Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Stotratrayee
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॥ अहम् ॥ कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचिता * स्तोत्रत्रयी * (सकलाहत्स्तोत्र - वीरजिनस्तोत्र - महादेवस्तोत्राणि ।) सूरि न कस्तूर सद् विज्ञान गुरु भ्योनमः कीर्ति कला मेमि SEANING पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिविरचित- कीर्तिकलाव्याख्याविभूषिता ।
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सुणाव निवासी
धर्मप्रेमी श्रेष्ठीवर्य खीमचंदभाईनायुपुत्री
नगीनदास तेमना धर्मपत्नी कमलावेन
कान्तिलाल तेमना धर्मपत्नी शारदावेन
तथा
खीमचंदभाईनावडिलबन्धुनासुपुत्र
मणिलाल चुनीलालना धर्मपत्नी भुरीवेन
उपरोक्त त्रणेना धर्मपत्नीओनी अट्ठाइतपनी
तपश्चर्या निमित्ते सादर सप्रेम
स्वाध्यायार्थे भेट।
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श्री प्राचार्य विनयचन्द्र ज्ञान भण्डार, जयपुर
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आचार्य श्रीविजयकस्तूरसूरीश्वरजी महाराज साहेब
प पू आचार्य श्रीविजयकम्नग्म रिमिप्यम
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पन्यामप्रबर भीकीनिचन्द्रविजयजी गणिवर
॥ अहम् ॥ श्रीविजय - नेमि - विज्ञान - कस्तूरमरिसद्गुरुग्योनमः कलिकालमर्वजश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचिता- स्तोत्रनयी (सकलाऽर्हत्स्तोत्र - वीरजिनस्तोत्र - महादेवस्तोत्राणि । ) । तपोगच्छाधिपतिशासनसम्राटकढम्बगिरिप्रभृत्यनेकतीर्थोद्धारकवालब्रह्म- चार्याचार्यवर्यश्रीद्विजयनेमिसूरीश्वर-पट्टालङ्कारसमयजगान्तमूा- चार्यवर्यश्रीमद्विजयविज्ञानमूरिश्वर-पट्टधर-सिद्धान्तमहोदधि- प्राकृतविद्विशारदाचार्यबर्यश्री विजयकस्तूरसूरीश्वरशिष्य- पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिवरविरचित- कीर्तिकलाव्याख्याविभूषिता । सम्पादक:- -- विक्रम संवत् -२०१६ मुनि श्रीअजितचन्द्रविजयः।
प्रकाशकीय
प पूम फ्यासपतर भीकीविश्वविद्यमणिकर महाराम्से
रक्ति कीर्तिफहानामक संसास तमा प्रिन्वी यास्मासहित-कृत्रिम
सर्वम मीहेमचन्द्रापार्यनिर्मित-स्तोत्रोंमें, द्वात्रिंभिकादमी (नोगत्वा
ववानितिका तथा मन्ययोगव्यक्तवात्रिंच) तवा वीसरगरसके
पार पुस्तकोंमें प्रकासन हो चुके है। मिसका मैन समात्र सपा
भन्मतमी भम्छा म्यागत सा पावर किया गया है। एवं विद्वानों-
ने उनकी मुकाठसे प्रशंसाकी है।
प्रस्तुत सोनवमी पाम के दो मन्मों के प्रकाशनमै उक्त पन्यास
महाराषके द्वारा निर्मित कीर्तिकमनामकी सेहतम्पारण या
हिन्वीमापानुवादसहित उक भापार्यमहाराषक तीन सकीस्वाय
पीरबिनस्तोत्र महादेवस्तोत्र--स्तोत्रोत्र समावेश किया गया है।
मेसे उक्त तीनो म्होत्रोका मकस तब हिन्दीमास्यासहित एक
पुसक मा केक्स हिन्दीमास्त्रसहित सरी पुस्तक ।
सकाईम्तोब उऊ भाचार्गमहाराबविरचित प्रसिद्ध मान्
प्रसन्म विपरिशसाफापुरपपरिता मंगलबारम है।
समाजमें मय वान है इस पिपमें कुछ मा इस स्तोत्रकी
प्रसिद्धि प्रम मावर या प्रतिक्ष्मणक्रियाम मनियायरूपसे पाठनमक
समावेसको देखते हुए एक भृष्टता प्रमेही होगी।
इसका जैन
इस मोपके
2 सस्कृत, हिन्दी तथा गुजराती व्याख्यासहित अनेक प्रकाशन अन्यत्र हो चुके हैं। फिरभी कीर्तिकलाव्याख्याकी अपनी विलक्षणशैली, गब्द -प्रकरण आदिको ध्यानमें रखते हुए पदार्थ तथा भावार्थका स्पष्टीकरण, चमत्कारिक लगे, ऐसे मनोग्राह्य अर्थों का विश्लेषण तथा क के भावोका प्रामाणिकरूपसे अधिकाविक अनुसरण - आदि सभी विशिष्टतायें द्वात्रिंशिकाद्वयी तथा वीतरागम्तवके जैसे ही इस पुस्तक में भी अपने उत्कृष्टरूपसे विद्यमान हैं। वीरजिनस्तोत्र उक्त आचार्यमहाराजविरचितप्रसिद्ध परिशिष्ट- पर्वका मगलाचरण है। तथा इस स्तोत्रका सकलाह स्तोत्रके साथ ही बड़े आदर एव भक्तिसे पाठ किया जाता है-यह विदित है । महादेवस्तोत्र, प्राय अतिसरल समझे जानेके कारण आज तक किसीभी व्याख्याताओंको आकृष्ट नहीं कर सकाथा- ऐसी सम्भावनाकी ना सकती है। किन्तु यहा यह विशेषत ध्यान देने योग्य है कि-इस स्तोत्रके कितने श्लोक अत्यन्त प्रसिद्ध एवं जैन समाजकी भावनाओंको अक्षरदेहमें अत्यन्तसरल एवं प्रभावोत्पादक रीतिसे व्यक्तकरते हैं। जैसे-इस स्तोत्रके अन्तिमश्लोक । यह श्लोक अत्यन्त प्रसिद्ध है। यह इस बातका प्रमाण है कि जैन विचारधारा व्यक्ति नहीं, किन्तु गुणको प्राधान्य देती है। इस स्तोत्रमें परमात्मा, अन्तरात्मा तथा वाह्यात्माका स्वरूप स्पष्टरूपसे बताया गया है। यहा बताये अर्थको देखते हुए ऐसा लगता है कि अन्यग्रन्थके टीकाकारो के वाह्यात्माकापदार्थ अनुमान पर आधारित है। यह, सरल जानकर
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इस खोजकी पठन पाठनमें उपेमाका परिणाम है ऐमा स्सा
परिलक्षित है। तथा इस स्तोत्रकी कीर्तिकलान्यास्या
मम्मपना पाय मा प्रगट ही ज्ञात होता है कि सम्मकी रिसे
मरस खातेहुए भी यह स्तोत्र मर्मसे अत्यन्त सारगर्मित है। इसलिम
कीर्मिकलान्मारमासे इसस्तोमका महत्व प्रकाश माया है-गेमा काना
कोई भरपुफि नहीं। में मपनी योम्यताकी मयादामासे परम
ई। फिरभी इतनातो अवश्य ही समानता हूं समा कर सकना ।
किकीर्तिकरूपयात्या सरस, सारगर्मिन, उपयोगी ई मसनीय।
सना ही नहीं किन्तु इससे रिफाससे अपेक्षित समा एक अत्यन्त
भावश्यक म्मामाकी पूर्ति हुई है।
कीर्तिकमासहिस भन्म प्रासमा वैसे ही इस प्रस्तुत
प्राप्ठनमेभी साफोंके बिन्तीम मावाममदिये गम है। सबा सर
रूपसे प्रत्येक पवाघ पर शान हो भौर इस प्रकार पापकांके
ममत शब्दोक प्रधान भी उपयोगी ही इस रपिसे प्रत्येक पदोंका
अर्थ नया समासभाले पोका पृषको सहलित मर्मभी दिय गये है,
बिससे विद्यार्थियों पर सन्दर्षिक विनासुमोकम्पिये इस प्रकासनकरी
ग्पमागितामें पशि हुई है। जिससे बिना किसीक सहापद्याकेही
काका मभ समगा तब्य समझाया जा सकता है। यह बात पुस्तक
दमनेक बार म्पय ही मगट हो माती है।
इस मगरकी त सर पिरोपतामोको देखते हुए इसके
प्रकासनका हुन सुमक्सर मास होनेसे मेरे लिये तारपाका सभा
- एक शुभकार्यमे भागलेनेके आनन्दका अनुभव होना सकारण ही है। पूर्वमेंमी कीर्तिकला सहित 'द्वात्रिंशिकाद्वयी' तथा कीर्तिकला संस्कृत व्याख्यासहित 'वीतरागस्तव' के प्रकाशनका अमूल्य सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ था । वाचकाके द्वारा उसका आदर देखकर इस प्रकाशनके कार्यभारको द्विगुण उत्साहसे वहन करनेमे में समर्थ हुआ हूँ, जो स्वामाविक ही है। यहा पर. जिनकी अनुकरणीय एव प्रशसनीय आर्थिक सहायताके बल पर इस ' स्तोत्रत्रयी' का प्रकाशन सुचारुरूपसे सम्भव हो सका, उन श्रीखीमचन्दभाई जेसगभाईका आभार सहित उल्लेख करना अप्रासंगिक नहीं समझा जायगा । श्रीखीमचन्द भाई एक धार्मिक प्रकृति, शुभकार्योंमे उत्साहसे भाग लेनेवाले, सफल व्यापारी तथा अत्यन्त मिलनसार हैं । आपका उपरोक्त गुणोके कारण समाजमें एक विशिष्टस्थान है, जो स्पृहणीय माना जाता है। आप तीसवर्षकी अल्प अवस्थामें ही एक साहसिक व्यापारी होनेके कारण व्यापारके उद्देगसे आफ्रीका गये थे। तथा सहज धार्मिक प्रकृति होनेके कारण आपने सुणावमें मन्दिर तथा उपाश्रयका निर्माणकर प्रचुर पुण्य एव सुयशका लाभ किया है । आप शुभनाम 'नगीनदास' तथा कान्तिलाल इन दो सुपुत्रों तथा अन्य परिवारों से भरे पूरे हैं। तथा आपके ही चाचा श्रीमणिलाल चुनीलाल भाई है। जो स्वभावत ही धार्मिक उत्साह्याले, सज्जन तथा आकर्षक व्यक्तित्व सम्पन्त है। इस प्रकार इन दोनों माईयोका सम्पूर्ण परिवार ही धार्मिक प्रवृत्तियोंके
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अनुरागी दया उनमें सोत्साह मागलेनेवाय है।
इस प्रशासन
भार्षिक सामा देकर पूर्ण करने केरिये में इनकेलिये सहर्ष भनी
तमसा प्रगट करता है।
यहां बारकोसे सानुनर निवेदन है कि स्पपि मूफ
संशोपा
मादिमें पूरी सावधानी रस्सी ग्पी है फिरमी रष्टि समा मद्रण वोस
गेमशुद्धि रह गयी है-उसकेम्पेि सहानुभूति पूर्वक क्षमा करेंगे।
या सापमें दिये गये सुमिपत्रका माक्सर उपयोग करेंगे।
मन्तमें इस माशा वा मिसक साब कि बारका
मध्यापक इस स्तोत्रमीके मध्यपन सपा पध्यापनके द्वारा ममा सम्मा
भास हो अधिकाधिक प्रभावित होंगे, तया इस प्रकार भीवीतराग
लिनेभरकी भक्तिसे अपनी भारमाको पवित्र करेंगे इति ।
मदीय
माईलाल, मम्मातात,
पेटत्मदवारम
॥ शुद्धिपत्रम् ॥ सकलाहस्तोत्र कीर्तिकलासस्कृत व्याख्यासहितम् । . प. २ ७ ३ ११ ३ १७ . ११ ९ ५ १२ १८ १४ १ । अशुद्धम् शुद्धम् भूमि भृमी भुवर्मनु भुवोमनु भूस भूस् अवस मुवस स्तौति स्तौति लोत्पत्य लोत्पत्त्य तिक्ष्णी तीक्ष्णी द्यति द्युति. (मद्रमित्यनन्तरम् श्रियमितिपाठे तु अन्तरङ्गारिमथनसम्पद- मित्यर्थ , तस्य एव प्रकृतत्वादि वोध्यमि-त्यधिको वोध्यः ।) शिवपोप शिवश्रीपोप व व मूलति मूलयति निवत्तन निवर्तन दुप दूप महादेवस्तोत्र कीर्तिकलासस्कृतव्याख्यासहितम् । नार्या ना नन्तर नन्तर चय प्रय पेवेत पचेत किया क्रिया चिह चित एवेक एवैक १६ १५ १६ २० ३१ ૨૨ ११ १ ८ १४ ८ १५ १ २७ २८ १ ३३ ३४ - -- ४२ १ १३ . पुग्यै पुष्यै विक स्पमा एक्मृति एकमूर्ति सम्पर्जस्तीन किमरिन्दीमावारसनिम् ४ स्वामिकी स्वामी ५ ૨૨ भरिश शुदिपत्रम् महादेस्तोर्स कीर्सिकलाहिन्वीमापानुगावसहितम् । प्र प मएसम् एसम् के पामे . बारे मराय मप प्रापि मचा भर्म मापियों .
।। अहम् ॥
श्रीविजय-नेमि-विज्ञान-कस्तूर-रिसद्गुरुभ्यो नमः ।
कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितं
॥ सकलाऽर्हत्स्तोत्रम् ॥
सकलाऽहत्प्रतिष्ठानमधिष्ठान शिवश्रिय ।
भुर्भुव म्बस्त्रयीशानमार्हन्त्य प्रणिदध्महे ।। १ ।।
नामाऽऽकृतिद्रव्यभावै पुनतस्विजगज्जनम् ।
क्षेत्रे काले च सर्वस्मिन्नईत समुपास्महे ॥ २ ॥
आदिम पृथिवीनाथमादिम निष्परिग्रहम् ।
आदिम तीर्थनाथ च ऋषभस्वामिन म्तुम. ॥ ३ ॥
अर्हन्तमनित विश्वकमलाकरभास्करम् ।
अन्लानकेवलाऽऽदर्शसक्रान्तजगत स्तुवे ॥ ४ ॥
विश्वभव्यजनाऽऽरामकुल्यातुल्या जयन्ति ता ।
देशनासमये वाच श्रीसम्भवजगत्पते ॥ ५॥
अनेकान्तमताऽम्भोधिसमुल्लासनचन्द्रमा ।
दद्यादमन्दमानन्द भगवानभिनन्दन ॥ ६ ॥
घुसकिरीटगाणायोतेजिताड्दिनखावलि ।
भगवान् सुननिखामी ननोत्वभिमतानि व ॥ ७ ॥
२
समस्तोत्रम्
पप्रमप्रमादेहमास पुष्णन्तु म भियम् ।
मन्तरङ्गारिमपने पाऽटोपविणप्रया ॥ ८॥
भीमुपायजिनेन्द्राय महेन्द्रमहिवाहमये ।
नमश्चतुर्मसहगगनाऽऽमोगमास्यते ॥ ९ ॥
पन्द्रपमप्रभोधन्दमरीचिमिचयोसपा ।
मिसिवन्याननिर्मितेष प्रियेस्तु ॥ १० ॥
करामसका विश्व फम्पन् केभिया ।
अचिन्त्यमाहास्पनिभिः सुमिनियोधमेख ॥ ११ ॥
सत्त्वाना परमानन्दकन्योदनमाऽमुष ।
स्पानाहामवनि.सन्दी सीतल पातु को दिन ॥ १२ ॥
भवरोगप्रन्तूनामावदारवर्षन ।
निमसभीरमणः मेयांस भेमसेऽस्तु म ॥१३ ।।
विवोपकारकीम्त्तीपारकर्मनिर्मिति ।
सुरासुरनरै पूज्मो वायुयूम्म पुनातु र ॥ १४ ॥
सिमलम्पामिनो पार कसकोदसोवरा'।
समन्धि विमगचेसोयरनमायहेत ॥ १५ ॥
सयम्भूरमणस्पर्षिकरुपारमारिणा ।
मनन्तमिवमन्ता पछय सुसभियम् ॥ १५॥
कम्पममपमापमिटप्रामौ गरीरिणाम् ।
पतुपापर्मरेसार पम्नामुपास्महे ॥ १७ ॥
सक्लाऽर्हत्स्तोत्रम् ३ सुधासोदरवाग्ज्योत्लानिर्मळीकृतदिड्मुख । मृगलक्ष्मा तम शान्त्यै गान्तिनाथजिनोऽस्तु व. ॥ १८ ॥ श्रीकुन्थुनाथो भगवान् सनाथोऽतिशयर्द्धिभिः । सुरासुरनृनाथानामेकनाथोऽस्तु व. श्रिये ।। १९ ।। अरनाथ स भगवाश्चतुर्थाऽरनभोरवि । चतुर्थपुरुषार्थश्रीविलास वितनोतु वः ॥ २० ॥ सुरासुरनराधीशमयूरनववारिदम् । कमन्मूलने हस्तिमल्ल मल्लिमभिष्टुम ॥ २१ ॥ जगन्महामोहनिद्राप्रत्यूषसमयोपमम् । मुनिसुव्रतनाथस्य देशनावचन स्तुमः ॥ २२ ॥ लुठन्तो नमता मूर्ति निर्मलीकारकारणम् । वारिप्लवा इव नमे पान्तु पादनखाशव• ॥ २३ ।। यदुवंशसमुद्रेन्दु कर्मकक्षहुताशन । अरिष्टनेमिभगवान् भूयाद्वोऽरिष्टनाशनः ॥ २४ ॥ कमठे धरणेन्द्रे च स्वोचित कर्म कुर्वति । प्रभुस्तुल्यमनोवृत्ति पार्श्वनाथ श्रियेऽस्तु वः ॥ २५ ॥ कृताऽपराधेऽपि जने कृपामन्थरतारयोः । ईषद्वाप्पायोभद्र श्रीवीरजिननेत्रयो ॥ २६ ॥ इति सकलाऽर्हत्स्तोत्रम् ।
श्रीवारजिनस्तोत्रम् ॥ मते मीरनामाय सनाबायाऽयुतभिमा । महानन्दसरोराममराणायाहते नम ॥१॥ सपी पसामाभमाविम परमेठिनाम् । पानिदेन सर्व भीतीर प्रमिवामहे ॥२॥ कल्याणपादपाऽनाम मतगड़ाहिमाचरम् । लिभाम्भोषरवि देव द भीमातनन्दनम् ॥ ३॥ पान्तु न भीमहावीरम्बामिनो देशनागिर । मम्पानामान्तरमसमक्षास्नजलोपमा ॥१॥ पति कालिकासमपर भीहेमकदापामविरपित भीपीरजिनस्तोत्रम् ।
।। अहम् ॥
श्रीविजय-नेमि-विज्ञान-कस्तूर-मरिसद्गुरुभ्यो नमः
कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितं
॥ श्रीमहादेवस्तोत्रम् ॥
प्रशान्त दर्शन यस्य सर्वभूताऽभयप्रदम् ।
मङ्गल्यं च प्रशस्त च शिवस्तेन विभाव्यते ॥ १ ॥
महत्त्वादीश्वरत्वाच यो महेश्वरता गतः ।
रागद्वेषविनिर्मुक्त वन्देऽह तं महेश्वरम् ॥ २ ॥
महाजान भवेद्यम्य लोकालोकमकागकम् ।
महादया-दम-ध्यान महादेव स उच्यते ॥ ३ ॥
महान्तस्तस्करा ये तु तिष्ठन्त स्वशरीरके ।
निर्जिता येन देवेन महादेव. स उच्यते ॥ ४ ॥
रागद्वेपौ महामल्लो दुर्जयो येन निर्जितौ ।
महादेव तु तं मन्ये शेषा वै नामधारका ॥ ५ ॥
शब्दमात्रो महादेवो लौकिकाना मते मत ।
शब्दतो गुणतश्चैवाऽर्थतोऽपि जिनशासने ॥ ६ ॥
शक्तितो व्यक्तितश्चैव विज्ञानालक्षणात्तथा ।
मोहजाल हतं येन महादेव स उच्यते ॥ ७ ॥
मसवेक्तोरम्
नमोऽस्तु ते महादेव ! महामवाविवति ।।
महालोमरिन्मुिक्त! महागुणसमन्वित ॥८॥
मारागो महादेपो महामोहस्तमेव प।
कमायम हसो मेन महादेवः स उच्यते ॥ ९॥
महाकामो बितो येन महामपरिवति ।
महारतोपदेशी व महादेव स उच्यते ॥ १० ॥
महाभो महामानो महम्मात्या महामद ।
महामेमो हतो मेन महादेषः स उच्यते ॥ ११ ॥
महानन्ददये यस्म महायानी महापा ।
महामोगी महामौनी महादेव स उच्यते । १२ ।।
माती महा महाधी महागुण ।
महामपुलमा यस्य महादेव स उच्यते ॥ १३ ॥
स्स्सम्मन यतो शान साकामेकमाकम् ।
भनन्दनीयारिख सपम्मः मेऽमिपीक्से ॥ १९॥
रिपोयमाबिन मोह घर प्रकीर्तित ।
कायात्सर्गी व पर्यी सीससानिविर्मितः ॥ १५ ॥
साकारोऽपि नापारी मूर्योऽमूवलमव प।
परममा पसायास्मा सोनारामा सभेन ॥ १५ ॥
वर्शनशनपगेन परमारमाध्यममम ।
परा शान्तिरहिंसा प परमारमा स उप्पते ॥ १७ ॥
महादेवस्तोत्रम् ७ परमात्मा सिद्धिप्राप्तौ वाह्यात्मा तु भवान्तरे । अन्तरात्मा भवेद्देहे इत्येष त्रिविध शिव ॥ १८ ।। सकलो दोपसम्पूर्णो निष्कलो दोपवर्जित. । पञ्चदेहविनिर्मुक्त सम्प्राप्त. परमं पदम् ॥ १९ ॥ एकपूर्तिस्त्रयो भागा ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा । त एव च पुनरुक्ता ज्ञानचारित्रदर्शनात् ॥ २० ॥ एकमूर्तिस्त्रयो भागा ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा । परस्पर विभिन्नानामेकमूर्ति कथ भवेत् ? ॥ २१ ॥ कार्य विष्णु क्रिया ब्रह्मा कारण तु महेश्वर, । कार्यकारणसम्पन्ना एकमूर्ति कथ भवेत् ? ॥ २२ ॥ प्रजापतिसुतो ब्रह्मा माता पद्मावती स्मृता । अमिजिज्जन्मनक्षत्रमेकमूर्ति कथ भवेत् ? ॥ २३ ॥ वसुदेवसुतो विष्णुर्माता च देवकी स्मृता । रोहिणी जन्मनक्षत्रमेकमूर्ति कथं भवेत् ॥ २४ ॥ पेढालस्य सुतो रुद्रो माता च सत्यकी स्मृता । मूल च जन्मनक्षत्रमेकमूर्तिः कथ भवेत् ? ॥ २५ ॥ रक्तवर्णो भवेद्ब्रह्मा श्वेतवर्णो महेश्वर. । कृष्णवर्णो भवेद्विष्णुरेकमूर्ति कथ भवेत् ? ॥ २६ ॥ अक्षसूत्री मवेद्ब्रह्मा द्वितीयः शूलधारक । तृतीय शङ्खचक्राक एकमूर्ति कथ भवेत् ॥ २७ ॥ 11
८
मारेवस्थानम्
चतुर्मुखो मद्रमा त्रिनेत्रो महेभर ।
सुभुजा मवेधिष्णुरेसमुक्ति का मयेत् ॥ ॥ २८॥
मपुरायां पातो प्रमा, राजगुरे महधर, ।
द्वारास्यामहिष्णुरेकमूर्सि, कप मयेन् । ॥ २९ ॥
ईसयानो मवेद्रामा पूपयानो महेश्वर ।
सामानो मवेठिष्णुरेकमर्पि का भवेत् ! ॥ ३०॥
पहम्ना मवेद्रमा शूलपागि महेश्वर ।
पाणिर्मवेदिष्णुरेकमपि कर्म मवेत् ॥ १॥
कृते बातो मवेदमा तायां च मासर ।
विष्णुध द्वापरे या एफर्षि च भवेत् । ॥ १२ ॥
शान विष्णु सदा प्रोक्त प्रामा पारित्रमुच्यते ।
सम्पवत शिव मोकमन्ममियात्मिका ।। ३३ ।।
विनिजलपानातासनमम्मानाऽऽकाम्सोमास्या ।
झयेतेऽष्टौ मालति गीता वीतरागे सुगुणा ॥ ३१ ॥
क्षितिरिस्युच्यते शान्ति मा प प्रसन्नता ।
निःसङ्गता मवेदाईसाशो वेग उम्पते ॥ १५ ॥
सम्मानो मारमा पावानदयादिमि ।
भयकवावाकाशसाश सोऽमिमीयते ॥ १६ ॥
सौम्पमहिमिन्द्रो पीवराग, समीक्ष्यते ।
धानप्रामकस्पेन स मादिलोमिपीयते ॥ २७॥
महादेवस्तोत्रम् . पुण्यपापविनिर्मुक्तो रागद्वेषविवर्जितः । अर्हस्तस्य नमस्कार• कर्तव्य शिवमिच्छता ॥ ३८ ॥ अकारेण भवेद्विष्णू रेफे ब्रह्मा व्यवस्थितः । हकारेण हर प्रोक्तस्तस्याऽन्ते परम पदम् ॥ ३९ ॥ अकार आदिधर्मस्य मोक्षम्य च प्रदेशक खरूप परमज्ञानमकारस्तेन प्रोच्यते ॥ ४० ।। रूपिद्रव्यस्वरूप वा दृष्ट्वा ज्ञानेन चक्षुषा । दृष्ट लोकमलोक वा रकारस्तेन प्रोच्यते ॥ ४१॥ हता रागाश्च द्वेषाश्च हता मोहपरीषहा । हतानि येन कर्माणि हकारस्तेन प्रोच्यते ॥ ४२ ॥ सन्तोषेणाऽमिसम्पूर्ण प्रातिहार्याऽष्टकेन च । ज्ञात्वा पुण्य च पाप च नकारस्तेन प्रोच्यते ।। ४३ ।। भववीजाऽङ्कुरजनना रागादय क्षयमुपगता यस्य । ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्मै ॥ १४ ॥ इति महादेवस्तोत्र समाप्तम् ।
अध्यात्मसार
फीसिंफलाम्पास्यासहिता (यन्त्रस्वः)।
(सम्पूर्ण-मागों में)।
aux
HEASURESERRORSE
॥ अहम् ।।
श्रीविजय-नेमि-विज्ञान-कस्तूर-सरिसद्गुरुभ्यो नमः ।
कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितं
॥ सकलाऽर्हत्स्तोत्रम् ॥
पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगाणावरचित-
कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ।
सकलाऽर्हणाग्रभूमि सकलाऽहंगुणाकरान् ।
सकलाऽहंध्येयरूपान् नमामि सकलाऽर्हतः ॥ १ ॥
सकलाऽर्हद्भक्तिवशः पन्यासः कीर्तिचन्द्रोऽहम् ।
सकलार्हत्स्तोत्रस्य प्रकरोमि कीर्तिकलाभिधां व्याख्याम् ॥
अथ कलिकालसर्वज्ञो भगवान् श्रीहेमचन्द्राचार्यस्त्रिषष्टिशलाका-
पुरुषचरित्र नाम महाप्रबन्ध चिकीर्षुर्विघ्नप्रशमनपूर्वकप्रारिप्सितपरि-
समाप्तिकामो मङ्गलमाचरन् कीर्तनीयाश्चतुर्विंशतिमर्हत एव सकल-
मगलाऽविष्ठानतया स्मरन्नादौ गुणा पूजास्थानमित्याहन्त्य प्रणिदधान
आह-
सकलाऽहत्प्रतिष्ठानमधिष्ठानं शिवश्रियः ।
भूर्भुवःस्वस्त्रयीशानमार्हन्त्यं प्रणिदध्महे ॥ १ ॥
