Adarsh Library, Jaipur
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कैसे-कैसे सन्च
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कैसे-कैसे सच विमल मित्र
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कैसे-कैसे सच विमल मित्र
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विशिष्ट साहित्यसेवो
बन्धुवर
थो रामेश्वर प्रसाद गुरू को-
सादर समर्पित
जिनका अनुपम स्नेह मेरे जीवन
की अनमोल धरोहर बन चुका है
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अपने लेखक-जीवन में मैंने इतने आदमी देखे हैं और इतनी घटनाओं का मैं साक्षी रहा हूं कि अगर मैं उन्हें लिखने वळू तो एक जन्म मे तो हगिज पूरा नही कर सकूँगा और एक सो उपन्यास लिखने पर भी वे घटनाएं शेष नही होंगी। प्रत्येक कहानी का एक आरम्भ होता है, एक मध्य और एक अन्त । अधिकांश कहानियो की शुरुआत बड़ी दिलचस्प होती है, पर आखिर तक पहुंचते-पहुंचते उनका दम टूट जाता है। बहुत-सी कहानियों के अन्त में कोई क्लाईमेक्स ही नहीं मिलता। लेकिन जिस कहानी की शुरूआत भी दिलचस्प होती है और जिसका अन्त भी खूबसूरत होता है-वही कहानी पाठकों का मन छू पाती है। किन्तु शुरू से आखिर तक किसी कहानी या उपन्यास को दिलचस्प बनाने के लिए काफी समय देने की जरूरत होती है। वह समय कौन देता है ? वंगाल में पूजा-विशेषांकों के लिए उपन्यास लिखने के लिए सम्पादक- गण पर्याप्त समय नही देते। यह उपन्यास भी पूजा-विशेषांक के लिए सम्पादक के तकादे पर लिखा गया है। उस पर मज़ा यह कि मेरे दिमाग मे उपन्यास का कोई प्लाट था ही नहीं। इसीलिए मैंने अपने एक वकील-मित्र के पास जाकर उससे अपनी समस्या बताई। मेरी समस्या सुनकर मेरे मित्र ने कहा-क्यों, तुम्हारी वह मिठू दीदी जो है, उसी के बारे में लिखो न । उसका चरित्र तो बड़ा ही अद्भुत था। मैंने कहा-उसे तो मैंने कभी का लिख डाला है...। मेरे दोस्त ने फिर कहा--तो फिर पटेश्वरी बहू रानी? वही, तुम्हारे विद्यासागर कॉलेज में पढ़ने के समय...! .
मैंने हंसते-हंसते कहा-उसके बारे में भी लिख डाला है भाई। में
उपन्यास 'साहव बीवी गुलाम' अगर तुम पढ़ते, तो वह चरित्र तुम्हें ।
मिल जाता
तब मेरे दोस्त ने कहा- तो फिर तुम्हारे गांव की उस नयनतारा
चरित्र ? अरे उसी चौधरी-बाड़ी की कहानी, जिसमें स्वयं गृहस्वा
अपनी
पुत्रवधू
के कमरे में रात के अंधेरे में चला जाता था। उसी के
में लिखो न...
।
मैंने कहा-लगता है कि तुमने मेरी कोई भी किताब पढ़ी नहीं। में
किताब 'मुजरिम हाज़िर' में ही तुम्हें वह चरित्र मिल जाएगा।
मेरे दोस्त ने पूछा-तो फिर क्या करोगे?
मैंने कहा-क्या करूं, यह तुम ही बताओ।
मेरा दोस्त काफी देर तक सोच-विचार में डूबा रहा।
आखिर उसने कहा-आज रहने दो। देखता हूं कि कल मैं तुम्हें कं
कहानी दे पाता हूं कि नहीं।
यह कहकर मेरा दोस्त चला गया।
.
मेरे जीवन में ऐसा कई बार हुआ है। इसके लिए वेशक और कोई दूस
आदमी जिम्मेवार नहीं, जिम्मेवार खुद मैं ही हूं।
बहुत-से लोग समझते हैं कि जब मैंने इतनी मोटी-मोटी किताबें लि
डाली हैं तो फिर शायद कलम लेकर बैठने पर ही मेरी कलम से लेख
धारा प्रवाहित होने लगेगी।
लेकिन दरअसल यह बात सही नहीं है।
यह तो कोई जानता नहीं कि मेरी इन किताबों के पीछे किन अमा
8 / कैसे कसे सच
-
पिक यन्त्रणाओ का इतिहास छिपा हुआ है ! दूसरे लोग जब सभा-समि- तियों में जाकर फूलो की माला गले में डालकर आनन्द मनाते हैं, उस समय मुझे विश्राम नहीं होता। मेरे मन-मस्तिष्क मे तब कहानी को लेकर भारी यन्त्रणा होती रहती है। लोगो ने मुझे जितना प्यार दिया है, उसकी दस गुनी तकलीफें भी दी हैं उन्होने । जिन्होने मुझसे जोर-जबर्दस्ती लिखवाया है, उन्होंने हमेशा स्नेहवश ही लिखवाया हो, ऐसी बात नहीं। लेकिन इसका परिणाम उल्टा हुआ है। वह सब लिखकर ही मैंने लोगो का प्यार पाया है। उसके साथ दस-गुना आघात पाने पर भी जन-साधारण के उस प्यार को ही मैंने अधिक प्रमुखता दी है। ? किन्तु उपन्यास लिखते-लिखते भला अपने बारे में इतनी बातें मैं आखिर क्यों लिख रहा हू कह सकते हैं कि यह भी कहानी की एक तरह की भूमिका ही है...! गीत गाने के पहले जैसे गायक आलाप करता है तथा परिणाम के पहले जैसे पूर्व राग की रीति है.."यह भी बहुत कुछ वैसा ही है। मैंने अपने जिस दोस्त का जिक्र किया है, वह बीच-बीच मे मुझसे कहा करता-तुम खुद तो बहुत कम बोलने वाले हो। तो फिर तुम अपनी रचनामओ में इतने बातूनी क्यों बन जाते हो? में जवाब देता-इसीलिए कि अपने वास्तविक जीवन में में बहुत कम बोलता हू मेरा दोस्त कहता--तुम्हारी वात समझ में नहीं आई। मैं विस्तारपूर्वक समझाते हुए कहता-फूलो के गुच्छे में क्या सिर्फ फूल ही रहते हैं, और कुछ भी नही? तुम अगर भलि-भाति लक्ष्य करो तो देख पाओगे कि फूलो के गुच्छे मे जितने फूल रहते हैं, उससे पाच-गुना अधिक रहते हैं देवदार के पत्ते। उन पत्तों से फूलो का मौन्दयं घटता है या है, तुम्ही बताओ! दोस्त कहता-हम लोग इतना समझते नहीं भाई। हमारा कहना है कि तुम्हें जो कुछ कहना हो, झट-पट कह डालो। हम भा झट-पट लें...। बस, झंझट खत्म हो ! मैं कहता-तब तो कहानी लिखना बड़ा ही आसान काम हो जाता। हारी भी जान बचती और मेरी भी। दोस्त कहता-सो तुम चाहे जो कहो। मैं तो भाई साहित्य-वाहित्य कुछ समझता नहीं। मैं तो जासूसी कहानी पढ़ना पसन्द करता हूं और उसे ही पढ़ता हूं। सिर्फ मेरे इस दोस्त की ही बात नहीं है, पृथ्वी पर इस तरह के पाठकों की संख्या नगण्य नहीं। उनके पास मन जरूर है। लेकिन मनन नाम की जो चीज़ होती है, वह उनके पास नहीं। और यही वजह है कि जासूसी कहानियों के पाठकों की संख्या भी कम नहीं है । कहानी लिखने के पहले उसका अस्तित्व लेखक के मस्तिष्क में छिप रहता है। वह अस्तित्व निश्चय ही बड़ा सूक्ष्म होता है, लेकिन सर्व जाग्रत और भासमान रहने वाला । मनुष्य के अगोचर में ही उसका नि है। उसे देखा नहीं जा सकता। उसे रूपायित करने के लिए प्रयास व पड़ता है। विश्राम, निद्रा और विलास को तिलांजलि देनी पड़ती है। तरह साधना द्वारा भी अशरीरी कहानी शारीरिक-रूप धारण करती कोई लेखक इस साधना के लिए पर्याप्त समय दे चाहता। बाह्य जगत् की ओर से वाधाएं आती हैं। तो फिर क सम्पादक या प्रकाशक हाथ में लट्ठ लेकर हाजिर हो जाते हैं । वे कहते हैं-कहानी दीजिए। उनसे यदि कहा जाए कि समय चाहिए, तो वे नाराज़ हो लेकिन बहुधा 10 | कैसे-कैसे सच कहते हैं--यह सब हम कुछ भी नहीं जानते । समय देने की हमें जरूरत भी नहीं । हमें तो सिर्फ कहानी चाहिए। हमे अपनी कहानी दोजिए... यह सतयुग तो है नही कि मैं क्रौंच-मिथुन की पीड़ा देखकर अधीर हो नाऊ और कलम की नोक से कल-कल करती कहानी बह निकले ! नहीं, यह तो होने का नही। यह कलियुग है। कलियुग मे क्रौंच-मिथुन के दर्शन हो ही नहीं सकते। और वाल्मीकि ? वाल्मीकि तो इस युग में अदृश्य ही हो चुके हैं। 1 इस तरह की हालत मे मैं और क्या करता? इसीलिए मुझे अपने दोस्त के दरवाजे पर जाना पड़ा। मेरे इस दोस्त को अगर लगोटिया यार कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा । कभी हम लोग साथ-साथ पढा करते थे। उस समय मेरा यह दोस्त मालदा मे रहा करता था। वह अपने चाचा जी के घर मे ही बड़ा हुआ है। मैं भी उस समय कुछ वर्षों तक मालदा के स्कूल में ही पढा करता था। उसी समय अपने इम दोस्त जहर के साथ मेरा परिचय हुआ था। जहर के पिताजी जहर के बचपन मे ही मर चुके थे। विधवा मां थी। जहर के चाचा ने अपनी विधवा भाभी और भतीजे को अपने घर मे आश्रय दिया था। उसके बदले जहर को घर का सारा काम-काज करना पड़ता। घर के सभी लोगों की फरमाइश उसे पूरी करनी होती। जहर जानता था कि वे सब गरीब हैं, चाचा के टुकड़ो पर पलने वाले। इसीलिए वह जी-जान लगाकर पढ़ने-लिखने की कोशिश करता। वह जानता था कि पढाई में अव्वल आने पर ही उसकी और उसकी विधवा मां की इज्जत बचेगी। उस समय से ही मैंने देखा है कि वह हम लोगो की तरह न पान खाता और न ही चाय या सिगरेट पीता।
नशे का गुलाम - वह कहता--नहीं भाई, इन चीजों का नशा-वशा करना हमारे जैसे लड़के के लिए ठीक नहीं। मैं तो यूं ही गरीब हूं और उसके ऊपर यदि मैं भी बन जाऊंगा तो कोन मेरे नशे का खर्च जुटा देगा? इसीलिए तो मैं उस रास्ते में जाता ही नहीं, भाई। हम लोग जहर की हालत से वाकिफ थे। इसीलिए इस मामले में हमने उसे कभी भी तंग नहीं किया। उसके बाद मैं मालदा छोड़कर अपने पिताजी के साथ कलकत्ता चला आया। पिताजी के दफ्तर के बदल जाने के साथ ही मेरा स्कूल भी बदल गया। उसके बाद से जहर के साथ मेरा सम्पर्क-सूत्र टूट गया था । उसके बाद क्या से क्या हो गया, इसका मुझे कुछ भी ख्याल नहीं रहा। जो इस संसार का सृष्टिकर्ता है, हम लोग उसके हाथ की कठपुत- लियां हैं। सच पूछिए तो हमारी कोई क्षमता है ही नहीं। मैं तो समझता हूं कि पेड़ का एक पत्ता तक उस सर्व-शक्तिमान की इच्छा के विना हिलता नहीं। मैं कह नहीं सकता कि मेरे ऐसा कहने पर कोई मुझे भाग्यवादी कहकर बदनाम करेगा या नहीं ! लेकिन अगर कोई मुझे बदनाम करे, तो भी मैं अपने विश्वास से तिल-भर भी टलूंगा नहीं। हमारे देश में भर्तृहरि नाम के एक ऋषि-कवि थे। उन्होंने कहा है। कोई तुम्हें साधु बोलेगा या मूर्ख । सभी तुम्हें नाना प्रकार से विभ्रान्त करने की कोशिश करेंगे। लेकिन तुम किसी की भी तरफ ध्यान मत देना, सिर्फ एकाग्र मन से अपना काम करते जाना। यह वात कितनी सच है, उसे मैं अपने जीवन में जिस तरह समझ सका उस तरह और कभी भी कोई दूसरी बात मैंने नहीं समझी। wooA । , जव आखिरकार मेरा एक ठौर-ठिकाना हुमा, तब एक दिन रास्ते में जहर' के साथ मुलाकात हो गई। मैंने तो उसे पहचान लिया था, लेकिन वह मुझे - 12 / कैसे-कैसे सच पहचान नहीं पाया। मैंने पूछा-तुम जहर हो न? जहर मेरी ओर देख कर कुछ देर तक अवाक रह गया। फिर वह कहने लगा-भाई, मैं तो आपको ठीक-ठीक पहचान नहीं पाया। लेकिन जैसे ही मैंने अपना नाम बताया, जहर ने खुशी के मारे मुझे गले से लगा लिया। उसके बाद उसे मैं अपने घर ले वाया था। हमारा परिचय फिर से घनिष्ठ हो उठा। हम लोग फिर पहले की भाति एकाकार हो गए। और फिर उसके बाद से हम लोग नियमित रूप से मिलने-जुलने लगे। मेरा जो पेशा है, उसमें लोगों के साथ मिलना-जुलना और अड्डे दाजी करना अपरिहार्य है। बड्ढवाजी किए बिना भी लेखक जरूर बना जा सकता है; पर सुलेखक बना जा सकता है या नहीं, इस पर मुझे सन्देह है। मैं एक-एक किताब लिखता और उसके माय सलाह-मशवरा करता। वह एक-एक पृष्ठ सुनता और अपना मतामत व्यक्त करता। कभी वह कहता—यह पृष्ठ ठीक नहीं हुआ। में पूछता-क्यों? जहर कहता-इस तरह कमी सड़के-लड़की से प्रेम नहीं होता । इस पृष्ठ को तुम फिर मे लिखो। उसकी राय सुनने के बाद कभी में अपना लेखन बदल देता और कभी- कभी नहीं भी बदलता। जहर मेरा ऐमा दोस्त है जो साहित्य के बारे में कुछ समझता ही नहीं। जो बादमी साहित्य के बारे में कुछ समझता नहीं, उसे मैं अधिक पसन्द करता हूं! इसका कारण यह है कि उसके साथ दिल मोलकर बातें की जा सकती हैं । साहित्य बढ़ी ही मुश्म वस्तु है । जो यादमी साहित्य की समझ रखता है, उसके साथ उस सूक्ष्म वस्तु की आलोचना करते वक्त मुंह से कोई अप्रिय बात निकल जाने पर तो खुद अपनी रात की नींद और दिन की शान्ति गायब हो जा सकती है। उसके बजाय तो मेरा असाहित्यिक दोस्त ही भला है। साहित्य के बारे में अगर वह कुछ विपरीत मंतव्य भी व्यक्त करे, तो भी उससे मेरे मन पर कोई आघात नहीं पहुंचेगा। खैर, जो भी हो। अब जहर की ही बात कहता हूं। जहर मुझसे प्रायः ही कहता--भई, तुम बुरा मत मानना। तुम्हारे उपन्यास में कहानी बड़ी ही धीमी चाल से आगे बढ़ती है। तुम अपनी कहानी को खूब धोंटते रहते हो। जो कुछ कहना है, उसे क्या झट-पट नहीं कह सकते? मैं कहता-लेकिन भाई, आदमी का जीवन भी तो धीमी चाल से चलता है। जीवन और कहानी क्या अलग-अलग हैं ? जहर कहता-लेकिन भाई, हम तो साधारण आदमी हैं। कहानी के आखिर में क्या हुआ, यही जानने का इन्तजार करते रहते हैं। और तुम वही बात इस तरह घुमा-फिरा कर कहते हो कि हमारा धीरज जल्दी ही टूटने लगता है। मैं कहता-देखो, सिनेमा और साहित्य में एक बुनियादी फर्क है। वह यह कि उपन्यास जितनी धीमी चाल से चलेगा, वह उतना ही उत्तम होगा। लेकिन सिनेमा जितना ही गतिसम्पन्न हो सकेगा, वह उतना ही श्रेष्ठ माना जाएगा। जहर कहता-ये सब हुई तत्त्व की बातें। हमारे-जैसे साधारण आदमियों को यह सब जानकर कोई फायदा नहीं होगा। जहर एक मामले में बढ़िया है। बढ़िया इसलिए कि कुछ नहीं समझने पर भी बहुत कुछ समझने का ढोंग वह नहीं किया करता है। । 