Sanmati Library, Jaipur
Purushottam Mas Mahatmaya
Front matter
4 به د محمد" گهد های ابعاد معه معما حد به نام خ= همیشه سیم میدهد ایمیج۔ يه مريم افلام لواط 17 مهم مره مریم - 5 - 3 \ و } لم م ه م م م له ت و به در انه تم تو ہر لے ہے بجده اداره یا نه جمله مهما معهد عماد مه *** بالله " . - تماس با ما :: ج لی و مد ط - 19 هده 2. لهمم اد 1 مه دو دا ، تا به تمام في ا % 5.6 ** ** 5 * 11315 * * ، 4 لي مقعد مامان حامد هم عبدالصمدوممد ممتصدعععمععههم وعدم معه مهنده هههههههههعععهميعهمیدمعجميهعمها یه عموعد مع ع م م به همه لهجهمعععه بعلی ܟ معه مهم توجه به جا لا } 1 عبع مل أطعه
No text on this page.
दोहा-गौर गिरा गणराज श्री, हारी हर ब्रह्म मनाय ॥ श्रीपुरुषोत्तममासकी, भाषा लिखत बनाय ॥१॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीमद लम्बोदर ईशाननन्दन आनन्दके बढानेवाले आप विघ्नरूपी वल्लोके नाश करनेको कुठार हो अशुभ दूर करते हो मैं आपकी शरणको प्राप्त होताहूँ ॥ १ ॥ मैं सद्गुरुके चरणकमलको प्राप्त होताहूं जिनकी कालेशसे आनन्दित हो सज्जन प्रपंचरूपी सागरके पार होजाते हैं ॥ २॥ किसी समय तीर्थयात्राके उद्देशसे परमधार्मिक पुराणके जाननेवाले व्यास जीके शिष्य धर्म अर्थ काम मोक्षकी विद्यामें चतुर श्रीगणेशाय नमः॥ श्रीसरस्वत्यै नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ श्रीमलंबोदरेशाननंदनानंदवर्द्धन ॥ विनवल्ली- कुठारेश त्वां प्रपद्ये महाशुभम् ॥१॥ वंदे सद्गुरुपादाज यत्कृपालेशनंदिताः ॥ जायते सज्जनाः सद्यः प्रपंचार्णवपारगाः॥२॥ कदाचित्पर्यटैस्तीर्थयात्रामुदिश्य धार्मिकः ॥ सूतः पौराणिको व्यासशिष्यो धर्मार्थकोविदः ॥ ३॥ बहुतीर्थीम्भसि स्नात समगानेमिषालयम् । तत्रापश्यद्विजगणेवेष्टितं शौनकं प्रभुम् ॥ ४ ॥ मूर्तिमद्भिरिवादित्यर्वेदवेदांगपारगैः ॥ दिगंबरर्मुक्तः केशेरं बुवाताशनरपि ॥ ५॥ निराहारेनिष्कपटैस्तपसा दग्धकिल्बिषैः॥ आब्रह्मस्पृहणीयः सच्छ्रद्धापूतांतरात्मभिः ।। ६ ।। आस्तिक्येब्रह्मसंदोहचिंतानिस्तीर्णहायनः ॥ परिशंकितमार्तण्डैः शापानुग्रहकारकैः ॥ ७ ॥ बढचैः सामगैर्दिव्यैर्यजुषां गण, पाठकः॥ आथर्वणैरुग्रतेजः सर्वलोकनमस्कृतैः॥८॥ सूतजी ॥ ३॥ अनेक तीथोंमें स्नान करके नैमिषारण्यमें आये; वहां ब्राह्मणोंके सहित कुलपति शौनकजीको देखा ॥ ४ ॥ सूर्यकी समान प्रकाश- मान वेदवेदांगके पारगामी दिगम्बर खुले केश जल और पवनके आहारवाले ॥५॥ निराहार रहनेवाले कपटसे रहित तपसे क्षीणपाप ब्रह्मपर्यन्त श्रेष्ठ श्रद्धासे पवित्र आत्मावाले ॥६॥ आस्तिक्य ब्रह्मज्ञानके पात्र चिन्तासे राहत सूर्यके शंकित करनेवाले शापानुग्रह करनेमें समर्थ ॥ ७ ॥ बहुत ऋचा अर्थात् ऋग्वेदके जाननेवाले साम गानेवाले दिव्य यजुर्वेदी गणाके पवित्र करनेवाले अथर्वज्ञाता उग्र तेजस्वी सब लोकोंसे नमस्कृत ॥ ८ ॥ JAIPUR ना.दी PORORAawer बहुत कचाओंके जाननेवाले वृद्धमम्मत भार्गवकुन्ोत्पन्न देवताभोंमें इनकी ममान ॥ १ ॥ इनको मनेही उन्होंने मन्य और जियवान पवित्र पिको प्रणाम किया और प्रीतिमे हाथ जोडे, वह सुन्दर लोचन मुन्दर वचन कहने वाले थे। ॥ इन बापी लामीमे विगजमान महातेजबीने उनको देख इस प्रकारको प्रमत्रता पात की जिन प्रकार मतकारी प्राण आजाते हैं 117 और हमे गहर कण्ठ हो मुनाभने उन माजीने कहा; हे महाभाग मृत ! आओ, तुम बडे नायरान हो ॥ १२ ॥ तुम अन्यनशुनील हो जो मेरे नेत्रगोनर साहो ॥ १३ ॥ तुम निमारतक बदचं भार्गवमुनि शौनकं वृद्धसंमतम् ॥ शिष्यरुपेतं श्रीमद्भिगीर्वाणोरव वामयम् ॥ २ ॥ दृष्ट्वाश ननामेनं मृतो वि- नयवाञ्छाचिः ॥ प्रयतः प्रांजलिः प्रहः शिववार शुभलोननः || १० || तमालोक्य महानेजा बाबा लक्ष्म्या विरा- जितः ॥ स जातोऽतीव हष्टात्मा प्राणान्प्राप्य यथा तनुः ॥ 1 ॥ हपगदया वाना तमुवान मुनापरः ॥ एहि सूत महाभाग भाग्यवानासि सांप्रतम् ॥ १२॥ अत्यंतशुभशीलम्वं यन्में दृष्टोऽम्ति वे भवान् ॥३॥ चिरंजीव चिरं पाहि गृणतो नः शुभानन ॥ तिष्ठस्वोचासने शुभ्रे महत्ते धूतपापक ॥ १२ ॥ श्लाघनीयोऽमि पूज्योडास व्यासशिप्य- शिरोमणे ॥ कथयस्व कथामेकां पृच्छामि त्वा गरिप्रियाम् ॥ १५ ॥ चितितां चिरकालं में हृदये परिवर्तिनि । नास्ति त्वत्सदृशो भूमो संदेहतिमिरापरः ॥ १६॥ एवं पृष्टः शोनकन मृतभातुर्यभूषणः ॥ प्रत्युवाच प्रसवात्मा विनयानतकन्धरः ॥ १७॥ जीओ हमको मंसारसागरमे पार करो, आप उंचे आसनपर बैठिये यह हम आपके लिये प्रदान करते हैं ।। 12 | आर प्रमाणे योग्य व्यांगशिष्य सबके शिरोमणि हो में तुममे एक कथा पूछताई सो आप कहिये यह नागयणमम्पनी क्या हैं ॥ १५ ॥ यह बहुत बारमे दिवारी दुई मेरे हृदय वर्तमान है आपके समान कोई अन्धकारका दूर करने वाला नहीं है ॥ १६॥ जय तुगईके भूषण मृतजीमे इस प्रकार पृडागात वह पनन हो ܐ
4
विनयसे शिर झुका कहने लगे ॥१७॥ सूतजी बोले-शौनकजी ! सुनिये जिस कारण मैं यहां आयाहूं; हे करुणानिधे ! आपहीके दर्शनकी अभिलाषा
थी ॥१८॥ हे स्वामिन् ! प्रथम मैं पुष्करतीर्थको गयाथा वहां स्नान कर देवता पितरोंको तृप्त कर ॥१९॥ फिर पापनाशिनी यमुनाके तटपर गया।
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! वहाँसे पुष्कल तीर्थको गया ॥ २० ॥ फिर गंगामें स्नान कर काशी गया वणिा कृष्णवेणी गण्डकी पुलहाश्रम ॥२३॥ धेनुमती रेवती
सरस्वतीके तटमें तीन रात रहकर हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! फिर मैं गोदावरीको गया ॥ २२ ॥ सीता अलकनंदा यवटोदा कृतमाला कावेरी निर्विध्या ताम्र-
सूत उवाच ॥ शृणु विप्रेश वक्ष्याम यतोऽहमागतः प्रभो ॥ त्वदीयदर्शनालादपूरितः करुणानिधे ॥ १८॥ आदावई
गतः स्वामिस्तीर्थं पुष्करसंज्ञितम् ॥ स्नात्वाचम्य च संतर्य सुरानृषिगणान्पितॄन् ॥ १९॥ ततः प्रयातो यमुना-
मापगां पापनाशिनीम् ॥ तस्यानु वै गतस्तीथं पुष्कलं भो द्विजेश्वर ॥२०॥ सुरनद्यामनुस्नातस्ततः काशीमुपागतः॥
वीणायां कृष्णवेणायां गण्डक्यां पुलहाश्रमे ॥२१॥ धेनुमत्यां तु खेत्यां ततः सरस्वतिटे॥ त्रिरात्रमुपितो ब्रह्मस्ततो
गोदावरी गतः ॥ २२॥ सीतामलकनंदां वा यवटादामथो नदीम् ॥ कृतमालां च कावेरी निर्विध्यां ताम्रपर्णिकाम् ॥
॥ २३ ॥ तापी वैहायसी नदां नर्मदा पापमोचनीम् ॥ पयोष्णी सुरतां शुभ्रामधःशोणानदद्वयम् ॥ २४ ॥ भद्रा
दृषद्वतीं विप्र तापसैरुपसेविताम् ॥ पापसंघानाशयित्वा ततश्चमण्वती नदीम् ॥ २५ ॥ ततःप्रयातः प्रयतः कल्याणी
जगदंबिकाम् ॥ सर्वाभयकरी देवी संसारभयनाशिनीम् ॥२६॥
पर्णिका ॥ २३ ॥ तापी वैहायसी नंदा पापमोचनी नर्मदा पयोष्णी सुरता शुभा अधः दोनों शोणभद्र नद ॥ २४ ॥ हे विप्र ! भद्रा दृपद्धती जो तप-
स्वियोंसे सेवित रहती है इस प्रकार उसमें स्नान कर पापरहित हो चर्मण्वती नदीके तटपर आया ॥ २५ ॥ फिर वहांसे नियमित हो कल्याणी जग-
दम्बाके दर्शनको गया जो देवी सम्पूर्ण भय और संसारभय नाश करनेवाली है ॥ २६ ॥
अ.१
जगद्धात्री महामाया सुरेश्वरीको नमस्कार करके फिर सिद्धक्षेत्रमें आनकर प्राप्त हुआहूँ ॥ २७ ॥ हे श्रेष्ठ ! इनके सिवाय और भी सिद्ध क्षेत्रोंमें
गया फिर कुरुजांगल देशोंमें गया जहां भगवान् प्रभु ॥२८॥ व्यासपुत्र महातेजस्वी शुकदेवजी ब्रह्मरूप पापरहित प्राप्त हुए थे ॥ २९ ॥ जहां
श्रीकृष्णके ध्यानमें मन लगाये सबके उपकारी राजोंमें शिरोमणि राजा परीक्षित् जन्ममरणकी निवृत्तिके निमित्त ॥ ३०॥ वह महाबाहु राजा
विरक्त होकर देहादि सम्पूर्ण वस्तुओंको मलकी समान मानता हुआ स्थित था ॥३१ ॥ वहां अपनी इच्छासे घूमते हुए उसके अनुग्रह करनेको आये
नमस्कृत्य जगद्धात्री महामायां सुरेश्वरीम् ॥ सिद्धक्षेत्रं सदा रम्यं प्राप्तवान्भुवि संस्तुतम् ॥ २७ ॥ एतेष्वन्येषु. तीर्थेषु..
व्रजन्नागतवान्विभो ॥ कुरुजांगलकं देशं यत्रागाद्भगवान्प्रभुः ॥ २८॥ व्यासपुत्रो महातेजाः शुकदेवः प्रतापवान् ॥
ब्रह्मभूतो मुनिवरः श्रीमान्विगतकल्मषः ॥ २९ ॥ श्रीकृष्णपदविन्यस्तमना भूतोपकारकः ॥ जन्ममृत्युनिवृत्त्यर्थं
राजा क्षत्राशरोमाणिः ॥३०॥ विरक्तस्य महाबाहोर्विष्णुरातस्य भूपतेः ॥ देहादि सकलं वस्तु मलभूतं तु यन्मते ॥
.॥ ३१ ॥ यदृच्छयागतस्तत्र तस्यानुग्रहकारणे॥ श्रुत्वा तमागतं दिव्यं मुनिभिः परिवारितम् ॥ ३२॥ गतोऽहमपि
तत्रैव संस्थितस्तदनुग्रहात् ॥ श्रुत्वा विष्णुकथास्तत्र भवसागरमोचनीः॥ ३३ ॥ चित्तं कृत्वा मनोधीर ऐहिकामु-
मिकां गतिम् ॥ निराकृत्य हरेः स्थानमंजसैव प्रपद्यते ॥ ३४ ॥ तत्रानेकाः कथाः श्रुत्वा ब्रह्मरातप्रसादतः ॥ गते
परीक्षित स्थानमनावर्तनमुत्तमम् ॥३५॥
उन दिव्य महात्माओंको मुनियोंसे युक्त आया जान ॥३२॥ मैंभी वहां गया और उसके अनुग्रहसे स्थित हुआ वहां भवसागरसे छुडानेवाली विष्णुकी
कथा सुनी ॥ ३३ ॥ जो मनुष्य एकान्त मनसे धीरतायुक्त कथा सुनते हैं उनको उपयलोककी प्राप्ति होती है और पापरहित हो वह नारायणके
स्थानको प्राप्त होते हैं ॥३४॥ वहांशुकदेवजीके प्रसादसे अनेक कथाओंको श्रवण कर परीक्षितके पुनरागमनरहित स्थानके प्राप्त होनेपर ॥ ३५॥
॥ २॥
किं जहां जाकर कोई शोच नहीं रहता मनीषी जिसकी अभिलाषा करते हैं वहां राजा गया; नारायणकी कथा सुननेमे यह गति हुई इसमें कुछ चित्र
नहीं है ऐसा जानकर ॥ ३६ ॥ कि, एकही बार जिनका स्मरण करनेसे पातकोंके समूह नष्ट होजाते हैं जिससे फिर मनुष्यका जन्म नहीं होसकता
है ॥ ३७ ॥ फिर इस साधुसम्मत परीक्षितकी मुक्ति क्यों न होती है, हे ब्राह्मणो ! ऐसा विचारकर मैं आपके समीप ॥ ३८॥ यहां आनकर
प्राप्त हुआ हूं कि आप यहां यज्ञ कररहे हैं आपको देखकर प्रसन्न हुआ हूं अब मैं आपसे यह जाननेकी इच्छा करता हूं कि आपका क्या निश्चय
यत्र गत्वा न शोचंति स्पृहयति मनाषिणः ॥ नैतच्चित्रं गति ज्ञात्वा हरिलीलाश्रुतेः किल ॥ ३६॥ सकृयन्नाम
संस्मृत्य यावत्पातकसंततिम् ॥ दग्धुं शक्तो भवेत्का जन्मनापिन शक्यते ॥ ३७॥ तत्कथं मुच्यते नायं परीक्षि-
साधुसंमतः ॥ इति संचितयन् विप्राः सन्निधिं भवतामहम् ॥ ३८ ॥ प्राप्तवान्सत्रिणो ज्ञात्वा भवतः कलितो
भवात् ॥ तदनुज्ञामथेच्छामि यत्कर्तास्यद्य निश्चितम् ॥ ३९ ॥ धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि यन्मां स्मरथ सत्तमाः॥
स्वल्पभाग्यतरं मूढं सर्वथा ज्ञानजल्पकम् ॥ ४० ॥ जातं च प्रतिलोमेन मूर्ख पंडितमानिनम् ॥ एवं चोक्त्वा
ततो धीमान्वेदवेदांगपारगम् ॥४१॥ शौनकं प्रत्युवाचेदं प्रहसश्लक्ष्णया गिरा ॥ साधु पृष्टं महाभाग निष्पापोऽस्ति
भवान किल-॥ ४२ ॥ त्वत्समो नास्ति लोकेषु वेदव्यासगृहालयम् ॥ प्रश्नमेनं वदस्वाद्य यन्मे हदि चिरं स्थिरम् ॥४३॥
है ॥ ३९ ॥ हे श्रेष्ठ ! जो आप मुझे स्मरण करते हैं इस कारण मैं धन्य और अनुगृहीत हूं मैं स्वल्गभाग्ययुक्त मूढ और वृथा ज्ञानजल्पक
हूं ॥ ४०॥ प्रतिलोमसे उत्पन्न मूर्ख और वृथा पंडितमानी हूं परम आप यह जानकर वह बुद्धिमान् वेदवेदांगके पारगामी ॥४१॥ शौनकजीमे हँसते
हुए मनोहर वाणीसे बोले; हे महाभाग ! आपने अली बात पूछी है आप पापरहित हो ॥ ४२॥ आपकी समान लोकमें कोई नहीं है आप
वेदव्यासके गृहरूप हो सो आप मेरा प्रश्न कहिये जो चिरकालसे मेरे हृदयमें स्थित है ॥ ४३ ॥
भा. टी. अ. A हे ब्रह्मन् ! तुम्हारे सिवाय संदेहरूपी रोगकी औषधी नहीं है चैत्राादि महीनोंके ईश्वरादि देवता हैं ॥ ४४ ॥ परन्तु यह तो आप कहिये कि, अधि- मासका स्वामी कौन है पूज्य और मानका देनेवाला कौन है उसमें क्या व्रत दान और भोजन करना चाहिये ॥ ४५ ॥ उसमें जप दान उपवास और साधन क्या है सो कहिये किस कत्यसे देवता प्रसन्न होते और क्या फल देते हैं ॥ ४६ ॥ हे सूत ! औरती आप विधान कहिये; कारण कि व्यासजीके आप शिष्य हा जो मनुष्य पृथ्वीमें परभाग्यानुवर्ती उत्पन्न होते हैं ॥ ४७ ॥ नित्य दरिद्रसे पीडित रोमी पुत्रोंकी न कश्चित्त्वहते विद्वन् संदेहामयभेजषम् ॥ सात मध्वादयो मासाः सेश्वरास्ते श्रुता मयां ॥ ४४ ॥ आधिमासस्य कः स्वामी पूज्यमानश्च कस्तदा ॥ तस्मिन किंस्वित्प्रकर्त्तव्यं व्रतदानादि भोजनम् ॥४५॥ जपदानोपवासादि साधनं किंतु भण्यताम् ॥ तुष्येत्कृतेन को देवः किं फलं वा प्रयच्छति ॥ ४६॥ अन्यच्च बहिनःसूत व्यासशिष्योऽस्ति वै भवान् ।। 'नरा ये भुवि जायते परभाग्यानुवर्तिनः॥४७॥ दारिद्रयपीडिता नित्यं रोगिणः पुत्रकांक्षिणः ॥ जडा मूका दांभि- काश्च हीनविद्याः कुचेष्टिनः॥४८॥नास्तिका लंपटा रौद्रा जर्जराः परसेविनः ॥ नटाशा भनसंकल्पाः क्षीणकृत्याः कुरूपिणः॥ ४९ ॥ निःश्वासाश्चोपमायत्ताः सततं दुःखभागिनः ॥ इष्टपुत्रकलबादिपितृमातृवियोगिनः ॥ ५० ॥ शोकदुःखातिशुष्कांगाः स्वेष्टवस्तुविवर्जिताः॥ पुनर्नवविधास्ते स्युर्यत्कृतेन श्रुतेन च ॥५॥नारीणामपि भो सूत दृष्ट्वा दुःखान्यनेकशः ॥ वैधव्यवांध्यदौर्भाग्यहीनांगत्वाद्दुराधयः ॥५२॥ इच्छा करनेवाले जड मूक पाखण्डी, हीनविद्या कुचेष्टावाले ॥ ४८ ॥ नास्तिक लम्पट रौद्र जरायसित परसेवी नष्ट आशावाले अनसंकल्प क्षीणकृत्य कुरूपी ॥ ४९ ॥ निःश्वास लेनेवाले उपमामें तत्सर निरंतर दुःखलागी पुत्र कलत्र मित्रादि इष्ट जन और माता पिताके वियोगी ॥५०॥ शोक दुःखसे शुष्क अंगवाले अपनी इष्टवस्तुसे रहित इस प्रकारके वह किसी कृत्य वा शास्त्रके सुननेसे नहीं सो कहिये ॥५१ ॥हे सूत ! इसी प्रकार स्त्रियोंके अनेक ॥३ ' N
4.
दुःख देखकर विधवा वंध्या दुर्भाग्ययुक्त हीनांग महारोगिणी ॥५२॥ दुःखसे पीडित सर्वांगवाली महादुःखसे युक्त हैं सो आप शीघतासे इनके दुःख दूर
होने के उपाय कहो जिससे मैं प्रसन्न हूं ॥५३॥ हे प्रिय ! आप सर्वज्ञ और सब शास्त्रोंके निधान हो। सूतपुत्र यह वचन सुन बहुत प्रसन्न हुए ॥५४॥
और शंख चक्र गदाधारी हृषीकेशको स्मरण करते हुए बोले ॥ ५५ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे । पुरुषोत्तममाहात्म्ये ऋषिसूतसंवादो नाम
प्रथमोऽध्यायः ॥ ३ ॥ सूतजी बोले-हे द्विजराजशिरोमणे ! आप एकाग्रचित्त होकर सुनो । एक समय ज्येष्ठ पाण्डव- युधिष्ठिरने श्रीकृष्णसे
दुःखपीडितसांगा वीक्ष्य दुःखान्विताः प्रभो ॥ तहि त्वं हि मामांशु येन प्रीतोऽभवं पुनः ॥५३॥ सर्वज्ञःसर्वशास्त्राणां
निधानं त्वमसि प्रिय ।। सूतपुत्रस्त्विमां वाचं श्रुत्वा सहृष्टमानसः ॥५४॥ प्रत्युवाच हृषीकेशं स्मरशंखगदाधरम् ॥५५॥
इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये ऋषिसूतसंवादो नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १ ॥ सूत उवाच ॥ शृणुष्वैकाग्रचित्तस्त्वं
द्विजराजशिरोमणे ॥ श्रीकृष्णं पांडुतनयो ज्येष्ठः पप्रच्छ धर्मवित् ॥ ३॥ धार्मिकः सत्यसंधो यः कुंतीहृदयतोपकः ॥
यदा द्यूतजितः पार्थः केशितो धृतराष्ट्र जैः ॥२॥ कोपेन वेणी संगृह्य कृष्णा दुःशासनेन वै ॥ आकृष्टा तत्र वासांसि
श्रीकृष्णेनैव रक्षिता ॥ ३ ॥ युधिष्ठिरः स्वदेशं च त्यक्त्वा कामवनं गतः ॥ ज्ञातवृत्तांत आगत्य वासुदेवः
प्रतापवान् ॥ ४॥ यादवरावृतः श्रीमान् सात्यकिप्रमुखैर्वृतः ॥ दृष्ट्वा तानुरुतापान्वै रौरवाजिनवाससः ॥५॥
पूछाथा ॥ १ ॥ धार्मिक सत्यसंध कुंतीके हृदयको संतोष करनेवाले जब यूतसे दुर्योधनादिद्वारा जीते गये तब क्लेशित हुए ॥ २ ॥ और उसी
समय क्रोधसे द्रोपदीके बाल पकडने और वस्त्र खींचे जाने पर जब श्रीकृष्णने रक्षा की ॥ ३ ॥ और युधिष्ठिर अपना देश छोडकर वननें गये
तब उनका यह वृत्तान्त सुनकर प्रतापवान् श्रीकृष्णजी ॥ ४॥ यादवांसे युक्त श्रीमान् सात्यकि आदिके सहित इनको रुरुसम्बन्धी मृगचर्म
धारण किये देख ॥ ५ ॥
पु.मा. 50 ८ HIN . कि जटाधारी धूलिसे रूखे शरीरयुक्त हैं इसी प्रकारकी पांचालीकी भी दशा देख वह जक्तवत्सल अक्तके दुःखसे दुःखी हो ॥ ६ ॥ कि वह सत्पुरुषोंके पति धृतराष्ट्र के पुत्रोंसहित त्रिलोकी भस्म करनेकी इच्छा करने लगे और वह विश्वात्मा चुकुटी कुटिल करने लगे ॥ ७ ॥ युगान्तामिकी समान आकारवाले कोटिसूर्यके समान शरीर किये झुमित सागरको जलाते हुएमी श्रीकृष्णजी ॥८॥ उस समय सीताके वियोगसे दुःखी रामचन्द्रकी समान अर्जुनको लक्षित होने लगे तब अर्जुन वीर यह देख रोमाञ्चयुक्त होगया ॥ ९॥ तब वह विष्णु जगत्पति विभुको प्रणाम कस्ता हुआ स्तुति जटिलान्धूलिरूक्षांश्च पांचालीमपिताहशीम्।। भक्तदुःखेनातिदुःखी सर्वदा भक्तवत्सलः ॥६॥ दग्धुकामः स त्रैलोक्यान् धार्तराष्ट्रान्सतां पतिः ॥ चक्रे कोपं स विश्वात्मा. भ्रुकुटीकुटिलक्षणः ॥ ७ ॥ युगांतानिसमाकारः कोटिसूर्य- कलेवरः ॥ ददृशे रुक्मिणीनाथो दिधक्षन्निव सागरम् ॥ ८॥ सीतावियोगं स तदा साक्षादशरथात्मजः ॥ तमालक्ष्य तदा वीरो घर्जुनो जातवेपथुः ॥ ९ ॥ प्रणम्य स्तुतवान्विष्णुं भवाय जगतां विभुम् ॥ बिडोजानुजमत्युग्रं काला- निमिव दीपितम् ॥ १० ॥ अर्जुन उवाच॥ दवदेव महादेव क्षमस्व जगदीश्वर ॥ नायं ते कोपसमयः संयच्छानंदय प्रभो ॥ १३ ॥ भूतभव्यभवनाथ भक्तशोपात्तविग्रह ॥ यच्चक्षुःपतनेनैव जगतः प्रलयो भवेत् ॥ १२ ॥ कृपां कुरु जगन्नाथ साधूनां त्वं परायणः॥ कंसकेशिकचाणरमुष्टिकारिष्टमर्दनः ॥ १३॥ करने लगा कारण कि उस समय कालानिकी समान उनका महाकोष बढरहाथा ॥१०॥ अर्जुनने कहा; हे देवदेव महाबाहो ! आप क्षमा कीजिये हे विनो! यह आपके कोषका समय नहीं है इससे रोककर आनन्द दीजिये ॥ ११ ॥ भूतभव्यभवद्रूप अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले आपके फेरनेसे ही जगत् नष्ट होसकता है कोधकी आवश्यकता क्या है ॥ ३२ ॥हे जगन्नाथ ! कपा. कीजिये, आप साधुओंके परायण हो। हे कंस केशी चाणूर मुष्टिक और अरिष्टके मारनेवाले ! ॥ १३ ॥ . - ब -
व्योमासुर वत्सासुरके निधनकर्ता कालियके शासक बकासुर और यक्षेके नियामक हे महाराज! रक्षा करो २ यह जगत् आपहीका है ॥ १४॥ हे विदांवर!
आपही कहिये कि आपके क्रोध करनेपर कौन रक्षा कर सक्ता है इस प्रकार स्तुति कर शत्रुधातीअर्जुनने श्रीकृष्णको प्रणाम किया ॥१५॥ तब क्रोधरहित
होनेसे श्रीकृष्ण अत्यन्त शोषित हुए और भी सब कोई तारागणके समान शोभित हुए ॥ १६॥ तत्र द्वारकाके स्वामी जगत्के आदिकारण भक्त समू-
हके तारक संसाररोगके निवारक ॥ १७ ॥ गोकुलके आनन्ददाता देवेश लीलासे शरीर धारण करनेवाले हरिको नमस्कार कर युधिष्ठिरजी यही बात
व्योमवत्साहिकालेयबकयक्षनियामकः॥त्राहि त्राहि महाराज जगदेतत्वदीयकम् ॥१४॥ त्वत्कोपदग्य कस्त्राता
कृपां कुरु विदांवर ॥ इति स्तुत्वा ननामाशु फाल्गुनः परवीरहा ॥१६॥ वीतरोपो हरिजर्जातः शुशुभे सात्वतां पतिः ॥
सर्वे शुशुभिरेतत्र तारका इव निर्मलाः ॥ १६॥ ततः कुशस्थलीनाथं जगतामादिकारणम् ॥ तारणं भक्तसंवानां
वारणे भवसंततेः ॥ १७॥ गोकुलानंददेवेश लीलागोत्रधरं हरिम् ।। नत्वापृच्छत्सुमनला त्वं च पृच्छसि मां तु यत् ।।
॥ १८॥ श्रुत्वैतद्भगवान्कृष्णो विष्णुः कृष्णाहिमर्दनः ॥ ध्यौ मुहूर्तमानं तु सिद्धसेवितपंकजः ॥१९॥ ध्यात्वाऽऽ-
श्वास्य सुहृद्वर्ग कृष्णां शशिनिभाननाम् ॥ वक्तुमारभत प्रश्न यः कृतो धर्मसूनुना ॥ २० ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ शृणु
राजन् महाभाग सर्वधर्मभृतां वर ॥ प्रश्नोऽयं दुर्द्धरः साधो मदन्येन कुरूदह ॥२१॥
पूछने लगे जो तुमने मुझसे पूछी ॥ १८ ॥ यह वचन सुन कालियनागमर्दनका विष्णु कृष्ण एक मुहूर्तमात्र ध्यान करतेहुए जिनके चरणोंका
सिद्ध मुनि सेवन करते हैं ॥ १९ ॥ इस प्रकार ध्यान कर अपने सुहृवर्ग और पांचालीको समझाकर श्रीकृष्णजी युधिष्ठिरके किये प्रश्नको कथन करले
लगे ॥ २० ॥ श्रीकृष्ण बोले-हे राजन् ! महानाग सर्व धोके जाननेवाले ! सुनिये. हे कुलद्रह ! मेरे सिवाय दूसरा तुम्हारा प्रश्न कथन करनेको
समर्थ नहीं है ॥ २३ ॥
यु. मा. ॥५॥ अनुक्रमसे तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर पृथक् २ देताहूं. है प्रभो ! आजतक मैंने किसीके आगे यह कथन नहीं किया ॥ २२ ॥ चैत्रादिक महीने लब पक्ष नाङिका आधा पहर पहर महीना दिन मुहूर्त दोनों अयन ॥ २३ ॥ वर्ष युग संख्या कमसे चारों युग कमसे सब नदी समुद्र कूप ह्रद बावडी उज्ज्वल जलके झरने ॥ २४ ॥ औषधी द्रुमवल्ली सम्पूर्ण द्रुम (वृक्ष ) वनस्पति पुर ग्राम अनेक पत्तन ॥ २५ ॥ यह सब मूर्तिमन्त स्वामीके गुणोंसे पूजित होते हैं ऐसा कोईभी नहीं जो श्रेष्ठगुणयुक्त पूजित न हो ॥ २६ ॥ अपने २ अधिकारमें स्थित हुए सबही पूजित होनेसे फल देते हैं; अनुक्रमेण ते वत्स प्रश्नांनामुत्तरं पृथक् ॥ मयापि कथितं नास्ति कस्यचित्पुरतःप्रभो ॥ २२ ॥ मध्यादयोमासवरा लवपक्षाश्च नाडिकाः॥ यामार्द्धयामसहितो मुहूर्तस्त्वयने उभे ॥२३॥ हायनंयुगसंख्यानं चतुर्युगमनुक्रमात् ॥ नद्योऽ- र्णवा ह्रदाः कूपा वापीपल्बलनिर्झराः ॥ २४ ॥ औषधीद्रुमवस्यश्च सर्वे चैव द्रुमाश्च ये ॥ वनस्पतिपुरमामा गिरयः पत्तनानि च ॥२५॥ एते सर्वे मूर्तिमंतः पूज्यंते स्वामिनो गुणैः ॥ न ह्येषां कश्चिदप्यस्ति अपूज्यः प्रभुरूर्जितः ॥२६॥ स्वे स्वेऽधिकारे सततमचत सुफलप्रदाः । स्वस्वामियोगमाहात्म्यायथायोगेन पांडव ॥ २७॥ अधिमासः समुत्पन्नः कदाचिन्मनुजर्षभ । तमूचुः सकला लोका असहायं जुगुप्सितम् ॥२८॥ अनहों मलमासोऽयं रविसंक्रम- जितः ॥ अस्पर्शोऽकर्मकस्तुच्छः सर्वकर्मबहिष्कृतः॥२९॥ श्रुत्वैतद्वचनं लोकानिरुद्योगो हतप्रभः ॥ दुःखितोऽतीव संत्रस्तो मृत्युमङ्गीचकार सः ॥ ३०॥ हे पाण्डव ! अपने स्वामीके योगमाहात्म्यसे यथायोग्य ॥ २७॥ अधिमास किसी समय प्रगट हुआ है हे मनुष्यश्रेष्ठ ! उसको जनोंके बीचमें विना विचारे यह भयानक वचन कहे गये ॥ २८ ॥ यह सूर्यसंक्रान्तिसे रहित मलमास कहावेगा यह अस्पृश्य कर्महीन तुच्छ और सब कर्मसे बहिष्कृत होगा ॥ २९ ॥ यह वचन सुन वह निरुद्योग और प्रभारहित होगया और बडे दुःखसे व्याकुल हो उसने अपनी मृत्यु स्वीकार की ॥ ३० ॥ , और हृदयमें चिन्ता कर यह मेरी शरणको पात हुआ, और मनमें विचार कर नारायणकी स्तुति करने लगा ॥ ३३ ॥ वैकुंठमें जाकर परमासनपर स्थित हो हाथ जोडे दोनों नेत्रोंमें जल बहाता ॥ ३२ ॥ अधिमास कहने लगा; हे देवाधिदेव जगन्निवास जगत्के गुरु भूतपति ! आपको नमस्कार है। हे अनाथोंके नाथ ! सब जगत्के पालक विश्वपालक गोपाल दीनोंके दुःख दूर कर्ता ॥ ३३ ॥ जिस प्रकार आपने जानकीका रावणके घरसे उद्धार किया जैसे गौतमकी धर्मपत्नीका उद्धार किया इसी प्रकार मेरा उद्धार करो ॥ ३४ ॥ जैसे आपने दुष्ट कंसके हाथसे देवकीकी रक्षा की और हृदये चिंतयित्वा तु मामसौ शरणं गतः। चेतसा चिंतयंस्तत्र तुष्टाव जगदीश्वरम् ॥३१॥ गवा वैकुंठभवनमास्थितः परमासने ॥ प्रांजलिः प्रणतो भूत्वा मुंचनश्रुणि नेत्रयोः ॥३२॥ अधिमास उवाच ॥ देवाधिदेवेश-जगनिवास जगट्ठरो भूतपते नमस्ते ॥ अनाथनाथाखिलविश्वपाल गोपाल नारायण वासुदेव ॥ ३३ ॥ यथा विभो ते निमिराजपुत्री पौलस्त्यदुष्टेन छलाट्टसीता ॥ विमोचिता गौतमधर्मपत्नी तथैव मां पाहि रघुप्रवीर ॥३४ ॥ यथा देवकी कंसदुष्टा- द्विमुक्ता चिरग्राहग्राही मजेंद्रोऽपि मुक्तः॥ जरासंघराजन्यनीता महीपास्तथा. पाहि मां रुक्मिणीनाथ विष्णो॥३५॥ यथाजामिलः कोऽपि लुब्धोऽबलायां यथा गोपिका याज्ञसेनी गरिष्ठा॥ दरिद्री कुचलो द्विजेंद्रोऽर्चितस्ते विभो जा- नकीजीवनाधीश पाहि.॥३६ ॥ त्वदीयं पदद्वंद्वमासाद्य तत्र ऋषेरंगना लोकमाता तवैव ॥ कृपानीरधि शेवधि सेवकानां कथं जानकीजीवनं नो भजामः ॥३७॥ नाकेसे ग्रहण किये गजेन्द्रको छुडाया जरासंघके हाथसे जैसे अनेक राजाओंको छुड़ाया, हे रुक्मिणीनाथ ! इसी प्रकार आप मेरी रक्षा करो ॥ ३५ ॥ जैसे वेश्याके लोनी अजामिलको आपने छुडाया जैसे गोपी और द्रौपदीकी रक्षा की, दरिद्र मैले वस्त्रधारी सुदामाकी जैसी रक्षा की. हे विनो जानकीजीवन ! उसी प्रकार मेरी रक्षा करो ॥ ३६ ॥ आपहीके दोनों चरणकमलकी प्राप्ति कर ऋषिपली आनंदलोकको प्राप्त हुई । कपासागर M . भा. टी. पु. मा. अ.२, भक्तोंसे सेंथित जानकीजीवनका हम क्यों न भजन करें ॥ ३७॥ आपकी इच्छासे अनि शीतल होती है और आपकी आज्ञासे सुमेरु चलत्वको पाता है और सागर लघुत्वको प्राप्त होसक्ता है बृहस्पति जडत्वको और सूर्य अंधकारको प्राप्त हो सक्ता है । हे रुक्मिणीवल्लभ ! हमारी रक्षा क्यों नहीं करते ॥ ३८ ॥ श्रीकृष्ण बोले-जब यह श्रेष्ठ मास इस प्रकार स्तुति कर विरामको प्राप्त हुआ और शोकसे पृथ्वीमें गिरा, तब उसकी प्रार्थना सुन नेत्रोंमें जल भर ॥ ३९॥ नम्र होकर आगे स्थित हुए उस अधिमाससे कहा । हे वत्स २! यह क्या दुःख तुम्हारे ऊपर पडा है ॥४०॥ तव विच्छया शीततामेति वह्निश्चलत्व सुमेरुनंदीशो लघुत्वम् -जडत्वं सुरेज्यस्तमस्त्वं दिनेशो भवात्रुक्मिणी- वल्लभः किन्न पासि ॥ ३८॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ स्तुत्वैवं विररामायं यदा मासविभूपणः ॥ गत्वा धरण्यां शोकेन तत्क्षणात्साश्रुलोचनः ॥ ३९ ॥ तमुवाच विनम्रांगमधिमासं पुरः स्थितम् ॥ वत्स 'वत्स किमित्येवं दुःखमनोऽ- सिसांप्रतम् ॥ ४० ॥ यत्किचिद्गतं शल्यमुद्धरामि वदाशु मे ॥ न मत्पादाब्जशरणं प्राप्य शाचितुमईति ॥ ११ ॥ प्रतितोऽपि महाबाहो किं पुनस्त्वत्समो जनः ॥ मल्लोकं विद्धि निर्दोष निदुःखमजरं वरम् ॥ ४२ ॥ त्वामत्र दुःखित दृष्ट्वा विस्मिता मे पुरःसराः ॥ म कामोऽसि येन त्वं तहहि शरणं गतः ॥४३॥ अधिमास उवाच ॥ विभो वेत्ति भवान्सर्व नाज्ञातं किंचिदस्ति ते ॥ चराचरगुरुः स्वामी साक्षी सर्वस्य चेतसः॥४४॥ जो तुम्हारे हृदयका दुःख है वह मैं दूर करूंगा तुम कहो मेरे चरणोंकी शरणमें प्राप्त होकर फिर प्राणी शोच नहीं करते है ॥ ४१ ॥ हे महाबाहो ! पतित होकरनी प्राणी आपकी समान शोच नहीं करते, कारण कि मेरा लोक दोषरहित दुःखरहित जरारहित और श्रेष्ठ है ॥ ४२ ॥ तुमको दुःखी देखकर मेरे अनुचर दुःखी हुए जिस कारण तुम मनेकी इच्छासे मेरी शरण आये हो, वह कहो ॥ ४३॥ अधिमास बोला-हे विभो ! आप सब कुछ जानते हो कुछनी आपको अज्ञात नहीं है आप चराचरके गुरु स्वामी साक्षी और सबके अन्तःकरणके साशी हो .॥ ४४ ॥ ॥६॥ . ३ आप कूटस्थ सबमें स्थित हो कोईभी आपसे रहित नहीं है फिर क्यों आप मेरे दुःखको नहीं जानते इससे मेरे ‘बराबर कोई अल्पभाग्य नहीं है ॥ ४५ ॥ हे विनो! तौं भी आप मेरे दुःखका कारण सुनिये, जो बडा अद्भुत है सब जन्तु सामान्य धर्मवाले सुखसे जीते हैं ॥४६॥ सो में सबसे हीन हो मृत्युकी इच्छा करता हूं। क्षण लव मुहूर्त पक्ष महीने दिन रात वे अपने नामाधिकारको प्राप्त हो देवताओंके समान प्रसन्न होते हैं परन्तु मेरा न कुछ नाम है न.कोई स्वामी और न कुछ आश्रय है॥४७॥४८॥ यह निष्कर्मा है ऐसा सब मिलकर कहते हैं कि, अहो ! यह मलमास निकष्ट है कूटस्थः सर्वसंस्थोऽसि न त्वया रहितः क्वचित् ॥ किं मेन वेत्सि हृदुःखमल्पभाग्यतरस्त्वहम् ॥४५॥ तथापि शृणु मे भूमन्दुःखकारणमद्भुतम् ॥ सामान्यधर्मिणः सर्वे सुखं जीवति जंतवः ॥४६॥ तत्र हीनत्वमापनो मृत्युमिच्छामि सत्पते ॥ क्षणा-लवा मुहूर्तानि पक्षामासा-दिवा निशम् ॥४७॥ नामाधिकारप्रभुभिमौदंते निर्जरा यथा ॥ न मे नाम न मे स्वामी न मे किंचिब्यपाश्रयः॥४८॥ निष्कर्मा च विहीनश्च सर्वे संभूय दुर्जनाः॥ मलमासो निषिद्धोऽयं नित्यं व्याख्यांति मां सदा॥४९॥ तस्माद्धि मर्तुमिच्छामि नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ कुजीविताद्वरो मृत्युनित्यदग्धः कथ स्वपेत् ॥ ५० ॥ तत्कुरुष्व महाराज यत्ते मनास वर्त्तते ॥ न जीविष्ये नजीविष्ये पुनःपुनरुवाच ह ॥५१॥ एवं विज्ञप्तिमुक्त्वा वै सोऽ- धिमासस्तदा विभो ॥ विसझं निपपाताशु पादमूलमुपानतः॥२॥ इस प्रकार सब प्राणी मुझसे कहा करते हैं ॥ ४९ ॥ इस कारण मैं मरने की इच्छा करता हूं जीना नहीं चाहता कुजीवनसे मृत्यु होनी श्रेष्ठ है नित्य दग्ध कैसे हो सकता है ॥ ५० ॥ हे महाराज ! जो आपके मनमें वर्तता है सो आप कीजये मैं इस प्रकारसे न जिऊंगा न जिऊंगा ॥ ५३ ॥ इस प्रकारसे जब आधिमासने कहा तब फिर मूछित हो श्रीभगवान्के चरणोंमें गिर पड़ा ॥ ५२ ॥ ।
पु.मा. अ. - इसके देखने से सब पार्षद विस्मयको प्राप्त होगये; हे राजन् ! इस प्रकार उसे देखकर मुझको भी दया आई ॥ ५३ ॥ हे राजन् ! उस समयका यादी वृत्तान्त सुनो मैं तत्त्वसे कहता हूँ तब मैंने दृष्टिसें गरुडजीके प्रति. कथन किया ॥ ५४ ॥ तब गरुडजी अपने पंखोंसे आदरसहित उसको पवन करने लगे तब वह उठकर फिर कहने लगा। हे प्रभो! मुझे यह बात नहीं रुचती ॥ ५५॥ हे करुणानाथ ! जो मैं तुम्हारी शरण आयाहूं इससे मेरी रक्षा करो आप गोपियोंके हृदयकी कामानि शांतकर्ता जनवल्लभ हो ॥ ५६:॥ हे महाभाग ! तब उस काम्पत हुएके प्रति मैं कहने लगा ॥ ५७ ॥ इति विस्मिताः पार्षदा सर्वे तदशमविलोकनात् ॥ ममापि फरुणा जाता पारपूण नराधिप ॥५३॥ शृणु राजंस्ततो वृत्त यत्तद्वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ कटाक्षेण समादिष्टः सुपर्णस्तमवीजयत् ॥५४॥ पक्षवातेन तरसा वीजयामास सादरम् ॥ उत्थितः पुनरेवाह नैतन्मे रोचते विभो ॥ ५५॥. पाहि मां करुणानाथ यत्ते शरणामागतः ॥ गोपीहृदयकामाग्निश- मनो जनवल्लभः ॥५६॥ तमुवाच महाभागो वेपमानं मतिकम् ॥५७॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्येऽ- धिकमासविज्ञप्तिनाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ साधु साधु सुरश्रेष्ठ यन्मामनुसृतो भवान् ॥ यत्ते दाम तदप्राप्यं सुरैर्ऋषिगणैरपि ॥३॥ न मामुपेतः कुत्रापि शोकवान्दृश्यते नरः॥ तस्माद्भवतु सुस्वस्थः सर्वाधिकतरो भवान् ॥ २॥ कीर्त्या तक्षम्यानुभावेन बलेन चारतेन च ॥ शौर्यवीर्यगुणज्ञानप्रज्ञाधैर्यपराक्रमः॥३॥ श्रीपमपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये अधिकमासविज्ञतिनाम वितीयोऽध्यायः ॥ २॥ श्रीभगवान् बोले, हे सुरश्रेष्ठ !' जो तुमने मेरी शरण ली इस कारण तुम धन्य हो, जो मैं तुम्को दूंगा वह देवताओं और ऋषियोंको भी अप्राप्य है ॥ १ ॥ मुझको प्राप्त होकर कोई मनुष्य शोकित नहीं दीखता है इससे तुम स्वस्थ हो, कारण कि, सबसे अधिकतर हो । ॥ कीर्ति लक्ष्मीके अनुभाव बल और चरित्र शूरता वीरता शूरता वीरता गुण ज्ञान प्रज्ञा धीर पराक्रमसे युक्त होने के कारण ॥३॥ A 2 , -- 1 यह सब जगत् मेरा आत्मा है, शोकरहित होकर भय त्यांगन करदो, तुम मासोंके आधिपति मेरी समान होगे ॥ ४ ॥ वैराग्य ऐश्वर्य धर्म अर्थ प्रताप अनुग्रह आश्रम श्री भाग्य सुख लालित्यता गुण ऐश्वर्य तप यज्ञ ॥ ५ ॥ सुख संतुष्टि करना कलि चतुरता सुटुता विद्या विनय निपुणता धर्म कर्म सतउक्ति ॥ ६ ॥ इन गुणोंसे में पुरुषोंसे उत्तम हूं इसी कारण पण्डितजन मुझे पुरुषोत्तम कहते हैं ॥ ७.॥ जब कि, मैं तेरा स्वामी हूं तो तू भी उत्तमताको प्राप्त हो, मनसेही तेरा नाम पुरुषोत्तम ऐसा विख्यात होगा ॥ ८ ॥ नाममात्रके ग्रहणसेही सबके पाप दूर करनेवाला होगा फिर यदि मैंने यन्मदात्म जगत्सर्वं वीतशोको भवं त्यज ॥ ततस्तु मम सादृश्यमश्नीयाः साधिपो भव ॥ ४॥ वैराग्यैश्वर्यधर्मार्थ- प्रतापानुग्रहाश्रमैः ॥ श्रीभाग्यसौख्यलालित्यगुणैश्वर्यतपोवरैः ॥ ५॥ सखे संतुष्टिकरुणाकेलिदाक्षिण्यसौष्ठवैः ॥ वि- याविनयनैपुण्यधर्मकर्मसदुक्तिभिः॥६॥ एतैरन्यगुणैः शुदैरुत्तमः पुरुषेष्वहम् ॥ तस्मादभिज्ञासततं विदुमा पुरुषो- त्तम ॥७॥ त्वमप्युत्तमतां याहि यतोऽहं भवतः प्रभुः॥ मनसैव हि ते नाम विख्यातं पुरुपोत्तमः॥ ८॥ नाममात्रेण सर्वेषामघकंदानिकृतनः ॥ किं पुनर्दत्तनामानि मत्कृपानितरात्मनाम् ॥ ९ ॥ यथाई नै रे चक्रे मुख्यः सर्वोत्तमो- त्तमः ॥ विधूय किरिबषाटोपमुद्धरामि भवाणवात् ॥ १०॥ तथा त्वमपि भक्तानां दुःखदारधखंडनः॥ भविष्यास जगत्पूज्यः स्वधुनी सरितां यथा ॥११॥ सर्वे मासाः कृताः काम्या न मया त्वं कृतस्तथा ॥ कर्मदाः सन्त्विमे सर्वे निष्कर्मफलदो भवान् ॥ १२ ॥ नामकरण किया तो मेरी कपासे तू क्यों न श्रेष्ठ हो ॥ ९ ॥ जिस प्रकार. देवचक्रमें मैं सबसे श्रेष्ठ हूं इसी प्रकार मनुष्योंके पाप दूर कर संसारसागरसे पार कर देताहूं ॥ १९ ॥ इसी प्रकार तुमभी अपने भक्तोंके दुःख दरिद्र दूर करोगे और गंगाकी समान जगत् तारनेमें समर्थ होगे ॥ ११ ॥ सब महीने काम्यफलके देनेवाले हैं तुम विना कामना फल देते हो यह और सब कर्म फल देनेवाले और तुम निष्कर्म फलके देनेवाले हो ॥ १२ ॥ - Pr १ - 50 पु.मा. भा. दी. ... अ. ३ जो जो मासाँके अध्यक्ष और इष्ट फल देनेवाले हैं वे उन्हींके हैं परन्तु तेरा अध्यक्ष और सत्कर्म करनेवाला मैं हूं ॥ १३ ॥ इसमें सन्देह नहीं कि मैं कर्मसे मुक्त हुए पुरुषोंको मुक्ति देता हूं अकाम का सकाम जो तुममें श्रेष्ठ आचरण करेगा ॥ १४ ॥ जो ब्रह्मस्थान आनंदरूप है जो भोगरूप है वह में सम्पूर्ण देनेवाला हूं यह वार्ता सत्य है इसमें सन्देह नहीं ॥ १५ ॥ जहां जाकर फिर प्रवृत्ति नहीं होती भोगान्तमें उसी स्थानको प्राप्त होता है जिसको महाभाग्यवान् ब्रह्मचारी यत्न करते हैं ॥ १६ ॥ वे मनुष्य त्रिलोकीके दुःख भोगनेवालोंको देखते हैं उसका जो उग्र कारण है उसको वे कोई नहीं अध्यक्षादिष्टदातारोये येमासाधिपाः स्मृताः॥ त्वदीयोऽस्म्यहमेध्यक्षस्त्वयि सत्कर्मकारिणाम् ॥ १३॥ कर्मभिर्वे वि- मुक्तानां मोक्षदोऽहं न संशयः ॥ अकामो वासकामो वा यस्त्वय्याचरतेशुभम् ॥ १४ ॥ आनंदं ब्रह्मसदनं यश्च भोगसमुच्चयः ॥-तत्सर्वदोऽहमुक्तस्तु सत्यंसत्यं वदाम्यहम्॥१५॥यद्गत्वा न निवर्तन्ते भोगांतेतत्प्रयास्यति ॥ यजन्ते वै , महाभागा, ऋषयो ब्रह्मचारिणः ॥ १६॥ त्रैलोक्यदुःखभोक्तारो दृश्यते ते जनाः सदा ॥ तत्र कारणमत्युग्रं न ते जानांत केचन ॥.॥ १७॥ शृणु तत्ते प्रवक्ष्यामि जायते ये त्वकर्मिणः ॥ सकामकर्मणः सर्वे मासिमासि भवति ते॥१८॥ प्रवय कामनिपुणा न तु कैवल्यदायिनः ॥ कारणेन संमं कार्य सर्वदैतनिगद्यते ॥१९॥ अगाधध्ययसंबन्धो यथा नानाव्यवस्थितः॥ यादृशी कर्मणोऽवस्था श्रद्धातो देशकालतः ॥२०॥ जानते हैं ॥ १७ ॥ सुनो मैं तुमसे कहताहूं जिससे अकर्मवाले उत्पन्न होते हैं सकाम करनेवाले महीने महीने में होते हैं ॥ १८॥ जो अवस्था- युक्त काममें निपुण हैं परन्तु वे कैवल्य देनेवाले नहीं हैं ऐसा कहा है कि कारणके समान कार्य सदा होतेहैं ॥ १९ ॥, जिस प्रकार आधाराधेय सम्बन्धसे अनेक प्रकारकी व्यवस्था है जिस प्रकार कर्मकी अवस्था देशकालके अनुसार है ॥ २० ॥ , --
,
इस सम्पूर्ण उपकरणमें कालही बलवान है कारण कि, कालके अनुसारही मनुष्य कर्म करते हैं ॥ २१ ॥ और कर्मके अनुसार फल पाकर
फिर तपित होते हैं इस कारण कालका माहात्म्य जानने में कोईशी समर्थ नहीं ॥ २२ ॥ एक मुट्ठी बीज लेकर बोये जाते हैं परन्तु कालके
योगसे उसमें असदृश फल लगते हैं ॥ २३ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आमोंका यद्यपि एकही वंश है परन्तु उनमेंभी समानता नहीं होती यही कालका
योग है सो आप दोखिये ॥ २४ ॥ माताके गर्भाशयमें पिताके वीर्यसे प्राप्त होकरभी वह एक समयमें जन्मको प्राप्त होकर कालसेही उनकी समानता,
सर्वोपकरणे यत्र कालो हि बलवत्तरः ॥ यादृर्श कालमासाद्य कुरुते कर्म मानवः ॥ २१ ॥ फलं तु तादृशं लब्ध्वा
भूय एव प्रतप्यते । अतः कालस्य माहात्म्यं न केनाप्यवगम्यते ॥ २२ ॥ एकमुष्टिगृहतिानां बीजानां रोपणं तथा।।
फलान्यसदृशान्यव जायते कालयागतः॥२३॥ एकवंशसमुद्भूतैः सहकारैर्न साम्यता । लभ्यते कालयोगेन पश्य त्वं
पुरुषोत्तम ॥ २४ ॥ मातुर्गाशये लग्नाः पितृवीर्यमुपाश्रिताः ॥ एककालाः कुतस्तेऽपि न कालेन समानता ॥२५॥
तस्मात्काम्येषु मासेषु सकामविहितं नरैः॥ यत्तत्प्रभुसमादिष्टं यथोक्तं फलदं भवेत् ॥ २६॥ किंचिद्भोगानिहालभ्य
पश्चाल्लोकांतरं गताः ॥ तत्तद्भोगांतमासाद्य पतति क्षीणकर्मिणः॥ २७॥ निर्वर्त्य कर्म सर्वेऽपि क्लिश्यते त्वतिसंकटः ।।
त्वयि सद्धममिच्छंतः सूरयो गुणभूषणाः ॥ २८॥
नहीं होती ॥२५ ॥इस कारण काम्य मासोंमें मनुष्य काम्यकर्म करते हैं जो प्रभुने कहा है उसके अनुसार करनेसे यथेष्ट फल मिलता है ॥ २६ ॥
कुछ भागोंको यहाँ प्राप्त हो पीछे लोकान्तरोंमें जाकर उन भोगोंको भोग्यकर्म क्षीण होनेपर फिर यहां पतित होते हैं ॥ २७ ॥ कर्मसेही निवृत्त
होकर फिर संकटमें पड़ते हैं परन्तु गुणभूषित कवि आपसेही श्रेष्ठ धर्मकी इच्छा करते हैं ॥ २८ ॥
-- पु.मा. - भा.दी ॥ ९॥ अ. । 7 जो धीरतासे मुझको आश्रय किये हैं वह निरामय रहते हैं इस कालका प्रभु मैंहीं हूं दूसरा नहीं है ॥ २९ ॥ ॥ इस कारण इसमें जो कृत्य करेगा उसको अनन्त फल प्राप्त होगा, जो मनुष्य इसमें निष्काम वा सकाम कर्म करेंगे ॥ ३० ॥ वे निर्मल हो नित्य भुक्ति मुक्तिको प्राप्त होंगे, जिन मनुष्योंने इसमें कंत्य किये हैं वह मैं सर्वथा बलसे ग्रहण करताहूं ॥ ३१ ॥ जिस प्रकार राजा अपनै छठे भागको नहीं छोड़ता है इसी प्रकार मुझे कर्म अर्पण करनेसे कभी उसके कर्मका अन्त नहीं होता ॥ ३२ ॥ इससे अनन्त सुखकी प्राप्ति और अन्तमें मुक्ति मिलती है पापरहित होकर मामाश्रित्य च धैर्येण ह्यस्मिन्काले निरामये ॥.कालस्यास्य प्रभुर्नित्यमहमास्मन्न चेतरः ॥ २९ ॥ तस्मात्कृत्य- फलस्यास्मिन्संख्यानं नैव लभ्यते ॥ निष्कामं च सकाम च कर्तास्मिन्संचितं जनैः ॥ ३० ॥ भुक्तिमुक्तिप्रदं नित्यं मय्यधीशे मलात्मभिः ॥ अस्मिन्कृत नरेंः कम बलादादमि सर्वथा ॥ ३१ ॥ यथा भूमिपतिर्भागं स्वीयं षष्ठं न मुंचति ॥ महत्तकर्मणामतो न भवेत्काईचित्स्फुटम् ॥ ३२ ॥ अतोऽनंतसुखावातिरते मोक्षफलं लभत् ॥ विधूय पापतिमिर निर्मलो जायते जनः ॥३३॥ त्वाये ये वतिनो दांता दानस्नानजपे रताः ॥ सर्वे सत्कृत्यरहिता देवतीर्थ- गुरुद्विषः ॥ ३४॥ जायते दुर्मुखा दुष्टाः परभाग्योपजीविनः ॥ न कदाचित्सुखं तेषां स्वप्नेऽपि शशशृंगवत् ॥ ३६॥ तिरस्कृत्य भवंतं ये मलमासेऽतिदांभिकाः॥ नाचरिष्यति सद्धम सदा निरयवासिनः ॥ ३६॥ वह मनुष्य निर्मल हो जाता है ॥ ३३ ॥ जो व्रती चतुर दान स्नान और जप आपमें, अर्पण करते हैं वे सुखी होते हैं और जो सब सत्कत्यसे रहित देवता तीर्थ और गुरुसे द्वषे करते हैं ॥ ३४ ॥ वे दुष्ट पराये भाग्यके उपजीवी दुर्मुख होते हैं उनको स्वभमेंभी कभी सुख नहीं मिलता जैसे खरगोशके मांग नहीं होते॥३५॥जो मनुष्य इस मलमासमें धर्मका तिरस्कार कर देंभता करते हैं और धर्म नहीं करते वे सदा नरकमें पडते हैं ॥३६॥ ३
फिर वे नरकसे निकलकर अल्पभागी थोडे विद्यावाले हो यहां जन्म लेते हैं प्रत्येक तीसरे वर्षमें जो पुरुषोत्तम मासको प्राप्त होकर ॥ ३७॥ धर्म
नहीं करते वे कुंशीपाक नरकमें पेडते हैं। दुष्कृतकारी जीव पृथ्वीमें जन्म ले सदा शोच करते हैं ॥ ३८॥ पुत्र मित्र कलत्रोंकी आशासे शोचते
हुए विलाप करते दुःखानिमें पड़ते हैं ॥ ३९ ॥ जिनके अज्ञानसे वैष्णव श्रेष्ठ पुरुषोत्तम मास वृथा बीत जाता है उनको किस प्रकार सुखकी प्राप्ति
हो सकती है ॥ ४० ॥ स्त्रीवाले स्वरूपवान् गुणी दीर्घजीवी चतुर विद्यावान् आज्ञा संपादन करनेवालोंका ॥ ४१ ॥ सदृतिवाले साधु धैर्यशाली
अल्पभाग्यास्त्वल्पविद्या जाताश्च नरकेष्विह ॥ पुरुषोत्तममासाद्य वर्षेवर्षे तृतीयके ॥ ३७॥ अविशेषकृतो जीवाः
कुंभीपाके पतंति ते ॥ शोचंति सततं जीवा भूमौ दुष्कृतकारिणः ॥ ३८॥ पुत्रमित्रकलत्राप्तशोकसंविनमानसाः ॥
विलपति पतंत्येते दुःखदावानले चिरम् ॥ ३९ ॥ ते कथं सुखमेधते येषामज्ञानतो गतः ॥ श्रीपुरुषोत्तमो मासो
वैष्णवः पुरुषोत्तमः॥४०॥ सदाराणां सरूपाणां गुणिनां दीर्घजीविनाम् ॥ चतुराणां सुविद्यानामाज्ञासपाादिनां तथा
॥४१॥ सद्वृत्रिहतचित्तानां साधूनां धैर्यशालिनाम् ॥ सुमुखानां वदान्यायं पुत्राणां शीलवृत्तिनाम् ॥४२॥
श्थामा च श्यामवर्णा च श्यामा षोडशवार्षिकी ॥ अप्रसूता भवेच्छयामा श्यामा मधुरभाषिणी ॥४३ ॥ श्यामा
गुणवती दिव्या सर्वालंकारभूषिता ॥ चतुरा शीलसंपन्ना चित्तेनारुंधतीसमा ॥ ४४ ॥ सुभगा दर्शनीयांगी
कुरंगीनयनांचला ॥ करिकुंभस्तनी रम्या शुभा ताराधिपानना ॥ ४५ ॥
सुमुख चतुर शील वृत्त और पुत्रवानोंका ॥ ४२ ॥ तथा श्यामा श्यामवर्णा अर्थात् सोलह वर्षकी खी श्यामा अप्रसूता श्यामा और मधुरभापिणी
श्यामा होती है ॥ ४३ ॥ श्याम गुणवाली दिव्य सम्पूर्ण अलंकारसे भूषित चतुर शीलसे सम्पन्न चित्तमें अरुंधतीकी समान ॥ ४४ ॥
सुन्दर दर्शनीय शरीरवाली कुरंगीचंचलनेत्र गजकुंजके समान स्तनवाली सुन्दर चन्द्रमाके समान मुखवाली ॥ ४५ ॥
-- ना.. अ.३ . PE जिसके चरण रखनेकी चतुरता देखकर अप्मरा लज्जित होती है अपने अंगरागसे मनोहर सुवर्णवेलिके समान ॥ ४६ ॥ स्वरसे कुबेरकी स्त्रियोंको जीतनेवाली तरुणी पतिव्रता सदा पतिकी आजा करनेवाली उसके कथनका आचरण करनेवाली ॥ ४७ ॥ इस प्रकारकी सुख देनेवाली खी उसको कैसी प्राप्त होतीहै जिसको पुरुषोत्तम मास अज्ञानसे बीतता है ॥ ४८ ॥ पांडत शूर नवीन यौवनशाली हाथीकी समान बली पराक्रमसे शत्रुओंके मारनेवाले भाई ॥ ४९ ॥ उसको कैसे प्राप्त होसकते हैं जिसका पुरुषोत्तम मास अज्ञानसे बीतता है जिसने कुछ सुकृत नहीं पदविन्यासचातुर्यं दृष्ट्वा लज्जति चाप्सराः॥ स्वांगरागेण रुचिरा वल्लीव कनकोत्कृता ॥ ४६॥ स्वरनिर्जितवित्तेश- तरुणी पतिदेवता ॥ आज्ञाकरी सदा पत्युश्चोदनां चरती शुभाम् ॥४७॥ ईदृशी सुखदा रामा कथं तत्समचारिणी॥ यस्य ज्ञातो गतो मासो वैष्णवः पुरुषोत्तमः॥ ४८॥ भ्रातरः पंडिताः शूरा नवयौवनशालिनः ॥ प्रभित्राइव मांर्तगाः पराकमहतारयः॥ १९ ॥ ईशान्कथमीप्सन्ते न कृते पुरुषोत्तमे ।। सुकृतं किंचिदप्येव न दत्तं दानमार्थने ॥ ॥५०॥ सुरूपः सुमुखःशूरः सत्यवादहिते रतः॥ दृढेंद्रियबलोपेतो हरिभक्तिपरायणः ॥५१॥ चातुर्यगुणसंपन्नः सुलक्ष- णसमन्वितः॥अंगदों धार्मिको विद्वान्सात्त्विकः सततं घृणी ॥५२॥सांगशोभनोऽतीवजातगात्रोथ भाग्यवान् ॥ यत्र यत्र प्रयात्यग्रे धनराशिस्ततस्ततः॥५३॥ किया अर्थियोंको दान नहीं दिया ॥ ५० ॥ रूपवान् सुमुख शूर सत्यवादी हितमें तत्पर दृढेन्द्रियवाला हरिभक्तिपरायण ॥ ५३ ॥ चतुरताके गुणसे सम्पन्न अंगदवान् सात्त्विक धर्मात्मा निरन्तरदया करनेवाला ॥ १२ ॥ सर्वांगसे शोभित पुष्टगात भाग्यवान् जहां जहां जाय वहीं उसके आगे धनराशी स्थित हो ॥ ५३ ॥ 3 . I. .
