाप बबाडिकरत, उपरभक्तिरसमाज उरभुजा दिमालाधरे गालमिल गालियाना मिथ्याचल निवसत स्वय धारिगये सकनाम अंतर वाहिर एकरम,शतभावी शुचिता, ध॥-पर उपकारी ज्ञानमय तापद मन आराय-१,१. यो ज्वारी निज पाउँको करत, चिन्मय सत्या औरनो सारथ नहींतत - - . मैगलपिनी बुध प्रीतम नित्या घटकेतर वाहिरे देखिय प्रकटयो । घेटफूटे घटहीन नाहीं गगन-विनय तथा जीव अरु देह 'यह ज्ञानपथ गहिदेवु । अविनाशी अंजनगुणहै निज श्रीपापदे लेखु १४ जाग्रतमें ज्या ध्याइये त्या स्वप्ना करुनेह । कोरिया सु- धुति में वह जो कर्तब निजदेह १५ बंधन काको जगतमें मोक्ष 'कौनकों तात ॥ अविनाशी देतको यह अचरजी-पाता। जरैअग्निसों यहनहीं नीवपर्म अविनास ॥ अस्तीत्रकारकटते नहि.सबदिन पूरणभास.१७ गृहाजात प्रतिषिवन हि जिमिकर, सों गुणकोटि । त्योही यहशुचि आतमा क्योंकोउसकत अगो. टि १८ मस्यौ न मरिहै अमरचज भयो न होवन हार ॥ आपु- हि यापु प्रकाश कृत हरिमतय है विचार १ जाकेरूपं न रेखहै. श्रीवते जातं न दीख ताहि स्वर्ग अरु नपथ यह कैसी मने सीख २-० कवि पंडित कोउ सत्यमग पंगधारै सुँघि काम । तेष सींग सत्यमत गहिपावै विनाम २१ श्रीहरि अर्जुन को कियो' कर्मयोगउपदेशा सिद्धांतिनत्रातमबद्यी तवत्याग्यो भ्रमदेशक जो प्रातम नहिं उद्धरत पाप पुण्यकी पात् ॥ तेपूरुष निजा- शश करत विपद वास २३ जीवकर्मवेय विषयरत प्रासंपत्ति करकाल भरमाका सब योनिमें जे कलेशके जाल २४ सार वस्तु सो खोजिये तजि असार निकाजी मोल अधिक स्वादी अधिक शुचि, सुगंधि शुचिसाज २५ मूढ़-काँचकरमें गहत तर्जि पारस पापाण ॥ तैसे तू विषयी गहत त्यागत पद निवाण २६ व्यालं चालि बिकरोंलगभवन सरले गतिलेतस्यों मंगल तू विषयरत हरिमगु चेलुकरि चेत २७ संबंयोगनको योगहेस फल-संभ्रमय भूरि । अशल प्रीति भगवानकी जो दायक सुख भूरि २४ करमाला जापक लिये मन विषय के ध्यान मोक्ष लालता वृथाकृत अंत विषय सन्मान २ यथा गगजल घट भयो पावन पापं विनास ॥ सुराविंदु कृत अशुचितिमि जीव विषय संगभास ३'मायाको परपंच है नीच ऊँचे कुलवान ।। .

६
मंगलषिनाग
ज्यों भोजन गोमांसते विप्रगवाथ समान सुरुचि कुरुचिर्को
कर बातम तत्व विचार । मंगलमत सिद्धांतक लहै मोक्षक
रतार ३२ श्रमजलगि करिसकत नर तवलगि हितसेघर ।।
शिपिलभये त्यागत सफल तूतजु-तिनहिं सबेर ३३जिीकीवुद्धि
प्रयोध मयं ब्रह्माचार सुलोका तेबहुमोले अबंध व घसंज्ञान
थोक ३४ जो भारंग भयंकार मन सिंह से अंजश।जानि
जात किन अपर पय भूलिजात कसंतत्रं.३५ मैं स्वपनेमहँदीख
मह जन्मामो गृहसून ॥ मोहे लातानंदमें जांगिरेवा सोकहू
न३६ यहेमोहको नीदह ज्ञान दिवाकर नित्य प्रिटतप्राची
बुद्धिमय जागत पूरुपै सत्य ३७दुशदिशि प्रेमट प्रकाश हे देखि
लेह किन मौत । अछत नयन कल अधावन तूती परम पु-
नीत ३८ पाप पुण्य सुरखें दुखतुही छद्म अछा समाना जो
है सातौं आप तू क्याँ मग भूल भुलाने ३१ येथा रुधिर
सोंग में व्यापत तथा सुमुक्ति मनुज देह के संग सँग डा.
लतहै बिनुयुक्ति ४० विपय ध्यान नाशर्तसुमति यावत कुंमति
शरीर ॥ जासुप्रचलताव बसत अधों योनि सहपीर १२ कर्म
तीनिविध जानिय शत रज तमके भाय । टोयतले एकैगह रहै
मोक्षकोपाय १२ जिमियोधने नीलता दृष्टि सीवको लेखु ।।
यो अतस्य संसारके सकलंपदारय देव भीनमान अनुमान
करि वदतसकल वुधिर्वत। जानतपूरणे ज्योतिमय बाह्मणसेवेत
संत ४४ बीजनहोते गुलाब जामतर्गप्रतापगी 'नानु चतुर
योओतमा अंगअंगकेथाप ४५ करकहत्त दुविधालगत है असत्य
लंगरूपं ॥ याहिबर्डीयों जातुने सोप्रभु सत्यप४६तोनिकाले
सविनरहे तिमिभवेको धमभूल ॥ वैपद तीसरे जीवधेम ओं
दायकदुखशल ४७चालकरचिके रख्योलसेब अंतमिटावतसर्व
तिमिपरमतिम चारिश समयसमय निर्मिपर्व १८ सूरज्योति
सह विवित्तनहिं नखत्तमयूपन भोर्स ॥ तत्त्वबस्तु गुणेकॉलनहि
लहाब्रह्म बिलास लोकालोकन कहिसकैत रूप रुपन

4 , ७ संगल विनोदी कोइ। तनतहां प्रकारकृत-जातएकही, होइ.५० यथा अग्नि तृणकाष्ठलवजारिकरता निजचंग ॥ तिमि परमातम-जीव कर निमपरकरस अभंग-३१ज्ञानवानको जगत्तमह फोमरुख मति हीन -बियसभोगमहँ समदुवा-भापत निकर प्रवीनार जाकी बुदिसतोगुणी सोजानी मतिधोरणी याजगचाही जसरही अंत न. धमकीपीर-पू३. सकलवस्तुको ज्ञातर शीलवान शुचिकाम:|| माया जानत-झूठजो सुगति लहत्त, परिणाम:५४ लोभ सहित भयोहारसब मातबड़ाई चाह ॥ ताकीवुद्धि रजोगुणी घबताअखि- लंकबिनाहार त्यापनपदावीन्हत्तनहीं जड़लों रहतं समहि । मूढ़मावतमाःगुणविवश नहींमुक्तिकी चाहि बुध मण्डलीन जातखल विचरत सदाकुसंगः॥,तेंप्राणीबहु जन्मलगि लखत न यापनरंग-१७ यतनकरत्त सुरलोकको विषय बासनालीन को पावत्तपत अमरबुध दुविधालगी, मलीन ५८ जा दिन- जन्मेज़ीव सब तादिनते न मिलान, भयोपितासँग यतनंकरिअबकुरुमन पहिचान:५६ वारिधियानबढ़तअरूं-पटत न काहूरीति तिमि परमातम अकल बदनवाक्य श्रुतिनीति इन्द्रवरुणयम धनपशिखि आदिकसब नगिजात, ॥ इनके सेवनते चतुर कहां मोक्षकीवात इ.१-क्या यावत नरके चतुर जोपरीस् तजिदेइ ॥ महुरिजन्म भवगहै,लेनिजातम-सेइ.६ पाणीपरिहरि-मोह की रहातममें लोन ॥ ब्रह्मज्ञान प्रतापते पावैमुक्ति अखीन १३ मायामहा अपार क्षरवतसोइ प्रमान ॥ अक्षरपूरण, ब्रह्म है यह सिद्धांत महानः१.१ डोकार सोहं वदत प्रणव अजप, भाव, । मंगलमनके बोपत्ते सम्यकएक प्रभाव -अकलकला बिनुक्यों कहत करतलोक फार ना लिनहोतनहिं जलजजल लखुकरि जान विचारता मांगिखात सहिसेजकृत नरतरहत तजिलाज। मुक्ति होत मंगल नहीं बिनध्याये तनराजा६७ प्रीति प्रतीति सनेमानितः प्रीतमको मनध्यात-॥-मोचिनाय वाफो सिलै तब साकल्यान६८ कामी मगधम घड़ी मुक्तप्रेतहोयना सोजाने । । ५१

मंगलविनोदी
बिनुपातमा जानते साधूसोय ६ जीनतंतिम भावजे परमो.
तममाया गवत निर्वाणपद-दुविधा देतवहीय, बिना
फैमनहिसिद्धभव कर्मफलित दुधार गा-परमहंतर्मनाकरत
जानत वियफठोर जोधनियावै सहजही सो कर्तव नित
साधु ॥ सत्यभाक श्रीरामपदं जलसदा आराधु ७२ स्वर्ग-रहै -
निलपुण्यसम अमरंपदारथ भोग । दुविधामिटीन जन्मी क्यों
फरिभयो वियोग ७३ उड़तपेक्षि आकाशकह निजवल बुधियन
सागपावतवेतनाकोटिकृत मायाँ तथाअपार जोजीत माया
विवुध होई ब्रह्मसोत्रीपस्विर्गनरक व्यापैमिहींदुविधाजन्मसंताप
मोहनियालोगिउँठ्यौं लहिरविमप्रकाश चीन्हींओपनि
घस्तुसंघ निकट दूरिचहुंाश ७६ जैसेमिहोपान मेंलालीलवी
न जाय योग भये सतसंग परत प्रसिदलवाय ७७ अथवा
तिलमें तेलज्यों निवसत गधि प्रसून ॥ तथा निरंजन ब्रह्मा प्रभु
तन प्रति वोपं बिहून ज्याचरीर के मधन ते प्रकटततासुप्रि-
तावातम ज्ञानी योग रत मेंटत भवसंतापवस्वागत
नभूति गि'दुविधा बासँशरीरात पर ध्यान नीतिमी.क्यों
करि होइ सधीर ट० पांच प्रागा वासी धपापांच तत्व निरमा-
गा। यक मारगमह सब चले तो पावै निरवाण र कमलापति
फी चाहिनहि कमलाकी प्रति चाह ॥ मूरुख सूमुझत. अमर पद
फाल कौर क्षणमाह १२ तीनि पाँच पटली तजै भनेनिरंजनदे-
व ॥ समजानै लघु ऊँच कह लहै मुक्तिको भेव ८३ पांचवीसको
एक नि मनको देइ भुलाई सुमुझे बातम्तत्व को प्राणुमुक्त
छै जोर्य-२४ गुरु बागी प्राणी सुनै-करीतानु धनुसारंगाधर्म सन
फलं.जगहेतु हित करै सबल विचशिल अपनी बुषिनिर्मलकर
धेरागी मन होईयरवन एकै रस रहै ज्ञानी कहिये तोहीटर
जी कुकर्म की वाहमने तो मची जपयागा सिदि लहतनहिंकों-
टि विधि पति नीति विभाग शास्त्र उपनिषद वेदलों पर
पतपुरवज्ञानासोमानत नहिं दैभिजन कल्पत आनपुरोनट
।

७२ मंगलवितोद। वश ब्राह्मण के नाम हैं। पदक्षत्री के नाम् ॥, विविधि वैश्य यफ शूद्र है एक्कै पुनि परिणाम:४८ जिमि कंकण किंकिणि, अपर नू- पुरस्रक नाम ॥ मिलत नाम चर्जुन भारी समुझत बुध गुणग्रा- म. पाट एकही भूमिहै, रवान पानसो एका विविधा पितुमें कुंशनहीं करपे, घरण विवेक:२१ ब्रह्मा ते उपजे सकल ब्राह्मण वरग्री सर्व करणी उजम अधम लघु घरणोजम कृतार्बन नीचयातमा उद्धरै ब्राह्मण पंदमें जाय । ब्राह्मण अट:कर्मन रहि- त अमित नर्क भरंमाया ६३.युज. नाम सुनितिन कप्यो प्रजादण्ड- द्वाभूमा कयों क्षत्री वासों कहत तन मन, नीच. स्वरूप ६१ सजिस्वधर्म,रत, अपरमत जिमि पतिव्रत रतन्धान ॥ मगले तू सौगातज़ि करू,जनि पान बरवान ६५,सम्पूरण सर्वागमत या में नाहिं सन्देह । यी शुफाव्यास वशिष्ठ मृगुः मुनि यह गा.वि- देह ::मान बडाई हेतु क्यों कर्म करत जगभरि ॥ आयुगली सगीतही तज़िदे दुखकी मूरि, २७सातपांचके योगते निर्णय निपद जहानः मूल,गहै शाखा तजै सो साधू परमान, ८ मंग- मंगलाचारि दिशि-परमातम परसादः। क्षणक-ध्यानते कृपा तिधि मेदत विविध विषाद मंगल मनहिं प्रबोधनाहि. कोटि उपायन होइ॥ बिनु बिराग मारग-गहे करणी पूरणलोइ॥१०॥ तिश्रीमत्सकल ज्ञानहतयिांसंबोगसुवुद्धिकर्तायामंगलविनोदकामिगल दासविरचितायोनिर्वाणज्ञानवर्णनोनीमचतुर्थश्शतकः । दोन कर्म पात्र घटि बढ़ि नहीं कर्म प्रधान सदाहि ॥ शुभ कांजी ठरधापसंत अशुभ अधोगति जाहि लोभ विवश मित्र- न झखेत करि प्रपंच बहु-भांति ।। अन्त समय पातक संसहि.अ. धशतिध्वसि पछिताति २ कामवश्य परतिय रमण बेश्यारतनरं जोइदिएड पाइहैं सामनपुर नरकनिष सिहैं,सोइ ३.प्याक ब- णिक पैरनजिमि जानत गुण नहितासु ॥ पारख कर परिसरत्न स्वइनिजगुणाकरतःप्रकासुर तथा जीव माया:विवाजानत .

मंगलोवनोद। सोन स्वतंत्र ॥ पारख अनुभव छुवतही प्रकट्यो पूरणमंत्र ५बि- नुखायेइन्द्री थिथिल यथा विदित बुधिवन्त ॥ तिमिज्ञानी सत- संगपिनु पावत लोश अनन्त ६ कहाचहत निरगुण पदहि सर- गुण लानत कोई ॥ मंगल ज्ञानीमौनभल ज्ञानवदै भमसोइ ७ पण्डितपाठ पुराणकिय मूरख मण्डलजाय ॥ कोतक चेतक भनै कहैं बडो बकवाय ८ कुजन मण्डली सुजन बसि पंथन पावतमीत ॥ दुखित रहत सो निकरगति यह पात विपरीत चारिखानि भवभूतसव ब्रह्मग्रंथ निरमाण ॥ अज हरिहर तत्पद बदै असिपदसोबिनुमाण जावभ्रमउरमेंबसै मोहलालसासा थातबलगि मोक्ष न जीव कहँ जन्मै मरै अनाथ११ जानोंचाहत ब्रह्मगति अजधनवद अनकाय ॥ चीन्हत नाहींआपुको कहाज्ञा- नकोभाय १२ वेद नेति भापत सदा हरिहर सकत न जानि । धी नर ता खोजमेंसहत अनेक गलानि १३ बालर्भाव धारै सदा छल प्रपंच तजिदे ॥ लिप्त रहै प्रातम विपे श्रमी पदारथ लेइ ११ योग भोगमें कठिन पद पूरणताको तात॥'लघु मति" कटु गुण कर्म बिनु दुहूं और भ्रम खात १५ थक वैपानस विषय रत धुक तपसी अविचार ॥ बिनु परमातम भजनबुध क नर- काय अगार १६ गर्भवासकी सुधिनही निज निवन्धगे भूलि ॥ अबको रक्षक होइगो का विहसत मन फूलि १७ समन चारके दरश ते मल तजिही अकुलाय ॥ वैतरणी महँ विविध बिधि मन हिलोर तूखाय १८सील सुधासम सुनतनहिं गुणत नसति उप- देश ॥ सुधि भावेगी मन तवहिं जब यम देह क्लेश १८ मित्र पुत्र रक्तीभये जग अनित्यमहाय ।। ऊंचे मन्दिरकाय नर चढ़ि पुनि गिर झहरायर० जाकी बुधि प्रज्ञा गही विषय धरत नाहिताहि।। ज्यों महीप के मीतको प्रजान सकत सराहि २१ कोल भील काननवसत कवि गुण जानन योग ॥ विधमान ज्ञानीनको कंध अपनावत भोग२२ यथाअंगरबनमहजरत गधिन जानतकोल॥ तथा ज्ञान निरघाण मत मूरख मनको झोल २३ जे शैवी मति → ।

५४ । 1 , लावनादा धीर हैं। शुद्ध चित्त विज्ञानि ॥ ते उत्तम भ्रसहीन जग इमि थिव - लिंग घरखा नि २४ व्यासदेव सब वेदमत जानि सिखायो शक॥ सिद्धान्तन मत तिन गह्यो मतिमहँ परी न चूक २५ जनकराज, गृहवासि.भे विदितबिव्ह जहान ॥ यज्ञः अमित बलि भूपकिय भो नहिं मनअनुमान २६ नारद घूमत तीनि पुर करतपिशुनता काज ॥ दोपनलागत ब्रह्मपद 'लीलाकृत सुखसाज २७ वामन तनहरि धरिछल्योवलि नरपतिकोजाय ॥दोप प्रपंचनकछुभयो रहे सदा यकमाय २८ परम रानेही रामके लक्षमण वन सँग कीन्ह ।। काल पाय पद प्रीतिको तुरत समतजिंदीन्हा २४ कुष्ठी चपबिन कर विना बानो इन्द्री हीन ॥ मातम ध्याय मोक्ष को पावै बदत प्रवीन ३० धाय किये बत आसुरी पूजे तिनके पीरा। कथ सह्यो निज अंगप्रति व्यथा न ,मिटी शरीर ३१ जीन बेद पौराणमें काब्यवताचे नाहिं ।। तहां वैष्णव शेव क्यों शाक्तब्रह्मविद जाहिं ३२ पूजिय बेष प्रताप सों धूर्त प्रपंचठलोग ॥ प्रकटे छल परिणाममें सघ.विधि होत अयोग.२२ तन धना मित्रहित जीव लोभ तजिदेई । सोप्रीतम संसारमें पिपति सहायकरेइ ३४ जग नर प्रीति प्रतीति अति प्रभु पेदाप्रीतिप्रलेख। जोपुरवैनर नारिसो मेटैकलुप विशेख ३५ जन्मभयो सामान्य पद करणी कर्मद्वितीय ।। सेवत पतिव्रत कथभइ बिनासेवा, कुधितीय ३६ कल्प कल्प कल्पित रहत ज्ञानी कर्मज-माहि॥ बुधि बिनु नर रत विषय महँ पुनि पुनि श्रावहिं जाहिं, ३७ कूकुर ज्यों भूकत स्था दर्पण बिम्ब स्वरि ॥ त्यों मति बिनु विपयक-मनुज दुख पावत चहुं फेरि ३८-सिंह निरखि प्रतिविम्ब निज़मस्यो कूप परिमढ़ ।। तथानीवमाया विवंश लखेतन तत्त्वअगढ़ ३८ काक अस्थि ले भगि चल्यो देखिपक्षि पछितात ॥ तैसेलखि हरि भक्त को विषयक नरपच्छितात ४०, छर्दिरोग बशुभोजन बमन करत नर नारि ॥ श्वान खादसों,भपतहैं। निजसन महा सुखारि,११ तिमि संसारी, संतजन परिहरि हरिरसालीनः ॥ मूरखा भोगत । - - .

. मंगलविनोद स्वाट सो पापमूल को लीन-४२ व्यास पंग शुकदेव ज्यो दैत्य घंश प्रह्लाद । पूजनीय पावन भये सुनुमन भजन प्रसाद, ४३ क्षुद्रनदी पावससमय चली कु मगहितुराय ॥ तिमि मूरखलहि सम्पटा हितु अरि लखत सदाय ४४ कोही 'अरूं आयो कहां अंत कहा विश्राम ॥ निज पद खोने वुद्धि शुचि तासु विचारी नाम ४५ लघु दीरघ, एकै लखै निज प्रातम में लीन ॥ ता. हि कहत ससुभाय बुध करै न कर्म मलीन १६ दान दया-उर घास मत निग्रह इन्द्रिन युक्तः ॥ दम साधनको सिद्धि मत को न होत जग मुक्त १७ सो विकार व्यापै न उर जो अलोकदा लोक ॥ चीन्हें पूरण ज्योतिकर विम्बजीव विनुशोक ४८ प्रकल कलासो जारच्यो गहाकला अवतार ।। निगम संत पण्डित वर वृत सो प्रभु मही अपार १८ नारायण जन्म्यो जवै ब्रह्म बास्य ते तात ॥ चतुरानन तानामि ते ताते सब जग जात ५० माया ब्रह्म अपार ही काया कर्म विहीन ॥ माया चीन्है ब्रह्मको जाने मर्म प्रवीन ५१ मर्म बूझतहि जीव नशि ब्रह्म लीन हजाय । को, वरणै. अद्वैतको भेद बुद्धि भ्रम खाय ५२ जाके लानतही मिटत जीव भावभव भेद ॥ बिन जाने भ्रमवश फिरै यह मत अगम अखेद ५६-यथा करके अतरहि निवसत सिरिखनप्रकाशा संघट ते प्रफटत तुरत तिमि तन ब्रह्म-विलाश ५४ इन्द्रजाल घश पंखते होत परेवा रूप । यदपि असत्य न लखि सकत तथा जगत भ्रम कूप ५५ नट साचाझूठी कला समुझत भूमन नशात ।। तिमि माया,परमात्मा पै नहिं बुद्धि समात ५६ दीप प्रकाशित पहिगयो खोजत लोचनहीन ॥ तिमि अज्ञानी ब्रह्म को क्यों लखिपरै अक्षीन ५७ अपनी करणीते भयो चौर,, पन्दि महतात.॥दोष लगावति विधि लिखनि यह-सुनि मन- पछिताता ५८ सात दिवस जाने किये सप्तस्वर्ग फलवान ॥ एक, रहै मदि जग सब जगयहै प्रमान ५८ याखर विरचे, गुणिन- जेतिनमें शब्द प्रमान तातो भव, सब जीव मन पावत मोक्ष .

IT f मंगलविनोद ।। महान ६० रोकार पद लौ चढ़े अक्षर मारग लेइ ॥ आगम, मरण नशाय पुनि जानै अापन भेइ ६१ भेव लखेविनु आपनो लहै न ब्रह्मज्ञान ॥ ताबिन मोक्ष न जीवको भाषत वेद प्र. मान ६२ बारम्बार न मनुज वपु पावत जीव सुजान ॥ अब कीचूके युगनि लगि भ्रमैयोनि सर्वान ६३ दुविधा दोष मिटाय के सत्य प्रीति करु तात ॥ मगल नेहप्रताप ते मित्र धाम लगि जात ६४ मित्र मिले अानन्द को तू प्रापति मनहोइ । सम्यक मनकी कामना कहुप्रीतम सों सोइ ६५ कपट कतरनी काखमें काटत प्रीति पटान ॥ त खुले मित्रत्वनश कहा मित्र सन्मा- न ६६ बहुयोजन पक्षीउडत संध्या पावत धाम॥ त्यों संबदेही ब्रह्ममै लिप्त होत परिणाम ६७ बिन करणी शरणी भये मित्र हार बिनछन ॥ प्रीतिमानि यापन करत घासदेत निजसन६८ धर्म कर्मकी सिद्धि है श्रद्धाही के साथ ॥ अहा सात्विक बिन चतुर धर्म सैन विन नाथ ६६ विद्यापढ़ि पंडितभये सब कोउ कृत सन्मान ॥ ईशभजन विन सर्वथा दुखरूपी अज्ञान ७० पढ़ि निंगल मंगलरचे छन्द कवित्त अनेक ॥ मनबध घाव न वि-- षय रत भूकतखान कितेक ७१ तूमंगलमन अंतरहि पूरणराखु. • प्रतीति ॥ वाहिरसों कछुकाज नहि यहै ज्ञानकीरीति ७२ न्हा- येधोये वपुप के जाप होत्यउ मुक्त ॥ तौ पाठीन स्वजन्म भरि “जल मधि रहत प्रयुक्त ७३ जोमाला बांधेतरत जन्ममरण शरि कोइ ॥ वसत कीटतौ काष्ठनित परमहंसहै सोइ ७४ पूजेमूरति मुक्तिको पावतकोउ संसार ॥ तौबहुनरनगवासिनी करतअमित व्यवहार ७५ सत्यप्रीति बिनु मूढ़मन मुक्त न होवैजीव ॥ दंभ कपट भव कोटिकर भरमिहि द्विपुर सदीव ७६ अशत अक्षगे सुतनके जवलगि बिधन दिखात ॥ दूधपियावत परि हरत उप- जत दुखको वात ७७ जा निकरत दुर्कामको मानिन मानत ज्ञा- न ॥ मंगल तूसीग ते पावैशुभ निजथान७८ निंदा औरनकी - करत आपु अशुचि वपुधारि ॥ शिखि बोली भोजन उरग विषय 1 ७७ -- मंगलविनोद। ते बुधनर नारि ७६ जटा लटा तन पलित अति मौन साधना कौन ॥ को उपदेशन करि, सफत शिष्य, समाज प्रवीन ८०. भीखकाज उरमाल शिर भूति जटारचि 'कोपि ॥-ठगत अबूझन बूझमति संतकहावत सोपि ८१ अहकार पमित्रसन भुजगहि छल रसकीन ॥ को ज्ञानी कर्ता करम यमचर त्यहि दुःख दोन ८२ पापी सातों स्वर्ग बसि अधोगिरत बिन चूक ॥ पाप बासना उरबसी ज्यों चातककीकूक ८३ तजतन कपटी कपट फो सतसंगतिहू पाय ॥ यथा नीम तरु मलयसँग कटुता नाहिनशाय ८४ लोप्टनगं हाटक यथा खोयेनिजपदमोल ॥ नीवसंग त्यो सुजन परि ब्राह्मण मतलहकोल ८५ पातम बापु अदृश्यहै दृश्यमान प्रतिबिंब ॥ यह सुजानजाने लहत शुचिमा- रगन बिलंबलोकलोकं मर्यादहै वेदवचनकी तात ॥मूरख सोमानत नहीं कहांमोक्ष दरगात ८७ कलिकठोर पाणीसुनै नौचनको कुलवान ॥ तिर्मिज्ञानी पापंडमत मन मनकृत अनु. मान ८८ जिमिलोहेका ताउहै तिमिजीवन तूज़ानु ॥ परिहरि अान भरोसभजु प्रभुखरूप विज्ञानु ८८ नभेपिर हरियधि चप उभम भुजहरिहर धनवीजु उरविधि उदर सुलोकयह देह वि- राट कहीजु विश्वरूप आपुनबन्यो विश्वभर पुनिआपु॥मंगल दूसर कौनहै जासुजपत तूजापु८१ ज्ञानिनसोही प्रश्न कियएक दोइकीतीनि ॥ कहामिलै पटएकरस दूसर परत न चीनि १२ तवमंगलयों फिरिकहा नामभया रंसकौन ॥ कहानाम सीग को घरणे मूरखतौन ८३ याजगमें विनुनामके वस्तु न जानी जात ॥ यातेसघते अधिकम्वहिं नामप्रताप दिखात? कमठ, पीठि जामेंकवौं केश न भ्रममनहोइ । मुक्तिपदारथ भजनविनु पावै अचरज सोइ ८५ कोपसमय बुधिधिरनही रहत सत्ययह घात ॥ जैसेनिंदक वादते ब्राह्मण आपुपलात ८६ मतिदृढ़ आ- पनि कोजिये परमारथकोसेइ ॥ शुद्धमनीपी अंतमें शुभगति जीवहिदेई ६७ अमितपाप कारक सदा मंगल मंतचांडाल ॥

4 क मंगलविनोद किमिलागै सतपथमें विकल रहतत्रैकाल ८ वीस विसेगति शुभल हैातमाध्यावकोई ॥ पूरणकला।प्रकाशमय क्योंनलीन मनहोइख्यमगलबार अपारत्वहि समुझायो मननीच ।। तदापि न मान्यो दुष्टतू-फिरिगा बिपय नगीच.१००।, 7 - T; इतिश्रीमत्सकलअज्ञानहायासागमुवुद्धिकर्तायामग़लविनोदकायां; मालदासविरचितायोज्ञानोपदेशनिर्वाणपदवर्णनोनाम: *- - पचमश्शतकः-५॥ " दो०॥ चारिओर,अधजलो नामप्रकाश दिखात ॥ सोजाने बिनु मूढ़मन क्योंदुर्भाव नशात १ नामभेद जानतनही काम कल्पनाकोटि तिन प्राणिनकी जगतमे मेयाउत्तमखोटि २ विनु जाने ,हरिनामके कियेविना-गुणगाना । सतमारेंग-सूझत नहीं जीव भमतदैथान ३ जबलॅगि नामप्रतापउर,प्रकटताइनतात। तबलगि मग, विवरणकरब महाकठिन दुरखगात ४, कालकराल सचेतको निजवश करत अचेत ॥ भवसागर मे जीवकहँ विविध हिलोरे देत ५-जानत नाम न-जासुको वपुनिरख्यो भरिनैन ।' जगतमांझफिरिधानसों बरणत चतुरबनैन ६'नासधारीकपट गत ममता रहिन सधर्म ॥ विचरत पा संसारमें वधतन कर्मा- कर्म ७ जपोनाम-अजपा सदृढ़ ध्रुवलह अतुलस्थान ॥ श्रीप्रह- लाद सुनामवले कियोबिष्णु सन्मान टेकनत्यागै ब्रह्मवत नाम जपै चितलाय ॥ पूरणप्रीति प्रतीतिसो हरिपुरसो चलिजाय । जहाँगये बहुरैनहीं :पुरपक्षीण नहिहोइ ॥शुभकारी स/गमति पाचतहै पुरसोइ. १० रामनामको बलबड़ो विदित्तवेदविज्ञान.॥ ज्ञानदीप उरज्वलितकरि कीजिय ताकोव्यान ११, रोसनाम प्रहलाद्धृव जप्योसधीर सज्ञान.॥ भक्तशिरोमणि होतभे क्यों गुणफरिय वखान:१२महाबली-गुणवानकविसतमारगकेदास। योगक्रियाकरि नामको सब दिन उरदियवास-१३० घालमीकि गति नामकी जानी ज्ञानप्रयुक्त, ॥ तीनिकाल दर्शकभये, अागम कीन्होउक्त १४ रामकाम तरुवारिदिशि रमण सकल तनकीन्ह।। 1 ७६ मंगलविनोद। पाप पुण्यकै तुल्यही सबजीवन फलदीन्ह १५ रमत, कीटते ईगलगि रामपरम शुचिवस्तः॥ भाववश्य सवठामहै देतमुक्ति जनहस्ते १६ रामनामबिन कोटि बिधि वुधनगहे विज्ञान ॥ बि- दितज्ञानबिनमोक्षपद मिलत न कोटिउड़ान १७ रामकर्मकी दाम है रामसुध्यान समाधि ॥ निश्चयवशामुक्तिहिगहै बुधदे- खैाराधि १८ नाममात्र जे तीनिपुर लखितपु जानेजात ॥ जानत कौन अनामको यद्यपिहृदय,समात १८अलख कहानी लख नहीं अमल कहा मल,रावि ॥सुमति कहा विन कुमतियों देत चतुर कवि सांखि २,०रूप.कौन अनरुपको जो नहिं जानन हारः।। अकल विचारेत कला सों जिनके बिमलाविवार:२१राम नाम उर धारिये मगल सरलस्वभाय ॥ द्विविधादोप बिहायनित परम तत्वले ध्याय.२२ जासुनाम अज हर रटत योगलमाधि लगाय ॥ ताहि ध्याउ तजि दुष्टमति अंत मोक्ष लैजायर काल कलाविनु लखि परत नारायणकोभाव । कुत्सित दृष्टि नदीसही घदत ऋपय शुचि ठाव २४ ऊपर रटना नामकी अतर समता सोह ॥ विचरै निज इच्छा सेरस नाहिंन व्यापतासीहर५ अान नीचं अरु ऊचकी निन्दा तजै.सुजान ॥ जब नींदै तबआपकोसो नर ज्ञान निधान २६ औपनि करणी शुद्धनहि कहादेवको दोप खीझताभातिअनेक नर क्यों पावै संतोप २७.कोउ कहत सुर पुर सुलभ कोउकहत सुरधाम। मंगलमत तिरबुद्धिकेनरकसुल- भ परिणाम २८ देवायजै भक्तिहि करै चततीरथ करिजाय ॥ स्वर्ग लोकको बुधवरत नरक विनीत्रमाभाय २४ उड जानि भोगी तजतनरक्रपयकी चाट ॥ करतक्रिया सोहेतु"ज्य हि विल: सुरपुर हाट३० सन्यासी-स्वर्गहि डरत-पुनर्जन्म अनुमानि । यातमध्यावताकर्मलिनु फलाशाकृतजानिर१जासु पुग्यपूरण उदय भव में परैत लखाय ॥ जीवत ताको स्वर्गफल मगल मंत दरचाय ३२ पापी जनकोजीव्रतहि नरकजगत मृह होइ ॥ज्ञान वान तू देखिले पुनिलिखिके तजु सोइ.३३ एक दोर्ड पुरकी . , मंगलविनोद क्रिया निजकर लेत सम्हारि ॥ जीवत भोगत विविध सुख जात अंत पुर चारि ३४ एक इहां अति दुखलेहत तपसाकर मनमा- हिं॥ लीन होत पद आपने दुखसुख व्यापंतनाहिं ३५ एक प्रथ- म संचित,विवश भव भोगत कृतपाप ॥ अंत नरक वासै लहत अति कलेश,संताप ३६ एकन सचित कर्मकरि भोग लहत यहि लोक ॥ अरुन सत्य मारग चलत अंतनरकलहि शोक ३७ चारि भांति नरनारि जग मंगलमनको ख्याल आन मरत अहिके डसे मोरहि बधतन व्याल ३८जो परिणाम नफल मिलत कर- णी सम हरिद्वार || तौयोगी भोगी अधम क्यों जगकरैविचार विषय पाय तन हठि तजै अमीपान मृतुहानि ॥ ऐसे. कर्माकर्म को फल लीजै अनुमानि ४० कनक रूप हरि भजनहै चूकेउ घटि ननिकाय ॥ पाप कांच फूटे चतुर कोउ गाहक ठहराय:४१ क्यों लांचेको त्यागि मन मग असत्यमें जाय ॥ आपनपौ पहि- चान किन आपामध्य समाय ४२ निर्गुण सर्गुण सुलभदौ दंभि- नके मुखमाहि ।। मंगलके मत कठिन श्रीत दोनोपंथ सदाहि४३ "प्रथमै साधै जगतमत पुनि करिसर्वाचार ॥ सगुणरूप व्यावैप्रभु- हि नानाग्रंथ विचार ४४ श्रीराधा पति चरणरति गीताग्रंथ बिचा- * रि, गहै बाट विज्ञानको भवेभ्रम देइ निवारि १५ पुनि विवेक सम दमकरै योगअंग हठरूप ॥ लिहियोग पुनिताधिकै पावैवस्तु धुनूप ४६ -शनै भने, मारगचलै पहुचै मित्रस्थान ॥ कूदे एक- हिवारमें क्यों करिजाय सुजान ४७ शनै रचत कथा थनै पंथ तरबजलपार ॥ शनै वित्त विद्यालहत त्यों विज्ञान विचार १८ जे भूले हठपंथमें तेनलहँगे, मोप ॥ त्यागिभूल सत्यहिगहैं तो पावै संतोप ४६'सतसंगति पारसमनुजहै कुधातलहि संग॥रूप लहत गांगेयवत अंत मोष गतिभंग ५० पारस सतसंगति भई हरिगुण खानिप्रताप ॥ ताते सेइय, खानिज्यहि पौरतहोइन- ताप ५१.बैद्य बुलावत रोगहर, करणीफल बिसराय। बिनुभोगे निजकर्मफल मंगल रोगनजाय५२ मिथ्या, साखीदेतहैं परतिय । - . मंगलविनय ८१ ० रमत नमः। यानकार्न निंदककरते से नर, घनेसनेमा वेश्यागामी जीवहा सरवादीह-छल कारि लपकाजीते मात- भर ग़लमाला वैचारि ५४, काहिज्ञान मंगलकहत कोअज्ञान-न- माण, जानव मूलब कहत नारायण निर्वाण'५५, नदीपंथमह देखिकै भूपरचायो सेती त्यों ज़ादीपथ धर्म, पेसेतवाचत५६ घलाजाय लघुःप्रधुल केउ तामारय भ्रम हैन ॥ पहुचै इच्छा धाम मधि अयशरिगेकि सकैन.५७ विपति-देखि अकुलायनहि सपतिमें नभुलाय कर्म,वश्यजातै सबै यातमरहै समाय:५४ जीव कृत्तिदाता है प्रेपुर, पालनहार ॥ क्यों,मगल सनतूभ्रमंत बेइतोहि सविचार:५८:नृपति प्रजाकिय: श्रापुही सबमरिह्यो सुपूरि ।। क्यों डरमानत अानको भलुफिन जीवनमूरि:६० सव के शिरपर आपुही तदाविराजत नाहि ॥सोरी प्रतिपालना करिहि भजति किनाताहि:६१नीतिगई तालों कहा पावन सों काकाम ॥ जोहै. सोई धन्य है, भजुहरितजि सभ्रामा ६२ वाला वस्था.मोह मय खेलतराई सिराय:॥कामकला कामिनि विवध ईश्वर भयोनभाय-६३ जरठभुये तृष्णाबढीदृष्टिंधकी बलधोर॥ अगावतनहि परमातम फहत अखिल जग मार पाणी वृद्धि सहितकतह पहिचानतननरवाना तदपि न ध्यावतनमको पाइ कालनियराना किये जन्मभर पापही धर्मरहित स्वभांतिः।। अमन-चार हानि-मुद्गरन,जीवहि बाँधेजाति ६६-कीबांधायम पासमें मागायो कोसूला। जानिबूदि मगल चतुरागहत भूल तरुमल याचारी-जीवकोयमचर कर्मप्रतापः॥ उद देत हैं। तमें वड़ अवरन संताप.६८ याजगमें दुख है बड़ो, चिताको मन मीतः॥ जाना दुविधा रहतीसोनि विपति-प्रतीत१६ लाकी माया पति लड़ी त्यहि किमि जाने को नापित, गति जानतुनहीं क्यों सुखपूरण होइ.५० खोजतलगकी वस्तु को जिन्म सिरानोमनीभन्यो तालीभगवानको अंतजीवकोपा ७१ -जानी चुधिनिर्मलसदा-ताको मुक्तिसदाहि । मायावय कामी ૧ ।

