Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Vedant Siddhant Muktawali

Singh,guru Dutt · 2012/08

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.... ॥ ओ३म् ॥ अथश्री वेदान्त सिद्धांत मुक्तावली भाषापूर्वार्द्धगत विषयानुक्रमणिका। विषय पृष्ट | विषय पृष्ट अथफलसहितटीकाके प्रारम्भ यात्मामें श्रतिप्रमाणकी अपेक्षा की प्रतिज्ञा ..... | निरूपणपूर्वकग्रव्ययपदार्थका प्रथमूलग्रन्थव्याख्या निरूपण प्रारम्भः ....५ अथपूर्वपक्षायात्माप्रमाण श्रात्माकेचारविशेषणोंका के अभावसे असत्यताका फलनिरूपण निरूपण २३ शंकापूर्वकग्रन्थके व्याख्यान यात्मा लौकिकप्रमाणका कीयोग्यताकानिरूपण ....७ अभावनिरूपण यात्मपदार्थकीविशेष्यता अथात्मामेवेदप्रमाणकीवि कानिरूपण ....१० | पयताकानिषेधनिरूपण ...:२६ श्रतिपदकेअर्थकानिरूपण ....११ अथएकदेशिवेदान्तीकीरीति श्रवपूर्वपक्षीकीरीतिसेयात्मा सेपूर्वपक्षकासमाधाननिरूपण २६ मेंश्रुतिप्रमाणकीनिक्षतायौ प्रथएकदेशीकीरीतिसेअविद्या देहादिकोंकीयात्मरूपताका केयाश्रयनथाविषयकाभेद निरूपण निरूपण पूर्वपक्षकसंग्रहकाश्लोक ....१४ प्रत्यक्षादिकों में प्रामाण्यका अथर्वपक्षकेनिराकरणपूर्वक निषेध अव्ययपदव्याख्यानिरूपण-....१५ | यथएकदेशीकेमतकाखंडन ....४२ .२३ .१२ ....३१ ३४ ...७२ ५६ विषय पृष्ट विषव यात्मातथासुखकेसंबन्धा काधमतथाब्रह्ममें तात्पर्य ऽभावकानिरूपण निरूपण .....६८ थथस्वाश्रयास्वविषयायवि अज्ञानकेएकत्वकानिर्धार द्याकानिरूपण .....५२ अथयज्ञानके एक त्वसाधन अथजीवब्रह्मकेभेदकाखंडन /५४ काफलनिरूपण अथभेदमेंउपाधिकेयभाव / यथग्रज्ञानतथाजीवकेएकत्व कानिरूपण तथायनेकत्वकथनकरनेवाली श्रज्ञानकोउपाधिरूपता श्रतियों कीव्यवस्थाकानिरूपणः७३ निरूपण प्रथएकजीववादमें बद्धमुक्ता दिव्यवस्थाकाप्रकारनिरूपण ७६ अथयौपाधिकभेदकाखंडन अथवेदकेतात्पर्य्यकाएक त्रिविधतन्त्रताकानिरूपण यदैतमें निर्धार अथवज्ञानकोजीवब्रह्मप्रति अथपूर्वपक्षीकीरीतिसेयधि योगिकभेदकीयधिकरणता कारीकेयभावसेमोक्षकाय भावनिरूपण अज्ञानकोशुद्धचेतनयाश्रत्व अथस्वप्नदृष्टान्तमें द्रष्टाके औविषयत्वकास्थापन एकत्वकाप्रतिपादन शंकापूर्वक प्रज्ञानकेएकत्वकी श्रथदार्टान्त मेंद्रप्टाकएक प्रतिज्ञा त्वकाप्रतिपादन प्रथयज्ञानमेंलौकिकादिप्रमाण श्रयपूर्वअर्थकेयनुवादपर्वकएक कैखंडनपूर्वकलाघवसहकृततर्क देशिपूर्वपत्नीकीरीतिसेयज्ञात सेतिसकेएकत्वकास्थापन ....६७ सत्ताकानिरूपण पूर्वकांडतथाउत्तरकांडरूपवेद अथत्रिविधसत्ताकेखंडनपूर्वक .... .८३ का निषेध .... १४ ३ पृष्ट विषय विषय पृष्ट ख्यातियोंकास्वरूपनिरूपण ....१०२ लब्धिकास्थापन १२१ पथदृष्टिसमकालीनदृष्टि शंकापूर्वकप्रपंचकोथविद्यो सृष्टिवादमेंप्रतिज्ञानसृष्टिका पादानकत्वस्थापन १३० भेदौतिसमें प्रत्यभिज्ञाकेविरोध अथ अवान्तर विपय की कीशंकाकासमाधाननिरूपण १०८ | समाप्ति पूर्वक प्रपंच निष्ठ ज्ञात शंका पूर्वक सुषुप्तिमें प्रपंचा सत्ता केनिरूपणकाउपसंहार १३१ ऽभाव कीबोधता श्रतिको यथ पूर्वपक्षी की रीतिसे देवताधिकरणन्यायकीरीति अविद्याको प्रपंचकी कारणता से निरूपण का असंभव निरूपण ..११३ १३२ अथ पूर्व पक्षी की रीति से यथसिद्धांत सत्तथाग्रसत पूर्वउक्त अर्थक अनुवादपूर्वक कीउत्पत्तिकेनिरासपूर्वकवि सर्पज्ञानसेजाग्रतज्ञानमें विल द्या को जगत् कारणता की क्षणताका निरूपण .११५ / सिद्धि का प्रकार १३६ पूर्व अर्थके अनुवाद पूर्वक परिशेपसे प्रपंच की अनिर्व इन्द्रियादिकों को प्रपंचज्ञान के चनीयता के स्थापन पूर्वक प्रतिकारणताकाखंडन ....११९ / अविद्योपादानकत्वकानिर्धार १४४ श्रथ प्रमानिष्ठ कार्यता की अविद्या मात्र कारणवाद में दुर्निरूप्यता निरूपण ....१२० वादी उक्त दोपों का परिहार अथ प्रमाण के विषय विवे निरूपण चन पूर्वक चक्षु यादिकों में प्रपंचके याविद्यक पक्षपूर्व प्रमाणता का खंडन १२२ | कांड निष्ठ प्रमाणताका निरूपण १४६ मनकी करणता के निषेध जगत्के याविद्यकत्वसाधन पूर्वक विद्या मूलक प्रपंचोप काफलतथाष्टिसमकालीन विपय पृष्ट विषय पृष्ट दृष्टिसृष्टिपक्षका उपसंहार का समाधान निरूपण अथ दृष्टि मात्र सृष्टिरूप प्रमाणाऽभाव से यात्मा में दृष्टिसृप्टिवादा तथाज्ञानज्ञेय असावापत्तिकायन्य प्रकारसे परिहार केभेदका निराकरणनिरूपण १५१ प्रमाणके अभावसे यात्मा ग्रथज्ञानज्ञेयकेभेदमें प्रत्यक्ष मेंयसत्त्वापत्तिका अन्य प्रकार प्रमाण का खंडन सेपरिहार ११४ स्वप्रकाशप्रत्यक्षको भेदकी यात्मा के यसतपने की ग्राहकताकानिपेधनिरूपण १५४ शंका का न्यप्रकारसेपरिहार ११५ ज्ञान पर प्रकाश पक्ष में प्रत्यक्षां प्रमाणाऽभाव से यात्मा में तरकोज्ञानज्ञेयकेभेदकी ग्राहक यसपने की शंका का अन्य ताकानिषेध प्रकारसेपरिहार श्रथ ग्रनुमान प्रमाण को अथ आत्मामें सर्वप्रमाणों ज्ञानज्ञेय के भेद की ग्राहकता कीविपयताकानिरूपण का निराकरण - अथ अनात्मा के भानका / अथज्ञानज्ञेयकभेदमेंयागम प्रकार निरूपण २०२ को प्रमाणताका निराकरण अथ स्वयंप्रकाश चिदात्मा ग्रथज्ञानज्ञेयकेभेदमें यर्था मेंअज्ञानकी विषयताकाअन्य पत्ति प्रमाण का निराकरण प्रथसिद्धांत निरूपण १८२ अथआत्माकीस्वयंप्रकाशता अथप्रमाणाऽभावसे प्रात्मा मेंअनुमानप्रमाण कानिरूपण २०१ मेंथसत्पनेकीशंकाकासमाधान १४ अथयात्माकीस्वप्रकाशताके थन्यप्रकार से उसी शंका साधकथनुमानका खंडन २०१ २०० १६८ प्रकारसेनिरूपण ....

... .... ....२६१ विषय पुष्ट | विषय *ष्ट अथसिद्धांतरीतिसेतिसयनु अथशून्यादीको अभिमत मानकामंडन २१३ यात्माकेखंडनकाप्रकार अथपुनःशंकासमाधानपू अथयात्माकीसुखरूपता कियात्माकी स्वयंज्योतिरूप कानिषेध २५५ ताकाप्नकारांतरसेनिरूपण २१८ अथदुःखाऽभावकीपुरुषार्थरूप प्रथयात्मासेभिन्नघटके ताकानिरूपण :.२६५ अथसिद्धान्तापूर्वपक्षकेयनु स्वरूपकाखराडन २३० प्रथयात्मासेभिन्नकरकेसर्व वादपूर्वक यात्माकीपुरुषार्थरूप अनात्माकाखराडन ताकामंडन २३५ शंकाकेनिराकरणपूर्वकज्यो अथ आत्माकोसर्वशेषित्व निरूपण ২99 तिपदकीव्याख्याका अथयात्मासुखतथादुःखा उपसंहार २३६ (इतिपूर्वाद्धम् ) ऽभावरूपताकानिरूपण अथउत्तरार्द्धम्। अथज्ञानीतथायज्ञानीकी विलक्षणताकानिरूपण ..२१० प्रथयानंदपदव्याख्या २४० अथात्मसाक्षात्कारके अथपूर्वपक्षायात्माकीपुरुषार्थ करणकाविचार .२६३ रूपताकोखंडन २४० अथएकदेशीकेमतकीरीति अथसिद्धान्तीद्वारा अनुपादे सेपूर्वपक्षकाखंडनौरमनको यत्वसाध्यकारखण्डन अथपूर्वपक्षीकासमाधान। श्रात्मसाक्षात्कारकीकरणता उपादेयत्वकानिरूपणा अथात्मामेंदुःखाऽभावत्व शब्दकोसाक्षात्कारकीकरण कानिषेध ....२५३ ताकाप्रतिपादन ....२७ .... .... .२५२/ कानिरूपण पृष्ट विषय .... .... विपय पृष्ट अथअपरोतत्वकास्वरूप अथस्वरूपभेदकानिरूपण निरूपण ३०२ पूर्वपक्षीकासमाधान ..३४७ ग्रथपुनःपूर्वपक्षामहावाक्यों मेंलक्षणाकानिपेध अथकिसीवादीकीरीतिसे ३०६ भेदत्रयकानिरूपण यथएकदेशीकीरीतिसेमहा वाक्योंमेलक्षणाकानिषेध अथदोनोंभेदोंकेनिराकरण पूर्वकस्वरूपभेदकास्थापन ....३५२ यथएकदेशीकेमतसेजीव केस्वरूपकाविचार यथतटस्थकीशंकाकसमा धानपूर्वकपूर्वपक्षकाउपसंहार ३६० प्रथमहापूर्वपक्षीकीरीतिसे ग्रथसिद्धांतातत्त्वंपदार्थके सिद्धान्तमुद्राकोयाश्रयणकर शोधनपूर्वकवाक्यार्थनिरूपण ३६१ एकदेशीकमतकाखंडन यथस्वरूपभेदकाखंडन .... ३६८ अथसिद्धान्तामहावाक्यों में पथग्रज्ञानकारणत्ववादिनी लक्षणाकेसंभवकाप्रकार ३२२) तथा ब्रह्म कारणत्व वादिनी अथसाक्षीकीसिद्धिका श्रतियों के विरोधका परिहार प्रकारनिरूपण .३३३ निरूपण ३७४ अथउभयपदमें लक्षणाका प्रकारनिरूपण ..३३६ यथथज्ञानकी यसिद्धिका निरूपण । पूर्वपक्ष ३८० अथब्रह्मात्माके अभेदरूप प्रमेयमेंप्रत्यक्षादिप्रमाणोंक अथ सिद्धान्त। यज्ञानकी सिद्धिकामकारनिरूपण ३१० विरोधकापरिहारशंकासमा यथपूर्वपक्षाजिज्ञासापूर्वक धानपूर्वकनिरूपण वाधशब्दकायर्थ निरूपणकर यथधर्मभेदकेनिराकरणका प्रकारनिरूपणा सिद्धांतीकी नेकेलिये अन्यमतोंकी रीतिसे अाशंका ..३४३ वाधका स्वरूप तथा तिसके पृष्ट विषय विषय पृष्ट निराकरणकाप्रकार ३९८ रूपताकीयसिद्धिनिरूपण ....४३३ प्रथसिद्धांतरीतिसेवाधका अथएकदेशिसंक्षेपशारीका स्वरूपनिरूपण .... ४०२ ऽचार्यकमतसेपूर्वपक्षकासमा प्रथपूर्वपना संक्षेपसे अन्य धाननिरूपण .....४१८ ख्यातियोंकेस्वरूपप्रदर्शन पूर्व अथएकदेशीकेमतकी यस मीचीनताकानिरूपण कयनिर्वचनीयख्यातिकाखंडन ४०७ ४३३ ख्यातिवादादिकों केखंडन यथएकदेशिविवरणाचार्य कीरीतिसेपुर्वपक्षकासमाधान ४३१ पूर्वकअनिर्वचनीयख्यातिका स्थापनतथावाधकाउपसंहार ४०६ निराकरण अथ एक देशीके मतका ४४१ अथ पूर्वपक्ष । विद्या यो अथ सिद्धान्तरीति से पूर्व अविद्या के विरोधकासंभव पनकासमाधान निरूपण ४१२ अध्याचार्यकीकृतकृत्यता श्रथ सिद्धान्त । विद्या का निरूपंग तथा अविद्या का उपमर्य अथ यात्मा की यानंद उपमर्दकभाव लक्षण विरोध रूपता के अस्फुरण में प्रति निरूपण बंधकनिरूपणद्वारा यहष्टद्वय अथपूर्वपक्ष । जीवन्मुक्ति केयभावप्रतिपादनद्वारा संप पद की व्याख्याका प्रारंभ। दायकालोपनिरूपण ४१८ श्रथ पूर्व पक्ष अथ सिद्धांत । तात्का अथ यानंदरूपताकेयभान लिक मुक्तिपक्ष का स्वीकार मेंप्रतिबंधककाविचार ...४५५ तथा संप्रदायकेलोप कापरिहार ४२६ अथद्वैतद्रप्टाकेस्वरूपका यथपूर्वपक्षायात्माकीयानंद विचारयौरतिसकानिषेध ....४५८ ... ....

विपय पृष्ट विपय पृष्ट श्रथगुरुशिष्यकेसंवाददारा पुरुषोंकरतुच्छत्ववादकायनंगी पुनद्वैतद्रप्टाकेस्वरुपकाविचार ४६२ कारनिरूपण अथभक्षेपसेदेहात्मवादादि अथश्रुतिप्रमाणसे तुच्छत्व कोंकानिरूपण ....४६५/ वादकाउपपादन ४१७ देहात्म वादादिकों का विवर्त्तवादादिकोंकेस्वीकार निराकरण ....४६७ की व्यवस्था तथा जगतकी पथसिद्धान्त ....४७१ तुच्छतानिरूपणकाउपसंहार ५०० श्रथयात्मदर्शनसेसर्वजगत् यथ अदृष्टदयपदकी व्या कादर्शननिरूपण १७६/ ख्याका उपसंहार ५०१ अथविधिनिषेधउपदेशकी अथ यात्मासाक्षात्कारका व्यवस्थानिरूपण ४७७/ फलतथातिसको निर्पक्षमोक्ष पुनः दैतद्रष्टाके स्वरूपका कीसाधनताकानिरूपण ५०२ विचार अथ विद्याससंसारकीयनि दैतद्रष्टापदार्थकेयवयंवन वृत्तिनिरूपण का निरूपण अथ तत्त्वज्ञानसे संसारकी अथग्रसत्कानिवर्तकरूपकर शास्त्रकीसफलताकानिरूपण १६१ निवृत्तिकाप्रकारनिरूपण ५१२ अथग्रदैतनिष्ठयप्रामाणिक अवान्तरप्रयोजन निरूपण त्वशंकाकापरिहारनिरूपण ४६३ तथाग्रंथकाउपसंहार अथ दैतदर्शित्व पदार्थके (इति उत्तरार्द्धम् ) • विचारनिरूपणपूर्वक द्वैतनिष्ठ यथ मूलकारिकाकी भाषा टीका तुच्छत्वकाप्रतिपादन ४६४ इति विषयानुक्रमणिका यथलौकिक तथापरीक्षक .... १८० ४८१/ ममाता ॥

यो३म्
भूमिका
COGgan
इस संसार मंडल में महा मोह रूप महान् शत्रु को तथा
तिसकी कामादिक सैना को समूल नाश करने वाला विचारजन्य
ब्रह्मात्मा का अभेदज्ञान एक ही अतिरथि योधा समर्थ है। जिसके
होने से सत् ब्रह्म भाव की प्राप्ति तथा जिसके न होने से महान्-
हानि की प्राप्ति श्रुति भगवती बोधन करती है ॥ तथाहि-
इहचेदवेदीदथ सत्य मस्तिनचे दिहवेदीन् महति
विनष्टिः के० उ० ॥ २ ॥ १२
य०-इस लोक में यदि यह मनुष्य ब्रह्म को अपना यात्मा रूप
कर साक्षात्कार करता है तो सत्य ब्रह्म स्वरूप ही होता है । और
यदि इसलोक में यह मनुष्य ब्रह्म को अपना यात्मा रूप कर नहीं
जानता तो जन्मादि रूप अनंत विस्तार वाली हानि को प्राप्त होता
है ।। इति ॥.और तिस अभेद ज्ञान को सर्व अनर्थ का बाधकपना
तथा मोक्ष का साधकपना यह यर्थ भी श्रुति भगवती ने चोधन
किया है तथाहि-
तमेव विदित्वाति मृत्यु मेतिनान्यः पन्था विद्यते
ऽयनाय।। श्वे० उ.

भूमिका य०-तिस ब्रह्म को अपने यात्मा से अभिन्न जानकर ही यह पुरुप अज्ञान तत्कार्य को वाध करता है। इसलिये मोक्ष के यर्थ अन्य कोई साधन नहीं किंतु ब्रह्मात्मा का अभेद ज्ञान ही एक साधन है ॥ इति ॥ याते जो अधिकारी मनुष्य अभेद ज्ञानरूप अतिरथि योधा की शरण को प्राप्त होता है । अर्थात् साधन संपत्ति से अपने अन्तःकरण में तिसको संपादन करता है सो अधिकारी महामोह रूप शत्रु को सैना के सहित समूल नाश करके अमृत भाव रूप मोक्ष को प्राप्त होता है । यह अर्थ भी श्रुति में प्रसिद्ध है- ज्ञात्वा देवं सर्वपाशा ऽपहानिः ॥३०३०॥२॥११॥ ये पूर्व देवाऋषयश्चतहिदुस्ते तन्मया अमृतावे बभूवुः ॥ श्वे०॥५॥६॥ य०-स्वप्रकाश ब्रह्मको अपने से थभिन्न माक्षात्कार करकरके यह अधिकारि । यविद्यादिपंच केशरूप पाशोंको अत्यंतनाशकरता है। और पूर्वकाल में जिसदेवता तथा अपियो मनुप्यादि ने तिम ब्रह्मको अपना यात्माजाना वह सर्व ही मृत्यु से रहित ब्रह्मभाव रूपमोक्ष को प्राप्तहूऐ इति । और जिस यात्मज्ञान कामहान् प्रभाव देवराजइन्द्र ने महाराज प्रतर्दन के प्रति कथन किया है और मनुष्यों के प्रति अत्यंत हिततमरूप कर जिमका वर्णन किया है। यह वाती कौपीतिकी उपनिपद मे प्रसिद्ध है। और श्री अमिष्ट भगवान जी ने श्री रामचन्द जी के प्रति जिम यभेद ज्ञानका ही वारंवार उपदेश किया है। तथा श्री मद्भगवद्गीता मे श्री कृष्ण भगवान् भूमिका जी ने अनेक प्रकार से जिस अभेद ज्ञान का प्रशंसन किया है ।। और इस कलियुगमे होने वाले श्री शंकराचार्य तथा श्री गुरु नानक देव यादिक सर्वज्ञ महापुरुषों ने भी अभेद ज्ञान ही मोक्ष का साधन अनेक विध से निरूपण किया है । इस प्रकार श्रतिस्मृति इति हास पुराण तथा सर्वज्ञ पुरुषों को संमंत वह यभेद ज्ञान ही मोक्ष के यर्थ मुमुक्षु जनों को अत्यंत यत्न से संपादन करने योग्य है । और भेद ज्ञान दूर से ही त्यागने योग्य है। क्योंकि भेद अनर्थ का हेतु है । तथा हि- यदा वैषएतस्मिन्नुदर मन्तरंकुस्ते अथतस्य भयं भवति ॥ ते. उ० ७० अ० ७॥ सर्वतंपरादाद्यो ऽन्यत्रात्मनः सर्व वेद ॥ 4. उ०० वा. अ०-जिस काल में यह पुरुष इस ब्रह्मात्मामें अल्प मान भी भेद देखता है तिस को भेद दर्शन से अनंतर भय अर्थात् जन्मादि अनर्थ की प्राप्ति होती है। और सर्व ही तिस का तिरस्कार करते हैं। जो सर्व को अपने यात्मा से भिन्न जानता है ॥ इति ।। इत्यादिक अनेक प्रतियोंने भेदको यनर्थ की हेतुता प्रतिपादन की है। और पक्षपात से रहित होकर यदि विचार किया जाए तो व्यवहार भूमि में भी भेद दर्शन अनर्थ का हेतु हे परमार्थ में भेद दर्शन को अनर्थ की हेतुता में तो क्या ही कथन करना है। । तथाहि ।। यदि राजा मंत्री को अथवा मंत्री राजा को अपने यात्मा से भिन्न जानता है तो दोनो टेप को प्राप्त होकर राज्य भूमिका संपदा से भ्रष्ट होजाते हैं और गृहस्थ में पति स्त्री को अथवा स्त्री पति को यदि अपने ग्रात्मा से परस्पर भिन्न जानते हैं तो तिस देत दर्शन से वह दोनो सांसारिक सुख से भ्रष्ट होजाते हैं। तैसे सूक्ष्म शरीर गत इन्द्रिय तथा मन एक भाव को यदि न प्राप्त हों तो वह किसी रूपादिक विषय के ज्ञान को नहीं प्राप्त हो सकते ! और स्थूल शरीर गत वात पित्त कफ यह तीनों दोप जब समता को त्याग विपमता रूप भेद को पाते हैं तब अनेक रोगों कर यह शरीर पीडित होता है । बहुत क्या कहें अंद्रेत के याश्रयण से बिना कोई व्यवहार नहीं सिद्ध हो सकता । इस प्रकार व्यवहार दशा में भेद दर्शन अनर्थ का कारण है । और अात्मा से ब्रह्म का भेद दर्शन तो महान् जन्मादि अनर्थ का हेतु है इस कारण से अनर्थकारि भेद भ्रम को त्याग कर अभेद साक्षात्कार मुमुनु पुरुषों को अवश्य संपादनीय है यह सिद्ध हुया । तिस अभेद ज्ञान के दो साधन श्रुति में प्रसिद्ध हैं । तथाहि- तत्कारणं सांख्य योगाधि गम्यं ॥ श्वे० उ० ६॥१३॥ य०-चह प्रकृतकारणता उपलक्षित ब्रह्म सांख्य तथा योग करके विद्या द्वारा प्रत्यक रूपता से प्राप्त होने योग्य है । और श्री कृष्ण भगवान जी ने भी यह दो ही साधन अर्जुन के प्रति निरूपण किये हैं। तथाहि ।।- यत् सांख्यैः प्राप्यतेस्थानं तद्योगरपिगम्यते।। भ० गी०५।५ भूमिका एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विदते फलम् ॥ गी०५१४॥ ०-जिस ब्रह्म को अपनायात्मारूप कर विद्याद्वारा सांख्यी अर्थात् श्रवणादिकों के अनुष्ठान करने वाले पुरुष प्राप्त होते हैं । तिसी ब्रह्म स्वरूप को योगी अर्थात् निर्गुण ध्यान करने वाले पुरुप भी प्राप्त होते हैं । इन दोनों साधनों में किसी एक को भी सम्यक थर्थात् सांगोपांग अनुष्ठान करता हुया पुरुष दोनों के फल को अर्थात् मोक्ष को विद्या द्वारा प्राप्त होता है । इति ।। यद्यपि इस वाक्य में योगपद को निर्गुण ध्यान परता नहीं सिद्ध होसकती । क्योंकि गीताभाप्य में भाष्यकारों ने तिस पदको कर्म योग परताकर व्याख्यान किया है। तिन से विरोध होगा। तथापि योग पद को ध्यान में रूढ होने कर वास्तव से कर्म परता का अभाव है । और इस वचन के मूलभूत पूर्व उदाहरण की हुई श्रुति मे योग पद का ध्यान अर्थ भाष्यकारों ने शारीरक भाष्य मे कथन किया है इस कारण से इस गीता वाक्य में भी योग पदध्यान का ही वाचक है । और कर्मयोग को मुख्ययोग अर्थात् निर्गुण ध्यान द्वारा ब्रह्मज्ञान की साधनता है । साक्षात् साधनता नहीं । इस अर्थ के बोधन करने के लिये कर्म विपयक योगपदका प्रयोग श्रीभगवान् जीका तथा तिसके अनुसारी भाष्यकारों का व्यख्यान कर्मपरता से संभवता है। याते तिनसे किंचित् भी विरोध नहीं । यौर गीता के अयो दशेअध्याय मे श्रीभगवान् जीने स्पष्ट ही यात्मविद्या के दोनो साधन विकल्प करके निरूपण किये हैं। तथाहि ।।

भूमिका. ध्यानेनात्मनि पश्यंतिकेचिदात्मान मात्मना। अन्ये सांख्येन योगन कर्मयोगेन चापरे ॥ भ० मी० १३ ॥२४॥ यशदादिक विपयों से श्रोत्रादिक इन्द्रियों को मनमे उपसंहार करके और मन को ब्रह्मात्मामे उपसंहारकर एकाग्रता से जोचिंतन है अर्थात् तेल धाराकी न्याई निरंतर विच्छेद रहित प्रत्ययों का नाम ध्यान है ॥तिम ध्यान करके योग मार्ग मे निष्ठा वाले कोक अधिकारि अपने अंतःकरण मे ध्यान संस्कृत मन से यात्मा को ब्रह्मरूप कर साक्षात्कार करते हैं | और यह सत्व रज तम तीनों गुण तथा तिनके कार्य मुझ अात्मा के दृश्य हैं और मै गुण तथा तिनके कार्यों से भिन्न तिनके व्यापार का सात्ति नित्य गुणों से विलक्षण ब्रह्मस्वरूप हूं । इस प्रकार के विचार का नाम सांख्य है । तिस सांख्य योग करके सांख्य मार्ग में निष्ठा वाले कोईक अधिकारि अपने यतःकरण में विचार संस्कृत मन से यात्मा को ब्रह्म रूपता से साक्षात्कार करते हैं । और कोईक अधिकारी कर्म योग से यंतस्करण की शुद्धि द्वारा सांख्य अथवा योग मार्ग मे ग्रारूढ होकर यात्मा को देखते हैं। इति ॥ कोईक सज्जन योग मार्ग के अत्यंत प्रेमी सांख्य मार्ग को भी योग के अंतः पाति ही निरूपण करके योग मार्ग से विना यात्म साक्षात्कार का असंभव कथन करते हैं । परंतु यदि पक्षपात से रहित होकर पूर्व उक्त वाक्यों को तथा इनके सदृश और यनेक वाक्यों को अवलोकन किया जाय तो योग की

भूपिका
न्याई सांख्य नाम वेदांत विचार स्वतंत्र यात्म . साक्षात्कार का
साधन है । और श्रीवसिष्ट भगवान जी ने वासिष्ट ग्रंथ मे वाहु-
ल्यता से विचार को ही यात्मज्ञान की हेतुता निरूपण की है।
तिन के कितनेक वचन यहां पर इसी अर्थ के बोधक लिखे
जाते हैं।
सामान्येन विचारेण क्षयमायाति दुष्कृतं ।
योग्य वाक्य विचारेण कोनयाति परं पदम् ।
उ० प्र० स०८४१
अ०-यदि सामान्य से वेदांत विचार कर पाप नाश को प्राप्त
होता है । तो अभेद बोधक वाक्यों के विशेप विचार से कौन
अधिकारि परम पद को नहीं प्राप्त होता किंतु अवश्य प्राप्त होता है।
इसी यर्थ को स्पष्ट करते हैं।
अज्ञान मुच्यते पापं
तद्विचारेण नश्यति।
पाप मूलछिदं तस्माद्विचारं न परित्यजेत्
स०८।४२
अ०-सर्व पापों का हेतु होने से यहांग्रज्ञान को ही बुद्धिमानों
ने पाप कहा है वह यज्ञान वेदांत विचार कर नाश होता है। तिस
से पापों का मूल ज्ञान जिस विचार से विद्या द्वारा बाधित हो
जाता है। तिसी कारण से यह अधिकारि विचार को कभी न
त्यागे। तथा-
वलिवत् प्रविवेकेन नित्योहमिति निश्चयात्
पदमासादयाद्वैतं पौरुषेयौवराधव । ३० स० २६ ॥ ४० ॥

भूमिका य०-हेराम बलि की न्याई पुरुष प्रयत्न से तीक्ष्ण विवेक कर नै नित्य ब्रह्मस्वरूप हूं ऐसा निश्चय उत्पन्न होता है तिससे तुम यदेत पदमोक्ष को संपादन करो । तथाहि- सर्वसंभ्रम संशांत्यै परमाय फलाय च। ब्रह्म विश्रांति पर्यंतो विचारो ऽस्तुतवानघ । य०-हं निष्पाप श्रीराम सर्व भ्रमों को अत्यंत नाशकरने के लिये और परमफल अर्थात् मोक्ष के लिये और ब्रह्म मे विश्रांति पर्यंत तुझको विचार ही करने योग्य है । तथाहि- नास्त्यविद्येति सजाते निश्चये शास्त्र युक्तितः गलत्यविदया तापेन तुपार कणिका यथा -- उ० स० ३७४० अ०-शास्त्र तथा युक्ति से अविद्या तत्कार्यतीनो काल मे मुझ ब्रह्मात्मा में नहीं है ऐसा निश्चय उत्पन्न हुए यह यविद्या कार्य सहित बाधित हो जाती है । जैसे सूर्य के तेज से हिमकाकगा विनाश होजाता है। और- विचारोत्थात्म विज्ञानं ज्ञान मंगविदुर्बुधाः स. २०२१ यहे प्रिय श्रीरामजी वेदांत विचार से उत्पन्न हयाजो अपरोक्ष ज्ञान है तिसी को तत्त्वदर्शी महात्मा ज्ञान कहते हैं । तिम विचार का ही अभ्यास सर्वदा करना योग्य है यह कहते हैं ।।

भूमिका अश्ननगच्छन्स्वपंस्तिष्ठन्नितिराघवचेतसा। सर्वत्रप्रज्ञयातज्ज्ञः प्रत्यहंप्रविचारयेत् ॥ , उ० स०८१। १७ ॥ 7 या हे श्रीरामब्रह्मतत्त्वकाजिज्ञासुशुद्धचित्ततथा एकाग्रबुद्धि से सर्वदेशोंमे तथा सर्वकालोंमे अर्थात् भोजन करता हूया तथा गमनकरताहूया औ शयनकरताहूया तथास्थितहया निरंतरब्रह्मात्मा का विचार करे । इति और- अथातोब्रह्मजिज्ञासा- इस वेदान्त शास्त्र के ग्रादि सूत्र में श्रीवेदव्यासजी ने भी ब्रह्मज्ञानके यर्थ वेदान्त विचारही विधान किया है और महाभारत के शांति पर्वगत मोक्ष धर्म में स्वपुत्रके प्रति तिन्होंने दोनों मार्ग पृथक् निरूपणकरके सांख्यमार्गकोयोगसेश्रेष्ठताकथनकीहै । तथाहि सांख्ययोगौतुयायुक्तौमुनिभिः समदर्शिभिः । मार्गोतावप्युभावतौसंश्रितौ न च संश्रुतौ ।। मो० श्र० ॥ ब्रह्मदर्शनसम्पन्न मुनियोंने सांख्य तथायोग यह दोनों जो मार्ग कथनकियेहैं । वह दोनों ही मार्ग मुमुक्षुपुरुषोंने थात्म- साक्षात्कारके अर्थसम्यक् याश्रयणकियेहैं। तिनदोनोंमें सांख्यमार्ग में जपादिक्रियाका विधान नहीं । इसप्रकार दोनोंमागाँकोकथनकरके सांख्य तथायोगके अनुछाता पुरुषोंके लक्षण और तिनकोब्रह्मविद्या दारा मोक्षकालाभ कथनकरके सांख्यमार्गको योगमार्गसे श्रेष्ठकथन किया। तहां नीलकंठी टीका ।। ० अ० १६१८ भूमिका सांख्ययोगपक्षयोर्मध्येसांख्यमेवश्रेय इत्याह । अथेति॥ १०॥ सांख्य तथायोग इनदोनोंपक्षोंमें सांख्यही बुद्धिमान पुरुषको यात्मज्ञान बारामोक्षका श्रेष्ठसाधनहै । यहयर्थयगलेश्लोक में कहते हैं। अथज्ञानप्लवांधीरोगृहीत्वाशांतिमात्मनः। उन्मजश्वनिमजश्वज्ञानमेवाभिसंश्रयेत् ॥ य० ॥ गुरुके उपदेशसे अनन्तर यहविवेकादि साधन सम्पन्न पुरुप अपने मोतका साधन ज्ञानाभ्यासरूपनावको ग्रहणकरकेविषय रूप संसार सागर में उद्ध्व अधः को प्राप्तहोताहूयाज्ञानाऽभ्यासको ही सम्यक् याश्रयणकरे ॥ और सिद्धांतलेशकसंग्रहकर्ताअप्ययदीक्षित याचार्यनेप्रथम श्रवणादिरूपसांख्यमार्गकोनिरुपणकरकेपश्चात्योगमार्गकानिरूपण किया और तिसयोगमार्गके निरूपणकीसमाप्तिमें यह कथन किया- इयांस्तुविशेषः प्रतिवंधरहितस्यपुंसः श्रवणादि प्रणाड्याब्रह्मसाक्षात्कारोझटितिसिद्ध्यति इतिसांख्य मार्गोमुख्यः कल्पः। उपास्त्यातुविलंबेन इतियोग मार्गोऽनुकल्पः ॥ मि० ० ५० श्र० ॥ परन्तु योगमार्गसे सांस्यमार्गमें इतनी विशेषताहे कि बुद्धिमंदतादिप्रतिबंधसे रहितपुरुषको श्रवणादिकों की परंपरासे ब्रह्म साक्षात्कारशीघ्रसिद्धहोताहै। यातेसांख्यमार्गही प्रधान्यतासेयनुष्ठान करने योग्य है और निर्माणध्यानसे विलंबकरके ब्रह्मसाक्षात्कारसिद्ध भूमिका होताहै।यानयोगमार्गअनुकल्पहेयर्थयहकि सांख्यकेयलाभहूएपश्चात् योगअनुष्ठानकरनेयोग्यहै । इसप्रकारशीघ्रसिद्धिकाहेतुसांख्य मार्गही मुमुक्षुवोंको अनुमानकरनेयोग्यहै । औरजिसअधिकारिकीरुचियोग मार्गमेंहो वह तिसीकाअनुष्ठानकरेइसमें कुछ याग्रहनहीं ॥ क्योंकि रुचियोंकीविचित्रता है। दोनोंका फलएकहीयात्मसाक्षात्कारहै।याते दोनोंमेंसेजिसमार्ग में रुचिहोउसीकोश्रद्धापूर्वकयनुष्ठानकरे । केवल दोनों मार्गोंकीवार्तामें कुशलपुरुषफलको नहींपाता ! फलतो किसी एक साधनके अनुष्ठानसेही होगा । यातेतिनके अनुष्ठान परायण मुमुक्षुको होनाउचितहै ।। इति ॥ पूर्व श्रेष्ठ रूपताकर कथन किया जो सांख्यमार्गहै तिसमेंयहभीविचारणीयहै । बहुतयाचार्योकेमतमें तो श्रवणमनन निदिध्यासनइनतीनोंका नामसांख्यहै । तथाविचार भी इनतीनोंकोहीकहतेहैं। गौरवार्तिककारसुरेश्वराचार्योंकेमतमेश्रवण तथामननकोहीसांख्ययाविचारकहाहै।। तथाहि वृहदारण्यकउपनिषद के चतुर्थतथापष्टाऽध्यायगत मैत्रेयीब्राह्मणमें यहपठनकियाहै- आत्मावा अरेद्रष्टव्यः श्रोतव्योमंतव्योनिदि- ध्यासितव्यः॥ तिसकेयनंतरचतुर्थाऽभ्यायगत मैत्रेयीब्राह्मणमेंयहपठनफिया- आत्मनोवा अरे दर्शनेनश्रवणेनमत्याविज्ञानेन। और पठाध्याय गत मैत्रेयी ब्राह्मण में यह पठनकिया- आत्मनिखल्वरे दृष्टेश्रुते मते विज्ञाते। तहां यह शंका रूप बार्तिक वचन है अनुवादेयथोक्तानांप्रक्रांतेदर्शनादिषु । 3D १३ भूमिका विज्ञानेनत्ययकथानदिध्यासनमुच्यते ॥ १॥ यक-"यात्मा वायरेष्टव्यः” इत्यादि श्रतिसे कथनकियेहुए दर्शनादिकोंकाअनुवादप्राप्तहुए तिन दर्शनादिकोंके मध्यश्रवणकिया जो निदिध्यासनहे । सोविज्ञान पदसेकेसेयनुवादकियाहै। क्योंकिदर्शनादिदोंकासमानपदोंसेअर्थात् दर्शनादिपदोंसेही अनुवाददेखने में ग्राताहै । याते निदिध्यासनका भी "निदिध्यासनेन" इस समान पदसेही अनुवादहोना योग्य था "विज्ञानेन" इसपदसेतिसका अनुवादकरनायुक्तनहीं ।।इति।।इसशंक का समाधान रूपवार्तिक वचन- ध्यानाशंकानिकृत्यर्थं विज्ञानेनेति भण्यते। निदिध्यासनशब्देनध्यानमाशंक्यते यतः ॥२॥ अ०॥ निदिध्यासनशब्दव्यानकावाचकहै । इसकारासेश्रवण तथा मननसे यनंतर यात्मसाक्षातकारका अंग रूपताकरम्यानही निदिध्यासनशब्दसे श्रुतिनेविधानकियाहै | ऐसीअाशंकापूर्वपक्षिकी जिसकारणसेमाप्तहोतीथी इसीकारणसेतिस याशंकाको निवृत्तकरने के लियेअनुवादकालमेस्थितहोकर पूर्वावाक्यमे निदिध्यासन' जो है वह ज्ञानरूप विवक्षित है तहां तिसपदसे ध्यानविवक्षित नहीं याते निदिध्यासितव्यः"इसपदसेपूर्वउक्तश्रतिमेध्यानविधिकीयाशंका कायवकाशनहीं।इसभिप्रायवालीप्रतिभगवती विज्ञानेन'इसविज्ञान पदसे निदिध्यासनकाअनुवादकरतीहै । इति । ध्यानकोअनुभवका अंगमाननेमे कौनदोपहे जिससे तिसयाशंकाको श्रुतिनिरासकरती है ऐसीजिज्ञासाके हुए कहते हैं ।

भूमिका विज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वंध्यानादेः प्रागवादिपम् ॥ य० ॥ ध्यानादिकोंको विज्ञान उत्पत्तिकी कारणतामे जो दोष कहनेयोग्यथासोहमपूर्वग्रंथमेविस्तारपूर्वककहयाएहैं।औरतिसीवार्तिक के अन्यस्थलमेभी यहअर्थनिरूपणकियाहै तत्वंपदार्थविषयक श्रवण तथा मननकायनेकवार अभ्यासकरनेमेतत्त्वंपदाथोंके लक्ष्योंका निर्णयहएवाक्यार्थज्ञानकाहीयवसरप्राप्तहोनेकरध्यानविधिकायवकाश नहीं औरयदिऐसेकहोकितिनदोनोसे घूमाणतथापूमेयगतसंभावना के निवृत्तहुएभी विपरीत प्रत्ययकर प्रतिबंध होनेसे वाक्यार्थरूपयभेद ज्ञानकी उत्पत्ति नहीं होगी तिसप्रतिबंधकेनिवारणकरनेकेलियेध्यान की थावश्यकता हे सोयह कथनभीनहींसंभवता। क्योंकि श्रवणतथा मननका अनेकवार कियाजोअभ्यासतिसके प्रभावसेही विपरीतप्रत्यय की निवृतिभीसंभवतीहै।ौरवाक्यार्थज्ञानकरनिवृत्तहोने योग्यविपरीत प्रत्ययकोवाक्यार्थज्ञानकाप्रतिबंधकपनाभीनहींसंभवता । क्योंकि लोक मे विपर्यय को स्वविरोधिज्ञानका प्रतिबंधकपनाकहीं भी देखा नहीं। यांतेविपर्ययकीनिवृत्तियर्थच्यानकीअपेक्षानहीं।।इति।यदिनिदिध्यासन शब्द का अर्थयहां ध्याननहीं हे तोतिसका क्याअर्थ है। ऐसीयाकांक्षा के हुए कहते हैं। वार्तिकवचन ॥ अपरायत्तबोधोननिदिध्यासनमुच्यते ॥ य-"श्रोतव्यः" इसवाक्यमें अपरायत्तबोपही निदिध्यासन शब्दसे कहाजाताहै। जैसेध्यानमें पुरुष प्रयत्नकी अपेक्षाहै तेसे बोध मेंनहीं किन्तुपुरुष प्रयत्न अनपेतत्व है यहही तिस वोधमें यपराय तत्व है। ऐसे योधके अर्थश्रवणतथा मननका अभ्यासकरने योग्य .

भूमिका
है यह कहतेहैं।
यावद्यथोक्तविज्ञानमाविर्भवतिभास्वरम् ।
श्रवणादिक्रियातावदकर्तव्येति प्रयत्नतः ॥
अ०-यावतकालपर्यतपूर्वजेसाकथनकियाबोधप्रकाशात्मकप्रादुर्भाव
अर्थात् उत्पन्नहो तावत्काल पर्यंत श्रवण तथामननयत्यंतप्रयत्नसे
अनुष्ठानकरनेयोग्य है ।।इति॥ श्रवणतथामननकेयभ्यासकीप्रपकता
से यात्मसाक्षात्कार होता है यहकहते हैं ।
श्रुत्वामत्वात्तंसाचादात्मानं प्रतिपद्यते ॥
य-श्रवण तथा मनन की प्रपकता से उत्पन्न हूया जो
तत्त्वंपदोंके लक्ष्यार्थोंकानिर्णयतिससेयनंतरयह अधिकारिमहावास्य
से ब्रह्मको अपनायात्मारूपकरके साक्षात् अनुभव करताहै ॥इति।
इसप्रकार वाक्यार्थके ज्ञानवाले पुरुषको कृतार्थताकी प्राप्तिहोती
है यहकहते हैं।
अनन्यायत्तविज्ञानेशूवणादेरुपायतः।
जातेनापेक्षतेकिंचित्प्रतीचोऽनुभवात् परम् ॥
अल-श्रवणतथा मननरूप उपायकेयभ्याससे अपरायत्तबोध
के उत्पन्नहूए तिसकर अविद्या तत्कार्यकी निवृतिपूर्वक निजस्वरूप
प्रत्यगात्मामे ब्रह्मभावके स्फुरणसे यनंतर यहयधिकारि किंचितमात्र
भीथपेक्षानहीं करताकिंतु कृतकृत्यताको प्राप्तहोताहै ॥इति। इसरीति
सेवार्तिककारके मतमेश्रवण तथामननका नामहीसांख्य है । यद्यपि
वार्तिककारकापूर्व उक्तश्रुतिका व्याख्यान मानेहए निदिध्यासनपद
की द्रष्टव्यपदकेसाथ पुनरुक्तिहोगी। क्योंकिदोनोपदोंसे साक्षात्कार
.

, भूमिका काही महणकियाहै । तथापिदर्शनका उद्देशकरके श्रवण औमननके विधानसे अनंतरपुनःफलकाजोकथनहै तिसकोपूर्वउपक्रम कियेदर्शन के उपसंहार परताका संभवहोनेसे पुनरुक्तिकी शंकानहीं संभवती । अथवा द्रष्टव्यपदसे विचारके प्रयोजक यापात दर्शनका अनुवादहै । और निदिध्यासनपदसे विचारके फलभूत साक्षात्कारका अनुवादहै । इसपूकार पुनरुक्तिकी शंकाका परिहार संभवता है ।। इति । इसपूकार वार्तिककारसुरेश्वराचार्यके मतमेसांख्यमार्गमेध्यानकायभावहे। और भाष्यकारोंकोभी सांख्यमार्गमे ध्यानका यभावसंमतहै । तथाहि- एतेनयोगः प्रत्युक्तः ॥ शा० ॥२॥ इस अधिकरण के भाप्य मे॥ तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ।। इसश्रुतिकेव्याख्यानमेभगवान्भाष्यकारोंने यहकथनकियाहे ।। वैदिकमेवज्ञानं ध्यानं च सांखययोगशब्दाभ्याम- भिलप्यते ॥ अ०-पूर्वउक्त श्रुतिमे सांख्य और योग शब्दसे वेदोक्तज्ञान अर्थात् ज्ञानाऽभ्यास और ध्यान यह दोनों ही कथन किये हैं । इति। यौर सांख्य मार्गमेध्यानाभावके अभिप्रायसेही सर्वज्ञात्ममुनियों ने भी निदिध्यासन पदका ज्ञानही अर्थ कहा है ॥ तथा हि- शवणमनन बुद्ध्योर्जातयोर्यत्फलं तन्निपुण- मतिभिस्वैरुच्यतेदर्शनायाअनुभवनविहीनायैवमेवे- तिवृद्धिः श्रुतमननसमाप्तौतन्निदिप्यासनंहि ।। सं० ० भूमिका य-श्रवण तथा मनन जन्य निश्चयके उत्पन्नहूए जो फल होताहै वह कुशल बुद्धि वाले पंडितों ने यात्म दर्शन के अर्थ उच्च स्वर से कहा है इसी अर्थको स्पष्ट करते हैं। श्रवण तथा मनन यह दोनों ही दीर्घ काल तथा निरंतर यौर यादर से अनुष्ठान किये हुए तिनकी अपकता से अविद्या के निवर्तक साक्षात्कार से भिन्न “यह इस प्रकार ही है" ऐसी जो बुद्धि उदय होती है अर्थात् में चिदात्मा ब्रह्मस्वभावही हूं और ब्रहाविद् एकरस प्रत्यगात्म स्वभाव हीहै। इसप्रकारजो तत्त्वंपदके लक्ष्यार्धका निर्णयरूप ज्ञानसो निदि ध्यासनशब्द का अर्थ है ध्यान तिसका अर्थ नहीं । इनके मत मे भी श्रवण तथा मननही दीर्घकाल पर्यंत अनुष्ठान करने योग्य हैं निदिध्यासन अनुष्ठान करने योग्य नहीं । क्योंकि तिसके उत्पन्न हुए उत्तर काल में साक्षत्कार उत्पन्न हो जाता है । इस प्रकार जो श्राचार्य श्रवणादि तीनों को ही सांख्य कहते हैं । तिनके मत में भी निदिध्यासन ध्यान रूप विवक्षित नहीं । और जिन आचार्यों के मत में निदिध्यासन क्रिया रूप माना है तिन की रीति से भी वह योग मार्ग गत ध्यान से विलक्षण है । क्योंकि निदिध्यासन श्रवण तथा मनन पूर्वक ही होता है और ध्यान में तिन की अपेक्षा नहीं। और सांख्य मार्ग में ध्यानाऽभाव के अभिप्राय से ही स्वामि विद्या रगय जी ने भी ध्यान दीप में ज्ञान के उदय होने पर्यंत विचार की कर्तव्यता ही विधान करी है । तथाहि- विचाऱ्यांप्यपरोनेण ब्रह्मात्मानं नवेतिचेत् । अपरोना वसानत्वात् भूयोभूयो विचारयेत् ॥

भूमिका विचार यन्नामरणं नैवात्मानं लभेत् चेत् । जन्मांतरे लभेतैव प्रतिबंधनये सति ॥ पं० द० ध्या० दी० ३२१३३ अ०-यदि यहअधिकारिपुरुष वेदांतविचारकरकेभीअपरोक्षरूपताकर ब्रह्मात्मा को नहीं जानता। तौपुनः पुनः विचारका ही अनुष्ठान करे। क्योंकि अपरोक्षबोधपर्यंत विचारही करनेयोग्यहै।।१।।और यदिकिसी प्रतिबंधके वलसेमरणप्रर्यंतविचारकरतेहुएपुरुषकोभी आत्मसाक्षत्कार उदय नहो तो प्रतिबंधके नाशहुएदूसरे या तीसरेजन्ममें अवश्य यात्म साक्षात्कारकोयहपुरुपप्राप्तहोताहै।इतिायौरतिसीपंचदशीगतयात्मानंद प्रकरण के अंत में ध्यानसे रहित केवल सांख्यनामवाले विचारकोभीसर्व यशमें ध्यानकेतुल्य अात्मसाक्षात्काररूप फलकीजनकताबहुतपूकार से निरूपणकीहै।इति। पूर्वउक्तसमग्र श्रतियादिक वचनोंका यहरहस्यहै। कि विचारकायपरपर्याय सांख्यमार्गयोगमार्गसेभिन्न स्वतंत्रयात्मसाक्षा कारकासाधनहै।योगसेविनावोधनहींहोतायहकईकपुरुषोंकाकथनश्रुति स्मृति तथाविद्धानोंके अनुभवसे विरुद्धहे । इसप्रकारमुमुक्षुपुरुषोंको यात्मसाक्षात्कारकासुगम तथामुख्यउपाय सांख्यसंज्ञकविचारहै । सो विचारश्रीशंकराचार्य्यतथा तिनकेशिप्यसंप्रदायमेंप्रविष्टसुरेश्वराचार्या- दिकोंनेबहुतविस्तारसे स्वस्वग्रन्थों मे निरूपणकिया ॥ तिन ग्रंथोंको थतिविस्तृततथाकठिनदेखकर श्रीप्रकाशानंदसरस्वतीसंज्ञकमहानुभाव ने वेदांतसिद्धांतमुक्तावलीग्रन्थमें इसमार्गका निरूपण संक्षिप्त यौ मनोहर युक्तियोंसे किया। यहमहानुभाव श्रीसर्वज्ञात्ममुनियोंसे कुछ कालपश्चातहुएहें । ऐसायनुमानहोताहै। क्योंकिउनकेवचनप्रमाण १८ भूमिका रूपतासे अनेकस्थानों में इसग्रंथमें देखेजाते हैं । इनका रचनाकिया हुथा यह एकहीग्रंथभेदवादरूप यंधकारके दूर करनेको मार्तराडकी न्याईप्रसिद्ध है ।। इसग्रन्थकीयद्भुत रचनासर्वविद्वानों के चितकोरंज न करने वाली तथाविस्मयकाजनकहै । औरएकहीप्रथम कारिकाका व्याख्यानरूप समग्र ग्रंथहे। क्योंकि तिसमकथन किये विशेप्य यात्म वस्तुके चारविशेषणोंकाहीविस्तारसे निरूपणसमग्रग्रंथ है । और तिन विशेषणों के निरूपणकालमें प्रसंगसे प्राप्त यन्यभी वेदांतप्रक्रियाका समस्त तथाव्यस्तन्पतासेनिरूपण है । तथाहि ॥ प्रथम देहादिकों की यात्मरूपता पूर्वपक्षीकी रीतिसे कहकर सिद्धांत मेदेहादिभिन्न यात्माकीसिद्धि तथायव्ययपदकी व्याख्यानिरूपणकी।पुनःएकदेशी कीरीतिसे अज्ञानके याश्रय और विषयका भेदकहकर सिद्धान्तमतमे अज्ञानके ग्राश्रययौ विपयकायभेदनिरूपण किया । और पुनःतिस मे उपयोगि जीवब्रह्मके स्वाभाविकतथायौपाधिकभेदका खंडनकरके यज्ञानतथाजीवकाएकत्वस्थापनकिया।और पुनःउत्तमयधिकारियोंको अद्वैतवोधमें उपयोगी एकजीववादमेंबंधमोक्षादि व्यवस्थाश्रुतिप्रमाण पूर्वक अनेक युक्तियोंसेस्थापनकी। यौरसर्वयनात्मपदार्थोकीज्ञात सत्ताकाखंडनकरके ज्ञातसत्तातिनमेंस्थापनकी । औरतिसकेयवांतर मध्यमअधिकारियोंको दृष्टिसमकालीनसृष्टि पक्षकाभीनिरूपण किया। औरपुनःउत्तम अधिकारियोंकलिये ज्ञानज्ञेयकाभेद अनेकयुक्तियोंसे निराकरणकरकेदृष्टिमात्रसृष्टिपक्षकानिरूपणकिया।पुनःप्रमाणकेयभाव सेात्माकोयसत् कहनेवाले नास्तिकका यत्तयनेकयुक्तियोंसेनिरा- करणकरकेयात्माका स्वतःसद्भावोरवयंज्योतिपनानिरूपणकिया ।

भूमिका औरपुनःविशेष्यग्राम पदार्थकानिरूपणकरके तिसमेंअपुरुषार्थत्वकी याशंकाके निषेधपूर्वकतिसकीपरमपुरुषार्थरूपतानिरूपणकी। तिसके अनंतरयात्मसाक्षात्कारमें एकदेशिकेमतसेमनकोकरणता दिखलाकर तिसके निराकरणपूर्वक महावाक्यरूप शब्दको करणतास्थापनकी । तिसके अनंतर महावाक्यों में लक्षणाकेयभावकी शंकाकरके तिसके निधपूर्वकभागत्यागलक्षणाका निरूपणतथा वीचमेंही लक्ष्यार्थके उपस्थायकसत्यादिपोंमें शक्तिवृत्तिसेलक्ष्यार्थका उपस्थापकत्वनूतन रीतिसेप्रतिपादन किया । औरपुनःयनात्मप्रतियोगिकयौरयात्मयनु- योगिकधर्मभेद तथा स्वरूपभेदका निराकरणयनेक नूतनयुक्तियोंसे करकेप्रपंचमेंमिथ्यात्वकी सिद्धि केयर्थब्रह्मकारणत्ववादिनी औरयज्ञान कारणत्ववादिनी श्रुतियोंका परस्परविरोध परिहार करके साक्षिसिद्ध अज्ञानकोपपंच भ्रममेंनिमित्तमात्रतास्थापनकी । औरपुनःयज्ञानकी असिद्धिकी शंकाके निषेधपूर्वकभ्रमसिद्ध अनादिग्रनिर्वचनीयत्वादि रूपयज्ञानकास्वरूप निरूपणकिया।औरपुनःयज्ञानादिकोंकेवाधका स्वरूप निरूपण में एक देशियोंकी रीतिसे वाधका स्वरूप निषेधकर के नूतन रीतिसे वाधकास्वरूप निरूपण किया । औरतिससे अनंतर विद्या यौ अविद्याके विरोधका स्वरूप निरूपण करके एक जीववादमे गुरुशिष्यकीपरम्परारूपसंप्रदायकेलोपकीयाशंकाकासमाधाननिरूपण किया।|औरघुनन्यानंदस्वरूप यात्मामे थानंदत्वादि धर्मनका विचार चलाकर यानंदत्व सामान्यतथा थानंदव्यक्ति उभयरूपताथात्माकी अपूर्वरीतिसे प्रतिपादनकी ॥ औरतिससेयनंतर यात्माकी श्रानन्द रूपता दृढकरानेकेलिये श्रदयानंदके याविर्भावमेमियादेतदर्शनको भूमिका प्रतिबंधकपना निरूपणकिया। औरपुन देतद्रष्टाके स्वरूपविषयकगुरु शिष्यद्वारा अनेकप्रकारका विचारचलाकरदेतद्रष्टाका अभावनिरूपण करकेयात्माकी यदृष्टद्वयता प्रतिपादनकी औरषीचमही उत्तमयधि- कारियोंकेप्रति प्रपंचका तुच्छवाद और मध्यम अधिकारियों के प्रति विवर्तवादभी अनेकयुक्तियोंसे निरूपणकिया ॥ औरपुनः विदिन्केअनुभव सिद्धकृतकृत्यताकोनिरूपणकरकेग्रंथ कोसमाप्तकिया। इसप्रकार उक्तानुक्त अनेकवेदांत सिद्धांतरूप अमूल्य मौक्तिकोंकीयहश्रेणी है । जोसुकृतिपुरुष इसकोयपने कंठ धारणकरतेहें वहअतिशयशोभावालेहोतेहैं। औरमुमुक्षुपुरुषोंकोयहग्रंथश्रवणरूपीहे क्योंकिवेदान्तवाक्योंकेतात्पर्यकानिर्णययनकस्थानोंमेकियाहे । और यहग्रंथमननरूपभी है क्योंकिभेदकीवाधक तथायभेदकीसाधक यनेक श्रुतियनुसारीतइसमेंनिरूपणकी।इससेयहग्रंथसाक्षात्हीयात्मज्ञान काजनकहे । थौरग्रंथोंमेंकहींकहींयात्मविचारकालाभहोताहे।औरइस ग्रंथमें शीघ्रही जिज्ञासुकी बुद्धि प्रात्मविचारको प्राप्तहोती है। यहभी अन्यग्रंथोंसे विचित्रता है । इसलिये संस्कृतके पाठकजिज्ञासु जनोंको यहग्रंथ यात्मविद्याके संपादनमें यत्यंतहीउपयोगीहे । यौरवादियों के जयकरनेकी इच्छावाले पुरुषकोभी इसीकाअभ्यास करनेयोग्यहे । यहथवांतरफलभी इसका स्वयंमूलकारने कथन किया । सर्वथायह ग्रंथयनुपम है। थौरजैसे उत्तमजातिवाले मौक्तिकोंकी श्रेणी सुंदर मंदरमेंदीपकसे प्रकाशितकीहुई थत्यन्तशोभाको धारणकरती है तैसे यहसिद्धान्तमुक्तावली जिज्ञासुवोंके हृदयरूपमंदिरमें श्रीनानादीनित विद्धानकर निर्मित दीपकानाम्नी टीकारुपदीपककर प्रकाशितकीहुई भूमिका २१ अत्यन्तशोभायुक्तहै । परन्तु व्याकरणादिरूप द्रव्यसेविना भाषाग्रंथों के पठनपाठनमें निपुणमति सज्जनपुरुष अत्युत्तम इसमुक्तावलीको स्वं ठमेधारणकर यपूर्वशोभाको नहींलेसकतेथे वहसज्जनभीइसको कंठमेधारणकर सुशोभितहों यहविचारकरके शमादिनिरत श्रीमुक्ति- पूदमृगेंद्रशांतात्मास्वमित्रवर्य ने मुझको इसग्रंथभाषाकरनेकीपरणा की।तिनकीप्रेरणाकोहृदयमे धारणकरउन्हीकीसहायतासेइसदुर्गमयर्थ वालेग्रंथकेमूलतथाटीकाकोयथायोगमिलाकरभाषाकरना थारंभकिया। यहशरीरप्रायःव्याधिग्रस्तथा । परंतुजिसजिसकालमेशरीरकी किंचित् स्वस्थदशादेखीतिसतिसकालमे किंचित् भाषायनुवाद लिखतेहुएयह ग्रंथनिर्विघ्नसमासहोगया । तिस से अनंतर रिपीके शनिवासी श्रीमान् विरक्तात्मापंडितस्वयंज्योतिजीकी सहायता से यहग्रंथसंशोधन किया गया । यद्यपिइसग्रंथकोभायाकरतेहूएअनेकवारचित्तमेलज्जाभी पाती थी। क्योंकिशास्त्र में निपुणमति पंडितइसकेदेखकरहँसेंगे।यहविचार करचित्तऊपरतभी होजाताथा परंतु यह वक्ष्माण विचारचित्तको पुनः उसीकार्यमेलगादेता था कि शास्त्र मे निपुणमतिपंडित इसभापाको दूपितजानकरऔर सुंदर रचनावाली इसग्रंथकीभाषाकरनेमे प्रवृत्तहोंगे तिससेभीसर्वउपयोगीयहकार्यसिद्ध होजायगा । यथवावहपंडितजन दयालूभीहोतेहैं। इसलिये इसकीही न्यूनता तथादोपोंकोदूरकरकेइसी भाषाकोसुधारकरसुभूपित करदेंगे तिससे भी यहकार्य सिद्धहोगा। औरपरमकारुणिकश्रीगरों के मुखाविंदसे श्रवणकियाहूयायर्थविस्मरण नहो।इसलियेभी इसग्रंथकोभापामेलिखनाउचितजाना । यद्यपिवेदांत सिद्धांतमुक्तावलीगत सिद्धांत मौक्तिकों की पहचान अत्यंत दुर्लभ

२२
भूमिका
तथा वह अमोलिक हैं । तथापि जैसे अमोलिक मौक्तिकों की
पहचानस्वस्वबुद्धि अनुसार सबीपरीनिक पुरुषकरतेहुए अन्यपुरुषों
कोतिनकास्वरूप स्वस्वभाषामें यथायोग्यकहते हैं । तैसे इनसिद्धांत
मौक्तिकोंकी पहचान स्वबुद्धियनुसार परमकारुणिक श्रीगरोंसे पाकर
भापामेंइनकेस्वरूपका अनुवादकरना उचितहीहै | याशाइकिसमग्र
महात्माविद्वान् तथा औरसज्जन विचारशीलपुरुष मेरेदोपोंको समा
करेंगे औरइसको अवलोकनकरके मेरेप्रयत्नको मफलकरेंगे।
॥ इति ॥

श्री ओ३म्
अथ
श्रीवेदान्तसिद्धान्तमुक्तावलीभाषा
पूर्वार्ड प्रारम्भः।
दोहा-सत्यचिदानन्द, विभुजो कर्तापुरुपयकाल ॥
ताहि निजातमलखरिद, होवत सदा अकाल ।। १ ॥
कवित्त-सांख्ययादितर्कसेन चालितकदापिजोऊ वेदकेसिद्धान्त
माहि जोउसेदागतहै । मूलहीनयागमन ताहिकोऊजानसके
यातेभूतपञ्चककी जनिलयथित है ॥ जनमविनाशते विहीन
जोचिदातमाहै व्यापककर्तारसब जननकोगत है। ताहिजान-
कीशको भजोंमें सदावारवारजोऊजगनामरूप प्रकटकरतहै।॥२॥
दीनप्रतिपारनको संतनउवारनको असुरसंहारनको सदाजह
चाउहै । एकनारीव्रतजोऊ पितुयाज्ञारतजोऊ धरमधरतजोऊ
सीतलस्वभाउहै ।। पटभगपूरन नहोवेकवीऊरन त्रिलोकमाहि
पूरन सुजाहिकोप्रभाउहै। ताहिरघुनाथको निवाऊंसदामाथको
दिखावेंमोहपाथको जोयानन्दस्वभाउहै ॥ ३ ॥
वेदीकुलव्योममाहि जगगुरुशशियाहि सुयशमभाहैताहि
फेल्लीतीनलोकमै। गुरुमुखचकोर दोनोगनकोजोर करेंध्यान
ताहिओर हीहोक्तयशोकमै ।। मनमुखनहीवाम जलेंदुःखथाठो
जाम सुनकरजाहिनाम धरेचितशोकम। शशिगुरुनानक त्रिताप
करेहानक सुध्यावोंसुखदानक नसावेपापरोकमै ॥४॥

०सि० मु० स्वेया-भूमिसमानक्षमाजिनमे पुनशोधकवायु समानहैजोई।व्योमसमंजु असंगसुभाव रुदोफ्नदाहकपावकजोई ॥ शीतल नीरसमंपिखिये वरतसबकेहितमेपुनजोई ॥ तागुरुअंगदके पदपंकजजोर नमो करहोंकरदोई ॥५॥ स्वेयाछंद-जाकीकरनीसकललोकमहेप्रसिद्धजानतसवकोय । गुरु सेवाकीरीतिदिखारीजिन सम कर नसकत है कोय ॥ शीलवंत तपसातनुधारी सहनशीलजासमनहिकोय । श्रीगुरुयमर यमर पदवीप्रदध्यावों विघ्ननलागेकोय ।। ६ ।। त्रिभंगीछन्द-सोटीकुलभानू कलितमभानू भक्तिप्रभानुनामरते । जहवाक्यरसाम्रित अचकरपानितहोवतयाम्रित सामगते । जो जनहितकारी परमउदारी भवदुःखटारी शरणगते । तायझरमदा- सह पदकमलासह गमरिदवासह जामहते ॥७॥ स्वेया-जहहारद के तमनाशन को रविकीरसमं उपदेश विधारा । भवसिन्धुपरे जनतारनको गुरुग्रंथ जहाज कियोबहुसारा।। गण थासुरकौरव कोदलजो समयर्जुन के जहने दलडास । तागुरु अर्जुनपापविभर्जन केपदकजनमो बहुवारा ।। ८ ।। छैलघवील नीलजुवेन सुलोचन, करुणारसमाते । पीरन पीरसुमीरनमीर जुबीरनवीरसदा रणमाते ॥ यमरास्मिलेच्छन मेघनकेदलवायु समानकरे जिनहाते । ताहरिगोविन्द राजनके पदकज सदा मनमोर सुहाते ।। १ ।। ययाहजहान अररायमहा तहमाहियिजीवसहें दुखभारे ।। तांयतिदीनदशा पिसके हरिशय गुरुकरुणा चितधारे।। हारसम . पूर्वाद निजदैउपदेशह काढयरण्य सुकीनसुखारे । पंकजतेवरतायुरुके पद वारहिवार प्रणामहमारे ॥ १० ॥ चौ०-कृष्णभये हरिकृष्ण स्वरूपा । इन्द्रियगणगोपिनके भूपा ॥ मनकाली रिपुमर्दनहारे । नमोंकरोंसदवयसकुमारे ॥ ११ ॥ कवित्त-जाहिउपदेशसुन होक्तवैरागमन भयेज्ञानवानजन काटें भवबन्धको । संपदविपदमाहि सदासमचित्तजाहि पालहशरणा- गताह धर्मधुरन्धको ॥ तिलकजनेऊकाज निजशिरदीनोगाज हिन्दुनकीराखीलाज काटीजरअन्धको । ताहरिविन्दनन्द जुकेजोपदाविद करोंसदाताहिबन्द काटहपापबन्धको ॥ १२ ॥ स्वैया-शेशनिशेशदिनेशमहेश सदापदपंकजजाहिमनावें। व्यास पराशरनारदौ सनकादिकसेजहकोयशगावें।। सोउकालभये गुरुगोविन्द सिंहसरूपमलेच्छनघावें । तांगुरुतेगवहादुरनन्दन दूखनिकन्दनकोहमध्यावें ॥ १३ ॥ कवित्त-कोऊव्यासमुनिभनेरामगुरुकोऊगने कपिलस्वरूपकहकोऊ गुनगावते । योगक्चजिनोंसुनाशेपरूपतिनोभना भीषमस्वरूप- कोऊौरनवतावते ॥जाहिकोचरितपेख होवतहुलासमन विसम विसमहीयेहोतसवीजावते । यातेसखातमस्वरूपहरिहरजान ताहि । गुरुमूरतिकोसदाहमध्यावते ॥१४॥ दो-तां गुरुके पदपद्मकी, गहीशरण जवयाय । हरीहीयकी जाड्यता दोपमूलसवाय ॥ १५ ॥ चौपाई-महानुभाव जुजगतमझारी । अभिवंदन है तिनेहमारी ।। यहममकाजहोयनिर्विनो जोसवजनकेहितकरखरनो ॥ १६ ॥ + म मु. दो-विदांतसिद्धान्तमुक्तावलिदुर्गमयर्थविशाल । तहभाषाकरनेविषेमममतिग्रल्पविहाल ॥ १७ ॥ तथापिश्रीगुरुवदनतेजहविधश्रवणसुकीन । तामे जोस्मरन रहियोवरनों तिसे यदीन ॥ १८ ॥ सोरग-श्रीगुरु चरन मनाय वाकवादिनी ध्यायकै । भाषा करों बनाय पेख मुदित वैधीरजन ॥ १६ ॥ * अथमूलटीकाकारकृतमंगल ॐ सर्वजगत् के ईश्वर जो श्रीमहादेव तिनको मै प्रणामकरता । तथासर्वजगत्कीउत्पत्ति यो स्थिति तथा संहारके करनेवाले जोश्रीगणेशजी हैं।तिनकोमे पूणाम करता हूं। तथावाक् अभिमानी देवता जो श्रीसरस्वती जी हैं तिनकोमेंपूणामकरताहूं । तथा अल्पग्रक्षरोंवालेपदोंकर घटितौविस्तृततथासारभूतअर्थ के कर्ता जो श्रीवेदव्यासजीहैं । तिनको में पूणाम करता हूं। तथासूत्रअनु- सारीपदोंसेसूत्रकेयर्थ जिसमेकथनकीएजाएं औ अपनेकठिनपदों की व्याख्याहोजिसमे इसलक्षणयुक्तभाष्यके कर्ता श्रौतीनोंलोकोंमे प्रकटताहैजिनकी ऐसेश्रेष्टयाचार्यजो श्रीशंकरजीहतिनकोमै पूणाम करताहूं ॥ १ ॥ तथा ग्रानंदडेअंतमेजिसके सो श्रानंदयतकहीएहै। तिससे अभिन्नजो प्रकाशानुभवपद अर्थात् प्रकाशकेयनुभवकाजनक जो पूकाशपद वहहैपदकहियेनामजिनका सो ग्रानंदान्त पूकाशानुभव पदपदकहेजातेहैं । ऐसेजो सद्गुरुश्रीप्रकाशानंदसरस्वतीतिनको मे पूणामकरताहूं । यौविद्याकेनिधि जोश्रीनृसिंहाश्रम तथाशमदमादि पूर्वाई साधनोंमे प्रीतिवाले तथा संन्यासीयों के स्वामीश्रीराघवेन्दसरस्वती इनदोनों विद्यागुरवोंकोंमे प्रणाम करताहूं ॥२॥ संन्यासियोंकरके वंदनाकरनेयोग्य तथाजिनके शिष्यपरशिष्यों केसमूहसे भारतवर्षके सर्वदेशस्तिहोरहेहैं तिन ईश्वरस्वरूप श्री प्रकाशानन्द स्वसद्रोंको पुनः मै प्रणामकरताहूं ॥ ३ ॥ * अथफलसहितटीकाकारम्भकोप्रतिज्ञा * वेदान्त सिद्धान्तरूपी मौक्तिकोंकी जोशेणीतिसके प्रकाशवर्थ तथाप्रतिपक्षरूपीसमूहअन्धकारके नाशकरनेवाली प्रदीपिकानाम्नी टीकाको मैंरचनाकरताहूं ॥ ४॥ अथमूलग्रन्थव्याख्याप्रारम्भः प्रथमतिसग्रन्थके श्रादिमे शिप्टपुरुपोंके प्राचारसे प्राप्ततत्वानु- संधानरूपमंगलकोसूचनकरतेहुए औरवेदान्तोंका विपयतथापूयोजन साक्षात् प्रतिपादनकरके कर्तव्ययर्थकी प्रतिज्ञाकरतेहैं क्योंकि प्रतिज्ञा से अनन्तरहीनिरूपण करनेयोग्य अर्थनिरूपण कियाजाताहै ।। अदृष्टयमानंदमात्मानज्योतिरव्ययम्। विनिश्चित्यश्रुतेः साहयुक्तिस्तत्राभिधीयते ॥१॥ दो०-श्रद्धय दृष्टि श्रानंद चित श्रव्यय बातम जान । साक्षात् वेदसे ताहमे युक्ती करों वखान ॥१॥ जाके चिंतन करते होवत बुद्धि विशाल । तांते ज्ञान सुदृढ भयो नाश करे भ्रमजाल || २॥ टीका-यहां मूलकारिकामें अष्टद्धय श्री पानंद तथाज्योति' श्री श्रव्यय' यहचारआत्माके विशेपणहें औरयात्मवस्तुविशेष्यपदार्थ ' २० मि. मु० है। तिनकथनकिये चारविशेषणयुक्त यात्माको साक्षात् उपनिषत् प्रमाणसे जानकर चारविशेषणयुक्त तिसयात्मामें श्रुतिअनुसारीतर्क निरूपण करतेहैं ।। यर्थयह किदैतदर्शनसरहित तथा परमपुरुषार्थ तथास्वप्रकाश तथाविनाशसे रहिन यात्माको सोमेंहूं इसप्रकारसा- खात्महावाक्योंसे जानकर तिसकेज्ञानकीप्रतिष्ठाकेलिये श्रुतिअनु- सारीतर्क निरूपणकरतेहैं । क्योंकि श्रतिसेविरुद्धतर्क यात्मज्ञानमें उपयोगीनहीं यहवार्ता श्रुतिमें प्रसिद्धहै ॥ नपातणमतिराप्नया ॥ फ००अ० १३०२ १०६ य-ययात्मविद्या शुष्कतर्कसे प्राप्तहोनेयोग्यनहीं । याते श्रुतियनुसारीतर्कही यहांग्रहणकरनेयोग्यहै । तिसके चिंतनकरनेसे बुद्धितीक्ष्णयात्सूक्ष्मअर्थके ग्रहणकरनेयोग्यहोतीहै । औरघुद्धिकी सूक्ष्मतासे यात्मज्ञान प्रतिदृढताकोपाप्तहोताहै । भावयहहैकिभेद- वादीपुरुषोंकी तकॉसेसंशयरूप कलंकसहित नहींहोता । यौरदृढ अपरोक्षज्ञानसे अविद्यातत्कार्यरूपभ्रमजालकी अत्यन्तनिवृतिपूर्वक ब्रह्मभावकीप्राप्तिरूप मोक्षहोताहै ॥ इति ॥ * आत्माकेचारविशेपणोंकाफलनिरूपण * देहादिकोंसे यात्माकेभेदकी सिद्धि केलिये (श्रव्ययं) यह विशेषणकथनकियाहै । औरयात्मामेंयदि कोईप्रमाणकहो तोप्रमाण काविपय होनेसे घटादिकोंके समान यनात्मपनाहोगा। गौरयदि यात्मामेंकोई प्रमाणनहींकहोगेतो वंध्यापुत्रकेसमान असत्पनाहोगा। ऐसीप्रतिवादीकीशंका दूरकरनेकेलिये (ज्योतिः) यहविशेषणकथन पाद कियाहै। औरयात्माही परमपुरुपार्थरूपहै इसपथके कथनकरनेकेलिये (यानन्द)यहविशेषणकंथनकियाहै।यौरसजातीयविजातीयस्वगतभेद के .दूरकरनेकेलिये तथाप्रपंचको मिथ्यात्व प्रतिपादनकरनेकेलिये (अदृष्टद्रयं) यहविशेषण कथनकियाहै । औरयद्यपि “श्रुतेः विनिश्चित्य ” इतनेकथनसेही यात्मामें श्रुतिप्रमाणकीसिद्धि होस कतीथी पुनःसाक्षात्पद कथनकरना निष्फलहै । तथापिमहावाक्य 'रूपश्रुतिही अपरोक्षज्ञानकासाधनहै। इसअर्थके प्रकटकरनेकेलिये (साक्षात् ) यहपदकथनकियाहै ।। इति ।। 'शकापूर्वकग्रन्थकेव्याख्यानकीयोग्यताकानिरूपण शंका-यहग्रन्थयाख्यानके योग्यनहीं। क्योंकि विपलिप्सादिक दोषोंसेरहित अथवावेदप्रमाणके अंगीकारकरनेवाला जो शिष्टपुरुष तिसकरचितनहींहै । जोशिष्टपुरुप होताहै वहग्रन्थकेयादिमें मंगल का अनुष्ठान अवश्यकरताहै । इसग्रन्थकेकर्ताने मंगलयनुष्ठाननहीं किया यातेयशिष्टहै । और नमःयादिकपदके अभावसेमंगलकायभाव ‘स्पष्टहीहै । थौरतेसेही ग्रंथकेयारम्भमें चारयनुवंध अवश्यनिरूपण करनेयोग्यहोतेहैं क्योंकिग्रनुबंधोंके जानेविनाशोताजनोंकी ग्रन्थके पठनपाउनमें प्रवृत्तिनहींहोती। यहसम्प्रदायवेता पुरुषोंकीमर्यादाहै। यद्यपितिनअनुबंधोंमें युक्तिको विषयपनापूतीतहोताहै । तथापिप्रयो- जनकाकथन यहांनहींकिया। जोऐसेकहोकि महावाक्यजन्य अपरोक्ष ज्ञानहींयुक्तिकाप्रयोजनहै । सोकथनभी नहींसंभवता । क्योंकियहां "क्त्वा" प्रत्ययकाकथनहोनेसे तिसज्ञानकी पूथमहीसिद्धिहै। जैसे (स्नात्वागच्छति) १० स्नानकरके गमनकरताहै यहांपरस्नानपृथम

८
०सि० मु०
हीसिद्धहै।तसे (श्रुतेःविनिश्चित्य)य०-श्रुतिसे निश्चयकरके तिसमेंयुक्ति
कहतेहैं। यहांपरभीज्ञान प्रथमहीसिद्धहै। यातेतिसको युक्तिकापूयो-
जननहींकहसकते । औरजोऐसेकहोकियहां “ग्रानन्द" पदपूयोजन
कथनकरनेकेलियेहै सोकथनभीनहींसंभवता । क्योंकि तिसकोमहा-
वाक्यजन्यज्ञानका प्रयोजनहोनेसे युक्तिकापूयोजन तिसकोनहींकह
सकते । तैसेविषयऔरप्रयोजनके यभावसे अधिकारी यौरसंबन्धभी
यहांनिरूपणनहींकिये | यातेयनुबंधचतुष्टयके अभावसेभी यहग्रन्थ
व्याख्यान करनेकेयोग्य नहीं।
समाधान-हे वादिन पूथम जो मंगल केनअनुष्ठानकरनेसे
दोपकहा सोनहींसंभवताक्योंकि यनारोपित ब्रह्मतत्त्वकायनेक प्रकार
सेचिंतनरूपमंगलयहां किया है। औरब्रह्मकेवोधकयनेकपदोंका
यहां प्रयोगहोनेसे चिंतनकोयनेकपनाहै | औरजोपूर्वकहाकियहां
प्रयोजननहींकहा सोभीसंभवेनहीं। क्योंकियानंदपदहीतिसप्रयोजन
काबोधकहै । औरमहावाक्यजन्य अपरोक्षज्ञानकाफलयानंदहेयुक्ति
का फलनहीं। यहकथनभीनहींसंभवता । क्योंकिपधानकेफलकरके
ही अंगफलवालेहोतेहैं । जैसे दर्शादिकयंगीयागकेफलकरकेहीप्रया
जादिकयंगफलवालेहोते हैं । तेसे महावाक्यजन्ययपरोक्षबोधरूप
अंगीका फलयानंदहै और तिस ज्ञानमेयंगयुक्ति है । यातेजोज्ञान
का फलहैवहीयुक्तिकाफलहै । ज्ञानमे युक्तिको अंगपनाभट्टपादोंने
भीकथन किया है।
धर्मेप्रमीयमाणोहिवेदेनकरणात्मना ।
इतिकर्तव्यताभार्गमीमांसापूर्यिष्यति ॥१॥

पूर्वाई अ०-प्रमाणरूपवेदसेहीधर्मकानिश्चयसंपादन करनेमे कथं भावयकांक्षारूपइतिकर्तव्यता भागको युक्तिपूर्णकरेगी॥ १॥ जैसे यहांधर्मज्ञानमेयुक्तिकोयंगरूपताहै। तैसेहीब्रह्मज्ञानमेंयुक्तिकोअंगरूप- ताहै यद्यपिज्ञानकोपूर्वहीसिद्धहोनेसेतिसकेप्रतियुक्तिकोयंगरूपतानहीं संभवती । तथापि ज्ञानकोपूर्वसिद्ध मानेहएभीतिसकीदृढताका हेतु पनायुक्तिकोसंभवताहै । यहवार्ताभाष्यकारोंनेभीकथनकी है । ब्रह्मात्मैक्यविद्याप्रतिपत्तयेसर्ववेदान्ताप्रारभ्यंतइति।। शा० मा० अ०१ पा० .. श्रा-ब्रह्मात्माके अभेदज्ञानकीदृढताकेयर्थसर्ववेदांत प्रारंभ अर्थातविचारकियेजातेहैं। औरयदिवादीऐसेकहेकियुक्तिकोयात्मज्ञान कीदृढताकाहेतुमानेहए यात्मज्ञानकीदृढताही तिसकाफलहै यानंद तिसकाफलनहीं यहकथनभीनहींसंभवता । क्योंकिसाक्षात्तथापरंपरा करकेदोनोफलपुक्तिकेमाननेमेकोई विरोधनहीं । तहां साक्षात्फलतो यात्मज्ञानकीदृढताहै। औपरंपरा फलयानंदहै जैसेग्रंथकासाक्षातविषय युक्तिहैऔरपरंपराविपय जीवब्रह्मकायभेदहै।तैसेप्रयोजनभीदोपकारका जानना । इसपूकारदोपूकारकाविषयऔरपूयोजनहोनेसेही वेदांतोंका विषयौपयोजनसाक्षात्प्रतिपादनकरके कर्तव्यकीप्रतिज्ञा करतेहैं"ऐसा पूर्व कथनकियाहै ॥ इति ॥ अथवा-युक्तिकाकथनयाचार्य को अपनेयर्थतोनहींसंभवता क्योंकिवहभापतोहढज्ञानवालाहै। किंतुजिज्ञासूकेयर्थयुक्तिकाकथन है। तिसकोज्ञानकीउत्पत्ति के लिये युक्ति कीअपेक्षाहैयातेयुक्तिको अभिधेयताहै । इसप्रकारजिज्ञासको यात्मसाक्षात्कारकेयर्थयुक्तिकी १० अपेक्षाहोनेसेवहज्ञानकायंग कैसे नहींहोसकतीकिंतुहोसकतीहै।और मूलकारिकामें (यदृष्टद्धयमात्मानं) इनदोनोंपदोंकीसमानाधिकरणता सेब्रह्मात्माका यभेदरूपविषय साक्षात् कथन कियाहै । सोयहग्रंथ कापरंपराविषयहै । और (यानंद) इसपद से प्रयोजन सानातकथन कियाहै । सोयहग्रंथ का परंपरा पूयोजनहै । औरइसग्रंथमेयुक्तिप्रति पादनकरनेयोग्यहैयाते कथनकाविपय युक्तिइसग्रंथकासानाविषयहै यद्यपि साक्षात् पूयोजन इस ग्रंथका धादिमें नहीं कथन किया । तथापिग्रंथकेयंतमेकथनकीजो बुद्धिकी अतिशयतारूपविशालतासो यहाग्रंथयादिमेभीजाननेयोग्यहै । औरसानात्तथापरंपराभेदसेजोदो प्रकारकापूयोजनतिसकीकामनावालापुरुपहीअधिकारीजानना । और विपयादिकोंकेसाथग्रंथादिकोंका प्रतिपाद्यप्रतिपादकतादिरूपसंबंधभी भलीप्रकारसंभवताहै। याते अनुबंधचतुष्टकेसंभव से भीयहग्रंथ अवश्य व्याख्यानकरनेयोग्यहे ॥इति।। * आत्मपदार्थकीविशेष्यताकानिरूपण * शंका ।। जिसवस्तुके बोधकशब्दका पूथमउच्चारणकरें सोवस्तु उद्देश्यकहाजाताहै ।। इसन्यायसेयदृष्टद्रय पदार्थकी प्रधानताप्रतीत होतीहे ॥ क्योंकितिसके बोधकशब्दका पूथमउच्चारणहोनेसेतिसको उद्देश्यताहे ॥ औरजोउद्देश्यहोताहे वही पूधान होताहै || इसरीतिसे श्रदृष्टदयको प्रधानता होनेसेविशेष्यताहै यात्माविशेप्यता नहीं।। समाधान ॥ हेवादिन, "प्रसिद्धपदार्थकाउद्देश्यकरके अप्रसिद्धपदार्थ विधान कियाजाताहे" इसन्यायसे आत्माकोविशेष्यपनाहे क्योंकि, यहमस्मि,इसप्रकारके अनुभवसे यात्मासर्वको प्रसिद्धहतिसकाउद्देश्य - पूर्वाद करके सिद्ध अदृष्टद्रयादि' पदार्थविधानकियेहैं । औरजोउद्देश्य होताहैवहीप्रधानहोताहै । इसप्रकारप्रधानता होनेसेयात्माकोविशेग्य पनासंभवताहे औरइतरपदार्थगौणहोनेसेतिसकेविशेषणहें।।औरश्लोकों मेयो जनावाक्यसे अन्वयबोधहूयाकरताहै इमलियेयहां “ग्रात्मानं अदृष्टद्रयमित्यादि" योजनाकरनेसे पूर्वउक्तन्यायका विरोधभी नहीं प्राप्तहोता ।। इति । ॐ श्रुतिपदकेअर्थकानिरूपण यहां मूलकारिकामें कथनकियाजो श्रुतिपदतिससे उपनिपदग्रहणकरने योग्यहै । क्योंकि- तत्वोपनिपदंपुरूपंटच्छामि । ० उ० अ० ३ मा० ६ ०२६ या उपनिपदोंकरकेजाननेयोग्ययात्माकास्वरूप मैं तुझको पूछताहूं । इसश्रुतिमें “औपनिपदत्व" अर्थात् उपनिपदोंकरकेजानने योग्य यह थात्माका विशेषणकथनकियाहै । यातेश्रुतिपदसेउपनिपंद् का ग्रहणहै । यथवा ॥ सर्वेवेदायत्पदमामनन्ति ॥ ८० उ० अ० १ (३० ११३० १५॥ थ०॥ सर्ववेद जिसपरमपदको तातपर्यवृतिसेवोधनकरते हैं। इस श्रुतिकोयाश्रयणकरनेसे श्रुतिपदवेदमात्रका बोधकहै ।। इति ।। शंका ।। मूलकारिकामें “तत्र"इसपदसेयात्माकापरामर्शनहीं संभवता क्योंकि यनेक पदोंका व्यवधान है । समाधान ॥ हेवादिन सर्व नामशब्दोंको वाधकके अभावहुए प्रधानपरामर्शित्वका ही नियमहे याते" तत्र इसपदसेचारविशेषणयुक्त आत्माकाहीपरामर्शसंभवताहै। क्योंकि यात्मपदार्थप्रधानहे ॥ ौर इतरपदार्थनका "तत्र" पदसे १२ मि० भ० परामर्शनहींसंभवता।क्योंकिवयात्माविशेषणहोनेसेगौणहें।।इति।। अवपूर्वपक्षीकोरीतिसेआत्मामेंश्रुतिप्रमाणकी निपेक्षताओदेहादिकोंकीआत्मरूपताकानिरूपण है शंका ।। मूलकारिकामें श्रुतिपदइतरप्रत्यक्षादिक प्रमाणों के बोधन करनेकेलियेहे ॥ अथवातिनकी निवृत्तिकेलियेहै ।। प्रथमपक्ष में श्रतिकोव्यर्थताहोगी ।। क्योंकि श्रतिसेभिन्नप्रत्यक्षादिकोंकरके हीयात्माकासाक्षात्कार होजायेगा । पुनः श्रुतिकीकुछयपेक्षानहीं औरशक्यार्थकी यनुपपत्तिसेविनाहीलनणाकीप्राप्तिरूपदोपभीहोगा।। औरयदिइनदोनों दोपोंके दूरकरनेकेलिये श्रुतिपद “अवहन्यात्"इस पदके समान यपने विधानकेलिये यौर दूसरेप्रमाणों के निषेधकेलिये है अर्थ यहजेसेयागमे उपयोगी बीहोंके तुपोंकी निवृत्ति दोउपायनसे होतीहै ॥ एकनसविदलनसे गौ दूसरामूमल यवहननसे ॥ तहां ॥ “यवहन्यात्"यहपदनखविदलनकीनिवृतिकरके अपनाविधायक है ॥ तैसे श्रुतिपद अन्यप्रमाणोंका निषेधकरके अपनाविधायकहे | यह दूसरापनयादिस्वीकारकरो तोयहभी नहींसंभवता । क्योंकि यात्म साक्षात्कारमेश्रुतिकी किंचितभीयपेचानहीं । यद्यपिक्षुधापिपासादि पट्टीयोंसेरहितयात्माको प्रत्यक्षादिकप्रमाणविपयनहींकरसकते ।। तिममेंथतिकीयोना केमेनहींमंभवती । तथापिदहादिकामे भिन्न यौकोईयात्मानहीं। किंतुदेहादिकहीयात्माहें । यहांयहतात्पर्यहे । ज्ञानकायाश्रय यात्माहोनाहे यहचातांविवादरहितहे ॥ थोखानप्रथम देहकाधर्मप्रतीतहोताहै क्योंकि “मेमनुप्यहूं” इसमतीतिकवलमेश्रहं शब्दकेयर्थचेतनकामनुष्यत्व जातिवालेदेहकेसाथधर्मधर्मीभावप्रतीत होताहे ॥ औरचेतनहीज्ञानहै यातेस्थूलदेहकोज्ञानकायधिकरणहोने सेयात्मपनाप्रसिद्धहै । इसीरीतिसेइन्द्रियादिकोंको भीयात्मपनामहा करनेयोग्यहै । तथाहि ॥ काणोऽहम् “वधिरोऽहम्" इत्यादिक प्रतीतियों से काणत्वादि धर्मविशिष्ट इन्द्रियनके साथ अहंशदके अर्थ चेतनका धर्मधर्मिभाव प्रतीतहोताहै । औरचेतनहीज्ञानहै और ज्ञानका अधिकरण यात्मा होताहै यहपूर्वकथनकियाहै। यातेज्ञानका यधिकरण इन्द्रियादिकभी यात्माहे। यहां (इन्द्रियादिक)इसयादिपदसे प्राण औरमन तथा बुद्धि यादिकोंका ग्रहणकरना। इसप्रकार प्रत्यक्षप्रमाणसे देहादिकोंमेयात्म रूपतासिद्ध है । तैसेही इच्छादि परिशेपाऽनुमानसे भी तिनमेंयात्म रूपतासिद्धहै तिसयनुमानका यहयाकारहै- * इच्छादयः देहायाश्रिताः अन्यानाश्रितत्वेसति गुणत्वात् व्यतिरेकेणघटादिवत् * अ० इच्छादिक जो है वह देहादिकोंके आश्रित हैं । अन्यके अनाश्रितहुएं गुणहोनेसे । जोजोदेहादिकोंके ग्राश्रितनहीं है सोसो अन्यके अनाश्रितहुया गुणभीनहीं है । जैसेघटादिक हैं ॥ इति ॥ इसप्रकार इच्छादिकों की अधिकरणता देहादिकों में सिद्धहुए पुनः इच्छादिमत्त्वलिंग से तिनमें थात्मता सिद्धकरनी तिस अनुमानका यहथाकारहै। देहेंद्रियादयः अात्माभवितुमर्हन्ति इच्छादि- मत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथा घटादि 'यंदेहतथाइन्द्रियादिकयात्माहोनेकोयोग्यहोइच्छादिधर्मवालहोने वे. सि. मु सेोजोयात्मानहींहैं। सोइच्छादिधर्मवालेभीनहीं,जैसेघटादिकजडपदार्थ हाइति। यौरजोसिद्धांतीऐसेकहेकिदेहादिकोंकीयात्मताहमनिवारणनहीं करते। तथापितिसदेहादिरूपयात्माकोअतिप्रमाणकी अपेक्षाक्योंनहो। सोयह कथनभीनहींसंभवता क्योंकियनधिगतयर्थका बोधकहीप्रमाण होताहे औरदेहादिरूपयात्मा प्रत्यनादिकप्रमाणको विषयताहोनेसेयन- धिगतपनेकाअभावहै।इसीकारणसेश्रुतिकोतिसमें प्रमाणतानहींसंभवती। यद्यपिसाज्ञिरूपप्रत्यक्षसेदेहादिरूपयात्माकी सिद्धिमानेहुयेभी अनधि गतपनादूरनहींहोसकता क्योंकिसानीकरकेही विषयनिष्ठयज्ञातपना मिद्धहोताहे । औरचेतनरूपसाक्षिसे विनायन्यकिसीप्रमाणसेयज्ञान कीसिद्धिभी नहींसंभवती । क्योंकिग्रज्ञानकेसाथ इन्द्रियादिकोंके संबंधकायभावहे । यातेदेहादिरूपयात्मामें यज्ञातताके सिद्धहूयेतिस मेंश्रुतिप्रमाणकी विषयतासंभवतीहोतथापिलौकिकप्रत्यक्षादिकोंकरके सिद्धदेहादिरूपयात्मामें अनधिगतपनेकायभावहै यातेतिसमें श्रुति प्रमाणाकी विषयतानहींसंभवती अथवा अव्ययपदसे निवृतिकेयोग्य देहादिकोंकीयात्मरूपतासो इसपूर्वपक्षमेंकथनकीहै ।। इति ॥ 3 पूर्वपक्षकेसंग्रहकाश्लोक देहादिरात्मानः सिद्धोलौकिकादेवमानतः । नापेक्षतेश्रुतितस्मात् स्वसाक्षात्कृतयेपुनः ॥ १ ॥ अ०॥ चौ०॥ देहादिकयात्महजोई। लौकिकमानसिद्धभा सोई।। यातेस्वेसिद्धीकेमाहीं। श्रुतिप्रमाणसुचाहेनाहीं । समाधान।

-- प्रशंद १५ * अथपूर्वपनके निराकरणपूर्वक अव्ययपदव्याख्या निरूपण आत्मानित्योऽथवा नित्योभेदस्त्वायेस्फुटोमतः। अन्त्येतुकृतहानिः स्यादकृताभ्यागमस्तथा ॥२॥ ॥ स्वैयाछंद ।। प्रातमनित्यकहोतुमवादिन अथवाताहिअनि त्यवखान ॥ यादिपक्ष महिभेदस्पष्टा यहउरनीकेलेहुपचान ॥ अंत- पक्षकृतकर्मनकोभोगे विनासुहोवतहान । तथानकीयेहोवहप्राप्तयही दोपभाषेमतिमान ॥३॥ टी. हेवादिन् यात्मानित्यहैअथवायनित्यहै ॥ प्रथमपक्षजो स्वीकारकरोतोदेहादिकोंसे भेदस्पष्टहीसिद्धहोताहै । यौरजोदूसरापक्ष कहोतो "कृतनाश” अर्थातकियेहुयेकर्मनकाफलभोगसे विनाहीनाश रूपदोपतथा “ग्रकृताभ्यागम" यर्थात् नकियेहूयेकर्मनकीप्राप्तिरूपदोप प्राप्तहोगा। यहांयहतात्पर्यहै । यात्माको नित्यहोनेसे देहादिकोंको आत्मरूपतानहींसंभवती। यद्यपि देहात्मवादि के प्रति यात्माका नित्यत्व प्रसिद्ध है। तथापिआगे कथनकीहुईयुक्तिसे सो नित्यत्वप्रसिद्धहै । तिसयुक्तिको ही दिखलातेहैं ।इससंसारमंडलमें कोईसुखीहै कोईदुःखीहै कोईबर्द्धहै कोईमुक्तहै । इसप्रकार जगत्की रचना विचित्र प्रतीतहोतीहै । इसमें कोई विवादनहीं। सोविचित्रता कार्यहोनेसे हेतुसहितहै । यहां यह अनुमान जानना ] जगद्वैचित्र्यं सहेतुकं कार्यत्वात् पटवत् । श्र०-जगत्कीविचित्रता कारणसहित कार्यहोनेसे जोजोकार्य ० सि. होताहै सोसोकारण पूर्वकहीहोताहे पटकीन्याई ।। इति । इसअनुमान से जगत्कीविचित्रताकोकारणपूर्वकताकेसिद्ध हुये सोकारणभीविचित्र ही कथनकरना होगा अन्यथा कार्यकी विचित्रतासिद्ध नहीं होगी। यहवार्ता यन्यग्रंथमें कथनकीहै ! वैचित्र्यंनसमस्येति। य०--विचित्रतासे रहितपदार्थको विचित्रता की कारणतानहीं संभवती ॥ इति ॥ सोविचित्रकारण अदृष्टहीमाननाहोगा। क्योंकि दृष्टजोयागादिक हैं तिनको शीघ्रविनाशीहोनेसे कालांतर होनेवाले सुखादिकों का वहकारण नहीं होसकते इसी अभिप्राय से जगत्की विचित्रताके हेतुग्रदृष्ट कथनकियेहैं। यहांयहयनुमानजानना- इदंजगत् विचित्रकारणकं विचित्रकार्य त्वात् विचित्रपटवत् । अ०-यहजगविचित्रकारण वालाहै विचित्रकार्यहोनेसे जोजो विचित्रकार्य होताहै सोसोविचित्र कारणपूर्वकही होता है विचित्रपट कीन्याई ।। इति ॥इसयनुमानसे विचित्रकााणकी सिद्धिहै सोविचित्र कारणदृष्ट ही है । इसप्रकार विचित्रताके कारण अदृष्टकी सिद्धिहुये तिसकायाश्रय रूपताकरके नित्ययात्माकी सिद्धिहोतीहै ॥ इति ॥ शंका । विचित्रकार्य क्रियाजन्यहोताहै वहक्रियादेह जन्यहै । क्योंकि देहमेंहीक्रिया देखीजातीहै । यातदेहकोही क्रियाद्वारा सुखादिकोंका जनकहोनेसे वहदेहहीयात्माहै। औरवहही विचित्रताकाकारणहै।तिस सेभिन्नऔर कोई अदृष्ट विचित्रताकाकारणनहीं। जिसकाआधार रूपताकर नित्यात्माकी सिद्धिहो । समाधान । दृश्कारजोकिया पूबाई रूपतुमने कथनकियाहै | तिसकोशीघ्र विनाशी होनेसे चिरकालमें होनेवाले सुखादिकों का वहसाक्षात् कारणतोनहीं संभवता । और यदिकोईद्वार कल्पनाकरोगे । तौहमको अभिमत अदृष्टवलात्कार से 'सिद्धहोगा । शंका ॥ शरीरके सिद्ध हुयेयदृष्टकी सिद्धितथाथदृष्ट के सिद्धहुए शरीरकीसिद्धि ऐसेमानेहुये दोनोंकोअपनी सिद्धिं में परस्परयापेक्षाहोनेसे अन्योऽन्याश्रयदोपकीप्राप्ति है ।।समाधाना जैसे वीजौयंकरकापरस्पर कार्यकारणभावनिमित्तक अन्योऽन्याश्रयदोप पूवाहरूपताकर अनादिहोनेसे परिहारकियाजाताहै । तैसेशरीर श्री अदृष्टकेपूवाहको अनादि होनेसे परस्परयापेक्षाहुयेभी अन्योन्याश्रय दोषकी प्राप्तिनहींहोसकती ।। शंका ॥ यदृष्टको यनादिमानेहुयेभी तिसकायाश्रयरूपताकरके यात्मा कीसिद्धिनहीं संभवती । क्योंकि अदृष्ट अाकाशादिक भूतोंके याश्रित है ॥ समाधाच ॥ पञ्चभूतों कोसर्वशरीरोंमें समहोनेसे तिनकेयानित अदृष्टभी सर्वकोसाधारण होगा । औरतिसकाफल सुखतथा दुःखका भोगभी सर्वकोसाधारण होगा । सोयहवार्ता अनुभवसे विरुद्धहै । क्योंकिसको भिन्नभिन्न हीभोगदेखा जाताहै । याते प्रतिनियतभोगकेयसंभवसे ग्रदृष्टका थाश्रयपञ्चभूतनहीं हैं । और निराश्रयभी वहयदृष्टनहीं रहसकता इसलिये यन्यपूकारसे अनुपपन्नहुया वहयदृष्ट अपनायाश्रयरूपता करके यात्माकीकल्पनाकराताहै । इसपूकार यदृष्टकायाश्रययात्मा सिद्धहुया ॥ शंका ।। पूर्वउक्त प्रकारसे यात्माकी सिद्धिहो तथापि तिसको नित्यपना कैसेसिद्धहुया ।। समाधान ।। श्रदृष्टको पूर्वजन्म कासंबंधिहोनेसे प्रवाहरूपताकरतिसकीयनादितासिद्धहै । तिस अनादियदृष्ट के प्रवाहका थाधारहोनेसेयात्माभीयनादिहै । याते -- वे. मि० मु० थात्मानित्यहै । शंका॥ यनादित्वमानहेतु नित्यत्वकासाधकनहीं क्योंकि प्रागभावमें अनादित्वहेतु व्यभिचारीहै। समाधान ॥ जो अनादिभावहोताहै सो नियमकरके नित्यहोताहै। यात्माभीयनादि भावरूपहै यातेनित्यहे और मागभावमें अनादित्वकेहुयेभी भावरूपता नहीं यातयनादि भावत्वहेतु निर्दोपहे ।। शंका ।। जगत्के उपादान कारणअज्ञानको अनादिभावरूपता आपके सिद्धांतमें स्वीकारहै । यातेपूर्वउक्तहेतुका पुनःयनानमे व्यभिचारहे।।समाधान || अज्ञानको अनिर्वचनीय रूप होनेसे सद्प भावत्व तिसमें स्वीकारनहीं । इस लियेपूर्वउक्त हेतुनिर्दोपहे ॥ शंका - आत्मानित्यः अनादित्वेसतिसद्रूपभावत्वात् इस अनुमानमेंयदि ग्राकाशादिकोंको दृष्टांतमानोगेतो तिस दृष्टांतमें हेतुकी विकलता होगी। क्योंकिवेदान्तसिद्धांत आकाशादिकोंको अनिर्वचनीयहोनेसेसद्रूप भावत्वतिनमें स्वीकारनहीं। समाधान ॥ याकाशादिकोंमेहेतुकी विकलताहमकोइष्टहै । शंका॥ अनादिसद्पभावत्वहेतुकोयाकाशा दिकसपत्नसेव्यावृतमानेहये वहयसाधारणहलाभासहोगा। क्योंकि जोविपत्तसपत्त दोनोंसेव्यावृतहोकर पनमात्रवृतिहोसोयसाधारण हेत्वाभासहोताहै । औरयहयसाधारणकालक्षणपूर्वउक्तहेतुमेप्राप्त है । क्योंकि अनादिसद्पभावत्वहेतु घटादिकविपक्षतथाथाकाशादिक सपक्षसेव्यावृतहोकर पक्षमात्रयात्मावृत्तिहै यातेदुष्टहेतुहै। समाधान श्रति आकाशादिकोंकी उत्पत्तिकथनकीहै औरउत्पत्तिवाला पदार्थ घटादिकोंकीन्याईनियम करकेयनित्यहीहोताहै । यातेनित्यत्वसाध्य काभीथाकादिकोंमें प्रभावहोनेसेसपक्षत्वकाथभावहै।यातेहेतुगतपूर्व उक्तदोषनहीं प्राप्तहोसकता । औरयहांकेवलव्यतिरेकिलिंग स्वीकार होनेसेभीपूर्वउक्तदोपनहीं । यहांकेवलव्यतिरेकिकायहाकारहै। *आत्मानित्यः अनादिभावत्वात् यन्नैवं तन्नैवंयथा घटादि श्रा यात्मानित्यहैअनादिभावरूपहोनेसेजिसमेंनित्यत्वकाश्रभावहै तिसमेंअनादिभावत्वकाभीअभावजैसेघटादिकहैं।।इति।।यद्यपि केवल व्यतिरेकिलिंगमानेहयेनित्यत्वसाध्यकीयपूसिद्धिहोगी तथापिसामान्य तोदृष्टानुमानसे अनिश्चितडैधर्मिजिसका ऐसेनित्यत्वधर्मके सिद्धहये केवलव्यतिरेकिअनुमान श्रात्मामेहीनित्यत्वको स्थापनकरता।याते नित्यत्वसाध्यकी असिद्धिनहीं । यहांसामान्यतोदृष्टानुमानका यह श्राकार है। नित्यत्वंकचिदाश्रित धर्मत्वात् रूपादिवत् * श्र० ॥ नित्यत्वधर्मकिसीके ग्राश्रितहै धर्मरूपहोनेसेजोजो धर्महोताहसोसोकिसी धर्मिकेयाश्रितहोताहे रूपादिकोंकीन्याई ।इति। श्रथवायहांनेयायिकमतकेयनुसारयात्मामेंनित्यत्व सिद्धकरनेसेश्राका शादिकसपक्षमेंनित्यत्वसाध्यऔयनादिभावत्वहेतुइनदोनोंकीविकलता नहीं। क्योंकि वह श्राकाशादिकोंको नित्य तथा थनादिभावरूप मानते हैं ॥इति ।। यहांतककारिका के पूर्वार्द्धका व्याख्यानहूया ॥ अब नित्यत्वके साधकअनुमानमें विपक्षविषयक बाधकको निरूपण करतेहुये कारिकाके उत्तरार्द्धका व्याख्यान करतेहैं । यदिअात्मा को अनित्यमानोगे तो कियेहूयेकर्मनका फलभोगसेविनानाश और न ० मि० मु० कियेहुएकर्मनका फलभोगजो कृतनाशतथा यकृताभ्यागमरूप दोप तिसकीप्राप्ति होगी, भावयहपूर्वउक्तअनुमानसे यात्माकी नित्यता सिद्धहोनेपरभी जोवादीका अनित्यताकथनहे यहहीविपक्ष है, और पूर्वउक्तदोपकी प्राप्तिही विपनगंवाधक है । औरयात्मा को अनित्य मानेहुयेकर्ता प्रोभोक्ताकामी एकत्लनहींहोगा। क्योंकि वादीकेमत मेंदेहरूप यात्माहीकमकाकर्ता है । वहतोयहांहीभस्मीभूत होगिया औरनवीन उत्पन्नहूयादेव शरीररूपयात्मा कर्मफलकाभोक्ताहोगा । ऐसेमानेहूयेलोकमें प्रसिद्धकर्ताभोक्ताकेएकत्वका नियमभंगरूपदोप वादीकोप्राप्तहोगा। क्योंकिलोकमजोभक्षणक्रियाकाकर्ता हे वहीतिस केफलतृप्तिकोप्राप्तहोताहै । अन्यनहीं यदि ऐसानमाने तोदेवदत्तके भोजनकरनेसेयज्ञदत्ततृप्तहयाचाहिये । सोऐमादेखनेमेंनहींयाता याते कर्तायौ भोक्ताका एकत्वहीमानना उचितहै । जब ऐसे माना तब श्रात्माकीनित्यता वलात्कारसेसिद्धहूयी ।। शंका॥ धर्मिकल्पनाताधर्मकल्पनावरमिति के अ०॥ धर्मिकीकल्पनासेधर्ममात्रकी कल्पनाकरनेमलाघवहै । इसन्यायसे शरीरादिक प्रसिद्धधर्मियों में आत्मत्व धर्मकीकल्पना क्यों निहींकरते । समाधान ॥ शरीरादिककार्यव→में अात्मत्वकायसंभव है। क्योंकि, इसकोयनित्यहोनेसेयौ कार्यहोनेसे तथारूपवालाहोनेसे औजडहोनेसे तथापरिछिन्नहोनेसे योदृश्यहोनेसे अनात्मतानिश्चित है। इसकथनसेकारिकाके द्वितीयपादका व्याख्यानहूया ॥ शंका ।। पूर्वउक्त युक्तिकेवलसे यात्माकीनित्यता सिद्धहुयेभी नैयायिकमतमें तिसकोमानसप्रत्यक्षका विषयहोनेसे तिसके साक्षात्कारकेयर्थ श्रुति प्रमाणकीकिंचितभी अपेक्षानहीं। *- पूर्वार्द्ध ** आत्मामे श्रुतिप्रमाणकीअपेक्षानिरूपण पूर्वक अव्ययपदार्थका निरूपण * समाधान ॥ विशिष्ट यात्माकोमानस प्रत्यक्षका विषयहूयभी शोधनकियाहूयातत्त्वंपदकालक्ष्यार्थयकर्तायभोक्ताशुद्धयात्मामानस प्रत्यक्षका विषयनहीं होसकता याते। अविनाशीवारेअयमात्मानुछितिधर्मा । निष्कलमिति * १० उ०० प्रा०के०।१४) अ०॥ अरेमैत्रेयीयहयात्माअविनाशीहै तथाविनाशसेरहित धर्मवालाहै और निखया है। इत्यादिक श्रुति सिद्धनित्ययात्माके साक्षात्कारकेयर्थयन्यप्रमाणका यभावहोनेसे श्रुतिप्रमाणकीअवश्य अपेक्षाहै । यहांपूर्वउक्तश्रुतिनेतीनप्रकारका विनाशजोयात्मामेभ्रान्ति, करप्राप्तथा।तिसकानिषेधकियाहै। वहतीनप्रकारकाविनाशयहहै। एक तोस्वरूपनाशप्रयुक्तनाशहै । जैसेविद्युतकाविनाश स्वरूपसेहोताहै । औरदूसरार्धमनाश प्रयुक्तमाशहै । जैसेकुंडलरूपधर्मके अभावहोनेसे सुवर्णरूपर्मिका अभावहै । क्योंकिउत्पत्तितथा विनाशकोप्राप्त होता हुयाधर्मयपनेयाश्रयरूप धर्मिकोभीविकारिकरदेताहै। औरतीसरा अवयवोंके विनाशपयुक्तनाशहै । जैसे तंतूरूप अवयवके विनाश, होनेसेवस्त्रकानाशहै । इसीकोशास्त्रमेयपक्षयशब्दसेकथन कियाहै। इनमे स्वरूपनाश प्रयुक्तनाशका यात्मामे निषेध करने के लिये यविनाशी " यह पद. श्रुतिने कथनकिया है..। और दूसरेनारा ०सि० मुं० के निषेधकरनेकेलिये “अनुछितिधर्मा" यहपदकथनकियाहै। और तीसरेविनाशके निषेधकरनेकेलिये "निष्कलं” यहपदकथनकियाहै। इसीभिप्रायसेप्रथमकारिकामे (यव्यय) यहयात्माकाविशेषणकथन कियाहै । यद्यपियहांव्ययनामविनाशकाहै नजोविनाशहोउसकानाम श्रव्ययहै । इसप्रकारकासमास कियेहुयेयविनाशीरूपताथात्माकी सिद्धनहींहोसकती। क्योंकिअपनेविनाशसेभिन्नजो घटादिकपति- योगीहैं तिनमेंअनित्यपनाहीदेखाहै । तैसेवनाशसेभिन्नयात्मा भी अनित्यपनाहोगा । तथापियहांपूर्वउक्तसमासनहीं किन्तुसमासांतर है। सोदिखलातेहैं । न विद्यतेव्ययेविनाशोधर्मतः स्वरूपतोऽवयवतो यस्यसअव्ययः॥ य-जिसकाधर्मसे और स्वरूपसे तथायवयवसे विनाशनहो तिसकोयव्ययकहतेहैं । “यर्थयह" यात्माकोनिरवयवहोनेसे श्रव- यवनाशप्रयुक्त नाशनहींहोता । और निर्धर्मकहोनेसे धर्मनाश पूयुक्तनाश नहींहोता ॥ यौरनित्यहोनेसे स्वरूपनाशप्रयुक्त नाश नहींहोता.॥ शंका ॥ सांख्यमतमें प्रकृतिको परिणामिनित्यमानाहै तिसका स्वरूपसे जैसेनाशहोताहै तैसे यात्माकाभीनाशहोगा समा- धान । परिणामिनित्यपदार्थकीन्याई आत्माकास्वरूपसे अर्थात्परि- णामरूपसेनाशनहींहोता,क्योंकियात्माकूटस्थनित्यहे,अर्थात्परिणाम रूपविकारसे रहितनित्यहै और परिपूर्णहै ।। इतिथव्ययपदव्याख्या ।। * अथ ज्योतिपदव्याख्याप्रारंभः ॥ श्रुतिसिद्धआत्माके साक्षात्कारकेयर्थ श्रुतिप्रमाणकीथपेक्षाहै।

यहअर्थपूर्वनिरूपणकिया ।। तहांयात्माकोश्रुतिसिद्धयत्वनिषेध करने केलियेपूर्वपक्षीकोईएकनास्तिकभूमकारचनाकरताहै ॥ ॥ अथ पूर्वपक्ष ॥ * आत्मामेप्रमाणकअभावसे, असत्यताका निरूपण हेसिद्धांतिन् जिसमात्माकीनित्यता प्रापप्रतिपादन करतेहो तिसमेकोईपूमाणहै अथवानहीं । यहांपूथमपक्ष बहुतवक्तव्यहोनेसे द्वितीयपक्षमपूथम दूषणदिखलातेहैं।। तहाँद्वितीयपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकिमाणके श्राधीनहीवस्तुकीसताहै। प्रमाणकेयभावहुयेयात्मा कोथसत्रूपताकी प्राप्तियवश्यहोगी ।। शंग ।। हेवादिन पूमाणके प्राधीनवस्तुकीसत्ताहै । इसतुम्हारेनियमका प्रमाणमें व्यभिचारहै ।। क्योंकिपमाणमेप्रमाणका अभावहुएभीतुमनेप्रमाणकी सत्तामानीहे । समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् यहयापकाकथन नहींसंभवता ॥ क्योंकि स्वपरकासाधकजोपमाण तिसकोहमप्रकाशकस्वभावमानतेहैं । याते तिसमेंप्रमाणकेअभावहुएभीग्रसरूपतानहींहोसकती। औरथात्मा तोपमेयएकस्वभावहै । इसीसेपूमाणके श्रभावहुए यात्माकोसत् रूपकीपाप्तियावश्यक है । यदिऐसेनमानतो प्रमाणकेयभावहुए नर शृंगादिकभी सत्यहुएचाहिये।सोनरशृंगादिकोंकी सत्ताहमदेखतेनहीं। यातेपूमाणकेअभावसे जैसेनरशृंगादिक असतहैं।तैसे श्रात्माभीश्रसत् रूपहोगा। आत्मामलौकिक प्रमाणकाअभावनिरूपया औरयदिप्रथमपक्षमानोतो तिसमेंयहकहनाचाहियो वहप्रमाण ० मुंसक लौकिकहैयथवावेदहै। प्रथमपक्षोभीयहविचार करनेयोग्यहै। वहलौकि कप्रमाणप्रत्यक्षहैवायनुमानहैयथवाशब्दहैवाइनसेको भिन्न है।प्रथमपक्ष तोनहींसंभवता क्योंकि शब्दादिकगुणोंकोयाकाशादिकभूतोंकाधर्म होनेसेयौरवृतिज्ञान तथाइच्छादिकगुणोंको अंतस्करणका धर्महोनेसे श्रात्मासर्वधर्मोसे रहितहै | औरयदि निर्धर्मकयात्मामेभी इन्द्रियकी विपयतामानो तोनहींसंभवती । क्योंकिनेत्रइंद्रियरूपवान वस्तुकोही विषयकरताहै । रूपरहितकोनहीं । अन्यथावायुका प्रत्यक्षमीनेत्र इंद्रियसेहूयाचाहिये । ऐसेहीश्रोत्रत्वकरसनाघ्राणयहचारोइंद्रियभीशब्द औस्पर्शवान्तथारसयौगंधभात्रकोविषयकरतेहैं।शब्दादिकोंसेविलनण आत्माकोनहींविषयकरसकता।ौरइन्द्रियोंकोवाद्यवस्तुकेदेखनेका स्व- भावहै। यात्मातुमनेसर्वसेअंतरमानाहै । यातेभीइंद्रियोंकी यात्मामें प्रवृत्ति नहींहोसकती । औरअनुमानप्रमाणकाभीयात्मा विषय नहीं। क्योंकियात्मव्याप्तहेतुका अनिश्चयहै | भावयह यात्माकानिश्चा यकजोहेतुहेसो यात्माकरकेव्याप्तहीग्रहणकरनेयोग्यहै।तिस्यात्मव्याप्त लिंगग्राहकइन्द्रियहैंयहकथनतोनहींसंभवता। क्योंकिपादिवान्तथा वाद्यवस्तुकोहीइन्द्रियविषयकरतेहैं। यहपूर्वकथनकियाहै। और अनुमान सेभी तिसयात्मव्याप्त लिंगकाग्रहण नहींहोसकता। क्योंकि यनवस्था दोषकीप्राप्तिहै | भावयह आत्माको अतीन्द्रिय होनेसे यात्मविशिष्ट हेतुभी अतींद्रियकहनाहोगा। तिसहेतुके ज्ञान अर्थयोर अनुमान कीअपेक्षा होगी। तथादूसरे अनुमानकोभी लिंगज्ञान जन्यहोनेसे लिंगकेज्ञानयर्थतीसरेअनुमानकी अपेक्षाहोगी। योस्तीसरेयनुमान कोचौथकीयपेक्षा होनेसे अनवस्थाकी प्राप्तियवश्य होगी ॥शंका!!

. पूर्वाद हेवादिन जहांयन्वयिलिंगसे साध्यकी सिद्धिहोवहां साध्यव्याप्तहेतुका निश्चय अनुमानकायंग है । औरजहांकेवल व्यतिरेकिलिंगसेसाध्य कीसिद्धहोवहां व्यतिरेकव्याप्तिका निश्चय अनुमानका अंगहै । इस कथनसेयह यर्थसिद्धहुया । प्राणादिमत्व रूपव्यतिरेकि लिंगसेयात्मा कीसिद्धिहोती है । तिसयनुमानकायहयाकारहे । । 3 जीवच्छरीरंसात्मकं प्राणादिमत्वात् यन्नैवंतन्नैवं यथाघटादि अ०-जीवत्शरीर यात्मासहितहै । पूणादिवालाहानेसे जोजो आत्मासहित नहींहै । सोसोपूणादि वालाभीनहीं है । जैसेघटादिक हैं ॥ इति ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् प्रतियोगीज्ञान विना अभाव काज्ञाननहींहोता यहनियमहै । जैसेअग्निरूप पूतियोगीकेज्ञान विना अमिकेअभावको कोईनहींजानसकता । तैसेहीग्रात्मारूप प्रतियोगी केज्ञानविना यात्माकेयभावरूप साध्याभावकी प्राणादिमत्त्वाभावरूप साधनाभावकेसाथ व्यासिकाग्रहण कैसेहोगा । औरइसी अनुमानसे यात्माकाज्ञान मानेहुए कैसेअन्योन्याश्रयदोपनहीं प्राप्तहोगा क्योंकि आत्माकीसिद्धिहुए इसयनुमानकी प्रवृति यो यनुमानके पूवृतहुए यात्माकी सिद्धि माननीहोगी ॥ ऐसेदोनोंको अपनी सिद्धि में परस्परयापेक्षाहोनेसे श्रन्योन्याश्रय दोपस्पष्टही है। औरइसकेवल व्यतिरेकि अनुमानमें यसिद्धविशेषण वालापक्षीहै ।। क्योंकि ।। सबैकार्यसवितकर्तृपूर्वकं कदाचित्क- त्वात् यन्नैवं तन्नैवंयथा आकाशादि । थ-सर्वकार्य सर्ववित्कर्तृपूर्वकहें अर्थात किसीसर्वज्ञकर्ताकर दे०सि० मु. रचितहें । कदाचित्कहोनेसे जोजोसर्ववित्कर्तृपूर्वकनहींहैं सोसोकदा- विकभीनहींहैं । जैसेथाकाशादिकहैं ।। इति ।। जैसेइसयनुमानसे पूर्वसर्ववित्वादिविशेषणकी अप्रसिद्धिहोनेसे अप्रसिद्धप्रविशेषणवाला पक्षहै । तैसेहीसिद्धांतीनेयात्माकीसिद्धियर्थकथनकियाजो अनुमान तिसकीपूवृतिसेपूथमजीवत्शरीररूपपक्षमसात्मकत्वरूपसाध्यकीपू- सिद्धिहोनेसे अप्रसिद्धविशेषणवालापन प्रसिद्धहीहै । यातेप्राणादि मलहेतु थाश्रयसिद्धिरूपदोपकर दुष्टहोनेसेभी यात्माकासाधकनहीं। इसपूकारयात्मायनुमानकाविषयनहीं।यवतीसरेपक्षकोदूपितकरतेहैं । औरलौकिकशब्दभी प्रात्माकोविषयनहींकरसकताहैं। क्योंकिप्रत्यक्ष और अनुमानकीजहांविषयताहोवहांहीलौकिकशब्दप्रवृतहोताहै। और श्रात्मा पूर्वउक्तरीतिसे प्रत्यक्षादिकोंकी विषयताकाथभावहै । याते लौकिकशब्दभीतिसमें प्रमाणनहीं । औरइनतीनोंसेभिन्नअन्यकिसी प्रमाणकीसंभावनाभीनहींहोसकती। क्योंकियर्थापतिप्रमाणतो अन्य पूकारसे उपपन्नहे । सोऐसेहै । शरीरकाजीवनप्राणोंसेविना अनुप- पन्नहुया प्राणयात्माकी कल्पनाकराताहै ।। इति ।। औरअनुपलब्धि प्रमाणकी श्रात्मामयोग्यताहीनहीं। अथात्मामेवेदप्रमाण की विषयता का निषेध निरूपण अवयादिमें कथन कियाजो दूसरापनथा तिसको वादीनिषेध करताहै। दूसरेपत्त मेंभी यहविचारकरने योग्य है वेदजन्यज्ञानभास्यत्व रूपविपयत्वयात्मामें है ॥ अथवा ॥ प्रकारांतरसेभासमान यात्मामें वेदजन्य ज्ञानसे निवृत्तहोनेयोग्य अज्ञानकी विषयतारूप विषयत्व है ।

- पूर्वाई यहांवेदजन्यज्ञानसेनिवृत्तिके योग्यज्ञानकरजोबाच्छादितपनाहैयही, यात्मामेंग्रज्ञानकीविषयताजाननी।। वेदजन्यज्ञानभास्यत्वरूपविषयत्व हैइसप्रथमपक्षकोपितकरतेहैं। प्रथमपक्षमेयात्माकोवेदजन्यज्ञानका विषयहोनेसेघद्यादिकोकीन्याईजड़ताहोगी। यौरजडताहोनेसेअनात्म पनाहोगा। यहांयहअनुमानजानना ।। *आत्माअनात्माभवितुमर्हतिजडत्वात्घटादिवत्* अ०॥ यात्मायनात्माहोनेकेयोग्यहै । जडहोनेसे । जोजो जडहोताहैसोसोयनात्माहोताहै । जैसेघटादिकहैं ।। इति ॥ शंका हेवादिन्यहांचिद्काविरोधिजडत्वकहतेहोअथवाचिद्काथनधिकरणत्व जडत्वहै । यहदोनोंप्रकारकाजडत्वयात्मामेनहींसंभवता । क्योंकि यात्माचिद्रूपहै। तिसमेज्ञानकीविषयतासेजडपनातुमकैसेापादन करतेहो । औरजडत्वहेतुअनात्मताकासाधकभीनहीं। क्योंकितिसमें ज्ञानाऽनाश्रयत्वउपाधिहै । सोएसेहै । जहाँजहांथनात्मत्वहैतहांतहाँ ज्ञानाऽनाश्रयत्वहै । जैसेघटादिकोंमेंहै । औरजहाँजहांजडत्वहैतहां तहांज्ञानाऽनाश्रयत्वनहीं। जैसेयात्मा है। इसप्रकारथनात्मत्वसाध्य केसाथव्यापकौरजडत्वहेतुकेसाथअव्यापकहोनेसे ज्ञानाऽनाश्रयत्व कोउपाधिरूपताकासंभवहै । यातेजडत्वहेतुसोपाधिकनामाहेत्वाभास है । स्वसाध्यकासाधकनहीं । समाधान । हेसिद्धांतिन्त्रात्मामेज्ञान भास्यत्वमानेहूएचेतनरूपताकीसिद्धिहै । क्योंकि भास्यरूपश्रर्थात् दृश्यभीहोपुनः वहचेतनहोऐसेकहींभी प्रसिद्ध नहींहै। श्रीज्ञानमें वेद्यत्वभीस्वीकारनहींउलटातिसकोयवेद्यस्वभावमानाहै।ौरज्ञानाऽना श्रयत्वमेउपाधिरूपताभीनहींसंभवती। क्योंकिनैयायिकमतमेवपक्ष ३०सि० मु० । इतरत्वहै। यदिपक्षेतरत्वकोभीउपाधिरूपमानलेंतोसर्वहीसत्हेतुदुष्ट होजायेंगे | क्योंकिसर्वहीसतहेतुपक्षेतरत्वरूपउपाधिकरयुक्तहीहैं । यातेपक्षतरत्वकोउपाधिरूपतानहींसंभवती । किंवा।यहउपाधिसाधन केसाथभीव्यापकहै। क्योंकिजहांजहांजडत्वहेतहांतहांज्ञानाऽनाश्रयत्व भीहै । जैसेशरीखाद्यदेशावछिन्नयात्मामेहै । इसरीतिसेज्ञानाऽना श्रयत्वकोउपाधिपनेकेनवननेसे जडत्वहेतु निर्दोपहया अनात्मत्वका साधकहै ।। इति ॥ ौरद्वितीयपक्षमेभीयहविचारकर्तव्यहै । वह प्रकारांतरसे यात्मामेभासमानत्वस्याहै । स्वयंभासमानताहैअथवा अन्यकिसीप्रमाणसेभासमानताहै । अंत्यपक्षमेतो दोपपूर्वकथनकर श्रायेहैंयातेपुनःकथनकीयावश्यकतानहीं । औरस्वयंप्रकाशरूपतासे भासमानयात्मायाज्ञानकरयाच्छादितहैयहप्रथमपक्षशेपरहताहैवहभी नहींसंभवता । क्योंकिस्वयंप्रकाशस्वरूपात्मामेयज्ञानकीविषयताका हीयसंभवहे।अर्थयहाअज्ञानकारिपयात्माकोमानेहयेयभासमानता होगी। सोस्वयंभासमानयात्मामेनिरूपणनहींहोसकती ॥ शंका ॥ हेवादिन्जैसेस्वयंभासमानसूर्यमेयभासमानताकीसंभावनाउल्लूकादिक करतेहैं । तैसेहीस्वयंभासमानयात्मामेभीयभासमानताकीसंभावना श्रजजनोंकोहोजायेगी ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन्जेसेमध्यान्हकाल वर्तिस्वयंप्रकाशमानसूर्यमेकोईभीयंधकारकीसंभावनानहींकरसकता। औरसूर्यकोअंधकारकरके याच्छादितहोनेसेउल्लूकादिकतिसकोनहीं देखतेयहवार्तानहीं। किन्तुसूर्यके प्रकाशसेतिनकीद्रष्टिमंदहोजाती है तिसदिवांधत्वरूपदोपसे वहसूर्यकोनहींदेखसकते । तैसेहीवयंप्रकाश श्रात्मामेअज्ञानविषयत्वकेयसंभवसेवेदप्रमाणकीविषयतानहींसंभवती।

पूबाई यातेदेहादिकोंसेभिन्नयात्माअसतहै । यहअर्थसिद्धहुा ।। इति । * अथएकदेशिवेदांतिकारीतिसेपूर्वपक्षका समाधाननिरूपण * हेवादिन्यात्मामें अज्ञानविषयत्वके अभावसे वेदप्रमाणकोवि- पयतानहीं संभवतीयहपूर्वतुमनेकथनकिया।सोक्यायज्ञानकीविषयता जीवमेंनहींसंभवती यहतुमकहतेहो । अथवा ब्रह्ममेंनहींसंभवती यह तुमकहतेहो। तिनमेंप्रथमपक्षतोहमकोभी स्वीकारहै । क्योंकिकर्ता औरभोक्तारूपसंसारीजीवको वेदनहींप्रतिपादनकरता । तिसकेप्रति- पादनमेंकोईप्रयोजननहीं । औरद्वितीयपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकि ब्रह्मम॑यज्ञानकीविषयता “ब्रह्मनजानामि"इसअनुभवसेसिद्धहै। याते वेदजन्यज्ञानकरके निवृत्तिकेयोग्य ज्ञानविषयत्वरूपवेदप्रमाणकीवि षयताकैसेनहींसंभवती । इसप्रकारकाजोएकदेशीकामतहै । तिसको दूपितकरनेकेलिये पूर्वपचीतिसकोप्रकटकरताहै । पूर्वयात्मामेंप्रमाण काअभावनिरूपणकिया। तिसप्रमाणकपनेके निपेधर्मकोईकमंडनमत को याश्रयणकरनेवाले औरयागेकथनकीहुईरीतिसे यात्माग्रज्ञान काविषयहै इसकोनसहनकरतेहुये उत्तरदेनेकोपूर्वपक्षीके सन्मुखश्रव- स्थितहोतेहैं । शंका । पूर्वब्रह्माविषयकथज्ञान तुमनमाना है और जीवविषयकनहींमाना ।। सोकथननहींसंभता ।। क्योंकि- अयमात्माब्रह्म अ०-यहात्माब्रह्मस्वरूपहै।इसश्रुतिवचनसेजीवब्रह्मसेअभिन्न है यातेवहकैसेयज्ञानकाविषयनहीं किंतुयज्ञानकाविषयहै।।समाधाना हे वादिश्रुति सिद्धयदेतकोसंकोचकरके जीवौरब्रह्म तथाजीवोंका सि० मु. १९ परस्परभेदहमकल्पनाकरतेहैं । यातेजीवथज्ञानकाविषयनहीं ॥शंका।। यदिवास्तवद्धतके थाश्रयणकरनेसेही जीवात्मायज्ञानका विपयनहीं यहनिषेधवनसकताहे तोप्रमाणशून्ययदेतकामंकोच किसलियेकरतेहो । समाधान ।। हेवादिन् ॥ ॐ यत्परःशब्दःसशब्दार्थ पृ० मी० श्र०-जिसकोतात्पर्यवृतिसे शब्दयोधनकरे सोईशब्दकाअर्थ होताहै। इसन्यायकोग्राश्रयणकरनेसे अदेतश्रुतिमत्यक्षादिकप्रमाणों को प्रभासरूपताकरके प्रत्यक्षादिसिद्धदेतकोवाधकर यदेतकोस्थापन करतीहै। यातेयद्धतयप्रमाणकनहीं। इसीकारणसे यपनेमतकीसिद्धि केयर्थयबेतकासंकोच अवश्यकरनेयोग्यहै। इसमेंकारणयहहै । एक जीवऔरतिसकासंपादक एकअज्ञानस्वीकारकियेहुये साधनों के अनु- छाताकिसी एकपुरुषकोतत्त्वज्ञानके उत्पन्नहुयेजगत्के उपादानभूतथ- ज्ञानकाविनाशहोनेसे इसवर्तमानकालमें किसीकोभी संसारकाअनुभव नहींहोगा। औरतेसेहीकोईबद्धहै कोईमुक्तहै। इसप्रकारकीव्यवस्था भी सिद्धनहींहोगी। यातेजीवब्रह्मकेभेदसे विनावद्धमुक्तादिकव्यव- स्थाकीअनुपपत्तिसेअदेनकासंकोच्यवश्यकग्नेयोग्यहै।।इति॥शंका!! हेएकदेशिन् यदिशात्माविषयक जाननहींहै तोक्याग्रज्ञाननिर्विषयही है। औरयदियहकहो अज्ञानकाविषयब्रह्म।।मोनहींसंभवता। क्योंकि ब्रह्मस्वयंप्रकाशस्वरूप है । तेसेअज्ञानकायाश्रयभी कोईनहींनिरूपण होसकतायिद्यपिजीवहीअज्ञानकायाश्रयहेतथापितिसकोयज्ञानविशि- होनेसे अज्ञानकीयाश्रयतानहींसंभवती । क्योंकियात्मयाश्रयदोप मातहोताहै । सोइसप्रकारहै ।।

पूबाई विशिष्टतिधर्मस्यविशेषणतित्वनियमात् ॐ अ०-विशिष्ट वर्तनेवाले धर्मकाविशेषणमे वर्तनेकानियमहै । इसन्यायसे अज्ञानविशिष्टमेंवृत्तिजोयज्ञानकीयधारता सोविशेपणी भूतयज्ञानमेंभी अवश्यवर्तेगी यातयात्माश्रयदोपहोनेसे जीवभीअज्ञान का आश्रयनहीं । औरब्रह्मकोभी अज्ञानकीयाश्रयतानहींसंभवती । क्योंकि ब्रह्मकोतुमनेयज्ञानकाविपयमानाहै । विषयहोनेसेहीतिसको श्राश्रयतानहींसंभवती । औरयज्ञानकोयाश्रय तथाविषयके भेदकी अपेक्षाहोनेसेभीएकहींयाश्रय तथाविषयनहीं बनसकता। यौरब्रह्मको अज्ञानकायाश्रयमानेहुये जीवकीन्याई अल्पज्ञहोनेसे सर्वज्ञताकीभी हानीहोगी । इसरीतिसेयज्ञानकायाश्रय तथाविषयकोईभी निरूपण नहीं होसकता ॥ इति ॥ समाधान ॥ * अथएकदेशीकीरीतिसेअविद्याकेआश्रय तथाविषयकाभेदनिरूपण जीवाश्रयावलपदाह्यविदयातचविन्मता। तहिरूदमिदंवाक्यमात्मात्वज्ञानगोचरः ॥३॥ चौ०-जीवाश्रितयौब्रह्मविपैनी। ग्राहियविद्यावुधजनवैनी॥ अज्ञान विषययात्मपुनगायो । ततविरुद्धयहवचननभायो ॥४॥ टी--ब्रह्मकोस्वयंप्रकाशहोनेसे तिसमेंयज्ञानकी विषयतानहीं संभवती यहपूर्ववादीनेकथनकिया सोयसंगतहै। क्योंकि विद्याकी कल्पनाकरनेवालेजीचकेपति वहमारवयंप्रकाशरूपतासे सम्यकभान बै० म०सि० नहींहोता। औरजिसकेज्ञानसे मोनहो तिसकेयज्ञानसेही बंधहोताहै यहनिर्विवादहै । औरब्रह्मकज्ञानसे मोक्षहोताहे यहवार्ता - ब्रह्मवेदब्रह्मैवभवति श्र०-ब्रह्मकेजाननेवाला ब्रह्मस्वरूपहोताहे। इसश्रति प्रसिद्ध है । इसीकारणसेवंधभीब्रह्मके यज्ञानसेही होताहे । यातेकिसप्रकार तुमब्रह्ममें यज्ञानकी विपयताका अभाव प्रतिपादन करतेहो । और जीव को अज्ञानका याश्रय मानने में जो यात्माश्रय दोप तुमने पूर्वकहाथा । वहभीनहींसंभवता । क्योंकियज्ञानको उपाधिरूपता सेतटस्थहोकर जीवभावकानियामकहोनेसे जीवकोटिसे वहवा है । इतनामूलकारिकामेजो (हि) शब्दहै तिसकायर्थजानन ॥शंका।। व्याकरण (याप्ल) धातूव्याप्तियानपूर्णयर्थमेहै तिसधानसेयात्म शब्दकीसिद्धिहोनेकरतिसकोब्रह्मकावाचकपनाहीप्रतीतहोताहै। और ब्रह्ममयज्ञानकीविषयतातुममानतेहो ॥ औरपूर्वउक्तरीतिसेब्रह्मऔर यात्माएकहीपदार्थहै ॥ यातेयात्मामेयज्ञानकीविषयताकाअभावतुम कैसेकथनकरतेहो । समाधान ॥हेवादिन्यद्यपियोगबृतिसेयात्मशब्द ब्रह्मकावाचकहे । तथापि ॥ रूढियोगमपहराति अादिवृतियोगवृतिकोहरलेतीहै ।। इसन्यायसेयात्मशब्द जीवकाहीवाचकहै ।। सोजीवज्ञानकायाश्रयहैविपयनहीं ॥ विषय तोयज्ञानकाब्रह्महीहै । इसप्रकारज्ञानकीविषताहोनेसेहीवेदजन्य ज्ञानकरकेनिवृतिकेयोग्यज्ञानविषयत्वरूपजोवेदप्रमाणकी विषयतासो ब्रझमेसंभवेहेन। इति ।। शंका ।।.जीवयज्ञानकाथाश्रयहोपरन्तुतिस पूाई कोएकहोनेसेबद्धमुक्तादिकव्यवहारकैसेसिद्धहोगा ॥ समाधान ॥ हे वादिनवहयज्ञानका याश्रयरूप जीवनाना, अन्यथावद्धमुक्तादिक व्यवहारनहींवनेगा।जीवोंकाभेदवद्धमुक्तादिकव्यवहारकासाधकहैइसी अर्थकोस्पष्टकरतेहैं ॥ जिसअधिकारिकोश्रवणादिकोंकेअभ्यासकी पुष्कलतासेब्रह्महीयात्मा हूं । इसप्रकारकासाक्षात्कारहुयाहै |तिस पुरुषकामोतहोताहैऔरतिससेभिन्नबद्धरहताहै ।। यहांमुख्यसामानाधि करणयकीन्याईपदोंकाबाध सामानाधिकरणयमानेहुयेभी ब्रह्मस्वरूपही थात्माहैतिसब्रह्मसेइतरनहीं क्योंकिकल्पितपदार्थकी अधिष्ठानसेभिन्न सत्तानहींहोती ॥ यातेपूर्वउक्तबोधकायाकारखनसकताहै ॥ यहभाव है ॥शंका ।। यद्यपिपूर्वउक्तरीतिसेजीवअनेकहोंतथापितिनकाउपाधि रूपयज्ञानकोएकहोनेसेब्रह्मज्ञानकरतिसएकत्रज्ञानके निवृत्तहुये पुनः संसारकीप्रतीतिकिसीकोनहींहोगी । समाधान || हेवादिनपूर्वउक्त बद्धमुक्तादिकव्यवहारकी अनुपपत्तिसेयज्ञानभी अनेककल्पनाकिये जातेहैं । यातेसंसारकीपूतीतिकासंभवहे ॥ शंका ॥ साधारणतथा यसाधारणपूपंचकाउपादानऔरप्रतिबिंबतुल्ययनेकजीवोंके याश्रित औब्रह्मकोविषयकरने वाला एकहीअज्ञान बद्धमुक्तादिक व्यवहार का साधकक्यानहो ॥ इसीअर्थकोदिखलातेहैं जिसअधिकारिजीव में तत्त्वसाक्षात्कार उत्पन्नहोताहे । तिरायाश्रयको विरोधसेत्याग कर औरयाश्रयरूपजीवोंमें अज्ञानवर्तताहै । जिसयाश्रयको श्रज्ञा नत्यागताहै । तिसकोमुक्तकहतेहैं । जिनमेंस्थितहोताहै तिन कोबद्ध कहतेहैं । तैसेमानेहुये एक अज्ञानसेही अनेकप्रकार का बद्धमुक्तादिक व्यवहार सिद्धहुये पुनः अनेक ज्ञानोंकी कल्पना वे सिमु निष्फलहै । समाधान ॥ हेवादिन हमयहपूछतेहैं । तत्त्वज्ञानअपने आश्रयसे अज्ञानको निकासदेताहे अथवातिसको नाशकरदेताहै। यदिप्रथमपक्षमानोतो यज्ञानकी निवृतिनहींहोगी। क्योंकिज्ञानसे भिन्नौरकोई अज्ञानकानिवर्तकहै नहीं औरनतुमनेमानाहे । तेसामाने हुये यज्ञानको नित्यत्वपूसंगहोगा। औरयज्ञानकोनित्यहोनेसे दैतकी भी प्राप्तिहोगी यातेपूथमपन्न ग्रसंगतहे । पौरयदिद्वितीयपक्षकहो तोयज्ञानकोएकमानेहुयेएकपुरुपकेज्ञानसे यज्ञानतत्कार्य सर्वपूपंचकी निबृतिहुयेपूत्यनादिपूमाणमिद्धजगत्काकिसीकोभीयनुभवनहींहोगा औरयदिवादीऐसेकहेब पर्यन्तफिसीको ज्ञानहीनहीं हुया सोकथन यमंगतहै।क्योंकिपूर्वकालमेजोव्यासवमिष्टादिकमहान पुरुपहुयेहैं।यौ सभ्यस्यगोतथाउपांगों सहितसाधनोंका यनुष्ठानजिन्होंनेकियाहै ।। तिनकोभीजवज्ञाननहींउत्पन्न हुयातोइसकालमेहोनेवालेयस्मदादिक जीवोंकोजानउत्पतिकीसंभावनाभीयशस्यहोनेसे श्रवणादिकसाधनों केश्रभ्याममेप्रवृतिकेयभावहुये अनिर्मोक्षपूमंगहोगा यर्थात् किसीको भीमोक्षकालाभनहींहोगा। यहांशमादिकज्ञानकेयंग,ौरयज्ञादिक उपांगहेगौरवणयादिकसाधनह।।ौरदीर्घकालतथायादरयोग्यत रायसेरहितजोश्रवणादिकाँमायनुष्ठानहेयहहीयनुष्ठानमेसम्यरुपनाहे ॥इति।। शंका ॥जेसवद्धमुक्तादिकव्यवस्थाकेयनुसारयनेक अज्ञान कल्पनाकियेहै जेमपूत्यनादिकपमाणों के अनुमारमत्यहींद्रेतक्योंनहो । समाधान।। र प्रत्यक्षादिकोंमेंप्रामाण्यताकानिषेध हेवादिन् प्रत्यज्ञादिकपूमाणांकेयनुमारत कोसत्यमानेहुयेति- समेंतुमको यहकथनकरनेक योग्यहे ।।

। पाद प्रत्यक्षादिप्रमाणानां प्रमात्वंपरतोयदि । अनवस्थास्फुटांतत्रस्वतस्त्वेदोषसंशयः ॥ ४॥ स्वैया ॥ यहलौकिकमानजितेजगमेपरतोपरमात्वयदीतिन माहीं । अनवस्थविख्यातभयातिनमेयहनीकविचारकरोमनमाहीं । परमात्वसुतस्त्वकहोजवहीतबदोपसंदेहभयोतहिमाहीं ॥ इहकारण देतयसत्यविचारधरोग्रदुतीयसदामनमाहीं ॥ ५ ॥ टी० ॥ प्रत्यक्षादिकप्रमाणोंमेयहप्रमात्वक्याहै ॥ अर्थयहसो प्रमात्वजातिरूपहैयथवाउपाधिरूपहै ॥ प्रथमपक्षनहींसंभवता ॥ क्योंकि इदंरजतं' इसभ्रमज्ञानमेसंकरहै ।। सोऐसहै ॥ केवलप्रमात्व 'अयंघट' इसज्ञानमेरहताहै ॥ औरकेवलयममात्वस्वाप्नगजादिज्ञान मेवर्तताहै ॥ तिनदोनोंकाएकत्रप्रवेश 'इदंरजतं' इसभ्रमज्ञानमेयंश भेदसेविद्यमानहै ।। सोसंकरदोपजातिकावाधकहोताहे। यातेप्रमात्व जातिरूपनहीं ॥ परस्परयत्यंताभावकेयधिकरणमेरहनेवालेदोधर्मों काजोएकत्रपूवेशहैइसीकानामसंकरहै ।। इति ।। अवउपाधिरूपममात्व पक्षकेपितकरनेकेलियेदोविकल्पदिखलातेहैं ॥ तहां “व्यवहारमे समर्थवर्थविषयत्वरूपममात्वहै" अथवा सर्वकालमे प्रभावितयर्थ विषयत्वरूपप्रमात्वहै । प्रथमविकल्पमेयर्थविषयत्वरूपप्रमावकहेंतोभ्रम ज्ञानमेयतिव्याप्तिहोगी। तिसदोपकेदूरकरनेकेयर्थ व्यवहारमेंसमर्थ" यहयर्थकाविशेषणकहाहै ॥ भ्रमकाविषयजोयर्थसोव्यवहारमेसमर्थ नहीं ॥ यदितिसकोभीव्यवहारमेसमर्थमाने ॥ तोमरूस्थलमेजलके भ्रमसेप्रवृतहुयेपुरुपकीभीपिपासानिवृतहूयीचाहिये । औरमरुस्थल केजलसेकिसीकीभीपिपासाउपशमनहींहोती ॥ यातेभ्रमकाविपयजो दे मुसि. अर्थवहव्यवहारमेसमर्थनहीं। इसलिये “व्यवहारमेसमर्थ" यहयर्थ काविशेषणकथनकीयाहै ।। तैसेसर्वकालमेयवाधितयर्थविषयत्वरूप प्रमात्वहै । इसदूसरेविकल्पमेयदि “सर्वकाल” यहपदनकहतेतोभ्रम ज्ञानमेयतिव्याप्तिहोती ॥ क्योंकियवाधितयर्थविषयत्वभ्रमकालमे भ्रमज्ञानमेभीहै ।। यातेभ्रमज्ञानमेयतिन्याप्तिकेपरिहारयर्थ “सर्वकाल" यहविशेपणकथनकियाहै ॥ इसपूकारदोनोविकल्पोंमें विशेषणोंकी सफलतादिखलाकरयवतिनदोनोविकल्पोंकोक्रमसेनिषेधकरतेहैं ।। हे वादिभ्रमकेविषय भूतयर्थकोव्यवहारमें समर्थपनाक्यिा? भ्रमकालमें नहीं है ॥ अथवावाधकालमेनहीं है ।। पृथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिभ्रमकालमेप्रवृत्यादिकरूपव्यवहारकी सामर्थ्यरजतादिरूपयर्थमे देखीजातीहै।ौरद्वितीयपक्षभीयसंगतहै।क्योंकिवाधकालमेभ्रमज्ञान कायभावहोनेसेतिसकेविषयभूतयर्थकाभीयभावहै ॥ यातेभ्रमजान मेपूथमप्रमात्वकेलक्षणीयतिव्याप्तिहोनेसे प्रमात्वकालक्षणदुष्टहै ।। यौरभ्रमकालमेकल्पितपदार्थकोव्यवहारकासाधकमाननेमे कोईविरोध नहीं ।। यातेपूथमपक्षनहींसंभवता ।। यौरविनीयपनमेभीयहविचार कर्तव्यहै । वहसर्वकालमे यवाधित यर्थविपयत्वरूपप्रमात्वक्यास्वतः ग्राह्यहै। अथवापरतोग्राह्यहै ॥ यर्थयहममात्वकायाश्रयजोप्रमाज्ञान तिसकाग्राहकजोसामग्रीतिसकरग्राह्यत्वहै।यथवा।यपनेयाश्रयकाग्राहक जोसामग्रीतिससेभिन्नसामग्रीकरग्राह्यपनाहै।तिनमेप्रथमपक्षनहींसंभवता क्योंफिप्रत्यज्ञादिकपूमाणोंमेदोपकीसंभावनाहै ॥ यहांयहअनुमान जानना ॥ विमतं प्रत्यक्षादिज्ञानं दोपवत्करणजन्य पुवाई जन्यज्ञानत्वाविशेषात् भ्रमवत् अ०-विवादकातिपय जोप्रत्यक्षादिज्ञान है सोदोपवालेकरणसे जन्यहे।जन्यज्ञानपनातुल्यहोनेसेजोजोजन्यज्ञानहोताहैसोसोदोपवाले करणसेजन्यहै जैसेभ्रमज्ञानहै ।।इति।। इसयनुमानसेप्रत्यक्षादिज्ञानमें दोपकीसंभावनाहुए तिसदोपकी निवृत्तियर्थप्रवृत्ति संवादिरूपदोपाभाव काग्राहकजो अन्यप्रमाण तिसकीपूत्यक्षादि ज्ञानरपेक्षा करताहै वा नहीं। यदि अपने पूमात्व ग्रहणमें दोषागावकेग्राहक अन्य प्रमाणकी प्रत्यक्षादिज्ञान अपेक्षा नहींकरतायहयन्त्यपक्षकहोतोनिष्कंप प्रवृत्ति पुरुपकी नहींहोगी ।। क्योंकिदोपका संदेहप्रवृति का प्रतिबंधकहै । और यदिअन्य पूमाण कीपेक्षा करताहे यह प्रथम पक्षकहोतो स्वप्रमात्वके प्रतिदोपाभावके ग्राहक अन्यपूमाणकी अपेक्षा होनेसे स्वतः ग्राह्यत्वकाभंगहोगा । और वहंदोपाभावका ग्राहकप्रमाण कोईज्ञानमात्रका ग्राहकतोहैनहीं । जिससे तिसकी यापेक्षा हुयेभी स्वतःग्राह्यताबनीरहे । औरयदिदोपाभावके ग्राहकपूमाणको ज्ञानमात्र काग्राहकमानलें । तोभ्रमज्ञानकाही उच्छेदहोजायेगा । यातेदितीय पक्षभीयसंगतहै । औरज्ञानमात्रके ग्राहकसेभिन्न प्रमाणकरवहपूमात्व ग्रहणहोताहै यहयादिमेंकथन कियाजोदितीयपक्ष सोभीनहींसंभवता क्योंकि ग्रहणहुया हे प्रामाण्य जिसका तिस पूमाणको प्रमात्वका निश्चायकमानेहुए अनवस्थादोपकी प्राप्तिहोगी। यहांयहयर्थजानने योग्यहै । प्रथमज्ञानके प्रमात्वकाजो ग्रहणहै। सोअपनेविषयकेनिश्चय अर्थ है । वहप्रमात्वस्वाश्रयभूतज्ञानके ग्राहकसे किसीभिन्नपदार्थकर ही ग्रहणकरने योग्य है । वहांवह प्रमात्वका ग्राहक क्या?शेयरूपहै । .

० मि. म. अथवाज्ञानरूपहै । यहविचार कियाचाहिये । इनमें प्रथमपक्षतोनहीं संभवता।क्योंकितिसज्ञेयपदार्थको जडहोनेसे प्रकाशकताकाही अभाव है। और द्वितीय पक्षमेंभी यहविचार कियाचाहिये । पृथमज्ञान के प्रमात्वका ग्राहक जोज्ञानहे सो गृहीत प्रमात्वहुया अपने विषयभूत . पूथमज्ञानके पूमात्वकागाहकहै अथवायगृहीतपूमात्वहुया निश्चायक है।जिसका प्रमात्व किसीदूसरे ज्ञानकर ग्रहणहुयाहो तिसको गृहीत प्रमात्व कहतेहैं । औरजिसका प्रमात्वकिसी करग्रहण न हुथाहो । तिसकोयगृहीत पूमात्वकहतेहैं । पृथमपनमेंभी यहविचारकरनेयोग्य है । ग्रहण करनेयोग्य प्रमात्वके ग्राहकभूतज्ञानका प्रमात्व किसने ग्रहणकियाहै । क्यायापही अपने प्रमात्वका ग्राहकहै । अथवा ग्रहणकरनेयोग्य प्रमात्वका याश्रयभृतजो प्रथमज्ञानवह तिसकेप्रमात्व काग्राहकहै । अथवाइनदोनोंज्ञानोंसे भिन्नकोईतृतीयज्ञानतिसप्रमात्व काग्राहकहै।। इनमेंपूथम पक्षनहीं संभवता । क्योंकि अपनेग्रहणमें अपनीयपेक्षा होनेसे यात्माश्रयदोपकी प्राप्तिहे । औरस्वतः पूमाल काग्रहणपूसंगभीहोगा । तिमसे परतोग्राह्यत्वपक्षकी हानीहोगी । भावयह । स्वप्रमात्वकायाश्रयजोदिनीयज्ञानवहयापको विपयकरता हुया थपनेप्रमात्वकोभी यापही विपयकरताहे याते श्रापको विषय करनेसे तथा यापही प्रमात्वकाग्राहकहोनेसे यात्माश्रयदोप तथा स्वतस्त्वपक्षकीपाप्तिस्पष्टहीहै । औरद्वितीयपक्षभी अन्योन्याश्रय दोपकीमाप्तिसेनहींसंभवता । सोइसप्रकारहै। प्रथमज्ञानको अपनेप्रमा वकेग्रहणमें द्वितीयज्ञानकीयपेक्षाहै। औरद्वितीयज्ञानकोअपनेप्रमात्व केहण पथमज्ञानकीपेक्षाहै .। यातेयन्येऽन्याश्रयदोपहै.। और .

पूंचाई प्रथमज्ञानको स्वप्रमात्वकेग्राहकीभूतज्ञानकेममात्वका ग्राहकपनाभी नहींसंभवता । क्योंकिजोज्ञानजिसपदार्थको विषयकरताहै। सोज्ञान तिसपदार्थकीयाकारताको प्राप्तहोताहे।यौरयहांपूथमज्ञानकोस्वपूमात्यके ग्राहकद्वितीयज्ञानकाविषयहोनेसेस्वविषयकज्ञानके मात्वकीयाकारता तिसकोनहींसंभवती यातेद्वितीयपक्षभीयसंगतहै। औरद्वितीयज्ञानके पूमात्वकाग्राहक इनदोनोंसेभिन्नकोईतृतीयज्ञानहेयहतृतीयपक्षभीययु कहै । क्योंकिवहतृतीयज्ञानभीगृहीतपूमात्वहीकहनाहोगा । तिस तृतीयज्ञानके मात्वकाग्राहकतिसीकोमानेतो यात्माश्रयदोपतथास्वत- स्त्वपक्षकी प्राप्तिहोगी। यौरतृतीयज्ञानकेश्मात्वकाग्राहक यदिद्वितीय . ज्ञानकोमानेतो अन्योन्याश्रयदोपकीमाप्तिहोगी। औरसथमज्ञानको तृतीयज्ञानकेप्रमात्वकाग्राहकमानेतो चक्रकादोपमाप्तहोताहै। औत्यदि इसचक्रकादोपकेदूरकरनेकीइच्छासेतृतीयज्ञानके प्रमात्वकाग्राहककोई चतुर्थज्ञानमानोगेतो थनवस्थादोपमानहोगा । यातेपरतोग्राह्यत्वपक्ष भीयसमीचीनहै । अषयगृहीतममात्ववालाजो दितीयज्ञानवहमयम जानके ममात्वकाग्राहकहै इसपहिलेकथनकियेहूये द्वितीयपक्षकोपित करतेहैं। औरयगृहीतममात्ववालेद्वितीयज्ञानको प्रथमज्ञानकेममात्व काग्राहक माने तो प्रथमज्ञानके ममालका निश्चय व्यर्थ होगा । क्योंकियगृहीतपूमात्वजोपृथभज्ञानहैतिसकरहीयपनेविषयकानिश्चय होजायेगा ।। पूमात्वग्रहणकीकुछयापेक्षानहीं ॥ यातेद्वितीयपक्ष भीयसंगतहै ॥ सर्वकालयवाधितयर्थविषयत्वरूपपूमात्वपूत्यतादि ज्ञाननिष्ठग्राहककेयभावसेनहींसंभवता ॥ अथवा जिसकिसीपुकारसे अर्थात्वतस्ववापरतस्त्वरीतिसेषमात्वकाग्रहणहो ॥ परन्तुसर्वकाल 'थवाधित यर्थविषयत्वरूपममात्वमत्तादिज्ञानमेनहींसंभवता ॥ क्योंकि ३० स० मु. श्रुतिहीतिसकोनिषेधकरतीहै । इसदूसरेहेतुकोकथनकरतेहैं ॥ किंवा प्रत्यक्षादिकोंकीयप्रमाणताश्रुतिनेहीदिखलाईहै ।। यद्यपिप्रत्यक्षादिक अप्रमाणरूपहेंऐसेश्रुतिनेसाक्षात्नहींकथनकिया। तथापिप्रत्यक्षादि ज्ञानकेविषयभूतजगत्कामिथ्यापनादिखलातीहुईतिप्रत्यक्षादिकोंकी अप्रमाणतायर्थसे बोधनकरतीहै ॥शंका।। प्रत्य नादिकज्ञानयप्रमाण रूपहें ॥ जगत्कोमिथ्याहोनेसे ॥ यहहेतुव्यधिकरणहै ॥ क्योंकि मत्यतादिकज्ञानमेतोयपमात्वसाध्यवर्तताहै ॥ औमिथ्यात्वहेतुजगत् मेवर्तताहै ॥ यातेभिन्न यधिकरणमेवृतिहोनेसेयहहेतुयपनेसाध्यका साधकनहीं ॥ समाधान ॥ हेवादिन्मत्यक्षादिज्ञानकेविषयभूतजगत् कोश्रुतिमिथ्यापनादिखलातीहै ॥ यातेयहांयहयनुमानविवक्षितहै ॥ प्रत्यक्षादिरप्रमाणमिथ्यार्थकत्वावरजतज्ञानवत* य० ॥ पत्यक्षादिज्ञानयममारूपहै । मिथ्यायर्थविषयकहोने से ॥ जोजोज्ञानमिथ्याअर्थविपकहोताहैसोसोयममारूपहोताहै ॥ जैसेरजतज्ञानहै ॥ इति ॥शंका ।। अर्थकोयवाधितहोनेसेमिथ्यापना अयुक्तहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन्श्रुतिहीसर्वमपंचकानिषेधकरतीहे।। सोश्रुतियहहै ॥ नेहनानाऽस्तिकिंचन * उ०म०६ वा० ४ ० १६ अ० मसिद्धजगत्कायधिष्ठानरूपजोब्रह्महेतिसमेभेदविशिष्ट प्रपंचकिंचत्मावभीनहीं । इसश्रुतिमेसकलपपंचको निषेधकातियो गिपनाकथन कियाहे ॥ औरजोनिषेधकापतियोगिहोताहेसोमिथ्याही होताहै ॥ निषेधशब्दसेयहांकालिकनिषेधग्रहणकरना ॥ शंका , पूाई जोवाधित होताहैसो अज्ञानजन्यदेखाहै | जैसेवाधितरजतादिक शुक्त्यादिकोंकेयज्ञानसेजन्यहैं ।। औरघटादिजगत्यज्ञानजन्यनहीं। क्योंकिमृत्तिकादिकतिसकेउपादानकारणहें औस्मृत्तिकादिकउपादान गोचरज्ञानवालेकुलालादिकतिसकेनिमित्तकारणहैं ।। यातेभपंचमिथ्या नहींकिन्तुसत्यहै ।। समाधान ।। हेवादिन्श्रुतिनेजगत्काउपादान कारणयज्ञानहीकहाहे ॥ सोश्रुतियहहै ।। de मायांतुप्रकृतिविद्यात् * *वे०३०अ०४० १० अ० ॥ मायाकोजगत्काउपादानकारणजाने यद्यपिश्रुतिमे मायापदहै। अज्ञानपदनहींतथापिमायाऔरअज्ञानदोनोएकहीपदार्थ हैं ॥ यातेविरोधनहीं ॥ ौखहयज्ञानही मृत्तिकादिरूपपरिणामको प्राप्तहुयाघटादिकोंका उपादानकारणहै ॥ यातेयज्ञानकोउपादान मानेहुयेभीकोईविरोधनहीं यहांमूलग्रंथमे (निपिद्धमानत्वमायाप्रकृति स्वाभ्याम् ) यहतृतीयाविभक्तिपंतपदकथनकियाहै ॥ वहतृतीया विभक्तिकर्ताकरणादियर्थमेनहींकिन्तुइत्यंभावयर्थमेतृतीयाजाननी। यातेयहांऐसाथर्थकरना ॥ निषेधपतियोगित्वतथामायाउपादानत्व रूपमिथ्याभूतजोजगहहै ।। इति । इसरीतिसेव्यवस्थाकेयनुसार अनेकज्ञानमानेहुयेभी'त्यत्नादिप्रमाण केअनुसार जगत्कासत्यत्व जिसकारणसेपूर्वउक्तयुक्तिकेवलसेनहींसंभवता । तिसीकारणसेव्यव- स्थाकथनुसारजीवयाश्रितौब्रह्मकोक्पियकरनेवालेयनेकअज्ञानपन सकतेहैं । शंका || व्यवस्थाकीग्रनुपपतिरूपतर्कसेहीयनेकन्यज्ञान तुमनेसिद्धकियेहैं । परन्तुवहतर्कयामासरूपहै । क्योंकितिसमेउप- जीव्यममाणकायभावहै । जिसममाणकेयाश्रितहोकरतर्क अपने ०सि० मु० यर्थकोसिद्धकरेसोममाणतर्ककाउपजीव्यकहियेहै ।। समाधान ।। हे वादिन्यहांउपजीव्यममाणरूपश्रुतिविद्यमानहे ॥ यातेतर्ककोयाभास रूपतानहीं ॥ सोश्रुतियहहै ॥ * इन्द्रोमायाभिःपुरुरुपईयते स ०३० अ० ४ वा ५ ० १६ अ०॥ परमात्मामायावोंसेनानारूपप्रतीतहोताहे ।। इसति मे (मायाभिः) इसबहुवचनके अनुसार अनेकयज्ञानप्रतीत होतेहैं । यहांमायाऔरयज्ञानदोनोंपर्यायशब्दह।।वहअनेकयज्ञानब्रह्मकोविषय करतेहैं ।। इसलियेयात्माकोग्रज्ञानविपयत्वतुमनेकैसेकथनकिया । यहांयात्मायज्ञानकाविपयनहींयहजोनिषेधहेसोइसयर्थकाभीवोधकहै ब्रह्मकोयज्ञानकाविषयहोनेसेतिसमेश्रुतिप्रमाणकत्वका याक्षेपजोपूर्व पक्षीनेकहाथासो कैसेकथनकिया किन्तुवहभीनहींसंभवता ॥ यहां तकएकदेशीकेमतकासंक्षेपसेनिरूपणहुया ॥ यहांइसमतकेसंग्रहका श्लोक ॥ *अज्ञानप्रतिजीवस्यादिन्नंब्रह्मपदंचतत्॥वडमुक्तव्य वस्थाऽतोब्रह्मश्रीतंचसिद्ध्यति ॥ १ ॥ दो० ॥ बद्धमुक्तविवहारसेप्रतीजीवज्ञान ।। भिन्नब्रह्मगोचर यहैब्रह्मौतपहचान ॥ १॥ अथएकदेशि के मत का खंडन अब सिद्धांतमतको याश्रयणकरके एकदेशिकेमतकोतर्वपक्षी निषेधकरताहै ॥ यहांसिद्धांतमतकोयाश्रयणकरकेएकदेशिकमत खंडनकरनेमेपूर्वपत्नीकायहगूढयभिप्रायहै || परमसिद्धांतीनचेतन i, पूर्वाद -मात्रकेयाश्रितऔरतिसीकोविषयकरनेवालीयविद्यामानीहै । और स्वयंप्रकाशचेतनमेअविद्याकीविपयतानहींसंभवती ॥ यहवार्ता पूर्व निरूपणकीहै । औरयविद्याकीविपयताकायभावहोनेसेवेदप्रमाणता काभीतिसात्मामेयभावहै । यातेदेहादिकोंसेभिन्नकोईयात्मानहीं यहहमारामतसुखेनहीसिद्धहोगा । इसमूढतातपर्यवालापूर्वपत्नीजीव आश्रित यौब्रह्मविषयकअविद्याहैइसपूर्वकथनकियेहुयेएकदेशीकेमतमे दूषणकथनकरताहै ॥ मू०॥जीवब्रह्मप्रयोगाभ्यामेकंवस्त्वथवादयम् । आधेत्विष्टममैवस्यातद्वितीयेत्वन्मतक्षतिः ॥५॥ तोटकछंद।यहजीवपरेशदुऊपदजो|भनएकपदारथवादुयिको। पछयादिविषेममवांछितहै । पदूसरहानहितेमतहै ॥६॥ टी० ॥ हेएकदेशिन्तुमजीवयौब्रह्मशब्दसेएकहीवस्तुप्रति पादनकरतेहो।यथवा।दोपदार्थकथनकरतेहो।।यद्यपिजीवौरवाशद कावाच्यार्थभिन्नहीहैयातेविकल्पनहींसंभवता ।। तथापिजीवऔरब्रह्म केउपाधिकापरित्यागकरकेएकलक्ष्यप्रतिपादनकरतेहोअथवा। लक्ष्यों काभेदकथनकरतेहो। ऐसाविकल्पसंभवताहै।प्रथमपक्षमानोगेतोमेरा हीइष्टसिद्धहोगा ॥ यद्यपिजीवीब्रह्मकाअभेदएकदेशीकोभीइष्टहै। इसलियेमुलकारिकामे (एव) शब्दकाउच्चारणययुक्तहै ॥ तथापि अज्ञानकेयाश्रयतथाविषयकायभेदएक देशीकोथनिष्टहै ॥ याते (एव) शब्दकाउच्चारणग्रयुक्तनहींकिन्तुयुक्तहै।।योरद्वितीयपक्षनंगी कारकरोगेतोतुम्हारेमतकीहानीहोगी।क्योंकिलक्ष्यार्थकाभेदएकदेशी कोभीस्वीकारनहीं ।। यहांमूलकारिकामे (तु) यहशदहेतुकासूचक - iy वे०म०सि० है। सोयागेस्पष्टहोगा।यथवावाच्यौरलक्ष्यकेभेदकोत्यागकरके सामानतासेहीदूपणदेनेकेलियेविकल्पकरतेहैं ॥ हेएकदेशिन्जीवौर ब्रह्मइनदोनोंशदोंसेएकयात्माहीतुमकथनकरतेहोयथवा।जीवशदतो यात्माकावाचकहै औरब्रह्मशदतिससे भिन्नयर्थकावाचकहै ॥ ऐसे कहतेहो प्रथमपनमेयात्माकोयज्ञानकीविषयताकैसेनहींवनेगी।यहां पर (कैसे) यौर (नहीं)इनदोनिषेधकशदोंसेयात्माकोयज्ञानविषयता कीप्रतिज्ञाकरकेयवतिसमे (तु) शब्दसेसूचनकियेहुयेहेतुकोकहतेहैं।। क्योंकिब्रह्मशब्दसेभीजीवशब्दकीन्याईयात्माकाहीकथनहोनेसेतिसमे अज्ञानकीविषयताकासंभवहै । यहांयहनिष्कृष्टयर्थहै ॥ आत्माअज्ञानविपयःअज्ञानाभासकत्वेसतिब्रह्मशब्द वाच्यत्वात्।ब्रह्मवत् य० ॥ यात्मायज्ञानकाविषयहै ।। अज्ञानकायप्रकाशकहुया ब्रह्मशदकावाच्यहोनेसे जोजोयज्ञानकायप्रकाशकहुया ब्रह्मशदका वाच्यहैसोसोयज्ञानकाविपयहै । जैसेब्रह्महै ।। इति ।। इसअनुमान सेयात्मामेशज्ञानकीविषयतासिद्धहे ॥ यातेतुमयात्मामयज्ञानकी विषयताकायभावकैसेकहतेहो ॥ शंका ॥ हेवादिन्यहतुम्हारानु- मानसत्सतिपक्षरूपहेत्वाभासवालाहोनेसेदुष्टहै ॥ जिसहेतुकेसाध्या भावकासाधकऔरहतुहोतिसहतुकोसत्पतिपक्षकहतेहैं।सोइसप्रकारहै। आत्मानतमोतिपयःभासमानत्वात्यन्नवंतन्नैवं यथाअंधकारातोघटः य० ।। यात्माअज्ञानाविपयनहीं भासमानहोनेसे जोजो अज्ञानकाविषयहोताहेसोसोभासमाननहींहोता जैसेयंधकारसेश्रावृत्त पुदि घटहै । इसअनुमानसेपूर्वकथनकियावादीकाअनुमानसमतिपतरूप हेत्वाभासयुक्तहै ।। औरतुम्हारेअनुमानमेअभासमानत्वउपाधिभीहै। सोइसमकारहै । जहाँजहांयज्ञानकीविषयताहेतहांतहायभासमानता है ।। जैसेब्रह्महे ।। इसरीतिसेउपाधिप्ताध्यकेसाथब्यापकहै | और जहांजहांग्रज्ञानकायप्रकाशकडयाब्रह्मशब्दकावाच्यहै ॥ तहांतहां अभासमानत्वनहीं ।।जैसेयात्माहै । इसरीतिसेउपाधिसाधनकेसाथ श्रव्यापकहै ॥ यातेपूर्वकथनकियाजोहेतुवहसोपाधिकहेत्वाभासहोने सेदुष्टहै।स्वसाध्यकासाधकनहीं।।समाधान।। हेएकदेशिन्यहजोतुमने पूर्वकथनकियासलतिपक्षयौरयभासमानत्वउपाधि इनदोनोंकोतंत्रसे निषेधकरतेहैं। एकवारउच्चारणकियाहुयावचनबहुयर्थकाजोज्ञापकहो तिसकोतंत्रकहतेहैं।जैसेएकदीपकप्रज्वलितक्रियाहुयायनेकपदार्थोंको प्रकाशकरताहै । तैसेयहांएकहीउक्तिसेसत्प्रतिपक्षयौरउपाधिकानिरा करणकरतेहैं। तिसउक्तिरूपतंत्रकोहीदिखलातेहैं । हेएकदेशिन्द्रया नंदरूपतासेतिसयात्मामेयजानकीविषयताहै। औरचेतनमात्ररूपतासे तिसयात्माकोभासमानहोनेसेयज्ञानकीविषयताकाअभावहै । अन्यथा प्रकाशककेयभावसेग्रज्ञानकीभीसिद्धिनहींहोगी। यहांयहयर्थजानने योग्यहै ॥ एकदेशीनेप्रतिपक्षाऽनुमानमेयात्मशदसेक्या?यदयानंद रूपपतकियाहै । अथवाचेतनमात्रपनकिया।तहांपूथमपनमानेहुये प्रतिपनाऽनुमानवाधितहोगा। क्योंकियदयानंदरूपपनमेग्रज्ञानकी विषयताविद्यमानहोनेसेयज्ञान विषयत्वाभावरूपसाध्यायभावहै । औरद्धितीयपक्षभीनहींसंभवता।क्योंकिपथमअनुमानमे चेतनमात्रको पनत्वकाअभावहै । इसीसेपूतिपनाऽनुमानमेभीवेतनमात्रकोपक्षपना वै० सि. मु. युक्तनहीं ॥ शंका ॥ हेवादिन् यदयानंदरूपको पक्षमानने मेवाधहै यहतुम्हाराकथनअसंगतहै। क्योंकितिसश्रद्धयानंदकोग्रात्मा सेअभिन्नरूपताकरभासमानहोनेसेतिसमेग्रज्ञानकीविषयतानहींसंभवती समाधान।। यदयानंदकोग्रामासेअभिन्नहुयेभीयविद्याकेप्रभावसेचेतन मात्रकाहीभानहोताहैयदयानंदकानहीं। इसकथनसेयहसूचनकिया प्रतिपक्षाऽनुमान स्वरूपासिद्धहै।क्योंकि अदयानंदपक्षमेभासमानत्व हेतुस्वरूपसेहीग्रसिद्धहै || शंका ॥ हेवादिअज्ञानकाविषय यात्माहै औरचेतनकोही यात्माकहतेहैं तिसचेतनस्वरूप यात्मामे अज्ञानकी विषयताहोनेसेतिसकीभासमानताकैसेकहतेहो । समाधान ॥ हेएक देशिनचैतन्यरूपतासेतिसयात्माकोयज्ञानकायविषयहोनेसेभासमानता है । औरयदिऐसेकहोकिचेतनरूपभीअज्ञानकरक्योंनहींयावृत्तहोता किन्तुहुयाचाहियोसोयहकथनभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिचेतनकोभी आवृत्तमानेहुयेथज्ञानकीहीसिद्धिनहींहोगी ॥ भावयह ॥ अज्ञान चेतनरूपसाक्षिमात्रकर सिद्धहोताहै किसीप्रमाणकरनहीं यहवार्ताहम दोनोंकोस्वीकारहै ॥ यातेचेतनरूपतासेयात्मायावृत्तनहींहोसकता यौरप्रकाशककेयभावसेजगत्मेकिसीवस्तुकाभानभीनहींहोगा।इतने कथनसेसत्मतिपक्षकेनिषेधपरग्रंथकाव्याख्यानकिया ॥ यवउपाधिके निषेधकरनेकेलियेभीइसीग्रंथीपुनःयोजनाकरतेहैं ।। स्थापनायनु- मानमेयर्थात्प्रथमाऽनुमानमेयदयानंदस्वरूप यात्माकोपक्षपनाहै ॥ तिसअनुमानमेश्रभासमानत्वउपाधिनहींसंभवता ॥ क्योंकिसाधनके माथवहव्यापकहै ।। इसीयभिप्रायसेश्रदयानंदस्वरूपयात्मामयज्ञान कीविषयतारखीकारक है ॥ तिमयदयानंदरूपयक्षमेंयभाममानत्व उपाधिकेवर्तनेसे वहसाधनकेसाथ कैसेव्यापकनहीं किन्तु व्यापकहे यहभावहै।शिंका यात्मासेयभिन्नपदयानंदकैसेनहींभानहोतेकिंतुहुये चाहिये।।समाधान।यात्मत्वभानकाप्रयोजकनहींकिंतुभानकाप्रयोजक चैतन्यहै यातेचेतनमात्रको अज्ञानकायविषयहोनेसे भासमानताहै। अद्वयानंदकोनहीं।इसप्रकार उपाधिकेयभावसेपूर्वउक्तअनुमाननिर्दोप है।शंका।। यदयानंदरूपतासे यात्माकोयभासमानहोनेसे अज्ञानकी विषयताहै। औरचेतनरूपताकर भासमानहोनेसे तथाविद्याकासा- धकहोनेसे यात्माको अज्ञानकीविषयतानहीं हैं । यहपूर्वकथनकिया सोयसंगतहै । क्योंकि- विज्ञानमानंदंब्रह्म * अ-विज्ञानौरानन्दस्वरूपब्रह्महै । इसश्रुतिवचनसे पद- यानंदौरचैतन्यएकस्वरूपहैं । इनकाभेदनहीं। यद्यपियभेदकीन्याई भेदभीहै तथापिविरुद्धस्वभावहोनेसे भेदौरयभेददोनों एकयधिकर, गमेनहींरहसकते । यातेपदयानंदको अज्ञानकीविषयताकाकथन नहींसंभवता ॥ समाधान ॥ अदयानंदौरचेतनकावास्तवभेदनहीं इसलियेथदयानंदकोभी भासमानहोनेसेयज्ञानकी विपयतावास्तवसे नहीं है यहतुमकहतेहो अथवा । कल्पितभीयज्ञानकीविपयतानहीं है यहकहतेहो । प्रथमपक्षतोहमकोभीस्वीकारहै । क्योंकिवास्तवथज्ञान कीविपयताहमभीनहींमानते। दितीयपक्षको प्रश्नपूर्वकनिषेधकरतेहैं। प्रश्न-श्रदयानंद औरचेतनकेभेदका अभावहुये अज्ञानविषयताकी व्यवस्थाकिसप्रकारहै ॥ समाधान ॥ हेएकदेशिन् श्रदयानंदस्वरूप आत्माको अज्ञानकीविषयताकाकथनहै । चेतनकोनहींयातेव्यवस्था वनसकतीहै । यद्यपिभेदकायभावहोनेसे विषयतानहींसंभवती यह चे० मु०प० पूर्वकथनकियाहै । तथापिस्वयंप्रकाशपरिपूर्ण थानन्दस्वरूपतासे भासमानयात्मामेंभी भेदकीमिथ्याकल्पनाकरकेही अज्ञानकीविषयता काकथनहे वास्तवसेनहीं ।।इति।।शंका ।। जोभानहोताहै सोयज्ञान करयावृत्तनहींहोता औरअदयानंदरूपता यात्माकीभान नहींहोती यदिभानहोतो निर्यत्नहीसर्वपुरुपोंकोमोक्षकालाभहोगायातेभेदकल्पना व्यर्थ है। भावयहचेतनसे अदयानंदकी भेदकल्पनायभानताकेलिये करतेहो सो अभानतापूर्व कथनकियेप्रकारसे बनसकतीहै पुनः भेद कल्पना से क्या प्रयोजन है ॥ समाधान ॥ हे एकदेशिन् यात्मातोप्रथमभानहोताहीहै।यदियात्माकाभाननमानेतोतृकौनहैं ऐसे पूछेहुयेमैह्वानहींहूंऐसासंदेहपुरुपकोहोनाचाहिये । औरऐसासंदेह किसीको नहींहोता ॥ यातेयात्माकाभानसर्वको प्रसिद्धहै ॥ तिस यात्मासेयभिन्नयद्वयानंदकैसेनहींभानहोंगे।।यौवहइसयविद्याकाल मेनहींभानहोतेइसीसेतिनयदयादिकोंकेयभानकाप्रयोजकभेदकल्पना संभवीहे इसीकारणसेपूर्वग्रंथमेकहाहै ॥ चेतन्यमात्रहीभानहोताहै श्रद्धयानंदस्वरूपकाभाननहींहोता ॥ इति ॥ शंका ॥ मैंयदयानंद स्वरूपनहींहूं ।। इसप्रकारकीयदयानंदयौरचेतनकेभेदकोविपयकरने वालीप्रतीतिकावाधनदेखनेसेतिसप्रतीतिकाविपथजोभेदहै। सोवास्तव होक्योंनहो ॥ समाधान ॥श्रमप्रतीतिकेयनुसारभेदकीकल्पनाहैयाते भ्रमप्रतीतिकाविषयभेदवास्तवनहींबनसकता।यद्यपिब्रह्मयद्वितीयहैतिस कोभ्रमकिसीरीतिसेनहींसंभवताक्यिोंकि अपनेस्वरूपमेयापकोहीभ्रम होनाथयोग्यहै । तथापिजैसेभूताविष्टजोमनुष्यहै ॥ तिसकोयपने हीशरीरमभूतकाभ्रमंहोताहे ॥ तैसेहीयविद्याकेप्रभावसेयद्वितीयब्रह्म कोभीभ्रमवनसक्ताहे ॥ शंका ॥ देधीभावकानामभेदहेयर्थातएक पूर्वाई वस्तुकेंदोखंडनकानामभेदहै ।। सोसावयवकाष्टादिकोंकाधर्महै ।और यात्मानिरवयवहै ॥ क्योंकि (निष्कलं) इसश्रुतिमेयात्माकोनिरवयव कहाहै ।। यातेतिसयात्मामेभेदकल्पनाययोग्यहोनेसेकिसीप्रकारभी नहींसंभवती॥ समाधान ॥ ॐ निर्गुणेनिरूपप्यखंडचितिसर्वकल्पनाशून्यघट यतिजगदीशजीवभेदान्तस्मादघटनघटनापटीयसी माया इति अ० ॥ निरूपऔरनिर्गणतथायखंडचेतनतथासर्वकल्पनासे शून्ययात्मामेजगत्यौईशतथाजीवकेभेदकीकल्पनानहींवनतीतिसके वनानेमेजोकशलहोतिसकोमायाकहतेहैं ।। सोऐसामायारूपयज्ञानहै इति ॥ इसन्यायसेनिरवयवात्मामे भीअनादि सिद्धअनिर्वचनीय अज्ञानकेसंबंधसेमिथ्याभेदकल्पनावनसकतीहै । शंका ।। चेतनमात्र हीभानहोताहैअदयानंदस्वरूपनहीं इसप्रतीतिकोभ्रम रूपताकैसेहै ।। क्योंकिभ्रमरूपताकेहुयेहीवाधितपनायुक्तहै॥ समाधान || परमप्रीति केविषयभूतात्माकोग्रानंदरूपतासेहीभासमानहोनेसेपूर्वउक्तप्रतीति कोभ्रमरूपहमकहतेहैं यहांयहअनुमानजानना ॥ 3 आत्मापरमानंदरूपःपरमप्रेमास्पदत्वातविषया नंदवत य०-यात्मायानन्दस्वरूपहै परमप्रीतिकाविषयहोनेसे जोपरम प्रीतिकाविषयहोताहै सोयानन्दस्वरूपहोताहे जैसेविपयानंदहे।।इति।। मैंनहोवों ऐसेमतहोकिंतुमसदाहीहोवों इसपूकारकी इच्छाकानाममहे ०सि० मु० सोयहइच्छाकिसीउपाधिके सम्बन्धसे प्रात्माविषयकनहीं किंतुनिरुपा- धिकहै । यदिकेवल “प्रेमास्पदत्वात् " इतनाहीहेतुकहते परमयह विशेपणनकहते । तोदुःखाभावयौरसुखकेसाधनोंमेंयहहेतुव्यभिचारी होता। क्योंकिसुख तथादुःखाभावके साधनोंमेंभीपुरुपोंकाप्रेमहे परन्तु परमप्रेमनहीं।परमपेमतोदुःखाभावरूपतथासुखस्वरूपयात्मामेंहीहै।याते हेतुव्यभिचारीनहीं ॥इति।। इसप्रकारसुखौरयात्माका अभेदहोनेसे यात्माकेभासमानहुयेतिससेयभिन्नग्रानंदनवश्यभानहोताहीहै। याते यानंदकेअभासमानताकीजोमतीतितिसकोबाधितहोनेसेभ्रमरूपतायुक्त है।शिकाहेवादिनविपयानंदरूपदृष्टांतमेंजोऐमहैसोयात्म उपाधिकहे क्योंकिसुखमात्रकीकोई प्रार्थनानहींकरता।कितुमुझकोसुखहोइसप्रकार थात्माकेसम्बन्धसे सुखकीप्रार्थनाकरतेहैं । यदिऐसेनमाने तोवैरीके सुखविषयकभी प्रार्थनाकी प्राप्तिहोगी । औरवेरीके सुखकी कोई वांछानहींकरता ॥ याते विपयानंदरूप दृष्टांतमें निरुपाधिक प्रेम विषयत्वकायभावहोनेसे साधनकीविकलताहै | समाधान ॥ हेएक देशिन सुखमेपेमकीविषयतायात्मउपाधिकनहीं।क्योंकिसुखतथादुःखा भावरूपजोफलहेतिसफलरुप उपाधिके संबंधसमाधनों मेप्रेमहोता । और यात्माकोनित्य होनेसेवहसुखका फलनहीं है । जिसकारणसे सुख प्रेमयात्मउपाधिकहो। औरयात्माविषयकसुखसेउत्पन्नहुयाकोई उपकारभीनहींपूतीतहोता क्योंकिसुखसेभिन्न औरउपकारकाप्रभाव है।तिसीसेसुखमें आत्मउपाधिकप्रेमनहीं। यद्यपिसुखमात्रकीप्रार्थना मानेहुयेवैरीकासुखभी उपादेयहुयाचाहिये । तथापिस्वरूपसेसुखको उपादेयताकहुयेभीतिसमेंडेयताबुद्धियन्यउपाधिकहै ।