सामन्तोषम् सकतेति । सफलाईप्रतिष्ठानम्-सफामना मूसपर्वमान भविष्यता नवेल द्वयोइनामेव माताम् , महति सुरासुर नरेन्याविरुवा पूजामिन् , म द प प स चेति सेवामूपमा वीपहरमाईस्क्वाध्यत्वेन प्रसिवानाम् , यदुधम् - ' समागम पूमार्मानेवोत्तमोक्मो सोके । देवपिनरेन्द्रम्पः पूपेम्योऽप्पमसात नामिति । "पषमागिननामोहरप्पादहस्याऽमातापार्जन पूरे दरादित्यादि "ति कम्पचिपाल्पानं एम्बम्मुत्पादनोपायान्तरपरका फपधिनेयम् । मन्दाना व्युत्पचिनियमाऽमाताविति योमम् भौपित्यादेष छन्दव्युत्पावने याच्छिकम्युत्पचेरमोम्पत्वमिति व्युत्पति- निवः । तेगा सकार प्रतिष्ठान प्रतिष्ठासापनम् , पूमाहेवरिपर्व । पाईन्स्यादेव पन् , मन्यबा क. प्रतिविशेष स्मादन्पेम्पसल । यदा सफल्म मन्तिः प्रतिष्ठान प्रतिष्ठस्पोति तर आमम इसी । मापि पईस न स्पाई काया स्यात् । । एतेनाऽस्पिपमिमाने प्रीजमुफम् । यदि सफलाईता पनिमासान, सकाम भान्तो या पदामप, मस्स सकसानमेवाटतो प्रणिपेक्त्वावगमिषेयत्वम् । मदुतम्-'प्रमापारन गुणानामिति । येन पयपाधी मगिपेपन हम स्वस्य पविति किमु पफव्यमिति चेति मातः। ननु मच ससाकमाईतिष्ठामम् , न प ताक्या सस्प कोऽपि स्म, मा प्रमोक्नमसि मन्दोऽपि सपन इति पेसाप-शिवभिया शिवा निरुपयवत्वानिरपासवानमातिसहायतालयमावलाच कामे कारपोप-पराधयमा या भीममीनाऽतिपादिसमविस्तस्याः, सिर- कान्तेन कल्याममयसान्नोसस्य या भीरनन्तम्भवासमामन्दावि ३ । कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् समृद्धिस्तस्या वा, सर्वकल्याणसम्पद इत्यर्थ. । "श्व.श्रेयस शिव भद्रं कल्याण मङ्गल शुममिति, "शोभासम्पत्तिपद्मासु लक्ष्मी श्रीरिव दृश्यत" इति चाऽमर.। अधिष्ठानम् स्वस्मिन् याऽधिष्ठितिरधिकं विशेषेणेतर विलक्षणतया स्थितिस्तत्साधनम् । अधितिष्ठत्यस्मिन्निति कारणे कार्योपचारादधिष्ठानसाधनेऽधिष्ठानोक्तिः, आश्रय इत्यर्थ. । । अर्हत्स्वेव तादृशश्रीस्थिति., तत्र हेतुश्चाऽऽर्हन्त्यमित्युपचारादार्हन्त्यमेव तदधिष्ठान- मिति हृदयम् । अर्हन्त्यादेव तादृशश्रीलाभो नाऽन्यथा, कथमन्यथा- हत्स्वेव तादृशश्री र्नाऽन्यत्रेति तालाश्रीलाभ एवाऽसाधारण प्रयोजन- मित्यतस्तदवश्यं प्रणिधेय प्रेक्षावतेति भाव. । तदेव गुणानुक्ता महिमानमाह-भूर्भुवःस्वस्त्रयीशानम्-भूर्नागलोक , पातालमित्यर्थ । भुवर्मनुष्यलोक स्व. स्वर्ग तेषा त्रयी तस्या ईशानमीशित्वाऽनुगुणमहिम, धर्मधर्मिणोरमेदाद्धर्मी चेदीशानो धर्मोऽपीत्येवमुक्तिरिति बोध्यम् । ईशानत्वप्रयोजकत्वात्तादर्थ्यात्ताच्छन्दधं च । अर्हन् हि भूभुर्व स्वस्त्र- यीशान , यदुक्तम्----" मूर्ना यम्मै नमस्यन्ति सुरासुरनरेश्वरा इति, “ छत्रत्रयी त्रिभुवनप्रभुत्वप्रौढिशसिनी "ति च । न हि कोऽप्य- नीशानमानमति, य च सर्वे नमस्यन्ति स सर्वेषामीशानः, अत एव छत्रत्रयाद्यतिशय इति ध्येयम् । भूस, भुवसि "ति यथाक्रम नागलोकमनुष्यलोकवाचकाविति सिद्धहेमवृहद्वृत्ति । “स्वरव्यय स्वर्ग- नाकत्रिदिव त्रिदशाल्या" इति चाऽमर । महान् महिमाऽऽर्हन्त्यस्य, यदुत तत्प्रभावात्तिभुवनेशानत्वमिति भाव. । यदपि समाधानम्- अत्राद्यन्तयोद्स् स्वश्श्ब्दयो• पातालनाकिलोकवाचकयो सन्निध्यात्त- दन्तरालवर्तिभुवशब्दस्य मर्त्यलोकवाचकत्वमनन्यगतिकत्वेन नाऽयुक्त- Y समर्मस्तोत्रम् मिति । ताऽनन्मगतिकत्वेनेस्पसममसम् । महि गतिर्नास्तीति याइच्छितोय करप्यते । मन प मुक्स समस्म मप्लोमा उकामपासमन्य एवं गतिरिति कुतोऽनन्यगविकत्व मिस । शिम माह-आईन्स्यम्-महतो मात्र कर्म पाऽऽन्त्यम् । "मोश प" (सि हे ७१-६२) इति इममि न्तादेशे प सिम्पति । हा मी पार्षच्छब्दप्राविस्वनिमयः। सहापरिशयादि मानानिमी पाछन् । , प्रमिदमहे-कामवाल्मनोमिसन्मय सापयाम, या हि सकसिनिस्पदिसि हदयम् । तद्धि मारूपत्वामनिममे नतूपासनाविकमईसीति तमिदमहे इति भावः। अमिस्तोत्र सर्वत्रा अनुष्टुपन्द ॥१॥ तदेवमुफमकारेण धर्म स्तुत्वा पर्मिणे स्तौति- नामाऽविद्रष्यमापापनास्तिजगमनम् । से काले च सर्वस्मिता समुपासहे ।। २ ।। मामेति । सर्वस्मिन्सपोर, मवयफदेष बाते मरसम्हातिदेहायो पत्रपदनाम्मे, काले-मासम्मिापास्म के प्रावधान फाले, वा समुष्मे तेन स्पैसिमिति देताम्मोईयोविशेषणम्, सर्वमिन् घेते सस्मिन् काले चेत्यर्थ । लिमगवनम् जगमा नस्वकम्प इयोरेव वा भगतो मुवमानो मन माम् , 'मेको भर मया" सिम । मन मनमिति सामान्योतया देवान्तरणको पक्षपाप्ताऽमाप सूच्यते । मामामनियममा.माम मामनिक्षेपनि भासम्झापीराषिः, मी साफ्नानिक्षपरिषयोईपतिमावि, धर्म
कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम्
५
व्यनिक्षेपविषय., यस्य जीवस्याऽहत्पर्यायो भावी स भविष्यदहज्जीव ।
भावो भावनिक्षेपविषयोऽहत्पर्यायापन्नः समवसरणाद्यवस्थितोऽहन् ,
रेतैश्चतुर्भि प्रकारै , पुनतः शुचीकुर्वत , नामस्मरणादिना नाम्ना
कृत्वा, आकृतेर्वन्दनपूजनादिनाऽऽकृत्या कृत्वा, द्रव्यस्य पितृत्वपुत्रत्व-
। 'सख्यदास्योपचारपरिचरणादिना द्रव्येण कृत्वा, भावस्य देशनाश्रवणा-
*ऽतिशयादिना भावेन कृत्वा चाऽन्तर्वहिर्मलराहित्य जायते जनम्येति तैः
- प्रकारैरर्हन् त्रिजगज्जन पुनातीत्युच्यते इति बोध्यम् । एतेन तेषा-
रेमवश्यसमुपास्यत्व सूच्यते । येन हि स्वस्य पवित्रीकरण सोऽवश्य
सेवनीयो भवति मतिमताम् , अतस्तादृशान् , अर्हतः अर्हत्पदवाच्या-
नृषभादितीर्थकृत., समुपास्महे सम्यग् भक्तिश्रद्धादिनिर्भरतया पर्युपा-
सहे, यथा पवित्रीकृता. स्याम इति हृदयम् । त्रिजगत्पवित्रीकरणलक्षणं
वैलक्षण्यमहतोऽसाधारणमिति तात्पर्यम् । यद्यपि सर्वत्र सर्वदा च न
भावाऽहतो विद्यमानता, तथापि नाम्नाऽऽकृत्या द्रव्येण च पवित्रीकार-
क्रियासम्पत्ते का पि भावेन च तत्सम्पत्तेस्तैश्चतुर्मि पवित्रीकरणस्य
सामान्यत उक्तियुज्यत एव । नहि सर्वदा सर्वत्र च तच्चतुष्टये तात्पर्य-
मसम्भवादिति ध्येयम् ॥ २ ॥
1
तदेवमुक्तप्रकारेण सामान्यतोऽहंतः स्तुत्वा तद्विशेषान्
यथाक्रम स्तुवन्नादौ प्रथममृषभनाथ स्तौति-
आदिम पृथिवीनाथमादिमं निष्परिग्रहम् ।
आदिमं तीर्थनाथं च ऋपभस्वामिन स्तुमः ॥ ३॥
-
समतोषम्
माविममिति । आदिमम्-मादौ मव माविम
वारणम् , प्रथिवीनायम् पृषिम्मा नाम ईश्व इति धम् , पुग्यो
प्रक्रिया न कोऽपि एमाऽऽसीत् । काखममागलोकेऽपक्सामा ।
सामा वनियमनायेन्द्रातिमि पमनापस राम्यामिपेकपा मागणी
पर्मिसमिति गोप्यम् । ननु पनिीनायो न स्तुतिमा साना
फामनाऽमाणावामुमिककामनायावतोऽसिदे येत्यस माह-आदिम
मथमम् , निप्परिणाम् परिमझो पाराशारादिशमिता, समसारिक
रहितो निप्परिमो निन्यस्त्रम् , युगायो स एव प्रपम परिगि
वानित्यागम इति पाध्यम् ।
ननु पायो निप्परिमहा इति न हास
कस्वाऽपि निप्परिप्रहेण स्सस्पताऽऽयाति समानस्वादित्यत मार--
आदिम तीर्पनायम्-तीर्थ सानुसावीमाक्तमाक्किापा समुपास
स्मक साखस्स माय इस विधिनिषेभीपदेशकल्यानापस्तीमार इल।
मेकान्तिकामरैवी प्रारमेन माफ्ति फलमनाग मानिसवान् । देक
मातपनन्तरं न सममसरणे सेम तया देख्नया प्रमुवान गरी
महात्माऽमुताना ममोर्षिहारकारे पतुर्म साप्रातविस्वागभ
पा समुचये। मयामिकोकमाऽपि सर्वत्र कानमेने सिवर्ण
पपरि, वापि सर्वत्र मापम्पन पैतरवमयसपनायासानुदिन
बाम्यम् । स क इस्यपेक्षपामा-मामसामिनम् अपमपात
पबमस्तीभात, भामिन् गभस्मे गगन्या स्वमे प्रथमसूपमवारगम |
साम्मनपाय पितृम्मामुपमैति लामिस्व, सपाऽमो स्वामिभयहार
मनादिनोपदेशाविना १ प.मबावामी, तम् स्तुमा
माम । न मोजविग्यणगुणमिर घमुसेनैवेनि पोष्पम् ॥ ३॥
कीर्तिक्लान्याख्याविभूपितम् यथा अथ द्वितीयमजितजिन स्तुवन्नाह- अर्हन्तमजितं विश्वकमलाकरभास्करम् । अम्लानकेवलाऽऽदर्शसङ्क्रान्तजगतं स्तुवे ॥ ४ ॥ अर्हन्तमिति । विश्वकमलाकरभास्करम् विश्वं जगत् । तास्थ्यात्वाच्छन्दयमिति जगजीवसमुदयः कमलानां स्वनामख्याताना पुष्पविगेपाणाम्=पङ्कजानामाकर खनिरिव, तस्य प्रबोधकत्वात्तत्सम्बन्धी भास्करः सूर्य इच भास्कर इति गौणी लक्षणा, त तादृशम् । हि सूर्य स्वकिरणैः कमलानि प्रबोधयति=विकासयति, तथाऽयं जनान् देशनावाभि प्रबोधयति-प्रबोधं ददातीति क्रियासाम्यादुपमा । सा च कमलपबोधोऽन्यो जगत्प्रवोधश्चाऽन्य इति द्वयो देऽप्यमेदाऽध्यवसाय- रूपाऽतिशयोक्तयनुप्राणिता । एतेन तस्य तादृशी देशनावाग्यया विश्वं प्रबोध्यत इति वचनाऽतिशय सूच्यते । खानिरि "ति हैमः । तत्र हेतुगर्भ विशेषणमाह-अम्लानकेवला- ऽऽदर्शसङ्क्रान्तजगतम्=अम्लानोऽमल , अतिस्वच्छ इय॑थ , तादृशो यः केवल तदाख्यं क्षायिक ज्ञानमादर्शो दर्पण इव, तत्र सक्रान्तं विषयतया प्रतिविम्बित जगत्तास्थ्यात्ताच्छब्दयमिति जगत्पदाथसार्थो यस्य ते तादृशम् । अत्राऽम्लानेति न केवल विशेषणमन्यभिचारात्सम्भव- व्यभिचाराम्या विशेषणस्य सार्थक्यात् । आदर्शविशेषण तु युज्यते, तादृशश्चैव स केवलज्ञानोपमानं भवितुमर्हति, तस्यैव च प्रतिविम्ब- सक्रान्तियोग्यताऽपि । , किन्तु तथा सति तस्य केवलपदानन्तरमादर्श- पदसमभिव्याहारेण प्रयोग उचित । तथाप्येकनौचित्यादन्यल च तथा- स्यादाकरः खनिः ८ सायर्मयोगम् स्वामपाधिमई केवममिति मोफसया प समस्खस्म फेवावति पदस्पैच सविशेषणमिति बोम्पम् । मत्र कसमस्याऽजतिस्पतया का मगत्प्रतिविम्नीमाव उनित पर। किन्तु साने मतिगिम्भीमायोजन भादर्श पाऽन्य इति पूयोर्मेदेऽप्यमेवाध्यवसाय इत्यतिसमोक्तिमत्म- पमा । पप यस्म माने जगत्सरन्त ठस्य जगप्रबोधनाम मसमिति मायबोधे भान नगरसदान्तेहेतुमायापनिदेखक काम सितम् । तथातिश्योकपनुमाणितोपमोजीविसमिति सादर । पतेन सस्म जगविपक शानमिति ज्ञानातिश्यो धन्यते । “दर्पणे मुरा- ऽऽवति 'स्फमर । मन एप, हन्तम्-सुरासुरनरेन्द्राविस्ता पूजाहतीति ताशम् तीरमित्पर्य । मोहि धियोमा केबलशानवान् सोईनेर मक्तीति मावः । यो हपामुपदेशक तस्य सर्व स्ता पूमा युफ्त एवेति पूजातियो परते। ई- सकम्पेशिएपहेतविज्ञासानिासे विशेष्यालयापरणाप पात्र- अजितम्म विवो बक्षीतो रागादिमि पाऽऽन्तरानिमिरिति स प्रयन्वयितमामा इतीपस्तीहरः भमिन् गमस्थ मननी प्रते मया न बितेति सपनुसारेण पित्रा तामिताऽमिल्सय, वम् । मो? रमितस्ते तेनैव पिता इति यो पीवरग स एषोकविशेषमर्माति मान्य इति मात्र । पतेनामामाऽपगमाऽविश्वयो भन्यते । स्तुवे- स्वनिरपीकरोमि । भोकापन पूर्वत प गुपनमिस्पसङ्गति! मानीया एकमिनयेऽप्यायो पहुवफ्नाऽनुशासनात् एकमोऽस समापेयम् ॥ १॥ wan ९ - स्यादुपवनमि "त्यमरः। तेषा कुल्यातुल्या उद्यानसारिणीसन्निभा । कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् अथ तृतीयं श्रीसम्भवजिन स्तुवन्नाह- विश्वभव्यजनाऽऽरामकुल्यातुल्या जयन्ति ताः । देशनासमये वाचः श्रीमम्भवजगत्पतेः ।। ५ ।। विश्वेति । देशनाममये देशना दानगीलतपोभावभेदाच्चतुर्विध- धर्मोपदेश , यदुक्तम् - ' दानशीलनपोभावभेदाद्धम चतुर्विधम् । मन्ये युगपढात्यातु चतुर्वक्तोऽभवद्भवानि "ति । केवलोत्पत्यनन्तर देवैविकृते समवसरणे केवलिना जिनेश्वरेण दीयमानं प्रवचन देशनेति प्रसिद्धमिति वोध्यम् । तस्या देशनाया य समय कालस्तस्मिन् , देशनासमयभवा इत्यर्थः । यद्वा देगनाया य समय सङ्केत आगमादिरूपेण प्रवृत्तः सम्प्रदायस्तस्मिंस्तत्र वर्तमाना श्रुतरूपा वाच ता:=प्रसिद्धाः, बहु- विषयत्वान्नानाविधाः श्रोत्रनुकूलभाषापरिणतिशीलत्वाच्च नानाप्रकाराः, यदुक्तम्- "देवा देवी नरा नारीमसुरा आसुरीं तथा । तिर्यञ्चोऽपि च तैरश्ची मेनिरे भगवतिरमि "ति । ततश्चाऽखिलवाग्विलक्षणत्वाद- ननु भवतु तास्तथा, तेनाऽस्माक को लाभ इत्यतो विशेषणमाह-विश्वभव्यजनाऽऽरामकुल्यातुल्या= सर्वे ये भव्या. सेत्स्यन्तो जना , सेत्स्यन् भव्योऽन्योऽभव्य इति हि सम्प्रदाय । विश्वे जगति ये भव्या जना इति वा, त आरामा उप- वनानीव, वाक्सलिलसेचनादिना पोषादिमत्त्वसाधर्म्यात् । निर्वचनीया इत्यर्थः । I=विश्वे . "आरामः यथा हि सारिणीसलिलसेकेनोपवनवृक्षलतादयो वर्धन्ते पुष्पफलादि- समृद्धिमन्तश्च जायन्ते, तथा भगवद्वच प्रतिपाद्यधर्मसम्पर्कमेत्य भव्य- पाठकलापतिरिव बगपति, भिमा सामापनिश्पसपया परितण पवाऽमिल्प, स पाऽसी नगरपतिम वस्य । पापा-उपरेर पतरऽप्यतिमा प्रदिपाविमा योध्या । या मायमापति प्रभावोत्रम् मना उतरोतरं गुणदिमामुरन्ति मुख्यारिफासमवाय मार्ने सडक विधायकनाऽऽरममावस्मा' इति । "पाने अन्य सारगिरि "ति हैम । भीसम्भवजगत्पते मान सदुपदपनि सम्मवमवाल्यस्मृतीमस्तीमा, मम्मिन् गमे राम्मे मक पान्यादिना सममकीत पितम्या तानुसारेण सम्मम इति सम्मान मि बाप्प , मनानीति या, बयन्ति-सोकग मन्ते । ताल वैशिष्टयस्मायाऽनामात् । मयुक्तम्-" प्रयत्पभूप्य किन ! म वे" वि माव । एतेन वाशिम प्रतिपादित , निमसार- म्युत्पत्सा य फस्पापोतुस्सस्य समपाय स्पस्यागमातिय, এ অধিকমূল্প বল দুর্দশা, মন देशवि देवनासमये इत्मनेम नसूमाक्तिया ज्ञानातिसमय मतिका वितोपगसम्मः ॥ ५॥ मम पसुमिनन्दनबिन नौमि अनेकान्तमवाममोधिसमुछासनक्द्रमा । दपायमन्दमानन्द मगवानमिनन्दनः ॥ ६ ॥ ममेकेति । अनेकान्तमामोघिसमुहासनपन्द्रमान भनेकजन्ता भविरुद्धा सरसीवखादयो विरुवा निस्पानित्यवसा सालसामान्पविशेषामिमप्याजमिनप्यस्वमेवाऽमेवाषयो पर्मा भी कीर्तिकलाव्याख्या विभूषितम् ११ पर्यवसिता एकस्मिन्नेव वस्तुनि अपेक्षाभेदेनाऽविरुद्धतया समावेशा. सिद्धान्तविषयीकृता यसिंस्तदनेकान्तम् , तच्च तन्मत वादश्चाऽने- कान्तमत स्याद्वादः, यदुक्तम्--"स्यान्नाशि नित्य सदृशं विरूपं वाच्य न वाच्य सदसत्तदेवे"ति “अनन्तधर्मात्मकमेव तत्त्वमतोऽन्यथा सत्त्व- मसूपपादमि"ति च । नित्यानित्यत्वादीनामेकस्मिन् समावेशप्रकारश्च मत्कृताऽन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकाकीर्तिकलातोऽवसेय । मृताव- वसिते रम्ये समाप्तावन्त इष्यत" इति विश्व । तदेव चाऽङ्गोपाङ्गा- द्यतिविस्तृततया नयभङ्गादिकल्लोलमालाऽऽकुलतया मिथ्यात्वमतिदुर- धिगमतया चाऽम्भोधि पारावार इव, तस्य समुल्लासने देशनावाक्च- न्द्रिकामि समुत्कर्षसमापादने चन्द्रमाश्चन्द्र इव । चन्द्रेण हि समुद्रस्यो- लासन प्रसिद्धम् , तद्वदनेनाऽप्यनेकान्तमतोल्लास इत्युपमा, सा च समुद्रोल्लासनमन्यदनेकान्तमतोल्लासनं चाऽन्यदिति द्वयोर्मेदेऽप्यभेदरूपा- ऽतिशयोक्तयनुप्राणिता । चन्द्ररूप इत्यर्थे तु पूर्वत्राऽम्भोधिरूप इत्यर्थों बोध्य । ततश्च परम्परितरूपकाऽलङ्कार । अत्र पक्षे च चन्द्रेण समुद्रस्योल्लासनमुचितमेवेति भाव. । “हिमाशुश्चन्द्रमाश्चन्द्र " इत्यमरः । यद्वा-अनेके, अन्ता अम्यते गम्यते प्रतीयत इत्यन्ता धर्मा विरुद्धा अविरुद्धाश्च, तेषा यन्मतमेकस्मिन्नेव वस्तुन्यपेक्षामेदेनाऽविरुद्धतया कथञ्चित्समावेशात्स्वीकार , अनेकान्तवादः स्याद्वादाऽपरपर्याय इत्यपि व्याख्यानम् । शेप पूर्ववत् । अत्र हेतुगर्भमपर विशेषणमाह- भगवान्-प्रशस्तो भूमा च भगो ज्ञानादिरस्त्यस्येति स तादृशः । यदुक्तम्-" ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य तपस.श्रिय । जानवैराग्ययो- श्चैव पण्णा भग इतीरणे "ति । प्रशस्तभूमज्ञानादिमतोऽनेकान्तमतसमु- .
मनोरम् सनसन नातिरिति माप । विशेष्यमार-अमिनन्दनायास्म म्तृतीयस्तीहरः अमिन् गभस्मे राज्ये सर्वतोऽप्यानन्दमाापितम्मा सानुसारेण वाऽमिनन्दनपमित्मा, अमिनन्दस्तीत्पमिनन्वन इल वपनाम । नत्पावित्वादन । अमन्द-न मन्दमस्पममन्दमनस्पम्, सातासण्डतयाऽनन्त मिपर्व । जन्मासस्त्वनित्यवादिना भन एवेति मोमम् । बानन्दम् सुखम् , " स्यावानन्दपुरानन्द धर्म साम्मुखानि पे "स्पमर । दधात्मदातु मानापो सप्तमी का मानव सया न तु मेरणेति पोध्यम् । मानन्दपदानमार्थनेन प सस्मानपनामता पयते । षा सामाऽतिशप मविपाविता, इसे अत्यसिष्ठमा म्मानिन्मामेनोपक्षिसा वेदनीया । किसाऽऽनन्वयत्य- ज्यपानुपपत्त्मा तस्य माआय इस्पपायाऽपगमाविसम , मगरसदेन तु सर्वे एवाधीशमा प्रतिपादिता बोध्या ॥६॥ अब पाप मुमतिजिन सबभाह- घुसस्किरीटशाणाम्रोचेजिताधिनस्तापतिः । भगवान् सुमतिस्वामी धनीस्वमिमवानि पा ॥७॥ पुसविति । पुसकिरीटभागायोगविवाधिनस्तापसि। विनि सीदन्ति इति ते वाच्या पुस्खो देश सेन्द्रास्तेपो मिलीयन मुकुटान्येव कठिनलावीक्ष्यीघ्रणयोम्पत्वात् शाणा समातितिक्ष्णी- कारसापरकम्पमस्तेषाम मेरममागेः फोटिमिरिर । उपेसिवा निरन्तरसपानात्मकमर्पमतस्तामयापारमेन सीसीस्तान एष वीस- शिशमसम्पमता मीताजपोः पादयोनमानामालमिः पचिस्प स कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् १३ " पादित । तादृशः । देवा हि भगवन्त भक्तिश्रद्धाऽतिशयादतिसान्निध्येन तथा प्रणमन्ति यथा तेषां किरीटाग्राणि भगवदविनखसङ्गतानि भवन्ति, ततश्च मुहुर्मुहुस्तथासंघट्टनेन नखाना तानव दीप्तिविशेषश्च जायते । शाणाऽने घर्षणेन शस्त्रादीनामुत्तेजन प्रसिद्धमेव । अत्र शस्त्राणामुत्ते- जनमन्यन्नखानां चाऽन्यदिति द्वयोमेंदेऽप्यभेदाऽध्यवसायमूलाऽतिश- योक्तिजीवित किरीटशाणेतिरूपकम् । " आदितेया दिविषद" इति, पदविश्वरणोऽस्त्रियामि"ति चाऽमर । अत्र पूजाऽतिशयः प्रति- मुकुट पुन । मौलि किरीट कोटीरमुष्णीषमि "ति, 'शाणस्तु निकष कष" इति च हैम. । देवकृतप्रणामसमर्थनाय विशे- षणान्तरमाह-भगवान् सहजाद्यतिशयाद्यैश्वर्यादिसमन्वितः, सुमति- स्वामी=सुशोभना केवलाख्या मतिर्ज्ञान यस्येत्यन्वर्थनामा, अस्मिन् गर्मस्थे मातुः सुमतिभावात्पितृभ्या तदनुसारेण सुमतिरिति कृताऽभि- ख्यश्च सुमतिनामा पञ्चमस्तीर्थकृत्स चाऽसौ स्वामिवत्पालकत्वात्स्वामी सः, एतेन ज्ञानाऽतिशय. प्रतिपादितः । वा= स्तोतृणा वाचकाना च, अभिमतानि-अभीष्टानि, बहुवचनेन सर्वाऽभीष्टप्रदत्व सूच्यते । यो ह्यभिमतप्रदः सोऽवश्य स्वय निरपायः स्यादित्यपयाऽपगमाऽतिशयः सूचित. । वागतिशयश्च साहचर्याद् भगवत्पटमहिन्ना च सूचितोऽवगन्तव्यः । तदेवमजितस्वामिस्तुतौ ज्ञाना- ऽतिशयः सम्भव जिनस्तुतौ वागतिशयोऽभिनन्दनजिनस्तुतावपायाऽप- गमाऽतिशय सुमतिस्वामिस्तुतौ च पूजातिशय. क्रमशः कण्ठरवेण प्रति- पादितोऽवगन्तव्य ॥ ७॥ तनोतु-सम्पादयतु ।
मस्सोमम् अब पर पमपममिम सक्माह- पपप्रमप्रमोहमासा पुष्णन्तु यः भिपम् । अन्तरिमयने कोपाष्टोपादिवासमाः ॥८॥ पति। पपप्रमप्रमोसमम्म कसमस्प प्रमेव ममा पतिः- माणपुतिर्यस्य स वात्स इत्पन्नामप्ता सूध्यते । वाऽस्मिन् गर्मस्पे मात पयसम्पादोहदमावसितम्या स्वनुसारेण पमपमेति तामिन पाठस्तीपहर , स पासौ प्रमगति मान्यविना अगस्थिति प्रमुरभि पसि., पप, स्यु प्रमारमुषिस्त्विमामाश्यविपुस्लिीप्तम" छ "मपरिशोऽपिप" इति पामर । अन्तरदारिममने मन्तर हानीघेस्पन्तरगा , बहानि या मीरान्त वावविसनिहितानि तमे मेऽन्तरास्मसम्बद्धत्वावतिसलिहिता इरफ्न्तरङ्गा भतिसनिहिता भास्म सेम्बदा मम्पुरमनि भेफ्सपरिपबित्लावरम रिपब इस कर्मकमाया- रस्तेष' मबन मगदुन्मूख्ने विपये कोपाऽष्टोपादिवकोप- कोपस्तस्म प पटोप बामेशस्तस्मातारिवति हेतूमेश्य । केप बिनाना कर्मादीनो समूहमन्मूलन यथा-- सणे मान्य फर्मकक्ष- मुन्मूसमति मुस इति । कोपकापाऽमपरोप" इस्वमर । भावशाऽऽटोप संरम्मे पति इम । अरुपापमपमतादम्मक- सगटोणा मेण कोनापाव । मम्मकारागस्तरम" स्ममरा । रिमपनाना पावेशान्मसनेत्रापासप्प प्रमिदम् । मस्स तु कोपाटोपानामपिमा किन्तु सामातिपयनम्मिचदम्पसायाबसूमेशा । शिव्यमाह-मासा-शरीरउपम , पास्वोतमामन्येपो - कीर्तिकलान्याख्याविभूषित १५ शिवम् भद्रम्, पुष्णन्तु-परोत्कर्षमानयन्तु, पद्मप्रभप्रभोर्दर्शने तादृश्य- स्तदेहभासो मनोज्ञत्वादहत्यनुरागविशेष जनयन्ति, अर्हद्क्तया दिना च शिवपोषः प्रसिद्ध एवेति भावः । अत्र कोपादन्तरङ्गारिमथने आरु- ध्यस्य कोपहेतूत्प्रेक्षा न सगच्छते। यो हि य मथ्नाति स तस्य प्रमुरिति तस्य तेन प्रभावितत्वोत्प्रेक्षा न मनः प्रीणयत्यनुचितत्वात् । किञ्च कोपान्मुखनेत्रादीनामेवाऽरुणिमा प्रसिद्धो न तु देहस्येति सुधीभि- विभावनीयम् ॥ ८॥ अथ सप्तम सुपार्श्वजिनं स्तुवन्नाह- श्रीसुपार्श्वजिनेन्द्राय महेन्द्रमहिताहये । नमश्चतुर्वर्णसङ्घगगनाऽऽभोगभास्वते ॥ ९ ॥ श्रीसुपार्श्वति । चतुर्वर्णसङ्घगगनाऽऽभोगभावते चत्वारो वर्णा. प्रकारा साधुसाध्वीश्रावकश्राविकारूपा यस्मिन् स तादृशश्चा- ऽसौ सङ्घश्च स साध्वादीना बहुसङ्ख्यकत्वान्महत्त्वाद् गगनस्याऽऽका- शस्याऽऽमोगो विस्तारस्तस्य भावानिव प्रकाशेनेव ज्ञानेन तमोनाशक- त्वाद् भास्वान् , तस्मै । "प्रपञ्चाऽऽभोगविस्तारव्यासा" इति हैमः। एतेन सङ्घस्याऽतिविस्तृतत्वं भगवत सूर्यस्येव तमोनाशनेऽप्रतिमत्व च ध्वन्यते। यथा सूर्यः स्वप्रचण्डप्रकाशेन गगनस्थमन्धतमसमपि सद्य एव नाशयति, तथाऽय जिनोऽप्यतिशयवत्या वाचा सज्ज्ञानप्रदानादिनाऽज्ञान दूरी- करोतीति भावः। तदेव ज्ञानाऽतिशयो वागतिशयश्च प्रतिपादि-' तोऽवगन्तव्यः । अत एव, महेन्द्रमहिताङ्हये-महान्त प्रतापादि- भिरन्यापेक्षयोत्तमा ये इन्द्रा देवासुरनरेन्द्रास्तैर्महितौ पूजितावही .