जिसका मन लोभ और धर्मके प्रमादमें तथा क्रोधमें रत न हो इस प्रकारका सन्तान विना पुरुषोत्तमकी अचाके किस प्रकार होसक्ता है ॥ ५४॥ देव- कीनंदन देवका पुरुषोत्तम मासमें पूजन करना चाहिये अथवा चंद्रमौलि जगत्के आनंददाता शंकरका पूजन करै ॥ ५५ ॥ सूर्य ईश वा गणाधीश चंडिका भक्तवत्सला महामाया महालक्ष्मी बंध मोक्षकी विधान करनेवाली है ॥ ५६ ॥ मेरी आज्ञासे वे सब मनुष्य तुम्हारा पूजन करेंगे तेरा माहात्म्य पृथ्वीमें आजतक किसीने नहीं जाना है ॥ ५७ ॥ ज्ञानदृष्टिसे ऋषि मेरे हृदयकी बात जानते हैं इस कारण मेरी आनाके पालन करनेवाले लाभो धैर्य प्रमादश्चक्रोधेनाक्रमतेमनः ॥ ईदृशो जायते जंतुः कथं येन न चार्चितः ॥५४॥ देवकीनंदनो देवः संप्राप्ते पुरुषोत्तमे ।। अथवा जगदानंददायी शीतांशुभूषणः ॥१५॥ दिनेशो वा गणाधीशचंडिका भक्तवत्सला ॥ महाभागा महालक्ष्मीबंधमोक्षविधायिनी ॥५६॥ ते त्वां संपूजयिष्यंति जनाः सर्वे ममाज्ञया ॥ त्वदीयमेतन्माहात्म्यं नं ज्ञातं केनचिटुवि ॥ ५७॥ ज्ञानदृष्टया ऋषिगणाज्ञास्यति मम हृद्दतम् ॥ ततस्त्वामर्चयिष्यंति मच्छंदपरिपालकाः ॥ ॥५८॥ सर्वेषामपि मासानां त्वमप्युयो भविष्यसि ॥ तथोत्तमांगमासीनः किरीट इव राजसे ॥ ५९॥ इत्यादिश्य ततो मासमहमंतर्हितोऽभवम् ॥ इति ते सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया ॥६० ॥ जननीयौवनवनच्छेत्तारो ये नरा भुवि ॥ जायते सुखलेशांशास्तैलाभ्यंगकलेवराः॥६१ ॥ प्रेता इव निरानंदा विचरंति महीतले ॥ स्त्रीपुत्रधनधा- न्यादिहीनदीनमनःक्रियाः॥१२॥ तुम्हारी अर्चना करेंगे॥ ५८ ॥ सम्पूर्ण महीनेमें तुम श्रेष्ठ होगे जिस प्रकार शिरमें किरीट सबसे श्रेष्ठ शोभित होता है ॥५९ ॥ यह उस महीनेसे कह मैं अन्तर्धान हुआ, जो आपने पूछा सो तुमसे सब वर्णन किया ॥६०॥ जो मनुष्य पृथ्वीमें माताके यौवनरूपी वनके छेदन करनेवाले हैं वे किंचित् सुख पानेवाले तैलसे लिप्त कलेवर पृथ्वीमें जन्म लेतेहैं ॥ ६३ ॥ वे प्रेतोंकी समान निरानंद पृथ्वीमें विचरते हैं बी पुत्र धन धान्यसे हीन, हीन क्रियावाले E - भा.. अ.३. होते हैं ॥ ६२ ॥ हे महाराज! आप. स्त्री और अनुजोंके सहित इस पुरुषोत्तममासके माहात्म्यको नहीं जानते हो ।। ६३ ।। न विशेषकर आपने पुरुषोत्तमकी सेवा की है. हे राजन् ! अब वह महीना इसके उपरान्त आनेवाला है ॥ ६४ ॥ वह महामास विष्णुका प्रिय है तुम बनमें रहनेवालोंको प्रमादसे पांच महीने बीत गये हैं ॥६५॥ आपने जयदेपयुक्त होमकी अवज्ञा की है कारण कि धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधनादि गंगापुत्र भीष्म रूपाचार्य, ॥ ६६ ॥ अश्वत्थामा कोण सौबल इनसे तुम्हारा चित्त सदा व्याकुल रहता है और वनवासी होनेके कारण तुम्हारा सुखध्वंस होरहा है भवानपि.महाराज सदारानुजसेवितः॥ न जानासि पृथिव्यां वै मासेशं पुरुषोत्तमम् ॥ ६३ ॥ न त्वयापि विशे- षेण सेवितः पुरुषोत्तमः ।। अतः परं नरेंद्रेश मासो वै चागमिष्यति ॥ ६४ ॥ विष्णुप्रियो महामासो भवतां काननौ- कसाम् ॥ प्रमाद्तो गता मासाः पंचैते भवतामिह ॥६५॥ श्रीमद्भिस्तेऽप्यव ज्ञाता भयद्वेषसमन्वितैः॥ वैकर्तगाधकाः पुत्राः स्वधुनीसुतगौतमौ ॥६६॥ द्रौणिद्रोणसौबलेभ्यो भयसंत्रस्तचेतसाम् ॥ वनवाससुखध्वंसस्वजनायोगदुः- खिनाम् ॥६७॥ वने वास प्रसादायं विद्याराधनतत्परे ॥ धनंजये गते स्वर्गमितोत्राऽसिसमुद्यते ॥ ६८॥ तद्वियोगपी- रविष्टेन ज्ञातः पुरुषोत्तमः॥ साधनं जायते राजन्भविष्यस्य प्रभावतः ॥६९॥ किमत्र भवतां कृत्यं यद्भविष्येन वर्त्तते। सुखं दुःखं भयं क्षेमं भविष्यादाप्नुते जन।।७०॥ इति श्रीपद्मपुराणे पु०मा भगवतःवरप्रदानं नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥ स्वजनोंके वियोगसे दुःख है ॥ ६७ ॥ वनमें निवास विद्याके आराधनमें तत्पर अर्जुनके अस्त्र सीखनेको स्वर्ग जानेपर तुमको दुःख प्राप्त होनेपर ॥ ६८॥ तथा उसके वियोगसे क्लिष्टशरीर होने के कारण तुमने पुरुषोत्तमको न जाना. हे राजन् ! इसके प्रभावसे भविष्य साधन होता है ॥ ६९ ॥ इसमें तुमको और क्या कृत्य भविष्यतासे वर्तती है.सुख दुःख भय क्षेम यह मनुष्य अपने कृत्यसे प्राप्त करता है ॥ ७० ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये भगवतः पुरुषोत्तमवरपदानं नाम तृतीयोऽध्यायः ।। ३.॥ ॥१३॥ - -
.
4
१
श्रीकृष्ण बोले, महाभागा द्रौपदी पूर्वजन्ममें किसी ब्राह्मणकी बडी सुन्दर रूपवती पुत्री थी॥ ३ ॥ हे तात !समय बीतनेपर यह दश वर्षकी हुई यह
रूप लावण्यमें श्रेष्ठ सुनेत्रा हुई ॥ २॥ यह चतुरताके गुणोंसे सम्पन्न पिताकी एकही पुत्री थी इस कारण यह गुणसुन्दरी पिताको अधिक प्यारी
थी ॥ ३ ॥ इसको ब्राह्मणने पुत्रकी समान पाला, कभी तिरस्कार नहीं किया, यह साहित्यशास्त्रमें कुशल और नीतिमें भी पंडिता थी ॥४॥
इस कारण अतिचतुर पृथ्वीमें दूसरी लक्ष्मीकी समान थी शुभ अशुभ गुणके ज्ञान और श्रेष्ठतामें विशारद थी॥ ५ ॥ हे राजन् ! नित्य सुखवाली
श्रीकृष्ण उवाच ॥ पांचाली या महाभागा पूर्वजन्मनि सुंदरी ॥ कस्यचिहिजमुख्यस्य पुत्री जाता सुमध्यमा ॥
॥१॥ कालेन गच्छता तात संजाता दशवार्षिको ॥ रूपलावण्यललितनयनापांगशालिनी ॥२॥ चातुर्यगुणसंपन्ना
पितुरेकैव पुत्रिका ॥ वल्लभातीव तेनेयं पाठिता गुणसुंदरी ॥३॥ लालिता पुत्रवत्रित्यं न कदाचित्पलभिता. ॥ सा-
हित्यशास्त्रकुशला नीतीवपि विशारदा ॥ ४ ॥ अतीव तेन चतुरा रमान्या च यथा भुवि ॥ शुभाशुभगुणज्ञानसौ-
ष्ठवेन विशारदा ॥५॥ नित्यं सुखवती राजन्पुत्रपौत्रकृतस्पृहा ॥ चिंतयंती तदा बाला ह्येवं मम कथं भवेत् ॥ ६॥
गुणभाग्यनिधिर्भता सुखदा मे सुताः कथम् ॥ एवं मनोरथस्यांतं न गता सा मनस्विनी ॥७॥ किंवा प्रीतिसमायुक्ता
पूजयामि सुरेश्वरम् ॥ किं वा मुनिमुपातिष्ठे किंवातीर्थसुपाश्रये ॥ ८॥
होनेसे एक दिन वह विचार करने लगी कि मैं पुत्र और पौत्रवाली कब हूंगी ॥ ६॥ किस प्रकार मुझे सुखनिधान स्वामी मिले और श्रेष्ठ पुत्र मेरे
किस प्रकारसे हों इस प्रकार वह मनस्विनी मनोरथके अन्तको न प्राप्त हुई ॥ ७ ॥ मैं प्रीतियुक्त होकर किस देवताकी उपासना करूं अथवा किस
मुनि वा किस तीर्थकी आराधना करूं ॥८॥
मा. भा २॥ अ. - सखियोंके सुन्दर पुत्र और उनके मनोरथ पूर्ण हैं परन्तु मेरे भाग्यके कारण यह कोई वस्तु नहीं है ॥ ९ ॥ मेरे पिता प्रमादसे मेरा विवाह नहीं करते इससे मैं बडी दुःखी हूं परन्तु सखीसमूहकी अध्यक्षा होनेसे मैं बडी मानवती हूं ॥ १०॥ मैं सुखकी ज्ञाता नहीं हूं मेरी भगिनी सुखी मैं अल्पभाग्यवती हूं परलोकगामिनी नहीं हूं ॥ ११ ॥ इस प्रकार वह बाला चिन्ता करती मनोरथसागरमें शोकयुक्तमन होकर वारंवार मन होनेलगी ॥ १२ ॥ इधर वह बुद्धिमान् ब्राह्मण अपनी पुत्री देनेके निमित्त वरको ढूंढते पृथ्वीमें विचरने लगे ॥ १३ ॥ वह किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण- सख्यो मे सुतसौंदर्यालोकनाप्तमनोस्थाः॥ मम. भाग्यप्रसंगेन दृश्यते मम नैवतत् ।। ९ ।। प्रमादी जनको मेऽपि तेनाई दुःखिता बहु ॥ अध्यक्षाहं सखीवृंदे तेन मानवंती दृढम् ॥ १० ॥ नाहं चैव सुखाभिज्ञा सुखिनो मम जामयः ॥ अल्पभाग्यवती चाहं न कापि परलोकगा ॥ ११ ॥ एवं चिंतयती बाला मनोरथमहोदधौ ॥ निममजातिदुःखेन शोकसंविनमानसा ॥ १२ ॥ मेधावी ऋषिराजोऽसौ विचचाल महीतलम् ॥ पुत्रीदाननिमित्ताथं विचिन्वन्सदृशं वरम् ॥ १३॥ नाप्तवान्द्रिजमुख्येशंस निर्गतमनोरथः ॥ सुता स्वकीयभाग्येन न प्राप्ता सहर्श वरम् ॥ १४॥ अवाप देवयोगेन ज्वरव्याधि सुदारुणम् ॥ स्फुटत्सर्वांगसंभिन्नहृदयो गतचेतनः ॥ १५ ॥ कन्यादानोक्तसंकल्पभमपद्मव- नालयः ॥ बह्वामयेन युक्तोऽसौ स्वगृहागमलालसः ॥ १६ ॥ कुमारको न प्राप्त हुए अर्थात् अपनी पुत्रीके भाग्यसे उसको सदृश वर न मिला ॥ १४ ॥ दैवयोगसे उसे बड़ा दारुण ज्वर प्राप्त हुआ उसके सर्वांगमें हडफूटन होने लगी हृदयमें , चैतन्यता न रही ॥ १५ ॥ उस समय उसके कन्यादानका संकल्प अमं होगया और महारोगयुक्त होनेसे उसको घर जानेकी इच्छा हुई ॥ १६ ॥ - .
स्वल्प बल होनेसे वह ब्राह्मण मूच्छित हो पृथ्वीमें गिरा और मदसे मत्त गजराजकी समान चलने लगा ॥ १७ ॥ घर आता हुआ वह पृथ्वीमें गिरा जबतक पुत्री पिताके लेनेको चली ॥ १८॥ तब वह ब्राह्मण उसको स्मरण करता पृथ्वीमें गिर प्राण त्यागता हुआ और भावि अर्थके कारण वह मनोरथको प्राप्त न हुआ॥ १९ ॥ गोविन्द विश्वेश जगन्निवास दामोदर चराचरके आधार सत्यभामाके स्थानमें रहनेवाले चक्रपाणि देवेश मेरी रक्षा करो ॥ २० ॥ इस प्रकार कहकर अपने नेत्रोंके सामने प्राण त्यांगन करते देख कि, जो जगत्के आनदं देनेवाले गदाग्रजका स्मरण कर स चलन्यपतन्मूर्छामाप्नुवन्नृषिणां वरः॥ मदिरामदमत्तांगो गजराज इवागमत् ॥ १७॥ आगच्छन्नेव भवनं स पपात धरातले ॥ यावत्सुता समादातुं पितरं द्रवति क्षणात् ॥ १८ ॥ तावत्परासुः संजातो भूसुरस्तामनुस्मरन् । भाविनार्थबलेनैव न प्राप्तश्च मनोरथः ॥ १९ ॥ गोविंद विश्वेश जगनिवास दामोदराधार चराचराणाम् ॥ श्रीसत्य- आमालय चक्रपाणे मां पाहि देवेश जगनिवास ॥२०॥ इति ब्रुवत्रसून्विप्रः संपश्यन्नयनाग्रतः॥ तत्याज जगदानं- दपादावाप गदाग्रजम् ॥ २१ ॥ सा निरीक्ष्य पितुः पातं हाहा कृत्वा. प्रधाविता ॥ अंके कृत्वा पितुर्देह विललापा- तिदुःखिता ॥ २२॥ कुररीव चिरं कालं विलप्य भृशपीडिता ॥ उवाच पितरं बाला जीवमानमिवात्मनः ॥ २३ ॥ 'हाहा पितुः कृपापूरपूरित प्रणयालयं ॥ कस्यांके मां निधायाय गतोऽसि त्वं महामते ॥ २४ ॥ पित्रा विहीना मात्रा बांधवैः श्वशुरेण च ॥ भर्चा चश्वा कुमार्यस्मिन् गतिः का मे भविष्यति ॥२५॥ ॥ २१ ॥ वह पिताका गिरना देख हाहाकार कर दौडपडी और पिताके देहको गोदीमें घर दुःखसे विलाप करने लगी ॥ २२ ॥ वह बहुत कुररीके समान विलाप करती हुई महापीडित हुई और अपने जीते हुएकी समान पितासे कहने लगी ॥ २३ ॥ हाहा पिता कपासे पूर्ण पालक हे महामते ! मुझे आप किसकी गोदीमें रखकर चले गये ? ॥ २४ ॥ मैं पिता माता बंधु और श्वशुरसे भी रहित हूं तथा भर्तृरहित भा.दी अ.४ -- कुमारी हूं मेरी क्या गति होगी । कन्याके प्रदानसमयमें आप त्रास करते थे आनंदके समय तुम यमालयमें जानेके योग्य नहीं हो ॥ २५ ॥ २६ ॥ अब वेदध्वनिसे रहित तुम्हारे इस आश्रममें किस प्रकार स्थित हूंगी ? हे द्विजश्रेष्ठ ! मेरी जीवनमें अब क्या इच्छा हो सकती है ॥ २७ ॥ हे दुहितृवत्सल ! मेरा विवाह विना किये आप धीरवान् इस लोकसे जानेको योग्य नहीं हो ॥ २८ ॥ यह कह वह बाला आंखोंमें आंसूं भरे पिताका मुख चूमने लगी और वह सुन्दरी महादुःखी हो ऊंचे स्वरसे रुदन करनेलगी ॥ २९ ॥ तपोवनवासी ब्राह्मण उसका रोना सुन कन्याप्रदानसमये कृतस्त्रासश्च मत्कृते ॥ आनंदसमये गंतुं नाहोऽसि त्वं यमालये ॥२६॥ कथं तिष्ठाम्यहं शून्ये निग- मध्वनिवर्जिते ॥ आश्रमे ते द्विजश्रेष्ठ का नु मे जीविते स्पृहा ॥२७॥ असंपायैव वैवाह्यं विधिं दुहितवत्सल ॥ न यातु मत्पिता धीरो लोकांतरमितो मम ॥ २८ ॥ इत्युक्त्वाश्रुमुखी श्यामा चुचुंब वदनं पितुः ॥ मुक्तकंठा रुरोदा" सुंदरी बहुलव्यथा ॥ २९ ॥ श्रुत्वा तन्निनद विप्रास्तपोवननिवासिनः ॥ किमेतन्महदाश्चर्य श्रूयते दारुणस्वनः ॥ ३० ॥ मेधाऋषेः सुताशब्दः श्रूयते करुणाकृतः॥ इति ते संभ्रमोपेता: समापेतुः सहस्रशः॥ ३१ ॥ शोकसंतप्तमनसो हाहा- कारपरा द्विजाः ॥ हंसा इव निदाघार्ताः बहुधा परिपीडिताः ॥३२॥ ददृशुक्रषिराजं तं सुताकस्थकलेवरम् ॥ समा- श्वास्य ततः कन्यां काष्ठान्यादाय तत्तनुम् ॥३३॥ कहने लगे कि यह क्या आश्चर्यका शब्द सुनाई आता है ॥ ३० ॥ वह मेधाऋषिकी बेदीका करुणाभरा शब्द सुनाई आता है इस प्रकार संभ्रमको प्राप्त हो सहस्रों ऋषि उसके निकट आयेः ॥ ३१ ॥ शोकसे संतप्त मन हो हाहाकार करने लगे जैसे गरमीसे व्याकुल हंस पीडित होते हैं इस प्रकार होगये ॥ ३२ ॥ और उन ऋषिराजके शरीरको सुताकी गोदीमें देखने लगे तब कन्याको समझाकर काष्ठ लाय उसका शरीर ॥ ३३ ॥ H ।
- अनिमें दग्ध कर वे सब ऋषि अपने अपने आश्रमको गये और हीनमनोरथ विपत्तिको प्राप्त हुई कन्या वहां निवास करनेलगी ॥ ३४ ॥ और अपने अनुरूप पति प्राप्त होनेकी इच्छा करने लगी ॥ ३५॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये ऋषिभिः कृतमृषिपुत्र्याः सान्त्वनं नाम चतु- र्थोऽध्यायः॥ ४ ॥.श्रीकृष्ण बोले-उस बनमें निवास करते उस कन्याकी शोकसे हिमकी सताई पमिनीकी समान दशा होगई ॥ वनमें यूथसे भ्रष्ट मृगीकी समान आंसुओंसे शरीरको भिजोती हृदयकमलको दग्ध करती ॥ २ ॥ निःश्वास लेनेसे दीन हुई मंत्रसे रुद्ध सर्पिणीकी दग्ध्वा विभावसौ सर्वे गताः स्वेस्वे निवेशने ॥ बाला तस्मिनिवसती आपद्गतमनोरथा ॥३४॥ चिंतयाना तु सहर्श पतिमाशु द्विजात्मजा ॥३५॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये ऋषिभिः कृतमृषिपुत्र्याः सांत्वनं नाम चतुर्थोऽ- ध्यायः॥४॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ निवसत्यास्ततस्तस्यास्तस्मिन्नेव तपोवने ॥ शोकेन च पराक्लिष्टां हिमाक्तां पद्मिनी- मिव ॥ १॥ शून्यकाननमासन्नां यूथभ्रष्टां मृगीमिव ॥ गलद्वाष्पोषपूराक्तज्वलद्धृदयपंकजाम् ॥२ ॥ निश्वासपरमां दीनां संरुद्धामुरगीमिव ॥ चिंतयंतीमपश्यती दुःखपारं कृशोदरीम् ॥३॥ तामाससाद भगवान्भविष्यबलनोदितः॥ यदृच्छया ऋषिईप्तः परमः कोपनो मुनिः॥४॥ यद्विलोकनमात्रेण तप्येदपि शतक्रतुः ॥ जटाकलापसंछन्नः साक्षा- दिव सदाशिवः॥५॥ यस्ते जनन्या राजेंद्र शैशवे च प्रसादितः ॥ निर्जराकर्षिणीं विद्यां ददावस्यै सुपूजितः ॥६॥ समान स्थित थी और वह कशोदरी दुःखका पार न जानकर विचारने लगी।॥ ३ ॥ भविष्यके बलसे प्रेरित भगवान् उसके निकट आये अर्थात् वह परम कोपन. स्वताव दृप्त ऋषि स्वेच्छासेही वहां आये ॥ ४ ॥ उनके देखने मात्रसेही इन्द्रकोनी आधक ताप होता था जटाकलापसे संछन्न साक्षात् शंकरकी समान ॥ ५ ॥ हे राजेन्द्र ! जो कि तुम्हारी माताने बडी प्रीतिसे शिवभक्त दुर्वासाको प्रसन्न किया था इस कारण इन्होंने !-
भा. टी
अ..५
प्रसन्न हो इनको देवताओंके बुलानेकी विद्या प्रदान की थी॥६॥ हे राजन् ! जिन्होंने अत्यन्त सेवा करनेवाले मुझकोनी अत्यन्त कोपसे पीडित
किया कि ऐसा कोई न करेगा॥ ७ ॥ अर्थात् हमको और रुक्मिणीको कुसुमाकर रथमें लगाया जलकी इच्छा करनेपरभी उस बालाको जलन
देकर पीडित किया ॥८॥ महाक्रोधसे व्याप्तशरीर साक्षात् रुद्रके अंशसे सम्भूत दूसरे कालरुद्रकी समानही दूसरा शरीर धारे ॥ ९ ॥
अत्रिका महातपरूपी वृक्षका दिव्य फल, पतिव्रताशिरोमणि अनसूयाके गर्भसे उत्पन्न ॥ १० ॥ बुद्धिमान् दुर्वासाजी साक्षात् ब्रह्माकी समान
येनाइमपि भूपालचक्रे चर्चितपादुकः ॥ कोपेन पीडितोऽत्यर्थं न यथान्यः पुमान्कचित् ॥ ७ ॥ रथे संयोजितो
राजन्नुक्मिण्या कुसुमाकरे ॥ जलमर्थयती बाला तृषया पीडितात्यलम् ॥ ८॥ तीवकोपपरीतांगः शशाप वनितां
तदा ॥ साक्षाद्रुद्रांशसंभूतः कालरुद्र इवापरः ॥ ९॥ अनेरुयतप कल्पवृक्षे दिव्यं फलं महत् ॥ पतिव्रताशिरोरत्नान-
सूयागर्भसंभवः ॥ १० ॥ दुर्वासा नाम मेधावी परमेष्ठीव मूर्तिमान् ॥ नैकतीर्थजलक्किन्नजटाभासुरसच्छिराः ॥११॥
तमालोक्य समायांतं ब्राह्मणी शोकसागरात् ॥ उन्मज्ज्य नेत्रकमले सुस्वरा मृदुभाषिणी ॥ १२॥ ववंदे चरणो मूर्धा
मुनेद्भुतकर्मणः ॥ नत्वा स्वाश्रममानीता वाल्मीकेर्जानकी यथा ॥१३॥ अपूजयद्वरारोहा ऋषिराजं तपस्विनी॥
अघोदिक्रियया सम्यग्वन्यैरुच्चावचैरपि ॥१४॥
-
-
मूर्ति धारण किये अनेक तीर्थोके जलसे धोई जटाभारसे शोभित थे॥ १,१ ॥ उन ऋषिको आया देख शोकसागरसे उठ वह बाह्मणकुमारी अपने
नेत्रोंको खोल अच्छे स्वरसे बोलनेवाली ॥ १२ ।। अद्भुतकर्मा मुनिके चरणोंको शिरसे प्रणाम करती हुई और नमस्कार कर - ऐसे 'उनको अपने
आश्रममें लिवा.लाई जैसे वाल्मीकि जानकीको लायेथे ॥ १३ ॥ उस तपस्विनी सुमुखीने ऋषिराजकी पूजा वनके छोटे बडे फल पुष्पादिसे
॥३४॥
। उनकी यथेष्ट पूजा की ॥ १४॥ क्रियासे निवृत्त हो सुखसे बैठेहुए ऋषिकी उपासना करनेलगी और वह सुनेत्रा उनका स्वागत कर इस प्रकार पूछने लगी ॥१५॥ हे अत्रिगोत्रोत्पन्न भगवन् ! आप भले आये, हे भगवन् ! आपके चरणोंकी देवसमूह वन्दना करते हैं ॥ १६ ॥ तुम कमलके रजकी समान शोषित होते, जटाभारसे विराजित हो सुरासुरोंसे वन्दनीय ब्रह्मचिन्तनमें तत्पर ॥ १७ ॥ जिनके नामस्मरणसे अनेक दुःखका क्षय होता है आप सब सिद्धि के समुद्र हो शीघ्र कौन तुम्हारा दर्शन कर सकता है ॥ १८॥ आपको देखने और नमस्कार करनेसे सब पाप सत्कृत्य सुखमामासीनमुपासांचक्र ईश्वरम् ॥ भामिनी स्वागतं वाक्यमुवाच शुभलोचनी ॥ १५॥ स्वागतं तेऽस्तु भगवन्नत्रिगोत्रसमुद्भव ॥ वृन्दारकवृंदवंद्यपदपम मुनीश्वर. ॥ १६॥ लसत्कदंबकिंजल्कजटाभारविराजित ।। सुरासुरै- वंदनीय ब्रह्मचिंतनतत्पर ॥ १७॥ यन्नामस्तुतिमात्रेण ह्यनेकदुःखसंक्षयः ॥ सर्वसिद्धिंसमुद्रेकः सद्यो भवति दर्शनात् ॥ १८॥ त्वां दृष्ट्वा चैव नत्वा च सर्वपापक्षयो भवेत् ॥ मदीयमृषिशार्दूल येन. प्रश्ने मम स्पृहा ॥ १९॥ कुतोऽधि- गमनं साधो तीर्थादिनिमिषण किम् ॥ अभाग्याया मम पुनर्भाग्यलेशन प्राप्तवान् ॥ २० ॥ अथवा मत्पितुः पुण्य- प्रवाहप्रेरितः किम् ॥ श्रीमद्विचलनं ब्रह्मन्नृणामघविनाशकृत् ॥ २१ ॥ गृहांधकूपे पतितां स्वैः पापैर्दुष्टचेतसाम् ।। भवादृशां पदस्पर्शस्तीर्थकोटिसमो भवेत् ॥ २२ ॥ क्षय होजाते हैं है ऋषिशार्दूल ! मुझको कुछ आपसे पूछनेकी इच्छा है ॥ १९॥ हे भगवन् ! आपका इधर आना किसी तीर्थक मिससे दुआ हे भगवन् !. मुझ अभागिनीके भाग्यलेशसे यह वार्ता प्राप्त हुई है ॥ २०॥ अथवा कोई मेरे पिताके पुण्यप्रभावसे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है, आपका दर्शन मनुष्योंके पापका दूर करनेवाला है ॥ २१ ॥ गृहरूपी अंधकूपमें पड़े अपने पापोंसे दुष्टचित्त हुए पुरुषोंको आपके चरणोंका स्पर्श 1 -- , भा. टी. अ.५. कोटितीर्थोंकी समान होता है ।। २२ ।। यह वाक्य कह कह ब्राह्मणकन्या नीचेको मुख कर स्थित हुई । तब शिवके अंश दुर्वासाजी हँसकर उससे कहने लगे ॥ २३ ॥ हे बाह्मणकन्ये ! तू धन्य है तैने कुलका उद्धार करदिया मैं धर्ममें तत्पर शिवपूजन कर ॥ २४ ॥ कैलासमें तेरी धर्मशीलता जानकर आयाहूं, मैं तेरे चरित्रसे प्रसन्न और तेरे पिताके स्नेहसे यंत्रित हूं ॥ २५॥ तेरे आश्रमको प्राप्त हो तुझसे पूजित हुआहूं, हे वरारोहे ! अब मैं बदरिकाश्रमको जाताहूं ।। २६ ॥ वहां नरनारायणका दर्शन करूंगा और वहां उप तप करनेकी मेरी इच्छा है ।। २७ ॥ उक्त्वा वाक्यं द्विजसुता तस्थौ तूष्णीमवाङ्मुखी ॥ सुस्मितं मुनिराहेदं दुर्वासा गिरिशांशजः ॥ २३ ॥ साधुसाधु द्विजसुते कुलमप्युद्धतं त्वया॥धार्मष्ठस्य च मेधावेः परस्य शिवपूजने॥२४॥कैलासादहमागच्छं ज्ञात्वाते धर्मशीलताम्।। त्वचरित्रेण प्रीतोऽहं त्वात्पतुः स्नेहयंत्रितः ॥ २५॥ त्वदाश्रमपदं प्राप्तस्त्वया संपूजितो ह्यहम् ॥ गमिष्यामि वरारोहे, श्रीमद्वदरिकाश्रमे ॥ २६ ॥ द्रष्टुं नारायणं देवं नरयुक्तमनुद्धतम् ॥ तपश्चरन्तमेकायमनुग्रं चिरसंस्थितम् ॥ २७ ॥ द्रष्टुकामोऽस्मि मुश्रोणि तव दुःखं महत्तरम् ।। अंतराधिप्रदीप्तन वह्निना सा प्रदीपिता ॥ २८ ॥ कन्योवाच ॥ ऋषे त्वदर्शनादेव संशुष्क शोकसागरः ॥ परितोऽपि शुभं भावियत्संतुष्टस्त्वमात्मना ॥२९॥ किं न वेत्सि तपाश्लाधिन्मम शोकस्य कारणम् ॥ हर्षदं तु न मे किञ्चिदृश्यते त्वं विचारय ॥३०॥ न माता न पिता भ्राता न मित्रं न च बांधवः॥ कुमारो न च मे भर्ता स कालोऽप्यतिवर्तते ॥३१॥ है सुन्दरी ! मैं तुम्हारे महादुःखका कारण देखने की इच्छा करताहूं, जो तुम्हारे अन्तरमें आमिके समान प्रदीप्त है ॥ २८॥ कन्या बोली-हे ऋषे! आपके दर्शनसे मेरा शोकसागर नष्ट होगया है और जो आप संतुष्ट हुए हो तो आगेको शुभ होनेकी भी आशा है ॥ २९ ॥ हे तपमें तत्पर ! क्या आप मेरे शोकका कारण नहीं जानते हो, मुझे कोई भी प्रसन्न करनेवाला नहीं दखिता यह आप विचारिये ॥ ३० ॥ मेरे माता पिता भाता बंधु ॥१५ ।
कोई नहीं है यह जानिये मेरा विवाह नहीं हुआ कुमारी हूं विवाहका काल बीता जाता है ॥ ३१ ॥ जिवर देखती हूँ वही दिशा मुझे शून्य विदित होती है. हे भगवन् ! कोई भी ऐसा आय है ? जिससे नेरा दुःख नष्ट हो ॥ ३२ ॥ आप ऐसा कीजिये जिससे मेरा कल्याण हो, हे शिवांश- सम्भूत ! वह करो जिससे शूद्रता प्राप्त न हो मुझको सुख देनेवाला हो ॥ ३३ ॥ जो मेरे पिता होते तो कुछ चिन्ता न थी वह भी अकालमें कालकवलित हुए सबको थोडा बहुत सुख होता है परंतु मैं क्यों एकान्त दुःखी हूं ॥ ३४ ॥ वह कोकिलकंठी यह वचन कहकर कुछ न यां यां दिशं प्रपश्यामि सा सा शून्या विभाति मे ॥ कोऽप्युपायः सदृष्टोऽस्ति येन मे दुःखसंक्षयः ॥ ३२ ॥ दिश तं शिवसंभूत वृषली येन नोऽभवम् ॥ भवेऽस्मिस्तव शापोऽस्ति मामेकश्च शुभप्रदः॥३३॥ चेद्भवेन्मे जनकः सोऽप्यकाले दिवं गतः॥ सर्वथाल्पसुखिन्येवाहं चैकाप्यतिदुःखिता ॥३४॥ वाक्यमुक्त्वा पिककंठी किंचिनोवाच सुंदरी ॥ ध्या- त्वोवाच ऋषिदेवी, कारुण्यभररंजितः ॥ ३५ ॥ ऋषिरुवाच ॥ शृणु सुंदारे यत्नेन कस्यापि कथितं न मे ॥ वक्ष्यामि तुभ्यं सुश्रोणि त्वद्गुणेन सुयंत्रितः ॥ ३६॥ तृतीये सुभगे सुभ्र हायने परमाद्भुतः ॥ भविष्यति वरारोहे मासो वै पुरुषोत्तमः ॥ ३७ ॥ यस्मिन्नातो नरस्तीर्थे मुच्यते भ्रूणहत्यया ॥ अपि स्नानान्महापुण्ये मासे किसुत सा- धनात् ॥ ३८॥ नायं तुल्यो भवेदेवि मासैरन्यैः सुशोभनैः ॥ साधनानि समस्तानि ऋपिप्रोक्तानि सुंदरि ॥ ३९ ॥ बोली तब ऋषि दया कर क्षणमात्र ध्यान कर बोले ॥३५॥ दुर्वासाजी बोले-हे सुश्रोणि ! यलसे सुन यह मैंने आजतक किसीसे नहीं कहा परंतु तेरे गुणसे यंत्रित हो कहताहूं ॥ ३६॥ हे सुचू ! तीसरे वर्ष परम अद्भुत पुरुषोत्तम मास होगा ॥ ३७ ॥ जिस मासमें तीर्थयात्रा कर तीर्थमें नहानेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे छूट जाता है स्नानसेही बड़ा पुण्य होता है साधन करै तो क्या बात है ॥ ३८ ॥ हे देवि ! हे मुशोजने ! इसके समान .
, ! अ. और कोई महीना नहीं है. हे सुन्दरी ! इससे ऋषियोंने अनेक साधन कहे हैं ॥ ३९ ॥ और महीने उनकी सोलहवीं कलाके जी बराबर नहीं हैं सब महीने और पखवारे ॥ ४० ॥ भी इसके एक दिनके स्नानके फलको नहीं प्राप्त होते हैं। हे शोचने ! जो अन्नदानका फल होता है ॥ ४३ ॥ वह जप उपवास दानका फल इसके एक दिन सेवनसे होता है, यह सर्वथा सब महीनोंके शिरसर स्थित है ॥ ४२ ॥ इस कारण तुम पुरुषोत्तम मासका सेवन करो। हे ब्राह्मणकन्ये ! यह नारायणको अत्यन्त प्रिय है ॥ ४३ ॥ हे भामिनी ! यह मास जब प्राप्त होता है तब मैंभी इसकी सेवा मासस्य तस्य नाहति कलामपि च षोडशीम् ॥ सर्वे मासास्तथा पक्षाः सर्वाण्यन्यानि भामिनि ॥ ४० ॥ एक- स्मिन्दिवसे स्नानमाहात्म्यं नानुयांति हि ॥ अन्यदानस्य पुण्यं यद्धृतं भवति शोभने ॥४१ ॥ जपोपवासदानानि तदस्मिन्नैकसंख्यया ॥ सर्वथा सर्वमासानां शिरःस्थाने व्यवस्थितः॥४२॥ तस्मानिपेवयाशु त्वंमासंवै पुरुषोत्तमम् ॥ अत्यंतकैटभारातिप्रियोऽयं भूसुरात्मजे ॥ ४३ ॥ मयापि सेव्यते नित्यं यदा प्राप्नोति भामिनि ॥ विष्णुनामा स विज्ञातः कोऽन्यो भवितुमर्हति ॥४४॥ मुंचत्राज्ञऽबरीपाय क्रोधं कृत्वा सुदारुणम् ॥ तदा त्रातोऽस्य पुण्येन विष्णुचक्रा- त्सुदुःसहात् ॥४५॥ सोऽहं शक्तः सुनाभस्य तेजः परमदारुणम् ॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशंब्रह्मांडानां च भस्मकृत् ॥४६॥ युगांताग्निसमं तस्य भूरिशो दाहकस्यचित् ॥ मुक्तो मासप्रभावेण तेज़साई समेधितः ॥ ४७ ।। करताहूं, यह विष्णुके नामसे विख्यात है कौन इसकी बराबरी कर सकता है ॥ ४४ ॥ जब मैंने अज्ञानतासे अम्बरीषके ऊपर दारुण कत्या छोडीथी तब उसके पुण्यने विष्णुके चक्ररूपसे रक्षा कीथीं ॥ ४५ ॥ सो मैं सुनानके परम दारुण कोटि सूर्यके समान प्रकाशित जगत्के भस्म करनेमें समर्थ ॥ ४६ ॥ युगान्तानिके समान चारों ओरसे व्याध उसके तेजसे आहत हो मैं इस महीने के पुण्यप्रभावसेही मुक्त हुआ था ॥ ४७ ॥ . । ।
.
.
नहीं तो नारायणके हाथसे छुटे हुए चक्रसे कौन मुक्त हो सकता है चाहै साक्षात् देव इन्द्र के शत्रुका मारनेवालानी क्यों न हो ॥ ४८ हे वामोर !
न और कोई जीवनसे बच सकता है हे वामांगी ! उस दिनसे मुझे बडा विस्मय हुआ ॥ ४९ ॥ अहो इस महीनेका ऐसा प्रभाव है जिसे कोई
नहीं जानता कारण कि, महामाहात्म्यवाले विष्णुने इसे स्वीकार किया है ॥ ५० ॥ हे सुओणि ! इस कारण श्रीमान् पुरुषोत्तम मासका तुम भजन
करों जिसका सम्यक् व्रत करनेसे आनन्दकी प्राप्ति होती है ॥ ५१ ॥ इस सूर्यरूप व्रतसे दुःखरूपी अंधकार दूर होजाता है. हे वरानने ! प्राणी इसको
नो चेदरिकरान्मुक्तचक्रकोपाद्विमुच्यते ॥ यदि साक्षाद्भवेदेवः सहस्रनयनारिहा ॥४८॥ कश्चिदन्योऽपि वामोरु
जीवन्याति कथंचन ॥ तदोप्रभृति वामांगि विस्मयो मे महानभूत् ॥ १९ ॥ अहो ह्येतादृशो मासो, न ज्ञातः केन
हेतुना ॥ महामाहात्म्यवान्विष्णुयनायसुररीकृतः ॥५०॥ तस्माद्भज त्वं सुश्रोणि श्रीमंतं पुरुषोत्तमम् ॥ यस्मिश्चीर्ण-
व्रताःशश्वत्सौख्यसागरगामिनः॥५१॥ दुःखध्वांतोंगपुंजीवनाशो विद्धि हि भास्करम् ॥ तावदन्ये प्रशंसंति स्वात्मा-
नं च वरानने ॥५२॥ नोदितः पातकध्वांतविध्वंसचतुरो रविः । तत्साधनसहस्राणि निरस्य त्वं द्विजात्मजे ॥ ५३॥
केवलं हरिनामानं मासं तिष्टस्व सर्वथा ॥ इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलो विरराम स खिन्नवत् ॥५४॥ न शशाक पुनर्वहुं मास-
माहात्म्यमद्भुतम् ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ इति श्रुत्वा ऋषेर्वाला बाल्यान्मोहाच गर्वतः ॥५५॥
जबतक प्राप्त नहीं हुआ है तभीतक दूसरे व्रतोंकी प्रशंसा है ॥ ५२ ॥ जबतक पातकरूपी अंधकार नारा करनेको पुरुषोत्तमा सूर्योदय नहीं
होता है हे द्विजात्मजे ! सो तू सहस्रों दूसरे साधनोंको छोडकर ॥ ५३ ॥ केवल हरिनान मासके स्मरणमै सर्वया स्थित हो इस प्रकार कह खिन्न हुएके
समान मुनि मौन हुए ॥ ५४ ॥ और फिर इस मासके माहात्म्य कहनेको समर्थ न हुए, श्रीकृष्ण बोले-वह बाला ऋषिके यह वचन सुन मोह
और गर्वसे ॥ ५५॥
भा. टी. अ. और होनहारके वशसे असूयापरवश हुई और ग्रंथके मतको ग्रहण कर मुनिक वचनको स्वीकार नहीं किया ॥ ५६ ॥ वह सुन्दरी क्रूर और कल्पित मतको विचारने लगी कन्याने कहा हे ब्रह्मन् ! यह आपका-वाक्यविस्तार मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ ५७ ॥ मावादि महीनोंको अतिक्रमण कर आप कैसे ऐसे वचन कहते हो यह सम्पूर्ण शास्त्रका तिरस्कार आपको योग्य नहीं है ॥५८॥ आप कार्तिकादि मास और चान्द्रायणादि बत त्यागकर इसको किस प्रकार कहते हो ॥ ५९॥ हे मुने ! वैशाख महीना क्या व्रत करनेसे मुक्तिदाता नहीं है, क्या सदाशिवादि भाविनोऽपि बलाञ्चेव सासूयापूरिताभवत् ॥ अन्य ग्रंथमतं मृह्यानाहत्य मुनिभाषितम् ॥५६॥क्रूरमंतककल्पं हि सा चिंतयति सुंदरी ॥ कन्योवाच॥न मह्यं रोचते ब्रह्मस्त्वदीयो वाक्यविस्तरः ॥१७॥ कथं माघादिमासांस्त्वमतिक्रम्याव- भाषसे ॥ न वै त्वय्युपपद्येत सर्पशास्त्रोपमर्दनम् ॥५८ ॥ कथं कार्तिकमासं त्वमूनं वदसि तद्वद ॥ चांद्रायणादिक त्यक्त्वा विरुद्ध किं प्रभाषसे ॥५९॥ वैशांखः किमु नोदाता फलानां चरितव्रतः ॥ सदाशिवादयो देवाः सिद्धिदा न भवंति किम् ॥६० ॥ भगवानुक्मिणीनाथः सेवितो न सुखप्रदः॥ अथवा भुवि मार्तंडो देवः प्रत्यक्षदर्शनः ॥ ६ ॥ दर्शनात्स्पर्शनाध्यानाडुःखौघौषविनाशनः ॥ किंवाष्टादशदोर्दडराजिता जगदंबिका ॥ ६२ ॥ शाकंभरी महादेवी कष्टइंत्री भवेन्नहि ॥ सिंदुरारुणसद्दात्रशुण्डपुष्करराजितः ॥ ६३ ॥ दुःखहा न भवेत्किंतुं श्रीमान्विघ्नविनाशकृत् ।। व्यतीपातादिकान्योगानुपरागानपि प्रभो ॥ ६४ ॥ देवता मुक्ति देनेवाले नहीं हैं ॥ ६० ॥ क्या भगवान् रुक्मिणीनाथ सेवन करनेसे सुख देनेवाले नहीं हैं अथवा मार्तण्डदेव् सेवन करनेसे प्रत्यक्ष दर्शनवाले नहीं हैं ॥ ६१ ॥ क्या यह देव दर्शन स्पर्श और ध्यानसे दुःखसमूह नाश नहीं करते वा अठारह भुजासे युक्त जगदम्बा ॥ ६२ ॥ शाकंभरी देवी कष्ट हरनेवाली नहीं है सिंदूरकी समान अरुणशरीर शुण्डमें शोभित कमल ॥ ६३.॥ विनविनाशी गणेशजी क्या दुःखहारी नहीं हैं ॥१७॥ । .
. प्रभो ! व्यतीपातादि योग और ग्रहण ॥ ६४ ॥ सम्पूर्ण पुण्ययोग संक्रांति अयन तप नियम और उपासनीय अनेक देवता हैं ॥ ६५ ॥ आप सबको कर कहनेमें लज्जित क्यों नहीं होते हो। हे द्विज ! आपने क्या आश्रय कर मलमासका प्रकाश कियाहै ॥ ६६ ॥ सब साधनोंकी निन्दा कर यह वार्ता आपको कहनी योग्य नहीं है । हे मुने ! सब प्रकारके दुःख और भवसागरसे पार करनेवालेको मैं जानतीहूं ॥६७॥ हे भूदेव ! उन्हीको रात दिन चिन्ता करती उनके सिवाय दूसरेको नहीं जानती । कौशल्यानंदन राम और जानकीके सिवाय और नहीं जानती ॥ ६८॥ अथवा गंगाधारी पुण्ययोगानपि सर्वान्संक्रांति यनेऽपि च ॥ तपास्यन्यानि नियमानुपास्यानपि देवताः ॥६५॥सर्वानुल्लंघ्य वदत- स्त्रपाते किं न जायते ॥ किमाश्रित्य त्वया विप्र मलमासः प्रकाशितः।। ६६ ॥ नैवं वक्तुं भवान्युक्तः सर्वसाधननि- दनः ॥ वेझ्यहं सर्वदुःखानां पारदं भवसागरे । ६७॥ नान्यं पश्यामि भूदेव चिंतयंती दिवानिशम् ॥रामा जानकी- जाने कौशल्यानंदवर्द्धनात् ।। ६८॥ अथवा स्वर्धनीपूरधारिणः शंकराहते ॥ बाणासुरदशग्रीवादयः सिद्धि पुरो गताः ॥६९ ॥ पुत्रपौत्रमयीं सिद्धिं यथेष्टां माषपूजनात् ।। भगवान्देवकीपुत्रो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः ॥७०॥ सदाशिवप्र- सादेन लेभे पुत्रान्सहस्रशः ॥ विहाय तं महादेवं धूर्जटिं शशिशेखरम् ।। ७१ ॥ एतान्विहाय सततं कथमेनं प्रशंससे ।। नैतन्मे रोचते ब्रह्मस्तव वाक्यं न संशयः॥७२॥ करके सिवाय और कौन देव है जिनकी आराधना करनेसे रावण बाणासुर आदिक सिद्ध होगये ॥ ६९ ॥ मायके पूजनसे पुत्रपौत्रमयी सिद्धि मिलती है उसमें भगवान् भक्तवत्सल देवकीनंदनका पूजन होता है ॥ ७० ॥ सदाशिवके प्रसादसे सहस्रों पुत्रोंको प्रान हुए उन धूर्जटि शशिशे- । खर महादेवको छोडकर ॥ ७१ ॥ तथा अन्य देवताओंका छोङकर आप कैसे इस महीनेका वर्णन करतेहो । हे ब्रह्मन् ! निःसन्देह मुझे आपका वाक्य . , .