14 / कैसे-कैसे सच सो आखिरकार मुझ इसी जहर का शरण में जाना पड़ा था। - 1 जहर दूसरे दिन फिर आया । मेरो समस्या की बात उसे याद थी। जहर ने पूछा-क्या हुआ? क्या तुम्हारी समस्या का कोई हल निकला? मैंने कहा-नही भाई। इतनी जल्दी अगर समस्या मिट जाती, तो फिक ही किस बात की थो? और फिर हाथ में फ्यादा समय भी नहीं ये लोग तो बस ऐन मौके पर हडबडी मचाते हैं। थोडा समय मिलता, तो कुछ सोचता भी। ये लोग ममय भी कम देंगे और बढिया रचनाए भी मागेंगे। यह तो बहुत मुश्किल बात है। यह तो कोई बिजली का बल्व नहीं है कि स्विच दबाते ही जल उठेगा। यह शायद सम्पादक और प्रकाशक का भी दीप नहीं है। यह दोष है इस व्यस्त युग का ही। स्पोड, स्पीड और स्पीड...। सिर्फ स्पीड...। इसीलिए इस युग मे कोई महान् सृष्टि नहीं हो रही है। जो कुछ सृष्टि हो रही है उसे मध्यम दर्जे का ही कहना शायद ठीक होगा। यदि किसी महान् स्रष्टा के जन्म होने की सम्भावना हो भी, तो वह इस नक्की के पाटों के बीच पड़कर पिस जाएगा-चूर-चूर हो जाएगा। जहर के पास यह सब समझने लायक समझ है ही नहीं या फिर वह कभी इन्हे समझने की इच्छा भी नहीं रखता। मेरी कुछ किताबो को उसने मजबूर होकर पढ़ा है, तभी उसे साहित्य के सम्बन्ध मे सामान्य ज्ञान हुआ मैंने इसीलिए पूछा-क्या तुमने मेरे लिए कुछ सोचा है ? जहर ने कहा- ज़रूर सोचा है। कल रात बिछौने पर पड-पड़े मैं काफी देर तक तुम्हारे बारे मे ही सोचता रहा हूं। आखिरकार जब कोई कूल-किनारा नहीं मिला तो मैंने सोचा कि अगर मैं अपनी ही कहानी तुमसे लिखवाऊं तो कैसा रहे ! मैंने पूछा-तुम्हारी कहानी का मतलव ? क्या तुम्हारी अपनी जिंदगी से सम्बन्धित कहानी? जहर ने कहा-हां...! बिलकुल पर्सनल लाइफ की कहानी। बिलकुल सच्ची घटना। न तो यह कानों से सुनी हुई कहानी है और न ही आंखों से देखी हुई। यह तो खुद मेरी मापवीती है। मैंने कहा-सुनाओ तो, कैसी है तुम्हारी कहानी ! जहर कहने लगा-तुम तो जानते ही हो कि मैं अपनी विधवां मां के साथ अपने चाचा जी के घर पर उनके टुकड़ों पर पल रहा था। छोटी उम्र में पिता जी के गुज़र जाने पर अपने रिश्तेदार के घर पर विधवा मां को लेकर उनका आश्रित होकर रहना क्या चीज है, वह तुम सब कोई नहीं समझ सकते। पूरे साल-भर की स्कूल की फीस मेरे चाचा जी ही चुकाते। और फिर मां का और मेरे खाने और रहने का खर्च भी था ही। इस दया के विनिमय में घर का सारा काम-काज मुझे और मेरी मां को ही करना पड़ता। मां की जो उम्र थी, उस उम्र में घर के सारे काम अपने हाथों से करना बड़ा ही तकलीफदेह था। मां की ओर देख-देखकर मुझे अपार कष्ट होता। मां से अगर मैं यह सब बातें छेड़ता तो मां कहती-तू चुप रह तो। इस तरह की बातें मुझसे मत किया कर। कोई अगर सुन लेगा तो सर्वनाश हो जाएगा। . 16 | कैसे-कैसे सच मां सुबह से रात के ग्यारह बजे तक रसोई करती रहती। उन्हें पल- भर का भी आराम नसीव न था। मां जो इतना परिश्रम करती थी, उसका एकमात्र स्वार्थ था मै हो । मैं पढ-लिखकर आदमी बनू, बस यही प्रार्थना मां हमेशा भगवान से किया करती थी। मां की एकमात्र चिन्ता यो मुझे लेकर ही। मैं ही मां का सरदर्द था। थोडी-सी भी चूक होने पर चाची मां को खरी-खोटी सुनाने में कोई कोर-कसर वाकीन रखती। मुझे सुनकर बड़ी तकलीफ होती। मैं खुद भगवान से प्रार्थना करता- भगवन् ! तू मेरी मा का कष्ट दूर कर। मा के कष्ट अब मुझसे देखे नहीं जाते। उस दिन चाची मां पर बहुत नाराज हुई थी। मैंने दूर से देखा कि मां आचल से अपने आसू पोछ रही थी। उस समय मैं और कुछ भी बोल नही पाया। रात में मां को अकेला पाकर मैंने चुपचाप कहा-मां, चाची ने तुम्हें इतनी खरी-खोटी सुनाई और तुमने चुपचाप कान में तेल डाले सुन लिया? तुम कुछ भी बोल नही सको? मां ने कहा-तू चुप रह तो। तू जा, अपना काम कर । मैंने कहा--लेकिन वे सब तुम पर झूठा इल्जाम लगाएगे और तुम मुंह वन्द कर उसे सहन करती रहोगी? मा ने कहा--बेटा, इसमे बुरा मानना ठीक नही है ! तुम पहले बड़े तो हो लो। तू जव वडा हो जाएगा, तब मेरे सारे दुःख अपने-आप मिट जाएगे। तेरे भविष्य के बारे में सोचकर ही मैं यह सब अपमान मुह बन्द करके सहती जा रही हू । माथे के ऊपर भगवान तो सब देख रहा है न ! मैंने कहा- नही, भगवान है ही नहीं। अगर भगवान होता तो क्या तुम्हे इतनी तकलीफें उठानी पडती? मां ने कहा-तू इतना चीखता-चिल्लाता क्यों है ? अगर कोई सुन . तो फिर तुझे लेकर मैं किसके पास जाऊंगी, वता तो? कोन हमें सिर ने के लिए जगह देगा? मैं मां का दुःख समझता था। किन्तु मुझे यह सोच-सोचकर बड़ा कष्ट ता था कि मैं मां की किसी भी तकलीफ का प्रतिकार नहीं कर पा रहा ।। मैं सोचता था कि कव मैं पढ़-लिखकर बड़ा आदमी वनूं और किस. तरह मां को इस अपमान से बचाऊं ! आखिर मां की उम्र भी तो वढ़ती जा रही थी...! सचमुच भाई, अव मैं वड़ा हो गया हूं। अव हमारी हालत भी कुछ ठीक हुई है। कलकत्ते में मैंने अपना मकान भी बनवा लिया है। मेरे पास वेशुमार रुपये भी जमा हो गए हैं। लेकिन मुझे इसी बात का दुःख है कि, मां यह सव कुछ भी देख नहीं सकी। जिसके लिए इतना कष्ट करके अव अपना मकान बनाकर आराम कर रहा हूं, वही मां अव इस संसार में नही रही। यह वात सोचने पर ही मुझे बहुत तकलीफ होती है भाई । मेरी या तकलीफ कोई भी समझ नहीं पाता। मेरी यह वात कौन समझेगा, तुम वताओ ! मैं और किसी को भी ये बातें नहीं बताता। आज पहली दफ बातें मैंने तुमसे कही हैं। कारण यह है कि यह घटना बताए विना आखिर मेरी कहानी लिखोगे कैसे? तुम लोगों के कलकत्ता चले आने के पहले से ही वहां ये घटनाएं थीं। तुम लोग भी यह जान नहीं पाते थे कि मुझे क्या दुःख है ! किसी को बताने लायक बात तो यह थी नहीं। मैं किसी तरह दो में डालकर स्कूल जाता। सच पूछो तो किसी भी दिन मेरा पेट पू. नहीं था। देखो भाई, भूख मुझे कुछ अधिक ही लगती थी। दूसरे लड खाते, मैं उसका दुगुना खाता। मेरा पेट किसी तरह भरता ही भी मैं अपने मुंह से कह नहीं पाता कि. मां मुझे और थोड़ा भात 18 | कैसे-कैसे सच । मां मेरी भूख के बारे में जानती थी। मां जानती थी कि मैं कुछ फ्यादा भात स्वाता हूं। मां रसोईघर की ओट से छिप-छिपकर देखती। लेकिन कभी भी वह मेरे पास आकर बोल नहीं पाती कि मुन्ने, तुम और थोड़ा-सा मात लोगे क्या! चाची जी घर का काम-काज कुछ भी नहीं करती, पर वे चारो ओर नजर रपती। कहा पानी बर्बाद हो रहा है, कौन ज्यादा भात सा रहा है और कोन चोरी कर रहा है। उस तरफ ही उनकी ज्यादा नजर लगी रहती थी। और फिर उनकी जुबान बडो तेज थी। जिसे सामने पाती, उसे ही जी-सो वकने लगती। इसी माहौल में मेरा विद्यार्थी जीवन वीता है भाई। एक तरफ मा को वंसी तकलीफें और उस पर रुपयों की किल्लत । स्कूल जाने पर भी चैन नहीं मिलता। मैं गरीब था, इसलिए तुम लोग भी मुझमे सोधे मुह बात नहीं किया करते थे। मैं शर्म के मारे तुम लोगो के सामने अपनी तकलीफो को कहानी कह नहीं पाता। और फिर किस्मत ऐसी थी कि अगर मैं मन लगाकर कोई किताव पढ रहा होता तो उसी समय आकर चाची जी कहती-पाव-भर सरसों तेल ले आओ तो। सरसो तेल बिलकुल खत्म हो गया है। मां कहती- वह अभी पढ रहा है। उसकी परीक्षा दिलकुल नजदीक है। दो, मैं दुकान से ला देती हूं तेल। चाची जी कहने लगती-यह क्या, तुम बाज़ार जाओगी पास- पड़ोस के लोग क्या कहेंगे, जरा बोलो ती? लोग तो फिर मुझे ही बुरी बताएंगे । लोग बातें बनाएगे-अपनी विधवा जेठानी को इसने बाजार भेज दिया है । लोगों का मुंह तो मैं बन्द नही कर सकती दीदी। मा कहती-मुन्ना पढ़ रहा है न ! उसका समय बर्बाद होगा, इसी. - ।
. लिए कह रही थी। चाची जी फिर तो चीख पड़तीं। कहती-तुम रुको तो दीदी। तुम्हारा लड़का तो पढ़-लिखकर बड़ा पण्डित वन जाएगा न? वह तो वहादुर है सिर्फ भात खाने में । वह पढ़-लिखकर बहुत निहाल कर देगा न ? मैं तब चाची जी के पास जाकर कहता-मैं अभी जा रहा हूं चाची जी। कहिए, कितना तेल लाना होगा? चाची जी कभी भी एक वार में ज्यादा तेल नहीं खरीदती थीं। खूब जोर पाव-भर या आधा पाव। इसका कारण यह था कि मां रसोई में ज्यादा तेल खर्च न कर डाले ! और फिर सिर्फ सरसों तेल के मामले में ही नहीं, हर चीज़ के मामले में वह ऐसी ही थीं। सरसों तेल, घी, दियासलाई और मसाला-सब कुछ थोड़ी मात्रा में ही चाची जी खरीदती थीं। चाची जी कहती-पैसा क्या पेड़ में उगता है ? पूरे घर में कमाने वाला तो एक ही आदमी है । खून-पसीना एक कर कमाए गए पंसों को क्या यूं ही वर्वाद कर देने से घर चलेगा? तुम खुद अगर कमाती, तव तुम्हें मालूम होता। मामूली-सी दियासलाई । दियासलाई की तीलियों तक का चाची जी हिसाव रखतीं। वे हरेक रात मां को एक तीली देतीं। उसी एक तीली से मां को दूसरे दिन सुबह चूल्हा जलाना होता। वह तीली अगर चूल्हा सुलगाते वक्त किसी कारण से बुझ गई तो बस फिर मां की शामत आ जाती। चाची जी इतना चीखती-चिल्लातीं कि उस दिन घर को मुंडेर पर कौए भी नहीं बैठ पाते। इतने दुःख-दर्द की कहानी तुम्हारे पाठकों को वढ़िया लगेगी या नहीं, कह नहीं सकता। भाई, अगर तुम लोगों का साहित्य जीवन की छवि होता है तो इन सव मामूली घटनाओं को छोड़ देने पर तो फिर जीवन की बात । । 20 / कैसे-कैसे सच ही नहीं बनती। सर,मैं नहीं जानता कि सर पारों शुम्हारोहानी के काम की है या नहीं; फिर भी में इनका जिक करता जा रहा हूं। उपवास लिखने के समय तुम जो कुछ होड़ना हो छोड़ देना और काम को पीओं का उपयोग कर लेना। मैं ठहरा असाहित्यिक प्रारमो। मुझे जो कुछ मामला रहा है, सभी कुछ कहता जा रहा हूं। तुम अपनी जमे अनुसार अपने काम की चीजें छाट लेना। जो भी हो, इसी तरह दिन पाची जी की गृहस्थी की फरमाइशें पूरी करने मे तथा स्कूल के मास्टरों को गट-फटकार पाने मे वीरा रहे थे। लेकिन फिर भी मुझे अपनी रातों पर भरोसा था। कहा जा सकता है कि राते ही मेरी जो कुछ भी थी-अपनी पी। लेकिन वत्ती जलाकर पढ़ने का मतलब हो पा पंसो की फिजूलखी। फिजूलखर्ची चाची जी के लिए असहनीय थी। पे सब कुछ पत कर सकती थी, लेकिन एक चीज हरगिज नहीं। यह पी पैसो की पिजूसषी। रात मे जाग-जागकर पढ़ना-लिखना पापी जी की निगाह मे पैसों की बर्बादी ही था। चाची जी नाराज होकर कहती-बिजली शायद पूरी रारती हो गई है न दीदी । इसीलिए वत्ती जलाकर गप्पें लगा रही हो? गया यती मार गप्पें नही लडा सकती? मेहनत करके अगर कमाना पडता तमग तो को महिमा समझती। हो सकता है कि उस समय मां गणे नहीं समा रही हो, पहhtra माजने के बारे में बातें कर रही हो। मान में भावास मातही पानी की समझतीं कि मां किसी के साप गप्प कर रही है। मा कहती-मैं तो गप्पें नहीं समा रहीर" यी कि भात की याली पहले मात्र दी। चाची जी कहती-कामिनी पर हम मानी ही Title । किन वत्ती वुझाकर बात करने पर महाभारत अपवित्र तो नहीं हो एगा। चाची जी की नज़रों में सभी कुछ फिजूलखर्ची था। विना वजह बत्ती जलाना फिजूलखर्ची था, भूख लगना फिजूलखर्ची था और वत्ती जलाकर पढ़ना-लिखना भी फिजूलखर्ची ही था। लेकिन मेरा एक सौभाग्य था इस मामले में । वह यों कि हमारे घर के ठीक सामने चबूतरे के बगल में ही एक लैम्प-पोस्ट था। घर के चबूतरे के ऊपर बैठकर लैम्प-पोस्ट की रोशनी में मैं पढ़ाई-लिखाई करता। इस तरह मैं चाची जी की डांट-फटकार से भी बचता और स्कूल में पढ़ाई-लिखाई न करने पर मास्टरों की सजा से भी छुटकारा पाता। एक रात मैं उसी चबूतरे के ऊपर बैठकर लैम्प-पोस्ट की रोशनी में पढ़-लिख रहा था। उस समय मैं ग्यारहवीं क्लास का छात्र था। परीक्षा नज़दीक थी। और किसी भी तरफ मेरा ध्यान नहीं था। उस समय रात के साढ़े ग्यारह या बारह बजे होंगे। ऐसे समय में मैंने रास्ते से आती हुई एक लड़की की आवाज सुनी। लड़की कह रही थी-थोड़ा सुनिए ना। मैंने उस ओर देखा। लड़की की उम्र कम ही थी। काफी सजी-संवरी हुई थी वह। मैंने देखा कि मेरी ओर लक्ष्य करके ही वह लड़की कह रही थी। तब मुझे कुछ उत्सुकता हुई। मैंने पूछा-क्या आप मुझसे कुछ कह रही हैं ? लड़की वोली-जी हां। क्या आप मेरा एक अनुरोध मान सकेंगे? मैंने कहा-कहिए! लड़की बोली-मुझे बहुत डर लग रहा है । आप अगर मुझे मेहरवानी करके मेरे घर तक पहुंचा दें तो.." 22 / कैसे-कैसे सच
मैं तो अवाक रह गया। कहां की लड़की है, कौन है-इसका कुछ
ठिकाना नहीं । कभी अपनी ज़िन्दगी में उसे देखा तक नहीं। और उसके
ऊपर यह आधी रात !
और फिर लड़की के साथ भला कोई क्यों नही है ? इस उम्र की
लडकी केली आखिर अपने घर से क्यों निकली है ?
मैंने कहा-मैं तो आपको ठीक पहचान नही पाया।
लड़की बोली--पहचानती तो मैं भी नही मापको। निहायत मुसीबत
में पड़ गई हूं, इसीलिए आपसे मदद मांग रही है।
मैंने कहा-~-कहिए, क्या करना होगा?
लड़की बोली-मुझे क्या आप मेरे घर तक पहुंचा देंगे? सामने मैदान
के पास गुण्डो का डर है। रात के वक्त उस तरफ से जाने में मुझे खूब डर
लग रहा है।
मैंने पूछा- आपका घर कहां है ?
लडकी ने कहा-वैद्यपाड़ा में ।
नाम सुनकर मैं जगह पहचान नहीं पाया। मैंने पूछा-वैद्यपाडा कहा
है?
लड़की बोली-वह जो वडा मैदान है, उसे पार करने पर जो नई
कॉलोनी बनी है-उसी का नाम वैद्यपाहा है।
मैंने सुना था कि देश-विभाजन के बाद वहा बहुत-से नये लोगो ने
आकर अपना घर बनाया था। लेकिन मैं उस तरफ पहले कभी भी गया
नहीं था। बाजार मे मुझसे भेंट होने पर बहुत-से नये लोगो ने बताया पा
कि वे वंद्यपाड़ा में रहते हैं ।
पूछा-आप इतनी रात मे घर से क्यो निकली थी?