नमस्तोत्रम् परणौ यस्य स सारशस्वस्मै, महेन्द्रमितररणाय । यो ह ठा विपणनानाविमान् स एष महेन्द्रपूपिठो मबति । “गुणा नासान गुमिपु न प लिन प म "ति मात्र । मात्र पूजाऽतिशय प्रतिपादितः । " पर विमरणोऽसियामि " स्कार। विशेष्यमाह-मीसुपार्शधिनेन्द्राय सपा ममिन् गर्म मक स्वमे पाः सर्पमप्या रसवतीति अनन्या सपाश्वामितम्या व सारेण सुपार्थ इति साऽमिम्प, म पाऽसौ अमन्ति रागादीनिति मिनास्तेषु देवेष्पित्र समेत, मियातितयाविन्मया पुकमा भीमुपाश्नेिन्द्रमै । एतेनाऽपायाअगमाऽतिशयो पनिठ, गोर रागादिविजेवा तस्य मागासलेप्रपि । नमा नमस्कारः मलिक शेप । ' यहाऽपरिक्रमापदं न ममते तत्राप्तिमपन्तीपर- म्यु" हि महाप्रप्यम् । भत्रोपमामयः ॥९॥ भवाऽमम पापमपिन सपनाह- पन्द्रप्रमप्रमोमन्द्रमरीचिनिषयोज्जा । मूर्विसितम्पाननिर्मिदेव भिमेऽस्तु म ॥१॥ पन्द्रममेति । चन्द्रप्रमप्रमोद पन्त्रस्म ममा कान्तिरिक प्रमा यस स इत्पलनामा ममिन् गमस्ये मातुपद्रपानदोहबमापति- तुम्ना नुसारेग न्द्रपमेतिवाऽमस्म , स पासी प्रमुः सदुपदे माहिना पालकत्वागुपदेशिएपार स्थमी वस्म, ममिवापाननिर्मितेव मूर्ती सि ए प परपान क्रप्पाननि प्रसिद्ध सेम निर्मिता परितेवेसुम्पेक्षा । मान न मूर्यम् किन निर्मापनिहाप कमवा कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् , मापन्नतयोत्प्रेक्षितम् । कथमन्यथा शुक्लध्यानवन्निरञ्जनत्वं तन्मूतॆरिति भाव । ध्याननिर्मितत्वोत्प्रेक्षया च सर्वविधभावाऽतिशयः प्रतिपादि- तोऽवगन्तव्य.। सम्प्रत्यन्वर्थनामत्वायाऽऽह--चन्द्रमरीचिनिचयो- ज्ज्वला-चन्द्रस्य मरीचीना किरणाना निचयः पुञ्ज इवोज्ज्वला शुभ्रा, चन्द्रकिरणपुञ्जवत्सिता निर्मलाऽऽादिनी चेत्यर्थ । अत्र च शरीरद्युति- वर्णनेन सर्वविघ शारीरोऽतिशय उपलक्षणत्वात्सूचितो वोध्यः । सा केत्यपेक्षायामाह-मूर्तिः तनुर्बिम्ब वा, वा-युष्माक स्तोतृणाम् , श्रिये सम्पदे, अस्तु-भूयात् । शोभासम्पत्तिपद्मासु लक्ष्मी श्रीरिव दृश्यत" इत्यमर । उत्प्रेक्षोपमयो ससृष्टिः । यः स्वय वाद्याऽऽभ्यन्तर- श्रीसम्पन्न , स एवाऽन्यस्याऽपि श्रिये भवितुमर्हति, नहि स्वयमसिद्धः परान् साधयतीति भावः ॥ १० ॥ अथ नवम सुविधिजिन स्तुवन्नाह- करामलकवद्विश्वं कलयन् केवलश्रिया । अचिन्त्यमाहात्म्यनिधिः सुविधिोधयेऽस्तु वः ॥११॥ करामलकव दिति । केवलश्रिया केवल केवलज्ञान तस्य श्रिया जगत्पदार्थसार्थपरिच्छेदप्रगुणया सम्पदा, केवलज्ञानमेव श्रीरतिशय- स्तया वा, अथ च केवलाऽऽत्मस्वभावात्मकत्वान्निरुपाधिकत्वाच्छुद्धाऽ- द्वितीयाऽसहाया च या श्रीश्चिद्रूपा सम्पत्ति. केवलजान तया, विश्वम् = अतीताऽनागतवर्तमानसर्वद्रव्यपर्यायविशिष्ट चराचरात्मक जगत् । करामलकवत्-करो हस्तस्तस्य तत्स्थत्वात्तत्सम्बन्धि यदामलकमामलक्या घान्या. फल तद्वत् , कलयन्-पश्यन् नानन् वा, यथा हि करस्थमा- 2
समतोनम्
मसर्फ मुफरत्या सर्पमा परिछपते सभा मगलसा केवजानिमिया
निमिया । सामावरणाविमातिकर्ममा साफापेन मय पर फेवणे
स्पषस्तसमिनिपरकं तज्ज्ञानमितिमाय । एतेन सानातिश्प स्पर
पर मतिपादितः । कातिर ज्ञानार्य, फतिहि कामपेनुः । अत एव,
अचिन्स्पमाहात्म्पनिषि - मचिन्त्यवाऽगम्यम्म मनसोप्परिपक-
स्पेत्यर्व । यदि पिताऽसीत तळागायतीतमिति किमु कम्पमितिमात्र ।
सासस्य माहाम्यस्म महिमो निषिराकर, किमित. पर मामम्मे मवेत
झानेन विषकसनम् । तच धर्मचक्षुषी चिन्तरिक्षमप्पसक्यम् । ARE-
साममध्य एमाऽसम्ममावस्पशेन समहिमोओस्लावितिमा | एका-
बामस्य महिमा मतो म्यामि पूरुप इति सम्म् । मन्त्रीसमक
इति विशेप्याकामापूरपागा-समिपिम्पिरिधिरित्यमियो मक्म-
स्वीकार गमिन् गर्मस्पे मातुः सर्वविधि नैपुण्यापितम्या सदनु-
सारेण विपिरितितामिठ्य पुप्पपोहदेन वन्सोरमाच पुप्पान्तेस्प-
परनामा सुशोमन सम्मेएमइत्मानिरपायलाच ममोशो विभिमुपयादि
सामनमनुष्ठान यम्य प्रतिपावनसम्बन्धेन परसम्कभीरमानामा प, पा=
मुष्माकम् गोषपे-परमाननाय मस्त-मस्तु । यो है परमार
संजयस्यैव मोभिवानभिकाराम् । नुहम्-- "गुरुप स्वस मोदेति
सिमासाम्पेन माता। मारमतत्त्वाशेम साबरसेम्यो
गुरूराम
इति । देशेन काझेन च महतोऽपि पदासाओं मगवतः परस्पऽऽमस-
फलस्पुरस इस परिच्छेपोऽमस्तस्मऽऽकमहिमा, नैवारमप्रिमायस
कम्पापीति सम्पाप्रमैकिकमाहाम्पपिशिस्वापद एष गोप सम्मति
माध्यमावनीशविमिमाषः ॥ ११ ॥
कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् १९ अथ दशमं शीतलजिन स्तुवन्नाह-- सत्त्वानां परमानन्दकन्दोद्भेदनवाऽम्बुदः । स्थाद्वादाऽमृतनिःस्यन्दी शीतला पातु वो जिनः॥१२॥ सत्त्वानामित्यादि । सत्त्वानाम् जीवानाम् , परमानन्दकन्दो- द्भेदनवाऽम्बुदः परम• शाश्वताऽखण्डत्वात्सर्वोत्कृष्टो य आनन्द.सुख- मयत्वम् , स एव कन्द. पृथिव्यामिवाऽऽत्मनि सावरण स्वभावत एव स्थित- स्वादश्रमूलविशेष इव, तस्योरेटोऽनुभवात्मकाऽङ्कुरोदमस्तस्य तत्सहका- रित्वातत्सम्बन्धी नवाम्बुदो नूतनजलधर इव । वर्षौ नूतनजलधरेण हि तदृष्टसलिलसम्पर्कात्कन्डाढकुरोद्गम' प्रसिद्ध , जिनेनाऽपि च प्रवच- नादिना तत्पालनादिरूपसम्पर्कवशान्मुक्तवाद्यात्मकपरमसुखोद्गम इति माव । ननु न नवाम्बुदसत्तामात्रेण कन्दोद्भेद , किन्तु तदृष्टसलिल- सम्पर्कादिनेति कथन्तानिवृत्तये-विशेषणमाह- स्याद्वादाऽमृतनि:- स्यन्दी-स्यादित्यव्ययमनेकान्तद्योतकम् , ततश्च स्याद्वादोऽनेकान्तवाद, एकस्मिन्नव धर्मिणि विरुद्धसामान्यविशेपनित्याऽनित्याऽमिलाप्यानभिलाप्य- सदसत्त्वमेदाऽमेदाद्यनन्तधर्मस्वीकारः। स एव वस्तुयाथात्म्यप्रतिपाद- कत्वादज्ञानात्मकविषमविपप्रमोपप्रगुणत्वादानन्दकन्दोरेदप्रयोजकत्वा- चाऽमृत पीयूषं पयश्च, तन्नि स्यन्दते उपदेशादिना वर्षणेन च सिञ्चती- त्येवशील , स्याद्वादात्मकाऽमृतसेचक इत्यर्थ । पीयूपममृत सुधे"ति पयःकीलालममृतमि"ति चाऽमरः । न चेदृश कोऽपि साधारणो जन इत्याह-जिना वीतराग , एतेनाऽलौकिकाऽतिशयसामग्री सूचिता, वीतराग एव हि सकलाऽलौकिकाऽतिशयसम्पन्न इति तस्य ताश- - " , सफ इनि सम्पत्तोत्रम् स्वामिन्दान्दानेदनममतनि-स्पन्दन प नाऽतिविति माय । मो बाक्सामुदानितक्रया विधोपरफर्स प्यन्यते । विशेष्यापेक्षायामाह-दीतला-पीने मानपानवाचस्प स्पति सदुप- देशाविना मक्सपायहरममुमेम सम्पादयतीत्पननामा ममिन् गभस्मे मारणस्पछापितुखापाऽपहाराचदनुसारेण पितृम्मा शीतस इति हाऽमिस्मम दशमतीर, वा-युष्मान्, पासु-यात् , भपा- माविस्यनगाहम्पते । साठ एव रक्षको मवितुई ति माऽमार, सम्म स्पमसिदत्वादिति दयम् । भानन्दोद्रेदमाऽन्म कन्योनेव भाज्य इति मोर्मेदेऽपमेदाध्यक्मायल्पा तिनमोतिप्रेपितामतेति हेपाऽनुपारितोपमामारोऽत्र पोप्प ॥ १२ ॥ मकाया मेमांसजिन स्तुपाह- मररोगार्चजन्तुनामगधारदर्शनः । निश्रियसभीरमणा यांसा भेपसेऽस्तपः ॥१३॥ मसरोगेति । भवरोगार्थअन्तूनाम् मतस्परसपते बन्दरस्मिनिति मातुर्गतिक ससार स एष अत्यनेन कृत्वा बीब इमि रोग माध्यामिकाऽविकाऽऽभिमतिकापिकवापिकमानसिकमन्माविम्पादि ज्वराविपीगनिमितमाय । एकान्वेन रोगनिनिक्लप्रतिपावनाम का कारणोपचाराद्वा मा एवं रोग भाप्पामिकाविपीडा, मी वेगा- मायामिकादिदु मानामपसमात्तात् । पम्प हि न मावस्म न रोग इति रोग मानिमित्त एव । यखा मयो कम, तकसत्वावलम्बन्धी यो गस्तेनाऽऽर्ता प्रसा पीरिता याम प्रसादम्नुमबन्टो ये गन्तव. - कीर्तिकलव्याख्याविभूषितम् . प्राणिनस्तेषाम् भवत्मिकरोगपराभूताना प्राणिनामित्यर्थः । अगदकार- दर्शनगढो रोगः, " रोगव्याधिगदाऽऽनया" इत्यमर. । न गदो यस्य सोऽगदस्त तादृश करोतीत्यगढङ्कारो भिपक्, योगमहिम्ना रोगाऽप- हारकत्वात्तद्रूप दर्शन प्रतिविम्वाद्यवलोकन शासन स्याहादाख्य दर्शनं वा यस्य स तादृश , भवरोगाऽपहारकदर्शन इत्यर्थ । वैद्येन कृत्वा रोगस्येव जिनप्रतिमादिदर्शनतम्तच्छासनाऽऽराधनादिना च पाप विशुद्धे- गुणवृद्ध्या भवस्योच्छेदात् । यदुक्तम् ‘इत्याज्ञाराधनपरा अनन्ता परिनिर्वृताः । निर्वान्ति चाऽन्ये क्यचन निर्वास्यन्ति तथाऽपरे" इति, "प्रान्तस्तीर्थानि दृष्टम्त्व मयैकस्तेपु तारक” इति चेति भावः । तदुपपादक विशेषणमाह -निःश्रेयसश्रीरमणः = निश्चितमेकान्तेन श्रेय.शर्म न तु कथञ्चिदपि दु.खसम्भिन्नमिति नि श्रेयस मुक्तिस्तस्य तद्रूपा वा या श्री सम्पच्छाचताऽखण्डानन्दस्तस्य रमते इति रमण , मुक्त्यात्म- कशाश्वताऽखण्डाऽऽनन्दमग्न., स क इत्यपेक्षायामाह-श्रेयांसातदाख्य एकादशस्तीर्थङ्कर , अस्मिन् गर्भस्थे जनपदे सर्वथा श्रेयोभावात् श्रवण- नक्षत्रे जन्मभावाच्च तदनुसारेण पितृभ्या श्रेयास इति कृताऽभिख्य , चा-युष्माकम् , श्रेयसे कल्याणाय, यत्प्रशस्यतम तत्सिद्धये इत्यर्थ । अस्तु भवत्विति प्रार्थये । प्रशस्यतमश्च भवरोगवियोग इति तादृश- विशेषणोपादानेन भङ्गया सूचित । यद्वा मवरोगाऽपहारान्मुक्त्याख्य- श्रेय प्राप्तिरेवेति - भवरोगोच्छेदकत्वान्मुक्तयेऽस्तु । भवरोगोच्छेदकस्य स्वयसिद्धस्य मुक्तये प्रभुतोचितैवेति पदार्थहेतुकं काव्यलिङ्गमलकार , स च नि श्रेयसश्रीरमण इति श्रीतिस्त्रीलिङ्गसाम्याद्रमण इति श्लेषाच स्त्रिया रमण इवेति समासोक्तिससृष्ट । तेन च यथा पति स्त्रिय तथाऽय २२ साव्यप्रंसपम् मुर्ति ययेरमपमोई प्रमरित सस्म फस्याणमदानसाममीसारस्म- मुकम् ॥ १३॥ पब हाद वामप्म्पनि स्तुपमाइ-- विश्वोपकारकीभववीधर्मनिर्मितिः। मुरासुरनरै पूज्यो वामपूज्य पुनातु वः ॥ १५ ॥ विपकारकीति । वियोपकारकीभूतवीर्षरुकमनिर्मिवित न विधम्मोपकारक विवस्मोपकारक सम्पदमिति विवोपकारकीमा मक्ष सीहतम्टीमारस्प कर्म तीरनामकर्म । तीधारमामकर्मणो दिमाग नादिना विभोपकारः परिपाम इति स्वभापादेव मधिोपकाररिपाकमित्यसो रिपोपचरकीमा मिशि पोम्पम् । ताम्म सस्म निर्मितिर्निमार्ण स्प स वाय इत म्परिकरणबहुप्रीति । येन स्पिापकारकीभूकमी- सामकर्मोपार्थित स इत्पर्य , सममिनिटकर्मति सम् । एतेन तीर्थकलो निष्कारण विश्वासस्म कन्यते । कर्मण एव त्याविपारपत्र कारणान्सराऽनपक्षणाविति बप्पम् । मत एष मुरासुरनर-मुरापाड- सराम नरामोफ्यमत्वावन्मे मीनाथ, ज्योम्नमस्प । यदुसम् बगहमतीय स्वा यान्ति पसिपाऽपि यक्षिणमि', 'पहिम्मो पनि पीता हर्मोट्रीने संगैरपी"ति र । मो हि निफारम विथोपकार- कसम स्थिपूज्यतोकितैवेति मार। विधोपकारचे विधम्मति नियम । मुहम्- 'सर्वे मेनोवमस्यन्त सम्मा पादपाः । मभा सम्मै नमसन्ति सुरासुरनरेगा " इति । विरोप्यमाह-पास पून्पा-सारसो प्रावतीको सपनपामय । वायुप्मान्, २३ कीर्तिकलाव्याख्यावभूपितम् पुनातु-शुचीकरोतु, तीर्थकरेण हि सदुपदेशाद्यात्मकोपकारादिना सन्मार्ग- प्रर्शनात्तदाराधनेन कृत्वा कर्ममलाऽपकर्षणाब्जीवाना शुचित्वसम्पत्तिरिति वासुपूज्य पुनात्वित्युक्तमित्यवगन्तव्यम् । यो हि विश्वोपकारको विश्व- पूज्यस्ततो विश्वपवित्रीकरणाऽऽशोचितैवेति ध्येयम् ॥ १४ ॥ अथ त्रयोदश विमलजिन स्तुवन्नाह- विमलस्वामिनो वाच कतकक्षोदसोदराः । जयन्ति त्रिजगचेतोजलनैमल्यहेतव ॥१५॥ विमलेति । विमलस्वामिनः तदाख्यस्य त्रयोदशतीर्थङ्करस्य, अस्मिन् गर्भस्थे जनन्या नैर्मल्यभावात्तदनुसारेण पितृभ्या विमलेति कृताऽभिख्यस्य, विगत मल यस्मात्तादृशस्य वीतरागस्येत्यन्वर्थता च ध्वन्यते । एतेनाऽपायाऽपगमाऽतिशय प्रतिपादित । तत्सहचारित्वाच्च ज्ञानाऽतिशय. पूजातिशयश्च स्वयमृह्य.। वचनाऽतिशयमाह -कतक- क्षोदसोदश: कतक तदाख्यो जलशोधको द्रव्यविशेष , कतकाख्य- तरुफल वा । तस्य क्षोदश्चूर्णम् , तस्य सोदर ----सोदरो हि सदृशो मवतीत्यतिसादृश्यप्रतीतिप्रयोजनया लक्षणया सदृश्य इत्यर्थ ! सादृश्य समर्थयस्तादृश विशेषणमाह-त्रिजगचतोजलनैर्मल्यहेतवः त्रयाणा जगता तात्स्य्यात्ताच्छन्द्यन्यायाज्जगत्त्रयस्थितप्राणिना चेतासि मनासि सलिलानि जलानीव कषायादिरूपमलादिकलपितानि, तेषा नैर्मल्यस्य निष्कलुषत्वस्य हेतवो निमित्तभूता । जलानां कतकक्षोदा इव त्रिजग- जनमनसा कालुष्याऽपाकरणेन कृत्वा शुचित्वसम्पादिका इत्यर्थ विशेप्यमाह-वाचा देशनावाण्य , कतकक्षोदक्षेपेण कलुष जल- . मापनस्तोत्रम् ममाविलं गायत इति प्रसिद्धम् । सबा मगलपनाऽऽरापनन हा रागापुच्छेदापेक्सो विशुद्धिमायत इति भावः । षत एष, बन्ति- सर्वोत्कर्पग पर्यन्ते । मन्पचीमवाचाऽनीरसपाविवि माव। पतन पचनाप्रविसमो व्यकमेव मतिपादितः । उपमाहारः ॥१५॥ मन पर्दभमनन्सनिन सफ्ताह- सपम्मरमभस्पर्षिकसमारसपारिमा । अनन्वचिदनन्तो । प्रपच्छतु सुखमिपम् ॥ १६ ॥ स्वयम्मरमणेति । अनन्यजित् = वात्सर्वशस्तीयार, मस्मिन् गर्मस्म पितानन्त शत्रुबस जिव मिति तदनुसारेण तिसम्म ममन्तनिविति तास्मिोऽनन्तज्ञानाविसमन्वितत्वावमन्त सानाधिक माति स्वशीकरोतीस्पनन्तत्रिविस्पानामा, स्वयम्भ्रमणस्पर्षिक हमारसगारिणा-स्वमम्मरमण सक्षमपा सर्वसागरान्तिमतदात्माऽसाम- मोमनक्विारसागरम स्पर्पते स्वपरिमाणेम परामसिमियादीरगंशी स्वयम्मूरमणास्पसागराऽपम्पाऽप्यपिकपरिमार्य मकरणा परतु ल महाणेच्छा, तदास रसवारि साससिकम् कस्पास्मो रस एक बारीति ना तेन स्था, नि सीमकायमेस्पम् । पसेन मावान् कल्यायाम इति मन्यते । पता करपारसमरिष्य सा स्क्पम्मरममस्पर्षी मनन्त- मिविस्मयम । पम्मरमपश्मरिमापाऽपेयमाऽप्यविपरिमापकरणार समारिपूर्ण इति समवायपरमात्र । मन एव, पाम् युप्मभ्यम्, मनन्साम्साघसीमासम्मं मर्मपरिपटोफ्नमाम् , सुखमिपम्- सुसस्म भी समनिम्ताम् भविमपरमम्मसम्पदमिति सम्मापार्य ।
कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम्
२५
।
प्रयच्छतु-वितरत्विति प्रार्थये । यो हनन्तकरुणापूर्णोऽनन्तजिन्च, तत
एवाऽनन्तसुखलामसम्भवः, यदुक्तम्-"पूर्णात्पूर्णमुदच्यत" इति भाव ।
उपमानादुपमेयस्याऽऽधिक्यवर्णनाव्यतिरेकाऽलङ्कार. ॥ १६ ।।
अथ पञ्चदश धर्मनाथ जिन स्तुवन्नाह
कल्पद्रुमसधर्माणमिष्टप्राप्तौ शरीरिणाम् ।
चतुर्धा धर्मदेष्टार धर्मनाथमुपासहे ॥ १७ ॥
कल्पद्रुमेति । शरीरिणाम्=प्राणिनाम् , “ प्राणी तु चेतनो
जन्मी जन्तुजन्युगरीरिण" इत्यमर
। इष्टप्राप्तौ-इष्टस्याऽभिलषिता-
श्रस्य प्राप्तौ लाभे, कल्पद्रुमसधर्माणम्=कल्पद्रुमस्य, समानो धर्मो
यस्य स सधर्मा सदृशस्त तादृशम् , कल्पवृक्षवदिष्टप्रदमिति मिलितार्थ ।
तत्र हेतुगर्भ विशेषणमाह-चतुर्धाधर्मदेष्टारम् चतुर्धा दानशीलतपो-
मावभेदाच्चतुर्विधो यो धर्म उपलक्षणत्वात्तत्सञ्चयहेतुरनुष्ठानादिः, कारणे
कार्योपचारादानक्रियादिरपि धर्म । त दिशत्युपदिशतीति स
तादृशस्तम् । चतुर्धाधर्माऽऽराधनेन प्राणिना सकलेष्टसिद्धि , इष्टो हि
धर्म एव तेषाम् । तल्लामे चैष एव कल्पतरु , अन्यत्र प्रयस्याऽपि स
दुरापश्चेति भाव । विगेप्यमाह-धर्मनाथम्=तदाख्य पञ्चदश
तीर्थक्करम् , अस्मिन् गर्मस्थे मातुर्धर्मक्रियादोहदभावात्तदनुसारेण
पितृभ्या धर्मनाथेति कृताऽमिख्यम् , चतुर्धा धर्मदेशकत्वाद्धर्मस्य नाथ
इत्येवमन्वर्थाऽभिधम् , उपास्महे भजामहे । धर्माऽमीप्सूना धर्मदेष्टा
वर्मनाथ एव शरणमिति भाव ॥ १७ ॥
सम्मप्रसोरम् २१ मम पोरस शान्सिपिनं स्वस्तार- मुषासोदरवाग्ज्योस्लानिर्मठीकदिवसला । मगलामा समानान्स्पै शान्तिनापजिनोऽस्तु पा॥१८॥ मुस्पादि । सुपासोदरपाग्ज्योस्मानिर्मसीकवादिसुखा- सुपाऽमृत सस्मास्तुतिमदलान्मुक्तिमार्गाविमतिपादनेन लाऽमरक- प्रदत्वादुमसाब सोदरा पशी मा बाग देशनाताम्मेव मुपासम्पन्न निर्मस्वारगारमा र मापात्म्याम्योत्या पत्रिका, “चन्द्रिका कोमयी ज्योस्मे" स्वमर । तया त्या निर्मम्मकतानि कर्मयोपाम मदर्शनेन रुला फर्ममस्मररितानि समोनशानकारसदायाच प्रसवानि सानि विा फार्मा मुसानि मुखात्पुरः स्मिततात्पुरोमागा साम्प्यायपोपचारादिगन्तवास्तम्पाः माणिनम येन स वादशः । विसस्तु काम पाय' स्पमर । मो-सामि हि वियो निर्मकी करणमुचितमेव । 'यथा पोसामिर्दिग्न्सपर्यन्तै मनश्यते तमा वाला सर्वे मामात्मना प्रारमन्ते। मयशेनेर प्रानेन समसोज्ज्ञानस्य समुन्मूलनाहिति तात्पर्यम् । एतेन सम शान्तिमामग्रीसाकल्पमुकम् । माय कापतौस्मारसापात् मृगलमा मृगो हरिम स एप मम मनन सम्म स तात्यो हरिपाम्नस्त्रापाप । शान्ति निम्प मृगे मम्म्नमिति प्रसिद्धमेन । म्सौगार क्सनिधिरि ति "मादो साउन पनि म्म व सम्पमि ही पामर । विशेषमार-शान्तिनापजिना-शान्ति- स्वास्स पोरसमीपटर अस्मिन् गभने ठोके सोपद्रवन्ति हिम्मगुपन्द्रमाचन्द्रः कीर्तिकलान्याख्याविभूषितम् २७ । जातेति पितृभ्यां तदनुसारेण शान्तिरिति कृताऽभिस्य शम्यादित्या- शास्यमानः, स एव सन्मार्गोपदेशादिना पालकत्वान्नाथ इव नाथ. स्वामी, स चाऽसौ जयति रागादीनिति जिनः, स तादृश । वा-युष्माकम् , तमाशान्त्यै-तमसोऽन्धकारस्य वस्तुयाथात्म्याऽवबोधप्रतिपन्थित्वसा- धादुपचारादज्ञानस्य च शान्त्या उपशमाय, तमोनाशायेत्यर्थः। प्रबोध- प्रकाशायेति यावत् । अस्तु भवत्विति प्रार्थये । यो हि शान्तिनाथ- स्तत एव तम शान्तिप्रार्थनमनुगुणम् । ज्योत्स्नाद्योतितदिङ्मुखश्च मृगलक्ष्मा तम शान्त्यै भवत्येवेति शान्तनाथस्तुतिरवश्यफलप्रदेति ध्वन्यते। परम्परितरूपकाऽलङ्कारस्तस्य चोपमाऽङ्गम् ॥ १८ ॥ अथ सप्तदश कुन्थुजिनं स्तुवन्नाह- श्रीकुन्थुनाथो भगवान् सनाथोऽतिशयद्धिभि । सुरासुरनृनाथानामेकनाथोऽस्तु व श्रिये ॥ १९ ॥ श्रीकुन्धुनाथ इति । सुरासुरनृनाथानाम्-सुराश्चाऽसुराश्च नरश्च तथा तेषामेव नाथाश्च, यद्यपि सुरादिनाथा अपि सुरादय एवेति पृथढ्नाथोक्तिर्गतार्था, तथापि ब्राह्मणवशिष्ठन्यायेन पृथगुक्तिर्बोध्या । सुरनाथादिनाथश्च जगन्नाथ एवेति तिर्यगाद्यनुक्तर्न न्यूनता । सुरादीन् विहाय तन्नाथानामेव तात्पर्यविषयत्वे च न्यूनता समापद्यत एव, नहि सुरादिनाथनाथ एव कोऽपि न तु सुरादिनाथ इति युक्तिमत् । यद्वा य सुरादिनाथनाथ स सुरादिनाथ युतरामिति यथेष्ट व्याख्येय न काऽपि निवन्ध । तेषा देवदानवमानवेन्द्राणाम् । एकनाथा:एको द्वितीयस्य ताहास्याऽभावादेकमात्र स्वयमनाथत्वाच्च प्रधानं च नाथ.
