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Samay Ek Shabda Bhar Nahi Hai
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समय एक शब्द भर नही है
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समय एक शब्द भर नहीं है
धीरेन्द्र अस्थाना
राधाकृष्ण
1981
धीरेद्र अस्थाना
दिल्ली
प्रथम सस्करण 1981
प्रकाशक
राधाकृष्ण प्रकाशन
2 असारी रोड दरियागज
नई दिल्ली 110002
मुद्रक
भारती प्रिंटस
दिल्ली 110032
केवल
सुरेश उनियाल के लिए
जो मुझे मेरी तमाम-तमाम
कमजोरियो, बेहदगियो और
मर्खतासो के बावजूद प्यार करता है।
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पह जो उत्तरता हुआ मुस्त सा अंधेरा उसके चेहर पर दिखापी दता है यह उसे समय ने दिया है। समय एक शब्द भर नहीं है। अगर समय तुम्हारी बगल म होकर गुजर जाय तो तुम्ह मुस्तकिल उदासी दे सकता है। मुस्तकिल उदासी चहरे का सांय सांय करत रेगिस्तान म तब्दील कर देती है। और यह तुम अच्छी तरह म जानते हो कि रेगिस्तान अगर दिल से निकल कर चेहरे पर आ बैठे तो ज़िन्दगी सर्र से पिमल जाती है। जिन्दगी के फिसल जाने के बाद तुम्हारे पास आत्महत्या क तक क अलावा भी कुछ बच सकता है क्या? और आत्महत्या तुम कर नहीं सकते क्योरि आत्महत्या के लिए निस भलेज की जरूरत पड़ती है वह तुम्हारे पास वहाँ है ? अगर आत्महत्या कर लेन वाला कलेजा तुम्हारे पास होना ता तुम अव तर हत्याएँ न कर देत? अगर तुमने आत्महत्या या हत्या करने की चाहना बहुन शिद्दत से कभी वो होती और असफर रहे हाते तो उसके चेहरे पर उतरत इन मुम्न-से अंधेरे के साथ तुम्हारा रिश्ता अपरिचय और तटस्थता वा न होवर सवेदना के स्तर पर अतरगता तर फैला हुआ हाना और इन अंधेरे के विरुद्ध एष लवी चीख तुम्ह अपने भीतर गूंजती मवलती महमून हाती मगर । मगर ऐसा नहीं है, क्योकि उसम और तुममें कोई बुनियादी पर्व न 8 समय एक शब्द भर नहीं है होते हुए भी अन्तर का एक पतला-सा सूत्र तुम्हे उसमे अलग-थलग फंक्ता उसने जो सोचा उसे आकार दिया और अजाम लगे हाथ झेला, और उमर जहाँ तक तुम्हारा सवाल है तो साफ कहूँ? तुमने जब भी, जो भी सोचा, उमे तत्काल स्थगित कर दिया । जो भी चाहा उमे भूल गये । चाहतो को स्थगित करते रहने का अटूट सिल- सिला तुम्हारे नाम और तुम्हारे व्यक्तित्व और तुम्हारे चरित्न का पर्याय तुम उमे नही छू सक्ते। तुम कुढने क्यो लगे? यह माना कि तुम पढाकू हो, बौद्धिक हो, इस किस्से या इतिहास या बकवास के पाठक हो, मगर इसका यह अर्थ तो नहीं है कि तुम्हारी कम- जोरियो पर कोई बात ही न की जाये और तुम्हे यह हक दिया जाये कि दूसरो की कमजोरियो पर तुम नाक-भौह सिकोडते रहो। क्या एक भी शब्द मैंने गलत कहा है ? अच्छा, खुद ही पुनर्विचार करना। करना तो दर किनार, तुमने कभी पूरी ईमानदारी से, अपनी एक- एक साँस के साथ आदमी के सपनो को कुचल देने वाले लोगो को कत्ल कर देने का सपना अपने भीतर कभी जवान होने दिया है ? अपनी चाहतो को स्थगित कर देने के सिलसिले मे इतनी महत्त्वपूर्ण जरूरत को अनदेखा करते हुए क्या तुम अनायास ही कातिलो के पक्ष मे जाकर खडे नहीं हो गये ? अपने व्यक्ति' की चाहतो को स्थगित कर देने की अपनी निजी स्व- तरता का इस्तेमाल करते हुए तुमने दूसरी की स्वतन्त्रता का दमन अना- यास ही नहीं कर दिया क्या ? खैर तुम नायर नही हो । दुख इस बात का है कि तुम खलनायक भी तो नहीं हो। खलनायको की भी अपनी एप पक्षधरता होती तो है । मगर तुम तुम्हारे लिए एक शिखडी शब्द का इस्तेमाल करते हुए बहुत तक- लीफ हो रही है, मगर तुम ही बताओ, परिस्थितियो को प्रतीक्षा करने ?
समय एक शब्द भर नहीं है 9 वाले लोग आखिर कौन होते है ? कौन होते हैं वो लोग जो पक्ष में होते है और नहीं होते ? जा विरोध मे नहीं होते मगर होते है ? यह अस्पष्टता क्या है और किसकी है ? और आखिरकार इस असण्टता की जडें यहाँ से पनप रही हैं। तुम शालू हो और जब सडको पर आतर का मन्नाटा उतरने लगता है तो तुम भाग कर मकानो में कैद हो जाते हो । नायक ऐसा नहीं करते। वे चुनाव करते है । तुम्हारे भीतर चुनाव की समझ मौजूद है १ क्या? तुम तो चुनाव के नाम पर मतदान करते हो और हर बार उन्ही लोगो का राजतिलक करते हो जिनकी तिजोरी का चोर-दरवाजा राज महल और ससद जाने वाले मार्ग की तरफ खुलत्ता है। नहीं नहीं विरोध मत करो। तुम बात को समझे बिना विरोध कर रहे हो। दरअसल, तुम्हारा विरोध जनतत्र के तमाशे को न समझ पाने से पैदा हुआ है। तुम प्रतिनिधियो का ही तो चुनाव करते हो न? और प्रतिनिधि जिस रास्त से होकर ससद जात है उसी रास्ते पर मुल्क की कुल दौलत के बड़े बड़े हिस्सेदारो की तिजोरियो के चोर-दरवाजो के सामने मे गुजर कर जव ससद पहुँचते है तब तर व तम्हारे नही तिजोरियो के नुमाइन्दे बन चुके होते हैं। तुम सभवत इसी हवीक्त को स्वीकार नहीं करोगे । मत करो। बात तुम्हारी है ही नहीं । पाँचवी से लेकर विश्वविद्यालयो की ऊंची ऊँची डिग्नियो को लपक लेने के दौरान जो लोग 'जनता-जनतन-जनता की तोता रटन्त करते आये हो उनकी बात ही नहीं है। चात तो उसकी है। वहते है कि उसके दिमाग की कोई एक नस शुरू से ही नहीं है । इस बात की घोषणा सबसे पहले उसके पिता न बहुत गभीर होकर समूचे परि- वार में की थी और वई रातें जागकर अपने सबसे बडे लडके ने बरबाद दिमाग की चिन्ता मे डूबते-उतराते रहे थे। यह तब की बात है जब एवं रोज वह अपना कॉलेज छोडवर दन 10 समय एक शब्द भर नहाह दनाता हुआ कांग्रेस कमेटी के दफ्तर में घुस गया था और नगर अध्यक्ष को कुर्मी पर बैठे अपने पिता से चीय कर बोला था कि इन्होन उसका इतना अधिक वेहूदा नाम रपकर उसकी भावनाओ पर चोट पहुँचायी है कि अगर उन्हें नाम रखने की तमीज़ नहीं थी तो किसी अक्तमन्द आदमी से सलाह ले लेते, कि अब वह इस सडियल नाम को छोडकर अपना नाम खुद रख रहा है, कि यह एक बहुत बडा मज़ाक है कि आदमी को अपना नाम तक पहले से तय हुआ मिलता है, कि आजादी का अर्थ तव तर बेमानी है जब तक आदमी अपने अस्तित्व को अपनी इच्छा से आकार देने के लिए स्वतत्र न हो। पिना अवाक रह गये थे और उनका शव यकीन मे वदल गया था। घटना चूकि कांग्रेस कमेटी के दफ्तर म घटी थी, इसलिए उन्होंने इसे गभी- रता म लिया था। एक बारगी तो उनके जेहन में आया था कि थप्पड मार-मार के साले को वाहर खदेड दें, लेकिन नगर-अध्यक्ष की गरिमा और प्रतिष्ठा के साथ-साथ दीवार पर लगी महात्मा गाधी की दयावान तसवीर न उनकी इच्छा के आगे बैरियर लगा दिया था और वे अपने गुस्स मे घिरे भीतर से थर-थर कापते रहे थे और बाहर म महात्मा गाधी की तरह मुसकराते रहे थे। मुसकराने की प्रक्रिया के दौरान ही उन्होन उस समझाना चाहा था कि पडित जी ने उसकी राशि निकाल कर जो नाम तय किया था वही नाम उन्होन रख दिया था। उसकी राशि सिंह' थी और उसका नाम ट' से रखा जाना चाहिए था, इसलिए उन्होंने उसका नाम टव चन्द रख दिया कि उनके खानदान मे नाम रखाने की रस्म कुलपडित द्वारा ही सम्पन्न कराने की परम्परा है। उमने पिता के चेहरे पर चढे महात्मा गाधी की मुसकान वाल खोल का वेरहमी स चीथडे-चीथडे वरत हुए विफर कर कहा था कि वह उनके खानदान, पडित जी और परम्पराओ को अपने जूते की नोक पर रखता है और इस सडियल नाम टेक्चन्द से उस उतनी ही नफरत है जितनी खद्दरधारी कांग्रेसियो मे, कि उसने अपना नाम भुवन रख लिया है भुवन किशोर। उसक इस वाक्य ने तेजाव का-सा असर दिया था। कांग्रेस कमेटी समय एक शब्द भर नहीं है 11 के दफ्तर में बैठे तमाम छोटे-मोट पदाधिकारियो के चेहरों पर पडा मुसकान, धीरज और अहिंसा का लवादा गल-गल कर उतरने लगा था और उन्होंने नगर अध्यक्ष की प्रतिष्ठा को नकारते हुए अपने भीतर जमी तीखी, बदबूदार नदी के दहाने खाल दिय थे। मामले को विगहता देख वह ढेर सारा थूक दफ्तर में पिछी शानदार दरी वीचोवीच उगल कर बाहर भाग आया था। उसकी इस हरक्त पर पिता का दिमाग मनावा खा गया था और उन्हे यकीन हो गया था कि उसे लेकर उन्होन जो सपने बुने है, टूटनाही उनका सच है, कि अव उनका लडका मेम्बर ऑफ पालियोमेट तो कभी नहीं बन पायेगा, कि उसके दिमाग की कोई एक नस जरूर-जरूर ही नही है। इस बात का सन्देह पहली बार उन्ह तब हुआ था जब अक्षर-ज्ञान के समय घर पर पढाने आने वाले मास्टर साहब का सिर उसन अपनी पत्थर की सलेट से फोड डाला था। बात की तह में जाने पर उन्ह पता चला था कि अक्षर-ज्ञान की अपनी पढ़ाई के दौरान उसने मास्टर साहब स पूछा था, " 'अ' से पहले क्या आता है ?" "अबे तू पागल है क्या?" मास्टर ने जवाब दिया था। "पागल होगे आप, ' उसने पलट कर कहा था, "मैं जो पूछ रहा हूँ उसका जवाव क्यो नही देते ? मैंने पूछा है कि 'अ' से पहले क्या होता । मास्टर साहब का सिर भन्ना गया था। अपन शिष्य वे विलक्षण प्रश्न से वे पहले तो चवित रह गय । फिर प्राध मे उफन कर उन्होंने एक जबरदस्त चांटा उसके गाल पर गड दिया और फुफकारते हुए बोले, 'ये होता है।" "ये भी होता है ।" उसने परम्पराओ को अस्वीकार करते हुए प्रति- उत्तर दिया था और उछल कर अपनी पथरीली सलेट के कोन मे मास्टर साहब का मि तोड़ दिया था। ऐसा करने के बाद वह भयभीत नहीं हुआ था और न ही मास्टर माहब के सिर से बहते यून को देखकर उसे अप- राध-बोध हुआ था । वह विजेता की तरह मुमकराया था और मास्टर 12 समय एक शब्द भर नहीं है मास्टर ने कहा था साहब को कमरे में छोड़ पूरी निश्चिन्तता और सहजता मे वाहर आकर पानी पीने लगा था। ऐसे पागलो को मैं नहीं पढा सस्ता, माहब और अपने टूटे सिर को थामकर चुपचाप चला गया था। इस घटना से पिता के दिमाग म सन्देह का एक सूत्र जन्मा था रि उनका लडका शायद एवनॉर्मल है और वह कही भी एडजस्ट नहीं हो पायेगा। कहते है कि वी० ए० करने के बाद एक रात वह सबको सोता छोड अपने सुविधा सम्पन्न घर का दरवाजा खोल, गली के अंधेरे सन्नाटे मे चुपचाप उतर आया था और फिर वापस कभी नहीं लौटा। तब भी नही जव उसके पिता को किसी नक्सलवादी ने रात की स्याही मे निर्ममता मे खत्म कर दिया था। कहत है कि इस कल से उसका चेहरा कही से भी नहीं टूटा था और नक्सलवादियो के प्रति उमके दिल मे प्रतिहिंसा का भी कोई भाव नहीं उग पाया था। उसके लिए पिता का कत्ल जैसे एक खबर थी और इस खबर से जैसे उसका कोई निजी रिश्ता ही नहीं था। रोज होते कत्लो की तरह उसने इस खून को भी उनम शुमार किया था और आग बढ गया था। कहते हैं कि नक्सलवाडी के सशस्त्र किमान विद्रोह के दिनो मे उसका एक भूमिगत नक्सली दोस्त कलकत्ते से फरार होकर बचता-वचाता एक रात उसके शहर में उसके घर मे आवर टिका। टिक जाने के बाद दोस्त या मालूम हुआ कि उसके दोस्त का पिता आजक्ल शहर की कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष है। अपनी गलती पर सिर धुनते हुए उसने सुबह मुंह-अंधेरे ही खिसक लेने का निर्णय किया। रात-भर दोनो ने राजनीति पर कोई बात भी नही की, क्योकि पिता का चरित्र कमरे में छाया हुआ था, लेक्नि इस एहतियात के बावजूद सुबह तीन बजे जब वह नक्सली दोस्त घर छोड़ने की तैयारी में था, पुलिस के द्वारा पकड लिया गया। बाद में मुना गया कि उम दोम्न को जेल में अमानवीय यातनाएँ देवर मार डाला गया।
समय एक शब्द भर नही है 13 जिस दिन व्हिसकी के नशे म डूयते-उतराते पिता ने उस नक्सलवादी की मौत का ऐलान घर में किया और माँ को बताया कि आगामी चुनाव म पार्टी का टिकट उन्ह ही मिलने जा रहा है, उस दिन उसके वी० एक फाइनल का रिजल्ट आया था जिसम वह सकिन्ड डिवीजन से पास था। उसने अपने पास हो जाने की सूचना देन के बजाय नशे में धुत अपने पिता का कॉलर पकड लिया था उनका चेहरा अपनी आँखों के ऐन सामने दिया था और उनके चेहरे पर पूरी नफरत से थूक कर बोला था, "तुम इमी लायक हो कमीने आदमी।' उमकी मां ने अचरज मे काप कर यह दृश्य देखा था और अपने कमरे म जाकर रोने लगी थी। नशे म डुवे पिता अपने चेहरे पर उसका थूब लिये अपने पलग पर औधे मुंह गिर पड़े थे। बेहोश होने से पहले अपनी टिमटिमाती चेतना मे उन्होंने एक कठार निर्णय ले ही लिया था कि अगली सुबह इस जुर्म की सजा वे अपन लडके को देंगे, लेकिन वह उसी रात अपना घर छोड कर बाहर आ गया था। यह सन् उन्नीस सौ उनहत्तर की बात है जब उसकी पांच सात बहा- नियो बहुचचित होकर साहित्य वे अखाडे म उत्तर चुकी थी और सल- यादी का शव भर होने से आदमी कोलाश म तब्दील कर दिया जाता था। घर छोड पर वह सीधा देश की राजधानी म पहुँचा या । राजधानी, जिस बब्जे म करन वो लडाई नक्सलवादी मै शुरु होकर जेला और जगलों में पहुंचकर स्थगित हो गयी थी। और जिस लड़ाई के बडे-बडे भूरमा हरिद्वार और ऋषीरेश म जार र अध्यात्मवादी हो गये थे या फिर कांग्रेसक झडे तले आवर 'संल्फ विटिसिनम' ये अमाप अस्त्र से अपना यचाव करते हुए समूची कौम के मुर्दा हो जाने की घोषणा करने लगे। यह वह दौर था जब देश के अन्य हिस्सो के लोग नक्सलबाडी के समर्थन म उठन लग थे और उसकी विस्तृत जानकारी के लिए उत्सुक होन लगे । यह वह दौर था जब सरकार-भान पालनू लेघा नक्सलवादी आन्दो- 1 14 समय एक शब्द भर नहीं है नन का डवती और नूरमार की घटनाआ स जोड देने की कोशिश म रगीन पत्रिकाआ के पना पर पन रग जा रहथ और नौजवान तैयकाका छोटा मा तपका बलम और वदूर वा आपसी रिश्ता पूरक या रिश्ता धोपित करवे भूमिगत पर्चे और पत्रिका दश भर म वितरित करन के लिए लाम-बद हो रहा था। और यही वह दौर भी था जव अगली पक्तिया व पातिवारी नायक एक-दूमर को सशोधनवादी प्रतिक्रियावादी और कठमुल्लावाटी कह कर मोटी मोटी कितावा में भारी भरकम शावली म आरोप प्रत्याराप उछाल रहे थे और पुलिस चुन चुन कर आदोलनकारिया या आदोलन समथका को मुठभेड के नाम पर गोलिया स उडा रही थी। कहते है कि जिस प्राइवेट वसन म राजधानी आन के बाद उसन पहली नौकरी ज्वाइन की वहा मे ठीक पाचवे महीने उम निकाल दिया गया। कारण एक वही था-उमरे दिमाग की किसी एक नस का सिर से ही अनुपस्थित होना। दफ्तर म एक ही सावजनिक वाथरुम था और वास से डाट फटकार खाने के बाद कुछ कुठित किस्म के कमचारिया ने वाथस्म की दीवारा पर आडी तिरछी मार म पेशाव करव पीली-पीली लवीरें बना डाली थी। ये लकीरें इतने वीभत्स तरीप मे आपस म गुथी हुई थी कि बाथरूम म घुसते ही पेट का पित्त एकाएक उछल कर हलक मे फंस जाता था और पशाब रुक रुक कर होन लगता था। उस इस बाथरूम से बहुत ज्यादा तकलीफ थी क्यापि प्रत्येक घट डढ घट बाद उसे बाथरूम म पशाब करा के बहाने बीडी पीने जाना पन्ता था। सीट पर वठवर यानी कार्यालय मे धूम्रपान सख्त रूप से मना था। और बाथरूम की हालत यह थी कि वीडी क् धुएँ के साथ ही साथ भपकार छोडती तीखी दुग ध भी फफ्डा मवे रोक टोक घुसती थी और उसे भय था कि वीडी के धुए से फ्फ्डा मे चाह कैसर या तपदिक न भी हो मगर इस पेशाव की दुगध से ज़रूर ही एक-न एवं दिन उमके फफड पीखते हुए फर जयेंग। बाथरुम रो नाक दवाकर बाहर निकलते हुए वह गिनवर डढ सौ गालिया उन क्मचारिया का दिया करता था तो अपनी कुठाआ का बदला वास से लने के बजाय वाथस्मी मौन समय एव शब्द भर नहीं है 15 दोवारों से लिया करते थे। इस वायरूम कालेसर उत्पन्न तनाव में उसका चेहरा भिचा-भिचा और ऐंठा-गेठा रह्न लगा था और इस बाथरूम में ही कारण कई बार उरान बीडी छोड देन का भी निर्णय विमा था, मगर यह मोचयर दि पेशापर करन का निर्णय ता वह कर नहीं सकता, उसन बोडी छोट देने का निर्णय भी स्थगित कर दिया। मगर एक रोज़ अचानक ही उमका ऐंठा हुआ चेहरा चमताग्वि म्प से तनावहीन होकर सरन हो आया । भक्व मे उसका मुंह राहत वाली मुद्रा मे खुल गया और उसमें से सिलसिलेवार तेज ठहाके निपल-निकल कर समूचे दफ्तर को चेतना पर ठाठ बजने लगे। पूरा दपतर जैम एव वेहद लम्बी नीद के बीच से हडबडावर जाग गया और अपनी-अपनी फाइलो से पटाक से बाहर निकल आया । दुछती पर बने एकाउट संक्शन के लोग तुरन्त ही रपये-पैसी ये समीकरण से कूद कर बाहर भागे और खटाखट सीढियां उतरकर नीचे चले आय, मगर उलटे पांव वापस भी चढ़ गये और छत के उपर खड़े होकर नीचे झाक्ने लगे। यह एक ऐतिहासिक घटना थी। दफ्तर के सबसे पुराने एक क्लर्क, जो वहां बीस साल में क्लर्क था, की आंखें आश्चर्य वे मारे बाहर निकल गयी थी। जच बॉस के पिता इस दफ्तर के मालिक थे, ठहाके तो तब भी नहीं गूंज थे। हालांकि वॉस के पिता वॉस की तरह जालिम नहीं थे। उसके ठहाक अभी तक गूंज रहे थे। उसके ऐन सामा बैठा असिस्टेन्ट सेल्स डायरेक्टर अपने एक हाथ वो मुट्ठी को दूसरे हाथ की हथेली पर पीटता हुआ इन्तजार कर रहा था कि उसके ठहाके रुकें तो वह अनु- शासनहीनता के लिए उसका जवाब तलब करे । इतने म पेशाब करने गया वॉम वापस आ गया और अचरज तथा मोधरे मम्मिलित भावो को एक्साथ थामे उसके ऐन सामने आकर ठिठक गया। बॉस का सामने देखकर उसके ठहाके तो रुक गये, मगर मुसकान नहीं जा सकी। वॉस ने गभीर होकर अपने होठ गाल कर लिय थ । बाँस के गोल होठो का देखकर असिस्टेन्ट सेल्म डायरेक्टर वा मुंह सूख गया ।
16 समय एक शब्द भर नहीं है। वह बॉस के गोल होठो को महिमा जानता था। अब वह स्वयं को ही कोसन लगा कि उसन ठहाको के रखने की प्रतीक्षा क्यो की ? क्यो नहीं उसन सामने बैठे बदतमीज छोकरे को अपनी कडक आवाज़ मे डपट दिया? अब वॉस का गुस्सा लडके के साथ-साथ उस पर भी उतरेगा । वॉस के होठ अभी तक गोल थे और वह हैरानी से सामने बैठे उस लडके को लगातार तक रहा था जिसने उन्मुक्त ठहाके लगाकर उसके सात वर्ष व वठार एडमिनिस्ट्रेशन की धज्जियां उडा दी थी और जो इतना गुस्ताख था कि दफ्तर के एक्छन मालिक के ऐन सामने खडे रहने के बाव जूद वैठा हुआ था । न सिर्फ बैठा हुआ था, वरन धीमे-धीमे मुसकरा भी रहा था। बॉम न उसकी आंखो मे सीधे देखते हुए आहिस्ता से कहा,"आई थिंक, यू आर मैड ।" फिर वह पूरी ताकत से दहाडा "तुम हमारे दफ्तर म क्या कर रहे हा वास्टई । गो टु हैल | फिर उसी गुस्से को थामे वॉस एका- एक पलटा और असिस्टेन्ट सेल्स डायरेक्टर से बोला, "क्यो, यही है आपका एडमिनिस्ट्रेशन और आप सेल्स डायरेक्टर होने की ख्वाहिश रखते है। असिस्टेन्ट सेल्स डायरैक्टर गरदन नीची क्येि रहा । उसकी समझ मे ही नहीं आ रहा था कि वह बॉस को क्या जवाब दे? इसका हिसाब करो तुरन्त ।" वॉस ने निर्देश दिया और धडधडाता हुआ अपने केविन मे प्रविष्ट हो गया। "इन आजक्ल के लौडो को नौकरी करनी भी नहीं आयेगी।" असिस्टैन्ट सल्स डायरेक्टर वडवडाया और इन्टरकॉम के द्वारा एकाउट सेक्शन को कुछ निर्देश देने लगा। इसके बाद उसन सामने बैठे उस वेवकूफ लड का एकाउट संक्शन म जाने का कहा और अपना माथा पक्ड पर वैठ गया। वॉम के प्रोध और असिस्टेन्ट सेल्स डायरेक्टर के रिरियाहट पूर्ण निर्देश को सुनन के बाद भी उसके होठो की मुमवान वाली भगिमा मिटी नहीं। मज पर से अपना सामान समेट कर उसने अपना थला पन्धे पर लटवाया और एबाउट विभाग मे जाने के लिए सीढियां चढने लगा।
वह मक्ते में एक प्रमिद हिन्दी साप्ताहिक में ITrtilt तीन महीन बदहाली और बदहवामी म गुजारोप या aut समय एक शब्द भर नहीं है 17 बात यह थी कि अधिशासी अभियन्ता को अंग्रेजी म क्या कहते है, यह याद करने के लिए जैसे ही कागजी पर फिसलती अपनी कलम को रोक उसने चेहरा ऊपर उठाया, वॉस को केबिन से निकलकर वाथरूम की ओर जाते देख लिया । अचानक, एक्दम अचानक बाथरूम की नसें तोडती दुगन्ध, दीवारो पर वीभत्स तरीके से गुंथी पीली लकीरो का जाल और उसम पसे हुए वॉस की बदहवास सूरत उसके दिमाग मे औचर तरीके स उतर आयी । इस समीकरण के दिमाग मे तैरते ही उसका मुंह खुल गया और दीवारो को झिंझोडते, दफ्तर का चौकाते और कर्मचारियो को हिलात उसके उ मुक्त ठहाके यसायक विखरने फैलने लगे और चेहरे पर एक मुकून-भरा इत्मीनान आकर ठहर गया। पांच महीन की इस नौकरी के बाद के पूरे चार वर्ष उसन एक वडे प्रेस म पूरीडरी करके और अमेरिवन लायब्रेरी मे अध्ययन करके विताय । भूख, ठड, गर्मी और कुठाआ के त्रासदायी ददं वे माथ । इन चार वर्षों म उसन हिदी और दर्शन से प्राइवेट एम० ए० भी किये। य कापी गरीबी के दिन थे और इन दिनो म फुटपाथ की जिन्दगी मे उसका नजदीकी रिश्ता कायम हुआ था। पढ़ते हैं कि सन् निहत्तर के उत्तरार्ध मे उसके एव लेखा मित्र ने जो सी० डी० ए० म ज्वॉइन्ट कन्ट्रोलर था, उस सी० डी० ए० म एन० डी० सी० की पोस्ट पर लगवा दिया और वह मेरठ चला गया। लेकिन मरठ जैसा नीरस, बेहूदा और बोझिल शहर बहुत समय तक उस अपने भीतर नही समो सका और वह प्रोवेशन पीरियड के दौरान ही नौकरी छोड पर एर प्राइयट पब्लिक स्खूल म हिन्दी अध्यापन वनकर लयार चला गया। यहां भी वह उपादा दिना तर एडजस्ट नहीं हो गया और जिन्दगी यो अनी शर्तों पर जीन की विद्रोही सना उसे पलाता तीन पर लगयी। मलना । गजधानी व लाल किले पर साल हा 11 तमन्ना रखने वाले नानलवादी क्रान्तिरारियो या मेन्द्रीय मत!
