Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Hari Bhansuri Sunhari Ter

Sumitranand Pant · 2010/12

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हरी बाँसुरी
सुनहरी टैर
+
सुमित्रानदन पत
राजपाल एण्ड सन्त्र दिल्ली

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माकार
.
२४
पि
उमास
प्रासू
स्मृति
माबी पत्नी के प्रति
प्रतीका
स्मिठि
१२
भीमकमत
मन पिहप
प्रेम मी
याकाण
पवाप
पीत
नहरों का पीत
हवाके मकोका गीत
मामपन
बिजनबाटी
.२
हरीबीमुरी मुनहरी टेर

४७
प्राम पुरती
रेखाचित्र
८१
मार
मटिता
८६
सणसवी
नारीबम
मर्म कपा
प्रपम पुष
७
पररावनी
१८
ममैम्पमा
बोपन
१.
रणबन
स्वणही
हरय तारण्य
मानधी
स्मृति
मागीद
भाव स्मृति
स्मृति पीत
१४२
माषप
मनोमय
पुनर्मूस्पकिन
हरी बारी सुनहरी टेर

भय भीवन के स्रोत सम्मिनित
हो पाते हैं किसी प्रकार,
उन्हें नहीं पर विश्ग सकता
सखे, स्वय तारक करसार ।

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प्रमि
वह मधुर मधुमास पा, पप गप से
मुग्ध होकर झूमते पे ममुप दस
रसिक पिक से सरस वरुण रसाल थे,
प्रमनि के सूख बढ़ रहे पे दिवस-से।
जानकर ऋतुपन का मव प्रागमन
प्रसिम कोमस कामनाएँ प्रवनि की
खिम उटी पौ मृदुल सुमनों में कई
सफल होने को प्रगनि के ईश से!
प्रस्तमित निक्ष पनक किरमों को तपन
परम गिरि को सींपता पा पण सा
परम पामा में रंगा पा बह पतन
रवकों सो बासनामों से विपुल !
तरणि के ही सग तरल तरंग से
वरगि बी पी हमारी ताल में
साम्य निस्वप्न-से गहन बम गर्भ में
पा हमारा विश्व तम्मय हो गया।
पपीमुरी मुबहरी टेर

x
बुदबुदे गिन पपस महरों में प्रयम
गा रहे पे राग पीवन का अधिर
मल्प पस उमके प्रबल उत्पान में
हृदय की महरें हमारी सो गई।
x
x
पय विमूहिम मीद से मैं पा बगा
(कौन पामे किस तरह ?) पीयूष सा
एक कोमस समयपित नि स्वास पा
पुनर्जीवन सा मुझे तव वे रहा।
पीश रस मेरा सुकोमस पौष पर
राशि कसा सी एक बामा म्यग्र हो
देखती थी म्लान मुख मेरा प्रपल
समय भीर प्रभीर, चिन्तित दृष्टि से !
इदु पर, उस मुख पर साथ ही
से परे मेरे भयन वो चदय से,
मार से रक्सिम हुए थे --पूर्व को
पून पा पर बह द्वितीय प्रपूर्व पा!
मास रजनी सी ममक पी डोलती
धमिव हो पधिक ववन के बीच में
प्रथम रेगापित भी पी कर रही
प्रमुखता मुस की सूछवि के काम मे !
एक पस
मेरे प्रिया के ग पसा
ये उठे पर, सहम
नीषे मिरे,
हरीबीमुरी सुनहरी टेर

चपलता ने इस विपित पुलक से
दुक किया मानो प्रणय सबष पा
सार की मादक सुरा सी सामिमा
फम गालों में, नवीन मुमाब-से ,
छप्तकती पी बाढ़ सी सौन्दर्य की
प्रघमुले सस्मित गों से सीप-से !
(इन गड़ों में स्प के मावत-से-
पूम फिर कर, नाव-से किसमे मयन
है नहीं ये भटक कर, अटक कर,
मार से दब कर तरुण सौम्वर्य के?)
सूभग सगता है गुलाय सहर सदा ,
क्या उपामय का पुम कहना ममा?
मासिमा ही से नहीं क्या टपकती
सेव की चिर सरसप्ता सुकुमारता?
पद मों को गिन समय के मार को
प्रवनिवस
पुरम कर, वह पर पलों की पृष्टता
पी वहाँ मानो छिपाना चाहती !
x
इद् की छवि में, तिमिर के गर्म में ,
मनिस की ध्वनि में सलिम की वीधि में
एक उत्सुकता विपरती थी, सरम
सुमन की स्मिति में, मता के ममर में ।
बो मटाती पी मुलाकर,
x
हरीबीमुरी मुनारी और

धन
याद है मुझको प्रभी यह पा समय
म्याह के दिन पव पिकल दुल हदय
प्रों से वारफों को बिगन में
गिन रहा था, व्यस्त हो, उति हो ।
हाय रे मानव इदय ! तुमसे
वण भी मममीत होता है वहीं
देश तेरी मृनुसता विम सुमन मी
समुषित हो सहम जाता है सवा!
प्रषि यंभन !-स सुनहमी प्रपि में
स्वर्गकी मौ' विश्व की मंगलमयी
जो मनोसी बाह पो उम्मत्त
है छिपा पह एक है, मनमोम है!
शेवमिनि ! पामो, मिलो तुम सिंपु से ,
प्रनिस ! मार्मिगन करो तुम गगन को
बद्रिके । पूमो तरंगों के प्रषर
• उड़मगो | गापो पबन-बीणा बजा ।
पर, हुपम | सब भौतिगाम है,
उठ किसी निर्जन पिपिम में बैठ कर
मधुर्मों की बाद में मपनी विड़ी
मग्न भावी को एषा दे पास-सी।
देश रोता है चकोर पर, यहाँ
तरसता है वृषित पातक वारि को,
हरी बांसुरी सुनहरी टेर

बह, मप विष कर तपसा है यही
नियम है समार का
रो हृदय, रो!
।
सुकुमार, यों
छि सरस सौन्दर्य ! तुम सपमुष यरे
निठुर पौ' नावान हो
पसक दस में हारकों में, प्रघर में
सेम कर तुम कर रहे हो हाय ! क्या ?
जानते हो क्या ? सुकोमस गान पर
का मैगुमियों पर कटी पाटि पर छिपे
तुम मिचौनी सेस पर कितना गहन
पार करते हो सुमन-से हृदय में !
मो' अकेले पिक तिल से कुछ उठी
कुछ गिरी भ्रू पोधि से कुछ-कुछ मुसी
मयनष्ठा से कुछ की मुसकान से
छोमते किस भौति हो तुम धर्य को ?
मुकुस के भीतर उपा की रविम से
मम्म पा मधु की मपुरवा धूमि की
ममता, कद कटकों की प्रक्षरता,
मुग्यता सी ममुप की सुमने पुरा!
पौर, माझे प्रेम ! क्या तुम हो बने
बेपना के विकम हापों से ? महो
झूमते गब-से विपरो हो, नहीं
पाह है उन्माद है उत्साप है!
हरी भानुरी मुनहरीर

वेदना ! कैसा करुण नागार है!
वेदना ही है प्रसित ब्रह्मोर यह
तुहिन में वृम में, उपम में, सहर में
सारों में, व्योम में है बेदना!
वेदना 1-तिमा विशव यह रूप है।
यह मधेरे हृदय की दीपक घिसा!
स्म की मंतिम स्टा! इस विश्व की
प्रगम परम प्रबधि क्षितिजकी परिभि सो।
फोन दोपी है? यही तो म्याय है।
वह मधुप विष कर सड़पता है पर
दग्ध बातक तरसता है-विक्ष्य का
मियम है यह रो प्रमाग हपय रो।।
x
कौन वह बिहो विलों की दुर्दशा
पॉछ सकया है ? दुर्गों की बाढ़ में
विकस बिखरे बुवमुर्दो की बरती
मौन पाहे हाय ! कौन समझ सका।
शूम्प पीमन के मकेने
पृष्ठ पर
विह!-अहह कराहते इस सन्द को
फिस कुलिष्ट की तीक्ष्ण पुमती नोंक से
निठुर विधि में प्रमों से है मिना!!
x
प्रेम बषित को सपा कंगास को
है कहाँ पामय ! पिए की मधि में
X
x
हाँसुरी मुमारीटेर

भस्म होपर हृदय की पुपम दशा
हो गई परिणत विरति सी शमित में।
सुहार ! कगास कृश काल सा
भैरवी से भी सुरीसा है महा!
किस गहनता के प्रभर से फूट कर
फैसते हैं शून्य पर इसके सदा!
भाष में अंगास क्या यह प्रपम
पार मने ही कहा? मो हदय ! तुम
वह रहे हो मुफ्त इसके मोद में
भूम कर दुर्देव के गुरु भार को।
मैं अकेला विपिन में कहा हमा
सींचता हूं विसनसा से हृदय को,
और उसकी मेवती कृत दृष्टि से
दूंखा हूँ विश्व के उग्माद को !
विश्व, यह कैसी मनोहर भूस है।
मपुर दुर्यसता !-कई छोटी बही
अस्पताएं मोड़, सीमा के लिए,
यह निरामा खेम क्या विपि ने था?
कौन सी ऐसी परम पह बस्तु है
भटकते हैं मनुन-गम विसके लिए?
कौन सा ऐसा भरम
खींचता है जो जगत के हृदय को?
हामुरी सुनहरेर

सुमन दम में फूट पागम-सी, पचिस
प्रणय की स्मृति हंस पड़ी है, मुकुल में
पास है मशात मावी कर रही
माज मेरी द्रौपदी सी परवशा।
,
गर्व-सा गिर उन्ध निर्मर सोत से
स्वप्न सुर मेरा शिलामय हृदय में
पोप मीपण कर रहा है बम सा
बात सा, मूपम्प सा
चस्पात सा।
धारकों के मचल पमों से विपुम
मौन मिस्मय छीन कर मेरा पतन
निनिमेप विनोकता है विश्व की
भीरता को पन्द्रमा की म्योति में।
तिमिर के प्रशात बंचम में पी
झूमती है प्रान्ति मेरी भ्रमर सी
चन्द्रिका की लहर में सती
मम्न माया प्राज शत शत सर हो।
तिमिर! यह क्मा विश्व का उन्मार है,
पो छिपाता है प्रकृति के म को?
या किसी भी यह विनीरव पार है
मोजती है जो प्रमय की राह को!
या किसी के प्रेम पचित पलक की
मूक पाता है? पपन में विपर कर,
२२
हरी बांसुरी मुनारी टेर

पूछती है वो सितारों से सतत- प्रिय ! तुम्हारी नींव किसमे छीन मी? यह फिसो के रुवन का सूसा हमा सिन्पु है क्या ? पो दुओं की भार में सृष्टि की सत्ता खाने के मिए उमझता है एक नीरज महर में। माह, यह किसका प्रपेरा माम्य है? प्रसय छाया सा मनन्त विपादसा। कौन मेरे कल्पना के बिपिन में पागमों सा यह प्रमय है पूमता हृदय ! यह पमा दग्ध तेरा मित्र है? घूम ही है शेप प्रव घिसमें रहा। इस पवित्र दुकृत से सू देव का बदन मने सिए क्यों म्पग्न है। ? हपयोमुरी मुमार

उच्छ्वास
(सापम मादो)
(सापन)
सिसकते, मस्पिर मानस
बाम-वादम-सा उठकरभाष
सरम, प्रस्फुट उच्छ्वास !
अपने छाया के पड़ों में
(मीरव-बोप भरे रसों में)
मेरे मासू गूंप, फेस गभीर मेष-सा
पाच्छावित कर से सारा प्राफाए ।
यह प्रमूल्य मोती का सार
इन सुवर्णमय, सरस परों में
(सृषि-स्वभाव से मरे सरों में)
तुझको पहना पगत देश मे-यह स्वर्गीय प्रकाश
मंद विपुव-सा हैसकर
पन-सा उर में सकर
परण गगम के मान । गरब गंभीर स्वरों में
भर प्रपना संविध सरो में प्रौ प्रबरों में
हमारी सुपारी और
।
-1

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पर
है झांक रहे नीरव नम
पनिमेष, भटम, कुछ पिम्वापर !
-उड़ गया, पपानक मो, भूपर
फाका प्रपार बारिद के पर।
रख-शेप रह गए ६ मिमर,
है टूट पड़ा भू पर मम्वर !
पंस गए परा में समय पास !
उठ रहा {मा पस गया तास !
यो पलव-यान में विष, विपर,
पा इन्द्र सेमता इन्द्रजाम !
(वह सरमा उस गिरि को कहती पी पारस-पर!)
इस तरह मेरे चितेरे-दय की
बाम-प्रकृति बनी चमतत-चिमपी
सरम-शैवप की सुसद-सुपि-सी वही
वासिका मेरी मनोरम-मित्र पी।
(मारों)
दीप के विकास ।
पनिम-सा मोक में,
हर्प में पौर शोक में,
कहाँ महीं है स्नेह ? सांस-सा सबके उर में।
हरी बाँसुरी सुनहरी टेर

-
स्वन, क्रोहन, मार्मिगन,
भरण, सेवन, भारापन,
शधि की-सी ये कलिव-कमाएं किसक रही है पुर-पुर में।
मही तो है बचपन का हास,
बिसे-पौवम का ममुप विसास,
प्रौदता का वह वि-विकास
का अन्तर्मयन - प्रकाश !
बमदिन का है यही हुलास,
मृत्यु का यही दीर्ष-निश्वास !
यह वैविक-वाप
विश्व का सुब-युखमम उम्माव
एकसामय है इसका माद
गिरा हो पाती है पनयन,
पयन करते नीरव-माषण
श्रवण क मा बाता है मन
स्र्य मन करता वात श्रवण!
मयुमों में रहता है हाम,
हास में प्रयुकों का मास,
श्वास में छिपा हुमा उन्ख्यास,
मोर उभ्यासों ही में श्वास !
बीपन-सार
सव में छिपी हुई है यह मकार !
बमुरी मुमहपौर
है