- भा.टी. अ. अच्छा नहीं लगता ॥ ७२ ॥ उस समय उस कन्याके यह वचन कहने पर वह क्रोधी मुनि शरीरसे प्रकाशमान हो क्रोधसे लाल नेत्र कर ॥ ७३ ॥ जैसे कि घृतसे प्रज्वलित हुत अग्निपर कोई जल छिडके इस प्रकार व्याकुल हो कुछ न बोले क्रोधसे चिन और शरीर चलायमान होगया ॥ ७४ ॥ मुहूर्तमात्रतंक इधर उधर देखते रहे और फिर उसके वाक्यको विचारते हुए भगवान् बोले ॥७५॥और मित्रसुता जानकर क्रोधित होकरभी उसे शाप एवमुक्तस्ततो विप्र पुत्र्या सक्रोधनो मुनिः ॥ जाज्वल्यमानोवपुषारोषसंरक्तलोचनः ॥ ७३ ॥ जज्वालाज्यसरिद्धा- रोसिक्तकालाग्निवन्मुनिः । नोवाच किंचित्कुपितश्चलक्लिष्टकलेवरः॥७४ ॥ मुहूर्तमात्र तत्रैव तस्थौ दिगंवलोकनः।। अथावभाषे भगवांस्तद्वाक्यमनुशीलयन् ॥ ७९ ॥ कुपितोऽपि शशापैनां नैव मित्रसुता हि सा ॥ कुमारी ललिता बाला दुःखदग्धा निराश्रया ॥ ७६ ॥ किं करिष्यति मच्छापदग्धा प्रागेव भजिता ॥ ऋषिरुवाच ॥ भो भो बाले न मे कोपस्त्वयि त्राता ततः शुभे ॥ ७७॥ येन चेतः प्रसन्नं स्यात्नत्कुरुष्व शुचिस्मिते ॥ नाहं वक्ष्यामि ते किंचित्त्व- त्पुरः शुभशंसिवत् ॥ ७८ ॥ नोपचारस्त्वदीयोऽस्ति मनागपि कथंचन ॥ भाग्यहीने नरे व्यर्थ उपदेशो भवेच्छुभे ॥७९॥ मुमूषोभेषजं यद्वत्तीबे दारपरिग्रहः ॥ अंधा च यथादर्शः पुस्तकं च जडाग्रतः ॥८० ॥ मरौ कूपखनिर्य- द्वद्गतासोभूषणक्रिया ॥ ऊपरे बीजनिक्षेपः सागरे वृष्टिरुद्गता ॥ ८१ ॥ · । नहीं दिया, कारण कि वह कुमारी बाला स्वयं दुःखसे दग्ध होरहीथी ॥७६ ॥ यह तौपहलेही दग्ध होरहीहै इसको मेरा शाप क्या करेगा यह विचार ऋषि बोले-हे बाले ! हे शुओ ! तुझपर मेरा कोप नहीं है ॥ ७७ ॥ हे शुचिस्मिते ! जिसमें तेरा चित्त प्रसन्न हो सो करो और मैं तेरा शुभशंसी अब और कुछ में कहूंगा ॥ ७८॥ तुझमें किंचिनी उपचार नहीं है भाग्यहीन मनुष्यको उपदेश व्यर्थ है' ॥ ७९ ॥ मरनेवालेको औषधी देनीसी है जैसी नपुंसकको बाकी प्राप्ति, अंधेके आगे जैसे दर्पण, मूर्खको जैसे पुस्तक ॥ ८० ॥ मरुदेशमें कुएका खोदना और मरे हुएको भूषणोंसे सजाना, ऊपरमें बीजका बोना ॥१८॥ । , । और सांगरमें वर्षा ॥ ८१ ॥ कृतन मित्रके ऊपर कपा, सागरमें जल डालना, दुर्जनसे सद्वचन कहना यह सब निष्फल हैं ॥ ८२॥ हे भाग्यरहिते ! जो तेरे मनमें है वह तू निरंतर कर मेरा वचन मुझमें स्थित रहो ॥ ८३ ॥ औरभी मैं कुछ तुझसे कहता हूं सुन जो कि तैने विष्णुके महीनेका निरादर किया है ॥ ८४ ॥ सर्वथा उसका फल इस जन्म वा परजन्ममें मिलेगा अब मैं तुझसे पूछकर विशाल बदरीवनको जाताहूं ॥ ८५ ॥ हे मित्र कृपा कृतने च सागरे च यथा पयः॥ तत्सर्वं निष्फलं यदुर्जने सद्वचस्तथा ॥ ८२ ॥ यत्ते चेतसि संजातं मुटुभाग्यविवर्जिते ॥ तत्त्वं कुरुष्व सततं मदचो मयि संस्थितम् ॥ ८३ ॥ परं किंचित्समाख्यास्ये शृणु तन्नियंली. कतः ॥ विष्णुश्रेयस्य मासस्य यत्त्वया नादरः कृतः॥ ८४ ॥ सर्वथा तत्फलं लभ्यमिह वा परजन्मनि ॥ गच्छामि तेऽभ्यनुज्ञातो विशालां बदरीमहम् ॥ ८५॥ शापं दमि न वामोरु मित्रो मे त्वत्पिता यतः ॥ मित्रद्रोहो भवेन्मह्यं शप्तायां त्वयि सर्वथा ॥ ८६ ॥ तेन मे संयतः कोपः कालकूटसमाकृतिः ॥ स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि मा मे काल- व्ययो भवेत् ॥ ८७ ॥ शुभं शुभेतर भावि न केनाप्यवगम्यते ॥ ८८ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये दुर्वा- ससऋषिपुत्र्या सह संवादो नाम पंचमोऽध्यायः॥५॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ इति वाचसुदीर्यासो जगामात्रिसमुद्भवः ।। क्षणादृषिमुता जाता निष्प्रभा मुनिवाक्यतः॥ १ ॥ रु ! जिस कारण कि तेरे पिता मेरे मित्र थे इस कारण मैं तुझको शाप नहीं देता हूं तुझको शाप देनेमें सर्वथा मित्रद्रोह होता है ॥ ८६ ॥ इस मैंने कालानलकी समान क्रोधको रोक लिया है तेरा मंगल हो मैं जाता हूँ मेरा कालव्यय न हो ॥ ८७ ॥ होनहार सुख दुःखको कोई नहीं जानसकता ॥ ८८ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये दुर्वाससकषिपुत्र्या सह संवादो नाम पंचमोऽध्यायः ॥ ५ ॥ यह वचन कह अत्रिपुत्र दुर्वा- भा. टी. अ.६ साजी चलेगये और उनके वाक्यसे ऋषिसुता क्षणमात्रमें प्रभाहीन होगई ॥ ३ ॥ और बहुतकालतक विचार करती रही कि अब मुझको क्या करना चाहिये अब मैं तपसे पार्वतीपति देवेशकी आराधना करूंगी ॥ २ ॥ दुःखरूपी अमिदुःखका कुण्ड दुःखका स्रुव है उसमें दुःखरूप दुर्वासाही होता और दुःखरूपी घृत आहुति है ॥ ३ ॥ इस समिद्ध हुई अमिको कोई जलसे बुझानेवाला नहीं है केवल संकटमोचन शंकरही इससे छुडानेवाले हैं ॥ ४ ॥ यह मनमें विचार कर वह ऋषिकन्या मुनिके वाक्यको अनादर कर दुर्वासाके वाक्यसे मुग्ध हुई ॥ ५॥ वह कल्याणी दुष्कर तप करने लगी विमृश्य सुचिरं कालं किंतु कार्य मयाधुना ॥ आराधयामि. देवेशं तपसा पार्वतीपतिम् ॥ २ ॥ दुःखानौ दुःख- कृत्कुंडे दुःखसुश्रुवसंभृते ॥ दुर्वासा दुःखहोतायं दुःखाज्यं हुतवान्किल ॥ ३ ॥ समिद्धपावकस्यास्य सेक्ता नास्त्यधुनांबुना ॥ सदाशिवाहते शंभोईढसंकटमोचनात् ॥ ४ ॥ इति निश्चित्य मनसा ह्यायी कन्यका तदा ॥ अनादृत्य मुनेर्वाक्यं मुग्धा दुर्वाससः शुभम् ॥५॥ समारभत कल्याणी तपः परमदुष्करम् ॥ चिंतयंती शिवं शांत पंचवकं सनातनम् ॥६॥ भुजंगभूषणं देवं नंदि गिनिषेवितम् ॥ चतुर्विंशतितत्त्वेशं गुणैस्त्रिभिरभिष्टुतम् ॥ ७ ॥ महासिद्धिभिरष्टाभिः प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ महत्तत्त्वेन दीप्तेन ह्यहंकारेण संस्तुतम् ॥८॥ चंद्रकांत्या लसद्भालं जटारा- जिविराजितम् ॥ चचार दुश्चरं बाला तमुद्दिश्य सदाशिवम् ॥ ९॥ कर्तुं शक्यं न केनापि तपः परमदारुणम् ॥ पंचानामनिनां मध्ये स्थायिनी ग्रीष्मगे खो॥१०॥ और पंचमुख सनातन शिवका विचार करने लगी ॥ ६ ॥ भुजगभूषण देव नंदी शृंगीसे सेवित चौवीस तत्त्वोंके अधिपति तीन गुणोंसे युक्त ॥ ७ ॥ आठ महासिद्धि और प्रकृति पुरुष दीत महत्तत्त्व और अहंकारसे स्तुतिको प्राप्त ॥ ८ ॥ चन्द्रकान्तिसे शोभित मस्तक जटासमूहले शोभित शिवके उद्देशसे वह बाला दुष्कर तप करने लगी ॥ ९ ॥ ऐसा तप करने लगी कि, कोई कर न सके ग्रीष्मकालमें पंचामि तापती ॥ १० ॥ . ॥१९॥ - ५ हेमन्तमें शीतल जलमें बैठ तप करती इस प्रकार तप करती वह महाभागा केवल पमिनीकी समान शोषित हुई ॥ १३ ॥ श्यामकेश अलकोंसे युक्त जंबालकी बेलके समूहसे चारों ओर वेष्टित ॥ १२ ॥ कि, जिसके ब्रह्मरंधसे धूम निकलने लगा था और कमलिनीकी समान हंसी जिसकी निरन्तर सेवा कररही थीं ॥ १३ ॥ दीप्तिमान् शरीरसे सदाशिवकी सेवा करती हुई दोनों संध्या मानो उससे धुमेली हो रही हैं ॥ १४ ॥ थोडेही समय में वह देव- समूहसे विशंक होगई देवता और सिद्धोंसे दुर्धर्ष और महर्षियोंकी स्पृहा करने योग्य हुई ॥ १५ ॥ हे राजन् ! जब वह इस प्रकार शिवपूजनमें हेमंते शिशिरे शीतवारिकुंडनिवर्तिनी ॥राजते च महाभागा पमिनीव तु केवला ॥११॥ शिरोधःप्रसृतश्यामनीलालकवि- गुंफिता ॥ जंबालवल्लरीपुंजपरितः परिवेष्टिता ॥ १२॥ ब्रह्मरंध्रोद्तश्रीममराजिप्ररोहिणी ॥ नलिनी सेव्यमानेव हंसीव सततं स्थिता ॥१३॥ वपुषा दीप्यमानेन सेवमाना सदाशिवम् ॥ संध्ययोरुभयोस्तन्वी धूम्रपानकृतस्पृहा॥१४॥ विशंका सुरसंघानां कालेनाल्पेन साभवत् ॥ दुर्द्धर्षा दिविजैः सिद्धैः स्पृहणीया महर्षिभिः ॥ १५ ॥ तपस्यायां प्रवृत्तायां तापस्यां नृपभूषण ॥ गतान्यष्टसहस्राणि तदा राजन्यपूजित ॥१६॥ संतुष्टस्तपसा तस्या भगवान्भगनेत्रहा ॥ प्रत्यक्षदर्शनो जात- स्तस्या नार्याः समीपगः ॥ १७ ॥ वनिताऽवनता भूत्वा ननाम गिरिजापतिम् ॥ गजषण्मुखनंदीशैः सुसेव्यं सुरपूजितम् ॥ १८॥ मानसैरुपचारैस्तु पूज्यं विश्वेश्वरं विभुम् ॥ तुष्टाव जगतां नार्थ भक्तिप्रवेण चेतसा ॥ १९ ॥ कन्योवाच ॥ विभो शैलजावल्लभप्राणनाथ प्रमो भर्ग भूतेश गौरीश शंभो ॥ नमः सूर्यसोमानिनेत्रांविकेश सदाधार मुंडांगमालिनमस्ते ॥२०॥ प्रवृत्त हुई तब तप करते उसको आठ सहस्र वर्ष बीत गये ॥ १६ ॥ तब उसके तपसे भगवान शंकर संतुष्ट हुए नव उस स्त्रीके समीप स्थित हो प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ १७ ॥ तब उस कन्याने नम्र हो शंकरको प्रणाम किया जो गणेश कार्तिकेय और नंदी आदि गणोंसे पूजित थे ॥१८॥ विश्वेश्वर प्रभुको मानसी उपचारोंसे पूजन कर भक्तियुत चित्तसे जगन्नाथको संतुष्ट करने लगी ॥ १९ ॥ हे मर्वव्यापक ! हे पार्वतीवल्ला ! हे पाण- जा.. अ.६ 4 नाथ ! हे प्रभो गर्भभूतेश ! गौरीपति शंभु सूर्य सोम अभिनेत्र अम्बिकेश सदाधार मुण्डमालाधारीके निमित्त नमस्कार हो ॥ २० ॥ जटाजूटमें गंगा धारण किये कांतिसे शुन्न शरीर नील कर्णमें अवतंस धारे कोटि बिजलीकी समान कान्तिमान् भुजंगाधिनाय आपके निमिन नमस्कार है ॥ २३ ॥ आपकी अनेक पुण्योंसे दानव और मानव सेवा करते हैं, हे प्रभो ! भवानी आपके प्रनावको जान सकती है मैं आपका क्या वर्णन करूं केवल नमस्कार करतीहूं ॥ २२ ॥ मैं आपके गुण क्या वर्णन करूं जहां वैखरी वाणी और सरस्वती भी मौन होती हैं सहस्रमुखसे जटाजूटगुच्छोल्लसत्स्वधुनीभाभराशुनितानीलकर्णावतसिन् ॥ लसद्रक्तकोटिद्युतियोतितांग भुजंगाधिनाथाय तुभ्यं नम- स्ते ॥२१॥ असावडतानेकपुण्यप्रसंगैः समाश्रीयते मानवैर्दानवैर्वा ॥ प्रभो वाण्यगम्यप्रभावस्तवास्ते कथं वर्णये केवलं त्वां नतास्मि ॥२२॥ कथं वर्णयामीश ते वै गुणौघान्मुखे वैखरी. भारती मेऽल्पवर्णा ॥ सहस्रमुखंयुक्तनागाधिपोऽपि गुणान्व- र्णितुं वै प्रभुस्ते नमोऽस्तु ॥२३॥ त्वदीयं प्रपन्नः पदार्ज पुरारे न वै विद्यते तस्य संसारभीतिः ॥ दयालुःशरण्यागतोद्धार- कर्ता विभो धूर्जटे पाहि मां ह्यातबंधो ॥२४॥ नरोऽनेकतापाभिभूतांगपीडः परं घोरसंसारमार्गे प्रपत्रः ॥ खलव्यालका- लोगदंष्ट्राभिदष्टो विमुझेगवंतं शरण्यं न याति ॥२५॥ सदा शर्वसर्वागमोत्तीर्णचित्तो विभुं शंकरं नीलकंठप्रपन्नः॥ तदैवाशु संछिन्नकर्मोग्रजालः परं ब्रह्मभूयाय जंतुः प्रयाति ॥ विभो येन बाणः स्वकीयीकृतस्ते मृता जीवितालकभूपालपुत्री ॥२६॥ नागाधिप शेषशी आपके गुण वर्णन नहीं करसकते आपको नमस्कार हो ॥ २३ ॥ हे पुरारि ! जो आपके चरणोंके शरणमें आजाता है फिर उसे संसारका भय नहीं होता; हे दयालु ! शरणमें आये हुओंका उद्धार करनेवाले विभो ! हे धूर्जटे ! दीनबन्धु मेरी रक्षा करो ॥ २४ ॥ यह प्राणी अनेक तापसे तापित हो परम घोर संसारके मार्गमें पडा है, यह दुष्ट कालके गालमें 'पडता हैविमुग्ध होकर आपकी शरणको प्राप्त नहीं होता ॥ २५॥ सदा सर्व प्रकार सब अंगसे उत्तीर्णचित्त विभु शंकर नीलकंठकी शरणमें प्राप्त हूं सो आप शीघ्र कर्मके महाबंधनको छिन्न कीजिये . ॥२०॥ - ८ 1 N जिससे यह प्राणी अपने ब्रह्मरूपको प्राप्त हो, हे प्रभो ! आपने जिस घाणका प्रहार कर अलर्क राजाकी पुत्री मृत्युसे बचाई थी ॥ २६ ॥ हे भक्तजन- रक्षक ! हे शंकर सुखदायक ! मेरीभी रक्षा करो शरण हूँ; हे दयालु ! कपासागर जटाजूटधारी आपने विदर्जराजपुत्रीका मनोरथ सिद्ध किया है। इसी प्रकार मेरे हृदयमें जो अभिलाषा है हे भवानीपति ! उन्हें आप पूर्ण कीजिये ॥२७॥ यह प्राकृत मनुष्य अनेक प्रकारके पापसे युक्त होकर शंकरकी शरणमें नहीं जाते। हे विसो ! हे नाथ ! हे भूतेश ! हे चण्डीश ! भर्ग भवत्राणकर्ता मुत्युंजय उक्षेशगामिन् ! ॥ २८॥ मैं अबला होनेके कारण आपकी स्तुति करनेको दयालो कृपालो कपर्दिन्यथेश विदर्भागजायाः कृतं वांछितं ते ॥ तथा मामके मानसे योऽभिलाषः कुरु त्वं भवानीश साक्षात्समेत्य ॥२७॥ जनः प्राकृताघौघसप्लुटदेहो दयालु शरण्यं सुरेशं न याति ॥ विभो नाथ भूतेश चंडीश भर्ग भवप्राण मृत्युंजयोक्षेशगामिन् ॥ २८ ॥ स्तुति नैव कर्तुं समर्थाबलाहं पुरारेंऽधकारे नमस्ते नमस्ते ॥ २९ ॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥ तमीडयैवं छुपरता शव सर्वांगमीश्वरम् ॥ सुसंतुष्टस्तया स्तुत्या जगाद वचनं हरः ॥ ३० ॥ प्रसन्नवदनांभोजःप्रपन्नपरवारिधिः ॥ अनेकदुःखसामुद्रशोषणेऽगस्त्यसन्निभः ॥ ३१॥ वद भामिनि ते चैत्यं दधि ते द्विजनंदिनि ॥ नित्यमद्भुततपास रतासि वरवर्णिनि ॥ ३२ ॥ सूत उवाच ॥ मुदिता नादमाकर्ण्य साक्षादश्वा- कुलक्षणा ॥ निदाघाकांशुसंतप्तो वारि प्राप्य यथा कृशः ॥३३॥ नहीं समर्थ हूँ; हे पुरोरि ! हे अंधकार! आपको प्रणाम है प्रणाम है ॥ २९ ॥ श्रीकृष्ण बोले-इस प्रकार स्तुतियोग्य शर्व साँग ईश्वरकी स्तुति करके वह कन्या मौन हुई तब उसकी स्तुतिसे प्रसन्न हो ॥ ३० ॥ प्रसन्न मुखकमल कृपासागर अनेक दुःखसागरके शोपनेमें अगस्त्यकी समान शिव बोले ॥ ३१ ॥ हे द्विजनंदिनी ! जो कुछ मुझे अभिमत हो सो कह, हे वरवणिनी ! तैने निरन्तर तपमें मन लगाया है ॥ ३२ ॥ सूतजी बोले-यह शियके वचन सुनकर वह प्रसन्न हुई नेत्रोंमें आँसू भर आये जैसे गरमीमें सूर्यकी किरणोंसे तप्त भूमिपर जल पडनेसे कषक प्रसन्न ना.दी. अ.६ होता है इस प्रकार सुखी हो ॥ ३३ ॥ वह कामारि शिवजीसे पतिकी इच्छा कर उसीमें मन लगाये अन्य सुखोंसे इच्छा दूर किये बोली ॥ ३४ ॥ हे प्रमथपति ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हो तो हे शितिकंठ ! मेरा उद्देश आप सफल करो ॥३५॥ आप मुझे पति दो पति दो पति दो पति शे पति दो हे भगवन् ! इसके सिवाय मैं अन्य वरकी इच्छा नहीं करती यही मेरे हृदयमें वर्तता है ॥ ३६ ॥ इस प्रकार जगत्के गुरु शिवजीसे कह वह कपि- कन्या विरामको प्राप्त हुई । शिवजीने उससे कहा हे शुचिस्मिते ! ऐसाही होगा ॥३७॥ हे शुने ! एकही वर तैने पांच बार मांगा है इस कारण तुम्हारे वरमन्वर्थयत्तन्वी कामधन्विषुमर्दिता ॥ पतिकामा नाप्तसुखा बहुसौख्यगतस्पृहा ॥ ३४ ॥ कुमार्युवाच ॥ संतुष्टोऽ- सि भवान्मह्यं यदि त्वं प्रमथाधिप ॥ शितिकंठ ममोदेशंकुरु सत्यं वृषध्वज ॥ ३५ ॥ पतिं देहि पति मा पति पतिमहं वृणे ॥ पतिं देहि महाराज नान्यं मे चिंतितं हृदि ॥ ३६॥ विरराम तदायी शिवं प्राय जगद्गुरुम् ॥ शवों- प्युवाच वनितामेवमस्तु'शुचिस्मिते ॥ ३७ ॥ पंचकृत्वस्त्वया भद्रे याचितोऽयं वरोऽधुना ॥ भविष्यति वरारोहे 'पतयःपंच भामिनि ॥३८॥ सुराः सकलधर्मज्ञा साधवः सत्यविक्रमाः ॥ यज्वानः स्वगुणख्याताः सत्यसंधा जितें- द्रियाः॥ ३९ ॥ त्वन्मुखप्रेक्षकाः सर्वे भाविनो लोकपूजिताः ॥ येपामैश्वर्यं देवानां स्पृहणीयं भविष्यति ॥४०॥ अन्येषामपि देवानां स्पृहणीयं भविष्यति ॥ त्वं भर्तृकामिनी रामा भविष्यस्यन्यभूमिजा ॥४१॥ सूत उवाच । श्रुत्वैतत्कर्णकटुकं वाक्यं वाक्यविशारदा ॥ पुनरूचे शिवं देवं मैवमस्तु जगत्पते ॥ १२ ॥ पांच पति होंगे ॥३८॥ मनुष्य नहीं किन्तु वे साधु धर्मन सत्यपराक्रमी देवता होंगे यज्ञ करनेवाले अपने गुणांसे विख्यात सत्यसन्ध जितेंद्रिय ॥३९॥ सब लोकपूजित तेरेही मुखको देखनेवाले होंगे जिनके ऐश्वर्यकी देवतानी आकाक्षा करेंगे ॥ ४० ॥ नथा औरसी देवताओंको स्पृहणीय होंगे और तूमी स्वामीकी इच्छावाली भूमिसे उत्पन्न होगी ॥ ४३ ॥ वह वाक्य बोलनेमें चतुर यह श्रवणकटु वाक्य सुनकर शिवजीसे बोली हे जगत्पते ! ॥२१. - -- , यह बात न हो ॥ ४२ ॥ कारण कि एक स्त्रीका एकही पति होता है पांच भा एक स्त्रीके न देखे न सुने ॥ ४३ ॥ एक पुरुषकी खिये तो कई होसक्ती हैं परन्तु एक स्त्रीके कई पति तो नहीं होसक्ते ॥ ४४ ॥ हे अहिरूषण ! यह वार्ता कहनेको आप योग्य नहीं हो आप सब भूतोंके हृदयको जानते हो मैं यह वार्ता नहीं चाहती ॥ ४५ ॥ तब शिवजी पंच मुख कंपित करते उससे बोले हे भीरु ! इस जन्ममें नहीं किन्तु जन्मान्तरमें यह बात होगी ॥ ४६ ॥ और उस जन्ममें तपके बलसे तू योनिसे उत्पन्न न होगी अयोनिसे होगी और भतीके महासुखको प्राप्त होगी ॥ ४७ ॥ मेरा वाक्य एकायाः किल कामिन्या एक एव पतिर्भवेत् ॥ पंचभर्तृमती काचिन्न दृष्टा न श्रुता क्वचित् ॥४३॥ एकस्य पंचका- मिन्यः पुरुषस्य भवंति हि ॥ न तु नार्या भवेयुश्च भारः पंच एव हि ॥४४ ॥ नैवं वक्तुं भवानईः सर्वथा ह्यहि- भूषण ॥ सर्वभूताशयज्ञस्त्वं कपर्दीश न कामये-॥ १५ ॥ ततः प्रोवाच तां पंच शिरांस्याधूय शंकरः ॥ मास्तु तेऽ- स्मिन्भवे भीरु भाव्यं जन्मांतरेषु तत् ॥ ४६॥ अयोनिसंभवा तस्मिन्भवित्री त्वं तपोबलात् ।। भर्तृसौख्यं सुविपुलं भुक्त्वा ब्राझं पदं तव ॥ १७॥ भाव्यन्यन्न च मे वाक्यं यदुक्तं तद्भविष्यति ॥ मक्षिकापादमात्रं विष स्याद्विषमेव हि ॥ १८॥ तथा तु विहिताल्पापि क्रिया तत्फलदा भवेत् ॥ तस्माद्विमृश्य कृत्यं हि विधेयं चैव तापसि ॥ ४९ ।। दुर्वासा मे प्रिया मूर्तिब्रह्ममूर्तिकृतश्रमः ॥ स त्वयावमतः पूर्व सोपदेशो मुनीश्वरः ॥ ५० ॥ स कोपावृतसागो निर्दहेजगतां त्रयम् ॥ त्वया चातुर्यशालिन्या ब्रह्मतेजःप्रमर्दितम् ॥५१॥ अन्यथा नहीं होता जो कहा है सो अवश्य होगा हे शुभे ! जैसे मक्षिकाके चरणमात्रभी विष विषही है ॥ ४८ ॥ इसी प्रकार थोडी की हुई क्रिया भी फलवाली होती है, हे तापसि ! इस कारण विचारकर कृत्य करना चाहिये ॥ ४९ ॥ दुर्वासा मेरी प्रियमूर्ति ब्रह्ममूर्तिमें किये हैं श्रम जिन्होंने उन मुनिके उपदेश करनेपरजी पहले तैंने उनका निरादर किया है ॥ ५० ॥ वह कोष करके तौ त्रिलोकीको भस्म कर भा. अ. सकते हैं। मैंने अपनी चतुरतासे उस ब्रह्मतेजका तिरस्कार किया है ॥ ५१ ॥ जो पुरुषोत्तममास परब्रह्मात्मक है हे मानिनि ! अपने मानसे तैंने उसे चरणाकान्त कर दिया ॥ ५२ ॥ मैं ब्रह्मा प्रजापति जो नारद आदि मुनीश्वर हैं इन्द्र सूर्य अग्नि पवन वरुण ॥ ५३॥ जिसकी आज्ञाको उल्लंघन नहीं कर सकते कौन उसकी आज्ञा उल्लंघन करसकता है यह पुरुषोत्तम मास मुझसे भी अधिक प्रिय है ॥ ५४ ॥ वह मुनिके कहने पर भी तैंने कुछ न गिना इस कारण तुझे पांचही पतियोंसे सुखकी प्राप्ति होगी ॥ ५५ ॥ हे सुक्षु ! पुरुषोत्तमके खण्डनसे सुख नहीं परब्रह्मात्मको मासो मासाद्यः पुरुषोत्तमः ॥ सोऽपि वामपदाक्रांतस्त्वया मानाने मानतः ॥ ५२ ॥ . अहं ब्रह्मा प्रजेशा ये नारदाद्या मुनीश्वराः ॥ हरिवाजिपतंगानिसमीरणजलेश्वराः ॥ ५३ ॥ यनिदेशाविधेयात्मा तदाज्ञा को विलंघयेत् ॥ ततः प्रियो हि मासोऽयं नाना यः पुरुषोत्तमः ॥५४॥ स त्वया नैव गणितः ख्यातोऽपि मुनि- नासकृत् ॥ अतस्ते पंचनाथानां भविष्यति सुखाद्गमाः ॥ ५५॥ नान्यद्भावि सुख सुभु पुरुषोत्तमखंडनात् ॥ पुरु- षोत्तममासस्य भक्ता ये भुवि मानवाः॥५६॥ ऐहिकामुष्मिी सिद्धिं याता यास्यति यान्ति च ॥ वयं सर्वेऽपि गीर्वाणाः श्रीपुरुषोत्तमसेविनः ॥ ५७॥ यस्मिन्संसेव्यमानेऽयं प्रीयते मधुहा हरिः ॥ भजनीय कथं मासं न भजामः सुमध्यमे ॥५८॥ इत्युक्तं चैव मे वाक्यं नैव मिथ्या भविष्यति ॥ परिपाल्या द्विजश्रेष्ठाः सदसद्वादिनोऽपि हि ॥१९॥ सेविताः सर्वदा भद्रे निर्दईत्यवमानिताः ॥ प्रतीतिर्द्विजवाक्येषु तेषां लोकाः सनातनाः ॥६० ॥ होता पृथ्वीमें पुरुषोत्तममासकी भक्ति करनेवाले मनुष्यको ॥ ५६ ॥' इस लोक और परलोककी सिद्धि वारंवार आती और जाती है, हम सब देवता पुरुषोत्तमसेवी हैं ॥ ५५ ॥ जिसके सेवन करनेसे हरि प्रसन्न होते हैं. हे सुमध्यमे ! फिर वह महीना क्यों न सेवाके योग्य हो ? ॥ ५८॥ इस कारण मेरा कहां वाक्य मिथ्या न होगा सद्असद्वादी ब्राह्मणोंके वाक्य अवश्य मानना चाहिये ॥ ५९ ॥ हे भद्रे ! उनका सदा सेवन । ॥२२ 1- - ।
T ₹ करना वे अवमानित हो भस्म कर देते हैं जो बामणोंके वाक्यमें प्रतीति करते हैं उनको सनातन लोक प्राप्त होते हैं ॥ ६० ॥ सबसे प्रथम पूजित शिव इस प्रकारके वचन कह फिर गणेश कार्तिकेयसहित तत्काल अन्तर्हित होगये ॥ ६१ ॥ माथेपर शोजित चन्द्रमावाले शिवके अन्तर्धान होनेपर उसको बड़ी चिन्ता हुई ॥६२॥ इति श्रीपद्मपुराणे श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसं ष्ठिरसंवादे भाषादीकायां पुरुषोत्तममाहात्म्ये सदाशिवारमाप्ति म षष्ठोऽध्यायः ॥६ श्रीकृष्ण बोले ॥ हे राजन् ! इस प्रकार शिवजीके चले जानेपर कान्तिराहित हो वह बाला परम दनि हो श्वास लेती हुई आंखोसे जल त्यागन वदने शितिकंठः सर्वप्रमथपूजितः ॥ क्षिप्रमंतर्दधे राजन्सहेरंबषडाननः ॥ ६१ ॥ शशांकलेखांकितभालदेशे सदाशिवेंऽतहाश संप्रयाते ॥ चिंता बबाधे मुनिराजकन्यां हत्वा यथा वृत्रहणं मुनीशाः ॥ ६२ ॥ इति श्रीप- अपुराणे श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादे पुरुषोत्तममाहात्म्ये सदाशिवाइरप्राप्ति म षष्टोऽध्यायः ॥ ६ ॥ श्रीकृष्ण उवाच॥ एवं गते शिवे राजन्सा बाला विगतप्रभा ॥ निःश्वासपरमा दीना शुष्यन्नेत्रा कृशोदरी ॥१॥ तस्या नयनजं वारि बह्वप्यप्राप्य भूतलम् ॥ अत्यंततापसंतप्तं वक्षोऽसिञ्चच्च भारत ॥ २ ॥ दुःखोदधेश्च पारं वै कदाचित्राप सुंदरी । अत्यंतायासकृत्येनापीह वंध्यातनूजवत् ॥ ३ ॥ शोकसंतापनिःश्वासशुष्यद्वदनपंकजा ॥ सर्वांगे दह्यमाना सा दावदग्धा लता इव ॥४॥ हाहाकारपरा नित्यमभितः परिधावति ॥ आत्मानं दर्शयामास जडांधबधिरोपमम् ॥६॥ करती थी ॥ १ ॥ उसके नेत्रोंका जल पृथ्वीपर न पडकर अत्यन्त तारसे युक्त हृदयको निजाता हुआ ॥ २ ॥ इस प्रकार वह सुन्दरी दुःखसागरके पार न हुई जैसे अत्यन्त यत्न करनेसेनी बंध्या पुत्रको प्राप्त नहीं होती ॥ ३ ॥ शोक संताप और दीर्घ श्वासके कारण उसका मुखकमल सूखगया और सारे अंगसे अग्निसे दग्धलताकी समान व्याकुल होगई ॥ ४ ॥ हाहाकार करती हुई वह चारों ओर धावमान होतीथी और अपनेको जड अंधे , भा.दी अ.७ बहरेके समान दिखाने लगी ॥ ५ ॥ कहनेपर भी कुछ नहीं कहती सुनानेपर नहीं सुनती न इच्छासे चलती केवल पवनसे उडाई रुईकी समान भ्रमण करती ॥ ६ ॥ इस प्रकार मार्ग में वर्तमान रहते कुछ समय बीत गया, वह जगदक्षी काल एक समय ऋषिकन्याके निकट सहसा आनकर प्राप्त हुआ ॥ ७ ॥ जैसे मूसेके स्थानमें सर्प प्राप्त होता है, कालको आया जानकर वह प्रसन्न हुई ॥ ८ ॥ और बोली मेरे दुःखका अन्त करनेके निमित्तही विधाताने कालको भेजा है यह कहती हुई ब्राह्मणकन्याको कालने अपने वश किया ॥ ९ ॥ जैसे मेषयुक्त बलाका पवनसे चलाय- वाच्यमानापि न ब्रूते श्राव्यमाणा शृणोति न ॥ नेच्छया चरति कापि पवना ततूलवत् ॥६॥ एव मागें वर्तमाना कियान्कालोऽत्यजायत ।। जगद्वै भक्षयन्कालः कदाचिपिकन्यकाम् ॥७॥ सहसा स समापनः फणीवासुनिवेश- नम् ॥ ननंदांतकमायांतं ज्ञात्वैतत्प्रियजल्पती ॥ ८॥ ममायमेव दुःखांतो मान्यः सृष्टोऽस्ति वेधसा ॥ इति ब्रुवन्ती कालेन वशं नीता द्विजांगजा ॥ ९ ॥ यथा समीरणोता मेघयुक्ता बलाकिनी ॥ तदाश्रमपदे नष्टा तपसा दग्ध- कल्मषा ॥ १०॥ एतस्मिन्नेव समये द्रोणायाभिचरन्क्रुधा ॥ याजोपयाजविप्राभ्यामास्थितो दारुणाकृतिः ॥११॥ चकार यज्ञ सुभृशं रक्तचंदनचर्चितम् ॥ क्रूरभावसमाविष्टो ब्राह्मणे कृतमर्षणः ॥ १२ ॥ हूयमाने चं हवने ब्राह्मणैर्वे- दपारगैः॥ जज्वाल पावकस्तत्र होमे तस्मिन्युधिष्टिर ॥१३॥ ततश्चटचटाशब्दोविनिष्क्रांतो विभावसोः॥ निससा- रोज्ज्वलद्वात्रा वेदिमध्यादनिंदिता ॥ १४ ॥ मान होती है इसी प्रकार तपसे हीनपाप हुई. वह आश्रमपदमें नष्ट हुई ॥ १० ॥ इसी अवसरमें द्रोणाचार्यपर क्रोधित हुए द्रुपदराजा ब्राह्मणोंसे द्रोणके ऊपर अनिचार करानेलगे ॥ १३ ॥ रक्तचंदनसे चर्चित सुन्दर यज्ञ कराया वह राजा ब्राह्मणपर क्रोध कर क्रूर भावमें आश्रित हुआ ॥ १२॥ जब वेदपारगामी ब्राह्मणोंने अनिमें आहुति दी, हे युधिष्ठिर ! तब उस हवनमें अनि बल उठी ॥ १३ ॥ तब अनिमेसे ॥२३ .
चटचटा शब्द निकलने लगा तब प्रकाशितशरीर उस वेदीके मध्यसे निन्दारहित ॥ १४ ॥ वही राजा हुपदकी कन्यारूप प्रगट हुई वह द्रौपदी चन्द्रमाकी कांतिके समान प्रगट हुई ॥ १५ ॥ यह सब राजांके बीचने अर्जुनको पात होकरशी अनेक दीर्घबाहु राजकुमारोंको तृणकी समान मानती. हुई ॥ १६ ॥ वही यह दुःशासनके हाथसे केश आकर्षणको प्राप्त हुई । हे राजन् ! इसके निमित्त कानोंको शूल देनेवाले वचन सुनकरभी ॥ १७ ॥ पुरुषोत्तमके तिरस्कार करनेसे मैंने इसकी उपेक्षा की जब वह दुष्ट इसके वस्त्र बैंचने में सेयं द्रुपदशार्दूलतनया पो रहोगता. ॥ द्रौपदी चंद्रकान्ती च ह्यायी याभवत्पुरा ॥ १५ ॥ लब्धार्जुनेन पांचाली सर्वराजन्यमंडले ॥ तृणीकृत्वा नृपसुतान्दीर्घबाहुनकेकशः - ॥ १६ ॥ सेयं कचग्रहं प्राप्ता दुःशा- सनकराग्रगा॥ वचांसि कर्णशूलानि श्राविता वरवर्णिनी ॥ १७ ॥ मया चोपेक्षिता राजन्पुरुषोत्तमहेलनात् ॥ यदा- क्षेपे प्रवृत्तोऽसावंशुकस्य पृथात्मज ॥ १८॥ दुःशासनो दुष्टबुद्धिधृतराष्ट्रतनूद्भवः ॥ प्रदत्तानि तदा राजन्मया वासां- स्यनेकशः॥ १९॥ सदा मयि कृतस्नेहा मामेति प्रियजल्पती ॥ मामेव ध्यायती नित्यं साध्वी गुणविभूषणा ॥२०॥ यदा बभाषे राजेंद्र इति वाचः सुपेशलाः ॥ ताः श्रुता मे महाबाहो दयार्दीकृतचेतसा ॥ २१ ॥ माता न बंधुः सहजो न नेता सख्यो न जामिन च भागिनेयः॥ नेष्टः सुहृदर्गतनूजवर्गस्तस्माद्धृषीकेश त्वमेव रक्ष ॥ २२ ॥ प्रवृत्त हुआ. ॥ १८ ॥ तब उस धृतराष्ट्रपुत्र दुर्बुद्धि दुःशासनकी दुष्टता विचार मैंने इसको वस्त्रमय कर दिया ॥ १९ ॥ यह सदा मुझमें स्नेह कर मेरी ही चर्चा करती है और गुणयुक्त यह साध्वी नित्य मेराही ध्यान करती है ॥२०॥हे राजन् ! जब इसने मनोहर वचनोंसे मेरी पुकार की उस समय इसके वचनसे चित्त दयामय होगया ॥ २१ ॥ द्रौपदीजीने कहाथा माता बंधु सहज मित्र सखी बहन भानजा सुहृवर्ग पुत्र आदि तथा पति ना. दी. अ.७ इस समय कोई मुझे बचानेको समर्थ नहीं है इस कारण हे हृषीकेश ! तुम मेरी रक्षा करो ॥ २२ ॥ उस समय पांचालीने मेरा स्मरण कियाथा इस कारण सभामें कोई इसको वस्त्ररहित न देखसका ॥ २३ ॥ वनमें रहना दुःखरूप है और बड़ा दारुण शत्रुताप है हे राजन् ! इसी कारण मैंने उपेक्षा की ॥ २४ ॥ जैसा यह महीना मुझे प्यारा है ऐसे अन्य महीने नहीं हैं। यह सदा देवनाओंसे सेवने योग्य है मनुष्योंकी तो कौन कहै ॥२५॥ हे राजन्यश्रेष्ठ ! इस कारणसे होनहार अवश्य होगी शिवका कहा वचन सत्य होगा द्रौपदी पुत्र मुखनागिनी न होगी ॥ २६ ॥ सूतजी बोले ॥ विलो- तदा मे स्मरणं जातं पांचाल्याः शवकर्शन ॥ तेन नालोकिता तन्वी खस्तवस्त्रा सभां गता ॥ २३ ॥ बने वासोऽतिदुःखार्तः शत्रुलंभः सुदारुणः ॥ उपेक्षितो मया राजन्मत्प्रियापेक्षणेन वै ॥ २४ ॥ यथायं मत्प्रियो मास- स्तथेमे द्वादशापि न ॥ सर्वदा सुरसेव्योऽयं मानुपैः किमुतापरेः ॥२५॥ तद्राजन्यवरश्रेष्ठ तत्तथैव भविष्यति ॥ शिवेनोक्तं वचः सत्यं न कृष्णा सुतसौख्यभाक् ॥२६॥ सूत उवाच ॥ शनैस्तद्वचनं श्रुत्वा हरित्रैलोक्यपावनः ॥ पुनस्तां सांत्वयामास यज्ञसेनमुतां प्रियाम् ॥ २७ ॥ धुष्टद्युम्नानुजे वाले पश्यालि त्वं वरानने ॥ वर्षे चतुर्दश देवि यद्भाव्यं गजगामिनी ॥ २८॥ व्यालोकि चिकुरवातस्तवायं यः कृशोदार ।। तनारीणां वरारोहे निर्व पिण्येऽलकान- हम् ॥ २९ ॥ सुयोधनादिभूपालान्सर्वानेष्ये यमक्षयम् ॥ इति सत्यं ब्राम्यद्य त्वं जानीहि सुमध्यमे ।। ३० ॥ न प्रिया मे तथा लक्ष्मीः प्रियो नापि हलायुधः॥न तथा देवकीदेवी प्रयुमो नेव सात्यकिः ॥ ३१॥ कीके पवित्र करनेवाले श्रीकृष्णने शनैः २ यह वचन सुनाकर फिर द्रौपदीको समझाया ॥ २७ ॥ हे वरानने ! जो कि, तुम अपने मोटे माता बाल धृष्टद्युम्नको देखती हो जो कुछ चौदहवें वर्ष में होनहार है ॥ २८ ॥ हे वरारोहे ! जिन्होंने तुम्हारे साथ व्यतिकर कर्म कियाहै उनकी स्त्रियोंके बाल खुलवा दिये जायंगे ॥ २९ ॥ सुयोधनादि सब राजोंको यमलोक पहुँचाऊमा । हे सुमध्यमे ! यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ ॥ ३० ॥ मुझे लक्ष्मी । ॥२४॥ .
- ! -- । बलराम देवकी प्रद्युम्न सात्यकि ॥ ३३ ॥ अनिरुद्ध गरुड सुदर्शन चक्र तथा चतुर्भुजरूप ऐसा प्यारा नहीं है ॥ ३२ ॥ जैसे मुझे अके प्रिय हैं ऐसी कोई वस्तु प्रिय नहीं है, त्रिलोकीमें भक्तके तुल्य कोई वस्तु प्रिय नहीं है ॥ ३३ ॥ हे शुभे ! जो मेरे साथ द्वेष करता है मैं उसको उसके सौवें भागकी बराबर नहीं मानता जैसा कि, भक्तके दुःखसे दुःख मानता हूं ॥ ३४ ॥ हे सुओणि ! सावधान हो तुमको सुखकी प्राप्ति होगी विना दिया स्वममेंभी नहीं मिलता जैसे खरगोशके शृंग नहीं होते ॥ ३५ ॥. द्रौपदीको समझाकर श्रीकृष्ण बोले हे अजातशत्रु ! धर्मज्ञ सम्पूर्ण धोके नानिरुद्धः सुपर्णों वा न च चक्र सुदर्शनम् । न मे चतुर्भुजं रूपं प्रियं ताइक्समध्यमे ॥ ३२ ॥ यथां वे मे प्रिया भक्तास्ताहक मे नास्ति किंचन ॥ त्रिषु लोकेषु यद्वस्तु भक्ततुल्यं न विद्यते ॥ ३३ ॥ येन मे पीडितो भक्तस्तैरई शतशःशुभे । द्वेष्यो मे नास्ति तत्तुल्यो यन्मे विप्रकृतो जनः ॥ ३४ ॥ समाश्वसिहि सुश्रोणि भविष्यति सुखं तव ॥ नादत्तं प्राप्यते स्वप्ने कदापि शशशृंगवत् ॥३५॥ समाश्वास्य द्रुपदजामुवाच मधुसूदनः ॥ अजातशत्रो धर्मज्ञ सर्वधर्मभृतां वर ।। ३६ ।। राजन्मामनुजानीहि यास्याम्यद्य कुशस्थलीम् ॥ सरिपाणिर्महाबाहो यमुनाकर्षणो बली ॥३७॥ आहुको वसुदेवश्च गदसांबोदवादयः ॥ देवकी च महाभागारोक्मिणेयोऽथ सारणः ॥ ३८ ॥ सर्वे तेऽनि- मिषेनेत्रैर्ममागमनकांक्षिभिः ॥ मन्मार्गमुक्तनयनाश्चिंतयंतो दिवानिशम् ॥ ३९ ॥ सूत उवाच ॥ इत्युक्तवतं देवेश कथंचित्पांडवाग्रजः ॥ कूष्णप्रयाणकातावदाश्रु प्रमुक्तवान् ॥ ४० ॥ जाननेवाले ॥ ३६ ॥ अब मुझे आज्ञा दो तो मैं द्वारकाको जाऊं यह हलधर महाबली जिन्होंने यमुना आकर्षण कियाहै ॥ ३७ ॥ तथा आहुक वसुदेव गद साम्ब उद्धव देवकी रुक्मिणीपुत्र प्रद्युम्न सारण ॥ ३८॥ यह सब हमारे आनेकी बाट देखरहे हैं मेरे मार्गमें नेत्र लगाये दिनरात विचार करते हैं ॥ ३९ ॥ सुतली बोले ॥ देवेशके ऐसा कहनपर युधिष्ठिरने कठिनतासे श्रीकृष्णके-जानेसे कातर हो उनको जानेकी आज्ञा दी ॥ ४० ॥ ५
मा. दी.
अ.७
।
नारायणके वचन श्रवण रति करनाही विष्णुभक्तांको परम चित है, आप हमको फिर शीघ दर्शन देना ॥ ४३॥ हे देवकीनंदन ! आप हमारे जीवन हो
आप पाण्डवोंके स्वामी जगत्में प्रतिष्ठित हो ॥ ४२ ॥ हे कृष्ण ! सदा हमारी रक्षा करो, मनसे भूलना मत, आप हमारे चित्तरूप कमलके भ्रमर हो
॥४३॥ वारंवार पाण्डुपुत्रसे मिलकर श्रीकृष्ण आनर्तवासियोंसे पूजित हो द्वारकापुरीमें गये ॥ ४४ ॥ कौमोदकीधारी प्राणनाथ जगत्मिय
जीवनं विष्णुभक्तानां हरिरेव च नेतरत् ॥ पुनदर्शनमल्पेन कालेनास्तु गदाग्रज ॥ ११ ॥ देवकीनंदनः श्रीमानस्माकं
जीवनं भवान् ॥ पांडवानां हरि थो जगत्येतत्प्रतिष्ठितम् ॥४२॥ सदा नः पाहि दाशाह मा नो विस्मरणं कुरु ॥
अस्मञ्चेतःसरोजानां पदपदोऽस्तु भवान्विभो ॥ १३ ॥ असकृत् पांडुपुत्रेषु गृणत्स्वेवं यदूद्वहः ॥ प्रायादारवती
। ब्रह्मनानर्तजनपूजितः॥४४॥ गते कौमोदकीबाहो प्राणनाथे जगत्प्रिये ॥ राजापि भ्रातृसहितः पर्यतप्यद्विजोत्तम
॥ ४५ ॥चचारानेकतीर्थानि चिंतयन्पुरुषोत्तमम् ॥ पुनःपुनश्च राजेंद्रो विस्मितेनांतरात्मना ॥४६॥ भीमादीननुजा-
न्सर्वानुवाच धीमतां वरः ॥ श्रुतं भवद्भिवचन विष्वक्सेनस्य सत्तमाः॥४७॥ अहो मासस्य माहात्म्यं यदुक्तं शाङ्गधन्व-
ना । कथं सौख्यं हि लभ्येत नाभ्यर्च्य पुरुषोत्तमम् ॥ १८॥ संपूज्यो भारते वर्षे संपूज्यः श्रेष्ठ एव सः ॥ देवताभिः
पूजनायो भाग्यवान्वै धरातले ॥ १९ ॥
श्रीकृष्णके जानेपर राजानी उनके वियोगसे भाइयोंसहित परितापित हुए ॥ ४५ और पुरुषोत्तमका ध्यान करते अनेक तीर्थों में विचरनेलगे
हे राजेन्द्र ! वे वारंवार विस्मित हो ॥ ४६ ॥ अपने नीमादि सब भाताओंसे बोले, हे भाताओ ! तुमने श्रीकृष्णके वचन सुने ? ॥ ४७ ॥ अहो इस
पुरुषोत्तम मासका कैसा माहात्म्य है पुरुषात्तमको विना अर्चन किये किस प्रकार सुखकी प्राप्ति हो सकतीहै ॥ .४८. ॥ इस भारतवर्षमें सबसे
॥२५॥
१ अधिक श्रेष्ठ और पूज्य वही है और देवताओंसे पूजित हो पृथ्वीमें भाग्यवान् होते हैं ॥ ४९ ॥ जिनका यह मास अनेक प्रकारकी पूजा और नियमसे बीता वही पुरुषोत्तम है ॥ ५० ॥ अहो श्रीकृष्णका कहा यह कैसा अद्भुत पुरुषोत्तम मासका फल है यह देवताओंको भी दुष्पाप्य फिर मनुष्योंकी कौन कहै ॥ ५१ ॥ इस प्रकार कहकर वह बहुत समय (वर्षों ) तक भ्रमण करते रहे उसके अन्तमें श्रीकृष्णके प्रसादसे उनको राज्यकी प्राति हुई ॥५२॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये भाषाटीकायां पुरुषोत्तममहिमप्रशंसनो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥ इस प्रकार यह महीना विविधैनियमैर्येषां हरिपूजाविधानकैः ॥ साधनविंगतो मासः पुरुषोत्तम एव सः॥ ५० ॥ अहो मासस्य माहात्म्यं यदुक्तं चक्रपाणिना ॥ देवानामपि दुष्पापं किं पुनर्मानुषे जने ॥५१ ॥ एवं वदन्भूमिपतिर्बभ्राम बहुलाः समाः ॥ तदंते राज्यमतुलमाप कृष्णप्रसादतः ॥ ५२ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये पुरुषोत्तममहिमप्रशंसनं नाम सप्तमोऽध्यायः॥ ७ ॥ सूत उवाच ॥ एवंभूतोऽधिमासोऽयं महापापप्रणाशनः ॥ महिमानं यस्य वक्तुं नालं शक्तश्चतुर्मुखः॥१॥ मासस्यास्य प्रसादेन पुरा राजर्षिसत्तमः ॥ दृढधन्वा इति ख्यातो बवाप महतीं श्रियम् ॥२॥ मोगांते जगतां नार्थ प्राप्तः पारं भवांबुधेः॥ पुरा पुत्रवियोगाप्तव्याधी राजा धरातले ॥ ३॥ संप्राप्य सौख्यसीमानं महिमः पुरुषोत्तमात् ॥ एतन्मासस्य माहात्म्यमतुलं मुनिसत्तम ॥ ४ ॥ नाहं वक्तुं समर्थोऽस्मि महिमानं भृगूद्रह । अप्रमेयबलो मासो यथा नारायणो हरिः॥५॥ महापापका नाश करनेवाला है जिसकी महिमा कहनेको ब्रह्माजी समर्थ नहीं हैं ॥ १ ॥ इस महीनेके प्रसादसे पहले राजर्षि श्रेष्ठ दृढधन्वाको बडी लक्ष्मी प्राप्त हुईथी ॥ २॥ भोगके अन्तमें जगत्पति नारायणको प्राप्त हुआ प्रथम राजाको पुत्रवियोगसे बडी व्याधि प्राप्त हुई थी ॥ ३ ॥ इसी मासकी महिमासे उसको सुखकी प्राप्ति हुई थी हे मुनिश्रेष्ठ ! इस महीनेका अतुल माहात्म्य है ॥ ४ ॥ हे नृगुकुलोद्भव ! इस मासकी महिमा .
मा.दी. अ.८ कहनेको मैं समर्थ नहीं हूं. इसका अप्रमेय बल जैसे नारायण हैं ॥ ५ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ ! यह जानिये कि इसकी तुल्य और महीना नहीं है इस मासके गुणका विस्तार मैंने व्यासजीसे ॥ ६ ॥ सुना परन्तु सर्वथा वे भी कहनेको. समर्थ नहीं हुए इन सब महीनोंके. शिरोमाण नारायणप्रिय मासके अधिक कौन है ? ॥ ७ ॥ इसके सम्पूर्ण माहात्म्यको कौन जान सकता है ? जिसको स्वयं नारायणने वर दिया है जिसके जाननेसे करोडों यज्ञका फल होता है ॥ ८॥ शौनकजी बोले ॥ `महाभुज सूतजी ! आप जगत्पतिकी यह कथा कहिये जिसमें पुरुषोत्तम मासके गुण वर्णन जानीहि मुनिशार्दूल नैतत्तुल्योऽस्ति कश्चन ॥ पुरुषोत्तममासस्य कृष्णद्वैपायनादहम् ॥ ६॥ शृण्वन्गुणस्य विस्तार वक्तुं नैव शशांक सः ॥ कोऽन्यो महिज्ञो भुवने सर्वमासशिरोमणेः ॥७॥ माहात्म्यमखिलं वेत्ति यस्य नारायणः स्वयम् ॥ यस्मिज्ञाते भवेद्विद्वान्कोटियज्ञामिदं फलम् ॥ ८॥ शौनक उवाच ॥ कथयस्व कथामेतां सूत साक्षाजग- त्पतेः ॥ पुरुषोत्तममासस्य गुणान्वद महाभुज ॥९॥ विस्तराच्छ्रोतुकामानां सुराज्ञो दृढधन्वनः ॥ पुरुषोत्तममाहा- त्म्यात्कथमाप सुखानि सः॥ १०॥ कथं वैकुंठनाथस्य पद साक्षाजगत्पतेः ॥ अलंबुद्धिर्न मे तात कथापीयूषपा- नतः ॥ १३॥ ततो विस्तरतो ब्रूहि कथामेतां सुदुर्लभाम् ॥ कृतक्षणोऽस्म्यहं सूत तुष्यामि गदतस्तव ।। १२॥ अस्म- भाग्यप्रसंगेन ह्यद्य संदर्शितो भवान् ॥ चिरसंभृतपापस्य क्षयं नेतुं महाभुज ॥ १३॥ हो ॥ ९ ॥ मैं राजा दृढधन्वाके चरित्र विस्तारसे सुनना चाहताहूं. पुरुषोत्तममाहात्म्यसे कैसे उसे सुख प्राप्त हुआ ॥ १०॥ किस प्रकार साक्षात् वैकुंठनाथ जगलतिके गुणोंसे सुख हुआ हे तात ! इस कथारूप अमृतके पानसे मेरा मन तृप्त नहीं होता ॥३१॥ आप इस दुर्लन कथाको विस्तारसे कहिये हे सूत ! आपसे कथा श्रवण कर मैं कैसे तृप्त हो सकताहूं ? ॥ १२ ॥ हमारे भाग्यसेही आपका दर्शन हुआ है. हे महाभुज ! आप हमारा . चिरकालके पाप नष्ट करनेकोही आये हैं. ॥ १३ ॥ यह परम मनोहर भृगुवाक्य श्रवण कर मुनियों को प्रसन्न करते हुए मूतजी बोले ॥ १४ ॥ हे द्विजेश्वर शौनकजी ! सुनो पवित्र कथा वर्णन करताहूं यह व्याँसके मुखसे निकली गंगाकी समान पवित्र करनेवाली है ॥ १५ ॥ उन व्यासजीको नमस्कार कर उनके वाक्यरूपी जलमें मज्जन करनेसे ब्रह्महत्यारा और सुरापान करनेवालाभी पापसे छूट जाता है इसमें सन्देह नहीं ॥ १६॥ जो इसमें सन्देह करते हैं वे मृत्युको प्राप्त होते और सब जन्मोंमें भाग्यहीन प्रज्ञाहीन निर्बुद्धि होते हैं ॥ १७॥ वे पराधीन रोगग्रस्त अपुत्र होते श्रुत्वा भार्गववाक्यानां सौकुमार्यमनुत्तमम् ।। सूतः प्रोवाच संहृष्टो मुनीनां सुखयन्निव ॥ १४ ॥ शृणु शौनक वक्ष्यामि कथा पुण्यां द्विजेश्वर । व्यासवक्रसमुत्पन्नां स्वर्धनीमिव पाविनीम् ॥ १५ ॥ नत्वा कृष्णाय मुनये यद्वा- क्यजलमजनात् ॥ ब्रह्महापि सुरापोऽपि मुच्यते नात्र संशयः॥ १६ ॥ अत्र संशयिनः सर्वे चरतोऽपि मृतायते ॥ सर्वजन्मसु दुर्भाग्या हीनप्रज्ञा प्रबुद्धयः ॥ १७ ॥ पराधीना गदग्रस्ता अपुत्राः स्युन संशयः ॥ मृताः प्रयांति विप्रेश कुंभीरौरवशूकरान् ॥ १८॥ युगकोटिसहस्रांते प्रेतयोनिमवाप्नुयुः ॥ निर्जलेऽरण्यदेशे ते वसंत्यत्यंतदुः- खिनः ॥ १९॥ ये व्यासवाक्यविमुखा नास्तिकाः कपटावृताः॥ पुराणे दृढविश्वासाः कृष्णंसायुज्यभागनः ॥२०॥ शृणु दिव्या कथां विप्र तद्राज्ञो दृढधन्वनः॥ आस्तिकस्य सुव्रतस्य कृष्णभक्तस्य भूपतेः ॥२१॥ हैं इसमें सन्देह नहीं । हे विषेश ! वे कुम्भीपाक और रौरव नरकको जाते हैं ॥ १८ ॥ और कोटि सहस्र युगके अन्तमें प्रेतयोनिको प्राप्त होते हैं और निर्जल देशमें उत्पन्न होनेके कारण अत्यन्त दुःखभागी होते हैं ॥ १९ ॥ जो व्यासके वाक्यसे विमुख नास्तिक और कपटी हैं वे दुःख पाते हैं पुराणमें दृढविश्वास करनेवाले कृष्णकी सायुज्य मुक्ति पाते हैं ॥ २० ॥ हे विप्र ! उस दृढधन्वाराजाकी कथा सुनो जो बडा - - नाशमें आभिषेक किया सम्पूर्ण विषयोंसे निवृत्त हो स्पृहाहीन हो विचार करनेलगा ॥२ ९ ॥ कि अब मैं किस प्रकार इस महासंसारसागरसे पार - भा. टी. अ.. आस्तिक सुव्रत कृष्णभक्त था ॥.२१ ॥ यह श्रीमान् राजा हैहयदेशका रक्षक था, यह चित्रवर्मानामसे विख्यात और सत्यपराक्रमी था ॥ २२ ॥ इसका तेजस्वी पुत्रं दृढधन्वा था वह भी सर्वगुणसम्पन्न सत्यवान धर्मात्मा शुचिं था ॥ २३ ॥ वह महातेजस्वी गुणोंके साथही बढने लगा जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढता है इस प्रकार वह शत्रुनाशी बढ़ने लगा ॥ २४ ॥ अंगोंसहित वेदोंको पढ वह संपूर्ण शास्त्रका जाननेवाला एकेवारही कही बातको ग्रहण कर लेताथा ॥ २५ ॥ उसने गुरुजनोंको बडी दक्षिणा दी थी, वह धीर उनकी आज्ञासे बड़ा प्रसन्न आसीहियदेशस्य गोप्ता श्रीमान्महीपतिः॥ चित्रवति विख्यातो धीमान्सत्यपराक्रमः ॥ २२ ॥ तस्य पुत्रोऽतिते- जस्वी दृढधन्वेति विश्रुतः ॥ स सर्वगुणसंपन्नः सत्यवाग्धार्मिकः शुचिः॥२३॥ अवर्धत महातेजाः साई गुणगणेन सः ॥ शुकृपक्षे मृगांको वा सर्वशत्रुनिबर्हणः ॥ २४ ॥ अधीत्य सांगार्निगमान्सर्वशास्त्रविशारदः ॥ सकृन्निगदमात्रेण प्रागधीतमिव स्फुटम् ॥ २५॥ ददौ बहुतरास्तेभ्यो दक्षिणाः 'सुमनोहराः ॥ तेषामनुज्ञया धीरो मुमुदेऽसौ महाबलः ॥२६॥ मंत्रिणां ब्राह्मणानां च प्रकृतीनां तथैव च ॥ सर्वेषां च मतं ज्ञात्वा पित्रा राज्येऽभिषेचितः ॥ २७ ॥ गुरूं. संपूजयामास सततं राज्यभुक्पुनः ॥ चित्रवापि तं पुत्रं दृष्ट्वा लेभे परां मुदम् ॥ २८ ॥ अभिषिक्तं महाबाहुमराति- गणशोषणम् ॥ निवृत्य विषयेभ्योऽक्षांश्चिंतयामास निःस्पृहः ॥२९॥ इतः प्रभृति केनाहं हेतुना घोरसागरे । संसा- रलक्षणे तीव्रविषयव्यालदुःखिते ॥ ३० ॥ होताथा ॥ २६ ॥ मंत्री बाह्मण और प्रजा इन सबके मतको जानकर पिताने उसका युवगज्यमें अभिषेक करदिया ॥ २७ ॥ वह निरन्तर राज्य भोगकर गुरुकी पूजा करता चित्रवर्माभी उस राजाको देख परम आनन्दको प्राप्त हुआ ॥ २८ ॥ उसे इस प्रकार शत्रुगणोंके . ॥२७॥ - जिसमें तीव्र विषयरूपी व्याल दुःखित करते हैं ॥ ३० ॥ अनेकों दुराशाओं और क्रोधरूपी दंष्ट्रासे विदारण करनेवाले आधिव्याधिसे सब प्रकार परिवारित ॥ ३३ ॥ इस संसारमें अपनेको नष्ट न करके मैं विश्वनाथ जगन्नाथ सबके सुख देनेवाले नारायणकी शरण जाताहूं ॥ ३२ ॥ जिनके एक बार नामस्मरण करनेसे चाण्डालभी नारायणताको प्राप्त होता है उन सनातन वासुदेवकी में शरणमें जाता हूं ॥ ३३ ॥ यह संसारसागर अक्षोत्य है मनुष्योंको दुस्तर है इसमें अनेक आशाकी तरंगें उठती हैं और अनेक आशाके आवर्त उठते हैं ॥ ३४ ॥ अनेक विहंगरूपी वितर्क और दारुण दुराशाबहुलो कोशितदंष्ट्राविदारणे ॥ आधिभियाधिभिश्चैव सर्वतः परिवारिते ॥ ३१ ॥ आत्मानंमज्जयामीह यामि सन्मनसा हरिम् ॥ विश्वनाथं जगन्नाथं सर्वेषां सुखदायकम् ॥३२॥ सकृधनाममात्रेण वादोऽपि हरितां ब्रजेत् ॥ तं यामि शरणं विष्णुं वासुदेवं सनातनम् ॥ ३३ ॥ कृष्णसागरमक्षोभ्यं धिगिर्म दुस्तरं नरैः ॥ आशातरंगबहुलं रागा- वर्तविभीषणम् ॥३४॥ वितर्कानेकविहगं दारुणं जनभीकरम् ॥ शुभाशुममनःसृष्टकल्पनाचारिसंभृतम् ॥ ३५ ॥ चितोगतुंगिरिबातश्रोणीभिश्च विराजितम् ॥ कथं हरिपदं पोतविहीनस्तरितुं क्षमः ॥ ३६॥ पुत्रोऽयं मम धर्मात्मा श्रीमान्विनयकोविदः ॥ प्रजाः पालयते नित्यं स्वीयान्पुत्रानिवौरसान् ॥३७॥ पितराविव जनः सर्वो विश्वस्तोऽस्मि- न्सुते मम ॥ महाभागवतः श्रीमान्विष्णुभक्तिपरायणः ।। ३८ ॥ भयंकर शुभ अशुन मनसे निर्मित कल्पनाओंसे युक्त ॥ ३५ ॥ चिंतारूपी ऊंचे पर्वतोंके समूह और ओणि ( तट ) भागसे विराजित इसको विना हरिनामस्मरण नौकाके पाणी कैसे तर सकता है ॥ ३६ ॥ यह मेरा श्रीमान् पुत्र धर्मात्मा विनययुक्त है अपने पुत्रोंकी समान प्रजापालन करता है ॥ ३७ ॥ और प्रजा इसमें पिताके समान विश्वास करती है यह मेरा पुत्र महाभाग्यवान् विष्णुजक्तिपरायण है ॥ ३८ ॥ .
भा. टी. अ.८ इससे अधिक और चित्तकी स्थिरताका क्या प्रयोजन होगा मैं विश्वक्सेन जनार्दनका आराधन करताहूं ॥ ३९ ॥ ध्रुव अम्बरीष शर्याति ययाति शिवि धुंधुमार प्रतर्दन वसुमना हरिश्चद्र नल मनु ॥ ४० ॥ क्षेमधन्वा रंतिदेव शशबिन्दु भगीरथ प्रियव्रत भूरिषेण यौवनाश्व बाल -नृग ॥ ४३ ॥ भीष्म यु- धिष्ठिर कर्ण दुष्यन्त भरत विभु महाभाग पृथु मांधाता सगर अंशुमान् ॥ ४२ ॥ दिलीप पृषध पुण्डरीक क्रतुध्वज इत्यादिक औरती धर्म कर्ममें उद्योग अतः परं किमत्रास्ति स्थैर्यचित्तप्रयोजनम् ॥ आराधयामि देवेशं विष्वक्सेनं जनार्दनम् ॥ ३९ ॥ध्रुवोंऽबरीषः शतिर्ययातिः शिबिधुंधुरुः॥प्रतर्दनो वसुमना हरिश्चंद्रो नलो मनुः ॥४०॥ क्षेमधन्वा रंतिदेवः शशंबिंदुर्भगीरथः॥ प्रियवतो भूरिषेणो यौवनाश्वो बलिनुगः॥ ११ ॥ भीष्मो युधिष्ठिरः कर्णो दुष्यन्तो भरतो विभुः ॥ पृथुश्चैव महाभागो मांधाता सगरोंऽशुमान् ॥ ४२ ॥ दिलीपश्च पृषधश्च पुंडरीकः क्रतुध्वजः॥ एते चान्येऽपि राजानो धर्मकर्मकृतोद्यमाः ॥४३॥ भुक्तभोगामिमां त्यक्त्वा राज्यलक्ष्मीमतंद्रितः ॥ नागास्त्वचं यथा जीणां निर्विशंका वनं गताः॥४४॥ तत्रोपास्ये हरि भत्त्या हृषीकेशं सनातनम् ॥ इति निश्चित्य मनसा जगाम पुलहाश्रमम् ॥ ४५ ॥ तत्रैव जानकीनाथं भत्त्यातिदृढया स्वया ॥ कंचित्कालं तपस्तत्वा चित्रवर्मा महीपतिः॥४६॥प्राप नारायण देवं गण्डक्युपक्ने शुभे॥ कालोत्तमांगमांकम्य पदा सव्येन भूमिपः ॥१७॥ ॥२८॥ करनेवाले राजा ॥ ४३॥ आलस्यरहित हो इस भुक्तभोगवाली राजलक्ष्मीका त्यागकर वनको चले गये वैसा मैंनी जिस प्रकार नाग पुरानी कैंचली त्याग गमन करते हैं ॥ ४४ ॥ वहां भक्ति से सनातन हृषीकेशकी उपासना करूं यह विचार राजा पुलहकाषिके आश्रमको गया ॥ ४५ ॥ वहां जानकी- नाथकी परम दृढभक्तिसे आराधना कर राजा चित्रवर्मा तप करतारहा ॥ ४६ ॥ गण्डकीके सुन्दर उपवनमें नारायण देवको प्राप्त हो कालके ऊपर KI अपना वाम चरण रखकर ॥ ४७ ॥ स्तुति करते हुए उनकी मनोहर वाणी श्रवण करता,चला और उस नारायणके स्थान वैकुंठको प्राप्त हुआ जहाँसे जाकर फिर कोई नहीं लौटता ॥ ४८ ॥ और कतकृत्य होनेके कारण उसने पुत्रादिकी अपेक्षा न की जब दृढधन्वा राजाने इस प्रकार अपने पिताकी वैष्णवी गति श्रवण की ॥ ४९ ॥ तब शोक और हर्षयुक्त हो पिताका और्धदोहक कर्म किया ब्राह्मणोंकी आज्ञासे पिताकी अक्तिसे राजाने श्रेष्ठ कर्म किये ॥ ५० ॥ उस महाशोभायमान पुष्करावर्त नगरमें अनेक गुणगणोंसे युक्त प्रजाको पालनेलगा ॥ ५१ ॥ उसकी गुणसुन्दरी नाम जगाम स्तुवतां तेषां शृण्वन्वाचः सुपेशलाः ॥ वैकुंठाख्यं हरिपदं यतो नावर्तते गतः ॥ १८॥ सुतादिकृतकृत्यानां ना- पेक्षां कुरुते यतः॥ दृढधन्वापि शुश्राव स्वपितुर्वैष्णवीं गतिम् ॥ १९ ॥ शोकहर्षपरीतात्मा एकरोदौलदेहिकीम् ॥ पितृभत्तथा महीपालः सम्यग्विजवराज्ञया ॥ ५० ॥ पुष्करावर्तके पुण्ये नगरेऽतीव शोभिते । पुपोष च प्रजाः सर्वा नानागुणगणैर्युतः ॥५१॥ तस्य शीलवती भार्या नाना वै गुणसुंदरी ॥ पुत्री विदर्भराजस्य रूपेणाप्रतिमा भुवि ।। ॥५२॥ पुत्रांस्तु सुषुवे दिव्यांश्चनुसनतिशोभितान् ॥ पुत्रीं चारुमती नाम्ना सर्वलक्षणपूजिताम् ॥५३॥ चित्रवा- चित्रबाहुश्च मणिमाश्चित्रकुंडलः॥ सर्वे च मानिनः शूरा विख्याताः पृथिवीतले ॥ ५१ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरु- षोत्तमाहात्म्ये दृढधन्वोपाख्यानेऽष्टमोऽध्यायः॥ ८॥ सूत उवाच ।। दृढधन्वा गुणैर्युक्तः शांतो दांतो जितेंद्रियः।। पुष्करावर्तकं नाम नगरं तस्य धीमतः ।। १॥ शीलवती भार्या थी वह विदर्भराजाकी पुत्री पृथ्वीमें महारूपवती थी ॥ ५२ ॥ उसके दिव्य अति सुन्दर पुत्र चार उत्पन्न हुए और चारुमती नाम पुत्री सर्व लक्षणोंसे लक्षित थी ॥ ५३ ॥ चित्रवाक् चित्रबाहु मणिमन चित्रकुंडल यह सब मानी बडे शूर पृथ्वीमंडलमें विख्यात हुए ॥ ५४ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये दृढधन्वोपाख्याने भाषादीकायामष्टमोऽध्यायः ॥ ८॥ सूतजी बोले ॥ दृढधन्वा गुणोंसे युक्त शान्त दान्त भा. अ.९ S जितेन्द्रिय पुष्करावर्त नाम नगरमें निवास करता था ॥ १ ॥ रूपवान् गुणवान् धनुर्धारी श्रीमान् स्वभावसे सुन्दर धार्मिक सत्यवादी सत्यसंध पवित्र ॥ २॥ वेदवेदांगधर्मज्ञ धनुर्वेदपरायण कामक्रोधादि षड्वर्गके - जीतनेवाला शत्रुसमूहके नाशक ॥ ३ ॥ जिसके मुखकी शोभासे राकेशमण्डल पराजित था जिसके धनुषकी टंकार सुनकर भयव्याकुल हो.॥ ४ ॥ उसके वैरी पातालमें प्रवेश करगये, जिसके भुंजदंडमें कराल तलवार सदा स्थित रहती थी ॥ ५ ॥ जिसको देखकर सम्पूर्ण वरी प्राण छोडते थे, जिसकी शत्रुभयदायी धनुषटंकार सुनकर ॥ ६ ॥ रूपवान् गुणवान्धन्वी श्रीमान् प्रकृतिसुंदरः॥धार्मिकः सत्यवादी च सत्यसंधः समः शुचिः॥२॥ वेदवेदांगधर्मज्ञो धनुर्वेदपरायणः ॥ सुनिर्जितारिषड्वर्गः शत्रुसंघविदारणः ॥३॥वकलावण्यनिर्धूतस्फुरद्राकेशमंडलः ॥ यदीयकरकोद- डटकारवभयार्दिताः ॥ ४ ॥ रसातलं प्रयांत्यद्धा त्रासानिर्जरवैरिणः ॥ करालकरवालं यदाहुदंडोपलालितम् ॥५॥ य दृष्ट्वा वैरिणः सर्वे भ्रांता वै विरमंति च ॥ यस्य टंकावं श्रुत्वा शत्रूणां भयदायकम् ॥ ६॥ दिग्गजाश्च दिशो याता-. स्त्रांसादिव मदोद्धताः ॥ यन्नामश्रुतिमात्रेण विना यद्वद्भवार्णवात् ॥७॥ पलायंते दिशः सर्वाः शत्रवो नात्र संशयः ॥ यद्यशःश्रवणं कृत्वा लीयते शत्रवो पुरि ॥ ८॥ यन्नामश्रवणत्रासाद्वदति हि रिपुस्त्रियः ॥ यद्यशः श्रवणं नास्ति दृढ- धन्वनि शास्तरि ॥ ९॥ यत्प्रयाणोत्सवे नागाः पातालतलवासिनः ॥ जायंते मारुताहाराश्चिंताकुलितचेतसः ॥१०॥ दिशाओंके दिग्गज व्याकुल हो दिशाओंके अन्तको चले गये जिसके नाम श्रवणमात्रसे संसारसागरके विनकी समान ॥ शत्रु दिशाओंके अन्तको चले जाते थे इसमें संदेह नहीं. जिसका यश श्रवण कर शत्रु अपने नगरमें लीन हो जाते थे ॥ ८ ॥ जिसके नाम स्मरणमात्रसे शत्रुकी स्त्री कहने लगती थीं "इस दृढधन्वा राजाके भयसे त्रस्त हुई हम किसकी शरणमें जाय ? " ॥ ९॥ जिसके प्रयाणके समय ७ ॥ सब ஆல்கல ॥२९ । +- .