18 समय एक शब्द भर नहीं है पर नियुक्त हो गया। सुना जाता है कि कलकत्ते मे सगीता बनर्जी नाम की क्सिी लडकी से उसका रोमास हो गया था और बहुत जल्द वे शादी भी करने वाले थे, पर यकायक क्सिी वात पर नाराज होकर या परेशान होकर सगीता बनर्जी एक रोज बिना बताये कलकत्ते से गायब हो गयी। वहुत खोजवीन के बाद पता चला कि सगीता बनर्जी बम्बई चली गयी है । बम्बई का नाम सुनकर वह बहुत-बहुत भीतर तक दरक्ता चला गया और नौकरी छोडकर वापस दिल्ली चला आया-बेचैन, परेशान और पराजित । वह भावुक तो था, लेकिन वेवकूफी की हदो तक नही और अच्छी तरह जानता था कि बिना पते के सगीता बैनर्जी को वम्बई मे तलाश करने के लिए एक पूरी उम्र भी कम है । सगीता वैनर्जी एक वेपहचान नाम था और वम्बई पहचान वाले नामो को भी अपने भीतर किसी रहस्य की तरह गुम कर लेती है-उसे यह मालूम था । इसी कारण वह चाहकर भी सगीता बनर्जी के पीछे बम्बई नहीं जा सका। उसकी जिन्दगी मे सगीता वैनर्जी के एकाएक चले जाने के भी कई किस्मे सुने जाते है । लेकिन जो सर्वाधिक प्रमाणिक बात है और जिसे उसन अपने उपन्यास मे स्वीकारा भी है वह यही है कि शादी से पहले और सगीता के गायव हो जाने से ठीक दो रोज़ पहले उसने सगीता के साथ सभोग करना चाहा था। सगीता को कोई एतराज भी नहीं था, मगर एन वक्त पर, जब उत्तेजक स्थितियां अपने चरम पर थी, वह यक-ब-यक बर्फ के टुकडे म तब्दील हो गया था और सगीता को आग जल-जल कर धुआं होती गयी थी । सगीता तो चौंकी ही थी वह ख द भी कम आश्चर्यचक्ति नही था । एक औचक हादसा समझ कर दोनो ने इसे टालना चाहा था, मगर जब दूसरे रोज भी घटना की पुनरावृत्ति हो गयी तो सगीता का शव यकीन मे वदल गया और तीसरे रोज वह कलकत्ते में नहीं पापी गयी। उसकी तकलीफ भयानक थी। उसने उम्र की अपरिपक्वता के गुजर जाने के बहुत बाद पूरी तरह से मैच्योर मानसिकता मक्सिी लडकी के साथ प्यार का रिश्ता कायम किया था, मगर अजाम इतने चौकाने और आघात कर देने वाले तरीके से समय एक शब्द भर नहीं है. 19 सामने आया था कि उसकी नसें तडक गयी थी और दिमाग सुन्न हो गया था। वह सगीता के विछोह और अपने पौम्प की पराजय की तकलीफ को एक साथ वरदान करता हुआ वनवते की सडको पर बेतरह थक गया। इतनी असीम थकान के साथ और इतनी यातनादायी यादो का वाझ मभाले, कलकत्ते म रहने का अर्थ था स्वय को जिबह करना । चन्द रोज वाद ही वह दिल्ली भाग आया। इसवे वाद शुरु हुए उसवे खानाबदोश दिन। शहर-दर-शहर । तकलीफ दर तक्तीफ। याद-दर-याद । सवाल दर-सवाल । अनुभव अनुभव अनुभव पलपत्ते वी नौकरी छोड़ने के बाद वह कोई और नौकरी नहीं हो र सवा प्रीमिंग और किताबोकी रॉयल्टी उसकी अवेली ज़िन्दगी को कठिन तरीके मे ही सही मगर खिसकाती रही । सगीता चैनर्जी और स्वय पी जिन्दगी पर लिखा गया उसका दूसरा उपन्यास यौन विकृतियो और पुटाओ से लबरेज या मगर एक ही यप मे एक के बाद एक बार सस्करणों मे छपकर वित्री के प्रतिमान तोड रहा था। उसन्यास पी तारीफ और विरोध ने उसे खासा कन्ट्रोवशियल राइटर बना दिया था और यही वह चाहता भी था। उसरे बारे म सुनी गयो या पलायी गयी सारी ही वातें ज्यो की त्यो सच नहीं है । कुछ नहीं हैं, कुछ वॉफी हाऊस से निकली हुई लपफाजियों है और युछ ऐसी हैं जो अपने मूल रूप मे सही थी, मगर दूसरो तक पहुँचते- पहुँचते इतनी विकृत हो गयी है कि उनकी वास्तविक्ता वहाँ से प्रारभ हापर यहां समाप्त हो गयी है, बताना मुशिल है। दो उपन्यासी और माढ़े तीन दर्नन विख्यात नुख्यात पहानियो वे चार सक्लनी के अलावा उमसी व्यक्तिगत जिन्दगो व चीवाट भरे और विवादास्पद प्रसग ही उमपी अब तक की जिन्दगी की कुल पूंजी है और । पर ।
20 ममय एपशम भर नहीं है वात उमरे चेहरे पर उतरते हुए गुस्तनो अंधेरे में शुरू हुई थी जो उने समय ने दिया है और जिमो बारे में तुम जानते हो कि वह एक शन्द भर नहीं है। यानी गमय। तुम्हारा नाम क्या है? उसा। नाम भुवन है। भुवन दिगोर । वह अपनी जिन्दगी के तीमा माल और मत्ताइम महर नैनीताल मे है। तुम विम शहर म रहते हो? वह पिसी शहर में नहीं रहता। वह हर शहर में रहता है। नैनीताल पहुँचने के सातवें दिन की दोपहर तक तमाम उत्साह वो मोह- भग या सामना करना होगा और नैनीताल आने की एक पूरी-बी-पूरी ललक इस तरह चक्नाचूर हो जायेगी, उसने कल्पना भी नहीं की थी। यह एव अचरज की बात थी। अचरज यी और दुग्न की भी। उसे अपनी मानसिकता पर दुख भरा श्रोध आने लगा। काई बात है भला पूरे नैनीताल के चेहरे पर एक तृप्त-सी उन्मुक्तता है, ताजगी है और खिल- खिलाहट है । एक साबुत उत्साह वा सिलसिला चेहरा-दर-चेहरा बनता चला गया है और मिस्टर भुवन --भुवन विशोर है कि मनहूस हो उठे हैं। हाँ, मनहूसियत यहां ये सन्दर्भ मे एक उपयुक्त शब्द है। लेकिन ऐसा हुआ क्यो है ? 'सध्या।' उसने सोचा। उसकी उदासी के सूत्र कही सध्या से जाकर तो नहीं जुडते ? वह बेचैन हो गया। सध्या हलद्वानी के सबसे बड़े टिम्बर मर्चेन्ट की इकलौती लडकी है और भुवन किशोर की पागल प्रशसिवा। भुवन की आधा दर्जन किताबें सध्या की बुकशेल्फ मे एक अलग व्यक्तित्व बन कर उभरती हैं । उन्ह इमी तरह सजाया गया है कि देखने वाले की नजर उनके ऊपर पडे । उसने सध्या की बुकशेल्फ का फोटोग्राफ देखा है।
समय एक शब्द भर नहीं है 21 उससे मिलने के लिए संध्या दो बार दिल्ली भी आ चुकी है । वह जहाँ कही भी रहा है, मंध्या के पत्र उसे नियमित रूप से वही मिलते रहे है । तव भी जब वह कलकत्ता में था और सगीता बनर्जी से शादी करने की तैयारियों में लगा था। सध्या यह वात नहीं जानती थी कि संगीता वैनर्जी नाम की भी एक लड़की थी जो उसके भुवन को अपनाते-अपनात छोड़ गयी। हालांकि मंध्या अपने प्रत्येक पत्र में एकाध ऐसा वाक्य या संकेत जरूर देती थी जिससे यह जाहिर होता था कि सध्या नाम की एक पाठिका भुवन नाम के एक लेखक की केवल रचनाओं में ही दिलचस्पी नही रखती, बल्कि भुवन जैसे अराजक व्यक्ति के बेतरतीब जीवन को तरतीय देने के लिए भी उत्सुक और व्यग्र है, लेकिन भुवन ने सध्या की इस व्यग्रता को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया था। सध्या का महत्त्व उसके जीवन में एक अच्छी दोस्त और सुरुचि-सम्पन्न पाठिका के बतौर ही रहा और वह उसी तरह पत्र भी सध्या को लिखा करता था। संगीता बनर्जी वाले कांड के बाद कलकता की सड़कों पर उसके बौखलाये और घबराये हुए दिमाग ने पहली बार सोचा था कि उसे सध्या के पास जाना चाहिए, मगर यह सोचकर कि अपने पराजित पौरप का क्षत-विक्षत शव वह कहाँ छोडेगा, उसने इरादा बदल दिया था। और इस तरह सध्या रावत, संगीता बनर्जी का विकल्प बनते-बनते रह गयी थी। अपने नैनीताल पहुंचने की सूचना उसने सध्या को भेज दी थी और जवाव में संध्या एका घंटे के लिए उसे नैनीताल के वस-अड्डे पर उसी दिन मिल गयी थी जिस दिन वह पहुंचा था। 'क्या उसकी उदासी का सूत्र सचमुच संध्या से जाकर जुड़ता है ?' उसने सोचा और सिहर गया। नहीं ! अय को बार वह स्वयं को उस भावुकता तक कतई नही पहुँचने देगा-जिस भावुकता पर पहुंच जाने के बाद सगीता बनर्जी के छोड़कर चले जाने से ज़िन्दगी में आग लग जाती है और दिमाग तहस- नहस हो जाता है। 'नहीं !' उसने निर्णय किया और घड़ी देखी-सवा चार बजे थे। पांच 22 समय एक शब्द भर नही है 7 और साढे पाँच के बीच सध्या को पहुँचना है । वह साढे छह बजे तक उसके साथ रहगी । इस एक घंटे के अटूट सुख का स्वागत उसे खुशी के साथ वरना चाहिए। मगर कैसे खुशी कोई आवरण तो नहीं है जिसे जररत पड़ने पर चढा लिया जाये। जब भीतर तब भारीपन और उदासी का जगल सांय-सांय कर रहा है तोख शी पिस दरार से आयेगी? तो? सध्या या स्वागत इसी मनहूसियत के साथ करना होगा। वह जानता है कि अगर इसने जबदस्ती खुश होने का प्रयत्न किया तो स्थिति हास्या- स्पद हो जायेगी, क्योकि उसकी खुशी खिसियाहट बनकर उभरेगी। वह यहाँ कुछ लिखने के उद्देश्य से आया था लेग्नि, इस मन स्थिति में जीते रहकर लिखना ता क्या, पढ़ना तक सभव नहीं है उसपे लिए। नैनीताल आने ने लिए उसने गलत मौसम का चुनाव किया है। "गलत वक्त पर पहुँचे, भुवन-दा।" नैनीताल पहुँचते ही उसके लेखक दोस्त आशू न एर थवी मुमकान के साथ उसका स्वागत करते हुए कहा था, "अब तुम ऐसी तकलीफ झेलोग जिस मैं हर सीजन झेलता हूँ। मगर मेरी वात और है। मैं इस तक्लीक की अनिवार्यता के कारण इससे निवटने व लिए तत्पर रहने की कोशिश करता हूँ, मगर तुम एकाएक इन तकलीफ के शिक्जे मे फंस जाओगे, मुझे ऐसा लगता है। पहाडी की जो कल्पना आदमी के दिमाग मे होती है उसे हर सीजन मे नैनीताल निर्म- मा में तोड़ता है। सीजन मे यह शहर उत्तरायड का उच्चवर्गीय वेश्या- लय बन जाता है । तुम्हे जाडो मे आना चाहिए था । आजकल तुम यहाँ बुछ नहीं लिय सकोगे । और यहां के माहित्यवार ? यूट ऐय्याशी को छाड़ दिया जाय तो साहित्य और पत्रकारिता की यहाँ की जवान पीढी या नो जलों में है या फरार । शहरी वो जगलो मे तब्दील कर देने वाले सत्ता- धीश जगलो को वटवा रहे है । जवान पीटी उनसे मोची ले रही है। जिस नरह की तुम्हारी मानसिकता है उगा अनुम्प अप यह समूना उत्तरा- गड ही नहीं रहा तुम रामधानी में भाग र यहाँ पनाह लेने आये हो, लरिन मुझे लगता है रि अन्तन तुम्ह राजधानी के कॉफी हाउस में ही पनार मिलेगी, भुवनन्दा ! तुम यहां दो पारणों से नही दिर समोगे। एक - 1 क समय एक शब्द भर नहीं है 23 तो सीजन का नरक तुम्हारे भीतर वितृष्णा पैदा करगा दूसर यहा लडाइ शुरू हो चुकी है। उसने आशू की चेतावनी को माक्सवादी फितूर समझ कर उडा दिया था नतीजतन वह फँस गया या । और चूकि वह फंस चुका था इस लिए सध्या का स्वागत उल्लास और उ मुक्तता के साथ नहीं कर सकता था। वह सध्या के आने पर अपनी तकलीफ से जूझ रहा होगा इसलिए सध्या के भावुक मन को उसको आँखा मे पानी बनकर बहने स नहीं राक मकेगा। वह रोयगी और वह सिगरेट पीना रहेगा । वस्स । जो बातें कहनी हैं वो अनकही रह जायेगी और जा तब करना है उसका सून खो जायेगा। वह मिनेगी और विन मिल सी स्थिति में वापस लौट जायगी। वह फिर अकेला रह जायेगा और यहा य भाग जाने की सोचेगा । भागन की तयारी भी करगा मगर भाग नही पायगा। क्याकि सध्या तीन या दा राज बाद फिर आने का वादा वरखे जायेगी और आशू कहेगा घबरा गयन सध्या फिर आयेगी और फिर चली जायेगी । यह इस या कार की खिडकी स झाक कर भावुक हो जायगी और वह यक ब-यक भीतर म पूरी तरह रीत जायगा। रीत जायेगा और सिगरट पीने लगगा । वह फिर मिगरेट न पीने को कहेगी और वह भी फिर में यह वादा करेगा कि अगली मुलाकात तक सिगरेट छूट चुकी होगी। वह चलत हुए रूमान हिलायगी और उसे लगेगा वि सगीता बनर्जी बम्बई जा रही है। सगीता सगीता सगीता । उसने अपना सिर झटक लिया । क्या यह जरूरी है कि दुनिया की हर लड़की का प्रेम सगीता वाल सीमान्त पर जाकर चटख जाता हो? क्या वह अपने पराजित होन वा रिस्क फिर एक बार ले? उसने फिर एक बार अपना सिर पटका सिगरेट सुल गायी और होटल के कमरे से बाहर आ गया। यह होटर आशू ना है। रहना चाहिएँ कि आशू के परिवार का है। आशू परिवार वालों के तीन होटल है यहाँ । विचारोम बटर मावस वादी आशू नैनीनान से हिंदी कासाप्ताहिह्न अखवार निकलता है-ननी * 24 समय एक शब्द भर नहीं है दर्पण' । पांच हजार नियमिन ग्राहको और दो हजार फुटकर बिनी वाला उत्तराखड का सर्वाधिक लोकप्रिय अखबार । जगल के ठेवेदारी से लेकर प्रशासनिर ताक्तो तक के लोग 'ननी दर्पण' के दुश्मन हैं, मगर आशू भी कमजार सपादक नहीं है । आशू जिस पार्टी को बिलांग करता है उसके योद्धा कॉलेजो, अदालतो किसान सभाओ, ट्रेड यूनियनो और प्राध्यापको मे लेकर बस ड्राइवरो और बैंक कर्मचारियों तक फैले हुए हैं । 'ननी-दर्पण' का एक मतलब है । आशू विष्ट एव 'पर्सनैलिटी है। 'पैपर टाइगर्स' को अपनी कलम की नोक के नीचे रखने वाले आयू से उसकी दोस्ती तब से है जव देहरादून के डी० ए० वी० वॉलेज म दोनो साथ पढ़ा करते थे और साहित्यकार बनने के सपने सग-सग देखा करते थे। यह सन् उन्नीस सौ सडसठ की बात है जब पश्चिम वगाल के नक्सल- वाडी क्षेत्र में मजलूमो न हथियार उठाकर राजसत्ता के विरुद्ध जग का ऐलान किया था और उसके भुवन विशोर के पिता कांग्रेस ममेटी के जिला अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे। नक्सलबाडी मे हथियार उठने पर आशू को उसके घरवालो न वापस नैनीताल बुनवा लिया था, होटल का कारोबार सभालन। और यह खुद माहित्य को समर्पित हो गया था। बाद के वर्षो मे इतना ही पता उरो आशू के बारे म चला कि माक्सवादी जुनून ने आशू यो अपनी गिरफ्त में पूरे तीर पर ले लिया है और आशू को यही पता चल पाया नि सगीता बनर्जी के जुनून ने भुवन विशोर की जिन्दगी म तवाही लाकर उम खानाबदोश बना दिया है । दानो न एक-दूसरे पे प्रति अपन-अपने खतो म मवेदना प्रकट की थी और धीमे मे बुदबुदाय थे-बेचारा। साढे पाँच वजने म पन्द्रह मिनट वाकी थे। उसने 'ननी-दर्पण के कार्यालय में झार लेना उचित समझा और नीचे की सीढियां उतर कर पिस में पहुँच गया। ऑफिस म करीब एक दर्जन चेहरे उसे अनिरिक्त नजर आये। यह ठिठक गया। आओ आओ भुवन दा, तुम्हारा परिचय हा जाये," आपू अपनी धुर्मी मे ही चिल्लापा और आफिरा म मौजूद चेहरों की तरफ मुखानिव हार वाला, 'माई प्रेन्ड ए चल नान हिन्दी राइटर भुवन विमार समय एव शब्द भर नहीं है 25 आजक्ल नैनीताल में हैं।" फिर आशू ने आफिस में मौजूद चेहरों का परिचय देना शुरू किया "पी० सी० जोशी, डो० एस० वी० पालेज स्टूडेन्ट्स यूनियन के अध्यक्ष, मिस रेखा थपलियाल, उत्तराखड छात्र सब की महासचिव सुरेश वडथ्वाल, पन्तनगर विश्वविद्यालय मजदूर यूनियन के ज्वाइन्ट मेनेटरी, भगवती प्रसाद डोभाल, दुमांऊ पत्रकार एसोसिएशन के सयोजक, वे ० ० तिवारी, डी० ए० वी० पी० जी० कॉलेज छात्र संघ देहरादून के महा- सचिव, और य मिस रजनी उनियाल, जनवादी क्ला-साहित्य मोर्चा, उत्तराखड की केन्द्रीय कमेटी की चीफ ।" उसने सभी से हाथ मिलाये और' 'ग्लैंड टू मीट यू' वाक्य का रिपीट क्यिा। जनवादी क्ला-साहित्य मोर्चे की रजनी उनियाल से हाथ मिलाते हुए उसने महसूस किया कि लडकी होने के बावजूद उसके हाथों की कठोरता आदमी में अधिक है। एक क्षण के लिए उसने रजनी ती तरफ आंख उठाकर देखा तो पाया कि वह वडे रहस्यमय अन्दाज मे उस घूर रही है। उसने नजर घुमा ली और सिगरेट सुलगाने लगा। राजी ने उमे दो समाचार दिये। एक यह कि हलद्वानी से मध्या का फोन आया था कि किसी जरूरी कारण से वह आज नही आ रही है। तीन रोज़ बाद सुबह सात बजे वह नैनीताल के वस-अड्डे पर मिलेगी। दूसरा कि नैनीताल क्लब जलने की आड में सरकार ने जिन छात्र- नेताओं को गिरफ्तार किया है उनकी रिहाई के समर्थन मे, हलद्वानी में एक विशाल जुलूस निकल रहा है और आशू का चूंकि यही रहना ज़रूरी है इसलिए वह चाहता है कि इस जुलूस के साथ-साथ रहकर समस्त कार्य- वाही के पोटोग्राफ भुवन खीचे और फिर एक वढिया-सा रिर्पोताज नैनी- दर्पण' के लिए तैयार करे। आशू का विचार था कि भुवन वो यह कार्य करना चाहिए ताकि वह सक्रिय हो सके और उसके दिमाग में लगातार जमता जाता कुठाओ का जग उतर सके। साथ ही आशू की यह सलाह भी थी कि जब वह यहाँ लिखने के उद्देश्य से ही आया है तो 'चिपको मूवमेंट' को आधार बनाकर क्यो नही लिखता' इससे पहले कि आशू की सलाह पर वह कोई प्रतिक्रिया जाहिर कर ममाचार यह 26 समय एक शब्द भर नहीं है पाता, रजनी उनियाल तपाप मे वोली, "बीच मे बोलने के लिए मुआफी चाहती हूं, मिस्टर भुवन ! मैने आपयो पढ़ा है और मेरा सवाल है वि मदं और औरत के जिस्मानी ताल्लुकात के अलावा, क्या इतनी बडी दुनिया मे और कुछ भी ऐसा नहीं रहा है जो लेखन और चिन्तन का विषय वन सके ? गरीवी, भुपपरी और बदहाली की शिवार इतनी बडी आवादी मे भी आपत्रो वेडरूम की नीली रोशनी मे यौन तृप्ति के लिए तडफडाती औरत ही नजर आती है या फिर नपुसकता से आत्रात कोई मर्द कहाँ है वो लोग जो हर शहर मे, हर गांव मे और हर मुहल्ले में सरकारी गोलियों से मारे जा रहे हैं आपकी चिन्ता है कि एक बदचलन अमीर- जादी की हवस कैसे पूरी हो? पुलिस के तहखानो मे जिस औरत के ऊपर पन्द्रह सिपाही चढ रहे हैं या जिस औरत का स्तन जलती सिगरेट से गोदा जा रहा है वहां तक क्यों नहीं जाती आपकी नजर ? यह मेरा सवाल है और आपका स्पष्टीकरण ?" रजनी उनियाल ने अपने आगोश का उपसहार किया। भुवन विशोर का दिमाग सनाका खा गया। यह लडकी नहीं, आग है। इसकी हथेली ही नही, जवान भी कठोर है । फिर भी, वह उत्तेजित नहीं हुआ। शानि से मुसकराता रहा। फिर आहिस्ता से बोला, "मेरा स्पष्टीकरण बस यही है कि मेरी जिन्दगी में अव तर जो लडकियां आयी उनमे रिवोल्यूशन को नहीं, सैक्स की आग थी अगर सबसे पहले आप मिली होती तो हो सकता था कि मैं किसी जेल मे पडा होता ।" "आप मजाक के मूड में है।" रजनी खिलखिलाकर हंस पडी। भुवन किशोर सबसे पहले तो उसके 'मुआफी' कहने के ढग पर फिदा हुआ था और अब उसके हंसने के ढग पर मर गया। साथ देने के लिए उसने ए ठहाका लगाया और फिर अचानक बोला, "टोटल चेंज मिस रजनी अपकी वार जब मुझे पढ़ेंगी तो टोटल चेंज मिलेगा।" "आमीन'" रजनी ने जोर से कहा और फिर एक सम्मिलित ठहाका ऑफ्गि में चकराया-चकराया फिरने लगा। "तो फिर?" आशू ने अचानक पूछा "तो फिर क्या "भुवन ने तत्परता से जवाब दिया, "रजनी जी का समय एक शब्द भर नहीं है 27 भाषण सुनने के बाद भी वोई नुम्हारे आन्दोलन से कट सकता है क्या "मेरे नही, जनता के आन्दालन मे।' आशू बोल पड़ा। "ओ० के०, ओ००। भुवन मुसकराया और ठहावे एव बार फिर उछल पड़े। इतने मे ही चाय आ गयी और भुवन बानी लोगो से बातें करने लगा। जब वह हलद्वानी याले जुलूम की मारी जानकारी ले चुका तो सबसे विदा लेकर ऑफिस से बाहर निकल आया। बाहर आने के बाद वह फिर मुडवर ऑफिस म गया और आशू से गोला "मूवमेंट से सम्बन्धित सारी सामग्री कमरे में रखवा देना रात कोम्टडी करन का इरादा है।" इसके बाद यह सीढियां चढवर ऊपर आ गया और झील की तरफ चल पडा । उसने महसूस किया कि उसके आन्दानन में शिरकत करन की स्वीकृति से आशू का चेहरा एव इत्मीनान-भरे सुकून गे दिप दिप करन लगा था। इगलिश लिटरेचर से एम० ए० करने वाली सुपरिन्टेंडेंट पुलिस की दवग और शोख लडकी जया चौधरी ने नाश्ते की मेज पर अपने पिता मिस्टर शमशेर चौधरी से सवाल किया, 'आपने नक्सलवादियो को देखा है ? कैसे होते है वे" मिस्टर चौधरी के गले मे बैड या पीस अटक गया। उनकी आँखें पहले तो भौचक रह गयो, फिर उनमे हलकी-सी उदासी कोधी और अन्तत पुलिसिया मुद्रा मे तब्दील हो गयी। "गुडे और डकत होते है ।" एस० पी० चौधरी ने बिना वेटी की तरफ देखे जवाब दिया और कॉफी मिप करने लगे। "लेकिन मुझे लगता है कि यह सरकारी प्रचार है। गुडो से कोई भी सरकार इतना परेशान नही होती," जया ने पिता के चेहरे का धूरते हुए कहा, "डकैतो और नक्सलियों में कोई तोपर्क जरूर है। आखिर वे इस मुल्क से खत्म क्यो नहीं होते? इतनी बड़ी राज्य-शक्ति उन्हे पूरे तौर पर कुचल क्यो नही पाती" 28 समय एक शब्द भर नहीं है 'उन्ह कुचला जा चुका है।" मिस्टर चौधरी का चेहरा सख्त हो आया। लेकिन उन सहन हुए चेहर के पीछे कांपते घनीभूत अंधेरे को जया ने पपड लिया। उसने कुछ तेज आवाज में पूछा, "आज का अखबार देखा है आपने?" देखा है, क्यो?' "क्योकि पहाड के एव सर्वोदयी लीडर ने दिल्ली जाकर वयान दिया है कि 'चिपो' म तेजी के साथ नक्मलवादी घुस-पैठ आरभ हो गयी है और अगर सरकार न पडा रख न अपनाया तो परिणाम यतरनाव होंगे।" "तुम राजनीति में दिलचसी मो लेने लगी हो?" मिस्टर चौधरी एकाएक झल्ला पडे । "क्योकि अंग्रेजी के बाद अब मै पोलिटिकल साइस से एम० ए० कर रही हूँ।" जया ने शरारत के साथ यहा । "तो करो भई । लेविन एम० ए० करने के लिए नक्सलियो की खोज- वीन की जरूरत क्यो पड रही है ? ' मिस्टर चौधरी ने उसी मुद्रा मे कहा और कॉफी वा अन्तिम सिप लेने के बाद नेपक्नि से मुंह-हाथ साफ करने लगे। दरअसल, उनकी झल्लाहट या कारण जया के सवाल नही, 'चिपको' मे नक्सली घुसपैठ ही था। जो न्यूज़ आज वे अखवारों मे छपी है वह उन्ह कल रात ही पता चल गयी थी। दिल्ली से उनके अतीत का गुणगान करते हुए आज की न्यूज़ के सन्दर्भ में, उन्ह साड पडी थी कि क्या वे सो रहे हैं ? इस झाड मे एक बार तो उनका मूड ही खराब हो गया था। 'चिपको' के सन्दर्भ म उन्हे अभी तक न तो सर्वोदयी नेताओं का रख समझ में आया था और न ही सरकार का । इतना तो उन्ह मालूम चल गया था कि सर्वोदयी नेताओं को सरकारी सरक्षण प्राप्त है, लेरिन यह उन्ह अभी भी पता नहीं चला था कि सरकारी सरक्षण प्राप्त सदियो लीडरशिप के शाकाहारी मूवमेंट 'चिपकों' मे तेजी वे माथ प्रवेश करते जा रहे अलग-अलग इलारी वे हिंसावादी जन-नेताओ के बारे में स्पष्ट निर्देश क्या हैं, और इसी कारण वे निर्मम दमन' पी नीति पर चला से हिचपिचा रहे थे। रान की झाड समय एक शब्द भर नही है 29 स उह क्रोध तो आया था लेकिन यह भी स्पष्ट हा गया था कि इस बार दमन का स्वरूप कतई भिन्न होगा। उह हिंसव तत्वा को जनता से अलग थलग करना होगा और सर्वोदयी लीडरशिप म चल रहे मूवमेंट को नज़र अदाज करते हुए हिंसक नतृत्व के मूवमेंट का दवाना होगा। यह काम आसान नहीं था क्याकि इस वार लाग नक्सलवाडी की तरह घोपित प्रचा रित और खन हुए नहीं थे। इस बार उनक पास केवल ब वे नहीं थी आदमी थ और दिमाग थे। इन लागो का इरादा और हौसला कैसा होता है यह मिस्टर चौधरी पहले स ही जानते थे। इस हौसन वो कुचलन के लिए कितना बडा हौस ना अपने भीतर जुटाना पडता है यह याद करते ही उनकी आखें सिकुड गयी और चेहरा एक सुस्त थकान म डूब गया। स्वय को अतीत के मुहाने पर पहुँचन स व रोप नही सके । नक्सलवादी शब्द ही एसा था। नक्सलवादी नव दु घोप आखिर मिस्टर चौधरी इस शद और शब्द के पीछे छुपे भूल से सक्त हैं ? अपनी अब तक की ज़िन्दगी मे मिस्टर चौधरी ने बडे बड शन्दा का तोड कर फेंक दिया था। कातिल डक्त स्मगलर और नेता य तमाम बड-बड शब्द उहान इस तरह तोड दिय थे कि वे वदशक्ल और वरीढ हो गय थे । डकत-दुनिया म मिस्टर चौधरी का आतक चट्टान की तरह सख्त और शाश्वत था। उनकी शक्ल दख भर नेने स अपराधी सच कबूल कर लेत थ । कातिला और डकता के साथ हवालात म लडी जाने वाली जवान खुलवाने की नडाई म व हमेगा विजता सावित हुए थे। लकिन लेकिा व नवे दु घोप को कस भूल सकत है जिम यातना चत्र म पीसत पीसते उहांने अतत समाप्त कर दिया था मगर उसकी जबान पर पर ताने का नहीं तोड़ पाय थे । नवदु धोप । कलक्त्त का परार नक्सली जिसत्र ऊपर पांच हजार का ईनाम था और जिससे भूमिगत नक्सली नेता सीताशु वैनर्जी का पता उगलवाने का वाम सरकार ने एस० पी० चौधरी वा सोपा था। लेकिन व एस०पी० चौधरी पहली बार अपने इस मुहिम म नावामयाब हो गय य। एक अदना म छाकरे न अजय एस० पी० चौधरी को पराजित कर दिया अथ को ।
30 समय एक शब्द भर नहीं है - था । व हार गये थे और हारने के तुरन्त वाद वे नक्मलवादी शब्द वे पीछे छुपे हुए फौलादी अर्य से रोमाचित हो उठे थे । और रोमाचित होते ही वे अनायाम और अनजाने हो नयेन्दु पोप वे प्रति श्रद्धानत हो गये थे। नवेन्दु के मरते ही मिस्टर चौधरी को एकाएक लगा था कि उनके भीतर नवेन्दु के प्रति एक विचित्र-सी मोहग्रस्त भावना ने जन्म ले लिया है। अचानक', एक्दम अचानक, उन्ह कांग्रेस कमेटी के नगर-अध्यक्ष मिस्टर आर० के० सर्मा के प्रति अपने भीतर एक तीखी नफरत का अहसास हुआ था जिन्होंने पुलिस का फोन वरखे नवेन्दु घोप को अपने घर से पक्डवा दिया था 1 नवेन्दु आर० वे शर्मा लडके का दोस्त था और सुबह तीन बजे जब वह घर छोड़ रहा था, पुलिस द्वारा परड लिया गया था। मिस्टर शर्मा न नवेन्दु के उपर रखा पांच हजार का ईनाम काँग्रेस-यमेटी के कोप मे दान कर दिया था और आहिस्ता म विधान सभा में प्रवश कर गये थे। प्रधानमन्त्री की कृपा-दृष्टि उन पर पहले से ही थी और इस घटना से उस कृपा-दृष्टि मे इजाफा ही हुआ था । नवेन्दु की मॉल हालांकि स्वय मिस्टर चौधरी के हाथों हुई थी, मगर उन्ह लगा था कि उसकी मौत वे फ्यादा बड़े जिम्मेदार मिन्ट र शर्मा ही है और मिस्टर चौधरी अपनी तमाम वर्तव्य- निष्ठा पे बावजूद मिस्टर शर्मा ये प्रति गहरी नफरत मे भर उठे थे। यही कारण था कि मिस्टर शर्मा के एम० एल० ए० बनते ही एक रात जब एक नक्मली द्वारा उनका निर्मम वत्तर दिया गया तो मिस्टर चौधरी को अपनी जिन्दगी की चिन्ता के साथ-साथ मिम्टर शर्मा के पत्त मे कही थोडा-मा सुकून भी मिला था। यक-ब-यर जया चौधरी को लगा कि उसरे पिना पुछ रमादा ही ध्यान-मग्न हो गये है, जवधि उसका मवाल अभी तब भी अनुत्तरित ही है। उसने अपना अन्तिम हथियार इस्तेमाल दिया और पिता के गले में बांह डालकर लाड से पूछा, "आपने बताया नहीं? नक्मलवादियो को देखा है आपन" मिस्टर गौधरी चौक पडे। जिम गैर-सरकारी मन यिनि मे वे इस ममय गुजर रहे थे उममे एम० पी० चौधरी वाले प्रोध की जगह नही थी। ग कारण अपनी शालीनी बेटी की शाभी पा समाधान करने में उन्न Pr..
समय एक शब्द भर नहीं है 31 कोई नुक्सान नहीं दिखापी दिया। "हां, देखा है," उन्होंने धीरे स कहा 'उसका नाम नवेन्दु था । नवेन्दु घोप। यह सन् उनहत्तर की बात है जब हम इस शहर म नही य । तुम्ह अपने उस वी० ए० वाले क्लास-फनो की याद है जिसके पिता मिस्टर आर० के० शर्मा थे जो वाद में एम० एल० ए० वन गय थे?" एम० एल० ए० बनते ही जिनका खून हो गया था?" जया ने याद दिया। "हाँ," मिस्टर चौधरी ने कहा, "यह नवेन्दु घोप उन्ही मिस्टर शर्मा के लडके या दोस्त था।" "टेकचन्द का दोस्त ?" जया चौक गयी। 'टेर चन्द ? ' मिस्टर चौधरी ने पूछा। "हां, टेकचन्द उसका असली नाम है । भुवन किशोर नाम तो उसने तव रखा था जब उसने कुछ लिखना वगैरह आरभ किया था। "खैर छोडो," मिस्टर चौधरी ने प्रसग बदल दिया, "चलाते कर वह फरार नक्सली मेरे हाथ से मारा गया था।" "मारा गया था?" जया हतप्रभ रह गयो । फिर वह कुर्सी पर बैठ गयी और उत्सुक्ता से बाली, 'यह लडाई वब हुई थी? आपने कभी जिन तक नहीं किया? यह लडाई यहाँ और किस प्रकार हुई थी?" जया काकौतूहल चरम पर पहुँच गया था। "हवालात मे।' मिस्टर चौधरी अचानक नर्वस हो गये। "हवालात मे" जया जैसे धडाम से जमीन पर गिर पड़ी। उसने तीखेपन के साथ कहा, “मतलब, आपने एक निहत्थे और बंधे हुए आदमी पर अपनी बहादुरी आजमायी" 'शटअप " मिस्टर चौधरी सहसा ही उत्तेजित हो गये और पर बोले, "डोट डिस्टर्व मी ऐंड गो।" जया पैर पटकती हुई नाश्त के कमरे से बाहर चली गयी और मिस्टर चौधरी एकाएक ही वेचन हो गये । जया ने उनके मन के दुखते हुए अंधेरे कोने को छील दिया था। तकलीफ से उनका चेहरा विकृत हो गया। उन्हें याद है, यातना के वे तरीके जो लगभग नहीं ही इस्तेमाल होते 32 समय एक शब्द भर नहीं है है, उन्हान नवेन्दु पर आजमाये थे मगर उसी जवान इस तरह बन्द थी जैसे अलीरावा और चालीस चोर' वाली कहानी की गुफा जो 'खुल जा सिमसिम' कहने में ही खुल सकती थी, जववि मिस्टर चौधरी और-और सम्बाधनो से उमे खुलवाने के लिए प्रयत्नशील थे। नवेन्दु की दोनो जांघो मे उन्होंने पतले-पतले तेज धार वाले दो चार निर्ममता के साथ भोक दिये थे और उन चाकुओ को तीन रोज तक उसकी जांघो मे ही घुस रहने दिया था। जब जांधे पर गयी थी तो उन्होंने चाकुओ को मथनी की तरह हिलाया था, मगर नवेन्दु वा चेहरा विकृत-भर हुआ था, आंखें एक तीखी नफरत मे भर गयी थी। मिस्टर चौधरी को लगा था कि उनकी स्थिति कासिम जैसी है जो अभेद्य गुफा म बन्द है और गुफा के दरवाजे को खुल- वाने के लिए 'खुल जा सिमसिम' के बजाय खुल जा आलू, खुल जा टमाटर, खुल जा सिमरैला और खुल जा अबला' जैम हास्यास्पद जुमलो को दोहराता हुआ सिर पटक रहा है। वे क्रोध से बौखला गये थे। उन्होंने नवेन्दु का एक-एक नाखून उखाड लिया था, उसकी ऊंच-कट दाढी को ठोडी के मास सहित नोच डाला था। उसकी छाती चेहरे और पीठ पर गर्म सलाखें चिपकायी थी और अन्त मे उसके गुप्ताग को जलती हुई मोमवत्ती की लौ पर रख दिया था। नवेन्दु चौखा था और उन्ह लगा था कि शायद अवको वार गुफा खुल ही जाये, मगर नवेन्दु ने तडप कर कहा था, "यह जुल्म बहुत कम है जब इन जुल्मो का बदला लिया जायेगा मिस्टर चौधरी, ता उस क्रातिकारी प्रतिहिंसा को दहशत-भर से तुम जैसे कुत्तो वा दिल क्ट जायेगा।' सुपरिन्टेंडेंट पुलिस मिस्टर शमशेर चौधरी का गुस्सा अन्धा हो गया था और उन्होने नवेन्दु के सिर के लम्बे वालो को अपने मजबूत फौलादी सीधे हाथ (जिस सीधे हाथ पर सिर्फ उन्ह ही नही, सरकार बहादुर को भी गर्व था) से पकडकर उसका सिर हवालात की चट्टानी दीवार पर पागलो की तरह टकराना प्रारभ कर दिया था। एक दो तीन चार और पांचवी चोट मे चटाख, कडाक की कर्कश आवाज के साथ नवेन्दु का सिर वीच से फट गया था और उसका भेजा वाहर निकल आया था। नवेन्दु के बीचोबीच फटे हुए सिर से पब्बारे की शक्ल म उछलते गिरते समय एक शब्द भर नहीं है 33 - मुर्ख खून मे भीगते हुए मिस्टर चौधरी अवाक रह गये थे। मरते हुए नवेन्दु पी आँखो मे एक खतरनाक नफरत उतर आयी थी। मिस्टर चौधरी आज तक उन आँखो को भुला नहीं सके हैं । उन आँखों की नफरत वरदाश्त न कर पाने के कारण मिस्टर चौधरी बहुत दिनो तक रात मे चौक-चौक पर जागते रहे थे। उन्हें लगा था कि अव वे एक अजीब- से अफसोसनाक हादसे की तकलीफदेह याद मे आक्रात रहगे । नवन्दु के भरते ही मिस्टर चौधरी को लगा था कि उनके चेहरे की लालिमा स्याह पड़ने लगी है और आगोश तथा कर्तव्यनिष्ठा की समूची भावना गत-गन कर बह रही है । अकस्मात और अनायास ही उनका पूरा बदन एर म्यायी भवान से शिथिल पड़ गया और चेहरे पर एक नीली-नीली-गी आग दर आयी। आदर्शवादी शब्दो मे इस नीली आग को पश्चाताप की परटाई रहा जा सकता है । मगर इतना तय है कि इस नीली आग ने मिस्टर की रातें छीन ली थी। तब, थे अपनी जिन्दगी में पहली बार जटा तरीके से पराजित हुए थे। तव से हमेशा के लिए, इस अफसोसनाव पगार - नवेन्दु घोष के प्रति उनके दिल में एक अजीब और Torr ईयालु प्यार थिरकने लगा है। इस ईर्ष्यालु प्या मन का एक हिस्सा सुनसान रेगिस्तान मे नीरrant इस सुनसान रेगिस्तान वाले हिस्से मे xiiyoranreka परती भटकने लगती है । उनी पगर:Trxr सीने में दवाये मर जाने वाले नवेन्टर roorry हिस्सा वेपनाह प्यार करता है irrrrrrrrt व्यक्ति को प्यार और नपग्न marati नहीं समय सकता। जया परिचित होती तो उनकी जया, । जया चौघर्ग 'ट-rzras इक्लोली सासरी - अचानक, मावान चौधरी यो चेतना र rrrrrrrrm 34 समय एक शब्द भर नहीं है ताछ करने की आवश्यक्ता उनकी बेटी को क्यों पड़ गयी? नक्सलवाद यानी अपराध, और वह भी एस० पी० चौधरी के घर में जिस व्यक्ति की जिन्दगी के वीस कठोर साल अपराधो को नेस्तनाबूद करते रहने मे गुजर गय, आज अपराध के सूत्र क्या उसने अपने घर म पनप रहे हैं ? असभव । उन्होंने सोचा और परेशान हो गये। अगर नक्सलियों के प्रति उत्सुक होकर जया चौधरी अपराध कर रही है तो नवेन्दु घोप के प्रति आज भी मोहग्रस्त बने रहकर क्या मिस्टर चौधरी जया से भी बडा अपराध नहीं कर रहे है ? नहीं। मिस्ट र चौधरी ने एस० पी० चौधरी के सामने तर्क पश किया, पहल यह तय होना चाहिए कि क्या नवेन्दु घोप वास्तव में एक अपराधी था और नवेन्दु को मारकर एस० पी० चौधरी न क्या सचमुच एक वडे अपराधी का पन कुचला था?' वेशर, नवेन्दु एक खतरनाक मुजरिम था। एस० पी० चौधरी न जवाब दिया। 'और उसका जुम" मिस्टर चौधरी ने सवाल फेवा, 'नवेन्दु घोप अपनी पार्टी के अध्यक्ष सीताशु बैनर्जी का पता नहीं बता रहा था, यह सच है और उसन वताया भी नहीं, लेकिन सवाल यह है कि सीताशु बनर्जी का पता सरकार को क्यो चाहिए था? उसे कत्ल करने के लिए हीन मगर क्या? सीताशु बैनर्जी, नवेन्दु घोप और उनके अन्य साथियो का सफाया करान की जरूरत क्या सरकार को इसलिए नही पड गयी थी कि उन्होन जालिम हुक्मरानो, सूदखोरो, अत्याचारी जमीदारी और तिजोरियों के सौपा का कुचलना शुरु कर दिया था। एस० पी० चौधरी, तुम बताओ कि अगर जुल्म के विरुद्ध हथियार उठा लेना अपराध है तो जुल्म करना और जुल्म को सरक्षण देना क्या है ? अत्याचार का विरोध करना अगर अन्याय है ता अत्याचार करना क्या है ? क्या यह सच है एस० पी० चौधरी, गि तुम्ह तन्नाह देने वाली सरकार अत्याचारी है, जैसा कि नवेन्दु कहा करता था? और अगर नवन्दु सच कहता था ता सच की सजा मोत क्यो" मिटर चौधरी हांपने लग । 'गट अप।" एस० पी० चौधरी या दिमाग भन्ना गया । 'गुद को गभानो मिटर चौधरी, तुम्हारे शब्दों में बगावत चू रही है।'
