Adarsh Library, Jaipur

Dard Ki Muskan

Sharma Rajendra Kumar · 2011/03

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दर्द की मुस्कान

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दर्द की मुस्कान राजेन्द्रकुमार शर्मा

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नवम्बर के प्रथम सप्ताह की एक दुनती हुई शाम । अपने होने पर तारों को आपमिचौनी खिलाता हुआ एला माफ़ आममान । गर्मी को विदा करने के बाद जाडो के आगमन की गूचना देती हुई, हल्की पुरवदार हा और पगगवार मौमम । मनोरंजन, दिल बहलाये और मौज-मस्ती की दायत देती एक दिलपस फिवा। भारत के दिल दिल्ली में इंडिया गेट के पाग वाया गहामिह मार्ग पर अधिक पल-पहल पी मोटर, स्पूटर, माइकिल दौड़ते चले जा रहे थे। सर जल्दी में जल्दी पहुंचना चाहते थे, अचंना पिटर में। इस पहल-पहल, दौड़-धूप और भीड़-भाड़ का कारण पा, कुमारी मूमी पापंचरे नृत्य । अर्चना थियेटर रंग-बिरंगी रोगनी मे जगमगा रहा था और पिपेटर मी यह सजावट इस बात की गूचना दे रही थी कि पिटर में आज कोई विशेष थावपंग है। आमतौर से इम पिपेटर में मंगीत और नाटक के ही कार्यक्रम हुआ करते थे और यह कार्यत्रम दर्शकों के लिए तरसते रहते थे। पर आज कुछ और ही बात पी। दांक, पार्यक्रम देखने लिए नरम रहे थे। पिटर के बाहर हाउस पुसमा बोर्ड लगा हुआ पा। यह हाउस पुल का वो इसी अवसर के लिए ही बनवाया गया था, क्योंकि इससे पहले दम बोर्ड पीइम थियटरको भी आवश्यक्ता ही नहीं पड़ी थी। मन में उमंग और दिल में समन्ना लिए हुए लोगों से हाउम पुन पढकर ऐगा सगा किमानी किसी युवती ने रिसी युवर को प्यार में पाम युनाकर तमाचा मार दिला हो । सोग गिदपिटा रहे पे एक टिपट के लिए और जिनके पान सिट पायो इन लोगो मी एग देश रहे थे, चंगे किपरटं काय का यात्री पसती हुई गाठीभी पिटरी में से उन से मनाम के यात्रियोगादेगा है,जो भीड के मारण गाड़ी में न पड़ सके थे।

६ तीसरी घंटी बजी और इधर-उधर खड़े लोग थियेटर में जाने लगे। कुछ ही देर में थियेटर खचाखच भर गया और दर्शकों की नज़रें थियेटर के लाल मखमली पर्दे पर टिक गई। अव प्रतीक्षा असहनीय हो गई और दर्शकों की वेचैनी उनकी तालियों में उठी। पर्दा हट गया और थियेटर के मैनेजर ने सामने आकर अभि- वादन किया और इतराते हुए दर्शकों को संबोधित किया--'कलाप्रेमियों नमस्कार! हम आपका स्वागत करते हैं। आज हम आपकी मनचाही कलाकार, सौंदर्य की मूर्ति, हुस्न की मलिका और नृत्य की रानी मिस लूसी को प्रस्तुत कर रहे हैं। तो, साहवान, सावधान, दिल थाम के बैठिए, देखिए, वो आ रही हैं, मिस लूसी । जिनके पांव में बिजली की चंचलता है, जिस्म में जादू है और जिनकी हर अदा में कयामत है 'मिस लूसी।" स्टेज पर अंधेरा हो गया और फिर एक धीमी रोशनी की स्पाट लाइट में मुस्कराती, मदमाती, इठलाती, वल खाती हुई हौले-हौले, हल्के-हल्के मदुर संगीत के साथ प्रवेश किया मिस लूसी ने। नीली रोशनी में वर्फ से सफेद वस्त्रों में ऐसी लग रही थी, जैसे कोई परी हवा में तैर रही हो । वो सचमुच सौंदर्य की रानी थी। उसका गोरा, चमकता हुमा सुडौल शरीर बस देखते ही बनता था। उसमें मेनका का वो रूप था जिसमें किसी भी विश्वामित्र की तपस्या भंग करने की क्षमता थी। उसके नेत्रों में छलकते हुए पैमाने का उन्माद, झील की गहराई और लहरों की मस्ती थी। उसकी काली लटों से घिरा उन्नत ललाट बरसाती रात में किसी वादल की ओट से झांकते हुए चांद की तरह था। उसके गालों पर फूलों का शवाव था। उसके होंठ गुलाब की खिली हुई पंखुड़ियों की तरह थे। उसके गाल पर काला तिल तो ऐसा मालूम होता था कि विधाता ने इसलिए बनाया था कि उसे नजर न लग जाए । चोली में कसकर बंधे हुए उसके उन्नत उरोज ऐसे लग रहे थे, मानो यौवन के समुद्र में उमंगों और उन्माद की उठती हुई तरंगों को किसी ने बन्दी बना दिया हो। उसकी बाहों में लता की लचक थी। और सबसे आकर्षक थी उसकी मुस्कान, उसकी मुस्कराहट, जिसमें चुम्बक का आकर्षण, जलतरंग की सरलता और फुलझड़ी की चमक थी। ऐसा लगता था, मानो खजुराहो फी कोई मूर्ति सजीव हो गई हो। उसके सुगठित ७ परीर की सीमा रेगानों के उभरते और मुरते हुए रोग रिमी पुगन पित्रमारपीरलानाका परिचर दे रहे । पारपास्य मंगीत की सय पर उनके पग बागेबाने सगे और मे ही उमरे पग यागे बढ़ते जाते, लोगों के दिलों की धड़ान भी बरती जाती। स्टेज के बीच आरर उसने अपनी मुराहोदार गर्दन कोमटमा देकर एक ऐमा मनचना पटाक्ष फेंगा कि यम मानो वामदेव का बाप हो। वह जब मो इस तरह गर्दन को सटरा देती तो उसके घने वाले रामी बालों की सटें, उसके कुन्दन मे दमाने चेहरे को हक सेती और ऐमा नगता मानो बादलमा कोई आवारा कहा चन्द्रमा के माप आयमिचौनी न रहा हो । इसके बाद उसने अपनी गोरी मरदार वाहें वही ही भारपूर्ण मुद्रा स फैलाकर दोनोन पक्कर वाटे । पन भर के लिए उमरो गर्दन झुगी और फिर उसने कुछ इस अदा में उठाई कि दारी में एक बिजली काँध गई और उसने दर्शको की तरफ इस तरह देया मानो पूर रहो हो-कोई बता देसहा मगर है !' उसने इसके बाद मम्मी की तरह को मफेद पोगार उतार फेंगे और दगंकों को लगा जमे हुस्न के पिटारे यो विमी ने परत पोल दी हो। उसके परीर पर अब नीले रंग की मितारों जडी चोनी और नीला केला पांघरा रह गया। उसके परीर में मौश्यं पी किरण फूट रही थी। मंगीत कंचा और तेज हो गया और वो मंच पर इधर में घर कवरे मी नाट्य-मुद्रा में मंडराने सगी। रोम-रोम फडपता हुआ। अंग-अंग पहाता हुआ, लहरों की तरह नहराते हुए बाल, ज्वारभाटा का जोगनिए हुए सीने के उभार, पहाडी पगडंही पी तह मचनती पसर, कमल के नान सी मृदुल टांगे, योनम की मूर्ति यो गीय करता हुआ नितम्ब 'ऐमा मग रहा था कि यह यात्म्यापन के कामशास्त्र को उत्तेजिन अभिमारिताको जीती-जागती तस्वीर हो। वो कंबरे नस्य के धाम अंदाज में पीपेहलो हुई मच मे पनी गई। पियेटर हाल दर्शको की तालियों में गूज उठा। तालियों के बीच एर-दो दरी ने मीटी बजाई और आवाज लगाई-हाय, जानिम ने मार गला!' और सब सोग हंस पड़े। सूमी तानियों की गडगडाहट में मंघ मे मोशे अपने मेरअप म्म में मा - C गई। उसकी तरफ बहुत-से लोगों ने आने की चेष्टा की, परन्तु दरबान ने रोक दिया। थियेटर का मैनेजर बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में लूसी के पास आ पर बोला- 'आज तो आपने कमाल कर दिया।' 'कल भी आपने यही कहा था।' 'तो झूठ थोड़े ही कहा था। अगर आप सारी रात डांस करें तो लोग सारी रात बैठे रहेंगे। एक भी अपनी कुर्सी से नहीं हिलेगा।' 'और इसके बाद मुझे अस्पताल जाना पड़ा तो अकेली ही जाऊंगी। कोई साथ नहीं जाएगा। मैनेजर कुछ और कहना चाहता था पर लूसी ने वात काटते हुए कहा, 'गुडनाइट' और मैनेजर को न चाहते हुए भी वहां से जाना पड़ा। दर्शक वहां से चले गए थे, लेकिन फिर भी दो-चार आदमी इस लालच में कि उन्हें शायद लूसी से कुछ बातें करने का अवसर मिल जाए, अव भी खड़े थे। लूसी ने अपना मेकअप उतारा और नाइलोन की एक साधारण-सी साड़ी पहनकर घर जाने के लिए मेकअप रूम से बाहर आई। बाहर आते ही एक सज्जन जो लगभग पचास वर्ष के थे और पूरी सजधज के साथ बढ़िया सूट पहने हुए थे एकदम आगे बढ़े और बोले- 'गुड इवनिंग मिस लूसी ! मैंने आपका डांस देखा, वंडरफुल, वंडर- फुल..' लूसी ने व्यंगात्मक ढंग से कहा 'और वंडरफुल 'आई एम पीटर। यह मेरा कार्ड है । मैं आपको यह गुलदस्ता पेश फरना चाहता हूं।' 'आप यह कार्ड अपने पास रखिए और यह गुलदस्ता वहां रख दीजिए।' 'लूसी, हम तो आपका डांस देखने रोज़ आएगा।' 1 'बैंक यू' 'मैं क्या कहूं मिस लूनी...' और लूसी ने वात काटते हुए कहा-'आपको कुछ कहने की जरूरत नहीं। मैं सब समझती हूं। अच्छा गुडनाइट मिस्टर पीटर।' और वो आगे बढ़ गई और मिस्टर पीटर वहीं खिसियाने से खड़े रहे।

६ सूसी थियेटर के बाहर आ गई और दरवान उसके लिए टेक्सी लेने दौडा। इतने में एक साहब जिनकी सफेद दाढ़ी यह बता रही थी कि उनकी वायु लगभग साठ दर्प है, मफेद कुर्ता-गजामा पर्ने दृए, हाय में छड़ो, और जिन्होंने अपने गंजे सिर को टोपी मे ढका हुआ था, एकाएक लूमी के पास याए और अपने एक खाम यंदाज़ और लहजे में वोले- 'अदा व यज।' 'अदा व अर्ज। "खुदा कमम, जमा मुना था वमा ही पाया । बाप तो बहुत ऊंचे दर्जे की फनकार हैं । मैंने बहुत नाच देखें हैं लेकिन ।' 'लेकिन मेरा जमा नाच आपने अभी तक नहीं देखा...' सूमी ने बात काटते दृए कहा। 'आपने तो मिम लूमी मेरे मुह में बलफाज छीन लिए । आरके हुनर की बोर हुस्न की जितनी तारीफ की जाए थोडी है।' 'तारीफ तो आप मेरे हुम्न की करना चाहते हैं । हुनर को बीच में क्यों धमीट रहे हैं । अच्छा मुदा हाफिज ।' टैक्मी आ गई और लूमी टक्मी में बैठकर चली गई। पीटर, ईमान अली और कुछ लोग जब तक टेक्मी दिखाई दी देखते रहे। तृमी घर पहुंच गई। कालका जी में एक छोटा-सा घर । मिर्फ दो कमरे और रसोई। डाइंगरूम में मोफामेट, दीवान और कुछ इसी तरह की चीजें जो साधारणतीर के हाटगहम में होती हैं और उसके दूसरे कोने में डाइनिंग टेविल, पर्दे टत्यादि तो थे ही। घर मे जरूरत को सब चीजें, लेकिन ऐम्वयं की कोई वस्तु नहीं । इन चीजों में से कोई भी वस्तु इम वात की गवाही नहीं देती थी कि उन पर फिजूलखर्ची की गई है। मभी वस्तुएं, मभी मामान तडक भड़क और ग्लैमर मे दूर । घर देखकर यह अनुमान समाना पठिन या कि यह किमी कचरे डांसर का घर है । ऐमा प्रतीत होता या कि यह कोई ममाजमेविका या स्कल-टीचर का निवाम-स्थान हो। इम दो कमरे के घर में केवल दो प्राणी । तूमी बौर उसकी नौकरान लक्ष्मी । अव लक्ष्मी को उमकी नौकरानी कहना तो उचित नहीं होगा, सबसे पहले उसका संबंध नूमी मे इमी रिश्ते में हुआ था। धीरे- १० । नौकरानी से उसकी सब कुछ हो गई। वो उसकी सहेली, उसकी मित्र, उस की शुभचिंतक, बल्कि यह कहें कि लक्ष्मी के अतिरिक्त लूसी का इस संसान में कोई था ही नहीं जिसे वह अपना कह सके। लक्ष्मी ने दरवाजा खोला और लूसी कुछ लड़खड़ाती हुई, डगमगाती हुई सोफे पर बैठ गई, बल्कि लुढ़क गई । वो थकी-थकी-सी थी । उस भटके हुए राही की तरह जो मंजिल ढूंढते-ढूंढते थक गया हो। उस जुआरी की तरह, जो अपना सब कुछ हार चुका हो । कुछ देर पहले जिससे कामुकता, उत्तेजना और वासना की किरणें फूट रही थी इस समय कितनी टूटी हुई और विखरी हुई थी। मस्ती विखेरने वाली, बहार लाने वाली स्वयं एक पतझड़ थी। जिसका एक कटाक्ष दर्शकों में हलचल पैदा कर देता है, जिसकी हर अदा विजली गिराती है, जिसकी एक मुस्कराहट वेवस कर देती है, जिसका रूप और सौंदर्य दर्शकों को पागल कर देता है, वो इस समय एक दीन-हीन अवला-सी लग रही थी। वो उस दरिया की सतह की तरह शांत नज़र आती थी, जिसके नीचे अनगिनत लहरें प्रतिक्षण आती, उमड़ती और गिरती हैं। वो उस पर्वत की तरह थी जो ऊपर से खामोश नजर आता है लेकिन जिसके अन्दर ज्वालामुखी धधकता है । वो फूल के उस पौधे की तरह थी जो अपने सीने में कांटों की चुमन सहन करते हुए फूल को अपने सिर पर थामे रहता है । और लोग फूल की मुस्कान देखते उसकी सुगंध सूंघते हैं लेकिन उसके कांटे कोई नहीं बटोरता। लक्ष्मी ने लूसी के पास आकर कहा-'क्या आज फिर रो रही हो ! 'नहीं-नहीं, मैं नहीं रोऊंगी। मैं हंसूंगी, मुस्कराऊंगी, यह आंसू तो फिजूल हैं। इनकी कोई कीमत नहीं। आंसुओं का कोई खरीदार नहीं। इन आंसुओं का कोई मूल्य नहीं। विकती है तो औरत की मुस्कराहट । उसकी मुस्कराहट पर लोग मर मिटते हैं। बढ़-चढ़कर बोली लगाते हैं। मेरी मुस्कराहट भी कीमती है। मेरी मुस्कराहट भी विकती है। मेरी मुस्कराहट लोगों के दिलों में एक तूफान पैदा करती है, और उसी तूफान से में पैसे बटोरती हूं। दर्शकों की कमजोरी से लाभ उठाती 'भगवान का दिया आपके पास सब कुछ है । सब तरह का आराम । पैसा है।" । ।'

'जो पहले 'भगवान ने मुझे पैसा दिया है और जिसे भगवान पैसा दे उसे, लक्ष्मी, और क्या चाहिए ! क्योकि पैसा दुनिया में सब कुछ हासिल कर सकता है, सब कुछ खरीद सकता है, आदमी को, औरत को, इंसान को, देवता को और शायद भगवान को भी।' 'मेरी समझ में तो आपकी यह वात नही आती।' लूसी ने हाथ का इशारा करते हुए लक्ष्मी से कहा-ह्विस्की और सोडा। लक्ष्मी ने ह्विस्की की वोतल और सोडा लूसी के सामने मेज पर रख दिया और वोली- 'ज्यादा शराब नही पीनी चाहिए। गराव कलेजा जला देती है ।' जल रही हो उमे यह क्या जलाएगी !' लूसी ने ह्विस्की को वोतल मे से अपने सामने रखे हुए गिलास में शराव डाली, और फिर उसने सोडे की वोतल खोली। सोडे की बोतल में एकदम उफान उठा और उसने अपना हाथ रखकर दवा दिया । काग दो अपने अन्दर उठते हुए उफान को भी इसी तरह दवा सकती। वो प्रयल तो रोज़ यही करती थी कि अपनी अन्दर के ज्वालामुखी की आग को शराव से बुझा दे, अपने दर्द को शराव में वहा दे, अपनी पीड़ा को शराब में डुबो दे, अपनी पुरानी यादों को शराव में भुला दे, अपने दिल में चुभते हुए कांटों को शराब में गला देशराव पोडी देर के लिए उसे मदहोय कर देती और उसके बाद वही दर्द, वही पीडा, वही टीस और वही चुभन । कुछ देर के बाद लक्ष्मी ने मेज़ पर खाना रख दिया । लूसी ने नशे में लड- खड़ाते शब्दो में लक्ष्मी से कहा-'तुम सो जाओ, मैं खाना खा लूगी।' वो कब तक पीती रही, कब उसने खाना खाया और वह कब मो गई उमे स्वयं भी मालूम नहीं हुआ। एक रात और वीत गई। न जाने कितनों को कितने तरह के सपने दिखाकर न जाने कितने दिलों में नए सपने जगाकर, अव उसके बाद आया सुहावना प्रभात । लोगो के लिए एक नया संदेश और नई आगा लेकर। एक नया उल्लास और उजाला व चमक लेकर । लेकिन लूसी नही उठी। वो बहुत देर तक सोती रही। रात को कुछ ज्यादा पी गई थी। लक्ष्मी ने आकर उसे जगाया और वो अलसाई हुई अंगड़ाई लेती हुई यह कहती उठी.---'जिन्दगी का एक दिन और कट गया।' लूसी ने उठकर स्नान आदि किया और नौ बजे नाश्ता करके तैयार हो गई, वह सोचने लगी कि मैं जिऊं भी तो क्यों जिऊं और मरूं तो क्यों मरूं! लक्ष्मी ने मेज़ पर पवों का एक बंडल लाकर रख दिया और कहा-यह पचास चिठ्ठियां आई हैं। 'पचास !' 'जी हां, पचास । इन्हें पढ़ लीजिए।' लूसी ने इन पत्रों को हाथ से इस तरह एक तरफ कर दिया जैसे यह कोई रद्दी कागज़ के फटे टुकड़े हों। लक्ष्मी ने कहा-'इन्हें आप पढ़ेंगी नहीं ?' 'मुझे मालम है इनमें क्या लिखा है । यह पचास चिट्ठियां पचास आदमियों ने लिखी हैं, पचास जगह से आई हैं, लेकिन इन सबका एक ही मजवून होगा, इन सबमें एक ही बात लिखी होगी : मेरी तिरछी नज़र पानी में आग लगा देती है। मेरी मुस्कराहट कयामत ला देती है। मेरी हर अदा बिजली गिराती है।' यह कहकर उसने एक व्यंगात्मक ककहा लगाया और बोली, 'लक्ष्मी, यह सब भंवरे हैं जो फूल के रस के प्यासे हैं, रस चूस कर उड़ जाना चाहते हैं।' लक्ष्मी ने इसके बाद उसे एक पत्रिका दिखाई, जिसमें उसके नाच का विज्ञापन था। उसे देखकर लूसी ने कहा--'जानती हो लक्ष्मी, यह मेरी खूबसूरती का इश्तहार है, मेरी अपनी नुमाइश है । मेरी नीलामी का डंका दरवाजे पर दस्तक हुई। लक्ष्मी ने दरवाजा खोला। दरवाजे पर थे मिस्टर पीटर। मिस्टर पीटर जो लूसी का नाच देखने के बाद फूलों का गुल- दस्ता लेकर उसके पास आये थे। मिस्टर पीटर जो अपना कार्ड भी लूसी फोदे गये थे, इस आशा में कि शायद वो कभी उन्हें टेलीफोन कर दे। मिस्टर पीटर जो थियेटर में ही खड़े रहे जब तक लूसी घर नहीं चली गई थी। मिन्टर पीटर वढ़िया सूट पहने हुए थे, और सिर पर थी फेल्ट हैट । अपनी कार में आये थे। लक्ष्मी को देखकर उन्होंने अपनी फेल्द हैट उतार पर हाथ में ली और बोले-'गुडमानिंग यानी कि नमस्ते !'

'क्या मिस लूसी घर पर हैं ?'
'हां हैं, लेकिन वो इस समय किसी से नहीं मिलेंगी।'
'वंडरफुल, मेरा मतलब है वो कब मिलेंगी, कहां मिलेंगी, कैसे
मिलेंगी, यानि कि हन एंड द्वेयर...'
'आप उनमे थियेटर में मिलिये।'
'हम मिस लसी का डांस लखनऊ मे कराना मांगता है।'
लूमी ने अन्दर से आवाज लगाई–'लक्ष्मी, इन्हे ड्राइंगरूम में लाकर
बिठा दो।'
लक्ष्मी ने मिस्टर पीटर को ड्राइंगरूम में लाकर विठा दिया । मिस्टर
पीटर ड्राइगरम को बडी जांच-पड़ताल की नजरों से देखने लगे और
फिर लक्ष्मी से कहा-
'आप उनकी प्राइवेट सेक्रेट्री हैं ?'
'क्या मतलब?'
'मेरा मतलब है आप उनके प्राइवेट मामलों को मीक्रेट रखती है और
उनके सीक्रेट मामलो को प्राइवेट ।'
'मेरी कोई सीक्रेट नहीं है और न ही कुछ प्राइवेट है। मेरे पाम जो
कुछ भी है, मैं उसकी नुमाइश करती हू।' यह कहते हुए लूसी ने ड्राइंगरूम
में प्रवेश किया।
मिस्टर पीटर एकदम उठकर खड़े हो गये और हंसकर वोले-
'गुडमानिंग मिस लूसी।'
'गुडमानिंग ।'
'मेरा नाम पीटर है और मैंने कल रात आपका डांस देखा था।'
'जनाब ने उसके बाद रात-रात मे मेरे घर का भी पता लगा लिया !
और ऐसा लगता है कि जनाव को रात में नीद भी नहीं आई होगी, तभी
तो यहां सबेरे ही आ पहुंचे हैं।'
'आपका नाच मिस लूसी वडरफूल, वंडरफूल.
'और वंडरफूल'-लूसो ने उसका वाक्य पूरा किया।
'आप नाच के बाद मुझसे मिले भी थे !'
"जी हां, लेकिन आपसे बातचीत नहीं हो सकी थी।'