८२ vm. मंगलविनोद रहत श्रम परित्यागत नाहिं ७२ अंधकारमें अंधकी एक दगीद काल ॥ दृष्टाकोभ्रम चंध सम तिमि मूरुख गुणपाल ७३ सात स्वर्ग सुखकोलहै क्षण संतसंगप्रसाद ॥ यथा त्रिवेणी न्हाइनरमे टत पापबिपाद” ७४ चातकज्यों लवसों स्टै निजै प्रीतम की नामा सिंधुगंग जलंसों विबुध तासुनहीकछुकाम-७५, पापदृष्टि सो देखिहै क्योतू पूरणरूप । पापपुण्यको भावनहिं सोप्रभु - कल अनूपू७६ पुस्य पीपसबके लखत अंतर बाहरसोइ । कोटि शिपाव कपटकरि आपुविदित जगहोइ ७७ जोकरणी पूरीकरैनी पावै सुरधाम्य ॥ मंगल जगकरणी बध्यो आदिमध्य परिणाम कर्मवान क्यों भूलिहै निजकरणीको काजा ज्ञानवानयॊज्ञान को खोजत तीनि समाज ७मातपितात्रिय घंधुनु स्वास्थरत कब जानु । विनुस्वारय परमातमा तासु भननमनबीन ४० वितारूप भुधगनी। नरतनबिलमेबास । अमृतबिकचोर' विधि क्यों लखुब्रह्म प्रकास शांतिविनों श्रद्धानहीं विनश्रद्धा नहिं मुक्ति । शुभकारी प्रातम क्रिया यह ज्ञानकी युक्ति ८२ समुझायो समुझेनहीं कामी रक्तितवाम ॥ ज्ञानगली विचरत ने खल क्यों अानंद परिणाम ८३ सांचेजोया जगत में ते प्रवीणता रक्त ॥ त्रातम शोधत ज्ञानममा निम्पिदिन त्यहि धासक्त पति विना विज्ञानको भक्तिसिद्धि नहिंतात ॥ भक्तिविना प्रातम सु- खहि निरखतनहिं घिरपात ८५ कूकुरको जोगीहै त्रियापल- गत, काल॥ सोइदशा चहिनीवको सँगाशा चाँडोलज्ञान कतरनी मोहमट काटत विविध प्रकार पातम भौधत तीनि विपि तजि दुविधा व्यवहार ८७ यथा चम्ब के बिटप हैं तिमि हरिजने संसार ॥ फले परारे हत हैं सकतहत प्रहार सैटजी- नि बतावै भेदनहि विनाजिज्ञासिहि ज्ञान तिजै आशियाशाप चा सेवेपद निरवाना अापन पद आपुहिल अनिहि क्यों तू भावुमा तजि हलुकाई जीवकी गुरुतोसाहित्तुराखुटः वाको मायाको करें जाकपुण्या न पापास्वर्गनरकचाहतनहीं शुद्धचित्तगत ८ मंगलंबिनोद। तापर१जारोह-बिलास कृत तावद्भोग कि चाहत्याहित्यासि फ़िरिजीत्रयह मंकरतापनि राहा२प्रणगहितजैनकोटिकृत को कुंलीन शुचितन्तज्योंचकोरपावकभनत कौनस्वाद् बुधिवंत६३ जामत अर्जुनकोदियो त्रीयदुनाथ दयाल.॥ ताहिनिवाहै.जगत' कउ-मोक्षलह वकाल ८१ बालक तोतरबातको वूझत चतुर' समाज ॥ त्योमगलकी वारता साधनके शुभसाज,६५ जाषिन रहत न क्षणकयक तागुण दोपनलेत.॥ यथामीन जलको चतुर तजि,फिरिप्राणहिनेत ६६ज्ञोप्राणी लहसुन भपत आवत गन्धि न ताहि ॥ त्याअपकारी अप्रेयची मगंल कहालवाहि-७वाकी सिसताकोकरे जो नहिमानतवेदः॥ बुद्धि आसुरी यवनज्यों क्यों दलान हरिभेद १८.पीजघोडयो शालिको उपजत भी गोवूम- पाहि निचारत बुद्धिकिमि अचरज-झूलनझूम मगलहरिके नामबल सोवतनोंद अवाय॥ स्वर्गनरक हरिजोच, करेको अब पशिवाय:११॥ry" - Tit, सर हतियोमत्सकलप्रजानहायासर्व गमबुद्धिकर्तायांमगलायनोटकाया। मगलदासविरचितायाज्ञानोपदेशनिर्वाणपटवर्यानोनाम, ; 335 पष्ठमश्शतका ६॥ -- -21 .', 'दो० ॥ मोठीवाणी, शत्रुको दुखदायक सबभांति - जिमि मोठा विषकालकर ज्ञाननैन दरगाति १ मित्रहेतु, श्रीरामजी वाचियो, नि:पाप मंगल तू निज मित्रहित कुल नहरत सत्ताप २ परमप्रीतिकी भावना व्यापतमित्रहिपाहि-॥ जानत पूरणधर्मसो अतियतकर्म कमाहि ३ विद्याजाकी सत्यहै सोचैरी मलहोइ ॥ मूरुख मीत कलेशकर ज्ञानमान लखुनोइ १,भक्ति विनाशन दुष्टबहुःकामाद्रिक निजसंग, ज्योजल क्षीरहिअमिल कउ. करति भिन्न हितुभग ५ जोनहिं जानत सत्यपद मोहमानमें लीन चीन्हत नहिं शिरताजनित: यद्यपिजगत प्रवीन कोटि चतुरता जगतको भजनविना नि:काम ॥-जिमिबिनु अन्नअनेक धनक्षुधा सकतं नहिंथाम७ रूपमारते विपुलविधि सुन्दरत्राम प मंगलविनोद रहत भ्रम परित्यागत नाहि ७२ अंधकारमें अंधकी एक दाई काल ॥ दृष्टाको भ्रम.अध सम तिमि मूरुख गुणपाल ७३ सात वर्ग सुखकॉलहै क्षण संतसंगप्रसाद ॥ या त्रिवेणी न्हाइनरमे- स्त पापोनिपाद ७४ चातकस्यों लबसों स्टै निज प्रीतम की नाम सिंधुगंग जलसो विबुधे तासुनहीकछुकाम-७५ पापदृष्टि सौं देखि है क्योंतू पूरणरूप ॥ पापपुस्यको भावनहिं सोप्रभु श्रः कल धनूप ७६ पुण्य पीपसबके लखत अतर बाहरसोडें । कोटि शिपाव कपटकरि आपुविदित जगहोडा जोकरणी पूरीकरैती पाव सुरधाम । मंगल जगकरणी बध्यो आदिमध्य परिणाम कर्मवान क्यों भूलिहै निजकरणीको काज॥ ज्ञानवानयो ज्ञान को खोजत तीनि समाज ७६ मातपितानिय वधुत म्वास्थरत कब जानु ॥ विन्नुस्वारथ परमातमा तासु भननमनत्रानु । वितारूप भुधंगती 'नरतनबिलमेंबासः ॥ अमृतबिईकचारि विधि क्यों लघुब्रह्म प्रकास शांतिबिनों श्रद्धानहीं बिनबद्ध नहि मुक्ति । शुभकारी प्रातम क्रिया यह ज्ञानको युक्ति,८२ समुझायो समुझे नहीं कामी रक्तितवाम ॥ ज्ञानंगली' विचरत ने खेले क्यों अनिद परिणाम:८३ सांचेजोयों जगतमें ते प्रवीणता रक्त ॥ यतिम शोषत ज्ञानेमन निशिदिन त्यहि घासक्त शक्ति बिना विज्ञानको भक्तिलिद्धि नहितीत ॥ भक्तिविना अातमनु खहि निरखतनहि घिरपात ८५. कूकुरकी जोदशा है त्रियापन- गत काल॥ सोइदशा यहिजीवको सँगाशी चौडील ज्ञान कतरनी मोहमंट काटत विविधप्रकार गौतम शोधित तीनि विधि तजि दुविधा व्यवहार ८७ यथा अम्ब के विटप हैं तिमि हरिजन समारः ॥ फले परारे हेतहैं सबको हत्तं प्रिहार टट जा- निवताव भेदनहि विनाजिज्ञासिहि ज्ञान । तर्जे आशिपाशाप चौं सेवेपद निरवाना पिन पद आपुहिलखें श्रीनहि क्यों तू भालु तजि हलुकाई जीवको गुरुत्ताला हितुरखुटर वाको मायाका करें जाकपुण्या न पापोस्वर्गनरकचाहतनहींशुद्धचित्तर्गत - मंगलविनोद। वापरजावोह-विलास कृत तावद्रोग,कि,चाह ॥ याहित्यागि फिरिजीवयह प्रकरतापनि राहट२प्रणगहितजैनकोटिकृत को कुंशीन शुचिसन्तामोचकोरपावकभपत कौनस्वाद घुधिवत जामत यर्जुनकोटियो त्रीयदुनाथ दयाल ॥ ताहिनिवाहै जगत का-मोक्षलहे घशकाल.६४ बालक तोतरवातको बूझत चतुर समाज॥ त्योंमगलकी वारता साधनके शुभसाज १५ जाधिन रहतान क्षणकयक तागुण टोपनलेत.॥ यथामीन जलको चतुर तजि फिरिमाणहिदेत ६ जोप्राणी लहसुन.भपत आवत गन्धि नताहि त्योअपकारी अपयशी मगेल कहालवाहि६७वाकी ससंतांकोफर जोन्नहिमानतवेदः ॥ बुद्धि आसुरो यवनज्यों क्यों जानै हरिभेद १८ पोजघोड्यो शालिको उपजत भो गोधूमः। याहि-निचारत बुद्धिकिमि अचरज झूलनझूम मंगलहरिके जामबल सोबततीद वाय॥ स्वर्गनरक हरिजोचहें करेको. अब पशिवाय ११०॥ बाइतिष्तीमत्सकलंत्रज्ञानहायासर्व गमधुद्धिकर्तायांमगलान्यनोटकायां मगलदासविरचितायाज्ञानोपदेशनिर्वाणापटवर्णनानाम, Homsपठमश्शतका ६॥ - दो० ॥ मीठीबाणी,शत्रुको दुखदायक सवभांति । जिमि मीठा विपकालकर ज्ञाननेन दरशाति,१ मित्रहेतु श्रीरामजी घालिंबध्यों नि:पापा। मंगल तू निज-मित्रहित कुल नाहरत सन्ताप २ परमप्रीतिकी भावना व्यापतमिहिपाहि.॥ लानत पूरण धर्मसो श्रुतिवतकर्म कमाहि ३ विद्याजाकी सत्यहै सोवैरी भलहोइ ॥ मूरुख,मीत कलेशकर ज्ञानमान लखुमोइ भक्ति बिनाशन दुष्टबहु कामाद्रिक निजसंगः॥ ज्योजल-क्षीरहिनमिल कर करति भिन्न हितुभंग-५ जोनहिं जानत सत्यपद मोहमानमें लीन॥चीन्हत नहि गिरताजनिज, यद्यपिजगत प्रवीन ६ फोटि चतुरता जगतको भजनधिना नि:काम:।-ज़िमिविनु अन्न अनेक धनक्षुधा सफत नहियामरूपमारते विपुलविधि सुन्दरत्रामन b - दहे मंगलबिनादा चन्द ॥ भजनबिना टेसूर्यथा बिन सुगन्धिः द्युतिमन्द ट मर पदारथ कौनभय समरकहीं-हिलोक ॥ भजनभाव शुभ अशुभ दो दायक सुख अशोक ज्ञाताको दाताकहाँ कोविद्याधरतात। निजुजाने दायाँ हृदय ईशगुणनकी बात ठीठिगन टगत लाने नरहि भमानता पहिचानििितमिनीया हरिदासकीनंगलेमन चिर्नुमानि'६२ करेंगहीन वेनन सुनत नयनहींनमितिदीख ।। योमर्गले जानतू गहतान मेरीलोखे शशावामीकामी याम बहु शमी सामीनाहिहियअनुगिन मुक्तिको मंगळेसन्सदीहि १३ ज्योनिज गृहकानेहहे त्योहरिपद किर्नेलाल मंगल भव पद प्रीतिवंश अन्तर्मुक्ति पदपाठ १४ होनहारती होइंगों मिटैग्न कोटिलपाय। मंगल मनक्यों शोचकृत अर्जुश्रात्तम चितलार्य १५ ज्यौकरीप पटमेंधरे बचनाकलङ्क विहीनमात्योंकुसंगीनीचम- ति होतकहत पिरवीन १६ बारबार लिखताग्रही मनत्यहि उत्तमज्ञान ॥ तूनतजत प्रारब्धवश यद्यपि महासुजान लोभ घोस उर करते अपकीरति चहुंपास। मंगलदेख्यो नियनयह तदापि नजिबिनयाँस १८ ज्ञाननयनदेखैमिनुज बारिश्चोर प्रभु रूप ॥ अज्ञानी मंगलसरत परेविषयकूप १६ सातस्वर्गापवर्ग को सुख़न मोक्षसमाहि ॥ मनुज ब्रह्मविदासौलहेत यामहस- शर्यनाहि २०.यातनमें अतिशोर है पापिनको मनमूद चुपकी- वत्त किन तिहिं त मन ज्ञामनगूढर शामित्रोंगमेमंगल करतबिलाला जानिहितू सतसंगकरु करहिनन्नहित प्रकाश बैरीके सतसंगमें कोपवित सुखदेयु तातेमंगले अरिन दिणि नेक दृष्टिजनिलेखु २३ पाचवतावत सात सातवामकेबासि। ज्ञानवती मनितही तदुविधा देनासिकालपाशमें नगध्यो धावतजति प्रथामा कोहिज्ञान मंगलवदेत सवललारंसिपोरा ज्ञानसुनै चित्तलायकव्यान धापुरकोइगाबिनुभमामलियतमहँ पायत मुक्तिहि सोई॥६. त्रियमलें नरमल मिलिलम्बोमाया पति भैदेह ॥ ब्रहाण करणी विषश-निवत भौनि सदेह २७ -- ८५ 1 - मंगलविनोद। जिठरानलकी ज्वालतों विफल होत जब प्राण गर्भमूत्र मलगधि सातबाध्यवित भगवेनि २४जीपतिया दडते आपुरक्षनेग- दोश । जन्माये तुर्यभजनतजि करौनकछ विसंवीश २६ हरि रक्षा सर्वविधिकरी से नि निवध सेतिभाय । जन्मकाल लैगि रोगहर जन्मतदयो भुलाय ३० 'उपजत' कीटके पेटमें दुविधा "मोह प्रतापगी फोटोदिक कबहूँ बसतं तवबहु करत विलाप शर घालदगोगई बलसँग आई तेन तरुणाय । काम कलामद हर वस्योनहि हरिभजन-वहाय ३२ पाप पट चाहिये भोगहेत मिला नारि निजकर मंगल धमनर देवत धर्महि टारिश जरा व्यवस्था भयो महिवाल उरन्त्रीइ म जावेश नारायण - जिन मंगलयों नधाई ३४ मोटिभांति गुरुशिपतई ज्ञानिन कहा बुझायन तदपिन योगी दुष्टता गई युनियराया शिमन चारकर पाल नायताकेपास दिखिभयानवेपफोर्मल तजिजीब सत्रात मारिसुद्गरम घाधिपग दक्षिणचले पती- टिव्याकुल कीन्हें विविध विधि लोह मोगरन पीटि३ ले डास्यो कुम्भी'नरक भोंपीवक्त नीरकीटकांग विधाजर्व में गहत लहतवडिपौर घट कर कूकुर योनिमें नरकभीगनव- ताजानिन ध्यावत धातमाहोय जन्मनिरधार बह्मचारजो निरकर तजिदुविधाको खेल। सोप्राणी उत्तम:महा करत मुक्ति पदभेलामाजोगृहत्य हरिभजनी मेनिरंतर है। दिनराति दमा धर्मयुत्त हरिभजे याशु-मुक्तिदोजाति वानप्रस्थाकर्तव किठिन साधिोत्पांच कोइा नारायणको कृपातपाय मुक्तिहि सोहोर संन्यासीको मति सुगतिलोवन मुक्तिसदाहिनी को निानेता जीयको जन्म मरणहै नाहि ४३ चारोंत्रिम सूचित अतिताधैक्रोउत्ताधा पावैमोक्षप्रवास बिनु शुद्धचित्त अनवाध, प्रष्ट्या भवसे भयंजालहै भागुमीत तू वेगि ॥ नातरु-पावै दंडे मितिौर अपत्य अनेगि ४५-पापाथी भाना यथा टूटत मंति- 'फा तूली।बुद्धि आसुरी में चतुर तैसे परत समूल ४६ चालकलौं ca मंगलबिनोद। हीखाया, गर्व विद्यागरमा इरमातीमा जातुः धर्मकर्म खोवतसकलदेवनरक बासु निरत दिवन नि शिविषय हित हरिहित घुदीनए क्योइनख मंगलपाइहैं पहेलिपयकोदेहा बालदशा में शुद्धिकतिगमन हि भजनलाउ ॥ निबहे तीनौकाल के पदनिर्वाणहि पाउजेभूले निजातमी धीरधर्मकोमाani तेनहि जन्मसहस्सलागि मुक्त होता तिसावा अध्यातम विद्या गुणैःसाधारणसत साधि । जगमें कैरोहुविधिरहै ताहि न धमकी व्याधि मंगलबनतनातर्मशुभ तृष्णाके वयकोय । समुझाव गुरु.कोटिबिधितिदपिनामानैतोबा पीछेदिन खोयेधमे आगे देह,खोय॥ मंगलमजकी नालिलरियामनमें दीन्होरोयकोटि भौतिशिक्षादई मनपातीको सांच। तदापि दुष्ट भागालालला ना: चत विषायीनाची १२ ज्योहि भेदत कंजदल कौनोविधिको लान लालों; शिपमेरी दुष्टमन तूंनाही किहुंकाल ३ अघते मेरी कहीसुनितजि बिसरनकोषागाउ सुकीरति श्यामकोउ सुंदरपदिजासुनामीभेवते नर तारिजातान्त्रभेद, संगल मन निजल्यानधरु तजिदो सबजगखेट्दा ५ सतमारग सतसंग कसलातमको अपनायायों शोचत मनमूदतू प्रामुक्त जाया मंगलमन नहिंमानिहै; विनुवांधेरजजानायहडपदेश प्रमाणिका सोकिनकर सुजान ९७ दुशहारेजो प्रकदा तितहिं बंदरिदेह । मनमारग, पावैतही.तब सतकरैः सनेहू ६८ इड़ा पिंगला.सुपमनायाशरी/कुतवारसा सवाहित्यागि करू. प्रीति हदा तिनसों ज्ञान विचार ए मोक्ष कुवारो:जीव को सुपसन उदयप्रधानामुगलो मतपातस्महिमज़िलेत्रीभगवान १०॥ इतिश्रीमासक्रलमज्ञानहाया. सामसुद्धिमायामगविनोदकायामागल दासविरचितायानानोपदेशनिवरणपदबनानाससामन्यतका दो०४॥ गगन अनिलजल बनलमहि पंचतत्वकृतलोक रालो व्यापतयह-श्वासमह जानतहोय विशोकही जानेतेढ़ता लहत सुनेवोपन हिज्ञान भोजननिनःखामिदता धानको दिसयानर ।

- ८६ - मंगलविनोदे। नासाको सबख्यालहै तीनिलोक तिहुकालः ॥ ताहिलखैबुध दृष्टिसो लहैमोक्ष नरवाल ३. गुरुकर्ता सतसगते भोक्षलहत बिन भेदं ॥ यथााप उष्णतावश तनते चलतप्रसेद कर्मकिये ते कामनाकोनकरै वुधिमानः ॥ इच्शवत फलकोलहै परिपूरण :- ल्यान ५ घासन अमित कहेअहैं शकरमारगयोग ॥ पद्मसिद्धि उत्तमदुवो करत शरीरनिरोग ६.पणनमंत्रकोजानिकरा प्राणाया- म सदाहि ॥ आयुबढ़े अघगणनौ अंतबसै पदमाहिए आशाराखै मोक्षकी निपय घासनात्यागि ॥ सुखमनमारग हरिभारहैमोक्ष तटलागि बावनतनु नभक्योछुवै अंघलबै सुखरूप ॥ दूनोंश्रा- तंम यानवशे यह सिद्धात अनूपपगुचढ्यो वाकाथली अति अचरजकीवात ॥ जानेते कछुभमनहीं मूरख मनपश्तिोत:१० बातनेसे मुनिसमबने दभग़लित मनजान ॥तेपाखण्डीकोनविधि पागे कल्यान ११ दीनवसन बिनशिशिरमें ज्योंनिरखत दिन नाथ ॥ त्योअाशाकरि ब्रह्मकी जगनरहोय सनाथ:१२ तृपावन्त जताबिकलमन,खोजतकूप तहाग.॥ त्योमंगल खोजहि हरिहि उदयहोय तवभाग १३ समरभूमि जिमिनृपतिमन निनजयकी अभिलाप ॥ तैसेमंगल मनवसै हरिप्रद प्रीतित्रमाप वोहित बूंडतजीवज्यों भवावर्त बिनजान ।। मंगल अबत्ती कठिन : अति राविहि त्रीभगवान १५-मधुमाखी मधुकृत अमित भखत कृप- णतावश्या कोलशीनि-लियदुखभयो ततधन लोभियवश्य १६ यह सम्पति तुर्वसंगनहिं जन्मीसुनु मनमूढ़ ॥ श्रुतसंगिनी होते' नहि कतदुख करत गूढः१७ परवश धन्दी भवननर यथारहत सकलेशः॥ तिमिइंद्री धमजीवयह भरमत देशविदेश १८ जनों फुलाल भाजनरचै,ऊच न नीचा विचारि॥ सगतिवया शुभअशुभ भौतयाजीवनिरभारि १८ साधुसग साधेमनाहिं नीयसंगभूमखान या शुभकारी कोउजन्मन हि संगति मूलवतासन्२० सापाय चेततनहीं ऐस्पउमहा अचेतना अहिमलयज वालीकहा अमृत बुद्धितजिदेत २.१सरितासर बापीकहौं कूपादिकं जलधारिकास - १२ ।

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मंगलविनोद
हीखाता, बर्ण गर्व विद्यागराज उरलासीमा जानु धर्मकर्म
खोवतनकलीदेत नरकवासु निरत दिवमति शिविपयहित
हरिहित घुटीनएलेकयोस्तुख मांगलपाइहैं पहेलिप्तसफीदेकर
वालदशामें शुद्धिक्ररिगमन हि अजनमेला ॥ निवहे तीनौकाल
के पदनिर्वाणहि पाउ७ लेभूले निजातमा ओरधर्मकोभाव
तेन हि जन्मसंहलगि मुक्त होती त्रुतिगावाट अध्यातम विद्या
गुणे साधारणसतासाधि ॥बागमें कैसेहुविधि है ताहिन श्रमकी
व्याधि धमालयनतन कर्मशुभ तणाके घामकोय । समुझावै
गुरु कोटिविधितिदापिन मानेलोया पीछेडित खोयेघने भागे
देखोय॥ मंगलमतकी मालिलरिशमनमें दोहोरोयकोटि
भोतिशिक्षादई सतप्पापीको सांच। तदपि, दुष्ट पाशालालता ना.
चत विपापीनाचीर र ज्योत हिदित कजदल कोनोविधिकीला
लात्यों शिपमेरी दुष्टसन तूंनाही किहुंकाल ३ अवते मेरी
फहीमुनि तजि-विप्रायनकोमादागाउ सुकोरतिध्यामक्रोउधर
सुंदरपात जासुनामके भेदते. नर तारिजातान्त्रभेटे। संगल
मात्र निजध्यानधरुत्तजिदे सबजगखेडा ५५ सतमारग सत्तसंग,
करू यातमको अपनायाभोवतामनमूदतू प्राशुमुक्त
जाय मंगलमन नहिमानिहै; विनुवाधेरजज्ञाना। यहड़पदेश
प्रमाणिका लोकिनकर मुजान ८७ दशद्वारेजो प्रकट हैं तितहिं
बंदकरिदेह ॥ मनमारग पावतही तत सतकरी सनेह ६ इड़ा
प्रिंगला सुपमना यापरी कुतवारत: सबहित्यागि करू: प्रीति
हट्ट,तिनों ज्ञान विचार मोक्ष दुवारो जीवः को सुपमन
उदयप्रधानता मंगलो मतपावत्यहिभजिलेश्रीभगवान, १०॥
इतिमीमासंक्रल प्रज्ञान यां, सर्वागसुबुद्धिधातायाम्गल विनोदकायामराल
बन्दासविरचितायाजानोपदेशनिणफदवर्णनानामसम्मायतका
दो० गगन अनिलजल अनलमहि-पंचतरस्कृतलोकालो
ज्याप्रतयह श्वासमहँ जानतहोप विशोकही जानेतेहढता लहल
सुनेधोधन हिंज्ञान भोजनबिन खाये मिटताक्षुधानकोदिसयानर

1 ८६. मंगलविनोद। श्वासाको सबख्यालहै तीनिलोक, तिहुंकाल, ताहिलखैबुध दृष्टिसो लहैमोक्ष नरबाल-३ गुरुकर्ता सतसगते मोक्षलहत्तविन भेदः॥ यथायाप उज्यतावश तनते चलतप्रसद.४ कर्मकिये ते , कामनाकोनफेरै बुधिमान ॥ इच्शवत फलकोलहै परिपूरण क- स्यान, ५ श्रासन अमित कहेहैं शकरमारगयोगः ॥ पद्मसिद्धि उत्तमदुवो करत शरीरनिरोग प्रणवमत्रकोजानिकर प्राणाया- में सदाहि ॥ आयुब अपगणन अतबसै पदमाहि आशाराखै मोक्षकी विषय घासनात्यागि ॥ सुखमनमारग हरिभजै रहमोक्ष तलागि ८ बावनतनु नभक्योंछुवै अंधलबै सुखरूप ॥ दूनोप्रा- तम ध्यानवशे यह.सिद्धात अनूप पगुचढ्यो श्राकामा अति अचरजकीवात जानेते कछुभमनही मूरख मनपशितीत १० घातनसे मुनिसमबने दंभगलित.मनजान |तेपाखण्डीकौनविधि *पावैगे, कल्यान ११ दीनवसन बिनशिशिरमें ज्योंनिरखत दिन नाथ ॥ त्योाशाकरि ब्रह्मकी जगनरहोय सनाथ १२ तृपावन्त जप्तःविकलमन खोजतकूप तहाग ॥ त्योंमंगल खोजहि हरिहि उदयहोय तवभाग:१३ समरभूमि जिमिनृपतिमन निजजयकी अभिलाप ॥ तैसेमंगल मनवसै हरिपद प्रीतिमाफ १६वोहित बूडतजीवज्यों भवावर्त बिनजान ॥ मगल अवतो,कठिता प्रति राखिहि श्रीभगवान १५-मधुमारखी मधुकृत अमित भखनकृप- णतावश्य।। कोलीनि-लियदुखभयो तसधन लोभियवश्या१६ यह सम्पति तुवैतगनहि जन्मीसुनु मनमूढ़ ॥ अंतसंगिनी होत नहिं कतदुख करत अगढ़.१७ परवश धन्दी भवननेर यथारहत सकलेयः॥ तिमिइद्री वशजीवयह भरमत देशविदेश २८ ज्यो कुलाल भाजनरचै,ऊचान तीचा विचारि॥ संगतिवश शुभअशुभ भौतयाजीवनिरधारि१६साधुसग साधैमनहिानीच संगभूमावान या शुभकारी: कोउजन्मनहिासंगति मूलवतासार सिगपाय चेततनहीं ऐस्पउमहा अचेत । अहिमलयज वालीकहाअमृत' बुद्धितजिदेत २१सरितासर बापीकहाँ कूपादिक जलधारिशकास' - १२

मिंगलविनोद।
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आपतो चतुरजन सबते लेत निकारि २२कहाकरैले सम्पदानो
नहिनीवनापामरणसमयरावणकुरुपधनहितकीन्हविलाप२३
जिमिनिपंगमें परभरत्यकयक करिवटिजाताताश्वास निन
जातहै चेतुंआयु नियरात २८ कामीक्योंकरीचेतिहैं चढ़ेउडुप
निर्बुद्धि ॥ चन्द्रइंद्र दुखअतिलह्या कामविवश महिशुद्धिार५
कहानबथमें ओपना विनपरमातमएकी जन्ममरण) निनबम
सदा करुनि चित्तविवेक-२६ पापराशि यमराजपुराकोटि भाति
पछितायनाधर्मात्माासुप्रयासविन हरिपुरकोचलिजायो २७,क्षर
अक्षरको एकसम ज्ञानीक विचार गानित्यानित्य विवेकउराभव
मंगकरें विचार २४गिंगाजल-पावनपरम बदतवेदौरान। पैनहिं
मानत निकटबसि जाहिकहत ज्ञानरंह अक्षत चखनमेधिवत
निकट बस्तु नहिसूझ नानामतखोजतफिरैसतमारंग नहिबूझ
३० जाशोभा शोभितत्रिपुरजोपाभाभवभूतः ।। मंगल मनबूझंत
नहींजगहिछलतजिमिधूत३१ आशापूरण होइसवधासआपनेधा-
मपिरमातमा बिज्ञानमयाजन्ममरण"नि:काम।३२ जिमिन
बाधकलाइगृह ताहि चरीक्तधसिकालनं जानतमुग्धमति तिमि
नरतपणापास ३३ पवेद वेदोतको विषयलीननरकोयताहि
महावातुल कहिया दादुरावक्तांसोइ३४खगनिज मुखवाणी बदत
नित्याप्रातहरि नोम ।। नरमलीन भिनसारसेविपय भजत मति
वाम ३५मेरी बुधि अति बोधिनीमन चंचल चंडालांतासुमिरण
हितैयतनबहु कह्योन नाश्योकाल ३६मनोजोमानै मत सुमतितौ
मना चीता होय ॥ सत्याप्रीतिबध ईशभव वदत सयाने लोगशेष
सात सात को घासकरि गुणसोदीजियवाटिना रोपवस्तुकोबो-
जिलेमन मलीनको डोटि ३८ जिमिधकारविन व्यंजनहि बोलि
सकतनहि कोयातिमि हस्तिजि प्राणीनकी मुक्तिन कैस्य होय
नारि अापनेप्रतिहिजिमिसेवतिनेहानमेति ॥ तभस्मता
प्रीतिवश होति परमगतिलेति ऐनीसांची प्रीतिसँगाप्रीतम
के निरवाह या करै सोधु सो दटतीमिलि प्रीतम 'सुखलहि १

, मंगलविनोदा- मोह लालसो.त्यांगिमत ध्याऊप्रेमढ़लाया हर्ताकर्ता आपही त्योमतरहा समायरामांगत लागत लाजनहिं औरनेलों मन तोहि ॥ यांचतासांचे मित्रसो क्यों लजात कहुमोहिं १३ जन्म नभोप्रथम रच्यो माता कुचपयजानु ।। मगलापालकत्सत्यहरि साविधि,शनुमानुः ४४. खीझतातेली-तेलको क्षुधावन्त चह पीन | कोकाकी वाणी सुनै निजस्वास्थ लवलीन ४५ यथा श्रन्ध वैचारि मिलिगज चीन्हने मनकीन्ह ।। करपेट पूछरु उदर वताहीतम कहिदीन्ह ४६ तथा पंथसंसार के नयनहीन अनुन मान, द्रष्टामत सीगहै सो हाथी पहिचान १७.ज्यो कवीर निज ग्रन्थमें घरण्यो पूरण ज्ञान ॥ नानकगोरव भग्धरीसबीगी जगजान:४८ परख्यो पूरण तीनिविधि अपर धारियह ज्ञान॥ 'पॅथा गोसाई जी भये हरिप्रताप जगजात्त-४८ माणिकको जुन, प्रकाम है त्यहि न डुलावत् पात॥ तथा वचन सागको डुलिन तफताविख्यात ५० मंगल श्रुतिमततीनिपुर हैपरमातमवास। 'चन्द्रभूर ग्रादिक उडुपतासुतेज परकामा लिप्त होतनहि गगनजिमि मिला सबनमे देखु ॥ ऐसेतनतनब्रह्मबुधज्ञानचक्षु उरलेखु.५२ शाखा दलफल फूल अरु मूल विदिततरुनाम ।। तिसिजल चलनभघर अखिल कहिय ब्रह्म परिणाम कोन •विचारत ब्रह्मपर पैनहिं पावतजानि ॥ जिमि पक्षी नभ अन्त हित बढ़त स्ववल अनुमानि:५४ सिन्धुपिपीलन गायिा कौनौ काल-सुजान ॥ तिमिनब्रह्म के भेदकी जानत जीव प्रमानी ५ वाकी उपमा फौन जग जो अद्वैत अरूपा उपमा बिन-बूझव. कठिन कट्टतः कविनकेभूप-५६ कविपुंगवान्यासादि जेागम भारखी यानः ॥ सोपि,ब्रह्मके भावको भेदन करचो घरखान पु७ पात्रतत्त्वरि भूदमनः यह शरीर चिदीनमा तामापनधिम्य फोवासकृपानिधिकोन -तू उपज्यो सागमत पंचतत्वक जार्नु ध्यानपंच अरुयोसगति सोपिफरी निरमानुपस्यि मांसध्वक रोमञ्चरुनाडी प्रकृति पांच-धिरा तत्त्वकायोग ते - । , 6 १४ मंगलविनोद। गुणी मुनि सुजाना कृतपहः॥ जीवत. पावत,मोदभला हरिपुर त्यागतदेहा अनहदध्वनि वाजाबजत-गयन गुफा हेरु । मंगलजाके सुनतही मिटैजन्मकोफेरुः१०० इतिश्रीमत्सकलअज्ञानहतीयासर्वागसुवुद्धिकीया मगविनाटकायामा, लैंदासबिरचितायाज्ञानोपदेशनिर्वाण पदवर्णनानामअष्टमश्शतका दो-जोपैमंगल विमलमति तौ जनुज्ञानप्रकाश। अनुभव घिधिरसों उदित्तप्रभु सूझैचहुंआश १ जा सेवन निर्वाणपदबनि नपरै मनमौर ॥ तौतूभजु यदुनाथ पद होइ परेम'गति तोरर कश्यप अदिति सुप्रथमही तप कीन्ह्यो प्रभु लानि ।।: बरमाग्यों तेपसिद्धिभे होहुपुत्र :ममा आनि ३ निजनिबंध के हेत अरुसुनि सुर, बिनय कृपाल॥जन्म्यो मथुरामें खबश भजुतापत्रैकाल? नासुकृपाबंधनमुच्योसवपहरे गेसोयः॥ तूमंगलताकमलपभजु सब दुविधाखोययमुनावाहपयाबभो हूंकसुनततत्कालागयेपार रवसुदेवलैनंदालयउत्ताल ६ जानभेदनरनारिनहि प्रभुमाया अश तातः॥ मगलबिनध्यायेहरिहियमपुर जडपछितात जन्मकालते अल्पदिनवीतपूतनानाशि, जानिभमतमंग़लफहा तायश रहारः काशि, शकटासुर कागासुरहि वक्ष्योजातिखलनाप ॥ मंगलभनि श्रीकृष्णपदमेटुतीनिबिधितापदावधिमाखन भक्षणकियोकौतुक निधि परधाम। तासुचरण ध्यावतमिटत जराजन्मपरिणाम.१० यमलार्जुनमोचन कियो नारदृशापविचारि॥ मंगल ध्यावततासु पदाजातयमपुरहिहारि, ११, नदग्राम बसिअघासुरबव्यावकादि कराला निज़दासन, हितविदितभवमंगल भजुनंदलाल-१.२गो- वरधन पूजन कियो सुरपति मान-तिहानः॥-कौतुकनिधि राधा- रमण अति उत्तमताध्यान,९,३ कालीमद, मर्दनकस्यो,रमणकद्वीप पठाका, मंगलकहु ताचरण जि क्यहिन ऊंच पदपाव १४, रास कियोलारिनसहित अकथ कृपातिधि:श्यामाना रसिकनाथके भजनते-मुक्तिल है परिणाम १५ के गीच्योमादिकाधे निजजनके दुखदानि ॥ लाभमहाहरि पदभजें मंगलभूलेहानि १६-मधुरागे मंगलविनोद अङ्करसँगरजक दुविधकीन्हें ॥ मगल हरिप्रतिसरलगतिनीचहि निजपुरदीन्ह १७ लूली कुवरीनेहकरिचदेन अरप्यो श्रीनिमा कीन्ह्याशुद्ध स्वरूपप्रभुप्रीतिनत्यपहिचानि १६-धनुर्भज्यो गज बलमध्योमायोप्रवलंचारशापरमातम श्रीश्यामजू जासुअंश- पशिधार-१८ कसदुष्ट दुखदानिजग मरद्योखिकर कृपाला मंगल मोहनदासहितु परिपूरणत्रैकाल २ सत्रहवार जानिधिहिं की- न्हापराजयश्याम पाभारउत्तात्यो भूमिको यशपूस्योत्रेधाम २१ कालयवनको मारियो सोवते भूपजगाय ॥ मुक्तिदई मुचुकुंदको भजसिनत्यहिचितलाय २२ मथुगतजि द्वारावती बसिकीन्हे बहुरच्याला ॥ सोबरणत-पोधीबढ़े भजुमन, मदन गुपाल २३ जिमिविधवा करि कुकृतपनि गर्भरहे पछितामा तिमिमंगल तू विपयरत अंततीहि दुखेदाय २४ बाम प्रकृतितजिाश्यामभजु कामकला बिनुसत्यामुक्तिहोड संशयनहीं नाशेजगतविपत्यर५ राधावरको मनुजसमाजानत नेरचंडाल-॥ तेपछितैहैं शमनपुर यथा नीचपिशुपाल वा निष्ठाशुद्ध लंगायकरि मनविशिष्टं करि ध्याउ॥ मंगल हरिपद प्रीतिसो यतमुक्ति पदपाउ २७ श्याम श्याम हरिमिकहु भाय. कुभाय विहाय ॥ कोटियज्ञ फलकोलहै मगलं कहत बुझाय २८ श्रीहरिनाम प्रतापते मिटत पापकारखा- नि ॥ यथाकाष्ठ-तृणव्यूहको रचेकसिखिकृतहानि २६ श्रानयांग तजि मीतमन अातम श्यामहिध्याउ ॥ क्योयहिझूठे स्वांगमेश्रा- यु. अमोल गनाउ३० कोटिजन्म जपत्तपकियेशलप्रपंचयुतदभाग सिदिलहैम्नहिमोक्षकी पारुभीति कृतभ३१-मानि'प्रतीतित: प्रीतिमन घासुदेवं गुणग्राऊ ।। प्रीतिविवश हरि सर्वदा भयंतविबु- कविराउ-३२दुखसुख काले अकालमे नेहएकारसराखु भक्ति विवंश श्रीश्यामजूतादाया भवनावु ३३ कपटछुरीकरमलिये, छेदत अजविज्ञानी मंगलऊपर साधुवन क्योपावकिल्यान विष्ट प्रातसमय निजिमनाभ्याउरमाको कता जीवतः सुखसंपति अमित लहेमोक्ष पदयंत३५अनखीलसहुखिोजियानी झिमजै J ।

V 7 मगलावनोद । घनश्यामः॥, मंगल प्रापक, मुक्तिको जापक संयुतवाम ३६. आनोरहेरैनहीं तजिनिन मीत सुजान.॥ जिमिचकोर शशिको- लखत सोपावन गुणवान ३७ रटैनिरंतर श्यामपद ध्यानलनेमुर, राखिभुक्तिमुक्ति दोनोंलहै देतउपनिपदसाखि३८ कालसुचक्र, कुलालको घटसम जीवअपार ॥भरमावतविधिकोटिपुनिउपजा- वतसंसार जानरकी सेवाकरतबेतनसोदैदेतानारायणपदच्या, नसोकोय अखिणकितलेताजिमि पाणकी यातारदिपार सरितकोजाय ॥ तिमि नरकीसेवा निफल मंगलकहत वुझाया। जोन सम्हारत आपकहँ.भारसोयांभकिसान ॥ मंगलकरणींनाक की तूकृत यात हिंज्ञात ४२॥ प्रथम आपको सिद्धकसा तब औरन तिखहा। जगतबहाई मुक्तिदो नहिं हरिपदभजि लेह,४३ काले ! कूट करणीअमृत क्यो करिहै अज्ञान ॥ तिमिपापी किमि सुकृत : को निज़उस लावैध्यान,४४,तेलसनेही तिलनको तेलीपेरि नि- कार ॥ देखुमित्रता कठिनप्रण जीवत संगतहार ४५ लाली नेही मिहदिदल काहुइपरी नदेखि ॥ वांटिनिकारी कोटिनिधि तदापि परी नहिपेखि ४६ मित्रंमृतककै संगही नरतनुलोन्ह्यो लेखि... मित्रद्रोह उरपारि त्यहि तनुमें गई प्रवेसि,४७.प्रीति यथा शशि । सिंधुकी पूरणलखि उमड़ात। मंगल ऐसीप्रीतिदृढ़ करुक्यो मन पछितात ४८ जानि श्यामपदनभिजत, वृथा दादुरीबाद ॥ स. गलयमपुर: विविध विधि,जीवहिहोय, धिपाढ४६कहासुदामाने कियोपायो हादकधामः॥प्रीतिप्रतापहिविदितभव हरिभजु मन बसुयमियर्जुनको स्वार्थ कियो कास्वास्थ यदुनाथः प्रीति वश्यात्रैकालप्रभु यह ज्ञानकी गाथ५१. गुपदीको फुर्तवकस्योबा- ढ्योबसना अनंतनामंगलमहिमा प्रीतिको जानतकोबिदसत ५२ कोपोलप कियभारही. गिरधोघट हहराय प्रवचे तनयवल अमिः तते पत्यप्रीतिके भाय ५३दंभीपापी अपकृती अज्ञानी चंडाल। नामलेत बिन भावबढ़ नाहिरीझत गोपाल ५४ को पांडवके बल रहै लक्षनिकेत कुठाम ॥ प्रीतिविवश उवरेसकल, भिरिव भधिगे - -- , . 1 . मंगलविनोदी।. घनश्याम ५५'विकल रुक्मिणी व्याहदिन लैअये जगजान ॥ प्रीतिसत्य अनुमानिहरि खलदलं बधि मनमान ५६ वाणासुर कोमानमथि लीन्ह्यो अनिरुध व्याहि ॥ मानहरत संसारको ता 'मन मानहिंचाहि ५७ दुर्योधन 'श्रीज्ञातजी दीन्यो बंशनधाय ।। मूर्ख हरियायसु तजत पूजत प्रेतनजाय ५८श्याम श्याम पुनि श्यामकहु राम राम कहुराम भटकत क्यो भवमें फिरत विनों मागे लहुदाम ५८ पेटेखलाये.जगफिरत मतिहीनो नहिंदूझ ॥. राधावल्लभ भजनों मिटैविपति म्वहिसूझ ६० झाल कर्मको. नाशकर दाता जनानंककोदूसर सतधर्मके त्यागिनखत य? : चंद ६१:फोटियापदा नामसुनित्मगल जातंपराय ॥ यथाकेहरी नामसुनि वनचरव्यूहलुकाय ६२ सहरुभातिके विघ्न व हरिया सुति नशिजाता। जिमिदिनमणिके उदयते नभद्युत्तिमान छिपात' ६२ श्यामशता सुनिपिउठे मृत्युकालयमदूत-।। पुंडरीकसुनि करिविपुल जिमिशंकत विपुपूत ६४ श्रीराधाबर नामको अर्पत जो हितचिसलाय.॥- शिव आदिक सुर जयववत तानरकी मुंद. पाया ६५चमर सराहत मनुजवपु.श्यामभक्ति हदज्ञान ॥ मंगल तू नरतन लहोमजुहरि धरिशुभध्यान ६६ उडतभ्यामा कहत- हिअमित दीपकुकर्म सशंका शब्दद्भुशुंडी सुनियथा भाजतकाक- भश्चक ६७.गेहतजत पाखंडभ्रम श्यामशब्द सुनिताता चंडपवन तण उडतजिमि निजथल पुनि ने लखात ६८ धारवार शिक्षा करत ज्ञानीध्यानी साधुः॥धपरमूलतजि सर्वथा श्रीहरिपक्ष्यारा- 'धुप बढ़त सकल आनंदसुख भजतश्याम भवमाहि । जिमि राका शशि सिंधुलखि कृतप्रवाह.भ्रमनाहि.७० संपति तरुंजल' + भक्तिजंग नारायणकी मौत थारखावाढत नित्तनित भजुहरिसटो- सफल सिद्धिता दिगवस जोध्या नंदलालं। जितिः 'सेव पावसकालको मिलत सिंधुकीलाल ७२ आदरबड़पमान- ता ताचेरीवजात ॥ कूकुर ज्यौ निज स्वामि रॉग जोध्या या जात ७३ सबके उनमें प्रीति तेहि वसत जो ध्यावत इयान । १३ , ।

1 । है मंगलपिनीद पूपण जैसे शरद ऋतु संघ चाहतं. निजधाम ७४. बालक की . वाणी यथा मीठी कटुवति लागि ॥ यामभक्तकी चारता सुनत विबुध अनुरागि ७५जापै मानैतौ कही जोभंजक तुवमान ॥ जा- निदुष्ट पुनि मीत मम जाहन तेहि अस्थान ७६. मेरी भाई होत नहि नत त्यागतमनमोह ।। श्यामश्याम श्यामा कहत त्यागिअ- खिल छलछोह ७७को तजि श्यामा श्यामपद पूजै भूतनजाय। नरकबासंको भ्रमदय अंतरुपुर पशिताय७८मेरेमत श्रीश्याम पद पारसके पितुआहि ।। अंत आपु.समहीकरत बदतबेद भ्रम 'नाहि हांक सुनत हनुमानकी कम्पत ज्यों खलजाल,राधा मोहन नामसुनि तिमिप पापकराल ८०वामावाम विचारिये धामाधाम सराहि ॥ नामानार्म प्रवीणको यहशोचिय जियमा- हि ८१.पाठक मूरुख मौनको पष्टिीनंदप्रमान काटवृक्षको भेद है जानत पर सुजान ८२ ज्ञाताजाता जानिये दातादातासोइ ।। भ्रामिकमत क्यों बूझिये परिपूरणहरि-होइ ८३'प्रभुआज्ञा शिर । मानिकै अर्जुनमज्यो युद्ध ॥ जयपाई अानँदभयो सुन्यो सुमारग, शुद्ध ८४ आनोरते भूलतजि शत्रुसंगदे त्यागि ॥ मित्र आंतमा आपनी लाहीलों रहुलागि ८५ विष्णलोकमें ध्वंतभी जन्मत.त्री यदुराय ॥ परिपूरण अवतारशुचि वद्योव्यासमुनिराय ८६सगुः णरूप सुंदरबपुप सुखदायक तिहुंकाल ॥श्याम कृपानिधि दास हित नायक जगजजाल ८७ मारुमारु लावतभगत दलविवेक' विनुत्रान ॥ बर्मश्यामको नामकरु कामप्रबलतो भान ८८ गर्ज वाहन रथ द्रव्यगृह संपतिलखि मनभूल॥ध्यावतनहि यदुनाथ पदा अंतशमनकर शाल ८६ मातपिता त्रियबंधुसत संखासुसेवक- कोटि ॥ अन्तसगनहि देहहू समुझतनहिं बुधिछोटि ६० नीचन त्यागत नीचता कोटिभांति सिंखदीन्ह ।। यथानकदुतानीमतजि चंदनको संगकीन्ह ८१ जाकीप्रकृति प्रदीपमय सो नचहत हरि ज्ञान । जिमि उलूक भागतबिकल उदयहोतही भान ८२ मन प्रबोध आवतनहीं बिनुजाने गुणश्याम॥ मंगल सांची मनकही - । । -- ।

। - . मंगलविनोद । ध्याउश्याम पुनि राम ६३ कौडीके दानीनहीं निंदत वलिकर- याहि ।। मंगलतू सुनि सीखममे भजुहरि निज चित्त चाहि "जयजय ध्वनि चहुओरहै सतमारगको मीत्त ।। ताहित्यागि क्यों दुष्टमन भरमत विपरीत.६५ पारावारन चारिदिशि आतम अकल प्रकाश ॥ प्रफुलित मनभा ताहिलखि पायो शुद्धविला- श६६ दिवसनिया कछुहैनही महि अकाश के बीच ॥आदित यकराधिमय को भ्रमरहा नगीच ८७ अवतो पूरण मतिमई पूरणपदको जानि ।। क्योभूलै मंगलचतुरकरणी तरणीमानिध्य फोटिजन्मको फलमिल्यो राधावल्लभनेह ॥ अवनचाहकोउ मन रही मुक्तिलहौ तजिदेहे ६६ मुक्तिपदारथ करलगै युक्तिध्यान निसजगमगलकी शिक्षासुधा मुनिभजु मनब्रजराज १००॥ इतिश्रीमत्सकल प्रज्ञानहायासर्वागसुबुद्धिकाया मगलविनोदकायामग लदासविरचितायांसगुणपक्षनिर्माणवणनानामनवमश्शतक. ॥ ६ ॥ दो। सर्वसिद्धिमय सिदियह मंगलदीख बिचारि ॥ भग- वगर्जन विहूनमन अमितजन्मको हारि १ सवधर्मनको धर्मयह अखिल तत्त्वकी सार॥ आराधन भगवद्धजन दया सहितव्यो- हार २ मदिरापान बजानज्यों त्यों कुलीन धनवान ॥ महामूढ़ चेततनही करतन भगवतध्यान ३ ठोंकारक्षररूपहै विरचेत्रिपु- र स्वअंग ॥ कोकुलीन कुलहीन कहि यकरस घटेत अभग १ जो विभूति चौदहभुवन संवते परक्षररूप ॥ जापक नीचसो ब्रह्मघर ब्राह्मण भयोस्वरूप प्रणवमत्रको पाठकृत नासामग सधिबेक!! पूरण प्राणायामकृत जनु कृतयज्ञ अनेक ६ ध्यावत जाके .मन तजत चंचलता सवाति ॥ सोपद प्रणवलयेजगतबेदमातदिख- राति ७अजेपाको कारणफठिन गहिनको दुखनित्त ॥पाठकजाए- 'क प्रणवकेपावतंसदो सुकित जासअर्थते जानिहै परमतत्त्वको भेद । आपुझिहैं आपुमे वदतवेद विग्वेद चारिऔरहे सिद्धि मन जवलगि रामदयाल । विघ्नविष्टि दिगालखग दहिनहें। 14 .

4 मंगल विनोदा। तत्काल १० मूलवहै शाखासकलं बीज़ई पतंसार ॥ उपजावक नाशकवहै एक आपुकरतार १९ तूही मंगल भीरुभट समरकाल विकराल । ज्ञानमान अज्ञान तू दूसर नहिं त्रैकाल १२ दया पुहिना तुहीनिराचार आचार ॥ ज्ञान प्रवण सुनि वाक्यमम लखु शापन व्यवहार १३ धर्माधर्म तुही चतुर मूरुख पण्डित मूद ॥ बामण क्षत्री वैश्य तू शूद्रतरुण सुतबूढ़ १४ गजवाहन को भेदहै जन्मशरीरप्रसाद ॥ तूही पूरण एकहै नहिं द्वितीयम- दि १५"जीवई शतूहीअहै मायाशया तूल अपनावतभागी फिरत ज्यो सरिताके कूल १६ मायाब्रह्म अदृश्यद्वौ, एकन आन प्रकार ॥ जलबीची शया विटप भूपणस्वर्ण विचार-१७ माथा पति तुहावनी कीन्हे जीववनाय ॥ बहुरिआपनेपंथकरि ब्रह्महि दियो लखाय, १८ माया के नाशेचतुर, कथा कधीन हिंजाय,॥ शंगाजस मध्याहनकी इतउतनहिं दरयाय १८ जब मायाको अन्तहै तब 'दुविधाकोजान ॥ शया नाशत वृक्षकी कोधौं'चतुर प्रमान जलज्ञान गुडजानिये सेवक गुंगसमान । कहिनस- कततास्वायको पोंवर्णन, निर्वान २१ ज्योरहदामें,शब्दहै,पैनाहीं लखिजात ॥ जीवभावभारतत हृदय कहताबनतनहिं वातः१२ एकारण सूक्ष्मत्थूल न वपुधारीप्रभुसोइ ॥ जानतः अध्यातमचतुर पदलेत दिलोइ २३ तीनिवपुपाज्योंई शके सोहतहै विज्ञानः। तिमिनैतन गाजीवके सततमभेद तुजान २४ ईशसतोगुणपूरहै जीवतमोगुणलीन ॥ उत्पतिकाया कर्ममे समतायहै प्रवीन.२५ ब्राह्मजीवएकै दुबौनयन इष्टिनहि दोयादृष्टिहोतहै नेत्रत्ते ताविन . लवतन कोपरशुरदेवभापित्तजगतअन्धनिरन्ध प्रमानाव्याप- क गव्यय अजप्रभूई शजीव है थान २७ जीवनहैपरमातमा जा- नत वेद विचार ॥ बुन्दा लिन्धुमें भ्रम कहा जलएकै निरधार शट खोजत भूली वस्तुको दीपक तमहि प्रकाशि ॥जोपै दृष्टिहिहोड नहिं को रथ दीपकराशि २९ माया बंश भरमत फिरता ऊरध अधबिनज्ञान ॥ जोपैचीन्है आपुपद फिरिन भ्रमै बुधिवान ३० .