पूाई. ""आत्मीतथासुखकेसंबंधाभावकानिरूपण BF औरसुखतथायात्माकाकोईसंबंधभीनहीं निरूपण होसकता यातेभीसुखमेप्रेमयात्मयोपाधिकनहीं ॥ सुखतथायात्माकासंबंधा भावहीस्पष्टकरतेहैं ॥ हेएकदेशिसुखतथायात्माकाकौनसंबंधहै । संयोगसबंधहैवासमवायसंबंधहै।अथवा।तादाल्यसंबंधहैवाऔरहीकोई संबंधहै।। इनमेप्रथमपक्षतोनहीं संभवताक्योंकिसुखद्रव्यनहीं है।।संयोग द्रव्यों का ही होता है । और द्वितीय पक्षी असंगत है। क्योंकि श्रात्मा को निर्गुण कहने वाली श्रुति का विरोध है | और सुख को अंतःकरणमेसमवेत होनेसेभी सुख श्रो' यात्माका समवाय नहीं संभवता औरतृतीयपक्षमेयहविचारकियाचाहिये । तादात्म्यअभेद कानामहै।अथवााभेदाभेदकानामहै। प्रथमपक्षनहींसंभवता।क्योंकि सुखतथायात्माकायत्यंतअभेदप्रसंगहोनेसे तिनकाउपाधिउपहितभाव नहींसिद्धहोगा । औरभेदाभेदकापरस्परविरोधहोनेसेद्वितीयपक्षभी नहींसंभवता।औरइनसेभिन्नचतुर्थपक्षकोई निरूपणहीनहींहोसकता । यांतेविषयानंदरूपदृष्टांतमेपरमप्रेम विषयत्वरूपहेतुकीविकलतानहीं। इसलियेपूर्वउक्तयनुमाननिदोपहै । तिसकायदयानंदऔरयात्माके भेदकोविषयकरनेवालीप्रतीतिकावाधसंभवताहै ॥ शंका ॥ यद्यपि चेतनसेकल्पितभेदकरकेभिन्नंजोयदयानंदस्वरूपयात्माहै । तिसमे यज्ञानकीविषयतापूर्वकथनकी ॥ तथापिवास्तवसेयविद्याकेयाश्रय. यौविषयकाभेदनहींनिरूपणकियाक्योंकिजैसेघटपदकी शक्तिघटपदमे रहतीहै । औरकंबग्रीवादिमानव्यक्तिकोविषयकरतीहैयातेयाश्रययौ विषयकाभेदवास्तवहै ।। तैसेअविद्याभीएकशक्तिहै तिसकोभीवास्तव ०सि० मु० -- श्राश्रययौरविषयकभेदकीयपेक्षासहितहोनेसे तिसकेविषयौयाश्रय काकल्पितभेदयुक्तहै। समाधान ॥ हेएकदेशिन्यविद्याकेयाश्रय तथाविपयकाभेदवास्तवसेनहींनिरूपणकियायहतुम्हाराकथनसत्यहै।। शंका ।। हेवादिन्यदियाश्रयौविषयका भेदवास्तवसेनहीं निरूपण कियातो तुमकोनिरूपण कियाचाहिये ॥ क्योंकि याश्रययौविषयके वास्तव भेदकीयविद्याकोयवश्ययपेक्षाहै ॥ * अथस्वाश्रयास्वविषयाअविद्याकानिरूपण * समाधान ॥ मू०-अविद्यास्वाश्रयाभिन्नविपयास्यात्तमोयतः ॥ यथावाह्यतमोदृष्टतथाचयततस्तथा ॥६॥ संकरछंद ।। सुनलेयविद्यास्वाश्रयापुनऐक्यविपयाजान ।। जिसहेतुतेहैतमोरूपातापनीमेगान ॥ वाह्यतमसजियुदेखियोहै तथा विधयहयाहि ।। तिसहेतुतेहैतथाविधकीकहितबुधजनताहि ॥७॥ टी० ॥ प्रथमयहांयहअनुमानजाननेयोग्यहे ।। अविद्यास्वाश्रयाभिन्नविपयिणीतमस्त्वात्वाह्यतमोवत् य० ॥ यविद्यायपनेयाश्रयसे अभिन्नकोविषयकरनेवालीहै तमरूपहोनेसे।जोजोतमहमोसोयपनेयाश्रयसेयभिन्नकोविपयकरताहै जैसेवाह्यतमहै ॥ यातेयविद्याकोयाश्रयतथाविषयकभेदकीअपेक्षा नहीं । शंका हेवादिनइस अनुमानमे बाह्यतमकोदृष्टांतरखाहै । वह बाह्यतमद्रव्यरूपहै।यथवा।यालोकाभावरूपहे। यदिप्रथमपक्षस्वीकार करोतोदृष्टांतसाध्यसेहीनहोगा।क्योंकिजसेयपनेथवयवोंकेयाश्रितजो धूमहेसोथन्यदेशको याच्छादनकरताहै ॥ तैसेहीतमरूपदव्य अपने पुवाई यवयवोंकेयाश्रितहूयाग्रहकेउदरवर्तीदेशकोयाच्छादनकरताहै।याते जिमकोयाश्रयणकरताहेतिसीकोविषयकरताहैयह स्वाश्रयाभिन्न विष यत्व" रूपजोसाध्यहैतिसकोबाह्यतमरूप दृष्टांतमेनहींवर्तनेसेंसाध्य विकालदृष्टांतहै|औरदितीयपक्षमेभीयहदृष्टांतमेसाध्यकीविकलतारूप दोपहीमाप्तहोताहै ॥ क्योंकिग्रालोकाभावकाप्रतियोगीजोयालोकहै तिसकासमवायिजोयालोकावयवरूप देशतिसकेयाश्रितयालोका भावकोधटादिकोंकायावरकपनादेखाहै । यातेवाह्यतमरूपदृष्टांतइस पक्षमेभीसाध्यसेहीनहै समाधान ॥ हेएकदेशिन्जेसेअपनेअवयवों केयाश्रितजोघटहेतिसका श्राश्रयपना भूतलकोदेखाहै ।। तैसेयपने श्रवयवोंकेयाश्रितजोबाह्यतमसोगृहकेभीयाश्रितरहताहै । औरतिसी कोविषयकरताहे ॥यातेवाह्यतमकोद्रव्यमानेहुयेकोई विरोधनहींयर्थात् श्राश्रयतथाविषयकभेदकाअभावहे। औरद्वितीयपक्षमेयालोकसंसर्गा ऽभावकोतमरूपताहे॥संसर्गाभावपदसे थत्यंताभावयौरमागभावतथा प्रध्वंसाभावइनतीनभावोंकाग्रहणहै । तिनमेपागभावकोतथापूध्वंसा भावको प्रतियोगीके समवायिदेशमे वृत्तिहूएभी अत्यन्ताभावको प्रतियोगीकेसमवायिदेशमे वरतनेकेनियमका अभावहै । इसपूकार वाह्यतमकोसंसर्गाभावरूपताकरप्रतियोगिसंबंधिदेशमेहीवरतनेकानियम नहीं।।यातेवाह्यतमकोद्रव्यरूपमानेहुयेयथवायभावरूपमानेहुयेदृष्टांतमें साध्यकीविकलतानहींहोसकती।इसप्रकारयनुमानकीनिर्दोषतादिखला करयवश्लोककीव्याख्याकरतेहैं।।तिसतमशब्दकावाच्यजोवाह्यतमतथा अंतरज्ञानरूपतमहै।।तिसकोयाश्रयतथाविषयकेभेदकीयपेक्षानहींहै पूर्वकथनकीहुईयुक्तिसेयहयर्थसिद्धहै।परन्तुतिसीयर्थकोपुनःस्पष्ट करने लियेयाश्रयोविपयकभेदकीयनपेक्षामथमदृष्टांतमेसिद्धकरतेहैं। जैसे वै० म० मु० ४. गृहकेभीतस्वरतनेवालाजोअंधकारहेसोयपनेयाश्रयरूपगृहकेअंतरवर्ती देशकोक्या?नहींविषयकरताजिससेभिन्नदेशकीयपेक्षाकरताहै।।सोऐसा तोदेखनेमेनहींयाता।किन्तुअंतरवर्तीदेशकोवहतमविषयकरताहै।। तैसे अविद्यारूपतमभी ग्राश्रययौविषयके भेदकीयपेक्षानहींकरता।।इति॥ पूर्वयहदोविकल्पकियेथे ॥ जीवोब्रह्मशब्दसेएकयात्माकोहीकहतेहो अथवादोनोंका भिन्नभिन्नयर्थहै । इनमेप्रथमविकल्पको निषेधकरके अवद्वितीयविकल्पकोनिषेधकरतेहैं । जिसकारणसे यविद्यायाश्रययौ विषयकेभेदकी अपेक्षानहींकरती इसीहेतुसेजीवऔर ब्रह्मकाभेदनहीं संभवता ॥शंका। जीवयौरब्रह्मपरस्परयभिन्न हैं । अविद्याकोयाश्रय तथाविपयकेभेदकीयपेक्षानहोनेसे ॥ यहहेतुव्यधिकरणहै ।। क्योंकि परस्परअभेदरूपसाच्यतोजीवब्रह्मरूपपक्षमेवर्तेहै । यौरयाश्रयविषय भेदअनपेक्षत्वरूपहेतुअविद्यामेवतेहै ।। यातेपूर्वउक्तहेतुस्वरूपासिद्धहै ॥ समाधान ॥ 83 अथ जीव ब्रह्म के भेद का खंडन *' हेएकदेशिन्यहांयौरहीहेतुहैसोतुमश्रवणकरो ॥ मू०॥ ब्रह्मात्मनोविभिन्नत्वेभेदःस्वाभाविकोयदि । भोपाधिकोऽथवाभेदःसर्वथानुपपतिकः ।। ७ ॥ नाराजछंद ।। परेशयातमाविभेदभापहोसुनायके। स्वभावि कोकहोथवाउपाधिकोयनायके । सीप्रकारभेदकीवनौतनापछानिये ।। अभेदकोनिहारखेदनेकहूनयानिये ॥८॥ दी० ॥ यौरहतुकप्रतिपादन करनेके लियेभिन्नपचमेविकल्प फरतेहैं. ॥ ब्रह्मतथायात्माका रखाभाविकभेद कहतेहो थथवाओपा- है पूाई धिकभेदकहतेहो ॥ द्वितीयविकल्पकायर्थतोयागेस्पष्टहोगा ।। प्रथम विकल्पकायहयर्थहै।इतरकी अपेक्षासेरहितजोवस्तुकास्वरूपमात्रहैतिस कोस्वभावकहतेहैं । तिसवस्तुकेस्वरूपायुक्तभेदको स्वाभाविकभेद कहतेहैं । तिसस्वाभाविकभेदपक्षकायनुवादपूर्वकखंडनकरतेहैं। यहां जीवतथाब्रह्मकापरस्परभेदमाननेमेदोभेदेसिद्धहोतेहैं। तिनमेयात्म प्रतियोगिकयौब्रह्मयनुयोगिकएकभेदहै । औरब्रह्मप्रतियोगिकतथा श्रात्मअनुयोगिक द्वितीयभेदहै । तिनमेयदिप्रथमभेदमानो तोब्रह्ममे जडताकीप्राप्तिहोगी । क्योंकियात्मा चिपहैतिससे यदिब्रह्मभिन्न होगा तोघटकीन्याईअवश्यजडहोगा। यहांयहयनुमानजानना ।। * ब्रह्मजडंभवितुमर्हतिाआत्माभन्नत्वात्।घटवत् ॐ ।। 'य॥ ब्रह्मजडहोनेकेयोग्यहै आत्मासेभिन्न होनेसेजोजो यात्मासेभिन्नहोताहैसोसोजडहोताहै।जैसेघटहै ।। इति ॥ औरयदि तुमब्रह्मकी जडता स्वीकार करोगेतो (विज्ञानमानंदब्रह्म) इसश्रुतिका 'विरोधप्राप्तहोगा। क्योंकिइसश्रुतिमेविज्ञान औरब्रह्मपदकीसमानाधि करणतासेअभेदयर्थपूतीतहोताहै । यदिब्रह्मकोविज्ञानसेभिन्नमानोगे तोजडपनायवंश्यहोगा । सोब्रह्मकाजडपनापूर्वउक्त श्रुतिकेविरोधसे तुमकोभीइष्टनहीं॥शंका।।हेवादिनज्ञानयौब्रह्मपदकेसामानाधिकरण्य मात्रसेब्रह्मतथाज्ञानकायभेदनहींसिद्धहोसकताक्योंकिजैसे(शुक्ल पटः) शुक्लगणवालापटहै।यहांगणगुणीभावकोलेकरसमानाधिकरणताहै तैसेज्ञानोब्रह्मपदकीसमानाधिकरणताभीरणरणीभावको लेकरवन जायेगी।तिससेयभेदनहीं सिद्धहो सकता:।: समाधानः।। हेएक ग्देशिनः ब्रह्मकोयदि तुमजडमानोगे, तोग्रज्ञानको विषयताभीनहीं वे०सि० मु० '५६ बनेगी। क्योंकिजडमेंयज्ञान कृतयावरण के प्रयोजनकायभावहै ।। यातेयज्ञान विषयताकी सिद्धियर्थज्ञान थोब्रह्मका यभेदहीमानना उचितहै।इसप्रकारयात्माप्रतियोगिकतथा ब्रह्मयनुयोगिकभेदकोनिरा करणकरकेयवब्रह्मप्रतियोगिकतथाअात्मयनुयोगिक द्वितीयभेदको दूपितकरतेहैं । औरहेएकदेशिन् यदिब्रह्मसेभिन्नयात्माको मानोगेतो घटादिकोंकीन्याईयात्मामें अनात्मपनाप्राप्तहोगा । अर्थयह ।। अप रिच्छिन्नतथामुख्ययपरोक्षलाहोनेसेब्रह्मकोप्रत्यक्पनाहै। तिसप्रत्यक ब्रह्मसेयात्माकोभिन्नमानहुये अवश्यहीपराक्पनाअर्थात् अनात्मपना होगा। यातेद्वितीयभेदभीनहींसंभवता। इसप्रकारजीवतथाब्रह्मका स्वाभाविकभेदनिराकरणकरके यवतिनदोनोंके योपाधिकभेदमेंयनु वादपूर्वकविकल्पकरतेहैं । जीवनकायौपाधिकभेदहै यहद्वितीयपक्ष पूर्वकहाथा । तिसमेंयहविचारकरनेयोग्यहै । उपाधिजन्यका नाम औपाधिकहे । वाउपाधिभास्ययर्थात् उपाधिकरकेपूकाशने योग्यका नामयोपाधिकहै। अथवा।उपाधितंत्रयर्थात् उपाधिकेयाधीनकानाम औपाधिकहै । शंका।जीवब्रह्मकायदि औपाधिकभेदसंभवतोयौपा धिकशब्दकेयर्थका विचारकिया चाहिये । सोयोपाधिकभेदहीनहीं संभवता । क्योंकिउपाधिकेनिरूपणका अभाव है। * अथभेदमें उपाधिकेअभावका निरूपण सोदिखलातेहैं। जीवब्रह्मभेदका उपाधियज्ञानहैवायंतस्करण है।यथवा अतिरेकहै । यहांजीवब्रह्मक भेदाभेदकासंपादककोईधर्म विशेषयतिरेकशब्दकार्थजानना । इनमेपूथमपक्षतानहींसंभवता । क्योंकितिसअज्ञानकोविकाररहितझतथाईश्वरभेदका संपादकपना पूर्वाई हैजीवबूझकेभेदकावहसंपादकनहीं। यहवार्ता ।। * कारणोपाधिरीश्वरः । श्र० ॥ कारणरूपयज्ञानउपाधिवाला ईश्वरहै ।। इस श्रुतिमेंकथनकी हैं। औरदितीयपनभीनहींसंभवता।क्योंकितिसतस्करणकोवास्तव मानेहुये भेदकोभी वास्तवपना प्राप्तहोगा । औरयदि अंतस्करण कोकल्पितमाने।तो वहयनादि है वा। सादिहै यह विचार कर्तव्यहै ।। सादिपतकानिराकरणागेकरेंगे। पृथमयनादिपतमेयहविचारकिया चाहिये।वहयंतस्करणसुषुप्ति आदिकअवस्थामस्थितरहिताहै।वानिहीं। पुनः प्रथमपक्षमेयहविचारकर्तव्यहै । क्या?वहयतस्करणस्थूलरूपता सेरहिताहै।वासूक्ष्मरूपतासेरहिताहै।। प्रथमपक्षनहींसंभवता क्योंकि मनःसर्वेानैःसहाप्यति य० ॥ सर्ववृतियोंसहित यंतस्करणसुषुप्तियवस्थामे लीनहो जाताहै ॥ इसश्रुतिकाविरोधहोताहै।ौरमनरूप अंतस्करणकोस्थूल रूपतासेविद्यमानहुयेसुपुप्तिकाभीयभावहोगा । औरद्वितीयपक्षभी नहींसंभवता।क्योंकिसूक्ष्मपनेकाशक्तिवालेकारणरूपयज्ञानसेभिन्ननि रूपणनहींहोसकता। औरयदिकारणरुपतासेयंतस्करणकीस्थितिमाने तोकारणहीवहांस्थितहोगा।यंतस्करणनहीं।तिसअंतःकरणकेनिवृत्तहुये जीवब्रह्मका भेदभीनहींसिद्धहोगा ।। इसीरीतिसे अंतस्करणसुषुप्ति यवस्थामेनहींरहिता।यहपक्षभीनिरासहुयाजानलेना।औरयंतस्करण कोउपाधिरूपताकेनिराकरणकीजोयुक्तिहै।तिसीसेअतिरेकपक्षभीनिरास करनेयोग्यहै । औरभेदाभेदकापरस्पर विरोधहोनेसेभी अतिरेकको उपाधिरूपतानहींसंभवती ।। इसप्रकारउपाधिकेननिरूण होनेसेंजीव ०सि० मु. यौब्रह्मकाभेदयौपाधिकहैयहकथनययुक्तहै । समाधान ॥ * अज्ञान को उपाधि रूपता निरूपण जोयज्ञानशुद्धब्रह्मतथाईश्वरकेभेदका उपाधिहैसोईही अज्ञान जीवब्रह्मकेभेदकाउपाधिकहनेयोग्यहै ॥ क्योंकिज्ञानकेकार्यश्रतः करणादिकोंकोकदाचित्कहोनेसेजीवब्रह्मके भेदका उपाधिपनानहीं संभवता ।। यद्यपिईश्वरकाउपाधिजोयज्ञानहै सोईजीवकाउपाधिहै ॥ ऐसामाननेसेईश्वरतथाजीवके सर्वज्ञतादिकधर्मांकासंकरहोगा तथापि यावरणशक्तिप्रधानयज्ञानजीवब्रह्मकेभेदकाउपाधिहैयौरविक्षेपशक्ति प्रधानयज्ञानईश्वरका उपाधिहै । इसीकारणसेवेदांत ग्रंथोंमेमाया' उपाधिवालाईश्वरकहाहै ।। यातेदोनोंकेधर्मोंकासंकरनहीं ॥ इति ।। अथ औपाधिक भेद का खंडन इसप्रकारयौपाधिकपक्षमेतीनविकल्पकरके यौरतिसमेअज्ञान कोउपाधिरूपताकीसंभावनाकरकेतिस योपाधिकपक्षकोदूषितकरनेके लियेयारंभकरसेहैं। पूर्वयौपाधिकभेदपक्षमेतीनविकल्पकियेथे तिन मेग्रज्ञानजन्यजीवब्रह्मकाभेदहै।।यहप्रथमपततिसमेंयहविचारकर्तव्य है। वह जीव ब्रह्म का भेदसादि है यथवा यनादि है ॥ यदि अनादिकहो तो तिम को अज्ञान जन्यता नहीं बनेगी ॥ क्योंकि जो अनादि होता है सो यजन्य होताहे यदि अनादिकीभी उत्पत्ति मानोगे। तोब्रह्मकीभी उत्पत्ति ईचाहिये । औरजोऐसेकहोकिभेद व्यक्तितोसादिहै परन्तुतिसका प्रवाहयनादिहै ।सोकथनभीनहींसंभ वता । क्योंकिभेदव्यक्तिमभिन्नाभिन्नरूपताकरके प्रवाहकानिरूपण नहींहोसकतातियाहिाभेदव्यक्तिसेयदिप्रवाहकोभिन्नमानेतो प्रवाहको पाद हीअनादिपनासिद्धहोगाभेदव्यक्तिकोनहीं। औरभेदव्यक्तिसेप्रवाहको भभिन्नमानेतोमवाहकोभी अनादिपनानहींसिद्धहोगा। यातेभेदको सादिपनाहीशेघरहताहै ॥ तिसमेंभीयहविचार कियाचाहिये ॥ क्या? अज्ञानमयोजनसेविनाहीभेदकोउत्पन्नकरेगाअथवा किसीप्रयोजनके अर्थउत्पन्नकरेगा ॥ प्रथमपक्षनहींसंभवता।क्योंकि निप्पलवस्तुको कारणताकाही असंभवहै ।। सफलवस्तुकोही कारणकहतेहैं । और द्वितीयपक्षमेभीवह प्रयोजनकोईजीवकाहे वायज्ञानका अपनाकोई प्रयोजनहै । यहविचार करने योग्यहै || प्रथम पक्षतो नहींसंभवता क्योंकिभेदकीउत्पत्तिसेपूर्वजीवभावहीयसिद्धहै।और द्वितीयपक्षमेभी यहविचारकर्तव्यहै ।। क्या?याश्रय तथा विषयकालाभयहयज्ञानका अपनामयोजनहै ।। अथवा अन्यकोईप्रयोजनह।। यंत्यपक्षतोयसंगत है।क्योंकिजीव ब्रह्मभेदसे उत्पन्नहुया अज्ञानगतौर कोईप्रयोजन । निरूपणनहीं होसकता पौरप्रथमपक्षभीनहींसंभवता क्योंकिभेदकी उत्पत्तिसे पूर्वहीजीवईशभेदसेरहितात्मानिष्ठयज्ञानकीसिद्धिहोनेसे भेदकीतिसयज्ञानकोकिंचत्भीयपेक्षानहीं । शंका ॥ हेवादिन्भेद कीउत्पतिसेपश्चातगज्ञानयाश्रयतथा विषयकोप्राप्तहोगा ॥ भेदकी उत्पत्तिसेपूर्वतिसकोयाश्रययौविषयकालाभनहीं ॥ सामाधान ।। हे एकदेशिन "किसकोकिसविषयकज्ञान। इसप्रकारकाप्रश्नलोक मेंप्रसिद्धहै । तिससेयाश्रयतथा विषयकीयपेनासहितहीअज्ञानप्रतीत होताहै । अन्य कारसेनहीं। क्योंकितिसको स्वतंत्रताकायभावहै । यातेभेदकाउत्पन्नकरनाव्यर्थहै । यहभावहे । औरअज्ञानभास्यजीव ब्रह्मकाभेदहैयह द्वितीयपक्षभीनहींसंभवता। क्योंकि यज्ञानकोज्ञानसे वे०सि०म० भिन्नहोनेकरजडपनाहे जडहोनेसेपूकाशकताका अभावहे । और अज्ञानकेयाधीनजीवब्रह्मका भेदहेयहतृतीयपक्षभीयसंगतहे । * विविधतंत्रताका निरूपण क्योंकितंत्रतायर्थात् पराधीनतातीनपूकारकी लोकमेंदेखीहै । एकतोघटादिकार्यको अपनेकारण मृत्तिकादिकोंकी याधीनताहै । औरदूसरीमनुष्यादिशरीरोंको अपने अाधारभूम्यादिकोंकीयाधीनता है ॥ औरतीसरीघटादिक पदार्थोंकोअपनेपूकाशकेलिये सूर्यादिक प्रकाशकोंकी थाधीनताहै । तैसेजीवब्रह्म केभेदकोयज्ञानरूपउपाधि करकेजन्यतारूपयाधीनताहै।वाउपाधिकेयाश्रितपनारूपयाधीनता है वाउपाधिकरकेपूकाश्यत्व रूपयाधीनताहै। इनतीनोंकेमध्यकोई भीअज्ञानजन्यत्वादि प्रकारपूकरणगतजीवब्रह्मकेभेदमेंनहीं संभवता क्योंकिजीवबृह्मभेदको अज्ञानजन्यतायौरयज्ञानभास्यताकातोपूर्व निषेधकरहीयाएहैं यातेपुनःनिषेधकरनेका कुछफलनहीं॥यौरतीसरी अज्ञानयाश्रयता रूपतंत्रताभीजीवब्रह्मके भेदनिप्ठनहीं संभवती । क्योंकिवहभेदजीवयौ ब्रह्मइनदोनोंकेमध्यकिसीएकमेंरहताहै । यदि जीवप्रतियोगिकयौ अययोगिकभेदहेतो ब्रह्मवर्तताहै औरयदि बूप्रप्रतियोगिकयौजीव यगुयोगिकभेदहै।तो जीवमेवर्तताहै ॥ याते वहभेदयज्ञानको कैसेयाश्रयणकरेगा किंतुनहीं करसकता॥शंका ।। हेवादिनजैसे “महाकाशसे घटाकाशभिन्नहै" इसप्रतीतिमें महाकाश प्रतियोगिकभेदका घटाकाशकोधर्मिफ्नाहुये विशेषणरूपघटकोभी धर्मिताहै ॥ तैसे “वूमलेग्रज्ञानीजीवभिन्नहै" इसप्रतीतिमेंभीब्रह्मति योगिकभेदकाजीवको धर्मिपनाहुयेभीजीवके विशेषणरूपयज्ञानको पूनाई हुए तिस भेद की अधिकरणता क्योंनहीं होती किन्तु अवश्यहूई चाहिये ।। समाधान ।। हेएकदेशित हमारेसिद्धांतमें यज्ञानकोजीव भावकी उपाधिरूपताहोनेसे तटस्थहोनेकरभेदके धर्मिजीवकाविशेषण पनास्वीकारनहींहै । जैसेपाकरूप क्रियापाचकका उपापिहुयीभी पाचककाविशेषण नहींहोसकती ॥ औरयदिपाकक्रियाकोपाचकका विशेषणमानलेतो पाकक्रिया में भी पाचकपनायाप्तहोगा। "क्योंकि विशिष्टवृत्तिधर्मका विशेषणमें वर्तनेकानियमहै" ॥ यर्थयह ॥ पाक क्रियाविशिष्ट पुरुषमें वर्तमान जोपाचकत्वधर्महे सोपाचककीविशे- पणीभूतक्रियामेंभी प्राप्तहोगा। सोऐसादेखनेमेंनहींयाता ॥ याते जीवब्रह्मकभेदकीयज्ञानमें अधिकरणता नहींसंभवती ।। पाकक्रिया कोपावककी विशेषणता निराकरणकरनेसेघटभी घटाकाशकाविशेषण नहींकिन्तुउपाधिहै यातेपूर्वउक्तदृष्टांतभी असमीचीनहै ॥ शंका । जीवनुयोगिकजो बूमकाभेदहै वह ज्ञानमें क्योंनहीं वर्तेगाकिंतु अवश्यवर्तेगा ॥ क्योंकिएकहीभेदके अनेकधर्मिस्वीकारहैं । जैसेएक हीघटभेदकेपटादिक सर्वहीधर्मिहै।तैसे यहांभीभेदका धर्मिपनायज्ञान को बनजायेगा ॥ समाधान ।। . अथअज्ञानको जीवब्रह्मप्रतियोगिकभेदकी अधिकरणताका निषेध । अज्ञानमेंब्रह्मका भेदस्वाभाविकहै | वाग्रौपाधिकहै पृथमपक्षतो नहींसंभवता,क्योंकिएकही चूमप्रतियोगिकभेदको जीवमेंयौपाधिक मानेहये और ज्ञानमेंस्वाभाविक मानेहुयेदिरूपताहोनेसेविरुद्धपनाई अर्थयहस्वाभाविकत्वतथायौपाधिकत्वदोविरोधिधर्मएकभेदरूपधर्मिमें ६२ नहीं संभवते ।। औरभेदकोवास्तवहोनेसे देतापत्तिभीहोगी। यातेभी प्रथमपक्षयसंगतहे ॥ ौरद्धितीपक्षमेंअविद्यासेभिन्नौर कोईउपा घि निरूपण नहीं कर सकते। किन्तु यविद्या कोही उपाधि कहनाहोगा । औरविद्यानिष्ठभेदमें विद्याकोही उपाधिमाने हुयआत्माश्रयदोप कैसेनहीं प्राप्तहोगा। इसप्रकारभेद स्वाभाविक तथाऔपाधिकरूपता सेननिरूपणहोनेकरवृक्षकाभेदयविद्यामेंढे यह कथननिरर्थकहै । इतनेकथनसेजीवतियोगिक भेदकीयाश्रयताभी अविद्या निषेधकी गयी ॥ क्योंकिजीवपतियोगिकभेदकोब्रह्ममेयी पाधिकहोनेकरतिसको अविद्यामेंभी यौपाधिक मानहुयेकैसेयात्मा श्रयदोपनहींहोगाजिसकाग्णसेअविद्यासेभिन्नउपाधिकाग्रभावहेऔर तिसजीवप्रतियोगिकभेदको थविद्यामेस्वाभाविक मानेहुयेदिरूपता कीपाप्तिभेदकोहोगी। क्योंकिब्रह्ममेवहभेदयोपाधिकहै औरयविद्या मेस्वाभाविक है ।। एकहीभेदमें दिरूपताकी पासिविरुद्धहै । औरपूर्व कीन्याईदेतापतिदोपभीइसपनपातहोगा।किंवाजीवसेभिन्नयज्ञानको जीवभेदकाउपाधिपनाहेअथवाजीवसेअभिन्नयज्ञानकोउपाधिपनाहै।। अंत्यपज्ञतोनहींसंभवता क्योंकियपनेविषयकयापकोहीउपाधिपना अयुक्तहै ।।योरयापकोउपाधिरूपतामाननेमेयात्माश्रयदोपभीहोगा। औरयन्योऽन्याश्रय दोपहोनेसे प्रथमपक्षभीयसंगतहै । क्योंकिभेद सिद्धिके श्राधीनउपाधिकी सिद्धिहै। और उपाधिकी सिद्धिके श्राधीन भेदकी सिद्धिहै । इस प्रकार स्वाभाविक तथा यौपाधिक भेदको अज्ञान थाश्रितत्वनहींसंभवता । यहभावहै ।। योरजो एक देशीऐसे कहेकि जैसे अन्नान और आत्माका संबंध प्रज्ञानके था.

पूर्वाद धीनहै। तैसे ब्रह्मात्माका भेदभी यज्ञानके श्राधीन है । सो यह कथनभी नहींसंभवता । क्योंकि संबंधकों संबंधियोंके याधीनरहने कानियमहै । औरभेदमेंसंबंधरूपताका अभावहै ॥शंका॥ हेवादिन पर्वकथनकीहुयी तीनप्रकारकीतंत्रतासे भिन्नहीजैसेद्रव्यत्व औरण वत्ताकानियम्यनियामकभावहै।तैसे जीवब्रह्मके भेदौरग्रज्ञानकानिय- म्यनियामकभावक्योंनहो भावयह ॥ जैसेद्रव्यत्वको नियम्यहोनेसे अपनेनियामकगुणवत्ताकी श्राधीनताहैतैसे नियम्यजो जीवब्रह्मका भेदतिसकोभीयपने नियामकयज्ञानकीयाधीनताक्योंनहींहोतीकिंतु हुयीचाहिये ॥ यहांव्याप्यकानामनियम्यहैऔर व्यापककानामनि यामकहै ॥ समाधान ॥ हेएकदेशिन् एकअधिकरणमें रहनेवाले पदार्थोंकाहीनियम्यनियामकभाव देखाहै ॥ जैसेद्रव्यत्वौरगुणवत्त इनदोनोंकोएकद्रव्य वृत्तिहोनेसेसमानाधिकरणताहै ॥ यातेतिनका नियम्यनियामकभाव वनइंग्रौरयहांप्रसंगमेंजीवब्रह्मकेभेदयौयज्ञानकी एकाधिकरणताका अभावहै । क्योंकियज्ञानजीवनिष्ठहैयौरजीव प्रतियोगिकभेदब्रह्मनिष्ठहै । इसप्रकारएकयधिकरणताकायभावहोने सेदृष्टांतविपमहे ॥ यातेजीवब्रह्मके भेदयौयज्ञानकानियम्यनियामक भावनहींसंभवता ।। शंका ॥ हेवादिन भेदौरयज्ञानकीएकयधि- करणताबनसकतीहै।क्योंकि मैंअज्ञानीहूं"इसमतीतिसेयज्ञानजीवनिष्ठ हैयौर “मॅब्रह्मनहींहूं। इसपूतीतिसेब्रह्मप्रतियोगिकभेदभी जीवनिष्ठहै। इसरीतिसेब्रह्मभेद औरयज्ञानकोजीवनिष्ठहोनेसे तिनकी समानाधि करणताकाअभावकैसे कहतेहो ॥ समाधान।। हेएकदेशिन् यहांयह शब्दसेंअंतःकरणका द्वितीय पर्याय जोयहंकारहै तिसका कथन है ०सि० मु० ६४ अथवाअंतःकरणके साथतदात्मभावको प्राप्तचैतन्यका यहंशब्दसे कथनहै । वाशुद्धब्रह्मकाकथन है।।पृथमयौद्धितीयपक्षतोनहींसंभवते। क्योंकितिनदोनोंको अज्ञानयाधीनहोनेकर अज्ञानकायाश्रयपना नहींसंभवता. औरतृतीयपन मेंहमकोइष्टापत्तिहै।क्योंकिशुद्धचिन्मात्र हीयज्ञानका याश्रयतथाविपयहै । * अज्ञानको शुद्धचेतनाश्रयत्वौ विपयत्व का स्थापन शंका ।। चेतनमात्रनिष्ठायज्ञानहोपरंतुविषय तिसकाब्रह्महो जायेगा ॥ समाधान ॥ एकदेशिन्यहांयहतात्पर्यहै ॥ ब्रह्मयज्ञान काविषयहैयहजोतुमकहतेहो । इसमेब्रह्मशदकाअर्थकौनहै ॥ क्या विवप्रतिबिंबभावसेरहितशुद्धचिन्मात्रहै अथवाविवभावको प्राप्तचैतन्य ब्रह्मशदकायर्थहै ।। प्रथमपक्षमतोहमकोभीइष्टापतिहै ।। क्योंकिशुद्ध चिन्मात्रकोहीअज्ञानकीविषयताहममानतेहैं । औरदितीयपक्षमेचिंब भावकोयविद्यासेउत्तरकालमेहोनेकरवयविद्यातिसकोविपयनहींकरती किंवा।यज्ञातब्रह्मकीसिद्धिक्याप्रमाणसेहै यथवाभ्रमसे है।। अथवा।स्व प्रकाशतासेहै ।। प्रथमपक्षमेतोब्रह्मकोजडपनाहोगा।क्योंकिजोप्रमाण काविषयहोताहै । सोघटकीन्याईजडहीहोताहै।ौरब्रह्मकाविशेषणी भूतयविद्याकोप्रमाणसिद्धहोनेकरदैतापत्तिभीहोगी ॥ ौरविरोधसे भीप्रथमपक्षयसंगतहै क्योंकिपमाणकरनिवृत्ति केयोग्यजोयज्ञानवह प्रमाणकेसंबंद्धकोनहींसहनकरसकता।ौरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता क्योंकिजवभ्रमसे अज्ञातबह्मकीसिद्धिमानेतोयविद्याकीविषयताकाय- भावप्रसंगहोगा। विपयकेवाधहोनेकरहीज्ञानकोभ्रमपनाहोताहै।ौर पूाई तृतीयपक्षभीयसमीचीनहै ॥ क्योंकियज्ञातब्रह्मका स्वप्रकाश रूपता करस्फुरणनहींहोता।। यातेसोब्रह्मकिसप्रकारअज्ञानकाविषयहोसकताहै इसीसेसर्वथाभेदकेनबननेसेंजीवब्रह्मकेभेदसेरहितशुद्धयात्माकोयज्ञान थाश्रयणकरकेतिसयात्माकोहीविषयकरताहै ॥ इसप्रकारयज्ञानकी विषयताप्रात्मानिष्टसिद्धहुई ।। इति ॥यविद्याजीवब्रह्मविभागसेरहित शुद्धचिदात्माको थाश्रयणकरतीहै । औरतिसीको विपयकरतीहै ।। यहअर्थपूर्व निरूपणकिया ॥ तिसमे वृद्धोंकी संमत्तिकहतेहैं । यह वार्तासर्वज्ञात्ममुनीयोंनेभीकथनकीहै । उन्होंनेक्याकथनकियाहै ।। ऐसीयाकांक्षाकेहुये कहतेहैं॥ आश्रयत्वविषयत्वभागिनीनिर्विभागचितिरेवकेवला पूर्वसिद्धतमसोहिपश्चिमोनाश्रयोभवतिनापिगोचरः।। सं० शा० अ० १ नो० ३१६ ॥ चौ० ॥ याश्रयत्वविषयत्वविभागन । निर्विभागचितिकेवल थोखन । पूर्वसिद्धतमोहैयांते।याश्रयविपयोनकार्यतांते ॥१॥ टी० ॥ अज्ञानकेयाश्रय तथाविषयके भजनेवालाचेतनहै ।। यद्यपियज्ञानकायाश्रयजीवकोमानेहुयेतथा विपयब्रह्मकोमानेहुयेभी चेतनकोयज्ञानकीयाश्रयतातथाविपयताकीयनुपपत्तिनहीं। क्योंकि जीवौब्रह्मइनदोनोंमेचेतनयनुगतहै।।तथापिजीवौईश्वरकोयज्ञान केयाधीनहोनेकर जीवईशभेदसे रहितही चेतन अज्ञानका था .य तथाविषयहै शंका।। जैसेचेतनमात्रकोअज्ञानका थानयतथाविषय तुमनेमाना है ।। तैसेयनात्माभीमज्ञानका याश्रययौविषयक्योंनहो ॥ समाधान ||तुम्हारीइसयाशंकाकोमूलमेकथनकियाजो "एक्कार" ३०सि० मु० तिसकेयर्थकोस्पष्ट करनेवालेकेवलपदनेनिवार्णकियाहै ।। शुद्धचेतन सेभिन्नयनात्मवर्गग्रज्ञानकायाश्रययौविपयनहीं इसमेहेतुकहतेहैं ।। जिसकारणसेयज्ञानप्रथमहीसिद्धहै।इसीसेपश्चातहोने वालाअनात्मा तिसयज्ञानकायाश्रयऔरविपयनहींवनसकता ।। इति ॥ * शंका पूर्वक अज्ञान के एकत्व की प्रतिज्ञा शंका।।हेवादिन्यज्ञानकायाश्रयएकमानेहुयेतिसकीअनेकता- निरूपणकरनीकठिनहै।। जिसकारासेजीवजीवप्रतिजगत्केउपादान भूतयज्ञानकीयनेकताएकदेशीनेभीनहींकानी।किंतुएकजीवकेयाश्रित एकहीअज्ञानमानाहै औरयज्ञानकोएकमानेहुयेबद्धमुक्तादिव्यवस्था कीयनुपपत्तिहै।। इसप्रकारयज्ञानके एकत्वतथा यनेकत्वपक्षमे दोष देखनेसेहमयहपूछतेहैं। यानयतथाविषयकाएकत्वमानेहुयेभीसोअज्ञान एकहैअथवायनेकहै ।। यहनिर्णयकैसेट्ठया । इसप्रकारएकतटस्थ की याशंका को सुनकर “धर्मिकी कल्पनासे धर्ममात्र की कल्पना श्रेष्टहै " इस न्याय को याश्रयण करके सिद्धांत मुद्राको आश्रयण करने वाला पूर्व पत्नी उत्तर कथन करता है ।। समाधान हेतटस्थ एकही यज्ञान है यह हम कहते हैं । शंका || देवा दितिमयज्ञानकी एकतामें साधककोनहे । भावयह ॥ यदितुम अज्ञानकेएकत्व विषयकप्रमाणकहोगे | तोयपसिद्धांतहोगा।क्योंकि प्रमाणसिद्धग्रज्ञानको सत्यहोनेकरंटेनापत्तिरूप दोपप्राप्तहोताहै । यौरविरोधभीहै । क्योंकियज्ञानप्रमाणके संबंधकोसहनहीनहींकरता थोरयदितुमकोईप्रमाणनहींकहोगे। तोयज्ञानकाएकत्व सिद्धनहीं होगा । योरयदिकेवलयुक्तिही तिमकामाधककहोगेतोमूलप्रमाणसे ॥

पूर्वार्द्ध रहिततिसयुक्तिको यामासरूपताहोगी। यातेकिसीप्रकारसेग्रज्ञान काएकत्वसिद्ध नहींहोसकता । *अथअज्ञानमेलौकिकादिप्रमाणकखंडनपूर्वकलाघव सहकृततर्कसेतिसके एकत्वकास्थापन समाधान मू० ॥ लौकिकीवैदिकीचापिनाज्ञानेदृश्यते प्रमा। कार्यदृष्टयाथकल्प्यं चेल्लाघवादेकमेवतत् ।* भुजंगप्रयात० ॥ पूमाल्लौकिकी वैदिकीमोहिप्यारे ॥ अज्ञानं विपेनाहिकोईदिखारे ॥ यदीसृष्टिको देख, ऊहाकरैहो । लघूतासितो एकहीजानलैहो ॥ १ ॥ टी० ॥ यहांकारिकाके पूर्वार्द्धसेयपसिद्धांतकी याशंकाका परिहारजानना । औरउत्ताईसे लाघवसंज्ञकतर्क ग्रजानके एकत्वको सिद्धकरताहै।शका।मूलकारिकामें (नाज्ञाने दृश्यतेपूमा) ० यज्ञान मेंकोईप्रमाणनहीं देखाजाता । यहजोकथनेहसोययुक्तहै । क्योंकि श्रज्ञानके स्वरूपमें प्रमाणकाजो प्रदर्शनहै तिसकामकरणके साथ किंचितभीसंबंधनहींहै । जिसकारणसेयज्ञानके स्वरूपमतोयज्ञानहैवा नहींइसमकारकेविवादका अभावहै । किंतुतिसके एकत्वोअनेकत्व मेंहीविवादहै ।। यातेपूर्वकथननहीसंभवता ।।समाधान । यज्ञानका जोसाधकहैवह तिसकेएकत्वकोभी सिम्करदेगा । इसयभिमायसेपूर्व कथनसंभवताहै । इसीयभिमायकोलेकर श्लोककीव्याख्याकरतेहैं । • अज्ञानाक्या? वेदममाणकरसिद्धहैवामित्यक्षादिममाणकरसिद्धही यहां श्रादिपदसेअनुमान तथालौकिकशब्दका ग्रहणकरना ॥ अथवा ॥ दृश्यमानजगतरुपकार्यकी अन्यथाऽनुपपत्ति रूपतर्कसेवह अज्ञान वे०सि० मु. ६८ कल्पनाकरनेयोग्यहै ।। व ॐ सर्वेवेदायत् पदमामनंति ॥ इसश्रुतिकोनयाश्रयण करकेपथमपक्षकोदूषित करतेहै । ** पूर्वकांडतथा उत्तरकांड रूपवेदकाधर्म, औब्रह्ममेंतात्पर्य्यनिरूपण । इनतीनोंपक्षोंमे पूथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिसाक्षात्तथा परम्परासेपूर्वकांडरूपवेदकाकर्ममात्रविषयहै औरउत्तरकांडरूपवेदांतोंका साक्षात् तथापरंपरासे परिपूर्ण सचिदानंद ब्रह्ममात्र विषयहै ॥ शंका ॥ धर्मतथाब्रह्महीवेदवाक्योंकाविषयहै यहनियमापक्योंकरते हो किन्तुजिसवाक्यसेजोयर्थश्रवणकियाहै तिसयर्थमेसोवाक्यक्योंन प्रमाणहो।समाधानाधर्मतथाब्रह्मकप्रतिपादनमेहीफलकासंबंधहै भाव यह ॥ जिसकारणसेयध्ययनविधिफल वालेयर्थकाजोज्ञान तिसका उद्देशकरकेवेदाध्ययनकाविधानकरताहै।।यौरसाक्षात्वेदसेप्रतिपादन कियाहुयायर्थसर्वत्र फलवाला नहींहोसकता ।। क्योंकिनामधेयऔर देवतादिरूपयर्थभीयनेकवाक्योंमेप्रतीतहोताहै । परन्तुतिनकेप्रति- पादनमे सुखतथादुःखाभावरूपफलका यदर्शनहै । औरधर्मकाज्ञान अपनेविषयभूतधर्मका यनुष्ठानकराताहुया स्वर्गादिरूपफलकोउत्पन्न करताहै । औरब्रह्मज्ञानतो यनुष्ठानकी अपेक्षासेविनाहीयनेकदुःख रूपयज्ञानकीनिवृत्तिपूर्वकपरमानंदकाप्रापकहै ।। इसरीतिसेधर्मतया ब्रह्मकेप्रतिपादनमेहीफलकासंबंधहै ।। इनसेभिन्नयज्ञानरूपयर्थतथा श्रवणादिरूपयर्थकेप्रतिपादनमेफलकासंबंधनहीं ॥ यातेयज्ञानमेवेद प्रमाणायभावहै ।। योरदितीयपक्षभीनहींमभवता ॥ क्योंकिस्पष्ट पूर्वाद प्रत्यक्षादिसिद्ध अज्ञानकोमानेहुये वादियों कापरस्पर विवादनहोना चाहिये ।। यहांविवादग्रस्तईश्वरादिप्रत्यक्षसेजोभिन्नपनाहै ॥ यहही प्रत्यक्षनिष्ठस्पष्टपनाहै । इसरीतिसेयज्ञानकोप्रमाणकाविषयहोनेसे श्रपसिद्धांततथाविरोधकीभीयाप्तिनहींहोतीयहभावहै ।यहांतकश्लोक केपूर्वार्द्धकाव्याख्यानकिया।यवज्ञानकोलौकिकतथावैदिकपूमाण करसिद्धमानेहुयेप्रमाणकेयभावसे तिसकाएकत्वनहींसिद्धहोगा । इसपूकारकीयाशंकाकालाधवहैसहिकारीजिसकाऐसीजोअन्यथाऽनुप पतिरूपयुक्तिवहयज्ञानकेएकत्वकासाधकहैइसप्रकारका परिहाररूपता करउत्तरार्द्धकाव्याख्यानकरतेहैं । जिसकारणसेश्रज्ञानविषयकपूमाण नहींसंभवता । इसीकारणसेस्वभावसेनसंगयौरउदासीनतथास्वानंद करतृप्तयात्मानिष्ठमिथ्यायौरथनेकपूकारकेसुखदुःखादिरूपप्रपंचरचना कीग्रन्यथाऽनुपपत्तिसेअज्ञानकल्पनाकियाजाताहै।यहहीकथनकरना योग्यहै।क्योंकिग्रन्यकिसीरीतिसेपूपंचरचनाकीउपपत्तिनहींसंभवती भावयह ॥ यज्ञानसेविनायसंगईश्वरसेजगत्रचनाकीयनुपपत्तिहै।। यातेथज्ञानकल्पनाकियाजाताहै ।। शंका ।। जैसेकुलालघटकोउत्पन्न करताहुयायज्ञानकीथपेक्षानहींकरता।। तैसेईश्वरभीयज्ञानसेविनाही जगत्रचनाकरलेगा ।। श्रज्ञानकीकल्पनाकरनेकाकिंचित्भीपूयोजन नहीं । समाधान ॥ सोईश्वरशरीस्तथा इन्द्रियोंके संबंधसेरहितहे ।। यहवार्ताश्रुतिमेप्रसिद्धहै । यातेयसंगकोकर्तृत्वनहींसंभवता॥शंका।। जैसेवस्त्रस्वभावसेजलकेसाथ संबंधवालाभीहै परन्तुमोमसे लिप्तहुया जलकायसंसर्गीहोताहै ।। तैसेईश्वरस्वभावसेसंगिड्डयाभीकिसीउपाधि केवशसेयसंगिक्योंनहो ॥ समाधान ॥ वहईश्वरस्वभावसेहीयसंग ७०. वे०सि०म० है। क्योंकि ॥ असंगोह्ययं पुरुपः य० ॥ यहपुरुषयसंगहै । इसश्रुतिमेईश्वरका असंगस्वभाव कहाहै ॥ योरकिसीउपाधिकननिरूपणहोनेकरयसंगपनाऔपाधिक नहीं किंतुस्वाभाविकहै ॥ शंका ॥ तत्तेजोऽमृजत् ॥ छ० उ० अ० ६ ख २॥३ य० ॥ सोपरमात्मा तेजको उत्पन्नकरताभया ॥ इस श्रुतिसे ईश्वरमेकर्तृत्वप्रतीतहोताहै ॥ यातेयसंगपनायसिद्धहै |समाधान|| हेवादिन्वहईश्वरउदासीनहै अर्थात्यकर्ता है ॥ भावयह चेतनकर्ता किसीप्रयोजन काउद्देश करकेकार्यको रचनाकरताहै ॥ औरईश्वरको जगत्रचनाकामयोजनक्या?दुःखाभावरूपहै अथवासुखरूपहै। प्रथम पक्षतोनहींसंभवता क्योंकिदुःखाभावतोईश्वरमेस्वतःसिद्धहै। और द्वितीयपक्षभीयसंगतहै । क्योंकिवहईश्वरअपनेस्वरूपभूतथानंदकर हीतृप्तहै ॥ तिसीसेदोनोंप्रकारके प्रयोजनसे शून्यहोनेकर वह ईश्वर उदासीनहै । यातेतिसकोतेजादिजगत्काकर्तृत्वयुक्तनहींहै ॥ और * यतोचाइमानभूतानिजायते ॥ १० उ० मृ० य० अ%8 यः ॥ जिसकारणसेयहसर्वभूतउत्पन्नहोतेहैं।। इसश्रुतिनेजगत्रचना ईश्वरसेकथनकीहै । इसीकारणसेयसंगतथाउदासीनयात्मानिष्ठप्रपंच रचनायज्ञानसेविनानहींसंभवती । यातेअज्ञानकल्पनाकियाजाताहै। शंका रजतकोउत्पन्न करतीहुयीशुक्तियज्ञानकीयपेक्षाकरतीहै ।क्यों किविहरजतमिथ्याहै। औरप्रपंचकोतो सत्यहोनेकर तिसकेउत्पादनमे पूर्वाई ईश्वरको ज्ञानकी अपेक्षानहींसंभवती ॥ समाधान '|| "नेति- नेति" इसश्रुतिसेईश्वरमे पंचका निषेधश्रवणहोताहै ।। यातेरजतकी न्याईपूपंचभीमिथ्यारूपहै।तिसकीउत्पत्तिमेईश्वरकोथवश्ययज्ञानकी अपेक्षासंभवत्तीहै ॥ औरयनेकपूकारकेसुखदुःखादिरूपजगतकीरचना अन्यप्रधानादिकोंसेनहींसंभवती । किन्तुजैसेरज्जुअज्ञातहुयीअनेक पूकारकेसर्पमूत्रधारामालादिरूपपातिभासिकपूपंचकोरचनाकरतीहुयी' देखनेमेग्रातीहै | इसीप्रकारयसंगस्वभावहुया भीईश्वरयज्ञानकेवरा सेनानापूकारके पंचकोरचनाकरताहै।इसरीतिसेयज्ञानकीसिद्धिहयहां श्रन्यरीतिकाअभावहै ।। तात्पर्ययह।। पृथमब्रह्मकोयसंगस्वभावहोने सेयज्ञानसेविनातिससेपूपंचरचनाकायसंभवहै।ौरयन्यकिसीप्रधान प्रमाणुयादिकसत्यउपाधिउपहितब्रह्मसेभी जगत्रचनाका संभवनहीं क्योंकिकार्यमिथ्याहै।मिथ्याकासत्यकारणनहींहोसकता।ौरयन्यकिसी मिथ्याउपाधि सेभीजगतचनाकासंभवनहीं। क्योंकितिसउपाध्यांतरको सादिपनाहैवायनादिपनाहै।यहपृष्टव्यहे।प्रथमपतमेतोयनादिप्रपंचके उत्पन्नकरनेमेतिसकोउपाधिपनानहींसंभवता।औरद्वितीयपक्ष मानेहुये अज्ञानकाहीनामांतरकरणहै।तिससेयज्ञानकीसिद्धिवलात्कारसेहुयी । औरयज्ञानकोपपंचरचनाकी साधकताकायसंभवभीनहीं।क्योंकिरज्जु निष्ठयनेकसादिरूपप्रातिभासकमपंचकीरचनामेयज्ञानकोसाधकपना देखनेसेअसंभवकायभावहै । इसप्रकारपूपंचरचनामेयन्यकिसीप्रकार केनवननेसेयजानकीकल्पनाकरनीयुक्तहे । इति ।। शंका || अज्ञानके एकत्वकानिर्धार । इसपर्वउक्तरीतिसे अज्ञानकी कल्पनाकरो परंतुतिसकाएकत्व ०सि० मु० किसकारणसेहे । समाधान ॥ तिसपूर्वकथनसे कल्पनाका विषय भूतसोयज्ञानएकहे वायनेकहै इसप्रकारकेविवाद हुएएकहीअज्ञानहे यहनिर्णयहुया । यद्यपिक्रमसे होनेवाले अनेककार्योंके देखनेसे अनेकज्ञानोंकी कल्पनाप्राप्त होतीहै । तथापि वहएकही यज्ञान विचित्र शक्तियोंवालाहै ।। यातेतिससे विचित्रकार्यकीउपपत्तिहै ।। यौरएकही विचित्रशक्तिवाले पदार्थको अनेककार्यकीजनकताकोई दृष्टिकायगोचरभीनहीं।क्योंकिस्वप्नमें अनेकप्रकारकेकार्यकीजनकता निद्रादोपमेदेखीहै ॥ इसीसेयज्ञानएकहै | औरयदिएकदेशीऐसेकहे। अज्ञानरूप धर्मिका ग्राहकजो प्रपंचरचनाकी अन्यथाऽनुपपत्तिरूप तर्कहैतिसकावाधहोगा ॥ क्योंकि यज्ञाननिष्ठएकत्वमानेहुए अनेक प्रकारकेसुखदुःखादिरूपप्रपंचरचनाकीतिसमेंयधटमानताहै । सोयह कथनभीनहीं संभवता ॥ क्योंकिप्रपंचरचना अज्ञानकेएकत्वतथा अनेकत्वकल्पना करनेमेंउदासीनहै । औरएककोयनेकविधकार्यका जनकपनाभीपूर्वदृष्टांतसे सिद्धकराएहैं । यातेधर्मिकेग्राहकअन्यथा ऽनुपपत्तिरूपतर्कका बाधनहीं ।। शंका ॥ अनेकयज्ञानकल्पनाकिये जावें ।। वायनेकशक्तियोंकीकल्पनाहो । इसमेंक्याविलक्षणताहै ।। समाधान ।। धर्मिकीयनेकताकल्पना करनेसेधर्मकोयनेकताकल्पना करनीश्रेष्टहै ।। इसन्यायसेधर्मिका एकत्वकल्पनाकरनेमें लाधवहै । तिसलाघवसहकृत अन्यथाऽनुपपत्ति रूपतर्क विचित्रशक्तिवालेएक श्रज्ञानकोग्रहणकरके विश्रामकोप्राप्तहोताहै। यहकथनहीयुक्तहै।इति। ॐ अथअज्ञानके एकत्वसाधनका फलनिरूपणा शंका।। प्रपंचरचनाजैसेएक अज्ञानसे वनसकतीहै । तैसेअज्ञाननाना पूर्वाद मानेहुएभीवनसकतीथी पुनःअज्ञानकेएकत्व साधनकाकोइर्फलनहीं। समाधान । यद्यपिमिथ्या प्रपंचरचनामें अज्ञानकाएकत्वसिद्धकरना निष्फलहै तथापि वहयज्ञानकाएकत्वजीवके एकत्वकासाधकहै।याते तिसकाएकत्वसिद्धकरनाउचितहीहै। इसीकारणसेएकजीववादी जीव एककहतेहैं ॥ अज्ञानकाएकत्वजीवके एकत्वकासाधककैसेहै ॥ ऐसी श्राकांक्षाके हुएकहतेहैं । श्रज्ञानकोजीव भावकाउपाधिपनाहै यह पूर्वकथनकराएहैं । औरउपाधिकायहलक्षणहै ॥ उपकहियेसमीय स्थितहोकरयन्य पदार्थमें अपने स्वरूपकोजो धारणकरेसो उपाधि कहियेहै । जैसेघटतथादर्पणादि प्रसिद्धयाकाश तथामुखादिकोंका उपाधिहें । तैसेयज्ञानभी चिदात्मामेंअध्यस्त होनेकरसमीपहेयौर चिदात्माकेसमीपस्थित होकर अपनेएकत्व धर्मकोउपहित चिदात्मामें समर्पणकरताहै। यातेउपाधिरूपहै। ताज्ञानउपहितचिदात्माभीजीव भावकोप्राप्त हुया एकहीहोताहै ॥शंका।। एकयज्ञानरूप उपाधिवाला श्रात्माजीवभावकोप्राप्त हुयायनेकरूपक्योंनहो ॥ क्योंकिजिसकारण सेएकहीदर्पणादि रूपउपाधिौमुखस्तंभ पुरुषादिकअनेक रूपप्रतीत होतेहैं । समाधान ॥ हेएकदेशिन उपाधिकएकहुएभी वियोंकेभेदसे प्रतिवियोंकी अनेकता दृष्टांतमेंतोयुक्तहै औरमकरसमेतो किंकानाना पनाहनहीं । तिसीकारणसेउपाधिकएकहुए औरविवकेएकहुएतत्उप हितप्रविभीएकहींहै । ऐसेएकजीववादी कहतेहैं इति ॥ प्रथअज्ञानतथाजीवके एकत्वतथाअनेकत्वकथन करनेवाली श्रुतियोंकी व्यवस्थाकानिरूपण। * शंका ॥ हेवादिन लाघवसेएकही श्रज्ञानस्वीकारकरनेयोग्यहे।

दे०सि० मु० 'T2. यहतुमनेपूर्वकथन कियासोयसंगतहै क्योंकि ॥ -- 89 इन्द्रोमायाभिः पुरुरूपईयते ॥ * इसश्रुतिसेयज्ञानका नानापनापतीतहोताहै । औरप्रमाणवाले गौरखकोयुक्त होनेसेयप्रामाणिक लाघवयकिंचित्करहै । अर्थात्यर्थ : कासाधकनहीं । औरजोपूर्वकहाथा जीवकाएकत्वसिद्धकरनेके अर्थ अज्ञानकाएकत्वसिद्ध करतेहैं । सोयहकथनभीययुक्तहेक्योंकि ।। * रूपंरूपंप्रतिरूपोवभूव । ® (कउ०व० ॥१) श्र०॥उपाधिउपाधिके प्रतिसोयात्मातत्सदृशताकोप्राप्तहुया। इस श्रुतिसेजीवका नानापनाही पूतीतहोताहै ॥ यातअज्ञानएकहै औरजीवएकहै यहकथन श्रुतिसेविरुद्धहै । समाधान।। हेएकदेशिन् असंगतथाउदासीन चिदात्मासेप्रपंचकी रचनायज्ञानसेविनासंभवती नहीं।यहपूर्वकथनकियाहुयालाघवसहकृतयन्यथाऽनुपपत्तिरूपतर्कतिस करसिद्धजोयज्ञानकाएकत्वौरतिसकापूयोजनजीवकाएकत्वइनदोनों अर्थोकेअनुवादकरनेवालीश्रुतिभीविद्यमानहै।ौरयज्ञानकोएकमानेहुये (मायाभिः)इसबहुवचनरूपाश्रुतिकाविरोधभीनहींहोसकता।क्योंकिवह श्रुतिमायागतशक्तियोंके नानापनकोप्रतिपादनकरतीहेयौरशक्तियोंको मायाकाधर्महोनेसेलक्षणावृत्तिकरमायाशब्दवोध्यता तिनकोसंभवतीहै। यदिऐसी व्यवस्थानकातो। *मायांतुप्रकृतिविद्यात् इसश्रतिमेकथनकियेहुये(मायां इसएकवचनकाविरोधहोगा। तिसकारणमेवहुवचनरूपाश्रुतिश्रज्ञानकेनानापनेकोनहींकहती॥ यौर -

x
पूाई.
प्रामाणिकहोनेसेगौरवभीस्वीकारकियाजाताहीयहकथनभीनहींसंभवता
क्योंकिपूर्वउक्तरीतिसे प्रामाणिकपनेकीहीअसिद्धिहै ॥ थोरजोश्रुति
जीवकेनानापनेमेप्रमाणकहीवहभीयसंगतहै।क्योंकिवहमंत्रएकजीव .
केयज्ञानकरकल्पितयनेक प्राणियोंकेभेदपरहै ।। कोईजीवकेनानात्व
परनहीं ।। यदिऐसेनमानोगेतो
* अजोह्येकअनीशयाशोचतिमुह्यमानः *
या एकहीजन्मसेरहितात्माहै ॥ विद्याकरमोहकोप्राप्त
हुयाशोककरताहै।इत्यादिकजीवकाएकत्वकथनकरनेवालेश्रुतिवचनों
काविरोधप्राप्तहोगा । यातेजीवका नानापनानहींसंभवता ॥ इसपूर्व
उक्तअर्थकेअनुवादकरनेवालीश्रुतियवयहांपठनकरतेहैं ।
अजामेकालोहितशुक्लकृष्णवह्वीःप्रजाःसृजमानां
सरूपाः ।।अजोहकोजुपमाणोऽनुशेतेजहात्येनांभुक्त
भोगामजोऽन्यः ॥श्वे० उ० भ० (४) में० (५)
मत्तमला० ॥ एकथविद्याजन्मोंरहितालालश्वेततमरूपीहै।।
अनिकमजाकोजनतीसोईजोयपनेसमरूपीहै ॥ एकयजातमविदहै
जोई तहिसैवतयनुसोताहै ! ऐसअविद्याभुक्तभोगकोअन्ययजो
तजदेताहै॥१॥ इसश्रुतिरूपमंत्रकायहयर्थहै ।यहांप्रथममंत्रकेद्वितीय
पादकोथर्थसेव्याख्यानकरतेहुये (थजां) इसपदकरके निवारणकरने
योग्यग्रंशकोकथनकरतेहैं ॥ मिथ्याभूतजगत्कोअविद्याहेतुककथन
करनायोग्यहै ॥ ऐसेद्वितीयपादकेयनुसारमाप्तहुये यहसंशयहोताहैं।।
वहयविद्याजन्यहैयथवाथजन्यहै ॥ समाधान। वयविद्या(यां)
..

७६ वे०स० कहियेजन्मरहितहै ॥शंका । इसमंत्रमे विद्याकेवाचकपदकाअभाव होनेसेयहमंत्रयविद्याकोहीवोधननहींकरसकतातोतिसकाएकत्वकिस कारणसेहोगा ॥ औरयविद्या उपहितजीवकाएकत्व तोयतिदूरहै ।। समाधान ।। अविद्यावाचकपद कायभावनहीं ।। क्योंकिस्त्रीलिंग रूपताकरनिर्देशकियाहुयाजो (यजां) यहपदहै तिसीको अविद्याकी वाचकताहै। औरतिसयविद्यामे अनेकतानहीं किन्तु (एकां) कहिये वहएकहै ।। यहांयहभीजानलेना।। अनिर्वचनीयरूपतासे जगत्यौर अविद्यादोनोंसामनहें। अबतिसयविद्याकोविचित्रकार्यकेउत्पन्नकरने कीसामर्थ्यत्रिगुणात्मकरूपतासेकथनकरतेहैं ॥ (लोहितशुक्लकृष्णां) कहियेरजोगुणसतोगुण तमोगुणरूपवयविद्याहै ।। यातेविचित्रकार्य केउत्पन्नकरनेमेवहसमर्थहै ॥ तिसत्रिगुणात्मकतथा जन्मसेरहितौर एकथविद्याउपाधिवालाजीवभीउत्पतिसेरहितहै | यहकहतेहैं (यजः) कहियेयवियोऽपहितजीवजन्मरहितहै ॥ यौखहजीवनानानहीं किन्तु "एकः" कहियेएकहै ॥ शंका ॥ जीवगतनानापनालोकमेअनुभव सिद्धहै ॥ तिसकाएकत्वतुमकैसेकहतेहो । समाधान ।। कएकोदेवःसर्वभूतेषुगूढः ॥ श्वे० उ० अ० ६।११ * * नान्योतोऽस्तिद्रप्टानान्योतोऽस्तिश्रोता ॥ १० ज० १०५ ग्रा० ७० २३ * एकएवहिभूतात्माभूतभूतेव्यवस्थितः ॥ स्मृ० थ०॥ एकहीस्वप्रकाशचिदात्मासर्वभूतोंमेयविद्याकरयावृत्त होरहाहे ॥ औरइसथात्मासे भिन्नयौरकोईदृष्टानहीं । औरनइससे भिन्नौरकोईश्रोताहै। औरएकही सर्वभूतोंका यात्माहरएकशरीरमे - पूर्वाद अवस्थितहै । इसस्मृतिसहित उपनिषद्मजीवका एकत्वप्रसिद्धहै ।। औरउपाधितथाविंचकाजोएकत्वहैसोप्रतिविवकेएकत्वकानियामकहै ।। इत्यादिकयुक्तिकरभी एकत्वप्रसिद्धहै । इतनायर्थ प्रसिद्धियर्थकजो मंत्रमे "हि" यहपदहैतिसने घोधनकिया ।। औरजीवके अनेकत्वका अनुभवतोजीवके अज्ञानकरकल्पितयनेकपाणियोंकेभेदकोविषयकरता है। कोईजीवकेभेदकोनहीं ॥शंका।। स्वयंप्रकाशब्रह्मसेयभिन्नजोजीव है तिसकोविलक्षणविक्षेपयुक्त अवस्थाकैसेप्राप्तहुयी ॥ समाधान ॥ पूर्वकथनकियेहुयेलक्षणयुक्ततिसयविद्याकोयाश्रयणकरकेनिद्रावाले पुरुषकीन्याईशयनकरताहै ॥ अर्थात्यज्ञानसेयावृत्तहुयाज्ञाननेत्रको निमीलनकरलेताहै ॥ पश्चात्कार्याकाररूपतासेस्थिततिसथयिद्याको ही (जुषमाणः) कहियेसेवनकरताहुयास्वप्नद्रष्टापुरुषवत् नानाप्रकारके विक्षेपयुक्तजाग्रतादिरूपसंसारकोअनुभवकरताहे ॥ शंका ॥थविद्या कोयनादिरूपतासेयविनाशिपनाह।यद्यपियहांमागभावमेथतिव्याप्ति दोपनिवारणकेअर्थअनादिकेसाथभावरूपताभीकहीचाहिये।। तथापि सत्कार्यवादीकेमतमेप्रागभावकेयनंगीकारसेभावरूपताकहनेकीयाव- श्यकतानहीं।इसप्रकारयविद्याकोअविनाशिताहोनेसेमोक्षकायभाव प्रसंगहोगा ।। समाधान ॥ तत्त्वमस्यादि महावाक्यसे उत्पन्नहुयाजो प्रात्मतत्त्वका साक्षात्कारतिसकर (जहात्येनां) कहियेइसथविधाको निवृतकरताहै ।। अविद्यामेयनादित्वकल्पितहोनेसेतत्त्वज्ञानसेनिवृति कायसंभवनहीं ॥ शंका । यदियविद्या त्यागनेयोग्यअर्थातनिवृत्त करनेयोग्यहेतोतिसयविद्याकोयात्मा किसलिये याश्रयणकरताहे ।। समाधान || भोगके निमित अविद्याका याश्रयण यात्मा करता ७८ ० है। क्योंकिभोगको तिसअविद्याकर जन्यता है | अब स्वस्वरूप के साक्षात्कारसे प्रयोजनसे रहित तिसको मानता हुया त्याग देता है। इसीयर्थको कहतेहैं ॥ (भुक्तभोगां) कहियेभोग लियाहोभोग जिसकरतिसको “भुक्तभोगा" कहतेहैं ॥ तिसभुक्तभोगायविद्याको प्रयोजनरहितजानकरत्यागदेताहै ॥ यहां भुक्तोभोगोयया"इसप्रकार काविग्रहकरनेसे “यया" यहपदतृतीयाविभक्त्यंतहै । औरकर्तातथा करणमेतृतीयाविभक्तिहोतीहै ।। यहांयदितृतीयाविभक्तिकर्ता अर्थमे मानेतो अविद्या निष्ठचेतनता होगी । और अविया में चेतनता है नहीं किंतु जडता है। याते कर्ता अर्थ मे तृतीया नहीं किन्तु साधनमे तृतीया जाननेयोग्य है । इसीकारण से भोग कासाधन होनेकरयविद्याकोभोक्तत्वका अभावहोनेसेचेतनताका असंभवहै । शंका ।। यज्ञोजंतुः ॥ " इसप्रतीतिसे अज्ञान विशिष्टमे जीवपना प्रसिद्धहै ॥ याते अविद्याको जीवके स्वरूपमेप्रविष्ठ होनेकर ॥ तिस थविद्याकोत्यागदेता है । वहकथनकैसेवनेगा। क्योंकियपनेस्वरूप कात्यागनायसंभवहै ।।समाधान ।। ग्रजोऽन्यः कहियेवहजन्मरहित जीवयविद्यासेभिन्न है । कोईअविद्याकोयंतर्भावकरकेजीवपनानहीं। क्योंकियविद्याजडहे औरजीवचेतनहे । दोनोंएकरूपनहींहोसकते।। शंका ॥ विद्याकोजीवभावका अधिकरण मानेहुयेचेतनताकीमाप्ति अर्थसेतुमनेकथनकीमोग्रयुक्त है ॥क्योंकिविशिष्टवृतिधर्भकोविशेषण मेवर्तनेका नियमनहीं ।। यदिऐसेनमानेतो "रक्तघटमानय" यहांपर भीरतरूपयोघटत्वजातिकाथानयनप्रसंग होगा।क्योंकिवहदोनोंघटक विशेषणहैं । उभयविशिष्टघटमेवरतनेवालीयानयनक्रियातिनदोनोंमे पूवाई . . प्राप्तहोगी ।। सोऐसा देखनेमे नहींयाता से अज्ञानको जीवका विशेपणमानेहुयेभीचेतनताकीप्राप्तिकाकथनयुक्तहैं। समाधान ।। यदितुमकोपूर्वकथनमेतोपनहीं तोऔरहेतुश्रवणकरो, अज्ञानजीव भावकाउपाधिरूपहमकोस्वीकारहै । इसीकारणसेअविद्यानिष्टचेतनता कीप्राप्तिनहींसंभवती।क्योंकिउपाधिवस्तुकेस्वरूपसेवहिरभृतहोताहै ॥ यातेतिसकात्यागभीवनसकताहै ॥ इति ॥ * अथएकजीववादमें वमुक्तादिव्य वस्थाका प्रकारनिरूपण ॥ पूर्वयहकथनकिया प्रपंचरचनाका साधकयविद्याहै औरवह लाघवसेएकहै । तसी अविद्यारूप उपाधिवाला यात्माजीवभावको प्राप्तहुयाएकहीहोताहै ॥ इति ॥ श्रवतिसएकजीववादमें बंधमोक्षा दिव्यवस्थाके उपपादनअर्थजिज्ञासाको पूगटकरतेहैं । मू॥बंधमोक्षव्यवस्थास्याज्जीवाऽभेदेकथंतव। यथादृष्टंतथैवाऽस्तुदृष्टत्वात स्वप्नदृष्टवत् ।। सारंगी । बंधोमोक्षोयेव्यावस्थाजीवा ऽभेदकैसेजी । तोने मानीजैसेहेसोमोकोभापोतैसेजी।। जैसेदेखी तैसेईसोयामेकायानीती है । स्वप्नेनाईजागेमाही देखोयाकीरीतिहै ॥ १०॥ टी० । शंका ।। हेसिद्धांतिन तेरेमतमेंएकहीजीवमानेहुये तत्त्वज्ञानसे प्रथम “वद्धहै" इसप्रकारकाही व्यवहारहोगा | औरतत्त्वज्ञानसेयनं तरव्यवहारकर्ताकाही अभावहोनेसे मुक्तव्यवहारनहींहोगा ॥ और इदानीकालमेंबद्ध तथामुक्तयहदोनों व्यवहारदेखेजातेहैं । इसकारण सेएकजीवादमपूर्वउक्त दोनोव्यवहारोंकी अनुपपत्तिहै । समाधान ॥

० स० मु. हेवादिन जैसेनानाजीववादमेंकोईवद्धहै कोईमुक्तहैइसप्रकारकेव्यव हारकाविषयभूतजगत् देखाहैतैसेएकजीववादमेंभीवद्धमुक्तव्यवस्था बालाजगत् विद्यमानहै ।। यद्यपिएकजीववादमें बंधमोक्षादिव्यवस्था कीअनुपपत्ति पूर्वकथनकीहै । तथापिवहअनुपपत्तिनहींसंभवती । क्योंकिदृष्टयर्थमें अनुपपत्तिकाअभावहै । अर्थात् एकजीववादमेंभी चिदात्माके अज्ञानकरकलित बद्धमुक्तादिव्यवस्थाकासंसारमेंदर्शन बनसकताहै यातेअनुपपत्तिनहीं ॥शंका॥ अविद्याकरकल्पितपदार्थ कोधितहोनेसे व्यवहारकी साधकतानहींसंभवती । समाधान ।। हेवादिन यविद्यासेकल्पितपदार्थको अविद्याकालमेंञ्यवहारकासाधक पनानहींयथवायविद्याके वाधकालमेतिसको व्यवहारकासाधकपना नहीं।। प्रथमपक्षमतोकोईअनुपपतिनहीं। क्योंकिजैसे स्वममेंस्वमद्रष्टा पुरुषकीयविद्याकरकल्पित अनेकगजतुरंगादिक पदार्थोंकोअपनेव्यव हारकासाधकपना देखाहै । तैसेजाग्रत्कालमेंभी क्योंनहो । और द्वितीयपक्षमेंथविद्याको बाधितहोनेसे व्यवहारकाअभाव हमकोइष्टही है। यातेएकजीववादमें किंचत्भीदोपनहीं ॥ इति ॥ अवकारिकाके पूर्वार्धकाविस्तारसे व्याख्यानकरतेहैं । शंका ।। यदिएकहीजीवहतो एकपुरुपबद्धहेऔर एकमुक्तहै । यह व्यवस्थाकै सेवनेगी ॥ औरयदि सिद्धांतीऐसेकह।एकजीववादमेव्यवस्थाकीकियायनुपपत्तिहेक्यिोंकि दैतयनुभवसिद्धहै। औरदृष्टयर्थमकोई अनुपपत्तिनहींसंभवती सोयह कथनभीयसमीचीनह।क्योंकिस्वरूपलाभवालायनुभवयनुपपत्तिको परिहारकरताहे यहतोसत्यहै ॥ परंतुएकजीववादमतो अनुभवका स्वरूपहीनहींसिद्धहोसकता वहअनुपपत्तिकोकेसे दूरकरेगा ।। अनु, ܪ पुवाद भवकेयभावमें यहकारणहे । एकवामदेवसंज्ञक पुरुषजोश्रवणादि साधनसंपन्न है तिसकोतत्त्वमत्यादि महावाक्यसे तत्त्वसाक्षात्कारहोकर सर्वसंसारकेउपादानकारणरूप विद्याकीनिवृत्तिख्य मुक्तिहोतीहै । तिससेंद्रेतगोचर अनुभवकाकरण अंतःकरणयौ इंद्रियादिकतथावद्ध मुक्तादिविषयरूप संसारकाअभावहोनेसे थनुभवकोस्वरूपलाभकाही अभावहैतोवह अनुपपत्तिकोकैसे परिहारकरेगा। समाधान ।। हेवा दिन्वामदेवशब्दसे शरीराज्वच्छिन्नचैतन्यकहतेहो अथवा अनवच्छिन्न अज्ञानींचैतन्यकहसेहो । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिशरीरा वच्छिन्नकोकल्पित होनेकरबंधमोक्षका अनधिकरणपनाहै । जिस कारणसेयविद्या बालाहीपद्धहोताहै । औरशरीराऽवच्छिन्नयविद्या वालाहैनहीं । क्योंकिवहयविधाकाकार्य होनेकरयवियासेपश्चात भावीहै । यातेशरीराऽवच्छिन्नचैतन्यवद्धनहीं । इसीसेवहमुक्तभी नहींकहाजाता क्योंकिबद्धकोही मुक्तहुयाकहतेहैं । औरयज्ञानो पाधिकज्ञानीचैतन्यवामदेव शब्दकार्थहै । इसद्वितीयपक्षमेसो अज्ञाननिवृत्तनहींहुया ।क्योंकि “मैयज्ञानीहूं" इसअनुभवसेवह अज्ञानयवभीपूतीत होरहाहै । यातेअज्ञान कीनिवृत्तिकायभावहोने सेयज्ञानकर कल्पित नानापूकारकेकरण समुदायका अज्ञानपर्यंत सद्धावहोनेकर दैतकाअनुभवबनसकताहै । यहांयहअर्थजानना । थनुभयनहीं संभवता यहजोवादीने कहाथा इसमेंहम यहपछतेहैं। क्याकरणकेयभावसे यनुभवकायभावहे वा विपयकेयभावसेतिसकी श्रनुपपत्तिहे । पूथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकियंतःकरणौवाह्य इंदियतथाअनुमान थौरशब्दादिक यहअनुभक्केकरण यथायोग्य वे०सि० स्वीकारहैं.॥ शंका ॥ तिनकेस्वीकार करनेसे देतकीपाप्तिहोगी। समाधान ॥ वहसकलकरणअविद्याकेकार्य होनेकरमिथ्यात् ।। याते दैतकेसाधकनहीं । औरद्वितीयपक्षमेंभीयह विचारकरनेयोग्यहै ।। जिसविषयसेविनायनुभवकी अनुपपत्तिकथनकी । सोविपयक्या? अनुभवकेस्वरूपकाउपयोगीहै । यथवा तिस अनुभवकेमात्वकाउप योगीहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिविषयके अविद्यमानहुए भीयतीतादिज्ञानदेखने याताहौयौरयदिवादीदितीयपक्षकीयाशंका करे विषयकेयभावसेअनुभवमेप्रामाण्यकीयनुपपतिहै।।यौरयदिकोई ऐसेकहेविषयौअनुभवकेवीच प्रामारायसेक्यापूयोजनहै.यपनेकरण सेउत्पन्नहुयायनुभवबद्धमुक्तादिकव्यवस्थाकीयनुपपतिकापरिहारकर देगा। सोयहकथनभी नहींसंभवता । क्योंकिपामारायके असंभवसे अनुभवकार्यमे असमर्थहोगा। भावयहएकजीववादमे बद्धमुक्तादिक व्यवस्थाकी यनुपपतिदूरकरनेमे समर्थनहींहोगा।इसप्रकारप्रामाण्यकी अनुपपतिसेयनुभवकी अनुपपचिरूप द्वितीयपक्ष मेवादीने यहकहा चाहिये। कियपनेप्रामाण्यकेयर्थअनुभवकोकैसाविषययपेक्षितहै।क्या? अर्थक्रियामेसमर्थविषयहोवापरमार्थसत्यविषयहो। प्रथमपक्षकहोतोऐसा विषयविधमानहीहैतिसव्यवहारकेयोग्यविषयकेसद्भावहुयेअनुभवकेवल सेएकजीववादमेव्यवस्थाकासंभवहै ।।शंका।। मिथ्यायर्थप्रामारायका संपादकनहीं अन्यथाभ्रमज्ञानमेभी प्रमात्वहोगा इसलियेपरमार्थसत्य विषयहीप्रमाग्यकाप्रयोजक माननेयोग्यहै।औरथविद्याकर कल्पितबद्ध मुक्तादिकपदार्थोंकोपरमार्थपनेकायभावहोनेसे स्वगोचरयनुभवनिष्ठ प्रामाण्यकाउपयादकपना तिनकोनहींसंभवता ॥ इमप्रकारप्रपंचकी पृवाद सत्यतामानेहुयेजीवोंके यनेकपनेकी सत्यतामेतोक्याहीकहनेयोग्यहै यहभावहै । समाधान ॥ हेवादिन्यदिपरमार्थसत्यविषयहैयहद्वितीय पक्षतुममानोगे।तोयहऐसेकिसप्रकारवनेगा ।। अर्थात्वद्धमुक्तादिभेद विशिष्टपूपंचसत्यकैसेहोगा । क्योंकिएपंचसत्यनहीं किन्तुमिथ्याहै। औरभेदविशिष्टयूपंचसत्यहीक्योंनहोऐसेयदितुमकहोतोतिसमेयहकथन कियाचाहिये ॥ अथवेदकेतात्पर्यकाएकअर्हतमेनिर्धार क्या? पद्धतकेग्राहकपमाणकायभावहोनेसेभेदकोतुमसत्यकहते हो। अथवा भेदके मिथ्यापनेकाग्राहककोई प्रमाणनहींयातेभेदकोसत्यकहते हो। पूथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकियदेतहीवेदकेतात्पर्यकाविषयहै। थर्थ यहतात्पर्यअर्थकेग्राहकउपक्रमादिषदलिंगोंकेसहित तत्त्वमस्यादि महावाक्यरूपवेद त्रिविधपरिछेदसेरहित वस्तुकोवास्तवरूपतासेवोधन करताहै।तिसकारणसेभेदपरमार्थसेसत्यनहींहोसकता।।ौरमहावाक्यों कोदेसमात्रबोधनमेयहहेतुभीहै।जिसकारणसेअध्ययनविधिफलवाले यर्थकेवोधवास्तेवेदवाक्योंके अध्ययनकीकर्तव्यताबोधन करताहै। और दैतसाक्षात्कारहीफलवालाहै क्योंकि ॥ तरतिशोकमात्मवित् ३० ई० अ० ७ खं० १।१* थ०॥ यात्मसाक्षात्कारवालापुरुप शोकउपलक्षित थज्ञान तत्कार्यकोबाधकरताहे ।। ऐसेश्रुतिनेकहाहै ।। यातेथदेतकेप्रतिपादन मेहीफलकासंबंधहै अन्ययर्थपूतिपादनमेनहीं। इसकारणसेयदेत हीवेदकेतात्पर्यकाविषयहैयहयर्थसिद्धहुया ॥ इति ॥ अवदितीयपक्ष कोपितकरतेहैं । औरहेवादिन्सर्वभेदका मिथ्यापनाभीप्रसिद्ध है ।।

देसि मु. क्योंकिप्रसिद्धजगतकायधिष्ठानजोब्रह्महैतिसमे "नेतिनेति इसवाक्य सेभेदवशिष्टसर्वजगतकानिषेधप्रतीतहोताहैवातेद्वितीयपक्षभीयसंगत है ॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिवेदकायदैतमेहीतात्पर्य हैयहअापकाकथन नहींसंभवता।क्योंकिवेदमेहीवामदेवादिकपाचीनपुरुषोंकोज्ञानभीसुना जाताहै॥ तडेतत्पश्यन्नृपिर्वामदेव प्रतिपदे । ६०उ०अ० १ मा०४।१० यहश्रुतिवामदेवज्ञानसेमुक्तहुयाइसथकोप्रतिपादनकरतीहुई भेदकोभीविषयकरतीहै । तिससेयदैतही अतिकाविषयहै यहकथन कैसेवनसकताहै। औरयहां (वामदेवादिक) इसयादिपदसे।। योयोदेवानांप्रत्यबुध्यतसएक्तदभवत्। वृ० उ० अ० ३॥ मा०४९० २०॥ जोजोदेवतायोंकेमध्यमेब्रह्मबोधवालाहुयावहीब्रह्म रूपहुया । इत्यादिश्रुतिमेप्रसिद्धयदेत सानात्कारवाले देवतामनुष्य तथायसुरोंकाग्रहणहै यहजानना ॥ इति ॥ औस्यदिसिद्धांतीयथा श्रुतअर्थको अंगीकारकरे तोजीवोंका भेदवलात्कारसे सिद्धहुया ॥ समाधान ॥ हेवादिनतिसमे यहकथन करनेयोग्यहै।। क्या?यहश्रुति वाक्य साक्षात्मेदको प्रतिपादन करताहै ।। अथवा “एतत्” कहिये श्रात्माको “तत्" कहिये ब्रह्मरूपदेखताहुयाअर्थात् “मैंब्रह्महूं" इस प्रकारसाक्षात्कारकरताहुया महीमनुहुयाहीसूर्यहुया ऐसेसर्वात्मभाव कीप्राप्तिकप्रतिपादकमंत्रोंकीदेखताभया॥यहश्रवणकियाजोयर्थतिस कीअनुपपत्तिसे जीवभेदकल्पना कियाजाताहै।इनमेप्रथमपक्षतोनहीं ५ पूर्वाद संभवता।क्योंकितिसवाक्यकोजीवकेभेदकीप्रतिपादकतानहींहै ।इस मेयहहेतुहै।किएकतोवामदेववाक्यमभेद कोकिसीपदकार्थनहोनेसे वाक्यार्थपनानहीं।ौदूसरातिसवाक्यकोभेदाकारज्ञानकाजनकपनाभी नहीं॥शंका वामदेवकर्तृकज्ञानसेवामदेवसर्वात्मभावकीप्राप्तिवालाहुया यहजोश्रवणकियायथैवहतववनसक्ताहै यदिवामदेवपदकावाच्यकोई मुक्तजीवमुझवद्धमुमुक्षुसेभिन्नहो।इसप्रकारजीवोंकेभेदसेविनावामदेव कोसर्वात्मभावकी प्राप्तिके अनुपपद्यमानहोनेसेश्रुतयर्थकी अनुपपत्ति जीवोंकेभेदका ज्ञापकहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन यहद्वितीयपक्षभी नहींसंभवता। जिसकारणसेकल्पनापुरुषबुद्धिमूलकहोतीहै।वहविरोधा अधिकरणन्यायसेनिश्चितयर्थवाली श्रुतिकर वाघ होजाती है ॥ पूर्व मीमांसाकेपथमाऽध्यायगततृतीयपादकेतृतीयसूत्रमेश्रुतितथास्मृतिका .एकविषयमेपरस्परविरोधहुऐप्रत्यक्षश्रुतिसे स्मृतिकावाधनिर्णयकियाहे तिसकोविरोधाधिकरणन्यायकहतेहैंतिसमेयहरीतिकथनकीहै ॥ * औलुवरीवेष्टनीयासर्वा * य०॥ यागमेंउदुंबरवृक्षाशाखासर्वहीवेष्टनकरके सामगाय नकरेयहस्मृतिप्रमाणहैथवाायपूमाणहै । इसपूकारसंशयकेहुएपूर्वपक्ष प्राप्तहुभाकियष्टकादिस्मृतिकीन्याईयहस्मृतिभीपूमाणरूपहै । सिद्धांत। औदुवरी स्पृशन्गायेत् * अ० । उदुंबरकीशाखाकोहस्तसे स्पर्शकरताहुयागायनकरे ॥ इसप्रत्यक्ष श्रुतिकाविरोधहोनेसे तिसस्मृतिक मूलवेदकाअनुमाननहो नेकरमूलकेअभावसे तिसकोअपमाणताहे ॥ अथवा ॥ प्रत्यक्षी . वै०सि०म० अनुमितदोनों श्रुतियोंकापरस्परविरोधदेखनेसेदोनोंको यप्रमाणताकी शंकाप्राप्तहुई ॥ तिसीकारणसेयहांपरयनुमानका बाधनिरूपणकिया है। औरयदिवेष्टनस्मृतिका मूलपरप्रत्यक्षवेदहे ऐसेकहोतोनिःसंदेह वहमलहो।परंतुऐसे मानेहुएभीयपनेको प्रत्यक्षवेदकेयनुसारहीअनु- छानकरनेयोग्यहे।यातेप्रत्यक्षश्रतिसेयनुमितश्रतिमूलकस्मृतिका तथा ;. 'परपूत्यनवेदमूलकस्मृतिका वाधयवश्यहोताहै । तिसीरीतिसे । 8 अजोहक एकोदेवः सर्वभूतांतरात्मा * इत्यादिनिश्चित अर्थवालेतथा जीवकेएकत्वप्रतिपादक श्रति वचनोंकाविरोध होनेकरपुरुषबुद्धिमूलककल्पनाकी अनुपपत्तिहै । शंका ॥ जीवकेएकत्वप्रतिपादकवाक्योंको निश्चितार्थपना युक्त नहीं।क्योंकिएकजीववादमें एकजीवकीमुक्तिसे सर्वमुक्तहुएचाहिये इस तर्ककाविरोधहे । समाधान । हेवादिन् यहतयाभासरूपहै । क्योंकिएकत्ववादीके प्रतिसर्वत्वका निरूपणहीयशक्यहे । और यदिऐसेकहो।कितर्कके साथविरोधकाअभावहुएभी अनुभवकाविरोध तोयवश्यहोगा क्योंकिजीवोंकानानात्वसर्वके अनुभवसिद्धहे । सो यहकथनभीग्रयुक्तहै।क्योंकितिसअनुभवकोचेतनकेयज्ञानकरकल्पित देहोंकेभेदविषयक होनेकरभ्रमरूपताहोनेसेतिसकर श्रुतिकावाधयुक्त नहींहै । यातेस्वपकीन्याईसर्वव्यवस्थाकासंभवहै । इति ॥ अथपूर्वपक्षीकी रीतिसे अधिकारिकेअभाव से मोक्षकाअभाव निरूपण अवसिद्धांतीके अभिप्रायको नजानताहुयावादी कारिकामें पूर्वाद कथनकियेहुएदृष्टांतदाटीतभागको व्याख्यान करताहुया सिद्धांती केयनिष्टकी अाशंकाकरताहै ।। शंका ।। हेसिद्धांतिन जैसेस्वप्नमेंएक हीस्वमद्रष्टापरमार्थसत्यहै। अन्यसर्वपदार्थ तिसकेभ्रमकरकल्पितहैं । इसीरीतिसेजाग्रतमेंभी एकहीद्रष्टापरमार्थसत्यह।यौरसर्वद्रष्टातिसकेभ्रम 'करकल्पितहें । तैसेअंगीकारकियेहुए बहुतद्रष्टावोंकेमध्यकौनवहपर मार्थद्रष्टाहै । इसपूकारके निश्चयकायभावहुए श्रवणादिकसाधनों केयनुष्ठानमें कौनप्रवृत्तहोगा । औरसाधनोंके अनुष्ठानकाअभाव होनेसेमोक्षकाथभाव पूसंगतथामोनप्रतिपादक शास्त्रभीनिष्फल होगा।ौरयादसिद्धांतिऐसीयाशंकाकरोकिरवपदप्टापरमार्थ सत्यहैयह पूतीतिस्वमकालमेंहोतीहै।वा स्वानिवृत्तिकेउत्तरकालमेंहोतीहै । प्रथम पक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिस्वमकीन्याईजाग्रतमभी परमार्थदृष्टा कानिश्चयहोजाएगा नवयनिश्चयके अभावसेश्रवणादिकोंमेंप्रवृत्ति क्यानहोगी। ौरसाधनोंकेयनुष्ठानसे मुक्तितथातिसकेप्रतिपादक शास्त्रकीसफलताभी अवश्यहोगी। यौरदितीयपक्षभीयसंगतहै ॥ क्योंकिस्वानिवृत्तिके उत्तरकालमेंजैसेयह प्रतीतितुमनेमानीहैतिसे जाग्रत् निवृत्तिकेउत्तर कालमेंहीइसमतीतिनेहोनायोग्यहै । औरवह संभवतीनहीं । तैसेहीदिखलातेहैं।। जाग्रनिवृत्तिकाउत्तरकालक्या? स्वमकालहै ॥ अथवा सुपुप्तिकालहै । चामुक्तिकालहै। प्रथमपक्षतो नहींसंभवता। क्योंकिस्वानिवृत्तिके उत्तरकालमेंही तुमनेऐसीप्रतीति कीउत्पत्तिमानीहै । औरद्वितीयपक्षभी असमीचीनहे । क्योंकि सुषुप्तिमें विशेषज्ञानका अभावहै थन्यथासुपप्तिकाही प्रभाव होगा । औरइसीकारणसेतृतीयपक्षभी नहींसंभवता! औरमोक्षकालमेंप्रमाता A. व०सि० केअभावसेभी तृतीयपक्षयसंगतहै । यातेपूर्वकथनकी हुईवादीकी शंकानहींसंभवती । सोयहसिद्धांतीकाकथनभी प्रयुक्तहै । क्योंकि हमारेकरकथनकियेहुए यर्थकाहीतुमको ज्ञाननहींहुया । मैंपरमार्थ सत्यहूंतथा अन्यसर्वमेरेभ्रमकरके कल्पित इसपूकारस्वप्न द्रष्टाजानता है।यदिऐसेहमकहतातोपूर्वउक्ततुम्हारेविकल्पोंकायवकाशहोताासोऐसे तोहमनहींकहते किन्तुस्वप्नकेपदाथाको स्वप्नद्रप्टापुरुपकीयविद्याका परिणामहोनेसे तिसस्वप्नप्रपंचके उत्पन्नकरनेवाली अविद्याकीअधिष्ठा नतास्वप्नद्रष्टाकोहै । इसीसे वहपरमार्थसत्यहै ॥ यहवार्तायुक्तिसे निश्चयहोतीहै ॥ तिसदृष्टांतसे इसजाग्रत्यवस्थामभैद्रिष्टाके परमार्थ सत्यताकीसंभावनाकेहुए नानादष्टावोंकेमध्यमें किसदृष्टाकीयविद्याका परिणामयहजगतहे ।। इसप्रकारकासंशययवश्यहोताहै ॥ क्योंकि निश्चयका कारणकोई पूतीत नहीं होता याते पूर्वउक्त शंका युक्त है ।। इति ॥ समाधान ।। #अथस्वप्नदृष्टांतमें द्रष्टाकेएकत्वकाप्रतिपादन * हेवादिनजाग्रत्यवस्थामें यनेकद्रप्टावोंकेनिरूपणकायभावहोने सेसंशयकेयसंभवहुएश्रवणादिकसाधनोंके अनुष्ठानमें प्रवृत्तिहोजायेगी तिसकारणसे ग्रनिर्मोक्षप्रसंगनहींहोसक्ता।।यातेनिश्चयकरदे हात्मवादको 'याश्रयणकरकेतूभ्रांतिको प्राप्तहूयाहैकिसमकारमभ्रांतिकोमाप्तहूयाहूं यदि ऐसेकहेंतोश्रवणकरास्वमकालमेंस्वप्नद्रप्टासेभिन्न यौरजीवकल्पितहैंइसका क्याअर्थहैक्या?देवगंधर्वादिसंज्ञकरारीरकल्पितहैंयथवा। हमकोयभिमत जोअज्ञानउपाधिकजीवहैवहयज्ञानउपाधिकही बहुतअनुभूतहोतेहैं तिन .

पूर्वाई 2 अज्ञानोपाधिकअनुभूतोंकेमध्यमेंएकसत्यहेऔर अन्यसर्वकल्पित,यह तुमकहतेहो।यद्यपितिनयनुभूतोंकेमध्यएकसत्यहै औरयन्यसर्वकल्पित हैंयहकथननहींसंभवता। क्योंकियनुभवके विषयकोयनुभूतकहतेहैं तिसकोनियमसेदृश्यरूपताहोनेकरशुक्तिरजतकीन्याईमिथ्यापनाहै ।। अनुभविताकोहीसत्यपनायुक्तहै ॥ यातेद्वितीयविकल्प असंगतहे ।। तथापितिनसर्व अज्ञानउपहितोंनिष्ठअनुभवितापनाभीविद्यमानहै। इस कारणसेलाघवताकरक्या?एकही परमार्थसेयनुभविताहैयन्यज्ञानी अनुभविताभीहैं । परन्तुकल्पितहैं यहविकल्पबनसकताहै ॥ इति ।। इसरीतिसेविकल्पकीसंभावनाकरकेयवइनदोनों विकलों मेप्रथमविकल्प कोदूषितकरतेहैं ॥ प्रथमपक्षनहींसंभवता ॥ क्योंकिदेवादिशरीरोंको कल्पितहुएभीद्रष्टापनेकायभावहोनेकरयनेकद्रष्टावोंकीकल्पनासेसंशय केप्राप्तहुएथनिर्मोक्षकीमाप्तिलक्षणविरोधकाथभावहै ।। शंका ॥ देह कोयथवादेहावच्छिन्नचेतनकोद्रष्टापनाकल्पितहोनेसेयनेकदष्टावोंकी कल्पनाकैसेनहींसंभवती।यौरसंशयकेप्राप्तहुए अनिर्मोक्षप्रसंगलक्षण विरोधकैसेनहींप्राप्तहोगाकिन्तुयवश्यहोगा ।। समाधान || हेवादिन् देहकोअथवा देहान्छिन्नकोहमश्रवणादिकोंमे अधिकारीनहींकहते जिसकरविनगमनाविरहरूपदोपहो। यर्थयहाजोदप्टाहोताहेवहीश्रवणा दिकोंमेअधिकारीहोताहैयौरयज्ञानका याश्रयहीद्रष्टाहोताहै ॥ देह अथवा देहान्छिन्न अज्ञानका याश्रयनहीं ।। क्योंकितिनदोनोंको अज्ञानकाकार्यहोनेसे अज्ञानके याश्रयपनकी अनुपपत्तिहै ॥ तिसी कारणसेदेहादिकोंकोकल्पित हुएभीकौनपरमार्थ सत्यश्रवणादिकोंमे' अधिकारीहे।इसमकारएकअर्थकेनिश्चायकयुक्तिकाअभावहोनेसेश्रव- ०सि० मु० णादिकोंमेप्रवृतिकेयभावहुएयनिर्मोक्षप्रसंगलक्षणविरोधनहींहै। और स्वप्नमयज्ञानउपहितजीवोंकाभेदयनुभवहोताहेयहदितीयपक्षभीनहीं संभवता क्योंकियज्ञानउपहितजीवोंकाभेदस्वप्नमेयनुभवनहींहोता यद्यपि “मैंयज्ञानीहूं" इसप्रकारयज्ञानउपहितस्वप्नद्रष्टायपनेस्वरूप कोतोअनुभवकरताहीहै । तथापिजीवोंकाभेद अनुभवनहींहोता ।। क्योंकियज्ञानउपहितजीवकामेद प्रत्यनप्रमाण ग्रहणकरताहै अथवा अनुमानग्रहणकरताहै ।। मथमपक्षमेभीयहविचारकियांचाहिये जिस अज्ञानकरउपहितजीवकेभेदकोप्रत्यक्ष ग्रहणकरताहै ॥ वहश्रज्ञान क्या?एकहीयनेकजीवकाउपाधिहैयथवाजीवजीवप्रतियज्ञानभिन्न है प्रथमपक्षतोनहींसंभवता क्योंकिउपाधिकएकहुएतथा विवकेएकहुए प्रतिवियकाभेददेखनेमेनहींयाता ॥ यहपूर्वनिरूपणकरयाएहैं।। और द्वितीयपक्षभी नहींसंभवता ।। क्योंकिजैसे थपनेसेभिन्न दूसरेपुरुषका ज्ञानप्रत्यक्षनहींहोता तैसेदूसरेपुरुषकंग्रज्ञानकोभीयतींद्रियहोनेसेतिस अज्ञानउपहितकोयन्यपुरुषप्रत्यनकरनेकोममर्थनहींहोसक्ता शंका।। यद्यपिप्रत्यक्षप्रमाणस्वप्नकालमेजीवके भेदकोनहीं ग्रहणकरसक्ता ।। तथापितिसतिमदेहकीचेष्टाकरवहजीवकाभेदयनुमानकियाजाताहै। तिसकीयहरीतिहै । शरीरयोतिसकेहस्तपादादिकयवयवोंमेसमवाय संबंधसेरहनेवालीयोरधर्माधर्महनिमित्त जिसमेऐमीकोई विगेपक्रिया चेष्टानामसेकहीजातीहै । वहचेप्टादहकभेटसेभिन्नहीप्रीतहोतीहै।। तिसचेष्टाकेउरादानभूतदेहयोतिमफेयवयवोंमे ममवायसंबंधसेरहता हुयाजोप्रयत्नवालेयात्माकासंयोगवहउमवंशकायममवायिकारणहै पोखहचेष्टाप्रयत्नवत्थात्म मंयोगस्प थममवायिकारणफायनुमान - पूर्वाद करातीहुईस्वसमवायिकारणकाविशेषणरूपताकरयात्माकामीयनु- मानकरावतीहै । तिसअनुमानकायाकारयहहै ।। देवदत्तदेहनिष्टचेष्टाप्रयत्नवदात्मसंयोगाऽ समवायिकारणकाचेष्टात्वात्मन्चेष्टावत श्र० ।। देवदत्तकेशरीरमेजोचेष्टाहै ॥ वहप्रयत्नवालेयात्मा केसंयोगरूपयसमवायिकारणवालीहै ॥ चेष्टारूपहोनेसे जोजोचेष्टा होतीहैसोसोप्रयत्नवदात्मसंयोगरूपयसमवायिकारणवालीहोतीहैजैसे मेरेशरीरनिष्टचेष्टाहै ।।इति।। इसप्रकारवहयात्माप्रतिदेहभिन्नभिन्नहै।। यदिऐसेनमानेतोएकदेहमेचेष्टाकेहुएसर्वहीदेहचेष्टावालहोंगे।क्यों- किचेष्टाकाहेतु यात्मातथा शरीरकासंयोग सर्वत्रविद्यमानहै।। तिसी कारणसेतिसतिसशरीरकायधिष्ठातायात्मा तिसतिस शरीरकीचेष्टासे भिन्नभिन्नथनुमानकियाजाताहै ॥ तिसयनुमानकायाकारयहहै ॥ देवदत्तशरीराऽधिष्ठातात्मायज्ञदत्तात्मनः भिद्यते यज्ञदत्तशरीरानाधिकरणचेष्टासमवायिकारणसंयोगा श्रयत्वात् ॥ यन्नैवतन्त्रवयथायज्ञदत्तात्मा * श्र०॥ देवदत्तकेशरीरकायधिष्ठातायात्मायज्ञदत्तकेयात्मासे भिन्नहै ।।यज्ञदत्तकाशरीरनहीं हैअधिकरणजिसकाऐसीचेप्टाके असम- वायिकारणरूपसंयोगकायाश्रयहोनेसे।जोजोयज्ञदत्तकेयात्मासेभिन्न नहींहै ।। सोसोयज्ञदत्तशरीराऽनधिकरणचेष्टाकेयसमवायिकारणरूप संयोगकायाश्रयभीनहींहै ।। जैसेयज्ञदत्तकायात्माहे ॥ इति ॥ इस प्रकारस्वप्नकालमेजीवकाभेदअनुभवसिद्धहे !! समाधान ।। हेवादिन यहदितीयपक्षभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिपहायहअर्थजाननेयोग्यह।।

तिसतिसशरीरकीचेष्टासेपृथकथात्माकायनुमानजोतुमकरतेहो इसमे कौनकारणहै।क्या?एकदेहमेचेष्टाकेहुएसर्वहीदेहचेष्टाकरेंगेयहथति प्रसंगप्राप्तहोताहै अथवा एकथात्मासेयनेकदेहगतचेष्टानहीवनसकती अथवा अनेकशरीरोंमेएकहीयात्माकोयधिष्ठाता मानेहुएदूसरेशरीरोंमे कियेहुएकार्यकाअनुसंधानप्राप्तहोगा ।इनमेप्रथमपक्षतोनहींसंभवता क्योंकि प्रात्मा का संयोग मात्र तो चेप्या का कारण है नहीं किन्तु प्रयत्नवाले श्रात्माकासंयोगचेष्टाका कारणहै औरप्रयत्नजिसशरीरा बच्छेद कर उत्पन्न हुयाहे तिसी शरीर की चेष्टा का हेतु है ।। याते अतिप्रसंगकैसे प्राप्तहोगा किन्तुनहीं होगा । और तिसतिस शरीरके श्रारंभकधर्मादिनिमित्तकोभी नियामकहोनेसेअतिप्रसंगनहींहोसक्ता। श्रवद्वितीयपक्षको दूपितकरतेहैं। जिसकारणसे तिसतिस शरीरमेवर्तने वालीचेष्टास्व असमवायिकारण यात्मशरीरके संयोगकी अपेक्षा करतीहै ॥ तिससंयोगकाविशेषण प्रात्माएकहो अथवायनेकहो॥ इसमेंवहउदासीनहै ।। तिसीकारणसेइसचेष्टाकर यात्माकेभेदकाअनु माननहींकियाजाता ॥ किंवा । यहांयहअनुमानजानना ।। अनेकशरीरवर्तिन्यश्चेष्टा एकात्मसंयोगा ऽसमवायिन्यः ॥चेष्टात्वात् ॥ एकशरीरमात्र समवेतचेष्टावत् ॥ अ०॥ अनेकशरीरों में वर्तनेवालीजोचेष्टाहै ।। एकात्माके संयोगरूपसमवायिकारणवालीहै ॥ चेष्टारूपहोनेसे ॥ जोजो चेष्टाहोतीहैसोसोएकयात्माकसंयोगरूपयसमवायिकारणवालीहोती है । जैसेएकशरीरमात्रमें समवायसंबंधसे रहनेवालीचेष्टाहै ।। इति ।

-- पूर्वाद ३ औरयदिवादीऐसेकहे ॥ कि ॥ शरीरमात्रंनिष्ट चेष्टात्वरूपउँपाधिइंस धेनुमानविद्यमानहै ॥ क्योंकिजहां जहाएकयात्मसंयोगरूपस मवायिकारणकत्वहै। तहांतहाएकशरीरमात्रनिष्टचेष्टात्वहै जैसएकशरीर मेत्रिसमवेतचेष्टा है। इसपूकारउपाधिसाध्यके साथव्यापकहै। और जहांचेष्टात्व हैतहाएकशरीरमात्रनिष्टचेष्टात्वकाग्रभावहै। जैसेयने- कशरीरसमवेतचेष्टावोंमें है। यातेसाधनकेसाथउपाधिकोयव्यापकताहै इसरीतिसेपूर्वउक्ताहेतुसोपाधिकहोनेसेदुष्टहै। सोयेहवादीकाकथनमी नहींसंभवता ॥ क्योंकियोगीके अनेकशरीरोंकीचेष्टामेंसाध्यकेसाथ यहउपाधियव्यापकहै ।। तहां “एकात्मसंयोगरूपयसमवायिकारण त्वरूपसध्यिके विद्यमानहुएएकशरीरमात्र निष्टचेष्टात्वकायभावहै । यतिपूर्वउक्तहेतुदुष्टनहीं ॥ इसप्रकारएकही यात्मासे अनेकदेहंगत चेष्टांसंभवमेंदृष्टांत कहतेहैं । जैसेनैयायिकोंके मतमेयोगीपुरुषको योगसिद्धिके बलसेसमूहशरीरोंकी रचनादशामेएक यात्मसंयोगैसेही अनेकदेहोंमेंचेष्टास्वीकारकीहै । तैसेयहांप्रकरणमेंभीएक यात्मसंयोग सेहीयनेकदेहगतचेष्टा वनसक्तीहै ।। शंका ॥ जैसेयोगीपुरुषको धनेकशरीरों कियेहुए कार्यका अनुसंधानहोताहै तेसेयहांभी अनु संधानहुधाचाहिये क्योंकि सर्वदेहोंमेंएकहीवात्मा यापनेमानाहै। समाधान ॥ हेवादिन्इसतृतीयपक्षमेंभी यहविचारकर्तव्यहै । शरीरा अनुपहितयविद्यावच्छिन्नजोसाक्षिहै।तिसकोयनुसंधानतुमयापादन करतेहो । श्रथवा शरीराऽवच्छिन्नकप्रति थापादनकरतेहो। प्रथम पक्षकहोतोवहहमकोभीस्वीकारहै । क्योंकियविद्याऽवच्छिन्नसातिको थनुसंधानहोताहीहै । औरद्वितीय पक्षनहींसंभवता क्योंकितिन ०सि०१० योगीकेदेहोंमेंभी उपाधिकभेदसे तिसतिस देहाऽवच्छिन्नको अनु संधाननहींहोता। योगीकेदेहोमकौनअनुसंधानकरनेवालाहै । ऐसी थाकांक्षाकेहुएकहतेहैं।शहांभीयज्ञानमात्रउपहितकोयनुसंधातापनाहै। तैसेही दार्टीतमे जानना ॥ इसकथनकियेहुएयर्थको अनुभवसेदृढ करतेहैं।इसीकारणसेएकहीशरीरमेपादाऽवच्छिन्नचेतनमस्तकाऽवच्छिन्न चेतनकेदुःखकोनहींयनुसंधानकरता।।अन्यथा “मैंपादाऽवच्छिन्न" शिरोवच्छिन्नकेदुःखवालाहूं ॥ ऐसाअनुभवहुया चाहिये सोऐसा तोअनुभवनहींहोताकिन्तु “ मेरेपादमेसुखहै " औरमेरेशिरमेदुःख ह"ऐसायनुभवसर्वकोहोताहै।यातेयज्ञानउपहितकोहीअनुसंधातापनाहै शरीराऽवच्छिन्नकोनहीं।इसप्रकारपूर्वउक्तयुक्तिसेथज्ञानावच्छिन्नजीव काभेदस्वप्नकालमेप्रत्यक्षप्रमाणसेवायनुमानप्रमाणसेनअनुभवहोनेकर जीवोंकेभेदकायनुभवशरीरोंकेभेदकोहीविषयकरताहै।यहअर्थसिद्धहुया यातेविनगमनाविरहदोपकाअभावहोनेसे बद्धमुक्तव्यवस्थाकीअनुप- पतिनहीं ॥ इति ॥ * अथदाष्टींतमेद्रष्टाकेएकत्वकाप्रतिपादन * इसमकारस्वप्नदृष्टांतमेदशकाएकत्वप्रतिपादनकरकेयवदा तभी द्रष्टाकाएकत्वौरजीवोंकेभेदकायनुभवशरीरोंकेभेदकोविषयकरताहै।। औरयर्थसंबद्धमुक्तादिव्यवस्थाइनसर्वोंके प्रतिपादनकरनेकेलिये जिज्ञासाकोपूकटकरतेहैं । यद्यपिस्वप्नमे पूर्वउक्त रीतिसे व्यवस्थाका संभवहै।तथापिइसजाग्रत् अवस्थामजीवोंकेभेदकाअनुभवकिसरीतिसे होताहै । ऐसीजिज्ञासाकेहुएजीवोंकेभेदकाअनुभवसिद्धांतीउपपादन करताहै।। हेवादिन्तुमसावधानहोकरश्रवणकरो। सोईजाग्रत्यवस्था पूबाई मेभ्रांतिसहितहोताहै ।वहकौनहै। ऐसीयाकांक्षाकेहुएकहतेहैं । वह सजातीयविजातीयस्वगत भेदसेरहिततथा भेदाभेदसेरहितात्माहै यौवहनित्यहै। इसीसेदेहादिकोंसेभिन्न है।।और अविद्यातत्कार्यसेरहित शुद्धहै । इसीसेअविद्यातत्कार्यको अनित्यहोनेकरौरयात्माकोतिन सेभिन्नहोनेकरयात्माकोपूर्वनित्यपनाकथनकियाहै।औरवहात्मायुद्ध कहियेचेतनस्वरूपहै ।। इसीहेतुसेअविद्यातत्कार्यात्मानहीं।। और जडस्वरूपअविद्याततकार्यसेभिन्नपना चेतनरूपयात्माकोयुक्तहीहै । शंका ॥ श्रात्मासंसारीहैयांतेअविद्याकावहकार्यहै तिसकोयापनित्य कैसेकहतेहो ॥ समाधान ।। हेवादिन्वह यात्मामुक्त स्वभाव है ॥ यद्यपितिसमेसंसारीभावयविद्याकाकार्यहै । तथापिविशेपस्वरूपचेतन मात्रकल्पितनहींइसीअर्थकोश्रुतिभीकहतीहै ।। विमुक्तश्चविमुच्यते * य० ॥ वहमुक्तस्वभावयात्माथाविद्यकवंद्धको स्वरूपवोधसे निवृत्तकरकेपुनःमुक्तव्यवहारकेभजनेवाला होताहै। इति ।। इसीसेवह प्रात्माउपनिपदप्रमाणमात्रकरहीवास्तवसेजाननेयोग्यहै । यहांमात्र पदकहनेकायहभावहै ।। यदिप्रत्यक्षादि प्रमाणोंकेसाथ उपनिषद्की संमतिहोगी तोयधिगतयगोचरहोनेसेउपनिषदोंकोयप्रमाणताहोगी यदिइतरप्रमाणोंसे विरोधहोगा।तोभीयप्रमाणताहोगी। औरमात्रपदके कहनेसेकिसीप्रकारभीयप्रमाणतानहींहोती ॥ शंका !!शुद्धचेतनको जाग्रतादिअवस्थाकीप्राप्तिनहींसंभवतीक्यिोंकि तिनकोजीकाधर्मपना है|समाधान। हेवादिबहशुद्ध चेतनहीजीवभावकोप्राप्तहोताहैयद्यपि शुद्धयात्माकोहीजीवभावकीप्राप्तिमानेहुएमुक्तत्वीसंसारित्वदोविरुद्ध ० मि. मु० रूपएकमेप्रामहोंगे।तथाणिजमेशुक्तिकेन्यज्ञानकरकल्पितरजतरूपसेप्रतीत हुईशुक्तिकोविन्दहिम्पबत्ताकीप्राप्तिनहींहोती । तैसेपूर्वउक्त यात्माके श्रज्ञानकरजीवभावकांकल्पितहोनम चेतनमेविरुद्धदिरूपवत्ता की प्राप्ति नहींहोसकती।इमप्रकान्यात्मा यज्ञानको याश्रयणकरके जीवभावकोप्राप्त होकादेवतियफमनुम्यादिशरीरों को कल्पना करता है ॥ औरपुनःतिन देवादिरागरांकामहिकारिरूपताकरब्रह्मांडपर्यंतचतुर्दशलोकोंकोरचना करताहै । औरतिनदेहोंमेकोर्डदेवहै कोईमनुष्य कोई असुरहै कोई सर्वशरीरीकउत्पन्न करनेवालाब्रह्माहे ॥ औरकोईजगतका पालनकरने वालाविष्णुहै । औरकोई अन्यप्रलयकालमेसर्वक संहारकरनेवालारुद्र होइनतीनोंकीउपाधिमत्त्वादिगुगगहें।।तिनसत्त्वादिगुणोंकवशसेतिनमें उत्पादकत्वपालकत्वमंहारकर्तृत्वादिसर्वसामर्थ्यहे ।। इसपकारजीवोंके भेदकायनुभवौरजगत्कायनुभवउपपादनकरकेयव अधिकारित्वके श्रनुभवकोउपपादनकरतेहैं ।। औरमंत्राह्मणकुमारयवस्थाकरयुक्तहूं। यहांशमादिसंपन्नयधिकारीहीब्राह्मणशदसेगृहीतहै॥तिसकाहीवेदांत श्रवणमेयधिकारहै।यहसूचनकरनेकोब्राह्मणकाग्रहणहैको ईजातिमात्र बाह्मणकेवास्तेबाह्मणपदका ग्रहणनहीं ॥ ौरवानप्रस्थ धाश्रमसे थनंतरहीसंन्यासकरे ॥ इसक्रमसंन्यासके नियमाभावसूचनकरनेके लिये “कुमार” पदग्रहणकियाहै ।। भावयह संन्यास ग्रहणमे वैराग्य कारणहै ।वहजिसकिसीयाश्रमतथाअवस्थामहोतबीयहजीवसंन्यास ग्रहणकरे ॥ इति ॥ श्रवणादिकसाधनोंमेजोप्रवृत्तिहै तिसमेप्रतिबंधका भावसूचनकरनेकेयर्थकहतेहैं ।। तिनविष्णुयादिकोंकीपूजानमस्कार पादसेवनश्रवणकीर्तनस्मरन्दास्यसख्ययात्मनैवेदनरूपभक्तिकायनुष्ठान पूर्वाद करकेश्रणादिकसाधनों कोसंपादनकरमें मोक्षकोसिद्धकरूंगा। इस लियेथात्मज्ञानकेयर्थीजिज्ञासृजनोंनेईश्वरभक्तिसकलविघ्नोंकेनिवारण अर्थव्यवश्यकरनीचाहियेयहभावहै ॥इति। इसप्रकारसर्वका अधिपति हुयाभीयहयात्मदेवयज्ञानकेप्रभावसे जाग्रत्यवस्थामेभ्रांतियुक्तहोता है। पुन जैसेपूर्वकथनकियाहुयाजोजाग्रत्प्रपंचतिसकोउपसंहारकरके स्वप्नकालमेनिद्रारूपदोपकरसहकृतहुयायात्मदेवतैसेप्रपंचकोकल्पनाकर तिसतिसशरीरतथाइन्द्रियों करसिद्धहोनेयोग्यभोगोंकोभोगकरपुनःयह भ्रमहोताहै ॥ वसिष्टादिकमुनिमुक्तहुएहैंउनसेभिन्नौरजीवबद्ध हैं । औरमेंभीकोईबद्धहूं। दुःखीहूं । तथासंसारीहूं । किसी प्रकार मुक्तहो जाऊं ॥ ऐसेकल्पना करकेपुनः तिसस्वामयवस्था को उपसंहार करके सर्वभ्रमकीनिवृतिरूपजाग्रत्यवस्थाअथवासुषुप्तियवस्थाकोप्राप्तहोताहै ॥इति।इसप्रकारयात्मानिष्ठयज्ञानकेवशसे जीवभावतथाईश्वरभावी जगतरूपताऔरयवस्थावत्ताकीकल्पनाकेहुएजोयर्थसिद्धहुधासोकहते हैं।एकहीयात्माव्यापकौस्वकाशतथायानंदएकस्वरूपयपने ज्ञान केवशसेजीवहै। संसारीहेइत्यादिशब्दोंकाविषयहोताहै। जीवकल्पितही है ऐसेजोकोईमानताहै तिसकामतनिषेधकरतेहैं। तिसशुद्धयात्मासे भिन्नकोईसंसारीहैएसीसंभावनाभीनहींकरसक्त अन्यथामुक्तिौरसंसा रकाएकयधिकरणनहींवनेगा।यातेयात्मासेभिन्नकल्पितजीवकोईनहीं यहयर्थसिद्धहुथा।इसपूकारब्रह्मात्माकोअपनेयज्ञानसे संसारीपनाप्रति पादनकरके यवमुक्तपनाभीतिसीमेप्रतिपादनकरतेहैं।तिसपूर्णानंदस्वरूप थात्मदेवकोहीजिसकालमेंयनादिसंसारमेंसंचितकियेहुए पुण्यकर्मन्के समुदायसेपापकर्मनिवृत्तहोजातेहैंऔरविवेकादिचतुष्टयमाधनसंपन्न A ०सि०० होताहै । औरशास्त्रतथायरुकी कृपासेपाप्त तथायादरनैरंतर्यदीर्घ कालकरसेवनकियेहुए श्रवणादिसाधनोंकी पुष्कलतावालाहोताहै | तिसकोजिसकालमें तत्त्वमस्यादि महावाक्यसे उत्पन्नहुयास्वरूप साक्षात्कारउदय होताहै । तिसकालमें अज्ञानतत्कार्यसकोउप संहारकरके स्वरूपानंदकर तृप्तहुयायौरअपने स्वरूपभूत महिमामें स्थितहुयासोईयात्मा "मुक्तहै" इसव्यवहारका विषयहोताहै । इस प्रकारयनेकरारीरादिजगत् भ्रमकाउपादानरूप अज्ञानकीतत्त्वसाक्षा कारसेनिवृत्तिकालमें तिससेभिन्न औरकोईसंसारीजीव तथातिसकर अनुभूतदेतकिंचितमात्रभीशेपनहींरहता यहपरमरहस्यहै ॥१॥ इसपूर्वउक्तसिद्धांतके संग्रहका श्लोक ॥ ब्रह्माज्ञानादीशजीवादिभावात् भांतजाग्रत्स्वप्न सुषुप्तीविभविभर्ति । स्वात्मज्ञानादज्ञताया निवृत्ती नान्योजीवोनास्तिचाऽज्ञातमन्यत् ॥ १॥ कवित्त ।। व्यापकयानंदएक रसशुद्धब्रह्मजोई तमोजन्यभ्रांत युतविविधलसतहै ।। जीवईशभावहोय जगतविथारकर जाग्रतसुपन सुखपतकोधरतहै।। सोईजबईशध्याय गुरुकी शरणजायसुनमहावाक्य निजबोधकोभरतहै । तबहीयज्ञानसहकारज विनाशहोतकोऊअन्य जीवनाहि दैतकोलखतहै ॥ १ ॥ इति ॥ ॐ अथपूर्वअर्थके अनुवादपूर्वक एकदेशिपूर्वपक्षी कीरीतिसे अज्ञातसत्ताकानिरूपण ॥ * थात्माकायज्ञान देवादिशरीररूपतासे औरतिनशरीरोंका सहिकारिब्रह्मांडरूपतासे परिणामको प्राप्तहोताहै । वहीयज्ञानतिस पूर्वाद तिसपदार्थगोचर वृत्तिरूपतासेविषयोंका चैतन्यकेसाथ संबंधहोनेके अर्थपरिणामकोप्राप्तहोताहै | औरसोविपयाकारविद्याकीवृत्तिचेतन रूपबोधकरप्रकाशितहुई ज्ञानाभासौरभ्रमइसनामसेकहीजातीहै । विषयकास्फुर्णभी तिसीसेहोताहै । तिसीकारणसे देवादिशरीरऔर जगतरूपविषयऔर तिनकाज्ञानरूपथविद्याकीवृत्तिइनसर्वकायविद्या हीउपादानकारणहै । इसीकारणसे यदेतबोधकरयविद्याकीनिवृत्ति हुएकार्यरूपविषयौर भ्रमज्ञानतिनसवकीनिवृत्तिहोतीहै । यहकथन वनसक्ताहे ॥ इति ॥ जगत्यज्ञातसत्तावालानहींरहता इसपूर्वकथन कोवादीनसहनकरताहुयाशंकाकरताहै । मू०। अज्ञातसत्त्वंनेष्टं चैव्यवहारः कथंभवेत्। नह्यदर्शनमात्रेण विपण्णोनाशनिश्चयात्।१०। सो० ॥ अज्ञातसत्त्वनहि इप्टकहुविहारकत संभवै । अदर्शनते नहिक्लिष्ट तायभावके ज्ञानते ॥ ११ ॥ टी०॥ अनुभूवमानढेतनहीं है ऐसेकहनेवालासिद्धांतीपूछने योग्यहै ॥ किअनुभव केविषयको अनुभूयमानकहतेहैं। तिसअनुभव शब्दसेक्या? प्रमाणजन्यज्ञानकाग्रहणहैअथवायविद्याकीवृत्तिकाग्रहण है । प्रथमपततो नहींसंभवता । क्योंकिविषयनिष्ठ अज्ञातसत्ताका यभावहोनेसेपूमाणजन्यज्ञानकी विपयतायंगीकारहीनहीं।यदिदितीय पनकहोतोसर्वजगत्कोअपरोक्षयात्माकेयज्ञानकापरिणामहोनेसेतिस जगत्कोऔर तत्गोचरथविद्याकीवृत्तिको अपरोक्षएकरूपताप्राप्तहुई। जिसकारणसे अपरोक्षशुक्तिके अज्ञानकापरिणाम जोरजतौरतिस का ज्ञानयहदोनोंपरोक्षनहींदेखे जाते। किंतुयपरोक्षही देखेहैं । तिस १०० कारणसेयपरोक्षयविद्यावृत्तिकीविषयताकोअप्राप्तजोदेतंतिसकीसत्ता यदिस्वीकारनहींहै । तोपरोक्षपुत्रादिरूपविषयका ग्रहणत्यागरूपजो व्यवहारहेवहपरोक्षयर्थकेयभावहोनेसेनहींहोगा । यदिइसीयर्थमें इष्टापत्तिकरोतोनहींसंभवती । क्योंकिनदेखनेमात्रसे नाशकानिश्चय होनेसैकोई पुरुषविपादयुक्तनहींहोता।यातेयविद्या उपादानकजगत्हे यहकथनहीयसंगतहै ।। अवसंक्षेपसेकथनकियहुएश्लोकके अथको विस्तारसेनिरूपणकरतेहैं ॥ हेसिद्धांतिन्तुमक्योंइसप्रकारकहतेहो । जोतिसजीवकर अनुभूयमानद्रेत नहीं है ॥ क्योंकिजिसकारणसे अज्ञातदैतकी सत्ताभीज्ञातदैतकीसत्तावत् नैयायिकादिक । अथवा हमारेएकदेशीवेदांती अंगीकारकतेहैं || अज्ञातदेतकीसत्ता विवरण चार्योकाअंगीकारभी प्रमाणरूपहै ॥ सोदिखलातेहैं । इसीकारणसे पारमार्थिकतथा व्यवहारिकयौपातिभासिक यहतीनप्रकारकीसत्ता विवरणाचायें मानतेहैं । सत्ताकीत्रिप्रकारताका अंगीकारयज्ञात सत्ताकदैतकाकैसे उपपादकहै। ऐसीयकांक्षाकेहुएकहतेहैं। हेसिद्धा तिन्वहसत्ताकी त्रिप्रकारताका अंगीकारयज्ञातसत्ताके नमानेहुएनहीं वनसंकता । इसमेंयहकारणहे ॥ पूर्वउक्तयुक्तिसे प्रपंचकीपाति भासिकंसंताहै।ौरसर्वप्रकारखाधसेरहितहोनेसेब्रह्मकीपारमार्थिकसत्तां है।इसरीतिसेदोनोंप्रकारकीसत्तास्वीकारकरनेसेदृष्टातथाश्यपदार्थकेस्व रूपकानिरूपणसंभवहुएसत्ताकीत्रिप्रकारताकाअंगीकारतिनकांव्यर्थहो गायातेयाविद्यकरजतादिज्ञातसत्तावालेहें।।ौरप्रपंचकोयविद्योपादान कनहोनेसे तिसकीयज्ञातसत्ताहै। इसप्रकार त्रिविधसत्ताके अंगीकारकी अनुपपत्तियज्ञातसत्ताकदैतमेप्रमाणहै। यहनिरूपणकरके अवयज्ञात पूवाद सत्ताकेअनंगीकाररूपविपक्षमे दंडकहतेहैं । यदिअज्ञातदैत कीसत्ता नहींमानोगेतोगृहसेवाहरदूरदेशमे गयेहुएपुत्रतथापशु यादिकसकल साधनसामग्रीकोनदेखतेहुएपुरुषकोपुत्रादिकोंका अभावनिश्चयहोकर शोकयमिसेदग्धहुएयौररुदन करतेहुएको मरणहीप्राप्त होगा । याते अज्ञातदैतथवश्यअंगीकारकरनेयोग्यहैयहयर्थयुक्तियौरप्रमाणसेसिद्ध हुया इति।। शंका ।। हेवादिन् पश्चादिक साधनसामग्रीके दर्शनका अभावतिनकेअभावकानिश्चायकनहीं । क्योंकिसुषुप्तिमे पुत्रादिकों के दर्शनकायभावहुएभीतिनकेअभावकानिश्चयनहींहोता । यदिवहांभी अभावकानिश्चयमानेतोसुपुप्तिकाहीउच्छेदप्राप्तहोगा । औरजोसत्ता कीत्रैपुकारताकायंगीकार अज्ञातसत्त्व कासाधक रूपपूमाण पूर्ववादीने कथनकियावहभीनहींसंभवता । क्योंकिपातिभासिकसत्ताकाहीयवां- तभेदमाननेसेसत्ताकीत्रिविधतावनसकतीहै । भावयह किज़िनपाती तिकपदार्थोंकायदर्शनकालमेअसत्त्व निश्चयनहोवह व्यवहारिकसत्ता वालेहैं। औरजिनकाअसत्त्व निश्चयहोवहतातीतिक सत्तावाले हैं। फिर जुदीयज्ञातसत्ताद्वैतकीमाननीनिष्फलहै।।यौरजोऐसेकहोकिज्ञात सत्ता वालेरजतादिकोंकोजैसेव्यवहारकासाधकपनानींदेखा। तैसेहीज्ञातसत्ता वालेदैतपपंचकोभीव्यवहारका साधकपनानहींहोगा। सोयहकथन भीनहीं संभवता ।। क्योंकिजैसे स्वप्नमेदेखेहुए ज्ञातसत्ताकगजयश्चा दिकोंको यारोहणादिव्यवहारका साधकपनाहै। तेसेजाग्रत प्रपंचभी -ज्ञातसत्तावालाहीव्यवहारकासाधककैसेनहीवनसक्ता किंतुबनसक्ता है । और प्रातिभासिकरजतादिकों कोभीप्रवृत्त्यादि व्यवहारका साध कपनाविद्यमानहीहै । यहाँयहअनुमानजानना ॥

१०० कारणसेयपरोक्ष यविद्यावृत्तिकीविषयताकोअप्राप्तजोदेततिसकीसत्ता यदिस्वीकारनहींहै । तोपरोक्षपुत्रादिरूपविपयका ग्रहणत्यागरूपजो व्यवहारविहपरोक्षयर्थकेअभावहोनेसेनहींहोगा । यदिइसीअर्थमें इष्टापत्तिकरोतोनहींसंभवती। क्योंकिनदेखनेमात्रसे नाशकानिश्चय होनेसकोईपुरुषविषादयुक्तनहींहोता।यातेथविद्या उपादानकजगत्है यहकथनहीयसंगतहै ॥ ययसंक्षेपसेकथनकियेहुएश्लोकके अर्थको विस्तारसेनिरूपणकरतेहैं ॥ हेसिद्धांतिन्तुमक्योंइसप्रकारकहतेहो । जोतिसजीवकर अनुभूयमानदेत नहीं है ।। क्योंकिजिसकारणसे अज्ञातदैतकी सत्ताभीज्ञातदेतकीसत्तावत् नैयायिकादिक । अथवा हमारेएकदेशीवेदांती अंगीकारकतेहैं ॥ अज्ञातदैतकीसत्तामेंविवरणा चार्योंकाअंगीकारभी प्रमाणरूपहै ॥ सोदिखलातेहैं ।। इसीकारणसे पारमार्थिकतथा व्यवहारिकोपातिभासिक यहतीनप्रकारकीसत्ता विवरणाचार्य मानतेहैं ॥ सत्ताकीत्रिप्रकारताका. थंगीकारयज्ञात सत्ताकद्वैतकाकैसे उपपादकहै। ऐसीअकांक्षाकेहुएकहतेहैं। हेसिद्धां तिनवहसत्ताकी त्रिप्रकारताका यंगीकारयज्ञातसत्ताके नमानेहुएनहीं वनर्सकता । इसमेंयहकारंणहे ॥ पूर्वउक्तयुक्तिसे प्रपंचकीप्राति भासिकसत्ताहै।ौरसर्वप्रकास्वाधसेरहितहोनेसेब्रह्मकीपारमार्थिकसत्ता है।इसरीतिसेदोनों प्रकारकीसत्तास्वीकारकरनेसेद्रष्टातथादृश्यपदार्थकेस्व रूपकानिरूपणसंभवहुएसत्ताकत्रिप्रकारताकायंगीकारतिनकाव्यर्थहो गायातेयाविद्यकरजतादिज्ञातसत्तावालेहैं।यौरप्रपंचकोअविद्योपादान कनहोनेसे तिसकीयज्ञातसत्ताहै। इसप्रकार त्रिविधसत्ताकेगीकारकी अनुपपत्तियज्ञातसत्ताकदैतमेप्रमाण है। यहनिरूपणकरके अवयज्ञात पूवाई सत्ताकेयनंगीकाररूपविपक्षमे दंडकहतेहैं । यदिअज्ञातदैत कीसत्ता नहींमानोगेतोगृहसेवाहरदूरदेशमे गयेहुएपुत्रतथापशु यादिकसकल साधनसामग्रीकोनदेखतेहुएपुरुषकोपुत्रादिकोंका अभावनिश्चयहोकर शोकयमिसेदग्धहुएयौररुदन करतेहुएको मरणहीप्राप्त होगा । याते अज्ञातदैतअवश्यअंगीकारकरनेयोग्यहैयहयर्थयुक्तियौरप्रमाणसेसिद्ध हुया॥इति।। शंका । हेवादिन् पश्चादिक साधनसामग्रीके दर्शनका अभावतिनके ग्रभावकानिश्चायकनहीं। क्योंकिसुषुप्तिमे पुत्रादिकोंके दर्शनकायभावहुएभीतिनकेयभावकानिश्चयनहींहोता । यदिवहांभी यभावकानिश्चयमानेतोसुषुप्तिकाहीउच्छेदप्रामहोगा । यौरजोसत्ता कीत्रैपुकारताकायंगीकार अज्ञातसत्त्व कासाधक रूपप्रमाण पूर्ववादीने कथनकियावहभीनहींसंभवता । क्योंकिपातिभासिकसत्ताकाहीयवां- तरभेदमाननेसेसत्ताकीत्रिविधतावनसकतीहै । भावयह किज़िनपाती तिकपदार्थोकायदर्शनकालमे यसत्त्व निश्चयनहोवह व्यवहारिकसत्ता वालेहैं। औरजिनकायसत्व निश्चयहोवहयातीतिक सत्तावालेहैं।फिर जुदीअज्ञातसत्ताद्वैतकीमाननीनिष्फलहै।यौरजोऐसेकहोकिज्ञात सत्ता बालेरजतादिकोंकोजैसेव्यवहारकासाधकपनानहींदेखा। तैसेहीज्ञातसत्ता वालेदैतपपंचकोभीव्यवहारका साधकपनानहींहोगा। सोयहकथन भीनहीं संभवता ॥ क्योंकिजैसे स्वममेदेखेहुए ज्ञातसत्ताकगजयश्वा दिकोंको पारोहणादिव्यवहारका साधकपनाहै।। तेसेजामत मपंचभी ज्ञातसत्तावालाहीव्यवहारकासाधककैसेनहींयनसक्ता किंतुबनसक्ता हे ॥ और प्रातिभासिकरजतादिकों कोभीप्रवृत्त्यादि व्यवहारका साध कपनाविद्यमानहीहै ॥ यहाँयहअनुमानजानना ॥

०सि० मु * जागरावस्थद्वैतं ज्ञातमेवसद्भवितुमर्हति व्यव ह्रियमाणत्वात् ॥ स्वग्नप्रपंचवन है य० ॥ जाग्रत्यवस्थामेजोदैत प्रपंचहै ।। सोज्ञातसत्तावाला होनेकेयोग्यहै ॥ व्यवहारकाविपयहोनेसे । जोजोव्यवहारकाविषयहै सोसोज्ञातसत्तावालाहोनेकेयोग्यहै। जैसेस्वप्नप्रपंचहै ।। इति ॥वादी कासमाधान ॥ हेसिद्धांतिन यह तुह्मारा अनुमान “वाधितत्व" रूप उपाधिकरदृपितहै।। सोइसप्रकारहै।।जहांजहांज्ञातसत्तावालादेतहै।।तहां तहां “वाधितत्व" कहियेवाध ज्ञानविषयत्वहै । जैसेस्वप्नप्रपंचमेहै ॥ : यातेउपाधिसाध्यकेसाथव्यापकहै ॥ औरजहांजहां व्यवहारकीविपता है ॥ तहांतहां वाधज्ञान की विषयता रूप “वाधितत्व" कायभावहै।। जैसेजाग्रत्प्रपंचमेंहै । इसप्रकारपक्षमेउपाधिसाधनके साथग्रव्यापक है। इसीसेजाग्रत् तथास्वप्नप्रपंचकी विलक्षणताहै | क्योंकि जाग्रतबोधसे तिसस्वप्नप्रपंच का याध होजाता है ॥ और इसजाग्रत् प्रपंचमेंयात्मसाक्षात्कारसे पूर्वाधनहींहोता ॥ यहकथन सिद्धांतीके अभिप्रायसे अथवाएकएकदेशीके अभिप्रायसे जानना यातेअज्ञातसत्ताकदैत स्वीकारकरनेयोग्यहै ॥ १० ॥ इति ॥ । ॐ अथत्रिविधसत्ताके खंडनपूर्वक ख्यातियों का स्वरूप निरूपण * जायतदैतएपंच अबाधित होनेसे यज्ञातसत्तावालाहै यहपूर्व वादीनेकथनकिया अवतिसकोसिद्धांतीदूपित करताहै ॥ यहाएक देशीकामतनिरास करनेसेनैयायिकादिकोंकामतभी निरासहोजावेगा प्रवाई इसअभिप्रायसे एकदेशीका मतखंडन करनेकेलिये सिद्धांती तिस से पूछताहै ॥ मू। सत्त्वत्रयंवदन्वादीप्रष्टव्योवाधुनामया। सत्यद्वैतमसत्यवानाऽसत्येत्रिविधंकुतः ॥ ११॥ भुजंगपूयात ॥ त्रिधासत्त्ववादीभलेजोवखाने ॥ इहांपूछने योग्यमैनेवजाने ॥ कहोदैतसत्यं असत्यंवहोई ॥ उभेनावनेतोत्रिधा कैससोई ॥ १२॥ टी-हएकदेशिन क्या ?वास्तवदैतको श्राश्रयणकरके अज्ञात सत्ताकोतुमसिद्धकरतेहो । अथवायनिर्वचनीयदैतको आश्रणकरके तिसकोसिद्धकरतेहो ॥ पृथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिजहां प्रत्यक्षादिप्रमाणोंनिष्ठपामाण्यकानिषेध कियाहे तहांवास्तवदैतका भी निपेधकरयाएहैं ॥ ौरदितीयपक्षमेंयहविचारकियाचाहिये । सत्यरूपतासेतथा असत्यरूपतासेऔउभयरूपतासे जोकथनकेयोग्य नहोवहयनिर्वचनीय पदार्थप्रथमकहींशुक्ति रजतादिस्थलमेंप्रसिद्ध हैवानहीं ॥ यंतिमपक्षकहोतो वहनहींसंभवता । क्योंकिदृष्टांतका प्रभावहै । अर्थयहयाकाशादि पंचनिष्ठ अनिर्वचनीयताकोयंगी कारकरकेतिसकी अज्ञातसत्ता सिद्धकरनेकी हेवादिन्तइच्छाकरताहें यातेतिसपूपंचकी अनिर्वचनीयतामें यहविचारकरनेयोग्यहे । प्रपंच निष्ठयनिर्वचनीयता प्रत्यक्षपूमाणसेसिद्धहै ॥ अथवायनुमानपूमाण सेसिद्धहे ॥ पृथपपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिथनिर्वचनीयता को स्पष्टपूत्यक्षकर सिद्धमानेहुयेवादियोंका परस्परविवाद नहीं होगा ॥ ौरदितीयपक्षभी असंगतहे ॥ क्योंकिदृष्टांतकेयभाव ३० स० मु० * जागरावस्थद्वैतं ज्ञातमेवसद्भवितुमर्हति व्यव हियमाणत्वात् ॥ स्वप्नप्रपंचचत है श्र० ॥ जाग्रत्यवस्थामेजोदेत प्रपंचहै ॥ सोज्ञातसत्तावाला होनेकेयोग्यहै ॥ व्यवहारकाविपयहोनेसे ॥ जोजोव्यवहारकाविषयहै सोसोज्ञातसत्तावालाहोनेकेयोग्यहै। जैसेस्वप्नप्रपंचहै.॥ इति ॥वादी कासमाधान ।। हेसिद्धांतिन् यह तुह्मारा अनुमान “वाधितत्व" रूप उपाधिकरदूपितहै। सोइसप्रकारहै।जहांजहांज्ञातसत्तावालादैतहै।।तहां तहां “वाधितत्व" कहियेवाध ज्ञानविषयत्वहै । जैसेस्वप्नप्रपंचमेहै । यातेउपाधिसाध्यकेसाथव्यापकहै । औरजहांजहां व्यवहारकीविपता है ॥ तहांतहां वाधज्ञान की विषयता रूप “वाधितत्व" कायभावहै।। जैसेजाग्रत्प्रपंचमेंहै । इसपूकारपक्षमेउपाधिसाधनके साथयव्यापक है। इसीसेजाग्रत् तथास्वप्नपूपंचकी विलक्षणताहै ॥ क्योंकि जाग्रत्वोधसे तिसस्वप्नप्रपंच का वाध होजाता है ॥ और इसजाग्रत् प्रपंचयात्मसाक्षात्कारसे पूर्वाधनहींहोता ॥ यहकथन सिद्धांतीकेयभिप्रायसे अथवाएकएकदेशीके अभिप्रायसे जानना यातेअज्ञातसत्ताकद्वैत स्वीकारकरनेयोग्यहे ॥ १० ॥ इति ।। *अथविविधसत्ताके खंडनपूर्वक ख्यातियों का स्वरूप निरूपण * जाग्रतद्वैतपंच यवाधित होनेसे यज्ञातसत्तावालाहै यहपूर्व वादीनेकथन किया यवतिसकोसिद्धांतीदूपित करताहै ॥ यहांएक देशीकामतनिरास करनेसेनैयायिकादिकोंकामतभी निरामहोजावेगा पुवाई १०३ इसयभिप्रायसे एकदेशीका मतखंडन करनेकेलिये सिद्धांती तिस से पूछताहै ॥ मू। सत्त्वत्रयंवदन्वादीप्रष्टव्योऽत्राधुनामया। सत्यंबैतमसत्यवानाऽसत्येत्रिविधंकुतः ॥ ११॥ भुजंगपूयात ॥ विधासत्त्ववादीभलेजोवखाने ॥ इहांपूछने योग्यमैनेबजाने ॥ कहोंढेतसत्यं असत्यवहोई ॥ उभेनावनेतोत्रिधा कैससोई ॥१२॥ टी-हएकदेशिन् क्या? वास्तवदैतको याश्रयणकरके यज्ञात सत्ताकोतुमसिद्धकरतेहो । यथवायनिर्वचनीयदैतको थाश्रणकरके तिसकोसिद्धकरतेहो ॥ पृथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिजहां प्रत्यक्षादिपूमाणोंनिष्ठपामाण्यकानिषेध कियाहे तहांवास्तवदेतका भी निषेधकरथाएहैं ॥ औरदितीयपक्षमेंयहविचारकियाचाहिये । सत्यरूपतासेतथा असत्यरूपतासौउभयरूपतासे जोकथनकेयोग्य नहोवहअनिर्वचनीय पदार्थप्रथमकहींशुक्ति रजतादिस्थलमेंप्रसिद्ध हैवानहीं । अंतिमपक्षकहोतो वहनहींसंभवता । क्योंकिदृष्टांतका थभावहै । यर्थयहयाकाशादि पंचनिष्ठ अनिर्वचनीयताकोयंगी कारकरकेतिसकी अज्ञातसत्ता सिद्धकरनेकी हेवादिन्तइच्छाकरताहें यातेतिसपूपंचकी अनिर्वचनीयत में यहविचारकरनेयोग्यहे । पंच निष्ठअनिर्वचनीयता प्रत्यक्षप्रमाणसेसिद्धहै ।। यथवाअनुमानपूमाण सेसिद्धहे ॥ पृथयपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकि यनिर्वचनीयता को स्पष्टपूत्यक्षकर सिद्धमानेहुयेवादियोंका परस्परविवाद नहीं होगा ॥ औरदितीयपत्तभी असंगतहै ॥ क्योंकिदृष्टांतकेयभाव १०४ वे०सि०म० से यनुमानकरके याकाशादिएपंचनिष्ठयनिर्वचनीयता किसप्रकार तुमसिद्धकरोगेकिंतुनहींकरसक्ते ॥ यातेपथमपत्नही स्वीकारकरने योग्यहे ॥ क्योंकियनिर्वचनीयताको श्राश्रयणकरकहीयज्ञातसत्ता एकदेशीने सिद्धकरनी ॥ यहीयनिर्वचनीयताके सिद्धकरनेका पूकरण उपयोगहै इसलियेवहयनिर्वचनीयपना शुक्तिरजतादिकों में प्रथमप्रसिद्धहे । इसपूथमपक्षको- एकदेशीस्वीकार करता है। यहांपरयहयर्थजाननेयोग्यहे ॥ “ इदंरजतम् ” यहप्रतीति रजतकेसंबंधाकारतथा इदंत्वविशिष्ट पुरोवर्तिकोविपय करनेवालीहै अथवानहीं ॥ यदियंत्यपक्षकहोतो रजतार्थी पुरुपकी -सन्मुखदे शवर्ति पदार्थ प्रवृत्ति नहींहुईचाहिये ॥ क्योंकि प्रवृत्तिकेकारण रूपविशिष्टज्ञानकायभावहै।ौस्यदिकोईग्रख्यातिवादीऐसेकहे। कि यहांदोज्ञान इदंतागोचरतो सामान्यज्ञानप्रत्यक्षरूपहै औररजतगोचर स्मृतिरूपज्ञानहै ॥ तिनदोनोंकेविवेकज्ञानाऽभावसेपुरोवति विषयक प्रवृत्तिहोतीहै।।सोयहकथनअख्यातिवादीकानहींसंभवता।क्योंकिजैसे दोज्ञानोंकातथादोविषयोंका विवेकज्ञानाऽभाव प्रवृत्तिकीसामग्री तुमने मानीहैतिसेउसीसमयमेदोनोंज्ञानोंकेतथादोनोविपयोंकेस्वरूपभिन्नहोने सेथविवेकज्ञानाऽभावनिवृत्तिकीसामग्रीभीविद्यमानहै।तिससे निवृत्तिभी अवश्यहुईचाहिये।।औरएककालमेपरस्परविरुद्ध प्रवृत्तितथानिवृत्तिनहीं देखीजाती। औरसर्वअर्थात्सत्यरजतादिस्थलमेभी विवेकज्ञानाऽभाव सेहीप्रवृत्तिहोजावगीतोप्रयोजनसेरहित विशिष्टज्ञानका संसारमेलोपहो जाएगा। यातेविवेकज्ञानाऽभावसेपुरोवर्तिमेप्रवृत्तिनहींहोसकतीकिन्तु विशिष्टज्ञानसेहीहोतीहै इसलिये यंत्यपक्षयसंगतहै । यौवह प्रतीतिहै १०५ यहप्रथमपक्षयदिकहोतोतिसमेभीयहविचारणीयहैं। क्या?वहमतीतिनिर्वि षयहोतीहै। अथवासविषयहोतीहै । प्रथमपक्ष तोनहींसंभवतायोंकि निविषयकोईज्ञाननहींहोता। औरयदिविषयसेबिनाभीज्ञान मानोगेतो विज्ञानवादीबौधकामतप्राप्त होंगा । औरविषयसहितवहप्रीतिहैयह द्वितीयपक्षयदिकहो।तोतिसमेयह विचारकर्तव्यहै। क्या?र्तिसप्रतीतिका विषयसतहे अथवायसन्है । अत्यपक्षतोनहीं संभवता । क्योंकिवह प्रतीतिअपरोंचहै। औरयसत्कीअपरोक्षप्रतीतिनहींहोसकती। और यदिप्रथमपक्षकहो तोतिसमेयहविचारकर्तव्यहै। क्या?वहविपयपुरोवर्ति में सत्है अथवा अन्यस्थलमें सत् है पुरोवत्तिमें यदि सत्कहो तो उत्तरकालमे तिसको भ्रमरूपता तथा बाधयह दोनोंनहुए चाहिये। क्योंकि सत्पंदार्थके यहदोनोंनहींहोते ॥ और द्वितीयपक्ष मे यह विचार करनेयोग्यहै ॥ वहयन्यस्थलक्या?बुद्धिहै ॥ यथाकांता करादिहै। प्रथमपक्षतोनहींसंभवंताक्योंकिबुद्धिमेरजतहै इसमेप्रमाण काभावहै।यौर इदंरजतम्।।इसप्रकारकारजतविषयकरत्यय यथवा "नेदरजतम" इसमकारकाधमत्ययभीरजतकीविज्ञानरूपताकोवोधन नहींकरता क्योंकिप्रथमप्रत्ययकोइदंताविशिष्टपुरोवर्तिविषयकरजतका बोधकपनाहै ॥ थोरवाधप्रत्ययभीइदंताविशिष्टपुरोवर्तिकोरजतसेविवे- चनकरताहै ।। औरवहरजतनित्यहै अथवाकार्यहै ॥ प्रथमपक्षतोनहीं संभवता क्योंकि नित्यरजतंकोस्थाईरूपहोनेकरक्षणक विज्ञानरूपता कैसेहोगी । औरकार्यरूपरजतकोवुद्धिसेयत्यंतभिन्नमानेहुए तिन काकार्यकारणभावनहींसिद्धहोगा । और यदिमायोकेवलसे तिनका कार्यकारणभावमानोगौतोस्वसिद्धांतकीहानिहोगी ।। यातेनित्यत्वयौ ।

वे०सि०म० से, अनुमानकरके याकाशादिप्रपंचनिष्ठयनिवर्चनीयता किसप्रकार तुमसिद्धकरोगेकितुनहींकरसक्ते ॥ यातेपथमपत्नही स्वीकारकरने योग्यहै ॥ क्योंकियनिर्वचनीयताको ग्राश्रयणकरकहीयज्ञातसत्ता एकदेशीने सिद्धकरनी है ॥ यहीग्रनिर्वचनीयताके सिद्धकरनेका प्रकरणमें उपयोगहै इसलियेवह अनिर्वचनीयपना शुक्तिरजतादिकों में प्रथमप्रसिद्धहे ॥ इसपथमपक्षको - एकदेशीस्वीकार करता है । यहांपरयहयर्थजाननेयोग्यह ॥ “ इदरजतम् ” यहतीति रजतकेसंबंधाकारतथा इदंत्वविशिष्ट पुरोवर्तिकोविषय करनेवालीहै अथवानहीं ॥ यदिग्रंत्यपनकहोतो रजतार्थी पुरुपकी -सन्मुखदे शवत्ति पदार्थमेप्रवृत्ति नहींहुईचाहिये ॥ क्योंकि प्रवृत्तिकेकारण रूपविशिष्टज्ञानकायभावहै।।यौरयदिकोईग्रख्यातिवादीऐसेकहे। कि यहांदोज्ञानहैंइदंतागोचरतो सामान्यज्ञानप्रत्यक्षरूपहै यौरजतगोचर स्मृतिरूपज्ञानहै ।। तिनदोनोंकेविवेकज्ञानाऽभावसेपुरोवर्ति विषयक प्रवृत्तिहोतीहै।सोयहकथनयख्यातिवादीकानहींसंभवता क्योंकिजसे दोज्ञानोंकातथादोविषयोंका विवेकज्ञानाऽभाव प्रवृत्तिकीसामग्री तुमने मानीहै।तैसेउसीसमयमेदोनोंज्ञानोंकेतथादोनोविषयोंकेस्वरूपभिन्नहोने सेयविवेकज्ञानाऽभावनिवृत्तिकीमामग्रीभीविद्यमानहै।।तिससेनिवृत्तिभी अवश्यहुईचाहियो।यौरएककालमेपरस्परविरुद्ध प्रवृत्तितथानिवृत्तिनहीं देखीजाती। यौरसर्वत्रअर्थात्सत्यरजतादिस्थलमेभीविवेकज्ञानाऽभाव सेहीप्रवृत्तिहोजावगीतोप्रयोजनसेरहित विशिष्टज्ञानका संमारमेलोपहो जाएगा। यातेविवेकज्ञानाऽभावसेपुरोवर्तिमेप्रवृत्तिनहींहोसकतीकिन्तु विशिष्टज्ञानसेहीहोतीहै इसलिये यंत्यपक्षयसंगतहै । औरवह प्रतीतिहै F पूर्वाई यहप्रथमपक्षयदिकहोतोतिसमेभीयहविचारणीयहैं।क्या?वहप्रतीतिनिर्वि पयहोतीहै। अथवाासविषयहोतीहै । प्रथमपक्ष तोनहीं संभवताक्योंकि निविषयकोईज्ञान नहींहोता । औरयदिविपर्यसेविनाभीज्ञान मानोगेतो विज्ञानवादीवौधकामतप्राप्त होगा । औरविषयसहितवहप्रतीतिहैयह द्वितीयपक्षयदिकहो।तोतिसमेयह विचारकर्तव्यहै। क्या?तिसप्रतीतिका विपयसतहै अथवायसत्है । अंत्यपक्षतोनहीं संभवता । क्योंकिवह प्रतीतियपतिहै । औरयसत्कीयपरोक्षप्रेतीतिनहींहोसकती । और यदिप्रथमपतकहोतोतिसमेयहविचारकर्तव्यहै। क्या?वहविषयपुरोवर्ति में सत्है अथवा अन्यस्थलमें सत् है पुरोवर्तिमें यदि सत्कहो तो उत्तरकालमे तिसको भ्रमरूपंता तथा बाधयह दोनोंनहुए चाहिये। क्योंकि सत्पंदार्थके यहदोनोंनहींहोते ॥ और द्वितीयपक्ष मे यह विचारकरनेयोग्यहै ॥ वहयन्यस्थलक्या?बुद्धिहै ॥ अथवाकांता करादिहै। प्रथमपक्षतोनहींसंभवताक्योंकिबुद्धिमेरजतहै इसमेमाण कायभावहै।यौर इदंरजतम्"।।इसप्रकारकारजतविपयक त्यय' अथवा 'नेदरजतम" इसप्रकारकावाधप्रत्ययभीरजतकीविज्ञानरूपताकोवोधन नहींकरता क्योंकिप्रथमप्रत्ययकोइदंताविशिष्टपुरोवत्तिविषयकरंजतका बोधकपनाहै। यौवाधप्रत्ययभीइदंताविशिष्टपुरोवर्तिकोरजतसेविवे- चनकरताहै ॥ ौरवहरजतनित्यहै अथवाकार्यहै ।। प्रथमपनतोनहीं संभवतां क्योंकि नित्यरजतंकोस्थाईरूपहोनेकरक्षणक विज्ञानरूपता कैसेहोगी ।।ौरकार्यरूपरजतकोबुद्धिसेयत्यंतयभिन्नमानेहुए तिन काकार्यकारणभावनहींसिद्धहोगा । और यदिमायाँकेवलसे तिनका कार्यकारणभावमानोगौतोस्वसिद्धांतकीहानिहोगी ॥ यानित्यत्वयौ १०६ ०सि० मु० कार्यत्वरूपताकरबुद्धिरूपरजतकानिरूपणनहींहोसकता॥ औरकांता करादिदेशमेवहरजतसत्है । यहद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता॥क्योंकि कांताकरादिगततिसरजतकासन्मुखशुक्तिदेशमेग्रहणनहींहोसकता ॥ व्यवधानहोनेसेनेत्रभीतिसकाग्राहकनहीं । औरयदिदोपकेवलसेतिस काग्रहणमानेतोक्या?दोपमात्रसेउसकाग्रहणहोताहै। अथवादोपसह- कृतनेत्रसेग्रहणहोताहै ॥ प्रथमपक्षतोनहींसंभवताक्योंकिग्रंधपुरुषको भीकांताकरादिगतरजतकाग्रहणप्राप्तहोगा।।ौरद्वितीयपक्षभीनहींसंभ- क्ता ॥ क्योंकिमध्यदेशवर्तिौरपदार्थोंकाभीनेत्रइन्द्रियसेग्रहणहुया चाहिये । इसप्रकारअख्यातिवादादिकोंकाभ्रमस्थल मेयसंभवहोनेसे पुरोवर्तिशुक्तिदेशमेवहरजतनसत्हैनग्रसत्है औरपरस्परविरोधहोनेसे सत्थसत्उभेरूपभीवहरजतनहीं किन्तुसत्यसत्से विलक्षण थनिर्वच नीयवहरजतहै।।यहअर्थसिद्ध हुयायातेभ्रमकाविषय यनिर्वचनीयहै। इसरीतिसेतिसदृष्टांतकोयाश्रयणकरकेयाकाशादिप्रपंचनिष्ठभीअनिर्व- चनीयपनायंगीकारकरकेयज्ञातसत्ता सिद्धकरनेयोग्यहै । यहस्थित हुया । इसकोअवसिद्धांतीपितकरताहै ।। हेवादिन्यदितुमपूर्वउक्त अर्थकोस्वीकारकरतेहोतोदृष्टांतयौदाप्रतिको विपमतादूर करनेकेयर्थ तिसशुक्तिरजतमेयनिर्वचनीयताकेउपपादनसेंजेसीज्ञातसत्तामान है।। तैसीहीसत्तायाकाशादिएपंचनिष्ठभीमाननेयोग्यहे ।। ऐसेमानेहुएयह विचारकरनेयोग्यह।। क्या?याकाशादिकोंकीअज्ञातसत्नाहोवातिनकी ज्ञातहीसत्ताहे ।। अन्त्यपक्षमतोविरोधकाअभाव।। औरयदिद्वितीय पक्षकहोगेयर्थात्याकाशादिकोंमेतुमयज्ञातसत्ताकीकल्पनाकरोगे। तोदृष्टांतदार्टीतमेसमीचीनरूपताकरकैसेउपसंहारकोप्राप्तहोगााक्योंकि १०७ पूर्वाद दोनोंका विरोधहै । अव यज्ञातसत्त्वके साधकतर्कको अनुवाद करके सिद्धांतीदूपित करताहै । औरपुत्रादिक साधन सामग्रीकेगृहसे बाहर निकसेहुएयदर्शनमात्रसेनाशनिश्चयहोनेकर रुदनादिकोंकीप्राप्तिरूप दोपजोवादीनेपूर्वकहाथावहभीनहींसंभवता। क्योंकिवाधकप्रमाणकी प्रवृत्तिकेयभावसेतहांयभावनिश्चयकायनंगीकारहै । अर्थयह जिसे "इदंरजतम्"यहप्रथमभ्रमज्ञानहोताहै।पश्चातानेदंरजतम्।इसवाधका त्ययसेरजतकायभावनिश्चयहोताहै।तैसेयहांबाधकमत्ययकेनमवृत्तहोनेकर तिनपुत्रादिकोंकायभावनिश्चयनहींहोता । इसीसेरुदनादिकोंकीमाप्ति भीनहींहोती। यालेस्वमकीन्याईसर्वव्यवहारकासंभवहै । और जाग्राऽवस्थंद्वैतं ज्ञातमेवसद्भवितुमर्हति व्यवाहिय माणत्वात् स्वप्नप्रपंचवत् इसयनुमानसेभीयाकाशादिकपूपंचकीज्ञातसत्ताहीसिद्धहोती है । यद्यपिपूर्वइसयनुमानमे “वाधितत्व” उपाधिका निरूपणकिया था । तथापिवहउपाधिसाध्यकेसाथव्यापकनहोनेकरदूपितहै । अर्थात् रजतादिभ्रमकालमेयथवास्वनकालमे जाग्रत्यवस्थाकीन्याईवाधका श्रभावहोनेसे पूर्वउक्तउपाधि साध्यकेसाथ अव्यापकहै । औरवाधक प्रमाणकीपवृत्तिहुएवाधकालमेतोस्वप्नरूपधर्मीकाहीयभावहै ।। इसीसे उपाधियोसाध्यकीव्याप्तिकाग्रहणरूपव्यवहारका प्रभावहोनेसेउपाधि कोसाध्यकेसाथव्यापकपनेमेपूमाणकाहीअभावहे।। औरवृद्धोंकेत्रिविध सत्त्वकेयंगीकरणकीयनुपपत्ति अज्ञातसत्ताकाकल्पिकहे यहकथनभी नहींसंभवता ॥ क्योंकितिनकाथंगीकारयन्यपूकासेवनमकताहेसोई दिखलातेहैं।सर्वदेतनिष्ठमातिभासिकसत्ताका तिन्होंने न त्यागकरके १०८ ३००० भ्रांतपुरुषोंकोसंतोपमात्र करायाहे। इसीसे तिनके अंगीकारकेसाथ विरोधनहीं ॥ भावयह ॥ प्रतिभासिकसत्ता मपंचनिष्टमानेहुएभी भ्रांतपुरुषोंकी बुद्धिकरसिद्धजोजाग्रत् स्वप्नकीयवांतरविषमतातिसको याश्रयणकरकेन्यवहारिकसत्ताकेकथनसेविरोधकायभावहै।।११॥ पूर्व अर्थकसंग्रहकाश्लोक ।। स्वप्नवदृष्टिसृष्टः सन्सर्वव्यवहृतिक्षमः । प्रपंचोनाऽत्रदोपो ऽस्तितस्यपरिहतत्वतः ॥ १ ॥ दो० ज्ञातसत्त्वमपंचजो सुपनेसमहै जोइ ।। सबविवहार समर्थसोयामें दोपनकोइ ॥ १ ॥ इति ॥ अथदृष्टिसमकालीनदृष्टिसृष्टिवादमेंप्रतिज्ञानसृष्टि काभेदौतिसमेंप्रत्यभिज्ञाके विरोधकीशंकाका समाधाननिरूपण आत्माकायज्ञानदेवादिदेहाकारसेतथातिनकासहकारीब्रह्मांडाकारसेंऔर तिसतिसंपदार्थगोचर वृत्याकारस्पताकरपरिणामकोमाप्तहोताहै। इस पनवृत्तिसमकालीनहींसोसोपदार्थहै। वृत्तिसेपूर्वोवृत्तिसेपश्चात वहपदार्थनहींवर्तते ॥ वृत्तिसमकालीनज्ञातहीघटादिक पदार्थहैं । यहयर्थपूर्वनिरूपणकिया ॥ तिसमेंयहविचारकियाजाताहै ।। तिस तिसपदार्थगोचरजो वृत्तिहैवहवाधसेरहित अनुवृत्तिहोतीहै ।। अथवा शीघ्रविनाशहोजातीहै।। इनमेमथमपजनहींसंभवता। क्योंकिएकतो सुपुस्तिकाभावाप्तहोगा॥ ौस्दूसरीवृत्तिभी नहींउत्पन्नहोगी। तात्पर्ययहहै । किसीविशेषज्ञानके विद्यमानहुए सकलविशेषज्ञानोंकी उपरमश्रवस्थारूप सुषुप्तिकायसंभवहैं । यौखतिज्ञानोंकी “अयोग प्रवाई पद्य" अर्थात्एककालमेंनहोनास्वीकारहै । यदिएकवृत्तिकेविद्यमान कालमेंदूसरीवृत्तिमानोगेतोज्ञानोंको यौगपद्य होनेसेवृद्धोंकेयंगीकारके साथविरोधहोगा। औरदितीयपक्षभीयसंगतहै। क्योंकिवृत्तिकेसमान हीयोगक्षेमवालेभपंचकाभीशीघ्रविनाशिपनाहोगायौरज्ञानकीउत्पत्ति सेतमपंचकीउत्पत्तिहोनेकरज्ञानके भेदहुएमपंचकाभीभेदमसंगहोगा। औरयदिइसमेंअर्थात् प्रतिज्ञान पंचकेभेदमें सिद्धांतीदोपाभावकथन करतोवहनहींसंभवता । क्योंकिमत्यभिज्ञाकाविरोध माप्तहोताहैसोई दिखलाते हैं। मू। द्वैतभेदेप्रतिज्ञानं प्रत्याभिज्ञाकथंवद । दशानांयुगपत्सर्पभ्रमे यहत्तथैवसा ॥१२॥ अडिल भ० प्रतिज्ञानमेंदैतभेदजोराखीए । मतिभिज्ञाहुइ तामेकिहविध भापीए । उ०॥ एककालमेंदशको जहविधसर्पभ्रम । तामेजसमतिभिज्ञातस विधइहांक्रम ॥ १३ । टी०सोईयहघटहैसोईयहगृहहै।इत्यादिकमत्यभिज्ञा ज्ञानज्ञानमति घटादिकविपयोंकाभेदमानेहुएनहींहुईचाहिये जिसकारणसेप्रत्यभिज्ञाका विषयजोघटादिकोंकायभेदतिसकायभावहै । यौवहपूत्यभिज्ञासर्वक अनुभवसिद्धह तिसकालोपनहींसंभवता ॥समाधान।। हेवादिनएकत्व रूपविषयकेयभावसे क्या?पूत्यभिज्ञाका स्वरूपहीनहींसिद्धहोतायहतुम कहतेहो।यथवा तिसमेंप्रामारायका असंभवहेयहकहतेहो।प्रथमपततो नहींसंभवता क्योंकिजेसेदशपुरुषोंको युगपत् कहियेएककालमेरज्जु विपयकसर्पभूमहोताहै तहाएकसर्परूपविषयके थभावहुएभीजसेप्रत्य ११० वे०सि०म० भिज्ञाहोतीहै । तैसेयहांप्रकरणमेंभीजानो । कालांतरमेंहोनेवालेभिन्न भिन्नसर्पभ्रममें प्रत्यभिज्ञाकी प्राप्तिहीनहींहोसक्ती । इसलियेयहांमूल कारिकामें युगपत्"यहपदकथन कियाहै। और यहघटहै"इत्यादिक प्रमास्थलमैवेदांतमतमेंप्रतिज्ञान देतकाभेदहोनेसे विषयकाभीभेदमाना हैऔरयन्यवादियोंके मतमेविषयकाभेदनहींमाना।।इसप्रकारकाविवाद होनेसे "मूलकारिकामें “भ्रमे" यहपदकथनकियाहै। क्योंकि धागे कथनकरनीजोरीतिहै ॥ तिससे भ्रमस्थलमें विषयके भेदका विवाद नहीं है ।। यहां पर यहकथन होताहै ॥ देवदत्त पुरुपके नेत्र इन्द्रियकारज्जुरूपअधिष्ठानमेसंबंधहुएदोपकेवणसेरज्जुकेविशेषरूपको नग्रहणकरनेवाली इदमाकारयंतस्करणकीवृत्ति उत्पन्नहोतीहै ॥ तिसवृत्तिके उत्पन्नहुए पूर्वदृष्टसजातीयवस्तुके संस्कारकेवशसेरज्जु अवच्छिन्नइदमाकार देवदत्तकेअंतस्करणकी जोवृत्तिहै ॥ तिसमे प्रतिबिंवतचैतन्यनिष्ठ यविद्याक्षोभकोप्राप्तहुई सर्पोतिसकाज्ञान रूपताकरपरिणामको प्राप्तहोतीहै । औरवहउत्पन्नहु यासर्प जिसके अंतस्करणकीवृत्ति प्रतिबिंबतचैतन्यनिष्ठयविद्याकापरिणामहै। तिसी केसन्मुखउत्पन्नहोताहै। औरतिसीकरजानाजाताहै।क्योंकिसकार वृत्तिकोभीतिसीपुरुपके अंतस्करणकी वृत्युपहितचैतन्यनिष्ठयविद्याका कार्यपनाहै ॥ इसदेवदत्तकदृष्टांतसे मैत्रादिनवपुरुषोंको भिन्न भिन्न सर्पभूमइसीरीतिसे जानलेना ॥ इसप्रकारभूमको प्रतिपुरुषविद्याका परिणामहोनेसेदशपुरुषोंको रज्जुरूपयधिष्ठानमेंएककालमेंहीसर्पभूमके उदवहुएदशसर्पोरदशही तिनकेज्ञानउत्पन्नहोतेहैं ॥ तिसप्रकारएक सर्पकेयभावहुएभी जैसेतिनको “एकहीसर्पहमसबने अनुभवकियाहै यहप्रत्यभिज्ञाजैसेस्वरूपसे उत्पन्नहोतीहै तैसेदार्टातमेंभीघटादिविषय की एकतासेविनाभी “सोईयहघटादिकहैं" इसप्रत्यभिज्ञाकास्वरूपवन सक्ताहै ॥ औरविषयकेयभावहुए पूमापनापत्यभिज्ञा निष्ठनहींहोगा यहद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिजैसेविपयके अभावहुएभी दृष्टांतमें भूमरूपप्रत्यभिज्ञा होतीहै ॥ तैसेदाष्टांतभी भूमरूप प्रतिभिज्ञाहोतीहै ॥ इति ॥ श्रवविस्तारपूर्वक श्लोककीव्याख्याकरते हैं ॥ शंका ॥ पूर्वउक्तरीतिसे अज्ञातसत्ताकपूपंचकेनअंगीकारकरेहुए सुपुप्तिसेजागेहुएपुरुपको “सोईयह प्रपंचहै" ऐसीपूत्यभिज्ञा होतीहैसो नहींहुईचाहिये।। क्योंकियापकेमतमेंसुषुप्तिसेमथममपंचकातथासुषुप्ति सेउत्तरमपंचकाभेदहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन् यहतुह्मारीशंकानहीं संभवती। क्योंकिविशेषदर्शनकेअभावकाकारणजोमंदग्रंधकारतिसमे वर्तमानजोएकहीरज्जुरूपयधिष्ठानहै । तिसमेदशपुरुषोंको एककाल मेसर्पभ्रमहोताहै । तिससेभयभीतहोकरभागतेहुएतिनपुरुषोंकापरस्पर यहसंवादहोताहै। जोसर्पतुमनेअनुभवकियावहीहमनेभीदेखाहै"यहमत्य भिज्ञजैसेभ्रमरूप तिनकोहोतीहै। तैसेयहांदार्शतमेभी जानकर संतोष करनेयोग्यहै।।शंका तिनदशपुरुषोंकोभीवह त्यभिज्ञाएकहींसर्पविषय कक्योंनहो।समाधानाहेिवादिनतिन पुरुषोंनेभिन्नभिन्नहीसर्पकाथनु- भवकियाहैएककानहीं।यर्थयहा देवदत्तपुरूपकीरज्जुविषयकयंतस्कर एकीइदमाकारवृत्तिमेयूतिविंवतचैतन्यनिष्ठविद्याकापरिणामरूपभ्रमकर सिद्धभिन्नहीसर्पदेवदत्तने अनुभवकिया। सर्वपुरुषोंनेएकही सर्पनहीं अनुभवकिया।यातेवहपूत्यभिज्ञाश्रमरूपहै ॥शंका। जैसेएकहींघटको सर्वजनअनुभवकरतेहैं । तेसेभ्रमसिद्धविषयकोभीसर्वही जन धनुभव वेसि०० भिज्ञाहोतीहै । तैसेयहांधकरणमेंभीजानो। कालांतर होनेवालेभिन्न भिन्नसर्पभ्रममें प्रत्यभिज्ञाकी प्राप्तिहीनहींहोसक्ती । इसलियेयहांमूल कारिकामें "युगपत्"यहपदकथन किया है। और यहघटहे"इत्यादिक भमास्थलमेवेदांतमतमेप्रतिज्ञान देतकाभेदहोनेसे विषयकाभीभेदमाना हैऔरयन्यवादियोंके मतमेविषयकाभेदनहींमाना।इसप्रकारकाविवाद होनेसे "मूलकारिकामें "भ्रमे" यहपदकथन कियाहै । क्योंकियागे कथनकरनीजोरीतिहै ॥ तिससे भ्रमस्थलमें विपयके भेदका विवाद नहीं है। यहां पर यहकथन होताहै | देवदत्त पुरुपके नेत्र इन्दियकारज्जुरूपयधिष्ठानसेसंबंधहुएदोपकेयशसेरज्जुकेविशेषरूपको नग्रहणकरनेवाली इदमाकारअंतस्करणकोत्ति उत्पन्नहोतीहै ।। तिसवृत्तिके उत्पन्नहुए पूर्वदृष्टसजातीयवस्तुके संस्कारकेवशसेरज्जु अवच्छिन्नइदमाकार देवदत्तकेयंतस्करणकी जोवृत्ति ॥ तिसमें प्रतिकिंवतचेतन्यनिष्ठ अविद्याक्षोभकोपाप्तहुई सर्पोतिसकाज्ञान रूपताकरपरिणामको प्राप्तहोतीहे ॥ औरवहउत्पन्नहुासर्प जिसके अंतस्करणकीरति पूतिर्विवतचैतन्यनिष्ठथविद्याकापरिणामहे। तिसी केसन्मुखउत्पन्नहोताहै। औरतिसीकरजानाजाताहै।क्योंकिसकार वृत्तिकोभीतिसीपुरुपकेयतस्करणकी वृत्त्युपहितचैतन्यनिष्ठाविद्याका कार्यपनाहै | इसदेवदत्तकेदृष्टांतसे मैत्रादिनवपुरुपोंको भिन्नभिन्न सर्पभ्रमइसीरीतिसे जानलेना ॥ इसप्रकारभूमको प्रतिपुरुषश्चविद्याका परिणामहोनेसेदशपुरुषोंको रज्जुरूपयधिष्ठानमेंएककालमेंहीसर्पभूमके उदयहुएदशसर्पयोरदशही तिनकेज्ञानउत्पन्नहोतेहैं ॥ तिसमकारएक सर्पकेश्रभावहुएभी जैसेतिनको “एकहीसर्पहमसबने अनुभवकियाई पूर्वाद यहप्रत्यभिज्ञाजैसेस्वरूपसे उत्पन्नहोतीहै तैसेदाातमेंभीघटादिविषय की एकतासेविनाभी “सोईयहघटादिकहैं” इसप्रत्यभिज्ञाकास्वरूपवन सक्ताहै ॥ ौरविषयकेयभावहुए पूमापनापूत्यभिज्ञा निष्ठनहींहोगा यहद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिजेसेविपयके अभावहुएभी दृष्टांतमें भ्रमरूपप्रत्यभिज्ञा होतीहै ॥ तैसेदाष्टांतमें भी भूमरूप प्रतिभिज्ञाहोतीहै ।। इति ॥ अवविस्तारपूर्वक श्लोककीव्याख्याकरते हैं ॥ शंका । पूर्वउक्तरीतिसे अज्ञातसत्ताकपूपंचकेनयंगीकारकरेहुए सुषुप्तिसेजागेहुएपुरुषको “सोईयह प्रपंचहै" ऐसीप्रत्यभिज्ञा होतीहेसो नहींहुईचाहिये। क्योंकियापकेमतमेंसुषुप्तिसेमथममपंचकातथासुषुमि सेउत्तरमपंचकाभेदहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन् यहतुह्मारीशंकानहीं संभवती । क्योंकिविशेषदर्शनकेयभावकाकारणजोमंदअंधकारतिसमे वर्तमानजोएकहीरज्जुरूपअधिष्ठानहै । तिसमेदशपुरुषोंको एककाल मेसर्पभ्रमहोताहै । तिससेभयभीतहोकरभागतेहुएतिनपुरुषोंकापरस्पर यहसंवादहोताहै। जोसर्पतुमनेअनुभवकियावहीहमनेभीदेखाहै"यहमत्य भिज्ञजैसेभ्रमरूप तिनकोहोतीहै। तैसेयहांदार्यतमेभी जानकर संतोप करनेयोग्यहै।।शंकातिनदशपुरुपोंकोभीवह त्यभिज्ञाएकहीसर्पविषय कस्योंनहोसमाधानसहेबादिनतिन पुरुषोंने भिन्नभिनहीसर्पकरमानु- भवकियाहैएककानहींीयर्थयह। देवदत्तपुरूपकीरज्जुविषयकयंतस्कर णकीइदमाकारवृत्तिमेप्रतिबिंबतचैतन्यनिष्ठयविद्याकापरिणामरूपनमकर सिद्धभिन्नहीसर्पदेवदत्तने अनुभवकियाहै। सर्वपुरुषोंनेएकही सर्पनहीं अनुभवकिया।यातेवहप्त्यभिज्ञाभ्रमरूपहे ॥शंका।। जैसेएकहींघटको सर्वजनयनुभवकरतेहैं । तेसैभ्रमसिद्धविषयकोभीसर्वहीजन अनुभव वे० सि० मु करलेंगे। इसमेकौनवाधकहै ||समाधाना। हेवादिन्यन्यपुरुपकेभ्रमकर सिद्धविषयकायन्यपुरुपकोज्ञाननहींहोसकता । क्योंकिदेवदत्तकेअंत- स्करणकीवृत्तिमेप्रतिबिंबतचैतन्यनिष्ठयविद्याकापरिणामरूपजोभ्रमहै। वह देवदत्तसेभिन्नयज्ञदत्तकेयंतःकरणकी वृत्तिसेजाननाकठिनहैयाते अन्यकेत्रमकाविपययन्यको त्यतनहींहोसकता ॥ शंका ॥ पूर्वउक्त युक्तिसेसादिकभ्रममे यदिविषयकाभेदहै।। तोसादिकोंकेअभेदका अनुभवकैसेहोताहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन्दशपुरुषोंकेभ्रमकरसिद्ध दशसोको अत्यंतसादृश्यहोनेकरपरस्परतिनकाभेद ग्रहणनहींहोता इसीसेतहांयभेदविषयकप्रत्यभिज्ञाहोतीहै । एकहीसर्पहम सबनेयनु- भवकियाहै।ऐसेहीजाग्रत्अवस्थामेनानाप्रकारकेमपंचकोयहपुरुपयनुभ- वकरकेसुषुप्तियवस्थाकोप्राप्तहोताहै।यौरपुनःतिससेउठकरजोयहमपंचका अनुभवहोताहै।वहअनुभवदूसरेप्रपंचकोहीविषयकरताहै। यौर सोईयहप्र- पंचहै"ऐसीप्रत्यभिज्ञातोदोनोंप्रपचोंकोयत्यंतसादृश्यहोनेकरतिनकाभेद नग्रहणहोनेसेभूमरूपहोतीहै।।यद्यपिजाग्रत् अवस्थामेही वृत्तिकोशीघ्र विनाशीहोनेकर तिसके समानयोग्यक्षेमवाले प्रपंचकाभी नाशसिद्ध करनाउचितथायवस्थाओंमेप्रपंचकामेदसिद्धकरनेसेक्याप्रयोजनहै । तथापिभिनुपादप्रसारणन्यायकोयाश्रयणकरके यवस्थावोंमेप्रपंचका भेदसिद्धकियाहै ।। पूर्वउक्तन्यायका यहअर्थहै । जैसेकिसीभिक्षुको जबकिसीधनिककेगृहमेप्रवेशकाअवसरमिलजावेतोपादमसारणयर्थात् अनेकपदार्थउससेमांगलेताहे तैसेहीयवस्थाओंमेप्रथमजयमपंचकाभेद सिद्धहोजाएगा तोजाग्रत् अवस्थामेप्रपंचकाभेदज्ञानज्ञानप्रतिभीसिद्ध करसकतेहैं ।। यातेपूर्वकथनउचितहीहै ।। इति ॥

पूर्वाद शकापूर्वकसुषुप्तिमेप्रपंचाऽभावकीवोधकता श्रुतिकोदेवताधिकरणन्यायकीरीतिसेनिरूपण* शंका ॥ हेसिद्धांतिन् प्रत्यभिज्ञातो हमदोनोंकोस्वीकारहै ॥ परन्तुतिसकोभ्रमरूपतायुक्तनहीं। क्योंकिवाधकप्रमाणकायभावहै। विषयकेबाधविनाज्ञानको भूमरूपतानहींसंभवती॥ौरदशसोकीमत्य भिज्ञामेकथनकीहुईयुक्तिभीतिसकाबाधकनहीं ।। क्योंकि मूलप्रमाण केयभावसेयुक्तिको याभासरूपताहै। यातेप्रत्यभिज्ञाको प्रमाणरूप होनेसेअवस्थाओंमेप्रपंचकाभेदनहीं सिद्धहोसक्ता। किन्तु तिनमेभी प्रपंचकायभेदअनुभवहोनेसे प्रपंचकाएकत्वही सिद्धहोताहै ।। इसी अभिप्राय से सुपुप्ति मे प्रपंचलीन होजाताहै इसमेकोईप्रमाणनहीं । समाधान ॥ हेवादिनसाक्षातश्रुतिवचनहीसुषुप्तिमेप्रपंचकेविलयहोने मेप्रमाणहै ॥ सोदिखलातेहैं । पश्यन्वैतत्* (वृ० उ० अ०६ मा० श२३) य० ॥ सुपुप्तियवस्थामेभी यात्मादृष्टाहीहै।। इसकथनसेयह अाशंकाहोतीहै ।व्यापारवालेचक्षुयादिकरणोंकासुपुप्तिमेयभावहोने सेहमयहनिश्चयकरतेहैं । जोसुपुप्तिमेयात्माद्रष्टानहीं किन्तुजडहै ।। इसशंकाकायापहीश्रुतिसमाधानकरतीहै ।। * नहिद्रष्टुपृष्ठविपरिलोपोविद्यतेऽविनाशित्वात् ॐ ३०१० अ०६वा.२३॥ थ०॥ "द्रष्टुः" कहियेयात्माको अविनाशित्वात” कहिये वे मुर मू० ॥ सर्पसमाहिशेषोऽस्तिजाग्रहोधेऽन्यथाकथम्। इन्द्रियादेरुपादानंतदभावयतोनधीः १३ ॥ हरगीतका० ।। सर्पभ्रमतेहै विलक्षण बोधजाग्रतजानीए ॥ होइन्द्रियनकोग्रहणकैसेऐसजोनहिमानिए ॥ इन्द्रीनके अभावतेनहीं वोधजाग्रतहोकही।याहेतुतेलखइन्द्रियनकोबोधप्रतिकारणसही ॥१४॥ टी० ॥ हेसिद्धांतिन् सादिकोंको अपनेअपने भ्रमकर सिद्ध होनेकर प्रातिभासिकपनाहो || }} परन्तुजाग्रतादि प्रपंचकोतोभ्रांति कर सिद्धपना नहीं क्योंकि वह इन्द्रिय जन्य प्रमाका विषयहै । यदि इन्द्रिय जन्य प्रमा की अविषयता मपंच निष्ठ मानोगे तो घटादि प्रपंच के ज्ञान अर्थ इन्द्रियादिकों का ग्रहण कोईकैसे करेगा। शंका । हेवादिन् भ्रमसिद्धप्रपंचहै ऐसेकहनेवाले वादीकेपूति इन्द्रियादिकोंको पंचज्ञानकेप्रतिकारणपनाहीयसिद्धहै ॥ समाधान ।। हेसिद्धांतिन् इन्द्रियोंके अभावहुए जिस कारणसे पूपंच ज्ञाननहींहो सक्ता इसीसे इन्द्रियकारणहैं ॥ यहांयहयनुमानजानना । जाग्रतादिएपंचज्ञानं भ्रमजनादिलक्षणं ऐन्द्रियकत्वात् यन्नैवं तन्नैवं यथाभ्रमजानं * य० ॥ जाग्रतादिपूपंचकाजोज्ञानहै ।सोभूमज्ञानविलक्षणहे। इन्द्रियजन्यज्ञानहोनेसे ॥ जोजोज्ञानभूमज्ञानसे विलनणनहींहै ॥ सोसोज्ञानइन्द्रियजन्यभीनहीं है जैसेरज्जुमादि भूमजानहे ॥ इति ॥ श्रवपूर्वकथनकियेहुए यर्थकोविस्तारसे निरूपणकरतेहैं ॥ पूर्वउक्त युक्तिसेपूपंचको भूममात्रगरीरहोनेकर पातीतिकसनाके सिद्धहएभी रज्जुसर्पकेज्ञानसे श्राकागादिपूपंचज्ञानमें कोईकविलनणताहै ।।

पूबाई - शंका । हेवादिन प्रपंचज्ञानमें अविद्याजन्यत्व औयर्थगोचरत्वरज्जु सर्पज्ञानके तुल्यहोनेसेकसे तिसमेंरज्जुसर्पज्ञानसे विलक्षणताहै ।। समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् कारणकृत तथा विषयकृत प्रपंचज्ञान में रज्जुसर्पज्ञानसे विलक्षणता है ॥ तैसे ही दिखलाते हैं । पूपंच ज्ञान में प्रत्यक्षादि प्रमाणको कारणताहै और अविद्याको कारणताकाअभावहै । यही सर्पज्ञानसे मंपचज्ञानमे विलक्षणता है औरसर्पज्ञानमयविद्याकोकारणताहै।यौरभत्यक्षादिभमाणकोकारणता नहीं।यहीमपंचज्ञानसे सर्पज्ञानमें विलक्षणताहै ।। इसमकारतिनदोनों ज्ञानोंमेंकारणकृतविशेषताहै|अवतिनदोनोंज्ञानोमेंविषयकृतविलक्षणता कहतेहैं । जैसेयज्ञातसत्ताकयर्थको इन्द्रियादिजन्यज्ञानविषयकरताहै तैसेहीयर्थको अविद्या जन्यभूमभी विषय करताहै यहनहीं संभवता थसंभवमें हेतुकहतेहैं ॥ ज्ञानमात्रशरीरहोनेकर भूमसेपूर्वविषयकी सत्यताकायभावहै ॥ ौरभूमकेविषयसे इन्द्रियादिजन्यज्ञानकेविषय मेंविशेपताहै।। क्योंकिइन्द्रियादिकोंसे उत्पन्नहुएज्ञानकोसन्निकर्षादि जन्यहोनेकरज्ञानसे पूर्वविषयकीसत्ता अवश्यकहनेयोग्यहै । अर्थयह प्रत्यक्षज्ञानकोइन्द्रिययौअर्थ केसन्निकर्पजन्यहोनेसे तिसज्ञानसेप्रथम तिसकाकारणरूपताकरसन्निकपकीसिद्धियवश्यकहनेयोग्यहै। औरतिस सन्निकर्पकाआधाररूपताकरज्ञानसे पूर्वचक्षुकी न्याईविपयकीसत्ताभी अवश्यकहनेयोग्यहै । औरयनुमितिरूपज्ञानको लिंगज्ञानजन्यत्व कानियमहै।।ौरलिंगको पत्नतथाव्याप्तिकरघटितपनाहे औरपक्षतथा व्याप्तिकोसाध्यकर घटितपनाहै तिसीसे अनुमितिज्ञानसेमथम साध्य कीसत्ताथवश्य अन्वेषणकरनेयोग्यहै ।। यौरयदिसिद्धांतीऐसेकहे !