E पातालतलवासी नांग चिन्तासे व्याकुल हो केवल पवनका आहार करते थे ॥ १० ॥ तुरंग स्पंदन गज पैदलके चरणोंसे चूर्ण हुए जाने थे जिसके सेनाके रजसे सूर्य आच्छादित हो जाता था ॥ ११ ॥ जिसकी यात्राके अवसरको सुनकर पर्वतभी शंकित होते थे कि, यह घोडोंके पदापातसे हमको रेणुवत् कर डालेगा ॥ १२ ॥ हे.प्रतो ! इस प्रकार वह राजा श्रेष्ठ उस स्थानमें राज्य करता था. लोक उसके राज्यमें आनंदको प्राप्त हो पुत्रपौत्रवाले हुए ॥ ३३ ॥ वह वाञ्छावितरणसे चिन्तामणिके समान शोभित हुआ जगत्के रंजन करनेसे पूर्ण चन्द्रमाके तुरंगस्यंदनगजपदातिपदचूर्णितैः ॥ रजोत्करौर्दशां रोधः सूर्यमाच्छादययन्निवः ॥ ११ ॥ ययात्रावसरं श्रुत्वा -गिर- योऽपि शशंकिरे ॥ तुरंगाणां पदाघातैनः कर्ता त्रसरेणुताम् ॥ १२॥ इति राजन्यशार्दूले भूराज्य शासति प्रभो ॥ लोका आनंदसंयुक्ता बभूवुः पुत्रपौत्रिणः ॥ १३ ॥ वांछावितरणाचासो बभौ चिंतामणियथा ॥ जगदजनशीलेन शीतांशुखि सा बभौ ॥ १४ ॥ कुबेर इव कोशाव्यः क्षमया पृथिवीसमः ॥ हरिभक्तियुतो नित्यं गांभीर्य जित- सागरः ॥ १५॥दंडधारणसामथ्र्ये क्रोधे चैव यमोपमः ॥ पितामहसमः साम्ये तेजस्वी हव्यवाडिव ॥ १६ ॥ अनुल्लं- घ्यो गिरिरव स्थैर्ये च हिमवानिव ॥ कौशिकेन समः शौर्ये दृढत्वे मेरुणा समः ॥ १७ ॥ ब्रह्मोपदेशे निपुणो साक्षा- द्वाचस्पतिर्यथा ॥ स्वकीयरूपलावण्ये मूर्तिमानिव मन्मथः ॥ १८॥ स्वसौंदर्यातिबाहुल्यान्मानिनीमानहारकः॥ एक- पत्नीव्रतधरो नान्यनार्यवलोककः ॥ १९ ॥ समान शोभित हुआ ॥ १४ ॥ कुबेरकी समान धनी, क्षमा पृथ्वीकी समान, हरिक्तिम तत्पर, गंभीरतामें सागर ॥ १५ ॥ दण्ड धारणकी सामर्थ्यसंयुक्त, क्रोधमें यमराजकी समान, समतामें पितामहकी समान, तेजमें अनिके समान ॥ १६ ॥ स्थिरतामें पर्वतकी समान, धैर्यमें हिमालय, शूरतामें कौशिक, दृढतामें मेरु ॥ १७ ॥ ब्रह्मके उपदेशमें साक्षात् बृहस्पतिके समान, अपने रूपमें साक्षात् कामदेव ॥ १८॥ अपनी सुन्दरताकी UGC जा.दी अ.९ अधिकतासे मानिनीके मानका हरण करनेवाला वह राजाभी एकपत्नीव्रतधारी दूसरी स्त्रीको स्वममेंभी नहीं देखता था ॥ १९ ॥ अपने बलसे वह रामचन्द्रकी समान त्रिलोकीके अभय देने में समर्थ था सत्यमें तत्पर मानोदूसरा हरिश्चन्द्रही था॥ २० ॥ अपने धर्ममें शिबि और उशीनरकी समान सदा तत्पर था जिस राजाने त्रेताको सतयुगका समय बना दिया ॥ २१ ॥ उसके रूपकी समान किसीका रूप नहीं था प्राकत और विकत यज्ञोंसे उसने गरुडध्वज नारायणको प्रसन्न किया ॥ २२ ॥ दूसरे कार्तिकेयकी समान महाकीर्तिको प्राप्त हुआ जिसके राज्य करनेपर लोकोंमें भ्रम कुओंपर घटोंमें त्रैलोक्याभयदः श्रीमान्कौसल्यानंदनो यथा ॥ सत्यपाशविनीतात्मा हरिश्चंद्र इवापरः ॥ २० ॥ सदा स्वधर्मनिरतः शिबिरौशीनरो यथा ॥ त्रेतायां येन भूपेन कालः कृतसमः कृतः॥२१॥ कस्तेन समतामेति प्रतिरूपो न कश्चन ॥ प्राकृतैर्विकृतैर्यहस्तर्पितो गरुड़ध्वजः ॥२२॥ अत्युप्रकीर्तिमान्धन्वी कार्तवीर्य इवापरः ॥ यस्मिनाजनि लोकेषु भ्रमः कूपघटेष्वभूत् ॥ २३॥ बंधनं केशपाशानां प्रजासु न कथंचन ॥ कामिनीसुरतेष्वेव वस्त्राक्षेपो न चेतरः ॥ २४ ॥ हारः सुंललनोतुंगकुचकुण्डलभूषणः॥ रोष कामिषु कामिन्या प्रेमजो न तु वैरजः ॥ २५ ॥ वचनं पुस्तकेष्वेव ह्यक्षेषु मरणं तथा ॥ संभ्रमः क्रूरता दैन्यं मिथ्यालापस्तु कंचन ॥२६ ॥ काठिन्यं नास्तिकत्वं च स्वल्पभाग्य 'दरिद्रता ॥ भूतहिंसा परद्रोहः परदाररतिः क्रुधिः ॥२७॥ होताहुआ ॥ २३ ॥ केशपाशोंका बंधन होताथा प्रजामें कभी बंधन नहीं होताथा सुरतमें कामिनीका वस्त्र उघड जाताथा और किसी प्रकार नहीं ॥ २४ ॥ हरण करना ललनाओंके ऊंचे कुचोंका और कुंडल भूषण तथा कामकलामें कामिनियोंमें क्रोध होताथा किन्तु वैरसे नहीं होताथा 10 ॥ २५॥ वचन पुस्तकोंमें और मरण अक्ष ( पाशों) में गुट्टका होताथा संचम क्रूरता दैन्यता मिथ्याप्रलाप ॥ २६ ॥ कठिनता नास्तिकता स्वल्प भाग्य ।
८ . दरिद्रता भूतहिंसा परद्रोह परदाराओंमें रति क्रोध ॥ २७॥ मलिनता मत्सर चारी दस्युता जडता चुगली क्लेश क्रोध पराये धनका लेलेना ॥ २८ ॥ अनार्यत्व निर्माणत्व लालच शत्रुता तृष्णा दंश कपट कृपणता हरिका न सेवन ॥ २९ ॥ माता पिताका असन्मान वृत्तिके वास्ते धर्मसेवन दृढधन्वाके राज्यमें इनसेंसे कोई वार्ता नहीं थी ॥ ३० ॥ जैसे खरगोशके सींग मृगतृष्णाका जल गगनके फूल बंध्याके पुत्र नहीं होता इसी प्रकार इन वस्तु- ओंका अभाव था ॥ ३१ ॥ बाह्मण अपने २ धर्ममें निरत श्रुति स्मृतिमें परायण थे इस प्रकार - उस दृढधन्वा राजाके राज्य शासन करने- मालिन्यं मत्सरोऽत्यर्थं चौर्य दस्युत्वजाड्यता ॥ पैशुन्यं कलहः क्रोधोऽनपत्यत्वं परार्थना ॥ २८ ॥ अनार्यत्वं निर्गुणत्वं लोलुपत्वमरातिता ॥ तृष्णा दंभश्च कापट्यं कार्पण्यं हरिसेवनम् ॥ २९ ॥ मातापित्रोरसन्मानं वृत्त्यर्थं धर्मसेवनम् ॥ एतान्यविद्यमानानि दृढधन्वनि शासति ॥ ३० ॥ यथा शशविषाणानि मृगतृष्णाजलाानि च ॥ यथा गगनपुष्पाणि यथा वध्यासुतोद्भवः ॥ ३१ ॥ स्वधर्मनिरता विप्राः श्रुतिस्मृतिपरायणाः ॥ दृढधन्वनि राजेंद्रे तास्म- व्राज्यं प्रशासति ॥ ३२॥ बुद्धींद्रियमनःप्राणतेजांसि यस्य भूपतेः ॥ अव्याहतान्यसो यावच्छशास क्षितिमेकराट् ॥ ३३ ॥ गदजं न भयं नृणामस्य राज्ये श्रुतं न च॥ न स्यात्तस्करपैशुन्यं शत्रुभ्यश्च पराभवः ॥ ३४॥ राज्ञो राजीव- नत्रस्य शूरस्य दृढधन्वनः ।। गुणा न वर्णितुं शक्या गुणिनः सर्वचेतसः ॥ ३५ ॥ महत्सुखं तस्य राष्ट्रे हरिभाक्ति- युते शुभे ॥ हरिभक्तियुतान्येव दिनान्यायांति यांति च ॥३६॥ ॥ ३२ ॥ जिस राजाके बुद्धि इन्द्रिय प्राण तेज अव्याहत थे इस कारण वह एक राजाकी समान पृथ्वी पालन करता था ॥ ३३ ॥ राज्यमें किसीके रोगाय श्रवण नहीं कियाथा तस्करता पिशुनता शत्रुओंसे . पराभव सुनाई नहीं आताथा ॥ ३४ ॥ उस ललोचन दृढधन्वा राजाके गुणोंको कोई गुणी वर्णन करनेको समर्थ नहीं है ॥ ३५ ॥ हरिभक्तियुक्त उसके राज्यमें बड़ा सुख था। उसके ६ - , मा.दी अ.९ दिन नित्य प्रति नारायणभक्तिमें बीततेथे ॥ ३६ ॥ उसका पुष्करावर्त नाप नगर सम्पूर्ण समृद्धिमान् था जिसमें धर्मात्मा बुद्धिमान् दृढधन्वा राजा निवास करताथा ॥ ३७ ॥ जिस प्रकार स्वर्गमें देवताओंकी अमरावती शोषित होती है इसी प्रकार राजाने सुन्दरतासे सम्पूर्ण पुरी स्थापित करदी ॥ ३८ ॥ गली और चौराहोंसे शोभित चैत्य और गुल्मोंसे मनोहर चित्र ध्वजा पताकाओंसे जहांकी धूप निवारित होती थी ॥ ३९ ॥ जहाँका चतुष्पथ मार्ग हाथियोंके मदसे सिक्त होता था चमेलीकी माला मार्गमें जहां तहां शोभित होती थीं ॥ ४० ॥ चन्दन मिले पानीसे जहां छिडकाव पुष्करावर्तकं नाम पुरं सर्वसमृद्धिमत् ॥ यस्मिन्वसति मेधावी दृढधन्वा नराधिपः ॥ ३७॥ यथामरावती स्वर्गे भाति देवगणान्विता ॥ धरासंस्थापि सर्वांगशोभना नृप सा पुरी ॥ ३८॥ वीथिंचत्वरशोभान्या चैत्यगुल्ममनोहरा ॥ चित्रध्वजपताकाभिर्वारितातापसत्पथा ॥ ३९ ॥ मातंगानां मदेनैव सिक्तमार्गचतुष्पथा ॥ मालतीनां च मालाभिवा- सिताना मनोरमा ॥ ४० ॥ श्रीखंडामोदपानीयंसिक्तमार्गा च सर्वतः ॥ नित्योत्सवविनोदार्थ कृतकौतुकतोरणा ॥ ॥ ४१ ॥ ज्वलत्कृष्णागुरूद्दामधूपपूजाविराजिता ॥ विचित्रविकसत्पुष्पदामिभिस्त्वतिमंडिता ॥ ४२ ॥ विकीर्ण- कुसुमामोदमायद्धमरयूथपा ॥ गलद्गजेंद्रदानोघसिक्तमार्गचतुष्पथा ॥४३॥ तस्याः पुर्याश्च शोभा वै नकेनाप्युपमी- यते ॥ वलभीसंश्रितानेकक्रीडाद्विजकृतारखा ॥ ४४ ॥ सप्तधातुदृढोत्तुंगप्राकारवरदुर्द्धरा ॥ सुरैरपि दुराराध्या किं पुनर्भूचरैनरैः॥४५॥ होताथा जहां नित्य उत्सवके विनोदके निमित्त ध्वजा लगाई जाती थीं ॥ ४१ ॥ काला अगर जलाया जाता था सहस्रों पुष्पोंकी माला जहां लटकती रहती थीं ॥ ४२ ॥ विखरे हुए फूलोंकी सुगन्धि उडनेसे नारे गुंजार रहे थे हाथियोंके मद चूनेसे राजमार्गमें छिडकावसा रहता था ॥ ४३ ॥ उसकी पुरीकी उपमा किसीसेभी नहीं दी जा सकती छज्जोंके ऊपर क्रीडापक्षी बनाये हुए शब्द करते थे ॥ ४४ ॥ उसका बडा दुर्धर प्रकार सात . T - -
.
.
-धातुका बना हुआ था जिसको देवतानी प्राप्त होने में समर्थ नहीं थे पृथ्वीमें फिरनेवाले मनुष्योंकी तो कौन कहै ॥ ४५ ॥ मानो लक्ष्मी अपना स्थान
छोडकर वहां स्वयं निवास करती है,जहांके मनुष्योंके घर लक्ष्मीके रहनेके स्थान थे ॥ ४६॥ वे घर अत्यन्त मनोहर सहस्रोही थे जिनके चारों
ओर झरोंखोंके द्वारोंसे कान्ति निकलती शोभित होती थी ॥ ४७ ॥ अनेक किवाडोंमें सोनेकी कीलें लग रही थीं द्वार द्वारमें सजे हुए अनन्त योधा.
स्थित थे। ४८॥ दिव्य घोडोंके शब्दोंसे दिग्गजोंका शब्द तिरस्कृत होता था सोने चांदीके मनोहर ऊंचे मन्दिर ॥ ४९ ॥ वैडूर्य मणिकी बनी
श्रिता या वै स्वयं त्यक्त्वा कमला कमलालयम् ॥ गृहाणि यत्र दृश्यते नांगराणां महात्मनाम् ॥ ४६॥ रम्याणिरम्य-
रामाभिरावृतानि सहस्रशः ॥ यस्यां भांति चतुर्दिक्षु गोपुरद्वाररोचिषः ॥ ४७ ।। स्वर्णकीलैः कपाटेश्च खचितानेकशः
शुभाः॥ द्वारद्वारेषु सन्नद्धाःसुभटाः कोटिशः स्थिताः॥४८॥ दिव्यवादिवनिर्घोपबधिरीकृतदिग्गजाः ॥ सौवण राजतैः
शुभैः सुधाबद्धबलैवरैः ॥४९॥ वैडूर्यकृतसोपान नामणिगणोचितैः ।। वजनद्धकपाटांगैरिंद्रनीलशतवः ॥ ५० ॥
स्फाटिकाहालकूलैश्च नानाधातुविचित्रितैः ॥ हरिन्माणिकृताशेषवेदिकाशतराजितैः ॥५१ ॥ महामरकतत्रातरचित-
स्तंभपक्तिभिः॥ पद्मरांगशताकीर्णैः सरोभिर्विमलदिभिः ॥ १२ ॥ येषु कीरगणाः शश्वत्पतति दाडिमभ्रमात् ॥
वीक्ष्यस्फटिककुंडेषु महामारकतान्मणीन् ॥५३॥
सीढी अनेक मणिगणोंसे खचित वज्रसे बंधे किवाड सैकडों इन्द्रनील मणियोंसे जटित ॥ ५० ॥ स्फटिकमणियोंके समूह और अनेक धातुओंसे चित्र
विचित्र हरित मणियोंसे विराजित सैकडों वेदिका थीं ॥ ५१ ॥ जहांके स्तंभोंमें महामरकतमाण जटित हैं पद्मरागमणियोंसे आकीर्ण विमल
फद्धिमान सरोवर. ॥ ५२॥ जिनमें दाडिमके त्रम अनेक तोते वारंवार पडतेथे स्फटिकके आंगन में महामरकत मणि जटित देखकर ॥ ५३ ॥
. मा. दी - अ. बिडालके नेत्रोंकी भांतिसे तोते और चूहे नहीं स्थित होतेथे अनेक प्रकारके उज्ज्वल श्रृंगादक और सुवर्णकलश ॥ ५४ ॥ महा उपवनसे संसिक्त द्विजराशिसे विराजित और बावडियोंकी सीढीसे पृथ्वीः महाशोभित होतीथी ॥ ५५॥ कुमुद, शतपत्र, कहार, कमल, अम्बुज, कोमल उत्पन्न कतार, इन्दीवर ॥ ५६ ॥ चान्दीकी रतीकी नदी तथा पक्षियोंके शब्द हंस सारस चकवा चकवी जलकुक्कुट ॥ ५५॥ जलमें मदोन्मत्त होकर बिडालनयनभ्रांत्या न संत्यासुशुकादयः । नैकशृंगाटकैः शुभैः शिखरेहेमकुम्भकैः ॥ ५४॥ महोपवनसंसिक्तद्विजरा- जिविराजितः ॥ वापीभिः कृतसोपानरांजिराजितभूमिभूः ॥ ५५॥ कुमुदैः शतपत्रैश्च कहारकमलांबुजैः ॥ कोमलै- रुत्पलश्चैव कहारेंदीवरैरपि ॥५६॥ राजताभिर्नदीभिश्च स्वनैः सत्तमपक्षिणाम् ॥ हंससारसंचक्राहकों चैश्च जलकुक्कुटैः ॥ ५७॥ मदोन्मत्तैः सललनमोदिताभिर्मनोरमैः ॥ नैकपुष्पभरानम्रशिखरैः शाखिभिर्वृतः ॥ ५८॥ प्रमदाभिर्वृतैर्वीर- कोटियूथपभूषितैः ॥ सुरनारीतिरस्कारविभ्रमाभिरहर्निशम् ॥ ५९ ॥ ईदृग्विधैः सौधवरैः शोभितः शतकोटिभिः ।। सरोजयना यत्र कुचभारावनामिताः॥६० ॥ क्षाममध्याः पृथुश्रोण्यश्चलत्कुंडलरोचिषः ॥ चलंत्यः शोभयंति स्म तां पुरीमलकामिव ॥ ६१ ॥ सुप्रोक्षिता विलासिन्यो मानिन्यो मदिरेक्षणाः ॥ सुरनारितिरस्कारलावण्या विलसति याः॥ ६२॥ ८ शब्द करतेथे, अनेक पुष्पोंके भारसे जहांके पुष्प नम्र होरहेथे ॥ ५० ॥ अनेकों वीरस्त्रियोंसे व्याप्त जिनके विलासोंसे देवस्वी तिरस्कृत होतीथीं ॥ ५९॥ इस प्रकारके अनेक कोटि महल वहां शोभित होतेथे जहां कमलनेत्रवाली स्त्री कुचोंके भारसे नम्र थीं ॥ ६ ॥ जिनकी पतली कमर भारी नितम्ब श्राणलिाग पृथु चलायमान कुंडल थे वे विचरती हुई उस पुरीको शोषित. करतीथीं ॥ ६१ ॥ वह अच्छी प्रकार स्नान किये ॥३२॥ . F विलासिनी मानिनी मदिरेक्षणा अपने श्रृंगारसे देवताओंकी स्त्रियोंको तिरस्कार करतीथीं ॥ ६२ ॥ चन्द्रमाकी समान मुख, खंजनकी समान नेत्र, बिम्बोंकी तुल्य ओष्ठ, भुजगपतिकी तुल्य बाल, पीन ( पुष्ट, .) कुच जो हाथीके बच्चेके कुंतस्थलकी समान कठिन थे न जाने यह स्त्री विधाताने कैसे बनाई हैं ॥ ६३ ॥ वह राजा इन्द्रकी 'समान लक्ष्मीको भोग करता हुआ महेन्दके भुवनकी समान ऋद्धिको भोगता प्रसन्न होताथा ॥ ६४ः ॥ जिसके स्पृहणीय गुण थे वह बडा शूर देवताओंके निमित्त बडा दान करताथा m मुखं चंद्राकार नयनयुगलं खंजननिभं स्फुरदिबाभोष्ठ भुजगपतितुल्योऽलकचयः ।। कुचौ पीनी कान्तौ करिकलभ- कुम्भाभकठिनो न जाने रामेयं कथमिह विधात्रा विरचिता ॥६३॥ सौनासीरामिव स्फीतां श्रियं भुंजन्महामनाः ।। महेंद्रभवनस्पद्विसदहस्थो मुमोद ह ॥ ६४॥ स्पृहणीयगुणः शूरः सुराणामपि भूरिदः ॥ महाभक्तिगुणयुतः सदा विष्णुपदार्चकः ॥ ६५ ॥ शशास भूमंडलमुग्रतेजाः प्रपन्न रापन्नशरण्यमूर्तिः ॥ विराजयन्देशममानभावः स्वर्ग बिड़ौजा इव भूतलेऽस्मिन् ॥ ६६ ॥ यदीयपादद्वयमिंद्रसूनोस्तीर्थानि नान्यत्र चचाल विद्वन् ॥ जगाद जिह्वा जगदीशनामाकरोजगन्नाथपदाजपूजाम् ॥ ६७॥ ननाम नारायणदासवर्यमृते कदाचिन्न शिरस्तदीयम् ॥ शुश्राव सीतापतिचित्रगाथां व्यालोकतो नेत्रयुगेन विष्णुः॥ ६८॥ महाभक्तिके गुणसे युक्त सदा विष्णुके चरणोंका पूजन करनेवाला ॥ ६५ ॥ महातेजस्वी भूमंडलकी रक्षा करताथा साक्षात् शरण देनेवालोंकी श्रेष्ठमूर्ति था इस देशको इस प्रकार शोभित करता हुआ मानो राजा इन्द्रही भूतलमें प्राप्त हुआ है ॥ ६६ ॥ जिस राजाके दोनों चरण तीर्थोंको चलते जिह्वा नारायणके गुण गाती और हाथ जगन्नाथकी पूजा करतेथे ॥ ६७ ॥ केवल हरिभक्त महात्नाओंकेही निमित्त उसका मस्तक झुकताथा कानोंसे सीतापतिकी कथा सुनता और दोनों नेत्रोंसे विष्णु भगवानका दर्शन 'करता ॥ ६८ ॥ उस वीरवरका भा.दी शील और नारायणका भजन किस प्रकार वर्णन हो, सक्ता है जिसकी सुन्दरताके विचारकालमें इन्द्रादिक देवता चित्रकी समान हो गयेथे ॥ ६९ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये दृढधन्वोपाख्याने राजधानीवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ सूतजी बोले ॥ वह चन्द्रकी समान अ.१०. कान्तिमान् राजाओंका राजा चन्द्रवत् मित्रमंडलको. आनंद करता था और शत्रुओंके निमित्त सूर्यकी समान तपता था ॥ १ ॥ कमललोचनी किं वय॑ते वीरवरस्य शीलं किं वर्ण्यते तद्भजनं मुरारेः॥यदीयसौंदर्यविचारकाले सेंद्राः सुराश्चित्रगता इवासन् ॥१९॥ . इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये दृढंधन्वोपाख्याने राजधानीवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९॥ सूत उवाच.॥ द्विजराजः स राजावै राजमंडलमंडनः ॥ रेजे सपत्नवर्गेषु सूर्यवत्कुलनंदनः ॥१॥ तं सिषेवेऽतिसुभगा राज्ञी राजीव- लोचना ॥ सर्वसौंदर्यसंयुक्ता नाम्ना या गुणसुंदरी ।। २ ॥ पतिव्रता महाभागा नित्य भर्तृहिते रता ॥ यस्या गुणसमानत्वे भुवि नास्त्यन्यसुन्दरी ॥३॥ नारीगुणगणः सवों यामाश्रित्य विराजते ॥ तरुणी रूपसंपन्ना मानिनी मदिरेक्षणा ॥ ४ ॥ महाभाग्यवती.सा च दयायुक्ता तपस्विनी ॥ प्रणयावनता नित्यं सौंदर्यमदवर्जिता ॥५॥ सुधाधारप्रतिस्पर्खिलोललोचनराजिता ॥ विलोक्य यन्मुखं याति त्रपयेव शनैः शशी ॥६॥ सौभाग्यवती रानी उसकी सेवा करतीथीं वह गुणसुन्दरी नामवाली सम्पूर्ण सुन्दरताके गुणोंसे युक्त थी ॥ २॥ पतिव्रता महाभागा नित्य स्वामीके . हितमें तत्पर पृथ्वीमें जिसके गुणकी समान अन्य स्त्री नहीं थीं ॥ ३॥ जिसके आश्रय सम्पूर्ण स्त्रियोंके गुण थे वह तरुणी रूपसम्पन्न मानिनी र. ॥३३ मंदिरेक्षणा थी॥ ४ ॥ वह तपस्विनी महाभाग्यवती दयावती थी प्रायः वह सुन्दरताके मदसे वर्जित थी ॥ ५॥ अमृतकी समान वचन चलाय- - .
4 -- मान दृष्टिसे विराजित जिसके मुखको देखकर चन्द्रमा लज्जित होता था ॥ ६ ॥ खंजनके तिरस्कार करनेवाले उसके दोनों नेत्र थे जिनकी सुन्दरता देख मृग वनको चले गये ॥ ७ ॥ जिसके दोनों कपोल सुवर्णके संपुटकी समान थे विम्बाफलकी समान अधर मधुव्रतवरूथिनी ॥ ८ ॥ कुछेक नील केशोंके सहित कानोंमें कर्णफूल पहरे हुए ऐसे शोभित होतीथी मानो दो चन्द्रमाओंको राहु यास करनेको आगया है ॥ ९ ॥ जिसकी नासिकासे शुक लज्जित होताथा सुन्दर ठोडीवाली जिसके मुखकी समान किसीका मुख नहीं था जो उपमा दीजाय ॥ ३० ॥ वैडूर्य मणिकी समान जनमनो- लसत्खंजनसन्मानहरितं नयनद्वयम् ॥ तत्सौंदर्याशयेनैव कुरंगाः काननौकसः ॥ ७॥ सौवर्णसंपुटस्पर्दिकपोलयुग- मोहिनी ॥ लसदिबाधरभ्रातमधुव्रतवरूथिनी ॥ ८ ॥ किंचिच्चिकुरसंवीतकर्णताटंकशालिनी ॥ बिभ्रतीव शशियुग्म राहुयस्तार्द्धमंडलम् ॥ ९ ॥ नासिकालजितशुका लसच्चिबुकशोभिनी ॥ न तु तन्मुखसौंदर्योपमानं विद्यते कचित् ॥१०॥ लसद्भवेयसौंदर्यग्रीवा जनमनोहरा ।। अत्यंतकर्कशोत्तुंगवृत्तपीनघनस्तनी ॥११॥ स्मराभिषेककलशो सौवर्णाविव बिभ्रती॥ शुद्धजांबूनदोद्भूतमालया परिवेष्टितौ ॥ १२ ॥ भारितोन्नयनयुग्ममध्यतो मध्यगश्चिकुरनील- -कलापः ॥ किं सुधाघटरिरक्षया धृतो भोगिराज इव दुश्च्यवनेन ॥ १३॥ यद्राजते तुंगसरोजयुग्ममापीनमुद्यत्कल- धौतकांति ॥ मन्ये धृतं तुंगयुत मृगाक्ष्या लावण्यवारांनिधिलंघनाय ॥ १४ ॥ र ग्रीवा विदित होतीथीं अत्यन्त कर्कश ऊंचे पीनपयोधरासे युक्त थी ॥ ११ ॥ मानो कामदेवके अभिषेक करनेको सुवर्णके कलश धारण है शुद्ध सुवर्णनिर्मित मालासे वेष्टित हो रहेथे ॥ ३२ ॥ उसके केशपाशसे दोनों ओर नीले विखरे हुए बाल शोषित हो रहेथे अमृतके घडे रक्षा करनेको दो सर्पराज आनकर स्थित हुए हैं ॥ १३ ॥ जो कि ऊंची कलीवाले कमलकी समान सुवर्णकी कातिवाले . . भा.दी. स्तन शोभित थे वे ऐसे विदित होतेथे मानो इस मृगनयनीने सुन्दरताका समुद्र इसमें रख छोडा है ॥ १४ ॥ अथवा : उसके दोनों; स्तन हाथीके कुम्भस्थलकी समान विदित होतेये और उनपर मोतियोंका हार गंगाकी समान शोभित होताया ॥ १५ ॥ उदरसर बडी सीधी, कोमल रोम- राजि विदित होतीथी उससे कुचरूपी कुम्भ बडे मनोहर लगतेथे और नाभिरूप कूपको देख कामी जन प्यासेकी समान विदित होतेथे ॥ १६ ॥ इस कशोदरीका मध्याग नहीं दीखता था मानो वह' स्तनरूपी पर्वतके त्राससे पलायन कर नानिरूप ह्रदमें गिर पड़ा ॥ १७ ॥ अ..१ + . . - करिकुंभलसद्युग्मकुचकुंभोपार स्थिता ॥ मुक्तालता तथा भाति स्वर्णकुंभेऽमरापगा ॥१५॥ रोमराजिलसद्रज्जुः कुच- कुंभो मनोरमौ ॥ अभ्यर्णनाभिसत्कूपतृषिताः किमु कामिनः ॥ १६ ॥ वक्षोजभूधरत्रासान्नांभिह्रदगतं किमु. ॥ मध्यं न लक्ष्यते तस्याः कृशोदर्याः पलायितम् ॥ १७॥ त्रिवलीदलसौवर्णसोपानानि मृगीदृशः ॥ लावण्याचयमारोढुमिव पंचेषुभूपतेः ॥१८॥गजराजलसच्छुण्डादंडशोभिविलोमशम् ॥ तदूरुयुगलं भाति शृंगाराधारभासुरम् ॥१९॥ नितंब- चक्रमेणाक्ष्याः प्रतिरूपविवर्जितम् ॥ लावण्याख्यकुलालेन रचितं चातिसुन्दरम् ॥२०॥ तस्याः सुजातचरणावुप- 'मानविवर्जितौ ।। मुष्णतो यावकरसमुगिरंताविव स्फुटम् ॥ २१ ॥ उसके उदर में जो त्रिवली पडतीथी वही मानो उसकी लावण्यरूप - पर्वतार · चढनेकी , सीढी है ॥ १८॥ हाथीकी . सूंडकी समान चढाव उतारकी उसकी परम मनोहर जंघा ऐसे शोभित होतीथी मानो श्रृंगारका भार संभारनेको संभ हैं .॥ १९ ॥ उसके नितंबकी शोना वर्णनसे बाहर है मानों लावण्यनामक कुलालने उनकी रचना की है ॥ २० ॥ उसके सुन्दर चरणोंकी उपमा किसीसे नहीं देस- कते मानो लीलायुक्त होकर यावकका रस प्रत्यक्ष ग्रहण किये हुए हैं ॥ २१ ॥ . , . ऐसी गुणसुंदरी महारूपवती -उस राजाकी इस प्रकार आसना करतीथी जैसे चन्द्रमासे रोहिणी प्रेम करतीहै ॥ २२ ॥ उसके सुन्दर शब्दसे अर्थात् स्वरसे पवन स्तंभित होजाती थी वह मेखला उसकी कमरमें महा शोजित होतीथी और उसके चलनेके समय बडा मनोहर नूपुरोंका शब्द होता था. ॥ २३ ॥ उसके सब गात्र सुंदर थे और वह सम्पूर्ण आमरणोंसे भूषित थी पतिव्रत धारण करनेवाली साध्वी राजाके वशवर्ती थी ॥ २४ ॥ हे महाराज ! वह राजाकी विष्णुबुद्धिसे आराधना करतीथी राजा दृढधन्वाका भाग्य कौन सेयं स्वरूपचारित्रशोभिनी गुणसुंदरी ॥ तमुपास्ते महाराज रोहिणीव निशाकरम् ॥ २२ ॥ स्वरुचा रोचिता बाला स्तंभयंती मरुद्गणान् । मेखलाकटिशोभाढया रणकंकणनूपुरा ॥ २३ ॥ सर्वसुन्दरसद्गाचा सर्वाभरणभूषिता ।। पति- व्रतधरा साध्वी राज्ञश्छंदानुवर्तिनी ॥ २४ ॥ विष्णुबुद्धया महाराजमाराधयति भामिनी ॥ किं वय॑ते महाभाग्य भूपतेदृढधन्वनः ।। २५ ॥ वामांगे यस्य संयुक्ता लसच्चामरधारिणी ।। सेवते मेदिनीनाथं छायेव गुणसुंदरी ॥ २६ ॥ सुरासुरा यस्याः सौष्ठवालोकांक्षिणः ।। शृणुष्वान्यद्विजेशान भाग्यं राज्ञः कलानिधेः ॥ २७ ॥ चत्वारस्तन- य निदेशाकांक्षिणः सदा ॥ चातुर्यनिधयः शूरा वेदवेदांगपारगाः ॥ २८ ॥ धार्मिकाः सत्यसंधाश्च धनुर्विद्या- माः॥ पंचकर्मसु निर्विष्णा विक्रांताः सिंहयोधिनः ।।२९ ।। सकता है ॥ २५ ॥ जिसके वाम अंगमें वह चमरधारिणी लक्षित होतीथी छायाकी समान गुणसुंदरी राजाकी सेवा करती ॥ जिसके देखनेकी नित्य देवतानी इच्छा करते थे, हे महाराज ! आप उस राजाकी भाग्यकी महिमा सुनो ॥ २७ ॥ सदा उसकी आज्ञामें रहतेथे जो चतुरताके निधि शूर वेद और वेदांगके पारगानी थे॥ २८ ॥ धर्मात्मा सत्यसंघ धनुर्विद्या में श्रम करनेवाले " भा. टी. . a अ.१ न , मांचों कर्ममें तत्पर विक्रान्त सिंहकी समान युद्ध करनेवाले ॥ २९ ॥ समुद्रकी समान दुर्गम शत्रुओंको तापित करनेवाले बाह्मणोंके निमित्त विक्रम करनेवाले विष्णुअक्तिमें परायण ॥ ३० ॥ सम्पूर्ण सद्गुणके सागर सूर्यके समान अपने पिताकी उपासना करनेवाले ॥ ३१ ॥ सत्यरूप सब कार्यके अर्थत्यागी पिताकी भक्तिमें परायण सब दिशाओंके जीतनेवाले धीर अनेक राजाओंसे वंदित ॥ ३२॥ नित्य अपने आचारमें निरत साधुओंको प्रसन्न करनेवाले जिनके नाम श्रवणमात्रसे शत्रुकी स्त्री क्षणमात्रमें ॥ ३३ ॥ स्खलितगर्मा होजाती हैं और हत उत्साह हो जाती हैं कि समुद्रा इव दुष्पाराः प्रतापतापितारयः॥ ब्राह्मणार्थे पराक्रांताः पितृभक्तिपरायणाः ॥ ३० ॥ सर्वसद्गुणवार्योंघसंपूर्णाः सागराइव ॥ आदित्यमिव चोचंतमुपासतः पितुर्मुखम् ॥३१॥ संत्यक्तसर्वकार्यार्थाः पितृभक्त्या महारथाः ॥ सर्वदि- ग्जयिनो धीरा नैकभूपतिवंदिताः ॥३२॥ स्वाचारनिरता नित्यं कृतरंजितसाधवः॥ यन्नामश्रुतिमात्रेण रिपुनारीगणाः क्षणात् ॥ ३३ ॥ स्खलद्गर्भा हतोत्साहा लसत्कटितटाः पुनः॥ कांदिशीकाः कुतो याम कुत्र यामेति जल्पकाः ॥३४॥ एवंविधा महात्मानः साधवः शंसितव्रताः ॥ चत्वारस्तनया राज्ञो राजानममितौजसम् ॥ ३५ ॥ उपाचरति नियतं किंकरा इव भूपतिम् ॥ नृपाज्ञापरतंत्रास्ते सूत्रबद्धा शुका इव ॥ ३६॥ नित्यं बलिहरा राज्ञो नसि प्रोता वृषा इव ॥ न तथानेकभोगेन नंदिनो नृपनंदजाः ॥ ३७॥ जनिकर्तृनिदेशेन यथा सानंदविग्रहाः ॥ सत्पुत्रैरावृतः श्रीमानेजे भूपाश- खामणिः ॥३८॥ किस दिशामें कहां जायें इस प्रकार कहने लगती थीं ॥ ३४ ॥ इस प्रकारके महात्मा शंसितव्रत महापराक्रमी राजाके पुत्र विचरते थे ॥ ३५ ॥ राजाकी किंकरकी समान उपासना करते थे और राजाकी आज्ञाको सूत्रमें बँधे शुककी समान करते थे ॥ ३६ ॥ वे नथे बैलकी समान नित्य राजाकी आज्ञा करनेवाले थे और राजाकी आज्ञामें जैसे आनंद थे ऐसे नोगमें नहीं ॥ ३७ ॥ जैसे अपने पिताकी आज्ञामें आनंद मानतेथे वह राजा ॥३५॥ ॥३५॥ . T सत्पुत्रोंसे युक्त हो ऐसा शोभायमान हुआ ॥३८॥ कि जैसा देवेन्द्रका हाथी एक साथ उत्पन्न हुए चार दांतोंसे शोभायमान होता है अथवा भगवान् महदादि विभूतियोंसे शोभायमान होते हैं ॥३९॥ सुन्दर गिरि वा चार वेदोंकी समान थे राजनीतिके आठों अंग पूर्ण थे कोष धनसे पूर्ण थे ॥४०॥ सेवक सब पवित्र और स्वामीकी सेवामें तत्पर थे वे साधुओंके अभिलाषकी पूर्ति प्राणोसेनी करते थे॥४३॥ दासोंको वे सदा गुणोंके उपकारसे रंजित करते थे उसकी दासी सोलह वर्षकी अवस्थावाली गुणोंके उपकारसे रंजित थीं कंठमें सोनेके केठे पहरे थे ॥४२॥ श्यामा सोलह वर्षकी सुन्दर चलने- सुरेंद्रवारणो दन्तैश्चतुर्भिः सोद्भवैरिव ॥ ईश्वरो भगवान्यद्वन्महदायैर्विभूतिभिः ॥ ३९ ॥ शुभैः शुभैगिरिवरो विरिचि- निगमरपि ॥ अष्टो वै द्रव्यकोशाश्च सदा भाग्यप्रपूरिताः॥४०॥ भृत्याः पवित्राः सुभृता भर्तृप्रियहिते रताः ॥ प्राणे- रप्युपकुर्वति साधूनां वांछितानि च ॥४१॥ दासान्सुदानाः सततं गुणोपकृतिरंजिताः॥ दास्यः पोडशवार्षिक्यो निष्क- कच्यो विभूषिताः ॥४२॥ श्यामा मंथरगामिन्यः पीनोन्नतपयोधराः ॥ हावभावकटाक्षैश्च मोहयति जगत्रयम् ॥४३॥ नित्यमेवमुपासते शतशोऽथ सहस्रशः ॥ विशयोजनपर्यंतं प्राकारः परितः सदा ॥४४॥ बद्धास्तिष्टंति मातंगा नित्यमत्ताः प्रहारिणः॥. सर्वे रिपुविभत्तारो महाबलपराकमाः ॥ ४५ ॥ हयाः शुकनिभाश्चैव सिंधुदेशसमुद्भवाः ॥ चप- लाश्चपलानेकशिक्षागतिविशारदाः ॥ ४६॥ केचित्तित्तिरिवर्णाश्च शुकनासानिभाः परे ॥ हंसवर्णाः पवनभाः खेचरा इव पक्षिणः॥४७॥ वाली पीनपयोधरवाली हाव भाव कटाक्षोंसे तीनों लोकोंको मोहित करनेवाली थीं ॥ ४३ ॥ ऐसी सैंकडों उसकी नित्य उपासना करती थीं उस नगरके परकोटाका विस्तार बीस योजनका था ॥ ४४ ॥ बंधे हुए मातंग नित्य प्रति स्थिर रहते थे यह सब महाबल पराक्रमी शत्रुओंके पुरके भेदन करने- वाले थे. ॥ ४५.॥ शुककी समास श्रेष्ठ सिंधुदेशके उत्पन्न हुए घोडे थे वे बड़े चञ्चल अनेक शिक्षा गतिमें चतुर थे ॥ ४६॥ कोई तीतर वर्णवाले कोई M भा.दी. अ.११ - . शुंकनासाकी समान नाकवाले हंसवर्णवाले पवनकी समान गमन करनेवाले पक्षियोंकी समान गतिमान् ॥ ४७ ॥ पर्वतोंके उल्लंघन करनेवाले उच्चैःश्रवाके कुलमें उत्पन्न वे घोडे थे ऐसे अनेक घोडे और हाथी नित्य राजद्वारमें स्थित रहतेथे ॥ ४० ॥ कांचनवर्णके चित्र अंगवाले सुन्दर घोडों- से जुते ध्वजा पताकाओंसे युक्त सुन्दर पहिये और कूबरवाले ॥ ४९ ॥ सुन्दर वरूथ सुंदर नीडवाले अच्छी प्रकार सजाये हुए विमानकी समान सब प्राणियोंको मनोहर ॥ ५० ॥ अनेक योधा और गुणी मनुष्योंसे आश्रित स्वर्ग पाताल और दैत्य दानवकी सभा जानेवाले रथ थे ॥ ५१ ॥ पर्वतोल्लंधिनः सर्व उच्चैःश्रवकुलोद्भवाः॥राजद्वारगता नित्यं राजंते वाजिराजयः ॥ १८ ॥ रथाः कांचनचित्रांगाः सदश्वपरियोजिताः॥ सुध्वजाः सुपताकाश्च सुचक्रवरकूबराः॥४९॥ सुवरूथाःसुनीडाश्च स्वास्तीर्णाः साध्वलंकृताः॥ विमानसदृशाः सर्वे सर्वे प्राणिमनोहराः॥५०॥ अनेकभटौंडीरैः संश्रिता गुणिभिर्नरः । स्वर्गे लोके च पाताले : दैत्यदानवसंसदि ॥५१॥ स नास्ति विभवो लोके यो नात्र विद्यते जने ॥ ५२॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहा- त्म्ये सुधन्वोपाख्याने समृद्धिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः॥१०॥ऋपिरुवाच ॥ यस्मिन्संसक्तहृदयो दृढधन्वा मही- पतिः ॥ न बुध्यते सुखासक्तः संवत्सरगणान्बहून् ॥ १॥ संवत्सराणां नियुतत्रयं राज्यमपालयत् ॥ कदाचिच्छयना- रूढ अश्वानां द्वेषितं श्रुतम् ॥२॥ वृंहितं गजवृंदस्य सुभटानामहंकृतिम् ॥स्नेहयुक्तानि रम्याणि वचांसि भृत्यवर्गतः ॥३॥ पृथ्वीमें ऐसी कोई वस्तु नहीं थी जो उसके मनुष्योंको प्राप्त न हो ॥५२॥ इति श्रीप० पुरु० सुधन्वोपाख्याने समृद्धिवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥ | ऋषि बोले ॥ इस प्रकार वह दृढधन्वा राजा उनमें मन लगाये सुखमें आसक्त होने के कारण बीते हुए बहुत वर्षाकोनी न जानता हुआ ॥ १ ॥ तीस सहस्र वर्षतक उसने राज्य किया एक समय लेटेहुए उसने घोडेका हौंसना सुना ॥ २ ॥ जो हाथियों के मध्यमें सुनटोंके अहंकारपूर्वक - - ॥३६॥ है .
. सुनागया और भृत्योंके स्नेहयुक्त वचन सुने ॥ ३ ॥ दास और दासियोंके मनोहर वचन सुने जो अपनी भक्तिसे युक्त चन्द्रमाकी समान निर्मल थे ॥ ४ ॥ इस प्रकार महाधनसे युक्त अपनी आज्ञा पालन करनेवाले तथा पुत्र पौत्रादिकोंकोभी अपनी आज्ञा पालन करनेवाले देखकर ॥ ५॥ निर्दोष लक्ष्मी और रोगरहित अपना कलेवर देख अपने नामकी विख्याति स्वर्गतक देखकर ॥ ६ ॥ अतुल और दिव्य समृद्धि मनोहर दासदासीगणेशानां श्रुत्वा वाचः सुपेशलाः॥ आत्मभक्तिगुणोदकाः प्रियाश्चंद्रांशुशीतलाः ॥४॥ निरीक्ष्य वसुपठिं स्व स्वीयाज्ञापरिपालकम् ॥ पुत्राः पौत्राः पवित्राश्च भक्तियुक्ता मनोहराः ॥ ५ ॥निर्दोषाश्च प्रभा लक्ष्मी रुंज स्वं कलेवरम् ॥ यन्नाम त्रिदिवं यातमालोकालोकविश्रुतम् ॥ ६॥ समृद्धिरतुला दिव्या कामिन्यश्च मनोहराः॥ पृथिवी सर्वशोभाढया लोका धर्मपरायणाः॥७॥नगरी सुरभोग्येव जना निर्जरसुंदराः ॥ अनेकसौख्यसलिले पारपूरितवा- रिधौ ॥८॥न लेभे चिंतयन्वीरो दुःखपंकं मनागपि ।। तदा संचिंतयामास केन पुण्येन लब्धवान ।। ९॥ अतुलं निर्मलं सौख्यं स्वर्गिणामपि दुर्लभम् ॥ न पश्यामि तपस्तप्तं न दत्तं न हुतं क्वचित् ॥ १० ॥ नाराधितोऽस्ति मे देवः केनाहं प्राप्तवानिदम् ॥ किमिदं परिपृच्छामि स्वीयमैश्वर्यकारणम् ॥ ११ ॥ अतः परंतु किं भावि घोरसंसारसागरे । न तादृशं मुनि पश्ये संदेहं यः पराणुदेत् ॥ १२॥ कामिनी, संब शोभायुक्त पृथ्वी धर्मपरायण लोक ॥ ७ ॥ देवताओंके भोगकी समान नगरी जरारहित सुन्दर जन आनंदके सागरको सुखरूपी जलसे पूर्ण देख ॥ ८॥ विचार कर उस वीरने कहीं दुःखका लेशभी न जाना तब विचारनेलगा किस पुण्यसे मुझको यह लब्धि हुईहै ॥ ९॥ यह निर्मल सुख स्वर्गवासियोंकोभी दुर्लभ है न कुछ तप मैंने किया है न हवन किया है ॥ १० ॥ न किसी देवताका आराधन किया यह किस देवता- का फल है अपने ऐश्वर्यका कारण किससे पूर्वी ॥ ११ ॥ इससे आगे घोर संसारसागरमें क्या होना है ऐसा संदेह दूर करनेवाला कोई मुनिजी मा. दी.. अ.११ नहीं विदित होता ॥ १२ ॥ ऐसा विचार करके राजाको वह रात्रि बीत गई और उपःकालं होगया तब सहसा उठ बैठा ॥ १३ ॥ वैतालिकके मुखसे मनोहर स्तुतियोंके वाक्य श्रवण करते हुए उठकर राजाने आवश्यकीय कार्य कर गंगाजलसे स्नान कर ॥ १४ ॥ निकलते हुए सूर्यको अर्घ देकर देवताओंको पूजन कर फिर शृंगारके स्थानमें आया ॥ १५ ॥ और शृंगारके वस्त्रोंको पहर स्वस्तिवाचन कराय अपने पुरोहि- तको नमस्कार कर सिन्धुदेशमें उत्पन्न हुए घोडेपर स्थित हो ॥ १६ ॥ पर्वतोंके स्थानमें मृगया करनेको चलागया और साथमें मुख्य योधा और एवं संचितयनराजा यामिन्यतमवाप्तवान् ॥ उपस्युत्थाय सहसा समं दुंदुभिनिःस्वनैः ॥ १३॥ वैतालिकमुखोद्गीत- स्तुतिवाक्यमनोरमः ॥ आवश्यकं विधायाशु साला गंगोदकेन तु ॥ १४ ॥ उपस्थायार्कमुद्यतं सुरान्संपूज्य यत्नतः॥ ततः शृंगारभवनमागत्य परिधत्तवान् ॥ १५॥ शृंगारान्वसनं सर्वं स्वस्ति वाच्य द्विजातिभिः॥ पुरोधसे नमस्कृत्य वा- जिनं सिंधुजे शुभम् ॥१६॥ आरुह्य गिरिकूटेषु मृगयां गंतुमुद्यतः॥साकं सचिवमुख्यैश्च योधमुख्यः पदातिभिः ।।१७।। श्वजीविभिर्वागरिकै रणग्राहभेटैरपि ।। बहुशूरावृतः श्रीमांश्वचार गहनं वनम् ॥ १८ ॥ नीलमेघसमं हृद्यं विचित्र- द्विजराजितम् ।। ईहामृगगणाकीर्ण बहुपादपशोभितम् ॥ १९॥ पक्षिभिः क्वचिदाकीणं कचिच्चैवातिसुंदरम् ॥ झि- ल्लिकोलूकशब्दैश्च कचिच्चातिभयानकम् ॥२०॥ फेरूणां चैव शब्देन द्वीपिशब्दैवृतं क्वचित् ॥ कचिन्मत्तमयूरोग्रश- ब्देनैव विराजितम् ॥२१॥ मुख्य २ मंत्री थे ॥ १७ ॥ तथा श्वजीवी व्याधे और बडे बडे योधा थे इस प्रकार वह लक्ष्मीवान् अनेक शूर योधाओंसे युक्त उस गहन वनमें विचरने लगा ॥ १८॥ जो वन नीले मेघकी समान सधन विचित्र पक्षियोंसे युक्त ईहामृग तथा अनेक पक्षियोंसे शोषित था ॥ १९ ॥ कहीं पक्षि-i योंसे आकीर्ण कहीं ऊंचे शब्द बोलनेवालोंसे व्याप्त कहीं झिल्ली तथा उलूकोंके शब्दोंसे पूर्ण कहीं अतिभयानक ॥ २० ॥ कहीं गीदड --- - .
।
--
कहीं गेंडोंके शब्दोंसे पूर्ण कमी मत्त मोरोंके शब्दोंसे पूर्ण ॥ २१ ॥ कबरे श्वेत कंठवाले कबूतरके बच्चोंसे व्याप्त सारिका कोकिला तथा नौरोंके
। शब्दोंसे व्याप्त ॥ २२ ॥ हंस सारस चकवा चकवीके अनेक कुलोंसे सम्पूर्ण कहीं पारावत कबूतरके अनेक शब्दों तथा विहगोंके शब्दोंसे पूर्ण है
. २३ ॥ शाल ताल तमाल प्रियाल पनस अर्जुन हिन्ताल कोविदार आम महुआ कुटजादि वृक्षोंसे व्याप्त है ॥ २४ ॥ रसाल अशोक बदरीफल
रंभा तिलक टेसू नागकेशर आम बहेडा पाटल लोध घोटक ॥ २५ ॥ सिंदूर एरण्ड बकुल पिलखन न्यग्रोध चंपा धव पीपल खैर बेल आमला
कर्बुरं शितिकंठेश्च आनीलं शुकपोतकैः ॥ श्यामितं षट्पदध्वां क्षमाससारिककोकिलेः॥ २२ ॥ हंससारसचक्राह्वब-
कोटकुलसूचितम् ॥ पारावतशकुंतोघाप्तं नानाविहंगमैः ॥ २३ ॥ शालतालतमालैश्च प्रियालपनसार्जुनैः ॥
हिंतालकोविदारानमधूककुटजासनैः ॥२४॥ रसालाशोकबदररंभातिलककिंशुकः ॥ केसराम्रातभल्लातैः पाटलाकोड:
घोटकैः ॥ २५ ॥ सिंदूरैंडबकुलप्लक्षन्यग्रोधचंपकैः ॥ धवाश्वत्थोग्रखदिरबिल्वामलकार्तिदुलैः ॥ २६ ॥ कर्परागरु-
खर्जूरकेतकीदाडिमेंगुर्देः ॥ सुरदारुकपित्थाक्षपत्रजीवकसेचकैः ॥ २७ ॥ जंबुजंबीरनारिंगशेलुश्रीपर्णचंदनैः ॥
एभिश्चान्यैर्दुमवातैर्वनं तत्सर्वतः शुभम् ॥ २८ ॥ विवेश मृगयाशीलः कामीव वनिताब्रजम् ॥ चचार मृगया शूरो
निघ्नन्मृगगणान्बहून् ॥ २९॥
.-
।
तिदुल ॥ २६ ॥ कपूर अगर खजूर केतकी दाडिमी इंगुदी देवदारु कैथ अखरोट जीवक सेचक ॥ २७ ॥ जामुन जंभीरी नारिंग श्रीफल पर्पट
चन्दन इनके सिवाय और भी अनेक प्रकारके वृक्षोंसे चारों ओर व्याप्त हो रहाथा ॥ २८ ॥ वह मृगयाशील राजा इस प्रकार वनमें प्रविष्ट हुआ
'जिस प्रकार कामी स्त्रियोंके समीप गमन करता है अनेक मृगसमूहोंको मारता वनमें विचरने लगी ॥ २९ ॥
मा.दी. अ.११ मृग रीछ. शूकर खड्ग शल्लक गैंडे हाथी चित्रमृग चमर समर बल ॥ ३० ॥ गवय सिंह गोपुच्छ शार्दूल असे रुरु इस प्रकार अनेक मृगोंको मारता विचरने लगा ॥ ३१ ॥ वह महाबाहु वनमें अनेक प्रकारके मृगोंका वध करने लगा और अपने पासके मृगोंको एकही वाणसे नष्ट करने लगा ॥ ३२॥ भल्ल पट्टिश पास जिंदिपाल मुद्गर कुंड दंड शतघ्नी गदा मुशल लांगल ॥ ३३ ॥ तोमर मृणि पाश शूल चक मृगानृक्षान्वराहांश्च खड्गांश्च शशशल्लकान् ॥ द्वीपिनो द्विरदांश्चित्रांश्चमरान्समरान्बलान् ॥३०॥गवयान्सिंहगोपुच्छा- छार्दूलान्महिषानुरून् ॥ एवंविधाननेकांश्च सर्वान्वनचरान् बहून् ॥ ३१ ॥ जघान स महाबाहुः शरैर्नानाविधैर्वने ॥ अभ्याशवर्तिनः खङ्गैश्शरैश्च शरगोचरान् ॥ ३२॥ भल्लैश्च पट्टिशैः प्रासैभिदिपालैश्च मुद्गरैः ॥ कुंडैदँडैः शतघ्नीभि- गंदामुसललांगलैः ॥ ३३ ॥ तोमरैः सृणिभिः पाशैः शूलचक्रपरश्वधैः ॥ भुशुण्डीभिर्गदाभिश्च निस्त्रिंशः परिधैः -पलैः॥ ३४ ॥ शूकराणां वंधेनापि लोडयामास तदनम् ॥ रुद्राक्रीडसमं घोरे कृतं तेन महात्मना ।। ३५ ॥ कदाचि- तेन बाणेन महाबलयुतेन च ॥ कश्चिन्मृगो इतोऽरण्ये बाणेन दृढधन्वना ॥ ३६॥ स मृगोऽतर्हितो जातो बाणमादा- य सत्वरम् ॥ तं जगाम तु राजेंद्रः शर्वः क्रतुमृगं यथा ॥ ३७ ॥ मृगः कुत्रापि संलानो भ्रमन्नेवापतन्नृपः॥ क्षुतृइदुः- खपरीतात्मा बभ्राम वनसंकटे ॥ ३८॥ 2 परशे भुशुण्डी गदा निस्त्रिंश परिघ पलसे ॥ ३४ ॥ शूकरोंको वध करता हुआ उस वनको विलोड़ित करने लगा । उस महात्माने उस वनको शिवके क्रीडा करनेकी समान महाघोर कर दिया ॥३५॥ एक समय उसने महाबलसंयुक्त बाण द्वारा दृढ धनुषसे घोर मृग वनमें मारा ॥३६॥ बह मृग उस बाणको लेकर अन्तर्धान होगया राजा उसके पीछे ऐसे चलने लगा जैसे शिव यज्ञमृगके पीछे गयेथे ॥ ३७॥ परन्तु राजाको वह मृग ॥३८॥ - । वनमें कहीं न मिला और बराबर दुःखी चित्त हुआ राजा — वनमें भ्रमण करने लगा .॥ ३८ ॥ जैसे विष्णु भगवान्से पराङ्मुख जीव कामिनीके वशीभूत हो विचरण करता है । फिर वह वीर बहुत शीघ्र महागहन सागरकी समान सरोवरमें प्रविष्ट हुआ ॥ ३९ ॥ जहां हंसोंका कुल शब्द करताथा तथा चकवा चकवी शब्द करतेथे.॥ ४० ॥ जलकुक्कुट दात्यूह पक्षियोंसे कुररीकी समान शब्दायमान था तथा मानस सरोवरकी समान स्वच्छ जलसे पूर्ण था ॥४१॥ जिसके अन्तरमें अनेक क्रूर ग्राहगण दुष्टोंके हृदयकी समान थे, जिसमें मत्स्य स्फुरायमान थे जिसका सुन्दर कामिनीनयनाविद्धो यथा विष्णुपराङ्मुखः॥ आससाद चिराद्वीरः कासारं सागरोपमम् ॥ ३९ ॥ कूजद्धंसकुलश्रेष्ठं [ . “चक्रवाकरवेण च ॥ सारसारावसरसं कारंडवनिषेवितम् ॥४०॥ जलकुक्कुटदात्यूहकुररीबककूजितम् ॥ स्वच्छपानीय- संपूर्ण यथा सज्जनमानसम् ॥४१॥ अंतहिगणक्रूर खलानां हृदयं यथा ॥ स्फुरन्मत्स्यचलत्पद्मरेणुरंजितस- त्पयः ॥ १२॥ लसत्पंकजनियूं हैः परितः परिवेष्टितम् ॥ स्वच्छमत्स्यं यथा 'चंद्रमंडलं तारकावृतम् ॥ ४३ ।। तत्सर सलिलं पुण्यं सर्वाजीव्यं वगाहतः ॥ यथा प्रपंचसंतप्तो विष्णुभक्ति विगाहते ॥४४॥ सर्वाजीव्यं वारि वीरो है ययौ पातुं च भक्तितः॥ नीरं पीत्वा ततस्तीर आगत्य मनुजाधिपः ॥ ४५ ॥ अपश्यच्च वटं वीरः केतुभूतं वनांतरे ॥ सर्वत्र संवृतं पत्रैर्घनच्छायं मनोहरंम् ॥ ४६॥ कमलोंसे व्याप्त था ॥ ४२ ॥ चारों ओर कमलोंसे व्यान रहाथा जिस प्रकार स्वच्छ चन्द्रमण्डल तारकाओंसे आच्छादित होता ४३॥ उस सरोवरके निर्मल जलमें अनेक जीव अवगाहन करते थे जिस प्रकार विष्णुभक्त प्रपंचसे संतप्त हो नारायणके नामका अवगाहन करते ॥ ४४ ॥ वह राजा यथायोग्य अश्वके ऊपर चढाहुआ उस सरोवरका जलपान करनेको उसके तटपर आया ॥ ४५ ॥ उसने उस वनमें . - - भा. टी. अ.१५ एक सबसे ऊंचा केतुभूत वटका वृक्ष देखा वह पत्ते और घनी छायासे संयुक्त था ॥ ४६ ॥ वीरने उस वृक्षको देखकर इस बातकी चिन्ता की कि, यह न्यग्रोधका वृक्ष अनेक घनी छायासे समन्वित है ॥ ४७ ॥ पत्र पुष्प फल जटा दारु निर्यास वल्कलसे युक्त है; क्षणमात्रमें इसके नीचे बैठकर मैं सुखी तो हो जाऊं ॥ ४८ ॥ जिस प्रकार घोर संसारसे पीडित हो महात्मा नारायणके धर्मको प्राप्त होते हैं यह विचारकर राजा घोडेसे उतरा ॥४९॥ और वही घोडेकी काठीपैसे वस्त्र उतारकर बिछालिया और स्वयं राजा उसके ऊपर सोने लगा ॥ ५० ॥ घोडा वटके वृक्षकी दृष्ट्वा व्यचिंतयद्वीरः क्षोणीमंडलमंडनः ॥ न्यग्रोधोऽयं बहुच्छायः सर्वसत्त्वसुखप्रदः ॥ ४७॥ पत्रैः फलैर्जटाभिश्च दारुनिर्यासवल्कलैः ॥ क्षणमेनमुपाश्रित्य भविष्यामि ह्यहं सुखी ॥४८॥ हरिधर्मों यथा साधुोरसंसारपीडिनाम् ।। इति निश्चित्य मनसा हयादुत्तीर्य भूमिपः ॥ १९॥ निषसाद धरोपस्थे चैलास्तीर्णे सुशादले ॥ चर्मोपधानमादाय मुष्वाप धरणीतले ॥ ५० ॥ जटासु वाजिनं बद्धा सर्वतोऽलोकयटम् ॥ निरीक्षमाणे नृपतौ वटशाखाः सहस्रशः ॥ ॥५१॥ पंचयोजनविस्तीर्णाः सप्तयोजनमुद्गताः ॥ तत्रागमत्खगः कश्चित्कीरः परमशोभनः ॥६२॥ सत्प्रवालल- सञ्चंचुः कृष्णग्रीवो हरिच्छदी ॥ अत्यंतविलसन्नेवः सुपादः शोभनोदरः ॥ ५३ ॥ मानुषीमीरयन्वाणीमतुलां नृपमो- दिनीम् ॥ यदाकर्णनमात्रेण दुःखं सबः प्रशाम्यति ॥५४॥ जटामें बांध दिया और बटकी सहस्रों शाखाओंको देखने लगा ॥ ५१ ॥ जो पांच योजनके विस्तारमें और सात योजन ऊंची थीं वहां कोई परम सुन्दर कीर ( तोता) आनकर प्राप्त हुआ ॥ ५२ ॥ जिसकी चोंचमें मूंगे जडेथे काली गर्दन हरित वर्ण अत्यन्त सुन्दर नेत्र मुन्दर चरण और उदर था ॥५३ ॥ वह राजाको प्रसन्न करनेवाली मानुषी वाणीसे बोला जिसके श्रवणमात्रसे तत्काल दुःख शान्त हो जाता है ॥ ५४ ॥ ॥३९॥ .
.
जिस अमृतको पान कर राजा प्रसन्नमुख हो गया और कलद्वारा प्रेरण कियेकी समान तत्काल शयनसे उठ बैठा ॥ ५५ ॥ राजाने आदरसे
तोतेकी श्रेष्ठ वाणी सुनी तोतेके मुखसे बारंबार यह वाणी राजाको सुनाई दी ॥ ५६ ॥ वह अतीतात्मा राजा अतुल मुख विद्यमान होनेपर जी
विचार नहीं करता फिर किस प्रकार संसारके पार होगा ॥ ५७ ॥ वारंवार यह श्लोक पढकर राजाके आगे पतित हुआ और अमृतारी वाणीसे
समझानेलगा ॥ ५८ ॥ यह वटशाखापरसे वाणी राजाको सुनाई इस प्रकार राजाको सुख देनेवाला तोता कहकर आकाशमें उडगया ॥ ५९॥ राजा
पीयूषक्षरणं पीत्वा हृष्टरोमा नृपोऽभवत् ॥ उत्थाय शयनाचूर्ण यंत्रोक्षिप्त इव स्वयम् ॥ ५५ ॥ शुश्राव शुकसद्का-
द्वाणीमादरतो नृपः॥ शुकःस्ववक्रात्सुश्लोकं पपाठासौ पुनः पुनः॥५६॥ विद्यमानातुलं सौख्यमालोक्यातीतमात्मनः॥
न चिंतयति संमूढः स कथं पारमेष्यति ॥६७ ॥ वारंवारमिदं पद्यं पपाठ नृपतेः पुरः ॥ बोधयन्निव संमूढं वाचापीयू-
1. पकल्पया ॥५८॥ वटशाखामलंकृत्य मुहूर्तमीरयन्निदम् ॥ शुकः शुकसमो राज्ञोऽनिच्छतः खमुपारुहत् ।। ५९ ॥
श्रुत्वा तस्य वचः श्रीमान्मुमुदे मुमुद्देऽपि च ॥ किमेतदुक्तवान्धीरः शुकः पद्यं पुनःपुनः ॥६०॥ समुपालब्धवान्किवा
मद्भाग्यं सुमनोहरम् ॥ किंवा चायं भवेत्कृष्णद्वैपायनसुतोऽपरः॥ ६१ ॥ अथवा देवकीपुत्रः किंवा कश्यपनन्दनः ॥
स्वमेथानुचरं ज्ञात्वा मम दृष्टिपथं गतः ॥ १२॥ ममानुग्रहकर्ता च वासुदेवो भविष्यति ॥ इति चिंतापरे राज्ञि सा
सेना समुपागता ॥ ६३ ॥
सुखी होकर बहुत प्रसन्न हुआ और बारंबार कहनेलगा यह तोतेने क्या कहा है ॥ ६
॥ ६० ॥ यह इसने श्रेष्ठ वाणी क्या कही है क्या यह कृष्णदै-
पायनके पुत्र दूसरे शुकदेव हैं ॥ ६१ ॥ अथवा यह देवकीपुत्र यदुनन्दन हैं अपना दास जान मुझे दर्शन देनेकों आये हैं ॥ ६२ ॥ यह हमारे ऊपर
अनुग्रह करनेवाले वासुदेव होंगे राजा यह चिन्ताही करताथा कि, उस समय राजाकी सेना आनकर प्राप्त हुई ॥ ६३ ॥
भा.बैं अ.११ , विना जाने राजाको वह ढूँढती फिरती थी हाथी घोडे पैदल आदि चतुरंगसमूहसे युक्त थी ॥ ६४ ॥ उस सेनाके प्राप्त होनेसे यह राजा बहुत प्रसन्न न हुआ परन्तु कनखियोंसे मंत्रियोंकी ओरको देखने लगा ॥ ६५ ॥ उसने जाना कि, राजाको कोई चिन्ता है कौन उसे दूर करसकता है इस प्रकार राजा है चिन्ता करके कहींभी सुख न पाता हुआ ॥ ६६॥ न खाता न पीता न क्रोध करता था आनंदसागरमें योगीकी समान ध्यानमें मन होगया ॥६७॥ कहनेपरजी कुछ नहीं बोलता हँसानेसे नहीं हँसता न पुत्रोंको आलिंगन करै न भार्यासे प्रसन्न होता ॥ ६८ ॥ न कोई राजाके मनकी चिंता जाननेको आजानेयखुरक्षुण्णा मेदिनीलोकिनी चिरात् ॥ वाजिवारणपादातरथवृंदलसद्भटा ॥६४ ॥ तामाप्य दृढधन्वासौ नातिहष्टमना ययौ ॥ परंतु सचिवैः साकं नयनापांगलक्षितः॥६५॥ नृपोऽप्यचिंतयचित्ते को मेशोकं पराणुदेत् ।। इति चिंतापरो राजा न लेभे शर्म कुत्रचित् ॥६६॥ न शासते न वै भुंक्ते न हृष्यति न कुप्यति ॥ ध्यानमेवाश्रितः श्रीमान्योगीवानंदसंप्लवे ॥ ६७॥ वाच्यमानो न च ब्रूते हास्यमानो न नंदति ॥ परिरंभत नो पुत्रान्न भार्यामभि- नंदति ॥ ६८॥ न च तचित्तगां चिंतां कोऽपि वेद नृपेतरः ॥ कदाचिदासाय पति साध्वी साः गुणसुन्दरी ॥ ६९ प्रोवाच राजानं पोलोम्येव मरुत्पतिम् ॥ गुणसुन्दर्युवाच ॥ भो भो नृपतिशार्दूल शउसेनाभयावह ॥ ७० ॥ महा- राजनरेशान सर्वसाधुजनप्रिय ॥ किमेनमाधि दुर्धर्षा हादि धारयसे विभो ॥७॥नाहं जानामि वीरेश सज्जनानंदव- ईन ॥ त्वदाधिमूल भूपाल त्रैलोक्येऽपि कुतो यथा ॥ ७२ ॥ समर्थ होता था। एक समय वह गुणसुन्दरी अपने पति के निकट आनकर प्राप्त हुई ॥.६९ ॥ और एकान्तमें राजासे कहनेलगी जैसे पौलोमी इन्द्रसे बोलती है। हे नृपशार्दूल ! शत्रुओंके भय देनेवाले ॥ ७० ॥ हे महाराज ! नरेशोंके नरेश सम्पूर्ण, साधुजनोंके प्यारे हृदयके बीचमें आप कैसी दुर्धर्ष अमिको धारण किये हैं ॥ ७१ ॥ हे वीरेश ! मेरे हृदयके आनंद देनेवाले मैं इस वार्ताको नहीं जानती हे महिपाल ! आपके हृदयका शूल त्रिलो- ॥४ -- M कीमें होना नहीं देखती हूं ॥७२॥ नाग यक्ष पिशाच सुपर्ण उरग चारण गन्धर्व नर राक्षस संर असुर मृग खग ॥ ७३॥ सदा आपके गुणोंका गान करते रहते हैं आपके प्रसादरूप अमृतकी सब कोई कामना करते रहते हैं ॥७४॥ सो आप किस प्रकार दुःखाग्निमें पडे रहते हैं ? हे स्वामिन् ! ऐसी चिन्ताको मनमें रखना आपको शोभा नहीं देता है ॥ ७ ॥ हे वीर ! जो कुछ आपके अन्तःकरणमें हो पुत्र मंत्री आदिका यदि कोई अपराध हो तो आप क्षमा कीजिये ॥ ७६ ॥ माताके गर्भसे उत्पन्न हुआ बालक दुर्धर पदाघातको करता है तौ माता उसके ऊपर क्या विकार करती नागा यक्षपिशाचाश्च सुपर्णोरगचारणाः ॥ गंधर्वा नररक्षांसि सुरासुरमृगाः खगाः ॥ ७३ ।। सद्गुणग्रामपीयूषपयोधि- प्लाविताः सदा ॥ त्वत्प्रसादसुधासिंधुमाकांक्षति निरंतरम् ॥ ७४ ॥ स भवान्कथमत्युग्रं चिंताज्वलनमुद्धतम् ॥ हृदि धारयते साधो नैतत्त्वय्युपपद्यते ॥ ७९ ॥ यदि किंचिन्मया वीर भवांतः प्रकृतं भवेत् ॥ तनूजैः सचिवैर्वापि क्षमस्व त्व महीपते ॥ ७६ ॥ मातुर्जठरजो बालः पदाघातं सुदुर्धरम् ॥ करोत्यपि ममाधार किमिति विक्रियां भजेत् ।। ७७।। ततः क्षमस्व भूपाल अपराधशतानि चेत् ॥ शरच्छीतांशुसंदोहशोभनं वदनं तव ॥ ७८ ॥ कथं न राजते भूप हेमंते कमलं यथा ॥ प्रसन्ननयनापांगालोकनानंदनिर्वृता ॥ ७९ ॥ साहं कथं निरानंदे त्वाय स्यां हृदयेश्वर ॥ आपीय कर्णरस्यानि महिलावचनान्यपि ॥ ८० ॥ तथैवास्ते स भूपालो न किंचिदभिजल्पते ॥ स्मरञ्छुकवचस्तप्यं दुर्वि- ज्ञेयं सुरासुरैः ॥ ८१॥ ॥ ७७ ॥ हे राजन् ! इसी प्रकार आपको सौ अपराध क्षमा करने चाहिये आपके मुखकमल शरदके चन्द्रमाकी समान मनोहर है ॥ ७८ ॥ हे महाराज ! हेमंतकालीन कमलकी समान वह शोभित नहीं होता है आपके नेत्रोंकी दृष्टिसे सब लोक प्रसन्न होजाते हैं ॥ ७९ ॥ हे जनेश्वर ! सो आपके होते मैं कैसे निरानंदताको प्राप्त होती हूं ? इस प्रकार अमृतकी समान अपनी भार्याके वचन श्रवण कर ॥ ८० ॥ वह राजा वैसेही . . ।
.