समापनस्तोत्रम् श्रीसमरस्लाविना स्वामीव स तारष्ठ समालाब इति मिल्लिा । म हेसुगर्भ विशेषपमाह-अतिशयलिमिापविशेते कानेमि- रित्पतिशमा मलौकिकाऽनिसरसापारणगुणा प्रसिमा सहमपतिमा, सस्म अदमोऽतिबदुस्वम् । यदुधम् -- 'स्वामिन् ! सहसम्मिान सको वस्तु न ते गुणानि गति । मविशय एष मादम सम्पन इति पा तामि का सनापा-समन्वित केमि र सुराविनायो- न्यापेक्षमा कतिपमाऽविशयसम्पन्नो भवति ममें स्पतिविमिः सम्पा इति मुराप्मरन्नाभस्मामेफनायो मक्त्येवेति मातः । भत एक भगवान् मग ऐधर्या विस्तान्, मतम्मेभ्याक्सिमम इत्पर्य । "ऐधर्मस्य समरस्य पर्मस्प यायसः भियः । ज्ञानसम्पमोर पण्णा मग इतीरणे 'स्युमिति मोमम् । विशेष्यमाह- भीकन्युनापामीसमन्निसः सुमायेत्यात्म सतववस्तीमार , अस्मिन् गर्मस्व स्वम मात्रा मुनामरमराशिदर्शनावदनुस्परेप पितृम्भो कुसुनायेति ताऽमस्य वा-युप्माकम् , मिये-झानाविसम्पये अस्तु-मवस्पिति मार्गमे । ३. भीसपच स पर मिमे मखि मांसीति मात्र ॥१९॥ भपाऽध्यवसमरमानपिन स्मरमाह- मरनाप स मगांधतुर्याअनमोरविः । चतुपुरुपापभीपिठास पिठनोतु ॥२०॥ मरनाथ की। सजगति पतपुरपायपदस्पेन म्यात, पहषामनमोरवि-पार्षो बादचारे पासपो तुरीयो योऽरपक- कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् २९ जगतल्यात, स्याऽर इव भाग इत्यर इति ख्यातश्चतुर्थोऽशो दुषमसुषमाऽरः, स एवाररविणाऽधिष्ठीयमानत्वाज्ज्ञानादिप्रभया प्रकाश्यमानत्वाच नभो गगनम् , “नभोऽन्तरीक्ष गगनमि "त्यमरः । तस्य तत्प्रकाशकत्वात्त- दधिष्ठानत्वाच तत्सम्बन्धी रवि प्रकाशकत्वादिसाधादविरूपः । सूर्यो यथा गगने सर्वताराग्रहाद्युत्कृष्ट सर्वलोकप्रकाशकश्च, तथाऽर- नाथोऽपि चतुर्थारे सर्वोत्कृष्ट सर्वप्राणिप्रबोधोद्बोधकश्चेति भाव. । कुत इत्याकाङ्क्षानिवृत्तये आह–भगवान् ऐश्वर्यादिरूपभगसम्पन्न , यो हि भगवान् स लोकोत्तमो भवत्येवेति हृदयम् । अत एव, सः सर्व- विशेष्यमाह-अरनाथ:-तदाख्योऽष्टादशस्तीर्थङ्करः, अस्मिन् गर्भस्थे मात्रा स्वप्ने चक्रारदर्शनापितृभ्या तदनुसारेणाऽर इति कृताऽमिख्यः,वः युष्माकम् , चतुर्थपुरुषार्थश्रीविलासम् =चतुर्थो य. पुरुषस्याऽर्थ. प्रयोजन धर्माऽर्थकाममोक्षेप्वन्त्यो मोक्षनामा पुरुषार्थस्तस्य या श्री शाश्वताऽखण्डानन्दादिलक्ष्मी., अथवा तद्रूपा या श्रीस्तस्या विलास प्राकटयेन सान्निध्यम् , तम् , वितनोतु-उपदेशादिना सज्ज्ञानप्रदानेन कृत्वा सम्पादयतु । चतुर्थस्थस्य चतुर्थप्रदत्वमनुगुणमेव । किं च स एव चतुर्थपुरुषार्थप्रद , यदुक्तम् – “जगन्ति भिन्दन्तु सृजन्तु वा पुनर्यथा तथा वा पतय प्रवादिनाम् । स्वदेकनिष्ठे भगवन् ! भवक्षयक्षेमोपदेशे तु पर तपस्विन.” इति भाव. । परम्परितरूपका- ऽलङ्कार. ॥ २० ॥ अथैकोनविंश मल्लिजिनं स्तुवन्नाह- सुरासुरनराधीशमयूरनववारिदम् । कर्मन्मूलने हस्तिमल्लं मल्लिमभिष्टुम ॥ २१ ॥ -- पायस्तोषम् सुरासुरेमि-सुरासुरनरापीममयूरनवरारिदम् मुरामामुराम नराम तेपामेवाऽभीमा दाध सुरासुरनराधीशा एस मपूरा परिया, " मयूरी मारिणा बदी शुमापार चिम्पावल " इत्यमरः । तेपा मो. भून, सरविकपणइर्षपदत्वादिनिमाव । स बारसो मनाविरमादि प्रचुरतरसलिलसम्मुक्त्वात्मत्यप्रय वारिदो मेपन्तद्रूप इस्पर्म । मयूरो । मपम सलिससम्मृतमुनत बारिद राष्ट्वा पति फेकार्य कराति मृत्पति । मुरादपमाळी मधिन रहा हप्पन्ति मामाराव कुर्वन्ति नृत्यादि प कुर्वन्ति । परस्म नि मासिरियमिति सहक मपूरमवास्ति मिति । मुरादिमपूरनक्यारिवत्वे हेतुगर्भ विशेषममाह-कर्ममन्मूलने =कर्माण्येव पासवाशानामरणादिनानासालमालस्वारिष्ट- ऽनिष्टफस्त्वाच यो दुमास्तेषा झानचारित्रादिना स्वकीयाना परकीयाली पसन्मार्गोपदेशाविनोन्मूमने मुम्बुसाटने रिपमे, मिनाथन पः । इस्तिमछम् ऐराताम् गमेन्द्रम् सम्पमिपी । गमेन्द्रस्मर दुमोत्पाटन प्रसिद्धमे । पसेन नाम्न स्स्स सकरमिति मन्यते बातिश्चमानि गमेन्द्रोऽनतिप्रयासेनैव द्वममुन्मूलमतीत योप्पम् । पदुधम् 'लपो माज्य कर्मरूपमन्नत मूत " इति । ऐराक्सो हस्तिमा गोऽममप्रिम नि हैम । कर्मचापिताना है सापाबाना मयूराणा सानासको मारिद स कर्मद्रमोन्मूछो मपिरिति दयम् । मत्र पारिवस्फम दुमपोषकवानपणापम हुमोन्मूम्पति- मनमा सफ्नमसमाजसमिव मस्मितीति समामेपनीयम् । विशेष्यमाइ- मल्लिम् स्वास्थमनपिस्तीतम् , भस्मिन् गर्भस्मे मार. पुष्य मास्यसपनदोहगावनुसारेण पितुम्ने मतिरिति तामिस्सम् , कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ३१ अभिष्टुम =गुणकीर्त्तनेन कृत्वा तदाभिमुख्यं साधयामः । आनन्द- लाभार्थ कर्मोन्मूलनार्थ चेति तादृशविशेषणमहिम्ना प्रतीयते ॥ २१ ।। अथ विंशतितम मुनिसुव्रतजिन स्तुवन्नाह - जगन्महामोहनिद्राप्रत्यूषसमयोपमम् । मुनिसुव्रतनाथस्य देशनावचनं स्तुम ॥ २२ ॥ जगदिति । जगन्महामोहनिद्राप्रत्यूपसमयोपमम् = जगत- स्वास्थ्यात्ताच्छब्दयाज्जगज्जन्तूना यो महाननादिकालप्रवृत्तत्वादुत्कट- त्वाच्च दीर्घा गाढश्च यो मोहोऽनात्मनि ममत्वबुद्धि , यदुक्तम् “अनित्य- धनदेहादौ नित्यत्वेन ममेति च । अज्ञानेनाऽऽवृता बुद्धिर्मोह इत्यमि.. धीयते " इति । स एव सत सज्ञानस्याऽन्तरायत्वात्तदागमप्रतिपन्थि- खाच निद्रा शयनमिव, "स्यान्निद्रा शयन स्वाप" इत्यमर । तस्या निवत्तन- साधनलक्षणेन सम्बन्धेन तत्सम्बन्धी यत्प्रत्यूषोऽहर्मुखम् , “उपसि प्रबुद्धयेते" युक्तरिति भाव. । “प्रत्यूषोऽहर्मुखं कल्यमि" त्यमरः । तदात्मक समय काल , दिवसस्य पञ्चपञ्चाशत्तमघटिका । यदुक्तम् पञ्च पञ्च ऊष काल. सप्त पञ्चाऽरुणोदय । अष्टपञ्च भवेत्प्रात.शेष. सूर्योदय स्मृत " इति । स निवर्तकत्वसाधादुपमा यस्य तत्तादृशम् । यथा प्रत्यूषकालेन निद्राविलयो ज्ञानागमञ्च, तथा मुनिसुव्रतवचनेन मोहव्यपोह सज्ज्ञानलाभश्चेत्यर्थ । मुनिसुव्रतनाथस्य-मुनिसुव्रतस्त- दात्यश्चाऽसौ मोहनाशाद्यर्थमाशास्यमानत्वान्नाथश्च तस्य तदाख्यस्य विंशतितमतीर्थङ्करस्य, अस्मिन् गर्भस्थे मातुर्मुनेरिव सुव्रतभावात्तदनु- सारेण पितृभ्यां मुनिसुव्रतेति कृताऽभिख्यस्य, तदुच्चरितत्वेन तत्सम्बन्धी- - समस्तोत्रम् स्पर्म । देवनावपनम् देसना धर्मापदेश नम्, मन मित्यर्थः । स्तुमा कीर्तयामः, मोइस्लिमो गतनिद्रस्पेस दिलमनमोइस बस्तयापारम्पाप्रमामय या स्पापिति मान । उपमाऽसधर ॥२२॥ मानिस नमिनाबग्नि सामाह- उउन्तो नमा मूनि निर्मलीघरकारनम् । पारिसमा स नमे पान्तु पादनक्षमः ॥ २५ ॥ रन्त इन। नमवाम् साऽतिशयमवयाऽवियतया मर्मा पावस्पर्थो यथा स्यावामणमा जनानाम्, मम्निमसके " मूर्मा म्य मस्तकानिमामि " स्पमर । लठन्त सम्मुर्छन्त , प्रसान्त सन्त इस्पर्य । वारिसमारम्बारीणां ममना प्ला पूरास्वविय लात, पदप्रसरणनिर्मलामावालाचेनि माष । वेन समासे पिमा झोपभेत्यनुशासनादत्ताकपि म भितिस्प इति बोम्पम् । “मम्मी पूर तमोऽपि तिहम । निर्मतीकारकारमम् भनिर्ममस्म धारीरति मम्समातिसम्य कर्माविममरिसस्प प निर्मम्पोफाऽनर्मस्याऽपाकरमेन हमा पवित्रस्प करण निर्मीकारतस्य कारण कारणमूसा अन्यमिता पविकीमवारणधारपेवफस्पैनमा यदा.प्रमाणमिस्पादियदेकाबन- मुपपावमीयम् । नमः सबालस्पकसितीमाररस्य भस्मिन् गर्मस्मे मसायमपिता मातरम्स्प्रेफनमात्रेण त्रयो मता एति पवनुसारेक पितम्मा ममिरिठि स्वामिस्तस्य पादनस्वाधव-पवयो में माम्ते मामलो म्यूमा हिणाऽसमयूसाशामसिपमिरश्मय" इस्म्मर । पान्तु-रमन्त । निर्ममारणेन वेति मात्र । प्रसरमा कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् - क्रियासाम्यात्तकण्ठरवोक्तनिर्मलीकारक्रियासाम्याचाऽत्रोपमाऽलङ्कारः । अत्रोपेक्षा वर्णयन्तस्त्वलङ्कारमर्मणा दत्ताऽर्धचन्द्रा एव । उपमाप्रयोजको- भयसामान्य क्रियायाः स्वयमेवोक्तेः । प्रकृतस्य परात्मना सम्भावन खुत्प्रेक्षा, न तु सामान्यधर्मोक्तिपुरस्सर साम्यप्रतिपादनम् । उत्प्रेक्षा- यामपि साम्य मूलमित्यन्यदेतत् । यथा हि मूर्ध्नि लुठद्भिर्वारिपूरै. स्नानादौ शरीरस्य मलाऽपकर्षणेन कृत्वा निर्मलता, तथा मूनि लठद्भि पादनखाशु- मिस्तेषा पुण्यत्वात्कर्ममलाऽपकर्षणत आत्मन. शुचितेति तत्त्वम् ।।२३।। अथ द्वाविंशमरिष्टनेमिजिन स्तुवन्नाह - यदुनशसमुद्रेन्दुः कर्मकक्षहुताशनः । अरिष्टनेमिभगवान् भूयाद्वोऽरिष्टनाशनः ॥ २४ ॥ यदुवशेति । यदुवंशसमुद्रेन्दुः यदूना यदुनामनृपाऽपत्यानां यो वश सन्तानः, “वंशोऽन्ववाय सन्तान " इत्यमरः । स एवाऽ- तिमहत्त्वाख्यातिसलिलराशिपूर्णत्वादसङ्ख्यातपुरुषरत्नादिसम्भृतोदरत्वाच्च समुद्र इव, तस्य तद्वर्धकत्वात्तद्भवत्वाच्च तत्सम्बन्धीन्दुश्चन्द्र इव, चन्द्र. समुद्रोद्भव समुद्रवर्धकश्च प्रसिद्ध , तद्वदयमपि । यदुवंशवर्धको यदुवशोद्भवश्चेत्युपमा । तथा, कर्मकक्षहुताशन = कर्माणि शुभा- ऽशुमानि कक्षा वनानि, “ कान्तार विपिन कक्ष स्यात्पण्ड कानन वन मि"ति हैम । तस्य तन्नाशकत्वात्तत्सम्बन्धी हुताशनो वहिरिव, स तादृश । हुताशनो वनमिवाऽयं कर्माणि खीयानि चारित्रादिना परकीयाणि च तथाविधोपदेशादिना नाशयतीति भावः । ननु स क इत्यपेक्षायामाह-भगवान् = ऐश्वर्यादिरूपप्रशस्तमूमभगसम्पन्न , 8 उम्पमोरम् एतेन विशेषणेन स्वेष्टसिद्धिसम्माफ्नोझा, मगत एवेरसिद्धिसम्मा मोम्मम् । अरिष्टनेमिः सयाल्पो शामितीयार, मस्मिन् गर्यो मात्रारिष्टरसमामाराप्रपेक्नानुसारेण पितृम्मामरिनेमिरिति स्वामस्य । -पुस्माकम् , अरिष्टनाशन भरिमाप्मास्मिात्री वैरिकाऽऽभिभौतिकमुपसर्ग सदुपदेशाविनातिशयादिषयाच मातोति स वाश , स्योपसर्गोत्सारक इपः । “उपसि स्परिट स्मनुपम उस " इति हेम । भूपाद-मवत्स्यिासासे । एतेन परत शादिनमिवशिवसनावारिसनेमिरित्यपर्वाऽभिषेमता पनित्य । मामेमा, रूममपरतमा पाल्माने मामापक पोम्मम् ॥ २५ ॥ भय प्रयोपि पार्धनाममिन स्सुमतार- कमठे धरणेन्द्र प स्वोषित कर्मवति । प्रसस्पमनोपित पानामाभिमेस्तु पः ॥ २५ ॥ कमठ इति । सोषितम्-सस्य स्वस कमठस परगेन्द्रसव मस्तिमम्पर्स न्माम्म गर्म प साध्वम् स्वस्वमान्मनुस्ममिलन । पम्पतेऽप्युक्ति न्यायमित्यमर । कर्मव्यापार कमठस्प- सुरनिशेषस्म परोपसर्गाविरमाऽम्मासात्मप्रमाप्रातिमा परोपसी- करणादेरेव पनुगमवाव स्वोर्गणाविर पानापमो मरिमामय सव.सबोफ्सर्गरूप वेष्टितमिस्पर्म । परगेन्द्रपये प-तस देवपाली तमा सात्वमभानामा परोपभरकरणापभ्यासात्पर सक्मिोनादि स्मापारस्व प तदनुगुममा प पार्सप्रमौ महिपतनिधारमारमा सत्कर्म व विम्ममिति, कमठे-मासम्मुरचिोपे घरगेन्द्र . . कीर्तिकलान्याख्या विभूषितम् -जिनभक्ते तदाख्ये नागराजविशेषे, चः समुच्चये, तेन स्वोचितं कर्म कुर्वतीत्यस्योमयत्राऽन्वय. । तुल्यमनोवृत्ति तुल्या मध्यस्थतयाऽप- कारिणि द्वेषरहितोपकारिणि च रागर हिता च मनोवृत्तिर्भावोऽभिप्रायो यस्य स तादृशः, समतामतिरित्यर्थ. । वीतराग इति यावत् । इदम- साधारणमलौ किंक च वैशिष्टय यदपकारिणि न द्वेष उपकारिणि च न राग इति भाव । विशेष्यमाह -पार्श्वनाथः तदाख्यस्त्रयोविंश- स्तीर्थकरः, अस्मिन् गर्भस्थे तमस्विन्यामपि रात्री मात्रा पार्श्वतो गच्छतः सर्पस्याऽवलोकनापितृभ्या तदनुसारेण पार्श्व इति कृताऽमिख्य , प्रभुः स्वामी, एतेन तस्य समता नाऽशक्तस्येति मनोरथसिद्धिसम्भावना च सूच्यते । वा=युष्माकम् , श्रिये लक्ष्म्यै, अस्तु भवतु । यो हि वीतरागस्तत एव चिन्तामणिवत्प्रार्थनासिद्धिरिति तात्पर्यम् । पार्श्वनाथ- अमौ प्रतिमामास्थिते तद्ध्यानभङ्गाय पूर्वजन्मवैरिणा कमठदानवेनोपसर्गः कृत । प्रमो. परमोपासकेन नागराजेन धरणेन्द्रेण च स निवारित इति कथामनुसन्धायैषा स्तुतिरिति बोध्यम् ॥ २५ ॥ अथ चरमजिन श्रीमहावीरस्वामिनं स्तुवन्नाह- कृताऽपराधेऽपि जने कृपामन्थरतारयोः । ईपद्वाष्पयोर्भद्रं श्रीवीरजिननेत्रयोः ॥ २६ ॥ इति' कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचित सकलाऽहं- स्तोत्र समाप्तम् ॥ कृतेति । कृताऽपराधे-कृतो विहितोऽपराधो मन्तुर्विविधोप- सर्गरूपो येन स तादृशस्त्रस्मिन् , अनिष्टाऽऽचरणेनाऽपराधिनि, अपि- उम्मयोमम् मिनकमो बने इत्पनन्तरं द्रष्टन्म । बने-साम्मुरादौ मेरे मन, अपिनानाराभिनि भने उ कौर केसि सूच्यते । काममा वारपोफ्याकताऽपराधेपकारपरायमस्साय बनस्य मान्य रस्म "न्ति ! कसमस सदसिर्मपित गति परख-समहामेमा भन्ने मिस्पन्दे पारे फनीनिक मोस्वादश्यो , हरयाजम्मेममानस में निमले मक्तीति वाहिरिवि माव । "भागोऽपरापो मन्तये" 'तारकाम कनीनिके"सि पाऽमर । ईपडाप्पाईयो पर घेतसो मुस्वावीपदस्प बाप्पेप नेवसेनाऽ सिन्थे, त्योस्तो, कस्यापूर्णपोरित्यर्थः। गाय मेजवलेमतो "रिस्पर शिष्यमा- भीषीरबिनननयो भीसहितो रवाशासामारणमझोपर्योऽय शोमान्महावीर इति के स्मातमाऽसौ बिमाम, सि सिस्तिय धीमहरस नेले पक्षिणी समो., भवम् महरूम, सारनी भीनी-- मिनने सकरमणमिकेन । भमेदेऽपि राहो सिरी- बत्पछी बोया। 'मेमस सि मद कामापं मासे शुममि "स्यमर । एतेन पीरविमस्स निकामिक विचम् , कामन्यापारि- प्पपि फरगति प्रेम्पम् । पब मामिनि या करपा मम्मेष, मत एष मारूकार पनि स्वयम् । मा-दिपिक्परिपति प्रोग विहित “सम्पति रुपसो वीरोअनि पालवन् मनुष्करप परास्न केनाऽपि मामध्मान कापस ' इस परमजिमगुणवपनमार्ण माताऽसूम सकोकमभमान परीक्षित सप पर महीसम्मक्तीम परिमारकस्म परमशिनस्स विनिय वाल्ममुपसर्ग कई प्रामे सामान सुराः । तेन मुम तक निभानसीन वगेश्य निष्पक- कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् श्रमःस्थगित इव जातः स सुरः स्वस्थानं गन्तुमुपक्रान्तो "हन्त ! कथमस्य सुगतिर्भविते"ति तच्चिन्तया कृपया निश्चलाभ्यामश्रुसिंग्याभ्या भगवता ददृशे । तस्थितिमनुसन्धाय स्तुतिरेपा जिनस्य निष्कारण- एतेन स्वस्मिन्नपि प्रभोस्तादृशदृष्टिप्रार्थन कारुणिकत्वसूचनाय प्रवृत्ता। . ध्वन्यते ॥ २६ ॥ इति कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचिते सकलाऽर्हत्स्तोत्रे श्रीतपोगच्छाऽधिपतिशासनसम्राट्कदम्बगिरिप्रभृत्यनेकतीर्थोद्धारकाऽऽचा- र्यवर्यश्रीविजयनेमिसूरीश्वरपट्टालङ्कारसमयज्ञशान्तमूर्त्याचार्यवर्यश्रीविजय- विज्ञानसूरीश्वरपट्टधरसिद्धान्तमहोदधिप्राकृतविद्विशारदाचार्यवर्यश्रीविजय- कस्तूरसूरीश्वरशिष्यपन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिविरचिता कीर्तिकला- ख्या व्याख्या समाप्ता ॥ ॥ श्रीवीरजिनस्तोत्रम् ॥ अथ परिशिष्टपर्व प्रारिप्सुनाऽनेनैव कलिकालमर्वज्ञेन श्रीहेम- चन्द्राचार्येण परिप्सितपरिसमाप्तिकामेन विघ्नविघाताय कृत चतुःश्लोका- मक श्रीवीरजिनस्तुतिरूपं मङ्गलमपीह प्रसगाद्याख्यायते। तत्राऽयमाद्य. श्लोक श्रीमते वीरनाथाय सनाथायाऽद्भुतश्रिया । महानन्दसरोराजमरालायार्हते नमः ॥ १ ॥ श्रीमत इति । अहंते अर्हति पूजा सुरादिकृतामित्यहन् , तस्मै तीर्थक्कराय सुरासुरादिपूजिताय, यतश्चाहन्नत एव, अद्भुतश्रिया अद्भुत- याऽसाधारणयाऽलौकिकया च । असाधारणमलौकिकमेव चाऽद्भुत भव- "सारः सरसी सर" १८ भीलामकिनखोरम् तीति बोम्यम् । ताश्या स्मा, मिया मदमा सहयपतिशमला "विस्मयोऽमुसमामि"त्यमरः। सनामाप समन्तिाय, मत एसए महानन्दसगेराममरालाय-महान् सामनासमतमानस , जनता इत्यर्थः । म प मानन्दः सुसम् , सकसमममममन्यमुसमिण, स एव सरो महत्वपूर्णस्याक्सिापम्पाकासार मल दागास्यवसभी मो राममयले मरापनो रामा, राजईस इपर्व । रामवन्याविवस्ममास । तपाय, कम स्मसि इसेप राम्स सर्वोत्तममीसमन्वित सर्वमेध मपति, मग भीवीरगिनोऽपि मानन्दममेषु सर्वोत्तम समाऽवमुतनीसमन्निता स्वार्धन सरस एव मातीति मात्र । सम्मै सासमाय, भीमते-सह- विमलसम्मर्सपासमन्विताम मपप्पत्राद्भुतमिया मनभावयुक्तक्षेत्र श्रीमते इसकीय पेशाम्बोम्स मवेश्वरस्य नरायम्, सभी मीसम्बयोगेन नामापुलेससाऽऽपारलानुपादानमिति सन्तोत्रम् । निशेम्पमाह-पीरनामाय-रो विनाऽपि प्रत्यय वरपरोप- सापा मम्मेभिल्यमैकदेशेन मप्रमाणान्मापीरघरमस्तीटर, पर समगदुपभरकर पचव लामीन, मब बरिष पोत्साहीवार्य सहिष्णुत्वाविमस्म वीरपदबाध्यत्वेन प्रसिद्धपसापरणोपमाधिना- ऽपि सत्ताऽमपम्नादेतो व इनर, महावीर मर्म । सम, नमाम्नमस्कारोऽस्तु । यो पुषविपरिणि सोन नमबर- पीम, स ममात् । खुकम्- 'म भयवान् वीर" वि मावः ॥१॥ स कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ३९ श्रीसुखवत्त्वेन स्तुत्वा ज्ञानिमुख्यत्वेन स्तुवन्नाह- सर्वेषां वेधसामाद्यमादिमं परमेष्ठिनाम् । देवाधिदेव सर्वज्ञ श्रीवीर प्रणिदध्महे ॥२॥ सर्वेषामिति । सर्वेपाम् सकलानाम् , न तु कतिपयानामेवेति बोध्यम् । वेधसाम् ज्ञानिनाम् , आद्यम् आदौ भवस्तम् , आदौ गणनीयं कीर्तनीय चेत्यर्थः। मुखमिवाऽङ्गेषु प्रधानत्वान्मुख्यमिति वार्थ । मुख्यो ह्यादौ प्रथममेव कीयते गण्यते चेति बोध्यम् । यद्वा- सर्वेषाम्, वेधसाम्=बहुवचनादुपलक्षणत्वाद्वेषा ब्रह्मेन्द्रः, शेषाश्चेन्द्रा- स्तेषा पूज्यत्वादादौ भवमिव । अथवा, वेधसः प्रजापतयस्तेषामाचं प्रथमम् , ऋषभप्रमु गद्य. पृथिवीनाथ , अर्हतां च सर्वेषामभेदः, यदुक्तम्- यत्र तत्र समये यथा तथा योऽसि सोऽस्यभिधया यया तया। वीतदोषकल्लष स चेद्भावनेक एव भगवन्नमोऽस्तु ते" इति । तथा-वेधसो विष्णवत्रिपृष्ठादयो वासुदेवा अर्धचक्रिणस्तेषामाद्य प्रथमम् । भरतपुत्रो मरीचिर्हि प्रथमस्त्रिपृष्ठाख्यो विष्णु , मरीचिजीव एव च चरमोऽहं निति श्रुतज्ञा । अत• श्रीवीरजिन एव वेधसामाद्य । "स्रष्टा प्रजापतिर्वेधा" इत्यमर । " विष्णुजिष्णुजनार्दनौ बश्रुशशबिन्दुवेधस" इति हैमः । न केवलमसौ संसारिणामेवा- ऽऽद्योऽपि त्वससारिणामपीत्याह-परमेष्ठिनाम्=परमे लोकोत्तरत्वा- त्सर्वोत्तमे भावे-पर्याये तिष्ठन्तीति परमेष्ठिन. पञ्चाऽर्हत्सिद्धाचार्यो- पाध्यायसाधवस्तेषाम् , आदिमम्-आदौ भवम् , अतिशयाद्यसाधारण- गुणविशिष्टतया "निर्हेतुकपरमकारुणिकतया सर्वजगदुपकारकतया च -- भीमारविनखोरम् मुस्पलादायौ कीयमानमित्ययः । मत पर दनाभिदेवम् देवेन्ये भिक भेष्ठ देवम्, अत एव मुरासुराविमिर्मकया म्यूजनाहीत भाष । पतेपी सर्वेपामेव विशेषमाना हेवम्त विशेपममाह-संचार करसमऽमकवमिसकेकामेकान्तिप्रगसवासार्थम् मन्म- स्त्पनीश इत्यतोऽस्सोफविशेषममुभिधमेवेत्यभिसन्धि । विशेष्यमार- भीवीरम् भीसहिसे वीरान परमसीहारम् , प्रमिदमोलसमाती विय । शाखाऽसाधारणगुणविशिलादेक स एप प्रतियो मानेकुमिरिति भयम् ॥२॥ सदेवमुरुपारेण कस्पायपदस्वादियोम्पा समर्व सम्मति फास्त्पाणाविमूल्सया स्तौति- फाल्पामपारपाजाम भुगङ्गाहिमाचलर । विश्वाऽम्मोअरवि देव बन्दे भीडायनन्दनम् ॥ ३॥ कमाणेति । स्याणपादपाऽभामम् कास्पार्म शुभ वदेव मापविमापालाक्विानो सीमापावरवाणसाम्नमिति पादपो. अपस्म नमोहपोपयामपसाराम उपक्नम् रूपम् । पमा परामे उपमाना पारपामा रोपेपावि सबा रामरोहपोपवीति परम्परिक 'कस्पाप मा ममि 'वि " मारम- स्माफ्ता- 'मि सि पार 'फरपणममम शानाद, नदी मारमियररित्यय भा-भुतगङ्गारिमापसम्मानि पनेमावसनिमारविश बमाबानि बसान्ग समापाऽप्याराऽपिकभारवाना वास्ता मेष्मसिदा नदी, मारमानाविना नानि पारापनाविमा शुफिस ४१ . कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् निमित्तमिति बोध्यम् । तस्या गङ्गायास्तत्प्रभवत्वात्तत्सम्बन्धी यो हिमाचलो हिमालयाख्यो नगाधिराजस्तद्रूपम् । यथा हि हिमवतो गङ्गा प्रभवति तथा वीगच्छूतानि, तथा यथा हिमाचलो नगाधिराजस्तथा चीरो ज्ञानीन्द्र इति रूपकेण ध्वन्यते । अत्राऽपि परम्परितरूपकम् । अत एव, विश्वाम्भोजरविम् विश्व जगदेव विकास्यत्वसाधा- दम्भोज कमल तस्य तद्विकासकत्वात्तत्सम्बन्धी रविः सूर्यस्तद्रूप , तम् । यथा रविणाऽम्भोज तथाऽनेन विश्व प्रबोध्यत इति परम्परितरूपकम् । अत एव, देवम् देवाधिदेवम्, विनाऽपि प्रत्यय पूर्वोत्तरपदयोर्लोप इति ध्येयम् । श्रीज्ञातनन्दनम् श्रीसमन्वितश्चाऽसौ ज्ञातस्य तथा- ख्यातस्य ज्ञातकुलस्येक्ष्वाकुविशेषस्य नन्दन आनन्दप्रदस्तम् , तत्रोत्पन्न- त्वात्तदुत्कर्षकत्वाचेति भाव । चरमजिनेश्वरं श्रीवीरमित्यर्थ । वन्दे नमामि, यथा कल्याणश्रुतवोधलाभः स्यात् , तस्यैव तन्निदानभावादिति हृदयम् ॥ ३॥ सम्प्रत्यन्त शुद्धयर्थ वचनद्वारा चरमजिन स्तौति- पान्तु वः श्रीमहावीरस्वामिनो देशनागिरः। भव्यानामान्तरमलप्रक्षालनजलोपमाः ॥ ४ ॥ इति कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचित श्रीवीरजिनस्तोत्रं समाप्तम् ।। पान्त्विति । भव्यानाम् अनादिपारिणामिकभव्यत्वभाववताम् , अभव्यमिन्नानामित्यर्थ । सेत्स्यता सम्यक्तवतामिति परमार्थ । आन्त- रमलप्रक्षालनजलोपमा: आन्तरमन्तर्भवमात्मसम्पृक्तमित्यर्थ । तादृशं यन्मलं विकार कर्म वा कपायादिर्वा, पक्षे शरीरसश्लिष्टरज.प्रभृतिक भीवीरपिनसोचम् पास पक्षाम्मे परिसीपने, दूरीकरणे इति यावत् । मले सनिक- मुफ्मोपमान यास ता स्वास., भरमसम्पभिकर्मकायापालकम- शोभने सरिम्समधीम इत्यर्थः । यथा मलेन शरीराविसम्पधमाल शोषन स्थानिनेपरदेशनापनेनाऽऽन्तरमसम्पति मात्रा बसेन हि मम्मोक्न प्रसिद्धमिति सयम् । मपप्यान्तामति विशेषमस्य मम्म सापेक्षलारसामर्यम्, समापि देवस गुरुकुलमिस्माविषद्गमकामा समासो बोम्म । भीमारीरस्वामिनाभीसमन्वितो महावीरस दात्मपरमतीमरर एवोपदेशादिना सन्मार्गमार्शनादिना खा पास- पवारलामीर एप श्रीमहावीरममो, दयनागिर =पर्मोपदेष्टासि, क-युष्मान् मम्मान् पान्तु-मायावन्मामु । सदारापनेन यन्तर मम्मक्षामनास्तम साध्यापपरिहार इति वा देशनागिरः पान्ति- पर्व । बरनमेव सरण रागापरामतानामिति सासर्यम् । मन श्रीराविमम्मन्यवान्सरम चन्पपिनि योदश्यमेवाऽम्पसापा- पतिश्पोच्नुपाणितोपमा । १ इति रिकाम्सशनीमभन्दाचार्यविरक्तेि वीरभिमानाने श्रीतपोगच्छापिपतिवासनसम्राट्कम्बगिरिपमृत्पनेतीर्थोवारकापार्मि- भीमविषयनेमिधरीपरपहायरसमससान्तमाचार्मसमीविभचिन सरीपरपापरमिवान्तमदोदपिपानतिधिशारदाचार्यमी विजयकस्तर- सुरीपरमिप्यफ्यासमीकी विपन्द्रवियगम्मिपिरपिता कीर्तिकमरूमा मास्सा स्माता कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ४३ ॥ प्रशस्तिः॥ वृद्धप्रगुरु नेमि स्तीर्थोद्धाराऽऽप्तसद्यशोनिचयः । शासनसम्राड् जातो भविकुलकैरवकलानाथः ॥१॥ तत्पट्टालकारो वहुविधविरुदावलीपात्रम् । विज्ञानः प्रगुरु में समयज्ञः शान्तमूर्तिश्च ॥ २ ॥ सुगुरु में कस्तूरः प्राकृतविद्विशारद सुरीशः । नव्यभव्याऽब्जबन्धुः सिद्धान्तमहोदधिर्गीतः ॥ ३ ॥ तत्कृपोपेतसुमति. कीर्तिकला कीर्तिचन्द्रोऽहम् । सकलाऽर्हत्स्तोत्रस्य व्याख्या खाख्या समाख्यमिमाम् ॥ ४ ॥ केऽपि द्रक्ष्यन्तीमामुपेक्षयाऽहकृतिच्छलिताः । कष्ट मनसि दहेयु हो! मात्सर्य दुरन्ततमम् ॥ ५ ॥ वराकोऽसूययाऽसौ द्विगुणितनीलाऽऽननो न वचनीय । खकृतं सद्यो मुक्ते दैवहतस्याऽपहत्याऽलम् ॥ ६ ॥ तोपमेयन्त्यवश्य गुणगृह्या प्रेक्ष्य तामेताम् । व्याख्यासु सतीषु कतिषु सुमेषु कहारमिव भृङ्गा. ॥ ७॥ रसशीतांशुखनयने वैक्रमवर्षे समाप्तिमाप्तेयम् । मौन्यामेकादश्या सकलाऽर्हद्भयोऽर्हणा भूयात् ।। ८ ।। नेत• कीर्तिमपेक्षे पाठकजनमन.प्रसाद तु । तहतो भक्तानपि सद्भक्तघेह प्रपन्नोऽस्मि ॥ ९ ॥ इति कीर्तिकलाव्याख्यासहित श्रीसकलाईस्तोत्रं श्रीवीरजिनस्तोत्रं च समाप्तम् ॥
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॥ अहम् ॥ श्रीविजय नेमि-विज्ञान-कस्तूर-सरिसद्गुरुभ्यो नमः । कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितं श्रीमहादेवस्तोत्रम् पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिविरचित- कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् । वीतराग महादेव करुणावरुणालयम् । सिद्धथेकसाधनं सद्धीप्रदं केवलिन श्रये ॥१॥ तपोगच्छनिरभ्राऽभ्रभानु शासनचक्रिणम् । तीर्थोद्धाराऽऽप्तसत्कीति मरि नेमि नमाम्यहम् ॥ २॥ समयज्ञ विज्ञानं सूरि शान्तमूर्ति प्रगुरुम् । शिष्यप्रशिष्यसेवितचरणद्वन्द्व नमामि जनतेब्यम् ॥ ३ ॥ सूरीश. प्राकृतविद्विशारद. शारदेन्दुसितकीर्ति । कस्तूर शरण मे सिद्धान्तमहोदधिः सुगुरुः ॥ ४ ॥ पन्यासः कीर्तिचन्द्रोऽहं व्याख्यां कीर्तिकलाऽभिधाम् । करोमि श्रीमहादेवस्तोत्रस्यार्थविदे मुदा ।। ५ ।।