समय एक शब्द भर नहीं है 35 - 'ओह !' मिस्टर चौधरी को एकाएक होश आ गया। उन्हे लगा कि अब तक वे एक दुःस्वप्न से गुजर रहे थे । उन्होने जल्दी से पाइप सुलगाया और गहरा कश खीच कर अपना सिर कुर्सी की पुश्त मे टिका लिया। थोड़ी देर बाद उन्होंने अपना सिर झटका और मेज पर पड़ा अखबार उठा कर उसमें डूब गये । यह उनको रोज की आदतों में शुमार था। नाश्ते से पहले एक नजर अखबार के शीपंकों पर, फिर नाश्ता, फिर अखबार और अन्त में ऑफिम। पिता को फटकार से तन्नायी हुई जया कुछ देर बाद ही नॉर्मल हो गयी थी। उसने अपने डिग-रूम की सभी अस्मारियो छान मारी थी, मगर वहाँ ऐसी कोई किताव नही थी जो उसे नक्सलियों का परिचय दे पाती । नक्सलवादियों के प्रति उसकी उत्सुकता का कारण था, कल शाम अटैन्ड की गयी मर्वोदय कार्यकर्ताओं की एक सार्वजनिक सभा में नक्सली' शब्द का इतना अधिक आतंक क्रिएट किया गया था कि जया हैरत मे पड़ गयी थी। उसकी समझ में नहीं आया था कि कांग्रेसी, जनसंघी, सोशलिस्ट, सर्वोदयी और कम्युनिस्ट के बाद राजनीति के रंगमच पर यह 'नक्सली' नाम की कौन-सी जाति चढ आयी है जिससे सर्वोदयी तोग इतने अधिक आतंक्ति और वेचन है? सर्वोदय वालो के दस कार्यकर्ता कई रोज से टिहरी की जेल में बन्द पड़े थे और उनकी रिहाई के समर्थन में ही यह जन-सभा आयोजित की गयी थी। सर्वोदय के एक स्थानीय नेता ने क्रोध से बौखलाते हुए कहा था, "जो लोग हिंसा में यकीन रखते हैं, जो चीन के एजेन्ट है और देश के दुश्मन है उनके साथ सरकार नर्म रवैया अपना रही है। तीन रोज पहले, हिंसा में यकीन रखने वाला एक चीनी एजेन्ट टिहरी में गिरफ्तार किया गया था जिसे अगले रोज़ छोड़ दिया गया...जवकि हमारे शान्तिपूर्ण भाई पन्द्रह रोज से जेल में बन्द है...हम इस नीति का हिसक विरोध करेंगे।" इस भाषण के बाद उन्होंने समवेत स्वर में नारे लगाये थे -'माओवाद हो वरवाद...! नक्सलवाद मुर्दावाद !!' इस सभा मे लौटने के बाद ही मे 'नवमलवादी' शब्द जया की चेतना पर. ठकाठक बज रहा था। माओत्से तुंग के विषय मे तो वह जानती 36 समय एक शब्द भर नहीं है और चीन तथा चीनी क्रान्ति के विपय में भी उमने थोडा-यहुत पढा था लेकिन गडबडी देश के दुश्मन, माओवादी, हिंसप तत्व और नक्सली जैसे शब्दो मे थी जो उसकी समझ से इस तरह फिसल रहे थे जमे किसी नर्सरी वे बच्चे के सामने हल करने के लिए त्रिकोणमिति का सवाल रख दिया गया हो। यह वह अच्छी तरह जानती थी कि अपनी आदत मे मजबूर वह उस समय तक बेचैन रहेगी जब तक इस शब्द के तमाम अर्थ और समी- वरण उसे मालूम न चल जाये । उसकी वेचनी के वद जाने का नया कारण यह था वि उसके पापा कहते थे कि उन्होंने एक नक्सली को जान से मार दिया था और ताज्जुब की बात यह थी कि मरने वाला नक्सली जया के बी० ए० के दिनो के सहपाठी भुवन का दोस्त था और भुवन के पिता या हत्यारा भी एक नक्सली ही था। उस लगा कि वह वावू देवकीनदन खत्री वे किसी तिलिस्मी उपन्यास के मायावी लोक मे धूम रही है, मगर तिलिस्मी ससार से एक दम अपरिचित चौकी हुई और बदहवास । अचानक उसे लगा कि पापा यदि चाह तो उसे ऐसे सूर दे सकते है जिनके सहारे वह आगे बढ सकती है। वह फिर नाश्ते वाले कमरे में आ गयी जहाँ मिस्टर चौधरी अखवार पढ रहे थे। "वन क्वेश्चन, पापा " जया बोल पडी। "नो क्वेश्चन।" "ओनली वन, पापा प्लीज़" "अच्छा, पूछो।" "टिहरी जेल मे बन्द एक नक्सली को अगले दिन क्यो रिहा कर दिया गया था?" "उसके लिए डी० एम० के स्पेशल ऑर्डर थे।" मिस्टर चौधरी ने जवाब तो दे दिया, पर वे शकित हो गये। "क्यो?" "सुनो," मिस्ट र चौधरी ने अचानक ही कहा, "मुझे लगता है कि तुम मेरी मुहब्बत का नाजायज फायदा उठा रही हो।" "मुहब्बत और वेरखी का फंपला आज मत करिये, पापा । प्लोज, मुझे इस सवाल का जवाब दे दीजिये, फिर मै इस विषय पर पोई बात कभी समय एक शब्द भर नहीं है 37 नही कहेंगी, यह प्रॉमिस है । मुझे वताइये पि डी० एम० 2 स्पेशल ऑर्डर क्या थे? क्या वह डी० एम० का रिलेटिव था?" "नही," चौधरी साहब पराजित स्वर में बोले, "उसका मास बेस बहुत स्ट्रांग है। उसरी गिरफ्तारी स जबरदस्त तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी और उमे न छाडने पर भी वाई हिमव और खतरनार वारदात घट मरती थी।" "पर पापा "यू बैन गा।" मिस्टर चौधरी ने जया को डपट दिया और अपनी कंप उठा कर बाहर निकल गये। जीप वे स्वप ड्राइव किया करते थे। 'मुहब्बत की दुहाई मत दो, पापा ।' जया बडवडासी । कडवाहट से उसका चेहरा बिगड़ गया। अगर इस घर म मुये मुहत मिली होती तो मुझे भी आन्दोलनी, गोष्ठियो और वसो म दिलचस्पी लेने का शौक नहीं था, जया न सापा। इतने बड़े सूने घर में कोई भी क्या करेगा, पापा? अगर सन्तान के लिए खाना और कपडा उपलब्ध करा देना ही मुहब्बत है तो मैं इस मुहव्यन से घेद दुखी हूँ वेहद । उसने दांत भीच कर सोचा और अपने स्टडी रूम म आवर एक ईजी चेयर पर गिर पड़ी। अभी तमाम-तमाम सवाल अनुत्तरित ही थे और उसके दिमाग मे एक तीखा वोलाहल पैदा कर रहे थे। अगर नक्मलवादी डत होते है तो किसी डवंत का इतना स्ट्रांग मास वेस से हो सकता है कि उसकी रिहाई के लिए डी० एम० को स्पेशल ऑर्डर जारी करना पड़े? मास वेस जनता के हकों के लिए लडने वाले जन-नेताओ का होता है और अगर नक्सली लोग देश के दुश्मन तथा चीनी एजेन्ट है तो हिन्दुस्तानी जनता के आन्दोलनों में वे क्यो नेता बन हुए है और जनता उनकी इतनी कट्टर भक्त क्या है कि एक नक्सली को गिरफ्तारी से पूरा पहाड हिला दे? पापा बता रहे थे कि उन्होंने एक नक्सली को जान से मार डाला था। पुलिस वाले किसी निहत्थे आदमी का ख न कर दें तो उन पर दफा तीन सौ दो का मुकदमा क्यो नही चलता?
38 समय एक शब्द भर नहीं है क्यो क्यो आखिर क्यों जया चौधरी का दिमाग लहूलुहान हो रहा था। चमक्ते हुए हलके नोले रग की 'ग्री जीरो फोर सिक्स' मसंडीज़ जिस वक्त नैनीताल के बस अड्डे पर पहुंची उस वक्त भुवन झील के सामन वाली रलिंग मे टिककर सिगरेट पी रहा था और पूरे नैनीताल में हलका हलवा बोहरा उड रहा था। पहली बार भुवन का मौसम पसन्द आया था। इस वक्त तक नैनीताल धूमने आये ऐय्याश धन-कुवेरी का झुरमुट सडको पर नहीं निकला था, इसलिए हवा भी साफ थी और सडक भी शान्त थी। यह सुबह के तकरीवन सात बजे वस्त था जब सध्या कार से वाहर उतरी और मुसकरायो। मै वक्त पर पहुँची, देखा। सध्या ने नजदीक आते ही उसके चेहरे पर चुम्बन जड दिया। वह इस हमले के लिए तैयार नहीं था। न मानसिक रूप स और न ही शारीरिक रूप स । क्षणाश के लिए वह लडखडा गया और सिटपिटा कर इधर-उधर तारने लगा। आस पास ज्यादा लोग नहीं थे। जा थे उनका ध्यान इस घटना पर नहीं गया। अगर जाता भी ता उनके लिए यह सामान्य सी बात होती, घटना नहीं। आज पापा मुरादाबाद गय है, रात तक लौटेंगे, मैं शाम तक की हूँ।' सध्या मुसकरायी। वह सध्या की इतनी खुली और निमत्रण दती मुसकान दलकर बौखला गया । उसे लगा पूरी रात सिगरेटें पूंक कर उसन जो कठार निणय किया है वह दरअमल इतना कमजोर या वि भरभरा कर दहन ही वाला है। लेविन अधिक दर करना भी मुनासिव नहीं है। भावुक्ता मजीदगी के लोह क्वच म प्रवेश करे, इससे पहले ही उसकी गरदन ताड देनी जरूरी है। गाद में एक सूना जगल आदमी को मिल, यह भी ता गलत है। न सिफ समय एक शब्द भर नहीं है 39 7 गलत है बल्कि अत्याचार है, उसने सोचा । "खुश नहीं हुए 'सध्या एकाएक ही जिद्दी बच्ची की तरह मचल गयी । शायद वह अपने साथ पूरा खुलापन लायी थी और पूरी ताजगी। "इसमे खुश होने जैसी क्या बात है?" उसके मुंह से अचानक निकल गया। हालांकि वह कहना यह चाहता था कि खुश होने का फायदा क्या है "क्यो?" सध्या परेशान हो गयो। "क्योकि यह लम्बा वक्त तुम तब निकाल सकी हो जब तुम्हारे पापा वाहर हैं।" उसने कहा जबकि वह कहना चाहता था कि इस ख शी के सहारे क्तिने दिन खुद को छला जा सकता है ? उसे महसूस हुआ कि जो कुछ वह कहना चाहता है वह फिर अनकहा रह जायेगा। लेकिन सवाल यह था कि बिना कहे, सम्बन्धो का यह छद्म कितने दिन और जिया जायेगा? सम्बन्धी के इस छद्म को चकनाचूर किये विना वह अपने पांव दूसरी दिशा मे भी तो नहीं मोड सकता। दुविधा- ग्रस्त रहार तो दूसरा कार्य भी ढग और मन से नहीं दिया जा सकेगा। तो फिर? वह परेशान-सा होने लगा। 'तुम मेरी मजबूरी नहीं समझ पाते बस इसी बात का दुप है।" सध्या एक पल के लिए गहरी उदासी मे डूब गयी। उदासी के उसी गुहा- धकार में डूबे रहकर वह आहिस्ता से बोली "क्या मैं नहीं चाहती कि तमाम दिन और तमाम रात मैं सिर्फ तुम्हारे ही साथ रहूँ ? मगर क्या यह सभव है ? पापा को पता भर चल जाये तो । 'पापा पापा वह अचानक विफर गया और सडप कर बोला, "एक न एक दिन तो पापा को बताना ही पडेगा । तब?" उसने उत्तेजित होर 'तव' पर जोर दिया, लेकिन तुरन्त ही उसके भीतर ढेर सी वेचनी और घबराहट दौडने लगी। उसके माथे पर पसीना छलछला आया। वह समझ नहीं सका कि इस वक्त उसको जवान ने धोखा दिया या उसका दिमाग ही उसका रकीब बन रहा है ? पूरी बात के निर्मम निर्णय के बाद जिन वाक्यो को उसे बोलना था वे वाक्य और शब्द आश्चर्यजनक १प से उसकी चेतना से अनुपस्थित हो गये थे। उसने स्वय को अचरज-भरी दयनीयता में पाया। " ।
सध्या । 40 ममय एक शब्द भर नहीं है फैमला तो हो जायेगा, उसने सोचा, लेकिन अपनी तरह से होगा, वम नहीं जैसे उसने तय किया था । शन्द जिस तरह गायव हो-होकर अपने तरीके से आ रहे थे उसमे फैमला विकृति की ओर जा रहा था। "तुम उस दिन को करीब ले आओ, मैं पापा को छोडकर तुम्हारे साथ न चली आऊ तब कहना।" सध्या भावुक्ता के चरम पर जा चुकी थी। उसने सध्या की भावुक्ता को तौला तो परेशान हो गया। सध्या की भावुकता में सजीदगी थी। "तुम इसी वक्त वह दो कि वह दिन आज का ही है, मैं अभी अपने घर टेलीफोन करती हूँ कि मैंने अपना साथी चुन लिया है और घर छोड रही हूँ। वोलो . क्या तुम इसी वक्त मुझसे शादी कर सकते हो।" की सांसे भारी हो गयी और वह उसके बदन से पूरी तरह सट गयी। शादी . एक हारा हुआ आदमी भुवन के भीतर सिसकने लगा। सगीता बनर्जी का नाम चीखता हुआ उसके दिमाग से टकराया और दिल को चीरता हुआ बदन के पोर-पोर मे तेजधार चाकू की तरह घुस गया। यक-व-यर । देर तक भुवन का बदन टूटे हुए पत्ते की तरह कांपता-लड- खडाता रहा और माथा बेइतहा बूंदो से भर गया। रोकते-रोक्ते भी उसकी सांस उखड गयी। कमरे की नीली रोशनी में, सिलवटो-भरे बिस्तर पर, सर से पांव तक नगी, पाँव पटक्ती, हाय फटकारती और रह-रहकर भुवन के वालो को नोवती-खसोटती सगीता बनर्जी उसकी आंखो मे उतर आयी और वह थर्राकर सम्पूर्ण स से पराजित हो गया। नहीं, यह संभव नहीं है । अगर यह सभा होता तो कनाते से सगीता बैनर्जी अचानक गायव न हो जाती-उसने सोचा। उसका दिमाग जलने लगा था और आँखें पथरा गयी थी। तनाव से उमरा पूरा चेहरा ऐंठ गया था और टांगें थरथराने लगी थी। सध्या भौचक रह गयी। "कुछ नही।" वह स्खलित हुए कमजोर आदमी की तरह हॉफ्नै लगा। हलक में फंसी हुई सांसो को पूरी तरह बाहर फेंक कर उसने आहिस्ता से कहा, "चलो, चाय पी लें।" "क्या हुआ " समय एक शब्द भर नहीं है 41 - उसने पीठ मोड ली थी और झोल ये किनारे पडी वीरान नावी को एक्टर तापने लगा था। 'नही,' उसने सोचा, 'वह दिन कभी नहीं आ सस्ता जब यह पोप से सन्न हुआ हाथ सध्या की पीठ पर फिरा कर रह सकेगा, चला हम शादी कर लेत हैं।' उमन एक सिगरेट निवाली और होठो मे दाव ली। "फिर सिगरट'सध्या न सिगरट छीन ली। उमन मुडवर देवा-सध्या की आँखों में आंसू चमर रहे थ। सारी बौद्धिक परिपक्वता के वावजूद अपने भीतर यह कही बेतरह भावुक हो गया । उसने दर तर सध्या को आंखो म देखा और धीरे से बोला, 'क्या सचमुच मुझे बहुत प्यार करती हो?" सध्या की आंखो के दो माटे आमू उसरे गाल पर दुलम आय । उसने भुवन की छाती पर अपना सिर टिका कर प्यार से पहा 'चलो, कोर्ट चलते है।" उसकी सांस फिर उसडने लगी। इससे पहले कि उसका दिमागी सन्तुलन उसके नियत्रण से फिसल जाता, वह सयत हो गया और आहिस्ता से ही वोला, 'पहले चाय पीते है।" सध्या का चेहरा सुस्त पड गया। वह सुस्त कदमी से ही मल्लीताल की तरफ चल पडी। भवन पीछे पीछे था। 'सुनो।" उसने अचानक वहा । सध्या पलट गयी। "चलो, कोर्ट चलते हैं" उसने नीद मे डूबे आदमी की तरह बडवडा- कर कहा, ' पर याद रखना, मैं ।" उसकी जबान लडखडा गयी। "क्या याद रखना है ?" सध्या उत्सुक हो उठी। नही, याद नहीं रखना है," उसने कुछ याद करते हुए कहा, याद नहीं रखना है वरित भूल जाना है। भूल जाना है कि शादी की पहली रात और जिन्दगी की बाकी रातो मे प्रेम के सम्बन्ध देह तक पहुंचेंगे।" "मैं समझी नहीं।" सध्या हतप्रभ रह गयी। ' समझो सध्या डालिंग, समझो दि जब प्रेम से गुजरते हुए तुम शरीर तक पहुँचोगी तो तुम्ह धक्का लगेगा।" उसने एकाएक सध्या के क्या " 42 समय एक शब्द भर नहीं है कन्धे पर सिर टिवा दिया। "मैं शारीरिक सुख नहीं दे सकता मैं शरीर के स्तर पर पुरुप नहीं हूँ।" उसने रख-रख कर धीरे मे कहा और पहने के बाद उसे लगा कि एक बहुत बडा अन्धड उसे छूता हुआ गुजरा है। "नहीं ।" आश्चर्य मे सध्या की चीख निकल गयी। अब बर्फ होने की उसकी वारी थी। "तुम झूठ बोलते हो।" सध्या ने भुवन की छाती पर मुट्ठियां पटवनी शुरू कर दी। ऐसा कैसे समव है ? वह कई वर्षो से भुवन को अपना सर्वस्व सोपने के लिए वेकरार बैठी थी। सर्वस्व । न सिर्फ तन, न सिर्फ मन । दिल, दिमाग और शरीर । उसका अपना-आप। उसका सभी कुछ भुवन की अमानत या। वेवल भुवन की अमानत। इसमे रत्ती भर भावुक्ता नहीं थी। "यह झूठ है, । कहीं न, यह झूठ है ।" सध्या ने दोनों हाथों से भुवन का चेहरा थाम लिया। यह सच है।" वह वौद्ध भिक्षु को तरह निर्द्वन्द्व और निर्विकार हो गया। मगर दूसरे ही पल उसमे सामान्य पुरपो की सभी कमजोरियो ने सिर उठा लिया और वह कडवाहट के साथ बोला, "प्रेम की तमाम- तमाम ऊँचाइयो और भावुक्ता वे पूरे आवेश के वावजूद औरत आखिर- वार औरत है। सगीता बनर्जी भी औरत ही थी।" "सगीता बनर्जी कोन" सध्या की आंखें फट गयी। "औरत।" उसने तीपेपन से वहा और सिगरेट मुलगाने लगा। "तुम सिगरेट नहीं छोडोगे?" सध्या ने धीरे मे पूछा । "छाडो, यार" उसने एक लम्बा और गहरा पश खीचा और नॉर्मल हो गया। उसके चेहरे का तनाव हालांकि पूरी तरह नहीं मिटा था, लेकिन अब पहले जम चरम की स्थिति नहीं थी। उसने दो-तीन यश लेने के बाद सध्या को देखा और दग रह गया। सध्या की आंखें निकली पड रही थी और उमका चेहरा जगह-जगह से तिड गया था। उसे सध्या पर दया ही आने लगी। 'आखिर वही हुआ न " उसने सोचा। सध्या को एक सूना जगत ही मिलान .