। 1 मंगलविनोद । प्रीति एकरत. श्वासमधि राखैज्ञानीकोय ॥ तत्त्वदरश पावैसही ब्रह्मलीन पुनिहोइ ३१ भेदन जानो आपनो मूरुखकर्तवलाख,।। जाना चाहत ईश्वरहि अन्धष्टि, अभिलाख ३२ पूजतापन देवता मुधि, पाई जगकाज ॥ विकल शीघ्रपूजनकरत कवरीझै सुरराज.३३ जब लगि पूजनकरिचुक तबलगि पानननीर ॥ तपा.लालसा उरलगी,पूजन या यधीर ३४-तुलसी तरुमाला गले बांधे बालग्राम ॥ कपटहृदय, परशिय रमत भक्त कहावत नाम ३५ नीचपायकलियापुको कहतकुलीनसनेन ॥ मंगलतू चुप साधु फिन करिधर हरिपदनेम ३६ जिनहि नहीं अधिकार है यज्ञसूत्रधर कन्ध ॥ मगल अब मर्यादको अन्यायीकुप्रबंध ३७ चंदन तिलकदिये फिरत कोलभीलकलवार॥ तेलीधोबी मीनहा परितैहै यमद्वार ३८ गेहधर्ममहकीजियेत्यागिधर्मछल 'त्यांगि ॥ कुलकरणी झोडत, चतुर चलत भलाई भागि ३८बूझि जाइजो प्रातमा तौ ब्रह्मण हैजाय ॥ पुनिनहिं पूछैज्ञातिको संत समाज सुहाय ४० ब्रह्म ज्ञानको प्राप्तभे,नीचनाऊच लवाय ॥ समताको उरवास शुचि मन भावितभप खाइ ४१.दंभकपटयुत गेह रत, तवलगिकर कुलफानि । जव विवेक समता मिले,तव नःवर्ण फुलवानि३२व्यास वेढयहि हेतही कीन्हे धरणविभाग सतवरण दूसर रहा परमहस अनुराग ४३ विद्या चौदहजानि के रतनो विषय विलास ।, ताते मूरुखही भलो-जोन धर्ममग पान ४४ जानि जोहरी परिहरै हीरा काननवीच.॥ ताहिकहिय तृणको धगिक परखनतासु नगीच १५ जेसपूत मांचे जगतगहे घेद मर्याट । ते आदर कृतगुणिनके मूरुखसग विपाद:४६, काग श्वानको पालियो सुंदरभोज्य भपाय॥ तदपिलालसा मांसकी तिमि नरनीच सदाय ४७ शिक्षाकीन्ही ज्ञानकी, दिक्षाप्रणवसु- ध्यान ।। तदपि नीच निजबरणसग भोन ऊचपदमान १८ अहं- कारपोरेकरत मगलनरकुलहीन ॥ प्रावृटके नारेयथा घादनदेत्तन- चीन ज्ञानवान लहिलामत आपुहिदेत दुराय॥ चलतचालि: - N +- मंगलविनोद। पूरुबसरत् ज्यों समुद्र के भायः ५० आनन आपन मगवदत शिष्य समाज अपार ॥ तेचाहत निज मान्यता सोनहिं हरिदरवार ब्रह्मधामको ऊंचलख भजनाभजन प्रधान ॥ करणीही कुलवान है करणीवत प्रस्थान ५२ यापुरमें बांग्लणवने क्षत्री पायराज॥ भजेउन पूरण ब्रह्मपद वापुर नीचसमाज ५३ पढिविद्या पंडित भये लिखिपोथी बहुजोरि ॥ रामभजनविनु नीचमन कहां मुक्ति हैतोरि ५४ अवते मेरी मानिशिप लखुतू नैनपसारि ॥ पूरण ज्योतिप्रकाशहै अध ऊरध दिशिचारि५५जानिन मानत नीचमन विषयवासना ध्यानः॥ आतमको नित ध्याउजपि सोहंहसःप्रान ५६ ज्याँअहिजामत चरण निज लखतन कोऊ नैन । त्योजानत यहातमा आतमभाव सचैन५७विपलबिहंग बनौबसत डरत श्येनंको देखि ॥तिमिलरिख ब्रह्मज्ञान को इद्रीव्यूह बिशेखि ५८ ब्रह्मवेत्ता चतुरसो जोरत ब्रह्मज्ञान ॥ कोजानत ताबिन हरिहि जिमि रविविन नविहान ५६ काल ब्यालके सुख पत्यो जीव भकके तूल ॥ विषयभोग मारवीचहत यह याकी वडिभूल ६० दृश्चिकसुत ज्यो मातनिज भक्षिउदर बहिरातिः॥ तथा जीववधि बासना ब्रह्मलीन हजाति ६१ करीयथा लखि सिह को तजत जीवकी आँश तिमिदेखतही ज्ञानके मोहहृदय महत्राश६२ तीनि भांतिकी कामना संवहिनके गात ॥ दुविधत्यागि यक पथलगु यहै ज्ञानकी बात ६३ गायत्री ज्यों छंदमें सुरमधि यथा महेश । सर्वज्ञान में आतैमा शोधवतपी विशेष, ६४ ज्यो भारत पौराणमें गंगा नदिनके माहिं ॥ ब्रह्मज्ञान सवपंथ में त्योगिरताज साहिं ६५ पातपात, सींचत फिरतः मूलन डारतनीर ।। डार पातायकवारहीं प्रफुलित होहि शरीर ६६ सुकृत पाप दोनोंतजै सो ज्ञानी परमान । विननाशे सुरपुर नरक लहैन पदनिर्वान६७ 'अपनीप्रीतिः प्रतीतिकरूं साथमित्रके सांच्च ॥ ध्याउ शुद्धमति अतिमहि निरंग जनिराँचुं६८ ऐसीप्रीति सराहिये ज्यो पय पानीकरिः ॥ मिलंत एकही होतहरे दुवरण परतन,हेरि ६४ शब्द + - 1 मंगलविनोद। १०३ त आकाशमें ब्रह्मवावय शुभकारि ॥ ज्ञानप्रबल मंगलसुनत तिदोष सबहारि ७० जेतेवाजा.जगतके बजतएक नुरसग ॥ नत बनत वरणत नहीं अद्भुत सुभग प्रसग ७१ हदहीत सब स्तुकी अनहद सीन नशातः॥ मगल यहजानेबिना यमपुर, नर छितात ७२ मारगके सरिता,सरन नृपकृततेत सुकाम।। तिमि नीशिक्षाघदत अपरहेत निजठाम७३ उदय अस्त नहिँ ज्यो- को आदिमध्य अवसानः ॥ -देखत ज्ञानी नैनबुधि दशदिशि कसमान, ७४ मगल.अवकी कपट तजि करुहरि ध्यान सचे । ॥ मुक्तिलहै,नत जन्मबहु उपजिहिकायाखेत ७५ क्षेत्रदेही हि जानिये आतनलो- क्षेत्रज्ञ ॥ द्वितिय नवूझत मूढ़मंति अबूझको प्रज्ञ ७६ हरिमाया में जीवको नाधिकार फछु,प्रा. हे । जिमिन भूपके काम में कछु अधिकार प्रजाहि -७७-बल, बेन उद्यम होतनहि. पूछत्त कोउनषात ॥ वृद्धापनकी यह, या मगलमन पछितात ७८ सन्यसिंधु अव्यक्त अज अव्यय अकल अमान । ज्योतिनिरीह निरंजनहिंकरान करत मनभ्यान ७६ समुद बढ़त राकातिथि हितोन बढ़त क्यहुंफाल ॥ घटतना कौनौभातिप्रभु दाससुखदगोपाल .८१ अबकी निबहै एकरस, ममप्रणकीजिय सोइ ॥ वारवार न भव भवर ममभरमव-प्रभु होड ८१ परमहंत मंडल जुरेवहुज्ञानी चहुवानि ॥ पैमगलपूछ- तभयो पूरणपंद अनुमानि ८२ संसुझायोनव भजनवदि ,नवम गयो मनोरं ॥ अवतो आधा सवतजी हैभरोस प्रभुतौर ८३ जिमिचढ़ियानपपीलको सूझताननधान ॥ तिमितुवशरणागत पस्यो मगल जय भगवान ८४ सोहत कुलटा कर्म नहिँ पति- व्रताको जैस ॥जगनगलको ड्यामतजिसवकोउ दीसततैस८५ जय मायापति श्यामकी जयजय पालन हार ॥ दुखहरियजन जानि प्रभु जयजयजग कौर ८६ जय सतवादी पापहा जय सुखदायक दास ।। जयचनीह अजमाल विनु देवहिं निजथल वास ८७ जयनिरगुण जयसगुणफी जयअजहर,हरिरूप ॥ जय - 1 १०४ । मंगलविनोद विश्वभर विश्व वपुजय जनपाल अतूप ८८जयअरूपजयरूपधर जय अनेक जयएक ॥जय नरतियं जयपशु विहग जयजय प्रभु सबिबेक ८८ जय अनावपतिनाथप्रभु जयप्रवीण त्रैकाल ॥ जय गायत्रीमंत्रशुविजयवैश्यक जयवालजय अहिमहि जयपव- नशिखिनभ जयजय अहँकार ।। मंगलके दुखशोकसबाहरौखक- रकरतार ६१ जयदेव जय देववत जयसाग धिराज॥ धीवर चरभु एकतू जयजयजय बजराज-६२ गुरुप्रताप निर्वाणपद वरण्यो मंगलमूढ़ ॥ यथाबुद्धि बिनुवकत कोउ तिमि यह वक अंगद ६३ धीरजधरि मनर्मेसदा जोव्यावसाग । ताकेकुशलहि क्षमनित होइन प्रंणको भंग १४ साधारण कविता करीमतवि- वरन निर्शन ॥ कविपंडित हरिजन क्षम्यो खोरिजानि: अज्ञान ६५ दासनकोहौ दासही यतिपापी, छलकारि | मंगल मनको मढ़ अति कहौ सेत्य निरंधारि संतजानि निजसेवकरदीजै। आशिर्वाद ॥ जीवत पाचौं सौरव्यरत अंतमुक्ति मरयाद ६७ मांगत मंगल जोरिकर नारायण सो दान भक्तिमुक्ति आनन्द', पदे परिपूरण विज्ञान ६८ दासजानि राधारमण हरी विपतिको जाले । मंगल को निज भक्तिदै कृपासिंधु गोपाल ६६ उनइस सौ तेइस गये संवत पोप सुमास ॥ कृष्ण चतुर्दशि शनौकिय पूरण पुस्तक भासे १०० इतिश्रीमसकल प्रज्ञानहायासागसुबुद्धिकायांमंगलविनोदकाया , । मंगलदासविरचितायांसगुणपक्षनिर्वाणशिक्षामार्गवर्णनोनाम दशमश्गतक'' 2015 - M । +- -- दोहा.॥ . पाठक झोता ग्रंथ के गुण विज्ञान सुजान ॥ दोनो दिशिानद लहैं मिटै भूल परिमाना " रामराम पुनि रामकहि रामराम कहि राम ॥ र मंगल तीनोकालयह राखु ध्यान सुख धाम है 74-7 इति२ T . श्रीगणो शायतम ॥ -- 4. . सनसिद्धांतसप्ततिका ... - । ॥ पटपद ॥ एक देसन घरवसन विघ्न नाशन लम्बोदर । मदन कदन सुतवदन, नाग सेनापति सोदर ॥ चन्द्रभालं गुण- पाल यथनायक शुभकारी । तिदिधाम शुभग्राम महामंगल प्र-- धिकारी भणि वै मातुर हेरम्ब, पुनिवन्दि विनायक कज़चरण । मंगल-समोद तनमन वचन ज्ञान कथा वाहत करण १ आसन कुबलस लसत भारती तुमति प्रचारिति । हंसवाहिनी भग भास्वा कुमति निवारिनि ॥ बागदेवतातोय विधाताधाम बिला- तिनि- सरस्वती शुचियक्ति बाणि कवि पाणि प्रफालिनि पुनि बन्दिवा शुचिबाक बुध्यायं गिराअवहरचरण । मंगल समोद तनमनबचन-ज्ञानकथा चाहत करण २. ॥ कवित्त । गोतको बिलोकि महि जात नाक बोसकीन्ह बाल रविली लिमिटायी अभिमान है। सिन्दुर लुकाच नारि भाल तियत्यार्ग जानिविद्रम समुद्रमाझ अधिक लजानहै- आकर छपान लालजाकर प्रकाये देखिहूजिय दयाल तुप्रतिइ खलभान है। मंगल भरोसे कपिराज हीके हरियणगावत सहायकर एक हनुमान हैं. ३ ।। संवा । प्रादि अनादिकहै, अति सज्जन पूरणलप अरूप अमोमा धाम अधाम निराजत आपु-स्वतंत्र अकथ्य अनीहू, अनामा । चौदह लोक प्रकाशित जो बहुभांति गुणी अगुणी अभिरामा । मंगल हीनदयाल वहै करजारि को पदकंजप्रणामा ४ दीन दयानिधित परमातम वेद पुराण अनैसतिसारखी पालत बात दशौ दिधिर्म प्रति रोगन गरणागतराखी । व्यापतं ताहि ने मोह उपाधि जो तू पदपकजको अभिलायो। मंगलहपर होहु केपालमनोरथ पागद चारवी लोग भने भगठानि कृपानिधि है विजंदात - - m १४

१०६
सप्तशतिका।
ननोरथवानी । वेद पुराण कधीय महामुनितेड बर्दै यहउत्तम
वानी ॥ सोयबिचारि प्रतीनिभई उरमोरि सुनौ टुकशारंगपानी।
मगलकी मनकामना पूरिय होः सन लायक मोमनमानी ६
देहु मनोरथ वेगि कृपानिधि. सत्यमनोरथ दानि कहावो । काहु
के काजको बार न लावत 'क्यों ममहेतु अवार लगावौ ॥ हौदिन
राति रटौं तुव नौमाहि जानतही पुलिकाहे भुलायौ । मगदीन
पुकारत भारत बाशु मनोरथ मोर करावौं ७ जानतही नाहीस
गुणं निर्गणनाम प्रताप लखौं दिशिचारी ! ता हित नाम खान
करौं नितापकरौं अचिनाम बिहारी ॥ ध्यानकरों भलनीमहि
को अरु ज्ञान गुनों तुर्वनाम विचारी। मंगलनाम गोर्तुव मोहन
देहु मनोरंथ पाम मुरारी "जीन मनोरथ लोग जब जवतीन,
सतुवनामते पार्यो। कौनहु काल निराध रही नहि सत्यकहीं
नहिं जात छपायों ।। कीट मनोरथ दारुशरीर लग्यो पुनिटीई
धनोभ्रमछायो। मंगल सो पुरवै करुणाकर त्यागिसबै शरणागत
आयोट को असभूति विभूति तिहू पुर जो न मिले तुम्हरोयी
गाये। तीनिहलोक वनावत पालत नाधतही अपनो मतपायेगा

। - १ . wak सतयतिका । कारण सूक्षम धूलहु नामते तीतिप्रकार,कहाया१३ तांचुबुखा- नत-निन्दकवाजत,झूठबखान कियोनहिं जाई तत्त्वमसी- --तिसामवतावतको तत्व अतितीनिभाई । सन्तमहन्त कवी- शाहु,कोविद त्वंपद-ौतत ईश लखाई, मगलवह्मवर्दै असितो -पुनिदैतरहा न अद्वैत गनाई १४ सास्य विचार कह्यो मुनिदि -पुचीसप्रकार विधानहिगायो।कर्मप्रधानप्रमाणवद्यो भवजीवन- -पार-अनादि जनायो ।ईश्वरमय-जगभासिरहा बिनुई चराचर नाहिलखायो। मगलयोगसमाधि बिहाय कहांलखि.कारणतार- -पायो१५अादिनहीं भवकी अरु अत न नाहिं बनविनहारवता- इय । पूरुप यो प्रकृतीहिसंयोगते होतसमस्त निरस्थिरगाइय॥ भूतलनाक-पतालनिवासहि देतेनहीं यककर्मप्रभाइय । मंगल १. कर्मकारण-होत न कारणते किसि.मुक्तिहढाइय१६ पूजतदेवन कारणपाइकै ध्यावत देवन कारणलागी:। तीरथ औवत कारण हीत न पन्थ अपन्ध-जुतोपतत्रागी।। देहरंगै नाकारणलागि चढ़ा- वतनीर सुकारणेपागी । मगलप्तचितकारण देखत मोक्षन कारण -को अनुरागी १७कोउबनों सुर्खियाइत. डोलते कौउमहाविपदा स्थधिकारी। भूपतिकोउ प्रधान चमूपत्ति-कनधिवनो पर्दचारी। परिपडत कोउ बिमूढकुलीनमलीन कहाच चीनचैनारी। मंगल मोहमस्पो निज बातम जानतताहि महा अविचारी । तप को तपव्यापत काहुक्मे धीत सतावतहै दुखभारी । भीतपा- सवसमें विनुकारण मान्यसुनावत लोग पुकारी ॥ आनंदला नित काल-वितावत एककहावत द्वीतभिखारी - मंगल मोहग्रस्यो निजाताम जानत-नाहि महाविचारी-१८ वाइनके यकसून -वनायत एकमुपेतन देतजिवाई । एक, करामत आप दिखावत भूत पुजावत देवधिहाई एक प्रशोध करावत ब्रहा तो आपनहीं मतिकीटुचिताई। मगल संत समर्थसदा जोकरेंसी सही मनायो भ्रमलाई २०षस्तु अनादि सबैजन खोजतं चित्तन सूझतापश्च- " नायी। शुद्धस्वरूप अनूप काय सो तो येक न - ।

m - १०० सप्तशतिका। भूलमिटाय गहेंगरपाया देय लखाय नहोहि विपादी। मंगल देत विहायन सर भापत, मुनिहूसनादीर १ तीरथके बगर- तिकेबगहें बतकेवशमें प्रतिभूखे । पूजनकवच पाठन केव जी- पनवश बोलतरख, । ज्ञानेहिकवर्थ ध्यान हि केवा स्यानाहिक वश बेद हिंदूखे । मगल सम्पत्ति केशम नित यातमकेधनते प्रति खूखे ३३. जांधवाहु कतिपएक खड़ेपदएकर है दिनराती एक अधोमुख झूलन झलत क्षारपिय तजिनिभाती। कारसेंजरहै नितएक जुकाटतायु विशवत पाती । मंगल प्रतिमज्ञान बिना अपनेमनते यह स्वाँगदिखा २३चामकरण विशयर, यकझारि मही पंगदेत सदीहै । प्रात, निजदेवलजाय चढ़ावतचायल ज्ञानकदाहै । मौनरहें यकसैनवुझावत औघडेबास सुराहि येदा है । मगलजानतातमा जो नहितोपर्ड सांच स्वींगवटाहै ३४ जागतमजस चेतन चेतन सोवत तंतजागिरहाहै । इन्द्रिनके व्यवहार अनेकनसो नलखें शुचिरुप महाहै यापहिजनित आपरवानेत दूसरकोन विवेकलहाहै । मंगल जाने विनीभ्रम' लागत जानतज्ञानतान कहाहै २५ जीबहिर्तिनपाकलांगत पूरणवह्म प्रभापसरी हैं। नीचकुलीन नहीं यह जी कहावतमें 'अहि ज्यों रसरी है। भूल बडी तनमान अमान मि छोडत सो नन पोढसरी है। मंगल संतसमाजबिना कटकाटिसकै नगले फसरोहै २६ शक्ति पिपोलके अंगवद गजते तनम भरिपूरिही है. देव अदेवन में पुनिसीय मनुष्य पतंर्गको शक्तिवही गानोग बनस्पतिमें फिरि देवियपै दुविधायक चित्त नहीं है। मलेडा- । वरताल नंदीयक नीर न रूप मेदयही है ३७ या तनम ईक नित्य निरंजन सत्य मुनिसत खान । बोलत डोलत तोक्त रोवत लेवंतह निजध्यान प्रमनि । बुद्धिनहीं जुबडी गुणवानि नहीं मेन चचलकी गतिसाने । मंगलापुहियापुधिराजत तू' दशहू दिशिमें भ्रमठान ३६ कोन बतक्ति काहि बत्तवित कान लंगाय सुनै पुनि कोरे। काहि चितावित कौन निमावत'ज्ञान न - प - सप्तशतिका। ११० यांचत ज्ञानवटोरें गाजाप्रभु ओघुप्रकाशिरहा न हित्तीय कहाँकि वेसनतोरे मंगल मौनगही अपने घर जो अपने सबके घरसोरे २८ कामवीभव भूतकितें असेंकेतन के मनोध प्रजार लोभ लियमन काकोडोलत महिकि राजु बधोनि सम्हारेका मान प्रमान हियेणं काहुको कोउ महामर्दको मतवालामालं क्यों नियह बुझिविबैंक बिनानितही दुरखमरियमंत्रनवशतप्रेन केवयन्त्रन वधर्मयकफूले भूितनकवधिमूढतपिपाचनविश मभ्रम'पेलन झूला वोरुपकेबग जालनकोयश लालनके वैशबैठ अलूले मंगल भांडलो स्वागनकवर्श धोतमा धापन आपुहिासले ३१ अयन के घश पन्नके घश संथनकेवश पाठकंडूले योगन कवी भीगर्नकबंश रोगनके वशमेसहाले । योधन केवशयोध. नवर्ग चौधनके ज्ञान अमलेमिंगल पण्डितः घेदन के घंश 'अतिम अापन आपुहिभूले बाहिरमें मनसतौलागताअन्तर श्रीनविचार विचार ज्ञानकथै निधिवासरास्तू खलाफामा फला छुपिके अनुसारैगाबातविवेक फि गवितहै नितमोहमयी मदिरा "चितधारै मंगल स्वागनसौंन सरेहरिकर्म कुकर्म समस्त निहारे क्यानभर्जे हरित्यागि विपयरस नीरसलौकिनबनिजावे। जन्मश्रमौल गावत कयो समुझायकहै समुझो जन्नताजा- नंतहे पनि मौनतनाहिमिहाखलधौं अपनी मैतिभाव-मिगल ध्याउ मनोहर मूरतिअन्तरवाहिरजोयुतिगावै कानधात नहीं सुनिनादते नैनजुडात न रूप बिलोकी। ज्योरसना नायकै शुविवादते नाकसुवासते नाहिसंशोकी ॥ोन वापरसेलन धाकत अद्भुतपक्ति सुपाचहुमोकी । मंगल पांचथकोमनथाकत नातरु कौनसकोमनरोकी ३५०को असंभूतभयोजागोजेहिके मिनमें लगी विपाशाला कामकि लोभाकि क्रोकिमीकि द्रोहकि छोहकिमोद बिलामाखान किम्पानकि सावना जातकि स्विर्ग अाणकि मुक्तिप्रेकामाामगल इन्द्रिय स्योमन जोलखुसो 'विषयी अटक्यौ भ्रमपाशा ३६ ॥ दंडकारामलखकि वातसमु. - ११० सप्तमतिका झाचन गुनावै भ्रम वृथहि लखावैजाहि लखतना कोई है । अगम वतावैजो चलायमान बुद्धिवादुविधा दुराशावश सुमतिविगो हा गुणा सुनावैजोगुणानिक रि भांतिभांति दभकृतज्ञात कैले सुधि बुधि होई है । मंगल जो अकर बताय कहै. कीन्हे लोक तो तौ देत भाववंश आपुरहा सोई है .३॥झलना ॥ माला गलेहारेच फिरंग मालतनशलघर बैठतहां वानी र PRोती. प्राचारकैवादी-बडे प्रतिद्वारकाधनको खड़ें ले भागवत ऊपोथी भाई सोहावन-बासको॥ एकादशम अर्थाचहीं विज्ञान त्योग लखावहीं औरोंकोतो समुझावही झूठेपिता हितु तातको। मंगल भुलाने लोभमें माया महामद क्षोभमें आकाश साधेयोन में कहु-मुक्तिको दरशातको ३८ उठिपात झाडेगेहलो पुनिधी 'बैठे देहों पूलै विद्योता; नेहको दुविधाको ही वास है- पार्व "मनोरथ नाहिने धावेजो बाझे दाहिने तीरथ शिवालय माहि ने परब्रह्मकोगन:प्रकास है..॥ विद्या विधान, बवानही विज्ञान मोरगजानहीं हतां नहीं-उर आतहीं, पंडितकहा-अनयासह मंगल विचार योगको आशा लगीउर भोगको बाहै नही सरोग को बंधन महाँ भ्रमपास है ३६ गुणज्ञात को-उरलेशना-विज्ञान को उपदेशना बैरागको तनभेसना धारण किये संन्यास है। जानेननेती धौतिको अष्टांग साधनहोतिको भानिएलान ज्योति को कारणलिये अभ्यासाहैं ,श्वारलानरोकी एकाहै योगीबत विवेकहै शब्दैः अनाहद टेकहै वचकहियो जपन्यास है। मगन मानध्यावै रामको पावन सोमनकामको ठगताफि रवामको परिणाम यमकीत्रालहै ४६ जबतत्वकोजपाचारना-तिहुली को विस्तारनाफरणी करसकरतारना संधितानि तारानाथही अहंकार पूरुषप्रकृतिना धितकंठपूरण शक्ति ना कछुपोगा भगता जीभगतिना भानन्द दुखलंहिसायहोमिनबुद्धिको निरधारन मधिनातमा व्यिवहारंना वैकुंठन पिचारनारपूरणकला गाधहो। मैगल कहां तवतू है। प्रवासत्य क्यों नाहींकहै सत्ते - T सप्ततिका। फैन मेरोदहै भूपति किनावत मायही ४१॥सवैयाजी वअनन्त चेति लोकमे एकसो दूसरनाविनोहै। एकसिवुद्धि न एकसित तुद्धिनएकसे जाननचित्तसनोहै । एकौशब्दन एकसों तेजना किस्तिथक्तिन भक्तिमनोहै। मगल धन्यवनावनहारजिहांतहॅएक हरूपगमा है। ४२ एकस्वरूपंतिहूं'पुरंडोलत रूपअनेक -धरेचहुँ वानी योवहरूपिय रूपवनावत धानहि श्रान प्रेकारप्रमानी- यापन काभेट्नलागत स्वागदिखायप्रसन्नतप्रानी। मंगलत्यों- प्रभुरूंपकिये बहु एकप्रभासवअंगसमानी १३ ऊपरकोसिघ खाँग बिलोकतं अंतरकीन कथाअनुमानै । साधुनही वरुप प्रय चित मूर्ति निचोलरगेतन धान । एकनापं विभूति विमर्दित जानत-मनमें शुविज्ञानगमंगलअत विभांति वतावता साधन- को गतिको पहिचानयोजिटातिनक्षार बिमर्दित हस्तकम- उलु सेजकुठामा भालत्रिपुंडे गलेबहमाली भुजानदियभलछाम सुपामानाचाम कुरग वियर नितज्ञान कथै सुकथाभिरामा मगललोनिजभाव नहीं दृढ़तौ यह साधु किया छलसामा ४५ ज्ञान जाउ बिसजतशीयहि भालविचारकी सोहतरोरी तोप निचीलरेंगेढ़ता निशि धीरजकेसँग प्रीतिन थोरी ॥ दीठिविवेक, बिलोकतमारगे राग बिहून कि घूमतिखोरी । मंगल यतिमबो गुरूअससाधु महीतल मुक्तिकीधारी ४६ठहुमेंन खरीदततूमन कौनु अनेठकी घातचलावे । वामलिये फेर कॉमनवित धर्तिन के मनमो करीवै। जानिलियों पहिचानि भलीविधि विधिब झूठ हमें भटकावे मिगले ज्ञान विवेक विचारसों पुतुही कसे 'आमवतावै किचित्ता काहूयलपंडित स्वरूपैंधारिवंदपढ़े काहूं. थलोकवितनकृत कविताई है। काहूधसाधुत्तन साधनाअनेक कृत काहूधलेमोनाति बैठोमोनलाई होकिाहू,लचातुरीतिखाचे कहूँसीयाप कोहूधलंबिपुलकरतानिपुग्णाई है काकाहूलमंग- लडचित्तों कहूएकचित्त ऐतोप्रभु अलेख लेख प्रभुताई है ४८, सर्वया गानोदुख औसुख यावजीवहिा एकअष्टिहिसोकहिंदी . ।

११२ सप्तशतिका जिय, ताबिनधाननहोतमहीतल जोनिर्वाणको मारगलीजियः।।। तौदुखको सुख एकतमानहि मानिस्वातमके सभी जिया मगल ज्ञान गलीसकरी प्रविण मतिथूल न कोटिककीजिय४५ ऊसरमेंन.उगैतरणकैसा धारिद जोवरपैसुरपानाथूहरवक्षनपात. विलोकिय कौदिउपासनसों गुणवाना ब्रह्मविचार निरूपायज्ञान को व्योंकृतजोनिजसत्यतमाना । मंगलजन्म जरापुति. ताहित ग्रसितदेवदसाधुसुजाना जो यह जीवा निराकृतवाहिना है- तनलिाहिको अधिकारी , क्रांतिनहीं' शुविधातमदेवकी है। प्रगटोकछुपिंडविकारी';॥ तोहूं विचारत -प्रातमज्ञान सम्हारत, आतमध्यानाकारी । मंगलनर्कन स्वर्गहिधावत जाइनिवासत धाममुरारी ५१ सूरजते प्रगटैजिमिश्रातपपाय, प्रदोपमिलै- रविज़ाई । कोटि उपाय, विधानकर विनुभानु न आता देतदि खाईजी त्यों, सचराचर प्राण विलोक्रिय ज्योति अपुरव ब्रह्म लखाई मंगल अत्तमिलें तिज नार्थहि, कौन अधोरधकी गति पाई राती निहुंकाल युगान सुचारिह बेद पुराणकथा सरसाई। जेतिकजाहि समर्थकदै ततदेव अवनकी प्रभुताई। धर्मअधर्म क्रिया पुनि कर्मभने सनामांतिननेक दुराई । मंगल संतमहातम भाषत ठिरहोत्सबा लानि चुपाई:५३. नंतकहे हरिमानुष भी अरु संतक लवणोदःसुखानो, सतकहे पदमूलभयो अरुसंत, कहोलभगेश सकानों-॥ संतराहे पगि सोण-पायो पुनिसंतकहे विधिपूजताहातो, मंगल सतकहोतर हरिपाइन ते प्रगटो जगजानो.५४ क्यों रविपाय हिवाम तादेखत दोप,प्रभाकरको कि,विहायतान्हातहि गंगपने मला दातहोतनाउज्वल धोवत चार्यसंशुद्धःमनोगति होतनहीं चिमिधर्म सुतेरत्त इन्द्रिय स्वायतामंगल को उपदेश मनोहर मढ़नाचेतत कोशिपायल सनातन बेकाबखानत कोविद सो कविता सजावे। आदि-अनादि-अकारण कारण सत्यायनी सोड लखावें । बुदितमान प्रमान विधान करै निरचारि निगूढ रानावे । मंगल, - म k सूधिरया बिनुक्योंकिहहै जुसँदिग्ध नहीं बिधिभावें.५६ लोपै सुपूर्व स्वरूप कृपानिधि तोसुर तेरह तिनधीन्हे । जोप्रभुमानुप- प्राकृति गाइय तो फिरि कोमंत धारणाकीन्हे क्यों पशुकोट कहाँ मनमुरुष है खगलोन काहि लीन्हें मिंगल भूतपिशान बनं भासर हटिपरै नहि दृष्टिहिदीन्हो पूजतत्त्वकहे मृतिकाजल पावक घायु सनातनहै प्रमुसोई । जो गुणतो सतराजस तामसे पूरुष यो प्रकृती नहि होई ॥ त्रैमुरतौविधिविष्णु महेशनायें बितीतत कालक होई । मगलशक्ति यशक्तिन भास्वर दृष्टिदिये नहि सूझि परोई पक्ष खजूरि लगेफल दूरिकिये बलभूरित पाथरजाई मूलबिनाकिमिधायचद्वैमहिटूटिपरेनहि देतदिखाई। तातरु पात समीर कि सधिमें घूमतहै नहिँ होत गहाई। मंगल 'सोजड चेतनही फल सतलहैं बिन पक्ष-डाई पू८ साधु फही. मनाहाय नजाकरध्यानकहा चितचेतनाहीनो। ज्ञानकहा मति गोथिर नाहिन भक्तकहा शुचि त्यागनलीनो कौन विवेक जो इद्रियकेश क्षेमकहावधमोह न कोनो। मंगल ब्रह्म विचारकहा. लोपै पातम छापुन आपुहि चीनो.६.०-स्वर्ग, निवास कहा मन तोपित नर्ककहाँ बहुश्राधि सताये । भोगकहा सुरवामनके सँगर सुन्दरबुद्धि समाधिलगाये। नर्ककैलेथ महा कृमिचाटत भ्रामिक लौघहुपथनधाये । मंगल भूल दुबौदिवि नर्क जोयातम ध्यान' गहै मुवपाये भातम ब्रह्म निरंजन भाषत बातम देव अदेय भुलानो । अातम लोक अलोक अधीरज जंगम, पावर रूप सः मानो ॥ तत्व अहंकृत है गुण बातम बुद्धि विधान समान बरवानी मंगल ध्यानसदा कृत श्रातम, संतसमागम सोपहिं-- चानो ६२. विष्णुभजै नरजन्म दुतीनिकु मुक्तिलहै जब मोहन जागैः। शक्ति अनादि निरूपण जोकृतलीउनेजन्म अष्टहित्याग:- शंकर ध्यायलहै शिवलोकहि अंतहु जन्मापदारथलागै। मंगल ब्रह्मबिचारि कहै उरावत मोक्षाहि सो अनुरागै६३ एक भषैफल: सक्ष न जानत कौन दिशा क्यहि देशहिलागो । एकलिये फल। १५. 1 ।। -- । सधथतिका खोजत पादप खीतनहीं गुण औगुण पांगो एकते जानत पेड़ भलीविधि खात महाफलजी अनुरागो।। मगेल.एकन खीतन जानेत कोतरु कोफलमूलको सागो. ६४ बालक रूपा महोशुचिः सुन्दर देखनहारके चिहि भावतःचंधप्रशंसित रूपनादेखत्त टोवनको निजहाथबढ़ावत ॥ सूक्ष्म स्थूलने लंबन चाकल ऊर्चन नीचाजो हाथहि आवंत । मंगल क्यो समुझै पुनिमूरुख पाखंड के कर ज्ञान गहावंत. ६५ दृष्टि न ' श्रावत: रुपन्मनोहर शब्द अनूप देतसुनाई । भापि न पावत अद्भुत अत्यहै शुद्ध सुगंधिन वासहआई। सुष्टुंपदारथ हैं मनभावना कोटिहु भातिन होती हाईमपलहै नटवाकरलमोहर देखेवनै नहि जातचलाई दिए मेघचले शशिमूढ़ बखानत नावचले तरुजातेलखाई। बालक, ज्यो पहुबारन घूमत वैठिलखैनिजदृष्टि. उठाई। ॥, देशभ्रमैगृह : घाहेर भीतरभूनभघूमतादेवतभाई मंगलत्यो मनकीभ्रमणा विपरीत लेखेभ्रमजातनभाई ६७ बालकता तरुणाईगई बिर धापनकेशःश्वेतबिराजै'चानन दन्तबिहीन सुनैनहिं दृष्टिपरैः जगधुंधसमाजकमपत कर द्रिय पान कोटिकिये नहियात. काजै। मगल मृत्युसमीपडरैनहिं रामकहै नकुकर्महि लाजैदी क्योमन ढूंढ़तहै दिभिचारिहु स्वर्गचढ़े अपवर्गहिधावै। तीरथमूरः ति जापान पाठ न पूजनभोजनमे दुचितावै॥ संतनपूछिमहत्तन- बूझि सबैउपदेश मुनीश्वरगावै। मंगल सत्यगुरू निजातमापक नभेद्रजो आपुवतवियाठायाम प्रसिद्धपुकारत शब्दमनोहर हंसकि वानी भूरुंखलौं दशहू दिशि भ्रामिकक्षरखोजत बारवर दानी ।। चेति अनौंःअपने 'घरबैठिय भूलिगयेधन मूलकिहानी । मंगल जोतिहुँलोंकमैपाइय सौंअपनेघरहैन भुलानी ७० पांचहि- तत्त्वनतेपुरतीनहुँ हैंविरचे करतारसुजाना। आपनअंश प्रवेशितकैः सवराचरजीक कियविधिनाना. ॥ तोरशरीरसोपंचप्रभूततेहैं लघु दोरघकेरि प्रमाना जोगुणेसिंधुमें सोगुणविंदुमे मंगलभावद्विती - . सप्ततिका अरूपींपवाल फिरिकौन है ।अगुणवखान कृतगुणहीकोलोपहीत बजरवताये जाग्रसितनतौन है । कहतअनादि आदि द्वितियनि- चारहीत भणतअखण्डखेण्डदूसरनजौनहै । पुरुपपुरीणसवेठाम- नएकभाव मंगलनजानिपरै द्वितियकोगौन है ७२ पुरुपबखान कृतनारिकोविभेद होत अंचलावेतोयनररुपी कोऊनहै। लीव- तेनगाये बुषिसाधुमाने नाहि प्रतिनिवासभा'मायाकोम्-ि लान, ।। ऊरधनिवासकहीं प्रभुअंधरांजैकौनु श्वेतदीपसोहैं यान 'होपकाकोधान है । नगलचंपार किमि वरणिवत्ता ताहि अधिक नहीनहरि सदहिसमान है७३ कोटी पतंग पशु खगनर नांग मुनि देवता प्रदेव लेते त्रिपुरविचारिये । सबमें विराजै एकभाव संबठामप्रभु सबनते न्यारोकरि ज्ञान निरधारिये ॥ जैसेघटमठ धामसनमैनाकमिलो बुद्धिचपदेखेन्यारो चतुरसम्हारियो बुद्धि में वै नविवेज्ञानगावे कैसे मगलबताच तातेचुप्पचित्तधारि- ये ७४ संवैया । ज्ञानगलौचलि सूझिपरे कछु सोऊ धनैकहतेन , अनूपा द्विश्रेचंभित मोहितद्वैमन शुद्धिाशुद्धि परैभ्रमकूपाना लोकमेनाहि अलोफर्मेनाहिंन धोकमेनाहिन रैयतभूपा। मगेल है तुवरूपवहै विनज्ञानेंगुरूलखि जातनगूपा ७५ दास अदासन दासकुदास विचारत,प्रभु ब्रह्मसनातर्ने । पलितएकहिभावचरी- चरमोहनरुप वसै सबगातन ॥ नीचकुलीन गुणीअगुणींमहिदेव गवाशको भेदनजतिन् । मंगलतासुप्रभालखि नैनन त्यागेंत संत बिरयनिपपतिने ७६मापनको संबज्ञानियजानतापनकोतव यानियलेखे। आपनकोतव भक्तप्रमाणत आपनकोशुर्चिहीय- रेख। आपनकोतवसंतबरवीनत नापनकोतपसीलमपेखें। गंग- लमानय हैकहिये भव आपनिमूरति प्रापुंनदेखें जीविहैिकर- 1. ताभवको शंतवव्यतीततकालनशावें । शंकरदेवतुरेशहुँको मृतु 'नाकर यहवेदवतावे ॥स्वर्गनिवास सुपर्वतजै तनकालविलोकि नीरजावे। मंगलभूल महाजगजालमें क्योनकृपानिधिकेपद या करियपगे कहि धामयरे मन तेरहनी रिनते जगपूरों। । - - सप्तमतिका यो मनुराज कहां चवतात्तरचेबहुअन्धं प्रबंध अधूरो॥ मकहां -पुनि कच्छकहाँमुनि दक्षकहां, कियचीस समूरो, मगलतू-मन मे नहि शोचत्त मृत्यु प्रताप सुने मुख यूरो ७८त्यागत देहायी सुकृती सबौरसर पायभयो ऋतुहाको जानि न जातकहां चाल जात न घूमिकहै सुबुधी निजशाको ना कौत दिशा क्यहि देशवसै तुर कौनके रूपअरूपप्रभाको। मगल मानिलयो मनतेनतःका- कह मोक्ष अधोगत्ति काको ८० केतिककाल व्यतीतभये मनजौनु यो रथलौटिनहाको त्रानि खान करचो न दशानिज नर्क -गिस्यो, किधों स्वर्गहिताको ॥ भोगकरों कि सरचोनिज भावहि रोगग्रस्यो कि घरोगहिछाको।मगल-लोगक, सो सही-क्यहि मोक्षफहैं। यो अधोगतिकाको ८४ आचकहातेन-यापुहि जानत लोगतको मुखसों सुनिमानी । ब्रह्मतेकर्मतेखानिनिगोवत्तेवादम के तनरूह समानी । पुत्रपिताते पवित्र सुजीवहै पूरुप औ-प्र- कृतीहि प्रमानी । मंगलपैन-पताकालागत खोजतप्रांधरवस्तु हिरानी-८२ ॥ यथाकषित |कोसकोजमाई एकमूढा चल्यो सासुबर चीन्हत्त न-सातुं न ससुर निजसारेको।-गविले निकट जातजामहूँको भूलिगयो-चकित भ्रमात पुर-सफल दुवारेको । फोऊ.याहि जाननाहिं यह पहिचान -नाहि-बिकल महान मन "कीधी मतचारेको मगल-सकोचिमन लोगनसोपूबैलाग लानत सिजान कोऊ ससुरहमारेको १३॥ सवैया-॥-मातुकहै सुतसोर हे अरु तातकहै सुतसो निजपूता । नारि वदै पति-पुत्र पिता प्रपिता कहि नाति मचाव अकूता, म मित्राकहै हितुशत्रुकहै भरि शिष्यकहै मुरु श्रादिप्रभूतानमगलपन-मिशनतहै कोउ साहिब -होइ कि किङ्कर-दूतो ८४ जीवचराचर-जे पुरतीनि प्रकाशित सबमें पुनि प्रापू -ज्यों सब बस्तु प्रकाशक भानुहि ज्ञान-विना भ्रमपूजनापू॥ शुद्धसतोगुण मूरिरहा निजअज्ञतमोगुण राजस दापूर मंगल मोहन मूरतिध्यावत लागत है बरदान न गापू.-५ ज्ञानधिना सिगसेभ्रमहै नहिबूझत मरुखसार असारा । दूरिखदै ।

सप्तमतिका।
११७,
भरिपूरि रहा प्रतिपारस भनै प्रभुसत्या थकाताअन्तर माहिर
आवत जावत धापनभेदसो,पापु पुकारा । मंगलपै नहिं मानत
तू गुणल्यागत औगुणहोत पसारा ८६ कश्यपकी दमती नित्रिया
तिनके सुत तीनिहुं लोकभरेहैं ।। स्वेदजः अडज योनिज निज
वारि खानिनमें पसरेहैं। एकरूपअनेकभये बिनु कश्यपस्यों
कहिये वगरे हैं- 1. मगल-कश्यपको लोपैलूढ़िय तौनहि काहूके
धामपरेहैं ८७ जामतमें दुखही दुख देखियह वपने महँ, दण्ड,
कराला । इन्द्रिय धूलतो जाग्रतमें बरु सूक्षम सो स्वपने कृत
शाला ॥ कारणरूप सुपुति में चकिचौंकि उठेपहिरे भ्रममाला ।
मंगल को निरधारल है दुविधा. नितीनिहुं में विकराला
कारण देहमिटे सुनुरेमनका कहिये बुधिमें न समाई टुक्षकहाँ
पालफूल सुगन्धिजो धीजहि हानिपरे भ्रमताई पात्रहितत्व:
नते तिहुलोक, जो तत्व विनाश तो लोगनभाई। मंगलकारण
भाविचवानिय बादि समस्त चहै-निपुग्णा,८६. श्रीपरमातम
पूरय रूपजो अतर बाहिर भाबिस जाना अजानप्रवीण स;
मूढ़नपावत जाकरशुद्ध समाजैासी जगदीश बतावत-पास हि
सन्त महन्त कबीश चकाजै। मंगल अन्ध अज्ञान-बिना गुरुपंथ
न हेरत धावतला १० बालक तामह मोहनही वडिभल कि
झाललगी मनमेंहै। प्रौढ़भये कछुमोहसकाम इत्तैउत्तहेरत भूलन
मैंहै; वृद्ध नाममोहबढ़ो उर ज्ञानकहा प्रभुताधनमें है। मगल
चंतक अतयस्यो सब छोडियो भावही-क्षण है.८१ तीरथको
पगदेत्तमिटै-अवयों कविपडित लोगवरखाने । स्वर्ग बसें बतको
फलपाय- बिलासकरै मबसों-सुरथाने । जो अधभोग दुवोपरि
स्यागत सोक्त तीरथ औ बतठान मंगलमोद-समेत लानेहरि
मुक्ति पदारथ करतल याने १२ काम सतावतकोध नरावतलोभ
भमावंतहै-चहुबाई - गिरावत दम्भरिझावत,संतन, भाक्त
जड़ताई ॥ मोहनभावत जाननावत-चित्तचितावत धान
उपाई । मंगलं भक्त कहावता ऐतेहुः एकहु-भावनभक्तिलखा-

सप्तपतिका ई.३ सत्य न जानत झूठ घरवानत मानहि मानतहै दुचि ताई ग मूरति पूंजत भोजन भूजते हैं। बहु कूजत खाइअघाई। धर्म-दुरावत कर्म करवित चित्त'न भावत अान"बडाई मंगल भक्त कहाचैतऐसहु एकहुअंक न भक्तिलखाई जानता पनों शुचित्रातम ऑननको अपवित्र विचार । श्रीपनधर्ममनी. हरहै यहिनाहिमलो दृढज्ञानप्रचारे काठगढ़ाया गलेगहिवाधिक मूरतिपूर्जिगुमानहिंधारों मंगल नेकदयाउरमें नहिमक्तकहावत ज्ञानविसारहि५ प्रतिमवांस शरीरवतांवत लोगनको मन भक्ति तेंटारें। देवननी दिकरेंवकघादुन स्वादुलगैमुखजीभचारें ।बोत नमानत संतनकी नकवीशकिवाणि हियेकछुधारें । मगलजोहंठि श्रोतमपूछिया तौफिर वत्तिसेढांतनिका ६६ ब्रह्मनिरंजनज्योति वतावत'कोऊहै निरवाणविलासी । भवेतसुदीपवैखानतको हुँ शेषके शीश कहैमनभातीं। कोउबदै हरिधामसुनहि लानत हैं मुंनिज्ञानकोसी। मगलकेउरमेंदुविधा फिरिह समठामहिकानु बिलासी एब्रह्मजोहै नरकायविराजत तौपशुफी-बिहायस- कोहै। देवेनमेंनित संतनमें प्रभुबाप्त करै गुणपडित्ततीहै ॥ दैत्य अतंतनपुनिकोनु बिराजिरहा गुणगोगुणजोहैं। मंगल भूलकि कातकहोन द्वितीयकहींइऑपुहिदोहै ८ एकरखानतहै विवि- धाक्यहिभाषिकहै बकतीपुनिकारे। वाहिपुमानभने यहिनारिन नारिऍमान गुमानकभारे गाएकअपार द्वितीय अनादि बखानत कैतिकहमतिधोरेग मंगल सूरजधूप हिभांतिन 'ज्ञानबिना सबके करजोरे ६८ कवित्त । ब्रह्महीमाया ताते तीनिर्गुणं 'पोचतत्त्व सूक्षमसंधूलकवि दुविधलखावे।तत्त्वनतेसातनाकदेवर्षीसदेखि- यत सकलपता उग्रति तत्त्वरिगावैहै । धादिौन्ननादिननेंद्वि- विधिवखाने लोग मँगलकवितएका सांचौतित्रावहै। मेरीजीन विश्वनाथ घोलकीव जैसे चिकैघरोंदा पुनि आपुहिमिटावे है। १०० क्षमामिटिगंधिहोत गंधि:रयोगलेत वापरतरूपपार्य रहतनलेशहै। पुनिरसम्पायर्कशरीरमिलि जतिपनि पावकहरूप सप्ततिका ११६ होतकहतसुदेशहै ॥ रूपपवमानहोत्र कहतसमीर पुनि परसमें लीनतातो नहिप्रवेशहै। नाकमुनिशब्दसौतौहोत अहँकारपुनि प्रकृतिपुरुप हरि मंगल हमेशहै।१०१सवैया िकतिकपण्डिंती कंबिचातुर देवदेवमुनीशसुजाना । गाधतजाकरि कीरतिरेमन पवितपारनवेदवखाना तासुकथाकिमि जानिलकै वकवादु करै किचुपायंअयाना । मगलगूढ़ कहाकहिये करिये मनहीमनताकर ध्याना १०२ कोपमहेश बिरचिसुरेशा जाहिमजैक्छुभेदनपावेंग देवगदेव, कवीशमुनीश क्षमाधरकोविदीननगाचे जाकरभेदन भाषतसंतन पीरगुरु कात्तिवत्तावै मगलतो परमातसयव्यय धूर्तप्रत्यक्षवर्दै श्रीलंखावा १०३ काकरल्याना कहैवुधितू अवहीं तुर्वरूप हितोमनमाना। रूपनरेख अनीहअनाकृति श्वेतनपीतन श्यामप्रमाना ॥ श्राविना मध्यनअंतनतत्वन मातपितीगुरुवधुन भानोमिंगलनापुहिआपुर्विचारत जानतआपुन जानताना१०४ एकुहिपाट बिछायमहीरचि बामगाशद्र कुलीनरुनीची। तापर वैठियेनावताजैवत खोवतज्ञान बिनीतनगीचा जोसमुझैमनमें गुरंगधारिसौदूसरंमानतहीं मनहीचा, मगलतूमेन शकरलौंजल पान करै प्रथम करिकीचा:१०५-एकानवानि सुनो कबहूँ-कहैं वेदनकीहमजानतबानी भागमकोनहि अक्षरजानत नीदत्त हैं श्वरूपअज्ञानी || पाठकस्यो न शलोककंवों कहैं भाषि तुच्छकहानीतामंगलक्यों समुझेजहरुखो बापनहीं मतमानत माती १.०६ 'सूर कही सब श्यामकथा तुलसीकरघुनायक गायवखानी दासकबीरबंद्योन्सतिरामहिम्नानकनाम भयो रुतिमानी ॥दादमिलूक धना सदनाय गोरख वाणि भली पाहिचानी मगंलमूढ़क, इनते हम, अधिकै जोभणे निजबानी १ जेखलाखोजतहै धनको तनको गिके करबेतीलगाये। लोगन सो बगनाथ पुरीकर. पक्वताइचहैं भटकाये ।। जानकर्षे कदिवादेबडो सुनिसाधुलवै जनुनानंदपाये मंगलते ठगिजात सही न कही न कहीअपनी अनवाये १० वामनलों नितप्रेम . पुराणन .