मत पर मामोहो मावतोमम् स, बगति सल मेपो मानाविधामिया चामिल पीडिवो मुनिभिषिविषपायेषु पाते। मम देवाराम मप्युपपती प्रतिपादित । देवाप परोऽनेकनगुपक्षमत सारसम्पन्न प्रीर्तिता । तेषु च सर्वभेठो महादेव शिमोधरी पदे, स्यातमाहाम्पो गीमते ममात्राममुपासते । समका किं गुण इत्यत्र सम्प्रदायमेवान्महान् मतभेदः । मा मदिति छोकहितमा सनामपन्य कसिससा भीमका पार्म शिवमहेभरमहादेवादिपदार्य स्खेतक निरुत्पमिषु महा स्वासपात मायौ तिवपदार्थनिर्वमनेम इत्या पाह- प्रशान्त दर्शनं यस्य सर्वमताऽनयप्रदम् । माप प प्रशस्त प शिवस्वेन विमाम्पते ॥१॥ मसान्तमिति । यस्य यदीयम् , यदेषकर्मकमित्याः । दर्शनम् -मामेकनम् प्रशान्तम्-अनुपमनुदेगा सौम्पमुपम्ममा पोरो कत्वाधामामयप, न तु वीर्यान्दरमसिददेसद् मेगावमध्यति विकारादुममुहगकरमसौम्पमित्वमसान्तमिल मालः । तथा पराम- स्वादेव प सरभूताऽभयप्रदम्सम्यो न तु नियेम्म रोग भूतेभ्यो सीवेम्पोऽभय मपामा पवाति मम न मोतीनि सवारसम् , मत देवान्तरमच्छमादिसानिम्पारकोपापापिष्टवास्तपिपापादेय कापि सम्पाधी भयपरम् । समाविमो बना दिम्पतीति भार । मा म माम्पम्-मासविषये स्भ, मायादमिपः । न तु देवान्तरमा मतगनादिस्यपाराकपामुण्डमागसिमनिसार कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ३ मङ्गल्यमिति भावः । एतेन दर्शनस्य मङ्गलात्मत्वं सूचितम् । स्वयम- मङ्गलस्य मङ्गलहेतुत्वाऽयोगादिति बोध्यम् । अत एव, प्रशस्तम्- वर्णनीयमदुष्टमिष्टं च, न तु दिगम्बरादिमावाज्जुगुप्सादिकरत्वादप्रशस्त- मिति भावः। एतेन दर्शनस्याऽवश्यकरणीयत्व सुच्यते । यद्धय- प्रशस्त दर्शन न तत्कस्याऽपि करणीयमिति बोध्यम् । चद्वयं सर्व- विशेषणसमुच्चये, तेन चैकैकमात्रस्याऽपर्याप्तत्व सूच्यते, एतेषा गुणानां समुदितानामेव शिवत्वप्रयोजकत्वमित्याशयाऽवगमादिति ध्येयम् । अथ च, यस्य यदीयम् , यदुपज्ञमित्यर्थः । दर्शनम् पदार्थयाथात्म्यज्ञानाऽभ्यु- दयनि श्रेयस सिद्धयुपायभूतमार्ग , स्याद्वादरूप सिद्धान्त इति गूढा- कूतम् । प्रशान्तम्-उपशमप्रतिपादकत्वात्कार्ये कारणोपचाराच्छान्ति- न तु दर्शनान्तरवद् हिंसासाध्यविध्याधुपदेशकत्वाद- प्रशान्तमिति भावः । तथा, सर्वभूताऽभयप्रदम् सर्वभूताऽभय प्रददाति दयाऽहिंसादीना विधेयतया प्रतिपादनेन कृत्वा प्रयोजयतीति तत्तादृशम्, सर्वमूताभयोपदेशकमित्यर्थ. । न तु देवान्तरोपनदर्शनान्तरवदभिचारादि- प्रतिपादनेन कृत्वा भयप्रदमिति भाव । अत एव, मङ्गल्यम्= सम्यग्ज्ञानादिमङ्गलप्रयोजकत्वान्मङ्गलप्रयोजकम् , " नन्दी मगलम्"ित्यु तेरिति बोध्यम् । अत एव चैतदर्शनमपि मझलमिति सूच्यते । तत एव च, प्रशस्तम्-दर्शनश्रेष्ठम् , वस्तुयाथात्म्यप्रतिपादकत्वात्सन्मार्ग- प्रदर्शकत्वाचेति भाव । यदुक्तम् “ प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं नयति शासनमि"ति । एतेनाऽस्याऽवश्योपादेयत्व ध्वन्यते । अप्रशस्तप्रशस्तत्व- योर्हेयोपादेयत्वप्रयोजकत्वादिति वोध्यम् । तेन-उक्तगुणमहिन्ना, स इति यच्छन्दवलालभ्यते । शिवा शिव कल्याणमस्त्यस्येति स तादृशः, प्रदमित्यर्थः ।
म्हास्तोत्रम् म शिकानाच्य इस्पर्व । सिमाम्पते-सापते, विचार्यते ।। रिविशेष । यो निशुमकाल शुम्गुणाश्रमय सस्व सिपदमामी परमार्थतः । मम हि धर्मनमानस्यादिगुम्यापो हिसाविसाभारत पदेशकत्वाचोममुद्रगकरमसौम्पमत पर मपपवम्त एपामारमा प, स पेटियमवशिन को नाम विमाम्मत।। वा वनम कर्तुरमुखेन छोकसामान्यकतृका मेसामान्योपादेव र फो। मनीत वर्शन न करणीय नैनोपादेयमप्पशिकवादिताम् । तीर्याऽन्तरे पुमो मीमोफीको नमो मूतसो मुप्पमापविनिमूने हिंसाविसाध्ययाविपिपिपपानदर्शनापुपदेसको निमहाअनुसार समाविसहित स्विो वर्भते । समग । सिया खारस्पतम तदर्शनस्प न सिक्समिति बसत सोऽशिव एवेति गम वम् ॥१॥ मग निहन्तिपूर्वक क्षमेव मि महेपरत्वेन सौति-- मातादीपरवाच यो मोमरवो गतः । रागद्वेपविनिमुक बन्दे महेपरम् ॥ २॥ महत्त्वादिति । या पारयो देव., उकाकार सिव इत्यभि सन्मि । महचान-मपते पूम्पते साम्सानिवरसाधारणाप्रतिक सामापतिशम्समृद्धिमस्याडौकरिति ममान् , पष्ठमनिरुतमोपम' पुरुष यदुक्तम् नि स उत्तमेम्याऽप्युपम इति पूमतम एन । परत्पा-ईट बस्तुभारम्पसदममेवामार्गाविषमनुमति माका- लस्सी ईपर, सभापमय, सत्य मालमत्, पास्मुषो।
कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ५ महत्त्वेश्वरत्वोमययोगादिति हृदयम् । महेश्वरताम्=महाश्वाऽसावी- श्वरश्च, तस्य भावस्तता देवाधिदेवत्वमित्यर्थः । गतः प्राप्तः, न तु नाममात्रेण भक्त श्रद्धादिना महत्त्वाद्यभावेऽपि तथाख्यात इति भाव । उक्तगुणसम्पत्तौ हेतुगर्भ विशेषणमाह-रागद्वेपविनिर्मुक्तम् रागो विषयासक्ति द्वेषोऽनिष्टेऽप्रीतिरुपलक्षणत्वाकपायादयश्च, तैविनिर्मुक्तम- सम्पृक्तम् । तथाविधनानचारित्रादिना रागादिमूलकर्मणः साकल्येन क्षयात्कारणाऽभावात्कार्यस्य सुतरामभावाद्वीतरागमित्यर्थ । वीतराग एव महानीश्वरश्चेति स एव महेश्वर । अनीदृशस्तु रागादिपरतन्त्रतया न महान्नवेश्वर इति भावः । अत एव, तम्=तादृश महत्त्वादीश्वरत्वाच्च महेश्वरता गत वीतरागम् , महेश्वरम् महेश्वरेत्यन्वर्थसज्ञासजिनम् , देवाधिदेवमित्यर्थ । अहम् भक्तिश्रद्धासमन्वितो विवेकी स्तोता, वन्दे नमामि । स्वात्मोत्कर्षार्थमित्यात्मनेपदेन सुच्यते । यस्त्वनीदृशो दारपरिग्रहाऽसुरहननादिना रागद्वेषपरतन्त्रः, अत एवाऽमहाननीश्वरश्च, स न चन्दनीयो विवेकिभिरिति हृदयम् ॥ २ ॥ ज्ञानादिविशेपवैशिष्टयादेव देवस्य महत्त्वमित्याह- महाज्ञानं भवेद्यस्य लोकालोकप्रकाशकम् । महादया-दम-ध्यान महादेवः स उच्यते ॥ ३ ॥ महाज्ञानमिति । यस्य यादृशस्य देवस्य, लोकालोक- प्रकाशकम् लोकस्य लोकवर्तित्रैकालिकसर्वद्रव्यपर्यायात्मकपदार्थसार्थम्य, तात्स्थ्यानाच्छन्द्यमिति बोध्यम् । अलोकस्य च प्रकाशक परिच्छे- दकम् , अत एव, महाज्ञानम् =महत्सर्वपदार्थविषयत्वादनन्तत्वाच्छुद्ध- 4
मारेक्योरम्
खाच मठ कक्षान सत् , मिझानमित्पर्य । धानान्तर
मुताविकमस्पविषयमिति म सन्मदिति बोध्यम् । मक्व-मस्याम् ।
म सम्पवासापरिच्छेदककेवम्पानवानिति साराम । ठया, मा
दयाइमपानम् मापत् सर्वमीवविषमत्वाविष्कारमताव गोकमा
दा, सा प सन्द्रिमविपपत्वाद्विवेकसम्प्रापलापानसोऽसापरम्म
पमा स प शुमामासानिफिस्पताच सर्वोतम पवमान समानिय
तेषां समाहारो दयारमप्यानम् , स्पेसि भवेरिति व समाते ।
पया-परखु-सपागेच्छा, वम इन्द्रियनिग्रह, पान पसभापति
मेयम् । यवुझम् “सामा पाऽमृते", "सकनानि ।
चास्यामि नैोपाम्मिानि । ही सम्पपतिपदा स्क्मेन्द्रिय
स" इति 'भ्यासा प्येय सधा मान अपमेकास्मता गामि "ति ।
सावासो महामानवमादमम्मानपान देव एव। सर्व वा सार
पारणमिति मायादेशों सम्पते। तेन पासवानामावमम्मान
मान् । महादेव महादेवपदमतिपाप, उम्पते-कप्यते ।
महादेवपदेन स एष गीयते पन । न त सीन्तिरमसिद्धो महा
देवेपता मुक्मिाप्नुपदेशानिर्दयोमराहिहन्नमस्तिो पार
परिभादेईमानो देविप्ररिपु कोपाविमलादिति मातः ॥३॥
मपेन्द्रियममदारा देवस पुनमहलमार-
महाम्तस्तस्करा ये तु विष्ठम्सः स्वाक्षरीरके।
निर्मिता मैन देवेन महादेव स उप्पते ॥४॥
कीर्तिकलाव्याख्याचिभूपितम् ७ महान्त इति । स्वशरीरके-स्व निज यच्छरीरम् , स्वार्थे कः । तस्मिन्, निजदेहे, तिष्ठन्तः वर्तमाना , ये=यत्प्रकारा , तुरेवाऽर्थे भिन्नक्रम स इत्यनेन सम्बध्यते । महान्तः धनधान्याद्यपहारक- तस्कराऽपेक्षया बलवन्तो दुर्निर्माह्या आत्मसम्पदा सम्यग्दर्शनादीनां पश्यतोहराः, तस्करा:= चौरा , इन्द्रियाणि मनोवच काययोगरूप आस्रवो वा। तानि हि वलाद्विषयेषु प्रवर्तयन्ति सद्दर्शनादीनि मुष्ण- न्तीति बोध्यम् । “चौरस्तु प्रतिरोधकः । दस्यु पाटचर स्तेनस्तस्करः पारिपन्थिक" इति हैम । अन्ये हि तस्करा परोक्ष एव बाह्य घनमेव च मुष्णन्ति, इन्द्रियाण्यास्रवाश्च शरीरे कृतस्थितय एव वला- नात्मसर्वस्वं दर्शनादिकमपहरन्तीति तानि महान्तस्तस्करा इति हृदयम् । ते इति यच्छन्दवलाल्लभ्यते । येन यत्प्रकारेणाऽनन्तज्ञानादिमता सवरसंवृतेन, देवेन देवपढवाच्येन, निर्जिता: वशीकृता निगृहीता वा। यो देवो जितेन्द्रिय सवरसंवृतश्चेति निष्कृष्टोऽर्थ , न तु दार- परिग्रहादिनिरत. शत्रुवधादिकदारम्भवाश्चेति हृदयम् । यदुक्तम्- "सयतानि न चाऽक्षाणि नैवोच्छृङ्खलितानि च । इति सम्यक्प्रतिपदा त्वयेन्द्रियजय कृत" इति, “ मनोवच कायचेष्टा सहृत्य सर्वथा । श्लथत्वेनैव भवता मन शल्य वियोजितमि "ति च । स तु= स एव, महादेव उच्यते। बाह्यतस्करजयवदान्तरतस्करजयो येन विहित स महादेव । वाह्यतस्करजये तु देवमात्रम् । अन्येषामपि तादृशत्वान्महत्त्वे वीजाऽभावात् । ततश्चाऽन्यादृशोऽजितेन्द्रियो हिंसा- द्यारम्भवाश्च देव परतीर्थिकप्रसिद्धो महादेव सामान्यदेवसदृश एवेति न केवलं महत्त्वमपि तु देवत्वमपि तस्याऽतिवहित्याकूतम् ॥ ४ ॥ कष्टा महारेकस्योलम् - सम्मति वीतरागत्वेन महादेवसमाह- रागोपी महामाहौ दुर्वपो येन निर्मिती । महादेवं तु तं मन्ये शेषा नामधाराः ॥ ५ ॥ रगपाविति । येन-मप्रकारेण देवेन, महामझौ-माने पराऽपेक्षमा देहम्मविशिष्टपासादिको यो महो सके मी स्मानौ म्मायामाविना शारीरिकविशिष्टशक्तिसम्पनौ खाने, मनमा पविय, मनाविकासमतत्वेनाविरत्वादिवि कोमम् । मत एक दुर्बयो- सेन मीयेते पनि हारसी कप्टसा पनियही महामध्ये हम मुकरतया मेक्य कलाऽपि, महत्त्वस्पाऽन्यथाऽनिर्वाहात् । सप मझामानेप्रेयो मातु मा वा दुर्नेयस्तु मात्मेवेति भाव । गगापौर रागो विपयेप्पावरो पोऽनिशेऽमीति ताम्सौ तो, मला मपि र कसे राग्वेपमोरपीनासपोर्महामासमुचिठमेवेति ध्येयम् । निजिटी- निगृहीती त्याविषय, निाशिवानिति यात् । रम्पीना निमास त्यागम्प नाशस्य पानावान्तरतेवि बोम्यम् । तुरेवा मिनार मित्पनन्तर सम्म । साथ, ते तु-समेष, TPS महामहरामहे जेवार देवमेवेत्यर्थ । महादेवम्-महादेवपबामियम् , स्वीकरोमि । महामाझजतमहादेवल सहेसुमिपावरेव स्वीकारा मिनि हदयम् । मनु पपीषु बहलो महादेना प्रसिया, न पते सर मितरागोपाः परिमहादिना रामविसमापागमास, तक्स- महादेवन तेपा कममिति पेज्वार-पारागादिमेतुरन्ये मा. देवपास गोप्य' -निम्पपत, नामधारका महादेवेति मामल मन्ये कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् - एवञ्च ते रूढ्यैव धारयन्ति, न तु तत्र महादेवपदार्थोऽपि घटते । महादेवा न तु योगत इति वस्तुतस्ते न महादेवा । नामनिक्षेपविषय- ताया यादृच्छिकत्वानादृशमहादेवादिष्टाऽसिद्धे । अर्थक्रियाकारित्वा- दावतो महादेव एव महादेव । किच्चाऽन्यैर्दुर्जय यो जयति स एवेत- राऽपेक्षयोत्कृष्टगुणवैशिष्टयान्महत्त्वास्पदम् । यदुक्तम्-" अरक्तो भुक्त- वान्मुक्तिमद्विष्टो हतवान् द्विषः । अहो महात्मना कोऽपि महिमा लोक- दुर्लभ " इति । रागादिपरतन्त्राणा देवाना रागादिजेता महानिति वीतराग एव भावतो महादेवो नाऽन्ये । यद्वक्ष्यत्यनुपदमेव-"शव्दतो गुणतश्चैवाऽर्थतोऽपि जिनशासन" इति भाव ॥ ५ ॥ ननु नामभावमहादेवयो कतरस्तवेष्ट इति चेत्तत्राऽऽह- शब्दमात्रो महादेवो लौकिकानां मते मतः । शब्दतो गुणतश्चैवाऽर्थतोऽपि जिनशासने ॥ ६॥ शब्दमात्र इति । लौकिकानाम्=लोका एव लौकिकास्तेषाम् , साधारणजनाना वस्तुतत्त्वग्रहणाऽपटूनामित्यर्थ. । लौकिकमर्थं बहु मन्यमानानामिति यावत् । मते-सिद्धान्ते, शासने इत्यर्थः । स्वर्गादि- मात्रसाधनहिंसादिसाध्ययज्ञादिप्रतिपादके शास्त्रे इति हृदयम् । मता इष्ट प्रतिपादितश्च, महादेवा महादेवाऽभिधो देव , शब्दमात्रा शव्द एव, शब्दत एवेत्यर्थ । न तु तत्र महादेवपदार्थो महादेवगुणो वा, रागादिसत्त्वान्महत्त्वाऽभावात् । यदुक्तम्---" स्पृहावन्तो विलो- क्यन्ते लघवस्तृणतूलवत् । महाश्चर्य तथाप्येते मज्जन्ति भववारिघावि"ति तुल तृणादपि लघु तूलादपि हि याचकः । वायुना किं न नीतो- १ मपदेषोत्रम् औ मामम मामिप्यतीति । पब ममहत्ताऽमावेशी महादेव उच्यतेनो नामनिक्षेपविषय पवेीि शन्दमात्र एप, न तु भावनिक्षेप विषयवासायत इति पापर्यम् । ननु सहि महादेव. क पारम्परिको मत इति चेववाह-जिनशासनेमति रागादीनिति जिनस्तस ब्दुपालापसम्बन्भिनि सासने शामे मैनम्वन पर्व । सम्रता महादेवपदयोग्यत्वाच्यम्देन कला, साविमकिकस । गुप्ता शानेन्द्रियप्रणीतरागत्वविम्मेि हत्या, पैवेति समुच्ये । मत एवं मर्पता महापाऽसौ देवपर्यसद्भावेन हवा भपि:-समुभमे । एमए प्रिनशासनमतो महादेव एव मावनि पक्तिमत्वादास्तको महादेष इति मैक्तिमताऽपेक्षमा परमामतो वस्तुपाहिरकौशिष्यालोकोपर पिनशासनमिति मन्यते । एपमाऽन्यसीसम्मतो महादेषो महादेश गुणस्म महादेवपदावस्य पाऽमलाल स इशः किन्तु पिनासनसम्मत एकति स एवाऽऽभवणीय इति मावः॥६॥ मनुकं गुणतोऽतिमेति सदेष तिमि छोक विश्वपति - प्रतितो व्यक्तितपैर विधानालपनाचया । मोदवात येन महादेव स उम्पते ॥७॥ मित इति। येन-बारमोन देवेन, मोहमालम् मोदो स्वे स्मुबि माफम् - 'मनिस्पफ्नदेहादी नित्यत्वेन ममेति । मानेनाऽजन्य मुधिर्मोह इत्यभिधीयते इति । स एवं संसारे साम्मानिसणसायनमिति मापम् मोहस्य माले परम्परा पा इतम्- विनाशितम् मेन मोहम्मत इति सारा । सा-रो देष, कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ११ - %3D शक्तित: निजात्मवीर्य विशेषतः, वीतरागस्य क्षायिकाऽनन्तवीर्यवत्त्वा- दिति भाव. । व्यक्तित: सहजाद्यतिगयविशिष्टतया स्वीयेतरविलक्षणा- ऽसग्धारणाऽलौकिकव्यक्तित्वमपेक्ष्य, चैवेति समुच्चये। विज्ञानात् विशिष्ट सर्वद्रव्यपर्यायविषयत्वादनन्तत्वाहिशुद्धत्वाच्चेतराऽपेक्षयोत्कृष्ट यज्जान तस्मात् , केवलज्ञानाद्धेतोरित्यर्थ । तथा-पुन., लक्षणात् सुरासुरनमस्यत्वादिरागद्वेषजयादिरूपमहादेवलक्षणस्योक्तस्य वक्ष्यमाणस्य च सद्धावाद्धेतोश्च, स = तादृशो मोहनालहन्ता देव , महादेव उच्यते । यो वीतमोहोऽनन्तवीर्य सातिशयव्यक्तिविज्ञानवान् , अत एव महादेवलक्षणोपेतश्च स महादेव उच्यते, इतरस्तु शब्दमात्र इति सारार्थ । यद्वा येन विज्ञानात्स्वीयविशिष्टज्ञानवलाच्छक्तितो निजात्म- वीर्यविशेषवलाच मोहजालं व्यक्तितो व्यक्त्या, प्रत्येक व्यक्ति यथास्या- त्तथा, अय मोहोऽय मोह इत्येवं प्रतिव्यक्ति शृङ्गग्राहिकया गृहीत्वे- त्यर्थ । मोहसमूहसम्बन्धिन्य सर्वा एव व्यक्तय इति यावत् । हतम् , स लक्षणात्सकलमोहहन्तृत्वरूपाऽसाधारणधर्मात्मकलक्षणहेतोर्महादेव उच्यत न तु तीर्थान्तरीयदेववद्धार्यावियोगादिना क्षणं विरक्त., स्वभार्यायां पार्वत्यां दक्षयज्ञे मृताया महादेवो विरक्तस्तपस्तेपे, पुनश्च दारपरिग्रह. कृत इति पौराणिका इत्यनुसन्धेयम् ॥ ७ ॥ इदानीं मदलोभजयाख्यगुणेन स्तुवन्नाह- नमोऽस्तु ते महादेव ! महामदविवर्जित ! महालोमविनिर्मुक्त ! महागुणसमन्वित ! ॥ ८ ॥ इत्यर्थ ।
१२ मारेक्ोत्रम् मम इति । महामदविवर्जित !-मदै नापुकोऽमिमान- मनितोद्वत्यैर्विनितो रहित महान् ज्ञानापुस्कवितपरकारब साकस्पेनी सामस्येन समहिलासमरिकमाऽसौ मवविनितम स तात्र, या महान् मन्मापेक्ष्पास्पषिको यो मवस्तेन बिर्मित, क्सम्बोधने, यो महता मदेन सिमित सोऽस्पेनापि तेन विपरित मवस्पेवेति सर्वरिपमदमिमिकतामपिको मवविवति स पवेति निर्मदमेष्ठ पर्म । देवन्तर तु श्मशानाविनिवासान्नृत्यापमिनिवेशा- रमपमिमानेन हिंसाविमापाच मचता माऽतिक्रामतीत नस महादेव इति सम्म् । “पिचलेक सो मद" इत्यमरः । रूप, मासोममिनिर्सककोम. परस्म्हणेच्छा, तेन विनिर्मको रहिस, निर्मेम इत्यर्व । निप्परिप्राइनादिति मावः । महान् साकस्पेन होम रहितत्वासमोठये मेमविनिर्मका, महा महरिगोपादेयानमा रयाविश्विकपरिहारेण मारम्भाविमोबफतावस्युकटौ मैरिनिर्मच, वाम्योपने । महवा मेमेन रिसोप्रपेमाऽपि तेन रहितो मास्पेवेति सर्वरिपोमरहित पर्व । म देवोन्मपदम्पपूनाविना प्रसपमान स्पदिनाऽनुमेयछोमगन्य इति स्यम् । मठ एष, महागुणसमन्वित महदिरन्पैरमाप्यनिर्मवसानिर्गमायादिमिस्तपा ममत्रोपकारितालिम, सर्वोत्करपियुद्धज्ञानादिभिश्व गुमै शिरपा समन्वित सहितः, यहा महान् निर्मदत्वारिभिसाकाणेः ला सर्वोपमपाऽसौ मुणसम- विध स तत्सम्पापने। गुणिमेष्ठत्यर्थः । मत स प महादेव! =महान् देवान्ताऽपक्षयाधिकगुणत्वात्मठियाऽसौ रेवा, म्यो- भने । पा६ि मदादिरहितो गुणपंप स मदेव, भन्या तु सों ।
कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् १३ , - महादेव एव स्यादिति हृदयम् । ते-तुभ्यमेव तादृशाऽनुत्तम विशेषण. विशिष्टाय, न त्वनीदृशाय, सर्व वाक्य सावधारणमिति न्यायादिति बोध्यम् । नमः नमस्कारोऽस्तु, ममेतिरोप । मदादिराहित्याय गुणलाभाय च तादृशो महादेव एव नमस्करणीय उत्कृष्टत्वान्नाऽन्यादृशो- ऽपकृष्टत्वादात्महितेच्छुभिरिति तीर्थान्तरप्रसिद्धो महादेवो न केवलं शब्दमानोऽपि तु नमस्कारमपि नाहतीत्याकूतम् ॥ ८ ॥ सम्प्रति पुना रागाद्यभावान्महादेवत्वमाह- महागगो महाद्वेपो महामोहस्तथैव च । कपायश्च हतो येन महादेवः स उच्यते ॥ ९॥ महाराग इति । येन यत्प्रकारेण देवेन भुवनाऽद्भुताऽतिशय- शालिना, महारागः महान् गुरुतरो दुष्परिहरत्वादृढ़तरश्चिरसह- चरत्वादशीकृतजीवमात्रत्वाच्च दुर्जयश्च यो रागो विषयाऽनुरागो विषया- ऽऽसक्तिविषयेषु प्रीतिर्वा स तादृश , “रागोऽनुरागोऽनुरति "रिति हैमः। महाद्वेषा=महान् गुरुतरो दृढतरो दुर्जयश्च यो द्वेषोऽनिष्टेष्व- पीति. स तादृश , तथैव चेति समुदाय समुच्चये। महामोहः महान् गुरुतरो दृढतरो दुर्जयश्च यो मोहोऽस्वे स्वबुद्धिः, स तादृश', कपायः क्रोधमानमायालोमात्मकाऽऽत्माऽशुभपरिणाम , चः समुच्चये । हत: विनाशित , त्यक्त इत्यर्थ । रागादीना हि त्याग एव नाश इति वोध्यम् । न तु देवान्तरवन्निग्रहानुग्रहपरिग्रहादिनाऽनुमितरागादि- परे देवा रागादीनपि हन्तुमप्रभवोऽय तु महारागा- दीनपि हन्तीत्यत एव, सातादृशमहारागादिहननसाधनाऽसाधारणा- ऽलौकिकाऽऽत्मवीर्यसम्पन्न , महादेव उच्यते । देवाऽन्तराऽसाध्य- मानित्याकूतम् ।
मनीतशास्तु दवा देवान्म- बारेक्रतोत्रम् महारागाविहनमादस्पैनोनित म्याम् । सापारण इति सम्बमात्र स इति दयम् ॥ ९॥ सम्मति महावतोपदेशाविना महादेवत्वमाह- महामो सो मेन मामयविर्जिता। महावठोपदेशी व महादेवः स उच्यते ॥१०॥ महाकाम इति । पेन यामकारेण देवेन, महाकामा महान् मस्तीपम्मी वस्तुन्यकटम्मा गुरुवर उकपकारेण स्तरो दुर्गम मः कामो मोगोपमोगेच्च स तारत: सर्वपकारम फाम , हवा मामयणेन विनाशिता, मो महान्त काम हन्ति सोम इन्धीति किम पकव्यमिति सर्वरिपकामहन्त याक्त् । न त परसीर्षिकप्रसिद्ध महादेवरकाम दम्माऽपि पुनस्तवमगोश्पकामान्तेसि मानः। नन मिष्कामोऽपि देवन्तरवनिमयो म मदिति चेपाह-महानयरिक जिवा महान् गुख्खरकारणपस्मयार्निवारत्वावन मर्म मा मममिस्पर्कः । सदेव माम दुस्वात् , मन्मार पौराऽप्रिधिप बाविमर्म त कमधिदन्यैरप्युप्पमित्पसमेव, तेन सिर्मितो रहित , क्षीणामस्वात् सर्वमा निर्मप इति लयम्। महामपरहिक्स & नाम मममपीति योध्यम् । बत एक देवान्तरदेशियम् सद मामपाऽनुयात् करमन्मया स्वारिकाररक्षाममरादिनिप्रहमास पुराणवी गणित इति माप । मोफोपचारापेक्षयाऽपि क्त महास मपेक्षितमित्याह-महामवोपदशी-मामाशेयरमपपारिफम्मा- समठ मसमरिसासपाऽस्तेमाभाऽपरिमहापारमक पार नुप कीर्तिकलाव्याख्याविभूपितम् १५ दिशतीत्येवशील, ताशवतस्योपदेशोऽस्त्यस्य विधेयतया प्रतिपाद्यतया च वा सः, च समुच्चये। न तु बालतपोहिंसादिसाध्ययज्ञादिरूप- निकृष्टवतोपदेशीति भाव । स महादेव उच्यते । यस्त्वल्पकामहन्ता दारपरिग्रहादिना कामाधीनो वा भवमग्नतया भवभीतोऽल्पव्रतोपदेशी च शासनान्तरे प्रसिद्धस्तस्य तु देवत्वमप्यतिबहु, तस्मात्स महादेवः शब्दमात्र एवेति तात्पर्यम् ॥ १० ॥ अथ क्रोधादिजेतृत्वेन महादेवत्वमाह- महाक्रोधो महामानो महामाया महामदः । महालोभो हतो येन महादेवः स उच्यते ॥ ११ ॥ महाक्रोध इति । येन यत्प्रकारेण देवेन, महाक्रोधः महा- नत्युत्कटो हिंसादिप्रवृत्तिप्रयोजकतयाऽतिचिरस्थायितयाऽनल्पश्च य क्रोधो विविधाऽनिष्टप्रयोजकतया स्वसजातीयेषु गुरुतरः कोप , तथा, महा- मान:-महान् गुर्वादिष्वप्यवज्ञाप्रयोजकत्वादतिमात्रो यो मानो मम नात्यादिक सर्वाऽधिक नाऽन्य कोऽपि मादृश इत्येव जातिकुलैश्वर्य- विद्याद्यभिमान , स । गर्वोऽभिमानोऽहकारो मानश्चित्तसमुन्नतिरि"- त्यमर । तथा, महामाया-मइती परैर्दुज्ञेयत्वादुप्पारा या माया शाठ्य मिथ्याव्यापारेण परवञ्चनादिरूप सा । माया तु शठता शाध्यमि"ति हैम: । महामदा-महान् अविनयादिप्रयोजकत्वाद्गुरुतरो यो मदो बलैश्वर्याद्यधिक्यमावनाजनितचित्तोद्रेक , सः । अत्यधिक- मौद्धत्यमित्यर्थ । “चित्तोद्रेक स्मयो मद" इत्यमरः । तथा महालोम: =महान् स्वल्पेऽपि वस्तुनि महाननादियाच्यादिप्रयोजकत्वादतिलघुत्व- . -- प्रादेवयोगम् सम्पावकलाहरूपानतिमात्रम यो होम परस्वम्हणेचा, स । सर्वत्र कोपायो महत्त्वविरोपणातस्य दुर्घयत्नमन्वैरप्पसत्तैर्मन्यते। क्निाशिव , परिहत इस्या । महामात्मनेन स्पस रतेति गि विपरिणामेनाऽन्यो वेभ्यः। निफसायो निर्ममय यो देव ही सागम् । स महादेव सन्यसे । म त्रादिहननापुमीतमहास्येष सम्पनोप्रमेव सर्वमहानिति मापनमा महामानी सपपरिषवनानना परमधाम्याण्डमाविसकरवान्महामद पूमोपहारविमाणाविनाऽनुमित महामेम पुराणादो सपात्वेनोपर्मित परेप्टो देव । तपादि रपि परम्प दुर्नय , यस्य तु महाकपाविररि मुनय, सोमरस महादेव स एव प महादेवः । येन प महापाविसम्स्य पनि हनन किमर्दिनि या सर्वथा प कोपारिरहितत्पाजिनशासने देव पर महादेपोज्यस्त सम्बमात्र इति मनः ॥ ११ ॥ प्रकारान्तरेणाधी जिमस्व महादेवस्वमित्यार- महानन्ददये यस महामानी महातपाः । मदापोगी महामौनी महादेवा स उच्यते ॥ १२ ॥ महानन्देति । पस्स- यारसास्य देवस्य, महानन्दएप- सावतामनिरपपिनिर्षियम्पत्वाम्मषिोऽननो या सर्वश्रेष्ठप, या महनी निकारणबारमांची पिवसादस्पैत्रिकी सराय पसे पमानन्द गुम क्यामपस स प महानन्दाये, वय म दयानभ्यते । महामना दया पपेशिनिपार । मगन्नी राम या ९ पम्पेत्पम् । मन मनपात्याया भनु तणसी कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् , १ . क्तमपि महत्त्व गम्यते । -महानन्दादिसमर्थनक्षम गुणान्तरमप्याह महाज्ञानी-महदनन्तत्वात्सर्व विषयत्वात्सर्वाधिक क्षायिकत्वात्सर्वविशुद्ध च यज्जान केवलज्ञान तदस्त्यस्येति स तादृश , सर्वज इत्यर्थ । यो महाज्ञानी तस्यैव महानन्ददये इति भाव । अनरवन्ति चक्राणीतिवत्कर्म- घारयान्मत्वर्थीयो बोध्य । हेतुद्वारकेण विशेषणेन ज्ञान समर्थय- नाह-महातपाः मह-परैरसाध्यत्वान्निरन्तरत्वान्निर्दुष्टत्वान्महाफलत्वाच्च सर्वोत्कृष्ट सर्वविशुद्धं सर्वाधिक च तपोऽनशनादिरूप यस्य स तादृश ज्ञानतपसो फलमाह - महायोगी-महान् सर्वाऽतिशयमूलतयाऽलौ- किकतयाऽसाधारणतया सर्वकर्मक्षयप्रयोजकतया चाऽनुपम. सर्वोत्कृष्टो निरन्तर प्रवृत्तोऽसाधारणो योगश्चारित्र समाधि, यस्य स , योगीन्द्र इत्यर्थः । यदुक्तम्-" स एष योगसाम्राज्यमहिमा विश्वविश्रुत । कर्मक्षयोत्थो भगवन् ! कस्य नाऽऽश्चर्यकारणम् ?” इति । ज्ञानतपसो- महायोगलाम. फल मिति कृतार्थत्वं ध्वन्यते । महामौनी महत् सर्व- विलक्षणत्वात्सर्वोत्तमत्वादभङ्गुरत्वाचाऽसाधारणत्वाच्च सर्वश्रेष्ठं यन्मौन वाचयमता, तदस्त्यस्येति स । प्रियपथ्यतय्यमितवाक्यं हिं पारमा थिंक मौनम् , वानिरोधश्च शब्दार्थमात्रम् , वाड्निरोधात्मकमौनस्य हि सदुपदेशा दिविरोधितया लोकहिताननुगुणत्वादिति ध्येयम् । किञ्च महत्सर्वाऽतिशायि यन्मौन मुनित्व मुनेर्मावः कर्म च, तदस्त्यस्येति स., महाज्ञानचारित्रसम्पन्न सम्यक्तुसम्पन्नश्चेत्यर्थः। यदुक्तम्-" सम्यक्तुमेव तन्मौन मौन सम्यक्तमेव वे"ति बोध्यम् । स महादेव उच्यते । लौकिकाऽनन्दमनो निर्दयोऽल्पज्ञोऽल्पतपा बालयोगी मायामौनव्रती 4.