'अच्छा तो आप यहां बातचीत करने आये हैं !' लूसी ने व्यंग कसते हुए कहा। 'मैं आपका कंवरे लखनऊ में करवाना चाहता हूं। क्या आप वहां चलेंगी?' 'मैं हर जगह जा सकती हूं, मुझे मेरी कीमत मिलनी चाहिए।' 'मैं वहां तीन दिन आपका डांस करवाना चाहता हूं, आप क्या लेंगी?' 'तीन हजार । आने-जाने का किराया हवाई जहाज़ का, और ठहरने का प्रबन्ध मेरा और लक्ष्मी का किसी बढ़िया होटल में करना होगा, धर्म- साला में नहीं।' मिस्टर पीटर एकदम चौंककर बोले, 'धर्मशाला' 'नो, नो, और फिर कुछ गिड़गिड़ाते हुए कहा-'कुछ कम कर दीजिए । दुनिया में पैसा ही सब कुछ नहीं होता। लूसी कोध में एकदम खड़ी हो गई। 'गलत । पैसा ही दुनिया में सब कुछ है। मैं पैसे के लिए ही नाचती और लोग पैसे के लिये हो नचाना चाहते हैं।' 'दो हजार ले लीजिए, मिस लूसी।' 'जी नहीं।' 'एक बात कहूं मिस लूसी अगर आप माइंड न करें।' 'मैं हर तरह के आदमी से हर तरह की बातें सुनने की आदी हूं।' 'मेरा मतलब है, उस दिन आपका नाच बहुत बढ़िया था। बहुत ही वंडरफूल । लेकिन आपकी टांगों पर, आई मीन, मेरा म."त"ल"व । 'मैं नापका मतलब समझती हूं। आपका मतलव है मेरी टांगें जरूरत से ज्यादा की हुई थीं। मिस्टर पोटर यह मुनकर एकदम उछल पड़े। मानो प्यासे को पानी मिल गया हो। उन्होंने एक अर्थपूर्ण दृष्टि फेलते हुए कहा---'आप तो जानती है...' ....मैं सब जानती हूं। सब समझती हूं, मिस्टर पीटर । एड़ियों के पर ५० रुपये फी इंन और घुटनों के ऊपर १०० रुपये प्रति इंच के हिसाब से कपड़ा कम होता जायेगा । कहिए मंजूर है, आपको ?' मिस्टर पीटर लूसी का यह उत्तर मुनकर सकपका गये और अपने आप को संभालते हुए कुछ क्षण बाद मछली पकड़ने के लिए जाल फेंकते हुए अन्दाज.मे वोले, 'मैं एक फिल्म भी बना रहा हूं।' 'आप तो अनुभवी शिकारी मालूम होते हैं। आपको यह जाल फेंकना भी आता है।' 'मैं सच कहता हूं। मैंने फैसला कर लिया है कि मैं अपनी फिल्म में आपको हीरोइन बनाऊंगा।' 'यह फैसला आपने कब किया?' 'कल रात आपका नाच देखने के बाद।' 'कितनी फिल्म बनाई हैं आपने ।' 'है तो पहली फिल्म, लेकिन मैं ऐसी फिल्म बनाऊंगा, ऐसी फिल्म बनाऊंगा कि... 'मुझे सब मालूम है, पहले आप मुझे अपनी कहानी सुनायेंगे, फिर किसी होटल मे फिल्म के शाम डिस्कस करने के लिए बुलायेंगे, इसके बाद आप मुझे फिल्म यूनिट के साथ पिकनिक पर ले जायेंगे, फिर अपने किसी दोस्त कैमरामन को बुलाकर मेरी तस्वीरें खिंचवायेंगे और फिर फिल्म की हीरोइन बनने के लालच मे आप मुझे अपने बिस्तर पर सोने के लिए कहेंगे, इसके बाद आपको फिल्म पूरी हो जायेगी।'--लूसी ने एक ही स्वर में यह सब कह डाला। पीटर एकदम झेंप गये। उनका सुन्दर सपना टूट गया। उन्हें लगा, मे उनके जाल मे मछली की जगह साप आ गया हो । उन्होंने सामने मेज पर रखा हुआ अपना फेल्ट हैट उठाया और जाने के लिए खड़े होकर बोले- 'आप मुझे गलत समझ रही है।' 'मैं तो आपको ठीक समझ रही है, लेकिन आप मुझे गलत समझ रहे हैं। आप जा सकते है ।' मिस्टर पीटर ने सिर पर फेन्ट हैट पहना और बाहर के दरवाजे की ओर चल दिये। दरवाजे पर जरा रुके और फिर पलटकर इस मामा में, - . देखा कि शायद पासा पलट जाये और फिर चलते-चलते वो वोले- 'सब आदमी एक तरह के नहीं होते हैं।' लेकिन, मेरा अभी तक एक ही तरह के आदमियों से पाला पड़ा है। अच्छा, गुडनाइट मिस्टर पीटर ।'-~-लूसी ने उत्तर दिया। पीटर ने कुछ इस तरह से गुडनाइट कहकर जैसे किसी खिलाने से चावी देकर आवाज़ निकाली गई हो, चल दिये। लूसी के होठों पर एक मुस्कान आ गई और वो मन ही मन में सोचने लगी कि औरत को साथ लेकर चलने में आदमियों की एक ही मंजिल होती है, सिर्फ रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं । डाक्टर, वकील, मास्टर, इंजी- नियर, नेता, राजनीतिज्ञ, कलाकार, व्यापारी, समाज-सुधारक, कोई भी हो, औरत के साथ एक ही संबंध रखना चाहते हैं, उससे एक ही रिश्ता कायम करना चाहते हैं। उसके सम्मुख आते ही वो अपने कवच, आवरण और मुखोटे उतार फेंकते हैं और संजी-संवरी सुन्दर स्त्री को निर्वस्त्र देखना चाहते हैं। लूसी सोच रही थी कि पीटर मुझे बेवकूफ बनाने चला था। मैंने अव बहुत पीटर देख लिये हैं। मैं अव इन आदमियों को अच्छी तरह जान गई हूं, मैं इनकी नज़रें पहचानती हूं, इनकी बातों का मतलव खूब समझती हूं, इनके इरादे भांप सकती हूं, इन रावका मकसद ताड़ सकती हूं। अब मैं बोलता नहीं जो इनकी बातों में आ जायेगी, इनके फंदे में फंस जाये, इनके जाल में अटग जाये, जिसे यह धोखा दे सके, जिसके साथ विश्वास- घात कर सकें। लता अब लूमी हो गई है. 'लूसी। दरवाजे पर फिर दस्तक हुई। लूसी ने लक्ष्मी को आवाज़ दी और कहा-'लगता है एका और पीटर आ गया है। लक्ष्मी ने दरवाजा खोला और देखा कि एक नवयुवक खड़ा है । अचानक आने वाला आगन्तुक गोरा, गुडौल और आकर्षक व्यक्तित्व का युवक था। वुश्शर्ट और पैंट पहने हुए थे । वस्त्र भड़कीले नहीं परन्तु उम्दा और अच्छे सिले हुए थे। आधुनिक भाषा में हम उसे स्मार्ट कह सकते हैं । शकल-सूरत में पढ़ा-लिखा और मन्य दिखाई देता था। उसने लक्ष्मी को हाथ जोड़कर नमस्ते की और पूछा- --

१७
'क्या मिस लूसी घर पर ही हैं ?'
'हा हैं । लेकिन, वो इस समय किसी मे नहीं मिलेंगी।'
'मैं तो उनमे मिलने आया हूं और मिलकर ही जाऊंगा।' उसकी
आवाज में विनम्रता थी, परन्तु दृढता भी।
'आप हरये ।
यह कहकर लक्ष्मी ने नूसी को बताया कि कोई युवक आया है और वो
बहता है कि.--'में मिलकर ही जाऊंगा।' लूसी ने लक्ष्मी को उसे अन्दर
लाने के लिए कहा । लक्ष्मी ने उसे वंटक मे विठा दिया। लूसी के आने
पर वो खड़ा हो गया और उसने हाथ जोडकर नमस्ते की । लूसो ने जवाब
मे कहा-
-
'नमस्ते । आप मुझसे मिलना चाहते हैं ! तो ठीक है, मिलिये और
चले जाइये।'
'विश्वास रखिये मिस लूसी मैं यहां ठहरने के लिए नहीं आया हूं।
मेरा नाम अनिल कुमार है । मैं पत्रकार है । मैं यहां की एक प्रसिद्ध पत्रिका
का रिपोटर हूं।'
'तो वैठिये मिस्टर अनिल ।' लूसी ने बैठते हुए कहा।
'मैंने आपका नाच देखा है।'
'मुझे मालूम है ।'
'चो कसे?
'अधिकतर लोग मेरा नाच देखने के बाद ही मुझसे मिलने आते
'ओह..
'मैं यह भी जानती हूं कि आप क्या कहना चाहते हैं।'
'क्या मतलब?
'आप यही कहने आये हैं कि आपका नाच तो बहुत ही बढ़िया था।
आज तक मैंने ऐसा नाच नहीं देखा। यापके पास वो कला है कि बस क्या
कहूं, और उसके बाद बाप कहेंगे, दिल छीन लेने वाली मिस लूसी, आपकी
आखें तो हिरनी को याखो की तरह है। आपके होठ खिले फूल की पंखड़ियों
की तरह हैं। इसके बाद आप मेरी फोटो कही छपवायेंगे और इस तरह

१८ । मेरे नज़दीक आने की कोशिश करेंगे। इतने नज़दीक कि आपके और मेरे जिस्म थोड़ी देर के लिए एक हो जायें। मैं जानती हूं कि पुरुपों की स्त्री के साथ एक ही मंजिल होती है, सिर्फ रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं।- लूसी ने यह सब एक मनोवैज्ञानिक की तरह कह दिया । 'आप मुझे गलत समझी हैं। मैं न तो आपके साथ चलना चाहता और न ही मेरी वो मंजिल है । मैं चाहूं तो अच्छी से अच्छी लड़की से विवाह कर सकता हूं। मैं यह कहने नहीं आया हूं, जिसकी आपने भविष्य- वाणी की है। 'तो आप क्या कहना चाहते हैं ?' लक्ष्मी ने प्रश्नमूचक शब्दों में कहा । 'सच पूछिये, तो मैं यह कहने आया हूं कि मुझे आपका नाच बिल्कुल पसन्द नहीं आया। बाकी रही कला की बात सो आपके नृत्य में कला का कोई स्थान नहीं है, आपका नृत्य तो केवल जिस्म ही की नुमाइया है। एक वासना-उत्तेजक व्यायाम है।' 'लोग तो यही चाहते हैं।'-लूसी ने किसी बचाव पक्ष के वकील की तरह दलील दी। 'लोग तो आपने बहुत कुछ चाहते हैं । क्या आप सबको अपना सब कुछ दे देंगी यादेनकेंगी?' यह मुनकर लूनी के शरीर में एक सिहरन उठी और एक कंपकंपी-सी आ गई और वो एक घायल की तरह चिल्लाई 'वस कीजिए, मिस्टर अनिल । प्लीज स्टाप इट! आप पहले आदमी हैं जिसने मुझे यह कहने की हिम्मत की है।' 'आपका असली रूप तो यही है ना! सचाई कड़वी होती है।' लूसी और न सहन कर सकती थी और नहीं सुन सकती थी। एकदम वालीगया आप शराब पियेंगे?' 'नहीं। आपको गराय पीना अच्छा लगता है मिस लूसी ?' 'और आपको क्या बुरा लगता है, मिस्टर अनिल ?' में अपनी पत्रिका में आपकी एक इंटरव्यू छापना चाहता हूं।' 'उससे क्या होगा?' 'आपके नाच की कीमत बढ़ जायेगी।'

१९ 'और इंटरव्यू छापने से यापको भी कुछ पैसा मिल जायेगा। ठीक है : 'आपने यह कवरे डांस कर सीखा ?' 'जब मुझे सीखना पड़ा। 'यापको यह डास किसने सिखाया?' "मेरी परिस्थितियों ने।' 'क्या आपको इस तरह नाचना अच्छा लगता है है?' 'इसमे अच्छे-बुरे का क्या सवाल है ? यह मेरा धधा है। यह मेरा व्यवसाय है।'-सूसी ने एक लम्बी सास सोचते हुए कहा। .. क्या आप इससे खुश हैं ?' 'मेरी सुमी से रिसीको क्या? हां, मैं खुगी वाटती हु, आनन्द लुटाती है, लोगों का मन बहलाती हूं।' 'मुझे ऐसा लगता है कि आपकी वो मुम्कराहट, जो दर्शकों के दिलों में घडवन पैदा करती है, एक दर्द की मुस्कराहट है । आपका अंग-प्रदर्शन एक पीडा की ऐंठन है।' लुमी को लगा कि उसने उसकी दुखती रगो को छेड दिया है और वो चिन्ता मे उठी---- 'मैं और कुछ नही सुनना चाहती। मैं जमी भी है, जो भी हू, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए । नमस्कार।' अनिल पर लूसी के क्रोध की कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई । वह उसी तरह दात और विनम्रता से बाराम से उठा और हाय जोडकर नमस्कार किया और बाहर चला गया। लूसी ठगी-सी खड़ी रह गई। आज तक उमने केवल अपनी प्रगना ही सुनी थी । जो भी उमे मिलता वह उसकी तारीफ ही करता। लोग उसके स्प की, यौवन की, सौंदर्य की सराहना करते थे। उसके कंबरे डाम को भी कलापूर्ण बतलाते । कोई उसे चौदहवी का चाद कहता तो कोई उसे आफताब यतलाता । कोई कहता कि उसकी बातों में उन्माद है तो कोई कहता कि उसकी मुस्कराहट मे फूलो की शोखी है । लोग उससे बात करने को तरसते । जिसमे वह दो बातें कर लेती वो अपने आप को भाग्यमाली ना।

२० । उसे अभी तक ऐसे ही लोग मिले थे जिनको उसके रूप ने चकाचौंध कर दिया था। जो उसके यौवन को शराव की तरह पी जाना चाहते थे। अनिल पहला आदमी था, जो न उसके नाच पर और न उसके सौंदर्य 'पर मुग्ध हुआ था। वह पहला आदमी था जिसकी नज़रों में न वासना की तड़क थी और न कामुकता की झलक । उसने उससे वेधड़क और वेझिझक चात की। लोग उससे बात करते तो कुछ इस तरह वोलसे जैसे वो गिड़गिड़ा रहे हों, उससे कुछ मांग रहे हों। लेकिन अनिल ने ऐसे वात की मानो लूसी कोई अपराधी हो। उसकी सच्ची बातों ने उसे झकझोर दिया। उसके घावों को फिर से किसी ने कुरेद दिया। उसकी सोई हुई यादों को फिर से किसी ने जगा दिया। वो छटपटा उठी। वह तड़फ उठी । वो कराह उठी। लक्ष्मी ने शीघ्र ही एक पंग ह्विस्की का तैयार कर उसके हाथ में दे दिया। शराब ही तो उसके दर्द की दवा थी, उसके दुःख-दर्द की सायी थी।

- २ एक महीने बाद । कड़ाके की सर्दी पड रही थी। दो-तीन दिन से धूप नही निकली थी। बूदा-बांदी हो रही थी। घर से बाहर वो ही लोग निकलते थे जिनका बाहर जाये बिना काम न चल सके । जितने कपडे कोई पहन सक्ता, उतने पहन लेता। दस्तानो और गर्म टोपियो की बिक्री बढ़ गई थी। लोग घरो मे भी हीटर और अंगोटियां जलाकर उसके पास ही बैठे हुए थे। सुबह १२ बजे तक बहुत गहरी धुध रही । मोटरकारें, मोटर- साइकल, स्कूटर इत्यादि धुंध के कारण अपनी वत्तिया जलाकर चल रहे थे। दो-तीन दिन से इस सर्दी के कारण लूसी का नाच नहीं हुआ था। दोपहर के चार बजे थे। लूसी भी अपने कमरे में बिस्तर पर कंबल सेकर लेटी हुई थी और पास ही रखा हुआ था एक हीटर । वह समाचार पत्र पढ रही थी। पढते-पढ़ते उसकी नजर एक खबर पर ठहर गई। वह ध्यानपूर्वक पढ़ने लगी-'कल रात के दस बजे नारायणा के बम-स्टाप से एक नर्स दिल्ली छावनी के लिए बस पर चढी । उस ममय बम मे दल पाच या छ: यात्री थे । थोड़ी दूर जाने के बाद सब यात्री उतर गये और वह नर्स इस बस मे अवेली रह गई। कुछ देर के बाद जब नम ने यह देखा कि बस गलत रास्ते पर जा रही है तो उसने बस रोकने के लिए उहा। बस और भी तेज चलने लगी। वह चीखी-चिल्लाई, पर वहा उभरो आवाज सुनने वाला कोई नहीं था । कंडक्टर ने उसके साथ बलात्कार रिया और उसे चलती बस से नीचे फेंक दिया। पुलिस इस मामले की बड़ी बगानी में छानबीन कर रही है। लूसी ने पढ़कर समाचार पत्र एक तरफ रसु दिया और होने लगी : मनुष्य समाज ने यह पुरस्कार दिया है एक नगे, जो मिर्ग सेवाओं के बदले । नर्स जो घायलो के घाव पर पट्टी कमी है, से २२ । चीमारों को दवा पिलाती है, जो रोगियों के दर्द को सहलाती है, जो कराहते हुये लोगों के आंसू पोंछती है और सारी-सारी रात स्वयं जागकर रोगियों की सेवा करती है। उसके साथ आज समाज ने कितना बड़ा जुल्म, कितना बड़ा अन्याय किया है। स्त्री चाहे, नर्स, डाक्टर, वकील, इंजीनियर, टाइपिस्ट, क्लर्क, टीचर, या कुछ भी हो, मनुष्य समाज उसे केवल स्त्री ही समझता है और स्त्री को मनुष्य केवल एक मनोरंजन का साधन, अपने खेल का खिलौना समझता है। जब तक चाहा खेला और फिर फेंक दिया। मनुष्य उसे अपनी कामुकता और वासना-तृप्ति का एक साधन मानता है। स्त्री वर्ग का इतिहास मनुष्य की क्रूरता का इतिहास है । उसकी बर्वरता का इतिहास है । उसके जुल्म का इतिहास है। मनुष्य तो मनुष्य देवताओं ने भी स्त्री से छल-कपट ही किया है । इन्द्र ने अहिल्या के साथ छल किया और उसका दंड भोगना पड़ा अहिल्या को वर्षों तक पत्यर वनकर । मनुष्य जिसे देवी कहता है उसके साथ दानव का-सा व्यवहार करता है। अवसर मिलने पर हर मनुष्य दुशासन ही हो जाता है। मनुष्य छल से, कपट से, धोखे से स्त्री को अपने जाल में फंसाकर अपनी वासना का शिकार बनाता है और फिर वही मनुष्य-समाज कहता है कि उसकी मर्यादा खत्म हो गई, उसकी पवित्रता भंग हो गई, उसका सतीत्व नष्ट हो गया । उसे कलंकिनी, दुराचारी और भ्रष्टा की संज्ञा देता है। और स्वयं दूध में -नहाया ही रहता है। वह यह नहीं सोचता कि उसे कलंकित किसने किया, उसे दुराचारी किसने बनाया, उसे पथभ्रष्ट किसने किया। उसका सतीत्व किसने नष्ट किया । पुरुष स्त्री को लूटने के बाद, उसे मसलने के बाद भी निरपराधी ही रहता है। उसकी मर्यादा नष्ट नहीं होती, उसकी इज्जत नहीं लुटती, उसके पुरुषत्व को आंच नहीं आती। स्त्री को वेश्या पुरुष ही बनाता है और फिर दिन के उजाले में उसे समाज की गंदगी पुकारता है और रात के अंधेरे में उसे अपने सीने से लगा लेता है। यह कौती विडम्बना है ? यह कैसा विधान है ? यह सोचते-सोचते लूसी अपने अतीत में खो गई। पुरानी यादों में डूब गई। उसके सम्मुख उसके जीवन का इतिहास खुलने लगा। वह घटनाएं और वह परिस्थितियां, जिन्होंने उसे लता से लूसी बना दिया था, एक-एक - - २३ करके उसके नेत्री के सामने चित्रित होने लगी। उसे इस सर्दी में भी गर्मी लगने लगी। लक्ष्मी ने एक प्याला काफी लाकर सामने मेज पर रख दिया। पर लूसी को पता नहीं चला। वह तो अपने विचारों में खोई हुई थी । लक्ष्मी ने जब दो बार पुकारकर लूमी को काफी के लिए कहा तो उसने चौक कर कहा-'क्या है ?' 'काफी पी लीजिए,' लक्ष्मी ने फिर एक बार कहा। 'अब काफी से काम नहीं चलेगा, लूसी ने कुछ संभलते हुए कहा और फिर लक्ष्मी को समझाने लगी। लदमी ने सब समझने के वाद, सिर हिलाते हुए बोली-'ह्विस्की और सोडा' । लूसी ने केवल सिर हिला दिया । लक्ष्मी ने एक पयिका लूसो को दिखाते हुए कहा-'इसमे दीदी, आपकी फोटो छपी है और आपके बारे में बहुत कुछ लिखा है। लूसी ने वह पत्रिका लक्ष्मी से ले ली और पढने लगी। मिस लूसी कंबरे-डांसर से एक भेंट-भेटका अनिल। 'मिस लूसो को नृत्य से कोई गाव नहीं। कोई शौक नही । उन्हे तो उनको मजबूरियों ने, परिस्थितियों ने उन्हे कैवरे-डांसर बना दिया। वह इसलिए नाचती हैं कि उन्हें नाचना पड़ता है। उनकी मुस्कराहट, जो लोगों को पागल बना देती है, एक दर्द की मुस्कराहट है, उनकी भाव-भंगिमा, जो दर्शको को मतवाला बना देती है, एक पीडा की ऐंठन है।' 'नानमेंस, ईडियट ।'--लूसी ने माथे पर त्योरिया चढ़ाते हुए कहा । और फिर वह अपने नृत्य का फोटो देखने लगी, जो कि उसमें छपा था। फोटो के नीचे लिखा था-'मिस लूमी, जिनके नृत्य मे कला और वस्त्र तो नाम मात्र को ही हैं, लेकिन उत्तेजना और वासना से भरपुर हैं।' लूसी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उसने पत्रिका बन्द करके मेज पर पटकते हुए कहा-'अपने आप को क्या समझता है ! मैं उसे वह मजा चखाऊगी कि साला क्या याद रखेगा। तृसी एकदम मे विस्तर मे उठी और कुछ ढूढने लगी। उसने मेज की दराज देखी, अपनी ड्रेसिंग टेबिल की दराजें देखीं, और फिर अलमारियां देखने लगी। लक्ष्मी ने पूछा-'दीदी, क्या ढूंढ रही हो? क्या खो गया है लूसी ने कहा-'वो जो उस दिन आया था, अपना कार्ड छोड गया था।'

२४ । लक्ष्मी ने बताया कि उसने इस तरह के सारे कार्ड एक जगह अलमारी में रखे हुए हैं । लक्ष्मी जल्दी से अपने कमरे में गई और अलमारी में से का? का ढेर उठा लाई। लूसी जल्दी-जल्दी उन्हें पढ़ने लगी और फिर यकायक एक कार्ड पढ़कर बोली-'मिल गया."मिल गया। देख लक्ष्मी, यह रहा उसका कार्ड।' लूसी ने साड़ी बदली और उसने बाल संवारे। एक दुशाला ओढ़ा और चल दी। लक्ष्मी ने उसे जाते देख कहा-'दीदी, वाहर सर्दी पड़ रही है। इस शाल से काम नहीं चलेगा। मेरी मानो तो आज कहीं मत जाओ। आज बहुत ठंड है।' लूसी ने अपना कोट पहन लिया, जुरावें पहनीं, दस्ताने पहने और यह कहकर कि मैं तो भूल गई थी कि आज बहुत सर्दी है, बाहर चली गई। उसने टैक्सी रोकी और सीधे अनिल के घर पहुंची। उसने बड़े जोर से घंटी बजाई । अनिल ने भीतर से ही आवाज़ दी-'दरवाजा खुला है, चले आओ।' लूसी ने दरवाजा खोला और देखा कि अनिल मेज़ पर बैठा हुआ कुछ लिख रहा है । पास में ही एक हीटर जल रहा है । ड्राइंग रूम बड़े ही करीने से सजा हुआ है । अनिल लुसी को देखकर खड़ा हो गया और उसने लूसी को वैठने के लिए कहा। 'मैं बैठने नहीं आई हूं।'~-लूसी ने उत्तर दिया। 'माफ कीजिएगा, मैं भी आपको ज्यादा देर नहीं बिठा सकूँगा, क्योंकि मुझे एक ज़रूरी काम से बाहर जाना है।' 'व्हाट् नानसेंस, मैं जिसकी तरफ मुस्कराकर देखती हूं, वह अपने आपको भाग्यशाली समझता है । जिससे मैं चार बातें कर लेती हूं, वो समझता है कि उसे स्वर्ग मिल गया और एक आप हैं कि...' 'मुझे अभी स्वर्ग नहीं चाहिए। मैं अभी कुछ देर और पृथ्वी पर रहना चाहता हूं।' अनिल ने लूसी की वात काटते हुए कहा । 'आप अजीब आदमी है!' 'सिर्फ आपके लिए।' लूसी ने पत्रिका की उस प्रति को जो अपने साथ लाई थी उसकी मेज़' पर पटक दिया और फिर कुछ इस तरह, जैसे कि कोई पुलिस अधिकारी २५ . अपराधी से पूछता है, उसने कहा-'मैं पूछती हूं, यह सव क्या है ?' । 'आप यह वैठकर भी पूछ सकती हैं।' 'मैं नही बैठूगी। लूसी ने एलान करते हुए कहा ! 'तो मुझे भी खडा ही रहना पड़ेगा।' 'मैं पूछती हूं कि आपने यह सब क्या लिखा है ? इसे जरा पढिए।' 'मैंने तो लिखा है, इसलिए मुझे पढने की जरूरत नहीं । आपने पढ़ लिया है ?' 'आपको यह लिखने की क्या जरूरत थी और आपको क्या अधिकार है ?' 'अधिकार की वात छोड़िए। आप यह वताइए कि यह सच है या नहीं।' 'नहीं।' अनिल थोडा-सा हंस दिया और फिर व्यंग करते हुए बोला-'आप सच्चाई मे भवराती है। आप वास्तविकता से डरती हैं।' 'आपने लिखा है कि मेरे नृत्य में वस्त्र और कला को कमी होती है, लेफिन...' अनिल फिर उसे टोकता हुआ वोला-'क्या ये सच नहीं है ? आप अपने दिल से पूछिए । अपना मन टटोलिये और फिर वताइये, क्या यह कला है ? क्या यह हुनर है ?' लूसी चुप हो गई और कुर्सी पर बैठ गई। कुछ क्षण के बाद उसने फिर प्रश्न किया--'आपने वह फोटो कहा से लिया ?' 'आप जब इस तरह सैकडों आदमियो के सामने नाचती हैं, तो कोई भी फोटो ले सकता है। 'लोग जो चाहते हैं, मैं वही उन्हे देती है। वो मेरी हसी की खिल- खिलाहट सुनना चाहते हैं, वो मेरे शरीर का आकर्षण देखना चाहते है। उन्हे मेरे होठो की लाली और आखो का कजरा अच्छा लगता है । मैं उन्हे वही देती हूँ। 'मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि इस बहार के नीचे एक ज्वालामुगी है । इस खिले हुए फव्वारे के नीचे विजली है।'