है झांक रह मीरख नम पर
ममिमेप, प्रटम, कुछ निम्तापर!
-तड़ गया, मचानक लो भूपर
फाका प्रपार पारिद के पर।
रप-शेप ए गए है निझर,
है टूट पड़ा भू पर मम्वर ।
भैस गए भरा में समय सात!
उठ रहा धुमा, पस गया तास!
यो असद-यान में विष, मिथर,
पा इन्द्र पेसता इन्द्रमास ।
(वह सरना उस गिरि को कहती पी मारम पर!)
इस तरह मेरे बितेरे-हवय की
बास प्रातिबनी पमकत चित्रपी
परम-शव की सुसव-सुपि-सीबही
बालिका मेरी मनोरम मित्र थी।
(मारों)
वीप के बचे-विकास!
मनिम-सा मोक में,
हर्ष में प्रौर सोक में
कहाँ नहीं है स्नेह ? सास-सा सबके ठर में ।
हरी बांसुरी मुनहटेर

वन डन, पार्मिगन भरण, सेवन पारापन अधि की-सी से कसित-कलाएँ किसक रही है पुरपुर में। यही तो है बचपन का हास सिमे-यौवन का ममुप-विसास प्रौरता का बह मुधि विकाय बरा का अन्तर्मयम प्रकाश! पम्मदिन का है यही हलास मृत्यु का यही दीर्घ निवास! यह वैदिक-याद विश्व का सुख-समय उन्माव एकतामय है इसका माद- गिरा हो पाती है सनयन, नमन करते नीरव भापण पवण तम मापाता है मम स्वय मन करता वात श्रवण ! मयों में रहता है हास, हास में प्रयुकणों का मास, स्वास में छिपा हुपा उन्यास, और उभ्यासों ही में श्वास ! पीवन-वार, सब में छिपी हुई है यह मझार! हपयोमुरी मुमहपरेर २९

हो बाता संसार
नहीं तो दारुण हाहाकार!
मुरसी के से सुरसीस
इसके छिद्र सुरीने,
प्रगणित होने पर भी तो
तारों से है चमकीसे ।
प्रचल हो उठते हबम
पपम बन पाते है पविचम
पिपल पड़ते है पाहन-यस
कुमिरा भी हो बासा कोमस!
पढ़ाता भी है तो
गुम
से
गेर कर में है मन माकास
पटकसा भी है तो
गुण
पींचने को धरई-सा पास !
मर्म-पी के हास
रोग का है उपचार,
पाप का भी परिहार
है मोह सन्देह नहीं है इसका कुछ संस्कार !
हवय की है यह दुर्वल-हार !!
सीयसो इसको, कहीं मा गेर है?
प्रौपदी का यह पुरत-दुकम है !
हरीमुरी मुमहरी

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हो गया था पतमा, मधुकाम
पत्र वो मावे हाय, नपस !
झा गए स्नेह-पन्त से फूल
लया यह पसमय कैसा फल ।।
मिमे थे दो मानस पहास
स्नेह-वति मिम्बित पा भरपूर
प्रमिल-सा पर प्रकरण माषात
प्रेम प्रतिमा कर दी वह पूर!!
भूमता है सम्मुल बह रूप
सुवर्शन
हए सुवर्धम पक्र!
हास-सा रहवासा-शशि पाण
हो गया है हा! मसि-सा बक!!
बामक का-सा मारा हाप,
कर दिए निकम इत्य के तार !
महीं अब वकती है झंकार
मही पाहा! क्या एक सितार?
हुई मह की मरीविका माग
मुझे गंगा की पाबम-भार!
उत्कंठा
इसी येवमा में पिसीन हो अब मेरा संसार ।
पो
बाहो
है प्रधिकार!
टूट बा यहीं यह हृदय हार | !!
है
का
पार।।
२
हरी बांसुरी सुनहरी रेर

कौन पान सका किसी के हृदय को?
सप महीं होता सदा अनुमान है !
कौन भेद सका प्रगम प्राकास को?
कौम समझ सका उपपि का गान है?
है सभी तो पौर दुर्वलता यही
सममता कोई मही-
निरपरापों के लिए भी तो महा!
हो गया ससार
कारागार है।
हरीपोमुरी मुनहरी टेर

मेय पायस ऋतु सा बीवन
मानस-सा उमग प्रपार मम,
धुंधसे घुसे सविले,
मेभा से मेरे भरे नयम 1
कभी उर में प्रगणित मृदु भाष
कूमते है विहगों से हाय !
मरण कसियों से कोमस पाय
कभी तुम पाते हैं प्रसहाय !
इन्दधमु-सा पाशा का सेतु
पनिम में प्ररका कभी पछोर
कमी हरे-सी पूमिल पोर,
दीसती भावी चारों पोर !
तारित-सा सूमुनि! तुम्हारा प्यान
प्रमा के पमक मार र बीर,
गू मर्षन कर जम गम्भीर
मुझे करता है प्रभिक प्रभीर,
पुगनुभों से नर मेरे प्राग
सोबते है पर निवाम !
पघाती है बमों से स्थास
मम गया मीसम प्योम प्रणाम
पाम सोने का
संप्याराम
पल रहा मगह-सा विकराल ।
हरीबांसुरी मुनहरेर

पटक रवि को बनि-सा पाताल
वामन पग में-
सपकता है तमिस्र तस्काम
-धुंए का विश्व विद्यास !
मिनगियों से वारो को गत
माग का-सा अंगार शशि मास
महकता है-फैसा ममि बाल
पगत को रसमा है सम व्याम !
पूर्व सृषि सहसा पर सूमारि !
सरम शुक-सी सुखकर सूर में
तुम्हारी मोमी बातें
कभी दुहराती है उर में!
प्रगन-से मेरे पुमकिस प्राण
सहस्रों सरस स्वरों में कुक
तुम्हारा करते हैं मालान
गिरा रहती है श्रुति-सी मूक!
देता
हूँ पर
उपवन
पिमामों में फूमों के
प्रिये भर भर अपना यौवन
पिमाता है ममुकर को!
मबोदा
महर
प्रधानक उपकूला के
हरीबांसुरी मुनहरी टेर
.

प्रमूनों कगि रुक कर
सरकती है सस्वर ।
प्रकेनी माकुलता-सी प्राग!
कहीं सब करती मृदु मापात
सिहर उठता कृत गत,
ठहर गाते है पग मज्ञास।
देखता हूँ पर पतसा
इनधनुपी हसका
रेशमी धूपट बातम का
खोलती है कुमुद कला|
तुम्हारे ही मुस का तो प्यान
मुझे करता वय प्रवर्षाम
न माने तुमसे मेरे प्राग
घाइते
मादान!
गावों के छायामय मेम
भूमते है मांचों में, फैन !
प्रबनि पौ' पबर के ये सेन
चैन में ममद, जमद में शेष |
विसर पर विपर मस्त रसगाम
बेणु में भरता पा बन स्वर,
मेमर्मों से मेर्मों के बाज
कुदकते थे प्रमुदित गिरि पर।
हरीबीमुरी सुनारी और

द्विरद दमों से उठ सुन्दर
सुशव कर-सीकर से बढ़ कर,
भूति-से पोभित विसर विसर
फल फिर कटि केसे परिकर,
वदतों विविष पेश जसपर
घनाते ये गिरि को गमवर ।
इन्द्रमन् की सुनकर टकार
उचक चपसा के पचत्त-मान
दौड़ते पे गिरि के उस पार
देख उम्पे पिपिर्यो की धार,
मस्त बब उनको द्रुत मकार,
रोक देवा पा मेधासार।
प्रथम के मय में विमल विचार
प्रवनि से उठ उठ कर ऊपर,
विपुस म्यापकता में प्रतिकार
सोन हो पाने में सरवर,
विहंगम-सा बैठा गिरि पर
सुहासा या विशास प्रस्बर ।
पपीहों की यह पीम पुकार
निर्मरों की भारी झर झर
झींगुरों की झीनी मनकार,
घनों की गुरु गम्भीर षहर,
हरीबीमुरी नुनहरी टेर

गगम के भी उर में घाव,
देसी ताराएँ भी राह,
अंपा विपुत् छवि में पसमाह
बान्द्रकी चितवन में भी चाह
रिसाते परभी तो अपनाय
अनिल भी भरती ठणीमाह !
मेरा भीवन,
प्रेम मौ' मांसू के कन
माह
मेरा मक्षय
अपरिमित सुन्दरता मी मन !
-एक वीणा की मृदु मंकार
कहाँ है सुन्दरता का पार!
तुझे किस दर्पण में सुकुमारि।
विहार्ड में साकार?
तुम्हारे छूने में या प्राण
संग में पावन गंगा स्नान।
तुम्हारी गाणी में कल्यागि
त्रिवेणी की महरों का गान !
प्रपरिचित पितबम में था प्राप्त
सुपामय साँसों में उपचार!
तुम्हारी छाया में प्रापार,
सुखद चेष्टामों में प्रामार!
हाँसुरी सुनारी टेर

कक्षा भोहों में या प्रामाध,
हास मैं शव का ससार,
तुम्हारी मांसों मे फर पास
प्रेम में पाया था माफार!
कपोसों में उर के भाव
अपम नपनों में प्रिम पाव
सरन सकेसों में संकोच,
मकुम मधरों में मपुर दुराप!
उषा का पा उर में प्रावास
मुकूम का मुख में मृदुल विकास,
पांदनी का स्वभाव में मास
विचारों में पच्चों के सांस।
विन्दु में थी सम सिम्पु प्रनम्त
एक सुर में समस्त संगीत,
एप कसिका में प्रशिल वसन्त
परा में भी सुम स्वर्ग पुनीत !
पिपुर चर के मृदु भावों से
तुम्हारा कर नित मव मंगार
पूजता हूँ मैं मुम्हें, कुमारि!
मूंद दुहरे वृग द्वार!
मम पसकों में मूर्ति संचार
पान करता है स अपाय,
हामुरी सुमार
।

मावी पत्नी के प्रति प्रिये, प्राणों की प्राग! म पाने किस गृह में मनमान हिमी हो तुम, स्वर्गीय विमान ! नवम कलिकामों की सी वाम पास रति सी पनुपम प्रसमान- न माने, कौन कहाँ मनवान प्रिये, प्राणों की प्राग] जननि मंघम में भूल सकाम मृदुम उर कपन सी बपुमान, स्नेह सुन में बद सचि! चिरकास वीप की अफसुप शिक्षा समान, कौन सा भालय मगर विशाल कर रही तुम पीपित, पुतिमान ? रासम पंचम मन प्राण प्रिये, प्रार्गों की प्राम। मेरे हरीपांसुरीमहरी टेर

मबल मपुरतु निहुंच में प्रात
प्रपम कलिका सी प्रस्फुट गास,
नील नम-प्रसपुर में, सन्ति ।
दूब की कला सदृषा नवमात
मपुरता, मदुसा सी तुम, प्राण
म जिसका स्वाद-स्पर्ष कुछ शात,
कल्पना हो माने, परिणाम ?
प्रिये प्राणों की प्राण ।
हृदय की पतों में गति-हीन
स्वप्न संसृति सी सुषमाकार,
बास मावुकता घोष नमीन
परी सी धरती पप्रपार
झूमती उर में किशोरि।
तुम्हारी मपुर मूर्ति छविमान,
साब में लिपटी उपा समान
प्रिये प्राणों की प्राण!
माज,
मुकुल माँ का मद् मधुमास,
स्वर्ण सुग श्री सौरम का सार
मनोमार्यो का मधुर विमास,
विश्व सुपमा ही का संसार,
पूर्गों में छा पावा सोस्मास
म्पोमबाप्ता
परदाकाप
हरीबांसुरी मनहरी टेर

तुम्हारा प्रावा पवप्रिय पान
प्रिये, प्रागों की प्राणा
परम अपरों की पस्सव-प्रात
मोसियों-सा हिमता हिम-हास
इन्द्रधमुपी पट से बैंक गाव
वाम विद्युत् का पापस-सास,
हृदय में सित उठता तस्काम
असिमे-प्रो का
मधुमास
तुम्हारी छवि का कर अनुमान
प्रिये प्राणों की प्राण ।
सेम सस्मित सत्रियों के साप
सरम रौशव सी तुम साकार,
सोस कोमम महरों में मीन
सहर ही-सी कोमम स भार
सहन करती होगी सुकुमारि !
मनोभावों से बिहार
हंसिनी सी सर में कस तान
प्रिये प्राणों की प्राण !
वास
सोल सौरम का मृदु कच-याल
खूपता होगा पनिल समोर,
हरीबासु सुमारे

सीसते होंगे उस गन्यास
तुम्हीं से कसरब, केलि, विनोद,
धूम मधु पद चंचलता, प्राण !
फूटते
होंगे नव वमलोस,
मुकुल बनती होगी मुसकान,
प्रिये, प्राणों की प्राण !
.
गान,
मुर्मिन सरसी में सूकुमार
पषोमुख परुण सरोग समान
मुग्भ कवि के ठर के फू चार
प्रणय सा नव
सुम्हारे शैव में
सोमार,
पा रहा होगा यौवन
स्वप्न-सा विस्मप-सा अम्लान,
प्रिये, प्राणों की प्राण |
परे बह प्रयम मिलन मज्ञात ।
विकपित मदु-उर पुस्ति गात
सष्यक्ति ज्योत्स्ना-सी चुपचाप,
परित पद ममित-मसक-दूग-पात,
पास पब मा म सकोगी प्राण ।
मपुरता में सी मरी ममान
माप की मिई सी म्मान
प्रिये प्राणों की प्राण !
हरीमुरी मुनहरीर
४३

कहेंगे
सुमृति,बह मधुमण! यह मषुबार!
घरोगी कर मैं कर सकुमार!
मिसिम पर नर नारी संसार
मिलेमा मब सूख से नब वार
प्रघर-चर से सर प्रधर समान
पुमक से पुमक प्राण से प्राण
नीरव प्रगयास्पान
प्रिये, प्राणों की प्राण !
परे चिर गूर प्रणय मास्पान !
पय कि क पाएगा प्रनमान
सास-सा नम उर में पवमान,
समय निश्चम, रिधि पमक समान,
पवमि पर मुक भाएगा प्राण !
म्पोम पिर, जिस्मृति से म्रियमाण
नीस सरसिज-सा हो-हो म्लान
प्रिये, प्रामों की प्राण]
हरी बांसुरी मुनाटेर

प्रतीक्षा
पर से विलोकटी सुमको
स्पा मा वातायन से?
संध्या उवास फिर पाती
सूमे गृह के मांगन से !
लहर अधीर सरसी में
तुमको तकती उठ-उठ र,
सौरम-समीर रह नावा
प्रेयसि, ठंडी सांसें भर।
है मुकुल मुंद गलों पर,
कोकिम मीरव मपुषम में
फिटमे प्राणों के गाने
ठहरे है तुमको मन में!
तुम प्रामोगी पाशा में
मपलक हैं निधि के उगम !
प्रामोगी मभिसापा से
पषस पिरनव जीवन-मण!
हप बांसुरी मुनारी टेर