लड़की ने कहा-इधर सिनेमा देखने के लिए आई थी, नाइट
मे...1
मैंने
मैंने कहा-नाइट शो में सिनेमा देखने क्यों आई थीं? तव तो आपको यह मालूम था ही कि घर लौटने में बहुत रात हो जाएगी। लड़की ने जवाब दिया-इवनिंग शो की टिकट मिली नहीं। इसीलिए नाइट शो में पिक्चर देखनी पड़ी। उस समय मैंने सोचा था कि कोई न कोई तो वैद्यपाड़ा की तरफ जाएगा ही। लेकिन अब देख रही हूं कि उस तरफ कोई भी नहीं जा रहा है। मैं भाई, समझ ही नहीं पाया कि क्या किया जाए ! एक अनजान लड़की के साथ आधी रात के समय जाना भारी मुसीवत की वात थी। कौन जाने किसके मन में क्या हो...! उसके बाद हठात् मैंने देखा कि लड़की मुंह पर रूमाल रखकर सिसक- सिसककर रोने लगी। तुम जरूर अन्दाज लगा सकते हो कि उस समय मेरे मन की अवस्था क्या थी! उस समय तक किसी भी लड़की के साथ मेरी दोस्ती नहीं हुई थी। लड़कियों के मामले में तव तक मुझमें कोई दुर्वलता नहीं थी। और उसके ऊपर उस आधी रात के समय एकान्त में एक लड़की मेरी सहायता चाह रही थी । और सिर्फ सहायता नहीं, सहायता नहीं मिलने पर हताश होकर मेरे सामने असहाय-सी रो रही थी; यह घटना चाहे जितनी भी रोमांचक क्यों न हो, मेरे लिए बेहद डरावनी थी । मैं तो भाई सचमुच बहुत डर गया। विशेष रूप से तब मुझे अपनी मां और चाचा-चाची की याद आई। मैं सोचने लगा कि अगर वे सब कुछ देख लें तब क्या होगा? वे सव अगर देख लें तो मेरा क्या सर्वनाश होगा, इसका मैं साफ-साफ अन्दाज़ लगा चुका था। मेरी आर्थिक अवस्था और विशेष कर मेरी मां की असहाय मूर्ति मेरी आंखों के सामने तैरने लगी। मैंने सोचा कि उस समय अगर वैद्यपाड़ा की तरफ जाने वाला कोई 24 / कैसे-कैसे सच
मादमी मिल जाता तो सड़को को इसके लिए चिन्त हो
पाता। तो फिर मुझे परेशान होना नहीं पाता।
लेकिन भगवान को साराहना नहीं !
सो मैं क्या करू'-'यान कहं को दिशा में सामो
लड़की का चेहरा देखकर मुझे बहुत दबानाई।
और इतने दिनों के बाद तुम्हें रह रहते मुझे नहीं कि
लडकी की तरफ अच्छी तरह देखने पर मुझे त शाकि यह सब
सुन्दर थी।
या फिर यह भी हो सकता है कि यह बाधीराज रे-जालेकी
माया थी। उस माया के जाल में फसकर कितने ही सामानों की
भी मति मारो जाती है । शायद मेरो हालत ठीक वो हो यो।
चकिमचन्द्र जी के उपन्यास 'कपाल कुम्डता पडादा नि गह
खोकर जब उपन्यास का नायक नदकुमार हवाग ही पसापानमा
हठात् कपाल कुण्डला से उसकी भेंट हुई थी। सन र नायक नानार
के मन में जैसी अनुभूति हुई थी, मुझे भी ठीक दंडी ही अनुति दुई उस
लड़की को देखकर । ठीक कपाल कुण्डला की तरह दह नही भी
आकर्षित करने लगी। मुझे ऐसा लगा कि वह तहरो बारकु मरने के
लिए कहे, तो मैं मरने के लिए भी सहपं प्रस्तुत हो जाऊंगा।
तो फिर जानते हो मैंने क्या किया? मैं उससे एक दात पूर देवा।
उससे पूछना चाहता था, ऐसी बात नहीं। पर हटान् बानु मेरे हमें
निकल ही गई।
मैंने पूछा-आपका नाम क्या है ?
लडकी ने कहा- मेरा नाम सध्या भादुडी है। आर मुझे 'दुर महरा
सम्बोधित कर सकते हैं।
लेकिन क्या मामूलो-से चन्द मिनटों के परिचय में किमी
। कहा-आपके साथ तो मेरा अधिक परिचय हुआ नहीं। इतने सय में मैं आपको 'तुम' कैसे कह सकता हूं? और फिर आपकी उम्र मेरी उम्र के समान ही लग रही है। वह लड़की हठात् बोल उठी-मैं उम्र में आपसे बहुत छोटी हूं। आप • मुझे 'तुम' कहकर पुकारें तो इसमें बुरा मानने की कोई वात ही नहीं इतनी निर्भरता पाने पर मैं कुछ आश्वस्त हुआ। मैंने सोचा कि एक ड़की की थोड़ी-सी मदद कर देने में मेरा नुकसान ही क्या है ? इसके लिए रे पैसे तो कुछ खर्च हो नहीं रहे हैं। मैंने कहा- अच्छा, तुम रुको । मैं अभी तुरन्त आता हूं। यह कहकर मैंने घर के सदर दरवाजे का ताला वन्द किया और मैं O वाहर रास्ते पर निकल आया। मैंने कहा- चलो...। रात अन्धेरी थी। मेरी परीक्षा विलकुल नजदीक है, यह बात और मुझे फिर याद रही ही नहीं। चाचा-चाची को अगर पता चल गया तो वे क्या कहेंगे, यह भी याद न रहा। यही नहीं, ताज्जुब की वात है कि मेरे सम्वन्ध में मेरी मां की आशा-आकांक्षाओं की वात और मां के ऊपर हो रहे चाची के अत्याचारों की बात भी उस समय मुझे याद न रही। लड़की के साथ-साथ चलने लगा। शुरू में मैंने ही वात छेड़ी। मैंने कहा-इतनी रात में सिनेमा देखने के लिए आना किन्तु ठ नहीं हुआ। आजकल का ज़माना बहुत खराब है। संध्या भादुड़ी ने कहा- मैं तो शाम को ही पिक्चर देखने आई पर टिकट नहीं मिलने की वजह से मुझे नाइट शो में पिक्चर देखनी मैंने कहा-तो इतना समय तुमने कहां विताया? . . 26 / कैसे-कैसे सच संध्या बोली-चाय की दुकान पर सिर्फ एक कप चाय लेकर बैठी घो। मैंने कहा--तुम्हें तो सिनेमा देखने का वड़ा शौक है। संध्या बोली-हा, आप ठीक कहते हैं। सिनेमा देखभा मुझे बहुत यच्छा लगता है। क्या बाप सिनेमा पसन्द नहीं करते? मैंने तब तक कोई सिनेमा नहीं देखा था। और फिर सिनेमा देखने के लिए मेरी जेब में पैसे भी तो नही रहते थे। हम लोगों के जमाने में हमारे गुरुजन सिनेमा देखने के मामले में हमें हमेशा हतोत्साह किया करते थे। इसीलिए मैंने कहा~सिनेमा देखना मुझे वैसे ज्यादा अच्छा नहीं लगता है। मंध्या ने कहा-यह क्या? आप सिनेमा नहीं देखते ? लगता है कि आप भी मेरे पिता जी की तरह हैं। मेरे पिता जी को भी सिनेमा के नाम मे ही.चिद है। मैंने पूछा- अगर तुम्हारे पिताजी को सिनेमा से इतनी नफरत है तो फिर तुम सिनेमा देखने कैसे चली आई हो? यह वात अगर तुम्हारे पिता जी को मालूम हो जाएगो, तो क्या वे नाराज नहीं होगे ? संध्या बोली-पिता जी को मालूम होगा, तब न ! मैंने मां से कह दिया है कि पिता जी अगर मेरे बारे में पूछे तो कह देना कि में सो गई हूं। मैंने कहा - तुम्हारी मा तो बहुत अच्छो मालूम होती है । संध्या बोली-मेरी अपनी मां नहीं है । सौतेली है। मैं और भी अवाक रह गया । अवाक रह गया उस लड़की की सरलता देखकर। मैं तो उसके लिए अपरिचित आदमी था, उसके बावजूद मेरे सामने अपनी पारिवारिक बातें बताने में उसे सकोच नही हो रहा था। मैंने पूछा-'तुम्हारी अपनी मां कव चल बसी ? सध्या का चेहरा जाने कैसा करुण हो उठा।
. मैंने पूछा- वह कहने लगी-मैंने अपनी मां को देखा ही नहीं। संध्या की बात सुनकर मेरा मन सचमुच पसीज गया। मां ही मेरे जीवन का सर्वस्व थी। मैं जानता था कि मां के जिन्दा रहने का क्या सुख है ! इसीलिए मां के जिन्दा न रहने के दुःख की कल्पना भी मैं भली-भांति कर सकता था। इसीलिए जब मैंने सुना कि उस लड़की की मां नहीं है, तब सचमुच मेरे मन में उसके लिए बड़ा कष्ट होने लगा। मेरी आंखों के सामने उस लड़की की तकलीफों का स्पष्ट चित्र खिच गया। मैंने उस अंधेरे में ही राह चलते-चलते उस लड़की की तरफ देखा। उसकी दोनों आंखें आंसुओं से छल-छल कर रही थीं। पूछा-क्या तुम्हारी सौतेली मां तुम्हें प्यार करती है ? उसके जवाब में लड़की ने कहा--सौतेली मां क्या कभी भी अपनी मां की तरह होती है ? मैंने कहा-अगर तुम्हारी अपनी मां होती तो तुम्हें इस तरह अकेले सिनेमा देखने के लिए कभी भी जाने न देती। और कोई तुम्हारा छोटा भाई नहीं है क्या? संध्या ने कहा-हां, मेरे बड़े भइया है। उम्र में मुझसे काफी बड़े हैं लेकिन शादी करने के बाद भइया भाभी को लेकर अलग हो गए हैं। मैंने उस लड़की ने कहा-मेरी भाभी अच्छी नहीं है। भइया तो हमेशा हम लोगों के साथ ही रहा करते थे। लेकिन जिस दिन भइया को नौकरी मिल गई, उसी दिन से भइया बिलकुल बदल गए। भाभी ने फिर हमारे साथ रहना पसन्द नहीं किया-वह भइया को लेकर अलग हो गई। जब तक भइया को नौकरी नहीं मिली थी, तब तक भाभी हमारे साथ ही रहती पूछा-क्यों? -- थी। 28 1 कैसे-कैसे सच मैंने कहा-आजकल तो घर-घर की यही कहानी है। वह लड़को कहने लगी-फिर तो मेरे सिवाय पिता जी की देख-भाल करने वाला और कोई न था। मेरी उम्न उस समय कम थी। मैं उस समय घर-गृहस्पी के बारे में कुछ भी समझती न थी। मैं उस समय पिता जी से सिर्फ पूछा करती थी-पिता जी, भइया कहां गए? पिता जी कहते--- तुम्हारे भइया मर गए। उसके बाद एक दिन हमारी नई मा पाई। उसी नई मां ने हमारे घर में आकर टूटी गृहस्थी का बोझ अपने कन्धों पर उठा लिया । नहीं तो पिता जी वचते नही और मैं भी मर-खप जाती। रास्ते पर चलते-चलते उस लड़की की राम-कहानी सुन रहा था। कुछ दूरी पर वही मैदान नजर आया। उस मैदान तक उसे पहुचा देने पर ही मेरा कर्तव्य पूरा हो जाता। लेकिन न जाने क्यो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि यह मैदान बहुत जल्दी चला आया। इतनी जल्दी अगर सामने वाला मैदान नही माता तो कितना अच्छा होता ! मैं सोचने लगा कि वह लड़की अगर मुझ से घर तक पहुंचाने का अनुरोध करे तो मैं कृतार्थ हो जाऊगा। भाई, मैं उसी समय से जानता था कि काम, क्रोध, लोभ, मोह और मत्सर ये सब मनुष्य के असली दुश्मन है । लेकिन अनेक शास्त्रों का ज्ञान रहने के बावजूद बहुत-से आदमी इनके माया-जाल मे फमकर वर्वाद हो जाते हैं, यह तथ्य भी मेरा जाना हुआ और पढा हुआ था। लेकिन उस परिस्थिति में पड़कर मानो मैं सब कुछ भूल गया। मैदान पार हो जाने के बाद भी मैंने कोई आपत्ति नही की । मैं उसके साथ-साथ चलने लगा। हठात् एक अंधेरी जगह के पास आकर वह लडकी रुक गई। मैं अवाक रह गया । मैंने पूछा- यह क्या ? रुक क्यो गई? मैंने देखा कि अचानक उस लडकी का चेहरा विलकुल बदल गया था। वह मुझे इस तरह देखने लगी कि मैं तो बस डर गया । यह क्या? वह मुझे इस तरह घूर-घूर कर क्यों देख रही थी ? : मैंने पूछा-तुम्हें क्या हो गया? तुम मुझे इस तरह क्यों देख रही हो? उस लड़की ने कहा- तुम मुझे यहां अंधेरे में क्यों ले आए हो? इस सुनसान मैदान में...? मैं ? मैं उसे सुनसान मैदान में ले आया था! क्या कह रही थी वह छोकरी ! मैं तो उसकी बातें सुनकर कांप उठा। लड़की की आवाजं तव तक तेज़ हो चुकी थी। वह कहने लगी। अगर आप मुझे यहां नहीं ले आते तो मैं यहां क्यों आती? कहिए, क्या है मतलव आप का? मैंने चारों तरफ नज़रें दौड़ाईं। सुनसानं मैदान था और था घना अंधेरा। फिर भी मुझे ऐसा आभास हुआ मानो कुछ लोग चुपचाप ओट में छिपे हुए थे। वे लोग मानो छिप-छिप कर हम दोनों को देख रहे थे। मैं डर के मारे थोड़ी दूर सरक गया । लेकिन उस लड़की ने तपाक से मेरा हाथ पकड़ लिया। वह कहने लगी-भांग कहां रहे हैं ? सोच रहे हैं कि भाग जाएंगे? मैं अभी चिल्ला-चिल्ला कर लोगों को इकट्ठा कर लूंगी। मैंने क्षीण प्रतिवाद के स्वर में कहा-तुम्हीं तो मुझे यहां खींच लाई हो । तुम्हीं ने तो कहा था कि तुम्हें अंधेरे में अकेले घर जाने में डर लगता है। फिर तो उस लड़की ने और भी ऊंची आवाज़ में कहा-मनगढन्तं कहानी सुनाकर अपना दोप छिपाने की कोशिश मत कीजिए। इससे आपको ही मुसीवतों का सामना करना पड़ेगा। बोलिए, आप मुझे यहां जबर्दस्ती क्यों ले आए हैं ? कहिएं, आपका क्या इरादा है ? मैं तो उस समय डर के मारे कांप रहा था। फिर भी थोड़ा साहस - .. .. . .. 30 / कैसे-कैसे सच जुटाकर मैंने पूछा- सारी झूठी बातें क्यों कह रही हो? उस लड़की ने कहा-~-धुप रहिए। चुपचाप अपनी अगूठी निकाल दीजिए। मुझे याद आया कि मेरी उंगली मे सोने की एक अगूठी थी। जब मेरे पिता जी जीवित थे, तभी मेरे यज्ञोपवीत-सस्कार के समय वह अगूठी मुझे मिली थी । अगूठी की कीमत भले ही अधिक न हो; लेकिन यह अंगूठी मेरी सबसे प्यारी चीज थी। अगूठी के ऊपर मेरे नाम का प्रथम अक्षर 'जे' अंकित था। उस लड़की ने फिर चीखकर कहा-अगूठो दीजिए, नहीं तो मैं हल्ला मचा दूंगी। चीख-चीखकर लोगो को इकट्ठा कर लंगी। अन्धेरे में उस लडकी का चेहरा अच्छी तरह देख नही पा रहा था। साथ ही साय कल्पना मे आंखो के सामने पुलिस का चित्र उभरने लगा। उसके बाद कोर्ट, कचहरी और महिला के शीलहरण का अभियोग-विचार ...! और फिर साथ ही साथ मा के ऊपर होने वाले चाची के अत्याचारों का चित्र भी उभरा। मा की तकलीफों की वात याद आते ही मैं नरम पड गया। देखते ही देखते मैंने अपनी उगली से अगूठी निकालकर उस लड़की को दे दी। और न जाने कहां से अन्धकार फाड़कर कुछेक लोग बिलकुल मेरे सामने आ गए। सभी के मुंह से हसी फूट रही थी।. उन्हें देखकर ऐसा लगा मानो सभी उस लडकी के दल के आदमी थे उस लडकी के साथ वे सारे लोग हंसते-हसते चले गए। जाते समय वे धमकी देते गए-देख साला, अगर तू पुलिस को खबर देगा तो हम तेरा खून कर डालेंगे। होशियार:: उसके बाद ही वे सब अन्धेरे में न जाने कहां ओझल हो गए।