.
भा.दी.
अ.१२
स्थित रहा और कुछभी न बोला और देवता असुरोंकोभी दुर्विज्ञेय शुकके वचन स्मरण करता रहा ॥ ८१ ॥ और पतिव्रतमें परायण
अपनी भायीसे कुछ न बोला वहमी भतीके दुःखसे दुःखी हो गरम श्वास ले ॥ ८२ ॥ राजाके चिन्ता करनेके कारणको न जानसकी,
इस प्रकार राजाको कितना एक समय बीतगया ॥ ८३ ॥ और संसारसागरसे पार होनेको बहुत कालतक विचार करनेलगा ॥ ८४ ॥ इति
श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये हृदधन्वोपाख्याने भाषाटीकायां शुकवाक्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ सूतजी बोले ॥ एक समय वह
न किंचनोवाच प्रियां पातिव्रत्यपरायणाम् ॥ वाग्मिनी सापि निःश्वस्य भर्तृदुःखातिपीडिता ॥ ८२ ॥ न बुबोध
धरानाथचिंताकारणमद्भुतम् ॥ एवमेव प्रियान्कालः प्रवबाज महीपतेः॥ ८३ ॥ संदेहसागरोत्तारहेतुं चिंतयतश्चिरम्
॥ ८४ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये दृढधन्वोपाख्याने शुकवाक्यं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ ७ ॥
सूत उवाच ॥ कदाचिच्चिन्तयानस्य राज्ञः शोकातुरस्य च ॥ आजगाम प्रसन्नात्मा वाल्मीकि गवान्विभुः॥१॥
यो रामचरितं दिव्यं चकार परमाद्भुतम् ॥ यस्य श्रवणमात्रेण ब्रह्महापि विमुच्यते ॥ २ ॥ नृपतिस्तमथालोक्य
मित्रावरुणनंदनम् ॥ अतिसंहृष्टवदनः स्वात्मानं बह्वमन्यत ॥ ३॥ अभ्यर्णवर्तनां नारीमुवाच गुणसुंदरीम् ॥ बाले
ममाघ दुःखानामन्तः प्राप्तो हरीच्छया ॥४॥
गुणोंसे श्रेष्ठ राजा विचार करतेथे इसी समय भगवान् प्रभु वाल्मीकिजी आये ॥ १ ॥ जिन्होंने परम श्रेष्ठ रामचरित वर्णन कियाहै जिसके श्रवणमात्रसे
ब्रह्महत्या छूट जातीहै ॥ २ ॥ उन उदार मित्रावरुणको राजा देखकर बहुत प्रसन्न हो अपने आपको कतार्थ मानता हुआ ॥ ३ ॥ और अपने
निकट वर्तमान स्त्रीसे इस प्रकार कहने लगा; हे बाले ! आज मेरे दुःखोंका अन्त प्राप्त हुआहै ॥ ४ ॥
BRUAan
॥४३॥
यह वाल्मीकिही नहीं साक्षात् स्वयं नारायणही है साधु सब प्राणियों में दयायुक्त दीनवत्सल होतेहैं ॥ ५॥ यह साक्षात् रामके परम प्रिय मुनि हैं. हे द्विजातियोंमें इनके समान कोई दूसरा नहीं है ॥ ६ ॥ जिसने रामायण बनाकर त्रिलोकीको पवित्र कियाहै. हे वामोरु ! वही यह चले आते हैं इससे अधिक और क्या मेरा भाग्य होगा ॥ ७ ॥ सूतजी बोले ॥ इस प्रकार कहता हुआ राजा मुनीश्वरके समीप गया और वहा पृथ्वीमंडलका ईश्वर उनके नायं वाल्मीकिरायाति किंतु साक्षाद्वारः स्वयम् ॥ सर्वभूतदयायुक्ताः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ५ ॥ अयं साक्षान्महाभागःश्रीरामदायितो मुनिः॥ नानेन सदृशो लोके द्विजातिर्विद्यते शुभे ॥६॥ कृत्वा रामायणं येन पावितं जगतां त्रयम् ॥ सोऽयमायाति वामोरु किं मे भाग्यमतः परम् ॥७॥ सूत उवाच ।। एवं रटन्महीपाल:- प्रत्युद्गम्य मुनीश्वरम् ॥ पपात चरणोपांते क्षोणीमंडलनायकः ॥ ८॥ तमासाद्य मुनि प्रेम्णा वाल्मीकि जगतां गुरुम् ॥ आनंदेन युतो राजा ददौ वै परमासनम् ॥ ९॥ मधुपर्कविधानेन संपूज्य मुनिपुंगवम् ॥ धेनुं निवेद्या- तिथये विश्राम्य मुनिभूषणम् ॥ १० ॥ पादावंकगतौ कृत्वा कराभ्यां प्रामृजन्नृपः ॥ पादावनेजनीरापः शिरसातिसुदा वहन् ॥ ११ ॥ उवाच स्निग्धया वाचा स्मरज्छुकवचो हृदि ॥ हार्दचिंतः तमाकांक्षन्मा- नयन्मुनिपुंगवम् ॥ १२॥ चरणों में गिर गया ॥ ८॥ जगत्के गुरु वाल्मीकिजीको प्रेमसे मिलकर राजाने परमानन्दको प्राप्त हो उनके निमित्त आसन दिया ॥ ९ ॥ और मधुपर्कके विधानसे मुनिश्रेष्ठका पूजन किया अतिथिसत्कारके निमित्त धेनु निवेदन कर विश्राम करनेको कहा.॥ १०॥ और राजा अपने हाथसे उनके चरण दाबने लगा और उनके चरणोंका जल अपने शिरपर धारण किया ॥ १३ ॥ और हृदयमें तोतेके वचन स्मरण कर १ भा.दी. अ.१२ राजाने कहा और अपन हृदयकी चिन्ता इस प्रकार उन मुनिश्रेष्ठसे सुनाने लगा ॥ १२॥ राजा बोले ॥ हे मुनीश्वर ! मैं कृतकृत्य और भाग्यवान हूं आज मेरी सब क्रिया और जन्म आपके दर्शनसे सफल हुआ है ॥ १३ ॥ हे विनो ! आज आपके चरणदर्शनसे मेरा ज्ञान सफल है ॥ १४ ॥ हे विजश्रेष्ठ ! मैं कृतार्थ हूं जो आप मेरे दृष्टिगोचर हैं इससे मेरा श्रुत शास्त्र सफल हुआ है ॥ १५॥ यह विचार करकेभी मैं नहीं जान सक- ताहूं कि किस पुण्यसे आपका दर्शन हुआ है जो त्रिलोकीके ताप दूर करनेवाले आप हमोर नेत्रगोचर हुए हो ॥ १६ ॥ आज हमारे पितर राजोवाच ॥ भगवन्कृतकृत्योऽहं सभाग्योऽस्मि द्विजेश्वर ॥ अद्य मे सेफलं जन्म अद्य मे सफलाः क्रियाः ॥ १३॥ अद्य मे सफलं ज्ञान विभो त्वत्पाददर्शनात् ॥१४॥ कृतार्थोऽई कृतार्थोऽहं कृतार्थोऽहं द्विजेश्वर ॥ श्रुतं मे सफलं जातं यद्भवानक्षिगोचरः॥१५॥ विमृशन्नानुपश्यामि केन पुण्येन नो भवान् ॥ त्रैलोक्यतापसंहार यन्नेत्रविषयीकृतः ॥१६॥ अद्य मे पितरस्तृप्ताः सेंद्रा लोके प्रतिष्ठिताः । स्थूलसूक्ष्मात्मको देवो विष्णुस्तुष्टो महेश्वरः ॥ १७ ॥ किमु वयं मह- द्भाग्यं जगत्पावनपावन ॥ दृश्यते मत्सभासंस्थो वाल्मीकिः सुरदुर्लभः ॥ १८ ॥ अहो स्वप्नः किमथवा माया वा मनसो भ्रमः ॥ अलभ्यमपि लोकेशैः पश्याम्यद्य समक्षतः ॥१९॥ त्वत्समागमतो ब्रह्मन्किमलभ्यं ममाधुना ॥ यत्त्वया जगतां नाथस्त्रैलोक्यपावनो हरिः॥२०॥ . ॥४२॥ इन्द्रादि देवताओं सहित प्रतिष्ठित हुए, आज स्थूलसूक्ष्मात्मक विष्णु महेश्वर सन्तुष्ट हुए ॥ १७ ॥ मैं अपने जगत्के पवित्र करनेवाले भाग्यका क्या वर्णन करूं जो समाके बीचमें सुरदुर्लभ वाल्मीकिजीका दर्शन करताहूं ॥ १८॥ क्या यह स्वम माया वा मनका भ्रम है जो इन्द्रादिको अलाय देव मेरे नेत्रगोचर हुए हैं ॥ १९ ॥ हे जगवन् ! आपके दर्शनसे मुझको क्या अलक्ष्य है जो कि आपने त्रिलोकीके पवित्र करने- १ . वाले नारायणका इस प्रकार निरूपण किया है ॥ २० ॥ कि एसा और कोई निरूपण नहीं कर सकता तुम्हारे मुखसे निकले हुए हरिकथारूपी अमृतके पान करनेसे ॥ २१ ॥ मनुष्य सुखसे संसारसागरके पार हो जाते हैं। सूतजी बोले ॥ इस प्रकार राजा मुनिसे कह नमस्कार कर मौन हुआ पुत्र मित्र मंत्रिजनभी इसी प्रकार मुदित हुए ॥ २२॥ इस प्रकार वाल्मीकि राजाको प्रसन्न और विस्मययुक्त देखकर उनके वचना- मृतसे तृप्त होकर बोले ॥ २३ ॥ वाल्मीकिजी बोले ॥ हे राजन् ! तुम धन्य हो यह भक्ति तुममें ही हो सकती है, हे राजन् ! रामके भक्तजन सदा तथा निरूपितो रोमो यथा नान्येन केनचित् ।। पिबतस्त्वन्मुखांभोजाच्च्युतं हरिकथामृतम् ॥ २१॥ मुच्यते भव- पाशेभ्यः सुखेनैवाजिताः जनाः ॥ सूत उवाच ॥ विरराम मुनि नत्वा स्तुत्वा नृपतिनंदनः ॥ सपुत्रः स्वजनामात्यः सपत्नीकः सबांधवः ॥ २२॥ वाल्मीकिरथ तं दृष्ट्वा राजानं विस्मयान्वितम् ।। उवाच परमप्रीतः पीत्वा तद्वचनामृ- तम् ॥२३॥ वाल्मीकिरुवाच ॥ साधुसाधु नृपश्रेष्ठ त्वय्येव उपपद्यते ॥रामभक्ताः सदा राजन्परोपकृतये नराः ॥२४॥ धन्योऽस्मि नृपशार्दूल वद यत्ते मनोगतम् ॥ अदेयमपि दास्यामि, ना देयं विद्यते तव ॥ २५ ॥ त्वद्विधा गाणनो. राजन्वराही नेतरे नृप । किंचिद्वक्तुं स्पृहा तेऽस्ति ज्ञातमद्योगतेस्तव ॥ २६ ॥ राजोवाच ॥ त्वत्प्रसादान्मुने किंचि- न्यूनं नास्ति ममाधुना ॥ यदहं वसुधापीठे कामये सुखकारणम् ॥ २७ ।। परोपकारके निमित्त होते हैं ॥ २४ ॥ हे राजन् ! तुम्हारी वार्तासे मैं धन्य हूं जो आपके मनोगत हो उसको कहिये जो अदेय वस्तु होगी उसेनी दे सकताहूं मुझे कोई वस्तु आपको अदेय नहीं है ॥ २५ ॥ हे राजन् ! आपसरीखे राजा ही श्रेष्ठ हैं दूसरे नहीं जो कुछ तुम्हारे पूछनेकी, इच्छा हो सो कहो मैं कहूंगा ॥ २६ ॥ राजाने कहा॥ हे ब्रह्मन् ! आपके प्रसादसे मुझे किसी प्रकारको न्यूनता नहीं है वसुधाके पीठपर अर्थात सिंहासनपर ~- मा. टी. अ.१२ स्थित हो सुखके कारणकी कामना करतेही पूर्ण होता है ॥ २७ ॥ आपके चरणोंकी कृपा मेरे ऊपर पूर्ण है हे विद्वन् ! तथापि मेरे हृदयमें संदेह है ॥ २८ ॥ इसके दूर करनेको आपके सिवाय कोई दूसरा नहीं है हे ब्रह्मन् ! सो आप मेरे हृदयका संदेह दूर कीजये जो चिरकालसे मेरे मनमें शल्यके समान स्थित होरहा है ॥ २९ ॥ हे राजेंद्र ! आप शीघ्र कहिये ऐसा कहनेपर राजाने कहा । राजा बोला ॥ हे ब्रह्मन् ! मैं राज्य करता हूं और कोई इस तरह न करसकै ॥ ३०॥ मैं जहांतक देखता हूं वहांतक सुखका पार नहीं देखता हूं पुत्र पत्नी प्रजा भृत्य बांधव स्वजन ॥ ३१ ॥ हाथी घोडे तत्त्वदीयपदांभोजकृपया चास्ति मेऽखिलम् ॥ परंतु हृदये विद्वन्संदेहो विद्यते मम ॥ २८॥ तस्य पारप्रदस्त्वत्तो नान्यस्त्रिभुवनेष्वपि ॥ तत्पराणुद मे ब्रह्मन्मनःशल्यं चिरार्पितम् ॥ २९ ॥ सत्वरं वद राजेंद्रेत्युक्तो भूपोऽप्युवाच ॥ राजोवाच ॥ ब्रह्मत्राज्यं करोम्यद्य कथं नान्यः करिष्यति ॥ ३० ॥ सुखानामपि नो पारं पश्यामि प्रविलोकयन् ॥ पुत्राः पत्न्या पजा भृत्या बांधवाः स्वजना मम ॥ ३१ ॥ हया नागा रथा धान्यं धन कोशो बलं सुहृत् ॥ मित्राण मेदिनी सर्वा शरीर चासनानि च ॥३२॥ सर्वमेतच्छुत तेऽस्ति यथा नान्यत्र विद्यते॥ नापेक्षा मानुषे लोके त्रिदिवेऽपि "मुनीश्वर ॥ ३३ ॥ केन पुण्यप्रभावेण लब्धमैश्वर्यमद्धतम् ॥ स्पृहणीयं सुरेशाद्यैरपि कि मानवैर्मुने ॥ ३४॥ काशी- कोशलकर्णाटकांबोजकुरुकैकयान् ॥ मत्स्यमागधगांधारगोडसैंद्रेन्द्रसेंधवान् ॥३५॥ रथ धान्य धन कोश बल अधिक मित्र मेदिनी शरीर आसन ॥ ३२ ॥ वह मैंने सब कुछ प्राप्त किया है जो और स्थानमें नहीं है हे मुनीश्वर ! मुझे त्रिलो- कीमें किसी प्रकारकी अपेक्षा नहीं है ॥३३॥ केवल यही पूछता हूं कि मैं किस पुण्यके प्रतापसे इस अद्भुत ऐश्वर्यको प्राप्त हुआ हूँ यह ऐश्वर्य इन्द्रा- दिकोंकोनी दुर्लभ है मनुष्योंकी कौन कहै ॥ ३४ ॥ काशी कोशल कर्णाटक काम्बोज कुरु केकय मत्स्य मगध गांधार गौड सैंद्र इन्द सैंधव ॥ ३५ ॥ L
कलिंग वंग पाण्ड्य अनंग कैकट केरल दशार्ण नीच चैलेय लाटक मरु धीवर ॥ ३६ ॥ काश्मीर मरु पांचाल मरुमालव कैकय सौराष्ट्र, जांगल
आनत हूण हैहय जनक ॥ ३७॥ त्रिगर्त हय पांचाल पाटच्चर कुटच्चर पण्यप श्रीक लम्बोष्ठ दरद आभीर भैरव ॥ ३८॥ हयवर्त करीनास कर्ण पाव-
रण,औरभी देश तथा चित्र योधा राजानी महायुद्ध करनेवाले हैं ॥ ३९ ॥ हे महामुने! वह सब लीलाहीसे मुझे भेटें देते हैं और प्रतापसे अनेक
प्रकारके धन धान्य भेंट करते हैं ॥ ४० ॥ हे राजन् ! हमारे पुत्रोंने इनको वेश्याकी समान करदाता बना दिया है हे ब्रह्मन् ! इसमें क्या कारण
"कलिंगवंगपांडयांश्चानंगकैकटकेरलान् ॥ दशानीचचैलेयाँल्लाटकान्मरुधीवरान् ॥३६॥ काश्मीरमरुपांचालमरुमा-
लवकैकयान् ॥ सौराष्ट्रजांगलानर्तहूणहैहयजानकान् ॥ ३७ ॥ विगतहयपांचालपाटचरकुटच्चरान् ॥ पण्यपश्रीक-
लंबोष्ठदरदाभीरभैरवान् ॥ ३८॥ हयवर्तान्करीनासान्कर्णप्रावरणानपि ॥ अन्यानपि च देशान्मे तन्नृपाश्चातियो-
धिनः॥३९॥ लीलया बलिमादाय नत्वा यांति महामुने । प्रतापादेव राजन्या धान्यं यच्छंति सत्वराः॥४०॥ कृतामे
तनयैर्वीर वेश्या इव करप्रदाः ॥ किमत्र कारण ब्रह्मस्तपो दुःखिदयाथवा ॥ ११ ॥ अन्यश्च हृदयाघन्मे ह्यनिशं नाप-
सप्पति ॥ शृणु तन्मे मुनिश्रेष्ट संदेहं मे पराणुद ॥ ४२ ॥ कदाचिन्मृगयाकामो गतोऽहं गहनं वनम् ॥ चरित्वा
मुचिरं प्राप्तो दुश्चरं गहन वनम् ॥ ४३ ॥ भ्रमन्नपश्यन्कासारं तत्र पीतं जलं मया ॥ श्रमापनोदमाकांक्षस्तीरे न्ययो-
धमाश्रितः॥४४॥
सो आप हमसे कहिये ॥ ४१ ॥ हे भगवन् ! इसी विचारमें मेरा मन रहता है दूसरे स्थानमें नहीं जाता हे मुनिराज ! इस मेरे चरित्रको श्रवण करें
आप मेरा सन्देह दूर कीजये ॥ ४२ ॥ मैं एक समय वनमें मृगयाको गयाथा वहां बहुत कालतक वनमें विचरता रहा ॥ ४३ ॥ वहां वनमें भ्रमण
करते मुझको एक सरोवर मिला वहां जलपान कर उसके किनारे न्यग्रोधका वृक्ष था उसके नीचे श्रम दूर करनेको मैं बैठ गया ॥ ४४ ॥
.
भा..दी.
अ.१३
जिसकी सुन्दर छाया नन्दनवनकी समान मनको आनन्द देनेवाली थी वहां मैंने परम मनोहर एक शुकको अवलोकन किया ॥ ४५ ॥ बड़ा मधुर
भाषण करता था उसको देखकर मेरा मन बडा प्रसन्न हुआ जबतक मेरे चित्तकी वृत्ति उस-पक्षीमें पडें तबतक वह शुक मधुर वाणीसे मुझसे
बोला अर्थात् उसने एक श्लोक पढा ॥ ४६ ॥ बारंबार वह पक्षी उस श्लोकको पाठ करने लगा मेरे अतीव. सुखकी विद्यमानतामें उसने उपदेश
किया ऐसा सुख देखकरनी ॥ ४७ ॥ जो विचार नहीं करता वह मूढ किस प्रकारसे पार होगा यह बात श्रवण कर मैं बडा विस्मित हुआ॥ ४८ ॥
सुच्छायं सुंदरतरं मनोनयननंदनम् ॥ अपश्यं दर्शनीयांगं शुकमेकं मनोहरम् ॥ ४५ ॥ मधुराभाषिणं विप्रं दृष्ट्वा मेह-
पितं मनः॥ चेतोवृत्तिर्यतस्तस्मिन्यावन्मम पतत्रिाण ॥ तावन्मां सम्मुखो भूत्वा श्लोकमेकं पपाठ ह ॥ ४६॥ पुनः
पुनस्तदेवासो पद्यं पठति पक्षिराट् ॥ विद्यमानातुलं सौख्यमालोक्यातीतमात्मनः ॥ १७ ॥ न चिंतयति संमूढस्त-
कथं पारमेष्यति ॥ इति वाचं शुकेनोक्तामाकर्पोहं सुविस्मितः ॥ १८ ॥ समुत्थितस्ततः शीघ्र कीरराङ्गगनं गतः ॥
न तजानाम्यहं ब्रह्मन्किमुवाच हरिच्छदः ॥४९॥ कोऽसौ शुकः किमाहायं मह्यं वै भावयन्मने ॥ इमं मे हादसंदेह
भवानुच्छेत्तुमर्हति ॥५०॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये दृढधन्वोपाख्याने दृढधन्ववृत्तांतकथनं नाम द्वादशोऽ--
ध्यायः ॥ १२॥ सूत उवाच ॥ श्रुत्वा वाक्यानि भूपस्य वाल्मीकिमुनिसत्तमः ॥ प्राणायामपरो भूत्वा मुहूर्त ध्यान-
माश्रितः॥१॥
इस प्रकार वह पक्षिराट् कहकर आकाशको चला गया हे ब्रह्मन् ! यह मैं नहीं जानताहूं कि, पक्षिराजने क्या कहा ॥ ४९ ॥ वह शुक कौन था
क्या उसने मुझे उपदेश किया मेरे इस हृदयके संदेह दूर करनेको आपही योग्य हो॥ ५० ॥ इति श्रीप० पुरुषोत्तममा० . दृढधन्वोपाख्याने भाषा-
टीकायां दृढधन्ववृत्तान्तकथनं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिजी राजाके वचन श्रवण कर प्राणायाम करके एक मुहूर्तभर तक
॥४४॥
ध्यानमें स्थित हुए ॥ १ ॥ भूत भविष्य वर्तमान उनको हाथमें आमलेकी समान वर्तमान था इसी कारण मुनिश्रेष्ठने मनमें ध्यान किया ॥ २॥ फिर हँसकर मुनिराजने राजासे कहा और विस्मयको प्राप्त होकर बारंबार शिर कंपित करने लगे ॥ ३ ॥ वाल्मीकिजी बोले ॥ हे राजन् ! अपना पहले जन्मका चरित्र श्रवण कीजये हे राजन् ! जिस पुण्यके प्रतापसे आपको यह परम ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है ॥ ४ ॥ हे राजेन्द्र ! पहले जन्ममें तुम द्रविडदेशमें ताम्रपर्णी नदीके किनारे सुदेव नामसे विख्यात विष थे ॥५॥ आश्वलायनप्रोक्त कर्ममें तत्पर सदाचारमें परायण धर्मात्मा सत्यवादी यथाला- करामलकवद्विखं भूतं भव्यं भवञ्च यत् ॥ व्यालोक्य स मुनिश्रेष्ठो ध्यानस्तिमितमानसः ॥२॥ ततो विहस्य भगवा- वाजानं मुनिरूचिवान् ॥ विस्मितः शुभया वाचा शिरो धुन्वन्पुनः पुनः ॥३॥ वाल्मीकिरुवाच ॥ शृणु भूपतिशार्दूल प्राग्जन्मचरितं तव ॥ येन पुण्येन भगवांस्त्वय्यैश्वर्यं समर्पयत् ॥४॥ पुरा जन्मनि राजेंद्र भवान्द्रविडदेशजः॥ द्विजः कश्चित्सुदेवाख्यस्ताम्रपर्णीतटे वसन् ॥ ५॥ आश्वलायनसंभूतः सदाचारपरायणः ॥ धार्मिकः सत्यवादी च यथा- लाभेन तुष्टिमान् ॥ ६॥ स्वाध्यायव्रतसंपन्नः सदा विष्णुपरोऽभवत् ॥ तस्यैवं वर्तमानस्य भार्यासीद्वरवर्णिनी॥७॥ गौतमीति सुविख्याता सवंशजननी शुभा ॥ पति पर्यचरत्प्रेम्णा शीतांशुं रोहिणी यथा ॥ ८ ॥ तस्यैवं गृहमधे च वर्तमानस्य धर्मतः ॥ व्यतीतः सुमहान्कालः प्राप नासो सुसंततिम् ॥९॥ असेही संतुष्ट होनेवाले ॥ ६॥ वेदपाठके व्रतमें सम्पन्न सदा विष्णुके भजनमें तत्पर थे उनकी परम श्रेष्ठ भार्या वर्तमान थी ॥ ७ ॥ वह गौतमी नामक श्रेष्ठ वंशमें उत्पन्न थी और प्रेमसे पतिव्रत धर्म पालन करतीथी जैसे रोहिणी चन्द्रमाकी परिचर्या करतीहै ॥ ८ ॥ उसके साथ यथायोग्य गृहस्थ- धर्ममें वर्तमान होकर उसको बहुत समय बीतगया तथापि कोई सन्तति न हुई ॥ ९ ॥ , ना. दी. अ.१६ एक समय वह अपनी स्त्रीसे सेवित हो स्थित था और वह शोकसे गद्द कंठ होकर कहनेलगा ॥ १० ॥ हे सुन्दरी ! संसारमें पुत्रप्रातिकी बराबर सुख नहीं है उस पुत्रकी प्राप्तिके विना मेरा जीवन निष्फल है ॥ १३ ॥ यदि मेरे पुत्र न हो जो श्रेष्ठ और मान देनेवाला है तो मेरी मृत्यु होनाही श्रेष्ठ है मुझको अपुत्र रहना अभीष्ट नहीं है ॥ १२ ॥ इस प्रकार वह प्रियभाषी बडे खेदसे अपनी स्त्रीको देखकर दुःखी हुआ तब वह प्रियवादिनी अपने स्वामीको समझाती हुई वचन बोलने में चतुर श्रेष्ठ वचन कहने लगी ॥ १३ ॥ गौतमी बोली ॥ हे द्विजराज ! इस प्रकारके वचन आप मत एकदा स समासीनः सेव्यमानः स्वकांतया ॥ जगाद वचन विप्रः शोकेन गद्दाक्षरम् ॥ १०॥ अयि सुंदार संसारे नास्ति सौख्यं सुतात्परम् ॥ तमप्राप्य वरं पुत्रं जीवितं मम निष्फलम् ॥१३॥ न लभेयं सहक्षं चेत्सुतं मानिनि मान- दम् ॥ सद्यो मे मृतिरेवास्तु नहि पुण्यं प्रियं मम ॥ १२॥ अतिखेदसमाविष्टं प्रियं वीक्ष्य प्रियंवदा ॥ आश्वासयत्स्व- भतार वाक्यैर्वाक्यविशारदा ॥ १३ ॥ गौतम्युवाच ॥ मैवंविधान वाक्यानि बहि वल्लभ भूसुर ॥ भवद्विधा भागवता मैवं मुह्यति सूरयः॥ १४॥ सत्यधर्मपरोऽसि त्वं जितः स्वर्गस्त्वया विभो । साधुचारित्रसाहः किंतु पुत्रैः करिष्य- सि.॥१५॥ यदि नारायणः पुत्रं न दास्यति हरिप्रिय ॥ कथं पुत्रैः सुखावाप्तिर्भवित्री तव सुव्रत ॥१६॥ चिंतनं रघु- नाथस्य हरिपादार्चनं विभो ॥ सुखं दास्यति विजेंद्र न तु पुत्रः कथंचन ॥ १७ ॥ यदि पुत्रजसौख्ये तु कामनास्ति दृढा तव ॥ कथं न देवदेवेशमाराधयसि केशवम् ॥ १८॥ कहिये आप सरीखे भक्त विद्वान् इस प्रकारसे शोच नहीं करतेहैं ॥ १४ ॥ आपने सत्य धर्ममें तत्पर होनेके कारण स्वर्ग जीत लिया है आपके चरि- त्रही बढे पवित्र हैं आप पुत्रोंसे क्या करोगे ॥ १५ ॥ यदि नारायणकी इच्छा पुत्र देनेकी न हो तो पुत्र और सुखादिकी प्राप्ति किस प्रकार होसकतीहै ॥ १६ ॥ रामका चिन्तन करना और हरिके चरणोंका पूजन करनाही सुखका देनेवाला है न कि पुत्र ॥ ३७॥ और यहि आपकी कामना - ॥४५॥ १ -- - ८ . पुत्रकेही सुखमें है तो फिर आप देवदेवेश केशवकी आराधना क्यों नहीं करतेहो ॥ १८॥ हे ब्रह्मन् ! पूर्वकालमें जिनकी आराधना कर कर्दमको सुखकी प्राप्ति हुई उन सर्व सुखके निधानको प्राप्त हो पीछे हरिपदको प्राप्त हुए ॥ १९॥ सर्वेश्वर हरि जगत्के नाथकी सेवा करो जिनकी किंचित् कपासे प्राणी उअयलोकमें प्रसन्न होता है ॥ २० ॥ ब्राह्मणश्रेष्ठ अपनी स्त्रीके यह वचन श्रवण कर उसके साथ निश्चय कर ताम्रपर्णी नदीके किनारे गया ॥ २१ ॥ और एकान्तमें स्थित होकर परम दुष्कर तप करनेलगा चार सहस्र वर्षतक तप किया जिससे देवता कंषित होगये ॥ २२॥ जगन्नाथ हृषीकेश यमाराध्य पुरा ब्रह्मन्कर्दमः सुखमाप्तवान् ॥ सर्वसौख्वनिधि प्राप्य पश्चाद्धारपदं गतः ॥ १९॥ सेवस्व जगतां नाथं हरि सर्वेश्वरं विभुम् ॥ यत्कृपापांगलेशेन इहामुत्र च मोदते॥२०॥ इति वाक्यानि रामायाः श्रुत्वाविप्रशिखामणिः॥ निश्चित्यैवं तया साई ताम्रपर्णीतटं गतः ॥२१॥ चचार विजने तस्मिंस्तपः परमदुष्करम् ॥ चतुर्वत्सरसाहस्रं येन देवा- श्चकंपिरे ॥ २२ ॥ सभाजयनगन्नाथं हृषीकेशं जगद्गुरुम् ॥ विष्णुः सर्वेश्वरो देवश्चिरात्तुष्टः समागमत् ॥ २३॥ दृष्ट्वा 'त कमलाकांतं सुपर्णोपार शोभितम् ॥ तुष्टाव परया भक्त्या सपत्नीका प्रहर्षितः॥२४॥ सुदेव उवाच ॥ नमस्ते जगतां नाथ त्रैलोक्याभयद प्रभो ॥ सर्वेश्वर नमस्तेऽस्तु त्वामहं शरणं गतः ॥२५॥ पाहि मां परमेशान शरणागतव- त्सल ॥ जगद्वंद्य नमस्तेऽस्तु नमस्ते पुरुषोत्तम ॥२६॥ जगद्गुरुको ध्यान करते रहे सर्वेश्वर देव विष्णु बहुत कालमें सन्तुष्ट हुए और उनके समीप आये ॥ २३ ॥ उन कमलाकान्तको गरुडजीके ऊपर स्थित देखकर वह स्त्रीके सहित उनको परम भक्तिसे संतुष्ट करनेलगे ॥ २४ ॥ सुदेव बोला ॥ गरुडके ऊपर स्थित कमलाकान्तको नमस्कार है जगत्पति त्रिलोकीके अभय देनेवाले सर्वेश्वर आपको नमस्कार है मैं आपकी शरणमें प्राप्त हुआहूं ॥ २५ ॥ हे परमेशान ! हे शरणागतवत्सल ! आप मेरी रक्षा । ।
- मा.वै. अ.१३ कीजिये. हे जगन्ध पुरुषोत्तम ! आपके निमित्त नमस्कार है ॥ २६ ॥ जैसे दूसरे देवताओंके भक्त अज्ञानसंकटमें दुःख पाते हैं इस प्रकार आपके भक्त दुःखी नहीं होते हे पुरुषोत्तम देव ! आपको नमस्कार है ॥२७॥ हे महाराज ! जैसे मापने देवकीको कंसके संकटसे छुडाया है इसी प्रकार घोर दुःखसे मेरी रक्षा करो ॥ २८ ॥ जिस प्रकार यज्ञसेनसुता द्रौपदी दुर्योधनके वशीभूत हुई विलाप करती हुईकी आपने रक्षा की थी ऐसे मेरी रक्षा करो ॥ २९ ॥ हे प्रभो ! जब कि आपने जरासंधके वशीभूत राजाओंको महासंकटसे छुडाया तो आप हमारी रक्षा क्यों नहीं करने हो ॥३०॥ हे यथान्यसुरभक्तस्तु क्लिश्यत्यज्ञानसंकटे ॥ न तथा भवदीया ये तेन त्वं पुरुषोत्तमः ॥ २७ ॥ यथाविता- महाराज देवकी कंससंकटात् ॥ तथैव रक्ष मां स्वामिन्धोदुष्पारसागरात् ॥ २८ ॥ यज्ञसेनसुता दुष्टदुर्योधनवशं गता ॥ लालप्यमानाऽविरतं त्वयैव परिरक्षिता ॥ २९ ॥ दुष्टमागधभूपालसंरोधपरिकर्षिताः ॥ राजन्या रक्षिता विष्णो 'न मां किमिह रक्षसि ॥ ३० ॥ दारुणाजगरग्रस्तानेकाहीरसुतान्विभो । यस्त्वं रक्षितवान्कृष्ण स मां पाहिजेश्वर ॥३१॥ बल्लव्यो विरहाक्रांतदेहाः काननविभ्रमाः॥ मध्यतां दर्शयित्वा ते ह्यनस्पसुखपूरिताः ॥ ३२ ॥ पाहि मां जगदानंद गोविंद शरणागतम् ॥ प्रपन्नभयहेत्यैवं व्रतं तेऽस्ति गदाधर ॥ ३३ ॥ जतुगेहे प्रचंडाग्निज्वालाभिः परिवे- ष्टिताः ॥ रक्षिताः पांडुतनयास्त्वयैव जगदीश्वर ॥ ३४ ॥ विनो.! महाअजगरसे असे हुए अहीरपुत्रोंकी जैसे आपने रक्षा की थी उसी प्रकार आप हमारी रक्षा करो ॥ ३१ ॥ गोपी विरहसे व्याप्त हो वनमें भ्रमण करती थीं आपने भक्तिसे सन्तुष्ट हो उनको दर्शन देकर महासुखसे पूरित किया ॥ ३२ ॥ हे गोविन्द ! मैं शरणमें प्राप्त हुआ हूं आप मेरी रक्षा करो; आप प्रसन्न होकर मुझको अभय दीजिये हे गदाधर ! यही आपका व्रत है ॥ ३३ ॥ लाक्षागृह जिस समय महा प्रचंडामिसे प्रज्वलित - Hin हो रहाथा हे जगदीश्वर ! उस समय आपनेही पाण्डुपुत्रोंकी रक्षा की ॥ ३४ ॥ हे दामोदर ! हमारे आधार भक्तोंके अनय करनेवाले लक्ष्मी- कान्त गरुडध्वज ॥ ३५ ॥ चौबीस तत्त्व जीवन के कारणसे वर्जित वासवानुज विश्वेश चक्रपाणि, आपके निमित्त नमस्कार है ॥ ३६ ॥ हे ईश्वर ! ब्रह्मादि देवता आपकी स्तुति करनेको समर्थ नहीं हैं मैं मनुष्य अल्पबुद्धि किस प्रकारसे आपकी स्तुति कर सकूँ ॥ -३७ ॥ इस प्रकार स्तुति कर वह ब्राह्मण नारायणके आगे स्थित हुआ, तब भगवान् उसके खेदको दूर करते हुए मधुरवाणीसे बोले ॥३८॥ विष्णु बोले ॥ धन्य हो दामोदर ममाधार भक्तानामभयंकर ॥ क्षीरोदतनयाकांत सुपणांकितकेतन ॥ ३५ ॥ चतुर्विंशतितत्त्वौघजीवनाय- विवर्जितं ॥ वासवानुज विश्वेश चक्रपाणे नमोऽस्तु ते ॥३६॥ न त्वां ब्रह्मादयो देवाः स्तोतुं शक्ता रमेश्वर ॥ मनुष्यो झल्पबुद्धिश्च कथं स्तोतुं क्षमो ह्यहम् ॥ ३७॥ इति स्तुत्वा द्विजस्तस्थौ खिन्नो हि पुरतो हरेः । ततो. विष्णुाह्मणं तं दृष्ट्वा म्लानमुखं पुरः॥ प्रोवाच स्निग्धया वाचा तत्खेदं शमयनिव ॥ ३८॥ श्रीविष्णुरुवाच ॥ साधुसाधु द्विजश्रेष्ठ किमिच्छसि वदस्व तत् ॥ यत्तेऽभिलषितं चित्ते दास्यामि तव भूसुर ॥ ३९ ॥ सुदेव उवाच ॥ किमज्ञात महाराज कूटस्थाखिलचित्तज ॥ सवैद्रियनियंतासि सर्वसाक्षी जगत्पतिः ॥४०॥ यदि प्रीतोऽसि भगवन्मे तदक्षामि तेऽग्रतः॥ 'अनाथनाथ नाथोऽसि शृणुष्व त्वमधोक्षज ॥ ४१ ॥ प्रभो पुत्रविना शून्यं गाईस्थ्यं काननोपमम् ॥ इहामुत्रं सुराधीश नैराश्यं तनयेविना ॥१२॥ ब्राह्मण तुम बडे श्रेष्ठ हो तुम्हारी क्या इच्छा है कहो, हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! जो तुम्हारी अभिलाषा होगी सो मैं दूंगा ॥३९॥ सुदेवने कहा ॥ हे कूटस्थ ! सबके हृदयकी जाननेवाले आपको क्या अज्ञात है सम्पूर्णकी इन्द्रियोंके ज्ञाता आप जगलति हो ॥ ४० ॥ जो आप प्रसन्न हो तो मैं आपके आगे कहताहूं हे अधोक्षज ! आप अनाथोंके नाथ हो श्रवण कीजिये ॥ ४३ ॥ हे प्रभो ! पुत्रके विना गृहस्थपन शून्य अर्थात वनकी समान है. हे सुराधीश ! '' ।
भा. टी.'. अ.१३, पुत्रके विना मुझको दोनों लोक शून्य प्रतीत होते हैं ॥ ४२ ॥ इस प्रकार केशव ब्राह्मणके मुखके वचन श्रवण कर अत्यन्त प्रसन्न होकर वचन कहने लगे ॥ ४३ ॥ भगवान् बोले ॥ हे विष ! शेषजीको पुच्छसे ले विचित्र भुवन पर्यन्त अनेक सुख हैं उनको मैं तुझे देता हूं ॥ ४४ ॥ परन्तु हे द्विजराज ! पुत्रका सुख तुम्हारे भाग्यमें नहीं है. हे मुने ! जो तुम्हारे भाग्यमें हो वही प्राणीको मिलता है इसमें तपका हेतु है ॥४५॥ सो पुत्रके विना और जो इच्छा हो सो मांगो पुत्रके शरीरका स्पर्श भाग्यके विना नहीं हो सकता है ॥ ४६॥ हे सुव्रत ! इस कारण दूसरी वार्ता कहो वह मैं तुमको इति विप्रमुखोद्गीतां वाचमाकर्ण्य केशवः ॥ उवाच वचनं श्रीमान्नतिहष्टमना विभुः ॥ ४३ ॥ विष्णुरुवाच ॥ शेषलां- गूलतो विप्र विचित्रभुवनावधि ॥ संति सौख्यान्यनेकानि तानि ते.वितराम्यहम् ॥४४॥ न तु पुत्रसुखं तेऽस्ति द्विज- राजकुलोत्तम ॥ दीयते भाग्यनिर्दिष्टं तपसा हेतुना मुने ॥ ४५ ॥ अधुना सर्वदातास्मि तनुजाभ्यर्थनं विना ॥ पुत्र- गात्रपरिष्वंगस्तव भाग्ये न विद्यते ॥ ४६॥ तस्मादन्यात्समाचक्ष्व तत्ते दास्यामि सुव्रत ॥ अर्जितं वर्षसाहस्रेस्तत्ते पुण्यं ददाम्यहम् ॥४७॥ इत्युक्त्वोपरते विष्णौ द्विजः परमदुर्मनाः ॥ पपात सहसा भूमौ छिन्नमूल इव द्रुमः ॥४८॥ पति पतितमालोक्य रुरोद प्रमदा भृशम् ॥ निराशं पश्यती नाथं बाला बालस्पृहा सती ॥४९॥ उत्तिष्ठ भूसुरश्रेष्ट शृणुष्व वचनानि मे ॥ यद्भाग्यरचितं वस्तु लभेन्नारायणादापि ॥ ५० ॥ प्रदान करूंगा सहस्रों वर्ष जो तुमने तप किया है उसके पुण्यका फल ग्रहण करो ॥ ४७ ॥ विष्णुके यह वचन कहनेपर ब्राह्मण महादुःखी हुआ और तत्काल पृथ्वीमें जड कटे वृक्षकी समान गिर पड़ा ॥ ४८ ॥ अपने पतिको गिरा देख उसकी स्त्री अत्यन्त रुदन करने लगी अर्थात् वह अपने पतिको निराश देख महा दुःखी हो बालककी इच्छा किये हुए बोली ।। ४९ ॥ हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! उठो और मेरे वचन सुनो; जो भाग्यमेंही रची हुई वस्तु • - नारायणसे मिलती है ॥ ५० ॥ और कमलकी समान. श्यामवर्ण नारायण अधोक्षजको देखकरभी जो वस्तु प्राप्त नहीं होसकी वह कहांसे मिल सकती है ॥ ५१ ॥ रमानाथ और सुरेश्वर क्या करसकते हैं अथवा कैलासपति शिव वा महेश्वरी क्या करसकती हैं ॥ ५२ ॥ श्रीमानं गणेश तथा लोकपितामह ब्रह्मा अनि तथा कोई मुनि क्या करेगा ॥ ५३ ॥ पितृपति वरुण वा अनन्त नाग अथवा गरुडजी क्या कर सकते हैं जब नारायणहीकी इच्छा नहीं तो उसका किया सब व्यर्थ है ॥ ५४ ॥ हे नाथ ! रमाकान्तके वचन श्रवण कीजिये आपसे क्या कहा जाय यदि यदि चंदीवरश्याम नारायणमधोक्षजम् ॥ समंक्षीकृत्य नोप्राप्तस्तत्कुतो विंदसे विभो ॥५॥ किं करोति रमानाथः किं करोति सुरेश्वरः ॥ कैलासानलयः शंभुर्भवानी वा महेश्वरी ॥५२॥ गजेंद्रवदनः श्रीमन्पिता लोकपितामहः॥ वीति- होत्रः किंच कुर्यान्सुनिर्वा किं करिष्यति ॥५३॥ पितराजोजलेशोवा अनंतो नागराडपि।। तस्य व्यर्थं भवेत्सर्वं व्यर्थ- स्तस्य परिश्रमः ॥५४॥ शृणु,नाथ रमाकांत किं ते वदति संगतः॥ यदि ते भाग्यविभ्रंशः कुतो दद्यात्तु पुत्रकम् ॥५५॥ अस्मद्भाग्यविनाशेन हरिदर्शनजं फलम् ॥ इह दुःखाय चोत्पन्नममुत्र सुखदं विभो ॥५६॥ क्रतुदानतपःसत्यवतेभ्यो हरिसेवनम् ॥ वरं नाद्यापि पश्यामि भाग्यं तस्माद्धलाधिकम् ॥१७॥ श्रुत्वा वचांसि ब्राह्मण्याः शोकवेगाकुलानि च ॥ अत्यंतक्षाभसंजातवेपथुर्विनतात्मजः॥५८ ॥ आपका भाग्यही नष्ट है तो आपके पुत्र कहांसे प्राप्त होगा ॥ ५५॥ हमारे भाग्य नष्ट होनेके कारणसेही नारायणके दर्शनका पुण्यफल हमारे खके निमित्तही प्राप्त हुआ ॥ ५६ ॥ यज्ञ दान तप सत्य व्रतोंसे नारायणका सेवन करनाभी विना भाग्यके नहीं होसकता इस कारण अधिक बलवान है ॥ ५७॥ इस प्रकार शोकवेगसे युक्त ब्राह्मणीके वचन सुनकर विनतापुत्र गरुड अत्यन्त क्षोभको प्राप्त हो कम्पित 4
,
भा. टी.
अ.१३
होनेलगा ॥५८॥ और शोकसे पीडित हो भगवान्से बोले कारण किं बाह्मणकी पीडा देखकर उनके नेत्रोंसे जल बह रहाथा ॥ ५९ ॥ गरुडजी
बोले । हे भगवन् ! हमको बड़ा आश्चर्य है कि इस समय आपकी ब्रह्मवत्सलता क्या हुई जो इस दीन तपस्वीको देखकर आपके मनमै व्यथा उत्पन्न
नहीं होती॥ ६०॥ हे विनो! जब कि पतितोंको मुक्ति देने में आप विचार नहीं करते तो इस बाह्मणके ऊपर तुच्छ बातमें दया क्यों नहीं आती ॥६१॥
मुक्ति आठ सिद्धि सार्वभौम राज्यकी प्राप्तिमी आपके स्मरण करनेवालोंको दुर्लभ नहीं है फिर पुत्रकी इच्छा क्या बडी बात है ॥ ६२॥ हे गोविन्द ! इस
पद्मनाभमुवाचेदं ब्राह्मणी शोकपीडिता ॥ विप्रमालक्ष्य नयनक्षरद्वाष्पकलाकुलम् ॥ ५९, ॥ गरुड उवाच ॥ अहो
ते देवकीसूनो ब्रह्मण्यत्वं कुतो गतम् ॥ यदिमं तापसं दीनं दृष्ट्वा नालक्ष्यते व्यथा ॥६० ॥ यदि कैवल्यदाने ते नास्ति
'विष्णो विचारणा ॥ पतितानामपि विभो नहि किं तापसे दया ॥६१॥ कैवल्यं सिद्धयोऽप्यष्टौ सार्वभौमादिसंचयः ।।
न ह्यलभ्यस्तव स्मर्तुः किं वराकी सुतस्पृहा ॥ ६२ ॥ तदस्मै देहि गोविंद पुत्रमेकं गुणाधिकम् ॥ न दास्यसि हृषी-
केश सदोषं तव चाहणम् ॥ ६३॥ त्वदीयानुचराः सर्वे विनष्टाः कीर्तिदूषणात् ॥मास्तु नः श्रवणे वाक्यमिदं भूमन्क-
दाचन ॥ ६४ ॥ त्वामाराध्यजनः सर्व फलं प्राप्नोति वांछितम् ॥ तत्राप्ययं द्विजवरस्त्वत्पादांबुजसेवकः ॥ ६५ ॥
अदांभिकः कृपाशीलः साधु सद्गुणभाजनः ॥ब्राह्मणी च महाभागा त्वयि संन्यस्तमानसा ॥६६॥
कारण इसके निमित्त एक गुणी पुत्र दीजिये, यह पापरहित आपकी सदा पूजा करता रहाहै नहीं तो आपकी पूजामें दोष रहेगा ॥ ६३ ॥ कीर्तिदूषणसे
| आपके अनुचर नष्ट होंगे सो ऐसे वाक्य हमारे श्रवणगोचर कभी न हों ॥६४ ॥ आपकी आराधना कर सब प्राणी मनोवांछित फलको प्राप्त होतेहैं फिर
। उसमें तो यह ब्राह्मण आपके चरणोंकी सेवा करताहै ॥६५॥ तथा पाखण्डरहित कपाशील साधु सद्गुणका पात्र है और इसी प्रकार यह ब्राह्मणी आपमें मन
2
॥४८॥
लगाये है ॥६६॥ हे विश्वेश! इनको देखकर आपके मनमें दया क्यों नहीं उत्पन्न होती ? इसके नेत्रोंसे निकला ज़ल जाने क्या करेगा ॥६७॥ यह कानोंको अमृतकी समान गरुड़जीके वचन सुनकर गरुडको साश्चर्य कहते हुए ॥ ६८॥ प्रभु बोले ॥ हे गरुडजी ! जो आपके मनमें स्थित है वह इस ब्राह्मणको दो, बाह्मणको अभीष्ट विना दिये मेरा हृदयभी परितप्त हो रहाहै ॥६९॥ क्या करूंगा इसके भाग्यके वशसे मेरे मुखसे निकल गया जो इसका मनचिन्तित दिया एनामालक्ष्य विश्वेश घृणा ते किं न जायते ॥ एतयोनॆत्रसंभूतो वारिधिः किं करिष्यात ॥ ६७ ॥ श्रुत्वा सुप- वचनपीयूषं श्रुतिसुप्रियम् ॥ हरिः प्रसन्नः प्रोवाच वैनतेयं स्मयन्निव ॥६८॥ नागारे देहि विप्राय यत्ते मनसि वांछितम् ॥ ममापि हृदयं तप्तमदत्त्वा द्विजचिंतितम् ॥ ६९ ॥ किं करोम्यस्य भाग्येन मम वाद्विनिर्गतम् ॥ ममापि स्यात्प्रियं ह्येतददाति चिंतितं भवान् ॥ ७० ॥ इत्याकर्ण्य हरेवाक्यं वैनतेयः प्रसन्नधीः ॥ ददौ यथे- प्सितं कामं विप्राय सुमहात्मने ॥ ७१॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये सुदेवाय वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥ वाल्मीकिरुवाच ॥ क्षोणीपते ततो जातं वृत्तांतं कथयाम्यहम् ॥ सुपणः केशवादेशाद्वाक्यमाह द्विजेश्वरम् ॥ १॥ गरुड उवाच ॥ द्विजराजानृतं नाह विष्णुः पद्मविलोचनः ॥ भाग्ययोगेन च सुखं भवतीह द्विजोत्तम ॥२॥ . - . जावे तो इसमें मेराभी प्रिय होगा ॥ ७० ॥ यह वचन सुनकर गरुडजीने प्रसन्न होकर उस महात्मा ब्राह्मणके निमित्त पुत्रप्रदान किया ॥ ७१ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये सुदेवाय वरप्रदानं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३॥ वाल्मीकिजी बोले ॥ हे राजन् ! आपसे मैं वृत्तान्त कहताहूं गरुडजी भगवान्की आज्ञासे उस ब्राह्मणसे कहने लगे ॥ १ ॥ गरुडजी बोले ॥ हे ब्राह्मण ! कमललोचन विष्णु भगवान्ने असत्य नहीं कहा; हे द्विज ! .
मा. टी. भाग्यके योगसेही यहां सुख होताहै ॥ २॥ विष्णुके वाक्य अनादर कर मैं तुमको पुत्र नहीं देताहूं. हे पापरहित ! जो मेरा स्पर्श करताहै वह सर्वथा अभय हो जाताहै ॥३॥ इस कारण अपने अंशसे तुमको पुत्र देताहूं इस कारण सत्य आशीर्वादसे गौतमीमें पुत्रकी प्राप्ति करोगे ॥४॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! जो कि तुम्हारी नारायणके चरणोंमें मति प्राप्त है इससे तुम धन्य हो. सकामा अकामा कैसी भी हो हरिभक्ति सुख देनेवाली है ॥५॥ जिस प्रकार पत्तेपर स्थित जल क्षणमें नष्ट होजाताहै इस प्रकार यह शरीर क्षणमें विध्वंस होनेवाला है ॥ ६ ॥ उसमें जो रघुनाथजीके चरणकमलको हृदयमें चिंतन नहीं विष्णुवाक्यमनाहत्य न वेदास्यामि ते सुतम् ॥ यो हि मां स्पृशते घोरो ह्यभयः सर्वथानघ ॥३॥ तस्मान्ममांशतस्तुभ्यं सुतं दमि मनोहरम् ॥ येन त्वमाशिपः सत्या लप्स्यसे गौतमीसुतम् ॥ ४ ॥ धन्योऽसि द्विजशार्दूल यत्ते जाता हरौ मतिः ॥ सकामाप्यथ निष्कामा हरिभक्तिः सुखप्रदा ॥५॥ पल्लवाग्रलसदिंदुक्षणध्वंसि जने वयः ॥ तत्र राघवपादा- ब्जं धन्यश्तियते हृदि ॥६॥ विषया विषरूपा वै नराणां तुच्छसौख्यदाः ॥ कौशल्येयमनादृत्य तेषु मूढोऽतिलं- पटः॥७॥ इंद्रियाणि प्रमाथीनि बांधवा इव दुर्द्धियः॥ तदर्थे जानकीनाथं नोपसात मंदधीः ॥ ८॥ नाशं वसुमती गंत्री गंतारो गिरयो द्रुमाः॥ आपगाः सागरा नागाः सुरा दैत्याः खगा मृगाः ॥९ ॥ यत्किचिदृश्यते लोके स्थूलं सूक्ष्म परं च यत् ॥ सर्व नाशात्मकं पश्यन्नोपयाति जनार्दनम् ॥ १०॥ करताहै वह जम्म वृथा गमाताहै कारण कि; यह विषय तुच्छ सुख देनेवाले हैं मूर्ख रामचन्द्रको अनादर कर उनमें लम्पट होरहाहै ॥७॥ यह इन्द्रिय मनुष्योंको प्रमथन करनेवाली तथा दुर्बुद्धि बांधवोंकी समान है इनके विषयमें तत्पर हुआ भी यह मूर्ख नारायणके समीप नहीं प्राप्त होता है ॥ ८ ॥ पृथ्वीका एक दिन नाश होगा पर्वत वृक्ष नष्ट होंगे नदी सागर नाग सुर दैत्य खग मृग ॥ ९ ॥ जो कुछ लोकमें दीखताहै तथा जो कुछ स्थूल सूक्ष्म । ॥४९॥ । ,
है यह सबको नाशात्मक देखकर भी जनार्दनके निकट उपस्थित नहीं होताहै ॥ १० ॥ अहो यह महामोहका अज्ञान तथा यह बुद्धिका महान्त्रम
इसको देखकर भी मूर्ख इससे पृथक् होकर हरिका सेवन नहीं करता है ॥ ११ ॥ क्या स्त्री पुत्र वा सुदृत् कोई भी अपना नहीं है धन घर
भृत्य राज्य हाथी घोडे ॥ १२ ॥ इन सबको बलसे मृत्यु अपनेमें मिलाती है ऐसा जानकरभी जो मनुष्य कोशलपतिको चिन्तन नहीं करता
उसको धिक्कार है ॥१३॥ सिवाय पुण्डरीकाक्षके कौन उसको अवलम्बन दे सकता है नारायणके सिवाय दूसरा तारनेवाला नहीं है नहीं है ॥ १४ ॥
अहो मोहांधतामिस्रमहोऽयं बुद्धिविभ्रमः॥ नाशात्मकं समालोक्य रघुवरिं न सेवते ॥ ११ ॥ किमु पत्नी सुतो वापि
किमु कन्या कथं सुहृत् ॥ कथं धन कथं गेहं राज्यं भृत्या गजा हयाः ॥ १२ ॥ मृत्युनावर्तयंतीह बलात्कारोपयो-
जिताः॥ धिग्जनं कोशलाधीशं नानुचिंतयतीह यः॥१३॥ तमृते. पुंडरीकाक्षं कोऽवलंबयते परम् ।। नैव नैवेति नैवेति
हरेरन्यो न तारकः ॥१४॥ हरेः कृपावलोकेन मया दत्तः सुतस्तव ॥ संसारसंभवं सौख्यं मुंश्व विप्रेश्वर क्षितौ ॥१५॥
वाल्मीकिरुवाच ॥ दंपत्योः पश्यतोः सद्यो दत्त्वा वरमनुत्तमम् ॥ ससुपर्णः सलक्ष्मीको हरिरंतरधीयत ॥ १६॥ स
गौतम्या सुदेवोऽपि जगाम निलय स्वकम् ॥ हर्षसागरमासाद्य यथेच्छमभजत्सुखम् ॥ १७ ।। कालानुक्रमतस्तस्यां
दोहदः समपद्यत ॥ पांडुरं च मुखं दधे गौतमी पतिदेवता ॥ १८॥
नारायणकी कृपादृष्टिसे मैंने तुमको पुत्र दिया है. हे ब्राह्मण ! पृथ्वीमें तू संसारके सुखोंका अनुभव कर ॥१५॥ वाल्मीकि बोले ॥ दोनों स्त्री पुरुषोंको
इस प्रकार वर देकर -गरुड और लक्ष्मीसहित नारायण वहांसे अन्तर्धान हो गये. ॥ १६॥ वह गौतमी और सुदेवशी अपने स्थानको गये और प्रसन्न-
ताके सागरको प्राप्त हो यथेच्छ सुख भोगने लगे ॥ १७॥ कालक्रमसे गौतमीको गर्भ रहा अर्थात् उस पतिव्रता खीका मुख श्वेत होगया ॥ १८ ॥
मा. दी. भ.१३ व वह गर्भवती हो भर्ताको आनन्द देनेवाली शोषित हुई जैसे जयन्तको गर्नमें धारण करनेसे इन्द्राणी शोभित हुई थी ॥. ३९ ॥ उस महानाग्यवतीने चेतना प्रसादकी समान सर्वगुणयुक्त पुत्रको उत्पन्न किया जिसका मुख चन्द्रमाकी समान था ॥ २० ॥ मुनिश्रेष्ठने उसके जातकर्मादि किये और प्रसन्नताके कारण अपनेको बहुत मानते हुए ॥ २१ ॥ अहो मुझ अल्पभाग्यको पुत्रप्राप्ति कहां हो सकती है शंख चक्र गदा पन धारण करनेवाले नारायणहीकी कपासे सब कुछ होसकता है ॥ २२ ॥ इस प्रकार महा प्रसन्न हो उसने पुत्रके जातकर्म किये और उस महात्मा- अंतर्वत्नी रराजेयं भर्तुरानंदवर्धिनी ॥ यथा पौरंदरी रंजे जयंते गर्भमागते ॥ १९ ॥सा प्रसूता महाभागा प्रसादमिव चेतना ॥ सुतं सर्वगुणोपेतं पूर्णचंद्रनिभाननम् ॥२०॥ जातकर्मादिकार्याणि चकार सुनिपुंगवः ॥ महता हर्पयोगेन स्वात्मानं बह्वमन्यत ॥२१॥ अहो ममाल्पभाग्यस्य कुतः पुत्रस्य वै सुखम् ॥ विना दयां सुरेशस्य शंखचक्रगदा- भृतः ॥ २२ ॥ इत्यानंदसमायुक्तः सर्वकार्याण्यथाकरोत् ॥ ब्राह्मणान्भोजयामास विष्णुबुद्ध्या महात्मनः ॥ २३ ॥ नाम चास्याकरोद्धीमान्ब्राह्मणैः स्वजनैर्युतः ॥ असौ शिशुः सुपर्णेन दत्तः प्रेम्णातिशोभनः ॥ २४ ॥ यस्माच्लोकेन प्रहितो दीव्यतीव दिवाकरः ॥ शुकदेवेति नाम्नायं तस्माद्भवतु बालकः ॥२५॥ व्यवर्द्धत शिशुःशीघ्र शुक्लपक्ष इवो- डुराट् ॥ पितुर्मनोरथैः साकं मातुर्मानसनंदनः ॥ २६ ॥ क्रमाबभूव षडर्षः कंदर्पसमशोभनः ॥ कदाचित्तट्टहाभ्या- शमाजगाम मुनिः स्वयम् ॥ २७ ॥ ने विष्णुबुद्धिसे बाह्मणोंको भोजन कराया ॥ २३ ॥ और इस महात्माने अपने कुटुम्बी जनोंके साथ इसका नामकरण किया जिस कारणसे कि, प्रसन्न हो गरुडजीने यह पुत्र दियाथा ॥ २४ ॥ जिस कारणकी श्लोकके द्वारा दिव्य प्रकाश हुआ इस कारण इस बालकका शुकदेवही नाम होगा ॥ २५ ॥ तब यह बालक शुक्ल पक्षके चन्द्रमाके समान बढने लगा पिता और माताको आनंदित करने लगा ॥ २६ ॥ कामदेवकी समान + . शोभायमान वह बालक क्रमसे छःवर्षका हुआ. एक समय उसके स्थानमें स्वयं मुनिराज ॥ २७ ॥ तेजसे प्रकाशमान नारदजी आये. उनका विधि- पूर्वक पूजन कर ब्राह्मणने उनकी गोदीमें अपने पुत्रको ॥ २८॥ परम भक्तिसे लिटाकर प्रणाम किया और कहा; हे विश्रेष्ठ ! सब प्रकारसे मंगल करनेवाला यह बालक आपहीका है ॥ २९ ॥ नारदने भी बड़े प्रेमसे उस बालकको देखा उसे देखकर वारंवार हास्य किया ॥ ३० ॥ और गौतमीके नारदः सुरसंकाशस्तेजसा प्रज्वलनिव ॥ तमर्च्य विधिवद्विपस्तदुत्संगे सुतं स्वकम् ॥ २८॥ निधाय परया भक्त्या ननामानतकंधरः॥ बालस्तवायं विप्रर्षे पाव्यः सर्वात्मने हितः ॥२९॥ नारदः स्नेहसंयुक्तः कुमारमवलोकयन् ॥ नयनो- पगतं कृत्वा स्मयित्वा च पुनः पुनः॥ ३०॥ उवाच गौतमीनाथं सुदेवं सात्त्विकं द्विजम् ॥ भोभो धन्योऽसि यत्साधो तुष्टस्ते यादृशो हारः॥ ३१ ॥ तपसाराधितः पुत्रं दत्तवानतिसुन्दरम् ॥ किमत्र शृणु मे वाक्यं प्रसादे विष्णुसंभवे ॥३२॥ तिर्यगूर्ध्वमधोमाने ह्यष्टोत्तरशतांगुलः ॥ सुदेव तनयस्तेऽयं किन्नु स्यात्पृथिवीपतिः ॥३३॥ अहो किमेतत्प- श्यामि करे बालस्य धीमतः॥ सच्छत्रं चामरयुगं हरेष्यति किं पुरम् ॥ ३४ ॥ कनिष्ठामूलतो रेखा तर्जन्यंतमुपा- श्रिता ॥ अक्षता निर्मला दीर्घा दीर्घायुष्यप्रदायिनी ॥ ३५॥ अच्छिद्रौ कठिनौ रक्ततलो पझोपमो करौ ॥ राजाङ्क- सूचकौ रक्तनखौ दीर्घागुली शुभौ ॥ ३६॥ पति सुदेव सात्विक ब्राह्मणसे कहा हे ब्राह्मणदेव ! तुम धन्य हो जो कि, तुम्हारे ऊपर नारायण प्रसन्न हुए हैं ॥३१॥ और तपसे प्रसन्न हो तुमको पुत्र दिया है और इस विष्णुकी प्रसन्नतामें मेरे वचनको सुनौ ॥३२॥ ऊपर नीचे तिरछे सर्वत्र एक सौ आठ अंगुल यह तुम्हारा पुत्र है. हे सुदेव ! यह तुम्हारा पुत्र पृथ्वीका पति होगा ॥३३॥ अहो मैं किस प्रकारसे इस बालकके हाथमें छत्रचामर देखताहूं क्या यह वैकुंठका जीतनेवाला होगा ॥३४॥ कनिष्ठि- काके मूलसे रखा तर्जनीके अन्ततक चली गई है और जो निर्मल तथा दीर्घ है यह आयुकी देनेवाली है ॥ ३५॥ छिद्ररहित रक्तवर्णके हायकमलकी मा.दी. अ.१८ समान हैं दीर्घ अंगुली और लाल रंगके दीर्घ नखून राजा होनेका चिह्न कथन करते हैं ॥ ३६ ॥ जंघापर्यन्त लम्बायमान मांसल पुष्ट इसके हाथ हैं यह तुम्हारा पुत्र समुद्रपर्यन्तका राजा होगा ॥ ३७ ॥ मधुकी समान पिंगलवर्णके नेत्र श्याम शरीर स्निग्ध तथा बूंघरवाले बाल ऊंची छाती पुष्ट गर्दन समान कर्ण बैलकी बराबर ऊंचे कंधे ॥ ३८ ॥ गूढ हंसली महरी नाभि त्रिवलीसे विभूषित उदर ह्रस्वलिंग पद्म गंधि. वीर्ययुक्त पृथु कटि ॥ '॥ सुन्दर जंघा और ऊरुभाग सुन्दर आकति पाठीन मछलीकी समान कोमल रक्तवर्ण पृथ्वीको स्पर्श आजानुलंबिनौ हस्तौ हस्तितुल्यौ सुमांसलो ॥ आवारिधेभूमिपालो भविष्यति सुतस्तव ॥ ३७ ॥ मधुपिंगेक्षणः श्यामः स्निग्धकुंचितमूर्द्धजः॥ तुंगवक्षाः पृथुग्रीवः समकों वृषांसकः ॥३८॥ गूढजणूंढनाभिस्त्रिवलीभूषितोदरः ॥ ह्रस्वलिंगः पद्मगंधिवाययुक्तः पृथुः कटौ ॥ ३९॥ सुजानुः सुन्दरतरो जंघाभ्यां च शुभाकृतिः ॥ पाठीनपृष्ठस- दृशौ कोमलारक्तभूस्पृशौ ॥ ४० ॥ सुकुमारांगुली सौम्यावूर्ध्वरेखांबुजान्वितौ ॥ सुगुप्तगुल्फो सत्पाष्र्णी पादौ तस्य मनोहरो॥४१॥ पाणिपादनखान्यक्षिजिह्वोप्टो गण्डतालुके ॥ अष्टौ रक्तानि दृश्यते भाग्यचिह्नानि ते सुते ॥ ४२ ॥ मूत्राधारशिर केशौ दक्षिणावत्तिनौ यदि ॥ सालकं हृदयं विप्र दीर्ष सौख्यप्रकाशकम् ॥ ४३॥ सर्वलक्षणसंपूर्णः पुत्रो भाग्यनिधिजि ॥ नियं नैवात्र पश्यामि परमाणुनिभं क्वचित् ॥४४॥ - - करनेवाली ॥ ४.० ॥ ऊर्ध्व रेखावाली सुकुमार अंगुलियोंको अलंकृत सुन्दर रक्षित गुल्फ सत्यही मानो लक्ष्मीके स्थान उनके चरण हैं ॥ ४१ ॥ हाथ चरण नखून नेत्र जिह्वा ओष्ठ गाल और तालु यह आठ वस्तु जिसके लाल देखो उसे भाग्यवान् जानो ॥ ४२ ॥ जिसका मूत्राधार तथा शिरके बाल यदि दक्षिणावर्ती हों और हृदय जिसका रोमसहित चौडा हो बहुजी बडा सुख पाता है ॥ ४३ ॥ हे विष! यह तुम्हारा पुत्र भाग्यवान् सब ॥५॥ .