- सप्तमंतिका -- -- बढ़ावतवामनों अनसाय न 'वामी दामगुलामालासेवकपेटके मांगतदारनवामनधामो । राम रहीमाकरीसन्नीकेमव याद बिन वादक मतिखामी, मंगल तू चुप क्यों न गहै अंतसंगकिये जगसें वदतामी १०,गन्ध अनाहद होतमहीं जब 'मूदि सुने वंशहू तनहारा वायुनिसेवेत शब्दउठै यह ज्ञात अखंड प्रवीण विचारा । जोतमुझौ मनजानिापरे तलझालरि प्रखमृदंग उचान सा मंगलप्राण अपमिक्रिरेलपायुनौ' सुखसोंकरतारा ११. अन्य समाधि लगाय बिलोकत धूमिल भूमर रंगपसारानी त्रिकुटीतटलौं चढिजाय लरलै सुत्रिवेणि कि पावन धारा अमा बढेकछु होत प्रकाशहै भासतायोग प्रचारनहारा । मंगलखोजतं ब्रह्मतहां नहिंानस्वरूप लोबानप्रकारा ११११ टूटिफिरयोंबहु तीरथमूरति बूझिफित्यों बहुपंधश्रधाई खोजिफिस्यों पहुशेष मभायख योनिफिरयोोकितनीगुरुवाई ॥ वादविवाद अनेककि- ये,कहुलाजिगयो, कहानलजाई । मगंला सांचु कहावतहैयह - पछोरत जातउडाई, ११२ काहुकह्योउठिप्रातहिंन्हाइयपूजिये देव सुव्यानलगाई । काहुकह्यो कलिमाबिन मोक्षन काहुबद्यो' निरवाणगुणाई । काहुभन्यो गुरुविप्रप्रतारत फाहुबखान स्वगंध कथाई मंगलकोनहिं बोधभयो जस छपछोरत जातउडा- ई ११३ योगवशिष्ठ पश्योकळुसादर दासकबीरके ग्रंथ मॅगाई। जीवनके कछुपंचकभाषि सुनीकछु सुन्दरकी कविताई।बादकरें कविपण्डिततो अरु नोंदतहैं मुनिदेव प्रधाई। मंगलसांचुकहा क्तहै कुम्हडा मुखमें न अजोकेसमाई १४देवनकोनित हैपरि देवन सेवनको किमिवाताचलाई अातमभूत कुलालसमान है पालकविष्णु नठीकलगाई ॥ शंकरकोपिसँहास्तहैं यकब्रह्मनहीं वहुंठाम दिखाई। मंगल सांचुकहाचतहै तुम्हडामुरबमें न जा केलमाई १६५आपुन कर्म कियोनकचौं कहैं कर्मकियो कछुहोते. नभाई। वास कबीरामलूक धना तुलसी गुरुनानक प्राधि सुन, नाईयों शुकदेव भन्यो गुरुगोरख कर्मवशीजन मुक्तिनपाई।

. + 4 सप्तशतिका। १२१ मंगल युद्ध पठान विजय वेहना निज लागन-फूलिसमाई १.१६ गीगुरुनानक दासकवीरकै यानंहुं पंथमें लीन्ह मुहाईत. सानते हैं किरि वेद पुराणने तीरथ यो व्रतादेत उडाई-॥ वाद विवाद विशेष करें अरु भामि कहैं गुरुयर्थ गुदाई. । मंगल पे निज-भेद न जानत खांड बँधावत ऊख पराई २१७, वेदको अक्षर कान सुन्यो नहिं बादि कहै मुतिसार असारा आगमको कहुं रूपं "न देख भनें झगडा पड शास्त्र विचाराः, धादि। कहैं। हसाल वनित देत लवाय अखंड अपारा । मगल आपन भेद न जा- नत भीति उठावत ईंट न गारा.१.१८ ज्यो प्रवमान.प्रेसूनाके घागते आवत शुद्धसुगन्धि,लखाई ।सोई समीर कुगन्धि निकेंव ते वाहिर होत कुवार्स बमाई ॥ धोरकुजाइ सुगन्धि कुगन्धिंनि शुद्ध स्वरूप सदो सुखदाई म मगल त्यों यह जीव दोपित 'पापरु पुग्य यसोनहि जोई।११८ लोचन हीनं नाअंघ बखा- निय नैनसमेत न देखनहाप नहीं पगहीन चलै निसर्पगु यह पग नाहि भिकारो ॥ गुङ्ग,रहै रसना शुचि सोहर बोलते है नहिं जीभ सहारा । मगल है यह अद्भुत कारण जीवहिकोकरि देखु पिचारा १२० दगडचहूं दिशिते नहि रोवत रोवतहैं सुख अधिकारा सोवतहू मह जागतदेखिय जागत सोवत के चतु: सारामा गांवतहै । विवाह गीत अस्वार ताल मृदंग पसारा। मंगलहै यहअद्रुतं कारणाजीवहिको करिदेखु बिचारा१२२मूढ़- न सतलग विहारत साधन सगतिते' फहुन्याराज्ञानिन में नितमासकरै को मान लगांवत पार अपारा पन्हात जम्हात खवावत खातन पाठक पाठित शुद्धप्रचारा, मंगल है महाअजुत कारण जीवहिं को कार देखुविचाराशर चेतन बस्तु सही तनु में विन चेतनाचेतन दृष्टि न आवैयहि द्वीप दिखावत सूझन खोजन को निजी हाथ बढ़ावै ॥ लोग सबै हटिवाद चर्दै परमातमहोत नलखावै। मंगल मूलफि बातयहै ज्यहिरूप नही त्यहि देखना औघडामत्रलिये यक ढिोल - - J १२२ सप्तशतिका।। मिप भौजि सुराकृतपाना । बातन मानत आननकी यकबाम कि सेवतही वधठाना ॥ एक तजे मदिरा असा आमिष दक्षिण भागलिये अभिमाना। मंगलहै रुचि पनि आपनि जापैकर, परमातम ध्याना १२४ काकर पापयसै क्यहि कारण काकर पाप सुपुण्य प्रकास । काकर पाप निवासत नरकन काकर, पाप जो स्वर्गबिलासै ।। काकर पाप भ्रमावत जन्मनाकाकर पापसु- मुक्तिप्रभास । मंगल कारपाप मिलात ब्रह्म निरंजनमें अन: यासै १२५ यातनुमें यक चेतनहै ज्यहिशक्ति सबै तनु इन्द्रिय डोले। चित्त अहंकृतहै मन बुद्धि न सूक्षम थूल न कारण खोली। सोवत जागत जागत सोवत आपवस्वानकर अनमोलैः। मगल शक्ति अनंतवहै, बिन,जानते पारस पाथरतोले १२६ जा हिनहीं दुख औं सुखे व्यापत नेहन नात न पास न दूरी। जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तुरीयरहै येक भावन अल्पनभूरी ॥ जीवतहै न यसै मृतु अंतक रुपवरूप रहातनुपूरी । मंगल, सो यह जीव कहावत आदि अनादि कि जीवनमरी १२.७ तिौ पाक कडून हिं मानतनीच कुलीनदुवौ यकसारा । खात अघाइ, ठठावत पेटहि रामभजे नहितत्त्व बिचारा ॥ ऊपर हूंसस्वरूप बनेसति भीतर बायस,रूप अपारा । मंगल नावत पहिमाथ भलो रजतेकरि सांप,पसारा १२८ श्रीगुरुकी कथनी निज भावत बापकिगावंत दादे कि लावत । पंथकि आवत ग्रंथसुनावत ज्ञानि-कहावत बेद मिटावत:॥ कर्मनशावत धर्म भ्रमावत प्रानवतावत पान करावत । मंगल जो अपनी कछु-पूछिय तो जमुहातं वृथा, मुख वावत १२८ ऊरध बाहुवने तनु.पीडत पांव(धेनर झूलझुलावै। भूतिवने अवधूर्ति बने बिना जूतिचले प्रग कंटकवावे.॥ भूमि गड़े तनु, घागि जरेबिन अन्नमरे निज-जीवसत्तावै । मंगल कर्म अस्वारथहै नहि खोलनहारके हाथन यावः१३० ब्रह्मकि बाणि- भरी संघ बेद कलास खुदाजो अरान, कहावै। आगम: वाणि मुनीशनकी जुहदीस रसूलकि वाणिबतावै ॥ पाणि पुराणमहा। 4 A. 1. सप्ततिका। 'मुनि व्यासंकि ब्रह्म निरूपण ज्ञान लखावै। पुस्तक जैनसो परिसंवाणि चहूदिशि मंगलबाणि जनावै' १३१ जेतिक पंथ महीतलहै सबमें यकवाणि नवीन भरीहै। एकविलोकिद्वितीय चनात सो उपमा मिचितअंगहै। ज्यों यकराग अलापकियों 'सुनि श्रीनहुँ तासुकि कूक करीहै । मगल बाणि विवाद चहूं दिगिब्रह्मवखानत पाणिडरीहै ३३२घाणिकहैयक सर्गुणनि- गण बाणिक है यकब्रह्म माया बाणिव सवठाम कृपानिधि घाणिभने प्रभुहैयहि कार्यों वाणिकथै यफसिर्जनहारहै बाणि कहै यक पालेकपोयो । मंगल वाणिगुणे यकहतक श्रादिअनादि बतावत मायाँ २३३ एक कि घाणि द्वितीय न जानेत एककि बाणि अनेक लरैजू । कूकुर भूकि उठोनम खाय सुनेत्यहि प्रा- नहु भूकिपरै॥ वाजिमि घोलिगलिउठो सुनतेबहुतासँगही फिकरजू मंगल पाणि ग्रेजीत महाकछु नीककहाँ तो बिमूढ़ जरजू १६४ सूरज अस्त समय दिनहै किधौं रातिकही कवि पेपित ज्ञानी छह औधूपके मध्यकहा किधी धूपकि शहदी गुणवानीमा पूचत मगलसों बहुलॊग पत्तावन में प्रतिहोतंग- लानी । इश्वरलीयके मध्यतथा वडिसंधिपड़ी नहिं जातवखानी १३५ चिन्ततचित्तगहें अहंकारगुणानिक मनबुद्धिढ़ावै पाप पापयतैय हिजीवहिं क्योंदुविधा अपनेंमनावामोहनखायश्र- घयि सुभोजन सुदरापनपेठठठावै। मगलभूलि वडीभवमेंतर्जि साहिबसेवकराजबतवि१३६ चित्तकहाभवाशकहीं अहकारकहा दुबिधा तेनुता । कौनअहै मनभ्रमणावुधिरूपकहा धिरतातनु आपै।। चित्तनहींअहकारनहीं मनवुद्धिनहींयविज्ञानप्रलापै मंग- लेह यकतूंविधिारि विचारिहिये किनदोपनढांपै३७कारणदेह रहै जयतोग्निहीं तबज्ञान ज्ञानवरवाना इंद्रियज्ञानन कर्मरहै मनबुद्धिनहीं शुचिब्रह्मसूर्याना । सूक्षमतत्त्व नदेखिपरै नहिमातु पित्तागुरु नाम हिजाना । मंगलसोकि अचेतकिचेतनब्रह्मकि जीव कहैंबुधिौनी १३टलिंगशरीर लियेर्नेवतत्त्व कहाँकिमिसत्रहथूल ।

१२२ सप्तगतिका । मिप भौजि सुराकृतपाना । बातन मानत अाननकी यकबाम कि सेवतही वधठाना ।। एक तजे मदिरा, अरु आमिप दक्षिण भागलिये अभिमाना। मंगलहै रुचि आपनि आपनि जोपैकरै परमातम ध्याना १२४ काकर पापग्रसै क्यहि, कारण काकर पाप सुपुण्य प्रकालें । काकर पाप निवासत नरकन काकर पाप जो स्वर्गबिलासै ॥ काकर पाप भ्रमावत जन्मनाकाकर पापसु- मुक्तिप्रभासै । मंगल काफरपाप मिलावत ब्रह्म निरजनमे अन यासै १२५ यातनुमें यक चेतन है ज्यहिशक्ति सवै तनु इन्द्रिय डोलै। चित्ता अहंकृतदै मन बुद्धि न सूक्षम थूलन कारण खोले। सोबत जाग्रत जागत सोवत आपवखानकरै अनमोलै । मगल शक्ति अनंतवहै विन,जानते पारस पाथरतोले १२६ ,जा हिनहीं दुख श्री सुखे व्यापतनेह न नात त पास न दूरी। जाग्रत स्वप्न, सुपुप्ति तुरीयरहै यक भावन अल्पनभूरी ॥ जीव्रतहै न यसै मृतु अंतक रूप.अरूप रहातनुपूरी । मंगल सो, यह जीव कहावत आदि अनादि कि जीवनमूरी १२.७ फूति श्रौ पाक कळूनहि मानतंनीच कुलीनदुवौ यकसारा । खात अघाड ठठावत,पेटहि रामभजै नहिंतत्व बिचारा ॥ ऊपर हूंसस्वरूप बनेसति भीतर वायस रूप-अपारा । मंगल नावत पहिमाथ भलो रजतेकरि सांप पसारा १२कात्रीगुरुकी कथनी-निजाभावत बापकिगावत दादे कि लावत । पंथति आवत ग्रंथसुनावत ज्ञानि कहावत बेंद मिटावत, कर्मनशावत धर्म भ्रमावत अान,बतावत आन करावत । मंगल जो अपनी कछु-पूछिये तो जमुहातं वृथा मुख वावत १२८ अरघ बाहुबने तनु पीडत पांववधेनर झूलझुलावै। भूतिवने अवधूर्ति बने विन'जूतिचले पर कंटकधावै, ॥ भूमि गडे तनुःागि जरेबिन अन्नमरे निज जीवसतावै । मंगल कर्म अस्वारथहै नहिँ खोजनहारके हाथन यावे॥१.३० ब्रह्मकि बाणि भरी सब वेद कलाम खुदाजो कुरान कहावैधा आगम, पाणि, मुनीशनकी जुहदीस रसूलकि वाणिवतावै ॥वाणि पुराणामहा- .

॥ १ सप्ततिका। १९२३ मुनि व्यासं कि च निरूपण ज्ञान लखावैन पुस्तक जैनसो पारसवाणि चहूदिशि मंगलबाणि जनावें १३१ जेतिक पंथ महीतलह-सबमें यकैबाणि नवीन भरीहै। एकबिलोकिद्वितीय नावंत सो उपमामिमवितरीहै |ज्यों यकराग अलापकियों सुनि' भानहु तासुकि कूक करीहै । मंगल वाणि विवाद चहूं दिशि ब्रह्मवरखानत वाण्डिरीहै १३२घाणिकहै यक सर्गुणनि- गेण धाणिक है यकब्रह्म मायावाणि वदै सवठाम कृपानिधि घाणिभने प्रभुहैयहि कार्यों ॥ धाणिकथै यफसिर्जनहारहै बाणि पक पालेकपा । मंगल वाणिगुणे-येकहतक आदिअनादि बतावत मायाँ १३३ एक कि पाणि द्वितीय न जानत एककि बागि अनेक लरैजू । कूकुर भूकि उठोम्रम खाय'सुनेत्यहि था- नहु किपरैजू । वाजिमि घोलिगलिंउठों सुनतेबहुतासँगही फिरजू मंगलबाणि अजीत महाकछु नीककही तो विमूढ़ लरेजू ईट सूरजे अस्त समय दिनहैं किधौं रातिकही कवि पण्डित ज्ञानी शह औधूपके मध्यकहाँ तिघी धूपति शंहबदी गुणवानी। पूछत मंगलतों बहुलौंग पत्तावन में अंतिहोतंग- लानी । ईश्वरजीवके मध्य तथा बडिसंधिपडी नहिं जोतवखानी १३५ चिन्तत चित्तगहै अहकारगुणार्निकरै मनवुद्धिटेढ़ावै ।। पाप पापयतैय हि यहि क्योंदुविधा अपर्नेमनीव मोहनरवायस- पोयसुभोजन मुंदरीपनपेटठठावै। मगलेभूलि वडीभवतजि साहिवसेवकराजवतावे१३६ चित्तकहाभवशिकहीं अहकारकहा , दुविधा तेनुताएँ । फौना मनहैभ्रमणावुधिरूपकहा धिरतातनु आप। चितनहीं अहँकारनहीं मनबुद्धिनहींयदिज्ञानप्रलोमिंग- . लहै यकतू विधिारिविचारिहिये किनदीपनेढांपै१३७कारणदेह रहैं जवतोरिनहीं तबज्ञान अज्ञानवेरवाना इंद्रिय ज्ञानर्न फर्मरहें ' मनवुद्धिनहीं शुचिवमन्यानो ॥ सूक्षमतत्व नदेखिपरै नहिमातु पितागुरु नाम हिजाना। मंगलसोकि अचेतकिचेतनब्रह्मकि जीव कहे युधिमाना१३८लिंगशरीर लियेनवर्तत्व कहाँकिमिसत्रह -- । 1 सप्तशतिका प्रमाना इन्द्रियकर्मसज्ञानाचहै दधावुद्धिहित्योमनपंदकमानाः ।। कर्मप्रताप बिलासभयौलहि धूलशरीरभयो अभिमाना। मंगल कौनक मतकीगति सत्यासत्य विवेकयाना १३६ धूलभरी- स्मो जामतहै ज्यहिके कृतमातदेव अदेवा- लिंगविभेदजोवन कथाजसत्यश्चतत्य लखेबहुभेवान.कारणरूपसुपुप्ति विचारिय संत्ययातत्य दुधौसिटिनेचा । संगलकारणले परकीगतिलोत्तुरी:- यविलक्षण एवा १४० बालकतामें,सतोगुणव्यापत शुद्धअशुढे कछूनहिनामैं। प्रौढ़ाये तरुणाईग्रहे उरव्यापतोगुण कोषनाग सैद्धवही महोतरजोगुण ज्ञानयज्ञान चौभ्रमतामें मंगल अतत्रिदोषमिले,यहजीवाप्रबुद्धलहै ,पराम१-४१ जोजसा कि मिजन्मधरै अरुजाअनुयोनि सोयोनिनधावे । जोबिभुतो किनि होतजा, अरुंजौनु अनीहसोदेहना। अद्वैतक्ति भगोकवि- ण्डित तारकीरति क्योक रिगावै। मंगल शोचिरही मनहीं मन- नासप्रभाचति वाणिवत्तवि१,४२- कवित्त ॥ आशावध तीरथ शिरत विभिचारिह में आशावशंकरतसुव्रतमनमूढहै । यायावक्षीरपात त्रासाबधा जीरन्हान आशावय देतदानढू ढ़तजद ढहै । आशावस्य ठाइरहै नायाबश देहद है आशावश बालकबिलोक ज्वानबूढहैं। माशावर्गमगलकवितशबदोहाकहै आशापरे जीपपावै वडोज्ञात गूढ़ १८ मारय पाउन्जायऑशाबश ज्ञानध्यान, आशावधि- पुल-करतरणयावहै । प्राणवशमोद्रोह याभावशकामफोह आया बामराम रटतस्वभावहै ।आचावशनातगोतांशावणवामहोत अभावशदेवजत की गतिसुगावैहे वाभावशमंगलदुचित्तोनित भूमितल आशापरे जीवबड़ो-गूढज्ञानपावैहै १४४-आशावश विक- लनरकबास पावैआप-आशावशसुरपुरलहत निवासहै, आफ्नाव उपजि मरत बारखारदेनु, आशावश मोचिजात प्रभुपदपासहै ।। आशावश पापलागै आशाबशपुराय जागे आभावशसम्पदाको अपि कबिलासहै। आशावामंगलमुजानता दिखावैनिला आपापगढ़ गतिज्ञानको विभासहै,१.१५आशावध भूतनकोदेत पलिभागदेखु ८ । - " तिधार लदभ्रमज्ञान गुरू मुरुज्ञान लहाह १.५२ वेदव, हम सप्तशतिक्षा। पायांवरदेवलमें देवपूजैघाइहै।अिायावशकविगुण आदर विचार 'चित्त आविध कुबचचदत भ्रमपाइहै। आभाश योगदान होम सयमादिकृत पाण्यावश ऊरधैपवन ठहराइहै। मंगलनिराशहोत पूजे मनकामनान भटकति पावश दुविधा]ोभाइहै ११६ अट- वीलिवानजोषिलोकैराम सत्यभाव तौतौकतेबनवासिवनही में खासैहैं।नोपैजलशायीभावान भेटैसत्यताततौती जलमानुपको चलो विलासैहैं । जोपी निरवासना मिलतप्रभु धायचाय तोतो घोलको दिननगनयनत्रासहैं। मंगल,विवेकीसाधु मुनिजनज्ञान: वान तिन्हैन वहाइदम्भप्रकटनिरासैहैं. १४७तवैयाशवन्दतभाल लिये, बैंक नन्दन एकत्रिपुंडू चढ़ावत माटी कग्रठवधी बहुमाल सुकठिकि गोलरची तुलतीत्तसकाटी। एगिभुजाउरडारिसुलोच- नकोडरहैलपसी मुरवचाटी । मंगलज्ञान उदोत,भये यह दम्भ ललाय,महा खटपाटी ११८ पावक-पूजत, ईश्वर जानि कोई कृतसागर पूजनधाई। पूजत भूमि समीर, महीधर-सूरज चांद्रहितानि भलाई सरति त्तावृत्तसाहिब मानत पूजन में रुचि होत. सुदाई-मगल जान उदोतभये उर भ्रामिकहै यह कम्भालखाई, १.४८ जानि सकै हरिको गतितो भ्रमजाने बिना ते महा भलाग। गाय कहें नु शुकत्व बड़ो भ्रमगाये बिनाहर प्रेम नजागे ॥ क्योति , तिरजन नैन लखैत्रम देखे बिनाकत तारमा पागै। मगल तू इत्तही.उतही भ्रमहै इतही उतहीकिन खानै १५ देखत, नैनन यापन रूप अनेक-द्वितीय स्वरूपनि हारे कान सुनैनिज नावुनहीं जगवाय सुनैटर, प्रेम प्रचार ।। वापनि,गधिन सूचत घ्राण अनेकन गधिकुगंधि विचारै । मंगल योतु दिलोत नीरचहै, घृत. आपुनापु उचार-१-५९ आदि 'कहोसौ अनादि कहा.अरु मध्यकहा पुनित कहा है। जोपै अ- नाहि काही परमातम तौ-फिर कौन प्रकागि रहाहै. ॥ जोअनुः, मानलहीतोषडानम मान प्रत्यक्षन रूप, सहाहै। मगलू क्यों -- । ' - १३६ : - - सप्तशतिका बैंद बर्दै सब आगम और पुराण बतावै। सन्तवर्दै जुमहंत र मुनिराज पर्दै कविपण्डित गावें ॥धूत ब, अवधूत बर्दै बुध घ अनुमान लखावै । मंगल क्रूरब विपरीतहिापूरपरेन पंछिताव १५३ ॥ कवित्त ॥ कहत जिवूरहै किताबभगवान किलाइ केदाऊद सबलोगन सुनाई है । अपर भणत तौरेत मैं वान, भापी सोई लाइमूता केतौकीन्ही चतुराई है । ईसौं । इंजीलसुनी कहत महम्मद कि बडी फुरकान जो खुदाई घनाई है। मंगल किताबोंरि एकही को हिलिफहैं एकमतनाह यातवंडी भ्रमताई है'१५४ ज्ञानसमुझावै कोई बेदन किंगा भापि लागेम पुराण आदिसकल हेढाइकै । चातुरी बतावै बिद थानको अनेक भांति लातुरी लेखावे रणकाजे भलिभाइक राजकाजे वातनमें भेदभाव भाषिकहै यवनादि विज्ञता सुना मोद पोइकै मंगल सुजान होतं दुविधा लरवात चित्त तुम बिहीन मूढरहत'चुपाईकै १५ कोऊ कहे मक्के यौमेदीने । निजात्त होत कीऊकहै काशी किधौं गया में निजात कोऊको रोजांनी नमाज बिन परिकहीं कोऊकहै पूजापाठ सुमति ढ़ा तहैं। कोऊन्हे दाढ़ी मेरी नूरहै खुदाई यार कीऊँ कहै शिरवा कीधौ धरमा बिभातहैं। मैंगले कहत कोऊ सुन्नति ईमानदार कहेत जनेऊ कोऊ भ्रमही किं तिहै १५६ कोऊपद प्रोटको भोजन वनाई खांत कोऊवाइ-अचवत चौकहीमें तातहै। को तनुभूतिलाइ धसने बिहीन डोले को माला 'तिलक रंगत निजंगातहै ।। कोऊ मारि पक्षी पशु कहत विहिश्त जाते को बडो जैनी मांस मदिरा न खौतहै । हिन्दू नौ मुसलमान ओप चापपार्कजान मंगले कहत संघ भ्रमही किचातह १५७ वेद घेद अंग इतिहास के विवाद सुनै गुनै चित्त बापने कथान के विधानको सारासार झिमन बोधै बहुभाति नित्य सत्य ज्ञान ग्रामवास रहत सुजानको ॥ वेदकों बनायो श्री चलायो कासुद्वार तात चलत को ताकी चालि मानत प्रमान को मंगल महान - 4 सप्तशतिका। १२७ सूड कोनी भांति दूरि होइ गुरू सत्यवादी कौनंशिष्यः ज्ञात मानको.१५८ परम प्रधान बेद गार्वत कितेव जाहि कहैं थिर नाज सब लोगन में एकहै । रवितित भानु जहाँ करत प्रकाश नाहो रोगन सो आपकीधी सूरज अनेक है, ।। अज शिव आदि काल होतज़ाके क्षणहि मे ऐसा करतार सदा चनव्य तिरेक है। सींक घोट मंगल पहाड जैसे भापियत तैसे,जीव पारब्रह्म वि. बुध विवेकहै १५ सात सुरवास सात नागलोक आदि धाम काल बश सक्ल नधात त्रुति सारखीहै । नभपवमान ,शिवि नीर भूमि,लोप होत माया अलगाय कीधी- कौनेधल गखी है। जीवन के पाप कृत दंड दानि कहाँ रहे ज्ञानिन के ज्ञान जाने कौनी गली नारखी है । मग़लत्रिदेव गुणतीनि एक भावदोवै दुविधा दुराशाको, विवेक अभिलारखी है १६० -पुनि उपजावै चारिखा निजीव देवासुर जहां तहा, वासदेत ऊँचनीच धामहै। काने पापकीन्हो कानेसुकृत कमायो तवजाके फल भोगरोग:भोग अप काम है ॥ अनुर वराकद्विज,श्वपचकहायो काहे करमप्रताप जोपै जाना अभिराम है । मेरे मन मंगल न भूलतू विवेक पाय , कोधी, नाशिजात होत काकोधौं- विराम है १६१ तारागण द्वीपकहैं नभके प्रवीणकोऊ कोऊक है लोकत को होवतप्रकासहै । कोऊऊहै अचल चलायमान सूरचाँद कोऊ पदैदेवता प्रतापी तेज़भासहै।जाहिंचपदेखै.ताकी वातनाहीलेवै फिरि कैसेचवरेखै हरिपतनु अघासहै। मगल विवेकसो विचार देखुआपुमांझ इतस्त चारिऔर मायाको विलासहै १६२-मात पितुसोदर कलत्र सूरमोहरूप डारतसमुद्र विषयान नेहनाते हैं। आगे त्यागिजातकोऊ पाछेको विचारुचित्त सकलसमान हितका. रीनदिखाते हैं । कायााप प्यारीजाहि पालत, सुभोजभौजि.सं- गत्तासुचतकाल कौनजीवपातेहैं, मंगल समस्त-झूठ कारोबार तीनलोक आपसाथ नेहलो नातेसबजाते हैं, ३६३ येरेमनमूद तोहि अधिक-डरातिरहौं जानिके प्रधानदेह ग्रामको सदाहीही।

१.२८ सप्तपतिका। सोतीभाव ते रेनेकपायो नपरीक्षाकाल चेटकी घटोरनीचं जाना सबमाहीहौं । अवन भूमावैवात अलिक अबूझमापि किमानु मेरीभूप तेरोदान नाहीही नीतो पछितामन मंगल पार भौति जवैशुद्ध भावकहो यामाश्याम पाहीही१६४ मनुजारी- रवीन्यो सुखभोग हेतुनाय सकलंविभूति तोके लैंगपंजोई है । जगदुखरूपी सबभांतिना विचारिचित्त परमसुजानप्रभुकीन्हीनि पुगाई है ।। भोगभाग योगयांग लोगनके भोगलांग भूलीमूलयों तदूत प्रेरणा प्रभाई है। मगलं सुजान जन मायामद ज्ञानहीन इतउन काया मनधाया दुहूंचाई है १६५ सवैयाँ शैयिकह शिव बोधकहैं बुध जैनिकहैं प्रभु पारसनाचे । विष्णुकहै कोठशक्ति व पणनीथ पुरातन भापतगाथै । ईसा का मूलोभनकोड फोहरसूल मुहम्मदसाथै । मगल साचु मेबैजनं गावत खोजन हारके लागनहाथै १६६ तीरथन्हान करैव्रतसयम वान अनेक न दैजोनाथै । औघड ध्यान पियोमदिरा चिदूरिको रुचिपाध अपाथै ॥ मूरतिपूजि-वजावत घंटन दीप दिखाय सुनावतगाये। मंगलकर्म अस्वारथ है नहिं वोजनहार के" लागनहाथै १६७ ठारहै तनुदण्डं सहे मुख मौनरहे पशुलौं घनिजाचे । दूधपियै तजिअन्नभवे तणधुमघुटे जेलबॉल लु भावे नग्नरहे पहुंजीन कथै नित ध्यानधेरै नसुनै नसुनावै। मंगल कर्म अस्वारपहनाहि खोजनहारकेहाथन याचे १८ कीजिय गिदया जम हरि- ये 'दुखरोग सवै यदुनीयकं । औषधमूल प्रतापतुम्हार धन्वंतरि रूपयरे गायक ॥ शूलममूल नीयकृपानिधि रीखियदेसि कहाँलब लायक । मगलेटेक तुम्हारिंगहें नितान द्वारसुहात न पायक शरंगस्ति नशावत नीरन जो पकी तपती तनता। पालप्रकाश बुझाय समीरन जाप्रफटीवस झंझप्रता पै।। कौदिरयुद्धांडवितबीरन जो बहुसंगरके गुणथापा मगल धर्मामिटावत धीरने चिथुदगल प्रसिद्धप्रदाय १७ दारिवनि- न्दत हैं धनवानको जानतये श्रदयों जगमाहीं दीननकाधनधान , - - सतगतिका १२६ "कहैं लघुतुच्छ कुवर्ण सदा भ्रमानाहीं ॥ एक भुलीन महामद लोभमें दूसरके दिन धावत जाही । मंगलसोइवडो दुहुंभांतिन जासुहिये.हरिभक्ति लखाही १७१ ॥ दडक ॥ मनवम कीन्हे भोग चाहत न चित्त नेक कटुरस बरस कि नाही पहिचानहै.। भोगन फिवात सुनि जिय अकुलात तात धाता सुरत्राता स्वाद काग बीटमानहै । शीतकाल ग्रीपम समान भाव धारे रहै अ- मित उदास रूप हरिरस सानहै । मंगल सुजान बदै सोई भूमि भागवान सुरुचि विराग जाके ऐसो ज्ञान गानहै १७२ विपयी समाज विपरूपी नानि भागै दूरि हाटकादि सम्पतिविचारैमोह बानोहै । नारीजग अखिल समान मातुजाके चित्त चरिता हिता. ई दुरि, पोई द्रोह सांनीहै ॥ देखत तमाघे सो धरातल अमोह रूप हँसत ठठाइ कहुँ रोयत अमानीहै । मंगल विरागी सोई वेदभाव भापियत रहत उदासी ज्ञान धाम अनुमानीहै १७३ बासना नव्या जाके जीव काहूभांति और कामना सतावैना- हिफाजनमें जाहीहै । बसन बिहीन जैसे बासित नहानतैसे सेजे अनसेज मोवे गोकताप दाहीहै ।। दीन हितकारी धनवान कोन नेह चित्त जोईभाव मानै ताकी सुमति सराहीहै। मंगल महीप कौनु दीन भूमिहीन राव वाके 'एकभाव रागत्यागी त्रि- विधाहीहै १७४ कामज्वाल दाहतन शुद्धचित्त शीतलको क्रोध नाग काटत न बेकामन जाकीहै। मदकी मदाई तट जात न सजान जानि लोभसिन्धु वोहित बिचारोज्ञान वाकोहै ॥ मोह तम बुद्धिमणि रूपीदेखि नाभिजात माया दाया हेरि जासु द्वार- हून झाफोहै।मंगल विरागी ऐसो विदित त्रिलोक सत्यागावत प्रमाणसाधुवेदजाकोणाकोहै१७५गुफाको निवासी बनवासीकहें पर्णकुटी नातो नेह सांचो जाके नामकोअधारहै । काहूसों न नेह धेर जात काहूदार नाहिं राति-दिनं भास किंधौ एकही प्रकारहै ।। देवता लिहात रागहीन देहधारिदेखि यम अकुलात वाकेनाम को पुकारहै । मगल विरागरूप गावत सुजान ऐतो नातो दम्भ . सप्तशतिका। मायामोह प्रेरेसगकारहै १७६॥रावेया॥वा प्रभुको कछु जाति,न पांति ने श्राश्रम वर्ण विचार न कोई । देव अदेच नमानुसं नाग बिहायत श्री पशु कीट ना सोई ।। पांचहुतत्त्व परेगुण तीनिते चौदहलोक निवास करोई मंगल-बुद्धि वितर्कनेते परतोपरमा- तामवेद बदोई :१:७७ जीवनमेनिता आपु विराजतजीव सवैतन तालु तसाही भापतयो मुनि पण्डित बागल हननकायः- लित संदाहीं ॥ दूरिमहा संबतेति पासहि हैगप्रतिठाम्न श्यो त्ति नाहीं। लंगलके दुविधा सुनिलागत द्वैत यति दुवौ यक- ठाहीं.१,७८ बारारमें निशि देखिपरै नहिनौ रजनीसह द्योस न भाई-1 आगम एक निराग़म दूसर वर्ण वर्ण अकथ्य कथा- चेतन औजड़ एकस्वरूपानही थिर अस्थिर की निपुगाई। मंगलके मासदेह रहा.गहिएक-द्वितीय स्थावितराई जो गुणवानि तोहै, कवि कोविद जो गुणहीन तो मूढ़ माहाना। औ तनहीनतो शन्य वताइय जो तनधारि तो धूल, समानागाजी विधि, और निषेध वतायत तो वपु : सत्य धरे अस्तज्ञाना।मंगले देखु बिचारिरावै विधि सत्य असल्या नाजाति घरवाना १८० छन्दः ॥ सातदीप नवखण्ड धरातल भयोजीत बहुका है। सात पताल जीव बहुबारसी,अस्मृतिवेह लखायाहै । सात स्वर्ग बसत सघजीवहि आगम,ज्ञानिन गाथाहै । मंगल पांच तत्वहूँ सीवहि जीवविना भ्रममायाहै.१८१वाण,और निरत्राण वखा- नैरालधाम वायाहै,। उत्तम पुरुप प्रकृतिकृत, तिहुंपुर प्रकट जीयपद पायाहै। नीव विहाय, मृतक जडरूपी कोनों का हिबना- थाहै नंगल जीवाश्रम, अविनायी जल अल ऑपुः समाया है. १८२.जीव-ईशयुत:ब्रह्म बखानैः सामवेद शनिवानी है। निहुवेद भणयह जीवहिःपूरण पुरुषा-अमानी है नोकोइ जीवभावको जानै सो परिपूरण ज्ञानी है। मंगल जिन बातम निज़,खोज्यो माया तिमहि डेरातीहै १,८३. दातामुक्ति वसत. झोकाथल मुक्तिदेत पुनि काफोहै। फूटो पणय पर घंधन - सप्तपतिका १३११ जीवनलख जग घोकोहै । दुखीसुखी नहि अध वाधिरो चलै न. अचला धाफोहै । मंगलस्वयंसिद्धि नितआतम बंधनमोक्ष न वा फोहै.२८४ जितै देखिये तितभरि पूरो कोई दिशा न खाली हैं। लीलाधापुलखैमा आपुहि कतहुँपुरुप कहुँबालीहै । जडचैतन्यः भाव भवभारी:मालाको कृत मालीहै। मंगल मालधारिहूमाली कर्मिनरूपालीहै १८५॥ सवैयालम्पतिके हित दम्भ दिः खावत सम्पतिकेहित.जीवसतावै,। सम्पतिकारण वेपवनावत' सम्पति कारण देई जगवै ॥ सम्पति कारण सेवक साहिब- सं. म्पति कारण मौनालखावै। मंगल सम्पतिके वण्डोलत बोलत शब्दमतोहर भावै १८६: आपनही मगशुद्ध प्रचारत चापनहीं, मगवक सिधार। आपनही उपदेश वतावत' आपनही उपदेश विचारै ॥ आपनहीं अपि श्रातम ध्यावत यापनही मतिहीन पुकारै । मगल आफ्नही वडज्ञानन आपतो दूसर कौनप्रसारै १८७ आपन जानत ब्रह्मवखानत नागमवेद पुराण निचारी। भूलबडीभवंजाल भ्रमैनित दम्भफि पद्धति दीन्हप्रचारी ॥ सत्य, अप नमानत तूमन अयन श्राव न जातपशारी। मगलशुद्ध वरूपना ध्यावत ववनमुक्त, कि वाणि निवारी१८८बंधनहेसुख- इन्द्रिनको भवमोक्ष नीररायोकुल जोईनभावस्वभाव प्रभाव नजानत सेवत देवन स्वारयहोई ॥ जो दुविधा-अपनी-विभी, त्यहि त्यागत जीव कृतारथ कोई । मंगल ब्रह्मविचारनाभाषि- य भापत दूसर रूप कथोई १८८ जोप्रभु ज्योतिस्वरूप अरे मन तौनहि तत्त्वशिखीकरि मानिय । शक्तिअनंत.न जानिलकै? बुधिःज्ञान विवेक विधान प्रमानियः ॥ संतकहैं प्रभु दृष्टिनावत मूढनके सँग रक्षकगानियः । मंगल भूलमिटै न बिनागुरू पोटिक अथ सुनोजो बखानिय--१६०, देहधरे मनुजार्द विषय रस देह घरे मनमोह दुरावै । देहधरे दुविधा वश भ्रामिक देहधरे शुचि प्रातम,पावविहधरे खलरूप कहावत देहधरे मुनि पद्धतिभाव। संगल देहविना सिंगरोधम पंधन मोक्ष, न मोमन आवै १८१ 1 4 - ॥ १३२ सप्तशतिका। सार असार विचारन पावत त्यागत देह किधौं अनुमानी। जा- नत कोउन मानतहै मन यातन हीन दुबुद्धि सुजानी ॥ काल कलेवर लोक बढ़ावत हीन शरीर न जानतप्रानी। मंगलजीवन धन्य धरातल बंधन मुक्ति बतावत बानी १८२ श्रापन वोध भयोन अरेमना औरन कोकसंज्ञान लिखावै ।गाठरिया तककी उर मंदिर वाहिर उज्ज्वलवस्त्र दिखावै ॥ ज्ञान विवेक के रग रॅगोनहि कातन में रज चन्दनलावै। मंगल सत्यवदैन सुनेमन ऐसे नहीं अपनो पद पावै १६३ आयुधटै प्रतिश्वासन शोचत मोहमयी मतवारु लगाहै। कोटिन मारग या भव में मनक्यों तिनको मत तू अवगाहै ।। अन्धकि दीपक राशि बिलोकतनैन- न वारहिये उमगाहै । मगल त्योभव यातम ज्ञान है जानतसंत असंत खगाहै १६४ पूरबके कृतन्ड सभोग बतावत, सबलोग सुजाना । ब्रह्म प्रभाकिधौं ब्रह्म विभागको जन्मसमै कृतनाहि बरखाना । जो प्रभु चाहत सोकृत जीवहि लागत है यह अद्भुत ज्ञाना । मंगल पूरव पश्चिम को तजि कीजिय ध्यानसदा भग• वाना १८५ राम कथा सुनि नींद सतावत धामकथा श्रुतिदेत अभागा । पारसको तजि पाथरमानि गहेकर कांच सचिकन लागा ॥ज्ञानिन के ढिग भूल बतावत है व्यसनी सँगजी अनु- रागा। मंगलजाति कुजाति सुम्मानिय ऊपरहस जो अंतरकागा १८६ मान महाधन रूप गुमान सुवर्ण महामद जीव समानो। पौरुप मोह जो पात्रमगर्व स्वपथको पक्ष अहकृतभानो ॥ फूलो फिरैखल लोभव बीथिन ज्ञानिनके तट जात लजानो। मंगल राम न ध्यावतं जोनर सोइ महाजड़ जी अनुमानो-१६७ ॥ झूलेना ।। क्षर रूपको विस्तारहै सो पुरुषप्रकृति बिचार है नव. तत्त्वको पुनि सारहै जानेजो संज्जन काय है। माया जो अगम अपरिहै वहुभांति त्रिपुर बिहार है करनी करम करतार है लोई जो पूरण भाय है। दश तीनि सर अधिकार है नर नाग पशुनम चार, कृमि अमित रूप विकार है भवसकल तनसोनेशाय है।