'यह बताने से गया होगा?' अनिल ने बातगीत का सिलसिला बदलते हुआ पाहा---'मेरा नोकर इरा गगग पर पर नहीं है। अगर आप थोड़ी देर बैठे तो मैं माफी या पाय का प्याला बनाकर लाऊं। काफी या चाग के अलावा चानी रही हिरकी और गोटे गी गात, वो तो मेरे घर में नहीं है । न मैं पीता हूं और न ही पिलाता हूं।' आपके पारा पाय या गाफी पीने नहीं आई।' 'आप मेरी मेहमान हैं। पहली बार मेरे पर आई हैं। इतनी खातिर तो गारनी ही पाहिए।' 'तो आपको नाग या गाणी नहीं पिलाई थी।' 'यो आपकी मेहमाननयापी थी।' लूसी गो लगा गि अनिल उसे गात पर गात देता जा रहा है । उसने पुछा---'आपकी शादी हो चुकी है ?' जी, नहीं।' 'आप जरो आदमी गे गोई लड़की शादी गारेगी भी नहीं।' 'आपने भी पानी नहीं गी या गं माहिए कि आपनी भी शादी नहीं लूसी निगार हो गई। उसे लगा कि वह बाजी हार गई है । यह तो उरो गणा गगाने आई थी। उसे गरी-गोटी सुनाने आई थी। लेकिन, उसका गोई सीर नहीं गला । उसने तीर तरकश में ही रह गये। में जयादा वहा नहीं गारना चाहती । आइन्दा अगर आपने मेरे बारे में भी लिगा तो अजहा नहीं होगा। यह गाहते हुए गह उठकर एलादम चल दी। दरवाजे को पारा भागार उसने मुंह से यह शब्द निगाले-'अजीव आदमी है। उसी समय अनिल ने भी गही गाहा---'अजीव औरत है।' गुरु देर यही परमहा पगातावरण में गूंजते रहे। नसी गे गगी ली और सीपी पर आ गई। रास्ते में उग अन्तः गरण में बार-बार यह आवास उठ रही थी...'को गहता तो गर ।' पर नकार उसने पंटी गगाई, लक्ष्मी ने दरवाजा गोला और वो फुर्ती गाना की तरह अपने कमरे में पली गई। दस्ताने उतारकर २७ • फेंक दिये, कोट उतारकर पटक दिया, जुराबें एक झटके में अलग की और "विस्तर पर रजाई ओढकर लेट गई। लक्ष्मी को उसकी इन हरकतो से ऐसा लगा कि उसके मन को मन में रह गई और वह अपना-सा मुंह लेकर लौट आई है । उसने जिज्ञासा भरी दृष्टि से उसके उतरे हुए उदास चेहरे को देखा और फिर पूछा-'मिल गया था, अनिल ?' 'मिलता कैसे नहीं।'-लूसी ने उत्तर दिया। 'क्या उसने कुछ कहा ?' लक्ष्मी ने फिर पूछा। 'कहता क्या ! उससे तो कोई जवाब ही नहीं बन पडा । मैंने.."मैंने उसे “वो खरी-खोटी सुनाई कि साला याद करेगा। अपना-सा मुह लेकर रह गया। मैंने उसकी वो खबर ली और उसको वो फटकारा कि वह भी याद करेगा कि किसी स्त्री से पाला पड़ा था।'—सूसी ने बड़ी फुर्ती से कहा। "लेकिन, उसके स्वर मे बनावट स्पष्ट नजर आ रही थी । नाटक के संवाद बोलने का अंदाज़ था। उसकी आवाज मे सचाई की गंध नही थी। लक्ष्मी तुरन्त भाप गई कि वात कुछ और हुई है । उसने धीरे से कहा -~'कहता तो सच है ।' लूसी ने एक ठंडी सास ली और फिर कहा-'हा, “वह सच कहता है, सच कहता है, और फिर एकदम जोर से चिल्लाई: -"लेकिन, मैं क्या करूं ? मैं क्या करूं ?' कहते-कहते उसके मन की घुटन और दिल की कसक आमुओं में ढल गई। .

३ - पन्द्रह दिन वाद । धुंध और बूंदा-बांदी समाप्त हो चुकी थी। सर्दी की हर लौट गई थी । मौसम सुहावना था। जाड़े की सुहावनी धूप घर से पाहर निकलने की दावत दे रही थी। दोपहर को सड़कों और बाजार में काफी चहल-पहल थी। क्रिसमस और नववर्ष के आगमन के दिन थे। दुकानें सजी हुई थीं। कनाटप्लेस में एक मेला-सा लगा हुआ था। इन दिनों जनपथ पर काफी हाउस की बगल में एक वाज़ार लगता है, जिसमें किस- मस और नववर्ष के अभिनन्दन पत्र की अनेकों दुकानें होती हैं । यह बाज़ार पूरे जोरों पर था। तिल रखने की जगह नहीं थी। रास्ता चलना बड़ा ही कठिन था। कंधे से कंधा भिड़ता था। कई मनचले नवयुवक तो इस बाजार में इसीलिए आते थे कि सुन्दर नवयुवतियों के साथ कंधे से कंधा मिला सकें। मनचले उनके जिस्म के साथ जिम्म मिलाकर चल सकें। बाज़ार में केवल खरीददार ही नहीं थे, बल्कि ऐसे वहुत-से लोग थे, जो मिर्फ मेला देखने आये थे । वल्कि, यूं कहिए कि पृथ्वी पर जन्नत का नजाग देखने या फिर वाज़ार की चहल-पहल और रौनक का स्वाद चखने आये थे। लेकिन, ऐसे अवसरों पर पाकेटमार, चोर और गुंडे भी पीछे नहीं रहते । वल्कि, यह कहना चाहिए कि वो लोग तो ऐसे अवसर की ताक में ही रहते हैं कि उन्हें अपनी हाथ की सफाई दिखाने का मौका मिले, क्योंकि उन्हें अपने हाथ का करिश्मा दिखाने का अवसर ऐसी भीड़-भाड़ में ही मिलता है। इस बाज़ार में, इस मेले में, इस भीड़ में कुछ लोग खरीद रहे थे, कुछ लोग कुछ पा रहे थे और कुछ लोग कुछ खो रहे थे। लूसी भी कनाटप्लेस में कुछ खरीददारी करने के लिए आई थी उसने अपने लिए एक साड़ी खरीदी और लक्ष्मी के लिए एक धोती । उस .

२९
।
अपने मेकअप का सामान भी घरीदा। मेकअप जो जग हा निधारता
है । जो उसके सौंदर्य को उभारता है । पकाया उसे ग्यास भागा-या
यह रूप अमर है ? क्या उसका शौक्ष्यं सदा ही ऐरी रहेगा? मामो निशान
जो वक्त उसके चेहरे पर छोड़ देगा, यह मेकअप मागान गगिता
• सकेगा? यह विचार आते ही यह एक उदारा धुन की सगा पाप गई और
फिर अपने मन को समझाने की कोगिग-सी मारते हुए उसने गोगा, अभी
से मैं इसकी चिन्ता क्यो कर ? अभी नी मैं जथान। अभी शो में
दुनिया के मेले में अपने आकर्षण की पूरी कोमा यस कार
और सौंदर्य का पूरा लाभ उठाऊ । वह गोपती-गोपती पटरी पर पर
केले पाले में टकराई। परन्तु समल गई और फिर दिए l
देते हुए मन ही मन में उसने कहा-'जो होगा देवा जायेगा। गया
कि नववर्ष के अभिनन्दन काई गरीदने वालों की यही भीड़।
उसे इसकी आवश्यकता नहीं है । दुनिया में उगका गंगा कोई नही fam
वह नववर्ष पर अभिनंदन भेजे ।
लूमी इम बाजार के पाग गे होकर कनारप्ग के योग में भा
-गई । यहा बहुत कम भीड थी। मोड में थोड़ी दर पर तीन-चार गवाः
खड़े थे। उनके सिगरेट पीने का यदान और यारपीगं या प्रकार
होता था कि यह उन लोगों में में नहीं । गिन्ने म गम्य मार्ग पर
'उम्नाद ! यो देखो, यह तां वही लमही नाही
सीटी बजाकर उछलते हुए कहा।
'इमका ती अग्रवार में फोट भी धरा है। क्या फोद माया'
दूसरे ने कहा
"मैंने तो इमाम भी देखा है कानमा है। मैं मा
चन आदी हैं, वनेता दाहा को पाादा है।जोमा मना
"हम मीनन्दा दीवाने है। दाद मार रायम /--और
ने वाले दिल पर हाय रन दाहा
लमी टारगई और R HIT Hindi
यादी?'

'आपको देखकर तो शर्म आने की बजाय चली जाती है।'-उनमें से एक ने कहा । वाकी सब ज़ोर से ठहाका लगाकर हंस दिये। लूसी पहले सहमी, डरी और फिर अपने आपको संभालती हुई वोली' ----'मैंने तुम जैसे बहुत देते हैं । मैं तुम लोगों को...' 'देखें हैं या चखे हैं ?'-एक ने कहा और वाकी सबने फिर एक ज़ोर का कहकहा लगाया। शाम का झुटपुटा, अंधेरा हो चला था और आस-पास इन व्यक्तियों के अतिरिक्त कोई नहीं था। लूसी घबरा गई। अनिल अपनी कार में उधर में जा रहा था। उसने लूसी को देखा और उन बदमाशों के कहकहों को मुना । उसने कार रोक ली और बाहर निकल आया। ऊंचा कद, गोरा-. उजला-गुडौल शरीर । अनिल एक प्रभावशाली व्यक्ति था। बदमाग समझे कि कोई बड़ा पुलिस अफसर है। वह कार मे उतरते ही उन लोगों की तरफ बढ़ा और फिर बड़े जोर से कड़कती आवाज़ में पूछा---'क्या बात है ? अपने आपको बहुत बड़े बदमाग समझते हो ? मैं अभी तुम्हारी सारी बदमागी निकाल दृगा।" 'नहीं, साहब कोई बात नहीं है।' यह कहकर वह सब लोग वहां से चुपचाप चले गये। लूनी को 'शुक्रिया' कहना चाहिए था, लेकिन उसने कहा नहीं । वह कह नहीं सकी। वह कुछ सोचती वही खड़ी रही। फिर उसने अनिल को एक नजर देखा और यह नज़र कह रही थी-'अजीब आदमी है।' अनिल भी कुछ क्षण चुप रहा और फिर बोला'चलिए, मैं आपको आपके घर छोड़ दूंगा। मैं उधर ही जा रहा हूं।' 'पाप क्यों कष्ट करते हैं ? 'विश्वास रखिर मैं ऐसा कोई काम नहीं करता जिसमें मुझे कप्ट हो।" अनिल ने अपनी कार का दरवाजा खोलते हुए कहा-'बट भी जाइए, टेक्नी का किराया दे दीजिएगा।' लूसी ने कुछ और नहीं कहा। वह कार में बैठ गई। अनिल के पास अगली सीट पर । कार धीमी-धीमी रफ्तार से जा रही थी, लेकिन लूसी के दिल की धड़कन तेज़ थी। लूसी कुछ सोच रही थी। दोनों चुपचाप चले. । ।

जा रहे थे। मानों मौनव्रत रहा हो। थोड़ी दूरं जाने के बाद एक साइकिल वाते ने एकदम अपनी साइकिल दाईं तरफ मोड दी। अनिल ने जोर का ब्रेक लगाया और ब्रेक लगाते ही लूसी उसके कंधे पर जा गिरी। अनिल ने कहा-'आई एम सॉरी' और इसके उत्तर में लूसी थोड़ा-सा मुस्करा दी। कार फिर चल पड़ी और दोनों फिर चुप हो गयै : लूसी के घर के मामने अनिल ने कार रोक दी । लक्ष्मी ने खिडकी में से बाहर को देख लिया था। उसने याकर दरवाजा खोल दिया । लूसी कार से उतर गई और बोली-'येक यू 'लक्ष्मी ने अनिल को देखा तो चकित रह गई । लक्ष्मी ने अनिल को नमस्कार किया और अनिल ने भी उत्तर में हाथ जोड़ दिए । लक्ष्मी ने कहा--'आप अन्दर नही आयेंगे।' 'मुझे अन्दर बुलाने से पहले अपनी दीदी से पूछ लीजिए।'-अनिल ने लूसी की तरफ देखते हुए कहा। इससे पहले कि लूसी कुछ कहती, अनिल ने कहा--'इस समय जल्दी में हू, फिर कभी आऊंगा।' अनिल ने कार स्टार्ट की और फिर चल दिया। तदमी ने इन दोनों को साथ देखा तो यह उसके लिए एक पहेली बन गई । वह कुछ उलझन मे पड़ गई। वह सोचने लगी। उस दिन तो लूसी कह रही थी कि उसे वो मजा चखाया है कि उम्र भर याद रखेगा। उसमे जवाब देते ही नहीं बना। और आज दोनो कार में एक साथ आये है। उसने लूसी से कहा- 'दीदी, आज तुम्हे यह कहा मिल गया ?' 'कनाट प्लेस मे।' 'तो क्या आपसे वहा माफी मागने लगा लूसी ने केवल सिर हिलाकर 'हा' कह दिया । लक्ष्मी ने फिर पूछा-'धो आपको कार में बिठाकर लाया या आप उसकी कार में बैठकर आई है ?" 'सव किस्मत की बात है।'-लूसी ने उत्तर दिया और गीरी में अपने थापको देखने लगी। उसने कधी उठाई और बालो में फेर ली तथा गालो से सटी हुई एक लट को भी ठीक कर लिया। तत्पश्चात् उसने लि. उठाई और होठो पर लगाने लगी। लक्ष्मी ने पूछा-'दीदी, फिर कहा। । . -

..
रही हो क्या ?'
'लो, मैं तो भूल ही गई थी। मैं बाहर थोड़े ही जा रही हूं। मैं तो
बाहर से आई हूं।' कहते हुए लूसी ने लिपस्टिक रख दी और कुर्सी पर
बैठकर कुछ गुनगुनाने लगी।
लक्ष्मी की अपनी पहेली और भी जटिल हो गई। वह अब भी सोच
रही थी कि आज कुछ अनहोनी घटना हुई है। कब, कहां और कैसे, यह
उसकी समझ में नहीं आ रहा था।

आज टैक्मी और स्कूटर वालों को हडतान थी। इसका कारण या पहले के मूल्य में वृद्धि । वैसे कारण कुछ भी हो सकता था, क्योकि उन दिनों हडताल करना एक फैशन था। रोज अपवार स्ट्राइक की खबरों से भरे होते । कभी विद्यार्थी हडताल करते तो कभी नसें, कभी बिजली वाले हड़ताल करते, तो कभी पानी वाले, कभी कार्यालय के क्लर्क और कभी उनके अफसर, तो उनके माथ-साथ बस और ट्रक वाले हडताल करते हैं। हडतालो का जोर था। कल बस वालों ने हड़ताल की थी और इस हड़ताल का पूरा-पूरा फायदा उठाया टैक्सी और स्कूटर वालों ने । मनमाने पैसे बमूल किये और खूब कमाई की । आज टैक्सी और स्कूटर वालो की हड़ताल थी। हां, बस स्टेड पर मेला लगा हुआ था। वसों पर लोग लटक रहे थे। कई बस में चढ़ने के असफल प्रयास करते-करते अस्पताल पहुंच गये थे। पंदल जाने वालों की भी काफी भीड थी। लूसी का आज नृत्य था । वह शाम को घर से बाहर निकली तो याद आया कि आज टैक्सी की हडताल है। वह सोच रही थी कि क्या करे। वह इसी उधेडवुन में थी कि अकस्मात अनिल कार में आया और आगे बढ़ गया। जैसे ही उसने लूसी को देखा तो अपनी कार पोछ करते हुए लूसी के सामने लाकर खड़ी कर दी। 'नमस्ते, मिस लूमो !' 'नमस्ते। 'आप कहा जा रही है ? 'आप कहा जा रहे हैं ? 'पहले आप बताइये, लेडीज फस्र्ट ।'

'भाप जाइये मैं चली जाऊंगी।'
'आज आप नहीं जा सकेंगी। आज आपको कोई टैक्सी नहीं मिलेगी,
और बस में चढ़ना आपके बस की बात नहीं। आपको अर्चना थियेटर
पहुंचना है ?'
लूसी ने केवल सिर हिलाकर हां कह दिया।
'तो बैठिये। टैक्सी का किराया दे दीजिएगा सिर्फ: 'वैठिए भी !'
अनिल ने दरवाजा खोल दिया और लूसी चुपचाप कार में बैठ गई
लूसी ने पूछा-'क्या आप उधर ही जा रहे थे ?'
'नहीं।
'तो फिर आपने वेकार में कष्ट किया।
'मैंने पहले भी आपसे कहा था कि मैं कोई ऐसा काम नहीं करता
जिससे मुझे कष्ट हो।'
फिर थोड़ा रुककर अनिल ने कहा-'अगर आज टैक्सी की हड़ताल
न होती, और आप मुझे कहती कि थियेटर छोड़ आओ तो भी मैं आउट
आफ़ दि वे नहीं जाता।
'थेंक यू।'
और फिर दोनों चुप हो गये । कार जा रही थी, यकायक एक आदमी
सड़क पार करने के लिए बिना देखे सड़क के इस तरफ से उस तरफ भागा।
वह एकदम कार के सामने आ गया। अनिल ने ज़ोर से ब्रेक लगाया। पहियों
के रुकने की ज़ोर से आवाज़ हुई और उसके साथ ही लूसी के मुंह से यह
शब्द निकले-'ओह ! ईडियट, कैसे बेवकूफ लोग हैं । सड़क पार करते हैं
और इधर-उधर नहीं देखते ।'
अनिल सिर्फ मुस्करा दिया।
'मेरा दिल अभी तक कांप रहा है।'-लूसी ने कहा ।
'आप अपना दिल ठीक कर लीजिए, फिर आगे चलेंगे।-अनिल ने
कार रोक दी।
'ठीक
कार फिर आगे चल दी। दोनों चुपचाप थे। शायद अपनी-अपनी
कल्पना की उड़ान में खोये हुए थे या अपने विचारों की उलझनों में। एक
गया।'

को यह नहीं मालूम था कि दूसरे के दिल में क्या है । लेकिन दोनों के मन में कुछ हलचल थी। दोनों के दिलों की धड़कन साधारण नहीं थी। कभी- कभी दोनों एक दूसरे को चोरो से देख लेते। लूसी के दिमाग में यह भन्द प्रतिध्वनित हो रहे ये कि-'मजीव भादमी है और अनिल के दिमाग में-'अजीब औरत है।' थोड़ी दूर जाने के पश्चात वह सोग एक चौराहे पर आ गये। चौराहे के एक तरफ से एक बस मा रही थी। मनिल ने बेक लगाई, लेकिन रमकी बेंक टूट गई। उसके मुंह से एक चीस निकली और कार इधर से उधर लड़खडाने लगी। लूसी भी चिल्ला उठी। एक जोर का धमाका हुआ और कार बिजली के खम्भे से टकरा गई। लूसी कार की खिडकी मे बाहर जा गिरी । उसके हाय-पर पर कुछ चोट आई। लोग दौडकर इधर-उधर में आ गये । उधर से जाते हुए लोग एक गये । उनके आमपाम एक भीड जमा हो गई । दो-चार आदमी लूसी को पकड़कर उठाने लगे, लेकिन उसने यह वह कर कि 'मैं ठोक हूं, सबको अलग कर दिया । लूसी ने देखा कि अनिल स्टेरिंग ह्वील पर सर रखे पड़ा है। उमने अनिल को आवाज दी, लेकिन अनिल ने कोई उतर नहीं दिया । बेहोग था। ऐमा मालूम होना था कि उसके सिर पर चोट आई है । उसको वाह में शीशे का एक टुकड़ा आकर लग गया और उममें से खून बह रहा था। लूमी बहुत घबरा गई। वह बोली-'इन्हें अस्पताल 'जाना चाहिए।' एक आदमी जो वहा रहा था, वह बोला---'इन्हें मेरी कार में लिटा दीजिए।' मैं इन गेनो को अस्पताल ले जाता हूं।' कार की पिछली मीट पर अनिल को लिटा दिया गया। भीड़ में से एक आदमी बोला--'देखिए, वहन जी इनका मिर थोड़ा-सा उठा लीजिए। आप भी पीछे बैठ जाइए और इनरा सिर अपनी गोद में रख लीजिए।' एक और बोला-'हा, इस तरह ठीक रहेगा।' लूसी कार की पिछली सीट पर बैठ गई और उसने अनिल सिर अपनी गोद मेर लिया। कार चल पड़ी और फिर थोड़ी ही देर मे अस्पताल पहुंच गई। लान मे बैठे कुछ लोग रो रहे थे। उनसरा कोई रिश्तेदार, कोई दुनिया से चल बसा था। कार कैजुअलटी वार्ड के पास पर कहा-'स्ट्रेचर लाओ।' अस्पताल के दो कर्मचारी . । फिर अनिल को उसपर लिटाकर कैजुअलटी वार्ड के अन्दर ले गये । अनिल अब भी बेहोश था। यहां पर लोगों की काफी भीड़ थी। कुछ घंटे पहले बस का एक्सीडेन्ट हो गया था, जिसमें पन्द्रह-बीस आदमी घायल हुए थे। यह भीड़ घायलों के संबंधियों की थी। लूसी ने इस तरह की भीड़ पहली बार देखी थी। उसने तो अभी तक थियेटर में अपने नाच देखने वालों की भीड़ देखी थी, जिसमें शाम को लोग अपने अच्छे से अच्छे कपड़े पहनकर आते थे। जिनके चेहरे से मादकता, मस्ती और खुशी झलकती थी। जिनकी आंखों में वासना लहराती, जिनके होंठों पर एक प्यास थिरकती, जो उसे देखते, घूरते और फिर किसी आनन्द की कल्पना करते हुए मदहोश हो जाते । उन्हें देखकर मालूम होता कि संसार में किसी को कोई दुख नहीं है, कोई कष्ट नहीं है। यह संसार एक मौज-मस्ती का मेला है। यह भीड़ उससे बिल्कुल भिन्न थी। वाल विखरे हुए, कपड़े अस्त- व्यस्त । चेहरे पर चिन्ता और व्याकुलता की रेखाएं । कुछ आंसू बहा रहे थे। इन्हें देखकर मालूम होता था कि संसार में ममता, प्यार, प्रेम भी कोई चीज़ है । किसी से किसी का रिश्ता भी होता है । संबंध होता है, रिश्तेदार होते हैं, सगे-संबंधी होते हैं, कुछ लोग अपने भी होते हैं । इन्हें देखकर मालूम होता था कि हर आदमी दुखी है, पीड़ित है। इस संसार में सिवाय दुख-दर्द के कुछ और नहीं है। हर एक की जुबान पर एक ही शब्द था- 'हे भगवान !' यह भक्तों की भीड़ थी। कैजुअलटी वार्ड में दो डाक्टर और तीन नर्से थीं। अनिल को स्ट्रेचर से मेज़ पर लिटा दिया गया। एक डाक्टर ने पूछा-'क्या हुआ ?' लूसी ने कहा-~~'एक्सीडेन्ट हो...' डाक्टर ने फिर पूछा-'कैसे हुआ?' लूसी ने उत्तर दिया-'हम लोग कार में जा रहे थे कि अचानक इनके मुंह से चीख निकली और कार खम्भे से टकरा गई।' डाक्टर ने फिर पूछा-'आपके भी चोट आई है ?' लूसी ने कहा-'कोई खास नहीं। बस टांग और हाथ पर खरोंच आ गई है। 'इनका क्या नाम है ?' 'अनिल' -

२७
'आप बैठिये । मैं इन्हें देखता हूं।'
डाक्टर ने अनिल को देखा और फिर बोला-'मिसेज अनिल, आप
घवराइये नही, इन्हें होश आ जायेगा। हैमेरेज तो मालूम नही होता ।
सदमा पहुंचने मे बेहोश हो गये हैं । टांग पर मूजन है । उसका एक्सरे करना
पड़ेगा।
लूसी के शरीर में डाक्टर के मुख से 'मिसेज अनिल' का सम्बोधन सुन
कर एक कंपकंपी-सी आ गई । वह उसकी बात को वही काट देना चाहती
थी, लेकिन बोल न मकी। डाक्टर ने अनिल को एक इंजेक्शन दे दिया
और फिर कहा-'मिसेज अनिल...'
'मैं मिसेज़ अनिल नहीं हूं।'
'आइ एम सॉरी। यह बहुत बच गये । आप इनकी मिसेज को टैलीफोन
कर दीजिए।
'इनकी शादी नही हुई है।
'इनके घर में कोई और है ?'
'कोई नहीं।'
'आपका इनमे क्या रिश्ता है ?"
'जी, जी. मेरा'"इनमे "मेरा मतलब है कि मैं.. और यह कार
में जा रहे थे ।'
'वो तो ठीक है। आपका इनमे क्या मंबध है ?'
'मैंने कहा ना कि मैं...'
'मैं मब समझ गया।'
'मैं इनकी पडोसिन है।'
डाक्टर ने एक ऐसी मुस्कराहट दी जिसके लिए किसी ने कहा है-
'मजबू भाप लेती है लिफाफा देखकर'-और कहा-
'आप भी अपनी चोट पर दवा लगवा लीजिए।'
'मेरे बहुत मामूली-सी चोट आई है।'
'फिर भी।'
एक नर्स ने उमको बांह पर और फिर टाग पर जहां खरोंच आई यी
दवा लगा दी।

