Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Garmani Ka Vikas

Verma,surya Kumar · 2011/01

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जर्मनी का विकास
पहला भाग
समक
सूर्यमार वर्मा
१९९८
NEEमीनारायण प्रेम, पनारस में मुदिन ।
मस्या

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:
परिचय।
वर्तमान यूरोपीय महायुद्ध के कारण सारे ससार ही
बाँखें जर्मनी की भोर लगी हुई हैं। उसने युद्ध के अखाड़े में
उतर कर चारे ससार को युद्ध के लिये निमत्रित किया है।
ससार के जितने विशाल राष्ट्र हैं वे तो एक ओर हैं और
अकेला जर्मनी एक ओर । जर्मनी के टो एक साथी है, वे भी
सब उसी के बल पर कूदते हैं । अतएव बहुत से लोग जर्मन
राय
के संगठन और उसकी उन्नति का इतिहास जानने की
इन्छा रखते है । इसी कारण इस पुस्तक में प्राय वेही यावें
बताई गई हैं जिनसे जर्मनी के विकास का पता चले । इम
--पुस्तक का मुख्य विषय तो जर्मनी के व्यवसाय वाणिज्य का
विकास है । पुस्तक का बहुत बड़ा भाग इसी विषय ने पर
लिया है। पचास वर्ष, में जर्मनी ने अपना किस प्रकार
रुपातर कर लिया और अपने व्यवसाय वाणिज्य से ससार
को किस प्रकार चकित और स्तभित कर दिया, ये सब
बातें, इस पुस्तक में खूब अच्छी तरह समझाई गई हैं। परतु
वाणिज्य व्यवसाय के सामने उसने कृषि, शिक्षा, समाज
आदि की उन्नति की ओर ध्यान न दिया हो, यह बात नहीं
है। जर्मनों ने अपनी उन्नति की सब बातों पर समान
ध्यान रक्सा । जर्मनी का यह रूपातर और वास , कर
सापतिका रूपातर, किस प्रकार होता गया, यह बात इस
-
.
-

( २ ) पुस्तक को पढ़ने से पाठकों के ध्यान में अवश्य आ जानी चाहिए । व्यापार मे यश प्राप्त करने के लिये जर्मनी ने कितने प्रयत्न किए और किस परिश्रम और उत्साह से उसने अपना कार्य संपादन किया, ये सब बाते पाठकों को इस पुस्तक में मिलेंगी। जर्मनी ने जो औद्योगिक उन्नति की, उसका रहस्य समझने में इस पुस्तक से सहायता मिलेगी। "जर्मनी का विकास किसी गुप्त मार्ग से हुभा हो, यह बात नहीं है। उसने जिस मार्ग और जिन उपायों का अवलमन किया, वे मार्ग और उपाय सब के लिये सुळे हुए हैं। जो चाहे वह उन्हें प्रहण कर सकता है। संसार के बाजार में जो अप्रस्थान जर्मनीने प्राप्त किया है उसका कारण शास्न, शिक्षा और दीर्घ उद्योगों के सिवाय और कुछ नहीं है। जिन राष्ट्रों ने इन बातों की ओर दुर्लक्ष्य किया उन्हाँको यह अलभ्य लाभ प्राप्त नहीं हुआ। छोटे बड़े सब कामों की ओर बराबर ध्यान रखने से ही कार्यसिद्धि होती है। यह मत्र जर्मन लोगों से सीखने योग्य है। हमारा देश व्यवसाय वाणिज्य मे बहुत पीछे है। शिक्षा का प्रचार भी यहां उतना नहीं हुआ है जितना होना चाहिए । कलाकौशल में भी हम लोग बहुत गिरे हुए हैं पर इन सब बातों को प्राप्त कर लेना कुछ कठिन नहीं है, यदि हम उचित मार्ग को ढूढ़कर उसपर बराबर प्रयत्न करते भागे अढते जॉय । जर्मन लोगों को तो सारे प्रयत्न स्वत' करने पड़े थे और हमें तो सहायता देने के लिये स्वयं ब्रिटिश सरकार और भारत की देशी रियासतें हैं जहा पर यह प्रयत्न बराबर जारी है कि . .

।
जिस तरह हो सके देश के वाणिज्य व्यवसाय और कला
कौशल को बढ़ाया जाय ।
यह पुस्तक मि० डब्लू हरपर्ट डासन की अगरेजी पुस्तक
"The Evolution of modern Germany" का हिंदी अनु
बाद है। विषय गहन और नया होने पर भी इस बात का प्रयन
किया गया है कि भापा ऐसी हो, जिससे विषय के समझने
में पाठकों को कुछ अधिक कठिनता न पड़े। मि. डासन
महोदय ने इस पुस्तक को इसी उद्देश्य से लिखा है कि
"भमेज लोग उन बातों को जान ले जिनसे जर्मनी
ने अपनी थोड़े समय में ही उन्नति कर ली है"। मि० डासन
ने इस पुस्तक में स्थान स्थान पर इग्लैंड के व्यापार, समाचार.
पत्रों, राजनैतिक विचारों, कलाकौशल सवधी साधनों, रेलवे,
नहरों आदि की अच्छी तुलना की है जिससे पाठक यह जान
सकेंगे कि अगरेज लेखक अपने देश की उन्नति के लिये किस
प्रकार का साहित्य प्रस्तुत करके अपने पाठकों के हाथ मे देने
का प्रयत्न करते हैं। मूल पुस्तक मि० डासन के कई वर्ष के
परिश्रम का फल है। उन्होंने बहुत सोज और छानबीन के
पश्चात् उपर्युक्त सामग्री एकत्रित करके, यह उपयोगी प्रथ,
उद्यमशील अगरेजों के सामने रक्खा और इस पुस्तके को
हिंसने का उद्देश्य भी उन्होंने मूल पुस्तक की भूमिका मे यही
पताया है कि अगरेज लोग जर्मनी के विकास का रहस्य जान
कर अपने देश को वर्तमान अवस्था से अधिक उन्नतिशाली
अनाने का प्रयत्न करें।
यह पुस्तक पहले पहल सन् १९०८ में प्रकाशित हुई थी।
.

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जर्मनी का विकास ।
पहला भाग।
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-
.
पहला अध्याय ।
नवीन विचारों का उदय ।
गत पचास वर्ष पहले की, यदि जर्मनी की दशा की
ओर ध्यान दिया जाय तो यह स्पष्ट प्रगट होगा कि
उस देश के मनुष्यों के मन की गति विलकुल सकुचित थी,
अर्थात अपने देश, अपनी भाषा, अपने आचार विचार,
अपना धर्म और अपने तत्त्वज्ञान के चिंतन में वे लीन
हो रहे थे। "स्व", अर्थात 'आप या अपना' इसके सिवाय
अन्य विषयो की भोर उनका ध्यान ही न था। परतु गत
पचास वर्ष से ही उनकी स्थिति बिलकुल बदल गई है। अपने
देश के अतिरिक्त और जो पृथ्वी का भाग है, उस भाग मे
प्रवेश करके, अपने देश का व्यापार बढाना और अपने देश
को सम्पत्तिशाली बनाना चाहिए , इतना ही नहीं, वरन
इस साधन की सहायता से, अपना राजकीय महत्व भी अन्य
देशों में स्थापित किया जाय, 'इस प्रकार की भावना उत्पन्न ।

- । (२) होने से और उसके अनुरोध से इनके लिये उनका प्रयत्न बराबर जारी है। प्राचीन सकुचित विचारों को त्याग कर अब नए उदार विचारों का उनमें सघार हुआ है। सारे ससार में अपना नाम हो, संसार के बहुत बडे भाग पर अपना प्रभुत्व हो, विद्या प्रभाव से नाना प्रकार के यत्रादिक निर्माण करक, नए नए शास्त्रीय शोध लगा कर, अपना देश सुसपन्न हो, यह बात हर एक जर्मन के मन में समाई हुई है। इस विचारक्राति का कारण यदि तलाश किया जाय, तो सौ वर्ष पहले पैदा हुए कॉट, फिस्टे, गेटी, और शिलर नाम के चार प्रथकार समुख आकर उपस्थित हो जाते हैं । इन चारों ग्रथकारों ने अपने अपने ढग पर अपनी लेखनी के प्रभाव से, जर्मन लोगों में नवीन चैतन्यता उत्पन्न कर दी है। नेपोलियन के उग्र प्रताप के कारण, जर्मन लोग, निस्तेज होकर बिलकुल असमर्थ हो गए थे यह बात सच है, परतु उनकी निस्तेजता को दूर करके, उनमें नवीन भावों और वीरश्री उत्पन्न करने का श्रेय, यदि किसी को दिया जा सकता है तो, इन्हीं चारों प्रथ- कारों को दिया जा सकता है। अपने दश के अभ्युदयार्थ हर एक मनुष्य को आत्मयज्ञ करना ही चाहिए, इन प्रथकारों का यह तत्व जय जर्मन लोगों के मन पर जमा, तब नेपोलियन द्वारा बैठाया हुमा मत शनै शनै कम होने लगा और लोगों में शौर्य की नवीन लहरें हिलोरें मारने लगी, और थोड़े दिनों के पश्चात ही उन्हे जो युद्ध करने पड़े उनमें उन्हें यश प्राप्त हुआ। उपरोक्त प्रथकारों ने यह एक ही काम नहीं किया, शौर्य के साथ साथ विद्या की रुचि की ओर भी लोगों - । .

- को लगाया। यह विद्या की रुचि धीरे धीरे इतनी अधिक बढतो गई कि जर्मनी विद्या की जननी कहलाई जाने लगी। अतएव यदि सौ वर्ष पहले की जर्मनी का, आज कल की जर्मनी से मुकाबला किया जाय तो प्रगट होगा कि वहाँ बिलकुल नया युग आकर उपस्थित हो गया है। उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्धं का यदि आप इतिहास पढ़ें तो आपको मालूम होगा कि काल्पनिक जगत् में, वे लोग विचरण करते थे और अध्यात्म विचारों में ही लीन रहते थे। परतु उचरार्द्ध का इतिहास अवलोकन करने से एक नवीन भाव दृष्टिगोचर होगा। काल्प- निक जगत् का नाश होकर उसका स्थान ईश्वर-निर्मित दृश्य जगत् ने अब अपने अधिकार में कर लिया है। मनुष्य जाति क सुख के लिये परमेश्वर द्वारा निर्माण की हुई, सार वस्तु क्या है, उसका गुण धर्म क्या है, इसका शोध करने की ओर अब विचारों का स्रोत वह निकला है। इन विचारों को शीघ्र ही परिपकता का स्वरूप प्राप्त होकर आधिभौतिक सम्पति में, अन पूजा का मान, जर्मनी को प्राप्त हुआ। सौ वर्ष पहले जर्मन लोगों ने भावनाधीन होकर कल्पना जगत् में भी बहुत बड़ा वैभव सम्पादन किया था परतु इससे उन्हें आर्थिक लाभ दिलकुल न हुआ। अब तो आर्थिक लाभ उन्हें प्राप्त हो रहा है और जो सृष्टि अपनी आँखों के सामने है, उस सृष्टि पर-काल्पनिक जगत् पर नहीं प्राप्त किया हुआ ध्येय उन्होंने अपनी आँखों के सामने रक्खा है। सौ वर्ष पहले जर्मन लोगों की स्थिति कैसी थी, इसका धर्णन एक जर्मन प्रथकार ने इस प्रकार किया है--" पूर्व ++ .

समय में जर्मन लोग गरीव और दुवले थे। संसार के और लोग उनका तिरस्कार करते थे और समय पड़ने पर उन्हें लूट लेते थे। लोग उनके साथ गुलामों के समान बर्ताव करते थे। उनके खेतों में पैठ कर माल को जबर्दस्ती छीन लाते और यदि मौका पड़ जाय तो उन्हें मार भी डालते थे। आत्मसरक्षणार्थ वे शत्रु से लड़ते झगड़ते भी थे, परतु लोग अपने साथ ऐसा बर्ताव क्यों करते हैं, इसका कारण जानने का वे कमी उद्योग नहीं करते थे। ससार की सपत्ति अन्य राष्ट्र आपस में बाँट लेते हैं और जर्मन लोगों को पूछते भी नहीं हैं, ऐसा क्यों होता है, यह विचार ही उनके मन में कभी नहीं आया। पेट पालनार्थ जितना उद्योग करना आवश्यक है, उतना करने के पश्चात बानी का समय, अपने घर में शातिपूर्वक बैठ कर प्राचीन प्रथकारों, कवियों और तत्त्ववेत्ताओं के प्रथ पढने में, वे व्यतीत करते थे। उन्हीं के साथ आनदपूर्वक विचरण करना, अथवा दु खाकुल होकर रोना, बस यही उनकी दिनचर्या थी । तत्त्वज्ञान में मग्न होकर वे अपने शरीर की सुध भी भुला देते थे । मनोराज्य में एक बार जहाँ उन्होंने प्रवेश किया फिर उन्हें अपने सामने संसार में क्या हो रहा है, इसकी चिंता नहीं रहती थी। इस प्रकार लिख कर फिर वही प्रथकार लिखता है-“परतु अब यह दशा बिलकुल बदल गई है। निरुपयोगी तत्त्वज्ञान को हमने एक किनार उठा कर रख दिया है। छोटी उमर में हम अपना समय अवश्य नष्ट होने देते हैं, यह सच है, परंतु बड़े होते ही हमें अपना हानि लाभ तुरत सूझने लगता

है। भय हम नवीन उद्योग में लग गए है। चाहे जितनी
कठिनाइया बीच में आकर पढ़ें, हम उनकी कुछ परवाह न
करते हुए अपने निश्चित स्थान पर पहुँच जायगे, ऐसा हमारा
दृढ निश्चय हो गया है।
जर्मन लोग स्वभावत बड़े उत्साही, उद्योगप्रिय और
बुद्धिमान होते हैं। ससार के अन्य भागों में आधिभौतिक
सुधार का कार्य जिस शीघ्रता से हो रहा है, उसके सामने वे
पीछे रह जायगे, यह सम्भव नहीं है। उन्नीसवीं शताब्दी के
आरम से, ही, कल्पना जगत् के बाहर निकल कर, वाह्य
जगत् की ओर अधिक ध्यान देने का अकुर, उनके हृदय में
उत्पन्न होने के चिह्न स्पष्ट दिखाई पडने लगे थे। अभी
इन अकुरों को फूटे हुए बहुत वर्ष नहीं हुए हैं तो भी आज
कल जो कुछ देख रहे हैं उस पर से कह सकते हैं कि इतना
विस्तृत वृक्ष खड़ा हो जायगा, इसकी कल्पना भी उस समय
किसी को न थी । सन् १८७० ई० में जर्मनी ने फ्रास पर पढाई
कर के विजय प्राप्त की थी। यही विजय, उनके अभ्युदय का
कारणीभूत हुई। नए नए शास्त्रीय शोध करके व्यापार में
अपना एक एक पैर आगे बढ़ाने का आरम उसी समय से
उन्होंने किया। आज कल, सारे संसार में, उनका व्यापार
इतना बढ़ा हुमा है कि उसे देख कर कोई भी मनुष्य चकित
हुए बिना न रहेगा। 'जिसके हाथ में व्यापार उसी के
घर में सपत्ति, इस सिद्धात के अनुसार जर्मन राष्ट्र भय
बहुत अधिक सपत्तिशाली हो गया है। कई इतिहासकारों
का मत है कि यदि सन् १८७० का युद्ध न होता तो जर्मनी
।
--

.
-
2
की जो स्थिति आज कला है वह आने में उसे और अनेक
वर्षों तक राह देखनी पड़ती।
इस युद्ध में जर्मनी के अधिकार में बहुत सा देश मा
गया। जीते हुए राष्ट्र से लड़ाई के खर्चे की बहुत बड़ी
रकम भी मिली। इस युद्ध में जर्मनी को यह साम्पत्तिक
लाभ तो हुआ ही परतु साथ ही जर्मन लोगों के विचारों में
भी बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ और इस विचार-परिवर्तन से
चन्हें जो लाभ हुआ वह साम्पत्तिक लाभ की अपेक्षा हजारों
गुना अधिक था।
इस विचारक्राति के कारण, औद्योगिक विषयों में जर्मनी
का सुधार
कैसे
हुआ, परदेश से व्यापार करने में किस प्रकार
उसे यश प्राप्त हुआ, इन बातों का विचार करने की यहा
जरूरत नहीं है, आगे चल कर प्रसगानुसार इन बातों पर
विचार किया जायगा। यहा पर केवल जर्मन लोगों का
बर्ताव, व्यवहार और उनका नवीन स्वरूप किस प्रकार
का है, इसी का परिचय करा देना आवश्य जान पडता है ।
जर्मन विद्यार्थियों को जो शिक्षा आज कल दी जाती है
वह इन चिह्नों में से एक चिह्न है । जिस शिक्षा की सहा-
यता से, विद्यार्थियों के मन में, भौतिक विषयों की आसक्ति
उत्पन्न होती है, उस प्रकार की शिक्षा पाठशालाओं और
कालेजों में दिए जाने की ओर जर्मनों का लक्ष्य है । हमारे
कथन का यह तात्पर्य नहीं है कि ऐसी शिक्षा देने का कार्य
जर्मनी ने ही आरम किया, अन्य राष्ट्रों को ऐसी शिक्षा पहले
नहीं मिलती थी और न अब मिलती है, शिक्षा की यह प्रवृत्ति
-

।
थोड़ी बहुत अब सर्वत्र है। परतु आज कल जर्मनी में वह
जिस तरह स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रही है वैसी वह और
कहीं भी दिखाई नहीं पड़ती, हमारे कथन का केवल इतना
ही मतलब है। नवीन शिक्षा का स्वरूप निश्चित करने के पश्चात्
पहला हमला जो वहाँ हुआ वह जिमनेशिया ( Gymnasin)
नाम से प्रसिद्ध माध्यम शिक्षा देनेवाली पाठशालाओं पर
हुआ। इस प्रकार की पाठशालाओं को जो उत्तेजना मिलती
थी वह कम की जाकर नवीन पद्धति की पाठशालाएँ स्थापित
की गई और उनकी संख्या दिनों दिन बढ़ने लगी । परतु
इसका यह
अर्थ नहीं है कि प्रशिया की माध्यमिक श्रेणी
की पाठशालाओं में आज कल जितनी अग्रेजी भाषा की शिक्षा
दी जाती है उतनी शिक्षा पहले कभी नहीं मिलती थी। परतु
अग्रेजी भाषा अच्छी है अथवा उसका साहित्य ऊँचे दर्जे का
है, ये भाव उत्पन्न होकर प्रशियन लोगों के मन में अग्रेजी
भाषा के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ हो, यह बात नहीं है। जर्मन
गवरमेंट ने फ्रेंच भाषा के बजाय अग्रेजी भाग सिखाने का
प्रस्ताव स्वीकार किया और उस अमेजी भाषा के गौरव बढाने
योग्य शब्द मौजूद हैं, यह ठीक है , परतु वास्तव में वह है
शब्दप्रपच ही। उसमें प्रेम का लेशमात्र नहीं है, यह बात
कभी भुलानी नहीं चाहिए । व्यापारी लोगों को अमेजी
भाषा की जरूरत है।' ससार के किसी देश में जाइए, यदि
आप को अग्रेजी भाषा आती है तो व्यापार में आप को कहीं
भी कठिनाई न पड़ेगी। व्यावहारिक दृष्टि से यह घड़ी
-आसानी है और इसी भासानी की ओर ध्यान देकर जर्मनी
,
-
--

ने अप्रेजी भाषा को स्वीकार किया है। यह स्वीकार करना, प्रेम दृष्टि से नहीं, स्वार्थ दृष्टि से है । व्यवहारोपयोगी शास्त्रों की शिक्षा के लिये प्रशियन सरकार मुक्तहस्त होकर जितना चाहिए उतना धन प्रदान करती है। परतु तत्त्वज्ञान की शिक्षा देने को दो दाने भी मिलना कठिन होता है। इस विषय में एफ प्रथकार ने लिखा है-"सृष्टि विज्ञान तथा औप- योगिक शिक्षा की भोर विशेष ध्यान होने के कारण मानस- शास्त्र और कला कौशल में, जर्मन लोगों का मन अधिक लगता है । आत्म ज्ञान संपादन करके आत्मसुख की इच्छा रखनेवाले लोग अब वहा बिरले ही दृष्टिगोचर होते हैं । उद्योग और व्यापार द्वारा ऐहिक सपत्ति प्राप्त करनेवाले लोग तो आप को अनेक दिखाई पड़ेंगे परंतु यह सृष्टि कब निर्माण हुई, इस सृष्टि में कौन कौन से गूढ तत्त्व भरे हुए हैं, इसका निर्माता कौन है, सृष्टितत्त्व का सच्चा रहस्य क्या है, इन विषयों पर विचार करनेवाले लोग आप को शायद ही अववहा कोई दिखाई पडें । यह कितने दु.स की बात है।" सरकारी नौकरी द्वारा जो सापत्तिक लाभ प्राप्त होता है उससे कहीं अधिक लाभ व्यापार द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, यह वात जर्मन लोगों के ध्यान में पूरे तौर पर आ गई है, अतएव इसका परिणाम सरकारी बड़ी बड़ी नौकरियों से लेकर छोटी छोटी नौकरी तक पड़ा है। व्यापार की ओर लक्ष्य जाने के पहले सरकारी नौकरी ही अधिक लाभदायक द्विसाई पड़ती थी और इस कारण बड़े बड़े सरकारी ओहदों के अफ- सर सर्व साधारण लोगों से अहकारपूर्वक बर्ताव करते थे । सर.

कारी अधिकारी होना ही वहावड़े आदमी होने का चिह्न समझा
जाता था। अतएव अधिकारी लोग रियाया को अपना प्रभुत्व
बता कर तग करते थे।
परतु व्यापार द्वारा सपत्ति प्राप्त
करने का मार्ग खुल जाने से अब बिना सरकारी नौकरी किए
हुए ही लोग सपचिशाली और धनाढ्य हो रहे हैं अवएव
अधिकारियों का गर्व भी कम हो गया है, और वे अय
साधारण, लोगों के साथ खुले दिल से वरावरी का वर्ताव करने
लगे हैं। परतु सरकार में अपने काम के प्रति प्रतिष्ठा और
मान पूर्ववत् बना हुआ है, नौकरी की यह मोहनी मूर्ति अन भी
उनके सम्मुख बनी हुई है , इस कारण " हमें सरकारी नौकरी
> दो"ऐसी विनय करने का क्रम अब भी वहा बना हुआ
है। परतु यह होते हुए भी भव यह भाव नहीं रहा कि जितने
अच्छे मनुष्य हैं वे सब सरकारी नौकर ही हैं। सरकारी
नौकरी के अलावा अन्य कहीं किसी काम को करनेवाले अच्छे
आदमी नहीं है, यह स्थिति अब बदल गई है। यदि जर्मन
देश की सच्ची बुद्धिमत्ता का पता चलाना हो तो भिन्न भिन्न
कपनियों, कारखानों अथवा बैंकों में जाकर देखना चाहिए।
इस उलट-फेर का कारण यदि आप जानना चाहते हैं तो यह
बात सहज ही आप फे ध्यान में आ जायगी कि जितना धन
नौकरी कर के वेतन द्वारा प्राप्त हो सकता है उसस कहीं
अधिक धन व्यापार द्वारा कमाया जा सकता है। बस,
इसी कारण सरकारी नौकरी की ओर से लोगों का ध्यान
इंट कर व्यापार की ओर जा लगा है।
सरकार भी
नौकरी के लिये अच्छे आदमियों की खोज में अधिक

- . ។ जन और पदवी का प्रलोभन दिखाने लगी है; परतु इस प्रलोभन द्वारा उतनी अधिक मुट्ठी गरम नहीं हो सकती 'जतनी व्यापार द्वारा हो सकती है। जिन लोगों ने बड़े बड़े- सरकारी ओहदों से इस्तीफा देकर व्यापार द्वारा पुष्कल धन उपार्जन किया, यदि उनका पता लगाया जाय तो बहुत से मनुष्य आप को मिल जावेंगे। जो लोग किसी बड़े सरकारी मोहदे पर पहले कार्य करते थे वे अब या तो किसी बड़े कार- खाने के मेनेजिंग डाइरेक्टर के रूप में दिखाई पडेंगे अथवा ट्राये कपनी में काम करते दृष्टिगोचर होंगे या किसी बड़े लोहे के कारखाने के मेनेजर होंगे। ऐसे उदाहरण कहा तक दिए जावें । पाठक स्वय इसकी कल्पना कर सकते हैं। आजकल के अन्य देशों के साथ उपरा चढी करने का जो भाव जर्मन लोगों में उत्पन्न हो गया इसका मुख्य कारण अगरेज लोग यह समझते हैं कि उद्योग व्यवसाय करने वाले जर्मन व्यापारियों ने सारे ससार का व्यापार अपने हाथ में कर लिया है। परतु यदि इस बात को जरा ध्यानपूर्वक देखा जाय तो पता चलेगा कि वे लोग व्यापार की ओर ही ध्यान नहीं रखते वरन् वे चारों ओर अपनी दृष्टि डाला करते हैं और ऐसा करने में जर्मनी में प्रगट हुए नवीन तेज का प्रभाव अन्य भोर भी अनेक वातों पर पड़ कर उसके स्पष्ट चिह्न दिखाई पड़ने लगे हैं। शरीर में दृढ स्नायु होना ही सचा पुरुषार्थ है, यह बात जर्मन लोग अच्छी तरह जान गए यह उन चिह्नों में से एक चिह्न है। गत-शताब्दी के उत्तरार्ध के आरभ में तीन युद्धों में प्रशिया ने विजय प्राप्त ܛܼ -

की। यह उसी दृढ स्नायु-शारीरिफ पल का प्रभाव है।
राजकार्य सपादन करने के लिये शारीरिक सामथ्र्य फी ओर
विशेष ध्यान रखना स्वाभाविक बात है। गत पीढ़ी में जर्मन
लोगों ने देश अथवा विदेश जहाँ कहीं राजकार्य किए, वे सब
अपने शारीरिक बल के भरोसे पर ही किए । इन राजकार्यों
का प्रवर्तक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ प्रिंस विस्मार्फ था। "राजकीय
प्रश्न अर्थात् शक्ति का प्रश्न यह विस्मार्क का दृढ विश्वास
था, और इस नियम का वह अपने हृदय से प्रतिपादन करता
था। युद्ध ही में उसन शक्ति का उपयोग नहीं किया वरन
अन्य बातों में भी वह शक्ति का उपयोग करता था ।
अमुक शास्त्र का अमुक सिद्धात है, यह प्रतिपादन करने
वाले मनुष्य की बातों को शातिपूर्वक सुन लेने की विस्मार्क में
बिलकुल आदत न थी। किसी विषय का अपने मन से चिंतन
न करनेवाला और उसमें मग्न रहनेवाला उसकी दृष्टि के
सामने भी नहीं आता था । किसी काम को करने का मन में
विचार आते ही उसे दृढ़तापूर्वक फर डालना ही उसका स्वभाव
था । वह यह नहीं देखता था कि इस बात का लोगों के हृदय
पर क्या प्रभाव पडेगा। अपने बहुत दिनों के सोचे हुए
विचारों का अपने द्वारा अनादर होगा अथवा क्या, इसकी
परवाह उसने कभी नहीं की। इस प्रकार का दृढ निश्चय
शारीरिक शक्ति की दूसरी प्रतिमा है, यह स्पष्ट है । प्रिंस
बिस्मार्क के इस कार्य का अनुमोदन करनेवाले और उसके
मत का प्रतिपादन करनेवाले लोग जर्मनी में आज कल कितने
उसकी बुद्धिमत्ता और उसकी दूरदर्शिता भले ही

- किसी में न हो तो भी उसके मत का प्रतिपादन करने में लोगों को कोई रोक टोक नहीं है। "हमारे राजनीतिज्ञों में यदि राजनीतिमत्ता की कमी हुई तो वे अपने शारीरिक बल से उस शक्ति को पूरा कर देंगे" ऐसे उद्गार एक प्रसिद्ध जर्मन सेनापति ने अभी थोड़े ही दिन हुए, निकाले थे । सच्चे राजनैतिक कार्य में, जर्मन राजनीतिज्ञ इतनी सैनिक धमड की भाषा का व्यवहार नहीं करते हैं यह बात सच है, परतु । इन दोनों की जाति एक ही है। आधिभौतिक शक्ति की इतनी प्रबलता होने का इतना अधिक प्रभाव जर्मनी में पड़ा कि सरकारी सत्ता इतनी अधिक बढ गई जितनी पहले कभी नहीं बढ़ी थी। परतु सरकार के हाथ में, जितनी सत्ता अधिक रहती है, प्रजा के अधिकार उतने ही कम हो जाते है। अतएव प्रजा को हर बात में सरकार का मुख देखना पड़ता है। आज कल जर्मनी की ऐसी ही स्थिति हो गई है। जर्मन सरकार का अधिकार क्षेत्र बहुत विस्तीर्ण हो गया है। यदि इसका प्रत्यक्ष उदाहरण किसी को देसना हो तो उसे जर्मनी की प्रचड सेना की ओर ध्यान देना चाहिए । यथाशक्ति अपना बल बढ़ाते रहना, यही जर्मन लोगों की इच्छा है, और उस इच्छा का स्वरूप उसकी विशाल सेना है। जर्मन सेना ही जर्मन राष्ट्र है, यही भाव सर्वन जर्मन लोगों में * जर्मन समाज में सेना का कितना महत्व है यह बात 'जर्मन' नामक पुस्तक में इस प्रकार लिखी है- -- , (१३) फैला हुआ है । जमीन पर लड़नेवाली अजित सेना को समुद्री येडे के साथ करा देना चाहिए, यही सर्वत्र चर्चा हो रही है । ये सब बातें जर्मन शक्ति को बढाने के लिये ही हैं। फौजी शक्ति बढ़ाने की इतनी प्रचड तैयारी जारी होने पर भी, कुछ लोग कहते हैं कि इस से अन्य राष्ट्रों को कुछ भय का विशेष कारण नहीं है। क्योंकि वे लोग कहते हैं कि हमारे राष्टू के समान कोई दूसरा राष्ट्र शातिप्रिय नहीं है। हमारी तो केवल यही इच्छा है कि जर्मनी का पग व्यापार में आगे बढ़े और इस इच्छापूर्ति के लिये अन्य राष्ट्रों से कलह उत्पन्न करने का हमे कोई कारण नहीं समझ पड़ता । राज्य में प्रचड सेना हो, बस इसीलिये उसकी योजना की गई है। अन्य राष्ट्रों के विरुद्ध उसका उपयोग करने का कोई प्रयोजन नहीं . One of the most striking features of German life is the presence every where of the regular soldiery and the great place the army holds in the thoughts and affections of the nation Neat and tidy in appearance, you will see in every town officers strutting the streets with a look of conscious dignity, jingling their spurs and clanking their sabres The daily press 10 Ger 103ny whilé often ignoring political topics that seem to touch the masses more closely, is for ever devotiog much space and time to a discussion of the different phases of army life, and their readers demand thus No where else in the world is the army so much identified with the uation, and no where else is respect and tender regard for the army so deep-seated and general Pages 216-17

-
है। इस प्रकार के विचार अनेक ग्रंथकारों ने अपनी अपनी
पुस्तकों में लिख रक्खे हैं । जर्मनी के सेठ साहूकार, मजदूर,
कल, कारखाने और खेती करनेवाले सबों का ध्यान सरकार
के इस सिद्धात की ओर आकर्पित हो रहा है और उन्होंने
सरकार का यह उदाहरण "जिसकी लाठी उसकी भैंस" सदा
अपने सामने रक्खा है
जान रस्किन ने एक स्थान पर लिखा है कि जब कभी
किसी राष्ट्र के हृद्गत विचारों को जानना हो अथवा यह
जानना हो कि किस उद्देश्यपूर्ति के लिये उसके प्रयत्न जारी
हैं, तो उस राष्ट्र की वास्तुविद्या-आर्किटेकघर--का निरी-
क्षण करना चाहिए । जर्मनी की वर्तमान प्रचलित वास्तुविद्या
की कसौटी पर रस्किन का मत यदि लगाया जाय तो उसका
विचार अक्षरश सत्य प्रतीत होगा। जर्मनी के उत्तर आर क
नगरों को देखो अथवा स्वय बर्लिन राजधानी की ओर
ध्यान दो, तो मालूम होगा कि गत तीस वर्षों में जितनी
नवीन इमारतें तैयार हुई हैं उन सवों में मालिकों की शक्ति
प्रगट करने का प्रयत्न किया गया है परतु अठारहवीं शताब्दी .
अथवा इससे पहले के बने हुए बर्लिन के मकानों को देखने
,
4
• यदि उन अथकारों के फथन को सच्चा मान कर अन्य राष्ट्र
अपनी अपनी शक्ति न पढाते तो इस वाक्छल का परिणाम क्या
होता ! जर्मनी ने अपनी स्थल सैनिक शक्ति के साथ जल शक्ति भी
खूब पढ़ाली है । इस काम के लिये वहाँ नितने धन की आवश्यकता
होती है उतना धन सरकार मजूर करती है।

से कारीगरों की कुशलता का पता चलता है। यह दशा सर- कारी इमारतों की ही नहीं है, निज के लोगों के बनवाए हुए मकानों की भी यही दशा है। कारीगरी की ओर अब उतना ध्यान नहीं है जितना पहले था । अब तो इमारतों की भव्यता अथवा विशालता की ओर अधिक ध्यान है जो सापत्तिक उन्नति का परिचय करता है। आज कल जर्मन राष्ट्र का सुधार सब प्रकार से हो गया है और भविष्यत् में इससे भी अधिक होगा, इसमें किसी प्रकार का सदेह नहीं है। पचमहाभूतों को जर्मन लोगों ने एक प्रकार से अपने अधिकार में कर लिया है। पृथ्वी के बहुत बड़े भाग पर जर्मनी का प्रभुत्व स्थापित होना चाहिए, एसी आकाक्षा उनके हृदय में उत्पन्न हो चुकी है। व्यापार और व्यवसाय में वे अन्य लोगों की अपेक्षा आगे निकल गए हैं। सैनिक शक्ति वे इतनी अधिक बढा रहे हैं कि जिससे अन्य देश- वासी उनकी ओर आँखें उठा कर भी न देख सकें। परोत्कर्षको नसह कर, वे समुद्र पर अपना वर्चस्व स्थापित करने के उद्दश्य से समुद्र की ओर, बड़ी आशा से आँखें लगाए बैठ है। ये सब बातें सर्वोपरि सुधार के लक्षण नहीं है वो और क्या हैं? परतु इस सुधार की जड़ में कौनसा तत्व है, यदि इस पर विचार किया जाय तो यह बात स्पष्ट प्रतीत होने लगेगी कि आधुनिक जर्मनी में गौरवोन्माद की तरग उठ रही है और इन तरगों के मद में मस्त, वह अन्य राष्ट्रों का उत्कर्ष सहन नहीं कर सकती है। सारे राष्ट्र मेरे स्वाधीन हो जावें और सर्वथा मेरी विजय हो, ये भाव उसके हृदय में उत्पन्न हो

-
-
का
( १८ )
बहुत फठिन है। धन धान्य से भरे हुए कोठे अथवा माल से
भरे हुए व्यापारी जहाज अथवा नए नए शास्त्रीय शोधों द्वारा
बढ़ी हुई अपार संपत्ति, यह कुछ योग्य उपहार नहीं है,
जिसके लिये कोई जर्मनी को अनेक धन्यवाद दे अथवा
उसके यश की चर्चा का प्रसार हो। “जर्मनी का सुधार कहा
जाता है वह है कहाँ ?" यह प्रश्न एक जर्मन लेखक ने अभी
कुछ समय हुआ तभी किया था, उसका भी भावार्थ अथवा
रहस्य यही है।
आज कल के समय में, किस विषय की ओर जर्मनी
लक्ष्य है यह वात यदि विचारपूर्वक देसी जाय तो यह बात स्पष्ट
प्रतीत हो जाती है कि जड़-सृष्टि पर वह अपना प्रभुत्व जमाने
की चिंता में ही लगा हुआ है। शारीरिक और आधिभौतिक
शक्ति पर ही उसका दारोमदार है। पच महाभूतों को सींच .
कर अपने अधिकार में लाने की शक्ति का विकास, जितना
जर्मन लोगों में देखा जाता है उतना अन्य राष्ट्र के लोगों में
चहुत ही कम देसा जाता है। उनके काम करने की पद्धति
अनुकरण करने योग्य है। यह बात नहीं है कि जर्मनी में
तैयार की हुई यत्रसामग्री सर्वोत्कृष्ट होती है, परतु उन यत्रों
की सहायता से जो काम किया जाता है वह काम अवश्य
अति उत्तम होता है, यह बात बिलकुल निर्विवाद है। तो
भी इन अचेतन यत्रों को छोड कर मनुष्यरूपी सचेतन
यन्त्र को हाथ में लेते ही हाथ डगमगाने लगता है। परतु
इसका कारण क्या है ?
इसका कारण भी उपरोक
घेतलाई हुई मनोवृत्ति के सिवा, और कुछ नहीं है। जर्मनी
क

। ( १९) के कालेजों और यूनिवर्सिटियों में बड़े बड़े ,पडित निर्माण होते हैं। कला कौशल की शिक्षा देनेवाली पाठशालाओं में छोटे बडे सब प्रकार के यत्रों की पूरी पूरी जानकारी रखने- वाले तथा उन यत्रों को चलानेवाले कारीगर उत्पन्न होते हैं परतु विद्यार्थियों को शीलवान बनाने अथवा उनके अग में किसी विशेष गुण के उत्पन्न करने में वहाँ की यूनिवर्सिटियों और कालेजों का बिलकुल उपयोग नहीं होता। देश की प्रच लित राज्यव्यवस्था की जड़ में यह दोष होने से वहाँ के कुछ सुशिक्षित लोग भी इस बात को चुरा कहते हैं। परतु यह राज्यपद्धति बुरी क्यों है, इसका दोष किस पर है और यह दोष दूर किस प्रकार किया जा सकता है, इस विषय में सुशिक्षित लोगों ने अभी तक कोई स्पष्ट राय नहीं दी है । परतु वे इस प्रथा को दूपित अवश्य बताते है। राज्य व्यवस्था से सुशिक्षितों को जितना लाभ होना चाहिए उतना अभी नहीं हुभा है, इस कारण जर्मन राज्य नौका ठीक मार्ग पर नहीं जा रही है, यह उनका विश्वास है। परतु राज-सत्ता उनके हाथ में न होने से वे जहाँ के तहाँ हाथ मलते बैठे जर्मन लोगों में अनेक उत्तम उत्तम गुण भी पाए जाते हैं। उनके गुणानुरूप ससार में उनकी उन्नति हो, ऐसी इच्छा रखनेवाले जर्मनी के याहर भी बहुत से लोग मौजूद हैं । परतु उनके मतानुमार ही यह भी एक घात पाई जाती है कि जर्मन लोगों के हाथ से जो एक बहुत बड़ी भूल हुई है, वह यह है कि उन्होंने अपने राष्ट्र का पूर्व का ध्येय त्याग कर समान रूप में ऐहिक उन्नति को प्राप्त करने के पीछे अपने भाप

,
(२०)
को लगा दिया है। ऐहिक संपत्ति का यह निदिध्यास आगे
पल कर जब कम हो जायगा तब उनकी सात्विक वृत्ति का
उदय होगा और राजसिक वृत्ति का लय हो जायगा ! कुछ
वर्षों के पश्चात् यह सुपरिणाम होने से अपने आप ये बातें
स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगी, ऐसी दृढ आशा की जाती है।
जर्मन, राष्ट्र-सुधार की दृष्टि से बाल्यावस्था में है । बचपन का
लडकपन अबतक उसमें मौजूद है। यह लडकपन दूर हो कर,
बुद्धि की स्थिरता आने और दृढ़ विचार करने की शक्ति का
विकास होने पर जर्मनी हर तरह से एक अनुकरणीय राष्ट्र
चन जायगा ऐसी आशा करना कुछ अनुचित बात न होगी।

- दूसरा अध्याय । जर्मनी के तीन विभाग । जर्मनी अथवा जर्मनी के लोग, इस विषय में सर्व साधारण सिद्धातों का निश्चित करना, बड़ा कठिन काम है। "जर्मनी" इस एक शब्द में भिन्न भिन्न छब्बीस प्रातों का वोध होता है और इन प्रातों में भिन्न भिन्न प्रकार के लोग निवास करते हैं। उन प्रातों में भौगोलिक दृष्टि से भी बड़ा अतर है। उनके राजकीय इतिहास का स्वरूप भी बिल- कुल भिन्न भिन्न है। हर एक जाति की उपजातियों के भी बहुत से भेद हैं और घरों की रहन सहन तथा ज्ञान-प्राप्ति के मार्ग भी भिन्न भिन्न हैं । इस भिन्नता के कारण, सर्वसाधारण सिद्धातों का स्थिर करना बड़ा कठिन काम है। परतु यदि सावधानी के साथ विचार किया जाय तो इस बात का निश्चित कर लेना बिलकुल असभव भी नहीं है। जर्मन राष्ट्र के यदि कई विभाग कर दिए जाय तो इस बात का बवाना बहुत आसान हो जायगा। परतु ये विभाग निर्दोष अथवा प्रमाणवद्ध होंगे, यह हमारा सिद्धात नहीं है। परतु यदि जर्मनी और जर्मन लोगों का ठीक पता लगा कर, उनका हाल जानना है, तो ऐसी योजना किए बिना, यह काम होना असभव है और यदि ऐसा किया जायगा तो भिन्न प्रकार से कुछ न कुछ स्थानिक मर्यादा त्याग करनी पड़ेगी। .

( २२ ) हम अपने सिद्धात के अनुसार जर्मनी के तीन विभाग करना चाहते हैं। लोरेन, वेदन, बवेरिया और सेक्सन इन प्रांतों की सरहद पर से पश्चिम से पूर्व की ओर एक रेखा सींचनी चाहिए। इस रेखा से जर्मनी के दो भाग-उचर जर्मनी और दक्षिण जर्मनी-हो जाते हैं। फ्रास और बेलजियम के समीप, राइन प्रात से पूर्व की ओर रूसी पोलैंड की सरहद तक सारा प्रशिया प्रांत तथा इसके सिवा मेल्केनवर्ग, ओल्डन- वर्ग और वासविक प्रदेश उत्तर जर्मनी की ओर जाता है। भाल्सेस-लोरेन, साक्सनी के तीन राज्य, बवेरिया और वर्दैवर्ग, उसी प्रकार प्रांड 'डची माफ बेडन-इतना प्रदेश दक्षिण जर्मनी में शुमार किया जाता है। इन दोनों के बीच का विभाग थुरिंगियन स्टेट्स को इन दोनों भागों में से किसी भाग में न मिला कर स्वतन्त्र रहने दिया है और ऐसा करने के लिये हमारे पास कई कारण भी उपस्थित हैं। पूर्व पश्चिम रेखा पर एक दूसरी लबी रेखा बनाई जाय तो स्वय प्रशिया के दो भाग हो जाते हैं, अर्थात् पश्चिम और पूर्व । इन दोनों देशों की पूर्व सज्ञा कायम रख कर इन्हें "पश्चिमी एल्बाप्रात" और "पूर्वी एल्बा प्रात" कहने में भी कुछ हर्ज नहीं है। पहले भार्ग में हनोवर, हेसी-नसाऊ, न्हाइनलैंड और वेस्ट फालिया ये प्रांत आ जाते हैं, और दूसरे भाग में खेती करने योग्य प्रशिया का समतल भाग मेल्कनवर्ग के दो प्रात आते हैं। एल्ब नदी के पूर्व की ओर का भाग जर्मन राष्ट्र के धान्य की कोठी है यदि ऐसा कहा जाय तो कुछ हर्ज नहीं है। क्योंकि साल भर के खर्च के लिये, जितना गेंहू और राय (Rye) 1 .