न - - वतावें ॥ सप्तगतिका । मगल बखानतं सारंहै अक्षर सवन के पार हे सो प्रातमा नरि- धार है यकभाव जोन द्विभाव हैं. १८८ जो जान अक्षर भाय को रसना बिना गुण गाय सो, बातम प्रकट दरशाय जो दृढ़ सुमति के श्राधीनहै । भूलै न माया जालसो देखैसवी जग ख्याल सो करि योग बिधिकछु काल सो निज श्रातमा मे लीनहै। सबकोनयह उपदेशिये उरज्ञानदीपक लेसिये चीन्हिय विदेशी देशिये तपजाप रत कि मलीनहै । मंगल चुपकि घर वैठिये शुचिज्ञान मदिर पैठिये मति शुद्धविनुनहिं होतयह कृत परमहंस प्रधीनहै १६६॥सवैया ॥ श्रीमुनि व्यास पुराण किये सबै द्वापरमें कविकोविदगावै । सत्ययुगादिकमें न पुराण कथा इतिहास मनुष्य तो द्विजराज पुराण बिना मृतकर्म कहो किमि लोग करावें। मंगल अद्भुत दंतकथा नहिं बूझनहार के बैनन भावें २०० देखिय दृष्टि पसारि दशौ दिशि नश्वरही संवु देतदिखाई। जो अविनाश स्वरूप न ताकर है नवमें गति शब्द सुनाई ॥ मौन रही सब और कही ननिठौर न ठौरवडी प्रभुताई । मगल आपन आपुन जानत खोजत ईश्वरहै अधमाई २०१बह्मविहाय न देखिय कारण कारण रुप विचारिय माया। माया बिहीन न ब्रह्म विचारक जानत ज्ञानधनी शुचिकाया।। दोउन में नहि अन्तर भापत कोविद ज्यों तरु औ तरुछाया'। मगल बूझिपरै न धिना गुरु सोउ मिले न दुरांय दुराया २०२ केतिक फल्पगये भवनामिक आपन धाम न पाव सुरवासन । योनि कुयोनि सुयोति फिस्यो अबऊरधकी पफरेमन ग्रासन ॥ जानि न जात गली निज ग्राम कि सत्य धमत्य कि पाणि दुरा- सन । मंगल राम कथा कछु जानत मानतह नहि पूरण वासन २०३ पाखंडको तन बेर धनावत वातन में निजबोध करावे। थापनि बुद्धिभस्यो न कयौ गुरु ओमनको नितसीख सिखावै॥ मोह मयी मतिहै अपनी बहु लोगनको निरमोह जनावे । म- गल ढोल समान कहौ तेहि गट बडो उर खोखलखावै २०४ नसशतिका जाकहँ नेकज्ञानप्रबोधहै सोन मिलै हितसो हितकारी । द्वैत' कि.बुद्धिा लगी, मनमूरुख को निरबाण बिलास बिचारी संभ भ्रम बोध दुवौ उरमाचपने चित्त कीन है विधिचोरी मगल चोरन साधुबरवानिय जो नहि जीवनलेत उबारी-२० रामः नही तवरामज. सवद प्रहलाद कथा परमाना जानियराम' अनादि कृपानिधि वेदपुराण,विवेक बखानाः। राममुये तितराम रहे सगालोगगके शुचि.अवितध्याना । मंगल झवडी लघुता हिन भागिल.पाछिल होत समाना-२०६"विष्णु सतोगुण रूप बखानता होय त्रिविक्रम यज्ञ नायो। नाहिं सतोगुण में छला चाहिय'नारदकों कपिरूप बनायो वामे जलंधरको व्रतवालि वोसुर भानु सुधा जब पायो, ।,मगल का कहिये रचियोपः सत्य असत्य'न जात गनायो।२०७यंकर रूपातमोगुण गावत योग समाधि वसे, बहुकाला जानत ज्ञानसुधी समता अरु बेषधिक-धरे, गतजाला ॥ देता अभिप्रियदान सबै अवदान दया विनुको प्रतिपाला । मर्गल, मौनरहो दुविधा यहासन त्यक तामस में कृतख्याला,२०८ जो पुरुपोत्तम सोजनुः भानु है घाम समान गुणो त्यहि माया धाम विपरबि देखि पर विनु घामान पूपण कोलखिपाया ॥ सूरज हीन न घाम: बिलोफिय, जो धन मध्यतो दोउ छपायानगल सो भ्रममोह- कही ज्यहिजीक सदृष्टि निरक्षाबनाया र ज्योजलमें चिक-- नाहट देखिय, कोटि मधेनहि आवत हाथै । त्यों यहजीव वित हाय शरीरतात बिलोकिय ज्ञान कि गाथै ब्रह्म अपरमवस्तु न भाषियमानिय सांच न-झूवन साथै । मालतूफिविमूढ़वंडो क्यहिनाध वाजत जानि अनाथै २१०ज्ञान कहै सघमे हरि , मापत ज्ञान कहै.सवही विधियारा, । शल्पा रामानदिई उपमा प्रबंधोध भयो, कि अबोध-विचारा; ॥ ताक अहौ जड चेतना ना- हिना ह्यांजड़ ते तन, चेतन-धारा मंगल ज्ञान-गुणो उसमें भ्रम, ज्ञान विहीनमहा अंधियारा २११॥ कविता मुसल्मान वेतन, सप्ततिकार १३५ . बतावै,हिन्दूकहैं अनूपाहै । दोनौंथके खोजते भाई! किया किसी न निरूपाहे ॥ चित्र विचित्र कहैं गूनागूं मध्य में शंह कि धूपा है। मंगल है-कहने की नाहीं रूप धिना बहुरूपाहै २१२ पर्दै कबीर कमलमें संपुटसत्य पुरुप, अनमायाहै। सो विज्ञानरूपधौं तत्पद चतुरमहामति गायाहै।। सत्रलोक में शुद्ध सतोगुण अस्ति पदलोन कहायाहै । जहँलगु रूपहोयनहि असिपद मंगल रूप नीयाहै. २१३त्यहिथल बसप्त संवहुतेरे दरगि परशिसुख पाते हैं तो अमृतभ पुरुप अरु नारी उर अनुरागढ़ातेहैं। सत्य नाम पाटक तहसोहैं पापरूपनिहि जाते हैं। मंगल तीन होय नहायसिपद पक्षापक्षलवातेहैं २२४ हंसहसिनी विविधि - ताच निज निज मुख थानन्दे हैं । भिन्न भिन्न रहसकल विलानी पुरुप चरण नितबन्देहैं । क्षुधाविवश अमृत-माहारी माया मोह निकन्देहैं। मगल अभय वपु जीवनको क्योंकरिकहत स्वरत्वे हैं २१५ कहते कबीर पायच गासन हम जगजीव चितातेहैं। 'पलटिजाय भवकथा मनोहरौतामह सुरुचित्सुनातेहैं । विधि निपेञ्चको दाता-ठहरा सुखसागर सबमातेहैं।मंगला तिपदही त्यहं कहिये अग्निपद फेहा लखाते है २१ लाहलगिामुख दुख . रूप चपा ज्ञान विवेकवतावेजूालोकप्रलोक हंसी भी इंति- निअमृत निपचरगावैजूगा तहलगुमाया मोह वैवानिय क्यों अपनेमनाभावैजू। मंग्रल समुझिझि गहुसांची द्विविधा ध्यान न आवेजू २१७ सत्य जप्तत्य लोक कोउ कहिये हुविधा भ्रम विज्ञानी है । सत्यं लोकसें वसतं हंस सब कापानसत्याप्रमानी है। जीवहिाखात काल यमरूपी जो पुरुपोचम ज्ञानीहन्मंगल । महा दुचिताकी कथनी अपनी अपनी मानी है।२.१० शब्द , मृदगं धांधि यमरोजान्तुरत नरक में डाराहे । रोयत शब्द निर्क में बहुविधि पुरुष हुकुम शिस्धाराहै तबकवीर करि महा परिश्रम गन्दहि जाय उवाराहै। मगल सुजन विवेकीदेखें सत्य । शप्तत्या विचाराहै २१६ एकानगत, रजतम बागेशुद्धसतो. । - . -- .

1 १४४ सप्तशतिका। ई।२७७ शिष्यकरें धनाथलगी मन मानकि पद्धतिचिंत नि- वासा पंथ चलावत वेद विवर्जित ज्ञान गनावतहै अनयासैः॥ बेझलखावत- नैनसदा ज्यहिहेरि फिरे मुनिसंत उदासै सिंगल लाखलखेरनके घर झूठनके मुस्वमें किधौभासैः२७८ चोहितपंप भवार्णवमें बहुशिष्य चढ़ायलियो सुखमानी । आपुनहीं कनि- हारमहा भ्रमपच प्रभूतभ्रम्योअभिमानी । पारलहै किमिमध्य- हिबूडत मोहबयारि उशलत पानी मगलभूल जहाज चढ़ौ • जनि चैठिरही बंपने घरबानी २७६ जो कनिठारमिलै युतवो- हित तौनतजी करिकै चतुराई । धाइनजाइ चढ़ौ बिनबूझ जो पारने याचत लाग लुगाई ॥ पूछि तिन्हें पुनि खेवट यांचिकैहेरि 'रावैतन वोहितभाई। मङ्गलशुद्ध समाजचढ़ी गुरुदेव प्रतापलगी उहिबाई २८० शुद्ध अशुद्ध न मानत नेकहु अंतरमें अपनेभम भारी आननहू उपदेपतहै जनुधर्म बिना कि मूरति धारी। एक सनातन ईश्वरःमानत तो न मिले अपने, मतवारी मङ्ग- लकाकहिले हुरिदातना दण्डप्रणाम करी सुखकारी २८१ वेद सुचारिकहैं ऋगो यजु साम अधर्वणधर्मपुराना । चारिकिताम जबूरनजीलकही तब रेतजं है फुरकाना ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य जुझाबहु चारिहुवर्णा किये निरमाना सैयद शेखजु मुाल पठानसीएकते चारि कि कि ज्ञाना २८२ जातिन पिितन वेद फित्तेबनापीरागुरू नामुरोदे नाचेला होतभये मनुतौं किधों स्वातम तादिनको मन अद्रुत खेला । जाबिधि बाढिगये न भू- तउता:विधि वन्यनामोक्षाप्रहला मंगलजाति कितावभयतब युत्य अनेक कि ठेलमठेला २८३ ज्योति दिखायके मोक्ष हदावतापावक तत्व नब्रह्म अनादी रेत पियाय-पर्दै गतिएक सौ पौरिकोतवकि मोक्ष प्रतादी ॥ मत्रजपाय के मुक्तिवता-', बत अक्षर रूपनलोअिधिनादी । मंगल मौन-मली,नबको प्रय अस्तु अकययन दूसर वादी २८४ जातिको विपरीत भयो फैछुबिध स्वरमा गया अवतारी । विना निंदक कीन्ह प्रपूजित m - ใน १ सप्तमतिका। को पुरुपोत्तम वाणिनिहारी,॥ श्रीजगनाथ सवैयकाठामहि भोज जिमावत बेद बिसारी मालानिटक कोउन भापत एकादशी नहँठाढि पारी २८५ छन् । सेतुबंध शिवदर्शन कीन्हे देहहारि- कोलारीहै। बद्री.उंदर कुंडजल पीकर नकल व्याधि निरवारी । पुरुषोत्तमापुर भात खाइके काशी करवा धारी है। मंगल मुण्डप्रयाग:महाया तदपिन माशा हारी है २८६ मजायकरी इन अकेवर सर्वगुनाह बसंधाये हैं की जियारत जाइमदीने करवला-फिरि आयेहैं। दबी करान-बंगलमें भैया हाफिजबड़े कहाये हैं। मंगल कवनि जाताजा दिलमें हिरती हवी कुपाये हैं सवैया श्रीजगदीश्वर तोहि कोजानत नापनहींगति जानिनपाई श्रावकहाँ क्यहियाम निकेत कोनावकहाँ तजि फामास्वभाई । क्यों ठहरे इतको ठहरोइति ज्ञानज्ञान कि बाणि सुनाईप-मंगले जानिसकै अपनी गतितौजनयापन धाम- हि लाई ८cामारग भूलिगयो मितिमें भ्रम पविभ्रमाय महा विकलाई क्यों अपनी याचिमारगापावत जाननहार मिलेविनु भाई। त्यों यह जीव बिषयरमलपट जातं जितैतितही भ्रम- ताई। मंगलसंत सुजान सुमारग जानतहैं अरु देतवताई २४० ग:विष्णुपद हरिगतिजाति सकत कीभारी मायापति श्रज 'अकर बनामय अलख देवायसुरारी निरंतनु धरै स्ववश करुणा करलखत न विधि त्रिपुरारी- मनभावित कृत करत जगत प्रभु श्रुतिमर्याद चित्रारीनधर्म सेतु जनहेतु चारि फल दैनित करत मुखागा तुरा मणि सुवन कार कायाधरि सिया पगोंच प्रहारी कीन्ह महा अगमहा शेत्रुवत वाधितव्यों भौमारी ॥ बालि. ध्यो परनारि निरत लखिमत्वो इंद्राअफवारी । मंगल कोजानत प्रभुको गति तू भईयाम मुरारे REमन भूल्यो ध्यहिं कौतु विताप्रियम तोहि इंद्रीपत्ति कहियेत सेवकतम तूं धावा विषयभोगविपतुित्या घदत अति सोअमृत करिमाद ।। किसुरलीइत उतपित है। लालनहीं उरचा मम कहनी 1 7 . सप्तशतिका। ई।२७७.शिष्यकरें धनप्राशलगी मन मानकि पद्धतिचिंत नि- वासैतापर्थ चलावत वेद विवर्जित ज्ञान गनावतहै अनयासै ॥ ब्रह्मलखावत नैनसदा ज्यहिहेरि फिर मुनिसंत उदास मिगल लाखेलखेरनके घरं झूठनके मुवमें किधौभासैः२७८ वोहितपंथ भवार्णव में बहु मिष्य चढ़ायलियो, सुखमानी आपुनहीं कनि- हारमहा भ्रमपंच प्रभूतभ्रम्यो अभिमानी ॥ पारलहै किमिमध्य- हिबूडत मोहबयारि उडालत पानी मगलभूल जहाज चढ़ी जनि चैठिरही अपने घरबानी २७६ जो निहारमिलै युतवो- -हित तौनतजौ करिकै चतुराई। धाइनजाइ चढौं बिनबूझ जो पारने आवत लोग लुगाई, ॥ पूछितिन्हें पुनि खेवट याचिकहेरि रावेतन वोहितभाई । मङ्गलशुद्ध समाजचढ़ी गुरुदेव प्रतापलगौ उहिघाई २८० 'शुद्ध अशुद्ध न मानत नेकहु अंतरमें अपनेभूम भारी आननहू उपदेशतजनुधर्म बिनाया कि मूरति धारी।। नाक सनातन ईश्वरमानत सोन मिले अपने मतचारी मङ्ग- 'लकाहिये हरिदासत दण्डप्रणाम करौ सुखकारी,२८१ वेद 'तुंचारिकहैं ऋगी-यजु साम अधर्वणधर्मपुराना । चारिकिताब जबूर इँजीलकही। तब रेतर्जु है फुरकाना ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय -वैश्य जुशबहु चारिहुवर्ण किये निरमाना। सैयद खजु मुगल पठानसो एकते चारिकि भूजर्फि ज्ञाना दर जाति न पांतिन वेद कित्तेवन पोरगुरू नामुरोदे न-चेला होताये मनुधौं किधी स्मात्तम तादिनको मन अद्भुत खेला । जाविधि बाढिगये नर भू- तसा विधि बन्धनामोक्षाप्रहला मंगलजाति किताबभयेसब युत्य अनेकाकि ठेलमठेला "२८३ ज्योति दिखायके मोक्ष घढ़ावतापावकत्तत्त्व नब्रह्म अनादी रित पियाय बदै गतिएक सोबारिकोतत्वफि मोक्ष.प्रसादी। ॥ भजपाय के मुक्तिवता- बत अक्षर रूमान नौअधिनादी । मगल मौनामली. अस्तु धयाना दूसर बादी २८४ जो श्रुति के फैछुबोध स्वरूप गया अवतारी । विप्रनानिंदक कीम्हं - । रुविमानी ।। गुरुपंडित कविसंतबखानत काम क्रोधदुखदानी। 'तूतिनको संसर्ग समोदित करत सुखद चितवानी ॥ क्षणक्षणभू- मत फिरत भववीथिन जिमिमृगी अज्ञानी। यिरनहोत पलएक -नीचतू विषय विवंग छलतानी-॥ करत बिचौर नीचर्वत इत उत लखितुहि लाज लजानी.। मङ्गल वारवार कहतोसन भज कित ब्रह्म अमानी ८५ मनसुनुःसीखमनोहरमेरी ममतकि- मर्थ प्रिनित्य जगतमहँ तजिदुविधा मतिरी । भजिले रामच. "पण सुखदायक होइासुगति सुनुतेरी ॥ ततमयनातरु पछि- तैहै पायीता यमकेरी। माता-पिता त्रियतात मीतहितु स- कैन कोउ निवेरी ॥ ज्ञानीगुणी मूढ़ पशुपक्षी देवदंनुज चहुफे- री। कालबली सबहीको भपि है पंदतवेद बुधटेरी ॥ काम क्रोध मदलोभ मोहअरि रहेवहूं दिशिधेरी मंगल ज्ञानखगों -बधुकिन करत कामुहितदेरी २८६ सुनुमन तोहिकही समुझा- ईजो पूरणपदको अभिलापा तोभजिले सुरराई ।मुक्तिल है अनयास बेपबुध वदत नआने उपाई ॥ चारिवानि धावर चर प्राणीरचि विधि सृष्टिबनाई। तिनमहँ अतिउत्तम नरदेही सो 'लहिकात कराई।वैभवसुख समाज जग, जेतोअन्त सगनहिं लाई। कपट कि प्रीति प्रतीति करतहै यहतेरी जडताई ताते तजिदुविधा भ्रमसिगरे अनभव शुभ उरलाई मंगल च्याउ युग लपदाहरिके जो तिहुंकाल सहाई २६७. हरितजि फिरि पाछे पछितैहै । कामक्रोप मद लोभ मोहवय तू कुक्या चलिजैहै। श्र- न्तसमय रबिपूत दूतसुनु अतिही त्रासदिरहै । सुतदारोमादि क सम्पति सब कोऊ कामन ऐहै। तजि सुरधाम कर्मयश अपने बास नरकमेपैहै। तातोमानुसीखशुभ मेरी नोहरिपदा चितलैहै। सुयंग ससौन्य रहैजीयनभरि यमको दण्डं नसैहै। मोते हितू अपरको तेरो जोत्यहि सुमग चले है। मंगल सुधा सीखपीलेतू पीवतमृत्यु विलैहै.२८८ यकदिन मरण अहैतनजिनको हिरणा कुश हिरण्याक्ष प्रवल जगहै प्रसिद्धकृततिनको । करजरकेहरि - 1 १,१६ तप्तशतिका। सुख खानि सफल विधि सोल्वहिं नेकन भावै ॥ कामादिकसुत तोर प्रकटःयह तिनके संगमजावै। लखियनीति पयतजत समतिमति अबुध किधों मदंशवालोकरीति परलोकमतौरथ टूनों स्वकर नाचन मंगल अबते मानि-सीखममाहरि प्रातम किन ध्यावै २८१ मन अपने मनदेखु बिचारी । तजिबेगता ध्यंगता गतिको बैठीतपिर गुणधारी: जेखल महा मधुसम घर्तत.तिनहि कहत हितकारी प्रीतम सुमति लुगति भुद्धि वायक त्यागत विषय प्रचारी। सूरज जातधाम अतकैवथ जाइ- हिं देखु निहारी ॥ तहतुवहितू गति दातासारवीहोइंगारी। महा. मोहमयजानिधर्मविनुयमचरंगहि कखचारी । नरकमेलि वाधिहिदैताड़ना कोउनतह रखवारी । मंगल शोचि यह भजिले किन, शीराधिका बिहारी. २६२ यह संसार लखात असारात केतिक धनी निधन समविचरत अधन धनिक व्यवहारा वा संप्रति यहिकर दुखादारिद कितगा करियः विचारा-॥ महाराज गहिराउ यदिकिय दीनराजवैठासातासु, विभवा दीनतीयासुकी केहि द्विशि करताविहारा पंडित शिर पियाविका लागी मूढ़प- यो गुणसारा वापांडित्या मूढ़ता याकी मिटैन लेशप्रचारी। सतन अतन विनधाम गेहयुत होतं सहजचहुँदारा। मंगल भजु श्रीरयामा रामपंदपावासबसुख न्यारा २८३ यापु, अपनीभूल भुलाना ज्यों शाखामृग अन्नगहेकर घंदिपस्यो अनुमाना।तज 'तताहि.मोचैतो बॅदिते, नहिं अवित अतज्ञाना अहजिमि श्वा- न.पणी मंदिर निज: प्रतिविभ्रमाना। भूकिासस्यो हरिगि स्थो कूपजिमि गजरदा बिनु पछिताना ॥ तिमि यहजीव विष- अमायावरी पासपनाहिज़ानात खर्वत खोइदयोपैरिनकरश्वत समय दुख साना बिहि सबेर चेतलखुण्यापुहिं मिटै-सकल विष्ठानों मंगल सुमति सतोगुण प्रकटै जेहि. मगलहु भगवाना .REFलोगकहत मनतू बड़ज्ञानी मेरीजाना महामूरुखतू वि प्रया'वल अभिमानी । बेदपुराण-विषणितजोपय ताहिचलत स - । सप्तशतिका। ११७ रुविमानी ॥ गुरुपंडित कवि संतबरखानत काम क्रोधदुखदानी। - तूतिनको संसर्ग:समोदिता करत सुखद चितानी क्षणक्षणभ- मताफिरत भववीथिने जिमिभृङ्गी अज्ञानी । यिरनहोत पलएक नीतू विषय विवश छलतानी ॥ करत विचार नीचर्वत इत उत लखितुहि लाज लजानी। मङ्गल घारवार कहतोसन भजु कित ब्रह्म अमानी.२८५ मनसुनु सीखमनोहरमेरी ममतकि- मर्थ अनित्य जगतमहूँ तजिदुविधा मतिरी । मंजिलें रामच. ', रणसुखदायक होइासुगति सुनुतेरी ॥ अतसमयनातरु पछि- तैहै पायत्रीलायमरीजमाता पिता वियत्तात मीतहितु:स- कैन कोउ निरी॥ ज्ञानीगुणी मूढ़ा पशुपक्षी देवदंनुज चहुफे- दी। कालबली सबहीको भपि है बंदतवेद बुधटेरी काम क्रोध मदलोभ मोहअरि रहेवहूदिथिधेरी मंगल ज्ञानखड्गसों बधुकिन करत कासुहितटेरी२८६.सुनुमन तोहिंकहीं समुझा- ईजो पूरणपदको अभिलापा तोभजिले सुरराई । मुक्तिल है अनयास बेद बुध-वदतनाने उपाई॥ चारिवानि थावर चर प्राणीरचि बिपि सृष्टि बनाई। तिनमहाअतिउत्तम नरदेही सो "लहिाकाल कदराई । बैभवसुख समाज जग जेतोअन्त सगनहिं चाई। कपट कि प्रीति प्रतीति करतहै यहतेरी जडताई ताते तजिदुविधा भ्रमसिगरे यतभव शुभ उरलाई मंगल ध्याउ युग लपद हरिके जो तिहुंकाल सहाई २६७ हरितजि फिरि पाछे पछितैहै । कामक्रोप मद लोभ मोहवय तू कुपथ चलिहै । अ- न्तसमय रबिपूत दूतसुनु अतिही त्रासदिखैहै ।। सुतदाराचा दि. क सम्पति सब कोऊ कामन ऐहै। तजि सुरधाम कर्मवश अपने घोस नरकमेपैहै।तात.मानुसीखशुभ मेरी लोहरिपदा, चितलैहै। सुयण ससौरन्य रहैजीवनभरि यमको, दण्ड नसैहैामोते हितू अपरको तेरो जोत्येहि सुमगाचलैहै। मंगल..सुधा सीखपीलेतू पीवतमृत्यु विलैहै २६८यकदिनमरण अहैतनजिनको।हिरणा कुम हिरण्याक्ष प्रवल जगहै.प्रसिद्धकृततिनको जाकर नरकेहरि F 1 - I . ' सप्तयतिका। शारीरचरि कीन्हनाथ पापिनकों ॥रायण कुम्भकरण कतादिक श्रानासुर कोटिनको। राम कृपणतनाविरविकृपानिधिहत्त्वोभार शापिनको । रामलपण वलसमश्यामजू सुर्यग ख्यातनवाइन को । तेत त्या गिर्गयोनिजामहि गनैको नर नारिमको [ मी- पम पाण्डव प्रबल धनु र बारीअिन्यबलिनको रहोजतन मङ्गला मजिले हरिजीवन केतिक दिनको २४ालखातिल विनापरी भाई । अजजमवाधिनमबतिभावमा अतनारीरस्व हाई ॥ अमरमत्यो कार कत्ती दायीकृतरवताई। एकअनेक रूपतों देखा जलाय माझसमाई करणे हीनाजाविनय-सुन- तहै अक्षर हित दृष्टीई चरणहीन तीनोंपुर ना करबिन सृष्टिं उपाई। लिंगरहित नबलिंगवनायकालविता वयपाईपासको लभाति बिपरीत देखियत पैवरणी नहिजाई मङ्गल नरकवा देहीको दुविधादूनोंठाई:३०० तजुमन विय-प्रमाअतीराम दुविधाको मारग यहि जगमें छल प्रपचाव्यवहारा कोसुख तो- हिंमिले इनके सँग सूरुख बुधि नाविचारागावकीचूकहूकार उठिहै पहुँचतयमदरबारा- करणीफल चोहितरको मिलेगी विनु आतम निरधाराजिलाँचोमग गुधारी करतं ज्ञान व्यापारीन 'तिन लोगोति रीतिकहनांची करै सुमिनि बिस्तासानीचईली सतसंगविवर्जित परिहरु तिनको द्वारा मंगल भजामातमा पैर मायाभुक्तिमुक्ति हौवारा ३०१ सुनुमना विपरीत विवारीजो वियताहि कहताजोवनदा अरिहितु देखु निहारी। काक बुद्धिचेह विषय विष्टनित मति विनुहोत दुखारी ॥ ज्ञान पय जग-जन्म नयावत तुही निरय अधिकारी | दिनमणि उदय लखजिगरथ्या जान उलूक यारी ॥ गौरी सकल भूतासुखा सोबत चकाहि पतिदुखभाचारिप्रकासाचारिवि विज्ञान-चतुराश्रमनावारी प्रकट प्रतीप दिखात ब्रह्मको चहुँदिशि ज्योति पसारी । मगल मनतंजि चालिं विपय लखुजोतिहुँ होइ सुखारी इ०२ कहत' बनत नहिं काल कहानीायकसँग जन्ममरणमें दुनियाधदेतवेछ ।' , - -- सप्तशतिका। १ धमानी जासु प्रबलतावापुरतीनों बुरामजगिरा, भवानी ॥ शेक सोप संयोग वियोगहि देत सवहि अनुमानी। कोतरमूद मित्रन सेयो कृष्णेप्तजी रजधानी ॥ घायुअग्निायमा इन्द्रसरुत पंथि बन्दिपरोजगजानी जगजित शुम्भ निशुम्भाबरण त्री- गौ महरानीः ॥ मंगल, दुखमुख फाल वियशद्वौपाचताभव सब- पानी तूमनत्यागिमूलभजिले हरि जोकृतकालकिहानी३५३ कैसारे मतिहै मेनतेरी। धिनु स्वारथ भरमतभवतीथिन कुपथ चलतमाहेरोकोकलत्तवन्ताजगमम तज़िदुबिधा बुधि केरो-॥ मांत तात-प्रियांवन्धुतनपयुत काल, न सकत: निबेरी। पमपुर कष्टपाय पंछितैहै मानुलीख,शुचिमी-॥ रामश्यामपद नलित होहु अउिदिनानिधि भूल गहरी । मुक्तिप्रदारथ शुभप- रागल हुकुमति कुन्धिमिटेरो ॥ अाने उग्रायाजामकोटिहु लागि करुनगरा फेसगर्ल: मोक्षहोइनहि कोड पदत वेद बुध - टेरो३ ऐनोइ प्रमजीवाभमभाईजोगणिविमा प्रत्योजल भीतर जलहल हलत लवाई। सूरज्योति जहँतहॅ शिखरनमहूँ पैनगहीकरजाई घटवहिरन्तरगगन विराजत कुम्भन नान- गाई। जलतरंगा विवरण मिमिको जिपप्रद्भुतकथा सुनाई आपति पूरण पुराणं पुरुषोत्तम तनप्रति रहा समाई, दरपण यथाविन्तु परिपूरितेतू स्तर हेराई तजि गोर-तिमि जोवन देखियःको दूसरदोउठाई। मंगला भजुअातमसुखदायकातजिनुरध्मानला ३३०प्राम-नामत्तजि काम न कोई भूपरङकोहरिपुरसुनुमन फिर्तास्वर्गबताई जेमददमाकरत परपीडादया शीलता, खो- तेहिलोक सुखोबुधकहिये नरकवास हां होश परिते हैं पापोनन्यायो तेवेदामाजोई जवि कोबिद मुनिवर यहभाप्रत , 'वेदपुराणालिखोई । रोम भजे रिजपूतान है।बुध मूरुखनिय "लोई । जिमिबिनजलानजीवजीवनजल यह संक्षिप्त कहोई।. मगलं तजिभम भूलव्याय हरिलेहु मुक्तिमगाटोई-३०६ तजि . घाराम नामभजिलेमन! रामभजेापूरणानुष पानिायल A १५६ सप्ततिका। कौन भगवानहै । संगल विवादएकजीव आपु ब्रह्मरूपाकाको न्याय कौनकर बैठो कौने थानहै.३४३॥ सवैयाँ जीवभयो न अहै मन मूरुख औनहिहोय सुजान अगारी । कर्मनके बग पादनहोवत नित्यनित्वसहारनकारी ॥ ताहिअधोरघ वासन माधिय है अधऊरथ ज्योति पसारी। मंगलपाप ग्रनहि भातप दोरकि सूरजकेतन भारी ३४३ तूपरमातमहै। लबठामनकोटि- नाम न लोगपुकारे । सोसुनि देत मनोरथहै नित शुद्ध शुद्ध नवित्त विचाकोउ नरूप न धर्म सुकर्म न जातिमतामनतो अनुसारै ।मंगल यांचत तोहिं कृपानिधि सत्य मनोरथदे अविका ३४५ कासन जायफहौं अपनी दुरव यांभवमेंप्रभु तोहि विहा- ई। दूतरकी न समर्थविलोकतमोमनमेंजडतादृढ़ताई ॥ पालत लोक चतुर्दश आपुन क्योंसमकाज धरी निठुराई । मंगलमांगत जोरि दुवोकर देहु मनोरथ भेउ नशाई ३४६जौलगि चित्तमनो- रथ चहित तौलगि शुद्ध सतोगुण दूरी.। जो भवाश बिबश्यरहै सुरलोक अलोक दुवोलुख भूरी ॥बंधनमोक्ष, दुवो मनभूलमनो- रथहै न सजीवनसूरी ।मंगल जोविषयी विपनाथत सोप्रभुसत्य रहोभरिपूरी ३४७ जानतहै सबके मनकी प्रभु सत्यवहै मनश्च- तरयामी । तासन कौन मनोरथ भापिय भापतही-नर जानत कामी ॥ देडगोचापु क्षमानिधि तोकहँ क्यों बकबादकरै नितवा- मी।मंगल-ध्याउसदा निजातम जोसबमें सवते परधामी,३४८ सुंदर मारगहू डरमानत तूमन क्यो भवपंथ चलैरे । देखिशया दुबिधा उरलावत क्यों मृगनायक पाइलैरे ॥ काम सक्रोधन जीतिसकै फिरि मोह लिधौं निजहाथ मलैरे। मंगलसंतसमाज नभावत ज्ञानकहा कियौं कौन थलैरे ३४८ ज्ञान दिवाकर शुद्ध प्रकाश तहाँ न सके निजवस्तु बिलोकी । तौफिरि भक्तिकि चंद वित्तीयको नेक विकाशत होत अलोकी ॥ सोहनिशा अधियारकि सझत नैनपसारत दृष्टि संधोकी। मंगल खौजिले सत्य पदारथ ट'सकैख जीव चराचर पार चारि - सप्तपतिका १५७ भूमिधरे अपनेथिरभासै। भूमिहि शेषधरेघिर सोहतकच्छप पृष्ठ किशेप बिलासै कच्छप वायु बिमंडलमें नभमें पुनिबायु प्रबी- गनिवास। मंगल हैनभ शब्दति शक्ति सुशक्ति सनातन ब्रह्मप्र : कासै ३५१ शक्तिबिना कछुहोतनहीं व्यवसाय उपाय न कारण काजू । जौन अशक्ति सो कोकृत साधत मृत्यु किधौं जडलौतन साजू आयक्तिअनंत प्रपार भणैश्रुति शक्तितेदेव त्रिलोक समाजू। मगल शक्तिहि चीन्हिलहै हरि कौन अशक्ति करैभवराजू ३५२ सिद्धनकेतन सिद्धि न लागतद्धनकमनदि न आवै। शरशरीर नातप व्यापत ना हिमते हिमवान जडाचे ॥ पावतेजन पावकदीहत सर्पमुवै विप ना मरिजावे । मंगलत्योमनबुद्धिअहं चितजीवहि क्योंहु न लावहुवावै ३५३ जाफरवृद्धि न हानि न ताकरजाकरहानिन वृद्धि न ताके ॥ मावस औपुणिमाकि कथा शशिक्षीण औदृद्धि न कतप्रभाके । वृद्धिो हानिदुवोदुखदायक यावत जावतं को समता के ॥ मंगल त्यो अध ऊरधमें भ्रमजी रस एक तोको दुखवाके ३५४देखिसि काजो कहै सबमेप्रमुखो- जिति का जोकहै इतनाही ध्याइप्तिका जोपै दृष्टिनावबता- इलिका,जो अकाय सदाही ॥ पाइतिका जोपै हाथ नलागतगा- इनिका जो अकथ्य कथाहीं। मगल पूरणज्ञान उदय अपनेघर में न इतैउतजाही ३५५ पण्डितको नहि बातम चीन्हत कोक , रिता मन ज्ञानन जाके तितकहाँ उर तोपक्षमा नहि भूपकहा भवसिद्ध नथाके । योगकहा न समाधिहि धारत भोंग का धनं . नारिबिनाके ।।मगल ज्ञानकहा गावमें तिमि जोनर मगमेंसम- -ताले ३५६औरनको मनतुच्छ विलोकत आपुहि तुच्छ न थोच तहरे । यानन के गुण ग्रामव नित योगुणको अपनेगृह ढेरे ॥ चाहति पद्धति आपनिही खल निदतहै सबकोअप तेरे। मंगल दीन हैं हम साहन साह भयो धन वातन केरे ३५७ कर्म प्रतापविलासकरै सुरधाम पयो दुविधा दुखदाई । स्वर्गअयोरू अयोपुनि स्वर्गते यावत जात वही भ्रमताई ॥ त्यागि शुभाशुभ T -- - 1 १५० सप्तशतिका। कर्मसबै मुनि संतरहे निज अंग समाई । मंगल स्वर्ग ने नर्कयसै तिनको अपने पदमें ठहराई ३५८ वाणविलासने है निरंबाणह वाप्रभुको मन क्यों भ्रमभूला । सृष्टिंबनायें न पालत मारत है विपरीत कथा तरुमूला ॥ आदि कि अन्य किईश्वर आदि बताइ सकै कथनी प्रतिकूला । मगलको भवे जाननहार अभाव किवा- त बकै लघु थूला ३५वारिजपत्र रहै जलमेंनित पारिन व्या- पत त्यों जगसाधू । यो जलजीव रहै जलराशिहि वूडत नहि नीर अगाधू ॥ सर्प समाज रहैं तरुचदन शीतलहीन यसै विप बाधू । मंगल-ज्ञानितथा भववीधिन डोलतनीर संहीकृत नाधू ३६० गौरवमें गुरु लागिरहे अरु पीरनकेदिल लाग पिराई। ईश्वर खोजलगे मुनिसाधु रसूल रसालतिकी चतुराई ॥ एकदु तीनि विचारकरै बनिसंत महतरचै कबिताई। मंगल ब्रह्मघरवा- नकरैनहिं पूछत क्रोधि कहै चुपभाई ३६१ वेद फितेव बखान बिचारिय आगम और हदीशकि बानी ॥ आपुहि न्यायकरै संघ को नित शासित कारक जीव प्रमानी॥ हैसुनता सबकी निज कानन तो तनुधारि परै अनुमानी । मंगल बुद्धिथकै न बकैअर्व जोकछु, सो सहीन कहानी ३६२. दीरघमें लघुनानिपरै अरूं हैलधुमें परिनाहशरीरी । थावरमें चरदेखिय औचरमें पुनिथा- वर सोगति धौरी ॥थूलनामें अति सूक्षम आवंत लिंगनमें जनु, धूलकिथीरी । मंगल क्यों कहिये प्रभुकी गति ह्यां भवकी गति में मतितीरी ३६३ ज्यों शिर औश्रुति मस्तक नाक सलोचन श्रीमुख दंत गनावै । जीभ 'कहै पुनि' कंठभुजा.उर पेटसनाभि गुणी समुझावै ॥ लिंग गुदा पंगस्यों नखते थिखलौं जिमिहैतन नाम कहा। मंगल त्यों तिहुँलोक अलोकहु नाम सनातनब्रह्म घतावै ३६ जाहि कहै सबके शिरपै पुनि ताहिकहै सबकेतन घाती|भापि अजन्म अनादि धदै पुनिगावतहै ,रघुवंश प्रकासी। रूप न रेख न रंगभणे फिरिभाषत शेषकेशीश बिलासी। मंगल हैत कियौं यकभावने फूलत गालजो आवत हासी ३६५ सीख - 4 .

प । . सप्तशतिका। १५८ क हमहीमन ज्ञानविचार: विबेक लही सुख जाते। तेहमको पुनि ज्ञानपर्दै गुणि छंदंचनेक कथी कबितातें ॥. श्रापनमें नदि- भाव पिलोकत नित्यलिखावत योगकि घात।मगल सांचकहा- वतहै यह नानिकेआगे ननौरेकि वातै ३६६ जोप्रथमयपितु तौ पुनि काकर पुत्रकही पितुहीन न. सोई । वृक्ष बदें जिमि बीज मिना किमि चीजभणेविनु वृक्ष न होई ॥ कारणतौ विनुकारंज नाहिन कारज कारणं हीनकिकोई । मंगल शन्य न एक विना तिमि एकनेशन्य बिहाय पदोई ३६७ राम निकाम भयेसुत दोई अक्रोध कहावत ब्राह्मणघाते । मोहबिना बहुरोवत भ्रातहि "लोभविना शुचिराज सुहाते.॥ मानविना ,निजनारि तजीहित- कारक क्यों निज वधुडुवाते । मंगलमित्रतजे सबवीचहि सेवक शॉप.स्वधामन जाते ३६८ लासन भाषिय सत्यकथा अनखाय कहै बडनिदक तूहै। ज्योतिपके मतमेअटको' नभकीवरण नहिं -जानतभूहै। बीजकि बाणि न बूझिसकैलपिटायग्रजानगहैमहि रहै । मगलम्पों समुझेखगहोरिल पांवदवीलफडीगतकूहै ३६६ गोमलते जिमिकीटभयो नहिमातपितानिजजानत सोहै। त्यों प्रथमैमनुभे किधौं यातम बुद्धिसमाने पितानिज जोहै । जान- तनाहिंवनावनहारहि कोटिकबेद फिते बनिटोहै।मंगलपंखकबू तरहेरत कोकमितादुविधा न बिमोहै३७० जादिनभेमनु नारि । समेत लिखा न पढ़ा तब अक्षरकोई । बाढ़ीजवैअतिसततिताक-' र फीन तवै गुणि पागम सोई ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य नही तबनीचकुलीन दुधामति खोई । मंगल एफहिवर्ण तहासघ सों अघ भातिअपार कथोई ३७१ठाकुर श्री तुलसी यक भावहि ताहि धरे शिर कामिनिराते। बाद वृथा कृत साखि मृपा कहि जूप एलै निज धर्म कहाते.॥ माप तुला कृतकूटिसवा परनारि चौ पातुरि के सँगमाते,। मगल निंदक सोफिधौं सज्जन भक्त 'कहावत मूढमहाते ३५२ ॥ कवित्त ॥ तीस्थते श्राइकहै हाथन । लगतुमीप दुःख अति मारगमेंकहांलौ गनाइये । अमुक कुंथान . - - .