३० स० मु० ५२६ अयमाम्रवृक्षः फलवान्भविष्यति । आमूत्वेसति वर्डमानत्वात् ॥ संप्रतिपन्नामवत् ॥ * य० ॥ ययानकावृक्ष फलवाला होगा भान हुयावर्द्धमान होनेसे ।। प्रसिद्धयामकीन्याई । इसभविष्यत् यर्थकोविषयकरने वालीयनुमितिमे व्यभिचारहै । क्योंकियर्थसे विनाभीज्ञान होगया सोयहकथनभीनहींसंभवा।।क्योंकितिसयनुमानमेंभीभविष्यत्अर्थको अनुमितिसेपथमही विद्यमानताहै अर्थात् विद्यमान प्रागभावकाप्रति योगिरूपताकर अनुमितिसे पूर्वभविष्यत्यर्थकी विद्यमानताहै।याते अनुमितिसेपूर्व भविष्यत् अर्थ नहीं है यह कथन असंगत है । और भविष्यत्यर्थकायभाव मानेहुएवर्तमान अर्थवाली अनुमितिकी ही प्राप्तिहोगी तिसकर भविष्यत्यर्थकयनुमितिका लोप होजाएगा ॥ इसप्रकारयनुमितिसेपूर्व अर्थको विद्यमान होनेकर भविष्यत् अर्थक अनुमितिमेकैसे व्यभिचार होसकताहै ।। इति ।। औरशाद ज्ञानको शब्दौयर्थकवाच्यवाचकरूपसंबंधज्ञानकर जन्यहोनेसे शदकर्णक ज्ञानसेप्रथमहीअर्थकीसत्ताभीऊहाकरनेयोग्यहै । यातेइन्द्रियादिजन्य ज्ञानसेप्रथमविषयकीसत्तायवश्यकहनेयोग्यहै ।। यहीभ्रमज्ञानसेप्रपंच ज्ञानविलक्षणताहै। औरयन्वयव्यतिरेकरूपप्रमाणकरकेइन्द्रियादि कोंकोप्रपंचज्ञानकेप्रतिकारणता सिद्धहोनेसे प्रपंचमिथ्यात्ववादीनेभी तिनकाकार्यकारणभावअवश्य अंगीकार कियाचाहिये ॥ शंका ॥ हेवादिन प्रपंचज्ञानमे भ्रमज्ञानसे विलक्षणता यद्यपिहो तथापिइससे तुम्हाराकौनइष्टसिद्धहुश्रा ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् पूर्वउक्तयुक्ति सेज्ञानसेपूर्वयर्थकी सत्ता अवश्यस्वीकार करनेयोग्यहोनेसे प्रपंचकी पूबाई अज्ञातसत्तावश्यस्वीकारकरनेयोग्यहै ॥ अन्यथाम्रमसेविलक्षणता नहींसंभवैगी ॥ अर्थयह प्रपंचज्ञानको उत्पत्तिसेप्रथम प्रपंचरूपविषय कीसत्तानमानेहुएप्रपंचरूपविषयतथा इन्द्रियकेसन्निकर्पकोज्ञानके प्रति कारणतानहींहोगी किन्तुथविद्याकारणकत्वमात्रता प्रपंचमेप्राप्तहोने करभ्रमरूपताहीहोगी। भ्रमसेविलक्षतानहींसिद्धहोगी। याते प्रपंच कीयज्ञातसत्ताअवश्यमाननीचाहिये।यहीहमाराइष्टसिद्धहुया१३॥इति पूर्वअर्थकेअनुवादपूर्वकइन्द्रियादिकोकोप्रपंचज्ञान केप्रतिकारणताकाखंडन के समाधान।। हेवादिन्याकाशादि रूपप्रपंचज्ञानकेप्रति इन्द्रियादिकोंको कारणताहोनेकर भ्रमज्ञानसे तिसकीविलक्षणताहै तिसविलक्षणताके उपपादनयर्थप्रपंचकीयज्ञातसत्ता माननेयोग्यहै । यहयर्थतुमनेपूर्व निरूपणकियासोनहींसंभवता । क्योंकि मू० ॥ इन्द्रियाणांकारणात्वेभवेच्चोयतदातव । स्वप्नभ्रमेयथातेषामन्वयव्यतिरकधीः ॥१४॥ वसंततिलकका० ॥ इन्द्रीनकारणयदाभवतोसुजाना तौहोत कालपनकातुमरीप्रमाना॥ स्वप्नेभ्रमेजसतिनांकरणोदिखाना ।। तेसे सुज्ञानव्यतिरेक अन्वेवखाना ॥ १५ ॥ टी० ॥ इन्द्रियोंको यदि प्रपंचज्ञानीकारणताहोतोतुम्हारा विकल्पबने थौरागे कथनकीहुईरीतिसेइन्द्रियोंको प्रपंचज्ञानकेमति कारणताथसिद्धहै । औरजोपूर्वमपंचज्ञानकेमतिइन्द्रियोंकी कारणता कामाइक यन्वयव्यतिरेकरूपमाणकदाथा वहभीभ्रमरूपहै क्योंकि वे०सि०म० १३० जैसेस्वप्नभ्रममेइन्द्रियोंकायन्वयव्यतिरेकभ्रमसेप्रतीतहोताहै।तैसेजाग्रत मेभीजानना ।इति।। अवइसीयर्थकोविस्तारसेनिरूपणकरतेहैं ।। हेवादिन इन्द्रियादिकोंको वास्तवसेपूपंचज्ञानकी कारणतानहीं संभवती । किसहेतुसे इन्द्रियादिकोको प्रपंचज्ञानकी कारणतानहीं ? ऐसीजिज्ञासाके हुएकहतेहैं । हेवादिन् तिनइन्द्रियोंकोज्ञानकेभतिजो कारणताहै तिसमेंयहविचार करनेयोग्यहै । * विनाकार्यन कारणं ॥ य० ॥ कार्यसे विनाकारण नहींकहाजाता ॥ इसन्यायसे इंद्रियनिष्ठकारणता ज्ञाननिष्ठकार्यताके श्राधीनकहनेयोग्यहै । और सोकार्यतानिरूपणकरनीकठिनहै । यातेकार्यताकरनिरूपणकरनेयोग्य इन्द्रियनिष्ठ कारणताभी अलीकहै । अथपमानिष्ठकार्यताकी दुनिरूप्यतानिरूपण कर अवइन्द्रियनिष्ठकारणताके निषेधयर्थप्रमानिष्ठ कार्यताकीदुनि रूपताउपपादनकरनेकेलिये विकल्पकरतेहैं । हेवादिनक्या ? इन्द्रिया- दिकोंकोपमामात्रकी कारणाताहे । यथवाभ्रमतथा।पूमारूपसाधारण ज्ञानमात्रमें तिनकोकारणताहै । अथवाभ्रममात्रमें तिनकोकारणता है। यहांथमविकल्पमें यद्यपिप्रमामात्रमें इंद्रियोंकोकारणता नहीं संभवती॥ क्योंकिईश्वरपूमामें व्यभिचारहै ॥ तहांइन्द्रियोंकोकारणता नहीं ॥ यातेपूथमविकल्पथसंगतहै । तथापियहां “मात्र" प्रत्ययका अवधारणयर्थहै ॥ काय॑न्यअर्थनहीं ॥ यर्थयहपूमाकीकारणताहै कोईसंपूर्णप्रमाकी कारणतानहीं । यातेप्रथमविकल्प मंभवताहै ।। औरदूसरेविकल्पमेंभी “मात्रच्" प्रत्ययकाययधारण अर्थहीजानना। - पुवाई इति ॥ प्रमामात्रमें इंद्रियादिकोंको कारणताहै । यहप्रथमपक्षनहीं संभवता । क्योंकिइंद्रियादिजन्य ज्ञानमेंजोप्रमात्वहै ॥ वहभूमके विषयसेभिन्नअर्थ विषयत्वरूपताकर सिद्धकरनेयोग्यहै । अर्थात् भूमकेविषयसेभिन्न अर्थकोविषयकरनेवालाज्ञान प्रमाकहाचाहिये ॥ औरभ्रमकेविषयसे भिन्नयर्थत्व प्रमाज्ञानकी विपयताकर सिद्धकरने योग्यहै । अर्थयहपूमाज्ञानका जोविषयहैवहभ्रमके विषयसेभिन्न अर्थकहनेयोग्यहै । ऐसेमानेहुएअन्योन्याश्रयदोपस्पष्टहीप्राप्तहोता है।सोदिखलातेहैं।भ्रमकेविषयसेभिन्नयर्थकाज्ञानप्रमाज्ञानकेयाधीनहै। औरणमात्वकाज्ञान भूमकेविषयसे भिन्नयर्थकज्ञानके अाधीनहै । इसीसेप्रमाकाज्ञान दुर्घटहोनेकरतिसके प्रतिइंद्रियादिकोंकोकारणतातो अतिदुर्निरूप्यहै यहभावहै । इसीमेंौरदूपणकहतेहैं । यौरहेवादिन अर्थको भूमविषयसे भिन्नपनेमें प्रमाविषयत्व साधकनहीं क्योंकि "मिथ्याहीयहरजत भानहुया” इसप्रमानेमिथ्याभूत रजतकोभीविषय कियाहै । अर्थातइसपूमाके विपयरजतको भूमका असंबंधिपनानहीं देखा याते पूमाज्ञानकी विपयताअर्थके सत्यत्वकायर्थातभ्रमजानकी अविषयताकापूयोजकनहीं । शंका । हेसिद्धांतिन्यर्थकोभ्रमसेव्या वृतत्वप्रमाजानकी विषयताकरहमनहींसिद्धकरते जिससे अन्योऽन्या- श्रयदोपतथा व्यभिचारदोपहो किन्तु अबाधितत्वरूपतासे हमभ्रमसे भिन्नत्वयर्थमेसिद्धकरतेहैं ॥ समाधान ॥ हेवादिन् ।। अतोऽन्यदात नेहनानास्तिकिंचत इत्यादिक श्रुतियोंकरदैतको मिथ्यापनावोधन होनेसेविषयमे श्रयाधितत्वकी असिद्धिहै यातेपूर्वउक्तदोपदूर नहींहोसकते इसप्रकार १२२ दे०सि० मु० नेत्रादिकोंकोपूमाज्ञानकीकरणता रूपपूमाणता स्वीकार करकेप्रमाका ज्ञानकठिनहोनेकरतिसकरनिरूपितइन्द्रियादि निष्ठकारणता काज्ञानतो अत्यंतकठिनहै । यहअर्थपूर्वनिरूपणकिया । * अथप्रमाणके विषयविवचनपूर्वक चक्षु आदिकोंमें प्रमाणताकाखंडन अवइंद्रियादिकोंमें प्रमाणताकाहीअभावहै इसअर्थकोनिरूपण करतेहैं ॥ किंवा ॥ हेवादिन् । * अनधिगतार्थ गंतृपमाणं श्र० । अज्ञातअर्थका ज्ञापक प्रमाणहोताहै । यहप्रमाणके जाननेवालोंकी मर्यादाहै । और यज्ञातअर्थ विषयक अनुभवकी उत्पत्तिद्वाराइंद्रियोंको अज्ञातयर्थकी विषयताकहनेयोग्यहै ॥ शंका ।। हेसिद्धांतिन्प्रमाणोंको अज्ञातअर्थविषयकमाननेमें कोईदोपनहीं । समाधान !| हेवादिन् यज्ञातगोचरतातिनकोजवमानोगेतोयधिष्ठान मात्रविषयत्वही तिनकोमाप्तहोगा क्योंकि अधिष्ठानमेंही अज्ञातताहै। अधिष्ठानमेंही प्रमाणोंकी विपयताकिसहेतुसेहै ऐसीयाकांक्षाके हुए कहतेहैं । निश्चयकरप्रमाणोंकाविषय अज्ञातहीहोताहै । वहथज्ञा 'तत्वयधिष्ठानमेंहीहै अपंचमेंनहीं क्योंकि तिसमपंचको जडहोनेकर स्वभावसेहीयावृत्तपनाहै।। पुनःतिसमेंग्रज्ञानकी विषयतारूपयज्ञातता कल्पनमेंकोई योजननहीं ॥ भावयहकियज्ञानकीविषयताकामयोजन श्रावरणाकरनाथा सोयावरणजडमपंचमें प्रथमहीस्वभावसिद्धहै। यहां . यहयनुमान जानना।

विमतः प्रपंचोनाज्ञातः जडत्वात् । व्यतिरेकेण आत्मवत् ॥ य० ॥विवादकाविपयजोमपंचहै।वहयज्ञातनहीं।।जडहोनेसे जोजोअज्ञातहैसोसोजडभीनहीं ।। जैसेयात्माहै ॥ इति । यद्यपि 'अज्ञातोघट इसमत्यक्षयनुभवकाविरोधहोगा।तथापिअज्ञानकेसहित घटादिकोंका सातिचेतनमे अध्यासहोनेकर तिसमतीति कायन्यथा संभवहै । भावयहसातिचेतनमयज्ञानयौरघटदोनों यध्यस्तहोनेकर तिनकासामानाधिकररायहै। तिससंबंधसेघटनिष्ठभीअज्ञातताप्रतीति होतीहै । वास्तवसेघटयज्ञानकाविषयनहीं।।यातेप्रत्यक्षकोभ्रमरूपता होनेकरतिसकाविरोधनहीं।शंका।।यधिष्टानहीं यज्ञानकाविषयहो।यौर तिममेप्रमाणोंकीभीविषयताहोतोभीप्रपंचकाएकदेशजोशुक्तिरज्जुमरू भूम्यादिकहैं । तिनकोरजतादिकोंकायधिष्ठानहोनेकरयज्ञातताहोने सेइंद्रियोंकीविषयता तिनमेप्राप्तहुई ।। समाधान ॥ हेवादिन्तैसेमाने हुएअधिष्ठानताएकचिदात्मामेहीविश्रांतिकोप्राप्तहोतीहै ।। औरमिथ्या रजतादिकों को भी शुक्ति श्रादि अवच्छिन्न चेतन निष्ठ अविद्याका परिणाम होने से चेतन ही सर्वत्र भ्रमों का अधिष्ठान है ॥ शुक्ति अादिक नहीं । याते सर्वाधिष्ठान प्रत्यक् श्रात्मा विषयक इन्द्रियों कोप्रमाणताहै यहकहनयोग्यहै । औरपूत्यक्यात्मविषयत्वरूपतासे तिनकोपूमाणता नहींसंभवती । क्योंकिप्रत्यगात्मा इन्द्रियोंकायवि पयहै । अनिर्वचनीयपूकाशने योग्यविषयोंसे विपरीतरुपतासेयर्थात् 'सतचित्यानंदादिरूपतासेपूकाशकरतेहुएकीन्याईजोमतीतहो। तिस 'कोप्रत्यककहतेहैं । वहप्रत्यकहीयात्माहै तैसेमानेहुएअपने प्रकाशके ०सि० मुं० अर्थयात्माइन्द्रियों की अपेक्षानहींकरता ॥ शंका ॥ स्वयाश्रित अज्ञानकीनिवृत्ति करनेवालीस्वविषयकजोवृत्तिहै । तिसकीउत्पत्ति केलियेइन्द्रियोंकीयपेक्षा यात्माकरेगा ॥ समाधान ॥ हेवादिन श्रज्ञानकी निवृत्तिकेयर्थ यात्मा इन्द्रियोंकी अपेक्षा करताहै | यह तुम्हाराकथन यद्यपिसत्यहै । तथापिइन्द्रियोंकी यात्मामेंप्रवृत्तिनहीं होसक्ती ॥ क्योंकिरूपादिगुणोंको सन्मुखकरके प्रसिद्ध इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिहोतीहै।। अर्थयहरूपादिधर्मविशिष्टमें इंद्रियप्रवृत्तहोतेहैं । और थात्मारूपादिधर्मसे रहितनिधर्मकहे ॥ ऐसा श्रुतिमेंसुनाहै तिस कारणसे इंद्रियोंकी विषयताप्रात्मामें युक्तनहीं ॥ रूपादिधर्मरहित थात्मामें इंद्रिय प्रवृत्तनहींहोते इस अर्थमें श्रतिभी प्रमाणहै ॥ सो श्रुतियह है ॥ * परांचिखानि व्यतृणत् स्वयंभूःतस्मात् परांपश्यति नांतरात्मन् * ( के० ३० ६० ४।१ ) ०॥ ( "स्वयंभूः") परमात्मा (परांचि) वाद्यवस्तुओंको विषयकरनेवाले (खानि ) इन्द्रियोंको (व्यतृणत् ) हिंसाकरता भया ॥ भावयहबाह्यवस्तुके विषयकरनेकास्वभाव तिनकाईश्वरने रचनाकियाहै । यातेयनात्मदर्शनकी साधनताही तिनकाहिंसन अर्थात् मारनाहै। (तस्मात् ) जिसकारणसे इन्द्रिय वाह्य वस्तुको हीविषयकरतेहैं तिसीकारणसे सकलजनइंद्रियोंसे ( पराब् ) अनात्म पदार्थोंकोही ( पश्यति ) देखताहै । और (नांतरात्मन ) सर्वसे यंतरात्माको निधर्मकहोनेसेकोई तिसकोनहींदेखसक्ता ॥ इति ॥

१२५ पुराई इसमकारपूर्वउक्तयुक्तिसे जैसे प्रपंचज्ञानमें इंद्रियों को साधनताका श्रभावहै ॥ तैसेउक्तुप्रतिसे श्रात्मज्ञानमेंभीतिनको साधनताका श्रभावहोनेसेकहींभी इंद्रियोंकोममाणतानहीं यहभावहै ॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिन् “तस्मात्परापश्यति" यह श्रुतिइंद्रियोंकोमपंचज्ञानकी कारणतामतिपादनकरतीहुई तिनकोपपंच विपयत्वदिखलाती है। याते किसरीतिसतिनमें प्रमाणताकाअभाव तुमकहतेहो ॥ समाधान ॥ हेवादिन यहश्रुतिइंद्रियोंकोपूपंचविषयत्वके दिखलानेमें तात्पर्यवाली है यहतुमकहतेहो ॥ अथवाांद्रयोंकोमपंचविषयत्वकायनुवादकरके थात्मामेंइंद्रियोंकी अविषयताप्रतिपादनमें तात्पर्य्यवालीहै ॥ मथम पनतोनहीं संभवता क्योंकिनिष्फलतथा ज्ञातअर्थके प्रतिपादनमें श्रुतिकेवात्पर्यकी अयोग्यतहै।ौरद्वितीयपक्षमेभीयहविचारकरनेयोग्य है।अनुवादक्या?प्रमाणसिद्धकाश्रतिकरतीहै।यथवाश्रमसिद्धकाकरती प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ।। क्योंकिप्रपंचप्रमाकेप्रतिइंद्रियोंमेकारणता के ग्राहकप्रमाणरूपतासे अंगीकारकिये जोयन्वयव्यतिरेकादिहैं तिन कीागेकथनकी हुईरीतिसे अन्यथाहीउपपतिहै ॥ ौरभ्रमसिद्ध के अनुवादपक्षमे इंद्रियोंकोप्रपंचविषयकप्रमाकीकारणतारूपसेप्रमाणता नहींसंभवती ॥ जैसेस्वामनानके प्रति इंद्रियोंका अन्वयव्यतिरेकभ्रम रूपहै ॥ तैसेजाग्रतमेम्रमरूपयन्वयव्यतिरेककर सिद्धजोमपंचज्ञानकी इंद्रियोंकोकारणताहै तिसकायनुवादकरकेयात्मामेइंद्रियोंकीविषयता काअभावदिखलानेमेश्रतिकातात्पर्यहै ॥ यातेप्रपंचप्रमाकेप्रतिइंद्रियों, कोकारणताकेनहोनेसे प्रमाणताकाअभावहै । इसप्रकार प्रमामात्रमे १२६ वेमु इंद्रियोंकोकारणताहै।यहप्रथमपक्षथा। सोषमात्वकेनिरूपणकीकठि- नताहोनेकर तिसपूमांनिष्ठकार्यता निरूपितकारणता तिनइंद्रियोंमेन ग्रहणहोनेसेयौर-माकीकरणताकातिनमेयभाव होनेसेनहीं संभवता यहपूर्वकथन किया।ौरइंद्रियोंकोपमाजानकीकारणताकाअभावरूप जोहेतुहै तिसकरभ्रमपूमासाधारणज्ञानमात्रमेइंद्रियोंको कारणताहै ॥ यहद्वितीयपक्षभीनिरासहुया। क्योंकिपूर्वउक्तरीतिसेप्रमाकी कारणता इंद्रियोंमेनिरूपणा नहींहोसकती । शंका ।। हेसिद्धांतिनपूर्वउक्तरीति सेभ्रमप्रमासाधारणज्ञानमात्रमेइंद्रियोंकोकारणताकेअभावहुएभ्रममात्र मेतिनकोकारणताहै ॥समाधान।। हेवादिनवहतृतीयपक्षीयसंगत है क्योंकियहएकदेशीकाविकल्पहैअथवानेयायिकादिकोंका है।यहविचार करनेयोग्यहै।।तिनमेप्रथमपक्षनहींसंभवता।।क्योंकिभ्रमज्ञानकोयविद्या मात्रकारणकत्वतुमनेयापहीपूर्वकथनकियाहै।यदिइंद्रियोंकोभ्रमज्ञान केप्रतिकारमानोगे तोअपनेकथनकाविरोधप्राप्तहोगा । औरद्वितीय पक्षमेतिननैयायिकादिकोंसे हमयहपूछतेहैं ।। इंद्रियोंको भ्रमज्ञानकी कारणताकाग्राहकप्रमाणअन्यव्यतिरेकहीहै। यथवा कोई अन्यप्रमाणहै प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ॥क्योंकिजेसेस्वप्नमेइंद्रियोंकीमवृतिकेयभाव हुएभीइंद्रियोंकायन्यव्यतिरेकज्ञानकेप्रतिदेसनेमेयाताहै। वहअन्वय व्यतिरेकप्रमाणरूपहोनेकरकारणताकाग्राहकनहींहोसकता ॥ तैसे जाग्रत्मेभीइंद्रियोंका अन्वयव्यतिरेकज्ञानकेप्रतितिनको कारणताका ग्राहकनहीं ।। औरकारणताकाग्राहक कोईअन्यप्रमाणहै यहद्वितीय पक्षभीनहींसंभवता क्योंकितिसकीयप्रतीतिहै ॥ शंका ॥ रूपोपलब्धिःकरणसाध्या क्रियात्वात्॥

पुवाद . छिदिक्रियावत् ॥ थारूपकाजोज्ञानहैवहकरणसाध्यहै । क्रियारूपहोनेसे।जोजोक्रिया होतीदेवहकरणासाध्यहोतीहै जैसछेदनरूपक्रियाहे ॥इति।। इत्यादिक अनुमान नेत्रादिकोंको प्रपंचस्वरूप रूपादिकोंकी उपलब्धिके प्रति- कारणताकेग्राहकह।याते प्रमाणका प्रभाव कथन नहीं संभवता । समाधान ॥ हेवादिन्उपलब्धिशदसेस्फुरणरूपशुद्धचेतनमात्रकहतेहो अथवावृत्तिरूपज्ञानकहतेहो अथवावृत्त्युपहितचेतनकोकहतेहो।प्रथम पत्नतोनहींसंभवता ।। क्योंकि ॐ नित्यं विज्ञानं य० ॥ नित्यविज्ञानस्वरूपहै । इसतिसे चेतनस्वरूपज्ञान कोनित्यत्वसिद्धहुएकरणकीअपेक्षानहींहै ॥ ौरयदिद्वितीयपक्षकहो तोवहवृत्तिरूपउपलब्धिकरणसेरहितहुईहीअनुमानमेपतहै अथवानेत्र सेभिन्नकरणवालीहुईपक्षहै ॥ अथवानेत्ररूपकरणवालीहुईपक्षहे ।। पथमौद्वितीयपक्षतोनहींसंभवते ॥ क्योंकिउपलब्धिको अकरणिक मानेहुएयथवाचक्षुभिन्नकरणिक मानेहुए करणसाध्यत्वरूपसाध्यका अभावहोनेसेयनुमानमेवाधामहोगा। औरतृतीयपक्षमेग्रन्योन्या श्रयदोपकीमाप्तिहै ।। सोऐसेहै ।। चतुहैकरणजिसकाऐसीवृत्तिकेसिद्ध हुएचक्षुकरणिक उपलब्धि रूप पक्षवाले यनुमानकी प्रवृत्तिहोगी ।। और अनुमान के प्रवृत्त हुए चक्षु करणिक वृत्ति की सिद्धि होगी ।। इस मकार वृत्तिको पक्षत्वके अभावसे ही वृत्ति उपहित चेतनको भीपक्षपनानहींसंभवता क्योंकितिसमेभी अन्योऽन्याश्रय दोपहीमाप्त होताहै ॥ ौरपूर्वउक्तविकल्पोंकोत्यागकर उपलब्धिमात्रकोपक्षकहो १२९ दे०सि०मु. तोवहभीनहींसंभवता ।। क्योंकि * तस्मादापष्टष्टत उपस्पृष्टोमनसाविजानाति के बृ० उ० अ०३ ब्रा० ॥३ य० ॥ तिससेभीपृष्टसेसमीपस्पर्शहुएपदार्थकोमनसेयहपुरुष जानलेताहै ॥ इसश्रुतिसेमनकी स्वतंत्ररूपतासे बाह्यप्रवृत्तिसिद्ध है । यातेरूपादिउपलब्धिनेत्रादिकरणसाध्यनहीं किन्तुमनोजन्यहै अथवा अविद्याजन्यहै ।। औरयहांयहअनुमानभीजानना ॥ विमतंचक्षुर्नरूपस्यतदाश्रयद्रव्यस्यवाग्राहकं असा धारणेंद्रियत्वात् ॥ घ्राणादिवत् ॥ य० ॥ विवादकाविषयजोनेत्रइंन्द्रियहै । वहरूपौरतिसके श्राश्रयभूतद्रव्यकाग्राहकनहीं।।यसाधारणइन्द्रियहोनेसे। जोजोअसा धारणइन्द्रियहै।सोसोरूपयौरतिसके आश्रयभूतद्रव्यकाग्राहकनहीं है।। जैसेघाणादिकइंद्रियहैं । इसथनुमानकरनेत्रइंद्रियकोरूपकीग्राहकता कानिषेधहोनेसेघ्राणादिक इंद्रियोंको गंधादि विषयोंकी ग्राहकताका निषेधभीजानलेना ।। इसयनुमान मे “असाधारणेंद्रियत्वात्" यह हेतुहै। तिसकायदिवाह्यइंद्रियहोनेसे। ऐसायर्थकरें ॥ तोजिनकेमतमे मनकोइंद्रियरूपताहै।उनकमतकोलेकरतोयसाधारणपदसफलहोसकता हैं। परन्तुजिनके मतमेमनइंद्रियनहीं तिनकेमतमे यसाधारण पदकी निष्फलताहोगी । औरयदिऐसा निर्वचनकरें “यत् किंचन कार्यता निरूपित कारणता पाश्रयत्व" कानामयसाधारणत्वहैतोयनुमानमे बाधप्राप्तहोगा ॥ क्योंकियकिंवत्कार्य रूपकीउपलब्धिहै तनिरू- पितकारणताकाथाश्रयपनानेत्रइंद्रियमेमानेहुएरूपयौरतिसकेयाश्रय पूर्वाद भूतद्रव्यकायग्राहकत्वरूपसाध्यकाअभावहोनेसेवाधकीपातिस्पष्टहीहै। यातेयह निर्वचनभी समीचीननहीं । किंतु “यकिंचित् कारणता निरूपितकार्यता याश्रयत्वरूप” ही असाधारणत्वजानना ।। अर्थयह तेजादिभूतोंके सतोरण यत्किंचित् कारणताहै तिसकरनिरूपित कार्यतानेत्रादि इन्द्रियों विद्यमानहै याते उक्तनिर्वचनही समीचीन है ॥ इति ॥ औरमनभी प्रपंचउपलब्धि ॥ मनकीकरणताके निषेधपूर्वक अविद्यामूलक प्रपंचउपलब्धिका स्थापन । काकरणनहींहै । श्रवइसीको निरूपणकरतेहैं। वहमनक्या? श्रात्माकीउपलब्धि अर्थात् ज्ञान का करणहैयथवासुखादिउपलब्धि केतिकरणहै । पूथमपक्षतोकर्तृकर्म रूपविरोधहोनेसेनहीं संभवता। क्योंकिशुद्धात्माकोतो स्वभकाशस्वरूपहोनेसे मनोजन्यज्ञानकीविषय ताकाअभावहै औरयंतःकरणविशिष्टयात्माके ज्ञानकामनकोकरण माने ।। तोविशिष्टवृत्तिधर्मकोविशेपणमें वर्त्तनेकानियमहोनेसेएकही मनकोउपलब्धिका याश्रयरूपसे कर्तापनाहोगा। यौरउसीकोविषय रूपहोनेसेकर्मपनाहोगा।सोदोनोंएककालमें एकअधिकरणविषयक विरुद्धहैं ॥ यहीकर्तृकर्मरूपविरोधहै । यातेयात्माके ज्ञानकीकरणका मनमेंनहींसंभवती ॥ ौरद्वितीयपक्षभी असंगतहै । क्योंकिसुखा दिकसाक्षिभास्यहैं।। इसप्रकारइन्द्रियतथामनको प्रपंचज्ञानकीकरणता कायमावहोनेसे अविद्यामूलकहीजगत्काज्ञानहैकिसीभीहेतुसेइन्दूि- यादिकोंको प्रमाणतानहीं ॥ । * शंकापूर्वक प्रपंचको अविद्योपादान १२८ वे०सि०म० तोवहभीनहींसंभवता । क्योंकि * तस्मादापटष्टत उपस्पृष्टोमनसाविजानाति के बृ० उ० अ० ३ ब्रा० शा३ अ०॥ तिससेभीपृष्टसेसमीपस्पर्शहुएपदार्थकोमनसेयहपुरुष जानलेताहै । इसतिसेमनकी स्वतंत्ररूपतासे बाह्यमवृत्तिसिद्धहै ॥ यातेरूपादिउपलब्धिनेत्रादिकरणसाध्यनहीं किन्तुमनोजन्यहै अथवा अविद्याजन्यहै । औरयहायहअनुमानमीजानना ॥ विमतंचक्षुर्नरूपस्यतदाश्रयद्रव्यस्यवाग्राहकं असा धारणोंद्रियत्वात् ॥ घ्राणादिवत् ॥ य० ॥ विवादकाविषयजोनेत्रइंन्द्रियहे । वहरूपयौरतिसके थाश्रयभूतद्रव्यकाग्राहकनहीं।यसाधारणइन्द्रियहोनेसे। जोजोयसा धारणइन्द्रियहै।सोसोरूपयौरतिसके थाश्रयभूतद्रव्यकाग्राहकनहीं है। जैसेघ्राणादिकइंद्रियहैं । इसयनुमानकरनेत्रइंद्रियकोरूपकीग्राहकता कानिषेधहोनेसेप्राणादिक इंद्रियोंको गंधादि विषयोंकी ग्राहकताका निषेधभीजानलेना । इसयनुमान मे “अमाधारगोंदियत्वात्" यह हेतुहै। तिसकायदिवाह्यइंद्रियहोनेसे। ऐमाथर्थकरें ।। तोजिनमतमे मनकोइंद्रियरूपताहे।उनकेमतकोलेकरतोथमाधारणपदसफलहोसकता है। परन्तुजिनके मतमेमनइंद्रियनहीं तिनकमतमे असाधारण पदकी निष्फलताहोगी । औरयदिऐसा निर्वचनकरें “यत् किंचन कार्यता निरूपित कारणता थाश्रयत्व" कानामथमाधारणत्वहतोथनुमानमे वाधपाप्तहोगा ।। क्योंकियतचित्कार्य रूप की उपलब्धिहे ततनिरू- पितकारणताकायाश्रयपनानेत्रइंद्रियमेमानेडएरुपचौरतिमकेथाश्रय - - पूर्वाई १२६ भूतद्रव्यकायग्राहकत्वरूपसाध्यकाअभावहोनेसेवाधकीप्राप्तिस्पष्टहीहै। यातेयह निर्वचनभी समीचीननहीं । किंतु “यकिंचित् कारणता निरूपितकार्यता याश्रयत्वरूप” ही असाधारणत्वजानना ।। अर्थयह तेजादिभूतोंके सतोगुणमेंयत्किंचित् कारणताहै तिसकरनिरूपित कार्यतानेत्रादि इन्द्रियोंमें विद्यमानहै याते उक्तनिर्वचनही समीचीन है ॥ इति ॥ औरमनभी पूपंचउपलब्धि ।। मनकीकरणताके निषेधपूर्वक अविद्यामूलक प्रपंचउपलब्धिका स्थापन । * काकरणनहींहै । अबइसीको निरूपणकरतेहैं । वहमनक्या? श्रात्माकीउपलब्धि अर्थात् ज्ञान का करणहैअथवासुखादिउपलब्धि केभतिकरणहै ॥ पृथमपक्षतोकर्तृकर्म रूपविरोधहोनेसेनहीं संभवता । क्योंकिशुद्धात्माकोतो स्वभकाशस्वरूपहोनेसे मनोजन्यज्ञानकीविषय ताकाअभावहै औरयंतःकरणविशिष्टयात्माके ज्ञानकामनकोकरण माने ।। तोविशिष्टवृत्तिधर्मकोविशेषणमें वर्त्तनेकानियमहोनेसेएकही मनकोउपलब्धिका श्राश्रयरूपसे कपिनाहोगा। औरउसीकोविषय रूपहोनेसेकर्मपनाहोगा।सोदोनोंएककालमें एकअधिकरणविषयक विरुद्ध हैं ।। यहीकर्तृकर्मरूपविरोधहै । यातेयात्माके ज्ञानकीकरणता मनमेंनहींसंभवती ॥ यौरद्वितीयपक्षभी असंगतहै । क्योंकिसुखा दिकसाक्षिभास्यहें।। इसप्रकारइन्द्रियतथामनको मपंचज्ञानकीकरणता कायभावहोनेसे अविद्यामूलकहीजगत्काज्ञानहैकिसीभीहेतुसेइन्द्रि- यादिकोंको प्रमाणतानहीं। * शकापूर्वक प्रपंचको अविद्योपादान -१३० वे०सि० मु कत्वस्थापन ॥ ॐ ॥ शंका ।। हेसिद्धांतिन् अविद्या हैउपादानजिनका ऐसेजो। मिथ्यारजतादिकहैं तिनको अविद्याकी वृत्तिकर ग्राह्यपनातो संभवताहै। परंतुघटादिजगत्कातोयविद्याउपादानकारणनहीं। क्यों किघटादिकोंकेयर्थीकुलालादिकोंकोमृत्तिकादिकारणविशेषकाग्रहण देखनेमेंथाताहै । तिसकारणसेयन्वयव्यतिरेककरसिद्ध मृत्तिकादिक घटादिकोंके उपादानकारणहैं । यातेघटादि प्रपंचकोअविद्योपादान कत्वकायभावहोनेसे अविद्यावृत्तिकी विषयता किसमकारसंभवेगी किंतुनहींसंभवती ।। समाधान ॥ हेवादिन्मथमघटादिपदार्थ कार्य रूपहैं । यहांकार्यताके साधक यनुमानका यहयाकारहै । घटादिकार्य मध्यमपरिमाणत्वात् व्यतिरेकेण आत्मवत् ॥ थ०॥ घटादिजगत्कार्यरूपहै। मध्यमपरिमाणवालाहोनेसे। जोजोकार्यनहीं है। सोसोमध्यम परिमाणवालाभीनहींहै जैसेयात्मा है ॥ इति ॥ ौरवहघटादिजगत्भावरूपहै। क्योंकिनिष्पतियोगिक है। इसप्रकारसर्वघटादि भावकार्यमेंउपादानकारणकी अकांक्षाकेहुए श्रात्माकोतोप्रसंगहोनेसे किसीकावहकारणनहीं संभवता । परिशेषसे अविद्याहीउपादानकारणरूपतासेकल्पनाकरनेयोग्यहै।यद्यपिघटादिकों कोअविद्याउपादानक मानेहुएघटादिकोंकेयर्थीकुलालादिकोंकोमृति कादिकोकाग्रहणदेखाजाताहै तिससेमृत्तिकादिकोंकोउपादानकल्पना काविरोधहोगा । तथापिघटादिकोंके अर्थियोंको तिसतिस कारण विशेषकाग्रहणयाविद्यकपनेकाविरोधिनहीं।।क्योंकिमृत्तिकादियाकार पूर्वाद सेअविद्याहीपरिणामकोप्राप्तहुईहै। अविद्याकोउपादानहोनेसेअविद्या स्वरूपमृत्तिकादिकोंकोघटादिकोंकेप्रतिकारणताकीकल्पना याविद्यक पनेकेसाथविरोधवालीनहीं । जैसेस्वप्नमे वास्तवसेनकोईघटहै औरन कोईमृत्तिकाहैकिंतुयविद्याहीमृदूपताकोप्राप्तहोकरयाविद्यककुलाल करगृहीतहुईयाविद्यकघटादिकोंकोरचनाकरतीहै ।। क्योंकि *नतत्ररथाः* श्र० ॥ स्वमअवस्थामेव्यवहारकरथनहींहै ॥ इत्यादिकश्रुति सेतहांवास्तवसृष्टिकानिषेधकियाहै ॥ तथाजाग्रत्कालमेभी * नेहनानास्ति * इत्यादिश्रतिसेघटादिप्रपंचकानिषेधसुनाजाताहै। थौर ॐ मायांतुप्रकृतिविद्यात् ॐ इसश्रुतिसेमायारूपयविद्याकोजगतकी उपादानताश्रवणहोने सेमृदादियाकारपरिणामको प्राप्तहुईथविद्याहीघटादिकोंका उपादान कारणहै इसप्रकारमाननेमेकिंचित्मात्रभीविरोधनहीं ॥ इति ॥ ॐ अथअवांतरविषयकीसमाप्तिपूर्वकप्रपंचनिष्ठज्ञात सत्ताकेनिरूपणकाउपसंहार यहांप्रथमजगत्कीज्ञातसत्ताप्रधानरूपताकरकथनकरनेलगेथेतिसकी सिद्धिके अर्थप्रपंचनिष्ठाविद्यकपनाकथनकिया । यबतिसअवांतर विषयकोसमाप्तकरतेहैं। पूर्वउक्तयुक्तिसेब्रह्मसेभिन्न सर्वकार्यमात्रज्ञान योज्ञेयस्वरूपवहसर्वही याविद्यकहै अर्थात्यविद्याकाकार्यहै । इस प्रकारप्रपंचौतिसकेज्ञानकोथाविद्यकहोनेसेसर्वप्रपंचकीज्ञातसत्ताहै। यहयर्थसिद्धहुथा।इसरीतिसे ज्ञानतथाज्ञेयको श्राविद्यकहोनेकरज्ञान ०सि० मु०भा० कालमेहीज्ञेयकीसत्ताहै।ज्ञानसेपूर्वतथाउत्तरकालमेज्ञेयकीसत्तानहीं।और ज्ञानकी स्थितिसेप्रपंचस्थितहोताहै।ौरज्ञानकी निवृत्तिसेनिवृत्तहोजाता है।। यातेज्ञातसत्ताकहीमपंचहे ॥ यहअर्थपूर्वनिरूपणकिया। अबइसी थर्थमेवसिष्टमुनिके वचनकी संमतिदिखलातेहैं । यहीयर्थश्रीवसिष्ठ भगवानजीनेभीकहाहै ॥ मृ० ॥ अविद्यायोनयोभावासर्वेमीवुद्धदाइव । क्षणमुद्भुयगच्छंतिज्ञानेकजलधौलयं ॥१॥ य० ॥ (सर्वेयमी) यहसर्व (भावाः) ज्ञानज्ञेय रूपपदार्थ (अविद्यायोनयः) अविद्याउपादानकहैं ॥ और (बुदुदाइव)जैसेसमुद्र मेबुद्धदेक्षणमात्रमे उत्पन्न होकरलय होजातेहैं ॥ तैसेयहज्ञानज्ञेयरूप पदार्थभी (क्षणं) एकक्षणमात्रमे (ज्ञानेकजलधौ) एकरस चेतनरूप समुद्रमे (उद्य) उत्पन्नहोकर (लयंगच्छंति)लयहोजातेहैं।। इति ॥१४ अथपूर्वपक्षीकीरीतिसेअविद्याकोपूपंचकीकारणता काअसंभवनिरुपण अथपूर्वपक्ष ।। घटपटादिकोंके अर्थियोंकोमृत्तिकातंतुयादिक कारणविशेषकाग्रहणस्वमकीन्याई उपपादनकरनेयोग्यहै । ऐसेकहने वालेंसिद्धांतीसे हमयहपूछतेहैं । मृद्घटादिकोंकाकार्य कारणभाव तुमयंगीकारहीनहींकरते अथवातिनकाकार्यकारणभावतुमयंगीकार करतेहो । इनमेंप्रथमपक्षमें दूपणकहतेहैं। मू० ॥ मृदादीनां कारणत्वनचेदिष्ट घटप्रति । अविद्यायाःकारणत्वंकथंसिद्ध्येत् प्रमांविना॥१५ पूवाद चित्रपदा० ॥ जेकरइष्टनहोगा । कारणमाटिघटोंका ।। कारणसोतमऐसे । मानविना कहुकैसे ॥ १६ ॥ टी० ॥ हेसिद्धांतिन् यदिमृदादिकोंको घटादिकोंकी कारणुता तुमअंगीकारनहींकरोगे।तोकहींभीकार्यकारणभावनयंगीकारहोनेकर अविद्याकोप्रपंचकीकारणता कैसे सिद्धहोगी ॥ क्योंकिदृष्टयर्थके अनुसारहीअदृष्टकी कल्पनाहोतीहैयौरयदि तुमकार्यकारणभावमानो तोवहकार्यकारणभाव मृदयदिकोंका प्रमाणसिद्धहै अथवाभ्रम सिद्धहै । अंत्यपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिविषयके वाधहोनेसेही ज्ञानमेंभ्रमपनाहोताहै। जवकार्यकारणभाव रूपविषयकाबाधहुअातो अविद्याकोकारणता कैसेसिद्धहोगी ॥ यहपूर्वउक्तदोपहीपुनः प्राप्त होताहै। थौरयदिप्रथमपक्षकहोतोघटादिकोंकीकारणता अविद्याको नहींसंभवैगी ॥ क्योंकिकारणताके ग्राहकयन्वयव्यतिरेकादिरूप प्रमाणकोमृत्तिकादि कारणविषयकहोनेकर विद्याविपयकत्वतिनको नहींहै । यातेप्रमाणसेविना अविद्यामेंकारणताका अभावहै । अब इसीअथको विस्तार पूर्वकनिरूपणकरतेहैं ॥ हेसिद्धांतिन् यविद्या सर्वभावकार्योंका उपादानकारणहै ऐसेकथनकरनेवाले तुझकोकहीं कार्यकारणभाव स्वीकारहैवानहीं । यदित्यपक्षकहोतो प्रपंचको यविद्याउपादानकत्व कैसेसिद्भहोगा ॥ क्योंकिकार्यकारणभावतो कहींभीस्वीकारनहीं । औरजोप्रथमपतकहो । तो यथायोग्यअन्वय व्यतिरेकादि प्रमाणसेही कार्यकारणभावका ग्रहणकरनाउचित है ॥ यहां “यन्वयव्यतिरेकादि" इसयादिपदसेधर्मीके शाहकुममाणका ग्रहणहै । तिसीकारणसेप्रत्यक्ष मृद्घटादिकोंकाकार्य कारणभावतो है वै० मि. मु० भा० अन्वयव्यतिरेककरके औरशब्दतथायाकाशादिकोंकाकार्यकारणभाव धर्मिग्राहकअनुमान प्रमाणसेयथायोग्य ग्रहणहोताहै ॥ तिसकार्य कारणभावमेंऔर कोई प्रकारनहींसंभवता यहांधमिग्राहकअनुमानका यहयाकार है। * शब्दःपृथिव्यादि अष्टद्रव्यातिरिक्तद्रव्याश्रितः। अष्टद्रव्यानाश्रितत्वे सतिद्रव्याश्रितत्वात् ॥ यन्नैवंतन्नैवं यथारूपादि य० ॥ शब्दजोहै सोपृथिव्यादिक अष्टद्रव्यों से भिन्नद्रव्य केयाश्रितहै । अष्टद्रव्यके अनाश्रितहुया द्रव्यके आश्रित होनेसे जोजोअष्टद्रव्योंसे अतिरिक्तद्रव्यके ग्राश्रितनहीं। सोसो अष्टद्रव्योंके अनाश्रितहुश्राद्रव्यके आश्रितभीनहीं । जैसे रूपादिकरणहैं । इसअनुमानमेंहेतुगत विशेषणभागकी असिद्धिदूरकरनेके लियेतीन अनुमानौरहैं । तिनमेंप्रथमकायह याकारहै ॥ * शब्दोनस्पशवद विशेषगुणः । अग्निसंयोगा ऽसमवायिकारणकत्वा भावसतिअकारणगुण पूर्वकप्रत्यक्षत्वात् ॥ सुखवत् है अ०॥ शब्दजोहै सोस्पर्शवाले द्रव्योंकाविशेष गुणनहींहै ॥ श्रमिसंयोगरूप थसमवायिकारणकत्वके अभाववालाहुथा थकारण गुणपूर्वक प्रत्यक्षहोनेसे ॥जोजोअग्नि संयोगरूप असमवायिकारण कत्वके श्रभाव वालाडया अकारणरणपूर्वक प्रत्यक्षहोताहै । सोसो स्पर्शवालेद्रव्योंका विशेषगुणनहींहोता । जैसेसुखरूपगुणहै । इस श्रनुमानसेपृथिवीजल अग्निवायुइनचार द्रव्योंकेयाश्रितशब्दनहींहै M पुवाद्ध यहसिद्धहुथा। इसधेनुमानगतहेतुमे यदिविशेष भागहीकहतेतो पाकजरूपादिकोंमें व्यभिचारहोता। क्योंकिकारणगुणपूर्वकतासेविना हीतिनका प्रत्यक्षहोताहै ॥ तिसव्यभिचारके दूरकरनेके लियेहेतुमें विशेषणभाग कथनकियाहै ॥ तिनमेंअग्नि संयोगरूपयसमवायि कारणकत्वका अभावनहीं ॥ किंतुसद्भावहै । औरयदिहेतुविशेष भागनकहते ॥ तोपटगतरूपादिकोंमेव्यभिचारहोता। क्योंकियाग्नि संयोगरूप असमवायिकारणकत्वकायभावतिनमेंभीहै ॥ तिनमें व्यभिचार दूरफरनेकेलिये अफारागापूर्वकत्वयहविशेषभागकथन कियाहै ।। तिनमेंअकारणगुणपूर्वकत्वनहीं।किंतु कारणगुणपूर्वकत्वहै औरजलपरमाणुगतरूपमें व्यभिचार दूरकरनेकेलिये “प्रत्यक्षत्व" यहपदहेतु,कहाहै ॥ क्योंकि “अग्निसंयोगाऽसमवायिकारणकत्वके यभाववालाहुया अकारणगुणपूर्वकत्व" इतनाहेतुभाग तोजलपर माणुकेरूपमें विद्यमानहै परन्तुतिसका प्रत्यक्षनहीं होतायावेव्यभिचार नहीं। औरद्वितीययनुमानयहहै ।। शब्दोनदिक कालमनसांगुणः विशेषगुणत्वात् रूपवत् अ० ॥ शब्दजोहैसोदिशातथाकालोमन इनतीनोंकायण नहींहै।विशेषगुणहोनेसेजोजो विशेपरणहोता।सोसोइनतीनद्रव्योंका गुणनहींहोता । जैसरूपादिकहैं । इसयनुमानसेदिगादितीनद्रव्योंके श्राश्रितभीशब्द नहींहै यहयर्थ सिद्धहुया ॥इति ॥औरतृतीययनु मानयहहै ॥ * शब्दोनात्मविशेषगुणः वहिरिंद्रिय ०सि० मुः भा. योग्यत्वात् रूपवत् मैं यः॥ शब्दजोह।सोयात्माकाभी विशेषगुणनहीं बाह्यइन्द्रिय करग्रहणकेयोग्यहोनेसे ॥ जोजोगुण बाह्यइन्द्रियकर ग्रहणकेयोग्य होताहै । सोसोयात्माका विशेषगुणनहींहोता ॥ जैसेरूपहै । इस अनुमानसे शब्दयात्मा केभीयाश्रितनहीं। यहसिद्धहुया॥ धौरहेतु गत विशेषभागकी यसिद्धिदूरकरनेके लियेयह अनुमानहै ।। 3 शब्दोद्रव्यसमवेतः। गुणत्वात्। संयोगवत् । अ० शब्दजोहै। सो द्रव्यमेंसमवेतहै ॥ गुणहोने से ॥ जो जो गुणहोताहे सोसोद्रव्यमेंही समवेत होताहै । जैसेसंयोगहै ॥ इसअनुमानसेशदको द्रव्यसमवेतत्वसिद्धहोताहै । औरइसयनुमानमे स्वरूपासिद्धिकेदूरकरनेवाला यहयनुमानहै || * शब्दोविशेषगुणाचक्षुर्ग्रहणायोग्यवहिरेंद्रियग्राह्य जातिमत्वात् स्पर्शवत् य०॥शदजोहैसो विशेषगुणहे ॥ चक्षुइन्द्रियकर ग्रहणक अयोग्यहुयाबाह्यइन्द्रियकरग्राह्यजातिवालाहोनेसे।। जोजोचाइन्द्रिय करग्रहणकेययोग्य याबाह्य इन्द्रियकरग्राह्यजातिवालाहै सोसोविशेष गुणहै । जैसेस्पर्शगुणहै ।।इति।। इसप्रकारनिर्दोपपूर्वउक्तपरिशेपानु- मानसेगगननामवालानवमद्रव्यही शबकायाधारहै। यातेययनुमान शदतथाअाकाशकेकार्यकारणभावकाग्राहक होनेसे धर्मिग्राहकममाण जानना ॥ इति ॥शंका।। हेवादिनमृद्घयादिकोंमेयन्वयव्यतिरेकादि प्रमाणसिद्धकार्यकारण भावहो तिससेक्यासिद्धहुथा ॥ समाधान ।। हसिद्धांतिनतेसे मानेहुए अन्वयव्यतिरेकादिसिद्ध जोमृत्तिकादिकामे पूर्वाद कारणताहै । तिसकोत्यागकरयविद्याकोकारणकहनाउचितनहीं ।। यहसिद्धहुया ॥ किंवा ॥ “कारणत्वेनाऽविद्येवउपसंहर्तव्या" का कारणत्वरूपतासेअविद्याहीग्रहणकरनेयोग्यहै । इसवाक्यमे “अवि- धैव" यहजो (एव) शब्दहै सोयविद्यासेभिन्नमृदादिकोंमेकारणताकी योग्यताकोदूरकरताहै । अथवायविद्यामे कारणताकी अयोग्यताको निवारणकरताहै । दोनोंरीतिसे "एव” शदकाप्रयोगनहींसंभवेता।। इसीयर्थकोस्पष्ट करतेहैं ॥ अविद्याहीसर्वभावोंकाउपादानकारणहैऐसे कहनेवालेवादीसेयहपछाचाहिये क्या?इतरकारणजोमृत्तिकादंडफुलाल यदृष्टईश्वरादितिनकी अपेक्षासेविनाविलयविद्याहीकारणहै अथवा अदृष्टईश्वरतथामृदादिकारणांतरकी अपेक्षासहित अविद्याकारणहै ।। एवशद्वकाजोप्रथमयर्थयन्ययोगव्यवछेदतिसकोप्रथमनिषेधकरतेहैं। प्रथमपक्षनहींसंभवता क्योंकियदिकेवलयविद्याकोहीकारणींनोगे तोप्रपंचरूपकार्यमे नानापना नहींहोगा ॥ कारणनिष्ठ विचित्रता के भावहोनेसे कार्यनिष्ठविचित्रताकी अनुपपत्तिहै एकपदार्थकोगवि- चित्रहोनेसेकार्यमेयनेकरूपतानहींहोसकती ॥ क्योंकिसामग्रीको भेद कार्यकभेदकासाधकहै । जैसेश्वेतपीतादिवर्ण युक्ततंतुयोंसे विचित्र पटकीउत्पत्तिहोतीहै केवल श्वेतंतंतुयोंसेनहीं ॥ तैसेदाटीतमेभीजान लेना ।। किंवा । कारणरूपतासेस्वीकारकीहुईजोयविद्या है।यहचेतन तोहैनहीं। क्योंकितिसकोचेतनमाननेकरयविद्यात्वकोहानिहोतीहैं।। यातेवहजडहे । यौरयदितिसकोजडमानो तोइसमेयहप्रष्टव्यहै क्या?वह श्रापहीकार्यकरनेमेप्रवृत्तहोतीहै ॥ अथवाचेतनकरप्रेरितहुईप्रवृत्तहोती है । अत्यपरतोनहींसंभवतास्योंकिचेतनकोभीतिसकीयविष्ठानता २३६ वे०सि० मु० मा० रूपसेकारणताकीप्राप्तिहुए अवियामात्रकारणाहै इसतुम्हारे कथनकी हानीहोगी ॥ यातेचेतनकीयधिष्ठानतासेविनायापहीकार्यकरनेको अवियाप्रवृत्तहोतीहैयहप्रथमपक्षहीकहनाहोगावहभीनहींसंभवतात्यों किजडशक्तिकोचेतनरूपयधिष्ठानसेविनाकार्यकरनेकीसामयकहीदेख नेमेनहींयाती॥यवएवशदकाअर्थजोग्रयोगव्यच्छेदहै।तिसकेनिरास करनेलियेकारणांतरसापेक्षयविद्याकार्यकोरचतीहै इसद्धितीयपक्षकोनि पेधकरतेहैं।ौरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवताक्योंकि अविषाकोकारणता कहनेवालेसिद्धांतीनेभीयदृष्टईश्वरादिकोंकोकारणतातोयवश्यकहनी होगी ।। यातेघटादिकार्यकानिमित्तकारणरूपताकरयदृष्ट ईश्वरादिकों काकारणसामग्रीमेप्रवेशहोनेसेौरउपादानताकीयपेक्षाकोमृदादिकों करपूर्णहानेसेलाघवकेवलकर तिनसेही विचित्रकार्यसिद्ध होजाएगा कारणरूपतासेयभिमत जोमिथ्यायज्ञानरूपयविधातिसके माननेका किंचित्मात्रभीफलनहीं ॥ शंका ॥ हेवादिन् यदृष्टादिकोंकी न्याई अविद्याकोभीप्रमाण सिद्धहोनेकरतिसको कारणताकैसेनहीं सिद्धहो सकती ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् “मैंयज्ञानीहूं" यहप्रतीतिही अज्ञानमेप्रमाणरूपकहनीहोगी। सोतोज्ञानकेागभावकोविषयकरतीहै तिसकरयविद्याकी सिद्धिनहीं होसकती ॥ यातेयप्रमाणिक यविषण जगतकाकारणनहीं ॥ शंका । हेवादिनवेदांतशास्त्रकी प्रमाणताके अर्थज्ञानज्ञेयरूपपदार्थवियोपादानकयवश्यमानेचाहिये।।समाधान।। हेसिद्धांतिन्पूपंचको अविघाउपादानकताके अभावहुए त्यत्नादि लौकिकप्रमाणको औरपुत्रपशुस्वर्गादिकोंकेप्रति यागादिकोंकोसाध नताकेबोधक पूर्वकांडरूपवेदकोपमाणता संपादित होसक्तीहे ॥

-- पूाई औरयदिघटादिएपंचकोषाविद्यकमानतोमिथ्यायर्थकोविषयकरनेवाले प्रत्यक्षादि लौकिकप्रमाणनिष्ठशुक्तिरजतज्ञानकीन्याईप्रमाणता नहीं होगी ॥ ौरस्वर्गादितथायागादिकोंकोआविद्यकमानेहुए तिनका परस्परसाध्य साधनरूपसंबंधभीयाविधकहीहोगा।तिसकोविषयकरने वालपूर्वकांडरूपवेदकोभीप्रमाणतानहींहोगी ॥ औरलौकिकतथा वैदिकप्रमाणकी अपूमाणतामानेहुए लोकवेदसेविरुद्ध किसपक्षको यहवादी आश्रयणकरेगा॥ अर्थयह कियह याविद्यकजगत्वादी वैदिकभीनहीं । क्योंकिपूर्वकांडकी प्रमाणतानहींमानता ॥ और यहबौधभीनहीं ! क्योंकिप्रत्यक्षादिकोंकोभी श्रपूमाणकहताहै । इन दोनोंपक्षोंसेभ्रष्टहुयायहग्राविधकजगत् वादीकिस पक्षकोयाश्रयण करेगा। औरयहजोपूर्वकहाथाकिजगत्को याविद्यकनमानेहुएवेदांतों मेंअपूमाणतामाप्तहोगी।सोकथनभीनहींसंभवता । क्योंकिवेदांतोंको जपादियर्थहोनेकरभी प्रमाणतावनसक्तीहै। जिसकारणसेयविद्याको कारणमानेहुएविचित्रताकीयनुपपत्तिहै यौरजिसकारणसेग्रविद्याजड शक्तिहै।ौरजिसकारणसेप्रत्यक्षादिकोंमेरमाणताहै ।। तिसीकारणसे ज्ञानज्ञेयरूपपदार्थोंकोयविद्यामात्रउपादानकताकायभावहै।याते अविद्या मात्रकोजमफिरमानकथानकेवल सिद्धांतीका साहसमात्रयदि विचारविनाकथनहे । इतिपूर्वपक्ष ॥१५॥ प्रथसिद्धांत । सत्तथाअसतकीउत्पत्तिकेनिरास पूर्वकअविद्याकोजगत्कारणताकीसिद्धिकाप्रकार समाधाना जोवादीनेपूर्व यहकथनकियाकिमृदादिकारतको त्यागकरप्रवियाकोकारणताकाकथनयनुचितहै । इसपूर्वपनमेथविषा १४. ०सि० मु. भा. कोकारणताकाकथनउचितहै । इस सिद्धांतकोहम निरूपणकरतेहैं । अविधाकोकारणताकैसेसिद्धहोतीहै । ऐसीयाकांक्षाकहुएकथनकरने योग्ययर्थकोकहतेहैं मू०॥ यथासतोजनिर्नवमसतोपिजनिनच । जन्यत्वमेवजन्यस्यमायिकत्वसमर्पकम्॥१६॥ विद्युन्माला ॥ साचाजैसेनाहीजामे । नाहींझूठोतैसेजामे । जन्यायासंसारमाहीं । मायाकीताबोधताहीं ॥१७॥ टी०॥ हेवादिकार्यक्या?निर्वचनकयोग्यहे अथवानिर्वचन केयोग्यनहींहै।। पृथमपन मेभीयह विचारकर्तव्यहै ।। वहकार्यक्या ? यात्माकीन्याईसतरूपहै।अर्थात्पारमार्थिकस्वरूपहै।यथवाशशशृंगकी न्याई असहरूपयर्थात् तुच्छरूपहै पृथमपक्षतोनहींसंभवता।। क्योंकि * स्वसत्तासंबंधोहिजनिः अ० ॥ “स्व” कहियेकार्यकेसाथसत्ताकाजोसंबंधहतिसको "जनि" कहियेउत्पत्तिकहतेहैं । वहयहांनहींसंभवती क्योंकि अपनी सत्ताकेसाथसंबंधवालेसत्पदार्थमेयन्यसत्ताकेसंबंधीयपेक्षाव्यर्थहै।। औरउत्पत्तिवालाहीकार्यहोताहै । औरसत्वस्तुसर्वकालमेउत्पत्तिरहित है ।। तिसीसेसतरूपताकरपूपंचका निर्वचनकियेहुए तिसमेकार्यत्वकी हानिहोगी। और एकमेवाद्वितीयम* यहशास्त्रसजातीयादिभेदरहितएकदैतमात्मामेउपक्रमादि पलिंगोंसेतात्पर्य्यवालाहै । कार्यकोपारमार्थिकमानेहुए तिसकेसाथ विरोधभीमाप्तहोगा ॥ शंका ॥ ॐ मृत्तिकत्येवसत्यं * पूर्वाई य० ॥ मृत्तिकाहीसत्रूपहै। यहशास्त्रपूपंचकीसतरूपताभी बोधनकरताहै । पापपूपंचकोअसत्रूपकैसेकहतेहो ॥ समाधान ॥ हे वादिन्जो श्रागमतुमनेकहा सोयद्यपिसत्यहै । परन्तु तिसकास्वार्थमे तात्पर्यनहीं ॥ क्योंकि “एकमेवाद्वितीयम्” यहपूर्वकथनकिया जो शास्त्रसोयागेकथनकियेहुएअनुपपतिरुपतर्कसहकृतहुया वलवान् है तिसकेसाथविरोधहोनेसेवहयागमअन्यार्थपरहै । यर्थयह वहआगम कोईमृदादिप्रपंचकोसत्रूपनहींकहता। किंतुतिनके अधिष्ठानसत्ब्रह्म कोहीसत्यरूपप्रतिपादनकरताहै। इसीअभिप्रायसेपूपंचकेसत्यत्वमेयनु पपत्तिकोनिरूपणकरतेहकार्यपूपंचमेसत्यपनेकीअनुपपत्तिहैजिसपकार सोअनुपपत्तिहैसोदिखलातेहैं।हेवादिन्क्या?उत्पत्तिसेपूर्व यहकार्यसत्है वायसतहै । यहांथमअसत्पक्षकोयनुवादपूर्वक निराकरणकरतेहुए "मसतोपिजनिर्नच" यहजोकारिकाकादूसरापादहै तिसकाव्याख्यान करतेहैं ॥ हेवादिन यदिकार्यको असत्कहोतो तिसमें यहविचार कर्तव्यहै ॥ ॐ स्वसत्तासमवायोजनिः अ०॥ कार्यमेंजोसत्ताकासमवाय संबंध?तिसकानाम उत्पत्ति है ।। अथवा ॥ *स्वकारणसंसर्गाजनिः * या कार्यकाकारणकेसाथजोसंबंधहे तिसकानामउत्पत्तिहै । सोयहदोनोंपूकारकी उत्पत्तियसतनिष्ठनहींसंभवती। क्योंकियसत्में संबंधकीयाधारता वासंबंधकी निरूपकतानहींहै ॥ औरकहींदेखने में भीनहींयाती । तिसीसेपूपंचकोयदि यसरूपताकरनिरूपणकरोतो उत्पत्तिमत्ताकेअसंभवसेतिसमेंकार्यत्वकीहानिहै।।यातेकार्ययसतरूपता १४४ ० स० मु० भा० नहींहोजाती ।। यातेसत्यसत्पक्षभीनियुक्तिकहै ॥ * परिशेषसेप्रपंचकीअनिर्वचनीयताकेस्थापनपूर्वक अविद्योपादानकत्वकानिर्धार * इसपकारसत्रूपतासेतथाअसत् रूपतासेयौरउभेरूपतासकार्यका निर्वचनन होनेकर सत्यसत्सेविलक्षण अनिर्वचनीयहीकार्यहे यह माननाहोगा। ऐसेमाननेसेपूर्वउक्तदोपोंकी पासिनहींहोती। यौरजब कार्यरूपप्रपंचकोयनिर्वचनीयमाना।तोसत्वस्तुकोतोतिसकीउपादान तानहींसंभवती।क्योंकिलोकमेकार्यकारणकीविलक्षणतादेखनेमे नहीं 'याती किंतुकार्यकेसदृश्यहीउपादानकारणकल्पनाकरनेयोग्यहै।।यौर के योग्यःयोग्येनसंवध्यते य० ॥ योग्यहीयोग्यकेसाथसंबंधवालाहोताहै । जैसेमनुष्यों कीउत्पत्तिमनुष्योंसे औरपशुयोंकीउत्पत्तिपशुओंसेहोतीहै।इसन्यायसे भीअनिर्वचनीयप्रपंचकायनिर्वचनीयहीकारणकल्पनाकरनेयोग्यहै ।। सोऐसायनादिग्रनिर्वचनीयमायारूपयज्ञानहै । तिसअज्ञानकोउपा- दानवकीकल्पनाकार्यप्रपंचनिष्ठकार्यत्वही अन्यथाअनुपपन्नहुाकरा ताहै।यातेतिसयज्ञानकोउपादानकारणताकाकथनअनुचितनहींकिंतु उचितहीहै।।इति।शिंका।।विलक्षणताकेहुएभीकार्यकारणभावक्योंनहीं होताकिंतुहोसक्ताहै ॥ जैसेसत्यशुक्तिमिथ्या रजतका कारण लोकमे प्रसिद्धदेखनेमेयातीहै।। तैसेसतहीथसत्प्रपंचकाकारणवनजायेगा। समाधान ।। हेवादिन्तहांभीचूंक्तिका ज्ञानहीरजतकाकारणहैशुक्ति नहीं । अन्यथा नेदंरजतम्"इसबाधकालमेभीरजतरूपकार्यकीप्राप्ति 'पूर्वाद । हूईचाहिये ।। क्योंकितिसरजतकाकारणशक्ति विद्यमानहै ॥ यातेवि- लक्षणोंकाकार्यकारणभावलोकमेनहींदेखाजाता ॥ * अविद्यामात्रकारणवादमेवादीउक्तदोषोंका परिहार निरूपण औरजोवादीनेयहपूर्वकथनकियाथा। किकारणकी विचित्रता केयभावसेकार्यविचित्रताकी अनुपपत्तिहै । सोकथनभीनहींसंभ- वंता। क्योंकिविचित्रशक्तिवाला अज्ञानहींउपादानरूपताकरकल्पना कियाहै । यहपूर्वकथनकरयाएहैं ॥ “विचित्रशक्तिवालेएकशज्ञान कोग्रहणकरकेयन्यथा अनुपपत्तिरूपतर्कविश्रामको प्राप्तहोताहै "ऐसेपूर्वकथन कियाहै" यद्यपियविद्याहीकारणहै। इसपक्षमेंचेतनरूप अधिष्ठानसेविनाजडशक्तिको कार्यजननकीसामर्थ्य नहीं । तथापि अविद्याकी अधिष्ठानता चेतनमेंमानेहुएभीज्ञानज्ञेयरूपपदार्थीको अविद्यामात्रउपादानकताका विरोधनहीं ॥ क्योंकितिसचेतनको निमित्तमात्रताहै ।। यौरचेतनगतजोयविद्याकी अधिष्ठानता।तिस कोयविद्यारूपयधिष्ठेयकीयपेक्षासहितहोनेसेयाविद्यकपनाहेयातेथवि द्यामात्रकारणताकीहानीनहीं।ौरयदृष्टादिसापेक्षयवियाकार्यकोकर तीहे।इसपत्तमजोवादीनेकहाथाकिलाघवसेयदृष्टादिकहीकारणवन सक्तेहैं अविद्यासेक्या प्रयोजनहै।।सोयहपक्षभी निरासहुया।क्योंकि अष्टादिकोंकोभीयाविषकहोनेकरतिनकीकारणतासेयविद्याकोहीकार पतासिद्धहोतीहै ।। शौरइसीकारणसे मृदादिकोंकोघटादिकोंके प्रति उपादानकारणताहोनेसे अविद्यासेक्याप्रयोजनहे ।। इसवादीकेकथन काभीनिरासहुया ॥ क्योंकितिनघंटादिकोंमेंभी मृदादियाकारपरि दे०सि० मु० भा० णामकोप्राप्तहुईथविद्याकोही उपादानकारणताहै।।तिसकारणसेप्रपंच प्राविधकहींहैयहअथनिर्दोषसिद्धहुया ॥ इति ॥ औरजोवादीनेतर्व यहकथनकियाथा। किमिथ्याप्रपंचगोचरजोलौकिक प्रत्यानादिप्रमाण तिनमेंपूमाणताकीअनुपपत्तिहैयौरमिथ्यास्वर्गतथायागके साध्यसाधन रूपसंबंघकाग्राहकपूर्वकांडरूपवेदकोमानेहुए तिसमेंभीप्रमाणताकी अनुपपत्तिहै । सोकथनभीअसंगतहै । क्योंकिलौकिकप्रमाणोंकोतो पूर्वउक्तयुक्तिसे अप्रमाणता होनेसेहीतिनमें प्रमाणताकीअनुपपत्ति दोपकेयर्थनहींहै । इसलियेतिनकीतोउपेक्षाहीहै । * प्रपंचकेाविद्यकपक्षमपूर्वकांड निष्ठप्रमाणताकानिरूपण योरपूर्वकांडरूपवेदमेप्रमाणताकीअनुपपतिनहींसोईदिखलातेहैं। हेवादिनपूर्वकांडरूपवेदस्वर्ग औरयागकेसाध्यसाधनरूप संबंधमात्रमें तात्पर्यवालाहै। यथवातिनकेसाध्यसाधनभावके प्रतिपादनदाराब्रह्ममें हीतात्पर्यवालाहै ।। प्रथमपक्षतोनहींसंभवना ।। क्योंकि- ॐ स्वाध्यायोऽध्येतव्यः इसअध्ययनविधिकाविरोधहै ।। तिसविरोधकोहीस्पष्टकरतेहैं । थध्ययनविधिप्रयोजनवाले अर्थकेज्ञानकाउद्देश्यकरके वेदाध्ययनका विधानकरताहै ।। योरयागकोप्रयोजनवत्तासंभवतीनहीं ॥ क्योंकि स्वर्गादिकोंकोविनाशीहोनेसे प्रयोजनाऽभासपनाहै । तिसस्वर्गकेसा धनयागकोपारमार्थिकप्रयोजनकीसाधनताअनुपपन्नहै ॥यातेस्वर्गयो यागकेसाध्यसाधनमात्रयर्थमे यदिपूर्वकांडात्मकवेदकातात्पर्यकथनकरें तोयध्ययनविधिकाविरोधकैसेनहींप्राप्तहोगा ॥ औरयध्ययनविचित्र वर्णिकपुरुषोंकोकोईबहकावनेकेनिमित्तनहीं है।। यांतेसाध्यसाधनमात्र पूबाई १४७ मेपर्वकांडकातात्पर्यहैयहकथनव्यर्थ है। और द्वितीयपक्षमे प्रमाणता कीयनुपपत्ति नहीं ॥ क्योंकितिस पूर्वकांडका ब्रह्ममेहीतात्पर्य है । शंका ॥ पूर्वकांडमेब्रह्मकीअप्रतीतिहोनेसेतिसमेतात्पर्यका संभवकैसे होसकताहै ।। समाधान ॥ हेवादिनपूर्वकांडप्रथमयागोस्वर्गादिकों केसाध्यसाधनभावकोबोधनकरताहै तिसकेज्ञानसेप्रथमपुरुष कर्मोंका अनुष्ठानकरताहै ॥ अनुष्ठानकियेहुएकर्मब्रह्मज्ञानको सिद्धकरतेहैं । यातेतैसेकर्मोकावोधकजोपर्वकांडहै ।। तिसकाब्रह्ममेतात्पर्य परंपरासे बनसकताहै ॥ शंका । उपनिपपवेदांतोंकोही ब्रह्मज्ञानकासाधन होनेसेतिसज्ञानकेतिकर्मोकोसाधनतानहींसंभवती ॥समाधान ।। हे वादिन्यतःकरणकीशुद्धिप्रथमज्ञानकायंगहै । क्योंकिस्मृतिमेअंतः फरणकीशुद्धिकोज्ञानकाअंगत्वकथनकियाहै ॥ * ज्ञानमुत्पद्यतेपुसाक्षयात्पापस्यकर्मणः ॐ अ०॥ “पुंसां" पुरुषोंको (पापस्यकर्मणः) पापकर्मके (क्षयात) नाशहोनेसे (ज्ञान) ज्ञान (उत्पद्यते) उत्पन्नहोताहै ।। औरअंतःकरण कीशुद्धिकर्मोंसेहोतीहै । यहवार्ताभीस्मृतिमेकथनकीहै ।। कषायेकर्माभिःपक्के य० ॥ कर्मोंसेपापोंकीनिवृत्तिहुएशुद्धग्रंतःकरणमेज्ञानहोता है । यातेअंतःकरणकीशुद्धिद्धाराकर्मीकाज्ञानमेउपयोगहै । इसरीति सेकर्मीकाज्ञानमे उपयोगबोधनकरनेवाले पूर्वकांडात्मकवेदकाब्रह्ममे तात्पर्यहै । शंका ॥ नित्यकर्मोकोफलसे शून्यहोनेकर तिनकोयतः करणकीशुद्धिकीकारणताहो। परन्तुकाम्यकौकातोयन्यस्वर्गादिफल होनेसेतिनकोशुद्धिकीकारणताकैसेहोसकतीहै "समाधान ॥हेवादिन् ०सि० मु. भा. १४६ नित्यकर्मोंकोनिष्फलताकीयसिद्धिहै ।। क्योंकि- ॐ कर्मणापितृलोकः । इसश्रुतिनेसाधारणकर्ममात्रसेपितृलोककीप्राप्तिकहीहै ।यौर संयोगपृथक्त्वन्यायसेयागादिकर्मोकोशुद्धियर्थतामाननेमेकोईविरोध नहीं ॥ संयोगपृथक्त्वन्यायकायहयर्थहै । पूर्वमीमांसामे एकस्यतूभयत्वेसंयोगपृथक्त्व। अ० (४) पा० (३) ० (५ यहसूत्रहै । तिसकायहयर्थहै (एकस्य)एककर्मको (उभयत्वे) उभय अर्थत्वमेंसंयोगपृथक्त्वनियामकहै अर्थातविधिवाक्यकाजोभिन्न पटनहैसोनियामकहै जैसे"खादिरोयूपोभवति"और “खादिरं वीर्य्यकामस्य” यहांएकहीखादिरको यज्ञार्थत्वयोरपुरुषार्थत्वरूप उभयअर्थत्वमेंइसपूर्वउक्तविधिवाक्यकाभिन्न पठननियामकहै। तैसेस्त्र र्गादिफलकेयर्थजोयागादिकर्म, तिनकोंविविदिपावाक्यनेयंतस्करण कीशुद्धिकेयर्थवोधनकियाहै । यातेइसन्यायसे सर्वकाँकोसंस्कार अर्थत्वमाननेमेंविरोधनहीं है।। अथवा विविदिपामेंकोका विनियोगहै इसपक्षकोयाश्रयण करकेपूर्वकांडकी यप्रमाणताका परिहारकरतेहैं। श्रवणादिकोंमपत्तिद्वारा पूर्वकांडकाब्रह्म तात्पर्य है। यहांयहअर्थज्ञात व्यहै ॥ कर्मकेस्वरूपमानका बोधकविधिवाक्यउत्पत्तिविधिकहाजाता है। जैसे “सोमेनयजेत"यहवाक्यहै । तिसउत्पत्तिविधिवाक्यकरपूथम विधानकियेजोकर्म, तिनकोफलकीयाकांक्षा अवस्थामजैसे अधि कारविधिदूसरा प्रवृत्तहोताहै ॥ फलविशेषकेसंबंधका बोधकविधि अधिकारविधिकहियेहै । जैसे “ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामोयजेत"यह वाक्यहै । तैसेही “यज्ञेनविविदिपंति" इत्यादिफलविधायकवाक्यकी पूाई प्रवृत्तिहोतीहै तिसवाक्यकायहसार अर्थसिद्धहुया।। "ब्रह्मज्ञानकीका मनावालापुरुपयागादिकर्मोकाथनुष्ठानकरे” इसवाक्यसेकोकोसा मान्यरूपतासेब्रह्मज्ञानकीसाधनतामतीतहोतीहै। औरसाक्षात्कर्मसाध्य त्वज्ञानमेवाधितहै। यातेयंगावतरणान्यायसेज्ञानके साधनश्रवणादिकों मेंपूवृत्तिद्धारातिनकर्मोको ब्रह्मज्ञानकीसाधनतापूतीतहोतीहै ॥ तिस हेतुसेतैसकर्मोंकायोधकजोपर्वकांडात्मकवेदहै तिसकोब्रह्मपरताका संभवहै ।कैसेतिसकी अपमाणतातुमकहतेहो। अंगावतरणन्यायका यहयर्थहै। जोसाधनांगीमेवाधितहोकरयंगमें “यवतरण" अर्थात प्राप्तहोतिसकोयंगावतरणन्यायकहतेहैं | जैसे पंचदशारलिः वाजपेयस्य ।' य० ॥ वाजपेयसंज्ञकयागकायूपपंदरह अरनिः होताहै।इसवाक्यसे वाजपेयरूपयंगीयागमें यूपयाकांक्षापरितहोनेकर (सप्तदशारनिः वाजपेयस्य।) य० ॥ वाजपेयसंज्ञक वागकायूपसतरह अरनिः होताहै । इसवाक्यउक्तयूपकावाजपेयमें चाधहोताहै इसीसेतिसके यंगरूपमित्रविन्दादियागोंमें तिसयूपकी प्राप्तिहै यहांमुष्टिकोबांधकरकनिष्टकायंगुलीकेविस्तारयुक्तहस्तपरिमा एकानामथरनिःहै । तेसेप्रकरणमेंकर्मोकाज्ञानमें बाधहोनेसेति सके अंगरूपश्रवणादिकोंमेंतिनकीपाप्तिहै ॥ इति ॥ शंका ॥ पूर्वउक्तपूकारसेब्रह्मविषयकपूर्वकांडरूपवेदका तात्पर्यहो । तथा पितिसमेंपूमाणताकासंभव कैसेहे ॥ समाधान ॥ हेवादिनी यत्परःशब्दःसशब्दार्थ। अ०। जिसयर्थमेशब्दकातापर्य हो वहीशब्दकार्थहोताहे इमन्याय सेतात्पर्य केविषयभूत अर्थमही शब्दकी प्रमाणताहोतीहै । यातेपूर्व कांडमएमाणता मंभवतीहै ।।

के०सि० मु० भा० जिसकारणसेजगत्को अज्ञानउपादानकमानेहुएएकदोपभीनहींप्राप्त होसकता तिसीकारणसेज्ञानज्ञेयरूप पदार्थोंको अविद्योपादानकत्व शोभनकथन कियाहै। *जगत्को आविद्यकत्वसाधनकाफल तथा दृष्टिसम कालीन दृष्टि सृष्टि पक्षकाउपसंहारनिरूपण * आविद्यकजगत्केसिद्धकरनेकाक्या?फलहै। ऐसीजिज्ञासाके हुएकहतेहैं । हेवादिनमातीतिकसत्ताकीसिद्धिहीतिसकाफलहै। अर्थात अविद्याहीप्राणियीकेकर्मोंकीवशतासेक्षोभकोमाप्तहुईजगताकाररूपता सेतथातिसकीमतीति याकाररूपतासे एककालमेही परिणामकोमाप्त होती है । क्योंकिक्रमसेपरिणामहोनेमेकोईनियामकनहीं । औरतिस काकोईप्रयोजनभीनहीं। औरवृत्तिनिष्ठविषयजन्यता अंगीकारनहींहै औरतिसमेग्राकारकीसमर्पकताविषयकोयजनकमाननेसेभीवनसकती है ।। जैसेमुखदर्पणकायजनकहुयाभीतिसमे गतिविंचकोसमर्पणकर देताहै ।। तैसेप्रकरणमेभीजानना ॥ इसरीतिसेविषयौरज्ञानकाएक कालमपरिणामहोनेसेप्रतीतिसमकालीनही विषयकीसत्ताउचितहै । क्योंकिरज्जुसर्पौशुक्तिरजततथा गंधर्वनगर औरस्वामपंच इनसर्वमे प्रतीतिसमकालीनताहै ॥ तैसेजाग्रत्प्रपंचमेभीप्रतीतिसमकालीनताहै यहांपरययनुमानजानना ।। विमतः प्रपंचः प्रतीतिसमकालीनः अविद्योपा- दानत्वात् रज्जु सादिवत् अ०॥ विवादकाविषयजोप्रपंचहै ।सोप्रतीतिसमकालीनहै अविद्योपादानकहोनेसे ॥ जोजो विद्योपादानकहै ॥ सोसोप्रतीति पूर्वाद समकालीनहै जैसेरज्जुसादिकहैं ।। इति ॥ १६॥ पूर्वउक्तयर्थकसंग्रह काश्लोक ॥ प्रतीतिमात्र कालीनं घटायविद्यकंयतः॥ रज्जुसादिकंयद्वत्तथाचेदंततस्तथा ॥१॥ चौ० ॥ घटादियाविद्यकहैंयाते । प्रतीतिसमसत्ताहैताते । रज्जुसपादिकजैसे । तातेयहजगजानोतैसे ॥१॥ * इतिदृष्टिससकालीनसृष्टिरूपदृष्टिसृष्टिवाद * *अथदृष्टिमात्र सृष्टिरूपदृष्टिसृष्टिवादनिरूपण तथाज्ञानज्ञेयकेभदका निराकरण निरूपण * दो० ॥ वेदवतीपतिवाकपतिश्रीगुरुनानकयादि । तिनपद पद्मनपद्मवरनमोदंडवतयादि ॥१॥ ममचितमेथिरहोसदाहनियेविन प्रमाद ॥ दुर्गमभीसुगमोभवततुमरेतनकप्रसाद ||२|| प्रतीतिमात्रकालीनजगद्युक्तयानिरुपितं ॥ प्रतीतिव्यतिरेकेण सत्त्वंचास्यनिवार्यते ॥१॥ सो० ॥ जगदृष्टीकालीनयुक्तीकरनिर्णयकियो । दृष्टिमात्रयवचीनसत्ताजगकीगावते ॥१॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिन्प्रतीतिसमकालीनजगत्की सत्ताकहनी उचितहै यहयापनेपूर्वकहा तिसमेएकजगत्कीसत्ताऔरदूसरीज्ञानकी सत्ताहै इसप्रकारदोसत्ताभानहोतीहैं ।। जैसेघटमात्रकालीन जोपटदै वहघटसेभिन्नसत्तावालानहींहै यहकथनतोसंभवतानहीं। क्योंकिएक कालमेउत्पत्तितथाविनाशकोप्राप्तहुएजोघटपटहैं तिनकाभेदहोनेकरएक सचाकीययोग्यताहै ।। तेसेजानतथाज्ञेयकोपरस्परभिन्नहोनेसे तिनकी वे०सि० मु० भा० सत्ताकाएकत्वभीयुक्तनहीं है । ऐसीशंकाकेप्राप्तहुएयहवक्ष्माणप्रकार जोबुद्धिमेस्थितहै वहनिरूपणकरनेयोग्यहै ॥ कौनवहप्रकारनिरुप- णीयहै ऐसीजिज्ञासाकेहुएकहतेहैं । मू०॥ पूतीतिमात्रसत्वचेत् सत्वं पातीतिकंमतम् ॥ अविरोधान्ममापीष्टंतर्द्रदेवदकापूमा॥१७॥ वासंतीचंद ॥ ज्ञातासत्ताजानजगतकीहीमेठानो । ज्ञानाते नोभिन्नतनकताकोजोमानो । मोकोभीहैइष्टविरुधतानाकोराई । ताके भेदेमाहिप्रमितिकोभापोभाई ॥१८॥ टी० ॥ हेवादिन प्रातीतिकसत्ताजोहै वहयदि पूतीतिमात्रही सत्ताहै । अर्थातपूतीतिकीसत्तासेभिन्नवहसत्तानहीं तोइसमेविरोधका अभावहोनेसेहमकोभी स्वीकारहै । औरपूर्वउक्तयुक्तिसेज्ञान तथाज्ञेय काभेदहोनेसेज्ञानकीसत्तासेज्ञेयकी सत्ताभिन्नहै । यदिऐसेकहो।तो हे वादिन्तिनदोनोंकेभेदमेकौनप्रमाणहै।यहतुमकथनकरो।यौरवक्ष्माण रीतिसैतुमकोईप्रमाणनहीं निरूपणकरसकते । तिसकारणसेज्ञानौर ज्ञेयकेभेदमेकोईभीप्रमाणनहीं ॥ इति ।। अवविस्तारसेश्लोककीव्या- ख्याकरनेकेलियेभूमिकारचनाकरतेहैं ।। हेवादिनप्रतीतिसमकालीन जगतकीसत्ताहैइसकाक्याअर्थहै। क्या? प्रतीतिमात्रहीसत्ताहै।अर्थात् ज्ञेयपदार्थप्रतीतिरूपहीहै।यातेतिनकायभेदहोनेसे ज्ञेयकीसत्ताज्ञानकी सत्तासेभिन्ननहीं । अथवाप्रतीतिसेभिन्नकरकेजगत्की पृथक्सत्ताहै। अर्थात्ज्ञानतथाज्ञेयकाभेदहोनेसे तिनदोनोंकीसत्ताकाभीभेदहैप्रथम पक्षतोसिद्धांतरूपताकर स्वीकारहोनेसे तिसकोत्यागकर अंत्यपक्षको दूपितकरतेहैं हेवादिन्तिसज्ञानतथाजेयकेभेदमेकोईप्रमाणहैवानहीं ।

पृवाई १५३. ज्ञानसेभिन्नकरकेप्रपंचकीपृथकसत्तामेयदिकोईप्रमाणनहीं।।तोपूमाण केयभावसेज्ञानयोज्ञेयकाभेदसिद्धनहींहोगाऔजानतथाज्ञेयकेभेदका कियाङथा तिनकीसत्ताकाभीभेदनहींसिद्धहोगा । इसरीतिसेयंतिम पक्षकोनिषेधकरकेयवयाद्यपक्षकोविस्तारपूर्वकनिषेधकरनेकेयर्थयनु वादकरतेहैं । हेवादिन्यदिप्रमाणहैयहपृथमपक्षकहोतोवहकौनप्रमाण है।अर्थात्क्या?वहपूत्यक्षपूमाणहै। अथवानुमानहै वायागमहै वा अर्थापत्तिहै।यहांउपमानपूमाणकोकेवलसादृश्यमात्रगोचरहोनेसेतिस काकथननहींकिया । और अनुपलब्धिको अभावमात्रगोचरहोनेसे तिसकाभीकथननहीं किया ।। अथ ज्ञानज्ञय के भेदमेप्रत्यक्षपमाणका खंडन 8 ज्ञानौज्ञेयकेभेदमे प्रत्यक्षप्रमाणहै ।। इसपथमपक्षकोदूपित करनेकेलिये अनुवादपूर्वकतिसमें विचारकरते हैं । प्रथमपक्षमें “अयं- घटः” यहजोप्रत्यक्षज्ञानहै।वहअपनेसेघटकेभेदकोयर्थात् “अयंघट" इसप्रकार केयाकारखाले स्वस्वरूपभूतज्ञानसे घटयनुयोगिक भेदको प्रकाशकरताहेअथवा “यहघटइसको" विषयकरनेवालेज्ञानसेभिन्नहै।। इसप्रकारकाजोथन्यप्रत्यक्षहैवहतिनदोनोंकेभेदकोविपयकरताहै।स्वप्र- तियोगिकीविषययनुयोगिक भेदकोग्रापही "अयंघटः” यहप्रत्यक्ष ज्ञानग्रहणकरताहै।यदियहपूथमपक्षकहोतोतिसमें भीयहविचारकर्तव्य होक्या?"अयंघट"यहपूत्यत्तस्वकाशहैअर्थात्यन्यकिसीज्ञानकाविपय नहुयायपरोक्षव्यवहारकेयोग्यहै। अथवापरभकाशहै। श्रर्थात्यन्यज्ञान काविषयहुथा थपरोक्षव्यवहार केयोग्यहै । अयंघट" यहमत्यक्षस्वम- काशहुयास्वप्रतियोगिक प्रौस्वविषयअनुयोगिक भेदकोयापहीग्रहण .

वे सि० मु० भा० करताहै। इसमथमपक्षको अनुवादकरकेदूपितकरतेहैं । * स्वप्रकाशप्रत्यक्षको भेदकीग्राहकता कानिपेधनिरूपण स्वप्रकाशपरमकाश इनदोनों प्रथमपक्षमेंतोयपनेसेापहीउत्पन्न हुयायहमाप्तहोताहै । क्योंकिस्वविषयका विशेषणरूपकर भेदकाभान हुएयौरविशिष्टज्ञानको विशेपणज्ञानजन्यमानेहुएअपनेकरहीभेदरूप विशेषणकाग्रहणहुएयपनेसे अपनीउत्पत्तिमाप्तहुई । इसीयर्थकोस्पष्ट करतेहैं । “अयंघटः” यहमत्यक्षस्वप्रतियोगिकभेदको घटयनुयोगिक रूपतासेग्रहणकरताहुया “मत्तोभिन्नोघटः" य० मेरेसेघटभेदवालाह इसमतीतिकेअनुसारविशेष्यघटकाविशेपणरूपताकरभेदकोग्रहणकरता है। अथवा “मदघटयोर्भेदः"||०॥ मेरायौरघटकाभेदहै। इसमतीति केयनुसारस्वभेदको विशेष्यरूपताकर ग्रहणकरताहै। यदिस्वविषयका विशेषणरूपताकर स्वप्रतियोगिकभेदकोमत्यनग्रहणकरताहै यहयादि पनकहो तोतिसमेंभीयहविचारकर्तव्यहै।क्या?विशिष्टज्ञानविशेषणज्ञान गौरविशेष्यकेसाथ इन्द्रियसन्निकर्षसेजन्यहोताहै अथवाविशेषणतथा विशेष्यकेसाथ इन्द्रियसन्निकर्पसे जन्यहोता है । विशेषणज्ञानजन्य विशिष्टज्ञानहै।इसपक्षमभीयहविचारकरणीयहै। विशेपणरूपभेदकाग्राह कज्ञानयही प्रत्यक्षहैजोभेदकाग्राहकरूपताकर स्वीकारकिया अथवा इससेभिन्नहै। यदिभथमपतकहो तोविशिष्टज्ञानजो स्वमतियोगिक यौ स्वविपययनुयोगिकभेदका ग्राहकरूपताकरस्वीकार है सोईहीविशिष्ट भेदज्ञानकाजनकरूपतासे अभिमतविशेपणभेदकाजानहोनेकर अपमे सेयापउत्पन्नहोता।यहपूर्वउक्तदोपकसेनहींमानहोगाायपनेसेयपनी .

“१५५ । पूर्वाद उत्पत्तिमाननेमकौनदोपहोताहै ऐसीजिज्ञासाकेहुएकहतेहैं. इतरकेव्य वधानसेविना अपनी उत्पत्ति में कारण रूपताकर अपनी अपेक्षा होनेसेयात्माश्रयदोष प्राप्तहोताहै ॥ इति। अवयात्माश्रयदोषकेदूर करनेकेलियेप्रत्यक्षस्वपूति योगिकभेदकोविशेष्यरूपतासेग्रहणकरताहै। इसद्धितीयपक्षकोवादी उठाताहै ॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिन् “अयं घटः" यहपूत्यत्नभेदकोविशेष्यरूपतासे ग्रहणकरताहै । इसपनमें घटरूपधर्मीतथाप्रत्यक्ष रूपमतियोगीकोभेदका विशेषणपनाहै ॥ तिनमेमतियोगिरूपमत्यक्षतो स्वमकाशरूपताकरमानंहोताहै । और घटरूपयनुयोगीस्वगोचर “ययंघटः" यहजोमत्यतज्ञान तिसकरभान होताहै । इसमकारविशिष्टभेदप्रत्यक्षको विशेषणविशेष्य दोनोंकेसाथ इन्द्रियसंबंधसेजन्यमानेहुएभीयपनेसेयजन्य होनेकरयात्माश्रयदोष कीप्राप्तिनहींहोसकती ॥ समाधान ॥ हेवादिनइसरीतिसेभेदको विशेष्यरूपताकरमानपक्षमे विशेष्यकेसाथ इन्द्रियसन्निकर्पजन्यत्व कोलेकर विशेषणविशेष्यदोनोंकेसाथइन्द्रियसन्निकर्पजन्यविशिष्टज्ञान है ।। इसपक्षमेही यात्माश्रय दोपदेनेकोभूमिका स्वनाकरतेहैं ।। हे वादिनज्ञानकीउत्पत्तिसेपूर्वभेदकीसत्ताकहनेयोग्यहै ॥ अर्थावभेदके । ग्राहकरूपप्रत्यक्षज्ञानको विशेषणविशेष्यदोनोंकेसाथ इन्द्रियके संबंध जन्यमाने एयौभेदकोविशेषणरूपवाविशेष्यरूपकरभानहुए भेद के साथइंद्रियकासंबंध ज्ञानकीउत्पत्तिसेपूर्वयवश्यकहनाचाहियेोक्योंकि भेदकेसाथजोइंद्रियकासंबंधवहभेदकेग्राहकविशिष्टमत्यनकाजनकहै ।। तथाइंद्रियसन्निकर्पकाभेदको याश्रयपनाहोनेसेभीतिसकेयर्थभेदकी सत्ताथवश्यकहनेयोग्यहै । शंका ॥ हेसिद्धांतिन इसरीतिसेभेदकी चे० सि मु० भा० सत्ताहोपरन्तुतेसामानेहुएक्या?सिद्धहोताहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन तैसेमाननेमेयहविचारकर्तव्यहै ॥ इंद्रियकेसंबंधकाथाश्रयजोभेदहे ॥ वहअपनेग्राहकप्रत्यक्षको ज्ञातहुअाउत्पन्नकरताहै अथवाअपनीसत्ता मात्रसेउत्पन्नकरताहै ।। यदिगतहुथाउत्पन्नकरताहे यहाथमपक्षकहो तोजिसकरभेदगतहुआहै वहज्ञानयहीहै जोभेदकाग्राहकरूपताकर स्वीकास्हे अथवा वहज्ञानइसमेश्रन्यहै।।प्रथमपनतोनहींसंभवता क्यों कितिसीज्ञानकावहभेदकैसेविषयहोसकताहै अर्थात्स्वप्रतियोगिकी स्वविषयअनुयोगिकभेदकाग्राहकरूपताकर अंगीकारकियाजोविशिष्ट प्रत्यक्षतिसकाकारणरूपभेदविपयनहींवनसकता।कारणायहकिअपनी उत्पत्तिसेपूर्वथपनायभावहै । औरयदिज्ञानकासद्भावप्रथममानलें तो श्रात्माश्रयदोपपुनः प्राप्तहोगा ।।इति।। इसप्रकारप्रथमपतकोनिषेध करकेयवभेदकाग्राहकरूपताकरस्वीकारजो विशिष्टज्ञानतिसकीउत्पत्ति सेपूर्वजोभेदकाज्ञानहै। वहौरहीज्ञानहे।यातेयात्माश्रयदोपकी प्राप्ति नहींइसद्वितीयपक्षकोउठाकरदूषितकरतेहैं ।। यहांपरयहतात्पर्यजानने योग्यहै । वहज्ञानांतर क्या?निर्विकल्पकहै।यथवा। सविकल्पकहे ।। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता॥क्योंकिभेदकोएकसविकल्पकज्ञानहींविषय करसकताहै ॥ शौरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिज्ञानांतरका " श्रयंघटः" यहज्ञानस्वयंप्रकाशहोनेसे विषयनहींहै ।। इसीकारणसे तत्मतियोगिकभेदकोवहयन्यज्ञानविपयनहींकरसकता ॥ शंका ॥ श्रागेहोनेवालाजोप्रतियोगिरूपज्ञान तिसकोवर्तमानकालमेनहोनेसे स्वकाशरूपताकायभावहे तिसीसेउसकोविषयकरनेवालेभेदजानकी अनुपपरितनहीं ।। समाधान ॥ श्रवर्तमानताकोज्ञानकीपरमकाशता प्रवाई २५ मेहेतुकहनेवालेवादीने वर्तमानकालीनज्ञानकोयर्थसे स्वप्रकाशता मतिपादनकी । तिसजानकीस्वप्रकाशतामेवर्तमानत्वहेतुहै । अथवा ज्ञानत्वतिसकामयोजकअर्थात्साधकहै ।। पथमपक्षमतोवर्तमानकाल उपाधिकस्वप्रकाशपनासिद्धहोगा ॥ तैसेमानेहुएज्ञानका स्वाभाविक स्वभकाशपनाअंगीकारहै इसपक्षकीहानी होगी। औरवर्त्तमानकाल मेज्ञानकास्वरूपहीस्वप्रकाशहै यदियहद्वितीयपक्षमानो तोयहभीनहीं संभवता क्योंकिज्ञानत्वहेतुको तुल्यहोनेसे यतीतयौभविष्यतज्ञानोंमे भीस्वप्रकाशताकीप्राप्तिहोगी ॥ जैसेकालभेदसेकदाचित्भीघट्यघट रूपनहींहोता ॥ तैसेकालभेदसेज्ञानकवीभीपरमकाशनहींहोसकता। औरयतीततथाभविष्यतज्ञानमेज्ञानत्वहेतुहीनहीं।यदिवादीऐसेकहोतो प्रत्येकवस्तुकेस्वभावकात्यागमाप्तहोगा । औरविशिष्टज्ञानविशेषणणन सेजन्यहै।इसमथमपतकेअवांतरभेदकाविशेषणरूपतासेभानहोताहै इस पक्षमेविशेषणज्ञानविशिष्टज्ञानसेभिन्नहै।यहपक्षपूर्वकहाथासोपतभी इसभेदज्ञानकेनिराकरणसेनिरासहुयाजानलेना क्योंकिवहभेदकाज्ञान सविकल्पकहै । वानिर्विकल्पकहै इत्यादिविकल्पकी माप्तिइसपक्षमेभी समानहींहै । इसलियेइसकोजुदानिषेधकरनेकामयलनहींकिया । औरइंद्रियसन्निकर्षकायाश्रयरूपभेदस्वसत्तामात्रसेस्वविषयकज्ञानका जनकहें यहद्वितीयपक्षीकेवलकथनमानहै ॥ शंका । मत्यज्ञान मेसंबंधभीभासताहै।ौखहसंबंधभेद तथाइंद्रियकायथायोग्य विशेषण विशेष्यभावहै । ज्ञानमत्यासतिरूपसंबंध नहीं। तिसकारणसेस्वरूपसे विद्यमानभेदको स्वज्ञानकेतिजनकपना मक्रियामात्रहै। यहयापकैसे कथनकरतेहो ॥ समाधान ॥ हेवादिनभेदमेप्रमाणकेयभावसेतिसकी व०सि०'मु० भा० . १५८. सत्तानहींसिद्धहोसकतीपयसत्भेदस्वगोचखानकोंकैसेउत्पन्नकरेगा यौरजोविशेषण विशेष्यभावप्रत्यासत्ति पूर्वकथनकीहै । यहअवश्यहो परन्तुवहसत्पदार्थकोहोतीहै असत्कीनहीं।ौरभेदकीसत्ताप्रमाणके थाधीनहै।यातेभेदविषयकत्यक्षसेप्रथमभेदकीसत्ताकाग्रहणकरनेवाला प्रमाण्यवश्ययन्वेषणकरनेयोग्य है।यौर तिसकायभावहोनेसेभेदकी सत्तानहीं।औरयसत्भेदज्ञानकोउत्पन्नकेसकरेगाायौरभेदकीसत्ताकाथ भावहोनेसेविशेषणविशेष्यरूपप्रत्यासत्तिकाभीयभावभत्तीपूकारसिद्ध हुया ॥शंका।। यद्यपि “अयंघटः" यहप्रत्यक्षहीस्वप्रकाशहुअाअपने विपयकभेदकोग्रहण करताहै । यहपचनहींसंभवता । यहपूर्वकथन किया ॥ तथापिवहीप्रत्यक्षपरप्रकाशहुया स्वसेस्वविपयकेभेदको ग्रहणकरताहै इसपक्ष मेंपूर्वकथनकियेहुए यात्माश्रयादिदोपकीप्राप्ति भीनहीं ॥ क्योंकिपरप्रकाशप्रत्यक्षपक्षमें अयंघटः" इसज्ञानप्रतियोगि कयौविपययनुयोगिक भेदकाग्राहकयौरज्ञानहै । यातेऐसामाननेमें कोईअनुपपत्तिनहीं ॥समाधान।। हेवादिनऐसेमाननेमेयहही प्रत्यक्ष भेदकोविषयकरताहै यहतुम्हारीमतिज्ञाभंगहोगी ॥ यातेयहपनभी असंगतहे ॥ औरस्वकाशज्ञानपक्षपतियोगिरूपमत्यतकोयवेद्यहोने से .स्वभकाशशनपतियोगिक भेदकोयौरकोईज्ञानविषयकरनेकोसमर्थ नहींहोसकता । इसपक्षकोत्यागकरपर प्रकाश ज्ञानपक्षमत्यक्षांतर करतानसेज्ञेयकाभेदग्रहणहोताहे । इसपलकोवादीउठाताहै ॥शंका ।। हेसिद्धांतिन् “अयंघटः” इसप्रत्यक्षकोस्वप्रकाशरूपताकरभेदकाग्रा- हकहुएभीपरप्रकाशज्ञानपक्षमें प्रत्यक्षांतरकरज्ञानसे ज्ञेयकाभेदग्रहणहो जायेगाइसमेंकोईदोपनहीं ॥ यहांप्रतियोगिरूपमत्यरसेभिन्नमत्यक्षका.

पूबाई नाममत्यतांतरहै। अवइसपक्षकोदूपित करनेकेलियेविकल्पकरतेहैं । * ज्ञानपरप्रकाश पक्षमेंप्रत्यक्षांतरकोज्ञानज्ञेयके भेदकीग्राहकताकानिषेध * समाधान ॥ हेवादिन्वहदूसरा प्रत्यक्षभीच्यावृत्तयर्थातभिन्न प्रतियोगीयादिकोंके ज्ञानपूर्वकभेदकोग्रहणकरताहै । वानहीं । यह विचारकर्तव्यहै ॥ प्रतियोगीयादिकोंके ग्रहणपर्वकभेदकाग्रहणप्रत्य तनहींकरता। यदियहअंत्यपक्षमानों। तोवहभेदकोकैसेविषयकरेगा। शंका । प्रतियोगीश्रादिकोंकोविपयनकरकेवहप्रत्यक्षभेदकोक्योंनहीं विषयकरसकता ॥ समाधान ॥ हेवादिधर्मीसेविनातथाप्रतियोगी सेविनाकेवलभेदमात्रको कोईज्ञानविषयनहींकरसकता ॥ यहांपरयह तात्पर्यजाननेयोग्यहे ।। भेदकाग्रहणकरनेवाला जोयन्यप्रत्यक्षहै । वहनिर्विकल्पकहै । वासविकल्पकहै ॥ प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ।। क्योंकिभेदको समवायादिकोंकीन्याई एकसविकल्पकज्ञानकरहीवेद्य पनाहै। औरदितीयपक्षमभी यहविचारकर्तव्यहै ।वहसविकल्पकज्ञान पूमेयरूपतासेभेदकोविपयकरताहैअथवाभेदरूपतासेभेदकोविषयकरता है।।पूथमपक्षतोनिष्फलहोनेसेनहींसंभवता क्योंकिनमेयरूपतासेजल काज्ञानहुएभीपिपासावान् पुरुपकीपिपासाकीशांतिके निमित्तजला नयनमेंप्रवृत्तिनहींहोतीतैसेपमेयरूपतासेभेदज्ञानभीनिष्फलहै । और द्वितीयपक्षभी नहींसंभवता क्योंकिधर्मीयोप्रतियोगीकज्ञानसेविना भेदरूपतासेभेदकाज्ञानदुर्निरूप्यह।जिसकारणसेभेदकोधर्मिप्रतियोगि सापेक्षएकरूपताहै । अर्थात्धर्मीयौमतियोगीकैग्रहणपर्वकहीतिसके १६० सि० मु० भा. ग्रहणकानियमहै । इसीयभिप्रायसे यहयनुभवलोकमेंप्रसिद्धहै ॥ "श्रयंअस्माभिन्नः" य-यहपदार्थइसपदार्थसेभिन्न है ॥ इति ।। अब व्यावृत्तिविशिष्ट प्रतियोगीयादिकोंके ज्ञानपूर्वकभेदका ज्ञानहोता है इसयाद्यपक्षको अनुवादपूर्वकदूपितकरते हैं । हेवादिन भिन्नप्रतियोगीयादिकोंके ग्रहणपूर्वकभेदकाज्ञानमानेहुए प्रतियोगि ज्ञानभेदज्ञानमेंहेतु प्रतीतहोता है यहांप्रतियोगिज्ञान किसप्रकारका विवक्षित है। यदितिसज्ञानकोनिर्विकल्पककहोगे। तोकिवित्याकार प्रतियोगीभेदज्ञानमेभासेगा ॥ क्योंकिज्ञानकोस्वसमानाकारविषय कापूकाशकपनाहै ॥ यदिज्ञानकोस्वसमानाकारविपयकापूकाशनहीं मानें। तोघटज्ञानमेपटाकारताकास्फुरणरूपयतिप्रसंगप्राप्तहोगा।और यदितिसज्ञानकोसविकल्पककहो। तोवहज्ञानक्या ? प्रतियोग्यादिकों कोभिन्नरूपतासे ग्रहणकरता है अथवातिनको अभिन्नरूपतासेग्रह णकरता है। द्वितीयपक्षतोनहींसंभवता क्योंकिधर्मीतथाप्रतियोगीके अभेदग्रहणकरनेवालेकोप्रमाणरूपहोनेकर तिससेउत्तरभेदकाग्राहक रूपताकर अंगीकारकियाजोप्रत्यक्षतिसकोयप्रमाणताकीप्राप्तिहोगी। कारणयहकितिन प्रतियोगीयादिकोंके ज्ञानकोयाश्रयणकरके उत्तर भेदज्ञानकीप्रवृत्तिहोती है । जवप्रतियोगीयादिकोंकाज्ञानतिनकेत्र भेदकोग्रहणकरता है तोतिसको अाश्रयण करके प्रवृत्तहुयाजो उत्तरज्ञान वहतिन के भेदकोग्रहण कखाहुश्रा कैसेअप्रमाणरूप नहींहोगा ॥ यातेभिन्नरूपतासे धर्मीयादिकोकाग्रहणहीशेप रहता है। अवइसप्रथमपक्षकोदूपितकरते हैं ॥ ौरव्यावृत्ति विशि ष्टप्रतियोगी आदिकोंके ग्रहणपूर्वकभेदका शनहोता है । यदि -

पूर्वार्द्ध
यहपृथमपंक्षमानो तोभिन्नरूपतासेमतियोगी आदिकोंकोगहणकरने
वालाजोदूसरामत्यक्षवहभीभेदज्ञान है ॥ तिसकोभीभेदरूपविशेषण
करविशिष्टजोतियोगीयादिक तिनकेशनकरहीजन्यपना है । यदि
तिनकाग्राहक औरसत्यक्षस्वीकारकरो तो अनवस्थादोपकी प्राप्तिहोगी
औरभेदकाग्राहकरूपताकर स्वीकार किया जोप्रत्यक्षतिसकोही व्या
वृत्तिविशिष्टप्रतियोगीयादिकोंकाज्ञानमानेहुए अपनेसेअपनीउत्पत्ति
होनेकर यात्माश्रयदोपयाप्तहोगा ॥
॥ शंका ॥ प्रत्यक्षकोभेदका अग्राहकमानेहुएनिर्विषयपनाहोगा ॥
औरनिर्विपयज्ञानही अलीकहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन्तिसपूर्वउक्त
युक्तिसमुदायसेवस्तुमात्रको ग्रहणकरनेवालाजोप्रत्यक्षपूमाणहैसोभेद
कीवार्तामात्रकोभीनहींग्रहणकरसकता । यह अर्थसिद्धहुया । इति ।
अथअनुमानप्रमाणको ज्ञानज्ञेयकेभेदकी
ग्राहकताका निराकरण
इसपूकारमत्यक्षकोभेदकी ग्राहकताकानिषेध करकेयवधनु
मानभेदकाग्राहकहै इसद्धितीपक्षको शंकाद्वारा मकटकरतेहैं। शंका
हेसिद्धातिन्यदि प्रत्यक्षभेदका ग्राहकनहीं है ।। तोयनुमानप्रमाणसे
ज्ञानतथाज्ञेयकाभेद ग्रहणहोगा । तैसेहीदिखलातेहैं ।
विमतोविषयः । स्वविपयज्ञानात् भिद्यते ॥
तविरुद्धधर्माश्रयत्वात् । योयविरुद्धधर्माश्रयः सतु
तस्मात् भिद्यतेयथाघटापट तथाचायंतस्मात्तथा।
य०॥ विवादकाविषयजोजेयहै ।वहस्वविषयकज्ञानसेभिन्न
हैज्ञानसेविरुद्धजोजडतायत्यप्रकाशतारूपधर्मतिसकायाश्रयहोने
--

वे०सि० मु० मा० से॥जोजोजिससेविरुद्धधर्मका याश्रयहोताहै।सोसोतिससेभिन्नहोता है। जैसेघटसेभिन्नपटहै। गौरतेसेहीयह विषयविरुद्धधर्मका याश्रयहै तिसीसेस्वविषयकज्ञानसेभिन्नहै ।। इति ॥ विपयरजतघटज्ञानसेभिन्न है यातेसिद्धसाधनतादोप यनुमानमेहोगा।इसलिये स्वविपय"यह विशेषणसाध्यमेकथनकियाहै ।। समाधान || हेवादिनज्ञानज्ञेयकेभेद मेयहथनुमानभीस्वरूपाऽसिद्धदोपसे नहींसंभवता । क्योंकिधर्मनिष्ठ विरुद्धपनाविरोधकी थाधारतासेहै यहवा विवादरहितहै। औरज्ञान तथाज्ञेयकाजोविरोधहे सोतिनदोनोंकाभेदजानेहुएहीज्ञातहोसकताहै ज्ञानतथाज्ञेयकाभेदजानेविनाउसकोकोईनहींजानसकता । औरतिन काभेदयवीसिद्ध करनेयोग्यहे तिसकीयसिद्धिहुएतिसके थाधीनजो विरोधरूपधर्मकाविशेषणतिसकीयसिद्धिहोनेकरधर्मको तिसविरोधका श्राश्रयपनाभीयसिद्धहै। यातेपक्षमेयहहेतुस्वरूपसेहीयसिद्धहोनेकर स्वसाध्यकासाधकनहीं किंवाज्ञानप्रतियोगिकभेदसिद्धकरतेहोअिथवा भेदमात्रसिद्धकरतेहो। अंत्यपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकितिसमेहमारा विवादनहीं। औरयदिप्रथमपक्षकहो तोसाध्यकीयप्रसिद्धिहै।ौरपद काविशेषणरूपसाध्यकीयप्रसिद्धिहोनेकरपक्षकीभीग्रसिद्धिहै । याते श्राश्रयासिद्धिभीअनुमानमेप्राप्त है । औरयदितुमऐसायनुमानकरो। ज्ञानतहिषयौपरस्पर भिन्नौविरुद्धधर्माश्रय त्वात ॥घटपटवत॥ य० ॥ जानौतिसकाविषयपरस्परभिन्नहैं । विरुद्धधर्मोका थाश्रयहोनेसे । जोजोविरुद्धधर्मका आश्रयहोतेहैं सोसो परस्परभिन्न होतेहैं । जैसेधटपटहैं ॥ इति ॥ इसमेसाध्यकीयमसिद्धिनहीं ॥

- पूर्वाद क्योंकिपरस्परभेदघटादिकोंमेमसिद्धहै याते अप्रसिद्ध विशेषणरूपतासे आश्रयकीयसिद्धिनहींहै सोयहकथनभीनहींसंभवताक्योंकिव्याप्तिकी असिद्धिहै। सोदिखलातेहैं । साध्यौरसाधनका व्यभिचारसेरहितजो संबंधतिसकानामव्याप्तिहै । औरसंबंधकोदोनोंसंबंधियोंकेयाधीनहोने सेतिनदोनोंसंबंधियोंकीसत्तायवश्यहोनेयोग्यहै।तिनमेसाध्यतोदृष्टांत मेभीविद्यमाननहीं है । क्योंकिपमाणकायभावहै । तिसीकारणसेसाध्य कीयप्रसिद्धिहोनेकरतिसफरनिरुपितव्याप्तिभीयसिद्धहै । इसप्रकार व्याप्यत्वासिद्धहेतुहै इसकथनसेवाश्रयसिद्धिभीयर्थसेकथनकी क्यों कियमसिद्धविशेषणवालापनहै । औरघटतथापटकाभेदकिसीप्रमाण करसिद्धनहीं जिसकरसाध्यकीप्रसिद्धिहो प्रत्यक्षतोघटऔरपट केभेदमे प्रमाणनहींहै क्योंकितिसको यागेनिराकरण करनाहै ॥ औरसकृत अनुमानसेभिन्न किसीयऔर अनुमानसेघटपट काभेदग्रहण होजायेगा यदिऐसेकहो तोतिसमेभीव्याप्तिकाग्रहण तिसीयनुमानसेमानोगे तो अात्माश्रयदोषमाप्तहोगायो स्यदितिससेभिन्नग्रन्ययनुमानव्याप्तिका ग्राहकमानोतो यनवस्थादोपमाप्तहोगा इसमकारपूर्वउक्तदोप पूर्वकी न्याईहीमाप्तहुएयातेयनुमानप्रमाणसेभीगनतथाझेयकाभेदनहींग्रहणहो सकता ॥ अवज्ञानायके- * अथज्ञानज्ञेयकेभेदमेंआगमकोप्रमाणता कानिराकरण * भेदमेयागमपूमाणहै इसतृतीयपनकोदूषितकरतेहैं । हेवादिन पूर्वकाडतथा उत्तरकांडरूप वेदहीयागमममाणहै तिनमेपूर्वकांडकातो साध्यसाधनकासंबंधकथनकरके संस्कारद्वारा अथवाश्रवणादिकों मे के० सि० मु० पा० भवृत्तिद्धारायद्वितीयब्रह्ममेतात्पर्य्यपूर्वनिरूपणकियाहै | औरपटप्रकार केलिंगयुक्तउत्तरकांडकातो सानातहीयदैतमेतात्पर्यहै यातेवागम प्रमाणकोभेदके बोधकपने कीशंकाभी नहींकरसकते ॥ शंका ।। हेसिद्धांतिन् ॥ यतोवाइमानिभूतानिजायंते ॥ अ० ॥ जिससेयहसर्वभूतउत्पन्नहोतेहैं ॥ यहशास्त्रब्रह्मसे सृष्टिकोप्रतिपादनकरताहुया “देवताऽधिकारणन्याय" सेसर्वकार्य मात्रकातिसब्रह्मसेभेदभीप्रतिपादनकरताहै ॥ देवताऽधिकरणन्यायका स्वरूपपूर्वकथनकरदीयाहै ॥ औरयदितुमऐसेकहो किपूर्वउक्तवाक्य अभिन्ननिमित्तउपादानरूपब्रह्मसेसृष्टिमात्र कोकथनकरताहै । तिससे कोई भेदनहींपूतीतहोता। यातेदेवताधिकरणन्यायसेतिसवाक्यको कार्यकारणभेदमेप्रमाण्यताकैसे होसकतीहै । सोयहकथनभीनहीं संभवता। क्योंकिब्रह्मतथाजगत्कायभेदमानेहुएतिसब्रह्मसे जगत्की उत्पत्तिनहींसंभवैगी । जैसेघटसेघठनहींउत्पन्नहोसकता । क्योंकि एकहीपदार्थमेपूर्वउत्तरवृतित्त्वनहीं है । औरयदितुमऐसेकहोकिइस रीतिसेब्रह्मयौ जगत्काभेदहुएभीज्ञानौज्ञेयकेभेदमे क्याप्राप्त हुआ भावयहज्ञानकार्यरूपनहीं है। क्योंकिकार्यजडहै । औरगनब्रह्मस्वरूप भीनहीं। क्योंकितिसब्रह्मको असंगस्वभावहोनेकर घटादिकोंकायप- काशकपनाहै । इसप्रकारब्रह्मौजगत्कोज्ञानरूपताका अभावहोनेसे ब्रह्मयोजगत्काभेदहुएभीज्ञानतथाज्ञेय काभेद कैसेहोसकताहै । सो यहतुम्हाराकथनभीयसंगतहै ॥ जिसकारणसे प्रकाशकस्वभावज्ञान है ॥ ौरवृत्तिमेप्रतिविवितहुश्रा चिदरूपब्रह्मही जगत्काप्रकाशकहै वृत्तिनहीं ।। क्योंकितिसकोजडहोनेकरयप्रकाशकपनाहै। और (१) तदुपर्यपिवादरायण सभवात् ॥ उ० मी. १।३।२६ पूबाई १६५ सविशेषणेहि अ०॥ विशेषणसहितपदार्थमेजोवुद्धिहोतीहै ।वहविशेषण अंशमेवाधितहुईविशेषकोमाप्तहोतीहै । इसन्यायसे वृत्तिअवच्छिन्न ब्रह्ममेप्रकाशकपनेकी प्रतीतिहुएतहांवृत्तिरूप विशेषणमेप्रकाशकपना बाधितहै ॥ यातेविशेपचेतनमात्रब्रह्ममेही काशकपनेकीप्राप्तिहोनेकर ज्ञानस्पताकासंभवहै।।इसीसेब्रह्मसेजोकार्यकाभेदहैवहज्ञानसेहीभेदहै यातेयागमप्रमाणसेज्ञानयोज्ञेयकेभेदकीसिद्धिहै।।समाधाना हेवादिन यहांतुमकोयहकथनकरनेयोग्यहपूर्वकथनकियाजोयागमहै क्या?वह कार्यकारणभावकाप्रतिपादकमात्रहोनेकरज्ञानज्ञेयकेभेदकासाधकहै । अथवाकार्यकारण भावविषयक -माज्ञानकाउत्पादक होनेकरभेदका साधकहै ॥ प्रथमपक्षतोनहींसंभयता ॥ क्योंकि "विप क्ष्व" थ. विपकोतूंभक्षणकर ॥ इत्यादिवाक्यमे अतिप्रसंगहोगा ॥ भावयह केवलप्रतिपादकतामात्रकरयदिवाक्यकिसीयर्थमेप्रमाणहोतोयहवाक्य भीविपभक्षणमेप्रमाणहुयाचाहिये । औरद्वितीयपक्षभीनहीं संभवता क्योंकिवहश्रतिवाक्यवादियोंकर कल्पितप्रधानादिककारणांतरोंकेनिरा करणमेतात्पर्यवालाहै । इसलियेकार्यकारणभावकावहपमापकनहीं। थौरतात्पर्य केविषयभूत अर्थमेहीशद्धकीप्रमाणताहोतीहै ॥ यहपूर्व कथनकराएहैं। अबइसीयर्थकोस्पष्ट करतेहैं। “यतोवाइमानिभूता निजायते” इसश्रतिमे "इमानि" यहप्रथमभूतोंकाविशेषणहे ॥ तिस विशेषणकरनामतथारूपसेस्पष्टयौरमनकरकेभी जिनकीरचनाचिंतन नहींकीजाती ऐसेभूतोंकेधर्मसमर्पणकियेजातेहैं । तिनधर्मोकरयुक्त अपंचकीरवनायचेतनप्रधानादिकोंसेतथाथल्पशक्तियालेहिरण्यगर्भा- t ब० सि. मु० भाः दिकोंसेनहींसंभवती । यातेपूर्वउक्त समग्रश्रुतिवाक्य सांख्यादिकोंने कल्पनाकीयेहुएजोप्रधानादिककारणांतरतिनकेनिषेधपरहैं ॥ शंका ॥ समग्रसृष्टिप्रतिपादकवाक्योंकोवादियोंनेकल्पनाकियेजोजगत्केकारण प्रधानादिकेनिपेधपरत्वनहींसंभवता ।। क्योंकिसमन्वययधिकरणका विरोधहै ।। अर्थयह- * तत्तुसमन्वयात् ॥शा० प्रा० १ पा० १॥सू०४॥ अ० ॥ तुशदपूर्वपक्षकोनिवारणकरताहै “तत्" वहजगत् कारणयद्वितीयब्रह्मवेदांतोंसेहीनिश्चयहोताहै । क्योंकि(समन्वयात्) तिसमेहीसर्ववेदांतोंकेतात्पर्युकीविषयताहै ॥ इसथधिकरणमेसमग्र वेदांतवाक्योंकाएकयद्वितीयब्रह्ममेतात्पर्यनिरूपणकियाहै।।ौरयदि थापयहांपरसृष्टिवाक्योंकाप्रधानादिकारणांतरके निराकरणमेतात्पर्य कहोगे तोइसधिकरणसेस्पष्टहीविरोधहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन तात्पर्य्यदोप्रकारकाहोताहै एकथवांतरतात्पर्य हैऔरदूसरापरमतात्पर्यहै यहांयवांतरतात्पर्य्यसृष्टिवाक्यनकाप्रधानादिककारणांतरकेनिराकरण मेहै । औरपरमतात्पर्यतोअद्वितीयब्रह्मकीसंभावनामात्रमेहै। अर्थात सजातीयादिकभेदसेरहितजो ब्रह्मकास्वरूपपूर्वकथन कियावहऐसाही होनेयोग्यहै।। इसप्रकारकयाकाखालीपद्धितीयब्रह्मकीसंभावनामात्र मेतिनकातात्पर्य है । जिसकारणसेब्रह्मसेसकलकार्यप्रपंचकाभेदनिरू- पणनहींहोसकता जैसेमृदादिकारणसेघटादिकार्य भिन्नकरके निरूपण नहींकियेजाते ॥ यदितिनकाभेदमानेतो हिमगिरितथाविध्यगिरिकी न्याईकार्यकारणभावकाहीथदर्शनहोगा । और "मृदघटः" इससा- मानाधिकररायसेतिनकाअभेदमाननेमेहीकार्यकारणभावयुक्तहै श्रन्य पुर्वाई १६७ प्रकारसेनहीं ॥ यातेसमन्वय अधिकरणका विरोधनहीं याता॥ शंका ॥ मृत्तिकायौघटका अभेदमानेहुए पूर्वउत्तरभावकायसंभव होनेसेपूर्वउत्तरभावकर व्याप्तजोकार्यकारणभावहै वहभेदसेविना अनुपपन्नहै यातेसृष्टिवाक्यभेदमेंही तात्पर्य्यवालाक्योंनहो।समाधान हेवादिन्यदिभेदको सृष्टिवाक्यकेतात्पर्यका विषयमाने ॥ तो नेह नानास्तिकिंचन” इत्यादि श्रुतिसेतिसभेदकाजो निषेधहैवहव्यर्थ होगा । जिसकारणसे अखंडवस्तुकीसिद्धिके यर्थभेदकानिपेधहै। और श्रुतितात्पर्य्यका विषयभेदकोमानेहुए तिसभेदकानिषेधव्यर्थ है। औरभेदसेविनाएकही वस्तुमेंपूर्वउत्तरभावका असंभवहोनेकर कार्यकारणभावनहींसंभवेगा ।। यहतुम्हाराकथनभी समीचीननहीं। क्योंकिकल्पितभेदकोयाश्रयण करकेकार्यकारणभावको मानेहुए विरोधकाग्रभावहै ।। किंवा ।। मृष्टिवाक्यभेदपरहे इसकाक्यायर्थहै। क्या ? यहवाक्यपदार्थ रूपतासेभेदकोसाक्षात्बोधनकरताहै अथवा वाक्यकायर्थरूपताकर भेदकोबोधनकरताहै। वा। भेदसेविनाकार्य कारणभावजोवाक्यका अर्थवयनुपपन्नहै इसलियेतिसवाक्यार्थका उपपादकरूपताकर भेदकोअर्थसेसृष्टिवाक्यकल्पनाकरताहै । तिन मेंप्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकिमृष्टिवाक्यमेंकोईभी पदसाक्षात् भेदकोनहींपतिपादनकरता ।। तिसमेंभेदकेवाचकपदकायभावहै ।। श्रौरद्वितीयपक्षभीनहीसंभवता ॥ क्योंकिभेदकोकिसीपदकार्थन होनेसेवाक्यार्थत्वकाभीअभावहै ॥ शंका ॥ जैसेशत्रके गृहसंभोजन कीनिवृत्तिकिसी पदकार्थनहींतोभी "विषभुत्व" इसवाक्यका तिसकोयर्थपनाहै ।। तैसेब्रह्मयौजगत्काभेद किसीपदकार्थयद्यपि દિક वेस० ० मु० भाग नहीं हैतथापिसृष्टिवाक्यका अर्थपना तिसमेंसंभवहोजायेगा । समाधान ॥ हेवादिनपदार्थोकोहीसंसर्गीरूपताकरसाक्षात्वाक्यका यर्थपनाहे ।। औरयदियखंडवाक्यार्थत्वपक्षकोयाश्रयणकरेंतोपदार्थ कोहीधर्मीमात्रपरताहोनेकर साक्षात्वाक्यप्रतिपाद्यताहै । इसकारण सेपरगृहमभोजनकीनिवृत्तिको अपदार्थहोनेसेसाक्षात् वाक्यार्थता नहीं है ॥ यातेकोईदोपनहीं। औरतृतीयपक्षभीनहींसंभवता।क्योंकि प्रथममृष्ठिवाक्यतो कार्यकारणभावकोकल्पना नहींकरसकताजिससे वहयचेतनहै । औरखाक्यार्थकोदेखकर पुरुषभेदकीकल्पनाकरताहै। यहभीग्रसमीचीन है । क्योंकि पुरुषकल्पनाका भेदनिषेधकश्रतिके साथविरोधहोनेसे तिसकोमासरूपताहै । इसरीतिसेज्ञानस्वरूपब्रह्म औजगतरूपज्ञेयके भेदमेंकार्यकारणभावकी अनुपपत्तिप्रमाणहै ।। यहयपत्तिप्माण पूसंगसेनिराकरणकिया । अथज्ञानज्ञेयके भेदमेंअर्थापत्तिप्रमाणकानिराकरण अवज्ञानकीअन्यथा ऽनुपपत्तिज्ञानयोज्ञेयकेभेदमेंपूमाणहैइस चतुर्थपतकोनिषेध करनेकेलियेपूर्वपक्षीद्वारा इसपक्षकोपूकटकरतेहैं। * अथपूर्वपक्ष शंका ॥ ज्ञानही स्वभिन्नज्ञेय सेविनाअनुपपन्नहुयायपनेसे भिन्नज्ञेयकोविषयकरता है । जैसे दाहकेयोग्यकाष्टादिकोंसेविना अग्निस्वरूपकोनहींप्राप्तहोता ॥ तैसेज्ञेयसेविनाज्ञानभीस्वरूपकोनहीं प्राप्तहोताहै ॥ तिसकारणमेज्ञेयकीसत्ताज्ञानसेभिन्नअवश्यहोनेयोग्य है । और वह ज्ञान प्रापही ज्ञेयस्वरूपनहींहोसकता । क्योंकिएक वस्तुकोउभ्यरूपमाननेमेकर्तृकर्मभावविरोधप्राप्त होता है ॥ तिसीसे पूर्वाद २६६ ज्ञानस्वभिन्नज्ञेयसेविनाअनुपपन्नहूयाज्ञेयकी कल्पना करता है ॥ इसरीतिसेज्ञानतथाज्ञेयकाभेदसिद्धहै । शंका । हेवादिन्दाहकेयोग्य काष्टादिकोंसेउत्पन्नहूया अग्निकाष्टादिसेविना अनुपपन्न है यह कथनतोयुक्त है परंतु ज्ञानतो किसीविपयसेजन्यनही है ।। तिससे विषयविना ज्ञान नहीं संभवता ॥ यह कथन कैसेवनसकता है । समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् अर्थकेप्रकाशकानामज्ञानहै ॥ अर्थके अत्यंतग्रसत हुए किसकाप्रकाशज्ञानकोकहेंगे । तिसकारणसेज्ञानको अर्थकेयाधीनहोनेकर विषयकेअभावहुएतिसका स्वरूपहीनहींसिद्ध होगा ॥ शंका ॥ हेवादिननवनताहुयाभी अर्थयदिप्रमाणसिद्धहो तोस्वीकारकीयाजाताहै | जैसेसूर्यमें असंभावित भीछिद्र है परंतुउत्पातकालीन प्रमाणसिद्धमाना जाता है तैतेयर्थसेविनाभी ज्ञानवनजायेगा । समाधान ॥ हेसिद्धांतिन्निर्विषयज्ञानसंभवता नहींऔरकहींदेखनेमेंभी नहींयाता । क्योंकिविषयकेसहितहीज्ञान भासमानहोताहै ।। शंका ॥ जैसकोईभूतलघटवालाहुअाभीउस सेभिन्नभूतलघटसे रहितभीदेखाहै । तैसेकिसीज्ञानकोसविषयहुएभी उससेभिन्नज्ञान निर्विषयहीक्योंनहो। किन्तुहुयाचाहियो।समाधान ॥ ज्ञानकोनिर्विषयमानेहुए प्रकारशून्यहीज्ञानभासेगा ॥ यद्यपि “ययं घटः" इसज्ञानमेंघटविषयहे औरघटत्वधर्मइसमें प्रकारहै । यहवार्ता हमदोनोंकोसंमतहै। तिससेविषयौपूकारकापरस्परभेदहोनेसेविषयके श्रभावहुए कार शून्यज्ञान भासेगा । यहतुमकैसेकथनकरतेहो । तथापिज्ञानमेविषयसेभिन्नथौर कोई प्रकार नहीं है। क्योंकिज्ञानमे भासमानजोसंसर्गतिसकेनिरूपकका नामपूकार है "जैसेययंघटः" वे० सि० मु० भा० इसज्ञानमेघटतथाघटत्वकासमवायभासताहे ।। तिससंसर्गकीयाधारता घटमेहेयौरतिसकीनिरुपकताघटत्वमेहे ॥ यातेघटत्वज्ञानमेप्रकार है। तसेप्रकरणमभीविशेष्यघटकीन्याईंभासमानजोघटत्वरूपप्रकार वह भी तिसज्ञान का विषयहै ॥ तिसकेयभावहूएपूकारशून्यहीज्ञानभासेगा।। तिसकारणसेज्ञेयविनाज्ञानयनुपपन्नहूया अभेदमेकर्तृकर्मविरोधहोने करयपनेसेभिन्नज्ञेयकीकल्पनाकरताह।।इतिपूर्वपक्ष अथसिद्धांत समाधान ।। हेवादिन ज्ञेयसेविनाज्ञानकी अनुपपत्तिकायभाव है ।। तैसेहीदिखलातेहैं । क्या? ज्ञेयसेविनाज्ञानकीउत्पत्तिकीयनुपपत्तितिन केभेदमेप्रमाणहाअथवाज्ञानकीस्थितिकीयनुपपत्तितिनकेभेदमेप्रमाण है ॥ वाज्ञानज्ञप्तिकीयनुपपत्तितिनकेभेदमेप्रमाणहै ॥ यहांजानके ज्ञानकानामज्ञप्तिहै ॥ प्रथमपक्षमेयहविचारकियाचाहिये।। क्या? यह हमारेएकदेशिकामतहै अथवानैयायिककामतहै ।। प्रथमपक्षकहोतो जानकीस्वरूपतासेउत्पत्तिकाअभावहै।यद्यपिवृत्तिउपहितत्वाकाररूपता सेज्ञानकीउत्पत्तिकासंभवहै। तथापिस्वरूपसेतिसकोनित्यभावहोनेकर उत्पत्तिकाग्रभावहै।।यातेप्रथमपननहींसंभवतागायौरदितीयपक्षमेतोपू माणयौरपूमाणाभाससेहीतिसज्ञानकीउत्पतिकासंभवहुएविपयकीतिस कोयापेक्षाहीनहीं है।।यावेज्ञानकीउत्पतिश्रन्यथाउपपन्नहोनेसेयहअर्था पत्तिज्ञानज्ञेयकेभेदमेपमाणनहींहोसकती॥शंका। जैसममातथायप्रमा ज्ञानयहदोनोंप्रमाणयौप्रमाणाभासकोकारणरूपताकरयपेक्षाकरतेहैं। तैसेकारणत्वधर्मकीतुल्यतासेविषयकीभीवहदोनोंअपेक्षाकरेंगे। याते विषयसेविनातिनकी उत्पत्तिकैससंभवेगी। किंतुनहींसंभवती समाधान हेवादिनज्ञानकोसर्वत्रविषयजन्यताकानियमनहीं है। क्योंकिअनुमिति १७१ अादिकज्ञानोंमेविषयजन्यताकाव्यभिचारहे । यातायप्रथमपक्षयसं गतहै । औरज्ञानकीस्थितिकीयनुपपत्तिज्ञानज्ञेयकेभेदमेप्रमाणहै । यहद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता।क्योंकिविषयनिष्ठज्ञानकीप्रधिकरणता काअभावहै ।। यदिविषयकोभीज्ञानकायाश्रयमानले तोतिसमेप्रमा तृत्वकीप्राप्तिहोगी ॥ ौरविषयपनेकाव्याघातहोगा । यद्यपि “जातो घट:"इसमतीतिसेज्ञानकीथधिकरणताघटमेप्रतीतहोतीहै । यातेविषय भीज्ञानकायाश्रयबनसकताहै । तथापि “नष्टोघटः" अ०॥ नाशका आश्रयघटहै । जैसे इसपूतीतिमैनाशकी अधिकरणताघटमेभासतीहै परन्तुवास्तवअधिकरणतानहीं तैसेउसएत्ययमेभीजानकरसंतोपकरने योग्यहे । अवतृतीयपक्षकोदूपित करनेकेलिये वादीदारातिसकोपूकट करतेहैं । (अथपूर्वपक्ष)हेसिद्धांतिनशेयसेविनाज्ञानज्ञप्तिकीअनुपपत्ति ज्ञानज्ञेयकेभेदमेममाणहै ।शंका।। हेवादिनज्ञानज्ञप्तियर्थातज्ञानकाजो. ज्ञानहै । तिसकाविषयभूतजोपथमज्ञानहै । क्या?विषयसेविनातिसका स्वरूपनहींसिद्धहोसकता । समाधान ॥ हेसिद्धांतिन्ज्ञानविषयकज्ञान कोविषयकेज्ञानकीयाधीनताहै । अर्थातविषयसेव्यावृत्तज्ञानकरजन्य पनाहै । तिसीकारणसेज्ञानकीन्याईज्ञानकेविषयकोज्ञानज्ञप्तिमेकारणता होनेसेतिसविषयकेअभावहुएज्ञानज्ञप्सिकी अनुपपत्तिहै " इति। (अथ सिद्धांत) हेवादिनज्ञानकीज्ञप्तिकाहीयभावहोनेसेजानज्ञप्तिकाकारणरूप करज्ञेयकीसिद्धिनहींहोसकती।अबइसीअर्थकोस्पष्टकरतेहैं। ज्ञानक्या? अपनेव्यवहारके अर्थयपनेसेभिन्नशानकीयपेक्षाकरताहै।यथवाविपयके व्यवहारअर्थस्वभिन्नशानकीपेक्षाकरताहै। यंत्यपनतोनहींसंभवता । क्योंकिविषयतोयरपर्यंतभीसिद्धनहीं था जिसकेव्यवहारअर्थज्ञानांतर १७३ २० मि. मुरमा कीयपेक्षाहो । पौरपूथमपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकिज्ञानकोस्वयं प्रकाशमानहोनेकरयत्यिवेद्यहृया अपरोक्षव्यवहारफेयोग्यहोनेकर तिसकोअपनेव्यवहारके यर्थस्वभिन्नजानकोकिंचित्भी अपेक्षा नहीं है । शंका । ज्ञानस्वप्रकाशनहीं है । क्योंकितिसकोघटादिकों की न्याईवस्तुरूपताहोनेसे वेद्यपनाहे ॥ समाधान ।। जानक्या?ज्ञात हुयाविषयकासाधकहे । वायज्ञातहुयाभीविषयकासाधकहे । पूथमपन तोनहींसंभवता।क्योंकिपथमज्ञानकीन्याईज्ञानकेपूकाशकद्वितीयज्ञान कोभीज्ञातहुयाहीस्वविषयकासाधकमाननाहोगा। औरद्वितीयज्ञान केपूकाशयर्थतृतीयज्ञानकोयन्वेपणकियेहुएतिसतृतीयज्ञानकोभीज्ञात हीकहनाहोगा। तिसमेचतुर्थजानकीयपेचाहोनेसेयनवस्थादोपकी प्राप्तिहोगी ॥ शंका यहयनवस्थादोपकेलियेनहीं है क्योंकिमूलभूत पूथमज्ञानविनाशसेरहितहे थौरमूलकेक्षयकरनेवालीयनवस्थाहीदोप रूपहोतीहै । यातेज्ञानांतरकीयपेक्षाहुएकोईदोपनहीं ॥ समाधान ॥ हेवादिनवानोंकीधारामे जोज्ञानज्ञातनहींहोगा तिसकोअसत् होनेकर तिसकाविपयभृतजोज्ञानहै वहभीप्रमाणकेयभावसे असत्होजायेगा।। इसप्रकार सकल ज्ञानधाराको यसत्होनेसेमूलभूत प्रथमज्ञानकी भी असिद्धिहोगी । तिसप्रथमज्ञानकोअंसहुएजडप्रपंचकीस्वतः सिद्धि कायभावहोनेसेतिसकीप्रतीतिनहींहोगी ॥ इसरीतिसे ज्ञानकापर प्रकाशकपनायुक्तनहीं ।। औरयज्ञातहुयाज्ञानस्वविषयकासाधकह।। यहद्वितीयपक्षभीनहींसंभवताः ॥ क्योंकिपमाणके अभावहोनेकरनर श्रृंगकीन्याईअपनीस्वरूपसत्ताहीप्रसिद्धहै। तोयौरविषयकीसाधकता तिसको कैसे होसक्तीहै ॥ शंका । जिसकिसीकालमें प्रमाणकी पूर्वाई प्रवृत्तिहोनेकर शानकास्वरूप सिद्ध होजायेगा ॥ समाधान ॥ हेवादिन् “तुष्यतोदुर्जन" न्यायसेज्ञानकोज्ञानांतरकीपेक्षाहो ॥ तथापिविषयभूतज्ञानकाविषयजोघटादिकहैं ॥ तिनकीपेक्षाज्ञान विषयकज्ञानकोकैसेहोसकतीहै । किंतुकिसीमकारनहीं ॥ यहांयह भेदजानलेना ।। ' पूर्वप्रकरणमेज्ञानकाज्ञानसंभवहीनहींहोसकता ।। यहथसंभवदोषयपत्तिमेकथन किया । औरयवतिसयर्थापत्तिकी अन्यप्रकारसेहीउपपत्तिनिरूपणकरतेहैं ॥ ज्ञानकीज्ञप्तिस्वविषयभूत ज्ञानकीहीयपेक्षाकरती है ।। स्वविषयरूपज्ञानकेविषयकीयपेक्षानहीं ‘करती। क्योंकिस्वविषयरूपज्ञानमात्रमेवहचरितार्थहै ।। शंका ॥ हे सिद्धांतिन ज्ञानज्ञप्तिमे क्या ? ज्ञान सामान्यविषय है ।। अथवा ज्ञान विशेष विषयहै । प्रथमपक्ष नहीं संभवता । क्योंकि घटका ज्ञानहै । ऐसातिसज्ञप्तिका याकारहै ।ज्ञानसामान्यकोविषयमानेहुए विशेषज्ञानकेस्फुरणकी योग्यताहै ॥ यातेज्ञानमात्रविषयताकी अयोग्यताहोनेसे सामान्यज्ञानकी तिसज्ञप्तिकोअपेक्षानहीं ।। और यदिदितीयपक्षमानों 'तोज्ञानविशेषताविपयके शाधीनहै ।। याते विषयकीयपेक्षाअवश्यहोनेसे विषयकेयभावहुए ज्ञानकीज्ञप्तिकैसे बनेगी ।। समाधान।। हेवादिन्यहतुम्हारा कथनसत्यहै । विज्ञान विशेषहीजप्तिमेंभासताहै । परंतुवहज्ञानमेजोविशेषहै सोव्यावृत्तिरूप अर्थात् भेदरूपहै । वहविषयकृतनहीं ॥ यातेतिसको विषयकी अपेक्षानहीं है ॥ शंका ॥ ज्ञान विशेषकोविषयके श्राधीननमाने हुए पटादिज्ञानोंसेघटमनमें व्यावृत्तिरूपविशेषकी सिद्धिकैसेहोगी। समाधान ॥ हेवादिन्तुम्हारायह कथनभीतुच्छहै । क्योंकिज्ञान वे. सि. मु० भा० मेंस्वतःहीव्यावृत्तपनाहै |जैसेनैयायिकादिकोंके मतमेंजातियादिक पदार्थस्वभावसेहीव्यावृत्तहैं।।इसीअर्थकोस्पष्टकरतेहैं क्या?एकज्ञानमें ज्ञानांतरसेव्यावृत्तिकाहेतुविषयहै । अथवाज्ञानमें व्यात्तिकीप्रतीति काहेतुविषयहै।।प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिव्यावृत्तिकोअन्यो . अन्याभावरूपहोनेकर अजन्यताहै। श्रौख्यावृत्तिकोजन्यमानेहुए तिसकीउत्पत्तिसेप्रथम सर्व से अभिन्नस्वभावहीशनउत्पन्न हुथा माननाहोगा । इससेवहज्ञानविषयसे व्यावृत्तिकेउत्पन्न एकैसे अपने स्वभावकोनहींत्यागेगा। किंतुयवश्यत्यागदेगा। औरप्रतीततथा भविष्यत्पदार्थविषयकज्ञानकोव्यावृत्तिसेरहितग्रव्यावृत्तपनामाप्तहोगा। क्योंकिविपयकातिसकालमेंअभावहै।।ौरविषयकोहीव्यावृत्तिकीहेतुता है ।। औरयदिविपयस्वज्ञानमेव्यावृत्तिकीप्रतीतिकाहेतुहैयहद्वितीयपक्ष कहो । तोयसत्व्यावृत्तिकोवह विषयनिश्चयकराताहै ॥ अथवासत व्यावृत्तिकोनिश्चय कराताहै || प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकि असत्कीप्रतीतिनहींहोसकती ॥ औरद्वितीयपक्षमज्ञाननिष्टव्यावृत्ति कीजोसत्ताहै | वहविषयकेयाधीननहीं है। क्योंकियन्यज्ञानोंसेस्वतः हीज्ञानव्यावृत्तस्वभावहै जैसेवैशेषिकादिवादियोंकेमतमें पटत्वादिक जातियोंसेघटत्वादिजाति स्वतःहीव्यावृत्तस्वभावहै ॥ कोईव्यक्ति तिसकाव्यावर्तकनहीं है ॥ यन्यथाअन्योन्याश्रयदोपकीप्राप्ति होगी। क्योंकिजातिसेव्यक्तिका भेदयौव्यक्तिसेजातिनिष्ठभेदकी सिद्धिहोनेसे परस्परपेचारूपयन्योन्याश्रय दोपस्पष्टहीहै । और अंत्यविशेषभीस्वतः हीव्यावृत्तहैं। व्यावतकोंकजोयन्तमेवतॆयर्थात् जिनकाअन्यकोई व्यावर्तक नहोइसीसे अन्त्यविशेषकहेहैं ।।

पूर्वाद
१७५
तैसेजानभीस्वतः हीव्यावृत्तहै।।इसप्रकारशनपरप्रकाशपक्षमभीतिसकी
प्रतीति विपयके श्राधीननहीं। याते ज्ञानज्ञप्तिकीअनुपपत्तिज्ञानज्ञेयके
भेदमे प्रमाणनहीं यहअर्थसिद्धहुश्रा ॥इति।शिंकायद्यपिविषयज्ञान
कीउत्पत्तिकाहेतुनहीं । औरतिसकीस्थितिकाहेतुभीनहीं ।। तथा
ज्ञानकीज्ञप्तिकाभी हेतुनहीं ॥ तथापिजैसेदाहकेयोग्यकाष्टादिकों
करव्याप्तहुअा जोअग्निहै वहदाह्यपदार्थोंको दग्धकरताहै ॥ तैसेज्ञेय
करव्याप्तहुशाज्ञानज्ञेयकाप्रकाशकरताहै ॥ यातेयपनेसेभिन्नज्ञेयकोवह
ज्ञानबोधनकरताहै समाधान ॥ हेवादिन्यहादृष्टांतऔरदार्टीतकी
विषमताहै। क्योंकिदृष्टांतमेतोनिसदेशमेतथाजिसकालमेघमिहै तिसी
देशमेयौतिसीकालमेदाहकेयोग्यकाष्टादिहैं। तहांसोअग्निदाहको
दग्धकरताहै यहकथनयुक्तहै। औरदातिमेतोज्ञेयकीव्याप्तिवालानान
हैनहीं क्योंकितिनदोनोंकोभिन्नदेशतथाभिन्नकालमेहोनेकरसमानाधि
करणताकायभावहै।अर्थयहाज्ञान्तोभीतरअंतस्करणादिदेशमेहै। और
मेयघटादिकवाह्यभूतलादिदेशमेयातेदेशएकनहीं। औरथतीततथाभ
विष्यत्यर्थकाभीज्ञानदेखनेसेएककालत्वकीभीयसिद्धिहै।यातेदेशतथा
कालसेसमानाधिकरणताकायभावहोनेसेव्याप्तिकीयसिद्धिहै।इसमकार
"त देवदकाप्रमा” इसकारिकाकेचतुर्थपादमेजोसंग्रहकियाहुथार्थ
था। वहइतनेग्रंथकरविस्तारपूर्वकव्याख्यानकिया ॥ १७॥ श्रवपूर्व
उक्तयर्थकोउपसंहारकरतेहुएएकश्लोकसेसंग्रहकरतेहैं ।
मू० ॥ प्रत्येतव्यप्रतीत्योश्चमेदः प्रमाणिकः कुतः ।
प्रतीतिमात्रमेवैतद्भातिविश्वंचराचरम ॥१८॥
'चौ-मानभयकोभेदजुगानो। नहिमामाणिकसोहियजानो।।
जगतचराचरभासतजेतो।नमात्रयातेलखतेतो'॥ १९ ॥

०सि० मु. भा. टी० ॥ तिसीकारणसेज्ञानयोग्यकाजो भेदतुमकहतेहो वह किसीहेतुसेप्रामाणिकनहींहोसकता ॥ शंका । जानतथाग्यकायभेद मानेहुएक्या?ज्ञानहीशेपस्थितरहताहै।।यथवा यहीशेपरहताहै इस प्रकारकासंदेहहुएएकअर्थका निश्चायकयुक्तिके अभावसेविषयकेअंत र्भावगनहीक्योंनहो। समाधान हेवादिनजडप्रपंचकोअपनीसिद्धि केयर्थज्ञानकीअपेक्षाअवश्यकहनेयोग्यहै औरगनकोविषयकीपेक्षा नहीं । यहवार्तापूर्वउपपादनकराएहैं । और “ सापेक्षतथानिपेक्ष दोपदार्थोमेनिनवलवानहोताहै"। इसन्यायसेज्ञानमेहीविषयकायंत र्भावयुक्तहै । यातेजोयहसंसारस्थावरयोजंगमरूपभानहोताहै । सो प्रतीतिमात्रहीहै । अथवाजोप्रतीतिमात्रस्वप्रकाशमहिमासेमासमानहे यहही विश्वरूपहै तिसविज्ञान धातुसे किंचित्मात्रवस्तु भिन्ननहीं । शंका ॥ यदिप्रतीतिमात्रहीयहजगत् है प्रीतिसेयतिरिक्तकिंचित् मात्रभीनहीं । तोचरावररूपतासे तथानानाभेदोंसेयहज्ञान कैसेभा सताहे ॥ समाधान ॥ मू-ज्ञानज्ञेयप्रभेदेन यथास्वाप्नंप्रतीयते। 'विज्ञानमात्रमेवतत्तथाजाग्रच्चराचरम् ॥ १६ ॥ चौक-ज्ञानज्ञेयप्रभेदअनेका । स्वप्नजगतभासतजिमएका ॥ तैसेजगतचराचरजोई । ज्ञानमात्रजागतमेसोई ॥ २० ॥ टी०-जैसेखमकालकाजगत्वास्तवसे विज्ञानमात्रस्वरूपही है। तोभीज्ञानज्ञेयादि नानाभेदयुक्तभानहोताहै । यातेस्वप्नमेविज्ञानही ज्ञेयरूपतासेतथानानारूपतासे भासताहे ॥ तेसेजाग्रतकालीनजो जगत् है । वहभीविज्ञानमात्रस्वरूपही है । यातेसोविज्ञानहीचराचर पूर्वाद्ध १७७ रूपतासे औरनानारूपतासे भानहोताहै । इसपूकारजगत्काभान औरतिसकाअनेकभेदयुक्तभानसंभवताहै ।। १६ ॥ शंका ॥ विज्ञान हीजगतरूपतासे भानहोताहै । ऐसेापक्योंकल्पनाकरतेहो ॥ वि ज्ञानसे भिन्नस्वतन्त्ररूपतासहीजगत्काभानहोजायेगा|समाधान।। मू-तंतोहेंदेपोयहच्छ्न्यएवस्वरूपतः। आत्मनोपितथैवेदंभानमात्रंचराचरम् ॥२०॥ चौ०-तंतूभिन्नयथापटकेरो । शून्यरूपहोवततुमहेरो ॥ श्रातमभिन्नतथायहमानो । भानमात्रचर अचरपछानो ।।२१|| टी-जैसेपटतंतुवोंसे भिन्नकियाहुवावास्तवसे असत्होजाता है । क्योंकिकारणकीसत्तासेही कार्यसत्भासता है । स्वतन्त्रतासे कार्यसपनहीं। यदिस्वतन्त्रभीपटकीसत्तामानले तोतंतुवोंकेय भावहुएभीपटहुधाचाहिये ॥ शंका ॥ पटकेप्रतितंतुकोसमवायिकार णताहोनेसेयाश्रयपनाहै | इसीसे तिसकेयभावहुए पटस्थितनहीं होता। कोईतंतुकीसत्ताहीपटकीसत्तानहीं। किंतुपटकीसत्तास्वतन्चहै। समाधान ॥ हेवादिनहिमाचल तथाविंध्याचलकीन्याईभेदमेकार्य कारणभावकायदर्शनहै । यातेकार्यकारणकाअभेदमानेहुएतंतुयौ पटइनदोनोंमेएकहीशेपरहाचाहिये। औरपटकोतंतुसापेक्षहोनेसेतथा तंतुकोपटनिजहोनेसेतंतहीशेपरहसकताहेपटनहीं । इसपकारतंतु सेभिन्न कियाहुश्राफ्टस्वरूपसेशून्यहीहोजाताहै । तैसेयहप्रतीतिसिद्ध जोचराचरजगत्है । सोयदिवास्तवसेयात्मासेभिन्नहो तोशून्यथर्थात् असतहीहोजायेगा।कारण्यहकिचेतनमात्रहैौखहचेतनरूपतावास्तव सेथात्मामेहीपर्यवसानकोप्राप्तहोतीहै।यातेयात्मासेभिन्नजगततुच्छ वेसि मु० मो० हयहकथनयुक्तहै।।२०॥शंका।।चेतनस्वरूपयात्माकोजगतरूपताकर भानमानेहुएविकारीपनामाप्तहोगा क्योंकिअनेकविकारसहितजगत् भासता है । समाधान। हेवादिन विवर्चवादकेश्राश्रयणकरनेसेयह दोपनहींप्राप्तहोसकता । इसीकोदृष्टांतसहितनिरूपणकरतेहैं । मू-रज्जुर्यथाभ्रांतदृष्टयासर्परूपाप्रकाशते। आत्मातथामूढबुद्ध्याजगद्र्पः प्रकाशते॥२१॥ चौ०-प्रांतदृष्टिकरगुण हैजोई । सर्परूपजिमभासतसोई ॥ तिमयहयातममूवुद्धिकर । जगद्पभासतनिजरिदधर ॥२२॥ टी-जैसेरज्जुभांतपुरुषकीदृष्टिसे सर्परूपताकरभानहोती है। तैसेअपुरुपकोभ्रांतिकरयात्माभीजगतरूपतासे भानहोता है । और मिथ्यासर्पकरजैसे रज्जुविषसहितनहींहोती ॥ तैसेमिथ्याजगत्कर थात्माभी विकारवान नहीं होता ।। २१ ।। शंका ।। यगतरज्जुकोसर्पकी अधिष्टानताहोनेसे तिसकीतोसादि रूपताकरप्रतीतिसंभवतीहै ।। परन्तुअात्माश्रज्ञानकेवशसे जगरूप ताकरमानहोताहै ।। यहकल्पनायुक्तनहीं ॥ क्योंकितिसकोनिमित्त कारणतामात्रहोनेसे जगदकीयधिष्ठानता नहींसंभवती समाधाना) मूः आत्मन्येवजगत सर्वदृष्टि मात्रमत्त्वकम् । उद्भयस्थिति मादायविनश्यतिमुहुर्मुहुः ॥ २२॥ चौ०॥ आत्ममेंहीसंबजगपयिए ॥ दृष्टिमात्रवासनहिद्दयिए । माउत्पतीक्षणस्थितीधार ॥ पुनः पुननाशहोतसंसारा॥२३॥ ट्री०-यहसर्वजगतप्रतीतिमात्रतथामिथ्या स्वरूपवास्वारउत्पत्ति १७६ पूर्वाई तथास्थितिकोपाप्तहोकर वारंवारविनाशकोप्राप्तहोताहै । यातेपूपंचकी उत्पत्तितथास्थितियोविनाशका कारणहोनेसे यात्माकोनिमित्तमात्र तानहीं। किन्तुविवाधिष्ठानतारूपउपादानकारणताहै । इसपूकार अज्ञातयात्माकोजगत्की अधिष्ठानतायुक्तहै ( २२ ) ॥ शंका ।। थात्माकोपरिच्छिन्नजगत् रूपताहोनेसेयनात्मताकी प्राप्तिहोगी। तथादुःखरूपजगतरूपताहोनेसेयात्मामेनानात्वरूपअनिष्टप्राप्तहोगा। और अशुद्धिरूपताभीआत्मा प्राप्तहोगी।क्योंकिग्रशुद्धजगतरूपताभी तिसीकीहै । औरतैसेही पुण्यौपापकीयधिकरणताभी तिसीमें प्राप्तहोगी । क्योंकिधर्मादिनिक्षत्रात्मा जगतचनाको नहींकर सकता । अन्यथाविषमतादिदोपकीपाप्तिहोगी । औरयदितुमऐसे कहो।किजीवकेयदृष्टकोहीपरमात्माघाश्रयणकरकेजगत्रचनाकरताहै। स्वयदृष्टकोनहींआश्रयणकरतायातेतिसकोपुण्यपापकीयधिकरणता नहीं है।सोयहकथनभीयसंगत|क्योंकिजीवोब्रह्मकायभेदतुमको स्वीकारहैकिंवा जैसेदुग्धदध्याकारपरिणामकोप्राप्तहुयादधिहीशेपरहता है।।दुग्धशेषनहींरहतातिसेयात्माभीजगरूपताकोमासहुयाजगतही शेपरहेगाायात्मानहीं।यातेपूर्वउक्तदोपयवश्यमासहोवेंगे।।समाधान।। मू०॥ पूर्णानंदादयेशुद्धपापदोषादिवर्जिते। प्रतिविमिवाभातिदृष्टिमात्रंजगत्त्रयम् ॥२३॥ चौ०॥ पूरनथानंदयदयशुद्ध । पापदोपादिकवर्जितबुद्ध । श्रभाससमंतिसमेहुयिभान दृष्टिमात्रजगत्रयंबखान ||२|| टी० ॥ जैसेदर्पणमुखादिकविकीसमीपताकेमाप्तहुएप्रतिबिंब रूपताकर भासमानहुयाभीतिसप्रतिवित्राकारताकोमिथ्याहोनेसेस्वरूप १८० वै० म० मु. भा. कोनहींत्यागतातैसेपूर्णतयायानंदस्वरूपोरदैतसेरहिततथाविद्या दिमलसेरहितशुद्धयौरपापदोपादिरहितात्मामेप्रतीतिमात्रजाग्रतस्वाम सुषुप्तिरूपजगत्त्रयअथवात्रयलोकात्मकजगताकारताकोमिथ्याहोनेसे जगतरूपसेभासमानहुयाभीयात्मास्वरूपकोनहींत्यागता । इसप्रकार अज्ञानकेक्शसेही परिच्छिन्नादिरूपजगतरूपतायात्मानिष्ठभानहोतीहै वास्तवसेनहीं । यातेपूर्वउक्तएकदोपभीनहींप्राप्तहोता । यहीयर्थ भगवान्वसिष्टमुनिजीनेभीकहाहै । तहांश्लोक- * तस्मिंश्चिद्दर्पणेस्फारेसमस्तावस्तुदृष्टयः ॥ इमास्ताः प्रतिक्विंतिसरसीवतद्रुमाः ॥१॥ यस्य चित्तमयीलीलाजगदे तच्चराचरम् ॥ तस्यविश्वात्मकत्वेपिखंडतेनैकपिडिता॥२॥* टी० ॥ तिसविस्तृतचेतन्यरूपदर्पणमेसोयहसमग्रपदार्थोंकी प्रतीतियांप्रतिविभावकोपाप्तहोतीहैं। जैसेस्वच्छतालावमेकिनारेकेवृक्ष प्रतिक्वितहोतेहैं ॥ १ ॥ औरजिसयात्माकीयहचराचरजगचित्तरूपी लीलाहै । तिसयात्माको अज्ञानकेवशसेनानाजगरूपतासेभासमान हुएभीएकयदितीयरूपताकीहानीनहींहोती। २।" इति ॥ २३ ॥ श्रव पूर्वउक्तसमग्रग्रंथसेएकदेशीकेनिषेधके मिषकरनिरूपणकियाजोविषय तिसको उपसंहार करतेहैं। जिसकारणसे ज्ञानौजेयकाभेद प्रमाण सिद्धनहीं तिसीकारणसे दृष्टिमात्र स्वरूपजगहै। अर्थात्दृष्टि यौदृश्यइनदोनोंकेमध्यएककी शेपताकेमासहुए दृश्यकोदृष्टिसापेक्ष होनेसे तथाप्टिको दृश्यनिर्पेक्षहोनेसेप्टिहीशेपरहतीहे । दृश्य नहीं । यातेदृष्टिमात्ररूपताजगत्कोसंभवतीहै । सोहष्टिमात्रस्वरूप -

पूर्वाई
१८५
जगत्यात्माकेयाश्रिततथातिसीको विषयकरनेवालेयज्ञानसेकल्पित
है ॥ शंका "एकदेशीकेमतकेनिषेधदासचिदात्माकोस्वाश्रयस्वविषय
अज्ञान करके जगत् रूपता तथा जगतरूपता से पूतीति निरूपण
करने वाले वादी ने अज्ञानविषयत्व यात्मामे अंगीकार किया ।
औरतैसे अज्ञानकानिवर्तकजोयपरोक्षयात्मज्ञानहै तिसकाजनकरूप
ताकरउपनिषदोंको यात्मामेप्रमाणता तुमनेयापहीउपपादनकी ।।
यातेयर्थसेसिद्धांतीकामतहीसिद्धहुयार ऐसेएकतटस्थकीयाशंकाहुए
पूर्वपक्षीकासमाधान ॥ तिसपूर्वउक्तयुक्तिसे अात्मानिष्ठयज्ञानकी
विषयताजोकल्पनाकीहैसोसाधुहै। यहांपरयहकाकूउक्तिजाननीयर्थ
यहक्या ? वहयज्ञानविषवत्वकीकल्पनासाधु है किंतुसाधुनहीं ।
जिसकारणसेकेवलकल्पनामात्र है।कोईप्रमाणसिद्धनहीं है ।। क्योंकि
स्वयंप्रकाशयात्मामे अज्ञानकी विषयताकायसंभव पूर्वकथनकर
श्राए हैं । यातेसिद्धांतीके मतकीसिद्धिनहींहोसकती। इसीको स्पष्ट
करतेहैं। यात्मामेलौकिकतथावैदिकप्रमाणकेयसंभवहुए शशशृंगकी
न्याई असत्पना है ।। तिसयसत्पनेकप्राप्तहुए तिसकेसाक्षात्कारके
अर्थशास्त्रकीयपेक्षाकिसहेतुसे होसकती है। किंतुनहींहोसकती।
औरतैसेहीयुक्तिकीयपेक्षातोयत्यंतदूरहै ।। क्योंकिवैदिकयर्थमेयुक्ति
कीयपेक्षानहीं ॥ औरयदितिसमेभीयुक्तिकीयपेक्षामानोगे ॥ तो
वेदकोनिपक्षप्रमाणताकीहानिहोगी। यथापूर्वपतसंग्रहकाश्लोक।।
आत्माऽसन्नप्रमाणत्वात् तत्साक्षात्कृतयेपुमान् ।
उपासीतश्रुतिंकरमायुक्तिं चापेक्षतेकथम् ॥ १ ॥

१८२ मु० भा० अंडिल० ॥ आत्मसत्तानाहिप्रमाणाभावते तांदर्शनहितनरनहि श्रुतिउपासते ॥ युक्तिअपेक्षातामछिकिसविधवनतहै ॥ होवृथापरिश्रम विज्ञनयातेधरतहै ॥ १ ॥ के इतिमहापूर्वपक्ष * अथसिद्धांतनिरूपण है इसपूकारपूर्वपतके प्राप्तहुएसिद्धांतकथनकरतेहैं । मू०-यत्तत्त्ववेदगुप्तपरमसुखतमंनित्यमुक्तस्वभावमास त्यसूक्ष्मात्सुसूक्ष्ममहदिदममृतमुक्तमात्रैकगम्यम् ॥ य स्यांशलेशमात्रंजगदिदमखिलंभ्रांतिमात्रैकदेहम्। प्रत्य- गज्योतिस्वरूपं शिवमिदमधुनाकथ्यतेयुक्तितोऽत्रा२४॥ क० । वेदगम्यतत्त्वजोऊपरमयानन्दरूप मुकतस्वभावनित्य सदाजोऊगायिए। सूछमतेसूछममहतयहसत्यामृत मुक्तमात्रगम्य पुन जाहिकोबतायिए । जाहिधेशविपलेशमात्रयहजगसबभ्रांति मात्ररूपकरिसदाठहरायिए । मत्यगस्वरूपशिवज्योतियहियातमा जो ताकेमाहियुक्तियत्र किंचितदिखायिए ॥ २५ ॥ टी० ॥ पूर्ववादीनेदोविकल्पकियेथेोकियात्मामेकोईप्रमाणहैवा नहीं। तहांहमवादीसेयहपछतेहैं। यहांथात्मशदसेअविद्यादिवशिष्ट जोयव्याकृततथाजीवादिशदनकावाच्यवहग्रहणकियाजाताअथवा शुद्धचिदानंदस्वरूपयात्मशब्दसेगृहीतहै । पूथमपक्षमेतिसकोश्रस्व प्रकाशताहोनेकरदृश्यत्वकाविरोधनहीं तिसमेप्रमाण की प्रवृत्तिमानने मेकोईदोपनहींप्राप्तहोता । क्योंकिवहअविद्यादिविशिष्टयहांप्रतिपादन पुवाई १८ करनेयोग्यनहीं । तिसमेप्रमाणकीप्रवृत्ति तथानिवृत्तिकाजोविचारहै सोनिष्फलहै।तिसवशिष्टयात्माकोयहांप्रतिपादनकीयोग्यताहुएयहां कौनप्रतिपादनकरनेयोग्यहै । ऐसीयाकांक्षाकेहुएकहतेहैं । इसग्रंथके प्रारंभमेप्रथमकारिकामेजोचतुष्टयविशेषणवालायात्माकथनकियाहै । वहहीयहांपरभीनिरूपणकरनेयोग्यहै।तिसीकोइसश्लोकसेनिरूपणकरते हैं। (यत्तत्त्वम्)जोयनारोपितस्वरूपयर्थात्पारमार्थिकस्वरूपयात्माहै। सोनिरूपणीयहै । शंका ॥ यहयात्मानिरूपणकनेयोग्यनहीं। क्यों कितिसमेप्रमाणकीप्रवृत्तिकाअभावहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन्वह यात्मा (वेदगुप्तम्) केवलवेदप्रमाणगम्यहै । यातेप्रमाणको प्रवृत्तिका प्रभावनहीं । शंका । यहपूर्वउक्तयात्मावेदगम्यनहींहै । क्योंकिवह अपुरुषार्थस्वरूपहै । समाधान ।। (परमसुखतमम्) वहतत्त्वपरमानंद स्वरूपहै । यातेयपुरुषार्थरूपनहीं । औरयविद्यातत्कार्यसेरहितहोने करभीवहतत्त्वपुरुषार्थरूपहे। इसीकोकहतेहैं (नित्यमुक्तस्वभावम् सदा हीयविद्यातत्कार्यसेरहितस्वरूपहै ।। शंका।। प्रयोजनरूपताहोनेसेवेद गम्यताकेसंभवहुएभीतिसतत्त्वकोदृश्यताहोनेसेमिथ्यात्वकीप्राप्ति है । समाधान ॥ वहतत्त्व (सत्यम्) तीनोंकालमेवाधशून्यह यातेतिसमे मिथ्यात्वकीपाप्तिनहीं ॥ शंका ॥ सत्यरूपंमानेहुएतिसतत्त्वकोसिद्ध होनेकरतिसमेप्रमाणांतरकीसंमतितथाविरोधहोनेसेवेदको अप्रमाणता होगी ।। समाधान ।। (सूक्ष्मात् सुसूक्ष्मम्) प्रधानादिसूक्ष्मपदार्थों सेभीयत्यंतसूक्ष्म है । इसीसेवहतत्त्वप्रमाणांतरकीविषयताकेययोग्य है । यातेतिसमेवेदकोयप्रमाणताकी प्राप्तिनहीं ।। शंका । तिसतत्व कोसूक्ष्ममानेहुएपरिच्छिन्नपनाप्राप्तहोगा । तिसीकारणसेघटकीन्याई ।