'अर्मनी को चाहिए उसका दो तिहाई भाग इसी प्रात में
उत्पन्न होता है।
जिन तीन भागों म देश को हमने बॉटा है वह बॉट
अधूरी अवश्य है, यह हमें ही प्रतीत होता है। परतु इस
व्यवस्था से जर्मन राष्ट्र में भिन्न भिन्न प्रकार के जो लोग
निवास करते हैं, उनके स्वभाव, व्यवसाय और उनके
हित मनहित का सागोपाग विचार करना और उससे बहुत
से महत्व के सिद्धातों का निश्चय करना, सहज होगा, इसमें
कोई शका नहीं है।
पहले पहल ही पाठकों को यह दिसाई पडेगा कि पश्चिम
से पूर्व की ओर जो एक आड़ी रेसा स्त्रींची है, उस रेखा
से जर्मनी के राजकीय दृष्टि से स्थूल प्रमाण पर ही बिलकुल
दो निराले भाग हो जाते हैं। उत्तर भाग में (हवर्ग और
प्रेमन दो प्रातों को अलग कर के) सर्वेटिव पक्ष के लोगों
की अधिक प्रबलता है । जर्मनी का इतिहास मुख्य कर इसी
पक्ष के लोगों के
मतानुसार
निर्माण हुआ है। इतना ही नहीं,
वर्तमान समय में भी, जो देश की भीतरी व्यवस्था स्थिर
की गई है उसमें भी उन्हीं प्रातवासियों का मत अधिक है।
प्रशिया ही जर्मनी है, यह जो लोगों का 'विचार है, वह
गलत है। प्रशिया की राजकीय, सामाजिक और औद्योगिक
स्थिति को देस कर सारी जर्मनी के सवध में किया हुआ मनु-
मान भूल है और आक्षेप करने योग्य है, इसमें कुछ संदेह
नहीं है। प्रशिया में विपुल संपचि है, सुधार के कार्यों में भी
उसका पैर आगे बढा हुआ है, उस प्रातः की राज्यव्यवस्था

३ ( २४ ) भी बहुत अच्छी है, सैनिक शिक्षा और कार्य भी अनुकरणीय है, ये बातें सब ठीक है, परतु राजकीय मामलों में वह अभी सभों से पीछे है। पक्षिण ओर के छोटे छोटे प्रात इस विषय में उस से कहीं आगे हैं। उत्तर जर्मनी और पक्षिण जर्मनी में, पचास वर्ष पहले लोकमत की कुछ अनुकूल वातें हो जाने के कारण वर्तमान राज्यव्यवस्था की बुनियाद पड़ी । परतु इन दोनों भागों में, उस समय जो एक महत्व की बात रह गई वह अब तक वरा- पर ज्यों की त्यों बनी हुई है । आज करीब करीब साठ वर्ष से प्रशिया में पार्लियामेंट कायम है, परतु उसमें अनियत्रित- सत्ता का प्रभाव अब भी कम नहीं हुआ है। उसका मत है कि पार्लियामेंट के अधिकार राजा ने स्वय प्रजा को प्रदान किए हैं, प्रजा ने स्वय अपनी शक्ति से,राजा से प्राप्त किए हों, यह बात नहीं है । राजा प्रसन्नतापूर्वक जो अधिकार प्रजा को प्रदान करें उन्हीं को पा कर प्रजा को सतोप मानना चाहिए । राजा की इच्छा के विरुद्ध जाने का प्रयत्न करना उचित नहीं है, यह प्रशियन राजनीति का मूल मन है और इस बात को राजा और प्रजा दोनों अच्छी तरह समझते हैं राज्यव्यवस्था का मुख्य प्रवर्तक राजा होने से, प्रशिया की राज्यव्यवस्था में एक प्रकार की कठोरता, उद्दडता आ जाने से उसमें नम्रता का बिलकुल लेश नहीं पाया जाता है। गत पचास साठ वर्ष से जितने अधिकार राजा ने भारभ म कृपा कर के, प्रजा को प्रदान किए, उतने ही अधिकार आज वक प्रजा को प्राप्त हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि राजा

-
।
( २५ )
और प्रजा दोनों अपने अपने मन में, एक दूसरे से भयभीत
और सशकित बने रहते हैं। राजा को यह शका रहती है कि
प्रजा अपने से अधिक अधिकार मागेगी और प्रजा को यह
। भय और शका सदा धनी रहती है कि जो अधिकार कृपा कर
राजा ने प्रदान किए हैं कहीं उनको वह फिर न वापस ले लें।
राजनैतिक आदोलन करने की जितनी शक्ति प्रजा में
चाहिए उतनी उसमें नहीं है । क्योंकि जिन लोगों का राज
दरवार में प्रभाव है, वे सब कसर्वेटिव मत अर्थात राजपक्ष
के हैं और वे सदा राजा का ही पक्ष ग्रहण करते हैं। परतु
दक्षिण के ओर की दशा इससे भिन्न है। वहाँ लिबरल पक्ष
का जोर पहले से ही अधिक है। राजसत्ता नियत्रित हो कर
प्रजा को अधिक अधिकार मिलना चाहिए, उनका यह ध्येय
है और इसी ध्येय को साध्य करने के प्रयत्न में वे बराबर
लगे रहते हैं।
इस प्रकार का प्रचलित राजकीय मतभेद ही उत्तर और
दक्षिण जर्मनी में है, ऐसा नहीं है, उनके सगठन में भी बडा
अतर है। उत्तरी विभाग के लोगों का मन कठोर और स्वभाव
रुक्ष होता है। उनमें मुरव्वत नहीं होती। इसके विपरीव दक्षिणी
विभाग के लोगों में अधिक सौजन्य पाया जाता है। उनका
। स्वभाव विनोदी होता है। वे खुले दिल से काम करनेवाले होते
हैं। उनकी रहन सहन में अधिक ठाठ बाट और बनावट
नहीं है । ईश्वर के दिए हुए जीवन और आयुष्य को सुखपूर्वक
आनद के साथ व्यतीत करने की ओर उनकी बुद्धि की प्रवृत्ति
'अधिकतर पाई जाती है।

अधिक हानि उठानी पड़ती है। जमींदारों और उनकी
जमीनके शहरों से दूर होने के कारण शहर के लोगों की सामा.
जिक, सापत्तिक, औद्योगिक और राजनैतिक उन्नति कैसे
होती है, इस ओर उन लोगों का ध्यान नहीं जाता। जहाँ
पर अज्ञान का वास है, वहाँ पर उन्नति और सुधार कितना
हो सकता है, इसका विचार पाठक स्वय कर लें। जिस
प्रकार एक जुलाहा या कोरी अपना ताना पूरा बाँधे
उतनी ही जगह का, अपने को राजा समझता है; उसी
प्रकार वहाँ के बड़े बड़े जागीरदार अपने इलाके का ही
अपने को राजा समझते हैं, लोगों पर हुक्म करने का हमें
अधिकार है, हमारी इच्छा के विरुद्ध हमारी प्रजा को कोई
भी कार्य करने का, अधिकार नहीं है, इतना ही नहीं, जो
आज्ञा हम दें उसके विरुद्ध प्रजा को मुँह से एक शब्द भी
निकालना नहीं चाहिए, ऐसी नवाबी की स्थिति में, वहाँ के
लोग क्या उन्नति कर सकते हैं ! ऐसी स्थिति में रहनेवाले
लोगों की सामाजिक उन्नति कभी नहीं होती और न उनकी
बुद्धि का विकास होता है। एल्ब और विश्चुला नदी के बीच
के प्रदेश पर बहुत समय हुआ तब स्लाव जाति के
लोगों का अधिकार था। उस समय वहाँ के निवासियों की
स्थिति अच्छी थी। परतु जब से वह देश जर्मन लोगों के
हाथ में गया है तब से वहाँ पर अवनति का जो आरभ हुआ
वह आज तक घरावर बना हुआ है। इस प्रात की आबोहवा
भी पश्चिमी प्रात की भावोहवा के समान उत्तम नहीं है और
न ज़मीन ही अधिक उपजाऊ है। इन कारणों से जितनी

है।
( ३१ )
पैदावार उमीन में होनी चाहिए नहीं होती। पैदावारी के
लिहाज से जमीन की मालगुजारी भी सरकार को कम वसूल
होती है। पश्चिमी प्रात की मालगुजारी की अपेक्षा, इस प्रात
की मालगुजारी एक तिहाई के करीब है। सेती की इस बुरी
दशा को सुधारने के लिये प्रशियन गवरमेंट ने बहुत कुछ
प्रयत्न किए परतु कोई भी अच्छा परिणाम आज तक
नहीं निकला।
राजनैतिक विषयों मे, जर्मनी का दक्षिणी विभाग
उत्तरी विभाग से कहीं आगे है, यह बात अपर कही जा चुकी
अन यदि उत्तरी विभाग के ऊपर विचार किया जाय
तो यह बात मालूम होगी कि पश्चिमी विभाग पूर्वी विभाग
की अपेक्षा काम के विचार से बहुत आगे है। एल्ब नदी के
पूर्व की ओर, खेती पर गुजारा करनेवालों प्रात में प्रशिया,
के कसर्वेटिव लोगों का प्रभाव बहुत अधिक है। पार्लिया-
मेंट मे सभासदों के चुनाव का काम, इतना मर्यादित कर
दिया गया है कि गरीब लोगों की वहा तक पहुँच ही नहीं होने
पाती। अतएव पार्लियामेंट में अमीर लोगों की भरमार होने के
कारण ही वहा क निवासियों की जितनी उन्नति होनी चाहिए,
नहीं होती। इग्लैंड में भी लिबरल और कसरवेटिव दो
दल हैं। लिवरल उन्नति के पक्षपाती हैं परतु कसरवेटिव
उन्नति के विरोधी नहीं है। उनका मत है कि जो कुछ सुधार
या उन्नति का कार्य किया,जाय वह धीरे धीरे हो । इस पक्ष
के लोग लिबरल पक्ष के लोगों का मान करते हैं और यही
कारण है कि दोनों के सम्मेलन से इग्लैंट का राजकाज बड़ी

उत्तमता से चलता है । परतु जर्मनी में, इसके विपरीत
कार्य होता है। वहा पर फसरवेटिव लोग सुधार और उन्नति
के पूरे द्वेषी हैं और चलती गाड़ी क आगे रोड़ा डालने के कार्य
में वे बडे कुशल और निपुण हैं। इस प्रकार के लोग प्रशिया
के पूर्वी भाग में जितने हैं उतने यूरोप ही क्या, स्वय जर्मनी
के अन्य भागों में ढूँढने से भी न मिलेगे।
पार्लियामेंट की मेंबरी की बहुत सी जगहें इन नवाचों ने'
हस्तगत कर रक्सी हैं और वहा पर बैठ कर वे यह काम करते
हैं कि कोई काम प्रजा की भलाई के लिये वहां उपस्थित किया
जाता है तो ये स्वाथ-साधु अपनी स्वार्थ-बुद्धि से उस काम में
विघ्न उपस्थित कर देते हैं। शिक्षा सुधार के कामों में भी ये
लोग कुछ प्रयत्न करते हों, यह भी नहीं है। आज से सौ वर्ष
पहले शिक्षा के सबध में, जो उनका मत था वही अब भी
ज्यों का त्यों बना हुआ है। इसी कारण,
में भी
उत्तर जर्मनी और पूर्वी-प्रशिया के देहाती मदरसों में, मामूली
लिखना पढना और कुछ हिसाब किताब पढा देना ही बस
समझा जाता है। उनको भय है कि यदि किसानों के बालकों
को शिक्षा देने का प्रवध कर दिया जायगा तो उनमें शिक्षा के
प्रभाव से महत्वाकाक्षा उत्पन्न हो जायगी, जो उनके अत्या-
। चारों के लिये हानिकारक है। अतएव जिस तरह किसानों
के पाप दादा 'मो, ना, मासी' से आगे शिक्षा में नहीं बढ़े
उसी प्रकार उनके नाती पोतों को भी शिक्षा में आगे नहीं
वढना चाहिए। ये उनके स्वार्थमूलक विचार हैं। परतु
सरकार ने, उन लोगों के विचारों को एक ओर रख कर,
.
वर्तमान समय
-

( ३३ ) . - शिक्षा क्रम में बहुत कुछ सुधार किया है। प्रशिया म शिक्षा की व्यवस्था जितनी उत्तम है उतनी उत्तम व्यवस्था ससार के और किसी देश में नहीं है, यह बात उदाहरण 'क तौर पर बताई जाती है। इस उदाहरण को मानने के लिय हम तैयार हैं। प्रशिया में जैसी उत्तम शिक्षा मिलती है वैसी अन्य दशों में नहीं मिलती, यह हम मानत हैं । परतु इतना होने पर भी, देहाती मदरमों की शिक्षा में, अब भी बहुत न्यूनता पाई जाती है और जो कुछ थोड़ा बहुत प्रबध है भी, वह उच्च कोटि का नहीं है। प्रशिया में किसान बालकों के लिये जो पाठशालाएँ हैं व हमार मफतवों से कुछ अधिक अच्छी नहीं हैं । इग्लैंड में और खास कर आय. लैंड में, सन् १८७० ईस्वी तक इस प्रकार की बहुत सी पाठ- शालाएँ थीं। परतु अब उनका वहाँ नामोनिशान नहीं रहा। इसका श्रेय मि० मध्यू ऑर्नोल्ड नामक एक सजन को प्राप्त है। उन्होंने भायलैंड की पाठशालाओं का जैसा वर्णन किया था वैसी ही स्थिति इस समय उत्तरी-जर्मनी में दिखाई पढती है। विद्यार्थियों की अपेक्षा शिक्षकों की कमी, पाठ- शालों क टूट फूटे मकान, योग्य परतु कम वतन पानवाले शिक्षक, खर्च में कजूसी करनेवाले व्यवस्थापक और द्रव्य के अभाव के कारण पुस्तकालयों, प्रयोग शालाभों वगैरह का अभाव । इन सब कारणों से पाठशालाभों में होमियोपैथिक तत्व के अनुसार अर्थात् अल्प शिक्षा विद्यार्थियों को प्राप्त होती है, यह एक साहजिक बात है। इस सषध में प्रशियन गयरमेंट का कोई कसूर नहीं है। इस बुरी स्थिति को सुधारने के ३ . - A ( ३४ ) लिये, 'सरकार अपनी शक्ति के अनुसार उपाय करती है। 'परतु लोकप्रतिनिधियों से जितनी सहायता उसे मिलनी चाहिए उतनी न मिलने के कारण, सरकार के उपायों और प्रयत्नों का परिणाम जैसा निकलना चाहिए वैसा नहीं निकल- ता। एल्य नदी के पूर्वी भाग की ओर से जो प्रतिनिधि पार्लियामेट (डायट) में पाते हैं, यदि वे अपनी पुराणप्रियता को त्याग कर सरकार के प्रयत्न को सफल बनाने की अपने मन में ठान लें, तो जो शोचनीय स्थिति इस समय दिखाई पड़ती हैं वह न दिखाई पडे । पूर्वी प्रशिया के जमीदारों के सषध में अब तक जो कुछ लिखा गया है, उसकी विवेचना से यह बात स्पष्ट प्रगट होती है कि वहा के सारे जमींदार सुधार के प्रतिकूल हैं। परंतु यह बात नहीं है। संसार में अपवाद भी हुआ करता है। कुछ जमींदार ऐसे भी हैं जिन्हें आज कल के सुधारों से प्रेम है । वे सुधार के नवीन मागों को पसद करते हैं। खेती के साथ ही साथ किसानों का भी सुधार वे लोग चाहते हैं। वे शास्त्रीय पद्धति से खेती करने के भी पक्षपाती हैं। ऐसे लोगों की सख्या जब बढ़ जायगी और उनका प्रभाव लोगों पर अधिक पड़ने लगेगा तब पूर्वी-प्रशिया की दशा सुघर जाने में अधिक समय न लगेगा। यह दशा समय पाकर अवश्य सुधरेगी, इसमें सदेह नहीं है। जमींदारों को अपने अपने इलाके में जो राजकीय अधिकार प्रदान किए गए हैं. वे अधिकार क्रमशः कम होने चाहिए । जमींदार और उनके वंशजो के अधिकार कम होने से

सात
(३७)
जर्मनी के पड़ोसी वयोवृद्ध राष्ट्रों ने आरम में किया ।
युद्ध में बहुत से लोग घायल हुए और नाना प्रकार के रोगों
से पीड़ित होकर हजारों तरुण पुरुष कुसमय कराल काल के
गाल में चले गए । इस प्रकार चारों ओर जर्मनी की दुर्दशा
दृष्टिगोचर होने लगी। परतु थोड़े समय में ही युद्ध का घाव,
सृष्टि के नियमानुसार भर आया । "उद्योग धधों की उन्नति
शीघ्रता से होने के कारण युद्ध की प्राणहानि शीघ्र पूरी
हो जाती है" इस सिद्धात को जर्मनी ने शीघ्र सचा करके
दिखला दिया। फ्रास के साथ युद्धारम होने से पहले,
माठ वर्ष तक जर्मनी आस्ट्रिया से लड़ता रहा। उस समय
जो सैनिक तैयारिया जर्मनी ने की थीं, वे वरावर उसी तरह
बनी रहीं और उनका उपयोग फ्रास के साथ युद्ध के समय
किया गया। इस युद्ध में विजय लक्ष्मी ने जर्मन वीरों के
गले में जयमाल डाली। परतु इस विजय से वे उन्मत्त न
होकर युद्ध के बाद भी उद्योग भूमि में अपना पराक्रम दिखा
कर वहाँ भी विजय श्री प्राप्त करने के कार्य मे मन, वचन,
कर्म से लग गए । जो धन लोगों ने अपने घरों में गाड रक्खा
या वह बाहर निकाला गया और अच्छी पूजी लगा कर नए
नए कारखाने खोले गए । इन फारखानों से पूजी लगाने-
वालों को भी अच्छा लाभ होने लगा। अब क्या था, अधिक
साहस और जोखिम का काम करने का भी उनमें उत्साह
पैदा हो गया। जो गाव भार शहर अब तक पीछे पड़े हुए
ये वे भी आगे आने का उद्योग करने लगे। वहा लोगों की
भावादी भौर सम्पत्ति वर्षा-काल की नदियों के समान बड़े
.
.

तीसरा अध्याय ।
उद्योग-युग।
सन् १८७१ में जर्मनी और फ्रास के बीच जो युद्ध
हुआ, उस युद्ध में, जर्मनी ने विजय प्राप्त की। बस,
उसी समय से जर्मनी में उद्योग धधों और व्यापार की
पन्नति का आरभ हुआ। इसी साल जर्मन साम्राज्य की स्था-
पना हुई। उसी समय से राजनैतिफ मामलों में और व्या-
पारिक कार्यों में जर्मन लोग विशेष रूप से चमकने लगे।
जर्मन एक राष्ट्र है, यह कल्पना उसी समय पहले पहल,
बहा
के निवासियों के मन में उत्पन्न हुई। सघ शक्ति के
पढ़ने से, उसके बल पर, बड़े बड़े कार्यों को हाथ में लने का
साहस उनमें उत्पन्न हो गया । जर्मनी की वृद्धावस्था जाती
रही। जिस प्रकार ययाति राजा ने बुढापे में तरुणता प्राप्त
की थी उसी प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी में जर्मन राष्ट्र ने
वरुणता प्राप्त की । तरुणावस्था के उत्साह, आवेश और धैर्य
का परिणाम उनके व्यवहार पर पड़ने लगा। अपने पड़ोसी
राष्ट्रों का भातक जो उनके मन पर था, वह एक दम दूर
हो गया। इतना ही नहीं, वे पड़ोसी राष्ट्रों के साथ स्पी
बर्ताव करने लगे । किसी बालक के अल्हडपने की
पेष्टा को, वयोवृद्ध लोग कौतुक की दृष्टि से देखते हैं, भौर
पर विशेष ध्यान नहीं देते, इसी प्रकार का कार्य

. N ( ३७ ) जर्मनी के पड़ोसी वयोवृद्ध राष्ट्रों ने भारभ में किया । युद्ध में बहुत से लोग घायल हुए और नाना प्रकार के रोगों से पीड़ित होकर हजारों तरुण पुरुष कुसमय कराल काल के गाल में चले गए । इस प्रकार चारों ओर जर्मनी की दुर्दशा दृष्टिगोचर होने लगी। परतु थोड़े समय में ही युद्ध का घाव, सृष्टि के नियमानुसार भर आया। "उद्योग धंधों की उन्नति शीघ्रता से होने के कारण युद्ध की प्राणहानि शीघ्र पूरी हो जाती है" इस सिद्धात को जर्मनी ने शीघ्र सच्चा करके दिखला दिया। फ्रास के साथ युद्धारम होने से पहले, सात आठ वर्ष तक जर्मनी आस्ट्रिया से लड़ता रहा। उस समय जो सैनिक तैयारिया जर्मनी ने की थीं, वे वरावर उसी तरह बनी रहीं और उनका उपयोग फ्रास के साथ युद्ध किया गया। इस युद्ध में विजय लक्ष्मी ने जर्मन वीरों के गले में जयमाल डाली। परतु इस विजय से वे उन्मच न होकर युद्ध के बाद भी उद्योग भूमि में अपना पराक्रम दिखा कर वहाँ भी विजय श्री प्राप्त करने के कार्य में मन, वचन, कर्म से लग गए । जो धन लोगों ने अपने घरों में गाड रक्खा था वह बाहर निकाला गया और अच्छी पूजी लगा कर नए नए कारखाने खोले गए । इन कारखानों से पूजी लगाने- वालों को भी अच्छा लाभ होने लगा । अब क्या था, अधिक साहस और जोखिम का काम करने का भी उनमें उत्साह पैदा हो गया। जो गाव और शहर अम तक पीछे पढे हुए ये वे भी आगे आने का उद्योग करने लगे। वहा लोगों की भावादी भौर सम्पत्ति वर्षा काल की नदियों के समान बढे के समय 1 ( .३८ ) वेग से बढ़ने लगी। जर्मनी की राजधानी वर्लिन की जन- सख्या सौ वर्ष पहले एक लाख साठ हजार थी। परंतु यह सख्या १९०५ में २० लाख चालीस हजार हो गई। बर्लिन नगर में तो सम्पत्ति का पानी ही बरसने लगा। शहरों की इस उन्नति के कारण वहा जमीन का मूल्य भी खूब अधिक बढ़ गया । अतएव गरीब लोगों को रहने के लिये जगह की बहुत बडी कठिनाई उपस्थित हो गई। शहरों में और शहर के बाहर, आस पास, मकानों का किराया इतना अधिक बढ़ गया कि मध्यम और गरीब स्थिति के लोगों को उचित,किराए पर रहने के लिये, मकान कैसे मिलेंगे, यह विकट प्रभ लोगों के सामन आकर उपस्थित हो गया। शहरों की सपत्ति के साथ साथ जनसख्या की भी वृद्धि हुई है। गत पचास साठ वर्षों में, जितनी जनसख्या बढ़ी उसका प्रसार उद्योग धधों में, जो प्रात आगे थे, उनमें हुआ। सन् १८५५ और १९०५ इन दो सालों की जनसंख्या के अको को देखने से पाया जाता है कि कृषि प्रधान प्रातों में जितनी जन सख्या वढी है उससे कई गुनी अधिक जनसंख्या व्या- पार करनेवाले प्रातों की बढी है। जर्मनी के उद्योग युग का भारभ होने से पत्थर के कोयले, लोहे और अन्य खनिज पदार्थों की पैदावार बहुत अधिक होने लगी। जर्मनी के कारखानों में पत्थर का कोयला जितना काम में लाया जाता है उतना करीष करीब जर्मनी की खानों से ही निकाला जाता है। कुछ थोड़ा सा, नब्बे लास टन, इग्लैंड से भी आता है। परंतु कोयले के लिये -

( ३९ )
भी अपने को इग्लैंड का मुंह ताकना न पड़े, इस बात का
जर्मन कोयले के व्यापारी, बराबर प्रयत्न कर रहे हैं। कोयले
के व्यापार की अपेक्षा लोहे का व्यापार बहुत अधिक होता
है। अतएव लोहे के बहुत से कारखाने जर्मनी में पाए जाते
हैं। अलावा इन दो के तामा, जस्ता, सीसा, पोटाश, सास्ट भी
पहले की अपेक्षा सब स्वानों से अधिक निकाला जा रहा है।
परतु इन चीजों की रवानगी की अपेक्षा आमद अब भी
'ज्यादा है।
जिस उद्योग की ओर इंग्लैंड का विशेष ध्यान है वह
उद्योग जहाज और नौका निर्माण है। परतु वतर्मान समय
में जर्मन लोगों का भी इस ओर विशेष ध्यान गया है और
वे अधिक परिश्रम के साथ इस कार्य को करने में सलग्न
हो रहे हैं। जहाज बनाने के काम में जो विदेशी सामान
'काम में लाया जाता है, उसे फाम मे न लाकर उसकी जगह
पर स्वदेशी सामान काम में लाया जाय, इस ओर भी जर्मनों
का विचार आकर्पित हुआ है। उन्हें हर साल अपने इस
विचार में मफलता भी मिल रही है। एक सरकारी रिपोर्ट
मे इस बाबत लिखा गया है-"जहाज बनाने के काम में
आने योग्य लोहे के पत्रों के देश से ही प्राप्त हो जाने से
उसके लिये विदेश का अर्थात् इग्लैंड का मुख ताकना नहीं
पड़ता, यह बड़े मानद की बात है।
यदि संसार में उच्च कोटि के जहाज कहीं बनते हैं तो वह
इंग्लैंड ही में । वहा पर समुद्र के किनारे, बदरगाहों में, खराब
जहाज कभी तैयार होकर डाला ही नहीं जाता, आज पचीस
.
।
-

1 (४०) वर्ष हुए, अब लोगों के ये विचार थे। टाइन (Tyna) और लाइड ( Clyde ) में जहाज तैयार करनेवाले लोगों । के हाथ का मुकाबला ससार में कभी कोई नहीं कर सकता, यह बात बहुत प्रसिद्ध थी। परतु जब जर्मनी के कारखानेवालों ने अच्छे जहाज बनाने और इस व्यवसाय में इग्लैंड का मुकाबला करने का निश्चय किया तब पहले पहल उन्हें यही चिंता उत्पन्न हुई कि इतना बड़ा काम कैसे हो सकेगा और श्वक लिये भगणित धन कहा से और कैसे आवेगा। परंतु उनकी यह चिंता धनिक लोगों की सहानुभूति और कारीगर लोगों की कुशलता से जल्दी दूर हो गई। आज, अब उनकी यह दशा हो गई है कि जर्मन लोग अपने देश में काम आने योग्य सारे जहाज स्वय तैयार करते हैं। इतना ही नहीं, यदि दूसरे देश वाले चाहते हैं तो वे उन्हें भी तैयार करके द दते हैं। " जहाज बनाने का कारोबार यदि जर्मती ने आरभ न किया होता तो युद्ध पोतों को बनाए रखने की प्रबल इच्छा का कोई काम न था।" आज ३५ वर्ष पहले एडमिरल स्टाश ने ये उद्गार निकाले थे। इससे उनकी सच्ची दूर-दर्शिता प्रगट होती है। इस कार्य में जितनी अधिक उन्नति होती गई, जर्मनी की समुद्री शक्ति उतनी ही अधिक बढती गई। मन् १९०६ में बाल्टिक समुद्र के एक बदरगाह की एक निजी कपनी ने " नेवी लीग" से यह प्रभ किया था कि " यदि रणपोत तैयार करने की हम तुम्हें भाज्ञा दें तो एक साल में कितने जहाज तैयार करके तुम दे सकते हो?" उत्तर में लीगने कहा था-'हम अपने छ बड़े बड़े कारखानों १ इस प्रश्न (४१) ॥ 'में १५ लड़ाई के जहाज प्रति वर्ष तैयार करके दे सकते हैं?" इस पर से पाठक यह अनुमान लगा सकते हैं कि कारखाने वालों को कितना लाभ इस काम से होता होगा। सारे राष्ट्र का ध्यान अपनी नाविक शक्ति बढाने की ओर लगा हुआ है। विर काल से समुद्र पर इग्लैंड का स्वामित्व कायम है, उसे नष्ट करने का जर्मनी ने पूरा निश्चय कर लिया है, यह बात अब स्पष्ट दिखाई दे रही है। जिन उद्योग धधों का ऊपर वर्णन किया जा चुका है, उनके अलावा बिजली के कारखानों की भी राक्षसी बाढ हो रही है। इस व्यवसाय को करनेवाली मुख्य कंपनियाँ तो कम हैं परतु एक कपनी का ही मूलधन पचास लास पाउड है। रक्षित धन और लोगों के दिए हुए कर्जे की रकम चालीस लाख नकद इससे अलावाहे। इस पर से ही यह बात मालूम हो मकती है कि यह कपनी कितनी धनवान् है। बिजली की ट्रावे, लाइट रेलवे, म्युनिसिपाल्टियो के लिये "मिजली का स्टोर करने, बिजली के यत्र तैयार करने आदि का सव काम यह कंपनी करती है। जर्मनी के बाहर अपने व्या- पार की वृद्धि हो, इस उद्देश्य पूर्ति के लिये इस बडी कंपनी ने और कई एक छोटी छोटी कंपनियाँ तैयार की हैं। इन कप- नियों से व्यापारिक उन्नति में बहुत सहायता पहुँचती है। इसी प्रकार रासायनिक द्रव्य, सूती और रशमी कपडा, कागज और • शकर तैयार करने के भी बहुत से कारखाने खोले हैं और उन कारखानों में तैयार किया हुआ माल सारे संसार में अब खप रहा है। स्थान की कमी के कारण . - गए - -- (४६) सकता है, यह बात उनको बताते हैं भौर नौसिखचोक चुनने का काम सिखाते हैं। इतना ही करके वे शा नहीं होते, जुलाहों के पास से जो शहरों के व्यापार माल खरीदते हैं, उन्हें वे कभी कभी धोखा देकर फुपलाते हैं अतएव वे उन्हें धोखा न दे सकें और न फुसला सकें, इसके व्यवस्था करके उनके माल का उचित मूल्य दिलाने का भी प्रयत्न करते हैं। अलावा इसके वे शिक्षक इस बात पर र्भ ध्यान रखते हैं कि फिस माल की कहाँ अच्छी खपर हो सकती है। इसका पता भी वे कपड़ा बुननेवालों को दें रहते हैं जिससे वे अपने माल को वहाँ भेज कर लाभ उठ सकें। किस तरह के माल की बाजार में अच्छी खपत है सकेगी, इस बात को भी वे बताते रहते हैं, और वे लोग भी शिक्षकों के सूचनानुसार ही माल तैयार करते हैं। इस व्यव- स्था से अच्छा माल तैयार होता है और घर में पड़ा पडा सड़ा नहीं करता, अच्छे भाव पर बाजार में जाकर बिफ जाता है। ६ . . -- -- - है चौथा अध्याय । विदेशी और समुद्री व्यापार । विदेशी व्यापार की जर्मनी में कितनी उन्नति हुई है, इसका विवरण सरकारी रिपोटों को देखने से स्पष्ट मालूम होता है और उसी पर से यह भी कल्पना की जा सकती है कि उद्योग धधों और कारखानों ने वहा कितनी उन्नति की है। यदि विस्तारपूर्वक व्यापार सबधी सालाना ब्योरा दिया जाय तो सभव है, पाठकों को अरुचिकर होगा। अतएव पचास वर्ष पहले साल की आमद और निकासी क्या थी और अब क्या है, उन्नति की कल्पना करने के लिये इतना दे देना ही काफी होगा। सन् १८६० में प्रति मनुष्य पीछे आमद १ पौंड १२ शिलिंग ६ पेंस और निकासी २ पौड १ शिलिंग ५ पेंस थी। परतु सन १९०७ से आमद ७ पौंड २ शिलिंग १० पेंस और निकासी ५ पौंड १५ शिलिंग हो गई। * • यदि विशेष जानाना हो तो देखिए- जर्मनी का व्यापार (१८६०-१९.७) १८६० १९०७ पर पौड एक मास की आमद ५,४७,५., एक साल की निकासी ...

(५०) रहे हैं। परतु हमारा देश इसमे सदा की तरह पीछे ही पड़ा हुआ है। जनसंख्या पर ध्यान देने से यह प्रतीत होगा कि गत सोलह वर्षों में जर्मनी ने जिवने व्यापारी जहाज तैयार किए उससे पचगुने इग्लैंड ने बनाए हैं। इग्लैंड का विदेशी च्यापार इन्हीं के उत्कर्ष पर अवलबित है।" इन विचारों के सामने जर्मनी को अब क्या करना चाहिए, यह किसे मालूम है! सब से बड़े और अतिशय वेग से चलनेवाले जहाज, जैसे इंग्लैंड में हैं वैसे अन्य देशों में अब भी नहीं पाए जाते हैं। जर्मनी के पास अवश्य कुछ जहाज ऐसे हैं, परंतु उनका टनेज (बोझ ले जाने की शक्ति ) इग्लैंड के जहाजों के टनेज के बरापर ही है। बड़े और जल्दी चलनेवाले जहाज तैयार करके समुद्री व्यापार बढाने के काम में जर्मन राष्ट्र विपुल धन खर्च फर रहा है। इसी प्रकार बदरगाहों का सुधार और नए नए बदरगाह बनाने में भी वहाँ बहुत कुछ धन लगाया जा रहा है। समुद्र के किनारे पर अथवा बड़ी बड़ी नदियों के किनारे पर जो बदर हैं, उनको बढा कर उनमे बड़े जहाजों को लाने की व्यवस्था करने की ओर जर्मनों का ध्यान लगा हुआ है । जहाजों के खड़े होने के लिय लकडी और पत्थर के घाट और उन घाटों पर भासानी के साथ खड़ी होनेवाली रेलगाड़िया, माल चढाने और उतारने के यन्त्र, मादि सामान जर्मनी में इतने अच्छे हैं कि उन्हें देख फर मनुष्य चकित रह जाता है । जो नदिया समुद्र में सीधी जाकर मिली है, उनके किनारे पर के पदरों को अधिक उप- -

-
.
योगी और काम का बनाने के लिये यहा परापर प्रयत्न
किया जा रहा है। राइन नदी के किनारे पर मनाहिम नाम
का एक नगर है। यह शहर कोलन के दक्षिण की ओर
करीब करीब १६. मील की दूरी पर है। वहाँ की म्युनिसि-
पैलिटी ने औद्योगिक दृष्टि से, इस शहर का महत्व बढाने
के लिये, इतना धन खर्च किया है कि उसे देखकर यह बात
सहसा मन में उत्पन्न हो जाती है कि जर्मन लोग जिस बात.
को मन में लाते हैं उस के सबंध में वे क्या करेंगे और क्या नहीं
करेंगे, इसका कुछ भी भरोसा नहीं है। मनहिम के लोगों
का किया हुभा प्रचड उद्योग और उस उद्योग से प्राप्त हुए
यश को देखकर एस्त्र, वेसर और भोडर नदी के किनारे बसे
हुए हमबर्ग, नेमन और फ्रेंकफोर्ट सरीखे शहरों ने भी उसी का
भनुकरण किया है। यदि व्यापार बढाना हो तो माल को
लाने और ले जाने के साधन जितने अधिक और सरल होंगे
उतना ही अधिक लाभ होगा, यह तत्व जर्मन लोग अच्छी
तरह समझ गए हैं और इसी के अनुसार जिन तीन नदियों
का ऊपर उल्लेख किया गया है उनके किनारे रहनेवाले
लोगों ने, पुराने घाटों को ठीक करने और नए घाटों को बनाने
का उद्योग भारभ कर दिया है और बड़े साहसपूर्वक वे इस
काम को कर रहे हैं।
--
.

पाँचवॉ अध्याय । व्यापार-व्यवसाय में विशेषता । वर्तमान काल में जर्मनी के व्यापार और वहाँ के उद्योग घघों की उन्नति की ओर इंग्लैंड के लोगों का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित हुआ है। सगीत शास्त्र, काव्य, नाटक, तत्वज्ञान, इन विषयों का ज्ञान सपादन करने के लिये हम लोगों को परिश्रम करना चाहिए और सारे ससार को यत्र सामग्री, कपड़ा और कपास देने का काम इग्लैंड के स्वाधीन कर देना चाहिए, यदि ये विचार जर्मनवासियों के होते तो इग्लैंड वासी जर्मन वासियों से प्रसन्न रहते । परतु "काव्य शास्त्रविनोदेन" अपना समय व्यतीत न करके जिस उद्देश्यसिद्धि के लिये जर्मन लोग व्यापारी बने हैं उसी उद्देश्य प्राप्ति के अर्थ वर्तमान सापत्तिक स्थिति उन्होंने किन उपायों से प्राप्त की, और उसकी मूल प्रेरणा कहाँ से हुई, इस विषय पर अगरेजों को भी विचार करना परमावश्यक है। पहले यह बात देखनी चाहिए कि वर्तमान समय में जो उद्योगप्रियता जर्मन लोगों में दिखाई देती है वह इग्लैंड का उदाहरण मागे रख कर उनमें उत्पन्न हुई है अथवा क्या परतु थोडा सा भी विचार करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जर्मन लोगों ने अप्रेजों की देखा देखी ही यह उन्नति का कार्य किया है। परंतु अब अमेज लोग कर ही क्या सकते ?

-
इस पत्र ने जो
हैं। जो शिक्षा उन्होंने दी उसी शिक्षा का अनुकरण किया जा
है। कुछ वर्ष हुए जब "कलोन गजट" नाम के एक
समाचार पत्र ने अपने पाठकों को स्मरण कराया था कि
"रेलगादी, गैसवर्स, ट्राव, और यन सामग्री की दुकानें
जर्मनी में खोलने का काम सब से पहले इग्लैंड ने अपने हाथ
में लिया था। उस काम में इग्लैंड ने वहा करोड़ों रुपया खर्च
किया। इस प्रकार जर्मनी की सापचिक सुधार का मार्ग
अप्रेजों ने ही भागे होकर ढूंढ निकाला।
बात लिखी है वह बिलकुल ठीक है और यह बात प्रमाण
सहित सावित की जा सकती है । बर्लिन तथा हमवर्ग आदि
बहुत
से नगरों में इंग्लैंड ने पानी को इकठा कर दिया ।
अगरेजी भाषा से "ट्रावे" शब्द जर्मन भाषा में ज्यों का त्यों
प्रयोग किया जाने लगा है।
इस से यह साबित होता है
फि जर्मनी में पहले पहल दावे किसने जारी की। सूती
और रेशमी कपड़ा येचनेवाली फई एक बड़ी बड़ी दूकानों के
नाम अब भी इग्लिश है। दक्षिण जर्मनी में कपास के व्यापार का
मुख्य स्थान मुलहासन (Mulhausen) है। उस नगर की
एक बड़ी सडक का नाम अप भी "मॅचेस्टर स्ट्रीट" कहा
जाता है।
'मेचेस्टर चेम्बर आफ कामर्स की एक बैठक में जो १३
दिसबर सन् १८३८ को हुई थी, मि. रिचर्ड कापडेन
ने जो भाषण किया था, वह अब भी बहुत प्रसिद्ध है।
उन्होंने स्पष्ट कहा था कि अगरेज जर्मनी में जाकर वहा
साहसपूर्वक, निर्भयता के साथ, काम अपने हाथ में लेते

- . हैं और सनको उत्तमतापूर्वक करके घतला देते हैं। परंतु यह दशा देखकर जर्मन लोग बुद्धिमान हो जायगे, और समय पाकर अगरेजों की अगुलियों को अगरेजों की ही आँखों में घुसेडने का प्रयत्न करने में वे कोई बात नठा नहीं रक्खेंगे। काबडेन की भविष्यवाणी के पश्चात् भी, बहुत वर्षों तक, अंगरेज लोग जर्मनी में आते जाते रहे। जब तक जर्मन लोगों को गरज थी, तब तक उन्होंने अगरेज लोगों के साहस, बुद्धिमत्ता और धन से लाभ उठाया। परतु जब शिष्य ने गुरु से अपना सारा मतलब निकाल लिया तब उसने अपनी आँखें फेर ली। जर्मन शिष्यों के समान नरम परतु उद्यम- शील विद्यार्थी अगरेज शिक्षकों को बहुत ही कम मिलें होंगे। विद्यार्थीदशा समाप्त होते ही, उन्होंने, स्वतः साहसपूर्वक बड़ी बड़ी जिम्मेदारियों के काम अपने हाथ में ले लिए और अपने बता दिया कि अब आपकी इस पाठशाला में आव- श्यकता नहीं है । विद्यार्थियो को हर तरह पर योग्य हो गया देख, "शिष्यादिच्छेत्पराजयम्" इस वाक्य का अनुभव प्राप्त कर के गुरु जन भी धीरे धीरे अपने देश को वापस लौट आए। अपने कारखानों में, अपने देश के निर्वाह योग्य ही, सामान जर्मन लोग तयार करेंगे, आरभ में अगरेज लोगों का यही अनुमान था। परतु यह उनकी भूल थी। क्योंकि थोड़े समय में ही, उन्होंने, अपने देश की आवश्यकताओं को पूरा करके, अपना ध्यान, विदेशी व्यापार को हस्तगत करने की भोर माफर्पित किया। उन्होंने जो काम अपने देश में, हाथ में लिए थे, उनको भच्छी तरह कर लेने के कारण उन- . . . - ( ५५ ) का साहस और भी अधिक बढ़ गया था। अवएव जो बाजार भक्तक भगरेजों के हाथ में था, उसे उन्होंने उनके हाथ से निकाल कर अपने हाथ में लेने का प्रयत्न भारभ किया । इस कार्य में उन्हें सफलता भी मिली। अगरेज व्यापारियों को हटा कर जर्मन व्यापारियों ने अपना अधिकार जमा लिया। यह कार्य फिस उत्तमता से किया गया, इसका विचार करने का ही यस हमारा यहाँ पर इरादा है। जर्मन राष्ट्र इस समय पूर्ण ऐश्वर्यशाली है। ससार की सापत्तिक स्पर्धा में वह अप्र-स्थान प्राप्त करना चाहता है और इस सफल्म की पूर्ति के लिये वह अपने उद्योग धों और व्यापार की उन्नति में अपनी सपूर्ण शक्ति लगा देना अपना कर्तव्य समझता है, और जर्मनी की उन्नति का यही मूल मत्र है। व्यापार विषयक पहला सा उत्साह, आप्रह, अथवा-आदर वर्तमान समय में भी अमेज जाति में घना हुआ है अथवा नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है । जर्मनी की तो व्यापार की भोर लौ लगी हुई है। जब एक बार मनुष्य व्यापार में अपना पैर फंसा देता है तब वह अपनी सारी लाज, शर्म एक ओर रख कर रात दिन उसी की चिंता में मग्न रहता है। व्यापार व्यवसाय कुछ पालकों का खेल नहीं है। कुछ दिन किया, कुछ दिन बाद छोड़ दिया। और न व्यापार व्यवसाय सुख चैन की वस्तु ही है।" ये विचार जर्मन व्यापारी महल के हैं। अपने कार्य मे यश संपादन किए हुए जर्मनी के व्यवसायी लोग, फिर वे चाहे कारखाने- बाले हो, अथवा व्यापारी हों, गर्मी की प्रघड हवा में, समुद्र- . , . -

( ५६ )
पर्यटन को निकलें चाहे किसी रम्य सरोवर के किनारे जा-
कर रहें, अथवा पहाड़ की ठढो हवा में जाकर विनाम लें,
परतु अपने काम को वे कमी कहीं भी भुलाते नहीं हैं। कुछ
देशों में 'वीकऐंड' छुट्टी की जो रवाज चली आती है, वह
उनकी राय से राष्ट्र की अवनति और कमजोरी का लक्षण
है। साल में ग्यारह महीने, अपने कारखाने अथवा वैक या
दूकान में परापर काम करने पर भी वहा के लोग क्षण मात्र,
अपना समय नष्ट नहीं करना चाहते । व्यवसाय में यश
सपादन करने के लिये उन्हें कैसा ही परिश्रम करना पड़े तो
भी वे शातिपूर्वक सहजप्राप्त इस भाव से, बिना किसी
प्रकार का आलस्य प्रकट किए काम करते रहते हैं।
एक यात और है। उद्योग धधे की उन्नति में अग्रसर हुई
जर्मनों की यह पहली ही पीढी है, यह बात जो कही जाती है,
सत्य नहीं है । उस देश में लोहे, फौलाद और शिल्पकला के कुछ
कारखाने बहुत पुराने हैं। और कुछ व्यवसाय की दुकानें, फिर
वे छोटी ही क्यों न हो, पचास, साठ और कोई कोई तो १००'
वर्ष तक की पुरानी हैं। परंतु वर्तमान समय में जो जाति
'चन्होंने की है, उसके पतन का अभी कोई चिहनहीं दिखाई
पड़ता।
-
।