- लक्षणसे सम्पन्न है और परमाणुमात्र जी मैं इसमें पाप नहीं देखताहूं ॥ ४४ ॥ परम कान्तिमान् देवर्षि यह वचन मुनाकर फिर श्वास लेकर विचारतें शिर धुनने लगे ॥ ४५ ॥ कि जब समय असने अनुकूल होता है तब सब शुभ दीखता है और जब प्रतिकूल होता है तब तत्काल नष्ट हो जाताहै ॥ ४६ ॥ इसी कारण हे सुदेव! यह तुम्हारा पुत्र बारहवें वर्षमें मृत्युको प्राप्त होगा इसमें शोक न करो ॥ ४७ ॥ ईश्वरकी इच्छासे होनेवाले इति वाचमुदीर्यासो देवर्षिः परमद्युतिः ॥ निःश्वसन्मौलिमाधुन्वन्पुनराह विचारयन् ॥ ४५ ॥ शुभं संपश्यते सर्वं यदा काल प्रदक्षिणः ॥ स यदा प्रतिकूलः स्यात्सर्व नश्यति हेलया ॥ १६ ॥ सुदेव तनयस्तेऽयं द्वादशे हायने गते ॥ मृ- -त्युमेष्यति तत्र त्वं मा शोके मानसं कृथाः॥४७॥ अवश्यंभाविनो भावा भवत्येवेश्वरेच्छया। तत्र प्रतिविधि नान्यः कर्तुमर्हति तं विना ॥ १८ ॥ भवादृशां वदान्यानां धार्मिकाणां सुवर्चसाम् ॥ सज्जनप्रियकृत्कृष्णो ना सुखानि क्ष- मिष्यति ॥४९॥ वाल्मीकिरुवाच ॥ इत्युक्त्वा निर्ययौ ब्रह्मलोकं ब्रह्मतनूद्भवः। सुदेवः सह गौतम्या निपपात धरा- तले ॥ ५० ॥ खातमूलो गिरियदच्छिन्नमूलो यथा तरुः ॥ ध्वजयष्टियथा वायोदंपती धरणीं गतौ ॥ ५३॥ व्यखें- ठत्सुचिरं भूमावपस्मारहतो यथा ॥ ततः किसलयस्पर्द्धिकरद्वंद्वांचितः क्षणात् ॥ ५२ ॥ भाव अवश्य होतेहैं उनके विनाकोई प्रतिविधि करनेको समर्थ नहीं है. ॥ ४८ ॥ आपसरीखे वदान्य धर्मात्मा तेजस्वी जनोंके सज्जन और प्रियबंधु कृष्णही सब मंगल करेंगे ॥ ४९ ॥ वाल्मीकिजी बोले ॥ इस प्रकारके वचन कह नारदजी ब्रह्मलोकको चले गये और मुदेव गौतमके सहित पृथ्वीमें गिर पडा ॥ ५० ॥ जैसा जड़ खोदा हुआ पहाड और छिन्नमूल वृक्ष गिरजाता है अथवा वायुसे जैसे धजा गिरती है ऐसे दोनों स्त्रीपुरुष गिरपडे ॥ ५१ ॥ और पृथ्वीमें लोटने लगे जैसा अपस्मारयुक्त ननुष्य गिर जाता है कनलकी समान स्पर्धा करनेवाले दोनों हाथोंका स्पर्श कर ॥ ५२ ॥ - -- 1 जा.वै. अ.१४ बाह्मण अमृत प्राप्त हुएकी समान तत्काल उठ बैठा और वह सुन्दरी बाला उस बालकको लेकर नेमसे उसका मुख चूमती हुई अपने स्वामीसे बोली हे द्विजराज ! होनहार वस्तुओंमें आपको भय करना नहीं चाहिये ॥ ५३॥ ५४ ॥ होनहार हुए बिना नहीं रहती और जो होनहार नहीं है वह नहीं होती. होनहार वस्तुका किसी प्रकार लोप नहीं होता ॥ ५५ ॥ यदि अवश्य होनहार वस्तुओका प्रतीकार होता तो नल राम युधिष्ठिर कदा- चित् दुःखी न होते ॥ ५६ ॥ दानवेंद्रका बंधन यदुकुलका क्षय कार्तवीर्य के शिरका छेदन दशग्रीवका नाश ॥ ५७ ॥ राम जानकीका विरह सद्योऽमृतप्राप्त इव समुत्तस्थौ द्विजोत्तमः॥अथ सा सुंदरी वाला स्वकमादाय बालकम्॥५३॥चुचुंब वदनं प्रेम्णा ततः स्वामिनमाह सा ॥ द्विजराज न ते कार्या भीतिर्भाव्येषु वस्तुपु ॥५४॥ ना भाव्यं कुत्रचिद्भावि भाव्यं नैव विनश्यति ॥ अवश्यं भावि यद्वस्तु सर्वथा नोपलुप्यते ॥ ५९॥ अवश्यं भावि भावानां प्रतीकारो भवेद्यदि।। तदा दुःखैर्न बाध्यते नलरामयुधिष्ठिराः ।। ५६॥ बंधनं दानवेंद्रस्य क्षयो यदुकुलस्य च ॥ कार्तवीर्यशिर छेदो दशग्रीवविनाशनम् ॥१७॥ 'विरहो रामजानक्योर्लक्ष्मणस्य विवासनम् । वालिगोपुच्छनिर्णाशस्त्रिशंकुतनयापदः ॥५८॥ वधो हिरण्यकशिपो- वृत्रासुरनिबईणम् ॥ त्रैलोक्ये तानि भो नाथ, ज्ञेयान्यमितबुद्धिना ॥५९॥ बहूपायैरपि विभो नाभाव्यं भवति क्वचित् ॥ भाव्यस्यापि नरःकर्ता नासीत्सुरवरोऽपि सन् ॥ ६ ॥ अकार्य शक्यते कत्तुं यदि केनापि भूसुर ॥ माग- धारद्धभूपालाः कथं जीवितमामुयुः ॥ ६ ॥ लक्ष्मणका त्याग वालिका नाश त्रिशंकुके पुत्रपर आपत्ति ॥ ५८ ॥ हिरण्यकशिपुका वध वृत्रासुरका विनाश हे नाथ ! यह त्रिलोकीमें वार्ता हुआ करती हैं सो बुद्धिमान्को जाननी उचित हैं ॥ ५९॥ हे विनो! कितने भी उपाय करो होनहार नहीं चुकती होनहारका कर्ता कहीं कोई देवतानी नहीं हो सकता है ॥ ६॥ हे भूसुर ! यदि कोई अकार्य करने में समर्थ हो तो जरासंधके घेरे हुए राजा किस प्रकारसे जीवनको प्राप्त हो सकते ॥ ६ ॥ राजर्षि परीक्षित दानवोत्तम प्रह्लाद अजगरग्रसित भीम अर्जुनका जीष्मकी जय करना ॥ ६२ ॥ लाक्षागृहसे कुंतीका मृत्युके मुखसे निकालना अथवा शंबरका रुक्मिणीके पुत्रका हरण करना ॥ ६३ ॥ सीताका रावणके हाथमें पडना चित्राश्वका मृत्युपाशमें पडना तथा दशपुत्र होनेपरजी पिताका सुख न पाना ॥ ६४ ॥ इस प्रकार जो होनेवाले भाव हैं वह अवश्य होकर रहते हैं हे वित्र ! इसमें तुमको किसी प्रकारकी शंका करनी उचित नहीं है ॥६५॥ यदि हमको पुत्रकी प्राप्ति होनहार है तो उसको इन्द्र वरुण और कुबेर किसी प्रकार परीक्षिदपि राजर्षिः प्रह्लादो दानवोत्तमः ॥ भीमोऽप्यजगरग्रस्तः पार्थों भीष्मं धनंजयः ॥ ६२॥ लाक्षागृहे तदा कुंती मृत्युवकाद्विनिर्गता ॥ शंबरो व्याहरब्रह्मन्रोक्मिणेयं महाबलम् ॥ ६३ ॥ पौलस्त्यंकरगा सीता चित्रावो मृत्यु- पाशगः ॥ दशपुत्रपिता विप्रो नाप पुत्रसुखं च सः॥६॥ एवं ये भाविनो भावास्तानालक्ष्य कदाचन ॥ द्विजराज न ते शंका कार्या चेतसि पुत्रके ॥ ६५ ॥ यद्यस्माकं सुखावाप्तिर्भवित्री सुतसंभवा ॥ न सापक्रष्टुं शक्या वै सेंट्रैरपि सुरा- सुरैः॥६६॥ न कार्यस्तत्र संत्रासः केशो वापि कथंचन ॥ नित्यं ध रमस्व त्वं मा शोके मानसं कृथाः ॥६७॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये सुदेवगौतम्याश्शोकापानोदनं नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥ वाल्मीकि- रुवाच ॥ इति ताः शीतला वाचः समाकर्ण्य प्रियामुखात् ॥ नियमे मानसं बुद्धा निनायानिमिषं हि तत् ॥ १ ॥ दूर नहीं कर सकते ॥ ६६ ॥ इसमें क्लेश और संताप किसी प्रकार करना उचित नहीं है तुम नित्य धर्ममें रमण करो किसी प्रकार तुम्हारे मनने शोक होना उचित नहीं है ॥ ६७ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये सुदेवस्य शोककरण नाम चतुर्दशोऽध्यायः ॥१४॥ वाल्मीकिजी बोले ॥ इस प्रकार स्वीके मुखसे वह शीतल वचन सुन मनमें शोकके अधिक होनेके कारण भाग्यको प्रबल मानता हुआ ॥ १ ॥ ।
. भा. टी. अ.१५ अनेक निश्वासाँको त्यागता हुआ बहुतकालतक शंकित रहकर क्या होनहार है इस प्रकार वह ब्राह्मण मनमें विचार करने लगा.॥२॥ एक समय समिधाकुश फलके भोजनोंके निमित्त वनको गया. सुदेव शान्तचित्त कृष्णके चरणोंका सेवी था ॥ ३ ॥ उसी समय इसका कान्तिमान् पुत्र अपनी. समान अनस्थाके बालकोंके साथ जलमें प्रवेश कर क्रीडा करने लगा ॥ ४ ॥ पिचकारियें छोडते हुए बालकोंके साथ प्रत्येक कमलके निकट विचरने लगा जैसे विषयों में मन विचरता है ॥ ५॥ यह चतुरताके गुणवाले बालकोंके साथ रमण करने लगा पानीके ऊपर एक दूसरे- निःश्वासान्बहुलान्मुक्त्वा सुशंकितमनाश्चिरम् ॥ किं मे भावीति मनसाचिंततासौ द्विजेश्वरः ॥ २ ॥ समित्कुशफ- लाहारः कदाचित्काननं ययौ ॥ सुदेवः शांतकरणः कृष्णपादांबुजाश्रयः॥३॥ तदास्य तनयः श्रीमानलवापी मनोर- माम् ॥ आविश्य क्रीडयामास वयस्यैरावृतः शुचौ ॥ ४ ॥ वारियंत्रः क्षिपन्वारि पद्मगंधाधिवासितम् ॥ पद्मपद्मे च विहरन्विषयेषु मनो यथा ॥ ५॥ चातुर्यगुणसंयुक्तो बालाकात्मयत्यसो ॥ आरुह्यारुह्य पानीये निपतन्पातयन्स्व- कान् ॥६॥ जलक्रीडासु चतुरो वयस्यैरावृतः सुधीः॥ एवं द्विजातितनये रमणासक्तमानसे ॥ ७॥ तत्र कश्चिन्महा- ग्राहो विधिना नोदितो बलात् ॥ पद्यामाकृष्य तं बालं भीतमंतर्जलं गतः ॥ ८॥ समानवयसः सर्वे हाहांकृत्वा प्रधाविताः ॥ गौतम्यै वेदयांचकुर्बहुशोकपरायणाः ॥ ९॥ मातस्ते तनयः क्रीडन्नस्माभिः सहितः सुहृत् ॥ जले जलचरग्रस्तः परामर्न विलोक्यते ।।१०।। को डालने लगे ॥ ६ ॥ इस प्रकार वह बालक जलक्रीडामें चतुर बालकोंसे आवृत हुआ बालकोंसे संग क्रीडामें आसक्त था ॥ ७ ॥ उस समय कोई महायाह बडा बलपूर्वक शब्द करता हुआ उस बालकको चरणोंसे पकडकर जलके भीतर चला गया ॥ ८ ॥ तव समान अवस्था- वाले सम्पूर्ण बालक हाहा करके घावमान हुए और महाशोकसे व्याकुल हो गौतमीसे यह वचन कहते भये ॥ ९॥ हे मातः ! तुम्हारा पुत्र ॥५ क्रीडा करताथा परन्तु किसी जलचरने उसको ग्रहण करलिया अब यह दिखाई नहीं देता ॥ १० ॥ हे-राजन् ! जिस समय दयासे युक्त वे कुमार इस प्रकारके वचन दयायुक्त होकर कह रहे थे उसी समय सुदेव समिधा लेकर बनसे आया ॥ ११ ॥ उन बालकोंके वह दोनों स्त्रीपुरुष बज्रपा- तकी समान वचन सुनकर उस बालककी क्रीडा करनेवाली बावडीके निकट गये ॥ १२॥ उसमें उसको न देखकर वह बडा शब्द कर रुदन करने लगे तब चलकर उन दोनों मिलकर उस स्थानमें जाकर ॥ १३ ॥ उस पुत्रको मृतक देख छिन्न पंखवाले पक्षीकी समान शिथिल हो छिन्नमूलवाले किशोरेषु वदत्स्वेवं दयायुक्तेषु भूपते ॥ आजगाम वनाद्विप्रः सुदेवः सन्मिदाहरः॥११॥ वज्रपातोपमं वाक्यमाकर्ण्य द्वि- जदंपती ॥ जग्मतुर्यत्र सा वापी तनूजकीडनालया ॥१२॥ तो तत्र तमपश्यतौ चक्रतू रुदनं बहु ॥ तावत्पुरालयस्ताभ्यां धृतः पुत्रो निवेदितः॥ १३ ॥ दृष्ट्वा पुत्रं परासुं स्वं छिन्नपक्षौ यथा द्विजो ॥ पेततुः शिथिलांगौ तौ छिन्नमूलाविव दुमौ ॥ १४ ॥ परमां ग्लानिमापन्नौ बुबुधाते न जीवितम् ॥ चिंराक्कथंचिदालभ्य संज्ञा पुत्रानुरागिणौ ॥ १५ ॥ आकृष्य सुतदेहं तावालिंग्य च पुनः पुनः ॥ अंके पुत्रं निधायादौ चुचुंबतुरधोमुखौ ॥ १६॥ धैर्यमुत्सृज्य मंदो तौं रुदंतौ च पुनःपुनः॥वद पुत्र शुभां वाणीमस्मकर्णमुखप्रदाम् ॥ १७॥ नं विहातुं भवानहः स्थविरौ पितरौ तव ।। एतादृशानि वाक्यानि ऊचतुर्दुःखितो भृशम् ॥ १८॥ . वृक्षकी समान गिर पडे ॥ १४ ॥ और परमग्लानिको प्राप्त हो उन्होंने अपने जीवनकोजी न जाना. बहुत कालमें उन पुत्रके अनुराग करनेवालोंको संज्ञा प्राप्त हुई ॥ १५ ॥ पुत्रके देहको बैंच वारंवार आलिंगन करके उस बालकको गोदामें धरं वारंवार उसका मुख चूमने लगे ॥ १६ ॥ और धैर्य त्यागन कर वारंवार रुदन करने लगे कि हे पुत्र ! आप हनारे कानोंको सुख देनेवाली वाणी कहिये ॥ १७ ॥ तू अपने बूढे मातापिताको . भा. टा. अ.१५ छोडनेके योग्य नहीं है इस प्रकारके वचन वे दोनों दुःखी होकर कहनेलगे ॥ १८॥ हे शिशो ! यदि मैंने कोई तेरा विकत किया हो तो क्षमा कर मूत्रादि ऊपर करनेपरती तेरी सेवा कीथी सो किस कारण हमको त्यागकर तुम वहां चलेगये ॥ १९ ॥ तुम्हारे मनोहर वचनोंसे हमारा हृदय अमृतकी समान सींचाजाताथा सो आज हमारे मनोरथरूप चमेलीकी बेल शोकरूपी दवाग्रिस जलाई गई है ॥ २० ॥ कुररी समान वह चिरकाल पर्यन्त इस प्रकार रुदन करते रहे, हे पुत्र हे तोते ! किस प्रकारकी तुम्हारी दशा होगई तुम कैसे यहां आये थे॥ २१ ॥ हे पुत्र! यह तुम्हारा कोमल अयि शिशो मयि ते विकृतं तव परिचितं यदमुत्र विनिर्गतः ॥ सुविधुरं करणं गलिताशिषः प्रविलपतमिहैव विहाय माम् ॥ १९ ॥ तव कलाक्षरवाक्यसुधाघने विरमिते हृदयंगमवणिनि ॥ विपुलशोकदलानलसंहृता मम मनोरथ- माधविकाततिः ॥ २० ॥ सुत शुकेति शुकेति विलापितं कुररियूथामिव स्वजनं चिरम् ॥ किमवलंब्य विधे विषये शिशुं परमितो नयता संकलं हृतम् ॥ २१ ॥ अयि शिशो सुकुमारतनो कथं कुटिलतीवधनंजयदीप्तयः ॥ कलपिना- किरणैररुणप्रभो अरुणतामग़मद्वदनं तव ॥ २२ ॥ अयि विधे मयि तेऽर्थमतिः कृता बत कुमारवये नु विमुंचता ॥ किमिति निर्दयमान नयनस्यहो कमपराधमदं कृतवांस्त्वयि ॥ २३ ॥ तव मनोहरपक्रसमुद्गताकलपदालपितानि पुनः पुनः॥ अतिसुखानि दहति हृदंतरं जवयजानि यथा सुतमागमान् ॥ २४ ॥ शरीर किस प्रकारसे अग्निकी लपटको सहन करेगा मैं विलाप करताहूं हे पुत्र ! तुम्हारे मुखसे अभीतक अरुणता नहीं गई है ॥ २२ ॥ हे विधाता ! इस कुमारके वध करनेसे तुमने बडी निष्ठुरता दिखाई है इसको पुनर्जीव देकर हमारी और कृपादृष्टि करो अथवा मानियोंको बडी निष्ठुरता होती है मैंने तुम्हारा क्या अपराध कियाथा ॥ २३ ॥ हे पुत्र ! तुम्हारे मुखसे जो वारंवार मनोहर तोतले शब्द निकलतेथे वह हमारे मनको बडा आनंद 1 ॥५४॥ - - न देतेथे अब वह स्मरण कर हमारा हृदय दग्ध हुआ जाता है ॥ २४ ॥ जब घर जाकर तुम्हारे विना मैं अमिशालाको देगा हे पुत्र ! तब मुझसे वहां स्थित न रहा जायगा मैं किस प्रकार स्थिव रहूंगा ॥ २५ ॥ न मैंने कोई गुप्त पाप किया है न ब्रह्महत्या की है न स्त्रीहत्या न गर्महत्या की है यह पापका फल है ॥२६॥ हे विधाता ! मुझ दीनके ऊपर कृपा करो मैं प्रार्थना करताहूं शुकदेवके आश्रित मार्गकी मुंझे शीघ प्राप्ति कराओ ॥२७॥ हे विधाता ! इस कार्यको करके तुमने क्या फल पाया है जो मुझ दीन दुःखीके दोनों नेत्र निकाललिये ॥२८॥ मुझ निर्धनका धन और अन्धेका नयन द्रक्ष्यामि गेहमागत्य वह्निशालामृते त्वया कथं भजामि सत्पुत्र कमरण्ये समाश्रये ॥२५॥ न मया चरितं गुहां ब्रह्महत्यापि नो कृता । स्त्रीहत्या भ्रूणहा नास्मि कस्येदं कर्मणः फलम् ॥ २६ ॥ अहो धातः किमेतावत्त्वया लब्धं महत्फलम् ॥ लोचनद्वंद्वमाकृष्टं दीनस्य मम दुःखिनः॥ २७॥ धातस्तात कृपां देहि मयि दीने वदामि ते ॥ शुक- देवाश्रितं मागं मह्यं लंभय मा चिरम् ॥ २८॥ निर्धनस्य धनं ह्येतदधस्य नयनं मम ॥ हृत्वा किं ते शुभं 'भावि विधे दारुणदारुण ॥२९॥ खे विप्रसुतास्तुभ्यं भवति च यतः प्रियाः॥ कथं न त्रायते त्रासाजगद्वंद्य द्विजप्रिय ॥३०॥ कुतो गत्वा नु किं कृत्वा पृथिव्यतमपि भ्रमन् ॥ द्रक्ष्ये तवाननं सूनो सुनसं चारुलोचम् ॥३॥पर्जन्याच्च्यवते वारि सूते धान्यं धरापि च ॥ रत्नं तिमिरदुर्गेषु मुक्तासारं पयोनिधौ ॥ ३२॥ फलानि द्रुमपंडेषु धातवोऽचलसानुषु ॥नतं देशं प्रपश्यामि यत्र गत्वा मनोहरम् ॥३३॥ यही था सो तुमने मेरा ग्रहण कर लिया हे विधै ! मुझे दारुण दुःख देकर तुम्हे क्याशुभ होगा ॥२९॥ हे सूर्यदेव ! स्वभावसेही तुमको ब्राह्मणपुत्र प्रिय होते हैं हे जगद्वंद्य-द्विजप्रिय ! सो दुःखसे उनकी रक्षा क्यों नहीं करते ॥ ३०॥ कहां जाऊं पृथ्वीमें कहां भमण करूं मैं अपने सुनेत्र पुत्रको कहां देखू मेघ जल वर्षाते पृथ्वी धान्य उत्पन्न करती है अन्धकार गहनतममें रन और सागरमें मोती होते हैं ॥ ३२ ॥ वृक्षखण्डोंमें फल पर्वतोंमें धातु 1 'मा.टी. अ.१५ । होती है परन्तु उस देशको नहीं देखता हूं जहां जाकर मनोहर ॥ ३३॥ पुत्रके शरीरको आलिंगन कर हृदयके दाहको मिटाऊं बारंबार आलिंगन कर अपने आसूं पोंछु ॥ ३४ ॥ हे पुत्र ! कोई वचन हमको सुनाकर हमारे ऊपर दया करो क्या वृद्ध मातापिताकोभी देखकर तुमको दया नहीं आती ॥ ३५ ॥ हे वीर ! मुझसे विना कहे तुम कहीं नहीं जातेथे हे पुत्र ! अब मेरे पूछे विना कैसे दीर्घ मार्गको चले गये ॥ ३६॥ हे पुत्र ! रात्रिमें पुत्रगात्रं समालिंग्य हृद्तं दाइमुत्सृजे ॥ भूयोभूयः समाश्लिष्य प्रकरोम्यश्रुमार्जनम् ॥ ३४ ॥ सुत कामपि वाचं मे श्रावयाशु दयां कुरु ॥ जरठं पितरं दीनं वीक्ष्य नायाति ते या ॥ ३५ ॥ अननुज्ञाप्य मां वीर न कदापि गतो भवान् ॥ मामपृष्ट्वा कथ दीर्घ मार्ग यातोऽसि पुत्रक ॥ ३६॥ निशायां पठनार्थाय बोधयिष्यामि कं सुत ॥स शुको पररावांते त्वामृते वल्लभात्मजः॥ ३७॥ हरितः सावकाशा मे सर्वाः शून्यास्त्वया विना ॥ कुतोऽपि ताततातोत शुभां वाचं शृणोम्यहम् ॥ ३८ ॥ अरे प्रमादिताः प्राणाः कुतः स्वस्थाः कलेवरे ॥ कथं सुखाशयारूढाः कुतो न प्रचलत्युत ॥ ३९ ॥ श्रुत्यानुसारिणीं वाचं कस्य श्रोष्यामि पुत्रक ॥ गेहमद्य संमासाय धिङमां दुजाविन खलम् ॥४०॥ पढनेको अब मैं किसको जगाऊं हे पुत्र ! तुम्हारे विना यह तोता प्रातःकालमें शब्द करताहुआ तुम्हारे विना शोभित नहीं होता ॥ ३७ ॥ हे पुत्र ! तुम्हारे विना सब दिशा मुझे शून्य लगतीहैं हे पिता ! हे तात ! अब मैं ऐसे शब्दोंको कहां सुनूं ॥ ३८ ॥ अरे प्राणो ! क्या प्रमाद करते हो क्यों कलेवरमें पडे हो अब कौनसे सुखकी कथा 'तुमको प्राप्त होगी अब तुम क्यों नहीं निकलते हो ॥ ३९ ॥ हे पुत्र ! अब मैं शास्त्रानुसारिणी किसकी वाणी श्रवणे करूंगा आज घरमें प्राप्त होकर मेरा जीवन धिक्कार है। 4 --- ॥५५॥ - r हे वीर ! मैं तेरे मनोहर वाक्योंको स्मरण करता हुआजी मेरे हृदयके सौ टुकडे नहीं होते ॥४१॥ आज हमारे बडे मानकी संकल्पित वली (बेल) जल गई अब हमारा तप भी अधिक नहीं है इससे फिर वह किस प्रकार उत्पन्न होसक्ती है ॥ ४२ ॥ मैं दशरथकोही इस विषयमें धन्य मानताहूं जो दशरथ कुमारोंके वनमें प्रवेश करनेपर अपने शरीरको त्यागते भये और मेरा पुत्र नष्ट होगया तथापि मैं जीवन धारण करताहूं मुझे धिक्कार है ॥ ४३ ॥ कुबेरके छोटे भाताहीको धन्य है जो पुत्रकी विपत्तिको सुनकर रामरूपी अग्निमें प्रविष्ट हुआ पुत्रकी व्याधिसे तप्त हुए मुझको धिक्कार, वामनुस्मरतो वीरं कलवाक्यं मनोहरम् ॥ शतधा दीयते नाव हृदयं त्वायसं मम ॥ ४१ ॥ बहुमानस्य संक- ल्पवल्ली प्रज्वलिताऽधुना ॥ अत्यंतपापिनो मेऽद्य पुनरुद्भवते कथम् ॥४२॥ मन्ये सुधन्यं किल कोशलेशं यः काननं दाशरथी प्रयाते॥ दधार नोऽ स्तनयाधिदग्धो धिङ्मां तनूजप्रलयेऽप्यनष्टम् ॥४३॥ धन्यो धनेशावरजस्तनूजमा- कर्ण्य कीर्ण रघुवीरबालात् ॥ पुत्राधिनुन्नः प्रविवेश रामवार्ड्स तु घिङ्मामलयं सुतार्तम् ॥ १४ ॥ गोविंद विष्णो रघु- नंदनेश सीतापते दाशरथे मुरारे ॥ दीनानुकंपिन्भगवन्दयालो मां त्राहि मनं सुतशोकवार्थों ॥ ४५ ॥ श्रीकृष्ण नारायण वासुदेव गोविंद विष्णो भगवन्मुरारे ॥ श्रीयादवेशाऽखिललोकनाथ मां त्राहि ॥ ४६॥ हरे विभो कंस- निषूदनाघमर्दिन्वकारे मधुकैटभारे ॥ घोराहिमूांगणखेलनाद्य मां बाहि॥४७॥ है ॥ ४४ ॥ हे गोविन्द ! हे विष्णो ! हे मुरारे ! हे रघुनन्दन ! हे सीतापते ! दीनोंके ऊपर दया करनेवाले भगवान् दयाल मुझे पुत्रशोकसे पार की- जिये मैं शोकसागरमें पडाहूं इससे मेरा उद्धार करो ॥ ४५ ॥ हे श्रीकृष्ण नारायण वासुदेव गोविन्द विष्णु भगवान् मुरारी श्रीयादवेश सम्पूर्ण लोकके नाथ ! पुत्रके शोकसागरसे मेरी रक्षा करो ॥ ४६ ॥ हे हार हे विभो हे कसनिषूदन हे अघासुरके मारनेवाले हे बकासुरमर्दन करनेवाले हे मधुकैट-
ना.बी.
अ.१६
भारी ! घोर सर्प मुझको पास किये लेता है इस सुतशोकसे मेरी रक्षा करो ॥ ४७ ॥ हे देवाधिदेव ! सम्पूर्ण लोकनाथ गापाल बालरक्षक अनिपान
करता कलिन्दकन्यासे रमण करनेवाले पुत्रशोकसागरसे मेरी रक्षा करो ॥४८॥ हे वैकुंठ ! हे नरकासुरशत्रु ! चराचरके आधार रथांगपाणे
काकुत्स्थवंशके अधिपति कोशलेन्द्र मुझे पुत्र शोकसागरसे बचाओ ॥ ४९ ॥ मेरी समान कोई मूढ नहीं होगा जो नारायणके वचनको उल्लंघन
| कर पुत्रकीही दुराशा की प्रारब्धमें न होनेवाली वस्तुको कौन प्राप्त हो सकता है ॥ ५० ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये सुदेवस्य पुत्र-
देवाधिदेवाखिललोकनाथ गोपालबालोपनिपीतवढे ॥ कलिंदकन्यारमणैकबंधो मां त्राहि ॥४८॥ वैकुंठ विष्णो
नरकासुरारे चराचराधार रथांगपाणे ॥ काकुत्स्थवंशाधिपकोशलेंद्र मां त्राहि ॥४९॥ मूढो मदन्यो भवते न
कोऽपि यो देवकीसुनुवचो विलंध्य । पुत्रे दुराशां कृतवान्सुरेश लभेत को दिष्टविनष्टवस्तु ॥५०॥ इति श्रीपद्मपुराणे
पुरुषोत्तममाहात्म्ये मुदेवस्य पुत्रविलापो नाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥ वाल्मीकिरुवाच ॥ एवं विलपतस्तस्य
बहुशोकयुतस्य च ॥अकालजलदोऽभ्यागाद्गर्जनाच्छादयन्दिशम् ॥ १॥ ववर्षाविरतं वारि नूनं स्फुरितविद्युतः ॥
अत्यासारातिवाताभ्यां तर्जयन्निव मानवान ॥२॥ गंभीरतमसा लुप्तदिग्विवेकविकल्पकः ॥ ववर्ष मासमात्रं च
सांवतक इवापरः ॥ ३ ॥
विलापो नाम पंचदशोऽध्यायः ॥ १५॥ इस प्रकार महाशोकसे उस बाह्मणके विलाप करनेपर अकाल मेघ गर्जनासे दशों दिशाओंको आच्छादन करता
प्राप्त हुआ ॥ १ ॥ और बिजली चमकने लगी जल वर्षने लगा और दिशाओंको आच्छादन कर मनुष्योंको तर्जन करती पवन चलने लगी ॥ २ ॥
गंभीर अंधकारसे दिशाओंका ज्ञान किसीको न-रहा एक महीनेतक प्रलयकी समान वर्षा होती रही ॥३॥
॥१६॥
.
.
परन्तु पुत्रशोकके कारण बाह्मणने कुछमी न जाना और पुत्रको गोदीमें लिये कुररेके समान विलाप करनेलगा ॥ ४ ॥ उसने कुछभी जलकी
वर्षाको न जाना और उसके सिवाय और कुछभी न कहता हुआ न अपने आसनसे चलायमान हुआ न उसको शांति हुई ॥ ५॥ उसको अज्ञात
पुरुषोत्तम मास बीतगया और वह नारायणके नाम उच्चारण करनेसे तपोरूप होगया जिसके कारण महामना कमललोचन विष्णु भगवान् प्रगट
हुए ॥ ६॥ जगन्नाथके प्रगट होतेही अनेक पापराशी दूर हो गई जब उन्होंने लक्ष्मीपति लक्ष्मणके बडे भाताको देखा ॥ ७ ॥ तब ब्राह्मणने
नासो विज्ञातवान्किचित्पुत्रशोकनियंत्रितः ॥ तथैव सुतमादाय रुरोद कुररो यथा ॥३॥ न पयो बुबुधे चैव जल्प--
वान्यन्न किंचन ॥ न चचाल न सुष्वाप नोपलेभे सुखं स्थितः॥५॥ तदज्ञाततपो जातं पुरुषोत्तममासतः ॥ विष्णुः
कमलपत्राक्षः प्रादुरासीन्महामनाः॥ ६॥ प्रादुर्भूते जगन्नाथे विलीनाः पापराशयः॥ ददर्श कमलाकांतं भूपणं लक्ष्म-
गाग्रजम् ॥ ७॥ द्विज़स्तुष्टमनाः पुत्रदेहं भूमौ निधाय च ॥ सपत्नीको नमश्चके दंडवजानकीपतिम् ॥ ८॥ कोटि-
: चंद्रसमाहा, कोटिसूर्यातिभासुरम् ॥ प्रसन्नवदनाम्भोज सुपणापार राजितम् ॥ ९॥ तं हार सायुधं दृष्ट्वा विस्मितोऽ-
भूद्विजोत्तमः॥ भगवानपि विश्वात्मा तुष्टस्तत्कर्मरंजितः ॥ १० ॥ उवाच प्रश्रितां वाणी पीयूपत्राविणीं मुदा ॥ द्विज-
साधनसंभूतपुण्यर्दिबहुयंत्रितः ॥ ११॥
-
पुत्रका देह पृथ्वीमें रखकर पत्नीसहित जानकीपतिको प्रणाम किया ॥ ८ ॥ कोटिचन्द्रकी समान आह्वाद देनेवाले करोड सूर्यके समान
प्रकाशमान प्रसन्न कमलसा मुख गरुडके ऊपर विराजमान ॥ ९ ॥ आयुध लिये नारायणको देख ब्राह्मण विस्मित होगया और विश्वात्मा
गवान्भी उसके कर्मसे प्रसन्न हुए ॥१०॥ और अमृतकी समान सुन्दर वाणी बोले कारण कि, ब्राह्मणके साधनसे वह महाप्रसन्न होगये थे ॥११॥
. भा.दी अ.१६ भगवान् बोले हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! इस समय तू बड़ा पुण्यवान् है तेरे भाग्यका प्रमाण मैंसी नहीं करसकता हूं ॥ १२॥ हे ब्राह्मण ! तुम श्रवण करो बारह सहस्र वर्षतक यह तुम्हारा सुख देनेवाला पुत्र इन्द्रके ऐश्वर्यकी समान सुख देनेवाला होगा ॥ १३ ॥ हे बाह्मणश्रेष्ठ ! इस प्रकारके सुखकी प्राप्ति तुम करोगे देव मनुष्य नाग यक्ष किन्नर ॥ १४ ॥ तुम्हारे पुत्रके ऐश्वर्यको कोईझी प्राप्त न होगा तुम्हारे पुत्रका ऐश्वर्य देखकर उसकी स्पृहा करेंगे और तुम्हारे पुत्रका विलास देखकर वे स्वयं पुत्रकी उत्कंठा करेंगे ॥ १५॥ जिस प्रकार सुखदायक पुत्र दूसरोंने तपसे प्राप्त श्रीविष्णुरुवाच ॥ भो भो द्विजवर श्रीमन्पुण्यवानसि सांप्रतम् ॥ त्वद्भाग्यमानं कर्तुं नो मयाप्यन्यैर्न शक्यते ॥१२॥ शृणु धात्रीसुरेशान यत्ते भावि प्रशमि ते ॥ वर्षद्वादशसाहस्रं पुत्रोऽयं ते सुखप्रदः ॥ १३॥ तादृशं पुत्रसौख्यं त्वं प्राप्स्यास द्विजसत्तम ॥ देवमानवनागाश्च ऋषयो यक्षकिन्नराः ॥ १४॥ त्वत्तनूजसुखं वीक्ष्य सस्पृहास्त्वत्प्रशंसकाः॥ त्वामेव बहु मन्यते भविष्यंति सुतोत्सुकाः ॥ १५ ॥ यथान्ये तपसा लब्धाः पुत्रा हि सुखदायकाः ॥ भवंति न तथा विप्र मया दत्तः सुतस्तव ॥ १६॥ पुरा मुश्विरः कश्चिद्धनुषाख्यो महामनाः ॥ मृतियुक्तान्मुताँल्लोके पश्यन्दीनमना- भवत् ॥ १७॥ स तपस्वप्तवान्नद्याः पुलिने त्वन्नवर्जितम् ॥ तपंतं बहुकालंतमीयुः सेंद्राः सुरावदन् ॥ १८॥ वरेण .' च्छन्दयामासुरमरं वृतवान्सुतम् ॥ तमूचुनिर्जरा नैवममरः कोऽपि भूतले ॥ १९ ॥ किये हैं हे द्विज ! इस प्रकार तुम्हारा पुत्र न होगा ॥ १६ ॥ पहले एक मुनीश्वर - धनुष नामक महात्मा थे वह अपने पुत्रको मृत्युयुक्त देखकर बडे दीनमन हो गये ॥ १७ ॥ तब वह निर्धनतायुक्त पुत्र होनेके निमित्त तप करने लगे बहुत कालपर्यन्त उनको तप करते देखकर इन्द्रादि देवता कहने लगे ॥ १८॥ और वरदान देनेके निमत्त उसको वरण किया तब उसने कहा मैं ऐसे पुत्रकी इच्छा करता हूं.जो अमर हो-देवताओंने . ॥५॥ .
कहा पृथ्वीमें कोई अमर नहीं हो सकता ॥ १९॥ तब ब्राह्मणने देवताओंसे कहा तो किसी निमित्ताके युक्त आयु दीजिये देवता बोले क्या निमित्त किया जाय सो आप कहियें ब्राह्मणने निमित्तका वर्णन किया ॥ २० ॥ समयपर उस धनुष नामकने आनन्द देनेवाले पुत्रको प्राप्त किया और उसका आनन्द पुत्रके साथ बढने लगा ॥ २३ ॥ उस पुत्रको उस महात्माने सम्पूर्ण विद्या पढाई तब अपने पुत्रको विद्यायुक्त देखकर मुनीश्वर कहने लगे ॥ २२ ॥ हे पुत्र ! विद्यासे मुनीश्वरोंको जय करता हुआ विचरण कर यह वचन सुन वह मुनि सम्पूर्ण ब्राह्मणोंको उद्वेजित करता हुआ विचर- पुनराह द्विजो देवानिमित्तायुर्भवेत्सुतः॥ सुराःप्रोचुनिमित्तं किं वद सोऽप्यवदद्विजः॥२०॥ धनुषाख्यः सुतं लेभे काले- नाल्पेन मानद ॥ स पुत्रो ववृधे तस्य साकं हर्षेण मानदः ॥ २१॥ तत्पुत्रं पाठयामास सर्वां विद्या महामनाः॥ स्वपुत्रं 'विद्यया युक्तं दृष्ट्वोवाच मुनीश्वरः ॥२२॥ चर.पुत्र सुनीन्सर्वान्विद्यया विजयन्सदा ॥ तथेत्युक्त्वा चचारासौ मुनि- मंडलमुद्विजन् ॥ २३ ॥ वरदानकृतोत्साहो ब्राह्मणानवमन्यत ॥ कदाचिन्महिषो नाम ऋषिः परमकापनः ॥२४॥ शशाप.मुनिपुत्रं तमद्यैव मरण व्रज ॥ चेतसा चिंतयामास निमित्तायुरयं भवेत् ॥२५॥ इति चिंतयता तेनं निःश्वासा: त्प्रकटीकृताः॥ महिषाः कोटिशो विप्र गिरिः शकलीकृतः ॥२६॥ ममार मुनिपुत्रोऽपि धनुष्याख्योऽतिदुःखितः ॥ विलप्य बहुकालं स गृह्य पुत्रकलेवरम् ॥ २७ ॥ नेलगा ॥ २३ ॥ और वरदानके उत्साहके कारण- ब्राह्मणोंका तिरस्कार करनेलगा किसी महिष नामके परम कोपवान् ऋषिने ॥ २४ ॥ उसको शाप दिया कि तू अभी मृत्युको प्राप्त हो परन्तु फिर चित्तसे विचारने लगा कि यह तो निमित्तायु है ॥ २५ ॥ यह विचारकर उन ऋषिराजने अपने, श्वाससे अनन्त माहिष अंगट किये उन्होंने वह पर्वत खण्ड २ करदिया ॥ २६ ॥ उसके फटनेसे महादुःखी हो मुनिपुत्रभी मृत्युको प्राप्त -- - भा... अ. १ हुआ तब बहुत कालतक विलाप कर पुत्रके कलेवरको ले ॥ २७ ॥ उसका पिता बड़ा दुःखी हो अनिमें प्रविष्ट हुआ इस प्रकार नीतिसे सुख देनेवाले बलसे प्राप्त पुत्र नहीं होते हैं ॥ २८ ॥ और यह पुत्र तुझको मेरे वाहन गरुडजीने दिया है यह तुमको इस जन्ममें दुर्लभ पुत्र सुखको देगा ॥२९॥ और मृत्युको प्राप्त होकर तू ब्रह्मलोकमें अनेक सुखको प्राप्त होकर निवास करेगा फिर बहुत कालतक पृथ्वीमें चक्रवर्ती होकर रहेगा ॥ ३० ॥ उस समय तुम महापुण्यको प्राप्त हो पृथ्वीम अनेक भोगोंको भोगोगे तीस सहस्र संवत्सर पर्यन्त राज्य करेगा ॥ ३१ ॥ चार पुत्र और एक पुत्री तुम्हारे प्रविवेश पिता वह्नि सुतदुखातिपीडितः॥ एवं बलातपुत्रा ये भवेयुनौतिसौख्यदाः॥२८॥ अयं तु तनयस्तुभ्यं सुपों मम वाहनम् ॥ इह जन्मनि ते दत्त्वा पुत्रसौख्यातिदुर्लभम् ॥२९॥ मृतस्त्वं ब्रह्मणो लोके वसिष्यसि सुखैर्युतः॥ बहु- कालं ततोऽवन्या चक्रवर्ती भविष्यसि ॥३०॥ तदापि त्वं महापुण्यैः क्षितौ ख्यातो भविष्यसि ॥ संवत्सराणां नियुत- त्रयं राज्यं करिष्यास ॥ ३१ ॥ चत्वारस्तनया भाव्यास्तत्र पुत्री च तेऽपरा ॥ भायी चात्यंतसुभगा इयमेव भवि- ष्यति ॥ ३२॥ भुक्त्वा भोगान्सुदुष्पापान्सुरैरैप्यमराधिपः ॥ अयमेव तदा पुत्रस्वनिस्स्तानिमित्तभूः ॥ ३३॥ भवि- व्यति शुको भूत्वा वाक्यमेकं वदिष्यति ॥ श्रुत्वा वाक्यं शुकप्रोक्तं निर्विण्णस्त्वं गृहाश्रितः ॥ ३४ ॥ दुर्मनाश्चि- त्यमानस्तु वाल्मीकि मुनिमाप्यसि ॥ तेन निर्मिनसंदेहजालः सद्योविमुक्तिमान् ॥ ३५ ॥ होगी और यही अत्यन्त सौभाग्यवती भार्या तेरे होगी ॥ ३२ ॥ देवताओंकोनी दुष्पाप भोगोंको भोगकर यही पुत्र तुम्हारे निस्तार करनेका निमित्त होगा ॥ ३३ ॥ अर्थात् तोतेका रूप धारण कर एक वचन बोलेगा शुकके वचन सुनकर तू घरसे विरक्त हो जायगा ॥ ३४ ॥ तब दुर्मनायमान हो चिन्ता करता हुआ वाल्मीकि ऋषिको प्राप्त होगा.उससे सन्देहरहित हो शीघ सब दुःखजाल दूर होजायँगे ॥ ३५ ॥ ॥५॥ . - J - हे ब्राह्मण ! मेरे चरणसेवनसे उत्तम कालके अंगको प्राप्त होकर स्त्रीसहित तू मेरे उत्तम स्थानको प्राप्त होगा ॥ ३६ ॥ जिस पदको जाकर कभी फिर निवृत्ति नहीं होती शान्त संन्यासी जिसकी सदा उत्कंठा करते रह्मे हैं इस प्रकार अमित तेजस्वी विष्णुभगवान्के कहनेसे ॥ ३७ ॥ वह ब्राह्मण पुत्र पिताका मन प्रसन्न करता हुआं उठ बैठा सब देवता प्रसन्न हो वारंवार फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३८ ॥ सब दिशा प्रसन्न और सब जन्तु परम आनन्दित हुए और शुकदेवनेभी अपने माता पिता तथा हरिको प्रणाम किया ॥ ३९ ॥ उस ब्राह्मणके पुत्रको देख गरुडजी महा- कालोत्तमांगमाकृष्य पदा सव्येन भूसुर ॥ मदीयमुत्तमं स्थानं सपनीकः समेष्यसि ॥३६॥ यद्गत्वा न निवर्तते शांताः संन्यासिनोऽमलाः ॥ एवं प्रवदतस्तस्य विष्णोरमिततेजसः॥३७॥ द्विजात्मज समुत्तस्थौ पिबोरानंदयन्मनः॥ सुराः सर्वे च संतुष्टाः कुसुमैर्ववृषुर्मुहुः ॥ ३८॥ सुप्रसन्ना दिशो जाताः सानंदाः सर्वजंतवः ॥ ननाम शुकदेवोऽपि पितरं मातरं हरिम् ॥ ३९॥ सुपर्णोऽप्यऽतिसंहृष्टः ससुतं वक्ष्यि भूसुरम् ॥ दंपती अतिसंहृष्टौ परिपस्वजतुर्मुदा ॥.४० ॥ द्विजोऽ- भूचकितस्तूर्णमतिविस्मितमानसः ॥ प्रोवाच भुवनेशानं केन तुष्टोऽसि मे विभो ॥४१ ॥ चतुर्वत्सरसाहस्रं तपस्तप्तं पुरा मया ॥ न ददौ किं सुतं मह्य भाग्यहीनस्त्विति ब्रुवन् ॥ ४२ ॥ अधुना केन मे भाग्यमुद्भूतं जगदीश्वर ॥ येन नष्टं सुतं भोगानन्यजन्मनि दुर्लभान् ॥४३॥ सन्तुष्ट हुए और वे दोनों स्त्री पुरुष महा प्रसन्न हो पुत्रको हृदयसे लगाते हुए ॥ ४० ॥ और ब्राह्मणनी विस्मयको प्राप्त हो बडा चकित हुआ और नारायणसे बोला ॥ हे प्रभो ! आप क्यों मेरे ऊपर प्रसन्न हुए इसका कारण कहो ॥ ४३ ॥ पहिले मैंने चार सहस्र वर्षतक तप किया उस समय भी आपने भाग्यहीनताके कारण मुझको पुत्र न दिया ॥ ४२ ॥ हे जगदीश्वर ! अब किस पुण्यके प्रतासे में भाग्यवान होगया हूं सो आप कहिये .
भा.दी. अ.१७ जिससे नष्ट पुत्रकी प्राप्ति हुई और अन्य जन्मभी दुर्लन भोग भोगूंगा ॥ ४३ ॥ और अन्तमें देवदुर्लभ मुक्ति मिलेगी हे महाराज ! सो आप कहिये. इसमें मुझे महा संदेह है ॥ ४४॥ इति श्रीपमपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये सुदेवस्य पुत्रजीवनं नाम पोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ विष्णुभगवान् बोले ॥ हे द्विजराज ! जो तुमने किया है वैसा कोई नहीं करेगा जिसने कि, देवताओंको दुरासद मेरा स्थान जीतलिया है ॥ ३ ॥ तथा वह लोकनी जीतलिया इसमे मैं तेरे ऊपर महा प्रसन्न हूं जिससे मैं प्रसन्न हुआ हूं इस वार्ताको तुम जानते नहीं हो ॥ २॥ यह मेरा प्रिय पुरुषोत्तम मास बीतता है काम तदंते मोक्षमेवापि सुरैरपि सुदुर्लभम् ॥ तन्मे बहि महाराज संशयोऽत्र महान्मम ॥ ४४.॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषो- तममाहात्म्ये सुदेवस्य पुत्रजीवनं नाम पोडशोऽध्याय ॥ १६॥ श्रीविष्णुरुवाच ॥ द्विजराज कृतं यत्ते नैतदन्यः करि- व्यति ॥ जितं येन ममाप्युच्चैः पद देवैर्दुरासदम् ॥१॥ अय लोकोऽपि विजितस्तुष्टश्चाप्यहमद्भुतम् ॥ न तद्वोत्ति भवा- नूनं येनाह तुष्टिमाप्तवान् ॥२॥ अयं मम प्रियो मासः प्रयातः पुरुषोत्तमः ॥ कामात्क्रोधाच विद्वेषाल्लोभादंभाग- यादपि ॥३॥ एकमप्युपवासं यः करोत्यस्मिन्द्विजोत्तम ॥ स्नानं वापि रजोमात्रं दानं वाचापि शोभनम् ॥ ४॥ सोऽनेकजन्माचारतकोटिपातकपंजरम् ॥ भित्त्वानोति महत्स्थानं निर्मलं स्वेन कर्मणा ॥५॥ सुतशोकमिषेणाद्य त्वया तप्त महत्तपः ॥ मासमा निराहारस्त्वकालजलदोऽभ्यगात् ॥६॥ त्रिषु लोकेषु ते विद्वन्नानानि प्रतिवासरम् ॥ अभ्रावकाशं दुःष्प्रापमस्मिल्लब्धं त्वया तपः ॥ ७॥ क्रोध लोग विद्वेष पाषण्ड भयसे ॥ ३ ॥ जो बाह्मण इसमें एकभी उपवास करता है वा स्नान अथवा रजमात्रभी जो दान देता है -॥ ४ ॥ वह अनेक जन्मके किये कोटि दुस्तर पापोंको दूर कर अपने निर्मल मेरे कर्मसे शाश्वत स्थानको प्राप्त होताहै ॥ ५॥ तेने पुत्रशोकके निमित्तसे बडा तप किया है अकाल मेघकी वर्षा सहकर एक महीने पर्यन्त निराहार रहा ॥ ६ ॥ हे ब्रह्मन् ! त्रिलोकीमें तू प्रतिदिन तप करके प्रतिदिन स्नान करता रहा - --
.
और अनाच्छादित स्थान में स्थिति करनेसे तुझको महातपकी प्राप्ति हुई है ॥ ७ ॥ आसन जीते हुए निराहार जितालोक जितेंद्रिय शोकोनी
मेरेही नामका जप बराबर करते रहे ॥८॥ हे ब्राह्मण ! जो कर्म तेने अहंकाररहित होकर किया है ऐसा कौन कर सकता है हे द्विज ! तुम्हारे विना
कोईजी पुरुष यह तप करनेको समर्थ नहीं है ॥ ९ ॥ यह लोक परलोक तथा इससे आगेशी लोक तैंने इस कत्यसे जीत लिये अब और क्या
सुननेकी इच्छा है ॥ १० ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! इस तेरे साधनकी महिमा मैं कहनेको समर्थ नहीं हूं दूसरा कैसे कह सकता है ॥ ११ ॥ सुदेवने कहा ॥
'जितासनो जिताहारो-जितालोको जितेंद्रियः॥ मन्नामालापचतुरः शोकेनापि भवानभूत् ॥ ८॥ निरहंकारिणा विप्र
यत्कृतं ते करोति कः ॥ नैतत्कर्तुं पुमाञ्छक्तस्त्वदन्यः पृथिवीसुर ॥ ९॥ अयं लोकः परो लोकः परात्परतरोऽपि ते॥
जितस्त्वनेन कृत्येन किं पुनः परिपृच्छसि ॥ १०॥ त्वदीयसाधनस्यास्य महिमानं द्विजोत्तम ॥ नाहं वक्तुं समर्थोंs-
स्मि कथमन्यः क्षमो भवेत् ॥ ११ ॥ सुदेव उवाच ॥ कोऽसौ मासस्त्वया विष्णो वर्ण्यते बहुविस्तरम् ॥ किमास्मि-
न्करणीयं स्यात्को विधिनियमश्च कः ॥ १२॥ किं प्रदेयं च को देवः सर्वं विष्णो वदस्व मे ॥ इष्टदेवोऽसि मे स्वामि-
न्मुक्तिमुक्तिप्रद प्रभो ॥ १३ ॥ नारायण उवाच ।। मासाः सर्वे द्विजश्रेष्ट सूर्यदेवस्य संक्रमाः॥ अधिमासस्त्वसंक्राति-
सोऽसौ शरणगतः॥१४॥
हे विष्णुजी ! वह क्या महीना है जिसका आपने बडा विस्तार वर्णन किया है क्या इसमें कर्तव्य है इसकी विधि और नियम क्या है ॥ १२॥ इसमें
क्या.देना चाहिये कौन इसका देवता है यह आप हमसे वर्णन कीजिये है स्वामिन् ! भुक्ति मुक्ति देनेवाले आप मेरे इष्ट देवही हो ॥ १३ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ ! संपूर्ण महीने सूर्यदेवकी संक्रांतिके कारण होते हैं अधिमासमें संक्रांति नहीं होती यह इस कारण मेरी शरणमें प्राप्त हुआ ॥ १४ ॥
down
.
'मा..
अ.१७
तबसे यह पुरुषोत्तम मास मुझे सबसे अधिक प्रिय है हे विष ! मैं सर्वथा इस पुरुषोत्तम मासके स्वामित्वमें कल्पित हुआ हूं ॥ १५ ॥. मेरा प्रिय
होनेसेही इसकी पुरुषोत्तम संज्ञा हुई है और महीनोंमें इस प्रकारसे मैं प्रियता. नहीं करता ॥ १६ ॥ और महीनोंमें जो कृत्य हैं उसके स्वामी
सूर्यदेव हैं परन्तु पुरुषोत्तम मासमें जितने कृत्य हैं ॥ १७ ॥ उनका मैं प्रभु अच्छी प्रकारसे फलका देनेवाला हूं हे पापरहित ! जो इसमें कर्तव्य है
सो सुन ॥ १८॥ जो फल भली प्रकार सौ वर्ष तप करनेसे प्राप्त होता है वह फल इस महीने में एक दिन व्रत करनेसे प्राप्त होता है ॥ १९ ॥
मम प्रियतमोऽत्यंत मासोऽयं पुरुषोत्तमः ॥ अस्याहं सततं विप्र स्वामित्वे पर्यवस्थितः ॥ १५ ॥ पुरुषोत्तमता तस्मा-
दस्स जाता मदात्मनः॥ मासेष्वन्येषु मे स्वाम्यमीदृशं न कदाचन ।। १६ ।। सर्वमासेषु यत्कृत्यं तत्स्वामी कश्य-
पात्मजः ॥ पुरुषोत्तममासेपु यानि कृत्यानि मानद ॥ १७॥ तेषामहं प्रभुः सम्यक्फलदातास्मि सर्वदा ॥ शृणु विप्र
फलं ह्यस्मिन्कर्त्तव्यस्य च मेऽनघ ॥ १८॥ सम्यक्चीर्णेन तपसा शतवर्षमितेन च ॥ यत्फलं लभते विप्र मासेऽ-
स्मिन्नेकवासरात् ॥ १९॥ कोटिशो ब्राह्मणान्सम्यक्संभोज्य स्वर्णभाजने ॥ विविधैः शोभने रत्नैर्यत्पुण्यमुपलभ्यते
॥२०॥ सावित्रीलक्ष्यजाप्येन लभ्यते यत्फलं नरैः ॥ सकृन्मंत्रजपेनैव मासेऽस्मिन्नुपलभ्यते ॥ २१ ॥ तत्पुण्यं
लभ्यते मासि सकृद्राह्मणतर्पणात् ॥ नालभ्यं दृश्यते किंचिन्मत्प्रिये पुरुषोत्तमे ॥ २२ ॥ द्वादशाक्षरमंत्रोऽयं यो जपे-
कृष्णसंनिधौ ॥ दशवारमपि ब्रह्मन्स कोटिफलमश्नुते ॥ २३॥
जो स्वर्ण पात्रोंमें करोडसौ ब्राह्मणोंके जिमानेका फल है जो पुण्य अनेक सुवर्ण और रत्न दानसे प्राप्त होताहै ॥ २० ॥ तथा जो फल लाख गाय-
त्रीके जपनेसे प्राप्त होताहै वह फल इस महीनेमें एकही बार मंत्रके जपनेसे प्राप्त होता है ॥ २१ ॥ अथवा इस महीने में एकही बार बामणको तृप्त करनेसे
वह पुण्य फल मिलताहै मेरे प्रिय पुरुषोत्तम मासमें जपादि करनेसे संसारमें कोई वस्तु अलाय नहीं रहती ॥ २२ ॥ जो नारायणके निकट द्वादशा-
॥६॥
। क्षरका जप करताहै वा दशवारजी जप करताहै वह अनन्त फलको प्राप्त होताहै अर्थात् उसे एक करोड मंत्र जपनेका फल मिलता है ॥ २३ ॥ पुरुषोत्तम मासमें सुकृत करनेसे सात कुलतक पवित्र कर देताहै इसमें पंचाक्षरी महाविद्याको जो पांचवार भी जपताहै ॥ २४ ॥ वह सैकडों पाप दूर करके परम पदको प्राप्त होजाता है यदि आसक्त होकर फल मूलादिसे ब्राह्मणको तृप्त करै तो ॥ २५ ॥ उसको पुरुषोत्तम मासमें सैकडों ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल मिलताहै छः वा आठ वर्णमें कोई हो जो पुरुषोत्तम भगवान्का स्मरण करता है ॥ २६ ॥ हे बाह्मण ! सौ बार स्मरण करनेसे कृत्यं पुरुषोत्तमे यत्तु पुनात्यासप्तमं कुलम् ॥ पंचाक्षरी महाविद्या पंचकृत्वोऽपि यो जपेत् ॥ २४ ॥ विधूयाघसह- स्राणि स याति परमं पदम् ॥ सुभक्त्या फलमूलायेदि तर्पयते द्विजम् ॥ २५ ॥ तेन स्युभोंजिता विप्राः शतशः पुरुषोत्तमे ॥ षड्वर्णमष्टवर्णं वा यः स्मरेत्पुरुषोत्तमे ॥ २६ ॥ शतवारमपि ब्रह्मन्स कोटिफलमश्नुते ॥ दरिद्रार्णवमु- कम्य वैभवं भुवि लभ्यते ॥ २७॥ विष्णोरनुग्रहं प्राप्य गाणपत्यपदं व्रजेत् ॥ मासं सर्वोत्तमं प्राप्य जानकी- जविनं हारम् ॥ २८ ॥ न पूजयति मंदात्मा स गच्छेन्नरकं चिरम् ॥ ध्वजारोपणमुच्चयों मासेऽस्मिन्हरिमंदिरे ॥२९॥ करोति चैलखंडेन तस्य पुण्य फलं शृणं॥ वीणावाद्यमृदंगाचैादित्रैर्नृत्यगायनैः ॥ ३० ॥ करोड मंत्र जपनेका फल होता है और दरिद्रसागरके पार होकर ऐश्वयोंमें लय होजाता है ॥ २७ ॥ फिर विष्णुके अनुग्रहको प्राप्त हो गाणपत्यके पदको प्राप्त होता है इस सर्वोत्तम मासको प्राप्त होकर जानकीजीवन नारायणको ॥ २८ ॥ जो मंदात्मा पूजन नहीं करते हैं वह चिरकालतक नरकमें जाते हैं जो इस महीनेमें हरिमंदिरमें ध्वजारोपण करते हैं ॥ २९ ॥ अथवा जो वस्त्रसे ध्वजा चढाते हैं उसके पुण्यका फल सुनो वीणा बाजे मृदंगी बाजे नृत्य गायन ॥ ३०॥ ११ भा. टी. अ.१८ . आदि ऊंचे स्वरसे विष्णुकी स्तुति करता है वह आनंदको प्राप्त होता है वह सहस्र युग पर्यन्त आनंद कर फिर विष्णुके लोकको प्राप्त होता है ॥ ३१ ॥ सहस्र दीपदानका सब भय हरनेवाला फल •सुनो सुवर्णके चांदीके ताम्बेके अथवा पीतलके पात्रमें ॥ ३२ ॥ तेलका अथवा घृतके पात्रमें जो मनुष्य दीपदान करता है वह अत्यन्त सुखको प्राप्त हो मेरा प्रिय होता है ॥ ३३ - ॥ वह अनेक वर्षांतक नाना प्रकारके भोगोंको भोगकर पीछे परब्रह्म परत्माके सालोक्यको प्राप्त होता है ॥ ३४ ॥ इस कारण सब प्रकार विष्णुमंदिरमें स्तुति विष्णोः करोत्युच्चोंदत्याखण्डलांतिके ॥ मोदित्वा युगसाहस्रं पश्चाद्धारपदं व्रजेत् ॥ ३१ ॥ दीपदानस्य साहस्रं शृणु सर्वभयापहम् ॥ सौवर्णे राजते ताम्र पैत्तले पार्थिवेऽपि च ॥ ३२ ॥ तैलेन च घृतेनापि भाजने दीपदो नरः ॥ अत्यन्तं सुखमाप्नोति मत्प्रिये पुरुषोत्तमे ॥३३॥ भुक्त्वा भोगान्छुभान्सर्वान्संवत्सरगणान्बहून् ॥ पश्चात्प- याति सालोक्यं ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ३४ ॥ तस्मात्सर्वात्मना कार्यों दीपः श्रीविष्णुमंदिरे॥ मन्मंदिरगतं ध्वति येन दीपैर्विनाशितम् ॥ ३९ ॥ तस्य त्वंतर्गतध्वांतं क्षिणोम्यतस्थितो यहम् ॥३६॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहा- त्स्ये पुरुषोत्तमे कर्तव्यताया वर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥ १७॥ विष्णुरुवाच ॥ समाप्यैवं शुभं मासमेकस्मिन्नपि वासरे ।। सुरसद्मनि दीपो वै न कृतो मन्दभाग्यतः॥१॥ कथं तस्याल्पभाग्यस्य जन्मकोटिगतं दृढम् ॥ दारिद्यु नाशामायाति दुर्भाग्यस्याकृतात्मनः ॥२॥ दीपक बालना उचित है मेरे मंदिरमें प्रकाश करनेसे यमलोकका अंधकार दूर होताहै ॥ ३५ ॥ और मैं उसके हृदय अन्तरका अन्धकार दूर करदेता हूं ॥३६॥ इति श्रीपद्म पुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये पुरुषोत्तमे कर्तव्यताया वर्णनं नाम सप्तदशोऽध्यायः॥१७॥ श्रीविष्णुजी बोले ॥ इस प्रकार इस मासको समाप्त कर एक दिनमेंभी जिसने नारायणके आगे दीपदान नहीं किया वह बड़ा मन्दभागी है ॥ १ ॥ उस अल्पभाग्यके अनेक कोटि जन्म वृथा गये भी 10 उस अकृतात्मा पुरुषका दरिद्र कैसे नाशको प्राप्त होजाताहै ॥ २॥ जिसने दीपज्योतिसे समान प्रकाशमान विष्णुका मुख नहीं देखा उसको इस सर्वा- तम मासमें क्या फल प्राप्त होताहै वह आप सुनिये ॥ ३ ॥ दरिद्र व्याधिवान् मूर्ख शठ सर्वत्र निन्दित होताहै और जहां जहां उसका जन्म होताहै वहां वहां वह नेत्ररोगी व्रणवाला और जड होता है ॥ ४ ॥ जो जो मनुष्य पृथ्वीमें महानेत्ररोगी देखे जाते हैं हे द्विजश्रेष्ठ ! उन उनको तुमै पराई स्त्रियोंके देखनेवाले जानो ॥ ५॥ अग्नि धाता रवि चन्द्र गौ ब्राह्मण संन्यासी गुरु हार ब्रह्मा ईशान इनके भक्तोंको तथा परस्त्रीको ॥ ६ ॥ नालोकि विष्णुवदनं दीपज्योति प्रकाशितम् ॥ मासे सर्वोत्तमे पुण्ये तस्य किं स्याच्छृणुष्व तत् ॥ ३॥ दरिद्रो व्याधितो मूर्खः पंढः सर्वत्र निंदितः ॥ यत्रयत्रावतारी स्यानेत्ररोगी व्रणी जडः॥४॥ ये ये नयनरोगाढया दृश्यते भुवि मानवाः॥ ते ते ज्ञेया द्विजश्रेष्ठ परदारावलोकिनः॥५॥ अग्निं धातुं रविं चन्द्रं मां विप्र न्यासिन गुरुम् ॥ हार ब्रह्माणमीशानमेषां भक्तं परस्त्रियम् ॥ ६॥ उच्छिया निर्विशंकाश्च प्रेक्षते ये नराधमाः॥ पतंति नरके घोरे पश्चान्नय- नरोगिणः॥७॥ स कथं पातकान्मयों मुच्यते भवपाशतः ॥ नालोकयति मासेऽस्मिन्दीपज्योतिर्गतं हरिम् ॥ ८॥ येनाई कमलानाथो नार्चितस्तुलसीदलैः ॥ सुगन्धैः कोमलैगधैः स कथं मुक्तिमाप्स्यति ॥ ९ ॥ अन्यैः कोटिमितैः पुष्पैः पूजा नारायणे कृता ॥ सुगन्धतुलसीपत्रेरकेनापि कृता भवेत् ॥ १० ॥ उच्छिष्ट निशंकित हो जो क्रूर दृष्टिसे देखते हैं वे दुष्ट पहले घोर नरकमें पडकर पीछे जहां जन्मते हैं नेत्ररोगी होते हैं ॥ ७॥ वह मनुष्य किस प्रकार यमराजके घोर पाशों और पातकोंसे छूट सकता है जो पुरुषोत्तम मासमें दीपक बालकर नारायणका दर्शन नहीं करता है ॥ ८ ॥ जिन्होंने तुलसी- दलसे कमलानाथका पूजन नहीं कियाहै अथवा सुगंधिवाले कोमल पुष्प नहीं चढाये वह किस प्रकार मुक्तिका भाजन होसक्ताहै ॥ ९ ॥ जिसने एकभी
-
मा.दी.