मैं अब तक कहानी सुन रहा था। कहानी सुनाते-सुनाते ज्योंही जहर रुका, मैंने पूछा-उसके बाद? जहर ने कहा-भाई, मेरे जीवन की दूसरी दुर्घटना यही थी। पहली दुर्घटना थी मेरे पिता जी की मृत्यु । जहर को मैं वचपन से जानता हूं। जिस समय जहर के पिता जी की मृत्यु हुई, उस समय वह हमारे स्कूल में नहीं पढ़ता था। जहर उस समय और किसी दूसरी जगह पढ़ता था। पिता की मृत्यु के बाद जब वह मालदा में अपने चाचा जी का आश्रित होकर अपनी मां के साथ आया था, उसी समय से मेरा उसके साथ परिचय है। उसी जहर की अव इतनी उम्र हो गई है। जीवन में बहुतेरे घात- प्रतिधात खाकर उसका मन बड़ा मजबूत बन गया है। मुझे याद है कि जिस दिन हम लोग मालदा से चले आ रहे थे, उस दिन उसकी हालत रोने-जैसी हो गई थी। मेरे घर पर आकर वह काफी देर तक वैठा रहा था और बातें करता रहा था। वे सारी बातें मुझे अभी भी याद हैं। जहर ने कहा था-कलकत्ता जाकर चिट्ठी दोगे न ! मैंने कहा था-ज़रूर दूंगा। तुम जवाव तो दोगे न ? जहर ने कहा था- हां, जरूर । लेकिन बचपन का प्रेम जैसे हो जाता है, वैसे ही चला भी जाता है। मालदा से कलकता आकर फिर मैंने बहुत-से नये दोस्त बना लिए। उनके साथ मिलने-जुलने के बाद मुझे यह याद भी नहीं रहा कि मेरा जहर नाम का एक दोस्त भी है। 32 / कैसे-कैसे सच वीच-बीच मे अगर जहर की याद आती भी तो सोचता कि दूसरे दिन हो एक चिट्ठी हाल दूगा। लेकिन दूसरे दिन फिर उसकी वात याद रहती ही नहीं। यहो तो जिन्दगी का मजा है। एक घाट से दूसरे घाट तक जाना और अतीत को भूलकर निकट भविष्य की वाट जोहते रहना । एक घाट से दूसरे घाट तक जाने के पट-परिवर्तन के बीच तिल-तिल खत्म हो जाने का नाम हो है जिन्दगी। इसी जिन्दगी की समीक्षा करने के लिए ही जितने भी कहानी, नाटक और उपन्यास हैं - उनको सृष्टि हुई है। जिन्दगी में इतना वैचित्र्य भरा हुआ है कि करोड़ो साल तक लिखते रहने पर भी वह चुकेगा नही । चकने की चीज़ वह है ही नहीं। इसीलिए मेरा यह स्वभाव बन गया है कि जहा भी जाता हूं, वहा कोई आदमी मिलने पर मैं उसके साथ कहानी जोड देता हूं। हजारों-हजार कहानियां सुनते-सुनते उनके बीच से कभी एक-आध चरित्र या एक-आध कहानी मैं पा भी जाता है। और उतने मे ही मेरा काम बन जाता है । इतने दिनो से इसी तरह चल रहा है। लेकिन इतने दिनों के बाद जहर के साथ मेरी मुलाकात होगी, इमे भी ईश्वर का विधान ही कहा जाएगा। नहीं तो भला इस समय उसके साथ मेरी मुलाकात होती ही क्यो ? इस समय मेरी भी काफी उम्र हो गई है और जहर की भी। वह आजकल एडवोकेट बन गया है। सच कहा जाए तो आज वह एक नामी- गिरामी एडवोकेट है । शादी हुई है और बच्चे भी। उसने मोटर और बगला भी हासिल कर लिया है। जिन्हें पाने पर मनुष्य अपने-आपको सार्थक मानता है, वे सारी चीजें जहर ने पा ली हैं। उसके मुवक्किल अनगिनत हैं और येशुमार है उसकी दौलत। सिर्फ शनिवार के दिन उसकी छुट्टी रहती है। उस दिन वह कोर्ट-कचहरी और मुवक्किलो से छुट्टी लेकर मेरे घर पर अज्ञातवास करता है। - कहा करता है-मैंने तय किया है भाई कि माज गों से छुट्टी लूंगा। इस दिन मैं न तो कोर्ट-कचहरी की बातें सोचूंगा रुपये-पैसों की चिन्ता-फिकर करूंगा। शनिवार के दिन मैं सिर्फ करूंगा। शनिवार के दिन मैं ऐसे लोगों से मिलूंगा; जो मुवक्किल जज नहीं हैं और वकील नहीं हैं---जो सिर्फ मनुष्य हैं; जज एवं न के अलावा कुछ और ही जिनका प्रोफेशन है। कभी-कभी जहर कहता-मैंने ज़िन्दगी में बुरे दिन खूब देखे हैं और छे दिन भी मैं देख चुका हूं। सिर्फ अपने ही मामले में नहीं, वरन् सबके मले में मैंने देखा है कि जिनके पास अधिक रुपये नहीं हैं, जो रोज़ कुआं खोदरी है और रोज़ पानी पीते हैं; वे ही सुखी हैं। विशेष रूप से वे, जो किराये के मकान में रहते हैं। जहर आगे फिर कहता-लेकिन क्या वह हमारी इच्छा के अधीन है ? जिस तरह मनुष्य के जीवन में झमेले आते हैं, उसी तरह शान्ति भी आती है। लेकिन दोनों ही हैं क्षण-स्थायी। झंझट-झमेले के समय ऐसा लगता है कि शायद इनसे मुक्ति नहीं मिलेगी और शान्ति के समय ऐसा लगता है कि यह शान्ति तो चिरस्थायी है। लेकिन झंझट-झमेले और शान्ति देने का जो मालिक है, वह शायद यह सव जानकर मन ही म हसता है। इसीलिए वह कव, किसे, क्या देगा, इसके बारे में पहले से कोई कुछ भी कह नहीं सकता। इसीलिए विपत्ति आने पर ही हम भग को पुकारते हैं तथा सुख-शान्ति के समय हम अहंकार के मारे अपने-अ भूल जाते हैं। दरअसल हम लोग सभी बुद्धिमान हैं। हममें से को भक्तिमान नहीं। जब हम मन्दिर में पांच चवन्नियों का प्रसाद चढ़ा हमारी प्रत्याशा यही होती है कि पांच चवन्नियों के बदले पांच रुपयों का लाभ हो। यह पूजा बुद्धिमान की पूजा है। कितना लय कितना पाया ! लेकिन भक्तिमान की पूजा? भक्तिमान की पूजा 34 / कैसे-कैसे सच ही होती है। यह है भगवान की पूजा के लिए ही पूजा करना"। आग नफा-नुकसान हुआ है या नहीं, इसके लिए मगजपच्ची नही की जाती। जहर ठहरा एक एस्योकेट । याय-कसा ही उसके धन्धे को मिति है। इसलिए मेरे साप जय यह मातें करता है, तब भी यह सोचता है कि मैं मानो कोई जज या मगिस्ट्रेट हूं। इसलिए मैं भी उस गागले में कोई याधा नहीं पहुंचाता। जब उसका प्रवषन घस रहा था तो मैं धीमही गं बाधा देते हुए कहा--यह तो भाई कोई कहानी नहीं हो रही है। यह तो हो रहा है उपदेश सुनाना। इन सब येकार की बातों को गुनपर गुहा गया कायदा होगा ? इनमें कहानी यही है ? यह तो है पोथी फियोगपी। जहर ने कहा-तुम तो भाई यहत जल्दी धीरज को देते हो । प्रगता है कि सुग कभी भी स्वर्ग में नहीं जा सकोग..." मैंने पूटा---गयों ? जहर ने कहा-तो फिर एक कहानी गुनो। एका मासिन थी। वह पवि कालिदाग को पस लाकर दिया करती यो। कालिाग गरीब ब्राहाण थे। लिए ये पलों का नाम नहीं देगकते थे। उस वदी में वे अपना काप्य पदकर गुनाने थे। एक दिन मालिनी पोयरे में एक विपित्र कमा विणा। मालिनी उंगे पाकर कालिदाग को उपहार में दिया। कवि कालिदाग नगर उपहार में पुरस्कारनवस्म 'मेघदूत' परफर गुनान मगे। "मपन' काव्य-गों का गागर है, किन्तु यह सभी जानते है कि उसके प्रारम्भिक शलोक धनागम है। मालिन कोमीक पध्दैन मंग। यह ऊब कर पल दी। कविने पूछा-गणी मानिन, पय दी। मामिन बोपी-म्हार लोकों में यहाँ है ? कवि ने कहा-~मामिन, नुम कभी भी ग्वर्ग न जा सकोगी।
- मालिन ने पूछा-क्यों? कवि ने उत्तर दिया-स्वर्ग जाने को बहुत-सी सीढ़ियां हैं। लाख योजन सीढ़ियां चढ़कर ही स्वर्ग जाया जा सकता है। मेरा यह मेघदूत' काव्य भी ठीक वैसा ही है। ये नीरस श्लोक प्रारम्भ की सीढ़ियां हैं। तुम इन मामूली सीढ़ियों पर नहीं चढ़ सकी, तो फिर लाख योजन की सीढ़ियों पर किस तरह चढ़ोगी? तव मालिन ने ब्रह्म-शाप से स्वर्ग खोने के डर से 'मेघदूत' काव्य सुना। उसके बाद प्रसन्न होकर वह दूसरे दिन मदनमोहिनी नाम की अद्भुत माला गूंथकर कवि कलिदास के गले में पहना गई। आखिर में जहर ने कुछ रुककर कहा-तुम भी कालिदास की मालिन जैसे ही हो। इतने में ही तुम अधीर हो गए ? आखिर तक कहानी को सुनो.भाई। मैंने कहा-खैर यह सब तो हुआ। उस दिन वाली घटना के बाद क्या हुआ, वही सुनाओ। जहर कहने लगा-भाई, अब तो हम लोगों की काफी उम्र हो चुकी है । इसीलिए मौका मिलते ही पुरानी बातें सुनाने को जी चाहता है। इसी- लिए कोई आदमी मिलने पर ही बचपन की बातें शुरू कर देता हूं। सो जब तुमने कल मुझे बताया कि तुम यह सोच नहीं पा रहे हो कि किसके बारे में लिखोगे, तब मैं घर जाकर विछोने पर लेटा-लेटा सोचने लगा । दूसरे दिनों मैं सोने के पहले सिर्फ इन्कम टैक्स और मुवक्किलों की बात सोचा करता था। लकिन मैं कल सोचने लगा तुम्हारी कहानी के बारे में। मैंने अपनी सारी जिन्दगी के बारे में ही सोचना शुरू किया। मैं क्या था और क्या बन गया...? इत्यादि..', इत्यादि...। सचमुच भाई, एक दिन मैंने कुछ ज्यादा भात खा लिया था। इसके लिए मेरी चाची जी ने मुझे खूब खरी-खोटी सुनाई। उनकी बातें सुनकर - 36 / कैसे-कैसे सच मेरा मन पराव हो गया था। और इस समय मेरे घर में बाहर पार आदमी हर गेज गाते हैं। यह मय वहाँ मे हवा? यह मम पिगमे कराया? मोचने-मोचते अचानक वचपन की वही घटना याद या गई। परी घटना, जिगका वमान मैंने योड़ी देर पहले किया है। लेपिन मंगा दिन की हालत की नुम कल्पना करी । मैं मारे गम के समझ नहीं पा रहा था कि कम घर लौटूंगा। जब मन की ऐसी हालत में ही मैं अपने पर के सामने आयागी मैंने देगा कि जिम तरह मैंने मदर दरवाजे पर ताला लगाया था, माला उभी तरह लगाया था। यहीं भी कोई नहीं.."। किमी को गवर. नहीं हुई। गवर मिल जाने पर तो मायद बहुत ही डांट मानी पहनी। लेकिन किस्मत यच्छी थी कि किमी को भी हम दुर्घटना का पता नहीं बना। लेकिन दूसरे दिन ही बात मृल गई। मां ने टोक देग लिया। मैं टम ममय भोजन कर रहा था। हटात मी ने पूछा-हां रे, तुम्हारी अंगटी महा गई? मैं का बोल, क्या उवाव यह मना ही नहीं पा रहा या। बाविरकार मैंने मुटमूठ बहा. -चंगूठी मो गई है मा। मां नाराज हो गई। उसने कहा-अंगटी गी गई ! तुम्हार यज्ञोपवीत के ममय कितने गारमचं तुम्हें इतनी बदिया अंगटी बनवाकर दी गई थी और तुम बने मी बाए हो? मैंने कहा-मां, नुम मुस्मा मत करो। मुझमे गलती हो गई है। सय याग में मावधान रहा। चाची के घर में मां मुझे काम और में डांट भी नहीं पा रही थी। कारन यह कि चाची को मालूम होने पर दौर भी हंगामा होता। नांददी दावार में रहने नगी-मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि यह अंगूठी अभी मत पहनो। बड़ा होने पर इसे पहनना। लेकिन तुमने मेरी बात मानी नहीं । अव तुम्हीं भुगतो । मेरा क्या है ? क्या अब कभी मैं तुम्हें वैसी अंगूठी बनवाकर दे सकूगी? क्या मेरी कभी भी वैसी अच्छी हालत हो सकेगी? मां की डांट-फटकार को मैं चुपचाप पचा गया। कुछ कहने लायक मैं रहा ही नहीं। और उसके बाद धीरे-धीरे सब कुछ सहज-सामान्य हो गया। मैंने प्रतिज्ञा की कि जीवन में मैं अब कभी भी विलासिता के पथ पर कदम नहीं रखूगा। अंगूठी अवश्य ही देखने में बहुत बढ़िया थी। उस जमाने में उस अंगूठी के लिए जोहरी ने दाम भी खूब लिए थे, ऐसा मैंने सुना है । लेकिन उस ब्लैकमेल की घटना ने मेरी जिन्दगी में एक मोड़ ला दिया। अगर यह घटना नहीं घटती, तो शायद मैं जो कुछ आज हूं, हो नहीं पाता । वह जो एक मामूली-सी अंगूठी मेरे हाथ से निकल गई, उसके बाद वाले दिन से ही मैं कुछ और ही आदमी बन गया। मेरा नपारिया ही बदल गया। मैंने नये दृष्टिकोण से इस दुनिया को देखना शुरू कर दिया। एक मामूली-सी अंगूठी मानो मुझे दिव्य दृष्टि दे . गई। उसके बाद कई साल गुजर गए। आंधी-तूफान की तरह ही गुजर गए, कह सकते हैं। क्या से क्या हो गया, मैं कुछ जान ही नहीं पाया भाई। लेकिन उसके बाद एक दुर्घटना हुई। मैंने पूछा-~-दुर्घटना ? कैसी दुर्घटना ? जहर ने कहा- मैं यथास्थान सब कुछ बताऊंगा। इतनी जल्दबाजी क्यों कर रहे हो? मेरी अंगूठी खोने का दुःख मां मरते दम तक भूल नहीं सकी। रुपयों के कारण नहीं, बल्कि इसलिए कि वही मेरे पिता जी का पहला और 38: / कैसे-कैसे सच । आषिरी उपहार था। मेरे पिता जी की आपिक अवस्था अच्छी नहीं थी। इमीलिए पिता जी का साया सिर से उठते ही मैं बनाय हो गया पा! लेकिन पिता जी की शेप-स्मृति यी वही अंगूटी। वह अंगूठी माई खूब वहिया पो। बटिया कहने का मतलब यह है कि खूब कीमती । काफी सोने से वह बनी यो और उम पर मीने का काम था। मीने के काम के ऊपर एक सुन्दर 'जे' असर यदा हुआ था। मेरे यज्ञोपवीत के सनय पिता जी ने बहुत प्यार मे वह अंगूठी दी थी। और मैं ऐसा नालायक निकला कि उसी अंगूठी से हाय घो वैठा । मां अपने जीवन के आखिरी दिनों में सेटी-लेटी केवल उस अंगूठी की की बातें करती। वह मेरी पत्नी से कहती -बहू, जहर के हाप में कुछ भी रुपये पैसे मत देना। उसकी भुलाने को बड़ी खराव आदत है। उसे उसकी जनेऊ के समय आध भरी सोने की एक अंगूठी बनवा कर दी गई पो; उसे भी वह पो चुका है। वह बड़ा ही भुलक्कड़ आदमी है, सभी चीजें यो डालेगा। मैं तव तक कितना बड़ा हो चुका था। वकील के रूप में मेरा यूब नाम हो चुका था। कलकत्ता शहर में मैंने अपना मकान बना लिया था। फिर भी मां की निगाहों में मैं वच्चा ही था। मां की नजरों में में कभी भी यहा हुआ नहीं। मेरी पत्नी मुझसे पूछती-क्यों जी, आपने क्या अपनी माघ भरी मोने की अंगूठी सो डाली थी? मैं उसके सवाल पर हंसता। मैं पूटता--तो फिर मा नै तुमसे भी सब कुछ बता दिया? पत्नी कहती-हां, मां ने मुझे सब कुछ बता दिया है। उम अंगूठी पर आप के नाम का पहला अक्षर 'जे पदा हुआ था न? और फिर मा जानती थी कि उस समय मेरी आर्थिक अवस्था इतनी । . बढ़िया हो गई थी कि मैं उस तरह की एक सौ अंगूठियां खरीद सकता था। लेकिन मामूली-सी आध भरी सोने की अंगूठी का दु:ख मां जीवन-भर भूल नहीं सकी। आज भी मुझे मां की बातें सोचकर बहुत दुःख होता है । दुःख-तकलीफें उठाकर मुझे बड़ा करने के बाद उन्हें जो खुशी मिलनी चाहिए थी, वह मिली नहीं। मेरी हालत जब बढ़िया हुई, उस समय मां ने भी बीमार होकर खटिया पकड़ ली। उसी विछोने पर पड़ी-पड़ी मेरी मां मेरी पत्नी को पुकारती और पूछती - आज बाजार से कौन-सी मछली आई है बहू ? मेरी पत्नी मछली का नाम बताती। किसी दिन हिलसा, किसी दिन झींगा-मच्छी तो किसी दिन रोहू। जब मां को पता चलता कि बाजार से हिलसा मछली आई है, तब मेरी मां मेरी पत्नी को सिखा देती कि हिलसा मछली किस तरह पकाई जाएगी। मां कहती---बहू, हिलसा मछली को तलना नहीं चाहिए। हिलसा मछली तलने पर खराब हो जाती है। जहर भाप में तैयार की गई हिलसा मछली खाना पसन्द करता है । हिलसा मछली को एक मुंह-ढकी वटलोई में भात के भीतर रख देना। तुम्हारा भात भी तैयार होगा और भाप में मछली भी सीझ जाएगी। -उसके बाद...? मां थी विधवा औरत, मछली खाती नहीं थी। लेकिन मैं मछली पसन्द करता हूं, इसीलिए वह मेरी पत्नी को सब कुछ सिखा देती। और क्या सिर्फ मछली? किसी-किसी दिन वह पूछती-क्यों वहू, आज बाजार से क्या-क्या आया है ? मेरी पत्नी एक-एक कर नाम गिना देती। आलू, परवल, भिण्डी 40 / कैसे-कैसे सच इत्यादि ! इत्यादि." मा कहती-बहू, तुम कुछ बुरा मत मानना । लेकिन तुम बाजार से सब्जियां मगाना जानती नहीं। रोज ही सुनती हूं कि एक हो तरह की चीजें आई हैं। क्यो, बाजार में और चीजें नहीं मिलती? रोज़ बस एक हो तरह की सब्जिया आ रही हैं---आलू-बैगन-परवल और परवल-वैगन- आलू मुझे क्या-क्या खाना पसन्द था, वह मा को जुबानी याद था। मुवह बाजार जाने के पहले मां बता देती कि उस दिन क्या रसोई बनेगी। और फिर खुद मां खाती साबूदाना ओर वाली। वही साबूदाना और बाली खा- याकर आखिरी समय में मां को खाने से अरुचि हो गई थी। कुछ भी मुंह में रख नहीं पाती थी वह। कुछ भी मुह में डालने पर सब कुछ उल्टी हो जाता था। में प्रतिदिन कोर्ट से आकर घर के भीतर मा को देखने जाता। मैं मां के पास बैठकर पूछता-आज कैसी हो, मां? मां मुझे देखते ही कहती-अरे जहर, बहू रानी को खाना बनाना बिलकुल भी नहीं आता। में कहता--क्यों मां? बहू रानी तो खाना बढ़िया ही बनाती है। मा कहती-साक बढिया पाना बनाती है। आज मैंने सुना है कि उसने चने की दाल बनाई है। यह सुनकर मैंने पूछा कि चने को दाल जो तुमने बनाई है, उसमें क्या-क्या डाला है ? मैं तो सुनकर ताज्जुब मे पड गई। बहू चने की दाल बनाना भी नहीं जानतो। चने की दाल में नारियल का चूरा, तेजपत्ता और इलायचीदाना पडता है, यह भी उसे मालूम नहीं। मैंने तभी कहा--देखो बहू, जहर इस दाल को छुएगा भी नहीं। मैंने कहा- हा मा, तुमने ठीक ही कहा है। मैं उस दाल को बिलकुल भीषा नहीं सका।