स्मिति
मुस्कुरा दी पी क्या तुम प्राण !
मुसकुरा पी पी भाव विहान ?
भाष गृह-बम-उपबम के पास
लोटता राशि राशि हिम-हास,
शिप्त उठी प्रॉमन में प्रवात
कुंद-कनियों की कोमम प्रात |
मुसकूरा वी पी बोमो प्राण !
मुस्कुरा दी पी तुम प्रनगान ?
माम छाया बहुविष्टि पुपचाप
मृदुम मुकुों का मौनालाप,
रुपहसी फलियों से कुछ साम,
सद पाई पुमफित पीपम गन,
मौर वह पिक की मर्म पुकार
प्रिये ! झर झर परती साभार,
माम से गड़ी म मामो प्राम !
मुसकुरा की क्या प्रार बिहान ?
हरी बाँसुरी सुमार

नील कमल मीस कमत-सी है ये मोड। थे जिनके मम्र में पास- ममु में मन-मधुकर के पास, पीस बसण-सी है दे मांस। मुग्ध स्वर्ण निरमों में प्रात प्रपम हिसाए वे नसमाउ मीस व्योम ने हम पात उन्हें मोसिमा दी मपात, भीषन की सरशी उस प्रात महरा उठी म मषु-नात, पाकुल महर्णे ने सत्काल चनमें बसता दी हाल, नीस नलिन-सी है ये मौर। जिनमें पस उर का मधुबास मि कनी बन गया पिशास, नीम सरोख-सी में पाव! हामुरी सुनहरीर मन विहग तुम्हारी मासों का प्रामाध! सरम पाँवों का मीलाकाश- सो गया मेरा बग मनमान, मगेक्षिमि । इनमें सग मनान! देशइनका चिर करुण प्रकाश पक्षण कोरों में उपा विलास खोजने निकमा निभूत निवास, पमा पल्मय प्रच्छाय निवास, नजाने से क्या-क्या प्रमिलाप सो गया बाल विहग नारान ! तुम्हारे मयनों का पाकाय समस, श्यामल प्रसपाकाश। गूर मीरव, गभीर प्रसार, न गहमे को तृण का भाभार, हरीबांसुरी मुनहरी टेर

बसाएगा
संसार,
प्राण! इनमें अपना ससार।
न इनका पोर-छोर रे पार,
होययावह नव पपिक मचान।
इपबासुरी तुनापौर

प्रेम मौर
मवस मेरे बीपन की राम
मन गई प्रेम-विहग का वास !
भाग मपुरम की उन्मव बात
हिमा रे गई पात सा गाव,
मंद्र हुम मर्मर सा मनात
समय उठता उर में सम्मास ।
नबस मेरे जीवन की गस
बन गई प्रेम विहग का पास !
मदिर कोरों से कोरफ पास
देचते मर्म मार रे वार,
मूक चिर प्राणों का पिक वाम
प्राणकर उठता करुण पुकार,
प्ररे प्रब बम-बममबम प्रवास
मगाते रोम रोम
माग बोरे रे तरुण रसाम
मौर-मन मैग्रा गई सुबास !
हबांसुरी सुनायटेर

गृह काम
प्राय रहने दो यह ग्रह काम
प्राम! रहने दो यह गृह काम!
भाव पाने कैसी
वावास
छोड़ती सौरभ-इलय उभ्यास,
प्रिये सामस-सासस वावास
जगा रोमों में सौ प्रमिलाप ।
भारतर के स्वर-स्तर में प्राण!
सबग सौ-सौ स्मृतियां सुमार,
दुर्गों में मधुर स्वप्न ससार,
मर्म में मदिर महा का भार!
शिपिस, स्वप्निस पंसलियो खोम
माम पपसक कमिकाएँ वास,
गूंगता भूसा मारा गेम,
सुमुखि उर के सुख से वाचाम !
हरीबांनुरी मुमारी टेर

पाम पंचम पपस मन-प्राण
मावरेशिथिल शिपिस तन भार,
मात्र दो प्राणों पा दिन-मान
ससार महीं ससार।
पाज क्या प्रिये सुहावी माण|
मार रहने दो सब गृह काम |
१८
हरी बांसुरी सुनहरी टेर

मधन मात्र नव मधु की प्रात मसकसी नभ-पतों में,प्राण ! मुग्ध यौवन के स्वप्न समान- मरासी, मेरी बीवन-स्वप्न ! प्रमात तुम्हारी, मुस-सुविसी रुषिमान ! माग सोहित मषु प्रात व्योम-मतिका में छायाकार मिल रही मव पत्सव सी लाम सुम्हारे मपुर कपोतों पर सुकुमार सायकापों महफिसमयमाल! भाव उन्मद मधु प्रात गगन के इंदीवर से मील झर रही स्वर्ण-मरंद समान तुम्हारे सयन चिपिल सरसिब उमीम सकताको मदिरामस,प्राण! हरीमुरी सुमारी टेर 8

माम स्वर्णिम म प्रास
म्योम के विजन कुंज में प्राण
सुम रही मवस मुत्ताव समान,
लार के गिनत वृत पर ज्यों मभिराम
तुम्हारा मुख-अरविन्द सकाम !
प्रिये मुकुलिस मषु प्रात
मुक्त नम वेगी में सोमार
सुहाती रक्स पमाश समान,
माग मपुबन मुकमों में मुक साभार
तुम्हें करवा निम विभव प्रवान |
रोममे मगी मपुर मपुयात
हिमा तृम प्रवति ष, पर-पात,
गोतने भगी प्रिमे! मृदु वात
गुंग-मपु-गम-भूमि-हिम - गात |
सोसने मगी, शयित चिर काल,
नबस कमि प्रमस-पलक-मपास,
दोसने मगी गम से गम,
प्रमुद, पुसकाकुस कोकिप्त नाम ।
युवामों का प्रिय पुष्प युभाष,
प्रमय-स्मृति-पिताप्रपम मपुवास,
.
हरी बारी सुनहरी टेर

खोसता सोपन-पस मदिराम,
प्रिये पस प्रसि दस से पाबास!
प्राव मुकृमिव-कुसुमित पहुँ मोर
तुम्हारी छवि की छटा पपार
फिर रहे उमद मषु प्रिय मौर
मयम पसों के पंख पसार।
तुम्हारी मंजुम मूर्ति मिहार
मग गईमधु के पन में ज्वास,
सरे किएक प्रनार, कचनार
साससा की सौ-से उठ साल!
कपोमों की मदिरा पी प्राण!
भाष पाटल गुलाब के पास,
विनत शुक नासा का पर म्यान
बन गये पुष्प पसाध पराल!
सिल उठी चल पचनापति प्राम
इंद कलियों में कोमस पाम,
एक पंपस चितवन के म्यान
तिमक को पार छप-मुख माम!
तुम्हारे चस पद पूम मिहाल
मंजरिख परम प्रयोक सकास,
हरीबीमुरी मुनपरी टेर

स्पप से रोम रोम तत्कास
सतत सिंचित प्रियंगु की बाल !
स्वर्गकलियों की बघि सूकुमार
पुरा पम्पक तुमसे मुद्बास
तुम्हारी पनि स्मिति से साभार,
प्रमर को पाने के क्यों पास?
देख पचम मा-पटु पदभार
सुटासा स्वर्ण राशि कनियार,
हम फूलों में मिए सवार
नर्म-मर्मश
मुग्ध
मदार!
तुम्हारी पी मुस-वास तरंग
माग पोरे मारे सहकार,
चुनासी नित सबग निग प्रेम
सम्बि ! तुम सी वनने सुकुमार !
मामिमा भर फूमों में प्राण !
सीसती मायवती मृदु माग
माधवी परती झुक सम्मान
देश तुम मधु के सब साग
मोसी सा उर भी हार
मोतिया मोती की मुसकान
1
हामुरी सुनहरी टेर

मोगरा कर्णफूम-सा स्फार,
अंगुमियां मवनवान की वान !
तुम्हारी तनु-चनिमा मधु भार
बनी मदु प्रतति-प्रसवि का पाम,
मृदुलवा सिरिस-मुकुम सुकुमार,
पिपुम पुसकावति घीना-बाल !
प्रिये, कमि-कुसुम-कुसूम में भाग
मधुरिमा मधु, सुखमा सृषिकास,
तुम्हारी रोम रोम छमि-म्पाव
छा गया मधुवन
में
मधुमास
(३)
वितरठी मूह-पन मलय समीर
सौस सुपि, स्वप्न सुरभि, सूख गान,
मार
मलप-समीर
हृदय हलसित कर पुलफित प्राण!
वेति-सी
अपस, लघु-पद महसह सुमार
मिपट मगठी मलयानिल गात
मूम मुर-मुफ सौरम के भार !
फैस फस
नवजात
हरी गोमुरी सुनहरी टेर

मात्र, तृण म्य, सग मम पिक, कीर,
कुसुम कमि, प्रति, विटप, सोम्बास
पसिम प्राकुम उस्कसित, पभीर,
भवनि, पस, मनिम, प्रमम, प्राकाण!
पान पन में पिक, पिक में गान,
विटप में कमि, कति में सुबिकास
कुसूम में रब रण में मग, प्राण |
सलिस में मार, लहर में मास !
देह में पुमा उरों में मार
भों में भग, दुर्गों में बाण,
अपर में प्रमृत हवय में प्यार,
गिरा में मान
प्रणय में मान !
तरुण बिटो से लिपट सूचात
सिहरती लतिका मुकुलित गात
सिहरती रह-रह सूब से प्राप,
मोम-मतिका बन फोमस पात!
गंप-गुणित
प्राय
बझे बाहों
में छायाप्रमोक
मर्मरित
पत्र-दस
मिए दुम, तुमको सड़ी विसोक]
हरीबांसुरी सुनारी टेर

मिस रहे नवम पेसि-तर, प्राण!
झुको-शुक हंस-हसिनी सग,
सहर सर सूरमि समीर विहान
मृगी-मृग, कलि मति, किरण-पतंग!
मिमें प्रमरों से मभर समान,
मयम से मयन, गात से गात,
पुलक से पुलक प्राण से प्राम,
भुर्गो से भुष, कटि से कटि शात!
प्रान तन-सन मन-मन हों सीम,
प्राग! सुख-सुम स्मृति-स्मृति पिरसात,
एक क्षण, मजिस विद्यावधि-हीन,
रस,
माम स्प प्रशात!
हरीबांसुरीमुनहरीर

मार, वण म्य, सग मृग, पिक, कीर,
कुसुम, कमि, प्रतति, विटप सोमास
पखित माफूल उत्कसित, प्रभीर
प्रबमि, बस अनिस, अनल, पाकाच !
माग पन में पिक, पिक में माम,
पिटप में कमि, कलि में सुविकास
कुसुम में रग रग में मष, प्राण |
समिस में सहर, महर में मास !
बेह में पुमक उरों में भार,
भुगों में भंग पूर्षों में बाग
मपर में अमृत हृदय में प्यार
गिरा में नाम प्रणय में मान1
तरुण बिटपों से लिपट सूपात
सिहरती मतिका मुकुमित गात,
सिहरती रह-रह सूख से, प्राण
सोम-मतिका बम कोमल पात।
गम-गणित
कृषों में
बैंभे वाहों
में हामाऽमोक,
मर्मरित
पन-दस
लिए दुम, तुमको सही पिसोक।
हरी बांसुरी सुनापौर

संग,
समान,
मिस हे मबस वेति-सर, प्राण।
शुको-शुरू,
हस-हसिनी
महर सर सुरभि समीर बिहान
मृगी-मृग, कलि-अलि, किरण-पतग !
मिले अमरों से प्रभर
मयन से मयन गात से गात,
पुसक से पुसक, प्राण से प्राण,
भुगों से मुन, कटि से कटि शात!
पाज तन-सन मन-मन हों मीम,
प्राण ! सुस-सुख स्मृति-स्मृति पिरसात,
एक क्षण, अखिल दिशावधि-हीन,
एक रस, नाम स्प प्रज्ञात!
हामुरी मुनहरी टेर

पतारा
स्प-साग तुम पूर्ण प्रकाम
ममेक्षिणि ! सापक-माम !
एक मावण्य सोक छविमान
मध्य ममम समान
उवित हो दृग-पप में सम्मान
वारिकाों की तान!
प्रणय का रच तुममे परिवेश
दीप्त कर दिया मनोनम-वेध
स्निग्म सौम्वर्य-शिक्षा प्रनिमेप !
प्रमद प्रनिन्ध प्रक्षेप।
उपा-सी स्वर्णोदय पर भोर
दिक्षा मुख कनक-किशोर
प्रेम की प्रपम मविरतम-कोर
वृर्गों में दुरा कठोर,
छा दिया यौवन-शिखर प्रछोर
रूप किरणों में वोर,
इरीमुरी मारी टेर

सजा तुमने सुख-म्वर्ण-सुहाग,
साज-सोहिस-अनुराग!
नयन-सारा बन मनोभिराम
सुमुसि,पय सार्थक करोस्वनाम!
तारिका-सी तुम पिण्याकार
पद्रिका की भकार।
प्रेम-पसों में उप अनिवार
पप्सरी सी लघु-भार,
स्वर्ग से उतरी क्या सोद्गार
प्रणय-हसिनी सुकुमार?
प्रदय-सर में करने प्रभिसार
रजत रसि स्वर्ण-विहार।
मारम निर्मलता में तल्लीन
पार चित्रा सी, प्रामासीन ।
पमिक छिपने में पुन अनजान
तन्वितुमने लोचन मन छीम,
कर दिए पसक प्राण गसि-हीन,
माज के बल की मीन!
स्प की-सी सुम पसिस विमान,
स्नेह की सृष्टि मवीन !
होबासुरी मुनहरी टेर
१७