4 JL त बकै 1 १५८ सप्तथतिको। कर्मसबै मुनि संतरहे निज अंग सेमाई । मंगलं स्वर्ग न नर्कयसै • तिनको अपने पदमें ठहराई ३५८ वाणविलासन है निरवाणाहु वाप्रभुको मन क्यों भ्रमभूला । सृष्टिवनाय ने पालत मारत है विपरीत कथा तरुमूला ॥ आदिफि शन्य किईश्वर आदि बताइ सके कथनी प्रतिकूला । मंगलको भव जाननहार अभाव किवा- लघु थूला ३५बारिजपत्रं रहै जलमेंनित वारि न व्या- पत त्यों जगसाधू । श्री जलजीव रहैं जलरोधिहि बूडतहैं नहि, नीर अगाधू ॥ सर्प समाज रहैं तरुचंदन शीतलहीन यसै विप बाधू । मंगल ज्ञानितथा भवबीथिन डोलतनीर • सहीकृत नाधू ३६० गौरवमें गुरु लागिरहे अरु पीरनकेदिल लाग पिराई । ईश्वर खोजलगे मुनिसाधु रसूल रसालतिकी चतुराई । एकदु तीनि बिचारकरै वनिसंत महत्तरचै कविताई । मंगल ब्रह्मवरखा- नकरैनहिं पूछत क्रोधि कहै चुपभाई ३६१ वेद कितेव वखान विचारिय आगम'और हदीकि बानी ॥ आपुहि.न्यायकरै सव को नित भासित कारक जीव,प्रमानी ॥ हैसुनता सबकी निन कानन तो अनुमानी । मंगल बुद्धिथकै न बकैश्रव जोकछुहैं सो सहीन कहानी ३६२, दीरघमे लघुजानिपरै अरु हैलघु परिनाहशरीरी । थावरमें चरदेखिय औचरमे पुनिया- वर सोगति धीरी ॥थूलन में अति सूक्षम, आवंत लिंगनमें जनु थूलकिथीरी । मंगल क्यों कहिये प्रभुकी गति ह्या भवकी गति में मतितीरी ३६३ ज्यों शिर औश्रुति मस्तक नाक सुलोचन औमुख दंत गनावै । जीभ कहै पुनि कंठभुजा उर पेटसनाभि गुणी समुझावै ॥ लिंग गुदा पगरयों नखते चिखलौ जिमिहैतन नाम कहावै । मंगल त्यो तिहुंलोक अलोकहु नाम सनातनब्र घताचै ३६४ जाहि कहै सबके शिरपै, पुनि ताहिकहै सबकेतन घातीभापि अज-म अनादि बदै पुनिगावतहै रघुवश प्रकासी। रूप न रेख न रगभणे फिरिभापत शेपके शीश बिलांसी। सगेल हैत किधौं यकभावन फूलत गालजो आवत हाती ३६५ सीर तनुधारि परै १९ सप्तशतिका।। १५६ कळू हमहीसन ज्ञान विचारे विवेक लही सुख जाते। तेहमको पनि ज्ञानपर्दै गुणि छदधनेक कथी कबितातें ॥ आपनमें नद्वि- भाव घिलोकत नित्यतिखावत योगकि पाते । मंगल सांचकहा- वतहै यह नानिकेआगे ननोरेकि बातें ३६६ जोप्रथमय पितु तो पुनि काकर पुत्रकही पितुहीन न सोई । वृक्ष घदे जिमि बीज विना किमि बीजभणेविनु वृक्ष न होई ॥ कारणतौ विनुकारज . नाहिन कारज कारण हीनकिकोई । मंगल शन्य न एक बिना "तिमि एकनशन्य विहाय वदोई ३६७ राम निकाम भयेसुत दोइ अक्रोध कहावत ब्राह्मणपाते । मोहविना बहुरोवत भ्रातहि 'लोभविना शुचिराज सुहाते ॥ मानबिना निजनारि तजीहित- कारक क्यों निज वधुडुबाते । मंगलमित्रतजे.सबबीचहि सेवक आप स्वधामन जाते ३६८ जासन भापिय सत्यकथा अनखाय कहै बडनिंदक तूहै। ज्योतिपके मतमेंअटको' नभकीवरणे नहिं जानतभूहै। वीजकि बाणि न बूझिसकैलपिटायजानगहैमहि रूाहै । मगलक्यों समुझेखग होरिल पांवदवीलकडीगतकूहै ३६६ गोमलते जिमिफीटभयो नहिंमातपितानिजजानत सोहै। त्यों प्रथमैमनुझे किधौं यातम बुद्धिसमाने पितानिज जोहै ॥ जान- तनाहिंबनावनहारहि कोटिकबेद फिते बनिटोहै। मंगलपंखकबू तरहेरत फोकबितादुविधा न बिमोहै३७०, जादिनभेमनु नारि समेत लिखा न-पढ़ा तब अक्षरकोई । बाढ़ीजबैअतिसततिताक:- र कीन तबै गुणि बागम सोई॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य नहीं. तवनीचकुलीन दुधामति खोई । मंगल एकहिषर्ण तहासव सों अब भातिअपार कथोई ३७१ ठाकुर श्री तुलसी यक भावी ताहि धरे गिर कामिनिराते। बाद वृथा कृत साखि मृपा जूप छलै निज धर्म कहाते ॥ माप तुला कृतpi. चौ पातुरि के सँगमाते । मगल निदक सोकिधौं कहावत मढ़महाते ३४२ ॥ कवित्त ॥ तीरथते लगतुमोप दुःख अत्ति मारगमेंकहांलो गनाइये। N कभी --- - 1 सप्तपतिका। 'जहां भोजनान लेशमिलै अमुक सुधानतहाँबडो सुखपाइये ॥ धीतकी कहानी धूपमेह वादु भाषिकहै मंदिरादि महिमावताव शुचिताइये। मंगलनहानप्रात धकाधकी चोरठगे मीतकोमिलन गावै मुक्तिको न भाइये ३७३ माघमें सवार गंग:डुबकीलगाइ खोजलवधिमोक्षन कृपालु निजपाइये। ठगनके मेलेमेंझमेले परि भाति भाँति बसनादिखोइ खाय धूमिघर आइये ॥ पांच चोर बागिबारि ग्रीपमा में देहजारि सुक्तिनदिखानि रामरामरट लाइये । मंगल भ्रमातजीव आपुआपु भूलवश सथिर न होत जाते. दुबिधा नशाइये ३७४ मूढ़ताको बासतन पंडित प्रसिद्ध भूमि गूंढ़ता न जानैज्ञान भक्तिकाको नामहै। गणक कहावै न' गणित वात बूझै कछु नृपति न भूमिरंच सैंनधन धामहै ॥ साध करि ख्यातजानै साधना, न एकजीन वाधक न मारैजीव सुमति सवामहै । मंगल ताहि ज्ञानि बिवित 'कुधाम देखु दृढतानज्ञान की न खतन विरामहै ३७५ एकजलबिन्दु धूडिमस्त पिपीलि जौन मनमत करत पयोधिअवगाहिहाँ । क्षणक उडात थकैम- संक विचारै चित्रं गगन निरंत ताके अतलौ समाहिहीं ॥ श्रातप्त मिलोति जातपारद विलाइ सोऊ करत मनोरथ दिनेश धाम गाहिहौ । मंगलविमूढ़ तैसे खोजत अगूढ़ बस्तु गूढ देखिमित कहत पूछौं काहिही ३७६॥सवैया ॥ व्यास पुराणकिये कितने इक भावनसों वहुभांति पुकारे । दायक मुक्ति बदेयक ब्रह्मकहैं येक शकर जीवहि तारें ॥ विष्णुकहैं यकशक्तिभणे यकरामकथा किधौं श्याम विचारे । मंगल भूलपरी मन पंडित आतमत्यागि फिरें वहुद्वारे ३७७ योगिनके मत योग समाधिरु जंगमके मत चेतन वानी, जैन, अनादि कहैं भवकर्म सन्यास स्वातमाधी निरबानी-॥ बादि निराश भणै दुरवेश पुजावत ब्राह्मण पावक पानी मिंगल येपटराग किी कहराइत रोग न धान कहानी ३७८तीरथ बासि पशुचि मंजन मूरति पूजक पूतरिध्याना। जापक मत्र विधान लिखावत पाठक पाठ मरांग प्रमाना । . - । - । । १ सप्तथतिका। ज्यानि खातम ध्यान कहै निनज्ञानि गुणावत उत्तमज्ञाना । मंगलगालि मुमुक्षु 'सवैधन पोपत ह्यांकहु क्षेत्रविधाना ३७६ ईश्वर अगसही यहजीवहै बेदपुराण कुरानवतावै । पै अवजाइ सकैढिग तासुन अगमें क्यों कर जाइ समावै ॥ कोटिउपाय वि- धानकरै जपपाठ सुतीरथलौं फिरिअावै । मंगल शोच तजौ सि- गरे अपने घरमें निजबस्तु लखावै ३८० ॥ यथा ॥ ज्यों तस्ते 'महिपातपरो फिरि ताहिलगैनहिं कोटिउपाई। ऊरध यो अध पावत जावत संधिसमीर भ्रमै बहुताई ॥ रोवतहै बिललात 'दगोदिधि क्यों निजखानि लहैदुचिताई। मंगल ब्रह्म नपावत जोर्व तथा उपचार वृथाहि लखाई ३०१ यातनकी पतिबादि -पटैमन भूपणवस्त्र अवस्त्र चभूपण । जीवसदा- परमानंद पूरेण ताकहँ नाहिंविदूप विदूपण ।। ग्रीपम शीतयथा गतितिपछी- जत वृद्धतनेश्न पूपण । मंगल ज्ञानगुणी उरलागत क्योहुन मूरुखके मनतूनण ३८२ एफदिशा विदिया भरगें यऊरधनी अध खोजतंडोले । एकउपायन में चटके यककर्म प्रताप सदा गति बोले । एकभणे हरिकी महिमा यक यापन में अपनी गदिशोले । मंगल एकसबै भ्रमत्यागत हैथिरंभावस्वभाव निचो- लै ३८३ क्योभटकै मनज्ञान विहाय विभालित रूप रूप नदोहै । ब्रह्मयनोदि सहीवंदसज्जन ठामकुठाम दुधो किमितो- है । स्वर्गवहै पुनिनर्क वहै गुरुभिष्यवहै सुनिपडित मोहै । मंग- ल बोन तजैदुविधा उतसोई विराजि रहाइत जीहै ३८४ आयत काल जवैजत जाफह होतंतवै-तसकाल घटाऊ । काल । स्वभाव दुभांतिरचो प्रभुजानत लन्तसुभाव कुभाऊ ।' कर्म कहावत धर्म विहाय न व्यापक रूप बिहीन दुठाऊ। मंगलको समुझावत बालक अक्षर पाठकबेट प्रभाऊ ३८५ कालमें केतिक चीनि गये युग आतम भूत मुरारि पुरारी । केते अकाश मही मिनमे सुग्भानु दिनेश निशाचरधारी ॥ वेदपुराणबिलान अनेक नभागम कारक ज्ञानविचारी । मगल आदि अनादि नहीं ज्यहि - व - २२ - १६: सप्तशतिका। जहां भोजनान लेशमिले अमुक सुधानतहीबडो सुखपाइये शीतकी कहानी धूपमेह बाद भापिकहै मंदिरादि,महिमावता शुधिताइये । मंगलनहानप्रात धकाधकी चोरठग मीतकोमिल गाचे मुक्तिको न भाइये ३७३ माघमें सवार गंगारकीलगाइ खोजैजलसधिमोक्षन कृपालु निजपाइये। ठगनके मेलेमेंझमेले परिभाँति भाति बसनादिखोइ खाय धूमिघर भाइये। पाच अोर आगिवारि ग्रीपम में देहजारि मुक्किन दिखानि रामरामरट लाइये । मंगल भ्रमातजीव आपुत्रापु भूलवश सथिर न होत जाते दुविधा नशाइये ३७४ मूढ़ताको वासतन पडित प्रसिद्ध भूमि गूंढ़ता न जानैज्ञान भक्तिकाको नामहै। गणक कहावै त गणित बात बुझे कछु नृपति न भूम्मिरंच सैनधन धामहै। साथ करि ख्यातजानै साधना न एकौन बाधक न मारैजीव सुमति सवामहै । मंगल तथाहि ज्ञानि विक्ति कुधाम देवु दृढ़तानज्ञान की न खतन बिरामहै ३७५ एकजलबिन्दु धूडिमरत पिपीलि जौन मनमत करत पयोधिप्रवगाहिहौं । क्षणक-उडात थकैम सक विचारै चित्त गगन निरंत ताके अंतलो समाहिहीं ॥ प्राता बिलोकि 'जातपारद बिलाइ सोऊ करत मनोरथ दिनेश धाम गाहिहौं । मंगलबिमूढ़ तैसे खोजत अगूढ़ वस्तु गूढ देखिमित कहत पूर्वी काहिही ३७६॥सवैया ॥ व्यास पुराणकिये कितने इक,भावनसों बहुभांति पुकारें। दायक मुक्ति पदेयक ब्रह्मकहै येक शंकर जीवहि तारें। विष्णुकहैं यक्रशक्तिभणे यकरामकथा किंधौं श्याम बिचारे । मगल भूलपरी मन पडित बातमत्यागि फिरें बहुद्वारे ३७७ योगिनके मत योग समाधिस जंगमके मत चेतन बानी, जैनाअनादि कहै भवकर्म सन्यास खातमधी निरबाती चादि निराश भणे दुरवेश पुजावत ब्राह्मण पावक पानीमंगल पटराग किनौं कहराइत रागन धान कहानी ३७८तीरथ वाति बर्दै शुचि मंजन मूरति पूजक पूतरिध्याना। जापक मत्र विधान सिखावत पाठक पाठ मरांग प्रमाना ॥ १ -- . सप्तशतिका। + व्यानि स्वातम ध्यान कहै निनज्ञानि गुणावत्त उत्तमज्ञाना । मगलथालि ममुक्षु 'सबैधन पोपत ह्यांकहु क्षेत्रविधाना ३७६ ईश्वर अवतही यहजीवहै बेदपुराण कुरानवतावै। पै अबजाइ सकैढिग तासुन अगमें क्यों कर जाइ समावै ॥ कोटिउपाय बि- धानकर जपपाठ सुतीरथलौं फिरिआवै ।मंगल शोच तजौ सि- । गरे अपने घरमें निजवस्तु लखावै ३८०॥ यथा ॥ ज्यों तरुते महिपातपरों फिरि ताहिलगैनहि कोटिउपाई । ऊरध औ अध आवत जावत संधिसमीर भ्रमै बहुताई ॥ रोवतहै बिललात दशौ दिशि क्यों निजखानि लहैदुचिताई । मंगल ब्रह्म नपावत जीव तथा उपचार स्थाहि लखाई ३८१ यातनकी पतिवादि पटैमन भूपणवस्त्र अवस्त्र अभूपण । जीवनदा परमानंद पूरण ताकहँ नाहिविदूप विदूपण ॥ ग्रीपम शीतयथा गतियातप छी- जत वृद्धतनेकन पूपण । मगल ज्ञानगुणी उरलागत क्योहुन मूरुवके मनतूपण ३८२ एकदिशा विदिशा भरगै यऊरधनी शवखोजतडोले । एकउपायन में अटके यककर्म प्रताप सदा गति वोले ॥ एकमणे हरिकी महिमा यक आपन मे अपनी गढ़ियोले । मगल एकसबै भ्रमत्यागत हैथिरभावस्वभाव निचो- क्योभटकै मनज्ञान विहाय विभालित रूपअरुप नंदोहै। ब्रह्म अनादि सहीवदसज्जन ठामकुठाम दुधा किमिलो- है। वर्गवहै पुनिनर्क वहै गुरुशिष्यवहै सुनिपडित मोहै। मंग- ल कौन तदुविधा उतसोई' विराजि रहाइत जीहै ३८४ श्रावत काल जवैजत जाकह होतत तसकाल बटाऊ । काल स्वभाव' दुभातिरपी प्रभुजानत सन्तसुभीव कुभाऊ ॥ कर्म कहावत धर्म विहाय न व्यापक रूप बिहीन दुठाऊ । मंगलको समुझायत बालक अक्षर पाठकबेट प्रभाऊ ३८५ कालमें केतिक वौति गये युग आतम भूत मुरारि पुरारी । केते अकाश मही बिन सुरभानु दिनेश निशाचरधारी ॥ वेदपुराणबिलान अनेक नयागम कारक ज्ञानविचारी । मगल आदि अनादि नही त्यहि . । J M २१ १६२. सप्तशत्तिका। गायसकै न प्रवीण अगारी ३८६ शब्द स्वरूप व यकजीवहि नाहिँ परै सुनि कान लगाये । एक भणे परिपूरण ज्योतिनहाथ- जरै भ्रमभूलगमाये ॥ श्रादि अनादिन जीवन गायत दूसरोर चलें मुशये । मंगल जन्म अपारन खोजत वीतिगये, न घरै फिरिाये ३८७ कोटि विचार बिचारि मई कवितापढिकोटि पनाय मरे । कोटिन तीरथ धाइफिरै ब्रतनेम अचार अपार करैरे ॥ पावक तापि तपाइ मरै पगएक दुपाद खडो विचौरे । मंगल बूझिपरैनबिनागुरु वातन साधनसों न. सरैरे ३८८ वेद ऋचा बहु बूझि भमै बहु धायत बूझिकुरान पढेरे । ब्राह्मण होइ कि शेखवनै चहु पण्डित आलिम नाम बढेरे ॥ भानगढ़ी नित भापि रहै चहु चातुरिकै बहु आपु.गढेरे । मंगल जाने बिना, निज मातम या भवतेकबहू न करे ३८४ साधनसाधिअनेक मही- तल वैठिरहे उरज्ञान विचारी । ईद कवित अपारवनाइ.चुपाइ. रहे विभुतान निहारी ॥ योगलमाधि तजेजलअन्नहि पै न लगा. कछुहाथ अगारी । मंगलहै परमातम सत्य न देखिसकै विपयी तनधारी ३६० जीर्वहि क्यों भरमावत तू जड़, भान, किसान कथाकथि भारी । पारसको खलपाथर गावतकांच गहावत बुद्धि बिलारी॥ शांतन होत बिना दृढ़ता मति तर्क अनेककिये अबि-. चारी । मंगल पूरिरहा सबही थल-एकतुही न द्वितीय ब्यकारी ३८१ जन्मज़र न तजै अपनी मति ज्ञानविवेक पारनेगायें। तीरथ न्हाय किये बत संयम साधन साधि दौदिशिधाये ॥ जौलगि घातम भाव, गहै नहिं पथकुपंथासुपंथ चलाये। मगल सन्त सबै निज गावत पै न बचे मृतु पाहि पाये ३८२ अन्त समयजत श्राशलहै ततयों मुनि अागम वेद बतावै। भाषिवहै. बहुसाधन गावत क्यों दुविधा अपनी-मिटिजावै॥ कर्म किये बिनु कर्म किये यक भाव पयान मनैनहिंबावै। मंगल सिद्धि • उपाय इतैजिमि पारस-लोहछुये हरिभावै ३६३त्यागि शुभाशुभ: भय भाव-उदासरहै- चितधारे। काहुको पैर सनेहन ज सप्तशतिका। १६ मानत मोहन मूरति चित्तपधारे ॥ ऊपरफे तजि स्वांगसबै शुचि अन्तर पूरण ज्ञान विचारे । मगल साधु सही महिते जनसादर अन्त स्वच्छन्द विहारे ३८४ धानंद रूप है निशि वासर त्यागि सबै सुखदुःख कारण । मौन रहैति भणे हरिकीरति प्रस्तुति सस्तुति जीवन मारण ॥ शापविवर्जित वाणिदिनहीन समस्त विश्य विधिधारण । मगल सन्त स्वतंत्र निहारत सुंदर भाव जिधौ भवतारण ३८५ एक नदीतट मेतु रचायत बूझतएक कहाँ जलथाहा । पैरत एक न पावत पारहिफूल हि एफखडेदुखाहा।। पांथि पंडा. श्रुतिपारचलै यक पूमि नहै कि निरन्त प्रवाहा । मं- गल श्रीगुरु वोहित पायविनाश्रम एकतरे सरिबाहा ३८६ ऊ- मरि के फल बालि यथा नहिं जानत दूसर देशवसैरे । त्योयह जीव धरातल ढोलत लोक बलोकन चित्त भसैरे॥ लोकत्रपार किये करतार तहाँ बहु भाति गुणी विल नरे। मगल पै नलखे यहि लोकहि जीअनुमानन एकलतरे ३८७ केतिक अन्धपुराण सुनेपढ़िकेतिक पुस्तकभौनथपीरे। केतिक तीरथन्हायथक्योबहु मंत्रगयत्री सुभाय जपोरे।केतिक पूजनपाठकियोबत नेमप्रचार कुचालि सारे। मगल चामन साधन तापनहाथन मूटीखुलीन ढपोरे३८८ अपिनसे करिये बहुतै परदोपविवाद पढ़े उर वाक। मौन भलीयहि कारण रेमन जीवनमृत्यु वृथानितताक। अक्षर पाठक ग्रन्थपढ़े किमि दीख उलूकन कंत प्रभाके । मगल क्यों उपदेयतअद्रुत वाहिर हेरबितर काके ३८६ ज्योजग लोग बर्दै तसभापिय अंतर आपनि वृत्ति बिराजोफर्मसुधर्मकर्म विमोह फहावत सोकहिये सुख साजै ॥ निंदक सूदन वादि कथै ज्यहि कारण सो शुचि शुद्ध समाजै। मगलतत्य छिपाय धरौ उरझूठ बद्रगौ भव चादर काजै १०० क्यो मन झूठ कहाँ भवबीथिन बादरकौन निरादर कोरे । तू विषयी रसलपट रेमन संमत देत 'विपयरस भोरे॥ अंत विभोग विलोकिय संसृति दुष्टमहाभ्रम- णा मनतोरे मगल सोनलगी अपने जलहाथ लगै न शिलादि । 1- । १६४ सप्तशतिको। निचोरे ४०१ लोक लिये, परलोकन,भांवत मोह विवर्द्धि लहै मनमाहीं। जो परलोक गहै तोरहै. फ़ित लोकहिमें सबलोग सोहाहीं॥जीवनमें सवभांति सदासुख जीवनमें दुखकी परि छाहीं।मंगल ज्ञान बखानत टूटत है.गुण बेद कितेव कहाही ४०२ संमत साधु सदा सुखदामति नीच अधोगति दानिकहा- वै। जोजन सत अतंतन वीन्हत सोदुखभोग कवौं नहिं पावै ।। आपनित्ति समाधि रहीन द्वितीय विलोकनि जीवहि श्रावें। मंगल सोजग जीवनमुक्त न जात अधोरध ब्रह्म समावै ४०३ त्यागि सबै भ्रम ध्याउ सदाहरि थान भरोस विहाय अरेमन । ज्ञानसमेति सुकीरति ताकर गायकरै शुभकाज.लहेतन । मुक्ति' पदारथ हाथलगै फल नहुँ पाय गुणे सुखकोगन । मगलसत्य विवेक लियेनहिं स्वारथ सतनको द्वितियसन ४०४ मोहकुमार- गमें भटकै सबिबेकन तूहरिको पदभ्यावै। दानि अभिप्रिय दूस- र नाहिन क्यों नहिँ तूदृढ़ता मनलावै॥नाम प्रताप दशो दिथि' मंडित पंडित दोन अजाकरवावै । मंगलभूल न जानते ईश्वरतू फत आयु अमोल गमावै ४०५ सेंगते पंडित होत महीतल सं। ते दुष्टयरीर बनैरे । संगतेमूढ़ कुकर्मविमोहित संगतेनीचकुली- न गनैरे ॥ संगते बेद विधान गुणेबत चोग समाधि सुध्यानसनै रे ।मंगल संग प्रकाशक ज्ञान कुसंगते उत्तम भ्रष्ट पनरे १०६ स्वांगनमें इत आयु गमावत रोगनको मनभोग बिचारै । संगति भावति मूढ़नको सततंगति में न घटीकुविहारै.॥ स्वाट विपय रस चित्त वस्यो अवक्यों शुविज्ञान हियेमें प्रचारै । मगल,चेति श्रजी भाजले हरिंजन्मद्वितीय व्यकारहि टारै७जीवनहेग याभवमें हरि-त्यागि विषयरस जे लपटाने । कीट पतगपायग भूघर तेपि भलेरत इंद्रिय साने ॥ जेनर कायहिपाय नध्यावत यातम शुद्ध स्वभावप्रमाने । मगलतेजडतेजड जानिय क्योंकर- तार तिन्हें निरमाने १०८ तोहिं महाधिक है मनमढ़न त्यागत भापनि चंचलताको । झूठविपयमें प्रयुक्तरहै 'सतमारगपैन खजा- . : सप्तशतिका १६५ नहिं हाको ॥कामकला मदकी मदता तजि लोभभजै, किनकत रमाको। मंगल सीख अपारदई नहिँ तूजड शुद्धभेयो दुखकाको २०४ातमही, परमातमहै तटही नहिँ दूरिफिरै दिभिचारी। वस्तुधरी अपने घरमे प्रतिद्वारकि खोजत ज्ञान विसारी ॥पूत आन बतावत दूसर जोपिबदै परधाम विहारी। मगल आपनि नाकनटोवत मूरुख धावत काक पछारी४१०ातमबास शरी- र सहीकवि सतन भापि बताय सकैरे। वाथल बुद्धिनहीं मन फीति कोटि कुयोजन धाइथकरे । ज्योत्रियभोगकराय बिना न बखानिराकै चहुंकोटि बकरे । मंगल आपुहि जानत आपुहि ज्ञान द्वितीय न बुद्धिचकैरे४११ याजग फागुन फागलगै अपने गृह फागुकि बारहमासी । लोग निलंजरहें यकमास इतै नित काम करावत हाती नारि इतै फगुवागहि मांगत ह्यां नितलोभ 'बयारि बिलासी। मंगल यातनते भवही भल जोमर्याद गहेन बिनासी ११२ जेतिकलागुल गाउ रहेन बहू रसको अव छुटि गयोरे । शुद्ध सतोगुण चित्तवसो तम मोहनश्यो रबिज्ञान उयो रे ॥ खोजत जाहि सोबापुमिलो भ्रम भूलफिपद्धतिको वितयो है। मगल मौनकि रामजप रसनीरस नाम विवेकभयोरे ४१३ जोःभ्रम आगिल पाहिलको अरु सर्गुण निर्गुण को व्यवहारू । सो,अब एक प्रमाण लखो दुविधा निज अंग विकल्प विचारू ॥ निर्गुण नाहिन सर्गुण कोपि वहै सब ठाम खछद विहारू । मग- लानागर, माम्यवनी त्रिपु पूरुष एक विवेक निहारू ४१४ सौपि स्वराज्यसबै निजमत्रिन भूपगयोवन ज्योंमृगयाको । ज्यों "हरियाव इतै तनुधारिसुमोहन रूप बजै शुचिशाको॥ कानन , रोजहि जीनत तेजन हैं जिन दीख कबौं नृपताको । मंगल संत तथा पहिचानत ब्रह्म स्वरूपहि श्याम प्रभाको ११५ चाहिय श्रापन शुद्धस्वभावकहाच्युत अच्युतलों निजकाजू । ब्रह्महिश्या- मजु श्यामहिंब्रह्म स्वभांति दुभातिन ज्ञानसमाजू ॥ दोविधितो भल एकहिती भलतू अपनीफहु त्यागिकुताजू। मंगलहोइमही- । - .११.६ सप्तमतिका। पतिकौनहुँ दासकहाय न पाउ राजू१६ जाकरराजे प्रजाहम ताकर जोहमहीतौ प्रजान नृपालू । कोअवतार धरैभवमें पुनि त्यागि कलेवर जात सख्यालू ॥ जानबहै अतिदुर्लभ चीन्हवदु- स्तरभाव फंसा भवजालू । मगल आपुहिभूलिकहा फलदूसरको सवबूझि हचालू ४१.७ ढूँढ़तका हिफिरै मनमूरवदेशविदेश सक- बटाऊ । सिंहपस्यो पिंजराजिमि दौडत तोडतताहि न भूलप्र- भाऊ। त्योभ्रमपाथ परीगलमें नहित्यागत चचलता व्यवंताका मंगलहतो तुहीनहिं दूसर अंतर बाहिर एकस्वभाऊ-११८ मुगडं मुडायगहे करवा दुखभोजनके घरग्रेहिकेगावै । जौन गृहस्थती घंधनमें सुतनारि प्रयोजन वित्तमतावै । जोनहिंसंत गृहस्थनहीं तिनको कुदमा न कयेकधिजावै। मंगल कौनहुं भांतिनहै सुख संसृतमें दुरवहू दुखपावै४१८ संतनटेक तजै अपनी भव व्याधि अपार संतायमररे । कोटिउपायकरे पितुज्यों प्रहलादसदा-हरि 'नामरौरे ॥ जानिदुखी निजसेवक साहिबधाईसहाय प्रसिद्धक- रे। मंगलक्योखलदेखि नितापनि वृत्तिहिमेसचौरे ४२० दृष्टिदिये जगराग बिलोकत कर्मवशी निरवाण विवादो। रामर- हीमवर्दै बुधपारस तारसको कुछजाननस्वादो॥ मोहमयी मति बासुन आवत ज्योंपशुपै शुचिचन्दन लादो । मंगलज्ञान वृाहि घिदै जडवानर जानत स्वाद कि प्रादो४२१ तालवजै न बजावन हारहै राग अलाप नगायककोई । देखनहार बिनाचपमूरति नृ- त्यकपाद विहीन लखोई ॥ शन्यगली तहँ आपुषिराजत माम तहां जनएकनहोई । मगलसत्येन दन्तकथा गुरुगम्यलदै दुषि- पासव खोई ४२२ मारगमें सवदेववसैं गणनाथ महेश रमापति देखे। शेर निशाकर गंगतरंगिनि सूरसुता सगिरा त्रिपुलेखे ॥ दंड.. दुतीनि कुसाधनमें संघ अद्भुत बात कि नैन निमेखे । मंगलयोग घदैसिधिसाधक अंधनबूझंत चक्षुनपेखे४२३॥कविताकोटिसम- झावैगुरुमूर्रुखन बूवातयथाकाकश्वेतहोय धोक्तनगंगमें जो नस्वभावी गुणबाहिरको रंगकाच कछुकतोहाथ जौलौरहत सु. . । ܝܢ सप्तयतिका। संग ॥ टिजात कालपाय कियौं मदजातहोत सुबुधि कुसंग तजि नाफाज्योंकुरंगमें । मगल न भूलैज्ञान सम्पति-अपारपाय तत्ययाम पुरुप बिलोकै निजगमें १२४॥ सबैया ॥ को अव ज्ञानगुणैसनमें मतिशुद्ध प्रकाश विचारि चुगानी । मारणहारन पालनहार न सिर्जनहार त्रिपावकटानी ॥ एकस्वरूप अखड वि- राजत तीनिप्रकार कथै भवज्ञानी । मंगलसिंधु कयान पिपील बतायलकै भ्रमपथ भुलानी ४२५- बासरभानु उदोतकरै निशि में गणिखेचरहोत प्रमाथी । आदिवनादि दुबौविधि अावत शुद्ध सभापलिये स्वविलाशो ॥ ईश्वरमय सबभासिपरै चिनु ईश्वर- ध प्रभाकितनाशी। मंगल धन्य करताररचौफिरि ताहिर- चोन दुभाशी ४२६. सत्यदयानिधि तूमबठामन रक्षतदास सदा हितमानी। को तुव कीरति गायसकै अति विस्तर रूप नजात वखानी ।। ज्ञानप्रकाश प्रभाकर मरति मोह निशा भ्रम रूप ति- रानी । मंगल.जैति बदै करुणाकर. देहुस्वभाविक वस्तु अमा- नी-१२७ मीशजटा न जडाउ वभ्यो नहिंमस्तकभूति नःचन्द- 'नरोरी। वामित अंग अवासित नाहिन तीरथ श्री व्रतते मति भोरी । मूढ़नमें गणना अपनी कविपंडित कीन कथा का मोरी, मालदीख दशौदिगिमें प्रभु थाइपरो शरणागतितोरी ४२८ मोहन सूरतिही परमानंद सत्या चिदानंद वेद परखाना। याभवभूल सबै विधिदेखिय काहि कहाँमनको अनुमाना ॥ एक महीतल एकवसै सुरधाम दुऔफिमि एकसमाना। मंगल दीख जहांतह-मायहि हौशरणागति तू भगवाना ४२८ कोटिन भाव कुभाव विचारिय कोटिन तीरथ धावतढोले। कोटिन.जाप जर्षे अजपापुनि पाठक कोटिन वाणिसुबोले। कोटिनपडित आलि' मई अरु कोटिन वैद्यरसौषधि खोले। मगल ईश्वरकोककुखोज- नागावत हैं, कितनी गढ़ि छोले, ४३० जेगुरुं के पदकी रज सेवत लेपि, सुजान कहैं कविताई ।.जे.न गुरूगति जानत पूरुख तेन: सुजान भणे भ्रमताई । को गुरु सेवक नामइतै शुचि भाव भये - - || > .

१६१ सप्तशतिका। JA " दुबिधा मिटिजाई। मंगल मौन रही न कही कछु सत्य समाज करौ सेवकाई.४३१ जो दृढ़ता अपनी मतिमें नहिती बत नेम स्था तनपीडा । सिद्धि उपाय स्वभाव वहै नतसंत समाजउठा- वत ब्रीड़ा ॥ भोग विलास विषय भ्रमरूपक सोलहिजीव प्रका- शक क्रीडा। मगल ब्रह्म बिधानको बूझत धर्मप्रति किधो गहि मीडा.४३२ गावत होट प्रयोग अहै ऋग्त्री यजु अध्वर जाहि बतावै। सामभणे उदगात, प्रयोगहि वेद अथर्वण शांतिलखावै।। पुष्टि समोहन वश्य उचाटन मारण थंभन आदि गुणावै । मंगले बेदके धर्म सवाक्य वखानत सो उपनीषद भाव ४३३जायतको यकसार विवारत स्वप्न बिधानगुणें यकलारा । एक सुषुप्ति विवाद लगे पुनि एकतुरीय प्रमाण विचाराला पैनहि जानतकोनु विमो-' दतबाद विवाद अखंड पसारा । मगल बूझमलीन हिंावत मूरुख खोजतसिंधुकरारा४३४जंगमरूप कहै यकसाधुवतावतार्थावरहैं यकसंता । भेदनजानत यादिवरखानत हैदुहुभाव प्रमाणनिरंतो। आपनि भूल विवादत आन किंबोधन होत पुराण भनंता । 'म- गलातम शुद्धसतोगुण ताहि बिसारिभ्रमै मतिवता ४३५ सूध चपानन-देखिसकै दृग मॅदि लखै बनैन पसारी । ऊलटि दृष्टि बिलोकतरूपहि सत्यकथा मुनिराज विचारी ॥ देवतही निज रूप:मनोहर मोहमयी भ्रमदेत बिसारी। मंगल सानंद मुक्तम- हीतल उम्भ विलास कि बात नियारी४३६ ॥ छन्द ॥ सातौ आसमानके ऊपर अर्शमुअल्ला कुस है । आपी तहां विराजतमा- लिक हरसायत गंति उी है । जाननहारा दूजा नाहीं यों कह वाणी फुर्सीहै । मगल हदरही नहि बेहद खाम ख्याली पुर्सी है. ४३७. ऊपर को सवसैन बुझावै नीचेकी सुधि नाही. है। भटकत फिरै भूलिमायामें पूजा पाठन माहींहै ॥ कहता सुनता तर्क- नेकन गूढ़ अगूढ कथाही हैं। मगल पैन बूझमें आवत है जैसा तैसाहीहे ४३८यकनासूत बतावै संशा यकजब रूत लखातेहैं। एककहैं मलकूत देखिये यकलाहूतासुझाते हैं। यकवारोंसेन्यारे 1 ne सप्ततिका डोलें घरहाहूत बताते हैं। मंगल भूली भटकी गावै ईतफी उत दरशाते हैं। ४३६ जायतसो ना सूतवतोइय ख्वाबकथा लबरूंती. है। है मलकूत ख्वाब गफलतम निज ज्ञाता-लाहूतीहै । जहति. आयान्तहासमाया सोंपालम हाहूतीहैं । मंगलपंचदशा येअपनी धानकहे मति सूतीहै ४४० सूरजका प्रकाश ज़र्ग मानूर इलाही ऐसाहै। सर्दी गर्मी कुछनहिाउसमेमर्माण प्रकाराधी जैसाहै । ने नज़ीर बेचून नामहै भया न होइन साहे। मंगल समुझिली जियेदिलमें है।वहाजैसा तैसाहै४४.१अद्भुतमूरति क्यों कहिजाकैः हियभावै जिय आचैजू । जिवाकहत बनतनहिकैसेहु शिरि क्यों करिसमुझावजू।सैनबुझावै बूझ नावावै कर्मकिये नहिपावैजू । मगल सत्य भणत मुनिसाधू ज्योलूंगागुडखावै—४४२॥सवैया ॥ जेनहिंजानिसकैगुणको मेततेकिमिनिर्गुणभेद विचारों वेचतनित्य- राटिफंजे नहितोमणि माणिकमोल उचार॥ कर्मघशी भवभूत ताजितेनहिं तेशुचि आतमज्ञान निहारे ।मंगल खेल खिलारित केसँगीमूरुरेवके सँग जीतता हारी ४३,३ कंदखनै इक मूलभर्षे फल खापत इकक्षीरअहारीगीपम पावक मध्यद, तनशीत रहैं। जलेमें दुखमारी पॉवसमें तजि शाह रहैं जप पाठकरै भव यागा प्रसारी। मंगल चीन्हत प्रातम जौनहिं तौभ्रम मेटिसर्वोन, अनारी-४४ज्ञानरालीनं चले कबहू तिनकोकस सिद्धि सती: गुण होई । बोणिसुने निर्वाण विभासकि क्रितत्रौंधि रहैं बुधि खोईानित गुणे यहदंतकथा जपपाठ विधान न. पूजातकोई। मंगलाचतानिकारत मंदते मूढफि दर्पणको कपिरजोई ४५ ब्राह्मण पूज्य गृहस्थनके घर धायसवैजन पाईंपरे । नेवफ्ने, मदमें घटकोकछु ब्रह्मविधान नचिनधरें। जानते बेदन भेदन, मांच-न भक्ति ज्ञानत याग वरेरे मगल भैडिधतीन, गहौपग पंचकरोजस तैसी करैरे ४४वधानव तापमनागिरमीनिरदेवस ताकहँ द्रोप लगाना I. सत्रियते m - सप्तशतिका। . + मे दुविधा मिटिजाई । मंगल मौन रही न कही कछु सत्य समाज करौ सेवकाई ४३१ जो दृढ़ता अपनी मतिमे नहितीव्रत नेम' वृथा तनपीडा । सिद्धि उपाय स्वभाव वहै नततंत समाज उठा- वत ब्रीड़ा ॥ भोग विलास विपय भ्रमरूपक सोलहिजीव प्रका- एक क्रीड़ा। मगल ब्रह्म विधानको बूझत धर्मप्रति किधौगहि मीडा ४३२ गावत होत प्रयोग अहै ऋग् श्री यजु अध्वर जाहि वतावै। सामभणे उदगात प्रयोगहि वेद, अथर्वण शांतिलखाचे पुष्टि समोहन वश्य उचाटन मारण थंभनाआदि गुणावै । मंगल बेदको धर्म सवाक्य वखानत सो उपनीपद भाव४३३लायतको यकसार बिवारत स्वप्नविधानगुणें यकसारा । एक सुपुप्ति विवाद लगे पुनि एंकतुरीय प्रमाण विचारों पैनहिं जानतकौनु विमो- दतवादविवाद अखंड पसारा मंगल बूझमेलीनहिंभावत मूरुख खोजतसिंधुकरारा४३४जंगमरूप कहै यकसाधुघतावेत यावरहँ यकसंता । भेदनजानत बादिवखानत हैदुहुंभाव प्रमाणनिरता। प्रापनि भूल-विवादत थान कि वोध न होत पुराण भनंतागम-: गलबातम शुद्धसतोगुणं ताहि बिसारिभ्रमै मतिवता ४३५ सूध चपानन देखिसकै हग दि लखै बनैन पसारी। ऊलटि दृष्टि .' बिलोकत-रूपहि सत्यकथा मुनिराज-विचारीता देखतही निज रूप-मनोहर मोहमयी भ्रमदेत विसारी। मंगल सानद मुक्तम-' हीतल दम्भ-विलास कि बात नियारी,४३६ ॥ छन्द ॥सातौ- आसमानके ऊपर अर्शमुअल्ला कुर्सीहै । आपी तहां विराजतमा- लिक हरसायत गति उती है ॥ जाननहारा दूजा नाहीं यों कह पाणी फुर्सीहै । मंगल हदरही नहिं बेहद खाम ख्याली पुर्सी है। ४३७ ऊपर को सबसैन बुझावै नीचेकी सुधि नाहीं है । भटकत फिरै भूलिमायामें पूजा पाठन माहींहै | कहता सुनंता तर्क- नेकन गूढ अगूढ कथाही हैं। मगल-पै नबूझमें आवत है जैसा तैसाहीह५३८ यकनासूत बतावै सञ्चा यकजब रूत लखातेहैं। एककहैं मलकूत देखिये यकलाहूत सुझातेहैं। यकचारोंसेन्यारे।। TH . 4 4 सप्तशतिका। १६६ डोले घरेहाहूतं बताते है। मंगलामूली भटकी गावे इतकी उत. दरशातेहैं४३४जायतसो नौ सूतवतीय रव्वावकथा लबरूती. है ।है मलकूत बाब गफलतमे निज ज्ञाता लाहूतीहै । जहति आया-तहासमाया सोपालम हाहूतीहै । मंगलपंचदशा येत्रपती अानकहे मति सूतीहै ४४० सूरजका प्रकाश ज़र्ग सानूर इलाही ऐमाहै। सर्दी गर्मी कुछनहिं उसमे मणि प्रकाराधी जैसाहै। ये नंजीर बेचूनानामहै भया न होइन वैसाहे। मगल समुझिलीश जियेदिलमें है।वहाजैसा तैसाहै४४अद्भुतमूरति क्यों कहिजावै हियभाकै जिय प्रावैजू । जिताकहत बनतनहिकैसेहु किरि क्यों करिसमुझावैजू सैनवुझावै बूझ नावावै कर्मकिये नहिपावैजू । मंगल सत्य भणत मुनिसाधू ज्योलूंगागुडखावैजू४४२॥सवैया । जेनहिंज्ञानिस गुणकोमिततेकिमिनिर्गणभेद विचारों वेचतनित्य घराटिफेजे नहितोमणि माणिकमोल उचारें। कर्मवशी भवभूः ताजितेनहिं तेशुचि प्रीतमज्ञानःनिहारै मगलःखेल खिलारिन, केसँगीमूरुरेवके सँगाजीतता हारे ४३,३॥ कदरखनै इक मूलभ- फल खायत्तपै इकक्षीरअहारीनयीपम पावक मध्यद हैं तनभीत रह जल में दुखमारी प्रविसमें तजि शाह रहैं जप पाठकरै भव 'याग पतारी । मगल चीन्हत श्रातम जौनहिं तौभ्रम मेसिन अनारी४४४ ज्ञानरोलीनचले फवहू तिनको, फरस सिद्धि सत्तो गुण होई । बाणिसुने निर्वाय विभासकि चक्रितौंधि रहैं बुधि खोई चित्तगुणे यहवतकथा जपपाठविधान न पूजनको मंगल इतनकारत मंदतामूढकि दर्पणको कपिरजोई ४१५. बाह्मणीपूज्यागृहस्थनके घर धायसवैजन पाइँपरेरे। अपने मदमें चटके कछु ब्रह्मबिंधान नचित्तधरें। जानत ोदन भेदन, भावन भक्तिन ज्ञानत याग वरमगल भैहिधसीन, गहौपग पंचकजिस तैस करे।४४वासवःतापतनारि मीनिरखेवस ताकहँ दोष लगावै ॥ कोशिफापातुरिकसँग मिनिता क्षत्रियते शुचिबिप्र कहावै विष्णमिलंधरा नारिलंगी सर्व यंत्रात होउन 1 -- . १७० सप्तशतिका लीव लजावें मंगल पंचकर सीकरौ नत सत्यकहे अगनिन्दक गाचे १४७दीख अनेकगुणी कवि कोबिदाजे कविता सवितासम गा। आलिम फाजिला शेषरु-आरिफ़ आयत जोन कुरानवता- बैंगबातनके, निर्वाण लियेवहु ऊपर केर- विचार लखावै।मंगल अंतरकी गति गावत आपुहि बूझत आपु लजाउँ, १४८ जासन पूंधिय मुक्तिगली सो बढी जप- तीरथ पाठ अचारा । जोकरि कोटिन धाकिरहे फिरि क्यों भटकै मन ज्ञान प्रवाराहैतनमें सोमेरै नतरै जोमरै धौतरै सोशरीर व्यकारां। मंगलसिद्धसमा पिन साधत बूझत आतम ब्रह्म विचारी,१४ जोसबके शिर ऊपर सोहत तालुकेथा किनिजात वखानी । जो नचहै तसहोत तबै इत बंधनमोक्षकथा न कहानी।। जायपरै शरणागतताकर जॉकरनाम जपें मुनिज्ञानी । मंगलभूलमिटै सिगरी अपतीपद- वी,लहि होइ अमानी ४५० अपिन बूझ बुझावतः आनहिसा किमि बूझिनकै मतिथूला सूरज की युति होत नहीं सिंकता चमकावत है प्रतिकूला॥ दंभ किमानताज्ञान विधानहिं जो सब भांति नगावत'मूला मङ्गलभेडि..चसेवनहार चुकायत क्योंगज' मोल भला४५१ ईश्वरकी रचना लरिखकै बुधि होतठगीसिन बूमतभेदै । कोटिप्रपंच करै व्यवसाउयधा जल छेदत होतन छदै। बीज विलोमिनिहारत पादप चौंकिउठे लहिकै उरखेदै। मङ्गल क्यो करतागेंति जानत- पंडित वैठि रहै तजिदै.४५२. जोकहनेनि कृपानिधिकी गति जानता, सोमति ताहिनाबूझै। अंगाकि संवैलापन देखत तापग पांवदिये मगसूझेनोमन सूतं इतै अरुझी सुलझावतहौं नितनित्य अझै सगल. सोकिमि तोहिं उबारिहि जोपहिले अपनैरण जूझै४५३ःपाहंननाव न नीरतरै फिमि-पथिवढाय लगावत पारा क्योभ्रमि मूरुखसों भटकै निशिबासर ध्याउसदा करतारा पिंथअनेक प्रपंचखा- नत, कृत आनहिं प्रानबिचारा मंगल सत्यकहे नबनै इत भाषिय लोगन के अनुसार ५४ क्योंसुखी देखिल हैं 'मुंदको.