महोत्रम् भेकरिसाऽननुगुणमौनी च परसम्मतो देव इति स शब्दमास इति विमर्सम्यम् ।। १२ ॥ सम्प्रति पीर्यादिमहत्तान्महादेवस्वमाह--- महावीर्य महाधैर्य महाशील महागुणः । महामश्वपमा यस महादेवः स उच्यते ॥ १३ ॥ महावीर्ममिति । यस्य = मारमस्य देवस्य, महावीर्यम्- मावसाभारणतारोकिकस्पाक्षामिफरवावान्तत्वाधान समरिक सोंचमं च पदीय सातिशम उपमाहा, न् । महाभैर्यम्=महवस- भोपादाक्प्पपमितत्वावमम्पमसाधारणत्वावगैक्षिक सर्वाधिक बत् मझाम्पत्वमत्वराऽनगम वत्। माशीसम्मापसापरणा- पौकिकत्वावमपलासमग्रलाच सर्वोत्तम मच्छी पारि तव । महागुमा = महान् माहिरपीन्द्रापः साणीवसादसापारपत्वाद मैत्रिफलासोपारकरवाच समोको बो गुणो विशेषण सम्बन्धः- मादिर्दमाविम स । महामम्जुबमा-महवी सकी सस्यमय कारिप्पपि भाषादसापारम्पतिकी मन एष मनु ममोरमा १ या क्षमा तितिक्षा सा । 'तितिक्षा सहर्म समेति “मसमास- मनोरमानि "नि पहेमः । सामप्पासमुचयो गम्पते। एकमेवानि यस्य, स महादेष उप्पते । न स्मन्यदेवस्वारस्पपीयों से- माम भोम्बसावयों बाराविपरिपहादिना पिसमीत एमा शुमबयामासाविमत्वादसगुणोपऽप्यपाधे निम्झोपवावसानः, कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् १९ प्रसिद्धं चैतत्सर्वं तीर्थान्तरप्रसिद्धस्य महादेवस्य पुराणादौ । तस्माच्छब्द- मात्रो महादेव परशासन इति भाव ॥ १३ ॥ अथ स्वयम्भूशव्दार्थनिर्वचनेन कृत्वा जिनशासनप्रतिपादितस्य महादेवस्यैव स्वयम्भूपदवाच्यतेत्याह--- स्वयम्भृत यतो ज्ञान लोकाऽलोकप्रकाशकम् । अनन्तवीर्यचारित्र स्वयम्भूः सोऽभिधीयते ॥ १४ ॥ स्वयम्भूतमिति । यतः = यस्य देवस्य, सार्वविभक्तिकस्तस् । यस्माद्धेतोरिति वा । लोकालोकप्रकाशकम् लोकस्य चतुर्दशरज्जु- प्रमाणस्य जगतोऽलोक्स्य लोकबहिर्भूतस्य च यावत आकाशप्रदेशस्य प्रकाशक परिच्छेदकम् । यद्यपि लोकाबहिर्भूत न किमपि ज्ञेय तथापि यदि स्यात्परिच्छिद्यतेति सम्भावनया महत्त्वद्योतनाय तथोक्तिरिति चोध्यम् । ज्ञानम् केवलज्ञानम् , तज्जान हि क्षायिकमिति निरावरण- त्वाल्लोकालोकप्रकाशकमिति बोध्यम् । स्वयम्भूतम् = स्वयमात्मना 'परोपदेशादिक विनैव भूत प्राप्तमाविर्भूत वा। कर्मक्षये हि मेघापगमे सूर्यवज्ञान स्वयमेवाऽऽविर्भवति । किञ्च जिनाना क्षयोपशमवशाजन्मत एव ज्ञानत्रयसमन्वितत्व निसर्गत एवेति बोध्यम् । तथा, अनन्तवीर्य- चारित्रम् अनन्त क्षायिकत्वादेवाऽविनश्वर वीर्यं सातिशय उत्साहश्चारित्र शील च, सः यतो यस्यैतानि, तत एव तादृशो देव , स्वयम्भूः= स्वयम्भूरित्येवम् , अभिधीयते = गीयते । ज्ञानस्य स्वयम्मूतत्वादेव स्वयम्मू , न तु परदेववदज्ञातजन्मत्वादिनाऽल्पज्ञानवीर्यचारित्रः स्वयम्भूः। एवञ्च लौकिकानां मते स्वयम्भूरपि शब्दमात्रः, जिनशासने तु गुणतः शव्दतोऽर्थतश्चेति तात्पर्यम् ।। १४ ।।
मारेषतोत्रम् - मनु यमुक्ता शव्यतोनम बिनशासन इस्पुयते स किममिष इस्पपेक्षायामार- शिवो पसान्निा प्रोका घारम प्रकीर्तितः । कायोत्सर्गी च पर्यही स्त्रीभवादिविजित ॥१५॥ शिम इति । यसात्-पतो देतो , मिना-समति रागावीनिति बिमस्वीर सामनापानि । फायोत्सर्गी -पाय शरीरमुस्सम्यते समत्वेन बाप्पते नासायनिक्तमिररष्टया मत्र सकायोत्सर्गो मुद्राविशेष, सोऽत्यस्मेति स उत्पितस्प सत समीरनासामनिम्तस्विरस्तिा मफस्थितिविशेषमामित इत्यर्थ । सबा, पर्यहोपासनलित, पक्षण यना- स्पामोरपीमागे पादापरिहते सति । पर्यहो अभिगोचानदक्षिणोपरपापिक" इति । समापिस एप । क्रियाको कामोत्सगी समाधी प पर्यहरीत्येवं फासमेवेनासामदेन पोमयो सत्व वो मम् । स्नीशखादिनिवर्मितासी दाराम असमायुष पाविमा पाइनफ्पावि पतैपिस्तिो रहित, निप्परिमह इति यावत् । पयुक्तम्- वपुप परम सर्व परधौ प नासानिमते सरे पेस, म शूनमापकाविसमारकरपान । मानाकमनीवाहपरिवा न पक्षिपशुसिंहादिपाहमाऽसीनविग्रह। इति । पा समुपये | मम्मम्ममारिति सम्मसे । बिशिव मभिपमा प्रोक ममगीत भर कस्पाम फरोतीति स ताशा, समुपये । प्रकीर्तित = पति । पमाविसरियसमारिन्ग भमुधियपुमासियोऽपियारम धमपारगादेरन्सचा निप्पमत पापण की कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् परतीर्थेष्टो देवो न शिवो नाऽपि शङ्कर., किन्तु शब्दमात्रेण स शिवः शक्करश्च । गुणतोऽर्थतश्शब्दतश्च जिन एव तादृश इति तात्पर्यम् ॥१५॥ परतीर्थप्रसिद्धस्य महादेवस्य साकारनिराकारत्वादि यद्वयेते, जिनशासनेष्टस्याऽपि तत्तथैवेति न तावताऽपि तस्य वैशिष्टयमित्याह- साकारोऽपि ह्यनाकारो मृतॊऽमूर्तस्तथैव च । परमात्मा च वाह्यात्मा सोऽन्तरात्मा तथैव च ॥ १६ ॥ साकारोऽपीति । सः जिनशासनेप्टो महादेव., हि = यतः, साकार:-ससाराऽवस्थाया शरीरित्वादाकारेण यथाक्रमसन्निविष्टाऽङ्गादि- घटिताऽऽकृतिविशेषेण सहित , शरीरीति यावत् । ससारीति हृदयम् । । न तु देवान्तरवदवतारग्रहेण तथा, मुक्तस्य नन्मग्रहणाऽयोगात् । जन्मादितो मुक्तिरेव हि मुक्तिरिति बोध्यम् । अत एव, मूर्तः= निश्चयनयेनाऽऽत्मनः स्वभावतोऽमूर्त्तत्वेऽपि संसाराऽवस्थायां कर्माऽष्ट- कोपगूढाऽऽत्मप्रदेशत्वाच्छरीराऽधिष्ठितत्वाच्च व्यवहारनयेन कथञ्चिद्रूपी, अपिना साकारस्याऽनाकारता विरुध्यत इति सूच्यते । अपेक्षा- भेदेन त्वविरोध इति बोध्यम् । तथैवेति समुच्चये। अनाकार:= सिद्धावस्थाया कर्मणां साकल्येनाऽभावाच्छरीराधभावादविद्यमान आकार उक्तप्रकाराऽऽकृतिर्यस्य स तादृश., अशरीरीत्यर्थः । मुक्त इति यावत् । चो-हेतौ, यतोऽनाकारोऽत एव, अमूर्त =अरूपी, कर्मसम्बन्धाऽभावा- कथञ्चिन्मूर्तत्वस्याऽप्यभावादिति भाव । एतेन परेप्टदेवस्य यथा साकार- निराकारत्वादि तथा जिनशासनेष्टदेवस्याऽपीति न तावता कस्यचिदेक- स्याऽपि न्यूनत्वमुत्को वा वर्णयितुं शक्यत इति सुच्यते । जिनशासने 5 मारेचोम् महादेवस्य परमात्मत्वादिकमप्याह-परमात्मा, पायास्मा, तर धन्तरात्मा प। स महादेव इति प्रकरणातम्यते । परमात्म्परिक मनुफ्यमेव सममेवोप्पावमिप्यते इति मेयम् । एपप साकारनिराकर स्मादिना न केवा परसरिस्म महादेवल किमपि सिम मिनमासनेष्टस्य प तस्य काही न्यूनचा प। म्युतीमा त गुणानां सत्यसाम्पमेय। किन्तु मशान्त दशनं स्पेत्यादिना पति सिमे न बिनशासनेष्टस्य महादेवस्यैवेति परतीमहारेक्स न्यूनता तपस्वाध्यापीति मोम्मम् ॥ १६ ॥ मवुक 'परमात्मा प वासस्मे त्यादि, कमलमयुपनियमिपुराणो परमात्मत्वमेबार- दर्शनशानयोगेन परमाऽऽस्माऽयमम्पया। परा धान्सिहिंसा परमास्मा स उच्यते ॥ १७ ॥ दर्शनेत्यादि । अपम्-प्रखठो मिनधासमेटये बारे अव्यया-भविनाशी, मानो दमनमेन नित्वादिति मारा । दर्शनशानयोगेन-दर्शन माविक पदम सामान्यज्ञानाम मासिक मोफरपु मदानात्मकं सम्मान, शान धारिक कसम्मान स्पद्यावामिमवाऽमेकासात्मकपबागसिवनस्वात्मान, यो समिन् योग एकमा माममो दर्शनशानामा परिमान इति सत्तम् , तेन खन्य । मिनस्य मत एव बनवानाम पुरुसया दीक्षान्न पातिकमकये केरम्पनिमाकतवा परमाया, मना मनशानोगेन, पश्ययान्ममरणाचपापरहिलावरिनाक्षी २३ जिनशासनेष्टो देव एवाऽव्यय परमात्मेत्याशयः । कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् निर्विकारो निर्गुण इत्यर्थः । परमात्मा परमो ज्ञानादिगुणोत्कर्षात्सर्वो- स्कृष्ट षष्ठप्रकृतिरुत्तमोत्तम आत्मा। एतेन नहि निर्हेतुक परसत्व- मात्मनोऽपि तु परमज्ञानादिगुणोत्कर्षात । अत एवोक्तगुणसद्भावाज्जिन एवं वस्तुतः परमात्मा। तीर्थान्तरप्रसिद्धस्य च महादेवस्य परिग्रहेण रागादिमत्त्वनिश्चयान्मत्यज्ञानादिकमेव, पुराणादितस्तस्यैकान्तात्मकवस्तु- रुचेरेवाऽवगमादिति तस्य परात्मत्व शब्दमात्रमिति समर्थितम् । यद्वा- अय जिनशासनेप्टो महादेवो ज्ञानदर्शनयोगेन कृत्वा, अव्ययान व्येति परात्मत्वतोऽपगच्छति दर्शनज्ञानादिना रहितो भवति, जन्मत एव ज्ञानत्रयादियुक्तत्वादित्यव्ययः परमात्मा । सर्वविशुद्धज्ञानादितो स्वात्मन. परमत्व न तु वाङ्मात्रतः, ज्ञानादि चाऽस्य जन्मत एवेत्यय- मव्ययः परमात्मा परमात्मत्वतो न कदापि हीयते। परेष्टदेवस्तु लौकिकेषु विशिष्टज्ञानादिना वाढं परमात्मा गीयताम् , न त्वव्यय. अवताराद्यवस्थाया लौकिकविशिष्टज्ञानस्याऽप्यभावादिति सर्वविदि" त्यादिना परेप्टदेवस्याऽपि सर्वज्ञत्वादिकमिति तस्यापि परमा- स्मत्व पारमार्थिकमेवेति चेत्तत्राह-परेति । यस्येत्यर्थवलाल्लभ्यते । यस्याऽत्मनो महादेवस्य, परा = सर्वाधिका सर्वोत्कृष्टा च, मित्रद्वेषि- साधारणत्वात्परां काष्ठामापन्नत्यय. । शान्तिः क्षमा, निग्रहसामर्थ्य सत्यपि चीतरागत्वादपराधादिसहनमित्यर्थ । यदुक्तम्-"हिंसका अप्युपकृता' इति, “कृताऽपराधेऽपि जने कृपामन्थरतारयोः। ईषद्बाप्पाद्रयोर्मद्र श्रीवीरजिननेत्रयोरि"ति चेति भाव । अहिंसा-प्राणातिपातनिवृत्तिः, चेन परेति सम्बध्यते । सर्वजीवविषयत्वात्सर्वसावद्यविरतत्वाच्च परा परमात्मा ।
जिनशासनेटस्प प तस्य काऽप न्यूनता प। मयुखोममा र मातयोगम् महादेवस्म परमात्मत्वादिकमप्यार-परमारमा, पाचारमा अन्तरास्मा च । स महादेव इति करपातम्पते। परमात्मदिन मनुफ्दमेर स्वपमेनोपयदपिप्यते इति ध्येयम् । एषध साकारनिराकार- माविना न केवस परतीस महादेवस किमपि किर गुणानां सत्त्वात्साम्पमेन । किन्तु प्रशन्न दशन मस्पेस्पदिन्न पनि वैशिष्ट्य तु निमशासनेष्टस्म महादेवस्पैवेति परतीमहास न्यूनवा वस्वाध्यापति थोम्पम् ॥ १६ ॥ यदुछ 'परमात्मा च बायरमे स्पावि, कमनवुपपियाम्पुिरको परमात्मस्वमेगा-- दर्शनशानपोगेन परमाऽप्रमाऽपम्पका । परा धान्तिरहिंसा र परमास्मा स उच्यते ।। १०॥ पम्नेस्पादि। अयम्म्मतवे बिनसासनेटो महारे मम्पयामपिनासी, भामनो सम्पमयेन निस्यत्वादिति भात । दर्शनझानयोगेन-दर्शन सापक दम सामान्यज्ञानामक सत्पसिक बिनोकताले मनानारमत सम्पत पकने दाविक केसम्मान स्वाशवामिमवाज्नेकान्तारमफपवारसितवनसत्त्वान प, समो स्पमिन् योगः सम्पमा मालमो दर्शनशानामा भरिमाम पनि सत्त्वम् तेन समा । दिनस्य 8 मन्मत एव पनजामत्र- युसतया बीमामन्दरं पातिकमधमे फेवबनवानपुछतमा पेमाराम, मना दर्शनचानयोगेन, भम्पया-सन्ममरमापासहिवतापस्निाभी - भवावस्थामा विगुणे सहित. सकल, सगुण इति यावत् । कीर्तिकलाव्याख्याविभूपितम् २५ -पूर्वशरीरत्यागानन्तरमपरशरीरग्रहणात्प्राक्च त्यक्तग्रहीप्यमाणभवयो- रन्तरे मध्ये, विग्रहगताविति यावत् । बाह्यात्मा बहिर्भवो वाह्य स चाऽसावात्मा च स तादृश , विग्रहगतौ ह्यौदारिकादिगरीरान्मुक्तेश्व रहितत्वरूपवहिर्भावादात्मनो वाह्यत्वमिति स भवान्तरे वाह्यात्मेति भाव । भवेदिति सम्बध्यते । तथा, देहे गरीरे, शरीराधिष्ठानाव- स्थायाम् , अन्तरात्मा अन्तर्मध्ये स्थित आत्मान्तरात्मा, मवेदिती- हाऽपि सम्बध्यते । देहे तिष्ठन् ह्यात्मा देहस्याऽन्तरस्तीति व्यवहारादिति वोध्यम् । इति एवम्प्रकारेण, त्रिविधः=एकोऽप्युपाधिभेदात्ति- प्रकार., मवेदिति सम्बध्यते । एवञ्च परेप्टदेवस्य वर्णितमुक्तत्रैविध्यम- स्यैव युक्तियुक्तम् । ततश्च नानो वैशिष्टयमन्यदेवस्येति तात्पर्यम् जिनशासनेष्टस्य महादेवस्य सकलत्वादिकमप्याह- सकलो दोपसम्पूर्णो निष्कलो दोपवर्जितः । पञ्चदेहविनिर्मुक्तः सम्प्राप्तः परमं पदम् ।। १९ ॥ सकल इति । स जिनशासनेप्टो महादेव इति प्रस्तावाल्लभ्यते । दोपसम्पूर्णः दोषैर्जन्मजरादिभिर्दूषणैः सम्पूर्णोऽविकल. सन् , स्थतादशाया हि जिनात्मनोऽपि ते दोषा रागादयोऽपि च चरमादन्य- स्मिन् भवे इति तदा स दोषसम्पूर्ण. । अत एव, सकल-कलामि- आत्मा हि धृतदेहाद्युपाघि सगुण सकल इति वा कीर्त्यते इति बोध्यम् । दोष चर्जितः दोपैरुक्तपकारैर्जन्मादिरागादिरूपैर्वजितो विनिर्मुक्तः, केवल- २॥१८॥ भव- ४ मारेगोषम् कापमापकलासामिका सर्वोदय प, सातारो देव, परमाता =परम परमक्षान्त्यहिंसाविसमावर्षभेष्ठमाऽसापारमा पसल उध्योगपते । पात्मना नियमेन तु साम्पमेय, किन्तु या सणे गुणोरकर्य, स सदपेक्षमा मारतम्मेन म्पपदिश्यते। देव परस- नमारिसदापावाला परमात्मेस्युच्यते। परेो महादेवम्म सत्तार राधेऽप्पसहनो वक्षयानासकोमुराविहन्ता वेति तस्स तत्समन्य हिंसपदेरप्यमाव., तदुभीतो वचनाप्रमाक्षेति स सन्नमात्र एस परमारमा न सु पम्मठ । परमारता परमात्मोकगुणसभागाजिनाम- मेहो महादेव एवेति पदयम् । म प पूर्षिमाइसंसारसागर रान पसार्यपम्पापां परमात्मनिपावमे सापर्यमित्यपपि बोध्यम् गरज पदुक "परमात्मा पारमा सोन्यामा नये पर निरोप परिहरनेकस्माऽप्यास्मनोऽवस्थामेदेम प्रस्मत मतिराव पार- परमात्मा सिद्विपाप्ती पापारमा हमरान्तरे । मन्दरास्मा मपेदेदे इस्पेपस्तिपिपा निः ॥ १८॥ परमारमेति । एषा-मननो निमसन, शिशिर पाण्य माननपतिमान् विनेभर इति दयम् । सिद्धिप्राप्ती मिनिगरमन सामन्येन पश्ये सपान्तवनाविषयपरमान, मुनिििन यार। सम्मा प्राप्तो प्रभ सन मुधो मामाया राय पामारमा परमो गुन ग परी सामान पापमो. ममतामा पस ताग, मोन्- म मापुर।मारे ,
२५
.