-
हैं
.
(५७ )
। साधारण समझ के अगरेजों का यह विचार है कि
व्यापार एक गतानुगतिक न्याय से साध्य करने योग्य
व्यवसाय है। परंतु जर्मन लोगों के मत से यह एक शास्त्र है।
व्यापार एक कला है और उसे साध्य करने के लिये
शास्त्रीय पद्धति से उसका अध्ययन करना चाहिए। ससार
का सारा व्यापार पुगनी प्रतिस्पर्धी से, पीछे हटा कर अपने
हाथ में लेने का उनका पूर्ण विचार है और उसकी प्राप्ति के
लिये वे जिन उपायों की योजना करते हैं और जिस मार्ग का
भवलबन कर रहे हैं, उसके मूल में एक मुख्य तत्त्व है । यह
तत्त्व केवल व्यापार में ही नहीं है, अन्य प्रकार के धर्ताव में
भी इसका उपयोग किया जाता है। वह तत्त्व यह है कि हर
एक काम में चाहे वह नित्य का व्यावसायिक कार्य हो अथवा
उससे भिन्न हो, चिकित्सा बुद्धि द्वारा पहले उसकी परीक्षा
करनी चाहिए और पश्चात् उसे साध्य करने के लिये उद्योग
करने में लाना चाहिए ।
स्थूल दृष्टि से यदि हम विचार करें तो मालूम होगा कि
औद्योगिक विषयों म जहा जहा जर्मनों ने अन्य लोगों पर
प्रभुत्व जमाया वहा वहा उसके मूल में तीन कारण दिखाई
पड़ते हैं-(१) जर्मन माल का अन्य देशों के माल की
अपेक्षा सस्तापन, (२) उनका उत्तम प्रकार का अथवा प्रसगा-
नुरूप उत्तम व्यवहार, (३) ग्राहकों को पैदा करके उन्हें अपने
हाथ में रखने का प्रशसनीय ढग। इन बातों में माल का
सस्तापन, यह विषय ऐसा है कि इस पर सबसे पहले विचार
करना चाहिए । इग्लैंड के लोगों की अपेक्षा जर्मन लोगों की
-

- , - (५८) रहन सहन देखी जाय तो उसमे कम आडबर दिखाई पड़ेगा। - जर्मन मनुष्य चाहे गरीब हो, चाहे मध्यम स्थिति का हो, अथवा अमीर हो, उसके व्यवहार में अधिक भाडेयर नहीं दिखाई पड़ेगा। अधिक परिश्रम न फरके और न बहुत सा समय नष्ट करके इच्छानुसार धन सर्च करके भानद- पूर्वक जीवन व्यतीत करने का कार्य यद्यपि वहा आरम हो गया है परंतु तो भी धनी लोगों की रहन सहन सादी और कम खर्चीली है। केवल आनदपूर्वक सुखोपभोग के लिये अतर के चिराग जलानेवाले बहुत कम लोग वहा पाए जाते हैं। इसी कारण यदि जर्मन व्यापारियों को कम लाभ भी हुआ तो भी वे सहसा डगमगाते नहीं । परतु अगरेज व्यापारियों की दशा इससे विपरीत होने के कारण यदि खूब अधिक लाभ हुआ तो ही वे प्रसन्न रह सकते हैं। थोड़ा लाभ होने पर उनका ठाठ बाट का ससार चलता नहीं । इग्लैंड और जर्मनी में एक और बहुत बडा अतर है, वह यह कि जर्मनी के कारीगरों और मजदूरों को इग्लैंड के कारीगरों । और मजदूरों की अपेक्षा अब भी कम मजदूरी मिलती है। "हमें अधिक मजदूरी मिलनी चाहिए, काम करने के घदे कम होने चाहिएँ" ये बातें अब कुछ दिनों से जर्मन मजदूर करने लगे हैं और कुछ सुधार भी हुआ है, परंतु इंग्लैंड के हिसाब से जर्मन कारीगरों और मजदूरों को वेतन अब भी बहुत कम मिलता है और काम भी उनको अधिक और देर तक करना पड़ता है। परतु इसी के साथ ही इतना अवश्य हुआ कि बीमारी, अपघात, वृद्धावस्था आदि उपस्थित होने पर है

(५९)
+
कानून के अनुसार उनके जीवन का बीमा करा दिया जाता
है। कारखानों में काम करनेवाले बालकों की शारीरिक
दशा ठीक रहे, इसके लिये भी अव नियम पना दिए गए हैं।
परंतु उपरोक्त विषयों में जितनी अच्छी व्यवस्था इग्लैंड में है,
वैसी जर्मनी में नहीं है । परतु व्यापार के अनुकूल दशा
जैसी मब है वैसी ही बनी रहगी इस का भभी कोई भरोसा
नहीं है। पेट भरने का सर्घ दिनों दिन बढ़ता जा रहा है
और मजदूर पेशा लोगों की "सघ-शक्ति बढती हुई "ट्रेडस
यूनियन" के समान उनकी मत-सस्थाएँ तैयार होती जा रही
हैं। ऐसी संस्थाओं के स्थापित हो जाने पर मजदूरों को
यह घमर हो जाता है कि मालिकों को हमारी बात सुननी
ही चाहिए। इसका भीतम परिणाम यह होगा कि माल
तैयार होने का खर्चा इग्लैंड के बरावर जर्मनी में भो पढ़ने
लगेगा। परतु इस विषय का विचार हम विस्तारपूर्वक एक
अलग अध्याय में करना चाहते हैं क्योंकि सागोपाग विधार
करने से ही इस विषय के समझने में सरलता होगी, यहां पर
तो केवल दिग्दर्शन मात्र कराया गया है।
जर्मनी के कारखानों में यत्र सामग्री और व्यवसाय में
काम मानवाला.मामान, नवीन पद्धति स तैयार किया जाता
है. यह बात और भी ध्यान में रखने योग्य है। नवीन पद्धति
और शास्त्रीय शोध के आधार से तयारकिए हुए पत्र आदि कैसे
अलौकिक पदार्थ हैं, यदि यह किसी को देखना हो तो उसे
जर्मनी के किसी लोहे या फौलाद के कारखाने में जाकर देखना
चाहिए । यहा पर सब पदार्थों के देखने से जर्मन लोगों की

--
।
(६०)
बुद्धि, उनका भथक उद्योग और कार्यकुशलता पर आश्चर्य
हुए बिना न रहेगा । अगरेज भंट्टियों द्वारा तैयार किया हुआ
लोहा (Pig-iron) जर्मन लोहे के मुकाबले में कम दर्जे का
होता है। जर्मनी का जो लोहा तीसरं नबर का है वह इग्लैंड
का पहले नबर का है। लदन टाइम्स" में ७ अप्रैल सन्
१९०६ को एक सजन ने एक लेख में यह बात प्रकाशित की
थी कि इग्लैंड के लोहे का नपर कम क्यों हो गया। उसने
बतलाया था कि इग्लैंड में लोहा तैयार करने की जो पद्धति
पूर्वजों से चली आती है, वे उसी लकीर के फोर बने हुए हैं।
धातु-विद्या (Metallurgy) मबधी जो नवीन शास्त्र तैयार
हुआ है उसी के अनुसार जर्मन लोग शास्त्रीय नियमानुसार
अपने कारसानों को चलाते हैं और इसी कारण उनका
नबर ऊचा हो गया है। उस लेसक का यह सिद्धात विचार
करने पर सच प्रतीत होता है।
यदि इस विषय पर और भी अधिक सूक्ष्म दृष्टि से
विचार किया जाय तो यह बात और भी अधिक स्पष्ट हो
जायगी कि जर्मन कारखानों में कम लागत से लोहा तैयार
होता है। इसका कारण यह है कि लोहा तैयार करने में
जिन क्रियाओं को उपयोग में लाना पडता है, उन सब को
एक इमारत में करने का प्रबंध करके, एक ही आदमी की
निगरानी मे वह सब काम कराया जाता है। इस बात को
हम एक उदाहरण दे कर अधिक स्पष्ट करना चाहते हैं। एक
सुई को ही लीजिए। अशुद्ध लोहे को गला कर फिर
उसका फौलाद बनाना, पश्चात् सुई तैयार करना और बाद

-
को उस पर जिला करना, ये सब काम पहले अलग अलग
कारखानों में होते थे। अर्थात् चार पाच कारखानों में नाच
नाचने के बाद तय कहीं काम लायक सुई तैयार होती थी।
एक कारखाने से दूसरे कारखाने मे, लाने ले जाने में, खी
भी अधिक पड़ता था। लाने और ले जाने का खर्चा सब
उसी माल की लागत पर चढ़ता था, परतु जब यह सब काम
एक ही इमारत में एक ही आदमी की निगरानी में होने लगा,
तो समय और धन का जो अपव्यय होता था वह घद हो
गया और इस प्रकार के प्रबंध से कम लागत में ज्यादा माल
तैयार होने से कम कीमत में वह बेचा जा सका और इससे
लाम भी अधिक हुआ। यह एक छोटा सा उदाहरण है।
इसी पर से अनुमान लगाया जा सकता है कि लोह की बड़ी
पड़ी चीजें जर्मन लोग फिम तरह सस्ती तैयार करके सस्ते
भाव पर बेंच सकते हैं।
खर्घ कम करने के उद्देश्य से भिन्न भिन्न स्थानों पर
चलनेवाले कारखानों का एक स्थान पर लाने का क्रम धीरे धीरे
प्रचार में आ जाने से "मिश्रित कारखाने" (Mined works)
दिनों दिन वहा अधिक सोले जान लग हैं। यदि इस प्रकार
के कारखानों का उत्कृष्ट उदाहरण देसना हो तो क्रुप
खाने को जाकर देखना चाहिए । कच्चे लोहे से काम की चीजे
बनने तक लोहे के सारे सरकार इसी एक कारखाने में होते
हैं, उसके लिये कहीं बाहर जाना नहीं पड़ता।
मिश्रित कारसाने खुल जाने से अलग जलग काम करनेवाले
कारखानों का नाश हो रहा है यह बात सच है, परंतु उनका
14
।
के कार

( ६२ )
नाम निशान मिट गया हो सो नहीं। हा,, इतनी बात
अवश्य है कि वर्तमान समय में शास्त्रीय शोध का उचित
उपयोग किए बिना बड़े बड़े कारखानों का वे मुकाबला नहीं
कर सकते, यह बात स्पष्ट है। परंतु हर्ष की बात है कि
छोटे छोटे कारखानों के मालिक भी अब इस ओर ध्यान देने
लगे हैं और इससे आशा है कि उन्हें लाभ अवश्य होगा।
ऊपर जो तीन कारण बताए गए हैं, उनमें से एक कारण
का विचार तो हो चुका, अब दो कारणों का विचार करना
और बाकी है। किसी विलकुल नवीन शोध करने की शक्ति
जर्मन लोगों के मस्तिष्क में अधिक नहीं है, यह बात सच है,
परतु यदि किसी दूसरे ने कोई नया शोध किया तो उसका
उपयोग अपने काम में कर लेने की उनकी कुशलता प्रशस.
नीय है। यदि व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाय तो मालूम
होगा कि जिसमें इस प्रकार की कुशलता है, वही पुरुष असल
शोध लगानेवाले की अपेक्षा, अधिक यश प्राप्त कर लेता है।
क्या किसी नए अविष्कारकर्ता के धनाढ्य होने का उदाहरण
तलाश करने पर मिल सकता है ? दूसरे की फल्पनाओं को
जाच कर यह निश्चय कर लेना कि कौन सी कल्पना अधिक
उपयोगी साबित होगी, घस इतनी चतुरता होने से ही काम
चल जाता है। उस कल्पना को अपने कार्य में उपयोग कर
के देखने से उसे साध्य करके बता देने पर कार्यसिद्धि अवश्य
प्राप्त होती है।
बुनाई के काम, यत्रशास्त्र और रसायन शास्त्र की ही माज
कल जर्मनी में अधिक उन्नति है। इनमें प्रवीणता प्राप्त करने
"

(६३)
का मेय कल्पना करनेवालों की बुद्धिमता और शोध करने-
चाले को जितना मिलना चाहिए उतना देकर उसका उपयोग
जिस ढग से जर्मनी ने किया है, उसे देना चाहिए ।
च्यापारिक दृष्टि से रसायन शास्त्र का कितना महत्व है,
यह बात अंगरेजों के ध्यान में न आने के कारण इग्लैंड
की कितनी अधिक हानि हुई है, इसकी कल्पना भी नहीं
की जा सकती और भविष्यत् में इस हानि की पूर्ति
शीघ्र की जा सकेगी, ऐसा भी प्रतीत नहीं होता। इग्लैंड के
रग के कारखानों की ओर देखिए। वहा के रगरेज प्राचीन
पद्धति के अनुमार ही कार्य किए चले जा रहे हैं। रसायन
शास्त्र का ज्ञान उनको बिलकुल नहीं है। एक समय इग्लैंड
में विशेष प्रकार के रंगे हुए कपड़ों की जरूरत आ पड़ी।
उन्हें तैयार कर देने के लिये एक अधिकारी ने प्राचीन पद्धति
से कपडा रगनेवालों से कहा कि-"क्या तुम ये कपड़े नमूने
के मुताबिक रंग फर दे सकते हो ?" उसने उत्तर दिया-
"नमूने के मुताबिक विलकुल नहीं तो करीब करीब नमूने
के बराबर तैयार करके दे सकता हूँ।' तब अधिकारी ने
• कहा---"नहीं, हमे तो नमूने के मुताबिक ही रँगा हुभा
कपड़ा चाहिए ।" रँगनेवाल ने उत्तर दिया--"नमून में
जो छटा है उसे मैं नहीं ला सकूँगा, पर काम देखने में अच्छा
होगा।" इस पर वह काम परदेशी रेंगनेवालों को दिया
गया। यह बात कुछ बहुत दिनों की नहीं है।
रासायनिक पदार्थ तैयार करने के कारखानों में, जर्मन
लोग शास्त्रीय पद्धति का पूरे तौर पर व्यवहार करते हैं, और

- । आश्रयदाताओं की मर्जी के अनुसार कार्य संपादन करने के लिये जर्मन व्यापारी सदा तैयार रहते हैं। व्यापार के लिये बहुत से परदेशी व्यापारी जर्मनी में पहुँचते हैं । इन लोगों को थोड़ी बहुत जर्मन भाषा अवश्य आती है परतु जर्मन व्यापारी परदेशी व्यापारियों से उन्हीं की भाषा में बात चीत करके उन्हें प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं, उनके देश में चलनेवाले सिको, माप, तौल आदि में अपने माल की कीमत बताते हैं। यदि पत्र-व्यवहार का काम पड़े तो पत्र व्यवहार न करके स्वय उन के पास जाते हैं अथवा ग्राहक की भाषा जाननेवाले अपने किसी गुमाश्ते या एजेंट को भेज कर काम करा लेते हैं । तात्पर्य यह है कि जो ग्राहक मिला, उसे किसी तरह हाथ से जाने नहीं देते । परतु अगरेज व्यापारियों के इस सिद्धातानुमार कार्य न करने से जर्मनी की अपेक्षा इग्लैंड का माल विदेश में कम खपने लगा, इसमें आश्चर्य ही क्या है। अब यह बात पाठकों पर स्पष्ट रूप से विदित होगई होगी कि जर्मन व्यापारियों में कौन से विशेष गुण हैं जो इग्लिश व्यापारियों में नहीं हैं । ये गुण देसने में तो छोटे मालूम पड़ते हैं परतु इन गुणों के सम्मेलन का उत्तम प्रभाव पढ़े बिना नहीं रहता । अब तक की विवेचना से पाठक यह न समझें कि जर्मन व्यापार की इतनी अधिक उन्नति होने पर भी वे लोग अगरेजों के काम को आदर-बुद्धि से नहीं देखते। व्यापार-व्यवसाय का मार्ग इग्लैंड ने ही भारम में उनके लिये ढूंढ निकाला, यह बात जर्मन लोग खूब अच्छी तरह जानते हैं और इस संबंध में वे अगरेज -

लोगों को पूज्य बुद्धि से भी देखते हैं। इंग्लैंड के उदाहरण
को भागे रख कर काम करनेवाले अब भी कुछ कम लोग
वहा नहीं हैं। गुरुस्थानी देश से गुरुद्रोह करनेवाला जर्मन
व्यापारी शायद कोई विरला ही दिखाई पडेगा ।
ऊपर जिन तीन कारणों का उल्लेख किया गया था, उन
पर विचार हो चुका । भय एक और दूसरे महत्व के विषय
पर विचार करना है। जर्मनी को भिन्न भिन्न रियासतों को
स्वय सार्वभौम सरकार की ओर से उद्योग धों और
व्यापार को उत्तेजना देने योग्य व्यवहारोपयोगी सहायता
दी जाती है, यह बात खास तौर पर ध्यान देने योग्य है।
विदेशी राज्यों में रहनेवाले जर्मनी के राजकीय दूत अवसर
पड़ने पर-परंतु लोगों की आँखे बचा कर व्यापार को सहा.
यता पहुँचाते हैं। सरक्षक राजस्व कर क नियम सरकार ने
बनाए हैं। उनको एक ओर रस कर यदि देखा जाय तो
देश की रेलों को सरकार ने अपने हाथ में रक्खा है ।
इससे व्यापार और सेती दोनों को अधिक लाभ पहुँचता है
यदि विशष प्रकार की कोई कठिनाई भा जाय तो सरकार
रेलवे के किराए में तुरत फेरफार करके उस कठिनाई को दूर
कर सकती है। विदेश जानेवाले माल पर आसानी के
साथ वसूल होने योग्य कर लगाया जाता है जिससे देश का
माल विदेश भेजा जाकर लाभ उठाया जा सके। इस प्रकार
की व्यवस्था से व्यापार को अधिक उत्तेजना मिलती है।
वहा पर जो गैर सरकारी रेलवे कपनिया हैं, वे सब इस
बात की ओर दुर्लक्ष्य नहीं देती। आपस के झगड़े का
,

-
( ६८ )
निना किसी पक्षपात के केवल देश के लाभ और सचाई की रष्टि
से तुरत प्रबंध कर दिया जाता है।
व्यापार को उत्तेजना देने के लिये देश में ही जल मार्ग
तैयार करने के लिये सरकार का विशेष ध्यान है। इस काम
को बहुत करके सरकार ही करती है। निज के तौर पर लोग
इस काम में हाथ नहीं डालते। उत्तरी समुद्र और वाल्टिक
समुद्र को एक करने के लिये जो कील नहर तैयार हुई है,
उसे सरकार ने ही बनवाया है। यह नहर सन् १८९१'
ई० से व्यापार के लिये खुल गई है । कील के समान बड़ी
नहर बनाने का काम केवल व्यापारोन्नति के लिये सरकार ने
अपने हाथ में लिया था, ऐसे उदाहरण अन्य देशों में बहुत ही
कम दृष्टिगोचर होते हैं। राइन व एल्ब नदी से बड़ी बडी
नहरें निकालने का काम प्रशिया में अब भी जारी है ।
लाखों रुपए लगा कर, छोटी छोटी बहुत सी नहरें देश के
सब भागों में प्रशिया से निकाली गई हैं। इग्लैंड में इस
प्रकार की नहरें नहीं हैं, यह बात नहीं है, परतु इग्लैंड की
नहरो में बड़े बड़े जहाज आ जा नही सकते, जर्मनी की
नहरों में वे जहाज आसानी से आ जा सकते हैं। दोनों
देशों की नहरो में यही महत्व का अतर है।
कारखानेवालों और व्यापारियों को शिक्षा देने के लिये
सार्वभौम सरकार और रियासतों की ओर से जगह जगह
पर औद्योगिक प्रदर्शनिया होती है। किसी किसी रियासत
में तो ये प्रदर्शनिया स्थायी कर दी गई हैं और कहीं
चलती फिरती रक्खी गई हैं। "प्राड उची माफ हेसी"
।

( ६९ )
एक सब से छोटी रियासत है। यहा की आबादी भी
बहुत कम है, और बड़ा शहर तो रियासत भर में एक ही
है।
परतु वहा पर सन १८३६ से "सेंट्रल ऐजसी फार
इडस्ट्री" नाम की एक औद्योगिक सस्था है। राष्ट्र को
प्रौद्योगिक और व्यापारिक जो कुछ मात जाननी होती हैं,
वे इस सभा द्वारा तुरत जानी जा सकती हैं। भारभ में इस
सस्था का प्रचार बहुत कम था। परतु जितनी उपयोगिता
प्रमाणित होती गई उतना ही अधिक इसका प्रचार होता
गया और राष्ट्र में इसका प्रभाव भी बढता गया । औद्योगिक
शिक्षा किम पद्धति से दी जाय, इस विषय का ज्ञान अन्य
भिन्न भिन्न सस्थाएँ इससे प्राप्त करती हैं। सस्था के पास एक
बहुत पड़ा पुस्तकालय भी है। इसके अतिरिक्त औद्योगिक
पदार्थ सग्रहालय और रासायनिक प्रयोगशाला भी हैं। सन्
१९०६ में सेंट्रल एजेंसी की निगरानी में १३६ औद्योगिक
पाठशालाएँ थीं। अर्थात् जनसख्या की दृष्टि से एक हजार
लोगों के पीछे एक पाठशाला थी।
इस प्रकार की सस्था
प्राय सब रियासतों में पाई जाती है और वे अपना काम
चडी उत्तमता के साथ चला रही हैं।
इस विषय में जितनी उत्तेजना देना ममन है उतनी
जर्मन सम्राट की ओर से दी जाती है ।
भाषण सम्राट् ने मेमेल स्थान पर दिया था उसका सारार्थ
नीचे दिया जाता है। पाठकों को उसे पढ़ने से यह ज्ञात होगा
फि राष्ट्रीय अभिमान और महत्वाकाक्षा श्रोताओं के मन में
जाप्रत करने का गुण जर्मन
सम्राट् में कितना मौजूद है-
सन् १९०७ में जो

क
(७०)
"नवीन अस्तित्व में आए हुए जर्मन साम्राज्य ने इतने
थोड़े समय में सब प्रकार का सुधार कर लिया, इसकी कल्पना
करना भी सहज नहीं है। इस सुधार की दृढ़ता को देखकर
विदेशी बढ़ा आश्चर्य करते हैं। हमारे व्यापार का विस्तार
बड़ा विस्मयकारक है । भिन्न भिन्न शास्त्रों और शिल्प
कलाओं में जो हम लोगों ने शोध किए हैं वे बखान करने
योग्य हैं। जर्मनी की भिन्न भिन्न जातियों के लोग परस्पर
के भेदभाव को भुला कर अपनी जन्मभूमि के अभ
एक साम्राज्य में सम्मिलित हुए, यह सब उसी का प्रभाव है।
ससार में अग्रस्थान मिलने की जितनी शक्ति हम लोगों में
बढ़ती जायगी यह सव ईश्वर का कृपा का फल है, यह वात राष्ट्र
के सब लोगों को ध्यान में रखनी चाहिए। यदि ईश्वर की
ऐसी इच्छा होती कि हम लोगों के हाथ से कोई महत्कार्य न हो,
तो उसने हम लोगों को इतनी शक्ति प्रदान न की होती।"
उद्योग-व्यवसाय, व्यापार, जहाज तैयार होना आदि सब
बातों की ओर जर्मन सम्राट् का ध्यान लगा रहता है। सारे
राष्ट्र में, धूम फिर कर बड़े बड़े कारखानों को अपनी आखों
से देखना और वहा क सारे हाल जानना यह उनका सद्रा
का नियम है। समुद्र के किनारों पर जो जहाज बनाने के
कारखाने है, उनका सारा हाल उन्हें मालूम रहता है और
व्यापारी जहाज कारखानों में कितने तैयार होते हैं, इस ओर
उनका सदा ध्यान रहता है।
राष्ट्रीय सापत्तिक स्थिति सुधारने के काम मे सरकार से
पहत प्रोत्साहन मिळता है वो भी यापारी लोग सतुष्ट हो

-
.
कर भालसी बने बैठे नहीं रहते। स्वावलबन के महत्व
वे पूरे तौर पर परिचित हैं । प्राय सब बड़े बड़े शहरों में और
उद्योग-धों में लगे हुए प्रावों में "चेंबर आफ कामर्स " नाम
की सभाएँ कायम हैं। इन सभाओं का पत्र-व्यवहार
सरकार और रेलवे कपनियों के साथ घराबर होता रहता
इन सभाओं की भवरव्यवस्था में सरकार विलफुल
हस्तक्षेप नहीं करती। परतु सरकार का इनसे बिलकुल
निकट का सबध होने से व्यापार के महत्व के विषयों
में परस्पर , विचार और सलाह देने का कार्य इनके द्वारा
होता रहता है ।
इस कारण इन पेंबरों का परराष्ट्रों
में अधिक प्रभाव है। उनके द्वारा जो समाचार प्रकाशित
होते हैं वे कभी असत्य प्रमाणित नहीं होते, ऐसा व्यापारी
संसार को भरोसा है। इग्लैंड में इस प्रकार की सस्थाएँ
सरकार के साथ एकमत होकर काम नहीं करतीं इसी कारण
विदेश में उनके कथन की सच्चाई पर पूरा पूरा भरोसा नहीं
किया जाता। कुछ वर्ष हुए जब सयुक्त राज्य अमेरिका के
सेक्रेटरी आफ स्टेट ने स्पष्ट तौर पर कहा था-" जर्मनी
की चेंबर आफ कामर्स के कथन पर जितना विश्वास हम
रखते हैं उतना विश्वास इग्लैंड की चेंबर आफ कामर्स के
कथन पर करना अनुभव से हम असमव समझते हैं।
हर एक रियासत की यर आफ कामर्स के नियम
अलग अलग हैं तो भी काम करने की पद्धति प्राय समान है।
व्यापार सबधी हर तरह का समाचार प्राप्त करना और फिर
लोगों में उसका प्रचार करना, व्यापारियों के कष्टों गौर

.
।
( ७२ )
भभाषों को सरकार और रेलवे कंपनियों के अधिकारियों के
पास पहुँचाना और उनके काम का निपटेरा करा देना,
फस्टम ड्यूटी अथवा अन्य फरों पर, जो व्यापार को हानिकारक
होते हैं ध्यान रखना, बैंकों से सरलतापूर्वक व्याज
की दर से व्यापारियों को धन फर्ज दिलाने का प्रअध
कर देना, इत्यादि हजारों तरह के व्यापारोन्नति संबंधी काम,
इन संस्थानों द्वारा होते रहते हैं। उन्हें अपना ही काम इतना
अधिक रहता है कि उन समाओं के सभासदों को राजकीय
विषयों पर विचार करने का अवसर ही नहीं मिलता।
व्यापार विषयक मामलों में ही वे राजपक्ष अथवा उसके
विपक्ष में जा कर सम्मिलित होते हैं। परतु वह काम हो
जाते ही वे राजकीय क्षेत्र से हट जाते हैं और यह समझने
लगते हैं कि "हम अच्छे, हमारा काम अच्छा।" इन सभाओं
में बर्लिन की सभा बहुत बड़ी है। वह सारे समार भर में
च्याप्त हो रही है । चेंबर आफ कामर्स की सहायता करने के
लिये बड़े बड़े शहरों में "इडस्ट्रियल एसोसियेशन" कायम
किए गए हैं। विदेश में व्यापार करनेवाले लोगों ने अपने
लिये "एसोसियेशन आफ एक्सपोर्ट फर्म" नाम की सभाएँ
खोली हैं। ये सभाएँ प्रशिया और मध्य जर्मनी में ही बहुता.
यत से पाई जाती हैं। स्टेटिन में आज कई वर्षों से एक
बहुत बड़ी सस्या कायम की गई है। यह सस्था विदेश जाने
फे लिये युवकों को व्यापार विषयक शिक्षा दे कर उन्हें
वृटिश उपनिषेशों, सयुक्त राज्य अमेरिका आदि देशों में
अपने खर्च से भेजती है। भेजने के पहले हर एक युवक को

( ७३ )
सस्था के प्रेसिडेंट के सामने उनका हस्तस्पर्श करते समय यह
शपथ खानी पड़ती है कि "जो विश्वास मुझ पर किया गया है
उसका दुरुपयोग में कभी नहीं करूँगा। सस्था क फल्याणार्थ,
मैं बराबर काम करूँगा।" यह शपथ खान के बाद वह विदेश
भेजा जाता है। विदेश जा कर वहाँ की स्थिति पर उसे सदा
ध्यान रखना पड़ता है। निश्चित समय के अदर स्टेटिन के
व्यापार की वृद्धि का क्या कार्य वहाँ किया, इसकी रिपोर्ट
उसे भेजनी पड़ती है। इस प्रकार विदेश में गए हुए दलालों
के कठिन परिश्रम द्वारा उस नगर का विदेशी व्यापार खूप
बढ गया है और इस कारण सस्था के संचालकों को इस बात
का विश्वास हो गया है कि जो नवीन युक्ति हम लोगों ने
निकाली है वह उपयोगी साबित हुई है
यदि कोई रोजगार लाभदायक समझ पड़े तो फिर
उसका पीछा अवश्य करना चाहिए, व्यापार का यह तत्व
सारे जर्मन लोगों ने मान लिया है । गत पचीस तीस वर्षों में
जर्मनी का विदेशी व्यापार जितना बढा है यदि उसे कोई
जर्मनी के कारखानेवालों क दीर्घ परिश्रम अथवा उपयाग
का फल न कह कर ईश्वर इच्छा से बढा कहे तो यही
कहना पड़ेगा वह मनुष्य इस बात को समझ ही नहीं सका
है कि जर्मनी ने व्यापार में जो यश संपादन किया है, उसका
.
ममें क्या है।
बर्लिन में सरकार ने "कलोनियल स्कूल" नाम का एक
विद्यालय खोल रक्सा है। जो उत्साही युवा पुरुष सेती अथवा
व्यापार के लिये जर्मन उपनिवेशों में जाकर रहना चाहते हैं,

पर प्रति-
( ४ )
उन्हें उस विद्यालय में विशेष प्रकार की शिक्षा दी जाती है
विद्यालय में रहनेवाले विद्यार्थियों का खर्चा प्रति वर्ष चालीस
पौंड से साठ पौड तक पड़ता है और बाहर रहनेवाले विद्या-
र्थियों पर पंद्रह पौंड से तीस पौंड तफ खर्च पड़ता है । यह
खर्च विद्यार्थियों को होनेवाले लाभ की अपेक्षा बहुत कम है।
व्यवसाय और व्यापार यदि करना है तो सभी को
करना चाहिए, अगरेज लोगों के ऐसे विचार हो रहे हैं।
परतु यह विचार ठीक नहीं, यह सिद्ध करने के लिये एक
प्रतिस्पर्धा वर्तमान काल में उत्पन्न हो गया है।
म्पर्धी कितना उद्योगी है और अगरेजों को पीछे ढकेल देने
के लिये कौन कौन से उपायों की उसने योजना की है, यह
बात अब तक बतलाई गई है । इस प्रतिस्पर्धी के जो दीर्घ
प्रयत्न जारी हैं वे शिथिल पड़ जायगे अथवा वे अपनी कल्पना
का ही त्याग कर देंगे, यदि अगरेज लोगों के ऐसे विचार हैं
तो वे अवश्य उसके जाल में फंस गए हैं। जर्मनी का यह
प्रभाव देस कर अगरेजों को अब चुप चाप आँखें बद कर के
बैठने का समय नहीं है। हाँ, यह सच है कि जब तक
इग्लैंड को कुशल, दृढनिश्चयी और सपत्तिवान पुरुषों का
सहारा है तब तक भय का कोई कारण नहीं है परतु समय
पर ही सावधान हो जाना अच्छी बात है।
-

छठा अध्याय ।
औद्योगिक शिक्षा।
जर्मनी के प्रतिस्पर्धी राष्ट्रों की पहले यह समझ थी
कि सार्वजनिक शिक्षा की ओर सरकार को विशेष
ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। परतु यह विचार ठीक
न था, इसे अब सारे राष्ट्र समझ गए हैं। पर अपनी भूल
समझने में उन राष्ट्रों को बहुत समय लग गया। परतु जर्मन
राष्ट्र की समझ में यह बात बहुत समय हुआ तभी आ गई
थी और वहाँ सर्व साधारण की शिक्षा का काम नियमानुसार
सरकार की देख रेख में होने लगा था। इससे जर्मन लोगों
बहुत लाभ पहुँचा । परतु इस लाभ का महत्व उन्हें उस
समय और भी अधिक ज्ञात हुआ जब उद्योग युग का आरम
हो कर जर्मनी का माल विदेशों में बहुतायत के साथ जाने
लगा और उसमें उन्हें स्पष्ट रूप से अधिक लाभ दृष्टिगोचर
हुआ । पचीस तीस वर्ष के पहले अर्थात् उद्योगयुग के आरम
में व्यापारोपयोगी शास्त्र-रसायन शास्त्र-की उपयोगिता का
लोगों को ज्ञान ही हुआ था और सपति उत्पादन में बिजली
को शक्ति का उपयोग करके जो चाह वह काम उस
से लिया जा सकता है, यह बात अनुभव में आने ही लगी
यी कि जर्मनी ने इनके द्वारा लाभ उठाने का कार्य भारम
कर दिया। परतु शिक्षा में पीछे पड़े हुए अन्य यूरोपियन
।

( ७६ ) . । राष्ट्रों को इस नवीन ज्ञान का बहुत समय तक पता ही न लगा। इस कारण उनकी दशा बहुत समय तक ज्यों की त्यों बनी रही। जर्मनी ने शिक्षा सबधी तैयारिया पहले 'से ही कर रक्खी थीं। अतएव समय अनुकूल आते ही जर्मन लोगों ने सारे ससार का व्यापार हस्तगत करने का उद्योग आरभ कर दिया और अन्य राष्ट्रों के साथ प्रतिद्वदिता करने के लिये अपनी कमर कस कर वाँध ली। जिस प्रकार किसी सेनापति की आज्ञा पाते ही सेना कमर कस कर निकट आती है उसी प्रकार कला कौशल सषधी कालेजों से शिक्षा पाकर डाइरेक्टर, इजिनियर, रशायन-शास्त्रवेत्ता आदि औद्योगिक जगत में इधर उधर तैयार दिखाई पड़ने लगे । नवीन शास्त्रीय शोधों के भत्र शस्त्रों से ये लोग सुसज्जित थे, और किस अस्त्र का कहाँ प्रयोग करना चाहिए यह अमोघ मत्र उनके गुरु न उनके कान में फूंक दिया था। सैनिक भाषा छोड़ कर साधारण भाषा में कला कौशल की शिक्षा देनेवाले कालेजों ने नवीन उद्योग युग का आरभ करके देश का बहुत कुछ हितसाधन किया । इन कालेजों के काम में आरमिक पाठशालाओं से पूरी पूरी मदद मिली। उद्योग धधों के कारखानों में काम करने योग्य जितने आद- मियों की आवश्यकता होती, उतने इन पाठशालाओं से भासानी के साथ मिल जाते थे। इन पाठशालाओं में केवल प्रारभिक शिक्षा ही उदार मत के शिक्षकों द्वारा दी जाती थी, इस कारण विद्यार्थियों में बुद्धि का विकास और कुशाग्रता अधिक आ जाती थी। प्रारभिक शिक्षा देनेवाली पाठशा.

( ७७ ) शालामों की आगे की सीढ़ी कटिन्युयेशन (Continuation) पाठशालाएँ थीं। इन पाठशालाओं का दूसरा नाम "प्रोफे- शनल' अर्थात् औद्योगिक पाठशाला भी है। इन पाठशा- लामों म सब प्रकार की औद्योगिक शिक्षा दी जाती है। वहाँ पर विद्यार्थियों के हाथ से कारसानों के उपयोगी सब काम कराए जाते हैं। इसी कारण इन पाठशालाओं स सीसे हुए विद्यार्थी किसी कारखाने में जाकर ऊँचे से ऊँचे दर्जे का काम अपने हाथ में लेकर और उसे सफलतापूर्वक कर के बता सकते हैं। । जर्मनी ने अपने यहाँ शिल्प कला की शिक्षा का प्रबंध बहुत ही अधिक लाभ उठाया और इसकी सहायता स बहुत शीत्रता के साथ जर्मनी की उन्नति हुई और इस उन्नति को अव स्थिरता प्राप्त हो रही है। भविष्यत् मे जो औद्यो- गिक युद्ध संसार में होनेवाला है और जिसकी तैयारियाँ जर्मनी में बराबर हो रही है, उसके लिय अन्य राष्ट्र देखते हुए भी हाथ पर हाथ रक्खे बैठे हैं, यह बात ध्यान रसने योग्य है । जर्मनी की जिन बड़ी धडी औद्योगिक पाठशालाओं का नाम अधिक प्रसिद्ध है उनमें से कुछ तो पचास साठ वर्ष पहले की है और कुछ की स्थापना हुए सौ वर्ष व्यतीत हो गए हैं। वर्तमान काल में इन पाठशालाओं की संख्या खूब बढो है। बड़े बड़े शहरों में उनका होना कुछ आश्चर्य की बात नहीं है परतु बिलकुल छोटे छोटे गाँवों में भी वे पाई जाती है और वहाँ उद्योग-धों और कला कौशनी शिक्षा प्राय घर धर दी जाती . 2 । ।।

(५८)
खर्च की अपेक्षा लाम कुछ कम नहीं होता है। इग्लैंड की
लोकोपयोगी संस्थाओं में से कुछ सस्थाओं का खर्च बहुत ही
अधिक है । इग्लैंड में यह एक नियम सा हो गया है कि बड़े
घड़े कामों का स्वरूप भी बड़ा होना चाहिए, परंतु इसका
परिणाम यह होता है कि भारंभ में ही अधिक खर्च हो जाने
से उस काम के बिगड़ने में कुछ देरी नहीं लगती। यदि उस
काम में यश भी प्राप्त हुआ तो समय भी बहुत लगता है।
जर्मनी में औद्योगिक शिक्षा के लिये अनेक पाठशालाएं और
कालेज मौजूद हैं। परतु खर्च अधिक न होने पावे और न
उसकी उपयुक्तता नष्ट हो जाय, इस विषय की बडीसबरदारी
रक्खी जाती है। इन सस्थाओं में केवल लखाव दिखाव के
आदमियों को आश्रय नहीं मिलता। शिक्षक लोग पहले दजें
के व्यवहार-कुशल होते है। उच्च कोटि के प्रोफेसरों को जो
वेतन वहाँ मिलता है उसे जान कर इग्लैंड में उसी प्रकार
फा काम करनेवाले अध्यापक मुँह सिकोड़ते हैं। प्राय सारे
जर्मन प्रोफेसर उतने ही वेतन में सतुष्ट रहते हैं और वेतन
देनेवाले अधिकारी भी यह नहीं समझते कि इतना वेतन
६ फर हम इन विद्वानों को भूखों मार रहे हैं अथवा इनका
अपमान कर रहे हैं। इमारत कारखानों में काम करने
वाले मुख्याधिकारी को जर्मनी में दो सौ दस पौंड से
ले कर तीन सौ दस पौंड तक वेतन मिलता है। इसी
प्रकार युनिवर्सिटी से शिक्षा पाए हुए इजिनियरों को
१७५ पौंड से २६० पौंड तक सालाना वेतन मिलता है।
यह वेवन और इस वेतन के अनुसार काम को देख कर
.

अगरेज लोग बिलकुल लाल हो जाते हैं, और यदि कोई यह
प्रयत्न करे कि जर्मनी में जिस काम के लिये जिवना वेतन
दिया जाता है, उस काम के लिये उतना ही वेतन इंग्लैंड
में भी दिया जाय तो उस औद्योगिक कार्य से सबंध रखनेवाले
समाचार पत्र उस पर कुवाच्यों की वर्षा करने लगते हैं
और समय पड़ने पर कुछ सभासद कामस सभा में सरकार
से प्रश्न करने से भी कभी नहीं डरते। जर्मनी के किसी
भात में भी अध्यापकों का वेतन अधिक नहीं है परतु
युनिवर्सिटी मे बाहर निकलते ही उन्हें जहाँ चाहे वहाँ काम
मिल जाता है... इसका परिणाम यह होता है कि आदमियों
की जितनी मॉग होती है उसी के अनुसार लोग बराबर
मिलते जाते हैं। ऐसी स्थिति होने के कारण औद्योगिक
पाठशालाओं के लिये उच्च कोटि के शिक्षक योग्य वेतन पर
जितने चाहिए उतने समय पर मिल जाया करते हैं।
इस
पर से अगरेज प्रोफेसरों को मिलनेवाला वेतन, उनकी
योग्यता से अधिक होता है, यह वात नहीं है। परतु बात
यह है कि जर्मनी में औद्योगिक शिक्षा की सस्थाओं को इससे
विशेष और महत्व का लाभ प्राप्त होता है। इस कारण ऐसी
सस्थाएँ स्थापित करना और उनके लिये खर्च करना, उस दश
के लिये बहुत सहज काम हो गया है।
औद्योगिक शिक्षा की बड़ी बड़ी सस्थानों द्वारा होनेवाले
काम को क्षण भर के लिये एक ओर रख कर बिल्कुल साधारण
और फम सर्च से चलनवाली तथा महत्वपूर्ण काम फरने-
वाली सस्थानों की जर्मनी में कमी नहीं है । जादे के दिनों
-

- (८०) में, सध्या के समय छोटी सी पाठशाला में, तेल के प्रकाश में, पढनवाले गाँव के लदकों को शिक्षा देने, चलती फिरती प्रद- शनिया और प्रात प्राव में लोगों के मन में महत्वाकाक्षा उद्दीप्त करने योग्य हाथ की बनी हुई वस्तुओं के नमूने दिखाने, पहाड़ी प्रदेश के लोगों के घरों पर ही साल में छ महीने रह कर उन्हे औद्योगिक शिक्षा देने, आदि कामों को गाव गाव और घर घर, घूम कर, जो औद्योगिक शिक्षा का मूल तत्व उत्कृष्ट रीति से बताते फिरते हैं, उन शिक्षकों का काम कितने महत्व का है, यह बात विचार करने योग्य है । जर्मनी में औद्योगिक शिक्षा को जो स्वरूप प्राप्त हुआ है उसमें विशेष म्यान रखने योग्य वात शिक्षा की व्यापकता है। इस व्याप- कता से किसी प्रकार का व्यवसाय, वह कितना ही छोटा क्यों न हो, बाहर नहीं रह सकता । शिक्षा पाए बिना, व्यव- साय करने की अपेक्षा, शिक्षा प्राप्त करके व्यवसाय करना, अधिक हितकारी है, यह बात जान लेने पर शिक्षाप्राप्ति की कठिनाइया बिलकुल मालूम नहीं पड़ती। क्योंकि सब प्रकार की व्यावसायिक शिक्षा देने की पाठशालाएँ वहा मौजूद हैं । जर्मन शिक्षा की यह व्यापकता प्रशसनीय और अनुकरणीय है। औद्योगिक शिक्षा महत्व की है और भावश्यक है, जर्मनी का यह राष्ट्रीष विश्वास कितना दृढ़ है यदि इसका कोई उदाहरण देखना चाहे तो किसी बड़े प्रात की किसी सस्था में जाकर देख सकता है। क्योंकि प्रत्येक प्रात में इस विषय में कुछ न कुछ विशेष गुण दिखाई पड़ेंगे। प्रशिया की औद्योगिक पाठशालाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं। .