કચ્છ ३० मि. मु. भा. अनात्मताकीपामिभीहोगी || समाधान ॥ (महत्) वहतत्त्वनि व्यापकहे यातेतिसमेघटवत्यनात्मतानहींप्राप्तहोसकती ॥ शंका तिसतत्त्वकोमुक्तस्वभावमानेहुएमुक्तिीमुक्तिवालेका भेदपूतीतहो सेवहसर्वसेयधिकव्यापकरूपनहींसंभवता ॥ समाधान।।(इदमझतम् यहपूर्वकथन कियाजोतत्त्वहै सोमुक्तिस्वरूपहै । तिससेभिन्नयौरको मुक्तिनहीं है । यातेपरिच्छेदनहीं संभवता । इसीयर्थ मे विद्वानका प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाणरूपतासे दिखलातेहैं । (मुक्तमात्रैक गम्यम्) एक मुक्त पुरुष करही वह जानने योग्यहे । अर्थात् विद्वान्पुरुषही तिस तत्त्वको अपना यात्मारूप कर अनुभव करता है। अन्य नहीं । इस प्रकार तत्पदका लक्ष्यार्थ निरूपण करके यवतत्पदके वाच्यार्थकोनिरूपण करतेहैं । (शिवम् ) वहीतत्त्वमायारूपउपाधि सेईश्वरहै । तिसकेईश्वरत्वकोही कथनकरतेहैं ।। (यस्यांशलेशमात्रं जगदिदमखिलम् ) अ० जिसकेमायिकप्रदेशरूपकिसीएकयंशयह लेशमात्रप्तमग्रजगत् कार्यरूपतासेस्थितहै । शंकाातिसतत्त्वकोजगत काउपादानमानेहुए विकारीपनाहोगा ॥ समाधान ॥ भ्रांतिमात्रेक देहम ) अज्ञानमात्रही तिसईश्वरत्वकास्वरूपहै । इसीहेतुसेसाभास यव्याकृतरूपयज्ञानही जगतकाउपादानकारगाहै स्वरूपसेयरब्रह्म कारणनहीं । यातेप्रज्ञान की प्रधान्यताकरजगतकी उपादानताहोंने सेविकारित्वकी प्राप्तिनहीं ॥ अथवा “श्रांतिमात्र " यहजगत्का हीविशेषणहै ॥ तिससेयहअर्थसिद्धहुयाभ्रिांतिस्वरूपजगत्कावास्तव सेयात्माउपादानकारणनहीं ॥ यदियात्माकोहीउपादानमानोगेतो जगत्मेंसत्यताकी प्राप्तिहोगी।क्योंकिसत्यउपादानकवस्तुसत्यहीहोता पूर्वाई है ।। यद्यपियात्माको उपादानताकेअभावहुए श्रुतितिसकोकार- णताकथनकैसेसंभवेगातथापिउपादानभूतथज्ञानकायधिष्ठानहोने सेतिसको कारणत्वकथनहै।यातेयात्मामेविकारित्वपूसक्तिनहींहोती। तिसयात्माकातटस्थपनानिवारणकरते हैं । ( प्रत्यय ) जडतातथा अनात्मतादिधर्मोकरवाह्यरूपताको प्राप्तडयाजोजगतहै । तिसकी थपेक्षाकर विपरीतचेतनतादिरूपतासे और यंतरादिभावकर)काश करतेहुएकीन्याईजोपूतीतहोताहे वहप्रत्यकहाजाताहै ।। प्रत्यक्त्वमे हेतुकहते हैं ।। (ज्योतिः स्वरूप) जिसकारणसेस्वयंप्रकाशचेतनरूपहै तिसतत्त्वकेकथनका भकरणनहीं है । ऐसीयाशंकाको निपेधकरते हैं। (अधुना) अब शिष्यकी जिज्ञासाके उत्तरकालमे तिसतत्त्वका निरूपणमाप्त है। यातेयमस्तुतयर्थात्मकरणअसंबद्धयर्थकाकथन नहीं । शंका ।। तुम्हारे कथनसे क्या? सिद्धहोगा। क्योंकिवेद करहीतिसका कथनवनजायेगा ॥ समाधान ॥ (युक्तितः) अज्ञानतथासंशयके निराकरणद्धारावेदयर्थकी मगटताकेलियेयौर तिसमेंयोग्यताकीमाप्तियर्थयुक्तिसे अर्थात्श्रुति यनुसारीतर्कसेतिस पात्मतत्त्वकोनिरूपणकरतेहैं ॥ इति । पूर्वपक्षकेयारंभमेंयात्मशब्द सेजीवतथाईश्वरविवक्षितनहीं किंतुशुद्धचेतनयानंदघनपत्यकब्रह्मका थभेदरूपयर्थहीयात्मशब्दसेविवक्षितहै । और तिसमेंपूर्ववादीकर कथन कियेदूपणोंकायवकाशनहीं है । इसकेकथनकरनेकेलिये सिद्धांतीय विकल्पकरताहै ।। * अथप्रमाणाभावसे आत्मामेंअसत पनेकीशंकाका समाधान ' १५६ ०सि० मु० भा० हेवादिन्क्या ? निरूपणीययात्मामेंप्रमाणके अभावसे यात्मा केस्वरूपकीयनुपपत्तिहै ।। यर्थयहयात्माकोप्रमाणकीअपेक्षाक्या? स्वरूपलाभकेयर्थ है। अथवाप्रमाणकेअभावसे प्रतीतिकीयनुपपत्ति है। अर्थात्यपनीप्रतीतिके अर्थप्रमाणकीयपेक्षा है ।। प्रथमपक्ष तोनहींसंभवता ॥ क्योंकितिसमेयहविचारकरनेयोग्य है । क्या ? यहपक्षयात्मनित्यत्ववादीकाहै। अथवायात्माकोकार्यकहनेवालेका पक्ष है ।। इनमेंप्रथमपक्षयसंगतहै । क्योंकियात्माको अकार्यहोने करइतरकीयपेक्षाकायभावहै ॥ भावपदार्थमेंनित्यत्वयकार्यहोनेसे हीसंभवहोसकताहै ।। यातेस्वरूपलाभकेयर्थयात्माप्रमाणकीअपेक्षा नहींकरता ॥ ौरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिप्रमाण प्रमेयकाउत्पादकनहींकिंतुज्ञापकहै ॥ शंका ॥ प्रमाणकोप्रमेयकी अनुत्पादकतायसिद्धहै। क्योंकिप्रवृत्तियादिकभीपमेयहैं। वहपूमा णसेउत्पन्नहोते हैं | समाधान ॥ हेवादिनप्रवृत्तिविषयकज्ञानप्रवृत्ति कोनहींउत्पन्नकरता किंतुजिसयर्थविषयकपुरुपकी प्रवृत्तिहोती है ॥ तिसयर्थविषयकइष्टसाधनताकाज्ञानप्रवृत्तिकोउत्पन्नकरताहे ।। याते स्वविषयकाउत्पादकप्रमाणनहीं ।। इसीसेप्रवृत्तिज्ञानमेव्यभिचारनहीं, औरयात्मास्वप्रतीतिकेयर्थप्रमाणकीअपेक्षाकरताहै । इसथायद्विती यपक्षमेभीयहविचारकर्तव्यहै । क्या ? प्रतीतिमात्रमाणकेवाधीन है। अथवाजडपदार्थकीप्रतीतिप्रमाणकेयाधीनहे ।। तहांथमपक्षमे तोथतिमसंगहै ।। क्योंकिममाणविपयकभीयन्यपमाणकहनेयोग्यहे । शंका ।। विषय कीसिद्धियर्थप्रमाणकीयपेक्षाहै । कोईप्रमाणकोथ न्यप्रमाणकीपेक्षानहीं। क्योंकितिसमेथन्यप्रमाणका कुछउपयोग पूबाई १५७ नहीं है ।। समाधान!! प्रमाणमेप्रमाणांतस्केयभावहुएनरशृंगकीन्याई असत्होनेकरस्वपमेयकेसाधकपनेकायसंभवहै ॥ अर्थात्लब्धसत्ता वालाहीपमाणस्वविपयकासाधकहै ॥ यौवस्तुमात्रकीसत्तापूमाणके श्राधीन है यहतुम्हारानियमहै । यातेप्रमाणांतरसे विनामथमममाणं कीसत्तानहींसिद्धहोसकती ॥ औरस्वरूपसत्ताके अभावहुए प्रमाण स्वविषयकासाधककैसेहोगा ॥ ौरयदिममाणमेंभीयन्यममाणकीय पेक्षामानोगे तो यनवस्थादोपकीमाप्तिहोगी ।। शंका ॥अनवस्थाके भयसेयदिौरसमाणनहींमानेगेतोप्रमाणकरहीवस्तुकीसिद्धिहोती है। यहवृद्धोंकाउच्चस्वरसे कथनसेसंभवेगा ॥ समाधान ॥ हेवादिन् अनवस्थादोपकीमाप्तिहोनेसेममाणकरहीवस्तुसिद्धहोतीहै । यहतिनका "उद्घोष" यर्थात्उच्चस्वरसेकथन केवलयभिमानमात्रहै अर्थात् भ्रांतिमूलकहै ॥ शंका ॥ जडवस्तुयपनीमतीतिकेयर्थप्रमाणकी श्रपेक्षाकरो।परन्तुप्रमाणतोस्वयंप्रकाशमानहोनेसेप्रमाणांतरकीयपेक्षा नहींकरता । जैसेमदीपस्वप्रकाशकेनिमित्तौरपदीपकअपेक्षानहीं करतायातेसर्वयर्थकासाधकजोप्रमाणहै। वह अपनीसिद्धिकेयर्थयन्य प्रमाणकीयपेक्षाकरताहैयहकथनहींअयुक्तहै।ौरजोसिद्धांतीऐसेकहे किमाणकोस्वविपयकमतीतिकाजोजनकपनाहै | यहहीस्वसाधक पनाहै। सोयहकथनसमीचीननहीं क्योंकिइसमेवृत्तिविरोधहै। अर्थात् एकपदार्थमेएककालमेकर्तृत्वतथाकर्मत्वकाविरोधहै। यातेममाणमेस्व पूकाशतानहींसंभवती सोयहसिद्धांतीकाकथनभीयसंगतहै। क्योंकि स्वव्यवहारमेदूसरेकीअपेक्षासेजोरहितपनाहै । यहहीस्वसाधकशदका अर्थहै । इसीकोममाणनिष्ठसिद्धकरतेहैं ममाणस्वसिद्धिकेयर्थजिसकी दे० सि० मु. भा. अपनाकरताहै । वहमथमममेयरूपतोनहींसंभवता । क्योंकिविषयको यमकाशकपनाहै । यौरयदितिसकोप्रमाणरूपकहोतोयहभीनहींसंभ- वता । क्योंकियनवस्थादोपाप्तहोताहै । यातेसर्वकासाधकजोप्रमाण है वहयपनीसिद्धिकेयर्थअन्यकीयपेक्षाकरताहै यहकथनयुक्तहै ।। इसमकारप्रमाणस्वप्रकाशस्वभावहुग्रास्वपरकीसिद्धि केयर्थकिसीयन्य प्रमाणकीयपेक्षानहींकरता । यातेपूर्वउक्तगनवस्थादोपकीमातिनहीं इसमकारपूर्वपक्षमाप्तहुएसिद्धांतीउत्तरनिरुपणकरताहै।समाधान। हेवादिनवडाहर्ष है स्वप्रकाशममाणकोयन्यकीयपेक्षासेरहितमानेहुए यात्माप्रमाणसेकैसेसिद्धहोगा ॥ शंका ॥ प्रमाणसेयात्माकीसिद्धि माननेमेक्यायनुपपत्तिहै। समाधान ॥ हेवादिन्ममाणकास्वरूपी तिसकाभानयात्माकेयाधीनहै।ौरयात्माकीसिद्धिममाणकेयाधीनहै इसपकारश्रन्योन्याश्रयदोपहोनेसेयात्माममाणसिद्धनहीं । प्रमाणकी सिद्धियात्माकेयाधीनहै। इसयर्थकोकैमुत्यकन्यायसे सिद्धकरतेहैं । प्रमाणप्रमेयादिनानाभेदविशिष्टसकलजगत्कामाधकात्माहै । क्यों किअपने अज्ञानसेसर्वजगत्को उत्पन्नकरकेप्रकाशकरताहै । यातेजो श्रात्मासर्वजगत्कासाधकहै ॥ तिसकोजगत्केएकअंशरूपप्रमाणकी साधकतामेतोक्याहीकहनाहै ॥ इति । * अन्यप्रकारसेउसी शंकाका समाधान है किंवा । हेवादिन्भमाणसेयात्मासिद्धहोताहै । इसकाक्या थर्थहे । क्या ? थात्माप्रमाणसे उत्पन्नहोताहै। अथवाभमाण सेजाना जाताहै। प्रथमपचतोनहींसंभवता। क्योंकिनमाणकेतियात्माकोकार णताहोनेसेममाणसेमथमहीतिसकीसिदिह ॥ शंका । हेसिद्धांतिन् पवाद भमाणकेमतिजोयात्माकोकारणताकहतेहो तिसमेयह पापकोकहना चाहिये किवयात्मा क्या?पमातारूपसे कारणहै । अथवाकरण रूपतासेकारणहै वाविषयरूपतासेकारणहै ।पथमपक्षतोनहीं संभवता क्योंकि- * हर्धािरित्येतत्सर्वमनएव ॥ वृ० उ० अ० ३ मा० ५ के ३ है य० ॥ लज्जातथाज्ञानादियहसर्वहीअंतस्करणकधर्म हैं। इसश्रुतिसेअंतस्करणमेहीमातापनाहैात्मामेनहीं । औरद्वितीयतथा तृतीययहदोनोंपक्षभीनहीसंभवते क्योंकियात्माकोकरणरूपतातथा विपयरूपतायंगीकारनहीं है । समाधान ॥ प्रमाणसेपूर्वयात्माकी थसिदिमानेहुएयाश्रयरूपमाताकयसिद्धहुएममाणकोस्वरूपलाभही नहींहोगा । भावयहचैतन्यकेसाथतादात्म्यभावकीमाप्तिसेविनाअंतस्क रणकोपूमातापनानहींसंभवता । क्योंकिवहजडहे । विशेपचेतनके तादात्म्यविनाभी यदिअतः करणमेममातृत्वमानोगे। तोघटादिकोंमेभी ममातृत्वमाप्तहोगा। औरयात्नाकेममातापनेमेंवृत्तिवालेअंतस्करणको उपाधिपनाहै । इसलियेअंतस्करणप्रमाताहै।ऐसालोकमेव्यवहारहोता है । इसप्रकारप्रमाताआत्माप्रमाणोंकाकारणहै । तिसकेयभावहुए प्रमाणकोस्वरूपलाभहीनहींहोगा । क्योंकिकारणकेयभावहुएकार्य काभीयभावहोताहै ॥ शंका।। हेसिद्धांतिन् । प्रमाणसेथात्माउत्पन्न होताहै यहहमनहींकहते।किंतुप्रमाणसेथात्माज्ञातहोताहै।। समाधान।। हेवादिन्इसद्वितीयपक्षमेभीयहविवारकरनेयोग्यहै । यात्माकोप्रमाण सेज्ञातमानेहुएज्ञाताक्या?वहीयात्माहै।यथवाकोईयन्यहै । पूथमपक्ष नहींसंभवता क्योंकिप्रमेयमात्रकेप्रतिएकात्माकोहीज्ञाताहोनेसेतिम २० मि. मु. भा. ज्ञेयपनाश्रयुक्तहै । भावयहहैकिप्रमाणकेप्रतियात्माकोज्ञाताहोनेसे ज्ञेयपनातिसकोयुक्तनहीं। यातेसर्वकेज्ञातायात्माकोपमाणकैसेविषय करसकेगा किंतुनहींकरसकता ॥ शंका ॥ प्रमाणादिकसर्वपदार्थों काजोज्ञाताहै वहप्रमाणकाविषयक्योंनहींहोता ॥ समाधान ॥ हे वादिन् यात्माकोभीयदिज्ञानरूपप्रमाणकाविषयमाने।तोकर्तृकर्मविरोध कीप्राप्तिहोगी। क्योंकिज्ञानभीएकक्रियाविशेषहै । सोकर्ताऔरकर्मकी अपेक्षाकरकेहीउत्पन्नहोतीहै । तिनमेकर्ताकोतोक्रियाकासाधनहोनेसे क्रियाकेप्रतिगौणताहै । औरकर्मतोस्वरूपसेअथवाधर्मसे क्रियाकर साध्यहोनेसेक्रियाकेप्रतिप्रधानहै । तिसीकारणसेयात्माकोस्वज्ञानरूप क्रियाकेतिएककालमेहीउभयरूपताकी प्राप्तिहै। ज्ञानकायाश्रयरूपता करसाधनहोनेसेगौणताहै । औरज्ञानकाविषयहोनेसेप्रधानताहै । इस पूकारविरुद्धदिरूपताकीप्राप्तिसेयात्माकोप्रमाणविषयनहींकरसकता । औरद्वितीयपक्षमेभीयहविचारकरनेयोग्यहै । ज्ञेयरूपयात्मासेभिन्नजो प्रमाताहै। वहजडहै । यथवाचेतनहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकितिसकोयनात्माहोनेसेप्रमातृत्वकायसंभवहै । यौरदितीयपन. भीअसंगतहै । क्योंकिपृथमयात्माकोशेयहोनेकरघटवत्यनात्मताकी माप्तिहोनेसेतिसदूसरेचेतनरूपप्रमाताकोहीयात्मपनाहोगा । यसर्व काविज्ञाताजोयात्माहै सोकिसीप्रमाणकाविपयनहीं इसयर्थमेमैत्रेयी ब्राह्मणकाशेषवाक्यउदाहरणकरतेहैं । * विज्ञातारमरेकेनविजानीयात् ॥१०) उ० पै० ग्रा००१५ अ०॥ यरेमैत्रेयीसर्वकेविज्ञातायात्माकोकिसकरणकरकेकौन धन्यज्ञाताजानसकताहै । क्योंकितिसमोक्षदशामे यात्मासे व्यति पूर्वाद रिक्तसर्वकायभाव है ॥ इसमकारप्रमाणसे बिनायात्माकीस्वतः सिद्धिहोनेसेप्रमाणके अभावसे यात्माकाअसत्पनानहीं होसकता। यहअर्थसिद्धहुया ॥ इति ॥ प्रमाणाभावसेआत्मामेअसत्त्वापत्तिका अन्यप्रकारसेपरिहार किंवा ।। श्रात्मामेयदिप्रमाणनहींतो असत्वापत्तिहोगी। ऐसे कथनकरनेवालेवादीनेआत्मामेप्रमाणकेयभावसे असत्पनाथापाद नकिया है। यहहमकोमतीतहोता है । सोयहकथनययुक्त है । इस अर्थनिरूपण करनेकेलिये विकल्पकरते हैं। हेवादिनप्रमाणकेयभा वसे यात्मामेयापाद्यमानयर्थात्प्राप्तहोनेयोग्यजोधसत्त्व है। वहज्ञात है वायज्ञातहै। श्रर्थयहकिग्रसिद्धस्वभाव है। प्रथमपक्षमेभीयहवि चारकियाचाहिये ।। क्या ? वहयात्माकायसत्त्वप्रमाणसेज्ञात है । अथवाभ्रमकरकेज्ञात है । वा स्वतःसिद्ध है । प्रथमपक्षमेपुनःयहवि चारणीय है । क्या ? वहअसत्त्वकाग्राहकमाणथसत्अर्थात्प्रभाव मात्रकोप्रहणकरता है । यथवाग्रात्मप्रतियोगिकथसत्कोग्रहणकरता है । प्रथमपक्षनहींसंभवता क्योंकिसत्काअभावरूपजोयसत् है तिस कोप्रतियोगीकेयाधीनहोनेकरसूतियोगीकोनविषयकरकेवहप्रमाण के वलसत्मात्रकोनहींग्रहणकरसकता । थौरयदिप्रतियोगीकोविषय करकेयसवकोप्रमाणविषयकरता है । यहदितीयपक्षकहोतो श्रात्माभी प्रमाणसिद्धहुथा। क्योंकियसत्कोग्रहणकरनेवालाप्रमाणप्रतियोगी कोनियमसे ग्रहणकरता है । यातेयात्माकोभी प्रमाणसिद्धहोनेकर प्रमाणाभावरूपयापादककेयभावसे यात्मामेयापाद्यमानयसत्त्वभी ११२ वे० स० मु० भा० नहींसंभवता ॥ जैसे यमिवालेदेशमेयग्निके अभावरूपयापादकसे धूमाभावनहीं यापादनकरसकते ॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिन्यसत्त्वका प्रतियोगीसत्त्व है ॥ यात्मानहीं ॥ यातेयात्माकोप्रमाणकीविषयता थापकैसेकहतेहो । समाधान || हेवादिन्वहसत्त्वप्रतियोगीहुया क्या ? किसीपदार्थकास्वरूप है अथवाधर्म है ॥ प्रथमपक्षमेभीयह कहाचाहिये कियात्माकास्वरूपवहसत्त्व है अथवाग्रन्यपदार्थकास्त्र रूप है । प्रथमपक्षमेतो उत्तरपूर्वककथनकरयाए हैं। कियात्माको प्रमाणसिद्धहोनेसे असत्पनानहीं है । औरद्वितीयपक्षमेतुम्हारेइष्ट कीयसिद्धिहै। क्योंकिग्रन्यकिसीपदार्थकाहीयसत्त्वहोगा। यात्मा कानहीं ॥ अर्थयहप्रतियोगीको अपनेयभावकीसाधकताकानियम होनेफरपदार्थांतरकास्वरूपभूतजो प्रतियोगीरूपसत्त्व है वहपदार्थांतर के असत्त्वकाहीसाधक है।। अप्रतियोगीरूपयात्माके यसत्त्वकासाध कनहीं।औरयदिवहसत्त्वधर्म है यहयायद्वितीयपक्षकहोतो तिसमेयह विचारकियाचाहिये ।। क्या ? वहसत्त्वशात्माकाधर्म है अथवाकिसी यन्यपदार्थकाधर्म है। प्रथमपक्षमेयात्माकासत्त्वप्रतियोगी है तिस यात्मसत्त्वकोप्रमाणसिद्धहुए अात्मामे असत्त्वकायापादनतुमकैसे करसकतेहो । यौरवहसत्त्वग्रन्यकिसीपदार्थकाधर्म है यदियहद्विती यपक्षकहो तोभीपदार्थातरकायसत्त्वहोगा ।। यात्माकानहीं ॥ याते यात्माकायसत्त्वकैसेयापादनकरनेयोग्य है। किंतुकिसीप्रकारभीनहीं। औरयात्माकायसत्त्वभ्रमसेसिद्धहैयहयाद्यजोद्वितीयपक्षथासोभीनहीं संभवता।। क्योंकियसत्त्वकोभ्रमसिद्धमाने हुएभ्रमकेविषयकोराधितहोने कर वास्तवसेयात्मामेंसत्त्वहीप्राप्तहोगा।औरतृतीयपतमेंयहविचारकिया . पूर्वाद्ध . चाहिये । असत्वमात्रस्वतः सिद्धहै। यथवाग्रात्मविशिष्टयसत्त्वस्व तः सिद्धहै। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकिप्रतियोगीसेविनाकेवलय भावमात्रकानिरूपणनहींहोसकता।ौरद्वितीपक्षमेतो यात्माकोस्वतः सिद्धताप्राप्तहोगीक्योंकिग्रात्मविशिष्टजोयात्माकायसत्त्वतिसकीस्वतः सिद्धताहुए विशेषणरूप यात्मामेंस्वतः सिद्धता बलात्कारसेसिद्धहो तीहै।तिसकारणसेदोनों स्वतःसिद्धताप्राप्तहुए यात्माहीस्वतः सिद्ध है।। यसत्त्वमेंस्वतः सिद्धिकायसंभवहै । क्योंकियात्मारूपप्रतियोगी निपेक्षहै ॥ ौरयसत्त्वरूपयभाव प्रतियोगिसापेक्षहै ॥ औरसा पेननिर्पेक्ष इनदोनोंके मध्यमें निर्पक्षको ही स्वतः सिद्धत्व का संभवहै। और प्रतियोगीके श्राधीन असत्त्वकास्वतःसिद्धपनानहीं संभवता । अन्यथाअसत्त्वमें सापेक्षताकीहानिहोगी । यहांपरयह अर्थज्ञातव्यहोवहयसत्त्वजडहै ॥ वाचेतनहै ॥ प्रथमपक्षतोनहीं संभवता क्योंकिजडताहोनेसेहीघटकीन्याईस्वतः सिद्धिकीययोग्यता है। योग्यदिदितीयपनकहोतो यात्माकाहीदूसरानामयसत्है। क्योंकि स्वतःसिद्धचेतनकोही यात्मरूपताहै । तैसेमाने एप्रमाणाभावसे प्रात्मा असत्वकायापादन हमकोयनिष्टनहींकिंतुइष्टहै ।।इति।यहां पर्यंतयात्माका यसत्त्वज्ञातहै। इसपथमपक्षका निरासकिया । श्रव अज्ञातरूपयसिदस्वभाववहनसत्त्वहै। इसदितीयपक्षको निराकरण करतेहैं।हेवादिन्यहदितीयपक्षभीनहीसंभवताक्योंकि यसिद्धकाथापा दनहीअनुपपन्नहै ॥ शंका ॥ यसिद्धकायापादनकिसकारणसेनहीं वनता ||समाधान।। हेवादिनप्रतिवादीके प्रतिशब्दसेजोयनिष्टकी प्राप्तितिसकानामयापादनहायौरयर्थकेजानेविनाशब्दरचनाकी अनु वे०सि० मु०या० पपत्तिहै।यातेबुद्धिमें अनारुदयसत्त्वका थापादनकरनाअयोग्यहै । इसमकारप्रमाणके अभावसे यात्माकायसत्त्व कोईनिरूपणनहीं करसकता ॥ * प्रमाणकेअभावसे आत्मा असत्त्वापत्तिका अन्यप्रकारसे परिहार ॥ * प्रमाणकरयात्माकेअसत्त्वकीसिद्धिहोतीहैइसपक्षयवसिंहाव लोकनन्यायसे औरदूषणकहतेहैं ॥ जैसेसिंह एकमृगकोहनन करकेागेगमनकरताहुया पुनःउसीस्थानकोदेखताहै यदिकोईऔर मृगवहांन्यायाहोतोतिसकोभीमहननकरूं यहसिंहावलोकनन्यायका श्रर्थ है ॥ तैसेहीपमाणसेयात्माका असत्त्वसिद्धहे इसपक्षकोनिरा करणकरकेपुनः वादीनेयदिकोईऔरयुक्तिइसपक्षमें प्राप्तकरीहो।तो तिसकोभीहमनिराकरणकरें । इति ॥ किंवा । हेवादिन्यात्माका असत्त्वक्या?यात्माहीजानताहै । अथवाअनात्माजानताहै ॥ प्रथम पक्षमेवहुतवक्तव्यहोनेसे तिसकोत्यागकरमथमअंत्यपक्षकोदूषितकरते हैं।यंत्यपक्षनहींसंभवता।क्योंकि अनात्माकोशेयऐक्यस्वभावहोनेसे ज्ञातृत्वकाअभावह ॥ औरप्रथमपतभीनहींसंभवता । क्योंकिव्या घातादोपकी प्राप्तिहोतीहै । तेसेदिखलातेहैं। क्या?यात्मायपनीसत्ता कालमेश्रपनी यसत्ताकोजानताहै अथवाअपनीयसत्ताकालमेस्व असत्ताकोजानताहपथमपन तोनहींसंभवता। क्योंकि अपनीसत्ता कालमेयपनीयसत्ताकैसेहोसकतीहै यौर- ॐ परस्परविरोधनप्रकारांतरस्थितिः य० ॥ परस्परविरोधहुयेकोई अन्यपकानहींस्थितहोता। इस पूबाई न्यायसेसत्तायौयसत्ताका परस्परविरोधहुए एककेविद्यमानहुएदूसरा नहींस्थितहोसकता ॥ शंका ॥ यद्यपिस्वसत्ताकालमेस्वयसत्तानहो परन्तुतिसकोग्रात्माजानतोसकताहै ।। समाधान ।। हेवादिनअसत्ता केनहुएवात्माकिसकोजानेगा ॥ क्योंकिविषयकाहीयभावहै। और अात्मास्वमसत्ताकालमेस्वयसत्ताकोजानताहै । यहदितीयपन भी नहींसंभवताक्योंकिस्वसत्ताकालमेज्ञातायात्माकाहीयभावहोनेसे किसमकारखहजानसकेगा। शंका । स्वसत्ताकालमेहीथात्माअपनी थसत्ताकोजानताहैइसप्रकारमाननेसेव्याघातदोषकीभीपातिनहींहोती क्योंकिस्वसत्ताकालमेस्वयसत्ताकाग्रज्ञानहायोग्यदिसिद्धांतीऐसेपछे किस्वसत्ताकालमेस्वयसत्ताके यज्ञातहुए किसकालमेहोनेवालीस्वय- सत्ताकोयात्माजानेगा तिसकायहउत्तरहै कालांतरमहोनेवालीस्वय- सत्ताकोयात्माजानसकताहै ॥ समाधान । हेवादिनऐसेमानेहुएसत् रूपयात्मासिद्धहुया।इससेकिसीअनिष्टकीप्राप्तिनहींहोसकती गशंका॥ श्रात्माकीसतरूपतायापकैसेकहतेहो । जिसकारणसेवयात्मायागे होनेवालीखयसत्ताकायनुभक्करताहै।। समाधान ।हेवादिन्ममाण केयभावसेक्या? अत्यंतयसतरूपतायात्मामेयापादनकरनेयोग्यहै। अथवायनित्यताप्रापादनकरनेयोग्यहै । प्रथमपन्तोनहीं संभवता । क्योंकिविनाशसेपथमयात्मासरहे। यौरद्वितीयपक्षभीयसंगतहे।क्यों किवहयात्माकीयनित्यताद्वितीयकारिकाके व्याख्यानमेकृतनाशतथा अकृताभ्यागमदोपकीमाप्तिसैनिवारणकरयाएहैं । यातेप्रमाणकेयभाव सेयात्माकायसवनहीं है । यहसिद्धहुया। किंवा ।। आत्माकअसतपनेकीशंकाकाअन्यप्रकारसेपरिहार॥

१५६ वे०सि० मु० भा० यात्माकायसत्त्वकहनेवालावादीयपनेयात्माका निषेधकरताहै अथवादूसरेयात्माकानिषेधकरताहै । पृथमपक्षमेनिषेधकरनेवालेका अभावहोनेसेनिराकरणकरनेयोग्यहीयात्मावास्तवसेसतरूपहैयहसिद्ध होताहै । औरद्वितीयपक्षमेनिषेधकाजिसकारणसेवास्तवसेस्थितहै। इसीकारणसेयात्माकाअसत्त्वकैसेहोसकताहै ॥ शंका यन्यथात्मा केनिषेधकरनेवालेकाकोईअन्यतृतीय ग्रात्मानिषेधकर्ता होजायेगा। कैसेनिपेधकरनेवालापरमार्थरुपतासेस्थितहोसकताहै। समाधान || हेवादिन्तिसतृतीयनिषेधकर्ताकाकोईअन्यनिराकरणकर्ता है॥यथवा नहीं ॥ पृथमपक्षमेतो थनवस्थादोपहै औरदियीयपक्षमेजिसमेवि- श्रांतिमानोगे | तिसीकोवास्तवसेस्थितहोनेकर किसहेतुसेयात्माका असत्त्वकहतेहो । यहीयर्थश्रतिमेकथनकियाहै ॥ ॐ असन्नेवसभवतिअसद्ब्रह्मेतिवेदचेत् । अस्तिब्रह्मेतिचेवेदसंतमेनंततोविदुः के तै. व. २० अनु०६ य. प्रथमज्ञातापनाचेतनकाधर्महै । क्योंकियचेतनघटादिकों में ज्ञातृत्वकायभावहै । औरब्रह्मभीचेतनहे जिसकारणसे श्रुतिमें विज्ञान घनसुनाजाताहै । सोविज्ञातासे भिन्ननहीं है । क्योंकि श्रतिमेंअभेद श्रवणहोताहै।ऐसामानेहुएयहज्ञातापुरुषयदिब्रह्मात्माकोअसतजानता है तोवहयापहीयसत्होजाताहै। क्योंकि अपनेयात्मस्वरूपब्रह्मका निषेधकर्ता है। अर्थातनिषेधकर्ता यदिअपनेयात्माकानिराकरणकरता है।तोवहअसतहोजाताहै यहहेतुरूपतासेकथनकियाहानिराकरणक कायसत्त्वश्रुतिसंमतहै।औरयदिवादीदूसरेयात्माकानिषेधकतोइस पूर्वाई पक्षनिराकरणकर्ताकासत्त्व श्रुतिसंमतहैसोईदिखलाते हैं । ब्रह्मात्मा है ऐसेयदियहज्ञाताजानताहै । तोसतरूप ब्रह्मात्माकेज्ञाताको सूक्ष्म थर्थकेद्रष्टापुरुषसतरूपहीजानतेहैं । अर्थात्वहपरमार्थसावरूपहीहोता है । यातेयात्माकीयसत्रूपताकाकथनययुक्तहै ।। इति किंवा ।। ॥ प्रमाणाभावसे आत्मामेंअसत्पनेकीशंका का अन्यपूकारसे परिहार। थात्माप्रमाणकेयभावसे असत्यताकीप्राप्तिकहनेवालेवादीने प्रमाणकीसत्ताकेहुएही वस्तुकीसत्ताहोतीहै यहकहनेयोग्यहे । तहां प्रमाणकीसत्ताहुएहीवस्तुकीसत्ताहोतीहै । इसकाक्यायर्थहै । क्या? प्रमाणके विद्यमानहुए वस्तुकीसत्ता उत्पनहोतीहै । अथवावस्तुकी सत्ताजानीजातीहै । प्रथमपतभीयहविचारकर्तव्यहै । क्या?प्रमाण सत्वस्तुमें प्रवृत्तहोताहै अथवाअसत्मे प्रवृत्तहोताहै । यदिग्रसतमें प्रवृत्त होताहै यर्थात् यसत्में प्रवृत्त हुआ प्रमाण सत्ताको उत्पन्न करताहै। यह अंत्यपक्ष कहो । तोशशशृंग की भी वह प्रमाण सिद्धि करलेगा। क्योंकि असत्पनेकी तुल्पताहै । और प्रमाणको थसत्त्वके उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य भी है । सो ऐसा देखने में नहीं श्राता । यातेयत्यपक्षनहींसंभवता । औरसत्में प्रमाणप्रवृत्तहोता है श्रर्थात् सत्वस्तुकीसत्ताकोममाणउत्पन्नकरताहै। यहपथमपक्षभीनहीं संभवता क्योंकिइसपक्षप्रमाणकेयाधीनवस्तुकीसत्तानहींहै 'शंका प्रमाणसत्वस्तुमॆप्रवृत्तहो परंतुप्रमाणकेयाधीनवस्तुकीसताक्योंनहो। ॥ समाधान ॥ हेवादिजिसकीयपेक्षासेजोप्रथमहीविद्यमानहो। वह वे०सि० मु० भा० तिसकाकार्यनहींहोसकता। क्योंकिनियमसेपश्चात् होनेवालकोही कार्यपनाहोताहै । जैसेइसप्रकरणमें प्रमाणकीयपेक्षासे प्रथमहीवस्तु विद्यमानहै । यातेवहप्रमाणकाकार्यकैसेहोसकतीहै ।। शंका । सत्वस्तु मेंप्रमाणकीप्रवृत्ति नमानेहुएप्रमाणकीप्रवृत्तिसे पश्चातहीवस्तुकीसत्ता उत्पन्नहोजायेगी ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यदिऐसेमानोगे।तोसत्मही प्रमाणमवृत्तहोताहै । इसयपनी प्रतिज्ञाकीहानिहोगी। औरयदिसत् वस्तुकाभानप्रमाणकेयाधीनहै। यहयाद्यद्वितीय पक्षकहो। तोग्रभान स्वरूपयनात्माका भानप्रमाणकेयाधीनहो। क्योंकिवहयचेतनहैऔर स्वयंपूकाशमान यात्मामेंएमाणकेयाधीनभानकैसेहोगाकिंतुनहींहोस ता'यहांयहभावहै।प्रमाणकेयभावसेवस्तुकीसत्ताकाअभावहै।यातेप्रमा गसत्तावस्तुसत्ताकाव्यापकहै यहकहनेयोग्यहै।इसलियेव्यापकाऽभाव कोहीव्याप्याऽभावकेप्रति साधकपनाह।यातजहांवस्तुकीसत्ताहोतीहै तहांप्रमाणसत्ताहै । यौरजहांप्रमाणकीसत्तानहींहै तहाँवस्तुकीसत्ता भीनहींहै ॥ ऐसामानेहुएसत्वस्तुकाहीभान प्रमाणकरहोताहै। यहां यहअर्थसिद्धहोताहै इसीयर्थकासाधकयहांययनुमानभीजानना।। विमतःअात्मायूमागम्यः सत्वात्घटवत् * अगाविवादकाविषयजोयात्माहै। वहप्रमाणगम्यहै ।। सनरूप होनेसे । जोजोसत्रूपहोताहै । सोसोप्रमाणगम्यहोताहैजैसेघट है ॥ इति ।। सोयहद्वितीयपनभीयसंगतहे । क्योंकिप्रथमयहयनु मानतोजडत्वरूपउपाधिसहितहोनेसेदुष्टहे सोदिखलातेहैं । जहां प्रमाणगम्यत्वहै तहांजडत्वहै । जैसेयभानस्वरूपयनात्माघटादिकों मेंप्रमाणकेयाधीनतिनका भानहयातेतिनमेंजडत्वभीहै । इसप्रकार पूर्वाद दृष्टांतमेंजडत्वउपाधिको साध्यकसाथव्यापकता कहकरयवपक्षमें साधनकेसाथश्रव्यापकता कथनकरतेहैं । तैसेहीस्वकाशस्वरूप श्रात्माममाणके श्राधीनकैसेभानहोसकताहै । क्योंकेिममाणके श्राधीनजोभानहै सोअपनेव्यवहारके अर्थअन्वेषणकियाजाताहै ॥ और यात्मा स्वरूपभूतप्रकाशसेहीस्वव्यवहार केसिद्ध हुएश्माणा धीनभानसेक्याफलहै किंतुतिसकाकोईफलनहीं । इसपूकारपतरूप थात्मामें “सत्त्वात्” यहसाधनतोहे परंतुजडत्वरूपउपाधिकाश्रभाव है। यातैउपाधिसाधनकेसाथ श्रव्यापकह।। शंका ।। भानस्वरूपता चेतनपनेकामयोजकहै । औरथात्माभानस्वरूपनहीं किंतुभानका श्राश्रयहै । तैसेमानेंहुए जडत्वउपाधिसाधनकायव्यापक किसमकार होगाकिंतुनहींहोसकता।यातेजडत्वकोउपाधिरूपताकायभावहोनेसे पूर्वउक्तअनुमानदुष्टनहीं।। समाधान ॥ हेवादिन्थात्माभानस्वरूप अर्थात्प्रकाशस्वरूपहै । इसअर्थमेश्रुतिभमाणहै || तहांश्रुति ।। * तमेवमांतमनुभातिसर्व तस्यभासासर्व मिदविभाति ॥ * ( फ० उ० ॥ ३० ॥ १५) श्र०॥ तिसमसिद्ध यात्माके भासमानहुएही पश्चात्सर्व थनात्मपंचकाभानहोताहे।शंका॥जैसेगमनकरतेहुएएकपुरुपकेपीचे दूसरागमनकरताहै । इसम्योगमेंजैसेगमनदोनोमें स्वगतहेयर्थातवह दोनोस्वतंत्र गमनकरतेहैं । तैसेयात्माकेभासमानहुए सर्वथनात्मा पश्चात्भानहोताहै ॥ इसमयोगमेंभीदोनोंमेंमानस्वतंत्रहीक्योंनहो। समाधान ॥ तिसयात्माकेस्वरूपभूत प्रकाशकरकेयहसर्वथनात्म प्रपंचभानहोताहै ।। यातेयनात्मास्वगतप्रकाशसे भाननहींहोता । - दे०सि० मु०मा० किंतुयात्माके प्रकाशसेहीप्रकाशितहै। इसलियेयात्मास्वयंपूकाश स्वरूपहै। इसपूकारपूर्वउक्तउपाधिसाधनकायव्यापकहींहै ॥ यातेपूर्व उक्तयनुमानदुष्टहै | इसपूकारइतनेग्रंथकरके पूमाणकेश्रभाव हुएथात्मामें असत्त्वापत्तिकी शंकाकापरिहार पद प्रकारसेनिरूपण किया।' अचश्रुतिकीतिसात्मामेंप्रमाणता निरूपणकरनेकेलिये कैमुतिकन्यायसेसर्वप्रमाणोंकीविषयताग्रात्मामेकथनकरतेहैं । किंवा।। अथात्मामेसर्वप्रमाणोंकीविषयताकानिरूपण * यात्मामेकौनप्रमाणहैं ऐसायभिनिवेशकरनेवालेवादीकेप्रति सर्वहीप्रमाणयात्माविषयकहें । यहीउत्तरकहनेयोग्यहै । क्योंकित्र- ज्ञातपदार्थहीप्रमाणोंकाविषयहोताहै ॥ शंका ॥ प्रमाणकीविषयता मेअज्ञातत्वप्रयोजकनहीं अर्थात्जहां अज्ञातत्वहोताहै तहांप्रमाणकी विषयताहोतीहै । ऐसानियमनहीं। क्योंकिज्ञातपदार्थभीधारावाहिक प्रमाणकाविषयदेखनेमेयाताहै ॥ समाधान ।। हेवादिनज्ञातवस्तुमे प्रमाणक्या?तिसवस्तुकेपूकाशयर्थहै।अथवातिसकेव्यवहारअर्थात्ग्रहण त्यागकेयर्थहै । दोनों कारनहींसंभवते । क्योंकिमथमप्रमाणकरके हीवस्तुकाप्रकाशौरतिसकेव्यवहारकानिर्वाहहोसकताहै पुनःद्वितीय प्रमाणकीकुछयपेक्षानहीं। यदिऐसेनमानेतोद्वितीयमाणसेभीवह दोनोंकार्यकैसेसिद्धहोंगे । औरइसपकारधारावाहिकज्ञाननिष्ठथप्रमाण ताभीनहींहोसकती । क्योंकिउत्तरउत्तरक्षणविशिशतिस विषयकीतिस तिसज्ञानमेअधिकताभानहोतीहै।यद्यपिकालकोयतींद्रियर्थावइन्द्रिय जन्यज्ञानकायविपयहोनेसेमत्यक्षज्ञानकीविषयतानहींसंभवती।तथापि पूर्वाद वहकालसर्वपत्ययोंमेभानहोताहै । यदिऐसेनमानेतो "इदानीगंधः" श्र० ॥ इसकालमेगंधहै। इसमकारकीमत्यक्षमतीतिकैसेहोगी । याते कालसर्वपत्ययवेद्यहै ॥ शंका ॥ “अज्ञातोघटः" इसमतीतिसेघटमेभी अज्ञातताहै । कैसेयापकेवलयात्माकोहीप्रमाणकाविषयकथनकरते हो। समाधान ॥ हेवादिन्यात्माहीयज्ञातहै । इसीयर्थकोउपपादन करतेहैं । मथमात्मापरमप्रेमकाविषयहोनेसेसुखस्वरूपहै। वहसुख नित्यतथास्वप्रकाशहै । क्योंकि "सुखमहमस्वाप्स” इसपरामर्शकेवलसे सुपुप्तियवस्थामेसर्वइन्द्रियतथा विषयकेउपरतहुएभीवहसुखभासमान होताहै । तिसीहेतुसेजाग्रत्अवस्थामभीतिसनित्यसुखकी “अस्ति भाति" इसमकारकीमतीतिकमाप्तहुएभीजोयहसुख “नास्तिनभाति" यहअन्यमकारकाव्यवहारहोताहै । सोयधिष्ठानकेयज्ञानसेउत्पन्नहुया है । यहवा शुक्तिकेश्रज्ञान जन्यरजतव्यवहारमे देखनेसेऐसेकल्पना कीजातीहै । औरसमिथ्याव्यवहारकायधिष्ठानयात्माहीहै ॥ याते विपरीतव्यवहारकीयोग्यतास्वरूपजोयज्ञानजन्य यावरणवहयात्मामे कल्पनाकियाजाताहै।इसमकारयात्माहीयज्ञानका विषयहोनेसेअज्ञात है। और जडमे अज्ञान की प्रविषयता स्वीकार करने योग्य है। ।। शंका ।। जडंपदार्थमेग्रज्ञानकीयविषयताकै है ।समाधान।। जो जिसमेकिसीयतिशयताकोधारणकरताहै।वहतिसकाविषयहोताहौर अज्ञानतोघटादिकयनात्मामेअतिशयताकोनहींधारण करता। क्योंकि तिसयनात्माकेविषयकरनेकाकोईफलनहीं|शंका|यज्ञानकृतयावरण निष्फलनहीं किंतुतिसयवरणका विक्षेपपूयोजन हे समाधान। हे वादिनविक्षेपकेयर्थयावरणको विद्यमानहोनेसे शज्ञानजन्ययावरण २०२ वै० म० मु० भां० कीकल्पनाव्यर्थहै ।। शंका ।। अज्ञानकृत यावरणकाजडमेंयभावहुए किसपूयुक्तयावरणजडमें है । समाधान ।। जडपदार्थ स्वभावसेही यावृत्तहै । क्योंकिग्रज्ञानसेवह श्रावृत्तस्वभावही उत्पन्नहुरहें । याते तिसमें अनात्मत्वयुक्त यावरणहै । अज्ञानकृत यावरणजडमेनहीं तिस कारणसेहीजडकोषमाणका अविपयहोनेसेयात्माही प्रमाणकाविषय है । यहयर्थसिद्धहुआ यद्यपिघटादिजडपदार्थोंमें यज्ञानकृतथावरण न मानेहुए “अज्ञातोघटः" यहप्रतीतिनहुईचाहिये । तथापिअज्ञान केसहितहीघटादिकोंकासाक्षिचेतनमें यध्यासहोनेसेसमानाधिकरणता होनेकरयहपतीति बनसकतीहै । शंका ॥ * अथअनात्माके भानकाप्रकारनिरूपण * जडपदार्थको यावृत्तस्वभावहोनेसेस्वः तोतिसका भाननहीं संभवता ।। औरप्रमाणसेभी तिसकाभाननहींसंभता ।। क्योंकितिस पूमाणकावहजड पदार्थविपयनहीं है । इसपूकारस्वतः तथाप्रमाण से जडकाभान नहोनेसे तिस अनात्माका भान कैसेहोगा ॥ समाधान।। यद्यपिजडस्वतःनहींभानहोता। क्योंकिवहयावृत्तस्वभाव है । औरअज्ञानकाविषयहोनेसेपमाणसेभीनहींभानहोता। तथापि थात्मस्वरूपचेतन्यकर जडकाभानहोता है । यद्यपियांत्मचैतन्यको स्वप्रकाशहोनेसेतिसकेसाथ संबंधवालाजडपदार्थसर्वदाकालही भान हुयाचाहिये । तथापिसातिरूपयात्माको अविद्याकारयायत्तहोने सेप्रपंचकायभानवनसकताहे ॥ शंका ॥ साक्षीकोयज्ञानकरयात मानेहुएकिसीकालमेंभी प्रपंचकाभाननहींहोगा | समाधान ॥ हे वादिन्धटावच्छिन्नजोचैतन्य वहघटके साथइंद्रिय कासंबंधहोनेकर पूर्वाई उत्पन्नहुईजोघटाकारतस्करणकीवृत्तितिसकरअविद्याकीनिवृत्तिविशि टहोताहै,ौखहीचैतन्यघटाकारवृत्तिमेप्रतिविधतहुआघटकोप्रकाशकरता है। इसप्रकारघटकी तीतिसंभवतीहै । औरपटादिकोंकीप्रतीतिमेभी यहीरीतिजानलेनी ॥ शंका । ऐसेमानेहुएघटकोपमाणकीविषयता प्राप्तहुई ॥ समाधान ॥ हेवादिन् प्रमाणकरनिवृत्तिकेयोग्यजोग्रज्ञान हैतिसकेविषयकोहीप्रमाणकीविषयताहै । औरतैसेयज्ञानकी विषयता घटादियवच्छिन्नचिदात्मानिष्ठहीहै । इसलियेचेतनस्वरूपयात्माही सर्वघटादिकोंमेप्रमाणकाविषयहै । औरघटतोस्वअवच्छिन्नअनावृत्त चिदात्माके साथकल्पिततादाम्यसंबंधकोपाकरभानहोताहै ।। यावे तिसघटकोप्रमाणकीविषयता किसपकारहोसकतीहै किंतुकिसीप्रकार भीनहीं। इसप्रकारात्मामेप्रमाणकेयभावसेग्रसत्त्वापत्तिकाजोविक ल्पवादीनेपूर्वकियाथासोपरिहारकिया ॥यवचिदात्मामेसर्वप्रमाणकी विषयताकेनिरूपणकाफलकहतेहैं ॥ तिसपूर्वउक्तप्रकारसेसर्वप्रमाणों करसिद्धजोयात्माहै ॥ तिसमेप्रमाणाभावरूपयापादककेयसत्त्वसे श्रापादनकरनेयोग्ययात्माके यसत्त्वकायसंभवहै । शंका ॥ यात्मा कोसर्वप्रमाणकाविषयमानेहुए "श्रौपनिपदत्व" यहजोयात्माका विशेषणश्रुतिमेकथनकियाहै ।। वहकैसेसंभवहोगा। क्योंकिसर्वममा णकेविपयात्माकोउपनिपमात्रगम्यत्वकाअभावहोगा । यद्यपि "प्रमेयोघटः" जैसेइसप्रयोगमेप्रमेयताघटकाविशेषणहै । तैसे "श्रोप निपदव" यहभीयात्माकाविशेषणवनजायेगा । तथापि- सर्वविशेषणसावधारणं * य० ॥ सर्वहीविशेषणइतरकेव्यावर्तकहोतेहैं । इसन्यायसेइतर वै० स० मु० भा० २०४, कायव्यावर्तकमात्र विशेषणकल्पनाकरनेमेफलकायभावहै। औरतिस सेयध्ययनविधिकाविरोधहोगा । क्योंकियध्ययनविधिनिष्फलयर्थ कायध्ययननहींविधानकरता। इसलियेयात्मामेइतरप्रमाणोंकाव्यावर्त कत्वहीयोपनिषदत्वविशेणकोकहनायोग्यहै ॥ौरसर्वप्रमाणोंकेविषय आत्मामेवहइतरप्रमाणोंकाव्यावर्त्तकपनातिसविशेषणकोनहींसंभवता। याते औपनिपदत्वविशेषण यात्मामे किसी प्रकारभी नहीं संभवता ॥समाधान।। हेवादिन्यद्यपिप्रपंचावच्छेदकरके यात्मामेसर्वप्रमाणकी विषयताहै ॥ तथापिपरिपूर्णसचिदानंदप्रत्यक्रूपतासेतिसयात्मामें औरप्रमाणोंकीयविषयताहोनेकरतिसरूपतासे श्रुतिमात्रगम्यताहै ॥ यातेयोपनिपदत्वविशेपणकाविरोधनहीं है ॥ अवपरिपूर्णादिपदोंका अर्थनिरूपणकरतेहैं ॥ "परिपूर्ण” कहियेसर्वयोरसेव्यापक अर्थात् निर्पेक्षव्यापकहै । शंका । परिपूर्णादिरूपयात्माकोउपनिषद्प्रमाण काविषयमानेहुएघटादिवत्दृश्यताहोनेसेमिथ्यापनाहोगा।समाधान। वहआत्मासतकहियेत्रिकालमेयवाधितस्वरूपहै । इसीसेश्रुतिभास्यता केयनंगीकारसेवहमिथ्यानहींहै ॥ शंका । श्रुतिभास्यताकेश्रनंगी कारसेतिसकाभानकैसेहोगा समाधान ॥ स्वप्रकाशचिद्रूपतासेही तिसयात्माकाभानहोताहै। इसीसेचेतनकथनकियाहै।शंका परिपूर्ण रूपयात्माकोसर्वरूपताहोनेसेदुःखरूपताभीकहनेयोग्यहै । औरदुःख रूपतामानेहुएवहयात्माउपनिषद्काविषयकैसेहोगा।क्योंकि अपुरुषार्थ रूपहै ॥समाधान ।। हेवादिन् “परिपूर्ण"विशेषणसेयात्माकाउद्देश्य करकेसर्वत्वकाविधाननहींकियाजाता ॥ जिससेदुःखरूपतायात्मामे हो ॥ किंतुसर्वत्वकाउद्देश्यकरकेयात्मत्वकाविधान है।तिससेथात्मा पूर्वाद १०५ हीसर्वकावास्तवस्वरूपहै। यात्मासेविनायन्यकोईवास्तवस्वरूपनहीं। इसप्रकार दुःखत्वादिरूप को मिथ्याहोनेकर तिसकावांध होनेसे श्रात्मायानंदस्वरूपहै । इसीहेतुसेश्रुतिमें 8 आनंदोवूह्म श्र॥ यानंदस्वरूपब्रह्महै । ऐसाकथनकियाहै ॥ यहांयात्मातथा ब्रह्मपदकाएकहीअर्थजानना । इसप्रकारयात्माकोपुरुषार्थरूपताहोने से उपनिपपमाणकी विषयतासंभवतीहै । शंका । यद्यपिपूर्वउक्त रीतिसेयात्मायानंदस्वरूपहे। तथापिपूर्णरूपतातिसकोनहींसंभवती । क्योंकिपरमात्माकाजीवसेभेदहोनेकरपरिच्छिन्नपनाहै।।समाधानावह परमात्माप्रत्यक्स्वरूपहै।क्योंकिजोप्रत्यकसेभिन्नहोताहैवहयब्रह्महोताहै याते तिनकाभेदकल्पितहै । इसीसेपूर्णरूपताथात्मामेंसंभवतीहै। इस पूकारप्रत्यगात्मायौ ब्रह्मकीएकताउपनिषद् मात्रगम्यहै । * अथस्वयंप्रकाशचिदात्मामअज्ञानकीविषयताका अन्यप्रकारसे निरूपण शंका । उपनिषद्जन्यज्ञानकरके निवृत्तिकेयोग्यज्ञानकी जोविषयताहै ।। यहीउपनिषद् प्रमाणकी यात्माविषयताहै | और वहश्रज्ञानकीविपर्यता स्वमकाशचिदात्मामेंनहीं संभवती ॥ क्योंकि भासमानतातथा अभासमानताकापरस्पर एककालमेंएकाधिकरण मंविरोधहै।समाधाना।हेवादिनस्वयंप्रकाशयात्मामेंअज्ञानकीविषयता नहींसंभवती।यहजोतुमनेकहासोसत्यहै॥शंका हेसिद्धांतिन्तोग्रज्ञान की विषयतायाफ्नेकमेकथनकी ।।समाधान ! हेवादिन यानंदादि रूपतासेयात्माशज्ञानकाविपयहै औरचिद्रूपतासे अज्ञानकाविषयनहीं। यदिऐसेनमानोगेतो यज्ञानकीभी प्रसिद्धिप्राप्तहोगी । इसमकारका ०सि० मु०मा० उत्तरयद्यपिपूर्वनिरूपणकियाभीहैतथापिपुनःप्रकारांतरसे इसकाउत्तर निरूपणकरते हें ॥ हेवादिन्एककालमें एकअधिकरणमें भासमानता यौयभासमानताकाविरोधहै । इसपूर्वउक्तदोपसे स्वयंप्रकाशयात्मा में अज्ञानवास्तवसेनहीं है। यहकहतेहोयथवाभूमसेभीनहहियहकहते होमथमपनतोहमकोभीस्वीकारहै । क्योंकिवास्तवयज्ञानतोयात्मा मेंहमभीनहींमानते । औरद्वितीयपनकहोतो वहनहींसंभवता।क्योंकि जैसेमध्यान्हकालीनजोस्वयंमकाशमानयादित्यहै । यहाँपर श्रादित्य में यंधकारकायत्यंतयसंभव दिखलानेके यर्थस्वयंप्रकाशयहतिसका विशेषणकथन किया है । तिसयादित्यमेदिनको अंधतास्पदोषवाले जोपेचकादि वहऐसी कल्पनाकरतेहैं। कि “तमसावृत्तोऽयंसविता" अ०॥ अंधकारसेयहसूर्यग्राच्छादितहै । जैसेदोपकेवशसेअविद्य मानभीरजतशुक्तिमें कल्पनाकरतेहैं । तेसेयहकल्पनाभीहै । तैसेही अत्यंत अज्ञानकरके याच्छादितहैबुद्धि जिनकी वह मूढजन थज्ञानसे यह यात्मा श्राच्छादित है ऐसी कल्पना करते हैं । औरयहजोवादीने पूर्वकहाथाकिदिवांधत्वदोपसे उल्लकादिकोंको सूर्यकायदर्शनहेकोईतमकीकल्पना वहसूर्यमेंनहींकरते ॥ सोयह कथनभीथसंगतहै। क्योंकि “यहसूर्यतमोमयहे" इसमकारकीजो तिनकीप्रतिति तिसकाविरोधहै।। तेसेहीअभियुक्तपुरुषोंकाकथनहै । घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्क यथामन्यतेनि प्रमंचातिमूढः । तथावद्धवद्भातियोमूढदृष्टेःसनित्यो पलब्धिस्वरूपोहमात्मात्मा ॥ १ ॥ य० ॥ जैसेमेघोकरकेयाच्छादितहुई है नेत्रोंकीदृष्टि जिसकी २०७ पूर्वा वहअत्यंतमूढजन स्वयंप्रकाशमान सूर्यमें यहसूर्य मघोंकर श्राच्छादितहुया प्रकाशशून्यहे ऐसेकल्पनाकरताहै । तैसेअज्ञान करयाच्छादितहुई हैबुद्धिजिसकी तिसयज्ञजनकोजोशात्माबद्धकी न्याईभासताहेवहनित्यज्ञानस्वरूपयात्मामेंहं ।। १ ।। इति ।। और यदिपूर्वपत्तीऐसेकहे ॥ श्रात्माकोअज्ञानकरावृत्तत्वकी कल्पनामें अज्ञानकोहीदोपमानेहुए यात्माश्रयदोपकीप्राप्तिहोगी ॥ सोयह कथनभीसमीचीननहीं है ।। क्योंकिथावरणकोथज्ञानका कार्यहोने करज्ञानजन्यमानेहुएभी थात्माश्रयदोपकायभावहै ॥ औरयदि श्रावरणकोयज्ञानस्वरूपभीमानलें ॥ तोभीयात्माश्रयदोपकी प्राप्ति नहींहोती । क्योंकिजैसेनैयायिकोंकेमतमें । “रूपसमवायिघटः" "य० ॥ रूपकेसमवायवालाघटहै ।। इसपतीतिमें जैसेरूपका समवाय संबंधघटमेंभासताहै ॥ तैसेंसमवायकासंबंधभी संबंधियोंसेभासताहै। तहांसंयोगादिसंबंधकातो असंभवहै । क्योंकिसंयोगद्रव्योंकाहीहोता है। औरसमवायदव्यनहीं है । औरसमवायकायन्य समवायसंबंध मानेहुएथनवस्थादोपकी प्राप्तिहोगी। इसलिये यहां समवायसंबंध थापहीस्वसंबंधकीप्रतीतिका निर्वाहिकहै ॥ और जैसेभाट्ट मतमें "भेदःपटोन" थ०॥ पटप्रतियोगिकभेदवालाभेदहै । इसमतीतिमें जैसघटपटकाभेदकभेदहै । तैसेअपनारपटकाभेदकभीवहीभेदहै। यहांभीभेदांतरमानेहुए अनवस्था दोपकीप्राप्तिहोतीहै । इसलिये अपनाभेदकयापकोही माननेमेश्रात्माश्रयदोपकीमाप्तिनहींहोती। तैसेयज्ञानकीकल्पनामें अज्ञानकोहीदोपरूपमाननेमें यात्माश्रयदोप कीप्राप्तिनहींहोती। क्योंकिसर्वमतसाधारणजोदोपहै वहदोपनहीं ०सि० मु. भा० होसकता॥ शंका ॥ यात्मा वेदांतोंकीप्रवृत्तियात्माके प्रकाशयर्थ है । अथवाग्रज्ञानकीनिवृत्ति अर्थहै । पृथमपक्षतोनहीं संभवता । क्योंकिदृश्यपनाहोनेसे घटादिकोंकीन्याई यात्मामेभीमिथ्यात्वप्राप्त होगा ॥ ौरद्वितीयपक्षभी नहींसंभवता ॥ क्योंकितिसअज्ञान को यात्माकीन्याई अनादिहोनेकरनिवृत्तिकी अयोग्यता है ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यावरणस्वरूपजोआत्माकायज्ञानहै तिसको कल्पितहोनेकरनिवृत्तिकीयोग्यताहै 'क्योंकिप्रथमही यात्माके स्वरूप प्रकाशकेमहात्मसेवास्तवसेनिवृत्तहोनेकरवहअसतहै।तिसयसतकीनित्र त्तिकेयर्थहीसर्ववेदांतोंकीप्रवृत्तिहै ।जैसेशुक्तिकास्वरूपविचारनेसेतिस मेरजनवास्तवनहीं । तैसेयात्माकेस्वरूपकाविचारकरनेसेयज्ञानभी तिसमेअत्यंतअसत्है।औरयनादित्वमात्रहेतुनिवृत्तिकीयोग्यताकासा धकनहीं । क्योंकिपागभावमेव्यभिचारहै । तिसमेयनादित्वकेहुएभी निवृत्तिकीयोग्यताहै ॥ औरयदिऐसेकहोकि “भावरूपढयाजोयना दित्वहै सोनित्यत्वकासाधकहै" । यहकथनभीसमीचीननहीं । क्यों कियज्ञानमेभावरूपताभीयंगीकारनहींहै । जैसेवहयसत्से विलक्षण है। तैसेसत्सेभीविलक्षणतातिसमेस्वीकारहै । इसीसेयज्ञानकल्पित है। यहकथन कियाहै ।। शंका |॥ अज्ञानकीनिवृत्तिमात्रप्रमाणसे होतीहै । यहथापक्योंकल्पनाकरतेहो । विषयकाप्रकाशहीप्रमाणका फलक्योंनहो ॥ समाधान ॥ प्रकाशस्वरूपयात्माकोप्रमाणसेबिना भीस्वप्रकाशताफेमभावसेहीसिद्धहोनेकरतिसकेनिमित्तप्रमाणकाग्रहण व्यर्थ है । यातेश्रज्ञानकीनिवृत्तियर्थहीप्रमाणकाग्रहणवनसकताहै । श्रन्ययर्थनहीं। शंका यात्मानिष्ठप्रज्ञानकीनिवृत्तिकरनेवालेवेदांतों ।

२०६ पूर्वाद कोअात्मविषयतानहींसंभवती।।यन्यथामिनिष्ठजोघटादिहैं ।तिनके निवर्तकपापाणादिकोंकोभीमृत्तिकाविपयताप्राप्तहोगी । क्योंकिदोनों मेन्यायकीतुल्यताहै | समाधान ॥ हेवादिन्घटादिकोंकेनिवर्तकजो पापाणादिहैं । वहकोईमृतिकाकारवृत्तिकोनहींउत्पन्नकरसकते । इसी सेतिनकोमृद्विषयतानहींसंभवती । औरदाष्टंतिमेतोयात्माकारवृत्तिके उत्पादकहोनेकरखेदांतोंकोयात्मविषयतासंभवतीहै ॥ शंका । स्वयं प्रकाशयात्मामेथज्ञानकीनिवृत्तिसेविनायौरकोई फलनहीं ॥ यहपूर्व कथनकियासोपयुक्तहै।। क्योंकियात्माकीस्वयंप्रकाशतामेषमाणका ग्रभावहोनेसेविवादहै ॥ समाधान ॥ ॐ अथ आत्माकीस्वयंप्रकाशतामअनुमानप्रमाण का निरूपण हेवादिन्यात्माकीस्वयंप्रकाशतामेप्रमाणकोविद्यमानहोनेसे कोई विवादनहीं। तैसेहोदिखलातेहैं ।। * आत्माइतरानपेक्षपूकाशः॥स्वसत्तायांकाशाव्य भिचारित्वात् ।। संवत्वालोकवहा * । श्र० ॥ यात्माइतरकीयपेक्षासेरहितप्रकाशस्वरूपहै ।स्वसत्ता कालमेप्रकाशकरख्यातहोनेसे । जोजोस्वसत्ताकालमप्रकाशसेयव्य भिचारीहै सोसोइतरयनपेक्षप्रकाशस्वरूपहै । जैसेज्ञानहै। अथवा थालोकहै।।इति।यहांज्ञानस्वप्रकाशवादीकेपूतिसंवत्रूपदृष्टांतजानना यौनैयायिकादिकनकेतियालोकरूपदृष्टांतजाननायथर्वपक्ष। आत्माकीस्वप्रकाशताकेसाधकअनुमानकाखंडन वे. सिं० मु. भा. हेसिद्धांतिन्इसयनुमानमेकौनयात्मापनहे । क्या?क्षुधापि पासादिधर्मोंसेरहितयात्मापक्षहै । अथवाकर्त्ताभोक्तायात्मपत्नहै ॥ पृथमपनतोनहींसंभवता । क्योंकिनैयायिककेप्रतियाश्रयासिद्धिहै । जिसकारणसेवहनैयायिकक्षुधापिपासादिधर्मरहितयात्माकोनहींमानता शौरद्धितीयपचनहींसंभवता। क्योंकिंवेदांतीकेतियाश्रयकीयसिद्धि है । जिसकारणसेवेदांतीयात्माकोकर्तायोभोक्तानहींमानता किंवा पक्षरूपयात्माक्या?पूमाणसिद्धही यथवाभ्रमसिद्धहैवास्वप्रकाशरूपता सेसिद्धहै। अथवाग्रसिद्धस्वभावहै । अंत्यपक्षतोनहींसंभवता । क्यों कियसिद्धपदार्थकोकहींभीपक्षपनादेखनेमेनहींयाता औरयूथमपक्ष भीअसंगतहै। क्योंकिपूमाणसिद्धकीस्वप्रकाशतासिद्धकरनेसेयनुमान मेवाधपासहोताहै । अर्थात्प्रमाणकाधिपयपदार्थस्वप्रकाशनहींहोता औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकिभ्रमसिद्धथात्माकोयाभास रूपताहोनेकरतिसर्थगवालेअनुमानरूपअंगीकोभीयाभासरूपताप्राप्त होगी । औरतृतीयपक्षभीनहींसंभवता।क्योंकियात्माकीस्वप्रकाशता तोअवसिद्धकरनेलगेहैं । इसअनुमानसेप्रथमभीयदिस्वप्रकाशताकी सिद्धिमानतोसिद्धसाधनदोपकी प्राप्तिहोगी। किंवा । यह इतरानपेक्ष प्रकाशत्व" रूपसाध्यक्याहै । अर्थात्इतरकीअपेक्षासेरहितजोप्रकाश है तत्रूपत्वसाध्यहै । अथवातैसेपूकाशकीयधिकरणतासाध्यहै । दोनोंपक्षोंमेप्रकाशको इतरानपेक्षत्व"क्या?उत्पतिमेहे अर्थात्वहपूका शयपनीउत्पत्तिमेदूसरे कीअपेक्षानहींकरता । अथवाअपनेप्रकाशमे इतरकीथपेक्षानहींकरतामथमपरमेस्वउत्पत्तिमेइतरानपेक्षश्काशात्मक साध्यमानेहुण्यात्माकोस्वभकाशनाकीनिदिनहींहोसकती । क्योंकि पूर्वाद्ध २११ उत्पत्तिमेइतरकीयपेक्षाअवश्यहोतीहै। यातेपथमपक्षनहींसंभवता ।। थोरथपनेप्रकाशमेइतरानपेक्षप्रकाशरूपसाध्यहै। इस द्वितीयपक्षसे थालोकरूपदृष्टांतमेसाध्यकीविकलताहै । क्योंकिवाह्यालोकमेंअपने प्रकाशमेइतरानपेक्षमकाशभास्वररूप है ।ौरदृष्टांतरूपयालोकमेभास्वर रूपात्मकतानहीं है । जिसकारणसे रूपौरूपीकी एकताअयोग्य है। यातेदितीयपक्षभीनहींसंभवना।। औरयायद्वितीयपक्षमे इतरान पेक्षप्रकाशवत्ता”रूपसाध्यमानेहुएयात्माको स्वमकाशताकीसिद्धिनहीं होगी । किंतुस्वप्रकाशप्रकाशकीयधिकरणताहीहोगी ॥ तैसेमाने हुएसंवितरूपदृष्टांतमेसाध्यकीविकलताभीहोगी।क्योंकिस्वप्रकाशरूप ज्ञान स्वप्रकाशज्ञानकायधिकरणनहीं है।यातेद्वितीयपतभीयसंगतहै। और प्रकाशाऽव्यभिचारित्व" हेतुभीयात्मामेकैसेवर्तताहै।यहभीकथन करनेयोग्यहै । तहांप्रकाशकरजोव्याप्तपनाहैयहीमकाशाऽव्यभिचारित्व कहनाहोगा।ौरव्याप्तिकाभीऐसायाकारकहनाहोगा। किजिसदेशमे श्रात्माहै।तहांगकाशहै।अथवाजिसकालमेयात्माहैतिसकालमेमकाशहै। सोदोनोंप्रकारकीव्यातिनहींसंभवती ॥ क्योंकियात्माकोव्यापकहोने सेकिसीदेशमेवृत्तितानहीं है । औरनित्यहोनेसेकिसीकालमेभीवृत्तिता नहीं है । और "स्वसत्तायां" यहजोहेतुकाविशेपणकथनकियाहै वह भीव्यर्थ है क्योंकिपरपूकाशघटादिकोंमेप्रकाशाज्यभिचारीपनानहीं किंतुभकाशसेव्यभिचारित्वहै ॥ यातेपकाशाऽव्यभिचारित्वमानहेतु कहनेसेभीतिनमेयतिव्यातिनहींहोती। औरयदिऐसेकहो । प्रकाशसे रहितजोध्यस्तदीपकह तिसमेसाधनकीविकलतादूरकरनेकेलिये “स्व सत्तायां" यहहेतुकाविशेषणकथन कियाहे 'सोयहकथनभीसमीचीन दे०सि० मु० भा० नहीं । क्योंकितिसमेहेतुकीयप्रवृत्तिहुएभीविरोधका अभावहोनेसे साधनकोदृष्टांतकेकिसीएकदेशमेवृत्तिहुएभीसतहेतुपनादेखाहे । जैसे "पर्वतोवन्हिमान्धूमात्"इसयनुमानमेमहानसमात्रकेयनाश्रितधूमको महानसविशेपमेवृत्तिहोनेसेसतहेतुतास्वीकारहै । तैसेइसयनुमानमेभी प्रकाशाव्यभिचारित्वहेतुकोध्वस्तमदीपमेग्रवृत्तिहुएभीतिससेभिन्न श्रा लोकमेविद्यमानहोनेसेसाधनकीविकलतारूपदोपनहींप्राप्तहोता। याते "स्वसत्तायां” यहहेतुकाविशेषणव्यर्थ है । औरसुखादिकोंमे यहहेतु व्यभिचारीभी है । क्योंकिसुखादिकोंको स्वसत्ताकालमप्रकाशसे अ व्यभिचारीपनाहुएभीइतरानपेनप्रकाशरूण साध्यकाअभाव है। और इसअनुमानमे “ तमोविरुद्धत्व " उपाधिभी है ।। क्योंकिजहांजहां "इतरानपेक्षप्रकाशत्व" है तहांतहां “तमोविरुद्धत्व" अर्थात्तमका विरोधीपना है ॥ जैसेप्रदीपादिकोंमे है ॥ ौरजहांजहां “स्वसत्ता कालमेंप्रकाशसे अव्यभिचारीपना" है ॥ तहांतहां “तमोविरुद्धत्व नहीं है । जैसेयात्मामे है । यद्यपियात्मामे साधनकेसाथउपाधि व्यापक है ।। तथापिअात्माकोतमकासाधकहोनेकरतमकाविरोधीपना नहीं है । यातेपूर्वउक्तहेतुसोपाधिकहै।। औरसंवितरूप तथापालोक रूपदोनोंदृष्टांतभीसाधनसे रहितहैं ॥ क्योंकिदेशसे अथवाकालसे प्रकाशकीसमानाधिकरणता संवितोयालोकमेनहींसंभवती ।। अर्थ: यह ॥ संवित्कोस्वप्रकाशताकेहुएसंवित्सेयतिरिक्तप्रकाशकाअभाव होनेकरसंवित् कीप्रकाशकेसाथसमानाधिकरणताअयोग्यहै। और श्रा लोककीभीभास्वररूपसंज्ञकमकाशकेसाथसमानाधिकरणताकाअभावहै। क्योंकिभास्वररूपतिसथालोककाधर्म है ॥ शंका ॥ यद्यपियालोक पूर्वाई यौभास्वररूपकागुणगुणीभावहोनेसे देशकृतसमानाधिकरणतानहीं संभवती । तथापिजिसकालमेंयालोकहैतिसकालमेंपूकाशहैयहकाल कृतसमानाधिकरणता यालोकयौ प्रकाशकीवनसकतीहै || समा धानाहेसिद्धांतिनकालकृतसमानाधिकरणताभीनहींसभवती। क्योंकि # क्षणमगुणंद्रव्यंतिष्ठति अ०-एकक्षणमात्रयणसेरहितद्रव्यस्थितहोताहै।इसन्यायकाविरोधहै।। यातेयहस्वप्रकाशताकासाधकअनुमानयसमीचीनहै ॥ इतिपूर्वपक्ष अथ सिद्धांत रीतिसेतिसअनुमानकामंडन * समाधान।।हेवादिन्यहतुम्हाराकथनहीथसमीचीनहै।तैसेहीस्पष्टकरके दिखलातेहैं।जोवादीनेयहकथन कियाकिकौनयात्मापक्षहै।सोयसंगतहै। क्योंकियात्मशब्दकेजोयोग्यहैतिसीकोपक्षपनाहै ॥ औरममाणसिद्ध थात्मा इत्यादिजोविकल्पपूर्वकहेथेवहभीयसमीचीन हैं।क्योंकिसिद्ध पदार्थकोहीपक्षपनायुक्तहै ।तिसमेप्रमाणादिविशेषणोंकोथसमर्थहोने सेतिनकाकथननिष्फलहै ॥ ौरजोसाध्यकीविकलतापूर्वउक्त विक- ल्पसेकथनकीथीसोभीनहींसंभवती।क्योंकि प्रकाशमेइतरकी अपेक्षा सेरहितजोप्रकाश है तत्रूपता"मानेहएको हीसाध्यपना है । और ऐसासाध्यदृष्टांतरूपयालोकमेसाध्यकोजोविकलतापूर्ववादीनेकहीथी वहभीनहींसंभवती। क्योंकि तहांभी पालोकसे अतिरिक्त प्रकाश अंगीकारनहीं है। किन्तु थालोकरूपहीमकाश है । जैसे ॐ पूकृष्टपूकाशश्चंद्रः * थ०-उत्कृष्टप्रफाशस्वरूपचंद्रहे । इसकथनमेचंद्रव्यक्तिजोमाति पदिकपर्थहैतिससेयर्थातरप्रकाशपदार्थनहीं है।अर्थात्धातुतथापत्य- २०सि० मु. भा. योदिकोंसेभिन्नयर्थवालाजोचंद्रशब्दतिसकोग्रातिपदिककहतेहैंतिसका प्रकाशहीयर्थहै।कोईप्रकाशचंद्रव्यक्तिसे भिन्न नहीं। भिन्नयर्थमाने हुएमनयौउत्तरकी समानाधिकरणतानहींहोगी ॥ क्योंकिप्रष्टानेतो चंद्रकेस्वरूपमात्रविषयकपनकिया है ।। वक्ताभीयदिचंद्रकेस्वरूपविप यकहीउत्तरनिरूपणकरेतो समानाधिकरणतासंभवती है ॥ अन्यथा प्रश्नतथाउत्तरकीव्यधिकरणताहोगी। औरभास्वररूपहीप्रकाशहै । यालोकभकाशस्वरूपनहीं यहवादीकाकथनभीयसंगतहै। क्योंकि तहांपरभीरूपतथारूपवालेकातादात्म्यस्वीकारहोनेकरयालोकरूपदृष्टांत मेसाध्यकीविकलताकाअभावहै । औररूपतथा रूपवान्का समवाय संबंधकथनकरनाअशक्यहै ॥ तिसीसेनेयायिकोंनेभीरूपरूपीकाता दात्म्यहीस्वीकारकरनायोग्यहै।।ौरजोपूर्ववादीनेहेतुगतदूपण कहेथे वहभीनहींसंभवते।क्योंकियावत्एकाशकालहेतावत्कालविद्यमानता कोहीहेतुकाअर्थपनाहै। औरजोग्रात्मामेंकालकृतपरिच्छेदकाग्रभाव कहाथा|वहभीनहींसंभवता । क्योंकियज्ञानकेवशसेकल्पितकालकृत परिच्छेदबनसकताहै।ौरसुखादिकोंमेंयहहेतुव्यभिचारीभीनहीं।क्योंकि जितनाकालपूकाशहै उतनाकालसुखादिकोंकीविद्यमानतानहीं । मुक्तिकालमेंयात्मरूपप्रकाशकेविद्यमानहुएभीदुःखनहीं है यद्यपिसुख तिसकालमेंभीहै । तथापिसुखकोयात्मरूपता होनेसेपक्षपनाहै ॥ तिसमेहेतुकोवृत्तिहुएभी व्यभिचारनहींहोसकता । थौरयहागे कथनकरनाजोहेतुहै । उसीसेज्ञातसत्तावालेघटादिकोंमेहतुकीयनका तिकताअर्थात् व्यभिधाररितापरिहारकी । क्योंकिसाक्षिभास्यघटा दिकोंकीयावत्कालसाक्षीहे तावत्कालस्थितिका अनंगीकारहै ।।

पुवाई .. और "तमोविरुद्धत्व" जोउपाधिपूर्ववादीनेकहाथावभीनहींसंभवता। क्योंकिसाधनके साथ उपाधिव्यापकहै।यद्यपियात्मातमका साधकहै विरोधी नहीं। याते उपाधिसाधनके साथ व्यापक है । तथापि स्वरूपसे प्रात्मातमका विरोधीहुग्रामी कल्पनाकरके तिसकासाधक हैं । औरवास्तवतथाकाल्पनिकदोरूपएकपदार्थकेनहींसंभवते यह वादीकाकथनभीनहींसंभवता ॥ क्योंकितैसेमानेहुएभ्रममात्रकालोप होगा । और “इदंरजतम्" इत्यादिभ्रममेंएकपदार्थके दोनोरूपभान होनेसेभीवहकथनययुक्तहै ॥ औरदृष्टांतभीसाधनसेविकलनहीं ॥ क्योंकियावत्पूकाशकालहै ॥ तावविद्यमानत्वरूपहेतुकासंचित् यौ यालोकइनदोनोंमेंसद्भावहै । संवित्यपरोक्षप्रतीतहोतीहैयौरपुनः नहीं हैयहनहींसंभवता ॥ औरयालोकभासताहै औरपुनःनहीं है ।। यहकथनभीययुक्तहै । औरपूर्वयहजोकथन कियाथा कि पालोकमे . जोभास्वररूपहै वहप्रकाशहै ॥ औरतिसप्रकाशकीयावत्कालस्थिति होतीहै । तावत्कालयालोककी स्थितिनहीं है । क्योंकिनिराश्रय हुयाउणएकक्षणस्थितहोताहै ।। यहस्वीकारहै। जिसकारणसेगुणीके नाशकोगणनाशके प्रतिकारणताहै । तिसकारणसेयाश्रयसेबिनाएक क्षणगुणकीस्थिति बनसकतीहै ।। सोयहकथनभीसमीचीननहीं ।। क्योंकिउपादानकेनाशकोही कार्यकेनाशप्रतिकारणताहै । औरयहां परयालोकोभास्वररूपकी उपादानकारणतानहीं क्योंकिवहदोनों एककालमेंउत्पन्नहुएहैं । इसीकारणसेएककालमेंउत्पन्न एतिनदोनों कागोकेवामतथादक्षिणशृंगकी न्याईउपादानथौउपादेयभावभंगी कारनहीं है । शंका || भास्वररूपकेप्रतियालोकको उपादानकारण वे०सि० मु० भा० नमानेंतो कौनतिसका उपादानकारणहै । समाधान ॥ हेवादिन थालोककेअवयवही तिसरूपकाभीउपादानकारणहैं ॥ यद्यपि ऐसे मानेहुए “यालोकरूपवान्हैं"यहप्रतीतिकैसेहोगी। तथापिउपादानके रूपकरकेहीकार्यमेरूपवत्ताकी प्रतीतिसंभवतीहै । क्योंकिउपादानयो कार्यकातादात्म्यहै । इसप्रकारस्वप्रकाशताकासाधकयनुमाननिर्दोष है ।। इति ।। शंका ।। इसअनुमानकीविपयतामात्मामे है। वानहीं। यदिग्रंत्यपक्षकहो तोकैसेयात्माकीस्वप्रकाशतासिद्धहोगी। क्योंकि तिसमेप्रमाणकाअभावहै । औरयदिप्रथमपक्षकहोतोभीस्वप्रकाशता सिद्धनहींहोसकती।क्योंकियनुमितिज्ञानकीविषयता होनेसेघटादिकों केतुल्यदृश्यपनाहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यदिइसयनुमिति ज्ञानकर भास्यतायात्मामानेतो म्वप्रकाशताकीहानिहो। परन्तुहमयनुमिति ज्ञानकरभास्यताप्रात्मामेंनहींमानताकिंतुइसयनुमितिकरनिवृत्तिकेयोग्य अज्ञानविपयताही इसअनुमितिकी विपयतायात्मामेंमानते हैं । याते पूर्वउक्तदोपनहींप्राप्तहोता । इसप्रकारनिर्दोषअनुमानसे सिद्धहुईजो यात्माकीस्वप्रकाशता यवतिसकोउपसंहारकरतेहैं। तिसपूर्वउक्तपूकार सेयात्मास्वयंप्रकाशहै। यहयर्थसिद्धहुया।इसीउक्तयर्थमें अदृष्टद्वयम्" इत्यादिप्रथमकारिकाके पूर्वार्द्धमें स्थित “ज्योतिः"विशेषणकाप्रवेशकरते हैं ।इसीपूर्वउक्तसमग्रयभिमायकोलेकर मूलपथमकारिकामें ज्योतिः" यहयात्माकाविशेषण कथनकियाहै ॥ शंका ।। यहांज्योतिपदसे परे “मतुप्" प्रत्ययकालोपहोनेसेअथवा “शुक्ल पटः” इसमयोगकीन्याई उपचारकप्रभेदहोनेसे ज्योतिरात्मानम्”इससमानाधिकरणताकामयोग है।कोईवास्तवयभेदसे यहयोगनहीं।।समाधाना जैसेलवणपिंडलवण पूर्वाद्ध एकरसहोताहै। तैसेविज्ञानएकरसस्वभावहोनेकरयहात्मास्वयंज्योति स्वरूपहै । अर्थयहाथमपकाशस्वरूपहोनेसेऔरतमकाविरोधीहोने से विज्ञानहीज्योतिपदकावाच्यहैयौरविज्ञानस्वरूपहीयात्माहे क्योंकिश्रति में विज्ञानघनहीयात्माकास्वरूपश्रवणहोताहै।इसलियेपूर्वोक्तमतुप्रकल्प नायौयौपचारिक अभेदब्यवहारयहदोनोनहींसंभवतेक्योंकिायहदोनो भेद निश्चयपूर्वकहोतेहैं औरपकरणमेंभेद निश्चयकायभावहै । और ॥ घटज्ञानयोसैंबंधः आत्मनिष्ठः ज्ञान निष्ठत्वात् सत्तावत् ॥ अ० । घटौरज्ञानकाजोसंबंधहै वहात्मनिष्ठहै । ज्ञाननिष्ठ होनेसेोजोजोज्ञाननिष्ठहै वहयात्मनिष्ठहै । जैसेसत्ताजातिहै॥इति। यहमहाविद्याअनुमानहै । दृष्टांत निर्णातव्याप्तिकेवलसेपक्षवादीको अनमिमतसाध्यके सिद्धकरनेवालायनुमान महाविद्याअनुमानकहा जाताहै ॥ इति ॥ इसयनुमानसेभी विज्ञानस्वरूपहीयात्माहै । तेसेमानेहुएविज्ञा- नैकरस स्वभावहोनेकर स्वयज्योतिस्वरूपही यात्माहै । तिसथात्मा कास्वरूपश्रुतिसे निश्चयकरके अयतिसमेंयुक्तिनिरूपणकरतेहैं यहप्तर्व श्लोकसेयन्वयजानलेना शंका॥ यदिस्वयंज्योतिस्वरूपथात्माहे । तोतिसस्वप्रकाशयात्मामें अनुमानकाकथनअनुचितहै । क्योंकिवह श्रात्माउपनिषद्मात्रकाविषयहै।यन्यप्रमाणकाविषयनहीं।।समाधान॥ हेवादिन्यनुमानसे ब्रह्मात्माकी संभावनामात्रकेहुए भागे कथनकी हुईश्रुतिहीतिसमें प्रमाणहै ॥ सोश्रुतियहहै ॥

५२१६ वे०सि० मु०भा० ।। अत्रायंपुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति॥ (वृ० उ० अ०६ वा० ३॥९) य०-इसस्वप्नयवस्थामें यात्माभानहोता है यहसकोस्वीकार है। वहभानयर्थात्प्रकाश प्रथमवाह्यइन्द्रियों करके नहींसंभवता । क्योंकिवाह्यइन्द्रियोंकीतिसयात्माविषयक प्रवृत्तिनहींहोती। तथास्वा कालमेंनेत्रादिकइन्द्रिय स्वस्वव्यापारसे उपराम है । औरमनसेभीतिस यात्माकाप्रकाशनहींहोता क्योंकितिसकारथादिरूपविषयाकारपरिणाम हुयाहै । औरवाह्यसूर्य्यादि ज्योतियोंकाभीस्वप्नकालमें अभावहै । याते परिशेपसे स्वयंज्योतिस्वरूपतासेही यात्माकाभानहोता है । यहयर्थ सिद्धहुया ॥ इति ॥ अथपुनः शंकासमाधानपूर्वकआत्माकीस्वयंज्योति रूपताकाप्रकारांतरसेनिरूपण । अथपूर्वपक्ष । हेसिद्धांनिनपूर्वउक्तश्रुति तथायनुमानदोनोंही यात्माकीस्वप्र- काशतासिद्धकरनेकोसमर्थनहीं हैं। क्योंकिपूर्वउक्तअनुमानकोसत्पति पक्षताहै । तथाअनुमानका विरोधहोनेसेश्रुतिका पूर्वोक्तयर्थयोग्यनहीं है। तैसेहीदिखलाते हैं। आत्मानस्वप्रकाशःज्ञातत्वात्अनात्मवत् ॥१॥ तथाआत्मानस्वप्रकाशः अज्ञातत्वात घटवत् ॥२॥ अ० । चात्मास्वप्रकाशरूपनहींहै । ज्ञानकांविषयहोनेसे जोजो ज्ञानकाविषयहोताहै सोसोस्वप्रकाशनहींहोता जैसेधनात्माहै । (१) औरयात्मास्व काशस्वरूपनहीं है यज्ञानकाविषयहोनेसेजोजोयज्ञान काविषयहोताहे । सोसोस्वप्रकाशनहींहोता । जैसेघटहै ॥ २ ॥ इन पूर्वाद दोनोंथनुमानोंसे पूर्वउक्तअनुमानदुष्टहै । तथाइनकेसाथ विरोधहोने करश्रुतिययोग्ययर्थको कैसेकथनकरेगी यातेवहस्वार्थमें प्रमाणनहीं। ॥ शंका ।। हेवादिन्दोनोप्रतिपक्षाऽनुमानों में पनरूपजोयात्माहैवह क्या?विशिष्टहै अथवाशुद्धहै ।। प्रथमपनतोनहींसंभवता।। क्योंकि स्थापनाअनुमानमें शुद्धयात्माको हमनेपक्षकियाहै ॥ विशिष्टको नहीं ॥ तिसविशिष्टकीस्वप्रकाशता हमभीनहींमानते ॥ और द्वितीयपक्षकहोतोदोनों हेतुम्वरूपसहीतिसयात्मामें नहींवर्तते ॥ क्योंकितिसयात्माकोज्ञात तथाअज्ञातपदार्थोसे विलक्षणताश्रुतिने कहीहै ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् यहदोनोंहेतु यनुभवप्रमाण करके यात्मामेसिद्धहैं सोदिखलातेहैं ॥ कवीतो (श्रात्मानमहं जानामि ) अ० ॥ यात्माकोमैजानताहूं ॥ ऐसाथनुभव होता है औरकवी (यात्मानमहं नजानामि ) य०॥ यात्माकोमें नहींजानताहूं ॥ ऐसाअनुभवहोताहै ॥ इसप्रकार इनदोनों अनुभवोंकरकेसिद्धजोयात्मामेज्ञाततातथायाज्ञाततारूपहेतुतिनकर केयात्मामेस्वयंज्योतिपनानहींसंभवता ॥ शंका।। हेवादिन “यात्मा नमहंजानामि" उसयनुभवकरके यात्मामे ज्ञाततासिद्धीहै परंतुवह स्वप्रकाशताकेनिवारणकरनेमेसमर्थनहीं ॥ क्योंकिज्ञानकरकेनिवृत्ति केयोग्यजोयज्ञानकीविषयतारूपज्ञातताहे तिसकास्वप्रकाशताकेसाथ विरोधनहीं ।। समाधान ॥ तिसज्ञातताकाजैसेविरोधहे।सोदिखलाते हैं। यदि "श्रात्मानमहंजानामि"इसपूर्वउक्त अनुभवकेवलसे ज्ञातल यात्मा स्वीकारहै तोज्ञानकीविपयता अर्थातज्ञानका कर्मयात्माहे। यहस्वीकार कियाचाहिये । तोयनात्मा धादिकों कीन्वाई यात्मामें २२० वे०सि० मु० मा० स्वप्रकाशताकायसंभवहै । यहांयहतात्पर्यहै। "यात्मानमहंजानामि" और "घटमहजानामि” इसप्रकारकेयनुभवसे दोनों में ज्ञाततातुल्यही सर्वकोपूतीतहोतीहै।ौरवेदांतीकेमतमेंघटविषयकज्ञान करकेनिवृत्तिके योग्यग्रज्ञानकीविषयतारूप ज्ञाततानहींसंभवती । क्योंकिजडघटादि पदार्थों में अज्ञानकी विषयतातुमको स्वीकारनहीं । और तिसकोज्ञान भास्यत्वमाननेमें विरोधकाभीयभाव है । औरघटादिकोंमेज्ञानकी विषयताअन्यपूकारकी है। औरयात्मामेंज्ञानकीविषयतायन्यपूकारकी है। यहकथनभीययुक्तहै। क्योंकिज्ञातशब्दकोयनेक यर्थत्वयाप्तहोगा यौरयनेकयर्थत्वन्यायनहीं किंतुयन्यायहै । तिसीसेज्ञानभास्यत्वरूप ज्ञातताहीदोनोमें युक्तहै ॥शंका॥ ज्ञानभास्यत्वरूपज्ञातताआत्माहो तिससे स्वप्रकाशताकी क्या?हानी है | समाधान ॥ हेसिद्धांतिन्तैसे मानेहुएपूर्वकथन किया जोस्वपूकाशत्वकी निवृत्तिकासाधकयनुमान वहभत्तीप्रकारसेस्थितहुया ॥ तिससेस्वप्रकाशत्वकीहानीहुई ॥ शंका ।।ज्ञानभास्यत्वरूपज्ञानकीकर्मताभीयात्मामेंहोयौरस्वप्रकाशता भीहो ऐसामाननेमेक्यादोपहै ॥ समाधान ॥ स्वप्रकाशतायौरज्ञान भास्यताएकधिकरणमेनहींदेखेजाते ॥ इसीसेस्वप्रकाशताकेहुए ज्ञानकर्मताकाअसंभवहै ॥ क्योंकिउसीकोस्वप्रकाशकहतेहैं । जो किसीरूपकरकेकिसीभीज्ञानकीकिसीकालमेकर्मताकोनहीं प्तहोता।। यदिऐसानमाने किंतुज्ञानके विषयकोहीस्वयंप्रकाशमाने ॥ तोसां केतिकहीस्वप्रकाशतासिद्धहोगी ॥ कोईयुक्तिसिद्धनहीं ॥ याते अात्मास्वप्रकाशनहीं यहअर्थसिद्धहुया ॥ शंका । हेवादिन “यम मेयं" ० ॥ यहयात्माज्ञानकाविपयनहीं ॥ इसश्रुतिसेतिसकोज्ञान पृाई २२१ विषयत्वकायभावहै । तुमज्ञानकाकर्मतिसकोकैसेकहतेहो ॥समाधान ॥ यद्यपिश्रुतिकाविरोधहोनेसे "आत्मानमहंजानामि” इसअनुभव कोतोयनात्मविषयकत्वरूपतासेभी संभवहोनेकर यात्मविषयकत्वइस कोनहीं है । तथापि॥ * अनीशयाशोचति मुह्यमानः ॐ अ०(४) मं० ७॥श्वेऽउ० इस श्रुतिसेथौर “मामहनजानामि" इसयनुभवसेयदिअज्ञा तताहीयात्मामेस्वीकारहो। तोभीस्वयंज्योतिपनेकीहानीहै ।। शंका। अज्ञातताभीयात्मामें स्वीकारहो। परन्तुवहस्वयंज्योतिपनेकाविरोधि नहीं ॥ क्योंकियस्वपूकाशघटादिकोंमें जडताहोनेसेस्वतःहीयावृत्त स्वभावताहै ॥ इसलियेअज्ञानकीविषयतारूपयज्ञातताकातिनमें अभावहै ॥ औरयात्माकोस्वप्रकाशहोनेसे अज्ञानविपयतारूपयज्ञा ततातिसमेंवनसकतीहै ।। समाधान ।। हेसिद्धांतिन् जैसे “मामहं नजानामि" यहअनुभवहै तैसेही “घटमहंनजानामि"यह अनुभवहै। यनुभवकीतुल्यतासघटादिकोंमेंअज्ञातता अवश्यस्वीकार करनेयोग्य है। औरघटादिकोंमें थस्वपूकाशता हमदोनोंकोस्वीकारहै । तैसे मानेहुए जहांयज्ञातताहै तहांयस्वपूकाशताहै ।। इसमकारप्रज्ञातता यस्वकाशताकर व्याप्तहै ॥ वहात्मामेंदेखीहुई तिसमेंस्वमका शताकीहानीकोसिद्धकरतीहै ॥ शंका ॥ हेवादिन्इतरकीयपेक्षासे रहितजोअपनीभासमानताईइसीकानामस्वप्रकाशताहै। भौरश्रभास मानताकानामअज्ञातताहै ।सोयभासमानताभासमानताकाविरोधी नहीं ।। क्योंकिघटादिकों में किसीकालमेंभासमानताभीदेखीजाती २२२ वै० सि. मु. भा. है । समाधान ॥ यद्यपिघटादिकों मेंयभासमानता औभासमानता दोनोंहैं । तथापिवहएककालमेंनहीं हैं। क्योंकिभासमानताकोकार्य होनेकरकदाचित्कपनाहै । औरयात्मामेंतोदोनोंएककालमेप्राप्तहैं । क्योंकिस्वप्रकाशता अात्माका तुमस्वरूपमानतेहो। तिसकोयनादि भावहोनेकरनित्यताहै। औरग्रज्ञानकोभी अनादिहोनेकर कार्यताका अभावहै ।। इसप्रकारदोनोंकोयनादिरूपतासेनित्यहोनेकरएककाल मेंदोनोंविरुद्धधर्मयात्मामेंनहींसंभवते । औरयज्ञाततातोहमदोनोंको स्वीकारहै।तिसीकारणसे आत्मा यज्ञानकालमे भाति"य०॥ भान होताहै इसप्रकारकेस्वरूपवालीभासमानताका विरोधहोनेसे कोईभी तिसकेअनुभवकरनेको समर्थनहींहोसकता। तिसविरोधकोहीस्पष्ट करतेहैं । जिसकालमेंयात्माभानहोताहै । तिसीकालमें (नभाति) या नहींभानहोता । यहयनुभवनहींहोसकता । औरजिसकाल में यात्माभाननहींहोता।तिसीकालमे(भाति)यहथनुभवभीनहींहोसकता इसप्रकारपूर्वउक्तज्ञाततातथा अज्ञाततारूपहेतुकोयात्मामें वृत्तिहोंने करकिसप्रकारतिसकास्वयंज्योतिपनासिद्धहोसकताहै । किंतुकिसी प्रकारभीनहीं'इतिपूर्वपक्षाअथसिद्धांत समाधान हेवादिनपूर्व कथनकियेहुए अनुमानकेसाथविरोधहोनेसे स्वप्रकाशताकेसाधक अनुमानमेंसत्प्रतिपक्षपना औरश्रुतिकेयर्थमें अयोग्यताकीप्राप्तिरूप दोपजोतुमनेपूर्वकहासोनहींसंभवता । क्योंकिग्रनुमान याभासरूप है। यहीस्पष्ट करतेहैं। शततथायातपदार्थसे विलक्षणकोहीयात्मता है । इसलियेपक्षभूतात्मामें शतत्वतथायज्ञातत्व यहदोनोंहेतु नहींवर्तते ॥ यद्यपि ॥

पूर्वाद * परस्परविरोधेनप्रकारांतरस्थितिः * इसन्यायसेगतयौयगतपदार्थोसेथात्माकीविलक्षणताकैसेहोसकतीहै। तथापितैसायात्माकास्वरूपश्रुतिकथनकियाहै ॥ अन्यदेवतहिदिता दथोविदितादधि उ०के०ख १)३ २०॥ वहयात्मा (विदितात्) हातपदार्थोंसेयौर (अविदि तात) अगतपदार्थोसे (अधि) विलक्षणहै । इसश्रुतिकेसाथविरोध होनेकरपूर्वउक्तन्यायकोयाभासपनाहै। शंका ॥प्रमाणसेविनाकिया हुथाजोन्यायहै वहयाभासरूपताकोप्राप्तहोपरन्तुयहन्यायतो“मामह जानामि"इत्यादिप्रमाणकी सहकारितावालाहै। यातेयहन्याय किस प्रकारमाभासरूपहोसकताहै ॥ अन्यथाइसपूर्वउक्त यनुभवकीक्या गतिहोगी ।।समाधान।। हेवादिन्इसअनुभवकोविशिष्टविषयकहोनेसे अनात्मगोचरताहीहै कोईनिरूपणकरनेयोग्य यात्माकीज्ञातताकोयह यनुभवनहींसिद्धकरसकता ॥ शंका ॥ यहअनुभवकिसविशिष्ट यात्माकोविषयकरताहै।क्या?यशनविशिष्टकोविषयकरताहै । अथवा अहंकारविशिष्टकोविपयकरताहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकि "यात्मानमहंजानामि इसत्यनुभवमेयशनकास्फुरणनहींहोता।ौर द्वितीयपत्तभीयसंगतहै। क्योंकि “यात्मानमहंजानामि" इसयनु अवमेंयहंशवकार्थजोअहंकारहै वहक रूपकरपृथकही भानहोता 1 यातेयात्मानमहंजानामि" यहअनुभवविशिष्टविषयक नहींकिंतु निरूपणीययात्माविषयकहीहै ।। समाधान ॥ हेवादिन्इसयनुभव मेनातिगुणक्रियासेरहिततथाग्रज्ञान यौदुःखसेभिन्नवस्तुकास्वरूपमात्र भानहोताहै। ऐसायनुभवतोहोतानहीं जिसकरयात्माकोजानकाकर्म वे०सि० मु० मा० २२४ पनाहो । किन्तुउपाधिविशिष्टकोही गनकाकर्मपनाहै। औरतिसको ज्ञानकाकर्ममानेहुएभी कोईविरोधनहीं॥ यहांयहअर्थजाननेयोग्यहै “श्रात्मानमहंजानामि" यहअनुभवनिर्विकल्पकतोहैनहीं । क्योंकि "किंचिद् इदं" ऐसाहीनिर्विकल्पककायाकारशदसेकथनकियाजाता है ।। यौस्यहांकिंचिदाकारसे कथनतोहैनहींकिंतु “यात्मानं” इस प्रकारात्मशदसेज्ञानकेाकारकाकथनहै ।। यातेयहज्ञानसविकल्पक है ॥ औरयहज्ञाननैयायिकोंनेमानसहीस्वीकारकियाहै ॥ ौरमनभी इंद्रियहै ।। तिसकीद्रव्यमेंप्रवृत्तियणकेसंबंधसेहीकहनेयोग्यहै । और गुण्भीयात्मामेदुःखादिकही कहनेयोग्यहैं। औरदुःखादिकोंकासंबंध श्रात्मामेंनैयायिकजैसेस्वतःमानतेहैं ।। तैसेहमारेमतमेनहीं है। किंतु दुःखादिकोंकेउपादानकारण अंतस्करणकेसाथतादात्म्यसंबंधसेहै ॥ औरतिसर्थतःकरणकातादात्म्यज्ञानसेविनानहींसंभवतातैसेमानेहुए “यात्मानमहंजानामि" इसअनुभवकेवलसेहीयज्ञानतथादुःखादिवि शिष्टयात्मकाहीभानहोताहै।शुद्धस्वरूपकाभाननहीं यन्यथायहज्ञाननि विकल्पकहोगा।तिसकारणसेयहयर्थसिद्धहुयाकिविशिष्ट यात्माही ज्ञानफार्महेशुद्धयात्मानहीं।शंका।यद्यपितैसेयनुभवकाविषयविशिष्ट हैतथापितिसविशिष्टस्वरूपकोभीज्ञानकाकर्मपनानहींसंभवता।क्योंकि वहभीयात्माहै। जैसेकुंडलवालादेवदत्तदेवदत्तनहींहै ।। ऐसानहींहो सकता।किंतुकुंडलविशिष्टहुयाभीदेवदत्तदेवदत्तहीरहताहै। तेसेविशिष्ट थात्माभीयात्माही है अन्यनहीं।।समाधाना हेवादिनतिसविशिष्टको स्वप्रकाशमानेहुएयज्ञानादिविशेषणकोभीस्वप्रकाशताकी प्राप्तिहोगी क्योंकिविशिष्टवृत्तिधर्मकोविशेषणवर्तनेकानियमहे । तिसकारणसे । पूर्वाई। २२५ विशिष्टज्ञानकाकर्म है। इसअर्थमेविरोधकाअभावहोनेसेवहस्वप्रकाश नहीं ।। शंका ॥ अज्ञानादिविशेषण कोभीदेहादिकों की अपेक्षासे अंतरताहै तिसीसेतिसकोग्रात्मपनाहोनेसे स्वप्रकाशताकाभीसंभवहै। ।। समाधान। हेवादिन यंतरताथात्मतामेंप्रयोजकनहीं।किंतुजडता सेविरुद्धचेतनतायात्मतामें प्रयोजकहै। औरयाज्ञानादिविशेषणको चेतनरूपताहैनहीं क्योंकिवहचेतनसे विरुद्धजडरूपहै । इसलिये अशनादिविशेषणको यात्मरूपतानहींसंभवती । औरथनात्मता होनेसेतिसकोस्वप्रकाशताभीनहीं है।यातेशुद्धआत्माकोहीस्वप्रकाशता काअंगीकारहै । अनादिविशिष्टकोनहीं ॥ शंका ।। जानकाविपय होनेसेविशिष्टकोशस्वप्रकाशतामानेहुए विशेष्यभागकोभीशानकाकर्म पनाहोगा । तिससेयात्मयशमेंभीपरप्रकाशताकी प्राप्तिहोगी | समाधान ॥ (सविशेषणेहि) अ०॥ विशेषणसहितमेंजोबुद्धि होती है वहविशेषण्यंशमेनसंभवतीहुई विशेष्यभागमेंपर्यवसानको प्राप्तहोती है । इसन्यायसे विशेपणीभूतयज्ञानादिका तिरस्कारकर केशुद्धजोविशेष्यमात्र है तिसकोग्रात्माहोनेसेस्वप्रकाशता है। विशि एकोनहीं क्योंकिलिसकोकल्पिलहोनेकरयनात्मला है ॥शंका यद्यपि ज्ञातताकाजोयनुभव है ॥ वहविशिष्टकोविषयकरता है। शुद्धकोज्ञान कीकर्मताकावहसंपादकनहीं । यातेपूर्वअनुमानमेंस्वरूपासिद्धिरूप दोपस्थित है।। तथापि अज्ञातताकाजोअनुभव है वहविशिष्टविषयक नहींसंभवता ॥ क्योंकिविशेषणरूपयज्ञानको अज्ञानविशिष्टकाप्रयो जकहोनेकर अज्ञानविशिष्टकोयज्ञानविषयत्वकायभाव है ॥ यदि अज्ञानविशिष्टकोभीयज्ञातमानेंतोयात्माश्रयदोपकी-प्राप्तिहोगी ॥

२२६ वे०सि० मु० मा० क्योंकिज्ञानकेविषयकोही अज्ञातकहते हैं ॥ स्वविशिष्टकोविषय करताहुयायज्ञानस्वकोभीविषययवश्यकरेगा।ौरअपनीविषयतामें यापकोहीकारणमाननेमेयात्माश्रयदोपकी प्राप्तिस्पष्टही है।। इसयुक्ति सेशुद्धात्मामेही अज्ञातता है ।। और- अनीशयाशोचतिमुह्यमानः। नीहारेणपात्तः ॥ य-यविद्याकरमोहितहुआयर्थात्याच्छादितहुया शोककर ताहै। और (नीहारेण) यज्ञानकरके (प्रावृत्तः) पाच्छादित है ॥ इत्यादिश्रुतिसेभीशुद्धात्माही यशनकाविषयह · तिसकारणसेसोप्ठर्व कथन कियायमतत्वहेतु कैमेस्वरूपासिद्धहोसकताहै । किंतुनहीं होसकता ।। समाधान॥ हेवादिन मामहनजानामि"यहअनुभवभी आत्माकीस्वभकाशतकाही साधकहै । कोईस्वभकाशताकाविरोधी नहीं। यद्यपियहयनुभव यज्ञातताको शुद्धात्मामेंस्थापनकरताहै । तथापिस्वप्रकाशतासेविनायात्मामयज्ञाततारोधनकरनेकोसमर्थनहीं। इसलिए यज्ञाततास्वपूकाशताका विरोधीनहीं ॥ किंतुतिसकासाधक है । यातेथज्ञातत्वहेतु यात्मामेयस्वप्रकाशताकासाधकनहीं । शंका। स्वप्रकाशताकायभावजो यभासमानता हे तिसकोअज्ञातता कहते हैं ।। तिसकाग्राहकजो “यात्मानमहंनजानामि" यह यनुभवहै वहस्वभकाशताकासाधककैसे है। क्योंफिजोजिसकाग्राहकहोता है। वहतिसकाहीसाधकहोता है। यदिऐसेनमानेंतो "ययंघटः" यहज्ञान जोघटकाग्राहक है तिसकोपटकीमाधकताप्रासहोनेसे अतिप्रमंगप्राप्त होगा। समाधान ।। जिसप्रकारयहअनुभवस्वप्रकाशताकासाधक है सोदिखलाते हैं। यहयनुभव यात्माविषयक ज्ञानकोविषयकरताहै।

पूर्वाद औरयहविशिष्टज्ञानहै ॥ तिसमें विशेष्ययज्ञातत्वहै ॥ सोविषयके आधीननिरूपणकरनेयोग्यहै। औरविषयात्माहीहै । सोअज्ञातत्व काव्यावर्तक होनेकर विशेषण है ॥ इस कारण से अात्मा भी विशिष्ट ज्ञानमें भान होता है । क्योंकि विशिष्ट ज्ञान को विशेषण विषयत्वकानियमहै ।। अर्थात् विशिष्टज्ञानविशेषणको अवश्यविषय करताहै ।। यातेइसअनुभवमें अज्ञानकीन्याईयात्माका भानअवश्य कहनेयोग्यहै ॥ शंका ॥ यहअनुभवात्माविषयक अज्ञातताको बोधनकरताहुयाभीयात्माको विषयनहींकरता ॥ क्योंकि यात्मा तिसअनुभवमेंउपलक्षणहै विशेषणनहीं ।। समाधान ॥ हेवादिन जैसे “काकवालादेवदत्तकागृहहै ॥ इसकथनमेंकिंचित्मात्रप्रति शयताजोतृणोंका ऊर्द्धमुखत्वरूपहोनासोदेवदत्तकग्रहकानिश्वायकहे तिसकोदारकरकेहीकाकदेवदत्तकेग्रहकाव्यावर्तकहुआ तहाँउपलक्षण अंगीकारकियाहै । औरयहांथज्ञानविषयकथात्मासे उत्पन्नहुथा कोईअतिशयतारूपघटादि विषयसेव्यावर्तकधर्मनहीं है । क्योंकि प्रतीतनहींहोता । इसप्रकारऔरकिसीधर्मको द्वारपनेकायसंभवहोने सेथात्माहीयज्ञानका व्यावतकहुयाज्ञानमें विशेषणकहनेयोग्य । यदियात्माकोविशेषणनहींमानोगे। तोयज्ञानकोआत्मविषयत्व नहींसिद्धहोगा।अन्यथा नजानामि"इतनाहीतिसयनुभवकाथाकार होगा ।। शंका ॥ यात्मरूपविशेषणयुक्त अज्ञातताकोप्रमाणप्रका शकरो। तथापि उससेयात्माकी स्वप्रकाशता नहींसिद्धहोसकती ॥ क्योंकिविशेषणतथाविशेष्यकेसाथइन्द्रियकेसन्निकर्पकोही विशिष्टगन कीकारणताहै ॥ समाधान ॥ हेवादिनविशेषणकेसाथइन्दियके वे०सि० मु० मा २२८ संबंधकोविशिष्टज्ञानकेप्रति कारणतानहीं है क्योंकिभूततथाभावी विशेषणोंमें इंद्रियकेसंबंधकायभावहे । तिसीकारणसेविशेषणकाज्ञान हीनियमसेविशिष्टज्ञानमें कारणहे ॥ इन्द्रियसंबंधनहीं। इसीसे "श्रात्मा नमहंनजानामि" यहयनुभव स्वप्रकाशरूपतासे भासमानयात्मा कोविपयकरकतिसमें यानस्वरूपयावरणकोविषयकरताहै । तात्पर्य यहहै । विशेषणरूपयात्माकीइसमत्ययमेंजो भासमानताहै । वह पमाणसेहे। अथवाभ्रमसेहै।अथवास्वप्रकाशरूपतासेंहेम्यहविचारणीयहै तिनमेंप्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिप्रमाणकी मवृत्तिहुएतिसमें अज्ञातताकाअसंभवहोनेसे विरोधहै । यौरद्वितीयपतभीयसंगतहै । क्योंकिग्रात्माकोकल्पितपनाहोगा । भ्रमसिद्धपदार्थकोकल्पितपना नियमसेहोताहे ॥ यातेपरिशेफ्सेस्वप्रकाशरूपतासेही यात्माकीभास मानता कहने योग्यहै ॥ शंका भासमानता का अभाव अज्ञातता है । सो भासमानता के हुए कैसे यात्मा में संभवैगी। किंतु नहीं संभवती ॥ समाधान ॥ हेवादिन अज्ञानका पावरक स्वभाव श्रुतिमप्रसिद्ध है। क्योंकि (नीहारेणावृत्तः) इसश्रुति यज्ञानकोथा वरकपनाकहा है। औरयावस्कस्वभावभावरूपवस्त्रादिकोंकाहीदेखा है । अभावकोयावरकपनाकहींदेखानहीं॥ तिससेभासमानयात्मा मेंभीअज्ञाततावनसकती है।क्योंकिभावयौयभावकाहीएकथधिकरण मेंविरोधहोता है.॥ ौरभावपदार्थोंकातो रूपरसकीन्याईएकअधिक रणस्थितिहुएभीविरोधनहींहोता ॥ शंका ॥ इसप्रकारमानेहुएघटा दिकोंमेंभीयज्ञाततायौभासमानतादोनोंहुएचाहिये । तिनमेंभीया स्माकीन्याईविरोधनहींहोगा ॥ समाधान ॥ हेवादिन्थनात्माघटादि पूवाई कोंमेंभासमानता प्रमाणसे कहनेयोग्य है क्योंकितिनकोस्वप्रकाश स्वरूपताकाअभाव है ॥ औरप्रमाणकीप्रवृत्तिहुएतिसकाविरोधिनी श्रज्ञाततातहांनहींरहसकती ॥ तिससेभासमानताऔरप्रभासमानता यहदोनोंपरप्रकाशघटादिकोंमेंहीविरोधकोपाप्तहोते हैं । स्वप्रकाशया स्माविषयकएककालमें भासमानतायौ अभासमानताविरोधकोनहीं प्राप्तहोते । इसप्रकार “यात्मानमहनजानामि" यहजोयात्माग्रज्ञा तताकासाधकप्रमाण है ॥ तिसकेवलसेहीयात्माकी स्वप्रकाशतासि द्धहुई ॥ शंका ॥ अज्ञातत्वकासाधकजोप्रमाण है । वहयज्ञानकेवि पयमेंस्वप्रकाशताकासाधकनहीं ।। क्योंकि “घटमहनजानामि" इस प्रकारकायनुभव अनात्माघटादिकों में भी यज्ञातत्वका साधक है ॥ तिनमेंभीस्वप्रकाशताकीप्राप्ति हुईचाहिये । औरतिनमेंस्वकाशता देखनेमेनहींयाती ॥ यातेपूर्वउक्तयनुभवात्माकी स्वपूकाशताका माधकनहीं ॥ समाधान ॥ हेवादिन् “घटमहनजानामि"यहथनुभव मथमयात्माकीन्याईघटादिकोंमें समानहीतुमनेमानाहै ॥ यातेघटादि श्रज्ञान विशेषणहैंयहभीकहाचाहियोऔरविशेपणज्ञानसाध्यहीविशिष्ट प्रतीतिकहनीहोगी। सोविशेषणरूपघटकाशन प्रमाणसेतोसंभवता नहीं। क्योंकिप्रमाणकेविद्यमानहुए थगतताकायभावहै । प्रमाण, केहुएभी यदिअजातताघटमें मानेंगेतोकवीभीतिसका नाशनहींहोगा औरस्वतःभीतिसविशेषणकाभाननहींसंभवताक्योंकिघटजडहयोर भ्रमसेतिसविशेषणकीसिद्धिमानोंतो तिसकोकल्पितपनाहोनेसे यज्ञात तानहींसंभवैगी ।। श्रवइसीयर्थकेकथनकरनेकेलिये यात्मामे भिन्न घटकेस्वरूपकोनिराकरणकरते हैं ।

दे०सि० मु० भा० * अथात्मासेभिन्नघटकस्वरूपकाखंडन * . हेवादिन्यहघटकिसकोकहते हैं। जिसकीस्वप्रकाशतातुमा पादनकरतेहो ॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिनजिसमेंघटत्वादिधर्मप्रतीतहोते हैं यहीघट है ॥अथवाव्यक्तिपदार्थपक्षमेकंबुग्रीवाकारवालीव्यक्तिवि शेषहीघट है। समाधान ॥ हेवादिन्इसघटकास्वरूपतुमकथनकरो। क्योंकिसर्वादिजोसर्वनामशब्द है। वहतोप्रसिद्धमात्रकेवाचक हैं किसी एकविशेषपदार्थकीउपस्थितितिनसेहोती है इसमेंकोईनियामकनहीं। यातेतुमहीघटकाविशेषस्वरूपकहो | औरशब्दसे तिसकाप्रतिपादन शुककीन्याईनहोकिंतुयर्थबुद्धिपूर्वककहनायोग्य है । औरवहअर्थ काअनुभवभीभ्रमरूपनहो। क्योंकिभ्रमकेविषयकोकल्पितपनाहोता है। इसलियेयथार्थअनुभवकरकेकहनेयोग्य है । औरवहयथार्थअनुभव भीप्रमेयत्वादिरूपतासे घटकाबोधकनहो किंतुइतरपदार्थोंसेभिनयसा धारणरूपकबोधनकरनेवालाहो ॥ अर्थाततिसघटकोसम्यक्अनुभव करकेइतरपदार्थोसेभिन्नरूपत्ताकरतुमदिखलायो । शंका ॥ हेसिद्धां तिन्“कपालादिकोंकरकेयारब्धजोअवयविविशेष" तिसीकोघटकहते हैं । श्रर्थयह ॥ कपालोंनेअपनेविषयकसमवेतरूपताकरजोउत्पन्न कियासोकपालारब्धकहियेहै ॥ यदिइतनाहीघटकालक्षणकरेंतोकपा लादिकोंमेसमवायसंबंधसेरहनेवाले रूपादिकभीषटहोनेचाहिये तिन कीव्यावृत्तिकेयर्थ श्रवयवि"यहपदलक्षणमे कहाहै। और कपालादि थारब्धथवयवि" जोइतनाही घटकालक्षणकहते" तोशरावादिकों में थतिव्याप्तिहोती।तिसकेनिवारण्यर्थ विशेष" यहपदलक्षणमेकहाहै यातेकपालादिकोंने अपनेविषयकसमवेतरूपताकर जोउत्पन्न किया है पूर्वाद अवयविशेष तिसीको घटकहते हैं । समाधान ॥ हेवादिन क्या?यहवाक्यकपालो घटके अवयवअवयवित्वसंबंधादिधर्मप्रतिपाद नपरहै । अथवाघटके स्वरूपकोवोधनकरताहै ॥ प्रथमपतकहोगेतो प्रश्नकाअनुत्तरहै । क्योंकिघटकेस्वरूपविषयकहमाराप्रश्नहै । कोई तिसकेसंबंधिधर्मोविषयक प्रश्ननहीं । औरश्रवयवौयवयवित्वादितो घटकेसाथसंबंधवालेघटसे भिन्न हैं ।। यातेप्रथमपक्षयसंगतहे । थौर द्वितीयपक्षभीनहींसंभवता। क्योंकिअवयवतथाअवयवित्वकोईघटका .स्वरूपनहीं हैं । अवयवित्वरूपतासेजोप्रतीति तिसको अवयवसापेक्ष होनेकरस्वस्वरूपयर्थात् तिसकोघटकास्वरूपहोनेकीयोग्यतानहीं । औरअवयवोंको यदियवयविस्वरूपहीमानले तोअवयवीकोअवयवों कीपेक्षाहीनहींहोगी। शंका ॥ स्वरूपनिर्णयकरनेसेअापका क्या प्रगोजनहै जैसातैसाघटकास्वरूपप्रसिद्धहीहै।। समाधान ।। हेवादिन यवयवित्वादिसेभिन्नघटकास्वरूपकहनेयोग्यहै यदिघटकास्वरूपहीतुम निर्णयनहींकरोगे । तोयतिपूसंगदेनेको तुमकैसेसमर्थहोगे। अर्थात् किसकीस्वप्रकाशता आपादनकरोगे । शंका ॥ घटकास्वरूपतो कहनेयोग्यहीहै ।। परन्तुमैंइससेभिन्नघटकास्वरूप विशेषकरकेकहने कोसमर्थनहींहूं ।। समाधान ॥ हेवादिन तुमकोकहनेकीअसामर्थ्य कैसेहुई है ॥ क्या? घटकास्वरूपयनुभवनहींहोता ॥ इससेतुमको -अशक्तिहै । यथवाघटनिर्विशेषहै इससेयशक्तिहै ।। पृथमपतमेतोसर्व लोकोंकाविरोधप्राप्तहोगा। क्योंकिघटकास्वरूपसर्वजनोंके अनुभव सिद्धहै ॥ औरघटकोनिर्विशेषस्वरूपहोनेसेतिसकेकथनकीहमको थशक्तिहै । क्योंकिशब्दकीमवृत्तिकिसीशेपधमको सन्मुखकरकेही २३२ वे०सि० मु. भा० होतीहै । यदियहद्वितीयपक्षकहो तोतिसमेंभीयहकथन करनेयोग्यहे जोनिर्विशेषघटकास्वरूप तुमनेस्वीकारकियाहै। वहसर्वजनोंकेअनुभव सिद्धहै । ऐसेसिद्धहुएवहअनुभूयमानघटकास्वरूपक्या ? स्वतःही अनुभवहोताहै।यर्थात्स्वप्रकाशस्वरूपतासेभानहोताहै ।अथवाअपने सैभिन्नौर किसीप्रमाणसे भानहोताहै ॥ अंत्यपक्षकहो तोनिर्विशे पताकीहानीहोगी। क्योंकिनिर्विशेपवस्तुप्रमाणांतरका विपयनहीं होसकता औरनेत्रादिक सर्वलौकिक प्रमाणतो सविशेषवस्तुको हीविषयकरतेहैं ॥ यहांपरयह अर्थज्ञातव्यहै | नेत्रादिकइन्द्रियों की तोरूपादिगुणवाले पदार्थमे हीप्रवृत्तिहोती है ॥ क्योंकिरूपा दिकोंको सन्मुखकरकेही तिनकी प्रवृत्तिकानियमहै ॥ औरअतु मानभीजाति आदिकधर्मनकोसन्मुखकरकेहीप्रवृत्तहोताहै | क्योंकि 'अनुमितिकोव्यापकताऽवछेदकप्रकारकत्वकानियमहै अर्थवह पर्व तोवन्हिमान” इसयनुमितिमेवन्हिनिष्ठव्यापकताका अवच्छेदकजो वन्हित्वधर्मवहप्रकाररूपतासेभानहोताहै। यौरशदप्रमाणभीयणतथा जातियादिकवालेपदार्थमेहीप्रवृत्तहोताहै । क्योंकियानंत्यतथान्य 'भिचारदोपके दूरकरनेके लियेसामान्यादि विशेषधर्मकीयपेक्षाहै ॥ तात्पर्य यहकियदिघटपदकी एकघटव्यक्तिमात्रमें शक्तिमानेंतो एक ही घट व्यक्तिकोतिससे उपस्थिति होगी । दूसरी व्यक्तिके बोधन अर्थौरशक्तिकी कल्पनाहोगी ॥ यातेघटपदमे यानंत्य शक्तियों कीकल्पना प्राप्तहोगी । औरयदि शक्तिसे विनाही दूसरीव्यक्ति उपस्थितहो।तोव्यभिचारदोषकी प्राप्तिहोतीहै। यातेघटत्वादिधर्मवाले घटमेहीघटपदकीशक्तिहोनेसे सविशेपपदार्थमेही शदप्रवृत्तहोताहै ।।

पूर्वाई २३३. औरउपमानप्रमाणभीसादृश्यादिधर्मविशेषकीयपेक्षाकरकेहीप्रवृत्तहोता है । इसप्रकारसर्वप्रमाण सविशेषपदार्थकोही नियमसेविषयकरतेहैं।। निर्विशेषकोनहीं ॥ शंका ॥ प्रमाणमात्रकोसविशेषपदार्थविषयकत्व मानेहुएयात्माकोउपनिषद्मात्रगम्यत्वका अभावहोगा । क्योंकि निर्विशेषयात्मामें शदप्रमाणरूपवेदांतोंकी प्रवृत्तिकीययोग्यताहै ।। समाधान ॥ हेवादिनलौकिकप्रमाणोंमेवहपूर्वउक्तनियमहै । और अलौकिकपूमाणरूपवेदांततोलक्षणासेनिर्विशेपाकारवृत्तिकेउपस्थापक हैं।यातेतिनकोयात्मामेषमाणतासंभवतीहै।जिसकारणसेसर्वलौकिक प्रमाणसविशेषवस्तुकोहीनियमसेविषयकरतेहैं । औरनिर्विशेषरूपघट सर्वकोयनुभवभीहोताहै ॥ तिसीकारणसेनिर्विशेषतथासकलइन्द्रियों कायविषयस्वप्रकाशस्वरूपघटपरिशेपसेसिद्धहुया ॥ यहपूर्वकथन कियापूथमपक्षहीयगीकारकरनेयोग्यहै । शंका । तैसेंमाननेसेभी स्वपूकाशतथानिर्विशेषवस्तुघटकास्वरूपहोनेकेयोग्यनहीं । अनात्म होनेसेजो अनात्माहोताहै वहस्वप्रकाशनिर्विशेपस्वरूप नहींहोता ।। जैसेपटादिहै । यातेघटस्वपूकाशस्वरूपनहीं ॥ समाधान ॥ यह तुम्हाराहेतुस्वरूपसेहीपक्षमेनहींवर्तता । क्योंकिघटकास्वरूपयात्मा सेभिन्नकोईनिरूपणनहींहोसकता।इसीअथकोस्पष्टकरतेहैं। हेवादिन वहनिर्विशेषस्वरूपघट्यात्मासेमिन्नहै। वानहीं। यहविचारकरनेयोग्य है । इनमेपूथमपक्षनहींसंभवता । क्योंकिभेदकधर्मकाथभावहै ।। शंका || घटत्वादि धर्मही घटको आत्मा से भिन्न करने वालेहैं । तिनकायभावयापकैसे कहतेहो ॥ समाधान ॥ हेवादिन्घटत्यादि धर्म घटमें भेदकहैं इसका क्या ? अर्थ है भावयह क्या ? यह मु० भा० वेसि धर्मव्यक्तिमात्रमेवर्तमानहैं अथवाघटव्यक्तियों मेंहीवर्ततेहैं । प्रथम पक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिसर्वव्यक्तियोंकोघटरूपताकीप्राप्तिहोगी। औरघटव्यक्तियोंमेही घटत्वादिधर्मवर्त्ततेहैंयहद्वितीयपक्षकहोतोतिसमें यहविचारकरनेयोग्यहै । वहघटव्यक्तियकौन हैं । यदिऐसेकहोकि घटत्वादिधर्मवालियांही घटव्यक्तियांहैं ।। यहकथननहींसंभवता । क्योंकिइसमेंथात्माश्रयदोपकी प्राप्तिहै। घटत्वादिधर्मनकोघटव्यक्तियों में अपनीस्थितियर्थअपनीयपेक्षाहै।यातेयात्माश्रयदोषहै।ौरयदि यात्माश्रयदोपकेभयसेवहघटव्यक्तियांधातरवालियहिऐसेकथनकरो। तोयहकथनभीनहींसंभवता। क्योंकितिसमेंभीपूर्वकीन्याईप्रश्नकरनेसे श्रात्माश्रयादिदोपदूरनहींहोसकते॥यर्थात्वहधर्मातरघटव्यक्तियोंमेंअप नीस्थितिकेयर्थयदिअपनीहीयपेक्षाकरेंगेतोयात्माश्रययदोषप्राप्तहोगा यातेघटत्वादिधर्मोंको भेदकपनेका अभावहोनेसेनिर्विशेषरूपहीघटहै। कोईआत्मासेभिन्नकरनेवालाधर्मतिसमेंनहीं है। औरनिर्विशेषरूपतासे जोभासमान है तिसकीस्वप्रकाशताभीयवाधितहै ।। इसीभिप्रायसे औरदूषणकथनकरतेहैं | हेवादिनभेदकाबोधकजो प्रमाणहै।वहभेद मात्रकेबोधनकरनेकोसमर्थनहीं।।क्योंकितिसपूमाणकोधर्मीयोप्रतियो गीग्रहणपूर्वकभेदका ग्राहकपनाहै। औरभेदमात्रविषयकतिसप्रमाण कोमानेहुएश्रात्मप्रतियोगिकऔघटअनुयोगिकभेद प्रमाण सिद्धनहीं होगा।इसपूकारयात्मासेभिन्नघटपूमाणकरसिद्धनहींहोता औरयदिभेद काग्राहकममाणपूतियोगिरूपयात्माकोयोधर्मीरूपघटकोभी प्रकाशक रताहै। ऐसेकहोतोयहकथनभी कैसेसंभवेगा।क्योंकिधर्मीओप्रतियोगी दोनोंहीस्वप्रकाशस्वरूपहैं।तिनकाभेदप्रमाणकरकेग्रहणकरनेकोकोईभी २३५ पूबाई समर्थनहीं । श्रन्यथास्वपूकाशताकीहानिहोगी। शंका ।। इसपूकार घटतथायात्माकायभेदमानेहुए दोनोमेंएकशेषरहाचाहिये । नियाम ककेयभावसेघटहीशेप क्योंनहो । समाधान || हेवादिन * इदंसर्वयदयमात्मा से पृ० ३० अ० (६) मा० (५) (७) थ० ॥ यहसर्वदृश्यमानजगत्यात्मास्वरूपहीहै । इसश्रुति मेंप्रत्यक्षादिप्रमाणसिद्धसर्वजगत्जोप्रथमउद्देशकियागियाहै। तिसका अनुवादकरके यात्मस्वरूपताकाविधान प्रतीतहोताहै । यातेयात्मा हीशेपरहताहै । घटशेषनहींरहता ॥ तिराकारणसेहीस्वपकाशात्म स्वरूपहीघटहै। तिससेभिन्नकिंचितमात्रभी घटकास्वरूपनहींयहयर्थ सिद्धहुयाइति।।औरयहजोवादीनेपूर्वकहाथा कियात्सामेंअज्ञातत्वका अनुभवयदियात्मामेंस्वप्रकाशताकासाधकहै । तोघटमेंभीस्वपूकाश ताहुईचाहिये।क्योंकिथात्माकीन्याईघटविषयकभीयज्ञातताकायनुभव समानहीहै। सोयहकथनभीसमीचीननहीं । जिसकारणसेपूर्वउक्त युक्तिकरयात्मासेभिन्नघटकानिरूपणनहींहोसकता । इसीरीतिको अन्ययनात्मपदार्थों मेंभीनिरूपणकरतेहैं। अथात्मासेभिन्नकरकेसर्वअनात्माकाखंडन * इसपूफारघटसेभिन्नौरपदार्थभीश्रात्मस्वरूपहीहैं। यातेयनात्म पदार्थयात्मासेभिन्नकिंचित्मात्रभीनहीं है।तोतुमकिसकीस्वप्रकाशता पापादनकरतेहो । अर्थातजिसअनात्मामेंस्वप्रकाशतातुमकहतेहो। वहयात्मासेभिन्नहीनहीं है । औरयात्मामेंस्वप्रकाशताकाकथनहमको भीइष्टहै । शंका ॥ स्तंभादिपदार्थअनात्मरूपताकरसर्वशास्त्रों में प्रसिद्ध हैं । तिनकोआत्मरूपतायापकैसेकथनकरतेहो। सभाधान ।।

३० सि० मु. भा. हेवादिन्जोन्यायघटकेस्वरूपनिरूपणमेकथन किया वहन्यायस्तंभादि कों मेंभीतुल्यही है । यर्थयहसतंभत्वादिधर्मनकामाश्रयस्तंभादिहैं । अथवास्तंभादिकोंकेश्वयवोंकरयाख्धजो अवयविविशेषवहस्तंभादि हैं। इसन्यायकीप्राप्तिसर्व अनात्मपदार्थों में तुल्यहोनेसेकोईअनात्म पदार्थयात्मासेभिन्नसिद्धनहींहोसकता" शंका यदिघटादिसर्वजगत् श्रात्मास्वरूपहीहै । तिससेभिन्नकिंचितमात्रभीनहीं । तोयात्मारूप करकेहीसर्वकाभानहुथाचाहिये । अन्ययाकारतासे अर्थात्घटादि श्राकारतासेभाननहुयाचाहिये । क्योंकियाकारांतरका थापअभाव कथन करतेहो॥ शकाकेनिराकरणपूर्वकज्योतिपदकीव्याख्याका उपसंहार॥ समाधान । हेवादिन्यनादितथायनिर्वचनीय विद्याकेसंबंध सेस्वप्रकाशस्वरूपयात्मायन्याकारसेभानहोताहै। शंका ।। एकशुक्ति मेंएकहीशुक्तिकायाकाररजतयज्ञानकेवशसेमतीतहोताहै । अनेक आकारनहींमतीतहोते तिसेयविद्यासेयात्मामेभीएकहीमिथ्यायाकार प्रतीतहुधाचाहिये। अनेकरूपतासेतिसयात्माकामानकैसेहोताहै । समाधान ॥ हेवादिनजैसेएकहीरज्जुयज्ञानकवशसेसर्पदंडमालादि अनेकमिथ्यायाकाररूपतासेभानहोती है ॥ तैसेएकहीयात्मायज्ञान केवशसेनानाप्रपंचरूपतासेभानहोताहै । इसमकारपूर्वउक्तयुक्तिसेस्व यंज्योतिस्वरूपयात्माहै । औरवहीपरमपुरुषार्थस्वरूपहै । इसीसे अानंदएकरसस्वभावहै क्योंकि आनंदोब्रह्मतिव्यजानात् ॥ २० उ. ५० ५० अनु० ६॥

२३७ पूर्वाद श्र०॥ श्रानंदस्वरूपब्रह्महे ऐसेजाननाभया । इसश्रुतिमें श्रानंदस्वरूपयात्माकहाहै । शंका ॥ जैसे "चंदनस्वर्ग:" य० ॥ चंदनसुखरूपहेइसप्रतीतिसेसुखकासाधनहोनेसेचंदनको सुखरूपकहां है ॥ तैसेकिसीविषयरूपउपाधिकेसंबंधसेयात्माको थानंदरूपताश्रुति नेकहीहै ॥ कोईस्वरूपसेयात्माअानंदरूपनहीं ।। समाधान ॥ हे वादिन् । असंगोह्ययंपुरुषः १० ३० अ० ६ मा० ३॥१५॥ य० ॥ यहात्मासंगस्वभावहै । इसश्रतिमेंथात्माकोसंग स्वभावकहाहै ॥ यातेतिसकाउपाधिकेसाथसंसर्गनहीं है । इसीसे थानंदएकमूर्तिहै । शंका ।। यात्माकर्ता है । यातेतिसकोदुःखकी संभावनाभीकीजातीहै । तिसकोसुखस्वरूपयापकैसेकथनकरतेहो। समाधान ॥ हेवादिनअविकारिस्वभावहोनेसे ग्रात्मा कर्तृत्वनहीं संभवता । किंतुवह उदासीनस्वभावहै । औरयज्ञानसेकायनातथा नानाप्रपंचरूपतासेतिसकाभानहै । औरखास्तवसेवहदैतरूपनहीं । शंका । "परस्परविरोधहुएप्रकारांतरनहींस्थितहोता"। इसन्यायसे यदिद्वैतरूपयात्मानहीं है । तोयदैतहीयात्माकावास्तवस्वरूपकहने योग्यहै। यौवभीनहींसंभवता।क्योंकिदैतकेयभावकानामयद्वैतहै तिससेयात्माकोअभावरूपताकीमाप्तिहोगी।यौरतिसयभावरूपयदेत कानिरूपणमतियोगिरूपद्धतकेयाधीनहै । यातेतिसयदैतकोयात्म स्वरूपतानहींसंभवती ।। अन्यकीयपेक्षाकरकेनिरूपणकरनेयोग्यको स्वभावपनेकायभावहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यद्वैतभीश्रात्माका वास्तवस्वरूपनहीं। किंतुद्वैताद्वैतसेरहितविज्ञानएकस्वभावात्माहै यहधर्थसिद्धहुया । औरघटादिकों में अज्ञातताकाथनुभवतोअन्य वे०सि० मु० भा० प्रकारसेहीसंभवहोसकताहै । सोदिखलातेहैं । एकहीवात्मा घटादि जगत्तथाथज्ञानकल्पितहै । एकअधिकरणरूपसंबंधसे अज्ञातरूपता सेघटकायनुभवहोताहै। वास्तवसेघटादिकोंमेंअज्ञानकीविषयतानहीं संभवती । यातेघटादिकों मेंस्वप्रकाशतानहीं । किंतुयात्माहीस्वयं प्रकाशचेतनस्वरूपहै ॥ २४ ॥ इतिज्योनिपदव्याख्या ॥ इति श्री १०८ मन्निर्मलसृताऽवतन्स ब्रह्म विदुत्तमहरिहरि पूज्यपाद शिष्येण गुरुदत्तसिंह साधुना विरचतायां वेदान्त सिद्धान्त मुक्तावलीभापायांपूर्वार्द्धम् ॥ यो३म् ॥ 1914

अथ
श्रीवेदांतसिद्धांत मुक्तावली
भाषाउत्तराई प्रारंभः।
दोहा-यजरयमर विभुसुप्रभो ज्योतीजोचिदरूप ।
सोहंलखछिनमेंनसत जगसबभ्रमतमकूप ॥ १॥
त्रिभंगीछंद।। भवदोपनभर्जनसूखनग्रजन यन्तकतर्जनजिहिनाम।
श्रमरारिनहरणं जनसुखकरणं शरणनभरणं जिहकाम।।
मदनामदहारी सुंदरप्यारी सूरतधारी निहकामं ।।
शिरवेदनगम्यं योगीरम्यं पदमननम्यं तिहरामं ॥ २ ॥
क० ॥ निर्दुखनिरीहनिराकारपरब्रह्मजोऊ सोऊभएनानक
निवारेंकलिपापको। अंगद यमरदास रामदासयरजुनश्रीहरयविंदभए
अरिदलतापको ॥ गुरुहरिरायहरिकृपणकृपणवपु तेगकेवहादरजुहिं
दुधर्मथापको ॥ गुरुयविंदसिंहलोपदाविन्दसबनके बंदोंकरजोरहते
दुःखमूलपापको ॥३॥
दो॥ श्रीरामहरिहरिकसदा चरणकमलरिदधार ।
शेषग्रंथभाषाकरोंजोजनकोहितकार ॥४॥
वीणाकरधरकरसदा भक्तनवांछितदेत ।
वाणीममवाणीवसो पुरवोयहसंकेत ॥५॥
वेदशिरनसिद्धांतजोतांकीश्रेणीमाहि ।
उत्तरार्द्धभापाकरों यथामतीममयाहि ॥ ६॥

२४० ३०सि० मु० भा० अथवानंदपदव्याख्याअथमूलटीकाकारकृतमंगल यस्यमासाजगत्सर्व भातिस्थावरजंगमम । तदहंब्रह्मपूर्णस्यां पुरुषार्थसुखात्मकम् ॥१॥ दो० ॥ जाप्रकाशभासतजगत स्थावरजंगमरूप । सोमेंपूर्णब्रह्महंपुरुपारथ सुखरूप ॥ १ ॥ अथपूर्वपक्ष । आत्माकीपुरुपार्थरूपताकाखंडन ॥ यात्मामेंप्रमाणके विद्यमानहुए दृश्यरूपतासे अनात्मपनेकी प्राप्तिनहींहोती। तथाप्रमाणकेयभावहुए नरशृंगकीन्याईयसत्पनाभी नहींहोता ॥ क्योंकिवहयात्मास्वप्रकाशस्वरूपहै ।। इतनाअर्थज्योति पदसेस्थापनकिया | अवयानंदइसविशेषणसे अात्मामें सूचनकी हुईजोपुरुषार्थरूपताहै ॥ तिसकेनिरूपणकरनेकेलिये सिद्धांतीकेमत सेसिद्धजोयात्माकास्वरूपहै ।। तिसकाअनुवादकरकपूर्वपक्षीतिमकी पुरुषार्थरूपताका निषेधकरताहै ॥ मू०। आत्माऽयंसर्वसंवतो भानुभासकउच्यते । नित्योऽयमविनाशित्वा दुपादेयःकथंभवेत्।। कुंडलियाछंद । सबजगमेंसंवद्धयहनिजयातमपहचान । भानूवतभासकसदायोंश्रुतिकीनवखान । योश्रतिकीनवखाननित्यपुनताकोगाययो॥ अविनाशिताहेतु ताहिमनीक बताययो॥ ग्रहनकरनसे.योग्यनहींयात्महसोकव । सुखदुःखहानहभिन्नजानचाहेनहजनसब ॥२६॥ टी० ॥ साधनचतुष्टयसंपन्न अधिकारीकोयहथात्मा “उपादेय" बसराई कहियेपुरुषार्थरूपकैसेहोसकताहै। किंतुकिसीप्रकारभीनहीं। क्यों किउपादेयतामेंसाध्यत्वप्रयोजकहोताहै । अर्थात्जोप्रयत्नसाध्यपदार्थ है। वहउपादेयरूपहोताहै । औरयहयात्मातोसाध्यहनहीं। क्योंकि सत्यरूपहुयानित्यस्वरूपहै। नित्यत्वकीयसिद्धिहैऐसीयाशंकाकेहुए कहतेहैं । “अविनाशित्वात्” कहियेविनाशरहितहोनेसेयहात्मा नित्यहै । यातेनित्यताथसिद्धनहींकिंतुसिद्धहै । इसयर्थकोयागेउप पादन करेंगे । आत्मायनित्यहोनेकेयोग्यहै परिच्छिन्नहोनेसे । घट कीन्याई । इसाशंकाकेहुएइसकोस्वरूपासिद्धिसेदूषितकरतेहैं । (थाप्लव्याप्तौ) य. “बाप्ल" धातुव्याप्तियर्थमेंहोताहै । इसपाणनि मुनिकेस्मर्णसेइसधातुसे यात्मशदको सिद्धहोनेकर सर्वकोपूर्णकरने वालायात्माहै । अर्थात्व्यापकहै । यहयर्थलाभहोताहै ॥ यातेपरि च्छिन्नत्वहेतुस्वरूपसेहीतिसयात्मामेंवृत्तिनहीं । इसीसेयात्मानित्यहै । शंका ॥ इतनेकथनसेभीअनित्यत्वकापरिहारकैसेहोसकताहै।क्यों कियापकेमतमेव्यापकग्राकाशमेंभीयनित्यत्वदेखाहै | समाधान ॥ यात्मासर्वपदार्थोमेसर्वरूपतासेसंबंधवालाहै ॥ अर्थात्सर्वजगत्का यधिष्ठानहै । यद्यपिअन्यसर्वपदार्थोंकायधिष्ठानथाकाशहै। तथापि स्वयंप्रतियधिष्ठानताकाअभावहोनेसेसर्वजगत्कीयधिष्ठानताथाकाश मेंनहींसंभवती ॥ तिसीसेसर्वकाउपादानहोनेसेआत्मानित्यनहीं औरनकिसीकाकार्यहै ।। शंका ॥ यात्माकोटकीन्याईजडताहोने सेसर्वजगत्कीउपादानतानहींसंभवती ॥ समाधान ॥ सूर्यकी न्याईवहयात्माप्रकाशकहै ॥ तैसेमानेहुएजोयात्मायन्यसर्वथनात्म पदार्थोकोभीप्रकाशकरताहै ॥ तिसकोअपनेप्रकाशमेंइतकीयपेक्षा । २४२ वै० सि. मु० भा० नहींसंभवती ॥ जैसेसर्वजगत्केप्रकाशकयादित्यभगवानकोअपने प्रकाशमेंइतरकीअपेक्षानहीं। किंतुवहस्वयंप्रकाशहै । तैसेयात्माभी स्वयंप्रकाशमानहै । तिसमेंजडताकायभावहै । यहीअर्थश्रुतिमें भी कथनकियाहै ॥ इति ॥अवयपेनितयर्थकीपूर्णताद्धाराविस्तारपूर्वक श्लोककीव्याख्याकरतेहुएयात्माकीपुरुषार्थरूपताका निषेधकरतेहैं ॥ इसलोकतथापरलोककेसर्वविपयानंदतथातिनकीसाधनसामग्रीसेविरक्त जोपुरुषहै ॥ तथायनादिसंसारमेंसंपादनकियेहुएपुण्यकर्मनकेसमू हसेजिसकेपापकर्मनाशहुएहैं ।। तथासकलविषयों मेंदोपदृष्टिसेवैराग्य जिसकोउत्पन्नहुआहै । औरपरमपुरुषार्थकीकामनावालाजोमुमुनुहै तिसकोयहयात्माकिसप्रकारउपादेयहै ॥ क्योंकियागेकथनकीहुई युक्तिसे यात्मामें पुरुषार्थरूपता नहींसंभवती ॥ शंका ॥ अनित्य जो सांसारिक सुखहै ॥ वह विनाशी होनेसे त्याग करने योग्य हो परंतुयात्मातोनित्यहै । यातेतीणतादिदोपसरहितहै वहकैसेमुमुक्षुको उपादेयनहीं है किन्तुउपादेयहै ।। समाधान ॥ यद्यपियात्मानित्यहै । तथापितिसकोउपादेयतानहींसंभवती । इसीकोस्पष्टकरतेहैं । आत्मनित्यःअविनाशित्वात् ॥ आकाशवत् है याथात्मानित्यहै। यविनाशीहोनेसेजोजोयविनाशीहोता हसोसोनित्यहोताहै । जैसेयाकाशहै । इसयनुमानमेंयविनाशित्व हेतुस्वरूपासिद्धनहीं ॥क्योंकियात्माकविनाशकी सामग्रीकाथभाव होनेसेतिसकाविनाश दुर्निरूप्यहै “तथाहि" समवायिकारणका नाशयथवा श्रसमवायिकारकानाशदव्यकेनाशकी सामग्रीनेयायि कोंनेमानीहै ॥ औरयकार्ययात्माके वहदोनोंकारणनहींसंभवते ।

उत्तरार्द्ध औरयनादियदृष्टोंके प्रवाहकायाधारहोनेसेयात्माको अकार्यपना सिद्धहैयहयर्थपूर्वही कथनकरयाएहैं ॥ शंका ॥ कार्यकायदिदर्शन होतोसामग्रीकीभीकल्पना होसकतीहै। अर्थात्जवयात्माकानाश देखाजायतोनाशकी सामग्रीभीकोईअवश्य कल्पनाकरनेयोग्य है ॥ समाधान ॥ यात्माकाविनाशग्रहणकरनेकोकोईभीसमर्थनहीं है । इसीयर्थकोउपपादनकरतेहैं। क्या?यपनेविनाशकोयापहीयात्माग्रह णकरताहै।यथयायन्य यात्माग्रहणकरताहै ॥ इनमेंप्रथमपक्षतोनहीं संभक्ता। क्योंकि यात्माकीविद्यमानताकालमें ग्रहणकरनेयोग्यजो यात्माकाअभावतिसका अभावहै । औरयात्माकेविनाशकालमें ग्रहणकरनेवालेयात्माकाहीअभावहै । औरयन्यथात्माप्रथमयात्मा केयभावको ग्रहणकरलेगायहपक्षभी समीचीननहीं । क्योंकिप्रति योगीके ग्रहणपूर्वकही प्रभावकाग्रहणहोताहै । प्रतियोगीयग्राह्य है यदितिसकोभी ग्राह्यमाने तोयात्मपनेकाहीअभावहोगा ॥ याते श्रात्मीययभावग्रहणकरनेके अयोग्यहै । किंवा ॥ यात्माकेविनाश काग्रहणप्रत्यनसेहै । यथवाअनुमानसेहै ।। प्रथमपक्षनहींसंभवता । क्योंकिएकात्माको दूसरेयात्माके प्रतिश्रीदियहोनेकरयात्मप्रति योगिकसंसर्गाभावप्रत्यक्षसेग्रहणनहींहोसकता । अर्थात् संसर्गा भावकेप्रत्यक्षमें प्रतियोगिप्रत्यक्षकोकारणताहै । औरयहां श्रात्मरूप प्रतियोगीप्रत्यक्षसे ग्रहणनहींहोसकता । यातेतिसकाअभावभीप्रत्यक्ष सेग्रहणकैसेहो ॥ और परिच्छिन्नत्वहेतुसेयनित्यत्व अर्थात् विनाश अनुमेयहैयहदितीयपक्षभीनहींसंभवता। क्योंकिवहपरिच्छिन्नत्व हेतु पक्षयवृत्तिहोनेसे स्वरूपाऽसिद्धहै ॥ कारणयहकिदेशकालवस्तुके २४४ वे०सि० मुः भा० परिच्छेदसेरहितको आत्माकहतेहैं। इसीउक्तयर्थकोश्रीवेदव्यासजी कीउक्तिद्धाराहढकरतेहैं। यच्चाप्नोतियदादत्तेयचात्तिविषयान्निह । यचास्यसंततोभावस्तस्मादात्मतिकथ्यते ॥१॥ श्र०॥ यहां “याप्ले" औयापर्व "डुदा" यो “अद" तथा “यत” इनचारधातुयोंसेयात्मशदकोसिद्धकरतेहैं।।(यत् )जिस कारणसेसकलयनात्मपदार्थों को सकलरूपतासे (याप्नोति) व्याप्त करताहै । (तस्मात् ) तिसीसेयात्माकहतेहैं । और (यत्) जिस कारणसेसुपुतियादिकयवस्थायों में अज्ञानकेकार्यअनात्माकोअज्ञान केवशसेस्वस्वरूपमे (यादत्ते) उपसंहारकरलेताहै ॥ तिसीसेयात्मा कहते हैं ॥ और (यत् ) जिसकारणसे विपयाकारवृत्तियों को (यत्ति) प्रकाशकरताहै। तिसीसे यात्माकहतेहैं । थौर ( यत् ) जिस कारणसे निरूपणीयरूपतासे प्रकरणमास जोयात्माहै तिसकी (संततः) अंतरायसेरहितरूपताकर (भावः) स्थिति है । वहस्थितिभी अपने यापमेंही हैकिसीग्रन्यपदार्थमेंनहीं। क्योंकिग्रन्ययनात्मपदार्थ कायभावहै ।। तिसीसे (सातत्येन) नैरन्तर्यरुपतासे (यतति) जो गमनकरताहै ॥ तिसकोग्रात्माकहतेहैं ॥ अर्थात्गमनकाफलतिस तिसदेशमेंजाकरस्थितहोनाहायौरयात्मासर्वत्रहीयवस्थितहै ।क्योंकि श्रात्मासेभिन्नवस्तुकाहीयभावह।यातेस्वस्वरुपयात्मा हीजोपूर्णरूपता सेस्थिति है । इसीकोसंततभावकहतेहैं ।। तैसेमानेहुएपरिच्छिन्नत्व हेतुस्वरूपासिद्धहै । तिसीसेयहांपरयहथनुमानजानना ।। .

उत्तराई * आत्मानित्यः अपरिच्छिन्नत्वात् व्यतिरेकेणघटादिवत् है य० ॥ श्रात्मानित्यहोनेकेयोग्यहै । अपरिच्छिन्नहोनेसेजोजो नित्यनहीं है ।। सोसोअपरिच्छिन्नभीनहीं है । जैसेघादिहैं ।। इति ।। शंका ।। इसअनुमानमेंयपरिच्छिन्नत्वहेतुव्यभिचारीहै । क्योंकिव्या पकयाकाशादिकोंमें भीअनित्यत्वदेखाहै। समाधान ॥ नित्यत्वके अभाववालेयाकाशादिकोमयपरिच्छिन्नत्वहेतुकाप्रभावहोनेसेव्यभि चारदोषकी प्राप्तिअनुमानमनहीं है। क्योंकितुमकोव्यापकताकाज्ञान हीनहीं। जिसकारणसे "सर्वसंवद्धत्व" अर्थात्सर्वकेसाथसंबंधवाला व्यापककहाजाताहे॥ शंका । सर्वकेसाथजोसंयोगिपनाहेइसीकोसर्व संबद्धत्वकहतेहैं । वहगगनादिकों में विद्यमानहै। यातेहेतुव्यभिचारीहै समाधान ॥ “सर्वसंयोगित्व" सर्वसंबद्धत्वादकार्थनहीं। किंतुसर्व मेसर्वरूपतासेजोसंवैधवालाहोतिसकोव्यापककहतेहैं। याकाम्यादिकों मेंइसलक्षणकाअभावहै ॥ याव्यभिचारकीशंकानहींसंभवती ॥ शंका ॥ श्राकाशादिकभीसर्वमेंसर्वरूपतासेसंबंधवालेहीहै । क्योंकि तिनकोनिखयवहोनेकरएकदेशसेसंबद्धत्वकायभावहै ।। समाधान ।। परस्पख्यभिचारीपदार्थोकायधिष्ठानअर्थात्सत्तास्छतिदेनेवालाहीसर्व मेंसर्वरूपताकरसंबंधवालाहोसकताहै। शंका ।। व्यभिचारिपदार्थही अन्यव्यभिचारिकाअधिष्ठानक्योंनहो ॥ समाधान । एकव्यभिचारि पदार्थअन्यव्यभिचारिपदार्थकायधिष्ठाननहींसंभवता ।जिसकारणसे अन्यजोपयदिक हैं।वहयपनेसेभिन्नपटादिकोंकरसकलस्पतासेव्याप्त नहींकियेजाते । अर्थात्सत्तास्वर्तिप्रयुक्तनहींकियेजाते। यदिसकल ।

वे० सि० मु० भा० ९४८ रूपसेतिनकीव्याप्तिमानलेतोव्याप्यघटादिकोंकेस्वरूपकाहीयभावहोगा क्योंकिएकाधिकरणमेंदोसत्ताकीययोग्यताहै। भावयहकिव्यापकका स्वरूपसत्रूपहै। तिससेभिन्नव्यभिचारीजोव्याप्यघटादिकहैं तिनके स्वरूपकाहीअभावहै । तैसेमानेहुएजिसकीसत्तासेव्याप्यघटादिकसत् हैं। वहव्यापकसत्है व्याप्यसतरूपनहीं ॥ शंका || व्याप्यमेव्यापक प्रयुक्तसत्तामानेहुएभीस्वरूपभूतसत्ताकाविरोधनहीं। क्योंकिव्याप्य केएकदेशव्यापककीसत्ताहै।ौरदूसरदेशमेंअपनीसत्ताहै। ऐसीव्यवस्था सेदोनोंसत्तावनसकतीहैं ।समाधान।। व्याप्यकोजिसदेशमेव्याप्य की स्वरूपसत्ताहै तिसदेशव्यापककीव्याप्तिहैवानहीं । प्रथमपक्षमेव्याप्य कीसत्तामाननेकाकोईभीफलनहीं । क्योंकिव्यापककीसत्ताकरकेही सत्व्यवहाखनजायेगा। औरयदिद्वितीयपक्षकहो । तोसर्वरूपतासे व्यापककीव्याप्तिनहींसिद्धहोगीइसकारणसेएकव्यभिचारिपदार्थदूसरे व्याभिचारिपदार्थकाअधिष्ठाननहींसंभवता । यातेयात्माहीसर्वजगत् काअधिष्ठानहै।याकाशादिकनहीं।इतनेग्रंथसे(यात्मायंसर्वसंबद्धः)इस प्रथमपादकाव्याख्यानकियायवदूसरेपादकाव्याख्यानकरतेहैं। शंका।। यात्माकासर्वकेसाथ संबंधमानेहुएभी तिसको सर्वका अधिष्ठानपना नहींसंभवता क्योंकितिसकोजडहोनेकरयज्ञानविषयतारूपयज्ञातता कीयोग्यताहै । औरसर्वज्ञानोंकाविषयहोनेसेतिसकोजडपनाहै ।। समाधान। देशकालादिपरिच्छेदसेरहितयात्मामेंप्रमाणांतरकीयपेक्षा नहीं है । जिससेवहसूर्यकीन्याईस्वयंप्रकाशमानहै । और तमेवभान्तमनुभातिसच। तस्यभासासर्वमिदंविभाति। अ०॥ तिसयात्माकेप्रकाशहुएहीसर्वजगत्पश्वात्भानहोताहै १४७ उत्तराई तिसकेप्रकाशकरकेयहसर्वजगत्भानहोताहै । इसश्रुतिमेसर्वजगत्का प्रकाशकरूपतासेयात्माप्रसिद्धहै । सर्वहीजगत्यात्माकरकेप्रकाशके योग्यहै । तिसजगत्सेयात्माकाप्रकाशनहींसंभवता । जैसेघटदीपक कोप्रकाशनहींकरसकता तिसकारणसेस्वयंप्रकाशमानहीयात्माहैजडं नहीं । तिसकोसर्वकीयधिष्ठानतासंभवतीहै । यद्यपियात्मानित्यहै। तिसकोक्षीणतादिदोपसेरहितहोनेकरउपादेयतासंभवतीहै। तथापि सुखतथादुःखाभावसेइतरहोनेकरतिसकोउपादेयतानहींसंभवती ।यहां परयहअनुमानजानना ।। आत्माअनुपादेयः सुखदुःखाभावेतरत्वात्घटादिवत् श्र० । आत्माउपादेयनहीं है । सुखतथादुःखाभावसेभिन्नहोनेसे।।जो सुखतथादुःखाभावसे भिन्न हैवहउपादेयनहीं है। जैसेघदादिकहें।।इति।। अथसिद्धांतीद्वारा अनुपादेयत्वसाध्यकाखंडन अवइसपूर्वपक्षीके अनुमानमें अनुपादेयत्वरूपसाध्यकोसिद्धां तीनिषेधकरताहै ॥ हेवादिन्यहजो अात्मानिष्टतुमने अनुपादेयत्व कथनकियाहैवहक्याहै।क्या? आदानक्रियाअर्थातहस्तादिकोंसेग्रहण क्रियाकीयविषयताका नामयनुपादेयताहै ।। अथवाइच्छाकीविषय ताकेयभावकाधिकरणत्वरूपयनुपादेयत्वहै?॥ अथवायपनेप्रयल करसाध्यत्वके अभावकायधिकरणत्वरूप यनुपादेयत्वहै ? । अथवा स्वप्रयत्नकरसाध्यत्वकेयभावविशिष्ट सुखदुःखाभाव सेजोइतरपनाहै यहीयनुपादेयत्वहै? ।। अथवासुखतथादुःखाऽभावसेजो इतरपनाहै यहीअनुपादेयत्वहै!। अथवायन्यहीकोईअनुपादेयत्वहै।इनमेंप्रथम पक्षतोगसंगतहै । क्योंकिवादानक्रियाकीयविषयता यात्मावादी दे०सि० मु. भा. प्रतिवादीसर्वहीस्वीकारकरतेहैं।जिसकारणसेस्पर्शवालेतथाक्रियावाले पदार्थकाहीहस्तादिकोंसेग्रहणहोताहै।क्रियातथास्पर्शसेरहितात्माका ग्रहणनहींहोसकता।यातेप्रथमपक्षमेहमकोभीइष्टापत्तिहै।यौरइसमें इष्टा पत्तिमानेहुएअनुमानसिद्धसाधनदोपभीप्राप्तहोगा। भावयहादान क्रियाकी अविपयतारूपयनुपादेयतायात्मा प्रथमहीसिद्धहै। तिसको पुनःसिद्धकरनेसेसिद्धसाधनदोपप्राप्तहोताहे ॥ अर्थात्याश्रयाऽ सिद्धिहेतुगतदोपहोताहै ॥ क्योंकिसंदिग्धसाध्यवान्पनहोताहै ॥ साध्यकातिसमेंनिश्चय होनेसेपक्षत्वकायभावहै । किंवायहयनु पादेयत्वकालक्षण यलक्ष्यसुखादिकों में वृत्तिहोनेसे यतिव्याप्तिदोप वालाहै । क्योंकिसुखतथादुःखाऽभावभी ग्रादानकियाकविपयनहीं होते ॥ इसप्रकारप्रथमपनको निरासकरकेयवदितीयपक्षकोपित करतेहैं । औरइच्छाकीविषयताका अभावजिसमेंहोवहयनुपादेयहै। यहदितीयपक्षभीनहींसंभवता ।। क्योंकि “परस्परविरोधहुएतिनदोनों मेग्रन्यकोईप्रकारनहीं स्थितहोसकता"।इसन्यायसेइच्छाकीविषयता काजोअनधिकरणहे तिसकोअनुपादेयमानेहुए इच्छाकीविषयताके अधिकरणनिष्ठ उपादेयताप्राप्तहोतीहै ।तिसमेंभीयहविचारकर्तव्यहै। इच्छाग्रौइच्छाकीविषयताकर विशिष्टजोविषयहे ।। वहउपादेयहे ।। अथवा तिनदोनों कर उपलनित विषयका स्वरूप मात्रउपादेयहै ।। पूथमपक्ष तोनहींसंभवता क्योंकि "विशिष्टऋत्तिधर्मको विशेषण मेंवर्तनेकानियमहे" || इसन्यायसेइच्छाऔरतिसकी विषयताको भीउपादेयता प्राप्तहोगी ॥ सोतुमकोइप्टनहीं ॥ और इच्छा यौ तिसकी विपयताकर उपलक्षित जो विपयका स्वरूपमात्रवह २५६ उत्तराई उपादेयहै । यदियहदितीयपक्षकहो । तोतिसमेंभी यहविचारकर्तथ्य है। जितना इच्छाकाविषयहै । वहसर्वही उपादेयहै अथवाइच्छा के विषयका एक देश उपादेय है ॥ अथवा इच्छा के विषय में विशेष्यमात्रउपादेयहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिदुःखको भीउपादेयताहुईचाहिये। यद्यपिदुःखकोकोईभीनहींचाहता । तथापि जोज्ञानकाविषयहोताहै वहीइच्छाकाभीविषयहोताहै। यर्थयहदुःखा भावकोपुरुषार्थरूपतासर्वहीवादीकहतेहैं । तिसदुःखाभावकेज्ञानका जितनायर्थविषयहोताहै । उतनेहीअर्थकोइच्छाभीविषयकरतीहै। क्योंकिज्ञानइच्छायौप्रयत्नइनतीनोंको समानविषयत्वकानियमहै । अर्थातइनतीनोंकाएकहीविषयहोताहै || शंका || दुःखाभावकेज्ञान मेंप्रतियोगिरूपदुःखविशेषणरूपतासेनहींभानहोता क्योंकितिसज्ञान कोनिर्विकल्पकरूपहोनेकर विशेषणदुःखौविशेष्यदुःखाभावकेसंबंध काग्राहकपनानहीं है।। समाधान ।। "किंचितइदं" यहनिर्विकल्पज्ञान इच्छाकेउत्पन्नकरनेकोसमर्थनहीं। क्योंकिविषयकीसौंदर्यताकायह ज्ञानप्रकाशकनहींहै । यौरविषयकीसौंदर्यताकेज्ञानसेहीइच्छाउत्पन्न होतीहै। यहन्यायकेजाननेवालोंकीमर्यादाहै औरविषयकीसौंदर्य्यता काग्राहकजोज्ञानहै । वहनिर्विकल्पकहै । यहकथनभीसमीचीननहीं जिसकारणसेवहज्ञानविशेपणतथाविशेष्यकेसंबंधकाग्राहकहै । याते इच्छाकाजनकजोजानहै । तिसकोसविकल्पकपनाहीयुक्तहै ॥शंका।। दुःखाभावका ज्ञान सविकल्पकहो तथापि तिसको दुःख विषयताकैसे है ।। समाधान || दुःखाभावमें प्रतियोगी रूप दुःख विशेषणहै । और अभाव ज्ञानको विशिष्ट विषयक होने कर दुःख रूप विशेषण दे० सि. मु० भा० वियपता भी संभवती है ॥ तिस कारण से जितना इच्छा का विषयहैवहसर्वही उपादेयहै । ऐसे यदिमानेतोदुःखको उपादेयताकैसे नहोगी। किंतुअवश्यहोगी। यातेप्रथमपक्षयसंगतहै । औरइच्छा केविषयकाएकदेशउपादेयहै । यहद्वितीयपक्षभीनहीसंभवता क्योंकि यहलक्षणग्रव्याप्तिदोषवालाहोनेसेदुष्टहै । तिसीकोस्पष्ट करतेहैं । सुखविपयणीइच्छाकासुखएकदेशनहीं है ॥ क्योंकिसुखसेभिन्नऔर कोईविषयहैनहीं । शंका ।।सुखमात्रपुरुषार्थनहीं है किंतुयात्मसंबंधि सुखउपादेयहै।तिसकारणसेइच्छाभीयात्मीयसुखविपयणी है। इसलिये सुखमेंइच्छाकेविषयकाएकदेशत्वरूपउपादेयत्वसंभवताहै।।समाधान। हेवादिन्यदिशात्मीयसुखकोउपादेयमानोगेतोयात्मउपाधिकहीसुखमें पुरुषार्थरूपताहोगी।स्वभावसेसुखउपादेयनहींहोगा। यातेद्वितीयपक्ष भीनहींसंभवता ॥ औरइच्छाकाविषयजोविशेष्यमानवहउपादेयहै ।। इसतृतीयपनकेमानेहुए दुःखमें उपादेयत्वकीप्राप्सिनहींहोती । क्योंकि दुःखकोइच्छाकाविषयहुएभीविशेष्यरूपताकाअभावहै || सोयहयाद्य द्वितीयपक्षमेतृतीयपक्षहै यहभीनहींसंभक्ता ॥ क्योंकि ( अहंस्वर्गी स्याम् ) “मेंसुखी होजाऊं" यहइच्छा सुख विशेषणविशिष्टयात्म विषयणीहै । तिसइच्छाकाविषयजो विशेष्यमात्रयात्माहै | तिस मेंपूर्वपतीको अनिष्टजोउपादेयतासोमाप्तहोगी ॥ औरअनुमानमें बाधकीप्राप्तिभीहोगी। क्योंकि यनुपादेयत्वसाध्यकायभावनिश्चय हुआहै । इसप्रकारद्वितीयपक्षको निपेधकरकेयवस्वकृतिसाध्यत्वका श्रभावहैजिसमेंवहयनुपादेयहे इसतृतीपनकोनिराकरणकरतेहैं । औरयहतृतीयपनभी नहींसंभवता ॥ क्योंकिस्वप्रयत्नकरकेसाध्यजो उत्तराई .२५१ दुःखौतिसकेसाधन, तिनमेंभीअनुपादेयताहै। औरपूर्वउक्तलक्षण तिनमेंयनुगतहैनहीं।यातेतृतीयलक्षणथव्याप्तिदोषयुक्तहोनेसेदुष्टहै। औरस्वकृतिसाध्यत्वके अभावविशिष्टसुखदुःखाभावसेजोइतरत्वहैयही यनुपादेयत्वहै। यहचतुर्थपक्षहै । इसमें "सुखदुःखाभावेतरत्व" इतना विशेष्यमात्रहीयनुपादेयत्वकालनणकहें । तोसुखकेसाधनयागादि कोंमें अतिव्याप्तिहोती।तिसकीनिवृत्तिअर्थविशेषणभागलक्षणमेंकहाहै वहयागादिकोंमेंनहीं यातेतिनमें अतिव्याप्तिभीनहीं ॥ सोयहचतुर्थ पक्षभीयसंगतहै।क्योंकिविशेपणभागकीव्यर्थताहै ।ौरसुखकेसाधन यागादिकोंमेंस्वप्रधान्यतासे उपादेयतानहीं।किंतुसुखकेसाधनहोनेकर सुखउपाधिकी उपादेयताहै । यातविशेष्यमात्रलनणमानेहुएभी तिनमेंअतिव्याप्तिनहींहोती ॥ क्योंकिपरमपुरुषार्थत्वका अभावसुख केसाधनों भीस्वीकारहै । याविशेषणका ग्रहणव्यर्थ है । औरसुख दुःखाऽभावसेइतरत्वहीअनुपादेयत्वहै यहपंचमपनभीनहीं संभवता । क्योंकिसाध्यतथाहेतुकाएकत्वमाप्तहोताहै ॥ तैसे मानलेंतोसंदिग्धा सिद्धहेतुअनुमानमेदोपहोगा ।। अर्थयहजोसंदिग्धरूपताकरग्रसिद्ध होवहहेतुसंदिग्धाऽसिद्धकहाजाताहै । सोसंदिग्धाऽसिद्धहेतुवाला अनुमानदुष्टहोताहै ॥ औरइनसेभिन्नौरकोईअनुपादेयत्वकालक्षण कथनकरनेकेयोग्यनहीं ॥ शंका ॥ कथनकरनेकीयसामर्थ्यश्राप क्योंकहतेहो । जिसकारणसेदुःखादि स्वरूपहीअनुपादेयत्वशब्दका अर्थहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यात्मामेंदुःखौतिसकेसाधनोंका तादात्म्यस्वीकारनहीं है ॥ यातेयात्मामेंअनुपादेयत्वरूपताकाअसं भवहै । शंका ॥ यदिग्रापयात्माकोदुःखादिरूपतानहींमानोगे ॥

वै० सि० मु० भां. २५२ तोसर्वात्मताकाव्याघातहोगा || समाधान ॥ हेवादिन्यात्माकी सर्वात्मताकाव्याघातनहीं है। क्योंकिसर्वकीयविष्ठानताही सर्वात्मता शब्दकायर्थहै । औरयात्मामेसर्वाऽयधिष्ठानता सर्वयध्यस्तपदार्थों कोसत्तास्फूर्तिप्रदत्वरूपहै।। कोईमिथ्याकार्यरूपता तिसको नहीं है। क्योंकिसत् पदार्थकामिथ्याकसाथतादात्म्यनहींसंभवता। यदिमिथ्या दुःखादिकातादात्म्यमानोगे तोसत्यत्वकीहानीहोगी । यव सिद्धांती अपनेपूर्वपक्षकोसमाप्तकरताहे ॥ इसप्रकारपूर्वउक्तयनुमानमें अनुपा देयत्वसाध्यकेकथनकीही यशक्यताहोनेसे किसप्रकारतुमयह यनुपा देयत्वरूपयनिष्टयात्मामेंसिद्धकरतेहो । (इतिसिद्धांतीकापूर्वपक्ष) अथपूर्वपक्षीकासमाधान। अथउपादेयत्वकानिरूपण हेसिद्धांतिपूर्वउक्तथापकीयाशंकानहीसंभवती ॥ क्यांकि अनुपादेयत्वजोहै ॥ वहस्वप्रतियोगिरूपउपादेयत्वकरनिरूपणकिया जाताहै ॥ तिसउपादेयत्वरूपप्रतियोगीसेविनातिसकानिरूपणनहीं करसकते ॥ यातेअनुपादेयत्वकेजाननेयर्थप्रथमउपादेयत्वकानिरू पणकियाचाहिये। सोउपादेयत्व यन्यानुपसर्जनत्वरूपहीजाननेयोग्य है ॥ यर्थयहजोयन्यसर्वपदार्थोंमेप्रधानहोवहउपादेयहे ।। यौरयदि सिद्धांतीऐसेकहेकियन्यसर्वसेपूधानतायात्मामहीवर्तमानह।।यातेया त्माकोहीउपादेयताहे।सोयहकथनभीनहीसंभवता।क्योंकिवहयन्यानु पसर्जनत्वरूपउपादेयत्वसुखतवादुःखाऽभावमेंही है।यन्यसर्वयात्मादि पदार्थोंकोतिनदोनोंकाउपसर्जनपनायर्थातशेषपना।। तिनमें प्रात्मा तोसुखतथादुःखाभाक्कायधिकरणम्पनामगेपह ॥ योरसुसादिकांक उशराई जोसाधनवहकरणरूपतासेशेपहैं ॥ ऐसेऔरभीजानलेने।। शंका आहे वादिनसुखतथादुःखाभावरूपभीग्रात्माहीहै । तोकैसेतिसकोतुमउप सर्जनयर्थात्शेपकहतेहो ॥ समाधान ॥ यात्माप्रथमसुखत्थादुःखा भावसे भिन्न है। प्रथमतिसमें * अथात्मामेंदुःखाभावरूपताकानिषेध दुःखाभावरूपताकानिपेधकरते हैं । अात्माकोभावरूपहोनेकर दुःखाभावरूपताकायसंभवहै । औरयदिऐसेकहोकियात्माकोदुःखा भावरूपतामाननेवालेवादीके प्रतिभावरूपत्वहेतुस्वरूपाऽसिद्धहै ।सोयह कथनभीनहींसंभवता । क्योंकि "अहमस्मि" इसप्रकारकीमतीतिमें किसीकाविवादनहीं । औरयहप्रतीतिदुःखरूपप्रतियोगीकरनिरूपण करनेकेयोग्यभीनहीं। क्योंकिदुःखकेनप्रतीतिहुएभी(अहमस्मि)यह प्रतीतिसर्वकोउत्पन्नहोती है । तिसीसेदुःखरूपप्रतियोगीकरननिरूपण करनेयोग्यहोनेसेभावस्वरूपहीयात्माहै । दुःखाभावरूपनहीं ॥ अथशून्यवादीकोअभिमतआत्मा केखंडनकाप्रकार* शंका । थव्यभिचारिस्वभावहीथात्माहोताहै । औरशून्यभी अव्यभिचारिस्वभावहै । इसकारणसेसर्वपदार्थीका वास्तवस्वरूप शून्यवहीयात्माहै । भावरूपयात्मानहीं । थौरशून्यरूपताथात्माको होनेसेदुःखाभावरूपताकाभीसंभवहै ॥ समाधान ॥ वहतुम्हाराशून्य क्याशेयरूपहैयथवाज्ञातारूपहै। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकिज्ञेय पदार्थकोयात्मपनकायसंभवहै । विज्ञाताकोहीयात्मपनाहोताहै । यदिऐसेनमानें । तोघटादिकों में भीग्रात्मताहुईचाहिये । यौरद्वितीय २५४ ० मि. मु. भा. पक्षभीनहींसंभवता । क्योंकिज्ञानकयाश्रयकोजाताकहतेहें। शून्यको ज्ञानकाअनाश्रयहोनेसेज्ञातृत्वकाअसंभवहै। औरशून्यकोज्ञानकायना श्रयपनाययुक्तनहीं है। क्योंकिशून्यसर्वाऽभावकानामहै। औरयभाव कोभावस्वरूपज्ञानकीयधिकरणताकायसंभवहै । ऐसेकहींदेखानहीं जोयभावभीभावपदार्थकायाश्रयहो । शंका ॥ यद्यपियभावभावका याश्रयप्रमाणसेनहींमंभवता । तथापिभ्रमसेतिनकाधर्मधर्मिभावसंभ वताहै क्योंकिभ्रमकोकोईकार्ययशक्यनहीं ।। समाधान ॥ हेशून्य वादिन्धर्मधर्मिभावकोआरोपितमानेहुए जिसकमाथअन्वितरूपताकर पारोपितप्रतीतहोताहै । वहयारोपकाविषययधिष्ठानप्रकृतयारोपमें अर्थातज्ञानतथाशून्यकेधर्मधर्मिभाव है वानहीं । अंतिमपज्ञकहोतो वहनहींसंभवता। क्योंकियधिष्ठानसेविनाकहींभीभ्रमनहींहोसकता। जिसकारणसेसर्वभ्रमोंमेंयधिष्ठानतथायथ्यस्तकायाकारभानहोताहै। औरयधिष्ठानहै । इसप्रथमपनमेंयहविचारकर्तव्यहै । क्या? शून्यसे भित्रकोई अधिष्ठानहै | अथवाशून्यहीयधिष्टानहै । पृथमपक्षतोनहीं संभवता । क्योंकियधिष्ठानसेभिन्नकोकल्पितहोनेकर शून्यमेंकल्पित त्वपूसंगहोगा।ौरशून्यहीयधिष्ठानहैयदियहदितीयपक्षकहो। तोशून्य करयन्वितहीसर्वघटादिपदार्थसर्वकोप्रतीतहुएचाहिये । जिसकारणसे जोयध्यस्तपदार्थहोताहै। तिसमेंयधिष्ठानकोयनुगतहोनेकरवह अध्य स्ततिसकेसाथतादात्म्यरूपताकरप्रतीतहोताहै । औरत्रारोपितमेशून्य कीयनुगतिहैनहीं । क्योंकियारोपितसतरूपसेहीप्रतीतहोताहै । अन्यथाशून्यंघटः “शून्यपटः" ऐसीप्रतीतिहोनीचाहिये। किंवावहशून्य सर्वभ्रमोंकायधिष्ठानहै । यथवाकिसीएकभ्रमकायधिष्ठानहै । प्रथम उत्तरार्द्ध पक्षमेतिसशून्यकीप्रतीतिकहनेयोग्यहै । क्योंकिसामान्यरूपतासेज्ञात कोहीयधिष्ठानपनायुक्तहै । औरवहअधिष्ठानकाज्ञानस्वतःहीहोताहै। अथवापरसेहोताहै । यहविचारकर्तव्यहै । इनमें अंत्यपक्षतोनहींसंभ वता। क्योंकियधिष्ठानसेभिन्नयन्यसर्वपदार्थोकीकल्पनासेप्रथमयसि द्धिहै । कल्पनासेप्रथमतिनकोसिद्धमानेहुएकल्पितपनेकीहानिहोगी यौरयदिप्रथमपक्षकहो।तोशून्यताकीहानिहोगी। क्योंकिशून्यकोज्ञान ‘स्वरूपताकाअभावहोनेसेस्वतःसिद्धिकाअभावहै ॥ शंका । शून्यकी स्वप्रकाशताकेयर्थतिसकोहमज्ञानस्वरूपहीमानलेंगे । जिसकारणसे अन्यथाऽनुपपत्तिसर्वसेवलवालीहोतीहै । अर्थयहशून्यकोज्ञानस्वरूप तासेविनास्वप्रकाशताकीअनुपपत्तिहै । यातेशून्यज्ञानस्वरूपहै ॥ समाधान ॥ यदिशून्यकोतुमज्ञानस्वरूपमानोगे । तोस्वप्रकाशज्ञान जोसर्वजगत्कायधिष्ठानहै तिसकाशून्ययहनामएकसंकेतमात्रहै । वहज्ञान वास्तवसे कोईशून्यरूपनहींहोगा क्योंकिवहभावस्वरूप है। औरकिसीविशेषभ्रमकाशून्यअधिष्ठानहै । यहपूर्वजोदितीयपक्षकहा था । वहभीनहींसंभवता । क्योंकिसर्वभ्रमकीयधिष्ठानताका अभाव होनेसेतिसशून्यकोव्यभिचारिपनाहै ॥ इसीसेवहयात्मानहीं । किंतु भावस्वरूपहीयात्माहै । इसप्रकार यात्माकोभावरूपहोनेसे दुःखाभाव रूपतानहींयहयर्थसिद्धहुया।इति ॥ ॐ अथात्माकी सुखरूपताकानिषेध ॐ इसप्रकारयात्मामें दुःखाभावरूपताकानिपेधकरके अवतिसमें सुखरूपताकायभावनिरूपणकरतेहैं। यहांपरययनुमानजानना। आत्मानसुखरूपः अकार्य्यत्वात् । अकाशवत् ॥

२५८ वै०सि० मु० भाग दोनोंकोसमानहीहै।समाधान।। हेसिद्धांतिन्यात्मायॉरसुखकेभेदका ग्राहक ग्रहंसुखी" यहजोप्रत्यक्षहै। तिसकाविरोधहोनेकरश्रतियर्थकी अयोग्यताहोनेसेतिसकोयौपचारिकयभेदपरताहै।यन्यथा यहंसुखम्' इसप्रकारकिसीकोप्रतीतहुअाचाहिये।औऐसीप्रतीतिकिसीकोनहींहोती इसलियेयात्मायौसुखकाभेदहै।।इति। वयात्माकीयनुपादेयताके. साधकयनुमानकोसमाप्तकरतेहैं ॥ जिसकारणसेपूर्वउक्तयुक्तियोंकर यात्माकोसुखतथादुःखाभावसेभिन्नपनाहैतिसीकारणसेउपसर्जनरूप अनुपादेयहीयात्माहै । यातेयहअनुमाननिर्दोषसिद्धहुया ॥(अात्मा अनुपादेयःसुखदुःखाभावेतरत्वावघटादिवत्।वाव्यतिरेकणसुखादिवत्) यहदृष्टीतजानना ।। इति ।। शंका ।। यात्मामें सुखदुखाभावेतरत्व"" रूपहेतुकेहोतेभीअनुपादेयत्व रूपसाध्यतिसमेंनहो ॥ इसप्रकारविप पक्षमानेहुएयर्थात्यात्मकोउपादेयमाने एकौनवाधकहै ॥ समा धान ॥ हेतुजिसपक्षविद्यमानहोतिसमें साध्यकेसनहींहोगा किंतु अवश्यहोगा। यातेहेतुसाध्यकीसमव्याप्तिजहांहोतहांहेतुकेअभावहुए हीसाध्यकायभावहोसकताहै।इसकारणसेहेतुकारभावहीविपक्षमेवाध कहै । इसीयर्थकोस्पष्टकरतेहैं । सुखतथादुःखाभावसेभिन्नौरकोई पदार्थपुरुषार्थरूपनहींजिसकारणसेयात्माभीमुमुनुपुरुषोंकोउपादेयहो तात्पर्ययह । किसुखतथादुःखाभावसेभिन्नकोईपदार्थ पुरुषार्थरूपहोता तोतिसमेंहेतुकाव्यभिचारहोनेकरउक्तहेतुसाध्यकानिश्चायकनहोता। तिसीकारणसे पूर्वउक्तहेतुवालेयात्मामें पूर्वकथनकियाहुयायनुपा देयत्वरूपसाध्यभीसिद्धनहींहोगा । यातेयात्मासुमुक्षुपुरुषोंकोउपादेय होजायेगा सोयहप्रकारनहींसंभवता । क्योंकिसुखदुःखाभावसे अन्य २५६ उत्तरा पदार्थकोपुरुषार्थरूपताका अभावहोनेसे “सुखदुःखाभावेतरत्व हेतु व्यभिचारीनहींकिंतुस्वसाध्यकानिश्चायकहै।। यातेसाध्यकेअभावहुए हेतुकायभावही विपक्षमाननेमेवाधकहैअर्थात् आत्मामें "सुखदुःखा भावेतरत्व"हेतुकोमानकरजोवादीतिसमेंअनुपादेयत्वसाध्यनहींमानता तिसकोहेतुकाभीअभाव अवश्य माननाहोगा ।। इति ॥ शंका ।। इसप्रकारविपक्ष वाधकतर्कके विद्यमानहुएभी पुनःपूर्वउक्तअनुमानमें “श्रात्मेतरत्व"उपाधितोहै।यौरवहउपाधियतुपादेयत्वरूपसाव्यकेसाथ यव्यापकनहीं क्योंकि उपाधिकायभावजो “यात्मत्व है। तिसको साध्याभावरूपउपादेयत्वकेसाथव्याप्तपनाहै।यातेजहांत्यनुपादेयत्वहै। तहांयात्मेतरत्वहै" जैसेघटमेंहै।यौरजहाँसुखदुःखाभावेतरत्वहै । तहां श्रात्मेतरत्खनहीं।जैसेयात्मामेंहै।इसप्रकारसोपाधिकहोनेसे तुम्हाराहेतु दुष्टहँसतहेतुनहीं ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् यात्मत्वहीपरमपुरु पार्थत्वकावोधकनहीं है। क्योंकिलोकमेंयात्मापुरुषार्थरूपतासेउपादेय हैऐसेव्यवहारकाप्रभावहै । थौरपक्षेतरत्वको उपाधिपनाभीनहीं संभवता ॥ यदितिसकोभीउपाधिरूपमानले तोयनुमानमात्रकाही संसारसेउन्छेदहोजायेगा। क्योकियक्षतरत्वउपाधितोसदनुमानमें भीवर्तमानहै । यातेवहउपाधिनहीं ॥ शंका ॥ पक्षतरत्वकोउयाधि रूपतानमानेहुए। तेजोऽनुष्याः द्रव्यत्वात् रज्जवत् ॥ इसथ्रनुमान तेजोभिन्नत्वकोउपाधिरूपताकैसेहोगी। क्योंकि यहभीपक्षतरत्वरूपउपाधिहै ॥ समाधान ।। इसयनुमानमेंतेजकी . अनुष्णतामत्यक्षप्रमाणकरबाधितहै ।। याते "तेजोमिन्नत्व" उपाधि २६० वेसि० मु० भा० वाधोनीतहै अर्थयह बाधकर (उद्भावित ) कहिये प्रगटहुयाहै । औरप्रकरणमेंतो “यात्मेतरत्व” उपाधिवाधकरउद्भावितहेनहीं।क्योंकि लोकमैयदि यात्मापुस्पार्थरूपतासे उपादेयहोतातो “पतेतरव" उपाधिवाधकरउन्नीतहोता। सोलोकमैतिस प्रकारके व्यवहारकाअभाव है ॥ याते यात्मेतरत्व” कोउपाधिरूपतानहींसंभवती ।। शंका ॥ हेवादिन्यन्यरीतिकेयभावसेलोकमेंयात्माहीउपादेयकहने योग्यहै । क्योंकियात्मासेभिन्न सर्वपदार्थयपुरुषार्थरूपहैं । और सुखादिकभीपुरुषार्थरूपनहीं। यदितिनकोभीपुरुषार्थरूपमानोगे। तो ‘शत्रुकेसुखादिकोंमेभीपुरुषार्थरूपताहुईचाहिये । औरयदिऐसेकहोकि श्रात्मसंबंधिसुखादिकहीउपादेयह अन्यउपादेयनहीं सोयहकथन भी समीचीननहीं । क्योंकि यात्मीयत्व अर्थात्यात्मसंबंधित्वविशेषण विशिष्टसुखादिकोंकोपुरुषार्थरूपमानेहुए यात्माहीपुरुषार्थरूपताकरख्य वहारकरनेयोग्यहै सुखादिकनहीं। समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् “सुखं मेस्यात दुःखमाभूत्'इसप्रतीतिसे यात्मसंबंधिसुखतथादुःखाभावकोही कामनाकाविपयहोनेसेयहदोनोंहीपुरुषार्थरूपहैं । अात्मापुरुषार्थरूप नहीं तात्पर्ययहहै। निरुपाधिकइच्छाकाविषयही पुरुषार्थरूपतासेउपा देयहोताहै।ौरवहीपुरुषार्थरूपकहनेयोग्यहै।औरसुखतथादुःखाभावही कामनाकाविषयहोनेसे पुरुषार्थव्यवहारकेयोग्यहैं।यौरयदियहकहो।कि, श्रात्मसंबंधिसुखतथादुःखाभावहीपुरुषार्थरूपहैं केवलवहदोनोंपुरुषार्थ रूपनहीं । सोयहकथनभीयसंगतहै । क्योंकियात्माकोसुखतथा दुःखाभावकाधिकरणहोनेसेकारकपनाहै । औरकारककोगौणहोने करवास्तवसे ग्रनुपादेयताहै । याते प्रात्मापुरुषार्थरूपनहीं ।। शंका ॥