हृदय-नम-वारा बन छविधाम
प्रिये ! अबसार्थक करोस्पनाम |
प्रपम यौवन मेरा मधुमास
मुग्म तर मधुकर,तुम मा, प्राण!
शयन मोपम सुधिस्वप्न विमास,
ममुर-संवा प्रिय-म्यान !
शून्य बीवन निसंग पाकाच
इ-मुख ई समान,
हृदय सरसी, चवि पप विकास
स्पृहाएँ मिल-गाम !
कल्पना तुममें एकाकार
कस्पना में तुम मार्को पाम
तुम्हारी मवि में प्रेम प्रपाय,
प्रेम में छवि मिराम?
माविम इन्छार्मों का संसार
स्वर्ण छवि में निजगढ़ छविमान,
बन गई, मानसि ! तुम साकार
देह वो एक-प्राग!
हरीमौतुरी सुनहरी टेर

गीत
पद मिसते मौन-नयन पल भर,
सिम-शिम प्रपतक कलियां सुदर
देसी मुग्म, मिस्मित नम पर! पप
तुम मदिर पथर पर मधुर प्रपर
परते, मरने हिम-कण झर झर
मोठी के चुवन से
मृदु मुकुलों के सस्मित मुख पर । पर.
तुम प्रालिंगन करते, हिमकर ।
नापटी हिलोरें सिहर-विहर।
सौ-सौ बाहों में बांहूँ भर
सर में, माकुम उठ-उठ गिरकर । अव०
हर्ष बामुरी मुनहरीर

पर रस मिनन होता सुखकर,
स्वर्गिक सुख स्वप्नों से सुवर
भर पाता स्नेहातुर होकर,
पग-ग का विरह विपुर प्रवर । बबन
हरी बांसुरी सुनहरीर

लहरों का गीत
मपने ही सुख से चिर परम
हम सिम सिल पड़ती है प्रतिपम !
जीवन के फेनिस मोती को
मे से पल-करतम में टममस ।
पाने किस मम का मसय परस
करता प्राणों को पुमकाकुम
भीवन की सहलह लतिका में
विकसा इछा के मव-मब दल!
सुन-सुन मम मुरमी की मृदु पनि
गृह-युसिन माप, सुख से विवस
हम हलस मुत्य करती हिल हिम,
धस-सस परसा उर से अधम !
पिर पम-मरण को हस-हंस कर
हम पासिंगन करती पस-पस,
फिर फिर प्रसीम ऐ उठ-उठकर
फिर फिर उसमें हो-हो मोमास !
परी बीमुरी मुनहरी टेर

हवा के भमोरों का गोत
हम पिर मदृश्य नमबर सुंबर
अपनी ही मधिमा पर निर्भर
पोभित मुर नीमाशूक तन पर,
स्मित तुहिन-बाप्प से पुसकित पर!
अपने ही सूच से सिहर सिहर
नम-बीगा के से स्थगिक स्वर
छा मेवे हम बग का प्रबर
महरा सहरों से महरों पर।
अपरों में भर प्रस्फुट मर्मर
सांसों से पी सौरभ सुबकर
फिरठे हते हम मिधि बासर
बद चित्रग्रीव पल असदों पर।
हम सांस-सांस में पास अमर
करते दुर उर-तर के भीतर,
२
हरी बांसुरी मुसहरी टेर
-४

बनकर फिर झमा से दुर्षर
दुत पीर्ण बगत दल लेत हर !
शिल उठसे पपम परस पाकर
पुमकों से पूण तस्वल सस्वर,
सग मिवसमा सहर
बांहों में कोमस बर्हि मर ।
नापती
ही बीमुरी मुनाटेर

मानधन मंडरित मान वन छाया में हम प्रिये मिले थे प्रथम बार, कार हरीतिमा-नम गुमित मीचे पंद्रातप एमा स्फार। तुम मुग्या थी प्रति भावप्रवण, उकसे ये मंत्रियों से उरोग पंपस प्रगल्म, हंसमुख, उदार मैं सतनातुम्हें पा रहा सोग। छनती पी ज्योत्स्ना पाशिमुम पर, में करता था मुस सुपा पान- कूकी पी कोकिम हिमे मुकुस, भर गए गंध से मुग्प प्राण ! तुमने अपरों पर परे अपर, भने मोमल बपु भरा गोद, हरीबीमुरी सुनहरी टेर

पा मारम समर्पण सरल, मपुर
मिस गए सहब मास्वामोद !
मंचरित मान बन के नीचे
हम प्रिये मिसे पे प्रथम वार,
मधु के कर में पा प्रणय-याण,
पिक में उर में पावक पुकार!
एपीमुरी बुनहरी टेर

विजन घाटी
बह बिबन पांदनी को घाटी
छाई म पन पर गंष यहाँ,
नीबू पार के मामों के
मद से मतमानित सदा बहाँ!
सौरम एसप हो पाते तन मम
विम्से झरझर मृदु सुमन शयन
जिम पर छन कंपित पर्षों से
सिमती कुछ ज्योत्स्ना यहां-तहाँ।
मा कोहिल का कोमल कूपन,
उकसाता पाकुस र कंपन,
यौवन का री, बह मपुर स्वर्ग,
जीवन बापाएँ वहाँ कहाँ ।
हरीमुरी सुनहरी टेर

प्राम युवती
उमद यौवन से उभर
मटा सी नव प्रसाद की सुन्वर,
पति श्याम वरण
पलभ, मदरण,
इठलाती माती ग्राम सुरति
वह गमगति
सर्पगर पर!
सरकाती पट
सिसकाती-मट,-
परमाती झट
बह ममित वृष्टि से देख रोमों के युग घट !
हंसती समसम,
प्रबमा पपस
ग्यों फूट पड़ा हो सोस सरम
मर फेनोग्बल दशमों से प्रमरों के तट!
हरीबीमुरी सुनारी और

वह मग में रुक, मानो कुछ झक प्रचित सेभामती फेर नयन मुख, पा प्रिय पर की प्राहट, मा प्राम युवक, प्रेमी यापक, पर उसे साकसा है कटक उल्लसिस, चकित, वह मेती मूब पसक पट! पमपटपर मोहित मारी मर! जब बस से मर भारी गागर सींचती उपहनी पह घरबस बोली से उभर-भर कसमस सिंपते सँग युग रस भरे सच- बल मलकाठी रस बरसाती, बसवावी बह पर को पाती सिर पर घट उर पर पर पट। हरीबीमुरी मुनहटेर कानों में गुपहल पोस, घबम या ई कनेर, सोष पाटम, वह हरसिंगार से कप संचार मृदु मौलसिरी के गूप हार, गठो संग करती बम विहार, पिक पातक के सँग व पुकार- वह कूद कांस से, ममलतास से पान मौर, सहमन पमाश से निर्जन में सम ऋतु सिंगार। उन पर यौवन सुपमाछामी मुख परयमक्रण रविकीसामी सिर पर पर स्वण सस्य गली वह मेहरों पर माती जाती उरु मटकाती, कटि मचमाती चिर वर्षातम हिम की पामी पनि श्याम वरण प्रति क्षिप्र परण प्रघरों से परे पकी बासी! रे दो दिन का उसका यौवन! बांसुरी सुनारी टेर ७१ पह मग में एक, मामो कुछ भुत पांचस समामती फेर मयन मुस पा प्रिय पद की माहट, प्रा ग्राम युवा प्रेमी यापक, अब उसे साकता है इकटक, उत्ससित, चकित, वह लेती मूंग पसक पट | पनपट पर मोहित मारी मर]- अब बस से भर भारी गागर सींचती उपहनी पह, बरबस पोसीसे उमर-उमर कसमस सिंघवे सँग युप रस भरे शमश- धम छलकाती रस परसाठी, वसवासी वह घर को पावी, सिर पर पट उर पर पर पट1 हरी मुरी मुनापटेर भवल कानों में युरहम शोस, या ऑई, कमेर, सोप पाटम, वह हरसिंगार से कप बार मृदु मौससिरी के गूंप हार, गरमों संग करती वन विहार पिक भातक के संग दे पुकार- पहर कांस से, ममसवास से माम मौर, सहवन, पप्ताश से, निर्गन में सन ऋतू सिंगार ! उम पर मौवन सूपमासासी मुस पर घमण, रविकी सामी, सिर पर पर स्वण अस्प गसी, वह मेरों पर प्राती जाती उह मटकाठी, कटि मराठी पिर वर्षातम हिम पी पाली धनि श्याम वरण प्रति क्षिप्र परण प्रघरों से परे पकी बाली! रेपो दिम का उसमापौवन! हरी मसूरी मुनहरी और 8

सपना ग्नि का
हवामस्मरण!
दुखों से पिस
दुर्विम में पिस,
पर हो बाठा उसका मन !
बह पाता प्रसमम यौवन पन।
बह पाता तट का तिनका
यो महरों से हंस हेमा कुछ मग !!
हरीमुममहहर

रेखाचित्र
चांदी की पोरी रेती
फिर स्वणिम गंगा पारा
मिसके मिश्वसर परविवड़ित
रन छाय नम
सारा।
फिर बालू
सा फैसा,
मासा,
समा प्राह र
छितरी
रेखा-
पछार फिर गया दूरतक मसा ।
जिस पर मछुमों की मई
पौ तरबूजों के
असर,
बीच-बीच में सरपत के मूठे
से होने
पीछे, बिमित बिटप पांति
महराई सौप्य क्षितिज पर,
हरी बासरी सुनहरी टेर

मिससे सट कर, मील घूम
रेसा क्यों सिंधी समावर !
मिसरे सुम्पर
बईपिन से वसद पंश
अंबर में
रग रग की हमकी गहरी
छायाएँ मिटका
सबसे ऊपर निर्धन मम में,
प्रपतक संध्या वारा
नीरव मौ' निसंग
खोजवासा एक पिर पपहारा!
साँझ-मवी का सूना तट,
मिमता है नहीं किनारा,
होग हा एकाकी जीवन,
साथी स्नेह
सहारा।
हरी बांसुरी मुनायटेर

स्त्री
यदि स्वग नहीं है पृथ्वी पर, तो वह नारी-वर के भीतर
वस पर दल घोस हदय के स्तर
पर विठसाठी प्रसन्न होकर
यह ममर प्रणय के शतदम पर।
मादकता जग में कहीं भगर वह नारी अषरों में सुखकर,
क्षण म प्राों की पीरा हर
नव जीवन का दे सकती घर
वह ममरों पर घर मदिरामर!
यदि कहीं नरक है इस भू पर तो यह भी मारी के प्रदर,
वासमावर्स में गस प्रसर
वह मंष गर्ने में चिर दुस्तर
नरको रकम सकती सरबर!
बांसुरी नहीं है।

मार
विदा हो गई साँझ विनत मुख पर मीना प्रापल पर
मेरे एकाकी पांगन में मौन मधुर म्मृतियाँ भर
बह केसरी दुकूम प्रमी भी फहरा रहा मितिण पर,
मष प्रसार के मेों से पिर रहा बराबर भार!
मैं बरामदे में मेटा शय्या पर पीड़ित पवयब,
मन का साभी बना वादों का विपार है मीरम !
सक्रिय यह सफरुण पिपाव – मेषों से उमर-उमडकर
भावी के बहु स्वप्न, भाव बहु म्पपित कर रहे मवर!
मुखर विरह दादुर पुकारता उत्कठिस भेकी को,
गहमार से मोर सुभाता मेष मुग्न केकी को
पामोक्ति हो उठता सुस से मेपों का मम पंचस
मतरतम में एक ममुर स्मृति बग-बम उठती प्रतिपम !
कपित करता पक्ष परा का पन गभीर गन स्वर
भू पर ही मा गया उवर शप्त मारामों में प्रमर !
८४
हरी दोमुरी सुनहरी और

भीनी मोनी माप सहन ही सांसों में घुममिल कर
एक मोर भी मधुर गप से हृदय दे ही है भर !
नम प्रसाद की सन्ध्या में मेों के तम में कोमल
पीड़ित एकाकी पम्या पर पत मावों से विदास
एक मपुरतम स्मृति पस भर विद्युत सी वलकर उम्पस
याद दिलाती मुझे हृदय में रहती गो तुम निश्चल !
हरीबीमुरी सुनारी टेर

प्रगठिता
पी
ममम बता पाऊँगा
वह सी पी!
प्रपम प्रणय पी मासों ने पा उसको देखा,
यौवन उदय
उपा
का
प्रणय की पी वह प्रपम सुनहमी रेखा !
प्रबगुठन पहने,
नया बाने मग पिक से कहने
मौन मुकुत सी मृदु मंगों में
मधुश्तु वंदी कर लाई थी!
स्वों का सौन्दर्य कल्पना का मापुर्य
६वम
में प्राई पी।
मह सी
पी
वह न कपा माळेगा
बह बैंसी पो।
ब
हरी बाँसुरी सुनारी

'क्या है प्रणय! एकदिन योमी 'उसकामास कहाँ है?
इस समाज में? देह मोह का
देह द्रोह का पास गहाँ है?
'वह महीं है परिषि प्रणय की,
प्रणय दिम्म है मुक्ति हृदय की
यह प्रनहानी रीति
देह बेदी हो प्राणों के परिमय की।
'बंकर हृदय मुफ्त होते हैं
धपकर वेह यातना सहती
मारी के प्राणों में ममता
बहती रहती, बहती रहती।
नारीका न मां का तन है,
पाति वृति के लिए विनिमिव
पुरुप प्रगय अधिकार प्रगय है
सुख विसासक हित सस्कठित !
"तुम हो स्वप्न सोग के वामी,
सुमको केबम प्रेम चाहिए,
प्रेम तुम्हें पती में प्रवसा
मुझको परकी क्षेम पाहिए।
"हृदय सुम्हें देती है प्रियतम,
सकसी,
ही बांसुरी मुनहरी और

मिसे देह दूपी पय मिश्चित
स्नेह नहीं दे सकती।
मत विदा दो मन के सापी
तुम मम के, मैं भू की वासी
नारी तम है सम है तन है
हे मन प्राणों के प्रमिसापी।
नारी देह शिक्षा है पो
नव देहों के नव दीप संगोसी,
जीवन जैसे देही होसा,
बो नारीमय बेह न होती?
'तुम हो स्वप्नों के द्रप्टा, सुम
प्रेम शाम मौ सस्य प्रकाधी,
मारी है सौन्दर्य प्राण
नारी है स्प सूचन की प्यासी ।
'तुम जग की सोपो म घर की
तुम अपने प्रमु, मैं निब पासी
मग्गा पर न तुम्हें प्रासी,
बन सकते नहीं प्रेम संम्पासी?'
'विदा! विदा।
'शायद मिम पाएं यदा कदा !
हरी बांसुरी सुनहरी टेर