समय एक शब्द भर नही है 43 “गो ऐंड रिलंक्स," उसने प्यार के साथ वहा, "मैं कल शाम हल- द्वानी आ रहा हूँ।" "क्यो?" सध्या चौंक पडी। "ऐसे ही।" उसने लापरवाही से जवान दिया। "एक बात बताओगे" सध्या ने सहसा ही पूछा। "हू।" वह अभी भी लापरवाह था । "जितनी लापरवाही से और निर्मम हापर तुम मुझे अपनी जिन्दगी से धकेल रहे हो क्या सचमुच तुम्हारा मन उतना ही कठोर है ?" "मैं समझा नहीं।" "तुम सब समझते हो, लेकिन यह नही समझते रि औरत उतनी नासमझ नहीं होती जितनी तुम समझते हो। क्या सिर्फ इस घटना से वि तुममे पुरुषत्व नहीं है मेरा यह अधिकार भी समाप्त हो जाता है कि तुम मेरे शहर मे क्यो आ रहे हो, मुझे दमकी जानकारी मिले।" "अधिकारी का अस्तित्व सम्बन्धो के ऊपर निर्भर करता है। सम्बन्ध अगर समाप्ति की तरफ बढ़ रहे हो तो अधिकार या कर्त्तव्य की रेखा खीच कर उन्हे ठिठका देना उचित नहीं है।' 'तुम सम्बन्धो की समाप्ति क्यों चाहते हो? क्या शारीरिक सम्बन्धी से परे और कोई सम्बन्ध आदमी और औरत के बीच नही होता?" "अगर सवाल सिर्फ आदमी और सिर्फ औरत का है तो मेरा जवाब है कि सम्बन्ध आखिरकार शरीर तर अवश्य पहुँचते है," भुवन ने निर्णा- यर स्वर में कहा, "वहस का कोई अन्त नहीं होता और सब-कुछ समाप्त हो जान के बाद तो बहस का कोई अर्थ भी नहीं रह जाता है।" सध्या चुप रही और चुपचाप से दखती रही। क्या वास्तव में अब सब-कुछ समाप्त हो गया है ? क्या यह सही है कि बिना शारीरिक सम्बन्धी को स्थापित किये, औरत रह नहीं सक्ती? क्या प्यार साथ सहवास की इच्छा अनिवार्यत जुडी है ? क्या सचमुच औरत वो पुरुप ही चाहिए? "मुझे थोडा समय दोगे?" सध्या ने अचानक कहा। "जो सवाल तुम्हारे भीतर जन्म रहे हैं समय उन्ह नही . सक्ता, सध्या डालिंग ' नाटर का दुपाल स्वीकार कर लो 44 समय एक शब्द भर नही है 1" दुखान्त नाटको का असर देर तक रहता है।" न चाहते हुए भी भुवन की आवाज़ पडवी हो गयी। 'कुढो मत।' सध्या ने तुन कर कहा। उसकी समूची कातरता यकायक पोध मे तब्दील हो गयी। "सामर्थ्यहीन होकर इस तरह के व्यग्य क्सने का हक तुम्हारे पास नहीं रह जाता।" "सध्या 'वह उत्तेजित हो गया, मगर दूसरे ही क्षण अपने आहत मन को साथ लिये पीछे मुड गया। ' विदा।" उसने मुडे-मुडे ही भारी गले से कहा, "अब, तीसरी सगीता बैनर्जी की चाहतें यह भुवन कभी नहीं तोडेगा।" "सुनो,” सध्या ने उसका हाथ पक्ड लिया, "वताओगे नहीं कि सगीता बैनर्जी कौन थी?" "सगीता बनर्जी एक औरत थी" उसने भरपूर नफरत के साय जवाब दिया, "जैसे तुम एक औरत हो।" 'मेरी बात सुनो," सध्या ने तडप कर कहा, "तुम एक-तरफा फैसला करके नहीं जा सकते ।" लेकिन उसने सुना नही । वह तेज कदमो मे आगे बढता चला गया। लगातार पीछे पलट कर देखने की न तो उसे जरूरत थी, न इच्छा और न ही हिम्मत । उसका दिमाग फ्टने-फटने को हो रहा था और सवालो के जत्थे इम फटते हुए दिमाग पर लगातार आक्रमण कर रहे थे। सम्बन्धो का अन्त सध्या के साथ जिस विकृत और निर्मम तरीके से हुआ है, अपने मन से उसने ऐसा नहीं चाहा था, मगर वातें इतनी तेजी से फिसलती चली गयी थी कि वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सका। क्षणाश के लिए उसे लगा कि उसे रक पर धैर्य के साथ सध्या की बातें सुननी चाहिए थी, लेविन तत्काल ही उसे अनुभव हुआ कि उसने जो भी किया है ठीक ही दिया है। विस-घिस करने और एक छद्म से दूसरे छद्म पर पांव टिकाते- टिकाते वह अपनी तमाम उम्र तो पार पर नहीं सकता और न उसे इम तरह जिंदगी गुजारनी ही चाहिए कि अन्त में एक बहुत बडी और दुखदायी समय एक शब्द भर नहीं है 45 निरर्थकता ही शेप रह जाये। कल रात उसने निर्णय कर लिया था कि अब उसकी ज़िदगी का मक- सद भी युद्ध होगा। बहुत सोच-विचार क बाद उसने पाया था कि शोषण और दमन की इस दुनिया मे आदमी का मकसद आखिरकार युद्ध ही है । युद्ध जो नक्सलबाडी म लडा गया था। युद्ध जो पहाडी म लडा जा रहा है। युद्ध जो लुटे हुए आदमी का सच है। कल रात के इस फैसले के बावजूद उसका शकित मन फिर स दुविधा ग्रस्त हो गया था । वह जानना चाहता था कि पहाडो पर चल रहे आन्दा- लन म उसकी भागीदारी क्या एक तरह का पलायन ही नही है। जिन्दगी से घवराकर भागे हुए आदमी का मन्दिर के घटो को थाम लेना और जिन्दगी से घबराकर लडाई परचम को थाम लेना क्या दोनो बातो का चरित्र एक नहीं है ? क्या दोनी ही विकल्प पलायन नहीं है ? प्रेम के मोह म फैसकर युद्ध क्षेत्र से भाग खडे होना और प्रम म असफल होकर युद्ध-क्षेत्र म जा धमकना, दोनी म फक ही क्या है ? विचारधारा की वजह से कितने लोग जग में कूदते है ? कोई बेरोजगार है कोई भूखा है कोई लुट रहा है कोई गरीब है यानी हर वह शग्स जो किसी न किसी वजह से जिंदगी से ऊब चुका है काति म आता है। क्या ऐसे लोगो द्वारा लायी गयी काति अन्तत अराजक्ता म नहीं बदल जायेगी? नैनी-दर्पण पे दफ्तर म घुसते ही उसने ये सारे सवाल आशू के सिर पर दे मारे और कुर्सी पर आराम की मुद्रा मे बैठकर सिगरेट पीने लगा। आशू जरा भी विलचित नहीं हुआ। बहुत शालीनता और एक गहरे आत्म विश्वास के साथ उसने शब्दो पर जोर देते हुए रुक रुक कर कहा 'जीते हुए लोग क्राति क्यो चाहेग? विचारधारा लिए नाति नहीं होती है जाति के लिए विचारधारा का जम होता है। जिसके पास खाने के लिए कुछ नहीं है उसी सवहारा के द्वारा लायी जाने वाली क्राति अराजकता म न बदन जाय, इसी बात के लिए क्राति की एक रणनीति है और यह रणनीति मही विचारधारा के अतगत ही सफलता प्राप्त कर सकती है। मुफलिसी, बदहाली और दमन शोषण के शिकार करोडो करोडो लोगो की खुशहाली के लिए प्राति ही एक मात्र विकल्प है और गमय TEभरा, ग प्रापिमा मादिगाने परत मार्ग में नितिम गागने मोपिगार. भाग यारागी गर नाग गगम याirri-मार। मारगंवानाभानीगनमा मामी" आगू पानी पोप गm मुगागमा और मुका पोदेगने गगा। पा दग गनिiniinाठिन गणानां में जागा ओर पि निरास गनामा माग गएरागर आने पर प्यार आ गया और या गम-जांनी गे योगा, बापा-गो माँगी पिला देगार मृगगमुगीगभादमी ।।गने युधनी गांग । गीगा मोनार या पी मेगनी निम्मी परममा । और यम । गांपा गोमैन । आयोगायों बागोपा।" Freोग सरसर आगू में संपनी में लिए frगी सरहा और भयन गे यांना, 'नोपन गाम ना हो" आरोग," उगर्ने गनगाग जयार दिया, "मोपाययम्न । । पर दो।" "और मोई हम गंग गार या" आगू ने ग र पहा । "ठोर है टी ।' भुवन ने हागा मगापा और नीचे बने रेन। पो देपने लगा, जहां ग पॉरी आन यानी पी। गुपरिटेंडेंट पुलिस मिन्ट र शमशेर चौधरी की परेशानी या कारण हल- द्वानी में निकलने वाला जुनूम बिलकुल नहीं था। इस तरह के गंगडी जुलूम उन्होंने अपनी जिन्दगी में दो पे और पुचल दिये थे। मनीताल में अपने दायें याजू डी० एस० पी० पन्नाको उन्होंने इन पहारी छोरो का दिमाग ठिकाने लगाने के लिए आज ही हलदानी रवाना कर दिया था । अगर 'रय' को बीच में न लाया जाये तो आतर और क्रूरता में भी० एस० पी० खन्ना मिस्टर चौधरी मे उन्नीम नहीं था। हलद्वानी की यादी पुलिस को भी मिस्टर चौधरी ने विशेष आदेश जारी कर दिये थे और इस जुलूस वे विरोधी सर्वोदयी नेताओं के साय आधे घटे पी गुप्त यातां मे भी डी० एम० के साथ भाग लेकर हलद्वानी- समय एक शब्द भर नहीं है 47 प्रशासन को डी० एम० के आदेश पहुंचवा दिये थे। सारी तैयारियाँ मुकम्मल थी, इसलिए जुलूस उनकी चिंता का विषय नहीं था। नैनीताल में कोई बवंडर खडा न हो और दूर-दूर मे घूमने आये सम्भ्रान्त नागरिकों और पर्यटको को कोई परेशानी न हो, इसके भी उन्होंने सारे बन्दोबस्त कर लिये थे। स्वय उनकी ड्यूटी वन-मंत्री के आदेश पर छह तारीख को नैनीताल मे ही थी। वन-मनी इन दिनों सपरिवार नैनीताल में ही थे और इस बात की पूरी आशका थी कि नैनी- ताल कार्ड में गिरफ्तार छात्रों के सर्मथक कही मत्रो-महोदय को जान-माल का नुकसान न पहुँचा दें । उनको सुरक्षा के कडे प्रयल किये गये थे। छात्रों और आम जनता का खुला आरोप था कि नैनीताल क्लब को मंत्री-महोदय के इशारे पर ही सरकारी गुडो द्वारा आग लगवायी गयी है, ताकि आन्दोलन को बदनाम किया जा सके और विद्रोही छात्र-नेताओं को इस काड की आड़ में गिरफ्तार भी किया जा सके। छात्रों ने इस कांड की न्यायिक जांच की मांग की थी जिसके लिए प्रशासन ने अपनी सहमति भी दे दी थी पर अचानक, पता नही क्यों, किस बडे राजनेता के आदेशानुसार, इस न्यायिक जांच की स्वीकृति को भीतर-ही-भीतर ख़त्म कर दिया गया और तमाम छात्र-नेताओं को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। जनता का आरोप था कि न्यायिक जांच के परिणाम चूंकि छात्रो के पक्ष मे और वन-मत्री के विपक्ष में जाते, इसीलिए उन्होने केन्द्र से सांठ- गांठ करके न्यायिक जांच की मांग को रद्द करवा दिया और छात्र- नेताओ को गिरफ्तार कर लिया। जनता का गुस्सा वन-मत्री के विरुद्ध इतना क्रूर था कि अगर वे पुलिस के पहरे से बाहर निकल आते तो शायद उनकी बोटियां तक बच पाना नामुमकिन था। इसीलिए प्रशासन के भी बहुत कम लोगो को यह जानकारी थी कि वन-मंत्री नैनीताल में ही है और उनके साथ पर्वतीय विकास-मंत्री भी हैं। पुलिस का पहरा सचमुच बहुत सस्त था और प्रशासनिक स्तर के सभी इन्तजामात दुरुस्त थे। एम० पी० चौधरी को इस तरफ से कोई चिन्ता नहीं थी। एस० पी० चौधरी की चिन्ता का कारण नितान्त व्यक्तिगत था। अपनी इकलौती बेटी जया के रग-ढंग उनकी समझ के बाहर होते जा रहे 48 ममय एक गम भर नही है पे। अपनी मरमारी य्यताओये पारण गया ये गाय उनपे मयाद पहले हो यहा मम होते थे, सेमिन यापी दिनों में ये यह अनुभव पर रहे ये fr पहले मां तरह अब ये और जया नारी और हिनर ये यस्त भी आपम में नहीं मिल रहे हैं। हालागि पई यार वे गत के गाने और गुनह पेनाले यक्त गदही घर में नहीं होते थे, लेकिन जब भी होते थे, जया उनरे पाम होती थी। मगर अब यह सम्पयं भी टूट गया है। गुरु मे उन्होंने इस तरप याम तमरजह नहीं दी थी, लेकिन एक-दो बार जब रात के गाने के वक्त उन्होंने जया का पाद पिया था तो नौकर ने सूना दी थी कि विटिया पर नही हैं । उन्होन सज आश्चर्य में निर्णय पिया था कि वे शीघ्र ही जया से पूछेग वि गत यो यह घर गे बाहर क्यों रहती है ? लेकिन पहाडी पर तेजी में फ्लत जा रहे बनान्दोलन की लगातार व्यस्तता न उनका यह निर्णय पूरा नहीं होन दिया और फिर वात उनकी याद्दाश्त से फिमल गयी। सबमे तेज झटका उन्ह पहली बार तर लगा या जब एक बार वे अपने एक साप्ताहिन दौरे के बाद घर आये थे तो उन्ह मालूम चला था वि, विटिया तीन रोज से घर नहीं आयी। उस रात ये पाइप पोते हुए तमाम गत जागत रहे थे और अगले दिन सुबह नौ बजे होने वाली एप 'आवश्यक बैठप' म भी नही जा सके थे। लगभग बारह बजे तक उन्होंने जया की प्रतीक्षा की थी और अन्तत क्रोध म उफनते हुए ऑफिस चले गये थे। रात नौ बजे वापस पर आकर उन्हें नौकर के द्वारा सूचना मिली थी वि बिटिया खाना खा कर अपने सोने के कमरे में चली गयी है। "अगर वह सो गयी हो तो उसे जगा कर लाओ।" चौधरी साहब ने पहली बार इस घर की मर्यादाओ, सभ्यता और नियमोको ठोकर मारते हुए बोई आदेश दिया था। कुछ ही देर बाद जया चौधरी चेहरे पर आश्चर्य के भाव लिये वहां उपस्थित थी। उसकी ज़िन्दगी की यह पहली घटना थी कि बेडरूम मे प्रवेश कर जाने के बाद उसे बुलाया गया हो। वह आशकित हो उठी थी, लेकिन अपने चेहर पर उसने इस किस्म का कोई भी भाव नहीं आने दिया था जिससे पापा कुछ भाप पाते और उनका बोध भडक उठता। वह सिर्फ ।
समय एक शब्द भर नहीं है 49 चौकी हुई थी। "क्या हुआ पापा, आप कुछ परेशान-से लग रहे है ?" जया ने आते ही मोर्चा सभाल कर दांव मारा था । दाँव निशाने पर लगा था । एकदम। मिस्टर चौधरी हतप्रभ रह गये थे। उन्ह एकाएक समझ नहीं आया था कि अपनी बात कहाँ से शुरू करें और कैसे? जया के चेहरे से ऐसा काई नहीं लग रहा था कि उसने कोई गलत काम किया है। उन्ह लगा था कि वे कई महीनो के बाद अपनी बेटी के सामने खडे है। और बात सच भी थी। लगभग दो महीनो के बाद वे अपनी बेटी का चेहरा देख रह थे। वे कुछ भावुव-से हुए, लेकिन तीन रोज घर से बिन बताये अनुपस्थित रहने की जया की गलत हरकत को याद करते ही क्रोध मे भर उठे। "क्या मैं जान सकता हूँ कि तुम कई कई दिनो तक घर से गायब रहकर नहाँ जाती हो, क्या किया करती हो" मिस्टर चौधरी ने आखिर पूछ ही लिया, हालांकि इतना कठोर सवाल करने का इरादा वे छोड चुके थे। ओ हो जया मुसकरायी, "तो एस० पी० चौधरी को कभी-कभी याद आ जाता है कि वे एक जवान लडकी के पिता भी है।" जया ने यह सवाद अपनी शरारती मुद्रा मे ही कहा था, क्योकि उसे पता था कि शब्दो के तीखेपन के साथ यदि इस वक्त लहजा भी तीखा हुआ तो उसके पिता खूखार हो जायेंगे। "अगर आप केवल इस बात से परेशान हैं कि मैं कहाँ जाती हूँ ता यह चिन्ता का विषय नहीं है," जया ने लापरवाही से कहा, 'मैं अपनी महेलियो के साथ रानीखेत, अलमोडा और भीमताल के टूर पर गयी थी जस्ट फॉर एन्जॉय और इस तरह घूमने का मुये हक है। थिक, लाइक ए ा मन बीइंग इस इतने वडे सुनसान और बियावान घर में मां, बाप भाई और बहनी से महरूम यह जया चौधरी क्या अपना सिर दीवारो से टकराती रहे? क्या आपने वभी सोचा है कि आन्दोलनो और अपराधो को कुचल देन ये आपके सरकारी कर्तव्य के अलावा भी एर छोटी-सी दुनिया है जहाँ आपको कुछ प पूरे करने थे वहरहाल । मैं सोना चाहती हूँ।" जया ने बेहद शालीनता से इस सनसनाते हुए सवाद - 50 गमप एरामद भर नहीं है यो अभिव्यक्ति की और अपने कमरे की तरफ मुड गयी। वह इस बात से प्रगन्न थी पिता शोध का उगने अपने अजेय हपियार से भोयग कर दिया है। गया ये धाराप्रवाह सवाद से मिस्टर नौधरी वेवन भीयो ही नहीं हुए वरन् सडबडा भी गये। एर हताश आदमी की तरह उन्होंने एक ठटी साम भरी थी और चुपचाप गाने वी मेज पर बैठ गये थे। डरा हुआ बूढा नौकर सहम-राहम कर पाना लगाने लगा था। उसे लग रहा था वि यही विटिया का गुस्सा चौधरी साह्य उमये उपर न उतार दें। लेपिन इस घटना के बाद परिवार पे सन्दर्भ म, चौधरी साहब को वई राज ना पिर गुस्सा नहीं आया। जया के प्रति उनके मन मे शका या का म्यान सहन करणा ने ले लिया था और वै पुन अपने सरकारी चत्र म उल गये थे। वे जया के प्रति निश्चिन्त थे । मगर यह निश्चिन्तता पयादा दिन नहीं चल पायी और जया के वार में उन्ह इधर उधर कई जगहों से हैरत-अगेज समाचार मिलने लगे ननी पल में धारा एक सौ चवालिस तोडरर 'छान-युवा सघर्प वाहिनी' और 'उत्तराखड सघर्ष वाहिनी' के डेढ सौ कार्यवतीओ न अपनी गिरफ्तारी दी, जिनमे जया चौधरी एक थी। उसे छोड दिया गया। हलद्वानी में आयोजित लगभग चार-पांच सौ लडकियो की एक सभा में जया चौधरी यो सरयार-विरोधी भापण देते हुए पाया गया। विश्वस्त सूत्री के अनुसार, उत्तर प्रदेश के खतरनाक और हिंसा- समर्थक छाप-नेताओं की बागेश्वर मे हुई एक गुप्त मीटिंग मे जया चौधरी जाती हुई देखी गयी 'जनवादी कला-साहित्य मोर्चा -उत्तराखड' द्वारा किये जाने वाले सरकार-विरोधी नाटक 'पूर कुल्हाडा भागेगा' मै जया चौधरी न ग्रामीण पहाडी युवती का रोल अदा किया। यह नाटक हलद्वानी और नैनीताल के गेठिया, गौलापार, तिरछाखेत, भीमताल, रानीबाग और परदाडागर इलाको मे संक्डो लोगो ने देखा। रामनगर और काशीपुर में आयोजित सैकडो लोगो की सभा में जया चौधरी ने अपने साथियो के साथ आन्दोलन के समर्थन म इन्वलावी परचे वाटे रुद्रपुर मे जया चौधरी ।
समय एक शब्द भर नहीं है 51 एस० पी० शमशेर चौधरी का दिमाग जैसे एक भयानक विस्फोट के साथ विखर गया। इन समाचारो को सुनकर उह लगा वि पुलिस- जिदमी के उनवे स्वर्णिम इनिहास पर बाल पाले साये मंडराने लगे हैं। यह लडकी ख द तो डूबगी ही उन्ह भी ले डूबेगी। इस बार उन्हान प्राध नहीं, हताशा और वचारगी का अनुभव दिया। उनके भीतर कहीं से आवाज उठी नि जया चौधरी अब उनके हाथ में फिसल गयी है और उमे वापस बुलाना नवदु पाप की जुबान खुलवान स बम दुप्पर नहीं है। फिर भी, वे वाशिश ता करेंग ही । आपट र ऑल, वाप है वे। उन्ह दुय हुआ था और पहनी धार ये पूरी ईमानदारी के साथ चिन्तित हुए थे। हलद्वानी वाले विज्ञान जुलूस और आन्दोलन के लगातार ध्यापक हात चल जाने के पारण उनी व्यम्नता बढ़ गयी । कई रोज से वे जया की खाज-खबर भी नही रख पाय थे। उनकी चिन्ता इसलिए और भी बढ़ गयी थी क्यापि जया पिछन पाँच रोज़ से घर म मौजूद नहीं थी और उह शवा थी कि कही हतद्वानी वान जुलूस म उनकी वटी न हो? अगर ऐसा हुआ ता इस बार बहुत गडबड हो जायेगी। इस जुलूस के दमन की पूरी सभावनाएँ थी और उन्होंने अपने सभी मातहतो को इस सम्बन्ध म आवश्यक निर्देश भी दे दिये थे। अब वे यह तो कह नही सक्ते थे कि अगर लाठी चार्ज करना पडे तो दख लिया जाये कि कोई लाठी यही उनकी बेटी के मामल शरीर पर अपने वदशक्ल निशान न बना दे। मिस्टर चौधरी की चिन्ता यही थी। खुद उन्ह उस दिन नैनीताल म रहना था यह और भी असहाय स्थिति थी। सार महापाह के बाद मिस्टर चौधरीन अन्त म डी० एस० पो० श्वना का यह निर्देश भेज ही दिया था कि यदि जुलूस म उनकी बेटी दिखायी दे तो उस चुपचा गिरफ्तार करके घर भेज दिया जाये और मिस्ट र चौधरी या तत्वाल सूचना दी जाये । इस निर्देश के बाद भी इनके मन से चिन्ता और वेचनी ने अपनी जगह रिक्त नहीं की थी। इम बात की गारटी कौन दे सकता था कि इतना बडा जुनूस एक लडकी को शान्ति स गिरफ्तार होता देखता रहेगा और उग्र नही हो जायेगा?