AY
लूसी ने टेलीफोन देखा तो डाक्टर से पूछा-'क्या मैं टेलीफोन कर
सकती हूं?'
'कर लीजिए।'-डाक्टर ने स्वीकृति देते हुए कहा।
लूसी ने टेलीफोन उठाया और फिर नम्बर मिलाया और...
'हैलो।'
'मैं लूसी बोल रही हूं।'
'आप कहां से बोल रही हैं ?'
'मैं अस्पताल से बोल रही हूं।'
'क्या बात हो गई ?'
'मैं थियेटर आ रही थी कि रास्ते में एक्सीडेन्ट हो गया। बहुत चोट
तो नहीं आई है । लेकिन मैं आज डांस नहीं कर सकूँगी।"
'क्या बात है ? चल फिर तो सकती हैं ?'
'हां, लेकिन आज डांस करने का मूड नहीं है ।'
'यह आप क्या कह रही हैं ! यहां पर काफी लोग जमा हैं । टिकट विक
चुके हैं।'
'आप टिकटों के पैसे वापिस कर दीजिए।'
'लोग वहुत उतावले हो रहे हैं । अगर आज डांस न हुआ तो लोग
कुर्सियां तोड़ देंगे और न जाने क्या-क्या करेंगे। बहुत नुकसान हो जाएगा।
'अगर मैं मर जाती तो...'
'तो शायद लोग सब कर लेते।'
'तो फिर कह दीजिए कि मैं मर गई हूं।'
'यह आप क्या कह रही हैं ! मरें आप के दुश्मन, मिस लूसी। यह
शो विज़नस है । एक बार शो उखड़ जाए तो फिर नहीं जमता। आप यहां
आइए तो सही। आपको याद होगा कि पिछले साल जिस दिन मिस शोभा
की मां की मृत्यु हुई थी उसने उस दिन भी डांस किया था।...
'आप कौन से अस्पताल से बोल रही हैं ?'
'सफदरजंग अस्पताल से ।'
'अच्छा। मैं कार लेकर आ रहा हूं। आप अस्पताल के बाहर बस स्टेंड
पर आ जाइए।' टेलीफोन वन्द हो गया। लूसी ने रिसीवर रख दिया।

उसने एक ठंडी सांस ली और उनके मुख से यह शन्द निकल-'यह हो
विजनेस है।'बिउमेस ।'
डाक्टर ने सिर से पाव तक इस तरह देखा जैसे कोई बच्चा पहली बार
हाथी को देख रहा हो और फिर कहा-
'बाप डांस भी करती हैं ?'
'जी, हा।'
'कौन-सा?'
"कवरे।'
'कबरे !'-डाक्टर ने आश्चर्य में यह शब्द फिर दोहराया।
'यह भी क्या आप के माय डाम करते हैं ?'
'जी, नहीं।'
'फिर यह क्या करते हैं ?'
'यह एक परकार हैं।'
'अच्छा।'
'डाक्टर, इन्हें होश आ जाएगा न !'
'विल्कुल आ जाएगा। आप चिन्ता न कीजिए !'
इतने में नम आई और उसने डाक्टर में कहा-'उसे होश आ गया
है।' डाक्टर उठ गया और अनिल के पास गया और उसके माप ही लूसी
भी गई।
"
'मैं क "ह हूं?' अनिल ने पूछा।
'आप अस्पताल में हैं।' -डाक्टर ने कहा ।
'वो कहां है
लूमी एकदम आगे बढ़ी और उसका हाथ अपने आप अनिल के माथे
पर पहुंच गया और उसने कहा-'अनिल !'
'आपके चोट तो नहीं लगी?'
'नहीं।'
'आपकी तबियत कैसी है ?'
'वस, पैर में दर्द हो रहा है।
'इसका अभी एक्सरा किया जाएगा।'-~डाक्टर ने कहा।

'आई एम सॉरी, लूसी, मुझे माफ करना। -अनिल ने कहा । 'माफी किस वात की ?चोट तो आपको लगी है। मैं तो विल्कुल ठीक three . 'आप जाइए । मापको डांस के लिए देर हो रही है । लोग उतावले हो रहे होंगे।' 'मैं रात को डांस के बाद आऊंगी।' 'मैं इन्हें वार्ड नम्बर ६ में भेज दूंगा और रात को वहां पर कोई औरत नहीं ठहर सकती। आप सुवह आकर मिल सकती हैं।' डाक्टर ने कहा। 'आधी रात को कहां आओगी और कैसे आओगी! अच्छा अव जाइए मापको देर हो रही है।' लूसी चुपचाप वहां से चल दी। चलते-चलते उसके दर्द का एक टुकड़ा आंखों से बाहर टपक पड़ा। लूसी अस्पताल से जैसे ही बाहर आई थियेटर का मैनेजर कार लेकर पहुंच गया। लूसी कार में बैठ गई । मैनेजर ने उत्सुकता से पूछा- 'एक्सीडेन्ट कहां हुआ ?' 'सड़क पर।' 'कब हुआ ?' 'जव बुरा वक्त आ गया। ?' 'बस हो ही गया।' 'आप टैक्सी से आ रही थीं। 'कैसे हुआ 'हां। 'पर आज तो टैक्सी की हड़ताल है ! 'हां।' 'कार वाला कौन था?' 'हां। ----मैनेजर ने आश्चर्य से लूसी की ओर देखा और एक बार फिर अपना प्रश्न दोहराया- 'कार वाला कौन था ?'

'एक आदमी था, जिसे आप नहीं जानते। रास्ते में खम्भे मे टक्कर हो गई, उसके काफी चोट आई लेकिन मैं बच गई । केवल आपके थियेटर में डास करने के लिए। —लूसी ने एक ही सांस में यह सब कह डाला। लूसी इस समय अपने विचारों में खोई हुई थी। वह नहीं चाहती थी कि कोई उससे बात करे। उसके जो मे तो आया था कि मैनेजर से कह दे कि चुपचाप कार चलाओ और दात मत करी । लेकिन वह कह न सकी और उसके प्रश्नों का उत्तर एक कम्प्यूटर की तरह देती रही। थियेटर पहुचते ही मैनेजर ने कहा-'आज देर हो गई। आप जल्दी से मेकअप कर लीजिए और तैयार हो जाइये । आज तो कोई ऐसा भडकता हुआ डास दीजिए कि बस लोग झूम उठे। आज डास देर से शुरू होने की सारी कसर निकाल दीजिए।' लूसी मेकअप करके बाहर आई तो मैनेजर ने कहा-'आज कुछ मेक- अप ठीक नही हुआ है। लूसी ने कोई उत्तर नहीं दिया । वो स्टेज पर चली गई। लूसी का नृत्य आरम्भ हुआ, लेकिन आज उसके नृत्य मे वह उत्साह, वह मादकता, वह भाव-भगिमा नहीं थी। वह एक मगीन की चांप रही थी। उसके हाथ-पैर हिल रहे थे—एक कठपुतली की तरह । वह सोच रही थी कि वह कितनी लाचार है, कितनी वेबम है। वह नाच रही थी, क्योकि उसे नाचना था। वह सोच रही थी कि उसकी स्थिति एक लटू की तरह है, जो डोर खीचने पर धूमने लगता है । तरह - । ५ उसकी वह मुस्कराहट जिसे देखकर दर्शकों को लगता था कि जैसे मंदिर में कोई लौ झिलमिला रही हो, आज बिल्कुल फीकी थी। उसके हृदय में आज एक अजीब उथल-पुथल थी। एक हलचल थी। एक उलझन थी। उसके हृदय के धागे आज उलझे हुए थे। और जैसे कोई किसी धागे को सुलझाने का प्रयत्न करते-करते ऊबकर थककर, एक झटके से धागा तोड़ देता है उसी तरह लूसी ने अपना नाच समाप्त कर दिया और फिर सीधे अपने मेकअप रूम में चली गई। कपड़े बदले और फिर बाहर को. आई तो मैनेजर ने कहा'आज आपके नाच में वो बात नहीं आई। वो मज़ा नहीं आया। वो रौनक नहीं आई। वह अदायगी नहीं आई।' लूसी ने कोई उत्तर नहीं दिया। सीधी थियेटर से बाहर आ गई। विना उमंग से अपने काम को पूरा किया। अब कुछ टैक्सियां चलने लगी थीं। उसने टैक्सी रोकी और सीधी घर पर आ गई। लक्ष्मी ने दरवाजा खोला और वो सीधी डाइनिंग टेविल की एक कुर्सी पर बैठी और फिर अपनी दोनों बांहों के बीच अपना सिर रख दिया । लक्ष्मी ने पूछा---'ह्विस्की लाऊं ?' 'नहीं।' लक्ष्मी लूसी के मन की भावना को जानने के लिए उत्सुक नज़र आयी। उसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने फिर पूछा-'आज ह्विस्की नहीं...' 'नहीं। 'क्या आज थकी नहीं ?' 'आज तो बहुत थक गई हूं। मन में एक उथल-पुथल मची हुई है, एक हलचल हो रही है, एक टीस उठ रही है, लेकिन आज मैं इस हलचल को -- .

४३ शान्त नहीं करना चाहती। आज मैं इस ददं को "हां इस मीठे दर्द को झेलना चाहती हूं, मिटाना नहीं।' 'आज, दीदी, आप कैसे गई थी ? टैक्सी वालों की हड़ताल पी।' 'अनिल के साथ।' 'यो...वो."उसके साथ...! वो कहां मिल गया ?' 'जब मिलना हो तो मुलाकात हो ही जाती है। पर रास्ते में आग दुर्घटना हो गई।' 'हाय राम, दुर्घटना' लदमी ने ठंडी सास खीचते हुए कहा--'चोट तो नही आई" 'मुझे तो चोट नहीं लगी, पर वो बेहोग हो गया। मैं उसे अस्पताल ले गई और फिर डास पर चली गई। "उसे बेहोश छोड़ कर "दीदी, आप डास पर चली गई !' 'हा, मैं डांसर जो हूं, नाचने वाली, हमारा कोई अपना नहीं, हम किसी के नहीं, बस हम तो एक खिलौना है, केवल एक तमागा । मनोरंजन और दिल बहलाने की वस्तु । और हमारे भी दिल होता है, यह किसी को मालूम नहीं, न कोई जानता है और न जानने का प्रयत्न करता है । भला जानने का प्रयास भी क्यों करे!' यह कहते-कहते सूसी खो गई । उसे लगा कि उसकी हृदय की वीणा के तार पर किसी ने एक विकल गनी की धुन छेड दी। अतीत को स्मृतियों ने उसे घेर लिया। पुरानी यादों ने उमे लपेट लिया। धीरे-धीरे यह धीमी तया दर्द भरी संगीत लहरी एक कोलाहल में बदल गई। इम कोलाहल में भी उभरती हुई चीखें, लम्बी दर्दनाक मिसकिया, कराहनी हुई आवाज । वह वचन हो गई। वह तड़प उठी । उमे अपना आर्तनाद यमह हो गया। वह भीतर ही भीतर अनुभव करने लगी कि वह रो रही है." चोप-धोडकर रो रही है। कुछ देर बाद वह अपने इस यातनाद कांदवाकर गौचन fre क्यों रोये, वह क्यों आंसू बहाये । वह जो मानन्द वाटती है, वह जो पानी लुटाती है, वह जो मुमराह विमग्नी है। याममा एक भी सनी नहीं, एक भी गुण नहीं। यह पता intil fath ४४. ! रहे । वह भी बहारों से लिपट जाये, नई कोपलों और पत्तों से अपने को ढक ले । वह मुस्कराई, हंसी और फिर ज़ोर से हंसी । लक्ष्मो को एक प्याला काफी लाने को कहा । लक्ष्मी ने काफी का प्याला लाकर उसके सामने रख दिया। वह काफी की चुस्कियां लेते हुए बुदबुदायी- क्या मेरा कोई अपना नहीं हो सकता! क्या मैं किसीकी नहीं हो सकती ? इतनी बड़ी दुनिया में क्या कोई मेरा हमदर्द नहीं हो सकता? क्या कोई ऐसा नहीं हो सकता जो मेरे शरीर को नहीं मुझे चाहे ? क्या कोई ऐसा नहीं हो सकता जो मेरे शरीर को नहीं बलिक मुझे दिल में समाये ? जो मुझे अपने बिस्तर पर लिटाने की जगह मुझे अपने हृदय में विठा ले । जो मुझे ललचाई नज़रों से न देखे । जिसकी बांहों के कसाव में स्वार्थ न हो, जिसके आलिंगन में मुझे मसल देने का इरादा न हो, जिसके चुम्बन में वासना की आग नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम की छाप हो । जिससे चिपककर, लिपटकर कामुक क्रियाओं का खेल न खेला जाये बल्कि जिसके सीने पर सिर रखकर वह अपना दर्द भूल जाये और उसे शान्ति मिले।' वह अपनी कल्पना की उड़ान में बड़ी देर तक खोई रही और फिर उठ कर अपने बिस्तर पर चली गई। वह करवटें बदलती रही। उसे नींद नहीं आई। चलचित्र की तरह अनिल की भिन्न-भिन्न तस्वीरें उसके सामने आई । अनिल जव पहले-पहल उससे मिलने आया था। उसने लक्ष्मी से कहा था-'मैं उनसे मिलने आया हूं और मिलकर ही जाऊंगा।' उसे देखकर वह समझी थी कि वह भी कोई रस का लोभी भंवरा है । परन्तु उसने उसका रूप नहीं बल्कि उसका दर्द देखा था। उसने कहा था-'आपकी मुस्कराहट एक दर्द की मुस्कराहट है । आपका अंग-संचालन एक पीड़ा की ऐंठन है।' किसी पुरुष को समझने में पहली बार उसने गलती की थी। दूसरी तसवीर : जब वह अनिल के घर अपना सारा क्रोध उड़ेलने गई थी, उसका यह कहना--'आप अपने दिल से पूछिये, अपने मन को टटोलिये, और फिर कहिये क्या यह कला है, हुनर है !' उसे ऐसे लगा था मानो किसी ने गर्म राख पर पानी के छीटें दे दिये हों। 'आपने भी शादी नहीं की या यह कहिये कि आपकी अभी तक शादी हुई नहीं।'-कहकर उसने उसके हृदय की सबसे भीतरी परत को उधेड़ दिया था। उसके बाद उसकी वह तस्वीर जव .

४५ । उसने उसे कनाट प्लेस मे गुंडों से बचाया था और फिर जब उसकी कार में बैठे-बैठे ब्रेक लगाने से वह उसके कंधे से टकराई थी। कसा मार्मिक था वह स्पर्श ! कितना खिंचाव था उस हार्दिक बंधन में । उसे अनिल की जो भी तस्वीर सामने आई उसमे एक सहज निश्चल आकर्पण प्रतीत हुआ। उसके बात करने में, उठने-बैठने में, चलने-फिरने मे एक मनमोहक शिष्टता दिखाई दी। वह इन तस्वीरो को देखते ही देखते न जाने कब सो गई और फिर उठ बैठी । अभी अंधेरा था, सवेरा नही हुआ था। उसने घड़ी देखी । अभी चार बजे थे। उसे विश्वास नहीं हुआ। उसे लगा जैसे घडी रुक गई हो। उसने घडी को कान से लगाकर देखा। घड़ी चल रही थी। उसने एक पत्रिका उठाई उसे पढ़ने लगी। दो-चार पन्ने पढने के बाद उसे मालूम हुआ कि वह सिर्फ पन्ने उलट रही है, उसकी आखें शब्दों पर तैर रही थी। उठते. बैठते, करवटें बदलते, कभी विचारों मे डूबते और कभी कल्पना मे तैरते, किसी तरह सवेरा हो गया। वह उठी। लक्ष्मी को उठाया । लक्ष्मी ने उठते हुए लूसी को एक आश्चर्यजनक दृष्टि से देखा । लूसी उसका प्रश्न समझते हुए बोली-'अस्पताल जाना है, जल्दी चाय वगैरा तैयार कर दो। थरमस मे काफी डाल दो। अस्पताल काफी लेकर जाऊंगी।' लक्ष्मी ने जानते हुए भी अनजान बनते हुए कहा-'अस्पताल में कौन है ?' 'वही।' 'वही कौन ?' "रात तुझे बताया तो था।' 'लो, मैं तो भूल ही गई थी।'–लक्ष्मो ने हसकर कहा। लूसी स्नान आदि से निपट कर, अनिल के लिए थरमस मे काफो लेकर अस्पताल पहुंच गई । अनिल अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था। लूसी का स्वागत करते हुए अनिल मुस्करा दिया। लूसी ने पूछा- 'कसे हैं आप?' 'रात को यह हाथ दर्द करता रहा।' 'रात नीद आ गई थी?' 'दर्द में नीद कहा आती है ! आप तो रात भर चैन से सोई होगी!'

४६ , 'मुझे भी नींद नहीं आई। कहकर वह कुछ सकपका गई। 'क्यों, आपको क्या हो गया?' कुछ नहीं, बस यूं ही।' दोनों मुस्करा दिये । लूसी ने थरमस में से काफी निकाली और काफी का प्याला अनिल की तरफ बढ़ाते हुए कहा-'लीजिए, काफी पीजिये ।' 'आपने क्यों कष्ट किया?' 'विश्वास कीजिए, मैं भी आपकी तरह कोई ऐसा काम नहीं करती, जिसमें मुझे कष्ट हो। दोनों की हल्की-सी हंसी फिर आपस में टकरा गई। अनिल ने बायें हाथ से काफी का प्याला पकड़ लिया। उसके दाहिने हाथ में चोट लगी थी। अनिल ने काफी का प्याला थामकर पूछा- 'आप नहीं पिएगी? 'मैं पीकर आई हूं।' 'क्या कहा, सुबह ही सुवह पीकर आई हो ?' 'जी हां, सिर्फ काफी ।' दोनों खिलखिला कर हंस दिए । 'काफी बहुत अच्छी बनी है।'-~-अनिल ने काफी का चूंट पीते हुए कहा। 'सच !' 'हां।' 'आपके हाथ की बनी काफी पीकर तो मज़ा आ गया।' 'काफी मेरे हाथ की नहीं, लक्ष्मी के हाथ की बनी है। मैं उससे कह दूंगी।" 'क्या? 'यही कि आपको लक्ष्मी के हाथ की काफी पीकर मज़ा आ गया, ठीक है न !' ---दोनों फिर हंस दिए। हंसी में सरसता थी और उल्लास भी। अनिल का उस दिन एक्सरे हुआ। उसकी दायें हाथ की हड्डी में दरार आ गई थी। हाथ पर तीन सप्ताह के लिए प्लास्टर कर दिया गया और उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। लूसी उस दिन प्लास्टर होने तक उसके साथ रही और फिर उसे टैक्सी में विठाकर उसके घर ले आई। अनिल

टैक्सी से उतरा तो लुसी ने कहा-'मैं इसी टंक्सी नगे अपने पर से
जाऊंगी।'
'अब कब आओगी?'
'भव फुरसत मिलेगी।
'कव पुरमत मिलेगी?'
'कल।"
दोनों ने एक अर्थपूर्ण रप्टि से एक दूसरे को देखा और फिर टैक्सी
चल दी।

१ । ६ दूसरे दिन सवेरे से ही लूसी का मन अनिल के पास जाने के लिए छटपटाने लगा। वह कुछ गुनगुना रही थी। लक्ष्मी से उसका यह परिवर्तन छिपा नहीं रहा । चेहरे से उसकी भावना प्रकट हो रही थी। लक्ष्मी ने कहा---'दीदी, क्या उससे मिलने जाना है ?' 'किससे?' 'उसी से, जिससे टक्कर हुई थी। लक्ष्मी ने हंसते हुए कहा । 'वो बीमार है, खवर लेने तो जाना ही चाहिए।' 'एक दिन पहले भी तो उसके यहां गई थीं। तव भी आपने कहा था कि ऐसी खवर लूंगी कि याद रखेगा।' लक्ष्मी ने व्यंग कसते हुए कहा । 'नहीं, वैसी खबर नहीं।' यह कहकर लूसी जोर से हंस दी। 'आदमी तो शरीफ मालूम होता है ।'---लक्ष्मी ने उसका मन कुरेदने के लिए कहा। 'लगता तो शरीफ ही है। औरों से बिल्कुल अलग । दूसरों से एकदम भिन्न । निष्कपट, निश्छल, जैसा मन के अन्दर वैसा ही बाहर । कितना सरल, सभ्य, सहृदय और सौम्य !' यह कहते हुए उसकी पलक बन्द हो गई और उसके चेहरे की आकृति एक सुन्दर, सुखद और सुहावने सपने की प्रतिक्रिया से जगमगा उठी। वह खो गई सपनों की झिलमिल में वह, उड़ गई कल्पना के पंखों पर । ऊंची, और ऊंची और बहुत ऊंची। लूसी जब अनिल के पास पहुंची तो वह बिस्तर पर लेटा हुआ था। लूसी ने जाते ही कहा- 'गुडमानिग।' 'वेरी गुडमानिग'---अनिल ने उत्तर दिया। 'क्या मतलब?' - 'मतलब यह कि आज की मानिंग तो गुड से देरी गुड हो गई है।' 'वो कैसे?' "आप जो आ गई हैं।' दोनों मुस्करा दिए । लूसी अनिल के सामने कुर्सी पर बैठ गई। लूसी ने पूछा- 'आपकी तबियत कैसी है ?' 'ठीक है । लेकिन यह बाजू रात दर्द करता रहा।' 'बहुत दर्द है क्या ?" 'बहुत तो नही पर दर्द है। डाक्टर ने कहा था कि एक-आध दिन दर्द होगा फिर ठीक हो जायेगा।' कुछ क्षण दोनो चुप रहे और फिर लूसी ने मौन मंग किया- 'मुझे बहुत अफसोस है। आपको मेरी वजह से चोट लग गई है । दर- असल मैं बहुत भाग्यहीन हू । दुर्भाग्य तो मेरा जन्म का साथी है । वह मेरा पीछा नहीं छोड़ता। मैंने अपने साथ आपको भी लपेट लिया।' 'गलत । यह चोट आपकी वजह से नहीं लगी। आप भाग्यशाली हैं । आपकी वजह से मैं भी वच गया, वरना अपना तो 'राम नाम सत्य है' हो गया होता।' 'ओह, नो, भगवान के लिए ऐसा मत कहिए।' अनिल का कंबल उसकी टाग से एक सरफ हट गया। अनिल ने झुककर उमे बायें हाथ से ठीक करने का प्रयत्न किया तो लूसी ने फौरन उठकर कंबल ठीक कर उमके ऊपर कर दिया। 'इम प्लास्टर ने तो मुझे अपाहिज बना दिया। दाया हाथ है ना, बाया हाथ होता तो इतनी दिक्कत न होती।' 'तीन हफ्ते तो यू गुजर जायेंगे।'—लसी ने चुटकी बजाते हुए कहा। 'जी नहीं, तीन हफ्ते तो तीन हफ्तो मे ही गुजरेंगे।' दोनो हम दिए। 'ओह, आप चाय पियेंगी या काफी माफ कीजिएगा, मेरे यहा ह्विस्की नहीं मिलेगी। अगर आप बुरा न मानें तो मैं कह दू कि मुझे आपका शराब पीना अच्छा नहीं लगता। मुझे शराब से नफरत है।'

-
'मुझसे तो नहीं !'-लूसी ने एक प्रश्नसूचक दृष्टि फेंकते हुए कहा ।
अनिल ने अपनी एक मधुर मुस्कान से सिर हिलाकर कह दिया-
'नहीं', और फिर बोला-'नौकर बाहर गया है। थोड़ी देर में आ जाएगा
तो काफी बना देगा। मेरा तो हाथ बंधा है, वरना मैं खुद ही काफी बना
कर पेश कर देता।'
'लेकिन मेरे हाथ तो ठीक हैं । मैं आपके लिए काफी बनाकर लाती
.
--
'आप क्यों कष्ट कर रही हैं !'
'मैं आपको पहले भी कह चुकी हूं कि मैं ऐसा कोई काम नहीं करती
जिसमें मुझे कष्ट हो । बस इतना बता दीजिए कि काफी, दूध, चीनी तो है
'सव रसोई में है।'
'स्टोव है या गैस ?'
'गैस।
'तो फिर क्या मुश्किल है ! मैं अभी बनाकर लाई।'
अनिल चारपाई से उठने लगा तो लुसी ने आग्रह किया-'आप लेटे
रहिए, मुझे आपकी रसोई का रास्ता मालूम है ।
'मैं आपको बता दूं कि दूध-चीनी कहां रखी है।'---अनिल फिर उठने
लगा तो लूसी ने व्यंग कसा:
'विश्वास रखिए मैं आपकी रसोई से कुछ चुराऊंगी नहीं। आप
लेटे रहिए।'
लूसी रसोई में चुपचाप चली गई। गैस जलाई और एक पतीले में
पानी डालकर गैस पर रख दिया। उसे इस समय एक विशेष आनन्द का
अनुभव हो रहा था। एक विशेप अनुभूति मिल रही थी। वह गुनगुनाने लगी
और फिर कुछ सोचकर एकदम चुप हो गई । उसका चेहरा शर्म से लाल हो
गया। चीनी और दूध पास ही रखा था। उसने दो प्याले काफी वनाई और
अनिल के सामने रखते हुए कहा ।
'लीजिए सरकार, काफी तैयार है।'
'काफी तो बहुत बढ़िया वनी है।'