मां कहती-~-खा भी कैसे पाते? बहू ने जब मुझे बताया था, मैंने तो तभी कह दिया था कि जहर इस दाल को खा नहीं सकेगा। भाई, मैंने दाल खाई जरूर थी। दाल वढ़िया ही बनी थी। लेकिन मां को खुश करने के लिए मुझे वैसा कहना पड़ा। बहू रसोई के बारे में ठीक से जानती नहीं थी, यह बात सुनकर मां बहुत खुश होती। उसके बाद दुःख से कहती-अरे, मेरा शरीर भी अब इतना कमजोर हो गया है कि मैं खुद अपने हाथ से खाना बनाकर तुम्हें खिला नहीं सकती। मैं मां को धीरज बंधाते हुए कहता-इससे क्या हुआ? जब तुम अच्छी हो जाओगी, उस समय खुद अपने हाथों से पकाकर खिलाना। अभी दो-चार दिन तकलीफ ही सही। मां कहती--अव क्या मैं अच्छी हो सकूँगी रे ? तुम्हें फिर से अपने हाथों से खिलाने की बात तो मुझे अच्छी ही लगती है, लेकिन भगवान ने मुझे मार रखा है। मैं क्या करूं, बोलो ? मैं मां को सांत्वना देता और मां की रसोई की खूब तारीफ करता। यह सुनकर मां कुछ पलों के लिए ही सही, शान्ति पाती। मेरे लिए मां के मन में कितनी दुश्चिन्ताएं थीं, उसके अनेक प्रमाण मैंने मां के शेष जीवन में पाए थे। मां हमेशा इस बात का अफसोस किया करती थी कि वह पोते की शादी देख नहीं पाई। मेरा लड़का उस समय मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहा था। पोते की बहू का मुंह देखे बिना इस संसार से विदा हो जाना मां के लिए बड़ा ही कष्टकर था। वह समझती थी कि पोते की शादी किए बिना मरने से नरक मिलता है। मां अफसोस करती हुई कहती-ज्योति की बहू को देखकर नहीं जा सकी, यही अफसोस मुझे रह गया है। . 42 / कैसे-कैसे सच वह रसोई ज्योति पैदा होने के दाद में ही बनी दादी के पास ही रहा करता था। मां की तबीतत उन दिनों ठीक नहीं थी। एक हाय बनाती और एक हाय मे पोते की देसमान करती। फिर भी मैंने कभी भी मां को परते नहीं देखा। मां ने पहले अपने देवर के घर में खूब मेहनत की पो और अब मेरे परिवार में भी वह उसी तरह मुंह बन्द कर सटती जाती पो.। योर फिर मेरे घर पर रसोइयों और नौकर-नौकरानियों को कोई कमी नहीं थी। कहता-मां, तुम पोहा आराम करो न । बव तो हम लोगों की हालत सुधर चुकी है। काम करने के लिए तो बहुत-मे लोग रखे हुए हैं। अब तो तुम योड़ा विश्राम करो। मा कहती-आदमी रखकर मेरी खूब मताई की है न ! मव को बस अपने-अपने वेतन की फिक्र है..। काम के न काज के, दाई सेर अनाज के...मैं जिस तरफ नजर नही रसूंगी, उधर ही बारह बज जाएंगे। मैं कहता- उनपर नजर रखने के लिए तो तुम्हारी बहू है ही। वही देखेगी। तुम्हारी अव काफी उम्र हो गई है। तुम अब अपने दिन भगवान की पूजा-आराधना में विता मकती हो। मा कहती-बहू है इस जमाने को लडकी। मिलावटी चीजें. सा- माकर बड़ी हुई है । वह इतने लोगों पर नजर कैसे रख सकेगी? हम लोगों ने उस जमाने में खांटी दूध पिया है और खांटी तेल-धौ खाया है। इतनी मानी में हम लोगों का शरीर खराव नहीं होता । तुम सारे आदमियों को जवाय देकर देव लो; तुम देखोगे कि मैं अकेली हो एक हाप से घर का मारा काम सम्माल लूंगी। नतीजा जो होना या, वही हुआ। मां ने एक दिन सटिया पकड़ ली। इतनी मेहनत बर्दाश्त होती तो कैसे ! परिवार के दूसरे लोगों की देखभाल करते-करते उसने अपनी तरफ विलकुल भी ध्यान नहीं दिया। वह वेला- कुबेला खाती रही। अपने-आप पर उसने काफी अत्याचार किया। वेकार नहीं जाए, इसके लिए वह बासी भात पानी में मिलाकर रही। और उसपर एक शाम उपवास । वार-तिथि और एकादशी- -सभी मानकर चलती थी वह। और फिर विछोने पर पड़कर भ वह निश्चिन्त हो सकी थी? दाल में किस चीज़ का छौंक देना होग मां रसोईए को बता देती। तो कभी वह इस बात की खबरदारी कर रात में सदर दरवाजे का ताला बन्द किया गया है या नहीं ! आज मुझे लगता है कि यदि मां ज़िन्दा रहती तो शायद मेरे खर्च इतना बढ़ नहीं जाता। दरअसल मां ही मेरे घर की लक्ष्मी थी दिन मेरी मां की आंखें मुंद गई, उसी दिन से मानो लक्ष्मी भी हम हो गई! इतनी देर तक मैं जहर से उसकी कहानी सुन रहा था। मैंने पूछा-भाई जहर, तुमने तो अंगूठी खोने की कहानी सुना. अब तुम सुनाने लगे अपनी मां की कहानी ! आखिर इन दोनों कहा परस्पर क्या सम्बन्ध है ? जहर ने कहा-तुस सचमुच कालिदास की मालिन हो ! तु कहानी तो सुनो। वही बात कहने के लिए ही तो मैंने यह सात का भूमिका बांधी है। बुनियाद अगर मजबूत न हुई तो फिर सात- मकान खड़ा कैसे होगा? मैंने कहा - देखो भाई, पूजा-विशेषांक के लिए उपन्यास लिखना यह तो तुम समझ ही पा रहे हो। बुनियाद पक्की करने में काफी सम जाएगा और फिर पाठक-पाठिकाओं का हाल तो तुम्हें मालूल है है. 44 / कैसे-कैसे सच महानो का अन्त जानने के लिए शुरू से ही उतावले रहते हैं। जहर ने कहा-माई, मैं तो यह सब कुछ भी नहीं जानता। मैं ठहा एक एडवोकेट। मैं तो यही जानता है कि केस को मजबूत बनाने के लिए गवाहो को मरदूत बनाना पडता है। मैंने अपनी मा की कहानी इतने विस्तार के साथ इसलिए देताई कि वह अगूठो सोने के बाद से मां अपना दु.ख कभी भी भूल नहीं सकी। मैं जव बडा हुआ, तब वह यगूठी छोटी हो गई थी। अगूठो मेरी उगली मे घुस नहीं पाती थी। मैं इसीलिए वह अगूठी पहनता नहीं था। मा ने कहा था कि जनेऊ के समय को अगूठी सोलनी नहीं चाहिए। इसीलिए एक मोनार को बुलाकर माने अगूठी को और वहा करवा दिया, ताकि वह मेरी उगली मे घुस सके। उसके बाद मा के सूब जोर डालने पर मैं अपने लड़के के विवाह के लिए सुयोग्य लडकी को तलाश करने लगा। लडके को शादी करने की वैसे इच्छा न थी। इसका कारण यह या कि उस समय तक भी वह छात्र था। लेकिन दादो की मनोकामना पूरी करने के लिए शादी करने के सिवाय और कोई उपाय न था। हाक्टरी का छात्र विवाह के पात्र के रूप मे आज के ज़माने में कितना लोभनीय है, यह तो तुम जरूर जानते हो । मेरे लडके के साथ भी वही बात थी। उसके अलावा स्वभाव, चरित्र और स्वास्थ्य के विचार से भी वह लड़कियों के अभिभावको की कसौटी पर खरा उतरता था। मैं भी अपने लड़के के लिए लड़को ढूढने लगा। लड़की का चुनाव करने के सम्बन्ध में एक ही चीज पर मेरा ध्यान था। वह चीज़ थी बढ़िया खानदान मोर लड़की का उत्तम स्वास्थ्य और रूप। दहेज के सम्बन्ध में मेरी तरफ से कोई भी माग नहीं थी। इस प्रकार लगभग सौ लड़किया देखने के बाद आखिरकार एक सड़को को मैंने पसन्द किया। लड़को ठीक वैसी हो पी, जैसी मैं चाहता था। पहले खानदान की बात बताता हूं। कलकत्ते का सबसे खानदानी मुहल्ला है जोड़ासांकू । वहीं उनका सात पीढ़ियों से निवास था। लड़की के पिता गुज़र चुके थे। विधवा मां थी। लड़की अपनी मां की एकमात्र संतान थी। विराट् सम्पत्ति थी उनके पास । मां के मरने के बाद उस सम्पत्ति का मालिक होगा उसका दामाद ही। इस तरह मुझे कई तरह के लोभ दिखाए गए थे। किन्तु मैं ठहरा एक वकील। इसलिए वह लोभ मुझे प्रभावित नहीं कर सका। आखिर मैंने अपने पेशे के मार्फत जिस तरह उत्थान देखा है, उसी तरह देखा है पतन भी। सम्पत्ति के भागीदारों के झगड़े में कितने खानदानों को नष्ट होते मैंने जिस तरह देखा है, उसी तरह कितने ही पैसे वाले आदमियों को अपनी वेशुमार धन-दौलत एक हस्ताक्षर के माध्यम से रामकृष्ण मिशन को दान देकर भिखारी होते भी देखा है। इसीलिए सम्पत्ति के लोभ से मुझे काबू में नहीं लाया जा सका। खानदान, स्वास्थ्य और रूप-ये तीनों ही थे मेरी पसन्द के यार्ड- स्टिक अथवा मानदण्ड। खानदान अच्छा मिलता तो स्वास्थ्य नहीं मिलता और अगर खानदान और स्वास्थ्य दोनों मिलते तो फिर रूप नहीं मिलता। मां छटपटाती रहती। मैं लड़की देखकर जब घर लौटता तो पहले मुझे मां के पास जाना पड़ता। मुझे जाकर बताना पड़ता कि लड़की कैसी थी। मां पूरा विवरण सुने बिना मानती ही नहीं। मां खोद-खोदकर एक-एक बात पूछती। पूछती-कैसी लड़की है ? लड़की के मां-बाप जिन्दा हैं या नहीं? कितने भाई-बहन हैं ? सिर्फ यही नहीं; वह यह भी पूछती कि वे लोग कैसे हैं-उन लोगों ने क्या-क्या खिलाया-पिलाया! इस तरह की सारी बातें मां को विस्तारपूर्वक बतानी पड़ती। 46 कैसे-कैसे सच मां को बताए बिना मैंने जीवन में कोई भी काम नहीं किया। और फिर कितनी साध थी उमे पोते के ब्याह की ! मां की अगर पड़े होने की हिम्मत होती तो फिर मुझे कुछ भी नहीं करना पड़ता। मा अकेली ही सारा काम सम्भाल लेती। लेकिन जय तक मां जिन्दा थी, तब तक तो मैं मां की अनुमति लिए विना कुछ भी नहीं कर मकता था। सब कुछ सुनकर मा कमी कहती-नहीं रे जहर। यहां हम लोग सम्बन्ध नहीं करेंगे। मैं 'अवाक रह जाता। पूछता-क्यो मां? मां कहती-तुम्हे सिर्फ चाय पिलाकर उन लोगों ने विदा कर दिया। ऐसे घर में में अपने पोते की शादी नहीं कर सकती। मां को मन भी कम न यो। मेरे जन्म के कुछ दिनों के बाद ही मा विधवा हो गई थी। दूसरे के घर में रसोई का काम कर मा ने मुझे वहा किया था। इतनी तकलीफें उठाने के बाद ही मां जान सकी थी कि भद्रता किसे कहते हैं, रईसी किसे कहते हैं और किसे कहते हैं कुटुम्यिता। जब मां ने आपत्ति उठाई थी, तो फिर वहां सम्बन्ध करना सम्भव नहीं हुआ। सिर्फ चाय पिलाकर जो लोग भावी सम्बन्धी का स्वागत- सत्कार करते हो, वे लोग रईम खानदान के आदमी हो ही नहीं सकते। मा यह मव समझती थी, उसे कुछ बताने की जरूरत नहीं थी। मापिरकार उसी जोड़ामांकू की रईस कोठी में ही सम्बन्ध पक्का हुआ। मा पूछती-क्या सचमुच उन लोगो ने तुम्हे चादी की तश्तरी में तीन प्रकार के मन्देश दिए और दूध का शवंत पिलाया? मैं कहता-हां मां। कमे कसे सच/47 यह बात मां की निगाहों में उन लोगों के रईस होने की नज़ीर थी। मां ने फिर पूछा-लड़की के बाल कैसे हैं ? तुमने खुलवाकर देख लिए हैं न? मैं कहता-हां मां। मुझे कहना ही नहीं पड़ा । उन लोगों ने खुद ही जूड़ा खोलकर बाल दिखा दिए। आजकल के जैसा नकली जूड़ा नहीं था। विलकुल कमर तक लम्बे बाल थे। यह सुनकर मां खुश हुई। उसके बाद मां ने पूछा-और पैर की उंगलियां कैसी हैं ? अलग-अलग हैं या सटी हुई ? मैंने कहा-सटी हुई। मां ने फिर पूछा-और शरीर का गठन ? मैंने कहा-सो तो मैं तुम्हें बतला ही चुका हूं मां। उस तरफ से भी कोई कोर-कसर नहीं है। आखिर जब मां ने अपनी सहमति दे दी तो फिर मैंने और देरी नहीं की। मैंने झटपट बात पक्की कर ली। फिर एक दिन मेरे लड़के की शादी हो गई। उन दिनों खिलाने-पिलाने पर तो कोई रोक थी नहीं । बारातियों ने खा-पीकर खूब तारीफ की । और उसके बाद हम लोगों ने बहू-भात के दिन जो प्रीति-भोज का आयोजन किया था--सभी आत्मीय-स्वजनों ने उसकी भी जी खोलकर सराहना की। मैं निश्चिन्त हुआ। विशेष रूप से जब मां अपने पोते की बहू को देख- कर खुश हुई थी, तो फिर मेरे कहने-सुनने को कुछ बचा ही न था । जहर के रुकते ही मैंने पूछा-यह क्या ? अभी भी तुम्हारी भूमिका ही चल 48 / कैसे-कसे सच रही है क्या ? मेरे पाठक माटिका तो अधीर हो जाएगे। जहर ने कहा-माई वह सब तुम लिखते वक्त ठीक कर लेना। मैं कोई लखक तो हूं नहीं। मैं तो सिर्फ तुम्हारे लिए कच्चा माल जुटाता जा रहा है। तुम इनके बीच अपनी जरूरत के मुताविक माल-मसाला घुसा देना। . मैंने कहा~जो हो, वह मेरा सरदर्द है-~-मैं समझूगा । लेकिन जरा देखना कि आखिर में क्लाइमेक्स ठीक रहे। वहीं कहानी-लेखन की करा- मात देखी जाती है। जहर ने कहा-वह क्लाइमेक्म तुम्हें जरूर मिलेगा। बहरहाल मैं जो कुछ घटना घटी थी, उसे ही ठीक-ठाक सुनाता जा रहा हूं। कही भी मैं थोड़ा-सा बढ़ाऊगा भी नहीं और न ही घटाऊंगा। थोड़ी देर पहले ही मैंने कहा कि मेरे लड़के की शादी हो गई। उस शादी के बाद ही मैं अपनी वकालन में व्यस्त हो गया। मैंने नव-वधू से कह दिया-~-देखो बेटी, तुम्हे घर के कामकाज कुछ भी देखने नहीं होगे। तुम सिर्फ मेरी मां की सेवा किया करो। तुम्हें और कुछ भी करना नहीं होगा। लेकिन जब मैंने सोचा कि इस बार मेरे जीवन में परम सुख आ गया है, तभी शायद आकाश की ओट में अदृश्य रहने वाला भगवान हसने लगा। मैंने कहानी सुनते-सुनते बीच ही में जहर को टोक दिया-~-यह क्या, अब कहानी में भगवान कहा से टपक पड़ा? भला भगवान क्यो हसा जहर ने कहा-भगवान यही सोचकर हंसा कि मनुष्य कितना याशा- वादी होता है। देखो, हमारे देश में एक कहावत प्रचलित हैं कि 'आशा से बचे चासा' । चासा यानी किसान याशा के सहारे ही जिन्दा रहता है। यह कहावत सिर्फ किसानों पर ही नहीं, बल्कि सारे मनुष्यो पर सही उतरती है। हिटलर को अगर मालूम होता कि आखिरकार उसकी ऐसी मर्मान्तक ?