.
(८१)
चालोटिनबर्ग कारायल टेक्निकल कालेज, (जहा सैकड़ों शिक्षक
काम करते हैं) और क्रेफेल्ड की बुनाई की पाठशाला देखने
योग्य हैं। परंतु सेकसन, बवेरिया, बुर्टेबर्ग और वेडन की
पाठशालाएँ ऊपर मताई हुई पाठशालाओं से भी उच्च कोटि
की है। सेफसन की पाठशाला उस प्रात के निवासियों
और पाठशाला से काम सीख कर जानेवाले लोगों की सहा-
यता से ही चल रही है। स्वावलवन की दृष्टि से भी यह
बात बड़े महत्व की है। अतएव इसका उल्लेख हम यहां पर
जरा विस्तारपूर्वक करना चाहते हैं।
सकसन में, औद्योगिक शिक्षा ही लोगों की जीवन मूरि
बन रही है। इतना ऐक्यभाव जर्मनी में अभी अन्यत्र नहीं
दिसाई पड़ता। परतु इसके लिये आश्चर्य करने की कोई
। बात नहीं है। क्योंकि इस प्राव के फेवर्ग में सब से पुरानी
औद्योगिक पाठशाला सन् १७६६ में खोली गई थी। इसके
तीन वर्ष वाद ही सेकसन लोगों ने अनिवार्य शिक्षा के तत्व
को स्वीकार कर लिया था। परतु इस तत्वानुसार शिक्षा
का कार्य होने में बहुत समय लग गया और सन् १८०५ से
नियमानुसार काम हुआ। इसी प्रकार घेमनिट्स (Chemnitz)
शहर में १७९६ में एक औद्योगिक पाठशाला सोली गई।
और उन्नीसवीं सदी का भारम होने पर, शीघ्र ही कुछ वर्षों
में और भी तीन पाठशालाएँ खोली गई। कहने का
तात्पर्य यह है कि सेफसन में प्रौद्योगिक शिक्षा का अच्छा
प्रचार प्राचीन समय से ही है।
सेकसन प्राव में चार प्रकार की पाठशालाएँ हैं। प्राय
६
--

( ८२ ) मिक (पूर्वभाग) अर्थात् प्राइमरी, प्राथमिक (उत्तर भाग ) अर्थात् "कटिन्युएशन", मध्यम अर्थात् "मिडिल" और श्रेष्ठ मर्थात् "हायर"। परतु वहा की पाठशालाओं की शिक्षा कितनी ही उच्च हो, तो भी प्राथमिक शिक्षा की उचमता से ही उच्च शिक्षा का कार्य सुचारु रूप से सपादित होता है। अन्य पाठशालाओं को एक ओर रख कर केवल औद्योगिक पाठशालाएँ ही वहा ३६० के करीब पाई जाती है और उन पाठशालाभों में भिन्न भिन्न व्यवसायों की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है । सन् १९०५ में इस प्रात की जन- सख्या ४५ लाख थी। अर्थात् तेरह हजार मनुष्यों के लिये एक औद्योगिक पाठशाला थी । जर्मन साम्राज्य की आबादी का हिस्सा सेफसन की आबादी थी। यह बात सन् १८७१ की है। परंतु सन् १८७१ से १९०५ में वहा जनसख्या ७६ ४ सैकड़ा के हिसाब से बढ गई। परतु जहा सेकसन की आबादी में इतनी अधिक वृद्धि हुई वहा प्रशिया में केवल ५१ १, बवेरिया में ३४ २,, बुदेंवर्ग में २६६ और बेडन में ३७६ सैकड़ा बढी । इससे यह स्पष्ट दिसाई पडता है कि प्रशिया आदि अन्य प्रातों पर सेकसन ने चढ़ाई करके कैसी अच्छी विजय प्राप्त की है। सेकसन में औद्योगिक पाठशालाओं का जो आश्चर्यजनक जाल फैला हुआ है वह किसी ने अत्याचारपूर्वक नहीं फैलाया है और न सरफार की सख्ती के कृत्रिम उपायों से ही उसका प्रसार हुभा है, यह वात खास तौर पर ध्यान रखने योग्य है। मौद्योगिक शिक्षा के सबध मे लोगों का उत्साह और

(८३)
उसे प्राप्त करने की सहज स्फूर्ति, इन दो बातों ने ही उन्हें
इस कार्य में सफलता प्रदान की है। लोगों ने अपनी स्वत
की प्रेरणा से, अन्य किसी पर भरोसा न करक, और अपने
पास का धन लगा कर औद्योगिक शिक्षा की इतनी उन्नति
की, यह बात कुछ कम माश्चर्य की नहीं है। अन्य प्रातो की
सरकारों का इस ओर विचार जाने के पहले ही इस प्रात में
लोगों के सद्योग से अनेक औद्योगिक पाठशालाएँ स्थापित
होकर लोग उच्च कोटि का काम करने लगे थे। अघ सेकसन
सरकार भी इस ओर ध्यान देने लगी है। परतु इन संस्थानों
की अतर्व्यवस्था में वह हाथ डालना नहीं चाहती। लोगों
को अपने आप ही उनकी देस भाल करनी चाहिए, शिक्षा
पद्धति में लोगों को जो आवश्यक फेर फार करना हो, उन्हें
सर्वसाधारण स्वत करें इस नीति पर वहा की सरकार चल
रही है । जो काम आरभ में सर्वसाधारण लोगों के
हाथ
से
नहीं होते, उन कामों का भारभ सरकार अपने हाथों से कर
देती है। ऐसे कामों का आरभ करने में सरकार द्रव्य
अथवा अन्य और किमी प्रकार की सहायता करने में, कमी
नहीं करती। व्यक्ति विशेष व्यापारी अथवा व्यापारी लोगों
की सभा के खर्चे ,से, अन्य छोटे दर्जे की पाठशालाभों के
मुकाबले में, उच्च कोटि की औद्योगिक पाठशालाओं का
चलाना जरा कठिन काम है । अतएव उन पाठशालाओं
को सरकार अपने सर्च से चलाती है। इसी प्रकार गाँवों में
घर घर कलाकौशल की शिक्षा देने का काम सरकार ने बड़ी
पतुराई के साथ भारभ किया है। क्योंकि सरकार के ध्यान
-

। धनाभाव . ( ८४ ) में यह बात आ गई है कि बिना सरकार के आगे हुए लोगों के हाथ से के कारण कुछ हो नहीं सकेगा। सर्व साधारण लोगों ने जो पाठशालाएँ खोल रक्खी हैं उन्हें भी सरकार से हर साल सहायता मिलती रहती है। परतु इस सरकारी सहायता को पाकर भी, स्वावलंबन का मार्ग पाठ- शालाओं के व्यवस्थापक परित्याग नहीं करते । कृषि शालाओं को सरकार से पूरी पूरी सहायता दी जाती है, उसके बाद औद्योगिक शालाओं को सहायता मिलती है । और सब से कम सहायता व्यापारी शालाओं को प्रदान की जाती है। सहायता में ऐसा अतर क्यों है, इसका कारण स्पष्ट है। व्यापारी शालाएँ बहुधा शहरों में होती हैं और उनकी धन से मदद करने के लिये व्यापारी और कारखाने- वाले सदा तैयार रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं और उन्हें इस बात का पूरा अनुभव होता है कि शिक्षा के लिये जो धन खर्च किया जाता है वह व्याज सहित वापिस आ जाता है । "ट्रेड गिल्ड" नामफ जो व्यापारी सस्थाएँ हैं वे भी इसी विचार से औद्योगिक पाठशालाओं को सहायता पहुंचाने के लिये निष्ठापूर्वक संचार रहती हैं। अब तक इस कार्य में लोगों ने जो साहस दिखलाया है वह प्रशसनीय है। परतु इस से भी अधिक साहस भविष्यत् में ये लोग दिखावें इसी उद्देश्य से सरकार औद्योगिक शिक्षा से अपना हाथ सींचती जाती है। परतु इसका यह अर्थ नहीं है कि सरकार इस ओर से उदासीन रहना चाहती है वरन् वह यह चाहती है कि वाणिज्य व्यवसाय 'करनेवाले लोग अपनी आवश्यकता । हैं (८५) नुसार अपने सहारे , आप खडे हों, क्योंकि ऐसा होना सार्व- जनिक दृष्टि से हितकर है। इसी कारण सरकार ने अपनी नीति को बदलना आरभ कर दिया है। सभव है कि सरकार की इस नवीना नीति को यश प्राप्त न हो, परतु सेकसन प्रात में तो कई स्थानों पर उसे बहुत ही उत्तमतापूर्वक यश प्राप्त हुआ है और इसी कारण उसने औद्योगिक शिक्षा में सब प्रातों को नीचा दिखा दिया है। सेकसन,प्रात में पाच प्रकार की औद्योगिक पाठशालाएँ । स्थानाभाव से इन सब का वर्णन यहा पर देना कठिन है। परतु इतना हम अवश्य कहेंगे कि इन पाठशालाओं में से किसी पाठशाला में पढ़ने के लिये जाने को विद्यार्थियों पर कुछ कड़ाई नहीं होती। कडाई नहीं होती, यह तो एक कहने की बात है । वास्तविक तौर पर देखा जाय तो उसे कड़ाई ही कहेगे । वहा पर यह एक नियम है कि चाहे बालक हो अथवा, बालिका, प्रारभिक शिक्षा पाकर मदरसे से निकलते ही उसे तीन वर्ष तक "कटिन्युएशन" पाठशाला में शिक्षा पाने के लिये जाना ही चाहिए। इस प्रकार की अनि चार्य शिक्षा का कानून साफ माफ तौर पर सन् १८९३ में व्यवहार,में लाया जाने लगा है। अन्य प्रकार की शिक्षा क लिये और कोई स्पष्ट कानून नहीं है, बस इतना ही अतर है। इस प्रकार सख्ती के साथ शिक्षा देने के तत्व को सप से पहले प्रशियाने स्वीकार किया, पश्चात् सेकसन में इसका प्रभाव जमा, ऐसा कहने में कुछ हर्ज नहीं है। इस तत्व को स्वीकार करने के पश्चात् ही शिक्षा के काम में नवीन युग का मारमा हुआ।

( ८६ ) सेकसन में वर्तमान शिक्षाप्रणाली का स्वरूप प्राप्त होने में बहुत कुछ बुद्धिमत्ता, बहुत समय और धन खर्च करना पड़ा। उन्हें पूर्ण यश प्राप्त हुआ देख कुछ लोगों के मन में उनके लिये पूज्य बुद्धि उत्पन्न हो गई। परतु कुछ लोग वैमनस्य मानने लगे हैं। इस काम में इन लोगों ने बहुत सी सरकारी मदद न ले कर स्वावलंबन के तत्व पर ही काम किया। यही उनके यश का मुख्य कारण है। और इसी प्रकार विद्यार्थियों ने भी केवल पुस्तकी ज्ञान न प्राप्त कर के व्यवहार मे जिस ज्ञान का उपयोग हो सके, ऐसी शिक्षा प्राप्त फरने में अधिक परिश्रम किया । यही कारण है कि वहा के लोग शिक्षा को अधिक उपयोगी बना कर अपन काम में ला सके। व्यावहारिक शिक्षा का एक उदाहरण हम यहा पर देते हैं। भिन्न भिन्न पाठशालाओं के विद्यार्थियों के धनाए हुए सामान की प्रदर्शिनी नियमित समय तक करने की व्यवस्था पहा की गई है। इस प्रदर्शिनी में विद्यार्थी और उनके शिक्षकों के अलावा और लोगों का प्रवेश नहीं होता। हर एक पाठ- शाला से विद्यार्थी अपने हाथों से सामान तैयार करके भेजते वह सामान चाहे अच्छा हो या बुरा । इस व्यवस्था से पाठशालाओं को सच्चेजना मिलती है। इन प्रदर्शिनियों में लखाव दिखाव और सजावट नहीं होती। क्योंकि लखाव दिखाव और सजावट से लोगों को प्रसन्न करना ही इन प्रदर्शिनियों का उद्देश्य नहीं है । इनका उद्देश्य तो यह है कि कुछ काम हो। अब अत में एक और महत्त्व की बात कह फर हम इस

( ८७ )
A
अध्याय को समाप्त करते हैं । उच्च कोटि की पाठशालाओं में
जाने की किसी को रोक नहीं है, परतु व्यवहार निपुण होने
के कारण विदेशी विद्यार्थियों की बाबत कुछ तिरस्कार नहीं
तो अप्रसन्नता वर्तमान समय में दिखाई पड़ने लगी है।
इस विषय में एक प्रोफेसर ने लिखा है-"पहले हम लोगों
से यह कहते थे कि हर एक आदमी को हमारे यहा आने का
अधिकार है, हमारे यहा आने में किसी को कुछ हानि नहीं
है, अपार पृथ्वी पड़ी हुई है, और हमारे पास भी काफी
• स्थान है, परंतु अब हम ऐसा नहीं कहते ।" इसका मतलब
यह है कि हर एक विदेशी विद्यार्थी कुछ समय बाद हमारे
साथ प्रतिद्वद्विता करने लगेगा, यह शका शिक्षकों में
उत्पन्न हो गई है। इसी कारण "आउट लेंसर" अर्थात्
विदेशी लोगों के सबध में इस प्रकार की उदासीनता पैदा हो
ज्ञान की दावत में विदेशी लोग घर के आदमियों
के साथ साथ एक चौके में कया से कथा भिड़ा कर पहले
बैठते थे परतु मम उनको दूसरे चौके में बिठाने का प्रयत्न
किया जा रहा है, इतना ही नहीं, अब तो भोजन के दाम
भी दुगने चौगुने मागे जा रहे हैं। परतु इतनी रोक टोक
होने पर भी विदेशी व्यापारी वहा बिना जाए नहीं रहते ।
क्योंकि इस उपाय से भी विदेशी विद्यार्थियों की संख्या कम
नहीं हुई है।
-
-
.

'सातवॉ अध्याय ।
कारखानवाले और मजदूर लोग ।
।
जर्मनी के कारखानेवाले मजदूरों की निंदा करते हैं,
"और मजदूर कारखानेगलों को। परतु इन दोनों
से दूर रह कर यदि कोई वस्तुस्थिति का निरीक्षण करे तो
उसे ये उतने बुरे नहीं दिखाई पड़ते, जितना वे आपम में
अपने आप को बुरा समझते हैं। हा, यह बात ठीक है कि
दोनों में खूब चलती है और किसी किसी व्यवसाय में तो
इसकी हद हो गई है। जिस प्रकार मजदूरों ने अपने संघ
बनाए हैं उसी प्रकार उनके जवाब में कारखानेवालों ने
अपने सघ कायम किए हैं। परतु कारखानेवालों के संघ
अधिक जोरदार हैं। किसी किसी कारखाने में तो इन सघ
शक्तियों के कारण मजदूरों का कुछ बस नहीं चलता ।
कारखानों के मालिकों से अपने लिये अधिक अधिकार
अथवा मजदूरी पाने में आसानियां पैदा हों, इस उद्देश से
वहा जो सभाएँ बनाई गई हैं, उनको " ट्रेड्स यूनियन "
कहते हैं। जर्मनी में इस प्रकार की 'एक नहीं अनेक सभाएँ
हैं। इन सभाओं की सघशक्ति पर मजदूरों के हित अथवा
अहित का बहुत कुछ दारोमदार है। मजदूरों और उनकी
सभामों से संबंध रखनेवाला एक कानून है। इस कानून
का नाम "इडस्ट्रियल कोड" है। इस कानून में १५२ धाराएँ

- सबध में हैं इन धाराओं में मजदूरों की सापत्तिक स्थिति सुधारने और अपनी उन्नति के लिये समुदाय बनाने अथवा भाषण करने की स्ववत्रता प्रदान की गई है। परतु जिस प्रकार मजदूरों के लिये स्वाधीनता प्रदान की गई है, उसी प्रकार कार- खानेवालों को भी कानून बना कर उनके कार्य के लिये स्वाधीनता दी गई है। अर्थात् मजदूरों के उपद्रव रोकने के लिये कारखानेवालों को अपने कारस्थाने का दरवाजा पद कर देने का अधिकार है। इसी को अगरेजी में "लॉक-आउट" कहते हैं। इसी प्रकार मजदूरों को अपनी सापत्तिक स्थिति के हड़ताल फरने और कारसानवालों को उनका मन मुटाव दूर करने का अधिकार कानून के द्वारा प्रदान किया गया है। परतु कानून में यह बात स्पष्ट कर दी गई है कि इस अधिकार को राजनैतिक अथवा सार्वजनिक कामों में । लाने का उमय पक्ष को हक प्राप्त नहीं है। हड़ताल कर के अपना कल्याण साधन करने का अधि- कार मजदूरों को कानून क अनुसार दिया गया है परतु वास्तव में, जैसा लाभ मजदूरों को मिलना चाहिए, नहीं मिलता । बहुधा देखा गया है कि जब मजदूर यह कह कर कि "तुम हमारा कहना नहीं मानते अतएव हम हड़ताल करते हैं अथवा अपने वेतन की वृद्धि के लिये मालिकों से कहते हैं" तो पुलिसवाले उनपर मुकद्दमे चलाते हैं और न्यायाधीश इन मुकदमों को सुन कर उन्हें अपराधी समझदड देत हैं। कोई कोई न्यायाधीश उन्हें । निरपराधी समझ कर छोड़ भी दते हैं परतु इस प्रकार के उदाहरण बहुत कम देखने में आते हैं। . ।

-
(९०)
इतना होने पर भी यदि साधारण तौर पर देखा जाय तो
यह विश्वास होता है कि कानून के शब्द, कानून बनानेवालों
ने मजदूरों के कल्याणार्थ उदारतापूर्वक ही रक्खे हैं पर
न्यायाधीश उनका अर्थ केवल अनुदारता के साथ लगा कर
दड देते हैं। इसीलिये कारखानेवालों और मजदूरों के बीच
उपस्थित होनेवाले वादविवाद में न्याय का पासा कारखाने-
वालों की ओर ही अधिक झुकता है और सदा नहीं तो,
अधिकाश तौर पर यश का पलड़ा उन्हीं की ओर झुका हुमा
रहता है।
मजदूरों को मुख्य तीन प्रकार की सभाएँ हैं। (१)
"मी" अर्थात्
"सोशियल डेमोक्रेट,
(२) हर्श-डेकर
अर्थात् "रोडिकल " और ( ३) "क्रश्चियन अथवा रोमन
केथोलिक " इन सबों में पहले प्रकार की "यूनियन" सब
से अधिक प्रभावशाली हैं और अगुओं का मान भी उनको
प्राप्त है । १८९० में इन यूनियनों के सभासदों की संख्या
पौने तीन लास थी।
परतु सन् १९०६ से यह संख्या बढ़
कर प्राय सत्रह लाख हो गई है। अब कुछ समय से पुरुषों
की देखादेखी स्त्रियों ने भी इसी प्रकार की अपनी सभाएँ
बनाई हैं। सन् १९०६ में स्त्रियों द्वारा स्थापित सस्थाओं
की संख्या ३७ थी, और उनमें सवा लाख स्त्रियाँ सभासद
थीं। फ्री यूनियनों की भामदनी भी बहुत अधिक है। परतु
खर्च भी उनका कुछ कम नहीं है। 'सोशियालिज्म " नाम
की जो राजनैतिक सस्थाएँ जर्मनी अथवा यूरोप के अन्य
देशों में स्थापित हुई हैं, उनकी इन लोगों से पूर्ण,सहानुभूति

-
.
( ९१ )
है, और इसी कारण बहुत से मजदूर पक्ष के लोग सोशि-
यालिस्ट बन गए हैं। यूनियन के सभासद बड़े परिश्रमी
कर्त्तव्यरत, युक्तिपूर्वक कार्य करनेवाले और अपने हिताहित
पर पूर्ण दृष्टि रखनेवाले होते हैं। अन्य सभा समाजों की
अपेक्षा इनको धन अथवा अन्य प्रकार के साधन अच्छे होने
से जितना उद्योग ये कर सकती हैं, उतना और सभाएँ नहीं
कर सकती। मुख्य सस्था के माश्रय में मजदूरों ने " सेके.
टरियट " अर्थात् "सलाह देनेवाली मडलियाँ" स्थापित की हैं
जिनसे मजदूरों को बहुत लाभ पहुँचता है।
दूसरे प्रकार की सस्था हर्श-डेकर अथवा रेडिकल "
है। इस सस्था के उत्पादक का नाम डाक्टर मेक्सहर्श था ।
पार्लियामेंट में रेडिकल नाम का ,
जो एक राजनैतिक
दल है, उसी दल के अनुयायी डाक्टर साहब थ ।
में इस संस्था का उद्देश्य राजनैतिक और सामाजिक दोनों
प्रकार का था और मजदूरों में रेडिकल दल के जो लोग थे वे
इस सस्था के सभासद होते थे। परतु वर्तमान समय में इस
सस्था फा राजनैतिक स्वरूप प्राय
नष्ट हो गया है और
केवल सापत्तिक विषय के अलावा और किसी राजनैतिक
विषय पर विचार करना इसने त्याग दिया है। मजदूरों में
से चुने हुए लोग इस सस्था के सभासद होते हैं। परतु
उनकी संख्या बहुत अधिक नहीं है और न उनके पास अधिक
धन ही है। कारसानेवालों के साथ लड़ने झगड़ने का प्रसग माने
पर जहाँ तक धनता है तहाँ तक ये उसे टाल ही देना चाहते
हैं। परंतु जो बात कारखानेवाले कहते हैं उसे चुपचाप मान
आरभ

+
( ९४ )
-
गत, पच्चीस वर्षों में मजदूरों को अधिक वेतन मिलने लगा
है और उनके स्वास्थ्य की भी उन्नति हुई है । इन सब सुधारों
का श्रेय ट्रेड यूनियनों को ही मिलना चाहिए। मजदूरों को
कम घटे काम करके अधिक वेतन मिलने से उनका बहुत कुछ
हितसाधन हुआ है। परतु कारखानेवालों पर खर्च का
अधिक बोझ पड़ गया है और इस बोझ से दब जान के कारण
उनकी क्या दशा होगी, इस पर विचार होने लगा है। किंतु
जर्मन माल की विदश में अधिक सपत होने के कारण कारसाने.
वालों के दिवाले निकलने की अधिक चिंता नहीं है, यह शुभ,
लक्षण है। मजदूर लोगों की माग पूरी करने को मालिक
कभी तैयार न थे परतु वहा के मजदूर मालिकों से न कर
चुप रहनेवाले नहीं हैं। वे दृढतापूर्वक अपना कार्य सपादन
करते रहते हैं और अत में सफलता प्राप्त करते हैं। यह बात
उनके लिये एक प्रकार से भूषणावह है।
लोगों का विचार है कि जर्मनी की ट्रेड यूनियनों की यह
वृद्धि वाजवी की अपेक्षा बहुत अधिक है। और इसी कारण
कभी कभी तो लोग यह भविष्य कहने लगते हैं कि मालिक
और मजदूरों के बीच का वाद विवाद मिटते ही इन यूनियनों
का महत्व मजदूरों को ही कम मालूम होने लगेगा। परतु
हमारे मत से यह बात केवल भ्रम मात्र है। उभय पक्ष के
वाद विवाद कभी मिटेंगे यह आशा करना भूल है। हम में
फितनी शक्ति है, यह बात यूनियन अच्छी तरह जान गई हैं
अतएव कुछ लोगों का यह मत है कि वाद विवाद का अत
होने के बजाय अभी तो यही कहना चाहिए कि उसका तो

-
--
भारम ही हुआ है । और यह बात अनुभव से भी ठीक जान
पड़ती है। जब कभी कोई बहुत बड़ा वाद विवाद उपस्थित
हो जाता है तब और भी बहुत से लोग यूनियनों में भाकर
शामिल हो जाते हैं परतु उस वाद विवाद का समाधानकारक
निर्णय हो जाने के पश्चात् खोगीर की भर्ती के लोग अपना भग
निकाल लते हैं। इस प्रकार के कई उदाहरण अभी हाल में
ही देखे गए हैं और इसी कारण कुछ यूनियनों के सभासदों
की सख्या भी कम हो गई है । परतु इस प्रकार के उदाहरणों
मे यह परिणाम निकलना कि मजदूरों और मालिकों के
बीच का विवाद नष्ट हो कर यूनियनें ही नष्ट हो जायगी,
मूल है। वर्तमान समय में जो दशा हम अपनी आँखों
से देखते हैं, वह ऐसी है कि ट्रेड यूनियनों की संख्या धीरे
धीरे परतु दृढता के साथ बढ रही है और यह बाढ़ और भी
कुछ दिनों तक ऐसी ही रहेगी, यही अनुमान है। हर विषय
में मजदूर्गे की स्थिति कैसे सुधरी, इस बात को ध्यान में
रख कर, यह अनुमान ठीक नहीं है, ऐसा प्रमाणित नहीं
होता । अपना हित साधन करने के लिये कारखानेवाली
द्वारा स्थापित "सिंडिकेट" अथवा यूनियन और दोनों की
सयुक्त सभाएँ और इन समाओं का विस्तीर्ण कार्यक्षेत्र और
द्रव्य की अनुकूलता, अधिक कर लग जाने से सर्च में किफा-
यतशारी और भानपूर्वक जीवन व्यतीत करने की इच्छा,
इन सब बातों के कारण अपने गोट में अधिक धन होन की
ओर मजदूरों की प्रवृति होना एक सहज बात है।
परतु
वे
लोग यह बात कभी नहीं सोचते कि यदि हम लोग अधिक
-
-

पत्र है मजदूरी मांगने लगेंगे तो उसका घार प्राइकों पर ही पड़ेगा, उनका ध्यान तो अपने लाभ की ओर है । 'ट्रेड यूनियनों को और साम कर सोशियालिस्ट दल की ट्रेड यूनियनों को अपना आदोलन नियमानुसार चलाने के लिये प्रभावशाली समाचार पत्रों की बहुत बडी सहायता है। सोशियालिस्ट दल के ६८ नगरो से दैनिक पत्र निकलते हैं। इनमें से तीन शहरों में तो दो दो सीन चीन दैनिक पत्र प्रकाशित होते हैं। चार पत्र साप्ताहिक हैं और १८ पत्र ममय समय पर निक लते रहते हैं। इनके अलावा भिन्न भिन्न व्यापार व्यवसाय का हाल प्रकाशित करनेवाले ट्रेड यूनियनों के और अनेक इन पत्रों में से बहुत से पन साप्ताहिक हैं। १२ मासिक पत्र भी इनकी ओर से प्रकाशित होते हैं । इन पत्रों का सपादन सोशियालिस्ट अथवा ट्रेड यूनियनों का कोई सभासद करता है । पोलेंड और इटली के जो मजदूर हैं उनके लिये उपयोगी समाचार पत्र उन्हीं की भाषा में प्रकाशित होते है । दैनिक पत्रों की खपत भी बहुत है। धातु खानों संबंधी यूनियनों द्वारा संचालित पत्र के दो लाख प्राहक । बहुत से दैनिक पत्र पड़ी कुशलता के साथ जोर- दार भाषा में निकलते हैं। ये पत्र वाद विवाद के विषयों में गुप्त स्वरूप न रख कर स्पष्ट रूप से धर्म सस्थाओं के विरुद्ध और कभी कभी तो नास्तिक मत का समर्थन करने तक पहुँच जाते हैं। सोशियालिस्ट लोगों का कथन है कि "हम धर्म के विरुद्ध नहीं हैं। धर्म लोगों की निज की सपत्ति है। बस, हमारा यही कहना है, परतु इस कथन और उनके के कर हैं पक्ष के समाचारपत्रों के धर्म-विरुद्ध लेसों की सगति कैसे लगाई जा सकती है। हा, इतनी बात अवश्य ठीक है कि इस प्रकार के लेखों से लोगो में खूब उत्साह उत्पन्न होता है। मजदूरों का पक्ष समर्थन करने को ये पत्र सदा तैयार रहते हैं और कारखानेवालों के साथ जब कभी मजदूरों का वाद विवाद आरभ होता है तब मजदूरों का पक्ष ले कर उनके पक्ष का समर्थन करने में ये पत्र कभी कमी नहीं करते। इन पत्रों के सपादक सुशिक्षित और विद्वान लोग होते हैं। कई एक सपादकों को तो " डाक्टर " की पदवी भी मिली हुई है। अर्थशास्त्र का अध्ययन अधिक करने के कारण ये लोग सापत्तिक विपयों पर गवेषणापूर्ण और विचारपूर्वक लेख लिस कर प्रकाशित करते हैं फिर चाहे व लेख एक- तरफा या पक्षपात सहित ही क्यों न हों, परतु उन लेखों में उनकी बहुज्ञता और बुद्धिमत्ता का पता अवश्य लगता है। पत्रों में कभी कभी जो बातें कही जाती हैं उनमें मूलें भी होती हैं परतु ये भूलें जान बूझ कर की गई हैं, यह नहीं कहा जा सकता। उन्होंने जिस सिद्धात का प्रतिपादन किया उसमें भूले हो सकती है परतु ये भूलें जान बूझ कर नहीं, उनके अधप्रेम के कारण होती हैं। अतएव व क्षम्य हैं। उच्च कोटि का साहित्य थोड़े दामों में पाठकों को देने के काम में, जर्मनी इग्लैंड के बहुत पीछे है। परतु कारीगर लोगों के पक्ष के समाचारपत्रों और मासिक पुस्तकों में प्रकाशित होने वाले लेख इग्लैंड के उसी पक्ष के लोगों द्वारा प्रकाशित पनों और पुस्तकों की अपेक्षा अधिक सरस और व्यापक होते हैं, . - . ७ ( ९८ ) . . इसमें संदेह नहीं है। किसी खास विषय के कुछ समाचार- पत्रों में तो कला कौशल, साहित्य, पदार्थ विज्ञान, सृष्टिशास्त्र, प्राचीन शोध और अध्यात्मविद्या आदि के लेख इतने अच्छे और विद्वत्ता पूर्ण निकलते हैं कि बडे बडे विद्वान् भी उन्हें पढ कर लाभ उठाए बिना नहीं रहते। इन लोगों द्वारा प्रकाशित समाचारपत्रों की अच्छी आमदनी होती है। जहा तक बनता है एक दल का मनुष्य दूसरे दलवाले के समाचारपत्र को नहीं खरीदता । "हर्ष-डकर" और "क्रिश्चियन" दल की यूनियनों के भी समाचारपत्र प्रकाशित होते हैं परतु सोशियालिस्ट दलवालों की अपेक्षा बहुत कम, और इस पक्ष के समाचारपत्रों का महत्व भी उतना नहीं है। क्रिश्चियन यूनियन ता इस काम में सब मे पीछ है । इन तीनों दलों के समाचारपत्रों मे सदा कुछ न कुछ घुस फुप बातें चलती ही रहती हैं। इस से यह अनुमान कर लना कुछ अनुचित न होगा कि इनमें भी परस्पर मद्भद और विरोध कुछ न कुछ बना ही रहता है, अर्थात् इनमें, आपस में, भी एकमत नहीं है। साधारण तौर पर हर एक दलवाले अपने नेताओं की व्यवस्था का उल्लघन करने को तैयार नहीं होते। जो एक व्यवस्था एक बार व्यवहार में लाई गई कि उसे सब लोग मान्य कर के, उसी के अनुसार व्यवहार करने लग जाते हैं। परतु आरभ में यह दशान थी। पहले उनके विचार न थे कि एक बार जो व्यवस्था काम में लाई गई उसे सब लोगों को मानना ही चाहिए। उसके द्वारा मिलनेवाले यश अथवा अपयश का हमें भी हिस्सेदार होना चाहिए। अपने नेता जिस यह

काम जैसा
.
( ९९ )
बात का निर्णय एक वार कर दें, उसी के अनुसार सब को
चलना चाहिए । और उस सबंध में उनकी निराशा अथवा
उनका अपमान हुआ तो भी उसे स्वीकार करना चाहिए।
इस प्रकार के विचारों के न होने से आरभ में यूनियनों का
आ चलना चाहिए वैमा नहीं चलता था। परतु धीरे
घोरे जव यूनियनों के तत्व लोगों के ध्यान में आ गए, संघशक्ति
को महत्व उन्हे मालूम हो गया कि परस्पर की सहायता के विना
कार्य करने में कैसे कैसे अनर्थ उठ खड़े होते हैं, तब उन्होंने
अपने मतभेद को भुला कर व्यवस्थित मन से अपना कार्य
करना आरभ कर दिया। राजनैतिक आचार विचार की
शिक्षा मिलने में इन लोगों में अधिक प्रगल्भता आ' गई है।
परतु राजनैतिक ओर औद्योगिक विषयों का एकीकरण
कर देने से जर्मन मजदूरों को कुछ मापत्तिक लाभ हुआ
अथवा नहीं, यह पश्न विचारणीय है। ऊपर जिस सुधार
की
चर्चा की है, वह सुधार हो जाने पर भी नेताओं के हाथ से
लोगों को निकल जाते हुए कई बार दखा गया है। इस
से यह पाया जाता है कि हड़ताल रूपी ज्वर जब एक पार
चढता है तब सारासार विचार एक ओर रख कर नेताओं
के अधिकार को लोग हवा में उडा देते हैं । सन् १९०७ में
जब गजा लोगों ने हड़ताल की तब मजदूरों के नेताओं ने
कारसाने के मालिकों के साथ जो व्यवस्था की समे मजदूर
लोगों ने स्वीकार नहीं किया। अतएव नेताओं ने भी अपना
मुँह इनकी ओर से फेर लिया। इस प्रकार मजदूरों को दोहरी
हानि उठानी पड़ी। कारखानेवाले कहने लगे कि मजदूर
.
-

(.१००)
--
३
-
लोग जब अपने नेताओं के किए हुए निश्चय के अनु
सार काम नहीं करते तब फिर उनके किसी , प्रस्ताव पस
विचार करना ही फजूल है ! उनके अनुकूल प्रस्ताव करने
पर भी जब मजदूर लोग कहना नहीं मानते तब हमारे पास
कर उन्हें किसी प्रस्ताव को उपस्थित करना उचित नहीं है।
इस प्रकार कारखानेवालों ने मजदूरों और उनके नेताओं के
मुँह बद कर दिए।
ट्रेड यूनियनों का खर्च चलाने के लिये सभासदों को
अपनी आमदनी में से ६ सैफडा देना पड़ता है। काम चलाने
के लिये जो आदमी नियत किए जाते हैं वे बड़े बुद्धिमान
और दिल लगा कर काम करनेवाले होते हैं और उन्हें जो
वेतन मिलता है वह उनके परिश्रम के मुकाबले में बहुत कम
है अर्थात् एक कुशल कारीगर को जो मजदूरी मिलती है
वेतन अधिक नहीं होता । इतने कम वेतन
पर उन्हें सप्ताह में छ दिन और कभी कभी तो इतवार तक
सवेरे, दोपहर और शाम को अपनी जगह पर हाजिर
रहना पड़ता है । अपना हित साधन करने के लिये दूसरों के
साथ झगडने में उनका बहुत सा समय नष्ट हो जाता है और
उन्हें शारीरिक कष्ट भी उठाना पड़ता है। इतना होने पर भी
अदालत का द्वार न देखना पड़े, इसका वे बराबर ध्यान रखते
है। हम सत्पक्ष के लिये झगड़ते हैं, यदि उनको इस बात का
दृढ विश्वास न हो और अपने काम पर प्रेम न हो तो इतना
थोड़ा धन पा कर कोई इतना अधिक और सकट का
काम करने को तैयार न होगा। अपने साथियों के पसीने से
उससे उनका

(१०१)
पैदा किए हुए धन पर मनमानी मौज उड़ानी चाहिए, यह
वासना उनके मन में कभी उत्पन्न ही नहीं होती। उनका यह
उदाहरण, क्या हमारे यहाँ (भारतवर्ष) की सभा सोसाइटियों
के संचालक लोग ध्यान में लाने की कभी कृपा करेंगे ?
ऊपर जिन तीन प्रकार के दलों का वर्णन किया जा
चुका है उनकी अनेक ट्रेड यूनियनों ने मिल कर एक सयुक्त
सस्था भी स्थापित की है। इस मस्था का नाम उन्होंन
"वर्कमेंस सेक्रेटेरियट"(Vork men's Secret inte) रक्खा
गों को जो बात जाननी हो अथवा जो सलाह लेनी हो
उसमें उन्हें इस सस्था से घराबर सहायता पहुँचती रहती है।
सकट में पडे
स्त्री पुरुषों को मित्र भाव से इस सस्था के
अधिकारी सहायता पहुनाते हैं । इसके अलावा जो जर्मन
लोग टापुओं में रहते हैं उनके सुख दुख की खबर भी ये
लोग लेते रहते हैं। इन कामों को सुचारू रूप से करने के कारण
यह सस्था बहुत ही अधिक लोकप्रिय हो गई है। देश में
उसका पद इतना ऊँचा हो गया है कि और कई लोगो ने
सर्व साधारण के हितार्थ, इसी ढग की सस्थाएँ कायम को
हैं। इन सस्थाओं की ओर से दीवानी, फौजदारी और मोद्यो-
गिफ फायदे कानून की वायत जो सहायता लोगों को चाहिए
यह मुफ्त दी जाती है। सन १९०७ में सोशियालिस्ट वर्क
मेंस सेक्रेटरियट की सख्या १६थी और उनके आश्रय में काम
करनेवाली शाखा सभाएँ १३२ थीं। इन शाखा सभाओं की
संख्या देस कर किसी को भी आश्चर्य हुए विना न रहेगा।
अब तक जो कुछ कहा गया है, उससे कोई यह

( १०२) । अर्थ न निकाले कि मजदूर लोग अपनी सेना का मार्ग तैयार कर के औद्योगिक सपत्ति के किले पर चढाई करने का मसूबा कर रहे हैं और पूजीवाले व्यापारी और कारखानों के मालिक पड़े सोते होंगे। बात यह नहीं है। वर्चमान समय में ट्रेड यूनियनो के तत्व का. इन लोगों की ओर से जर्मनी में जितना विरोध किया जा रहा है उतना इससे पहले कभी नहीं देखा गया था। और इसमें भी देश के किसी विशेष भाग अथवा विशप व्यवसाय में इसकी अधिक प्रब- लता दिखाई नहीं पड़ती । पश्चिमीय प्रशिया में पत्थर के कोयले, लोहे और फौलाद के कारखानों में मालिकों ने मिल कर सिंडिकेट-सहकारी मडल-स्थापित किए हैं। इन मडलों में, यह विरोध जितना प्रबल है उतना अन्य कार- खानेवालों में नहीं देखा जाता। ट्रेड यूनियनों के लोगों का भी प्रभाव जितना पश्चिमी प्रशिया में है उतना अन्यत्र कहीं नहीं है। इन दोनों पक्षों की वास्तविक रणभूमि हाइन लैंड और वेस्टफालिया प्रांत हैं। सापत्तिक युद्ध के अनुकूल सब तरह पर वहाँ की स्थिति पाई जाती है। जर्मनी का सबसे बड़ा वर्कशाप-कलामह-इस प्रात में ही है। यह वर्कशाप कमी वद नहीं होता। सपत्ति उत्पादन का काम बहा अहर्निश चलता रहता है। इस वर्कशाप में काम 'चलाने का अधिकार जिन लोगों को है उनकी संख्या छ सात से अधिक नहीं है। व्यवसाय वाणिज्य कैसे करना चाहिए और उसमें किस प्रकार यश प्राप्त करना चाहिए इस विषय में उन लोगों की बुद्धि बड़ी विलक्षण और तीन है।

1 (१०३) धनाढ्य होने योग्य उनमें हद् निश्चय है । लोगों पर कठोरता का नियम चलाने की कला उन्होंने जन्म से ही सीखी है। संवेदना क्या वस्तु है यह वेजानते ही नहीं हैं। परतु उनमें न्यायशीलता नहीं है यह हम नहीं कह सकते। हा न्याय का काँटा जरा झुकता हुआ रक्खा जाय, यदि यह उनसे कहा जाय तो यह काम उनसे न होगा। जिस बात का उन्हें एक बार निश्चय हो गया फिर उसमें रत्ती भर भी वे फेरफार नहीं करते। उनकी इच्छाशक्ति अति प्रबल है और राज- नैतिक विषयों में उनकी उदारता की कल्पना करने का पता भी नहीं मिलता। प्रशिया में नवीन युग को लाने के काम में इन लोगों ने जो कार्य किए हैं वे ससार में पूर्ण रीति से लोगों पर विदित है। राजा के समीपस्थ राज्याधिकारियों-मत्री अथवा कायदा कानून बनानेवाले लोगों को अपने पक्ष में मिला कर राज्यशक्ति में अधिक शक्ति इन लोगों ने प्राप्त कर ली है। प्रशिया के पूर्वी विभाग के फ्यूडल लाई लोगों की शक्ति कम होने का रंग तो दिखाई पड़ता है परतु आजकल उद्योग भूमि में इन फ्यूडल लाडों की शक्ति दिनों दिन बढ रही है। हजारों ट्रेड यूनियन स्थापित हो जाने पर भी उनकी इन्हें यिल कुल परवाह नहीं है । इस सबध में यदि कहीं कुछ बात चीत हुई तो वे लोग स्पष्ट कह देते हैं कि-" हमारे घर में हमारी मत्ता हमारे इच्छानुसार ही चलेगी।" ये शब्द अब भी उनके मुख से सुनाई पड़ते हैं। और इसी वाक्य के अनुसार कार्य कर डालने की शक्ति भी उनमें पाई जाती है। सितपर सन १९०५ में मनहिम की एक सभा में वेस्टफालिया के (१०४) प्रसिद्ध कारखाने के मालिक और एक दो सहकारी सभागों के सभापति हर फिरडाफ ने कारखानेवालों की ओर से जो व्याख्यान दिया था वह पढने योग्य है । उस व्याख्यान में उन्होंने कहा था-"हमारे मजदूर जब चाहते हैं तब अपने हाथ का काम छोड़कर चले जाते हैं, यह दशा बहुत शोचनीय है । जिस काम को मजदूर स्थायी रूप से करेंगे वही काम या व्यवसाय उन्नति को प्राप्त हो सकता है। परतु इस काम में कायदे कानून की मदद लेने की हमे जरूरत नहीं है। जो मजदूर आज इस कारखाने में और कल दूसरे कारखाने में नाच नाचते फिरते हैं उन्हें अपने बधन में लाने का जो उपाय हम करना चाहते हैं उसमें किसी को पड़ना नहीं चाहिए । एक मनुष्य ने यह सलाह दी है कि सब मजदूरों की सहकारी सभाओं का सम्मिलित होकर एक ऐसी सभावनाना चाहिए जो कारखाने के मालिका से बात चीत कर, परतु इस सलाह पर हम अमल करने को विल- तैयार नहीं हैं। "मोशल डेमोक्रेटिक" अथवा "क्रिश्चि यन" इस नाम को धारण करनेवाली सभाओं से मध्यस्थ का काम लेने की हमारी बिलकुल इच्छा नहीं है । क्योंकि सोशल डेमोक्रेटिक युनियनों की अपेक्षा क्रिश्चियन यूनियने अधिक हानिकारक हैं। वर्तमान समाज रचना का हम उलट पलट डालना चाहते हैं, यह बात पूर्वोक्त मडली कहती तो है परतु उपर्युक्त मंडली तो मुकाबला करने को तैयार होते ही अपने सामने झुठा निशाना रख कर क्रिश्चियानिटी हो की ओट में युद्ध करती है। सोशल डेमोक्रेट लोगों का उद्देश्य कमी सिद्ध नहीं . हो सकता, यह पाव हम लोगों को मालूम है तो भी धनवान पुरुषों को धर्मोपदेशकों के अधीन करने का इनका प्रयत्न भारी है। मजदूरों के साथ होनेवाले वाद विवाद में कमी कभी सरकार बीच में पड़ जाती है इस घात से भी मुझे पड़ा दुख होता है ऊपर जो अवतरण दिया गया है, उसके देने का उद्देश्य केवल इतना ही है कि इस वाद विवाद में कारखाने के मालिकों का क्या कथन है. वका न सरलतापूर्वक उसे बता दिया है। वक्ता के कथन में विषय को छिपाने अथवा अपने भान को गुम रखने का आभाम भी नहीं पाया जाता। हर किर- डाफ आदि कारसाने के मालिकों को यह बात बिलकुल अँच ई है कि मजदूरों की महकारी सस्थाएँ हानिकारक हैं और उनकी रोक का उपाय अवश्य होना चाहिए। लिये उन्हें कानून काद की भी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती और न मरकारी सहायता की ही उन्हें जरूरत मालुम होती है। क्योंकि इन लोगों के नामों का उल्लेख होत ही यह मालूम होता है कि ये ही लाग जर्मनी की सरकार हैं । इन संस्थाओं की ओर दुर्लक्ष्य करने से ये अपने आप ही नष्ट हो जायगी और दुर्लक्ष्य करना ही मजदूरों के रोग पर रामवाण ओपधि है, यह उनका दृढ विश्वास है। यदि मज- दूरों ने अधिक मजदूरी मांगने का प्रस्ताव किया और वह उन्हें उचित जान पड़ा तो फिर थाड़े धन के लिय वेअधिक रगड़ नहीं करते। परतु यदि उनके प्रस्ताव को अनुचित समझ कर उन्होंने एक बार इनकार कर दिया तो फिर चाहे ब्रह्मा उतर इस काम के .