५१ । 'विना चसे ही कह दिया !' 'जिम तरह कई पंडित माया देखकर भविष्य बता देते हैं, इसी तरह मैंने काफी की शकल देखकर बता दिया कि काफी बहुत बढ़िया है।' 'धन्यवाद। 'धन्यवाद, तो मुझे आपका करना चाहिए।' 'तो चलो आप भी धन्यवाद कह दीजिए।' 'धन्यवाद। 'चलो हिसाय वरावर हो गया।'-सूसी ने हंसकर महा। लूसी ने काफी का प्याला उठाकर अनिल की ओर बढाया और उसने उससे पलट कर बाएं हाथ मे थाम लिया। दोनो काफी को चुस्किया भरने लगे । बीच-बीच में एक दूसरे की तरफ देख लेते और कभी-कभी नजरें टकरा जाती। कुछ देर दोनो चुप रहे, फिर अनिल ने कहा- 'आप क्या सोच रही है ?' आप क्या सोच रहे हैं ? 'पहले आप बताइए 'पहले आप बताइए।' 'लेडीज़ फट । 'मैं सोच रही थी. मैं सोच रही थी तो मुझे...' 'अब पता चला कि कुछ भी नहीं सोच रही थी।' दोनो हस दिए और इस हसी मे अनिल जो प्याला बायें हाय मे थामे हुए था मंभल न सका। काफी का प्याला उसके हाथ मे छूट गया और उसके तमाम छीटे लूसी की साडी पर जा गिरे । अनिल ने झेंपते हुए कहा । 'माफ कीजिएगा । बायें हाथ में प्याला था। इसीलिए संभाल नहीं सका।' 'कोई बात नहीं । वच्चो और बीमारी से ऐसी बातें हो ही जाती हैं।' 'आपकी साही खराव हो गई। यह काफी के दाग तो नहीं जायेंगे।' 'नही जायेंगे तो न जाएं । यही पड़े रहे । अपना क्या ले लेंगे।' 'एक निशानी छोड़ जायेंगे।' लूसी उठी और रसोई से गीला रूमाल किया और फिर साड़ी पर ।

-- काफी के दाग पड़े थे फेरने लगी। 'मुझे बड़ा अफसोस है।' अफसोस की बात छोडिए । कोई खुशी की बात कीजिए।' 'हां, तो मुझे बहुत खुशी हुई है कि आप यहां आ गई।' इसी तरह कुछ सवाल करते, कुछ जवाब देते, कुछ पूछते, कुछ बताते, कुछ हंसते और कुछ हंसाते. कुछ सुनते और कुछ सुनाते कई घंटे बीत गये और फिर लूसी ने उस दिन के लिए अनिल से विदा ली। दूसरे दिन उसका मन अनिल के पास जाने के लिए फिर छटपटाने लगा। लेकिन उसके मस्तिष्क ने सोचा कि रोज-रोज़ जाना ठीक नहीं। वो उसका कौन है ? वो भी एक पुरुष है और किसी भी पुरुष पर विश्वास नहीं किया जा सकता। उसके मन और मस्तिष्क में एक द्वंद्व छिड़ गया। वह इसी उलझन में उलझी हुई घर से निकल पड़ी। वह सोचती रही कि उसे नहीं जाना चाहिये, लेकिन कदम आगे बढ़ते गये। एक खाली टैक्सी जाते देख उसके मुख से अनायास ही निकल गया-टैक्सी!' टैक्सी रुक गई और वह उसमें वैठ गई। मन और मस्तिष्क का द्वंद्व अब भी जारी था। लेकिन टैक्सी दौड़ रही थी अनिल के घर की ओर । थोड़ी देर में उसने अपने आपको अनिल के दरवाजे पर खड़ी पाया। उसका हाथ दरवाजे पर लगी घंटी की ओर बढ़ा, फिर रुका और फिर उसने घंटी की ओर हाथ बढ़ाया और घंटी दवा दी। अनिल ने अन्दर से आवाज़ दी. 'चले आइये, दरवाजा खुला है।' लूसी ने दरवाजा खोला। अनिल एक पत्र पढ़ रहा था। लूसी ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया और अनिल ने अपना बायां हाथ ऊपर उठा दिया। लूसी ने अनिल के पास बैठते हुए पूछा- 'अब हाथ कैसा है ?' 'अव तो पहले से ठीक है। रात को ठीक रहा है। दर्द नहीं हुआ। लेकिन दायां हाथ बंधा होने से बड़ी मुश्किल हो रही है।' 'वो तो होगी ही। 'कल आपकी साड़ी खराब हो गई उसका मुझे बड़ा अफसोस है।' 'विद्यार्थी की स्याही फैल जाये तो कहा जाता है कि वह पास हो ५६ जायेगा। इसी तरह अगर हाथ में काफी फैल गई तो इसका मतलब हुआ कि हाय विल्कुल ठीक हो जायेगा।' "आप कहती हैं तो जरूर ठीक हो जायेगा।' अनिल ने मुस्कराते हुए कहा। अनिल ने लूसी को वह पत्र, जो वह पर रहा था, दिखाते हुए कहा- 'यह एक पत्रिका के सम्पादक का पत्र है। उनका एक विशेषाक निकल रहा है। इन्हें एक कहानी भेजने का वायदा किया था। कहानी लिख चुका हूं। बस आखिरी पैराग्राफ लिखना है, लेकिन दाया हाय प्लास्टर में होने के कारण अब एक महीने तक नहीं लिय सकूगा। और तब तक विशेषाक प्रकाशित हो जायेगा। 'आपके पास टाइप राइटर तो है । -आप वोलते जाइए मैं टाइप कर दूगी। अनिल ने आश्चर्यचकित स्वर में पूछा---'आप टाइप कर लेती हैं !' "जी हा, मैं कंबरे डांसर से पहले टाइपिस्ट थी।' लूसी यह वहबार सामने मेज पर पड़े टाइपराइटर के पास जावटी और टाइपराइटर पर उंगलियां दौडाने लगी।' 'आप टाइपिस्ट से कंबरे डासर कसे बनी?" 'यह एक लम्बी कहानी है। इसे छोडिये । पहले आप अपनी यहानी पूरी कीजिए।' लूसी ने झट मे पास पड़े हुए कागज टाइपराइटर पर चढा लिए और कहा-'बोलिए।' अनिल ने लूमी को मेज पर पडे हुए कागज और कहानी के पन्ने उसे देने को कहा । लूमी ने वह पन्ने उमे पकडा दिए, उमने अंतिम पृष्ठ पदा और फिर पहा- -लिखिए. राजन आज एक महीने बाद लौटा था। इन एक महीने में नीलू हर पल, हर क्षण उसके दिल और दिमाग मे रही। वह जल्दी से जल्दी अपनी नीलू के पास पहुंच जाना चाहता था। नीलू जो उमके हृदय की धड़कनो मे बस गई यो । नीलू जो उसके हृदय की गहराइयों में उतर गई थी। नीलू जिसने उसके प्यार की कसमें खाई थी । नीलू जिसने उसमे गादी का वायदा .. किया था । नीलू उसकी सब कुछ थी। उसका संसार नीलू से था। उसके हृदय से सिर्फ एक ही आवाज आती थी-नीलू, नीलू, नीलू । वह स्टेशन से उतरा । टैक्सी की और चल दिया अपनी नीलू से मिलने ।.रास्ते में वह सोच रहा था कि नीलू उसे देखते ही उससे लिपट जाएगी । उसकी छाती पर अपना सिर रख देगी और कहेगी-'आप बड़े वो हो। इतने दिन कहां रहे ? यूं मुझे छोड़कर मत जाया करो।' वह इन सब बातों का जवाब उसे अपनी बांहों में बांधकर एक प्रेम भरे चुम्बन से देगा। टैक्सी इंडिया गेट के पास से जा रही थी। पेड़ों पर अंधेरा छाने लगा था। अचानक दूर घास पर उसे एक साया दिखाई दिया। उसने टैक्सी रोकी और वह वहां उतर गया । वो साया नीलू का था। वो तो उसके साये को भी पहचानता था । वह उस ओर चल पड़ा। उसने देखा नीलू किसी युवक की गोद में सिर रखकर लेटी है और वह युवक उसके वालों को सहला रहा है । वह चौंका । चकराया। इतना विश्वासघात! औरत सिर्फ एक फन्दा है, एक जाल है, एक छलावा है । उसका प्यार धोखा है, उसका प्रेम झूठा लूसी की उंगलियां टाइपराइटर पर दौड़ती हुई एकदम रुक गई और वह जोर से बोली- 'यह गलत है, यह झूठ है । पुरुप ने स्त्री को सदा एक खिलौना समझा है। केवल अपनी वासना । तृप्ति का साधन । पुरुप ने स्त्री को सदा ठगा है। स्त्री तो सीता, सावित्री और पद्मिनी होती है और पुरुप रावण और कंस।' 'न हर स्त्री सीता होती है और न सावित्री । और इसी तरह न हर पुरुष रावण होता है और न कंस । अच्छे आदमी भी होते हैं और बुरी औरतें भी।-अनिल ने उत्तर दिया। 'इतिहास गवाह है कि पुरुप ने स्त्री पर सदा अत्याचार किया है। उसकी लाचारी और वेवसी का अनुचित लाभ उठाया है। उसे केवल भोग की वस्तु समझा है । वैशाली में । वैशाली में सुन्दर स्त्री को नगरवधू घोषित करने की प्रथा थी। सर्वसुन्दरी आम्रपाली को नगरवधू बनाया गया था।

वह गणिका बना दी गई थी। गणिका यानी कि वेश्या, ताकि उस पर एक का अधिकार न रहे। ताकि उसका सौदर्य-रस-पान वंशाली के विलासी धनिक, राजपुन और शक्तिशाली लोग कर सकें । पुरुष समाज का विचार था कि स्त्री भोगने की वस्तु है और सर्वसुन्दरी एक उत्तम मदिरा की तरह मदिरालय में सब में वाटी जाए। वह किसी एक पात्र में सौमित न रहकर प्रत्येक रसिक, मद्यपान करने वाले, के जाम में छलक जाए।' लूसी यह सब एक साथ एकदम कह गई । अनिल ने कहा--'आपने जो भी कहा और जिस तरह कहा उसकी मैं दाद देता हूँ। आपको तो लेखिका होना चाहिए था। 'मैं लेखिका नहीं बनना चाहती । आप यह बताइए कि जो कुछ मैंने कहा है वह सच है या नहीं? 'सच है, बिल्कुल सच है । लेकिन यह तो तसवीर का एक पहलू है। विषकन्या भी तो औरत ही होती थी। वेश्या भी तो औरत ही होती है।' 'विष कन्या को विप किसने दिया? उसमें विष किसने भरा? पुरुप के स्वार्थ ने औरत को वेश्या बनाया है। कोई भी औरत वेश्या बनती नहीं। वह वैश्या बनाई जाती है। वेश्या बनना पड़ता है उसे।' 'अब तो ऐसा लगता है कि आपको वकील होना चाहिए था। आपके तर्क का जवाब नहीं।' 'माधारण आदमी को तो छोडिए, लेकिन संसार के प्रसिद्ध व्यक्तियों ने भी औरत से केवल उसके शरीर को चाहा है। उससे अपनी रातें गर्म की है । अपने बिस्तर की सजावट समझा है। इंग्लैंड का सिरमौर, इंग्लैंड का गौरव, इंग्लंड का महान् कवि वापरल औरत को विस्तर तक ही प्यार करता था । हर रात अपने विस्तार को नई औरत से सजाता था। औरत उसके लिए एक रसदार फल थी। जिसका रस चूसने के बाद वह उमे बचे हुए फल के गूंद की तरह फेंक देता था। उसने न जाने कितनी कुमारियों का कौमार्य भंग किया, न जाने कितनी पलियों का सतीत्व नष्ट किया और न जाने कितनी सुन्दरियों को अपनी ऐयाशी में डुबो दिया। और तो और, उसने अपनी सौतेली बहन भागस्टा में भी केवल एक औरत का मरीर देना । और उस शरीर से भी एक दिन गुंथ गया। फ्रांस का महान रूसो जिराने अनेक महिलाओं को अपनी कामुकता रूपी खेल का बनाया । वह छटपटाता रहा, वह बेचैन रहा, वह अशांत रहा और रहा । उराकी प्यास तब तक न बुझी जब तक उसने मादाम दावा शरीर को पा नहीं लिया। मादाम दावारेज जो उसे मुन्ना कहती थी यह मामा कहता था। 'चित्रकला का महारथी पिकासो। आधुनिक चित्रकला का पिकासो । रंगों का सबसे बड़ा खिलाड़ी पिकासो । वह औरत को भी एक रंग समझता था। जो रंग पसंद आया उसका प्रयोग किया और देर के बाद अपनी फूची धोकर दूसरे रंग में रंग दी। वह कपड़ों की औरत बदलता था। वह अपनी कलाप्रेमी औरतों को सीने से लगा और उनसे खुल खेलकर भोगने के बाद उन्हें इस तरह अलग फेंक जैसे वो कोई औरत नहीं, बल्कि उसके सीने पर रेंगती हुई छिपकली है सूसी यह सब एक भावात्मक अंदाज में कह गई। अनिल मुस्कर और बोला-'रवीन्द्रनाथ टैगोर, निराला, जयशंकर प्रसाद ऐसे म फपि जिनका परित्र वेदाग था। दुनिया में हर तरह के लोग हैं । औ भी अच्छी होती हैं और पुरुष भी। बुरी औरतें भी होती हैं और भी। गया आप समझती हैं दुनिया में कोई औरत बुरी नहीं है, हर औ एक देवी है?' ''नहीं, मैं यह तो नहीं कहती।' 'यह तो एक कहानी है।' 'किसकी?' 'सापको। आपके जीवन में क्या कोई नीलाई है?' नहीं। तो फिर यह कहानी किसकी है? कहानी जोक्स कहानी होती हैं कल्पित और गड़ी हुई में एक ऐसी कहानी लिखा दूंगा जिसमें पुरुष देवीको बत फिर तोबार खुश हो जाएंगी?' ":

५७ "हा, हो जाऊंगी।' 'तो पहले यह कहानी तो समाप्त कर लो।' 'बोलिए।' अनिल बोलता गया और वह टाइप करती रही। यह क्रम तीन सप्ताह तक चलता रहा : जब तक अनिल के हाथ का प्लास्टर नही उतरा। उसे टाइप करते हुए एक अद्भुत आनन्द की अनु- भूति होतो। उमे ऐसा लगता जमे कोई मंगीतज्ञ किसी साश पर रिमी गर्वया की संगत कर रहा हो। लूसी अपनी साडियों को अलमारी के सामने खड़ी थी। कभी हरी साडी निकालती और कभी पीली, कभी बनारमी तो कभी मैमूर के सिल्क को, कभी औरंगाबादी, तो कभी मुगिदावादी । उसको समझ में नहीं आ रहा था कि कौन-सी साडी पहने । आज उसके हृदय मे कोई उमंग गुदगुदा रही थी। वह चाहती थी कि आज वह सबसे अच्छी साडी पहने, शृगार करे, वह मुन्दर-बहुत सुन्दर और बहुत ही सुन्दर दिखाई दे । आकर्षण से सरावीर नवनीत की पुतली। उसने लक्ष्मी को आवाज दी और उत्सुकता से पूछा-- 'लक्ष्मी, कौन-मी साडी सबसे अच्छी लगती है " 'दोटी; तुम पर तो हर साडी खिलती है।' 'फिर भी, कौन-सी साडी...' 'क्या अनिल के पास जा रही हो 'हां, अव तो विल्कुल ठीक हो गए हैं । परसो उनके हाथ का प्लास्टर काट दिया गया । आज उन्होने इस खुशी मे मुझे खाने पर बुलाया है।' 'उनका खाना तो नौकर बनाता है न ?' 'आज हम लोग एक बडे होटल में खाना खायेंगे।' लक्ष्मी मुस्करा दे और अपनी धोती का पल्ला ठीक करती हुई . - बोली- 'आप यह बनारसी साड़ी पहन जाइए।' 'मैं भी यही सोच रही पी।' सूसो ने साडी पहनी । इसके बाद गहनो को बारी आई। उसने - एक-एक गहना अपने शरीर पर रखकर देखा और फिर छांटकर पहना। फिर शृंगार किया, जैसे वह स्वयं अपनी शृंगार कला की परीक्षा ले रही हो। इस तरह सज-संवर कर उसने फिर एक बार शीशा देखा और मन ही मन शीशे से कहा---'बहुत सुन्दर लग रही हो।' लक्ष्मी ने देखा तो झट से बोली- 'दीदी, काला टीका लगा लो, कहीं नज़र न लग जाए।' 'सच बता, लक्ष्मी, मैं कैसी लग रही हूं?' 'बस देखते ही वेहोश हो जाएगा।' 'उंह, अच्छा मैं जा रही हूं। रात को देर से लौटूंगी।' 'लौट तो आओगी।' लूसी रुकी, थिरकी, ठहरी, मुस्कराई और 'हां' कहकर चल दी। लूसी कनाटप्लेस काफी हाउस के पास आ गई। अनिल ने उसे यहीं मिलने के लिए कहा था। अनिल उसकी प्रतीक्षा में पहले से ही वहां खड़ा था। लूसी ने इधर-उधर देखा, लेकिन अनिल उसे दिखाई नहीं दिया। अनिल ने उसे देख लिया और चुपके से पास आकर कहा- 'क्या ढूंढ़ रही हैं मेम साहब ! क्या कुछ खो गया है ?' 'हां।' 'क्या?" 'जो अभी मिला नहीं है।' दोनों ज़ोर से हंस दिये । अनिल ने लूसी को सिर से पैर तक देखा और कहा---'आज कुछ कहने को जी चाहता है।' 'तो कह डालिये, मन में क्यों रखते हो।' 'आज आप बहुत सुन्दर और खूबसूरत लग रही हैं ।' लूसी यह वाक्य हज़ारों वार, लाखों वार सुन चुकी थी। उसके नाच के बाद जो आता, जो मिलता उसे यही कहता। वह यह वाक्य सुनते-सुनते ऊब गई थी। तंग आ गई थी। उसके लिए यह वाक्य वेजान हो गया था। लेकिन अनिल के मुख से यह सुनकर उसे इस घिसे-पिटे वाक्य में एक ताजगी महसूस हुई। उसे अच्छा लगा। उसे खुशी हुई। उसके हृदय में एक लहर-सी दौड़ गई। उसका जी चाहता था कि अनिल यह फिर कहे और वह फिर सुने। ।

१६ 'आप क्या पियेंगी?' अनित्त ने पूछ। "क्या मतलब?' 'आर तो डिक करती हैं न ! पहले यहां से कोई हिलो वर्गरा से लेते हैं, फिर पर चलते हैं। वहां आप डिक कर लीजिएगा और फिर यहो पाना खाने आ जायेंगे। 'आप तो डिक नहीं करते। 'तो फिर आप मुझे पीने के लिए क्यो बह रहे हैं ?' 'क्योकि आप पीती हैं। 'मैं पीती हूं, केवल अपनी उदासी दूर करने के लिए। मैं पीती हूं. जर मेरा कोई साथी नहीं होता। आज मैं मुश है और आप मेरे साथ हैं, इसलिए आज शराव की जरूरत नहीं । आज तो मुझे बिना पिये ही ना आ रहा 'तो जरा सभल के चलिएगा।' 'आज तो सभालने वाला मेरे साथ है।' दोनो हंस दिए और वायुमंडल मे उनको हमी की लहरें एक-दूसरे में घुल-मिल गई। अनिल और लूमी गेलार्ड की तरफ चल दिए । गडक पार करने गगे तो एक नेज रफ्तार मे आती हुई कार देगकर अनिन ने खूमी को कमर गे पकड़कर कहा-~-'जरा देखकर।' इस स्पर्श में अनिल के वदन में एक झुरझुरी दौड़ गई। उसे एक रोमाचित और मादक अनुभूति का अनुभव हुआ। अनिल का जी पाहता था कि प्रति क्षण इसी तरह कोई कार आती रहे और वह समी की कमर पर हाथ रखकर उमे इसी सरह सावधान करता रहे। सूमी भी दाग मे कम रोमांचित नहीं हुई। लूसी के वदन में भी इस पर गिहरन दौड गई। उसे भी इस म्प में अद्वितीय मुख, आनन्द और प्रय महमूस हुई। उसे लगा कि वह अभी नर अनी और अतृप्त रही ६० सड़क पार करते ही चिथड़ों में लिपटे एक जीर्ण-शीर्ण भिखारी ने. उसके सामने हाथ फैला दिया। अनिल ने कहा-'बावा माफ करो।' और आगे चल दिया। भिखारी निराश नहीं हुआ और यह कहता हुआ साथ- साथ चल दिया-'भगवान आपका भला करे । भगवान करे जोड़ी सलामत रहे। इस जोड़ी शब्द ने दोनों के हृदय को गुदगुदा दिया। लूसी रुकी और पर्स से एक रुपया निकालकर भिखारी को दे दिया। भिखारी उनको दुआयें देता हुआ और अपने भाग्य को सराहता हुआ चला गया। दोनों गेलार्ड गए। दोनों ने साथ-साथ खाना खाया। दोनों एक साथ कार में बैठे। दोनों के हृदय में उथल-पुथल मची हुई थी। दोनों के भीतर एक आंधी चल रही थी। दोनों के मस्तिष्क में विचारों के ववंडर उठ रहे थे। यह आंधी, यह बवंडर, यह विचार एक-दूसरे में घुल-मिल रहे थे। दोनों को लग रहा था कि उनमें कोई संबंध है, कोई रिश्ता है। दोनों को लग रहा था कि वे एक-दूसरे से जुड़े आ रहे हैं, बंधे जा रहे हैं, किसी अनजान डोर से । जुड़े आ रहे हैं, बंधे जा रहे हैं, किसी मजबूत धागे से, किसी अटूट कड़ी से। अनिल ने लूसी को उसके घर उतारा और फिर अपने घर आ गया। दोनों अपने-अपने घर में अपने-अपने विस्तर पर, अपने-अपने विचारों में मंडरा रहे थे। दोनों को नींद नहीं आ रही थी। लूसी को कभी भिखारी के उस वाक्य 'जोड़ी सलामत रहे' की आवाज़ गूंज रही थी, तो कभी अनिल के मार्मिक स्पर्श की याद उसके हृदय में खलबली मचा देती। अनिल के सामने भी रह-रहकर लूसी के विभिन्न चित्र उभर आते । उसके मानसिक चित्रपट पर नियान लाइट की तरह जलते-बुझते लूसी के यह शब्द 'आज तो संभालने वाला मेरे साथ है।' बार-बार उभरते और मिट जाते। अनिल तो लेखक है। वह उठा । अपना टेबिल लैम्प जलाया और अपने हृदय के उद्गारों को शब्दों में पिरोने बैठ गया।