प्रकार , मवेदिति सम्बध्यते । एवञ्च परेप्टदेवस्य वर्णितमुक्तत्रैविध्यम-
स्यैव युक्तियुक्तम् । ततश्च नातो वैशिष्ट्यमन्यदेवस्येति तात्पर्यम्
भवावस्थामा विगुणै. सहित. सकल , सगुण इति यावत् ।
कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम्
=पूर्वशरीरत्यागानन्तरमपरगरीरग्रहणात्प्राक्च त्यक्तग्रहीप्यमाणभवयो-
रन्तरे मध्ये, विग्रहगताविति यावत् ।
बाह्यात्माचहिर्भवो वाह्य स
चाऽसावात्मा च स तादृश , विग्रहगतौ ह्यौदारिकाढिशरीरान्मुक्तश्च
रहितत्वरूपवहि वादात्मनो वाह्यत्वमिति स भवान्तरे वाह्यात्मेति
भाव । भवेदिति सम्बध्यते । तथा, देहे-शरीरे, शरीराधिष्ठानाव-
स्थायाम् , अन्तरात्मा अन्तर्मध्ये स्थित आत्माऽन्तरात्मा, भवेदिती-
हाऽपि सम्बध्यते । देहे तिष्ठन् ह्यात्मा देहस्याऽन्तरस्तीति व्यवहारादिति
वोध्यम् । इति एवम्प्रकारेण, विविधः एकोऽप्युपाधिभेदात्ति-
जिनशासनेष्टस्य महादेवस्य सकलत्वादिकमप्याह-
सकलो दोपसम्पूर्णो निष्कलो दोपवर्जितः ।
पञ्चदेहविनिर्मुक्तः सम्प्राप्तः परमं पदम् ॥ १९ ॥
सकल इति । स जिनशासनेष्टो महादेव इति प्रस्तावाल्लभ्यते ।
दोपसम्पूर्णः-दोषैर्जन्मजरादिभिर्दूपणैः सम्पूर्णोऽविकल• सन् , भव-
स्थतादशाया हि जिनात्मनोऽपि ते दोषा रागादयोऽपि च चरमादन्य-
स्मिन् भवे इति तदा स दोषसम्पूर्ण ।
अत एव, सकला-कलामि-
आत्मा हि
धृतदेहाद्युपाघि सगुण सकल इति वा कीर्त्यते इति बोध्यम् । दोष-
चर्जिता दोषैरुक्तपकारैर्जन्मादिरागादिरूपैर्वजितो विनिर्मुक्तः, केवल-
॥१८॥
, महादेवगोत्रम् पर्सनझामपारित्रसदापदिति बोध्यम् । निकोप इस्पा । मास, पनदेहरिनिर्मका-पच पयसायाका ये वोश भरीरामि औदारिक- भारकक्रिमवासकार्मणास्मामि ते सकर्मक्षयान्ममऽमापार- निर्मुको रहिस , मुक्त इति यावत् । नरि मुफिलिमा सवारी राहिस्पमिति बोध्यम् । अस एस च, परमम्-स्पोरम सोचमतिका प पदम्-सानम् , सिद्धष्ठिलास स्थानमिस्पर्मः। मुकना बाम सानमित्याराम । सम्प्राप्त अधिष्ठित , स वात्स सन् , निफरः- मासम्बन्मियोपरहितत्वाकम्मम्य उक्तमत्रराम्रो मिती निका, निर्गण पम । सकिलोपामिविनिर्मक आत्मा निपले निर्णय इति या गीयत इति म्मेयम् । एकथाम सकम्त्यादिक युरियकम् । परेमदेक्स त मुचयमालादाइमाचम् । फसमन्यवा दारादिपस्थिर स्वस्म बर्मित साडेत, मुकम्म स्वयोगविति पारमाणिक समय- विक बिनस्पति उत्तम् ॥ १९ ॥ मा परेपदेवस 'एकमम्मियो माया प्रमविष्णुमहेभरा" पति मस्ति, सा मिनायोफ्फ्फ्त इस्माह- एकचिखयो मागा प्रमविष्णुमहरा। व एप प पुनरुका पानपारिषदर्शनाद ।। २० ॥ पनि । एकचिएकामदामाऽदितीला पा कम वा मम्मिकि, एको जिनामसभः । महा परिरातिः, मौन बिनाइतिरस्पर्षः । प्रभविष्णुमरेपराममा व विष्णुप महेश्वरी ते माया, "प्रमाऽमम् मरम्मेह' इति "Ajारापया हम्म' २७ - - , . परिमाषणादेकवचनम् । न विशकलितव्यक्तित्रयपरामर्शादुद्भूताऽवयवमेदविवक्षाया अवगमादिति ध्येयम् । च =समुच्चये । पुनरुक्ताः-पुन प्रतिपादिता , अपि पुनरुच्यन्ते। ज्ञानादिरूपा एवाऽहतो महादेवात्मनो भागा। पर्याया ब्रह्मादयो नाऽन्ये, ब्रह्मादिशब्दैझनादय एवेहेष्टा इत्यग्रे स्फुटी भविष्यति। तस्मादहन्नेव व्यात्मक. । परेष्टदेवस्य कस्या मूर्तेर्ब्रह्मादि- मूर्तिर्भागो न युज्यते, एकमूर्ती मूर्तित्रयसन्निवेशाऽयोगात्, तदनुपदमे- लक्षणयैव तथावर्णनमिति गृहाण । नन्वेव परे तथा न मन्यन्ते, किन्त्वेकस्या मूर्तरेव तिस्रो ब्रह्मादयो व्यक्तयो भागा इत्येव तेषामाशय कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् इति, “शिव शूली महेश्वर" इति चाऽमरः । वय =त्रित्वसङ्ख्या- विशिष्टा , भागाः अंशाः, एको महादेवाऽऽत्मैव ब्रह्मविष्णुमहेश्वराख्या- स्त्रयोऽशा इति पौराणिकाः। ते च भागा जिनात्मन एवेति हृदयम् । । ननु नैतत्मसिद्ध काप्यागमादाविति चेत्तत्राह-ते ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा- स्त्रयो भागा , एव=नत्वन्ये, ज्ञानचारित्रदर्शनात् ज्ञान केवल ज्ञान चारित्र क्षायिक दर्शन केवल दर्शनम् , तत., तदपेक्ष्येत्यर्थः, यलोपे पञ्चमी। इतरेतरयोगद्वन्द्वेऽपि "सर्वो द्वन्द्वो विभाषैकवद्भवती"ति च समाहारो युज्यते, ते इत्यनेन भवन्तीति शेष । ब्रह्मादिशब्दैये भागा उच्यन्ते त एव ज्ञानादिशब्दैरपीत्युक्ता ननु ब्रह्मादिशब्दानादयोऽर्था अप्रतीता इति चेत्सादृश्यमूल- इति चेत् , अनुपपद्यमानत्वान्न तत्र चिरित्यतोऽनुपपत्तिमुपपाद- - वोपपादयिष्यत इति ध्येयम् ॥ २० ॥ यन्नाह- म्यासडोषम् परिति शेप । पका चित्रयो भागा प्रमविष्णुमहेश्वराः। परस्परं विमिमानामेकमषित कर मवेत् १ ॥ २१ ॥ एकातिरिति । मतित येह , एका-मसालाऽहितीया, केवळामा "ममित्करणकम्पमूर्तो वेरखननदेासपरा" इति । 'पोयाम प्रभाने व प्रमे करते सम" पि । सस इस्पषमतम्यते । प्रया-निवसायावितिष्यः प्रमविष्णुमाया अमविष्णुमहेश्वरास्माखितो म्मकम, भागामा मत्र विपतिपपिमाह --परस्परम् अन्योन्यम् । निमिमानाम्- मेवाम् नहि मो प्रमा स एम विष्णु स एस माहेश्रो वाभिमानमसारस्पातलममेवाप, तप ते परस्पर मित्र एवेति वाचानो तेपामित्यप । एकमतिः- एकामिय या महि सप कपम्कन प्ररेण, मवेव सत्, काम ना साविस्पर्म । ममेदे R मरम्म पमितम् ममेन्दधामो.। मेदे पतिमिन्ध मर्पिमा क्षेत्रमैत्रयो । मेदेऽपि मरतये नगद्विसापुर विन भाऽऽपेपेन मेवय दुरुपपादः सार। मरिमेरे पाऽमेवल इस पारतेस्युमपाप्यनुपपनामिना म्यानेच यजसो मागा इति युप्म्। समाम्मानपारिवानादेकर म्पधिमयो भागा पेड़ अदेयमिति मार ॥२१॥ मन्येपम्पा पमानि मानाभिप्रनामि, म पासर पिभिजाम्मिो म्मको प्रमरिशुमादेपराती पेपरसमस- कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् २९ . कार्य विष्णुः किया ब्रह्मा कारणं तु महेश्वरः । कार्यकारणसम्पन्ना एकमूर्तिः कथं भवेत् ? ॥ २२ ॥ कार्यमिति । विष्णुः विष्णुपदवाच्यो देव , कार्यम्=क्रिया- जन्यफलाश्रय , कार्यस्थानीय इत्यर्थ । क्रियते यदिति कर्मव्युत्पत्तेरिति चोध्यम् । ब्रह्मा-ब्रह्मपदवाच्यो देव , क्रिया व्यापारस्थानीय., द्वारमिति यावत् । तुर्विशेषे मेदे च । महेश्वर. महेश्वरपदवाच्यो देवः, कारणम् जनकस्थानीय.। महेश्वरप्रेरणया ब्रह्मण शरीराद्विष्णोः प्रादुर्भाव इति पौराणिककथाऽनुसन्धानेनेत्थमुक्तिरिति ध्येयम् । तदित्यम्, कार्यकारणसम्पन्ना =कार्यकारणभावमापन्नास्ते ब्रह्मविष्णुमहे- श्वरास्त्रयः, एकमूर्ति =अभिन्नतनु , कथं भवेत् ? काका नैव कथमपि भवेदित्यर्थ । नहि पितृपुत्रयोरभिन्ना मूर्तिरिति कोऽपि सचेताः प्रतिपादयेत् । मूर्त्यभेदे च कार्यकारणभाव एव न स्यात् , तस्य व्यक्तिसेदनियतत्वात् । एवञ्चैकस्या एव व्यक्त नाऽभिधानानीति वाचोयुक्तेरप्यनवसर , एकव्यक्तयभावात् । तदेव परोक्तदिशैकमूर्ति- स्त्रयो भागा इत्यनुपपन्नमेवेति भाव ॥ २२ ॥ ननु यथा मृत्पिण्डस्यैकस्यैव कारणभूतस्य कपाल• क्रिया- स्थानीयो घटश्च कार्यस्थानीय इति वक्तुं शक्यम् , तथैकस्या व्यक्ते- रवस्थामेदात्ते त्रयो भागा इति चेत्तदपि नेत्याह- प्रजापतिसुतो ब्रह्मा माता पद्मावती स्मृता । अभिजिजन्मनक्षत्रमेकमूर्तिः कथं भवेत् १ ॥ २३ ॥ , एव 2 वापिति माव । मसक्योमम् मवाप विचत इति । प्रमाप्रमपदमामो देव, प्रजापति सवः प्रमापसिनामो विमस्य भुत पुत्र,, "भारमजसनय मन मुत्र पुस " इत्यमर । माता-अननी, प्राण इति सानिमारतीयते । पपावती-तवारमा प्रभापति द्विजमार्मा, स्मता प्रतिपादिता, पुराणा स्बा, बमनक्षतम् = पमसनयुके काले प्रस्मो भन्म समय मम् 'मक्षत्रमूक्ष में तारे स्पमर । अमिजिद-पति- मिदात्यम् । प्रजापतिमााया पपापा कमानतीर्थयानिति पौराणिका इति माव। तदेन स्मिते, एफचिः कप भवेद !! महि येषां विमिलौ मातापितरौ मन्मकाम्य मिलत्तेमियो या मता वा, मापदे एकस्पा एष म्परतण्डस्मैव प्रसिबलात् । फिर प्रमाणामेकरवे प्रमापतिमुवो मममोमतार इति रिशेपेम म्मपदेशो नितुक पव स्यादिति नैकमचिरिति भाव ॥ ५॥ मनु विमानका मजिसिति पेच्दपि नेपा- समुदेवसुवो विष्णुमाता च देवकी स्मृता । रोहिणी सन्मनयसमेकमर्पिः कप भवेत् ॥ २४ ॥ सुदे। पिप्यु-विशुपक्षामो देवा पसुरेगावा- सदेवात्मनुपपुत्र माता-जननी पा समुचये । वियोरिन मस्या- मस्या सम्पते । दमकी-दामा मुदेवमुपमाा, स्मापिया, अन्मनपसम्यन्मिने गन्म तत् रोरिणी स्वायम् । सदेवनुप- माया देवस्य मुझेरिष्णु जनामातार । पडुकम्---"पते मा. पुसा नतु भगवान् समि' ति पौराणिक र विभूषितम् .३३ शुलधारक-शूलस्य तदाख्यशस्त्र- तृतीयः विष्णुः, शङ्खचकाङ्क नादृशः, एव प्रत्येकमङ्कभेदे सति, कस्या मूर्तेविभिन्न चिह्न प्रसिद्धमिति णाम् , एकस्याऽनेकचिहत्वे लोकानां ७॥ तत्व समर्थ्य मुखाद्यगवैलक्षण्येनाऽपि 'नेत्रोऽथ महेश्वर । मूर्तिः कथं भवेत् ? ॥२८॥ चतुर्मुखः चत्वारि चतु सङ्ख्यानि -तथा, महेश्वरः, त्रिनेत्र त्रीणि एक भालस्थमित्येवं यस्य स तादृशः, नारो भुजा बाहवो यस्य स तादृश , चतुर्भुजत्वं त्रयाणामेव पुराणादा- यमिति चिन्त्यम् । एवमवयववैलक्षण्ये । यो हि चतुर्मुख. सोऽष्टनेत्रोऽष्ट- र्नुजश्चेति नैकमूर्तिस्ते इति तात्पर्यम्
।
मनापतिसत इति ।
मुख प्रजापतिनामो विवस्य में
पुत्र"श्यमरः। मामाज
पपावती-तवाच्या प्रजापतिदि
वाविति माप ।
तबा, सन्न
सन्म तलमत्र मम् 'ममत्रमूक्ष ।
निवाससम् । प्रजापरिमार्यामा
पौरणिका वि माप.। ददवे
मरि पा लिमिली मासापित
या मा पा मात्रापभेदे एकर
फिच प्रमाामामेकत्वे प्रमापतिम
पदेश नितक एव स्माविति
नमु बिम्पनर मर्पिति
पसरेवसुतो विष्णुमाता
रोहिणी जन्मनयसमेक
मुदेवे। विष्णु -नि
मुदेवात्मनुपपुत्र माता-ममनी
सत्या सम्पते। देवी-तदात
जन्मनक्षतम्-पम्मिप्रशने जन्म त
मार्यामा देसय कषिप्शु इन
पाँचमा पुस. ध मगपान
यस्य स तादृश., पद्मपाणिरित्यर्थः । व्यधिकरणबहुव्रीहिरपि साधुरेव, हि व्यधिकरणबहुव्रीहिर्जन्माधुत्तरपद” इति वामनश्चेति बोध्यम् । नाख्य चक्रमायुध नित्य पाणो यस्य स तादृशः। भवेत् । ततश्च, एकमूर्तिः कथ भवेत् ? नोकमूतैर्देवस्य पाणौ विभिन्नानि वस्तूनि प्रसिद्धानि । यद्यपि चतुर्मुजत्वात्प्रत्येक भुजेषु वस्तुभेदो नाऽयुक्तः, तथापि तथासति विवेकेन ब्रह्मादिपरिज्ञान पद्मादिद्वारा नैव स्यात्, नायते च चक्रपाणिशब्दादिना विष्ण्वादेविवेकेनैव ग्रह इति तदनुरोधा समादीनि विमिन्नमूतरेव विशेषणानीति नैकमूर्तिरिति बोध्यम् ।। ३१ ॥ कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ३५ गरुडः स एवैक यान यस्य स तादृशो गरुडवाहन गरुत्मान् गरुडस्ताों वैनतेय खगेश्वर " इत्यमर । भवेत् । तदेव प्रत्येकं वाइनमेदे सति एकमूर्तिः कथ भवेत् ? । नोकमूर्त देवस्य नित्यं विभिन्नवाहनविशिष्टतया ख्यातिः सम्भवति , विभिन्नवाहनत्वे स एवक चाहनमित्यबद्ध स्यात् , वाहनभेदेन विवेकेन तत्तद्देवग्रहश्च न स्यात् । जायते च तथैवेति नैकमूर्तिरिति भावः ॥ सम्प्रति करग्राह्यभेदेन मूर्तिभेदमाह.- पद्महस्तो भवेद् ब्रह्मा शुलपाणि महेश्वरः । चक्रपाणिर्भवेद्विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् १ ॥ ३१ ॥ पद्महस्त इति । ब्रह्मा, पद्महस्ता=पद्म कमल नित्य हस्ते अत एव सप्तम्या बहुव्रीहौ पूर्वप्रयोगनिषेधः सङ्गच्छते । " अवो मवेत् । महेश्वरः, शुलपाणिः शूल तदाख्यं शस्त्र नित्यं पाणौ यस्य स तादृशः, भवेदिति सम्बध्यते । विष्णु , चक्रपाणि =चक्र सुदर्श- .
मासयोगम् मेवादेकाबिहानिरेकात्माऽपापैर वारकेरिति पूनार्ममेरा मूर्मित लिपटमाइ--- रकपर्णो मयेरमा पेववर्णो महेनरा । कृष्णपों मवेरिप्रेमस्तिः क मवेद । ॥ २६ ॥ ररूपणे इति । प्रमा, रक्तपी-रको अहितो क्यों मन मस स ततस । सोमयन्तिरित्पर्म । “होहिये रोहिले रक' इत्यमर । मरेपरा, देववर्म: - शमी, "शुभशुक्रि- विसवश्वपाप्पारा' इत्यमरः । मवेद, पुरमायौ तमा प्रतिपावनाए दाम्पते इति मोम्यम् । विष्णः, फणीनीकवि, ने नीमऽस्तिश्मामपाध्याममेप इत्यमर । एवं मत्येक लिमिक वर्णस्वे सति एक धिः कप मरेत् ।। नसा मूमिमा प्रसिना । एमव वर्णमेवात्मम्मेिवो मिश्रित पपेस्पतः परोक सर्पबाड- पपलमेषेति भावः ॥ २६ ॥ मन्नस्सारमेयावर्षमेदोशी सम्माष्पत एक वर्षस सालमा मसाविति म वास्कमिसमिति पुस्तिथिममेदेनकमर्सि- वाशुपपतिमाह- मयसी मवेशा रितीय उपारक। वतीया सहकार एमचि कम भोट ॥२७॥ ममसूत्रीसि । प्रया, अषत्री-पई फासाव मिति सूत्र मास्यास्पस्म समिति व सोपस्की, स्वतार । द्वितीया-महेमामे देवा, वस्प प पूर्वोकोसमामा तीपत -
कीर्तिकलाव्याख्या विभूषितम्
कृष्णस्य च तृतीयत्वमित्यवधेयम् । शूलधारक. शूलस्य तदाख्यशस्त्र-
विशेषस्य धारकः, शूलाङ्क इत्यर्थ । तृतीयः विष्णुः, शङ्खचक्राङ्क
शहश्वक चाऽको चिह्ने यस्य स तादृशः,
एव प्रत्येकमङ्कभेदे सति,
एकमूर्ति. कथ भवेत् । न कस्या मूर्विभिन्न चिह्न प्रसिद्धमिति
चिह्नमेदाद्भिन्नैव मूतिर्ब्रह्मविष्णुमहेश्वरणाम् , एकस्याऽनेकचिह्नत्वे लोकानां
परिचयव्यामोहापत्तेश्चेति भाव. ॥ २७ ॥
तदेव चिहभेदेन विभिन्नमूर्त्तित्वं समर्थ्य मुखाद्यगवलक्षण्येनाऽपि
तदुपपादयन्नाह-
चतुर्मुखो भवेद् ब्रह्मा त्रिनेत्रोऽथ महेश्वरः ।
चतुर्भुजो भवेद् विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् ? ॥२८॥
चतुर्मुख इति । ब्रह्मा, चतुर्मुख. चत्वारि चतु सड्यानि
मुखानि यस्य स तादृशः, अथ तथा, महेश्वरः, त्रिनेत्र त्रीणि
त्रित्वविशिष्टानि नेत्राणि द्वे यथावस्थे एक भालस्थमित्येव यस्य स तादृशः,
भवेत् , विष्णुः, चतुर्भुजः चत्वारो भुजा बाहवो यस्य स तादृश.,
मुजवाहू प्रवेष्टो दोरि"त्यमरः। चतुर्भुजत्वं त्रयाणामेव पुराणादा-
वुक्तमिति न तावतेह वैलक्षण्य साध्यमिति चिन्त्यम् । एवमवयववैलक्षण्ये
सति, एकमूर्ति कथं भवेत् ? । यो हि चतुर्मुखः सोऽटनेत्रोऽष्ट-
बाहुश्चौचित्यात्स्यान्न तु त्रिनेत्रश्चतुर्भुजश्चेति नैकमूर्तिस्ते इति तात्पर्यम्
--
1॥२८॥
मगरेपोम् मन्मदेखमेवादपि अमिनमर्पित्वमित्माह- मपुरायो भातो प्रया राबगरे महेपर। धारावस्यामहिष्णुरेकति कार्य मवेद । ॥ २९ ॥ मपुरयामिति । प्रमा, मयुरापाम् अवास्सामा नपाम्, खाता भक्तीर्य, महेन्सरः, राजो-सदाम्मे मगरे मात्र इति सम्मम्मते । विष्णु, द्वाराबत्याम् वाल्माया मगर्मा, अस्त्र- मास कृष्णसाऽपि मपुरमामेव यन्म, मरासम्भपमपाता पमनिला परिचमसमवठटे द्वाराठी नगरी निर्माम तपासेर पुरापादौ प्रति पदिशमितीह पिम् । एवं धन्मदेवभेदे सति, एकमूर्तिः कर मोट ।। नफस्या पर मरनेकदेशे मेति मैकमविरिपनि बाइनमेदेनाभी मूचे मेवमाह- ईसयानो मवेशमा पयानो महारा। सार्पयानो भविष्णु रेकवि कप मपेत् । ॥३०॥ इसमाम इति । प्रमा, सपान -दाम- मसिद्धः पक्षिरिशेपो नित्य स एक पान वाहन पस स सात्यो बाहना, भमान पुम्मे पर गर्व र वाइनपोरणे" ति म । भगेट, मस्बिरः, इपपानाम्लो मन्पास्मो बसों निम पाने सव सारी पाहन, मवेदिति सम्पम्पते । “उमा यो बर्ग मामो भो " इत्यमरः । या विष्णः, पापपानापापों ३५ कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् , गल्डः स एवैक यान यस्य स तादृशो गरुडवाहन , गरुत्मान् गरुडस्ताक्ष्यों वैनतेय खगेश्वर " इत्यमरः । भवेत् । तदेव प्रत्येक वाहनमेदे सति एकमूर्तिः कथं भवेत् ? । नोकमूर्ते देवस्य नित्य विभिन्नवाहनविशिष्टतया ख्यातिः सम्भवति , विभिन्नवाहनत्वे स एवक चाहनमित्यबद्ध स्यात् , वाहनभेदेन विवेकेन तत्तद्देवग्रहश्च न स्यात् । जायते च तथैवेति नैकमूर्तिरिति भावः ॥ सम्प्रति करग्राह्यमेदेन मूर्तिमेदमाह- पद्महस्तो भवेद् ब्रह्मा शुलपाणि महेश्वरः । चक्रपाणिर्भवेद्विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् १ ॥ ३१ ॥ पद्महस्त इति । ब्रह्मा, पद्महस्ता पद्म कमल नित्य हस्ते यस्य स तादृश., पद्मपाणिरित्यर्थ. । व्यधिकरणबहुव्रीहिरपि साधुरेव, अत एव सप्तम्या वहुव्रीहौ पूर्वप्रयोगनिषेध सङ्गच्छते । हि व्यधिकरणबहुव्रीहिर्जन्मायुत्तरपद" इति वामनश्चेति वोध्यम् । भवेत् । महेश्वरः, शूलपाणिः शूल तदाख्यं शस्त्र नित्य पाणौ यस्य स तादृशः, भवेदिति सम्बध्यते । विष्णु , चक्रपाणि =चक्र सुदर्श- नाल्य चक्रमायुध नित्यं पाणौ यस्य स तादृशः । भवेत् । ततश्च, एकमूर्ति कथं भवेत् ? नोकमूर्तेर्देवस्य पाणौ विभिन्नानि वस्तूनि प्रसिद्धानि । यद्यपि चतुर्मुजत्वात्प्रत्येक भुजेषु वस्तुमेदो नाऽयुक्तः, तथापि तथासति विवेकेन ब्रह्मादिपरिज्ञानं पद्मादिद्वारा नैव स्यात्, जायते च चक्रपाणिशब्दादिना विष्ण्वादेविवेकेनैव ग्रह इति तदनुरोधा त्पद्मादीनि विभिन्नमूतरेव विशेषणानीति नैकमूर्तिरिति बोध्यम् ।। ३१ ।। " अवर्यो मसरेक्सोलम् बन्मदेशमेवावपि विमिनमस्तिमिस्याह- मपुरायो बावो प्रमा रामगहे मरेपर। मारावस्यामभरिप्रेकतिः मवेद । ॥२९॥ मपुरम्मामिति । प्रभा, मधुरापाम् सवारसाना नाम्, मावामस्तीर्म , महस्वरः, राजयो तदारुले मगरे, बाव इति सम्बप्यते । विष्ण, दारापस्याम् सवारसायं मगपाम्, अमृत पास रष्णम्माऽपि मधुराममेव बम, मरासम्ममूपमपातः परमनिया पम्पिमसमवाटे शराठी मगरी निर्माम तलासेत्से पुरापावो पति- पविठमितीह मिनसम् । एवं मन्मदशमेरे सति, एकमूर्ति मवेत् । मकरवा एव मरमेकदेशे मेति नैकाविरिममि माम॥२९॥ बाहनमैदेनाऽपि मूणे मवमाह- ईसयानो मवेदनमा पपानो महेश्वरः । वापयानो भविष्णु रेकचि कम भवेत् । ॥३०॥ समान इति । प्रमा, इसयान- ईस्वारम. 'प्रसिद्ध पक्षिविशेषणे निस्म स पक्क मानं बाहर्न यस स वाइसो स्थाना, "मानं पुम्मै पत्र पर्व पर पानभोरमे" इति म । मरेन, मरेपर, पयानापो मन्याम्सो बढीको मिप मान समस मारो गहना, मवेविवि सम्मम्मते । 'ग्या म्छो वमेव पापमो रस्मो प" इसमरा । तमा, विष्ण, पापपानम्म्यारों
पीविरगव्याख्याविभूषितम्
३५
गल्ड. स एवैकं यान यम्य स ताहगो गरुडवाहन , गरुत्मान्
गरुटस्ताक्ष्यों वैनतेयः खगेश्वर " इत्यमरः । भवेत् । तदेव प्रत्येक
वाहन मेदे सति एकमूर्तिः कथ भवेत् ? | नषेकमूर्ते देवस्य नित्य
विभिन्नवाहनविशिष्टतया ख्याति सम्भवति , विभिन्नवाहनत्वे स एवक
चाहनमित्यवद्ध स्यात् , वाहनभेदेन विवेकेन तत्तद्देवग्रहश्च न स्यात् ।
जायते च तथैवेति नैकमूर्तिरिति भाव ॥
सम्प्रति करग्राह्यमेदेन भूर्तिभेदमाह-
पद्महस्तो भवेद् ब्रह्मा शुलपाणि महेश्वरः ।
चक्रपाणिर्भवेद्विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् १ ॥ ३१ ॥
पद्महस्त इति । ब्रह्मा, पद्महस्त: पद्म कमल नित्य हस्ते
यस्य स तादृश., पद्मपाणिरित्यर्थ । व्यधिकरणबहुव्रीहिरपि साधुरेव,
अत एव सप्तम्या बहुव्रीही पूर्वप्रयोगनिषेध. सङ्गच्छते । “ अवर्यो
हि व्यधिकरणबहुव्रीहिर्जन्मायुत्तरपद " इति वामनश्चेति बोध्यम् ।
भवेत् । महेश्वरः, शूलपाणिः शूल तदाख्यं शस्त्र नित्यं पाणौ यस्य
स तादृश., भवेदिति सम्बध्यते । विष्णु, चक्रपाणि -चक्र सुदर्श-
नाल्य चक्रमायुधं नित्यं पाणौ यस्य स तादृशः । भवेत् । ततश्च,
एकमूर्ति कथ भवेत् ? नोकमूतैर्देवस्य पाणौ विभिन्नानि वस्तूनि
प्रसिद्धानि । यद्यपि चतुर्भुजत्वात्प्रत्येक भुजेषु वस्तुभेदो नाऽयुक्तः,
तथापि तथासति विवेकेन ब्रह्मादिपरिज्ञानं पद्मादिद्वारा नैव स्यात् ,
जायते च चक्रपाणिशब्दादिना विष्ण्वादेविवेकेनैव ग्रह इति तदनुरोधा
समादीनि विमिन्नमूतैरेव विशेषणानीति नैकमूर्तिरिति बोध्यम् ॥ ३१ ॥
मागचोषम्
मम माग्मेदेन मम्मेिदमाह-
च्ने भावो मषेत्रमा सेवायां प मधरा ।
विष्णुब मापरे चाव एकमूर्तिक मवेद । ।। ३२ ॥
इस पनि । प्रमा, तेस्मुगे, सम्यग त्वं । पसिना
मुगशष्टयेषु प्रथमे युगे इति यावत् । धावा-पत्तीर्ण, मवेत् ।
महेश्वरा, सेवायाम्-तवास्मे दितीये युग हर्म । पा समुने।
जात इति सम्बष्यते । विष्णः, द्वापरे दाम हतीये मुग वर्ग,
स, च समुचये। सदेव अमरत्यक्मतिमहत्पतरे एकदिन
कममपि युज्यते सदा-एकतिः कर्म भवेदिति । नवकमर-
नेय कालेषु पुन पुनर्गन्म बक्कमति मोम्ममसम्मपत्, समाचे प्रमो मग
नमः फसमप्पपपन्त इति मिथ्येव । यमप्यास्मा तम्मनाऊ-
बारमेदेन पिसाविकमसमन्वमेव सम्मपति । समापि कार्यकारक
रूपमा समकावितिनमाणा पत्रमाप्ति मोक्पयते, एकस नाव
पगिन् असे नानाशरीरापिठानतिरोबाकाकारणापवाय मेरे
सत्येवोपपत्ते मेति नैकमर्षि । किब न मस्तिनोऽपि वपूर्व ही
निमागलमेकमा रुमवस्पिकसमे स्पसमभिकेन २२ ॥
सदे परेएदेक्स्पैकषिमागसमसमभसमिति निवरेपोपपाय,
मयुक्त 'चान पारिनदर्शनादिपनि सदिश निषाद-
झान विष्णुः सा मोकं प्रभा पारितसम्पते।
सम्पपल व शिवा प्रोफर्माम्पिस्नपारिमका ॥२॥