'तुम बामो
मैं बोला
प्रसन्न मन पाम्रो, मेरा प्राची
उसके नयनों में मांसू थे
प्रघरों पर निश्छल हाँसी ।
यह क्या समझ सकी पी उस पर
क्यों रीमा पा यह मारमातुर
स्वप्न मोफकावासी।
मैं मौन
फिर स्वत
'यस्ती बापो, यहती जामो
बहती बीवन धारा में
शायद कभी लौट भामो तुम
प्राण पन सका प्रगर सवहारा में।'
हरीयोमुरी मुरारी

स्वप्न सती
भामो हेचिर स्वम ससी, माकुम घंटर में मामो
फूलों की मप कोमलता में वीयम का निपटामो ।
इन प्रिय स्नेह सरों में पपम घरद मीसिमा पागुत
पपर हंस पड़ों से मुक्ति सरसिद श्री परसामो।
इस प्रवाल प्यासे की मधु मदिरा समि तर मादन
तुहिन फेम स्मित स्वभिम प्रीति सुधा पट मुझे पिमानो।
स्नेह मवा-से पुमक पाश में कस मूमों के कोमल
उर में मुमपुर उर सी, दम में सन सी मम समापो !
सुरमित सांपों के पलने में मर्म स्पृहा कर दोमित
फूमों के मभु सिसरों पर प्रार्गों के स्वप्न सुमामो ।
इन मसिम पपक झरनों से सिपर्टी विपुत् मपटें,
प्रषय उदधि में प्रेसर की ज्यामा को पतन सापो !
मेटा नव मागण्य चादनी सामान में
शिसती कमिकामा की सोमा कोमम सेन समामो।
स्वप्नों की पी सूरा मात्र यौवन बाये विस्मृति में,
पंचम विद्युत् को समग्य म्पोरस्ना के मा मगायो ।
पापो हे प्रिय सप्न सपिनी, पाकुस तर में प्रायो।
हरीबांसुरी नहर

मारी मग
पृषक न अधिक रहा नारी पग
घरे पुरुप के सँग उसने पग
रंग सरगित जिसकी भी से
कुसुमित सुपमिव बग का मरु मग!
गुड़ियों के संग प्रिय किशोर क्षण
बीते, तर में भर मधु कपन,
सीच कुसुम पन सन, यौवम ने
किया म
सम्मोहन दर्पण!
वक्ष श्रोणि ने बद कटि ने उंट
सौष्ठव रेखाएँ की सपित
मुष नयनिमा समय मामिमा,
पर बडिमा में तरुणी पिषित!
छोमा फॅपची लहरी घी उठ
हुई यह समिमा में स्तमित,
देस मुकर-से सम में निरा मुख
रही मधुरिमा छमि से विस्मित!
मांसुरी मुमारी टेर

कोमलता का
कल्पलता सो
अंगमगि में हुई प्रस्फुटित
सुन्दरता ही प्रीति सूलि से
बनी मोहिनी प्रतिमा पीवित ।
हए स्पसी के नव पवयव
यौवन के प्रातप में विकसित
मधुर स्त्रीरब में पातु कल्पना
सूचन पसा के कर से मूर्वित ।
पगा समज पेष्टापों में अब
मय सीमा सापण्य प्रकल्पित,
पसक मुकुटि प्रगुमि वामन में
छवि की दोप शिखाएं कपित।
तिमिर ज्वाम सा के पास पन
पृष्ठ देश पर हुमा प्रग्यमित
मामा जीपी मयों को कर
कोमल शोमा-सम से मोहित !
स्वप्नों से मुंफित यमुना धम
गाय मोलतम हुमा तरंगित,
सौस से रहे फूमों के रंग
सौरभ की कवरी में दोमित ।
कोषम पी ठप ज्यसित कामना
उसी सपन सपनों में दोपित
हरी बांसुरो तुमारी

वनी कठोर कुसुम कोमलता
योणि मार में हो चिर पुषित !
पाहू ससाए फूल पाछ
पुसकों में हो उठी पल्सवित
कोमस करतस पचल पदतम
जीवन के पावक से रेजित।
रूप शिखा को श्री सुपमा से
हुए गेह प्रांगन पालोफित
पावायन में उपित कसा शशि
गृह-मूह के गवास घिर घोभित ।
कलि कुसुमों ने भूतम को रंग
किया शोमना के हित सग्मित,
उर की सांसों में बहने को
वना समीर गमवह सुरभित !
ज्योत्स्ना सकुषी उपा मगाई,
रहों द्वारिकाएँ क्यों विस्मिठ,
स्रोत बहे सरसी लहराई,
निसिल प्रकृति भी हुई प्रभावित !
हरपासन पर बिठा प्रेम ने
दिया प्रमर स्वप्नों से पूचन
समा स्वग में स्वर्ण पटों में
स्मोस्त किया मर्य मुन्न बंधन
हरीबापुरी मुनारी टेर

दो टुकड़ों में सिमिट नीमिमा
रही मौन मयनों में प्रपमक,
ममा प्रपर मव प्रणय वपन से
गए मासिमा से दुहरे रंग !
सिमती कमियों ने मार्दन भर,
कोकिल मेरे गीत सवित स्वर,
मोहक उसे किया ग्योत्स्ना ने
गोपन लम्बा में बेष्टित कर ।
मे
फूल ज्यास से भावृत्त
किमा परर ने लेखा-मुस स्मित,
मणि मुमतामय सनि सागर ने
मू ने स्वर्ण रजत से मात !
बगा हदय में प्रीति वर्प मग
खत-शत नयनों से हो लक्षित
हाय भाव में मपुर सयमन
पोमा तन
सग्मा से संवृत।
तापित् गर्म सुरपन कसरी मन
ज्यों कवार्य होता मू पर कर,
मभुर प्रप्सरा बनी पनी प्रय
कुम प्रदीप से ग्योतित कर घर ।
मात् स्नेह परसा नम गिनु पर
मुग्ध प्रणयिनी हुई मिठाबर,
सहपर्मिणी पनी पह प्रिय की
सुस दुख को मंत्री, चिर सहपर।
हरीमाँसुरी मुनारी टेर

मर्म कपा
दोष दिए क्यों प्राण
प्राणों से।
सुमने पिर मनमान
प्राों से!
गोपन रह न सकेगी
प्रव यह मम कपा
प्रार्मों की न रुकेगी
बढ़ती विरह म्यपा
विवश, फूटने गान,
प्राणों से!
यह विदेह माों का बंधन,
प्रतम्बामा में तपता तन!
मुग्ध हत्य, सौन्दर्य पिता को
दग्म कामना करता मर्पण!
रीमुरी मुनहरी और
.

महीं चाहता मोफुछ मी मादाम
प्रामों से!
पांप दिए क्यों प्राण
प्रामों से।
हरी बांसुरी मुनहर

प्रणय कुम
तुम प्रभय कृम में पब माई
पल्लवित हो उठा म यौवन
मरिस हृदय की पमराई।
मसय हुमा मद बस
महराया सरसी मन
पनि गूंज उठे, पिझपनि पाई।
प्रद वह स्वप्न प्रमोचर,
मर्म म्पपा, मथित करती अंतर,
प्राणों के दम
मापुस मर्मर।
पिर वियह मिमन में भर माई
तुम प्रणय पुर में पब माई।
दरीमुरी मुमारी

पारव धांधनी
घरद पावनी।
मिहंस उठी प्रतम मोम
मीमिमा उदासिनी!
पाकुस सौरभ समीर
एस-एम बस सरित मीर
हाय प्रणय से प्रभीर
जीवन सम्मादिनी!
मधु सजम वारक बस
अपमक दुग गिमते पम
में ही प्राण विक्रम
विरह वेणु वादिनी!
पपी कुसुम कमि पर
जमे रोम सिहर-सिहर
अधि प्रसि सी प्रेमसि स्मृति
पगी हरय सादिनी!
शरद पांदनी!
हामुरी सुनार

मर्म म्यपा
प्राणों में पिर म्पपा बांध दी।
क्यों चिर दम्पदय को तुमने
वृपा प्रमय की अमर साष दी।
पर्वतको बस दार को प्रनस
बारिद को दी विद्युत् पपल,
फूलको सुरभि, सुरभि को विकम
उड़ने की इच्छा भवाष दी।
पसँगे,
हृदय दहन
प्रामों की व्याकुल म्यथा गहन ।
यह सुमयेगी होगी म सहन
चिरस्मृति की पबास समीर मापदी!
प्राण
देह जमेगी,
मर्म स्पया की मपा रोगी
सोने सी तप, मिनरेगी
प्रेयसि प्रतिमा, ममता मगाष दी!
प्राणां में पिर प्पमा बौपदी!
हरी बांसुरी मुनहर

तुम्हें देखने घोमा ही ग्यों महरी सी उठ माई,
अंग भंगिमा तनिमा पन मृदु देही बीच समाई,
कोममता कोमम अंगों में पहिले तन पर पाई।
फूम सिम उठे तुम वैसी ही भू को दी विसमाई,
सुन्दरता पसुभा पर खिम सौ सौ रंगों में छाई,
छाया सी ज्योत्स्ना सकृषी प्रतिछबि सी उपा मगाई।
एम में गो मावण्य मपुरिमा, पो असीम सम्मोहन
तुम पर प्राम निणर करने पागम हो उठता मन !
महीबामती क्या निगमलतुम निरमपार माकपम?
माम लिया तुमने प्रामों को प्रगय स्वप्न बेपन में
तुम बानो क्या तुमको माया मर्म छिपा क्या मन में
जम्द्र पनुप बन कर हँसती तुम मषु वाप्प के मन में।
हवामुप सुमार

स्वप्न हो
स्वप्न देही हो, प्रिये
तुम
देह पनिमा मथु मोई !
स को सौ सी सुनहली
दीप में तन के संजोई।
सेब पर
लेटी सुपर
सौन्दर्य साया सी सुदाई
काम
स्वम सी
स्मृति वस्प पर तुम दी दिसाई।
कल्पना की मधुरिमा सी
भाव मृदुता में खोई!
देह में मृदु वेह सी
उर में मपुर उर सी समा कर,
सिपट प्राों से गई तुम
चेतना सी निपट सुन्दर।
होगीमुरी नुनहरी टैर
.

प्रेम पसों पर प्रकल्पित
रूप की सी स्वप्न सोई।
विरम पट से
मिस ममकरते हदय मोहित,
सरित बल में तैरती पों
नीस पन
छाया तरंगित।
काम पम में प्रगम ने हो
कामना की बेमि बोई!
मालसा -तम
कुम्तों के बाल में प्रम
पर्यो म होता प्यार प्रमा
छवि प्रपार निहार निरुपम !
मर्म की प्राकुस वृपा तुम
प्रणम वासों में पिरो!
स्नेह प्रतिमा सी मनोरम
मर्म इभा से विनिमित
हृदय शवदस में सवत तुम
मूमती प्रमिमाप स्पंदिरा !
सार तत्वों की बनी तुम
देह भूतों वीष मोई।
हरी बांसुरी मुनाइटेर

दषय तारण्य
माम मंदरित, मधुप मुंगरित
यंप समीरण मंद संपरित।
प्राणों का पिक मोल उठा फिर
घंटर में पर पवास प्रज्वलित !
गगताम पर दौर रही वह
स्वास रंग रंगों में समित,
नस नस में पर दधिर प्रवाहित
उर में रस बरा गीत तरंगित ।
सन का योपन महीं हृदय का
पौवम रे यह पाप उम्मसित,
फिर जग में सौन्दर्य पस्कषित
प्राों में मषु सप्न पागरित !
माम मचरित, मधुप गुंतरित
गष समीरण मध संचरित!
प्राणों में पिक योस उठा फिर
विधि-दिषि में करग्वाम प्रग्वमित!
हरीबांसुरी सुनापौर

मामसी
[पापुस्प नारी कारपक है। पम्प में पीत वाच दृश्यों के पनुम्म
पेप भिन्यास पिकमिमम भोप का पपीहा विएस्सार का प्रतीक है।
मारिया सामीन पो के वस्त्रों में गोपिकाएँ पटकीने मवे मामों पौर
पोनियों में मिम मिमुषियो केसरी पौर मेस्ने सबारी में तमा पाणु
निकाएँ विविध प्रान्तों में तुरंग सुचिपूर्ण परिवानों में नाचती है। प्रतिम
दरों में भविष्य निर्माता पक भमिक पा मम्प रम बों के पुषक
सो पौर बाकी बाबी में एवं सस्कृति को संविधवाहिकाएँ नम पुरविमा
रंगीन रेसमी बालों में नृत्य माट्य एवं पभिनय करतोयहाँ परमे पिक
पावक सपा युवक युपती की पारमा के पौठवहां प्रपन की सुविधा
असार पन्म सुपक युगतियां भी सहायक हो सकती है।
(१)
युवक
पिक गापो!
मम जीवन के पारण बन
नव प्रणय पषा परसापो !
पिक गाग्रो।
हरीमांसुरी मुनापर

प्रीति मुक्त हो, बने म बम्पन,
विरह मिसन देखें भासिंगम
हो प्रतीति-मन मर नारी जन
विशि-दिशि ग्वान अलामो!
भाग वसत विधरता मू पर
मद पल्सव के पंसमोस कर,
मबम पेतना की स्वपिम रज
मंग समीर,
उगमो।
कीम दणि तुम हसी रंगीमी
विहराती पासू से गीली ?
भीवन गस, प्रिये कंकरीली
प्रामो, पर, तुम मामो।
पिप गामो!
(२)
पिक
मौरी पी यौवन प्रमराई,
गम मद पोतन पुरवाई,
यह मुग्धा पीयन में पाई,
मरम्पा सा सहन समाई!
फूर्मों का उसका कोमल वन,
चौरम की साँसों का मदु मन,
हामुरी हुनहरीर

रोपों रोमों में भासिंगम,
चित्र सिधी पी स्प मुनाई।
कुटिम केंटोसा इस जग का मग
रंगे हषिर से जीवन के
पीरा की प्रेमी की रग - रम
म्यमा प्रेम की ही परगा।
पग
प्रेमी प्रेम को मिमा छाप रे
मनस्ताप वह, मनस्ताप रे
जग जीवन के लिए पाप रे
नम में दिए पटा पिरमाई!
युवक
तुम पामो ससि मामो !
पाप शाप से वो प्रिये तुम
तापन चर में पामो ।
तुम बाप्रो।
प्राप, प्रणय विप पाम मत परो
प्राणों को दे प्राण मत हरो
हरी बाँसुरी मुगहरी टेर