। टर"टर'""टर-टेलीफोन की घंटी बजी। लदमी ने टेलीफोन का रिमीवर उठाया-हैलो। योह दीदी, ये तो किसी अखबार का रिपोर्टर है-लक्ष्मी के हाथ मे लूसी ने टेलीफोन ले लिया। "इंटरव्यू, इंटरव्यू, इंटरव्यू, मैं तो तंग आ गई हूं, इम इंटरव्यू मे... आई एम सॉरी 'अभी कुछ दिन तक आपसे नही मिल सस्ती "उसके वाद टेलीफोन कीजिएगा।' लूसी ने टेलीफोन रख दिया। लक्ष्मी पत्रों का ढेर उठा लाई। कोई दो मौ पत्र । लूसी के प्रांसको के पत्र। नूसी को चाहने वालों के पत्र । लूसी के रूप के प्यामों के पत्र । लूमी के सौंदर्य से घायलों के पत्र । सव में वही प्याम, वही चाह, वही बाहिश, वही तप सूसी को पी जाने को, लूमी को निगल जाने की, लूसी से लिपट जाने की और लूसी से...... टेलीफोन की घंटी फिर वजी । लूसी ने टेलीफोन उठाया-~ 'हैलो “बम्बई में बोल रहे हैं। ""कोन प्रोड्यूमर बाल्टीवाला।... मैं पिछले महीने दो फिल्मो में डाम देकर आई है। अभी नहीं, अगले पंद्रह दिन तो मेरे पास बहुत प्रोग्राम हैं। अगले महीने बम्बई आऊंगी तब बात करूंगी।' टेलीफोन रखा तो देखा कि सामने अनिल खड़ा था। 'हम से इस वक्त बात करेंगी या नहीं, या फिर अगले महीने आऊं।' अनिल ने कहा। 'आइए, अनिल वावू, आपने ही तो मुझे इस कादित बना दिया है कि मुझे कहना पड़ता है कि मैं अगले महीने बात करूंगी।' 'मैंने क्या किया? यह तो आपकी मेहनत का नतीजा है।' 'यह आपकी पब्लिसिटी का नतीजा है कि मुझे आज दो नौ पत्र हैं । सात पत्रिकाओं में मेरा फोटो छपा है । फिल्म प्रोड्यूसर मेरे पीछे भाग रहे हैं । मेरे पास टेलीफोन है, कार है।' 'यह तो आपके रूप और कला का जादू है ।' 'एक वात पूछू ?' 'पूछो।' 'सच !' हां, कहो भी।' 'आप मेरा नाच देखने क्यों नहीं आते ? अखबारों में तो मेरे नाच की बहुत तारीफ छपवाते हैं, मगर खुद कभी नाच देखने नहीं आते । क्या तुम्हें मेरा नाच अच्छा नहीं लगता।' 'मुझे तुम्हारा नाच तो अच्छा लगता है लेकिन तुम्हारा नाचना नहीं। जब तुम नाचती हो तो लोग तुम्हें ललचाई हुई निगाहों से देखते हैं, ठंडी आहें भरते हैं, जो जी में आए कहते हैं, मुझे यह सब सहन नहीं होता। लेकिन इससे क्या । तुम तो खुश हो न ।' 'नहीं, मुझे शान्ति नहीं है, एकान्त नहीं है। दिल में एक टीस-सी उठती है और मुझे लगता है कि जैसे नाम, शोहरत और पैसे के अलावा कोई और चीज़ भी है जिसे पाने के लिए मेरा दिल छटपटा रहा है । कभी- कभी मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं कोई टूटा हुआ तारा हूं, कटी हुई पतंग, 'या उस राही की तरह हूं जिसकी मंज़िल खोई हुई है।' 'क्यों, ऐसा क्यों लगता है ?' 'हजारों हाथ जो मेरे लिए ताली बजाने को उठते हैं उनमें से एक भी ऐसा नहीं जो प्यार से पीठ थपथपा दे । हजारों आंखें जो मुझे घूरती हैं उनमें से एक भी ऐसी नहीं जिसमें मुझे अपनी तस्वीर दिखाई दे। उनमें वासना और कामुकता झलकती है। इस वाह-वाह के शोर में एक भी आवाज़ ऐसी नहीं जो मेरे लिए दिल से निकली हो। मैं सच कहती हूं, मेरा मन करता है कि मैं यह डांस करना बंद कर दूं । इस शोर को चीरकर, इस कोलाहल को फाड़कर, इस वाह-वाह को हटाकर, एक ऐसी दुनिया में चली जाऊं जहां शान्ति हो, जहां मैं इतमीनान से सांस ले सकू। किसी को सुना सकूँ । जहां कोई मेरा अपना हो। जहां काम, वासना, लिप्सा की आंधी की जगह प्यार, प्रेम, चाह की गीतल हवा के झोके हों। लेरिन मैं अब उम रास्ते पर पहुंच चुकी हूं जहा मे लौटना संभव नहीं है। याग में फिर सता बन सकती।' 'क्या तुम्हारा नाम पहले लता या?' उत्सुकता में अनिल ने पूछा। 'हां, मैं कभी लना थी। सभ्य, मौम्य, मरल लता। लेकिन दुनिया ने लता को जीने नहीं दिया । लता को मरना पडा और उनकी जगह पर जन्म लिया लू मी ने । चचल, चपल, निलंग्ज लूसी ने।' 'लता को क्यों मरना पड़ा? लूमी ने क्यों जन्म लिया ?'--अनिल ने जिजामापूर्ण प्रश्न किया। 'यह पूछकर क्या करोगे?' 'नही, लूमी, तुम्हें मुझे बताना पडेगा।' 'मुनोगे ।। - 'हा, अवश्य।' 'लो मुनो।' यह कहकर लूमी ने कहना आरम्भ किया-'मेरे पिता एक मामूली आदमी थे। जालंधर में एक कारखाने में नौकर थे। पटेल चौक मे दो कमरों का छोटा-सा मकान किराए पर ले रखा था। मैं उनकी पहली मंतान थी। मुझे मेरी मां, जी भरकर लाड करती थी और पिनाजी प्यार । वे रात-दिन मेरी बातें करते मुझ में खेलते और मेरे भविष्य के सपने देखने । कुछ अरने बाद मेरा एक भाई आ गया, लेकिन वह छ महीने बाद चल बमा । उसकी मृत्यु मे घर में उदासी छा गई। अब घर में न मा की मी गूजती और न पिताजी के कहकहे। मा की मेहत खराव होती गई और वो एक दिन हमे सदा के लिए छोड़ गई। मा के माय ही उमको ममता चली गई। लेकिन ज्यो-ज्यों यरत गुजरता गया और पिताजी का घाव भरना गया एक दिन यह मनहूम घडी भी आ गई जव पिताजी मेरी नई माले आए। नई मा ने दो-चार दिन तो प्यार का ढोग रचा और फिर मौतेली मां ठीक मौतेली मां बन गई । पाच वर्ष में हमारे तीन भाई-यहन और आ गए। हमारा घर नरक बन गया, जिसमें मा चीयती और चिल्लाती रहती। पिताजी टंडी आहे भरते रहते और मैं ऐसे वातावरण में कभी भामू बहा लेगी और कभी ६४ पी जाती। सौतेली मां मेरे हर काम में नुक्स निकालती, शिकायत लगाने का बहाना ढूंढ़ती और पिताजी भी अपना गुस्सा मुझ पर निकालते। मेरे मामा दिल्ली में रहते थे। उनके कोई संतान न थी। वो बहुत चाहते थे कि मैं उनके साथ रहूं। वो जव भी पिताजी के सामने यह प्रस्ताव रखते मेरी सौतेली मां बीच में बोल पड़ती, 'इसे यहां क्या तकलीफ है ? मैं इसे अपने बच्चों से अधिक प्यार करती हूं।' पिताजी फौरन इस बात की गवाही दे देते । और मेरी दशा उस कैदी की तरह हो जाती जिसे मारा भी जाए और फिर उसे तड़फने की इजाजत न हो। एक दिन पिताजी.भी एक दुर्घटना में चल बसे । मेरी सौतेली मां मुझे अभागिन बताने लगी। वह अकसर कहती कि यह पहले अपनी मां को खा गई और अब अपने पिता को मार डाला। मेरे लिए उसके साथ रहना असंभव हो गया। कुछ दिनों बाद वो अपने मायके चली गई और मुझे मेरे मामाजी दिल्ली ले गए। मामा-मामी मुझे वहुत प्यार करते । मेरी दुनिया ही बदल गई। मैं नरक से स्वर्ग में आ गई। मैंने मैट्रिक पास किया और फिर शार्ट हैण्ड और टाइपिंग सीख लिया। समाचार पत्र में एक विज्ञापन पढ़कर एक प्रार्थना पत्र भेज दिया। मुझे इण्टरव्यू के लिए बुलाया गया। एक कम्पनी में स्टेनोग्राफर की जगह थी। मैं इण्टरव्यू के लिए गई। मैनेजर कोई शर्मा था। उसने मुझे अन्दर बुलाया। मेरे अन्दर जाते ही उसने फौरन बैठने को कहा और फिर मुझे कुछ इस तरह देखा कि मैं शर्मा गई। इसके बाद मेरी टाइपिंग स्पीड आदि के बारे में कुछ प्रश्न पूछे और फिर निर्णय सुनाया 'आप वहुत स्मार्ट हैं। कल से काम पर आ जाइए। आपको हम तीन सौ रुपया देंगे।' मैं बहुत खुश हुई । मुझे लगा जैसे अन्धे को आंखें मिल गई हों। घर जाकर पता लगा कि मामाजी की बदली मद्रास हो गई। मामा और मामी मद्रास चले गए और मैं वाई. डब्लू० सी० ए० में रहने लगी। मेरे दिन हंसी-खुशी में व्यतीत होने लगे। शर्माजी, कम्पनी के मैनेजर, मेरा बड़ा आदर करते । एक महीने वाद एक दिन दोपहर को चार वजे के लगभग शर्माजी ने मुझे बुलाया और आदेश दिया कि मैं दफ्तर के बाद उनकी प्रतीक्षा करूं। वो एक मीटिंग में जा रहे हैं और मीटिंग से लौटकर उन्हें एक ज़रूरी डिक्टेशन देना है। मैं कुछ सकपका गई और वो चले गए। पांच बजे दफ्तर से सव लोग चले " गए। वहा केवल मैं रह गई और एक चपरासी । न जाने क्यों मुझे कुछ डर- मा लगने लगा। सवा पाच बजे शर्मा जी आए और आकर मुझे अपने कमरे में बुला लिया। उन्होंने मुझे एक छोटा-सा नोट टाइप करने को दिया। मैं उनके कमरे से अपनी मेज़ पर चली आई और नोट टाइप कर उसे लेकर शर्मा जी के पास चली गई। उन्होंने नोट पढ़ा और फिर एक नजर से मुझे देखते हुए बोले-'वेरी गुड, तुम तो बहुत अच्छी हो । मेरा मतलब है, तुम बहुत अच्छी टाइपिस्ट हो । तुम खड़ी क्यों हो, बैठ जाओ"वैठो भी। मैं उनकी सामने कुर्सी पर बैठ गई। मैं इसी कुर्सी पर बैठकर उनसे डिक्टेशन लेती थी। लेकिन इस समय वैठते हुए मुझे कुछ डर-सा लगा। मुझे पसीना आ गया। उन्होंने फिर प्रदन किया- 'दफ्तर में और कौन है 'बाकी सब तो चले गए है, सिर्फ चपरासी है।' 'चपरामी चाय लेने गया है।' 'मैंने तो चाय पी ली है। 'तो क्या मैंने कभी चाय नही पी!' इनने में चपरासी चाय की ट्रे लेकर आ गया। वह चाय बनाने लगा तो गर्मा जी ने उससे कहा- 'नहीं, नहीं, तुम रहने दो। तुम मत बनाओ। हम अपने आप बना लेंगे और देखो, तुम जा सकते हो। मैं चौकीदार से दरवाजा वन्द करवा दूगा। मुबह जरा जल्दी आन।।' चपरामी ने नमस्ते की और चला गया। वो कुछ क्षण चुप रहे और फिर चौंककर बोले- 'चाय ठंडी हो रही है । वनाओ न ।' मैं चाय बनाने लगी और उनसे पूछा- 'कितनी चीनी" 'पीता तो एक चम्मच ह पर तुम्हारे हाथ से आधा चम्मच भी चलेगा, और न भी डालो तब भी कोई बात नहीं।' उन्होंने अपने चेहरे पर एक अजीव मुस्कराहट विसेरते हुए कहा । एक कंपकंपी "एक सिहरन और चम्मच मेरे हाय से गिर गया।

. 'आई. एम. सो.."री।' 'कोई बात नहीं। तुम वाई० डब्लू० सी० ए० में रहती हो । कम्पनी एक कार ले रही हैं। उसके बाद मैं वन्दोवस्त कर दूंगा कि कम्पनी की कार घर से ले आया करेगी।' 'मुझे तो बस आसानी से मिल जाती है।' 'तुम चाय नहीं पी रही ! 'मेरा इस वक्त चाय को जी नहीं कर रहा है।' 'तो हम भी नहीं पियेंगे।शर्मा जी ने कुछ रूठने के अन्दाज़ में कहा । मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं, क्या कहूं, किस तरह कहूं । मन करता था कि वहां से भाग जाऊं। दूर बहुत दूर। लेकिन भाग नहीं सकी। मैं केवल इतना कह सकी : 'मेरा मतलव है। मेरा मतलब है, 'मेरा मतलव भी समझने की कोशिश करो।' 'मेरा मतलब है कि अच्छा नहीं लगता।' 'किसे अच्छा नहीं लगता ? क्या अच्छा नहीं लगता? मैंने तो अभी तुम्हें सिर्फ चाय पीने को कहा है, तुमने उसी का अफसाना बना दिया। चाय नहीं पीनी तो मत पियो,' ---उन्होंने त्योरियां चढ़ाते हुए कहा। मेरे मुंह से वरवस निकल गया । 'आप नाराज हो गए। आई एम सौरी, सर।' 'नाराज़ होने की बात ही है । तुम मुझे इस काविल भी नहीं समझती. कि मेरे साथ चाय पियो।' -अपने कंधे को उचकाते हुए उन्होंने कहा। 'सर, मेरा मतलब यह नहीं था । लीजिए मैं चाय पी लेती हूं।'-मैंने चाय का प्याला उठा लिया, लेकिन मेरा हाथ कांप रहा था। 'दैट इज लाइक ए गुड गर्ल । हां, कल लेवर कंटैक्टर से कह देना कि उसकी लेवर ठीक काम नहीं कर रही है। 'आप ही कहिएगा । मैंने कहा तो बुरा मान जाएगा।' मैंने चाय का एक बूंट निगलते हुए कहा। 'इसमें बुरा मानने की क्या बात है ?तुम्हें मेरी तरफ से पूरा अधिकार है । तुम समझती क्यों नहीं, तुम मेरी स्टेनो हो, मेरी पर्सनल सेक्रेट्री, .

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- 'समझ गई।' उन्होंने इस तरह कहा जैसे यह किसी कहानी का शीर्षक हो। कुछ क्षण चुप रहने के बाद उन्होंने अपना हाथ मेरी गर्दन के नीचे फेर दिया। मैं सकपका गई। वो बोले-'चींटी जा रही थी। मैं एकदम खड़ी हो गई और बोली-'जी मैं अव जाऊं?' 'हम भी चलते हैं। उन्होंने चौकीदार को आवाज़ दी। कमरा वन्द करने का आदेश दिया और हम लोग बाहर आ गए । उन्होंने अपनी कार की तरफ चलने का संकेत किया तो मैंने कहा- 'आप क्यों तकलीफ करते हैं, मैं चली जाऊंगी।' 'मैं उधर ही जा रहा हूं.' 'आप चलिए।' 'क्यों क्या बात है ? मेरे साथ जाते हुए डर लगता है ! मैं कोई हउवा हूं ! आओ वैठो।' मैं कार की पिछली सीट पर बैठने लगी तो उन्होंने आग्रह किया : 'मेरे साथ आगे आओ। मेरे पास बैठो।' 'जी, नहीं । मैं यहीं वैलूंगी।' 'जानती हो पीछे बैठने का मतलब यह हुआ कि मैं तुम्हारा नौकर हूं। यानी कि ड्राइवर 'मेरा यह मतलब नहीं है।" 'तो इघर मेरे पास आइए। आओ भी। शाबाश । कम आन | गुड गर्ल ।'-मैं उठकर उनके साथ बैठ गई--डरी हुई. 'सहमी हुई। वो कार चला रहे थे और बीच-बीच में एक ललचाई हुई नज़र से मुझे देख लेते । कार चल रही थी और मेरा दिल धड़क उठा। 'तुम इतना सिकुड़ कर क्यों बैठी हो? आराम से बैठो।' 90. ।' । 'मैं ठीक हूं।" 'चुप क्यों हो ? क्या सोच रही हो?' 'कुछ नहीं।' 'प्लाजा में बहुत अच्छी पिक्चर लगी हुई है । कहो तो कल शाम के दो टिकट मंगवा लूं !'

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७०
और उम्मीदों का तांता लग गया । अंधकार में एक किरण, एक रोशनी,
एक उजाला। शायद यह किरण पकड़ लं, यह रोशनी थाम लूं, यह उजाला
हाथ आ जाए।
मैं इंटरव्यू के लिए पहुंची। वहां आठ-दस लड़कियां और भी आई
हुई थीं। बारी-बारी से चपरासी आवाज़ लगाता और इंटरव्यू के लिए
अन्दर चली जाती। मेरी भी वारी आई। मैं अन्दर गई। एक बहुत बढ़िया
सजा हुआ कमरा। वहां थे, कम्पनी के जनरल मैनेजर वर्मा । गोरे, सुडौल,
आकर्षक व्यक्तित्व । उमर लगभग पचास वर्प । चेहरे पर धन और वैभव
की चमक । मैं अन्दर गई तो उन्होंने सिर हिलाकर मेरे अभिवादन का
जवाब दिया और हाथ से अपने सामने वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा
किया । मैं बैठ गई। उन्होंने मुझे क्षण भर देखा, मुस्कराए और फिर
-
'आपकी शार्टहैंड की क्या स्पीड है ?'
'लगभग एक सौ बीस, सर।'
'टाइपिंग की?'
'पचास के करीव।
'ओह, तो आप तो हर तरह से नंबर वन हैं।'
'आपने पहले कभी नौकरी की है।'
'जी, हां। यहीं एक कम्पनी के हेड आफिस में।'
'आप वहां क्या करती थीं?'
'मैं जनरल मैनेजर की सेक्रेट्री थी।'
'यू मीन, परसनल सेकेट्री! आपको वहां क्या काम करना पड़ता था ?'
'डिक्टेशन लेना और टाइप करना और...'
'मैं समझ गया और जो भी उनका पर्सनल काम था।'
'मेरा मतलब है दफ्तर में जो उनका'
'सब कुछ दफ्तर में ही होता है-' कहकर हंस पड़े और फिर एक
अजीव अंदाज में बोले—'आपको हमारे साथ भी सब कुछ करना पड़ेगा,
सब कुछ, समझ गई!'
'क्या मतलब ?'-मैंने चौंककर कहा।

. 'मेरा मतलब है, हायरी, डिस्च, फाइल व टाक्ष यानी कि सम कुछ करना पड़ेगा। 'मैं यह सब कुछ करूंगी।' 'तुम तो बहुत समझदार हो। मब समझती हो। मुझे आर जैसी लड़की की जरूरत थी। आपको वहां क्या तनपा मिलती थी ?' 'तीन सौ।' 'हम आपको साडे तीन सौ देंगे।' 'थेंक यू, सर। मैने युग होते हुए कहा । 'माल भर तक आपको साडे तीन मी मिलेंगे और अगर आपने हमें मग कर दिया, मेरा मनलव है, अगर हमे आप और आपका काम पमंद आ गया तो हम आपको परमानेंट कर देंगे और सौ रुपया तरसी हो जाएगी।' 'मैं दिल लगाकर काम करगी।' "गुड । अगर आपने दिल लगा लिया तो फिर कोई तकलीफ नहीं होगी, आप नल से काम पर आ जाइए।' मैं बहुत खुश थी। मुझे फिर नौकरी मिल गई। मुझमे आत्मविश्वास आ गया : अपने पैरों पर खड़े होने का भरोसा। मेरी जिन्दगी के सफर में जो एक अंधा मोड़ आ गया या, वह एक साफ और सपाट पय में बदल गया। मेरे जीवन को गाही फिर से चल पडी एक निश्चिन और निश्चित पटरी पर । मेरा सफर मुपद, मुगम और सुहावना हो गया। मिस्टर वर्मा मेरा बड़ा आदर करते । मैं भी बडी मंहनन में काम करनी । मेरे काम में कोई गल्ती नहीं होती। वो हमेगा मुझमे हमकर वान करते, कभी कोई चुटकला भी मुना देते । मैं मोचती किनन मग- मिजाज हैं, घमंड इन्हे छू तक नहीं गया है, और वैभव का काई नशा नहीं । इमी तरह दो महीने बीत गाए । एक दिन विमना जो उमी दानर में काम करती थी, आई और बोली- 'क्या कर रही हो लता 'वमा जी ने मुबह में अभी ना कोई ट्रिक्शन नही दिया है । धामी बैठेजी नहीं लग रहा। ।

७२ -- 'अभी तो डटकर काम करना चाहती हूं। मुझे तो अपने काम और मेहनत के बल पर ही दुनिया में खड़े होना है।' 'काम में तो तुम बहुत होशियार हो। लेकिन औरत को सफलता सिर्फ काम और मेहनत से नहीं मिलती।' 'यह क्या कह रही हो ! तो और कैसे...' 'धीरे-धीरे सव मालूम हो जाएगा। सब पता चल जाएगा, एक रहस्य- मय हंसी हंसते हुए कहकर चल दी । उसकी हंसी किसी खतरे के अलार्म की वजती हुई घंटी की तरह थी। मैं चौंक गई। सामने देखा तो वर्मा मेरी तरफ आ रहा था। वो मेरे पास आया। मैं खड़ी हो गई। उसने कहा- 'मैं जरा काम से बाहर जा रहा हूं। हो सकता है, पांच बजे तक न आ सकू । तुम मेरा इंतजार करना । मुझे शाम को जरूरी काम करना है।' इससे पहले कि मैं कुछ कहूं, वो यह कहकर चला गया। मेरा दिल धड़कने लगा । आज फिर वही बात । आज फिर वही सवाल । छुट्टी के वाद ठहरना होगा । छुट्टी के बाद जब दफ्तर में और कोई नहीं होगा। डिक्टेशन देने से पहले चाय बनानी होगी और फिर वह कहेगा-कितना सुहावना मौसम है और उसके बाद फिर वही वात-~~-तुम कितनी अच्छी कितनी खूबसूरत हो । काश मैं अच्छी न लगती' 'मैं सुन्दर न होती। हिरन को शिकार होना पड़ता है क्योंकि वह सुन्दर है, फूल को डाल से तोड़ लिया जाता है, क्योंकि वह लुभावना है। दुनिया खूबसूरती की दुश्मन है । खूबसूरती को जीने नहीं दिया जाता । स्त्री होना ही एक अपराध है और सुन्दरता एक अभिशाप । यह मर्द सव एक से ही होते हैं, यह सब एक ही सांचे में ढले हैं, एक ही मिट्टी के बने हैं । रूप के प्यासे, वासना के भूखे । जी चाहा वहां से भाग जाऊं। इससे पहले कि वह मुझे अपमानित करे, अपना हाथ मेरे शरीर पर रखे, इससे पहले कि वह मुझे कहे-~~-'कल से तुम्हारी कोई जरूरत नहीं, अभी समय है स्वयं क्यों न चली जाऊं! फिर दूसरा विचार दिमाग में कौंध जाता। वर्मा तो देखने में बहुत शरीफ लगता है। हो सकता है उसे वाकई काम हो । डिक्टेशन देना हो । सव आदमी एक से नहीं होते। मैं नाहक उस पर शक कर रही हूं। इस तरह हो, तुम - ७३ अगर में नौकरी छोड़ती चली गई तो फिर क्या होगा? अगर इसके बाद नौकरी नहीं मिली तो "एक अंधकार एक गहरी खाई "एक.... एक विचार आता और लोप हो जाता । फिर दूमरा विचार आता और फिर पहला। दोनों विवारी में दंड-एक अगहा--एक यम । एक अजीव उयेडबुन-एक अजीब उलमन । इसी उधेडवुन में, इमी उल- सन में ममय व्यतीत हो गया। पाच बजे गए। दफ्तर के लोग चले गये । मैं अकेली और चपरासी । मदा पांच बजे वां आया। आते ही मुने बुलाया और मैं अपनी नोटबुक और पंसिल लेकर उनके पास उनके कमरे में गई। उन्होंने मोमम की यात छेड़ी। मैं चौंक गई। उन्होंने चाय मंग- वाई । चपरामी को यह कहकर विदा किया कि वो चौकीदार से दरवाजा बन्द करवा देंगे। मैं डर गई। मैं वडव डाई- 'सर "डिक्टेशन ।' जवाब में एक मुस्कराहट । एक ऐडती हुई नज़र और... 'पहले अपने हाथ की बनी हुई चाय तो पिला दो'' मैं काप उठी। उसने एकदम मेरा हाय अपने हाय मे पकड लिया। तो काप रही हो ! मर्दी लग रही है।' मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया । यो कुर्मी में उठा । मेरे माथे पर हाथ रख दिया---'बुखार नो नहीं है।' इसके बाद आनी वाहे मेरे गले मे डाल दी। में बौखला उठी। उसकी बाहों को झटके मे अलग किया । मैंने कहा- 'आप मेरी वेवमो और लाचारी का अनुचित लाभ उठाना चाहते हैं ।' 'मैं तुम्हारी वेबनी को मुख में और लाचारी को अधिकार में बदल देना चाहता हूं।" 'मैं नौकरी करने आई हैं, अपने आपको वैचने नहीं।' 'तुम्हें कौन सरोद मकता है ! दुनिया को मारी दौलत भी तुम्हारे सामने कुछ नहीं । यह तो दिल का मौदा है दिल का।' 'मुझे यह मौदा नहीं चाहिए। 'नौकरी तो चाहिए या नहीं ?' 'मुझे ऐमी नौकरी नहीं चाहिए?' 'मैं कौन-मा तुम्हें घर बुलाने गया या 'अरे, तुम .