अ.१८
सुगंधित तुलसीपत्रसे नारायणकी पूजा की है. ऐसा जानो कि उन्होंने करोडों दूसरे फूल चढा दिये हैं ॥ १० ॥ जो भक्तिसे तुलसीदल द्वारा नारायण
जगन्नाथका पूजन करता है वह अपने दश पहले और दश अगले पितरोंका उद्धार करताहै ॥११॥ वह परमस्थानको प्राप्त होता है जहां जाकर शोच
करना नहीं पडता । जिसनें पुरुषोत्तम मासमें शालग्रामका पूजन कियाहै ॥ १२॥ वह फिर माताके उदरमें शयन नहीं करता जिसने अप्रमादसे शालयामके
स्नानका जलपान किया है ॥ १३ ॥ उस बुद्धिमान्को फिर माताका दुग्धपान नहीं करना पडता चंपक, करवीर, चमेली, मुद्र ॥ १४ ॥ कर्णिकार
वृंदादलैर्जगन्नाथं भक्त्या संपूजयन्नमन् ॥ आत्मना साकमुद्धृत्य दर्शपूर्वान्दशापरान् ॥ ११॥ प्रयाति परमं स्थानं
यत्र गत्वा न शोचति ।। शालग्रामशिला येन पूजिता पुरुषोत्तमे ॥ १२ ॥जननीजठरावासी न भूयो जायते नरः॥
शालग्रामशिलातोयं पीतं येनाप्रमादिना ॥ १३॥ न भूयः पिबति प्राज्ञः स्तन्यं मातुः कदाचन ॥ चंपकैः करवीरश्च
जातीचंपकमुद्गरैः ॥ १४ ॥ कर्णिकारश्च कमलेबिल्वपत्रैः सुशोभनैः ॥ मल्लिकायूथिकाकुंदैर्मालतीकिंशुकोत्करैः ॥
कैलासनिलयः शर्वश्चार्चितः पुरुषोत्तमे ॥ १५॥ तेन सर्व जितं मन्ये त्रैलोक्यं स्वीकृतं पुनः ॥ १६ ॥ न तदस्ति
पदं ब्रह्मस्तदलभ्यं तु यद्भवेत् ॥ शर्वः शतधृतिर्विष्णु नृणस्तस्य कुत्रचित् ॥ १७॥ तिलतुल्यं न मेध्यं स्याजगत्सु
द्विजसत्तम ॥ पृथिव्यां सर्वदानेभ्यस्तिलदानं विशिष्यते ॥ १८ ॥
३
-
कमल सुंदर बेलपत्र चमेलीकी लता कुंद मालती किंशुकोत्करद्वारा ॥ १५॥ कैलासवासी शंकरका जिन्होंने पुरुषोत्तममासमें पूजन किया उसने
मानो तीनों लोकोंको जीतकर अपने वशमें करलिया है ॥ १६ ॥ हे ब्राह्मण ! ऐसा कोई पद नहीं है जो इस मासमें पूजन करनेसे प्राप्त न हो इससे
शिव विष्णु उससे अनुण नहीं होते ॥ १७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! संसारमें तिलकी बराबर कोई वस्तु पवित्र नहीं है सब दानोंसे पृथ्वीमें तिलदान अधिक
॥६२॥
श्रेष्ठ है ॥ १८ ॥ जो द्रोणमात्र तिल सुवर्णसहित ब्राह्मणके निमित्त प्रदान करता है वह इस विष्णुमासके प्रसादसे कहीं जल पावै ॥ १९ ॥
कुरूप कुत्सित अल्पायु मत्सरवाला दरिद्री अत्यागी कृपण दुर्भागी ॥ २० ॥ अनाडी दुर्बुद्धि पापी रोगी नहीं होता है; तिलका देनेवाला पुरुष धन्य
और तिलकाही देनेवाला पवित्र है ॥ २१ ॥ पितरोंको तिल और जल देनेसे अक्षय होता है तिलसे अग्निमें हवन करनेसे देवताओंकीनी तृप्ति होती
तिलद्रोणं दिजेंद्राय स हिरण्यं प्रयच्छति ॥यत्र कुत्रापि संयाति विष्णुमासप्रभावतः ॥१९॥ कुरूपः कुत्सितो नस्याना-
ल्पायुर्न च मत्सरी ॥ न दरिद्री न चात्यागी कृपणो न च दुर्भगः॥२०॥नानायौँ न च दुर्मेधान पापीन च रोगवान्।।
तिलदः पुरुषो धन्यस्तिलदः पुरुषः शुचिः॥२१॥ तिलोदकं पितृगणे दत्तं भवति चाक्षयम् ॥ तिलहोमकृतो वह्निदेवा-
नामपि तृप्तिदः ॥ २२ ॥ तिलान्दत्त्वा सकृद्धत्वा पुरुषोत्तमवासरे ॥ आत्मबुद्धिं प्रपद्याशु ब्रह्मलोके महीयते ॥ २३ ॥
तिलमेकमपि प्राज्ञे विप्रे दत्त्वा भवेच्छुचिः ॥ विक्रयं च पुनः कुर्वनरके याति दारुणे ॥ २४॥ तिलधेनुं गुडधेनुं मधुधेनुं
जलस्य च ॥ विष्णोर्मासि द्विजेंद्राय प्रयच्छन्गर्भगो नहि ॥२५ ॥ शय्यां सोपस्करां धेनुभूषणानि शुभानि
च॥
व्यंजनानि विचित्राणि कर्पूरागरुचन्दनम् ॥ २६ ॥
है ॥ २२ ॥ जो पुरुषोत्तम मासके दिनों में तिलदान करता तथा हवन करता है वह आत्मज्ञानको प्राप्त हो ब्रह्मलोकमें गमन करता है ॥२३॥ एक तिलभी
पितरोंके उद्देशसे ब्राह्मणोंको देकर पवित्र होता है और ब्राह्मण तिल बेचनेसे दारुण नरकमें पड़ता है ॥ २४ ॥ तिलधेनु गुडधेनु मधुधेनु जलधेनु
पुरुषोत्तममास में विष्णुके निमित्त दान करनेसे फिर उसका जन्म नहीं होता है ॥ २५॥ सामग्रीसहित शय्या धेनु सुन्दर भूषण विचित्र व्यंजन
कर्पूर अगर चंदन ॥ २६ ॥
A4-
-NE
---
गा. दी
अ.१५
सोने चांदी कांसी तांबेके बरतन धन हाथी घोडे दिव्य महिष रथ ॥ २७ ॥ पालकी नौकर चाकर स्त्री गहने यह सब उमामहेश्वरको
तिलपात्रके ‘साथ समर्पण कर तथा घृतजी निवेदन कर ॥ २८ ॥ यह सब वस्तु अपने वित्त के अनुसार ब्राह्मणको प्रदान करें यह पवित्र पुरुषोत्तम
मास विष्णुकी सन्तुष्टिके अर्थ है ॥ २९ ॥ जो मनुष्य नित्य अन्य ब्राह्मणके घरमें भोजन करता है वह एक सेर अन्न लेकर कुंजमें पूजन करै ॥
॥ ३० ॥ हे विष ! जबतक हमारा प्रियदिन द्वादशी आवे तबतक नारायणकी बराबर पूजा करता रहै कलश और दक्षिणा भक्तिसे उनको देनी
स्वर्णरूप्यकांस्यताम्रभाजनानि धनानि च ॥ गजं च वाजिनं दिव्यं महिपी स्यंदनानि च ॥२७॥ शिबिकानुचरा दास्या
वनिता भूषणानि च ॥ उमामहेश्वरं विप्रतिलपात्रं हवींषि च ॥२८॥ सर्व देयं द्विजेद्राय आत्मवित्तानुसारतः ।। पुण्ये वि-
प्णुप्रिये मासि पुरुषोत्तमतुष्टये ॥२९॥ यद्यनाति नरो नित्यं गृहे ह्यन्यस्य ब्राह्मणाः ॥ अनप्रस्थमुपादाय कुम्भे नित्यं
प्रपूजयेत् ॥ ३०॥ यावन्मम दिनं विप्र द्वादश्यामर्चयेदारिम् ॥ कलशं दक्षिणां तस्मै भत्त्या दद्यात्समाहितः ॥३॥
तत्कर्ता च जनः कश्चिन्नान्यपीडामवाप्नुयात् ॥ न कदाचिद्भवेदुःखी संकटं नाभिपद्यते ॥ ३२ ॥ न कश्चिन्नरकं पश्ये-
नापि जाठरवेदनाम् ॥ सदा भोगी सदा दाता न कदाचिदृणी भवेत् ॥ ३३ ॥ नियमान्पालयनित्यं यावन्मासावधि-
भवेत् ॥ मासांते मंडलं कृत्वा दिव्यैर्धान्यैः सुशोभनम् ॥३४॥
चाहिये ॥ ३१ ॥ इस विधानका कर्ता कोई मनुष्य पीडाको प्राप्त नहीं होता न कभी दुःखी और न संकटको पात होता है ॥ ३२ ॥ न कमी
नरक ने कमी गर्भवासकी वेदनाको प्राप्त होता है सदा भोगी सदा दाता और कदाचितनी कणी नहीं होता है ॥ ३३ ॥ जयतक मासकी पूर्वि हो
नियमोंका पालन करे मासान्तमें दिव्य धान्यका सुंदर मंडल करके ॥ ३४ ॥
सोने या चांदीका व्रणरहित कुंज स्थापन करै तांबेके वा अन्य पात्रको अन्नसे पूर्ण करै ॥ ३५ ॥ पुरुषोत्तमकी सुवर्णमूर्तिको रेशमी वस्त्रोंसे लपेटे और उस पात्रमें स्थापन करिकै सर्व साधनोंसे पूजै ॥ ३६ ॥ सोलह उपचारोंसे पुरुषोत्तम देवका पूजन करें और उतने दिनकी संख्यासे गुणसम्पन्न बाह्मणोंका वरण करै । ३७ ॥ कुंडल कंकण मनोहर छत्र वस्त्र यज्ञोपवीत पद मुद्रा आसन आदिसे नारायणका पूजन करै ॥ ३८ ॥ और भक्तिमान् मनुष्य विष्णुकी समान ब्राह्मणोंका पूजन कर बाह्मण और नारायणमें भेद माननेसे मनुष्यको पाप लगता है ॥ ३९ ॥ जो विष्णुका अवणं स्थापयेत्कुंभ सौवर्ण राजतं पुनः ।। ताम्रजं मार्तिकं वापि त्वन्नेनैव प्रपूरयेत् ॥ ३५ ॥ वैष्टयेत्पकूलैस्तु सौवर्ण पुरुषोत्तमम् ॥ स्थापयित्वा च तत्पात्रे पूजयेत्सर्वसाधनैः ॥ ३६ ॥ उपचारः पोडशभिः पूजयेत्पुरुषोत्तमम् ॥ ब्राह्म- णान् गुणसंपन्नान्वरयेदिनसंख्यया ॥ ३७॥ कुंडलैः कंकणहृद्यैश्छत्रवस्त्रोपवीतकैः ॥ पदमुद्रासनाहारचयेद्विजस- त्तम ॥ ३८॥ यथा विष्णुं तथा विप्रान्यूजयेद्भक्तिमानरः ॥ विप्रे नारायणे भेदं कुर्वन्नामोति किल्विपम् ॥ ३९॥ विष्णुं संपूजयन्भक्त्या ब्रह्मद्वेष समाचरेत् ॥ महावतं कृतं तस्य सर्वं भवति निष्फलम् ॥ ४० ॥ तस्माद्विप्रेऽच्युते नैव विभेदं कारयेत्सुधीः ॥ एवं दिवानिशं विष्णुं संपूज्योत्सवकीर्तनः ॥४१॥ भास्करोदयवेलायां प्रार्थयेजगदीश्वरम् ॥ देवदेव जगत्स्वामिन्प्रसीद जगदीश्वर ॥४२॥ कृतेनानेन मे देव त्राहि मां भवसागरात् ।। कृतं न्यूनाधिकं यन्मे विष्णो- मासे तव प्रिये ॥४३॥ पूजन करता हुआ ब्राह्मणसे द्वेष करता है उसका किया सम्पूर्ण महावत नष्ट हो जाता है ॥ ४० ॥ इस कारण बुद्धिमान बाह्मण और नारायणमें भेद न करै इस कारण रात दिन विष्णुका उत्सव और कीर्तन द्वारा पूजन करे ॥४१॥ सूर्योदयके समय जगदीश्वरकी पूजा करे और कहे हे देवदेव! जगतके स्वामी परमेश्वर आप प्रसन्न हूजिये ॥ ४२ ॥ हे देव ! इस कृत्यसे आप मुझे भवसागरसे पार करो, हे विष्णो ! जो इस आपके प्रिय मासमें
भा.य.
अ.१९
भने न्यूनाधिक किया है ॥ ४३ ॥ स्नान दान तप होम वेदपाठ पितृतर्पण पोपण नित्यदान नियमादि देवार्चन ॥ ४४ ॥ द्विजपूजा भूतरक्षा जो
कुछ भने की है हे पुरुषोत्तम ! जो कुछ पूर्ण अपूर्ण हो ॥ ४५ ॥ वह सब आपके प्रसाद और पुरुषोत्तमके सेवनसे तथा बाह्मणोंके वचनसे परिपूर्ण
हो ॥ ४६ ॥ इस प्रकार सब बाह्मणों को प्रणाम कर स्वस्तिवाचन कराय विसर्जन करे वह लक्ष्मी और विष्णुमंडल बाह्मणोंके निमित्त निवेदन
सामं दानं तपो होमः स्वाध्यायः पितृतर्पणम् ॥ उपोपणं नित्यदानं नियमादिसुरार्चनम् ॥ ४४॥ द्विजपूजां भूत-
रक्षा यत्किचित्कृतवानहम् ॥ अतिरिक्तं खिलं वापि यद्भवेत्पुरुषोत्तम ॥१५॥ सर्वं तव प्रसादेन पुरुषोत्तमसेवनात् ॥
द्विजेंद्रवचनाद्वापि यातु मे परिपूर्णताम् ॥ १६॥ इत्यानम्य द्विजान्सर्वान्स्वस्ति वाच्य विसर्जयेत् ॥ लक्ष्मी विष्णु
मंडलं.च विप्राय विनिवेदयेत् ॥ १७॥ यदिष्टं स्वस्य सततं देयं वित्तानुसारतः ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्या दक्षिणां
भूरि दापयेत् ॥४८॥ पश्चात्स्वजनमध्यस्थः स्वयं भुंजीत वाग्यतः ॥ अनेन विधिना चीर्णवतो याति कृतार्थ-
ताम् ॥ १९ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये कृतस्य कर्मणो महिमवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥
श्रीभगवानुवाच ॥ दुर्लभ मानुपं जन्म लब्धं पूर्वकृतैः शुभैः ॥ पश्चान्न चिंतयन्मूढः पुनमें किं भविष्यति ॥ १ ॥
करे ॥ ४७ ॥ जो जो वस्तु अपनेको इष्ट हो वह वह अपने वित्तके अनुसार दान करे भक्तिसे ब्राह्मणोंको भोजन कराने दक्षिणा अधिक दे ॥४८॥
पीछे अपने कुटुंबियोंके साथ स्थित हो स्वयं भोजन करे इस प्रकार विधिपूर्वक व्रत करके कृतार्थ होजाता है ॥ ४९ ॥ इति श्रीपमपुराणे
पुरुषोत्तममाहात्म्ये कतस्य कर्मणो महिमवर्णनं नामाष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥ श्रीनगवान् बोले यह मनुष्यजन्म बडा दुर्लभ है बडे श्रेष्ठ काँसे
पान होता है मूर्ख इस बातको नहीं विचारता कि, फिर मेरा क्या होगा ॥ १ ॥
' अहो ! मनुष्योंकी अत्यन्त मूर्खता तो देखो जो मेरे मुखसे पुरुषोत्तम मासका माहात्म्य श्रवण करकेनी ॥ २ ॥ उसे छोड मृगतृष्णाकी समान इधर उधर धावमान होते हैं अर्थात् वे शीतल जलसे भरी गंगाको त्यागकर ॥ ३ ॥ मोहको प्राप्त हो चेतनारहित बावडी देखनेको भ्रमण करते हैं ऐसे पुरुषोत्तमको छोडकर वृथा अन्यकोंमें होरहे हैं ॥ ४ ॥ हे विद्वन् ! उन दुरात्माओंको अवश्य नरककी प्राप्ति होगी वे अनागी पुरुषोत्तम भगवान्का किस प्रकार भजन करसकते हैं॥ ५ ॥ जो मेरे पुरुषोत्तममासको वृया अहो मौन्यं जनेऽत्यंत रूढं सर्वत्र पश्यतः ॥ पुरुषोत्तममासं तु श्रुत्वा भुक्तिप्रदं सुखात् ॥२॥ विहाय परिधावति सर्वतो मृगतुष्णया ॥ शीतपानीयसंपूर्णां गंगामुत्सृज्य पार्श्वतः ॥३॥ वापी सुमोहमापना भ्रमति गतचेतसः ॥ अन्यकर्म- समासक्ता विहाय पुरुषोत्तमम् ॥ ४ ॥ तेषां दुरात्मनां विद्वानियतं निरयस्थितिः ॥ भजंत्यभागसंपूर्णाः कथं ते पुरुषोत्तमम् ॥५॥ एषामनियमाद्यातो मन्मासः पुरुषोत्तमः ॥ जन्मजन्मनि दुर्भाग्याः परभाग्योपजीविनः ॥ ६ ॥ रोगिणो भनसंकल्पा दारिद्रेणोपजीविनः ॥ यत्रयत्रापि कुर्वति तत्रतत्रातिदुःखिनः ॥ ७॥ कुरूपाः कुत्सिता रौद्रा मूर्खा मूढातिलोलुपाः॥ पुत्रपौत्रसुखातुष्टाः पापिनो नष्टजीविनः॥८॥स्त्रियोऽपि विधवा हीनाः कुरूपाःक्षीणवैभवाः॥ मातृकैः पैतृकैः सौख्यैातृपितृसुखैरपि ॥ ९॥ वर्जिता नाथ विकला गुणचारित्रदूषिताः। यत्रयत्र प्रदीयते तत्रा- प्यत्यंतदुःखिताः॥१०॥ व्यतीत करदेते हैं वे दुर्भाग्य जन्मजन्ममें पराये भाग्यसे जीनेवाले होते हैं ॥ ६ ॥ वे रोगी नमसंकल्प दरिद्रतासे जीवन धारण करते हैं जहां कहीं स्थित हों वहीं दुःखी होते हैं ॥ ७ ॥ कुरूप कुत्सित रौद्र मूढ अति लालची पुत्रपौत्रके सुखसेही सन्तुष्ट होनेवाले पापी नष्टजीवी होते हैं ॥ ८॥ खी विधवा हीन कुरूप क्षीण ऐश्वर्यवाली होती हे माता पिताके सुख, माई पिताके सुखोंसे ॥ ९ ॥ रहित अनाथ विकल अंग गुणचरित्रसे
-
भा. टी.
अ.१
J
दूषित होती है जहां जहां दीजाय वहीं वहीं अत्यन्त दुःखी होती है ॥ १०॥ हे उत्तम भूसुर ! इस प्रकार जो पृथ्वीमें देखे जाते हैं उन मूखौंको तुम
इसी प्रकार वृथा जन्मवाले पंडितमानी जानो ॥ ११ ॥ वे क्षुद्रकर्मा पुरुषोत्तम माससे विमुख हैं इस कारण हे विप्र ! तुम सब प्रकारसे इस समय
धन्य हो ॥ १२ ॥ जो इस मासमें तुमने बडा तप किया है यह पुरुषोत्तम मास नित्य मेरा प्रिय है ॥ १३ ॥ जो जो अत्यन्त दीन दिन रातमें
रहते हैं दूसरे घरोंमें शिक्षा मांगते फिरते हैं जहां तहां अन्नके कारण धिक्कार पाते हैं ॥ १४ ॥ वे निराश सब प्रकार अमआशा हुए देवता
ईदृशा ये प्रदृश्यते सृष्टौ भूमिसुरोत्तम ॥ विद्धि तानपि पापिष्ठान्मूढान्पडितमानिनः ॥ ११॥ पुरुषोत्तममासस्य विमु-
खान्क्षुद्रकर्मिणः ॥ तस्मात्सर्वात्मना विप्र भवान्धन्योऽसि सांप्रतम् ॥ १२ ॥ यदस्मिस्तप्तवानुग्रं ततः परमभासुरम् ।।
मम प्रियात्मना नित्यं मन्मासः पुरुषोत्तमः ॥ १३॥ ये ये दीनतरा नित्यं दिवाराचौ बुभुक्षिताः ॥ भ्रमंति परगेहेषु
धिक्कारामानतुष्टयः ॥ १४॥ निराशा भनसर्वाशाः सुरविप्रपराङ्मुखाः ॥ सदा दुर्बुद्धिबहुलाः कटुवाक्याः कुचै-
लिनः ॥ १६ ॥ आनिशीथमपि प्रासं सर्वेषु काक्षिणः क्षितौ ॥ सदारोगसमायुक्ता विप्रियाः सर्वजंतुषु ॥ १६ ॥
जायंते ईदृशाः सर्वे येषां व्यर्थों गतो मम ॥ अत्यंतवल्लभो मासो मत्प्रियः पुरुषोत्तमः ॥ १७ ॥ तस्मात्सर्वात्मना
विप्र संसेव्यः पुरुषोत्तमः ॥ स मत्प्रियः पुमाल्लोके स धन्यो भाग्यपारगः ॥ १८॥
ब्राह्मणोंसे पराङ्मुख सदा महादुर्बुद्धि कटु वाक्यमापी मैले वस्त्र पहरे ॥ १५॥ आधीराततक ग्रासके निमित्त पृथ्वीमें विचरनेवाले सदा रोगी सब
प्राणियोंके विप्रिय ॥ १६ ॥ वे प्राणी इस प्रकारके जन्म लेते हैं जिनका यह पुरुषोत्तम मास मेरा अत्यन्त प्रिय और वल्लभ है ॥ १७ ॥ हे. विष !
इससे.सब प्रकार पुरुषोत्तम मासका सेवन करना चाहिये वही पुरुष लोकमें मेरा प्रिय और वही धन्य बडा भाग्यवान होता है ॥ १८ ॥
॥६५॥
~ 1 . जो मनुष्य पुण्यराशि मेरे मासका आराधन न करके अन्य कर्म करते हैं तो मेरे माससे विमुख होनेके कारण सब निष्फल होता है ॥ १९ ॥ वाल्मी- किजी बोले। इस प्रकारसे गरुडवाहन हरि उसे प्रीतिसे कहकर अपने स्थान वैकुण्ठको चलेगयें ॥२०॥ वह गौतमी और सुदेव महा प्रसन्न हुए पुरुषो- चम मासका प्रभाव सुन बडे हर्षित हुए ॥ २१ ॥ उस दिनसे वह ब्राह्मण इस मासकी अची करता रहा और उस पुत्रसे ऐसे शोषित हुए जैसे जयन्त- के सहित इन्दु ॥ २२ ॥ शुकदेवनी अपने पिताको प्रसन्न करता रहा सुखपूर्वक बहुत समय बीतगया ॥ २३ ॥ सुदेवने यह बीतते हुए दिन नाराधयति मां पुण्यराशिरन्यः कृतो नरैः॥ मन्मासविमुखैस्तेषां सर्व भवति निष्फलम् ॥१९॥ वाल्मीकिरुवाच ।। एवमुक्त्वा सहस्राक्षों हरिर्गरुडवाहनः॥ जगामाकाशमाविश्य वैकुंठनिलयं प्रभुः ॥२०॥ गौतमी च सुदेवश्च मुमुदाते च हर्षितौ ॥ अतीव हर्षितौ श्रुत्वा प्रभावं पुरुषोत्तमम् ॥ २१ ॥ ततः प्रभृति विप्रोऽसौ तं मासं मुदितोऽर्चयत् ॥ तेन पुत्रे- णे शुशुभे जयंतेनेव नाकराट् ॥ २२ ॥ पितरं शुकदेवोऽपि नंदयामास तत्कृतम् ।। क्रमंतं बहुलं कालं यत्सुखाविष्टचे- तनम् ॥ २३ ॥ बुबुधे न सुदेवोऽपि यहोरात्रमिदं भ्रमात् ॥ वसिष्ठः शक्तिना यकुमारेण सतीपतिः ॥ २४ ॥ प्रद्यु- म्नेन रमाधीशः पांडुर्यकिरीटिना ॥ जयंतेन यथा शकः कानीनेन पराशरः ॥ २५ ॥ मुमुदे स च धर्मात्मा तेन पुत्रेण धीमता ॥ ध्यायन्देवं जगन्नाथं चक्रपाणिं तमीश्वरम् ॥ २६ ॥ स्तुवन्मासं च विष्णुं च प्रेम्णा संपूजयन्नमन् ।। ब्रह्मलोकप्रदेभ्योऽपि कर्मभ्योऽमन्यताद्भुतम् ॥ २७ ॥ रात न जाने जिस प्रकार शक्ति पुत्रके साथ वसिष्ठ और कुमारसे शिव प्रसन्न हुएथे ॥ २४ ॥ वा प्रद्युम्नको प्राप्त होकर श्रीकृष्ण और अर्जुनको प्राप्त होकर जैसे पाण्डु प्रसन्न हुएथे अथवा जैसे पराशर व्यासजीके जन्मसे प्रसन्न हुएथे ॥ २५ ॥ इस प्रकार वह धर्मात्मा उस पुत्रसे प्रसन्न हुए चक्रपाणि ईश्वर देव जगन्नाथको ध्यान करता रहा ॥ २६ ॥ इस मास और विष्णुकी स्तुति करता हुआ प्रेमसे पूजन करता हुआ तथा ब्रह्मलोकके देनेवाले कमाँ- . भा.. अ. १९ सेनी अद्भुत है ॥ २७ ॥ यह पुरुषोत्तम मास सब दुःखका दूर करनेवाला है इसमें यज्ञ जा तप दान करनेसे सब सुख मिलता है ॥ २८ ॥ यथा- योग्य सहस्र वर्षतक अनेक भोगोंको भोगकर वह शीत उष्णतारहित ब्रह्मलोकको चलागया ॥ २९ ॥ जहां तप करनेवाले ज्ञानियोंके सिवाय दूसरे लोग नहीं जाते हैं असत्यवादी लोभी तथा बडे व्रत करनेवाले वहां नहीं जासक्ते ॥ ३० ॥ जहां जाकर शोच नहीं करते और ब्रह्माके निकट निवास करते हैं ब्रह्माके संवत्सर पर्यन्त वह ब्राह्मण श्रेष्ठ सुख पाते रहे ॥ ३३ ॥ वही अब आप दृढधन्वा नामस उत्पन्न हुएहो और देवताओंको सर्वदुःखापहं मासं वरिष्ठं पुरुषोत्तमम् ॥ ददावीजे जपी पाठी तस्मिन्नेवाभजरिम् ॥२८॥ भुक्त्वा भोगान्यथाकामं वर्षसाहस्रकालिकम् ॥ जगाम ब्रह्मणो लोकं नातिशीतं न धर्मदम् ॥ २९ ॥ यत्र ना यज्विनो यांति नातप्ततपसो जनाः ॥ असत्यवादिनो लुब्धा न त्वचीर्णबृहद्रताः॥३०॥ यत्र गत्वा न शोचंति वसति ब्रह्मणोऽतिकम् ॥ ब्राह्मः संवत्सरो यावत्सौख्यमापद्विजोत्तमः ॥ ३१ ॥ सोयं भवान्समुत्पनो दृढयन्वेति विश्रुतः॥ लुब्धवानतुलं सौख्यं सुरा- णामपि दुर्लभम् ॥३२॥ तेन पुण्येन भूपालः सत्यं सत्यं न संशयः॥ एतत्ते सर्वमाख्यातं पृष्टवानसि यन्मम ॥ ३३॥ सौख्यकारणमत्युग्रं जातं ते पूर्वदेहिकम् ॥ शृणु त्वं शुकवृत्तांतं पृष्टं यद्भवता मम ॥ ३४ ॥ पूर्वजन्मनि ते भूप शुक- देवोऽभवत्सुतः॥ साक्षात्सुपर्णः स्वांशेन समुत्पन्नः कृपावशात् ॥ ३५ ॥ जी दुर्लभ तुम सुखको प्राप्त हुएहो ॥ ३२ ॥ हे राजन् ! इसमें सन्देह नहीं वह सब उसीका पुण्य है यह जो आपने पूछाथा सो सब आपको श्रवण कराया ॥ ३३ ॥ यह पूर्वजन्मके पुण्यसे इस प्रकार तुमको सुखकी प्राप्ति हुई है अब जो तुमने पूछा है वह शुक कौन था उसका वृत्तान्त श्रवण करो ॥ ३४ ॥ हे राजन् ! यह पूर्वजन्ममें तुम्हारा शुकदेव नाम पुत्र था. साक्षात् सुपर्णके अंशसेही रुपापूर्वक वह उत्पन्न हुएथे ॥ ३५ ॥ 55 हे राजन् ! उसने यह वार्ता विचारी कि जिसका मैं पुत्र हूँ उसका घोर संसारसामरमें फिर जन्म न हो ॥ ३६ ॥ तुम्हारानी पुरुषोत्तम मास- महत्तत्य है उससे कीररूपसे उसने तुमको दर्शन दिया है । ३७ ॥ न्ययोधके पेडपर चढकर उस वचनको सुनाया जिससे विरक्त हो मनुष्य कतार्थ होजाता है ॥ ३८ ॥ जो शुकका कारण है वह तुम्हारे सुखका कारण है; हे महाराज ! जो आपने पूछा सो वर्णन किया ॥ ३९ ॥ अब तेनैतञ्चितितं भूप यस्य कुक्षावहं सुतः ॥ तस्या मास्तु पुनर्जन्म घोरे संसारसंकटे ॥ ३६ ॥ तवाप्यस्ति महत्कृत्यं पुरु- षोत्तमसंभवम् ॥ तेनासौ कीररूपेण दर्शयामास वेऽग्रतः॥ ३७॥ न्यग्रोधविटपारूढः श्रावयामास तद्वचः ॥ येन वैराग्यमापनो जनो याति कृतार्थताम् ॥ ३८॥ शुकस्य कारणं यत्तत्तव सौख्यप्रदायकम् ॥ श्रावितं ते महाराज पृष्टोऽहं यत्त्वयानध ॥ ३९ ॥ अथोऽनुज्ञातुमिच्छामि घोरा संध्या प्रवर्तते ॥ सरयूमापगां पुण्यां यास्याम्याप्लवनाय वै॥ ४० ॥ इत्यादिश्य मुनिश्रेष्ठस्तमामंत्र्य महीपतिम् ॥ पूजितस्तेन चात्यर्थं विस्मितेन पुन:पुनः ॥ ११ ॥ जगा- माकाशमाविश्य ब्रह्मभूतो मुनीश्वरः ॥ राजाप्यत्यंतचकितश्चिंतयामास चेतसा ॥ ४२ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषो- ''तममाहात्म्ये वाल्मीकिना दृढधन्वनः पूर्ववृत्तांतकथनानंतरं वाल्मीकिप्रस्थानं नामैकोनविंशोऽध्यायः ॥ १९॥ मैं जानेकी इच्छा करता हूं कारण कि इस समय घोर संध्या प्रवृत्त होती है अब मैं स्वान करनेको सरयूको जाता हूं ॥ ४० ॥ इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ राजाको आमंत्रण कर उनसे वारंवार पूजित होकर ॥ ४१ ॥ ब्रह्मभूत मुनि आकाशमार्गमें स्थित होकर चले गये और राजानी चकित चित्त हो चिन्ता करने लगा ॥ .४२॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये वाल्मीकिचा दृढधन्वनः पूर्ववृत्तान्तकथनं नामैकोन- ॥. १९ ॥ .. १२ जी.टी. अ. २० सूतजी बोले यह अधिक मासका माहात्म्य श्रेष्ठसेभी श्रेष्ठ है इससे अधिक क्षणमात्रम पापका दूर करनेवाला क्या होगा यह राजाने मनमें विचार किया कि मुनिने क्षणमात्रमें मेरा घोर अज्ञान दूर करदिया॥१॥ कामक्रीडामें लोलप भोगेच्छामें तत्पर मुझको धिक्कार है जो अज्ञानमें पडा हुआ स्त्रियोंका कीडामृग हो रहा हूं ॥२॥ इस स्थावरंजगमात्मक जगत्में कुछभी स्थायि नहीं है मेरी अधिक क्रिया अध्यक्षता दृढता और महाचतुरताको धिक्कार है ॥३॥' विद्या बडे गुणकोनी धिक्कार है जिसको प्राप्त होकर मृत्यु न निवृत्त हुई यह ब्रह्मांडका भक्षण करनेवाला काल बड़ा दुर्घट वर्तमान है ॥४॥ ५ सूत उवाच ॥अहो मासस्य माहात्म्यं महाश्चर्योत्तरं परम् ॥ किमेतन्मुनिना मह्यं ध्वांतोषो दारितःक्षणात्॥१॥ धिङ्मा भोगेच्छया मूढकामक्रीडासु लंपटम् ॥ अज्ञानपीडितं क्षुद्रस्त्रीणां क्रीडामृगं खलम् ॥२॥ न किंचिदृश्यते स्थायि जगत्स्थावरजंगमम् ॥ धिक्कियां धिक्च ह्याध्यक्ष्यं धिक्चातुर्यमकल्पकम् ॥३॥ धिग्विद्यां धिग्गुणान्प्रौढान्यन्मू- त्युन निवर्त्तते ॥ ब्रह्माण्ड क वलीकुर्वन्वर्त्ततेऽतीव दुर्घटः॥ १॥ वाल्मीकिगमनादूर्ध्वमतिनिर्विण्णचेतसा॥ चितयन्मु- निराजानमिदमाह महीपतिः॥५॥ किं मया क्रियतेऽत्यंतमूढबुद्ध्या कुमेधसा ॥नं मयाराधितो विष्णुः कोटिब्रह्मांड- नायकः ॥६॥ चिंताशानुतुदानित्यं तुच्छभोगायुतान्विता ॥ कामलुब्धा च विक्षिप्ता दुर्गा विषयवागुरा ॥७॥ पंगु करोति सत्पादमधयत्यतिसेक्षणात् ॥ मचित्तं चेतनाहीनं सुवाचं मूकतां गतम् ॥ ८॥ इस प्रकार चित्तसे महाव्याकुल होकर मनमें मुनिराजको चिन्तन करता हुआ राजा इस प्रकारके वचन कहने लगा ॥ ५ ॥ हे भगवन् ! मूढबुद्धि अब मैं क्या कर सकता हूं कोटि ब्रह्माण्डनायक विष्णुका मैंने आराधन नहीं किया ॥ ६ ॥ नित्य चिंतारूपी आशा मुझे व्याकुल करती है और अनेक तुच्छ भोग चित्तको व्याकुल करते हैं लुब्ध होकर विक्षिप्तता प्राप्त करती है और कठिन विषयकी लगाम है ॥ ७॥ जो सत्पादको पंगु करती ॥६७० . - ~ । नेत्रवालेको अंधा करती मंद करती मेरा चित्त चेतनाहीन और वाणी मूकताको प्राप्त हुई है ॥ ८ ॥ मैं किस प्रकार नारीके सदूप संपत्तिसे अत्यंत मोहित हो रहा हूं और कलाषित चित्तमें किस प्रकारसे निवृत्तिको प्राप्त हो सकता हूं ॥ ९॥ आंतोंके बंधनसे अखण्ड और रक्त मज्जा नखोंसे युक्त केशं रक्त कफ विष्ठा मूत्र और रोम लारसे बिडम्बित शरीरमें ॥१०॥ महा अद्भुत मोहका माहात्म्य तो देखो जो क्लेदमांस कर्दमसे लिप्त कोटर है उसमें ॥११॥जिसके कि नौ द्वारोंसे विष्ठा मूत्र कीट निकलते हैं जिसमें कमिकीटकी उत्पत्ति होतीहै जो थोडे जीवन और निर्लज्जतासे युक्त है ॥१२॥ किमहं मोहितोऽत्यंत नारीसद्रूपसंपदा ॥ केन वा पुनरावृत्तिं गतः कलुषचेतनः ॥९॥ आंत्रनिबंधसकले रक्तमज्जा- नखायुते ॥ केशासकफविण्मूत्ररोमलालाविडंबिते ॥ १० ॥ अहो मोहस्य माहात्म्यं पश्यताऽद्भुतमुद्गतम् ॥ क्लेदस्थि- तिचयो मांसकर्दमालिप्तकोटरे ॥ ११ ॥ नवकोटरनिर्गच्छद्विष्ठामूत्रकफान्विते ॥ कृमिकीटगद्रव्याप्तेस्वल्पायुपिगत- पे ॥ १२॥ नारीकलेवरे तुच्छे किमह मोहितश्चिरम् ॥ यतो न ज्ञातवान्कालं ममायुदलनक्षमम् ॥१३॥ एवं पापतरा नारी सन्मार्गप्रतिबंधिनी ॥ कामधीवरदुर्जालं नानाविषयमामिषम् ॥ १४ ॥ मत्तुल्यानेकशफरीवंधनार्थं प्रसारितम् ।। दुस्तीर्णे दुःखसलिलपूणे संसारवारिधौः॥ १५॥ के मत्पुत्राः कुतो राज्यं कुत्र गेहानि वा पुरम् ॥ कुते खजनामात्याः पाशपाणावुपस्थिते ॥ १६॥ ऐसे स्त्रीरूप कलेवरमें मैं किस प्रकार बहुत कालपर्यंत मोहित रहा जो मैंने अपनी अवस्था नष्ट करनेवाले कालको न जाना ॥ १३ ॥ इस प्रकार सत्मार्गसे वंचित करनेवाली पापात्मा स्त्रीही है कालरूपी धीवरने नाना विषयरूपी मांसयुक्त जाल पसारे हैं ॥ १४ ॥ यह जाल मेरे तुल्य अनेक मछलियोंके पकडनेको फैलाये जाते हैं यह दुःखरूपी जलसे भरा संसारसागर दुष्पार है ॥ १५ ॥ कौन मेरा पुत्र घर वा पुर है कहां मा.टी. अ. . यह स्वजन अमात्य हैं यह पाशं हाथमें लिये उपस्थित हैं ॥ १६ ॥ पुत्र पिता माता भाई बंधु शरीर मित्र कोरा सुहृद् सखा कोई नहीं है ॥१७ ॥ न घर न मित्र नं चार प्रकारका ऐश्वर्य न गुणवती स्त्री न अधिक विद्या बुद्धि ॥ १८॥ कुटिलताके वेगसे उठा जिसकी चलतासेही जीवन आकर्षित हो जाता है ऐसे दुर्धर्ष वेतालरूपी कालसे मनुष्य क्षेम कहां पासकते हैं ॥ १९ ॥ देवदेव सनातन विष्णु नारायणके भजन विना कुशल नहीं है इस कारण मैं उन्हीं गदाधर देवकी शरणमें जाताहूं ॥ २० ॥ इस प्रकार विचार कर राजाने गुणसुन्दरी रानीसे कहा है प्रिये ! तुम्हारे साथ बहुत न सुता न पिता माता न भ्राता नापि बांधवाः ॥ न शरीरं न मित्राणि न कोशः सुहृदः सखा ॥ १७॥ न गृहाणि न मित्राणि वैभवं न चतुर्विधम् ॥ नापि दारा गुणा रामा न विद्या सौष्ठवं सुधीः ॥ १८ ॥ संरंभकुटिलोद्भूतभूलताकृष्ट- जीवितात् ॥ कालदुर्दर्शवेतालात्क्षेमं गच्छंति मानवाः॥ १.९ ॥ विना नारायणं विष्णु देवदेवंसनातनम् ॥ यास्यामि शरणं तस्मान्मक्षु देवं गदाधरम् ॥ २० ॥ इति निश्चित्य भूपालः प्रोवाच गुणसुन्दरीम् ॥ प्रिये बहुतरं, कालं भुक्तं सौख्यं त्वया सह ॥ २१ ॥ इदानीमस्मि संवृत्तो मामनुज्ञातुमईसि ॥ इत्युक्तवति राजेंद्रे किञ्चिन्मानमुपेयुषी ॥ २२ ॥ उवाच पृथिवीपालं सुन्दरी गद्गदाक्षरम् ॥ राजन्मम मनो बुद्धिः शरीरं जीवितं त्वयि ॥ २३ ॥ प्राणेशोऽस्ति भवा- न्मह्य त्यक्त्वा किंनु प्रयास्यास ॥ त्वया साई सुखं भुक्त्वा कुत्र स्थास्यामि मे वद ॥२४॥ दिनोंतक सुख भोगा ॥ २१ ॥ इस समय मैं वन जानेको तत्पर हूं सो तुम मुझको आज्ञा दो। राजाके यह कहनेपर कुछेक मानको प्राप्त होने- वाली ॥ २२ ॥ वह सुन्दरी गद्गद अक्षरसे राजाके प्रति कहने लगी हे राजन् ! मेरा मन बुद्धि जीवन शरीर तुममेंही है॥ २३ ॥ तुम मेरे पाणेश हो मेरे प्रति ऐसा कहकर कहां जाते हो आपके साथ सुख भोगकर अब में कहां स्थित हूंगी यह तो मुझसे कहो ॥ २४ ॥ - ។ , . हे राजन् ! मुझे आप अपनी देहकी छाया स्वरूपिणी जानिये अपनी वीके वचनसे संतुष्ट हो राजा कहने लगा ॥ २५ ॥ हे सुन्दरी! तुम बहुत धन्य हो मैं तुमको त्यागन नहीं करूंगा वनको हमारे साथ चलो तुम्हारे साथ दुष्कर तप करूंगा ॥ २६ ॥ आजसे आठ दिनके उपरान्त पुरुषोत्तम मास आवेगा और तुम्हारे शरीरसे उत्पन्न गुणोंमें श्रेष्ठ ज्येष्ठ पुत्रको अभिषिक्त करेंगे ॥ २७ ॥ धर्मकी रक्षा और दुष्ट जनोंको शान्त करनेको राजाने. विचार कर पुत्रको राज्यमें अभिषेक करदिया ॥ २८ ॥ उसे ब्राह्मणोंकी गोदीमें रख मंत्रियोंको त्वद्देहवर्तिनी छायां मां विजानीहि भूमिप ॥ कांतावचनसंतुष्टः प्रोवाच नृपतिः प्रियाम् ॥ २५ ॥ अतिधन्यासि सुश्रोणि न त्वां त्यक्ष्यामि सुंदार ॥ एहि साकं मयारण्यं चरिष्ये दुश्चरं तपः ॥२६॥ इतोऽष्टमदिनादूर्ध्व मासोऽस्ति पुरुषोत्तमः ॥ तावत्तनूद्भवं ज्येष्ठं वरिष्ठं गुणभूषणम् ॥ २७॥ धर्मसंरक्षणार्थाय प्रशमायेतरस्य च ॥ इति निश्चित्य भूपालः पुत्र राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ २८ ॥ ब्राह्मणांके समाधाय मंत्रिपु न्यस्य सत्क्रियाः ॥ वरवैराग्यमापनो जगाम दिशमुत्तराम् ॥ २९ ॥ यतः प्रवर्तते गंगा स्वर्धनी सरितांवरा ॥ तस्याः कूलं समाश्रित्य सपत्नीकः स्थितो मुनिः ॥३०॥ प्राप्त हरिप्रियं वीक्ष्य तं मासं पुरुषोत्तमम् ॥ तपस्तपे स धर्मात्मा निर्जरा येन विस्मिताः॥३१॥ ऊर्ध्वबाहु- लंबः पादांगुष्टाश्रितावानः ॥ उर्ध्वहष्टिनिराहारः स्थिरचित्तः समानतः॥३२॥ लगाय महा, वैराग्यको प्राप्त हो उत्तर दिशामें गमन किया ॥ २९ ॥ जहाँसे नदीश्रेष्ठ गंगाजी प्रवृत्त होती है उसके किनारे स्त्रीसहित स्थित हुआ ॥ ३० ॥ फिर नारायणके प्रिय पुरुषोत्तम मासको आया देख उस धर्मात्माने इस किया जिससे देवता विस्मित हो गये ॥ ३१ ॥ ऊपरको भुजा उठाये निरालम्ब चरणके अँगूठेके बलसे पृथ्वी 94 * 11 - 4 - मा.. अ.२० स्थित हुए ऊपरको दृष्टि किये. निराहार स्थिरचित्त समान वर्ण ॥ ३२ ॥ राजाको देखकर सिद्धजन धन्यवाद करने लगे और यह नारायण हरिको स्मरण करता परम जप करने लगा ॥ ३३ ॥ इस प्रकार कृष्णपक्षकी त्रयोदशीतक उसको तप करते करते त्रयोदशीके दिन राजा अन्धकारसे परे ॥ ३४ ॥ देवताओंसे प्रार्थित नारायणके धामको गया. हे शौनक ! उसी शरीरसे वह नारायणके लोकको चला गया ॥ ३५ ॥ वह स्त्रीभी अपने पतिको वैकुंठमें जाता देखकर कुछ मलिन मुख कर क्षणमात्रको दुःखी हुई ॥ ३६ ॥ और यूथसे भ्रष्ट हुई मृगीकी समान संधान्तचित्त होगई और धन्योऽयमिति सिद्धौषैः सादरं प्रविलोकितः॥ जजाप परमं जाप्यं स्मरन्नारायणं हरिम् ॥ ३३॥ एवं प्रतपतस्तस्य यावत्कृष्णत्रयोदशी ॥ दिने तस्मिन्महीपालो जगाम तमसः परम् ॥३४॥ वैकुंठाख्यं हरेर्धाम स्पृहणीयं सुरैरपि ।। तेनैव वपुषा विद्वन्गतोऽसौ हरिमंदिरम् ॥ ३५॥ सा नारी स्वपति वीक्ष्य यातं वैकुण्ठसद्मनि ॥ किंचिन्म्लानमुखी साध्वी क्षणं दुःखान्विताभवत् ॥ ३६॥ संभ्रांता यूथविभ्रष्टा मृगीवायतलोचना ॥ दृष्ट निर्जरचक्रैश्च दिक्चक्रं वीक्ष्य विस्मिता ॥३७॥ स्थिता.भूमौ विशुद्धेन स्वासनं परिकल्प्य च ॥पाणिना गुदमापीडय वायुमुत्सारयच्छनैः ॥३८॥ ततः समानं नाभिस्थं कृत्वा सोपानमूर्ध्वगे ॥ हृदि प्राणं समाधाय प्राणं सोपानमूर्ध्वगम् ।। ३९ ॥ आज्ञाचक्रमुपा- धाय भ्रूमध्येमनयच्छनैः॥ सर्वतो व्यानमाकृष्य तत्रानीय गतत्वरा ॥४०॥ देवसमूहयुक्त निर्जरचक्रको देखकर विस्मित हुई ॥ ३७ ॥ और विशुद्ध आसनकी कल्पना कर पृथ्वीमें स्थित हुई एडीसे गुदास्थानको पीडित कर शनैःशनैः वायुको निकालतीः॥ ३८॥ नाभिमें समान वायुको स्थित कर उसको पवनके जानेकी ऊर्ध्वसोपान बनाकर हृदयमें प्राणोंको समाधान कर ऊर्ध्वगामी सोपान कल्पना कर ॥ ३९ ॥ आज्ञाचकसे आगे शनैः २ भ्रूमध्यमें ले जाकर सब ओरसे व्यानको सैंचकर वहां ले जाय शीघता ॥६९० ।
10 नं कर ॥ ४० ॥ वह सुन्दरी हाथकी अंगुलियोंसे नासिकादिके छिद्रोंको रोक स्वामीके चरणोंका हृदयमै धारण कर जो उसने चिरकालतक आ- सना कियेथे ॥ ४१,॥ प्राण अपानकी गतिको रोक पापरहित हो वह सुन्दरी अगिकी धारणा कर देहको भस्म करती हुई ॥ ४२ ॥ देहायके पहले उसका पाण ब्रह्मरंध भेदकर उसके स्वामीके सालोक्यको गया जहां पतिव्रता जाती हैं ॥ ४३ ॥ इस प्रकार दृढधन्वा राजा इस मासकी उपा- सना कर पुरुषोत्तम मासके माहात्म्यसे परमपदको गया ॥४४॥ मैं क्या वर्णन करूं कारण कि, मेरे एकही जिह्वा है. हे गुकुलोत्पन्न ! इस प्रकारके करांगुलीभिः संरुध्य खानि सर्वाणि सुंदरी ॥ भर्तृपादौ हृदि ध्यात्वा चिरोपास्तावतिप्रियौ ॥४१॥ प्राणापानगती रुद्धा साध्वी विगतकल्मषा ॥ कृत्वानिधारणां देहं भस्मीभूतं चकार सा ॥ ४२ ॥ सा च देहक्षयादागास्फोव्य ब्रह्मरं- ध्रतः॥ जगाम भर्तृसालोक्यं यत्र यांति पतिव्रताः॥४३ ॥ एवमाराध्यमासाद्य दृढधन्वा महीपतिः ॥ पुरुषोत्तममा- हात्म्याजगाम परमं पदम् ॥ १४ ॥ वर्णयामि किमयाहं यदेका रसना मम ।। नेदृशोऽस्ति महामासः सत्यं सत्यं भृगू- द्वह ॥ १५ ॥ इहलोकेऽतुलं सौख्यं परलोकेऽतुलां गतिम् ॥ पूजितो भगवान्यस्मिन्कोटिकल्मषनाशकृत् ॥ ४६ ॥ व्याजेनापि कृते यस्मिन्नाने दाने कृते शुभे ॥ कोटिजन्मकृतानेककिल्विषोधनिबंतनम् ॥ ४७ ॥. जायते मुनि- शार्दूल यथाशाखामृगो गतः ॥ अज्ञानतः कृतेनापि त्रिरात्रस्नानमात्रतः॥४८॥ पुरावतानां दुर्गाणां कर्मणां निश्कृतिः प्रभो ॥ ततो विश्वभरप्राप्तिमहिमा वर्ण्यते किसु ॥ १९ ॥ माहात्म्यसे युक्त कोई महीना नहीं है ॥४५॥ जिससे इस लोकमें अतुल सुख और परलोकमें अतुलगतिकी प्राप्ति हो जिसने करोडों पापके दूर करनेवाले जगवान्का उस मासमें पूजन किया है । ४६ ॥ और किसी बहानेसे भी इसमें स्नान दान किया है तो करोडों जन्मके अनेक पाप नाश हो जाते हैं ॥ ४७ ॥ हे मुनिराज ! इस प्रकार एक वानरराज अज्ञानसे तीन दिन स्नान करके पातकरहित होगया ॥४८॥हे प्रत्तो ! उसके कठिन पुरातन . F भा...। अ. २१ -- पाप नष्ट होगये, फिर विश्वम्भरकी प्राप्ति हुई है. इसकी महिमा हम तुमसे क्या कहें ॥ ४९ ॥ वानरकी क्या श्रद्धा है जिससे नारायण प्रसन्न होजाते हैं तीन दिन स्नान करने मात्रसे बडी शक्ति हो जाती है ॥ ५० ॥ अहो अज्ञानी मनुष्य इस मासका सेवन क्यों नहीं करते इसमें विष्णुका प्रिय माहात्म्य विख्यात है ॥ ५१ ॥ वे धन्य और पुण्यात्मा हैं जो पुरुषोत्तमको जानते हैं नामसेही मनुष्यको पवित्र कर देता है; दान 'जपकी कौन कहै ॥ ५२ ॥ दूसरे उपयोगी फलोंको मुखरोगके कारण त्यागन करकेही इस दानसे एक कपिराज उत्तम गतिको प्राप्त हुआ ॥ ५३ ॥ का नाम वानरश्रद्धा यया तुष्टो हरिः स्वयम् ॥ त्रिरात्रस्नानमात्रेण वस्तुशक्तिबलीयसी ॥५०॥ अहो नरैर्मूढतरैः किमु मासो न सेव्यते ॥ विष्णुप्रियं प्रतापाय्यमुत्तमं पुरुषोत्तमम् ॥५१॥ ते धन्याः कृतपुण्यास्ते ज्ञातो यैः पुरुषोत्तमः ॥ नाम्नापि पावयत्यज्ञं किमु दानजपादिभिः ॥५२॥ मुखरोगपरित्यक्तफलैरन्यापयोगिभिः ॥ एतदानेन कपिरागतो गतिमनुत्तमाम् ॥५३॥ इति श्रीपुरुषोत्तममाहात्म्ये दृढधन्वनः सपत्नीकस्य वैकुण्ठप्राप्तिवर्णनं नाम विंशतितमोऽ- ध्यायः॥२०॥७॥ शौनक उवाच ॥ सूत सूत महाभाग विस्मयो मे महानिह ॥ सर्वार्थसाधनो देहो मानुषोऽयमिति श्रुतः ॥ १॥ अन्येषु सर्वदेदेषु साधने न मतिर्भवेत् ॥ कथं शाखामृगोऽप्यदा मुक्तो यस्य प्रभावतः ॥२॥ किमसौ वर्ण्यते वीर मासो वै पुरुषोत्तमः ॥ कथयस्व कथामेतां मम चित्तप्रसादिनीम् ॥३॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये दृढधन्वनः सपत्नीकस्य वैकुण्ठप्राप्तिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः ॥ २०॥ शौनकजी बोले ॥ हे महाभाग सूतजी ! इसमें मुझको महान् विस्मय है यह मनुष्यदेह सम्पूर्ण अर्थका साधन करनेवाला ऐसा विख्यात है ॥ १॥ और सम्पूर्ण देहोंमें साधनमें मति नहीं होती शाखामृग इसके प्रभावसे कैसे मुक्त होगया ॥ २ ॥ हे वीर ! क्या पुरुषोत्तममासकी यह भी महिमा है हमारे चित्त प्रसन्न करनेवाली यह कथा - 01 ।
। ५ M कहिये ॥ ३ ॥ हे सूतनन्दन ! तीन दिनतक उसने कहां व्रत कियाथा इस कपिका क्या नाम क्या आहार और क्या आचार था तथा यह कहां रहता था ॥ ४ ॥ आप पुरुषोत्तममाहात्म्य विस्तारसे कहिये आपसे कथामृत श्रवण करनेसे मेरी तृप्ति नहीं होती है ॥५॥ सूतजी बोले ॥ हे द्विज- राज! में सावधानतासे इस कथाको विस्तारसें कहता हूं जिसके सुननेसे पापसमूह नष्ट होजाते हैं ॥ ६॥ कोई कैरलदेशनिवासी ब्राह्मण बडा लोभी था नित्यही धन संग्रह करनेमें तत्पर मधुमक्षिकाकी समान था ॥७॥ इसी कर्मसे लोकमें उसको कदर्य कहते थे, इससे पहले उसका चित्रक नाम था ॥८॥ कुत्रासौ कृतवान्कृत्यं त्रिरात्रं सूतनंदन ॥ कोऽसौ कपिः किमाहारः किमाचारः कुतो वसन् ॥ ४॥ वद श्रीकृष्णमा- सस्य माहात्म्यमंतिविस्तरात् ॥ न ताप्तजायते त्वत्तः शृण्वतो मे कथामृतम् ॥५॥ सूत उवाच ॥ द्विजराज कथा- मतां वर्णयामि समाहितः॥ यदिश्रुतिसुपर्णेन लीयन्ते कल्मषाहयः ॥ ६ ॥ कश्चित्केरलदेशीयो द्विजः परमलो- भवान् ॥ नित्यं धनचये दक्षः सरघावद्वसुप्रियः ॥ ७॥ लोके कदर्य इत्याख्यां गतस्तेनैव कर्मणा ॥ चित्रकेति पुरा नाम तस्याभुत्पितृकल्पितम् ॥ ८॥ नान्नमश्नाति नो वस्त्रं परिधत्ते शुभं कचित् ॥ न जुहोति ददात्यन्नं न कदापि द्विजातये ॥ ९ ॥ महाश्रमेण सततमकरोद्भरिसंचयम् ॥ पंचसूनादोषनाशनिमित्तं न चकार सः ॥ १०॥ पितृपक्षे पितृदिने न श्राद्धं कृतवानसौ ॥ न च माघे कृतं तेन तिलदानं कदाचन ॥ ११ ॥ कार्तिके दीपदानं च नारायणपदा- तये॥ वैशाखे धान्यदानानि व्यतीपाते कदाचन ॥ १२॥ न वह कभी अच्छा अन्न खाता न अच्छा वस्त्र पहरता न होम करता और न कभी ब्राह्मणोंको दान करताथा ॥ ९॥ केवल अपने स्थानमें धनसंचय करता था. तथा पांच स्थानोंमें जो नित्य हत्या होती है उसके दोप शान्त करनेके निमित्तानी उसने कुछ नहीं किया ॥ १० ॥ पितृपक्षमें पिताके निमित्त कुछ दान न किया न श्राद्ध किया न कमी मावं महीने में तिलदान किया ॥ ३३ ॥ न नारायणपदकी प्राप्तिके निमित्त कार्तिक, ।
. " भा. टी. अ.२१ . दीपदान किया वैशाख और व्यतीपातमें न कभी धान्यदान किया ॥ १२ ॥ दही बूरा गुडयुक्त लड्डू तथा वैधृतयोगमें चांदीका दान द्वादशीमें अन्नदान ॥ १३ ॥ तथा संक्रान्ति और चन्द्र सूर्यके ग्रहणमें भी कभी कुछ दान न किया कृपणवासनायुक्त सर्वत्र दीन वाक्य बोलताथा ॥-१४ ॥ अहो मैं बडा भूखा हूं मेरे पास कुछ नहीं है चौथे वा पांचवें दिन कभी एक समय भोजन मिलनेपर खाताथा ॥ १५ ॥ और जो कभी अधिक मिलगया तो उसे एकान्तमें बेंचलेताथा बडे पुराने कपडे लपेटे विचरण करताथा ॥ १६ ॥ वर्षा पवन धूप शीत झेलनेसे नित्य दधि च शर्करा चैव गुडमिश्र न लड्डुकम् ॥ वैधृतौ रूप्यदानं च द्वादश्यामन्त्रमेव च ॥ १३ ॥ संक्रमे चैव नो दत्तं चन्द्रसूर्यग्रहे किमु ॥ सर्वत्र दीनवाक्यानि वक्ति कृपणवासनः ॥ १४ ॥ अहो बुभुक्षितोऽत्यंतं मम किंचित्र विद्यते । चतुर्थे पंचमे वापि भुक्तेऽसौ वासरे शठः ॥ १५॥ कदाचिनियतं लब्धं विक्रीणाति रहः कुधीः॥ जीर्णेन वाससा च्छन्नः पापकृद्विचरत्यसो ॥ १६॥ वर्षवातातपैः शीतैर्नित्यं श्यामकलेवरः॥ बभ्राम पृथिवीं सर्वा महालोल्यातिपी- डितः ॥ १७॥ तस्यातिमित्रं सद्वाटीपतिः काश्चद्वनचरः ।। मालाकारः प्रसन्नात्मा दीनं ज्ञात्वाऽकतेत्कृपाम् ॥१८॥ धिक्कृतं सर्वलोकेषु स्थितिं तत्र चकार सः ॥ नित्यं तनिकटस्थायी तस्याज्ञापरिपालकः ॥ १९ ॥ अतिविश्वस्तचि- तेन तेनासौ वाटिकावने ॥ कृतः सर्वात्मना सम्यङ् ममायमिति बुद्धिना ॥ २० ॥ श्यामशरीर होगयाथा और महाचंचलतासे. पीडित हो सारी पृथ्वीमें भ्रमण करताथा ॥ १७ ॥ उसका एक मित्र वाटीपती वनचर था यह मालाका बनानेवाला प्रसन्नात्मा इसको दीन जान सदा कृपा करताथा ॥ ३८॥ कारण कि यह सब लोगोंसे धिक्कारको प्राप्त हो वहीं निवास करताथा यह नित्य उसके निकट रहकर उसकी आज्ञा मानता था ॥ १९ ॥ यह उसके साथ वाटिकावन में बडे विश्वस्त चित्तसे रहताथा और अपनेहीकी ।। समान मानकर वह फलादि लेलेता ॥ २० ॥ है "
.