52 समय एक शब्द भर नहीं है तीन पक्तियो म कतारबद्ध और अनुशासित हलद्वानी के विशाल जुलूस म सवस आगे तीन लडक्यिों थी और उन तीन लडवियों में स एक का नाम जया चौधरी था। इन तीन लड़कियों के पीछे करीब आठ साँ लडवियां थी। इन आठ सौ लडक्यिो र पोछे पूरे कुमाऊँ जनपद का प्रनि- निधित्व करने वाले तीन हजार छात्र और युवा थे और उनक वाद थ लगभग एक हजार मजदूर, अध्यापक और अन्य शहरवामी। जुलूस के हाथो म पास्टर्स बैनस और फेस्टून थे जिन पर अलग-अलग नारे और मांगें अकित थी। जुलूस वे दोनो तरफ पुलिस और पी० ए० सी० के बन्दूकधारी जवान थे--किसी भी वारदात के प्रति सतक और मुस्तैद । जुलूस नारे लगाता हुआ आगे बढ रहा था -हर जोर जुलम की टक्कर म -मघर्ष हमारा नारा है। -नैनीताल काड में गिरपतार साथियों का -रिहा करो रिहा करो । -तानाशाही नही चलेगी -नहीं चलेगी नहीं चलेगी । हजारो गलो से फूटते जोशीले नारे सुनकर और जुलूस में शामिल लोगो का उत्साह देखकर क्षणाश के लिए डी० एस० पी० खन्ना की टांगो म आतक वा सन्नाटा दौड गया । वह एस० पी० साहब की बेटी जया चौधरी को पहचान गया जा हवा मे मुटिठयां उछाल पर चीख रही थो दमन वे आगे नहीं झुकेंगे । नहीं झुकेगे नहीं झुकेंगे । जया के पीछे वाली सैकडो लडवियाँ गुर्रायी थी। डी० एस०पी० खन्ना की समझ को सहसा ही जग सा लग गया। वह तुरन्त ही यह निर्णय नहीं ले सका कि क्या करे ? जया चौधरी जुलूस की नेत्री बनी हुई थी और जुलूस की नेत्री को गिरफ्तार करक डी० एस० पी० खन्ना तवाही को निमरण नहीं दे सकता था। दूसरी तरफ, जया चौधरी प्रमश उग्न होती जा रही थी। --टाटा विडलायी सरकार का समय एक शब्द भर नहीं है 53 -नही चलेगी, नही चलेगी --तानाशाहो की सरकार -नहीं चलेगी नही चलेगी। -आधी रोटी खायेंगे -इपलाब लायेगे। डी० एस० पी० खन्ना का शक सौ प्रतिशत यकीन में बदल गया कि आन्दोलन की बागडोर सर्वोदय नेताओं के हाथ से निकल गयी है। शायद यही कारण है कि आन्दोलन को कुचलने के आदेश दिल्ली से जारी हो चुके हैं। नारे लगाता हुआ, मुट्ठियाँ उछालता हुआ जुलूस लगातार आगे बढ रहा था और जुनूस वे साथ-साथ ही आगे बढ़ता हुआ डी० एस० पी० खन्ना जया चौधरी को किसी तरह गिरफ्तार कर लेने की फिराक में चौकन्नी आँखो से उसे घूर रहा था-मौके की तलाश मे कि तभी जया की आवाज उसने बानी पडी -पुलिस हमारी भाई है --उससे नही लडाई है। --पी० ए०सी० वापस साओ --वापस जाआ वापस जाओ। इसके बाद इन्वलाब जिन्दावाद का नारा उठा और रिपीट होने लगा जुलूस के कदम-ताल पर सधी हुई, अनुशासित मगर गरजदार आवाज़ म -इन्कलाब जिन्दावाद -जिन्दावा जिदाबाद । ----इन्क्लाव जि दावाद -जिन्दाबाद इसलाच । -यू० के० एस० यू० जिन्दावाद -जिन्दाबाद जिन्दावाद । डी० एस०पी० सुना दुरी तरह चौक पडा। ओहो उसने मोचा यू० वे० एस० यू० भी शामिल है। अभी वह चौंकने की स्थिति तो इसमे 54 समय एप शन्द भर नहीं है . में ही था कि एम० पी० चौधरी को लडी जया चौधरी ने अपनी दाग आवाज में कहा, "यू० ० एस० यू० को लाल सलाम...." -लाल सलाम लाल सलाम। रंड रोल्पूट रंड सेल्यूट-रंड सैल्यूट टु यू० ३० एग० यू० । -रंड त्यूट रंड सैल्यूट --रेड सेल्यूट टु यू० ये ० एम यू० । जुलूस ने दोहराया और डी० एस० पौ० पन्ना का चेहरा आतय और आश्चर्य से स्याह पड गया । तो, क्या चौधरी साहब की बेटी भी यू० बै० एस० यू० से सम्बन्धित है ? यन्ना ने सोचा, और एम० पी० साहन चुप है। य० के० एस० यू०। गढवाल और कुमाऊँ और दिल्ली और उत्तर प्रदेश और आन्ध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल तथा केरल के कई इलाकों में पिछले छह वर्ष से, गुप्त रप से कार्यरत नक्सली प्रातिकारियों का छात्र सगठन। डी० एस० पी० खन्ना पसीन से लथपथ हो गया । जया चौधरी को जुलूस का नेतृत्व करते देखपर जो शख्स सबस प्यादा बौखला गया था और अवाक रह गया था, वह था विभिन्न कोणी से जुलूस की भगिमाओं को यमरे में गिरफ्तार करता हुआ, भुवन किशोर। दिमाग पर जरा-सा जोर डालते ही उसे अपनी क्लास-फैलो जया चौधरी याद हो आयी थी-अलमस्त, वेपरवाह और दवग लडकी जया जिमी 'रैगिंग' ये शिकार नये स्टूडेन्ट्स रो तक दिया करते थे। प्राध्यापक जिसी शक्ल दसवर विदक उठते थे। कैसे-कैसे लोग यदल गये है इस वीच। भुवन विशोर न विस्मय के तेज आवेग मे घिर कर सोचा था। और वह, भुवन विशोर, ममाज की चेतना को परिष्कृत करने वाला हिन्दी का लेखक, इश्कबाजी और सक्स के चुतियापो मे ही फंसा रहा और एक लम्बा समय यूं ही गुजर गया आवारा और एक नावारा और दिशाहारा ।
समय एक शब्द भर नहीं है 55 अचानक, भुवन विशोर दूसरी वार चौक पड़ा। पी० ए०सी० में बन्दूषधारी जवानो ने जुलूस पा रास्ता रोग लिया था और जया चौधरी किसी पुलिस ऑफिमर मे मुट्ठियां बांधर र बहस कर रही थी कि तभी उस पुलिस ऑफिसर ने तीन-चार जवानी की मदद से जया को पुलिस- जीप में फेंक दिया और इसके तुरन्त वाद सबसे आगे खडी निहत्थी लडकियो पर तड-तड-तडातड की वंश आवाज़ के साथ ताठियां बरसन लगी। भुवन ने तुरत फुरत दो-तीन स्नैप लिय और पिटती हुई लडक्यिो के पीछे देखन लगा, जहाँ से पोध म तमतमात हुए उत्तेजित लटके भाग चले आ रहे थे। जीर में फेंके जान के दौरान ही जया चौधरी को सारी कहानी समझ आ गयी थी। जीप म गिरते ही वह गुर्राकर पलट गयी। "सरकारी कुत्ते वह दाँत भीन कर बोली और इससे पहल वि बी० एस०पी० खन्ना जीप स्टार्ट कर पाता, जया ने अपने अगल-बगल खडे दोनो पुलिस-चान्सटेवलो से स्वयं को मुक्त करा लिया और तय मटके से अपनी दो उंगलियां खन्ना की दोनो आँखो म घुसेड दी। खन्ना इस आकस्मिक हमले को सभाल नहीं सका। उसकी आँखो में घातब चोट तो नहीं लगी थी मगर एकवारगी उसका पूरा बदन तकलीफ से ऐंठ गया। जया जीप से नीचे कूद चुरी थी। मगर इससे पहले दि यह भाग पाती, नोचे खडे तीन सिपाहियो की लाठियां उसके ऊपर तडा-तड वरस गयी। वह तिलमिला पर जमीन पर लुढर गयी। सिर पर पडन वाली एक लाठी के जोरदार प्रहार मे उसकी चेतना क्षीण हाती चली गयी और अन्तत वह हाश खो बैठी। उसका सिर फट गया था। 'उल्लू के पटठो यह एस० पी० साल की बेटी है ।' डी० एस० पी० अन्ना ने गुरविर कहा और जया को हॉस्पिटल ले जाने का निर्देश देकर जुलूस की तरफ पलट गया । भुवन समझ नहीं सवा वि पुलिस कोलाठी चार्ज का आदेश क्यो दिया गया है ? जुलूस तो आयामर भी नही हुया था । वह बूद कर एक ऊँचे पत्थर पर खडा हा गया था और खटाखट फोटो खीचे जा रहा था । उम लगा, पुलिस पागल हो गयी है। पुलिस की तेल पिलायी लाठियां वैरभी 56 समय एक शब्द भर नहीं है । मे जद में आने वालों के सिर, टांग, हाय और कमर तोड रही थी। जुलूस में सबसे आगे लड़कियां थी और लाठियो के इस अन्धे और निर्मम प्रहार को वे ही झेल रही थी। एक तरफ़ दो पुलिस वालों ने एक लड़की को पकड़ लिया था और उसका ब्लाउज चर्र से फाड़ डाला था। भयातुर लडकी की चीख से भुवन थर्रा गया । इतने भयानक दृश्यों की उसने कल्पना भी नहीं की थी। पुलिस के दिमाग में सचमुच वहशियत ने अपना सिर उठा लिया था। तीन सिपाहियों ने एक लडकी की कमीज़ को तार-तार कर दिया था और उसे अपनी कठोर वाही की गिरफ्त में ले लिया था। लडकी पखकटी मुर्गी की तरह आहत और भयाक्रात थी। लगता था, अजाम के आतंक ने लड़की की आवाज छीन ली है । जैसे ही लडकी की शलवार फटने का दृश्य आया और लडकी की ड़प भरी चीख भुवन के कानो से टकरापी, उसकी लेखनीय गरिमा और शालीनता के परखचे उड़ गये । एक सिपाही ने हाँफ हॉफ कर हू-हू की आवाज़ करते हुए लडकी के उरोजो को कस कर पकड लिया था और वाकी दोनों भी अपनी वन्दूकें फेंक कर लडकी का अन्डर- वीयर फाडने लगे थे कि तभी भुवन बिजली की तरह कौंधा और उसने एक भारी पत्थर उठाकर एक सिपाही के सिर पर पटक दिया। खोपडी चटाख से टूट गयी और खून का फव्वारा उछल पड़ा । शेप दो में से एक मिपाही 'खून-खून' करता पीछे हट गया और दूसरा जमीन पर गिरी अपनी बन्दूक उठाने झपटा, मगर इस बीच भुवन उछल कर मुड़ा और बस- स्टेड की दिशा में भागता चला गया। दो पुलिस वाले उसका पीछे करने लगे थे। इस घटना से हतप्रभ और भयाक्रात लड़की नग्नावस्था मे ही, बचने के लिए तेजी से भागी, मगर पीछे हटते पुलिस वालों की एक बडी भीड़ के धक्के से ज़मीन पर गिर पड़ी। जमीन पर गिरते ही उसके लगभग नंगे जिस्म को पुलिस के संकड़ो पर्श ने निर्ममता से रौंद दिया। लडकी की चीख तक ऊँध गयी। पुलिस के एकाएक पीछे हटने का कारण था- उत्तेजित लडकों द्वारा पत्यरो में किया गया जबरदस्त और मामूहिक आक्रमण । पत्यरों की इन ------ +-- समय एक शब्द भर नही है 57 । भारी यौछार से पुलिस की घेराबन्दी टूट गयी थी और वह छितरा कर दायें-बायें और पीछे की तरफ भागी थी । समूचा वातावरण एक विचित्र-मे कोलाहल से भर गया था। हो-हल्ला, चीख-पुकार, आहो-कराहो, लाठियो की तडातड और पत्थरों के टकराव का मिला-जुला कोलाहल । और इस कोलाहल को चीरती हुई एक कडक आवाज गूंजी, फायर और इस अधिकारिक आवाज के तुरन्त वाद सत्ता बन्दुवो की नलियो से वहन लगी। पुलिस की वन्दु पहले तो आकाश की तरफ मुंह करके चली, फिर उन्होंने उत्तेजित और आनामर लडको के घुटनो और पैरो पर अपना हमला कन्द्रित कर दिया। पुलिस के इस वर्वर आक्रमण को जुलूस पयादा देर तक नहीं झेल सका और भाग लिया। घायल लडके, पिसी हुई लडकियां, टूटती कराह और रिसता हुआ खून पीछे छूट गया। जुलूस विखर चुका था। आंखो से दिखायी पडते भागते लडको, मजदूरो और लडकियो के पीछे उन्मत्त पुलिस दौड रही थी-हायो मे व दूक और दिमाग म तेज़ गुस्सा लिये । इस बार जुलूस नही, पुलिस बेकाबू हो गयी थी। लगभग डेढ सौ पुलिस वालो की एक टुकडी व चहरी म घुस गयी थी और दायी तरफ वाली नीची दीवार फांद कर बाहर निकलने लगी थी। लडके लम्बे रास्ते से भागते हुए गुजर रहे थे और पुलिस जानती थी वि जब तक भागते हुए लडके कोर्ट की दायी दीवार के सामने स गुजरेंगे तब तक वह सीधे वोर्ट म घुस कर दायी तरफ वाली नीची दीवार फांद कर उन्हे रास्त मही रोर लेगी और लडके घिर जायेंगे । इसी कारण पुलिस ने कोट वाला रास्ता चुन लिया था और दवा दब दीवार पांदने लगी थी। पुलिस की इस भागमभाग से वकीलो की कुर्सियां मजें इधर- उधर गिरन लगी थी और एक-दो वकीलो तथा उनके क्लाइन्ट के छोटी- माटी चोटें भी आ गयी थी। पुलिस इतने अप्रत्याशित तरीके स घुमी थी वि लाग-याग सतर्क भी नहीं हो पाये थे। जुलूस म शामिल कुछ वकील भी वचन के लिए भागकर कोट म ही घुसे थे, मगर पुलिस को कोर्ट म भी दख वे क्रोध से बौखला गय और उन्होंन पुलिस की इम नागवार हरपत के विरुद्ध रोष प्रकट वग्न हुए पुलिस ये खिलाफ नारेबाजी प्रारभ पर दी।
58 समय एक शब्द भर नहीं है जुनून की चिंगारियां आंखो म निये दीवार फांदते पुलिस के जवान एकाएक थम गय । क्षणाश के लिए उन्होंने कुछ सोचा और फिर उन्होन अपनी बन्दु उलटी पाड ली। इसके बाद वे नारे लगाते वकीलो पर टूट पडे और उनकी वन्दूको के हत्य वकीलो की कमर गरदन टांगो और हाथों पर वरमन लगे । कुछ ही देर बाद पूरे कोर्ट म घायन वकीलो और उलटी पडी कुर्सी मजो तथा टूटे बरसो के अलावा कुछ भी शेष नहीं बचा। इसके वाद उत्तजित पुलिस वाले कोट की एकमात्न चाय मिठाई और पूरी छोत की दुकान पर झपट पडे। दुकान के नौकर पहले ही भाग खड़े हुए थे। सिर्फ मालिक था जो फटाफ्ट दुवान बन्द कर रहा था और थर-थर कप रहा था। उसकी जिन्दगी का यह पहला वाव ना था और मय क साथ-साय उसकी आखो म अचरज भी था। पुलिस के सिपाहियों ने दुकान के मोटे मालिक का धक्के मारकर बगल वाल नाले म गिरा दिया और इसके बाद उन्होन अल्मारियो के शीशे ताडसर मिठाइयाँ लूटनी शुरू कर दी। थोड़ी ही देर बाद वे हल्ला मचात हुए चिडियाघर स मागे जगली खतरनार जानवरों की तरह सडको पर निकल पडे। सडकें जन शून्य थी । दुकानों के शटर बन्द य और तुफान गुजर जान के बाद पायी गयी तवाही की मनहूस शान्ति सांप सांय कर रही थी। डी० एस० पी० खन्ना का सिर तेज दर्द स फटने नगा। जिस बात को उस आशका थी वह होकर रही थी। यह बात उसकी समय म परे चली गयी थी कि जब जुलूस शातिपूवव तरीर मे गुजरता जा रहा था ता एस० ० एम० साहब ने उसे लाठीचार्ज का आदेश क्या दिया था? उसन अगर मगर करन की कोशिश की थी लेकिन एम० डी०एम० साहब ने उस सलाह दी थी कि वह चुपचाप आदेश का पालन पर । आदश मिनिस्ट्री के है और स्वय जिलाधीश महोदय इस वक्त हलद्वानी म उपस्थित है । वह चुप रह गया था और लाठी चाज के आदेश से पूर्व उसन जया चोरीका "क्डिनप' वरने का प्रयल भी किया था, लेकिन नावामयाव रहा। जब उसका दिमाग यह सोच सोच कर वोपराया जा रहा था कि वह एस० पी० साहब के सामने बम पडेगा? उनस स रहेगा कि आपके समय एक शब्द भर नहीं है 59 निर्देश के वावजूद जया का सिर जम्मी हाने से मैं बचा नहीं सका। अन्त में उसने यह सोचकर सन्ताप कर लिया कि एस० पी० साहब भारत सरकार से बडे नहीं है और ठीक उसी की तरह वे भी सरकारी गुलाम ही है । जब आदेश ही मिनिस्ट्री में आये है तो जुलूस म एस० पी० की बेटी है या डी० एम० का लडका, क्या फर्क पडता है ? मिनिस्ट्री से बडी कोई चीज नहीं है-उसन सोचा और जीप म जाकर बैठ गया। काफी देर तक वह जीप मे बैठा-बैठा घायलो को पुलिस-वैन म पट जाते देखता रहा। कुल तीन सौ सात लडके लड़कियों और मजदूरों को गिरफ्तार पिया गया था। । भुवन किशोर इस मीटिंग में देर मे पहुँच सका । उसके दो कारण थे। एक तो उसे नैनीताल के भूगोल का अच्छी तरह ज्ञान नहीं था, दूसरे-मीटिंग स्थल पर पहुँचन के लिए उसे आशू न जिस जगह का पत्ता दिया वहाँ फेवल दो लडवे बैठे हुए अखबार पढ रहे थ । "आपका शुभ नाम?" एक न पूछा था। 'दस परवरी।" भुवन ने आशू ये निर्देशानुसार ही जवाब दिया। "इधर से आइये। लडका खड़ा हो गया और भुवन को कमरे के पिछले दरवाजे की तरफ ले गया। खिडकी म झाँच वर सन्तुष्ट होने पर उसने पिछले दरवाजे से भुवन को निकाल दिया और कहा, "मल्लीताल के 'रोजवड' रेस्तरां में मिलने वाले साथी आपका सही जगह पहुँचा देंगे।" उसने पूछना चाहा था कि यह 'रोजचड' विप्त जगह पर है और वहां मिलने वाले लोगो की पहचान कैसे होगी मगर तब तक दरवाजा बन्द हो चुका था। उसने सोचा कि वह मीटिंग अटैन्ड करने का मोह त्याग दे और वापस होटल में जार र कुछ पन-लिख ले तो फ्यादा बेहतर रहेगा, मगर फिर भी वह मल्लीताल की तरफ चल पडा। अचानर उमे लगा वि एव आदमी उसका पीछा कर रहा है। वह सतर्क हो गया। इस पोछा करते आदमी को किसी भी कीमत पर यह पता 60 समय एक शब्द भर नही है नही चलना चाहिए कि वह वहां जाना चाहता है-भुवन ने सोचा और टूरिस्ट होटल' म प्रवेश कर गया । होटल के टैरेस पर जाकर उसने देखा वि वह आदमी होटल पे सामने खडा हुआ सिगरेट पी रहा था और उसकी आँखें होटल के मेन गेट पर ही केन्द्रित थी। भुवन नीचे उतर आया और पीछे की तरफ से गली म निकल गया । यह गली बेहद संकरी और दुर्गन्ध- युक्न थी मगर यी बहुत लम्बी और वह वगर किसी की नज़र म पडे सीधा मल्लीताल के चौराहे पर पहुंच सकता था। केशार्यावस्था मे पढे हुए जेम्स बॉन्ड के उपन्यासो के क्यानर और दृश्य याद करता हुआ वह तेजी से आगे वढने लगा। उसने तय कर लिया कि चाहे जितनी भी मगज पच्ची करनी पडे वह मीटिग स्थल तव जरूर ही पहुँचेगा। लेक्नि उमे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पडी। अभी वह गली के मुहाने पर ही था जब उसने ठीक सामने दो मजिला रोज़बड' की लाल पत्यरी वाली इमारत को देख लिया। प्रसन्नता के आवेग में भरकर एक क्षण के लिए वह रुका मिगरेट सुलगायी और रेस्तरां म घुसता चला गया। अब? उसने सोचा। वह एक हॉल मे खडा था जिसके एक तरफ 'रिसेप्शन था और दूसरी तरफ ऊपर जाने के लिए सीढियां । हॉल के बीच म चारो तरफ कुसियां मजें लगी थी, वैरे इधर-उधर भागते फिर रहे थे और लोगो को चाय, कॉफी तथा अन्य चीजें सर्व कर रहे थे। वह कॉनर वानी एक मज़ पर चला गया और हॉल मे बैठे लोगो का मुआयना करने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि यहाँ उसे कौन और क्स मिलेगा? वह किसी को भी पहचानता नही है और आशू ने भी कुछ म्पष्ट नही किया है। हाट डू यू वान्ट सर? एक नौजवान वैरे ने उसके सामने खूबसूरत सा मीनू रख दिया। 'कॉफो। उसने वगैर मीनू दवे आदेश दिया और हॉल ये गेट की तरफ देखन लगा जहाँ म चार लड और एव लडकी अन्दर आ रहे थे। शायद, यही व लोग हैं उसन माचा और उनके पास जाने के लिए उठन लगा, लेकिन तभी उसन मोवा कि उन पांचो वे पीछे वही आदमी हाल म घुमा जिसे उसने अपना पीटा करत हुए दखा था। उसने तुरन्त समय एक शब्द भर नहीं है 61 अपनी नजरें सामने पडे मीनू पर केन्द्रित कर दी और ध्यान से मोनू पढने लगा। 'अरे" वह चौक गया। मीनू मे खाने-पीने की वीस वस्तुओ के बाद सबसे अन्त में इक्कीसवे नम्बर के सामने पेन्सिल से दस फरवरी' लिखा हुआ था । वह हैरान रह गया। उसने जेम्स बॉन्ड के उपन्यासों में भी इस तरह के इन्तजाम के बारे में नही पढ़ा था । इस इन्तजाम में जहां पूर्ण भुरक्षा थी, वही जोखिम भी कम नहीं था। अगर प्रत्येक मीनू पर ऐसा लिखा हुआ है तो आम आदमी के तो नही, मगर इन्ट लीजन्स ने किसी भी आदमी के सामने यह भीन पड जाने पर खतरा पैदा हो सकता है। खैर, उसने सोचा, उन्होंने इस खतरे के विरुद्ध भी कोई इन्तजाम जरूर पिया होगा। वंरा कॉफी ला रहा था। वह सतर्क हो गया। उसने देखा, गेट पर न पीछा करने वाला आदमी था, न ही वे पांवो लडके-लडकियाँ । वैरे के आते ही वह खडा हो गया। "कॉफी कन्सिल," वह बुदबुदाया, "आई वान्ट टेन फेबोअरी।" "पार्डन"वरे ने कहा। बरे से निर्विकार चेहरे को देखकर वह अचरचा गया । वही उससे गलती तो नहीं हो गयी है, भुवन ने सोचा। फिरपूरे आत्म-विश्वास के साथ भीनू के इसीसवें नम्बर पर उँगली टिका कर धीरे-धीरे वहा, "दस फरवरी।" "ओह," बैरे ने मीनू देखा और बोला, "इक्कीसवें नम्बर पर तो 'शैम्पेन' है । गलती से तारीख टाईप हो गयी है शायद । मैं दूसरा मीनू लाता हूँ। 