चरा २६१ 'सुखमेस्यात्" इसप्रतीतिसेयात्मीयसुखविपयणीकामनाप्रतीतहोती है। तहांसुखकीन्याईयात्माभीतिसकामनाकाविषयहै । यातेतिस यात्मा सुखउपाधिकीइच्छातुमकैसेकहतेहो । समाधान ॥ यात्मा मेस्यात्" इसप्रकारकीकामनाकिसीकोनहींहोती ॥ 'औकामनाका विषयपुरुषार्थरूपनहींहोता । इसलियेसुखअनुपहितकेवलयात्मा मेंकामनाकाश्रदर्शनहै । औरसुखउपहितात्मामेंकामनाकादर्शनहै यातेसुखादिकहीकामनाकेविषयहैं। यात्माकामनाकाविपयनहीं।तिसीसे श्रात्मापुरुषार्थरूपताकरउपादेयनहीं ॥ शंका ।। आत्मलाभान्नपरांविद्यते* अ०॥ यात्माकेलाभसेउत्कृष्टयौरकोईलाभनहीहै ।। और आत्मकामः ० ३०५०मा० ४६ वायगाथात्माकीकामनावाला पुरुषयाप्तकामादिहोताहै।।इत्यादिश्रुतिकेवलसेयात्माकोकाम्यमानता निश्चयहोनेसेपुरुषार्थरूपताहै।समाधानाायद्यपिपूर्वउक्तश्रुतिहमकोभी स्वीकारहै । तथापिवहश्रुतिस्वनिष्ठयविरोधकीसिद्धिकेअर्थक्या?लोक व्यवहारकीयपेक्षाकरतीहैवानहीं। यदिप्रथमपतकहोतोलोकमैयात्म विषयणीकामनाकायभावहै ॥ किसप्रकारवहश्रुतियात्माकोकाम्य मानतासे पुरुषार्थरूपताको वोधन करेगी। क्योंकियहयात्माकोई अलौकिक पुरुषार्थरूप तोहैनहीं ॥ यातेश्रुतिभी लौकिकव्यवहार को न उल्लंघन करके ही पुरुषार्थ रूपता को प्रतिपादन करेगी। तैसेमानेहुए । “मंचाकोशंति" य० । मंचपुकारतेहैं । जैसेयह वाक्यलोकविरोधसेलक्षणावृत्तिकर यन्वयर्थकाप्रतिपादकहै । तेसे २६२ दे०सि० मु० मा० लोकंव्यवहारकेविरोधहुए पूर्वउक्तश्रुतिवाक्यभी ग्रौपचारिकहै । अर्थातसुखउपहितयास्मामेंही कामनाकीविपयताकाप्रतिपादकहै ।। केवलमात्मामेंनहीं ॥ शंका ॥ अपनेर्थकेबोधनकरनेमेंअतिलोक व्यवहारकीक्यों अपेक्षाकरतीहै । यदिकहोकि विरोधपरिहारकेयर्थ श्रपेक्षाकरतीहै । तोयहकथननहींसंभवता । क्योंकिलोकव्यवहारका वाधकरकेभी विरोधकापरिहारसंभवहोसकताहै | औरश्रुतिलोकव्यव हारकरवाधकेयोग्यनहीं । क्योंकिवहस्वार्थ मेंतात्पर्यवालीहै । याते श्रुतिकोलोकव्यवहारकीकिंचित्मात्रभीयपेक्षानहीं।। समाधान ॥यदि लोकव्यवहारकीश्रुतियपेक्षानहींकरती यहद्वितीयपक्षस्वीकारकरोतो अलौकिकहोनेसे स्वर्गकोभी मुखरूपतानहीं सिद्धहोगी। क्योंकि लोकव्यवहारकीयपेक्षानकरेहुए (ज्योतिष्टोमेनस्वर्गकामोयजेत ) इसवाक्यमेंकामनाका विषयभूतस्वर्गप्रथम पुरुषार्थरूपप्रतीतहोताहै। यहवास्तवमर्यादाहै । तहांकेवलवेदकरप्रतिपादितहोनेकरस्वर्गकोपुरु पार्थरूपमानेहुए तिसको मुखरूपतानहींसिद्धहोगी । क्योंकि सुखमें स्वर्गपदकावेदने संकेतनहीं किया। औरयदिलौकिकपुरूषार्थव्यवहार कोवेदयनुसरणकरताहै ॥तोलोकमेंसुखतथादुःखाभावकोहीपुरुषार्थ पनाहै । तिनमेंभीस्वर्गकोदुःखाभावरूपतामाननेमेंगौरवहै । क्योंकि प्रतियोगियादिकोंकी कल्पनाकरनीलगतीहै । इसलियेभावरूपसुख रूपताहीस्वर्गमेंयुक्तहै । औरस्वार्थमतात्पर्य्यवालीहोनेसे श्रुतिलोक व्यवहारकाबाधकहै ॥ यहकथनभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिस मुच्चयकरलोकव्यवहार तथाश्रुतिकोप्रमाणताके सिद्धहुएदोनों में उत्तरार्द्र एककेवाधकीकल्पनाययुक्तहै ॥ शंका ।। (ज्योतिष्टोमेनस्वर्गकामो यजेत)इसस्वर्गकामश्रुति श्रवणकियेहुएस्वर्गकोलोकव्यवहारकीअनु सारतासेसुखरूपताहै ।। यहतुम्हाराकथनयुक्तहै ॥ क्योंकि ।। यन्नदुःखेनसंमिन्नं नचग्रस्तमनंतरम् । अभिलापोपनीतंच तत्सुखंस्वःपदास्पदम् ॥ १ ॥ श्रः॥ जोदुःखकरमिश्रतनहींहै ।औरअभावरूपनहींतथाथत रायसेरहितजोहै । औरअभिलापाकाजोविषयहैसोसुख स्वर्गशब्दका श्रर्थहै । इत्यादिअर्थवाद स्वर्गकीसुखरूपताकाग्राहक विद्यमानहै। तिसीकारणसेयात्मकामादिक श्रुतिकेवलसेकामनाका विषयजोया त्माहे वहपुरुषार्थरूपताकर उपादेयहीहै ॥ समाधान ॥ यहात्मा कीपुरुषार्थरूपतालोकसे विलक्षणभृतक्याहै । जिससेइसलोकके मुखतथातिनकेसाधन वनितादिक यौरपरलोकमें होनेवालेस्वर्गादि सुखतथातिनकेसाधनयागादिक इनसर्वकोत्यागकर जन्मसेलेकरवा चादिरूपसकलदुःखोंके समूहसेअपनेआपको यहपुरुपक्लेशयुक्त करताहीयद्यपिपरमपुरुषार्थकीकामनासेइनसर्वक्लेशोंकासहनसंभवताहै तथापियहअलौकिकपुरुषार्थरूपयात्माहै इसप्रकारकेकथनमात्रसेही यहपुरुष अपनेयापकोकृतार्थमानताहै। कोईलोकसेयथवास्वयनुभव सेमात्माकोपुरुषार्थरूपताकीसिद्धिनहीं । किंतुकेवलवेदमात्रसेही सिद्धिहै । तैसेमानेहुएप्रसिद्धविषयसुखकोत्यागकर अप्रसिद्धपुरुषार्थ काउद्देश्यकरकेब्रह्मचर्यादिक्लेशकासहनकरनाबुद्धिमानोंको युक्तनहीं यहभावहै ।। इसीसेरागीपुरुषोंने यहकहाहै ॥

२६४ व०सि० मु. भा० वरवंदावनेशून्येशृंगालत्वंसइच्छति । नतुनिर्विपयंमोक्षमंतुमर्हतिगौतम॥१॥ श्र० ।। हेगौतमवहरागीपुरुपयहइच्छाकरताहै ॥ किशून्यवृंदा बनमेंशृंगालअर्थात्गीदड़होनाश्रेष्टहै । परन्तुवनितादिविषयोंसेहीन मोक्षमाननेयोग्यनहीं॥१॥किंवा। यदियह यात्माहीपुरुषार्थरूपहोतो 82 अक्केचेन्मधुविंदेताकमर्थपर्वतंव्रजेत् । इष्टस्यार्थस्यसंप्रप्ताकोविद्वान्यनमाचरेत् १॥ अ० ॥ यदिअपनेगृहकेकोनेहीमधुप्राप्तहोतोयहपुरुपपर्वतपर किसलियेगमनकरे किंतुनहींकरता ॥ तैसेयनसेविनाहीवांच्छितअर्थ केप्राप्तहुएकौनविद्वान्यनकरे किंतुनहींकरता ॥१॥ इसन्यायसेप्रयत्न विनाहीप्राप्तजोरपनायात्माहै तिसकोत्यागकरविपयजन्यसुखकेलोभ सेमनुष्य किसलिये प्रयागादितीर्थों में प्राणों का त्याग करते हैं याते प्रयागादितीर्थों में मरनेके यर्थजोतिनकी प्रवृत्तिहै ॥ वहात्माकीयपुरुषार्थरूपताकोबोधनकरतीहै । इसकारणसेयात्मा उपादेयनहीं ॥ शंका ॥ तिनकीमरणमेंप्रवृत्तिमात्रप्रमाणरूपनहींहो सकती ॥ क्योंकिप्रमाणमूलकप्रवृत्तिकोहीप्रमाणरूपताहै अन्यथा अतिप्रसंगहोगा ॥ अर्थात्प्रवृतिमात्रकोप्रमाणतामानेहुए जलार्थी पुरुषकीमरुस्थलमेंजोभ्रमसेप्रवृत्तिहोतीहै।तिसकोभीप्रमाणताहुईचाहिये औरप्रयागादितीर्थो जाकरप्राणत्यागनेमेंकोईप्रमाणभीनहींहै । क्यों कियात्महननकानिषेधकरनेवालेशास्त्रकाविरोधहै ॥ समाधान ॥ प्रयागादिकोंमेंप्राणत्यागकरनेवालेपुरुषभ्रांतनहीं हैं । क्योंकिशास्त्र नेहीप्रयागादिकों मेंमरणकाअनुमोदनकियाहै ।।

उत्तराई २६५ नलोकवचनात् तातनवेद वचनादपि । मतिरुत्क्रमणीयाते प्रयागमरणप्रति ॥ १॥ अहिप्यारेलोकोंकेकथनसेतथावेदकेवचनसेमीतुमकोप्रयाग मेंमरणेकीबुद्धित्यागकरनेयोग्यनहीं । किंतुअवश्यप्रयागौमाणोंका त्यागकरना ।। इति ।। केवलशास्त्रहीप्रयागमेंमरणकायनुमोदननहीं करता किंतुलोकभीइसकायनुमोदनकरतेहैं । औरयात्माकेहननका निषेधकरनेवालेशास्त्रकाभीविरोधनहीं।क्योंकिसिसयात्महननकेनिषे धकशास्त्रकोउत्सर्गतायर्थात्गौणताहै। पौरप्रयागादिकों मेंमरणको कथनकरनेवालाशास्त्रयपवादरूपहै । औरविशेषशास्त्रसेसामान्य शास्त्रकावाधहोजाताहै । यातेकिंचित्भीविरोधनहीं। तिसीसेयात्मा पुरुषार्थरूपनहीं। किंतुविपयजन्यसुखहीपुरुषार्थरूपहै । यहसिद्ध हुया ॥ इति ।। अथदुःखाभावकीपुरुषार्थ रूपताकानिरूपण औरदुःखाभावभीलोकप्रवृत्तिसेवात्माकीअपेक्षाकरपुरुषार्थरूप है। अबइसीकोस्पष्टकरतेहैं । कुष्टादिरोगयुक्तमनुष्यदुःखाभावका उद्देश्यकरकेप्राणत्यागकरतेहैं । यहवासर्वलोकमें प्रसिद्ध है । याते दुःखाभावभीसुखकीन्याईपुरुषार्थरूपहै । श्रात्मापुरुषार्थरूपनहीं ॥ शंका ॥ हेवादिन्यात्माकी अपुरुषार्थरूपहोनेसेतोक्या? अनात्माही पुरुषार्थरूपहै। समाधान ॥ अनात्माहीपुरुषार्थरूपहोइसमेंक्यासंशय ॥ शंका ॥ यदिधनात्माकोहीपुरुषार्थरूपमानोगे। तोयनात्मपने कीतुल्यतासेदुःखादिकभीपुरुषार्थरूपहुएचाहिये । समाधान ॥हे: सिद्धांतिन् । सुखतथादुःखाभावयौरइनकेसाधनपुत्रस्त्रीगृहक्षेत्रपशु २६६ वे सिमुक भा० सुवर्णादिकजोहैं । तिनकोउपादेयत्वअनिंदितहै। औरदुःखादिक निंदितहोनेसेउपादेयनहीं हैं । शंका ॥ इसलोकतथापरलोककेसर्व सुखश्रौतिनकेसाधनोंकीउपादेयताकोजोअनिंदितपनाहै । वहअनि दितपनाक्या?पामरोंकीदृष्टिसेहै। अथवापरीक्षकोंकीदृष्टिसेहै । प्रथम पक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिपामरोंकीदृष्टिसेयनिंदितपनाकिसीअर्थ कासाधकनहीं । औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकिइसलोक तथापरलोककेसुखयौतिनकेसाधनोंकोत्यागकरपरीक्षकपुरुपयात्ममात्र काउद्देश्यकरकेश्रवणादिकों में प्रवृत्तहोतेहैं । इसकारणसेतिनकीदृष्टि करथनिंदितपनेकीययोग्यताहै ॥ समाधान ॥श्रवणादिकों में प्रवृत्ति वालेपुरुपपरीक्षककनहींकिंतुवहभ्रांतहैं। औरयदितुमऐसेकहो कितिन कीप्रवृत्तिभीश्रुतिमूलकहै भ्रममूलकनहीं । यातेवहपरीक्षकहें। तिन कोम्रांतियुक्ततुमकैसेकहतेहो तोहमभीयहकथनकरसकतेहैं । किपर लोककेसुखअर्थप्रवृत्तिभीश्रुतिमूलकहीहै ।भ्रममूलकनहींयातेनिंदित नहीं । यद्यपिऐसेमानेहुएयात्मातथासुखादिइनदोनोंकोहीपुरुषार्थ रूपताकहनेयोग्यहै । तथापि ॥ * बहुनामनुग्रहोन्यायः ॥ अ० ॥ बहुतोंकाअनुग्रहयुक्तहोताहै । इसन्यायसेपारलौकिक सुखादिकोंकेयर्थसाधनअनुष्ठानकरनेवालेबहुतहैं । तिनसेविरोधहुए दोवातीनपुरुषजो श्रवणादिसाधनोंकेयनुष्ठाताहैं। तिनकोनांतपना युक्तहै। औरतिनकीप्रवृत्तिकामूलभूतजोश्रुतिहतिसकोअन्यथर्थकीबोध कताहै । अर्थातदुःखाभावका उद्देश्यकरके श्रवणादिकों मेंप्रवृत्तिको २६७ उत्तरार्द्ध वहश्रुतिवोधनकरतीहै । यातेतिसकास्वार्थमेतात्पर्यनहीं । इसप्रकार। आत्माअनुपादेयःसुखदुःखाभावेतरत्वातदुःखादिवत्। इसअनुमानमें “पक्षतरत्व" कोउपाधिपनेकाअभावग्रौरतिसको वाधकरउद्भावितत्वकायभावइतनेग्रंथसमुदायसेस्थापनकिया।शंका । : आत्मापुरुषार्थःसुखरूपत्वात्। विषयानंदवत् ॥ अ० ॥ यात्मापुरुषार्थरूपहै ॥ सुखस्वरूप होने से जो जो सुखरूपहै सोसोपुरुषार्थरूप है । जैसे विषयानंदहै । इस प्रतिपक्षाऽनुमान के विद्यमानहुए पूर्वपक्षीका अनुमान सत्प्रति पक्षहोनेसेदुष्टहै । औरयात्माकीसुखरूपता सिमेंभीप्रसिद्ध है । क्योंकि ( विज्ञानमानंदब्रह्म ) इसश्रुतिमेंब्रह्मस्वरूप यात्माको यानंदस्वरूपकहाहै । यातेयात्माहीपुरुषार्थरूपहै ॥ समाधान ॥ हे सिद्धांतिनात्माकीयानंदरूपताकोश्रतिकथनकरो। परन्तुकथनमीत्र सेयात्माकीपुरुषार्थरूपता सिद्धनहींहोसकती क्योंकि पूर्वउक्तयुक्तिसे सुखरूपतानहींसंभवती ॥ शंका । मुखरूपताकेहुए फिरात्माको पुरुषार्थरूपताक्यों नहींसंभवती ॥ समाधान ॥ यात्माकोसुखरूपी मानेहुएक्या?वहयात्माहीस्वतंत्रपुरुषार्थरूपहै।अथवासुखरूपयात्मामें समवायसंबंधसेरहनेवालाकोईअन्यसुखबहपुरुषार्थरूपहै । इनमेंप्रथम पक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिसुखमात्रहीपुरुषार्थनहीं किंतुस्वसंबंधि रूपतासे तिससुखकोपुरुषार्थपनाहै । अन्यथाशत्रुकेसुखकोभीपुरु पोर्थरूपताप्राप्तहुईचाहिये। औरयभेदमेंस्वसंबंधिपनाभीनहींसंभवता। तिसकारणसेसुखरूपयात्मास्वतंत्रपुरुषार्थरूपनहीं । यातेप्रतिपनाउनु मानसाधुनहीं । औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता । जिसकारणसेसुख दे० सि. मु. भा० हीसुखका पुरुषार्थनहीं होसकता । क्योंकि सुखरूपयात्माकोस्व रूपसुखकरहीतृप्ति है । तिसकोऔरसुखविषयककामनाकी अयोग्यता है । यातेसुखरूपयात्माकायौरकोईसुखपुरुषार्थनहींसंभवता ॥शंका।। अात्माअनुपादेयहै यहयर्थतुमनेबहुतयुक्तियोंसेसिद्ध किया । और विषयानंदभीवहुतदुःखोंकरमिश्रतहोनेसेयनुपादेयही है। तैसेमानेहुए सुखकाउद्देश्यकरके यागादिसाधनोंमेंकोईभी पुरुषप्रवृत्तनहींहोगा ॥ समाधान ॥ ययापकाकथनसत्यहै जोसांसारिकसुखदुःखसेमिला हुआहै । तथापिपुर्वउक्तयुक्तिसेयात्मातोप्रथमअनुपादेयहीहै । याते अन्यगतिकेयभावसेसुखमैजिसप्रकारदुःखकासंबंधनहोतिसप्रकारपुरुषों कोयनकरनायोग्यहै। यौरदुःखकेसंबंधकामयहोनेकरसुखकात्यागकर नायोग्यनहीं । जैसेकोईकहेकि "भिक्षुकोंकेभयसेहमस्थालीनहीं अधिश्रयणकरते"अर्थात्पन्नहीनहींपकाते।सोयहकथनयुक्तनहीं क्यों कियनकापाकनहोनेसेमरणप्रसंगहोगा । तेसेहीजबदुःखया जायतो वहपरिहार करनेयोग्यहै तिसकेभयसेसुखकात्यागकरनाउचितनहीं । किंतुसुख उपादेयहीहै ॥ शंका ॥ आत्मावारेद्रष्टव्यःश्रोतव्योमंतव्यःनिदि ध्यासतव्यः । १० उ० अ० (६)बा० ५ ०॥६ इसवाक्यप्रथमग्रहणकियाजोयात्मदर्शनहै। तिसकाअनुवाद करकेश्रवणादिसाधनविधानकियेहैं। तिसवाक्यमयात्मज्ञानकोस्वतः. फल रूपता तो प्रतीत नहीं होती ॥ क्योंकि वह पुरुषार्थरूप नहीं औरमुमुक्षुकोतिसमेंअधिकारीहोनेसेमोक्षहीतिसकाफलहै।यहकथनभी नहींसंभवताक्योंकियात्माकेस्वरूपसेभिन्नमोक्षकायभावहै।ौरया २६६ उत्तराई मासेभिन्नमोक्षकोजन्यमानेहुएअनित्यपनेकीभीप्राप्तिहोगी।इसप्रकार श्रवणविधिकीयन्यथाऽनुपपत्तिसे आत्माहीपुरुषार्थरूपहै दुःखाभावा दिकपुरुषार्थरूपनहीं।। समाधाना। यात्मासेभिन्नहीपुरुषार्थश्रवणादि साधनोंकेयनुष्ठानकाफलहै। यात्मातिनसाधनोंकाफलनहीं।क्योंकिति सकोग्रजन्यहोनेसेयनित्यपनानहींहै। औरतिसकीअभावरूपताभीस्वी कारनहीं है।यातेयात्मासेभिन्न यात्यंतिकदुःखकीनिवृत्तिहीमोनहै।तिस केयर्थहीश्रवणादिविधिहै । इससेश्रवणादिविधियात्माकोपुरुषार्थरूप माननेसेविनायन्यथाही उपपन्नहै । इसप्रकारविपयानंदयौदुःखाभाव यहदोनोहीपरमपुरुषार्थरूपतासेउपादेयहैं ॥ श्रात्माउपादेयनहीं । यहयर्थसिद्धहुया ॥ इति ॥ २५ ॥ पूर्वपक्षकसंग्रहकाश्लोक दुःखाभावोनायमात्मा सुखंनापिसइष्यते । मुमुक्षुभिरवंतस्मादुपादेयः कथंभवेत् ॥ १॥ दो० ॥ दुखाभावनहियातमासुखपुन यहनहिहोय । तातेमुमुक्षुजननकरिउपादेय किमहोय ॥ १ ॥ * इतिपूर्वपक्ष ॥ अथसिद्धांत ॐ पूर्वपक्षकेअनुवादपूर्वक आत्माकीपुरुषार्थ रूपताका मंडन यहजोर्वपक्षीनेकहाथा । किथात्मायनुपादेयहै ॥ सुखतथा दुःखाभावसेअन्यहोनेसे । दुःखादिकोंकीन्याई । तिसमेंअन्यपदार्थों में जोअनुपसर्जनअर्थात्प्रधानहै । सोउपादेयहै । औरतिससेभिन्नको अनुपादेयताहै । औरयात्माभीमुखादिकोंका शेषहोनेसेउपसर्जनहै। यातेअनुपादेयहै । इसकथनको दूपितकरनेकेलियेसिद्धांतीइसमें वे० सि० मु० ० २७० अनेकहेतुयोंको संग्रहकरताहै ॥ मू०। यात्मासर्ववस्तूनांयदर्थसकलंजगत् । आनंदाधिःस्वतंत्रोसावनादेयःकथंवद ॥२६॥ दो० ॥ सकलवस्तुकोयातमा जाहिलियेजगहोय । यानदसिन्धुसुतंत्रसो ताहि त्यागकतहोय ॥ २७ ॥ टी०॥ हेवादिन्वयात्मायनुपादेयहै यहतुमनेकैसेकथन किया सोतुमकहो ॥ शंका हेसिद्धांतिन्इसयर्थमें कौनसीयनुपपत्ति है जिसकारणसेपूर्वउक्तयनुमानसे यहयर्थसिद्धहैयर्थात् अात्मायनु पादेयह ॥समाधान। हेवादिन्यात्माकोअनुपादेयत्वनहींसंभवता । क्योकियहात्मा “स्वतंत्रहे" अर्थात् यन्यसर्वपदार्थों में प्रधानहै । तैसेमानेहुएपूर्वउक्तअनुमानमेंघाधप्राप्तहुया । यहभावहै ।। शंका ।। यात्माकोसर्वसेप्रधानयापकैसेकहतेहो ॥ जिसकारणसेसर्वयात्मादि पदार्थसुखतथा दुःखाभावकेशेषहैं ॥ समाधान ॥ हेवादिजिसके अर्थसकलजगतहै सोयात्माहीप्रधानहै । तात्पर्ययह । किजवसर्व हीजगत्यात्माकेयर्थहुया यात्माकाशेपहैतोजगत्काएकथंशरूपजो सुखतथादुःसाभावहैं । तिनकोग्रात्माका शेपहोनेमक्याहीकथन करनाहै । यहयर्थअभियुक्तपुरुषोंनेभीकहाहै ।। (सुखंचपुरुपार्थत्वात्य०। सुखतथादुःखाभावात्माकेयर्थ होनेसेयात्माकाशेषहैं ।। इति ॥ औरयात्मासेभिन्नसकलपदार्थोंको 'परायंत्व" अर्थात्यात्माकाशेषपनाहै । इसप्रकारवैशेषकादिकभी कहतेहैं ।। तिसकारणसेसर्वजगत्यात्माकेअर्थहै ॥ किंवा सुखदुःखा भावेतरत्व" हेतुभीस्वरूपाऽसिद्धहै।। क्यों किययात्मा (ग्रानंदाब्धिः) में २७१ उत्तरार्द्ध निरतिशयसुखकासमुद्रहै । अर्थातनिरतभ्यसुखस्वरूपहै । यतिस यात्माकीदुःखाभावरूपताकोकथनकरतेहैं ॥ औरजो घटादिकसर्व पदार्थोंका (यात्मा) स्वरूपहै । तिससेभिन्नकरकेघटादिकोंकोकोईभी निरूपणनहींकरसकता । इसीसेवयसत्हैं ॥ तिससेभिन्नग्रसत्का जोग्रभाववहसत्रूपहीहै । जैसेकल्पितसर्पकायभावसत्रज्जुरूपहै। थौरथभावकेयभावको भावरूपताहीस्वीकारहै ॥ औरभावरूपसव पदार्थहीयात्माहै । इसप्रकारकल्पितदुःखकायभावयात्मारूपहोनेसे आत्माहीदुःखाभावरूपहै ॥ यातेकिसमकारतुम्हारायनुमानस्वरूपा सिद्धनहीं किंतुस्वरूपाऽसिद्धहै ॥ २६ ॥ यवकारिकाकेपथमपादका अर्थउपपादनकरतेहैं ।। मू-यदन्यत्वस्तुतत्सर्वंयद्भेदेनरभंगवत् । सत्तासर्वपदार्थानामनादयःकथंवद ॥२७॥ स्वैयाछंद-तंतु भिन्न कीये जिम पटको रूपनकिंचित होवत भान । मृदजन मृदसे होत किनारे तुच्छ रूपहोवत हियजान । तिम यह विश्व यात्मते न्यारो बंध्यासूनुतुल्य पहचान । सकलपदारथकी जो सत्तायनादेयसोकहविधगान।।२८॥ टी०॥जिसमात्मासेभिन्नरूपताकरवादियोंनेजोपटादिपदार्थस्वी कारकियेहैं।वहसर्वहीजिसथात्मासेभिन्न कियेहुएनर,गकेसमानथसत् होजातेहैं ॥ इसीसेसर्वघादिपदार्थोकायामाहीवास्तवस्वरूपहै । और यात्माकोहीसर्वपदार्थोकास्वस्वरूपमानेहुए अपनेस्वरूपविषयक सर्वकोही प्रेमहोताहै।यातेवहयात्माहीपुरुषार्थरूपतासेउपादेयहै। वह श्रनुपादेयतुमकिसपकारकहतेहो॥२७॥ श्रवकारिकाकथनकीयेहुए - २७२ ०सि० मु० भा० "स्वतंत्र" पदकाव्याख्यानकरतेहैं । मृ०-यहशेप्राणिनःसर्वेब्रह्मादयःकृमयश्चये। ईशानःसर्वभूतानामनादेयःकथंभवेत् ॥२८॥ यच्चनःसर्वभूतानांमनसोयन्मनोविदुः । यज्ज्योतिज्योतिपांदेवोनोपादेयःकथविभुः॥२६ स्वै-ब्रह्मातेकृमिलौ जग जेतो जांके वशमें वरतेनीत । सर्वविश्वकोईशयहैजोताकोत्यागनकोनेरीत ।। सर्वभूतकोचनुजोहैमनकोमनश्रुतिभापेगीत ॥ ज्योतिनकाज्योतीहैजोऊअनादेयसोकिसविधकीत ॥२६॥ टी० ] शंका ॥ जोसत्तास्फूर्ति देनेवालाहो वह अधिष्ठान होता है । यन्यनहीं। और ईश्वरही सर्वकोसत्तास्फूर्ति देताहै । याते वही अधिष्ठानहै अात्मा अधिष्ठान नहीं । इस से प्रात्मा घटादिपदार्थीकोंकैसेसत्तास्फूर्ति देनेवालाहोगा । समाधान || हेवादिन्यात्माहीअज्ञानके वशसेईश्वररूपताकोप्राप्तहोताहै। इसी अभिप्रायसेयहकहाहै । ब्रह्मासेलेकरकृमिपर्यन्तसर्वप्राणीजिसके श्राधीनततेहैं औरसर्वभूतोंकाजोनिपता है यहात्मासेग्रनुपादे यहोसकताहै किंतुनहींहोसकता ।। २८ ॥ अवसत्तास्फूर्तिप्रदत्वरूप अधिष्ठानताकस्फुटकरनेकेलिये तिसयात्माकी प्रकाशकरूपताको कहतेहैं । औरजोयात्मासकलभूतोंका नेत्रयर्थात्प्रकाशकहै । और मनकाभीजोमनअर्थात्साक्षिरूपहै ऐसेजिसकोब्रह्मवेत्ताजानतेहैं । औरसूर्यादिकज्योतियोंकाभी ज्योतियर्थात्प्रकाशकहै । वहस्वप्रका शव्यापकयात्माकैसे उपादेयनहींकिंतुवही उपादेयहै ( २९ ) अब . उत्तराई कारिकाजोयानंदाब्धिपदहै तिसकीव्याख्याकरतेहैं । मू०॥ मोदप्रमोदपक्षाभ्यामानंदात्मातमोगतः। जीवयत्याखिलाल्लोकाननोपादेयःस्वयंकुतः३० यस्यानंदसमुद्रस्य लेशमात्रजगत्गतम्। प्रसृतंब्रह्मलोकादौ सुखाधिकःपरित्यजेत्॥३१॥ स्वैगा तमउपाधियुतहोकर अात्मप्रिपुनमोदप्रमोदहहोय । अखिललोकजीवावनकर्ता ताकोत्यागकहोकिमहोय ।। जासुखसागरकीइकविंदू पसरीतीनलोकमेंजोय । ब्रह्मलोकादिमेंपुनपसरी यससुखसागरतजेनकोय ॥३०॥ टी० ॥ श्रानंदस्वरूपयात्माही अज्ञानउपहितहुयाप्रिययौरमो दतथाप्रमोदादि रूपशिरतथा पक्षादिकल्पनाकोप्राप्तहोताहै । यहांइष्ट वस्तुकेदर्शनसेजोयानंद होताहैतिसकोप्रियकहतेहैं । यौरइष्टवस्तुके लाभसेजोयानंदहोताहै । तिसकोमोदकहतेहैं । औरइष्टवस्तुकभोग संजोयानंदहोताहै । तिसकोप्रमोदकहतेहैं । सामान्यसुखकोयानंद कहतेहैं । औरजोग्रात्मासर्वमाणिमात्रको स्वस्वरूपसुखकीमात्राको देकरजीवावताहै ।। अर्थात्सुखयुक्तकरताहै वहयापअनुपादेयकेसे होसकताहै ।। ३० ॥ इसकारिकाकेउत्तरार्द्धका यर्थहीउत्तरकारिका में स्पष्टकरतेहैं । जिसयात्मानंदरूपसमुद्रका लेशमात्रयानन्दसकल जगतमयनुस्यूतहै । गौरब्रह्मलोकादिकोंमेंजो थानंदलेशव्याप्त होरहाहै । ऐसेयानंदकेसमुद्रयात्माकोकौन बुद्धिमानत्यागकरसकता हैकिंतुनहींकरसकता॥३१॥यश्यात्माकीसुखरूपतामैयौरहेतुकहतेहैं। मू०॥ हैरण्यगर्भमैश्वर्ययस्मिन्दृष्टेतृणायते।

२७४ दे०सि० मु: भा० सीमासर्वपुमर्थानामपुमर्थःकथंभवेत् ॥ ३२॥ यत्कामाब्रह्मचर्यंत इंद्रादयःप्राप्तसंपदः । स्वस्वभोगत्यजंत्येवमपुमर्थःकथं नृणाम्॥३३॥ स्वै-जिसकेदेखेब्रह्मलोकगतजोऐश्वर्यसुतृणवत्होय । सबपुरुपास्थकीजोअवधी कहोदुःखतामेकिमुहोय । धारपुरंदरजांकीवाच्छास्वर्गभोगदीनेसवखोय । ब्रह्मचर्य्यतनधारनकीनो कहोदुःखमैकैसे होय ॥३१॥ टी० ॥ जिस ग्रानंदस्वरूपयात्माकेसाक्षात्कारहुएहिरण्यगर्म कीविभूतिशुष्कतृणकेसमानभासतीहै। औरजोसर्वपुरुषार्थोंकीअवधि है । वहयात्मायपुरुषार्थरूपकैसेहोसकताहै किंतुनहींहोसकता३२॥ शंका ॥ यात्मासकलपदार्थोकीयवधिहै ॥ ययापनेकैसेकहा ॥ क्योंकि (इदिपरमैश्वर्ये) अ० इदिधातुपरमैश्वर्ययर्थ है । इसपाण निमुनिकीस्मृतिसेइन्द्रादिकोंकीसंपदाहीपरमपुरुषार्थरूपहै श्रात्मापरम पुरुषार्थरूपनहीं। तात्पर्ययह इदिधातुसेइन्दशदसिद्धहोताहै।इसलिये परमऐश्वर्यवानइन्द्रशदकायर्थहै। यातेतिनकीसंपदाको परमपुरुषार्थ रूपताकाकथनसंभवताहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन जिसमात्माकी कामनाकरकेइन्द्रादिकमहानसंपदाकीप्राप्तिवालेहुएभीब्रह्मचर्यकोधारण करतेहुएयपनेअपनेभोगोंको त्यागतेभये यहवार्ता मघवान्प्रजापतौब्रह्मचर्य्यमुवास। छां० अ०(८)खं०(१०)क०(३) अ०॥इन्द्रब्रह्माजीकेसमीपब्रह्मचर्यव्रतकोधारणकरनिवासकरता भया । इसश्रति प्रसिद्धहै। जबइन्दादिकभीतिसयात्माकोपरमपुरु पार्थरूपमानतेहैं।।तोमनुष्योंकोयहयात्मापुरुषार्थरूपकैसेहोसकताहै उत्तराई २७५ किंतुनहींहोसकता ॥३३॥ शंका ॥ यदि यात्माहीपरमपुरुषार्थरूप है. तोस्वतःप्राप्ततिसयात्माको त्यागकरस्वर्गादिसुखकेयर्थसाधनों काविधानवेदनेक्योंकियाहै। इससेप्रतीतहोताहै किथात्मापुरुषार्थरूप नहीं ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यहशंकाभीनहींसंभवतीक्योंकि- मू० यदिदृक्षाफलाःसावैदिक्योविविधाक्रियाः। यागाद्याविहितास्तस्मिन्नुपेक्षावदतेकथम्॥३४॥ यद्दृष्टिमात्रतःसर्वाःकामाद्याःदुःखभूमयः । विनश्यंतिक्षणेनासावुपादेयःकथंनते ॥३५॥ स्वै० ।। वेदविहितशुभकर्मनकोफल जाहिदरशकीप्यासाचीन । ताकेविपेत्यागकीइच्छा कहोकौनकरसकेपवीन । कामादिकसबदुरसकेकारन जांकेदर्शनहोवतछीन ।' सोयानंदस्वरूपीयात्म उपादेयतुमकथनकीन ।। ३२ ।। टी० ॥ जिसथात्माकेदर्शनकीइच्छाही नानाप्रकारकीवेदोक्त सर्वयागादिविहितक्रियायोंकाफलहै । सोतिसयात्मामेंतुमकोउपेक्षा बुद्धिकैसेहुई है । यहतुमकहो । तात्पर्ययहकि- * तमेवेदानुवचनेन 3 (पृ० उ० अ०६ग्रा०५ फं० २२) इत्यादि श्रतिकेवलसेविहित यागादिकियाका अंतस्करणकी शुद्धिद्धारायात्मजिज्ञासाहीफलहै । स्वर्गादितिसक्रियाकाफलनहीं। और स्वादिकोंका जोफलरूपतासे श्रवणहै वह अज्ञानीपुरुषोंको प्ररोचनकरनेके लियेहै। अर्थाततिनसेनिपिद्धकर्मोंका त्यागकराकर शुभकर्मों में प्रवृत्तिकेयर्थवेदतिनकोस्वर्गादिकोंकालोभदिखलाताहै ॥ यदिऐसेनमाने ।। तोसर्वप्रकारसेसत्यवादीयोरसकलयर्थकामकाशक .

२७६ व०सि० मुः भा० जोवेदवहक्षीणता तथानित्यत्वादिदोषयुक्तहोनेसेअपुरुषार्थरूपजो स्वर्गादितिनकाउद्देश्यकरकेयागादिकोंकोकैसेविधानकरेगा ।। किंतु नहींकरेगा ।। तिसकारणसे अज्ञजनोंके प्ररोचनमर्थहीस्वर्गादिकोंका श्रवणहैफलकेयर्थनहीं। यातेकोईविरोधनहीं॥३॥ शंका स्वर्गादि कोंकाश्रवण यज्ञजनोंकीकर्मों में रुचिकरानेकेलियेहै यहकथनश्रयुक्त है। क्योंकिवात्मजिज्ञासाकोतोफलपनाअंगीकारनहीं।यौरयात्माभी यागादिक्रियाकाफलनहीं।क्योंकिवहयजन्यहै।ौरयात्माकाअनुभव भीफलरूपनहीं। क्योंकितिसकोमोक्षकासाधनहोनेसेस्वतःफलपनेका अभावहै । और आत्मजिज्ञासाकाभीज्ञानमात्रही फलहै वहस्वतः आपफलरूपनहीं । इसप्रकारयात्मादिसर्व पदार्थोंकोफलपनेकाअभाव होनेसे परिशेपसेस्वर्गादिकही यागादिक्रियाकाफलहैं । श्रन्यनहीं ॥ समाधान ॥ हेवादिन ॥ * यतोज्ञानमज्ञानस्यैवनिवर्तकम् , अ० ॥ जिसकारणसेज्ञानयज्ञानमात्रकाहीनिवर्तकहै । इस वचनसेब्रह्मज्ञानसे अज्ञानकेनिवृत्तहुए अज्ञानमूलकजोकामादिकदुःख केकारणवहभीसकलनिवृत्तहोजातेहैं । तिनकीनिवृत्तिकोयात्मरूपहो नेसेयात्माहीपरमपुरुषार्थरूपहै वहतुझकोकैसे उपादेयनहीं ।। याते स्वर्गादिकोंकाश्रवणयज्ञजनोंकेप्ररोचनयर्थहीहै । फलार्थनहीं ॥३५ पूर्व (मोदप्रमोदपक्षाभ्यां) इसकारिकामेंथात्माकीसुखरूपतामें-- तस्यप्रियमेवशिरः ते० उ० ५० ० अनु० ५६ श्र० ॥ तिसयानंदमयपक्षिरूपयात्माका प्रियवृत्तिरूपहीशिरहै इत्यादिश्रुतिवाक्यप्रमाणरूपतासेकथनकियेहैं । अवसुषुप्तिसेउठेहुए उत्तरा पुरुषका (सुखमहमस्वाप्सम्) इसपरामर्शकरसिद्ध जोसुषुप्तिकालीन अनुभववहभीयात्माकीमुखरूपतामेंप्रमाणहै यहकहतेहैं । मू० ॥ अहलादरूपतायस्यसुषुप्तेसर्वसाक्षिकी। तत्रोपेक्षाभवेद्यस्यतदन्यःस्यात्पशुःकथम्।३६। स्वै० ॥ सुखसरूपताजांकीसवको सुपपति माहिहोतहैभान । तांकोत्यागकरनजोचाहत तांतेयधिकपशूकोयान । याते परमानंद रूपमें परंप्रेम को नीके ठान। वैसाक्षात रिदमोतबही नाशहोतसंसृतदुखखान ॥३३॥ टी० ॥ हेवादिन जिसमात्माकीआनंदरूपतासुपुप्तिमेसर्वप्राणि योंकेअनुभवसिद्धहै। तिसयानंदसमुद्रमें जिसकोउपेक्षाबुद्धिहुई है ।। तिससे अधिक और कौनपशुहै ।। अब ग्रात्माकी पुरुषार्थरूपताको विस्तारसेनिरूपणकरतेहैं॥ * अथात्माकोसर्वशेषित्वनिरूपण पूर्वपक्षमेंआत्माविषयक अनुपादेयताकी सिद्धिकेलिये तिसका प्रतियोगिरूपताकरजोवादीनेइतरानुपसर्जनत्वरूपउपादेयत्व निरूपण कियाथा । वहहमकोभीस्वीकारहै । यद्यपिऐसामानेहुएपूर्वउक्तअनु मानमेंअनुपादेयत्वसिद्धहुया । तथापिवहइतरानुपसर्जनत्वरूपउपा देव यात्मामें ही विश्रांतिको प्राप्त होताहै ।। अन्यमेंनहीं इसीअर्थ कोस्पष्टकरतेहैं । स्रग्वनितादिक विषयजो सुखके साधनहें । प्रथमवहविषयसुखकेशेपहैं । औरसर्पकंटकादिकोंकाजोपरिहारहै वह दुःखाभावकासाधनहोनेसेदुःखाभावकाशेपहै ॥ औरसुखतथादुःखा भावात्माकेयर्थहोनेसेयात्माकेशेषहैं। यातेपरिशेपसेयात्माहीसर्वमें बे० मि० मु०, भा० प्रधानहैसुखादिकनहीं ॥ शंका । यदिग्रात्माहीपुरुषार्थरूपहै । तो सुखादिकों में पुरुषार्थत्वकाकथनक्योंहोताहै ।। समाधान ॥ हेवादिन यात्माकाशेपहोनेसेहीसुखादिकों में पुरुषार्थत्वकाकथनहै । स्वतःतिन मेंपुरुषार्थत्वरूपताकाकथननहीं । तिसकारासेयात्माहीपरमपुरुषार्थ रूपहै यहसिद्धहुया । औरयात्माकोपुरुषार्थत्वकेकथनसेयनुपादेय वकासाधक अनुमान बाधितहै वहभाव सूचनकिया ॥ शंका ॥ यात्माकोसुखादिकोंका अधिकरणहोनेसे सुखतथादुःखाभावके प्रति तिसकोकारकपनाहै।इसनेसुखादिकोंकाशेपत्वहीयात्मामेंयुक्तहै।विपरीत पनायुक्तनहींयर्थात्यात्माशेपिनहींहोसकता ॥ समाधान ॥ अथआत्माममुखतथादुखाभावरूपताकानिरूपण हवादिन्भेदमेंहीयधारयोग्राधेयभावहोताहै।यौरसुखादिकोंका श्रात्मासे भेदनहीं है। क्योंकिसुख तथादुःखाभावस्वरूपहीयात्माहै । यात्मातथासुखादिकोंकेभेदकायभावहोनेसे ग्रात्मातिनकाशेपकैसेहो सकताहै। और सुखतथादुःखामावेतरत्व" रूपहेतुभी यात्मारूपपक्षमें नहींवर्तता । यातेपूर्वउक्तअनुमानस्वरूपाऽसिद्ध है ।। शंका ॥ यात्मा सर्वपदार्थोंकोसत्तातिदेनेवालाहै । वहयापयसत्रूपयर्थातदुःखा भावरूपकैसेहोसकताहै ।। समाधान ॥ हेवादिन्भावरूपयात्माको दुःखाभावस्वरूपताकीग्रनुपपत्तिनहीं । क्योंकिदुःखयात्मामेंकल्पित है। इसीसेतिसकायभावात्मासेयतिरिक्तनहीं। यहपूर्वउक्तदोपतव होसकताहै।यदिदुःखात्मापारमार्थिकहो।सोऐसेतोहैनहीं।किंतुदुःख यात्मामेंयारोपितहै ॥शंका।। दुःखएकरणहै । औषहवाधितहोने सेकल्पितनहीं किंवाायारोपमेंयारोप्यतथायधिष्ठानकासादृश्यकारण उत्तराई देखाहै । औरयात्मामेतिसदुःखकासादृश्यनहीं। क्योंकिवहदोनोंही निरवयवहैं ।किंवा। भ्रमकालमेंयधिष्ठानविशेषरूपसेयज्ञातकहनेयोग्य है । औरयहांप्रकरणमेंदुःखकी प्रतीतिकालमेंयात्माविशेषरूपसेअज्ञात नहीं। किंतु “ग्रहमस्मि" इसप्रकारकीतिसकीविशेषरूपसेप्रतीति होतीहै। यातेदुःखकायात्मामेंयारोपकैसेहोसकताहैकिंतुनहींहोसकता समाधान ॥ हेवादिन्यहपुरुषअपनेयात्मामेंदुःखोंकेसमूहकाकेवल आरोपहीकरताहै ॥ यद्यपियारोपकाहेतुयात्मातथादुःखकासादृश्य यहांनहीं।तथापियारोपसेव्यभिचारीजोसादृश्यतिससेक्याप्रयोजनहै।। शंका । यदिसादृश्ययारोपमेंकारणनहीं। तोयारोपकाकौनकारण है। औरयदियज्ञानमात्रकोदुःखकेयारोपमेंयसाधारणकारणकहोगे। तोसुषुप्तिमेंभीदुःखका आरोपहुथाचाहिये । क्योंकिग्रज्ञानतहांभी विद्यमानहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन्शरीरादिद्वाराही अज्ञानकोदुःख कीकारणताहै सोदिखलातेहैं ॥ अज्ञानरूपीएकसर्पहै । औरज गुणतथातमगुणकी प्रधानताहीतिसकाफणयर्थात् मुखहै । तिसमें देहादियभिमानलक्षण विषधरदाड़ेंहैं ।। औरतिनकेयरवर्तिरागबेप रूपीहलाहलविपकीज्वालाहै । तिसविपके प्रवेशसेजिसकीस्वरूप दृष्टिमतिवद्धहोगईहै ।। वहपुरुषस्वस्वरूपयात्मामेंरौरवादियनेकभेदों करभिन्नजोनरकोंकासमूह तिससे उत्पन्नहुए दुःखोंकेसमुदायको केवलयारोपहीकरताहै जैसेतमरहितयादित्यभगवान्में प्रतिवद्धदृष्टि वाले उल्लुकादिकतमकाकेवलयारोपकरतेहे ॥ शंका ॥ जोवस्तु जिसमेंवास्तवसे नहोवह तिसमेंयारोप करनेयोग्यहै औदुःखकोतो गुणरूपताहोनेसेएक यात्मामेंहीसमवेतपनाहै । यातेतिसयात्मामेंही ३२० ०सि० १० मु० भां० तिसदुःखका यारोपकैसेहो सकताहै ॥ समाधान ॥ हे वादिन गुणरूपहुअाभी दुःखथात्मामें समवेत नहीं । क्योंकि “ मेरेपाद मेंदुःखहै" ॥ इसप्रतीतिसेपादयाश्रित दुःखप्रतीतहोताहै ॥ अथवा दुःखकोअंतस्करणका परिणामहोनेसे वहयतस्करणमेंसमवेतहै । यातेयात्मामेंदुःखका अत्यंताभावहै । औरयात्मामेंदुखकासमवाय मानेहुए ( केवलोनिर्गुणश्च ) इसश्रुतिकाविरोधभीप्राप्तहोगा। तिसी कारणसे दुःखाऽत्यंता भावके अधिकरण यात्मा में अज्ञानके वशसे हीदुःखकायारोपहोताहै यहकथनसमीचीनहै ।। शंका । यद्यपिपूर्व उक्तप्रकारसेदुखयारोपितहो । तथापियात्मातिसदुःखकायभावरूप किसकारणसेहै। क्योंकिवहभावरूपहै।। समाधान ॥हेवादिन्कल्पित वस्तुप्रतियोगिकजोअभावहोताहै वहयधिष्ठानसे भिन्ननहींहोता ॥ क्योंकि अधिष्ठानसे अभिन्नरूपताकरही यारोपित प्रतीतहोताहै ॥ और अधिष्ठानरूपताकल्पितनहीं है । तिसकोसत्यहोनेसेअकल्पितपना है ॥ शंका ।। यदिदुःखादिजगत् अधिष्ठानरूपतासेकल्पितनहीं तो किसरूपतासेवहकल्पितहै ॥ समाधन ॥ श्रात्मासेभिन्नअनात्माजो दुखादिहैततरूपतासेहीजगत्कल्पितहै ॥शंका।। सत्रूपयात्मासेभिन्न होनेकरदुःखादियारोपितहों।परन्तुतिससेक्यासिद्धहुया॥समाधान ॥ हेवादिनसत्रूपयात्मासेभिन्नकीयेहुए दुःखादिकोंको असत्रूपता सिद्धहोतीहै ॥ शंका ।। दुःखादियसवरूपहों तिससेयापकोक्या लाभहुया । समाधान ॥ हेवादिनअभावकायभावभावरूपहोताहै। इससेअसतदुःखकाग्रभावसत्यात्मरूपहोताहै । यहयर्थहमकोलाभ हुथा ॥ शंका ॥ दुःखाभावरूपताकरयात्माकोपरमपुरुषार्थरूपता उत्तराई । २९१ सिद्धकियेहुएयापकोअपसिद्धांतप्राप्तहोगा । अर्थात्यापकेसिद्धांत कीहानिहोगी । क्योंकिसुखरूपतासेहीतिसयात्माकोपुरुषार्थरूपता प्रापमानतेहो ॥ समाधान | (तुष्यतुदुर्जनः)इसन्यायसेसिद्धांत केसाथविरोधनहीं आता। क्योंकिजोवादीदुःखाभावकोहीपरमपुरुषार्थ रूपमानतेहैं। तिनकोभीथात्माहीपरमपुरुषार्थरूपमाननाचाहिये। जिस कारणसेवहयात्माहीदुःखाभावरूपहै ॥ शंका ॥ सकलसंसारकी निवृत्तिकानामपरमपुरुषार्थहै । केवलदुःखमात्रकीनिवृत्तिकानामपरम पुरुषार्थनहींकहसकते । क्योंकिवहसंसारकाएकदेशहै ॥ समाधान ।। हेवादिन्तिसदुःखकी निवृत्तिकोही सकलसंसारकी निवृत्तिरूपताहै । क्योंकिएकविंशतिप्रकारकेदुःखनकीनिवृत्तिपरमपुरुषार्थरूपमानी है ॥ औरसंसारभीएकविंशतिदुखनसे भिन्ननहीं । किंतुएतवरूपहीसंसार है। यातेकोईविरोधनहीं ॥ शंका ॥ यदिशात्माहीदुःखाभावरूपहै। तोतिसकोथकार्य्यताहोनेसेअसाध्यताहै । यातेतिसकोपुरुषार्थरूपता कासंभवकैसेहै । क्योंकिपुरुपतिसीयर्थकीवांच्छाकरताहैजोयसिद्धहो सिद्धपदार्थकीकोईभीवांच्छानहींकरता।) समाधान ।। हेवादिनसाध्य त्वपुरुषार्थताकाप्रयोजकनहीं।क्योंकिसाध्यपदार्थकोतीणतादिदोपयुक्त होनेसेहेयताहै । औरभाष्यकारश्रीशंकराचार्योनेसाध्यरूपतासेपुरुषार्थ पनेकानिपेधभीकियाहै।यातेयात्माहीपुरुषार्थरूपहै।शंका ।। यात्मस्व रूपदुःखाभावकोयनादिहोनेसेस्वतःसिद्धताहै । तिसकीसिद्धिकेलिये मुमुक्षुपुरुषोंकीसाधनोंमेंप्रवृत्तिनहींहोगी। क्योंकिसिद्धपदार्थकंसाधन कीययोग्यताहै ।। समाधान ॥ हेवादिनमोक्षकाउद्देशकरकेमुमुनु पुरुषसाधनों मेंप्रवृत्तहोताहैयहतुमकहतेहो।अथवाब्रह्मात्माकेसाक्षात्कार २८२ वे० मि. मु० भा० काउद्देशकरकेप्रवृत्तहोताहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकिश्रवणा दिसाक्षातमोक्षकेसाधनहैं। इसअर्थमेंकोईप्रमाणनहीं । यौरद्वितीय पक्षमेंभीयहविचारकर्तव्यहै।क्या?वहसाक्षात्कारसिद्धहैवानहीं । प्रथम पक्षकहोतोहमकोभीस्वीकारहै ।क्योंकिब्रह्मसाक्षात्कारसे यनंतरसाधनों मेंप्रवृत्तिनहींसंभवती।जिसकारणसेसाधनोंकाफल ब्रह्मसाक्षात्कारतिस कोप्राप्तहै । यौस्यदिद्वितीयपक्षकहोतोसाधनों मेंप्रवृत्तिसफलहै । क्यों किप्रथमब्रह्म साक्षात्कार थसिद्धहै। जबपुरुषसाधनों प्रवृत्त होताहै। तर सकल दुःखोंकायभावरूप जोब्रह्मात्मा तिसका साक्षात्कारसिद्ध होताहै । तिस कारणसे साधनोंमें प्रवृत्ति फलवाली है ॥ शंका ।। श्रात्मसाक्षात्कार के होने से मुमुनु की प्रवृत्ति फल वाली है । यह जो सिद्धांतीने कहा सोयसंगतहै । क्योंकिवहसाक्षात्कारवृत्ति रूपहै। अथवा चैतन्यरूपहै। यह कहनेयोग्यहै। यदिप्रथमपनकहो तोतिसकोफलपनेकी अनुपपत्तिहै । क्योंकि वृत्तिकोयारोपितहोने करमिथ्यापनाहै।ौरतिसकोसत्यमानेहुए द्वैतापत्तिभीहोगी । और द्वितीयपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकिस्वरूपचैतन्यकोयजन्यहोनेकर फलपनकायसंभवहै । इसप्रकारात्माकी न्याईज्ञानभीसाध्यनहीं। यातसाधनों मेंमुमुत्तुकी प्रवृत्तिनहींसंभवती ॥ समाधान ॥ हेवादिन वृत्तिमिथ्याहे इसप्रकारकाज्ञानक्या?वाधकेउत्तरकालमें होताहै। अथवा बाधसेपूर्वकालमेंहोताहै । अंत्यपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकियह परामर्शज्ञानसेउत्तरकालमेंहोताहै । अप्रमात्वकोपरतोगाह्यताहोनेसे बाधसेविनातिसका मिथ्यात्वग्रहणकरनेकोकोईभीसमर्थनहींहोसकता। और प्रथमपक्षमेंतो हमारे इष्टकीसिद्धि है ॥ क्योंकि बाधसे उत्तर उत्तराई श्र "वृत्तिज्ञानमिथ्याहै"ऐसापरामर्शहमभीमानतेहैं। यौरवृत्तिज्ञानकोस्वतः फलपनानहीं किंतुअज्ञानकानिवर्तकहोनेसेतिसकोफलपनाहै। सो अज्ञानकानिवर्तकपना मिथ्यात्वग्रहणसेप्रथमहीतिसमेंसिद्धहै।पश्चात् तिसमेंमिथ्यात्वकाग्रहण अनुपयोगीहै । शंका) दुःस्वाभावभीकेवल पुरुषार्थरूपनह है।क्योंकिदुःखाभावकेनहुएअर्थातदुःखकेहुएभीपाका दिक्रिया भोजनजन्यसुखकेलोभसेपुरुषकी प्रवृत्तिदेखीजातीहै। और दुःखाभावत्वपुरुषार्थत्वकामयोजकअर्थात्यवच्छेदकभीनहीं। क्योंकि सुखमेव्यभिचारहै ॥ अर्थातसुखमेंदुःखाभावत्वकेअभावहुएभीपुरुषार्थ पनाविद्यमानहै। औरजोन्यूनयधिकदेशमेंवृत्तिनहोतिसीकोप्रयोजक कहतेहैं।। समाधान ।। हेवादिन दुःखाभावक्या? पुरुषार्थहीनहींहैयह तुमकहतेहो। अथवादुःखाभावसेभिन्नसुखभीपुरुषार्थहैयहतुमकहतेहो। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिदुःखाभावकाउद्देशकरकेशिष्टपुरुषों कीप्रवृत्तिदेखीजातीहै।इसकारणसेदुःखाभावभीपुरुषार्थरूपहै।ौरदुःखा भावसेभिन्नसुखभीपुरुषार्थहै।यदियहद्वितीयपक्षकहो।तोसुखस्वरूपता यात्मामेंसुखेनही संपादनहोसकतीहै।क्योंकियात्माकोहीपरमप्रेमका विषयहोनेकरसुखरूपताभीतिसमें विद्यमानहै।यातेसर्वप्रकारसेयात्माही परमपुरुषार्थरूपहै।शिंका सुखएकगुणहै। इसप्रकारवेशेषकादिकमानते हैं । वहगुणद्रव्यरूपयात्माका स्वरूपकैसेहोसकताहै | समाधान ॥ हेवादिन्यात्माकीसुखस्वरूपतामविवादनहीं क्योंकिपरमप्रेमकीविषय तारूपहेतुसे तिसयात्मामें सुखरूपताकीसिद्धिहै । औरजोसुखस्वरूप नहीं तिसमेंपरमप्रेमकी विषयताभी देखनेमें नहीं पाती ।। शंका ।।

वैस० मु. भा० २५४ आत्मानसुखरूपः अजन्यत्वातयन्नवंतन्नैवं यथाविषयसुखम् इसयनुमानसे यात्मा सुखस्वरूपनहीं । पौरसुखकोजन्यहोनेसे अजन्ययात्माकेसाथतिसकायभेदभीनहींसंभवता ।। समाधान ।। हेवादिनइसतुम्हारेयनुमानमेव्यतिरेकच्यातिनहींसंभवती । क्योकि यहांसाध्याभावकेविद्यमानहुएभी हेतुकायभावनहीं है । यर्थयकि विषयसुखमेंयसुखस्वाभावतोवर्तताहै परन्तुग्रजन्यत्वाभावनहीं वर्तता यातेयजन्यत्व हेतुव्याप्यत्वाऽसिद्धहोनेसेदुष्टहै । इमप्रकारसुखको ग्रजन्यहोनेसेयजन्ययात्माकेसाथतिसकायभेदसंभवताहै । औरपूर्व पत्नसुखविषयकजन्यपनेकीसिद्धिकेलियेवादीनेजो "सुखमेजातम्" यहप्रतीतिकथनकीथी। वहभीग्रन्याकारसेहीसंभवहोसकतीहै । तिसीकोदिखलातेहै । पुण्यकमोकेवशसेयात्मस्वरूपसुखकाअभिव्यं जकजो अंतस्करणकोवृत्तिहै । तिसकीउत्पत्तिको वहप्रतीतिविषय करतीहै।कोईयात्मस्वरूपसुखकीउत्पत्तिकोवहप्रतीतिविषयनहींकरती। यातेप्रतीतिकोयन्यप्रकारसेउपपन्न होनेकर सुखकीउत्पत्तितिससेनहीं सिद्धहोसकती । औरयहजोवादीनेपूर्वकहाथा।कियात्मायौरसुखका अभेदमानेहुए “यहंसुग्वम्” ऐसीप्रतीतिहुईचाहिये।सोऐसीप्रतीतितो होतीनही । कितुतिमकीविरोधिनी यहंसुखी"इसप्रकारकीभेदप्रतीति होतीहै । सोयहकथनभीग्रसंगतहै। क्योंकिसुखतथाआत्माकायभेद हएप्रतीतिभीयभेदकोविषयकरनेवालीहोगी । यहजोयापादनहै । सोक्या?विदान्केप्रतिहै। अथवायज्ञानीकेप्रतिहै । प्रथमपनौतोहम कोभीइष्टापत्तिहै । क्योंकिविद्वान्को “ग्रहंसुखम्” यहप्रतीतिहमभी उत्तरार्द्ध स्वीकारकरतेहैं । औरद्वितीयपक्षमतोअज्ञानयवस्थामेंयात्मस्वरूप कोयविद्याकरयावृत्तहोनेकरयस्फुरणहोनेसे कल्पितदेहादिकोंमेंयात्म अभिमानहैइसकारणसेदेहादिकोंकोसुखकीअधिकरणताहोनेकरभिन्न रूपतासेमतीतिहोनेसेतिनकायभेदप्रतिपादनययोग्यहै । तहांयात्मा सुखकाशेपरूपकरहीस्फुरणहोताहै । अज्ञानीजनोंकी भ्रांतप्रतीतिके कथनसेसुखतथा यात्माकीभेदप्रतीतिका विरोधभीनिरासकरदिया । किंवा । जोवादीसुखकोगुणकहतेहैं । औरयात्माकोगुणीकहते हैं । वहभीयज्ञानकंवशहुएहीकहतेहैं। तिनकाकथनभीयथार्थनहीं है।क्योंकि यात्माकोनिठणकहनेवालीश्रुतिकाविरोध तिनकोपाप्तहोताहै । इसी सेज्ञानसुखादिगुणवालायात्माहैइसप्रकारतार्किकपुरुषभ्रांतिकोप्राप्तहुए हैं।शिकापूर्वउक्तयुक्तिसेसुखमेंजोजन्यपनेकीपतीतिहैवहथन्यथाउप पन्नहै। यर्थात्सुखकायभिव्यंजकजोवृत्तितिसकीउत्पत्तिकोविषयकरतीहै यातेयात्मासुखस्वरूपहैऐसामाननेसेदुःखरूपताभीआत्मामेंसिद्धहोगी। क्योंकिदुःखमेंजोजन्यताकीप्रतीतिहै।तिसकीभीयन्यमकारसेसिद्धि है सोदिखलातेहैं । पापकर्मोंकेयनुसारयात्मस्वरूपदुःखकाथभिव्यंजक जोवृत्तिहै। तिसकीउत्पत्तिकोविपयकरनेसे "दुःखमेजातं"यहप्रतीतियन्य थासिद्धहै । इत्यादियुक्तिकोतुल्यहोनेसे दुःखरूपताभीयात्माकोहुई चाहिये।समाधान हेवादिनसुषुप्तियादिकयवस्थायोंमेंदुःखकाव्यभि चारहोनेसेयव्यभिचारियात्मस्वरूपतादुःखमें नहींसंभवती।। किंवा ।। केवलयुक्तिवस्तुकासाधकनहीं किंतुप्रमाणमूलकयुक्तिवस्तुकासाधक है । और यात्माकीदुःखरूपतामेंकोई प्रमाणनह है । यातेयुक्तिया भासरूपहै । औस्केवलमूलप्रमाणके अभावसेही युक्तिको अभास २८द वे० से० मु. भा० पनानहीं ।। किंतु प्रियोवित्तात् अ०॥ श्रात्माधनादिसर्वपदार्थों सेप्रियहै ।इत्यादिश्रुतिजोयात्माकीसुखरूपताकोकथनकरतीहैतिसका विरोधभीमाप्तहोताहै।।यातेयात्मादुःखरूपनहींकिंतुसुखस्वरूपहै।शंका सुखत्वधर्मभी पुरुषार्थलकाप्रयोजकनहीं। क्योंकि दुःखाभावतिसका व्यभिचारअर्थात्थभावहै । औरतेसेहीदुखाभावत्वधर्मभी पुरुषार्थत्व काप्रयोजकनहीं। क्योंकिसुखमैतिसकाव्यभिचारहै औरदोनोंधर्मभी पुरुषार्थत्वकेप्रयोजकनहींसंभवते ॥ क्योंकिदोनोंकोमयोजकमाननेमें गौखदोपहोताहै ॥ ौरदोनोंकोप्रयोजकमाननेसे पुरुषार्थशब्दको अनेकार्थत्वप्रसंगभीहोगा। तिससेदोनोंकोपुरुषार्थत्वका असंभव है।। समाधान ॥ हेवादिन्यात्मत्वही पुरुषार्थत्वकाप्रयोजकहै । औरवह सुखतथादुःखाभावइनदोनोंमें अनुगतहै । इसप्रकारयात्माकोसुख तथादुःखाभावरूपमानेहुए यात्मत्वहीपरमपुरुषार्थत्वकाप्रयोजकहै। ऐसामानेहुए यात्माकीयनुपादेयताकेसाधकथनुमानमें "पक्षतरत्व" उपाधिजोहमनेपूर्वकहाथावह “वाधोनीत” अर्थात्वाधकरउद्भावितहै यहसूचनाकियाहुयायर्थभी जानलेना ॥ औरइसप्रकारयात्माको पुरुषार्थरूपमानेहुएसांसारिकसुखकोत्यागकरकेवल यात्मलाभकाउद्देश करकेप्रवृत्तहुएजोमुमुनुहँतिनको लोकोत्तरत्व" यर्थात्लोकोंसेविलक्षण पनेकाउपालभभीनिषेधकरदिया।क्योंकिलौकिकहीजोमहानुभावव्यास वसिष्टादिब्रह्मऋपिहुएहे।औरऋषभादिजोराजऋपिहुएहैं।तिन्होंनेइस लोकतथापरलोककेसुखनौतिनकेसाधनोंकात्यागात्मप्राप्तिकीकामना सेहीकियाहै।क्यावहसर्वहीमहानुभावभ्रांतहोसकतेहैंयहकवीनहीं।किंतु उनकोउपालंभकरनेवाला पुरुपहीभ्रांतहै । औरयहजोपर्ववादीने २८७ उत्तराई कहाथा।किश्रवणादिसाधनोंकेयनुष्ठानकरनेवालेमुमुनुजनोंको अल्प होनेसेतिनकोभ्रांतपनाहै ।। औरज्योतिष्टोमादिश्रुतिमूलकपारलौकि कसुखकेसाधनयागादिकोंकेयनुष्ठाताबहुतहैं । इससेतिनकायनु ग्रहयुक्तहै ॥ तिनकेविरोधसे श्रवणादिसाधनोंके विधानकरनेवाले श्रतिवचनस्वार्थमें तात्पर्य्यवालेनहीं । किंतु अन्ययर्थक बोधक हैं। सोयह कथनभी समीचीन नहीं। क्योंकि तिनपुरुषोंको ज्योति टोमादिश्रतिकेतात्पर्य्यका अनभिज्ञहोनेकर यथार्थ ज्ञानका प्रभाव हैं । इसीसेवहभ्रांतहैं। औरश्रवणादिविधायकवाक्योंके तात्पर्यको जाननेवाले मुमुक्षुयद्यपि अल्पभी हैं। तथापि प्रामाणिक होने सेवहम्रांतनहीं हैं । यौरयदिबहुतोंकेयनुग्रहकोहीन्यायमाने।तोदेहको श्रात्मामाननेवालेबहुतजनहैं।तिनकेविरोधसेज्योतिष्टोमादिश्रुतिमूलक साधनोंकेयनुष्ठातापुरुषभीतुम्हारीरीतिसेभ्रांतहुएचाहिये।औरवहतुमने भ्रांतमानेनहीं याते “बहुयनुग्रहन्याय" यहांपरनहींप्राप्त होसकता। यौरजोवादीनेपूर्वयहकहाथा । कियात्माकोसुखस्वरूपमानेहुएभीस्व संबंधिसुखकायभावहोनेसेतिसकोपुरुषार्थपनानहीसंभवता । यद्यपि स्वसंबंधिसुखही उपादेयहैयहवा सत्यहै। तथापिस्वतंत्र सुखमात्रको उपादेयताकैसेहोगी। सोयहकथनभीयसंगतहै। क्योंकियात्मामें सुखकेसंबंधकाउद्देशकरनेवालापुरुपसुखकेदाताम्यकीहीकामनाकरता है।इसीअर्थकोस्पष्ट करतेहैं।सुखहीअत्यंतउपादेयपदार्थहैवहकिसीप्रकार अत्यंतप्रियमेरेस्वरूपमेयभेदरूपतासेप्रवेशकरे । ऐसीकामनायहपुरुष करताहै।यहांौरसंबंधोकीयपेक्षासेतादात्म्यसंबंधकोयंतरंगताजानलेनी शका तादाम्यसंबंधकोयंतरंगमानेहुएयहपुरुषसंबंधमात्रसेकेसेतोप २८८ वे. सि. मु० भा० करलेताहे।क्योंकियन्यपदार्थकीकामनाकरताहुयाकिसीयन्यपदार्थकी प्राप्तिसेतोपकोकोईभीप्राप्तनहींहोता।अन्यथायलिप्रसंगहोगा।अर्थातजल कीकामनावालापुरुपपापाणकीप्राप्तिसेभीप्रसन्नहुयाचाहिये।।समाधान।। हेवादिन्यज्ञानकेप्रभावसेसुखतथायात्माकाभेदभ्रमइसपुरुपकोहोताहै तिसभेदभ्रमकीपावल्यतासे अभेदकरनेको असमर्थहुयासंबंधमात्रसे तोपकोषाप्तहोताहै । क्योंकिकहींमुख्यपदार्थकेयलाभहुएगौणकी प्राप्तिकोभीपुरुषार्थपनादेखाहै । जैसेकोईपुरुषचक्रवर्तीराजकीप्राप्तिमें असमर्थहुयाकिसीएकदेशकेराजप्राप्तहोनेकरहीयपनेकोकृतार्थमानता है ।। शका ॥ इतनीगुरकल्पनाकरनेसेक्याप्रयोजनहै। सुखकासंबंध हीसाक्षात्प्रयोजनक्योंनहो । समाधान ।। हेवादिनसंबंधकोस्वतः पुरुषार्थरूपतानहींसंभवती । क्योंकिवहसुखतथादुःखाभावसेभिन्न है। यातेसुखतथादुःखाभावस्वरूपयात्माहीपरमपुरुषार्थरूपमाननेयोग्यहै। अन्यकोईपदार्थपुरुषार्थरूपनहीं। औरजोपूर्ववादीनेयहकहाथाकियदि यात्माहीएकसुखस्वरूपहैतोविषयसुखकोपुरुषार्थपनानहींहोगा।क्योंकि सुखकासुखहीपुरुषार्थनहींहोसकता।जिससेसुखकोसुखविपयणीकामना कायभावहै।ौरकामनाकाविषयहीपुरुषार्थरूपहोताहै । यद्यपिसांसा रिकसुखकोतोहमभी पुरुषार्थरूपनहींमानते । तथापियात्मसुखकोभी पुरुषार्थरूपतासिद्धनहींहोगी क्योंकिसुखपनादोनों मेंतुल्यहै । सो यहकथनभीनहींसंभवता । क्योंकिजोवादीयहकहताहै । किसुखका सुखपुरुषार्थनहीं। तिसवादीकेमतमें सांसारिकसुखमें अभिव्यंजकवृत्ति कासंबंधहोनेसेवृत्तिविशिष्टमेंअनुपादेयताहै। तिसमेंसुखत्वपुरुषार्थव काप्रयोजकनहीं । जिससेयात्मसुखभीयपुरुषार्थरूपहो।किंतुविशिष्ट रूपतासेभ्रमहोलेकरयनात्मत्वहीतिसमेंअपुरुषार्थत्वकाप्रयोजकहै। और श्रात्मत्वहीपरमपुरुषार्थत्वकाप्रयोजकपूर्वस्थापनकरयाएहैं। अथवा विषयसुखमैतिसयपुरुषार्थत्वकीसिद्धियनात्मत्वके यारोपकेयाधीनहै औरपुरुषार्थत्वमें यात्मत्वहीप्रयोजकहै । यहपूर्वकथनकियाहै । और यहजोबादीनपूर्वकहाथा । कियदिशात्मत्वकोपुरुषार्थताका प्रयोजक मानोगेतोकष्टादिरोगयुक्तपुरुपोंकीदुःखाभावकाउद्देशकरकेजोग्रात्मा केत्यागमेंप्रवृत्तिहोतीहै । सोनहुईचाहिये । औरतिनकीप्रवृतिदेखने मेंथातीहै । तिसकारणसे यात्मत्वपुरुषार्थत्वकाप्रयोजकनहीं । सोयह कथनभीनहींसंभवता क्योंकिकुष्टादिरोगयुक्तपुरुपयद्यपिमरणमप्रवृत्त होतेहैं। तथापिवहयात्माकेत्यागप्रवृत्तनहींहोते। जिसकारणसेस्थूल शरीरकेत्यागकानाममरणहै। कोईआत्माकेत्यागकानाममरणनहीं । औरसुखस्वरूपयात्मामेंकुष्टादिरोगयुक्त स्थूलशरीरदुःखकाहेतुहै इसी सेतिसकेत्यागप्रवृत्तिहोनीउचितहीहै । "केवलसुखरूपहीपरलोकमें मैंहोजाऊ" ऐसाउद्देशकरकेदेहत्यागकरनेमेंवहपुरुषप्रवृत्तहोतेहैं। कोई यात्मत्यागकाउद्देशकरकेमवृत्तनहींहोते । यदिऐसेनमानोंतोयात्मा कात्यागकरकेदुःखाभावभीकिसकोहोगा । तिसहेतुसेजानाजाताहै। किवहांपरयात्माकात्यागनहीं । किंतुरोगग्रस्तदेहकाहीत्यागहै ।याते मरणामेजोतिनकी प्रवृत्तिहै । तिससेभीयात्माकीसुखरूपताहीसिद्ध होतीहै । इसप्रकारकुष्टादिरोगयुक्तपुरुषोंकोदुःखकेसंसर्गसेरहितसुख स्वरूपथात्माकीकामनासेदेहकेत्यागरूपमरणमें प्रवृत्तिकथन करनेसे प्रयागादितीर्थों मेंमरणानिमित्त प्रवृत्तिका उत्तरभीकथन कियागया । क्योंकितहांपरभीदुःखसंसर्गसेरहित सुखस्वरूपयात्माकी कामनासेही बेसिक मु० मा देहत्यागरूपमरणमेप्रवृत्तिहोतीहैयात्माकेत्यागमेंप्रवृत्तिनहीं । तिनकी प्रवृत्तिसेभीयात्माकोहीपरमपुरुषार्थरूपतासिद्धहोतीहै । यातेयात्मा हीपरमपुरुषार्थरूपहै यहसिद्धहुया ।। इति ।। शंका ।। अथज्ञानीतथाअज्ञानीकीविलक्षणताकानिरूपण पूर्वउक्तरीतिसेभीयात्मापुरुषार्थरूपनहींसिद्धहोसकता। क्योंकिमुक्त तथासंसारीमेंयात्माकोतुल्यहोनेसेसमानहींतिसकीदोनोंकोप्राप्तिहै।इस लियेब्रह्मचर्यादिसकलजोमुक्तिकेसाधन तिनमेंमुमुक्षुपुरुषोंकीप्रवृत्ति नहींहोगी भावयहकिजवसाधनहीनयौरसाधनयुक्तपुरुषकोसमानहीं . मुक्तिरूपफलहोताहै।तोफिरसाधनोंके यनुष्ठानकाक्याफलहै।समाधान हेवादिन्यद्यपियात्मा मुक्ततथासंसारीमें समानहीहै। तथापिस्वरूप सेविद्यमानहुयावहपुरुषार्थरूपनहीं । किंतुस्वस्वरूपकरसाक्षात्का रकियाहुयापुरुषार्थरूपहै । जैसेलोकमेंभी ज्ञातनिधियादिकोंकोही पुरुषार्थपनादेखाहै । अज्ञातकोनहीं । तैसेसंसारीयात्मस्वरूपको नहींजानता । श्रीविदान्यात्माकोजानताहै । यातेविद्वान्प्रतिही तिसकोपुरुषार्थरूपताहै । यज्ञानीप्रतिनहीं । इसकारणसेमुक्ततथा संसारीकोसमानप्राप्तिनहीं ॥ शंका ॥ यात्माकोसर्वहीजनजानतेहै। यातेज्ञानतथा यज्ञानकृतविलक्षणतायापकैसेकहतेहो ॥ समाधान ।। हेवादिनजिसकारणसे यज्ञजन मेकर्त्ताभोक्ताजरामरणधर्मवालाई ॥ इसप्रकार यात्माको जानताहै । तिसीहेतुसेमुक्तसे वहविलक्षणहै ।। यद्यपिसुखस्वरूपयात्मास्वप्रकाशहै वहसंसारीकोकैसे स्फुरणनहीं होता । तथापियज्ञानकेप्रभावसेसुखादिग्रंशयावृत्तहै । यातेतिसका स्फुरणनहींहोता । औरयज्ञानके याश्रयतथाविषयकाएकत्वपूर्वउप २६१ उत्तराई पादनकरयाएहैं।इसहेतुसेयज्ञानीहीअज्ञानकाविपयो।शिंका।। अज्ञान करसुखादियंशको ग्रावृतमानेहुए सुखरूपताहीयात्माकीनप्रतीतहो तिससेविपरीतकर्तृत्वादिरूपतासे तिसकाभान किसहेतुसेहोताहै । समाधान।।यज्ञानकेवशसेभ्रांतियुक्तहुया अकर्त्तत्वादिस्वरूपयात्मा कोभीकर्तृत्वादिरूपतासेदेखताहै । अज्ञानकोकौनयर्थकठिनहै।किंतु कुछभीकठिनता अज्ञानको नहीं । इसलिये अज्ञानअवस्था यथार्थ रूपतासेयात्माकोनस्फुरणहोनेसेतिसअवस्थामुक्तपनानहींहोसकता। इसप्रकारयज्ञानकृतविलक्षणतानिरूपणकाके अवज्ञानकृतविलक्षणता कोनिरूपणकरतेहैं।यौरविद्वान्पुरुपयज्ञानीसेविलक्षणपुरुषार्थस्वरूपहै। विसपुरुषार्थकास्वरूपहीकहतेहैं।देशकालवस्तुपरिच्छेदसेरहितपरिपूर्ण ग्रानन्दस्वरूपतासे स्थितहोताहै । जियकारणसे तिसविधानको अपुरुषार्थत्वका प्रयोजक जोयभान तिसकाहेतु जोयज्ञान तिसका वाधहुयाहै । यद्यपियज्ञानस्वरूपसे विद्यमानहुयायनर्थकाहेतुनहीं होता। क्योंकिसुषुप्ति तैसेदेखाहै । तथापिसकलदुःखोंकाबीजजो अज्ञानहैवहीकार्याकार परिणामकोप्राप्तहोकर अनर्थकाहेतुहै। याते कार्यसहिततिसकावाधकरकेअर्थात्अज्ञानतत्कार्यतीनोंकालमेंभीमुझ ब्रह्मात्मामेंनहीं है ऐसानिश्चयकरकेविद्वान पुरुषार्थस्वरूपहोताहै ॥ शंका ।। सुखस्वरूपकाभानकैसेहोगा। क्योंकिप्रकाशककाग्रभाव है ॥ समाधान ।। हेवादिनस्वप्रकाशस्वरूपतासेही सुखकाभानहोता है । श्रन्यप्रकाशककीतिसको अपेक्षानहीं। औरसकलदुःखोंका चीजहोनेसेकार्यसहित अज्ञानकीनिवृत्ति विद्वानकरताहै । श्रवसकार्य अज्ञानकीनिवृत्तिकासाधनकहतेहे । अात्मसानात्कारसेहीवहयज्ञान ०सि० मु० भा० निवृत्तहोताहै । गौरतिसमाक्षात्कारकाहेतु महावाक्यरूप यागम प्रमाणहै । इतनेकथनसेश्रवणादिसाधनों में मुमुक्षुकीप्रवृत्तिकाव्यर्थ तापरिहारकी। क्योंकिश्रवणादिसाधनोंके अनुष्ठानसे यप्रतिबद्धहुया महावाक्यरूपशब्दप्रमाण यात्मसाक्षात्कारको उत्पन्नकरताहै । याते तिनमेप्रवृत्तिसफलहै । यौतिसमहावाक्यको यापहीग्रहणुनकरे कितुयाप्तवक्ताजोश्रोत्रिय तथाब्रह्मनिष्ठयाचार्य है उनकेमुखद्धाराही महावाक्यकोग्रहणकरायौर विद्धानकायनुभवभीऐसाहीहै । यातेमहा वाक्यसेउत्पन्नहुया “अहंब्रह्मास्मि' याप्रकारकाप्रमाज्ञानसकार्य यज्ञानकोबाधकरताहे । परन्तुवहवाक्यार्थज्ञानपदार्थज्ञानपूर्वकहोता है । इसलिये “तत्त्वमसि" इसमहावाक्यगत “तत्" औ "व" यह दोपदहै । तिनमेंप्रथमततपदका वाच्यार्थनिरूपणकरतेहै । श्रज्ञान केवशसेसर्वजगत्की यधिष्ठानताको प्रासहुया यात्मा तत्पदका वाच्यार्थहै । औरकर्तृत्वादिसांसारिकधर्मोका याश्रयहुया त्वंपदका वाच्यार्थहै। श्रववास्तवजोयात्माकालक्ष्यस्वरूपहै। तिसकोनिरूपण करतेहै । पूर्वकथनकियाजो यज्ञानकेवशसे कर्तृत्वादिमिथ्यास्वरूप उससेविरुद्धयक यात्माहे ॥ इसकथनसे नैयायिकमतकानिषेध जानलेना । यौवहयात्मायभोक्ताहै ॥ इसकथनसेसांख्यमतका निषेधकिया । यौरवहयात्माजरामरणजन्मादि सर्वविकारोंसेरहितहै। इसकथनसेदेहात्मवादकानिषेधफिया । यौवह यात्मास्वप्रकाशस्व रूपहै इसकथनसे मीमांसकमतकानिपेकिया।ौरवहयात्मासत्रूप है। इसकथनसेशन्यवादीमाध्यमिककामतनिषेधकिया। इसप्रकारइन विशेषणोंसेइतरमतोंक निरासकियेहुएयवस्वमतसंमत यात्माकास्वरूप অবঃ कहतेहैं। यात्माचिदएकरसंपरिपूर्णस्वभावहै। यौवहयपुरुषार्थस्वरूप नहीं ।। किंतुयानंदस्वरूपहै । पूर्वसर्वमतोंकेनिर(समेंहेतुसूचनकरने केलियेपुनःऔरविशेषणयात्माकेकहतेहैं । क्षुधापिपासादिधाँसे रहितहोनेसे यात्मा अकर्ताओअभोक्तातथा असंसारीहै ॥ गौर स्थूलतासेहीनहोनेकर तथायणुतासेहीनहोनेकर तथासर्वदृश्यधर्मों सेयतीत होनेकर यात्मादेहरूपनहीं। औरसत्यस्वरूपहोनेसेयात्मा शून्यरूपनहीं औज्ञानस्वरूपहोनेसे स्वप्रकाशस्वरूपहै ॥ ौनित्य स्वरूपतथाविज्ञानस्वरूप तथाआनंदस्वरूप तथाब्रह्मस्वरूपहोनेसेयह आत्मासुखस्वरूप तथापरिपूर्णस्वरूपहै । इसप्रकारतिसयात्मसेयधिक औरकोईकामनाकाविपयनहींहै।क्योंकिसर्वकामोंकीयवधियात्माकी प्राप्तिहै । इसीसेश्रुतिमेंकहाहै ॥ (आत्मलाभान्नपरंविद्यते। आत्मकामाप्तकामः) इत्यादिश्रुतिसेयात्मप्राप्तिकोहीसर्वकामप्राप्तिकी सीमाहोनेसेथात्माही परमपुरुषार्थस्वरूपहे यहयर्थसिद्धहुया ।। इति ॥३६॥ अथआत्मसाक्षात्कारककरणकाविचार * "यागमप्रमाणसेसाक्षात्कारहोताहै" यहसिद्धांतीकाकथनसुन करतिसकौनसहनकरताहुयापूर्वपक्षी शंकाकरताहै । हेसिद्धांतिन थात्मसाक्षात्कारशदजन्यनहीं यहांयहयनुमानजानना ।। * आत्मसाक्षात्कारःनशब्दजन्यःसाक्षात्कारत्वात्। घटादिसाक्षात्कारवत् । य० ॥ यात्मसाक्षात्कारशदजन्यनहीं है । सानाकाररूपहोने से । जोजोसाक्षात्कारहोताहै । वहशदजन्यनहींहोता । जैसेघटादि २६४ वे०सि० मु०भा० साक्षात्कारहै ॥ इति ॥ औरयात्मसाक्षात्कारकोशदजन्यमानेहुए इन्द्रियकोसाक्षात्कारकीकरणताकायभावप्रसंगहोगा। क्योंकिइंद्रिय जन्यज्ञानकोहीसाक्षात्कारत्वकानियमहै । शंका ॥ हेवादिन जन्य साक्षात्कारमेंइंद्रियकारणत्व प्रयोजकनहींअर्थात् जहांजहांजन्यसाना कारहोताहै । तहांतहांइंद्रियकोकारणताहै ऐसानियमनहीं । क्योंकि “दशमस्त्वमसि” इसवाक्यसे उत्पन्नहुया ज्ञानभी प्रत्यक्षहीदेखाहै ॥ समाधान।। हेसिद्धांतिन् “दशमस्त्वमसि" इसवाक्यमेंभीयहशददशम केसाक्षात्कारको नहींउत्पन्नकरता ।। किंतुदशमपुरुपके शरीरसेइन्द्रिय कासंबंधहोनेसेही माक्षात्कारहोताहै यातेइन्द्रियजन्यत्वहीसाक्षात्कार मेंप्रयोजकहै । अर्थातइंद्रियजन्यज्ञानहीसाक्षात्कारहोताहै।। शंका ।। हेवादिन् अन्वयव्यतिरेकइंद्रियजन्यत्वमें औरशदजन्यत्वमेंतुल्यहै । अर्थात “दशमस्त्वमसि' इसशदकेहुएदशमसाक्षात्कारहोताहै।इसशब्द के अभावहुएनहींहोता । औरतेसेहीइंद्रियकासंबंधहुए दशमकासाक्षा कारहोताहै । औरइंद्रियकासंबंधनहुएनहींहोता । इसप्रकारअन्वय व्यतिरेकदोनों में तुल्यहोनेसेइंद्रियहीदशमसाक्षात्कारकाहेतुहैशदनहीं यहनियमतुमकेसेकरतेहो।समाधान।। शदकापरोतज्ञानकेउत्पन्न करने काहीस्वभावहै। अपरोक्षज्ञानकेउत्पन्नकरनेकास्वभावशब्दकाकहींभीदेखा नहीं ॥ औरइंद्रियकातोअपरोक्षज्ञानकेउत्पन्नकरनेकास्वभावप्रसिद्धहै। यातेशद्धकेस्वभावसेहीयपरोक्षज्ञानमें शब्दकोकरणतानहींकिंतुइंद्रिय कोहीकरणताहै ॥शंका।। अपरोक्षयात्माविषयकशब्दकोयपरोक्षज्ञान काहीजनकपनायुक्तहै । क्योंकिवेदवाक्यतवहीप्रमाणहोसकताहै ।। जबजैसायात्माकास्वरूपहोतिसीकेयाकाज्ञानकोउत्पन्नकरे। अन्यथा २६५ उत्तराद्ध ज्ञानकोभ्रमरूपताहोगी ॥ औरयात्मानित्यअपरोक्षस्वभावहै । तिससेअपरोक्षयात्माकासाक्षात्कारश्रुतिजन्यहीहै। समाधान करण कास्वभावअन्यथाकरनेकोकोईभीसमर्थनहीं। क्योंकिप्रमेयकेस्वभाव कीयपेक्षासेअपनास्वभावअभ्यर्हितहै अर्थात्उत्कृष्टहै ।। यातेपूर्वकथन ययुक्तहै ॥ किंवा ॥ ब्रह्मकीयपरोक्षतामात्रसेतिसविषयकज्ञानको अपरोक्षतायुक्तनहीं है । क्योंकिअपरोक्षताकेयोग्यवन्हियादिकों में शदसेपरोत्तज्ञानहीउत्पन्नहोताहै ।। यहवार्ताहमतुमदोनोंकोस्वीकारहै तिसीकारणसेयात्मसाक्षात्कारश्रतिरूपशब्दसेजन्यनहीं ॥ शंका ।। यात्मसाक्षात्कारसेहीप्रयोजनहै ।। सोजिसकिमीकारणसेउत्पन्नहोऔर अभ्यासकियाहुया परोक्षज्ञानही अपरोक्षरूपताकोप्राप्त होजायेगा । यातेपरोक्षज्ञानकाथभ्यासहीअपरोक्षज्ञानकाहेतुहै ॥ समाधान ॥ यहकिसीकामतभीसमीचीननहीं ॥ क्योंकियनुमितिश्रादिकपरोक्ष ज्ञानों मेंतसादेखनेमेंनहींाता ॥ अर्थयह “पर्वतोवन्हिमान्” इस परोक्षज्ञानकावारंवारयभ्यासकियेहुएभी यहज्ञानअपरोक्षरूपताकोनहीं प्रासहोता ॥ किंवा ॥ जैसेपथमज्ञानयपरोक्षरूपताकोनहींधारण करता । तैसेउत्तरज्ञानकाप्रवाहभीअपरोक्षरूपताकोनहींधारणकरेगा। क्योंकिशब्दजन्यतादोनों मेंतुल्यहै ॥ औरशादज्ञाननियमसेपरोतही होताहै । शंका ॥ साक्षात्कारकेकरणकाविचारकरनेसेक्यासिद्धहोता है। क्योंकिसाक्षात्कारको निष्फलहोनेकरहमारेकरवहत्यागनेयोग्यहै भावयह कियाप्तपुरुपनेउच्चारणकियाजो "नायंसर्पः” यहवाक्यतिस सेउत्पन्नहुयाजोपरोक्षज्ञान तिसकरकेहीभयकंपादिकनिवृत्तहोजातेहैं। फिरथपरोक्षज्ञानकेसाथक्याप्रयोजनहै । यातेतिसकेकरणकाविचार ३० ति० मु. भा. निष्फलहै । समाधान ।। जैसेजिसपुरुषकोपूर्वदिशामेंपश्चमदिशाका भ्रमहोजाताहै ॥ तिसकोपरोक्षज्ञानदिशाकाहुएभी तिससेदिशाका अपरोक्षभ्रमनिवृत्तनहींहोता। क्योंकिअपरोक्षभ्रमकायपरोक्षप्रमाज्ञान हीनिवत्तहोताहै ॥ तैसे “ग्रहकर्ता" अहंभोक्ता । इत्यादिजोसमूल अपरोक्षभ्रमहै तिसकीनिवृत्तिभी यात्मसाक्षात्कारसेविनानहींहोगी।। यातेतुम्हारेमतमें अात्मासाक्षात्कारत्यागकरनेयोग्यनहीं।।यौर “नायं सर्पः" इसवाक्यसेतुम्हारे मतकीरीतिसे अपरोनहीज्ञानउत्पन्न होताहै।। यातेयहदृष्टांतभी समीचीननहीं । औरपूर्वउक्तप्रकारसेकोईभीकरण निरूपणनहींहोसकता। याते सामग्रयमावेनफलाभावः ०॥ सामग्रीकेयभावसेफलकाभीअभावहोताहै । इसन्याय सेमात्मसाक्षात्कारकायभाव अर्थसेसिद्धहोताहै।। यातआत्माकायप रोक्षज्ञानकिसीकोभीनहींहोता ॥ इतिपूर्वपक्ष । * अथएकदेशीकेमतकीरीतिसेपूर्वपक्षकाखंडन । औरमनकोआत्मसाक्षात्कारकीकरणताकानिरूपण हे वादिन पूर्वजोकरणके अभावसे यात्मसाक्षात्कारकातुमने यभावकहा सोनहींसंभवताक्योंकियंतस्करणही ग्रात्मसाक्षात्कारका करणहै ॥ शंका ॥ हेएकदेशिन यात्मसाक्षात्कारकी करणता अंतस्करणमें नहींसंभवती।। क्योंकिसयविवेकीजनोंका अंतस्करण तोविद्यमानहै | परन्तुयात्मसाक्षात्कारतिनमें नहींदेखाजाता ॥ समाधान ॥ हेवादिनजसेकेवलचक्षुकोप्रत्यभिज्ञाज्ञानकीकरणतानहीं भीहै । परन्तुवस्तुकेपूर्वअनुभवजन्यसंस्कारसहकृतहुाचक्षुतिस २७ उत्तराई वस्तुविषयक ऐक्यप्रतिभिज्ञाकाहेतुहोताहै । तैसेकेवलमनशुद्धात्मा केसाक्षात्कारका यजनकहुाभी सजातीयप्रत्ययोंके प्रवाहसहित हृयातिसकाजनकहोजायेगा। शंका । जैसेकिसीपुरुषको भावना करनेसेमृतपुत्रका यप्रमारूपसाक्षात्कार उत्पन्नहोताहै । तैसेमल प्रमाणसेहीनकेवलभावनासे उत्पन्नहुअा अात्मसाक्षात्कारभीयप्रमा रूपहोगा ।। समाधान ।। हेवादिन्श्रवणादिकोंके अभ्याससेजन्य जोशाब्दपरोक्षज्ञानहै । वहीभावनाकामूलहै । यातेभावनाके प्रवाह सहकृतयस्करणरूपकरणसे उत्पन्नहुयायात्म साक्षात्कारयममारूप नहीं किंतुप्रमारूपहीहै ॥शंका यतोवाचनिवर्ततेअप्राप्यमनसासह । (त)उ प्र०व०अनु ) य० ॥ जिसब्रह्मसेमनसहितवाणियतिसकोनप्राप्तहोकरनिवृत्त होजाती हैं।।इति।मनकोकरणामानेहुएइसश्रुतिकेसाथविरोधहोगाक्योंकि यहश्रुतिश्रात्मामेंमनकीविषयताकाश्रभावकहतीहै।।समाधान।हेवादिन यहविकल्पकिसीवेदांतीकाहै।अथवानैयायिककाहै। प्रथमपक्षतोनहीं संभवता।क्योंकियागमप्रमाणकीयात्मामें विषयतामाननेवालेकोश्रति काविरोधतुल्यहीहैजिसकारणसेश्रतिनेमनकीविषयताकेअभाववत्वाणी कीविषयताकाभीयभावकथनकियाहै।ौरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता। क्योंकिवहश्रतिवचनलौकिकशब्दतथावैदिकसंस्काररहित मनकीविष यताकोनिषेधकरताहै ॥ कोईवैदिकशब्दतथाशुद्धमनकीविषयताका निधनहींकरता । इसप्रकारशुद्धमनकोयात्मसाक्षात्कारमेंकरणताहै। तिसकेविद्यमानहुएकरणकाथभावकहनाथयुक्तहै(इतिएकदेशिमतम्) (यथसिद्धांत) २१८ वे० सि० मु. भा० शब्दकोसाक्षात्कारकीकरणताकाप्रतिपादन इसप्रकारएकदेशीदारामहापूर्वपक्षको निरासकरके अयपरम सिद्धांती एकदेशीकेमतको निरासकरताहै ॥ समाधान।। पूर्वजोएक देशीने मनकोकरणताकथनकी सोनहींसंभवती।क्योंकियागमकोही यात्माविषयकअपरोक्षज्ञानकाजनकपनाहै ।। शंका ।। ॐ दृश्यतेत्वग्रथयाचुदया। मनसैवेदमाप्तव्यम् * य०-एकाग्रबुद्धिसेयात्मादेखाजाता है । औरमनकरकेहीयह यात्माप्राप्तहोनेयोग्य है । अर्थातदर्शनकरनेयोग्य है। इत्यादिकश्रुति सेयौरपूर्वकथनकीहूईयुक्तिसे मनकोही तिसयात्मसाक्षात्कारमें कर णता संभवती है। तिसकायापनिषेधकैसेकरतेहो ॥ समाधान ॥ हे वादिन्मनकोजोयात्मसाक्षात्कारमें तुमकरणताकल्पनाकरतेहो। सो क्या?शुद्धात्मासेजुदाकहींयन्यवस्तुकेयपरोक्षज्ञानमें तिसकोकरणता निर्णीत है इसलियेशुद्धयात्माके साक्षात्कारमेंभीलाघवसेमनहीकरण हो यहकहतेहो।यथवाकवलश्रतिप्रमाणकवलसेतिसकोकरताकहतेहो प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिनिरूपणहीनहींहोसकता।। तथाहि प्रथमबाह्ययर्थकेप्रलमेंमनकोकरणतानहींसंभवती ॥ क्योंकिवाद्य अर्थकोमनस्वतंत्रनहींग्रहणकरसकता । यदिस्वतंत्रग्रहणमानेतोअंध तथावंधिरपुरुषोंकोभी रूपतथाशदकाप्रत्यक्षहोनाचाहिये ॥यौरअंतर दुःखादिपदार्थोकेसाक्षात्कारमेंभी तिसकोकरणतानहींसंभवती । क्यों किदुःखादिककेवलसानीकेविषयहैं। औरशुद्धयात्माकेसाक्षात्कारमें भी तिसकोकरणतानहीं। क्योंकितिसकाविचारतोयवप्राप्तहीहै । और यदिसोपाधिक यात्माके साक्षात्कारमें मनकोकरणकहोतोयहकथनभी उत्तराई नहींसंभवता। क्योंकितहांउपाधिग्रज्ञानहै अथवाअंतस्करणहैयह विचारकर्तव्यहै ॥ प्रथमपतकहो तोसुषुप्तिमें यज्ञानउपाधिकथात्मा कासाक्षात्कारनहींडयाचाहिये । क्योंकिमनकातिससुपुप्तियवस्थामें विलयहै। औरद्धितीयपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकितिसमेंयात्मा श्रयदोषप्राप्तहोताहै । अर्थात्यात्मामें साक्षात्कारकेअर्थमनकी प्रवृत्तिहोनेमेंमनकोही उपाधिरूपताहोनेकर अपनेकोअपनीयपेक्षा रूपयात्माश्रयदोपस्पष्टहीहै।ौरयदिऐसेकहो कियतस्करणकाकार्य जोवृत्तिहैवहीउपाधिहै।यातेयात्माश्रयदोपकीप्राप्तिनहींहोतीसो कथन भीनहींसंभवता ॥ क्योंकितहांभीकार्यकारणका अभेदहोनेसेयंश रूपताकरयात्माश्रयदोपकीप्राप्ति अवश्यहोतीहै । औरयोदयात्मामें मनकीप्रवृत्तिकेयर्थ अंतस्करणकोउपलक्षणमानकर तिसमेंयंतस्करण उपलक्षितत्वधर्मकोस्वीकारकरें तोवहधर्मभीविशेषणरूपताकरतथाउप लक्षणरूपताकर निरूपण नहीं कियाजाता॥क्योंकिऐसेमाननेसेभी पूर्वउक्तदोषदूरनहीं होसकते । अर्थात्तस्करणउपलक्षितत्वधर्मको विशेपणमानेतोयात्माश्रयदोपप्राप्तहोताहै। औरयदितिसकोउपलक्षण माने तोयनवस्थादोषप्राप्तहोताहै ॥ तथाहि । अन्तःकरणउप लक्षितात्मामेंयन्तःकरणकीविपयतामानेहुएतिसयात्माकाविशेषण उपलक्षितत्वौतिस उपलक्षितत्वकाविशेषण अन्तःकरण इनदोनों मेंभी तिसकीविषयताथवश्यहोगी । तिससेयात्माश्रयदोपस्पष्टहीहै क्योंकिविशिष्टवृत्तिधर्मको विशेषणवर्तनेकानियमहै ॥ किंवाजैसे उपलक्षणरूपकाककेधर्मोंका देवदत्तकेगृहमें अध्यासनहींसंभवता । तेसेयन्तःकरणको उपलक्षणमानेहुए तिसके कृतत्वादिधर्मोकाभी ३० स० मुं० भा० आत्मामेंअध्यासनहींसंभवेगा । यातेभीयहपक्षयसंगतहै । औरश्रुति मात्रकेवलसेभीतिसमनकोकरणता नहींसिद्धहोसकती । क्योंकि “मनसा”यहतृतीयाविभक्तिरूपाश्रुति तोसहिकारतामात्रकोबोधनकर तीहै।तिसकेकरणपनेकोनहींबोधनकरती । यातेमनकोकिसीरीतिसेभी ग्रात्मसान्नात्कारकेप्रति करणतानहीं।किंतुयागमही तिसकाकरणहै। औरश्रुतिरूपशब्दको यात्मसाक्षात्कारकीकरणतामें श्रुतिउक्तलिंग भीप्रतीतहोताहै। क्योंकि ॥ 8 तंत्वोपनिपदंपुरुपंटच्छामि ००।१०(५)वा०६।२६) य० ॥ हेशाकल्यतिसउपनिषद्गम्य पुरुपकास्वरूपमैं तुझ कोपूछताहूं । इसतिनेयात्माकाही “औपनिपदत्व" विशेषणकथन कियाहै । सोविशेपणतवहीसमीचीनहोसकताहै । जवइतरप्रमाणोंके अविषयभूतग्रात्मामात्रकोहीविषयकरे । यदिऐसेनमानें । तोप्रमाणां तरकाव्यावर्तकहोनेसे तिसविशेषणकीव्यर्थताहोगी। शंका मन कीन्याईशब्दभीकहीं साक्षात्कारकाकरणरूपताकरनितिनहीं तो वह यात्मसाक्षात्कारकाकरण कैसे होसकताहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन् । लौकिकशब्दजो “दशमस्त्वमसि” इत्यादिवाक्यहै। तिस कोभीदशमरूपयपनेयात्माविषयकसाक्षात्कारकाजनकपनादेखाहै । औरतहांइंद्रियकोकरणतानहींसंभवती । क्योंकिइंद्रियकेविद्यमानहुए भीदशमकाज्ञाननहींहोता । औरअत्यंतअन्धकारमेंइंद्रियकीशक्तिके निरुद्धहुएभीवाक्यसे “दशमोऽहमस्मि” इसप्रकारकासाक्षात्कार देखाहै । औरइसज्ञानकोपरोक्षनहींकहसकते । क्योंकि “अस्मि" इत्याकारकप्रतीतिअपरोक्षरूपहीहोतीहै । इसप्रकारव्यभिचारहोनेसे उत्तराई इंद्रियकोतिससाक्षात्कारमेंकरणपनानहींहै ॥ शंका । पूर्वउक्तप्रकार सेशब्दको अपरोक्षज्ञानकी जनकतामानेहुए तिसकेस्वभावकीहानि होगी। क्योंकिशब्दकापरोक्षज्ञानकेहीउत्पन्नकरनेकास्वभावहै । समाधान ॥ हेवादिप्रमाणकोप्रमेयके आश्रितहोनेकरप्रमेयकेयनु सारीहीतिसकास्वभावहोताहै । स्वतंत्रतिसकाकोईस्वभावनहींहोता। यातेपरोक्षज्ञानकेउत्पन्नकरनेकास्वभावयसिद्धहै ॥ शंका ॥ जिस प्रमेयकेअनुसारीप्रमाणकास्वभावनापनेकहा।तिसप्रमेयकाक्यास्वभाव ॥ समाधान ॥ हेवादिन् । यहामहावाक्यरूपशब्दप्रमाणकाप्रमेय यात्मवस्तुहै। सोयपरोक्षस्वभावहै । यद्यपिअपरोक्षताकिसीकाल मेघटादिकों में भीहोतीहै । तथापितिनमेंनित्ययपरोक्षतानहीं। और यात्मातोश्रपरोक्षएकरसहै । यातेधयादिकोंसेविलक्षणहै । शंका ।। प्रमेयपरोक्षएकस्वभावभीनहीं।तथाथपरोक्षएकस्वभावभीनहीं । क्यों किएककालमेंहीवन्हियादिकविषयमें पुरुषोंकेभेदकीअपेक्षाकरसाक्षा कारतथाअनुमितिकीविषयताहोनेसेअपरोक्षतातथापरोक्षतायहदोनों रूपप्रतीतहोतेहैं। औरविरुद्धदोरूपएककालमेंएकपदार्थमेंनहींसंभवते। यातेवहदोनोंरूप प्रमेयकेस्वाभाविकधर्मनहींहैं । किंतुज्ञानविशेषरूप उपाधिकृतहोनेसे वहऔपाधिकधर्म, समाधान हेवादिनज्ञानगत अपरोक्षवनहींकिंतु यत्साक्षादपरोक्षातब्रह्म यात्मासर्वांतरः - (१०) ३० अ० (१) बा(४)१ * या जोब्रह्म साक्षात्"कहियेथव्यवहितस्वरूपहै।यद्यपिगौण अव्यवहितत्वश्रोत्रब्रह्मादिकों मेंभीहै । तथापिब्रह्ममें "अपरोक्षात्" वे०सि० मु०भा० कहिये मुख्यअव्यवहितत्वहै । औरजोयात्मासर्वकेअंतरहै । यद्यपि अंतरत्वइंद्रियतथापाणादिकों में भीहै।तथापिवहसर्वसेयंतरनहीं। किंतु श्रात्माहीसर्वकेअंतरहै । इत्यादिश्रतिमें यात्माकाहीयपरोक्षपनासुना जाताहै । यातेब्रह्मात्माकीअपरोक्षताश्रुतिसिद्धहै थोपाधिकनहीं। औरजोवादीनेयहशंकाकीथी किप्रमेयमेंस्वाभाविकअपरोक्षतामानेहुए वन्हियादिकों में दोनोंविरुद्धधर्मएककालमेंप्राप्तहोंगे। इसशंकाकेदूर करनेकेलिये अवयपरोक्षताकास्वरूपजिज्ञासापूर्वकनिरूपणकरतेहैं । अथअपरोक्षत्वकास्वरूपनिरूपण वहअपरोक्षताक्याहै अर्थाततिसअपरोक्षताकास्वरूपयापनिरू पणकरो ऐसीजिज्ञासाकेहुएकहतेहैं। वास्तवसेजोप्रमातासेयव्यवहित त्वहै यहीअपरोक्षत्वहै । अपरोक्षज्ञानकीविषयताकानामअपरोतल नहीं। सोयव्यवहितत्वप्रमातामही विश्रांतिकोप्राप्तहोताहै । क्योंकि जितनाजितनाकोईपदार्थप्रमातासेदूरहोताहै।उतनाउतनाहीवहअधिक परोक्षताकोप्राप्तहुयादेखाहै । तेसेमानेहुए वन्हियादिकों में परोक्षता हीमुख्यहै । औरयपरोक्षता तिनमेंगौणहै ॥ क्योंकिअपरोक्षतातिन मेंप्रमाताकीसमीपतासेप्राप्तहुईहै स्वतःनहीं। यातेएककालमेंदोनों काविरोधनहीं । क्योंकिस्वाभाविकतथायौपाधिकदोनोंरूपएककाल मेंएकपदार्थमें रहसकतेहैं।। शंका । जैसेघटादिकयनात्माहोनेसेपरोक्ष एकरसहैं तिनमेंगौणयपरोनतावर्ततीहै । तिसगौणयपरोक्षताको लेकर इंद्रियकोप्रमाणताहै । तेसेप्रमातामेंभी गौणपरोक्षताको लेकर शब्दतिसमें प्रवृत्तहोजायेगा ॥ समाधान ॥ हेवादिन गौणपरोक्षता भीयात्मामेंनहीं संभवती। क्योंकिआत्मासे यात्माकाव्यवधानकोईभी उत्तराई कल्पनाकरनेकोसमर्थनहींहोसकता । यातेप्रमाणरूपहुआवेदअपरोक्ष स्वरूपात्मापरोनज्ञानकोकैसेउत्पन्नकरेगा। औरयदिपरोवज्ञानको वेदउत्पन्नकरेगा। तोम्रमज्ञानकोउत्पन्न करताहुयावेद प्रमाणरूपकैसे होगाक्योंकिअन्यप्रकारसेस्थितपदार्थको अन्यमकारसे वोधनकरनेकर प्रमाणरूपतानहींसंभवेगी।यातेयपरोक्यात्माविषयकवेदअपरोक्षज्ञान कोहीउत्पन्न करताहै।यौवहीकरणहै । इसप्रकारसिद्धांतीने अपनेमत कोसिद्धकरके पूर्वउक्तरीतिसे एकदेशीकामतनिरासकिया। अबतिसी केनिषेधौ औरहेतुकहतेहैं। हेएकदेशिन प्रमाकरव्यातप्रमाणहोताहै । अर्थातजहांजहां "प्रमाणताहै" तहांतहांप्रमाकरणत्वहै । ऐसेनेया यिककहतेहैं । औरमनप्रमाकरव्याप्तहैनहीं । क्योंकितिसकोभ्रमतथा प्रमासाधारणउपलब्धिमात्रकीकारणताहै । यातेमोक्षकेसाधनयात्म साक्षात्कारकोमनोजन्यमानेहुए व्यभिचारिकरणसे जन्यहोनेकरात्म ज्ञानमेंप्रमात्वप्राप्तहोगा। इसलियेमनग्रात्मसाक्षात्कारकाकरणनहीं। यदिकरणमानोगे तोयात्मसाक्षात्कारभीभ्रमरूपहोगा। औरतिसको भ्रमरूपतानहींसंभवती । क्योंकिवहसकार्ययज्ञानकानिवर्तकहै । औरभ्रमज्ञानयज्ञानकोनहींनिवृत्तकरसकता। अन्यथायतिप्रसंगहोगा अर्थातरजतभ्रमसे शुक्तिकेयज्ञानकीभीनिवृत्तिहुईचाहिये ॥शंका।। हे सिद्धांतिन्यदिकेवलमनयात्मसाक्षात्कारकोउत्पन्नकरे तोतिसमेंभ्रमत्त कीयाशंकाहोसकतीहै । परन्तुकेवलमनकोतोहमकरणनहींमानते । किंतुतत्वमस्यादिवाक्यजन्यज्ञानके प्रवाहसहितमनही तिसयात्मसाक्षा कारकाकरणहै । तैसेमानेहुएमूलप्रमाणशब्दकेसाथसंमतिहोनेसे अप्रामाण्यशंकाकीप्राप्तिनहींहोसकती ॥ समाधान ॥ हेवादिनशब्द दे०सि० मु० भा० प्रमाणकोमूलहोनेकरमनकोप्रमाणतानहींसंभवती । क्योंकिअपरोक्ष रूपतासेवेदतिसकोबोधननहींकरता । ऐसातुममानतेहो । औरपरस्पर संमतिके अर्थ जैसाज्ञानमनउत्पन्नकरताहै तैसाहीयदिशब्दनेभीउत्पन्न किया । तोदोनों मेंएकको अप्रमाणताअवश्यहोगी। क्योंकिग्रनधि गतअर्थत्वकाअभावहै। औरइसप्रमाणतादोपकेदूरकरनेकेलियेयदि शब्दकोपरोक्षज्ञानकाजनकमानोगे। तोतिसकेसाथविरोधहोनेसेपुनः मनकोथममाणताहोगी ॥ शंका ॥ तत्त्वमस्यादिवाक्यपरोक्षज्ञानके जननस्वभाववालाहुयाभी यात्माविषयक अपरोक्षाकारज्ञानकोही उत्पन्नकरेगा। क्योंकिब्रह्मात्मामेयपरोक्षरूपाविद्यमानहै । औरतिस शब्दकेसाथसंवादहोनेसे मनकोयप्रमाणताभीनहींहोसकती। क्यों किधारावाहिकज्ञानोंकीन्याई तिसमेंप्रमाणताहोजायेगी। समाधान।। हेवादिन्यहकथनभीतुम्हारानहींसंभवता । क्योंकिवेदशब्दस्वरूपहै। वहयपरोनज्ञानकेउत्पन्नकरनेकोसमर्थनहीं । तिसकोपरोक्षज्ञानके उत्पन्नकरनेकाहीस्वभावहै । यदिऐसेनमानेतो [पर्वतोवन्हिमान् ] इसप्रतिज्ञावाक्यसेपरोक्षवन्हिविषयक “ययंचन्हिः” यहअपरोक्षाकार प्राप्तहोगा । तिसकारणसेपरोनाकारज्ञानकेउत्पन्नकरनेकाहीशब्दका स्वभावहै । यहवार्तासुरेश्वराचार्योंनेभीकहीहै ।। स्वभावतोऽखिलंवाक्यसंसर्गात्मकमेवहि । परोक्षवृत्त्याचतथावस्तुवोधयतिस्वतः ॥१॥8 य० ॥ सर्ववाक्यस्वभावमसंसर्गरूपताकोहीवोधनकरताहै । औरतेसेहीपरोनरूपताकरपदार्थकोस्वभावसेशब्दबोधनकरताहै ||१|| इति ॥ औरयात्मसाक्षात्कारकेप्रतिमनकोकरणमानेहुएवात्माको उत्तराई मनवाणीकी अविषयताकहनेवालीश्रतिका विरोधभी निवारणकरना कठिनहोगा । यद्यपियहश्रुतियशुद्धमनकीविषयताकोनिपेधकरतीहै। यहपूर्वकथनकियाहै । तथापिऐसीव्यवस्थामानने लक्षणाकीमाप्ति होगी । औरवहलक्षणामुख्यार्थमें किसीवाधककेविद्यमानहुएहीयुक्त होतीहै । अन्यथानहीं । यातेश्रुतिकाविरोधदुर्वारहै । यद्यपियात्मा मेश्रुतिरूपशब्दकीविषयतामाननेमेंभीश्रुतिका विरोधतुल्यही प्राप्त होता । तथापि वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः । उ० मु० ३ ख० २ ० ६ अ०॥ वेदांतजन्यज्ञानकरब्रह्मात्मारूपयर्थजिनअधिकारिपुरुषों कोभलीप्रकारनिश्चितहै । इत्यादिकश्रुतिप्रमाणसेब्रह्मसाक्षात्कारकी करणतावेदांतवाक्योंकोप्रतीतहोतीहै।और (यतोवाचोनिवर्तते) इत्यादि वाक्यसेशब्दको यात्मसाक्षात्कारकीकरणताका निषेधप्रतीत होताहै । इसप्रकारदोनोंवचनोंकापरस्परविरोधहुएक्या ? दोनों मेंएक वचनकोयप्रमाणताहोगी अथवादोनोंवचनोंकासमुच्चयस्वीकारहै। अथवायहांकोईव्यवस्थाहै । औरब्रह्मसाक्षात्कारमें वेदांतविकल्पसे करणहैं इसपक्षकायहांउपन्यासनहींकिया।क्योंकिविकल्पकायागादि क्रियाहीसंभवहै । वस्तु विकल्पनहींहोता । तहांप्रथमपक्षतोनहीं संभवता । क्योंकिदोनों मेंवेदवाक्यतातुल्यहै । यातेएककोथप्रमाण नहींकहसकते । औरसमुच्चयपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकिविरुद्धों काममुच्चयतेजतिमवत्अयोग्यहै । इसप्रकारदोनोंपक्षोंकेअसंभव हुएतृतीयपक्षहीशेपरहताहै। यातव्यवस्थासेहीविरोधकापरिहारकर्तव्य । सोईदिखलातेहैं । तहांनिषेधश्रुतितोशब्दकीशक्तिवृत्तिसेजो दे०सि० मु० भो० अात्मा प्रवृत्तिहै । तिसकानिषेधकरतीहै । औरवेदांतोंकोकरणता कहनेवालीश्रति लक्षणावृत्तिसे तिसयात्मामेंशब्दकी प्रवृत्तिकोबोधन करतीहै । यातेकिंचितमात्रभीश्रुतिकाविरोधहमारेपक्षमेनहीं। यह यर्थसिद्धहुया ॥ . *प्रथपुनःपूर्वपक्ष महावाक्योंमेंलक्षणाकानिषेध ब्रह्मात्माकेयभेद सानात्कारमें तत्त्वमस्यादियागमकोलनणा वृत्तिसेकरणताहै यहपूर्वसिद्धांतीनेकथनकिया । तिसमेंलक्षणावृत्ति सेथात्मा शब्दकीप्रवृत्तिको वादीनिषेधकरताहै । हेसिद्धांतिन्तत्त्व मस्यादिमहावाक्योंमें जोतुमनेलनणाकथनकी सोययुक्तहे।क्योंकि भागत्यागलक्षणासे वाच्यार्थकेएकदेशकाग्रहगणकरेहुए श्रुतयर्थका परित्यागप्रासहोगा। तात्पर्ययहहै किपथममहावाक्यों में जहतलक्षणा तोनहींसंभवती । क्योंकिवाच्यार्यकएकदेशरूप यात्माकाग्रहणहै । यौरजहतलनणामें समग्रवान्यथर्थकात्यागहोताहै। नौरथजहत लनणाभीनहींसंभवती । क्योंकिपरोनत्वादिवाच्यार्यके एकदेशका परित्यागहै । औरतिमयाच्यार्यसे अधिकयर्थकाग्रहणहोताहै । थौरजहत्यजहतलनणाकाभीसंभवनहीं। क्योंकिवाच्यार्थकएकदेश मेलनणामे शब्दकीप्रवृत्ति होनेकर वाच्यक एकदेशम्पशुद्रमल्चि दानन्दस्वरूपयात्माकाग्रहणम्वीकारकरें तो तत्"तथा व"इनदोनों पदोंकसामानाधिकररायके यलमेश्रवणकिया जोपगेनतथायपरोन प्रोममार्गतधायममार्गका भेदम्पयर्थ तिमका परित्यागहोगा। गातेभागत्यागलनणाभी महावस्या नहींमंभवती ॥ शंका । एक विभक्तियंतकथन कियजोपद हैं । तधामनिकानिमित्तजिनमेभिन्न उत्तराई ३०७ । तिनपदोंकीजोएकयर्थमनिष्ठाहै। इसीकोसामानाधिकरण्यकहते हैं। पर्यायपदजो एकविभक्तियंत तिनमेंसामानाधिकरण्यकोप्राप्ति केनिवारणयर्थ प्रवृत्तिकानिमित्तजिनमेंभिन्न है “यहपदलक्षण कहा है । यहसामानाधिकरणय “तत्यौत्वं' इनदोनोंपदोंमेंभीहै । क्योंकि एकविभक्तियंतभीहैं । औरतिनकी प्रवृत्तिकानिमित्तभीभिन्नभिन्नहै । औरएकअर्थमनिष्ठाभीहै ।। यातेदोनोंपदोंकेसामानाधिकरण्यकेपस मर्शसेयनंतरपदार्थोंका अभेदरूपवाक्यार्थप्रतीतहोताहै।ौरवहयभेद संसारीयोग्रसंसारीरूपतासेविरुद्धस्वभाववालेजीवतथापरमात्माकानहीं संभवता । इसप्रकारमुख्यार्थकेअसंभवसे (अईत्यजतिपंडितः) अ०॥ विरोधकेप्राप्तहुएपंडितजनाधाभागत्यागदेता है । इसन्यायसे विरुद्ध ग्रंशकोत्यागकरविरुद्ध ग्रंशके अभेदको महावाक्यलक्षणासे बोधनकरताहै।ऐसामानने मेंकोईदोपनहीं।।समाधान। हेसिद्धांतिन्यह आपकाकथनभीसमीचीननहीं । क्योंकिश्रुतिसिद्धयर्थमें अनुपपत्ति काअभावहै।।यर्थयह किवेदनेजोअर्थकथनकियाहै वहग्रहणकरनेको हमसमर्थहैं । तिसर्थमकिसीप्रकारकी प्रेरणाअर्थात्यहवेदऐसेक्यों कहताहै ऐसेनहींकरसकते । शौखहवेदसंसारीतथायसंसारीकेयभेद कोग्रहणकराताहै। यातेवहयभेदअनुपपन्ननहीं। औरयनुपपत्तिके अभावसे लक्षणाकाभीश्रभावहै ।। शंका ।। हेवादिन्जेसेलौकिक वाक्य प्रत्यक्षादिप्रमाणांतरकेसाथ विरोधकाअभावकरकेही स्वार्थको प्रतिपादनकरताहै। तैसेवेदवाश्यभीप्रतिपादनकरताहै।इसकानामलोक वेदयधिकरणन्यायहै ।। इसन्यायसेवेदभीलौकिक वाक्यकीरीतिसेही स्वार्थकोग्रहणकराताहै । औरलौकिकवाक्य प्रमाणांतरके विरोधका ३०८ मु० मा ० स० प्रभावहुए स्वार्थकाबोधकहोताहै।यौरप्रकरणमें प्रत्यक्षादिकोंकाविरोध प्राप्तहै। क्योंकि सर्वज्ञतादि धर्मविशिष्ट ईश्वरका तथा अल्पज्ञतादि धर्मविशिष्टजीवका परस्परभेद “नाहमीश्वरः ” इत्यादिप्रमाणोंसे सिद्धहै । तिनके साथविरोध दूरकरनेकेलिये तिनकेभेदको त्याग कर शुद्धचिन्मात्रका अभेद लक्षणासे वेदवोधनकरेगाइसमें कोईदोप नहीं ॥ समाधान ।। हेसिद्धांतिन् यहकथनभी यापकासमीचीननहीं क्योंकिश्रुतिकेविरोधसे भेदग्राहिप्रमाणकोहीयप्रमाणताहोजायेगी । यहांयहतात्पर्य है । लौकिकवाक्य अपनेयर्थकवोधनकरनेमें प्रमाणां तरके अविरोधकीपेक्षाकरताहै । यहक थनतोसंभवताहै । क्योंकि लौकिकवाक्य तथायन्यप्रमाण इनदोनों में लौकिकपनातुल्यहै। और वेदतोयपरिपेयहोनेसे प्रबलहै। यपनेयर्थकाविरोधीजोप्रमाणांतर तिस कोबाधकरदेगा । तिसकारणसे स्वार्थकीग्रनुपपत्तिनहीं। यातेमहा वाक्यों में भागत्यागलक्षणाभी नहींसंभवती ॥ शंका ॥ हेवादिन जिसकिसीप्रकारसे प्रमाणांतरकोवाध नकरके यदिअपनी प्रमाणता अर्थात्स्वार्थकीबोधकता वेदमें संभवहोजाय तोप्रयोजनसे विनाइतर प्रमाणकावाथ किसलियेकरनाहै।किंतुतिसकावाधकरनायोग्यनहीं ।। समाधान। हेसिद्धांतिमयदिइतरप्रमाणका बाधनहींमानोंगे तोयखंड तथासंसर्गसेरहिततथासजातीय यादिकभेदसेरहित जोग्रदयब्रह्मवही सर्वकाअंतरात्माहै । इसप्रकारजोलक्षणासेवोधनकरनाहै । वहभी नहींसंभवेगा। क्योंकिसजातीययादिसर्वभेदकेयोधकजोप्रत्यक्षादिक प्रमाणहैं । तिनकेसाथविरोधविद्यमानहै । तिससेप्रमाणांतरकाबाध श्रुतिकन्यवश्यहोनावाहिये । यातेप्रथमहीश्रुतिमुख्यायविरोधि उत्तराई प्रमाणांतरकोबाधकरेगी । लक्षणासेतिसको अन्यर्थपरत्वयुक्त नहीं। किंवा ।। * मानांतरविरोधतुमुख्यार्थस्यपरिग्रहे । मुख्याथेनाविनाभूतेप्रवृत्तिलक्षणेष्यते और अ०॥ मुख्यार्थकेपरिग्रहणकरनेमें जहांप्रमाणांतरकाविरोधहो तहांमुख्यार्थकेसाथसंबंधवालाजोयर्थहै तिसमेंशब्दकीवत्तिकोलक्षणा कहतेहैं । यहलनणाकास्वरूपजाननेवालेवृद्धपुरुपोंकीमर्यादाहै । इसलियेशक्यसंबंधियर्थमेहीलनणाहोतीहै । औरयहांतत्त्वमस्यादि वाक्यों में वाच्यार्थकेसाथ संबंधवालाकोईपदार्थ हैनहीं क्योंकिशुद्धा मातोसंसर्गसेरहितहै । औरतिसशुद्धात्माकोही तुमलक्ष्यअर्थ मानतेहो । तिसमेंलक्षणानहींसंभवती ॥ शंका ॥ यद्यपिलक्ष्यार्थ असंसर्गी है तथापि वाच्यार्थ जोविशिष्टहै वहतोसंसर्गी है । वही लक्ष्यार्थकेसाथवलात्कारसे संबंधवालाहोजायेगा ॥ समाधान ॥ संबंधदोनोंपदार्थोंकेयाश्रितरहताहै। एकपदार्थकोयसंसर्गीहुएइतर पदार्थकरनिरूपणकरनेयोग्यसंबंधकीययोग्यताहै।ौरयसंसर्गिपदार्थ लक्ष्यनहींहोसकता। क्योंकितैसाकहींदृष्टनहीं जोयसंसर्गिपदार्थ भीलक्ष्यहो। किंतुवाच्यार्थकेसंबंधीमहीलक्षणालोकमैदेखीजाती है ।। किंवा ।। लक्ष्यजोचेतनमात्रतुममानतेहो वहकिसीपदकावाच्यह वानहीं । प्रथमपक्षकहो तोजेसेवहशब्दशक्तिवृत्तिसेशुद्धचिदात्मा मेंप्रवृत्तहोगया । तेसे “तत्त्वं" पदभीशक्तिवृत्तिसेप्रवृत्तहोजायेंगे फिर लक्षणामाननेकाक्याप्रयोजनहे । औरद्वितीयपक्षभीनहींमंभवता ।। क्योंकिसर्वप्रकारसे जोयवाच्यार्थहे। वहलक्षणासेबोधनकियाजाता वे०सि० मु. भा० यहकहींभीनहीं देखा । यातेलक्ष्यपदार्थमेंमूकताप्रसंगहोगा | क्योंकिकोईपदतिसकावाचकनहीं ॥ शंका ॥ हेवादिन लक्ष्यार्थमें भूकताकीपासितुमक्योंकहतेहो।जिसकारणसेलाक्षणिकपदसेही तिस काकथनहोजायेगा ।। समाधान ।। हेसिद्धोतिन्लक्ष्यकाबोधकजो पदहै । वहलक्षणावृत्तिसेप्रवृत्तहोताहै। ऐसामानेहुए तिसकेलक्ष्यका वोधक कोईअन्यपदकहनेयोग्यहै । औरवहपदभी लक्षणासेहीप्रवृत्त होगा । इसप्रकारतिसतिसलक्ष्यकेयोधक औरौरपदमाननेमें थनव स्थादोपकीप्राप्तिहोगी ।। किंवा ।। “तत्” यौ “त्वं" इनदोनोंपदों कालक्ष्यक्या? एकहै।अथवाभिन्न है। प्रथमपक्षकहो तोदूसरापदव्यर्थ होगा। क्योंकिएकपदसेही लक्षणावृत्तिकरकेप्रत्यक्तथाब्रह्मकेयभेद रूपलक्ष्ययर्थकाजोसाक्षात्कारतिसकीसिद्धिहै ॥ शंका ॥ हेवादिन दूसरेपदकीव्यर्थताकिसलिये तुमकहतेहोकिंतुनहींकहमकते। क्योंकि साक्षात्कारको प्रमापनातवसिद्धहोगा।जवकोईवाक्यरूपप्रमाणहोऔर वहवाक्यदोनोंपदोंसेहीसंभवताहै । इसप्रकारप्रमाणताकीसिद्धियर्थ अपेक्षितवाक्यत्वका निर्वाहकहोनेकर द्वितीयपदभीसफलहै निष्फल नहीं। समाधान दोनोंपदोंकाएकयर्थमानेहुए पदार्थतरकायभाव होनेकर संसर्गरूपवाक्यार्थ पदार्थसेभिन्नसिद्धनहींहोगा। क्योंकिपदों कोसमानार्थकहोनेकर पर्यायताकीप्राप्तिहै । यातद्वितीयपदकाप्रयोग होनेसेभी वाक्यत्वकानिर्वाहनहींहोसकता। शंका ।। यद्यपिसामान्य रूपतासेलक्ष्यएकहीहै। तथापितिसलक्ष्यमें किसी विशेषग्रंशकोलेकर दूसरापदप्रवृत्तहोजायेगा । इसप्रकारयपर्यायताहोनेसे वाक्यत्वकैसे नहींहोसकता ॥ समाधान ।। हेसिद्धांतिन् लक्ष्यकोसामान्यविशेष उत्तराई भावकासंसर्गामानेहुए अखंडवाक्यार्थत्वकीहानिहोगी । औरयखंड वाक्यार्थत्वकोहानिसेही द्वितीयपक्षभीअसंगतहै। औरलक्षणाकी व्यर्थता द्वितीयपक्षमें औस्यधिकदोपप्राप्तहोताहै।। शंका ।। लक्षणा कायभावतुमक्योंकथनकरतेहो। क्योंकिभिन्नपदार्थोकेअभेदकोभीवेद लक्षणासेबोधनकरदेगा ।। समाधान । विरुद्धधर्मवालेपदार्थोंका अभेदनहींसंभवता । इसकारणसे लक्षणाकरकेभी भिन्नोंकेयभेदको तात्यर्यवृत्तिसे वेदनहींवोधनकरसकता।क्योंकिप्रमाणवस्तुकाउत्पादक नहींहोता । किंतुविद्यमानवस्तुकाज्ञापकहोताहै। औरभिन्नपदार्थों कायमेदवास्तवसेहोतानहीं । लक्षणासेभीवेदकिसकोवोधनकरेगा। अवमहावाक्यों मेंलक्षणाकाग्रभाव औरहेतुसेपूर्वपक्षीउपपादनकरताहै ।। किंवा ।। जैसेमीमांसकमतभव्यपदार्थजोयदृष्ट तिसकेयर्थभूत पदार्थवीहियादिकोंका उपदेशकियाजाताहै । तैसेवेदांतमतमेंनहीं।। किंतु भूत पदार्थ जो यात्मा तिसकी प्राप्तिके थर्थ भव्यपदार्थ जो श्रवणादि तिनकाउपदेश कियाजाताहै। यहांसिद्ध पदार्थकानामभूत है।ौरसाध्यपदार्थकानामभव्यहै । तिसकारणसेवेदांतशास्त्रमें तत्त्व मस्यादिमहावाक्य सच्चिदानंदस्वरूप सर्वकाशेषीजोचिदात्मा तिसके प्रतिपादकहोनेकर प्रधानवाक्यकहेजाते हैं ॥ तिनसेभिन्नजोश्रव णादिकोंकेबोधकवाक्यहैं वहमहावाक्योंको अपेक्षित अर्थका समर्पक होनेकर उपकरणहोनेसे तिनकाशभूतगौणयाम्यहैं ॥ शंका ।। महावाक्योंकोप्रधानताहो परंतुतिससे यासिद्धहोताहै ।। समाधान ।। इसप्रकारमहावाश्योंको प्रधानवाश्यताकेहुए तिनमें लक्षणाकासंभव किसरीतिसेहोसकताहै। किंतुकिसीरीतिसेभीनहीं।यहसिद्धहोताहै।

व०सि० मु० भाग शंका ॥ हेवादिनइसमेंच्या विलक्षणताहे ॥ जिसवाक्यमें अनुपपत्ति हो तिसीमेंलक्षणा संभवहोसकतीहे ॥ समाधान । प्रधानवाश्यों में जिनगौणवाश्योंकायर्थ असमवेतहै । तिनको प्रधानवाक्योंके अनुसारिरूपताकर ब्याख्यानकरनेकेलिये गौणवाक्योंमेहीलक्षणाका संभवहै । प्रधानकायों मेंनहीं । यद्यपिदोनोंवाक्योंमें वेदपनातुल्य है। यातेप्रधानवाक्योंमें भीलक्षणासंभवतीहै। तथापिन्यायकाविरोध होनसेतिनमेंलक्षणाकायसंभवहे।सोन्यायपूर्वमीमांसाकेनवमअध्याय में महर्पिजैमुनीजीनेकहाहै ॥ * विप्रतिपत्तौविकल्पः स्यात् समत्वात् । गुणेत्वन्याय कल्पनेकदेशत्वात् । पू०मी०(८)(३)१५) श्र० ॥ अग्निपोमीयएकपाशवालेपशुसंबंधियागके प्रकरण में (पाशान ) और (पाशं) यहदोमंत्रश्रवणकियेहैं । तहांबहु वचनांतमंत्रक्या?प्रकरणसे उत्कर्पणकरनेयोग्यहै वानहीं। इसप्रकार संशयकेप्राप्तहुए तहांयहपूर्वपक्षप्राप्तहुया॥ (पाशं ) यौ (पाशान्) इनदोनोंमंत्रोकायहांपरविकल्पहै । क्योंकिपाशजोपातिपदिकहै ।। वहदोनोंमंत्रोंमेंसमानहै। यातेमंत्रकाप्रकरणसेउत्कर्ष है। (सिद्धांत) यहांयग्नीपोमीयमेंममवेत यर्थहोनेकर पाशवाचिप्रातिपदिकप्रधानहै। तिसकेयनुसारीहोनेसे बहुवचनवाचिप्रत्ययगौणहै । यातेतिसगौण प्रत्ययमेंलक्षणाकरके वहपाशके यवयवोंकोकहताहै । इसलियेगौण शब्दमेंहीलक्षणाकीकल्पनाहोतीहै । तिसकेबलसेमंत्रकाप्रकरणसे उत्कर्पनहींहोसकता । क्योंकिप्रत्ययकोपदकाएकदेशहोनेसेप्रातिपदि कग्राधीनहोनेकर उत्कर्पताकीययोग्यताहै। इसन्यायसेगौणवाक्य उत्तरार्द्ध मेंहीलक्षणायुक्तहै ॥ प्रधानमेंनहीं ॥ इति ॥ अवपूर्वपक्षीसिद्धांत मुद्राकोयाश्रयणकरकेएकदेशीकामत निराकरणकरनके लियेतिसको दिखलाता है। * अथएकदेशीकी रीतिसेमहावाक्योंमें लक्षणाका निषेध ।। यहांकोईएकदेशीवेदांतीयहकहतेहैंकितत्त्वमस्यादिमहावाक्योंमें हमलक्षणाहीनहींमानते।यातेलक्षणाकानिषेधहमारेमतमेयनिष्टनहीं। औरयहजोसिद्धांतीकहताहै।किलक्षणाकाअभावमानेहुएमहावाक्योंमें सामानाधिकरण्य कैसे संभवेगा । क्योंकि जिनपदोंकी प्रवृत्तिका निमित्तभिन्नभिन्न है। निनकीएकयर्थमेंवृत्तिकायभावहै। औरलक्षणासे विनाजीवतथा परमात्माकासामानाधिकरण्यकोईभीसंभावनाकरनेको समर्थनहीं। यहांसामानाधिकररायएकताकानामहै अथवाजीवतथा परमात्माइनदोनोंशब्दोंकरकेतिनकेवाचकपदोंकाग्रहणकरना लक्षणा केअनंगीकारसेतिनकासामानाधिकरणयनहींसंभवेगा|यातेमहावाक्ये मेंलक्षणायवश्यमानीचाहिये। सोयहकथनभीसमीचीननहीं। क्योंकि रज्जुसर्पकीन्याईएककाबाधकरकेभीवहसामानाधिकररायवनसकताहै। अवइसीयर्थकोस्पष्ट करते हैं। “सर्पोरज्जुः” प्रथमइसवाक्यमेंदोपदहैं। सोदोनोंएकविभक्तिधेतहुएएकहीयर्थकोकथनकरतेहैं । क्योंफिसर्प का यनुवादकरकेरज्जुकाविधानहै । सोरज्जुकाविधानसर्पकास्वरूप विद्यमान एनहींकरसकते । किंतुसर्पकास्वरूपसर्पपदसेयनुवादके वहानेसेराधकरकेरज्जुकास्वरूपमात्रशेपरहताहै। इसप्रकारएकहीयर्थ मेंदोनोंपदोंकीकृत्तिोनेसे जैसेसामानाधिकररायसंभवताहै । तैसेही १० सि. मुः भा. "वं" इसपदसेजीवकोवाधकर "तत्" पदसेशेपरहेब्रह्ममात्रकाप्रति पादनहै । इससेदोनोंपदोंकोएकयर्थमवृत्तिहोनेकरसामानाधिकरण्य संभवताहै ॥ शंका ॥ हेएकदेशिन्इसप्रकारखाधसामानाधिकरण्य मानेहुएभी दोनोंपदोंकीएकयर्थमेवृत्तिनहींसंभवती । क्योंकितिनमें यद्यपिपरमात्मपद चिदात्माकाउपस्थापकहै।तथापित्वंपदजीवाभावका बोधकहै । तैसेमानेहुए भिन्न यर्थवालपदोंकी एकयर्थमेवृत्तिकैसेकहते हो ॥ समाधान ॥ कल्पितपदार्थकायभावयधिष्ठानसेभिन्ननहींहोता यातेजीवाभावयधिष्ठानब्रह्मस्वरूपहै । इसकारणासेदोनोपदोंकीएक थर्थमेवृत्तिसंभवतीहै ॥ शंका । यद्यपिदोनोंपदों मेंलनणानहींभीहै तथापिब्रह्मपदमेबहलनणापरिहारकरनीकठिनहै । क्योंकिविशिष्ट पदार्थमेशक्तिवालाजोपदतिमकोशुद्धपदार्थकीउपस्थितिमेलनणाकी यवन्यप्रपेनाहै ॥ ममाधान ॥ जैसे सत्यादिपदशक्तिवृत्तिमशुक्रके उपस्थापकमानेंहैं। तमेतन्पदसेभीशुद्ध कीउपस्थिनियनजायेगी। लनणाकायंगीकारनिप्फलहै ।। शंका ॥ पूर्वउक्तरीतिसंतत्पदसे शुदकीउपस्थितिमानेहुए “तत्त्वममि" महावाक्यमेंजीयकस्वरूपका बाधकरनाययुक्तह। क्योंकिङ्मवाक्यमननपदार्थ काप्रथमनिगहोने करतिमको यनुवादक योग्यहोनेसे ननपद कावधिक जीवत्वका विधान । यद्यपि प्रथमकथन किये पदार्थको यनुवादक योग्यमानेहुए “ययमात्मात्रा" इसमहावाण्यमें क्यागनि होगी । श्योंकितिसमेंजीवकाहीवाधप्रतीत होता ॥ तथापिएक यर्थनि स्वायम्युक्तिमकोर्डहेतु नप्रितीत होता । इमलियेयदिजीवपन्न पातीचमकेहीवारकी यशंकाग्नीपंचकपुरमापकीन्याई थपुरु उत्तराई पार्थस्वरूपजीवमें तात्पर्य्यवालाहुयाशास्त्रभी अप्रमाणरूपहोगा । समाधान ।। यहतुम्हारीयाशंकानहींसंभवती । क्योंकिब्रह्मपदार्थके स्वरूपमेंप्रमाणरूपसत्यादिवाश्यकाविरोधहोनेसेविनिगमनाविरहदोप नहींप्राप्तहोसकता ॥ यौरजीवभीशेष नहींरहता । तात्पर्ययह (सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म।) इसमंत्रसब्रह्मकी सत्यरूपताके निश्चयहुएपरिशेपसेसंसारीजीवकाहीवाधहोताहै ब्रह्मकानहीं । यातें शास्त्रकोप्रमाणतानहीं होती। ॐ अथएकदेशीकेमतसेजीवके स्वरूपकाविचार * शका/हेएकदेशिनजिसजीवकायापवाधकहनेहो । वहक्या? चिदात्माहीजीवहै । अथवावहजडपदार्थ है । प्रथमपनमें तोब्रह्मका हीनामजीवहै । यातेवाधकायसंभवहै । और द्वितीय पक्षमें जडघटादिकोंके तुल्य तिसजीवमें भोक्तापनेका अभावहोगा । क्योंकिभोक्तापनाचेतनमेंही होताहै ॥ समाधान ॥ यहपूर्वउक्त दोपहमारेपक्षनहींप्राप्त होसकते ॥ क्योंकितिसजीवकोचेतनका आभासहोनेकर मसिद्धजडचेतनसे विलक्षण यनिर्वचनीयपनाहै । अस्वप्रकाशहोनेसेचैतन्यसेभीविलक्षणताहै । यौरभोक्ताहोनेसेतथा चैतन्यकीन्याईभाममानहोनेसे इसकोचेतन्याभासकहतेहैं यातेजडसे भीविलक्षणहै । यहांपरयहनुमानभीजानना । जीवोनब्रह्मअस्वप्रकाशत्वात घटवत् ॥ १ ॥ जीवोनजडःभोक्तृत्वात् । व्यतिरेकेणघटवत् ॥२॥ याजीवब्रह्मनहीं है अस्वप्रकाशहोनेसे जोजोस्वप्रकाशनहीं होमोसो ब्रह्मयर्थातचेतनभीनहींहै । जैसेघटहे ॥१॥ औरजीवजडनहीं है दे०सि० मु. भा. भोक्ताहोनेसे जोजडहै ।सो भोक्तानहीं है। जैसे घटहै ।।२।। इति ॥ शंका ।। चैतन्यकोरूपरहितहोनेसे तिसकायाभासजीवहै यहकथन हीनहींसंभवता । क्योंकिरूपरहितवायुका आभासकहींभीदेखनेमें नहींधाता || समाधान ॥ रूपरहितचैतन्यकाभीप्रतिबिंबसंभवताहै। क्योंकिरूपरहित याकाशका स्वच्छजलमें याभासदेखनेमें याताहै। औरदृष्टयर्थ कोईभी अनुपपत्तिनहींहोसकती ।। शंका ॥ जलमेंया काशकाप्रतिबिंबनहीं संभवता । क्योंकिवहनीरूपहै । औरजलमेंजो तिसकेअभासकीप्रतीतिहै । वहतोयाकाशवर्तीजोसूर्यकीकिरणेतिन केयारोपसेहोतीहै । ऐसेतुमनिश्चयकरो। यातेजीवचैतन्यकायाभास नहीं ॥ समाधान ॥ स्वल्पजलमेंऔरणगाधजलमें महाकाशकी प्रतीतिहोतीहै । इसहेतुसेकामनासेविनाभी पुरुषनेऊर्ध्वदेशवर्तीयाका शकाप्रतिविवस्वीकार कियाचाहिये॥ऊर्ध्वदेशवीमहाकाशकेयाभास सेक्निायल्पगंभीरतावालेस्वच्छजलमेंमहत्परिमाणगंभीरताकाभ्रमनहीं संभवेगा तिसकारणसे जलमेंयाकाशकायामामविद्यमानहीहै। याते चेतनकायाभासरूपजीव फेसेनहींसंभवता । किंतुसंभवताहै । पूर्व उक्तयुक्तिसेसिद्धचिदाभामरूपजीवकोअतिप्रमाणसेभी सिद्धकरतेहैं। (रूपंरूपंप्रतिरूपोवभूव।) ० ॥ हरएकउपाधि विदा त्माप्रतिबिंबभावकोप्राप्तहुया । इमश्रुतिसेभीचिदाभासरूपजीवकी सिद्धिहै ।। शंका॥ हेएकदेशिन्संसारिजीवकोरापकियेहुएभी यात्मा कीमुक्तिनहींसिद्धहोसकती । क्योंकिमूलमहित थनर्थरूपजोबाह्य संसारहै तिसकातो उच्छेदहुयानहीं । समाधान।। (इदंसर्वयद यमात्मा।) य०॥ जोयहसर्वदृश्यहैमोयहयात्मारूपहीहै ! इस तगर्द ३१७ वाक्यकरज्ञानततकार्यरूप सकलअनर्थरूप संसारकेवाधहुएकेवल यानंदस्वरूपपरमात्माही मुक्तिकालमेंशेपरहताहै। यातेचैतन्याभास पक्षहीश्रेष्टहै ।। इतिएकदेशिमतम् ॥ अथमहापूर्वपक्षीकीरीतिसे सिद्धांतमुद्राको आश्रयणकरएकदेशीके मतकाखंडन । * अविद्योत्थंचिदाभासं जडाजडविलक्षणम् । जीवंयेवाध्यमित्याहुस्तानाचार्यों निषेधति ॥ १॥ चौ० जडचिदभिन्नजीवहै जोई । अविद्यक चिदाभासहै सोई ।। ताकोबाधजोउ नरररहैं । तिनेनिषेध याचार्य करहें ॥ १ ॥ समाधान ॥ यहएकदेशीकामत समीचीननहीं । क्योंकि बंधतथामोक्षको व्यधिकरणताकी प्राप्तिहोतीहै । तथाहि प्रथम भोक्तातोजीवहीहै । क्योंकि “मैं सुखीहूं" यहप्रतीतिजीवमेंहोतीहै । औरअपनेमेंसमवेतसुखके साक्षात्कारवालेकोही भोक्तापना होताहै। औरवहभोक्तृत्वकर्तृत्वसेविनानहींसंभवता । क्योंकिकर्ताहीभोक्ता होताहै । औरवहकर्तृत्वप्रमातृत्वसेविनानहींसंभवता । क्योंकिप्रथम यहपुरुषकिसीवस्तुकोजानताहै। पुनःतिसकीइच्छाकरताहै । तिससे अनंतरतिसकीप्राप्तिकेनिमित्तकोई क्रियाकरताहै । यहवार्तासर्वलोकों मेंप्रसिद्धहै । तिसकारणसे भोक्ताभोगभोग्य औक क्रियाकर्मतथा प्रमाताप्रमाणप्रमेय यहनवप्रकारकाबंधजीवनिष्ठहीहै । तिसजीवयौ श्रज्ञानकावाधहोनेकरमोक्षदशामें निरावरणसुखस्वरूपतासेयवस्थिति रूपमुक्तिपरमात्माकीहोगी । इसमकावंधतथामोक्षकीव्यधिकरणता है। सोनहींसंभवती । क्योंकिवद्धहीमुक्तहोताहै। वद्धअन्यहोयौर । वै. सि. मु० भा० मुक्तयन्यहो यहनहींहोसकता। किंवायदिजीवकावाधमानोंगे । तो श्रवणादिसाधनों मेंकौनप्रवृत्तहोगा ॥ औरयदिऐसेकहो । किमोन कीइच्छावालामुमुनु निनसाधनों मेंप्रवृत्तहोगा । तोहमयह पूछतेहैं । वहकिसकामोक्षचाहताहै । क्या ? किसीअन्यपुरुषका मोक्षचाहताहै। अथवायपनामोनचाहताहै ! प्रथमपनतोनहींसंभवता क्योंकिदूसरेकीमुक्तिकेयर्थकोईयन्ययनकरताहै । यहकहींदृष्टनहीं। औरयदिदितीयपक्षकहो तोतिसमेंयहविचारकर्तव्यहै । क्या ? अपना नाशपुरुषार्थ है । अथवास्वदुःखकीनिवृत्तिपुरुषार्थ है । इनमेंभीप्रथम पक्षमेंयहविचारणीयहै। अपनानाशक्या?स्वतः पुरुषार्थरूपहै।अथवा पुपार्थकामाधनहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिस्वनाशसुख तथादुःखाभावसे भिन्न है । यातेतिसकोपुरुषार्थरूपतानहींसंभवती । योरयदियहद्वितीयपनकहो। किदुःखकाउपादानकारणजीवहै। और उपादानकानाशकार्यकेनाशमेहेतुहोताहै । यातेजीवकेनाशसेदुःख निवृत्तहोताहै । इसप्रकारदुःखाभावपुरुषार्थरूपहै तिसकासाधनहोने सेस्वनाशभीपुरुषार्थरूपहै । सोयहपनभीसमीचीननहीं । क्योंकि केवलदुःखाभावकोहीतुमपुरुषार्थरूपकहतेहो । अथवाआत्मीयदुःखा भावकोकहतेहो । इनमेंप्रथमपनतोनहींसंभवता । क्योंकिशत्रुके दुःखाभावकोभी पुरुषार्थरूपताहुईचाहिये । औरद्वितीयपतभीनहीं संभवता ।। क्योंकि यात्माकानाशहोनेसे यहदुःखाभावरूपपुरुषार्थ किसकोप्राप्तहोगा॥ ौरअपनेयात्माकेनाशकायंत्रकोईभीकरतानहीं औरयात्मीयदुःखाभावपुरुषार्थहै ॥ इसपनकनिराफरणसेस्वदुःखकी निवृत्तिपुम्पार्थहै ॥ यहप्रथमकथन कियादितीयपक्षभी निरासहुया उत्तराई जानलेना ॥ यातेजीवकावाधनहींसंभवता । पूर्वयात्माकाराधमान कर अभासपक्षमेवंधमोक्षादिव्यवस्थाकी अनुपपत्तिप्रतिपादनकी।यब जीवात्मा यसत्यत्वकायभावहोनेसेतिसकावाधहीनहींसंभवता। इस अर्थकोप्रतिपादनकरतेहैं ॥ ौरजीवात्माकल्पितभीनहीं ॥ योंकि जोवादीजीवात्माकोकल्पितमानताहै । तिसकोहमयहपूछतेहैं ।। किजीवकेसत्यत्वकाग्राहककोईप्रमाणनहीं।इसकारणसेतुमजीवकोयस त्यकहतेहो ॥ अथवायुक्तिसेतिसकावाधहोजाताहै । यातेश्रसत्य कहतेहो। अथवाअसत्यत्वकाबोधकप्रमाणविद्यमानहै यातेयसतहै।। इनमेंप्रथमपक्षनहींसमवता ॥ क्योंकि (अननजीवेनात्मना) यहश्रतिजीवकीसत्रूपतामेंप्रमाणहै । यद्यपिजीवतथापरमात्माका अभैदमात्रइसश्रतिमेंप्रतीतहोताहै । कोईजीवकासत्यत्वनहींप्रतीत होता।। यातेजीवकल्पितकैसेनहीं किंतुकल्पितहै ।। तथापिसत्यज्ञाना दिपदार्थोके निर्वचनसे सिद्धजो सत्रूपपरमात्मा तिसकेसाथयभेद श्रवणहोनेसे जीवकायसत्यत्वबाधितहै ॥ शंका ॥ “नाहमीश्वरः" इसभेदग्राहिप्रत्यक्षकेविद्यमानहुए अभेदश्रुतिउपचारिकहै । अर्थात् अन्यार्थकोवोधनकरतीहै । समाधान (नान्योतोऽस्तिद्रष्टा) य० ॥ इसथात्मासेभिन्नऔरकोईदष्टानहीं । इसश्रतिमेंभेदकानिषेध श्रवणहोताहै ।। यदिभेदकोपारमार्थिकमानोगे तोयहनिषेधव्यर्थहोगा यातेजीवकाबाधनहीं होता ॥ औरस्वतःयसंसारिस्वभावजोपरमात्मा है तिसकोसंसारिस्वभावजीवरूपतानहींसंभवती । यातेजीवकोसत्य मानेहुएयुक्तिकाविरोधप्राप्तहोगा । यदियहद्वितीयपक्षकहो तोयहभी नहींसंभवता । क्योंकिजैसेआकाशमें अविद्याकेवलसेकल्पितनीलता ३२० वे० सि. मु. भा० प्रतीतहोतीहै । तैसेस्वतःसंसारिस्वभावात्मामेंग्रविद्यादिउपाधि केसंबंधसे कल्पितसंसारिजीवरूपतासंभवतीहै ।और।। *रूपंरूपंप्रतिरूपोवभूव इसश्रतिप्रमाणसेजीवकीयसतरूपतासिद्धहै । यहतृतीयपक्षभी . असंगतहै । क्योंकितिसवाक्यमें मनुष्यत्वादिधर्मयुक्त मनुष्यपशु पक्ष्यादिशरीरदोवारकथनकियेहुए रूपशब्दकार्थ हैं । औरतिन शरीरोंको सादृश्य प्रतिरूपशब्दकाअर्थहै जैसे (मुद्राप्रतिमुद्रा) इसवाक्यमेंमुद्राकेसादृश्यकोही प्रतिमुद्राशब्दवोधनकरताहै। किसी यौरयर्थकोनहीं । तैसेयहांभी प्रतिरूपशब्दसे रूपसादृश्यहीकथन किया है । याभासरूपतानहींकथनकी तैसेहीयन्यवाक्योभीकहाहै देहंदेहंप्रविष्टःसंस्तदेहाकारतामगात श्रादेहदेहमेंप्रविष्टहुयायात्मातिसतिसदेहकीसमानाकारता कोप्राप्तहुआ।इसप्रकारजीवकोयाभासरूपताकायभावहोनेसेसतरूपता संभवतीहै। शंका ॥प्रतिरूपशब्दको दर्पणस्थमुखादिकों में रूढहोने सेतिसकासादृश्यअर्थ यापकैसे कथनकरतेहो। औरयदितिसकाअर्थ प्रतिविमानोगेतोजैसेदर्पणस्थमुखमिथ्याहीहोताहै।तिसकीन्याईजीव कैसेसतरूपहोसकताहै किंतुवहभीमिथ्याहीमाननेयोग्यहै ॥समाधान ॥ यद्यपिपूर्वउक्तरीतिसेजीवप्रतिबिंवरूपहो तथापिवह यसत्नहीं है। क्योंकिजैसे "ग्रीवास्थितजोमुखहै सोईदर्पणमेस्थितहै" इसप्रत्य भिज्ञासेविंप्रतिबिंबकायभेदप्रतीतहोताहै | यातेप्रतिविमिथ्यानहीं किंतुसतबिंवरूपहीहै तेसेजीवभीविवचेतनस्वरूपहोनेसे मिथ्यानहीं किंतुसतरूपहीहै । औरयाभासतोउपाधिगतत्वरूपएकधर्महै। सोजीव उत्तराई रूपनहीं किंतुजीवकाधर्महै । औरजीवतोयाभाससेभिन्नचेतनरूपही है। तिसीसेयसत्यनहीं । यहउक्तअर्थसर्वज्ञात्ममहामुनियोंनेभी कथनकियाहै ॥ 'उपाधिरंतःकरणंत्वमर्थे जीवत्वमाभासनमत्रतहत् । तदन्विताचित्पतिविंवमेवमनन्वितांतामिहविंवमाहुः १ (सं० शा० अ०२ श्लो० २७८) य० । इससेपूर्वकारिकामें कथन कियाजैसेतत्पदकेवाच्यमें प्रविष्टयाभासरूपईश्वरत्वमिथ्याहै तैसेत्वंपदार्थमेंअंतःकरणउपाधिहै। औरयहांजीवत्वहीयाभासरूपहै । अर्थातमिथ्याहै ।। औरसाभास अंतःकरणरूपउपाधिके संबंधवालाचेतनप्रतिविधकहाजाताहै । और साभासयंतःकरणके संबंधसेरहितचेतनकोयहां विंचकहतेहैं ॥१॥ इति ।। यातेजीकास्वरूपमिथ्यानहीं किंतुसत्यहै ।। शंका । प्रति विवरूपजीव यदिविवस्वरूपहीहै ॥ तोविंश्योपतिविज्ञतथास्वरूपयह भेदकाकथनरूपव्यवहार कैसेहोताहै ।। समाधान । एकवस्तुमेंभी भेदव्यवहारउपाधिके थाधीनसंभवताहै । क्योंकिजेसेसर्वकल्पनासे रहितएकहीस्वरूप मुखतथा चंद्रादिकों में विवयोप्रतिक्वितथास्वरूप यहतीनप्रकारकाव्यवहारउपाधिमेतिनकेप्रवेशकेयारोपसेयनंतर देखने मेंग्राताहै।तसेसर्वकल्पनासेरहितएकस्वरूपयात्मामेभीत्रिविधभेदव्यव हारसंभवताहै।यद्यपियात्माकोअनेकप्रपंचरूपताहोनेसेएकरूपताका कथनयुक्तनहीं तथापियज्ञानकेवशसेतिसकोयनेकरूपताहै। परन्तु वास्तवसेस्वरूपसर्वकल्पनासे रहितएकरूपहीहे ॥शंका यद्यपिपूर्व उक्तरीतिसेजीवसत्यस्वरूपहो । तथापि तिमकाधाधमानकरसामाना ३२२ ०सि० मु. भा० धिकररायक्योंनहो । समाधान ॥ हेएकदेशिसाधक्यविरोधीही सत्यत्वहै । यातेतिसकाबाधकेसेहोसकताहै ॥ किंतुनहींहोसकता । इसप्रकारजीवको याभासरूपताकाअभावहोनेसे तत्त्वमस्यादिकमहा वाक्योंमेवाधसामानाधिकरणयकी कल्पनावेदवाह्यहै।यद्यपिइसकल्पना कोवेदबायकहनानहींसंभवता । क्योंकिवेदिकएकदेशीनेहीस्वीकार कीहै । तथापियुक्तियौप्रमाणका विरोधहोनेसेययुक्तहै । सोयुक्ति' तथाप्रमाणपूर्वकथनकरयाएहैं । इसप्रकारसिद्धांतमुद्राकोयाश्रयण करकेमहापूर्वपक्षीनेएकदेशीका मतनिरासफिया ॥ अवलक्षणानि रासप्रकरणकोपूर्वपक्षी समाप्तकरताहै । पूर्वकथनकियेहुएलक्षणाकी अनुपपत्तिरूपहेतुसेलक्षणाकरके परिपूर्णसच्चिदानंदप्रत्यगात्माका बोधननहींसंभवता ॥ इतिपूर्वपक्ष । अथसिद्धांत ) महावाक्योंमें लक्षणाके संभवकाप्रकार निरूपण । अखंडार्थपरत्वं हिपदयोलक्षणांविना । निर्णीयेत्थंतमाचार्यः पूर्वपक्षनिषेधति ।। १ ।। चौ० ॥ अखंडार्थपरताहै जोई । लक्षण विनापदोंको सोई ।। याविधतां निर्णयकर गुरुवर । पूरवपक्षनिषेधहिबलधर ।।१ समाधान ॥ यहांपरपूर्वपक्षीसेहमयहपूछतेहैं । महावाक्यनिष्ठ पदोंमेलक्षणाकायभावजोतुमकहतेहो।वहक्या?मुख्यार्थकीयनुपपत्ति के अभावसेकहतेहो । यथवामहावाक्योंका यखंड्यर्थमे तात्पर्य नहींइसलियेकहतेहोप्रथमपक्षतोनहींसंभवता क्योंकि- । मू०॥ विरुद्वयोरभेदोहिनवेदेनप्रमीयते। अनन्यगतिकत्वेनमानांतरस्यवाधनम्॥३७॥ नीलछंद ।। वैरिनकेरयभेद नवेदहुबोधसके । लोकविषयहरीति कईजनखोजयके । औरगतीनहिकोय कहंविधिजाहिबने । बाधतहांहुइमान नरंचकदोपगनै ।। ३४ ।। टी० ॥ प्रत्यक्षादिकममाणोंका विरोधहोनेसेजीवनकेयभेद कीययोग्यताहै ॥ यातेविरुद्भधर्मवालोंकायभेद वेदवोधनकरनेको समर्थनहीं। इसप्रकारमुख्यार्थकेअसंभवसे तत्मलकलनणामहावाक्यों मेंसंमतीहै । औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकियखंडएकरस चिदात्मामें तात्पर्य के ग्राहकपदविधलिंगकी विद्यमानताहै। यातेतिस तात्पर्यकोयतिप्रसिद्धहोनेसे तात्पर्य्यकेयभावसे लक्षाकाअभावभी नहींकहसकते ॥ शंका॥ * पौर्वापर्यपूर्वदौर्बल्यंप्रकृतिवत्।पू०पी०म०६-पा०शासू०५४॥ य० । ज्योतिष्टोमसंज्ञक्यागमेसामगायनकरनेवालेउदातायौ प्रतिह दोस्त्वमसिद्ध हैं । तिसयागमें श्रध्वयादित्वपरस्पर पृष्टभागमेशाटकाकोहस्तसेग्रहणकरकेपवमानस्तोत्रकेयर्थयज्ञशालासे बाह्यनिकसतेहैं । तिनमयदिदेवगतिसे उद्गातावाप्रतिहत्ताका क्रमसे वियोगहोजाय तोवहांवियोगनिमित्तक विरुद्धप्रायश्चितसुनाजाताहै। एकतोप्रतिहतृविच्देदनिमित्तक सर्वस्वदलगादेकरमारंभकर्मकासमाप्त करना।मौरसराउद्गातृविच्छेदनिमित्तक दक्षणासेविनामारंभकियेहुए कर्मकासमाप्तकरना। यहांपरयहसंशयह क्या?प्रतिहर्तृवियोगनिमिन ३२४ वे०सि० मु. भा० कसर्वस्वदक्षणादेकरप्रारंभकर्मकासमाप्तकरनायोग्यहै । अथवाउद्गात वियोगनिमित्तकदनणासेविनायागकासमाप्तकरनायोग्यहै।तहांयहपूर्व पक्षप्राप्तहुया।कोईविरोधीनउत्पन्नहोनेसेपूर्वनिमित्तवलवानहै। यातेपूर्व विच्छेदनिमित्तकप्रायश्चितही अनुष्ठानकरनेयोग्यहै।यथसिद्धांतानिमि त्तोंकेपूर्वयपरभावकहुएपूर्वनैमित्तिककोदुर्बलताहै। औरपूर्वनिपेक्षउत्तर नैमित्तिकको तिसकावाधकरूपताकरउदय होनेसेपस्खलताहै। औरपूर्व नैमित्तिककउदयकालमेंउत्तरकी प्राप्तिहोनेकर पूर्वनैमित्तिककरउत्तर निमित्तकावाधनहींहोसकता। औरउत्तरनैमित्तिकतोपूर्वनेमित्तिकको बाधकरकेहीउत्पन्नहोताहै।जैसेदर्शपूर्णमासरूपप्रकृतियागमेंनिर्णीतउप कारवालीकुशमयजोवर्हि वहश्येनरूपविकृतियागजोउपकारकीयाकां क्षावालातिसमेंप्रथम यतिदेशसेप्राप्तहोतीहैं।वहबर्हि उपदिष्टजोशरमय वहिनिक्षपश्चातभावी यर्थातवी जिनकाउपकारकल्पनानहीं किया तिनकरप्रथमवाधकीजातीहैं।। इति ।।इसन्यायसेपूर्वहोनेवालेजोभेदके ग्राहकप्रत्यक्षादिप्रमाणतिनकापश्चात्भावीश्रुतिप्रमाणसेवाधहोजायेगा यौरब्रह्मात्माकेएकत्वकीमिद्धियर्थ सर्वभेदग्राहिप्रत्यक्षादिप्रमाणोंका वाघयवश्यकरनेयोग्यहे । इसकारणसेमंमारीतथायसंमारीकेभेदको ग्रहणकरनेवालाजो प्रमाणहै तिसकावाधकरकेहीवेदतिनके अभेदको बोधनकरेगा।तिससेमुख्यार्थकीयनुपपत्तियापकैसेकहतेहो।समाधान हेवादिनपरिपूर्णतथा ब्रह्मात्मएकरसजो अखंडअर्थहै। तिसकीसिद्धि केयर्थजोसकलप्रमाणांतरका वाधकरनाहै । वहयन्यगतिकेयभाव सेहोताहै। जहांकिसीमकारसेभी प्रमाणांतरकेवाधविनाही स्वार्थकी सिद्धिहो तहांतिसका वाधकरनायुक्तनहीं।तिसेमानेहुए प्रमाणांतरको उत्तराई ३२५ बाधनकरकेतिसकी अनुसारतासेतोमुख्यार्थकी अनुपपत्तिसंभवतीहै। तिसकोदेखकर लक्षणावृत्तिसे वेदब्रह्मात्माकीएकताको बोधनकरता है । इसप्रकारमहावाक्यों में लक्षणाकीसिद्भिहोतीहै ॥ अवइसीयर्थ कोदिखलातेहुएपूर्वपक्षके अनुवादपूर्वक तिसको दूषितकरनेलियेवि स्तारपूर्वकश्लोककी व्याख्याकरतेहैं । यहजोपूर्वपक्षीनेकहाथाकि महावाक्योंमें मुख्यार्थकीअनुपपत्तिके अभावसे लक्षणाकायभावहै। सोकथननहींसंभवता । क्योंकिजीवतथापरमात्माकाशभेद प्रत्यक्षा दिप्रमाणकरवाधितहै। यद्यपिविरुद्धोंकाभीयभेद शुक्तिरजतादिकों में देखाहै । तथापिविरुद्धोंकायभेद प्रमाणसेकहींनहींदेखा। औरशुक्ति रजतादिकोंकायभेदतोम्रमसिद्धहै । यातेतिसकोदृष्टांतरूपतानहीं संभवती । औरप्रमाणांतरकोवेदकर बाधितहोनेसे मुख्यार्थकीअनुप त्तिनहीं । यहकथनभीअसंगतहै । क्योंकियहवाधकेयोग्यहै इतने कथनसेही बाधकीसिद्धिनहींहोसकती। किंतुस्वविषयसिद्धिकीयन्य थाअनुषपत्तिसे वाधकीसिद्धिहोतीहै । थर्थयह जहांश्रुतिकेविषयकी सिद्धिप्रमाणकेबाधसेविनानसिद्धहोतहांप्रमाणांतरका चाधसिद्धहोता है। श्रन्यगतिकेहुएनहींसिद्धहोता। औरयहांतत्त्वमस्यादिमहावाक्योंमें तोलतणावृत्तिसभीतिनको ब्रह्मात्माकेअभेकीप्रतिपादकता संभवती है। यातेतत्त्वमस्यादिमहावाक्योंसे प्रमाणांतरकावाधनहींहोता ॥ औरजवप्रमाणांतरकाबाधनहुया । तबमुख्यार्थकी अनुपपत्तिसिद्ध हुई । तिससेलक्षणाकीसिद्धि महावाक्योंमें हुई । यहभावहै । और प्रमाणांतरकेविरोधकर मुख्यार्थकी अनुपपत्तिनमाने तोसर्वत्रहीलन णाकायभावहोजायेगा । क्योंकिलोकमभीनिश्चितप्रामाण्यवाले ३२६ के० मि. १० भ० वाक्यमेंही लनणामान है। तैसेवाक्यकाविरोधहोनेसे विरोधिप्रमाणां तरकाबाधहोजायेगा । तिससेमुख्यार्थकीयनुपपत्तिका अभावहोनेसे लक्षणाकीमाप्तिभीनहीं होगी। यातेअन्यगतिकेहुए प्रमाणांतरकावाध करनायुक्तनहीं । औरयहजोवादीनेपूर्वक हाथा किसर्वसंसर्गसेरहित शुद्धब्रह्मात्माका यभेदरूपजोयर्थ तिसमें लक्ष्यताके प्रयोजकरूप वाच्यार्थकेसाथसंबंधकाग्रभावहोनेसे तिसमेंलक्षणाकायसंभवहे ॥ ऐसेकथनकरनेवालेवादीसे हमयहपूछतेहैं। वाक्यमेलक्षणाकीकल्पना अधिकारीमुमुचकरताहै । मोकल्पनातिसकोच्या? तत्त्वसाक्षात्कारसे उत्तरकालमेंहोती।अथवापूर्वकालमेंहोतीहै।इनमेंप्रथमपक्षतोनहींसंभव ताक्योंकितत्त्वज्ञानमउत्तरलनणाकीपनाप्रयोजनशून्यहोनेसेव्यर्थ है औरयन्योऽन्याश्रयदोपकी भीप्राप्तिहै । क्योंकिसाक्षात्कारसे उत्तर लक्षणाकीकल्पनाहोगी। औरलनणाकीकल्पनासेयनंतर माक्षात्कार होगा । यौरवाक्यमेंयोग्यताकासंपादकहोनेकर लक्षणाकोवाक्यार्थ ज्ञानमेंकारणताहै। यातेतत्त्वज्ञानसेपूर्वलनणाकी कल्पनासंभवतीहै । यहद्वितीयपनयदिमानोतोवाच्यार्थकमाथसंबंध सुखेनहीवनसकताहै क्योंकिशुद्धलच्यार्थ यद्यपिस्वभावसेसंगभीहै। तथापियविद्याऔर अंतःकरणारूपउपाधिकाजोअविद्याकरकल्पितसंबंधहेवहसंभवहोसकता है । जैसेदिवांधत्वरूपदोपयुक्त जोउल्लूकादि तिनकीकल्पनाकर सिद्धतमकायादित्यमेंकल्पितसंसर्गहोताहै।तेसे विद्याकेबलसेवाल्यार्थ केसाथशुद्धलक्ष्यार्थका कल्पितसंबंधसंभवताहै। तात्पर्य्ययहहै। यदि द्योपाधिकचैतन्य तत्पदकावाच्यार्थहै । औग्यतःकरगाउपहितचेतन्य वंपदकावाच्यार्थहै।तिनदोनकिमाथ लक्ष्यार्थरूपमात्मायभेदका उत्तराई ३२७ अविद्याकरकल्पितसंबंधभीविद्यमानहै । क्योंकितत्त्वज्ञानसेपूर्वकालमें ब्रह्मात्माकायविद्याकेसाथविरोधनहोनेसे अविद्याविद्यमानहै।यातेतिस अविद्योपाधिकमेंलक्षणाकैसेनहींसंभवती। कितुसंभवतीहै।शंका।कल्पित संबंधमूलकलक्षणाकोभी कल्पितहोनेसेलक्षणापारमार्थिकीनहींहोगी यौरतिसलक्षणामूलक वाक्यार्थकासाक्षात्कारभी कल्पितहोगा । उपहासपूर्वकासमाधानाहेवादिनलक्षणाकोकल्पितकथन हमकोअनिष्ट नहीं।यातेयहवार्ताउच्चस्वरसे तुमनेनकहनीचाहिये।क्योंकिकोईसुनन लोअर्थयह अंदैतकाविरोधहोनेसेहीसकलद्वैतकोयसतमानेहुएभी हम अद्वैतवादीयोंके सिद्धांतका विरोधयतिस्पष्टहै । तोतिसरेतकाएक अंशरूपलक्षणाौतत्मूलकवृत्तिरूपसाक्षात्कारकोकल्पितहोनेसेहमारे सिद्धांतकीक्याहानिहोसकतीहै। औरयहजोपूर्वकहाथाकिकिसीपदसे लक्ष्यकीउपस्थितिहोतीहै वानहीं । यदिनहींहोती तोलक्ष्यार्थ मेंमूकताप्रसंगहोगा अर्थात् लक्ष्यार्थका बोधनहींहोगा । सोयह कथनभी समीचीन नहीं । क्योंकि पदार्थके प्रतिपादन करने वालेजोसत्यज्ञानादिपदहें । तिनसेहीतत्पदकेलक्ष्यार्थकी उपस्थिति होनेसे तत्पदकेलक्ष्याथमें मूफताकी प्राप्तिनहींहोती। और सत्यादि पदंशक्तिवृत्तिसे ब्रह्ममें प्रवृत्तहोतेहैं । वालक्षणासे प्रवृत्तहोते हैं । इनदोनोंपक्षों मेंचादीनेदोपकहाथा । सोतिनमेंलक्षणासेतोसत्यादि शब्दकीप्रवृत्ति ब्रह्ममेंहममानतेनहीं यातयनवस्थादोपकेपरिहारकीहम कोकिंचित्भीयपेनानहीं।क्योंकिलक्षणाकेअभावसेयनवस्थादोपप्राप्त हीनहींहोता।। शंका सत्यादिपदशक्तिवृत्तिसे ब्रह्मकोबोधनकरतेहैंयह पतभीनहींसंभवता। क्योंकितत्त्वमस्यादिमहावाक्यगतपदोभीतसेही ३२८ ३० मि० भा माननाहोगा।अर्थात्वहभीलक्षणसेविना शक्तिवृत्तिसेहीब्रह्मकोबोधन करेंगे।समाधान।।हेवादिनकर्तृत्वभोक्तृत्वयपरोक्षत्वादिधर्मविशिष्टचेतन में त्वंपदकीशक्तिग्रहणहोनेसे त्वंपदकेश्रवणसेकर्तृत्वादिधर्मविशिष्टकी हीउपस्थितिहोगी ॥ ौरसर्वज्ञवयभोक्तृत्वपरोक्षत्वादि धर्मविशिष्ट चेतनमें तत्पदकीशक्तिग्रहणहोनेसे तत्पदकेश्रवणहुए सर्वज्ञत्वादि धर्मविशिष्टचेतनकीही उपस्थितिहोगी ॥ शुद्धकीउपस्थितिनहीं होगीयातेतिनमेंविरोधकेपरिहारयर्थ लक्षणास्वीकारकीहै।। शंका ॥ इसप्रकारमानेहुए सत्यत्व ज्ञानत्वादिधर्मविशिष्टचेतनमें सत्यादिशब्द कीप्रवृत्तिहोनेसे तिसशब्दकर शुद्धलक्ष्यार्थब्रह्मात्माका जोयभेद वह नहींप्रतीतहोगा। क्योंकितिससेभीविशिष्टकीही उपस्थितिहोगी। समाधान ।। हेवादिननानाउपाधियोंकेसाथ संबंधवालीजोएकव्यक्ति है उससेभिन्नसामान्यका अनंगीकारहै । यहांपर यहयर्थज्ञातव्यहै । ज्ञानपदकीशक्तिका ज्ञानव्यक्तिग्रहणनहीं ॥ क्योंकिव्यक्तिमात्रमें शक्तिमानेहुएयानंत्यतथा व्यभिचारदोपकीप्राप्तिहै । औरयदिऐसे कहो किज्ञानत्वसामान्य वालियांजोयतःकरणकीवृत्तिरूपज्ञानव्यक्ति यांहैं । तिनमेंज्ञानपदकीशक्तिहै । सोयहकथनक्या? त्रितयपदार्थमें शक्तिवादीनेयायिककाहै ॥ अथवाजातिमात्रपदार्थमेशक्तिवादीमीमां सककाहै ॥ दोनोंमतोंकीरीतिसेब्रह्मनिष्ठवाच्यताकी हानिनहींहोती। तैसेहीदिखलातेहैं । नानाव्यक्तियोंमेंयनुगतधर्म जोसामान्यवह तिनमेंअनुगतव्यवहारकाहेतुरूपताकर स्वीकारकियाजाताहै।यौरवह ज्ञानत्वमामान्य ब्रह्मसेभिन्ननहींहै ॥ नानाभिन्नभिन्नजोयतःकरणकी वृत्तियवहज्ञानत्वका व्यक्तिरूपताकर स्वीकास्की । तिनमेंकल्पितसं उत्तराई बंधवालीजोअनुगतव्यक्तिहै अर्थात् ॥ व्यज्यतेअनयाइति व्यक्तिःस्वरूपचैतन्यम् * य० ॥ प्रकटहोइसकरकेवहव्यक्तिकहियेहै।यातेस्वरूपचैतन्यही व्यक्तिशब्दकार्थहै । उससेहीसर्ववृत्तियोंकी प्रकटताहै । तिसग्रनु गतचैतन्यव्यक्तिसेभिन्न सामान्यकाथनंगीकारहै । औरतिसकेमानने काकोईप्रयोजनभीनहीं। क्योंकिथनुगतव्यवहारकीसिद्धि अनुगत व्यक्तिसेहीहोजायेगी । इसप्रकारदोनोंमतोंमें ज्ञानत्वसामान्यकेस्था नांपन्नशुद्धब्रह्महीवाच्यसिद्धहोताहै।इसप्रकारसत्यादिपदोंमेंभीसत्यत्वादि सामान्यस्थानापन्नशुद्धब्रह्मही तिनकावाच्यजानलेना । अवयनेक उपाधियोंमेंसंबंधवालीएकयनुगतव्यक्तिसेही अनुगव्यवहारकीसिद्धि मेंदृष्टांतकहतेहैं । जैसेजलकरपूरितजोदशपात्रहें तिनमेंदशहीचंद्रके प्रतिविवप्रतीतहोतेहैं । तिनमें “यहचन्दहै" यहचंद्रहै । ऐमायनुगत व्यवहारहोताहै।वहव्यवहारचंद्रवजातिकृतनहीं।क्योंकितहांनानाव्यक्ति रूपजातिकेव्यंजकका थभावहोनेसे औरचंद्रकीएकव्यक्तिकोजाति कावाधकहोनेसे चंद्रत्वधर्ममें जातिरूपता अनंगीकारहै । और जल पात्ररूपउपाधियोंकोभीयननुगतहोनेसेतिनकोभीयनुगतव्यवहारकी हेतुतानहींसंभवती । यातेतहांसर्वउपाधियोंमें थनुगतजोचंद्रव्यक्ति है तिससेहीअनुगतव्यवहारकी सिद्धिहोतीहै । तैसे अंतःकरणकी वृत्तियों में अभिव्यक्त ईजो चैत्यन्यरूप ब्रह्मव्यक्तिहै । तिसकरही यहज्ञानहै" यहज्ञानहै । ऐसा यनुगतव्यवहार संपादन कियाजाताहै। याज्ञानवजातिकास्वीकात्यर्थहै । इसमकाखानत्व कोजातिरूपताकानिषेधकरनेसे सत्यत्वादिधमाकोभी जातिरूपताका वे०सि० मु० भा० निषेधजानलेना ॥ शंका ॥ सत्यादिपदोंसेतत्पदकेलक्ष्यार्थकीउप स्थितिहुएभी वंपदकेलक्ष्यार्थकीउपस्थितिकिसपदसेहोगी औरयदि सत्यादिपदोंसेही तिसकीउपस्थितिकहो तोवहनहींसंभवती। क्योंकि सत्यादिपदोंकीब्रह्मपदकेसाथ समानाधिकरणताहै। त्वंपदकेसाथतिन कीसमानाधिकरणतानहीं । यातत्वंपदार्थमेंमूकताप्रसंगउसीप्रकार अवस्थितहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन् यद्यपिसत्यादिपदोंसेत्वंपदके लक्ष्यार्थकी उपस्थिति नहींहोती । तथापिपूर्वउक्तरीतिसे साक्षीयौ प्रत्यगादिपदोंसे तिसकीउपस्थितिभीकथनकरनेयोग्यहै । इसीयर्थ कोस्पष्टकरतेहैं। अनेकयज्ञानजो चेतनकेप्रतिपिंवसहितहैं। वह चैतन्यकी प्रधानतासेसाक्षिपदकेवाच्यह यौरव्यक्तिस्थानापन्नतिन साभासयज्ञानों मेंकल्पितसंबंधवाली जोयनुगतचैतन्यरूपएकव्यक्तिहै वहतिनयज्ञानोंकायवच्छेदकहोनेकरघटत्वादिजातिकीन्याईसाक्षिपद कावाच्यहै। इसप्रकारसाक्षिपदसे चेतन्यकीउपस्थितिकासंभवहोनेसे त्वंपदकेलक्ष्याथमेंभीमूकताकीप्राप्तिनहींहोती ॥ शंका ॥ इसप्रकार सत्यज्ञानतथासाक्षियादिकपदोंसे अनेकव्यक्तिस्थानापन्नजोसाभास अज्ञानतथा वृत्तिरूपउपाधियतिनकरयुक्तसामान्यस्थानापन्नब्रह्मचैतन्य कीउपस्थितिमानेहुएतत्वंपदकेलक्ष्योंकोअखंडत्वकीसिद्धिकैसेहोगी। क्योंकियखंडयर्थत्वउपाधियुक्तनहीं ॥ ममाधान ॥ हेवादिन यह विकल्पनैयायिककातोनहींसंभवता । क्योंकि- (पशुनायजेत) य०॥ पशुकरणकयागकायनुप्ठानकरे । इसवाक्यौपशुपदसेजाति ग्रौव्यक्तितथाग्राकृति इनतीनपदार्थोंकी समानउपस्थिति हुएभी योग्यताकेवलसे यागकीसाधनताजैसेपशुव्यक्तिमेंहीमानीहै जात्यादि উবঃ मेंनहीं । तैसेप्रकरणमेंभी सत्यादिपदोंसेउपाधिउपहितकी उपस्थिति हुएभी योग्यतासेकेवलशुद्धकाही ग्रहणहोताहै । औरमीमांसककातो यहविकल्पसंभवताहीनहीं। क्योंकिवहजातिमात्रकोही पदार्थमानताहै. तिसकीरीतिसे व्यक्तिस्थानापन्न जोसाभासउपाधि तिसकेसाथसंबंध बालाजो सामान्यस्थानापन्नब्रह्मचैतन्यहै । तिसकीहीसत्यादिपदोंसे उपस्थितिहोनेकर तत्त्वमस्यादिमहावाक्य शुद्धचैतन्यकोग्रहणकरके कैसेग्रखंडयर्थमंतात्पर्य्यवालेनहीं किंतुतात्पर्य्यवालेहैं।। शंका तत्त्व मस्यादिवाक्योंका पूर्वउक्तरीतिसे अखंडयर्थमें पर्यवसानमानेहुएभी सत्यादि तथा साक्ष्यादि पदोंकी “तत्त्वम्" श्रादिपदोंके लक्ष्यशुद्ध चेतनमेंशक्तिवृत्तिसे प्रवृत्तियुक्तनहीं। क्योंकि ( यतोवाचोनिव तते) इत्यादिश्रुतिवचनोंका विरोधहै । यौरसंप्रदायवेत्तापुरुषोंका विरोधभीप्राप्तहोताहै । क्योंकिउन्होंनेयहकहाहै ॥ तत्त्वंपदार्थविपयोनयएवयोज्यः । सत्यादिव स्तुनिनतत्रविशेषकल्प्यः ॥ सत्यादिशब्दविषयाः शवलास्तदर्थ भागेपुलाक्षणिकीयत्तिरपीहतुल्या॥ (सं० शा० अ०(१) लो० १७७) य० ॥ तत्त्वं” पदार्थविषयकजोलनणारूप न्यायमानाहै वहीन्यायसत्यादिपदार्थों में भी स्वीकारकरनेयोग्यहै । तिनमेंयौरकोई विशेषरीतिकल्पनाकरने योग्यनहीं । क्योंकिसत्यादिशब्दोंकाविषय भीउपाधियुक्तपदार्थहैं । यातेसत्यादिवाक्यमेंजो वाव्यर्थकभागहें तिनमेंलक्षणावृत्तिभीसमानहीहै ॥ १ ॥ इति ।। समाधान ।। हेवा ०० मुभा. दिन्यहतुम्हाराकथनभी अयुक्तहै । क्योंकिप्रथमजोश्रतिकाविरोध कहाथासोनहींसंभवता । तथाहि । वहश्रुतियविद्यातत्कार्यकेसंबंध सेरहितशुद्धचेतनमें शक्तिवृत्तिकानिषेधकरतीहै । अथवायविद्यातत् कार्यकेसाथ संबंधवालेचेतनमें तिसकानिषेधकरतीहै । यहप्रष्टव्यहै। इनमेंयदिप्रथमपक्षकहो।तोयनिष्टकीप्राप्तिनहींहोती।क्योंकिमोक्षकाल मेंशुद्धब्रह्मविषयक किसीपदकीवृत्तिकास्वीकारनहीं । यौरद्वितीयपक्ष तोनहींसंभवता॥क्योंकितिसमेंदोपकायभावहै। यद्यपिउपाधियुक्तकी सत्यादिपदोंसे उपस्थितिहुए शुद्धचिन्मात्रलक्ष्यस्वरूपकी उपस्थिति कैसेहोगी। तथापिउपाधिकोतटस्थरूपतासे वाच्यकोटिमें प्रवेश होनेकर शुद्धसच्चिदानंदएकरस “तत्त्वं” इनदोनोंपदोंकालक्ष्यहै । तिसकीसत्यादिपदोंसे उपस्थितिसंभवतीहै । जैसेधेनुपदगोत्वउप हितव्यक्तिमें शक्तिवालाहुयाभीतिससेगोव्यक्तिविशेपकीहीउपस्थिति होतीहै । गोत्वजातिकीनहीं।क्योंकिगोत्रको तटस्थरूपताहोनेसेवाच्य कोटिमें तिसकाप्रवेशनहीं ॥ तैसेहीसत्यादिपदसे शुद्धब्रह्मकीहीउप स्थितिहोतीहै। अज्ञानादिकउपाधिकोतटस्थ रूपताहोनेसे वाच्यकोटि मेंतिनकाप्रवेशनहींहै । यातेतिनकीउपस्थितिनहींहोती । इसप्रकार श्रतिकेविरोधकायभावहै ॥ ौरजोपूर्वसंप्रदायका विरोधकहाथा सोसत्यहै । परन्तुउनसंप्रदायवेत्तायोंनेभी श्रुतिकाविरोधपरिहारकरने केलियेही वेदांतपदोंमें लक्षणामानीहै । यहविरोधयदिहमारीकथन कीहुईरीतिसे परिहारहोसकताहै। तोपुनःसत्यादिपदोंमेलक्षणामानने काक्याफलहै । क्योंकिमुख्यार्थकेसंभवहुए लक्षणामाननीअयुक्त है । औरइसप्रकारतिनको यज्ञपनेकी प्राप्तिभीनहींहोसकती । क्योंकिएक उत्तराई उपाय दूसरेउपायका दूपकनहींहोता । तिनवृद्धोंकाप्रयोजनभीविरो धकेपरिहारकानेकाहै।उसविरोधकापरिहार जिसजिसमकारसेसंभवे ति- सतिसरकारसेही युक्तिकल्पनाकरनेयोग्यहै । यहहीउनकाथमि प्रायहै । यातेपूर्वउक्तसर्वहीअर्थनिर्दोपहै ॥ ौरयदियज्ञानएक है। औरतत्उपहितचेतन्यकानामसाक्षीहै ॥ तोग्रज्ञानरूप उपाधिको त्यागकरकेशुद्धचैतन्यही त्वंपदकालक्ष्यार्थ साक्षिपदसेपूर्वउक्तरीतिसे उपस्थितहोताहै । यहजाननेयोग्यहै । इससमयभिप्रायके प्रकट करनेकेलिये मूलग्रंथकर्ता श्राचार्योंने *नानाउपाधिसंबद्धव्यक्तिअतिरिक्तसामान्या नभ्युपगमात्र इसमूलग्रंथमें सामान्यको व्यक्तिकी अपेक्षा होनेसे उपाधि पदकेस्थानमें व्यक्तिपददेना योग्यथा तोभी जिसकारणसे व्यक्ति पदकोत्यागकर उपाधिपदकाप्रयोगकियाहै । तिसकारणसेहमनिश्चय करतेहैं। किजैसेयन्यस्थलमें उपाधिकावाच्यकोटिममवेशनहींहोता तैसेसत्यादिवाक्यमें शुद्धचेतनही सत्यादिपदके वाच्यकोटिमें प्रवेश होताहै। अज्ञानादिउपाधिकावाच्यमें प्रवेशनहीं । इसलिये ग्रंथकर्ता प्राचार्य्यउपालंभकेयोग्यनहीं हैं ।। इति ॥ अथसाक्षीकीसिद्धिकाप्रकारनिरूपण शंका पूर्वप्रकरणमेंजोसाक्षीयापनेकहा वहकौनहै।यहविचार णीयहै। तहांपरब्रह्मकानामसाक्षीहै। यथवाजीवकानामसातीहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकितिसपरब्रह्मकोयसंगहोनेकरसाति पनकायसंभवहै । जिसकारणसे साक्ष्यकेसंबंधविना लोकमेंकोईभी उत्तरार्द्ध प्राप्तिहोगी । क्योंकिविषयनिष्ठप्रमाणकीकीहुई अतिशयताका अभावहै । यर्थयह ॥ यज्ञानकीनिवृत्तिहीप्रमाणकृतयतिशयताहै।। वहजवप्रमाणसेसिद्धनहुई तोतिसप्रमाणसेण्याप्रयोजनहै । औरयदि विषयकाप्रकाशहीप्रमाणकाफलकहो। तोयहभीनहींसंभवता। क्योंकि अज्ञानरूपयावरणविद्यमानहुए विषयक प्रकाशकीभीथयोग्यताहै। इसप्रकारयज्ञातता प्रमाणकाविपयनहीं। औरद्धितीयपक्षभीयसंगत क्योंकिभ्रमसिद्धपदार्थको प्रमाणकीविषयताकाविरोधहै । अर्थयह अज्ञाततारूपविषयकेवाधसेहीअज्ञातताकीसिद्धिकोभ्रमपनाकहनेयोग्य है। इसप्रकारवाधिनयमेप्रमाणकैसेप्रवृत्तहोगा । क्योंकिविषयको हीग्रसत्पनाहै । औरग्रज्ञातताकीस्वतःसिद्धिहै यहतृतीयपक्षभीनहीं संभवता । क्योंकिग्रज्ञातताको अनात्मताहोनेसेजडताहै । औरजड काभानस्वतःनहींहोता। यौखहयज्ञातताकिसीयन्यसेसिदहोतीहै । यहचतुर्थपक्षकहो तोवहयन्यपदार्थहीपरिशेपसेसाक्षीहै। तैसेमानेहुए प्रमाणकीप्रवृत्तिसेप्रथमहीअज्ञातरूपतासेसाक्षीकरबोधनकियाहुयाजो विषयहै तिसकोहीप्रमाणविषयकरताहै। यहकथनयुक्तहै । इतने कथनसे साक्षीकामाननानिष्फलहै इसकापरिहारकिया। क्योंकि अज्ञातताकीसिद्धिसाक्षीकेयाधीनहै । यातेसाक्षीकास्वीकारसफलहै। औरपूर्वउक्तरीतिसेसाक्षीसेविनाप्रमाणकीयनुपपत्तिहोनेकर साक्षीकी सिद्धिहै।इसीकारणसेसाक्षीमें विवादकरनायुक्तनहीं । इसीयर्थमेंग्रास पुरुषोंकावाक्यभीप्रमाणहै । तैसेहीसुरेश्वराचार्योंनेकहाहै ।।