७४ 'आपको शर्म आनी चाहिए। आप भोली-भाली लड़कियों को धोखा देते हैं। आप पहले क्यों नहीं बताते कि आपको स्टेनोग्राफर नहीं अपना दिल बहलाने के लिए लड़की चाहिए !' 'यह कहने की नहीं समझने की बात होती है।' 'आप लोग कितने नीच हैं, बदमाश हैं ! आप लोग यह नहीं सोचते. कि...' शट अप ! तुम जैसी पचासों लड़कियां मेरे आगे-पीछे घूमती हैं। मुझे तुम्हारी ज़रूरत नहीं।' 'मैं ऐसी नौकरी पर लानत भेजती हूं।' 'गेट आउट !'--वो चिल्लाया। मैं फिर अपमानित हुई। मैं दफ्तर से बाहर निकाल दी गई। नहीं वल्कि फेंक दी गई। जैसे कोई रद्दी कागज़ । मेरा अपराध' 'मैं सुन्दर थी- 'मैं अपना औरतपन वेचना नहीं चाहती थी, मैं खिलौना नहीं बनना चाहती थी। मनोरंजन और दिलबहलावे की एक वस्तु । मैं अपनी मेहनत और ईमानदारी से रोटी कमाना चाहती थी। मैं समझती थी, मैं अपने काम से अफसर को खुश कर सकती हूं, मैं अपनी मेहनत से उन्नति कर सकती हूं। पर यह मेरा भ्रम था, नादानी थी, ना- समझी। मैं अपने होस्टल आ गई । मैं रो पड़ी, खूब रोई. 'जी भर के रोई, आंसुओं से दिल हल्का होता है लेकिन दुख मिटता नहीं, मुसीवत टलती नहीं। आंसू पीड़ा की टीस को दवा देते हैं डुबो नहीं पाते। अगले दिन से फिर वही चिन्ता। जीने-मरने का सवाल । मैं जीना चाहती थी और जीने के लिए पैसा चाहिए पैसे के लिए नौकरी: "नौकरी के लिए अपने आदर्श का बलिदान अपने विचारों की हत्या.''अपने आप से समझौता''सब कुछ सहने का समझौता 'सब कुछ देने का समझौता सब कुछ पहले तो नौकरी मिलनी चाहिए' 'समझौते से समझौता करने की बात तो बाद में आएगी। उसी होस्टल में, मेरी एक सहेली बन गई थी 'नाम था उमिला। उमिला एक सरकारी अफसर थी। उसके पति तीन साल के . ।

लिए अमेरिका गए थे। कोई बच्चा नहीं था। इसलिए वो होस्टल में है रहती थी। एक दिन उमिला ने मुझसे कहा कि उसके एक रिश्तेदार मिस्ट मनोहरलाल वहीं पर किसी कम्पनी के मैनेजर हैं। वो उससे मुझे कह नौकरी दिलाने के लिए कहेगी। एक दिन उर्मिला मुझे अपने साथ उनके घर ले गई। मेरा उनसे परिच करवाया। गोरा रंग, लम्बा कद, भरा हुआ जिस्म "मनोहरलाल ए आकर्षक व्यक्तित्व वाले आदमी थे। उनकी पत्नी भी वहां थी-किरण' शरद पूर्णिमा के चाद की किरणों की सुन्दरता समेटे हुए "सरल'"स्मार्ट एक मुन्दर जोडी। एक आदर्श दम्पति । दोनो ने मेरो बड़ी यातिर की आदर-सत्कार किया। मनोहरलाल ने मुझे दफ्तर में आने को कहा। मैं अगले दिन उनके दफ्तर में गई और मुझे फिर नौकरी मिल गई तनखा चार सौ रुपये महीना। मैं अपने आपको भाग्यशाली समझने लगी चिन्ता मिट गई। संकट टल गया। हसी-खुशी मे दिन व्यतीत होने लगे। अक्सर सोचती कि भगवान जो करता है अच्छा करता है । अच्छा हुआज मैंने पिछली नौकरी छोड दी। मुझे उससे ज्यादा अच्छी नौकरी मिल गई उससे बडी और चढिया कम्पनी में। मनोहरलाल मेरा बड़ा आदर कर और प्रायः यही कहते-'मेरे लिए जैसी उमिला येसी तुम ।' एक दि उन्होंने भी मुझे शाम को दफ्तर के बाद रकने के लिए कहा। मेरा दिन धड़का, लेकिन उनके सद्व्यवहार से मुझे उन पर विश्वास हो गया था उन्होंने शाम को एक घटे तक काम करवाया और फिर मुझे अपनी कार मेरे होस्टल छोडकर अपने घर चले गए। मुझे कुछ पछतावा हुमा, अप आपको धिक्कारा, मैंने नाहक उन पर सदेह किया था। कुछ दिनों में मुझे ऐमे लगने लगा कि वो मेरे अफसर ही नहीं मेरे शुभ चिन्तक, हितपी, सगे. सम्बन्धी हो। इसी तरह दो महीने व्यतीत हो गये। मैं इतनी अच्छी नौकरी और इतने अच्छे अफसर मितने पर कभी अपने भाग्य को सराहतो और कभी भगरान का धन्यवाद करती। मेरे जीवन में एक बहार आ गई, जिसमें रंग-रिंग फूल खिलते, हमी-खुशी की महक आती, आनन्द को हवा के झोके आते। मैं हर तरह से सुखी-मतुष्ट यो। .

. एक दिन दफ्तर के दिन एक घंटे तक दफ्तर का काम करवाने के पश्चात् मनोहरलाल मुझे अपनी कार में होस्टल छोड़ने के लिए ले जा रहे थे। रास्ते में वो बोले-'लो भाई, याद आया । आज किरण ने कहा था कि वो तुमसे मिलना चाहती है। सुबह दफ्तर आते हुए उसने मुझसे कहा था, मैं तुम्हें शाम को घर पर ले आऊं। तुम उस दिन उमिला के साथ आई थी, उसके बाद तो तुम आई ही नहीं । तुमने एक मुलाकात में ही उन पर न जाने क्या जादू कर दिया है कि वो तुमसे मिलने को बड़ी इच्छुक रहती है। पहले भी एक-दो बार उन्होंने कहा था लेकिन मैंने सोचा तुम्हें क्यों कष्ट दूं । पर सुवह तो उन्होंने कहा कि आज शाम को लता को ज़रूर लाना।' मेरा जी चाहता था कि मैं कह दूं, फिर किसी दिन सही, लेकिन मैं यह कह न सकी और कहा- 'चलिए, उनसे मिलने को तो मेरा भी जी करता है।' थोड़ी देर बाद वो अपने बंगले पर पहुंच गए। कार खड़ी की और मुझे अपनी बैठक में बैठा दिया। एक शानदार वैठक, एक आलीशान कमरा "साफ-सुथरा । वो मुझे विठाकर अन्दर चले गए और फिर आकर बोले-'लो, किरण तो अपनी सहेली के साथ पिक्चर देखने चली गई। उसे यह याद ही नहीं रहा कि उसने कहा था कि शाम को तुम्हें लेकर घर ।' मैंने कहा-'अच्छा, तो मैं चलू ।' "एक प्याला चाय पीने के बाद चलते हैं। मैं तुम्हें होस्टल छोड़ आऊंगा-1 'चाय को मेरा मन नहीं कर रहा।' 'लेकिन मेरा मन तो कर रहा है। वस पांच मिनट...।' उनका नौकर चाय ले आया। मैंने चाय वनाई और एक प्याला उनके आगे कर दिया। इतने में मुझे बाहर किसी के साइकिल उठाकर जाने की ' आवाज आई। यह शायद उनका नौकर था। चाय पीकर मैंने कहा- 'अच्छा, अब मैं चलं ।' 'अभी इतनी जल्दी क्या है ? अभी न जाओ छोड़कर, अभी तो दिल भरा नहीं।'-~-उत्तेजना के स्वर में उसने कहा। मैं हैरान हो गई.--स्तब्ध । हीरे की डिविया में सांप निकल आया- - ७० 1 अमृत की चौगी में भी निकला। उमने मेरे कंधे पर हाप रखा और कहा-'मैं भी आया और फिर एक तीखी नजर से देखता हआ बन्दर भला गया। तीसी नगर, जो हरी की तरह पीरती हुई मेरे दिल में उतर गई। मेरा दिल पदका, भवराया। मैं सहमी, सरी, कापी। जी चाहा, वहां मे दौड जाऊ, भाग जाऊं, उह जाऊं। लेकिन कुछ न कर सकी। सोचने लगी, आज फिर वही मवाल । नौकरी छोड़ए। उसके बाद कोई और नौकरी, और वहा भी मही होगा। नौकरी नहीं कसं, क्या र? रहो जाऊँ? कैसे जिऊ आदो के सामने बंधेरा छा गया, सिर चकराने लगा। कुछ क्षण के बाद उसने चुपके में पीने से आकर अपने गर्म दहा हा हीटी मे मेरे गालों पर अपने पाप की मोहर लगा दो। मैं एकदम पड़ी हो गई। 'मैं आपको ऐसा नहीं समझती थी।' "क्यों मुझमे क्या कमी है ? क्या मैं आदमी नहीं, मेरे दिल नहीं ।' उसकी सांस ज़ोर से चल रही थी। मैं पीछे हटी। वो आगे बढ़ा। "हटती गई"वस्ता रहा. मैंने हाथ जोड़े.."गिडगिहाई मिन्नत को "मुझे छोड दो "सब वेकार "मर य। अपटकर मुझे बाहों में कस लिया में झटके से अलग हो गई। बी चाहा उसके कमरे के पर्दे फाड डालू, शोगो पर पत्थर बरसाऊं...उसे नोच डालू पर नहीं नहीं, मैं कुछ न कर मरी। उमने मुझे एकदम गोद में उठा लिया। मैं तडफी, फडफडाई-वो मुझे उठाकर अपने बिस्तर पर ले गया। जी चाहा रोऊं, चीखू, विल्लाऊ पर वो भी न कर सको । आमों में सामने अंधेरा डा गया। मैं वेहोग-मी हो गई और फिर"उमने मुझे ममन डाला "सेंदडाला "जब होश आया तव तक में सुट चुकी थी. मैं सब बुध खो चुकी थी. बर्बाद हो चुकी थी। दूसरे दिन में दफ्तर नहीं गई। मुझे दफ्तर से नफरत हो गई, नौकरी से नफरत हो गई। पुरपजाति मे नफरल हो गई, दुनिया में नफरल हो गई।' मेरे आदों के महल गिर गए, मेरे विचारों की इमारत ढह गई। मेरे संयम का वाघ टूट गया। नैतिकता एक पोली और योपली दीवार लगने ।

जो किसी को सहारा नहीं दे सकती । मेरे नेकी और बुराई के पैमाने बदल गए । मैंने सोचा, अगर मुझे विकना है तो साढ़े तीन सौ रुपये महोने पर क्यों विकू ? मुझे अगर लाज-शर्म का चूंघट उठाना ही है तो किसी की आज्ञा पर क्यों, किसी के इशारे पर क्यों ? अगर मुझे अपनी जवानी की नुमाइश से ही पैसा कमाना है, अगर जवानी की नुमाइश से ही धन एकत्रित करना है, अगर मुझे औरतपन बेचकर ही जीवित रहना है, तो मैं पूरी क्यों न वसूल करूं । मैं अपनी सुन्दरता का पूरा फायदा क्यों न उठाऊं । यह कीमत सोचते-सोचते लता मर गई और उसकी राख पर जन्म लिया लूसी ने~बो लूसी जिसने रूप और सौंदर्य की मंडी में अपनी सुन्दरता को तराजू में रख दिया। जिसने अपने अंग-प्रदर्शन पर टिकट लगा दिया। जिसने अपने शरीर की चमक-दमक नीलाम कर दी। जिसने अपनी जवानी को सिक्कों में ढाल दिया। यह कहते-कहते उसके हृदय की पीड़ा दो बूंदों में सिमट कर आंखों से बाहर आ टपकी और इन्हें थाम लिया अनिल के हाथों ने । अनिल ने अपना हाथ उसी तरह रहने दिया और यह बूंदें धीरे-धीरे विलीन हो गई उसकी रगों में, समा गई उसके खून में और तालमेल करने लगी उसकी हृदय की धड़कनों के साथ ।

तूमी और अनिल अव एक जवंदन आर्पिण महसूस करने लगे। चुम्बक-मा आकर्षण । यह आकर्षण उन्हें बरबम एक दूसरे के पास पाच साता। उन्हें मिलने पर मजबूर कर देना । वह रोज मिलने लगे । कभी अपनी कहानी सुनाने और कभी दूसरी की। इस तरह मुनते-सुनने को एक दूसरे के नजदीक आ गए. बहुत नजदीक । दोनों के दिन एक साय धडकने लगे। लूसी का कप्ट अनिल का कप्ट हो गया और अनिन का मुर नमी का मुख । दोनों मिलते तो धूव घुल-मिलकर यान करने और जय अलग होते तो एक दूसरे के सपने देखने । लूशो को अब नाचते हुए दया की जगह अनिल की तसवीर दिखाई देती और उसमे एक नया उरमाह आ जाता, एक नई उमग भर जाती, उसके परी में एक नई गति आ जाती। उमे लगता, वह नाच रही है अपने अनिल को दिखाने के लिए । उमरे नृत्य में एक नई लहर आ गई। अनिल के नख अब अधिकतर रोमाटिक होने लगे। उसकी कहानिया अधिक भावपूर्ण होने लगी। उसके लेगो में एक निधार आ गया और उसको लयनी मे नयापन। एक दिन दोनी झील के किनारे बैठे हा थे। दोनों चुप । दोनो एकर दूमरे में सोये हुए। सहमा अनिल ने कहा-हिलो नही ।' 'क्यो?" 'मैं तुम्हारे प्रतिविष को देख रहा हूं।' 'मुझे ही देख लो ना। 'तुम्हें देना नहीं जाता। 'वया मतलब?' 'तुम्हारे चेहरे पर इनका नूर है कि आगे चोपिया जाती है।'

लसी ने पानी को हाथ से हिला दिया। 'देखो अब क्या देखते हो। 'यह छवि तो अब मेरे आंखों में बस गई है इसे कोई नहीं मिटा किता।' 'अव !' 'नहीं, बिल्कुल झूठ।' दोनों की नज़रें टकराई और दोनों हंस दिये । लूसी ने लहरों की तरफ देखते हुए कहा- 'इन लहरों को देखो किनारे से मिलने के लिए कितनी आतुर हैं ! 'और किनारे भी तो इन्हें आलिंगन में भरने के लिए बरसों से वाहें फैलाये 'ओह तुम तो कवि हो।' 'और तुम कवि की कल्पना !' अनिल उठा। हाथ का फूल लूसी के जूड़े में लगा दिया। एक सिहरन, एक लहर लसी के शरीर में दौड़ गई."उसे लगा किसी ने उसे गुदगुदा दिया"उसके हृदय की वीणा के तारों को छेड़ दिया और उसमें से निकली एक मधुर संगीत लहरी, जिसमें वह खो गई, जिसने उसे मदहोश कर हुए हैं।' - दिया। 'यह क्या किया?' 'फूल की आकांक्षा पूरी कर दी। 'क्या मतलव ?' 'नगीना अंगूठी में ही अच्छा लगता है।' लूसी ने अनिल को देखा और मुस्करा दी और मुस्कराहट की तरंगें अनिल के हृदय में उतर गई । अनिल फिर बैठ गया। उसने लूसी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा : 'तुमने शराव सचमुच छोड़ दी !' 'हां।' 'क्यों छोड़ दी?' 'क्योंकि अव इसकी ज़रूरत नहीं। मैं शराब पीती थी अपना गम

भुलाने के लिए, अपने हरम को पोहा मिटाने के लिए।'
'तो क्या अब ददं मिट गया?'
'मह तो नहीं कह सकती, लेकिन ददं हो चुभन महमूम नहीं होती।
फिर तुम्हें मेरा शराब पीना अच्छा नहीं लगता।'
'मुझे तो तुम्हारा नाचना भी अच्छा नहीं लगता।'
"तो नाचना भी छोड दूगी।'
अनिल को अपने कानो पर विश्वास नहीं हुआ। उगने फिर मारवयं रो
"
'क्या कहा, नाचना भी छोड़ दोगी।"
'हा, बहुत नाची हूँ. बहुन नचाया है दुनिया ने । अब थक गई है।'
अनिल प्रफुल्लित हो उठा। उसे लगा जैसे वह जिस मूर्ति की पूजा
कर रहा था वह सजीव हो उठी। उसने भावातुर होकर कहा-
'मैं नुमसे एक सवाल पूछू
'पूटो न, मैं तो तुम्हारे मवालो का इंतजार कर रही हूं।'
में आज से तुम्हें लता कहूगा।'
'लता तो मर चुकी है, अनिल । उसे दोबारा जिन्दा न करो।'
'लता मरी नही, लता ने लूसी का मुखौटा पहन लिया है, एक
आवरण ओढ लिया है। ये मुग्रौटा, यह आवरण उसे मुझमे छिपा नहीं
सकते । मेरी निगाह केवल मुखौटा पर ठहर नहीं जाती, मेरी नबर आय.
रण पर एक नहीं जाती, वह उसके भीतर भेदकर लता को देख रही है।
लता जो लूसी का असली रूप है । मेरे लिए तो तुम सता हो।'
'लता को बढ़ने और फूलने के लिए एक सहारा पाहिए।'
'सहारा नही, सायी कहो।...
'मैं तुमसे एक बात माहना चाहता हूं।'
'कहो न, में तो कय मे वह यान गुनने के लिए आतुर है।'
'मैं.. मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ।
इस बात को सुनकर लूमी की नजर एक गई। गालो पर हसी सम्मा
की लाली दौड़ गई। नूसी उठ यही हुई। अनित भी उठ गया। मोदी
मग आगे चली। गर्दन युमाई और बोली-
-

८२.
'क्या तुम मेरा अतीतं भूल सकोगे ?'
अनिल ज़ोर से हंस पड़ा और बोला-'अतीत मर चुका है । मुझे मृत्यु
से नहीं जीवन से प्यार है । अतीत को अतीत में ही रहने दो । आओ हम
दोनों अपने-अपने भविष्य को एक दूसरे से जोड़ दें।'.
अनिल ने अपना हाथ लूसी की ओर बढ़ाया और लूसी ने उसे थाम
।
लिया।

९ लता ने लूसी का चोगा उतार फेंका। यह आवरण हटा दिया। वह मुखौटा उतार फेंका। अब वह नशीली लूसो से सजीली लता हो गई। लूसी, जो दर्शको को रिझाने के मेल दिखाती, अपना अंग-अंग फडकाती, अपनी पिंडलियो और टागो से कपडा हटाकर बिजली गिराती, वह लूसी फिर से लता हो गई। लता जो किसी की नजर पड़ने से मिकुड, सिमट और सिहर जाती थी। लता जो सुगम, सरल, सुलभ मरजा से भरपूर थी। वह अब चौराहे को रोदानी नहीं बल्कि किसी के घर का उजाला बनना चाहती थी। किसी का विश्वासघात लता को लूसो की दुनिया में भगा ले आया था, लेकिन अनिल के निश्छल और निष्कपट प्रेम ने लूसी को लता की दुनिया में वापिस भेज दिया. वह दुनिया जिसे लूसी ने त्याग दिया था और पीछे छोड़ दिया था। भराव वह पहले ही छोड़ चुकी थी, अब नाचना भी बन्द कर दिया । वह अब स्वप्न देखती थी एक छोटे-से घर का, जिसमे वह होगी, अनिल होगा। वह प्यार में सास लेगी, अनुराग में जिएगी, उसका दर्द किसी और का भी दर्द होगा और स्मिी और की पीड़ा मे वह कराह उठेगी। ऐसे दो गरीर होंगे जो मुख मे एक. माप जिएगे और दुस में एक साथ हुवरिया लगाएंगे। यह घर नहीं बलिः उसके लिए मंदिर होगा जिममे वह अपने आपको अपने देवता पर अपंण कर देगी। उसकी दुनिया में इसी के खयाल होंगे, स्याव होंगे, वह उमक लिए जिएगी, उसके ही लिए मरेगी। भीडभाड से दूर, वाह-वाह वे शोर मे परे, बाजे और साज की आवाजो मे हटकर उसकी एक. अपनी अलग दुनिया होगी, जिसमे झरने वी चचलता नहीं, झील के पानी की गित होगी। प्यार के बुलबुले उदेंगे, प्रेम की लहरें अंगडाइयां लेंगी। के पानी की तरह एक पत्थर पर ठोकर नहीं सानी पड़ेगी।

८४ वह अव एक स्वप्न देखती रहती 'सोते. 'जागते.."उसकी आंखों के एक छवि बैठती रहती "उसकी अपनी एक तस्वीर' 'मांग में सिंदूर' 'गले में मंगल-सूत्र "हाथों में मेंहदी सिर पर लाज का पहरे- दार एक छोटा-सा चूंघट । वह तस्वीर देखती रहती और फिर खो जाती। अरमानों के मेले में, झूलती उमंगों के झूले में, उड़कर पहुंच जाती ऐसे आकाश में जिसमें मोहब्बत का चांद होता और झिलमिलाते प्यार के तारे। आंधी चल रही थी, विजली चमक रही थी, ज़ोर की वर्षा हो रही थी और लूसी इनसे बेखबर-बेसुध अपने सपनों में खोई हुई थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई । लसी चौंकी और दरवाजा खोला तो देखा अनिल खड़ा है । अनिल अन्दर आ गया। सिर से पैर तक भीगा हुआ। 'ओह, तुम तो बिल्कुल भीग गए !' 'पानी में तो आदमी भीगता ही है।' 'इस पानी और आंधी में आने की क्या जरूरत थी?' 'इसका मतलब यह कि आज मैं तुमसे मिलता ही नहीं। तुम्हें अच्छा नहीं लगा तो मैं वापिस चला जाता हूं। पानी बन्द हो जाएगा तो फिर आ जाऊंगा।'-नाराजगी का अभिनय करते हुए अनिल ने कहा । 'ओह तो तुम्हें रुठना भी आता है। किससे सीखा है, वताओ ना ?' यह कहकर लूसी कमरे में गई और एक तौलिया ले आई और अनिल को दे दि । . 'पहले आप इससे हाथ-पैर पोंछ डालो और फिर पर तुम क्या पहनोगे ? मेरे पास मर्दाने कपड़े तो हैं ही नहीं।' लूसी अपने कमरे में गई और अपनी साड़ी उठा लाई और अनिल को देते हुए कहा- 'लो इसका तहमत बनाकर पहन लो।' अनिल ने अपने कपड़े उतार दिए और लूसी की धोती पहनकर बैठ गया। लूसी ने अनिल की बुशर्ट और पैंट निचोड़ कर पंखे के नीचे रख दिए। 'टेरीकाट के कपड़े हैं, अभी सूख जाएंगे।'

८५ - . 'न भी सूबे, तो मैं तुम्हारी साही बांधकर चला जाऊंगा।' दोनों ने एक दूसरे को देखा। मजरें मिल गई और दोनों हम दिए । लूसी उठी और अनिल के लिए एक प्याला चाय बना लाई । अनिल ने पूछा-'पया लक्ष्मी घर में नहीं है ?' सूसी ने बताया कि वह अपने किसी रिश्तेदार के यहां दोपहर को गई थी और अभी तक नहीं लौटी। अनिल चाय की चुस्किया ले रहा था और सूसी उमे देख रही थी, जैसे जौहरी अपने सबसे मूल्यवान होरे को देखता है, मदारी अपने समरू को देखता है और कंजूम अपने धन को। 'वाय कमी बनी है।'-सी ने पूछा। 'बहुत अच्छी, बहुत बढ़िया।' 'सच कहो न 'सच ही कह रहा हूं, ऐसी चाय तो आज तक मैंने पी ही नहीं, चाय तो बहुत ही अच्छी, धम जरा मीठी स्यादा है, पत्ती पम है और दूध जला . " 'सच नह रहे हो 'जी नही, झूठ कह रहा हू।" 'सच, सच, बताओन ।' 'मैं सच कहता हूं कि मैं झूठ नहीं बोलता और ना ही बोल रहा हूं।' 'तुम्हें बातें बनानी नो बहुन आती हैं।' 'और तुम्हें क्या आता है "मुझे तो कुछ नहीं आता, चाय तक बनानी नहीं आनी।' 'मैं तो मजाक कर रहा था, चाय तो मचमुच बढ़िया है।' दोनों ने एक-दूसरे की ओर देना। नन मिले । नजरो ने मयाल पूछे। निगाहों ने जवाब दिया। दोनो संतुष्ट । दोनो घुश । यह पुगी होटी पर विसर गई और हसी बनकर फूट पड़ी। 'मैं एक बात कहू ?'अनिल ने नाय का प्याना रखते हुए यहा। 'जी नहीं।' 'क्या मतलय !' 'मतलब यह कि एक बात नहीं, कम से कम दो बान बहो।' ।

६
'मुझे वम्बई में एक पत्रिका की संपादक की जगह मिल गई है । तीन
हजार वेतन । मुझे कल ही बम्बई जाना होगा।'
'मुवारिक हो!'-लता ने प्रसन्न होकर कहा ।
एक महीने बाद मैं आऊंगा और फिर तुम्हें साथ ले जाऊंगा और
उसके बाद कोई भी मुझे तुमसे अलग नहीं कर सकेगा।'
'एक महीना यानी कि तीस दिन । तीस दिन तो बहुत होते हैं।'
'मैं तुम्हें रोज़ पत्र लिखूगा।'
'खाओ मेरी कसम ।'
'क्यों, मुझ पर विश्वास नहीं है !
'यह मत कहो। ये तीस दिन तो मैं तुम्हारे पत्रों के सहारे ही गुज़ार
दूंगी।'
लता ने यह कहते हुए अपना सिर अनिल की छाती पर रख दिया
और अनिल की उंगलियां उसके रेशा