परिणति होगी, तो क्या वह युद्ध करता? मिल्टन को अगर मालूम हो जाता कि जीवन के संध्या-काल में वह अंधा हो जाएगा, तो क्या वह पढ़ाई- लिखाई सीखता या काव्य-साधना करता? सम्राट शाहजहां को अगर यह मालूम होता कि उसके पुत्र ही उसे शेष जीवन में किले में बन्दी बनाकर रखेंगे, तो क्या उसने शादी ही की होती ? नेपोलियन अगर जानता कि अपने जीवन के आखिरी दिनों में उसे सेण्ट हेलेना द्वीप में निर्वासन-दण्ड भोगना होगा तो क्या वह फ्रांस की गद्दी पर बैठता? और मैं ही अगर जानता कि मेरी पुत्रवधू के आते ही मेरा जीवन विषमय हो जाएगा, तो क्या मैं उस लड़की के साथ अपने पुत्र का विवाह करने के लिए प्रस्तुत होता? मेरी समधिन विधवा होने पर भी काफी ज़मीन-जायदाद की मालकिन थी। मैं जानता था कि विधवा समधिन की मौत के बाद एक दिन मेरा लड़का ही उनकी सारी जायदाद का मालिक बनेगा। सो सम्पत्ति का लोभ मुझे नहीं था। दरअसल मैं लोभी आदमी नहीं हूं, ऐसी बात नहीं। मुझमें भी लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद और मत्सर- -- सभी हैं। ? लेकिन धर्म का लोभ क्या बुरा है ? ईमानदारी का लोभ क्या बुरा. है ? पुण्य का लोभ क्या बुरा है ? भाई, मुझे वैसा ही लोभ है। मुझे लोभ है अपने सुनाम का। लड़के की शादी करने के बाद मैंने चाहा था कि मेरा सुनाम हो । लेकिन मेरे उसी सुनाम पर आघात लगा। मेरे लड़के की शादी के बाद से ही घर पर आने के वाद सुनता कि अपनी लड़की को देखने के लिए समधिन आई थी। घर पर लड़के की सास के आने पर सभी अतिरिक्त रूप से सावधान रहते। समधिन बड़े लोगों में से थी। उसके बावजूद जब लड़की की शादी 50 / कैसे-कैसे सच कर दी है तो उसे ससुराल तो भेजना ही होगा। इकलौती बेटी थी। उसे छोडकर रहना कितना कप्टप्रद या, यह बात सभी आसानी से समास सस्ते - बहू की मा लेकिन पहले मेरी मां के पास आकर बैठती । यह पूटनी- मा, आज आप कंसी हैं? मां भी बहुत मुश होतो। पोते को ऐमी सारा मिलेगी, इसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। मां के पास जाते ही मो बताती-जानते हो जहर, आज बहू की मा आई थी। मेरे पास बैठकर वह काफी देर तक बातें करती रही। इतने बड़े घर की बहू है, फिर भी अभिमान उसे छू भी नहीं गया है। मा की खुशी मे ही मेरी खुशी पी। माने तो सारी जिन्दगी भभावो और तकलीफों में गुजारी यो। शेप-जीवन मे पोते की बहू का मुंह देवने की साध पी, सो यह साध भी पूरी हुई। उसके बाद समधिन इतनी बदिया मिलेगी, मा ने इसकी भो कल्पना नहीं की थी। मा को वह माध भी पूरी हुई। यह सब देखकर मुझे बड़ी खुशी हुई। मां ही तो मेरे जीवन का सर्वस्व थी। वीच-बीच में समधिन मेरी मा के लिए अपने हाथ से बनाई हुई कोई विशेष सब्जी ले आती। यह बात भी मेरी मां मुझसे बताती। यह कहकर वह मेरी पत्नी से बोलती-बहू, क्या तुम ऐसी सब्जी नही बना सकती ? ऐसी सब्जी ही जहर पसन्द करता है । अहा, अगर आज मेरे बदन में ताकत रहती तो क्या मेरे जहर को इतनी तकलीफ होती? जहर दिन-भर पटता है और खून- पसीना एक कर रुपये कमाता है और उसीको देखने वाला कोई नहीं। यह मेरी वकिस्मती है कि अपनी ही आखो से यह भी देखना पड़ रहा है। सभी कुछ जब इस तरह ही चल रहा था, तभी हठात् यबर आई कि बहू . मधिन बहुत बीमार हो गई थी। वहू के साथ मेरा लड़का अपनी सास को देखने के लिए गया। लड़के को उसकी मां के पास ही छोड़ दिया और वह खुद घर लौट आया। पर आते ही मैंने उससे पूछा--तुम्हारी सास की तबीयत कैसी है ? लड़के ने कहा-दवा दी है। वैसे कुछ अच्छी ही हैं । कल बड़े डाक्टर को लाकर दिखाऊंगा । देखें, वह क्या कहते हैं ! मैंने पूछा-क्या रोग है ? लड़के ने कहा-~-मुझे तो लगता है कि खाने-पीने में लापरवाही बरतने के कारण ही उनकी तबीयत खराब हुई है । हफ्ते में तीन दिन तो वे उपवास करती हैं। मैं अवाक् रह गया। मैंने पूछा-~-उपवास ? खूब उपवास करती हैं क्या ? आखिर इतने उपवास क्यों करती हैं वे ? लड़के ने कहा-कौन समझाए ? मैंने मां को बहुत कुछ कहा । लेकिन वे तो सिर्फ यही कहती हैं-मैं हूं एक विधवा औरत । और कितने दिनों तक जिन्दा रहूंगी ? पूजा-पाठ नहीं करने पर परलोक में जाकर भगवान के सामने कौन-सा मुंह दिखाऊंगी? लड़का सास से कहता-सो आपका जीवन बड़ा है या आपका यह पूजा-पाठ ? बताइए तो मां? लड़के की सास कहती-बेटे, ऐसी बातें मत करो। ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। देवी-देवताओं के बारे में यह सब कहना उचित नहीं। इससे अमंगल होता है बेटे। मेरा लड़का फिर भी अपनी सास को समझाता-~-मां, अव से मैं जो डायट-चार्ट बनाकर दूंगा, आप उसी के अनुसार खाना-पीना कीजिएगा। अपने दामाद की बात टालने का वह साहस कर नहीं पाती । कहती- सो तो इस शरीर के लिए करना ही पड़ेगा। तुम जब कह रहे हो तो उसे -- 52 / कैसे-कसे सच । मानकर ही चलना होगा। लेकिन दो-एक दिनों में ही मारे नियम फिर जहां में नहा धरे रह जाते । हटात फिर तो घर के पुरोहित महागय याकर हातिर होते। पुरोहित महागय जो विधान बताते, गृहिली भी टीक वही करती। मेरे लडके यो साम डाक्टरों को दानो मे ज्यादा मूल पुरोहिता-पुजारियों को यातो को देती। ऐसा कोई भी व्रत नहीं था, जिमरा वे पालन नहीं करतीं। ऐमी को पूजा नहीं थी, जिसे वे करना नहीं चाहती । लक्ष्मी-पूजा से शुरु कर मनमामूजा तक ममी पूजा वे अवश्य करती। बहू कहती--मा, तुम इतनी पूजा, इतने व्रत और इनने अवाम क्यों करती हो? मां कहती-क्या मैं ये अत-उपवाम मरने लिए करती हूँ? में वन- उपवास करती हूं तुम्हारे लिए हो। तुम्हारी हो तो मुझे दिन-रात चिन्ता मगी रहती है। मब कुछ मुनकर मेरी मां बहू मे रहती-अच्छा हो तो है। तुम्हारी मां ने पिछले जन्म में बहुत पुष्य किए थे। इसीलिए तो वह यानी इच्छा के अनुसार पूजा और व्रत-उपवास कर पा रही है। और मेरी विस्मत देखो, लगातार भोई पडी हूं तो मोई हुई ही हूं। पिछले जन्म में न जाने मैंने कितने पाप किए थे, तभी तो मुझे इतने भोग भोगने पड रहे हैं। मा की बीमारी की वजह से बहू सब ममय हमारे घर पर रह नहीं पाती। यहा दो दिनो तक रहकर फिर बुधक दिनों के लिए वह अपने मेके चली जाती। लड़का रोज एक बार अपनी समुराल जाता और काकी रात होने पर पर सौटता। लड़के के घर लौटते ही मैं पूछना-आज तुम्हारी साम की तबीयत कैसी थी?
- लड़का कहता-कल तक तो उनकी हालत ठीक थी। लेकिन आज फिर तबीयत बिगड़ गई है। -क्यों, एकदम तबीयत बिगड़ कैसे गई ? लड़का कहता-कल एकादशी जो थी। निर्जला एकादशी । एकादशी के दिन वे अपने मुंह में दवा भी नहीं डालतीं। मैं कहता-सो एकादशी के बारे में उन्हें खबर ही क्यों दी जाती है ? ये सब खबरें कौन देता है उन्हें ? लड़का कहता-वही पुजारी और पुरोहित खबर देते हैं। वहां एक झुण्ड पण्डितों का है और एक झुण्ड पुरोहितों का। उन सवों को मासिक वृत्ति दी जाती है। प्रत्येक मास उन्हें वृत्ति मिलती है और साथ ही साथ सीधा भी। कोई महीने में पांच सेर चावल पाता है तो कोई तीन सेर। कोई दो साल में एक कम्बल पाता है तो कोई एक साल में दो गमछे । यह सब उसी समय से जारी है, जब कि मेरे श्वसुर साहब जिन्दा थे। मेरे लड़के की ससुराल खूब विचित्र है भाई। खूब रईस खानदान जरूर है, पर सबों का चौका-चूल्हा अलग-अलग है । एक घर में सत्ताइस परिवार हैं । सत्ताइस रसोईघर हैं। किसी घर में रसोइया खाना बना रहा है तो किसी घर में गृहिणी खुद खाना पका रही है। इसीलिए एक-दूसरे के बीच ईर्ष्या भी है ! एक घर में मांस पकता है तो और एक घर में बनती है झींगा-मच्छी। लड़के का रिश्ता करते वक्त इतनी खबर नहीं मिली थी। नामी खान- दान था। तीन पीढ़ियां पहले हमारी बहू के पिता जी के दादा जी उस ज़माने में रायबहादुर बनाए गए थे। उनके पिता जी ने ही पहले जोड़ासांकू में वह मकान बनवाया था। उसके बाद से ही उस वंश की उन्नति शुरू लड़की देखने के दित लड़की के चाचा जी आकर खड़े हुए थे। 54 / कैसे-कैसे सच उन्होंने कहा था-बड़े भैया यधिक दिनो तक जीवित नहीं रहे । उम समय से ही भाभी हमारे पास ही है। यह सड़की ही बड़े भैया की एकमात्र सन्तान है। उसी दिन सुना था कि बहू की मां दिन-भर सिर्फ पूजा-पाठ में ही लीन रहती थी। लेकिन पूजा-पाठ में वह इतनी लीन रहती थी, यह तो मैंने उम समय कल्पना भी नहीं की थी। मैंने सोचा था कि कभी-कभी ऐमा भी होता है। वहुत-मे घरों में ही घर की गृहणियों को दिन-रात भगवान के नेम-धेम में ही व्यस्त देखा है । लेकिन उसकी भी तो एक हद होती है। फिर भी बहू की मां की तरह और किसी को मैंने देखा नहीं । पाने मब कुछ सुनकर कहा- मेरी भी इच्छा है कि एक बार जाकर समधिन को देख आऊं लेकिन जाऊ कंमे? उम वार मैं बहुत मुश्किल में किमी तरह मां को रोक पाया था। अचानक जहर कहानी सुनाते-सुनाते एक बार रुका । मैं शुरू से ही कहानी मुन रहा था। मैंने कहा-यह तुम कितनी कहानियां सुना रहे हो, भाई? तुमने तो कहानी शुरू की थी मालदा की। अव नुम कहानी सुना रहे हो जोड़ासांक को अपनी ममधिन के घर की। इम कहानी के साय तो मालदा की कहानी का कोई मेल दिखाई नहीं पड़ रहा है। जहर ने कहा--मेल जरूर है। नहीं तो इतने किस्से वयान क्यों कर रहा हूं? मैं हूं एक एडवोकेट । अट-शट बातें करना हमारे पेशे का दस्तूर नही । तब तो जज माहब मुझे तुरन्त रोक देंगे। मैं जो कुछ मुना रहा हूं, तुम चुपचाप सुनते जाओ। तुमने देखा होगा कि हम लोगों को पृथ्वी पर पहाड है, समुद्र हैं और रेगिस्तान भी । मरमरी नजर में देखने पर ये सभी कितने चेतरतीय दिखाई पड़ते हैं। ऐसा लगता है मानो दुनिया बनाने वाले ने अपनी मर्जी से इन्हें रख दिया-बिना किसी तारतम्य के, बिना किसी संगति के। लेकिन जब हम इन्हीं बेतरतीब चीजों को इस विश्व-ब्रह्मांड के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं, तब मालूम होता है कि इनके बीच भी कोई एक सामंजस्य ज़रूर है। मेरी इस कहानी में भी तुम्हें वह सामंजस्य देखने को मिलेगा, जब तुम इस कहानी का आखिरी अंश सुनोगे । मैं एक एडवोकेट हूं, यह तो मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया है। एडवोकेट जब जज के सामने बहस करता है, तव कभी-कभी मालूम होता है कि वह न जाने क्या आलतू-फालतू वातें वके जा रहा है। लेकिन जब बहस पूरी होती है, तब मालूम पड़ता है कि उन आलतू-फालतू बातों में भी उसका एक लक्ष्य स्थिर था। उस समय वे सारी आलतू-फालतू बातें अर्थपूर्ण हो जाती हैं। मेरी यह कहानी भी ठीक वैसी ही है। किस्मत का कुछ चक्कर ही ऐसा है कि वचपन से मैंने अब तक जो-जो काम किए हैं, उनमें से प्रत्येक का लाभांश आज पा रहा हूं। अच्छे कामों का अच्छा फल मिला है तो बुरे कामों का बुरा। अभी भी पा रहा हूं। परलोक का मुझे इन्तजार करना नहीं होगा। और फिर सच्ची बात तो यह है कि अच्छे या बुरे कामों का फल भुगतने के लिए किसी को भी परलोक का इन्तजार करना नहीं पड़ता। मेरे लड़के के श्वसुर साहब थे एक रईस बाप के बेटे । बाप की सम्पत्ति का कोई पार न था। इसीलिए वे जिसे भी सामने पाते, उसकी गर्दन खुद अपने हाथों से उतारते हिचकते नहीं। एक बार रेस के मैदान में जाकर उन्होंने एक लाख रुपयों का एक चेक काटा था। रेस के मैदान में वही घटना पहली है और आखिरी भी। उसके बाद से ही रेस के मैदान में यह नियम बनाया गया कि एक लाख रुपयों का एक चेक काटा नहीं जा सकता। 56 / कैसे-कैसे सच 1 उनके पिता जी बड़े हो कडे मिजाज के आदमी थे। पहले-पहल तो उन्होंने अपने लड़के को सावधान किया। लेकिन जब उन्होंने देखा कि लड़का अब सुधरने वाला नहीं है, तब उन्होंने उसे अपने घर मे घुराने ही नहीं दिया। यह देखकर लड़के ने भी अपने घर पर आना छोड़ दिया। जब तक पिता जी जीवित थे, तब तक वे कभी भी अपने घर पर नहीं पाए। एक दिन जब अचानक उन्हें अपने पिता के मरने की खबर मिली, तो वे अपने घर में आ धमके। उनके साथ थी उनको नवविवाहिता पत्नी। चाचा, चाची और चचेरे भाई आफर सडे हुए। बाप की मौत हो गई थी, लेकिन उन्होंने अपना सिर तक नहीं मुंडाया। श्राद्ध करने की तो बात ही दूर थी। अपनी पत्नी के साथ वे अपने कमरे के भीतर चले गए। जो लोग मृतक को सम्पत्ति हड़प लेने की ताक में थे, उनकी आशाओ के ऊपर तुपारपात हो गया। लेकिन उससे रहू के पिता का कुछ बनने- बिगडने वाला न था। उन्होंने मामला-मुकदमा कर अपनी जायदाद अलग कर ली। उस मुकदमे का फैमला होने में काफी दिन लगे। जब फैसला हो गया, तब वे अपनी मर्जी के मुताविक दिन गुजारने लगे। अपनी पुत्रवधू के मुह से ही मैंने यह सब किस्से सुने थे। बहू के दादा जी कोई वसीयत नहीं कर गए थे, इसी से जान बनी। बहू के पिता जी ने अपना हिस्सा अलग कर भाइयों के घर की तरफ दीवार चिनवा दी। भाइयो के साप फिर तो सारा सम्पर्क टूट गया। इस तरह-वोडासाय पी गांगुली-बाडी के सत्ताइस हिस्से हो गए। बहू के पिता जी ने फिर भी अपना रास्ता नही बदला। उसी समय उस घर में मेरी पुत्रवधू का जन्म हुआ। जब तक वह छोटी थी, तब तक वह कुछ भी जान नहीं पाई।
उसके बाद गुछ बड़ी होने पर यह रामश चुयी थी कि ये राव इतने बड़े पर में अलग थे। उनो घर में बहुतेरे रसोईघर थे। जितने रसोईघर थे, उतने ही थे पूलहे। बाहर से ये एगा थे, लेकिन भीतर खाते वक्त सभी अलग-अलग थे। मेरी पुत्रवधू गुहारी बात मारते हुए पाहती-बगल के कमरे में जब गाई-बहन खा रहे होते तो गां गुणे सावधान कर देतीचे राब अभी सा रहे है। तुग यहाँ गत जाना। वह पूछती-गयों गां, यहां जाने से क्या होगा? मां पाहती--वहां जाने पर राम तुम्हें लालनी कहेंगे। सब काहेंगे कि रा लड़की गो गुछ गाने को नहीं मिलता। एसी वातावरण में लड़की बड़ी हुई। फिर यह स्पाल में दाखिल की गई। उसे याय: गितब से ही मां सिर्फ पूजा-पाठ में व्यस्त रहती। घर पर गोई न कोई पूजा रोज होती। किसी दिन लक्ष्मी-पूजा, किसी दिन गाली- पूणा, तो गिती दिन शिय-पूजा। पूजा गो मागले में किसी दिन नागा नहीं होता। और प्रायःदी मां उपवास गारती। लड़गी पूछ बैठती-~-यह गया मां, तुगने आज खाया नहीं ? गां गाहती-आज मुशे खाना नहीं है। आज अशोकपष्ठी का व्रत जो | ! गगा तुम्ने, मालूम नहीं ? लड़फी पूछती-राना व्रत-उपवास करने से गया होगा मां ? इतनी पूजा करने से गया फायदा होगा? गो गहती---होगा और गया, भला होगा---गंगल होगा। तुम लोगों के गले गो लिए ही तो गह राव करती हूं । इसरो तुम्हारा और तुम्हारे पिता जीपा गंगल होगा बेटी। लड़की मां से पूछती-तुम तो इतना पूजा-पाठ मारती हो। लेकिन 58 / फसे-फरो राग
और किमी की मा तो इतनी पूजा नहीं करती, इतने उपवास नहीं करती।
मां कहती-वे सव पूजा नहीं करते हैं तो न सही। पूजा नही करने
पर भगवान उनमे नाराज हो जाएगे। और मैं पूजा करती हूं तो देखना
तुम्हारा कितना मंगल होगा।
लडकी पूछती-मां, मेरा क्या पगत होगा?