वे० सि० मु०भा० प्रमाणमप्रमाणंवाप्रमाभासस्तथैवच । कुर्वत्येवप्रमांयत्रतदसंभावनाकुतः।।* (श्नो० ८७४ । १० वा० अ० १) अजैसेप्रमाणकीसिद्धिसाक्षीकेयाधीनहै। तैसेमिथ्याज्ञानीसंशय ज्ञानइनदोनोंका सांधकभीसानीहै । क्योंकिमिथ्याज्ञानयोसंशयज्ञान कीप्रमाणसेतोसिद्धि कहनहींसकते । प्रमाणकेसाथतिनकाविरोधहै । औरमिथ्याज्ञानयोमंशयज्ञानरूपवृत्तिको जडताहोनेसेस्वतःभीतिनका भाननहींसंभवता । यौरभ्रमसेभीतिनका भाननहींहोता। क्योंकि भ्रमवृत्तिकेभानकाविचार तोप्रकरणमें यवप्राप्तहीहै। तिसकारणसेतिन दोनोंज्ञानोंकीसिद्धिभी मानीकरहीहोतीहै । यातेप्रमाण यौरभ्रमज्ञान तथासंशयज्ञान यहतीनों जिससानिविपयकप्रमाको उत्पन्नकरतेहैं । अर्थात्सानीसेविनाइनकी मिद्धिनहींहोती । तोतिससानीकीयसं भावनाकैसेहोमकतीहै ॥ १॥ इमप्रकारसर्वप्रमाणादिकोंकासाधक त्वंपदकालच्यार्थमानीमिद्भहुया ॥ इति ॥ अथउभयपढमेंलक्षणाकापूकारनिरूपण' और "तत्त्वं" इनदोनोंपोकाएकयर्थहै। थथवाग्रनेकयर्थहें । यहविकल्पजोवादीने पूर्वकियाथा । मोभीयमंगतहै । क्योंकियद्यपि दोनोंपदोंकाएकहीयर्थहे । तथापिदोनोपद स्वीकारकरने योग्यहैं । गंका ॥ भेदकाजनकजीयज्ञानहे । तिमर्कानिवृत्तिथर्थयभेदज्ञान हीयपेनितहं । वहयभेदतान यदिएकपदमेहीउत्पन्नहोजाय तोहमरे पदसेक्याप्रयोजनहै ।। ममाधान ।। हेवादिन् प्रमाणजन्यज्ञानहीभेद भ्रममानिवर्तक होताहै । मिथ्यानानभेदभ्रमका निवर्तकनहींहोता ।

उचराई और वह प्रमाण जन्य ज्ञान एक पद से नहीं उत्पन्न हो सकता ॥ क्योंकिपदमात्रको प्रमाज्ञानकी हेतुताकायभावहै । तिसकारणसेभेद भ्रमकेनिवर्तकज्ञानकी उत्पत्तिकेयर्थ वाक्यरूपप्रमाणकी अपेनाहै । औरएकपदमें वाक्यरूपतानहींसंभवती ॥ यातेवाश्यताकीसिद्धिक अर्थदूसरापदयवश्य थपेक्षणीयहै । थौरपदोंकीएकयर्थतामाने हुए पर्यायशब्दोंकीन्याईवाक्यपनेकी अनुपपनिरूपदोपपूर्ववादीने कहाथा वहभीनहींसंभवता।क्योंकिपदोंकीप्रवृत्तिके निमित्तकाभेदहै । जिसकारणसे भोक्तृत्वादिकधर्मत्वं पदकीप्रवृत्तिके निमित्तहैं औरसर्व ज्ञत्वादिकधर्म तत्पदकी प्रवृत्तिकेनिमित्तहैं। इसप्रकारप-यतामाप्ति कायभावहोनेसे वाक्यत्वकीहानिनहीं ॥शंका ॥ दोनोंपदोंकाप्रयोग वाच्यार्थकीउपस्थितिकेलियेनहींहै।क्योंकि तिसवाच्यार्थकीउपस्थिति काकोईप्रयोजननहीं। किंतुलक्ष्यार्थकी उपस्थितिकेलिये दोनोंपदों काप्रयोगहै ॥ वहलक्ष्यकीउपस्थिति यदिएकपदसेसिद्धहो तोदूसरे पदकाप्रयोगकरनानिष्फलहै ।। पौरपदकोभीअनुभवकाजनकहोनेसे ग्रौतिसकेविषयकाअबाधहोनेसे प्रमाणतासंभवतीहै । यातेदितीयपद निष्फलहै ॥ समाधान ॥ हेवादिजैसेघोपनिवासकावाचक जो “घोप” पदतिसकेप्रयोगसेविना गंगापदतीरको लक्षणावृत्तिसेवोधन नहींकरसकता। क्योंकिमुख्ययर्थमें किसीप्रकारकी अनुपपत्तिनहीं। तैसेतत्पदकायथयात्वंपदकाप्रयोगकरेहुए विशिष्टचेतन्यहीतिसपद सेउपस्थितहोगा । अखंडएकरसशुद्धचिदात्माकी उपस्थितिनहीं होगीतिससेजिज्ञासुकोवांच्छितयर्थकावोधनहोनेसेतिस“त्वंवातत्" पदकामयोगव्यर्थहीहोगा। औरवैदिकपदोंकाप्रयोग निष्फलनहींहो ० मि० मुः भा. सकता।तिसकारणसेलक्षणावृत्तिकरयखंडअर्थकेलाभनिमित्तद्वितीय पदकाप्रयोगहै । तिसद्वितीयपदसेविना विरोधकाअस्फुरणहोनेसे मुख्यार्थकाहीसंभवहोजायेगा ॥ पुनःलक्षणासेयखंडअर्थकाप्रति पादननहींसंभवेगा। यातेयखंड्यर्थकीसिद्धिकेलिये दूसरापदसफल है । थौरपदमात्रको जोवादीने अनुभावक कहाथा वहभीनहीं संभवता। क्योंकि- * पदमप्यधिकाभावात स्मारकान्नविशिष्यते। * अ॥ पदकोस्मारकहोनेसे अधिकयर्थजोवाक्यार्थतिसकी बोधकतापदमेंनहीं। इसीसेतिमकोविशेषतानहीं अर्थात्प्रमाणतानहीं। इसन्यायसे पदमात्रको प्रमाणताहोनेसे तिसकोग्रनुभावकतानहीं संभवती । औरप्रधानवाक्योंमें लक्षणाकी यनुपपत्तिहैयहजोवादीने पूर्वकहाथा सोकथनभी ययुक्तहै । क्योंकिइतरपदार्थों जो “अनुप सर्जन" अर्थात्प्रधानपदार्थहै । तिसकाप्रतिपादकहोनेसेही वाक्यको प्रधानपनाहै। सोप्रधानकीप्रतिपादकतालक्षणासेहो। अथवाशक्तिवृत्ति सेहो।इसमेंकोईअाग्रहनहीं।। यातेलक्षणाकेमानेहुएभी वाक्यमें प्रधान ताकीहानिनहीं ॥ और ( गुणत्वन्यायकल्पना) अ गौणवा क्योंलक्षणाकीकल्पनाहोतीहै।इसन्यायकाविरोधजोपूर्ववादीनेकहाथा वहभीनहींसंभवता। क्योंकिजहांप्रतिपादनकरनेयोग्ययर्थमें शब्दकी शक्तिवृत्तिकीविषयताहै । तहांहीयहन्यायप्राप्तहोताहै औरयहांतोप्रति पादनकरनेयोग्यअर्थमें तत्त्वंयादिकपदोंकीशक्तिवृत्तिकी विषयताका ग्रभावहै । यातेन्यायकाविरोधनहीं । तिसीहेतुसे तत्त्वमस्यादिमहा वाक्यलक्षणासेप्रत्यक्ब्रह्मकाजोयभेदयखंडएकरसशुद्धचिदात्मातिस उत्तराई ३३६ कोबोधनकरतेहैं । इसकारणसे (यतोवाचोनिवर्तते) इसश्रुति सेविरोधनहीं ॥ इति ॥ *अथब्रह्मात्माकेअभेदरूपप्रमेयमेंप्रत्यक्षादिप्रमाणों केविरोधकापरिहारशंकासमाधानपूर्वकनिरूपण * इसप्रकारअखंडएकरस जोब्रह्मात्माका अभेद तिसमेंवेदान्तोंका समन्वयजोशारीरकमीमांसाकेप्रथमअध्यायकाअर्थतिसकोसंक्षेपसेनिरू पणकरके यवतिसयभेदरूपयखंडार्थमें प्रत्यक्षादिप्रमाणों के विरोधका परिहार जोद्वितीययध्यायकाअर्थतिसकोसंक्षेपसेनिरूपणकरनेकेलिये पूर्वपक्षकोनिरूपणकरतेहैं। (अथपूर्वपक्ष)शंकाकोस्पष्टरूपतासेप्रकट करनेकेलियेपूर्वपक्षी प्रथमतत्त्वमस्यादिमहावाक्यों में हेयतथाउपादेय अंशकोनिरूपणकरताहै । कर्तृत्वादिधर्मविशिष्टतथासुषुप्तिादिक यवस्थावालाचैतन्यत्वंपदकावाच्यार्थहै । औरजगत्कर्तृत्वादिधर्म विशिष्टतथाअाकाशादिकोंका उपादानचैतन्य तत्पदकावाच्यार्थहै। तिनदोनोंकाअभेदगुरुमुखद्वाराश्रवणकियेहुएमहावाक्यसेमतीतहोताहै परंतुसंसारीतथायसंसारीकायभेदरूपजोमुख्यार्थहै तिसकीप्रत्यक्षादि प्रमाणकेविरोधसे अनुपपत्तिहै । तिसकारणसेवंपदार्थमेंविरुद्धधर्मजो कर्तृत्वभोक्तृत्वसुखित्वदुःखित्वादि तिनकोत्यागकरतिनसेपृथकिया हुया अवस्थात्रयमें अनुस्यूतशुद्धचेतनअंश जोप्रत्यगात्मातिसकातत् पदार्थ विरुद्धजगतकर्तृत्वादिधर्मोकोत्यागकरतिनसेपृथकियाहुप्रा श्राकाशादिकोंमें अनुस्यूत तथा शुद्धपरिपूर्णसच्चिदानंदस्वरूप जो परमात्मातिसकेसाथयभेदलक्षणावृत्तिसेमहावाक्यबोधनकरताहै। यह अर्थसिद्धांतीनेपूर्वनिरूपणकिया। शंका।।हेवादिन्यद्यपिइसप्रकारका २४० के. सि. मु. भा. अर्थहमने पूर्वप्रतिपादनकियाहै। तथापिइसमेंविरोधकी आशंकाकैसे प्राप्तहोतीहै । समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् प्रत्यक्षादिप्रमाणसिद्धजोसर्व भेद तिसकानिराकरण आपनेपूर्वनहींकिया।यातेअभेदका प्रतिपादन नहींसंभवता । यद्यपिपूर्वकथनकीहुईयुक्तिसे जीवब्रह्मकेभेदकानिरा करणकियाहै यातेकैसेतुमयहकहतेहो जोभेदकानिराकरणनहींकिया। तथापियहांभेदपद अनात्मभेदपरहै । याते अनात्मभेदतो तिसीप्रकार अवस्थितहै । यद्यपियवस्थात्रयमेंयनुगततथायाकाशादिकों मेंअनु स्यूतयहजोब्रह्मात्माकाविशेषणपूर्वकहाहैतिसकेप्रभावसेविजातीयभेदका निराकरणभीकियागया। क्योंकिजैसेअधिष्ठानरज्जुमेंपरस्परव्यभिचारी जोमूत्रधारादंडमालादिसोकल्पितहैं। तैसे अधिष्ठानब्रह्मात्मा सर्वजगत् कल्पितहै । और (मृत्तिकेत्येवसत्यं) इसतिनेकारणसेभिन्न कार्यकीसत्ताकायभावकथनकियाहै। यातेयाकाशादिकार्यकोमिथ्या होनेसे तत्प्रतियोगिकभेदकोभी मिथ्यापनाहै । इसकारणसे पूर्व उक्तशंकानहींसंभवती । तथापिइसविशेषणकेतात्पर्य्यकोनजानकर वादीकीशंकासंभवतीहै शंका।। हेवादिनजैसेयात्मातथापरमात्माके भेदकोग्रहणकरनेवालाप्रमाणयप्रमाणरूपहै तेसेयनात्मा के भेदकाना हकजो प्रत्यत्नादितिसकोभीप्रमाणताहै।।यहांयहयनुमानजानना । * विमतंअनात्मभेदग्राहकं अपमाणं भेदग्राहक त्वात् । आत्मपरमात्म भेदग्राहकवत्।। अ०ा विवाद काविषयजोयनात्मभेदग्राहक प्रत्यनादिसोयप्रमाणरूपहै । भेदका ग्राहकहोनेसे जोजोभेदका ग्राहकहोताहै। सोसोयप्रमाणरूपहोताहै। जैसेयात्मातथापरमात्मका भेदग्राहिप्रत्यक्षादिहें ॥इति।। समाधान।

उचराई हेसिद्धांतिन्दृष्टांतकी यसिद्धिहोनेसेयहतुम्हारा हेतुअसाधारणयनै कांतिकहै। इसीकोस्पष्ट करतेहैं। अनुमानमेंजोयप्रमाणरूपसाध्यहैतिस काक्याअर्थहै । अर्थात्प्रमाणत्वकाजो अत्यंताऽभावतिसकाजोअधि करणहो वहयप्रमाणहै। अथवाप्रमाणसेभिन्नकोयप्रमाणकहतेहो।यह दोनों प्रकारकाप्रमाणशब्दकायर्थमानेहुएभीनिश्चितसाध्यवालेहोने सेघटादिकसपक्षहीकहेजातेहैं । क्योंकिप्रमाणत्वके अत्यंताभावका अधिकरणभीघटादिकहैं।औरप्रमाणसेभिन्नभीहैं। औरअभेदकेग्राहक प्रमाणजोतत्त्वमस्यादिमहावाक्यहैं वहविपक्षहैं । क्योंकिग्रप्रमाणता रूपसाध्यकेअभाववालेहैं । तिनदोनोंसपक्षविपक्षोंसेव्यावृत्तहोनेसे हेतुमेंअसाधारणयनैकांतकिता संभवतीहै । और दृष्टांताभासोंकी हेत्वाभासोंमेंहीयंतरभावताहै । यातेपूर्वउक्तश्रनुमानदुष्टहै। शंका ॥ दृष्टांतकाअभावतुमकैसे कहतेहो।क्योंकिजीवतथा परमात्माकेभेदका ग्राहक(नाहमीश्चरः) “ मैंईश्वरनहींहूं" यहप्रत्यक्षहीदृष्टांत रूपतासे विद्यमानहै ।। समाधान ॥ यात्मातथापरमात्माकेभेदकाग्राहककोई प्रमाणनहींहै । इसीकोस्पष्ट करते हैं ॥ क्या?यहपूर्वकथनकियाप्रत्यक्ष भेदमात्रकोविषयकरताहै ॥ अथवा ॥ यात्मप्रतियोगिकभेदकोवि षयकरताहै।। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकि यात्माकेभेदकाग्राहक पनातिसकोयसिद्धहै। यातेदृष्टांतकायभाव उसीप्रकार यवस्थितहै। औरयदिद्वितीयपक्षकहो तोतिसमेंभी यहविचारकर्तव्यहै । कितिस पक्षमेंयात्मशब्दसे स्वप्रकाशचेतनसुखस्वरूपका ग्रहणहै । अथवा कर्तृत्वादिधर्मविशिष्टचेतनकामहणहै।पूथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकि श्रात्मा तथा परमात्मा इनदोनोंको स्वयंप्रकाशमान होनेसे किसी वे० सि मु० भा० पूमाणकी विपयतातिनमेंनहीं होसकती ॥ ौरद्वितीय पक्षभी नहींसंभवता ॥ क्योंकि ( सविशपणेहि ) ० ॥ विशेषण सहितवस्तुमेंजो प्रमाणप्रवृत्त होताहे ॥ यदिवह विशेष्यभागमें वाधितहोजाय तोवहविशेपणकोहीप्राप्तहोताहै। इसन्यायसेकर्तृत्वादि धर्मविशिष्टयात्माकेभेदकोविषयकरनेवालाजोप्रमाणहै तिसकोविशेष्य चेतनमात्रकेभेदकीविपयताकेवाधितहुए विशेपणजोकर्तृत्वादितिनके भेदकीगोचरताहोनेसे तिसकीयन्यप्रकारसेसिद्धिहै। यातेवहप्रमाण यात्मातथापरमात्माके भेदकासाधकनहीं । इसप्रकारपूर्वउक्तदृष्टांत श्रसिद्धहै यहभावहै ।किंवा विशेष्यभागजोचेतनमात्र तिसकेयभेद काग्राहकजोतत्त्वसस्यादिवाक्यरूपप्रमाण तिसकरपूर्वउक्तयनुमानको बाधितहोनेसेभीतिसयनुमानकोयात्मातथापरमात्माकेभेदकीसाधकत नहींसंभवती । इमप्रकारपूर्वउक्तसिद्धांतीके अनुमानकोदुप्टहोनेसे थनात्मभेदकंग्राहक जोपत्यज्ञादि वहएमाणरूपहैं । थौरयहांयहअनु- मानभीजानलेना ॥ अहनविश्वंइत्यनात्मप्रतियोगकभेदग्राहकंप्रत्यक्ष तच्चनाप्रमाणं । विपरीतार्थगोचरप्रमाणाभावात् । महावाक्यपूमाणवत्॥ य० ॥ मेंप्रपंचस्पनहींहूं यहयनात्मप्रतियोगिकभेदकाग्राहक जोप्रत्यक्षहै । सोयप्रमाणनहींहै । विपरीतयर्थकोविषयकरनेवाले प्रमागाकायभावहोनेसे । जहांजहांविपरीतयर्थविषयकप्रमाणतानहीं है तहांतहांयप्रमाणताभीनहींहै । जैसेमहांवाश्यरूपशब्दप्रमाणहै ॥ इति।। इसरीतिसेयनात्मप्रतियोगिकभेदकेग्राहक जोप्रत्यज्ञादिह।तिन उत्तराई काकोईबाधकनहीं। यातेपूर्वउक्तयप्रमाणत्वकासाधकअनुमानवाधित है। यहांपूर्वग्रंथमें (प्रत्यक्षादि) इसयादिपदसे आत्मानात्मानौ। मिथोभिन्नौ विरुद्धधर्माक्रांत त्वात् । द्रवकठिनवत इत्यादियनुमानकाग्रहण करना। अ०॥श्रात्मातथायनात्मा परस्परभेदवालेहैं । विरुद्धधर्मयुक्तहोनेसे । जोजोविरुद्धधर्मवालेहोते हैं सोसोपरस्परमेदवालेभीहोतेहैं । जैसेद्रवतायौरकठिनताह ॥इति।। 8 अथधर्मभेदकेनिराकरणकाप्रकारनिरूपण ॥ सिद्धांतीकीआशंका ॥ हेवादिनप्रत्यक्षादिप्रमाणोंको अनात्माकेस्वरूपविषयकत्वमाने हुएभीभेदगोचरता तिनकोनहींसंभवती।क्योंकिधर्मीतथाप्रतियोगीयौ भेद इनतीनोंकेग्रहणमेंक्रमतथायोगपद्यादिविकल्पोंकीप्राप्तिहुएयन्योऽ न्याश्रयात्माश्रयचक्रिकायनवस्थाबाग्लोष विनिगमनाविरहादि अनेकदोपोंकीप्राप्तिहोगी। इसीकोस्पष्टकरकेनिरूपणकरतेहैं।क्या? प्रत्यक्षप्रमाण भेदमात्रकोग्रहणकरताहै ।।अथवाधर्मीतथाप्रतियोगीयो भेद इनतीनोंकोग्रहणकरताहै ॥ प्रथमपक्षतोनहींसंभवता॥ क्योंकि धर्मीतथाप्रतियोगीकेज्ञानसेविना भेदकाज्ञाननहींहोसकता धिर्मिप्रति योगिज्ञानपूर्वकही भेदकाज्ञानहोताहैयहनियमहै ।। औरद्वितीयपक्षम भी यहविचारकरनेयोग्यहै । धर्मियादिकोंकाग्रहणक्या?क्रमसेहोताहै अथवाएककालमें तिनकाग्रहणहोताहै । यदिक्रमसेकहोतोतिसमें भी यहविचारणीयहै। क्या?प्रत्यक्षभेदकोप्रथमग्रहणकरके पश्चात्धर्मीयों प्रतियोगीकोग्रहणकरहाहै।यथवाधर्माप्रतियोगीकोग्रहणकरकेपश्चात ०सि० मु० भा० भेदकोग्रहणकरताहै।औरयुगपदग्रहणपक्षमेंभीयहवक्तव्यहै।क्या? जैसे "दंडीदेवदत्तः"यहप्रतीतिदंडतथादेवदत्तकोविशेषणविशेष्यभावसेग्रहण करतीहै । तैसेयहांधर्मीयोप्रतियोगीतथाभेदइनतीनोंकोविशेषणविशष्य रूपतासेप्रत्यक्षग्रहणकरताहै।।यथवाअंगुलित्रयकीन्याईपरस्परतीनोंको संबंधसेरहितरूपताकरग्रहणकरताहै। तहांसर्वसेप्रथमविकल्पमें धर्मीयौ प्रतियोगीतथाभेदइनतीनोंकोप्रत्यक्षग्रहणकरताहै।यहद्वितीयपक्षनहीं संभवता ॥ तथाहि ॥ तिसद्वितीयपक्षके अंतर्गत जोकमसेग्रहणयह प्रथमपक्षथा तिसमें भेदके ग्रहणपूर्वकधर्मीयौ प्रतियोगीकाग्रहणहोता है यहक्रमतोनहींसंभवता। क्योंकिभेदज्ञानकेप्रतिधर्मीयो प्रतियोगीके इनकोकारणहोनेसे पूर्वकथनकियाहुअाक्रमययुक्तहै। औरधर्मिया दिकोंको प्रथमग्रहण करके पश्चात् भेदकाग्रहण होताहै यहद्वितीय क्रमपक्षहै । तिसमेंभीयहविचारकर्त्तव्यहै। क्या?स्वरूपसेधर्मियादिकों काग्रहणभेदकानिरूपकहै । अथवा घटत्वादि रूपतासे तिनकाग्रहण भेदकानिरूपकहै ॥ अथवाधर्मित्व रूपतासेधर्मीकाग्रहणयौ प्रति योगित्वरूपतासे प्रतियोगीकाग्रहण भेदकानिरूपकहै।इनमें प्रथमपक्ष तोनहींसंभवता । क्योंकिजलतथादुग्धका तादात्म्यहोनेसे स्वरूपसे वहदोनोंभासमानभीहैं। परन्तुतिनकाभेदग्रहणनहींहोता। यातेस्वरूप सेधर्मियादिकोंकाग्रहण भेदकानिरूपकनहीं ॥ गौरद्वितीयपक्षभी नहींसंभवता । क्योंकिघटवादिरूपतासेजो प्रतियोगियादिकोंका ग्रहणहै तिसकोभेदकी अपेक्षाहोनेसे यन्योऽन्याश्रयदोपकीप्राप्तिस्पष्ट हीहै। इस यन्योंन्याश्रय दोपकीमाप्तिहोनेसेही तृतीयपक्षभीनहीं संभवताफ्योंकिभेदज्ञानकेयाधीनप्रतियोगियादिकोंकाज्ञानहै। जिस उत्तगई ४५. कारणसेधर्मीसेभिन्न भेदके निरूपककोप्रतियोगीकहतेहैं । औरइसी प्रकारधर्मीकाज्ञानभीभेदज्ञानपूर्वकही कल्पनाकरनेयोग्य है । क्योंकि प्रतियोगीसेभिन्नभेदके याश्रयकोधर्मीकहतेहैं । औरधर्मीतथाप्रति योगीकेज्ञानपूर्वकभेदज्ञान प्रसिद्धहीहै । यातेइसपक्षकैसे अन्योऽ न्याश्रयदोपकीप्राप्तिनहोगी किंतुअवश्यहोगी ॥ किंवा ॥ भेदभिन्न धर्मी वर्तताहै । अथवायभिन्नधर्मी वर्त्तताहै । अन्त्यपक्षतोनहीं संभवता । क्योंकितिसथभिन्नधर्मिविषयकभेदके ग्राहकप्रत्यक्षकोभ्रम पनाहोगा। भावयह भेदकेयनधिकरणकानाम अभिन्नहै । तिसमें यदिप्रत्यक्षभेदकोग्रहणकरेगा । तोवहकैसेभ्रमरूपनहींहोगा । और यदिप्रथमपक्षकहो तोतिसमें यहविचारणीयहै। क्या?अपनेकरभिन्न कियेहुएधर्मी थापभेदवर्त्तताहै । अथवाकिसीदूसरेभेदकरभिन्न किये हुएधर्मी मेंभेदवर्तताहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिअपनेकर भिन्नकियेहुएधर्मी मेंअपनीवृत्तिहोनेसेयात्माश्रयदोषकीप्राप्तिहै। और यदिदितीयपक्षकहो तोतिसमेंभी यहविचारकर्तव्यहै। वहद्वितीय भेद भीक्या?यमिन्नधर्मी में वर्तताहै।अथवाभिन्नधर्मीमें वर्त्तताहै। प्रथम पक्षमें तोभेदग्राहकप्रत्यक्षकोभ्रमपनाहोगा।यहपूर्वकथनकियाहै।और द्वितीयपक्षमेंभीयदिअपनेकरभिन्न कियेहुएधर्मीमवहदूसराभेदश्रापवर्तताहे तोत्रात्माश्रयदोपकी प्राप्तिहै।क्योंकि अपनीस्थितिकेयर्थइतरकेव्यवधान रहित्तथपनीहीपेक्षाहै। औरप्रथमभेदकरभिन्नकियेहुएधर्मी में द्वितीय भेदरहताहै ऐसेयदिमानो तोश्रन्योन्याश्रयदोषस्पष्टहीमातहोताहै । औरइनपूर्वउक्तदोषोकेपरिहारकरनेकेलिये द्वितीयभेदको भिन्नधर्मी में स्थितिकेयर्थयदितृतीयभेदस्वीकारकरो तोचक्रकादोषकीमासिहोगी।

३० मिमुः भा. क्योंकिदोकेव्यवधानसेजहांपुनः अपनीयपेक्षाहोतहांचक्रकादोपप्राप्त होताहै । यौरतिसचक्रकादोपकेदूरकरनेकेलियेयदिचतुर्थभेदस्वीकार करोतोयनवस्थादोएकीमाप्तिहोगी । औरयदिऐसेकहोकियन्यगतिके यभावसेयनवस्थादोपकोहमस्वीकारकरलेंगे।तोतिसमेंभीयहतुमनेकहा चाहियेक्या?वहयनंतभेदक्रमसे धर्मी मेंवर्ततेहैं।यथवाक्रमसेविनाएक कालमेंवर्त्ततेहैं।यदिक्रमसेकहोतोधर्मीकोयनादिपनाप्राप्तहोगा।क्योंकि अनंतधर्मोकायाश्रय सादिनहींहोसकता | औरउत्तरउत्तरभेदसेहीपूर्व पूर्वभेदकाकार्यजोधर्मी में भिन्नव्यवहार तिसकीअन्यप्रकारसेसिद्धिहोने से पूर्वपूर्वभेदकोव्यर्थहोनेकर प्राग्लोपदोपकीप्राप्तिहोगी। पूर्वपूर्वभेदों कालोपअर्थातनिष्फलताहोनी इसीकोप्राग्लोपकहतेहैं। औरयदिवह अनंतभेद धर्मी मेंएककालमेरहतेहैं।यहद्वितीयपक्षकहो तोभिन्नधर्मी में भेदवर्तताहै।इसपक्षकी हानिहोगी। औरयदिइसदोपके दूरकरनेकेलिये एकभेदविशिष्टधर्मी में अपरभेदोंकीस्थितिमानोगे। तोविनिगमना विरहदोपकी प्राप्तिहोगी। क्योंकिप्रथमभेदविशिष्टधर्मी में दितीयभेदकी स्थितिहै । इसअर्थकानिश्चायककोईयुक्तिनहीं । इसीकानामविनि गमनाविरहहै ॥ किंवा ॥ विनिगमनाविरहदोपके विद्यमानहुएभी यनंतभेदोंकोस्वीकारकरलें यदिभेदोंकीपरंपसकोग्रहणकरनेवालाकोई ज्ञानप्रकटहो। औरऐसाज्ञानकोईउदयनहींहोता । यातेप्रमाणकेअभाव सेयनंतभेदोंकास्वीकारनहींसंभवता । औरयदिइनसर्वदोपोंकोपरिहार करनेकेलियधर्मीतथाप्रतियोगीऔरभेदइनतीनोंकोएककालमेंहीप्रत्यक्ष ग्रहणकरताहै।यहपक्षकहो तोपरस्परसंबंधिस्पतासे भेदकाग्रहणनहीं संभवेगा क्योंकिभेदप्रतीतिकोविशेषण तथाविशेष्यकेसंबंधकीग्राहकता - उत्तराई कानियमहै।।, शंका ।। भेदप्रतीतिकोविशिष्टग्राहकताकानियममाने हुए विशेषणविशेष्यरूपताकरही प्रत्यक्षभेदकोग्रहणकरेगा।समाधान हेवादिनऐसेमानेहुएक्या? भेदकोविषयकरनेवालीही प्रतीतिविशेषण कीप्रतीतिहै। अथवाइससेवहप्रतीतिभिन्नहै।प्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकिकार्यतथाकारणबुद्धिकी एकताकाअसंभवहै। अर्थयहविशेपणु ज्ञानकारणहै। औरभेदज्ञानकार्यहै । तिनकीएकरूपताविरुद्धहै.। और द्वितीयपक्षभीयसंगतहै । क्योंकिविशेपणरूपतासेजोज्ञानहै । वह भेदज्ञानकेाधीनहै । ऐसामाननेसे अन्योऽन्याश्रयदोप प्राप्तहोताहै। यौरस्वरूपमात्रसेभासमानधर्मी तथाप्रतियोगीको भेदज्ञानकायजनक पनाहै । यहअर्थपूर्वकथनकराएहैं । यातेप्रत्यक्षवस्तुकेस्वरूपमात्र कोविषयकरताहै भेदकोविषयनहींकरता ॥ इति।। अथस्वरूपभेदकानिरूपण। पूर्वपक्षीकासमाधान हेसिद्धांतिन्यद्यपिपूर्वउक्तयुक्तिवाधसे धर्मभेदमेंप्रत्यक्षकीयविषय ताहुएभी स्वरूपभेदनिष्ठतिसकी विषयताका लोपनहींहोसकता अर्थ यह स्वरूपभेदकोप्रत्यक्षविषयकरताहै ॥ शंका ॥ हेवादिनवस्तुका. स्वरूपहीभेदहै यहकथनयुक्तिकखाधितहै । क्योंकिभेदकेअधिकरण कोभिन्नकहतेहैं । औरएकहीवस्तुमेंयाधाराधेयभाव अंगीकारनहीं और “स्वरूपंभिन्न” यहप्रतीतिसर्वमेंप्रसिद्धहै।तिसकेनवननेसेस्वरूप हीभेदहैयहतुमकैसेकहतेहो ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् “स्वरूप भेन्न' इसप्रतीतिकीयनुपपत्तिनहीं है। क्योंकिजैसे (राहोःशिरः), अ० ।। राहुकाशिरहे ॥ और (आत्मनश्चैतन्यं) ० ।। यात्माका चैतन्यहै । यहांएक पदार्थमेंभी भेदप्रतीति होती है।

वे०सि० मु० भा० भावयह । राहुतधाशिस्काभेदनहीं तोभी भेदप्रतीतिहोतीहै । यौरा स्मातथाचैतन्यकाभेदनहीं। क्योंकिचैतन्यस्वरूपहीयात्माहे तोभीभेद प्रतीतिहोतीहैं । तैसेस्वरूपकोयौरभेदको एकहुएभी भेदप्रतीतिसंभव तीहे ॥ शंका ॥ हेवादिनस्वरूपतथाभेदशब्दकी प्रवृत्तिकानिमित्त भिन्नहै।वानहीं । यदिप्रवृत्तिकानिमित्तभिन्ननहीं यहयंतिमपक्षकहोतो "स्वरूपंभेदः" ऐसेदोनोंशब्दोंकाएकठा प्रयोगनहींहोगा। क्योंकि पर्यायशब्दोंकाएकठाप्रयोग देखनेमेनहींयाता ॥ औरयदिप्रवृत्तिका निमित्तभिन्नहै तोवहकौननिमित्तहै । समाधान। स्वरूपशब्दप्रयुक्त जोव्यवहारहै तथाभेदशब्दप्रयुक्तजोव्यवहारहै तिसमेंइतरनिपेक्षता तथाइतरसापेक्षतारूप निमित्तसेदोनोंशब्दोंकीप्रवृत्तिहै।यर्थयहइतरनि क्षत्वरूपनिमित्तकोलेकरस्वरूपशब्दकीस्वरूपमेंप्रवृत्तिहै । औरप्रति योग्यादिसापेनत्वरूपनिमित्तकोलेकर भेदशब्दकीस्वरूपमेंप्रवृत्तिहै । यातेपव्यताकीप्राप्तिनहीं। शंका ।। अभेदमेंसापेक्षत्वतथानिक्षत्व प्रयुक्तविलक्षणताकी अनुपपत्तिहै । अर्थातस्वरूपशब्दतथाभेद शब्द कीप्रवृत्तिकेनिमित्तका भेदनहींसंभवतता । क्योंकिस्वरूपत थोभदएकहीपदार्थहै । तिसएकपदार्थके वाचकपदोंकी प्रवृत्तिके निमित्तकाभेदययुक्तहै ॥ समाधान ॥ हे सिद्धांतिन् एक पदार्थकेवाचक शब्दों की प्रवृत्तिके निमित्तकाभेदभीसंभवताहै । तथाहि । जैसेएकहीदेवदत्तशरीरमें पितातयापुत्रशब्द प्रयुक्तव्यव हारकेयर्थ तिसमें प्रवृत्तहुएजो पितापुत्रादिशब्दहैं। तिनकोपुत्रादिसा पेक्षत्वरूपजोप्रवृत्तिकानिमित्त तिसकीअपेक्षादेखनेमेंग्रातीहै। अर्थात् पुत्रकीयपेक्षासेतिसमें पिताशब्दकीप्रवृत्तिहोतीहै । औरपिताकी उत्तराई अपेक्षासेतिसमेंपुत्रशब्दकीप्रवृत्तिहोतीहै। तैसेएकहीस्वरूपमेंप्रवृत्तिका निमित्तजुदाहोनेसे स्वरूपशब्दतथाभेदशब्दकीप्रवृत्तिहोजायेगी और वहनिमित्तपूर्वकथनकरदियाहै॥शंका।।हेवादिनस्वरूपशब्दकोइतरनि तहुएभीभेदशब्दकोस्वरूपमेंप्रवृत्तिकेयर्थप्रतियोग्यादिकोंकीअपेक्षा वश्यकहनेयोग्यहै।तैसेमानेहुए इतरसापेक्षताकेप्राप्तहोनेसेभेदशब्दकी स्वरूपमेंप्रवृत्तिऔरइतरसापेक्षताकेनप्राप्तहुएभेदशब्दकीस्वरूपमेंअप्रवृत्ति होतीहै। इसप्रकारकेप्राप्ताप्राप्तविवेकसेसापेक्षपदार्थहीभेदशब्दकावाच्य सिद्धहोताहै । स्वरूपवाच्यनहीं सिद्धहोता । क्योंकिवहस्वरूपइतर निपेक्षहै। समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् तिससापेक्षपदार्थकाभीस्वरूपसे भेदनहीं। किंतुजैसेकोईवस्त्रादिद्रव्यस्वरूपसे निपेतहुथाभीहस्त तथा क्तिस्तियादिशब्दसेव्यवहारकाविषयहुआइतरसापेक्षवहीदव्यहोताहै। कोईहस्तादिशब्दकावाच्य तिसद्रव्यसेभिन्नपदार्थनहींहोता तैसेप्रकरण मेंभीइतस्पतियोग्यादिसापेक्षहुशास्वरूपहीभेदशब्दकाचाव्यहै।भेदशब्द सेव्यवहारकाविषयहुयाकोईस्वरूपसेभिन्नपदार्थनहींहोजातायातेस्व रूपहीभेदशब्दकावाव्यहै।। शंका । हेवादिनस्वरूपसेभिन्नकोईपदार्थ है अथवानहीं । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिस्वरूपसेजिसका भेदहोगा तिसकोनिःस्वरूपताकीमाप्तिसे श्रवस्तुपनाहोगा। औरयदि स्वरूपसेभिन्न कोईपदार्थनहीं। यहद्वितीयपक्षकहो तोस्वरूपहीथखंड सिद्धहुआभेदकोईपदार्थनहीं।।औरहेवादिन्यदितुमऐसेकहोकियद्यपि स्वरूपप्रतियोगिकभेदनहीं। तथापिस्वरूपहीइतरसे भिन्नस्योंनहोतैसे मानेहुए स्वरूपहीएकरसहै यहकैसेकहतेहो। सोयहकथनभीतुम्हारा समीचीननहीं। क्योंकिस्वरूपभेदके प्रतियोगीको निःस्वरूपताहोनेसे १५० वे सि० मु० भां० ततप्रतियोगिक भेदकोभी निःस्वरूपताकीप्राप्तिहोगी |औरस्वरूपभेद काप्रतियोगीयदिस्वरूपकोहीमानो तोयपनेसेअपनाभेदप्राप्तहोगा। सोअप्रसिद्ध है।। समाधान ॥ हेसिद्धांतिन स्वरूपसेभिन्नभीपदार्थहै। तिसकोनिःस्वरूपताकीप्राप्तिनहींहोती। क्योंकिजैसेएकघटसेभिन्न दूसरेघटको अघटपनादेखनेमेनहीं आता। तैसेस्वरूपसेभिन्नकोभीनिः स्वरूपतानहींहोती ।। शंका ॥ एकघटसेदूसरेघटकाभेदमानेहुएभी तिसके अघटपनेके प्रदर्शनमें कौनकारणहै । क्या? घटसेभिन्नजो भेदांतरहै वहयघटपनेकेयदर्शनमेंप्रयोजकहै।यथवाघटस्वरूपभेदममी प्रतियोगितायवच्छेदककाभेदप्रयोजकहै।यहकहाचाहिये।।समाधान।। यद्यपिएकघटसेभिन्नदूसरेघटमेंकिंचित्वैधर्मरूपभेदांतरविद्यमानभी है परंतुपूर्वधर्मभेदकेनिराकरणमेंकथनकियेहुएदोपोंकीप्राप्तिसेतिसकोभेद पनास्वीकारनहीं । यातेप्रथमपक्षयसंगतहै। औरवैधर्म्यकेहुएही स्वरूपभेदहोताहै यदियहदितीयपक्षकहो तोइसमेंहमकोभी इष्टापति है।क्योंकिसर्वयनात्मस्वरूप वैधय॑यत्तितव्यक्तित्वरूपअसाधारण धर्मकरव्याप्तहैं । यातेअनात्मास्वरूपभेदमें ततव्यक्तित्वरूपवैधर्म्यही प्रतियोगिताकायवच्छेदकहै।। तिसकेभेदसेही एकघटसेभिन्नद्वितीय घटस्वरूपको निःस्वरूपताकीप्राप्तिनहीं। तात्पर्ययहहै । किघटस्वरूप भेदमेंघटनिष्ठवैधर्म्यही प्रतियोगिताकायवच्छेकहै |इसकारणसेघटस्व रूपजोभेदतिसकोनिःस्वरूपताकीप्राप्तिनहीं क्योंकियदिस्वरूपत्वप्रतियो गिताकाअवच्छेदकहोतातोस्वरूपसेभिन्नकोनिःस्वरूपताकीप्राप्तिहोती परंतुस्वरूपत्वप्रतियोगिताकायवच्छेदकनहीं।यातेपूर्वउक्तप्रकारसेथन्य घंटकाघटसेभेदहुएभीअघटत्वकेयदर्शनमेंप्रतियोगितायवच्छेदकभेदको उत्तरार्द्ध प्रयोजकत्वसंभवहोनेसे द्वितीयपक्षमेंइष्टापतिहै ।। इति ॥ अथकिसीवादीकीरीतिसेभेदत्रयकानिरूपण 'शंका ॥ क्या?स्वरूपहीभेदहायथवाइतरभीभेदहैं ॥ प्रथमपक्ष तोनहींसंभवता ॥ क्योंकिइतरकोभी भेदपनेमें दोपकाअभावहैं। तथाहि ॥ भिन्नधर्मिविषयकभेदंवर्त्तताहै ।। यहपूर्वस्वीकारकियाहै। इसंपक्षमअन्योन्याश्रयादिदोषोंकीप्राप्तिनहींहोती ॥ क्योंकिस्वरूप भेदकरभिन्नधर्मी में अन्यभेदकी स्थितिसंभवतीहै । औरस्वरूपभेदको इंतरकीपेक्षानहीं यातेकेवलस्वरूपहीभेदहै यहकथनयुक्तहै। और यदिद्वितीयपक्षकहो तोसर्वही अन्योऽन्याभाव तथावैधादिरूपभेद यथायोग्यस्वीकारकरनेयोग्यहैं । तिसयथायोग्यताकोहीस्पष्टकरतेहैं। अर्थातघटाँदिकों में भेदत्रयको विवेककरदिखलातेहैं।। घटादिद्रव्यतथा गुणौकर्मइनतीनपदार्थों मेंतोस्वरूप तथायन्योऽन्याभावौ वैधर्म्य यहतीनों भेदवर्तमानहैं । क्योंकिद्रव्यगुणतथाकर्मस्वरूपसेमिन्नभीहैं औरतिनकापरस्परयन्योऽन्याभावरूपभेदभी तिनमेंवर्तमानहै। और द्रव्यत्वगुणत्वौकर्मत्वयह असाधारणधर्मरूप वैधर्म्यभेदभीतिनमें है। औरसामान्यतथासमवाय इनदोपदार्थों में स्वरूपभेदतथायन्योऽ न्याभावरूपभेद यहदोभेदरहतेहैं । औरसामान्यादिकोंमें वैघयंका अंभावहोनेसेतृतीयभेदतिनमॅनहींहै । क्योंकिप्रथमकार्यद्रव्यतथागुण औकर्मयहतीन तोसामान्य तथासमवायमें वृत्तिनहीं। किंतुकेवलद्रव्य मात्रवृत्तिहैं। यौरसामान्यभी सामान्यौतथासमवायमेंवृत्तिनहीं।क्यों 'किवहदोनों निःसामान्यहैं । औरसमवाययद्यपिसामान्यमेंवृत्तिभीहै तथापितिसकोउभयवृत्तिहोनेसे वैधर्म्यताकायभावहै । इसकारणसे ३५२ वे०सि० मु. भां० सामान्यादिकों मेंदोहीभेदहैं । तीसराभेदतिनमें नहीं रहता। और अभावकोभावकीयाश्रयतानहीं।यातेतिसमेवधर्म्यताकायभावहै। और तिसमें ग्रन्योऽन्याभावरूपभेदभी नहींवर्तता क्योंकियभावमेंअभावस्वी कारनहींहै । तिसकारणसेयभावमें केवलस्वरूपहीभेदहै । इतरदोभेद तिसमेंनहीं । इसप्रकारयथायोग्यतीनोंभेद स्वीकाकरनेयोग्यहैं।।इति।। अथदोनोंभेदोंकेनिराकरणपूर्वकस्वरूपभेदकास्थापन। समाधान ॥ पूर्वतीनभेदोंका जोनिरूपणकिया सोनहींसंभवता । क्योंकिसर्वपदार्थों में अनुगतहोनेसेस्वरूपभेदतोयवश्यहीस्वीकारकरने योग्यहै ॥ यद्यपिभेदव्यवहारकीसाधकता वैधादिकों मेंतुल्यहीहै । तिससेकेवलस्वरूपभेदकी यावश्कताकहनीनहींसंभवती ॥ तथापि अन्योऽन्याभावयौ वैधर्म्यको व्यभिचारीहोनेसे भेदव्यवहारकी श्रप्रयो जक रूपताहोनेकर तिनकाअंगीकारख्यर्थहै । शंका ॥ वहदोनों व्यभिचारी हुए भी भेद व्यवहार के साधक क्यों नहीं होते ॥ समाधान ।। एकाकारजोव्यवहारहोताहै । तिसकोएकरूपविषयकर साध्यत्वकानियमहै। जैसै अयंघटः" अयंघटः" इसएकाकारख्यवहारमें सर्वघटोमॅयनुगतघटत्वजातिही प्रयोजकहै । घटव्यक्तिइसव्यवहारका प्रयोजकनहीं।क्योंकिव्यक्तियननुगतहै।ौरयदिअननुगतव्यक्तिकोही एकाकारव्यवहारमें प्रयोजकमाने तोजातिकी असिद्धिप्राप्तहोगी । यातेयनुगतव्यवहारमें अनुगतविपयहीप्रयोजकहै यहनियमहै । इस प्रकारप्रकरणमेंभीभेदव्यवहारकाविषय जोअनुगतस्वरूपभेदहै। तिस कोअनुगतभेदव्यवहारमें प्रयोजकताकेसंभवहुए व्यभिचारीजोवैधा दितिनकोभेदव्यवहारका प्रयोजकपनानहींसंभवता ॥ शंका ॥

'उचराई ३५३ स्वरूपभेदकोभीभेदव्यवहारकी हेतुतानहींसंभवती । क्योंकिभेदस्व रूपयपनेस्वरूपमें भेदव्यवहार देखनेमेंनहींयाता । यदिस्वरूपमेंभी भेदमानोगे तोयपनेसे अपनाभेदभीडाचाहिये ॥ समाधान ॥ स्वरूपहीइतरसापेक्षङया भेदव्यवहारकाहेतुहै। यहपूर्ववहुतवारकह याएहैं । क्योंकिस्वरूपकाप्रतियोगिकोटिमें प्रवेशमानेहुए अन्यधर्मी काअभावहै । औरधर्मिकोटिप्रवेशमानेहुए ग्रन्यप्रतियोगीकायमा व है । औरभेदकोधर्मीतथाप्रतियोगीकरही घटितपनेकानियमहै ।। यातेयपनेसेयपनाभेदप्रसंगभीनहींप्राप्तहोता॥शंका ।।हेवादिनस्वरूप तथाभेदकायभेदमानेहुएतिनकापरस्परयंतरभावहोनेकरएकशेपरहना चाहिये । सोक्या?स्वरूप भेदमेंप्रवेशकरताहै।यथवास्वरूपमेंभेदप्रवेश करताहै । इनमेंप्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिभेदहै । इतनाही व्यवहारहुयाचाहिये स्वरूपव्यवहारनहोनाचाहिये । औरद्वितीयपक्ष भीयसंगतहै । क्योंकिस्वरूपमात्रकेशेपरहेहुए भेदाकारव्यवहारकालो पहोगा। समाधान ॥ हेसिद्धांतिन्दोनोंकायभेदमानेहुएएकशेष रहेगा । यहयापकाकथनसत्यहै । परंतुभेदकोस्वरूपसे यभिन्नहोने सेस्वरूपहीशेपरहताहै । औरस्वरूपकोशेषमानेहुए भेदव्यवहारनहीं होगा। यहकथनभीनहींसंभवता । क्योंकिधर्मियादिकसायेनस्व रूपहीभेदव्यवहारकाहेतुहै । यहअर्थपूर्वअनेकवारकथनकियाहै ।। इसीयर्थकोप्रकटकरनेकेलिये प्रतिवादीके विकल्पको अनुवादपूर्वक निराकरणकरतेहैं । औरस्वरूपभेदक्या? भिन्नधर्मी भेदव्यवहारकाहेतु है।अथवायभिन्नधर्मी में भेदव्यवहारकाहेतुहै। इसविकल्पकाभीया स्थानमेंअवकाशनहीं । क्योंकिइन्द्रियोंसेउपस्थितहुए वस्तुमात्रमें वे०सि० मु० मा जवधर्मीतथाप्रतियोगिज्ञानकी. उपेनाहोतीहै । तवभेदव्यवहारउत्प न्नहोताहै । औरजवतिनकेज्ञानकी अपेक्षानहींहोती तवयभेदव्यव हारउत्पन्नहोताहै । यातेपूर्वकथनकियाअर्थनिर्दोपहै ॥ इति ॥ शंका ॥ हेवादिन् ॥ * जन्यत्वमेवजन्यस्य मायिकत्वसमर्पकम् * इसकारिकाप्रपंचको मायाकाकार्यहोनेसे पूर्वमिथ्यापनानिलं पणकिया । तिसयाविद्यकमपंचमेंप्रत्यनादिप्रमाणप्रवृत्तनहींहोसकते। क्योंकिमिथ्यापदार्थसाक्षिमात्रकरसिद्धहोताहै। तिसमेंप्रत्यक्षादिकोंकी अपेक्षानहीं।ौरकल्पितवस्तुप्रतियोगिकभेदकोकल्पितहोनेकरतिसको भीप्रत्यक्षादिकविपयनहींकरसकते ॥ तिसकारणसेप्रत्यक्षादिकोंकेवल करब्रह्मात्माकेयभेदमेंभेदकीशंकातुमकैसेकरतेहो।समाधान।। हेसिद्धां तिन्यदिशज्ञानकार्यत्वप्रपंचमेंहोता तोरजतकीन्याईतिसकोमिथ्यापने कीसिद्धिहोती। परंतुअज्ञानकार्यत्वही प्रपंचनिष्ठनहींसिद्धहोसकता।। क्योंकिबहुतश्रुतियों मेंतिसको ब्रह्मकार्यत्वहीश्रवणकियाहै।। शंका ॥ हेवादिनप्रपंचमेंब्रह्मकार्यत्वको कथन करतीहुईथतियों का भी कार्य कारणभावकेप्रतिपादनमेंतात्पर्यनहीं।।क्योंकिब्रह्मकोकारणमानेहुए । नतस्यकार्यकरणंचविद्यते। तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरंक य० ॥ तिसब्रह्मकाकोईकार्यनहीं है तथाकोईकरणनहीं है।।सो यहब्रह्मकारणसेरहितहे। तथाकार्यसेरहितहे॥ इत्यादिश्रुतियोंकाविरोध प्राप्तहोताहै ॥ समाधान || हेसिद्धांतिनप्रपंचकोब्रह्मकाकार्यपना कहनेवालीश्रुतियोंकास्वार्थमंतात्पर्य है । क्योंकि । गतिसामान्यात् ॥ शा० अ० १ पा० २॥ म० १० * .

उत्तराई श्र०॥ जैसेसर्वनेत्रोंकी एकरूपविषयकसामान्यगतिहै श्रर्थात् सर्वकेनेत्ररूपविषयक एकज्ञानकोहीउत्पन्नकरतेहैं । तेसेसकलवेदांत वाक्यब्रह्मविषयकएकप्रकारके ज्ञानकोहीउत्पन्नकरतेहैं।इसन्यायसेऔर अभ्यासकोतात्पर्य काग्राहकलिंगहोनेसेस्वार्थमेतिनश्रुतियोंकातात्पर्य संभवताहै । औरवहयभ्यास यहांप्रकरणमें विद्यमानहै।ौरपूर्वकथन कियेजोश्रुतिरूप विरोधिवाक्यहैं। वहतोईश्वरकेस्थूलतथासूक्ष्मइनदो शरीरोंकेयभावकोप्रतिपादनकरतेहैं। कार्यकारणकेयभावकोनहींकहते यातेतिनकाविरोधनहीं । अवयभ्यासरूपलिंगकोहीस्पष्ट करतेहैं । * सदेवसोम्येदमग्रआसीत् । यतोवाइमानिभूतानि जायते । तस्माहाएतस्मादात्मनःआकाशःसंभूतः। यथाग्नेः क्षुद्राविस्फुलिंगाः एवमेतस्मादात्मनःसर्वे देवाः सर्वेलोकाः सर्वेऐतेयात्मानोव्युच्चरति * श्रहेप्रियदर्शनश्वेतकेतोयहदृश्यमानजगत्यपनीउत्पत्तिसेपूर्वस्थूल रूपकोत्यागकरसत्ब्रह्मरूपहीथा।औरजिससेयहसर्वभूतउत्पन्नहोते सो ब्रह्महै। औरतिसमंत्रतथाब्राह्मणप्रतिपादितमायोपाधिकब्रह्मसेयाकाश उत्पन्नहुया । औरजैसेएकथमिसेछोटेछोटेयमिकेयवयवरूपविस्फु लिंगनानाप्रकारकेप्रकटहोतेहै। तैसेइसविज्ञानमय यात्माकाजाग्रत्तथा स्वप्नअवस्थासेपूर्व जो यज्ञानउपाधिकस्वरूपहै । तिससेमाणादिकोंके थधिष्ठातायमिश्रादिकसर्वदेवता औरकमोंकेफलउत्पन्नहुए । तथा अंतःकरणादिउपाधियुक्तचिदाभासउत्पन्नहुए। इत्यादिकश्रुतिवचनों से ब्रह्मका कार्यपना प्रपंचमें प्रतीत होताहै ॥ और ब्रह्मको प्रपंच कीकारणताकेवलश्रुति प्रमाणकरही सिद्धनहीं किंतु युक्तिसभी ३० मि. मु. भा० सिद्धहै । तथाहि ॥ (जन्माद्यस्ययतः । शा० अ० १॥ पा० ।। २ ॥) य० ॥ प्रत्यक्षादिकोंकर उपस्थितइसजगत्का उत्पत्तिस्थिति भंगजिससर्वज्ञसर्वशक्तिवालेकारणसेहोताहैसोब्रह्महै इसन्यायसेभीब्रह्म कोजगत्कीकारणतासिद्धहै।यहयधिकरणसूत्रह।जिससूत्रमेंविषयतथा संशयग्रौपूर्वपक्षतथासिद्धांतोस्प्रयोजनयहपांचवयवहोंतिसकोयधि करणकहतेहैं।यहांयहयधिकरणकीरचनाहै। यतोवाइमानि इत्यादिश्रुति इसकाविपयवाक्यहै।सोक्या?ब्रह्मकेलक्षणको वोधननहींकरता अथवा करताहै। एकपदार्थकोउपादानतथा निमित्तरूपउभयविधकारणताके असंभवतथासंभवसेसंशयहोताहै।इसप्रकारकामंशयहुएपूर्वपक्षप्राप्तहुया श्रुतिकोअनुमानके अनुसारीहोनेसे वहस्वतंत्रउभय विधकारणताको बोधननहींकरसकती॥ औरएकपदार्थकोदोनोंप्रकारको कारणतामें दृष्टांतकायभावहोनेसे अनुमानभीउभयविधकारणताके वोधनमें असमर्थहै | औरउपादानत्ववानिमित्तत्वरूप एकप्रकारकीहेतुताको ब्रह्मकालक्षणमानेहुए वस्तुपरिच्छेदहोनेसे लक्ष्यपदार्थमें अब्रह्मत्व प्रामहोगा । यातेयहवाक्यब्रह्मके लक्षणको नहीं बोधनकरता । इसप्रकारपूर्वपक्षमाप्तहुए अवसिद्धांतनिरूपणकरतेहैं । अनुमानको पुरुपकीबुद्धिसेउत्पन्नहोनेकर तिसमेंदोपकीसंभावना होसकतीहै।याते तिसकोअपौरुषेयरूपतासे सर्वदोपोंसेरहितयागमप्रमाणकाअनुग्राहक तकरूपतासंभवतीहै । इन्द्रियोंकेयविषयभूतयर्थमें स्वतःतिसको प्रमाणतानहीं । अागमसिद्धजोउभयविधकीकारणता तिसमेंसुखादि दृष्टांतकोलेकरयनुमानसंभावनामात्रकाहेतुहै। अर्थवहजैसेसुखादिक उत्तराई अभिन्ननिमित्तउपादानकहैं तैसेजगत्मीअभिन्ननिमित्तउपादानक संभवहोसकताहै । यातेवस्तुपरिच्छेदका अभावहोनेसे लक्ष्यपदार्थमें ब्रह्मत्वकीसिद्धिहै । इसप्रकारसृष्टिवाक्य जगतका अभिन्ननिमित्त उपादानसच्चिदानंदस्वभावब्रह्महै । ऐसेलक्षणकोबोधनकरताहै । यहसिद्धांतहै । जिसअधिकरणमें लक्षणकानिरूपणहो तिसकाप्रयो जनभिन्ननहींहोता। किंतुपूर्वअधिकरणकाप्रयोजनहीतिसकाप्रयोजन जानना ॥इति। इसप्रकारश्रतियौयुक्तिसेब्रह्मकार्यत्वप्रपंचमेंसिद्धहै । औरब्रह्मकोसत्यस्वरूपहोनेकर तिसकेकार्य प्रपंचोभीसत्यत्वयवाधित है तैसेमानेहुएसत्यप्रतियोगिकभेदकोसत्यपनाहोनेसे प्रत्यक्षादिकोंकी विषयतातिसमेंसंभवतीहै । यातेप्रपंचकाभेदात्मामें अवश्यप्राप्त होताहै ।। इति ॥ शंका ॥ हेवादिन जैसेप्रपंचकोब्रह्मकार्यत्वकथन करनेवालेश्रुतिवचनह। तैसेयज्ञानकाकार्यप्रपंचहै।ऐसेकथनकरनेवाले श्रति वचनभीबहुतहैं । तथाहि ॥ * मृत्युनैवेदमावृत्तमासीत् १० ३० अ० (३) बा२ (१) तदेदंतहव्याकृतमासीत् * 2० अ० (३) ग्रा० (७) इंद्रोमायाभिः पुरुरूपईयते ॥ * मायांतुप्रकृतिविद्यात् । नासदासीन्नोसदासी त्तमासीत् अ० ॥ यहदृश्यमानजगउत्पत्तिसेपूर्वसाभासयज्ञानकर थाच्छादितथा ॥ अर्थात्यज्ञानमें विलीनथा ॥ और “तत्" इस शब्दसेवीजावस्थापन्नजगत्कहाजाताहै ॥ औरऐतिह्यप्रयोगमें "ह" शा होता है। और "इदं" यहशब्दन्यातपर्थात्स्पष्टनामरूपवाले १०सि० मुः भा० ३५८ प्रपंचकावाचकहै । इनदोनोंपदोंकीसमानाधिकरणतासेपरोक्षश्रपरोक्ष इनदोनोंयवस्थावालेजगत्कायभेदप्रतीतहोताहै ॥ इससेयहयर्थ सिद्धहुआ।सोयहजगतउत्पत्तिसेपूर्व अव्याकृतमासीत्"कहियेसाभास अज्ञानरूपहीथा। औरपरमेश्वरमिथ्याअभिमानोंसेवहुंतरूपप्रतीतहोता है।परमार्थसेवहबहुतरूपनहीं।शंका।मृत्युग्रव्याकृतादिशब्दज्ञानमात्र केवाचकैनहीं किंतुअज्ञानउपाधिकयात्माकेवाचकहैं । यातेप्रज्ञान काकार्यप्रपंचहै यहयर्थनहींसिद्धहोता। ऐसीयाशंकाहुएयवमाया दिपदोंकरयुक्तश्रतिवाक्योंकोकथनकरतेहैं । मायारूपयज्ञानकोजगत् काउपादानकारणजाने।क्योंकिकार्यतथाकारणकीसमानताहोतीहै । औरजगतकीउत्पत्तिसेपूर्वस्थूलतथासूक्ष्मयह दोनोंप्रकारकेपदार्थनहीं थे किंतुमिहीथा ।।यहांतमशब्दय़ावरणशक्तिप्रधानयज्ञानकावाचक है।।इत्यादिकश्रतिवाक्यजगत्कोअज्ञानकार्यत्वकथनकरतेहैं ॥ और इसपूर्वकथनकियेहुएअर्थमें श्रुतिअनुसारीयुक्तिभीहै ॥ तथाहि ॥ * मायामानंतुकात्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ॐ अ०॥ उत्तरमीमांसाके तृतीयपध्याय गतद्वितीयपादकायह तृतीय सूत्रहै ॥ इसमें- सयत्रप्रस्वप्ति ॥ ४० उ० अ० ६ ब्रा० ३ । ६ ॥* अ० ॥ सोयात्माजिसकालमेंशयनकरताहै। इसवाक्यसेलेकर क नतत्ररथानरथयोगाः॥ ० उ० अ० ६ ग्रा० ३ १० ॥ अ०॥ तिसस्वप्नकालमेंजाग्रत्केरथनहीं हैं । तथातिनकेयोग्य अश्वनहीं हैं। इत्यादिविषयवाक्यहै । तिसमेंयहसंशयहै।क्याजाग्रन् अवस्थाकीन्या स्वावस्थाभीव्यावहारिकप्रक्रिया सामर्थ्यवाली उच्चराई सृष्टिहैयथवाप्रातिभासिकसृष्टिहै।इसप्रकारसंशयकेहुएपूर्वपक्षप्राप्तहुमा स्वनमेंजामत्कीन्याईव्यावहारिकसत्तावालीसृष्टिहै ॥ क्योंकि- अथरथानरथयोगानपथःसृजते ॥१० उ० अ०६।वा० ३।१०। य० ॥ स्पमकालमेरथोंकोतथातिनकेयोग्यअश्वोंकोौरमार्गों कोयहयात्माउत्पन्नकरताहै । इसश्रुतिप्रमाणसेस्थादिकोंकीउत्पत्ति स्वप्नकालमेंप्रतीतहोतीहै ।। यातेतिसअतिप्रमाणसेस्वप्नकालमेंब्यावहा स्किसत्तायुक्तहीसृष्टिहै । इसप्रकारपूर्वपक्षमाप्तहुएसिद्धांतनिरूपण करतेहैं। सूत्रमेंजो “तु" शब्दहै वहपूर्वपक्षकोनिषेधकरताहै। अर्थात् स्वप्नकालमेंव्यावहारिकसृष्टिहै । यहकथनपूर्वपक्षीकानहींसंभवता॥ यदिस्वप्नमें व्यावहारिकसत्तावालीसृष्टिनहींतोस्वप्नमेंकैसी सृष्टिहै। ऐसीयाकांक्षाकेहुएकहतेहैं । (मायामात्रं) मायाकहियेमिथ्या रूपहीस्वप्नमेंसृष्टिहै व्यावहारिकसत्तायुक्तसृष्टिकावहांगंधभीनहींहै। इसमेंहेतुकहतेहैं। * कात्स्न्येना नभिव्यक्त स्वरूपत्वात् 28 अ०॥ व्यावहारिकवस्तुकेधर्मकरस्वप्नकोअप्रकटस्वरूपहोनेसे अर्थातव्यावहारिक पदाकिउचितदेशकालादि सामग्रीपूर्वकस्वाप्न पदार्थोंकी अभिव्यक्तिनहींहोती । इसीकारणसे स्वप्नमेंसृष्टिकथन करनेवालीश्रति व्याहारिकसृष्टिको नहींकथनकरती । और ('नतत्ररथानरथयोगाः) इत्यादिश्रुतिनेसृष्टिमतिपादकश्रुति केविषयभूतस्थादिकोंका निषेधकियाहै।इसलियेस्वाप्नसृष्टिव्यावहारि कसत्तावालीनहींकिंतु अविद्योपादानक होनेसे प्रातिभासिकसत्ता वालीहै । इसन्यायसेमीप्रज्ञानकार्यत्वप्रपंजनसिहोताहै। इस प्रकार

दे० सि० मु० मा०
पूर्वपक्षीतथासिद्धांतीकरके ब्रह्मकोकारणतातथायज्ञानकोकारणताके
निरूपणहुएएकतटस्थवादी याशंकाकरताहै।
* अथतटस्थकी शंकाकेसमाधानपूर्वक
पूर्वपक्षका उपसंहार *
शंका ॥ इसपूर्वउक्तप्रकारसेश्रतियोंकापरस्परविरोधहोनेकरजब
दोनोंहीकारणनहीं हैं तोजगत्का अन्य कोईकारणकहाचाहिये ॥
क्योंकिकारणसेविनाकार्यकीयनुपपत्तिहै । समाधान || कारणांतर
केविद्यमानहोनेसेजगत्रूपकार्यकारणसेशून्यनहींक्योंकिअपनेयपने
सिद्धांतों जैसाकारणहोनेकेयोग्यहै। तैसापरमाणुयादिकारणविद्यमान
ही है।। तिनकारणों मेंप्रथमपरमाणुकीसिद्धिकरते हैं।
त्रिसरेणुस्तावदारब्धः महत्वे सतिद्रव्योपादान
त्वात् “कपालादिवत्"।
अ-प्रथमत्रिसरेणुयारब्धयर्थात्कार्यहै । महत्परिमाणवाला
हुथाद्रव्योपादानकहोनेसे । जोजो महत् परिमाणवालाहूश्राद्रव्यो
पादानकहोताहै ॥ सोसोकिसीकरयारब्धहोता है । जैसेकपालादि
कार्य है ॥ इति ॥ इमयनुमानसेत्रिसरेणुकोकार्यतासिद्ध है । इस
प्रकारत्रिसरेणुकेयवयवरूपढ्यणुकोंमेंभीकार्यतायनुमानससिद्धकरनी
सो अनुमान यह है॥
विवादाध्यासितंकार्यद्रव्यं त्रिसरेण्ववयवाख्यं
स्वपरिमाणादणुतरपरिमाणारब्धं कार्यद्रव्य
त्वात् । संमतवत् ॥
यः॥ विवादकाविषयजोकार्यद्रव्यत्रिसरेणुफा अवयवरूपाय

उत्तराई णुकसंज्ञकहैवहथपने परिमाणसेअणुतरंपरिमाणवाले द्रव्यकरवारब्ध है । कार्यद्रव्यहोनेसे।जोजोकार्यद्रव्यहोताहै । सोसोथपनेपरिमाणसे अल्पपरिमाणवाले द्रव्यकरहीयारब्धहोताहै । जैसेत्रिसरेणुकार्यद्रव्य होनेसेअपनेपरिमाणसे न्यूनपरिमाणवालेद्यणुकोंसेपारब्धहै।।इति। इसप्रकार जोत्र्यणुक परिमाणकी अपेक्षासे न्यूनपरिमाणवाला द्रव्यदत्यणुकका श्रारम्भकहै वहीपरिमाणुजगत्का मूलकारणहै ।। इसप्रकारवैशेषिकादिकमानतेहैं ॥ औरऐसेहीसांख्यादिमतवालेप्रधा नादिकोंकोजगत्कामूलकारणकहतेहैं ॥ इसप्रकारजगतकोपरमाणु श्रादिजन्यमानेहुए प्रकरणमेंतिसकथनकाउपयोगकहतेहैं । जिस कारणसेसत्यउपादानककार्यकोसत्यताकानियमहै । जैसेपृथिवीउपा दानकपदार्थकोपृथिवीरूपताहै ॥ौरपरमाणुयादिकभीसत्यहें ।तिस कारणसे ततउपादानकजगत्भीसत्यरूपहै ।। तिसीकारणसेप्रत्यक्षादि प्रमाणसिद्धअनात्मप्रतियोगिकभेदकेविद्यमानहुए सर्वहीदेतहै ॥ यहअर्थकिसप्रकारसिद्धहोसकताहै किंतुनहींसिद्धहोसकता ॥ इस पूर्वपक्षसंग्रहकाश्लोक ॥ * आत्माऽभेदप्रमित्यापिनाढतंतेप्रसिद्धययति । अनात्मभेदसंसिद्धेःप्रत्यक्षादेः प्रमाणतः॥१॥ दो०-भेदात्मविज्ञानते नहितवपदयसिद्ध । यतोअक्षादिमानते नात्मभेद प्रसिद्ध ॥ १ ॥ ॐ अथसिद्धांत।तत्त्वंपदार्थकेशोधनपूर्वक वाक्यार्थनिरूपण हेवादिन्जोतुमने पूर्वकथन कियासोनहींसंभवता ।। क्योंकि दे०सि० मु० भा० श्रुतिकेतात्पर्य्यकातुमकोज्ञाननहीं है ॥ शंका ॥ हेमिद्धांतिनश्रुतिके तात्पर्य्यकाज्ञानमुझेकैसेनहीं ॥क्योंकिसंसारधर्मोंसेनिष्कृष्टका यर्थात् भिन्नकियेहुएसानिचेतनका संसारकर्तृत्वादिधर्मोंसे निष्कृष्टकेसाथ यर्थातभिन्नकियेहुए परमात्माकेसाथयभेदहै । इसपूर्वकथनमेश्रति कातात्पर्य्यजाननेवालेतुमनेही संसारधर्मादिकोंकीभिन्नस्थितिकथन की है । समाधान ।। हेवादिन्तत्त्वमस्यादिश्रुतिनेअनात्माकोपृथक् स्थापनकरकेशोधिततत्त्वंपदार्थोका अभेदवोधनकियाहै यहतिसका अभिप्रायनहीं ॥ यदिअनात्माकापृथक्स्थापननहींतोतिनकायभेद कैसेश्रतिबोधनकरती है ।। ऐसीजिज्ञासाकेहुए प्रथमजिज्ञासाकेविषय भूतस्वरूपकोकथनकरते हैं। प्रत्यगात्माकाब्रह्मकेसाथअभेदहै। इस अर्थकीसिद्धिकेलिये यधिकारीऐसा निश्चयकरताहै ॥ सोईदिख लाते हैं ॥ तहां प्रथमवाक्य में योग्यताकी प्राप्तिके अर्थ "काक्यार्थज्ञानपदार्थज्ञानपूर्वकहोताहै" इसन्याणकोयाश्रयणकरता हुशासिद्धांती त्वंपदार्थकीशुद्धिकाप्रकारप्रथमनिरूपणकरताहै।प्रत्यक् तथाकूटस्थचेतनरूपयधिष्ठानमें जाग्रतादितीनोंयवस्थाऔरकर्तृत्वादि अतर्थसमुदायजोसर्वव्यभिचारीप्रतीतहोताहै। वहसर्वहीतिसयनुगत साक्षिरूपयधिष्ठानचेतनमेकल्पितहै | जिसकारणसेवहसर्वअध्यस्त है इसकारणसेतिसयघिष्ठानचेतनसेभिन्न स्वतंत्ररूपताकरतिसयध्यस्त पदार्थकास्त्ररूपनहीं । यहवार्ता यन्वयव्यतिरेकसे जानकरयधिकारि पुरुपनिर्णयकरताहै । यहां प्रत्यक्” इसविशेषणसेसातीतथासाक्ष्य कायन्वयव्यतिरेकसूचनकिया ॥ सर्वयवस्थामें साक्षीकोयनुगत होनेसे तिसकाअन्वयहैयौरदेहादिरूपसाक्ष्यकोपरस्परव्यभिचारीहोने उत्तय 1 से तिसकाव्यतिरेक है ॥ औरअवस्थादिकोंको अध्यस्तपनासूचन करनेकेलियेअधिकरणका कूटस्थ"यहविशेषणकथनकियाहै । तिस विशेषणसेवास्तवचिकारकायभावहोनेसेअज्ञानकेवशसेही अधिष्ठान मेंयन्याकारताकी प्रतीतिहै । यहलाभहै । औरइसीविशेषणसे कार्यकारणकायन्वयव्यतिरेकभीसूचनकिया । सोइसप्रकारजानना। देहादिविवर्तरूपकार्योंका परस्परख्यभिचारहोनेसेतिनकाव्यतिरेकहै। औरविवाधिष्ठानरूपकारणकोसर्वग्रनुगतहोनेसेतिसकाअन्वयहै। और “अनर्थसमुदाय"यहजोपूर्वदेहादियनात्मवर्गका विशेषणकहा है।सोदुःखित्वतथापरमप्रेमाऽस्पदत्वके अन्वयव्यतिरेककोसूचनकरता । सोऐसेहै। दुःखकोव्यभिचारीहोनेसे तिसकाव्यतिरेकहै।ौरपरम प्रेमाऽस्पदत्वको सर्वत्रअनुगतहोनेसेतिसकाअन्वयहै। औरव्यभिचारी तथायनुगतकायन्वयव्यतिरेकसूचनकरनेकेलिये अनात्मपदार्थोंका "व्यभिचारी"यहविशेषणपूर्वकहाहै। औरतिसकूटस्थमें अधिष्ठात्वकी योग्यताकेलिये “अनुगत"विशेणहै । औरस्वसत्ताप्रदौस्फूर्तिप्रदत्व कथनकरनेकेलिये सात्ति"विशेषणहैऔरयनुगततथासाक्षीयहदोनों शधिष्ठानकेविशेषणयन्वयव्यतिरेककेकथनमेंभीउपयोगीहैं औरपरमप्रेमा ऽस्पदत्वकेभीयहउपलतकहैं ।इसप्रकारचारप्रकारकेयन्वयव्यतिरेकसे अधिष्ठानसेभिन्न अध्यस्तकीसत्तानहीं यहवार्ता थधिकारीनिश्चय करताहै । तिसनिर्णयकाफलकहतेहैं । इसरीतिसेनिर्णयकरकेशोधन कियेहुएशुद्धप्रत्यगात्माकेसाथ ब्रह्मकायभेदसिद्धकरनेकेलियेतत्पदार्थ कोभीयधिकारीशोधनकरताहै || तथाहि ॥ तवपदार्थ मेंभीजगत् कर्तृत्वऔपरोक्षत्वादिधर्म तथाअाकाशादिरूपसर्वजगतजोव्यभिचारी २६४ वे०सि० मु० भा० प्रतीतहोताहै । वहसर्वतिसयनुगतसचित्यानंदस्वरूपब्रह्ममेंअध्यस्त हैं । औरतिसब्रह्मसेभिन्न कियाहुयायसत्है । औरकिसीप्रमाणकर सिद्धनहीं किंतुकेवलभ्रांतिरूपहीसिद्धहै । यातेवास्तवसे असतहै। यह अर्थचारप्रकारकेअन्वयव्यतिरेकसेयधिकारीमुमुक्षुनिश्चयकरताहै यहाँपर "व्यभिचारी” यहजोजगत्काविशेषणपूर्वकहाहै और "अनु गत” यहजोअधिष्ठानकाविशेषणकहाहै । सोपूर्वउक्तचारप्रकारके अन्वयव्यतिरेककासूचकजानना । औरशून्यहीअधिष्ठानहै। इसौध मतनिधकरनेकेलिये अधिष्ठानका सत” यहविशेपणकहाहै।और सर्वत्रस्फूर्ति स्वरूपतायधिष्ठानकीदिखलानेकेअर्थ "चित् " यह विशेषणकहाहै ॥ शंका ।। अन्वयव्यतिरेककोतकरूपताहोनेकरसंभा वनामात्रकी हेतुताहुएभीप्रमाणतानहीं इसीसेतिनको अवधारणकी हेतुतानहींसंभवती॥ क्योंकिनिश्चयकाहेतुप्रमाणहीहोताहै।तर्कनहीं ॥ समाधान ॥ (नेतिनैति) इसनिषेधकश्रतिरूपप्रमाणसेकर्तृत्वादि रूपप्रपंचकाअभावअधिष्ठानमें यहअधिकारीनिश्चयकरताहै ॥ याते अधिकारीकांनिश्चयप्रमाणजन्यहेकेवलतर्कजन्यनहीं।यद्यपिनिषेधप्राप्ति पूर्वकहोताहै।प्राप्तिकेयभावहुएवहनिषेधकैसेहोगा। तथापिसृष्टिवाक्यसे तिसमपंचकीयधिष्ठान प्राप्तिसेअनंतरनिषेधवाक्यप्रवृत्तहोतो यातेनिषे धप्राप्तिपूर्वकहींहै।यौरयदिऐसेकहोकिप्रपंचकोसृष्टिवाक्यरूपश्रतिप्रमाण सेसिद्धहोनेकरतिसकानिषेधनहींसंभवगा।सोयहकथनभीयसमीचीन है क्योंकिअविद्यासेउपस्थितहुएजगत्का श्रुतिअनुवादकरतीहै। शंका श्रतिकोअनुवादकमानेहुएकिसलियेवहअनुवादकरतीहै || समाधान हेवादिनबोधकाहेनुजोयध्यारोपपवादन्यायतिसकोयाश्रयणकरकेबोध T

उत्तराई
अर्थश्रतियनुवादकरतीहै।' यांतेश्रतिप्रमाणकरयहजगतप्राप्सनहीं
कितुभ्रांतिसेपासहै । तिसकानिषेधसंभवताहै। इसप्रकारजाग्रतादिक.
.
.
.
.
1
f.
बांधकारमुमुक्षुगुरुकाशरणकोप्राप्तहोताहे ॥ शंका ॥ गुरुकीशरण
कोमासहोनांनिश्चयकेयर्थहै । यदिवहनिश्यपूर्वउक्तरीतिसेअधिकारी
haitarin
:::
"
mins
.....
पदार्थकभेदमेंहीप्रमाण
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: . .थापिप्रत्यनादिकोंकों
'वह समर्थनहींहै ।।
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॥शंका 1पूर्वउक्तयन्वयव्यतिरेकरूपयुक्तिसेहीभेद वालअनात्मा
केंसंबंधोंकल्पितनिश्चयहोनेकरयात्मातिसका प्रभावहै ।" या
ब्रह्मात्माकायभेदअधिकारीकोनिश्चितहोजायेंगी । समाधान ।। हे
वादिन युक्तिकोतकरूपताहोनेकर स्वतंत्रकिसीअर्थमेतिसको प्रमाण
तानहीं है। इसीकारण सेयभेदका निश्चार्यकयुक्तिनहीं। शंका ।।
अधिकारीको अभेदमें प्रमाण कायभाव कहना नहीं संभवता ।
क्योंकिधीतवेदही अधिकारी होताहे । याते अतिप्रमाणसे'
तिसको अभेद निश्चय उत्पन्नहोजायेगा" समाधान यद्यपि

३६६ वे. ति. मु. भा० जिसने पदपदार्थकी संगतिग्रहणकीहै।तिसको सुनाहुयाशब्द अर्थ काबोधकहोजाताहै । तथापि असंभावनाकरविषयकोग्रस्त होनेसे तिसमेंशब्दजन्यज्ञान प्रतिष्ठाको नहींप्राप्तहोता । इसकारणसे ही असंभावनाग्रस्तविषयमें वहशन्दप्रमाणरूपतासे व्यवहारनहीं किया जाता । यातेथधिकारी यभेदमेंसंशययुक्तहोताहे “संशययुक्त" इस विशेपणसे "नित्यानित्यवस्तुकाविवेक"यहजोअधिकारीकाविशेषण सो अर्थसे निरूपणकिया।यवयधिकारीकायौरविशेपणजो वैराग्यहै तिसकोनिरूपणकरतेहैं । संसाररूपएकरोगराजहै तिसकेअनुचरगर्भ वासादिअनेकरोगहैं । तिनसेउत्पन्नहुबाजोदुःखोंका समूह तिसके अनुभवसेजिसपुरुपको वैराग्यउत्पन्नहुयाहै।तिसीसेब्रह्मलोकमेंउत्पन्न हुएसुखकोभीविपकीन्याईमानताहै ॥शंका ॥ अधिकारी वैराग्यादि साधनसंपत्तिकेहुएभी गुरुके समीपगमननहींसंभवता ॥ क्योंकिगुरु केसमीपगमन कोईसंसारकी निवृत्तिकाकारणनहीं। औरयदिऐसेकहो (आचार्य्याद्वैवविद्या।) ०॥ श्रोत्रियतथाब्रह्मनिष्ठगुरु सेहीमात्मज्ञानप्राप्तहोताहै । इत्यादिश्रुतिसंसंसार दुःखकेनिवर्तक श्रात्मज्ञानकीहेतुतागुरुकेसमीपगमनकोप्रतीतहोतीहै।यातेयात्मज्ञानके अर्थगुरुकेसमीपगमनसंभवताहै।सोयहकथनभीसमीचीननहीं।क्योंकि यदिश्रात्मज्ञानसंसारका निवर्तकहो तोगुरुकेसमीपगमनसंभवे परन्तु श्रात्मज्ञानकोसंसारके निवर्तकपनेमें कोईप्रमाणनहीं । यातेतिसके अर्थगुरुकेसमीपगमन नहींसंभवता ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यात्म ज्ञानकोसकलसंसारकी निवर्तकता ( तरतिशोकमात्मवित् ) अगायात्माकेजाननेवाला शोकउपलक्षितसमूलसंसारकोनाशकरता उत्सराई ३१७ । इसतिप्रमाणकरसिद्धहै । यातेसंसाररूपदावानलसे प्रकटडया जोसंताप तिसकेशांतकस्नेकासाधन अमृतकासमुद्रयात्मविद्याहै।ऐसे जानताहुयायहयधिकारी तिसविद्याकी प्राप्तिकेयर्थ गुरुकेसमीप गमनकरताहै | शंका ।। स्वर्गकासाधनयागहै ऐसेजानतेहुएसर्वही वैदिकजनयागमें प्रवृत्तहोतेहीहेंयहकहींनहींसंभवता समाधान जिसको फलकीइच्छाहोतीहैवहीतिसकेसाधनानुष्ठानमेंप्रवृत्तहोताहै अन्यनहीं प्रवृत्तहोता।यातेपरिपूर्णब्रह्मात्माके अभेदविषयकयपरोक्षज्ञानकीइच्छा वालापुरुपश्रोत्रियब्रह्मनिप्ठतथापरमकृपालुसद्गुरुकीशरणकोशास्त्रउक्त विधिसेयर्थात्समिदादिकिंचित्उपहारकोहस्तमेंग्रहणकरकेप्राप्तहोताहै तवपरमकृपालुश्रीगुरुने शरणागतयधिकारीको नित्यतथानिर्दोष तत्त्वमस्यादिरूपशब्दप्रमाणसे शोधनकियेहुए तत्त्वंपदार्थोकायभेद वोधन किया । तिससेयनंतरअधिकारी अपनीनिर्मलबुद्धिकीसहा यतासेयद्वैतवस्तुके साक्षात्कारकोप्राप्तहोकर यानंदग्रंशकेयावरक अज्ञानतत्कार्यकोवाधकरके स्वरूपानंदसेतृप्तहुया श्रात्मारामअर्थात् स्वस्वरूपमेंही रमणकरनेवालाहोताहै। यद्यपियापकमतमें वेदकोभी कल्पितहोनेसे तिसकोनित्यकहना नहींसंभवता। तथापिवेदरचनाको बुद्धिपूर्वकनहोनेसे तथाप्रयत्नसे यजन्यहोनेसे नित्यत्वका तिसमें उप चारहै। इसप्रकारतत्त्वज्ञानसे सकलभेदकाविनाशहोनेकरसर्वयदैतही है यहतत्त्वमस्यादिमहावाक्यसे जाननेयोग्यहै । यहअभिप्रायसिद्ध हुथा। इसीहेतुसेश्रतिकेतात्पर्य्यकोनजानकरहीवादीनेपूर्वयहकहाहै जोयनात्मभेदसेयदैतकीहानिहोतीहै ।। इति ॥

. IIT वै० सि० मुभाँ० *अथस्वरूपभेदकारखंडन यौरजोपूर्ववादीनेयहकहांथा'। किस्वरूपभेदप्रत्यक्षादिप्रमाण काविषयहै तिसकोविरोधहुएयर्थसेवेदांत यदैतमेंप्रमाणनहीं ।' सौ' कथनीअत्यंत ययुक्त है। क्योंकि ॥ (परीचिखानि) इसंश्रुति सेप्रत्यक्षादियनात्माकोविषयकरतेहैं । यातेतिनकोस्वरूपविषयकत्व कहनानहींसंभवता। भावयह स्वरूपकोसतरूपहोनेकरामताहै।इसी सेयात्मस्वरूपभेदमें प्रत्यक्षादिकोंकीप्रवृत्तियुक्तनहीं ॥ शंका ।। सर्व प्रत्ययोंकाविषयस्वरूपहै यहयापकामतहै। तिसकारणसेप्रत्यक्षादिको कोयविपयस्वरूपकोयापकैसेकहतेहो।।' समाधान ॥ हेवादिन स्वरूप कोभेदपनेकीअनुपपत्तिहै।जिसहेतुसेस्वरूपमें भेदपनानींसंभवतासो तुमश्रवणकरो । क्योंउपाधिकसंबंधसेरहितशुद्धात्मासर्वधर्मोसेरहित वहस्वरूपभेदहै। अथवाउपाधिकेसंबंधवालाविशिष्टयात्मा वहस्वरूप भेदहै। तहांशुद्धहीस्वरूपभेदहै इसप्रथमपक्षमेतिसस्वरूपभेदकोकिसी व्यवहारकीहेतुताभीनहींहोगी । यहकथनकरनेयोग्यहै । यर्थयह।। प्रथमग्रामस्वाभाविकधर्मतोहैनहीं क्योंकिवह यविकारिस्वभावहै ।। श्रौरयोपाधिकधर्मभीउपाधिसंबंधसेरहितब्रह्ममे नहींसंभता'। याते शुद्धपदकेमहात्मसे तिसकोनिधर्मककहनाहीउचितहै । यहप्राप्तहुया थौरतसेहीव्यवहारकीविपयताभीतिसमेंनहींहै । यहकहनाउँचितह।। तथाहि ।। यहांकथनकानामव्यवहारहै । श्रथवाज्ञानकानामव्यवहारहै यहविचारणीयहै । इनमेंप्रथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिकिसी धर्मकोग्रहणकरकेही गन्दकीप्रवृत्तिहोतीहै ॥ तिसमकथभविहुए शब्दकीप्रवृत्तिकै सेहोगी । औरबह्मकोरवप्रकाशहोनेसे तिसमेंज्ञानकी उत्तराई विपयताभीनहींसंभवती । यातेद्वितीयपक्षभीअसंगतहै ॥ शंका ॥ निधर्मकतथास्वप्रकाशहोनेसेब्रह्ममेंसर्वव्यवहारकीयविषयताहो तिससे क्यासिद्धहुया ।। समाधान ॥ तैसेमानेहुए सर्वव्यवहारकाथविषय औरसर्वधर्मोसेरहित “अस्थूलमनणु" इत्यादिश्रुतिकरसिद्धसतरूप ब्रह्महीनामांतरसे प्रत्यक्षादिकोंकाविषय तुम्हारेकथनसेसिद्धहोताहै ।। शंका ॥ “यस्थूल" इसश्रुतिमें “नत्र"कोनिषेधार्थकहोनेसेस्थूलता कायभावब्रह्महै यहअर्थसिद्धहोगा। समाधान। हेवादिन्कल्पितजो स्थूलतादिकहैं तिनकोअधिष्ठानसेभिन्न कियेहुएअसतानाहोताहै।और असत्काअभावभावरूपहीहोताहै।यातेसतरूपहीब्रह्महैअभावरूपनहीं। इसप्रकारभेदपत्यज्ञादिप्रमाणकाविषयहैऐसेकथनकरनेवालेवादीनेभेद कोपूर्वउक्तब्रह्मसेअभिन्नहोनेकर ब्रह्महीभेदहैइसनामांतरसे ब्रह्मकोही प्रत्यक्षादिकोंकीविषयताकथनकीहै। तैसेमानेहुएहमारेमुतमें श्रनिष्टकी प्राप्तिनहींहोती।शिकाब्रह्मस्वरूपमानकरभी यदिप्रपंचभेदप्रमाणासिद्ध होजाय तोभीहमारे इष्टकीसिद्धि होजायेगी!! समाधान ॥ हेवादिद प्रथमअतिरिक्तभेदअर्थात् धर्मीसेभिन्नभेदतोतुमनेही स्वीकारनहीं किया ! औरस्वरूपभेदको ब्रह्मस्वरूपताकेहुए स्वप्रकाशहोवेसेऔर प्रत्यत्तादिप्रमाणकी विषयताकानिषेधहोनेसे भेदकोब्रह्मरूपहोनेकरभी प्रमाणगम्यतानहींसंभवती । पौरभेदकोब्रह्मस्वरूपमानकर प्रत्यक्षादि कोंकीविषयतामानेतो.। नचुक्षुषागृह्यतेनैववाचानात्यैर्देवैस्तपसा. कर्मणावा, ! (मु) उ० ३॥ ९ख० २॥5 श्र॥ सोब्रह्मनेत्रइन्द्रियकरग्रहणुनहींहोता, यौवाइन्द्रिय वे०सि० मु. भा. करकहानहींजाता । औरयन्यइन्द्रियोंकरभी ग्रहणनहींहोता । और कृच्छादितपसे तायागादिरूपकर्मसेभीनहीं जानाजाता । इत्यादि श्रुतिकाविरोधप्राप्तहोगा।यातेब्रह्मस्वरूपमानकरभी भेदकोप्रामाणिकता नहींहोसकती ॥ ौरसर्वप्रत्ययवेद्यत्व उपहितस्वरूपमें है शुद्धमैनहीं। शंका ॥ यदिपूर्वउक्तदोपसेशुद्धस्वरूपको भेदपनानहींसंभवता । तो विशिष्टस्वरूपहीभेदहो । तिसविशिष्टस्वरूपभेदमें पूर्वकथनकिये दोपोंकीप्राप्तिनहींहोती ॥ समाधान ॥ हेवादिनविशिष्टस्वरूपभेदहै इसपक्षमेंभीयहविचार करनेयोग्यहै। विशेषणतथाविशेष्यकाभेदमाने हुए विशेपणादिभेदसेभिन्नही कोई विशिष्टस्वरूपभेदहै। यहकथनकर नेयोग्यहैयथवाविशेषणादिकोंके भेदकाअभावहीविशिष्टस्वरूपभेदहै यहकथनकरनेयोग्यहै।विशेपणतथाविशेष्यकाभेदमानकरविशिष्टस्वरूप भेदतिससेभिन्नहै।यदियहप्रथमपक्षमानो तोदुःखपूर्वकहै परिहारजिस का ऐसे अनवस्थादोपकीप्राप्तिहोगी। सोदिखलातेहैं।। विशिष्टस्वरूप भेदकाउपपादकजोविशेषणविशेष्यकाभेदहै।वहक्याविशिष्टस्वरूपभेद हीहै।अथवाकोई अन्यभेदहै।प्रथमपक्षमानेहुएयापकोहीयपनाउपपा दकहोनेसेयात्माश्रयदोपकीमाप्तिहोगी।यौरद्वितीयपक्षमानेहुएअन्योन्या ऽश्रयदोपहोगा।क्योंकिविशिष्टस्वरूपभेदको अपनेउपपादकभेदांतरकी अपेक्षाहै।ौरभेदांतरकोयपनीमिद्धिकेयर्थविशिष्टस्वरूपभेदकीयपेक्षा है।औरयदिअन्योन्याश्रयदोपकेपरिहारकरनेकेलियेविशेषणविशेष्यके भेदकाउपपादकतृतीयविशिष्टस्वरूपभेदमाने तोचक्रकादोपकीप्राप्ति होगी।औरचक्रकादोपकेपरिहारकरनेकेलिये यदिचतुर्थस्वरूपभेदमाने तोयनवस्थादोपप्राप्तहोगा।ौरविशेषणतथाविशेष्यकेभेदकाअभावही -- . उत्तराई ३७१ विशिष्टस्वरूपभेदहै।इसद्वितीयपक्षविशिष्टस्वरूपकीयसिद्धिहै। क्यों किविशेपणतथाविशेष्यकायभेदमानेहुए दोनों मेंएकशेपरहेगा। याते विशिष्टस्वरूपकीही असिद्धिहोगी।क्योंकिएकविशेषणवाविशेष्यमेंवि शिष्टव्यवहारनहींहोता।यौरविशिष्टस्वरूपताभेदकोमानेहुएप्रमाणकी विषयता भीनहींहोसकती। क्योंकिविशिष्टकोभीशुद्धवस्तुकेस्वरूपकी न्याईनिधर्मकताहै।जिसकारणसेस्पादिविशिष्टपदार्थमेंयन्यरूपादिक नहींस्थितहोसकते । यातेविशिष्टस्वरूपभेदको निधर्मकहोनेसेतिसमें प्रत्यक्षादिप्रमाणकीविषयता नहींसंभवती ॥ किंवा ॥ विशिष्टस्वरूप, कोनिश्चयकरतुमभेदकहतेहो तहांसोविशिष्टस्वरूपक्या?विशेपणतथा 'विशेष्य यौरसंबंधइनतीनोंसेभिन्नहै । अथवायभिन्न है । प्रथमपत्ततो नहींसंभवता।क्योंकिविशिष्टनामवालास्वतंत्रकोईपदार्थनहीं विशेषण यौरविशेष्यतथातिनकेसंबंधसे भिन्नतिसविशिष्टपदार्थकायनुभवनहीं होता।औरद्वितीयपक्षोभीयहविचारकरनेयोग्यहै। विशेषणतथाविशेष्य यौतिनकेसंबंधसेविशिष्टको अभिन्नमानेहुएक्या?एकएकमेंविशिष्टव्य वहारहोताहै।अथवातीनोंकेसमुदायमेंविशिष्टव्यवहारहोताहै।इनमेंप्रथम पक्षतोनहींसंभवता।क्योंकिप्रत्येकमेंविशिष्टव्यवहारमानेहुएकेवलदंडमें भी दंडीपुरुषः" ऐसाविशिष्टव्यवहारहुयाचाहियोऔरऐसाव्यवहारहोता नहीं। क्योंकिकेवलदंडको तिसविशिष्टव्यवहारकीजनकतानहीं है ।। ऐसेहीकेवल विशेष्योरकेवलसंबंधीभीविशिष्टव्यवहारनहींहोता।और समुदायमेंविशिष्टव्यवहारहोताहै ।इसद्धितीयपक्षोभीयहविचारकर्तव्य है ! क्या?वहसमुदायइनविशेषणादितीनोंसेभिन्नहै।यथवायभिन्न है। पथमपक्षमतोदूषण पूर्वकथनकरही दियाहै। अर्थात् विशेषणादिकोंसे १७२ वे०सि० मु. भा. . भिन्नसमुदायपदार्थकायनुभवनहींहोता।यौरद्वितीयपक्षमेंभीविशेषणादि प्रत्येकमेंसमुदायव्यवहारहुयाचाहिये। यौवहदेखनेमेंनहींयाता। याते द्वितीयपक्षभी असंगतहै । औरयदिपूर्वउक्तदोपोंके दूरकरनेकेलिये विशेषणतथाविशेष्यकेसंबंधकानामहीविशिष्टपदार्थहै। ऐसेवादीकहेतो, यहभीनहींसंभवता । क्योंकिविशेपणादिकोंसे भिन्नहुासंबंधविशिष्ट स्वरूपहै।अथवाविशेपणादिकोंकरउपलक्षितहुयासंबंधविशिष्टस्वरूप है इनमेंप्रथमपतनहींसंभवता|क्योंकि "विशेपणतथाविशेष्योतिनका संबंधहै"इससमूहालंबनज्ञानमेंसंबंधौभीविशेपणादिकोंकीन्याईविशिष्ट व्यवहारदेखने मेनहींयाता।यौरदितीयपनभीयसंगतहै।क्योंकिदेवदत्त केगृहप्रयुक्तजो व्यवहारहै । सोगृहकेउपलक्षणरूपकाकमेंनहींदेखा तैसेसंबंधके उपलक्षणभूतविशेषणतथाविशेप्यमें विशिष्टप्रयुक्त व्यवहार कायभावमसंगहोगा। यातेविशिष्टस्वरूपताभी भेदको नहीं संभवती ॥किंवा।।वस्तुकास्वरूपहीभेदहै। ऐसेकथनकरनेवालेवादीसेयहमष्टव्यहै क्या?निःस्वरूपप्रतियोगिकवहभेदहै। यथवास्वरूपप्रतियोगिकभेदहै । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकिनिःस्वरूपको तुच्छहोनेकर तत्प्रति योगिकभेदकोभी तुच्छताकीप्राप्तिहोगी।ौरस्वरूपप्रतियोगिकभेदहै इसद्वितीयपक्षमेंभी यहविचारकरनेयोग्यहै।। क्या?स्वरूपप्रतियोगिक भेद प्रतियोगीकास्वरूपहै । अथवा धर्मीका स्वरूपहै ।। इनमेंप्रथम पक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिनाशऔरतिसकेप्रतियोगीकाअभेदनहीं संभवता ॥ और (भिदिरविदारणे ) य० ॥ भिदिधातुविदा रणर्थात्नाशयर्थमेहै। इसपाणिनिमुनिकेवचनसे विदारणरूपतिस भेदकोवस्तुकेस्वरूपकी नाशस्पतासिद्धहोतीहै । इसीयर्थकोदृष्टांत उत्तराई दारास्पष्टकरतेहैं ॥ जैसपटकाविदारणयातनाशवहपटकास्वरूप नहींहोता तैसेवस्तुके स्वरूपकाविदारणरूपभेदभी प्रतियोगीस्वरूप नहींहोता । औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता ।। क्योंकिस्वरूपत्वको प्रतियोगिताका अवच्छेदक मानेहुए स्वरूपत्वकाजो अनधिकरणहै तिसकोधर्मिपनाकहनाहोगा। औरतिसकोनिःस्वरूपहोनेकरभेदकी श्राधारताहीनहींसंभवेगी । औरयदिऐसेकहोकिस्वरूपभेदमेंम्वरूपत्व प्रतियोगिताकायवच्छेदकनहीं किंतुकोईएकवैधर्म्य प्रतियोगिताका थवच्छेदकहै । औरस्वरूपभेदसर्वत्रही वैधयंकरल्याप्तहै ।। यातेपूर्व उक्तदोपकाअवकाशनहीं । सोयहकथनभी असंगतहै। क्योंकिएक पदार्थमेंवृत्तिहुया तिससे इतरमेंजोनवृत्तिहो तिसको वैधयेकहतेहैं । जैसेघटत्वघटमात्रवृत्तिहुया घटसेइतरपटादिकोंमेंवृत्तिनहीं।यातेघटत्व वैधय॑है।सोवैधHइतरशब्दकाअर्थजोभेदतिसकेज्ञानकेयाधीनज्ञानका विषयहै।। औरप्रतियोगिताऽवच्छेदक वैधय॑ज्ञानकेयाधीनभेदकाज्ञान है। तैसेमानेहुए अन्योन्याश्रय दोपकीप्राप्तिस्पष्टहीहै । औरयदि इसदोपकेदूरकरनेकेलिये वैधयंकाउपपादक कोईकधर्मभेदस्वरूप भेदसेथन्यही स्वीकारकरो तोतिसमेंभी यहकथनकरनेयोग्यहै । वह धर्मभेदक्या?भिन्न याश्रयमें वर्तताहै।यथवायभिन्नाश्रयमेंवर्त्तताहै। प्रथमपततोनहींसंभवता।क्योंकिस्वरूपभेदसेअन्य यदिधर्मभेदमानेतो वहनिःस्वरूपहोगा। औरभिन्नकहिये द्विविभागकोप्राप्तहुएपदार्थको श्राश्रयपनाभीनहींसंभवतायातेनिराश्रयहुयासोभेद निरूपणपथके -योग्यनहीं।औरयादिभेदनहुएपदार्थकोभीयाश्रयमानातोश्वस्तहुया घटभीजलकामाधारहुआचाहिये ॥ ौखहधर्मभेदयभिन्नाश्रयमें ३७४ व०सि० मु० भा० वर्त्तताहै।यहद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता॥क्योंकिवभिन्नयाश्रयमेंविरोध होनेसेही भेदउसमेंनहींवर्त्तता । किंवा॥ पटप्रतियोगिकभेदघटस्वरूप है। अथवाघटका धर्महै। प्रथमपक्षमेंतोपटरूप प्रतियोगीकेसहितभेद कोघटरूपमानेहुए घटकोयदेतप्रसंगहोगा।यौरघटकाधर्मवहभेदहैइस दितीयपक्षोपटभीघटकाधर्महुयाचाहिये।क्योंकिपटस्वरूपहीभेदतुमने मानाहै ॥ किंवा ॥ वस्तुकास्वरूपहीभेदहै । ऐसेमानेहुएसंशयतथा भ्रमज्ञानकाभी संसारसेउच्छेदप्राप्तहोगा। क्योंकिस्थाणु तथाशुक्त्या दिकवस्तुकेग्रहणसे भेदकाग्रहणभीयवश्यहोजायेगा।पुनःपुरुषतथा रजतादिकोंकासंशयौरभ्रम कैसेपुरुषकोसंभवेगा। किंतुनहींसंभवेगा इसप्रकारभेदमेंअनेकदूषणहैं।यातेइसबहुतयनात्मविचारसेक्याप्रयोजन है इसविचारकासमाप्तकरनाही उचितहै।।सर्वप्रकारसेयर्थात्स्वरूपभेद पक्षमेंअथवाधर्मभेदपक्षप्रत्यक्षादिकप्रमाणयात्मातथाअनात्माकेभेद कोविपयनहींकरते यहअर्थसिद्धहुया। इसप्रकारसाक्षिमात्रकरसिद्धजो श्राविद्यकप्रपंचहै तिसकोप्रमाणकीविषयताकेययोग्यहोनेसे ततप्रति योगिकभेदकोकल्पितहोनेकरपारमार्थिकयदैतकी किंचित्भीक्षतिनहीं। इति ॥३७॥ अथअज्ञानकारणत्ववादनी तथाब्रह्मकारणत्व वादनीश्रुतियोंकेविरोधकापरिहारनिरूपण औरमिथ्याप्रपंचब्रह्मउपादानकनहीं। किंतुयविद्योपादानकहै यदिग्रविद्याकोउपादानतानहींमाने। तोयविद्याकोउपादानता कहने वालेश्रुतिवचनोंकाविरोधप्राप्तहोगा । यद्यपिब्रह्मकोकारणता कथन करने वाले श्रुति वचनोंका विरोधहोनेसे अज्ञानतथाब्रह्मइन दोनों ३७५ उत्तराई कोहीकारणतानहीं संभवेगी । यहपूर्वकथनकियाहै तथापिसोनहीं संभवता। क्योंकि ॥ * मू० ब्रह्माज्ञानाजगज्जन्मब्रह्मणोऽकारणत्वतः ॥ अधिष्ठानत्वमात्रेणकारणंबृह्मगीयते ॥३८॥ शिखरणी॥ जनीताभापोजीपरमतमसातेजगतकी। यतोभापीनाहीजनकपनतातामहतकी। श्रुतीगावेजोईजनकपनतातापरमको । अधिष्ठातामात्रेणलपमनमेंतामरमको ।।३।। टी०॥ ब्रह्मकेअज्ञानसेहीजगत्कीउत्पतिहोतीहै । यातेप्रज्ञान हीजगत्काकारणहै । शंका ॥ ब्रह्मतथाअज्ञानइनदोनोंकोकारणता केप्रतिपादकवाक्योंकोविद्यमानहोनेकर अज्ञानहीजगतकाकारणहै यह नियमयापकैसेकरतेहो। समाधान ॥ ब्रह्मकोयसंगतथाविकारशून्य होनेकरजगत्कीकारणतानहींसंभवती । और- * सदेवसोम्येदमग्रासीत् इत्यादिब्रह्मकी कारणताकेप्रतिपादक श्रतिवाक्यतोजगत्केउपा दानप्रज्ञानकीअधिष्ठानतामात्रसे तिसकोकारणताकामतिपादनकरते हैं यातेश्रतियोंकापरस्परविरोधनहीं। अबइसीयर्थकोविस्तारसेनिरूपण करतेहैं ।। जगतकायविद्याहीकारणहै । यद्यपियविद्यानामविद्याके अभावकोहै।सो अभावजगत्काकारण नहींसंभवता ।। क्योंकि तिस कार्यरूपजगत्कोभावरूपताहै। तथापिवहयविद्यासत्तथांयसबसे क्लिक्षणयनिर्वचनीयभावरूपतथा यनादिहै।यातेजगतकीउपादानता तिसमेंसंभवेशिकायविद्याकोयनादिमानेहुएभीयहजगत्सतरूपता वे०सि० मु० भा० सेपतीतहोताहै। यातेसत्सेविलक्षणयविद्याकोकैसे तिसजगत्कीउपा दानताहै ॥ समाधान ॥ हेवादिनदृश्यत्वादियनुमानसेजगत्की अनिर्वचनीयतासिद्धहै तहांयनुमान ॥ विमतंसतविविक्तंदृश्यत्वात्परिच्छिन्नत्वात् शुक्तिरजतवत्* य० ॥ विवादकाविषययहजगत्सत्सेविलक्षणहै । दृश्यतथा परिच्छिन्नहोनेसेजोजोदृश्यतथापरिच्छिन्नहोताहै।सोसोसत्सेविलक्षण होताहै । जैसेशुक्तिरजतहै ।। इति ॥ ौरयपरोक्षप्रतीतहोनेसे यह जगत् असत्भीनहीं। तिसीकारणसे यहजगत् सत्यसत्से विलक्षण अनिर्वचनीयहै । तैसेमानेहुए अनिर्वचनीयजगत्कायनिर्वचनीय अविद्याही उपादानकारण कथनकरनेयोग्यहै ।। क्योंकिकार्यतथा कारणकासमानहीरूपहोताहै। विलक्षणनहीं ॥ औरब्रह्मतिसजगत काकारणनहींसंभवता।। क्योंकिविकारसेरहितसोब्रह्मकार्य्यतथाकारण भाव सेविलक्षणहै।। शंका ॥यदिश्रुतिहीतिसकोकारणताबोधनकरती है तोआपतिसकोकारणतासेविलक्षणकैसेकथनकरतेहो ।। समाधान हेवादिन् श्रुतिहीतिसब्रह्मकोकार्य तथाकारणभावसे विलक्षणबोधन करतीहै । तहांश्रुति ॥ * तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनंतरमवाह्यमयमात्माब्रह्म सर्वानुभूरिति । १० उ० प्रा० ५ १०४ के १६ अ०॥ “तदेतद्” कहियेयज्ञानादिविपयरूपजगत्ब्रह्मरूपही है । इसजगत्कायौरकोपनहीं।क्योंकियध्यस्तपदार्थ अधिष्ठानस्व रूपहीहोताहै । सोब्रह्म (अपूर्व) कार्यहै ॥ तथा (अनपरं) अका विचराई रणहै।। और (यनन्तरं) सामान्यसेरहितहै। और (यबाह्य) व्यक्ति सेरहितहै। अर्थातजातितथाव्यक्तिसेविलक्षणहै। औरवहपरोक्षनहीं किंतु (अयमात्मा) नित्ययपरोक्षयात्मस्वरूपहै ॥ ौरवहीब्रह्महै ॥ और (सर्वानुभूः)चिदात्माहोनेसेवहीसर्वकाप्रकाशकहै। (इति) तिस पूर्वउक्तब्रह्मात्माकाज्ञान मुमुक्षुकोसंपादनकरनेयोग्यहै । यहवेदकी थाज्ञाहै ॥ तिसयाज्ञाकेउल्लंघनकरनेसेसंसाररूपमहान अनर्थकी प्रासिहोतीहै।। औरतिसयाज्ञाके पालनकरनेसेअपनीकृतार्थताहोतीहै ।। इति ।। इसश्रुतिवचनसेब्रह्मनिष्ठकारणताकानिषेधहोनेसे तथाब्रह्म कोनिर्विकारहोनेसे कारणताकातिसमेंसंभवनहीं। यद्यपिब्रह्मकोजगत् कीकारणताश्रति प्रसिद्धहै ॥ तिसकाविरोधप्राप्तहोगा । तथापि जगत्केउपादानभूत अज्ञानका ब्रह्मको अधिष्ठानहोनेकर औपचारिक कारणताकेकथनसेभीश्रुतिकीसफलताहोसकतीहै।तिसश्रुतिकाविरोध नहींप्राप्तहोता। यातेब्रह्मकारणनहीं किन्तुयज्ञानहीकारणहै ॥शंका औपचारिककारणताकोश्रतिक्योंनिरूपणकरतीहैक्योंकितिसकेकथन का कोई फलनहीं।और निष्फलयर्थकेकथनसे श्रुतिकोथप्रमाणता होगी ॥ समाधान ॥ हेवादिन ब्रह्मकोकारणताकहनेवालीश्रति स्वार्थमें तात्पर्य्यवालीनहीं ॥ किंतु अन्यार्थपरहै तथाहि ॥ "एक मेवाद्वितीयम्" इसतिसे प्रथमझनका अद्वितीयपनासिद्धहै। वहकिसमकारसंभावनाकरनेयोग्यहो । ऐसीयाकांक्षाकेहुएकहतेहैं । प्रथमकार्यतथाकारणकायभेद लोकमेंप्रसिद्धहै । क्योंकिमृत्तिकातंतु थादिककारणोंसे घटपटादिकार्यभिन्ननहीं प्रतीतहोते ॥ यातेमृदा दिकारणहीयद्वितीयहै । तैसेब्रह्मभीजगतकाकारणहै तिससेभिन्न ३७८, वे० स० मु० भा० जगरूपकार्यनहीं । यातेब्रह्महीयद्धितीयहै । तिसमेंअसंभावनाकैसे हो । इसप्रकारकारणताकहनेवालीश्रुतियद्धतमें संभावना बुद्धिमात्र कीउत्पादकतासे सफलहोनेकर अप्रमाणनहीं ॥ शंका ॥सर्ववेदांतों काब्रह्ममेंतात्पर्यहै । यहउतरमीमांसाके समन्वययध्यायकाअर्थहै । तिनमेवेदांतकाएकदेशरूप कितनेश्रुतिवचनोंका यज्ञानकीकारणतामें तात्पर्यमानेहुएकैसेअपसिद्धांतनहींहोगाकिंतुसिद्धान्तकीहानियवश्य होगी।समाधान। हेवादिन्यज्ञानमेंभीजगत्कीकारणताश्रतिविवक्षा नहींकरती। किंतुअखंडतथाथानन्दस्वरूपचिदात्माकानानाप्रकारसे दुःखित्वतथादृश्यत्वादिरूपतासेजोप्रतिभासयर्थात्प्रतीतिहैइसीकोभ्रम कहतेहैं। तिसभ्रमकानिमित्तमात्रहोनेकर अज्ञानकोकारणताश्रुतिकथन करतीहै । तिसमेंतात्पर्य कायभावहोनेसेसिद्धांतकीहानिनहीं।यज्ञान कोभ्रमकीनिमित्तमात्रताश्रीसर्वज्ञात्म महामुनिजीनेभीकथनकीहै। विषयकरणदोषान्नभूमः संविदिस्यादपतु भवतिमोहात् केवलादेवमेव । भगवतिपर मात्मन्यहितीये विचित्राहयमति रियमस्ति भ्रांतिरज्ञानहेतुः ॥ सं० शा०अ०१॥ ० ३०॥ अ०-जैसेस्वप्रकाशस्वरूपज्ञानमें वेद्यत्वकाभ्रमवादियोंकोविषय तथाकरणदोपसेनहींहोता । किंतुकेवल यज्ञानरूपनिमित्तसेहीहोता है ॥ तैसेहीअद्वितीयस्वरूपभगवान्परमात्मदेवमें यहविचित्रनाना प्रकारकाद्वैतवुद्धिरूपभ्रमकेवल अज्ञाननिमित्तकहै ।। इति ॥ शंका ॥ श्रुतिकोमुख्यउपादानताकेकथनसे उठाकरकिसलिये यज्ञानकीनिमि तमात्रपरता कल्पनाकरतेहो।। समाधान ।। हेवादिनसत्कोतथायस .

उत्तरार्द्ध कोकार्यपनानहींसंभवता । यहअर्थपूर्वनिरूपणकरयाएहैं ।। याते कार्यकेशसंभवसे कार्यतानिरूपितकारणताभी नहींसंभवती।। किंवा।। व्यापारवालाहीकारणहोताहै। तिसमेंयहविचारणीयहै । वहव्यापार क्या?यकार्य है । अथवाकार्यहै। प्रथमपक्षमाने तोसदाहीकार्यहुया चाहिये । क्योंकिकारणमें सदाव्यापारकेहुएकार्यसेवहकवीभीउपरत नहींहोगा । औरद्वितीपक्षमें अनवस्थादोपप्राप्तहोताहै। क्योंकितिस व्यापारके उत्पन्नकरनेकेअर्थ अन्यव्यापारमाननाहोगा। ऐसेअन्य थन्यव्यापारकेमाननेसे अनवस्थादोपस्पष्टहीहै। इसप्रकारच्यापारको निरूपणनहोनेकरभी कारणनहींसंभवता ॥ यौस्कार्यकारणभावको कल्पितहोनेकरप्रमाणकीययोग्यताहै। अर्थात्वहप्रमाणसिद्धनहीं। और यदिकार्यकारणभावकोप्रमाणसिद्धमानोगेतोरेतापत्तिहोगी।इसकारण से कार्यकारणवादवेदांतवादसे बहिर्भूतहै । अथवा कार्यकारणभाव कथनसे प्रारंभवादतथापरिणामवादकीमाप्तिहोतीहै । सोअनिष्टहै ।। क्योंकिब्रह्मकोएकहोनेसे श्रारंभवादभीनहींसंभवता । औरंब्रह्मकोनिर वयवहोनेसे परिणामवादभीनहींसंभवता । यातेयहदोनोंवादवेदांतसे माहित अर्थात्तसिद्धांतमेस्सीकारनहीं । शंका यादिदोनों प्रकारकावाद वेदांतसिद्धांतमेंस्वीकारनहीं तोवेदांतमतमें कौनवादहै । समाधान । हेवादिन्वेदांतमतमेविवर्त्तवादहीस्वीकारहै । तहाएकही सत्वस्तुकी यपनेवास्तवस्वरूपकोनत्यागकर पूर्वरूपसेविपरीतयसत् तथापनेकरूपतासेजोप्रतीतिहै । तिसकोविवर्तकहतेहैं । यातेइस विवर्तकानिमित्तमात्रज्ञानहै ॥ शंका ॥ अज्ञानकोप्रपंचरूपकार्यका निमित्तमात्रकल्पनाकरनेसे (मायांतुप्रकृतिविद्यात) इसश्रुति वे० मि. मुः भा० मेंकथन कियेहुए प्रकृतिशब्दकाविरोधहोगा। क्योंकिइसशब्दसेयज्ञान कोउपादानताप्रतीतहोतीहै।।समाधान।। हेवादिन्यहाँमायारूपयज्ञान कोउपादानकहनेवाले श्रतिवाक्यका अन्यहीअभिप्रायहै । तथाहि ॥ किसीनेप्रश्नकिया जगत्काकौनकारणहै । त+श्रतिद्वारायाचार्य्यने उत्तरदिया कियज्ञानहीजगतकाकारणहै।यदिप्रश्नकेहुएउत्तरस्फुरणन हो तिसकोयप्रतिभारूपनिग्रहस्थान नैयायिकोंनेकहाहै। तिसयप्रति भाकीनिवृत्तिमात्रही श्रतिकारणकथनका प्रयोजनहै अन्यप्रयोजन नहीं ॥ इति ॥ ३८॥ अथअज्ञानकोअसिद्धिकानिरूपण । पूर्वपक्ष । हेसिद्धांतिन यदिअज्ञाननिरूपणहोसके तोउसको उपादान कारणता अथवा निमित्तकारणतासिद्धहो।परंतुवक्ष्माणयुक्तिसे तिस अज्ञानकानिरूपणहीनहींसंभवता। तथाहि यहयज्ञानकार्यहै।यथवा अकार्यहै। प्रथमपनकहो तोइसकाकौनकारणहै।यर्थयहक्या?यज्ञान कारणहै अथवाब्रह्मकारणहै। यहविचारणीयहै । प्रथमपक्षातो श्रात्माश्रयदोपकीप्राप्तिहोगी । क्योंकियज्ञानकोअपनीउत्पत्तिइतर केव्यवधानरहितपनीयपेनाहै । औरयदिअात्माश्रयदोषकेदरकरने केयर्थ कार्यरूपयज्ञानसेभिन्न द्वितीयज्ञानको कारणमानोंगे तोवह यज्ञानभीकार्यहीकहनाहोगा ॥ तिसको यदिापनीउत्पत्तिकेयर्थ प्रथमयज्ञानकीपेनामाने तोयन्योऽन्याश्रयदोपप्राप्तहोगा । और तिसदोपकेपरिहारकरनेकेलियेतृतीययज्ञानौरमानेंतोतिसकोभीकार्य हीकहनाहोगा।औरकारणरूपतासेपथमग्रज्ञानकीपुनःतिसकोथपेक्षा मानेहुए चक्रकादोपहोगा। औरतिसतृतीयकोचतुर्थकीअपेक्षामाने ३५१ उत्तराई हुए अनवस्थादोपप्राप्तहोगा। किंवा अनंतग्रज्ञानोंकीधारामानभीलें यदिकोईज्ञान तिसयनंतयज्ञानधाराको विषयकरनेवालाउदयहो। सो ऐसाज्ञानतोउदयहोतानहीं । क्योंकिप्रमाणकायभावहै । याते अज्ञानकाकारणयज्ञानहै । यहप्रथमपक्षयसंगतहै । औरह्मज्ञान काकारणहै । यहद्वितीयपनभीनहींसंभवता ॥ क्योंकि श्रन्योपाधि उपहितहुआब्रह्म अज्ञानकाकारणहै । अथवाउपाधिरहितशुद्भहीकारण है । यहविचारकर्तव्यहै । इनमेंप्रथमपनतोनहींसंभवता । क्योंकि अज्ञानसेप्रथमश्रज्ञानयथवा उसकाकार्यरूपउपाधिकातोअभावहै । औरथन्यकोईसत्यउपाधिभी निरूपणनहींहोसकता। क्योंकितिससत्य उपाधिकेमाननेसे दैतापत्तिहोगी। औरदितीयपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकिशुद्धब्रह्मकोनिर्विकारहोनेसे कारणताकायभावहै । औरयदि शुद्धब्रह्मकोकारणमानलें तोमुक्तपुरुषकोभी पुनःसंसारकीप्राप्तिहोगी। क्योंकिसंसारकेहेतुभूत प्रज्ञानकीकारणसामग्रीरूपशुद्धब्रह्मको विद्यमान होनेकर तिसअज्ञानकी अवश्यउत्पत्तिहोगी ॥ यातेअज्ञानकोकार्य रूपताकासंभवनहीं ॥ यौवह यज्ञानअनादिहै । यदियहद्वितीय पक्षमानोतोजैसश्रनादिभावरूपब्रह्मकीनिवृत्तिनहीं होती। तैसेअनादि भावरूपयज्ञानकीभीनिवृत्तिनहींहोगी। यहायहयनुमानभीजानना।। विमतमज्ञानं ननिवर्तते अनादित्वे सतिभाव त्वात् ॥ ब्रह्मवत् ।। २०॥ विवादकाविपयजो अज्ञानहै वहनिवृत्तनहींहोता ।। अनादिहुभाभावरूपहोनेसे।जोजोअनादिभावहोताहै । सोसोनिवृत्त नहींहोता ।। जैसेब्रह्महै ।। इति ॥ यहाँघटादिकोंमेहेतुकाव्यभिचार वे. सि. भां० । दूरकरनेकेलिये “अनादि" यहहेतुकाविशेषणकहाहै । औरप्रागभाव मेंव्यभिचारदूरकरनेकेलिये “भावत्व" यहविशेष्यदलकहाहै ॥शंका।। हेवादिन कल्पिततथाअकल्पितरूपताकर ब्रह्मयोग्रज्ञानकीविलक्षण नाहै ॥ यातेइसपूर्वउक्तअनुमानमें “अमिथ्यात्व" उपाधिहै । सो इसप्रकारहै । जहांजहांयनिवृत्तित्वहै। तहांतहांयमिथ्यात्वहै । जैसे ब्रह्ममेंहै ॥ यातेउपाधिसाध्यकेसाथव्यापकहै । औरजहांजहांयनादि भावत्वहै । तहांतहां अमिथ्यात्वनहीं जैसे अज्ञान में है । यातेउपाधि साधनकेसाथश्रव्यापकहै । इसप्रकार सोपाधिक हेत्वाभासहोनेसे पूर्वउक्तअनुमानदुष्टहै ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन्यज्ञानकोकल्पि तपनानहींसंभवता । क्योंकिकल्पितपनेकी सामग्रीकाअभावहै । तथाहि ॥ सादृश्यौरपूर्वसंस्कारतथादोपयहतीनोंकल्पनाकीसामग्री है। सोअज्ञानकीकल्पना तीनोंका अभावहै । क्योंकिग्रज्ञानकोयदि कल्पितकहेंगेतोयात्मामेंही कल्पितकहनाहोगा। यातेयात्मातिसका अधिष्ठानहै। औरयात्मातथायज्ञानकासादृश्यभीसंभवतानहीं क्योंकि धात्मानिरवयवहै। औरपूर्वसंस्कारयौदोष यहदोनोंभीनहींसंभवते । क्योंकितिनदोनोंको अज्ञानपूर्वकहोनेकर अज्ञानसेपूर्वतिनकीअसिद्धि है।इसप्रकारअज्ञानकोकल्पितपनेके असंभवसेअमिथ्यात्वकोसाधनके ; साथव्यापकहोनेकर उपाधिरूपताकायसंभवहै।।शंका।।हेवादिनसादि थध्यासप्रथमनहोकरपुनःहोताहै । इसहेतुसेवहकार्यहै।तिसमेंसामग्री कीअपेक्षायवश्यहोतीहै।परन्तुयज्ञानाऽध्यासतोयानादिहैतिसमेंसाम ग्रीकीकिंचितभीअपेक्षानहीं।। समाधान हेसिद्धांतिनअज्ञानाभ्यास थनादिहै।यहकथननहींसंभवता।क्योंकिएकवाधकरहीयध्यस्तपनाऊहा उत्तरार्द्ध करनेयोग्यहै। औरग्रज्ञानकाबाधककोईप्रतीतहोतानहीं याते अज्ञानमें अभ्यस्तपनेकी यसिद्धिहै । शंका ॥ हेवादिन विद्यातिसयज्ञानका बाधकहै । यातेयध्यस्तपना तिसमेसिद्ध ।। समाधान ॥ हेमिद्धां तिन क्या?विद्यासेनिवृत्तिकेयोग्यकोबाध्यत्वहै। यथवाकल्पितहुयाजो विद्याकरनिवृत्तिकेयोग्यहो तिसकोबाध्यपनाहै।प्रथमपक्षकहो तोउत्तर ज्ञानसेनिवृत्तिकेयोग्यजोपूर्वज्ञान है तिसमें भीवाध्यव्यवहारहुथाचाहिये औरउसमेंबाध्यव्यवहारनहींहोता ॥ यातेप्रथमपक्षयसंगतहै । यौर द्वितीयपक्षमें अन्योऽन्याश्रयदोपकीप्राप्तिहै । क्योंकिग्रज्ञानमेंप्रथम कल्पतत्वकीसिद्धिहो तोज्ञानवाध्यत्वतिसमें सिद्धहो ॥ ौरज्ञानाध्य त्वप्रथमग्रज्ञानसिद्धहोतोकल्पितत्वकीतिसमेंसिद्धिहोइसप्रकारयपनी सिद्धि परस्परअपेक्षाहोनेसेयन्योऽन्याश्रयदोपहै।शिंका।हिचादिन्यह पूर्वउक्तदोपक्या?ज्ञानकेस्वरूपकालोपकरतेहैं। अथवाअज्ञानमेंवस्तुत्व कालोपकरतेहैं । प्रथमपनतोनहींसंभवता। क्योंकि “यज्ञोहम्” इस प्रतीतिसेसिद्ध जोश्रज्ञानकास्वरूपतिसका "अपलाप" अर्थातलोष युक्तनहीं। यौरद्वितीयपक्षमें तोहमारेहीइष्टकीसिद्धिहै । क्योंकियह दोपवस्तुकेवास्तवपनेको दूरकरतेहै।ौरअज्ञानमेंतोस्वभावसेही वस्तु पनानहीं । यातेकल्पितकोदोपयोक्याकरेंगे। इसीकारणसेयहकथन है।। कियुक्तितथाप्रमाणसे जो यज्ञानकीदुर्घटताहै यहहमकोभूषणरूप है। क्योंकियुक्तितथाप्रमाणसे जिसकानिरूपणसुघटहोतिसमेंकल्पित पनाहीदुर्घटहै । यातेपूर्वउक्तदोपभी तिसअज्ञानमेकल्पितपनेकोही संपादनकरतेहैं ॥ वहहमकोइष्टहै ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन श्रज्ञानमेंकल्पितपनामसिद्धहै । यातेतिसमेंइष्टापति कैसेकहतहो ।

३८५ ० स० मु० भां० यद्यपिपूर्वउक्तदोपही अविद्यामेंकल्पितपनासिद्धकरदेंगे ॥ तथापि प्रथमयज्ञानरूपधर्मीसिद्धहो तोदोपतिसमें कल्पितत्वधर्मकोसिद्धकरें परन्तुवहअज्ञानरूपधर्मी तोयवपर्यंतभी सिद्धनहींहुया ॥ औरयदि “यज्ञोहम्” इसप्रतीतिसेयज्ञानकीसिद्धिमानो तोयहभीनहींसंभवती। क्योंकियहप्रतीति ज्ञानाऽभावकोविपयकरतीहै । यातेश्रज्ञानरूपधर्मी कोयसिद्धहोनेकर तिसमेंकल्पितत्वकोदोपकैसेसंपादनकरेंगेकिंतुनहीं करसकते ।। शंका ।। हेवादिन अज्ञानकी जोयसिद्धितुमनेकथनकी तिसअसिद्धिशब्दकेयर्थकाज्ञानयपनेप्रतियोगिरूपसिद्धिकेज्ञानकेा धीनहै।क्योंकिग्रभावज्ञानप्रतियोगिज्ञानपूर्वकहीहोताहै। इसकारणसे सिद्धिशब्दकार्थविचारणीयहै।।तथाहि। क्या?उत्पत्तिकानामसिद्धिहै प्रथमअथवाज्ञप्तिअर्थातज्ञानकानामसिद्धिहै।इनमेंप्रथमपक्षतोनहींसंभ वत्ता।क्योंकियनादिकीउत्पत्तिकायभावयंगीकारहै।। औरद्वितीयपक्षभी नहींसंभवता।क्योंकिसाक्षीकरयज्ञानकीसिद्धिहोनेसेतिसकीयसिद्धिका हीयभावहै।। यहांपरययर्थज्ञातव्यहै। "यहमज्ञः"यहप्रतीतिवादीतथा प्रतिवादीकोस्वीकारहै।वहप्रतीतिक्या?यज्ञानकीस्वप्रकाशतासेहै। अथवा थनुमानादिकोंसेहैवाप्रत्यक्षसेहै।प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ।। क्योंकि अज्ञानकोजडस्वभावहोनेसे स्वप्रकाशताकाअभावहै । औरद्वितीय पक्षभीनहींसंभवता। क्योंकिलिंगादिकोंकेस्मरनसेविनाही इसप्रतीति कोउत्पन्नहोनेकर यनुमानादिकोंका अभावहै ॥ औरतृतीयपक्षमें यहविचारकर्तव्यहै । क्या?वाह्यनेत्रादिकइन्द्रियतिसप्रतीतिकेउत्पादक हैं । अथवामनतिसका उत्पादकहै । इनमेंप्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकिवाह्यइन्द्रियोंकी अन्तरप्रवृत्तिनहींहोसकती । औरद्वितीय उत्तराई पक्षीयसंगतहै । क्योंकिकेवलज्ञानमात्रही तिसमतीतिमस्फुरण नहींहोता किंतुग्रहमाऽच्छिन्नयज्ञानकास्फुरणहोताहै।तहाँ अहं"यह जोअज्ञानकाविशेषणहै। सोक्या?शुद्धात्माहै। अथवाग्रहंकारविशिष्ट धात्माहै। अथवाग्रहंकारउपहितयात्माहै।इनमेंप्रथमपतनहींसंभवता। क्योंकितिसशुद्धात्माको स्वप्रकाशहोनेकरमनकी विषयताकाश्रभाव है । औरद्वितीयपक्षभीयसंगतहै । क्योंकि “विशिष्टवृत्तिधर्मको विशेषणवर्तनेकानियमहै"इसन्यायसे अहंकाररूपमनविविष्टयात्मा मेंमनकीविषयतामानेहुए अात्माश्रयदोष प्राप्तहोगा । क्योंकिस्व विषयतामेस्वकीयपेक्षाहै। शौरमनकोमनकाविषयमानेहुएअतीन्द्रिय स्वकीभीतिसमें क्षतिहोगी। औरतृतीयपक्षमें अहंकारका स्फुरणतिस प्रतीतिमेंनहींसंभवेगा। क्योंकिउपाधिको तटस्थहोनेकर विपयकोटिमें तिसकाप्रवेशनहीं। थौरविषयकोटिमें अप्रविष्टहुएकोभी यदिज्ञानकी विषयतामाने तोविज्ञानवादीकेमतकी प्राप्तिहोगी। क्योंकिवहनिर्विषय ज्ञानमानताहै। औरसुषुप्तिअवस्थामें मनकेविलयहुएभीयज्ञानकी प्रतीतिहोतीहै। इसकारणसेभीयज्ञानकी प्रतीति मनकोकराता नहींसंभवती । तिसकारणसे परिशेपसे सानिमास्यहीअज्ञानहै। इस प्रकारअज्ञानरूपधर्मीकी सिद्धिहोनेसे तिसकी प्रसिद्धिहीयसिद्धहै । समाधान ॥ हेसिद्धांतिन्अज्ञानकीसिद्धि साक्षीसेनहींसंभवती ।। तथाहि ॥ साक्षीस्वसंबद्धकोप्रकाशकरताहै। अथवास्वयसंबद्धकोभी प्रकाशकरताहै।यहविचारकर्तव्यहै।।तहांप्रथमपक्षमतोसिद्धांतकीहानि होगी । क्योंकिअज्ञानकीसिद्धिसाक्षीके थाधीनमाननेसे साक्षीके साथतिसकासंबंधकहनाहोगा । तिससेयसंगताकी हानिहोनेसे TH वे० सि. मु. भा० अपसिदांतप्राप्तहोगा ॥ और- * असंगोनहिसज्जते । ( वृ० उ० अ० (६ ब्रा०(२) कं ४ ) य० ॥ जिसकारणसे यात्मायसंगहे । इसीसेकिसीपदार्थके साथसंबंधवालानहींहोता । इसथतिकाविरोधभी प्राप्तहोगा। और द्वितीयपक्षभी नहींसंभवता ॥ क्योंकिसंबंधसेविना प्रकाशकता कायसंभव है । औरप्रदीपादि स्वसंवदकेही प्रकाशकदेखे है ॥ इससेभी असंगकोप्रकाशकतानहींसंभवती ॥शंका॥ हेवादिन्यज्ञान केसाथजोसाक्षीकासंबंध अन्वेषणकियाजाताहै।सोक्या?वास्तवसंबंध है। श्रथवाकल्पितसंबंधहै। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकिवास्तव यहजोसंबंधकाविशेषण सोयसमर्थहै अर्थात्व्यर्थहै ॥ जैसेकल्पित सर्पकोदीपकनहींप्रकाशकरता औरदीपकका तिससर्पकेसाथ वास्तव संबंधभीनहींसंभवता। तैसेदातिमेंभीजानना ।। औरयदिसंबंधमात्र हीअपेक्षितहो।तोवास्तवसंबंधके अभावहुएभीकल्पितसंबंधसाक्षी और श्रज्ञानकाविद्यमानहीहै ॥ यातेद्वितीयपक्षमें हमकोभीइष्टापत्तिहै ।। समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् साक्षीयौरयज्ञानका कल्पितसंबंधभीनहीं संभवता ॥ क्योंकितबंधकल्पनासादिहै। यथवायनादिहै। यहविचार कर्तव्यहै।प्रथमपक्षमेंसंबंधकाकल्पककौनहै। यहविचारपुनःकर्तव्यहै । क्या?संबंधयौरसंबंधियोंसेभिन्नकोईकल्पकहै। अथवासंबंधादिकहीकल्पक हैंप्रथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकिसंयोगसंबंधौसंबंधियों प्लेभिन्नपदार्थ मसंबंधकीउपादानतादेखने मेंनहींयाती।। औरद्वितीयपक्षयहविचार णीयहै।क्या?संबंधयापहीअपनाकल्पकहै। अथवादोनोंसंबंधी तिसके कल्पकहैं।प्रथमपक्षमतोयात्माश्रयदोपस्पष्टहीहैयौरद्वितीयपक्षमैदोनों उत्तराई संबंधियोंकेमध्यक्या?यज्ञानकल्पकहै।यथवासाक्षीकल्पकहै।प्रथमपक्ष तोनहींसंभवताक्योंकियन्योऽन्याश्रयदोपप्राप्तहोताहै।।तथाहि।।अज्ञान स्वरूपलाभकोप्राप्तहोकरही संबंधकोउत्पन्नकरेगा। औरसंबंध केउत्पन्न हुएयज्ञानलब्धसत्ताकअर्थात्स्वरूपकेलाभवालाहोगा।इसप्रकारदोनों कोपरस्परअपेक्षाहोनेसे श्रन्योऽन्याश्रयदोपहै । औरदितीयपक्षभी नहींसंभवता ।। क्योंकि ॥ उपयन्नपयन्धर्मोविकरोतिहिधर्मिणम्* अ०-उत्पत्तितथाविनाशकोप्राप्तहोताहुअाधर्मअपनेधर्मीकोविकारी करदेताहै। इसन्यायसेउत्पत्तितथाविनाशकोप्राप्तहोताहुआसोसंबंधस्व धर्मीसाक्षीकेकूटस्थपनेकीहानिकरेगा ॥ यातेसाक्षीसंबंधकाकल्पक नहीं। औरयदिइसदोषकेदूरकरनेकेलियेउपाधियुक्तहुशासाक्षीयज्ञान केसंबंधकाकलाकहै तोयसंगताकीहानिहोगी। क्योंकिग्रज्ञानसाक्षी केसाथसंबंधसेबिनास्वरूपकोनहींप्राप्तहोता औरस्वरूपलामसेविनावह श्रज्ञानउपाधिको कैसेउत्पन्नकरेगा । किंतुनहींउत्पन्नकरसकता.॥ इसकारणसेजिसउपाधिउपहितहुग्रासाक्षीथज्ञानके संबंधकाकल्पकहै वहउपाधिपारमार्थिकहीकहनाहोगा।। तिसकेसाथसाक्षीकासंबंधहुए असंगताकीहानियवश्यहोगी औरयनिर्मोक्षमसंग अर्थातकिसीको भीमोक्षनहींप्राप्तहोगा। क्योंकितत्त्वसाक्षात्कारसे अज्ञानतत्कार्यका ही विरोधहोनेसे नाश होताहै। अन्य पदार्थका नाशनहींहोता।। तेसेमानेहुए जिसउपाधिकरउपहितसातीहै वहसत्यहै।तिसउपाधिको पूर्वउक्तरीतिसेपारमार्थिकहोनेकर तिसकी निवृत्तिनहींहोगी। यातेज्ञान कालमेंभीतादृश श्रज्ञानकेसंबंधकाहेतु उपाधिकेसद्भावसे संसारका ५९६ ०सि० म० भा० उच्छेदकभी नहींहोगा ॥ इसप्रकार थनिर्मोक्षप्रसंगहोनेसे मोक्ष शास्त्रभीनिष्फलहोगा। पौरयदिशात्माश्रयादिदोष दूरकरनेकेलिये श्रज्ञानकेसंबंधकायध्यासअनादिहै यहमाद्यद्वितीयपन स्वीकारकरो तोग्रात्माकीन्याई अनादिभावरूप होनेकर तिससंबंधकी निवृत्तिनहीं होगी। यहांयहअनुमानजानना ॥ विमतोऽज्ञान संबंधो न निवर्त्तते । अनादिभावत्वात् । आत्मवत् ॥ # य० ॥ विवादकाविषयजो अज्ञानकासंबंधहै । वहनिवृत्तनहीं होता। अनादिभावरूपहोनेसे । जोजोअनादिभावहोताहै। सोसो निवृत्तनहींहोता । जैसेयात्माहै। इति ॥ शंका । हेवादिनिवृत्त्या भावमयनादिभावत्व प्रयोजकनहीं। कितुयविद्याकीतंत्रताकाजो अनधिकरणत्व सोनिवृत्त्याभावमें प्रयोजकहै ॥ ौरसंबंधकोतो अविद्याकेयाधीनहोनेसे ग्रविद्याकी निवृत्तिहुए तिसकी निवृत्तिहो जाएगी। यातेपूर्वउक्तयनुमानमें “यविद्यातंत्रत्वाऽनधिकरणत्व" उपाधिहै । सोइसप्रकारहै ॥ जहांजहांनिवृत्त्याभावहै । तहाँतहाँ "अविद्यातंत्रत्वानधिकरणत्व" है । जैसेभात्मामें है। औरजहाँजहाँ अनादिभावत्वहै।तहांतहां यविद्यातंत्रत्वान धिकरणत्वकाथभावहें ॥ जैसेसंबंध में है। यातेसोपाधिकहेतुहोनेसे यनुमानदुष्टहै । इसप्रकार संवन्धाऽध्यासको यविद्याभ्यासकीन्याई अनादिभावत्वके मानहुए भीयविद्याकेयाधीनहोनेकर विद्याकीनिवृत्तिसें तिसकीनिवृत्ति संभवतीहै ।। समाधान ।। उपाधिकोसाधनकेसाथ व्यापकहोनेसे पूर्वउक्तयनुमानदुष्टनही ।। तथाहिं यह "अविद्यातंत्रत्व" पैंथर्थात उत्तराई अविद्याऽधीनत्वक्याहै । अर्थयह । क्या?यज्ञानजन्यत्वकानाम "अज्ञान तंत्रत्व" है । अथवाग्रज्ञानभास्यत्वरूप तंत्रतासंबंध है अथवा अज्ञानके आधीनस्थितिवत्तारूप तंत्रता है । इनमें प्रथमपक्षनहींसंभवता। क्योंकिसंबंधकोयनादिहोनेसे स्वउत्पत्नियर्थ अज्ञानकी अपेक्षानहीं ॥ ौरद्वितीयपक्षभी नहींसंभवता। क्योंकि सम्बन्धकाज्ञानसाक्षीकेयाधीनहै । यौरअज्ञानकोजड़होनेसे संबंधकी प्रकाशकताकाअसम्भवहै । यदियहकहो किसबंधीके ज्ञानकेाधीन संबंधकाज्ञान लोकमेंदेखाहै । यातेसम्बन्धकाविशेषणरूप जोसंबंधी तिसकोभीसंबंधज्ञानकी हेतुताहोनेसे संबंधमेंअज्ञानतंत्रताकासंभवहैं। सोयहकथनभीसमीचीननहीं । क्योंकिप्रत्यक्षादिप्रमाणसिबलौकिक संबंधका संबंधीकेयाधीनज्ञानहुएभी अज्ञानतथासाक्षीके संबंधों उससे विलक्षणताहै । जिसकारणसे साक्षीके संबंधक याधीन अज्ञानरूप संबंधीकीस्फूर्ति है ।। यातेपूर्वउक्ततंत्रतानहींसंभवती ।। औरसंबंध थपनीस्थितिकेयर्थ संबंधीकी अपेक्षा करता है । यहतृतीयपनभीनहीं संभवता । तथाहि।।क्या?वहसंबंधस्वरूपलाभसे विनाहीस्थितिमात्रकेयर्थसंबंधीकी अपेक्षाकरताहै।यथवास्वरूपलाभ युक्तहु यासंबंधीकीअपेक्षाकरताहै।प्रथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकि लब्धसत्ताकपदार्थही स्थितिकीयपेक्षावालाहोताहै। निःस्वरूपको स्थितिकी अपेक्षाहीनहीं । औरद्वितीयपक्षोभीयहविचारकर्तव्यहै संबंधकोस्वरूपकालाभकिसीकारणसेहै।अथवाकारण विनाहीस्वरूप कालाभहै?॥ प्रथमपक्षमानो तोयनादित्वकीहानिहोगी।ौस्यदि दितीयपक्षकहो।तोकारणकीयपेक्षाकायभावहुएस्थितिकेयर्थभीतिस ५०सि० मुल भ कोइतरपदार्थकीयपेक्षानहींहोगी। जैसेस्वतःलब्धसत्ताकयात्माको स्वस्थितिकेअर्थ इतरकीयपेज्ञानहींहोती। इसप्रकारसंबंधकोअज्ञान कीयाधीनतानहोनेसे पूर्वउक्तउपाधिसाधनकेसाथ व्यापकनहीं।। किंतुव्यापकहै । यातेपूर्वकथनकियायनुमाननिर्दोपहै ॥ शंका ॥ हेवादिन् अज्ञाननामज्ञानकेागभावकाहै।ौखहज्ञानकीयनुपलब्धि सेग्रहणहोताहै।तिसकीयसिद्धितुमकैसेकहतेहो ।। समाधान ।। यह तुम्हाराकथनभीयसमीचीनहै।क्योंकिग्रहणशब्दसेवृत्तिज्ञानका ग्रहण है।अथवास्वरूपचेतनकाग्रहणहै। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकि वृत्तिकोजडहोनेकर मुख्यज्ञानरूपताकीअनुपपत्तिहै ।औरद्वितीयपक्ष भीनहींसंभवता॥ क्योंकिनित्यउपलंभ अर्थातज्ञानस्वरूपयात्माकी अनुपलब्धिनहींसंभवती॥ औरभावरूपजगतका उपादानजोअज्ञान तुममानतेहो तिसकोअभावरूपताकीभी अनुपपत्तिहै ।। यातेपूर्वउक्त प्रकारसेअज्ञानहीनहीं हे तोतिसकोजगत्कीकारणता तुमकैसे कथन करतेहो । इतिपूर्वपक्ष ॥ अथसिद्धांताअज्ञानकीसिडिकाप्रकारनिरूपण मू० प्रश्नस्यज्ञानपूर्वत्वादाक्षेपेप्रतियोगिधीः। अवश्यंभाविनीपूर्वाविरोधःस्यादितोन्यथा।३६। चौवोलाछंद ॥ ज्ञानपूर्वकंप्रश्नपठानोयाक्षेपेप्रतियोगिधी ॥ अवश्यंहोतीइससेयन्यथाहोतविरोधलखोसोजी|३४|| टीगाहेवादिन् जोप्रश्नहोताहैवहज्ञानपूर्वकहीहोताहै। औरनिपे धर्मभीप्रतियोगीकाज्ञानयवश्यपूर्वहोताहै।याते यज्ञानकेस्वरूपविषयक "उत्तराई प्रश्नतथातिसकेनिपेधसे “अन्यथा" कहियेस्वरूपविषयकप्रमाण काप्रश्नकियेहुएविरोधप्राप्तहोगा।अर्थयहयज्ञानकोप्रमाणकरनिवृत्तिके योग्यहोनेसेतिसमें प्रमाणकाप्रश्नविरुद्धहै ।। अवइसीयर्थकोविस्तार पूर्वकनिरूपणकरतेहैं।। अज्ञानअंगीकारकरनेवालोंकेति जोपर्वपक्षी नेयहकथनकियाहै। कियज्ञानकीसिद्धिकैसेहोसकतीहै । ऐसेकथन करनेवालेवादीसे हमयहपूछतेहैं। या?यहतुम्हाराप्रश्नयज्ञानकेस्वरूप ' विषयकहै । यथचातिसकेस्वरूपकानिषेधहै ।। अथवातिसकेस्वरूप 'बोधकप्रमाणविषयक प्रश्नहै ॥ प्रथमपक्षकहो तोनहींसंभवता ॥ क्योंकियज्ञातस्वरूपविषयक प्रश्नकोयनुपपत्तिहै। अर्थयहप्रश्नवाणी 'काएकविशेपव्यवहारहै।यौरवहव्यवहारव्यवहर्तव्यवस्तुकेज्ञानकेश्राधीन है औरयहांप्रकरणमें कथनात्मकव्यवहारकेयोग्य अज्ञानकास्वरूपहै।। तिसकाज्ञानप्रश्नकर्ताकोप्रथम अवश्यहोनाचाहियेइसलियेयज्ञानका स्वरूपतुझको प्रथमहीसिद्धहै ॥ यातेप्रज्ञानकेस्वरूपकी सिद्धियर्थ प्रश्नकरनाव्यर्थहै ।। शंका ॥ हेसिद्धांतिन् यदियहप्रश्नयज्ञानके सामान्यस्वरूपकीजिज्ञासासेहोतातोयहउपालंभश्रापकाहोता।परन्तु ऐसेतोनहीं।किंतुअज्ञानकेविशेपस्वरूपकीजिज्ञासासे प्रश्नसंभवताहै।। समाधानाहेवादिन् इसकथनसेभी पूर्वउक्तदोपहीप्राप्तहोताहै। यर्थयह किप्रश्नव्यर्थ है।क्योंकि ज्ञानकेस्वरूपकीसिद्धिही अन्वेषणकीजाती है वहयदिसामान्यरूपतासेसिद्धहै।तोपुन:विशेषज्ञानकास्याप्रयोजन है. किंतुकोईप्रयोजननहीं।यथवासामान्यप्रतीतिविशेपप्रतीतिसेविना पर्यवसानताकोनप्राप्तहुईविशेषकोभी वहबोधनकरदेतीहै ॥ याते विशेषस्वरूपकीजिज्ञासासेभी प्रश्नकरनानिष्फलहै। औरदितीयपक्ष वे०सि० मु. भा० भीनहींसंभवता ॥ क्योंकि यज्ञानकायभाव बोधनकरनेका नामही श्राक्षेपहै।औरवहयभावशब्दसेही बोधनकरनेयोग्यहै। औरशब्दका उच्चारणभी ज्ञानपूर्वकहीहोताहै।ौरअभावकाज्ञानभीप्रतियोगिज्ञान केाधीनहीहोताहै। इसप्रकारयज्ञानकास्वरूपनिषेधकरनेवालेवादी केप्रति प्रतियोगिरूपयज्ञानकीसिद्धिप्राप्तहुई तिसकालोपकरनावादी कोउचितनहीं॥शंका ।। जोवस्तुप्रमाणसिद्धहो तिसकानिषेधकरना योग्यनहीं परन्तुअज्ञान तोभ्रमसिद्धहै । यातेवहकैसेनिषेधकरनेयोग्य नहीं किंतुनिषेधकेयोग्यहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन जोभ्रमज्ञानहोता है वहकरणतथाविषयकेयाधीनहोताहै। यातेथज्ञानकेभ्रममेंवहदोनों तुमनेकहेचाहिये ॥ अवसिद्धांतीयापहीवादीकोसंमतिदेताहै ॥ जिसकारणसेजवकोईऐसेपूछेकिससाधनकरभ्रमहुयाऔरकिसविषयक 'भ्रमहुया तवयहीउत्तरकहनेयोग्यहै । परोक्तशब्दाभासकरभ्रमहुआ औरअज्ञानविषयकहुयायातेशब्दाभासही भ्रममेंकरणहै। औरश्रज्ञान तिसभ्रमकाविषयहै। यहांशब्दमें ग्राभासत्वद्योतनकरनेकेलियेपरोक्त यहशब्दकाविशेपणकहाहै । इसप्रकारसिद्धांती यापहीवादीकेमति ऐसीसंमतिदेकर अबतिसकोदूपितकरताहै ॥ हेवादिन जबऐसेमाना तोभ्रमकोस्वसमानविषयकयज्ञानका उपपादकहोनेसे अज्ञानविषयक और अज्ञानस्वीकारकरनेकर अनवस्थादोषका परिहारकरना कठिन होगा।यर्थयहहै।कियज्ञानकेभ्रममेंकोईउपादानकहाचाहिये सोक्या? अज्ञानउपादानहै ॥ अथवा कोई अन्य पदार्थहै । थन्त्य पक्ष तो नहींसंभवता ॥ क्योंकि अज्ञानकोही उपादानता स्वीकार है ॥ औरप्रथमपक्षमें वहयज्ञानकौनहै। क्या?निरूपणीयरूपताकर प्रकरण - .