'मुझे आशू ने भेजा है।" भुवन ने अन्तिम प्रयत्न किया। इस वाक्य का असर हुआ। वैरेन कॉफी की ट्रे उठायी और दायी तरफ के गलियारे को ओर चलता हुआ वोला, "मेरे पीछे आइय ।" भुवन उसको बगल में आ गया। वह खुश था कि उसन मोर्या जीत लिया है । वरे के साथ चलता हुआ वह सोच रहा या नि आशू ने इतने कठिन तरीके से मीटिंग में बुलाकर उसके धैर्य और उत्साह और ज्ञान को 62 समय एक शब्द भर नहीं है परीक्षा ली है क्या? "मैं रिशोर हूँ, किशोर यडयाल," वैरेने पहा, "मैंने पहले आपको कभी नहीं देखा।" "इस शहर के लिए मैं नया है," उसने जवाब दिया, "मेरा नाम भी विशोर है, भुवन विशोर ।" "आपसे मिलकर खुशी हुई ।" "मुझे शायद देर हो गयी है।" "मामूली-सी । बस पहुंच रहे हैं।" वैरे अर्यात किशोर ने कहा और एक छोटे-से स्टोर म्म मे प्रवश कर गया। वहां अंधेरा था। किशोर ने कही, कोई स्विच ऑन किया और स्टोर मे कमजोर रोशनी पसर गयी। शायद जीरो वाट का कोई उल्ब जला या । भुवन आश्चर्यचक्ति रह गया। क्या इसी मरे तक पहुँचने के लिए उसे एक लम्बा गलियारा, एक बड़ा कमरा और जीने चढने-उतरने पड़े थ । कमरे मे टूटे हुए दो सोफो, शराव की खाली बोतली और कॉफी के जग खाय डिब्बो के अलावा एक बहुत गदी-सी दरी पडी हुई थी। वह कुछ पूछता, इससे पहले ही किशोर ने कोने मे बनी एक अलमारी का दरवाजा खोला और उससे कहा, "नीचे उतर जाइये, मगर मभल कर, मीढियाँ लम्बी है और अंधेरा भी है। वह हिचवता हुआ अलमारी म घुसा ही था कि किशोर ने पीछे से दरवाजा बन्द कर दिया और कुछ ही क्षणो के बाद कमरे के 'दरवाजे के बन्द होने की आवाज भी आ गयी। एक संकेंड के लिए भुवन घबरा गया। कही वह फंस तो नहीं गया है, उसने सोचा और शक्ति होकर धीरे धीरे सभल-सभल कर सीढियां उतरने लगा। नीचे उतरते चले जाने के सिवा और कोई विकल्प भी तो नही था। स्वय को बाबू देवकीनदन खत्री के उपन्यासो का नायक समझते हुए वह तंग और अँधेरे जीने की रहस्यमयी सीढियां उतरता रहा जो सभवत सीधे पाताल में ही जा रही थी। आखिर, नीचे की तरफ उसे उजाले का आभास हुआ । कुछ ही देर बाद वह सबमे अन्तिम सीढी पर या। सीढी के सामने एक तंग-मा गलियाग था जिसमे उसे जाना था, क्योकि या तो वहां वह गलियारा था या फिर पर ले जाने वाती सीढियां । इम गलियारे के अन्त मे तीन-चार भूने शेर समय एक शब्द भर नहीं है 63 अगर सिर पटा घूम रहे हो तो उसे उन शेरो फे जग्डों में मना होगा क्यापि इमरे सिवा भी कोई विकल नहीं था। वह तेज कदमो में आगे बढ़ता रहा और अन्तत गलियारा भी समाप्त हो गया। अव यह एव वन्द दरवाजे के मामने था। उसन विना समय गंवाये दरवाजा नीन बार खटखटा दिया । युछ क्षणो की खामाशो के बाद भीतर से पूछा गया, "कौन?" "दम फरवरी।" उसने चीपकर जवाब दिया । उसका धैर्य चा गया था और वह बौखलाया हुआ था। दरवाजा खुलते ही तण रोशनी उसकी आँखो पर पड़ी और वह ठिठक गया। अंधेरे में डूबी उसकी आँखें एकाएक इतनी तेज रोशनी सहन न कर पाने के कारण बन्द हा गयी थी। उसने अनुभव किया कि दरवाजा खोलने वाले व्यक्ति ने उसे हाम परड वर अन्दर खीच लिया है और फिर से दरवाजा बन्द कर दिया है। यह एक बहुत बड़ा हॉल था जो तेज रोशनी से जगमग-जगमग कर रहा था। पूरे हॉल में दरी के ऊपर करीव सौ-सवा सौ लडके लडकियां चुप बैठे हुए थे और उन सामने एक लम्वा-चौडा लडका खडा हुआ था जिसके चेहरे पर घनी दाढी थी और जिसन जीन पी पैन्ट पर सफेद रग की टी-शर्ट डाली हुई थी। लड़के की आँखे एक विचित्र-सी आग को लिये चमक रही थी। शायद यही वह ममगाई है जिसके बारे म आशू ने उसे विस्तार से बताया था। वह अपनी अब तक की सारी झल्लाहट और बौखलाहट को दया कर दरी पर बैठ गया। निशब्द । सभवत हॉल में ममगाई का भाषण चल रहा था । जब हॉल की स्थिति पूर्ववत हो गयी तो ममगाई ने पहना शुरू किया, "पर्वत पुत्रो को सहन-शक्ति और शान्तिप्रियता को सरकार वहादुर कायरता समझ रही है और सरकारी दमनचक्र की प्रमश: तेज होती गति इस बात का प्रमाण है कि उसने हमे वापर और कमजोर समझ लिया है। पिछले वर्ष उत्तराखड की युवा शक्ति ने उत्तरायड ये शोषण और उत्पीडन के विरुद्ध एकजुट होकर जो प्रतिरोध किया उस प्रतिरोध को कुचलने का घृणित और क्रूर पड्यत्र आप सबने 'नैनीताल- 64 समय एक श द भर नहीं है काड' के रूप में देखा । पहाडी सम्पदा के लुटेरे और शोषक वडे-बडे धन्नासट जिन्हें एक तरफ सरकारी सरक्षण प्राप्त हैं और दूसरी तरफ आन्दोलन की सर्वोदयो वागडोर को खरीदे है आनी लूट-मार को व्यापक और तेज करते जा रहे हैं और यही वात पहाड की शान्तिप्रिय और अबोध जनता के लिए भयानक तबाही के सामान ला रही है। नौजवान ताक्त के लिए यह घटना दुखद और गभीर है । हमारे शान्त स्वभाव और छात्री के सामा उपस्थित परीक्षाओं को देखकर सरकार मौके का फायदा उठाना चाहती है और छात्रो की परीक्षाओ को छानो की मजबूरी समझ कर और भी अधिक अमानवीय और बूंखार हो उठी है। परीक्षाओं की तैया- रियो म जुटे छात्र-छात्राओ को उनके घरो से घसीट कर जिस प्रकार जेल के सीख ची के पीछे ढूंस दिया गया है उससे एक जबरदस्त तनाव का वाता- वरण पैदा हुआ है। सरकार का यह कदम नैनीताल काड की न्यायिक जाच की तेज मांग को दमन और पड्यत्र से खत्म करने का कदम है । अपने निर्दोप साथियो को रिहा करने के लिए हम पिछले दस दिनों से वरावर प्रशासन और सरकार से विनम्र अनुरोध करते आ रहे है और हमारा यह विनम्र अनुरोध लगातार वेरहमी से ठुकराया जा रहा है। अपने गिरफ्तार साथियो की रिहाई के समर्थन मे हलद्वानी के नौजवानो और जनता ने जो शान्तिपूर्ण जुलूस निकाला था उसे सरकार की दरिन्दी पुलिस ने निर्ममता से कुचल कर तानाशाह सरकार की जनतत्रीय नकाब को उतार फेंका है और यह साबित कर दिया है कि 'दूसरी आजादी' की अलम्बरदार यह सरकार जो आपातकाल के विरोध म बनी थी, यह भी तानाशाही-पसन्द ताकत है और आपातकाल इसके राज म भी कायम है, अघापित आपातवाल । हलद्वानी के जुलूस का वर्वर दमन उत्तराखड के आज तक के इतिहास का सबसे काला दिन है। इस काले दिन की याद तक थर्रा देने वाली है । इस जुलूस में मेरी सगी वहा भी थी जिसके साथ वीच जुलूम मे गोलियो की आवाजो के वीच बलात्कार किया गया, वीभत्स बलात्कार । पचासी लडकियो के कपड़े फाड दिये गये, संबडी लडकी के घुटने तोड दिये गये और सरकारी कर्मचारियो, वकीलो, दुकानदारो तथा राह चलते नागरिको को जिस वहशियाना तरीके से पीटा और घसीटा समय एक शद भर नहीं है 65 गया और अन्त मे तीन सौ सात लोगों को 'फर्स्ट एड' दिये विना गाजर- मूली की तरह एक ही ट्रक मे ठूस कर बरेली, टिहरी और नैनीताल की जेलो मे भेज दिया गया- यह सब सरकार वहादुर के नग दमन को क्रूर- तम अभिव्यक्ति है । क्रूरतम और घिनौनी । ये तमाम घटनाएँ सिद्ध करती है कि सरकार चाहे किसी की भी हो, जव तक धन्ना सेठो की तिजोरियाँ नेस्तनाबूद नहीं कर दी जातो तब तक दमन जारी रहेगा। हम सरकार वहादुर को यह बता देना चाहते है कि हम कायर नहीं है। लूट और आतम' का ये राज जब तक चलेगा तभी तक सघर्ष भी चलेगा। संघर्प शान्तिपूर्ण होगा लेकिन अब अगर कही सरकारी हिंसा हुई तो जवाब प्रातिकारी प्रतिहिंसा से दिया जायेगा। सरकारी पोज और मशीनगनी का भय सर्वोदयी चूहो को हो सकता है मेहनतकश जनता को नही, क्रातिकारी जनता को नहीं। सरकार के नगे दमन और धन्ना मेठो की खुली लूट की निन्दा भरते हुए हम चौबीस फरवरी को 'उत्तरा- बड बन्द' की घोपणा करते है । 'उत्तराखड बन्द' के समर्थन म हम परसो नैनीताल मे एक वडा जुलूस निकालेगे। यहां मौजूद सभी कार्यकता कुमाऊँ और गढवाल के चप्पे-चप्पे में जाकर 'सपूर्ण उत्तराखड बन्द की तैयारी करेंगे और नैनीताल के परसो वाले जुलूस का नेतृत्व यहाँ बैठे केवल पांच साथियों के कधो पर होगा और इस जुलूस मे मैं भी चलंगा।" जैसे हॉल मे बिजली गिर पडी हो । शोर मच गया। 'नहीं, नहीं की आवाज़ो से हॉल गूंजने लगा। भुवन हतप्रभ रह गया। सोचने-समझने की सारी शयित जैसे अपग हो गयी हो। यही है उत्तरायड का लोकप्रिय भूमिगत नेता, एच० सी० ममगाई, जिसकी गिरफ्तारी के लिए सरकारी अधिकारी घायल शेरनी की तरह व्यग्र और आक्रामक हैं । और यह जुलूस मे चलेगा? अचरज' घनघोर अचरज । भुवन विशोर की लेखकीय समझ उसका साथ छोड गयी। ऐसे कैसा होता है कि कुछ लोग डर-डर कर तमाम उम्र काट देते है ! नौकरी छूटने का डर, जेल का डर, पिटाई का डर, भूखे मरने का डर, प्रेम-भग का डर, मोह-मम वा डर और अन्त मे मर जाने का डर और फिर भी ये सारे डरे हुए लोग उन्ही हादसो का शिकार होते है जिनमे वे डरते हैं। दूसरी तरफ कुछ लोग हैं जो डर को 66 गमय एक शब्द भर नहीं है। इराये रखते हैं और पहली तरह वे ढेर मारे डरे हुए लोगों की मुक्ति के 1, तिए नघर्षरत रहते हैं। बेटा भुवन विशोर, महान विवादास्पद लेखक, तुम्हारी यह तर्व-शक्ति यहाँ चली गयी जिसमें बल पर तुम तमाम दिग्गजी के सामने यह सिद्ध करते हुए घूमा करते थे कि पूरी दुनिया का सघपं अन्तत औरत पे डेउ इची चमटे पर आकर स्थगित होता है ? ये जो पहाडी म इन दीवाने छोरो और गुस्सैल जनता के सघर्प मे तुम चार- धिन्नी वो हुए हो, इसमे पता है पौरन की वह अंधेरी गुफा जिसमें तुम्हारे तयारयिन साहित्य की जवानी बंद है ? कहां है तुम्हारे 'वाउट र पल्टं' का प्रतिनाय जो हर कोमलामी के तने हुए उरोजी के बीच अपने मुक्ति-प्रसगा वो व्याप्यायित-पायित करता है ? यहाँ तो जो नायर है उसके पीछे तुम्हारी व्यवस्था के वरखरीद पहरेदार नुकीले वल्लम लेकर भाग रहे हैं और जो यामलागी है उनके गुप्ताग में सगीन भोर देने का दानवी रिहर्सल चल रहा है। बेटा भुवन किशोर, अपने प्रशसव पाठयो- लेखका को बुलाओ और उसे कहो कि लडती हुई इस जनता के सामने आकर जरा लौडिया की बेवफाई, सैक्स की कुठा और शराब में डूबे हुए वदहवाम अफसाने पेश करें तो पता चले कि अकेलेपन और मृत्यु-दर्शन के मसीहा कुछ दम-खम रखते है। तुम्हारे ऐसे मसीहाओ की चिन्ता और मक्ट और तकलीफ को सुनकर यह लडती हुई जनता मार-मार कर चूतड न तोड दे तन कहा । जरा अपने अन्तर्मन मे पूछो कि तुमने जो अभी तक महान साहित्य रचा है उसका मकसद क्या है आपिर थुलथुल शरीर वाले नामर्द धनकुवेरी को जिस तरह 'नू फिल्म' मजा देती है, उसी तरह क्या तुम्हारा साहित्य भी पेट-भरे, ऊबे हुए नाकारा लोगो की वियत मानसिपल को तृप्त नहीं करता? अगर लूट का यह साम्राज्य पलट गया तो जगह-जगह लडती हुई यह जांबाज और गुस्सल जनता तुम और तुम्हारे भ्रप्ट साहित्य को भी नष्ट करने से बाज नहीं आयेगी। जनता का यह गुस्मा बहुत गहरा है और जैसे-जैमे यह और गहरा होता जायेगा वैम वैगे ही अपने विरुद्ध खडी-यनी हर चीज़-धर्म, समाज, मस्कृति, साहित्य और व्यवस्था के प्रति उसकी नफरत भी वढनी जायेगी और नफरत का यह हरहराता हुआ ज्यालामुखी जब पटेगा तो भयानक समय एवं शद भर नहीं है 67 विध्वस करेगा । नया मकान पुराने मकान को तोडपर ही बनाया जाता है, यह तुम जानने हो। अचानव भुवन विशोर चौंक पड़ा। आशू और ममगाई उसके सामने आपर बैठ गय थे। वह थोडा असहज हो उठा। "बहुत खुशी हुई आपसे मिलवर," ममगाई कह रहा था "दुख है कि मैंने आपकी किताबें नहीं पढी, लेकिन हलद्वानी वाड पर आपका लिखा हुआ रिपोर्ताज मैंन पहा है। बहुत फोर्स है आपकी क्लम में।" ममगाई ने तारीफ की और भुवन को लगा, वह मजार कर रहा है । वह आहिस्ता मे मुसकराया और बोला 'अच्छा है कि मेरे लेखक से आपका पहला परिचय रिपोर्ताज वाला है वरना तो प्रतिक्रियावादी साहित्य ही लिखा है आज तब।" उसके इस जुमले पर आशू मुसकराया और ममगाई ठठाकर हँस पडा। दर तब हँसते रहन ये वाद उमने गभीरता से कहा "अगर नीयत प्रति- त्रियावादी नहीं है तो जनता अपने साथ ले ही लेगी। हनीवते दिमागी कुहासे का जुद व खुद खत्म कर देती है।" "सो तो है ।" भुवन ने रहा और खड़े होते हुए ममगाई से हाथ मिला लिया। हाथ मिलाने के बाद ममगाई ने दरवाजा खोला और हवा बी तरह अदृश्य हो गया । भुवन ने देखा इस समय तक हॉल मे कुछ ही लोग बचे थे । वह भी आशू के साथ बाहर निकल आया। अबकी बार वे एक दूसरे रास्ते से जा रहे थे और भुवन इस तिलिस्म वो देख अचरज के मार मरा जा रहा था। जया चौधरी अपने कमरे में आराम कुर्सी पर पड़ी छत को देखे जा रही थी और मिस्टर चौधरी अपने कमरे मे वेचैनी के साथ चक्कर लगा रह थे । लगातार । उनकी समझ में नहीं आ रहा था विक्राति करने का जो जुनून उनकी बेटी के दिला दिमाग पर वेतरह छाया हुआ है वह दूर कैस होगा? नवेन्दु घोप में स्वराकर पराजित हो जाने के अपने अनुभव में वे जानते थ कि अगर आदमी के दिमाग में घुसे हुए जुनून की जविचार- 68 समय एक शब्द भर नहीं है धारा की जमीन में जुड़ी हैं तो उस जुनून का कोई निदान नहीं है। विचार मे जुडा आदमो प्रतिरोध न करे, यह समर ही नहीं है। और इमी असभव के परिणाम ने मिस्टर चौधरीको वैचन पर दिया था। अपनी स्वय की बेटी से हुए सवाद और सवादों के परिणामस्वरूप उनके साथ अपने द्वन्द्व- पूर्ण सम्बन्धो के सूत्रपात के सप्ट समेत ने मिस्टर चौधरी को आगात कर दिया था। 'फर्स्ट एड' वगेरह दिलावर मिस्टर चौधरी जया को चुपचाप घर ले आये थे और प्राइवेट डॉक्टर्स की सहायता लेते रहे थे। उन्होंने सोचा था कि पूर्ण स्वस्थ होने के वाद जया यो अपराध-वोध होगा और वह उनसे क्षमा मांग लेगी। मगर ऐसा नहीं हुआ था। जया ने अपने चेहरे को तान कर और शब्दो पर जोर देकर कहा था, "मुझे घर ले आने का वक्त निकल गया है पापा, और ऐसा करने से आपको कोई लाभ भी नहीं होगा क्योकि मुझे जब भी मौका मिलेगा, मैं यहां से चली जाऊँगी। आई० ए० एस० के बाद में किसी रोज किसी शहर की डी० एम० बनकर आपको सुख दूंगी, यह कल्पना ही घटिया है । समझ लीजिये कि मैं माँ के साथ ही मर गयी थी।" "मगर क्यो?" मिस्ट र चौधरी आहत हो गये थे। "क्योकि मैं आपके बदन पर चढी इस वर्दी से नफरत करती हूँ।" जया का स्वर इतना निर्द्वन्द और इतना ठडा था कि मिस्टर चौधरी वी रीढ की हड्डी मे एक सरसराहट-सी दौड गयी। "तुम " वे इतना ही कह सके और हांफने लगे। "हां, मैं," जया ने शान्त, गभीर और निरुद्वेग आवाज़ आपके मालिको से नफरत करती हूँ जिन्होंने यह वर्दी पहनाकर आपके विवेक को खरीद लिया है । आपके मालिक गोलियों से भून देने के काबिल है, क्योकि उन्होंने अपनी तिजोरियो की रक्षा के लिए मजबूर और नेकदिल इसानो को मवेदन-शून्य बनाकर उनके हाथो मे बन्दूक और मशीनगर्ने पक्डाकर और पुलिस की यह खाकी वर्दी पहना कर अपने ही बेटे-बेटियो और भाई-बहनो के खिलाफ खडा कर दिया है। मुझे क्षमा करें पापा, निहत्यो पर गोलियां दागने का आदेश देने वाले मालिको और उनके गुलाम कहा, समय एव श द भर नहीं है 69 एस० पो० चौधरी से नफरत करती हूं---अटूट और असीम नफरत।" थर-थर कांपते मिस्टर चौधरी ने अपनी बेटी जया के शब्दो को भ्रम मानना चाहा था, पर वह भ्रम नही भ्रम भग था। उनके अपने घर में इतने बड़े अपराध ने मुंह उठाया था और वे अपराधियो की धर पक्ड बाहर कर रहे थे। उनकी आँखो के सामने सात महीने पहले वाली जया घूम गयी जो मचलते हुए पूछ रही थी 'पापा प्लीज, बताइये न आपन नक्सलवादियों का देखा है ? मिस्टर चौधरी को लगा कि उन्होने नक्सलवादी को सिर्फ देखा था और मार दिया था मगर जया न तो नक्सलियो को जान लिया है। नक्सलवादियो को जान लेने की जया की यह समझ ही उनकी बेचैनी या मूल कारण थी। जया के बागी हो जाने की सम्पूर्ण जिम्मेदारी क्या स्वय उन्ही पर ही नहीं जाती है जो पिछले सात महीनो मे एस० पी० चौधरी बनकर ड्यूटी निभाते रहे बाप का क्त्तव्य ही भूल गये ? खासकर ऐसी लडकी के बाप का फड भूल गये जिसके सिर पर मां भी नहीं है। वर्दी पर झूलते सारे तमगो गो नकारते हुए सहमा ही एक भावुक याद मिस्टर चौधरी की चेतना मे चली आयी। उसकी पत्नी की माद । तब जया केवल छह वर्ष की थी जब विडनी ऑपरेशन के दौरान उनकी पत्नी का देहान्त हो गया था। पत्नी के मरते ही मिस्टर चौधरी के लह- लहाने मन पर जैसे पाला पड गया। वे अपनी पत्नी से बेपनाह मुबत करते थे। मां-बाप के विरोध को झेलकर उन्होंने कोर्ट-मैरिज की थी। सारे सरकारी दमन-चन्द्र के बीच से अचकचाकर कभी-कभी जो मानवीयता उनके दिमाग में हलचल मचा देती है उसका एक मात्र कारण उनका अपनी पत्नी ये माथ गुजरा आठ-वर्षीय समय ही है । उनकी पत्नी जब तब जीवित रही उनके सरकारी वारनामो से टकराती रही । अगर कोई भूखा दुकान मे डबल रोटी चुरा कर भाग जाय तो आप उम पक्डरर जेल में ठूस देंगे" वे कहा करती थी, "पिर नोइन लोगो को पांमी दीजिये जो भूख के जिम्मेदार हैं। हमारे शहर का एक एम० एल० ए० औरतो का व्यापारी है। वह जानसर वावर जैसे पिछड़े इलाके से मौ-सौ पये में लड़कियां खरीद कर लाता है और दिलचे 1 70 समय एक शब्द भर नहीं है वम्बई, कलकत्ता के बाजारो मे पच्चीस गुना अधिक दामो पर बेच देना है । उस एम० एल० ए० को बन्द कर सकते हैं आप?" 'यह मेरा काम नहीं है।' मिस्टर चौधरी सुरक्षा के कोने तलाश करने लगते थे। 'आपका क्या काम है, बताएँगे? हडताल कर रहे मजदूरो को लाठियों से पीटकर मार देना आपका काम है । छात्रो के जुलूस पर फापर वरवाना आपका काम है | पति की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराने आयी किसी गरीब औरत को थाने मे रेप कर देना आपरा काम है " 'लग्वेज प्लीज, माया । लैंग्वेज प्लीज़।' मिस्टर चौधरी अपना सिर थाम लेते थे और अपनी पत्नी की सरकार-विरोधी मानसिकता रो भय- भीत हो उठते थे। 'हैवानी हरवतो के संचालक को आइने से इतनी बौखलाहट क्यो" "अपने वर्ग से जुडो माया, अब तुम एक एस० पी० की बीवी हो, प्राइमरी स्कूल के अध्यापक की वेटी नही ।' मिस्टर चौधरी न चाहते हुए भी पैना वार करते। लेकिन उनकी पत्नी वार के पनेपन को भोथरा बनाते हुए पलट कर जवाब देतो, 'मैं अपन वर्ग से ही जुडी हूँ मगर तुम जरुर अपने वर्ग से अलग हो गये हो।' 'तुम्ह तो पार क्सिी रिवोल्यूशनरी का हाथ थामना चाहिए था। तुम मेरे पल्ले यो पड गयी?" रिवोल्यूशनरी तो रिवोल्यूशनरी होता ही है, उसका हाथ पकडने से क्या लाभ होता ? लाभ तो तुम्हारे साथ ही है, क्योकि एक दिन तुम्हे प्रातिकारियो के पक्ष में खडा करना है।' 'यह तो मुमकिन ही नहीं है, डालिग।' मिस्टर चौधरी ठठाकर हंस पडते। 'इस नामुमकिन को अगर मैं मुमकिन न बना सको तो मेरी बेटी बनायेगी, माया चौधरी अपना विश्वास से मजबूत हाथ बेटी के सिर पर फिराते हुए जवाब देती और सवाल वरती, "अच्छा मान लो, मैं न रहूँ और जया बडी होकर पातिवारी बन जाये तो तुम क्या करोगे ? क्या अपनी बेटी को भी गोली मार दोग?"