मां कहती-जब तुम सयानी हो जाओगी तब तुम देखोगो कि तुम्हें
कितना मुन्दर दुल्हा मिलेगा। कितना प्यारा बच्चा होगा तुम्हारा । तुम्हारा
सभी कुछ शुभ होगा, मंगलमय होगा। लक्ष्मी तुम्हारे घर पर हाथ जोड़े
।
पुडी रहेगी।
लहकी सभी कुछ मुनती। फिर पूछती-शायद तुम्हारी मां भी पूर्व
पूजा-पाठ किया करती थी ! इमीलिए तो तुम्हारी शादी इस पर में हुई
है.
मा कहती-हा, तभी तो तुम्हारी-जसी रानी विटिया मितो है मुहो।
तुम सचमुच रानी-विटिया हो, सोना-विरिया।
यह कहकर मा अपनी लड़की को दोनो हापों से पकड़कर उसका
माया चूम लेती। प्यार-मनुहार करतो...।
लेकिन पिता जी को यह सब पसन्द नहीं था।
पिता जी कहते--इस घर में यह सब क्या हो रहा है ?
मां कहती-आप कुछ भी फिक न करें। देवी-देवता के विषय में
आपको कुछ भी कहने को जरूरत नहीं।
पिता जी कहते-झूठ-मूठ इन पुरोहितो और परितों को इतना
विला-पिलाकर रुपये देने में क्या लाभ है ? वे सब तो घोरोवार और
पावही हैं।
मां कहती-शि:, ऐसी बातें नही किया करते। भगवान नाराज हो
जाएगे। इतनी पूजा की है, तभी तो आप जैसा पति पाया है मैंने। इसकी
कैसे-कैसे सच 59
जैसी प्यारी कन्या मिली है मुझे । पिता जी कहते-ये सब बातें शायद उन धोखेबाजों ने ही तुम्हें सिखलाई हैं । तुम तो जानती नहीं कि वे सब क्या हैं ! केवल इस तरह की बातें बनाकर वे सब तुम से रुपये ऐंठने की फिराक में रहते हैं। और सचमुच ही मां की पूजा की क्या धूम थी ! उनके दान-ध्यान का का क्या कहना !! किसी को अर्थदान दिया जा रहा है तो किसी को स्वर्ण-दान और किसी को भूमि-दान। मां के दान-धर्म का कोई अन्त था ही नहीं। और उसके साथ थी सेवा । सेवा यानी शानदार भोजन । सव की मासिक वृत्ति बंधी हुई थी। किसी को महीने में दस रुपये मिलते तो किसी को सौ रुपये। पिता जी के पास रुपयों की कमी न थी। पिता जी के पास पैतृक सम्पत्ति तो थी ही, साथ ही दादा जी के पास से मिले हुए मकानों से किराये के भी हजारों रुपये आते। उसके साथ ही थे सोने और हीरे-मोती के गहने । मां के पास कितने गहने थे, इसका कोई हिसाव न था। मां को जेवर जमा करने की आदत थी । जिन्दगी-भर वह जेवर जमा करती रही। इसलिए मां भी धरम-करम के लिए खुले हाथ से ख़र्च करती। परिवार में नाममात्र के तीन आदमी थे। तीन आदमियों के खाने-पीने के लिए आखिर रुपये ही कितने खर्च होते ! अधिक रुपये खर्च होते पूजा-पाठ और यज्ञ-हवन में ही। पिता जी जैसे नास्तिक थे, मां ठीक उनके विपरीत थी परम आस्तिक । इसलिए दिन-भर पिता जी कहां रहते, इसका कुछ ठीक नहीं था। एक-एक दिन आधी रात को लड़की की नींद टूट जाती। वह जागकर हैरत से देखती कि उसकी मां भगवान की तस्वीर के सामने बैठी-बैठी एकाग्र भाव से जप कर रही होती 60 / कैसे-कैसे सच लड़की मा को पुकारती-मां"। मा भवानक अपनी बेटी की आवाज सुनकर उसके पास चली जाती। कहती-तुम अभी तक सोई नही वेदो? कभी वक बाग रही हो? मी जाओ। सो जाओ मेरी रानी बिटिया, काफी रात हो चुकी है। लड़को पूती-तुम क्यों जाग रही हो मा? क्या तुम सोनोगो नहीं? मां कहती-मेरी फिकर मत करो। तुम मो बानी। यह लो में भी तुम्हारे पास सोती हूँ। यह कहकर अपनी बेटी के माय लिपटकर मां लेट जाती। जद तक लड़की को नीद नहीं आती, तब तक वह वहीं लेटी रहती। उसके बाद जब काफी रात को पिता जी घर लौटते, तो मां घर का दरवाजा खान देती। पिता जी मां मैं कहतेक्या हुआ? तुम बद तक जना हुई हो ? मा वहतो-आप पर लौटे नहीं, फिर मैं कैमे मोती? बाप लौटे बिना क्या मुझे नीद आ सकती है ? यह कहकर मा पिता जी का खाना परोम देनी। कहनी-मोजिए, भोजन कर लीजिए । मने खाना ढककर रख दिया पा। पिता जी प्रायः कहते--में नहीं साऊंगा। मैं बाकर बाया हूं। मा वहती-आप खाएंगे नहीं ? पिता जी कहते--तुमने खा लिया है न? मां कहती--आपने अभी तक खाया नहीं। फिर वापसे पहले मैं कैसे खा लगी, यह बात आपके मन में आई ही कम ? पिता जो कहते-तुम तो मुझे भारी मुसीबत में डाल देती हो। तुम पर पर रहती हो। समय पर माना क्यों नहीं खा लेतो? मैं कब कहाँ रहता हूं, इसका कोई ठिकाना है क्या? मां बहती-कुछ जल्दी भी तो घर मा मरते हैं। राठ के दस बजे , तक पिता जी कहते-तुम ठहरी औरत की जात । दिन-भर घर में पड़ी रहती हो, तुम क्या समझोगी? मुझे कितना काम रहता है, वह तुम नहीं जानती। मां कहती-ऐसा क्या काम लगा रहता है ? आपके जितने काम हैं, वह सव तो आपके दफ्तर के लोग करते हैं। पिता जी पूछते-~-क्या मेरे मामले-मुकदमे नहीं हैं ? मां कहती-सो आपके वकील-अटर्नी भी तो हैं। वे सभी तो मामले- मुकदमे देखते हैं। इसी के लिए तो उन्हें मोटी तनख्वाहें दी जाती हैं। पिता जी कहते-वकील-अटर्नी के ऊपर ही सारा भार अगर छोड़ दिया जाए तो फिर हो गई छुट्टी। वे सब बारह बजाकर रख देंगे। तुम तो उन लोगों को पहचानती नहीं। वे सब तो रहते हैं सिर्फ रुपये बनाने के चक्कर में। मां कहती-सो जमीन-जायदाद रहने पर मामला-मुकदमा तो लगा ही रहेगा। पिता जी कहते-~मामला-मुकदमा नहीं करने पर जायदाद भी हाथ से निकल जाएगी। तुम तो हम लोगों के आत्मीय-स्वजनों को पहचानती नहीं। जिस दिन से मैं तुम्हें व्याह कर घर लाया हूं, उस दिन से ही वे मुझसे खार खाए बैठे हैं। उन्होंने सोचा था कि मैं कभी भी घर नहीं लौटूंगा। वे ही सारी जायदाद के मालिक बनेंगे...। मैंने उन लोगों के मनसूबों पर पानी फेर दिया है । खार तो खाएंगे ही। मां कहती - अगर जमीन-जायदाद के कारण ही वे हमसे इतने नाराज हैं तो जमीन-जायदाद को त्याग दीजिए। इतनी ज़मीन-जायदाद लेकर हम क्या करेंगे? उसके बजाय तो जायदाद का कुछ कम रहना ही अच्छा है, उससे आपका स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा और इतनी रात आपको घर लौटना 62 / कैसे-कैसे सच
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पिता जी कभी कहते ---जमीन-जायदाद का झंझट-झमेला छोड़कर
जिस तरफ दो निगाहें हों, उधर ही चला जाऊंगा। वकील-पेशकार और
मुख्तार-मुहरी से अव पार नहीं पा रहा हूं। विलकुल मार डाला है इन
सबों ने
लेकिन दूसरे ही क्षण पिता जी फिर बिलकुल बदल जाते ।
पिता जी कहते-आज मैं घर पर खाना नहीं खाऊंगा। मुझे अभी
तुरन्त ही बाहर निकलना होगा।
मां पूछती-कहां?
पिता जी कहते-आज हाई कोर्ट में पार्टीशन वाले केस का फैसला
सुनाया जाएगा। इसीलिए वकील को उसके घर से साथ लेकर जाना
होगा। दिन के दस बजे ही।
मां काहतीसो भापको पहले बताना चाहिए था। पहले ही बता
रखने पर मैं रसोइये से कहकर खाना तैयार करवा लेती।
काहां का मामला है-यह सब मां कुछ भी नहीं जानती । वह साथ ही
साथ पण्डित जी को बुलवाती।
पण्डित जी दौड़े आते।
कहते-~-क्यों मां, कैसे याद किया है ?
मां कहती-~~-आपको अभी ही हवन की व्यवस्था करनी होगी।
पण्डित जी हैरान रह जाते । पूछते-क्या हुआ है मां?
मां कहती-भारी विपत्ति में पड़ी हूं, पण्डित जी। आज के ही दिन
यज्ञ करना होगा। आज ही हाई कोर्ट में फैसला सुनाया जाएगा। आर
कुछ उपाय कर मेरी रक्षा कीजिए।
मां पूछती-लगभग कितने रुपये लगेंगे? पांच सौ रुपयों में
अनुष्ठा
पूरा हो जाएगान?
पण्डित जी कहते-एक बार इतने रुपये ही दीजिए। बाद में जरूर
64 / कैसे-कैसे सच
पहने पर मैं फिर आर से माग लूंगा। साप ही साथ आलमारी खोलकर मां पांच सौ रुपये निकालती और पण्डित जी के हापों में रण देती। और फिर उसके बाद घर पर पूजा-पाठ का दौर शुरू हो जाता। धूप. घूने की गध से सारा पर महक उठता। कांसे के घटे को आवाउसे घर-घर गूंज उठता। सत्ताइम हिस्सेदार समाजाते कि हमारे घर पर कोई बड़ी पूजा आयोजित हो रही है। और फिर सिर्फ या हो, यह बात नहीं। उसके साथ ही होता हन- भोजन और उसके बाद मोटी दक्षिणाए। एक दिन में ही मां के हजार रुपये खर्च हो जाते। रात में घर लौटने पर पिता जी मा से पूघ्ते-सहा. पो फिर तुम्हारा कोई प्रत पा क्या? उस घर में इस तरह प्रायः ही होता। इसमें तारजर को कई पो। पिता जी सिर्फ यह जानना चाहते थे कि nिs गया है! मा ने लेकिन उस बात का जवाब नहीं दिया। मां ने पूछा-हाई कोर्ट में बारके मारने का क्या आज? आप मुकदमा जीत गए हैं न ' पिता जी ने पूछा-इसीलिए समता है कि तुरा मां ने कहा--पहले आप मुझे मेरी ---- आपकी बात का जवाब दूंगी। पिता जी ने कहा-हिती हो। ---डिग्री मान? पिता जी ने कहा-पानी हर ?
मां दोनों हाथ जोड़कर अदृश्य देवता के प्रति अपना नमन ज्ञापित करती और कहती-~मैं जानती थी कि आप ज़रूर जीतेंगे। पिता जी हंसने लगते। कहते-सो तो मैंने समझ लिया। लेकिन कितने रुपये खर्च हुए हैं, यह भी तो सुनूं। मां कहती-आप सिर्फ खर्च की बात करते हैं। लेकिन आज जो आपकी जीत हुई है, वह क्या आपके वकील के कारण हुई हैं ? पिता जी हंसकर कहते -तो क्या तुम सोचती हो कि तुम्हारे गुरुदेव के कारण मेरी जीत हुई है ? मां कहती-हां-हां, गुरुदेव के कारण ही आपकी जीत हुई है। गुरुदेव ने हवन-पूजन किया, इसीलिए तो आपको विपत्ति टल गई। पिता जी बोले-सो रुपये कितने खर्च हो गए, यह तो बताओ न ! मां बोली-नहीं जी, नहीं। आपके ज़्यादा रुपये मैंने खर्च नहीं किए हैं । सब मिलाकर हजार रुपये भी नहीं। आप रुपयों की इतनी फिक्र क्यों करते हैं ? आपने जो यह मामला जीत लिया, इसमें आपको कितने हजार रुपयों का लाभ हो गया-बोलिए तो! मां के तर्क के सामने पिता जी को आखिरकार हार माननी होती। मां हमारे गांगुली परिवार के किसी भी सदस्य को फूटी आंखों भी सुहाती न थी। मैंने एक बार मां से पूछा था-मां, तुम घर में किसी के साथ भी मिलती-जुलती नहीं, क्यों? मां हंसती। कहती-कौन कहता है कि मैं घर के लोगों से मिलती- जुलती नहीं ? ये भी तो कोई मेरे पास नहीं आते हैं। मैं पूछती-क्यों नहीं आते मां? मां कहती-क्यों नहीं आते, बताऊ क्या? तुम्हारे पिता ने अपने भाई-बन्धुओं से अनुमति लिए विना ही मेरे साथ शादी कर ली थी, इसीलिए वे बहुत नाराज़ हैं। और फिर मैं गरीब घर की बेटी जो हूँ 66 / कैसे-कैसे सच रुपयों की तंगी क्या धीर है, इसे तुम नहीं समन्न सकती । लेकिन मेरी रग- रग ने इसे समझा है री। इमीलिए तो मैं दिन-राव सिर्फ भगवान को याद करती हूं। इसीलिए तो में दिन-रात पूजा करती हूं, व्रत करती हैं और उपवास करती हूं। मा की ये सब बातें बाहर का कोई भी आदमी नहीं जानता। मा भगवान की पूजा-आराधना में चाहे जितना सर्च कर डालती, परन्तु धमे वह राचं करने के मामले में बहुत कम यो। पिता जी बल्कि मां मे कहते-कहां, तुमने तो मुझसे रूपये मागे नहीं । इस बार तो पर के खर्च के लिए तुमने रुपये लिए नहीं? मां कहती-जब मुझे जरूरत पड़ेगी, मैं आपसे सर माग तूंगी। इस समय तो मेरे पास काफी उपये है। पिता जी अवाक रह जाते । पिता जी कहते-सये तुम्हारे पास कैसे बचे हुए हैं ? तुम्हे तो मैंने अधिक रुपये दिए नहीं थे। मा बहती--मैं जो बडी किफायत से रुपये मर्च करती हूं। पिता जी कहते-देगू, तुम्हारी कंग-वम देयू तो! देयू, तुम्हारे पास कितने सये हैं ? एक दिन पिता जी ने जबर्दस्ती मां की फैश-वरम देख डाली। उन्होंने देगा कि मा की कंश-बक्स में सयों के बण्डल भरे पड़े थे। पिता जी तो बग चमक उठे। उन्होंने कहा-यह क्या? इतने रुपये तुमने कहां मे पाए? चोरी तो नहीं की तुमने ? मा कहती-हा जी, ये रुपये मैंने आपकी जेब से चुराए हैं। थोर क्या सिर्फ रुपये? कितनी ही चीजें मा को अलमारी में पड़ी रहती, इसका कोई ठिकाना न था। किमी भो दिन पर में या घर के बाहर जाते वक्त भी मा को कभी अधिक गहने पहने मैंने देखा नहीं। और फिर मां के पास कितने गहने धे, सो में सट टेछ चकोह।
आलमारी खोलते वक्त मैंने कितनी ही बार उचक-उचक कर देखा है कि कितनी वेशकीमती साड़ियां थीं और कितने बढ़िया साये थे, ब्लाउज़ थे। इन सबों की कोई गिनती न थी। मेरी मां यह सब सुनकर अवाक रह जाती। कहती-तुम्हारी मां पिछले जन्म में बहुत पुण्य करके आई है, बहू । भगवान उसे इतना कण्ट क्यों दे रहा है ? भगवान के मन में क्या है, कौन जाने! वहू कहती--मैं भी तो यही कहती हूं कि मां इतना कष्ट क्यों पा रही है। मां ने जीवन में कभी किसी को ठगा नहीं, जीवन में कभी किसी का बुरा चाहा नहीं। मां ने तो ज़िन्दगी भर, जितनी भी तरह के व्रत और अनुष्ठान हो सकते हैं, किए हैं। पंचांग में जो कुछ नियम लिखे हैं, मां ने उनका अक्षरश: पालन किया है। मां तो इसीसे अव कहती है-पिछले जन्म में मैंने शायद बहुत पाप किए थे, इसीलिए इस जन्म में मुझे इतना कष्ट भोगना पड़ रहा है। जीवन के शेष-काल में मेरी समधिन ने भाई कितने कष्ट झेले थे, यह सुनकर तुम चौंक उठोगे। मेरे लड़के के श्वसुर ने वाणिज्य-व्यवसाय के द्वारा प्रचुर धन अजित किया था। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद मेरी समधिन विलकुल संन्यासिनी की तरह दिन विताने लगी। किन्तु उन्होंने बीमारी के कारण बहुत तकलीफ उठाई आखिर तक । अपने पुत्र से मैंने पूछा था-कैसे डाक्टर हो तुम लोग? एक रोगी को चंगा नहीं कर पा रहे हो? रोग दूर होने में क्या इतने दिन लगते हैं 'कभी? उनकी तो उम्र भी कोई अधिक नहीं है। .