(११४)
इतना होने पर भी वर्तमान समय का वादविवाद मिटाने
के अनेक मार्ग ढूँढे जा रहे हैं। प्रेट ब्रिटेन के सयुक्त राज्य
में खास खास व्यवसायों में होनेवाले वादविवाद का
निर्णय करन के लिये पचायतें स्थापित की गई हैं और
उनका काम बड़ी उत्तमता से चलता है। ऐसी पचायतें जर्मनी
में अब तक कायम नहीं हुई हैं। कोयले की खानों और
कुछ विशेष प्रकार के व्यवसायों में, "वर्समेन कमटी"
स्थापित की जावें इस बात का उल्लेख " इडस्ट्रियल कोड "
में किया गया है। कमेटी के मेंबरों का चुनाव मजदूरों के
मतानुसार होता है । चुनाव हो जाने और कमेटियाँ स्थापित
हो जाने के पश्चात् मजदूरों के हिताहित के प्रश्नों पर विचार
उनके द्वारा उनकी सलाह ले कर किया जाता है । मजदूरों क
अभावों के दूर करने का यह मार्ग कारखाने के मालिकों को
पसद नहीं है। इनकी सहायता से अपने अधिकारों में विना
कारण रुकावट होकर उनका स्वरूप संकुचित होता जाता है
अपनी तकलीफों को कारखाने के मेनेजर द्वारा मालिकों तक
पहुँचाना चाहिए इस पुरानी पद्धति को त्याग कर मजदूर
अपने सघ स्थापित करें और उनके द्वारा वे बातें मालिकों के
फान तक पहुँचे । फिर एक के लिये नहीं सवों के लिये, पताइए
इतनी कवायद करना कौन पसद करे परतु कहीं कहीं
उभय पक्ष की सम्मति से ही इस प्रकार की कमेटियाँ कायम
हुई हैं और उनका फाम सरलतापूर्वक चलता है जिसस
दोनों पक्षों को लाभ होता है।
'उभय पक्ष के बसेडों को कोई तीसरा आकर तै करे, जब
।
+-

( ११५)
यह बात दोनों मान लें तब उसका निर्णय सरकार द्वारा स्था-
पित " इडस्ट्रियल कोर्ट " करने के लिये तैयार हैं। जिन
शहरों की आबादी घोस हजार से ऊपर है उन शहरों में ऐसे
कोर्ट पहले से ही स्थापित किए गए है । परतु कम आबादी के
शहरों में जब उनका कायम किया जाना उपयोगी होगा और
जब यह बात सरकार के ध्यान मे आ जायगी तब ऐसी जगह
भी अदालतें कायम करने की कानून में व्यवस्था रसी गई
है। इसके अलावा कानून में यह भी नियम रक्खा गया है
कि दोनों पक्षों की ओर से नियमित सख्या के लोगों की
दस्तखती अर्जी या निवेदन-पत्र आने पर अदालत खोलने
और उसमें आधे पच कारसाने के मालिकों की ओर के और
आधे मजदूर पक्ष के लिये जावें ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।
परतु जो रिपोर्ट प्रकाशित हुई है उससे जाना जाता है कि
जितना लाभ मजदूरों को इन अदालतों से उठाना चाहिए
उतना लाभ वे नहीं उठाते ।
कारखाने के मालिकों और उनके यहाँ काम करनेवाले
कारीगरों की सलाह से ' वर्कमेन कमेटी" जो कायम भी हो
गई हैं तो भी इस व्यवस्था का स्वरूप सानगी है। अतएव
"पर भाफ कामर्स ऐंड एग्रीकलचर" के नमूने पर "चयर्स
भाफ लेबर " की स्थापना सरकार की ओर से होनी चाहिए,
इसका प्रयत्न आज कई वर्षों से जर्मन पार्लियामेंट में ट्रेड
यूनियनों और लेबर पार्टी की ओर से हो रहा है । सार्वभौम
सरकार ऐसी चंवर पनाने को तैयार है परतु उसका कथन है
कि उसमें आधे मेंवर तो मजदूर लोग और आधे कारखानों

- - (११६) के मालिक चुन दें।' परतु स्थिति को देखते हुए यह कह सकते हैं कि क्या इस घर से कोई विशेष लाभ होगा ! मजदूर दल के लोग कहते हैं कि इन चेंबरों में सारे मेंवर हमारे पक्ष के ली चुने हुए होने चाहिएँ । कारखानेवालों का यह कथन है कि यदि हम मजदूर दुल के लोगों का कहना मान लें तो कल फिर ये हमारी क्या दशा मनावेंगे, और ये जा कर कहाँ ठहरेंगे, यह कौन कह सकता है। इसके आगे भी ये एक पैर और बढ़ावेंगे और कहने लोंगे कि हमारे पक्ष का एक सार्वभौम मडल (Imperial Ministry) अथवा बोर्ड होना चाहिए। मजदूरों के उप- स्थित किए हुए प्रश्नों अथवा उनके अन्य विषयों का निर्णय वर्तमान व्यवस्था के अनुसार “मिनिस्ट्री आफ दी इपी- रियर" नामक मत्रिमडल द्वारा होता है। उनका यह अधि- कार कम करके एक स्वतत्र "लेबर मिनिस्ट्री" बनाने के लिये सरकार तैयार नहीं है। इस विषय में सरकार का यह कहना है कि मजदूरों का विषय अन्य विषयों के साथ शामिल होने से इस गाँठ को छुड़ा कर केवल मजदूरों के विषय का निश्चय करना जरा कठिन काम है और ऐसा निश्चय न होने से मजदूर जो चाहते हैं वैसी व्यवस्था से अन्य विभागों में गड़बड़ी पड़ जाने का बहुत भय है। सर कार का यह कथन बहुत कुछ युक्तिसगत है। घर बनाने के काम में सुधार करना, कारखानों और पाठशालाओं की आरोग्य व्यवस्था, कारखानों की देखरेख, धीमा के कायदे आदि इसी प्रकार के और बहुत से प्रश्न- हैं जिनमें मजदूरों A के हिताहित की बातों की मर्यादा बाँधना प्राय अस भव ही है। फुटकर व्यवसायों में और विशेष करके इमारत के कारखानों में मजदूरी निश्चित कर देने की पद्धति आज फल शुरू हो गई है और इसी कारण नियमित समय की मजदूरी के बसेड़े बहुत से उत्पन्न नहीं होते। इस व्यवस्था से कुछ व्यवसायों में कुछ समय तक के लिये मजदूरी का प्रश्न ही उठ गया है। परतु इससे क्या मुख्य वाद विवाद का निर्णय सदा के लिये हो गया ? निश्चित समय के लिये काम करने का वादा करने से विशेष करके लाभ मज. दूरों को ही मिलता है । वेतन की दर निश्चित करते समय कम से कम वेतन से किया जाता है। परतु उतना काम पूरा हो जाने पर फिर नया इकरारनामा लिखते समय मजदूर अधिक वेतन माँगने लगते हैं। और वेतन के शिखर पर पहुँचने की सोपान परपरा के अनुसार वे अपने विचारों और इच्छाओं को बढाते ही चले जाते हैं और मूल विवाद "अधिक वेतन और काम के घटे कम करने का" प्रश्न पुन आकर उपस्थित हो जाता है। परतु इस इकरारनामे की व्यवस्था से सय मजदूरों को समान लाम नहीं मिलता । जिन मजदूरों को अधिक परिश्रम करने की शक्ति नहीं, केवल उन्हीं को इससे लाभ है। परतु जिन्हें अधिक वेतन पाने की ठसक है उन्हें लाभ के बदले उल्टी हानि है। इसके अतिरिक्त इकरार- नामे के,लिखे जाने पर उसमें एफ यह नियम रहता है कि यदि इकरार पूरा न किया जायगा तो जो हानि होगी .

(११८)
वह पूरी की जायगी परंतु यदि इकरार के अनुसार काम न हुआ
और मामला अदालत तफ गया तो उसमें कानूनी पेंच निकल
आने पर न्यायाधीश द्वारा क्या निर्णय होगा, यह समझ
नहीं पड़ता। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि इकरारनामा
लिख कर मजदूरों का वेतन निश्चित कर देने पर मजदूर
लोग काम से दिल चुराने लगते हैं। परतु यह आक्षेप उचित
नहीं। ववेरिया की सरकार ने इकरारनामा लिख कर काम
करने की पद्धति को उत्तेजना दी है और जहा जहा सभव
हो वहा वहा इसका प्रचार करने का प्रयत्न करने के लिये
फेक्टरी इसपेक्टरों को आज्ञा दी है।
कारखानेवालों को होनेवाले नफे मे से मजदूरों को
हिस्सा देने की पद्धति जर्मनी में पसद नहीं की जाती। इमारत
के कारखानों में बोनस ( इनाम ) देने की प्रथा देश के कई
प्रातों में पाई जाती है। कितने ही कारखानेवाले वर्षारम
अथवा अन्य किसी त्योहार पर प्रेचुइटी भी देते हैं । परतु
लाभ में से हिस्सा देने को कोई तैयार नहीं । हा, ये लोग
इतना तो करते हैं कि मजदूरों और उनके बाल बच्चों के
कल्याणार्थ अनेक प्रकार की व्यवस्थाएँ अपने पास से धन
लगा कर करते हैं। इनमें से कुछ व्यवस्थाएं तो कानून
के कारण उन्हें करनी पड़ती हैं परतु स्वत अच्छेपन के कारण
उनका पैर कानून के आगे बहुत कुछ जाता है। कोयले,
लोहे, फौलाद, रसायनिक पदार्थ, बुनाई आदि के बडे बडे
कारखानों में बहुत सी आसानिया कर दी गई हैं ।
बीमा-फड कानून के अनुसार ही उन्हें कायम करना पडता
।
--
-
-

।
.
( ११९ )
है। इसके अतिरिक्त पेंशन और "बेनिफिट फड" खोले गए
है और इस फड से मजदूरों के बाल बच्चों को उनके पीछे
सहायता दी जाती है। त्योहारों और गर्मी की छुट्टियों में
मजदूरों के बाल बच्चों को दावतें दी जाती हैं। कितने ही बड़े
बड़े कारखानों में शराब, अनाज, दूध वगैरह की दूकानों और
भोजागलय आदि का भी प्रबंध किया गया है, जहा कम
मूल्य पर खाने की अच्छी चीजें मजदूरों को मोल मिलती
हैं। मजदूरों के माराम के लायक मकान कारखानों के पास ही
बनाने का प्रबध भी अभी थोड़े दिनों से ही हुआ है। इस
काम के लिये कारखाने के मालिकों को धन की आवश्यकता
हो तो सरकार से कम ब्याज पर रुपया उधार देने की भी
व्यवस्था की गई है । कारखानों के पास ही मजदूरों के लिये
रहने को मकान बनाने से दो लाम हैं। यह लाभ बड़े बड़े
शहरों से दूर फासले पर जो कारखाने हैं, उन्हें स्पष्ट मालूम
हो जाता है । मजदूरों को हवादार मकान मिलने से कारखाने
के मालिकों को मजदूरों का टोटा नहीं पडता । जिन प्रातों
में कोयले की खाने हैं धन प्रातों में इग्लैंड के समान ही
खाना में काम करनेवाले लोग, खानों के मालिकों के बनाए
हुए मकानों में ही रहते है। बड़े बड़े शहरों के बाहर बनाए
हुए मकान हर प्रकार से सुखदायक होते हैं। वे मजबूत
और
लम चौड़े होते हैं। उनके आस पास की जमीन रमणीक
होती है और वहा की भानहवा भी स्वास्थ्यकर होती है।
शहरों के मैले कुचैले मकानों का जो किराया उनको देना
पड़ता, है उससे कम किराया उन्हें इन मकानों का देना पड़ता

-
यह बात नहीं है। परतुहमें अधिक स्वतन्त्रता चाहिए, और
लोगों की सहायता बिना हममें अपनी गृहस्थी चलाने की
क्षमता आनी चाहिए और इसके लिये ही हमारे सब प्रयत्न
हो रहे हैं। वर्तमान प्रौद्योगिक युग में काम देनेवाळे मालिक
के भरोसे पर ही हमारे कुटुध को रहना चाहिए इस भावना
के
अनुसार
बर्ताव करना समय का दुरुपयोग करना है
हमारे ऊपर यदि मालिकों को उपकार करना ही हो तो हमारा
वेतन उन्हें बढाना चाहिए । और उसे किस
तरह
चाहिए इसका निर्णय करना हमारा काम है । हमारे वेतन में
वृद्धि करने में, मालिकों की उदार बुद्धि का ससार को पता
चलेगा और हमारी कृतज्ञता का ढिंढोरा पीटने का भी उन्हें
फिर अवसर न मिलेगा।"
खर्च करना
.

. । . नवां अध्याय। मजदूर। फरवरी सन् १९०६ की ६ तारीख को जर्मनी की सार्व- भौम पार्लियामेंट में एक प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ ने अपने देश के मजदूरों के समय में यह कहा था-"जर्मनी में व्यवसाय वाणिज्य का जितना विस्तार वर्तमान समय में हुआ है उतना विस्तार ससार के और किसी देश में, इतने समय में, नहीं हुआ ह। इसका मुख्य कारण हमारे मजदूरों का ही फर्तृत्व है ।" उसकी इस प्रशसा से जर्मन मजदूर जितन योग्य प्रमाणित हुए हैं उससे कहीं अधिक उदारता उस राजनीतिज्ञ की प्रगट होती है जिसने ये उदगार निकाले हैं । व्यवसाय वाणिज्य की उन्नति के लिये जो गुण चाहिएँ वे जर्मन मजदूरों में पाए जाते हैं और उन गुणों का अपने हाथों द्वारा व्यवहार करना, यह उनकी कर्तृत्व शक्ति के विकास का यथार्थ द्योतक है । सन् १८७६ में एक जर्मन प्रोफेसर ने कहा था कि हमारे देश का माल "सस्ता परतु घटिया है" पर अब वह स्थिति बदल गई है। अन्य देशों की अपेक्षा अब भी जर्मन माल सत्ता है और घटिया माल भी जितना चाहो बाजार में तैयार मिलता है परतु उसीके साथ बढिया माल भी बहुत तैयार होने लगा है, इसका बहुत कुछ श्रेय उपरोक्त राजनीतिज्ञ के कथनानुसार मजदूरों को ही है । जर्मन मजदूरों के साथ अगरेज मजदूरों की तुलना करके .

'( १२८) देखने का भाव उत्पन्न होना एक सहज वात है। इस तुलना करने में यह अंतर साफ दृष्टिगोचर होने लगता है कि जर्मन मजदूरों में स्वतत्रतापूर्वक काम करने की शक्ति नहीं है। पद पद पर उन्हें दूसेर की सहायता की आवश्यकता बनी रहती है। उनके स्वभाव में प्राय यह भाव इस कारण उत्पन्न होता है कि उन्हें-उत्तर प्रदेश के जर्मनों फो-अपना सारा जीवन दूसरों की देख रेख में ही व्यतीत करना पडता है । और इसीलिये किसी काम को स्वत आरभ करने का साहस उनमें नहीं पाया जाता । उन्हें इस बात का । दृढ निश्चय अथवा पूरा विश्वास हो गया है कि दूसरे की सहायता विना अपना जीवन नियमित रूप से नहीं व्यतीत हो सकता। जिन कारखानों में अगरेज और जर्मन साथ साथ काम करते हैं, उन कारखानों के मालिको को सदा यह कहते सुना जाता है कि जर्मन कारीगरों में स्वावलपन और आत्मविश्वास बिलकुल नहीं है । स्वाभाविक ग्रहणशक्ति और अभ्यास अथवा अनुभव से उत्पन्न हुई प्रहणशक्ति में जो भतर है वही अतर अगरेज़ और जर्मन मजदूरों में है । दोनों ही मनु- भव की पाठशाला में अपना अपना पाठ पढ़ते हैं परतु उनकी कर्तृत्व शक्ति और योग्यता मे अन्य साधनों का जो प्रभाव पड़ता है वही जर्मन मजदूरों में व्यावसायिक शिक्षा से पडता है। परंतु अंगरेज मजदूरों में उसका प्रभाव स्वाभाविक व्यव- हारकुशलता ! और सारासार-विचार द्वारा पुस्तकी ज्ञान अर्थात् मंत्र और व्यावहारिक ज्ञान अथवा तत्र में जो भेद है वही भेद इन दोनों में है । मन्त्र जपने से जितना पड़ता है ।

ज्ञान मिलना सभव है उतना जर्मन लोगों के पास है। परंतु
मत्र शास्त्र में अपर जाने में उन्हें पड़ी कठिनाई मालूम होती
है। और तत्र की साधना करने के लिये यदि कोई अवसर
आ जाय तो मन को एक ओर रख देना चाहिए, यह बात
भी उनके ध्यान में नहीं भाती। अगरेज मजदूर यदि
पुस्तकी विद्या के ज्ञान का महत्व अधिक समझने लगे तो
बहुत अच्छा हो। परतु इस प्रहार का ज्ञान तिरस्करणीय
है, यह बात और कोई नही, स्वतः उनके मालिक उन्हें
सिसाते हैं । उनके द्वारा, वर्तमान में जितना काम होता है
उतना काम दूसरे नहीं कर पाते अथवा अपने काम के सामने
दूसरों के काम को ये नलने नहीं देते, यह फितने आश्चर्य
की बात है । अगरेज कारीगरों में व्यावहारिक ज्ञान पहले से
ही भरपूर है । परतु यदि उन्हें पुस्तकी ज्ञान की भी सहायता
मिल जाय तो फिर सारे संसार में अपना कोई हाथ पकड़
मकेगा इसका भय करने का कोई कारण ही नहीं है।
जमन मजदूर परावलबी होने पर भी मेहनती और कष्ट
सहन करने में दृढ होते हैं। उनमें चालाकी नहीं है । परतु
अच्छे औजार, समान और समय का प्रबंध कर देने से
उनके द्वारा अन्य लोगों की अपेक्षा अच्छा काम होता
है । मोशियालिज्म के तत्वों का विकास और जनता के
मन पर बैठी हुई उनकी छाप, यह देखकर जिनकी कल्पना
शक्ति बहक गई है और चारों ओर पीछे हटने का सिद्धात
स्वीकार करना चाहिए, जिन को यह भासित होने
लगा है, उन्हीं को जर्मन मजदूरों के चित्र बहुत बुरे
&
.
।
-

हर एक बड़े (१३०) दिखाई पड़ते हैं। इस चित्र को देखकर बिना संकोच ऐसा भासित होने लगता है कि जर्मन मजदूरों में नैतिक समता का गुण मिलकुल नहीं है । व्यावहारिक तत्वों का उन्हें पिल- कुल ज्ञान नहीं है और जिन पर उनका जीवन निर्याह होता है वे कारखाने अथवा व्यवसाय वाणिज्य विलकुल नष्ट कर देने चाहिए, यह उनका दृढ संकल्प है। परतु यदि यह चित्र यथार्थ है तो जिस समय में सोशियालिज्म का विकास हुआ उसी समय में वहा सापतिक विकास हुआ। भतएव इन दोनों बातों का एकीकरण कैसे किया जा सकता है? शहर में दिखाई देनेवाली उत्तम इमारतों के नमूने, औद्योगिक कलाकुशलता की प्रदर्शिनियों के नमूने, प्रत्येक घड़ी दूकान में विविध प्रकार का भरा हुआ सामान, इतना सबूत मिलने पर भी वहा के मजदूरों में अधिक कुशलता मागई है और छोटी से छोटी बात के लिये भी वे ध्यानपूर्वक विचार करते हैं, यह बात अनुभव में आए विना न रहेगी । पूजीवालों और मजदूरों के बीच का सवध त्रासदायक नहीं, यह बात नहीं है, परतु यह बात बिलकुळ निश्चित है कि गत पचीस वषी में, मौद्योगिफ उमति की नींव दोनों ने मिल कर डाली, बहुत रद और मजबूत है और उसपर जो इमारत अब बनाई जा रही है वह बहुत सुदर है। जर्मनी में व्यापार व्यवसाय के नगरों को देखने के लिये इग्रह के जो लोग जाते हैं वे किसी एकराहगीर अथवा किसी कारखाने के एक मजदूर को देखकर उसके साफ सुथरे रहने के रग भौर मोड पान की अशलता को देखकर पकित .. -

हो जाते हैं और सोचने लगते हैं कि हमारे मुल्क के
मजदूरों में भी इस प्रकार की बात क्यों न दिखाई पड़े ?
परतु यह सोपवे, ही उन्हें यह भास होने लगता है कि जर्मन
मजदूरों को उनके रहन सहन की अपेक्षा अधिक वेतन
मिलता है और उनके रहने के मकान भी अच्छे हैं ।
परतु इन दो कारणों से ही जर्मन मजदूरों में अपर कहे हुए
गुण आ जाते हैं, यह कार्यकारण भाव उनको अथवा और
फिसी को ठीक ठीक नहीं जैधता । परतु फिर यह परिणाम है
किस बात का ? पाठशालाओं में मिलनेवाली भनिवार्य शिक्षा
का क्या यह परिणाम है ? ज्योग धघों में पैठनेवाले जर्मन
लोगों को विलकुल बचपन में ही क्या ऐसा नहीं सिखाया
जाता कि प्रत्येक मनुष्य को अपना शरीर और कपड़े स्वच्छ
रखने चाहिए तथा खयों से कुशलता और मर्यावापूर्वक
व्यवहार करना चाहिए। ये गुण विद्यार्थियों में पत्पन्न
हों, इस विषय में उनकी पाठशालाओं में शिक्षक विशेष ध्यान
देते हैं और यह सच है तो भी बहुत सी पाठशालाओं में जाने
वाले बालक नगे पैर, - मिट्टी और धूल में खेलते हुए जिस
प्रकार अन्य शहरों में जाते हुए पाए जाते हैं उसी प्रकार
जर्मनी के शहरों में भी पाए जाते हैं।
हा, यह संभ है कि जर्मन मजदूरदल के बाला साधा.
रण तौर पर मर्यादाशीळ होते हैं और उनमें उखळता
कम पाई जाती है। जर्मन बालिकाएँ भी बिनयशील होती
हैं और उनके व्यवहार में चमक दमक कम होती है। इसी
श्रेणी के भगरेज , बालक पालिकामों में ये गुण प्राय

,
-
(१३२)
पाए जाते हैं। जर्मनी में एक पुरानी मसल है कि "बालकों
पर नजर रक्सो परतु उनकी बातें मत सुनो।" इस कहा-
वत का पाठशालाओं में सदा प्रयोग किया जाता है, और
संभव है कि उसी का यह परिणाम हो । कौमार और तारुण्य
इन दोनों अवस्थाओं के बीच का जो समय जाता है,
उसमें पाठशालाओं में प्राप्त की हुई हितकारी शिक्षा में
से बहुत सी शिक्षा की बात भूल जाना संभव है, परतु
इस बीच में बालकों को मर्द बनाने की जर्मन कृति और
इग्लिश कृति में बडा अवर है। प्राथमिक शिक्षा की पाठ
शालाओं में पालकों के मन पर जो सस्कार होते हैं वे घलवान
हो कर भविष्यत् में बने रहें इसके लिये कौमार और यौवन
के नाजुक समय में जर्मनी में दो प्रकार की शिक्षा दी जाती
है, परतु इंग्लैंड में इस प्रकार की चिंता कोई नहीं करता।
पहली बात वहा पर यह है कि प्रारभिक शिक्षा की
पाठशालाओं से शिक्षा समाप्त होते ही विद्यार्थियों को फटि-
न्युएशन पाठशालाओं में पढ़ने के लिये जाना पड़ता है,
और दूसरी बात यह है कि उन्हें सैनिक सेवा के लिये
जाना पड़ता है। प्राथमिक शिक्षा की पाठशाला से विद्यार्थी
ऊँची पाठशाला में पढ़ने गया कि सहज में ही उसका मन
बढ जाता है। उसके व्यवहार पर दूसरे की नजर रहती है और
उसके बुरे मार्ग पर लगने का भय नहीं रहता । सैनिक शिक्षा
मिलने से शरीर में व्यवस्थित रहने का गुण आता है । जर्मनी
में हर एक दृष्ट पुष्ट और सुदृढ़ वरुण चालक को दो वर्ष तक
सेना में रह कर सैनिक काम सीखना पड़ता है। परचक्र से

(१३३) राष्ट्र का उद्धार करने के लिये प्रत्येक मनुष्य को, सैनिक शिक्षा देना आवश्यक और लाभदायक है या नहीं इस प्रश्न का विचार करना निरर्थक है। यहा पर तो केवल इतना ही देखना है कि सेना में रहकर मजदूरों में कुछ अच्छे गुण उत्पन्न होते हैं या नहीं और इस विषय में कोई मत भेद होना सभव नहीं मालूम होता । सैनिक शिक्षा से मनुष्य के व्यवहार में कुछ उद्देश्य उत्पन्न हो जाता है और एक मनुष्य की मावहती में रह कर अन्य लोगों के साय काम करने की आदत पड़ जाती है। मैनिफ शिक्षा समाप्त करके जब कोई मनुष्य कारखाने में नौकरी करने जाता है तम वहा से नई तरह फी यत्र सामामी और काम करने की पद्धति देखने को मिलती है, परतु उसे देख कर वह न डग- मगाता है और न घबड़ाता है। उसकी बुद्धि सुसस्कृत होने से नवीन परस्थिति में भी जाफर वह मिल जाता है । सैनिक शिक्षा से मजदूरों की नैतिक और शारीरिक उन्नति सैनिक विभाग द्वारा होती है और इसी कारण कारखानों में शारीरिक स्वच्छता रखने की व्यवस्था की गई है। हर एक कारखाने में मजदूरों के लिये स्नान गृह और हाथ, पैर, मुह धोने के लिये उचित व्यवस्था मालिकों को फर दनी चाहिए, ऐसा कानून है। इन स्नान-गृहों में गरम और उहा, जैसा पानी, जिसे चाहिए मिलता है। कई स्थानों पर वो "तुषार स्नान" की भी व्यवस्था की गई है। इसी कारण जर्मन कारखानों से बाहर माए हुए मजदूर कभी मैले कुपैळे नहीं दिखाई पड़ते। कपड़ों के संबध में भी उनकी यही , , T .

( १९४) . की व्यवस्था, व्यवस्था है। कारखाने में काम करने के लिये भाने पर, पहने हुए कपड़ों को उतार कर, वहा के कपड़ों को मजदर पहन लेते हैं तब काम करते हैं और जाते समय 'कोई मजदूर कारखाने का काम के समय का पहना कपड़ा पहन कर पाहर नहीं जाने पाता। कारखाने से बाहर जाने के लिए अपने स्वच्छ कपड़े बदल कर ही बाहर जाने का नियम है। यदि कोई इस नियम का पालन न करे तो कारखाने के दरवाजे पर बैठा हुभा पहरेवाला कभी किसी मजदूर को बाहर नहीं जाने देगा। अब तक जो कुछ कहा गया है उस सपका कारण पाठशाला में प्राप्त हुई शिक्षा, चारकों और परेर पर स्वच्छता और दृढ़ता के व्यवहार से मिली हुई उच्चेजना है। इन्हीं के सम्मेलन से जर्मन मजदूर अच्छा चलता है, अच्छा काम करता है और दिखाई भी अच्छा पड़ता है, इसमें आश्चर्य की बात ही कौनसी है ? और यह अच्छापन समाज स्थिति के कारण ही नहीं वरन् शिक्षा द्वारा प्राप्त होता है यह बात ध्यान में रखने योग्य है। व्यवस्थित रूप से रहने और मितव्ययिता के साथ काम करने में मजदूरों को उनकी जियों से बड़ी सहायता प्राप्त होती है। साधारण तौर पर इनकी खिया गृहिणी पद के सर्वथा योग्य हैं। पति के वेतन की सारी व्यवस्था वे ही करती हैं। थोदे खर्च में उनके लिय खाने पीने के अच्छे पदार्थ तैयार कर देना उन्हीं का काम है। आमदनी का हिसाब किताब रखना, घर का किराया ममवा' अन्य' करों का देना, उनका काम है।

पति के खजाने की वे ही मालिकिन होती हैं। स्वत परि-
अम करके इस खजाने में अपना कमाया हुआ मन भी लाकर
मिला देती हैं। अपने यहा जिस प्रकार साधु सतों के
वाक्यों को लोग कागजों पर लिख कर घर की दीवारों पर
चिपका देते हैं उसी प्रकार की चाल जर्मनी में भी है। वहा
भी साधु सतों के वचनों को मजदूर लोग अपने घरों की
दीवारों पर मथवा टेवल छाथ पर या खिडकियों में लगाए हुए
परदों पर जगह जगह चिपका देते हैं।
जर्मन मजदूरों को ऐश जाराम पसद है, परतु वह नियमा.
नुसार होनी चाहिए। आमोद प्रमोद के लिये वे इधर उधर बाहर
कहीं नहीं जाते । सप्ताह में छ दिन-प्रति दिन नौ दस और
कमी कभी ज्यादा से ज्यादा ग्यारह घटे उन्हें काम करना पड़ता
है। रविवार के सिवाय उन्हें कोई छुट्टी नहीं । इसलिये इस
दिन वे अपना समय आमोद प्रमोद में व्यतीत करते हैं।
उस दिन मजदूर श्रेणी के लोग दिखाई भी न पड़ेंगे । गर्मी
के दिन हुए तो किसी बाग अथवा जगल में, और अन्य
मतुओं में उपहार-गृहों में उनके दर्शन हो सकते हैं। बड़े
डे शहरों में इस प्रकार के सुमीते के स्थान बहुतायत से
पाए जाते हैं । मध्यम स्थिति के लोग अपने बाल बचों को
ले कर जिस प्रकार बन भोजन को जाते हैं उसी प्रकार ये
लोग भी जाते हैं सदा सर्वदा परिश्रम करते हुए जिसके
हाथ में घटे पड़ गए हैं, ऐसे मुख्य मालिक को अपने बाल
यचों के साथ रविवार का दिन मानद में बिताते देख कर
किसको सुख न मालूम होता होगा। जर्मनी में भाजकळ
.

(१२६) कटुत्रों के मनुष्यों में परस्पर बधन ढोळे होने के अनेक कारण रुपस्थित हो गए है परतु वो भी जर्मन मजदूरों का गृह सौख्य जो कुछ है वह सम भी बढा हुआ है और उसका अनुभव वे अपने इच्छानुसार करते रहते हैं। जर्गन मजदूरों के आमोद प्रमोद के जो मार्ग हैं उनमे वे कुछ काम नहीं करते । शातिपूर्वक बैठे रहना यह एफ मार्ग है। शाति पूर्वक बैठे रहकर आमोद प्रमोद करने की कल्पना भी अग- रंज मजदूरों के घपल स्वभाव में नहीं है। कोई भी जर्मन मजदूर मुह में चुरुद दबाए, शून्य आकाश की भोर दृष्टि लगाए घटों एक घंष अथवा घास पर बैठा हुभा, अपना समय व्यतीत कर सकता है परतु यह काम अगरेज मजदूरों से नहीं हो सकता । इस विषय में कुछ लोगों का यह कथन है कि जर्मन मजदूर स्वभाव ही से मुह पर मक्खी बैठने तक चुपचाप रहते हैं। परतु उनका यह कहना हमें यथार्थ नहीं दिखाई देता । इसके विपरीत हमारा मत तो यह है कि इस बात से तो जर्मन स्वभाव की सरलता, मर्यादित सुखापेक्षा और अल्प संतुष्टता आदि गुण ससार के सामने अच्छी तरह आते हैं। बड़े बड़े शहरों में नियमित दिन को-बहुत करके रविचार को-दोपहर के समय बाजिया लगाई जाती हैं । परतु मजदूर लोग इन यात्रियों के झगड़े में नहीं पडते, इस कारण वे सट्टे अथवा जुए के मोहजाल में नहीं फंसते । परतु उस देश में लॉटरी (भाग्यपरीक्षा ) का काम बहुत अधिक होता है मतपव मजदूर लोग लाटरी के टिकट खरीद कर अपनी .

अतएव
,
(१७)
भाग्य परीक्षा का मोह त्याग नहीं सकते, स्वय मजदूरों की
बात तो दूर रही, उनकी स्त्रिया भी अपने परिश्रम से कमाए
हुए धन को लाटरी में लगाकर अपने भाग्य की परीक्षा करती
हैं। सोशियालिस्ट सप्रदाय के समाचारपत्रों के कालम
के कालम लाटरी के विज्ञापनों से भरे रहते हैं और ये ही पन्न
बहुत करके मजदूरों को पढने के लिये मिलते है ।
इसपर से यह अनुमान कर लेने में कोई भूल न होगी कि
इन लॉटरियों के आश्रयदाता मजदूरदल के ही बहुत से
लोग हैं
मजदूर लोग अपने योग्यतानुमार सुसपूर्वक रह सर्फ
और उनकी आरोग्यता के लिय फिक्र रक्खी जीवे, इसलिये
जर्मन ने कुछ निनम बना दिए हैं।
मुख्य स्थान बीमा कानून को दिया गया है । किसी मजदूर
को अपघात होने पर अथवा बीमार पड़ने पर उसके अच्छा
होने तक कानून के अनुसार घर अथवा औषधालय में उसकी
सेवाशुश्रुषा और औपधोपचार होता है। इस काम के लिये उसे
अपने पास से पैसा खर्च नहीं करना पड़ता । इसी प्रकार
बुढापे में अथवा हाथ पैर से बकाम हो जाने पर पेंशन देने
की व्यवस्था की गई है • हाथ पैर चलते हैं तब तक तो ठीक
है, परतु किसी अपघात के कापण मरने पर अथवा हाथ पैर
टूट जाने पर,अपने पीछे अपने बाल बचों का क्या हाल होगा,
उनका पालन पोषण करनेवाला कोई न रहने पर वे अन्न विना
मूखों मर जायेंगे, ये विचार रात दिन मजदूरों को दुःस पहुँ-
चाया करते हैं । परतु उपरोक व्यवस्था होने के कारण वे इस
सरकार
इन नियमों में

(१५८)
है।
चिंता से सदा मुक रहते हैं और अपने पीछे अपने बाल पच्चों के
भूखों मरने का उन्हें विशेष डर नहीं रहता । बीमा कानून की
पाबत भी सोशियालिस्ट पत्रों में हाय तोबा मचा करता
है परतु यह चिल्लाइट छोटी छोटी बातों के लिये होती है।
मूल तत्त्व के सबंध में कोई मतभेद नहीं है वरन इस कानून
के कारण मजदूरों में सरकार के प्रति कृतज्ञतो पाई जाती
अन्य कोई भी कानून यदि रद्द हो जाय तो उन्हें इस
पात की कोई चिंता नहीं है परतु यदि बीमा कानून में कोई
हाथ लगाये तो फिर वे उसे कभी सहन करनेवाले नहीं हैं।
मजदूरों के ऊपर उपकार करने के लिये ही यह कानून
बनाया गया है, ऐसा कुछ लोग कहते है। परतु असल
बात यह है कि इस कानून की सहायता से धन का बहुत
पा बोझ मालिकों की अपेक्षा मजदूरों के ही सर पर
ठादा जाता है। इस बोझ को
मजदूर लोग प्रसन्नतापूर्वक
उठाने को तैयार रहते हैं, और जो कुछ चदा वगैरह देना
पड़ता है उसे खुशी से दे डालते हैं। ऐसी दशा में
मालिकों की परोपकार बुद्धि कैसे व्यक्त होती है, यह बात
कौन कह सकता है । अपघात - बीमा की रगड़ मालिकों
के सर पर ही पड़ती है, यह एक अलग बात है। बीमारी
की रकम में रकम मजदूरों को देनी पड़ती है, वाकी ,
मालिक देता है। 'अशक्तता और बुढ़ापे की रकम में दोनों
का आधा आधा भाग होता है। इसके अलावा प्रत्येक पेनशन
के पीछे हर साल २ पौंड : १. शिलिंग सरकारी खजाने से
दिया जाता है। बीमा कानून के अनुसार मालिकों को धन
भ

(१३९) की अधिक चिंता रहती है यह स्पष्ट है। परतु अपने ऊपर आए हुए सकट को प्राहकों पर डाल देने की मासानी होने के कारण उन्हें सब मिलाकर कोई विशेष हानि अपनी नहीं प्रतीत होती। उल्टा एक प्रकार से उन्हें लाभ ही रहता है। बीमा किए हुए मजदूरों की माग का भी भय अधिक नहीं रहता और वे भी भविष्य की आशा पर मन लगाकर अच्छा काम करते हैं और इस प्रकार मालिकों को अप्रत्यक्ष भय से लाभ ही होता है। मजदूरों की शारीरिक उन्नति के साथ साथ मानसिक उन्नति भी होनी चाहिए, यह तत्त्व उनके मुसियों के हृदय में अच्छे प्रकार भासित हो जाने के कारण पार्लिन, लिपजिग, हवर्ग, डुसेल, टार्क और म्यूनिच सरीखे बड़े बड़े नगरों में मजदूरों को रात के समय शिक्षा देने के लिये पाठशालाएँ खोली गई हैं। ये पाठशालाएँ सर्वसाधारण की भोर से ही स्थापित की गई हैं। सरकार से उन्हें कुछ भी सहायता नहीं मिलती । पाठशालाओं में पढ़ाई का काम रात को नौ बजे से ग्यारह बजे तक होता है। क्षा देने का काम सोशियालिस्ट प्रोफेसरों ने अपने हाथ में ले रक्खा है। इनकी विषय प्रति पादन की शैली दुराग्रह लिए हुए होती है। इस कारण विद्या- र्थियों को सधा ज्ञान प्राप्त नहीं होता, तो भी, भिन्न भिन्न सामाजिक, राजनैतिक और मोद्योगिक विषय व्याख्यान रूप से उनके कानों तक पहुँचते हैं, यह लाभ कुछ कम नहीं है। पार्लियामेट के मजदूर सभासद, ट्रेड यूनियनों के मुखिया, समाचारपत्रों के संपादक, लेखक, स्कूल मास्टर ये सब (१४) । लोग- अपने अपने सुभीवे के अनुमार रात्रि पाठशालाबों मे शिक्षा के फोम में सहायता पहुँचाते हैं। धर्लिन में मजदूरों के लिये जो व्याख्यान होते हैं उनमें बहुत सी खिया भी पहु- चती हैं । व्याख्यान होने की बात सुनते ही खाना पीना छोड कर अपने घर की खियों और बाल बच्चों को ले कर मजदूर वहाँ पहुँचते हैं। व्याख्यानों का विषय भी गहन होता है परतु सरल भाषा में विपय विवेचन होने से लोग बड़ी उत्सुकता से उन्हें सुनते हैं। मजदूरों के ज्ञान बढाने के काम में सर्वसाधारण लोगों की जैसी सहानुभूति है वैसी सरकारी अधिकारियों की नहीं है। थोड़ दिन हुए जब सोशियालिस्ट पक्ष के कुछ प्रमुख गृहस्थों ने पोट्महम में न्यायतत्व शास्त्र ( Jurisprudence ) पर व्याख्यान देने का निश्चय किया और इसी निश्चय के अनुसार समाचारपत्रों में विज्ञापन भी दिया गया । रियों ने एक पुराना कानून शोध निकाला और उस कानून के आधार पर व्याख्यान वद कर दिया गया। इमी प्रकार चालॉटनवर्ग में बालोद्यान शिक्षा पद्धति से होनेवाले व्याख्यान को भी पुलिस अधिकारियों ने बद कर दिया । शिक्षा के समान ही अपने मनोरजनार्थ भी मजदूर लोग खास योजना करने लगे हैं। बहुत से शहरों में उनके नाटक गृह, गायन वादन समाज, कुश्ती और, खेल कूद के अखाड़े मौजूद हैं । बर्लिन में "फ्री पीपल्स स्टेज" (Free Peoples:- stage) नाम का एक नाटक घर है। यहाँ थोड़े दाम दे कर सच्च कोटि के नाटक देखने को मिलते हैं। जर्मनी में पुराने परतु अधिका- . - ।

- '(१४१) और नए नाटककारों के नाटक सदा होते रहते हैं। राज- नैतिक, सामाजिक और एतिहासिक विषयों पर लिखे हुए नाटक लोगों को बहुत पसद आते हैं। शेक्सपियर अथवा 'अन्य अगरेजी अथवा विदेशी लेखकों के नाटक भी कभी कभी हो जाते हैं। गाने बजाने के जबसों और चित्रों की प्रदार्शनियों को मजदूरों से बहुत कुछ आश्रय मिलता रहता है। तरुण पुरुष भी आनद और आमोद प्रमोद में सलग्न रहते हैं। बालकों के लिये उन्होंने कुछ नहीं किया, यह आक्षेप भी उन पर नहीं लगाया जा सकता। कुश्वी के अखाड़ों में प्रति रविवार को बालकों के खेलने की व्यवस्था की गई है। मनोरजन के कामों में भी अपना पक्ष और अपने पक्ष के लोगों के कल्याण क लिये पक्षपात सहित विचार देखें जाते हैं, यह सच है, परतु उसकी सहायता से मनोरजन द्वारा मान प्रानि के काम में किसी प्रकार की रुकावट नहीं होती। गत दस पद्रह वर्षों से शराब कम पीने का आदोलन जर्मन मजदूरों ने शुरू कर रक्सा है। यह कार्य अपने और अपने दल के लोगों के हित के लिये आरम किया गया है। यह आदोलन आरम हुए अभी बहुत वर्ष नहीं हुए, तो भी इसका प्रचार सारे देश भर म हो गया है। शराम कम पीने का अर्थ और महत्त्व हर एक देश में भिन्न भिन्न है उदाहरणार्थ इग्लैंड और जर्मनी को ही ले लीजिए । दोनों देश हर एक पात में एक दूसरे से भिन्न हैं और इस कारण इस प्रभ का विचार दोनों देशों की स्थिति के अनुसार भिन्न भिन्न रूप से किया जाना चाहिए । स्वय जर्मनी में भी इस मावत

,
कोई निश्चित सिद्धात स्थिर नहीं हुआ है, क्योंकि
उसके भिन्न भिन्न प्रातों की आयोहवा भिन्न भिन्न प्रकार की
है, खेती करने की जमीन भी भिन्न प्रकार की है और देश
निवासियों की जातियाँ भी भिन्न भिन्न हैं। यथार्थ जर्मन,
वही कहलाता है जो पियर (Beel) का पीनेवाला है। बाकी
के लोग अन्य प्रकार की शराब पीते हैं। जर्मन और अगरेजों
में केवल इतना ही सतर है कि जर्मन लोग समझते हैं कि
'बियर' मनुष्य के भावश्यक पेय पदार्थों में से एक है
परतु अगरेज लोग यह समझते हैं कि यह भामोद प्रमोद
और मनोरजन फरनेवाला पदार्थ है। इग्लैंड में जिस तरह
पर लोग चाय और काफी का व्यवहार करते हैं उसी प्रकार
जर्मन लोग 'बियर' को काम में लाते हैं। "गरीब लोगों की
बियर" (Poor mens Beer) यह तो वहा एक कहावत है और
इस कहावत मे एक गूढ़ तत्त्व भरा है, ऐसा समझा जाता है।
जो गूद तत्त्व इस कहावत से निकाला जाता है वह यह है
किकिसी मनुष्य का ससार बिना वियर के चल नहीं सकता
और इसी कारण इस शाखा पर जर्मनी ने कर नहीं लगाया
है। बियर शराब पर फर नहीं है, यह सुनकर अगरेजों को
वड़ा
आश्चर्य मालूम होगा। परतु ऊपर जो रहस्य बताया गया
है, उसका भाव समझ लेने से उन्हें फिर इतना माश्चर्य नहीं
माल्म होगा।
परतु एक बात और है। जर्मन लोग वियर पीते अवश्य हैं
परतु इसकी वे ज्यादती नहीं होने देते। जर्मन की बियर
शराब में 'भरकोहल' पर्यात् मोदक पदार्थ का माग सैकड़ा