प्रियका उर में ध्यान मतभरो,
पप में
मत पिलमानो।
भय तक बीवन में पसस है,
यौरन में मुकुमित दिगत है
माथा सुस सपने मनत है,
प्रिय
का मोह भुसापो।
तुम पामो।
युवती
असे तुम हो, वैसे ही पन,
बही हृदय, छवि मोमी सोचन,
पही प्रणय का ताप है गहन,
तुम मत हृदय दुसापो !
प्रिय, प्रायो।
किसको रे बह ऐसी समता
रोक सके प्रारों की ममता,
यह स्वभाव मन का, यह रमता,
मुझको राह सुभ्यमो
प्रिय, मानो।
युवक
फूलों की मृदु देह तुम्हारी,
कोर्टी की कटु गैस हमारी,
हरीयोमुरी मुनहरी टेर

रोमों रोगों में प्रामिमन
विष मिसी पी रूप समाई।
कुटिल केटीसा इस जग का मग
रंगे पिर ये भीवन के पग,
पीड़ा की प्रेमी की रग रग
व्यपा प्रेम की ही परछाई।
प्रेम? प्रेम को मिमा शाप रे,
ममस्वाप यह मनस्ताप
जग बीवन के लिए पाप रे
नभ में विरह पटा पिर माई!
र!
युवक
तुम बानो ससि मामो !
पाप पाप से वो प्रिये तुम
ताप न उर में पामो!
तुम पाम्रो।
प्राण प्रमय विप पान मत करो
प्रार्मों को दे प्राम मत हरो
हरी बांसुरी सुमारेर

प्रिय का उर में ध्याम मत भरो
पप में मत बिसमामो!
पव तक पीवन में वसंत है,
पौरन में मुमित दिगत है
माशा सुस सपने प्रनत है,
का मोह मुनामो!
प्रिय
तुम मामो।
युवती
मसे तुम हो बसे ही बन,
वही हृदय, छवि लोभी सोचन,
वही प्रमय का ताप है गहन,
तुम मत हृदय दुखामो !
प्रिय, मानो।
किसको रे बह ऐसी क्षमता
रोक सके प्रारों की ममता,
यह स्वभाव मन का, वह रमता,
मुझको सुझामो!
प्रिय पामो।
राह
युवा
फूमों की मृत् देह तुम्हारी
काटों की कद पैस हमारी,
हरीबीमुरी सुनारी और

प्रगप ताप पति दुसह प्यारी,
वृषा न हपय मुमामो !
पुम बानो।
प्रणय प्रपिर दो दिन का सपना
उनका सपना, मन का सपना
सुन म
सर्वगा प्रिये कमपना
अपना
सुस न गवामो।
तुम पामो!
सपनाम
(४)
पपीहा
पी कही
प्रेम बिना सूमा पग
जीवन
प्रिय के मधुर प्रतीक्षा के क्षण,
परसामो प्रिय स्वाति सुपा कम
पाट मोहता विश्व यहाँ ।
प्रेम बिना बन है बीवन-मृत
प्रेम बिना अपने में सीमित,
मिमता पहाँ प्रणय परमामुत
मृत्यु म प्रावी पास वहाँ ।
दरीबानु मुमारी

प्रेम नहीं प्राणों का ममन,
प्रेमन मस्पिर विरह मिसन क्षण
प्रम मुक्ति है प्रेम ही सुमन
सुख दुख में मानन्द वहाँ !
प्रेम वृष्टि में कर भवगाइन
बनो भीत प्रणयी पिर पाबन,
यहाँ हृदय में भगन, स्वाति धन,
परसेंगे हो विवश वहाँ।
प्रेमी के मांसू के हो पन
प्रेयसी की स्मृति के विद्युत् प्रण
चिर मतृप्ति की उर में गर्मन,
विड मिसन बन जाय महा!
युवक
तुम माती हो तो मामो, प्रेयसि, मामो,
बीवन-पद में सौन्दर्य किरण बरसापो।
यह सब है, सूना प्रेम बिना पग बीवम,
मरमारी उर का प्रणय भार कटु वषम
तुम छाया नारी से मानकी कहामो!
तुम विरह मिमन से मुक्त प्रणय बन मामा,
तन भोति रहिस, मप जीमम को अपनाना,
निब हपय मापुरी में पग को नहमाप्रो।
हरीबीमुरी सुनारीर

तुम सुमन शक्ति बन मेरे उर में गाना
तुम घिर प्रतीसियन जन मन में घुम बाना
प्राणों में स्वर्गिक सौरभ मधुर बसामो!
जन एक प्राम दो देह अभिन्न हृदय हो
प्रत्यय हो मम में संघम नहीं उदय हो
उरकी उर, बीबम की बीवन बन पामो
तुम मावी हो तो प्रामो प्रेयसि पामो!
युक्ती
में पाती बीवन पाती हूं प्रियतम
हवयों का प्रम प्रकाश नहीं वन का दम
तुम मोम हदय पट प्रिय फिर मुझे मुसामो
युवक-तुम मामो मानसि मामो प्रेयसि मानो।
प्रिम में हो सीता में सावित्री राधा
हरती माई जग जीवन पथ की बाधा
पा मात धक्ति बन मगम, प्राण ममामो ।
युवक-प्रामो हे पाभा देही देवी पापो !
में मार्गी, पोपा सूर्या मदिति प्रवीणा
भारती मामती मम्मी मना मवीमा
धन बन के उर में तुम माहान उठामो!
पक-पामो है, युग की विस्य विमा बम प्रामो।
मैं दुर्गा सदमी कामी पावन बरणा
में भक्ति पक्ति सौन्दर्य मापुरी करमा
हय बानुरीतुनहरीर

तम का विनाश, युग का निर्माण फरामो।
युवक-पापो हे जग बीवन पात्री तुम मामो !
कम से मुम पर घर मग्मा का भयगुग्न,
में बनी मनुष की मोह मासना की तन
मैं तुम्हें शक्ति देती म्पवमान हटाभो,
युवक-मामो, स्पा धन, मनवगुठिसे, भामो !
तीसराय
युग-युग के
(६)
युवती
मैं माई, फिर प्रियतम, माई!
रूपों की मेरी
देखो तुम छिपती परछाई !
तुम क्या मर पे, मैं मया नारी,
मधू पपीना, पति अधिकारी
तुमने मेरी फूस देह पर,
तप्त मालसा सेव समाई।
मैं मानवी मान बन भात्री,
मानव सहपरि जीवन छात्री,
भीत न होमो, प्रिय, भय मारी
बागृति की मंगड़ाई।
मुम्को प्रव नारी वन पोना
देह मोह निब तुमको सोना,
हर्ष बांसुरी सुनहरी टेर
मेठी

तुम सुजन शक्ति बन मेरे उर में गाना
तुम चिरप्रतीति बन बन मम में पुम पाना
प्राणों में स्वर्गिक सौरभ मधुर बसामो!
पन एक प्राण, दो देह प्रभिन्न हृदय )
प्रत्यय हो मन में संशय महीं उदय हो
उरमी उर बीवन की बीवन बन बामो
तुम पाती हो तो मानो प्रेयसि मामो!
युवती
मैं पाती हूँ जीवन पाती हूँ प्रियतम
हवयों का प्रेम प्रकाश महीं उन का दम
तुम मोम हदय पट प्रिय फिर मुझे मुलामो
युवक-तुम मामो मानसि मामो प्रेयसि मामो!
प्रिय में ही सीता मैं सावित्री रापा
दूरती माई जग जीवम पप की बापा
पा मातृ शक्ति, पम मंगम प्राण ममामो।
युवक-पामो हे मामा ही देवी पापो!
मैं गार्गी भोपा सूर्या अदिति प्रवीणा
भारती मासती मम्मी सना मबीमा
बन बन के उर में तुम माहान उठायो ।
युवक-पामो हे, युग की दिम्म विमा यन मामो!
में दुर्गा ममी कामी पावन परमा
में मक्ति धक्ति सौन्दर्य मापुरी करुमा
हरी बांसुरी हुनाहरी टेर

वम का विनाश, युग का निर्माण करामो।
युवक-मामो हे, मग जीवन पानी तुम भाभो !
कर से मुख पर पर सण्या का भयगुठन,
में मनी मनुन की मोह पासना की वन,
में तुम्हें शक्ति देतो म्यममान हटामो,
युवक-मामो, रूपा बन, पनवगुठिसे, भामो !
तीसरा दृश्य
युवती
मै माई, फिर प्रियतम, माई!
मुग-युग के स्पों की मेरी
देखो तुम छिपती परछाई !
तुम क्या नर थे मैं क्या नारी,
बमू प्रथीना, पति अधिकारी
सुममे मेरी फूस देह पर,
तप्त सामसा सेन समाई।
मैं मानवी माग
बन पानी,
मानब सहपरि, जीवन छात्री,
भीत म होमो, प्रिय, मब नारी
मेती मागृति की अंगड़ाई।
मुझको प्रय नारी
तन मोना,
वेह मोह निम तुमको खोना,
हबानुरी मुनहरी टेर

मैं यदि फिससूगी मुग पप पर
प्रिय,
उत्तरदायी।
तुम होने
सिसका
माव यह की छाया
पामा पुन बनेगी माया
संस्कारों की प्रति परा पर
स्वर्ण मति माएगी स्थायी !
युग-युग के स्पों की
मेरी
देसो, प्रिय, हिमती परछाई ।
सीता राम सीता राम
क्या पाम है प्रगाम ।
हम मर छापा, कुल मारी,
पतिव्रता, पति की प्यारी
गुह दासी, सुत महतारी
कमह परिचा मरियारी
सग्ना सज्जामय गुण प्राम,
सीता राम, सीता राम!
सब पर से बाहर बासी
एईमुई सी कुम्हलातीं
देस बों को सकुचाती
मयन सामसा उकसावी !
हरी बाँसुरी मुगहरी और

परती निठ पर सब काम,
सीता राम, सीता राम !
युग-युग से हम मनगुम्ति,
गृह की दीप शिक्षाम्पित
देह मोह में ही सीमित
पुष्प मात्र से प्रातकित !
बिपि सदव से हम पर वाम,
सीता राम, सीता राम!
कौन बगाता हमें सामन
उरकेतम में भर कम्पन,
दवा रात में पावन कम
उसे जगाद भाग पवन।
प्रभु प्रबमा का में कर पाम
सीता राम, सीता राम !
(6)
राधे श्याम, राधे श्याम,
विश्व स हे मसाम !
पाई पी
एक बार
हम तन मन प्राण बार
सुन मधु मुरमी पुकार
छोड़ नेह गेह द्वार
हबीमुरी सुनहरीर

वन निज सब काम काम,
राधे स्पाम राधे श्याम !
यमुना की कप्त तरंग
पनी पपम मुकुटि मंग
भंग-मंग में ਰਸੀ
मृत्य गीत रास रंम,
मषरों पर मधुर नाम
राधे श्याम रामे स्पाम |
वही गीति काम्य भार
रस के निझर प्रपार,
संतति यह भी बार
जीवन या नहीं मार,
जन मन पे पूर्ण काम
राधेश्याम राधे श्याम !
निशिस मायिका ससाम
हम प्रम की रही बाम,
प्रीति रीति में प्रकाम
बिकी बधी बिना
मपुर
भाव में प्रकाम,
रामे श्याम राधे श्याम I
हरी बांसुरी मुमहरीर

कौन मान
यह कुमार
करता फिर से प्रचार,
किसलिए कुमीन मार
करे फिर घरामिसार?
ऐसा वह कौन काम,
राधे श्याम, राधे श्याम !
बुर की
धरण,
भरण,
संप की धरण
घम की
।
इच्छा मानव दुस का कारण
इम्छा का यदि करें निवारण
वो बग बोवन हो फिर पावन
पिर निर्वाण मिमे भवतारण |
गुर को घरण,
सेषा ही हो बीबम का व्रत,
सेवा ही में हो पोवन रत,
सेवा हित मो हो मस्तक मत
बोधिसत्व के मिर्ने सुपि परम !
दुख की धरण
हरांमुरी मुनारीहर

तण निम सब काम काम,
राधे श्याम राधे श्याम ।
यमुना की कस घरग
बनी पपस भृकुटि भग
प्रग-गंग में उमंग
रास रंग,
प्रघरों पर मपुर माम
राधे श्याम, राधे श्याम |
नृत्य गीत
मही गीति काप भार
रस के मिर्मर अपार
संसति बह पी उपार
जीवन मा नहीं भार,
बन मन पे पूर्ण काम
राधेश्याम राधे श्याम !
निखिम मायिका ससाम
हम बन की रही पाम,
प्रीति रीति में प्रकाम,
बिकी भी बिना दाम
मपुर भाव में मकाम
राधेयाम राधे श्याम !
परीयांमुपे सुनारी और
--

कौन पान
यह पुमार
करता फिर से प्रचार,
सिसिए कुलीन मार
करे फिर पराभिसार?
ऐसा वह कौन
राधे श्याम राधे श्याम !
सरण,
धर्म की दरण
सथ
की परण
इच्छा मानप दुर का कारण,
इच्छा का यदि करें निवारण
ठो पग पोषन हो फिर पावन
पिर निर्माण मिसे भव तारण
बुट को घरण
सबा ही हो बीवन का प्रत,
सेवा ही में हो जोबन रख,
सेवा हित पो हो मस्तक नत
बापिसरव के मिलें पुपि परण!
बुर की परण,
हर्ष बीमुरी मुनहरी टेर

जीव मात्र पर बरसे कपणा,
मामब उर में हरसे परुणा
सेवा के हिव तरसे करुणा,
मिटें शोक सब जम्म रुन मरण !
पुर की धरण,
छोगे हे मिथ्या माया
रोग बरा मम मृत्यु के विहग
पको मिक्स मिक्मणी का मग
जीवन की भय भीति हो हरण!
पुर की धरण
किन्तु सम्वसित हो रह रह मन
प्रागों में मरता मों जवन,
स्वप्नाकुल क्यों होते मोचम,
मिासु, माठ क्या तुमको कारण?
मुर पी धरण,
धर्म की प्ररण,
सप की धरण।
नेपम्प गीत
जीवन में जितना योगे उतना ही तुम सकतामोगे,
ममु में सिपटा कर पंच मधुप, फिर सहन नहीं उर पामोगे!
हरी बांसुरी सुमार