मेरे लड़के ने पहले बात प्रकट नहीं की। फिर सिर्फ मुझसे उसने चुप- घाप कहा-पिता जी, यह रोग कभी मिटेगा नहीं। मैं अपने लड़के की बात सुनकर स्तब्ध रह गया। मैंने पूछा- क्यो नही मिटेगा वह रोग? लड़के ने कहा -- उनके पेट मे कैसर हो गया है। लडके की बात सुनकर मैं चकित रह गया। जो महिला भगवान का इतना ध्यान करती है, इतने व्रत और उपवास करती है और गरीब की बेटी होते हुए भी जिसने कभी किसी को प्रवचित नहीं किया; उसीके भाग्य में इतनी तकलीफें लिखी हैं। लडके ने कहा- यह सब मुख्यत अनियमित आहार के कारण ही हुआ है। अपने शरीर की तरफ तो उन्होने कभी भी ध्यान नहीं दिया। श्वसुर साहब घर लौटते-लौटते रात के एक-दो बजाते । इसीलिए सास को भी इतनी रात तक भूखा रहना पड़ता। अपने लड़के के मुंह से समधिन के असल रोग का नाम सुनकर मैं समझ गया कि वह रोग लाइलाज या। मुझे बडी चिन्ता हुई। मेरी पत्नी मे दिन मुझसे पूछा-आप इन दिनो इतने गभीर क्यों दिखाई पड़ रहे ? क्या हुआ है भापको? हर समय देखती हूं कि आप न जाने किस सोच में डूबे रहते हैं। मैंने झूठ-मूठ का एक बहाना बना दिया। मैंने कहा-एक पेचीदा मामले की वजह से मैं वडा चिन्तित हूं। बहुत ही सीरियस केम है। हमारे पेशे में एक यही मुविधा है कि अपनी किमी समस्या को हम लोग दूसरे की समस्या बताकर अपनी जान बचा सकते हैं। इसीलिए हम लोगो के सम्बन्ध में लोगो की धारणा भी इतनी खराब है। हम लोग बहुत कुछ बहुरूपियों-जैसे होते हैं। पल-पल, छिन छिन हमारे रग बदलते हैं । एक जज के सामने हम कुछ होते हैं, मुवक्किलों के सामने कुछ और ही। इसी तरह अपनी पत्नी के सामने हम कुछ होते हैं--पास-पड़ोस के लोगों के सामने कुछ और ही। हमारा असली रूप क्या है, यह तो नहीं समझ पाते। यह कहते-कहते जहर रुका। लोग भी खुद इतनी देर तक मैं जहर की बातें सुन रहा था। जहर के रुकते ही मैंने पूछा-उसके बाद? जहर ने कहा-'उसके बाद' कुछ ज़रूर ही है, पर अभी से तुम यह जानने की फिक्र में मत पड़ो। उत्सुकता अच्छी चीज़ है, लेकिन अधिक उत्सुकता ठीक नहीं। जज के सामने हम लोग जिरह करते हैं। लेकिन जिरह करने के आरंभ में ही हम असल प्वाइण्ट की चर्चा नहीं करते। वह तो हम लोगों का तुरुप का पत्ता है। उसे हम आखिरी वक्त के लिए रख छोड़ते हैं। मैंने कहा-~-तो फिर इस बार भाई तुरुप का पत्ता फेंको। और इन्तज़ार नहीं कर सकता। अब तो तुम्हारी कहानी खत्म होने को आई जहर ने कहा-हां, कहानी खत्म होने वाली ज़रूर है। लेकिन रेल जव किसी स्टेशन पर रुकती है तो एकाएक तो नहीं रुक जाती। रुकने के पहले गाड़ी की गति धीमी होती जाती है और तब गाड़ी रुकती है। मेरी यह कहानी भी वैसी ही है। बहुत कुछ मेरी समधिन के कैंसर की तरह। वह रोग जब किसी को दबोचता है तो ऑक्टोपस की तरह धीरे-धीरे । पहले तो यह अन्दाज़ ही नहीं लगता कि अब रोग ने धर दबोचा है। जैसे- 70 कैसे-कैसें सच मेदिन बीत है, वैसे-वैसे रोग का प्रयोग बढ़ता जाता है। बहते-दाने रोग यानी चरम अवस्था में या जाता है। एक समय हारटरों ने कहा-रोगी को अस्पताल में भर्ती करना होगा। लेकिन मधिन बोली-~में असतात नहीं जाऊंगी। सहके ने पूछा-लेकिन क्या घर पर बढ़िया इलाज हो सस्ता है ? कभी यह सम्भव है? ममधिन बोली-लेकिन में अपने पति और श्वसुर का पर छोड़कर और कहीं भी नहीं जाऊंगी। मरना होगा तो यहीं मरूंगी। लड़की बोली-मां, तुम नासमझी मत करो। गक्टर वावू तुम्हारे भले के लिए ही कह रहे हैं । तुम बापति क्यों कर रही हो? मां ने मिर हिलाया। कहने लगी-बरे, तुम समझोगी नहीं। अस्पताल में जाने पर मुझे कोई भी पूजा-पाठ नहीं करने देगा। यहां टाकुर जी को कौन भोग लगाएगा? ठाकुर जी को भोग लगाए बिना मैं मुंह में एक दाना भी नहीं रस सकती । अस्पताल में यह सब कमे होगा? लहकी कहती- तो फिर तुम अपने शाकुर जी को भी अस्पताल में से चलो। मां कहती-दुर, ठाकुर जी को कोई उस गन्दगी में ले जाता है या मला? यहां ठाकुर जी पवित्र रह पाएगे क्या? जिमी जहा और जिम समय मौत लिखी होती है, वही और उसी समय उसे मरना पड़ता है। किसी भी व्यक्ति में यह समता नहीं होती कि वह इमे टास सके। इसीलिए जब एक दिन मेरे सड़के ने आकर घबर दी कि उसकी साम की मृत्यु हो गई है, तब मैं अधिक विचलित नहीं हुआ। जहां मृत्यु तय ही हो, वहाँ ताज्जब करने की बात ही क्या ! और फिर उसके अलावा जिसने जिस स्टेशन की टिकट कटाई है, उसे उसी स्टेशन पर उतरना होगा। उसके पहले. के स्टेशन पर भी नहीं और उसके बाद के स्टेशन पर भी नहीं...। यदि यात्री अपने नियत स्टेशन के परे किसी स्टेशन पर उतरेगा तो उसे विना-टिकट यात्रा करने के अभियोग में टिकट-चेकर के पास जुर्माना देना पड़ेगा या बेइज्जती का सामना करना होगा। जो हो, एक वकील के मुंह से ये सब बातें शोभा नहीं देतीं। तुम लोगों के मुंह से ही ये बातें शोभा पा सकती हैं। फिर भी इसीलिए कहता हूं कि न तो यह अदालत है और न ही मैं वकील । यहाँ मैं वकील नहीं, बस एक आदमी हूं। मामूली-सा आदमी । तुम्हारा खास दोस्त । बड़े खानदान की गृहिणी की मृत्यु ! उनके श्राद्ध-कर्म आदि में कितना झमेला हुआ, यह कहकर मैं तुम्हें और बोर करना नहीं चाहता। और फिर शुरू हुआ हिस्सेदारों का आपसी झगड़ा। सत्ताइस रसोई- घरों में एक रसोई-घर था हमारी समधिन का। उस रसोईघर का दर- वाजा बन्द हो गया। वहां अव और किसी भी दिन चूल्हा नहीं जलेगा। खूब धूम-धाम से श्राद्ध हुआ। कहीं भी कोई कृपणता नहीं की मेरे पुत्र और पुत्र-वधु ने। आखिरकार जायदाद का सवाल उठा। भाई, यहीं मेरी कहानी शुरू हो गई। यह है मेरी कहानी का बिलकुल आखिरी हिस्सा। इसीलिए तुम इसे कहानी का आरम्भ भी कह सकते हो और कहानी का अन्त भी। या फिर इसे कहानी की शुरुआत ही समझो। जीवन के आदि से अन्त तक यह जो मानव की जीवन-परिक्रमा है, वह परिक्रमा आदि से शुरू होकर फिर उसी आदि में शेप हो जाती है । मैं एडवोकेट हूं न, इसलिए मुझे खुद लड़ाई के मैदान में आना पड़ा। और फिर एडवोकेट भी हूं तो हाई कोर्ट का। हिस्सेदारों ने तरह-तरह का छल-प्रपंच कर मेरे लड़के की जायदाद हथियानी चाही। लेकिन मैंने 72 / कैसे-कैसे सच
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आखिरी दिनों में होने वाले दुदिनों की आशंका से ही शायद आदमी को जमा करना पड़ता है। लेकिन इस तरह जमा करने की प्रवृत्ति भी मैंने जीवन में और किसी को देखी नहीं। वकील की हैसियत से मुझे बहुत-से वसीयतनामों का प्रोबेट लेना पड़ा है। लेकिन पहले कभी भी मुझे ऐसा अनुभव नहीं हुआ भाई। उसके बाद बैंक। बैंक की पासबुक आलमारी में ही थी। कोर्ट का आर्डर और 'सक्सेशन सर्टीफिकेट' दिखाकर रुपये निकाले गए। उसके बाद बारी आई लॉकर की। लॉकर की चावी भी आलमारी में थी। उसी चाबी से लॉकर खोला गया। लॉकर के भीतर झांकते ही मेरी आंखें चौंधिया गईं। एक औरत के पास कितने प्रकार के गहने हो सकते हैं, यह मैंने तब देखा। और क्या सिर्फ एक लॉकर था? सभी बैंकों के लॉकरों से ढेर के ढेर रुपये-पैसे निकले। मैंने खुद उन गहनों की एक फेहरिस्त तैयार की। सोने-चांदी और हीरे-मोतियों के कितने प्रकार के गहने थे, उन सवों का मैं नाम भी नहीं जानता। बहू से पूछा-तुम्हारी मां के पास जो इतने गहने थे, सो वे तुमसे बताकर नहीं गई? बहू ने कहा-मैंने तो पहले ही आपसे बताया था कि मां को जमा करने का बड़ा नशा था। मैं बचपन में जिन खिलौनों से खेला करती थी, उन्हें भी मां फेंक नहीं पाती। सब कुछ जमाकर रख देती। मां बहुत गरीब घर से आई थी, शायद इसीलिए उनकी ऐसी आदत हो गई थी। बहू ने फिर कहा-पिता जी ने शादी के समय अपने भाइयों की सम्मति नहीं ली थी, इसीलिए उन्होंने मेरे माता-पिता का बहिष्कार किया था। उसी दुःख से मां भी किसी के साथ बोलती नहीं थी, किसी के साथ कोई सम्पर्क नहीं रखती थी। और फिर घर की एक ही छत के नीचे सब रहा करते थे। 74 / कैसे-कैसे सच मैंने कहा---तब तो तुम्हारी मां ने जिन्दगीभर बहुत तकलीफें उठाई पी। बहू ने कहा-इसीलिए तो मेरी मां सिर्फ पूजा-पाठ में डूबी रहती यी। भाइयों के साथ एक घर में रहने पर भी किसी के साथ उसकी बात- चीत न थी, यह मां को अच्छा नहीं लगता था। और फिर घर में तो दिन- भर मां को कोई काम न था। मैं भी अपने स्कूल मे चली जाती और पिता जी चले जाते अपने दफ्तर में। इसीलिए वह अकेली बैठी रहकर करती भी तो क्या करती ? सिर्फ गुरुदेव, ठाकुर और पूजा"। सात वर्षों के बाद उस सम्पत्ति का हिसाव करते-करते मैं बार-बार सोच रहा था कि मनुष्य इतनी सम्पत्ति क्यो जमा करता है ? किसके लिए? किस स्वार्थ की पूर्ति के लिए? मैं ठहरा वकील""। कोर्ट-कचहरी मे जब ये सब मामले आते हैं तो खुद मुझे सुनते-सुनते अपने पेशे से नफरत होने लगती है ! बीच-बीच मे जिरह के वक्त मेरी इच्छा होती है कि अपने कानों को बन्द कर लूं...। इसीलिए तो कहता हूं कि पृथ्वी पर कितने प्रकार के आदमी हैं, कितने प्रकार के चरित्र हैं---यह सब मैंने अपनी आखों से देखा है भाई। लेकिन आज तक मैंने अपनी समधिन जैसी औरत नहीं देखी। मैंने पूछा-4 जहर कहने लगा-वही बात तो अब बताने जा रहा हूं। लॉकर से जो गहने निकले थे, उसको फेहरिस्त मैंने कल तैयार की थी। मेरे कमरे में उस समय कोई भी नहीं था। अकेला बंठा-बैठा मैं फेहरिस्त तैयार कर रहा पाकि अकस्मात् एक काण्ड हो गया। मैंने पूछा-काण्ड ? कैसा काण्ड ? जहर ने कहा-क्या तुम्हे याद है कि शुरू में ही मैंने तुम्हें बतलाया पा कि मालदा पहर में एक लड़की ने किस तरह मुझे ब्लॅकमेल किया थाअर्थात् मुझे ठगा था। उसने मुझसे मेरी अंगूठी छीन ली थी ! मैंने कहा- हां, वही आध भरी सोने की अंगूठी। जहर ने कहा-हां, जो मेरे पिता जी ने मेरी जनेऊ के समय तैयार करवा कर दी थी। अंगूठी पर मेरे नाम का प्रथम अक्षर 'जे' खुदा हुआ था। वही अगूठी उन गहनों के बीच मिली। मैं तो भाई भारी ताज्जुब में पड़ गया। कितने साल पहले की घटना है वह । उस अंगूठी के कारण मुझे अपनी मां से कितनी खरी-खोटी बातें सुननी पड़ी थीं। इतने दिनों के बाद वह अंगूठी मेरे लड़के की सास के गहनों के बक्से में पड़ी मिली ! मैं भी अवाक रह गया। मैंने पूछा- क्या वह हू व हू वही अंगूठी थी? जहर ने कहा-~-हां, हू ब हू वही अगूठी। और कोई दूसरी औरत होती तो शायद उसे तुड़वा कर दूसरी डिज़ाइन का गहना बनवा लेती। किन्तु उनका तो सारी चीजें जमा करने का स्वभाव था, इसीलिए उस अंगूठी को भी उन्होंने जमा कर रखा था। मैंने पूछा-लेकिन आखिरकार तुम्हारे समधी के साथ उनकी शादी किस तरह हुई थी? जहर ने कहा-सो तो मैं जानता नहीं भाई। हो सकता है कि मेरी तरह हो मेरे समधी को भी उन्होंने ब्लैकमेल किया हो और फिर शादी के बन्धन में जकड़ डाला हो। असल में हुआ क्या था, यह तो जानने का अव कोई भी उपाय नहीं भाई । उसी वजह से शायद भाइयों ने उन्हें बहिष्कृत कर दिया था। मैंने पूछा---उसके बाद तुमने उस अंगूठी का क्या किया? जहर ने कहा-और क्या करूंगा बताओ? मां से भी मैं यह कह नहीं सका कि देखो मां, जिस अंगूठी के कारण तुमने मुझ पर इतनी नाराजगी दिखाई थी-~~वह अंगूठी अव मिल गई है। लो, यह देखो अंगूठी। इसका कारण यह कि मां भी कभी की परलोक सिधार चुकी है। 76 / कैसे-कैसे सच मैंने पूछा-तुम्हारे लडके और बहू ने क्या कहा? जहर ने कहा-वे लोग तो कोई इस घटना के विषय में जानते नहीं। मैंने तो मीने की एक अगूठी पाई है, यह बात मैंने किसी से कहो ही नहीं। गह्नो की फेहरिस्त में उस अंगूठी का जिक्र मैने नहीं किया है। मैं नहीं जानता कि वह अगूठी लेकर मैं अब क्या करूंगा! तुमने जब कल मुझे यह बताया कि पूजा-विशेषाक के लिए उपन्यास लिखने के लिए तुम कोई प्लाट खोज नही पा रहे हो, तब मैंने कहा था कि मैं तुम्हें एक प्लाट दूंगा। लेकिन तब तक भी मैं नहीं जानता था कि खुद मेरे घर पर एक प्लाट मौजूद है। उसके बाद जहर ने जेद से एका यगूठी निकाल कर मेरी तरफ बढ़ा दी। कहने लगा-यह देखो भाई, वही बंगूठी है। मैंने अगूठी देखी। जहर ने शायद सोचा कि मैं अगूठी देख रहा था। लेकिन मच तो यह है कि उस समय मैंने उस अंगूठी मे मानो विश्वरूप के दर्शन पा लिए। गीता में श्रीकृष्ण ने जिस तरह अर्जुन को विश्वरूप-दर्शन कराया था, उसी तरह जहर ने भी मुझे अगूठी नहीं दिखाई थी, बल्कि विश्वरूप-दर्शन कराया था।
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