(१४३) पीछे २ होता है. परतु भगरेजी बियर में यह सैकहे पीछे ५ के हिसाब से पाया जाता है। जर्मन बियर की मादकता का भाग इतना कम होने पर भी पीनेवाले व्यक्ति को और उस समाज को जिसका वह व्यक्ति है, कितनी हानी पहुँचती है यह भावना मजदूर दल में दिनों दिन बढ़ती जा रही है। मित-पान करने का आदोलन पहले पहल सोशियालिस्ट लोगों ने भारभ किया। कुछ दिनों के बाद मजदूर दल के लोग भी इस आदोलन में सम्मिलित हो गए और मम तो सारे देश में यह आदोलन व्याप गया है । यह भादोलन स्वय जर्मन लोगों ने भारभ किया और उसकी व्यापकता एक विशेष दल के लोगों तक है, यह बात ध्यान रखने योग्य है । इग्लैंड में भी इस काम के लिये एक सोसाइटी है। उसके भाश्रय में काम करनेवाले अनेक लोग हैं। परतु जर्मनी में इस प्रकार का ठाट बाट 'बिलकुल दिखाई नहीं पड़ेगा। किसी अन्य ने आ कर कान में मन के समान फूज दिया अथवा किसी उपदेशक ने मा कर उपदेशामृत पान कराया या किसी अपूर्व वक्ता ने उसके गुण दोष बताए, यह दशा, वहा नहीं है । वहा पर मित- पान करने के काम में सभा करके भाषण करने, धर्मोपदेशक अथवा नीति शासवेत्ता या किसी समाज-सुधारक की आवश्यकता नहीं पड़ती। वहा तो भोता भी मजदूर वक्ता भी मजदूर ही हैं। सारी व्यवस्था मजदूरों ने अपने हाथ में ही रक्खी है। शराब पीना बुरा है, इसके सामा जिक नीति भ्रष्ट होती है। शराब पीनेवाला मनुष्य, मनुष्यत्व -

(११४४)
से गिर जाता है, इत्यादि नैतिक तत्व को, लाकर वे वाद
विवाद नहीं करते । शराब पीने से शारीरिक हानि होती
है, धन का बिना कारण अपव्यय होता है और समाज को
हानि पहुँचती है इसलिये वे इस बात पर जोर देते हैं कि
शराब का व्यसन ही नष्ट हो जाय तो बहुत अच्छा । परतु
यदि यह होना सभव न हो तो मित-पान करने का यथाशक्ति
प्रयत्न किया जाना चाहिए और इससे प्रत्येक व्यक्ति और
उसी के साथ सारे समाज का लाभ होना सभव है। इस
प्रकार साम्पत्तिक लाभ बता फर यह आदोलन उन्होंने
आरम किया है, नैतिक प्रश्न का इस विषय में उन्होंने कोई
सबध नहीं रक्सा।
यह आदोलन आरम होने से पहले विपद का चारों ओर
साम्राज्य था परंतु जब स यह आदोलन आरम हुआ तबसे
अब की स्थिति का कोइ मिलान करे तो उसे आकाश पाताल
का अतर दिखाई पड़ेगा। मित-पान का महत्व जाननवाला
एक भी पुरुष पद्रह वर्ष पहले दिखाई नहीं पड़ता था,
परतु यदि खाज देखा जाय तो चारों ओर भिन्न भिन्न समाजों
में यह आदोलन अपना प्रभाव डालता हुआ दिखाई पड़ेगा।
ट्रेडयूनियनों के सभागृहों से तो मादक द्रव्यों को निकाल ही
दिया गया है। बर्लिन के राज-कारीगर अब्बल दर्जे के
शरावी होते हैं, यह बात पहले बहुत मशहूर थी परतु यदि
'अब देखा जाय तो यह पाया जायगा कि काम पर जाते
समय वे अपने साथ खालिस दूध की बोतल ले जाते हैं
परवाना मिली हुई दूकानों, उपहारगृहों, अथवा अन्य स्थानों में

(१४५) शराब के बजाय चाय, काफी, दूध आदि , इसी प्रकार के माविक पदार्थ पीन को दिए जाने की व्यवस्था की गई है। मन १८९९ से १९०५ तक बियर शराब की कितनी स्वपत, हुई इसका ब्योरा जो प्रकाशित हुआ है, उसे देखने से यह प्रवीत होता है कि शराब की खपत दिनों दिन कम होती जाती है। भिन्न भिन्न प्रातों की सरकारें और उन शहरों के अधि. कारी लोग भी यह प्रयत्न करते रहते हैं कि मजदूर लोग दियर शराब पीना त्याग दें। घन्बेरिया प्रात वीरों की जन्म- भूमि कहा जाता है परतु वहा की सरकार भी इस काम में मन लगा कर सहायता पहुँचाती है, यह बड़े पाश्चर्य की बात है। रेलवे, बंदरगाह, नहरें आदि बनाने का काम सरकार द्वारा होता है अतएव ऐसी जगहों पर शराब बेचने की दूकानें खोलने की सरकार कमी आज्ञा नहीं देती। ऐसी व्यवस्था की गई है कि कारखानों की जाच करनेवाले अधिकारी लोग कारखाने के मालिकों को शराब न पीने का महत्व अच्छी तरह से समझा दें। सरकारी वर्ग शापों में बियर, के जगह काफी, चाय, दूध अथवा खनिजोदक ( Mineral unters ) मिलने की व्यवस्था की गई है। बियर शराप बनानेवाली भट्टियों मे, काम करनेवाले मजदूरों को, मुफ्त बियर पीने को दी जाय, ऐसी प्रथा थी परतु भव यह प्रथा भी बठा दी गई है। कहने का तात्पर्य यह है कि बियर के विरुद्ध जो चदाई की गई थी उसमें यश और विजय प्राप्त होरही है। मित-पान का भादोलन, भारभ से सोशियालिष्ट लोगों ने जारी किया यह ऊपर कहा जा चुका है। परंतु इस दल के सब - , - लोग भारभ से अनुकूल न थे, वरन कुछ लोग तो इस भादोलन के विरुद्ध थे परतु इस भादोलन के उत्पादकों ने इस ओर ध्यान न देकर समाचारपत्रों, मासिक पुस्तकों, सूचनापत्रों और व्या- ख्यानों द्वारा लोकमत जाप्रत करने का यत्नपढ़े परिश्रम के साथ किया। उनके इस प्रयत्न काफल धीरे धीरे जनता के सामने मा रहा है और सोशियालिस्ट दल के मुसिया और प्रसिद्ध प्रसिद्ध लोग भी इस आदोलन में सम्मिलित हो रहे हैं । सन १९०७ में एमन नगर में इस दल के लोगों को जो काप्रेस हुई थी, उसने इस आदोलन को न जाने क्या आशीर्वाद चिरजीवत्व के लिये, दिया कि तव मागन निषेध का विषय भी' सोशियालिस्ट लोगों ने अपने उद्देश्यों में से एक उद्देश्य समझ लिया है । धनी लोगों के पजे से मजदूरों को सदा लिये छुडाने के उद्देश्य से जो मनेक उद्योग उन लोगों ने किए हैं, उन सयों में उस मद्यपान निषघ के प्रयत्न को महत्व का स्थान दिया गया है। इस विषय की जरा विस्तारपूर्वक विवेचना करने के दो कारण हैं। पहला कारण यह है कि मजदूरी पर निर्वाह करने- चाले जितने लोग हैं उनका एक स्वतत्र दल तैयार होना चाहिए, यह स्पष्ट ज्ञान उनमें उत्पन्न करना और सब लोग एकमत हो कर काम करने को तैयार हुए तो अन्य लोगों की सहायता की अपेक्षा न कर के "उद्धरेदात्मनात्मान" के सिद्धातानुसार स्वावलवन का मार्ग ग्रहण कर के अपनी स्थिति सुधारना इस भाव को आगे रख कर मद्यपान-निषेध '-का प्रश मजदूरों ने अपने हाथ में लिया है, यह बात पाठकों को । 4

बहुत से लोगों
( १४७ )
ध्यान में रखनी चाहिए । दूसरा कारण यह है कि इस विषय
को सांपतिक दृष्टि से देखने पर मजदूर दल
है
की यह दृढ धारणा हो गई है कि मित-पान करने से उद्योग
धघो में अपने को अधिक यश प्राप्त होगा और समाज में
मनुष्यता
के नाते से हमारा अधिक मान होगा। शराब पीने
के व्यसन को तिलाजलि देने के लिये जो ये लोग तैयार हुए है
उनमे से बहुत से तो अपने मालिकों पर प्रेम दिखाने अथवा
अपने काम को सुचारू रूप से सम्पादन करने के लिये ही उद्यत
हुए हैं। स्वार्थ और अपने दल के लोगों की साम्पत्तिक उन्नति
के विचार से ही ये बातें उन्हें उस ओर ले गई है । परतु इस
कार्य में जितना अधिक यश प्राप्त होगा उतना ही अधिक
अनायास, कारखानेवालों को लाभ पहुँचेगा, क्योंकि शराब
के व्यसन से मुक्त हो कर मजदूर लोग अधिक कार्यशील
बनेंगे । परतु व्यापार में जर्मनी की बराबरी करनेवाले राष्ट्र
मद्यपान निषेध का मूल तत्व क्या है, इस आर बिलकुल
ध्यान नहीं देते। व तो केवल यह दुख रहे हैं कि जर्मन
व्यापार का भविष्यत् में क्या परिणाम होगा। परतु भविष्यत्
में क्या होगा इसकी चिंता निरर्थक है और उस विषय में
अभी कोई निश्चयात्मक विधान करना बहुत बड़े साहस का
काम होगा।
-
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Problemas । - - दसवॉ अध्याय। सिंडिकेट अर्थात् कारखानेवालों का संघ । लिन प्रवासी भास्ट्रिया के कासल (वकील) ने सन् १९०६ में अपनी सरकार को एक पत्र लिखा था, जिसका भाव यह था-"जर्मनी की सापत्तिक स्थिति वर्तमान समय में मुट्ठी भर अधिक से अधिक पचास मनुष्यों की इच्छा पर सव- लवित है, वैसी इससे पहले कभी न थी। औद्योगिक विकास के लिये किसी प्रकार का प्रतिबंध करना उचित नहीं है, वह जिस प्रकार से होता है उसे उसी प्रकार से होने देना चाहिए। यह सिखात जितना सन १९०६ में पीछे छोड़ दिया गया है इसके पहले वह कभी इतना पीछे नहीं रहा। बदी बढी चर्फे, औद्योगिक कारखाने, व्यापार के सघ, इन सयो में मुख्य मुख्य मनुष्यों के इच्छानुसार माळ का' तैयार करना, विदेश में भेज कर विक्री करना,माल की कीमत स्थिर करना; माल को उधार देने का प्रबंध करना, नई पूजी इकट्ठी करना, मजदूरों का वेतन और व्यापार की दर का निश्चित करना, आदि बातें अब प्राय वै भी हो गई हैं। जिन उद्योग अधों में व्यापारियों ने सघ बना लिए हैं, उनमें किफायत अधिक होती है। इसी प्रकार जर्मनी के औद्योगिक सुधार साथ जिन लोगों की थैलियाँ भरी हैं, यदि ऐसे कोई लोग है तो वे में संमिलित हुए व्यापारी हैं।" . - सप J कारखानों के सघ को जर्मनी में सिंडिकेट कहते हैं। 'इन सिंडिकेटों को स्थापित करने का जो उद्योग वर्तमान युग में वहाँ हो रहा है, उस ओर विदेशी लोगों का ध्यान किस प्रकार आकर्षित हुआ है, यह बात ऊपर दिए हुए अवतरण से स्पष्ट समझ में आ जाती है । इन विडिकेटों का जैसा उप- योग व्यवसाय वाणिज्य के प्रसार में होता है वैसा ही पूजी एकत्रित करने के विषय में भी होता है। यह बात आस्ट्रियन फासल के लेख से ध्वनित होती है और यह बिल्कुल ठीक है। हर एक प्रात में जितने बैंक हैं वे सब बर्लिन की मुख्य बेंक में सम्मिलित हैं। बर्लिन की इस बैंक ने पुन आप में सधि कर रक्सी है । इस कारण व्यापार के लिय धन की जो गडबढ़ी या धूमधाम होती है वह केवल पाच छ बैंकों द्वारा होती है । इन बैंकों में से तीन बैंकों की पूजी, दो दो करोड़ प्रति बैंक पौंड है। समुद्र द्वारा विदेशी व्यापार के लिय जितने धन की आव- कता होती है वह सच इन्हीं बैंकों द्वारा दिया जाता है। इसके अतिरिक्त भिन्न भिन्न प्रकार के वाणिज्य व्यवसाय के लिये सिडिकेट स्थापित करने का जो कम सारे देश में शीघ्रता से जारी है उसमें भी जितना धन लगाने की आवश्यकता होता है, ये बैंक सता देने को तैयार रहती है। औद्योगिक सघ पनाने का प्राबल्य जमनी म अभी हाल मेही भारभ हुभा हो, यह बात नहीं है। एक इतिहास लेखक ने लिखा है कि सन् १८१६ में भी एक सिंडिकेट वहा थी। इस साल से लेकर 'सन् १९०६ तक अर्थात सयर वर्ष के भोवर भीतर वहाँ करीब करीब चार सौ सिंडिकेट स्थापित - .

१५०) हो गए। . 1 इस पर से विदेश से रवाना होनेवाले माल का सारा काम कहीं- पूर्ण रीति से, कहीं अशत ; सिंडिकेट के रस्वाधीन हो गया है, यह कहना अतिशयोक्ति न होगा और साथ ही यह बात तो निश्चय के साथ कही जा सकती है कि भिन्न भिन्न प्रकार के व्यवसाय वाणिज्य को एक केंद्र में लाने का जो प्रयत्न चल रहा है उससे विशेष महत्व का माल उत्पन्न करनेवाले कारखानों को भी बहुत ही कुछ यश प्राप्त हो रहा है। सरक्षण-कानून पास होने से, सिडिकेट स्थापित करने वालों को कितनी उत्तेजना मिली, इस विषय में स्वय जर्मन लोगों में मतभेद है। यह कानून सन् १८७९ में जारी हुआ। परतु इससे भी पहले सिंडिकेट मौजूद थे। इस पर से यह नहीं कह सकते कि आनेवाले माल पर कर लगाने से ही इसकी उन्नति हुई है। सरक्षण के अतिरिक्त औद्योगिक सघों के परिपोषण की और भी भित्र भिन्न अवस्थाएँ हैं तथा उन उन अव स्थाओं में संघ का कार्य उत्तमवापूर्वक चलता है। उदाहरणार्थ- (अ) कथा माल जितना उत्पन्न होना चाहिए उतना न होने से अथवा उसे उत्पन्न करनेवाले मनुष्यों की संख्या कम होने से उसका व्यापार थोडे लोगों के इच्छानुसार चलना, (ब) कारखानों में अधपका अथवा पका तैयार होनेवाले माल का व्यापार स्वाभाविक रीति से मुट्ठी भर आदमियों के हाथ रहना, (क) बाजार में भेजजानेवालामाल किस प्रकार का होना चाहिए, वह किवना तैयार किया जाना चाहिए, और... विदेश में उसे किस प्रकार से भेजना चाहिए, इत्यादि .

(१५१ )
बातों के लिये स्थानिक सप बनानेवालों की दशा का अनुकूल
होना, और इसी प्रकार के और भी कुछ उदाहरण देने योग्य
हैं। जिन उद्योग-धों के लिये आज कल सिंडिकेट स्थापित
हुए हैं उनकी उन्नति सिरिकेट द्वारा ही हुई है ।
। सन् १८७९ में सरक्षण कानून पास हुभा, यह ऊपर
बताया जा चुका है । ' उस कानून का अमल दरामद होते
हो सिडिकटों की सख्या बढने लगी, यह बात ध्यान में रखने
योग्य है।
इस पर से यह अनुमान किया जा सकता है
कि सरक्षण, सिंडिकेटों की उत्पत्ति का आदि कारण न भी हो
तो भी इनकी स्थापना में उससे सहायता अवश्य मिली।
यदि वह कानून पास न हुआ होता तो बहुत कुछ सम्भव था
कि सिंडिकेटों का उतना प्रसार न होता जितना कि अप है।
हमारा यह अनुमान गलत नहीं है, इसके लिये जर्मन लेखकों
क लेखों के
बहुत से अववरण दिए जा सकते हैं, परतु विस्तार.
मय से यहा पर उनका देना चित नहीं जान पड़ता।
परतु यदि यह भी मान लिया जाय कि सरक्षण सिंडि-
केटों का प्रत्यक्ष कारण नहीं है केवल साथी अथवा सहचर है
तो भी यह अनुमान कर लेना ठीक न होगा कि यदि सरक्षण
* कानून कुछ ढीला कर दिया जाय तो औद्योगिक सघ निर्माण
होने की व्यापारिक प्रवृत्ति कम हो जायगी। प्रत्यक्ष उदा.
हरण देकर यह सिद्ध करना सरल होगा कि कुछ व्यवसायों
में सिडिफेटों का विदेशी व्यापार की चढा उपरी पर रती
भर भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। अतएव उन व्यवसायों के लिये
सरक्षण कर' का गाना अथवा न लगाना परापर है।
.

. ( १५२) देश का मूल धन इधर उधर फैला न रह कर मर्यादित दशा में रहे और इसी प्रकार वाणिज्य व्यवसाय सूक्ष्म दृष्टि रहने. वाले लोगों की देख रेख में रहे तो अच्छा होगा। परतु इसके विपरीत कितने ही सोशियालिस्ट लेनकों के मतानुसार इस प्रवृत्ति के अधिक ऊचे जाने का मुख्य कारण धनाढ्य लोगों की द्रव्य-तृष्णा है। परतु उनका यह ऋथन युक्ति सगत दिखाई नहीं पडता । व्यवसाय-वाणिज्य को व्यवस्थित खरूप देने का एक बार निश्चय हो जाने से वह किस मार्ग अथवा उपाय से सिद्ध किया जा सकता है, इसका विचार 'फिर सहज में ही करने की ओर ध्यान जाता है, और उन विचारों की प्रगल्भता आने से उनका पर्यवमान सिंडिकेट सरीखे सघों द्वारा होना एक सहज पात है। सिंडिकट तत्व के प्रतिकूल बहुत से लोगों का यह भाप है कि यह सस्था आवश्यकता से अधिक , आगे बढ नई और उसका परिणाम यह हुआ है कि थोड़े समय में ही जर्मन राष्ट्र एक बहुत बड़ा "वर्कशाप" बन गया है। और कारण देश की कृषि और फलाकौशल मादि रसातल को चले गए। व्यवमाय-वाणिज्य के अधिक प्रचार से खेती का काम करने के लिये मजदूरानहीं मिलते और ' यह कठिनाई सदा के लिय आ उपस्थित हुई है। सम्पत्युत्पादन के एकदम बहुत बड़ा फेर फार हो जाने स, किसानों पर यह कठिनाई अनपेक्षित रूप से माकर सपस्थित हो गई है और बह किस प्रकार दूर की जा सकती है, इसका उपाय सुझाई नहीं पड़ता। - . काम में -- ३ ।

कोयला और लोहा निकालने के कारखाने के मालिकों ने
जो सघ स्थापित किए हैं, वे अन्य प्रकार के संघों की अपेक्षा
अधिक पूर्णत्व को प्राप्त हुए हैं। स्वानों से इतना ही माळ
निकालना चाहिए और कारखानों में इतना ही माल तैयार
होना चाहिए, अधिक तैयार न होना चाहिए-इन सघों में
यह व्यवस्था भय भी अबाधित रूप से चल रही है। "वि
निश-वेटलियन सिडिट" सय से अधिक प्रभावशाली है।
इस संघ की स्थापना, एमन नगर मे, सन् १८८३ में हुई थी।
इसी प्रकार के सघ अन्य कारसानों के मालिकों ने भी बनाए
हैं। बाजारों में कितना माल भजा जाय जिम प्रकार यह
बात सघ फरते हैं उसी प्रकार बाजार में माल किस भाव
बेचा जाय, इस का निश्चय भी एक दूसरे सघ द्वारा होता है,
और ये दोनों प्रकार के सघ एकाचत होकर काम करते हैं।
इस प्रकार माल तैयार करने और बचने की व्यवस्था के
प्रतिकूल चार श्राक्षप किए जाते हैं। वे आक्षप य हैं-
(१) माल पैदा करने और अपने में जो वर्ष होता था
वह कम हो, और पहले इस विषय में जो उपग बढी होने
से हानि होती थी वह न हो, परंतु इतने मे ही ये सिंडि-
केट सतुष्ट न रहकर माल का मूल्य मर्यादा स अधिक बढा
देने के काम में भी इन सघों का उपयोग करत हैं।
(0) कचा और कारखानों में तैयार हुभा अधपा
माल विदेशी व्यापारियों को जिस मूल्य पर दिया
जाता है उससे अधिक मूल्य लेकर दशी व्यापारियों को दिया
जाता है। इस कारण कारखानों में अधपका तैयार हुमा
.
-

, -- - । (१९५३) देश का मूल धन इधर उधर फैला रह कर मर्यादित दशा में रहे और इसी प्रकार वाणिज्य व्यवसाय सूक्ष्म दृष्टि रहने वाले लोगों की देख रेख में रहे तो अच्छा होगा। परंतु इसके विपरीत कितने ही सोशियालिस्ट लेनकों के मतानुसार इस प्रवृत्ति के अधिक ऊचे जाने का मुख्य कारण धनाढ्य लोगों की द्रव्य-तृष्णा है। परंतु उनका यह कथन युक्ति सगत दिखाई नहीं पड़ता । व्यवसाय वाणिज्य को व्यवस्थित स्वरूप देने का एक बार निश्चय हो जाने से वह किस मार्ग अथवा उपाय से सिद्ध किया जा सकता है, इसका विचार 'फिर सहज में ही करने की ओर ध्यान जाता है, और उन विचारों की प्रगल्भता आने स उनका पर्यवसान सिंडिकेट सरीखे संघों द्वारा होना एक सहज बात है। सिंडिकट तत्व के प्रतिकूल बहुत से लोगों का यह साक्षप है कि यह सस्था आवश्यकता स अधिक आगे- बह गई। और उसका परिणाम यह हुमा है कि थोड़े समय में ही जम्न राष्ट्र एक बहुत बड़ा “वर्कशाप" बन गया है। और इस कारण देश की कृषि और कलाकौशल आदि रसातल को चले गए। व्यवमाय वाणिज्य के अधिक प्रचार से खेती का । काम करने के लिये मजदूर नहीं मिलते और ' यह कठिनाई सदा के लिये आ उपस्थित हुई है। सम्पत्युत्पादन के काम एकदम बहुत बड़ा फेर फार हो जाने स, किसानों पर यह कठिनाई अनपेक्षित रूप से आकर उपस्थित हो गई है और वह किस प्रकार दूर की जा सकती है, इसका उपाय: मुहाई नहीं पड़ता। + - कोयला और लोहा निकालने के कारखाने के मालिकों ने जो सघ स्थापित किए हैं, वे अन्य प्रकार के सषों की अपेक्षा अधिक पूर्णत्व को प्राप्त हुए हैं। स्वानों से इतना ही माळ 'निकालना चाहिए और कारखानों में इतना ही माल तैयार होना चाहिए, अधिक तैयार न होना चाहिए-इन सघों में । यह व्यवस्था अब भी अबाधित रूप से चल रही है। "वि निश- प्रेलियन सिंडिकेट" सबसे अधिक प्रभावशाली है । इस सघ की स्थापना, एमन नगर में, सन् १८८३ में हुई थी। इसी प्रकार के सघ अन्य कारखानों के मालिकों ने भी बनाए है। माजारों में कितना माल मजा जाय जिस प्रकार यह बात सघ करते है उसी प्रकार बाजार में माल किस भाव बेचा जाय, इसका निश्चय भी एक दूसरे सघ द्वारा होता है, और ये दोनों प्रकार के सघ एकाचत्त होकर काम करते हैं इस प्रकार माल तैयार करने और वचन की व्यवस्था के प्रतिकूल चार भाभप किए जाते हैं। वे आक्षप य हैं- (१) माल पैदा करने और बचने में जो वर्ष होता था वह कम हो, और पहले। इस विषय में जो उपरा चढी होने से हानि होती थी वह न हो, परंतु इतने मे ही ये सिंडि- सतुष्ट न रहकर माल का मूरय मर्यादा स अधिक बढा देने के काम में भी इन सघों का उपयोग करत हैं। (0) कला और कारखानों में तैयार हुआ अधपका माल विदेशी व्यापारियों को जिस मूल्य पर दिया जाता है उससे अधिक मूल्य लेफर देशी व्यापारियों को दिया जाता है। इस कारण कारखानों में अधपका तैयार हुमा - - . . । (११५२) देश का मूल पन इधर उधर फैला न रह कर मर्यादित दशा में रहे और इसी प्रकार वाणिज्य व्यवसाय सूक्ष्म दृष्टि रहने वाले लोगों की देख रेख में रहे तो अच्छा होगा। परतु इसके विपरीत कितने ही सोशियालिस्ट लेखकों के मतानुसार इस प्रवृत्ति के अधिक अचे जाने का मुख्य कारण धनाढ्य लोगों की द्रव्य-तृष्णा है। परंतु उनका यह कथन युक्ति संगत दिखाई नहीं पडता । व्यवसाय-वाणिज्य को व्यवस्थित स्वरूप देने का एक बार निश्चय हो जाने से वह किस मार्ग अथवा उपाय से सिद्ध किया जा सकता है, इसका विचार 'फिर सहज में ही करने की ओर ध्यान 'जाता है, और उन विचारों की प्रगल्भता आने स उनका पर्यवसान सिंडिकेट सरीखे सघों द्वारा होना एक सहज बात है। सिंडिकट तत्व के प्रतिकूल बहुत से लोगों का यह आक्षेप है कि यह सस्था आवश्यकता मा अधिक आगे बढ गई है और उसका परिणाम यह हुआ है कि थोड़े समय में ही जम्न राष्ट्र एक बहुत बड़ा "वर्कशाप" बन गया है। और इस कारण देश की कृषि और कलाकौशल आदि रसातल को चले गए। व्यवसाय वाणिज्य के अधिक प्रचार से खेती का काम करने के लिये मजदूर नहीं मिलते और यह कठिनाई सदा के लिय मा उपस्थित हुई है। • सम्पत्युत्पादन के काम में एकदम बहुत बड़ा फेर फार हो जाने स, किसानों कठिनाई अनपेक्षित रूप से आकर उपस्थित हो गई है और वह किस प्रकार दूर की जा सकती है, इसका उपाय सुझाई नहीं पड़ता। . पर यह +

कोयला और लोहा निकालने के कारखाने के मालिकों ने
जो सघ स्थापित किए हैं, वे अन्य प्रकार के संघों की अपेक्षा
अधिक पूर्णत्व को प्राप्त हुए हैं। स्वानों से इतना ही माळ
निकालना चाहिए और कारखानों में इतना ही माल तैयार
होना चाहिए, अधिक तैयार न होना चाहिए-इन सघों में
'यह व्यवस्था अब भी अबाधित रूप से चल रही है। "वि
निश-वेटलियन सिंडिकेट" सबसे अधिक प्रभावशाली है ।
इस संघ की स्थापना, एमन नगर में, सन् १८८३ में हुई थी।
इसी प्रकार
के सघ अन्य कारखानों के मालिकों न भी बनाए
हैं। बाजारों में कितना माल भजा जाय जिस प्रकार यह
बात सघ करते हैं उसी प्रकार बाजार म माल किस भाव
बेचा जाय, इसका निश्चय भी एक दूसरे सघ द्वारा होता है,
और ये दोनों प्रकार के सघ एकाचत्त होकर काम करते हैं।
इस प्रकार माल तैयार करने और बन की व्यवस्था के
प्रतिकूल चार आक्षप किए जाते हैं। वे आक्षप य हैं-
(१) माल पैदा करने और बेधने में जो वर्ष होता था
चह कम हो, और पहले इस विषय में जो उपरा बढी होने
से हानि होती थी वह न हो, परंतु इसने से ही य सिंडि-
केट
सतुष्ट न रहकर माल का मूल्य मर्यादा स अधिक बढा
देने के काम में भी इन सघों का उपयोग करत हैं।
(२) फवा और कारखानों में तैयार हुभा अधपका
माल विदेशी व्यापारियों को "जिस मूल्य पर दिया
जाता है उससे अधिक मूल्य लेकर देशी व्यापारियों को दिया
जाता है।
"पमा तैयार हुमार
इस कारण
-

(१५४.) माल खरीद कर पका तैयार करनेवाले कारखानों को और देश के ग्राहकों को बहुत बड़ी हानि होती है। ।। (३) कुछ व्यवसायों में यह भी होता है, कि देश की आवश्यकतानुसार माल तैयार न करके उसे मनमाने दामों पर बेचा जाता है और जितना चाहते हैं भाव बढ़ा देते हैं और उसी प्रकार के विदेश से आनेवाले माल पर 'सरक्षण कर लगा रहने से उसके आने का और अपने साथ मुकाबला करने का उन्हें बिलकुल भय नहीं रहता । (४) फुटकर व्यापार करनेवालों और दलाल लोगों को यह आपत्ति है कि व्यापार में पहले जो हमें स्वतत्रता थी, वह अब नहीं रही। पहले के समान व्यापार में जहा हमे काम मिलता था वहा भव वे सिंडिकेट बीच में पड, कर हमे अपने कार्य में सफलता प्राप्त नहीं होने देते । अब यदि दोनों पक्ष के सिद्धातों का मुकाबला किया जाय तो यह बात प्रत्यक्ष हो जायगी कि दूसरों पर अवलविच रहने वाले कारखानेवालों और व्यक्तिश व्यापारियों का उपरोक्त कथन मिलकुल ठीक है, यह बात स्पष्ट ध्यान में भाए मिना न रहेगी। सिंडिकेटों की स्थापना होने से इन लोगों को हानि पहुँची और उन्हें कष्ट, हो रहा है, यह बात ‘म्वत सिद्ध है। इसके लिये और किसी विशेष प्रमाण के देने की आवश्य- कता,नहीं है। कठिनता इतनी है, कि प्रत्येफ हानि के धावत मिडिकेट को कितना जिम्मेदार समझा जाय और उसपर कितना दोष भारोपित किया जाय, यह विशेष सूक्ष्म रीति से कहते नहीं बनता। "ह्रीनिश-फेस्ट: फालियन कोळ सिंडि- . - -- सन प्राय केट" की स्थापना हुए पश्चात् और विशेषत उस सस्था के अपने व्यवहार का खास उद्देश्य स्थित कर लेने के पश्चात् कोयल का भाव बढ़ गया है, इसमें संदेह नहीं है । १९०७ में कोयले का भाव बेहद बढ गया । उत्तर-जर्मनी की दशा वो इतनी शोचनीय हो गई थी कि कितने ही व्यव- साय कोयले के अभाव से नष्ट प्राय हो गए थे। मिल क काम के लिये लोगों को कोयला मिलना बद सा होगया था । जब यहा तक शोचनीय दशा पहुँच गई तब "राइस्टाक" और "प्रशियर डाएट' इन दोनों सभाओं में एक ही समय " कोल सिंडिकेट" पर गालियों की बौछार पड़ने लगी। इस समय तो उन्होंने अपना स्वर जरा धीमा कर दिया परतु आगामी वर्ष के अत मे जय व्यावसायिक नई लहर आई तब कोयले का दाम पहले की अपेक्षा अधिक चढ़ा दिया। यह तो कोयले का उदाहरण है परतु इसी प्रकार के और अनेक उदाहरण देकर यह सिद्ध करके बताया जा सकता है कि सिंडिकेट अपनी सघशक्ति के बल पर जान बूझ कर भी भिन्न भिन्न माल की कीमत मर्यादा से भी बहुत अधिक बढा देने में समर्थ हैं। माल का मूल्य अपने इच्छानुसार पढ़ाने की बात सिंड- केट स्वय स्वीकार करते हैं । परतु इस बात का समर्थन वे किस प्रकार करते हैं, इसका उल्लेख हर कालवर नामक एक लेखक ने अपनी पुस्तक में इस प्रकार किया है-"सिंडिकेट वालों ने मूल्य निश्चय करने के समय में अपना उद्देश्य कई वार बदला है और आगे भी वे बदलते रहेंगे इसमें

है। सरक्षण कर के भरोसे पर बाजार में जिस वस्तु का भाव
, कम ज्यादा होने का कुछ भय नहीं है उन वस्तुओं का व्यापार
भी सिडिकेट के हाथ में जाते ही उनका भी मूल्य मनमाना
बढाने की उनमें इच्छा उत्पन्न हुए बिना नहीं रहेगी। परतु बाजार
में आनेवाले माल का मूल्य पहले की अपेक्षा बढ़ता जा रहा
है अथवा नहीं, इस एक बात की ओर भी ध्यान देकर विहि
केट के लोगों के काम का विचार करने से काम नहीं चलता।
यह मूल्य चारों भार समान हो कर स्थिर है अथवा नहीं,
इसका भी विचार किया जाना चाहिए और फिर उनके काम
की बाधत अनुकूल अथवा प्रतिकूल साम्मति देनी चाहिए ।
सिंडिकेटों के अस्तित्व में आने से पहले व्यापार की स्थिति
और बाजार में अपरा-चढ़ी के अनुसार मूल्य कम ज्यादा
होता रहता था। माँग अधिक होने पर कीमत अपने आप
एकदम चढ जाती थी और फिर कुछ देर के लिये माँग कम
हो जाने से बाजार भाव उतर जाता था। इस कारण पूंजी-
वालों और उन्हीं के साथ काम करनेवाले मजदूरों को भी
हानि उठानी पड़ती थी। परंतु सामाल का पैदा करना
सिंडिकट के हाथों मे है उस माल के भाव के एकदम कम
अथवा ज्यादा होने का भय बिलकुल नहीं रहता। व्यापार तेज
होने से कीमत बढ़ जाती है परतु वह धीरे धीरे विचार.
पूर्वक चढने पाती है। इसी प्रकार - व्यापार मंदा होने मे
कीमत उतर जाती है परतु वह एकदम न उतर कर धीरे धीरे
१ कम होती है । सिंडिकेट'के मूल्य स्थिर करने का काम अपने
हाथ में लेने से पहले मूल्य के विषय में जो गड़बड़ होती थी

-
( १५७ )
वह दूर हो गई है। इसी प्रकार कौन सा माल कितना वैयार
करना, यह बात वे पहले ही निश्चित कर लेते है। इस कारण
बाजार में जा कर माल पड़ा नहीं रहता और न फिर मिट्टी
मोल उसे बेचना ही पड़ता है। सिंडिकटों स यह लाभ अवश्य
बहुत बड़ा है । पहले समय में कारखानेवालों का बाजार क
चढाव उतार पर ही नफा नुकमान का सारा दारोमदार
था परतु सिंडिकेटवालों के अधिकार में रहनेवाले कारखाने-
वालों की पहले की सी दशा अब नहीं रही है।"
यहा तक तो, पहले आक्षेप के सबध में दोनों पक्षवालों का
विचार किया गया। देशी व्यापारियों की अपेक्षा विदेशी
व्यापारियों को विशेष सहूलियत से माल दिया जाता है,
यह सिंडिकेटों के विरुद्ध दूसरा भाक्षेप है। इस प्रश्न अथवा
इसी प्रकार के और कई एक प्रश्नों पर विचार करने के लिय
-सरकार ने एक कमीशन नियत किया था। उस कमीशन के
सम्मुख इस आक्षेप के समर्थनार्थ जो प्रमाण उपस्थित किए
गए थे, उनको देखने से कारखानेवालों का कहना विलफुल
सच है, इसका पूरा पूरा विश्वास हो जाता भिन्न भित्र
गवाहों ने अपनी अपनी गवाहियों में मूल्य के भतर सपधी
जो अक दिए हैं उन्हें देखने से सिडिकेटवालों को भी सचाई
के विषय में शका करने की बिलकुल गुजाइश नहीं रहती।
ये भक बाजार में प्रत्यक्ष विक्री के हैं। व्यक्तिश विदेशी
व्यापारियों को इन लोगों से क्या सहुलियत मिलती है यह
बात प्रमाण सहित सिद्ध कर के बवाना अति कठिन होने से
यह गुम रहस्य ससार' के सामने नहीं जाता। परतु यदि यह

- (१५८) रहस्य उद्घाटन हो जाता तो ससार में कितनी होनई आश्चर्य- जनका बातें अपने भाप ही सामने आ जाती |विडिकेट के लोग अपने कच्चे माल को विदेशी व्यापारियों के हाथ कम मूल्य पर चेचते हैं और इस कारण विदेश से उनके माल की मॉग अधिक बढ गई है और इससे उनको लाभ भी अधिक होता है, यह भी सच है, परतु उनके इस कार्य से देशी कारखानों को हानि पहुँचती है इसका अर्थ क्या है? कई माल के लिये उन्हें अधिक दाम देने पड़ते हैं, इस कारण उन्हें माल भी महंगा पड़ता है और इसी कारण से उन्हें विदेश में जितने ग्राहक मिलने चाहिएँ नहीं मिलते । यदि इतना ही होकर रह जाता तो कुछ हर्ज न था परतु उनके कारखाने के बने हुए माल की बराबरी का माल विदेश से उनके देश में आता है और उसे विदेशी व्यापारी कम दामों पर बेच सकते हैं तात्पर्य यह है कि जर्मनी में तैयार हुआ कच्चा माल विदेश जाता है और वहा के कारखानों में उसका । रूपातर होकर फिर वह पुन, जर्मनी में वापस पाता है जिससे वहा क कारस्थाने वालों की कमर टूट जाती है। अर्थात् अपने पैर पर भाप कुल्हाड़ी मारने के समान सिंडिकेटों का यह उद्योग है, यह कहने में भी कुछ हर्ज नहीं है । "कलोन गजट में इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण प्रकाशित हुआ था। वह लिखता है कि सिडिकेट की स्थापना होने से पहले, पका माल तैयार करनेवाले कारखाने, बहुत वर्षों तक करीब करीब दस हजार टन की हालैंड-को भेजते थे। इसके सिवाय, चार हजार टन, कक्षा माल जर्मनी से हालैंड के व्यापारी ले जाकर अपने उसका -

(१५९ )
कारखानों में कील तैयार करते थे। परतु सिंडिकेट के हाथ
में व्यापार जाने से किफायत के साथ माल तैयार होने लगा।
"रोल्ड" तार द्वारा यंत्रों की सहायता से गोल तार बनाने के
कारखाने जारी होने लगे। इन कारखानों में इतना माल
तैयार होने लगा कि उसे किसी न किसी प्रकार से निकालने
का प्रबंध करना ही पड़ा। देश की माग पूरी करके यह माल
हालैंड भेजा जाकर सस्ते दामों में बेचा जाने लगा।
इसका परिणाम यह निकला कि हालैंड के व्यापारियों ने
जर्मन माल पक्का मेंगाना तो बिलकुल छोड़ दिया और उल्टा
पका माल वहा स जर्मनी में आकर विकने लगा और यह
माल जर्मन माल की अपेक्षा २५ सैफडा कम दाम पर बेचा
जा सका । इस कमी वेशी के कारण जर्मन व्यापारियों को
अपने अपने कीलों के कारसानों को
मजबूर
होकर वद करना
पड़ा और उससे उन्हे अपार हानि सहन करनी पड़ी। इस
विषय में 'मारगेनराथ नामक एक लेखक ने लिखा है-
"यदि आप सारे चेयर आफ कामर्स का रिपोटी को निकाल
कर पढ़ें तो इस संबंध मे उनके विचार प्रतिकूल ही पाइएगा।
सिंडिकेट के लोगों के इस व्यापारी उद्देश्य के कारण
कितने ही व्यवसाय जर्मनी में नष्ट हो गए और विदेश में
जाकर वे उन्नत दशा को प्राप्त हुए । इसी कारण राइन का
जहाज बनाने का व्यवसाय नष्ट हो कर हालैंड में जाकर
उन्नति को प्राप्त हुमा, क्योंकि इस व्यवसाय के काम में
पानेवाला सामान जर्मन व्यापारियों को जिस दाम पर
मिलता था उसकी अपेक्षा कम दामों पर हालैंड को मिलने

(९६०), लगा । जर्मन फौलाद कम दामों पर मिलने के कारण, हार- मे लोहे और फौलाद के अनेक कारखाने पड़ी उत्तमतापूर्वक चल रहे है । बेलजियम में भी जर्मनी के कच्चे माल के भरोसे। पर लोहे के तार, तैयार करने के बहुत से कारखाने वन गए है।" इसका उत्तर डा० लीफमन इस प्रकार देते हैं-"कच्चा और कारखानों में बना अधपका माल सिंडिकेटवालों के कारण विदेश के लिये सस्ता रवाना होता है परतु इस प्रकार से जर्मनी का विदेशी ब्यापार बढता है। जर्मन कारखानो में तैयार हुआ पका माल विदेशी पक्के माल के मुकाबले में ठहर नहीं सकता इसका कारण यह नहीं है कि कच्चा माल बहुतायत से विदेश में जाता है, इसका कारण यह है कि उस माल के लिये विदेशी व्यापारियों को अधिक मूल्य देना पड़ता है, ।" परतु यह बात तो बिलकुल साफ है कि इस प्रकार अधिक दाम देने के कारण देशी कारखानों को दोहरी हानि, उठानी पड़ती है। पहली हानि तो यह है कि माल तैयार करने में हो अधिक खर्च करना पड़ता है। दूसरी हानि यह है कि विदेशी व्यापारियों को बाजार में अपरा चढ़ी करने की उत्तेजना मिलती है। विदेशी ग्राहकों को अधिक सहूलियत देने से पका माल तैयार करनेवाळे देशी कारखानो को धक्का लगता है। यह बात सिंडिकेटवाले भी स्वीकार करते हैं और देशी पका माल विदेश जाने पर कच्चे माल का मूल्य अधिक प्राप्त 'होने से जो हानि होती है, उस हानि को पूरा करने के लिये, उस माल पर "वाटी "मर्थात् हानि का बदला देव है।

(१६१)
परतु यह बदला उस समय देते हैं जप व्यापार बिलकुल गिर
जाता है, हमेशा देने का कोई नियम नहीं है और यह बदले
की रकम इतनी कम होती है कि उसके द्वारा पहली ही हानि
की पूर्ति होना कभी सभव नहीं है।
सिंडिकेट के विरुद्ध तीसरे आक्षेप का विचार करने पर
यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि सिंडिकेटवालों ने जिन व्यव
सायों को हाथ में लिया है उनका बाजार पहले की अपेक्षा
अब अधिक अच्छा है। वे जो माल तैयार करते हैं उसमें
से कुछ माल तो विदेश से आना कम हो गया है। परतु
इस विषय में भी एक बात विचारणीय है और वह यह है कि,
यह दशा जो प्राप्त हुई है वह सिंडिकेट स्थापित होने के
कारण हुई है अथवा सरक्षण कर लगाने के बाद से हुई
है, क्योंकि इन दोनों कारणों से यह परिणाम होना सभव
परतु इसमें भी कुछ यात अपवाद स्वरूप है। जैसे
जस्त की घदर पर सरक्षण-कर लगा हुआ है और सिंडिकेट ने
भी उसका मूल्य बहुत कुछ बढा दिया है । यह होने पर भी
फी सैकड़ा ३० के हिसाब से जस्ते की चहरें इग्लैंड से जर्मनी
जाती है और उन्हें लाम भी अच्छा होता है, क्योंकि जर्मनी
में मिडिकेट की कृपा से इस माल का दाम अच्छा आ जाता
है। सरक्षण-कर और अन्य प्रकार के खचों को निकाल कर
उन्हें अच्छी रकम नफा के तौर पर बच रहती है।
जिस कमीशन का उल्लेख किया गया है उस कमीशन के सामने
एक गवाह ने इस विषय में अपने विचार जो प्रगट किए थे के
ये हैं-"माग की अपेक्षा माल को इकट्ठा करके रखने के
ऊपर

५ R अलावा इग्लैंड में ,जस्ते की परें जिस भाव में पड़ती है, उस की-अपेक्षा पचास फी सदी अधिक दास ग्राहकों से यहाँ मागे जाते हैं और इतना मूल्य देकर भी प्राहकों की मांग के अनु- सार माल तैयार करके नहीं दिया जाता है। , अब चौथे भाक्षेप के विषय में विचार करना वाकी रह गया। परतु यदि उसका विचार अति सक्षेप से भी किया जाय तो भी ठीक होगा, क्योंकि फुटकर व्यापार करनेवाले व्यापारियों और फुटकर माल लेनेवाले ग्राहकों की सिंडिकेट- वालों के पास बिलफुल दाल नहीं गलती। इकट्ठा माल खरी: दनेवाले जो बड़े पड़े फारखाने हैं, उन्हीं के साथ इनका कारोबार होता है और इसी कारण दलालों के मध्यस्थ होने का भी कुछ काम नहीं पड़ता। यहा तक तो उन चार बड़े बड़े भाक्षेपों का जो ऊपर बताए गए हैं संक्षेप में उत्तर दिया गया। परंतु पूंजीवालों और मजदूरों के हित का भी इस विषय से बहुत कुछ समय है। अतएघ उस दृष्टि से भी इन व्यापारी संघों का विचार करना बहुत जरूरी है। इस विषय का विचार करने पर यह बात स्वी- कार कर लेनी पड़ेगी कि (१) कमीशन के सामने आई हुई कुछ बातों को छोड़ फर सिंडिकेटों का व्यवसाय-वाणिज्य पर अच्छा प्रभाव पड़ा है और (२) सिंडिकेटों द्वारा ऐसी माई बात नहीं हुई है जिससे मजदूरों के लाभ को धक्का पहुँच । संघ बनाने से किस प्रकार लाभ होगा, इस विषय में पूजीवाले लोग जो कारण बताते हैं वे सरल और धनी लोगों के स्वीकार करने योग्य है। हानिः लाभ के विचार से माल पैदा .