उत्तरार्द्ध मेंजोपाप्सहै वहीअज्ञान है । अथवाउससेभिन्नहै ॥ प्रथममपक्षमतो थात्माश्रयदोपस्पष्टहीहै।क्योंकि ज्ञानको अपनेभ्रममें अपनीयपेक्षा है। औरद्वितीयपक्षमें अन्योन्याश्रयचक्रका अनवस्थादिदोपोंका समूहप्राप्तहोताहै। औरयदि अनेकयज्ञानोंकीधारा स्वीकारकरो तोयहयत्यंत आश्चर्यहे जोतुमएकज्ञानको नसहनकर तिसके निषेधकाप्रयोगकरतेथे अवयनेकअज्ञानधाराको स्वीकारकरनेसे मदसेउन्मत्तहुए तुझको स्वपक्षकीहानि और गौरखदोषतथाव्यर्थ नादि अनेकदोष प्रतीतनहींहोते । यातेस्वपक्षका निर्वाहभीदूर हुया । अर्थयहजवज्ञान तुमनेमानलिया तोस्वमतकीहानिहुई क्योंकितुमयज्ञानका निषेधकरतेहो । औरएकज्ञानसेहीस्वाकार तथाश्रन्याकार भ्रमकेसिद्धहुएअनेकयज्ञानमाननेमेंगौरखहै।किंवा । अज्ञानकोजडस्वरूप होनेकर स्वभावसेहीवहश्रावृत्तस्वरूपहै । तिसमें यावरणकेप्रयोजनकाभावहोनेसे अज्ञानविषयक औरयज्ञानस्वीकार करनाव्यर्थहै। औरऐसेभी यज्ञानधारा मानलें यदिअज्ञानपरंपराको ग्रहणकरनेवाला कोईज्ञानउदयहोसोऐसाज्ञानतोकोईउदयनहींहोता यातेप्रमाणाभावसे अज्ञानपरम्पराकीसिद्धिभीनहींहोसकती ॥शंका।। 'किसीविषयमॅयापकोभी प्रश्नतथायाक्षेपके विद्यमानहोनेसे पूर्व उक्तप्रश्नथापकेप्रतिभीतुल्यहीहै । क्योंकि- यत्रोभयोःसमोदोपः परिहारोपितत्समः । नैकस्तत्रनियोक्तव्य स्तागर्थविचारणे ॥१॥ श्रे०॥ जहांदोनोंपक्षोमें समानदोपहो तहांतिसकापरिहारभी दोनोपत्तों में समानहीहोताहै। तैसेयर्थकेविचारकरनेमें एकहीवादीवा दे०सि० मु० भा० प्रतिवादीतहांपर्यनुयोगकाविपयनहींहोता।किंतुदोनोसमानहीतिसका विषयहोतेहैं (१)इसन्यायसे किसीविषयमेंयापभीइसीप्रश्नकाविषयहो।। समाधान॥ हेवादिन्हमारेपक्षमेंपरिहारकीतुल्यतानहीं।क्योंकि अज्ञात रूपताकरसातिसिद्धयज्ञानकीनिवृत्ति अर्थप्रमाणका प्रश्नसुखेनहीसंभ वताहै।यौरयज्ञानमेंप्रमाणकेनदेखनेसेस्वरूपकातिरस्काररूपनिषेधभी करनेकोसुखेनहीहै । अवपरिहारकी समानताग्रहणकरकेवादीतृतीय पक्षकोउठाताहै ॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिन तोसाक्षिसिद्ध अज्ञानके वरूपविषयकमेराभी प्रमाणकाप्रश्नसमीचीनहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन पूर्वउक्तरीतिसे अज्ञानकोसाक्षिसिद्धमानेहुए अज्ञानतथा साक्षीकासंबंधभीकहनायोग्यहै। क्योंकिसंबंधसेविनासाक्षीकोअज्ञान कीसाधकतानहींसंभवेगी। तैसेयज्ञानतथासाक्षीके संबंधकोयनादि त्वभीकहनाचाहिये । नहींतोपूर्वमुक्तहुएपुरुषोंको पुनःसंसारकीमती तिहोगी । तात्पर्य यहहै || साक्षीतथा प्रज्ञानके संबंधकोसादि मानेहुए तिप्तकायादिकारण क्या?यात्माहै।यथवाग्रज्ञानहै । प्रथम पक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिमुक्तपुरुषोंकोपुनः संसारप्राप्तहोगा ॥ जिसकारणसे मुक्तिकालमेंभी संबंधकाकारणयात्मा विद्यमानहै ॥ सामग्रीकेहुए कार्ययवश्यहोताहै।। औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता ।। क्योंकिवहसंबंधकाकारणरूपयज्ञानक्या?संबंधिरूपहै।अथवायसंबंधि रूपहै यहविचारकर्तव्यहै ॥ इनमेंअंत्यपततोनहींसंभवता ॥ क्योंकि स्वतंत्रज्ञानस्वीकारनहींहै ॥ ौरसाक्षीकेसाथसंबंधवालायज्ञान कारणहै यहप्रथमपक्षभीनहीं संभवता ।। क्योंकिसंबंधतोअवपर्यंतभी सिद्धनहींहुया ॥ औरयदितुऐसेकहो किपथमज्ञानसेयहअज्ञान उत्तराई भिन्नहै ।। तोइसमेंभी यहविचारकरनेयोग्यहै।। क्या?वहअज्ञानांतरभी साक्षीकेसाथसंबंधवालाहैवानहीं।अन्त्यपक्षमतोयज्ञानकोस्वतंत्रताप्राप्त होगी। सोस्वीकारनहीं।यौरप्रथमपक्षमें अनवस्थादोपकीमाप्तिहोगी तथाहि ॥ द्वितीय यज्ञानका साक्षीकेसाथजोसंबंधहै । तिसकाउसी अज्ञानकोयदिकारणमाने तोयात्माश्रयदोपहोताहै।यौरप्रथमज्ञान कोदितीययज्ञानके संबंधकाकारणमाननेमें अन्योन्याश्रयदोपहै।। औरतृतीययज्ञानकोदितीयज्ञानकेसंबंधकाकारणमाननेसे चक्रका दोपहोताहै। औरचतुर्थयज्ञानकोसंबंधकाकारणमाननेसेयनवस्था दोपकी प्राप्तिस्पष्टहीहै ॥ शंका ॥ यहअनवस्थादोपकेयर्थनहीं ।। क्योंकियज्ञानपरम्परायनादिहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन अज्ञानों कीपरम्परातुमकिसलिये मानतेहो । यदियावरण के अर्थकहो तोवह एकज्ञानसेही संभवहोसकताहै ॥ अनंत ज्ञानोंकीधारामाननी निष्फलहै । औरयदियात्माकेसाथयज्ञानकासंबंधसिद्धकरनेके अर्थ अज्ञानोंकीधारामानो तोअपनेकरहीयपनासंबंध सिद्धहोजायेगा ।। जेसे "रूपीघटः" इसप्रतीति गुणगुणीका समवायभासताहै। और समवायकाभीयपनेसंबंधियों मेंसंबंधभासताहै । वहांअपनेसंबंधियों केसाथस्वसंबंधकाउपपादकग्रापहीवहसमपायहै।। अपनेसेभिन्नस्वतथा घटकेसंबंधकाउपपादक कोईअन्यसमवायनहींमाना। क्योंकियनेक समवायमाननेमेंगौखहै । तैसेयज्ञानतथासाक्षीकेसंबंधकाउपपादक लाघक्तासेएकहीयज्ञानस्वीकारकरनायुक्तहै।अनेकथज्ञानोंकीपरम्परा माननेमॅगौरवदोपहै । यातेजिसधर्मसेविना जोनहीसंभवतातिससर्व कायापहीअज्ञानकल्पकहै । तथाहि ।।साक्षीकेसाथस्वसंबंधकातथा २०सि० मु० भा० अनादित्वकाकल्पकहै । औरयज्ञानकोसत्मानेहुए दैतकीप्राप्ति होगी। औरयसत्मानेहुए “यज्ञोहम्” यहतिसकीअपरोक्षप्रतीति नहींहोगी । यातेसत्यसतसेविलक्षणयनिर्वचनीयत्वकाभीअपने विषयककल्पकहै । औरज्ञानकोअभावरूपमानेहुए प्रपंचकीउपादा नतानहींसंभवेगी। क्योंकियदियभावकोभी उपादानतामानें तोकार्य मेंसतबुद्धिनहींहोगी ॥ और सन्घटःसन्पटः" ऐसेकार्यमेंभावरूपता प्रतीतहोतीहै।यातेउपादानताकीसिद्धियर्थयपने भावत्वकाभीकल्पक है।औरएकपदार्थमें विचित्रकार्यकेउत्पन्नकरनेकीसामर्थ्यकेयसंभवसे अपनेमें विचित्रशक्तित्वकाभीकल्पकहै ॥ “ौरधर्मीकेभेदकल्पनासे धर्मकल्पनाश्रेष्टहै। इसन्यायसेस्वविषयक एकत्वकाभी कल्पकहै । औरयनादिहोनेपरभीतिसकीनिवृत्तियर्थ ज्ञानकर निवृत्तियोग्यत्वका भीस्वमेंकल्पकहै । इसप्रकारपूर्वपक्षीद्वारा अज्ञानयोतिसकास्वरूप कथनकरके यवसिद्धांती अज्ञानकेसाधकप्रमाणविषयक जोवादीका प्रश्नपतथा तिसकोनिरासकरताहै । हेवादिन यदिपूर्वउक्तश्रज्ञानका स्वरूपसाक्षीकरसिद्धहुया तोपुनःप्रमाणतिसमेंक्याकरेगा । क्योंकि सिद्धपदार्थमेंसाधनकी व्यर्थताहोतीहै । यातेयज्ञानकेस्वरूपविषयक प्रमाणप्रश्नव्यर्थहै ॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिन् यज्ञानकास्वरूपसिद्ध करनेकेलियेहमप्रमाणकाप्रश्ननहींकरते।किंतुयज्ञानविषयक ज्ञानकी निवृत्तियर्थप्रमाणकाप्रश्नहै ॥ ौरयज्ञानविषयक ज्ञानकीनिवृत्ति साक्षीसेकहो तोनहींसंभवती ॥ क्योंकिसाक्षीको तिसयज्ञानका साधकमानाहै | यातेप्रमाणप्रश्नसंभवताहै || समाधान ॥ हेवादिन यदिशज्ञानविपथक यज्ञानहो तोतिसकीतिवृत्तिकेलिये प्रमाणकाप्रश्न उत्तराई भीसंभवे परंतुभज्ञानविषयक अपरज्ञानकायभावहै। यज्ञानकोजड होनेसेस्वभावसेही यावृत्तएकरूपहै ॥ तिसमेंद्वितीयश्रज्ञानका स्वीकारव्यर्थहै । शंका ।। जैसेलोकदृष्टिसे जडघटमेंभीप्रमाएकी प्रवृत्तिहोतीहै।। तैसे अज्ञानमेंभी प्रमाणप्रवृत्तहोजायेगा। समाधान।। हेचादिन्घटकीप्रमाणसे निवृत्तिनहींहोती ॥ इसकारणसेप्रमाणकर तिसकाज्ञानलोकदृष्टिसेहो। क्योंकितिनकाविरोधनहीं । औरयज्ञान कातोप्रमाणकेसाथनिवृत्त्यनिव-कलक्षणविरोधहै । इसलियेप्रमाणकी विषयता अज्ञानमेंयुक्तनहीं । पूर्वउक्तप्रमाणातथाग्रज्ञानकेविरोधको तमोद्दीपन्यायसे स्पष्टकरतेहैं। *अज्ञानं ज्ञातुमिच्छेद्यो मानेनात्यंतमूढधीः । सतुनूनं तमःपश्येद्दीपनोत्तमतेजसा॥१॥ अ० ॥ जोअतिमूढबुद्धिपुरुष प्रमाणसे अज्ञानकोजाननेकी इच्छाकरताहै।वहमृढनिश्चयकरदीपकसे अन्धकारकोदेखनेकीइच्छा करताहै । यद्यपिदीपकतथातमकाभी निवृत्त्यनिवर्तकभावविरोधनहीं संभवता । क्योंकिमंदप्रकाशवालदीपकयुक्तमंदरमें प्रकाशतथातम इनदोनोंकीएकठीप्रतीतिहोतीहै।तथापिउत्तमप्रकाशवाले दीपकयुक्त मंदरमें श्रन्धकारनहींस्थितहोसकता। इसीकोतमोद्दीपन्यायकहतेहैं। यातेथज्ञानके स्वरूपविषयक प्रमाणप्रश्न व्यर्थहै । औरथज्ञानकेप्रश्न कीयन्यथाऽनुपपत्तिसे सिद्धजोथज्ञान तिसमें “कथंता" अर्थयहवह थज्ञानकैसेसिद्धहै यहकथननहींसंभवता ॥ क्योंकिस्वअनुभवसिद्ध -पदार्थ कथंतानहीं संभवती ।। शंका॥ इसिद्धांतिन् वहीपदार्थ स्वीकारकरनेयोग्यहोताहै जोयपनेप्रयोजनकाविरोधीनहो । और ३६८ व०सि० मु. भा० अज्ञानकोतोकर्तृत्वादि सर्वयनर्थकाहेतुहोनेसे मुक्तिरूपप्रयोजनका विरोधिपनाहै । यातेवहकैसेस्वीकारकरनेयोग्यहै ॥ औरयदिऐसे कहो किवेदांतवाक्यजन्यज्ञानसे तिसकीनिवृत्तिहोजायेगी। सोयह कथनभीनहींसंभवता। क्योंकिजिनपुरुषोंने वेदांतवाक्यश्रवणकियेहैं तिनकोभीपूर्वकीन्याईही संसारकीप्रतीतिदेखने यातीहै । यातेस्व प्रयोजनकाविरोधीग्रज्ञान स्वीकारकरनेयोग्यनहीं ॥ समाधन ।' हे वादिन् कर्तृत्वादिसमूहयनर्थकी उत्पत्तिकाहेतु जोयात्माकायज्ञानहै तिसकोस्वयनुभवसेसिद्धहोनेकरतिसकास्वीकारतोयवश्यकरनेयोग्य है।परन्तुतिसकेस्वीकारकरनेसे मुक्तिकीयनुपपत्तिनहींहोती। क्योंकि तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्ययपरोक्षब्रह्मात्माकेसाक्षात्कारसेयज्ञानकेवाध हुएमुक्तिकीउपपत्तिहै । यहतुमनिश्चयकरो ॥इति॥३॥ * अथपूर्वपक्षजिज्ञासापूर्वकवाधशब्दकाअर्थनिरूपण करनेकोलियअन्यमतोंकीरीतिसेवाधकास्वरूप तथातिसकेनिराकरणकाप्रकार बाधकाक्या?स्वरूपहै।ऐसीजिज्ञासाकेहुएनैयायिकमतकेयनुसार वाधकास्वरूप प्रथमपूर्वपक्षीकथनकरके तिसकोदूपितकरताहै । तहां पूर्वप्रत्ययमेव्यधिकरणप्रकारकत्वकाजोनिश्चयहैतिसकोनैयायिकवाध कहतेहैं।यहाँ इदंरजतम्"यहपूर्वप्रत्ययपुरोवर्तिशुक्तिविषयकहै । तथा रजतत्वप्रकारकहै।तिसप्रत्ययकेप्रकारकाइदंताकेसाथब्यधिकरणहै।अर्थ यहकिइदंतांके अधिकरणसेभिन्नग्रधिकरणवालाप्रकारइसप्रत्ययनिष्ठहै। तिसविषयकजोनिश्चयकियहइसीप्रकारहैतिसको बाधकहतेहैं।। तात्पर्य यह इदंरजतम्"इसप्रथमज्ञाननिष्ठभ्रमत्वनिश्चयकोवाधकहतेहैं। ऐसा उत्तरार्द्ध । बाधकास्वरूपयदिसिद्धांतीमाने । तोअपसिद्धांतहोगा क्योंकिभ्रमस्थ लमंसिद्धांती नेअन्यथाख्यातिनहींमानी जिसकारणसेयन्यथाख्याति वादीकेमतमेंपुरोवर्तिशुक्तिमेरजतहैनहीं। किंतुसादृश्यादिदोपसेउद्बुद्ध संस्कारसेउपस्थितहुएरजतरूपकरपुरोवर्तिशुक्तिकाहीभानहोताहै।याते "इदंरजतम्"यहजोपूर्वज्ञानहै।तिसकोभ्रमपनायुक्तहै।क्योंकिविषयरूप रजतकाशुक्तिदेशमेंअभावहै।तिसकारणसेतिसज्ञानविषयक भ्रमत्वका जोनिश्चयसोवाधहै। परन्तुयहवाधकास्वरूप नैयायिककोंके मतमेंही संभवताहै । वेदांतमतमेंनहीं । क्यों कियापकमतमें तोपुरोवर्तिशुक्ति मेंमिथ्यारजतकीउत्पत्तिहोनेकर इदंताकेसाथ प्रकारकीव्यधिकरणता नहीं है।अर्थातइदंताकायधिकरणही रजतत्वकाधिकरणहै । याते पूर्वउक्तवाधकास्वरूपमानेहुएयपसिद्धांतहोगा ॥ किंवा पूर्वज्ञानमें भ्रमत्वकाजोनिश्चयहै।वहयधिष्ठानकेयज्ञानकोबाधकरताहै। वानहीं। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता। क्योंकिदोनोंकाविपय भिन्नभिन्न है। अर्थात् अज्ञानतोशुक्तिविषयकहै।ौरवाधप्तर्वज्ञाननिष्ठ भ्रमपनेकोविषयकरता है।यौरभिन्नभिन्न विषयविषयक ज्ञानतथाअज्ञानकानिवृत्त्यनिवर्तकभाव नहींसंभवता । थन्यथाथतिप्रसंगहोगा । अर्थात्घटके ज्ञानसेपट कायज्ञानभीनिवृत्त हुयाचाहिये ॥ ौरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता । क्योंकिसंसारकेमूलभूतयज्ञानका बाधनहोनेसेतिसकीव्यर्थताहै। श्रव विवरणकारकीरीतिसेवाधकास्वरूपयागेकहकरतिसकोवादीपितफरता हैऔरकोईएकवेदांती कार्यसहितअज्ञानकीनिवृत्तिकानामवाधकहते हैं सोभीसमीचीननहीं । क्योंकिकार्यकीनिवृत्तिका नामवाधहै। अथवा कारणरूपयज्ञानकी निवृत्तिकानामवाघहै ॥ श्रथवादोनोंकीनिवृत्ति वे०सि० मु० मा० कानामवांघहै । यहविचारकर्तव्यहै । इनमेंप्रथमौरद्वितीययहदोनों पक्षतोयव्याप्तिदोपकी प्राप्तिहोनेसे नहींसंभवते । क्योंकिकार्यनिवृत्ति मेंसविलासअज्ञानकीनिवृत्तिरूप वाधकालक्षणनहींप्राप्त होता । तैसे अजानकीनिवृत्तिमात्रमेंभी पूर्वउक्तवाधकेलक्षणकीप्राप्तिनहीं । और अव्याप्तिदोपकी प्राप्तिसेही तृतीयपक्षभीअसंगतहै। क्योंकिएकएक कीनिवृतिमें उभयनिवृतिरूपताका अभावहै । प्रतियोगीकेभेदसेही अभावकाभेदहोताहै । यातैउभयनिवृत्तिकोभी वाधरूपतानहीं संभवती ॥ शंका ॥ कार्याकारपरिणामकोप्राप्तहुए अज्ञानकी निवृत्तिकानामहीवाधहै। ऐसेमानेहुए अव्याप्तिदोपनहीं प्रासहोता । क्योंकियहलक्षणसर्वत्र अनुगतहै ॥ समाधान ॥ तैसेमानेहुएभी यहविचारकरनेयोग्यहै। निवृत्ति प्रतियोगिरूप कार्याकारपरिणामको प्राप्नहुयाजोग्रज्ञानहै सोनिवृत्तिकाविशेषणहै। अथवाउपलक्षणहै। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिविशिष्ट्वृत्तिधर्मकोविशेषणमें वर्तनेकानियमहै। इसन्यासेविशेषणरूप अज्ञानमेंभी बाधपनेकीप्राप्ति होगी।औरयदिद्वितीयपक्षकहो तोयभावमेंउपलक्षणरूप अज्ञानका, कियाहुयाकोईनिश्चयाकधर्म नहींप्रतीतहोता । यातेनिवृत्तिमात्र कानामवाधहोगा । तिसमेंभीयहविचारणीयहै । क्या?यहनिवृत्तिरूप बाधध्वंसपात्रकानामहै।अथवाज्ञानसाध्यध्वंसकानामवाधहै । अथवा पदार्थांतरकानामहै । यर्थयह वहनिवृत्तिरूपवाधसत्रूपनहीं तथा असतरूपभीनहीं।ौरसत्यसत्उभयरूपभीनहीं। औरयनिर्वचनीय रूपभीनहीं। किंतुपंचमप्रकाररूप पदार्थातरहै । अथवायत्मस्वरूप हीनिवृत्तिहै । इनमेंप्रथमपक्षनहींसंभवता ॥ क्योंकिमुद्गरादिकोंके उत्तरार्द्ध ४०१ परिहारसे उत्पन्नहुया जोघटादिध्वंस तिसमेंजाधव्यवहार नहींहोता! औरद्वितीयपक्षभी असंगतहै। क्योंकिउत्तरज्ञानसे सिद्धहोनेयोग्यजो पूर्वज्ञानकाध्वंसह तिसमभीवाधव्यवहार हुयाचाहिये। जिसकारणंसे वहध्वंसज्ञानसाध्यहै ॥शंका ।। पूर्वज्ञानकेध्वंसप्रति उत्तरज्ञानकोज्ञान वरूपतासे कारणतानहीं । किंतुक्षणिकविशेषगुणत्वरूपतासे कारण ताहै।यातेतिसमेंबाधकेलक्षणकी अतिव्याप्तिनहींहोती ।। समाधान|| यद्यपिपूर्वउक्तरीतिसेउत्तरज्ञानसाध्य पूर्वज्ञानकेध्वंसमेंबाधकेलक्षणकी अतिव्याप्तिनहींहै।तथापिज्ञानमात्रकेष्वंसमेंतोप्रतिव्याप्तिनिवारणकरनी कठिनहै।क्योंकिज्ञानकाध्वंसज्ञानमात्रकरसाध्यहै।ौरतृतीयमक्षभीनहीं संभवता।क्योंकिवहपदार्थातरनिवृत्तहोताहै।वानहीं। यहविचारणीयहै प्रथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकिवहपदार्थातरध्वंसकरव्याप्तनहीं। और द्वितीयपक्षीयसंगतहै । क्योंकिपदार्थातरके अनिवृत्तहुएयदेतकी हानिहोगी॥ शंका ॥ यद्वैतकीहानितयहो जयपदार्थातरसतहो यातेदितीयसत्कायभावहोनेसेअद्वैतकीहानिनहींहोती ।समाधान।। तिसपदार्थातरकोयनिर्वचनीयसे विलक्षणहोनेकरतथाअसत्से बिल क्षणहोनेकरयात्माकीन्याईसतरूपताकासंभवहै । तिससेपदातिर केस्थितहुए कैसेयदैतकीहानिनहींहोगी किंतुयवश्यहोगी । याते तृतीयपक्षभीयसंगतहै । औरचतुर्थपक्षभी नहींसंभवता । क्योंकि तिसात्मस्वरूपनिवृत्तिकोनित्यसिद्धहोनेकर ज्ञानकोव्यर्थताकी प्राप्ति होगी ।। शंका ।। यात्माकास्वरूपमात्रही निवृत्तिनहीं किंतुवृत्तिउप लक्षितयात्मानिवृत्तिरूपहै । याज्ञानकोव्यर्थतानहीं समाधान ।। जैसेगृहमेंकाकरूपउपलक्षणजन्यउतृणादिरूपधर्मगृहकानिश्चायक - ४०२ वे०सि० मु. भां० है।तैसेवृत्तिरूपउपलक्षगाजन्ययात्माकनिश्चायकधर्मकायात्मामंअभाव है इसीसेवृत्तिकोउपलक्षणपनानहींसंभवता।।पूर्वकथनकाप्रकरणमेंउप योगकथन करताहुयावादी वाधकेनिराकरणकोसमाप्तकरताहै ।पूर्व उक्तकारसेवाधकास्वरूपकथन करनेकोययोग्यहै ॥ यातेरज्ञान तत्कार्यके बाधसेमोक्षसिद्धहोताहै । यहकथननहींसंभवता ।। इति 8 अथसिद्धांतरीतिसे वाधकास्वरूपनिरूपण भ्रमसेप्रसिद्धपदार्थके अधिष्ठानमें यध्यस्तपदार्थतीनकाल मेंनहींइसप्रकारकाबोधजो अधिष्ठानकेसानात्कारसेयनन्तरहोताहै। तिसकोवाधकहते हैं ॥ इसप्रकारकाउत्तर सिद्धांती निरूपण करताहै ॥ समाधान ।। * मू०॥ साक्षात्कृतेत्वधिष्ठानेसमनन्तर निश्चितिः । अध्यस्यमानं नास्तीतिवाधइत्युच्यते बुधैः ॥४०॥ मोटनकाछंद-साक्षातयाधारभएजवहीं । पाछेहुईजोनिश्चोसवही।। मिथ्यानहि तीनहुकाल यहं । धीमानसवीतहिवाध कहे ॥ ३५ ॥ टी० ॥ अधिष्ठानकेसाक्षात्कारहुए तदनंतरजो यहनिश्चय उत्पन्नहोताहैकि अध्यस्तपदार्थ तीनोंकालमें अधिष्ठानमेंनहीं । इसत्रैकालिकयत्यता ऽभावकेनिश्चयकोही बुद्धिमानोंनेवाधकहाहै । श्रवइसीयर्थको विस्तारपूर्वकनिरूपणकरतेहे ॥ जैसेशुद्धशुक्तितथा रज्जुरूपयधिष्ठानमें रजततथासर्परूप विपरीतयर्थको कल्पनाकरके प्रवृत्तहुएपुरुपको तथानिवृत्तहुए पुरुपकोजोअधिष्ठानको विपयकरने वालाज्ञानबाधका जनकपरोक्षरूपयथवा अपरोक्षरूपउत्पन्नहोताहै। यहांयह यर्थजानलेना। जहांपरोक्षभ्रमहोतहांपरोक्ष थधिष्ठानकाज्ञान ४०३ उत्तराई उत्पन्नहोताहै। औरजहांअपरोक्षप्रमहोतहायपरोक्षयधिष्ठानकाज्ञान उत्पन्नहोताहै।तिसयधिष्ठानकेसाक्षात्कारसेअनन्तरयहयध्यस्तरजतादि इसशुक्त्यादिरूप अधिष्ठानमें कालत्रयमेंभी नहीं हैं इसप्रकारका जो निश्चय वहीबाधकहाजाताहै। यहसर्वलोकोंमें प्रसिद्धहै । तैसे अधिकारिपुरुषको “मेब्रह्महूं"इसप्रकारकाअधिष्ठानकासाक्षात्कारहोने सेयनन्तर अज्ञानतत्कार्यरूप अध्यस्तपदार्थमुझब्रह्मात्मा तीनकाल मेंभीनहीं हैं। इसीनिश्चयको बुद्धिमानवाधकहतेहैं। यहविद्वानोंके अनुभवसिद्धहै । यातेअज्ञानतत्कार्यका बाधसंभवताहै ।। शंका ॥ हेसिद्धांतिन वाधकाविपयजोवाध्य वहअनिर्वचनीयहै यहयापका मतहै ॥ सोयहबाधकीविषयतापूर्वउक्त अन्यथाख्यातिवादीके मतमेकांताकरादिगत सत्यरजतमेंभीप्राप्तहै। जिसकारणसेवहरजत भीकालत्रयमें पुरोवर्तिशुक्तिके खंडमॅनहीं । इसप्रकारके निश्चयका विषयहै ।। यातेपूर्वउक्तबाधकालक्षणदुष्टहै ।। समाधान ॥ हेवादिन अन्यथाख्यातिवादीकेमतमें भ्रमकाविषयजोरजतादिहैं वहकांता करादिस्थल सत्यहैं। औरहमारेमतमें तोजिसयधिष्ठानमें वहरजता दियध्यस्तहैंतहांही वहअधिष्ठानरूपताकरसतहैं स्वतंत्ररूपताकर कहींभीसत्नहीं यातेयधिष्ठानसेभिन्नरूपताकर त्रैकालिक तिनका श्रभावहै । यहविलक्षणताउनकेमतसे हमारेमतमें है। यातेपूर्वउक्त बाधकालक्षणनिर्दोपहै । औरअध्यस्तपदार्थका त्रैकालिकथभावहै इसनिश्चयकोषाधरूपता मानेहुए ॥ प्रतिपन्नोपाधौ त्रैकालिक निषेधप्रतियोगित्वं अनिर्वचनीयत्त्वम् ।

दे० सि. मु. भा. अभ्रमसिद्धपदार्थकेअधिष्ठानमंअध्यस्तकोत्रैकालिकनिषेध कीजोप्रतियोगिताहै । यहीअनिर्वचनीयताहै । ऐसायनिर्वचनीय कालक्षणजोसंप्रदायके जाननेवालोंनेकहाहै ॥ वहभीसमीचीनता कोप्राप्तहोताहै । शंका । अध्यस्तपदार्थको अधिष्ठानकेसाक्षात्कार सेयनंतर निषेधका प्रतियोगीहुएभी वर्तमानकालमें श्रीभूतकालमें विद्यमानहोनेसे त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वको अनिर्वचनीयवहै यहयनिर्वचनीयकाल क्षण असंभवदोपवालाहे क्योंकिलक्ष्यमात्रमें वृत्तिनहीं ॥ समाधान ॥ हेवादिन् अध्यस्तपदार्थ जैसे वापसे उत्तर कालमें असत् है । तैसे वाधसेपूर्वभी वह असहै ॥ याते लक्षण असंभवदोपवाला नहीं इसवास्ते तुमको अनिर्वचनीय काज्ञाननहींहै । क्योंकिकदाचिकहोनेवाले पदार्थको अनिर्वचनीय नहींकहते जिसकारणसे यहलक्षणयतिव्याप्तिदोपवालाहै । यद्यपि वेदांतसिद्धांतमें घयादिपदार्थभी अनिर्वचनीयहीहैं । यातेतिनमें अतिव्यातिनहीं । तथापियन्यवादियोंका इसयर्थमें विवादहोनेकर प्रतिवादियोंको अभिमतमतघटादिकोंमें पूर्वउक्तलक्षणकीअतिव्याप्ति है। औरयदिघटादिकोंकी व्यावृत्तियर्थ ऐसालक्षणकरो कि आविद्यकत्वेसतिकादाचित्कत्वं अनिर्वचनीयत्वं । य० ॥ श्राविद्यक हुयाजो कादाचित सत्तावाला हो वहयनिर्वचनीयहे । सोयहलक्षणभी नहींसंभवता ॥ तथाहि ।। शुक्तिरजतमैयाविद्यकत्वक्या?है यहविचारकर्तव्यहै।तहांकारणमात्रसे जोउत्पन्नहो तिमकोयाविद्यककहतेहो। अथवाज्ञानकवाधके योग्यको थाविद्यककहतेहो । प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिथविद्याशब्द ४०५ संत्तराद्ध सेकारणकाग्रहणकियाहै।तेसेमानेहुएजोकारणसेजन्यहुयाकादाचित्क हो वहअनिर्वचनीयहै। यहलक्षणकायर्थसिद्धहोगा । तिसकारणसे पुनः घटादिकों में अतिव्याप्तिपूर्वकीन्याईहीस्थितहै ।क्योंकिघटादिभी कारणजन्यहुए कादाचित्कहैं । परन्तुवहयनिर्वचनीयनहीं। और द्वितीयपतभीनहींसंभवता। क्योंकिसत्पदार्थमनास्तित्वकाज्ञान असं भवहै।तात्पर्ययहज्ञानकरनिवृत्तिकेयोग्यकोहीज्ञानकरखाध्यताहै।सोसत् पदार्थमेंनहींसंभवती यन्यथासत्यात्माकीभी ज्ञानकरनिवृत्तिहुईचा हिये। तिसीकारणसे ज्ञानाध्यत्वकीयन्यथाऽनुपपत्तिसे वर्तमानतथा थतीतकालमेंभी अध्यस्तपदार्थस्वरूपसेहीयसतहै । इसप्रकारधि छानमेंकालिकनिषेधकाजोप्रतियोगिपनाहै यहीअनिर्वचनीयपनाहै यहलक्षणनिर्दोपहै ।। इति ।। शंका ।। वाधरूपनिश्चयक्या?मात्म स्वरूपहै अथवाग्रात्मासेभिन्नहै। प्रथमपक्षमानोतोकिसीकोभीसंसार कादर्शननहींहोगा क्योंकियात्मस्वरूपवाधकोस्वतःसिद्धहोनेकरभ्रम सिद्धपदार्थका किसीकोभी माननहींसंभवेगा । शौरदितीयपक्षोभी यहविचारकर्तव्यहै।क्या?वहवाध यात्मासेभिन्न वाधकेयोग्यहै अथवा श्रात्माकीन्याईसवरूपहै । यदि प्रथमपक्षकहो तोतिसमेंभी यह विचारकर्तव्य है अपनावाधयापही है अथवाघांतरहै । प्रथम 'पक्षमें तोयात्माश्रयदोपस्पष्टहै। औरदितीयपक्षमें श्रन्योऽयाश्रयादि दोपोंकीमासिहोगी। यातेयात्मासेभिन्नवहवाध बाधकेयोग्यहै। यह प्रथमपक्षनहींसंभवता । औरयात्मासेभिन्न वहवाधसतहै । यदियह दितीयपक्षकहो तोय?तसिद्धांतकी हानिहोगी। इसलिये "सकल कार्यकारणरूपजगत्ब्रह्मात्मा नहींहै" इत्याकारकवाधरूपनिश्चयका ४०६ दे०सि० मु० भा० कोईअन्यवाधयवश्य अन्वेपणकरनेयोग्यहै।।तैसेमानेहुए अनवस्था दि दोपप्राप्तहोंगे।यातेपूर्वउक्तवाधकास्वरूप नहींसंभवता। समाधान।। हेवादिनब्रह्मसे भिन्नसकलयनात्माका जोवाधरूपनिश्चयहै।तिसको अपनेअन्तर्भावरूपताकरहीवाधपनाहै यर्थयहब्रह्ममेंकल्पितसर्वग्रज्ञान तत्कार्य तीनोंकालमेंनहीं है इसनिश्चयकेदोरूपहैं ॥ एकवाधरूपहै औरदूसराकल्पितरूपहै।।इसप्रकार यध्यस्तरूपतासे तिसकोस्वविषयत्व है। औरवाधरूपतासेतिसकोविपयिपनाहै ।। यातेयात्माश्रयदोपकी प्राप्तिनहींहोती।औरतैसेमानेहुए अदैतकीभीहानिनहींहोती।क्योंकि यात्मासेभिन्नकोईवस्तुनहीं ॥ यातेपूर्वउक्तबाधकास्वरूपसंभवताहै ।। इति ॥ शंका ॥ बाधकेयोग्यजोप्रपंचहै वहब्रह्मसेभिन्नसत्है। अथवा असतहै ।। प्रथमपतकहो तोयात्माकीन्याईतिसकीनिवृत्तिनहींहोगी क्योंकिसत्पदार्थकाअभावसकलप्रमाणसेविरुद्धहै । औरद्वितीयपक्ष कहो तोतिसयसत्जगत्केअभावका उद्देशकरके ज्ञानादिकसाधनों में कोईभीपुरुषप्रवृत्तनहींहोगा।क्योंकियसत्कायभावस्वतःसिद्धहै और के परस्परविरोधेनप्रकारांतरस्थितिः इसन्यायसेसत्यसतसेविलक्षणकोईअन्यप्रकारभीनहींसंभवता । समाधान ॥ हेवादिनइनविकल्पोंकायहांयवकाशनहीं। क्योंकि (सतोपिजनिर्नच) इत्यादिकारिकाकेव्याख्यानमें इनविकल्पोंका परिहारयनेकवारकस्याएहैं । भावयह कियहदृश्यमानजगत्प्रथमसत् रूपतोहेनहीं।क्योंकि "नेतिनेति" इत्यादिश्रुतियोंने तिसकावाधकहा है। औरयहजगत्यसत्भीनहीं क्योंकियपरोक्षमानहोताहै।। तिसी कारणसेप्रतीतियौवाधकीयन्यप्रकारसे अनुपपत्तिहोनेकरब्रह्मसेभिन्न उत्तरार्द्ध सकलअनात्मप्रपंचसत्सत्सेविलक्षणयनिर्वचनीयस्वरूपहै। और श्रुतिकाविरोधहोनेकरपूर्वउक्तन्यायकोषाभासरूपताहै।। यातेपूर्वउक्त तुम्हारेविकल्पयहांनहींप्राप्तहोसकते ।। इति ।। *अथपूर्वपक्ष ॥ संक्षेपसेअन्यख्यातियोंकेस्वरूपप्रद शनपूर्वकअनिर्वचनीयख्यातिकाखंडन * हेसिद्धांतिन्यभेदव्यवहारकासंपादकतथास्मृतिज्ञानसेजिसका भेदग्रहणनहींहुया ऐसाजो “इदंरजतम्” यहसामान्यप्रत्यक्षज्ञानहै। वहीभ्रमरूमतासे कथनकियाजाताहै। तिसभ्रमकाविपयरजतयनिर्व चनीयनहीं।क्योंकिसामान्यप्रत्यक्षज्ञानकाविषय पुरोवर्तिशुक्तिका जो इदमंशहै वहसतहै। तथास्मृतिज्ञानकाविषय जोदेशांतरस्थितरजत वहभीसतहै।औरतैसेही “नेदरजतम्"यहवाधज्ञानभी अभेदव्यवहार मात्रकाही बाधकरताहै ॥ कोईभ्रमकेविषयका त्रैकालिकयभावनहीं बोधनकरता । इसप्रकारयख्यातिवादीमानतेहैं। पातेअनिर्वचनीय कावाधहोताहै यहयापकैसेकथनकरतेहो ॥ औरयात्मख्यातिवादी भीरजतकोयनिर्वचनीयनहींकहते। किंतुईदियकेसंबंधसेविनारजतका प्रत्यक्षहोताहै । यातेबुद्धिरूपताकरअंतरस्थितजोरजतहै तिसकीबाह्य रुपतासे जोप्रतीतिहै इसीकोभ्रमकहतेहैं। और “नेदंरजतम्" यह वाधज्ञानभीरजतके यसत्वकोनहींवोधनकरता ॥ किंतुतिसबुद्धिरूप रजतमेंइदंताकादूसरानाम जोबाह्यपनाहै तिसकानिषेधकरताहै । क्योंकिरजतरूपधर्मीके निषेधकीयप्रेक्षासेवाह्यतारूपधर्ममात्रकेनिषेध मेंलाघवहै । इसप्रकारयात्मख्यातिवादीबोधकहतेहैं ।। पौरयनादि वासनासेभ्रमकालमेंथसहीरजतभासताह।ऐसेकथनकरनेवालेयसव वे. सि० मु. भा. ख्यातिवादीभीयनिर्वचनीयरजतनहींमानते।किंतुनिःस्वरूपयसत्ही रजत यसत्प्रकाशकीसामर्थ्यवाले ज्ञानसेभासताहै । औरइसीकारण से “नेदरजतम्" यहवाधभीरजतके असत्वकोहीवोधनकरताहै । इस प्रकारपूर्वउक्तरीतिसेब्रह्मसेभिन्नसर्वजगत्यनिर्वचनीयहै।यहसिद्धांती काकथनही अनिर्वचनीयहै अर्थात्नहींसंभवता ॥इति॥ * अख्यातिवादादिकोंकेखंडनपूर्वकानिर्वचनीय ख्यातिकास्थापन तथावाधकाउपसंहार । * समाधान ॥ हेवादिन अख्यातिवादादिक तीनमतोंमेंभ्रमतथा वाधकीव्यवस्थानहींसंभवती यहयन्यथाख्यातिवादीने पूर्वनिरूपण कियाहै । इसीयर्थको स्पष्टकरतेहैं ॥ अख्यातिवादमें प्रथमसामा न्यप्रत्यक्ष ज्ञानही स्मृतिसे गृहीत भेदवालाहुया बाधकेयोग्य अभेदव्यवहारकासंपादक होनेकर भ्रमकहाजाताहै।। सोनहींसंभवता क्योंकिसामान्यप्रत्यनज्ञान तथा स्मृतिज्ञान यह दोनों भानहोतेहैं वानहीं । यदिअन्त्यपक्षकहो तोदोनोंनहींहोंगे। क्योंकितुम्हारेमतमें ज्ञानकोस्वप्रकाश होनेकर श्रभानकालमें स्वरूपाभावका नियमहै । अर्थातजववहभाननहींहोतेतो वहस्वरूपसेभीनहींहोंगे। औरयदि प्रथमपक्षकहो तोतिनकेभेदका अग्रहणकैसेहोगा । क्योंकिभेदतो तिनकास्वरूपहीहै। स्वरूपभानकालमें तिनकाभेदअवश्यहीग्रहण होजायेगा । इसीकारणसे तिसज्ञानकोयभेदव्यवहाकायापादकपना नहींसंभवता तिसीसेतिसज्ञानमें भ्रमरूपताकास्थापनभीनहींसंभवता। औरतैसेहीजोपूर्वबाधकी व्यवस्थाकीथी वहभीनहींसंभवती। क्योंकि जहांवीतरागपुरुषको व्यवहारहीनहीं उदयहोता तहां "नेदंरजतम्" ४०६ पत्तराई इसज्ञानकोबाधकपनाही नहींहोगा। यातेप्रख्यातिवादमें भ्रमतथा वाधकीव्यवस्थाकाअसंभवहै । औरत्रात्मख्यातिवादमेंभी यहविचार कर्तव्यहै।क्या?ज्ञानाकारताबाह्यपदार्थमेंअध्यस्तहै।यथवाज्ञानस्वरूप रजतमें बाह्यताअध्यस्तहै ।। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता क्योंकिक्षणिक विज्ञानवादी बौधकमतमें बाह्यपदार्थयलीकहै । तिसकोयसत्. होनेकर अधिष्ठानताकायसंभवहै । औरयदिधसत्कोहीअधिष्ठान मानलेंतो “इदंरजतमसत्" यहभ्रमकायाकारहुयाचाहिये क्योंकि अध्यस्तपदार्थयधिष्ठानसे थन्वितहीप्रतीतहोताहै ॥ शंका ॥ सत् रजतहै ऐसीप्रतीतिका अभावहोनेसे असतहीरजत क्योंनहो ।। समाधान।। हेवादिनजवतुमरजतको असत्मानोगे तोरजता पुरुप कीप्रवृत्तिनहींहोगी। क्योंकिवहरजतनिःस्वरूपहै ॥ औरयदिरजत में बाह्यताकाधारोपहै । यहद्वितीयपक्षकहो तोयहभीनहींसंभक्ता ।। क्योंकितिसवाह्यताकोभी असतहोनेकर तिसकोविपय करनेवालेज्ञान निष्ठयपरोक्षता नहींहोगी । औरयसवख्यातिवादभी तुम्हारेमत मेंप्राप्तहोगा। औररजतयन्तरविज्ञानस्वरूपहै इसमें प्रमाणकाभी श्रभावहै । औरयदिऐसेकहोकि “नेदंरजतम्” यहवाधरूपप्रत्ययही लाघवसहकृतहुया रजतकीवाद्यताका निषेधकरके अर्थसेतिसकी अन्तररूपताअर्थात विज्ञानरूपताकोबोधनकरताहै । यातेरजतकी बुद्धिरूपतामें यहवाधमत्ययही प्रमाणहै । सोयहकथन भीसमी चीननहीं । क्योंकि “इदंता" नामसमीपताकाहै । वहजबरजत मेंनिषेधकीगई तोरजतमें असमीपताही प्राप्तहोगी । तिस श्रसन्निहित रजतको थतिसन्निहित विज्ञानरूपतातो कबहो के०सि० मु० भा० सकतीहै । औरइन्द्रिय संबंधसेविनाही तिसरजतकोप्रत्यक्ष होनेकर तिसकोविज्ञानरूपताहै। यहकथनभीनहींसंभवता। क्योंकिदोपके वशसेदेशांतरवर्तिरजतकाहीइंद्रियकेसाथसंबंधसंभवताहै।याते "इंद्रिय संबंधसेविना" यहप्रत्यत्तकाविशेषण प्रसिद्ध है । औरयहजोयात्म ख्यातिवादीनेकहाथा कि "नेदरजतम्" यहवाधप्रत्ययरजतमेबाह्य तारूपइदंताकोनिषेधकरताहै रजतकोनिधनहींकरता ॥ सोयहतिस काकथनभीसमीचीननहीं। क्योंकिवाधप्रत्ययइदंतातथारजतइनदोनों कोनहींनिषेधकरता किंतुइदंतायौरजतकेतादात्म्यको निषेधकरताहै तिसतादात्म्यकेनिषेधकियेहुएइदंताको तोपुरोवर्तिमेवहवाधप्रत्ययस्था पनकरताहै। गौरजतको अथवारजतत्वको देशांतरमें अथवारजत मेंस्थापनकरताहै यानेयात्मख्यातिवादीके मतमें भ्रमतथावाधकीव्य वस्थानहींसंभवती । औरयसतख्यातिवादमेंजोयहकहाथा कियसत् केप्रकाशनमेंसमर्थज्ञान यसत्रजतकोहीमकाशकरताहैसोयहकथनभी नहींसंभवता । क्योंकिग्रसत्कीयपरोक्षप्रतीतिनहींसंभवती । और ज्ञानकिस अर्थमकाशनमेंसमर्थहै ऐसाप्रश्नकरनेसेसामर्थ्यको विषय कीयपेक्षाहै । औरवहश्रसविषयकार्य है अथवाज्ञाप्यहैऐसेविकल्पों कोनहींसहनकरता । तात्पर्ययहयसतविषयकोयदिज्ञानकाकार्यमाने तोअसत्वंध्यापुत्रकीभीज्ञानसे उत्पत्तिहुईचाहिये क्योंकिज्ञानमेंथसत् वस्तुकेउत्पादनकासामर्थ्य है । औरयदिअसतविपयकोज्ञाप्यमाने तो असतवंध्यापुत्रकामीज्ञानसेप्रकाशहुथाचाहिये । इत्यादिविकल्पोंके नसहनकरनेसे यसत्रख्यातिवादभीथसंगतहै । यद्यपि “नदरजतम्" यहवाधप्रत्ययरजतके थसत्पनेकोहीवोधनकरताहै तथापिपूर्वयात्म उत्तरार्द ख्यातिवादकेनिराकरणमें ग्रन्यथाख्यातिवादीकेमतानुसारतिसवाधमत्य यका परिहारकरयाएहैं। अर्थात्वाधज्ञान इदंतातथारजतकेतादात्म्य कोनिषेधकरताहै रजतकेयसत्वको वहनहींवोधनकरता। तिसकारण सेभ्रमस्थलमें औरकोईख्यातिनहींसंभवती।यातेब्रह्मसेभिन्नसकलजगत् अनिर्वचनीयहै।। यहयर्थसिद्धहुया ।। शंका ।। यदिअन्यथाख्याति वादीने यन्यख्यातियोंका निराकरणकिया तिसमेंयापको क्यालाम होगा उलटायन्यथाख्यातिवादतुमनेस्वीकारकरलिया।समाधान ।। हेवादिन अन्यथाख्यातिवादीकीरीतिसे इतरख्यातियोंका निराकरण सिद्धहोनेकर पुनःतिनका निराकरणकरना युक्तनहीं। औरसाक्षात् यात्मविचारकाभी तिनकेनिराकरणमें प्रभावहोनेकर तिनकेनिषेधमें यत्ननहींकिया। औरयन्यथाख्यातिवादकाभी स्वीकारनहींकिया। क्योंकिपूर्व तिसकाभी निषेधकरयाएहैं । इसप्रकारयधिष्ठानके साक्षात्कारसेंयनंतर अनिर्वचनीयपदार्थका कालिकअत्यंताभाव निश्चयवाधहै । यहयर्थसर्वदोपरहित सिद्धहुया ॥ इसीयर्थको सुरेश्वराचार्योंकेवचनसे दृढकरतेहैं ।। तत्त्वमस्यादि वाक्योत्थसम्यग्धीजन्ममात्रतः। अविद्यासहकार्येण नासीदस्तिभविष्यति ॥१॥ अ० ॥ तत्त्वमस्यादिमहावाक्यसे उत्पन्नहुथाजोदृढ थपरोक्षयोधहै तिसकी उत्पत्तिमात्रसेही कार्यकसहितयविद्या नपूर्वथी औरनयबहे थौरनयागेहोगी। इस लोकमें "नासीत" इसकथनसे अधिष्ठान केसाक्षात्कारसे यनंतर जगतकात्रकालिक थत्यंताऽभावहीप्रतीत होताहै । यातेकालिक अत्यंताऽभावकी प्रतीतिहीबाधहै। विद्या वे०सि० मु. भा. कीनिवृत्तियाधनहीं ॥ इति ॥ (४०) अवइसीयर्थको दृढकरनेकेलिये पूर्वपक्षनिरूपण करतेहैं। अथपूर्वपक्षी विद्यापीअविद्याके विरोध का असंभवनिरूपण॥* हेसिद्धांतिन् अधिष्ठानके साक्षात्कारकोयविद्याकाबाधकपना यापकैसेकहतेहो।ौस्यदि तिनकाविरोधहोनेसे विद्याकोयविद्याकी बाधकतायापकहोतोवहकौनविरोधहतिसकोयापनिरूपणकरो। इसी अर्थकोपूर्वपक्षीविकल्पोंदारा स्पप्टकरताहै । क्याविद्यातथायविद्या काजोएककालमें अनवस्थितपनाहै यहही तिनका परस्परविरोधहै । अथवाएकदेशमें अनवस्थितपनारूपविरोधहै। अथवाध्यघातक भावविरोधहै अथवाभावाभावरूपविरोधहै । इनमेंप्रथमपक्षतोनहीं संभवता । क्योंकिपूर्वकालमें होनेवालीयविद्याकेसाथ विधाकी एक कालमें यवस्थिति है ॥ शंका ॥ “ पूर्वभावित्व " यह विशेषण पदार्थोंके एककालमें अवस्थानका साधकनहीं। क्योंकि घटसेपूर्वकालमें होनेवालाजोघटनागभावहै तिसकेसाथएककालमें घटकीयवस्थितिनहींहै ॥ समाधान ॥ घटकोपागभावकीनिवृत्ति रूपताहोनेसेतिनकीएककालमेंस्थितिनहींसंभवती। क्योंकिप्रतियोगीयो तिसका प्रागभाव एककालमेंनहीं रहसकते। और यविद्याकीनिवृत्ति तोविद्याजन्यहै यातेअविद्याकीनिवृत्तिकोविद्यासे उत्तरकालमेंहोनेकर विद्यातथाविद्याकी एककालमें अवस्थिति परिहारकरनेयोग्यही नहीं ॥ शंका । विद्या विद्याकोक्योंनिवृत्तकरेगी क्योंकितिसको प्रमेयकाप्रकाशकहोनेकर विद्याकीनिवृत्तिसे विनाहीतिसकीसफल उचराई । ताहै। समाधान । विद्यासे यदिअविद्याकीनिवृत्तिनहीं मानेगे तो विद्याकोव्यर्थापत्तिहोगी।क्योंकिप्रमेयकोस्वप्रकाशहोनेकरतिसकाप्रकाश विद्यासेनहींसंभवता । यातेविद्यातथाविद्याकाएक कालमेंसहयन वस्थानरूपविरोधनहींसंभवता औरद्धितीयपक्षभीअसंगतहै।क्योंकिभिन्न भिन्नधिकरणमें स्थित विद्यातथायविद्या के विरोधकाअभावहै ।। तिनकाविरोधसिद्धकरनेकेलिये लिनकीएकयधिकरणाता थवश्य कहनेयोग्यहै । यातेएकदेशमें अनवस्थितपनारूप विरोधभीनहीं संभवता ॥ औरतृतीयपक्षमें यहविचारकरनेयोग्यहै । किवहनध्य रूपअविद्याकाघातक्याहै। जिसकाकर्ताहोनेसे विद्याकोघातकपना कहतेहो।यदिऐसेकहोध्वंसकानामघातहै तिसकेकाकोघातककहतेहैं तोइसमेंभीयहविचारणीयहै।क्यावहध्वंसवध्यरूपयविद्यासेभिन्नकोईस्व तंत्रपदार्थहै।इसीपतकोस्पष्टकरतेहैं।प्रथमयहध्वंसवच्यरूपयविद्यासेजन्य तोहैनहीं।क्योंकिवहतिससेमिन्नहैऔरभिन्नपदार्थोकाकार्यकारणभावनहीं संभवतायद्यपिजैसेघटसेभिन्ननिमित्तकारणंदडादिकघटकेजनक हैं।तसे भिन्नध्यसकोभीप्रतियोगिरूपतासेवध्यउत्पन्नकरदेगातिथापि कल्पित प्रतियोगिकध्वंसकोभी कल्पितहोनेकर मुक्तिकोभीकल्पितपनाहोगा। क्योंकि अविद्याकेध्वंसकानामहीमुक्तिहै। औरयदितिसर्वसकोयक ल्पितमाने तोदेतापत्तिहोगी। औरयविद्याकेज्ञानाऽधीन तिसध्वंसका ज्ञानहोताहै यहभीनहींसंभवता ।। क्योंकि विद्याकीनिवृत्तिकालमें प्रमातृत्वादिकोंकायभावहोनेसे तिसविषयकजन्यज्ञानही असिद्धहै।। तिसकारणसेसर्व प्रकारयविधासे संबंधकायभावहोनेकर ध्वंसस्वतंत्र हीकोईपदार्थहे ।। अथवाभिन्नहुयाभी स्वतंत्रनहीं किंतुतिसवध्यका वे० मि० मु० भा० धर्महै । यथवातिसमध्यकास्वरूपहे ॥ प्रथमस्वतंत्रपक्षमाने तोवध्य रूपयविधाकावंसनहींहोगा ॥ क्योंकिहिमगिरि तथाविध्यगिरिकी न्याईपरस्पर तिनकायसंबंधहै । यातेवहध्वंसयविद्याकानहींहोगा। औरद्वितीयपक्षकहो तोधर्मस्वस्थितिकेयर्थ अपनेधर्मीकीदीर्घायु कीवांछाकरताहे । अन्यथा निराश्रयहुअाधर्म कहां स्थितहोगा। यातेद्वितीयपक्षभीयसंगतहे । औरतृतीयपक्षमतो विद्यायविद्याका उत्पादकहीहोजायेगी विरोधतिनकाकिमहेतुसेहोगा । यातेतृतीय पक्षभीनहींसंभवता । और चतुर्थपनभीययुक्तहै । क्योंकिविद्या तथायविधायहदोनों भावरूपहैं । औरयविद्याकीपागभावरूपतापूर्व निपेधक्रयाएहैं । अन्यथातिनकीएककालमें सहस्थितिनहींहोगी। इसप्रकारविद्यातथायविद्याका विरोधकथनकरनेकेययोग्यहै । इसी सेविषायविधाकावाधकहै यहकथननहींसंभवता किंवा विद्या तथा थवि केविरोधकीतुल्यताहोनेसेविपरीतहीक्योंनहोअर्थातविद्याहीवाध केयोग्यहो क्योंकिविद्यावाधकहीहैइमनियममेंप्रमाणकाअभावहै। इति * अथसिद्धांत॥ विद्यातथाविधाका उपमर्य उपमर्दकभावलक्षण विरोधनिरूपण र विद्यातथाविद्याका कौनविरोधहै । इसप्रकारकाप्रश्नहुएविरोध कोनिरूपणकरनेके लियेप्रथमसिद्धांतीविरोधकेकार्यको कथनकरताहै। मू०॥उपमद्यस्वभावत्वमविद्यायाविरोधिता। तत्कर्तृत्वंतुविद्यायायाः प्रकाशतमसोरिव॥४१॥ रोलाछंद ।। उपमर्यस्वभाव कह्योताकोसुनभाई । अविद्यामाहि विरोधिपनो यहहै यनुमाई।।

उचराई तत्कर्तृत्वविरोधि पनोविद्यामें थाई। तमप्रकाशविरोध यथासवजनजगगाई ॥ ३६॥ टी०॥ यद्यपिविषातथाविधाकाकोई अन्य प्रकारकाविरोध यहाँनिरूपणनहींहोसकता। तथापिउपमर्षउपमर्दकभावलक्षणविरोध तिनदोनोंकानिरूपणहोसकताहै।अर्थयहउपमर्पउपमर्दकभावविरोधका . कार्यहैतिसकरकारणरूपविरोधकाअनुमानकियाजाताहैक्योंकिकार्यसे कारणकायनुमानहोताहै।औरणविघाउपमर्दनकरनेके योग्यहीहै । क्योंकिथविद्याकाउपमर्दकत्वरूप जोविद्याकास्वभावहैवहयन्वयव्यति रेकसेलोकप्रसिद्ध है ।। अर्थात विद्याकेहुएथविद्यानहींरहती। जैसे “यहशुक्तिहै"इसप्रकारकीशुक्तिविद्याकेहुए अविद्याकाबाधहोताहै ।। अर्थातइसशुक्तिमें अविद्या औरतिसकाकार्यरजततीनकालमेंनहींथे। औरशुक्तिविद्याकेयभावहुए शुक्तिविषयकथावरण तथान्यप्रकारसे अर्थावरजतरूपताकरमतीतिप्रसिद्धहै । इसप्रकारकेयन्वयव्यतिरेकसे अविद्याहीउपमद्यस्वभाववाली है।। यहलोकप्रसिद्धिसेकल्पनाकीजाती है। यहांयहथनुमानभीजानना ।। विमताविद्योपमर्याविद्यात्वातशुक्तयविद्यावत् के य० ॥ विवादकाविषयजोअविद्याहै सोउपमर्चस्वभाववाली है। अविद्यारूपहोनेसे जोजोथविद्याहोतीहै। सोसोउपमद्यस्वभाव वालीहोतीहै जैसेशुक्तिविषयकविधाहै ।। इति ॥ इसअनुमानमें अविघाउपमर्पस्वभाववाली है यहसाध्यहै। तिसकाअभावरूपविपक्ष अर्थात्यविद्याउपमर्थस्वभाववालीनहीं ऐसाविपक्षमाननेमेबाधकके कंथनदाराअन्वयव्यतिरेकसिद्धतिनदोनोंकेउपमर्यउपमर्दकस्वभावको दे०सि० मु० मा० दृढकरनेकेलियेविपरीतपनेकीप्राप्तिरूपपूर्णपक्षको अनुवादकरके सिद्धां तीनिराकरणकरताहै | औरपूर्वपक्षीनेजोपूर्वयहकहाथा। किविरोधि पनातुल्यहोनेसे यविषाहीविधाका उपमर्दकक्योंनहो सोयहकथनभी नहींसंभवता ॥ क्योंकि यविद्याकोविथकाउपमर्दकमानेहुएविद्याकी उत्पत्तिहीनहींहोगी ॥ क्योंकिउपमर्दकरूपयविद्याप्रथमहीस्थितहै ।। यातेवियाकीउत्पत्तिनहोनी यहीविपक्षमाननेवाधकहै ॥ वियाही अविधाकाउपमर्दकहै इसीयर्थ में औरहेतुकहतेहैं । प्रतिनियतस्व भाववालेपदार्थोंमें (पर्यनुयोग) यहविपरीतहीक्योंनहो ऐसाकथन नहींकरसकते । जैसेप्रकाशतथातमकाजोप्रतिनियतस्वभावहै उसमें विपरीतस्वभावकीयाशंकासंभवतीहीनहीं क्योंकिदृष्टविरोधप्राप्तहोता है। यातेविषाहीयविधाकाउपमर्दकहै यह यर्थसिद्धहुया ॥ इति ॥ शंका ॥ उपमर्दयविद्यासेभिन्नस्वतंत्रपदार्थहै अथवातिसकाधर्म है । इत्यादिविकल्पोंकीप्राप्तिवध्यघातकपक्षकीन्याई इसपक्षमभीतुल्यहीहो गी।। समाधान ।। हेवादिन्वयघातकपक्षमेकथनकीए हुएदोपोंकी प्राप्ति इसपक्षमेनहींहोसकती।। क्योंकि ।। * ब्रह्मात्मानसविलासाऽविद्याकालत्रयेऽपिनास्ति ॐ य० ॥ ब्रह्मात्मामकार्यसहितयविधाकालत्रयमेंभीनहीं है । इसनिश्चयकानामवाधका यपरपर्यायउपमर्दहै। तिसकोस्वविषयके अबाधितपनेकरप्रमारूपताहै ॥ शंका ॥ यदियविधानहींनिवृत होतीतोब्रह्मात्माकासाक्षात्कारनिष्फलहोगा।क्योंकिग्रवियाकीनिवृत्ति सेविनायन्यतिसकाफलकोईप्रतीतनहींहोता।। समाधान ॥ हेवादिन् ब्रह्मसाक्षात्कारकावाधरूप उपमर्दहीफलहै। अविणकीनिवृत्तितिसका उत्तरार्ट फलनहीं। क्योंकिग्रधिष्ठानसेभिन्नकरकेयविधात कार्यकोअसतहोने करतिसकी निवृत्तिकरनेके अयोग्यहै। याते विद्यासेउत्तरकालमेंउत्पन्न होनेसे बाधहीतिसकाफलहै ।। इसकारणसेविधाकीनिष्फलतानहीं।। शंका ।। हेसिद्धान्तिन् उपमर्दकोज्ञानरूपमानेहुए तिसज्ञानरूपबाध काकौनविषयहै । क्योंकिविषयसेविनाकोई ज्ञाननहींहोता। औरयदि अवियादिकोंका त्रैकालिकयत्यंताभावहीतिसबाधकाविषययापकहो तोतिसमेंयहविचार कर्तव्यहै क्यावह अत्यंताऽभावथसतहै। अथवासत् हैप्रथमपक्षकहोतोतिसअत्यंता ऽभावकेप्रतियोगिरूप यज्ञानादिकोंको सतपनेकी प्राप्तिहोगी । औरद्वितीयपक्षोभी यहविचारणीयहै क्या वहसतरूपयत्यंताऽभाव यात्मासेभिन्नहै । अथवाघभिन्न है । प्रथम पक्षमतोदैतकीप्राप्ति होनेसे अद्वैतश्रुतिकाविरोधप्राप्तहोगा । और द्वितीयपक्षमेवहवाधअधिष्ठानका साक्षात्कारहीहै । 'उससेभिन्ननहीं यातेवाधौविधाकाजन्यजनकभाव नहींसंभवेगा । इसमकारवाध काविषयकोईनहींसंभवता ।। समाधान ॥ हेवादिन वृत्तिरूपसाक्षा कारउपाधिउपहित यात्माकास्वरूपही त्रैकालिकअत्यंताभावरूपहै औरतिससाक्षात्काररूप शुद्धउपाधिसे कार्यसहितयविद्या ब्रह्मात्मामें कालत्रयमें भीनहीं"इसप्रकारकाज्ञानात्माविषयक उत्पन्न होताहै।याते पूर्वउक्तवाधका विषयसंभवताहै । इसमकोईदोषनहीं। यौस्यदिऐसे कहोकियहपत्रसंप्रदायके जाननेवालों से किसीनेभीस्वीकारनहीं किया सोयहकथनभीनहींसंभवता। क्योंकिवार्तिककारोंकी संमतिपूर्वकथन करयाएहैं । औरविवर्णाचार्योंनेभी यहीपक्षदिखलायाहे । तथाहि उन्होंनेयहकहाहै। "प्रसिद्धयधिष्ठानशुक्त्यादिकोमें रजतादिकों ० सं० मु. भा० केयभावकोवाधबोधनकरताहे।इसप्रकारप्रसिद्धयधिष्ठानमेंयभावप्रति योगित्वहीमिथ्यात्वहै । इसकथनसेयहीपनतिन्होने स्वीकारकियाहै। यदिविवर्णाचार्योंकोयहपत्नस्वीकारनहोता । तोरजतकेयभावको बाधवोधनकरताहै । यहकैसेकथनकरते । औरतत्त्वदीपनाचार्यतिस यभावपदकोत्रैकालिक अभावपरताकरकैसे व्याख्यानकरते । तिस कारणसेसंप्रदायके जाननेवालोंने यहपक्षयवश्यस्वीकार कियाहै । यातेयहपक्षयसांप्रदायिकनहीं । यहसिद्धहुया इति ॥ ४॥ * अथपूर्वपक्ष ॥ जीवन्मुक्तिकेअभावप्रतिपादन द्वारासंप्रदायकालापनिरूपण । ॐ शंका ।। हेसिद्धांतिन् विद्याकोअविद्याका उपमर्दकपनायुक्त नहीं।क्योंकिजीवन्मुक्तिका अभावप्राप्तहोताहै। तथाहि ॥ यदि विद्याकोयविधाका उपमर्दकमाने तो विद्वान्कोविद्याकी उत्पत्ति सेअनंतर कार्यसहित अविद्यासमूल विनाशकोप्राप्तहोगी । तिससे तिसीकालमेंविदेह कैवल्यकीप्राप्तिहुए तात्कालिकहीविद्वान्केदेह का पातहोगा ।। यातेजीवन्मुक्तिका यभावप्राप्तहोगा। शंका ॥ समूल अविधाकी निवृत्तिहोतीहै। यहकथनहीनहीं संभवता।क्योंकि अविधाको अनादि होनेसे तिसके मूलकी अनुपपत्तिहै । और यधिष्ठानहीअविथकामूलहै । यहकथनभीनहींसंभवता । क्योंकि तिसकोएकसत्यरूप होनेकर कल्पितपनेका असंभवहै । औरयदि अधिष्टानकोभीकल्पित मानले तोशून्यताकीप्राप्तिहोगी। समाधान यहाँइसशंकाकीप्राप्तिनहींहोती।क्योंकि "यहम्" इत्याकारकजोयध्या सहै तिसकोयविधाकहतेहैं।भाष्यकारश्रीशंकराचार्यांनतेसेहीकहाहै।।

. उत्तराई * तमेतमेवलक्षणमध्यासंपंडिताअविद्येतिमन्यन्तेक अ० पूर्वजिसमेंयाक्षेपकियागया पुनः जिसमेंसमाधानकिया गया।इसप्रकारकेलक्षणवालाजोयध्यासहै। तिसकोवेदांतशास्त्रकेवेता पंडिन “यविद्या" मानतेहैं ॥ इति ॥ तिसअध्यासरूपवियाका । कार्यकर्तृत्वादिहैं। औरतिसयध्यासकामूलमूलावियाहै।यातेसमूल थविद्याकी विद्यासे निवृत्तिहोतीहै यहकथनसंभवताहै ॥ शंका ॥ सकार्यतथासमूलयविद्याकेनाशहोनेसे विदेहमुक्तिसिद्धहोजायेगी। फिरजीवन्मुक्तिसे क्याप्रयोजनहै।। समाधान ॥ तैसेमानेहुएसंप्रदाय काउच्छेदहोगा ॥ बयोंकि "श्रोत्रियंब्रह्मनिष्ठम्” इसविशेषणसेजिस पुरुषकोसाक्षात्कार उत्पन्नहुआहै तिसकोहीयाचार्य्यपनाहै । और तिसकोतात्कालिकयर्थातज्ञानसमकालहीविदेहकैवल्यकीप्राप्तिहोनेसे ब्रह्मविद्याकाउपदेशकौनकरेगा । औरउपदेशकेयभावहुए ब्रह्मविद्या कीसंप्रदायकैसेप्रवृतहोगी।यातेसंप्रदायकाप्रभावहोनेकर वेदान्तोंको अवोधकतालक्षण थप्रमाणताकीमाप्तिहोगी ।। शंका ।। तत्वज्ञानसे उत्तरकालमेंही विद्वान्केदेहकापातहोताहै यहकथनयुक्तहै । क्यों किदेहकाकारणजोपाख्धकर्मकाशेषहै सोविद्यमानहै।ौरमाधकर्म भीतत्त्वज्ञानसे निवृत्तहोजाताहै यहकथनभीनहींसंभवता। क्योंकि प्रारब्धकर्मसे ज्ञानकाविरोधनहीं।। पौरप्रारब्धकर्मके याश्रितज्ञानकी उत्पत्तिहोनेकरभी तिसकीनिवृत्तितत्त्वज्ञाननहींकरता। यातेप्रारब्धकर्म केवलसेविद्वानकेशरीस्कापातनहीं होता तिससेउपदेशादिसर्वव्यवहार संभवताहै।। समाधान ।। यद्यपितत्त्वज्ञानका प्रारब्धकर्मसेविरोधनहीं तथापि वह प्रारब्धकर्म उपादान कारणसे विना तो स्थित नहीं.

० सं० मु० भा० केयभावकोवाधबोधनकरताहे।इसप्रकारप्रसिद्धयधिष्ठानमेयभावप्रति योगित्वहीमिथ्यात्वहै । इसकथनसेयहीपक्षतिन्होने स्वीकारकियाहै। यदिविवर्णाचार्योंकोयहपक्षस्वीकारनहोता । तोरजतकंग्रभावको वाधवोधनकरताहै । यहकैसेकथनकरते । शौरतत्त्वदीपनाचार्यतिस अभावपदकोकालिक अभावपरताकरकैसे व्याख्यानकरते । तिस कारणसेसंप्रदायके जाननेवालोंने यहपक्षयवश्यस्वीकारकियाहै । यातेयहपक्षयसांप्रदायिकनहीं । यहसिद्धहुया इति ॥ ११॥ * अथपूर्वपक्ष ॥ जीवनमुक्तिकेअभावप्रतिपादन द्वारासंप्रदायकालोपंनिरूपण । शंका ॥ हेसिद्धांतिन् विद्याकोयविद्याका उपमर्दकपनायुक्त नहीं।क्योंकिजीवन्मुक्तिका अभावप्राप्तहोताहै । तथाहि । यदि विद्याकोयविद्याका उपमर्दकमाने तो विद्वान्कोविद्याकी उत्पत्ति सेयनंतर कार्यसहितयविधासमूल विनाशकोप्राप्तहोगी । तिससे तिसीकालमेविदेह केवल्यकीप्राप्तिहुए तात्कालिकहीविद्वान्केदेह का पातहोगा ।। यातेजीवन्मुक्तिका यभावप्राप्तहोगा। शंका ।। समूल अविषाकी निवृत्तिहोतीहै। यहकथनहीनहीं संभवता।क्योंकि अविषाको यनादि होनेसे तिसकमृत्लकी अनुपपत्तिहै । और यधिष्ठानहीअविद्याकामूलहै । यहकथनभीनहींसंभवता । क्योंकि तिसकोएकसत्यरूप होनेकर कल्पितपनेका असंभवहै । औरयदि अधिष्टानकोभीकल्पित मानलें तोशून्यताकीप्राप्तिहोगी। समाधान यहांइसशंकाकीप्राप्तिनहींहोती।क्योंकि "यहम्” इत्याकारकजोअध्या सहै तिसकोअविद्याकहतेहैं।भाष्यकारश्रीशंकराचार्यांनतेसेहीकहाहै।।

उत्तराई । तमेतमेवलक्षणमध्यासंपंडिताअविद्येतिमन्यन्ते अगा पूर्वजिसमेंयातेपकियागया पुनःजिसमेंसमाधानकिया गया|इसप्रकारकेलक्षणवालाजोयध्यासहै। तिसकोवेदांतशास्त्रकेवेता पंडित “अविद्या" मानतेहैं ॥ इति ॥ तिसअध्यासरूपअविधाका कार्यकर्तृत्वादिहैं। यौरतिसयध्यासकामूलमूलायविगहै।यातेसमूल अविद्याकी विद्यासे निवृत्तिहोतीहै यहकथनसंभवताहै ॥ शंका ॥ सकार्यतथासमूलअविद्याकेनाशहोनेसे विदेहमुक्तिसिद्धहोजायेगी। फिरजीवन्मुक्तिसे क्याप्रयोजनहै।। समाधान ॥ तैसेमानेहुएसंप्रदाय काउच्छेदहोगा ।। क्योंकि "श्रोत्रियंब्रह्मनिष्ठम्" इसविशेपणसेजिस पुरुषकोसाक्षात्कार उत्पन्नहुयाहै तिसकोहीयाचार्यपनाहै । और तिसकोतात्कालिकयर्थातज्ञानसमकालहीविदेहकैवल्यकी प्राप्तिहोनेसे ब्रह्मविद्याकाउपदेशकौनकरेगा ।। औरउपदेशकेयभावहुए ब्रह्मविद्या कीसंप्रदायकैसेप्रवृतहोगी।।यातेसंप्रदायकायभावहोनेकर वेदान्तोंको अबोधकतालक्षण अप्रमाणताकी प्राप्तिहोगी ।। शंका ।। तत्त्वज्ञानसे उत्तरकालमेंही विद्वान्केदेहकापातहोताहै यहकथनयुक्तहै ।। क्यों किदेहकाकारणजोपारब्धकर्मकाशेपहै सोविद्यमानहै।ौरमारब्धकर्म भीतत्त्वज्ञानसे निवृत्तहोजाताहै यहकथनभीनहींसंभवता ।। क्योंकि प्रारब्धकर्मसे ज्ञानकाविरोधनहीं।। औरमारब्धकर्मके याश्रितज्ञानकी उत्पत्तिहोनेकरभी तिसकीनिवृत्तितत्त्वज्ञाननहींकरता। यातेपारधर्म केवलसेविद्वानकेशरीरकापातनहींहोता।तिससेउपदेशादिसर्वव्यवहार संभवताहै।। समाधान ॥ यद्यपितत्त्वज्ञानका प्रारब्धकमसेविरोधनहीं तथापि वह प्रारब्धकर्म उपादान कारणसे विना तो स्थित नहीं १० मि० ० भा० सकता। क्योंकिभावकार्यनिरूपादानकहींदेखानहीं।ौरयदिवहउपा दानकेसहितहैतोक्यायात्मातिसकाउपादानहै।यथवायविद्यातिसका उपादानहै? इनमेंप्रथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकिग्रात्माकोयकारण होनेकरतिगकी उपादानताकायसंभवहै।।ौरयदिद्वितीयपक्षकहो तो तिसमेंयहविचारकर्तव्यहै।क्यावहयविद्यानिवृतहोगईहै।अथवास्थितहै? प्रथमपक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिपारब्धकोभी अविद्याकाकार्यहोने करतिसयविद्याकेयभावहुएवहकैसेस्थितहोसकताहै ।किंतुनहींस्थित होसकता। जैसेतन्तुकेयभावहुए पटकीस्थितिकिसीप्रकारभीनहींहो सकती।यौरपारब्धकर्मक फलभोगकानिर्वाहकरूपताकर तत्त्वज्ञानसे उत्तरकुछकालतक अविद्यास्थितरहतीहै। यदियहदितीयपक्षमानो तो यहभीनहींसंभवता ।। क्योंकिविद्यानिष्ठ जोगविद्याकेउपमर्दकपनेका स्वभावहै तिसकीहानिहोगी। औरयदियहकहो किप्रारब्धकर्मकेनिवृत्त होनेसेअनन्तरही विद्यामेंयहस्वभावहोताहै।प्रथमनहीं।सोयहकथनभी यसंगतहै। क्योंकिएकपदार्थमें दोस्वभावअंगीकारनहीं हैं। अन्यथा अमिमेंभीदाहकत्वतथायदाहकत्व इनदोस्वभावोंकीप्राप्तिहोगी। और यदिऐसेकहो ॥ किप्रथम ज्ञानसे यावरणाशक्तिप्रधानयज्ञान निवृत्त होताहे।यौरप्राधकर्मकेनिर्वाहकरनेकेलिये विक्षपशक्तिमधानयज्ञान निवृत्तनहींहोता ।। सोयहकथनभीनहींसंभवता ।। क्योंकिदोयज्ञानों कायभावहै । एकहीयज्ञान सिद्धांतमेंस्वीकारहै ॥ यद्यपिएकही अज्ञान उभयशक्तिविशिष्टहै तथापिएकहीकालमेंएकपदार्थकीस्थिति तथानिवृत्तिकाविरोधहै । औरयदिऐसेकहो कियज्ञानकीशक्तिमात्र हीज्ञानसेनिवृत्तहोतीहै ॥ सोयहकथनभीसमीचीननहीं ॥ क्योंकि उत्तराई ४२१ पक्तियोशक्तिकालेकायभेदहै। अथवाभेदहै? यहविचारकर्तव्यहै ।। यदिप्रथमपक्षकहो तोयज्ञानकीनिवृत्तिभीअवश्यमाननीहोगी।केवल शक्तिकोनिवृत्तिहीविवक्षितहै यहकथननहींसंभवेगा । औरद्वितीय पनौतोयज्ञानरूपधर्माकी निवृत्तिहीनहींहोगी।क्योंकिशपप्रारब्धकर्म केभोगसेपूर्वयावरणशक्तिमात्रकोज्ञाननिवृत्तकरता है औरतिसकर्मभोग सेउत्तरकालमेंविक्षेपशक्तिको निवृत्तकरताहै । औरशक्तिकायज्ञानसे भेदहै।।याते यज्ञानरूपधर्माके निवर्तककाअभावहोनेसेतिसकीनिवृत्ति नहींहोगी । औरप्रारब्धकर्मकीनिवृत्तिसे यज्ञानथापहीनिवृत्तहोजाये गा। यहकथनभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिप्रारब्धकीनिवृत्तिप्रमाणरूप नहीं । शंका॥ यज्ञानकेनिवर्तकका अभावयसिद्धहै। क्योंकिज्ञान हीग्रज्ञानकानिवर्तकहै सोविद्यमानहै।।यद्यपिऐसेमानेहुए जीवन्मुक्ति कीसिद्धिनहींहोगी।। तथापिशेषप्रारब्धकर्मकर वहज्ञानप्रतिवद्धहोताहै औरयप्रतिवद्धकारणहीकार्यकाजनकहोताहै। यातशेषकर्मकीनिवृत्ति हुएप्रतिबंधककाअभावहोनेकरअप्रतिवद्ध हुआतत्त्वज्ञानअज्ञानकोबाध करेगा। समाधान ॥ हेसिद्धांतिन्प्रारब्धकर्मकेनाशहुए ज्ञानकाही अभावहै । औरयदिऐसेकहो किपाधकेनाशसेयनन्तर शरीरका नाशहोजाताहै। क्योंकिपारधकर्मकानाशशरीरनाशमें हेतुहै। तिस कारणसेपारधर्मकेनाशकीउत्पत्तिकालमेंप्रतिबंधककायभावहै। और देहादिकारणसमुदायभीविनाशअवस्थाके सम्मुखहुयाविद्यमानहै ।। योतज्ञानतिसकालमेंउत्पन्नहोकर यज्ञानकाबाधकरेगा। सोयहकथन भीसमीचीननहीं। क्योंकिपारधर्मकाशेपदेहरूपहीहै तिससेभिन्न तिसकाकारणरूप औरकोईशेपशब्दकार्थनहींहै। क्योंकिदेहादिफल २० सि० मुः भा० रूपताकरपरिणामकोप्राप्त एकर्मका औरकोईरूपांतरनहीं ।। तैसेमाने हुए शेषकाजोनाशहै तिसीकोदेहपातकहतेहैं ।। तिसकर्मशेषरूपदेह केपातसेयनन्तरकारणकेयभावसेज्ञानकाहीअभावहैतोयज्ञानकोकौन निवृत्तकरेगा ॥ औरदेहपातसेपूर्व प्रारब्धकर्मकरज्ञानप्रतिवद्धहै। याते श्रज्ञानके निवर्तककाअभावसिद्धहै ॥शंका ।। हेवादिन्यद्यपिमूलाऽ विद्यातोज्ञानकरनिवृत्तहोगई है।तथापितिसका संस्कारजोलेशाविद्या नामसेकहाजाताहै तिसकीयनुवृत्तितोसंभवती है।।यौरज्ञानतथाक्रिया काहीसंस्कारहोताहेयहनियमनहीं।किंतुवस्तुकाभीसंस्कारहोताहै।क्योंकि संस्कारकोनाशमानकर प्रयुक्तताहै तिसकारणसेयपरोक्षयात्मानिष्ठ संस्काररूपदोपकेवशसे देहादियनात्माकारप्रतीतिकासंभवहोजायेगा यातेजीवन्मुक्तिकी सिद्धिहोजायेगी। औरयदिज्ञानतथाक्रियाका हीसंस्कारहोताहै यहनियममाने तोसंस्कारशब्दका अन्यहीअर्थहै लेशाऽविद्याजोयविद्याकी अवस्थाविशेपहै तिसीकोसंस्कारकहतेहैं तिससे विद्वान् के शरीरादिकोंकी प्रतीतिका संभवहोजायेगा । समाधान ॥ तिससंस्कारकोभी अविद्याकाकार्यपनाहै। अर्थयहकि प्रथमसंस्कारको यनादिपनातोनहींसंभवता । अन्यथासंस्कारपनेका हीयभावप्रसंगहोगा।औरयदितिसकोसादिमाने तो तिसका उपादान क्यायात्माहै अथवायविद्याहै ? । प्रथमपततोनहीं संभवता क्योंकि यात्माकोनिर्विकार होनेसेकारणताका श्रभावहै । औरयदिद्वितीय पक्षकहोतोयविद्याके नाशहुएवह संस्कारकैसेस्थितहोगा। क्योंकि उपादानकाहीअभावहै । और भावकार्यउपादानसहितहीहोताहै यहनियमहै । शंका । अविद्याकीयवस्थाविशेषही लेशशब्दका उत्तराई वाच्यहुई संस्कार नामसेकहीजातीहै । समाधान ॥ तिसअवस्था विशेषकाविद्यासे भेदतथाअभेद निरूपणनहींहोसकता। क्योंकि यदियवस्थाविशेषका अविद्यासेभेदमाने तोतिसकीवहश्रवस्थानहीं होगी। औरयदिअभेदमाने तोतिसमेंसंस्कारशब्दका प्रयोगकरना निष्फलहै । औरशक्तिपक्षमें कथनकियेहुएदोपोंकी प्राप्तिहोनेसे भी यहपक्षययुक्तहै ॥ शंका ॥ (तस्यतावदेवचिरम्) श्र०॥ तिसविद्वान्को तबतकहीविदेहकैवल्यमें विलंबहै । और (सचक्षुरचक्षुरिव ) य० ॥ वहविद्वानवास्तवसे नेत्रादिइन्द्रिय रहितहै।परन्तुबाधिताऽनुवृत्तिसेनेत्रादिइन्द्रिय सहितकीन्याइहै। और * प्रजहातियदाकामान् सर्वान्पार्थमनोगतान् । (म. गी० अ० २१ (५५) १० ॥ हेयर्जुनजिसकालमें यहविदान्मनमें प्राप्तसर्वकाम नाथोंकोत्यागदेताहै । इत्यादिकश्रुतितथास्मृतिकी प्रमाणतासे विद्धानको विदेहकैवल्यकीमाप्तिमें विलंबमतीतहोताहै । तिसकारण सेतिसकेशरीरको स्थितिकल्पनाकीजातीहै। औरवहशरीरकी स्थिति प्रारब्धकर्मसेविना अनुपपन्नहुईतिसकर्मकीभी कल्पनाकरातीहै ।। यातेजीवन्मुक्तिकी सिद्धिहै ॥ समाधान ॥ (उभेइहैवैषएते तति) य० ॥ यहविद्रानज्ञानसमकालही पुरायतथापापरूप दोनोंकर्मीकोनाशकरताहै ॥ ौर (क्षीयन्तेचास्यकर्माणि) थ० ।। इसविद्वान्के कर्मनाशहोजातेहैं । और (ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि) अ० ॥ ज्ञानरूपअग्निसर्वकर्मोको भस्मकरदेता ।

३०सि० मुः भा० रूपताकरपरिणामकोप्राप्तहुएकर्मका औरकोईरूपांतरनहीं ॥ तैसेमाने हुए शेषकाजोनाशहै तिसीकोदेहपातकहतेहैं । तिसकर्मशेषरूपदेह केपातसेयनन्तरकारणकेयभावसेज्ञानकाहीप्रभावहैतोअज्ञानकोकौन निवृत्तकरेगा ॥ औरदेहपातसेपूर्व प्राधकर्मकरज्ञानप्रतिवद्धहै। याते अज्ञानके निवर्तककायभावसिद्धहै ॥शंका ॥ हेवादिन्यद्यपिमूलाऽ विद्यातोज्ञानकरनिवृत्तहोगई है।तथापितिसका संस्कारजोलेशा विद्या नामसेकहाजाताहै तिसकीअनुवृत्तितोसंभवती है।ौरज्ञानतथाक्रिया काहीसंस्कारहोताहेयहनियमनहीं।किंतुवस्तुकाभीसंस्कारहोताहै।क्योंकि संस्कारकोनाशमात्रकर प्रयुक्तताहै तिसकारणसेअपरोक्षयात्मानिष्ठ संस्काररूपदोपकेवशसे देहादियनात्माकारप्रतीतिकासंभवहोजायेगा यातेजीवन्मुक्तिकी मिद्धिहोजायेगी। यौरयदिज्ञानतथाक्रियाका हीसंस्कारहोताहै यहनियममाने तोसंस्कारशब्दका अन्यहीयर्थहै लेशाऽविद्याजोयविद्याकी अवस्थाविशपहै तिसीकोसंस्कारकहतेहैं तिससे विद्वान् के शरीरादिकोंकी प्रतीतिका संभवहोजायेगा। समाधान ।। तिमसंस्कारकोभी विद्याकाकार्यपनाहै। अर्थयहकि प्रथमसंस्कारको अनादिपनातोनहींसंभवता । अन्यथासंस्कारपनेका हीयभावप्रसंगहोगा।औरयदितिमकोसादिमाने तो तिसका उपादान क्यायात्माहै अथवायविद्याहै ? । प्रथमपक्षतोनहीं संभवता क्योंकि यात्माकोनिर्विकार होनेसेकारणताका अभावहै । औरयदिद्वितीय पक्षकहोतोयविद्याके नाशहुएवह संस्कारकैसेस्थितहोगा। क्योंकि उपादानकाहीअभावहै । और भावकार्यउपादानसहितहीहोताहै यहनियमहै ॥ शंका ॥ यविद्याकीयवस्थाविशेपही लेशशब्दका उत्तराद . वाच्यहुईसंस्कार नामसेकहीजातीहै ।। समाधान ॥ तिसअवस्था विशेषकाविद्यासे भेदतथायभेद निरूपणनहींहोसकता। क्योंकि यदिअवस्थाविशेषका अविद्यासेभेदमाने तोतिसकीवहअवस्थानहीं होगी। औरयदिअभेदमाने तोतिसमेंसंस्कारशब्दका प्रयोगकरना निष्फलहै । औरशक्तिपक्षमें कथनकियेहुएदोपोंकी प्राप्तिहोनेसे भी यहपक्षप्रयुक्तहै ॥ शंका ॥ (तस्यतावदेवचिरम् ) श्र० ॥ तिसविद्वानको तबतकहीविदेहकैवल्यमें विलंबहै । और (सचक्षुरचक्षुरिव ) य० ॥ वहविद्वान्वास्तवसे नेत्रादिइन्द्रिय रहितहै।परन्तुबाधिताऽनुवृत्तिसेनेत्रादिइन्द्रिय सहितकोन्याईहै। और * प्रजहातियदाकामान् सर्वान्पार्थमनोगतान् । (भ० गी० अ० २।(५५) श्र० ॥ हेअर्जुनजिसकालमें यहविद्वानमनमें प्राप्तसर्वकाम नायोंकोत्यागदेताहै । इत्यादिकश्रुतितथास्मृतिकी प्रमाणतासे विद्धानको विदेहकैवल्यकीप्राप्तिमें विलवपतीतहोताहै | तिसकारण सेतिसकेशरीरकी स्थितिकल्पनाकीजातीहै। पौरवहशरीरकीस्थिति मारब्धकर्मसेविना अनुपपन्नहुईतिसकर्मकीभी कल्पनाकरातीहै ।। यातेजीवन्मुक्तिकी सिद्धिहै ॥ समाधान ॥ (उभेइहैवैपएते तरति) य० ॥ यहविद्वानज्ञानसमकालही पुरायतथापापरूप दोनोंकर्मोकोनाशकरताहै ॥ ौर (क्षीयन्तेचास्यकर्माणि) य० ॥ इसविद्वान्के कर्मनाशहोजातेहैं । और (ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि ) य० ॥ ज्ञानरूपअग्निसर्वकाँको भस्मकरदेता ॥ ।

वे०सि० मु० भा० है । इत्यादिकश्रुतितथास्मृतिका विरोधहोनेसे कल्पनाकीअनुपपत्ति है । यद्यपिजीवन्मुक्तिकायभाव मानेहुए जीवन्मुक्तिकेप्रतिपादक वचनोंकाविरोधहोगा । तथापियध्ययनविधिका विरोधहोनेकर जीवन्मुक्तिके प्रतिपादक्वचनोंका स्वार्थमंतात्पर्य्यनहीं।यातेनिनका विरोधनहीं ॥ शंका ॥ यद्यपिजीवन्मुक्तिकाप्रतिपादन साक्षातिन वचनोंकाप्रयोजननहीं। तथापिसुखस्वरूपयात्माके साक्षात्कारकेहेतु जोश्रवणादिसाधनहैं। तिनमेंप्रवृत्तिकेजनकहोनेकर परंपरासेजीवन्मु क्तिकाप्रतिपादनतिनकाप्रयोजनहै।यातेस्वार्थमेतिनकातात्पर्य्यसंभवता है। समाधान।। जीवन्मुक्ति के प्रतिपादनकरनेवालेशास्त्रकोश्रवणा दिकोंमेंप्रवृत्तिकीजनकतास्वीकारकरेहुएयहविचारणीयहैक्यावहशास्त्र श्रवणादिकों मेंसाक्षातहीमुमुनुपुरुषोंकीप्रवृत्तिकराताहै। अथवाश्रवण यादिकोंकेविधायकवाक्यका शेषरूपहोकरप्रवृत्तिकराताहै?|प्रथमपक्ष तोनहींसंभवता।क्योंकितिसमें विचारके विधानकरनेवालेपदकायभाव है। औरयदिश्रवणादिविधिका यर्थवादरूपवहशास्त्रहैयहद्वितीयपक्ष मानो तोस्वार्थ में तिसकोप्रमाणतानहींहोगी ।। शंका।। जहांप्रमाण काविरोधहो। अथवाप्रमाणकासंवाद होतहांअर्थवादवाक्योंकोप्रमाण तानहींहोती ।। औरयहांतोवहदोनोंहीनहीं याते "देवतायधिकरण न्याय" सेतिनकोस्वार्थ मेंप्रमाणताकैसेनहींहोसकती॥ समाधान ।। शुक्तिकेसानात्कारहुए कार्यसहितयविद्याकावाधहोताहै। औरशुक्ति केसाक्षात्कारकायभावहुए सकार्ययविद्याकावाधनहींहोता ॥ इस प्रकारका अन्वयव्यतिरेकरूपलौकिकप्रमाणहै। और (क्षीयंतेचास्यकमाणि) इत्यादिवैदिकप्रमाणहै ॥ तिनदोनों उत्तराई ४२५ काविरोधहोनेसे देवताऽधिकरणन्यायकी यहांप्राप्तिनहीं होसकती यातेजीवन्मुक्तिकेप्रतिपादकशास्त्रकरविद्वान्केदेहकी स्थितिनहींकल्प नाकरसकते ॥ शंका ॥ जैसेधनुपसेछूटेहुए चाणकीक्रियाकाप्रारंभ कियेहुएवेगके नाशसेहीनाशहोताहै अन्यप्रकारसेनहीं। तैसेपारब्ध कर्मकाभोगरूपकार्यके नाशसेहीनाशहोताहै अन्यकिसीप्रकारसेनहीं। इसप्रकारशास्त्रकारोंने प्रारब्धकर्मकीस्थितिसिद्धकीहै । यातेजीवन्मु क्तिकासंभवहै ॥ समाधान ॥ दृष्टांतकीविषमताहोनेसेपूर्वकथन नहींसंभवता । क्योंकिदृष्टांतमें तोक्रियाकेउपादानभूताणकानाश नहींहुया ॥ यातेप्रारब्धवेगकेक्षयसे तिसकानाशसंभवताहै । और दार्टीतमें तोप्रारब्धकर्मकेउपादानभूत अज्ञानकीभीनिवृत्तिहुई है । यातेतिसकी स्थितिनहींसंभक्ती ॥ शंका ।। अनारब्धकार्यएवतुपूर्वतदवधेः ॥ उ०मी०॥४॥२॥१५ ** श्र० ॥ यहअधिकरणसूत्रहै। यहांराधिकरणारचनाऐसेहै ।। ज्ञानजन्यजोकर्मकाविनाशहै वहफ्यासकलरूपतासे कर्ममात्रकाहोता । अथवा प्रारब्धकर्मसेभिन्नकर्मकाविनाशहोताहै? ! यहसंशयहै । तहांपूर्वपक्षप्राप्तहुश्रा ।। (क्षीयन्तेचास्यकाणि) इसश्रुतिमें सामान्यरूपतासेसकलकाकाविनाशश्रवणहोताहै। यातकर्ममात्रका विनाशहोताहै।। इसप्रकारपर्वपक्षकेप्राप्तहुए सिद्धांतनिरूपणकरतेहैं। जोपुरायतथापापरूपकर्मइसदेहमसुखतथादुःखकेअनुभवयर्थप्रवृत्तहुए हैं वहमारब्धकार्यवालकहेजातेहैं। तिनसेभिन्न जोयनारधकार्यवाले कर्मजोयनादिसंसारचक्रज्ञानकी उत्पत्तिपर्यन्तसंचयकियेहैं वही विनाशकोप्राप्तहोतेहैं। मारधर्मविनाशकोनहींप्राप्तहोते । क्योंकि

सिमु. भा.
* तस्यतावदेवचिरंयावन्नविमोक्ष्येऽथसंपत्स्ये ॥*
छां० उ० अ०६ख १२
श्र० ॥ तिसविद्वान्कोतवतकहीविलंबहै जबतकपारधर्मको
भोगकर शरीरकोनहीं त्यागता । तिससेयनन्तर विदेहकैवल्यकोप्राप्त
होताहै । इसश्रुतिसे विद्वान्के देहपातका अवधिसुनाजाताहै इस
प्रकारसूत्रकारोंने जीवन्मुक्तिका उपपादनकियाहै । और
* नवारब्धकार्ये सामिमुक्तफले
अ० ॥ प्रारब्धकार्यवालेजोकर्मजिनकानाधाफलभोगलियाहै
तिनकाविनाशनहींहोता। इत्यादिग्रंथकरभाष्यकारोंनेभी जीवन्मुक्ति
कापतिपादनकियाहै। और ॥
नत्वारब्धविपाकंसंपादितजात्यायुवितेत्यादिना
य० ॥ जातितथाथायुयोरधनरूप फलकाजिनकर्मोंनेग्रारंभ
कियाहै तिनकाज्ञानसेविनाश नहींहोता । इत्यादिग्रंथकरवाचस्पति
मित्रोंनेभीजीवन्मुक्ति प्रतिपादनकीहै । तथा
*ननुकर्मणामपिनिवृत्तत्वात्कथंद्वैतदर्शनं ।
नैपदोपइत्यादिना ॥
ग्र० ॥ शंका ॥ ज्ञानसेसर्वकर्मोकोभी निवृत्तहोनेसे पुनः
विधानकोंदैतदर्शनकैसेभंभेगा ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यहदोपनहीं
इत्यादिग्रंथसे विवरणाचायोंनेभी जीवन्मुक्तिकथनकीहै । और ॥
* आरब्धफलशेपैकहेतुत्वान्देहसंस्थितेः ।
रागादिप्रत्योतिरिपुचक्रादिवेगवत ॥ॐ

उत्तराई अ०॥ प्रारब्धकर्मकेफलकाशेपही विद्वान्केदेहकी स्थितिकाएक हेतुहै इसीकारणसे तिसकोरागादि प्रत्ययोंकी उत्पत्तिकासंभवहै । यहांरागादिकोंकीप्रतीति थाभासरूपजाननी । जैसेपारब्धवेगवाले वाणकीक्रियाकावेगके नाशसेही नाशहोताहै। थौरकुलालकेचक्रकी क्रियाकाभीप्रारब्धवेगकेनाशमेहीनाशहोताहै । तैसेविदानकेदेहका पातभीप्रारब्धकर्मकेफलभोगसे अनन्तरहींहोताहै । इत्यादिग्रंथकरके वार्तिककारोंनेभीजीवन्मुक्तिका उपपादनकियाहै । तिसजीवन्मुक्ति केनस्वीकारकरनेसे तिनसर्वमहानुभावोंकाकथन प्रयुक्तहोगा । क्योंकियप्रामाणिकपर्थकाजोशास्त्रकारोंने उपपादनकरनाहैसोव्यर्थ है।।ौरजीवन्मुक्तिविषयक सर्वलोकोंकी प्रसिद्धिकाभीव्याघातनहीं होसकतागातजीवन्मुक्तिसंभवे ।। समाधान।। शिष्यको विद्यावत्ता होनेकरगुरुविषयक श्रद्धाहोजायेगी। तिसयश्रद्धाकीनिवृत्तिरूप प्रयोजनहोनेकर तिनमहानुभावोंकाकथननिष्फलनहीं किंतुसफलहै यौरजीवन्मुक्तिमप्रमाणका अभावहोनेकर लोकमसिद्धितोथन्धपरं परारूपहोनेसे त्यागनेयोग्यहै । इसप्रकार सर्वदोपोंसे रहित रूपताकर उपपादनकियेहुए विदेहमुक्तिपक्षको समाप्तकरते हुए पूर्वपक्षकाफल निरूपणकरतेहैं ॥ पूर्वउक्तमकारसे विद्याको अविद्याकाउपमर्दक स्वभावहोनेकर विद्वान्कोज्ञान समकालही 'मुक्तिकेमाप्तहुए उपदेष्टाकेयभावसे विद्याकीउत्पत्ति किसहेतुसे होगी किंतुकिसीहेतुसेनहींहोगी । तिससेसंभदायकालोपप्राप्तहोगा। शंका । विद्याकीउत्पत्ति याचार्यक्याकरेगा। क्योंकियापहीयह अधिकारीतर्कादिकोंसे विद्याकोसंपादनकरलेगा । यातेविद्याकी वै० मि. १० भां० उत्पत्तिसंभवेहै ॥ समाधान ॥ याचार्यकीयपेक्षासेविनाहीविद्या उत्पन्नहोजायेगी यहकथननहींसंभवता । क्योंकिऐसामाननेसेबहुत श्रुतिवचनोंकाविरोधप्राप्तहोताहै।।तथाहि (आचार्यवान्पुरुषोवेद) अ० ॥ आचार्यवालापुरुपहीयात्माकोजानसकताहै । और [नेपातर्केगामतिरानेया] अ० ॥ हेनचिकेतायहयात्मविद्या तर्कसेप्राप्तहोनेयोग्यनहीं और [प्राप्यवरान्निवोधत] १० ॥ उत्कृष्टयाचार्योको प्राप्तहोकरतुमयात्मतत्त्वकोजानो ॥ और *आचार्य्यस्तेगतिंवक्ता छा० अ० ४ ख. १४ क.१४ य०॥ हेब्राह्मण याचार्यहीतुझकोमोक्षमार्गकाउपदेशकरेगा और *अनन्यप्रोक्तगतिरत्रनास्ति । प्रोक्तान्येनैवसु ज्ञानायप्रष्ट ॥क० उ० ॥ अ० १ २० २ ० ८॥६॥ य० ॥ श्रभेदवादिग्राचार्यकर कथनकियेहुए आत्मतत्त्व विषयकसंशयनहींहोता । और हेप्रियतमभेदवादीसेभिन्नब्रह्मवेत्ता याचार्यकर कथनकियेहुए वेदान्तवाक्ययपरोक्षयोधकेयर्थहोतेहैं । इत्यादिश्रुतिवचनोंनेश्राचार्यसापेक्षहीब्रह्मविद्याकी उत्पत्तिकथनकीहै। औरपूर्वउक्तरीतिसेथाचार्यकाअभावहै। यातेविद्याकीउत्पत्तिनहींसंभ वती ।। इतिपूर्वपक्ष ॥ अथसिद्धांत ॥ तात्कालिकमुक्तिपक्षकास्वीकारतथासंपदायके लोपकापरिहार॥ समाधाम ॥ हेवादिन ज्ञानसमकालहीविदेहकैवल्यकीप्राप्ति विद्धान्कोहोतीहै।यहपक्षहीश्रेष्टहै । औरविद्याकी संप्रदायकायभाव उत्तरार्द्ध होनेकरविद्याकाअसंभवरूपदोपजोपूर्वपक्षीनेकहाथा।सोभीनहींसंभवता क्योंकि स्वअज्ञानकर कल्पिताचार्यविधमानहै ॥ शंका ॥ हे सिद्धांतिन् कल्पितजोमिथ्यारूपयाचार्यहै।तिसको उपदेष्टापनाकैसे संभवेगा । औरयदिमिथ्याकोभी उपदेष्टापनामानलें। तोअर्थक्रिया काकर्ताहोनेसेतिसकोमिथ्यापनानहींसंभवेगा|क्योंकिमिथ्यापदार्थयर्थ कासाधकनहींहोता । अन्यथामरूभूमिकेजलसेभी पिपासाउपशम हुईचाहिये | समाधान ॥ *मू०॥ कल्पितोप्युपदेष्टास्याद्यथाशास्त्रंसमादिशेत्। नचाविनिगमोदोषोऽविद्यावत्वेननिर्णयात्॥४२॥ स्वैयाछंद ।। मिथ्यावेदसत्यजिमबोधक तिमकल्पितगुरुदेउपदेश ।। असत्प्रतिश्विविवसत्बोधक वादृष्टांतलखोरिददेश ।। विनिगमविरहदोपनहियावत यामेंहैइकहेतुविशेष ।। अविद्यावानशिष्यहैकल्पल्यानिर्णयतेतजोक्लेश॥३६॥ टी० ॥ हेवादिन यद्यपिपूर्वग्राचार्यका अभावकथनकियाहै। तथापिकल्पितभी अचार्यसत्यकीन्याईसम्यकउपदेशकरसकताहै ॥ शंका ।। तिसकल्पितग्राचार्यको उपदेष्ठापनायुक्तनहीं। क्योंकिवह निस्वरूपहै। समाधान हेवादिन निःस्वरूपयदितुमतुच्छपदार्थको कहो तोवहहम अंगीकारनहींकरते ॥ औरयदिमिथ्याकानामनिःस्व रूपहै तोतिसकोउपदेशकर्तृत्ववनजायेगा । क्योंकिजैसेकल्पितभी वेदस्वार्थकोबोधनकरदेताहै । तैसेकल्पितभीयाचार्यउपदेशकरदेगा। यौरतत्त्वसाक्षात्कारसे प्रथमअधिकारीको थाचार्यनिष्ठमिथ्यात्वज्ञान काश्रभावहै।ौरतत्त्वसाक्षात्कारसेयनंतरयाचार्यकी अपेक्षाकायभाव वे० सि० मु० मा० होनेसेकोईदोपनहीं ॥ औरशास्त्रकोअपौरुषेयहोनेसे तिसकोकल्पित पनानहींसंभवता यहजोमीमांसककहतेहैं। तिनके प्रतियन्यउदाहरण निरूपणकरतेहैं ।। जैसेकल्पितभीप्रतिवित्र सत्यविवकीप्रतीतिकाहेतु स्वीकारकियाहै। तैसेमिथ्याप्राचार्यभी सत्यवस्तुकाउपदेशकरसकता है । यहांययनुमानजानना ॥ अविमतंविवपूर्वकंप्रतिक्वित्वात् संमतवत्* अ०॥ विवादकाविपयजोकोईप्रतिबिंधहै वहविपर्वकहै। जोजो प्रतिबिंबहोताहै। सोमोचिंचपूर्वकहीहोताहै । जैसेप्रमिद्धमुखकाप्रति विवहै ।। इति ॥ौरयदिऐसेकहो किविज्ञानमेंप्रतिक्विज्ञानहीकारण है प्रतिबिंबनहीं । सोयहकथनभी ममीचीननहीं । क्योंकिज्ञानमात्र को तोहेतुताहैनहीं।किंतुप्रतिकिंवाऽवच्छिन्नज्ञानकोहेतुताहै। यौरप्रति विवाऽवच्छिन्नजानकोहेतुतामानेहुए प्रतिविकोभी विज्ञानकीहेतुता दूरनहींहोसकती।। क्योंकिविशिष्टवृत्तिधर्मकोविशेपणमेवर्तनेकानियम है ।। यातेकोईअनुपपत्तिनहीं ॥ शंका ॥ एकहीजीवहै । इतरजीवा भासतिसकी यविद्याकरकल्पितहैं यहयापकामतहै । तिसमें शिष्यके अज्ञानकरगुरुकल्पितहै। यथवागुरुके ज्ञान करशिष्यकल्पितहै?इसप्रकार काविनिगमना विरहदोपप्राप्तहुए शिध्यकी श्रवणादिकों में प्रवृत्तिका श्रभावहोगा ॥ समाधान ॥ हेवादिन अज्ञानीकोहीकल्पकपनाहै। क्योंकितिसमेंकल्पनाका बीजभूत ज्ञानविद्यमानहै । औरविद्धान्में कल्पनाकेबीजभूत यज्ञानकायभावहै । यातेविनिगमनाविरहदोषकी प्राप्तिकाश्रभावहोनेसे शिष्यकीश्रवणादिकों में प्रवृत्तिकासंभवहै । इस प्रकारसर्वयनात्मपदार्थोंको कल्पितपनाहै । भौरभेदकानिरूपणभी उत्तगई कोईकरनेकोसमर्थनहीं ॥ औरप्रत्यक्षादिप्रमाणाभास भेदकोविषय नहींकरसकते ॥ यौरअविद्याकाविद्याकर उपमर्दनहोनेकास्वभावहै।। यौरयन्वयव्यतिरेकादिकोंसेशोधनकियेहैं तत्त्वंपदार्थजिसनेऐसेअधि कारीकोयरुउपदिप्टतत्त्वमस्यादिमहावाक्यसेभागत्यागलक्षणाकरविद्या कीउत्पत्तिकाभीसंभवहै । औरउत्पन्नहुई विद्याकरकेसच्चिदानंदस्वरूप ब्रह्मात्माकेयभेदकायावस्कजोअज्ञान तिसकावाधहोताहै ॥ तिससे निर्दोपतथासच्चिदानंदस्वरूपब्रह्ममेंहूं इसप्रकारकेस्वरूपसे अधिकारी यवस्थितहूयाकृतार्थताकोमाप्तहोताहै। इसरीतिसे अवइसथानंदपदकी व्याख्याकोउपसंहारकरतेहैं । जिसकारणसेविनिगमनाविरहादिदोपों कायभावहै। तिसीकारासेशास्त्रतथागुरुप्रसादसेपास जोतत्त्वमस्या दिमहावाक्य तिनसेउत्पन्नहुएवात्मसाक्षात्कारसे मोक्षकेयाविर्भावका प्रतिबंधकजोयज्ञानतकार्य तिसकावाधहोताहै। तिससेयनंतरनित्य तथाशुद्ध श्रीज्ञानतथामुक्तस्वभावौद्धितीयतथावानंदस्वरूपब्रह्म मेंहूं। ऐसेयहअधिकारीमानताहै । तिससेयननरसर्वकर्तव्यकाअभाव रूपकृतकृत्यताकोप्राप्तहोताहै।इसीकारणसे ग्रंथकेयादिश्लोकमें श्रेष्ठ कथनकियाहै। आत्मानमानंदं साक्षात् विनिश्चित्य अ०॥ आनंदस्वरूपयात्माका श्रतिसेसाक्षात् निश्चयकरके यहथधिकारीकृतार्थहोताहै ॥ इति ॥ पूर्वकथनकीहुईयुक्तियोंकों श्रुतिमूलकता होनेकर तिनमेंयाभासपनेकी निवृत्तिकरनेकेलिये यात्माकीआनंदस्वरूपताकथनकरनेवाली श्रुतियोंकोपठनकरतेहैं । विज्ञानमानंदब्रह्म (वृ० उ० ० (५) मा० ० २८)

५०सि० मु. भा.
श्र० ॥ विज्ञानतथाआनंदस्वरूपब्रह्महै ॥ और
* कोयवान्यात्कः प्राण्याद्यद्यपआकाशआनंदो
नस्यात् ॥२० उ० प्र० ३अनु० ७)
य० ॥ यदिहार्दाकाशमें यहयानंदस्वरूपयात्मानहोतोयपान
चेष्टाकोकौनकरेतथा प्राणनचेष्टाकोकौनकरे। क्योंकियानंदपूर्वकही
प्राणायपानकी कियाहोतीहै । यौर
* सैषानंदस्य मीमांसाभवति॥ तै• उ• म° व अनु ८
य० ॥ सोयहयात्माके यानंदस्वरूपका विचारहै । इत्यादि
वाक्यसेलेकर ।।
2 यश्चायं पुरुपेयश्चासावादित्येसएकएव ।।
(1) उ० व ३० अनु० ८)
अ०॥जोयहानंदस्वरूपात्माइसशरीरमेंहै।औरजोवहयानंद
स्वरूपयात्मायादित्यमंडलमें है वहएकहीहै । इत्यादिवाक्यपर्यंत
तेतरेयउपनिषद्गत ग्रानंदवल्लीमें यात्माकीयानंदस्वरूपता कथन
कीहै । औरतिसीउपनिषद्गतभृगुवल्तीमें ॥
ॐ भृगुर्वेवारुणिर्वरुणापितरमुपससार अधीहिभग
वोब्रह्मेति ॥ तैउ० भ० व० अनु० ११
श्र०॥ वरुणऋपिकापुत्रभृगुऋपि अपनेवरुणपिताकेसमीप
प्राप्तहुश्रा । औरकहाहेभगवन्मुझे यापब्रह्मउपदेशकरो ।। इत्यादि
वाक्यसेलेकर ।।
* आनंदोब्रह्मेतिव्यजानात् वै० स० भृ• व० अनु. ६

बचरा अ॥ आनंदस्वरूपब्रह्महै ऐसेभृगुनेजाना इसवाक्यपर्यंत आत्माकीयानंदस्वरूपता कथनकीहै । औरछांदोग्यउपनिषद्के पष्टमअध्यायमेंभी ।। ( योवैभूमातत्सुखं नापेसुखमस्ति) श्र० नोव्यापकवस्तुहै वहसुखस्वरूपहै।परिच्छिन्नवस्तु सुखनहीं है इत्यादिवाक्योंकर प्रात्माकी यानंदरूपता कथनकीहै । यहांयनेक वेदकीशाखागत श्रुतियोंको पठनकरनेवाले सिद्धांतीनेयात्माकी श्रानंदस्वरूपताकेप्रतिपादकवाक्योंकास्वार्थमेतात्पर्यहै।इसमेंअभ्यास रूपलिंगदिखलायाहै ॥ औरकेवलश्रतिप्रमाणसेहीथात्माकीयानंद रूपतासिद्धनहीं किंतु मैत्रेयीब्राह्मणामें युक्तिकरभी यात्माकीयानंद रूपतासिद्धहै । तथाहि ।। * नवाअरेपत्युःकामायपतिः प्रियोमबतिआत्म नस्तुकामायपतिःप्रियोभवति। 2. उ• मैया के ६ थ० ॥ अरेमैत्रेयीपतिकीकामनाकेलिये स्त्रीकोपतिप्यारानहीं। किंतुथपनीकामनाकेलिये पतितिसकोप्याराहै। इत्यदिवाक्यसेलेकर श्री नवाअरेसर्वस्य कामायसर्व प्रियंभवतिआत्मन स्तुकामायसर्वप्रियंभवति ॥ ( पृ०७० पै०मा००६) थ० ॥ अरेमैत्रयासर्वकी कामनाके लियेसर्वप्यारेनहींकिंतु आत्माकीकामनाकेलियेसर्वप्यारे। इसवाक्यपर्यन्तात्माकीयानंद स्वरूपतायुक्तिसेकथनकीहैयातेपूर्वउक्तयुक्तियेथाभासरूपनहीं।इति।४२ * अथपूर्वपक्ष। आत्माकी आनंदरूपताकी असिडिनिरूपण ० । वे. मि० मु० भा० श्रात्माकीयानंदरूपताश्रुतियों ने प्रतिपादनकीहै।ऐसेकथनकरनेवाले सिद्धांतीनेब्रह्मरूपयात्मामें यानंदत्वधर्मकथनकियाहै। यहहमको प्रतीतहोताहै । तेसेसतचित्यादिशब्दोंके प्रयोगकर्तासिद्धांतीनेब्रह्मा स्मामेंसत्त्वतथाचित्त्वादिधर्मभी अर्थसेकथनकियेहै। यहभीप्रतीतहोता है । तिसमेंहमयहविचारकरतेहैं।हेसिद्धांतिन्यानंदत्वादिधर्मयात्मामें वर्ततेहैं।अथवानहींवर्तते।यानंदत्वादिधर्मयात्मामें,इसप्रथमपक्षमेंयह विचारणीयहै। क्यावहधर्मसत्यहँ अथवाग्रारोपितहैंप्रथमपक्षमतोदेत कीप्राप्तिहोगी औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता।क्योंकिवयानंदत्वस्वरूप सेहीकल्पितहै। अथवायात्मामहीवह कल्पितहै। यहविचारकर्तव्यहै प्रथमपक्षमतोधर्मीकोयनानंदरूपताकी प्राप्तिहोगी। यर्थयहकोईपदार्थ यानंदस्वरूपनहींसिद्धहोगा ॥ अवद्वितीयपक्षकोयन्यश्रर्थकेकथन द्वारानिपेधकरते हैं ।। जैसेरजतत्वजिसयधिकरणमेंयारोपकियाजाता है वहअधिकरणरजतरूपनहींहोता ॥ तैसेयानंदत्वभीयात्मामेंयारो पितहै वहयात्मायानंदस्वरूपनहींहोसकता ॥ शंका ॥ हेवादिन् यहयनानंदत्वजोयात्मामें तुमनापादनकरतेहो सोक्याहै। यानंदसे भिन्नकोअनानंदत्वकहतेहो। अथवायानंदत्व केअनधिकरणत्वकोयना नंदत्वकहतेहो?। प्रथमपक्षमतोहमकोआपाद्यकीयप्रसिद्धिहै क्योंकि थानंदसे भिन्नघटादिकयनात्माहैं। यात्मायानंदसेभिन्ननहींयाते थापादनकरनेयोग्ययानंदत्वतिसमें नहींप्राप्तहोता ॥ समाधान ।। यद्यपियानंदभिन्नत्वरूप शनानंदत्वसिद्धांतीकेपति थापादनकरने योग्यनहीं तथापि यानंदत्वानधिकरणत्वरूप यनानंदत्व तिसमें होनेकरयानंदस्पतासिद्धनहीं होसकती । इसीअर्थकोसिद्ध करनेके उत्तराई लियेप्रसंगसेयात्मामेंथानंदत्व असतहेइसयाद्यदितीयपक्षकोभीदूषित करतेहैं। मौरयहद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता। क्योंकिमानंदत्वकेयनधि करणमेश्रानंदव्यवहारकहींदेखने नहींातार्थियहकिव्यवहारनाम शब्दमयोगका।यौरयानंदपदकीआनंदत्वविशिष्टमेंहीशक्तिग्रहणकी है यातेवानंदत्वकेअनधिकरणघटादिकोंमें आनंदपदकाप्रयोगलक्षणव्यव हारजैसेदेखनेमैनहीं यातातैिसेयात्मामेंभीयानंदपदका प्रयोगलक्षण व्यवहारनहींहोगा।इसप्रकारथानंदत्वानाधिकरणत्वरूप अनानंदत्वही सिद्धांतीकेप्रतिश्रापादनकरनेयोग्यहै।शंका। हेवादिनजहाँप्रसिद्धविषया नंदों यानंदपदकीशक्तिग्रहणहोतीहै।तहांयानंत्यतथाव्यभिचारदोष केदूरकरनेकेलिये श्रानंदत्वविशिष्टयानंदव्यक्तियों में धानंदशब्द प्रवृत्तहो परन्तुयहब्रह्मानंदतो उपस्थितनहीं है। क्योंकिसर्वममाणोंसे अतीतहोनेकरणलौकिकहै । तिसकारणसे आनंदवानधिकरणब्रह्मा नंदमें लौकिकन्यवहारका प्रभावापादनकरना हमकोअनिष्टनहीं। और (योवैभूमातत्सुखम् )इसवैदिकसुखादिशब्दकेश्योगसेपरी लकपुरुषोंकोतिसयलौकिक ब्रह्मानंदमें श्रानंदव्यवहारसंभवताहै।जैसे स्वर्गमें वैदिकसुखादिशब्दसे सुखव्यवहारपरीक्षकोंकोस्वीकारहै। याते श्रात्मायानंदस्वरूपहै |समाधान।। हेसिद्धांतिअलौकिकानंदके स्वीकारकरेजुएब्रह्मानंदमेवैदिकशब्दोंसेवानंदव्यवहारसिद्धहोजायेगा ऐसेकथनकरनेवालेश्राप हमारेकरमचनेयोग्यहो । क्यापदार्थरूपता करवेद अलौकिकथानंदको प्रतिपादनकरता है। श्रथवावास्यकाअर्थ रूपताकरप्रतिपादनकरताहै?। प्रथमपक्षकहो तोनहींसंभवता क्योंकि लौकिकतथावैदिक पदोंकाएकहीयर्थहै ॥ शंका ॥ लौकिक वे. मि० मु. भा० श्रात्माकीयानंदरूपताश्रुतियोंने प्रतिपादनकीहै। ऐसेकथनकरनेवाले सिद्धांतीनेब्रह्मरूपयात्मामें यानंदत्वधर्मकथनकियाहै । यहहमको प्रतीतहोताहै । तैसेसतचित्यादिशब्दोंके प्रयोगकर्तासिद्धांतीनेब्रह्मा त्मा सत्त्वतथावित्वादिधर्मभी अर्थसेकथनकियेहै। यहभीप्रतीतहोता है । तिसमेंहमयहविचारकरतेहैं।हेसिद्धांतिन्यानंदत्वादिधर्मयात्मामें वर्ततेहैं। यथवानहींवर्तते। यानंदत्वादिधर्मयात्मामेंहैंइसप्रथमपक्षमेंयह विचारणीयहै। क्यावहधर्ममत्यहें अथवायारोपितहैंप्रथमपक्षमतोद्वैत कीप्राप्तिहोगी औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता।क्योंकिवहयानंदत्वस्वरूप सेहीकल्पितहै। अथवाग्रात्मामहीवह कल्पितहै। यहविचारकर्तव्यहै प्रथमपक्षमतोधर्मीकोयनानंदरूपताकी प्राप्तिहोगी। यर्थयहकोईपदार्थ यानंदस्वरूपनहींसिद्धहोगा ॥ अवद्वितीयपक्षकोयन्यअर्थककथन दारानिषेधकरतेहैं । जैसेरजतत्वजिसत्यधिकरणमेंयारोपकियाजाता है वहअधिकरणरजतरूपनहींहोता ॥ तैसेग्रानंदत्वभीग्रात्मामेंयारो पितहै वहयात्मायानंदस्वरूपनहींहोसकता ॥ शंका ॥ हेवादिन यह अनानंदत्वजोयात्मामें तुमापादनकरतेहो सोक्याहै। ग्रानंदसे भिन्नकोअनानंदत्वकहतेहो। श्रथवाग्रानंदत्वकअनधिकरणत्वकोयना नंदत्वकहतेहो? प्रथमपक्षमतोहमको आपाद्यकीयप्रसिद्धिहै क्योंकि थानंदसे भिन्नघटादिक अनात्मा । आत्मायानंदसेभिन्ननहींयाते ग्रापादनकरनेयोग्यथानंदत्वतिसमें नहीं प्राप्तहोता ॥ समाधान ।। यद्यपियानंदभिन्नत्वरूप धनानंदत्वसिद्धांतीकेप्रति थापादनकरने योग्यनहीं तथापि अानंदत्वानधिकरणत्वरूप अनानंदत्व तिसमें । होनेकरयानंदरूपतासिद्धनहीं होसकती । इसीअर्थकोसिद्ध करनेके लियेप्रसंगसेयात्मामेंथानंदत्व असतहैइसथायद्वितीयपक्षकोभीदूषित करतेहैं। मौरयहद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता। क्योंकियानंदत्वके अनधि करणानंदव्यवहारकहींदेखनेमेंनहीं याताअर्थयहकिव्यवहारनाम शब्दप्रयोगकाहै।ौरधानंदपदकीयानंदत्वविशिष्टमेंहीशक्तिग्रहणकीहै यातेधानंदत्वकेअनधिकरणघटादिकोंमेंशानंदपदकाप्रयोगलनणव्यव हारजैसेदेखने नहीं आता तैसेयात्मामेंभीयानंदपदका प्रयोगलक्षण व्यवहारनहींहोगा।इसप्रकारानंदत्वानधिकरणस्वरूप धनानंदवही सिद्धांतीकेप्रतियापादनकरनेयोग्यहै।शंका। हेवादिनजहांप्रसिद्धविषया नंदों यानंदपदकीशक्तिग्रहणहोतीहै।तहांयानंत्यतथाव्यभिचारदोष केदूरकरनेकेलिये आनंदत्वविशिष्टयानंदव्यक्तियों में आनंदशब्द प्रवृत्तहो परन्तुयहब्रह्मानंदतो उपस्थितनहींहै। क्योंकिसर्वप्रमाणोंसे श्रतीतहोनेकरअलौकिकहै । तिसकारणसे श्रानंदत्वानधिकरणब्रह्मा नंदमें लौकिकव्यवहारका प्रभावापादनकरना हमकोअनिष्टनहीं। और (योवैभूमातत्सुखम् )इसवैदिकसुखादिशब्दकेप्रयोगसेपरी तकपुरुषोंकोतिसश्रलौकिक ब्रह्मानंदमें श्रानंदव्यवहारसंभवताहै।जैसे स्वर्गमें वैदिकसुखादिशब्दसे सुखव्यवहारपरीक्षकोंकोस्वीकारहै। याते श्रात्मावानंदस्वरूपहै समाधान।। हेसिद्धांतिन्अलौकिकयानंदके स्वीकारकरेहुएब्रह्मानंदमेवेदिकशब्दोंसेश्रानंदज्यवहारसिद्धहोजायेगा ऐसेकथनकरनेवालेबाप हमारेकरपूछनेयोग्यहो । क्यापदार्थरूपता करवेद अलौकिकानंदको प्रतिपादनकरताहै। थथवावाक्यकाअर्थ रूपताकरप्रतिपादनकरताहै। प्रथमपक्षकहो तोनहींसंभवताक्यिोंकि लौकिकतावैदिक पदोंकाएकहीअर्थहै ॥ शंका ॥ लौकिक दे०सि० मु० मा० प्रमाणकीविषयतातथाविषयताकर विषयानंदतथाब्रह्मानंदकीविलक्ष णतापूर्वकथनकीहै ॥ समाधान ॥ इसयवांतरविषमतासे यदि लौकिक तथावेदिकपदोंका एकयर्थनहींमानोगेतोलोकवेदाधिकरण न्यायकाविरोधप्राप्तहोगा। औरजैसेनीलपीतादि अवांतरयनेकप्रकार कापटव्यक्तियोंकापरस्परभेदहुएभी सामान्यपटत्वरूपताकर उपस्थित हुए तिनसर्वपटोंकोपटशब्दकीवाच्यताहै ॥ तैसेसर्वयानंदव्यक्तियों कापरस्परयवांतरभेदहुएभी सामान्ययानंदत्वरूपताकर वेष्टितकीहुई तिनसर्वयानंदव्यक्तियोंको थानंदपदकी वाच्यतायुक्तहीहै ॥ और यदिऐसेकहो किलौकिक यानंदशब्दकीही यानंदत्वविशिष्टव्यक्तिमें शक्तिग्रहणकीहै वेदिकयानंदशब्दकीनहीं।सोयहकथनभी समीचीन नहीं । क्योंकिलौकिकतावैदिक शब्दोंकायभेदहै। औरतिनशब्दों केभेदकाकथन स्वरादिउपाधिप्रयुक्तहै । इसप्रकारयानंदत्वके अनधि करण्यात्मामें थानंदव्यवहारनहींसंभवता । लोकवेदाऽधिकरण न्यायजोपूर्वकहाथा। मोपूर्वमीमांसाके प्रमाणलनणरूपप्रथमध्याय में स्थितहै ॥ तथाहि प्रयोगचोदनाभावादकत्वमविभागात् ॥* पु० पी० ॥ ॥ ॥२६॥ था। इसयाकृति यधिकरणमें उपोद्घातरूपताकरलौकिक तथावेदिकपदपदाधीकाभेदतथायभेद विचारकियाजाताहै ।।तहांयह अधिकरणावनाहे । लौकिकतावदिकपदपदार्योंकाभेदहै। अथवा अभेदहे?। इसमंगयकहुएपूर्वपनप्रामटुमा लोकनयावेदमेंपदोंकाभेद है। क्योंकिस्खगदिधर्मकाभेद प्रनीतहोताई ॥ थोरपदोंकभेदसेतिन केअर्थकाभीभेदहै । ऐसेपूर्वपक्षकेमाप्तहुए सिद्धांतनिरूपणकरतेहैं ।। (अर्थकत्व) पदतथापदार्थोंकाअभेदहै। क्योंकि (अविभागात) यहां प्रत्यक्षप्रत्यभिज्ञाहोतीहै । जोहीवर्णलौकिकपदमेंप्रतीतहोतेहैं वहीवर्ण वैदिकपदमेंप्रत्यभिज्ञाकेविषयमतीतहोतेहैं ।। पौवर्णात्मकहीपदहोता है। तिसकारणसेलौकिकपदसे वैदिकपदकाभेद नहीं सिद्धहोसकता। औरजोस्वरादिधर्मभेदसे पदोंकाभेदपूर्वपक्षीनेकहाथा वहभीनहींसंभ वता। क्योंकियर्थकेभेदकाकारण जोधर्मभेदहै वहीपदकेभेदकाहेतु है ॥ ौरसर्वहीधर्मभेदकेहेतुनहींसंभवते ॥ क्योंकिविकल्पसेहोने वालेस्वरादिकों में व्यभिचारहै।। अर्थयह तहांधर्मकाभेदहुएभीपदका भेदनहीं है। इसप्रकारलौकिकतथावैदिकपदपदार्थोंकायभेदमानेहुए क्रियातथाकारककासंबंधरूपप्रयोगविधियोंकाभीसंभवहै । औरयदि तिनकाएकवनहींमानेंगे तोवैदिकपदार्थके ज्ञानका उपायनहोनेकर औरसंबंधकोशास्त्रमानकरसिद्धहोनेसे (प्रयोगचोदनाभावात) प्रयोग विधियोंका अभावप्राप्तहोगा। यातेलौकिक तथावैदिकपदार्थोंका अभेदहीस्वीकारकरनेयोग्यहै। इसप्रकारपदार्थरूपताकरखेदअलौकिक शानंदकोप्रतिपादनकरताहै यहप्रथमपक्षनहींसंभवता । औखाक्या र्थरूपताकरखेदयानंदस्वरूपताको प्रतिपादनकरताहै यहद्वितीयपच भीसमीचीननहीं। क्योंकिवाक्यार्थत्वरूपताकरभी थानंदत्वकामति पादननहींकरसकते । अखंडार्थ मेंवेदका तात्पर्यस्वीकारहै । विशिष्ट अर्थमनहीं। औरहमारेमततोलौकिक तथावैदिक सर्ववाक्यों में वाक्यार्थश्रलौकिकहींहै । यातेलोकवेदाधिकरणन्यायकाविरोधनहीं। औरब्रह्मानंदकोकामनाकाविषयहोनेसेभीअलौकिकपनानहीं।क्योंकि ०सि० मु० भा० सर्वप्रकारसेबलौकिक यानंदमें किसीकोभीकामनानहींसंभवती।स्वर्गा दिकोंकोभीलौकिक सुखकेसजातीयहोनेसेही पुरुपोंकीतिनमेंकामना होतीहै।। इसप्रकारद्वैतापत्तियादिकदोपोंसेयानंदत्वकासत्तथाअसत् रूपताकरयात्मानिरूपणहोनेसेयात्माघानंदरूपनहीं।।इतिपूर्वपक्ष।। * अथएकदेशीसंक्षेप शारीरकाचार्यकैमतसे पूर्वपक्षकासमाधान निरूपण । इसपूर्वपक्षकासमाधानकोईएकाचार्यऐसेकहतेहैं। श्रनानंदकी व्यावृत्तिमात्रहीयानंदत्वहै प्रसिद्धविषयानंदस्वरूपहीयात्मानहीं।क्यों किधर्मधर्मिभावयनंगीकारहैयहवार्तासर्वज्ञात्ममहामुनियोंनेकथनकीहै * ब्रह्मेतराणिकिलनास्यवधूपितेपांवुद्धास्फुरत्य पररूपनिवृत्तिभावात्॥ अ॥ ब्रह्मसेभिन्ननित्यत्वादिक इसब्रह्मकास्वरूपरूपताकर बुद्धिमेंनहींस्फुरणहोते।क्योंकितिननित्यत्वादिकोंकोकालपरिच्छेदादि कोंकीनिवृत्तिरूपताहै ।। याते “यात्मानंदः” इसकाक्याअर्थहै ऐसी थपेक्षाकेहुएकहतेहैं ।यनानंदकीव्यावृत्तिमात्रहीयानंदपदकायर्थ है। तिसकारणसेयनानंदकी व्यावृत्तिरूपउपाधिसेयात्मामें थानंदशब्द प्रवृत्तहोताहै।।यानंदत्वधर्मकोसन्मुखरखकर यानंदशब्दयात्मामेंनहीं प्रवृत्तहोता।यातेपूर्वउक्तविकल्पोंका अवकाशनहीं।शिका ।।यानंदत्व धर्मकीन्याई वहन्यावृत्तिभीक्यासत्है अथवाग्रसतहै?। इसविकल्पसे दैतापत्यादिदोषपूर्वकीन्याईहीयवस्थितहैं।। समाधान हेवादिन्व्या वृत्तिसेदैतकीपाप्तिनहींहोती। क्योंकितिसव्यावृत्तिको अधिष्ठानात्मा सेभिन्नपनानहींहै । इसप्रकारयानंदत्वधर्मकोलेकरजोदूपणवादीने उत्तराई कहेथेतिनकोनिषेधकरके श्रवतिसीन्यायसेज्ञानत्वादिधर्मप्रयुक्तदूषण समुदायकोनिषेधकरतेहैं ॥ श्रज्ञानव्यावृत्तिहीज्ञानशब्दसेप्रतीतहोती है ॥ यातेश्रज्ञानकीव्यावृत्तिस्वरूपयात्मामेंही ज्ञानशब्दकीप्रवृत्तिहै ज्ञानत्वधर्मविशिष्टयात्मामें ज्ञानशब्दकीप्रवृत्तिनहीं ॥ यहरीति सत्यादिशब्दों में भीजानलेनी ।। इति ॥ अथएकदेशीके मतकीअसमीचीनताकानिरूपण सोयहएकदेशीकामतसमीचीननहीं। तथाहि । थात्मामेंघानंदादि शब्दकी प्रवृत्ति व्यावृत्तिक्याउपाधिहै।श्रथवाग्रानंदादिपदोंकावहवाच्य है? प्रथमपक्षकहोतोवहनहीं संभवता।क्योंकिव्यावृत्तिकोयात्मासेभिन्न तुमनेमानानहीं।इसीसेतिसकोउपाधिरूपतायुक्तनहीं । औरद्वितीयपक्ष भीनहींसंभवता।क्योंकिव्यावृत्तिकिसीपदकार्थनहींहै।ौरव्यावृत्तिको पदार्थमानेहुएअपोहवादकीप्राप्तिभीहोगी।ौरअन्योन्याश्रयदोषकी मासिसेअपोहवादभीयुक्तनहीं। क्योंकिव्यावृत्तिकीसिद्धियर्थव्यावर्तक धर्मवश्यकथनकरनेयोग्यहै।मन्यथाव्यावृत्तिकीही सिद्धिनहींहोगी थौरव्यावर्तकधर्मकीसिद्धिव्यावृत्तिकेाधीन है ।। औरयदिस्वरूपसे व्यात्तिकीसिद्धिकहो तोयहभी समीचीननहीं। क्योंकिग्रात्माश्रव्या वृत्तस्वरूपहै । यदिशात्माकोन्यावृत्तस्वरूपनहींमानोगे तोवस्तुपरि च्छेदयुक्तहोनेसे तिसकोब्रह्मपनाप्राप्तहोगा। यातेयहमतसमीचीन नहीं॥ इति ॥ * अथएकदेशिविवरणाचार्यकीरीतिसेपूर्व पक्षकासमाधान औरकोईअन्यथाचार्ययहकहनेहैं । थानंदत्वादिधर्म जिनमें ३०सि० मु० भा० कल्पितहैं वहहीयानंदादिपदोंकेअर्थ लोकतथावेदमें प्रसिद्धहैं।शंका लोकमेंतोविषयजन्यसुखकोहीयानंदकहतेहैं। तिसमेंयानंदत्वकल्पित नहीं ॥ समाधान ॥ हेवादिन् तिसविषयसुखमेंभीयानंदत्वकल्पित है ॥ औरतिनकाधर्मधर्मिभावभेदाभेदरूपताकरननिरूपणहोनेकर अयुक्तहै ।। शंका ।। आत्माकल्पितःकल्पितधर्माऽधारत्वात् । मिथ्यारजतवत् ॐ अा अात्माकल्पितहै। कल्पितधर्मकायाधारहोनेसे । जोजो कल्पितधर्मकायाधारहोताहै । सोसोमिथ्याहोताहै। जैसेमिथ्मारजत है।। इति ॥ इसयनुमानसेयात्माकोकल्पितपनामानेहुए पुरुषार्थरूप ताकरवहउपादेयनहींहोगा ॥ समाधान ॥ हेवादिन् थानंदत्वको कल्पितमाननेकरयानंदरूपताकी किंचित्मात्रभीहानिनहीं। क्योंकि धर्मकोयनुपादेयहोनेकरतिसके याश्रयभूतव्यक्तिकोहीपुरुषार्थरूपता सेउपादेयताहै। औरजोकल्पितधर्मकायाधारहोताहै सोकल्पितहोताहै इसव्याप्तिकाकल्पितरजतके अाधाररूपशुक्तिखंडमें व्यभिचारहै । तिस कारणसेयहांयहयनुमानजानना ॥ *विमतःआत्माआनंदरूपःआनंदत्वाधिकरणत्वात्। लौकिकानंदवत् ॥ य० ॥ विवादकाविषयघात्मा थानंदस्वरूपहै।यानंदत्वका श्रधिकरणहोनेसे। जोजोयानंदत्वकाधिकरणहै।सोसोयानंदरूप है।। जैसेप्रसिद्धविषयानंदहै।इति। इसप्रकारथानंदत्वधर्मकोसन्मुख रखकरयानंदशब्द यात्मा प्रवृत्तहोताहै । औरतिसकोकल्पितहोने उत्तरार्द्ध करद्वैतकीमाप्तिभीनहींहोती ॥ इति ।। *अथएकदेशीकमतकानिराकरण ॥ सोयहएकदेशीकामतभी विनाविचारसे सुंदरवस्तुकीन्याई सुंदरभासताहै । विचारकरनेसे समीचीननहीं। यहांयहतात्पर्यहै । यानंदत्वधर्मयानंदशब्दकीप्रवृत्ति उपलक्षणहै।यथयाविशेषणहै?।। प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकिव्यक्तिमात्रशक्तिहोनेसेअनंत शक्तियोंकीकल्पनामाप्तहोगी। औरयानंदपदसेकिसीविशेषव्यक्तिकी प्रतीतिभीनहींहोगी । क्योंकियानंदत्वधर्म सर्वश्रानंदव्यक्तियोंका समानउपलक्षणहै । किसीविशेपव्यक्तिकाउपलक्षणनहींमाना। याते प्रत्येकव्यक्तिकीसमानरूपतासे उपस्थितिहुए किसीविशेषव्यक्तिकी मतीतियानंदपदसेनहींहोगी। औरदितीयपक्षमें यहविचारकर्तव्यहै क्याशुद्धव्यक्तिसेविशिष्टपदार्थभिन्नहै। अथवाअभिन्नहै?। इनमेंप्रथम पक्षतोनहींसंभवता । क्योंकिविशिष्टकोहीयानंदपदका अर्थहोनेसे व्यक्तिमात्रमें थानंदपदकीवाच्यताअनुपपन्नहै। औरतिसविशिष्टको श्रानंदपदकाअर्थमानेहुएयखंडवाक्यार्थकीप्रसिदिहोगी।ौरद्वितीय पत्तभीनहींसंभवता। क्योंकिकल्पितयानंदत्वके याश्रयकोयनानंद त्वप्रसंगकीनवृत्तिनहहिोसकर्ता।' इसत्रिर्थकास्पष्टकरतेहैं । जो धर्म जिसअधिकरणमें स्वाभाविकनहीं । वहअधिकरणतिसधर्म वालापदार्थनहींहोसकता।यदिऐसेनहींमाने तोकल्पितरजतकेयाधार शुक्तिकोभीरजतपदकीयर्थताहोगी। यहांयहतात्पर्यहै । कल्पितधर्म केयाश्रयकोवास्तवसे तिसधर्मकीयाधारतानहीं। यदिऐसेनमानेतो धर्मकोकल्पितपनाही नहींसिद्धहोगा ॥ किंवा ॥

० सि मुभा * आत्माकल्पितः कल्पितधर्माधारत्वात् ।। मिथ्यारजतवत् । इसपूर्वोक्त अनुमानसेप्रात्माकोकल्पितपनाभीहोगा।औरशुक्ति खंडमेंजोहेतुका व्यभिचारपूर्वकहाथा सोभीनहींसंभवता । क्योंकि कल्पितरजतकीयाधारता शुक्तिकेस्वरूपप्रयुक्तनहीं । यदिअाधारता कोशुक्तिकस्वरूपप्रयुक्तमानोगे तोरजतकीनिवृत्तिहीनहींहोगी। और अज्ञातशुक्तिकोही याधारताहै शुद्धकोनहीं।औरयज्ञानविशिष्टशुक्ति कोशुद्धशुक्तिरूपताकामभावहै । तिसकारणसेहेतुव्यभिचारीनहीं। इसप्रकारदोनोंएकदेशियोंकेमतोंको निषेधकरके अबसिद्धांती स्वमत कीरीतिसे पूर्वपक्षकासमाधाननिरूपणकरताहै ॥ • अथसिद्धांतरीतिसे पूर्वपक्षकासमाधान * मू। उपाधिसंश्रयोहात्मा आनंदत्वंतदाश्रयः। विशिष्ठशक्यपक्षेतु व्यक्तिर्वाशक्तिगोचरः॥४३ तारकवंद ॥ यहमात्मदेवउपाधियुताहो, विवरुपधरेसुखयानदतासो इमवाच्यविशिष्टविपेयहरीता, पदवावलव्यक्तिविपेसुनमीता। टी०॥ यदिलोकमेंथानंदत्वधर्मविशिष्ट यानंदहीथानंदशब्द काश्रर्थहै तोइसपक्षमेंभीयात्माही थानंदपदार्थ है । क्योंकिविशिष्ट पदार्थविशेषणतथाविशेपादिरूपहीहोताहे। तेसेमानेहुए विशेपणजो श्रानंदत्त्वसामान्य है। मौरतिसकाथाश्रयभूतजोयानंदव्यक्तिहैवहदोनों मात्माहीहैं। थात्माकोउभयरूपताकिसमकारहै । ऐसीजिज्ञासाकेहुए कहतेहैं जिसेएकहीस्वरूपजोसर्वकल्पनासेरहितमुखतथाचन्द्रादिहे ॥ तिनमेंकिंवतथापतिविंव श्रीस्वरुपयहतीनप्रकारकाव्यवहार उपाधिमें उत्तराई प्रविष्टत्वकेयारोपसेयनंतरदेखने याताहै। यहपूर्वलक्षणास्थलमेंकह आएहैं। तैसेसर्वकल्पनासेरहितएकहीयात्माअंतःकरणकीवृत्तिविशेष रूपनानाउपाधियोंमेंप्रतिविवितहोकरतिनवृत्तियोंकर अवच्छिन्नहुया व्यक्तिरूपताकोप्राप्तहोताहै।ौरउपाधियोंकरभेदकोप्राप्तहुईतिनानंद व्यक्तियोमेविंवकीन्याईअनुगतबुद्धिकाउत्पादकहोनेसेयात्माहीआनंद त्वस्वरूपसामान्यकोमासहोताहै।यातेसर्वप्रकारसेमुख्यात्माहीयानंद पदकायर्थहै । इसप्रकारख्यक्तिहीयनुगतवृद्धिका कारणहोनेसेसामा न्यशब्दकावाच्यहै । औरविशेषाकारबुद्धिकाहेतुहोनेसे व्यक्तिशब्द कावाच्यहै । यहवाच तंत्ररत्ननामग्रंथके कानेभीकहींहै ।। * नहिजाति मव्यक्तेरातरभूतं किमपितत्त्व मस्त्यपितुवस्त्वेवहिएकंव्यावृत्तानुगततयावुद्यते। य० ॥ व्यक्तिसेभिन्न जातिनामकोईभी पदार्थनहींहै ।। किंतु एकहीपदार्थभिन्न भिन्नतथा अनुगतरूपताकरजानाजाताहै ॥ इति थात्माकीउभयरूपतालोको थप्रसिद्धहै इसथभिप्रायकोलेकरपक्षां तरको सिद्धांतीनिरूपणकरताहै।। अथवा व्यक्तिहीलोकमें तथावेदमें पदकीशक्तिकाविषयहै ॥शंका व्यक्तिशक्तिवादमेसर्वव्यक्तियों शक्ति काग्रहणहोताहै।यथवाकिन्हीविशेषव्यक्तियोंमेंशक्तिकाग्रहणहोताहै!! प्रथमपत्नतोनहींसंभक्ताक्योंकिव्यक्तियोंकोयनंतहोनेकरपदसेसर्वकी उपस्थितियनुपपन्नहैयौरद्वितीयपक्षभीयसंगत।। क्योंकिजिनविशेष व्यक्तियों में पदकावाच्यवाचकभाव संबंधग्रहणहुयाहै तिनसेभिन्न व्यक्तियोंमेंप्रवर्तमानहुयाशब्द अपनेवाच्यार्थसेव्यभिचारीहोजायेगा। भौस्यदितिनव्यक्तियोंमेंभी धन्यशक्तिकी कल्पनाकरतोयनंतशकियों वे०सि० मु० भा० कीकल्पनाप्राप्तहोगी। यातव्यक्तिशक्तिपक्षणयुक्तहै ।। समाधान ॥ हेवादिन्जहांदोनोंपक्षोंमें तुल्यदोपहोनहांपरिहारकीभीतुल्यताहोती है। सोयहांविशिष्टशक्तिपक्षमेंभी यानंत्यतथाव्यभिचारदोपकीतुल्य ताहै ॥ अवयानंत्यादिदोप विशिष्टशक्तिपक्षमभी उपपादनकरनेके लिये सिद्धांतीविशिष्टकी अनेकरूपताकोनिरूपणकरताहै।विशेपण कोएकहुएभीविशेष्योंके भेदसे विशेष्यविशेष्यप्रतिविशिष्टकाभेदहै।। जैसेघटत्वरूप विशेपणकोएकहुएनी घटव्यक्तिरूपविशेष्यकोयनंत होनेकर विशिष्टभीयनंतहैं। औरयदिऐसेकहोकिविशपणकोएकहोने करविशिष्टकीभीएकतासंपादनहोसकतीहै सोयहकथनभीयुक्तहै । क्योंकियशक्ययर्थके संपादनकरनेकोकोईभीसमर्थनहींहोसकता ॥ औरवहविशिष्टकीएकता असतहोनेसेजाननेयोग्यभीनहीं ॥ याते विशिष्टकोपदका वाच्यमाननेमेंभी यानंत्य तथाव्यभिचारदोष थवभ्यहीप्राप्तहोताहै ॥ शंका ॥ व्यक्तिकोनानाहुएयनुगतव्यवहार कैसेसिद्धहोगा ॥ ौरवाच्यभूतव्यक्तिकी अन्यत्रवाच्यपदार्थोंसे भिन्नरूपताकरप्रतीतिकैसेहोगी । औरयानंत्यादिदोपकापरिहारकैसे है ॥ समाधान ॥ हेवादिन जिसकारणमे विशिष्टपक्षमेंभीदोषोंकी तुल्यतातिसकारणसेवानंदपदकायवाच्यजोवाच्यताकायवच्छेदक श्रानंदत्वहै तिसकरही अनुगत वाच्यव्यवहारतथा अवाच्यकी व्यावृत्तिव्यवहारसंभवताहै ॥शंका।। हेसिद्धांतिन्थवाच्यजोवाच्यता कायवच्छेदकहै तिसकरधनुगतादिव्यवहारहोताहैयहमापकैसेकथन करतेहोजिसकारणसेगोपदसेगोत्वविशिष्टव्यक्तिकीहीउपस्थितिहोतीहै । याते तिसवाच्यता अवच्छेदकमेंभीपदकीशक्तिहै।समाधाना हेवादिन उत्तराई वाच्यतायवच्छेदकौशक्तिकल्पनाकरनेमें प्रमाणकाअभावहै । जैसे कारणताकायवच्छेदक कारणकेस्वरूपसेवाडहोताहै। तैसेवाच्यताका अवच्छेदकभीवाच्यसेवा है। तिसमेंपदकीशक्तिनहीं। औरगोपदसे गोत्वकीप्रतीति तोशक्तिसेविनाभीसंभवतीहै । क्योंकिगोपदकीगो व्यक्तिमेशक्तिग्रहणसे उत्पन्नहुएसंस्कारकेवलसे गोत्वकोउपस्थिति होतीहै ॥ तिसमेंगोपदकीशक्तिनहीं ॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिन् इस प्रकारयापकोभी उक्तसंस्कारसहकृतयानंदादिपदसे थानंदत्वविशिष्ट श्रात्माकीमतीतिहोनेसे यानंदपदसेशुद्धको उपस्थितिनहींहोगीतिस सेयखंडवाक्यार्थ नहींसंभवेगा। समाधान ॥ हेवादिन् थानंदत्वभी पूर्वउक्तरीतिसेयात्माहीहै । क्योंकिव्यक्तिसेभिन्न सामान्यअंगीकार नहींहै । औरउपाधिकोवान्यकोटिसे तटस्थहोनेकरयानंदादिपदसे शुद्धलक्ष्यार्थकीहीउपस्थितिसंभवतीहै। यातेप्रखंडार्थकीयनुपपत्ति नहीं ॥ यहयर्थपूर्वनिरूपणकरयाएहैं ॥ तिसकारणसेयात्माकी . यानंदस्वरूपतामें कोईभीयनुपपत्तिनहीं ॥ इति ॥ ४३ ॥ अथाचार्यकीकृतकृत्यताकानिरूपण इसप्रकारात्माकी अानंदादिरूपताश्रतितथायुषितसे निर्णीत हुएतत्त्वमस्यादिमहावाक्यसेउत्पन्नहुए ब्रह्मात्माकंसाक्षात्कारसेयात्माक श्रावरकरज्ञानकेवाधितहुए स्वात्मारामजोथाचार्य है वहथपनीकृत कृत्यता जिज्ञासुकेबोधकी दृढतार्थप्रकटकरताहै।। मू०॥आनंदरूपमात्मानसच्चिदहयतत्त्वकम् । अपूर्वादिप्रमाणोक्तंप्राप्याहतहपुःस्थितः ॥४॥ स्वैया ॥ जाहिनिमित्तसबीप्रियलागत तांहितुथानदरूपवखाना।

व० से. मु. भा. बाधविहीनचिदेकसुभावजु आतमदैतविहीनलखाना। श्रुतियुक्तिवखानतजाहसरूपह सोहमितीअपरोछपछाना। जानमलेनिजथातमकोततरूपयवस्थितमनिरवाना॥३७॥ टी० ।। श्रुतिप्रमाण प्रौतिसकेअनुसारीयुक्तिनेजिसयात्माको सचित्आनंदतथायदैतस्वरूप प्रतिपादनकियाहै । वहसचित् श्रानंदतथायदैतस्वरूपब्रह्ममैंहूऐसेतिसयात्माकोसाक्षात्कारकरकेतिस श्रानंदादिरूपताकरही मैंस्थितहुआई ॥४४॥ शंका ।। दैतसहितको श्रदयस्वरूपतानहींसंभवती ॥ क्योंकिद्वैतग्राहिप्रमाणकाविरोधहै । समाधान ॥ मू०॥योहमहयवस्त्वेवसद्वयेदृढनिश्चयः। प्राप्यचानंदमात्मानंसोहमद्यविग्रहः ॥४५॥ नास्तिब्रह्मसदानंदमितिमेदुर्मतिःस्थिता। कगतासानजानामियदाहंतहपुःस्थितः ॥४६॥ स्व० ॥ द्वैतविहीनजुपूरवमेंस तीयविदृढनिश्चितहुया। यानदयातमलामभएयव मैयदुतीयसरूपसुहुया । सतयानदयातमनासतमान सदोपसदाथिरमेमनहुआ। नहिजानपरेकहिंभागगयोजवहीततरूपयवस्थितहुआ।३८॥ टीनाजोमप्रथमयदयवस्तुहुयाहीभ्रांतिकरदैतविशिष्टस्वरूपमेंट निश्चयवालाहुयाथा वयानंदस्वरूपयात्माको प्राप्तहोकरसोई में श्रदैतस्वरूपस्थितहूं तात्पर्ययहहै।यद्वैतस्वरूपयात्माकोसतरूपताकर थधिष्ठानताहोनेसेतिससे भिन्नदैतकोथज्ञानकरकल्पितपनाहै। याते दैतप्रतीतिकोभ्रमपनाहोनेसे यदयस्वरूपतामें किसीप्रमाणकाविरो ४४७ उत्तरार्द्ध धनहीं ॥ १५॥ शंका ॥ ब्रह्मकोसतरूपहोनेसे अधिष्ठानताहै यहकथननहींसंभवता | क्योंकि “ब्रह्मनहीं है" यहप्रतीतिब्रह्मके असत्पनेकोविषयकरतीहै ॥ समाधान ॥ हेवादिन् “अस्तिब्रह्मेति चंद्वैद"इत्यादिश्रुतिजन्यवोधका विरोधहोनेसे वहप्रतीतिनहींसंभवती इसीअर्थकोस्पष्ट करतेहैं ॥ “सच्चिदानंदस्वरूपब्रह्मनहींहै" यहदुष्ट बुद्धिजोमेरेहृदयमंस्थितथी जबमैंतिसब्रह्मरूपताकर स्थितहुया तवमें नहींजानता जोवह दुर्बुद्धिकहांचलीगई ।। ४६ ।। शंका ।। पूर्वोक्त दुर्मतिकेनाशहुएभी "देहोहम्” इत्यादियांतरजगत्वाह्यजगतकी न्याईसत्है मिथ्यानहीं ॥ समाधान ॥ हेवादिन्यहतुम्हारा दृष्टांत असिद्धहै "तथाहि" ॥ मू०-पूर्णानंदाहयेतत्वे मेदिजगदाकृतिः। वोधेऽवोधकृतैवासीदवोधःक्वगतोऽधुना ॥४७॥ संसाररोगसंग्रस्तो दुःखराशिरिखापरः । आत्मवोधसमुन्मेषादानंदाधिरहोस्थितः।४८ खै०।। द्वैतविहीन सुपूरनयानद तत्त्वविपेजगथाकृतजोई । भासतथी तमयातमकेवल बोधमएयवसोकतगोई ॥ जगरोगनतेवहुपीडितथो दुखराशिसमानभयोधमोई । बोधनिजातमके प्रगटेयर शानदसिन्धुविपथिरहोई ॥३६॥ टी०॥ पूर्णतयायानंदयौदैतसेरहित अनारोपितस्वरूपयात्मा में मेल्यादिकवाह्यजगत्कायाकारजोभासताहैसोयज्ञानकाकार्यहोनेसे मिथ्याहै ।। शंका ।। प्रपंचको श्रज्ञानकाकार्य मानेहुएभीयज्ञानको श्रवांधितहोनेसे वहयज्ञानब्रह्मकीन्याईमत्यहै। पातेतत्मलकजगतभी वे. सि. मु. भा. मिथ्यानहींकिंतुसत्यहै ॥ समाधान॥ हेवादिन्जेसेदीपककेउदयहुए प्रतीतनहींहोता जोअन्धकारकहांभागगया ॥ तैसेब्रह्मात्माका सानात्कारउदयहोनेसे जानानहींजाता जोयज्ञानकहां चलागया ।। यातेज्ञानकखाधकेयोग्य अज्ञानमिथ्याहै औरतत्मृलकजगत्भी मिथ्याहै।।४७॥शंका। ज्ञानतथायज्ञानकाहीविरोधहै । तिसकारणसे सुखस्वरूपयात्माकायावरक जोयज्ञानहै । तिसकीतत्त्वज्ञानसेनिवृत्ति हुएभीसंसारकीनिवृत्तिकैसेहोगी।क्योंकितिसकेसाथज्ञानकाविरोधनहीं ॥समाधान।। हेवादिन्उपादानकीनिवृत्तिहोनेसे कार्यकीभीनिवृत्तिहो जातीहै । जैसेतंतुरूपउपादानकेनाशसे पटकानाशहोजाताहै ।। इसीअभिप्रायसेकहतेहैं । बोधसेपूर्वजोमैसंसाररूपरोगसे अत्यंतग्रस्त हुया दुःखकीराशिवत् अतिदीनहुयाथा।यवयात्मबोधकेसम्यसकट होनेसेअानंदका समुद्रहुआ स्थितहूं यहअत्यंतहहै (४८) “श्रानं दाधिः" यहविशेषणपूर्वकारिकामें जोकहाथा तिसका फलउत्तर कारिकामें कहतेहैं ।। सू०॥योहमल्पेपिविषयेरागवानतिविह्वलः। आनंदात्मनिसंप्राप्तेसरागःक्वगतोऽधुना॥४६॥ यस्यमेजगतांकर्तुःकार्येरपहृतात्मनः । आविर्भूतपरानंदआत्माप्राप्तःश्रतेर्वलात्॥५०॥ स्वैः । जुइमैंअतिअल्पविषेसुखमें यतिरागिव्याकुलभायफिरा। सत्यानदयातमलाभभयेयवरागकहांवहजायथिरा । जगकेकरतामुझकोजुसरूप सुकारजनेवहुभांतिहिरा । अवथाविरभूतपरानंदयातम लाभभयोषलवेदशिरा।।४० उत्तराई टी०॥ जोमैंअत्यंततुच्छविषयसुखमेंप्रीतिवालाहुया अत्यंत व्याकुलचित्तहुश्राथा ॥ अवानंदस्वरूपयात्माका सम्यकलाभहुए जानानहींजाता । जोवहरागकहांचलागया । और रागमूलकही प्रवृत्तिहोतीहै । औरनिरतिशयसुखमेसर्वविषयसुखोंका अंतर्भावहोनेसे निरतिशयसुखकेप्राप्तहुए वहसर्वविषयसुखप्राप्तहोजातेहैं।ौरमाप्तवस्तुमें कामनाकाअभावहोताहै।यातेविषयसुखकेअर्थप्रवृत्तिकायभावसंभवता है।॥४॥शंका ॥ अज्ञानकोयानंदस्वरूपयात्माकाथावरकपनानहीं संभवता ॥ क्योंकि सुषुप्तिकालमें अज्ञानकोविद्यमान हुएभीसुखकी प्रतीतिहोतीहै। यदिऐसेनमाने तो “सुखमहमस्वाप्सम्"यहस्मरणभी सुषुप्तिसेउठेहुएपुरुपको नहींहोगा ।। समाधाना। हेवादिन कार्याकार परिणामकोप्राप्तहुयायज्ञान सुखकेभानकाप्रतिबंधकहै । स्वरूपसे प्रतिबंधकनहीं । इसीअभिप्रायसेकहतेहैं । जिसमुझजगतके अधि छानकास्वरूपबोधसेपूर्व कार्याध्यासोंकरयाच्छादितथा । अवश्रुति जन्यबोधसेवहीमेरापरमानंदस्वरूप निरावरणहुयाप्राप्तहुआहै ॥५०॥ शंका ॥ हेसिद्धांतिन् यात्माप्रथमसर्वकोयपरोक्षभानहोताहै ॥ क्योंकि "हमस्मि" यहप्रतीतिसर्वकोहोतीहै । थौरतिसथात्मासे भिन्नब्रह्मभीयपरोक्षहै। औरयात्मापूर्वउक्तरीतिसे भानहोताहीहै।। तैसेमानेहुए ब्रह्मसाक्षात्कारतोप्रथमहीसिद्धहै। पुनःसंसारकाभानकैसे होताहै | समाधान ॥ हेवादिन् यहांयात्माकाज्ञानतुमकेसाकहतेहो क्या "मॅकर्ताहूं" इसप्रकारकायात्माकाज्ञानहै "यथवा "मेशुद्धब्रह्म स्वरूपहूं"ऐसायात्माकाज्ञानहै।इनमेंप्रथमपनतोनहींसंभवता।क्योंकि वहज्ञानतोयनात्माको विषयकरनेवालाहै । तिससे मंसारकीप्रतीति १० मि० मु० भा० दूरनहींहोसकती| औरदितीयपनभीनहींसंभवता क्योंकिविचारसेप्रथम ऐसेयात्मसान्नात्कारको असिद्धिहै । इसीतात्पर्यसेकहतेहैं ।। मृ०॥ परामृष्टोसिलब्धोसिप्रोपितोसिचिरंमया। इदानीत्वामहंप्राप्तौनत्यजामिकदाचन ॥५१॥ त्वांविनानिःस्वरूपोहंमांविनात्वंकथंस्थितः । दिष्टयेदानीमयालब्धोयोसिसोसिनमोस्तुते५२ स्वेला चिरकालवियुक्तहुते मुझसे अनवेपनते अवलाभतुझे । तुझको इप्रापत, ययही नहिदूरकरोंकवही तुझे । किछुतोरविनाममम्पनहीं थरुमोरविनाथिकैसतुझे । हमरेकरलब्धभए श्रवहो पुनजोतुम मोतुमबंदतुझे।।४१॥ टी० ॥ हे परमात्मन् दीर्घकालसे थापमरेसेवियुक्तहुएथे।यव वेदांतविचाग्मेयापकालाभहुयाहै। यवथापकोंमें अभेदरूपतासे प्राप्त हुथा कदाचिनत्यागनहींकरंगा ॥४१॥ शंका || तुमत्यागकरदो निममेक्याटोपहै || समाधान ॥ हेपरमात्मन थापसेविनामें निःस्व- रूपहूं । क्योंकिब्रह्मकोमनरूपहोनेकर नियमभिन्नको थमत्पनेकी पामिहोगी । उसकारगमेथापकात्यागनहींमंभवता । योरमुझसे बिना थापकीभीस्थिति कमेमभवंगी।क्योंकिवाको प्रत्यगात्मामभिन्नमाने हुए जडनाकी प्रामिहोतीहं । उमनिये यापकोभीमरा त्यागनहीं मंभवता । अत्यंतहप है जोथाजमुझमे यभिन्नरूपताकर यापप्राप्तट्टए हो । इमकाग्गाजम थापही वैगेथापहीही यन्यकिसीको श्रापकी तुल्यताका अभाव होनेने यापटपमामे रहिनहो । याने याप कोनमस्कार ।। ५२ ॥ मिथ्याधकोनिनि म्पउपकारकर्ना उत्तराई होनेसेापनमस्कारके योग्यहो इसीयभिप्रायसेकहतेहैं ।। मू॥देहेऽहंमाननिगडैवेद्यो ऽवोधाख्यतस्करैः। चिरंतेदर्शनादेवत्रुटित वन्धनंक्षणात् ॥ ५३॥ विशुद्धोऽस्मिविमुक्तोऽस्मिपूर्णात् पूर्णतमाकृतिः असंस्पृश्यतमात्मानमंतब्रह्माण्डकोटयः ॥५४॥ स्वैलगातन यात्म बुद्धि कुबंधहुते नमसंज्ञकचौरनधिलयो । चिरसेतुमरे करदर्शनदेव कुबंधनतूटछिनेकगयो । अतिशुद्ध विमुक्तसरूपग्रहं पुनपूरनतेयतिपूरभयो । ममरूपविपेजगकोटिवसे परताहिसपर्शनलेशभयो ॥ ४२ ॥ टी० ॥ अज्ञानादिकचौरोंने देहविषयक यहबुद्धियादिकदृढ बंधनोंसेजोमेंचिरकालसेवांधाहुयाथा।यवहेस्वप्रकाशस्वरूपपरमात्मन यापके दर्शनमात्रसेही चौरोंकेसहित वहसकल बंधन एकक्षणमें विनाशकोप्राप्तहोगये । इसहेतुसेनापनमस्कारकेयोग्यहो ॥ ५३॥ शंका ।। बद्धतथामुक्तक्याविलक्षणताहै? क्योंकियात्मातोदोनों मेंतुल्यहै ॥ समाधान । हेवादिनबद्धतथामुक्तकीविलक्षणतालोकमें हीप्रसिद्धहै ।। क्योंकिवद्धपुरुपमें मलिनतातथान्यूनतायौरदीनता देखनेमेंयातीहै ॥ ौरबंधनसेरहितमुक्तपुरुषमें बद्धसेविलक्षणता शुद्धतादिकदेखेजातेहैं। इसीयभिप्रायसेकहतेहैं।। मेंथविद्यादिमलसे रहितविशुद्धहूं ॥ क्योंकिद्वितीयवस्तुकायभावहै । पौरपूर्णजो आकाशादिकहैं तिनसेभीमें प्रतिपूर्णहूं ॥ यातेत्रिविधपरिच्छेदसे में रहितहूं । इसनिरतिशयमहत्त्वकोहीस्पष्टकरतेहैं । मुझब्रह्मात्माको नस्पर्शकरकेयनंतब्रह्मांडकल्पितरूपताकरमेरेयाश्रितहैं।इसीसेमपूर्णसे वे०सि० मु. भा. अतिपूर्णस्वरूपहूं। इसप्रकारयात्माकोसमानहुएभीज्ञानतथाअज्ञानकृत विलक्षणतामुक्ततथावद्ध संभवतीहै॥५४॥ तत्त्वसाक्षात्कारकासाधन जोअंतःकरणकीशुद्धिहै तिसकेहेतुभूतवेदाऽध्ययनतथायागादिसाधनों काअनुष्ठानभी अात्मसाक्षात्काररूप कार्यलिंगसेब्रह्मवेत्तासिद्धहै । इसीथभिप्रायसेकहतेहैं। * मू०॥ तत्त्वमादिवचोजालमावृत्तमसकृत्पुरा । इदानींतत्वादेवपूर्णानंदोव्यवस्थितः ॥५५॥ चौ० ॥ वेदवाक्यजोयाहसमस्ते । यनेकवारपूरवयभ्यस्ते ।। अवततश्रौतबोधतेकेवल । पूर्णानंदथिरामें केवल ॥४३॥ टी० ॥ पूर्वसकलवेदवचनोंका अनेकवारमेंने अभ्यासकिया । यहवेदवचनोंकायभ्यास ग्रन्यसाधनोंकाभीउपलक्षकहै।इसलियेयष्टा चत्वारिंशत्संस्काररूपवहिरंग तथानित्यानित्यवस्तुकाविवेक तथा वैराग्यादिअंतरंगसाधनभीमुझमेंप्राप्तहै ॥ अष्टाचत्वारिंशत्संस्कार यहहैं । गर्भाधान १ । पुंसवन २ । सीमंत ३ । जातकर्म ४ । नामकरण ५ । अन्नप्राश्न ६ । चौल ७ । उपनयन ८ । चारवेद बत १२ । स्नान १३ । सह धर्मचारिणीसंयोग १४ ॥ यहगर्भा धानादिचतुर्दशसंस्कारकहेजातेहैं । चारवेदव्रतयहहैं । प्राजापत्य १ सौम्य २ । आग्नेय ३ । वैश्वदेव ४ ॥ और देवयज्ञ १।भूतयज्ञ २ पितृयज्ञ ३ । ब्रह्मयज्ञ ४ । मनुप्ययज्ञ ५ ॥ यहपांचमहायज्ञहैं और श्रष्टका १। पार्वण २। श्राद्ध, ३ । श्रावणी । याग्रहायणी ५। चैत्री ६ । याश्वयुजी ७॥ यहसप्तसोमसंस्थाहै। मौरयग्न्या धान १ । थग्निहोत्र २ | दर्शपूर्णमास ३, ४ । थाप्रवण ५ ।

उत्तराई चातुर्मास्य ६ । निरूढपशुबन्ध ७ । यहसप्तहविसंस्थाहैं । और सौत्रामणि अग्निष्टोम २। अत्यमिष्टोम३।उक्थ ४। पोडशि ५१ वाजपेय ६। अतिरात्र ७) यहसप्तपाकसंस्थाहैं। औरयन्ननभक्षणकर केवेदसंहिताकाअध्ययन १ । प्रायण २ । कर्म ३ । जप ४ । उत्क्रमण ५ । दैहिक ६ । भस्मकाएकत्रकरना ७ । अस्थियोंका संचयन ८ । यहपूर्वउक्तसर्वमिलाकरअष्टाचत्वारिंशतसंस्कारहोतेहैं । सोब्रह्मवेत्तानेयहसर्वही पूर्वअनुष्ठानकरलियेहैंयहभावहै । इसप्रकार साधनसंपन्नहोकर गुरुशरणपूर्वकवेदांतविचारसेउत्पन्नहुाजोयात्म साक्षात्कारतिससेहीमुक्तिहोतीहै कर्मसहितज्ञानसेनहीं । इसलिये संन्यासकोभीयात्मसाक्षात्कारकीसाधनताहै।। इसयर्थकोसूचनकरने केलियेकहतेहैं। अबवेदांतश्रवणादिजन्ययात्मसाक्षात्कारसेहीपूर्ण तथायानंदरूपताकरमस्थितहुअाहूं।१५५।। इतियानंदपदव्याख्या ॥ अथात्माकीआनंदरूपताकीअस्फुरातमेंप्रतिनं धकनिरूपणहाराअदृष्टद्वयपदकाव्याख्याकाप्रारंभ। अथपूर्वपक्ष ।। हेसिद्धांतिन् पूर्वयात्माकीयानंदरूपताकथन की सोनहींसंभवती। क्योंकियानंदरूपताकस्यात्माप्रतीतनहींहोता यहांयहयनुमानजानना॥ ॐ आत्मानानंदरूप तद्रूपेणाप्रतीयमानत्वात् । घटादिवत् ॥ श्रा यात्माधानंदस्वरूपनहीं है। यानंदरूपताकस्नप्रतीतहोनेसे। जोयानंदरूपताकरनहींमतीतहोता। वहयानंदरूपनहींहोता। जैसे घटादिकहैं।।इतिशिंका।यहपूर्वपक्षहीनहींसंभवतात्योंकियदयानंद ४५४. 40 मि0 मुः मां रूपताकरतिसयात्माकोयज्ञानकीविषयताहै।इसस्थलमेंपूर्वहीयानंद अंशकोअज्ञानकरयावृत्तपनायस्फुरणमेंकारणकथनकियाहै।यातेपुनः तिसीयर्थकाविचारकरनेसे पुनरुक्तिदोपप्राप्तहोगा ॥ समाधान ॥ तथापियावरण करनेवालेयज्ञानादिविषयक विचारधारातिसीयर्थको अत्यंतहटकरनेकेलिये “स्थूणानिखननन्याय" सेपुनः ग्रंथकर्ता थाचार्यमवर्तमानहोताहै । यातेपुनरुक्तिदोपकी प्राप्तिनहीं ॥ इसीसे यदिपूर्णानंदस्वरूपात्माहै तोसंसारकालमें सर्वकोक्योंनहींभान होता? || यहपूर्वपन्नसंभवताहै ॥ शंका । हेवादिन (मानभवम् किंतुभूयासमेव ) भ०॥ मेनहोबायहनहोकिंतु सर्वकालहोवाइस प्रकारकीनिस्माधिक इच्छाकाविपयरूपताकर यात्मामधमसर्वकोभान होताहै ।। वहीसुखकास्फुरगाहै ।। तिससेभिन्नसुखनहीं है।भावयहपरम प्रीतिकाविषयरूपताकर जोयात्माकास्फुरणहै। यहीयानंदस्वरूपका स्फ़ाहै।याते "यप्रतीयमानत्व" हेतुस्वरूपामिद्धहै | समाधान ।। हेसिद्धांतिन् । क्यावास्तवसे निरतिशय यानंदम्पयात्मा परमप्रीति काविपयरूपताकम्भामताह ॥ अथवानिरतिशययानंदम्वरूपमेहूं ऐसायहपुरुषयभिमानकरताहै?प्रथमपनतोहमकाभीस्वीकारहै । और दितीयपननहींसंभवता ।। क्योंकितिमप्रकारकेयभिमानकायभावहै। यद्यपि "सुग्वमहमस्वाप्नम्" इसपगमर्शमे मुम्बम्पताकायहपुरुष यामि मानकरताहीहै।क्योंकि यनुभवपूर्वकही स्मृतिज्ञानहोताहै । तथापि एतस्यैवानंदस्याऽन्यानि भूतानिमात्रामुपजीवन्ति । (पृ.१० म०६ मा० . १२) श्र०ा इसयानंदस्वरूप यात्माकेहीलेशमात्रयानंदकोयाश्रया उत्तराद्ध करकेश्रन्यसर्वप्राणधारिजीवनको धारणकरतेहैं ॥ इत्यादिश्रुतिसे मोक्षकालमेंजेसायानंदस्वरूपात्मासुनाजाताहै।तेसेयानंदकायभि मानफिसीकोभीनहींहोता ॥ शंका ॥ हेवादिनजोसुखसुषुप्तिकाल मेंभानहोताहैवहभीनिरतिशयसुखहीहै।क्योंकिनित्ययात्मसुखमेकिसी प्रकारकोअतिशयतानहींसंभवती ।। समाधान || हेसिद्धांतिन् आनंदब्रह्मणो रूपंतच्चमोक्षे प्रतिष्ठितम् * य० ॥ जोयात्माकी यानंदस्वरूपताहै सोमोक्षकालमेंही अवस्थितहै। इसश्रतिसेमोक्षकालमेंतिस नित्ययानंदकी अभिव्यक्ति श्रवणहोतीहै । यातेसंसारयवस्थासेमोक्षकालमेंयानंदकी अधिकता होनेसे नित्यसुखमेंभी अतिशयताकासंभवहै।। और मै यानंदस्वरूप हूँ" इसप्रकारकेअभिमानको ज्ञानविशेपहोनेकर सुषुप्तिकालमेतिसका अभावहै। यातेतिसकालमें थानंदभासतायाभी स्पष्टनहींभासता! शंका॥ हेवादिन्यात्माके ग्रानंदस्वरूपकीजोअप्रतीतिहै। सोयात्मा कीयनानंदरूपतासेनहीं किंतुसंसारथवस्थामें प्रतिबंधकेसद्धावसे हैइस कारणसेयात्माकीयानंदरूपताके भासमानहुएभी इसपुरुषकोविशेष अगिमाननहींहोता ।। समाधान ।। अथआनंदरूपताके अमानमेंप्रतिबंधककाविचार। हेसिद्धांतिन्वहमतिबंधककौनहै । क्यायज्ञानहै।। श्रथवातिस काकार्यहै ? प्रथमपक्षोभीयह विचारणीयहै ॥ क्याजीवकायज्ञान श्रानंदरूपताकेभानमें प्रतिबंधक है।यथवापरमात्माकाथज्ञानप्रतिबंधकहै? अन्त्यपनतोनहींसंभवता । क्योंकिसर्वज्ञ तथानिर्दोष तिसपरमात्मा निष्ठयज्ञानकायभावहै । औरमथमपनभीनहींसंभवता । क्योंकि वे० मि. मु. भा. नान्योतोस्तिद्रष्टाअननजीवेनात्मना।तत्त्वमास अयमात्माब्रह्म॥ इत्यादिकतिवचनोंसे तिसजीवात्माका परमात्माकसाथयभेद श्रवणहोताहै।। यातेतिसजीवमेंभी यज्ञानकायभावहै।। योरयदिऐसे कहो किजीवनिष्ठभीकल्पनामात्रसेहीअज्ञानहै वास्तवसेनहीं। सोयह कथनभीयसंगतहै । क्योंकिपरमात्मामेंभी अज्ञानप्राप्तहोगा। जिस कारणासेजीवकेसाथ तिसकायभेदहै ॥ शंका ।। हेवादिन् अज्ञान जीवात्मामेंभीनहीं है।तथाविवरूपपरमात्मामेभीनहीं है। किंतुनिर्विभाग चेतननिष्ठअज्ञानहै । यहपूर्वनिरूपणकियाहै । यातेवहयज्ञानसर्व रूपतासेयानंदकेभानकाप्रतिबंधकहीहै ॥ समाधान ॥ हेसिद्धांतिन् तिसयज्ञानसेप्रात्माकीयानंदरूपताकाजोप्रतिबंधहै।सोक्यावास्तवहै। अथवाअनवधानमात्रसेयानंदकीयप्रतीतिहोनेसेवहप्रतिबंधकल्पितहै? प्रथमपक्षतोनहींसंभवता॥ क्योंकियदिसंसारअवस्थामें प्रतिबंधसेरहित यानंदकाभानहीनहींहोता तोकिसकीप्राप्तिसेवंधकीनिवृत्तिहोगी ॥ संसारीकीप्राप्तिसेतोसंसारकीनिवृत्तिनहींसंभवती। औरयदियहद्वितीय पक्षकहो किसंसारअवस्थामेंभी वास्तवप्रतिबंधसेरहितयानंदविद्यमान हीहै परन्तुयानंदस्वरूपयात्मामें अज्ञानसे “अनवधान" अर्थात् प्रमादमात्रहीप्रतिबंधहै वास्तवसेकोईप्रतिवंधनहीं ॥ इसीअर्थकोउप पादनकरतेहैं।केवल यज्ञानसेउत्पन्नहुया जोदैतरूपसंसार तिसकेअंतः पातिजोशब्दादिविषयरूपविप तिसकेयाधीनहुया जोपुरुषहै। पुनः तिनविषयोंकेदर्शनकालमेंभी तिनकीयत्यंतभावनासे प्रादुर्भावहुई जोविषयरूप कुंडितिसकर जिसकाहृदय थाकर्षण कियाहुयाहै ॥

उत्तराई पुनःपरमप्रियतमतथासर्व जगतके ईश्वरतथासर्व अंगोंमें योत प्रोत रूपताकर अत्यंतसमीपस्वस्वरूपकेदर्शनकोक्षणमात्रभी जोप्राप्तनहीं होसकता।यहांपरंयहभी जानलेना (यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म) इसतिसेसिद्ध जो “यतिसमीपता" तिसकरएकतादर्शनकेयोग्यहै यहसूचनकिया । और (योवैभूमातत्सुखम्) इसश्रुतिसे ब्रह्म कीसुखरूपताश्रवणहोतीहै।सो परमप्रियतम"इसपदसेकथनकी और * आनंदादेवखल्वेमानिभूतानिजायते । अा अानंदसेही यहदृश्यमानभूतउत्पन्नहोतेहैं । इसश्रुतिसे अनंदस्वरूपात्माकोजगत् की कारणता श्रवण होनेसेईश्वरपनाभी कथन किया।यौर “योतमोत" पदसेउपादानताकथनकी! इति। तिस पूर्वउक्तविशेषणयुक्तपुरुषको विषयोंकेदर्शनसेयात्मामें सुखरूपताका अनवधानमात्रहीप्रतिबंधहै वास्तवसेकोई प्रतिबंधनहीं । जैसे अपने कंठमेस्थितमालादिकोंकायज्ञानसेयनवधानमात्रही प्रतिबंधहोता है वास्तवनहीं । शंका॥ जैसेविषभीयौपधादिकउपायनसेत्यागाजाता है।तिसेविवेकसे विषयरूपविषका त्यागभीसंभवता है । समाधान ।। तिन विषयोंके दर्शानादिकोंकीकामनावाले पुरुपको विवेकहीउदय नहींहोसकता । यातेतिसकात्यागनहीं संभवता ।। शंका । यद्यपि विवेकनहींसंभवता ।। तथापिविपयानंदको क्षणिकहोनेसेही तिससे वैराग्ययुक्तहोनातोयोग्यहीहै।। समाधान ॥ विषयोंकेदर्शनकरहीसर्व श्रायुकोपूर्णहोनेसेवैराग्यका होनाभीदुर्घटहै। याते श्रात्माकीविस्मृति संभवती है । इसप्रकार अद्वैततथासुखस्वरूपयात्मामें दुःखादितथा देतसाहित्यादिकोंकादर्शनहीपतिबंधहै। यहांथज्ञानकाकार्यप्रतिबंधहै दे०सि० मु० भा० यहपूर्वकथनकियाहूयाद्वितीयपक्षइसीके अंतर्भूत जानलेना। सोयह द्वितीयपक्षभीनहीं संभवता ।। क्योंकि दैतदर्शनरूपप्रतिबंधकेयाश्रय कानिश्चयनहींहोसकता ॥ तथाहि ॥ ॐ अथद्वैतद्रष्टाकेस्वरूपकाविचारऔरतिसकानिषेध वहद्वैतद्रष्टाकौनहै।क्यावहपरमात्माहै। यथवाजीवहै? अथवाकोई थन्यहै? । इनमेंप्रथमपनतोनहींमंभवता। क्योंकि तिससर्वज्ञपरमात्मा निष्ठभ्रमकेकारणरूप यज्ञानका अभावहोनेकर तिसकोद्वैतदर्शनकी अनुपपत्ति है । और । ॐ यस्याज्ञानम्रमस्तस्यभ्रान्तः सम्यक्चतिसः * श्र० ॥ जिसकोअज्ञानहोताहै तिसीकोनमहोताहै। औरभ्रम युक्तहुयावहीयथार्थजानताहै"। इसन्यासेग्रज्ञानयोभ्रमतथायथार्थ ज्ञानइनतीनोंकोसमानाधिकरणताका निश्वयहोनेसे अविद्यावालेमेंही तिनकासंभवहै ॥ विद्यादिदोपसेरहित परमात्मामें इनकासंभव नहीं । इसलियेपरमात्मामें दैतद्रष्तृत्वनहींसंभवता । औरयदिअविद्या वालाजीवदेतकादप्याहै यह द्वितीयपक्षकहो तोयहभीनहींसंभवता । क्योंकि (नान्योतोस्तिद्रष्टा) इत्यादिश्रुतियोंमें तिसजीव कापरमात्माकसाथयभेदकथनकियाहै । इसकारणसेसर्वज्ञपरमात्मासे अभिन्नजीवनिष्ठभ्रमकैकारण रूपयज्ञानकाअभावहोनेसेतिसभ्रमका कियाहुादैतदर्शनभोतिसकोनहींसंभवता।शिका।।जैसे तदेवेदंमुखम्" इस प्रत्यभिज्ञासेविंव तथाप्रतिविंचकी एकताकेहुएभी श्यामतातथा लघुतादिधर्मप्रतिविघमें भासतेहैं ॥ औरस्वच्छतातथाविशालतादि धर्मविमेंहोतेहैं क्योंकिउपाधिकोपनिधिक पक्षपातित्वकानियम है , उत्तराई तैसे अज्ञानरूपउपाधिकृत द्वैतदर्शन तथा अल्पज्ञतादिधर्मजीव निष्ठहीहोतेहैं । सर्वज्ञपरमात्मानिष्ठनहींहोतो यातेजीवता ईश्वरका श्रभेदहुएभीविमतिविकीन्याई सर्वज्ञतातथाद्वैतदर्शनकीउपपत्तिहै। समाधान!! यहांदृष्टांततधादायतकी विषमताहोनेसेपूर्वउक्तव्यवस्था नहींसंभवती । इसीकोस्पष्टकरतेहैं ॥ दृष्टांततोदर्पणरूपउपाधि प्रथमसिद्धहै. तिसमेंप्रतिविवभावहोनेसेअनंतर मलिनतातथास्वच्छ तादिधर्मोकीव्यवस्थाकर उपपत्तियुक्तहै । औरष्टिांत तोअन्यो ऽन्याश्रयदोषप्राप्तहोनेसे सर्वज्ञतादिधर्मोंकी व्यवस्थानहींसंभवती । क्योंकिदैतदृष्टिकरप्रकटहुयाजो अज्ञानतकार्यरूपदैतबतिसकोविन तिवित्रभावकाउपाधिहोनेकर तिसमें प्रवेशसे अनंतरतिसकेसंबन्धसेवित्र प्रतिक्विभावकीकल्पना होतीहै। यौरतिसकल्पनाके हुए प्रतिविंवरूप जीवदैतकाद्रष्टाहै यहकल्पनाहोतीहै ।। इसप्रकारद्वैतद्रष्टाप्रथमसिद्धहो तोथज्ञानादिरूपउपाधिकीसिद्धि औरउपाधिकेसिद्धहुएदेतदुष्टाकी सिद्धिहै । तिसउपाधिकीसिद्धिसेपूर्वदैतद्रष्टाके व्यवस्थापककीअनुप पत्तिहै । यातेयन्योन्याश्रयदोपप्राप्तहोनेसे यहप्रकारनहींसंभवता । - शंका यनादिसिद्धयज्ञानरूपउपाधि प्रतिबिंवरूपदष्टाकोभीयनादि होनेकर "तिसप्रतिविंचकल्पनासेपूर्व द्रष्टाकीव्यवस्थानहींसंभवती" यहवादीकाकथननहींसंभवता।। यातेयन्योन्याश्रयदोपकी प्राप्तिनहीं होती। समाधान ।। पूर्वउक्तमकारसेजीवदष्टाहो परंतुवहसादिहै ।। अथवायनादिहै ? । यहविचारकर्तव्यहै ।। प्रथमपक्षकहोतोजीवको द्रष्टापनासिद्धनहींहोगा ॥ क्योंकियनादिसिद्ध अज्ञानकेंद्रप्टाको भीयनादिसिद्धताहीकहनेयोग्यहै । यातेप्रथमपतयसंगतहै। शंकर।।

४६० के.सि. मुः भा० जीवसेभिन्नपरमात्माही अनादिसिद्धद्रष्टाहो।।समाधान। वयनादि सिद्रष्टाकथनकरनेके अयोग्यहै ॥ शंका देतकद्रष्टाकायभावतुम किसप्रकारकहतेहो जिसकारणसे सानीहीदैतकादष्टाविद्यमानहै ।। समाधान।। वहसाक्षीक्यापरमात्माहै।अथवाजीवहै? प्रथमपक्षमेंभीयह कहाचाहिये ॥ क्यावहपरमात्मारूपसाक्षी स्वयविद्यादिकोंकाद्रष्टाहै अथवाजीवनिष्ठ अविद्यादिकोंकाद्रप्टाहै ? ॥ इनमेंप्रथमपक्षतो नहींसंभवता।क्योंकितिससर्वज्ञपरमात्मानिष्ठ स्वयविद्याकायभावहोने करतिसकादष्टापनायनुपपन्नहै ॥ औरसर्वज्ञकोभीयन्यकीयविद्या काद्रष्टाहोनेसेको ईविरोधनहीं यदियहद्वितीयपक्षकहो तोतिसमें भीयह विचारकर्तव्यहै । क्याजीवब्रह्मकाभेदवास्तवहै अथवायवास्तवहै? ॥ अन्त्यपक्षतोनहींसंभवता ।। क्योंकियपनेसेभिन्नजीवकीयविद्याका द्रष्टाहोनेकरपरमात्माको भ्रांतपनाप्राप्तहोगा|तात्पर्ययहहै।किस्वविषय कतोयविद्याकायभावहै । क्योंकिवहसर्वज्ञहै।औरअपनेसेभिन्नअन्य कोईयविद्याकायाश्रयनहींहै ॥ इसकारणसेस्वभिन्नमें अविद्याको देखतेहुएपरमात्मानिष्ठ भ्रांतत्वप्रमंगवश्यहोगा ॥ ौरयदिब्रह्ममें भ्रांतपनानिवारणकरनेकेलिये जीवब्रह्मकावास्तवहीभेदहै यहप्रथम पक्षस्वीकारकरो तोयहभीनहींसंभवता॥क्योंकि (नान्योतोस्ति द्रप्टा) इसशास्त्रकाविरोधप्राप्तहोगा ॥शंका || परमात्माहीदैतका द्रष्टाहो।ौरद्वैतकाद्रप्टामाननेसे सर्वज्ञताकामीविरोधनहीं। क्योंकि अविद्याकेनिवर्तकप्रमाणजन्यज्ञानकी याश्रयताका नामसर्वज्ञतानहीं किंतुस्वरूपचेतनसेअपनेमेंअध्यस्तसर्वजगतकीप्रकाशकताहीसर्वज्ञता है।ौरस्वरूपचेतनयविद्याकाविरोधीभीनहीं।क्योंकितिसकोअविद्या उत्तराई कासाधकपनाहै ॥ यातेपरमात्माहीद्वैतकाद्रप्ट्यहै ॥ समाधान ।। परमात्माकोद्वैतद्रष्दृत्वनहीं संभवता ॥ क्योंकि ॥ (निरवानि रंजनं) य० ॥ वहपरमात्मायविद्यासेरहितहै ॥ औरतकार्य सेभीरहितहै । इसश्रुतिने अविद्यातत्कार्यकातिसमें निषेधकथन कियाहै । औरयदिऐसेकहो कियहवाक्यवास्तव अविद्याकानिषेध कहै ॥ कल्पितविद्याका निषेधकनहीं। यातेयविद्याक निपे धकवाक्यकायन्यविषय होनेकर कल्पितअविद्यादिकों के निषेध कोवहनहींकथनकरता ॥ सोयहकथनभीसमीचीननहीं । क्योंकि अविद्यामात्र शक्तिवाला जोयविद्याशब्दहै तिसकोवास्तवयविद्या परमानेहुए लक्षणाकीमाप्तिहोगी। औरमुख्ययर्थकीयनुपपत्तिसेविना लक्षणाकास्वीकारदोपरूपहै ।किंवा।। वास्तवरूपयविद्यामसिद्धहै। वा नहीं? । प्रथमपक्षमतोदेतापतिहोगी। औरब्रह्मकीन्याइतिसकानिषेध भीनहींसंभवेगा । औरद्वितीयपक्षभीनिषेधनहींसंभवता । क्योंकि यासिद्धवस्तुकानिषेध कोईनहींकरसकता किंतुप्रसिद्धकाही निषेध कियाजाताहै । इसप्रकारपरमात्माकोदेतद्रष्दृत्वनहींसंभता ॥ और अनादिसिद्धजीवरूपसाक्षीद्वैतकादष्टाहै।यहद्वितीयपनभीनहींसंभवता क्योंकिजीवभावकोयविद्याकेउत्तरभावीहोनेकर अनादिलकाअसंभव है।ौस्यदिऐसेनमानेतोयविद्याकीनिवृत्तिहुएभीजीवभावकीनिवृत्ति नहींहोगी ।। क्योंकियनादिभावकी निवृत्तिनहींहोती ॥ ौरसंसारि भावके अनिवृत्तहुएअनिर्मोक्षप्रसंगहोगा । पूर्वजीवसादिहैवायनादि है यहदोविकल्पकियेथे। तिनमेंयनादिपनका निराकरणाइसपूर्वउक्त अनादिपक्षके निराकरणसेहीजानलेना ।। इति ।। अवयन्यहीकोई वे. सि. मु० भा० द्रष्टाहै इसतृतीयपक्षको निषेधकरते हैं। औरतृतीयपक्षभीनहींसंभवता क्योंकिजीवतथापरमात्मा सेभित्रसर्वथनात्मपदार्थोंकोजडहोनेकरद्रष्टा पनेकाहीयसंभवहै । औरयदिऐसेकहो किजीवतथाईश्वरइनदोनों में अनुगत जोसामान्यचेतनहै वहीदैतकादष्टाहै। सोयहकथनभीनहीं संभवता।। क्योंकितैसेमानेहुए अविद्याकोभीतिसयनुगतवेतननिष्ठ हीकथनकरनाउवित्तहै । तिसकारणसेपरमात्माकान्याईनिर्दोष तथा भ्रमसेरहितजीवकोभीयनायाससर्वज्ञतातथानित्यमुक्तताकीमाप्तिहोगी क्योंकितिसमेंभी परमात्माकान्याईअविद्याकायभावहै ॥ किंवाजीव तथाईश्वरमंयनुगतसामान्यचेतन देतकाद्रप्पाहै । इसपक्षमेंयन्योन्या श्रयदोपकोभीप्राप्तिहोतीहै ।। तथाहि ।। तृतीयपनयनुगतचेतनको दष्टापनासिद्धहुए तिमके याधीनउपाधिशब्दकेवान्यरूपयज्ञानादिकों कीसिद्धिहायोतिमउपाधिकेमिद्धहुएनिमकेयाधीनविपतिविवसंज्ञक परमात्मातथाजीवरूपदोपकारकविभागकी अपेनाकरसामान्यचेतनरूप तृतीयपकारकीमिद्धिह।इसप्रकार यन्योन्याश्रयदोपशीप्राप्तिसेयहपक्षी समीचीननहीं ॥ यानेद्रतद्रष्टायमिरिहानेकर तिमकेयाश्रितरहने चालादेतदर्शनरूपप्रतिबंधभीयमिद्ध ।। इति ।। अथगुरुशिष्यकेसंवादहारापुन तद्रष्टाकेस्वरूप काविचार गंकाशिप्य अविद्याकोयनंगीकारकग्हुए तिमविपयकमान धोग्थापनहींमंभवता ।। इमसेतुझपमा यथवाथानेपकर्ताको हीयविद्याकादष्टापनायुक्त यहवार्ता प्रश्नस्यज्ञानपूर्वत्वात्] इसकारिकाकव्याग्यानमें जीयविद्याविषयक प्रश्नकग्नवालाई यही ४६३ उत्तराई थविद्याकादष्टाहै।। ऐसेअर्थसेकथनकराएहैं ।।अथवा याक्षेपकरने वालाहीतिसकादष्टाहै। इसप्रकारदैतद्रष्टाकास्वरूपपूर्वनिरूपणकरनेसे पुनातिसविषयप्रश्ननहींसंभवता समाधान। हेभगवन्य द्यपिसामान्यसे मुझदैतद्रष्टाकास्वरूपपूर्वनिरूपणकियाहै।तथापितिसीमुझदैतदष्टाका स्वरूपवविशेषकरयापनेतत्त्वनिर्णयकेयर्थ कथनकरनाचाहिये। और यदिग्रापऐसेकहोकिजोतुमअपनेयात्माकोभीनहींजानते कियहमैहूं" औरयहमें पछताहूं ॥ ऐसेतुझकोप्रश्नकरनाहीसेसंभवेगा । क्योंकि कौनदैतकाद्रष्टाहै? इसप्रकारकाप्रश्नयविद्याकेदष्टातुझको अपनेस्वरूप केनजाननेकरनहीं संभवता ।। मनकेविषयकाअज्ञानहुए तिसविषय कशब्दप्रयोगकीहीअयोग्यताहै । सोयहयापकाकथनभीसमीचीन नहींप्रतीतहोता ॥ क्योंकि यज्ञात यर्थविषयकहीप्रश्नसंभवताहै।। यदि ऐसेनहींमानोगे तोप्रष्टव्यमर्थक ज्ञानसेतथाप्रष्टव्ययर्थ के अज्ञानसे प्रश्नकरनानहींसंभवेगा । थौर नाप्टष्टःकस्यचिढ्यान्नचान्यायेनष्टच्छतः।। जानन्नपिचमेधावीजडवल्लोकमाचरेत् ॥ य० ॥ यहविद्वान्नपूछाहुया किसीकोनकथनकरे ॥ भोर थन्यायसे अर्थात्केवलवुद्धिकी परीक्षाकेयर्थ प्रश्नकरनेवालेकोभीन कथनकरे। औरसर्वअर्थकोजानताहुभाभी तथाअर्थकीस्मृतिवाला हुथाभीजडकीन्याईलोकोविचरे । इसन्यायसे थापभीविदानकथन करनेकोथसमर्थहै । यातेसर्वशास्त्रयारण्यका रोदनहोजायेगा। थर्थातनिष्फलहोगा ॥ शंका । हेशिष्य प्रश्नकविषयकायज्ञानहुए तिसविषयकशब्दका उच्चारणरूपशब्दरचना कैसेसंभवेगी। क्योंकि ४६६ ०सि० मु. भा. तिसकारणसे शरीरहीयात्माहै । ऐसेस्थूलदर्शिचार्वाकवौधकहतेहैं । और कोईइन्द्रियोंकोही थात्मा कहतेहैं क्योंकि ज्ञानके साथइन्द्रियों का अन्वयव्यतिरेक प्रतीतहोताहै || जब इंद्रियहों तोज्ञान होताहै मृतशरीरमेंइंद्रियनहींहोते तवज्ञानभीनहींहोता । इसप्रकारके यन्वय व्यतिरेकसेइन्द्रियोंकोज्ञानकीकारणतासिद्धहुएउपादानकोश्रेष्टताहोने सेतिनइन्द्रियोंकोद्रष्टापनाउचितहै। और “अहंकाणः । अहंबघिरः" इत्यादिअहंप्रत्ययकी विषयताभी निनमेंहोनेसे इन्द्रियहीद्रष्टाहैं । और कोईएक ऐसेकहतेहैं । स्वप्नमेंइन्द्रियोंको स्वस्वव्यापार सेउपरतहुए मनकीतिसकालमें अनुवृत्तिहोनेसे तथाबंध मोक्षादि सर्वव्यवहार मनकेयाधीन होनेकर और “ अहंमनः" इसयह प्रत्ययकीविपयतासे मनहीयात्माहै । यद्यपि “यहमनः" यहप्रतीति स्पष्टनहीं।तथापि “हपशोकवानहम्"यहप्रतीति सर्वकोप्रसिद्धहै। और हर्पशोकादिधर्मवालामनहीहै। याते यहंमनः" यहप्रतीतिमीसंभवती है।यौरक्षणिकविज्ञानवादीवौध तोयहकहतेहैं।क्षणिकविज्ञानरूपबुद्धि मेभिन्नमनकायभाव है क्योंकिबुद्धिकेयाधीनही मनकाव्यापार होताहै।यातेविज्ञानहीयात्माहै।यहांबुद्धिपर्यंतपदार्थोंकाजोकथनहैवह अन्यंअन्तरपदार्थोंकाभी उपलक्षकहै । इसलियेयथायोग्यग्रंतस्तथा अव्यभिचारिरूतासेजो संभवहो वहभीस्वस्वरूपकरग्रहणकरनेयोग्यहै बुदिसेअंतरजोयानंद मयकोशहैतिसकोनेयायिकौरभाट्टतथाप्रामा करमतवाले तथाशून्यवादियोधयात्मा कहतेहैं । यातेइनमें किसी एकको अथवा इनके समुदायको तुम यात्मरूपताकर ग्रहण करो इसप्रकारश्री गुरुकरशिष्यकास्वरूपउपदेशकियेहुए अवशिष्यतिन उत्तराद सबकोनिषेधकरताहै ॥ समाधान ॥ * देहात्मवादादिकोंका निराकरण * हेभगवन् तिनशरीरादि पदार्थोंके मध्यकोईएकएक अथवा तिनके समुदायको यात्मस्वरूपताकी अनुपपत्तिहै । तिनको यात्म स्वरूपताकी अनुपपत्तिमें चारप्रकारका अन्वयव्यतिरेक हेतुरूपता करकहतेहैं | जिसकारणसेशरीरादिकसर्वपदार्थ अज्ञानकाकार्यहैं इसीसेतिनकोव्यभिचारी होनेकर प्रात्मरूपतानहींसंभवती ॥ इस कथनसेकार्यकारणाका अन्वयव्यतिरेकदिखलाया । यद्यपियज्ञानही कारणहै आत्मानहीं यातेश्रज्ञानकोही यात्मरूपताहोगी। तथापि अज्ञानकीयधिष्ठानतासे यात्माकोकारणता पूर्वअनेकवार प्रति पादनकरयाएहैं । औरअहंप्रत्ययभी इनमेंउपचारिकहै क्योंकियह सर्वही ममप्रत्ययकाविषयहैं । याते “ममेदंशरीरम्" इसभेदप्रतीतिसे श्रात्माकातथाशरीरका भेदप्रतीतहुए"यहंमनुष्यः” यहयभेदप्रतीति उपचारिकहै।औरयहजोपूर्वकहाथा। कि ममात्मा"यहभेदप्रतीतिजैसे उपचारिकौलेसे "ममेदंशरीरं"यहभेदप्रतीतिभीउपचारिकहोजायेगी। सोयहविपरितकथनभी समीचीननहीं। क्योंकिदृष्टांतकीविषमताहै। तथाहि ॥ दृष्टांतमेंतोयात्मशब्दकी समीपतासे वहसंबंधप्रत्ययउप चारकेयोग्यहै । क्योंकिथपने में अपनाभेद नहींसंभवता । औरयहां दाप्टातमेंतोयात्मशब्दकीसमीपताहैनहीं । यातेसंबंधपत्ययउपवारके योग्यनहींहोसकता । यौरदेहादिकोंमें अहंप्रत्ययतोयात्माकेयध्या ससेभीसंभवताहै ।। शंका ॥ अहंप्रत्ययकोदेहादिकोंमें थात्माके अध्याससेमानेहुए ममेदंशरीरादि यहांममपदसेउत्तरवर्तिपष्टिविभक्ति व०सि० ०म० भ० सेकौनसंबंधप्रतिपादनकियाहै ॥ ममाधान ॥ हेभगवन्शेपणेपि भावसंबंधकोही पष्टिविभक्तिबोधनकरतीहै। क्योंकिजैसेछत्रचामरादि इतरयनात्मपदार्थमेरेभोगकासाधनहैतिसेयहशरीरादिकभीमेरेभोगका साधनहै याते यनात्माहै । औरइनकोमेराशेपहोनेगेभी यनात्मताहै। इसहेतुसेइनमेकोईएक यथवाइनकासमुदाय मेरास्वरूपनहींहोसकता। क्योंकियात्मवस्तु अज्ञानतत्कार्यसे विलक्षणहै | औरहेयउपा देयसेरहितस्वभावहै ।। यहांयात्मामें यहेयरूपता कहनेवाले शिष्यने तिसकीयानंदरूपतायौरशरीरादिप्रपंचनिष्ठ दुःखरूपतासचनकी।यौर इसकथनसे दुःखित्वतथापरमप्रेमास्पदत्वके यन्वयव्यतिरेकभीदिखला दिये । यौरसर्वविकारोंसेरहितहोनेसे यात्मायनुपादेयहै । यौरजैसे देहादिकों में ग्रहप्रत्ययगौणहै।तैसे यात्मामेवहप्रत्ययगौणनहीं। क्योंकि यात्माममप्रत्यकी विषयताकायभावहै। यौरयात्मापरमप्रियतमहोने सेयन्यसर्वयनात्मपदार्थोंमें यनुपसर्जन यर्थातप्रधानहै । औरयपने सेभिन्नसर्वयनात्मपदार्थोंकाप्रकाशकहोनेसेमाक्षिस्वरूपहै। इसकथन सेसाक्षीतथासाक्ष्यके यन्वयव्यतिरेकदिखलादिये। यौरयज्ञानादिसर्व कल्पितपदार्थोंमें ग्रनुगतहोनेकर यह यात्मा अव्यभिचारिस्वभावहै । और अर्थसेदेहादि व्यभिचारिस्वभावहै । इस कथनसे यनुगततथा व्यभिचारिकाचतुर्थ अन्वयव्यतिरेकभी दिखलादिया । इस प्रकार स्थूलशरीरसेलेकरबुद्धिपर्यन्नपदार्थ कोईभीमेरास्वरूपनहीं।।शंका।हे शिष्यदेहसेयादिलेकरबुद्धिपर्यतपदार्थोसेभिन्नजोस्वरूपतुमनेपरिशेष कियाहै वहीतुमयपनास्वरूपनिश्चयकरो।।समाधान।। हेभगवतिस प्रत्यकचेतनकामुझकोयज्ञानहै। और यदियाप यहकहो कियज्ञान उत्तराई कोत्यागकरके तिसकाविषयजोस्वरूपमात्र प्रत्यक्चेतनतत्त्वहैवहथप नास्वरूपग्रहणकरनेयोग्यहै । सोयहकथनभीनहींसंभवता क्योंकि तिसप्रत्यक्चेतनकोभीजीवतथाईश्वरौतिनसेभिन्नशुद्धचेतनमात्ररूप करनिर्णयकरनेकीसामर्थ्यसेसंदेहकीविषयताहै।शिंका।शिष्यजीव तथाईशादिरूपताकरनिर्णयकरनेसेक्याप्रयोजनहैवस्तुकाजैसास्वरूपहै वहतुमकोनिर्णीतहीहै ॥ समाधान।। हेभगवन्सकलविशेषरूपतत्त्वके जाननेकीइच्छावालेप्रतियहउत्तरनहीं संभवतायातेविशेपस्वरूपयापने कथनकरनाचाहिये ।। शंका । हेशिष्य सामान्यविशेषभावसेरहित श्रात्मवस्तु विशेषकरजाननेकीइच्छाहीनहींसंभवती ।। समाधान ।। हेभगवन् तिससामान्यविशेषभावसे रहितवस्तुकास्वरूपही श्रापकर कथनकरनेयोग्यहै ॥ शंका ॥ हेशिष्यजोसंदिग्धयर्थहोताहै वही जिज्ञासाकाविषयहोनाहै।ौरयज्ञानपर्यंतपदार्थोसेभिन्नरूपताकरपरि शेषसेनिश्चितवस्तुमें संशयनहींसंभवता । औरसंशयके असंभवसे जिज्ञासाकीयनुपपत्तिहै।यातेतिसकेस्वरूपविषयकमश्नसेक्याप्रयोजन है.? | समाधान । हेभगवन स्वरूपविषयकज्ञानतोयवपर्यंतभी निवृत्तनहींहुया ! यातेजिज्ञासाकासंभवहै ॥ शंका ॥ अज्ञानन निवृत्तहो।परन्तुनिश्चितवस्तुमेंसंदेहकेनदेखनेसे जिज्ञासाकैसेसंभवेगी समाधानायज्ञानकेस्थितहुएहीविवेकदृष्टिसेतिसयज्ञानसेभिन्नमात्मा कास्वरूपनिर्णयहुएभी तिसहीग्रज्ञानकर विषयकीहुईवस्तुमॆसंदेहकी उपपत्तिहै।क्योंकिविवेकज्ञानकोअन्वयव्यतिरेकरूपयुक्तिकरजन्यहोने सेपरोक्षताहैयातेतिसको यपरोक्षसंशयादिकोंकानिवर्तकपनानहींसंभ वता शंका।। अज्ञानादिकोंसे यात्मवस्तुको भिन्नरूपताकरनिश्चित वे०सि० मु. भा. हुएभीग्रज्ञान श्रौतत्प्रयुक्तसंशयहोताहै ॥ इसतुम्हारेकथनसेयज्ञा नादिकोंकेविद्यमानहुए निश्चयहीनहींहोगा। औरयदिनिश्चयतुम मानोंगे।।तोयज्ञानादिकोंका सद्भावनहींहोगा।इसीअर्थकोस्पष्टकरते हैं। अध्यस्तसेजोअधिष्ठानकाभेदहै इसीकोविवेककहतेहैं । और कल्पितयज्ञानकेस्वरूपकीस्थितिहुएतिसकेयधिष्ठानयात्माकाअन्यत्व रूपविवेककिसीमकारभी ज्ञातनहीहोसकता ॥ क्योंकिअध्यस्तपदार्थ कायधिष्ठानकेसाथ तादात्म्यहोनेकर तिससेभिन्नअध्यस्तकेस्वरूप कायभावहै। यौस्यदिविवेकदृष्टिसे यधिष्ठानरूपयात्मवस्तुनिश्चित है तोतिसमेंयध्यस्तयज्ञानयथवातिसकाकार्यतिससे भिन्नकरकेतिस यधिष्ठानमेनहींहै । ऐसेनिर्णयकरकेहीग्रात्मतत्त्वनिश्चयकरनेयोग्य है ॥ तैसेमानेहुए तिसमे यज्ञानकेयभावसे संदेहकीयनुपपत्तिहै । औरसंशयकेअभावसे प्रश्नंभीनहींसंभवता । समाधान ॥ हेभगवन् इतनेकथनसेभीदैतद्रष्टाकास्वरूप यापनेनहींकथनकिया। यद्यपि आपकरकथनकीहुईयुक्तिसे गज्ञानादिकोंकेनिषेधहुए मोक्षसंबंधीशुद्ध विकाररहितचेतनशेपरहताहै ॥ परन्तुयनिष्टप्राप्तिसे तिसकोद्वैतका द्रष्टापनानहींसंभवता ॥ क्योंकियदिशुद्धकूटस्थचेतनकोद्रेतकाद्रष्टा मानोंगे तोमोक्षकालमेंभी द्वैतदर्शनकीप्राप्तिहोगी।यहीयनिप्टप्रसग है। शंका । हेशिष्यमोक्षकोनित्यहोनेकर वहसर्वकालमे विद्यमान है । यातेसर्वहीकालमोक्षकालहीहै । यद्यपिमोक्षकोज्ञानकरसाध्य होनेसेतिसको नित्यपनायसिद्धहै । तथापि ॥ (विमुक्तश्चविमुच्यते ) या प्रथमभीमुक्तहीथा परंतुयज्ञान केमभावसेयविमुक्तपनेकाभ्रमहुए तत्त्वसाक्षात्कारकरयज्ञानकेवाधित उत्तराई हुएविमुक्तहोताहै। ऐसाउपचारिककथनहोताहै। इसशास्त्रसेमोक्ष कोप्रथमहीसिद्धहोनेसेजन्यपनानहीं है|औरयदितुमऐसेनहींमानोंगे तोमोनकोकादाचिकहोनेसे अनित्यत्वप्रसंगहोगा। औरग्रजन्यहोने से मोतकोनित्यपनाहै। यातमोतकालमेंदतकादर्शनयनिष्टनहींहै ।। क्योंकिइसकालमेंद्वैतका दर्शनविद्यमानहै औरमोक्षभीविद्यमानहै ।। समाधान ।। हेभगवन्देतदर्शनतथामोन इनदोनोंकाएककालमें होनाक्यालौकिकयनुभवकेवलसे आपकल्पनाकरतेहो।यथवाश्रुतिके वलसेकल्पनाकरतेहो? । प्रथमपक्षमतोलौकिक अनुभवकाविरोधमाप्त होगा। क्योंकिदैतदर्शनकालमें कोईभीमोलकोनहींअनुभवकरता। प्रत्युतसर्वलोकदेतकोही अनुभवकरतेहैं । यातेप्रथमपक्षणयुक्तहै । औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता।क्योंकिसवलोकोंसेविरुद्धअर्थकोथति भीनहींप्रतिपादनकरसकती ॥ औरयदिलोकविरुद्धयर्थकोभीश्रति प्रतिपादनकरेगी। तोशिलाप्लवनादिवाक्योंकोभी स्वार्थमेंप्रमाणता हुईचाहिये । इसप्रकारसर्वलोकोंके अनुभवकाविरोधहोनेसे सर्वही कालमोक्षकालहै यहकथननहींसंभवता । तैसेमानेहूएदेत द्रष्टाका स्वरूपभीनिर्णीतनहुग्राायातेतिसकास्वरूपथापनेकथनकरनायोग्यहै यहशिष्यकाभिप्रायहै ।। इतिपूर्वपक्ष ॥ (अथसिद्धांत ।) यहापर्यंतगुरुशिष्यकेसंवादद्वारापूर्वपक्षनिरूपणकिया। अवगुरुशिष्य केसंवादद्वाराहीसिद्धांतनिरूपणकरतेहैं। देतकेयनुभवकरनेवालेमोन कोनहींयनुभवकरसकते । शिप्यकेइसकथनकोयाधयणकरकेश्री गरुउत्तरकथनकरतेहैं । समाधान ।। इशिष्ययनुभव तथादर्शनशब्द कोपर्यायहोनेसे जोसर्वदैतकेयनुभवकरनेवालेहैं वहीदेतोदय ।।