सप्तपतिका मनः औदुख हेरिलहै अयभारोः। देवनको शुचिं प्रातमा मानत देपनके जडता व्यभिचारो | एकस्वभाव सुधीलमधीनहि ज्ञान कितै केहियाम बिहारीमङ्गल सत्य विवेक लिये निशिवासर नीरस एक चारो ४५५ शुद्धसतोगुण ज्ञाना प्रकाशत बूझतही निवाणफि बानी ।पडित शंखन घटबजावता-गावतह अपनी मतिमानी धागः विहाय मुजिने डोलहि लोग हैं जहतावश प्रानी मगल जौलगि वूझन धावत तौलगि नेम-अधार प्रमानी ४५६ निर्गुणवस्तु विचार भयेउर दिंभ सबै तजिदेत सुजाना। को, निरखै दिशिपूरब पश्चिम भागमः वेदः पुराण कुराना ना तीरथ मूरतिमन्दिर माजिद धायमजारफिरै मनाना। मंगलं जौलगि धुझान आवतन्तौलगि लौनकरै.सोप्रमाना ४५७.काग कि नीणि अशुद्ध विचारत शुद्ध बखानत बोलत तोता । यावत 'चित्त द्विभाव लग्यो मनतावत शुद्ध अशुद्ध समोताहा बोधभ्ये दुबिधा-मिटिजोय विषय दधिमें पुनिखायनगोता। मगलवेरेवुतु ज्ञान कि आखिन जो इत सो-उत क्योहु न होतां १५.८ सत्य असत्य अपार ने भापत लोगनको ठगि धनजरिवाहिर-हंस स्वरूपकिये अरु अतर लोभ सुकर्मनितोरे॥ नीरस बाद घदैनित निर्गुण मौहमयी मतिधर्म न चौर। मंगलयाजगरूपप्रपचकजाने विना दुविधा किमिशेरे ४५४ सिधुकि थाह पिपील न पावत थाहत यापनजीवगमाचे । ज्योमभ अतन मैक्षिक जोवतकोटि उडान उडै फिरियावै। लक्षप्रकाशकरै सिकताकण नाहिदिनेश प्रकाहिः पावै । मंगल त्यों यह जीवन जानत 'ब्रह्म सनातन मूरति भावै १६० क्यों मनबुद्धि गुणानिगुणे सुनि घेद पुराण कथा अनुमाना। मोहनिया तजिदेखु दिवाकर प्रातमरूप वरूप प्रमाना॥हेतबमाहिपरतुन दीसत या भूमको न कथा न पुराना। मंगल बूझत आपनरूपहि वैठिरहै तजिमान 'श्रमाना ४६१. देह बिहाय न जीव बिलौकिय जीव विहून रहै न शरीरा । जीवहि चेहहै तनजीवहि सूक्षमथूल दुधाकृतपीरा ॥ पंधन मौलवी . 1 3. सप्तशतिका। पीतन.बंधित जीव प्रबंध समीरा मंगल तोहि न ज्ञानप्रले जोनहिंजानत जीव प्रधीरा ४६२ संपुट पाठकरें यकपंडित मृत्युंजय जापकरेंरे ॥ गोशत दाना दिवावत वाथलं पर्वत लुटाच परैरे॥ दान अजा शनि-एक करावत गाय पुजावत हिरैरे । मंगल हंस चलै परधामहि काहुके कर्म कछूनसरे इएक हि लग्न नक्षत्र घरी तिथिवार ससंवतजाति विचारि- देजनजन्मलियो यठामहिं एकहि योगकरन सम्हारिया। 'त भौगक मूढहितीय धनीयक-दूसर दीनभिखारियामङ्गल तिप बादसुभानहिं ईश्वरकी करणीकछु न्यारिय ४६४ दूरि खत थूललगै लघु ऊंचचढ़ लघुनीचासेरी नैन दियेचशमा, दीरघ हेरतहैदुविधा मतिघेरी॥ भेदनहीं कछुयक्षबिलोकिय हि दोषनहै बुधिमेरी । मंगल आपन बूझहिमेंभ्रम पंडितके बुद्धिकिरी ४६५॥ छंद ।। पंडितवेद चादरशाचे विविध करि गावैजू। आलिम फाजिल बडामौलवी आयत बांत्रि विजू ॥ जिनवह वेदकितेब वनाई तिनकीगति न हिप्रावैज़ा लसमुझि लीजिये दिलमें क्यों अवज्ञान सिखावैजू ४६ पिाठ जापतीस्थवत घोत्रम मदभुलूहै। मद्यविवाद दंभ. को प्रियेवचन गतिझुल्लू है ॥ विद्याधन नृपताको आफूमंदत कहुँ खुल्लू है। मगलहै निर्गुणमत बिजया येकचुल्लूमेउल्लू ६७बूझतही निर्गुण मतवानी सिगरीकथाभुलानी प्रश्न उत्तरंकुछ प्रानैदेत सुमतिबोरानीहै । जिसको पहिलेदुष्ट- नि अबकह पूरण-ज्ञानीहै मङ्गल बूझ विना सारस शिल त कौमति जानी है.४६८ जो कुछ वेद किन्नेबान जाना अब कौनुबतावैरै । वूझभये अपनेउर, अंतर बाहिर क्योकरि रेजो कहने सननेकी नाहीकोअब ताहिँ गाचरे । मंगल रिदेकी बीवीपरदा खुलैन पावर ४६८ । सवैया । सत्यकि बैंट धीरज श्रावण ज्ञान जलोददया दिशिप्राची । वायु बि- क्षेमामहि वर्षत,बुन्द विचारसुधी खगनाची मालिविवेक । ।

सप्तशतिका। १७३ | संतोप लहा सुख पाखंड अर्कअपर्ण कुराची ।संगलसंत किसान समोदित भापत बरपायहसांची..४७० आखिनसों सबको नि. | परबैनहिं नैनन देखिसकै तेहिकोई संपत्त वासु सबैनितनाकत वाकह पासित जातकहोई॥शब्द अपारसनै अतिद्वार.न ताहि सुनोति कोटि धरोई । मङ्गल-यातममोह विवर्जितमोहन रूप बसतत सोई,४७१ गावत ज्ञान का इतिहास हिवाणिसदा नाहिं वाहिकथोई। स्वादसबै,रसनाविललै नहिनीरसस्वादालापैकृत कोई ।। हाधनवस्तु अनेकगहैकबहू नहिवाहि प्रवीणगहोई ।म- गल पातममोह विवर्जितःमोहनरूपबसै तनसोई.४७२ जोमन औचितको भरमावत शुद्धाशुद्धगली.मतिखोई-बुद्धिहिमोहि- त नित्यकरै यदिवोवतहै तदिबोध न होई ॥ सर्पव्यकारभारीर लगावत श्रापुसकष्ट नदेखिपरोई । मंगेल, बातम मोहविवर्जित मोहनरूपवसै तनसोई १७३ जाहि-विचारि थकी मनकी गति चित्तववाउते आपुचुपोई । ज्ञानकि मौन विवेकरहो उतजातन दूसर मारग फोही बुद्धिमहा,जड़ता.चितधारत जाहि नबूझ सुः कोटिवदोई। मगल बातम मोह विवर्जित मोहन रूपावले तत सोई ४७४दमानियाद किये फितने, पढ़िवेद किताब चुपाइरहोई । बूझिफिरोघहुमानिनेसो जेहियोग समाधि अपारभनोई ।। जासु कथासुनि बाहिर देखत भीतर खोजत वाहिरजोई, मंगला तम मोहविवर्जित मोहनरूप वसैतनसोई ४७५ श्रातमजोनि: बसैतनमें तेहिनाहिं क्षुधा न पा कछु ध्यापै। दुःश्वनताप जरा न-ज्वरा नित आनंद रूप विराजत प्रापैकी मोहनहीं सुत विच -तिया धनवापुस्वछंद स्वमत्र सुजापै । मगल बूझत सातमभाघ- 'हि.ब्रह्म सनातताकौनुप्रलापै-४७६ दृष्टिविलोकत रूपसवैनाहि दृष्टिहिरूपविलोकत पानी । बाणि घरखानत वेद पुराणन या- "णिहि गायसफै अनुमानो ॥ श्रोत्र सुनैबहुशब्द यथा नहिं, श्रोत्र सुनै द्वितिय गुणवानी मंगल त्यॉनिज आत्तम है मन बुद्धिसकै नाहि.लाहि नखानी४७ दृष्टिहि अनजो देखतहै सवब्रह्मकिधी न ।

१७१ सप्तपतिका। बरवानिबताइय। कैश्रुतता जोसुनै सबवाद कि है मनब्रह्मसदा गति गाइय॥ बुद्धिहि ब्रह्म जोचीन्हत ज्ञानहिपै भम एक नहीं दृढ़ताइय । मङ्गलसर्व सुपुप्ति मिले यहिते जड भासत वह्मन पाइय ४७८ ज्यों कविता कविते उपजै कविता कृतही विना- महि पावै । मेव हिते जल नीरते मेघ धनी 'धनते औ धनी धन भावै ।। वृक्षतेबीज विवाहिते पादपको निरधार'सुजान बतावै। मंगलत्यों तनजीवकथा कहतेनवनै यदिचित्तहि आधे १७४ जो महिनीर शिरवीपवमान स्वभानुनिशेश नक्षत्रकहावै । लोकदि- था विदिशा चपलापन वेदसयज्ञ प्रोप्राणं बतावै ।। वाणिसदृष्टि स्वचा श्रुततामन भास अभास जोशुक्र गना । मगलजीवोषि- लोकजिते सबमें यक बातम आपुलखावै४८।श्रातमवासवि- हूनन जीवन औदृढ़तानहिं देखिपरैरे जातन यातमकोना निवा संसोमृत्युग्रस्यो क्षणनाठहरैरें। कोटि उपायकरै व्यवसावहियो- लन डोल न सोनकरै रे । मङ्गलसन्तसदाशुचिभूतलजोनिजा- तममें विचरैरे ४८१ लोकप्रिलोक सबै नभमें नभहू अहँकारमें वास कियेहै । शक्तिमें है अहंकार जोशक्तितो चेतनबह्मको बिम्ब लियेहै | चेतनब्रह्म अनादि अपार घरवानेत वेदसदा अवियेहै।' -मगल तासुप्रभा निज जोव सोपानंदरूप विलास हियेहै १८२ 'तत्त्वनहीं महतत्त्वनहीं अहँकार नक्ति स्वतंत्र विलासी।नि- त्यप्रकाशित पै नहि भानुबसै नबठामन पौन प्रभासी ॥ नैनन देखत बाणि न बोलत काननहीं सुनता सुखरासी मङ्गलताहि न दूसर जानत ऐक स्वछंद सदा अविनासी४८३ जाहि विचा- निभावत दूसर कोटिकथै कवि कोविद बानी । देखनहार वि- लोकत रूपहि अंपस्वरूप भने अनुमानी ।।दोउनमें यकभाव ने श्रावत यद्यपि पूरण वस्तु बखानी। मगल बूझवं धान बताउब धान हिहै समुझे शुचि ज्ञानी ४८४ जासन आपन ज्ञान बखानिय सोअनखाय रिसाय परैरे।मौनभली यहिकारण याजगसत्य कहे दुबिधा पसरेरे । ज्यों बक हंस कहै लघु धीनहि हंस कहै बुध सप्तशतिका। १७५ लोगुलरै। मङ्गल उम्भलिये उरज्ञानन ऊपर स्वांग अनेककरैसे ४८५ श्रावतहै मन उत्तम पूरुर एक अनादि त्रिलोक सजैरे । हर्षअपार तरंगउठे उरपैसर बाहिर कोन भजैरे। लोग कहेंहम को समुझाउरे मङ्गल तू कस देव जजैरे । सोनहिं बाणिमें वाचत. कैसहु संत बिचारि विवादु तजैरे ४८६ कासमुझाइय रूपन रंग नं धाम न नाम न मातपिता है। ज्योति न तत्त्वअमेय श्रमान अलिप्त अकथ्यपरे कविताहै ॥ऊच न नीच नथूलनसूक्षम आदि न अत सदारमिताहै। भगल बुद्धिनबूझिसकै तिहुलोक. प्रकाश नहीं सबिताहै १८७ादण्डकासफल समाज-चारिवानि-जल कृत देखुजलपवमान कृतसोतो भूताकासहै । भूताकाश अंतरिक्ष चन्द्रलोकसूर्यलोक सोऊतौनक्षत्र लोकपावत बिलासहै.॥भपुर घनावदेवलोकहीते देवलोक लोकगन्धरबसोतीप्रजापतिबासहै। प्रजापति लोकसो बनायोवह्मलोकपायामङ्गल-अलोकागेब्रह्म चिदाभासह ४८८देवकरि जानताको देवसों विवेकहोत,भूतक रि जानैताके भूतरूप बासीहै। वायुसोबिचारैताहि भासत समीर - समनाफरूपवादे ताको नभतो विभासीहै।भानु अनुमाने ताहि भावत, दिनेशतुल्य ,सगुणप्रमाणे वाकेसतनविलामीहैं।। एकरूप सोईन द्वितीयतात तीनिलोफ मङ्गल विचारि देखा सत्यधि नासीहै १८८ जडवत रहत न जानत विधानवेद हंसरूपकाग होता अचरजवानीहे । जानिबूझि,त्यागिभूल सत्यपंध लेतजौन तासुबात सबविधि,नुजन प्रमानीहे ॥, रतनको भावकोई जान- ताजवाहिरी,नजानत वणिक जौन वेचत भवानीहै । मंगलसम- स्तवस्तु प्रथम विचारिदेवै किरि परित्यागै सत्यभाव, वित्तयानी है ११०जाने विनु भापत लजात जीवोपमूढ़,पूछत निकारदांत अनहद बानीहै । ज्ञान यौबिबेक किधौं वसत सुठामजाहिबदत प्रमाणभापि कथाकि कहानी।।अलख बताय समुझावसत्यभाव कहाँबंधन में राजाजाके एकांखि कानीहै । मङ्गल स्वरूपापद:. सरो,कुरूपदेखै मूढ़ता किचातुरीवरखानैकोई जानी १६१ एक.

३ १७४ सप्तशतिका। घरबानियताइयं । कैश्रुतता जोसुनै सबवाद कि है ,मनब्रह्मसदा गति गाइय॥ बुद्धिहि ब्रह्म जेांचीन्हत ज्ञानहि पै भम एक नहीं दृढ़ताइय । मङ्गलसर्व सुपुति मिलै यहिते जड भासत वलन पाइय १७८ ज्यो कविता कविते उपजै कविता कृतही कविना- महिपावै। मेवहिते जल नीरते मेघ धनी धनतेश्रो धनी धुन भावै। वृक्षतेवीज विवाहिते पादपको निरधार सुजान बत्तावै । मंगलत्यों तनजीवकया कहतेनवनै यदिचित्तहि अावै '४७६ोजो महिनीर घिरवीपवमान स्वभानुनिशेष नक्षत्रकहाचै । लोकंदि- शा विदिशा चपलाधन वेदसयज्ञ औप्राण बतावै. वाणिसदृष्टि स्वचा श्रुततामन भास अभास जोशुक्र गनावै। मगलंजीव बि- लोकजिते सबमें यक बातम आपुलखावै४८०ातमवालबि- हूनन जीवन औदृढ़तानहिं देखिपरैरे।जातन आतमकोन-निवा ससोमृत्युग्रस्यो क्षणनाहरैरें। कोटि उपायकरै.व्यवसावहिबो- लन डोल न सीतकरै रे । मङ्गलसन्तसदाशुचिभूतलजोनिजा- तममें बिचरैरे ४८२ लोकाश्रलोक सबै नभमें नभहू अहँकारमें वासकियेहै । शक्तिमें है अहँकार जोशक्तितो चेतनब्रह्मको बिम्ब लियेहै। चेतनब्रह्म अनादि अपार बखानत वेदसदा अवियेहै। मङ्गल तासुप्रभा निज जोव सोपानदरूप विलास हियेहै, ४८२ 'तत्त्वनहीं महतत्त्वनहीं अहंकार न शक्ति स्वतंत्र विलासी।नि- त्यप्रकाशित पै नहि भानुबसै सबठामन पौन प्रभासी । नैनन देखत बाणि न बोलत काननहीं सुनता सुखरासी ।मगलताहि न दूसर जानत एका स्वछंदः सदा अविनासी ८३.जाहि विचा- 'रिनिभावत दूसर कोटिकथै कवि कोविद वानी। देखनहार वि- लोकत रूपहि अंधस्वरूप भनै अनुमानी ॥दोउनमें यक भाव न श्रावत यद्यपि पूरण वस्तु बखानी । मंगल बूझव भान बताउव अनिहिहै समुझै शुविज्ञानी १८४ जासन आपन ज्ञान बखानिय सोअनखाय रिसाय परैरे।मौनभली यहिकारण याजंगसत्य कहे दुबिधा पसरैरे ॥ ज्यों बक हंस कहै लघु धीनहिं हंस कहै बुध 1 ।

- । सप्तपतिका। १७७ जीभवखाने । नाकनसूय त्वचापरसैनहिं पानहुं इन्द्रिय कर्मन 'ठानै ॥ चिन्तहि चित्त नहीं अहकारित औमनधावन बुद्धिप्रमाने। मंगल चेतन प्रातमहीन नशैसिगरे नहि आपुहिजानै १८८ जा- गि खिलारिलो पुनि खेलहि तासुप्रताप सवैजन जागे । शब्द सुनै परतै यरु देखत्त चाखत सूंघतही अनुरागे ॥ कर्म कि इंद्रि- य कामरें निजबुद्धि मनादि स्वमारग लागे । मंगल चेतना- तम आपुहि ताबिन, जडता सबैपागे ५०० आपन तेपुर तीनि पसारत ज्योनकरी निजजाल पसारै । नेकपटै नसमेटिबदै ति- मि अंतसबै हरिनग बिहारै ।। सत असंत गुणीयगुणी सुरदैत्य 'कथा उतकौन विचारै । मगल एकहिभाव कृपानिधि जाननहार कियापुहिहारै ५०१ ब्रह्मसातन ज्योति निराकृति पावकभानु निशाकर नाही । रत्ननक्षत्र न वस्तु प्रकाशित प्राणप्रभासन भा- । विसकाही ॥ देखत जीवलहै पदापन ज्यों परमातमकी पर 'छाहीं। मंगलकीउपमा जोअनूपम वैठिचुपाइरहौं घरमाहीं५०२ छन्द ॥ पहिला चक्र गुदाकेऊपर द्वितिय शिग्नके आगैहै । नाभि स्थल तीजा चौथाहिय पंचम कठनभागैहै ॥'पष्ठम त्रिकुटीधाम अनाहद'ध्वनि जाँसुनि सुखजागैहै । मंगल भमहोत नहिंकतहूं यकरसदश विधिलाई ५०३यध्वनि सुनतपरम पदपा नि- लातम अनुरागैहै । पुनित्यहिनाहि अविद्याव्यापै विधवा ल- । हत सुहागैहे । एकभाव चहुँखानि बिलोकै चीन्हत हस न कागै है। मगल चिदानन्द महि विचरैःजाहिदाता नहि मागैहै ५०४ जे हिव्वनि सुनी अनाहदनाही हृदय फैमलमेंडोलहै । विविध भांति दुखसुख समृतमें खोवत आयुअमेलिहै ।। मायामोह यसै मनवाको दुविधगिरा गतिवोलेहे । मंगल जौलगि पुन जा- नंत तौलगि नरपशुतोलेहै ५०५॥ दंढक ॥ अमित विधानश्रुति गिमावखानदेखि बुधिधिर होतनाहीं दुविधाके थानमें । जा. नत प्रकाशरूप मानत विभासजाहि मोहतबिमोह'वापुमनबुधि प्रानमे । तीनिदेह पंचकोप पाचप्राण भूलभाव एकापु-हितिय .

" १७६ सप्तशतिका । मर्थ काहू विधि- पाठकीन्ह अर्थ हीन ज्ञानिनसे “वादकरै बोलि वोलि घानीहै । ज्ञानौबिचारकौन बूझतन शुद्धचित्त चारियोर मोह मातिन लफ्टिांनीहै।। धापुसम दूसरन मानताविमूढ़ सन माधुताकि 'बातेदूरि बडो अभिमानी है। मंगलतमानैराउं साँचीतो कहावत है विडियाके धामंधरी जैसेफौंडी कोनीहै । संवैयाँ ।। तूमन जनित है। अपनीगति तापर मारगावामरािधा जौं विभूताहि प्रजासम जानत कोथबातीकहं ज्ञानसिखावै । पविकनौर बुझाबतहै जोपनीरजरैफिरिकौन बुझावे । मगलमू- हरवलत तिरवावतसंत भ्रमाय कहा वनित्राचे श्वेद विधान बतीवत पंडित यापुदुचित्त विषयालपिटानोबिाहिर उज्ज्वल अंतर श्यामरंगे पंगचीचा हलप्रमानोगा औरनको भ्रमकूपगिरा वर्त आपुन मूरुख ज्ञानभुलानो । मंगलका कहिये छलबादिहि सत्यमिटाय असत्यहिबानो ४४ एकनकप्रणपाठविता जल पनिकरै नहिवासरकाहूं । रोगग्रस्यो प्रणेत्यागि-पियोजल आनि परी'उर|तरदाहूं।बक्रितपाठ तपाअतिध्यापितजोजलमें नाहिं पाठउछाहूँ। मगलेदभ परित्यजि लोकृततो सतकर्म-धदैविबु- घाहू ४८५ अतरत्रीहरि ध्यान विराजत वाहिरकाज बिषयरत जोई ताकहसंत बरेवानत कोबिद पपिपाप से नहिंकोया जाविधिभिावर जगताविधि' कर्मसुकर्म नजातवदोई। मंगल सततमान सुपीनहिं भावद्वितीयधरै हियसोई ४६ चीन्हत सूरज पायसवें दिनमें निशिचन्द्र प्रकाशहिपाई यस्तभयेदृहुं अग्निप्रकाशझे पाचकानात शब्दप्रभाई शब्द बिहूना नवीन निहसकैत बातमी बुधिचेतनताई ताथलालोकतिर पहि- चीनत मंगले पनिवस्तुपराई १७ शक्तिदागोतन इंद्रिय स्वीचिके पांच प्रणितमेटिचिलेरे । चित्त अहंकृतलैमन बुद्धिहि स्वप्नप्रदेश र स्ववलैरे- िजायतकी सववस्तु दिखावतारिख प्रसन्नत सत्यम्लेरे मंगलबाफि सुपुप्तिगहै इनहूँ सवको तमि तौन लैरे शहटकोटिकरीनहिं नविलौकहि कान सुनैनाई, F , - .

३ . सप्तपतिका। १७७ जीभवरखाने । नाकनाव त्वचापरसैनहिं आनहुँ इन्द्रिय कर्मन ठानै ॥ चिन्तहि चित्तनही अहकारित श्रीमनवावन बुद्धिप्रमानै। मगल चेतन आतमहीन नशेग्निगरे नहिं आपुहिजानै १६८ जा- गि खिलारिचलो पुनि खेलहि तासुप्रताप सबैजन जागे । शब्द सुनै परतै अरु देखत चाखत सूंघतही अनुरागे । कर्म कि इद्रि- य कामरें निजवुद्धि मनादि स्वमारग लागे । मंगल चेतना- राम पुहि ताबिनहैं जडता सबपागे.५०० आपन तेपुर तीनि पसारत ज्योमकरी निजजाल पसार । नेकघटै नसमेटिबदै ति- मि अंतसवै हरियग विहारै ॥ संत अनंत गुणीअगुणी सुरदैत्य कथा उत्तकौन विचारै । मंगल एकहिभाव कृपानिधि जाननहार कियापुहिहारै ५०१ ब्रह्मसनतिन ज्योति निराकृति पावरुभानु निभाकर नाही । रत्ननक्षत्र न वस्तु प्रकाशित प्राणप्रभासन भा- निसकाहीं ॥ देखत जीवलहै पदापन ज्यों परमातमकी पर शही। मंगलकीउपमा जोअनूपम वैठिचुहिरहौं घरमाही५०२ छन्द ॥ पहिला चक्र गुदाकेऊपर द्वितिय शिश्नके श्रागैहै । नाभि स्थल तीजा चौथाहिय पंचम कंठसभागैहे ॥ठम त्रिकुटीधाम अनाहद ध्वनि जाँसुनि सुखजागैहै। मगल भंगहीत नहिंकतहूं ' यकरतदर्श विधिलागैहे ५०३यर्वनि सुनतपरम पदपावै नि- नातम अनुरागैहै । पुनि त्यहिनाहिं अविद्याव्या विधवा ल- हत सुहागैहै । एकभाव चहुखानि बिलोकै चीन्हत हम न कागै है। मगले चिदानन्दे महि बिचरै नाहिंदाता नहिं मागैहै ५०१ जेहिध्वनि सुनी अनाहदनाही हृदय कमलमेंडोलेहै । विविध भाति दुखमुख समृतमे खोवत आयुअोलेहै । मायामोह मसै • पनवाको दुविधगिरा ऐतिबोलैहै । मगल जौलगि श्रापुन जा- मत तौलगि नरपशुतोलैहै ५०५ ॥ दंडक ॥ अमित ,विधानति श्यागम बख़ानदेखि बुधिधिर होतनाही दुविधाके थानमें जा नताशीमरूप मानत विभासजाहि मोहतविमोह यापुमनबुधि प्रोनमे। तीनिदेह पंचकोष पाचप्राण भूलभाव एकापु' - १९८० सप्तथतिका। ज्ञानिनमेंन बिलोकि परैरे । तर्कनमें न अतर्कनमें शुचिपक्रनमेन अधकचरैरे। मूढ़नमें द अमूढ़न में गतिगूढ़नमें न निगूढ़ धरैरे। मंगलयत्र विचारियतत्र न ओ सबठामनमे बिहरैरे ५२०, जो मनतोहिं सिखावतज्ञान अनादि अनन्त विधान बतावै । ताकहँ तूनहिं चीन्हंत मूरुख कोटिन योजनलौं फिरिश्रावै ॥ तीरथ मूरतिमें हरिखोजत दोपदोपनमें भ्रमखावै । मंगल लोग कहैं यहिकारण मूरखहै मनसत्यंनगावै ५२१. पांचहितत्त्वनते,उपजें सबजीव चराचर देख बिचारी । वृद्धिलहसुख दुःखसहैं, बहुज्ञान विधानकरें व्यभिचारी ॥ अन्तसमय मिलि जातसवै शरतत्त्व हि में मुनिवाणि पसारी। मंगलवाण अवाण विकल्पन भूलकिप- द्वति भूतलन्यारी ५२२ यद्यपिजीव वनस्पतिहूमहँ पैमनहतिन केउरनाहीं । पक्षिपतंग चतुष्पद नागमें जीवसही बुधिमा तिन- माहीं । उत्तमकाय मनुष्य' धरातल जामधिबुद्वि मनादिलखा- हीं। मंगलताकह पायनध्यावत प्रातमहै जडता परछाहीं५२३ तत्त्वरचे गुणदेवदेव वनस्पति कीटपतंगबनाये । पक्षिसरीसृप श्री पशुखेचर आदि विनायम सर्वउपाये ॥ पैन प्रमादित भोकर- तातव बुद्धिखरूप कियौं मनुजाये । मगल तादिन ते करतार चराचर जीवनहीं निरमाये १२४ स्वेद प्रसादते स्वेदज होवत चीलडलीख जुआ जगनाने । अण्डतेअण्डज कीटरवगामि पिपी- ल सरीसृप आदिप्रमाने । भूजल भानु प्रयोग वनस्पति उद्रिज होतसदा निरमानै । योनिज मानवौ पशुसम्भव सो नरनारि प्रसग न आने ५२५ जाग्रतमे मनान; विचारत स्वप्नं समय कछु अानकरैरे। सो त्तज़िदेत हुपुतिप्रचारत आपनहूं सुधिते वि- सरैरे॥ तद्यपि ज्ञानानावत है चित क्यों भरमाय भुलाय मः रे। मंगल सूरज तापनके वध क्यों कहिये कथनी, बिगरैरे५२६ आपनि बुद्धि अदोपित्त,चाहिय ब्रह्मसबैथलभापि परे। जोढ़ ता वुधिमे नहि-तो जनुचित्रित पूतर रंगभरैरे. मूढ़ बिलोफि प्रणामकरै बुध देखिगुणी गुणकोपकर मंगल काकहिये शिषणा ? ।

।। सप्तशतिका। १८१ निज बूझत भाव न आन -धरैरै ५२७ दायक वृत्ति समर्थ्य-क- पानिधि पण्डित सज्जन वेद वत्तावे। देतसवै.अनयाम सदानर जानि न तोप स्वचित्तहि लावै ॥ नित्यनमै प्रतिठाम विमोहित पालक भूलि न जीव लजावै। गंगल ध्याऊ-सदा परमातम-जो सब ठामनमें छवियावे. ५२८ ॥ दगडक ॥ शैवी शिव ब्रह्मवादे जैनी गरिहन्तकहें बाधकहैं बुद्धत्यादिब्रह्म अवतारहै । कर्महीप्रधा- 'नभने जगवद्धमीमासा ज्ञानी न्यायीकहैं त्रिपुरको एककरतारहै। वदत्त वेदान्ती सत्यवल्ल. अजयोनि योनि सगुण उपासी गावराम सम सार है। शक्ति शुचिवादी भाप प्रणव प्रधानरूप-मंगलअसत्य नाही दुबिधा अपारहै.५२८ वेदको नानै न फितेवकी बरखाने कछुआन अनुमान धन्य मन्तनकी बानीहे सत्यन दृढ़ावें, न अ- सत्य मानला गुणियानहीं सुझावै सूधोउलट्री कहानीहै।जाहि बूझबावै ताहिमोहन सतावै आपुरंग रूपपाचे नाहिरंगति रंगानी है । मंगलप्रबोध होतचीन्है सत्यनात मातचढ़े धायज्ञान पोतपार वाट जानीहै ५३.० ॥ गोपालसन्द, ॥ यक उपदेशै लबैनाप। प्रणवमत्र यजपाको जाप ॥ योग बताकरे न सोस । मगलवुन अविवेक न होय ५३१ पण्डित्त आगमकरै विचार। ज्ञानी क्षर- र विस्तार ॥ पढ़े मोलवी सुरुचि कुरान । मगल आपु नपाचे जान ५३२ कायरवाना वीरवनाय ! समरभूमिलो किमिठहरा- य॥ त्यो पारखगडी भवदरथाय । मंगलसन्त छलोनहिं जाय५३३ अग्निविनाशै जल बहुताय । वडवानल नहिसकै बुझाय॥ मूरख कोदम्भी छलिखाय । मगलज्ञानी ठगो न जाय-५३४ ऊपरहल अतरितकाग । मेड मेड,बाणी-भानागता--माला तिलकविभूति निचोल - उदर निमित्त वचन चढोल-२५ वेदकित्ताव न जाने जाहि पाखण्डी-दरणवै ताहि ॥ अलख वताय लावावे रूप। मंगलज्ञानी मूढ़ अनुप५३६-बाणी तस्बिलतमाय । कोटिमुरा।' अण कुरान कथाय जाहसो न का इतिहासा मिथ्या मायारुम (गिलास १३७ कामातरं पावककोवाल, पवननीर करिसकेन . । १८२ सप्तशतिका। नाता त्यों शरीरबिच जीवप्रवीण। कालगहे कछुपरै न क्षीण ३८ वेद उपनिषद आगमजान । श्रवणकियो केवहू नहितानापढाएक द्वैभापा ग्रन्थें । मंगलवादी विचरत पन्थं ५३६ ब्रह्म लखावमाह मलीन । शुद्ध संत्तोगुणगहे गलीन । निजविस्तार भेदनहिंपा। उपजत मरत स्वभाव अभाव५० त्यागीभयो न त्यागे दम्भी - रचि पचि मूढ़ वालुकृत थम्भ। गेहिनमें नितहोतय होत । प- वन उडावत बालूभीत ५४१ गुदंडी अलफी जटा लॅगाट निग्न अभपण तरुवर पोट ॥ आयुबिताई तेनु दुखपाव । मंगलहाथ कळून हिंाव ५४२जेते गुणगण ज्ञानविलाशं । जिवांग्रहितूकरते प्रकाश । सोकित्त धरेर तनुमाहि । जोसमुझावै वूझौंताहि५४३ 'ब्रह्मज्ञानी जोजंगआहि । बन्धन मुक्ति न व्यापत वाहि ॥ जीने- द्वारण वाले वैन । वैर प्रीति दुविधा मनहैन ५४४ निर्वाणीनि- र्गुण कृतवाद । जीभ चबायें लगत न स्वोद ॥जापुरुपोत्तमध्या- वतसत्या मंगलमेटत जन्मधिपत्ये५४५इष्टदेवफल देतेसमोट । "फले अाशा बन्धन चहुँकोद ॥ निष्फले वृक्षन सेवतकोई । सेवते जैन निराशा होइ ५४६ जादिन गुरु न शिष्यव्यवहार। क्रिया कर्म जवनहिं कर्तार ॥ तवधौ द्वैतकिब्रह्मअकेला शून्यकिधीयह अद्भुतखेल ५४७ निराकार कोउभणे अकार। सबठाकोउ बैकुंट बिहाराशिवनारायणज्ञान विचार । मंगलहोतनहीं निरधार ४९ प्रथमैं ब्रह्मकि मायाहोय । बुधजन हमैं बतावै सोय ॥ जोपैवं ब्रह्मादि । मायाविषय रूपिणीवादि ५ तोविज्ञान कह दरगाय । समुंझत दुविधाकथी न जाय।मायानश्वर बर्दैप्रवीन चेतन पुरुष अलिस अधीन५५०मायानाशि पुरुप मिलिजाय चौदहभुवन विभूतिनणाय । कौनवखाने जानताहि। मंगलयं मंन मतान आहि ५५१ मारग एकचले संसार । नहि द्विती 'कारणविस्ताराविहैपन्य मुनि धारणकीन । चीन्हो पातम पर प्रवीन५५२कथै विपर्यय वाणीएक मूरखं क्योंकरिसके बि के एफअनाहते बचनप्रकाश । मगलंबाणी बुद्धिविलाश' 1 सप्तशतिका १८३ क्षुधापिपास विवर्शदिनरैन । प्रतिथल फिरतप्रचारतवैन। प्राप- निमति थिरता गतिहीन । मंगल परमहंसपदलीन ५५४ जोन पुरुष पदजानाप । वृक्षाप्रणव अजपाकोजाप। अविवेकी सबके, घरखाय । श्वपचहै तेहिते अधिकाय ५५५ यत्र तत्रकरि वृथा वखान प्रतिकूलित बाणीनिर्वान ॥आपुबिपय रसभोग प्रयुक्त,। मंगलसोजगजीवन मुक्त५५६पयघृत मिलित भोज्य मिष्टान । पावै सदाप्रमाणे ज्ञान॥ व्यापैकाम वैत किनहोय । निजकर रेत गिरावत कोय ५५७करै वडाई अापनि श्राप । प्रतिथल मिथ्या वचनप्रलापा जोसुगन्धितो आपुवसाय । गन्धीमुख चीन्होनहि जाय ५५८ ॥सवैयाः॥ यातनवृक्ष सबैपरमातम जीव.खगामि सदा सुखदाई।भोगबिलास किंधौंफल रूपक जीवगहै मनबुद्धि स्वभाई ॥तावश जीवनमुक्ति लहै भवभूतल यों त्रु तिवाणि सुः "नाई । मगल है परमातमशुद्ध भपैफल नाहिन जन्मताई ५५८ जोमतिदेखिय दृष्टिपतारि कै तामह पाखड देत दिखाईर शुद्ध सतोगुण कोउगहेनहिं अापनि आपनि चाहबडाई ॥ एकद्वितीय को तुच्छवतावत कोबडोट कहै भ्रमताई । मगल ठीकन आ- वतं चित्तहि ब्रह्मसनातन देतलखाई ५६० वेदवदै-सबकेशिरपै पुरुषोत्तमहै अबिनाश अकेला । वाथल दीनमता नरनारिन पं. डित, प्रालिम औ गुरुचेला ॥ जानत.वाकहँ दूसरनाहिन है अनु- मान महान अपेला । मंगलबुद्धि भसैनहि मूरति होतप्रकाशन भानुनवेला ५६१ ॥ छन्द । जिनप्रकाश परवाहीदेखी तिनकी मति घौरानीहै । कोटिज्ञान पण्डित समुझावै कौनसुनै विपवा- नीहै।।। गृहबाहिर अलमस्तविराजै अानंदमय विज्ञानीहै । मगर लकहा बुझाव औरहि अद्भुतकथा कहानीहै ५६२ ॥ सवैया । नामनही फिरिकाकहि गाइयं धामनहीं फित्तबास कहौरे । देह नहीं केहि ध्यानबखानिय दैतनहींजप एकलहौरे । चेष्टितनाहिं : जोनेह बताइय बस्तुनहीं करकाहि गहोरे । मंगल अद्भुतवाद बडो इतही मनवैठि चुपाडरहोरे ५६३ तूमन जौनकहीसोकरी- ।

T . १८४ सप्तशतिका। हमयोजन केतिकधाय,चलेहैं । गासन वेकिताब लियतती स्थमूरतिपूजि भलेहैं। छदकवित्त रचे नवभांति विपयरसभोगसु मत्रश्लेहैं । मंगल बूझभये तजिपावड जानिवृथा निजहाथ मले हैं ५६४ मुक्तिकहूनहि बन्धनहै मनतू अबही भ्रमे पद्धतिधारे । बंधनमोक्ष कहावत नामहि नरकरवर्ग वृथाहि विचारे ।। जीवन मुक्त स्वरूपतुहीं लखुज्ञानके अक्षसुदृष्टि परतारे । मंगल बूझ भये दुविधागतहै असूनाहि दुचौभ्रमटार ५६५ क्यों निरदोपरमै भव पीथिन पापकुंदृष्टि दुराशवसेरा । कोटिव्यकार बिधातनव्यापते मानतहै नहिंकामे कोचेरा । जाहिबुझाइयाज्ञानसुमारग सोतुनि जीनत दुःखघनेरा। मगलातम कौन विचारत दंभ विवाद किये भटेभेरा ५६६ मोह बिलास विषय परिहास समोदित तूमन चित्तपधारे। आवइतै खलखांड खरीदनखारिखरीदताज्ञान बि- सारे,॥ संतस्वभावान भाषतहैउर दुष्टक्रिया हितसो कृत न्यारे। मंगलऊपर-छांपलिये स्त्रकमुक्तिन होइथा उपचारे ५६७ कौन गृहस्थाजो इंदिनकेवश कौन प्रवीण जोबूझंत वानी। कौन गुरु नो बुझावंत आतंमा शिष्य कोहै. जो स्वभाव अमानी ।। ब्राह्मण कौन जो हैसमधी पुनिकौन महत. स्वातनधानी । मंगल सत को है जोयमाने नहीं दुबिधाज्यहिकी मतिभानी ५६८/जेतिक लोगहैं मन भूतल ज्ञानविना नहिं देखि परे । जासन मूढ़ कहौ सोलडै उठिसाधुकहे हित सो बिचरैरे । ॥ त्यागत है नहि मानकिपद्धति ज्ञानिनको सँगकौन करे। मंगलतूबड मूरखया जगमाने कुमारग पांवधरैरे ५.६मानगहे भववी थिन भ्रामिक आनहियो मुखान कहै। वेद कितावन अक्षरजानत आतमभावे हि धाय गहरे । पालतकेवश होल्परिश्रमनाहिंन भिक्षुकभाव लहरे । मंगलशिष्य कियेषनके हितदंभ यस्यो नहिं सत्य है ५७. शीतलत स्वभाव संदानहिं क्रोधकिपावक चिनप्रजा, भोगविषय फिन आशहृदयनहिं कामवतात शरीर प्रचारै वैर' विमोहन व्यापत जीवहि बुद्धि मनोहर धामि उचारैन:मंगल - . " - । 1 . सप्तशतिका। १८५ होलततो विमण्डित खंगिडत दंभविवाद प्रकारे ५७१ बाद विपनहि भारत नितज्ञाने विवेककथै शुचिधानी । मौन्य रहे सतध्यान हृदयहरि शुद्ध संतोगुणधी निरवानी ॥ हंस दया जड़ चैतन देविधिपण्डित बालक चालिनजानी । मगल बातम ध्यान सदारति दूसरिवुद्धि न चितसमानी५७२सोहतनित्य स्वासन तोपित शुद्धसमाधिोलियेपटभांती । जो विचरे भवती मुदसंयुत बूझत सुंदरजाति कुजोती ॥ तीनि निभान वसैगृह काहु के वेद कि सीख सिखावत जाती। मंगल है तन एकगहे नहि निन्दक और प्रशंसक खाती-५७३ जायमिलै-सत्तसगति संतनायगहें जनसाधु विचारी। आपनको सवते लघुजानत थानन को शुचि मानविहारी मातत्रिया गणतात सबै नर ऐसहु एक गुणीन धनारी । मंगलसंत महीतलहैं यतकोनु कथै महिमा वडि भान री ५७१ संतनको नितमोर प्रमाण है संतनको नित नौमि सने- हा संतनको जनसंतेतही मनसंतत के पदमो उरहा ॥.संतन की महिमा-चितभावतःसंतनके हित श्रापनिदेहा। मगलदम्मिन ले गुरुरिहिराखियोहिनहैप्रणएहा ५७५ कारणबह्म पदभव को-उपने तेहितेपुनि ताहिसमावैकोउभणलिंगकारण काल है प्रापुरचै पुनिपालि मिटावे ॥होत स्वतंत्र घेदेयक कोविद पन्त स्वछन्दन मनाचे मंगलभूल मिटायसकै नहिं कोटि पुरान कुराना सुनावे १७६ एककहै जगकारण कर्महि एकजु पाचहि तस्ववतावा करतार सहीयक भापत पैनवतावनहार गुणावै।। गचितपक कियो प्रकृती जगत समेटि स्वथंग मिलावे। मंगल भूलमिटायसकै नहिं कोटिपुरीन कुंराम सुनावै ५७७ कंचनगर्भ तेहै पनी संबधी परिणमतही मिलिजावोयोग सवैकर एक कहें भक्कारण मिश्रितवस्तु ढ़ावै॥धापनिवाणि भली सवहीं यदिगुंग हैं तदिदंडन पाच मंगलभूले मिटायसकै नहि कोटि, पुरान कुरोत सुनावे पूजुट योगियती तपसी बुधमौनि उदाक्तिः, ' कबीश्वरज्ञानप्रवीनो देवच मुनीवाभूरुख भूपति रफधना -- -- सप्ततिका। प्रलहीनो ॥ संतगृहस्थ अधार्मिक धार्मिक, सातमज्ञानि, समा हिमोनो। मंगलाकोउ रहा. न महीतल कालंबलीसवको तर शीनो:५७ विष्णुभ चहुध्यावशिवै चहुशक्ति सनातन.बह घिधारी। जैन धनै चहुबौद्ध गुणे अपपंथावलै-किल पंथ बिहारैः। न्याय-पढेचहु सारुमगढ़े चहुदीन मुहम्मद को चितधारै मग़ल फोड प्वन महीतल कालवली सबको भनिहारीमदमातन भणि स्वः या स्वरुप वितानंद-मगल राशिफहावा ताकर दूत बोमनमोहन मानिसुझोजन रूपलखाचा इटि सुमात्र नित्य विचारिय पायक, इंद्रिय कर्णगुणावै मगलजो अरसा जानि भई निज शाम तोपरमानद पावै ५०१ शापनामावन जानतने फहुकर्म ग्यपारपसारकरैरे। हैतिनको फलबंधनामोर,न जन्म अनेकन: धार धरैरे ॥ मोकृतकीटा कुशलि स्वमविर आप हिामूरुख पदिपरैरे । मंगलकर्म अकामकर, जगधर्मवढे तबाजीव तरैरे-दृष्टिविहून शरीरकुटैन हि वाणिबिनाल कलेवर नाग। हीनित्त प्राणततनयो कर्णेन्द्रियहीन नकाय निनामहस्तपदा विनिहायर है वपुःनेकनही जो मलीन प्रकाय मगल मागवले तन नाचत साहिते प्राण स्वतान्त्रित भाय५८३-जोयासुपंप्ति वसै जायनाप-तौ सब इन्द्रितंकी गतिानाश ज्ञानकि कर्मकि जेदश भांति जाननहीं वन कोटि कुत्राशबुद्धि मनाविन भातिपरे फित जायकियोटढाचित तिवा, मंगल चेतत प्राण जगत याहितेमाणखतंत्रित भागे प्राधिष्णु विरचि-सहेशे पण 'दिनेश निशेशणेश सुरेशी रामसश्याम छहस्पति शुक्रपराम: स्मास हली मिथिलेश देतयष्टिीसुधी प्रहलाद महामुनि आनहुशुचिभेया मिगल तो गृहस्थ सवाम भसिजमातम भाव सुदेशा ५८५ कौनुगृहस्थाद्विगंवरकोलीप श्रासमध्यानर- है। चिताएका विधन मोपकि चाहने जीवहि आनंदमूरति शुद्धवि- वायधिलावायल भाव द्वितीयानःशुद्धसतोगुण पूरगाटेका, मंगल-जीवनमुक्त वह मान लिन तट मादायतका ५ मुक्ति - . सप्तगतिका । १८७ कोदानि वह परमातम बंधनदानि वहै. करताराः जन्मकोटानि. अजन्मको दानिश्प्रधोरधदानि नानबिचारा, आपनि भूलमि- दायनजैकरुणाकर नानो सांझ सवारा मंगल जीवनमुक्त यह शुविज्ञान अभेद गहे श्रुतिद्वारा ५८७तू परमातम सत्यसदा परिपूरण और त्रिलोक नसारा तूसतता सतिभासत नश्वरबि, कृत सर्व तुहै अधिकार कारण कारज.एकन होवत यद्यपिवेद घदेयकेतारामंगल धन्य है परमानदानाकृतः अद्भुत लोक, पसारा पंजीयत भवकाजकरौनिजः शक्तिसवै तनइन्द्रिय; पेरी, स्वप्न बिलोकत हैमनद्वारनलितरह समठामबहेरी जाय सुपुप्तिमें साखिरहै जब इंद्रियसर्व अचेतन हेरी। मंगलतोतन आतमालानिय नाकहँ वेदवदै,हरिटेरी हालेतिकच्याधिषि- पयरस होवत्त सोनहिं ताहिलगै मंचमाही। संसृतकेदुरय, यौसुरत पंधन कोटिनिधान सतावत नाहीं ॥ मिश्रित इदिनके सँग दे- खिया पैनहिं लिप्त अलिप्त सदाहीं। मंगल सोतन यातमभाषिय बूझतजाहि सबै भ्रमजाही २० जानत तीनिहुँलोक विभूतिहि अपिनथान रहैन घलैजूदा चित्त अदकृत थीमन का भरनीवत है विषयी कुयलैजू काहुसमय शुसज्ञान स्तिपायता सार 'पासार फलै सकलैजू मंगल सोतन बातम जानिय जौनंगहै अफलैं सालैजू ५१ सूक्षम है मृत्तिकागतिते जल नीरतेसूक्षम पाय- फगाइयः अग्निते सूक्षमवायु बिलोकिय मारुततेनभा सूक्षमता इयव्योमते सूक्षमाशदसदा पुनिशब्दते सोबहकालिखाइ, पामग्रल मूक्षमहै अहंकारते तोकिमि बुद्धिप्रत्यक्ष वताइयर देश विदेश दिया विदिशा अंध ऊग्ध में भरिपूरि निहारियः॥ है सबमें जैविचारत पडित मूरुखको दुविधा चित, धारिया पैनमि- लै बलकाहु यथानकोटिपार्यनसो निरधारिय ॥ मंगलस्यों • करिंगाईसकै.तिनेतिबर्दै यहिहेतु विचारिय ५८३जाहिदिलों- 'किय याभवत्यहिके सुखवाह उरस्थलं व्यायाजाको सुख, मोग विषयकर जाहिल अधजात सदापै ॥ लानत गहन शूरत - 7 - - १८८ सप्सथतिका।. मंढ फिरै मतिहीन न पाठ न जापै मंगल संत सदानंद मैडित धान्नहीं सुखमूरति थापे ।१६४ केतिक मारगमें भरभ्यो मन बोधभयो ने विना गुरुपाये । आपनि अपिनिबाट चलावत दूसर पथ निहारि लजाये ॥ क्यों फिरिश्रवित तोप हिये जित दंभ तहान विवेक सुहाये । मगल: मिश्रितकोगति बूझत मूलमिट हेरिके गुण गाये । नोमान श्रौत्तनमें महि लागत सो उपढ़े- शत पत्तिमोही। आपनभूमि अनेक भ्रम्यानमादूरिमयो नरहो मतेंद्रोही । क्योहम मानत लानताजाहिंना चेतनको जहरूप वटीही। मंगल जानेविना अँचिश्चातम बोध न होत कान कधीही-५८६॥छ । माया लगत अपारदेखियंत नो सत्रको भगमातीहै ।फाइ सुथले सुचित नहिं हरो दुविधा ज्ञाननग्न- तोहै ।। रमतसंगतिते न्यारे डालें विषयक बानि सुहातीहै । मंग- ल जान ठगिनि ठग नाहिन अपना बदनाचरातीहै सेवा करै यर्थकोपवि श्रद्धाधर्म घढ़ावैज्रतिफल सकले कामनापूजे भक्ति मोक्ष दरशावैजू । चारोक्रिया ज्ञानगत बुधजनोंभा"सुथ- लनपावजूद ज्यों मंगल सुन्दरी नाधिनु सदा निरादर भावजू Kष्ट ज्ञानी जिज्ञासू अर्धार्थी धारर्तनाम कहाचैर्जूनसुजनचारि ये प्रभुपद सेवक निधावेद भरमावैजना ज्ञान कर्मी उपासना जितलित जेहितेहिभाजूं। संगलयातमज्ञान विवर्जित निजपद कोक्यों पावै अति विशिष्ट अति द्वैतवदि पुनि अद्वैत लेषावजू। मुक्त मुमुक्षु विपयरत विधि धोता सुनि हावजू.॥ तीनोंकी यकभाव बिलोकनि सौ जेहिफेमन यावेजामंगलंजीव न मुक्त भवस्थल सोईस्वलमिधावजूदा कामयोगा औपनि भूल मिटायोसकैनहि औरंनकी कस बुद्धि सुधारेशापुहिरव सूमन टेखिय रैनि दिवाकर कोनु निहारे मानहि त्यागिमिटा- यवहपद क्यों निजीतम कोन विचारें । मैगल यावलोगभ्रमे बिनु ज्ञाननाथी हैरिधाम बिहारै ६०१ श्रानिबूझ भली मने भायत पानकिन गुणे सउपाधी । ज्ञान कथे न सुनै द्वितियेकि :१ - म - सप्तशतिकात रहे विपरीत कुमाधन साधी । वाणिमहे निर्वाण कि मारमा पाइ चलै जो पैतालकि काधी। मगल, सानु कहावत एकहै, अपिनि औरजहाँनकि धो६०२ में सतमारगमें विचरों सब मेरेचने सतमारगधाई अभिमान भरो,जनि तोरहुजात कुवावलंखे बहाघाई । मै अरु मोरु जोते मिरुतोर गुरणे -तिरूप-सौहे नम ताईमिंगल याहिनिवारता जो-जन जीवनमुक्तासीरभूतल भाई गोकर्म बिनाशिनि कानमः ओमरुतमालच की दुचितामाह्मणाचत्याना उत्तम धाकर जीवन: वृत्यु खमी वि पाईदेवाप्रदेव-शुशीनगुणी पुनि शौच गोचकिभूल मिटाईमिंगल एफहिंभाव बिलोकत जीवनमुक्त महीतला भाई १४ उत्तमज्ञानगहें प्रभुसेवत घंचिकतानि लगावल बेहो आता 'ममें लवलीन संदांतपासाधन चोर कुकर्म :नवेदो लाहुबैर सनेहनापंधित दमिफहै तिनको टा डेढो । मंगल सानु कहावत हैयेह नाचिनिश्रीवतांगन टेट्रोएंकबिमूद कहैं हमापड़ित धर्म निरेखाको दर चित्र एक अपार वरखानत कालहि उत्पत्ति इस्थितिमाग स्वभावैः। दोउनमें नसुजान-विलोकियजोनिधी, रिसुवस्तु बतावे मगल सत्य संदा परमातम्जोसबठासनष्ट्रि हिाविद जानित्परैन विना गुरु अद्भुत टेखि सुनीलकानी निने पारखी। क्योढ़ता:मनिमोनिस दुविधा बहुलोगनमा न भाखी सारगति जिभूल: प्रप्तारहिानाकर है निगमागमासान खोमिंगल शु सतोगुण धावत्ता बुद्धिार परमानंद वारसी सिंघुकहेते अगाध लगारु,बिंदु बर्दे प्रतिही लघुताई शासिंधुन बिंदु-अहैजलसमप्रभावोउनमें इमिवाणि सुतायता हिनिचाहिए सुजीनाहचुमि शिवर जीव दुभाव मिटाईमगलको लसुदीप बूझत-पातकीमान बिलोकि लजाश सिंधुरन्यो पतिथूल फलेवर जैव लानत ही लघुग्नेही; तुच्छ पिपील गहेमुख अन्नति बूझंतही सत्रतेबढ़ि केहीयो गजहेरिपिपील भई बडो करि सौलघुते लघु तेही मगले जीव दुवोयक भावहि वैतलगोमुभि + । + । सप्तगतिको चोपुन एही दमाविष्णुपदगा प्रभुगति कहते नाहिरिनी की कहिये तो हदय नहिं' सॉस ज्ञानी मूढीग मधअरु कीड मैनाहिंन ऐसी बेदे मनै छाबवत कहेलगत चैतनताबैतनजह सना रूप बखान प्ररूपहुँः अवित विधारही मनै कहिम अर्की पुनि की चौदह पुर अपर पालकालिखौं सहारक सोई क्यों यकतान्नठिनैश्यह निरधार करनहितासंती मुनि जनयके धनै भंगहाकिमोघली बता माया तोरि तिनै १० बहुमन धूशभरे प्रयोगाताजांबिंगता वियोमाया को स्वयेश भान लागे जी जाय कित्तई विषयान दिगतीने को अनुरागै दुष्टनकै सँग बसेरेनिदिन पैन दुष्टता पागोमवाली निन' अतिम नितम्यावची है हंस नाका- ६ जनमनशुद्ध सतोगुण याचा जोत्रम रहै वहीं मायाको'नीवईश बिविरूपात सोअब एक भाचसी देखत सकल एकही काया कृत्रिगुणनासः विधि हरिहर भारत सर्गस्थिति लय कर्माता सोधिभौतिनहि एफेब्रह्मांतीनि नामलों गापार स्वर्ग नर्के अपवर्ग बासकीय सेबैज बांधा । बूझतंजीक शुद्धचित्त बातम कौनु त्रिभोगति धोया यागम बदाउपनिपद देखो क्याकहि जीवहिलावै । मंगलाघौभयो।गुरुपाये ममत दुरिबहायाद१२मधया। केतिक ज्ञात सिवाय धकै भणि कैतिक न्याय गुणी सिमुझावै। केतिकवस्तु प्रत्यक्षातथि पदार) ज्ञान किसिद्धि लखाचीकेति' कंतीरयको चलिजाय न्हवा के मुक्ति सुपंछ यतावोमंगलध्याय बिनगिनिजात्रातमाकोटिकमन, हाधनाभावै पाए ३त्यामवर्क सेक्काम तजे प्रियवधु मुतातिनारिवानग्न रहै तजिलाज सबैजित भौनना हाथलमै तित खावे बानित्य विवेकी अचारलिये रहै व्रत निज जीव दुखविमंगल ध्यायेविनानिजबातम कौटिकरै मनहाँधन बाध-जाय सुपंधमामुण्ड मुंडायन- माय दोदिशि वायुयलासी बोधकि जिनकि पौर्व कि न्यायाफि सायिक चित्रण विचारकं जातो मुक्तिपदा यारखोजिम जतरै ' " सप्तमतिका १६१ ची भवढारि फरसोप्तो मंगलाआतमबोधबिनाः वध करके मोमेंनिवसोप्तोर५-धोधनजानतानियायकथाभिरुजैननमान- तनकि नानी-सारख्यफगादिलो अपनेमत दूसरमें नहियु- दिसमानी जोहठवादि किपरतिगावत सोन महामुनिइत्ता मज्ञानी मागलसार गहै सबकोतिब बूझत धातमकी गतिमानी अन् पाएकरसूल बचारि मिल्लत चारिफिताब क मताचारी आपसमेवाबांदु फयिका दूसरों बनि काफिराभारीमानकि प्रोपि, घसै दिलमें निज प्रोफन पार्क हसीमाति धारी। मंगलापर बुपासहीकृतवाडा इतैजुप्रवीण अतारी दूसरको परिन मातम तिजि पावकतेज स्वरूपत्रिलोकागजासु.प्रताप तनभ मधिनीया भाज्यहि यग विलोकातेजप्रकागजहालगुहेसबु बेवजात वदैको अशोकाा मंगल भूलयलेनसुनैहय पवगहेजड़ प्रयोगशिकोकापव्योमहि ब्रह्मविचारते कौन अपार मसिद्धिादिखाई। चौदहलोको हरीहरिजूनिभानु सुरासुर बामालखाई दृष्टिनाव धनाविष्लतभनीहायरूप जन्म ५ ग्रॅनाई। मंगलाबी द्वितीयन वूझतकिमरिकफलाकीटफिनाई, कोडाप्रभजनकी गतिहेरि भुलायमय हिकी भरपाई । आनहिश्वर जानत नाहिन वेवर मॉनमी त्यागिनिजाई। भारताशावत कह दिनडित जित पूजत मा चाईनिमगलं फौठाधुझायनकै विपागोर बु? अहिदूघा पिलाई पर संभव सो वरावरको 'जलयोगबिनानिहिँ दृष्टिहि लावैधनीर अपार अखड़ मंडित शिव स्वतंत्र तुजीव हावै । पूजतहै जलराणि सामोदित मना सत्यनही लविंपाचा मोल् श्वासप्रथास्थि चचोरतादागिदिस त्यहियामिन या पशुसेवतभातुःविचारि । स्वतंत्रिताधान नित साझा प्रभाताची ब्रह्माद्वितीयान मानते कोदिहशीन वरतानि बुझाइयोधाताजानत तीनिहुलोकप्रकार शिता, रवितेतहिं पान बिभातामंगलसूराप्रकायिती जोप्रभु ताहिन यूझताक्यो भ्रमनाता मासातीवन दैधिक पासवमंगल - "