१० अनिल उमके पास नहीं था, पर फिर भी वहा सदा अनिल के साथ रहती । लता ने शराब छोड दी, नाचना छोड़ दिया। अनिल उसके दिल और दिमाग में बस गया था। उसकी हर धडकन में समा गया था। उसके कानो मे शहनाई के स्वर गूजने लगते । वह स्वर जो उसे अनिल के साथ एक पवित्र बंधन में बांध देंगे। उसे और अनिल को एक कडी में पिरो देंगे। उमके बाद उन्हें कोई अलग नहीं कर सकेगा। वह अपना तन-मन उमे समर्पण कर देगी। उसका अपना अलग एक पर होगा । वह उस घर को मजाएगी, संवारेगी । मुबह जब अनिल अपने काम पर जाएगा तो वह उसके लिए खाना तैयार करेगी। उसके कपड़े निकालकर देगी और फिर वह कहेगी--'यह पेट नही, दूमरी पैट पहन जाओ। यह कमीज मली है." व्हरो इम कमीज का तो बटन टूट गया है' ...वह सुई-धागा लेकर उसका वटन लगाएगी और जब वह उसके सीने के पास सुई ले जाकर धागा तोडेगी तो वह उसका मुह चूम लेगा और वह फिर कनखियो से देखती हुई कहेगी-'तुम बड़े नटखट हो। शाम को जब वह घर आएगा तो वह दरवाजा खोलते ही उमको अपनी बाहो मे जकड़ लेगी। किसी दिन देर से आया तो वह रूठ जाएगी। वह एक तरफ बैठ जाएगी, फिर वह चुपके से पीछ में आएगा और अपनी बाहें उसके गले में डाल देगा। वह छुडाकर एक तरफ हो जाएगी। वह कहेंगी- 'पहले पूछो तो मही क्यों देर हो गई !' 'मुझे कुछ नही पूछना। वह फिर मुझे मनाएगा, मुझमे माफी मागेगा, आइन्दा समय पर घर आने का वायदा करेगा और फिर वह अपनी हंसी नही रोक पाएगी। वह हंस देगी। और फिर वह उससे लिपट जाएगी। उसके इस प्यार के ५८ संसार में प्यार की हवा होगी, प्यार के झोंके होंगे और प्यार के झूले होंगे। फिर उनके इस प्यार के बाग में वहार आएगी। एक नन्ही-सी कली खिलेगी। उन्हें एक खिलौना मिल जाएगा। जिसे वह लोरी देकर सुलाएगी, चूमकर उठाएगी। फिर वह धीरे-धीरे बड़ा होगा और फिर वह भी अपने पापा को टाटा करेगा। उसे हर रोज़ अनिल का एक पत्र मिलता और वह भी उसे रोज एक पत्र लिखती। डाकिया सुबह ११ बजे तक आ जाता । वह सुबह उठकर ११ वजने की प्रतीक्षा करती। ११ वजे के बाद अनिल का पत्र बार-बार पढ़ती और फिर रात को उसे पत्र लिखती। उसके विरह के दिन कुछ तरह व्यतीत हो रहे थे कि एक शाम को चार बजे अनिल का पत्र पढ़ते- पढ़ते उसे पेट में बहुत जोर का दर्द महसूस हुआ। उसने थोड़ा-सा चूर्ण खा लिया और अनिल का पत्र पढ़ने लगी। पांच दिन के बाद अनिल आ रहा था। उसका अनिल, उसीका अनिल । अनिल जो अव उसकी आकांक्षाओं का प्रतीक था, अनिल जो उसके सपनों का केन्द्र था, अनिल जो उसके रोम-रोम में समा गया था, अनिल जो उसके .अंग-अंग में बस गया था, अनिल जो अब उसके हृदय की धड़कन की आवाज़ था। अनिल जो अव उसके रक्त का प्रवाह था, अनिल जिसमें वह खो जाना चाहती थी, अनिल जिसमें वह घुल कर विलीन हो जाना चाहती थी। उसने पत्र पढ़ा, फिर पढ़ा, पढ़ती गई और फिर पत्र को चूम लिया। उसे फिर दर्द महसूस हुआ। उसका मन कर रहा था कि वह नाचे, गाए, झूम उठे, पर यह दर्द, इस दर्द को आज ही होना था, इसी समय होना था, दर्द बढ़ता गया और उसे एक दिन डाक्टर के पास जाना पड़ा । डाक्टर ने उसे दवाई दी और दूसरे दिन अस्पताल आने के लिए कहा । दूसरे दिन सुबह उठी तो फिर वही दर्द । वह अस्पताल गई, उसका एक्स-रे लिया गया, खून भी जांच के लिए लिया गया। वह दोपहर को अस्पताल से घर लौटी । अनिल का पत्र आ चुका था। उसने पढ़ा, उसमें उसने लिखा था कि वह अधिक दिन दिल्ली नहीं ठहरेगा। बस एक सप्ताह में वह उससे विवाह कर लेगा। उसने बम्बई में एक फ्लैट का प्रबंध भी कर लिया है। "लता फिर अपने सपनों में खो जाना 1 ८६ । . पानी थी, लेकिन ददं ने फिर उमे मा दवाया। यह ददं तो अब उसके पोछे पड़ गया था, पच सरम होगा यह दर्द, क्व पोहा छोटेगा उसका ? उमने दवाई ली। मेशिन ददं ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।पमूल खा लेती तो कुछ कम हो जाता। वह रोज अस्पताल जाती। हास्टर उमे अच्छी तरह में देखते और पाचवें दिन जब वह डाक्टर के पास गई तो डाक्टर ने बड़ी गम्भीर मुद्रा में पूछा- 'आर अकेली अस्पताल आती हैं ? आपके माथ कोई घर वाला नहीं माता?' 'डाक्टर साहब, मैं अकेली ही हूं। मेरा इस दुनिया में कोई नहीं।' पहने को तो वह यह कह गई लेकिन उमी क्षण उसे लगा कि वह झूठ बोली है । उसने फिर कहा-'नहीं, नही, डाक्टर साहब, मेरे वो हैं, वो बाहर गए हैं, बम्बई । लेकिन आप इतने गम्भीर क्यों हैं, क्या बात है कैमर।'-डाक्टर ने कहा। 'कमर !'सता ने इस मद को दोहराया। 'आप चिला न कीजिए। हम इलाज करेंगे। आप रोज अस्पताल आइए।' उमकी आखों के सामने अंधेरा छा गया, सिर चकराने लगा। भाग्य का यह कैसा मेल ! विधाता का यह कैमा विधान पतझड के बाद जब क्ष में नई कोपलें आने लगी तो किमी ने वृक्ष मे आग लगा दी। चिडिया जब बरसों बाद पिंजरे से निकली तो वाज ने झपट्टा मारा एवने-डूबते जब किनारा हाय लगातो मगरमच्छ ने पैर पकड़ लिया ! फूलो की मेज पर पैर रमते ही साप ने डक मार दिया ! वह टूटी हुई, थकी हुई, हारी हुई-सी घर पहुंची तो अनिल का पत्र मिला । अनिल आज शाम को आ रहा था । उसको गाड़ी लगभग नौ बजे पहुंचती थी। अनिल ने लिखा था कि विवाह के दूसरे दिन शाम को यह अशोका होटल में पार्टी देना चाहता है । पत्र पढ़ते-पढते वह रो पड़ी ""फूट-फूट कर रोई। थोड़ी देर के बाद जब वह कुछ अपने आपको संभाल पाई तो मोचने लगी कि अनिल को जब यह मालूम होगा तो उस - ..

पर क्या बीतेगी! वह यह वज्रपात किस तरह सहन कर सकेगा?जब उसे मालूम होगा कि उसकी प्रेम की प्रतिमा के टुकड़े-टुकड़े हो गए हैं तो उसकी क्या दशा होगी । वो भावुक है, उसका प्रेम सच्चा है। उसका अनिल विखर जाएगा, टूट जाएगा और फिर पागल भी हो सकता है। नहीं, नहीं, उसका अनिल पागल नहीं होगा। वह उसे पागल नहीं होने देगी। अनिल ने उससे प्यार किया है तो क्या उसे उससे प्यार करने की सजा भुगतनी पड़ेगी। उससे प्यार करना अपराध है। वह एक जलती हुई शमा है जो स्वयं जलती रहती है और जो उसे प्यार करता है उसे वह झुलस देती है। लेकिन इसमें उसका क्या दोष है ? वह निरपराध है। उसका अपना जीवन वर्वादियों की एक कहानी है। लेकिन वह उसे बर्बाद न होने देगी। वह क्या करेगी! जो स्वयं टूट चुका हो वह दूसरे को क्या समेटेगा ! जो स्वयं गिर चुका है वह दूसरे को क्या संभालेगा! अपने ही दर्द से छटपटाता हुआ दूसरे की पीड़ा कैसे दूर करेगा। कुछ भी हो, वह अनिल को टूटने नहीं देगी। उसे गिरने से बचाएगी, उसे पागल नहीं होने देगी, उसे दर्द से तड़पने नहीं देगी। पर कैसे, किस तरह, क्या करे? वह शहर छोड़कर चली जाए। अनिल के आने में अब केवल कुछ ही घंटे वाकी हैं। यह नहीं हो सकता। फिर इस तरह गायब होने से तो वह जीवन भर तड़पता रहेगा। उम्र भर उसके जीवन में एक सस्पेंस रहेगा। फिर वह क्या करे''कुछ नहीं समझ आता ''कुछ नहीं सूझता। अचा- नक एक विचार'"एक खयाल.."एक सुझाव । वह उसके प्रेम का अंत कर दे ! उसके प्यार को खत्म कर दे! उसके प्यार को नफरत में बदल दे ! अगर अनिल को उससे घृणा हो जाए तो उसके मरने पर उसे दुख नहीं होगा । उसके मरने के बाद उसकी याद उसे नहीं तड़पाएगी। वह उसे वेवफा समझकर दूसरी शादी कर लेगां और फिर वह सब कुछ भूल जाएगा। अपने परिवार में रम जाएगा। उसके जीवन में हंसी-खुशी होगी। यही तो वह चाहती है। मरने से पहले वह यह हँसी-खुशी ही तो उसे उपहार में भेंट करना चाहती है। इसी अधेड़बुन में सात बज गए। अनिल के आने में सिर्फ दो घंटे रह गए। वह उठी। उसने एक अच्छी-सी साड़ी पहनी, शृंगार किया, ।

सज-गंवर कर लक्ष्मी को पुकारा और पहा- 'अगर अनिल बाबू आएं और मुझे पूछे तो कह देना में डांस करने गई हूं।' 'डांम करने!'...आश्चर्यचकित होकर सामी ने यह दाद दोहराए, 'डांग करना तो आपने छोड़ दिया!''पर अब फिर मुर कर दिया है।'- यह कहकर लता बाहर आ गई और फिर चारों ओर देखरर तेज कदमो में मजिल की ओर चल पडी। लक्ष्मी इस पहेली में उलझी हुई आश्चर्यचकित लता को जाते हुए देखती रही। अनिल रात को मण्टियर मेल से दिल्ली पहुंचा। गाड़ी के प्लेटफार्म पर आते ही वह खिडकी के पास खड़ा हो गया। उसे पूर्ण आमा थी कि लता उसे लेने के लिए स्टेशन पर जरूर आई होगी। उसने बड़ी उत्सुकता में प्लेटफार्म पर खडे हुए आदमियों को देगा, पर लता नहीं दिखाई दी। गाडी रकी और वह गाडी से बाहर आकर खड़ा हो गया। कुछ देर इम आशा में कि मायद चलती गाडी में वह उमे नही देख पाया हो, वही राडा रहा। थोड़ी देर के बाद जब उसे लता न मिली तो वह अपना सामान उठवाकर स्टेगन से बाहर आ गया। टैक्सी की, और अपने घर पहुंच गया। राम्ने भर वह यही सोचता रहा कि लता म्टेशन पर क्यो नहीं आई। उमने मुह- हाप धोया और सता से मिलने चल पडा। वह लता के लिए एक लिया गुलायी रंग की माडी लाया था। वह रास्ते में सोचता रहा कि यह यह माडी पहनकर कमी लगेगी। कुछ देर बाद वह लता के मकान पर आ पहचा। घंटी बजाई। उसने सोचा कि जैसे ही लता दरवाजा सोलेगी वो उससे लिपट जाएगा और उमके अधरो को चूम लेगा। पर में नमी के मिवाय कोई नहीं होगा। लक्ष्मी मे कसी गर्म ! फिर लक्ष्मी तो जानती है कि वह विवाह कर रही है। लक्ष्मी ने दरवाजापोला । लक्ष्मी ने 'नमम्ने' वहा । अनिन 'नमम्ने' पहार एकदम अन्दर चला गया। पर लता उमे रही नहीं दिखाई दी। वह कुर्मी पर बैठा और जोर में बोला-'तना यह आग-मिचौनी गेलने का समय १२ । नहीं है, यह छिपने का अवसर नहीं है।' लक्ष्मी आई और उसके पास आकर चुपचाप खड़ी हो गई। उसने पूछा- 'क्या बात है ! लता कहां है ?' . 'वह घर पर नहीं है।' 'कहां गई है ? मेरे आने की चिट्ठी उन्हें मिल गई थी !' 'मालूम नहीं, साहव।' 'मालूम होता है उसे चिट्ठी ही नहीं मिली।'-उसने यह कहकर एक मीठी गाली डाकखाने वालों को दी और फिर पूछा- 'वह कहां गई हैं ? कब तक आएंगी?' 'वह नाच करने गई हैं। थोड़ी देर तक आ जाएंगी।' 'नाचना तो उन्होंने छोड़ दिया था। तू सच-सच बता वह कहां गई हैं?' 'मैं सच कह रही हूं।' 'तो नाचना कव से शुरू किया है ? कैसे शुरू किया ? क्यों शुरू किया?' 'आप उन्हीं से पूछ लेना।' लक्ष्मी यह कहकर रसोई में चली गई। अनिल कुर्सी से उठ बैठा । वह कमरे में इधर-उधर घूमने लगा। सोचता हुआ छटपटाता हुआ''अथाह सागर में डुबकियां लगाता हुआ। वह कुछ क्षण के बाद फिर कुर्सी पर बैठ गया। उसने अपना माथा पकड़ लिया। उसे लगा जैसे किसी ने उसे घूमती हुई कुर्सी पर बैठा कर विजली से बहुत ज़ोर से कुर्सी घुमा दी हो और फिर उसे सुनाई दी घंटियों की आवाज़' 'घड़ियालों का नाद । थोड़ी देर बाद लता आ गई। लता को देखकर वह आगे बढ़ा। लता एक तरफ हो गई । लता लड़खड़ा रही थी। 'हैलो, अजय !'-लता ने नशे में शराबी की तरह कहा। 'तुमने फिर पीना शुरू कर दिया ?'-अनिल ने पूछा। 'हां। 'क्यों?' 'मेरी मर्जी, तुम चाहो तो तुम भी पियो।' 'तुम डांस करके आई हो?'

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'हा, आज तो मैंने वह डाम दिया कि मोग देखते ही रह गए।
'तुम तो रहती थी कि डांम करना छोड़ दिया है !'
'अनिल, तुम तो बहुत भोले हो । मैंने कहा और तुमने मान लिया !'
'मैं तो डामर हूं। कैबरे डामर । डामर अगर डॉम नहीं करेगी तो और
क्या करेगी!' यह कहकर वह बडे जोर से हंसी"एक शराबी की मी
....एक पलनायिका की हमी.. किमी का मजाक उड़ाने वाली हंसी..
तीर की तरह पैनी हंसी।
अनिल तिलमिला उठा। उसे लगा कि किसी ने उसे काटों की मेत्र
पर धक्का दे दिया हो। किसी ने बिजली को सजीव तार परड़ा दी हो।
'तुम एक महीने में कितना बदल गई हो।'
'तुम्हे क्या मालूम कि इम एक महीने में क्या हो गया है !'
'वही तो तुममे पूछ रहा है
'मुममे क्यों पूछते हो! इममें मेरा कोई दोष नहीं । तुम यह क्यों भूनते
हो कि मैं डासर हूं और डामर क्मिीकी नहीं होती।'
'तुमने तो मुझसे शादी करने का वायदा किया था।'
'तो तुमने उसी वक्त मुझसे भादी क्यो नहीं की ?'
'अब क्या हो गया है "
'अव में किसी और से शादी का वादा कर चुकी हूं। लक्ष्मी, इनके लिए
पर्वत लाओ। यह मराव नहीं पीते।'
'मैं कुछ नहीं पियूगा।--अनिल जोर मे चिल्लाया-'मैं पूछना है कि
वो कौन है जिसमे...'
एक आदमी है"तुममे ज्यादा अच्छा है, तुमसे अधिक मुन्दर।'
"मुझमे ज्यादा अच्छा है।"
'तुममे अच्छा न होता तो मैं तुम्हे क्यो छोड़ती ? उममे क्यों शादी का
वादा करती? मैं घाटे का मौदा नहीं करती।'
'म एक महीने में
"एक महीना तो बहन होता है। हम तो आठ दिन मे आठ मादिया
कर लेते हैं।'
'वन्द करो, यह वावाम। मुझे नहीं मालूम था कि तुम इतनी नीच हो।

१४ लक्ष्मी शर्वत का एक गिलास ले आई । अनिल ने वह गर्वत का गिलास लक्ष्मी के हाथ से छीनकर जमीन पर पटक दिया। और वह गिलास चूर- चूर हो गया, ठीक उसके दिल की तरह। पैकेट में से साड़ी निकाली और फाड़कर फेंक दी। 'तुम याखिर एक रंडी ही हो, कुतिया।यह कहकर अनिल बाहर चला गया। अनिल को लगा जैसे उसे किसी ने पहाड़ की चोटी पर से धक्का दे दिया हो। सड़ाक'"सड़ाक किसी ने गर्म सलाखें उसके जिस्म पर दाग दी हों। किसी ने उसकी नसों से एकदम खून निचोड़ लिया हो। अनिल के जाने के बाद वह मुस्कराई। दर्द से कराहती हुई मुस्कान । उसने फटी हुई साड़ी के टुकड़े इकट्ठे किए और धड़ाम से सोफे पर बैठ गई। यह उसके जीवन का अन्तिम तमाशा था जो उसने आज अनिल को दिखाया। काश, उसे यह नाटक न करना पड़ता। वह रो पड़ी, खूब रोई "फूट-फूट कर रोई और न जाने कब तक रोती रही। अनिल सीधा अपने घर आया और दूसरे दिन ही वह हवाई जहाज़ से बम्बई वापिस चला गया। वह सोच रहा था कि भगवान ने उसे बचा लिया। अगर बादी के बाद वह नाचने लगती, शराब पीती तो उसका जीवन वर्वाद हो जाता। वह घर की उलझनों में ही उलझ जाता और कुछ नहीं कर पाता। यादमी पहाड़ की चोटीसे गिरकर खड़ा हो सकता है लेकिन नैतिकता से एक बार गिरकर फिर नहीं संभल सकता। वह जिसे कीचड़ का कमल समझता था, वह कीचड़ का कीड़ा निकला, जोकि कीचड़ की गंदगी में ही जीवित रह सकता है। जिसे जूठे पत्ते चाटने की आदत पड़ जाए, उसे एक जगह बैठकर आराम से एक वार खाने में मजा नहीं माता । जगह-जगह पास में मुंह मारने वाले जानवर को खूट से नहीं बांधा जा सकता। उसे अपने आप पर भी क्रोध आता है। कि वह उसे समझ क्यों नहीं सका! चरित्र से गिरने के बाद औरत गिरावट की किसी भी हद तक गिर सकती है। कितनी मक्कार और धोखेबाज ! कहती थी कि उसने गराब छोड़ दी है, नाचना छोड़ दिया है। वह उससे प्यार करती है । उसी की होकर रहना चाहती है और उसने उस पर विश्वास कर लिया। कुलटा पर विश्वास''चरित्रहीन स्त्री पर विश्वास कवरे, डांसर पर विश्वास...

। वैश्या पर विश्वास ! कितनी बडी भूल यो उमको । मितनी बड़ी मुना थी उसकी । उमे एक से एक अच्छी और मुन्दर स्त्री मिल मकती है । उच्च परिवार की । नेक और पढ़ी-लिखी। वह अपने भाग्य को मगहता कि उसे टीक समय पर वास्तविकता का पता चन गया। वह कुएं में गिरने म पर गया। वह दलदल में धमने से बच गया । वह उमे भूल जाएगा । उसे भून हो जाना चाहिए । वह इमी योग्य है। लता का जिगर का दर्द हर रोज बढ़ता गया । जब वेदना अमा हो गई तो वह अस्पताल में चली गई । डाक्टर उसका इलाज करने । दवाइया देने, लेकिन वह जानती थी कि वह मृत्यु के गस्त के उम मोड पर पहुंच गई है, जहा मे लोटना या वापिस पाना मुश्किल और असंभव है । उसके पास घी केवल लक्ष्मी । लक्ष्मी उसे मांत्वना देते हुए कहती-'दीदो, तुम अच्छी हो जाओगी।' वह उसके उत्तर में, इस पीडा में भी एक मुम्कान बिवेर देनी । जव उसकी पीडा असह्य हो जाती तो डाक्टर इजेक्शन लगा देते। वह प्रायः डाक्टर मे कहती--'मेरी वेदना की अवधि को पयो बढा रहे हो! मेरे लिए जिन्दगी में कुछ नहीं है। मैं और जीना नहीं चाहती। मुझे ऐमी दवा दो जिमसे में मदा के लिए मो जाऊं। जीवन के रास्ते में तो मुझे मजिल नहीं मिली। अब मौत के रास्ते पर तो मुझे जल्दी में जल्दी मेरी मंजिल पर पहुंचा दो। वह अनिल के पत्र अपने माय अस्पताल ले आई थी। उन्हें बार-बार पदनी लता की हालत हर गेज पराय होती गई। वह बहुन बमजोर हो गई थी। पीली पड़ गई थी। डाक्टर ने लक्ष्मी में वह दिया कि अब वह एक आध दिन की मेहमान है। लक्ष्मी ने अपने आमुओ को रोककर लता में पूछा---'दोदो, किसी से मिलना चाहती हो' सना ने कहा-'हा, लक्ष्मी । मैं अनिल में मिलना चाहती हू । केवल अनिल मे । तुम अनिल को तार भिजवा दो कि मैं मंसार से विदा लेने से पूर्व उमे देखना चाहती हूं।' लक्ष्मी ने अनिल को तार भेज दिया। लता लिमी में यह गुलाबी साड़ी लाने को कहा जो अनिल उसके लिए बम्बई में लाया था। वह माडी, जो अनिल चाहता था कि वह उमरे साथ विवाद के ममय पड़ने । यह माड़ी, ।

૯૬ जिसे अनिल ने क्रोध में फाड़कर फेंक दिया था। वह साड़ी, जिसके टुकड़े टुकड़े को इकट्ठा कर उसने सी लिया था। लक्ष्मी वह साड़ी ले आई। उसने उसे बड़ी कठिनाई से पहना, क्योंकि उसके लिए उठना-बैठना बहुत कठिन था। विदिया लगाई। रात को अनिल ने अस्पताल में टेलीफोन किया कि वह अगले दिन सुबह नौ बजे तक हवाई जहाज़ से दिल्ली पहुंच जाएगा। लता के चेहरे पर यह सुनकर एक हल्की मुस्कान आ गई । उसने डाक्टर से कहा-~~-'डाक्टर, मुझे सुबह नौ बजे तक ज़िन्दा रखो। डाक्टर, मैं तुमसे कुछ घंटों का जीवन-दान मांगती हूं, केवल कुछ घंटों का। जब मैं मरना चाहती थी, तुमने मरने नहीं दिया और अव मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूं कि मुझे नौ बजे तक बचा लो।' अनिल सुबह साढ़े आठ बजे हवाई अड्डे पर पहुंचा। टैक्सी की और अस्पताल की ओर चल दिया। उसके दिल की धड़कन तेज़ थी। वह सोच रहा था कि वह तो किसी और से विवाह करना चाहती थी। क्या उसका किसी और से विवाह नहीं हुआ। आखिर ऐसा क्यों ?' वह अस्पताल पहुंचा और टैक्सी वाले को वीस का नोट दिया। विना वाकी पैसे लिए अस्पताल की सीढ़ियां धड़ाधड़ चढ़ता गया। वार्ड नम्बर नौ किसी से पूछा । अनिल ने आवाज़ लगाई.'लता, लता' 'मैं आ गया।' अनिल तेजी से कमरे के अन्दर प्रवेश कर गया। उसकी नज़र लता पर पड़ी। लता उसी गुलाबी साड़ी में लिपटी हुई थी। उसके ललाट पर लाल विदिया चमक रही थी। उसकी आंखें दरवाजे की ओर मुड़ी हुई थीं, शायद किसी को देखने की लालसा में, और हाथ में अनिल का आखिरी पत्र था । अनिल को अब स्पष्ट हो गया कि लता को उस दिन समझने में उसने भूल की थी। नर्स ने आंखें वन्द कर दी और उस पर सफेद कपड़ा डाल दिया। अनिल अब अपने छलकते हुए आंसू न रोक सका और यह आंसू सफेद चादर ।

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Dard Ki Muskan

Author
Sharma Rajendra Kumar
Title
Dard Ki Muskan
File name
Dard Ki Muskan
Text
OCR done
Citation
1970
Published
2011/03
Publisher
Delhi,rajpal & Sons.
Language
Sanskrit
Pages
98
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Poetry
DLI number
552020
Barcode
4990010032703.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
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