समय एक शब्द भर नहीं है ! 'क्या पागलपन की बातें करती हो? न तुम मरोगी और न ही हमारी बेटी अपने वार ने विरद्ध खडी होगी। तुम देखना माया, हमारी बेटी कम से कम डी० एम० तो बनेगी ही।' मिस्टर चौधरी कहते और मन मे कही दूर तव उरते चले जाते कि अगर माया या सपना सच हो गया तो वे क्या निर्णय लेंगे? आज माया नहीं है और जया उनके विरुद्ध खडी हो गयी है। ये वाप वनवर निर्णय ले या एस०पी० वनरर? मिस्टर चौधरी की चेतना में पायम उभरने लगे। ऐगे अनिर्णय की स्थिति में उन्हें अपनी पत्नी की याद बेतरह आयी और वे थके-धवेसे सोफे पर गिर पडे । अपने ऊपर उन्ह पाफी ऋोध जा रहा था । वक्त निवल जाने पे बाद व चिन्ता परने बैठे है। उन्ह ताज्जुब हुआ कि ये रान लापरवाह वैसे रहे कि एक बार भी जया रे कमरे म जापर नही दर सबै ति माामयादी माहित्य का इतना विशाल नडार वहां से पहुँच गया है और क्यो ? यह और है, कि पत्नी यी अकाल मौत का गम उन्हें तोड न दे, इस भय ने व शराय के बजाय पाम ये नशे में डूब गये, लेकिन गलती पर हो गयी वि इस नशे में डूबे रहबर वे यह भी भूल गये कि जया जपान होती जा रही है और बुद निर्णय ने सपने पी दिशा मे तेनी में पा रही है । गलती यही हो गयी और यरी हो गयी। मिस्टर चौधरी ने सोचा और दहात में अंधेर मे घिर गये। एक विस्फोट पी प्रतीक्षा करते रहने के अलावा अर धार भी क्या सपते है ? उन्होंने सोचा और फिर में उठार टहलने लगे। या एर मजप और आहन वाप की तरह वे जपावे पान जागर गिड. गिडायें अथवा एतानाशार अफसरपोतरह मार-मारकर उसरा सारा विद्रोह शाइ दें? लेविन सानाशाह अपमर वो नपेन्दु पोप ने पिनने दुपद और अपमााजनय गरो पराजिा पर दिया था, यवा इस बात यावे भूल जायेंग? तो उन्होंने पापर मोचा और पपी-थकी स्थिति में ही जमा पे पमरे में घुस गये। वे जया ने ही पूडेंगे विवे क्या करें? वे कौन- मी से है जिन्ह पूरा कर देने में जया वापम सौट आपेर समरे में पुसते ही उन दिमाग में आतिशबाजी छूटने लगी। जया वीपीठ पर सरसर टेंगा हुभा था और वह जा रही थी। मरमुच ।
72 समय एव शन्द भर नहीं है 'मना रही हूँ।" जया ने कहा और पिता को देखा। निस्टर चौधरी की चेतना सुन्न पड गयी। उन्होंने सहारे के लिए दीवार का पकर लिया । वे जया को रोकना चाहते थे, मगर अधिकारी में नाते नहीं। आखिर, जया पे जाने के बाद वे नौकरी क्यो करेंगे और किसके लिए? वे जया को सामने विठावर एक नेक वाप की तरह बहुत-बहुत बातें करना चाहते थे, मगर इतना ही वह सके, "इस देश में तुम्हारे य कदम एक थ्रिल से ज्यादा अहमियत नहीं रखते, बेटे । मरे हुए और थके हुए लोगों के इस मुत्क मे तुम्हारा रास्ता नारेवाजी से शुरू होकर जेल की काठरियो म समाप्त हो जायेगा। मेरी बात मान जाओ, ये मुर्दा लोग जाति नहीं कर सकते, ये सिर्फ भातिकारियो भी तबाही का तमाशा दख सक्त है।" मिस्टर चौधरी की आवाज कांपने लगी थी और जिन्दगी म पहली बार उनके चेहरे पर बुढापे की निर्वल और असहाय रेखाएँ खिच आयी थी। एक पल के लिए जया चौधरी डगमगा गयी, लेकिन सिर्फ एक पल के लिए। उसन पिता की आंखो म झापवर पहा, "अगर मैं कहूँ कि जनता का सून चूसन वालो की कतार में से आप बाहर निकल आयें पति पांच या सात या दस साल का सच न हो, मगर चालीस या पचास मा सो वरस बाद पा सच जरर है तय" मिस्टर चौधरी को नहीं सूझा कि वे क्या जवाव दें सों की तग दीवारो से टकराना उन्हे वभी नहीं आया। वे चुप पड गये, कोई भी जवान नहीं दे सके और उन्होन अपने मलीन चेहरे तया सिकुडती हुई आँखो की भनान, और डूबते हुए दिल के दर्द को एक साथ अनुभव करते हुए देखा कि जया उनके सामने मे निम्तत्ती हुई बाहर चली गयी। वे दराने ही रहे । केवल । असहाय, लाचार, वैवस । गेट पर पई जया ये अगरक्षको को वे में वह दें फायर । और जगरक्षर भी बिना आदश में साईहरवन परतावंगे? एम० पी० चौधरी के तनुपी में चिनचिनाट्ट होने लगी और उनसरी समय एक शब्द भर नहीं है 73 हथेलियां पसीज गयी। जिस क्षेत्र मे धारा एक सौ चवालिस लागू हो गयी थी उस क्षेत्र की सीमा-रेखा के सामने वे अपनी जीप मे खड़े हुए थे और मल्लीताल से आते उम विशाल जुलूस को देख रहे थे जिसने धारा एक मा चवालिस तोडकर प्रतिवन्धित क्षेत्र से गुजरते हुए डी० एम० की अदालत म पहुँचने की घोषणा, सम्चे गढवाल और कुमाऊँ के इलाको में, बडे-बडे पोस्टरी, परचो और समाचारो के माध्यम से प्रसारित की थी। यह जुलूस 'आतक तोडो दिवस' और चौवीस फरवरी को सपूर्ण उत्तराखट वन्द' के समर्थन म निकाला जा रहा था और इसमे गढवाल और कुमाऊं के सभी शहरो के नुमाइन्दै भाग लेने पहुंचे थे। पुलिस हेडक्वार्टर में एम० पी० चौधरी का सूचना मिली थी पि जुलूस म आन्दोलन के तीन-चार बुख्यात और फरार नेता तक शामिल होंगे। उन मुग्यात नेताओ का नाम सुनते ही एस० पी० चौधरी की छठी इन्द्रिय न एक खतरनात आशका को भाँप लिया था और वे महमा ही पसीने और उत्तेजना से लथपथ हो गये थे। प्रशासनिक स्तर पर वात चिन्ताजनक थी भी। यह हवा लगते ही कि जुलूस की अगुवाई कौन-कौन लोग कर रहे हैं, पुलिस हेडक्वार्टर में मौजूद तमाम पुलिस ऑफिसर्स के चेहरो का रंग उड गया था। बहुत देर तक डी० एस० पी० खन्ना का मुंह अचरज मे खुला रहा था । एस० एच० ओ० थपलियाल और इसपक्टर रामसिह विष्ट बौखलाकर खडे हो गये थे। दो सव-इसपस्टर वार-बार अपने हलर का थूर से तर करन लगे थे और हैड-क्वार्टर में मौजूद मभी छोटे-मोटे पुलिस अफसर और सिपाही अपने भीतर एक असभव आत की थरथराहट महसूस करन लगे थे। एस० पी० चौधरी ने इशारा किया और ड्राइवर उनकी जीप को जुलूस की दिशा में से चला। जीप चलने के बाद भी एस० पी० चौधरी गई हो रहे और लगातार नजदीक आते जुलूम यो गभीरता म तारते रहे । निकट पहुँचकर जीप रक गयी। पांजी क्वामद की तरह, ऐंठ पर आगे बढने अनुगामिन जुलूस को देखकर उनके दिमाग म तनमनी-सी दौडने लगी। जुलूस म मवसे आगे जनवादी क्ला-माहित्य मोर्चे की अध्यक्ष रजनी उनियाल हाय में छोटा-मा पोस्टर लिये खडी थी, जिन पर लाल 74 समय एक शब्द भर नहीं है रग से लिया था, 'पुलिस हमारी भाई है, उसरो नही लड़ाई है।' पन्तनगर के एक मजदूर-नेता की इकलौती लडपी रजनी उनियाल के नाम पिछले छह महीने से गिरफ्तारी वा वान्रट जारी था / जारी है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार खतरनाक नातिकारी। उसके ठीक बगल में पन्तनगर विश्व- विद्यालय छान सघ का महासचिव तारा दत्त बडोला सीना तान कर खडा था और हुटका (एक लहाडी तवला) वजा रहा था। वेपोफ । बेझिझक । डेढ साल से भूमिगत, वामपयो शाय-नेता । उन दोनो के पीछे किती महा- राजा की तरह अवड कर चलने वाले आदमी का नाम था-एच० सी० ममगाई। नरेन्द्रनगर फाड, अल्मोडा काड, टिहरी काड, नैनीताल याड और देहरादून गोलीकाड का अभियुक्त, देश के सबसे बडे और जालिम नक्सली लीडर का विश्वासपान साथी, दो सव इस्पेक्टसं और पांच सिपाहियों को शूट कर देने वाला, दो वार देहरादून और एक बार बरेली की जेल सफरार हो जाने वाला एच० सी० ममगाई पहाड का वच्चा- वच्चा जिसे जानता है। गढवाल और कुमाऊँ की हर जेल में जिसके गुम- नाम चहेते, सरकारी मुलाजिम, मौजूद हैं। जिसे रामनगर के यस-अड्डे पर गश्त लगाते दस सिपाहियों ने देखा, मगर गिरफ्तार करने के बजाय भागकर कोतवाली आ गये, सूचना देने । पहाडो मे एक कहावत है कि जो आदमी ममगाई यो नहीं जानता उसे पहाडी कहलाने का हक नहीं है। और उसी ममगाई के बगल में एस० पी० चौधरी ने अपनी बेटी जया चौधरी को देखा जिसके हाथ मे एक बडा-सा पोस्ट र ऊँचाई पर चमक रहा -"पर्वत-पुत्री को वायर समझने वाली सरकार, होश मे आओ! पहाड के लुटेरी, होश मे आओ।" पर्वत-पुत्रो का साथ देने वाली अपनी गैर-पर्वतीय लडकी की हरक्त एस०पी० चौधरी की समझ से परे थी। वे सिर्फ हैरान थे और परेशान थे कि ममगाई, रजनी उनियाल और तारादत्त वडोला वोकैसे गिरफ्तार करें? एम० पी० चौधरी को परेशानी और पुलिस-फोर्म के आतक मे निर- पेक्ष यह जुलूस हुडके की ताल पर लयवद्ध स्वर मे गाता हुआ लगातार आगे बढ़ रहा था- "आज हिमाल तुमन के धत्छ, जागो जागो ओ मेरा लाल . नी करि दी हाली हमरी निलामी नी यरि दो हाली हमरी था- .
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76 समय एव शब्द भर नहीं है अनुभव था जो अपने नपेपन, पुलैगन और धारयता के कारण उमेर सिर्फ आश्चर्यचक्ति किये हुए था, बलि भाव-विभोर भी किये हुए था। वह आशू ये मना करने के बावजूद यहां आया था। लद्वानी वाले काड ये बाद से पुलिस की दृष्टि उसके ऊपर भी पड गयी थी, मगर उसने परवाह नहीं की थी और आशू के सामने यह तर्क पेश किया था कि जब ममगाई और रजनी और वडाला जैसे खतरनाम लोग जुलूस मे जा रहे है तो वही क्यो सुरक्षा के कोने में खडा रहे? उसने आज तक नहीं जाना था कि पुलिस, मिलिटरी, जेल, फांसी, गोली और गुडा कातिलों की पनाह में सांस लेती इतनी विशाल और इतनी दूर और इतनी अजेय व्यवस्था को भी इस तरह सीना तान पर चुनौती दी जा सकती है। सगर्व और भयमुक्त । इतने अधिक भयमुक्त लोगो के निरन्तर सम्पर्क में रहन के कारण वह स्वय भी मुक्त हो रहा था । भय मे, गलाजत म, कुठा से निराश से, हताश मे, और मृत्यु से । यह उसकी पूर्ण मुक्ति का समय था। समय जो केवल शब्द नही, अर्थ था। मुक्ति का अर्थ प्रसारित करन वाला शब्द । समय । वह समय वे इस अयं के आगे नतमस्तक था आभारी था और गद्गद था। तभी उसे अपनी बांह पर एक क्साव महसूस हुआ। उसने पलट कर देखा और रोक्त-रोक्ते भी उसकी चीख निकल गयी। वह सगीता वैनर्जी थी। वह अवाक रह गया । उसने अपन सिर वो जोर से झटका दिया, जांध पर चिकोटी काटी, होठो को दांतो से कुचल दिया और दर्द से चीख पडा। सचमुच, वह सगीता बनर्जी ही थी। संगीता ने उसकी बांह को कसकर परड लिया था और उसे पीछे की तरफ घसीट रही थी। उसने प्रतिवाद करना चाहा, मगर नहीं कर सका । उसकी जवान ऐंठ चुकी थी, आंखें फट गयी थी और दिमाग सज्ञाशून्य हो गया था। उसका जिस्म पूर्णत और याय शिथिना गया था। वह उसी दशा में उसी दिशा की तरफ घिसटता चला गया जिस तरफ सगीता उमे घसीटे ले जा रही थी। वे जुलूस का बहुत-बहुत पीछे छोड आय थे। जुलूस को पीछे छोड़ने में उन्हें तकरीग्न पौन घटा लगा था और इस पौन घटे के दौरान दोनो - समय एव शब्द भर नहीं है 17 वे बीच एक भयानर चुप्पी अपना सिर पटकती रही थी। अब वे झील के अन्तिम छोर पर थे, मगर सगीता उस तर भी घसोटे चल रही थी और वह घिसट रहा था, जैसे नगरपालिका के कर्मचारियों ने विसी आवारा कुत्ते को गोली मार दी हो और नगरपालिका को गाडी में फिरने के लिए घिसटता हुआ जा रहा हो, मृत । आखिर सगीता ने उस एव पहाडी के एवात म ले जाकर पटक दिया और हाँपन लगी। पुरे आठ महीने से मैं तुम्हे पागलो की तरह ढूंढती फिर रही हूँ, सगीता न हाँफ हॉफ कर ही कहा 'कलकत्ता दिल्ली, लखनऊ, मरठ, आगरा, शिमला, दहरादून, मसूरी और अव नैनीताल । मैं हर शहर में तब-तब पहुँची जब जब तुन वह शहर छाड चुके होते थे।" सगीता अभी भी होफ रही थी। तेज सांसो से उसना उभरा हुआ वक्ष ऊपर-नीचे हो रहा था और उमदे गोर तथा भरे हुए गाल उत्तेजना और थवन और आवेश स रक्तिम हो उठे थे। वह सुनता रहा और देखता रहा । वह देखता रहा और सुनता रहा। उसके भीतर न जाने कब का, क्या-क्या उमड घुमड करता रहा । उसकी अवाक आँखो म रफ्त रफ्त लालिमा उभरने लगी। उसके होठ और हाथ और माये की नसे फडक्ने लगी । वह काफी देर तक सुनता रहा । केवल । उसने लगातार सुना और जाना कि उससे अलग होकर संगीता ने किस तरह रिएक्ट' होकर एक सोने के व्यापारी से शादी की और फिर भुवन की वैपनाह याद ने किस तरह उसको रातो को छीन लिया, किस तरह उसने सोने के व्यापारी अपने पति स तलाक लिया और किस तरह वह भुवन की खोज म सारा मुल्क' खूदती रही, किस तरह उसने भुवन की जानकारियां हासिल की, पमिकाआ के दफ्तरों की सीढियाँ उतरी- चढ़ी, फारसी की फब्तियाँ सुनी, नैनीताल पहुंची और किस तरह इस जुलूस म पूरे डेढ घटे से वह एक एक चेहरे पर अपना भुवन खोजती रही है , किस तरह भुवन दो छोडकर भाग जाने को ग्लानि ने उसकी आत्मा को एक पहरे, अन्धे दलदल म फेंक दिया है। उत्सने सब-कुछ सुना और जाना और दखा। अपनी कल्पना में उसन सगीता क गुजरे वक्त का दखा और चुपचाप उसका बोलना, बताना और 78 समय एक शब्द भर नहीं है तडपना देखता-सुनता रहा । उसके दिमाग म एक तीखा कोलाहल अपने फन पटक रहा था और इस कामाल से उमरे दिमाग को एक-एक नस चटखी जा रही थी। उता। अनीत, उसका दुख, उसकी भटकन, उसकी आवारगी, उसकी वरवादी, उसकी चाहते, उसको निराशाएं और उसके सपने-सव-कुछ अपने हाथ मे नुकीले बरछे उठाये उसको जगह-जगह से लहूलुहान कर रहे थे। लगातार । वह तकलीफ के इतने सामूहिक और घने और असहनीय दर्द को सहता हुआ नि स्पद पड़ा था। निस्पद और निविवार। "मैं मै तुम्हारे वगैर नहीं रह सक्ती, भुवन," सगीता रोने लगी, "तुम जैमे भी हो, जो भी हो, मुझे स्वीकार हो, प्लीज़ ।" सगीता ने अपना असुआया चेहरा उसरे कन्धे पर टिका दिया। उसने सगीता के बालो को पकडा, उसका चेहरा ऊपर उठाया और अपनी पूरी ताकत लगाव र उसके गाल पर रैपट मार दिया। एक, दो, तीन, चार, पांच, सात, दस । वह होश खो बैठा था और सगीता को पीटे जा रहा था। लगातार । सगीता पिटती रही। उसने प्रतिवाद नहीं किया। वह हंसने लगी। हँसते-हँसते ही वह वोली, "मैं तरस गयी थी भुवन, और मारो, मैं तुम्हारे स्पर्श के लिए पागल हो गयी थी, मारो मुझे सुख मिल रहा है।" सगीता ने हँसते-हँसते ही वहा और रोन लगी। वह रक गया । वह थप गया था। उसका विवेक लोट आया था और आवेश थक वर गिर पडा था। उसने सगीना वो धक्का देवर एक तरफ ठेल दिया और खद पहाडी पर बैठकर तेज आवाज मे हांफने लगा। "तुम क्यो मेरा पीछा कर रही हो? तुमने मेरी जिन्दगी को तबाह करने की सौगन्ध खायी हुई है क्या तुम मुझे मुक्त क्यो नही होने देनी' भुवन ने चीख कर और लगभग रोते हुए कहा, "मैं फिर से उस गुहाधवार मे नही जाना चारता जहाँ आहो और वराहो के विषधर बिलपिता रहे 7 "पर मैं तुममे अलग होकर जी नहीं पायी भरन, मुझे अपना लो।" मगीता दोहकर उस पास आ बैठी।
समय एव पद भर नहीं है 79 "नही, अब नहीं।" भुवन ने दृढता से वहा और उठ खडा हुआ। उमने एक भरपूर नजर सगीता पर डाली और धीरे स बोला, "वह समय और था जब मैं तुम्हे अपनाना चाहता था, स्वय को तुम्ह सौपना चाहता था और तुम मुझे अपनाते-अपनाते भी छोड गयी थी, यह समय और "समय एक शब्द भर है भुवन, सब-कुछ वैसा ही तो है इतनी जल्दी भला क्या वदलता है? यह तो सिर्फ एक गप' था जिसने हमारे प्रेम को नयी ऊँचाई दी है।" "नहीं, समय एक शब्द भर नहीं है," भुवन ने मुंह घुमा लिया, और न ही यह एक 'गैप' भर था। तुम्ह नहीं पता, इस बीच सव-बुध बदल गया है। सोचने, रहने और जीने या तरीका वदल गया है इस बीच और इस वीच मैं ऐसी जगह जा पहुंचा है,जहां से वापस लौटने की कल्पना तक मुझे मुर्दा घर देगी । मै मुर्दा नही होना चाहता, संगीता डालिंग। तुम जाओ, मैं वापस उस अंधेरी, नाकारा और उपाऊ दुनिया में नहीं लौट सगा। मुझे पाने के लिए तुम्ह थोडा पहले आना चाहिए था।" 'क्यो ? क्या अब तुम किसी और को पाना चाहते हो" सगीता के भीतर नारी-जनित ई- न अचानक सिर उठा लिया। ' मैं अब इस 'पाने' और 'खोने' की दलदल को पीछे छोड़ आया "तो" 'तो कुछ नही," भुवन ने तडप कर जवाब दिया, 'मुझे जान दो, एक नयी दुनिया मेरे सामो पड़ी है।" "मगर मैं क्या कर "सगीता तडप उठी। "तुम इस नयी दुनिया का अर्थ समझने की कोशिश करो और जव समझ लो तो मुझसे मिलने वही आना जहां जया है रजनी है आशू है, ममगाई है पुलिस है, जेल है, गोली है, मौत है मगर भय नहीं है, गाजत नहीं है । जहाँ देवल अर्थ है । जहाँ समय एक शब्द भर नहीं है।" भुवन ने गभीरता से रहा और सगीता पा कन्धा थपथपावर बोला, "तुम्हारे प्रति कोई नफरत मेरे मन में नहीं है। मैं आज भी तुम्ह उसी दिन से
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समय एक शब्द भर नहीं है
पार करता हूँ। प्यार को उसी गर्माहट और गहराई को मैं सम्हाले
रहूँगा और तुम्हारा इन्तजार करूँगा। तुम आना...तुम जरूर आना।"
भुवन ने सगीता का कन्धा दवाया और इससे पहले कि कोई भावुक याद
उसे धराशायी करती वह सगीता को छोडकर भाग लिया।
"मैं ज़रूर आऊँगी।"सगीता चीखी और फूट-फूट कर रो पड़ी।
तभी धौय-धाय की तेज आवाज़ो से पहाड हिलने लगा। शायद,
जुलूस पर गोली चली थी।
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Road
धीरेन्द्र अस्थाना
जन्म . सन् 1956 के दिसम्बर महीने की 25 तारीख
25 दिसम्बर 1975 को अपनी पहली बहुचर्चित
और विवादास्पद कहानी 'लोगहाशिए पर'
(प्रकाशन अप्रेल 1976) से लेकर दिसम्बर 1981
तक के इस छह वर्षीय समय मे कुल जमा सनह
कहानिया और एक उपन्यास लिखकर हिन्दी साहित्य
मे अपना एक विशिष्ट और उल्लेखनीय स्थान बना
लेने वाले युवा हस्ताक्षर धीरेन्द्र अस्थाना की इससे
पहली तीन पुस्तकें है 'लोग/हाशिए पर' (कहानी
सग्रह), 'आदमीखोर' (लघु उपन्यास व अन्य
कहानिया), तथा 'कथाखण्ड एक' (सम्पादित कहानी
सकलन)।
सम्प्रति : राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. दिल्ली में
कार्यरत ।
पता: 82, सफदरजग हॉस्पिटल पवाटंसं, राजनगर
नयी दिल्ली-110029