सूत्र को तृष्णा मनतो विपाव सुख दस में मो तुम धीर रहो,
दुख में तुम एकमा सोलोगे प्रिय, सुस में परण महामोगे!
बो सहज र मेते जग में, भागे पढ़ पार नही पाते,
तुम रेमे नाससा रंग में पो, गेरुवा पहन के नामोगे।
प्रासक्ति पिरमित मकेसे ही घूघट पट महीं उठाएगी,
यो निरत हुए पम्वामागे, बो विरत हुए क्या पामोगे ?
रति पौर मिरसि के पुसिर्मों में बहती पीवम रस पारा
रति से रस मोगे पौर विरति से रस का मूस्य मगामोगे ।
मारी में फिर साकार हो रही नव्य पेतना पीपन की
तुम त्याग मोम का सूबन मावना में फिर मवल गामोगे !
(११)
स्प शिखा
मामुनिका!
फूलों की तम-सूबास,
महर्षे का परण मास
शक्षिका मप सूपा हास
वियु का पू विमास
स्म शिक्षा!
माप्त पर न दि सुपर
मांग में म सेंदुर पर
इस बीमुरी नुनहरी टेर

बीच मात्र पर परसे पपणा,
मानव सर में हरसे कएगा,
सेवा के हित तरसे करुणा,
मिटें शोक सब पम व मरम
बुध की शरण,
।
छोड़ो हे मिथ्या माया
रोग परा भय मृत्यु के विहग,
पकड़ो मिक्स भिरमुगी का मग
जीवन की भय भीति हो हरण !
गुर की धरण,
किन्तु उचित हो रह रह मन
प्राणों में भरता पर्यो मदन
स्वप्नाकुम क्यों होते मोचन
मिक्स, सात क्या तुमको कारण?
गुट की सरण,
धर्म की एरण
सम की परण!
बोचा प्राम
मेपम्य गीत
भीमन में जितना बोगे उतना ही तुम उकतामोगे,
मपु में सिपटा कर पंस,मपुप फिर सहन नहीं उर पामोगे!
हाँसुरी मुनहर

सूस की तृप्मा मनतो विपाद,सुख दुख में भो तुम पीर रहो,
दुस में तुम एकमा सीसोगे, प्रिय, सुख में चरण पड़ामोगे।
यो सहन र मेते बग में, मागे बड़ पार वही पाते,
तुम ये सामसा रंग में जो, गेरुवा पहन के पामोगे !
मासपिस विरक्ति मकेले ही धूपट पट नहीं उठाएगो,
बो निरत हुए पछतामोपे, पो विरत हुए क्या पामोगे?
रति मौर विवि के पुसिनों में महती जीवन रस की पारा,
रवि से रस मोगे पौर विरति से रस का मूल्य लगामोगे ।
नारी में फिर साकार हो रही नव्य चेतना जीवन की
तुम त्याग भोग को सुमम मावना में फिर नवस खामोगे !
(११)
रूप शिक्षा
प्रानिका!
फूर्मों की सुन-सुवास,
महरों का परम सास
राशिका मषु सभा हास
विपत् का पू विसास
स्प शिक्षा।
माप्त पर म बदि सुपर
मांग में म संपुर पर
हामुरी नुनहप टेर

भग
बीष मात्र पर परसे करुणा,
मानर उर में हरसे करपा,
सेवा के हित तरसे करुणा,
मिटें शोक सब पम स्व मरण !
पुट की शरण,
छोड़ो हे मिम्मा माया
रोग परा भय मृत्यु के विहग,
पकड़ो मिक्स भिरमुगी का मग
जीवन की भय भीति हो हरण
युद्ध की धरण,
किन्तु उन्मसित हो रह रह मन
प्राणों में भरता क्यों दन,
स्वप्नाकुम क्यों होते मोचन
भिक्त, मात क्या तुमको कारण?
पुट की परण
मर्म पी एरण
सप की परम।
(१०)
मेपम्य गीत
बीपन में मिसना गूगोगे उतना ही तुम उकसानोगे,
मभु में सिपटा कर पंस,मपुप फिर सहन नहीं उड़पायोगे !
हर मांसुरी मुमारेर
.

,
सूस को तृष्णा बनसो विपाद सुख दुख में यो तुम धीर रहो,
दुख में तुम सना सीखोगे, प्रिय, सुख में परण वडामोगे !
यो सहन र मेते वग में, प्रागे पढ़ पार वही पाते,
तुम रंगे मामसा रंग में मो, गेरुवा पहन के लाभोगे!
पासक्ति विरक्सि मकसे ही धूपट पट नहीं उठाएंगी,
पो निरत हुए पछतामोगे, पो पिरत हुए क्या पामोगे?
रवि पौर विरति के पुतिनों में बहती जीवन रस की धारा,
रवि से रस लोगे और विरति से रस का मूल्य सगानोगे !
मारी में फिर साकार हो रही नभ्य पेतना पीवम की
तुम त्याप भोग का सुमन भावना में फिर नवल खामोगे।
म पिडा
प्रामुनिका!
फूलों की तम-सूपास,
सहरों का चरण सास
शशि का मषु सुपा हास
विपुत् का भू बिनास
स्म मिला।
माल पर मदि सुपर
मांग में म सेंदर पर
मामुरी नुनहरीर

रंगती हम मधुर प्रखर
भ्रू मनु में कग्यत भर !
माषुमिका ।
छूट गई पट सस्कृति
हवय रहित ममुरारुति,
दे रही प्रगति को गति
हम मय युग की भारति
स्म शिक्षा
योमा का है प्रिय वन
मुक्त नहीं बन से मन
प्रिये, पीर परो परम
रिक्त क्या म यह जीवन?
मामुनिका!
प्राई पर
पकाचौंध मयनों पर
छोड़ मध्य युग की र
मामबी बनी न निसर।
रूप शिखा।
तुम पी मारत महिमा
मार म्पस युग प्रतिमा!
हरी बीमुरी सुनारी टेर

सुम में क्या उर गरिमा?
केवम सम की सधिमा।
प्रामुनिका !
(१२)
हम प्रीति शिक्षा
प्रति मानिका
पप रहीं दिखा।
हम गोरी भोरी प्रिय परिया
हम प्रस्ताचम की प्रसारियां,
मधु मुमर प्रणय की निमरियाँ,
हम नव युगग्योति उमागरिया,
हम प्रोति शिक्षा।
हम पढ़ी लिसी नर नागरियो
गोरस न, सुरा की गागरियाँ
हम नहीं गृों की चाफरिया,
हम मृत्य निपुण गुण मायरियाँ,
मति प्राधुनिका ।
मों पर देती पिरत वसन
जिससे विमुक्त निखरे यौवन
हम सोड़ प्रणय के कद बपन,
मोहित करती पन-मन के मन
हम प्रीति पिया।
बीमुरी सुनहरीर
१२१

धन पर म हमारे मनमुटम
पर हाप पकर मेती हम मन,
मिसती सव से मुस के गोपन
क्या हम पादर्श नहीं स्पीभन?
प्रति मापुनिका ।
मुबक
प्रिय सखि, तुम पूरब में पाई
पर तनिक नहीं जागृति मार
से फूम विहग की सुपराई,
तुम विभव स्वप्न में प्रलयाई
मयि प्रीति शिवा।
सुमको प्रिय प्रार्गों का जीवन
पति मरा स्नायुओं में संदन
तुम हो युग जीवन की पप
यह प्रगति महीं री चपल परण,
पति माधुनिका ।
बांचा प्रय
(११)
मेपप्प गीत
धारदे!
घरव हासिमी
तम विनाशिनी, जग प्रकाधिनी,
१२२
हरी मानुरी मुमार

नए स्मितिकी ज्योत्स्नावरसामो
वसुधा पर, बीवन विकासिनी।
धारदे।
नबल नीसिमा से ना प्रबर,
निर्मन सुख से कंपित सरि सर,
उतरो हे मामामयि भू पर,
कुमुद मासमी।
शुभ चेतना सी नव विपरो,
भाव महरियों को निसरो,
पुप्पी के सृण-ग पर विवरो
ज्योतिलासिनी।
स्वप्न पडित मूरज हो पेठन,
तन से ग्योत्स्ना सा छिटके मन,
दम तारा से भरें नव किरण
हृदय वासिनी।
मामो मष नारी बम प्रामो,
बम को पोमा में मिपटाभो
कर धीरन की सुमा पिसामो
श्री पिसासिनी।
हौ यांमुरीमुम्ही टेर
२॥

नेपय गीत
तापमों सी पुचि पारमाएं में भाग घरा पर भेजूंगी,
मब भाव शक्तियों से भू को मैं फिर से सहम सहेगी।
में हो सोई पम के सम में, में हो त रगों में बगती
में मर नारी में मात्र निषा हो पोवन के भुग मेंदूंगी !
पोपन मन माब ठेपर में फिर धरती पर सरगी
मानव के उर में फर प्रवेश जग में नब जीवन वितरंगी!
लो, पाय तुम्हें पूजी हूँ में प्रपने मामा के अपम से
मानव के स्वपिक स्वप्नों को में जीवन की वही दूंगो ।
पापम्प
(१५)
युवक
मानिनि, पपिक बिसम्म मत करो!
मो मानव को स्पषिम मानसि
उतरो प्रप परती पर उपरो!
युवती
प्रिय मैं उवर परा पर माई!
उवय विसर पर मव युग का प्रब
देखो स्वर्ण
फहराई।
१२४
हवामुरी नुनाटिर

युवक
मिचिन सृष्टि की धन तुम माधय
भीवन की
सकल्प पसराय
प्रतर्मन की पिर प्रभिसापा
सूचन सत्व की सार बन प्रणय,
युग युग के पग बीवन के
पिर मान कला से प्रयसि निसरो!
मानव की प्रिय मानसि, विषरो
तुम फिर से धरती पर विषरो!
युवती
मानव उर की मात्रा के पर
भीवम के स्वप्नों का उन पर
सुबन घेतना सी सदेह तुम
उर में मपुर प्रतीति वन अमर
मान सृजन प्रानन्द
से उमंग
ममे भीवन
सिपटा।
पुनः सूक्ष्म से स्पून वमी में
छिपी ग्योति में सब परछाइ।
प्रिय, में उतर परा पर पाई।
हरीबीमुरी मुनहरी टेर

सातमा श्य
युवती
पिक हम कैसे प्रेम पधिक!
प्रीति सूत्र में बंप पर वो हम
बन सकसे भू रे म पमिक !
प्रामो, भू को पाव गुहारें
मुग युग का प्रप कदम मारें,
जीवन का गृह प्रपम संवार
मन मम से शोमित हों विक!
किया नहीं सौंदर्य सूबन यो
किया नहीं माधुर्य पहन बो
रे किस सिए मनुन पीवन गो
पन में नहीं विभव प्रारिमक |
पिया महीं पो बीवन मषु दुस
मिसा म मो मू रचना में सुस
तो क्यों मर नारी हो उम्मुख,
युग्म प्रीति के रिक्त रसिक !
प्रिय तुम बीन--प्राग तुम परतो
मंकुर सी उठ सृष्टि मिधरती
१२६
हरी बांसुरी नुनहरी टेर

हरखो
जीवन हरियासो
मन
प्रीति हमारी
नहीं क्षणिक
प्रामो, भर परा पर प्लावन
स्वेद सिक्त यममा चिर पावन
युम्म प्रोति का विश्व गागरण
गायें मुक्त पिकी नव पिका
युवक युवतियां
प्रतोति प्रोति प्राण में
परण घरो परण घरो
लिए हो हाप हाप में,
म तुम रो न तुम ग्रो।
मनुप्यता ही
पुकार
छोड़ देह मोह मार
सोस रुख हदय द्वार
देह द्रोह से बिसार!
माम के
कसम
पक
मनुप्य के
हरो!
महान् यति मात्र हो,
प्रथा राम राब हो
हरी बांसुरी मुनाटेर
१२६

अभीष्ट मोक काय हा,
सुसभ्य बम समाग हो।
उठो, सदुष्प ध्येय, मर्म
शौर्य, वीर्य को परो!
म रक्तपात
न कम्दै प्रक्ति व हो
मनुष्य शुख गुर हो
विवेह मम म य हो,
ममय ममर हो मुत्यु मा
साप साप पो मरो।
छुपा रे प्रसंस्म प्राण
मम्न देह बुद्धि म्मान,
रोग म्याभि से मनाम,
निश्चय लो मान मान,
तुम प्रपम मनुष्य हो
म युग्म मात्र स्त्री रो।
मिनम शिष्ट निरभिमान
पुरुप नारि हो समान,
प्रीति प्राण, मुफ्त माम,
युक्त कसा मृत्य गान
स्वर्म तुस्प हो परा,
अपन्य हडियो झरो।
बांसुरी मुलहरी टेर

(२०)
मव युमतियाँ
ये पारिजात प्रिय पूमन क
ये माम मौर अभिनंदन के
ये सित सरोज पावन मन के
मपमक गुसाव प्रेमी बन के
यह सस्कृति का सदेव नवस
तुम ग्रहण करो तुम ग्रहण करो!
यह पास्ति सम्यता की प्रियवम
तुम बहन करो तुम वहन करो!
भीमी पपा नव भावों की
यह नही सुपर रुपि चारों को
मुर्तीसमयी प्रिय मौलसिरी
उर गरिमा से मतकी भरी
तुम स्नेह क्या सहृदयता से
पन मन की ईर्ष्या पृषा हरो!
ये गला री कलियां स्मृति की
यह कुदकसी निपछम स्मिति की
स्मित पार धमेसी सम्बा की
मत पमुई प्रिय मग्मा की
हरी मुरी मुनहरीर

सुम नव जीवन की थी शोभा,
सुख प्राशा वभव प्राण परो!
मंगरि प्रशोक की मगसमय,
रोमिस शिरीप शोमा में लय
ये हंस हंस करते हर सिंगार,
यह पुलकाफुम पपनारगर
तुम विमय सापना पत्य त्याग से
भू पाषाए निसित हरो!
सप्नों की की मपुर मोहन
पाटस विराग से गैरिफ तन
कामिनी सती सी स्वच्छ सुपर,
स्वर्णिम गेंदा सतोप अमर !
नब मानवता की सौरम से
तुम बसुपरा को पार भरो।
ये पौरुप से रक्तिम पसारा
ये स्सम शाति के प्रमततास
मामती भरी उर ममता से
सुर पदम सौरभ क्षमता से,
मानव जीवन के योम्य बना
इस पृष्पी को मानव विपरो!
यह संस्कृति का संवेद्य नवम ।
हरीबांसुरी सुनहरी टेर