वे०सि० मु० भा० यहतुमनेापही निश्चयकरलियाहै । इसकारणसे अपनीवुद्धिकर निश्चितयर्थमें पुनःप्रश्नकरनाग्रतियाश्चर्यहै । औरतिसमेंहमारेनिरू पणकापरिश्रमभीपिष्टपपणन्यायसेव्यर्थ है । शंका ॥ हेभगवन्द्वैत केयनुभवकरनेवालेहीद्वैतकेद्रष्टाहैं । ऐसेनिर्णयहुएभीमोतकोकादा चित्कहोनेसे अनित्यत्वकीप्राप्तिकौनउत्तरहै। समाधान ॥ हेशिष्य इनकोजोबेतकादर्शनहै वहद्वैतदर्शनही सच्चिदानंदपरिपूर्णयात्मस्व रूपमोक्षके अनुभवकाप्रतिबंधकहै । यहतुमनिश्चयकरो । तैसेमाने हुएमोक्षनित्यहीहै। परन्तुप्रतिबंधकेवशसेपुरुषोंकोतिसकायनुभवनहीं होता । जैसे अंधकाररूपप्रतिबंधसे गृहकेमध्यदेशमें अवस्थितहुए घटादिकोंका अनुभवनहींहोता। शंका हेभगवन् दैतदर्शनकोपूर्व उक्तविशेषणयुक्तमोक्षकाप्रतिबंधकहुएजिनकोदैतदर्शनहैतिनकोप्रति बंधहो। परन्तुमुझदैतकेनदेखनेवालेकोकिसकारणसेमोक्षका यनुभव नहींहोता?यातेद्वैतदर्शनमोक्षके याविर्भावकाप्रतिबंधकनहीं।।समाधान हेशिष्यद्वैतकायद्रष्टापना तुझकोयसिद्धहै। इसीयर्थकेसिद्धकरनेके लियेहमतुमसेयहपूछतेहैं । क्यातुमदैतकेयनुभवकरनेवालेपुरुपोंसे भिन्नहोजिसकरद्रेतकोनहीं देखते?|शंका।।हेभगवनइसमेंक्यासंशयहै। क्योंकिर्मेतिनकोयपनास्वरूपनहींदेखता । जिसकारणसेतिनकेसुख दुःखादिकोंकामुझकोलेपनहींहै । इसीसेमुझकोसुखदुःखादिकोंके लेपकायभावदेतद्रष्टामोंसेमेरेभेदविनायनुपपन्नहुआ तिनसेमेरेभेदको कल्पनाकराताहै । यातेभेदमेंसुखादिव्यवस्थाकी अनुपपतिरूपयर्था पतिप्रमाणहै । समाधान ॥ हेशिष्यद्रष्टायोंकेभेदमें प्रमाणकथन करनेवालतुझने द्वैतकायनुभवितृत्व अपने स्थापनकिया । इमीको उत्तराई स्पष्टकरतेहैं। प्रतियाश्चर्यहै । अनेकप्रकारसेदेव तथातिर्यकयौ मनुष्यादिभेदकर भिन्न तिनद्वैतद्रष्टायोंको देखताहुयातू मैं द्वैतको नहींदेखता ऐसेकथनकरनेवालेतुभकावचनकैसे विश्वासकरनेयोग्य होगा। किंतुमिथ्यावादिपनातुझकोपासहोगा। शंका । हेभगवन कथाप्रतिवादीके व्यामोहकरनेकेलिये अयथार्थमीकथनकरनेयोग्य होताहै। समाधान ॥ हेशिष्य मोक्षकीकामनावाले तथासंन्यासी औतत्त्वकेजानने की इच्छावालेतुझको यहमिथ्याभापणकरनाउचित नहीं । पूर्वयहकथन कियाथा क्यातुइनसेभिन्न हैं जिसकरदैतकोनहीं देखता?। यहांक्याशब्दसेसूचनकियेहुएअभेदपज्ञकोशिष्यग्रहणकरता है ॥ शंका । हेभगवन्में अापसेअभिन्नहूँ । यातेमुझको जोमिथ्या वादित्वयापकहतेहो । वहमिथ्यावादित्वयापहीप्राप्तहोताहै ॥ यहांयहअभिप्रायहै।जैसेदर्पणादिउपाधिकभेदसे प्रतिक्यिोंकेग्रौपाधि कभेदकोग्रहणकरके चलनादिव्यवस्थाकी उपपत्तिहै। तेसेसुखादि व्यवस्थाअनुपपत्तिसेयोपाधिकभेदकोग्रवणकरकेव्यवस्थाकासंभव है। यातव्यवस्थाकीअनुपपत्तिकोस्वभावविकयात्माकेभेदकाप्रमापकपना नहीं । इसहेतुसेमेंउपालंभके योग्यनहींहूं। यवइसीपक्षकोस्वीकार करके श्रीगुरुउत्तरकथनकरतेहैं |समाधान।। हे शिष्य यदिद्रेतद्रष्टा वास्तवसेतेरेसेभिन्ननहीं हैं किंतुतेराग्रात्माहीहैं।तोऐसेमानेहुएमुझको थात्मरूपदेखताहुयातूकैसेदेखताहै अर्थात्क्यामुझकोदेतसहितदेखता हेअथवायद्वितीयरूपदेखताह।। प्रथयपक्षमतोयहोरदोपतुमकोप्राप्त होगा।क्योंकिजोमविधानतथातेयहीयाचार्ययौब्रह्मरूपतासेयवस्थित औरदैतकीवार्ताकोभी नजाननेवाले तिसमुझको तुमसद्धितीयरूप ०सि० मु० भा० कल्पनाकरतेहो ॥ कलंकरहितमेंकलंकदेखनामहान्दोपहै। और यात्माकोसद्वितीयदेखनेमें श्रतिका विरोधभीप्राप्तहोगा। क्योंकि * एकमेवाद्वितीयं नहनानास्तिकिंचन । ॐ इत्यादिश्रतियों में यात्माकी अद्वितीयस्पताही कथनकीहै ।। यातेप्रथमपत्ननहींसंभवता । औरापकोमें अद्वितीयरूप देखताहूं । यदिइसद्वितीयपक्षकोमानो तोइसपक्षमें यद्यपिपूर्वकथनकियेमिथ्या भाषणादिदोषोंकी प्राप्तिनहींहोती । तथापिइसकालमें तुमने हमको अद्वितीययात्मरूपकिसहेतुसेजाना अर्थातवपूर्णात्माकादर्शनतुझ कोकिसहेतुसेप्राप्तहुआ? ॥ शिष्यउवाच ।। हेभगवन् पूर्वउक्तप्रत्युत्तर रूपआपकेवचनसे मैनेयद्वितीययात्माकोजाना ॥ यद्यपिवचनको युक्तिका प्रतिपादकहोनेसे उपजीव्यप्रमाणकीयपेक्षाहै । तथापिपूर्व कथनकिया जो (एकमेवाद्वितीयम् ॥) इत्यादिशास्त्रयही उपजीव्यप्रमाणहै ॥ श्रीगुरुवाच ॥ हेशिष्ययदियुक्तिसहकृत शास्त्रसे अद्वैत आत्माकासानात्कार तुमको उत्पन्नहोगया तोइससे पश्चात्यन्यज्ञातव्यका अभावहोनेसे प्रश्ननहींसंभवता ॥ क्योंकि श्रात्मवस्तुकेज्ञातहुए तिससेभिन्नयन्यथज्ञात वस्तुकोईनहींजो प्रप्टव्यहो । शंका ॥ हेभगवन्यद्यपियात्माको ज्ञातहोनेसे तिस विषयकप्रश्ननहींसंभवता । तथापियनात्मातोयज्ञातहे तिसविषयक प्रश्नसंभवताहै । समाधान ।। हेशिष्यथात्माकादर्शनहुए इतरसर्व अनात्मपदार्थका दर्शनहोजाताहे । यहवार्ताश्रुतिप्रसिद्धहे । आत्मनोवाअरेदर्शनेन श्रुत्यामत्याविज्ञानेनेदं सर्वविदितं ॥ ० उ० अ० (४) मे० प्रा० (४) (५) उत्तराई ২৩ अ०॥ अरेमैत्रेयीयात्माके दर्शनसेअर्थात् विचारकेसारक आपातज्ञानसे और तिसकरसाध्यविचाररूप श्रवणसे तथामनन सेउत्पन्नहुए विज्ञान अर्थात साक्षात्कारसेयहसर्वअनात्मपदार्थ जानेजातेहैं।इसश्रुतिसे यात्मनानसे सर्वकाज्ञान कथनहोनेसे अज्ञात वस्तुकायभावहोनेकर औरकोईजाननेयोग्य शेपनहींरहा ॥ याते प्रश्ननहींसंभवता ॥ शंका । हेभगवन क्याश्रतिने कथनक्रियाजो अर्थ वहीग्रहणकरनेयोग्य है। अथवायोग्यर्थ ग्रहणकरनायोग्य है? प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ॥ क्योंकि (शिलाप्लवन्ति) य० ॥ शिलातरतीहैं । इत्यादिवाक्योंका थर्थभीस्वीकार करनेयोग्यहोगा। औरयदिद्वितीयपक्षकहो तोतिसमेंयोग्यतानहींसंभवती। क्योंकिइतर सर्वयनात्मपदार्थयात्मासे भिन्न हैं। यथवायभिन्न हैं?। यहविचारणीयहै प्रथमपक्षतोनहींसंभवता।क्योंकिग्रन्यकेज्ञानसे अन्यकेजाननेकोकोई भीसमर्थनहींहोता । जैसेघटकेदर्शनसे पटकाभीदर्शनहोजाताहै ऐसे कथनकरनेकोकोईभीसमर्थनहीं । यदिऐसेनहींमाने तोघटोपटका यभेदप्राप्तहोगा । थौरदितीयपक्षभी नहींसंभवता । क्योंकिप्रत्यक् तथापरापतासे श्रात्मातथानात्माके स्वभावकाविरोधहै। किंवा यात्मा तथाअनात्माकायभेदमानेहुए क्याग्रात्मामें अनात्माकायत भावहै। श्रथवाथनात्मामें यात्माकायतर्भावहै? । प्रथमपनतोनहीं संभवता क्योंकिपरमार्थसत्यस्वरूपात्मासेयभिन्नअनात्माका निति. नेतिवाक्योंसेनिषेधकरनेकोयशक्यहोनेकरतिसकाराधनहीं मंभवेगा थौस्यदिद्वितीयपक्षमानो तोयनात्माकेयन्तर्भावहोनेकर थात्माका. भीवाधहोजायेगा । विससेशुन्यहीशेपरहेगा। यातेयात्माकेदर्शनसे ४७६ व०सि० मु०मा० सर्वहीयनात्मपदार्थदेखेजातेहैं यहकथनययुक्तहै ॥ इति ॥ अथआत्मदर्शनसेसर्वजगत्कादर्शननिरूपण यधिष्ठानकास्वरूपही अध्यस्तकास्वरूपहोताहै।क्योंकियधिष्ठान सेभिन्नरूपताकरतिसका निरूपणनहींहोसकता । यहवार्ताघटकी यात्मरूपताकेविचारादिकों में अनेकवारपूर्व निरूपणकीगईहै ॥ यातेअध्यस्तकी अधिष्ठानसे भिन्नमत्ताकाअभावहुए जगत् केयधिष्ठान अात्माकास्वरूपजानेहुए जगतकास्वरूपभीजानाजाताहै।। इसप्रकार जगत्काविदितपनाअर्थातज्ञानपनाब्रह्मात्माके अभेदज्ञानसेयुक्तिकर संभावनाकियाजाताहै ॥ तिसकीयोग्यताहोनेकर श्रुतितिसकोबोधन करतीहीहै । ऐसेउत्तरकोश्रीगुरुकथनकरतेहैं ।समाधान ॥ मू०॥ आत्मसत्तेवढतस्यसत्तानान्यायतस्ततः। आत्मन्येवजगत्सर्वदृष्टेदष्टंश्रुतेश्रुतम् ॥५६॥ झूलना ॥ यात्मरूपाहिदैतकोरूपरिदजान नयन्यसरूपहैताहिकरो। जासकेदेखनेजगतसवदृष्टहुइ श्रवणतेश्रवणहुइजातहेरो। मननतेमननहुइजातक्षणएकमें जानयहमरममनवेदकेरो ज्ञातव्ययवशेषनहिरहयो कोईयाहेतुतेप्रश्ननवनेतेरो॥४४॥ टी० ॥ हेशिष्ययहपूर्वउक्तदोष नहींसंभवता ॥ क्योंकिग्रात्म सत्तासेभिन्नअज्ञानतत्कार्यरूपद्वैतकीसत्ताकाअभावहै । जैसेरज्जुके स्वरूपकादर्शनहुएतिसमेंअध्यस्तमालादंडादिकोंका स्वरूपदेखाजाता है।तेसेयात्माकेदर्शनहुए सर्वयनात्मपदार्थदेखेजातेहैं।।यहवा यनुप पन्ननहींकिंतुउपपन्नहै।। यहांपरयहअर्थजानलेना॥ कारिकामेकथन कियाहुया “सत्ता" शब्दस्वरूपकावाचकहै । नेयायिकोंको अभिमत उत्तरार्द सत्तासामान्यकावाचकनहीं । क्योंकितिससत्ताजातिकोविशेषव्यक्ति कीयपेक्षासहितहोनेकर परमार्थरूपताकीअनुपपत्तिहै। इसीकारणसे दृष्टांतमेंस्वरूपशब्दकाहीग्रहणकियाहै ।। इति ।। * अथविधिनिषेध उपदेशकीव्यवस्थानिरूपण * पूर्वउक्तयुक्तिसे यात्मासे भिन्नरूपताकर थभिमतसकल अनात्मपदार्थोंको आत्मरूपताकेसिद्धहुए तिससेभिन्नकरकेतिनका श्रसत्त्वजानेहुए विधिनिषेधशास्त्रभीउपपन्नहोसकताहै ॥ अवइसी श्रर्थकोनिरूपणकरतेहैं । हेशिष्य यात्मस्वरूपसेइतरद्वैतकेस्वरूपका श्रभावहोनेसे विधिनिषेधशास्त्रकीनी अनुपपत्तिनहीं । तिनमेंप्रथम विधिशास्त्रको उदाहरणकरतेहैं ॥ 8 इदंसबैयदयमात्मा। सदेवसौम्येदमग्रआसीत्। एकमेवाद्वितीयम् ॥ ऐतदात्म्यमिदंसर्वं । ब्रह्म वाइदमग्रासीत् । अहंमनुरभवंसूर्यश्च । यत्रत्वस्यसर्वात्मैवाभूत् । नारायणएवेदंसर्व यद्भतंयञ्चभाव्यम् ॥ १०॥ जोब्राह्मणत्वजातियादिकसर्वजगत् प्रत्यक्षादिप्रमाण करउपस्थित थर्थात् प्रसिद्धहै वहसर्वजगत्यात्माहीहै | औरहेप्रिय दर्शनश्चेतकेतो यहसर्वजगत् अपनीउत्पत्तिसे पूर्वकालमें एकसत् श्रात्मरूपहीथा यहकार्यजातकिंचित्मात्रभीनहींथा। यात्माकेभेद मेंजोनिमित्त तिसकोनिषेधकरतेहैं। वहयात्मादैतसेरहितहै। और यहसर्वजगत्यात्मस्वरूपहीहै । औरयहदृश्यमानजगत् उत्पत्तिसपूर्व ब्रह्मात्मस्वरूपहीथा । श्रीमेंमनुहुयातयामेहीसूर्यहुआ । पौरजिस ४७८ वे०सि० मु० भा० निर्विशेषयवस्थामें इसविद्धानकोसर्वजगत्यात्मरूपहीहुया । और यहभूतभविष्यत् वर्तमानकालीनसर्वजगत् ‘नारायणस्वरूपहीहै । इत्यादिकविधिशास्त्रहै ।। अवनिषेधशास्त्रकोपठनकरतेहैं । * नेहनानास्तिकिंचन । अथातआदेशोनतिनति॥नो तस्मादितिनेत्यन्यत्परमस्ति । अतोन्यदाः । नतुततद्वितीयमस्ति। नैवेहकिंचनाग्रासत्॥ि नासदासीन्नोसदासीत् ॥ ॐ बृ० उ० ॥ य० ।। ( अथ ) सत्यस्वरूपकेनिरूपणसे अनंतर (यतः) जिसकारणसेसत्यकाजोसत्यहै वहीनिरूपणकरनेयोग्य शेपरहताहै तिसीकारणसे (ग्रादेशः) ब्रह्मकाउपदेशयर्थात्ब्रह्मकेस्वरूपका प्रतिपादनहै।। तिसब्रह्ममें गुणक्रियादिकशब्दकी प्रवृत्तिकेनिमितोंका ग्रभावहोनेसेवरहीहै ऐसेकथनकरनेकी अयोग्यताकेहुएभीप्रपंचका अपवादकरके तिसनिषेयकायवधिभूत अधिष्ठानब्रह्मस्वरूपहै । इम प्रकारश्रतिरूपशब्दकथनकरताहै ॥ तिसउपदेशकाहीस्वरूपकहतेहैं। (नेतिनैति )जोजोदृश्यरूपतासेप्राप्तहैवहब्रह्मनहीं।(हि) जिसकारण से (एतस्मात्नेतीति) इसनिषेधमुखउपदेशसे (नयन्यत्परमस्ति)यौर अधिकउपदेशब्रह्मकानहींसंभवता। तिसकारणसे यहीब्रह्मका उपदेश मंभवताहै। औरइसब्रह्मात्मासेभिन्नसर्वजगतमिथ्याहै। औरसुषुमियव स्थामेंसाभासंयतःकरणरूपप्रमातृउपलक्षितरेतप्रपंचकाअभाव है। और इसयधिष्ठानब्रह्ममेंउत्पत्तिसेपूर्वकिंचितमात्रभीनहींथा।ौरतिसकालमें सूक्ष्मप्रपंचनहींथा । यौरस्थूलप्रपंचभीनहींथा । इत्यादिनिषेधशास्त्र है। यातेयात्मासेभिन्नद्रेतकायभावमानेहुए यहदोनोंप्रकारकाउप उत्तराई देशभीसमीचीनहोसकता है। जैसेइसलोकमेरज्जुरूपयधिष्ठानमाला सादिकोंके यारोपवालेपुरुषको विधितथानिषेधरूप दोपकारका उपदेशहोताहै। कियहसर्पमालादिकरज्जुस्वरूपहैं। बाइसमेंमालादिक नहीं हैं । तैसेप्रकरणमेंभीजानना।। शंका || हेभगवन यद्यपियात्मा कादोपकारकाउपदेशसंभवताहै।तथापिदोनोंप्रकारकेउपदेशों में कौन साउपदेशश्रेष्टहै। समाधान ॥ हेशिष्य यद्यपिदोनोंप्रकारकेउपदेशों कोएकअर्थत्वकाही बोधकपनाहै । तथापिविधिमुखउपदेशमेकिंचित् अतिशयताभीहै।। तथाहि ॥तिसविधिमुखउपदेशमें दृश्यमानपदार्थों काजोस्वरूपहै मोटात्माहीहै । ऐसेकथनकरेहुए तिसथात्मासेभिन्न किंचितमात्रभीनहीं किंतु यात्माही एकरसपरिपूर्णहै। यहज्ञान विधि वाक्यसेसाक्षातही उदयहोताहै।ौरनिषेधमुखउपदेशसे तोसर्वदृश्य केनिषेधकरेहुएनिषेधकाअधिष्ठानरूपताकस्यात्माकाज्ञानथर्थसेहोता है साक्षातनहीं ॥ इतनेमात्रहीदोनों उपदेशोंकी विलक्षणताहै ।। थौरकोई विलक्षणतानहीं ।। शंका ।। हेभगवन् जवविधिमुखउपदेश कोयतिशयहोनेकरतिससेही परमपुरुषार्थकीप्रामिहोतीहै।। तोपुन दो मकारकेउपदेशकीमवृत्तिकसेसंभवेगी ॥ समाधान ॥ हेशिष्य थधि कारीभेदसेदोनोंप्रकारके उपदेशकीउपयोगताहै । इसीयर्थकोप्रथम दृष्टांतद्वारास्पष्टकरतेहैं जैसेकोई पुरुषरज्जुमें सर्पभ्रमकोप्राप्तहोकरभय सेकम्पायमानहोताहै । तिसकेप्रति रज्जुकेस्वरूपकाज्ञाताकोईदयालु पुरुष नाऽयंसर्पः"ऐसानिषेधमुखउपदेशही प्रथमकथनकरताहै।ौर "ययंरज्जुरेव" ऐसाविधिमुखउपदेशनहींकरता ॥ तैसेजोपुरुषजन्मा दिसंसारदुःखसेअत्यंतभययुक्तहुया तिसकीनिवृत्तिकीहीप्रथमकामना ४८० २०सि० मु. भा० करताहै । तिसकेप्रतिप्रथमनिषेधवावयहीउपयोगीहै।ौरविधिवाक्य पश्चात्कहनेयोग्यहै ॥ ौरजेसेरज्जुमें सर्पभ्रमकोप्राप्तहोकरमणिमंत्र औपधादिकोंसे तिसकेप्रतीकारज्ञानकर निर्भयहुयाजोपुरुषहै वहरज्जु केज्ञातापुरुपसेपछताहै। यहपुरोवर्तिपदार्थक्याहै ॥ तिसकेपति “अयं रज्जुरेव" ऐसाहीउत्तरदेनायुक्तहै। "नाऽयंमर्पः" ऐसानिषेधरूपउत्तर युक्तनहीं ॥ तेसेजोपुरुषसंसारसे अत्यंतउद्वेगयुक्तनहीं। किंतुइसदृश्य मानजगतका वास्तवस्वरूपक्याहै । ऐसीजिज्ञासाकरताहै।तिसपुरुष कंप्रति [इदंसर्वयदयमात्मा] इत्यादिविधिवाक्योंसेहीउत्तरदेना युक्तहै । औरनिषेधमुखउपदेशपश्चात्कहनायोग्यहै ॥ इसप्रकार यधिकारीकेभेदसे दोनोंप्रकारक उपदेशोंकाउपयोगहोनेकर किसीको भीव्यर्थतानहींहोमकती ॥ इमहेतुसे विधितथानिपेधरूपदोनोंप्रकार कंउपदेशोंकरमतचित्यानंदपरिपूर्णस्वरूपप्रत्यक यात्माहै ।। यहथर्थ मिद्धहुथा ॥ इति ॥ १६ ॥ [पुनडेतद्रष्टाकेस्वरूपकाविचार ] शंका। हेभगवन्यद्यपि देतद्रष्टावास्तवमुझभिन्ननहीं । इमपन्नमें यदेत यात्मसाक्षात्कारको मिद्धहोनेकर यात्मामेभिन्न थनात्माके स्वम्पकायभावहोनेसेसर्व थनात्मपदार्थी विदितानजानेजानेहैं । यातेपछनेयोग्य यन्य पदार्थकोईगपनहींग्हा ॥ तयापिवहनद्रष्टाकोनहै । यह यापयंत भीनियनहींहुया ।। ममाधान ।। हेशिष्य यदितुमनद्रष्टायोंसे भिन्ननहींहो नोतुमप्रश्नकग्नेवालही देनकेटष्टाहो ॥ गंका ॥ हे भगवन्में कौनई ॥ यर्थयह !) क्यामेमाग्म्विभावहूं ॥यथवातिम सेविलनगणयमंमाग्म्विभावह? । यद्यपिदेहादिकोंकीयात्मरूपताको उत्तराद निषेधकरनेवालेऔरकर्तृत्वादि प्रपंचकोमिध्यात्योधन करनेवाले शिष्यनेब्रह्मरूपतायात्माकी पूर्वनिर्णीतकीहै । यातेतिसमेंपुन उत्तर नहींसंभवता ।। तथापिपदार्थशोधनद्वाराअर्थसे ब्रह्मात्माकीएकता सिद्धहोतीहै । औरयहांतोसाक्षात्शब्दसे वहएकताकथनकरने योग्यहै ॥ यातेतिसकेयर्थ इसविचारकायारंभसंभवताहै । इसप्रकार जिसनेतत्त्वंपदार्थशोधन कियेहैं । औरशरणागतहै । तिसअधिकारी केप्रति कृपापरवशहुएश्रीगुरु पुनः उत्तरनिरूपणकरतेहैं। समाधान।। हेशिष्यतूअसंसारिब्रह्मस्वरूपहें ।। शंका ॥ ॐ द्वैतद्रष्ट्रपदार्थक अवयवनकानिरूपण ॥ हेभगवन् यदिमुझदैतके द्रष्टाका ब्रह्मकेसाथअभेदहै । तोब्रह्म कोविकारिपनाप्राप्तहोगा। यद्यपिविकारसमूह अविद्याकाकार्यहोनेसे मिथ्याहै। यहपूर्वयनेकप्रकारसे निरूपणकरयाएहैं । तथापिअन्य प्रकारसेतिसकानिर्णयकरनेकेलिये इसविचारकायारंभहै। समाधान । हेशिष्यब्रह्मकोदैतद्रष्टासे अभिन्नमानेहुए विकारिपनेकीप्राप्तिहोगी । ऐसेकथनकरनेवालेतुझको हमयहपछतेहैं । यहाँदेतद्रष्टा,तीनपदार्थ वर्त्तते हैं। दैतऔरतिसकीदृष्टि औरएकस्वरूप है।तहांतिनमेंजोस्वरूपहै तिसकेसाथवाकायभेदहोनेसेद्वैतद्रष्टाकेसाथअभेदमानेहुएविकारित्व कीमामिजोतुमयपादनकरतेहो सोसर्वप्रकारसे नहीं संभवती। क्योंकि वहविकारस्याहै।देतहै श्रथवातिमकीदृष्टिदायहवक्तव्यहैयदिदैतको विकारकहो तोयहपक्षसमीचीननहीं । क्योंकिब्रह्मसेभिन्नसकलदेत का "नेतिनेति" यहश्रतिनिपेधकरतीहै। शंका ।। हेभगवन् “भूतले ४८२ 40 सि. मु. भा. घटोनास्ति'इसप्रकारनिषेधकियाहुयाभीघट जैसेमृत्तिकाकाविकारहै। तैसेश्रुतिकरनिषेध कियाहुयाभीदैत किसीका विकारक्योंनहो ? समाधान ॥ हेशिष्य परमतकीरीतिसेसर्वथाघटकानिधनहीं। किंतु सन्मुखदेशवर्तिभृतलमे अन्यदेशमें घटविद्यमानहै ॥ ौरप्रपंचतो अधिष्ठानब्रह्मसंयन्यस्थलमेंहैनहीं ॥ जोयधिष्ठानमभीतिसका अभाववोधनकियातोयसत्होनेसेवहकिसीकापरिणामनहींहोसकता। इसमेंउचितदृष्टांतकोकहतेहैं।जेसेयसत्नरशृंगकिसीकाभीपरिणामनहीं शंका । हेभगवन नरशृंगसेदेतनिष्ठविलक्षणताहै ॥ क्योंकिनरश्रृंग किसीकोप्रत्यक्षनहींप्रतीतहोता ॥ औरयहप्रपंचतोसर्वकोप्रत्यक्षप्रतीत होताहै।इसप्रकारंदैतमेनरशृंगसेविलक्षणताकाप्रयोजकधर्मदृष्टिहैइसी हेतुसेंद्रेतकोविकारपनासंभवताहै।समाधान।हेशिष्यप्रपंचकोनर,ग सेविलक्षणतामानेहुए तिसकेविकारपनेमें दैतत्वधर्मप्रयोजकनहीं ॥ किंतुअपरोक्षप्रतीतिरूपदृष्टिकेसाथ संबंधित्वरूपधर्मप्रयोजकहै ॥ तैसेमानेहुए (सविशेपणेहि) इसन्यायसेदृष्टिकेप्राप्तहुएद्वैतनिष्ठविकार पनाप्राप्तहोताहै।औरदृष्टिकेयप्राप्तहुएद्वैतविकारपनानहींप्राप्तहोता। यातेदृष्टिहीविकारहै'यहपक्षतुमकोमाननाउचितहै।। किंवा ज्ञान तथा ज्ञेयकाभेदपूर्वनिरासकियाहै।।यातेपरिशेषसेभीदृष्टिकोहीविकारकहना योग्यहै।इसप्रकारश्रीगुरुकरअंगीकारकरायेहुएदृष्टिनिष्टविकारत्वपक्षको शिष्यअंगीकारकरताहै। शिष्यउवाचाहेिभगवन्दृष्टिहीविकारहैयहपक्ष मुझकोस्वीकारहै ।) श्रीगुरुवाच ॥ हेशिष्यदृष्टिशब्दसेक्यावृत्तिका ग्रहणहैयथवाविपयनिष्ठ अभिव्यक्तहुएफलनामवालेचेतनकाग्रहणहै?|| इनमेंप्रथमपक्षकहो तोनहींसंभवता ॥ क्योंकिवृत्तिकोस्वभावसेजड होनेकरप्रकाशकपनेकी अनुपपतिहै ॥ यातेतिसको दृष्टिपनानहीं संभवता । औरद्वितीयपक्षभीयसंगतहै । क्योंकिफलचेतनकोयात्म स्वरूपसेयभिन्नहोनेकर यात्माकेपरिमाणपनकायसंभवहै । जिस कारणसे अपनाथापही परिणामनहींसंभवतात किंवा ॥ यदियात्मा भी परिणामकोप्राप्तहोताहै।तोक्यावहसर्वरूपतासेपरिणामकोप्राप्तहोता है। यथवाकिसीएकदेशसे परिणामकोप्राप्तहोताहै?प्रथमपक्षमेंतोयात्मा काहीअभावप्राप्तहोगा सोयनिष्टहै। यातेप्रथमपक्षयसंगतहै । और द्वितीयपक्षभीनहींसमवता । क्योंकियात्मानिरखयवहै।। यातेकाप तथाएकदेश विकल्पसंज्ञकदोपकी प्राप्तिहोनेकर परिणामपक्षनहींसंभ वता।। शंका हेभगवन् यहकार्व्यर्थात् सर्वरूपता तथाएकदेश विकल्पाख्यदोपविवर्त्तपक्षमें भीतुल्यहीहै ॥ समाधान ॥ हेशिष्य विवर्चके स्वरूपकाहीतुझको श्रज्ञानहै। यदिविवर्तकास्वरूपतुम जानते नोयहदोपकीयाशंका तुझकोनहोती है क्योंकियधिष्ठानकेस्वरूपसे भिन्नविवर्तकिंचित्मात्रभीवस्तुनहीं जिसकोयाश्रयणकरकेकाप नथाएकदेशविकल्पाख्यदोपकी प्राप्तिहो किंतुधिष्ठानहीदोपके वश सेविलक्षणाकारसेभासमानहुया विवर्त्तकहाजाताहै ॥ शंका ॥ हेभगवन् वहविलक्षणाकारहीकिसकाहै। यहयापनेकहाचाहिये । समाधान ॥ हेशिष्यत्याप्रातिभासिकथाकारकिसकाहै यहतुमपूछते होयथवावास्तवथाकारकिसकाहै यहपछतेहो? यदिप्रथमपन्नकहो तोवहनातीतिकथाकार अधिष्ठानकाहीहै । यहहमथनेकवारबोधन करवाएहैं । औरद्वितीयपक्षभीनहींमभवता । क्योंकिवास्तवयाकार तोवहकिसीकाभीनहीं।जिसकारणासे यात्माकी वास्तवथनात्माकारता ४९४ वे० कि० गु. भा. निषेधवाक्योंकर बाधितहोनेसेनहींसंभवती॥यौरयात्मासेग्रन्यस्थल मेंतिसयाकारकी यप्रतीतिहोनेसे वहांमी तिसकायभावहै । याते वास्तवसेविलक्षणाकार किसीकाभीनहीं यहसिद्धहुया ॥ शंका ॥ हेभगवन् विवर्त्तवादकेव्याजअर्थात्वहानेसेअसत्ख्यातिवादकाहीयह आपनेउपपादनकियाहै ॥ समाधान ॥ हशिष्य असत्ख्यातिवाद कायहउपपादननहीं।क्योंकियसत्ख्यातिवादीचार्वाकनेऐसेअंगीकार नहींकिया।तथाहि तिसकेमतमेंतोज्ञान अध्यस्तनहीं। औरहमारेमतमें तोख्याति यर्थावज्ञानभीअध्यस्तहै । यातेसर्वरूपतासेसमतानहीं औरसमताकेयभावहुए परसिद्धांतकीप्राप्तिभीनहींहोसकती । और सर्वपदार्थोंकोशून्यकहनेवालेवादीकामत तोपूर्वहीनिरासकरयाएहैं।। शंका । हेभगवन् ख्यातिनामस्वरूपचेतनकाहै । तिसकोयध्यस्त मानेहुए शून्यताकी प्राप्तिहोगी। यातेख्यातिनिष्ठध्यस्तपनाक्याहै समाधान। हेशिष्य स्वरूपसेरजतकीन्याई ख्यातियध्यस्तहै यहहम नहींकहते ॥ किंतुवास्तवसेनिःप्रकारिकख्यातिकोअर्थात्प्रकारशून्य ख्यातिकोयाकारांतररूपताकरभानहोनेसे वहयध्यस्तहै।ऐसेहमकहते हैं।यातेशून्यताकीपासिनहींहोती। शंका हेभगवन् तिसयाकारांतर कास्वरूपकहाचाहिये। यदियाकारांतरकोयापथात्मस्वरूपहीमानोगे तोयात्मरूपताकरही वहसर्वकोक्योंनहींप्रतीतहोता? समाधान ।। हेशिष्य द्वैतकावास्तवस्वरूपयात्माहीहै।यहमतीतिक्यायात्माके अपरो तज्ञानवालकोापादनकरतेहो।यथवायज्ञानीकेप्रतिथापादनकरतेहो? प्रथमपक्षमतोहमकोभीइष्टापत्तिहै । क्योंकियात्माकेयपरोक्षज्ञानवाले पुरुषकोयहद्वैतनिर्विकल्पकख्यातियर्थात्यात्मस्वरूपहीभासताहै ॥

४५५ उत्तराई औरद्वितीयपक्षभीनहींसंभवता।क्योंकियन्यप्रकारके याकारकीप्रतीति कालमेंस्वरूपप्रतीतिकाविरोधहोनेसे भ्रांतपुरुषकोतिसकीययोग्यताहै ॥ शंका ॥ हेभगवन् भ्रमज्ञानकाविषयअधिष्ठानसेभिन्नकोईहै ? अथवानहीं।।यदिअन्त्यपक्षकहो तोतिसकोभ्रान्तपनाकैसेहोगा। क्यों किउसनेअधिष्ठानहीदेखाहै।। औरयदिपथमपक्षकहो तोतिसविषयका स्वरूपयापकरकथनकरनेयोग्यहै।।समाधानाहेशिष्य अधिष्ठानसेभिन्न किंचित्मात्रभीनहीं ॥ यद्यपिऐसामाने एतिसकोभ्रांतपनानहींहोगम तथापियन्यवस्तुविषयकप्रतीतिकोअन्यविपयत्वकेयभिमानसेहीतिस कोभ्रांतपनाहै । जैसेलोकोरन्जुकोदेखताहै । और अयंसर्पः" ऐसे सर्पकायभिमानकरताहै ॥ तैसेयात्माकोदेखताहै। और इदंजगत्" ऐसाअभिमानकरताहै।यौरयदितुमयहकहो किवहाअभिमानक्याहै । सोतुमश्रवणकरो।। परमार्थसेस्थितविषयकोभासमानहुएभी जोतिसमें यसनिश्चययर्थातभ्रमहै वहीयभिमानहै।। शंका । हेभगवन् यदि वास्तवसेपुरुषकोरज्जुविषयकहीप्रत्ययहोताहै तोपुनः “यहसर्प है"ऐसे सर्पकेउलेखवालाहोकखहप्रत्ययकैसेस्फुरणहोताहै ।। समाधान ।। हेशिष्यरज्जुतथासर्पका सादृश्यहै । तिसीसेसर्पको प्रतीतिहोतीहै ॥ शंका ॥ हेभगवन् यदिसादृश्यदोपको श्रापअभ्यास का कारणकहोगे । तोयात्मामें यन्याकारताकीपतीति नहींहुईचाहिये। क्योंकिनिरवयवहोनेसे तिसमें अनात्माकं सादृश्यकायभावहै ॥ समाधान ॥ हेशिष्ययात्मामें तोयज्ञानरूपदोपकेवशसेहीयन्याकार तांकीप्रतीतिकासंभवहै । यातेसादृश्यसे यथवाश्रज्ञानसे भ्रमप्रत्यय संभवताहै । इसकारणसेही “नायंसर्पः" इसवाधकेउत्तरहीने वे. मि० मु० भा० सर्परूपताकरदेखी।ऐसेयहपुरुपमानताहै । याते अयंसर्पः” यहप्रत्यय असत्रूपहै ।। शंका । हेभगवन्क्यासर्पउसने देखाहीनहीं ? यदि थापइसअर्थको स्वीकारकरलोगेतो अनुभवकाविरोधप्राप्तहोगा । क्योंकिभ्रमकालमें सर्पकायनुभवसर्वपुरुषोंकोप्रसिद्धहै समाधान।। हेशिष्यभ्रांतपुरुषके अनुभवकाविरोधहुएभी विरोधनहींहोता क्योंकि तिसभ्रांतपुरुषकोक्याप्रतीतहुयाक्यानहींप्रतीतहुयाइसप्रकारकेविवेक का प्रभावहै । औरभ्रांतिसरहितपुरुषकोऐसायनुभवहोतानहीं इसी से अनुभवकाविरोधनहीं है ॥शंका।। हेभगवन् “रज्जुहीमनेदेखीसर्प नहींदेखा"ऐसेकथनकरेहुएप्रामाणिकपुरुपकेयनुभवकेयनुमारदृष्टांतमें तोयधिष्ठानरज्जुऔरतिसकोविषयकरनेवालीप्रतीतियहदोपदार्थवर्तते हैं सर्पतथासर्पकाज्ञानयहदोनोंनहीं हैं। क्योंकिभ्रांतपुरुपकीप्रतीतियादर करनेयोग्य नहीं। योग्भ्रांतिज्ञानयोतिसकेविषयकायसत्त्वपूर्वसमीप हीकथनकराएहैं।ौरदातितोस्वप्रकाशचेतनयात्माहीयधिष्ठान है। तिसविषयकदूसरीप्रतीतिकास्वीकारनहीं। क्योंकियधिष्ठान और तिसकीप्रतीतियहदोनोंयात्माहीहैं।ऐसेमाने एयधिष्ठानहीस्वस्वरूप कोनत्यागकरकेरूपांतरसेभासमानहुयाविवर्तहै। यहपतदूरहुआ।क्यों कियधिष्ठानसेभिन्नविवर्त्तकास्वरूपदिखलानेकेअयोग्यहै । यातेरूपां तरकाअभावहोनेसे भानकर्तृत्वकाभीयभावहै । इससेस्वसिद्धांतका परित्यागयतिस्पष्टहै।। समाधान । हेशिष्य स्वसिद्धांतकात्यागनहीं होता ॥ क्गोंकितिसविवर्त्तवादकोमध्यमयधिकारियोंकप्रतिबोध मात्रप्रयोजनवालाहोनेकरउपनिषदोंकेतात्पर्य्यकी विषयतातिसमें नहीं है। तात्पर्य्ययहहै | किजैसेमंदरकशिखरपरथारूढहोनेकीइच्छा ४८७ उत्तरार्द्ध वालापुरुषसोपानकेएकपर्वसे दूसरेपर्वपरचरणरखताहुआमंदरकेशिखर परयारूदहोजाताहै। इससोपानारोहणन्यायसे अद्वितीय चेतन बुद्धि केप्रवेशअर्थप्रपंचका प्रथमयारोपकरके निषेधकरतीहुई श्रुतिभगवती विवर्तमेपर्यवसानताकोपामहोतीहै ॥ वास्तवसेयन्याकारप्रतीतिके सद्भावप्रतिपादनमेंश्रतिकातात्पर्य्यनहीं । अन्यथासमन्वयथाधिकरण काविरोधप्राप्तहोगा।क्योंकितिसमिथ्याप्रतीतिकोयात्माकीन्याईप्रमाण सिद्धहोनेकरतिससेहीदैतकीप्राप्तिहोजायेगी। यातेविवर्तमेभीवास्तवसे श्रतिकातात्पर्य्यनहीं। इसीसेस्वसिद्धांतकीभीहानिनहीं।।शंकाहिभग वन्वहदैतदृष्टिमिथ्याहीहै।यातेदूसरीसत्वस्तुकायभावहोनेसे दैतकी प्राप्तिनहींहोती ॥ समाधान ॥ शिष्य देतदृष्टिनिष्ठयहमिथ्यात्व क्याहै | क्याकालिकयसत्त्वका नाममिथ्यात्वहै । वायसत्पनेके तुल्यहुएभीकादाचितपतीति विषयत्वरूपमिथ्यात्वहै? द्वितीयलक्षण गतपदोंकाप्रयोजनकहतेहैं।। यदि असत्"मात्रहीमिथ्यात्वकालक्षण कहतेतोगगनकमलादिकोंमें अतिव्याप्तिहोती । तिसकेनिवारण यर्थ कादाचिकपतीतिविषयत्व" यहपदकथनकियाहै।यौरमतीतिभी यहांअपरोक्षहीविवक्षितहै। यौरअसतनामसदिलक्षणकाहै । और यदिकादाचितपतीतिविषयत्वही मिथ्यात्वकालवणकहें तोत्ति व्याप्यत्वरूपताकर यात्मामेभीविथ्यात्वमातहोगा ॥ तिसकीनिवृत्ति अर्थ “असत्" यहविशेषणकथन कियाहै। श्रात्मासरसेविलक्षणनहीं किंतुसतरूपहै । यातेतिसमेंमिथ्यात्वके लक्षणकीयतिव्याप्तिनहीं होनी॥और कादाचित पदस्वरूपकथनपरहै। वहकिसीकाव्यावर्तक नहीं । यातेलक्षणकायहनिष्कर्षसिद्धहुथा।

४८८ दे०सि० मु० भा० सबैलक्षण्येसति अपरोक्षप्रतातिविपयत्वमिथ्यात्वम्। य० ॥ सतसेविलक्षणहुया अपरोक्षप्रतीतिकाजोविपयहोसो । मिथ्याहै ॥ इति ॥ इसप्रकारद्वितीयपक्षगतमिथ्यात्वका लक्षणकह करयवत्रैकालिकासतरूपहीप्रतीतिनिष्ठमिथ्यात्वहै।इसप्रथमपक्षकोइप्टा पत्तिसेदूपितकरतेहैं । प्रथमपक्षकहोतोवहहमकोभीस्वीकारहै। क्योंकि श्रुतिभगवतींद्रेतका त्रैकालिकअत्यंताभाव बोधनकरतीहै।औरद्वितीय पक्षभीनहीमंभवता । क्योंकितिसमिथ्याप्रतीतिसेभी अद्वैतकीहानि पूर्वकीन्याईहीयवस्थितहै । इसीयर्थकोस्पष्टकरतेहैं । “अयंसर्पः" इसप्रतीतिकोमिथ्या कथनकरनेवालेवादीनेतिस प्रतीतिविपयकौर प्रतीतियवश्यकहनेयोग्यहै ॥ क्योंकिमिथ्यात्वकालक्षणप्रतीति कर्मत्वयर्थात्प्रतीतिविपयत्वकरघटितहै नैसेमानेहुएवहप्रतीतिभि क्यामिथ्याहै। अथवापारमार्थिकसत्रूपहै ।। वातुच्छहै? ॥यन्त्यपक्ष तोनहीं संभवता । क्योंकि यन्यप्रतीति कीन्याई प्रथमप्रतीतिकोभी तुच्छताप्राप्तहोगी ॥ ौरमध्यमपक्षभीनहींसंभवता।क्योंदितकी प्रामिहोतीहै । वह अनिष्टहै। औरयनवस्थादोपकी प्राप्तिहोनेसेप्रथम पक्षभीयसंगतहै । यातेपूर्वउक्तमिथ्यात्वकालक्षणनहींसंभवता । शका ॥ हेभगवन् “अयंसर्पः” इसप्रथमप्रतीतिकमिथ्यात्वकानिर्वाह करनेकेलियेतिसविपयक अन्यप्रतीतिकास्वीकारहै ॥ औरतिसके माननेसेयनवस्थादोपकीभीप्राप्तिनहींहोती ॥ क्योंकिवहयन्यप्रतीति साक्षिरूपहै । औरतिससाक्षीकोस्वप्रकाशताहोनेकर यन्यप्रतीतिकी भीअपेक्षानहीं। औरतिसकोयात्मस्वरूपहोनेकरद्वैतकीभीप्राप्तिनहीं। समाधान ॥ हेशिष्य (असंगोह्ययंपुरुपः) इसश्रुतिसेसाक्षि .

उत्तगई निष्ठयसंगतहै। औरसंबंधसे विना प्रकाशकताका असंभव है ॥ औरसाक्षीमेंकादाचित्तपनेकीभी अनुपपत्तिहै । क्योंकिवहनित्यहै ।। इसीयर्थकोस्पष्ट करतेहैं।। हेशिष्यसाक्षिशन्दसेयविद्याकीवृत्तिारुढ चेतनकाग्रहणहै। अथवाशुद्धचेतनमात्रकाग्रहणहै?।। प्रथमपक्षतोनहीं संभवता ।। क्योंकिविशिष्टपदार्थमिथ्याहोताहै । यदिविशिष्टकोभी पारमार्थिकमानों तोविशेषणरूपवृत्तिकोभीपारमार्थिकत्वप्रसंगहोगा। यौरविशिष्टकोमिथ्यामानेहुए अनवस्थादोषपूर्वकीन्याईहीयवस्थित है।।औरयदिऐसेकहो किवृत्ति प्रतिक्वितचैतन्यस्वस्वरूप तथावृत्तिइन दोनोंकोप्रकाशकरदेगा।क्योंकिवहस्वप्रकाशस्वरूपहै ॥ सोयहकथन भीनहींसंभवता ॥ क्योंकिलक्षणमें प्रतीतिविषयत्वकथनकियाहै ।। औरएकहीपदार्थ मेंकर्तृकर्मविरोधहोनेसेप्रतीतिविपयत्वकायसंभवहै ।। औरशुद्धचेतनमात्र सातिशब्दकार्थहै यहतृतीयपक्षयदिकहो तो तिसमेंयहविचारणीयहै वहसाक्षीस्वसंबंधिपदार्थकोप्रकाशकरताहै ॥ अथवास्वयसंबंधीकोभीप्रकाशकरताहै?|| प्रथमपनतोनहींसंभवता।। क्योंकितिसकाकिसीपदार्थसेसंबंधनहीं।यहअर्थश्रुतिमें प्रसिद्धहै। और द्वितीयपक्षभी नहींसंभवता। क्योंकिपदीपादिकों मेंस्वसंबद्धयर्थका हीप्रकाशकपनादेखाहै ।। स्वयसंबद्धकानहीं ॥ तैसेसातीभीस्वयसं बद्ध अर्थकोकैसेप्रकाशकरेगा किंतुनहींकरसकता ॥ किंवा ॥ द्वैत दृष्टिजोहै।सोक्याप्रमाणसिद्धहै।अथवाभ्रमसिद्ध है। प्रथमपक्षतोनहीं संभवता । क्योंकिवद्वैतप्रतिपादकश्रुतिकाविरोधप्राप्तहोगा । और द्वितीयपक्षभीनहींसंभवता। क्योंकिभ्रांतिसिद्धपदार्थनियमसेयसत् होताहै । औरयदिभ्रांतिसिद्ध पदार्थकोभीसत्मानोगे । तोतिसको ४६० मिल मां भ्रांतिविपयत्वकाहीयभावहोगा। इसपूर्वकथनसेयहअर्थसिद्धहुया कि यात्मानिष्ठंद्रेतदृष्टिकदाचित्भीनहींसंभवती । इसीयर्थकोयह श्रतिभीकहतीहै ॥ यद्वतन्नपश्यति पश्यन्वतन्नपश्यति । वृ० उ० य०॥ जोयह यात्मासुपुप्तिकालमेंकिसीदेतपदार्थकोनहींदेखता सोदेखताहुयाहीनहीं देखता।तात्पर्य्ययहहै। तिसकालमेंयात्मादेखता नहीं इसहेतुसेजडहै ऐसेनहींजानना किंतुयात्मातोयलुप्तदृष्टिहै परन्तुकोईअनात्मपदाथवहांहैनहीं यातेकिसकोदेख।। यहश्रतियलुप्त दृन्टिस्वरूपयात्मानिष्ट दैतदृष्टिकोनिवारणकरतीहै । और ॐ वालानप्रतिविवत्तॊऽयं ब्रह्मणः सकलंजगत् । अविवर्तितमानंदवर्ततेकृतिनःसदा ॥ १॥ अ० ॥ (वालान्) मध्यमयधिकारियोंकेप्रतियहसर्वजगत् ब्रह्म काविवर्त्तकथनकियाहै । और ( कृतिनः) उत्तमयधिकारियोंको तोविवर्तसेरहितयानंदस्वरूपब्रह्मही सर्वदाकालवर्तमानहै ॥ १॥ यहस्मृतिभी यात्मानिष्ठद्वैतदर्शनका अभावहीमानतीहै । इसप्रकार यात्मा दैतदर्शनका अभावतितथास्मृतिकरसिद्धहैइति। शंका ॥ हेभगवनकार्यसहित अज्ञानरूपद्धतकायात्मामेत्रकालिकअत्यंताभाव है ।। इसपक्षनित्यमुक्ततथा असंसारीयात्माकोतत्त्वमस्यादिशास्त्र करसाध्यप्रयोजनकायभावहोनेसे शास्त्रकोनिष्फलताकीप्राप्तिहोगी। तथाहितत्त्वमस्यादिशास्त्रक्याप्रत्यक्ब्रह्मके अभेदकोप्रकाशकरताहै। श्रथवातिसकेअज्ञानादिकोकी निवृत्तिकरताहै । प्रथमपक्षतो नहीं संभवता। क्योंकिमत्यक्ब्रह्मका अभेदवेतन रूपहोनेसेस्वप्रकाश।।

उत्तरार्द्ध औरद्वितीय पक्षभी नहींसंभवता ॥ क्योंकि अत्यंत असत्पदार्थ नित्यही निवृत्तहै ।। इसप्रकारदोनोंपक्षोंमें शास्त्रकीनिष्फलता है । 'समाधान। *अथअसत्कानिवर्त्तकरूपकरशास्त्रकीसफलता कानिरूपण ॥ * हेशिष्यनित्यमुक्त तथाथसंसारी अात्मानिष्ठ थत्यंतअसत् संसारकानिवर्तकरूपताकरही शास्त्रकीसफलताहै। और "नासी दस्तिभविष्यति” इत्याकारकवाधका उत्पादकत्वहीसंसारकानिवर्तक व शास्त्रनिष्ठजाननारायौरवंसकानामनिवृत्तिनहींहै।क्योंकितिसको पूर्वनिषेधकरयाएहैं।। यौरवहसंसारकानिवर्तकत्वभी शास्त्रकोप्रत्यक तथाब्रह्मकेयभेदगोचर अपरोक्षत्तिके उत्पादनदाराहीजानना। यह भावहै। शंका भगवन्अत्यंत यसत् पदार्थकोनित्यहीनिवृत्तहोने करतिसमेंशास्त्रकाव्यापार निष्फलहीहै । समाधान ॥ हेशिष्ययदि शास्त्रयसत्कोनहींनिवृत्तकरतातोश्यासतकोनिवृत्तकरताहै। अथवा थनिर्वचनीयको निवृत्तवरनाहै? || यहविचारणीयहै । प्रथमपक्षतो नहींसंभवता । क्योंकिजैसेयसत्को शास्त्रनहीं निवृत्तकरता तैसे सत्कोभीनिवृत्तनहींकरता। जिसकारणसे सतकोशास्त्रनिवृतकरताहै यहभीकहींनहींदेखायिन्यथासत्यात्माकीभीनिवृत्तिहोगी।औरयदि अनिर्वचनीयकोशास्त्रनिवृत्तकरताहै।यहद्वितीयपनकहोतोवहभीनहीं संभवता । क्योंकितिसकीनिवृत्तिभीशास्त्रकर देखनेमॅनहींथाती ॥ कारण्यहहै।कियनिर्वचनीयपदार्थ निवृतहोताहै । इसवार्ता मेवादी तथाप्रतिवादीकोनितिस्थलकोईभीनहीं ॥ यातेयनिर्वचनीयको वे०सि० मु० भा० भीशास्त्रनहींनिवृत्तकरता ॥ शंका ॥ हेभगवन् जगत्कोयत्यंत थसत्यापनेकथन किया । यौरतिसकानिवर्तकशास्त्रहै ॥ यहवार्ता थापनेतर्कसेप्रतिपादनकीहै ।। प्रमाणकरसिद्धनहीं । इसयाशंकाको श्रीगुरु निषेधकरतेहुए और शास्त्रकी सार्थकरूपतासे प्रमाणताको उपसंहारकरतेहुए उत्तरकहतेहै।। ममाधान ॥ हेशिष्य जिसकारणसे प्रपंचयत्यंतयमतहै।इसीकारगासे विमुक्तश्चविमुच्यते। नितंचनिवर्तते ॥3 इत्यादिशास्त्रमे अत्यंत यमतमंसारका निवर्तकरूपताकरही शास्त्र निष्ठप्रामारायकीमिद्धिहै।यहश्रुति यन्ययर्थपरहेइस याशंकाको निवारगाकरनेवाला मंनेपशारीररुकाश्लोक पठनफरतेहै ।। नित्यवोधपरिपीडितंजगडिभ्रमंनुदतिवाक्यजामतिः। वासुदेवनिहतंधनंजयोहन्तिकौरवकुलंयथापुनः॥ (अ० श्लो०१८) य० ॥ नित्यज्ञानस्वरूपयात्मामें स्वप्रकाशस्वम्पयोधप्रभाव से यहजगतरूपभ्रम पीडिन कहियेयमतिसनित्यनिवृत्तसंसारको हीतत्त्वमस्यादि वाश्यसेउत्पन्नहुयामानात्कारपुनःनिवृत्तकरताहे।जसे श्रीकृप्पाभगवान्कहननकोहुएकोग्यकुलकोपुन यर्जुनहननफरताहै। यहस्मृतिभी नित्योधम्बम्प यात्मांफस्वरूपकाविचारकरजगत्म्प भ्रमयत्यंत थमत्त्वकोहीवनकम्तीहै । याते यमत्फी नितिपरक हीशास्त्र सोमफ्लताहै।यह ययमिद्धया।पिचाशास्त्रको अनर्थक रूपतारग्यप्रामागययाजोयापादन मोक्याटेनवादीस्पतिही यथवा अद्वैतवादीप्रनिह प्रथमपनाहोतोत्रमे भिन्नगाम्नमतम्पहै ऐसे उत्तराई माननेवालवादियोंकेपतिशास्त्रनिष्ठयप्रमाणताकीप्राप्तिरूपदोपहोगा। क्योंकिवहप्रमाणकोहीमुख्यमानतेहैं।।ौरअद्वैतवादियोंकेप्रतितिसदोप केयापादनकीअयोग्यताहै ॥ क्योंकिजोदैतकीवात भीनहींजानते। किंतुसदाहीयद्वैतहै ऐसामानतेहैं । तिनकोयहदोपकैसे प्राप्तहोसकता है।। शास्त्रयथवातिसकीप्रमाणता ब्रह्मसेभिन्नतिनकोस्वीकारहीनहीं यदिब्रह्मसेभिन्नइनदोनोंकोमाने तोइनदोनोंकरहीयदैतकीहानिहोगी ।। शंका ।। हेभगवन् यदिवेदको यापयप्रमाणमानोगे तोयापको पाखंडत्वप्राप्तहोगा।क्योंकिवहवेदकोप्रमाणनहींमानता। समाधान।। हेशिष्य वेदमेंहमयप्रमाणताभी नहींमानते।। यातेपाखंडपनेकीप्राप्ति हमकोनहींहोती॥ ौरवास्तवसेतोपाखंडत्वभी यात्मासेभिन्नयत्यंत असतहीहै।यदैतवादीकेपतितिसकायापादनहीनहींसंभवता। यहभाव ॥ शंका ।। हेभगवन वेदकीयामाणताके यनंगीकारकरेहुएभी तिसकीप्रमाणता प्रापअंगीकारकरतेहोवानहीं?प्रथमपक्षमतोद्रेतकी प्राप्तिहोगी। योंकिब्रह्मसेभिन्न तिसकीप्रमाणताअापनेमानीहै। और द्वितीयपक्षमें ब्रह्मात्माकेयभेदकीयसिद्धिहोगी। क्योंकितिसमेंप्रमाण कायभावहै ।। समाधान ॥ अंथअद्वैतनिष्ठअप्रामाणिकत्वशंकाकापरिहारनिरूपण हेशिष्य यहतुम्हाराविकल्प द्वैतदर्शीकप्रतिहै।यथवायदैतदर्शी केप्रतिहै? । प्रथमपक्षकहो तोहमारीयाहानिहै । क्योंकिप्रमाणके श्राधीनमात्माकी सिद्धिमाननेवाले दैतदकिप्रति तिसदोपकी प्राप्ति होगी। औरद्वितीयपक्षमें तोप्रमाणप्रमेयभावकीहीयसिद्धिहै।क्योंकि [यत्रत्वस्यसात्मैवाभूत् ] इसश्रुतिनेयदैत यात्माकाही ४६४ १० मु. भा० मिल प्रतिपादनकियाहै ॥ किंवा॥ प्रमाणकाअन्वेषण तुमकिसलियेकरते हो।यदियहकहो। किअद्वैतयात्माकीप्रतीतिकेयर्थ प्रमाणकायन्वेषण है तोयहकथननहींसंभवता । क्योंकिस्वप्रकाशरूपताकरही अद्वैत यात्माकीसिद्धिहै ॥ यहअर्थविस्तारसे पूर्वनिरूपणकरयाएहैं। और यदियज्ञानकीनिवृतियर्थ प्रमाणकी अपेक्षाकहो तोभीयद्वैतकोसिद्ध होनेकरतिसमें प्रमाणकीयपेक्षानहीं।यातेयदेतकोयप्रामाणिकताकी प्राप्तिनहींहोसकती ।।इति ।। द्वैतदर्शीकप्रति तिसकोदोपरूपताहै यह पूर्वकहाथा। तिसकोग्रहणकरके पुनःशिष्यशंकाकरताहै ॥ अर्थहेतदर्शित्वपदार्थकेविचारनिरूपणपूर्वकद्वैत निष्ठतुच्छत्वकाप्रतिपादन शंका ॥ हेभगवन् द्वैतदर्शित्व क्यायात्माकाधर्महै ॥ अथवा यात्माकास्वभावहै?|| प्रथमपक्षमभीपुनः यहविचारकर्तव्यहै। वहधर्म क्यासत्हैयथवायसन्है?॥द्वितीयपनतोनहींसंभवता।। क्योंकिग्रसत् वंध्याकेपुत्रकोकिसीका धर्मपनादेखानहीं ॥ औरप्रथमपक्षकहोगे तो द्वैतकी प्राप्तिहोगी।औरआधद्वितीयपनौदर्शनकाद्वैतकोविशेषणपना हीकहनेयोग्यहै उपलक्षणपनानहीं।क्योंकिद्वैतको उपलक्षणमानेहुए "दर्शित्व" हीवात्माकास्वभावसिद्धहोगा। वहस्वदर्शित्वरूपनाकर भीवनसकताहै। यातेदैतपदकाग्रहणव्यर्थहोगा । इससेयहयर्थसिद्ध हुश्रा।किदैतविशिष्टदर्शित्वयात्माकास्वभावहैऐसेमानेहुएसर्व द्वैतकी भीस्वतः सिद्धिहोगी ॥ क्योंकि विशिष्ट वृत्तिधर्मका विशेषणमें वर्तनेकानियमहै ॥ समाधान ।। हेशिष्य देतकोयात्माकास्वभाव मानेहुए तिसकीभीस्वतःसिद्धिहोगी। यहतुम्हाराकथननहींसंभवता ।

उत्तराई क्योंकिइसमेंयहविचारकर्तव्यहै। क्याआत्मास्वरूपहीद्वैतहै ऐसाअंगी कारकरके तुमद्वैतकीस्वप्रकाशताप्रापादनकरतेहो।अथवास्वतंत्ररूपता करदैतकी स्वप्रकाशताकहतेहो? प्रथमपक्षमेंतोहमकोभीइष्टापत्तिहै । क्योंकिआत्माकी स्वप्रकाशतास्वतःसिद्धहै । औद्वितीयपक्षभीनहीं संभवता । क्योंकि (निवृत्तंचनिवत्तते)यहश्रुतियात्मासे भिन्न सर्वकीतुच्छताबोधनकरतीह।ौरपूर्णयात्माकेप्रतिपादकश्रुतिवाक्य करसिद्धपूर्ण यात्मस्वरूपकीअनुपपत्तिसेमी द्वैतनिष्ठतुच्छताहै।याते . स्वतः अथवापरसेंबैतकीसिद्धि अयोग्यहोनेसे द्वैतअत्यंतअलीकहै।। इति श्रुतिसिद्धयात्माके स्वरूपकीयनुमारतासेदैतकोतुच्छपनाकथन किया। तिसकेउपपादनकरनेकेलिये पुनःशिष्ययाशंकाकरताहै ॥ अथलौकिकतथापरीक्षकपुरुषॉकरतुच्छत्ववादका अनंगीकारनिरूपण शंका हेभगवन् यात्मासेभिन्नद्वैत भौतिसकादर्शन यहदोनों तुच्छहैं ।। इसमेंयहमष्टव्यहै । कियहमतलौकिकपुरुषोंको स्वीकारहै। अथवापरीक्षकपुरुषोंको स्वीकारहै? ।। यहांपरशास्त्रसंस्कारहितबुद्धि वालेपुरुष लौकिककहेजातेहैं । औरशास्त्रसंस्कारसहित युदिवाले पुरुपपरीक्षककहेजातेहैं ।। यदिप्रथमपक्षकहो तोवहनहीं संभवता ।। क्योंकितिनलौकिकपुरुषों को प्रपंचविषयक अवाधितत्वबुदिकवीभीदूर नहींहोती तोतिसमेंतुच्छत्वयुद्धि तोअत्यंतदूरसेहीनिरासकीगई ॥ थौरद्धितीयपक्षभी नहींसंभवत्ता ॥ क्योंकिसर्वपरीक्षकोंकीएकमति नहींहै। तथाहि ।। तिनमें सर्वप्रमाणप्रमेयव्यवहारकेलोपकरनेवाला प्रामाणिक जोसर्वशून्यवादीहै ॥ तिसनेसर्वपदार्थोका तुन्छपनास्त्री ४६६ स मु. मां कारकियाहै।ौरशून्यत्वसेविरुद्ध नित्यतथायनित्यकविभागकरकोई कथाकाशादिकपदार्थ सकलकालमेंसत्यहैं।। औरकोईकघटादिपदार्थ कादाचित्कसत्यह।।इसप्रकार कणाद तथागौतमादि प्रामाणिकपुरुषों नेस्वीकारकियाहै | औरदोनोंप्रकारकी पदार्थोकीसत्तासेविरुद्धसर्व कालमें सर्वपदार्थोकी सत्ताहै। यहसांख्य तथायोगशास्त्रककर्ता कपिल तथापतंजलिमहर्पिने स्वीकारकियाहै ।। क्योंकि तिनकमत मेंकार्यभीसतहै ।। तथाहि प्रथमवहकार्यउत्पत्तिसे पूर्वभीयसत्नहीं । क्योंकि तिसकालमेंभी सूक्ष्मरूपसे कार्य विद्यमानहै ॥ थोरवत मान कालमें तो विद्यमान होने से ही कार्य थसत् रूप नहीं ।। और ध्वंसभी तिरोधानमात्ररूपहै अभावकानाम ध्वंसनहीं ॥ याते नाशसे अनन्तरभी तिरोधानहुया कार्यविद्यमान है ॥ इसप्रकार सर्वकालमें सर्वपदार्थ सत्रूपहैं । यहसांख्यतथापातं जलादिकोंकामतहै ॥ इमरीतिसे सर्वपरीक्षकोंका परस्परविरोध होनेसे यात्मासेभिन्न सर्वयनात्मामें तुच्छता किसीकोभीस्वीकारनहीं तैसेहुएलौकिक तथापरीक्षकपुरुषोंसेविरुद्ध जगत्का तुच्छत्व कैसे स्वीकारकरनेकेमार्गमें बारूदहोगा किंतुनहींहोगा । औरयदियाप ऐसेकहो किपरीक्षकोंका मतभीपरस्परविरुद्धहोनेसे त्यागनेयोग्यहै।। सोयहकथनभी नहींसंभवता । क्योंकितिसतिसशून्यतथासर्वदासत्त्व तथाकादाचित्कसत्त्वादिजोपनहैं।तिनमेंएकएकपरीक्षकका अंगीकार तोश्रव्याहतहै अर्थात्यवाधितहै । औरतुच्छत्वपक्षमें तोकिसीका भीभंगीकारनहीं।यातेवही त्यागनेयोग्यहै। औस्यदिसिद्धांतीऐसेकहे कितुच्छत्लपक्षमें परीक्षकके अंगीकारकायभाव असिद्धहै। क्योंकि ভবাস্তু मुझपरीक्षकका अंगीकारतिसमें विद्यमानहै ॥ सोयहकथनभीस गतहै। क्योंकितुझकोअप्रामाणिकपनाहैअर्थात्प्रमाणसेपरीक्षाकर केव्यवहारकरनेवालेकानामपरीक्षकहै। औरतुच्छतामकोई प्रमाणनहीं है। यदितुच्छतामेभीकोईप्रमाण मानोगे तोतुच्छपनेकीहीहानि होगी ॥शंका।। वस्तुकेदोरुपनहींसंभवते । इसहेतुसेसर्वपक्षप्रामाणि कहींहैं | यहनहींकथनकरसकते । इसप्रकारसर्वको परस्परविरुद्ध होनेकर इनमेंकौनपरीक्षकहै।औरकिसकामतसमीचीनहोनेसेउपादेय है। औरकिमकामतअसमीचीनहोनेसे त्यागनेयोग्यहै । इसमें नियामककाअभावहोनेसे एककाभी ग्रहणनहींहोगा। किंतुसर्वमतों कात्यागहोगा ।। समाधान ॥ नित्यतथानिर्दोपवेदमूलकताकेसद्भाव तथाश्रसद्भावकोही इनकी विशेषतामें नियामकताहै ॥ अर्थात जिसकामतवेदमूलकहै। वहग्रहणकरनेयोग्यहै । औरजिसकामतवेद मूलकनहीं वहत्यागनेयोग्यहै । जैसेपाखंडियों कामतवेदमूलकन होनेसेत्यागनेयोग्यहै।। इसप्रकारशिष्यद्वारा पूर्वपक्षकपापहुए श्रीगुरु द्वारासिद्धांतीउत्तर निरूपणकरताहै ॥ समाधान ॥ * अथश्रुतिप्रमाणसे तुच्छत्ववादकाउपपादन * हेशिष्य यहतोयत्यंत हर्षकीवात्त है ।। क्योकियतकोजाकर भीपुनःयदिश्रतिपरही तुम्हाराविश्वासहै ॥ तोश्रतिसिद्धजोनिर्दोप मतहेवहीग्रहणकरनेयोग्यहै । तिससेभिन्नसर्वहीत्यागनेयोग्यहैं ।। क्योंकिवहयप्रामाणिक हैं । शंका ॥ हेभगवन् इतरमतयप्राणिक हैं यहकथनयुक्त है। क्योंकिइतरपक्षभी प्रत्यक्षादिप्रमाणमूलकहीहैं। समाधान ।। हेशिष्य श्रुतिकाविरोधहोनेसेप्रत्यक्षादिकप्रमाणधाभास वे०सि० मु० भा० रूपताकोप्राप्तहोतेहैं।।यातेइतरमतोमें अप्रमाणिकतासिद्धहै ।। शंका।। हेभगवन्श्रुतिसाक्षात्प्रपंचकी तुच्छताकेबोधनमेंतात्पर्यवाली नहीं क्योंकिसमन्वय अधिकरणकाविरोधहोगा। तिसमेंसर्ववेदकातात्पर्य एकयद्वितीयवस्तुमें प्रतिपादनकियाहै। समाधान।। हेशिष्यश्रतियें तोग्रात्मासेभिन्न सर्वअनात्मपदार्यों में तुच्छताकाअभिमानकरती हैं। उनश्रुतियोंकोहीपठनकरतेहैं । सदेवसोम्येदमग्रआसीत्एकमेवाद्वितीयानेहनाना स्तिकिंचन । सएपनेतिनेतीति। अथतस्यायमादेशअमात्रश्चतुर्थोव्यवहार्यः प्रपंचो पशमः शिवोऽद्वैतः॥ था यहनित्ययपरोक्षात्माकार्यकारण तथास्थूलसुक्ष्मरूप नहीं । यथनिसकायहनिषेधमुखउपदेशहै। तथाहि ॥ जोवस्तुप्रमा काविषयहो तिसकोमात्राकहतेहैं। जोमात्रासेभिन्नहो।सोयमात्रकहा जाताहै । अथात्यप्रमेयहै।। अथवा ॥ मात्रानामयवयवकाहै।तिस सेरहितकानामअमात्रहै । इसकथनसेस्वगतभेदकानिषेधयात्मामें सिद्धहुया ॥ औरतुरीयचेननकानामहीचतुर्थहै ॥ौर(अव्यवहार्यः) कथनादिव्यापारकाविषयहै ॥ तिस यात्माकीपुरुषार्थरूपताको कहतेहैं ॥ (प्रपंचोपशमः) दुःखरूपप्रपंचकाअत्यंताभावरूपहै ॥ यहांयात्माकोप्रपंचाभावरूपतातवीसिद्धहो जवप्रपंचयसतरूपसिद्ध हो। क्योंकिग्रसत्काअभावसत्रूपहोताहै। जैसेयसत्सर्पका|भाव सतुरज्जुरूपहै।। इसकथनसे विजातीयभेदकाभीयात्मामेंनिषेधकिया तिसयात्माकी सुखरूपताकहतेहैं।। (शिवः) वह यात्मासुखस्वरूपहे।

उत्तरा और (अदैतः) सजातीयभेदसेरहितहै । इसप्रकार त्रिविधभेदका निषेधकरनेसेश्रतार्थापत्तिप्रमाणप्रपंचकात्रैकालिकयभावबोधनकरता है ॥ शंका ।। इसप्रकारकालिकअभावकाप्रतियोगिरूपताकरजब श्रुतिबोधनकरेगी । तोप्रपंचकीप्रमाणसेसिद्धिप्राप्तहोगी ॥ समाधान भ्रांतिकरउपस्थितहुएपदार्थकोभी प्रभावकीप्रतियोगिता संभवती है यदिऐसेनमानें तो (नसुरांपिवेत् ) अ० ॥ सुराकोयहपुरुषपान नकरोइत्यादिनिषेधकवाक्योंसेभीसुरापाननिष्ठप्रामाणिकताहुईचाहिये जैसेरागसेप्राप्तसुरापानकेनिषेधकोश्रतिबोधनकरतीहै।परन्तुतिसनिषेध काप्रतियोगिरूपताकरसुरापानप्रामाणिकनहींहोसकता। तैसेदार्टीत मेंभीजानना ॥ और श्रुतियें अभिमानकरतीहैं" ।। इसकथनसे समन्वययधिकरणकाविरोधमीदूरहुआजानना है क्योंकिसजातीय थादिकभेदसेरहितयदैतात्माको श्रुतिबोधनकरतीहै। यदिप्रपंचकी तुच्छताकोतिनमाने तोविवक्षितात्माकी सिद्धिहीनहींहोगी । इसमकारयदैतयात्माकीसिद्धिकेरिसीमन्नागिनी। तात्पर्य्यतोदेतयात्मामेंहीहै ।। .. शंका ॥ हेभगवन् अतिप्रपंचकीतुच्छताकोहीक्योंमानतीहै। जिस कारणसेउक्तयात्माके स्वरूपकीसिद्धितोप्रपंचको मिथ्यामाननेसेभी वनसकतीहै । समाधान ॥ हेशिष्य तिसथात्मासेभिन्न किसीमकार काभी दैतमानेहुए यर्थात् मिथ्यारूपताकर थथवा सत्रूपता करदेतकी सत्तामानेहुएभी अद्वैतसिद्धांतकी हानि होतीहै । शंका ॥ हेभगवन्यदिप्रपंचकी तुच्छताहीश्रतिशनुसारहे। तोविवर्त्त वादतथापरिणामवादका स्वीकारकिसलिये कियाहै ।। समाधाना ।।

वे०सि० मु० भा० विवर्त्तवादादिकांकेस्वीकारकीव्यवस्था तथा जगत्कीतुच्छतानिरूपणकाउपसंहार हेशिष्यजिसकारणसे प्रपंचकाकिसीप्रकारसेभी मत्त्वमानेहुए अद्वैतसिद्धांतकीहानिहोतीहै ।तिसीकारणसेजगन्निष्ठतुच्छताश्रुति अनुसारीहै । औरविवर्त्तवादतथापरिणामवादको युक्तितथालौकिक प्रमाणमूलकहोनेसेवहभी अधिकारिभेदसे स्वीकारकियेजातेहैं। याते विरोधनहीं ।। अर्थयह किमध्यमयधिकारीकेलिये विवर्त्तवादहै। और मंदअधिकारीकेलिये परिणामवादहै । यहयर्थगौडपादाचार्यों नेभीकहा है। * तुच्छानिर्वचनीयाचवास्तवीचेत्यसौविधा। ज्ञेयामायात्रिभिवधैिःश्रौतयौक्तिकलौकिकैः॥ अश्रितिजन्यतथायुक्तिजम्योरप्रत्यक्षादिप्रमाणजन्ययहजो तीनप्रकारकेवोधहैं। लिन्होंकरअज्ञानतत्कार्यतुच्छतथा अनिर्वचनीय औरपरिणामरूपताकर तीनप्रकारसेही जाननेयोग्यहै। यर्थात्जोपुरुष लौकिकपमाणकोग्राश्रयणकरनेवालेहैं।तिनकोतोग्रज्ञानतत्कार्यसत्य भासताहै ॥ यहपरिणामवादवेदांतवादकीप्रथमभूमिकाहै । और युक्तिको श्राश्रयणकरनेवालेनिपुणमतिपंडितोंको यहअज्ञानतत्कार्य अनिर्वचनीयभासताहै ॥ यहविवर्त्तवादवेदांतवादकीदूसरीभूमिका है । औरउत्तमभृमिकामें प्रारूढविद्वान् जिसकोश्रुतिजन्यबोधप्राप्त हुआहै तिसकोअज्ञानतत्कार्य तुच्छरूपतासे भामताहे ॥ इति । इस प्रकारप्रपंचीतुच्छतामें श्रुतिप्रमाणकोकथनकरके अवतिसमेंस्मृति कीसंमतिभीकहतेहैं। वसिष्टभगवान्भी प्रपंचकीतुच्छताकोयाश्च उत्तराई यकीन्याईकथनकरतेहैं। अहोनुचित्रं यत्सत्यंब्रह्मतद्विस्मृतं नृणाम् । यदसत्यमाविद्याख्यं तत्पुर-परिवल्गति ॥ १॥ अहोनुचित्रं पद्मोत्थैर्वद्धास्तंतुभिरद्रियः । अविद्यमानायाविद्यातयाविश्वखिलीकृतम् ॥२॥ य० ॥ हेरामबहुताश्चर्यहै । जोसत्पबह्मथावहपुरुषोंको विस्मृतहोगया । औरजोयसत्ययविद्यालत्कार्यथा वहसन्मुखसत्य प्रतीतहोताहै ॥१॥ हेरामबहुतयाश्चर्यहै । जैसेकमलसेउत्पन्नहुए तंतुओंकरपर्वतबांधे हुएहैं तैसेंथविद्यमानयर्थात्असत्जोयविद्यांतिस करही सर्वजगत्दृढकियाहुयाहै ॥ इति ॥ * अथअदृष्टद्वयपदकी व्याख्याकाउपसंहार हेशिष्य जिसहेतु दैतयोतिसकादर्शन तुच्छहोनेसे असतहै तिसीहेतुसे स्वतःसिद्धशुद्धबुद्धीमुक्तस्वभावपरिपूर्णयानन्दस्वरूप श्रात्माकीयदृष्टद्धयता उपपन्नतरहै। यर्थयहजोअतिशयकरसंभवती है। तात्पर्ययहहै । दैतकोविवर्तमानेहुएभीयदृष्टदयतायात्माकीउप पन्नहै। अवतोप्रपंचकोतुच्छमानेहुएवहउपपन्नतरहै । अदृष्टद्रयही श्रात्माकावास्तवस्वरूपहै इसथर्थमश्रतिप्रमाणनिरूपणकरतेहैं । ननिरोधोनचोत्पत्तिनवडोनचसाधकः । नमुमुक्षुर्नवैमुक्तइत्येपापरमार्थता ॥१॥ तदेवनिष्कलंब्रह्मानिर्विकल्पनिरंजनम् । ततब्रह्माहमितिज्ञात्वाब्रह्मसंपद्यतेध्रुवम् ॥२॥ निर्विकल्पमनंतंचहेतुदृष्टांतवार्जितम् ।

પ૨
२०सि० मुः मा०
अप्रमेयमनादिंचयज्ज्ञात्वामुच्यतेवुधः ॥३॥
य० ॥ नकोईप्रलयहे । औरनकोईउत्पत्तिहै। पौरनकोईबांधा
हुआहै । औरनकोई वैदिककर्मक अनुष्ठान करनेवाला साधकहै ।
औरनकोईमुमुक्षुहै।। औरनकोईमुक्तहे।यहीवास्तवसेसिद्धांतहे ।। (१)
यौरवहीब्रह्मतत्त्व(निष्कल)निरवयवहै।और (निर्विकल्प) विशेषरूप
नहीं । और (निरंजनम्) अविद्यादिदोपसेरहितहै । सोततपदका
लक्ष्ययर्थब्रह्ममेंहूं।ऐसेसाक्षात्कारकरकेयहयधिकारिपुरुषापही(प्रव)
निश्चलकूटस्थब्रह्मभावकोप्राप्तहोताहै ॥२॥औरजोब्रह्म(निर्विकल्पम्)
गुणक्रियाजातिसेरहितहै । और (अनंत) नाशसेरहितहै । और
(हेतुवर्जित) यापयकार्यहै । और (दृष्टांतवर्जितं) अनुपम अर्थात्
अपनीतुल्यतासेरहितहै।। इसकथनसे सजातीयभेदकानिपेधकिया।।
और (अनादि) ग्रापकिसीकाकारणनहीं । और (अप्रमेयं) अविपय
स्वभावहै। ऐसेब्रह्मस्वरूपकोयहयधिकारीयात्मरूपतासेसाक्षात्कारकर
केअविद्यातत्कार्यरूपबंधनसेमुक्तहोताहै ॥३॥ इत्यादिकश्रुतिवाक्य
अात्मतत्त्वकोदेतदर्शनसेशून्यत्वहीप्रतिपादनकरतेहैं । यातेयदृष्टद्वय
स्वरूपहीयात्माहै । यहयर्थसिद्धहुया ॥[इतिग्रदृष्टद्यपदव्याख्या]
मू०। अथआत्मसाक्षात्कारकाफलतथातिसकोनिर्पेक्ष
मोक्षकीसाधनताकानिरूपण
शंका ॥ हेभगवन इसप्रकारकाआत्मतत्त्वहो।परन्तुतिससेक्या
सिद्धहोताहै ।। समाधान ॥
समृ०॥ सत्यंज्ञानमनंतंचपूर्णानंदविग्रहम् ।
मांत्रणिकमात्मानं विनिश्चित्यीवमुच्यते ॥५७॥

उत्तराद्ध चौ ॥ सत्यज्ञानयनंतस्वरूपं । पूर्णयानंदरूपयनूपं । मंत्रउक्तयातमपहचाना । तांकरकियोबंधसवहाना॥४॥ टी० ॥ हेशिष्य जिसहेतुसेपूर्वउक्तवास्तववृतांतहै । तिसीसे "सत्यंज्ञानमनंतंब्रह्म" इसमंत्रवर्णकरसिद्धसत्य तथाज्ञान औरअनंत तथापूर्णऔरयानंदस्वरूपयात्माको अपनेसेयभिन्न अर्थात् “सोई में हूँ" ऐसेसाक्षात्कारकरके यहअधिकारीअविद्यादिबंधनसे विमुक्तहोताहै यातेयात्मसाक्षात्कारसे स्वस्वरूपावस्थानरूपफलसिद्धहोताहै ।।इति ||५७॥शंका।। हेभगवन् यदिऐसाज्ञानकिसीकोहो तोघटादिज्ञानकी न्याईतिसकीउपलब्धिभीहो । परन्तुसाधनकेअभावसेऐसाज्ञानकिसी कोउत्पनहीनहींहोता|| समाधान ।। हेशिष्यऐसाज्ञानकिसीकोउत्पन्न नहींहोतायहतुम्हाराकथनअसंगत है । क्योंकि तिसकासाधनमहा वाक्यरूपप्रमाण विद्यमान है । और अनुपलंभ काविरोधभी नहीं संभवता ।। क्योंकि ॥ ॐ पश्यनप्रतिपेदे। योयोदेवानांप्रत्यबुद्ध्यत् सएक्तदभवत् इत्यादिश्रतियोंसेवामदेवादिकों में तिसज्ञानकी उपलब्धिप्रसिद्ध है। और साधनों के विद्यमानहुएभी ज्ञाननहींउत्पन्नहोतायहकथन ययुक्त है। क्योंकि वेदाध्ययनादि साधनों के अनुष्ठानसे जिसको विविदिपाउत्पन्नईई है । और ॥ अथातोब्रह्मजिज्ञासा ॥ शा० ।।१।२॥ इससूत्रमेंथशतसेसूचनकिये हुए विवेकादिचतुष्टयसाधन संपन्नजोपुरुष है ॥ तिसकोश्रोत्रियब्रह्मनिष्ठगुरुकरउपदिष्टमहावाक्य वै०सि० मु० पा० केविचारसेयनंतरज्ञानकीउत्पत्तिदेखनेमें थाती है ।। सूत्रकायहयर्थ ।। (यथ) साधनचतुष्टयसंपत्तिसेयनंतर (यतः) जिसकारणसे वेदहीयग्निहोत्रादिकर्मोंका अनित्यफल और ब्रह्मज्ञानकानित्यफल वोधनकरताहै । इसीहेतुसेयहयधिकारी (ब्रह्मजिज्ञासा) ब्रह्मज्ञानके अर्थवेदांतविचारकरे ॥ इति ।। शंका । हेभगवनजिनपुरुषानेवेदान्त काश्रवणकियाहै ॥ तिनको भी संसारकीप्रतीतिपूर्वकीन्याईहीदेखने मेंयाती है ॥ समाधान ॥ हे शिष्य असंभावनातथाविपरीतभावना यहदोनोंयात्मसाक्षात्कारकेप्रतिबंधकहैं । तिनकानिवर्तकमननतथा निदिध्यासनसहकृतयोश्रुतिकेतात्पर्यज्ञानके अनुकूलमानसव्यापाररूप ऐसाजोवाक्यकाविचाररूपश्रवणतिसकेयनुष्ठानसेप्रतिबंधसेरहितज्ञान अवश्यउत्पन्नहोताहै। यदिऐसेनहींमाने तोतादृशयात्माकेस्वरूपका प्रतिपादकजोशास्त्रहै।तिसकोयप्रमाणताकी प्राप्तिहोगी।शंका हेभगवन ज्ञानसेमोक्षहोताहै इसकथनकाक्याअर्थहै। क्याज्ञानहीमोक्षकासाधन हैयहतिसकायर्थहै। यथवाज्ञानभीसाधनहै तथाअन्यकर्मादिभीसाधन हैंयहतिसकायर्थहै? ॥ प्रथमपक्षतोनहींसंभवता ।। क्योंकि ॥ ॐ विद्यांचाविद्यांचयस्वेदोभयंसह उ० ई० म०(११) अ-ज्ञानतथाकर्मइनदोनोंकेसमुच्चयकोजोजानताहै । इत्यादि समुच्चयप्रतिपादकवाक्यका विरोध होगा ॥ और द्वितीयपक्षभीनहीं संभवता ।। क्योंकि ।। कर्मणैवाहिसंसिद्धिमास्थिताजनकादयः भ० मी० अ०३ ॥२०॥ थ-कर्मकरकेही जनकादिक अधिकारिपुरुष मोक्षकोप्राप्तहुए हैं।

उत्तराद इत्यादिकेवलकमसे मोक्षप्रतिपादकवाक्योंका विरोधप्राप्तहोगा ॥ यातेउत्पन्नहुएज्ञानकोभीसाधनांतरकी अपेक्षाहोनेकरफलदेनेकेलिये वहविलंबकरताहै ।। समाधान ।। हेशिष्ययहसमुच्चयवादनहींसंभवता क्योंकि ॥ तद्वैतत्पश्यन्वृषिर्वामदेवः प्रतिपदेअहंमनुरभवं सूर्यश्चेति । ब्रह्मवेदब्रह्मैवभवति । तरतिशोक मात्मवित्॥ १०-(तत्) ब्रह्मको (एतत्) मैं हूं ऐसे (पश्यन्) साक्षात्कार करताहूयाइसदर्शनसेहीऋषिभावकोप्राप्तहानामसेवामदेव(प्रतिपेदेह) निश्चयकरयात्मज्ञानकाफलरूपसर्वात्मभावकीप्राप्तिकप्रतिपादक" में हीमनुहुथा तथा महीसूर्यहृया"।।इत्यादिमंत्रोंकोदेखताभया।इत्या दिकश्रुतियोंसेयात्मज्ञान औरतिसकेफलमोनकोएककालीनत्वकाकथन होनेसेमध्यमेंयन्यसाधनतथाकालकेविलंबकायभावप्रतीतहोताहै। जैसे "मुंजन्तृप्यति" अ० भोजनकरताहूयातृप्तहोता है । यहां भोजन श्रौतृप्तिकेमध्यमेयौरकोईकार्यनहींप्रतीतहोता ॥ तैसे पश्यातिपेदे" यहांभीदर्शनतथासर्वात्मभाव की प्राप्तिरूपपलकेमध्यकार्यातरयर्थात् अन्यकिसीसाधनकीप्रतीतिवर्तमानार्थिक शत्"प्रत्ययकेकथनसेनहीं है। औरजिसकालमेंब्रह्मकोजानताहैतिसीकालमेंब्रह्मरूपहोताहै। इस कथनसेब्रह्मज्ञानतथाब्रह्मरूपताहोनेको एककालमेंप्रतीतिहोनेसेकाल काविलंबभीनहींप्रतीतहोता ॥ औरकर्महीमुक्तिके साधनहैं । यह कथनभीसमीचीननहीं । क्योंकि वे०सि० मु० भा० तमेवविदित्वाति मृत्युमेतिनान्यपंथाविद्यतेऽयनाय इत्यादिकथतियेंयन्यसाधनका निषेधकरतीहैं ॥ और पूर्व जोस्मृतिकाविरोधतुमने कहाथावहभीनहींसंभवता | क्योंकि “संसिद्धि" शब्दसेवहांतत्त्वज्ञानकाहीग्रहणहै ॥ और ॐ कपायकर्मभिःपक्वेततोज्ञानं प्रवर्त्तते ॥ या कर्मोकेयनुष्ठानसे पापरूपमलकेनिवृत्तहुए तिससेयनं तरज्ञानप्रवर्त्तमानहोताहै।इसशास्त्रसेकर्लोकोतत्त्वज्ञानकाकारणभूतजो अंतस्करणकीशुद्धितिसकीहेतुताप्रतीतहोतीहै।इसकथनसेसमुच्चयप्रति पादकवाक्यकाविरोधभीनिवारणकिया।क्योंकितहांही (अविद्या मृत्युंती) इसवाक्यशेपकरके मृत्युरूपपापोंका निवर्तकत्वही अविद्याशब्दकेवाच्य कर्मीकोप्रतीतहोताहै ॥ यातेज्ञानहीमुक्तिरूप फलकासाधनहै । यहअर्थनिर्दोषसिद्धहुया ॥ यदिऐसेहै । अर्थात् श्रात्मज्ञानहीमुक्तिकासाधनहै । तोयवश्यहीजन्मादिसंसारदुःखसे भयभीतहुएपुरुषोंनेतिससंसारदुःखकी निवृत्तिकासाधन जोतत्त्वज्ञान वहश्रवणादिसाधनोंकर संपादनकरनेयोग्यहै यहअर्थप्रकरणकेउप संहारमिपसेकहतेहैं ॥ तिसहेतुसेसन्याससहिततत्त्वज्ञानहीयत्नसेसंपा पनकरनेयोग्यहै । यहां ॥ त्यागएवहि सर्वेपांमुक्तिसाधनमुत्तमम् ॥* य० ॥ यज्ञदानादिजोपरंपरासे मोक्षकेसाधनहैं | तिनसर्वके मध्यसंन्यासहीमोक्षका उत्तनसाधनहै । इसशास्त्रकोग्राश्रयण करकेसन्याससहिततत्त्वज्ञानमोक्षका साधनकहाहै ॥ यत्नसेतिसके संपादनमेंयहहेतुहै कितिसतत्त्वज्ञानके अभावहुएमहानहानिश्रुतिने उत्तरार्द्ध कथनकीहै ॥ तहांश्रुति ॥ (नचेदिहावेदिमहतीविनष्टिः) य० ॥ यदिहमइससंसारमंडलमें ब्रह्मकोअपनायात्मारूपनहींजानेंगे तोतिससेहमब्रह्मात्मसाक्षात्कारसेरहितहोंगे।शिका।। ब्रह्मसाक्षात्कारसे रहितहोजायेंतिसमेक्यादोपहै।।समाधानाब्रह्मसाक्षात्कारके अभावहुए जन्ममरणादिस्वरूपयनंतपरिमाणयुक्त विनाशप्राप्त होगा ॥ तिसीसे अवश्यहीब्रह्मात्मसाक्षात्कारयधिकारिपुरुषोंने संपादनकरनायोग्यहै। इति ॥ ब्रह्मात्मसाक्षात्कारके उत्पन्नहुए संसारकी निवृत्तिहोतीहै।इस अर्थमेंह्मविद्पुरुषोंका अज्ञानतत्कार्यकीनिवृत्ति रूपफलसहितउद्गार अर्थातयनुभवभीप्रमाण रूपताकर स्मरणकियाजाताहे ॥तथाहि।। * विद्याविग्रहमग्रहेण पिहितं प्रत्यंचमुच्चस्तरा। मुत्कृष्योत्तमपूरुपमुनिधियामुंजादिपीकामिवाकोशात् कार्यकारणरूपविकृतात् पश्यामि निः संशयम् ॥ नासीदस्तिभविष्यतिक्वनुगतःसंसार दुखोदधिः ॥ * स० शा०४॥५३॥) यास्वप्रकाशचिदएकरसजोपुरुषोत्तमहै। सोयत्यंतउच्चरूपता कर विद्यासे याच्छादितहे। सहसोंप्रकारकेयलोंमे जोपाच्छादितपने कोदुर्भद्यताहै।यहहीतिसपिधाननिष्ठ उचैस्तरत्वहै। यौवहीपुरुषोत्तम (प्रत्यक्) सर्वकायंतरात्माहै निसको (मुनिधिया)श्रतियनुकूलमनन सेतीक्ष्णकियेहुएविवेकज्ञानकरमुञ्जसे तूलीकीन्याईवाह्य अंतर्भावसे यनेकमकारकेविकारको प्राप्तहुएअन्नमयादिपंचकोशनसेपृथक्करके संशयसेरहिन सोउत्तमपुरुपमहूं । इसप्रकारमें देखताहूं । जिसब्रह्म ५०८ वे. सि० मु: भा० दर्शनकेप्रभावसेयहसंसार दुःखकासमुद्नपूर्वथा। औरनयवहै। औरन आगेहोगा ॥ जानानहींजाता जोकहांगया। अर्थात्कभीहुयाहीन था ऐसेप्रतीतहुया ॥ ५३ ॥ तथापियामासरूपद्धतग्रसंभावितभी प्रतीतहोताहै। यहकहतेहैं। पश्यामिचित्रामवसर्वमिदंडितीयोतिष्ठामिनिष्कल चिदेकवपुष्यनंते । आत्मानमवयमाचंत्यसुखैक रूपं पश्यामिदग्धरशनामिवचप्रपंचम् ॥ सं० शा० अ०४ ॥ ५४॥ य० ॥ सर्वइसदेतकोचित्रकीन्यांई मैंदेखताहूं । इतनेमात्रसे अर्थात्याभासरूपजीवनसेमुक्तिकीकिंचित्भीविकलतानहीं यहकहते हैं (तिष्ठामीति) औरनिरवयवतथाचेतनएकस्वरूपचनंत यात्मामें मैं स्थितहूं ।। गौरदैतसेरहिततथामनकायविषय औयानंदएकस्वरूप श्रात्माकोमॆदेखताहूं । शंका ॥ संसारदर्शन तथाव्रह्मदर्शनइनदोनों कोविरुद्धहोनेसे एककालमेंतिनकी स्थितिकैसेहोगी। समाधान ॥ दग्धरज्जुकीन्याईइसप्रपंचकोमैदेखताहूं ॥ यातेप्रतिभासमानदैतको अर्थक्रियाकासामर्थ्य नहीं । यर्थयह ॥ किग्रदैतदर्शनकरदैतप्रपंच कावाधहीहोजाताहै ॥ यातेपूर्वउक्तशकानहींसंभवती ॥ ४ ॥ शंका ॥ देतदर्शनसे अद्वैतदर्शनकाहीवाधक्योंनहो । समाधान ।। अद्वैतमप्यनुभवामिकरस्थाविल्वतुल्यं शरीरमहिनि वयनीववीक्षे । एवंचजीवनमिवप्रतिभासनंचनिः श्रेयसाधिगमनंचममप्रसिद्धम् ॥3स० शा०अ० ४।५५ उत्तरार्द्ध अ० ॥ यदैतकोभीहस्तपरस्थितविल्वफलकीन्याई मैंअनुभव करताहूं। इसलियेयदैतअनुभवकोकदाचित्भीपरोक्षतानहीं। और जैसेसर्पनेपरित्यागकीहुईजोत्वचाहै वहसर्परूपभासतीहै।तैसेशरीरादि संसारबाधितहुयाभीभासताहै।यातेदैतदर्शनसे यदैतदर्शनकााधनहीं होता। अन्यथावस्तुकेस्वभावकापरित्यागप्रापहोगा। इसपकारजीवत कीन्याईप्रतीति तथामोलकीप्राप्ति यहदोनोंमुझकोमसिद्धहैं।। ५५ ॥ तत्त्वसाक्षात्कारकालमेंशरीखाधकेयोग्यहै । यहतोत्याहीकथनकरने योग्यहै। परन्तुतत्त्वसाक्षाकारसे पूर्वगीदैतप्रपंचकीप्रतीति जोमुझको हुई तिसमेंभीमुझकोग्राज याश्चर्यभानहोताहै ॥ अर्थात् प्रथमही यहमपंचवाधितथा यहकहतेहैं।। आश्चर्य्यमद्यममभातिकथंद्वितीयं नित्यनिरस्त निखलेशिवचित्प्रकाशे । आसीत्पुरेतिकिमिमाः श्रुतयानपूर्व येनद्वितीयमभवतातिमिरप्रसूतम् . सं०मा० अ०४॥५७ य० ॥ ग्राजमुझकोययाश्चर्यभासताहै।किजोनित्यतथा यज्ञानतत्कार्यसेरहित तथायानंद यौस्वप्रकाशयात्मामें यहदैतपूर्व कैसेस्थितहुथा ॥ शंका । इसमें क्यायाश्चर्यहै पूर्वकालमेंश्रुति जन्यबोधनहींथा । औरययवहश्रतिजन्ययोधविद्यमानहै।यातेतिस करदेतवाधितहोगया। समाधान ॥ तत्त्वज्ञानकेजनकवेदांतवाक्य क्यापूर्वनहींथे जिसकर यहयज्ञानसेउत्पन्नहुयादेत यात्मामेंउपस्थित हुथा । अर्थात् यज्ञानकेनिवर्तकतत्त्वज्ञानकेउत्पादकथनादिसिद्ध निर्पक्षकारणरूपवेदांतवाक्यपूर्वभीविद्यामानहीयोतोभीश्रज्ञानादिदैन वे०सि० मु भा० प्रतीतहुया यहहमकोयाश्चर्यहै ॥ ५७ ॥ इसप्रकारशास्त्र और याचायकेप्रसादसेजिसयधिकारीकोब्रह्मात्मतत्त्वकाढदसानात्कारउदय हुयाहै । तिसकेगुरुभक्तिकीप्रकटताभीस्मरगाकीजातीहै । क्योंकि गुरुभक्तिसेभीयहब्रह्मविद्याउत्पन्नहोतीहै ॥ तथाहि ॥ त्वत्पादपंकजसमाश्रयणविनामेसन्नप्यसन्निवपर: पुरुपःपुरासीत् । त्वत्पादपद्मयुगलाश्रयणादिदानी नासीनचास्तिनभविष्यतिभेदबुद्धिः। यस्मात्कृपा परवशोममदुश्चिकित्संसंसाररोगमपनेतुमसिप्रवृत्तः त्वत्पादपंकजरजः शिरसादधानःत्वामाशरीरपतना दहमप्युपासे ॥ #० शा० अ० ४ । ५८ ॥ ५६॥ अ० ॥ हेभगवन् अापकेचरणाविन्दोंकोसम्यक्याश्रयणकरने सेविनामुझकोपूर्वसर्व अनात्मासेउत्कृष्ट तथापूर्णरूपयात्मा सतभी अमत्कीन्याईप्रतीतहुया । अवयापकदोनोंचरणकमलोंकेयाश्रयण सेवहभेदबुद्धि नपूर्वथी औरन यवहै औरनयागेहोगी || ५ || जिसकारणसे कृपापरवशहुए अापमेरे असाध्यरोगके निवृत्तकरनेको अर्थात् संसारकेनाशकग्नेकोप्रवृत्तहुएहो । इसीकारणसेयापकचरण कमलोंकीरजशिरपरधारणकरताहयामेंयापकोशरीरकेपातपर्यंतसेवन करूंगा ॥ ५१ ॥ यातेब्रह्मविद्याकीकामनावाले जिज्ञासूजनोंनेगुरु भक्तियवश्ययनुष्ठानकरनीचाहिये ।।इति।। शंका ॥ अथविद्यासेसंसारकीअनिवृत्तिनिरूपण हेसिद्धांतिन् विद्याकरयविद्याकाबाधहुएभी संसारकीनिवृत्ति ५११ उत्चगई कैसेहोसकतीहै। कैसायहसंसारहै।जोइसलोक तथापरलोकमें संचार वालाहै । तथानानाप्रकारकीयोनियोंकीप्राप्तितथापरिहारकरकेयनक प्रकारकेदुःखकरसंयुक्तहै । तिसकीविद्याकरनिवृत्तिकैसेहोगी।क्योंकि तिसकेकारणकामकर्मादि तोपूर्वकीन्याईहीस्थितहैं । औरयदिशाप ऐसेकहो किकर्मसंसारका उपादानकारणनहीं। किंतुयविद्याउपादान कारणहै। वहयविद्याजवज्ञानसेनिवृत्त होगई तवविद्यामूलकसंसार भीनिवृत्तहोजायेगा। सोयहकथनभीनहींसंभवता । क्योंकिजैसे शेषिकमतमेंउपादान कारणकेनाशहुएभी एकक्षणपर्यंतकार्यपश्चात् अवस्थितरहताहै । तैसेयहांभी उपादानकारणरूपयविद्याकेनाराहुए प्रपंचकीअनिवृत्तिकीशंकादूरनहींहोसकती।औरयदिऐसेकहोकिदितीय क्षण कार्ययापहीनाशहोजायेगा। यातेदोपनहीं । सोयहकथनभी असंगतहै । क्योंकिप्रथमक्षणकीन्याई उत्तरक्षणमॅभीमपंचकी अनुपपत्तिका अभावयनुमानकरसकतेहैं । सोअनुमानयहहै ॥ * अविद्यानिवृत्त्युत्तरतृतीयक्षणःप्रपंचानुपपत्त्या भाववान् । क्षणत्वात् । अविद्यानिटत्त्युत्तर द्वितीयक्षणवत् ॥ य०॥ अविद्याकीनिवृत्तिसे उत्तरजोतृतीयक्षणहै वहमपंचकी अनुपपत्तिकेयभाववालाहै । क्षणहोनेसे । विद्याकीनिवृत्तिसेउत्तर द्वितीयक्षणकीन्याई ॥ इति ॥ तिसकारणसेयज्ञानकेनिवृत्तहुएभी संसारकीनिवृत्तिनहींहोगी ॥ क्योंकितिसकीनिवृत्तिमें प्रमाणका श्रभावहै । यातेप्रयत्ननिष्फलहै ॥ समाधान ॥

५२२ दे०सि० मु० भा० अथतत्त्वज्ञानसेसंसारकीनियत्तिकाप्रकारनिरूपण । हेवादिन् तत्त्वज्ञानका जैसेयज्ञानकेसाथविरोधहै । तैसेकराँके साथभीतुल्यहीविरोधहै । यातेधर्मतथायधर्मरूपकर्मभी तत्त्वज्ञानकर निवृत्तहोजातेहैं । यहअर्थश्रुति तथायुक्तिकप्रसिद्धहै। तथाहि । मृ०॥ कर्ममूलमनर्थानांतच्च ज्ञानेनवाध्यते। क्षीयन्तचास्यकमाणितथाचश्रुतिशासनम् ॥५८॥ दो० ॥ कर्ममूलयानर्थको कियोज्ञाननेराप । तज्ञकर्मसवनाशहुइ तैसेश्रुतिवचभाष ॥ ४५ ॥ टी०॥ ज्ञानकेउत्पन्नहुएभी कर्ममूलकसंसारकीयनुवृत्तिहोगी यहजोवादीनेकथन किया सोनहींसंभवता । क्योंकियविद्याकीन्याई अनकि मूलभूतकर्मोंकाभी ज्ञानकस्वाधहोजाताहै जैसेज्ञानका अविद्याकेसाथविरोधहे तैसेतिसयविद्याकेकार्यकेसाथभीविरोधतुल्य हीहै । जैसेरज्जुकेसाक्षात्कारसे तिसकीयविद्याके निवृत्तहुए यविद्याकेकार्यसदिकोंकीनिवृत्तिनहींहोती यहकथननहींसंभवता तेसेब्रह्मात्माके साक्षात्कारसे मूलाऽविद्याकी निवृतिहुए तिसकेकार्य प्रपंचकीयनुवृत्तिहोतीहै । यहकथनभीनहींसंभवता ॥ ौरयदितुम ऐसेकहोकि (यतोज्ञानमज्ञानस्यैवनिवर्त्तकम् ) य० ॥ जिसकारणसेज्ञाननिकाहीनिवर्तकहै । यहजोशास्त्रकारोंकायव धारणहै । सोज्ञानकोकार्यकानिवर्तकमानेहुए अममीचीनहोजायेगा सोयहकथनभीनहींसंभवता ।। क्योंकियज्ञानकाकार्ययज्ञानसेभिन्न नहीं। अज्ञानकेयभावहुए तिसकीसत्तानहींप्रतीतहोती!यातेतिनके उत्तराई कथनसेविरोधनहीं । औरतत्त्वज्ञानसे अज्ञानकेनिवृत्तहुएकमौकी निवृत्ति प्रमाणकाअभावहै यहवादीका कथनभीनहींसंभवता ॥ क्योंकिसाक्षातश्रुतिही इसयर्थमेंप्रमाणहै । तथाहि ॥ भिद्यतेहृदयग्रंथिछिद्यतेसर्वसंशयाः । क्षीयन्तेचास्यकर्माणितस्मिन्दृष्टेपरावरे ॥ यापरकहियेहिरण्यगर्भादि वहहैं “यपर कहियेनिकृष्टजिससे तिसकानामपरावरअर्थात्परब्रह्महै।तिसपरब्रह्मकाअपनेयात्मासेअभिन्न रूपताकरसाक्षात्कारहुए इसविद्वान्पुरुषकीचिद्जडग्रंथियातदेहादि कोंमेंजोयात्मबुद्धिवहनिवृत्तहोजातीहै । यौस्सर्वसंशयनाशहो जातेहैं औरसर्वकमभी निवृत्तहोजातेहैं ॥ इति ॥ औरयदिवादी ऐसेकहे कियहवाक्यग्रशुभकर्मोकी निवृत्तिकावोधकहै ॥ सोयह कथनभीनहींसंभवता। क्योंकिकर्मशब्दशुभतथायशुभ साधारणहै। औरविद्याकासामर्थ्य दोनोंकेनाश,साधारणहै । और ॐ ब्रह्मात्मैकत्वविज्ञानंशाव्दंदैशिकपूर्वकम् ॥ बुद्धिपूर्वकृतंपापंकृत्स्नंदहतिवन्हिवत् ॥ १॥ य० ॥ श्रोत्रिय तथाह्मनिष्ठयाचार्यकरउपदिष्टमहावाक्य रूपशब्दसेउत्पन्नहुयाजोब्रह्मात्माके अभेदकाशपरोक्षज्ञानहै वहबुद्धि पर्वककियेहुए सर्वपापकर्मोकोदाह अर्थात् नाशकरताहै। जैसेथमि सर्वकाष्टकोभस्मकरदेता है । इसस्मृतिसे बुद्धिपूर्वककियेहुएपापक्रमों कानाशकथन कियाहै। यौर

वे० मि० मु० पी०
• यथैधांसिसमिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाऽग्निसर्वकर्माणिभस्मसात् कुरुतेतथा।
(भ० गी० अ०४॥३७॥)
अ० ।। हेअर्जुनजैसेप्रज्वलित यग्निमर्वकाष्ठोंकोमस्मरूपकर
देताहै । तैसेतत्त्वज्ञानरूपयग्निभीसर्वकमोंकोनाशकरताहै । इस
वाक्यमें श्रीकृष्ण भगवान्जीनेभी सर्वशब्दसे सकलपुरायपापकर्माको
अहणकरकेतिनसर्वकाज्ञानयग्निसे दाहनिरूपणकियाहै ॥ किंवा ।।
जिसविद्वान्केदर्शनमात्रमेयन्यपुपोंकेपापनिवृत्तहोजाते हैं तिसब्रह्म
रूपब्रह्मवेत्तापापकर्मनाशहोजातेहैं यहतोक्याहीकथनकरनाहै ।इसी
अर्थकोभगवान्वमिष्टजीनेभीकहाहै ।
यस्यानुभवपर्यन्तं तत्वेवुद्धिःप्रवर्तते ।
तत्दृष्टिगोचराः सर्वेमुच्यतेसर्वपातकैः। *
अ-जिसपुरुपकीयपरोक्षयनुभवपर्यंत बुद्धिधात्मतत्त्वमेंप्रय
र्तमानहोतीहै तिसकीकृपादृष्टिकाविषयहुए सर्वजनसर्वपापोंसेमुक्तहो
जाते हैं ।।१।। इति ॥ औरतैसेहीकुलपवित्रत्वकीहेतुताभीब्रह्मवेताको
स्मृतिमंकथनकीहै । तथाहि ॥
* कुलंपवित्रं जननीकृतार्था विश्वंभरापुण्यवती
चेतन । अपारसंचित्सुखसागरेऽस्मिन् लीनंपरे
ब्रह्मणियस्यचेतः ।
अ०-देशकालादिपरिच्छेदसेरहित तथाचेतनौयानंदकेस
मुद्रइसपरब्रह्ममें जिसपुरुषकाचित्तलीनहुयाहै ॥ तिसकीकुलपवित्रहै
यौरतिसकीमाताभीरतार्थ है। औरतिसब्रह्मवेत्ताकरवहपृथ्वीभीपुराय

उत्तराई चालीहोतीहै जहांकिवहब्रह्मविद्पुरुषनिवासकरताहै ॥११॥इति।।५८}} इसप्रकारपर्वउक्तयुक्तिसे जैसाब्रह्मात्माकाअभेदविज्ञानकथन कियाहै। तिसकरयहयधिकारीपुरुषकनार्थहोताहै ।। इसअर्थमकिंचित मात्रभीविवादकरनेयोग्यनहीं ॥इति अवांतरप्रयोजननिरूपण तथा ग्रंथकाउपसंहारा यबमुमुनुपुरुषों की प्रवृत्त्यर्थग्रन्थकास्तवनकरतेहैं।। *प्रकाशानंदयतिना कृतिनाआत्मशुद्धये। सिद्धांतमुक्तावल्येषा रचितारंजिता ॥१॥ १०-ब्रह्मात्मसाक्षात्कारसंपन्न मुझप्रकाशानंदयतिनेअंतस्कर एकीशुद्धिके अर्थदोषरूपछिद्रसेरहितयहवेदांतसिद्धांतमुक्तावलीरचना कीहै ॥ १ ॥ यहमुक्तावलीकहांसमर्पितहै ॥ ऐसीयाकांक्षाकेहुए कहतेहैं॥ कन्यतानंदसंदोहा सत्यज्ञानादिलक्षणा । नारायणसमासक्ता श्रियासापल्यदूषिता ॥२॥* अ०-यद्वैततथाानंदकेसमूहकीप्राप्तिहै जिससेऔरसत्यज्ञा नादिस्वरूपात्माकोबोधन करनेवाली जोयहसिद्धांतमुक्तावली सोनारायणमेसम्यक् थासक्त है अर्थात्समर्पितहै। औरलक्ष्मीके साथसपनीभावकरदूषितहै अर्थात् यन्यसर्वदोपसेरहितहै ॥२॥ यवग्रंथकाअवांतरप्रकोजनकहतेहैं । * शृणुप्रकाशचितां सदैततिमरापहां । वादीभकुंभनिभेदसिंहद्रष्ट्राधरी कृताम् ॥३॥ य० ॥हेवादियोंकेजयकरनेकीइच्छावालेपुरुषमुझमकासानंद वे०सि० मु० भा० कररचनाकीहईइससिद्धांतमुक्तावलीकोत्श्रवणकर कैसी यहसिद्धांत मुक्तावलीहै जोद्वैतकेसहितग्रज्ञानकोनाशकरनेवालीहै।। तथावादी रूपहस्तियोंके मस्तकोंकोभेदनकरनेवालसिंहकी दाढ़ेंभीजिसकरतिर स्कारकीगईहैं । इसलियेवादियोंकेजयकरनेकीइच्छावालेपुरुषोंने इसीकायभ्यासप्रयत्नसेकरनाचाहिये । यहभावहै ॥ ३ ॥ दुर्विज्ञेय अर्थमकलरूपतासेइसमेंकथनकियाहै यहकहते हैं । वेदांतसारसर्वस्वमज्ञेय मधुनातनः। अशेपेणमयोक्तंतत्पुरुपोत्तमयत्नतः ॥४॥ य० ॥ वेदांतोंकामर्वमार जोइदानीकालकेपुरुपोंकरजानना कठिनहै । वहसारयर्थसकलरूपताकर परमात्माकीप्रेरणासेप्राप्तहुए प्रयत्नकरमेनेकथनकियाहै ॥ ४ ॥ ब्रह्मज्ञानमेसर्वकाँकाअंतर्भाव कहतेहुएग्रंथकोसमाप्तकरतेहैं ॥ * स्नातंतेनसमस्ततीर्थसलिलेसर्वापिदत्तावनियज्ञा नांचकृतं सहसूमखिलादेवाश्चसंपूजिताः॥ संसारा च्चसमुद्धृताःस्वपितरस्त्रैलोक्यपूज्योप्यसौ।यस्य ब्रह्मविचारणे क्षणमपिस्थैर्य मनःप्राप्नुयात्॥५ य०॥ जिसमाधनसंपन्नयधिकारीकाचित्तएकक्षणमात्रभीब्रह्म विचारमंस्थिरताको प्राप्तहुयाहै || तिसनेसर्वतीर्थोकेजलों मेंस्नानकर लिया ॥ औरसर्वपृथ्वीभीतिसनेदानकरदी ॥ औरहज़ारोंयज्ञोंका धनुष्ठानभी तिसनेकरलिया । औरसर्वदेवताओंकापूजनभी तिसने करलिया । औरसमारसेयपनेपितरोंकाउद्धारभी तिमनेकरलिया ।।

। उत्चगर्द औरतीनलोकोमेस्थितप्राणियोंकरपूजनेयोग्यभीवहीहै । क्योंकि ब्रह्मवेत्ताब्रह्मस्वरूपहै।ौरब्रह्मविद्यासकलकर्मतथाउपासनाकेफलका अंतर्भावहै । इसलियेब्रह्मविद्याकेयर्थमुमुक्षुजनोंनेसदाप्रयत्नकरना यहभावहै ।।५।। इति ॥यबटीकाकारश्रीनानादीक्षितविदानस्वविनय पूर्वकग्रंथकीसमाप्तिमेंनिर्गुणवस्तुनिर्देशरूपमंगलकोकरतेहुएइसदीपिका नाम्नीटीकाकोसमामकरतेहैं ।। यद्यपिवहमृलटीकायहांलिखीनहींगई यातेइनश्लोकों कीव्याख्याकरनीग्रयुक्तहै तथापिचहटीकासमग्र यहां भाषाविद्यमानहै यातेइन लोकोंकीभापाव्याख्यायुक्तहीहै ।। नानादीक्षितसंज्ञन विदुषेयंविनिर्मिता। सिद्धान्तमौक्तिकश्रेणीदीपिकात्मप्रकाशिका॥१ ** थ० ॥ नानादीक्षितसंज्ञिकमुझविद्वान्नेयहसिद्धांतमुक्तावली कीदीपिकानाम्नीटीकारवनाकीहै । कैसीवहटीकाहै जोयात्मतत्त्व केप्रकाशकरनेवालीहै ॥१॥ अवअगलेश्लोकमेंअपनीनम्रताको प्रकट करतेहैं । कविदितसकल वेचैनप्रशंसंतिलोकेग्रथितमपिमहद्भिः किंपुनर्मादृशेना इतिविफलसमेऽस्मिन् वाङ्मयेऽहं प्रवृत्तः स्वमातेविमलतायैक्षन्तु महतिसंतः॥२॥ '' - अ०॥ सकलवेदार्थकेजाननेवाले महानुभावपुरुषोंकररचनाको हुएग्रंथोंकोभी सकलजनश्लाघानहींकरते।तोमुझजैसेमनुष्यकररचना करेहुएग्रंथको लोगश्लापानहीं करेंगेयहतोक्याहीकथनकरनाहै। इस लियनिष्फलतुल्यइसवाणीरूपग्रंथ रचनामें में प्रवृत्तहुअाहूं । परन्तु अपनेअंतःकरणकीशुद्धिके अर्थ मेरीप्रवृत्तिसफलहायातेशांतचित्तमहात्मा

५८
३० स० मु० स०
मेरेदोपोंकोतमाकरनेकयोग्यहैं। यववस्तुनिर्देशरूपमंगलकोकरतेहैं।।
यदज्ञानादिदंभातीयज्ज्ञानाच्च प्रलीयते।
ब्रह्मस्यांतदहंनित्यं नित्यसंवित्सुखाइयम् ॥३॥
अ०॥ जिसके ज्ञानसेयहदृश्यमान जगत्भानहोताहै ।
औरजिसकेज्ञानसेयत्यंतनाशहोताहै ॥ सोनित्यतथाचेतनस्वरूप
औरयानंदतथाअद्वयस्वरूपबृह्मसदामैहूं ॥ ३ ॥
अवटीकानिर्माणका स्थानकहतेहुएसमाप्तकरतेहैं ।
अधिकाश्युपविश्वेशमियं सिद्धांतदीपिका।
निर्मिताराजतांशश्वत्सदानंद प्रदायिनी ॥ ४॥
अ० श्रीकाशीजीमें विश्वेश्वरमहादेवजीकेसमीपयहसिद्धांत
दीपिकानाम्नीटीका रचनाकीहै।सोमुमुक्षुपुरुषोंको सदायानंदकेदेने
वालीहुईनिरंतरविराजमानहो ॥ (४) इति ॥
गीयामा० ॥ विनाशजाको काहूविधसो नाहिकोऊपावहै ।
जोसर्वजगअवभासको आनंदपरमसुभाव है ।।
सजातीययादिद्वैतजामेंदृष्टनाहियावहै ।
सोयातमाहे रामरमियो निखल वेदवताव है ॥ १॥
का। सोईशुद्धबृह्मपर मायिकस्वरूपधर देवनकेहितकर जगप्रगटएहैं ।
नीलमेघसमश्याम तनाति अभिरामश्रतिछवपिखकाममनमोल
जएहोंनैनवपिखमृगमीनमुरझायरहे कंजखेज गमन माहि
विसमएहें। कमलसदोपपद कमलयदोपसदा ताहिरघुनाथको
प्रणामहमकऐहें ॥ २ ॥

-- त्तराई तोटकई०॥ वहरामभएगुरुनानकहैं, कलिदोपनदाहकपावकहैं। जहदर्शनतेनिस्यादिटरे, पदकंजनताहिनमोहमरे ॥३॥ चौ०॥ श्रीगुरुअंगदजनहितकारी, अमरदासजनकेदुखटारी ! रामदासयरुपस्मकृपालू, श्रीगुरुअर्जुनजनप्रतिपालू ॥ ४ ॥ तुरकननाशकहरीगोविंद, श्रीहरीरायभक्तवतशिद । श्रीहरीकृष्णजननसुखदान,धर्मकेतुगुरूनवममहान ॥५॥ दो० ॥ इनसवयवनकसदा चरणकलधरसीस । वंदोंबिवकरजोरकर धरोंध्यानयहिनीस ॥ ६॥ स्वै०ामुखजाहिंशशीसमशोभतहै परदोपविहीनतिसेअधिकाई । नैनसरोजसमंपिखिये परहैकरुणारसकीसरसाई । भुजदंडग्रहीसमशोभतहैं परदीननपालकताउचताई। तागुरुगोविंदकेहरकेपद दुंदनमोममहोयसदाई ॥ ७ ॥ थनंगशेषरा। रचाश्रगारभोगमोक्ष सेवकानहीतसे परोपकारवीचनीत चीतकोहुलासहै।हनामहातमोजिने सतीमतीप्रकाशदेचमादयादमो सुशीलजाहिमेनिवासहै। रिदेअडोलधीर श्रास्यकंजहैविकाशजां पिखेत्रितापशांतहोत दोपभीविनासहै। हमेयधारहैसदा धरोंसुचीत ताहिके पदारविंदकोनमो जुमोरपुरयासहै ।। ८ }} दो० ॥ वेदपादकेयादिक वर्णवामगतिसान ममसद्गुरकोनामहै भक्तनकोसुखदान ॥ ६ ॥ शिषरणी ॥ रचीजांकीलीला सकलजगमेहे वचनकी । गुणावंती शोभा अकथशशिजैसे वदनकी महाबानीजानी दुस्त सबहूंकेदलननिमोवारंवारंभवतुतुमकोहजननिमे ।।१० व० सं० मु० भां सो० ॥ श्रीगुरुचरणध्यान भयोसहायकनीतमम ॥ कारजभयोमहान बुधजनकोजुहर्षप्रद ॥ ११ ॥ स्वैया ।। मोक्षददोहरिनामनरोतम मित्रवरंममनीतसहाई । तांहिकिप्रेरनधारहियेइस कारजकीमनमेंहुलसाई । सवसज्जनसंतनसोविनती ममदोपछमोंमतिमेलघुताई । भयियाजसमाप्तमिरी उकतावलि सीयपतिप्रतिदीनचदाई ॥१२ कामुकतियुकतिपुनसारमतिदेनवारीसारसुतीसमजगजानोमुकतावली संशयविपरीतज्ञानवादीतर्कानगिरिनाशवेकोकुलिशविडोजमुकतावली त्यागभोगावलीकोधरेमुक्तावलीजोकटेदुखयावलीकोयहीमुकतावली थानंदभुवनमध्यदीपिकाप्रकाशयुतवेदकेसिद्धांतनकोलसेमुकतावली।। दो० ॥ सिद्धीदरशननाथशशि संवतफल्गुणमास | श्वेतपक्षतिथिवेदशशि सुतयहिपूरविलास ॥ १४ ॥ सो० ॥ श्रीगुरुयर्जुनथान तरनतारनविख्यातजग । तहारंभइतिजान रिपीकेशसुरमरितटे ॥ १५ ॥ इतिश्री १०८ मन्निर्मलमृताऽवतंसब्रह्मविदुत्तमहरिहरिपूज्यपाद शिष्येणगुरुदत्तसिंहमाधुनाविरचितायांवेदांतसिद्धांतमुक्तावली भाषायांउत्तरार्द्धम् ।। इतिश्रीमत्परमहंमपरिव्राजकाचार्यस्वामिप्रकाशाऽनंदयतिवरविरचित वेदांतमिद्धांतमुक्तावलीग्रंथस्य श्रीनानादीक्षितविरचितसिद्धांत दीपिकाटीकोपेतस्य श्रीमन्निर्मलमृतावतंस ब्रह्मविदुत्तम हरिहरिपूज्यपादशिष्येण गुरुदत्तसिंहसाधुनाविर चिताऽनंदभुवनाख्याप्राकृतभाषाटीकासमाप्ता ।। मो३म् ॥

।। श्रो३म् ॥
अथश्रीवेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली
मूलकारिकायाः शब्दार्थबोधिनी
भाषाटीकापारम्भः॥
१० ॥ नैनवैनमनजानको नैनवेनमनजान।
सोमें देतविनाशविन चिदानंदनिखान ॥ १ ॥
स्वैया ॥ वन्दनदोकरजोरकरों रघुनंदनकोसवदूपनिकन्दन ।
कन्दनदासनकैभवफन्धन हैजनतापमिटावनचन्दन ।
चन्दनताकपावकयौरवि जोतिनजोतिकरसवनन्दन ।
नन्दनहीननकोकरनन्दन हैममपालकवरघुनन्दन ||२||
चौ० ॥ गुरुनानकगोविन्दहरिवस्के । चरणकमलकोवन्दनकरके ।
स्वररुपदपङ्कजधरध्यानूं । मूलकास्किायवखानूं ॥ ३ ॥
अदृष्टद्वयमानंदमात्मानं ज्योतिख्ययम् ।
विनिश्चित्यश्रुतेः साक्षायुक्तिस्तत्राभिधीयते ॥३॥
भा० ॥ (अव्ययम् ) विनाशसेरहित (ज्योतिः )स्वप्रकारा
(थानंदम् परमपुरुषार्थ श्रदृष्टय) द्वैतदर्शनसेरहित(यात्मानम्)
आत्माको (साक्षात्श्रुतेः) मातातउपनिपढ्से (विनिश्चित्य) निश्चय
करके (तंत्र) उक्तचतुष्टयविशेषणविशिष्टयात्मामें (युक्तिः) श्रुति
अनुसारीतर्क (यभिधीयते) निरूपणकियाजाताहै ॥ १ ॥

. ५२२ वे० सि० मु० मा० आत्मानित्योऽथवानित्यो भेदस्त्वाद्येस्फुटोमतः। अन्त्येतुकृतहानिः स्यादकृताभ्यागमस्तथा ॥२॥ भा० ॥ (यात्मानित्यः) यात्मानित्यहै (यथवा अनित्यः) अथवायनित्यहै (तुयाये) प्रथमपनमें (भेदः) देहादिकोंसेश्रात्मा काभेद (स्फुटोमतः) स्पष्टहीअंगीकारहै । (तुयन्त्ये) औरद्वितीय पक्षमें (कृतहानिः) कियेहुयेकर्मनकाभोगसेविनानाश [तथा] और तैसेही ( अकृताभ्यागमः ) नकियेहुएकर्मनकेफलकी प्राप्तिरूपदोप (स्यात् ) होगा ॥२॥ जीवाश्रयाब्रह्मपदाह्यविद्या तत्त्वचिन्मता। तद्विरुद्धमिदं वाक्यमात्मात्वज्ञानगोचरः ॥३॥ भा० ( अविद्या ) अज्ञान (जीवाश्रया) जीवकेयश्रितहै । और ( ब्रह्मपदा) ब्रह्मकोविषयकरताहै। यहवार्ता (तत्ववित्मता) यथार्थजाननेवालोंको अंगीकारहै।इसलिये [यात्मातुअज्ञानगोचरः] यात्माही अज्ञानकाविषयहै [ इदंवाक्यम् ] यहवादीका कथन (तविरुद्धम् ) तिनके कथनसे विरुद्धहै ॥ [हि ] जीवयाश्रित अज्ञानमानेहुएभीतिसकोउपाधिहोनेकरयात्माश्रयदोपनहींयाता।।३।। प्रत्यक्षादिप्रमाणानां प्रमात्वंपरतोयदि। अनवस्थास्फुटातत्र स्वतस्त्वेदोपसंशयः॥ ४॥ भा० ॥ [ प्रत्यक्षादिप्रमाणानाम् ] प्रत्यक्षादिप्रमाणोंनिष्ठ [यदि] जोकदाचित् [ परतोप्रमात्वम् ] परतोप्रमात्वमानोंतो (तत्र) तिसपक्षमें [अनवस्थास्फुटा] अनवस्थादोपस्पष्टहीप्राप्तहोगा ॥ और स्वित स्त्वे] परमात्वकोस्वत ग्राह्यत्वमाननेमें (दोपसंशयः) दोपकी संभावनाहोगी ॥ ४॥ जीवब्रह्मप्रयोगाभ्यामेकं वस्त्वथवादयम् । । आयेत्विष्टंममैवस्यात् द्वितीयेत्वन्मतक्षतिः॥५॥ भा० ।। (जीवब्रह्मप्रयोगाभ्याम्) जीवौरवलइनदोशब्दोंसे [एकंवस्तु] एकहीपदार्थकहतेहो [अथवादयम्] अथवादोपदार्थ कहतेहो । [याये] प्रथमपक्ष [a] ब्रह्मशब्दसेभीथात्माकाही कथनहोनेसे [ममैव] मेराही [इष्टम् ] इष्टसिद्ध स्थान] होगा । [दितीये] द्वितीयपक्षमें विन्मतततिः] तेरेमतकीहानिहोगी ॥४॥ अविद्यास्वाश्रयामिन्नविषयास्यात्तमोयतः । यथावाह्यतमोदृष्टतथाचयंततस्तथा ॥६॥* भा०॥ [थविद्यास्वाश्रययाभिन्नविषयास्यात] थविद्यायपने थाश्रयसेयभिन्नकोविषयकरनेवालीहै ॥ (यतः) जिसकारणसे (तमः) तमरूपहै । (यथा) जैसे (बाह्यतमः) वाह्ययन्धकार(दृष्टम्) अपनेयाश्रयसेभिन्नकोविषय करताहुयादेखा है। (तथाचझ्यम्) तैसे हीयहथविद्या(ततः)तमरूपहोनेसे(तथास्वाश्रयाभिन्नविषयणीहै।।६ ब्रह्मात्मनोविभिन्नत्वभेदः स्वाभाविकोयदि। औपाधिकोऽथवाभेदः सर्वथानुपपत्तिकः ॥७॥ भा० ॥ (ब्रह्मात्मनोविभिन्नत्वे) ब्रह्म यौरवात्माकाभेदमानेहुए (यदि) क्या (स्वाभाविकः भेदः) तिनकास्वरूपप्रयुक्तभेदहै (अथवाग्रौपाधिकःभेदः) अथवाउपाधिप्रयुक्तभेदहै। (सर्वथा) सर्व प्रकारसे (अनुपपत्तिकः) भेदनहींसंभवता ॥७॥ लौकिकीवैदिकीचापिनाऽज्ञानेदृश्यतेप्रमा। कार्यदृष्टयाऽथकल्पय्यंचेल्लाघवादेकमेवतत् ॥८॥ भा०॥ [अज्ञाने] अज्ञानमें लौकिकी] लौकिकमत्यक्षादि प्रमाण [च ] अथवा [ वैदिकी ] वेद [प्रमायपि] प्रमाणभी निदृश्यते] नहींदेखाजाता [अथचेत् ] यदि कार्यदृष्टया] प्रपंच रूपकार्यकोदेखकर तित्] वहयज्ञान [ कल्प्य्यम् ] कल्पनाकरने योग्यहैतो लाघवात् ] लाघवसे [एकमेव] एकहीस्वीकारकरो।।८।। वन्धमोक्षव्यवस्थास्याज्जीवाभेदेकथंतव । यथादृष्टतथैवास्तुदृष्टत्वातस्वप्नदृष्टवत् ॥६॥ भा० ॥ [तव] तेरेमतमें [जीवाभेदे] जीवको एकमानेहुए (बन्धमोक्षव्यवस्था)वन्धतथा मुक्तिकीव्यवस्था(कथंस्यात्) कैसेहोगी (उ०) (यथादृष्टम्) जैसेतेरेमतमेव्यवस्थादेखीहै । (तथाएवअस्तु) तैसेहीहमारेमतमेंहो (दृष्टत्वात्) देखनेसे (म्बप्रदृष्टचत) स्वप्नमेंबन्ध मुक्तिकीव्यवस्थाजैसेदेखीजातीहै तैसे || * अज्ञातसत्त्वंनेष्टंचेढयवहारःकथंभवेत् । नह्यदर्शनमात्रेणविपण्णोनाशनिश्चयात् ॥१०॥ भा० ॥ (चेत्) यदि (यज्ञातसत्त्वम्) प्रपंचनिष्ठयज्ञातसत्ता (नइष्टम) अंगीकारनहींतो (व्यवहारः) व्यवहार(कथंभवेद) केसेहोगा (हि) जिसकारणसे (यदर्शनमात्रेण) पुत्रादिकोंकेयदर्शनमात्रकर तिनका (नाशनिश्चयात्)यभावनिश्चयसेकोर्डभीपुरुष (विषाणान) विषादयुक्तनहींहोताइसवास्तेप्रपंचकीयज्ञातसामाननीयोग्य ।।१० * सत्त्वत्रयंवदनवादीप्रष्टव्योऽनाधुनामया। . सत्यद्वैतमसत्यवानासत्येत्रिविधंकुतः ॥११॥ भा०॥ सत्त्वत्रयम्] त्रिविधसत्ता (वदन्) कहताहुया (वादी) एकदेशी (यत्र) यहां (अधुना) अब (मया)मेरेकर (प्रष्टव्यः) पूछनेयोग्यहै ।। क्या (सत्यद्वैतम्) दैतसत्यहै (वाअसत्यम्) अथवा अनिर्वचनीयहे ।। (न) प्रथमपक्षनहींसंभवता । क्योंकिदैतापत्तिरूप दोषहै ॥ और (असत्ये) प्रातीतिक दैतमानेहुए (त्रिविधम्) तीन प्रकारकीसत्ता (कुतः) किसहेतुसेहै ॥ ११ ॥ कढ़तभेदेप्रतिज्ञानप्रत्यभिज्ञाकथंबद । दशानायुगपत्सर्पभ्रमेयद्वत्तथैवसा ॥१२॥ भा०प्र० ।। (प्रतिज्ञानमा ज्ञानज्ञानप्रति दैतभेदे) दैतकाभेद मानेहुए (प्रत्यभिज्ञा) सोईयहप्रपंचहै यहप्रतिभिज्ञा (कथम्) किस प्रकारहोगी (वद) यहतुमकहो ॥ उ० ॥ (यदत) जैसे (युगपत) एककालमें (दशानाम्) दशपुरुषों को (सर्पभ्रमे) सर्पभ्रमहुएभ्रमरूप प्रतिभिज्ञाहोतीहै (तथाएव) तैसेही (सा) वहमपंचगोचरप्रतिभिज्ञा भ्रमरूपहे ।। (१२) सर्पभ्रमादिशेषोऽस्तिजाग्रहोघेऽन्यथाकथम् । इन्दियादेरुपादानंतदभावयतोनधीः १३॥ भ० ।। (सर्पभ्रमात) सर्पभमसे (जाग्रतबोधे) आयतज्ञानमें (विशेष अस्ति) विलक्षणताहै । (अन्यथा) यदिऐसेनमाने तो (इन्द्रियादेः) इन्द्रियादिकोंका (उपादानम) ग्रहण (कथम्) कैसेहोगा (यतः) जिसकारणसे (तत्यभावे) इन्द्रियोंकेयभावहुए (धीः) जानत ज्ञान (न) नहींहोता ॥ १३ ॥ इन्द्रियाणांकारणत्वेभवेच्चोयतदातव । स्वप्नश्रमेयथातेपामन्वयव्यतिरेकधीः ॥१४॥ भा० ॥ हेवादिन (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियोंको (कारणत्वे) जाग्रत्ज्ञानकेप्रतिकारणताकेहुए [तदा] तव (तव) तेरा (चोद्यम) विकल्प(भवेत् ) होसकेपरंतुऐसेनहीं क्योंकि (यथा) जैसे(स्वप्नभ्रमे) स्वप्नभ्रममें (तेपाम्) इन्द्रियोंका (अन्वयव्यतिरेकधीः( अन्वयव्यति रेकज्ञानभ्रमरूपहै तैसेजाग्रत्ज्ञानकेप्रतिजानो ॥ १४ ॥ मृदादीनांकारणत्वंनचेदिष्टंघटंप्रति। अविद्यायाःकारणत्वकथसिद्धयेत्प्रमांविना॥१५॥ भा० ॥ (चेत्) यदितुमको (मृदादीनाम्) मृत्तिकादिकोंकी (कारणत्वं) कारणता (घटप्रति) घटकेमति (इष्टन) स्वीकारनहींहै ।। तो (प्रमांविना) प्रमाणसेविना (यविद्यायाः) अविद्याको (कारणत्वम्) प्रपंचकीकारणता (कथम्। कैसे (सिद्धयेत्) सिद्धहोगी ॥ १५ ॥ यथासतोजनिनॆवमसतोपिजनिर्नच । जन्यत्वमेवजन्यस्यमायिकत्वसमर्पकम् ॥१६॥ भा०॥ (यथा) जैसे (सतः) सत्की (जनिः) उत्पत्ति (न) नहींहोती । (एवं ) इसी प्रकार ( असतःयपि) असतकी भी जनिः) उत्पत्ति (नच) नहींहोती ॥ इसवास्ते (जन्यस्य) कार्य

प्रपंचनिष्ठ (जन्यत्वंएव) कार्यपनाही (मायिकत्वसमर्पकम्) पाविद्यक
पनेकाज्ञापकहै ।। १६ ॥
प्रतीतिमात्रसत्त्वचेत सत्त्वंप्रातीतिकंमतम् ।
अविरोधान्ममापीष्टं तद्भदेवदकाप्रमा ॥१७॥
भा० ॥ (चेत्) यदिपातीतिकंसत्त्वम् मातभासिकसत्ता(प्रतीति
मात्रसत्त्वम् ) प्रतीतिमात्रसत्ताही(मतम्)स्वीकारहै। तोइसपक्षमें (यवि
रोधात् )विरोधकाथभावहोनेसे(ममयपिामुमकोभीइष्टम् इष्टापत्तिहै।।
(तद्धेदे) औरज्ञानज्ञेयकेभेदमें काप्रमा) कौनप्रमाणहै (वदो यहतुमकहो
अर्थात् ज्ञानज्ञेयकेभेदमें कोईभीप्रमाणनहीं ॥ १७ ॥
* प्रत्येतव्यप्रतीत्योश्चभेदः प्रामाणिक कुतः ।
प्रतीतिमात्रमेवैतत भातिविश्वंचराचरम् ॥१८॥
भा०॥ (प्रत्येतव्यप्रतीत्योःच) ज्ञानथौरज्ञेयका (भेदः) भेद
कुतः) किसहेतुसे (प्रामाणिकः प्रमाणसिद्धइकिंतुकिसीहेतुसेनहीं।
इसवास्ते (एतत् ) यह (विश्वस् )संसार(चराचरम् स्थावरजंगमरूप
जो (भाति) भानहोताहै। वह (प्रतीतिमात्रंएव) ज्ञानमात्रहीहै ॥१८॥
* ज्ञानज्ञेयप्रभेदेनयथा स्वाप्नंप्रतीयते ।
विज्ञानमात्रमेवैतत्तथा जापच्चराचरम् ॥१६॥
भा० (यथा) जैसे(स्वाप्नोस्वप्नकालीनजगविज्ञानमात्रस्वरूपहुया
भी (ज्ञानज्ञेयप्रभेदेन] ज्ञानतथाज्ञेयकेभेदविशिष्ट (प्रतीयते) प्रतीत
होताहै।(तथा) तैसेही (एतत् ) यह (जाग्रतचराचरं) जाग्रतकालीन
स्थावरजंगमरूपजगत (विज्ञानमात्रंएव) विज्ञानमात्रस्वरूपहीहै॥१॥

६
तन्तोर्मेंदेपटायहच्छून्य एवस्वरूपतः ।
आत्मनोपितथैवेदं भानमात्रंचराचरम् ॥ २० ॥
भा०॥ (यवत् ) जैसे (तन्तोः) तंतुसे (भेदे) भिन्नकियेहुए
(पटः) पट (स्वरूपतः) स्वरूपसे (शून्यःएव) असत्हीहोजाताहै ॥
(तथाएव)तैसेही(इदम )यह(चराचरम्)स्थावरजंगमरूपजगत्यात्मनः
अपि) अात्मासेभिन्नकियाहुअाभी असत्रूपहीहै ॥ क्योंकि (भान
मात्रम् ) विज्ञानमात्रस्वरूपहै ॥२०॥
रज्जुर्यथाभान्तदृष्ट्यासर्प रूपाप्रकाशते ।
आत्मातथामृढबुद्धयाजगद्रूपः प्रकाशते ॥ २१ ॥
भा०॥ (यथा) जैसे (रज्जुः] जेवरी [भ्रान्तदृष्टया] भ्रान्त
पुरुपकीदृष्टिसेसर्परूपा] सर्परूप (प्रकाशते] प्रतीतहोतीहै । तथा]
तैसे (मूबुद्ध्या) अज्ञानीकीदृष्टिसे [यात्मा] यात्माभी [जगत्
रूपः] जगतरूप [प्रकाशते] प्रतीतहोताहै ।। २१ ।।
आत्मन्येवजगत्सर्वं दृष्टिमात्रमतत्त्वकम्।
उद्यस्थितिमादाय विनश्यतिमुहुर्मुहुः ॥ २२ ।।
भा० ॥ (सर्व जगत) सकलप्रपंच (दृष्टिमात्रम्) प्रतीतिमात्र
(यतत्त्वकम् ) तथा अवास्तवरूप (यात्मनिएव) यात्मामेंही उदभूय)
उत्पन्नहोकर तथा (स्थितिम् ) स्थितिको (यादायाग्रहणकरके (मुहुः
मुहुः) पुनः पुनः (विनश्यति विनाशहोताहै ॥२२||
पूर्णानन्दाद्वयेशुद्धे पापदोपादिवर्जिते ।
प्रतिविमिवाभाति दृष्टिमात्रजगत्त्रयम् ॥२३॥

भा० ॥ (पूर्णानंदा दये) पूर्ण थौ आनंद तथा दैतसे रहित. (शुद्धे अविद्या मल रहित तथा (पापदोषादिवजिते) पाप औ रागादि दोपसेरहित यात्मामें (जगत्रत्यम् ) त्रयलोकात्मक प्रपंच (दृष्टिमात्रम् ) प्रतीतिमात्र प्रतिक्विंइव) प्रतिक्रिकेसमान (आभाति) भासताहै ।। २३ ।। यत्तत्त्ववेदगुप्तपरमसुखतमं नित्यमुक्तस्वभावम्। सत्यंसूक्ष्मातसुसूक्ष्ममहदिदममृतंमुक्तमात्रैकगम्यम्। यस्यांशेलेशमात्रंजगदिदमखिलंभांतिमात्रैकदेहस्। प्रत्यगज्योतिस्वरूपंशिवमिदमधुनाकथ्यतेयुक्तितोत्र भा०॥ यत्तत्त्वम् । जोगनारोपित यात्माहै(वेदगुप्तम् बहवेद प्रमाणकरहीजाननेयोग्यहै । और परममुखतमम् वहसर्वोत्कृष्टअत्यं तसुखरूपहै । और (नित्यमुक्तस्वगावम् ) सदाहीथविद्याततकार्यसे रहितस्वरूपहै । और (सत्यम् तीनोंकालमेंवाधशून्यहै ।ौरसूक्ष्मा सुसूक्ष्मम् प्रधानादिकोंसेअत्यंतसूक्ष्महै । पुनः (महत् ) वहनिर्पेक्ष व्यापकहै और (इदंअमृतम् ) यहपूर्वोक्ततत्त्वहीमो तस्वरूपहै । और मुक्तमात्रैकगम्यम् ] केवलमुक्तपुरुषकाहीजाननेयोग्यहै ।और इदं शिवम् । यहहीईश्वररूपहै ।। (यस्पशंशे) जिसतत्वकेमायिकप्रदेशमें (भ्रांतिमात्रैकदेहम् कंवलमममात्रस्वरूप (इदम् )यह (अखिलम् सर्व (जगत्) प्रपंचा लेशमात्रम ] लेशमात्रस्थितहै । (यौरमत्यक्) सर्वसे अंतरहै।तथा (ज्योतिः स्वप्रकाशस्वरूपहै। अधुना अब [युक्तिनः) श्रुतिअनुसारीतर्कसे (अबोइसमें (कथ्यते निरूपणकियाजाताहै|२४|

१०
आत्माऽयंसर्वसंवडो भानुभासकउच्यते ।
नित्योऽयमविनाशित्वादुपादेयःकथंभवेत् २५॥
भायात्माश्रयम् )यह यात्मा(सर्वसंवद्धः) सर्वकोसाथसंवन्ध
वालाहै । और (भानुभासकः) यादित्यवत्प्रकाशक (उच्यते! श्रुति
नेकहाहै।। और अविनाशित्वात् ] अविनाशिहोनेसे [अयम् ] यह
यात्मा (नित्यः नित्यहै । वह [उपादेयः] ग्रहणकेयोग्य कथम् ]
किसप्रकार (भवेत् ) हो किंतुनहींहोसकता ।।२५।।
यात्मासर्ववस्तूनांयदर्थसकलंजगत् ॥
आनंदाब्धिः स्वतंत्रोसावनादयः कथंवद ॥३६॥
भा० (सर्ववस्तूनाम् सर्वयनात्मपदार्थोंका [यः) जो यात्मा)
स्वरूपहै। औरत्यत् अर्थम् ) जिसकेवास्ते सकलंजगत् सर्वजगत् है
और जो [यानंदाब्धिः) श्रानंदकासमुद्रहै।और (स्वतंत्रः)स्वतंत्रहै ।
(यसौ) वहात्मा (यनादेयः] ग्रहणकेययोग्य (कथम्] किसप्रकार
होमकताहै हेवादिन् [वद] यहतूकथनकर ॥२६।।
यदन्यत्वस्तुतत्सर्वंयद्भदेनरश्रृंगवत ।
सत्तासर्वपदार्थानामनादेयः कथंवद॥२७॥
भा० ।। (यन्यन्यना जिससेभिन्नरूपताकरमानाहुया [ततसर्व
वस्तु वहसर्वथनात्मा [यतभेदे जिसयात्मासेभिन्नकियाहुया निर
श्रृंगवत) नरके,गसमयसतहोजाताहै।।यौर (सर्वपदर्थानाम] सकल
अनात्मपदार्थोंकाजो मित्ता] स्वरूपहै ! वह [यनादेयः] ग्रहणके
योग्य कथप किसप्रकारहै विद यहत्कथनकर ॥२७॥

१
यहशेप्राणिनःसर्वेब्रह्मादयःकृमयश्चये। ।
ईशानःसर्वभूतानामनादेयः कथं भवेत् ॥२८॥
भा०॥ ब्रह्मादयः) ब्रह्मासेयादिलेकर (कृमयःच) औस्कृमिप
पर्यन्त [ये) जो (स) सर्वः (पाणिनः "प्राणधारीहैं वह (यदशे।
जिसकेवशमवर्ततेहैं । यौर (सर्वभूतानां सर्वभूतोंकाजो ईशानः)
नियन्ताहै (अनादेयः) वहनुपादेय (कथं किसमकार (भवेत) हो
किंतुनहींहोसकता ॥२८॥
*यचक्षुःसर्वभूतानांमनसोयन्मनोविदुः ।
यज्योतिज्योतिपां देवोनोपादेयःकविभुः ॥२६॥
'' भागा (यत्) जोयात्मा (सर्वभूतानाम] सकलभूतोंका (चक्षुः)
प्रकाशकहै । थौर (यद )जोगात्मा (मनमः) मनकामी मनः' साक्षी
है.ऐसे (विदुः ब्रह्मवेत्ताजानतेहैं । और (यत) जोगात्मा ज्योतिषां)
सूर्यादिज्योतियोंकाभी (ज्योतिः। प्रकाशकहै । वह (देवोस्वप्रकाश
(विभुः व्यापक पात्मा (कथं। कैसे (उपादेयान] उपादेयनहीं किंतु
वहउपादेय अर्थाव पुरुषार्थरूपहै ॥२६॥
*मोदप्रमोदपक्षाभ्यामानंदात्मातमोगतः ।
जीवयत्यखिलॉल्लोकान्नोपादेयःस्वयंकुतः॥३०॥
भा० ॥ (यानंदात्मा) यानंदस्वरूप यात्माही (तमोगतः)
यज्ञानोपहितहुया (मोदप्रमोदपनाभ्याम्) मोद औषमोद इन दोनों
पक्षोंकरके (अखिलानलोकान्) सर्वलोकोंको (जीवति) जीवाचता
है। वह (स्वयं श्राप कृितः । किसहेतुसे ( उपादेयान ) पुरुषार्थ
रूपनहीं ॥ ३० ॥

* यस्यानंदसमुद्रस्यलेशमात्रजगत्गतम्।
प्रमृतंब्रह्मलोकादौसुखाधिक परित्यजेत् ॥३१॥
भा० ॥ (यस्य) जिस (यानंद समुद्रस्य ग्रानंदसमुद्रका
(लेशमात्र) लेशमात्रयानंद (जगत्गतम्) जगत्मेंप्राप्तहै और (ब्रह्म
लोकादौ) ब्रह्मलोकादिकों में (प्रसृतं) फेलाहुयाहै । तिस 'सुखाब्धि
सुखसमुद्रको (कः) कौन (परित्यजेत्) परित्यागकरे किंतुकोईनहीं
त्यागता ॥ ३१ ॥
करण्यगर्भमैश्वर्यंयस्मिन्दृष्टेतृणायते।
सीमासर्वपुमर्थानामपुमर्थःकथंभवेत्॥३२॥
भा० ॥ (यस्मिन्दृष्टे) जिसयात्माकेसाक्षात्कारहुए (हैरण्य
गर्भऐश्वर्य) हिरण्यगर्भका ऐश्वर्य (तृणायते तृणकेसमानहोजाता
है । औरजो (सर्वपुमर्थानां) सर्वपुरुषार्थोंकी (मीमा) अवधिहै । वह
(अपुमर्थः पुरुषार्थरूपकिथं) कैसे (भवेत्) हो किंतुनहींहोसकता३२
यत्कामाब्रह्मचर्य्यन्तइन्द्रादयःप्राप्तसंपदः ।
स्वस्वभोगत्यजंत्येवमपुमर्थःकथंनृणाम्॥३३॥
भा० ॥ प्राप्तसंपदः) संपदाकीप्राप्तिवाले (इन्द्रादयः) इन्द्रादिक
'यस्कामाः' जिसयात्माकीकामनावालहुए (ब्रह्मचर्य्यन्तः) ब्रह्मचर्य
कोधारणकरतेहुए (स्वस्वभोगम) अपनेयपनेभोगको (त्यजन्ति)
त्यागतेभये । तो (एवम्) इसप्रकार (नृणाम्) मनुष्योंकोवहयात्मा
(श्रपुमर्थः) अपुरुषार्थरूप (कथम्) किसप्रकार होसके किंतुनहींहो
सकता ॥३३॥

१४ ॐ यद्ददृक्षाफलाःसर्वावैदिक्योविविधाक्रियाः। यागाद्याविहितास्तस्मिन्नुपेक्षावदतेकथम्।।३४॥* भा०॥ (सर्वाः) सर्व (वैदिक्यः) वेदोक्त (विविधाः) नाना प्रकारकी (यागाद्याः) यागादिरूप (क्रियाः) क्रियायें (विहिताः जो विधानकीहैं । कैसीवहक्रियायेंहैं (यद्ददृक्षाफलाः] जिसथात्माके दर्शनकीइच्छाहीफलहै जिन्होंका (तस्मिन् तिसयात्माम ते तुझ को (कथम्] किसप्रकार [उपेक्षा अनुपादेयताहै बदायहतू कथन कर ।। ३४ ॥ झयदृष्टिमात्रतःसर्वाःकामाया दुःखभूमयः । विनश्यन्तिक्षणेनासावुपादेयः कथंनत॥३५॥ भा० ॥ यतदृष्टिमात्रतः) जिसके दर्शनमात्रसे कामाद्याः] कामादिक सर्वाः] सर्व दुःखभूमयः दुःखकेकारण ‘क्षणेन' एक ज्ञणमात्रसे 'विनश्यति' विनाशहोजातेहैं 'असौ', वहात्मा ते तुझको कथम्' किसप्रकार नउपादेयः' पुरुषार्थरूपनहीं यहतूकथन कर ॥ ३५ ॥ अहलादरूपतायस्यसुपुप्तेसर्वसाक्षिकी। तत्रापेक्षाभवेद्यस्यतदन्यस्यात्पशुः कथम्॥३६॥ ; भा०॥ यस्य जिसयात्माकी 'ग्रहलादरूपता' यानंदस्व रूपता 'सुपुले' सुषुप्तिमें 'सर्वसाक्षिकी' सर्वपुरुपोंके अनुभवसिद्धहै । तत्र तिसथात्माविषयक 'यस्य' जिसको उपेक्षाभवेत्' अनुपादे यताहो तत्यन्यः' मिसेभिन्न कथम्' औरकिसप्रकार 'पशु स्यात् पशुहोगा किंतुवहीपशुहै ।। ३६ ॥' .

१४ विरुद्धयोरभेदोहिनवेदनप्रमीयते। अनन्यगतिकत्वेनमानान्तरस्यवाधनम् ॥३७॥ भा० ॥ विरुद्धयोः' विरुद्धधर्मवालोंका अभेदः' एकत्व 'हि' जिसकारणसे वैदेन वेदने 'नप्रमीयते' नहींवोधनकियाहैइसीसे अन न्यगतिकत्वेन' अन्यगतिका प्रभावहोनेकर ‘मानांतरस्य' अन्यप्रमा णका बाधनं' वाधयुक्तहै अन्यथानहीं ॥ ३७ ॥ ब्रह्माज्ञानाज्जगज्जन्मब्रह्मणोऽकारणत्वतः ।. आधिष्ठानत्वमात्रेणकारणब्रह्मगीयते ॥३८॥ भा० ॥ 'ब्रह्मणः' ब्रह्मको 'अकारणवतः' अकारणहोनेसे 'ब्रह्मयज्ञानात' ब्रह्मकेअज्ञानसे 'जगत्जन्म' प्रपंचकीउत्पतिहोती है । और अधिष्ठानत्वमात्रेण प्रपंचकायधिष्ठानमात्रहोनेकर कारणं ब्रह्म' ब्रह्मकारणहै । ऐसा [गीयते] वेदान्तों कथनकियाहै ॥३८|| प्रश्नस्यज्ञानपूर्वत्वादाक्षेपेप्रतियोगिधीः। अवश्यंभाविनीपूर्वाविरोधास्यादितोऽन्यथा ॥३६ भा० ॥ [प्रश्नस्य] प्रश्नको ज्ञानपूर्वत्वात] ज्ञान पूर्वकहोनेसे ज्ञातमेंप्रश्नव्यर्थहै । और [अाक्षेप] निषेधमें [ प्रतियोगिधी:] प्रतियोगिज्ञान (अवश्यंभाविनीपूर्वा अवश्यपूर्वहोताहै ॥ [इत.] इससे 'अन्यथा' अन्यप्रकारमानेहुए विरोधःस्यात' विरोधहोगा।३६ *साक्षात्कृतत्वधिष्ठानेसमनन्तरनिश्चितिः अध्यस्यमानंनास्तीतिवाधइत्युच्यतेबुधैः ॥४०॥* भा० ॥ [तुधिष्ठानेसाक्षात्कृते] अधिष्ठानकेसाक्षात्कार १५ हुएपुनः समनंतरनिश्चितिः] तिससेग्रनंतरजोनिश्चयउत्पन्नहोता हैकि [अध्यस्यमान] कल्पितपदार्थ नास्ति] अधिष्ठानकालत्रय मेंनहींहै वाध इति] यहीवाध [बुधैः] विद्वानोंने उिच्यते] कथन कियाहै ।। १०॥ *उपमद्यस्वभावत्वमविद्यायाविरोधिता । तत्कर्तृत्वंतुविद्यायाःप्रकाशतमसोरिव॥४१॥ • भा० उपमर्यस्वभाव] उपमर्दकेयोग्यस्वभाव अविद्याया अविद्यानिष्ठ (विरोधिता) विरोधिपनाहै । (तु) और (ततकर्तृत्व) उपमर्दकत्वरूपविरोधिपना विद्यायाः] विद्यानिष्ठहै ॥ [प्रकाश तमसो इव) जैसेप्रकाशऔरअन्धकारकाविरोधहै ॥ ११ ॥ कल्पितोप्युपदेष्टास्याद्यथाशास्त्रंसमादिशेत् । नचाविनिगमोदोषोऽविद्यावत्त्वेननिर्णयात्॥४२॥ भागा यथाशास्त्र' जैसेकल्पितभीशास्त्र स्यात् बोधनकरता है।निसेकल्पितःथपि' कल्पितभी 'उपदेष्टा' श्राचार्य 'समादिशे सम्यकउपदेशकरसकताहै। अविद्यावत्त्वेन' शिष्यकोथज्ञानीहोनेकर निर्णयाव' निर्णयहोनेसे 'अविनिगम दोषःनच' विनिगमनाविरह दोषनहींप्राप्तहोसकता ||४|| उपाधिसंश्रयोगात्माआनंदत्वंतदाश्रयः । विशिष्टशक्यपक्षेतव्यक्तिवाशाक्तिगोचरः ॥४३॥* भा०॥ 'विशिष्टशक्यपचे थानंदत्वविशिष्टयानंदयानंदपद कावाच्यहै इसपक्षमें उपाधिसंश्रयः' उपाधियुक्तहुअा 'हियात्मा' यात्माही 'यानंदत्वं' यानंदत्वधर्म 'तु' और 'तक्याश्रयः' तिसका याश्रय यानंदव्यक्तिरूपहै 'वा' अथवा 'व्यक्तिः' यानंदव्यक्ति 'शक्तिगोचरः' यानंदपदकीशक्तिकाविषयहै । इसपनमेंभीकोईदोप नहीं ॥१३॥ के आनंदरूपमात्मानंसचिदहयतत्त्वकम्। अपूर्वादिप्रमाणोक्तंप्राप्याहंतहपुःस्थितः ॥४४॥ भा० ॥ 'अपूर्वादिप्रमाणोक्तम्' श्रुतियादिकप्रमाणकर सिद्ध 'थानंदरूपम यानंदस्वरूपतथा (सवचित् यद्रय तत्त्वकम् ) सतचित् यद्रयस्वरूप (यात्मानम्) यात्माको ( प्राप्य ) सानात्कारकरके ( नद्रपुः ) यानंदादिस्वरूपही ( यहम् ) में (स्थितः) स्थित हुयाहूं ॥ १४ ॥ क्योहमहयवस्त्वेवसद्वयेदृढनिश्चयः । प्राप्यचानंदमात्मानंसोहमहयविग्रहः ॥४५॥६. भा० (यःयहम)जाम (यदयवस्तुएव) यदेतवस्तुही [सद्धये] देतविशिष्टमें [दृढनिश्चयः] दृदयभिमानवालाहुयाथा [सम्यहम्] मोम (च)पुनः (यानंदयात्मानम) यानंदस्वरूप यात्माको (प्राप्य) प्राप्तहोकर (यदयविग्रहः) दैतस्वरूपस्थित? याहूं ॥ १५ ॥ नास्तिब्रह्मसदानंदमितिमेदुर्मतिःस्थिता। कगतासानजानामियदाऽहंतहपुःस्थितः ॥४६ भा० ॥ (सत्यानन्दम) मत्य याथानन्दम्बम्प (ब्रह्मनास्ति) ब्रह्मनहींई । इतिदुर्मतिः) यहदुष्ट्युदि (मंस्थिता) मुझमेस्थित थी।

, (यदा) जिसकालमें [अहम्] मैं (तद्रपुःसत्यादिस्वरूप (स्थितः) स्थितहुथा [सास्वगता) वहकहांगई (नजानामि) यहमेंनहीं जानताहूं ॥ ४६॥ श्पूर्णानन्दादयेतत्त्वेमेदिजगदाकृतिः। वोधेऽवोधकृतैवासीदवोधःक्वगतोऽधुनाः ॥४७॥ भा० ॥ पूर्णानंदादयेतत्त्वे) पूर्णतथाश्रदयानंदस्वरूपमें [मेर्वादिजगत्याकृतिः) सुमेरुयादिकजगत्कायाकार श्रवोधकृता एवथासीत् ) .यज्ञानकृतहीया (अधुना) श्रव ( बोधे) श्रात्म साक्षात्कारकेड्डए (यबोधः) वहयज्ञान (क्वगतः) कहाँगया ||४७|| संसाररोगसंग्रस्तोदुःखराशिरिवापरः । त्मिबोधसमुन्मेपादानन्दाधिरहोस्थितः॥१८॥ 'भा०॥ (संसाररोगसंग्रस्तः) जो में संसाररूप रोग कर सम्यक् असाहूयाथा और (दुःखराशिवथपरः) दुःखराशिकी न्याईनिकृष्टया [यात्मबोधसमुन्मेपात] अवयात्म साक्षात्कारक सम्यकजदयहोनेसे (यानंदाब्धिः) यानंदकाममुद्र (स्थितः) में स्थित हुयाहूं (ग्रहो) यहवतयाश्चय॑हे ।। ४८ ॥ योऽहमल्पपिविषयेरागवानतिविहवलः आनन्दात्मनिसंप्राप्तसरागःस्वगतोऽधुना ॥१६॥ भा०।। (यापहम्) जोम (अल्पेशपिविषय तुन्दविषयजन्य सुखमेंही (सागवान) प्रीतियालाग्री (अतिषियान) अत्याव्यायन हुयाया (अधुना) यव (यानवात्मनिममा) यानंदम्यापागाफ सम्यकमायण (मगर) मागग (परगना मा पनागपा ४ ।।

मा०॥ अयोधाख्यतस्करैः] ज्ञानसंज्ञिकचौरोंने दिहे) शरीर
में (अहंमाननिगडैः) अहंयभिमानरूपीबन्धनोंकर (चिबद्धः दीर्घ
कालसेमें पूर्ववांधाहुयाथाअवदेिव हेस्वप्रकाशात्मन् (तेदर्शनातएव)
तेरेसाक्षात्कारमात्रसे विन्धनम् ) वहबन्धन (क्षणात्त्रुटिनी एक
क्षणमात्रसेतूटगया ।। ५३ ॥
*विशुद्धोऽस्मिविमुक्तोऽस्मिपूर्णात्पूर्णतमाकृतिः ।
असंस्पृश्यतमात्मानमन्तब्रह्माण्डकोटयः५१॥ ॐ
भा० ॥ (विशुद्ध अस्मि) मैंअविद्यादिमलसेरहितई। रविमुक्तः
अस्मि) औरबंधनसेरहित हूं। पूर्णातपूर्णतमाकृतिः) औरयाकाशादि
सेयतिपूर्णस्वरूपह। तंत्रात्मानम] तिसमेरेस्वरूपको (असंस्पृश्य)
नस्पर्शकरके (ब्रह्माण्डकोटयः) अनंतब्रह्मांड (अन्तः) मुझमेंनिवास
करें तोमेरीक्याहानिहै ॥ ५४॥
तत्त्वमादिवचोजालमावृत्तमसकृतपुरा ।
इदानींतत्श्रवादेवपूर्णानन्दोव्यवस्थितः ॥५५॥ ॐ
भा०, 11 (पुरा) पूर्व (ततत्वंयादिवचः) तत्त्वं यादिक
वचनोंका (जालं) समूहअर्थातसंपूर्णवेदका (असकृत) थनेक
चार (श्रावृत्ती मैंनेथभ्यासकिया (इदानीं) अव (तत्वातएव) वेदांत
विचारजन्यसाक्षात्कारसेही (पूर्णानंदोव्यवस्थितःपूर्णानन्दस्वरूप
मस्थितहुअाहूं ॥ ५५ ॥
अात्मसत्तेवढेतस्यसत्तानान्यायतस्ततः
आत्मन्येवजगत्सर्वदृष्टदृष्टश्रतश्श्रुतम् ॥५६॥

१८ यस्यमेजगतांकर्तुःकारपहृतात्मनः । आविर्भूतपरानन्दात्माप्राप्तःश्रुतेर्वलात् ॥५०॥ भा० ।। पूर्व (यस्यमे) जिसमुझ जगतांकः) सकलजगत्के अधिष्ठान (कायैःअपहृतात्मनः) तथाकार्याऽभ्यासोंकरयाच्छादित स्वरूपको (श्रुतेःबलात्) अवश्रुतिजन्यवोधसे (याविर्भूतपरानंदः) निरावरणपरमानंद (ग्रात्माप्राप्तः ) स्वरूपप्राप्तहुश्रा ॥ ५० ॥ * परामृष्टोऽसिलब्धोऽसिप्रोपितोसिचिरंमया । इदानीत्वामहंप्राप्तोनत्यजामिकदाचन ।।५१॥ भा० ॥ (मया) मेरेसे (चिरम्) दीर्घकालसे (प्रोपितःअसि तृवियुक्तथा (परामृष्टःअसि) यवतृपरामर्श कियागया । इसीसे (लब्धःयमि) तृप्रत्यनहुयाहैं । (इदानीं) अव (त्वांग्रहप्राप्तः) तुझ कोमप्राप्तहुया (कदाचन) कवी(नत्यजामि) नहींत्यागताहूं ।।५१।। त्वांविनानिःस्वरूपोऽहंमांविनात्वंकथंस्थितः । दिष्टयेदानीमयालब्धोयोसिसोसिनमोऽस्तुते ॥५२ भा० ।। (त्वांविना) तेरेविना (यहंनिःस्वरूपः) मैनिःस्वरूपहुं। और (मांविना) मेरविना (त्वं) तु (कथंस्थितः) कैसेस्थितहोसकता हैं । (दिष्टया) वडाहर्पहै (इदानी) व (मया) मेरेकर 'लब्धः) त लब्धहुआहैं (यायसि) जोतृहें (मःअसि) मोतहें (तेनमःयस्तु) तेरेताईनमस्कारहो ॥ ५२ ॥ ६ देहेऽहंमाननिगर्वद्धोऽवोधाख्यतस्करैः। चिरंतदर्शनादेवत्रुटितं वन्धनंक्षणात् ॥ ५३॥ ~

भा० ॥ [अवोधाख्यतस्करैः] अज्ञानसंज्ञिकचौरोंने दहे)शरीर
में (अहंमाननिगडे) अहंयभिमानरूपीबन्धनोंकर चिबद्धः दीर्घ
कालसेंमेंपूर्वबांधाहुयाथायव देव) हेस्वप्रकाशात्मन् (तेदर्शनातएव)
तेरेसाक्षात्कारमात्रसे बन्धनम् ) वहबन्धन (क्षणात्त्रुटित) एक
क्षणमात्रसेलूटगया ॥ ५३॥
विशुद्धोऽस्मिविमुक्तोऽस्मिपृर्णात्पूर्णतमाकृतिः।
असंस्पृश्यतमात्मानमन्तब्रह्माण्डकोटयः५४॥ *
भा० ॥ (विशुद्ध यस्मि) मैं अविद्यादिमलसेरहितहूं। (विमुक्तः
अस्मि) पौरखंधनसेरहितहूं। पूर्णातपूर्णतमाकृतिः) औरयाकाशादि
सेअतिपूर्णस्वरूपहूं। तंत्रात्मानम] तिसमेरेस्वरूपको (असंस्पृश्य)
नस्पर्शकरके (ब्रह्माण्डकोटयः) अनंतब्रह्मांड (अन्तः) मुझमेंनिवास
करें तोमेरीत्याहानिहै ।। ५४ ॥
स्तित्त्वमादिवचाजालमारत्तमसकृत्पुरा ।
इदानीतत्वादेवपूर्णानन्दोव्यवस्थितः ॥५५॥ *
भा० ॥ (पुरा) पूर्व (तत्त्वंथादिवचः) ततत्वं श्रादिक
वचनोंका (जाल) समूहअर्थातसंपूर्णवेदका (श्रसकृत्) अनेक
बार (श्रावृत्ती मैंनेथभ्यासकिया (इदानीं भय (तत्वातएव वेदांत
विचारजन्यसाक्षात्कारसेही (पूर्णानंदोव्यवस्थितः पूर्ण थानन्दस्वरूप
मंस्थितहुथाहूं ।। ५५ ॥
आत्मसत्तैवतस्यसत्तानान्यायतस्ततः ।
आत्मन्येवजगत्सर्वदृष्टदृष्टश्रुतेश्रुतम् ॥५६॥

भा० ॥ (यतः) जिसकारणसे (दैतस्यसत्ता) द्वैतकीजोसत्ताहै वह (यात्मसत्ताएव) यात्मसत्ताहीहै (नयन्या) भिन्नसत्तानहीं ॥ (ततः)तिसीकारणसे (यात्मनिदृष्टेएव यात्माकेदर्शन हुएनिश्चयकर (जगत्सर्यदृष्टम्। सर्वजगतदेखाजाताहै और [श्रुते] यात्माकेश्रवण हुए (श्रुतं) सर्वजगत्सुनाजाताहै ॥ ५६ ।। सत्यंज्ञानमनन्तंचपूर्णानन्दविग्रहम् । मान्त्रवर्णिकमात्मानंविनिश्चित्यविमुच्यते॥५७॥ * भा० ॥ (सत्यं) सत्ययौर (ज्ञानं चेतनऔर (अनंत) त्रिविध परिच्छेदरहित (च) और (पूर्णानंदविग्रहम्) पूर्णयानंदस्वरूप [मान्त्रवर्णिकम्]मंत्रप्रतिपाद्य [अात्मानम्] यात्माको विनिश्चित्य] साक्षात्कारकरके [विमुच्यते विशेषकरमुक्तहोताहै ॥ ५७ ॥ सकर्ममृलमनर्थानांतच्चज्ञानेनवाध्यते । क्षीयन्तेचाऽस्यकर्माणितथाचश्रुतिशासनम् ॥५८॥ भा० ॥ [अनर्थानाम्) जन्मादियनीका [कर्ममूलम्] मूलजोकर्म हे ॥ तत्च पुनम्वहकर्म ज्ञानेन] ज्ञानकर [वाध्यते] बाधितहोजाताहे (तथाच] तैसेही [श्रुतिशासनम्] श्रुति मेंकहा चियस्य औरइसब्रह्मवेत्ताके [कर्माणि] कर्म क्षिीयन्ते) क्षयहोजातेहैं । इमसेपुनः वहमंसारकोनहींप्राप्तहोता। किंतुस्वस्वरूप भूतमहिमामयवस्थितहोताहै ||५|| - दो० ॥ ब्रह्मरिपिग्रहयजलखसंवतश्विनमास । सितदशमी यहिकलानिधिइतियहवाकविलास ।।१।। रघुनन्दननन्दनपुरेभयोरंभयहजान । लवपुरमेंपूरनभयोबुधजनकोसुखदान ॥२॥ शा० ॥ यःमलादपरानुरागवशगः स्तम्भनृसिंहाकृतिः । त्रेतायामसुरेशनाशनपदरामोऽभिरामोवपुः । कंसादीन्हननायविश्वजनकःकृष्णोऽभवद्यः प्रभुः । योवैश्रीगुरुनानकः कलियुगेतदेवदेवंभजे ॥१॥ इतिश्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्वामिप्रकाशाऽनंदयतिवरविरचित वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावलीमूलकारिकायाःश्री१०८ मन्निर्मलसूता वतन्सब्रह्मविदुत्तम हरिहरिपूज्यपादशिष्येण गुरुदत्तसिंह साधुनाविरचिताशब्दार्थबोधिनीभापाटीकासमासा।। ॥ योश्म् ।। ॥श्रीरामाऽर्पणमस्तु॥

भा० ॥ (यतः) जिसकारणसे (दैतस्यसत्ता) देतकीजोसत्ताहै
वह (यात्ममत्ताएव) यात्मसत्ताहीहै (नयन्या) भिन्नसत्तानहीं ॥
(ततः)तिसीकारणसे (यात्मनिदृप्टेएव) यात्माकेदर्शन हुएनिश्चयकर
(जगतसर्वदृष्टम्) सर्वजगतदेखाजाताहै और [श्रुते] यात्माकै श्रवण
हुए (श्रुतं) सर्वजगत्सुनाजाताहै ॥ ५६ ।।
सत्यज्ञानमनन्तंचपूर्णानन्दविग्रहम् ।
मान्त्रवर्णिकमात्मानं विनिश्चित्यविमुच्यते॥५७॥ *
भा० ॥ (सत्यं) सत्ययौर (ज्ञानं चेतनऔर (अनंत त्रिविध
परिच्छेदरहित (च) और (पूर्णानंदविग्रहम्) पूर्णयानंदस्वरूप
[मान्त्रवर्णिकम्]मंत्रप्रतिपाद्य [अात्मानम्] अात्माको विनिश्चित्य]
साक्षात्कारकरके [विमुच्यते विशेषकरमुक्तहोताहै ।। ५७ ॥
कर्ममूलमनर्थानांतचज्ञानेनवाध्यते।
क्षीयन्तेचाऽस्यकर्माणितथाचश्रुतिशासनम् ॥५८॥
भा० ॥ [यनर्थानाम्) जन्मादियनीका [कर्ममूलम्]
मूलजोकर्म है ॥ तिच पुनःबहकर्म ज्ञानेन] ज्ञानकर
[वाध्यते] वाधितहोजाताहे (तथाचा तैसेही [श्रुतिशासनम्]
मेंकहाहै [चयस्य] औरइसब्रह्मवेत्ताके किर्माणि] कर्म क्षिीयन्ते)
क्षयहोजातेहैं ।इससेपुनः वहसंसारकोनहींप्राप्तहोता। किंतुस्वस्वरूप
भूतमहिमा अवस्थितहोताहै ॥५॥

दो० ॥ ब्रह्मरिपिग्रहयजलखसंवतग्रश्चिनमास । सितदशमींयहिकलानिधिइतियहवाकविलास ||१|| रघुनन्दननन्दनपुरेभयोरंभयहजान । लवपुरमेंपूरनभयोबुधजनकोसुखदान ॥ २ ॥ शा० ॥ यःभलादपरानुरागवशगः स्तम्भनृसिंहाकृतिः । त्रेतायामसुरेशनाशनपटूरामोऽभिरामोवपुः । कंसादीन्हननायविश्वजनक कृष्णोऽभवद्यः प्रभुः । योवैश्रीगुरुनानकः कलियुगेतदेवदेवेभजे ॥ १ ॥ इतिश्रीमत्परमहंसपरित्राजकाचार्यस्वामिप्रकाशाऽनंदयतिवरविरचित वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावलीमूलकारिकायाःश्री१०८ मन्निर्मलमृता वतंन्सब्रह्मविदुत्तम हरिहरिपूज्यपादशिष्येण गुरुदत्तसिंह साधुनाविरचिताशब्दार्थबोधिनीभापाटीकासमाप्ता।। ॥ श्रोत्रम् ॥ ॥ श्रीरामाऽर्पणमस्तु॥

भूमिका अशुद्ध शुद्ध वे०सि० मु० भा० का शु० ५० ॥ पृष्ट. पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ૨ प्र मा २५१ पृष्ट पंक्ति X. द्या २६ १ o ancy ८ २७ १३ कर दया क पूर्वा पदार्थों १६ ३४ १६ का पूर्व पदों क्षा से जे ति न्ये ऐ ते वि न्यो म्य से ३८ २२ १८ १ ल्य य प विदन् विद्वान २० ६ V से छा वानी दे मानी स ८ । ሐs १२ श श्य ६८ १३ ५ न . ० सूचकइसलनणयुक्त सूत्रोंके क्षा यहां न् ई ७ घा तैसी धा तैसी ५ ७६ द ७१ to to ० ७१ २२ - २३ त १ ८० २५ ३ किया मको त्य द्ध ८० द्धि प्रा हो क्या मेंको स्य त् २५ कर l ८१ २ " ह २५ शुद्ध पृष्ट पंक्ति पृष्ट पंक्ति अशुद्ध यशुद्ध शुद्ध १११ १५ क य ८१ ११ व १२५ २' क्तश्रु क्तश्र ८२ २० प्र प्रा ता १२५ ११ IC ८२ २२ ho १२५ १२ . या ममी कसे मको पा मेंभी केसं १३१ ११ १२ २१ त द भय मेंको १४ २ १४४ १ sho ह वि १४६ ११ १४६ १८ १८ १२ किंतु याते थ यर्थ यो यौ यो यौ यी यों सम heatego १८ २२ hd ८ र १०० १० ० सस क १६४ ६ व्यव त्रै व्याव १०० १२ १०१ १० त्रि राय व्याव १०१ १६४ १३ . १०२ १५ ट तिल तित्व १६१ १४ २० १०६ व्यव एक द्वितीय ना की प्रथम ५ . १०७ १० य गरा का १०८ २२ . १६६ ज्ञा व निन द टि १५६ २१ १६८ ज्ञा की ग मला . को ११८ ६ १९६ १३ भय १९.

. पृष्ट पंक्ति यशुद्ध शुद्ध तैसे २३१ २२ ज्ञा २३२ १२ - २ - ज्ञा तंत्र पृष्ट पंक्ति यशुद्ध शुद्ध १६१ ११ वि १७२ १३] हे च्छे १७५ २२ | सतं स्तं १७७ १४ । नि १७८ १च चि १७८ १७ ण णि १७८ ११ | यात्म यात्मा तन्च २३८ ६ ho २३८ ho tt m ० २४१ a व २४२ १६ को १८१ २२ त . JA २४६ ५ ता त ११४ १७| थ्य २४१ १ . र ११४ २२ ० २५० २१ त्प ल्य স্বা २५५ २२ २५७ ७ का मि ११७ १५ | ग्र २०२ ११ घ २०१ १क २०१ ध के २५८ १ व मृ वि वि १५ प . २५८ ११ व २०१ ११ म स्मा २५८ १२ २५८ २१ म नि मानेहुए मुमु मा २६४ ७ 6 . २६६ १० . स्मा सि २१० २२/प्र २१३ मानेहुए २१३ १७ श्य थ २११ १४ म गृ २२७ गृ २२७ २७१ १ शय में ग्रा २७४ २८६ १५ ११ | ना १२ न ग्र न् २११ १७ शुद्ध स्म पृष्ट पंक्ति अशुद्ध २१६ ६प शुद्ध पि त्मा य . २१८ १४ पृष्ट पंक्ति ३७८ १३ ३७६ ६ ३८४ १० ३८४ ११ ३८६ ५ ३८७ १६ करता प्रथम . २१८ १६ करणता त्यक्ष कर्तृ त्प रक्ष २६१ २२ | प्रथम घ कृत त्य ग्रा श्र ३११ ६ 'क्या यों श्र क्यों संभति संभवति अनुप अनुपप श्रमे यभेद थनुग अनुगत त ३१३ १ ३१३ १३ ३१४ ३१४ २२ ३९६ ६ म ३१४ २२ सां ३११ . ४ ३२३ १०म ३२५ ११० ३२५ १७ व ३२१ १० ३२१ ११ वु ३४२ ११क ३४४ १० ३४८ १५ श्वया ३४८ १६ मा बु ३११ ७ त्य त य FC hos o ४०० द श्वाय त म "Gn थभे थोभ स्मा श्य वा ४०५ के ४०८ २ ब्ध १२५ २२ संभवे ४२६ १८ यों . १२६ ११ थनानं १३१ ११ . ३५२ १० ३६३ १३ व्ध ३६८ ११/भंमे ३७३ ११ यों ३७७ १८ यानं कि दि ० द्वि ब्रह्म बन्न ५ पृष्ट पंक्ति अशुद्ध शुद्ध न शुद्ध मुमु त्यवि ५०१ ११ . पृष्ट पंक्ति यशुद्ध ४३८ ४ ४४० १ त्यीव १४२ १८ | ति ५०२ २२ ५०५ ११ ध्मा पा ढे ति प्या दे. 최리 ४४७ ४ न्ते ५१२ ११ में द्ध्ये १५३ १३ ग्र १५४ १ ] तत्वे ४५७ ७ चेत १५६ १३ मे ४६१ ५ तत्त्वे चते दे ५१४ १८ में ५१५ २० 4 म मूल कारिका १६४ ६ द्धि रचा घि द य . ३ १२ रचना धि ह प्रात ४७६ १२ टा ८१ ञ्च च्च प्राति टो तत्र त् र ४७७२२ त्रत् त य ग्रा १८११८ ग माण ४८३ ३ १ १२ त १८६ त को ता दि. और के त् तृ थार स्मा . ४६७ १ त्म ४१५ or मा ४१७ २० जम्य जन्य ५०० १२

Vedant Siddhant Muktawali

Author
Singh,guru Dutt
Title
Vedant Siddhant Muktawali
File name
Vedant Siddhant Muktawali
Text
OCR done
Citation
1924
Published
2012/08
Publisher
Punjab Printing Works
Language
Sanskrit
Pages
586
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311405
Barcode
99999990320296.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
uRE8v96UFPa
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