(११६३."
करनेवाले लोगों को मापस में कमी वेशी करके एक दूसरे को
हानि पहुँचाना, धित अथवा मापस की कमी वेशी को रोक
कर संघों का एक विचार होकर काम करना और जो लाभ
हो उसे नियमित रूप से आपस में बाँट लेना, यह रचित है।
आपस मे एक मत होकर काम करने से जो कमी वेशी होने
से हानि होती थी वह अपने आप यहुत, कुछ दूर हो गई है।
व्यापार एक प्रकार का ईश्वरीय खेल है। इस खेल में जय
किसे मिलेगी और पराजय किस की होगी, यह यात बिलकुल
अनिश्चित रहती है। परतु इस दशा को बदलने के लिये सघ.
शक्ति को व्यापार का शाखीय स्वरूप देफर उस अनिश्चितता
के करने का प्रयत्न किया जाता है, इतना ही नहीं, इस
प्रकार से व्यापार करने में बहुत कुछ परिश्रम भी बच जाता
है और माल का भी बहुत नुकसान नहीं होने पाता और
व्यापार में लगाए हुए मूलधन पर करीब करीब सवों को
समान परतु सम्मिलित विचार से अधिक लाभ होता है।
सिंडिकेट के अनुकूल लोगों के इन विचारों में कुछ भूल है,
यह कहते नहीं धनता और पूँजी लगानेवाले भी इससे
प्रसन्न हो तो भी कुछ आश्चर्य नहीं है।
प्रस्तुत विषय में मजदूरों का सयध रखनेवाली दो बातें है-
अर्थात् मजदूरों को मिलनेवाली रोजाना मजदूरी और बाजार
में मिलनेवाली कीमत-इनका विचार करना और बाकी है ।
सिंडिकेटा की कृपा से कीमत कुछ थोड़ी बढ गई है परतु
उससे
मजदूरों को कोई विशेष हानि नहीं पहुचती। क्योंकि ग्राहकों
से अधिक मूल्य के रूप में लिया हुआ कर मजदूरों के हिस्से

१ मजदूरी के रूप में आ जाता है । - मजदूरी की बाबत अब इले के समान अस्थिरता नहीं रही है। सिंडिकेट स्थापित होने पहले मजदूरों की हाय हाय बद्त होती थी, परतु अब हाय आय दिनों दिन कम होती जाती है। सिंडिकेट स्थापित होने के गरण मजदूरी में स्थिरता आ गई है। इस कारण आज कम और ल ज्यादा आय हो इसका अवसर बहुधा कम आने पाता है। तना होने पर भी आरम में सिंडिकेटवालों के विषय में जदूरों का मत सशकित था। वे समझते थे कि माल पैदा करने- ले लोगों में ऊपरा-चढी को कम करके यदि ये लोग माल । मूल्य बढा सकते हैं तो मजदूरी देनेवाले लोगों में ती ऊपरा-चढी के भाव को कम करके हमारी मजदूरी कम न रेंगे इसका क्या सबूत है । इस प्रश्न का आरभ में उनके जन में पैदा होना एक सहज वात थी। परंतु इस प्रकार की शफा करने का कोई विशेष कारण समझ में नहीं आता, ज्योकि कारखानेवालों के समान ही मजदूर लोगों मे भी घशक्ति उत्पन्न हो गई है और उस शक्ति के बल पर वे केतना कार्य कर सकते हैं, इसकी विवेचना पिछले अध्याय की जा चुकी है। कुछ भी हो, परतु सिंडिकेट द्वारा मज- रों का अहित अब तक नहीं हुआ। परतु उनके द्वारा थापित ट्रेड यूनियनों के विषय में सिंडिकेटवालों ने जो आदो- छन अनेक बार किए और जो प्रतिकूल विचार प्रगट किए इससे यह नहीं कहा जा सकता कि वर्तमान समय की स्थति स्थिर बनी रहेगी अथवा नहीं ! हा, इतना कह सकते हैं कि यह आंदोलन अब तक स्थानीय रहा है। जिन लोगों ने

-
.
(१६५)
यह भादोलन उठाया है उनमें हर किरडक नाम के एक
पुरुष हैं जो यूनियनों के कट्टर शत्रु हैं और व्यापारी लोगों पर
उनका घड़ा प्रभाव भी है। ट्रेड यूनियनों के विनाश का यदि
उन्होंने पूर्ण निश्चय कर लिया है तो मजदूरदल के लोगो को
उनका सामना करने में बहुत कठिनाई उपस्थित होगी।
सिंडिकेट स्थापित करने की युक्ति बहुजन समाज को
कितनी पसद है, और इस विषय में सरकार का क्या विचार
है, इसका विचार करके यह विषय समाप्त किया जाता है।
यह युक्ति जिस समय पहले पहल सोची गई तब अनेक
जर्मन विद्वानों ने इसे युक्तिसगत ससझा और यह न्धिर
किया कि यदि यह युक्ति सफल हुई तो सपत्तिउत्पादन का काम
विशेष प्रमाणवद्ध होगा, मृत्य को स्थिरता प्राप्त होगी और देश
के व्यवसाय वाणिज्य का उत्कर्ष होगा । जर्मनी के लोहे का व्या-
पार सारे संसार में फैलना चाहिए, यह जर्मन लोगों की प्रवळ
इच्छा थी और यह इच्छासिंडिकेट की सहायता से पूरी होगी,
इस बात का उन्हें विश्वास होगया। सिंडिकेट स्थापित होने चे देश
का व्यापार खूब घढ़ेगा, मजदूरों को पेट के लिये विदेश जाना
नहीं पड़ेगा। निर्गत व्यापार का जोर होगा • घडे और छोटे
दोनों प्रकार के कारखानों को समान लाभ होगा। मजदूरों
को अधिक मजदूरी मिलने लगेगी और इस कारण समय
समय पर उनका भादोलन वद हो जायगा ।
लाभ हो कर भी किसी दल विशेष की कुछ हानि न होगी,
क्योंकि माल पैदा करने और बेचने की व्यवस्था में कम
वर्ष होने से पहले के मूल्य में फेर फार करने का अवसर
इतना अधिक

(१६६)
"
"
हो न भावेगा, इस प्रकार के अनुकूल उद्गार चारों ओर लोगों
के मुंह से निकलने लगे थे ।
इस भविष्य में कुछ तो अनुभव से बिलकुल असत्य
और कुछ। अशत सच्चा भी निकला है । सिंडिकेट के
स्वीकार किए हुए कुछ व्यवसायों में कई एक तो उत्तमता-
पूर्वक चलते हैं, और उन व्यवसायों को सरक्षक-कर का जोर
और भी मिल जाने से स्वदेश का बाजार सिंडिकेटवालों के
हाथ में पूरे तौर पर आ गया है। निर्गत व्यापार बढा है
और मजदूरों का वेतन भी बढ़ा है। इतना होने पर भी
संघ व्यवसायों में उन्हें समान यश प्राप्त नहीं हुआ है ।
सिंडिकेट में सम्मिलित न होनेवाले छोटे छोटे व्यवसाय तो
बिल्कुल नष्ट हो गए। निर्गत व्यापार बढने से जिस व्यव
साय में सिंडिकेटवालों का जोर रहा उसी व्यवसाय में
विना सिंडिकेटवालों को हानि उठानी पड़ी और भत में जिस
प्रकार कारखानेवालों को नफा हुआ उसी प्रकार देश के
प्राहकों को नुकसान भी उठाना पड़ा । कारखानेवाले,
व्यापारी और मजदूर, ये सब लोग प्राहकों पर ही सवारी
बाँधने लगे, इस कारण उनको बहुत ही कष्ट उठाना पडा।
अपने भविष्य को अनुभव से असत्य होते देखकर जो लखक
पहले सिंडिकेट का पक्ष लेकर बोलते थे उनमें से कुछ तो
सनके ऊपर टूट पड़े और कहने लगे कि सरकार को इन.पर
बहुत कड़ी निगाह रखनी चाहिए, नहीं तो ये विडिकटवाल
प्राहकों को लूट खायगे। परतु यदि वास्तव में देखा जाय
वो इस सस्या ने अब तक कानून के विरुद्ध कोई काम नहीं

(१६)
कियाँ, यह बाते कोई भी निष्पक्षपाती मनुष्य स्वीकार कर
लेगा। एक बार एक सिंडिकेट के विरुद्ध "इपीरियल सुप्रीम
कोर्ट में एक दावा दायर किया गया, उस दावे में यह कहा
गया कि सिंडिकेट द्वारा व्यापार में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को
धका पहुँचता है। परंतु अदालत में यह बात प्रमाणित नहीं
की जा सकी। अदालत ने अपने फैसले में वादी के विरुद्ध
यह निश्चय किया कि अनिश्चित दशा में व्यक्तिगत स्वतन्त्रता
को मर्यादित करने से ही समाज का कल्याण होता है।
"इंडस्ट्रियल कोड" में व्यवसाय को स्वक्षमता (Freedom of
occupation) यह शब्द आया हुआ है, इसी आधार पर उपरोक
स्वरूप का दावा कोर्ट में किया गया था परतु उसका परिणाम
भी वही हुआ जो ऊपर बताया गया है। अतएव कानून
के
अनुसार मर्यादा के अदर ही सिंडिकेटवालों को रहना चाहिए।
यदि इसके आगे उन्होंने पैर बढ़ाया तो कानून द्वारा उसकी
रोक होना जरूरी है, यह बात अब बहुत से लोग समझने
लगे हैं । बहुत सी सिंडिकेटों ने लोकमत अपने विरुद्ध कर
लिया है और यह बात वे जान गए हैं। अतएव विरुद्ध लोक
मत को शात करने के उद्देश्य से "कोल सिंडिकेटे" के डाय
रक्टरों ने प्रशियन सरकार से कुछ दिन पहले अपने में
सम्मिलित होने के लिये विनय की थी। उन्होंने यह सोचा
था कि यदि सरकार हममें शामिल हो जायगी तो हमारे
काम पर वह अपनी देख रेख अर्थात निगरानी रखेगी। परतु
ऐसा होने के लिये अभी तक समय नहीं भाया, यह कह कर
सरकार ने डायरेक्टरों की विनय को अस्वीकार कर दिया।

(१६८) सिंडिकेट के काम में हाथ डालने योग्य कानून सार्वभौम सरकार अथवा प्रातिक सरकारों ने अभी तक नहीं बनाया। प्रशियन सरकार की तरह सार्वभौम सरकार सिंडिकेटवालों की दशा को देख रही है कि वे कहां तक जाते हैं। देश के मुख्य व्यवसायों पर सिंडिकेट का अम तक क्या प्रभाव पड़ा इसकी जाँच करने के लिये एक कमीशन बैठाया गया है और उस कमीशन का काम अब भी चल रहा है। परतु सरकार ने लोगों को यह विश्वास दिला दिया है कि यदि सिंडिकेट मर्यादा के बाहर बर्ताव करने लगेगा कानून द्वारा तत्काल हम इसका प्रवध कर देंगे। अतएव लोग यह जान गए हैं कि जिस समय सरकार को विश्वास होजायगा उसी दम सिंडिकेट के मुँह मे कॉटेदार लगाम लगा कर उसे पीछे घुमाने अथवा उसे रोक देने में सरकार कभी आगा पीछा नहीं करेगी। वेस्ट फेलिया में "कोल सिडिकेट" के विरुद्ध लोग बहुत कुछ कटाक्ष करते हैं। कोयला नित्य के व्यवहार में आने के कारण सिंडिकेट के विचार पर ही गरीबों का हानि-लाभ अवलवित है। अतएव सिंडिकेट विरुद्ध जो लोगों का रोना चला है वह सिंडिकेट के व्यवहार पर ही बहुत कुछ अवलवित है । इस रोने को सार्वभौम सर- कार सुन रही है और समय आते ही उसके अपनी शाति को त्याग कर लोगों के सरक्षणार्थ आगे हो कर काम करने का पूरा पूरा सकेत है।

-
ग्यारहवॉ अध्याय ।
-
सरकारी काम।
-
रेलवे ओर नहरे।
अपने देश की सापत्तिक स्थिति किस प्रकार से सुधारी
जा सकती है इसका विचार जर्मन लोग तीस
चालीस वर्षों से कर रहे हैं। सरकार को अपने ऊपर कौन मा
काम लेना चाहिए और निज के तौर पर लोग कौन सा काम
दाथ में लें, इस विषय में निश्चित विचार अभी तक कोइ
स्थिर नहीं हुए हैं, परतु तो भी अपनी अपनी आसानी का
ध्यान में रख कर सरकार और निज के तौर पर व्यक्ति विशष
ने उन कामों को अपने अपने हाथों में लिया और इससे जर्मनी
को जैसा चाहिए वैसा लाभ भी हुभा । जर्मन राष्ट्र पुस्तकी
ज्ञान में कुशल परतु व्यावहारिक ज्ञान में कम है, इसके विपरीत
वृटिश राष्ट्र व्यावहारिक ज्ञान मे कुशल परतु पुस्तकी ज्ञान में
कम है, यह सर्व साधारण लोगों की राय है । तथापि
व्यक्ति विषयक स्वार्थपरायणता के आडबर रचने के तत्त्व
को यदि किसी ने स्वीकार किया है तो व्यवहार कुशल वृटिश
राष्ट्र ने ही किया है। जर्मनी ने इस माडबर को नष्ट कर इस
तत्व में जितना प्राधाश था उतना ही 'ग्रहण किया और
इसमे सहकार्य का महत्व कितना है, इसे भी अच्छी तरह
-

( १७.) समझ कर उन्होंने स्वीकार किया । परतु इससे अधिक मार्ड- बर उन्होंने नहीं रचा। जिस समय अगरेज लोग यह कह रहे थे कि देश का व्यवसाय वाणिज्य सरकार अपने हाथ में न ले उसी समय इसके विरुद्ध जर्मनी का कार्य चल रहा था, अर्थात् सरकार को इस काम में जरूर हाथ डालना चाहिए, यह उनका मत.था.। जर्मनी में बहुत समय तक एक- तत्री राज्य रहा और सारी शक्ति राजा के हाथ में थी। इस कारण जनता के ये विचार थे कि जो काम भारम करना हो उसे राजा को ही करना चाहिए। - वर्तमान समय में जब कि राज्यपद्धति में बहुत कुछ सुधार हो गया है. जर्मनी में राजा का महत्व कम नहीं हुआ है। जर्मन राज्यव्यवस्था का यह पहल देखने पर लोगों को यह सहज ही में मालूम हो सकता है कि वर्तमान दशा में भी देश की सामाजिक स्थिति सुधारने के काम में सरकार को आगे होने में कितनी स्वाभाविक सरलता है जर्मन राष्ट्र ने राजा का महत्व बना रक्खा, इस कारण सापत्तिक विकास के लिये जो अवकाश मिला उसका उपयोग करने में उस राष्ट्र को पराकाष्ठा की सहायता पहुँची । सपत्ति उत्पादन करने का बहुत सा बोझ तो सरकार और म्युनिसि- पलिटियों ने अपने ऊपर ले लिया और इस तरह निज का काम करनेवालों को अपनी पूंजी दूसरे कामों में लगाने और उन कामों में अपनी कुशलता दिखाने का अवसर अनायास ही प्राप्त हो गया। सार जन समूह के हिताहित के विषय में सरकार को निरीक्षणता में काम होने के कारण जिस काम से । 1 २७१) - व्यक्तिगत लाभ होना समव था उस काम में विशेष ध्यान देने का अवसर सहज ही प्राप्त हो गया । स्वय सरकार ने अथवा सरकार की निगरानी में निजी कंपनियों द्वारा जो रेलवे खोली गई हैं उनका विस्तार ३१००० मील है इन रेलों में ६० करोड़ पौंड घन लगा हुआ है। इनकी व्य वस्था के लिये न तो कोई डाइरेक्टरों का बोर्ड है, और न धन लगानेवाले लोगों की सहायता की आवश्यकता ही पाई जाती है और न हिस्सदारो शेअर होल्डर) की समाएँ करने की जरूरत पड़ती है। सरकार द्वारा ही सब काम बिना किसी कठिनाई के सरलतापूर्वक चलता है। हिस्सेदार और डाय- रेक्टर वगैरह सब सर्वसाधारण की पूंजी से बनी हुई कप. नियों में होते है और सरकार ने जो व्यवसाय वाणिज्य अपने हाथ में नहीं लिए हैं, उनमें वे अपनी करामात दिखाते हैं इवना ही नहीं, जर्मनी के भिन्न भिन्न प्रातों की जो आमदनी है उसका बहुत सा भाग सरकार द्वारा किफायत के साथ चलाए हुए व्यवसाय-वाणिज्य से प्राप्त होता है। प्रजा पर कर लगाने के प्रश्न पर विचार करते समय सरकार इस बात को ध्यान में रखती है और इस कारण कुछ प्रातों में प्रति मनुष्य कर का भार हलका क्यो है, यह बात सहज ही ध्यान में आ जाती है । सन् १९०५ के जर्मन राष्ट्र का बजट देखने से यह पता चल जाता है कि कुल आदमनी में से ३१३ सैंकड़ा आमदनी सरकारी कारखानों में होती है और सब प्रावों की मिला कर यह मामदनी ६८ फी सदी पड़ती है। जर्मन राष्ट्र और राष्ट्रावरगत सब प्रातों में से सरकारी कारखानों की -

।
,
(६१७२)
थामदनी १४,५७,५०,००० पौंडा है। साम्राज्य की आमदनी
का द्वार डाफा और तार, आलसेम-लोरेन को रेलवे, "इपीरियल
प्रिटिंग वर्कस्" और "इपीरियल बैंक" हैं। प्रातों की आपरलब,
डाक और तार, जंगल, जमीन, कोयला, लोहा, पोटॉश भादि
कीखानों और लोहा साफ करने के कारखानों से होती है। सन्
१९०६ में केवल प्रशिया में ३९ खाने, १२ लोहा माफ करने
के कारखाने, पाच नमक बनाने के कारखाने, तीन पत्थर की
खाने और एक अबर ( Amber ) का कारखाना सरकार क
अधिकार में था।
पहले जमाने में जमीन की मालगुजारी ही सरकारी
आमदनी का मुख्य द्वार थी, और यही दशा छोटे छोटे प्राप्तों
में अब भी पाई जाती है। बड़े बड़े प्रातों में जमीन की
मालगुजारी का स्थान रेल की आमदनी ने ग्रहण कर लिया
है। इस काम में प्रशिया का नबर सब प्रातों से ऊँचा है ।
सरकारी खर्च रेलवे की आमदनी से जितना उस प्रात में चलता
है उतना और किसी प्रात में नहीं चलता। प्रशियन लोगों को
इसका पूरा पूरा भरोसा है कि सरकार के स्थापित किए कार.
'स्त्राने पूर्णावस्था को प्राप्त होंगे, और इस काम के लिये सरकार ने
यदि कभी धन मागा तो उसका जिक्र भी पार्लियामेंट (डापट)
में कभी नहीं किया जाता। प्रशिया का यह उदाहरण देख
कर अन्य प्रातो की प्रजा के मन में भी ऐसे ही भाव उत्पन्न
होते।
। जा रहे हैं। रेलवे अथवा अन्य प्रकार के कारखाने
बिजली की शक्ति से चलाने के लिये पानी की शक्ति का
उपयोग करने की कल्पना बवेरिया प्रात में अभी हाल में
-

(१७३) ही की गई है और इस काम को उत्तमतापूर्वक चलाने का प्रयत्न यवेरिया की सरकार कर रही है । प्रातिक नदियों और नालों के पानी क उपरोक कामों के लिये उपयोग करने का अधिकार सरकार को पहले ही स है। इस पानी की शकि से पिजली उत्पन्न करके जहा आवश्य- कता हो वहा उसे एकत्रित करके रखने का प्रयत्न वहा की सरकार अपार धन लगा कर कर रही है। साक्सेन सर- कार ने भी इसी प्रकार की आयोजना अपने यहा की है। परतु वहा का लोकमत, इस काम के लिये जितना अनुकूल होना चाहिए उतना अभी नहीं है। जगलो और जमीन की मालगुजारी से भी प्रातों को आमदनी हती है यह अपर कहा गया है । सरकार के अधिकार में बहुत सी जमीन होने से खेती के हानि लाभ पर उनका कल्याण अकल्याण निर्भर है। इस कारण बडे और छोटे दोनों प्रकार के जमीदारों को अपने आश्रित समझ सरकार अपनी सम दृष्टि रख कर राष्ट्र को अधिक लाभ पहुंचा मकती है। परतु प्रसिद्ध राजनीतज्ञ प्रिंस विस्मार्क का विचार था कि प्रशियन राजनीतिज्ञों (मिनिस्टर आफ स्टेट) को जो वतन सरकारी खजाने से दिया जाता है उसका कुछ भाग तो नकदी के रुप में दिया जाय और कुछ वतन के बदले में जमीन दी जाय, और उस जमीन से अपने लिये वे जितना धन चाहें पैदा कर लें। इस सिद्धात से राष्ट्र की मुख्य भामदनी का द्वार जो जमीन है उसकी दशा कैसी है, इस पर सरकार की दृष्टि रहेगी और उसका सुधार किन उपायों

((१७४)
स्वत
से किया जा सकता और कौन सा मार्ग प्रहण करना चाहिए,
यह बात स्वतः के अनुभव से निश्चित की जा सकेगी।
प्रत्येक प्रात में बहुत सी जमीन सरकार के हाथ में है और
उस जमीन की आमदनी सरकार को मिलती है। इस पर
से यह कहा जा सकता है कि प्रिंस बिस्मार्क के उद्देश्य मे
चाहे कुछ रुकावटें मालूम हो परतु वे साध्य अवश्य हैं, और
इसी का अनुकरण करके सरकार दिनों दिन जमीन को अपने
अधिकार में करती जा रही है । सरकारी जमीन को १८ वर्ष
के लिये पट्टे पर देने का वहा पर नियम है और इस नियम
के कारण सरकार को खेती की दशा दूसरे से जानने के बजाय
आप जान लेने का मार्ग उसके अपने हाथ मे
है। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य भाग में जमीन की लगान
की आमदनी में २५ से ३० फी सदी कमी हो गई थी। परतु
सेती की धुरी दशा क्यों हो गई, इसको जानने के लिये उस
समय सरकार को कोई कमीशन नियत करने की आवश्यकता
नहीं पडी। स्वत की जानकारी से ही सरकार ने यह जान लिया
कि खेती के काम में कहा क्या त्रुटि है। सरकारी कृषि विभाग
द्वारा सदा नए नए प्रयोग वहा होते रहते हैं और उनसे
छोटे मोटे किसानों को बहुत लाभ पहुँचता रहता है। इसी
प्रकार सरकारी जमीन में खेती उत्तमतापूर्वक होनी चाहिए
इस प्रकार के कटाक्ष कृषि विभाग की ओर से होने पर उधर
लोगों का ध्यान जाना एक सहज सी बात है। आसपास
क
खतों में उत्तम फसल को देख कर, सरकार के कृषि विभाग
का ध्यान उस भोर जाता है। सरकारी कृषि विभाग द्वारा

9
।
उसको किसी प्रकार की हानि 'न होकर उल्टे. सरकारी
मालगुजारी की उन्नति का एक उत्तम साधन है। सरकार न
कृषि विभाग की स्थापना लोगों के लाम के लिये की है, यह
बात नहीं है। कृषि विभाग द्वारा सरकारी जगलों और पाग
बगीचों से जितना आमदनी बाई जा सके उतनी बढाने
का सरकारी अधिकारी प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार सरकारी
आमदनी बढ कर देश की खेती का भी सुधार होता है
और इस प्रकार इस सरकारी महकमे को दोहरा लाम पहुँचता
है। प्रशिया में जगलों से बहुत बड़ा फायदा होता है ।
उसकी व्यवस्था के लिये सरकार ने एक स्वतत्र महक्माही बना
लिया है । फारेस्ट्री की शिक्षा पास हुए लोगों को इस महक्में
में जगह दी जाती है । इस महकमे की दशा इतनी अच्छी
है और इससे वहा इतनी आमदनी हो जाती है कि कैसर
के निज का आधा सर्च इस महक्में की आय से पूरा
किया जाता है।
रेलवे की मालिक वहाँ सरकार है और उसकी सारी
व्यवस्था भी उसीके हाथ में है। जर्मनी में रेलवे की व्यवस्था
इतनी उत्तम है फि और कोई भी महक्मा इतनी किफायत क
साथ काम नहीं करता, यह अनुमान नहीं है अनुभव की बात
है। परतु जर्मनी की प्रचलित रेलवे व्यवस्था बहुत से अगरेज
लोगों को पसद नहीं है।
उनका विचार है कि रेलवे की
व्यवस्था कंपनियों के हाथ में रहना ही सुखकारी है ।
परतु यह विचार ठीक है या नहीं, इसके पीछे 'जर्मन लोग
नहीं पड़ते । अनुभव से उन्होंने निश्चय किया है। कि रेलवे

की व्यवस्था सरकार के हाथ में होने से ससमें बहुत कुछ
सुधार हुआ है और रेलवे केनौकर अपना अपना काम बहुत
आस्थापूर्वक करते हैं, इस कारण लोगों को भी सुख पहुँचता
है और सरकार को भी अधिक लाभ होता है । सरकारी
महत्व बढाने का अवसर आने पर प्रशिया उसे फजूल जाने
नहीं देता। सरकार के हाथ में रेलवे का काम शुरु होने
पर सबसे पहले प्रशिया ने ही नेतृत्व स्वीकार किया। सन्
१८३८ में "प्रशियन रेलवे लॉ" नामका एक कानून सब से
पहले पास हुआ। इग्लैंड को रेलवे पद्धति का अनुकरण
करके सर्वसाधारण के धन से कपनिया बना कर रेलव बनाने
की उस कानून में पूरी पूरी स्वतत्रता दी गई थी। परतु इसी
प्रकार की कपनियों के काम पर मरकार सख्त नजर रक्संगी,
इस प्रकार का अधिकार सरकार ने अपने हाथ में रक्सा
था और तीस वर्ष पश्चात् यदि सरकार उचित समझे,
इन रेलों को अपने अधिकार में ले सकेगी ऐसी भी कानून में
व्यवस्था की गई थी। आरभ में सरकार ने यह व्यवस्था वो
की, परतु शीघ्र ही इन ऊपनियों के हाथ से रेलवे खरीद लेने
का काम आरंभ कर दिया। कुछ कंपनियों को उधार रुपया द
कर सौर ने उसमें अपना पैर जमा दिया। इस प्रकार अब
बहुत सी रेलवे प्रशिया में सरकार के हाथ में आ गई हैं और
थोड़ी बहुव जो वाकी रह गई हैं उनपर भी सरकार की नजर
है। साक्सेन, बरिया, बुदृवर्ग और वेडन प्रातों ने भी प्रशिया
का ही अनुकरण किया है रेलवे की व्यवस्था सरकार के हाय
अहोना सब प्रकार से हितकारी है, यह बाद गत पचीस तीस
.

। . - ~ वर्ष में इतनी सर्वमान्य हो रही है कि अप इस विषय पर काई भी नर्मनी से पर्चा भी नहीं करता कि सर्वसाधारण द्वारा स्थापित कंपनियों द्वारा रेलवे की व्यवस्था अच्छी है अथवा सरकार के हाथ में रेलवे होने से व्यवस्था अच्छी है। सारे प्रातों के ऊपर अधिक अधिकार चलाया जा सके, इस राजकीय उद्देश्य को आगे रख कर जर्मन साम्राज्य की स्थापना होने से प्रिंस मिस्मा का यह कथन था कि जर्मनी की मारी रेलवे जर्मन राष्ट्र की मिलकियत होनी चाहिए और इस काम में प्रशिया ने आगे हो कर अन्य प्रातों के लिये उदा हरण दिखला दिया । इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये सन् १८७५ मे उन्होंने प्रशियन पार्लियामेंट के सामने एक व्याख्यान दिया था और उस व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि "प्रशिया को अपनी रलवे का स्वत्व और अन्य सब प्रकार - का अधिकार जर्मन साम्राज्य को अर्पण कर देना चाहिए।" इस भाषण पर रडिकळ पक्ष के सभासदों ने बहुत कुछ टीका टिप्पणियाँ की थी पातु उनसे कुछ लामाल हुमाप्रिंस विस्मार्क का कथन सबों ने बहुमत से स्वीकार कर लिया । इस प्रकार प्रर्शियन पार्लियामेंट ने अपनी सारी रेलवे साम्राज्य सरकार के स्वाधीन कर दी । परतु अन्य प्रातों में इस काम में वैसी सहायता नहीं मिली जैसी प्रशिया से। इस कारण प्रिंस बिस्मार्क का मुख्य उद्देश्य सिद्ध न हो सका। प्रशिया के विषय में अन्य बहुत से प्रातों को बहुत कुछ मत्सरता है। इसी कारण प्रशियों के अगीकार किए हुए काम का तुरंत ही अन्य प्रांतों में हो जानामि कठिन कामाहे रेल्वे का स्वत्व उनसन प्रात . . - - (((१७८) के पास और कुछ दिनों तक रहेंगा, ऐसा रंग दंग दिखाई पड़ता है, और यह वर्तमान समय के लोकमत से सष्ट जाना जाता है। बहुत-से मालिकों की बहुत सी रेलवेहोना, यह दशा व्यापारिक दृष्टि से हितकारी नहीं है, यह बात ध्यान में जख कर रेलवे की व्यवस्था में से कुछ व्यवस्थााइस ढग की रक्खी गई है कि उससे सारे साम्राज्य में समाना नियमों का पालन हो सकता है और उन नियमों का पालना ध्यानपूर्वक .सब प्रातों को करना चाहिए। उदाहरणार्थ रेल्वासे भाने और जानेवाले माल के किराए का दरमा तत्सबंधी नियम, टाइम टेबल और इसी प्रकार की अन्य छोटी छोटी बातों के यावत सारे, नियम साम्राज्य भर में समान हैं, और इस अवस्था से व्यापार के काम में जो कठिनाइया · उपस्थित होने का भय था, वहा बिलकुल नहीं रहा न Tr •rm सन १९०५ के भत में जर्मन साम्राज्य भर में,३४,१०५ मीळ रेलवे भी इसमें से २१,६१५मील भिन्न भिन्न ातों की, सरकारी की थीथवा सर्वसाधारणद्वारा स्थापित कप- नियो की थी, जिनकी निगरानी सरकार स्त्रय करती थी। वाकी-२,५६४ मील रेलवे सर्वसाधारण के धन से बनाई गई थी "औराइसम सेमी १९८२ मील तो दूसरे दर्जे की थी। यदि हिसाब लगा कर देखा जाय तो 1पाया जायगा कि.१०० वर्ग मील में २६२ मील और की एकालांखः भादमी पीछे।५६७ मोल रेलवे का परता पड़ता है और फो मील २१,३०० पौड. वर्ष पड़वा है। इस प्रकार ७४,RY०० पाँड.मल धन रेलवे में लगा रक्षा . बरन ।। १३,१८,५०,००० पौंड हुई थी और खर्चा७,७७,५७,००० पोल हुमा मा अर्थात् खालिन मुनाफा ४,४८००० हुमा । इस वरह मूलधन पर प्रति वर्ष,६पोडा५ शिलिंग की सदी व्याज पड़ता है। रेलवे में काम करनेवाले नौकरों की सख्यास माल ६०,३,७५५.थी। । D. IF THE Mail 8. भारेलवे की व्यवस्था सरकार के हाथ में होने से जो सब से घड़ी हानि होती है वह यह है कि सरकार अपनी आमदनी बढाने का प्रयन जहाँ अपने सरकारी अन्य विभागों द्वारा करती है वहाँरेलवे ने भी भामदनी बढ़ाने का उसका प्रयन जारी रहता है ।इस विषय में प्रशिया प्रात सत्र से भागे है। प्रशि- .यन सरकार, कोबहुत बड़ी आमदनी रेलवे से ही होती है। रेलवे की व्यवस्था के लिये। अधिक धन खर्च करना अथवा लोगों को किराए में अधिक सहूलियतें देना, यह कभी सर- कार स्वीकार नहीं करती और इस..कारण व्यापारी लोगों में बहु कुछ असदोष उत्पन्न हो गया है। रेलवोकी वर्तमान व्यवस्था धुरी, है, ऐसा वालोग नहीं कहते, उनका कथन इनाही.कि, जितना हो सके उतना ही धन बटोरने की, सरकारी नीति सार्वजनिक कल्याण की दृष्टि से अल्छी नहीं है। एसना के चेंबर ऑफ कामर्सः चे सन् १९०६ में इस विषय पर जो अपने विचार प्रकट किए थे, उनमें यह बात बताई गई थी कि सरकारी आमदनी रेलवे कीरथामदनी पर अवलवित होने के कारण सार्वजनिक हितको घका पहुँचवाई सरकारी भासदनी त्रदान की इच्छा होने FIRE emint FOR It . 1

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-
एल्ब, लोडर, धौर वेखर नदिया दक्षिण से उत्तर को बहती
है-इस कारण पश्चिम, और पूर्व प्रदेशों में माल ले जाने का
कुछ भी उपयोग इन नदियों द्वारा नहीं होता लल्म से लेकर
वायना तक पूर्व की ओर बहनेवाली केवल एक नदी डेन्यूब है
परंतु उसका भी दक्षिणी जर्मनी, में थोड़ा सा ही उपयोग हो
सकता है। यह दशा, बहुत दिनों से सरकार के ध्यान में
थी, और नहरों द्वारा व्यापार को अधिक लाभ होगा, यह
भी, वह जानती थी, और इसके लिये उसने कुछ नहरें भी
पहले निकाली थीं 11.अब हाइन, एस्त्र, एस, मोडर और
विश्चुला आदि नदियो तथा इनकी शासानों के सम्मेलन
से धनी हुई नहरें ही मुख्य हैं । अपर जिन नदियों के नाम
बताए गए हैं, वे बहुत बड़ी हैं। उनमें पानी, भी
बहुत
है।
। इस कारण व्यापारी जहाज,इन नदियों में आ जा सकते हैं।
इन जहाजों के आने जाने की आसानी के लिये जहां पानी
गहरा नहीं है वहा गहरा करने का प्रयत्न जारी है ।। इन
नदियों की कुछ नहरें तो इतनी चौड़ी हैं कि उनमें छोटे छोटे
जहाजों का आना जाना भी ,मासान, हो गया है। देश में
जलमार्ग का विस्तार शीघ्रता से हो जाने के कारण दूरादूर
कोपात भी एक दूसरे के पास हो गए हैं। - : ritr
नहरों के बनाने की ओर भाजफल प्रशियन सरकार का
भ्याने सूब लगा है।, एक लहर हाइन नदी से डार्टमड एम्स
नहर तक, दूसरी यहॉ से वेसर- नदी वातीसरी वेसर-से
और घौसी बहुत गहरी बर्लिन मे।स्टेटिन तक निकाली गई है।
इसके अलावा और भी छोटी छोटी नहरे निकालने के लिये

।
.
-
की ओर जितमा जाना चाहिए चना नहीं जाना और इस
कारण माल ले जाने में अधिका किराया लगने से कुछ सुभीता
नहीं होता। - यदि जनता की ओर से इस विषय में कुछ
आंदोलन किया जाता है तो सरकार उस ओर उतना ध्यान
नहीं देती जितना देना चाहिए, और फिराप की दर प्राय
स्थिर कर दी गई है। सन् १९०६ से प्रशियन पार्मि-
यामेट रेलवे विभाग की व्यवस्था को ध्यानपूर्वक देखने लगी
है। कृषि और वाणिज्य की जितनी उन्नति हो सके उतनी
करने के लिये रेलवे के झगड़े जितने कम करना सभव हों
किए जावें, इस विषय का एक प्रस्ताव भी पार्लियामेंट ने
पास कर दिया है , परतु उसका उपयोग में' भाना असंभव
अवीत होता है। क्योंकि सरकार कहने लगती है कि रेलवे
की आमदनी अवश्य हमें अधिक होती है परतु हम भी तो
प्रजा। पर इसी कारण कर कम लगाते हैं। यदि कर कम
वसूल होगा वो हमारी आमदनी कम हो जायगी और शिक्षा
"तथा इसी प्रकार के अन्य कामों में सरकार को अधिक खर्च
करने की गुजाइश न रहेगी । इस कारण सरकार जो कुछ कर
रही है उसमें हस्तक्षेप करने का किसी को साहस नहीं होता
और न ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार इस व्यवस्था में कुछ
फेर फार करने को तैयार है।।
मारे देश मे रेलवे का जाल बिछ जाने के कारण देश में
माने जाने अथवा माल लाने या भेजने में बहुत सुगमता हो
“गई है। इसी प्रकार नदियों से नहरें निकाल कर इस कार्य
में और भी सरलता कर दी गई है। जर्मनी में हाइन,
1

.
(१८)
एल्ब, प्रोडर, और वेसर नदिया दक्षिण, उत्तर को, बहती
है इस कारण पश्चिम और पूर्व प्रदेशों में, माल ले जाने का
कुछ भी उपयोग इन नदियों द्वारा नहीं होताअल्म से लेकर
वायना तक पूर्व की ओर बहनेवाली केवळ एक लदी डेन्यून है
परतु उसका भी दक्षिणी जर्मनी, में थोड़ा सा ही उपयोग हो
सकता है। यह "दशा, बहुत दिनों से सरकार के ध्यान में
थी, और नहरों द्वारा व्यापार को अधिक लाभ होगा, यह
भी वह जानती थी, और इसके लिये उसने कुछ नहरें भी
पहले निकाली थीं।
अब दाइन, एस्य, एस, मोडर और
विश्चुला आदि नदियों तथा इनकी शासानों के सम्मेलन
से धनी हुई नहरें ही मुख्य हैं । अपर जिन- नदियों के नाम
यताए गए हैं, वे बहुत बड़ी हैं उनमें पानी भी बहुत है।
इस कारण व्यापारी जहाज,इन नदियों में आ जा सकते हैं।
इन जहाजों के आने जाने की आसानी के लिये जहा पानी
गहरा नहीं है वहा गहरा करने का प्रयत्न जारी है। इन
नादियों की कुछ नहरें तो इतनी चौड़ी हैं कि उनमे छोटे छोटे
जहाजों का आना जाना भी भासान, हो गया है। देश में
जलमार्ग का विस्तार शीघ्रता से हो जाने, के कारण, दूर दूर
के मात भी,एफ दूसरे के पास हो गए हैं। - Anirr
• , नहरों-के, मनाने की ओर भाजपल प्रशियन सरकार का
भ्यान सूब लगा है। एक तहराहाइन नदी से डार्टमड एम्स
नहर तक, दूसरी वहाँ से वेसर नदी तक तीसरी वेसर-से
और चौथी बहुत गहरी.अनि से स्टेटिन तक निकाली गई है।
इसके अलावा और भी छोटी छोटी नहरे-निकालने के लिये
.
.

-
सरकारने सादियानल'लापास कर दिया है। इस
काम
पर सरकार" एक करोड़ सोठ लोखपौडि खर्च करना
चाहती है। दक्षिणं प्रात में नहरोका जाल
ऐसा बिछा हुमी
हैं और एक दूसरे से नहरें ऐसी जोड़ी गई है कि उत्तर प्रांत
और बाल्टिक समुद्र तथा वायना और डेन्यूब नदी पर' के अन्य
शहरों के बीच में पानी के ऊपर से आने जाने का कार्य बडी
सुगमता के साथ हो रहा है । हाइन अथवा एल्ब इन दो
नदियों के किसी भी बदरें की अपेक्षा बर्लिन बदरं पर व्यापार
बहुत अधिकता से होता है । बर्लिन राजधानी 'स्पी नदी के
किनारे बंधी है। सन् १९०४ में २४,३०० जहाजो में ४०
लाख टन माल स्त्री नदी पर से बलिन के बंदर में उतारा
गया । यह सूचना सरकारी खोज से प्रकाशित हुई है। उस
बदर से स्पी नदी के प्रवाह द्वारा नीचे जानेवाले 'माले की
मस्या और भी अधिक है। दो सौ फुट से अधिक लये, २६
फुट चौड़े और ६०० टन माल ले जानेवाले जहाज, इस नदी
में माजा संकेते हैं। इससे नदियाँ और नहरें व्यापा-
रोन्नति के काम में कितनी उपयोगी साबित हो रही हैं, यह
बात पाठकों के ध्यान में आ जायगी।
जर्मनी में जलमार्ग"से देश के देश में ही होनेवाले
व्यापार को इतिहास देखने से पाया जाता है कि उसकी गति
आज तक कही मी रुकी नहीं है। 'परतु ईश्वर निर्मित जल
मार्ग में स्थाने जाने के काम में हर एक को अधिकार प्रास
नहीं है। यह बात अवे पशियन परकार कहने लगी और
इसी लिये साम्राज्यांतर्गत
सारी नदियों पर कर बैठाया जाय,
+

- ((१८) ऐसी सूचनाविन्यासातोंकीसिरकारों को प्रशियन सरकार ने दी है। यह सूचना भिन्न भिन्न मार्गों द्वारा अन्य प्रातों तर्फ पहुँचाई गई हैं। परतु इस समय इन सूचनामों पर प्रातिर्फे सरकारें विचार करेंगी, इसके कोई लक्षण नहीं दिखाई पड़ते, पर, मागे,चल कर इन सूचनाओं पर उन्हें विचार करना ही पड़ेगा। प्रशिया में कृषि प्रधान विभागों के आए हुए पार्लिया- मेट क मेंपर लोग इस बात के विरुद्ध थे कि सरकार को नहरें बनाने का काम अपने हाथ में लेना चाहिए। परतु मत में अता पछता कर वे इस . पर राजी हो गए। हाँ, उन्होंने सरकार से भी यह बात स्वीकार करा ली कि जलमार्ग द्वारा होनेवाले व्यापार की आसानी के लिये नदियों और नहरों पर कर बैठाने का अधिकार हमें रहे। प्रशियन सरकार ने नुनका यह कथन एक दम ,स्वीकार कर लिया, यह बडे आश्चर्य की बात है। इस विषय में जर्मनी के अन्य प्रातों का निकट सबध तो है ही परतु जर्मनी के पदोघी अन्य राष्ट्रों- से भी इसका सबध है। इस कारण उपरोक वचन देने के पहले अन्य राष्ट्रों और प्रातों का इस विपया में क्या मत है, इसको जान लेने की प्रशियन सरकार को बहुत बड़ी आवश्य- कती थी। परतु यह न करके जो वचनाप्रशियन सरकार ने दे दिया है उसे पूरा करने के लियेोकपकों की ओर के सभासद बरोबर जोर दे रहे हैं। इस कारण प्रशियन सरकार ने उन अन्य प्रांतों और पडोसी राष्ट्रों से इस विषय में पत्रव्यवहार शुरू कर दिया है, और इसका मंतिम परिणाम कया होगा यह अभी से कहा नहीं जा सकता। - -

।
-
कर, बैठाने का नियमः प्रशियनॉसरकार ने एक दम
कर लिया यह किसी विशेष कारण के पिना-नहीं हो सकती।'
पहला कारण तो यह प्रतीत होता है कि जलमार्ग (नदियाँ)
और लोहमार्ग (रेल गाड़ियों) के बीच बहुत कुछ ऊपरा
चढ़ी हो रही है और इससे रेलवे की आमदनी कमाही जाने
का बहुत कुछ भय लगा हुभा है। दूसरा कारण यह हो
सकता है फिजर्मनी के अत प्रदेश में;, जलमार्ग द्वारा विदेश
से. जो माल आता है, उसके न आने की इच्छा ही शायद
इसकी जद में हो। किसान लोगों नोभी वाद विवाद के
समय पर एक कारण बतलाया था। प्रशिया के "अपर
हाउस" में किसानों की ओर से आदोलन करनेवाले सभा
सदों में से एक सभासद ने निम्नलिखितः विचार 'प्रगट । किए
थे-"यह कर लगाने से विदेश से अनाज का आना
बद हो जायगा और यह होना ही चाहिए" यह मैं स्पष्ट
शब्दों मे कहना चाहता हूँ। कर की देरमें उचित अंतर
रसने से हमारे समान पूर्वी प्रशिया में अनाज पैदा करने.
वाले लोगों को हाइनानदी के किनारे विदेशी अनाजवालों
से अपरी चढी करने में आसानी होगी। इस सभासद के
कथनानुसारकर लगाने पर यदि किसी को-हानि होने की
सभावना है तो वह अनाज घोनेवालों की है। यह बात'
उसके ध्यान में क्यों नहीं आई, 'यह समझ में नहीं आता।
नछी के ऊपर चलनेवाले जहाजो मालिक नवीन कर
जितना लगायेंगे, उसी हिसाबले अपना किराया
बदाने में वे किसी प्रकार की कमी नही करेंगेकेवल पश्चिमी
.
.