सुबह-प्रतीति प्रीति
प्राण
परम घरो, भरण घरो!
में
युवतिया-पदय
सुमन
परो
प्रणय
ग्रहण
सरमि
ग्रहण
में
युवक-मिए हो हाप हाय
न तुम रो न सुम ग्रो!
पुतिया-जन विकास
शिक्षा
वहन
पहन करो।
हरीतुरी मुनहरी टर

सुम नव जीवन की श्री शोमा
मुख प्राणा पैभव प्रान परो!
मंबरि भयोक की मगसमय
रोमिस शिरीप सोमा में मय
ये हस हस झरते हर सिंगार,
यह पुमकाकुम कपनार गर
सुम विमय मापना सस्प त्याग से
मू बापाएँ निमित्त हो।
स्वप्नों की िमपुर मोहन,
पाटम विराग से गैरिक न
फामिमी एती सी स्वच्छ सुपर
स्वणिम मेवा सतोप ममर।
मब मानवता की सीरम से
सुम वसुंधरा को पाप मरो।
ये पौरुप से रक्तिम पसारा
ये स्वर्ण शांति के प्रममतास
मासती मरी उर ममता से,
सुर पंदन सौरम क्षमता से
मानव जीवन के योम्प धमा
इस पृथ्वी को मानव विपरो!
यह सस्कृति का संदेश मपल' !
हदिौमुरी मुसहरी टेर

युवक-प्रतीति प्रीति प्राण
परष परो चरण परो।
में
युवतियां इदय
सुमन
करो
प्रणय
ग्रहण
सुरमि
करो!
में
युवक-लिए हो हाम हाप
न तुम रो न तुम रो!
युवतिया-सूवन विकास की चिसा
पहन
पहन रो।
दबानुरी
व नहर

स्मृति
परित्यक्ता वदेही सी ही
प्रय हपय काममा उठी निसर
प्रागों की ममता, प्रमु स्मात
कस, घरद शुभ मगदी सुदर ।
प्रेयसि की मुस छपि मेष मुमत
एपिरेमा सी उगती मन में
नीरव नम में विपत् धन सी
एकाकी स्मृति पयसी क्षण में ।
ज्योत्स्ना में झझन से कपित
हसकी फुहार सी परती पर
यह भीगी स्मृति, मानस वट पर
या लहरी सी विवररिसर!
मुख दस की मपटों में मिपटी,
मू के भंपारों पर पम पर,
हरीमापुरी नुनहरी टेर

वह यात्री स्वप्नों के पथ पर
मत पनि परीक्षाएं देकर!
प्रम प्रेमी मन बह नहीं रहा
धूप प्रेम रह गया है क्षेत्रम,
प्रेयसि स्मृति भी यह महीं रही
भावना रह गई विरहोम्पस !
बाहर पो कुछ भी हो बदमा
मम का पट बयस पया भीतर
विकसित होती पेठना उपर
परिमत पर जीवन का सगर।
हमोनुरी कुमारी टेर

मषु गोत
नव वसंत क्या सापा
प्राणों की घाटी में फिर
फूलों का पापक छामा !
सून कोयल का पाहरू कूपन
ममुर्पो का उमावक गुजन
स्वप्मों में मंतर मर्मर मर
कैसा गीत गाया !
रंग रंग की इच्छाएं इस इस
मन को पागस करती बरवस
पग-पग पर स्कती में उम्मन
किसने मुझे मुभाया !
पिरते पाय वितिज में क्यों धन
सौरभ के, मारों के मारत
हरी बामुरी मुनहरीर

चस वसत के मम में मपर
सावन पर्यो पिर माया
7
प्रघरों में नव कसियों की स्मित,
पसकों में स्मृति की मरमविदित
मम समीर के पलों में
उर में समुद्र सहयमा?
महरी टेर

भाव स्मृति
वन फूमों की वरु गमी में
गाती मह निर्दय गिरि कोयस
कासे कौमों के बीच पसी
मुंहबली प्राग करती मिद्धम ।
कोकिल का मामा का गायन
गायन में मर्म म्पपा मादन
उस मूक व्यपा में मिपटी स्मृति,
स्मृति पट में प्रीति कमा पावन ।
मह प्रीति-सुम्हारी ही प्रिय निषि
निषि, पिर पोभा की। (जो अनन्त
कमि कुसुमों के भगों में विस
बमती रहती जीवन वसन्त ! )
उस पोमा का स्वप्मों का तन,
(मिन सप्नों से मिस्मिठ लोचन।
हातुरी मुनापटेर

यो सप्न मूत हो सके नहीं,
भरते उर में स्वर्णिम गुवन !)
उस तन को माप वित मारुति,-
(पा पछाह पट पर पकित ।)
माति की सोई सी रेसा
सहरों में बेसा सी मग्मित!
यौगन मा यह स्वप्न सिखी,
छवि रेसाए
बिसमें मोम्मा
तुम प्रवर्मुख घोमा
এর
बहती व प्राणों में शीतस !
प्राों की फूसों की रासी
स्मृति की छाया मधु की कोयस
मह गोति यया मतर्मुस स्वर
वह प्रीति कथा पारा निम्छम !
हरीयोमुरी मुनहपेटेर

भावप्प
गंष अमिता
पर तुम पाई प्रदृश्य
हवय कुंज व भनित
सम्म सुरभि रे ममाम,
पुनकित मन, हम सफाम,
मत संगीत मा
रोम रघ्र में ममता
प्मान मौन प्रीति ईन,
सन्निपि म गंप पुंज,
कमक शिक्षा तुम मर्कप
उर प्रदीप में स्पित नित!
स्पर्स सक्ति हर्प स्रोत,
नियेयस् पोतप्रोत,
घोमा की पुष्प वृष्टि
दृष्टि-शून्य सुरखनु स्मित!
R
हरी बाँसुरी सुनार

मानव तर मोह मग्न
बाह्य रूप राशि सम्न
म्पर्ष स्पषो मरूप
सत्य ज्योति स्पर्य रहित !
तुम्हें वेश मुंद मयन
मतस् में सुमे गहन
सत्य वही जिसमें तुम
भाव स्प प्रमिपंजित!
हप बीमुरी सुनहरी टेर
3

माय स्प
गम प्रमित।
कर तुम पाई मदृष्य
हवय च पद पनित।
सूक्ष्म सुरभि रे प्रनाम,
पुसकित मन,सम सकाम,
मत संगीत मंत्र
रोम रेन में ममत!
ध्यान मौन प्रीति कंग
सन्निधि मधु गंप पुंज
कनक मिसा तुम प्रकप
उर प्रदीप में स्थित मित
स्पर्श प्रवित हर्प मोठ
निभेमस् मोतप्रोत
योमा की पुष्प वृष्टि
दृष्टि-थूम्प सुरमन स्मित!
हरीबानु मुमारी और

मानब उर मोह मग्न
बाम रूप राति लन
म्य स्म, मो अस्प
सत्य ज्योति स्पर्ण रहिस!
सुम देख मुंद मयम
प्रवस् में सूमे महन
सस्प वही जिसमें तुम
माय स्म भभिम्पवित!
हर्ष यामुरी मुनहरी टेर

भावस्प
गंभ ममित।
कर तुम माई प्रवृश्य
हवय हुँचमपनित।
सम्म सुरभि रे मनाम,
पुसक्ति मन,तन सकाम,
प्रभुत संगीत मा
रोम रघ्र में माता
प्यान मौन प्रीति जि
सन्निधि मधु गंप पुष
कमक शिसा तुम प्रकप
तर प्रदीप में स्थित नित!
स्पर्श समित हर्प मोठ
निघेयस् मोतप्रोत
योमा की पुष्प वृष्टि
दृष्टि-थम्प सुरवम् स्मित!
१४२
हरीबीमुरी मुमारीटर

मामय उर मोह मम्न
बाप रूप राशि सम्न
पर्ष रूप, पो प्रस्म
सत्य ज्योति स्पर्श रहित
तुम्हें देस मंद नयन
पंतस् में सुमे पहन
सत्य वही जिसमें तुम
भाव स्प प्रमिष्यमित!
-
हरी बांसुरी मुमारी टेर
in

मनोमव
पावक की प्रेमियो बनाती
मानों की बस बीणा,
मौन हृदय तभी से करता
कौम पुरुष रस कीड़ा?
प्राणों को भाया ।
माग प्याम के अपर से हंस
प्रेम उतर प्राया-
बीवन शोभा का रष सत्सब
पत्र में भर स्वर्णिम मधु रब
उवय हुमा मप स्प मनोमय
रोम हर्ष छाया।
सुख दुख मम का अंत म उद्गम,
रविप्रकाश में भी गोपन तम
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हरी बांसुरी सुनारी

जगी ज्योति मानस में निम
कनक गौर काया!
पावक प्रम प्रेम बस बीमा,
कमा हुई रस सिद्ध प्रवीमा-
उग्बस समस कप का मानन,
पड़ उर में पापा मव पेसम
पूर्ण हुई अन भू उसको पा
वह प्रकाश-छाया,
प्राणों को भाया!
पैगानु मुमारी टेर

पुनमूल्यांकम दैविय सूस से रहित मान मानम भारमा को बमा गए तुम जीपम को मरुपल भाशाकांक्षा को मृगजम काम दग्ध हे क्या सोचा तुमने?-प्रसंग बन खोस म पाए काम पंपि तुम मुक्त न कर पाए निज निर्मम प्रिय कृठित प्राम झुषित भ्रवस्तम। उदर क्षमा को स्पीति दे, पव भित्ति पर बम समाजका उछामर प्रासाद- अस्थि स्फटिककोग्यम। काम उपेक्षित मुर्गों युगों से, मनुमोषित संस्कार न कर पाया पनु स्तर पर कमुप पंक में सना पासना मिलम! नियविद तुम? पिक भयो ! तन मन प्रामों से स्वणिम प्रारमा को विममा कर हरी मुरी मुमहरी टेर स्वर्य दीन को धरती से कर यषित- नष्ट हुए विद्याऽधकार में मटक सप तुम, मन तिय पारिमक पोपण रहित पुष्प स्तमर्को से कुम्हमा, इए विद्या तम पिठ,-- पबर, बीवन-मूठ! मन्य पारम द्रष्टा सप्टा की सूचन सा का पी म सके तुम सम्छ विषय मा, पानन्दामृत । ताप होन कर रबि प्रकास को, प्राम हीन मानव पारमा को, बहा रंग से मुक्ति धूम्म में उमर गए निष्फत सुठिल- जीर्ण वस्त्रवत्, देह प्राम मन स्पच कमपित! निश्चय ही वर्ष समर पन मुप के सम्मुख, मानव भारमा को बापत् हो भीतर से होना नप बीपित बाहर से विस्तृत, नव विकसित मिट पाए पिरका समक(भीवर प्रमले है मस्यें।) मुक्त हो काम द्रोह से (काम दासता भो!) मानब पाए सम निक, हरीमापुरी मुगाटेर

पुनमू स्यांकन
ईनिम सूत से रहित मान मानव प्रारमा को
बना गए तुम बीपन को मरुपल
भाधाकांक्षा को
मृगमम !
काम दग्ष हे क्या सोपा तुमने ?--प्रसंग बन
योस न पाए काम अपि तुम, मुक्त न कर पाए
निग निर्मम इद्रिय ठित प्रान सुषिस
प्रतस्तस!
सवर भा को स्वीकृति दे अब प्रर्ष मिसि पर
जनसमाजका उठता पर प्रासाद--
अस्मि पंजर स्फटिककोग्बम!
काम उपेक्षित युगों युगों से, मनुमोचित सस्कार
म कर पाया पक्ष स्तर पर कप पक में सना,
पासना विलम!
पद्रियनिद तुम? धिक प्रयोष ! म मन प्रागों से
स्वर्णिम पारमा को विमगा कर
हरी बांसुरी सुमारेर

स्वर्ग बीवो मरती से कर वषित,
-
मष्ट हुए विधाऽपकार में भटम स्पर्म तुम,
इंद्रिय मास्मिक पोपण रहित
पुप्प स्तरकों से कुममा, हुए भविषा ठम पिठ,-
गजर, वीवन-मुत!
भम्प प्रारम इप्टा, सप्टा की सुगन कमा का
पी म सके तुम स्व विषम मष,
मानम्बामृत !
साप हीन कर रवि प्रकाश को,
प्राप हीन मामय मात्मा को
बह रन से मुक्ति पम्प में
उम कर गए निष्फत सुठिय,-
जीर्ण रस्त्रवत्
देह माण मन स्पर्म कति!
निश्मय ही दुर्ष समर बन मग
सम्मुख,
मानव भारमा को पाप हो
भीतर से होना मव दीपित
बाहर से रिस्ता नर विकसित
मिट पाए घिरमा कमक (भीवर समर्प है मर्द!)
नुन हो काम द्रोह से (काम पासता गो)
मामब पाए सम्प निव,
हरी गोरी नुमरगटेर

तन मम प्राणों से ज्योवित,
नस शिख संयोजिस!
स्वीकृत कर सम्पूर्ण प्रकृति को, पूर्ण मनुष को
फिर से हो जीवन पदार्थ का, मनोद्रम्प का
स्पूम सूक्ष्म का सागर मंथन,
नव मूल्यांकन ।
निस्सन उपचेतन भुषों को दीपित कर,
प्राण कामना का पंकिल मुस बोकर
उसको स्वस्थ मूस्य दे मामव
मिष स्वीकृति वे नूतन!!
उपदेसे मानव पारमा को
पूर्ण कप्तामों में वह विकसित
बाहर भीतर के ऐश्वर्यों से प्रासोक्ति
स्वयं प्रकाशित,-
पावनता मानद प्रेम सोमा महिमा की
जीवन प्रतिनिधि बन भरणी को
स्वग बना देगी पह मिश्पिस !
०००
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हरी बासुरी सुनारी टेर

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Hari Bhansuri Sunhari Ter

Author
Sumitranand Pant
Title
Hari Bhansuri Sunhari Ter
File name
Hari Bhansuri Sunhari Ter
Text
OCR done
Citation
1963
Published
2010/12
Publisher
Delhi,rajkamal Parkasan Sanas
Language
Sanskrit
Pages
152
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514683
Barcode
4990010022377.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
uSE3tBR0XTp
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