वह माली राजकाजमें लगनेके कारण उस बगीचामें नहीं आता और कभी स्वामीके साथ.कहीं चला जाताथा कभी शीघ्र चला आता ॥ २३ ॥ उस
समय.यह फलोंको तोडकर खाता और संचय करताथा पक्के फल खाता और बेंचनी डालताथा ॥ २२. ॥ और उस व्यको आशंकित हो स्वयं
ग्रहण करलेताथा जब वनका स्वामी पूछतां तब लज्जा त्याग उत्तर देताथा ॥ २३ ॥ मैं तो सदा निक्षा लाताहूं और सदा तुम्हारे वनकी सेवा करता
हूं तोजी पक्षी बहुतसे फल भक्षण करजाते हैं ॥ २४ ॥ देखो कुछ पक्षियोंको मैंने मारानी है उनके अस्थि और मांस पडेहुए हैं ॥ २५ ॥ उस
राजकार्यगरीयस्त्वात्रायाति वाटिकावनम् ॥ कदाचित्स्वामिना साई समायाति स सत्वरम् ॥ २१ ॥ चित्रका
सततं चिन्वन्भक्षयन्फलसंचयम् ॥ पक्वान्यश्नन्स्वयं नित्यं विक्रीणन्सफलानि च ॥ २२ ॥ द्रविणं तद्भवं सर्व स्वयं
गृह्णात्यशंकया ॥ यदापृच्छदनाधीशस्तदा वदति नित्रपः ॥२३॥ भिक्षामनामि सततं परिचर्यामि ते वनम् ॥
तथापि पत्रिणः सर्वे फलान्यश्चेति नित्यशः ॥ २४ ॥ पश्यानंतो मया केचित्राशिता गगनेचराः ॥ तपामस्थानि
मांसानि पिच्छानि पतितानि च ॥ २५ ॥ प्रत्ययाथै वधं चके पक्षिणां वसुलोलुपः ॥ एवं प्रवर्त्तमानस्य जग्मुर्पा-
णि दुर्दियः ॥ २६ ॥ सप्ताशीतिर्द्विजेशानो जराजरितस्तदा ॥ कृतांतलुलितः कालकल्पदाकरादितः ॥२७॥
तमीयुः सहसा कालानुचराः कृष्णपिंगलाः ॥ यदालोकनतः सद्यो जीणं हृदयपंजरम् ॥२८॥ ममार मूढधीन सौ
लब्धवानग्निसत्क्रियाम् ॥ पापानि फलदानि स्युनर्ना भुक्त्वा प्रव्रजति हि ॥२९॥
लालचीने उसके विश्वासके निमित्त पक्षियोंका वध किया इस प्रकार उस दुर्बुद्धिको बहुत दीन बीतगये॥२६॥सतासी वर्षकी अवस्थामें शरीर जराग्रस्त
होगया उस समय कालरूपी सर्पने उसको दबायो ॥ २७ ॥ कृष्णपिंगल नेत्रवाले यमके दूत उसके निकट गये जिनके देखनेसे हृदयपंजर शीघही जीर्ण
होजाय॥२८॥अन्तमें उस दुर्बुद्धिकी मृत्यु हुई और अमिसंस्कारभी प्राप्त न हुआ पाप अभक्तोंको बहुत शीघफल देते हैं विना भोगे नहीं जाते॥२९॥
मा.य अ.२१ यमदूतोंसे घसीटा हुआ नेत्रोंसे जल बहाता कोडोंके आघातसे हाहाकार करता ॥ ३० ॥ पापात्माओंके नीषण मार्गमें गमन करने लगा और पूर्वजन्मके किये अपने अपराधको स्मरण कर गद्गद स्वरसे रुदन करने लगा ॥ ३३ ॥ और कहने लगा; अहो ! मुझ अनाडी दुर्वृत्चका अज्ञान तो देखो जो देवताओंकोनी दुर्लन मानुष देहको प्राप्त होकर ॥३२॥ धनके लोभसे अपना सुन्दर शरीर व्यर्थ गमादिया; अब पराधीन कालपाशके वशी- भूत हुआ मैं क्या करूं ॥३३॥ मुझ कुबुद्धिने सब कार्य चिरकालके उपार्जन योग नष्ट कर दिये अब मृत्युपाशके वशीभूत हुआ मैं क्या करूं॥३४॥ सौरिसेविकराकृष्टः स्रवन्नयनीरवाद ।। हाहाकुर्वन्महानादं कशाघातनिपीडितः ॥३०॥ जगाम कृच्छ्रतो मार्गमपुण्य- जनभीषणम् ॥ स्मरन्पूर्वकृतं कर्म प्रलपन्गद्गदाक्षरम् ॥ ३१ ॥ अहो हा पश्यताज्ञानं ममानार्यस्य दुर्मतेः ॥ आसाद्य मानुषं देहं दुर्लभं त्रिदशैरपि ॥ ३२ ॥ किं कृतं धनलोभेन व्यर्थ नीतं शुभं वयः ॥ किं करोमि पराधीनः कालपाश- वशंगतः ॥ ३३ ॥ चिरकालार्जितं सर्व महायासैःकुमेधसा ॥ किं करोमि पराधीनः कालपाशवशंगतः ॥ ३४ ॥ न मया मानुषं जन्म लब्ध्वा किंचिच्छुभं कृतम् ॥ हुतं न ह्यमी किंचिच्च न दत्तं दानमर्थिने ॥ ३५ ॥ क्षुधिते नात्रमुत्सृष्टं न नीरं तृषिते जने ॥ तिलोदकं पितृभ्योऽपि न सुरेभ्यो.यवोदकम् ॥ ३६॥ न माघे श्यामलश्वेते पानीये मजनं कृतम् ॥ न माधवे मुक्तिकर्तृनर्मदामजनाच्छुचिः ॥ ३७॥ त्रिरात्रमुषितो नापि श्रीमत्सारस्वते तटे ॥न कालिंदीतटं दिव्यमाश्रितः सप्तवासरम् ॥ ३८॥ मैंने मनुष्यजन्मको पायकर कुछभी शुभ कार्य न किया न अग्रिम हवन और अर्थीको कुछ दान दिया ॥ ३५ ॥ न भुंखेको अन्न और न प्यासेको पानी दिया पितरोंको तिलोदक और न देवताओंको यव और जल दिया ॥ ३६॥ न माघमें गंगा यमुनामें स्नान किया न वैशाखमें मुक्तिदाता नर्मदामें खान किया ॥ ३७॥ न सरस्वतीके किनारे तीन रात स्नान किया न यमुनाके किनारे सात दिन निवास किया ॥ ३८॥ ॥७२॥ - और मुझ पापीने एकही बारमें करोडों पापोंकी दूर करनेवाली गंगाका सेवन नहीं किया ॥ ३९ ॥ और -तो क्या मुझ पापात्मा दुष्टबुद्धिने विष्णुके पिय पुरुषोत्तममासमें कहीं स्नानतकभी न किया ॥ ४० ॥ न मैंने हरिके प्रिय महीने में गंगाका सेवन किया गोमती कावेरी वा यमुनामें कभी स्नान न किया ॥ ४ ॥ सरस्वती क्षिप्राका कभी सेवन न किया.अहो मेरा सचित द्रव्य निरर्थक भूमिमें पा रहगया ॥ ४२ ॥ जबतक जिया तबतक दुर्बुद्धिसे आत्माको क्लेश दिया कभी मैंने जठारामिको तृप्त नहीं किया और न कभी अपने देहको वखसे आच्छादित किया जातिके बन्धु तथा पार्श्ववर्ती, सद्यः पातककोटयोपशोषिशुभ्रसुरापगा॥ विगाहिता-महापुण्या नैवं दुष्कृतकारिणां ॥ ३९ ॥ न च विष्णुप्रिये मासे विख्यातें पुरुषोत्तमे ॥ कुत्रापि स्नातवान्मूढो नाहं पाप्मातिदुष्टधीः ॥४०॥ न मया सेविता गंगा श्रीमन्मासे हरि- प्रिये ॥ गोमती वापि कावेरी प्रिया वापि कलिंदजा ॥४३॥ ख्याता सरस्वती क्षिप्रा या वा कापि समुद्रगा। अहो मत्संचितं द्रव्यं स्थितं भूमौ निरर्थकम् ।। ४२॥ यावज्जीवं परिक्लिष्टः स्वात्मा दुर्बुद्धिना मया ॥ कदापि जाठरो वह्निनः संतर्पितो मया ॥४३॥ नापि सदाससाच्छन्नः स्वदेहः कृपणात्मना ॥ न ज्ञातयो बांधवाश्च स्वजनाः पार्श्वव- तिनः ॥४४॥ भागिनेयाः सुता जामिर्जनित्री जनकोऽनुजाः ॥ वध्वोऽनुजांगना जाया ह्यन्येऽपि मानवास्तथा ॥४५॥ सदनैरेकवारं च तर्पिता न मया क्वचित् ॥ अष्टचत्वारिंशकेषु संस्कारेषु न मेऽभवत् ॥४६॥ संस्कारो मानुषे देहे दुर्गति येन नाप्नुयाम् ॥ कां गतिं नु गमिष्यामि तरण्यात्मजलंभिताम् ॥४७॥. स्वजन ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ भानजे भगिनी पुत्र यामि माता पिता छोटे भाईकी स्त्री स्त्री उनका सम्बन्धवाला तथा दूसरे मनुष्य ॥ ४५ ॥ अच्छे अन्नसे कभी मैंने तृप्त नहीं किये अडतालीस संस्कारोंमें एकभी मैंने सेवन नहीं किया ॥ ४६॥ मनुष्यदेहका संस्कार न होनेसेही. दुर्गति होती है मैं आत्मवचन करनेवाला किस गतिको प्राप्त हूंगा ॥ ४७.॥ 1 3 + है . मा. टी.. अ. २१ अब मैं अपने कृत्यको भोगूंगा मेरी मुक्ति कभी न होगी इस प्रकार उस विलाप करते हुएको दूत यमके लोकको लेमये ॥४८॥ उसकी आज्ञासे तत्काल इसको प्रेतयोनि मिली पीछे यमराजने मंत्रीसे कहा ॥ ४९ ॥ हमारी आज्ञासे सौवर्षतक प्रेतयोनि दो; कारण कि यह दुर्बुद्धि है इसे बडा दारुण प्रेतत्वप्रदान करो ॥ ५० ॥ इसने सदा पराये अपरिमित अन्न भक्षण किये हैं और फल चुराये हैं इस कारण इसको यह योनि दो॥५१॥ फिर तेरह जन्म इसको भयंकर वानरके दो वर्षा वात गरमी हिम क्षुधा तृषा व्याधि भयसे व्याकुल रहै ॥ ५२॥ पीछे इसको मैं अनेक भुक्त्वा जीवकृतं कर्म मुक्तिर्नास्ति कदापि मे ॥ एवं विलपमानं तं निन्युर्वैवस्वतांतिकम् ॥ १८॥ तदाज्ञया प्रेतयो- निमापनस्तत्क्षणादसौ ॥ पश्चात्तमूचिवान्सोरिरभ्यर्णासन्नमंत्रिणः ॥४९॥ अहोऽयं नीयतां विप्रः पापबुद्धिर्मदाज्ञया । शतायुतानि वर्षाणां प्रेतत्वमतिदारुणम् ॥५०॥ परकीयाणि भुक्तानि सुधाकल्पान्यसंख्यया ॥ फलान्यनेन चौर्येण तस्मादस्मै प्रदयिताम् ॥५१॥ त्रयोदशायुतं कृत्वा कपिजन्मभयप्रदम् ॥ वर्षवातातपहिमक्षुतळ्याधिभयाकुलम् ॥५२॥ पश्चादहं प्रदास्यामि बह्वीनरकयातनाः॥ दशाबुदानि वाणि प्रतिकुंडं निवत्स्यति ॥ ६३ ॥ इति तेन समादिष्टा मंत्रिणो भीषणाननाः ॥ तदा चकु प्रभोराज्ञां दुष्टविप्रे समाहिताः ॥ ५४॥ तदेहं ततो भुक्त्वा कानने द्रुमवर्जिते ॥ निर्जले बहुकालं स कपित्वमगमद्विजः ॥ ५५ ॥ दिव्ये कालंजरे शेले जंबूखंडे मनोहरे ॥ तत्र दिव्यसरः प्रख्यं कुंडं शकविनिर्मितम् ॥५६॥ कुररीमुररीकृत्य कुरर किल कूजति ॥ यत्रोच्छलजलच्छन्त्रपक्षच्छायालसच्छाच ॥१७॥ नरककी यातना दूंगा यह दशदश अर्ब वर्ष प्रत्येक नरककुंडमें निवास करेगा ॥५३॥ जब इस प्रकार भयंकर मुखवाले मंत्रियोंको उन्होंने आज्ञा दी तब वे उस दुष्ट विप्रकी वही दशा करने लगे ॥ ५४ ॥ तब वह वृक्षरहित वनमें प्रेतदेह भोगकर फिर निर्जन स्थानमें धानरके शरीरको प्राप्त हुआ ॥५५॥ दिव्य कालिंजर पर्वतके मनोहर जम्बूखण्डमें वहां एक दिव्य सरोवर इन्द्रको बनायाथा ॥ ५६ ॥ जहांके जलके समीप कुररी पक्षी बोलतेथे जहांके ॥५ PIC 7 जलके उछलनस पक्षछायाकी समान छबि दीखती थी ॥५७॥ वह मृगतीर्थनामसे विख्यात देवताओंको दुर्लभ था जहां प्राप्त हो पितर अपनी गतिको प्राप्त हुएथे ॥५८॥ किंचित् कारणके उद्देशसे यह मृगरूपी होगया सो यह दुष्ट पहले जन्मके कपित्वको प्राप्त हुआ॥५९॥ शौनकजी बोले ॥ हे सूतजी यह तो आप कहिये कि अनेक पातक करनेवाला वह शाखामृग किस प्रकारसे इस त्रिलोकीके पवित्र करनेवाले तीर्थमें निवास करता हुआ ॥ ६ ॥ सूतजी बोले ॥ हे शौनकजी ! धन्य हो आपने मुझे कृतकृत्य करदिया इसमें एक साधारण पुरातन कारण है ॥६१॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तम- मृगतीर्थमिति ख्यात सुराणामपि दुर्लभम् ॥ यत्रेयुः स्वर्गतिं शुभ्रां पितरं पूर्वदेहिकीम् ॥५८॥ किंचित्कारणमुद्दिश्य जाता ये मृगरूपिणः ॥ तत्रासो प्रथमं जन्म कपित्वं लब्धवान्खलः ॥ ५९॥ शौनक उवाच ॥ पौराणिक मम ब्रूहि तर्थेि त्रैलोक्यपावने ॥ उवास स कथं शाखामृगः पातककोटिमान् ॥ ६० ॥ सूत उवाच ॥ ब्रह्मन्धन्योऽसि सच्छ्रोता कृतकृत्योऽस्म्यहं त्वया ॥ सामान्य कारणं किंचिदत्रास्त्यतिपुरातनम् ॥६३ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये कदर्यविप्राख्यान एकविंशोऽध्यायः ॥२१॥ सूत उवाच ॥ यदा दाशरथी रामो नाममात्रभयापहः ॥ यत्रामस्मृति- मात्रेण तरेदंजो भवांबुधिम् ॥ १॥हतवान्रावणं युद्धे बद्धा सेतुं महोदधौ ॥ बिभीषणाहते कोऽपि राक्षसो नावशे- षितः॥ २॥ ततस्तनूनपाच्छुद्धा जानकी स्वीकृतामुना ॥ रावणे च हते तस्मिन्ब्रह्मरुद्रसुरेश्वरैः ॥ ३॥ प्रीतैर्वर वृणीष्वेति वचस्युक्ते ततोऽब्रवीत् ।। रामो राजीवपत्राक्षः कालकोटिदुरासदः॥४॥ माहात्ये कदयविप्राख्याने एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ सूतजी बोले ॥ जिस समय दशरथपुत्र रामचन्द्र नाममात्रसेही भयके दूर करनेवाले कि जिनके नामस्मरणमात्रसे मनुष्य संसारसागरसे पार होजाता है ॥ १ ॥ सागरमें पुल बांधकर रावण शत्रुको मारते हुए केवल एक विभीषणजी अवशेष रहे ॥ २॥ और फिर जानकीजी अनिके द्वारा शुद्ध हुई और रावणके मरनेपर ब्रह्मा रुद्र सुरेश्वर ॥ ३ ॥ प्रसन्न हो रामसे कहने लगे प Goy ।
मा... अ.२२ " कि आप वर मांगिये यह सुन रघुनाथजी बोले जो कमललोचन गम कालकी ममान दुरामद है ॥ १॥ वे बोले हे देवताओ ! यदि वरदान देनेहो तो यह शूर वानर रीछ जो राक्षसोंसे मारेगये हैं ॥ ५ ॥ यह मेरे हितकारी होनेने क्षतरहित हो पुनर्जीवित होजांच और यह वीर निम जिम वनमें निशान करें ॥ ६ ॥ वहां वहांके वृक्ष पत्र युप फल छायासे युक्त हो वहां सुन्दर जल और शीतल वन होगांप ॥ ७ ॥ हे देवताओ ! मुझे यह वर दो यह वानरजाति मेरी प्रिय है. ऐसाही हो; यह कह देवता स्वगको गये ॥ ८॥ इनने रामके पनामे जहां कहीं शाखामृग होता है कहां इन कल पानी मुराः शृणुध्वं मे वाक्यं यदि देयो वरोऽस्ति मे ॥ एते वे वानराः शूरा रक्षोभिभक्षिता हताः ॥ ५॥ अक्षता जीवमा- नास्ते संतु मत्प्रियकारिणः ॥ यत्रयत्र वने वीरा बसेयुमें वनेचराः ॥६॥ पत्रपुप्पफलेनम्राः सुच्छायाः संतु ते द्रुमाः ॥ करलभ्यानि वारीणि शीतलाान वनानि च ॥ ७॥ एपोऽस्तु मे वरो देवाः कपिजातिर्मम प्रिया । तथेत्युक्ते तु ते सर्वे जग्मुर्देवास्त्रिविष्टपम् ॥ ८॥ अतो रामप्रभावेण यत्र शाखामृगो भवेत् । तदनं फलपानीयपुष्पपत्रचयावहम् ॥ ९ ॥ परंतु पापपुण्याभ्यां सुखदुःखान्यनुव्रजेत् ॥ महावानररूपेण ववृधे पर्वतोपमः ॥ ३० ॥ क्षुधातुरोऽतिपापेन दीड- तिलोलुपः ॥ जन्मतस्तस्यवक्रेऽभूयथा परमदारुणा ॥ ११ ॥ यया नवनवनावि शोणितं वर्ततेऽनिशम् ॥ अत्यंतवे- दनाविष्टो भोक्तुं किंचिच्छशाक न ॥ १२ ॥ पानीयमपि नो पातुं सेहे प्राक्तनकर्मतः ॥ स च वानरचापल्याड्मभ्यः फलकोटयः ॥ १३ ॥ लुनाति वदनाभ्याशमानीय त्यजति त्वरन् । समिदो जाठरो वह्निरनिशं दहते भृशम् ॥ १३॥ पुष्प पत्र दिसे युक्त होताहे ॥ ९ ॥ परन्तु पाप पुण्यके अनुसार मुख दुःख उनके पीछे जाता है वह बडे वानररूपमे पर्वतकी समान या ॥1॥ और बडे पापसे क्षुधातुर हो दीर्घ प्याससे व्याकुल होनेलगा और जन्मसेही उसके मुखमै दारुण व्यथा हुई ॥ १३ ॥ निरन्तर उममेंमे रुधिर और राइ निकलतीथी और अत्यन्त वेदनाको पात हो वह कुछ सानेको समर्थ न हुआ ॥ १२ ॥ पूर्वजन्मके पापसे वह जलनी पान नहीं करसकनाया परन्तु चपलतासे वृक्षोंके अनेक फल तोड आला ॥ १३ ॥ परन्तु वा नहीं सकता इमसे बडा कट होता जठराधि उसको महाकट देती ॥ १४ ॥ ॥७४ FAE तृपाले सब अंग व्याकुल कंधे सूखगये इधर उधर लोदता हुआ महावेदनाको प्राप्त हुआ ॥ १५ ॥ इस वृक्षसे उस वृक्षार धूमता हुआ मृत्युकोही सुख- दायक मानता हुआ कभी पृथ्वीमें गिरकर महाशब्द करता था ॥ १६ ॥ और बडी ग्लानिको प्राप्त होता जैसे जलसे चद मच्छी, वानरी चपलतासे फिर इधर उधर धावमान होता ॥ १७ ॥ इस प्रकार क्षुधासे व्याकुल हो भमण करताथा रुधिर गिरने और व्रण होनेसे उसके दांत गिरगये ॥१८॥ इस प्रकार उसके नित्य निराहार रहनेसे,दैवयोगसे पुरुषोत्तममास प्राप्त होगया ॥ १९ ॥ उस महीनेमेंनी शीत वातादिसे व्याकुल वह उसी प्रकार स्थित तृषाकुलितसर्वांगः सशुष्कगलकंदरः॥ इतस्ततो लुण्ठमानो ह्यतींव वेदनातुरः ॥ १५॥ गुमायुमं भ्रमन्दीनो मेने मृत्यु मुखावहम् ॥. कदाचित्पतते पृथ्व्यां जल्पते विकलस्वरम् ॥१६॥रौति ग्लानिमवाप्नोति नीरभ्रष्टो यथा झपः ॥ कापे- यचापलत्वेन भ्रमन्गच्छति वासरम् ॥ १७ ॥ एवं क्षुधासमाविष्टः श्लथगात्रो वमन्मुखः ॥ पेतुर्दतास्ततः सर्वे व्रणिनो रुधिराप्लुताः ॥ १८॥ एवं प्रवर्ततस्तस्य निराहारस्य नित्यशः ॥ दैवयोगादुपागच्छत्स श्रीमान्पुरुपोत्तमः ॥ १९ ॥ तस्मिन्नपि तथैवास्ते शीतवातातपादिपाट् ॥ कदाचिद्रहुले पक्षे विचरन्गहने वने ॥२०॥ तृपितः कुंडनिकटे पानीयं नापिबत्कचित् ॥. क्षुधितश्चपलत्वेन तत्रोच्चैवृक्षमारुहत् ॥ २१ ॥ वृक्षादृक्षान्तरं गच्छन्यपतज्जलकुंडके ॥ चिरंतनान- राहाराच्छुष्कसर्वैद्रियप्रभः ॥२२॥ निवल शिथिलप्राणः पतन्निव विनिर्गतः ॥ भ्रमतीतस्ततस्तत्र भुजाभ्यां. वारि दोलयन् ॥ २३ ॥ सोपानमाजगामाशु पतञ्छैवालतः क्षणात् ॥ न च कश्चित्समागत्य वारयामास वानरम् ॥ २४ ॥ रहा. कदाचित् गहन वनमें विचरण करता हुआ ॥ २० ॥ प्यासा होकरसी कुंडके निकट जलपान न करसका और भूखा हो चपलताके कारण वृक्षार चढगया ॥ २१ ॥ वृक्षसे वृक्षके ऊपर जाता हुआ.जलके कुंडमें गिरपडा बहुत काल निराहार रहनेसे उसकी इंद्रियें सूख गईथीं ॥ २२ ॥ निर्बल और शिथिलमाण होकर उसमेंसे निकलने लगा और भुजाओंसे जलको ताडन करता फिरने लगा ॥ २३ ॥ फिर सोपानमार्गको प्राप्त होकर गिरपडा ना. अ.२१ परन्तु किसीने उसको निवारण न किया ॥ २४ ॥ इस प्रकार तीन दिनतक जलमें विचरतारहा वही उसका तप नारायणकी कपासे होगया ॥ २५॥ तीसरे दिन दुपहरके समय वह वानर जलमें प्राणरहित होकर गिरपडा ॥२६॥ और तत्काल वानरी शरीरको त्याग पापरहित हो शीघ देवत्वको प्राप्त हो बडे मनोहर शरीरसे शोजित हुआ ॥ २७॥ करोड कंदर्पकी समान शोभायमान नीले मेघकी समान कान्तिमान स्फुरायमान किरीट और कंकण बिजलीकी समान कान्तिमान् ॥ २८ ॥ वाजूबंद अगूंठी हार खड्डुए नूपर पहरे कटिसूत्र यज्ञोपवीत धारे चलायमान मकराकत कुंडलसे युक्त ॥२९॥ एवं दिनत्रयं यावद्वभ्राम जलमध्यतः॥ तदेवास्य तपो जातं भगवत्कृपया द्विज ॥२५॥ तृतीयदिवसे मध्यं गते भा- स्वति वानरः ॥ परासुरपतत्तीर्थवारिछिन्त्रकलेवरः ॥२६॥ उत्सृज्य सहसा देहं कापेयं गतकल्मपः ॥ सद्यो देवत्वमा- पत्रो रेजेऽतीतमनोहरः ॥२७॥ कंदर्पकोटिलावण्यो नीलनीरदसन्निभः ॥ स्फुरकिरीटवलयो विल सञ्चपलांबरः ॥२८॥ केयूरमुद्रिकाहारो लसत्कटकनपुरः ।। कटिसूत्रो ब्रह्मसूत्रश्चलन्मकरकुंडलः ॥ २९ ॥ कांचीकलापविभ्राजकटिर्म- णिमयांगदः ॥ त्रैलोक्यमोहनं रूपं बिभ्रन्विभ्राजयन्दिशः ॥३०॥ नीलकुंचितसुस्निग्धचिकुरावृतसन्मुखः ॥ चतुर्बा- हुर्लसन्मूर्तिर्यामिनीपतिसच्छविः ॥ ३१ ॥ तद्भासा काननं सर्वं रुरुचे कांचनप्रभम् ॥ यावदाक्रम्य गगनमास्थितः पुरुषोत्तमः ॥ ३२ ॥ तावद्विमानमागच्छदारसेवकवेष्टितम् ॥ वीणामृदंगपटहपणवानकगोमुखान् ॥ ३३ ॥ भेरभे- रीलसच्छंखनिःसाणमुरुजादिकान् ॥ वादयद्भिर्नरवरैराश्रितं बहुलोत्सवैः ॥ ३४॥ कांचीसमूहसे विराजित कमरमें मणिमय बाजूबंद पहरे त्रिलोकीको मोहनेवाला रूप किये सब दिशाओंको विराजित किये ॥ ३० ॥ नीले पूंघर- वाले बालोंको धारण कर श्रेष्ठ शोभासे युक्त होकर चार भुजाओंसे युक्त मूर्ति चन्द्रवत्प्रियदर्शन ॥ ३१ ॥ उसकी कान्तिसे सारा वन प्रकाशित हो गया जबतक वह पुरुषोत्तम वनको आक्रमण कर स्थित होता है ॥ ३२ ॥ तबतक हरिके सेवकोंसे युक्त विमानको देखा वीणा मृदंग पटह पणव नामक बाजे बजने लगे ॥ ३३ ॥ भेर भेरीसे शोभित निशान मुरजादि बाजे बजने लगे उनको बजाते हुए मनुष्य बडे उत्सवको करने लगे ॥ ३४॥ ॥७५ चित्र विचित्र स्त्री चारोंओरसे उनको घेरने लगी विद्याधर अप्सरा गंधर्व किन्नर उरग यह अनेक क्रियासे व्यय हो उसको देख प्रसन्न हुए ॥ ३६॥ यह अपनी दशा देखकर वह बडा विस्मित हुआ और कोई उनके ऊपर सुंदर छत्र चन्द्रमाकी समान ॥ ३७॥ धारण करता हुआ कोई जय उच्चारण करने लगा कोई चमर कोई ताम्बूल ग्रहण करता हुआ ॥ ३८ ॥ सहस्रों रत्नोंसे खचित सुवर्णके पात्रोंको कोई ग्रहण कर कोई उनमें अमृतकी समान जल प्रमदाभिर्विचित्राभिरनुकूलाभिरावृतम् ॥ ३९ ॥ विद्याधरैरप्सरोभिगंधर्वैः किन्नरोरगैः ॥ नानासेवाक्रियाव्यग्रेस्त- दालोक्य महोत्सवैः ॥ ३६॥ विलोक्य विस्मितोऽतीव स्मृतपूर्वकृतावलिः ॥ कश्चित्तदुपरि च्छवं पांडुरं शशिभासुरम् ॥३७॥ दधार व्यजनैरेवं वीजयत्नुपरि स्थितम् ॥ चामरं जगृहे काश्चत्तांबूलान्यग्रतो परः॥३८॥ खचितं रत्नसाहः पात्रं स्वर्णविनिर्मितम् ॥ काचिदृह्य स्थिताभ्यर्ण स्वधुनीवारिसंभृतम् ॥ ३९ ॥ पीयूषापूरितं पात्रं संगृह्य चापरा 'स्थिता ॥ काश्चिन्नृत्यविशेषेण तोषयामासुरीश्वरम् ॥ ४० ॥ काचिदानेन रम्येण वाद्यैरन्या सुशोभनैः ॥ एवं वैभवमालोक्य चित्रन्यस्त इवाभवत् ॥४१॥ किमेतत्केन पुण्येन प्राप्तोऽयं वै फलोदयः ॥ भ्रांतिर्ममाद्य संजाता इति संचिंतयन्स्थितः ॥४२॥ न तत्स्मरामि मत्कृत्यं येनाहं प्राप्तवानिदम् ॥ इति संशयमापन विष्णुभृत्यौ तमूचतुः॥४३॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये विष्णुदूतागमनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ जरकर उसके निकट स्थित हुए ॥३९॥ कोई अमृतमय पात्र ले उसके समीप स्थित हुई कोई उसको नृत्य करके संतुष्ट करने लगीं ॥४०॥ कोई मनो- हर गान और बाजेसे इसे प्रसन्न करती हुई यह इस प्रकारका वैभव देख चित्र लिखेकी समान होगया ॥ ४१ ॥ यह क्या है और किस पुण्यके प्रता- पसे मुझे प्राप्त हुआ है यह मुझे बडी भांति है यह विचारता हुआ वह स्थित हुआ ॥ ४२ ॥ कि मुझे उस कत्यका स्मरण नहीं होता जिसके प्रता- पसे मैं इसे गतिको प्राप्त हुआहूं इस प्रकार उस सन्देहको प्राप्त हुएसे विष्णुभक्त कहने लगे ॥ ४३ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये विष्णुदूता- .
मा.."
अ.२३
.
H
गमनं नाम द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ विष्णुके दूत-बोले हे प्रतो ! वैकुंठको जाओ बहुत कालतक क्यों विलम्ब करते हो तुमको सालोक्य मुक्ति
प्राप्त हुई है मनमें संदेह न करो ॥ १ ॥ देवताने कहा अहो आश्चर्य है कि तुम मुझे ज्ञानसे वा अज्ञानसे लेनेको आगये हो मेरे तो बहुतसे कुत्सित
गोगनेके हैं ॥ २ ॥ सो कौनसे कर्मसे मैं निष्क्रिय हो कर्मों का आनंद भोगनेवाला हुआ जो मैंने पहले किया है वह ऐसा नहीं जो अनिष्टरूप
न हो ॥ ३॥ जितनी वर्षाकी धारा अथवा पृथ्वीमें रजके कग हैं तथा जितनी तारा हैं उतनेही मेरे पाप हैं ॥ ४ ॥ यह सुन्दर चित्रमण्डप कैसा
विष्णुदूता ऊचुः॥प्रभो प्रयाहि वैकुंठं चिरं किमिह तिष्टसि ॥ सार्षिमुक्तिस्त्वया लब्धा मास्तु ते संशयो यदि ॥१॥
दव उवाच ॥ अहो ज्ञानादथाज्ञानानेतुं मां वामिहागतौ ॥ बहूनि मम कर्माणि-संति भो गर्दितात्मनः ॥२॥ केन में
निष्कयो जातः सहसोदयकर्मणाम् ॥ ना चेष्टं विद्यते कर्म न मया हि कृतं पुरा ॥३॥ यावत्यो वर्षतो धारास्तृणानि
भुवि पासवः ॥ धुभासो गगने,देवौ तावत्पापानि संति मे॥ ४॥ किमेतदृश्यते चित्रं मंडपं. इरिसुन्दरम् ॥ न याति
प्रत्ययो मह्य वैकुंठभुवनं प्रति ॥५॥ इति वाचमुपाकर्ण्य विष्णुदूतावथोचतुः ॥ नार्थ नाथ किमेतत्ते ह्यज्ञानं साधनं
कुतः ॥ ६॥ श्रीविष्णोराज्ञया त्वां नेतुमत्र समागतो॥ विष्णुप्रियो महापुण्यो नाम्ना यः पुरुषोत्तमः ॥७॥
यस्मिंस्त्वया तपश्चीर्णं यदलभ्यं सुरैरपि ॥ अविज्ञातं महाराज कपिदेहेन यत्कृतम् ॥ ८॥ परोक्षं कानने कृत्यं तदनं-
त्याय कल्पते ॥ निरुपाधिप्रियो विष्णुः परोक्षं हरिवल्लभम् ॥ ९ ॥
दीखता है मैं वैकुण्ठके योग्य हूं-यह मुझे विश्वास नहीं आता ॥ ५॥ वह वचन सुन विष्णुके दूत कहने लगे हे स्वामिन् ! आपको यह क्या अज्ञान
साधन कुछ नहीं है ॥६॥ हम विष्णु भगवान्की आज्ञाहीसे तुमको लेने आये हैं जो विष्णुका प्रिय पुरुषोत्तम मास है ॥७॥ इसमें देवताओंकोनी दुर्लन
तपस्या तैने की है. हे महाराज ! वानरदेहसे जो आपने पुण्य किया है वह आपको ज्ञान नहीं है ॥ ८॥ जो तुमने परोक्ष वनमें किया है वह अनन्त
--11
॥७६॥
. PM L हो जायगा परोक्ष उपाधिरहित जो किया जाय वह अनन्त होजाता है. ॥ ९ ॥ जो कि तुमने मुखरोगके मिपसे आहार नहीं किया है और वानरी स्वभावसे वनके फल तोडे ॥ १० ॥ और पृथ्वीपर डाले उससे दूसरे मनुष्य तृप्त होगये मूल फल समर्पण किये किन्तु स्वयं भक्षण नहीं किये ॥११॥ और पानीनी न पिया यही तुम्हारा दुश्चरं तप हुआ. फलदानसे तैंने महान् उपकार किया है ॥ १२ ॥ कठिन शीत वात आतप झेलकर वनमें विचरते हुए महातीर्थमें तीन दिनतक स्नान किया ॥ १३ ॥ तुम्हारे कृत्यका यदि कोई लक्ष अंशभी करें तो वह विष्णुपदको प्राप्त होता है ॥३४॥ मुखरोगमिषेणैव नाहारमकरोद्भवान् ॥ कापेयचापलत्वेन फलान्युत्कृत्य वृक्षतः ॥ १० ॥ क्षितानि धरणीपृष्ठे तृप्तास्तैरितरे जनाः ॥ फलं मूलं तथा पर्ण न त्वया भक्षितं कचित् ॥ ११ ॥. पानीयमपि नो पीतमेतत्ते दुश्चरं तपः ।। परोपकारः सुमहान्कृतस्ते फलदानतः ॥ १२ ॥ शीतवातातपा रौद्राः सोढा विचरता-वने ॥ महातीर्थवरे रम्ये व्यह- माप्लवनं कृतम् ॥ १३॥ तव कृत्यस्य लक्षाशं कोटयंशमपि कश्चन ॥करोति नरशार्दूलः सोऽपि विष्णुपदंब- जेत् ॥ १४ ॥ किं पुनस्तव कृत्येन मुक्तिर्भवति शाश्वती ॥ यस्त्वया साधितः स्वार्थों नान्यः कर्तुं शमः क्षितौ ॥१५॥ न विज्ञातः कथं देवप्रभावः पौरुषोत्तमः॥ यस्मिन्नेकोपवासेन मुच्यते कोटिकिल्विपैः॥ १६॥ नानेन सदृशं पुण्य- मस्ति लोकत्रयेऽपि च ॥ नैततुल्यं शुभं चित्तं नैतत्तुल्यं हरिप्रियम् ॥ १७ ॥ ते धन्याः कृतपुण्यास्ते त एव भुवि मानवाः ॥ नाविज्ञातो गतो येषां मासः श्रीपुरुषोत्तमः ॥ १८॥ फिर आपकी बराबर तप करनेसे किस प्रकार शाश्वती मुक्ति न होगी जो आपने अर्थ साधन किया वह तेरे सिवाय कोई नहीं करसकता है ॥१५॥ हे देव ! तुमने पुरुषोत्तम मासका प्रभाव क्यों नहीं जाना जिसके एक दिन उपासना करनेपरजी अनेक पाप दूर होजाते हैं ॥ १६ ॥ इसकी बराबर त्रिलोकींशी पुण्य नहीं है कोई इसकी समान सुन्दर चित्त और ने कोई इसकी समान हरिका प्रिय है ॥ १७ ॥ वे मनुष्य धन्य और कृतपुण्य हैं। - ।
भा.दी. अ.२३ वेही पृथ्वीमें श्रेष्ठ हैं तैंने पुरुषोत्तम मासजी बीता न जाना.॥ १८॥ उनका जीना सफल है उनकी क्रिया सफल है उनके ब्रह्मचर्य और अध्ययन सफल हैं ॥ १९ ॥ दान पितृकार्य सूर्य यज्ञ निर्मल कर्मयुक्त भारतखण्डमें जन्म होना बडा दुर्लभ है ॥ २० ॥ जिनका यह पूर्ण मास स्नान दान और जपमें बीतगया है वही सब साधनसे पुरुषश्रेष्ठ वैष्णव हैं ॥ २१ ॥ वह पापकर्ममें निरत अजितेन्द्रिय धिक्कारके योग्य है जो विष्णुके प्रिय मासमें कोई सत्क्रिया नहीं करता है ॥२२॥ इस प्रकार वह विष्णुदूतोंके वचन श्रवण कर अत्यन्त चकित होकर रोमांचितशरीर होगया ॥ २३ ॥ सफलं जीवितं तेषां सफलाश्च परिक्रियाः॥ ब्रह्मचर्यादिवृत्तानि श्रुतान्यध्ययनानि च ॥ १९॥ दानानि पितृकार्याणि सौराणि क्रतवोऽमलाः ॥ दुर्लभं मानुषं जन्म भूखंड भारते शुभे ॥२० ॥ येषां सर्वोत्तमो मासः स्नानदानजपैर्गतः ॥ सर्वसाधनभूयिष्ठो वैष्णवः पुरुषोत्तमः ॥ २१॥ किंगसौ पापको रौद्रः पापकार्यजितद्रियः ॥ विष्णुप्रियतमे मासे सत्कियावर्जितश्च यः ॥२२॥ इति तद्वर्णितं विष्णुदूताभ्यामनुभूय सः॥अत्यंतचकितो दृष्टः पुलकांचितसद्धपुः ॥२३॥ तीर्थदेवतमामंत्र्य गिरि कालंजरं ततः॥ वनदेवीं वनस्थांश्च सर्वान्गुल्मलतातरून ॥२४॥ ततः प्रदक्षिणीकृत्वा विमानं मुरदुर्लभम् ॥ समारुह्य चतुर्बाहुविचित्रवपुषा लसन् ॥२५॥ पश्यत्सु सुरवृंदेषु नानालेखगणार्चितः ॥ नानावादि- निनदैः कुसुमासारवीजितः ॥ २६॥ साकं जयारवेरुच्चैवेष्टितः प्रमदाजनैः ॥ स्वर्गसीमंतिनीलोल्यकारिसद्रूपसंपदा ॥ २७ ॥रोचन्वै विबुधाँल्लोकांश्चतुरापांगवीक्षितः ॥ सेंद्ररुद्रादिभिर्देवैः सम्यक्च परिपूजितः॥ २८॥ तीर्थ देवता और कालंजर पर्वतको आमन्त्रण करके वनदेवी देवता सब गुल्मलता वृक्षोंकी ॥ २४॥ प्रदक्षिणा कर देवताओंके दुर्लभ विमानमें चढ विचित्र शरीर चारभुजा ॥ २५॥ अनेक देवताओंको देख उनसे पूजित हो अनेक बाजों और फूलोंसे अचित हो ॥ २६ ॥ अनेक प्रकारके प्रमदाजनोंसे युक्त स्वर्गकी स्त्रियोंके रूपसंपदासे चलायमान ॥२७॥ अनेक प्रकारकी चतुरतासे वीक्षित इन्द्र रुद्रादि देवताओंसे अच्छी प्रकार पूजित हो ॥ २८॥ है ॥७७॥ -- 4 विष्णुके परमपदको गया, जहांसे फिर कोई जाकर नहीं लौटता और संन्यासी जहां अनेक सुख भोगते हैं ॥ २९ ॥ जहां कालचक्रका भय और जरा मृत्यु नहीं है । शोक मात्सर्य आधि व्याधि कलि श्रम जहां नहीं है ॥ ३०॥ न मोह न अशुभबुद्धि न दुःख न लोन रोग आदिक हैं तम रज सत्व जहां नहीं हैं सत रन मिलाहुआ नहां वर्तता है ॥ ३१ ॥ वहां यह देव कपित्व शरीर त्यागनकर महासुख पाकर नारायणरूपसे रमण करने लगा ॥ ३२ ॥ जगाम नित्याधिष्ण्यानि यद्विष्णोः परमं पदम् ॥ यद्गत्वातीव मोदते शुद्धाः संन्यासिनोऽमलाः ॥ २९ ॥ न यत्र कालचक्रेस्य भयं न च जरा मृतिः॥ न शोको न च मात्सर्यं नापियाधिः कलिर्धमः ॥ ३० ॥ न मोहो नाशुभा बुद्धिर्नार्तिलोंभगदादयः ॥ न तमों न रजः सत्त्वं ताभ्यां मिश्रः प्रवर्तते ॥ ३१ ॥ तत्रासौ चित्रको विप्रस्त्यक्त्वा कपिवपुः क्षणात् ॥ अवाप्य विपुलं सौख्यं रेमे नारायणात्मनः ॥ ३२ ॥ सूत उवाच ॥ एवं वृत्तांतमात्रेण पुरा वृत्तं यथा द्विजाः ॥ निवेदितं त्वया.पृष्टं तव भार्गवनंदन ॥ ३३ ॥ एवं प्रभावो मासस्य विप्रेश पुरुषोत्तमः॥ किं तेन जायमानेन नार्चितो येन वै हरिः ॥ ३४ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तममाहात्म्ये चित्रकस्य वैकुंठप्राप्तिवर्णनं नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः॥२३॥ सूत उवाच ॥ त्रिदिवस्था प्रशंसंति सर्वे देवाः सवासवाः॥ केनचित्पुण्ययोगेन मानुषं जन्म लभ्यते ॥ १॥ हे ब्राह्मणो ! इस प्रकारसे उस ब्राह्मणका चरित्र हुआ है । हे भार्गवनंदन ! जो आपने पूछा सो तुमसे वर्णन किया ॥ ३३ ॥ हे विष ! इस प्रकार पुरुषोत्तममासका माहात्म्य है उसके उत्पन्न होनेसे क्या है जिसने नारायणका चिन्तन नहीं किया है ॥ ३४ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुषोत्तम माहात्म्ये चित्रकस्य वैकुंठभातिवर्णनं नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥ सूतजी बोले ॥ स्वर्गमें इंद्रादिदेवता इस बातकी इच्छौं किया .
बा. - अ.२४ करते हैं कि, किसी पुण्यके प्रतापसे हमारा मर्त्यलोकमें जन्म हो ॥ ३ ॥ इस : भारतवर्षमें जन्म पानेसे सब साधन बनजाते हैं उस समय सब प्रकारसे नारायणके मासकी सेवा करें ॥ २ ॥ यह पुरुषोत्तममास एकही बार सेवनसे नारायणके लोककी प्राप्ति करता है लज्जारहित मनुष्य इस प्रकारके, मासकी सेवा नहीं करते हैं. ॥ ३ ॥ वे मृत्यु जन्मको प्राप्त होनेवाले किस प्रकार मुक्तिको प्राप्त होंगे ? न उनको पुत्र और न मुक्तिका सुख प्राप्त होगा ॥ ४ ॥ कुएके रहठपरोहेकी समान उनका वारंवार गमनागमन होताहै ॥ ५ ॥ फिर वे नारायणके दूत परस्पर जाते हुए एक दूसरेसे सर्वसाधनसम्पन्नेऽजनाभे खण्डनायके ॥ ताई सर्वात्मना मासं सेवयामो हरिप्रियम् ॥ २ ॥ हरिलोकप्रदं पुण्यमंजसा पुरुषोत्तमम् ॥ ईदृशं मानवा मासं नार्चयंति गतहियः ॥३॥ कथं मुक्ता भविष्यति मृत्युजन्मभवाविजाः॥ न च पुत्र- मुखं तेषां न च मुक्तिः कदाचन ॥ ४॥ यातं यातं प्रकुर्वति कूपकुंभभ्रमियथा ॥ विमानगांय विप्राय चित्रकाय महात्मने ॥५॥ पुनरूचतुरन्योन्यं प्रेम्णा मासस्य सद्विधिम् । हरेर्दूतौ गच्छमानौ तद्बाथाकृतमानसौ ॥ ६ ॥ अस्मिन्मासे द्विजश्रेष्ठा नासद्वस्त्राणि धारयेत् ॥ न पिबेत्परपानीयं न सायात्परवारिणा ॥ ७ ॥ न स्वपेत्पर- शय्यायां न च सेवेत्परोनिकम् ॥ परानं नोपभुंजीत न कुर्वीत परक्रियाः ॥ ८॥ परकीयान सेवेत वस्त्रोपानकमंड- लून् ॥ नार्चयेद्देवताः सर्वा धिया विषमया कचित् ॥ ९॥ परापवादान्न बयोच्छृणुयानानृतं वदेत् ॥ सर्वान्नं नोपभु- जीत शक्तश्चेत्तर्युपोषणम् ॥१०॥ . पुरुषोत्तममासकी विधि कहते चले ॥ ६ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! इस महीनेमें न तो असदख धारण कर न दूसरेका जल पीये न दूसरेके लाये जलसे स्नान करै॥ ७ ॥ न दूसरेकी शय्यामें सोवे न दूसरेकी अमिका सेवन करै न पराया अन्न खाय न पराई क्रिया करे ॥ ८ ॥ दूसरेके वस्वं जूते कमंडलु - आदिका सेवन । न करे, विषमबुद्धिसे देवताओंकी अर्चा न करै ॥ ९ ॥ न पराई निंदा करै, न सुने, झूठ न बोले सम्पूर्ण अन्न न खाय जो फलादिसे देह धारण कर । ॥७८1 7 r । सके ॥ १० ॥ वित्तशाठ्य न करता हुआ वालणोंको अन्न धन दे. थन होने पर जो दान नहीं करता वह नरकगामी होता है । 11 ॥ नित्य २ ब्राह्मणोंको उत्तम भोजन देकर जो शेष भोजन आप क्रता है उसके पुण्यका फल सुनो ॥ १२ ॥ जिसने ब्राह्मणात्मक नारायणको तृप्त किया उसने त्रिलोकीको तृप्त करदिया जिन्होंने पूजा आच्छादनसे नित्य ब्राह्मणको तृम किया है ॥ १३ ॥ अनेक प्रकारके मोदक नाना ताम्बूलके बीडे वस्त्र छोटे बडे मोग मुगांधत अच्छे चंदन ॥ १४ ॥ कर्पूर अनर कस्तूरी आदि व्यास बह्मणोंका पूजन करे । इस प्रकार जिसने पुरुषोत्तममासमें विष्णुका अर्चन वित्तशाठयमकुर्वाणो धनं दद्याद्विजातये ॥ विद्यमाने धने दौस्थ्यं कुर्वनिरयगर्भगः ॥ ११ ॥ नित्यं नित्यं द्विजेंद्रेषु दत्त्वा भोजनमुत्तमम् ॥ भुनक्ति शेषमात्रं च तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ १२॥ ब्रह्मांडं तर्पितं तेन येन विप्रात्मको हरिः॥ तोषितः श्रद्धया विप्र पूजनाच्छादनाशनैः॥ १३ ॥ मोदकैर्मधुरैनाना भक्ष्यस्तांबूलवीटकैः ॥ वस्त्रैरुच्चावचैोगः सुगंधेश्चंदनैः शुभैः ॥ १४ ॥ कर्पूरागरुकस्तूरीकुंकुमैरर्चयेद्दिजान् ॥ एवं यैरर्चिता विप्रा मासेऽस्मिन्पुरुषोत्तमे ॥ १५ ॥ स्वर्णभारसहस्रस्य दत्ते यत्फलमाप्नुयात् ॥ प्रत्यहं राजसूयस्य वाजिमेधसवस्यच ॥ १६॥ सदाक्षिणं फलं लब्धमंज- सैव द्विजश्वर ॥ किंचिदप्यधिकं मासि कुर्वतां पुरुषोत्तमे ॥ १७॥ विष्णुर्वदति विप्रेभ्यो मत्प्रियो नास्ति कश्चन ॥मासे- नानेन सदृश-सत्यमेतत्र चान्यथा ॥१८॥ धन्यास्ते पुरुषा लोके ये नित्यं पूजयति माम् ॥न ते धन्याः कदाचित्स्यु- मासे पूजनवर्जिताः ॥ १९॥ किया है ॥ १५॥ जो सौ सहस्र सुवर्ण दानका फल है वा राजसूय और अश्वमेधका जो कल है ॥ १६ ॥ और सौ अश्वमेधका जो फल है उससे अधिक पुरुषोत्तम मासका फल है ॥ १७ ॥ विष्णु भगवान्ने द्विजसे यह बोर्वा कहदी है कि, इस माससे अधिक मुझे अन्य वस्तु प्रिय नहीं है यह सत्य है अन्यथा नहीं है ॥ १८ ॥ लोकमें वे पुरुप धन्य हैं जो नित्य मेरी पूजा करते हैं इस मासके पूजन किये विना लोग धन्य नहीं भा. टी. अ.२४ होते ॥ १९ ॥ जो इसके भक्त हैं वे परमगतिको प्राप्त होते हैं. मैं सदा मुक्तिका देनेवाला स्थित हूँ ॥२०॥ इस कारण मेरे भक्त इस पवित्र मास- का भजन करते हैं मैं इनको जन्म मृत्युके निवारण करनेवाले श्रेष्ठ लोक देताहूं ॥ २१ ॥ इन्द्रद्युम्न शतद्युम्न नहुष भगीरथ यह अनेक अपने मनोरथसमुद्रके , पारको प्राप्त हुए हैं ॥ २२॥ हे विष ! यह श्रेष्ठ मंत्रराज है सुनो मैं इसे आपके प्रति कहताहूं दूसरे इसको श्रवण कर ब्रह्महत्यासे छूटजाते हैं ॥२३॥ "नमो भगवते वासुदेवाय" इस मंत्रको बडी श्रद्धासे या “ॐ नमो विष्णवे" इस मंत्रको श्रद्धासे जपै ॥२४॥ वा “ॐ नमो नारायणाय" अथवा पंचा- मासस्यैतस्य य भक्तास्ते यांति परमां गतिम् ॥ तेषां मुक्तिप्रदः साक्षादहं तिष्ठामि पार्वतः ॥२०॥ तस्माद्भजत मे भक्ताः पवित्रं पुरुषोत्तमम् ॥ लोकानंत्यप्रदातारं जन्ममृत्युनिवारकम् ॥२१॥ इन्द्रद्युम्न शतद्युनो नहुषश्च भगीरथः॥ मनोरथसमुद्रातमीयुरन्येऽप्यनकेशः, ॥ २२ ॥ मन्त्रराजमिमं विप्र शृणु ते वच्मि दुर्लभम् ॥ अन्येरितोऽपि यच्छुत्वा मुच्यते भ्रूणहत्यया ॥२३॥ नमो भगवते वासुदेवाय महत्या श्रद्धया युतः ॥ २४ ॥ यदा नारायणायेति नमः प्रणवपूर्वकम् ॥ अथवा नमो विष्णवति जपेत्प्रणवपूर्वकम् ॥ २५ ॥ यद्वा पंचाक्षरो जापः कार्यः श्रद्धासमन्वितैः । यस्मिञ्दा भवेद्यस्य तेनैव तोषयेत्प्रभुम् ॥ २६ ॥ लक्षमेकं जपेदेनं मासेऽस्मिन्मम वल्लभम् ॥ श्यामाञ्श्वेतान्मधु. तिलाञ्जुहुयान्निर्जरानने ॥ २७ ॥ तर्पणं ब्रह्मभोज्यं च जपं कुर्यादशांशतः ॥ मंत्र जपेदृषिदेवश्छन्दोबीजान्वित सदा ॥२८॥ न्यासेन विनियोगेन जप्तश्चेत्किल्बिषापहः॥ षडंगेषु न्यसेन्मंत्रं प्रणवाक्षरसंयुतम् ॥२९॥ क्षरका ज़प,श्रद्धापूर्वक करना चाहिये जिस मंत्रमें श्रद्धा हो उसीसे प्रभुको सन्तुष्ट करै ॥२५॥२६॥ इस मेरे प्रियमासमें एक लक्ष मंत्रजप करे और काले 'वा श्वेत तिलोंमें शहत मिलाकर हवन करे ॥२७॥ उसका दशांश तर्पण और ब्राह्मणभोजन करावे. ऋषि देव और छंदोंका उच्चारण कर मंत्र जौ ॥२८॥ और न्यासादि द्वारा पापरहित इस परमपवित्र मन्त्रको जपे प्रणवाक्षरके सहित षडङ्गन्यास कर इस मन्त्रका जप करै ॥ २९ ॥ ॥७९॥ . ,
इस प्रकार जप करनेसे यह पाणी बहुत शीघ संसारसागरकेपार होजाता है, इस विधिक करनेसे चारों वर्गकी प्राप्ति होती है ॥३०॥सदा श्यामवर्ण चतुर्भु-
जरूपका ध्यान करना शंख चक्र गदा पद्मधारी सुंदर भूपण पहरे॥३१॥ ऐसा ध्यान करनेसे सम्पूर्ण कामनाओंको भान होता है। विशेषकर पुरुषोत्तम-
मासमें सब फल मिलते हैं. हे द्विजराज ! मैं तुम्हारे प्रति यह सब विधान कहताहूं ॥ ३२ ॥ हे ब्राह्मणं ! यह कभी किसीके आगे कहना न चाहिये सदा
पुरातन श्रवण करना चाहिये ॥३३॥ जिसके पद श्रवणमात्रसे अनेक पापसमूह नष्ट होजाते हैं. गंगादि श्रेष्ठ नदी सब तीर्थ और सागर ॥ ३४ ॥ नैमिष
एवं जल्लभेज्जीवो मुजसा भवमोचनम् ॥ चतुर्वर्ग लभेदीरोह्यनायासेन सर्वथा ॥३०॥ सदा ध्यायेदिदं रूपं श्याम-
वर्णं चतुर्भुजम् ॥ शंखचक्रगदापद्मजुष्टं भुवनभूषणम् ॥ ३१ ॥ लभेत सकलान्कामान्विशेषात्पुरुषोत्तमे ॥ द्विजराज
प्रवक्ष्यामि तुभ्यं विधिमिह शृणु ॥३२॥ नेदं कस्यापि कथित कदाचिदपि भूसुर ॥ श्रोतव्यमेतत्सततं पुराणमृषिसं-
स्तुतम् ॥ ३३ ॥ यत्पदश्रुतिमात्रेण नश्यति पापराशयः ॥ गंगादिसरितः श्रेष्ठाः सर्वतीर्थानि सागराः ॥३४॥ नैमि-
पादीन्यरण्यानि हिमालयमुखा नगाः॥ कूपाः कुंडानि गर्ताश्च पल्खलानि सरांसि च ॥ ३५ ॥ सुरायतनसुख्यानि
तीर्थानि विविधानि च ॥ सुरा रामाः सुरम्याश्च सर्वकिल्विपतनाः ॥३६॥ तेषु सर्वेषु सुनातो सर्वयागकरःस
च ॥ विद्यावततपत्रातः श्रुत्वाख्यानमिदं भवेत् ॥ ३७॥ जप्त्वा मनुमिमं विप्र कोटिजन्मकृतापहः ॥ मुच्यते नात्र
संदेहः सत्यं सत्ये पुनः पुनः॥ ३८॥
आदि अरण्य हिमालय आदि पर्वत कूप कुंड गर्ल सरोवर छोटे सरोवर ॥ ३५ ॥ देवताओंके प्राप्त किये मुख्य तीर्थ देवताओंकी वाटिका जो पाप
दूर करनेवाली हैं ॥ ३६ ॥ वह उन सबमें खाल करचुका और सब योगका करनेवाला है. सब विद्या वत और तपमें स्नान करचुका जिसने यह
आख्यान सुनलिया ॥ ३७ ॥ हे मुनिराज ! कोटि जन्मके उसके पाप दूर होजाते हैं और मुक्त हो जाता है इसमें सन्देह नहीं यह सत्य है ॥३८॥
। , भा. टी. अ.२४ सूतजी बोले ॥ इस प्रकारके वचन सुनकर वह बाह्मण प्रसन्न हुआ और विमानके ऊपर चढकर हरिके निवासस्थान विष्णुकी सायुज्यताको प्राप्त हुआ ॥ ३९ ॥ निरंतर यह पुराण सुननेसे अत्यन्त शुद्धिकी प्राति होती है. धर्म अर्थ काम मोक्ष वाक्शुद्धि तथा अतुलरूपता प्राप्त होती है ॥ ४० ॥ | धन यश सुख पुत्र पौत्र आरोग्य प्रताप वांछित फल आयुष्य मोक्ष कुलबृद्धिको नारायण प्रदान करते हैं ॥ ४१ ॥ यह वचन सुनकर शौनकादि सूत उवाच ॥ द्विजेश एतच्चारितं निशम्य द्विजोत्तमः प्रीतमना बभूव ॥ विमानमारुह्य जगाम विष्णोः सारूप्यमा- साथ हरेनिवासम् ॥ ३९॥ निरंतरं श्राव्यमिदं पुराणमत्यंतशुद्धिं पठितं प्रयच्छेत् ॥ धर्मार्थकामानपुनर्भवं च यच्छेत वाक्शुद्धिमतुल्यरूपाम् ॥४०॥ धन्यं यशस्यं सुखपुत्रपौत्रारोग्यप्रतापाद्भुतवांछितं च ॥ आयुष्यमोक्षं कुलवृद्धिमुग्रां । ददाति लोकं प्रचुरं द्विजेशाः॥४१॥ श्रुत्वति विप्राः किल शौनकाद्याःसूतं तदोचुर्विनयानतास्ते ॥ धन्योऽसिधन्योऽसि चिरंतनोऽसि जगत्पवित्रीकरणोऽसि सूत ॥४२॥ यथैव विष्णोर्जगदार्तिहारि नाम त्वदीयं च तथैव सूत ॥ त्वं नो गुरुः पूज्यतमश्च विष्णोर्भक्तिप्रदस्त्वं किमु ते वदामः ॥४३॥ तवास्तु कीर्तिर्जगति प्रशस्ता छन्दांसि यावद्धि ततानि वीर ॥ तावत्प्रतापोऽस्तु तवोग्रतेजसस्तवानृणा नो वयमत्र जातु ॥४४॥ तवाननोद्गीतहरिप्रधानश्लोकाक्षराणां प्रतिकोटिदानैः॥ स्यामो नृणां नापि समुद्रनेमिप्रदाः सुराणामपि राज्यदानात् ॥ ४५ ॥ बाह्मण कहने लगे हे सूत ! तुम धन्य हो धन्य हो तुम जगत्के पवित्र करनेवाले हो ॥४२॥, जिस प्रकार विष्णु जगत्के दुःख हरनेवाले हैं हे सूत ! इसी प्रकारका नाम तुम्हारा है। तुम हमारे गुरु पूज्यतम और विष्णुकी भक्ति देनेवाले हो हम तुमसे क्या कहैं ॥४३॥ तुम्हारी कीर्ति जगत्में बड़ी प्रश- स्त है हे वीर ! जिस प्रकार छन्द हैं तैसेही तुम्हारा प्रताप उग्रतेजले युक्त हम तुम्हारी प्रार्थना करते हैं ॥४४॥ तुम्हारे मुखसे निकले हुए नारायणके G - नामरूपी श्लोक अक्षरके प्रति कोटि दानसे हम अनृण नहीं । समुद्रपर्यन्त पृथ्वीदानसेनी उऋण नहीं होसकते ॥ ४५ ॥ हे मनोज्ञ ! विस्तारसे आपने चरित्र हुनाया हम आपसे प्रसन्न हैं हे साधो ! इसी बहानेसे हमें आपका दर्शन हुआ आप शीघ आनेको सुखसे जाइये ॥ ४६ ॥ वह बुद्धिमान इस प्रकार ब्राह्मणोंके आशीर्वादको ग्रहण कर उनकी प्रदक्षिणा करनेसे प्रसन्न हो उन्हें नमस्कार कर अपने स्थानको गये और ब्राह्मण अपने स्थानमें प्रयाहि मा विस्मर नो मनोज्ञ वयं च ते प्रीतियुता भवामः ॥ संदर्शनं ते निमिषेण साधो सुखेन गच्छ स्वचिराग- माय ॥ ४६॥ इत्याशिषः संप्रति गृह्य धीमान्प्रदक्षिणावर्तनजातहर्षः ॥ नत्वा जगामाशु धरासुरेशान्स्वधामविप्राश्च- किताः स्म तस्थुः॥४७॥ अहो किमेत्कथितं द्विजेंद्रा वरिष्ठमाख्यानमिदं पुराणम् ॥ मासस्य दिव्यं पुरुषोत्तमस्य माहात्म्यमयं जगदातिहार ॥४८ ॥ इति श्रीपद्मपुराणे पुरुपोत्तममाहात्म्ये नियमनिरूपणं नाम चतुर्विशोऽ- ध्यायः ॥ २४ ॥ संपूर्णमिदमधिकमासमाहात्म्यम् ॥ स्थित हुए ॥४७॥ अहो ब्राह्मणो ! तुमने सुंदर यह पुराण सुना यह बड़ा श्रेष्ठ है इस श्रेष्ठ आख्यानको श्रवण करो, यह पुरुषोत्तममास जगतका दुःख दूर करनेवाला है-॥ ४८॥ इति श्री पुरुषोत्तममाहात्म्ये पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां नियमनिरूपणं नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥ दोहा-आदिपुरुष अव्यक्त अज, गुणागार गुणधाम ॥ जगपालक पालक असुर, जगद्विदित गुणग्राम ॥१॥ हरिहररूप अनन्त प्रभु, माया गुण गोपार ॥ माधव अशरणके शरण, पुनि दायक फल चार ॥२॥ रामरूप बहुरूप प्रभु, भक्तनके शिरताज ॥ विष्णु जिष्णु मण्डन भुवन, जनके साधत काज ॥३॥ वासुदेव व्यापक सबल, विबुधगणनके ईश ॥ हरत पीर जनकी तुरत, जबहिं नवावत शीश ॥४॥ AR .
i - - भा.. है यह प्रभुको बानि नित, राखत जनकी लाज ॥ सोइ प्रभु मम सब भाँतिसे, पूरे करि है काज ॥५॥ प्रेमसहित कर जोरकर, तिनके चरण मनाय ॥ एहि पुरुषोत्तममासकर, टीका कियो बनाय ॥ ६॥ 'संवत गुण शरं अंक विधु, ज्येष्ठ कृष्ण रविवार ॥ छठतिथि सब विधि सुखकरनि, पूरण ग्रन्थ विचार ॥ ७॥ दीनबंधु अशरण शरण, सकल सुमंगल मूल ॥ प्रभु ज्वालाप्रसादपर, सदा रहहु अनुकूल ॥८॥ वसत रामगंगा निकट, शहर मुरादाबाद । गुण गावत श्रीकृष्णके, नित ज्वालापरसाद ॥९॥ . इदं पुस्तकं कन्यागनगाँ श्रीकृष्णदासात्मज-गङ्गाविष्णोः अध्यक्ष “ लक्ष्मीवेंकटेश्वर " मुद्रणालये मेजेजर पंडिन-शिवदुलारे वाजपेयी इत्यनेन स्वाम्यर्थं मुद्रितं प्रकाशितं च । संवत् १९७७, शके १८४२.
No text on this page.