+
+
जर्मनी से जहां समुद्र काकिनारा है विदेशी व्यापारियों
को उस-प्रोत से अनाज 'लोना बहुत मासान है इस
कारण, यदि उन्हें नया कर भी देना पड़ेगा तो भी दह
कोई कठिनता न मालूम होगी। यदि जर्मनी के पूर्वी भाग से
आनेवाले मनाम पर हाइन और एल्ब नदियों पर अधिक
किराया देना पड़ेगा तो यह बोला देशी अनाजवाही को
असह्य हुए बिना ना रहेगा।. तात्पर्य यह है कि नया कर
लगाने से विदेशी अनाज के व्यापारियों को जर्मनी के बाजार
से निकाला जा सकेगा, उसामात के विद्वानों के ये विधार
विष्टफुल भ्रमात्मक हैं, ऐसा प्रतीत होता है। " .
"प्रशियन सरकार ने जिस "कर को बैठाने की अवस्था
की है वह कर लगाया जा सकता है अथवा नहीं, यह प्रभ
पहले साम्राज्य व्यवस्था के नियमों के आधार से ही त्याग
देना चाहिए और पश्चात् राष्ट्र राष्ट्र के इकरारनामों पर दृष्टि
रखकर यह देखना चाहिए कि कर का लगाना उचित होगया
नहीं। राज्यव्यवस्था के नियमों में फरफार करने कीलिये जर्मनी
के अन्य प्रांतों की समति लेना प्रशियन सरकार को जरूरी है।
परतु इसके अलावा फ्रास, हालैंड और आस्ट्रिया-हगरी का
मत भी इसमें अनुकूल होना चाहिए, क्योंकि १७ अक्तूबर
सन १८५८ के "हाइन नेविगेशन" एक्ट नाम कानून
के अनुसार प्रशिया, पेडन, बवेरिया और इसी मावि
प्रातों की ओर अधिकारियों की सहायता होने से प्रास
और हाड भी इसी पक्ष में है। इसके अलावा "एल्ट
नेविगेशन एक्ट" नाम का जो कानून बनाया गया है और
-

--
-
-
जिस कानून के आधार परासेही पल्प नदी हो करीजो
चाहे वह अपने जहाजों को स्वाधीनता के साथ ले जा सकता
है वह कानून पास्ट्रिया को भी पसद है। ..
साम्राज्य-व्यवस्था के नियमानुसार कर बैठाया जा
सकता है अथवा नहीं इस विषय. में कानूनाजाननेवालो
में मतभेद है। जर्मनी के कुछ प्रात यदि इस काम के लिये
अनुार हो जॉय तो क्या वाकी के प्रात भी अपना मत मनु-
कूल प्रदर्शित करेंगे, इस बात का अभी कोई भिरोसा नहीं है
औरन यह आशा की जा सकती है कि प्रास, हालैंड और
आस्ट्रिया कभी इस बारे में अपनी अनुकूल सम्मति प्रगट
करेंगे। इन सब कारणों से यह जाना जाता है कि प्रशिया
की उद्देश्यपूर्ति मा अनेक असुविधाएँ उपस्थित हैं। "उन सब
असुविधाओं को दूर कर के प्रशियन सरकार अपना उद्देश्य
पूरा कर सकेगी अथवा नहीं, इस विषय की अधिक
छानबीन करने की माज आवश्यकता नहीं है। प्रशिया ने
जो प्रमाउपस्थितं किया है उसका स्वरूप क्या है, यहाँ पर
केवल यही बात ध्यान में रखने योग्य है। "
-
क

14
-)-
"
(101
Es 13 15ip 3nzija tarzlarita in jos
Ptjirmire
13 बारहवां अध्याय ।
कृषि और वाणिज्य व्यवसाय ।
सारे फे देश में ही अनेक ऐसे कार्य हैं जिनकी उन्नति
की और जर्मन' राष्ट्र का ध्यान लगा हुआ है । उन
कायों में कृषि भार वाणिज्य व्यवसाय मुख्य हैं। इन दानों
में किस प्रकार ' का सबध होना चाहिए, यह प्रश्न बड़ा
जटिल है और इन दोनों में अर्थात् कृषि और वाणिज्य
व्यवसाय में कोई भी एक दूसरे का मारक न हो ऐसी
व्यवस्था सरकार को करनी पड़ती है। यह घर का काम है
परतु बड़ा नाजुक, क्योंकि व्यवसाय वाणिज्य की वृद्धि होने
से खेती की अवनति होना एक सहज वाव है। इसी प्रकार
खेती की उमति के लिये 'कानून कायदे बनाने से वाणिज्य
व्यवणय की दशा में अतर पड़ जाता है। केवळ खेती या
केवल व्यवसाय वाणिज्य हा एक देशीय विचार यदि किसी
ने किया तो दोनों का सागोपाग विवेचन करना बहुत
कठिन दे और यदि सब प्रकार से उस पर विचार करना हो
तो वर' विस्कुल भभक ही है, क्योंकि इनके सिवाय इन
दोनों पर जबलर्षित रखनेवाली राष्ट्रीय हिसाहित"
जो चौर वाते हैं चिनी मोर दुर्लक्ष्य होने की बहुत कुछ
सभावना है।
~ जर्मनी किसान लोग कहते हैं कि यदि भविष्य में
-
--

, (१०८) जर्मनी की सांपत्तिक उमति होगी तो हमारे द्वारा ही होगी। परंतु व्यवसाय वाणिज्याभिमानी लोग इसके विरुद्ध कहते हैं। इस प्रकार दोनों का वाद विवाद चल रहा है । जर्मन राष्ट्र के ये दोनों पलडे बराबर रहें,..इस उद्देश्यपूर्ति के लिये साम्राज्य सरकार ने जो उपाय किए हैं, उन्हें कहाँ तक यश प्राप्त हुभी है, इसमें भी सदेह है। परतु कृषि की उन्नति हो, इस उद्देश्य से- उद्योग करना आवश्यक और बुद्धिमानी का काम है और इस विषय में किसी का मतभेद भी नहीं हो सकता। क्योंकि मनुष्य जीवन की रक्षा करने.. चाली खेती ही है और अब तक जर्मनी में कभी, इसकी अव- हेलना नहीं हुई। , राष्ट्र का अभ्युदय और उसकी स्थिरता और उन्नति होने के जितने कारण है सन सबों में खेती मुख्य है। प्रेट ब्रिटेन, के सयुक्त राज्य में ,सन १८८१ में प्रति दस हजार मनुष्यों के पीछे खेती करनेवाले ७११-मनुष्य-थे और सन १९०१ में यह संख्या घटकर-४९५ रह गई अर्थात् प्रति सैकड़ा ३वा के हिसाब से कमी हुई। परतु जर्मनी में सन १८८२ में प्रति दस हजार में १७८३ मनुष्य कृषक थे और सन १८९५ में यह संख्या घट कर १५५४ रह गई अर्थात् प्रति सैकड़ा १३ की कमी, हुई। सन-१८९५- की, मनुष्यगणना पाया जाता है कि पाँच करोड़ बीस लाख मनुष्यों में से एक करोड मस्सी लाख लोग खेती और बाग बगीचे पर उदर निर्वाह करते थे और यदि जगल. भी इसमें शामिल, कर लिए जॉय तो यह सख्या पॉप लाख और बढ़ जाएगी, व मान केल, कुछ दिनों सेखेती की भोर कुछ कम 1

सहानुभूति दिखाई पड़ती है। समव है इसका दोष कदाचित्
किसानों के ही मत्थे मदा जाय। अपनी आवश्यकताओं को
जान'कर, उनकी पूर्ति के लिये लोकमत जापत करने का
प्रयत्न व्यवसाय करनेवाले लोग पराबर करते हैं । परतु
इसके विपरीत राष्ट्रीय और प्रातिक पार्लियामेंट में कृषकों की
ओर से सभासद इस बात का प्रयत्न करते रहते हैं कि प्रिंस
विस्मार्क ने जो राज्यव्यवस्था की नींव डाली थी, उसका प्रचार
किया जाय । प्रिंस पिस्मार्क के 'समय में उद्योग युग का
आरभ नहीं हुआ था इसलिये जितना खेती का प्रसार किया
जा सके उतना किया जाय, यह उनका मत था। परतु गत
तीस वर्षों में कितना सांपत्तिक सुधार हुआ है, इस महत्व
की मात को ये सभासद गण ध्यान में नहीं लाते । इस
कारण'वर्तमान समय में भी प्राचीन काल के समान ही बने
रहने का आग्रह करना अज्ञानमूलक है, इसमें संदेह नहीं है ।
जर्मनी की वर्तमान दशा को देख कर, उसके विशिष्ट
लक्षण क्या है और वे किस बात पर अवलयित हैं इसकी
खोज किए "बिना, एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करनेवाले इन
दानों पक्षों के विवाद का निर्णय करते नहीं बनता, अतएव
उसकी मीमांसा करना परमावश्यक है।
खेती पर छदर निर्वाह करनेवालों की संख्या दिनो दिन
कम होती जाती है। ऐसी दशा में, सेती को 'सुधार करने
को जो प्रात प्रयत्न कर रहे हैं उनकी अवस्था वही है जो
असाध्य रोगी की औषधोपचार करने से होती है, बहुत
से लोगों की एसी रोय है, परंतु यह उनकी भूल है, क्योंकि
न
-

. m + . जर्मनी में, खेती की, ऐसी बुरी दशा नहीं होगाई जेवावे लोग, अनुमान करते हैं। जर्मनी के जमीदार बहुधा यह रोता रोया करते हैं कि हमारा उद्योग नष्ट हो रहा है, हमारी जीविका रसावल को चली जा रही है , परतु इस रोने धोने में सत्य की अपेक्षा, हाय हाय, ही बहुत है, क्योंकि उत्तरी, और पूर्वी जर्मनी के बड़े बड़े प्रातों में फसल पैदा करने योग्य अधिक जमीन मौजूद है इसलिये सेती कर-के; अधिक धना पैदा करनेवाले जमींदार यदि, चाहें तो उन्हें भव भी वहाँ इस - काम में सफलता प्राप्त करने की बहुत कुछ गुजाइश है., और जो लोग छोटे पैमाने पर खेती करते हैं, उनके लिये तो सारे देश भर में बहुत कुछ, सहूलियतें मौजूद हैं। खेती करनेवाले लोगों में कुछ लोग तो ऐसे हैं जिन्हें खेती पर बिना कारण ही प्रेम है। कृषकों के हिताहित कि विचार से दया को सामने रख कर वे कुछ काम करते हों, यह बात नहीं है,। परतु ये लोग अपने तत्वज्ञान के घम में आपकर यह प्रतिपादन करने लगते हैं कि शहरों की जन- सख्या, अधिक बढ़ जाने के कारण घनी, वस्ती होने से शहर के निवासियों की शक्ति का हास हो जाता है । परतु देहात की आवाहवा शहरों से हजार, दर्जा अच्छी है । इसलिये राष्ट्र की शक्ति शहर के निवासियों की बनिस्बत गाँववालों पर ही बहुत कुछ क्षेवलपिध है। परंतु इस बात को जरा एक ओर रख कर जानी फे. सर्व साधारण लोगों के स्वभाव की, यदि - परीक्षा की जाय तो उनमें एक प्रकार का गवारपन पाया नायगा। इसी स्वभाव के अनुरूप नाटकासन्य, पन्यास ।

.
.
-
मावि में अनेक स्थलों पर इन कृषकों और इनके जीवन क्रम
की स्तुति के स्तोत्र, उस देश के तत्व ज्ञानी कवियों और
लेखकों द्वारा
लिखे प्रथों में पाए जायगे । करिकार्य म
मनुष्य को प्राकृतिक सुख का इच्छापूर्वक अनुभव प्राप्त होता
है। इसी कारण ऐसे मनुष्य शरीर से हृष्टपुष्ट, स्वभाव से इंद
और निश्चयी, व्यवहार में सक्षे, राष्ट्र हित के लिये तत्पर,
नीतिमत्ता में श्रेष्ठ और धर्म पर श्रद्धा रखनेवाले होते हैं । इस
प्रकार का वर्णन करनेवाले फितने ही कवि और प्रथकार वहा
पाए जाते हैं।
जिन लोगों की मन की भावना का वर्णन - अपर किया
जा चुका है, उन पर वाद विवाद करने की किसी की इच्छ।
नहीं है अर्यवा उन विचारों और उन विषारीनुरूप उनके
हाथ से होनेवाले कार्य की भी आलोचना करने की
भावश्यकता नहीं है। यहाँ पर फेवल इतना कहना ही काफी
है कि प्रेयकार गा जो यह कहते हैं कि नगर वासियों
की हालत खराब है, सच बात नहीं कहते । जिस प्रकार प्रत्येक
समाज सुधारका कुछ आधार नाहोते हुए भी फेवल हित सबध
अयवा आस्था दिखाने के लिये रोनाधोता मचाते हैं उसी
भकाररागगर वासियों की सामाजिक अवनति के विषय में भी
लोगांकुछ नाफुछ कहा करते हैं। परंतु यथार्थ में अब तक
जर्मनी में इनकी-हीन दशा नहीं हुई है प्रोफेसर शेरिंग
कृषिके पहुंताप अभिमानी पुरुष हैं. उन्होंने कुछ दिन
पिहले एका ऐसा सिद्धात कियाथा कि सेना में भरती
होने के लिये जितने मिदिमी कपिजीवीकामिला है, उनके
14

.
-
-
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एक तिहाई भी वाणिज्य व्यवसाय करनेवालों में से ओ. भार
के निवासी है, सेना के लिये नहीं मिलते। यह सिद्धांत सर्च
है या मूठ, इस के विषय में अनेक वर्षों तक किसी ने जाँच नहीं
की। बहुत वर्षों तक लोग इस सिद्धात को सच ही समझते,
रहे परतु सन १८९५ में बवेरियन सरकार ने, भिन्न भिन्न
स्थानों से इस बात की जाँच करने के लिये नकशे चैयार कर
के मंगवाए तो उनसे , मालम हुआ कि प्रोफेसर साहब
का सिद्धात यथार्थ में कितना ठीक है और उसी समय से
इस सिद्धात की कलई लोगों के सामने खुल गई।
कृषक लोग सैनिक काम में , कदाचित प्रवीण न होते हों
वो भी इस विचार को एक ओर रख कर कृषि की दशा
सुधारने के लिये और खास कर, स्वतत्रतापूर्वक जीविका
निर्वाह करनेवाले लाखों किसानों की रक्षा कर के थोड़ी खेती
करने की ओर उनका मन लगाने के उद्देश्य से सरकार का
प्रयत्न करना उसका कर्तव्य है और ऐसा करने के लिये अनेक
कारण भी मौजूद है। कृषि का सुधार करने से शहरों के
कारखानों में काम करने के लिये लोग नहीं मिलते मरवा
जिन्हें शहरों में रहने के लिये आरामा का घर नहीं मिलता,
येनेसी में जाते हैं। यह कभी नहीं होता। परंतु हो, जो
गाँवों को छोड़कर चले गए है अथवा जिन्हें शारों की
चटक मटक और ऐश आराम का व्यसना नहीं गाई,
उन्हें अपने अपने गांवों में वापस जाकर खेतों में मेहसन
"करने की भोर यान दिलाना जिससे वे पुन जा कर खेती
के काम में परिभमाकरने लगे, खेती के सुधार का मुरूम
.

- ( १९३)
पाय है, और इसी प्रकार जमीन जोतने और बीजारोपण
की वर्चमान प्रणाली में सुधार करने की आवश्यकता है।
इनके बिना कृषि से राष्ट्र के लोगों का उपयोग होना सभव
नहीं है। यह सुधार धीरे धीरे हो तो भी काम चलेगा।
परतु इस काम में आज पद पद पर जो कठिनाई उपस्थित
हो रही है वह इस काम के लिये अच्छे भादमियों का न
मिलना है। इस कठिनाई को दूर करने का प्रयत्न पहले
होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर देखिए गरमी के
दिनों में (Summer ) फसल काटने का वक्त आने पर पूर्वी
सरहद पर लाखों विदेशी लोग जर्मनी में आते हैं और फसल
काट कर रोजी कमाते हैं। परतु स्वय जर्मनी में जर्मन
लोग सेती के देश के छोड़ कर जिन प्रातों में व्यवसाय
वाणिज्य का काम होता है अथवा जहा आसानी से अधिक
लाम होने की आशा होती है वहा अपना घर बार त्याग
कर अवश्य चले जाते हैं। उनके इस काम से कृषि को
कितनी हानि पहुँचती है, इसकी कल्पना सहज में ही की
जा सकती है।
सन् १८८३ से सन् १९०० तक कृषि विभाग ने जो अक
प्रकाशित किए हैं, उनको देखने से यह मालूम होता है कि
उपर्युक्त हानि उठा कर भी खेती, बाग बगीचों, फल फूल तर
कारियों, जगलों और चरागाहों की आमदनी थोड़ी ही क्यों न
हो पर बरायर बढ़ती हुई मालूम पड़ेगी, और उससे यह बात
स्पष्ट मान में आ जायगी कि देश के देश में ही लोगों को
खेती द्वारा भिन्न भिन्न प्रकार से कितना लाभ होता है ।
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(१९४)
देश में उत्पन्न होनेवाले अनाज से जितना काम पलना
चाहिए उतना नहीं चलता। लोकसंख्या दिनों दिन बढती,
जा रही है, और लोगों के रहन सहन में भी पहले की अपेक्षा
अब बहुत सुधार हुआ है। इस कारण उत्तम जाति का
गेहूँ विदेश स देश में बहुत आने लगा है। गत आठ वर्षों
से अनाज की आमद बहुत बढ़ गई है। परतु तो भी जिस
अनाज से गरीबों का निर्वाह होता है. वह अब पहले की
अपेक्षा अधिक पैदा होने लगा है। गरीबों के भोजन क
लिय जर्मनी में जो अनाज पैदा होता है उसका नाम 'राइ"
( Rye ) और हलके दर्जे का गेहूँ है । इनकी पैदावार काफी
होती है। जिस हिसाब से अनाज अधिक पैदा होने लगा
है उसी हिसाब से चराऊ जगलों का उपयोग भी कृषि काम
के लिये-अधिकता स होने लगा जिन- मालिकों के
पास बहुत सी जमीन है वे नई शास्त्रीय पद्धति से उसमें
खेती करते हैं परतु उन्हें अभी बहुत सी नई नई बातें सीखने
की आवश्यकता है। खेती के काम में मजदूरी वढती जा
रही है इस कारण बहुत से स्थानों में यत्रों की सहायता से
काम होने लगा है भाफ की शक्ति से चलनेवाले दो दो
एजनों के दल बहुत से किसानों ने खरीदे हैं। इन इलों
की सहायता से रोज साद घारह एफड भूमि जोती जा
सकती है। पोटाश नामक द्रव्य का भी बतौर स्वाद के बहुत
से लोग प्रयोग करने लगे हैं।
इन सब कारणों से भम
खतो की पैदावार पहले की अपेक्षा बढ़ती जा रही है।
कृषि के विकास का वर्णन यहीं पूरा नहीं होता। शराब
है
.

1
आज जो
( १९५ )
वनाने योग्य पदायों अथवा अन्य प्रकार के फलों के पागों,
वियर शराष जिन फूलों में बनाते हैं उन फूलों की घेल "हाप"
(Hop.), आल तथा अन्य प्रकार के अनाजों.'से, शराब बनाने
के कारखाने और 'नीट' नामक वृक्ष को जड़ से शक्कर
तैयार करने के कारखानों की ओर देखा जाय तो इनसे भी
लाम पढता हुआ दिखाई
पड़ेगा। इसस यह बात
ध्यान में आ जाती है कि कृषि की उन्नति के उद्योग का
कार्य कहा तक सफलतापूर्वक हो रहा है, और इसी
के साथ यह भी मालूम हो जाता है कि
सरक्षक कर लगा हुमा है वह वैसा ही बना रहे, यह जो
लोगों का कहना है, वह किस उद्देश्य से है, इसका भी
दिग्दर्शन हो जाता है। आनेवाळे माल पर फर लगाने का
उद्देश्य निश्चित करते समय, उन्नीसवीं शताब्दी के अतिम
तीस वर्षों में सेती की उपज का विशेष विचार क्या किया
गया, यह यात जानन योग्य है ।, सन १८५१ तक और
उसके कुछ दिनों बाद भी खेती के काम में इतनी अधिक
उन्नति थी कि किमानों के लाभार्थ सरक्षक कर यदि नियत
किया जाता भी था तो भी वह नाम मात्रं, का होता था। इस
कर लगाने की आवश्यकता नहीं थी यह बात सन् १८६५ में
ध्यान में आई और उसी समय से वह कर उठा दिया गया।
अपने देश में अपना कोई प्रतिस्पर्धा न हो, ये विचार उस समय
किसान लोगों के ध्यान में बिलकुल न भाते थे, क्योंकि
उस समय जब उन्हें जरूरत होती वे अपने माल को बाहर ले जा
कर सचित मूल्य पर येच पा सकते थे। देश में मछी फसल
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( १९६)
न पैदा होने पर भी गेहूं और राइ बहुतायत से इग्लैंड को
रवाना होता था। वर्षा कम होने पर भी जर्मन लोग इस
अनाज को पसदन करने के कारण अपना उदर निर्वाह मका
पर करते थे, इस कारण देश में पड़े हुए भनाज को इग्लैंड में
अधिक मूल्य पर बेचने में सरलता होती थी।
भय यह प्रश्न सहज ही उत्पन्न हो सकता है कि फ्रास
के साथ युद्ध का अत होने पर उद्योग धधों की जैसी उन्नति
हुई वैसी कृषि की हुई अथवा नहीं ? इसका उत्तर यही है
कि “हा, कुछ समय के लिये फपि की खुष उन्नति हुई" परतु
वह कहा तक पहुँची १ " अनाज की कीमत जहा तक बढ
सकती थी वहा तक ।" परतु यह कीमत बहुत दिनों तक न
टिक सकी। हा, इससे इतना लाभ अवश्य हुआ कि थोड़े.
समय में ही अधिक मूल्य पर जमीन बेंचकर अपना मूलधन
बढाने की प्रकृति लोगों में बढ गई। अनाज का भाव ऐसा
ही चढा रहेगा इस विचार से ग्राहकों की भी कमी न थी।
बहुतों ने तो धन कर्ज लेकर जमीन मोल ली । परतु शीघ्र ही
जमीन का दाम धीरे धीरे उतरने लगा । गत मे भाव इतना
गिर गया कि लोगों में अपना कर्जा अदा करने की चिंता
उत्पन्न होगई और जिन्होंने अधिक जमीन मोल ली थी उन्हे
इस व्यवसाय में अधिक चिंता उत्पन्न हुई। इसी में और एक नया
विघ्न उपस्थित हुआ। खेती का काम करनेवाले
मजदूर
लोग
अधिक मजदूरी मागने लगे, क्योंकि खेती का काम करनेवाले
बहुत से मजदूर शहरों में जाकर कल कारखानों में काम करने
लगे मे। इसके अतिरिक नवीन युग का भारभ होने से पेट
t

( १९७)
भरने के लिये पहले समय की अपेक्षा अब बधिक मन की
जरूरत पड़ने लगी। जो लोग अपना घर न छोड़कर गाव
में ही बने रहे उनमें एक प्रकार की असंतुष्टता उत्पन्न हो गई।
अनाज की पैदावार के काम में इतनी ही रुकावटें न पड़ीं बल्कि
अब तक जो अनाज केवल रूस से आता था वह अमेरिका और
अरजेंटाइन से भी आने लगा। इस कारण "राइ" नामक
अनाज का भाव अब बहुत गिर गया। इन सब बातों का
यह परिणाम हुआ कि किसी को भी राइ की फसल बोने में
लाम नहीं हुआ। तब सन् १८७५ के भारभ में सरक्षक कर
लगाने का आदोलन भारभ हुआ। प्रिंस विस्मार्फ ने पहले तो
इस ओर ध्यान नहीं दिया परतु सन १८७९ में इस आदोलन की
ओर लोगों ने उनका मन आकर्षित कर ही दिया और उन्होंने एक
इड्रेटवेट गेहू अथवा राइ पर ६ पेंस सरक्षक कर लगा दिया ।
उस समय तक देश में पैदा हुआ अनाज ही जर्मन
लोगों का पेट भरता था, इतना ही नहीं वरन भावश्यकता
पड़न पर विदेश भी अनाज भेजा जाता था। परतु यह
भवस्था बहुत जल्द बदल गई। सचर के साल में व्यवसाय
वाणिज्य का आरभ होकर सारे राष्ट्र भर में उसका जाल फैल
व्यवसाय वाणिज्य की बढती के साथ ही शहरों में
रहनेवाले श्रमजीवियों की संख्या भी बेतहाशा बढने लगी और
इन लोगों को अपनी पेटपूजा के निमित्त अधिक अनाज की
आवश्यकता होने लगी और इसके लिये उनके पास काफी
धन भी मौजूद था। कृषि प्रधान प्रातों से लोग खेती का
काम छोर छोड़ फर शहरों में व्यवसाय सवधी कार्यों में
गया।

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(१९८)
अपने को लगाकर खेती की अपेक्षा अधिक धन पैदा करने
लंगे। इस कारण कपि में मजदूरी का भाव उन प्रातों में
जहा संदा से ही बहुत कम था वहा भी खून बढ गया ।
सन् १८७०तक 'जर्मन लोग संयुक्त राज्य अमेरिका,
बेजिल, आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका आदि देशों को
स्वदेश में काम न मिलने के कारण अपना पेट भरने के लिये
जाते थे। परतु इसके पश्चात् अपना देश छोड़ कर विदेश
जाने की आवश्यकता ही उन्हें न रही । भिन्न भिन्न प्रकार
की खानों, कल कारखानों, •फलाभवनों में जितने मजदूर
हो, उतनों को काम मिलने लगा। परतु इतने में ही मालिकों
की तृप्ति नहीं हुई। "और भी मजदूर चाहिएँ" ऐसा ये लोग
पुकार पुकार कर कहने लगे । सन् १८९० में तो नौबत यहा
तक पहुँची कि अपना देश छोड़ कर विदेश जाने की कोई
भी इच्छा न करता । ॐछ लोग जाते अवश्य थे परतु उनकी
सख्या दिनों दिन कम होती गई और अब तो बहुत ही थोड़े
लोग विदेश जाते हैं।
इतना होने पर भी पच्चीस क्यों -वीस वर्ष पहले
ही कृषि और व्यवसाय में आनेवाले विरोध का कोई
चिह्न भी दिखाई नहीं पड़ता था। पीछे जिस छोटे से कर
लगाने का उल्लेख हुओं है उसके लगाने से भी अनाज के
भाव में कुछ बहुत सी अतर नहीं पड़ा । कारखाने के मालिकों
को पहले के समान ही, जितने मजदूर पाहिएँ उतने मिल
जाते थे। उन्हें मजदूरी अधिफ देनी पड़ती थी, यह सच है,
परतुं भाज कल जो मजदूरी देनी पड़ती है उसकी अपेक्षा
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(१९९)
वह बहुत कम थी। देश में राष्य-म्यवस्था.का काम जिस
तत्व पर पलता था, उसमें भी कुछ अतर न पड़ा था,
क्योंकि इस तत्व का मुख्य भाव यह था कि जर्मनी का जो
मुख्य उद्योग, व्यवसाय कृषि-कार्य है, और वह पूर्व काल से
जैमा अबाधित चला मारहा है, वैसा ही भविष्यत् में सदा
चला जाना चाहिए, जिससे,जमींदार और फिसान सुसपन्न
बने रहे। मत्री और पार्लियामेंट दोनों, इसे अपना पहला
कर्तव्य समझते थे।
सन् १८९५ में व्यावसायिक मनुष्य
गणना का काम हुआ, उससे यह जाना जाता है कि
सन् १८८२ में कृषि के अपर जितने लोगों का जीवन निर्वाह
होता या उतनों का सन १८९५ में नहीं होता था । परतु यह
कमी विशेष ध्यान देने योग्य न थी क्योंकि इसके विपरीत
उन दिनों में भेड़ बकरी पालने का व्यवसाय जोरों पर था
और । इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि
गटू की अतरव्यवस्था की मूल जह जो कृषि है उसकी
भन्छी दशा में किसी प्रकार का धका नहीं लगा, तो भी
व्यवमाय वाणिज्य की उन्नति खूब हो रही थी। परतु इसके
पश्चात् कृषि पर दोहरा पार पडने लगा। शहरों में कारखाने
वालों की प्रतिस्पर्धा के कारण मजदूरों का अकाल पड़ने लगा
और
अनाज पैदा करने का खर्चा बढ़ गया । यह एक बार
था। दूसरा धार अनाज के भाव में कमी-थी जो बराबर
उतरता ही चला गया। सन् १८८० से १८८९ तक गेहूँ
और राइ के भाव की ओर यदि देखा जाय तो यह स्पष्ट हो
जायेंगा कि इनका भाव कितना कम हो गया था।
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+

(२००)
माने लगा।
कृषकों की दुर्दशा का यही भत नहीं हो गया । जर्मन
कारखानों में तैयार हुमा माउ कसरत से विदेश जाने लगा
और उसके बदले में बहुतायत के साथ अनाज विदेश से
इसका परिणाम यह मा कि कारखानों की
चढती के साथ शाहरों में मजदूरों की जो सख्या बढ़ गई थी,
उसका पेट भरने के लिये बाहर ही बाहर विदेश से अनाज
भाकर काम निकलने लगा। कृषि-अभिमानी प्रिंस बिस्मार्क
की जगह कौंट वान कप्रिवी जर्मनी के महामत्री हुए।
उन्होंने कानून के उद्देश्य को ही बिलकुल बदल दिया ।
इस कारण कृषकों को और भी अधिक मुसीबत का सामना
करना पड़ा। कृषकों की दशा अच्छी होने से
राष्ट्र
की
दशा अपने भाप अच्छी हो जाती है, यही प्रिंस पिस्मार्फ का
सढ निश्चय था, और इसी निश्चय के अनुसार वे कानून
कायदों को पनाते थे । कौंट वान काप्रिवी के चासेलर
होते ही सारा रंग बदल गया। जर्मनी को कृषि प्रधान देश
• समझ कर कृषि के कल्याणार्थ कानून बनाना भूल है,
संपति उत्पादन के नए नए मार्ग जो अब खुल रहे हैं
उनकी ओर ध्यान देना भी जरूरी है, कृषि का पालन ।
पोषण करना जितना भावश्यक है उतना ही इन नए मागों
के बीच में जो विघ्न आते हैं उन्हें दूर करना आवश्यक है
इस प्रधान मन्त्री ने अपनी यही राय स्थिर की। उनकी
इस राय के अनुसार जम कानून कायदों का स्वरूप भी बदलने
लगा तब व्यवसाय वाणिज्य और कृषि में तीव्र विरोध उत्पन्न
हुआ
और धीरे धीरे यह विरोध , सबके ध्यान में आ गया।

( २०१) कृषि का सुधार फरने के लिये सरक्षक कर किस प्रकार लगाया गया, इसका इतिहास इस पुस्तक में देने की भाव श्यकता नहीं मालूम होती। इसी प्रकार कर लगाने के विषय में जो अनेक वादग्रस्त प्रभ थे, सनका विचार करने की भी मावश्यकता प्रतीत नहीं होती, क्योंकि सापत्तिक दृष्टि से जर्मन राष्ट्र की आज कल क्या दशा है केवल इसी बात का स्यूल दृष्टि से इस जगह विचार करना है। तथापि इस विषय में दो प्रश्न ऐसे है कि जिनपर थोड़ा बहुत विचार करने से पाठकों के ध्यान में और भी अनेक बातें आ जायगी। ये प्रश्न देखने में तो भिन्न भिन्न हैं परतु उनका स्वरूप एक ही है। वे प्रश्न ये हैं-१) जर्मन लोग अपने आवश्यकतानुसार जर्मनी में ही अनाज पैदा कर सकते हैं या नहीं ? और ( २ ) यह उद्देश्य आज कल के प्रचलित कानून द्वारा कितना साध्य हो सकता है ? जर्मनी मैं आज कल खेती नवीन पद्धति से होने लगी है, परतु जन- सख्या बढ़ जाने के कारण और लोगों की रहन सहन जरा ऊँचे दर्जे की हो जाने के कारण जितने भनाज की लोगों को आवश्यकता है उतना अगज लोगों को नहीं मिलवा । अतएव यह दशा कैसे सुधारी जा सकती है, यह महत्व का प्रश्न जर्मन राष्ट्र के सामने है। इस प्रभ का विचार करनेवाले लोगों में नाना प्रकार की बातें होती हैं परंतु इस गड़बड़ी में पाठकों को ले जाकर उनका समय नष्ट करना हम नहीं चाहते। उनके कहने का सार क्या है केवळ यही हम यहा पर देना चाहते हैं। कृषि की उन्नति होकर उसकी स्थिरता कैसी होगी, इस । - (२०२) विषय पर जर्मनी में बहुत समय तक विचार करने की जरूरत है। इस उद्देश्य को सिद्ध करने के लिये कौन सा उत्तम उपाय है, इस काम में सरकारी मदद कितनी और कैसे प्राप्त की जा सकती है, इस बारे में उन लोगों का बहुत कुछ मतभेद है। इस बात मे एक मत होना बहुत कठिन काम है। कृषि अभिमानी लोगों का कहना है कि जर्मनी के अनाज का बाजार जर्मन लोगों के ही हाथ में रहने की व्यवस्था सरकार को कर देनी चाहिए। रेडिकल पक्ष के लोगों का कथन है कि जर्मनी के बड़े बडे टुकड़ों को तोड़कर छोटे छोटे खेत बनाने की व्यवस्था जितनी सरकार कर सके उतनी उसे कर देनी चाहिए । मतभेद का यह एक उदा- हरण है जो ऊपर दिया गया है। परतु यह और इसी प्रकार के और बहुत से मतभेद हैं जिनकी ओर ध्यान न देना ही अच्छा है, क्योंकि कृषि-व्यवसाय का मनुष्य के जीवन से निकर सबंध होने के कारण उस व्यवसाय की ओर सरकार के पूरा पूरा ध्यान रखने की आवश्यकता है। जिसे जो व्यवसाय रुचिकर हो उसे वही व्यवसाय करना चाहिए अब पहले समय की उदासीन वृत्ति को स्वीकार कर के चलने से काम नहीं चलेगा, इन मुख्य तत्व के विषय में अब कुछ भी मत भेद नहीं है । मतभेद है तो केवल ऊपर वर्णित उपाय योजना की बाधत है। केवल राजनैतिक दृष्टि से विचार किया जाय तो यह कहा जायगा कि विदेशी अनाज पर 'अवलवित रहना जर्मन राष्ट्र के लिये बहुत धोखे का काम है। यह बात प्रत्येक जिम्मेदार राजनीतज्ञ को ध्यान में रखनी चाहिए। . - . प्रेट ब्रिटेन के सयुक्त राज्य ने कृषि का ह्रास होने दिया, यह बहुत दुख बात की है। परतु समुद्र द्वारा वाणिज्य का मार्ग खुला रखने की शक्ति इग्लैंड के पळशाली नौसेना विभाग में होने के कारण यहां के लोगों को अनाज बहुतायत से मिलता रहता है परतु जर्मनी में यह शक्ति नहीं है और उत्तर तथा पूर्व की ओर अनाज पैदा करने योग्य उत्तम जमीन बहुत होने के कारण दश-कल्याण के उद्देश्य से इस ओर सरकार के ध्यान के विशेष रूप से जाने की बहुत वसी आवश्यकता है, यह यात बिलकुल निर्विवाद है। यह बात कट्टर सरक्षण नीतिवालों को जितनी स्वीकार है उतनी ही कौंट वान करिवी को स्वीकार है। पुरुष क व्यवसाय वाणिज्य की पूर्णाभिमानी होने के कारण, व्यवसाय वाणिज्य ही राष्ट्र का मुख्य जीवन है, ग्रह उसका नद निश्चय था। परतु तो भी मजदूरों को सस्ता अनाज मिलना चाहि यह बात उसको स्वीकार थी और इसी कारण ऊपर जा कहा गया उसके अनुकूल उसने अपना मत बना लिया था । सन् १८९१ मे राइटाग में उन्होंने एक बार यह कहा था- "दूसरे राष्ट्रों के साथ युद्ध करने का प्रसग यदि जर्मनी को आया तो उस समय अनाज के लिये बाहरी लोगों का मुँह ताकना न पडे, इस कारण स्वदेश मे ही खेती का जितना सुधार किया जा सके उतना करने का यत्न करना चाहिए । भविष्यत् में होनेवाले युद्ध में सेना अथवा अन्य लोगों के काम में आने योग्य अनाज देश में पैदा किया जा सकता है अथवा नहीं, इस बात पर हो जय पराजय का निर्णय होगा, इसका मुझे पूर्ण विद , 1 में जाना (२०४) वर्तमान विषय के इस प्रश्न पर ही सरक्षण कर के पक्ष- पातियों का यह मत है। व्यवसाय वाणिज्य की उन्नति के साथ साथ देश में अनाज साह की भी वृद्धि होनी चाहिए। अनाज के लिये परावलवी बनना हानिकारक है । एक देश से दूसरे देश में जानेवाले माल का बदला धन से न होकर माल के रूप में होता है और जर्मनी सरीखे देश में यह बदला सास करके कच्चे माल और अनाज के भनिवार्य है। इस पद्धति से जर्मन माल का क्रय विक्रय तभी तक चल सकता है जब तक जल मार्ग सघ राष्ट्रों के व्यापार के लिये खुला है-साराश, जब तक युद्ध का प्रसंग नहीं माया, तब तक जर्मनी की गाड़ी अच्छी तरह चली जायगी परतु युद्ध भारभ होते ही यह दशा बदल जायगी। सरक्षण नीति के पक्षपातियों का यह भी कहना है कि स्वदेशी कार- खानों को स्वदेश के बाजार में ही प्रतिस्पर्धा नहीं करनी चाहिए। इसीके साथ स्वदेश में अनाज इतना पैदा होना चाहिए कि विदेश से अनाज आने के बदले उन देशों में जर्मनी अपने यहा से अनाज भेज सके। और राष्ट्रों में बदला फरने के लिये जितना माल भेजने की आवश्यकता हो इतना ही भजना चाहिए, अधिक नहीं । सरक्षण पक्षवालों का यह कथन व्यावहारिक दृष्टि से ही निरूपयोगी नहीं है चरन कृषकों को भी उनका यह सिद्धात स्वीकार नहीं है। का सरक्षण करने के लिये-विदेशी अनाज पर कर बैठाना, इतनी बात सनकी स्वीकार करने योग्य है। परंतु विदेश में अनाज भेज कर यदि वहा अच्छा दाम मिलता हो - स्वत - (२०५ ) तो भी वहां न बेचेना, यह बात न्यायसंगत नहीं है। वर्त. मान इपीरियल पासलर वान व्यूलो को यह बात पसद है। उन्होंन सन् १९०६ से विदेश में आनेवाले अनाज पर सरक्षक कर तो लगा दिया है परतु स्वदेश से विदेश जानेवाल अनाज के लिय किसी प्रकार का नियम नहीं बनाया । कृषि की रक्षा के लिये उन्होंने जैसा सरक्षण कर लगाया है उसी प्रकार व्यवसाय वाणिज्य की रक्षा के लिये सरक्षक कर कायम रक्खा है। इस प्रकार दोनों का हित साधन करने की ओर उन्होंने अपना ध्यान रक्खा, और बहुत करके उनका यह कार्य उचित हुआ है, क्योंकि व्यवसाय वाणिज्य के समान ही कृषि की रक्षा करनी चाहिए । यदि व्यवसाय वाणिज्य की रक्षा न की जाय तो खेती भी करने की जरूरत नहीं है। इम प्रकार ये दोनों बाने एक दूसरे पर अवलमिन है। अनाज का दाम सरक्षण नीति द्वारा कर लगान से बढ़ता है अर्थात् प्राहकों पर उमका बोझा पड़ता है और बोझा भव में कारखानेवालों पर जाकर पड़ता है क्योंकि उन्हें अधिक मजदूरी देना पड़ती है। भाज कल कुछ व्यवसाय ऐसे हैं कि यदि अनाज पर का सरक्षक कर उठा दिया जाय और विदेश में जितना जा सके उतना अनाज जाने दिया जाय तो उनके लिये सरक्षक कर की भावश्यकता प्रतीत न होगी। परतु यह हो कैसे १ वर्त- मान समय में अनाज के अनियन्त्रित व्यापार तत्व को काम में लाना पड़ साहस का कार्य है। अतएव इस प्रकार कार्य करन का विचार किसी के मन में उत्पन्न हो नहीं सकता। -

(२०६)
इसीके साथ व्यवसाय-वाणिज्यवालों की कृषि के विरुद्ध
सदा यह तकरार रहती है कि “कुछ तुमको- और
कुछ मुझ को " इस तत्व , पर जमींदार लोग कभी तैयार
नहीं होते। सरकार जो कानून - कायदे बनाने उनमें
अपना जितना लाभ हो उतना अच्छा और फिर यदि
दूसरों को कुछ लाभ पहुँच जाय तो कुछ हानि नहीं,
उनका सदा यह ध्यान बना रहता है । "अमेरियन लीग" के
समान सस्था का काम जैसे चलता है, यदि यह बात देखी
जाय तो उपरोक्त कथन में कितनी सचाई है, यह बात
में सहज ही आ सकती है। उस सस्था का यह उद्देश्य
स्पष्ट है कि कृषि के व्यवसाय वाणिज्य की और जर्मनी में
जो प्रवाह बह रहा है उसे किसी न किसी उपाय से प्रत्येक
स्थान में रोकने का प्रयत्न करना चाहिए। इस काम में
"परवेटिव" पक्ष के लोगों के अनुकूल होने के कारण, राजनै
तिक दृष्टि से भी "लोग" को बहुत महत्व प्राप्त हो गया
है। इन सब कारणों से दुलारे लडके का हठ बाप जैस
इसी प्रकार सरकार भी इन लोगों का हर
पूरा करने को तैयार रहती है।
ध्यान
पूरा करता
Printed by G K Gurjar at the Shree Lakshmi
Narayan Press Jalanbar, Benares City
।

Garmani Ka Vikas

Author
Verma,surya Kumar
Title
Garmani Ka Vikas
File name
Garmani Ka Vikas
Text
OCR done
Citation
1917
Published
2011/01
Publisher
Shri Laxmi Narayan Press Banaras
Language
Sanskrit
Pages
189
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546299
Barcode
4990010024788.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
uOmW0pSLjUb
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