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- J सप्तमतिका। मिटाइम ६३७ को करतार. जो सृष्टिनहीं अरु को भरतार-नो दासंभावा । ठाकुरकौनु प्रजाबिनु भापत उज्ज्वल कौनु अनु ज्ज्वल धावा ॥ कोधनवान जो रंकनहीं अरु- सौख्य-कितजोपै दुःख नत्राचा । मंगल चित्त विचारु अरेमन ईथति बिन जीव, कहावा ६३८॥ कवितामानकोन त्यागै मन दीनताको, दूरिंगन प्रीतिन प्रतीतिसन संत रूपधारेहै, ।, लोभकोनिवास तनाहिये नाही ज्ञान बनखोजै प्रतिद्वार धन कंतको बिसारे तोप नाहीं एकक्षण बेद त्रौ पुराणभण बाधै भान नारिजन दतक व दारेहै,। मंगल,प्रवीणवन आननको तुच्छगन कूरपौं बिनोदैरण प्रस्त्रदूरि डारेहै ६३८ब्रह्मको पखानै जाहि बेदहून,जानै पानिदै निवाने माह माया चित्तबासीहै ।ज्ञान गीत गानै श्री प्रमाणे कोटि पाने, झूठीवात अनुमान-दैत काया बिलासीहै। ऊंच-नीच जानै हरिदासने पिछाने, जोन क्षारदेह सानै छोह छायाधौं, विनासीहै। मंगल नठाने एकभावन समाने और दुःख सुखमानै ताते कैसो धौं उदासीहै,४०जहादेखो तहां एकरूपको बिलासहोत भांति भांति भापत प्रमाणज्ञान सानी है। बिबिध किताब-ग्रंथ एकभाव सत्यकहै इतनाही शून्यबादै बोधजैन बानीहै ।। पंचनकीवात किप्रमाण भूमि स्वर्गलोक एकनर बात तात कौने सत्यमानीहै। मंगलको भासान्य,एककोन भाव दास बड़ोभ्रम-भासै,जाकीका थान,कहानी है ६४१जाको बुद्धिगावेत्ताको बानिन बतावैजाहि वाणि समुझावै सोनवुद्धिहूं प्रमानैहै । काननको काम कहांगाखि करपावै अरु नैननको काज कवै अवण बखानहै।जाको जौनका जतौन करत स्वभाव नित्य दूसर ने जाने व्यवसावे झूठ ठानहै। मंगले सुजान सत-जांचि देखें कोटिभांति शून्यको प्रभाव इहां एकही पधानहै.६४२ एकतन सकल समाज भूमि देखियतना- फहमें एकरूप तारागण भासैहै । देवगुरु दैत्यं गुरु होतन खगे- पार-कीट श्री पतंग एक कायामें निवासैहै।एकभूमि नीस्वायु पावक सव्योम हेरु दितियन होतयदि मिलित बिलासैहै । मंग सांगतिका। ल सुजान संग जांचिदेखें धार वार शन्यको अभाव इहां एकही प्रकासह ६४३देह विन जीयको निवास कौन भापिसके जीव होन कायाकौन चलत उपायहै । आतप बिहायन प्रकाश भानु भाषियत भानुहीन पातप न त्रिपुर लखायहै। पितुविनुसूनुन प्रमाण तन सूनुविनु पितुहूं कहावै ऐतो दुविधाको भायहै। मंग ल सुजान सतजांचि देखे बारबार तैसे ब्रह्ममाया एक तमेंदृढ़ा यह ६.२४॥ सवैयाक्विनमें मनसर्ब समर्थ जोदेवयजै सोलह मनचीती। दुष्टनमें जडता अति देखिय जेनभ6 सुरमोह प्रती ती। दानि अभिप्रिय देवफली बिनु पासगये फहँद्रव्य चहीती। मंगलकाम फलानि लिये नित ध्यावत देव विपर्य मति जीती ६४५'दीपसुगधि लिये जलगंग'सप्रेम स्वदेवनको मनमोपिाय मनोरथ होत समोदित कोटिकज्ञान सुनैन बिनोदें। ज्योरसनी रत एकन होवत त्यों इतकाम काम प्रमोदें। मंगल एक गहे सुख होवतं दोउनमें किमि जाय दुको ६४६मुक्तिदई प्रभुको- टिनको बिनु युति छर्दै कबि कोबिद ज्ञानी । स्वर्ग निवासपा एनको तुमदीन्ह कृपालु खयोजन जानी ।केतिक गोपुरमें बिल सेवहु सत्य सुलोक घसे घरमानी । मंगल कोनहिं नर्क बिहाय घसायलको फरशारंगपानी ६४७ पुण्य प्रभाव तेरे कितने नर केतिक मोक्षभये बतधारी पूजन पाठनों अघमेटि: भयेपहुंधा जनस्वर्ग बिहारी योग-वियोग लियभव केतिक जायसमीप धूसे सुखकारी। मंगलकेशिर पातक गाठोर क्योंतुम तारितको गिरिधारी १४८ जाकर पूरब पुण्य प्रकाश कृपाकर ताकहतारि दयाहयाजेहि कर्मकिये भव उत्तम तोफल उन अवासलयो है।। पूरव पुम्य नंजीवतके कृत जन्म कुमारंग में वितया है । । मगल' कोफत तारिसकोप्रभु याभ्रम में जियोच भयो? ६१८ कौन दुराव अहै तुमसों प्रभु जानतही मनकी संघ मेरी । पाठ । यामन भावत हैजग पाप बिहाय विषयमति घेरो ज्ञान विराग विवेक नभावत कामकथा किंउशह घनेरी ।मंगल कोनगलीजग .

। । 1 । . 7 1 १६६ लप्तशतिका। मोपकि: पानिपरो शरणागत तेरी १५० कर्मकियो जगतर्कनिवा सके क्यों अब होउ सुधामवलेरी । निंदक पंथ गही निशिबास र त्यागि-सुबाट जो मुक्तिकि ढेरी;॥जीच प्रसंग: नसाधु समाज विवाद किये बहु ज्ञान निवेरी। मंगल कोनि, गली जग मोपकि आनिपरो धारणागतातेरी पर जात,जितै तित मोह, पयोनिधि काम समीर कुतीचि करेरी । मुक्ति उडो भरमैन रहेधिरावत, ज्ञानयकों बुधि प्रेरी कर्म विवाद, उड़े प्रतवार सहाय नकोड कहीं जेहिटेरी मंगल कोनगली जग, मोपकि यानिपरो धारणा- गत तेरी-६५२ शुद्ध:स्वभाव नहोत, त्वधी इत्त कर्म उपायनसों चितहेरी जो समुझावतःसोनगुणै मन बान किमान अवहुते- री,सत्य, असत्य गुणानिकर चुपःौकतहूं वरणे खलाटेरी।सग ल कोनगली जंगमोपकि आतिपरोशरणागतातेरी ६.५३ जोजत जानि याकरिकै करशीश,धरौ पकरौ भुजमेरी ॥ तौ, अमहीन तजी भवसागर जाय नगाय-अधोरध,फेरी । नातरू योहि भो - भव बीधिन संतृत, में, दुखसो भटभेरी॥ मंगल को न गली जग मोष किल्यानि, परो शरणागत तेरी५४कोउतरेकरि तीरथसेवा नकोउत्तरे जत साधन-साधी कोउत्तर करिनेम प्रचारनि कोड तरै मनकीहत व्याधी ॥ कोउतरै पढ़िा,वेदपुराणनि कोउत्तरप्रभुः नाम अराधी मंगल कैसेतरीकरुणाकर,कीन्ह सुकर्म नहीं क्षण आधी ६.५५ ज्ञानगुणे तरिगे कितनेकरि योग समाधि तरेकितने हैं । तापसरूप बनायतरे बहु-गायत्तरे बढ़नाम सने हैं।पाठकिये बहु मोचिगने करिजाप अनेक स्वमुक्त भने हैं। मंगल कैसे भुचै करुणाकर-एकहुभांति-त;कर्म बने हैं। समाजहि सेईमुचे बहु पूजतमूरति मुक्त भयेहैं। मंत्र गुणेभमरूप हयेहैं, शिवै चितये ६.५७ बंधनको विचारि-वि + ।

- . सप्तशतिका। १८७ एकन मूरति तीरथ मानत व्यापक जानि, भलीगति पावै। मंग- ल कैसे तरैःकरुणाकर एकहुभांतिन जीवदावै ६५८ पण्डितके घल बुद्धि प्रसिद्ध कोहे कविकोबल वाणि सुहावनि । गौरवको गुरुकेवल देखिय शिष्य सुमंत्र लियेदृढ़भावनि ॥ ज्ञानवली धनवानेबली पलवान बली पदउच्च प्रभावनि ।मगल कौनुभरी सकरै प्रभुदेहु चताय ,परीमन तावनि ६५९ विष्णुपदासबविधि विषयक मोमन स्वामी । यत्तानेक किये याभवतल होईनाथ धनुगामी पैनःसुदृढ़ मनभयो कृपानिधि-हौतुमाअंतरयामी कादुराव तुमसन करुणाकर मोह मलिनंहीं कामी। कियेडपार कुकर्म देहधरि अजामीलको नामी. रसोअब समुझि होत मन घावर भूतकाल गति धामी ॥.क्यों निर्वाह होइगो हरिजू कूर भये संग्रामी-३ अखिल:ज्ञान विज्ञान-निरस रस बूझिधाम-पर धामी मंगल धरणगही प्रभुतेरी.तारिय द्विजवरागामी १० पान कौनकी शरण गहौंहीं ॥ देखिन परत द्वितिय दायानिधि दीनपाल पुरतीनों । निज स्वारथ रत सकल वेदषद फिरिकस सुगम लहीही १ केतिक जन्म वूशी विनु भटक्यो से वतरण थकानों। हारिमानि तुवपदरजापन्दी अब अपरेप वहाँहौ.२ नो भयरहै नरक सुरपुरको सोमनते विसरायोवधन मुक्तिदुवी करुणानिधि तुवपद तजिन चहींहो ३.दुख सुखको व्यवहारवह धरि नरक स्वर्ग:स्वइगायोमंगल प्रभुपदरजशिर लावत्त कौमुदू घरणि कहींही ६१ जानिपरी तुमही जनतारण। धवलगिरहै महाभम चितमें विविध मंध मतिलागी सोभमा मिट्यो भयो तवपद रजानेहा समोद अकारण-१:वास विपतिनाशक द्वितिय प्रभु त्यागि तुमहिाँ तिहुंलोकनि ॥ पासवकोप, जानि रक्ष्योवज गरिकीन्यो नख धारण २लक्षधाम सुतअंध विरचि तहमांडुसुत न दियवासा,पाचक प्रबल अर्द्धनिभिप्रज्वलित तुवप्रभु कीन्ह निवारणा द्रुपवसुता लज्जी गोपिनप्रण तुमःराख्यो बनवारी । मंगल धरण गही करुणाकर अब करिये. २मापन । । १६६ सप्तशतिका मोपकि श्रानिपूरो शरणागत तेरी ६५० कर्मकिये जगतर्कनिव सके क्यो अबाहोउ सुधामवसेरी। निंदक पंथ गृही र त्यागि:सुबाट जो मुक्तिकि ढेरी,॥ नीच प्रसंगा नसाधु समाज के विवाद किये पहुःज्ञानःनिवेरी) मंगल को न गली जगमोपकि आनिपरो धारणागत तेरी, ६५,जोत जितै तित मोहा। काम समीर कुचीचि करेरी । मुक्ति इंडॉ.भरमैन बधिरखेवक ज्ञानधको बुधि प्रेरी ॥ कर्म विवाद उडै पतवार, सहाय नकोड कहीं जेहिटेरी मिंगल कोनगली नगः सोपकि पानिपरो भरणा रात तेरी:६५३ शुद्ध स्वभाव नहोत. स्वधी इत्त कर्म उपायतों चितहेरी। जो समुझावत सोनगुणे मन धान कियान देवहुते- री सत्य असत्य गुणानिकर चुप औकतई बरणे खल टेरीमिंग, ल कोनगली जगमोपकि आतिपरो शरणागतातेरी ५३ लोजन नानि दयाकरिकै करशीश,धरौ पकरौ भुजमेरी ॥ तौ श्रमहीन - तजौं भवसागर जाय नशाय अधोध फेरी । नातरू योहि भूमों भव बीधिन संसत में, दुखौ.भटभेरीमा मंगल, कोन ग़ली जग मोष किमानि:परी शरणागत तेरी५४कोउत्तरकरि तीरथसेवा नकोउत्तर :बत साधन साधी, कोउत्तर करिनेम प्रचारनि कोठः । तरै मनक़ीहत व्याधी ॥ कोउत्तरै पढ़िा वेदपुराणनि कोउतरप्रभु नाम राधी /मगल कैसेतरी करुणाकर कीन्ह सुर्मनिहीं क्षण आंधी ६५५ज्ञानगुणे तरिगे कितनेकरि योग समाधि तरेकितने हैं । तापसरूप बनायतरे बहु गायतरे बहुनाम सने हैं।पाठकिये बहु मोचिगने करिजाप अनेक स्वमुक्त भनेहीं। मंगल कैसे मुचै करुणाकर-एकहुभांति-न-कर्म बने हैं ६ ५.६.संते समाजहि सेइमुने बहु पूजत मूरति मुक्त भयेहैं। मंत्रप्रभाव लही बहु मुक्ति अगढ़ गुणेभमरूप हये हैं | वामा अवाण विवेकमुचौपहुध्यान प्रखंड शिवै चितयेहैं। मग़ल कैसेतरे करुणाकरा एकहुअंगनःशुद्धभयेहैं ६५७ बंधनको यक झूठवखानि स्वछन्द प्रमाणत शुद्धकहावैः। शून्य विचारि विमोचत हैं यक अापन ग्रंथ प्रसिद्ध सुनावै ॥ 14 - प . सप्तशतिका। १६७ एकन भूरति तीरथ मानत व्यापक जानि, भलीगति पावै। मग ल कैसे तर करुणाकर एकहुभांतिन-जीव दृढ़ावैः६५८ पंण्डितके बल बुद्धि प्रसिद्ध कोहै कविकोबल वाणि सुहाच नि । गौरवको गुरुकेवल देखिय शिष्य सुमैत्र- लियेदृढ़ भावनि ॥ जानवली धनवानवली बलवान बली पदउच्च प्रभावनि ।मंगल कौनुभरी सकर प्रभुदेहु वताय परीमन तावनिन्द:५६ विष्णुपदासियविधि विपयक्कामोमन स्वामी यत्नअनेक-किये याभवतल होहुँनाथ अनुगामी पिनासुदृढ़ मनभयो कृपानिधि हौतुम अंतरयामी कादुराव तुमसन करुणाकर मोह मलिनहीं कामी। किये पार कुकर्म देहधरि अजामीलको नामी. रसोअव समुझि होत मन * घावर भूतकाल गति वामी ॥ क्यों निर्वाह होइगो हरिजू 'कूर भये संग्रामी, ३, अखिल ज्ञान विज्ञान निरस रस बूझिधाम पर धामी; मगल शरणगही प्रभुतेरी तारिथ, द्विजवरगामी ६० पान-कौनकी शरण नहींहों ना देखिन परत द्वितिय"दायानिधि दीनपाल पुरतीनों । निज स्वारथे, रत सकल वेदवद फिरि क्रस सुगम लहाँहौं।१ फेतिक जन्म बूझ, विनु भटक्यो से वतरण धकानों। हारिमानि तुवपदरजःपन्दी अब अघल्लोष वहाँही. जो भयरहे नरक सुरपुरको सोमनते घिसरायगावंधन मुक्तिडवी करुणानिधि तुत्रपट तजिन चहौंहो ३.दुख सुखकोव्यवहारदेह धरि नरक स्वर्ग:स्वइगायोमिंगल प्रभुपदरनभिर लावत कोसुद परणि कहाँहौं: जानिपरी तुमही लनतारण धवलगिरह महाभम चितमें विविध मंथ मतिलागी ॥ सोभमामिटयो यो तवपदारजानेह समोद अकारण दासाबिपतिनाशकन द्वितिय प्रभु त्यागि तुमहि तिहुँलोकनिः॥ वासघकोपा जानि रक्षयो बंज गिरिकीन्यो नख धारण २लक्षधाम सुतधाबिरचि तहमांडुसुत न दियवासा पायक प्रवल अर्द्धनिधि प्रज्वलित तुवप्रभु कीन्ह निवारणा द्रुपदसुता लजी गोपिनप्रण तुमारण्यो बनवारी । संगल पर गही करुणाकर अब फेरियन " 7 . सप्तशतिका मोह कहीं अब कासन ॥ बेदपुरान'कुरान ग्रंथबहुः गुणिहीमें त्यहि मारग विचरतः सुख भवसल होत दोसन १ जो विपरीत चलत निजेपथते तजि मर्या, यहि बिलोकि जगकरत बतकही यहजड़ धर्म बिन तित अब निंदकमत देखिय गहत सकलजन होते अतिलिदिशिचारी युग प्रभाव है तासन ३ प्रथा अचल संचलनबासचल अचल पहिचानो । मंगल ज़नि भाष्यो त्यागि नाम गरुडासन ६६३ निजमन- चुराई गुप्त प्रकट इतई मत देखिय दूनोंकी निपुं. तर यक बाहिर हेरत निजनिज बूझ बड़ाई १ सरगुणकी गणना यया अग्नि युगरूपाएकदृश्य ये. है क्योंबड छोट लवाई २ कष्टसहित यकमिलत, सु. टगुप्त मिलिजाई। सन्त सुजान ज्ञान मूरतिजे ते लाई ३अगुण सगुण तनजीव कथाहै यकविनु द्विति मंगल यहिकारण तनुधरिकै भजिय सदा यदुराई, काहिन सेवक जानी जिनहिं देखि भिव.थलत गोत्रवधकारी समरभूमि तिनको रक्षा हित पर मानी भिक्षा हारदेत कोउनीही द्विज व्याकुलयुर भरिभेटि दई संपति त्यहि-गिरान संकत घवानी, गृह भूमिपाल गण धन्दि परे दुखरूंपी । ते तुमही भंवमय जरासन्ध खलभानी ३यहि प्रकार अगणित पाले पालत पालौ आमंगल दोन शरणतव मोहन सुखेदानी ६६५ अबको पाना भजौं गिरिधारी । बल्लभ श्रीप्रभुबनीमूद अविचारी॥ताहवत्यागिह- नकहै भमभारीश्तजिमदारगही धदरीतरु कामदुधे.. गंगत्यागि-पुष्करी पानजल ज्ञानकि बुद्धि व्यकारी 'मदलोभ मोहवम रही:सदाभमनाहींपासुगतिः, -- . i 7 [. -राप्तगतिफा.. १८६ स्वतंत्र सबलायक ॥ मंगलके दुख दोप नाशिये समरधअपिमुरा- बी६-६६ करि बहुदंभ थकी मति मेरी॥ काहूविधिन भयोथिर . मनप्रभु विषयक खल अयकारी प्रतिक्षण बामपंथ जडधावं त निडर इद्वियन प्रेरी १,शास्त्रविहित मग गहतन जड़मतिकृत विपरीत पसारै । यद्यपि सीख दई सुन्दरहीं होतन स्वधलयले र मोह,निशा सोवत सुख अपने जानि मोहिं धकवादो। विषयभोग सुनि उठत मुदितप्रभु कितै ज्ञानकीढेरी २ बततीर- थ सपम जपपूजन पाठध्यान पथनाहीं । मंगल विकल हरिय दुख मोहन परो शरण प्रभु तेरी ६६७ ॥सवैया ॥काल अनन्त धन्योबहु पंथविचार अनेकन भांति विचारे। जोजप्त जानत तो तत भापत अर्थ निरर्थ समर्थ , घिसाबूझेतही मनतोष नघाव- तपानकि धान क्रिया वितधारे मंगल त्यागिसवै मग मोहन हौं परणागत द्वार तुम्हारे ६६८दृष्टि पसारि लखे सवमारग अंकित सर्व प्रशंकन कोई । क्यों भटकौं फिरि भूमि वृथा जित लाभ नहीं तित हानिहि होई।मुक्त गृहस्थ-उवासिनमें मतको दुविधा बुरि सत्य बिगोई | मंगल भापि थंको बहुज्ञान-परो प्रभुद्वार यीमति खोई ६६८ पूजत.देवन बैठिके एकखडे यक पूजत मोहनसी मति.। वैठिउ, यकं नाचत गावतधप जलाय स्वछद कर्धेअति ॥देवलिभाग रिझावत एक करें व्रतयोग सुयोग लंगीर- ति.।मंगल मोनित स्वांग बिलोफिचहौसोकरी, प्रभुहीं शरणागति ६७० काहुको होइरहै भय बाइकै मूढ़कहै कमि कोमिदं गावै। सौ. मनयूझि बिवेक-किाखि लखे संबपै नहिंदृष्टि समावै । त्यागितुम्हें करुणाकर नाथ द्वितीयन रक्षक मोमनभावै। मगल भूल मिटापपरों तव द्वारकरी जोतुम्हें वनिनावै ६७१ कीरस्था ललनी लटको कपि अन्नलिये करबन्दि-परोहै । भूकत क्यानकि दर्पण मदिर मत्स्य किकांट सलीम धरोहै । त्यों इतधर्म लिये नर धामिक छूटन कोन उपायं करोहै। मंगल त्यागिता सुविधा अब भापहि आपकेदार परोहै ६७२ ज्ञानि । 17 - १८८ सप्तमतिका। मोह कहीं अव: कासनः ॥ वेदपुरान कुरान मंथबहु रचेगुणिन गुणिहीमें त्यहि मारग विचरत सुख मवसल होत मोद गति दासन, जो विपरीत चलत निजपथते तजि मर्याद पुरानी। त्यहि बिलोकि जगकरतबतकही यहजड धर्म विनायनर जित तित अब निंदकमत देखिय गहत सकलजन होते ॥ मिटीमें त्रुतिकलिदिशि चारो युग प्रभाव है तोसन ३ प्रथम मोरमने अचल संचलनवा सचल अचल पहिचानो। मंगल चुपकि रहो' जनि भाष्यो त्यागि नाम गरुडासन ६६३:निजमनकी मनधरौ चुराई गुप्त प्रकट इतबै मत देखिय दूनौको निपुणाई । यक अंतर यक बाहिर हेरत निजनिज बूझ बडाई १ तिमि निर्गुण संरगुणकी गणेना यया अग्नि युगरूपाएकदृश्य यकै काष्ठान्तरे है क्योंधड़ छोट लखाई.२ कष्टसहित यकमिलत सुलभही प्रक- टगुप्त मिलिजाई । सन्त सुजान ज्ञान मूरतिजे ते समु. चित्त लाई ३अगुण सगुण तनजीव कथाहै यकविनु द्वितिय कोजाने। मंगल यहिकारण तनुपरिकै भजिय सदा यदुराई १५४ पास्य काहिन-सेवक जानी जिनहिं देखि शिव थलतंजि भागे जानि गोत्रवधकारी ॥ समरभूमि तिनकी रक्षा, हित प्रणेत्याग्यो नि • मानी. १भिक्षा द्वारदेत कोउनाही हि व्याकुलयुत नारी ॥भु भरिभटि दसंपति त्यहि गिरान'सकत बरवानी ३ मगधना गृह भूमिपाल गण वन्दि परे दुखरुपी । ते तुमही मोचेल श्रवमयं जरासन्धखलभानी यहि प्रकार अगणित जनभवत पाले पालत पालो आमंगल दीन शरणतव मोहन हरिया विप' सुर्खदानी ६६५.अबको धान, भजी गिरिधारी | जानिबूझिके वल्लभ श्रीप्रभुबनीमूढ़ अविचारी|साहबत्यागिनहीं सेवकपदा नकहै भमभारी तजिमदारगही बदरीतरु कामदुधा तजिना गंगत्यागि पुष्करी पानजल ज्ञानकि बुद्धि ब्यकारी काम मदलोभ मोहवश रही सदा भूमनाहीं ॥ धावत अबही शरण तुम्हारी ३. जो जो रु - सप्तशतिको २०१० 'देवदाता तुम्ही वेदधाता तुम्ही सर्वत्राता श्रवादी सवानी ॥ तु म्हीकौतुफी योयो एंककाया तुम्हींदिग्गजो दैत्यमानापमानी। नहींदूसरी चारिपेठोस हेरौं बिंदो प्रयाम, श्रीश्याम ज्ञानानुमा 'नी'६८०तुम्हें प्रोहमैकौनु एकत्व भास तुम्हें शौहमें दैतकोमूद गावो तुम्हें मोहमै स्वामिनी मृत्यदेखे तुम्हें औ हमेदेवता पुंसभा- वैगा तुम्हें श्रीहेमै कोअनीशीश जानैतुम्हैं औहमेंबूझि आपसमा- वैतुम्हें औहमै जोनजाने महाराज सोई महामूढ़ है पंथ धावै ६८ तुम्हें प्रौहमें गोइके बोधपावै तुम्हें औहमें ध्याय भेटेदु- भावे । तुम्हें श्रोहमै पूनिके जन्महारै तुम्हें औहमें यांचि दारिद्र 'दाच ॥तुम्हें औहमें बंदि वंदैनवाने तुम्हें यौहमैंएकही चित्तलावै। 'तुम्हैं अौहमें जौनजाने महाराज सोई महामूढ़ पंधवाचे ६८२ “तुम्हें औहमें बूझतै दैतनाये तुम्ही हमेंशोचतै द्वैतभावै। तुम्हें ौहमें सत्यौ झूठजाने तुम, श्रोहमैं धन्य बाणीसुनाच ॥ तुम्हे औहमैं एकही रूपदेखै तुम्हस्वामिजूजो हमें त्यागि गावै। वसंत ज्ञानों गुणी ब्रह्मज्यानी न तौमूढ़भूलो दुचौपंथं धावै ६८३ करै जोई सूनाथ सोईभलोगाथ कोई नहीं साथमाया वसेरो। परी द्वारते नजानौं यीभावायांची नादूजो सदा दासतेरो ॥ इहां औउहां आयतेरी दयासिंधु पापी बडोहीं किधों मोहचेरो। बदौं ' दीनवाणी सुनो श्यामश्यामा गही बांहमेरी रहमान मेरो ६८४ - अहोनाथतारे कितेतारिहीसांचुमोकौंलखे क्योंगही मौनवानी। घडोभिक्षुहट्ठी टरौंगोन टारो सुभिक्षालहौं जोकितेधावखानी॥ । नतीभी तजों द्वाररहोपरी और बाढी सुतैका करोगे अमानी। यह शोचिके पोपिये सूनुं श्रीश्याम दीजैबसेरो निजै राजधानी ६०५॥ दोहा।।, समरथ सपाविधिनाथतुम भाषतवेद किताव ।। ., मंगलको दुखदारियोलबन सहनी ताब ६८६ जय श्रीगुरुजय श्यामजू जयतिसंत छलहीन ॥ जयंतिसार वाणीकथन जय ।। जन हरिपदलीन ६८७ उक्तियुक्तिकरि सप्तमत सारकहा चि- तलाय । मिलित सातहू विवुधजन बूझिहि बाणि सुभाय६८८ - - + + । सप्ततिका। नध्याति बुझावत ध्यान नहीं है। तर्क किये कबभासत चित्तकवि- तरलेवित्त प्रति महीहै ॥अंतसमय जपपाठन पूजन केवलज्ञाने कि.वृत्तिकहीहै। मंगल तीनबनै अपनी यहिते प्रभुकी परणाई ग्रहीहैं ६७३ बालक नारि हितू पितुमातु महीधने धाम सबै धप तोहै। त्यागि सुधा हरिनाम बिषयरत सेवत मृत्युकि ज्ञानायनी है । अंत जिती परिवारसकाय बिहायास्वधर्म किधौ सपनोहै। मंगल शोचियहै.मनमोहत सेतन रंक अरंकवनो ६७४ मोहमते कुमतो नुमतो सबकामामते तपसा सब फीको क्रोधमते भ्रम भांति स्वभावजुलोममते कवितालघु-हीकी गर्वमते सबकर्म धेकारथहै पचकूटफसी मतिजीकी मंगल ताते। इतैन बनेकछु मोहनकीशरणागति नीकी६७५पक्षमते नहिंज्ञान विभातिप- क्षमतेनहिधर्म सोहावैभोगमते नतजै मन आधि अभीगमते बुधिकी रुविजावै आनमते अपनीमति नाचत आपुमते श्रुति निंदकागविग मंगले सत्यवनन्तवहीं जयहीं प्रभुको शरणागति आवेदमहाभुजंगप्रयात सहामोहमें बुद्धिहै नित्यहीीलीन कैसेबने इयामको ध्यान जीमेंबिध्योलीभके दीमज्यों कीद. कैयाम मोचै यथा सोनहै ज्ञानही जरैक्रोधको, आँचनाचैवधा नांचा जामबचै सांच नास्वान धीमें। इतैकाम मात्सर्या धाकाल कूटोफितभागिये ठौरहै ज्ञानसीमें। कहीं कोहि पाखंडको वृत्तिाजी तिवासनमानै कृपासिंधु ज्ञान । कयौं काव्य विज्ञान श्रद्धानहीं चिंत्तसंताप कामादिको सत्य ध्यान नहीमोक्ष रथ्यो 'कहूं दृष्टिमा जितेहीं चलाऊँ सुधी शुद्ध जानोस, अगिकोत्यागि, हौं पाहिश्री श्याम मो योगजोहोईसो देहुथानेद७८ कहाकोनि येजाइयेधाइको लाश कोऊ नहीं मुक्तिको पंथ देखोंबडोदन आंधारहरों निराधार अद्यापि निमोहनौग्रंथलेरवौं बनतीन मी सो जुहै वेदगाय पुराणादिभाषा सुकनिविणेखी। यहशोधकेत्रा हिहे पाहिंत्री श्यामहौं दूसरों मुक्तिदाता नपेखोर तुम्ही सत्य संज्ञातुम्ही सत्यवाणी तुम्हीं अव्ययी आदिअंतावताना तुम्हीं 17 लिप्तशतिका 'देवदाता तुम्हीं वेदधाता तुम्ही सर्वत्रता अवादी सवानी । तु म्हीकौतुको योघो एककोया तुम्ही दिग्गजो द्वैत्यमानापमानी। नहीं दूसरों चोरिषष्ठास हेरौं'घदौं श्याम, त्रीश्याम ज्ञानानुमा 'नी '६८० तुम्हें औहमकोनु एकत्व भास तुम्हें यौहमें दैतकोमूढ़ गावै। तुम्हें औहमें स्वामित्रौ मृत्यदेखे तुम्है औ हमेंदेवता पुंतभा- वैगा तुम्हें प्रोही कोअनीशीश जानैतुम्हें औहमेंबूझि आपसमा- वैतुम्है औहमें जोननाने महाराज सोई महामूढ़ है पंथ धावै ८ तुम्हें औहमैं गाइके बोधपावै तुम्हें अौहमें ध्याय भेटेदु- भावै । तुम्हें औहमें पूजिके जन्महारै तुम्हें, औहमैं यांचि दारिद्र दावे तुम्हैयौहमें बंदि वंदैनवाने तुम्हें औहमैंएकही चित्तलावै। “तुम्हें श्रीहमें जौनजान महाराज सोई महामूढ़ पिंथधावै ६.८२ "तुम्हें यौहमें वूझतै दैतनाणे तुम्हेंयौ हमैंशोचतै दैतभावै। तुम्हें बोहमै सत्यत्रो झूठजाने तुम्हें औहमैं धन्य घाणीसुनाव॥ तुम्हे ' औहमैं एकही रूपदेवै तुम्हेस्वामिजूजो हमें त्यागि गावै। वसंत ज्ञानी गुणी ब्रह्मध्यानी न तौमूढभूलो दुवोपं धावै,६८३ करै लोई तूना सोईभलीगाथे कोई नहीं साथमाया बसेरो। परी । - द्वारते नजानी हुयीभावोयांचौं नादूजो सदा दासतेरोगा इहां औउहां प्राशतेरी दयासिंधुप्पापी बडोहौं किधो मोहचेरोबिंदी दीनवाणी सुनो श्यामश्यामा गहौ चाहमेरी रहमान मेरो ६८४ अहोनायतार कितेतारिहीसांचुमोकौंलखे क्योंगही सोनवानी। घडोभिक्षुहट्ठी टरौंगोन टारो सुभिक्षालहौं जोकितेधाबखानी। नतोभी तंजी दाररैहोपो आरि बाढ़ी सुतेका यहै शोचिके पोपियें सूनु त्रीश्याम दीजैवसेरों ६८५॥दोहा॥ समरथा सघाविधिनाथतुम, मंगलको दुखदारियो अब न सहनी ताव श्यामजू जयतिसत छलहीन ॥ जन हरिपदलीन ६८७ aims तलाय । मिलित साता विवुधजन al - । 1

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सप्ततित
'निजमत परमते..बहुमतो पक्षअपक्षवखान । शिक्षामतसींगयु:
तकियेसात परमान ६८४ समुझि-सप्तमत सतजना बुझेसहित
विवेक बूझभये सर्वाङ्गकी तजै वादिनीदेकर मढप समुझे
नही निंदकंकरै विचार ॥ कीमतिःगुणजानेविना ज्यों मणितजै
गवार ६८१ आतमबादी ब्रह्मबिट विज्ञानी जोप्रवीन.।। सोसमु,
झैगो मुदितमन मणिजौहरि कबदीना, ६८२ सत्यवस्तु औसत्य
मत तत्यरूप सतकाय क्यों समुझै मायायतित कर्मबधी भव
आय ६६३ गोपुरमें प्रभुमरणपरि जीवकृतारथ होता इहांध्या-
यः श्रीश्यामपद पाँचत परमाउदोत ६९४ अपनी करणी सर्वतरै
हरिकरणीसंसार ॥ मंगलयहजानेबिना मायावशायमद्वारपy
जो अपनीमति मोहमय औसतसंग विहीनः। तौ नबोधनीगा-
इये रहैभवस्थल दोन ६६६ राजाराम:सुनामशुभु श्रीवासी का-
यस्थ ॥बसतमाम सरहोसदा निजमत कायासुस्थ६८७ बुध ,
गणेश तिनकेतनय हरिसेवक प्रयकॉल। तिनको सुतनिजमत
मढ़-भये बिहारीलाल ६६८ महाशुद्धमति छलरहित तिनतन
बनानीराम ॥ तिनको बालक मुहमति ह्रौं मगंलममनाम EL
कियेकाव्यं बहु हरिकथा ज्ञानमार्गनिस्तारि बोषमये यह
तसमत बरनो सुमन बिचारि Oppearera
महिगुणमयरवर्गभूमियुत संवतग्राश्विनमास।
'प्रतिपदशुलावाररवि, पूरणग्रन्थ निवास
हातामत्समस्त अजीनातमिररिप्रवायिकामा
सप्ततिकामालदासर्वाचितासमाना
मुंशोनवलकिशोर छापखान मुकाम लखनऊमें छपी :
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7 1 . छोड़नेका फल, प्रीतिमान, वडाई के फल, अहंकार, भ्रम और छल के पुरेफल, त्यागकायर्णन, सन्तोप भय आशा, निर्धनता, वैराग्यविचार, मम,नियम के फल ऐसेही अनेक विषय इसी मोक्षदायकपुस्तकमें है। वोजककबीरदाससटीक जिसमें आदिमंगल, रमैनी, शब्द, ककहरा, बसन्त, चौतीसी, साखी इत्यादि अनेक दुखी जीवोंके उपकारक योग और उपासनादि मतका प्रकाश और श्रीरामचन्द्रजी के स्वरूप का ज्ञान है इसमें टीका महा-. राजाधिराज रीवा राज्याधिपति श्री १०८ विश्वनाथ वैकुण्ठवासी की है। यह अपूर्घ पुस्तक भी युगलानन्य शरणजीके स्थानापन्न उन्ही के पुस्तकालयाध्यक्ष श्रीजानकीवरशरणजी के द्वारा बडे परिम्नम से प्राप्त : हुई थी। ब्रह्मप्रकाश भगयत्प्रसाद रचित जिसमें घेराग्य, पुरुषार्थ, त्रिगुण योग, उत्पत्ति चित्त त्रिपुटी पांचों अवस्था सक्ष पसे वर्णन कोगई हैं अानन्दामृतवर्यिगी अानन्दगिरि रचित यहपुस्तक मानों पेदात का मूल है . इसमे सब वदातकी योगकिया लिखी हैं और हरमन्त्रके समझनेके वास्ते कथायें भी साथ है। युगलसम्वादबोधप्रकाश मुन्शीयुगलकिशोरजो रचित जिसमें योगवाशिष्ठादि वेदांतके ग्रथों से अध्यात्मविचार घेदातरूप कथनपूर्वक आत्मस्वरूपब्रह्मको लखाया है। सुन्दविलास श्रीपरमइस मुन्दरदासजी रचित जिममें ज्ञान, भक्ति, वैराग्य पूर्वक नानाप्रकार के विचार,तृष्णा रोड्ने के उपाय, धीर्य रखना, विश्वाम, नारी को निन्दा, मनका जीतना नीतिविवेकस्वरूप, विस्मरण को निषेधता, प्रीत ज्ञान है ॥ सत्यनामविहारटन्दावन महात्मा वृन्दावन जो प्राचार्यरचित जिसमे मनुष्यके, 'उपकारक पद्य में उपदेश और उनकी टीका, छहो । ॥ 1 । t 11 ।

. मतका आशय और उनमें अपनी. मातका प्राकटा पर उनका निकाय के लये दृष्टांतपूर्वक विचित्र कथा, घेदातका परिपूर्ण प्राशय; नाद की उपासनाका परिणाम अंतमें चौपाई,छन्द, ककहरा, विनती,वारहमासा, होली, रेखता आदि रागों में श्रीमद्भगवदयश है इसमें सबो का विशेष करके उपकार है। भगवद्गीतानवलमाध्य नााका सपा निगम,पुराण, स्मृति, साण्यादि का सारभूत परमरहस्य है जिसको फरखाबाद निवासि स्वर्गवासि पण्डित उमादत्तजीने गीता भाप्यानुमार सस्कृत से देशभाषा में रचना किया जिस मे भगवद्गीता का मूलश्लोक उसके नीचे संस्कृत शकरभाष्य तत्पश्चात् पानंद गिरि और श्रीधरस्वामिकृत टीका और सबसे पीछे शकरभॉप्य का भाषानुबाद नवलभाप्य नाम मे वर्णित है इस पुस्तकको जिसने अवलोकन किया है अवश्यही उसने मोललीहै यह पुस्तक देखनेही के योग्य है ॥ - + इश्तिहार।। माइमार्च सन् १८८६ ई० से मुमालिक मगरबी व शिमाली का बुक- डिपो इलाहावाद क्यूरेटर वुडिपो से भतवा मुन्शीनवलकिशोर मुकाम लखनऊ में प्रागया है इस बुकडिपो में मग़रवी व शिमालो एजूकेशनल घुकडिपो के सिवाय और भी हर एक विद्या-की किताबें मौजूद हैं इन हरएक किताबों की खरीदारीकी कुलशत कीमत के सहित इस छापे- खाने की छपी हुई फेहरिस्त में दर्ज हैं जोदरख्वास्त करने पर हर एक चाहनेवालो को बिला कीमत मिलसती है किताबों को खरीदकरना होवे इमे खरीदकरें । का इन- .

Gyan Tarag

Author
Das,banshiramatamaj
Title
Gyan Tarag
File name
Gyan Tarag
Text
OCR done
Citation
1776
Published
2011/01
Publisher
Newal Kishore Press Lucknow
Language
Sanskrit
Pages
199
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546312
Barcode
4990010024799.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
u8ML6pngreS
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