३७ कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ज्ञानमिति । ज्ञानम् सम्यग्ज्ञान केवलज्ञान च, सदा सर्वदा, न तु यदाकदाचिदेव, विष्णु =विष्णुरित्येवम् । प्रोक्तम् प्रतिपादितम्, तज्ज्ञैरिति शेषः। व्यापकत्वाद्धि विष्णुरित्युच्यते पालकत्वाच्च । एत- द्गुणद्वय च ज्ञाने, केवलज्ञानस्य सर्वद्रव्यपर्यायविषयत्वेन व्यापकत्वात्सकल- कर्मक्षयहेतुतया भवभयात्पालकत्वाचेति ज्ञान विष्णुरिति प्रोक्तम् । तथा, चारित्रम्-सर्वसावद्यविरति , ब्रह्मा ब्रह्मपदवाच्यम् , उच्यते- प्रतिपाद्यते । ब्रह्मा हि ब्रह्मचर्यम् , तदेव च सत्याऽहिंसाऽस्तेयाऽपरि- ग्रहरूपमहाव्रतसर्गमूलम् । ब्रह्मचर्य विना सत्यादेर्यथावत्पालनाऽसम्भ- वात् । ब्रह्मा च जगत्स्रष्टेति सर्वजगन्मूलमिति द्वयो ब्रह्मणोरैक्यम् । किञ्च चारित्रमेव पारमार्थिको ब्रह्मा, सत्यादिगुणाऽऽधानादिना भवक्षय- पूर्वकसिद्धिसर्गमूलत्वात् । इतरस्तु ब्रह्मा भवसर्जक इति भवपरम्परा- वर्धक इति सर्जनधर्मसाधादेव तस्य ब्रह्मत्वमिति निकृष्टत्वाद्धेय एवेत्या- । एवम् , तुः पुनरर्थे, सम्यक्त्वम् तत्त्वार्थश्रद्धानात्मक सम्यग्दर्शनम्, शिवा शिवपदवाच्य , प्रोक्तम्-उपवर्णितम् शिवो हि पुराणादौ जगत्संहारको वर्णित , सम्यक्त्वमपि च कर्मक्षयोपशमहेतु- गुणवृद्धिक्रमेण सर्वकर्मक्षयपूर्वकभवक्षयहेतुश्चेति तदेव परमार्थत. शिव इति नात्पर्यम् । तदेवम् , अहन्मूर्तिः अहंतस्तीर्थङ्करस्य मूर्तिस्तनुः, " स्त्रिया मूर्तिस्तनुस्तनूरि"त्यमरः । नयात्मिकात्रये चारित्रज्ञान- दर्शनात्मका ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा आत्मा स्वरूप यस्या. सा तादृशी । केवल- ज्ञानादेरर्हत्येव सत्त्वात्स एवैकमूर्तिस्त्रयो भागा । तदेतत्सुष्ठुक्तम् "एकमूर्तिस्त्रयो भागा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः । त एव च पुनरुक्ता ज्ञान- चारिलदर्शनादि"ति । कस्याऽपि देवस्य व्यात्मकत्वस्योक्तप्रकारेणा- शय 6 महामस्तोत्रम् सम्मकस्म पतिपदमाद । वसाईकिन महादेो नान्य इति एन - ॥२०॥ यह परेप्टो महादेव किल्यापटमर्षि प्रतिपायते, सोशर्मि परमासो गुणाकसमापाचवेत्याह- विविस्लपवनदुताशनयजमानाकासोमार्याल्पाः । इस्पेतेश्यो मगरवि गीता वीतरागे सुगुमार कितीति । भगवति-मग ऐधति , म्युसम् " ऐपस्या का मस्प धर्मस तपसः प्रिय । मानरामयोभैर पप्पा मग तीरी। सोऽस्याऽस्वीमि स मांसम्मिन् , ईभर इत्यर्थ । धीवरागे-पीते दूरीमो राग उपमणलाबागवेषादयो दोषा पतः सवारसमिन, निरपशुसमुक्कसक्सभार इमः । शिविमलपवनदुतापनप समानाऽऽकाशसोमर्यारम्या:शिति एपिसी, गर्न प्रसिद्ध सक्किम पानो वायुः इवासनोजी मनमानो मती, बापाचो गगन, सोमपन्या पो रमियस्येता मास्म्या मनिपानानि ये गुभान ते पारा शिस्मादिनामान, 'भादेय स्पाम्मलेमती। यामको पम्मा मन हैमः इति उपभरा, पो-क्षित्पादमा, अटी-मा- सरस्याका मुगुणा-विशिष्टधर्माः, विशेपणानीस । गीवा पर्णिमा । परेशो महादेपय दम्मामालियाविरुप प्रतिपादित स्वत्यन्तमसम्मम् । परि हि परेएदेवस्य शिलादिनपत स्थाव, स महादेव एष स्पानिपार्वाि म तूमये, भमेदेनेकपाविरोमा । एकम्प पिमिल्लानामारपसासम्मवार । गुमास्त मिला त
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कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम्
३९
अप्यनेके एकस्मिन्नपीति गुणाऽष्टकसद्भावादहन्नेवाऽष्टमूचिरिति तात्पर्यम् ।
आर्यावृत्तम् ॥ ३४ ॥
-
क्षित्यादिगुणानिरूपयन्नाइ-
क्षितिरित्युच्यते क्षान्तिर्जलं या च प्रसन्नता ।
निःसङ्गता भवेद्वायु हुताशो योग उच्यते ॥ ३५ ॥
क्षितिरिति । शान्तिः शक्तौ सत्यामप्यपकारिष्वपि क्षमा,
अपराधादिसहनात्मको गुणविशेष इत्यर्थ. । अर्हत इति षष्ठ्यन्त सर्वत्र
अस्तावात्सम्बन्धनीयम् । येत्युद्देश्ये, प्रसन्नता साकल्येन कर्ममलाऽ-
भावाद्रागादिदोषाऽभावाच्चाऽऽत्मनो निर्विकल्पत्वान्निरुपाधित्वाच्च निर्मलता,
विशुद्धता स्वच्छता वेत्यर्थ । "प्रसन्नोऽच्छ” इत्यमर. । येति यच्छन्द-
चलातदिति लभ्यते । जलम् सलिलम् , उच्यत इति सम्बध्यते ।
चोऽन्वाचये। जलमपि निर्मलमिति प्रसन्नता जलतत्त्वमिति भाव ।
तथा, निःसङ्गता=निर्लेपता, वीतरागतेत्यर्थ । वायुः पवनः, भवेत्=
स्यात् । पवनो ह्यस्निग्धत्वान्न कुत्राऽपि सजति, तथाऽर्हन्नपि वीतरागत्वान्नि -
सङ्ग इति नि सङ्गता वायुतत्त्वमिति बोध्यम् । एवम् , योगः शुक्ल-
ध्यानम् , हुताशः अमि , यथा हि हुताश इन्धनादिदाहकस्तथा
योगोऽपि सर्वकर्मेन्धनदाहक इति योगोऽमितत्त्वम् , उच्यते प्रतिपाद्यते
,
-
॥ ३५॥
यजमानो भवेदात्मा तपोदानदयादिभिः ।
अलेपकत्वादाकाशसङ्काशा सोऽभिधीयते ॥ ३६ ॥
मपदेशेम् बममान इनि । आरमा-भाईसाबोपमनः, सपोदानमा दिमिातपःपठाध्यममम्पदिकम् । दान दीक्षामहमायग् वर्षमा नादिकम् । दया निसर्पमतानुकम्पा, ममतादेशेनासोरे स्पस्य सर्वसानपविरम्यापतिमाय । मादिना प्रमाऽपरिहाति, समस्या, पजमानाम्यामक, मानसर । दयारिसमेग ई पहा यमनम् , हिंसादिसाम् । इरिताऽनुअभिवादशुमलास्साश्व पर्ने सुकुममनमेवेति मावः । या सा-मागास्मा, अपकत्वात मम्लेपसापमाऽऽस्वान्मस्वासंतकवाच्छन्दसान लिम्पनि रिस फ्योम्पताया भप्यमानादिति कर्ममन्यामकोपाऽस्पियादित्यः । काशसहाय बायोपमा, 'निमसयासनीपासपतीसो मावय"इफमर । बमिधीयते-गीमते । पयामाशोऽमत्वापार विलेपाऽमोम्यतयाऽममम निर्गुणत्लादिति स नपाकाचवत्तमिति भार॥१६॥ सौम्पमूर्तिरूपिचन्द्रो पीवयगा समीक्ष्यसे । मानप्रकाशमसेन सम्पदिस्योऽमिधीयते ॥ २७ ॥ सौम्ममुलिपिरिति । वीसरागारागादिरहितोजन , सौम्म मूर्तिरुचिा सौम्या प्रिया प्रश्चान्ताऽनुगका मनोश प मम्मिभिः घरीरममा यस स साता सन् सबुकम्-"मास मै परिस्ते मेल्यामिस्मि चन्द्रमा । बहोरामामिल रसां पवासि परमा मुदमिति। सौम्य व मधुर पिपमिति हैमः। “स्मुः प्रमा:- मुचिस्मिर 1 मा एप, पन्द्रा - बन्द , समीक्ष्यवे-मबमे । अभिधीयते कीर्त्यते । - यःपरात्मा.पर- शब्दमात्रोऽष्टमूर्तिरिति हृदयम् ॥ ३७॥ चोपलक्षणत्वान्मोहकपायादिभिश्च विवर्जितो रहितः। यदुक्तम्---"न केवल रागमुक्त वीतराग! मनस्तव । कीर्तिकलाव्यास्याविभूषितम् क्यते । चन्द्रोऽपि हि प्रियदर्शन इति वीतरागस्य सौम्यमूर्तिरुचिश्चन्द्र- तत्त्वमित्याशयः । तथा, सः वीतरागः, ज्ञानप्रकाशकत्वेन जानस्य सम्यग्ज्ञानत्य प्रकाशकत्वेनोपदेशादिनोबोधकत्वेन, आदित्यः सूर्य इव, सूर्यो हि तमोनाशपूर्वक जगत्प्रकाशयति, तथा वीतरागोऽपि सदुपदेशेनाऽज्ञान विनाश्य सम्यग्ज्ञान प्रकाशयतीति ज्ञानप्रकाशकत्व वीतरागस्य सूर्यतत्त्वम् । यदुक्तम् ज्योति. परम परमेष्ठिनाम् । आदित्यवर्ण तमसः परस्तादामनन्ति यमि"ति भाव. । तदेव गुणगुणिनोरभेदनये उक्तप्रकारेण क्षित्याद्यात्मकक्षमाधष्ट- गुणात्मकत्वादईन्नष्टमूर्ति । परेप्टो महादेवस्तु विभिन्नव्यक्तीनाममेदाऽ- सम्भवस्य प्रागुपपादितत्वाच्छत्रुवधादिप्रवृत्ततया क्षमाद्यमावनिश्चयाच्च तदेवं गुणतोऽहन्नेव महादेव इति स एव नमस्करणीय पुण्यपापविनिर्मुक्तो रागद्वेपविवर्जितः । अहंस्तस्य नमस्कारः कर्तव्यः शिवमिच्छता ॥ ३८ ॥ पुण्यपाप विनिर्मुक्त इति । अर्हन्-वीतरागस्तीर्थङ्कर , सवै सुरा- दिमि कृता पूजामहतीति स तादृश. I यदुक्तम्- "यस्मादहति पूजामहन्नेवोत्तमोत्तमो लोके। देवर्षिनरेन्द्रेभ्य. पूज्येभ्योऽप्यन्यसत्त्वा- नामिति । रागद्वेपविवर्जित रागेणाऽऽसक्तया द्वेषेणाऽप्रीत्या इत्याह- २ । म पन्यो देखें पीलराम, महारेक्वोत्रम् सहोदरमि" । मत एष, पुष्पपारविनिर्मुक्ता पुग्दैवाने हिसकर्मजन्म पापखवानिपिनकर्मजन्य कर्ममिः, शुभैरो स्पः। विनिर्मो रहिस, शून्य इत्यथ । बीमागलासमा पासम्मरासप्तिमारम्भाना क्षयाच । मयुधम्- प्रतिना समिना शमरिना। स्वमा काममाअन्त कुटिम फटका" इति, “भनन्तकास्मपितमनन्तमपि सर्वथा । समान कर्मध्यमुन्मूख्यति मम। "इति । पाराविपरिषदमैरिनिमहाविसमामानित सर्पमितत्वासप्तमीप्रति भाषः । समारतोरित्यक्गतम्यते । शिपम् स्वकरप्रणम्, इनमा अमिता मेपोजना बनेनेति मन्तिा। वस-वीतरागस निर्ममस्मार्बत:, नमस्कार प्राम कम्प लिपेपा रागाविमास्त लयमसिल इवि स नमस्कारो' शिवाय मक्नुिमति । सुक्षम् - 'प्रान्तवीर्वानि दृष्यस्व मान्छे तारक.। सपा विमोऽमि माप ! सारस पारमे "ति भाष ॥ २८॥ तदेवं गुणतो पासमान मतिपाप सव्यवसवास्मत्वमा मकारेण मरेविण रेफे ममा म्पपस्थितः । इकारेण हरा प्रोतलमान्वे परमं पदम् ॥ ३९ ॥ भकारेणेनि । अकारेन-कण्ठपन हसखरेगाारस्पे 'मा" इत्यारपटफेम मममवर्मेनेस्सर्व। विष्णु-विष्यात्मक मोनस्सार । मी ति पदमिति शेष । विष्णुपापक मुखबाद उपसक्षणाफिसिमर्थ ।
४३ . ऽकारोत्तररेफोत्तरवर्तिहकारस्येत्यर्थ । अन्ते-पर्यवसाने, विराम इत्यर्थः । सर्वान्तिमम् , पदम् स्थानम् , ईपत्याग्भाराख्यमित्यर्थ । नहि तत कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् चकारसत्त्वादह इतिपदघटकोऽकारः स्वघटितनामलक्षकनामैकदेशवत् वघटितपदलक्षक इति भवति 'अहं' इति पदमच्युतात्मकम् । अच्यु- तश्च विष्णुपर्याय इति सुष्ठुक्त मकारेण भवेद्विष्णुरि "ति । " अकारो वासुदेव स्यादि "त्येकाक्षरकोपाच्चेति बोध्यम् । एवञ्च "महे" इति- पदं शब्दतो विष्ण्वात्मकमिति समाहितम् । रेफे-'अहं' इत्यक्षरघटक- रेफे, मा ब्रह्मवाचको ब्रह्मशब्द , व्यवस्थितः व्यवस्थया स्थितः । व्यवस्था चाऽवयवेऽवयविन. समवेतत्वस्य प्रसिद्धत्वाद्ब्रह्मशब्द• स्वघटक- रेफवृत्ति , स रेफश्च " अर्ह" इति पदस्थरेफेणाऽनुकृत इत्यनुकार्या- ऽनुकारणयोरमेद इत्येव रूपा । यद्वोक्तन्यायेन रेफो रेफघटितब्रह्मपद- लक्षक इति रेफे ब्रह्मा व्यवस्थित इत्युच्यते । एतेन शब्दतो ब्रह्मा- मत्व प्रदिपादितमवगन्तव्यम् । तथा, हकारेण=" अहँ" इतिपद- महेश्वरः, प्रोक्तः-प्रतिपादित , तत्प्रतिपादन चाऽकारेण विष्णुवदेति न विस्मर्तव्यम् । नन्वेवमहंतस्त्रया- रमकत्व शव्दत उपपादितमेवेति “अहं" इत्यक्षरे उपरिस्थितस्याऽनु. नासिकस्य किं प्रयोजनमिति चेत्तत्राह-तस्येति । अहँ इतिपदे- उपरीति यावत् । परमम् सर्वोच्चत्वात्सुदुर्लभत्वात्सिद्धैरेव प्राप्यत्वाच्च घटकेन महाप्राणेन वर्णेन, हर = उपरि किञ्चित्पदमिति तत्परममेव पद भवति । तदाकारश्चाऽर्धचन्द्रा- कृतिरनुनासिकरेखातुल्य , विन्दुश्च तत्स्थसिद्धाऽनुकृति । नासिको रेखागवयन्यायेन सिद्धशिलाऽनुकृतिरर्हतो ब्रह्माद्यपेक्षयाऽप्युच्च- एवञ्चाऽनु- त्वमा काममाअन्त कुटिल। स्पर्म । विनिर्मको रहित , शून्य इत्यर्थः । बीमत्वासावमा मारेपोत्रम् सहोदरनि" | मन एव, पुष्पपापविनिर्मुकः पुम्पेलात वितर्मय पापैवदास्यनिर्मिजन्यम्य कर्मभिः, गुमैरशुभ कमाऽसम्मवासभिवपारम्पाना क्षयाच । पछम्- 'पाको मविना समिना समवचिना। कप्टका "ति, "मनन्ठस्पतिमनन्तमपि सन्याल मा फर्मकधमुन्मूम्पति मूस गति । न भन्यो देवे बीतर दाराविपरिम्हवैरिनिहारिसदावधिति सक्शुिद्धत्वासमोर भाष, । समायोरित्यगलम्यते । शिवम् स्वारनामम् । ममिमता, योपिना ममेमेति मिस्ति। ससनीयर निर्मम्स्पार्धतः, नमस्कार--प्रमाम उपक्षपत्याकिरित्य कसम्मानिया, रागादिमास्स लपमणि इवि प्रल मम शिवाय मसिमईति। स्वकम् -"प्रान्ततीति एवं ममें धारकः । तखाछी किम्मोऽस्मि ! पारम धारये "वि ॥१८॥ तदेवं गुपतो प्रयापारमत्व पतिपाप सम्पसहयात्मतमा भकारेण मद्विष्णू रेफे प्रक्षा म्यवस्थितः । हकारेण हा प्रोक्तमसान्ते परमं पदम् ।। २९ षकारेणेति । अधरेम-कण्ठधेन इखसरेणा 'बा" स्पथरमटकेन ममबनेपः। विष्ण-विन मो सास् । यति पामिति शेप । निष्णुवारोs केवल ज्ञान ज्ञानानामादिभूतमात्मस्वरूपत्वात् , मत्यादिकं ज्ञानञ्चौपा- धिकत्वादागन्तुकत्वात्परवर्तीति तदादिभूत ज्ञानमकारेण मातृकापाठे- आदिधर्मस्य मोक्षस्य च प्रदेगकत्वेन केवलज्ञानस्वरूपत्वेन चाऽहतः । अकारा अईन्निदिपढघटकोऽकार, प्रोच्यते-कीय॑ते । सर्वप्रथम रुक्षयत्यहत्पदघटक इति सारार्थ । एतद्वैशिष्टयं चाऽर्हत्येव नाऽन्यत्रेति पीर्तिफाव्याल्याविभूषितम् विक स्वरूपमिति बोध्यम् । अर्हत इति प्रस्तावालभ्यते । एवञ्च ईच्छन्दे चाऽऽदिभूतेन लक्ष्यते, तटाह-अकार:= इति । तेन= धर्मस्य मोक्षस्य च प्रदेशकः केवलज्ञानवाश्चाऽहन्नेवेत्यादिमूतोऽकारो - m स एव नमस्करणीयो नाऽन्योऽनीश इति हृदयम् ॥ ४० ॥ अथाहत्पदघटक रेफ निरूपयन्नाह- रूपिद्रव्यस्वरूपं वा दृष्ट्वा ज्ञानेन चक्षुपा । दृष्ट लोकमलोक वा रकारस्तेन प्रोच्यते ॥ ४१ ॥ रूपीत्यादि । ज्ञानेन=मतिश्रुत्यवध्यात्मकेन, तद्रूपेणेत्यथ. । चक्षुपा नेत्रेण, न तु चर्मचक्षुपा, रूपिद्रव्यस्वरूपम् रूपि मूत्त यद्रव्यमणुस्कन्धभेदभिन्नपुद्गलात्मक द्रव्य तस्य यत्स्वरूपमुत्पादव्यय- प्रौव्यात्मक समान्यविशेषनित्याऽनित्यत्वसदसत्त्वाऽमिलाप्याऽनमिलाप्यत्व- मेदामेदाद्यनन्तधर्मात्मकत्वादनेकान्तात्मकं च तत्त्वम् , दृष्ट्वा ज्ञात्वा, ज्ञानचक्षुपा हि दर्शन ज्ञानमेवेति बोध्यम् । शेष । लोकम् चतुर्दशरज्जुप्रमाणमवगाढधर्मादिद्रव्योपाधिकाऽऽकाश- प्रदेशात्मकम् , लक्षणया तत्स्थ त्रैकालिकसर्वद्रव्यपर्यायम् , अलोकम्- लोकाद्वहितमाकाशम् , वेति समुच्चये। दृष्टम् ज्ञातम् । ज्ञानेन वा-तथा, अनन्तरमिति m सचिमपामा सिस्वा न ममारिति देष परम शानम् , तदेव बारेश्योपम् स्ानस्त मनति। वामपदस्थापन प्रसादय इत्यदिन माप इति स्वयम् । एतेनाईता अन्नतम पामवं समाहितम् ॥ १०॥ मयाइनितिपरपरकाकारविर्यपातिनिमितविरमेन - पवार्मगौरव पफरममा-- अकार आदिधर्मस्य मोक्षस्प प प्रदेशका । स्वरूप परमदानमकारस्तेन प्रोन्पते ॥ ४०॥ पकार इति । अकार भईनिति पदस्थ मोकारसमे पर्ण , आदिधर्मस्प:माविर्मस्त्य भावो उपविस्वामोपचारावादि प्रथमप यो पर्मा दानशीलतपोमावरूप तस्य, गदुम्-दान सीस्तपोमानमेवा तुर्तिवम् । मम्मे युगवामा कोमा मवानि "हि । मोपस्प-समझयम्मुक्के, मामीसरविण्यात समाफलामोवस्य मुस्मत् सर्वप्रथममहतोपदेसाधुगम्यषुपदेशकोप भारवाहित्य बोध्यम् । पारामिपसामादिसमलम, माता पुमागे पिनममुपविम्बात् । प्रदेश प्रतिपावक उपदेशच्या बारी हि मातृकापाठे साविरिति प्रसवपटक माविमर्मस्प मौसम सकम्मलादीमा पाऽभापविण पक्षकः। गुम्यो ईन् पातम भाषा धर्म मोस कसामाविक पविग्यानिति मातफयमबारपा. प्रत्पवमटफेनाकारेण म्यते इति परमार्य । यि, खरूपम-मान- नसतम्बम् परमसानम् केपणामझामहप केवग्जाम हि - निरारमा नियाशिवाय गुपगुपिनोरमैदक्पे पात्मनः पारमा केवलं ज्ञान ज्ञानानामादिभूतमात्मस्वरूपत्वात् , मत्यादिकं ज्ञानश्चौपा- धिकत्वादागन्तुकत्वात्परवर्तीति तदादिभूतं ज्ञानमकारेण मातृकापाठे- ईच्छन्दे चाऽऽदिभूतेन लक्ष्यते, तदाह-अकार:- इति । तेन%3D आदिधर्मस्य मोक्षस्य च प्रदेशकत्वेन केवलज्ञानस्वरूपत्वेन चाऽहंतः। लक्षय…हत्पदघटक इति सारार्थ. । एतद्वैशिष्टयं चाऽर्हत्येव नाऽन्यत्रेति कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् थिक स्वरूपमिति बोध्यम् । अर्हत इति प्रस्तावाल्लभ्यते । एवञ्च अकारा-अर्हन्निदिपदघटकोऽकार', प्रोच्यते-कीर्त्यते । सर्वप्रथम धर्मस्य मोक्षस्य च प्रदेशकः केवलज्ञानवाश्चाऽहन्नेवेत्यादिभूतोऽकारो स एव नमस्करणीयो नाऽन्योऽनीदृश इति हृदयम् ।। ४० ।। अथाऽहत्पदघटकं रेफ निरूपयन्नाह- रूपिद्रव्यस्वरूपं वा दृष्ट्वा ज्ञानेन चक्षुषा । दृष्ट लोकमलोक वा रकारस्तेन प्रोच्यते ॥ ४१ ॥ रूपीत्यादि । ज्ञानेन मतिश्रुत्यवध्यात्मकेन, तपेणेत्यथ. । चक्षुषा-नेत्रेण, न तु चर्मचक्षुपा, रूपिद्रव्यस्वरूपम्-रूपि मूत्त यद्रव्यमणुस्कन्धमेदभिन्नपुद्गलात्मक द्रव्य तस्य यत्स्वरूपमुत्पादव्यय- प्रौव्यात्मक समान्यविशेपनित्याऽनित्यत्वसदसत्त्वाऽमिलाप्याऽनमिलाप्यत्व- मेदाभेदाद्यनन्तधर्मात्मकत्वादनेकान्तात्मकं च तत्त्वम् , दृष्ट्वा ज्ञात्वा, ज्ञानचक्षुपा हि दर्शन जानमेवेति बोध्यम् । चा-तथा, अनन्तरमिति शेप । लोकम् चतुर्दशरज्जुप्रमाणमवगाढधर्मादिद्रव्योपाधिकाऽऽकाश- प्रदेशात्मकम् , लक्षणया तत्स्य त्रैकालिकसर्वद्रव्यपर्यायम् , अलोकम् = काहहितमाकाशम् , देति-समुच्चये। दृष्टम् जातम् । ज्ञानेन मारेमस्तोत्रम् परफेस्पनुमन्यते । मत्र पसान केवमस्मम् , सन सत्रमा परिच्छेदकासाविति प्येमम् । पेन सस्टिम्यस्यस्पदनामेर मेर- जन्मेकवर्डनेन देवना, रमारावपटको रेफ, प्रोपरे कीमते । पहिस्पटको रेफो पुपम्मपतमा रेफपतिसमिसम्यान दम्पतत्वानकमेमातो सोक्रोधानं ममत्कीति तात्पर्यम् । मईटी हि मन्मतो सानत्रयवैशिष्पम् , दीक्षामामाम प भासमिय पातिधर्मको सति केबमेस्पत्त्या समभवमिस्पेवमय रेफो मसी । मानो रेष पर्व गुणशिष्ठ इति माक्त् ॥१॥ मात्यापटक रकार निधि- बता रागाय देवाय हवा मोहपरीपा तानि पेन कर्माणि परस्तेन प्रोम्पते ॥ ४२ ॥ हवा इति । पेनबासकारेण भुक्तानुतपुष्पवामिना, मसिन यावत् । रागामपिपयाऽमिसाए, भारम मिनेवासम्म सर्व । बहुपपनं साकस्मेन रागपरिमार्यम् बाँति रमलेशस्याऽप्यमापात् । प्रमोऽपीति बोध्यम् । हेपाः मनिप्लेप्पमीतम पार समुजरे। हता विनास्तिा सा स्पध इस्प। पीचरागो मम्मत इति पयुक्तम्- मुले वुसे मवे मोझे सौदासीन्यमीसिपे । नाऽसि पिरागतानि 'शि स्था महारेन्द्र प्रीस्त्या नामोपमुज्यते । याम रतिर्नाम लिरको स्वाति से" इति मन मोहजन्ना कलामपीस ! समाविमाम्पस्प्ययुग्णमितोऽभी "सि भा। बा, मत एष, मोहपरीपहा मोहा मनाम्स पिनबारा- भारत। तदा राम्पमेवेनि गारादिषु ममत्वानि, परीषहाः क्षुत्तृष्णादयो द्वाविंशतिविधाः परीपह- कीर्तिकलाव्याख्याविभूषितम् ४७ इतानि-परिशाटितानि, पदवाच्याश्च, हताः विनाशिताः, मोहास्त्यक्ता परीषहाश्च सहिता इत्यर्थः । मोहस्य त्यागः परीषहस्य सहनं च नाशस्तयोरिति बोध्यम् । यस्य च न रागद्वेषौ तस्यैव मोहादिनय इति भावः । तथा, कर्माणि- शुभाऽशुभात्मकानि सर्वाण्येव पापपुण्याभिधानान्यास्रवजन्यानि कर्माणि, यदुक्तम् - " अनन्तकालपचितमनन्तमपि सर्वथा । त्वत्तो नाऽन्यः कर्मकक्षमुन्मूलयति मूलत" इति । तेन-राग- द्वेषमोहपरीषहर्महननेन हेतुना, हकारः अर्हत्पदघटको हकाररूपो वर्णः, प्रोच्यते वर्ण्यते। अर्हत्पदघटको हकारोऽहतो रागादिहननं. स्क्षयति, दारपरिग्रहादिना नाऽन्यो देव ईदृश इति हृदयम् ॥ ४२ ॥ अथाऽहन्नितिपदान्तस्थ नकार निर्वक्ति सन्तोपेणाऽभिसम्पूर्ण प्रतिहार्याष्टकेन च । ज्ञात्वा पुण्य च पापं च नकारस्तेन प्रोच्यते ॥ ४३ ॥ सन्तोषेणेति । पुण्यम्-शुभ कर्म, पापम् अशुभ कर्म, च= द्वयं समुच्चये। ज्ञात्वा विवेकेन परिच्छिद्य, इद पुण्यमिद पापमित्येवं विविच्येत्यर्थ । सन्तोपेण आत्मरत्या, तृष्णोपरमेणेत्यर्थ । उपशमेनेति यावत् । अभिसम्पूर्ण =सम्भृत , आत्मरमणात्सर्वथा तुष्टमनोवृत्ति- रित्यर्थ । असन्तोषात्परिग्रहादिप्रवृत्ते पुण्यपापाऽनुबन्धाद्भवपरम्परात्मक दुप्परिणामाऽनुषड्ग इत्यतो विषयविरक्त उपशान्ततृष इति परमार्थः । तथा, प्रातिहार्याऽष्टकेनप्रातिहार्याणा द्वा स्थ इव समवसरणस्थेऽर्हति नियतस्थितीना तथाख्याताना चैत्यपादपच्छत्रदुन्दुभ्यादीनामष्टकेना- मरमरम्पगमा मत पनि बमना । नायिका रामाबाम्नमोहकसमप्रभूवय बासना वि गायत् । माता ४८ मावतोयम् ऽस्नग्या, उपक्षणत्वात्यामापतिसमेन प, पेनाऽमिसम्पूर्ण हल्ला ज्यते, समन्वित प्रत्ययः । मदुसम्-"एता पमकारकरी मानिामिन रात्रिीयन्ते म के रक्षा माय ! मिरमरसोऽपि री" इति । क्षेत्र पुष्पपापरिवेस तापमतिमा पतिशयसमान हेतुना, नकाराधि त्याकारकमान्तस्पो नकाररूमो वर्ष प्रोच्यते-पायिते । पकिरे- सत्सदपटको माराईत पुष्पपापालत सन्तल मानिहाय मभूमरिमनिरामिक्ल पम्पमकीधि समम् ॥ १३ सदेवमुक्तमात्रेणाधीन छनोज गुपस मो मोसो महादेव एकमतिरएमतिपत्सुपपाय " लिन प म ' युध्यनुसारेण स्वस्म साटस्य मममनुपसमि- वीर्षगीतराग नमस्करोति- भवमीमापारजनना पगारसम्बयसपगवा यस्य । प्रमावा विहिरो जिनो या नमस्तस्मै ॥ १४ ॥ इति कमिकाम्यमीहेममवापानिरपिक- । मीनादेवोस सम्पूर्णम् ॥ मममीबादुरबनना इति । यस्प-मासस टेक्स्प, मनीषा शारजननायास्य कपिटदेखकमन्ममरपादेस गारस्य वीर्य कारन बामको मोडगे सरपरस्म वी परबमनेन परितर्षम् बीनगदुरस्त पाक्ति पुपितय सन् पुनपुन उम्तीति 'गुणा पूजालान गरिपु मर
.
कीर्तिकलाल्याख्याविभूषितम्
है भवपरम्परानिदानकर्मवन्धहेतव., यदुक्तम्-
-" आस्रवो वन्धहेतुः
स्यादिति बोध्यम् । क्षयम् नाशम् , उपगता प्राप्ताः, रतत्रयाऽऽ-
रविनादिना भवपरम्पराहेतवो रागाद्या यस्य नष्टा , स तादृश इति
सारार्थ । ब्रह्मा-तदाख्यो देव , विष्णुः तदाख्यो देवः, हर!
तदाख्यो देव , महादेव इति परतीर्थिकप्रसिद्धः । जिन: वीतरागो-
ऽर्हन् , सर्वत्र वाकारोऽनास्थायाम् । न व्यक्तिविशेपे आग्रह., किन्तु
यो वीतराग , तस्मै तादृशाय वीतरागाय, नमः=नमस्कारः, अस्तु
ममेति शेषः । ब्रह्मादीनाञ्चोक्तप्रकारेण ढारादिपरिग्रहेण वीतरागत्वाऽ-
भावन्जिन एव वीतराग इति तस्मा एव नम । ब्रह्मादयोऽपि चेत्तथा-
स्युस्तर्हि तस्मा अपि नम., यतो गुणा पूजास्थानमिति भाव ॥ ४४ ॥
,
पन्यासकीर्तिचन्द्रेण कृता कीर्तिकलाख्यया ।
व्याख्येयं श्रीमहादेवस्तोत्रसारार्थबोधिनी ॥ १ ॥
वत्सरे वैक्रमे सेय रसेन्दुव्योमलोचने ।
पूर्णा वसन्तपञ्चम्यां महादेवाहणाऽस्तु मे ॥२॥
पण्णां श्रीहेमचन्द्रेण निर्मितानां पृथङ्मया ।
स्तोत्राणां निर्मिता व्याख्या हिन्द्या चाऽमरभाषया ॥३॥
द्वालिशिकाद्वयी पूर्वं वीतरागस्तवस्ततः ।
पुनः सकलार्हत्स्तोत्र वीरस्तोत्रसमन्वितम् ॥ ४ ॥
मधदेतो वदन श्रीमहादेवस्वोसमे कमान्मया । स्याताना निर्मितेसेपी ग्याम्या लोकोपयोगिनी ॥५॥ धाम्पन्तु सन्त उत्सर्ग मत्वा स्लवित परि। मोदा नीलतपना स्खमाबो दुरविक्रमः ॥4॥ मतिरस्त महादेपे वाचलना मुनिपला। मीयास्कीविकला छोकमोदसन्दोहसत्फळा ॥७॥ शिप्पेण सनिचन्द्रेण चन्द्रेण मनिमाऽसि । थापा पूर्णकामेन विधापत ममायने ॥८॥ गुरवा कस्तूरास्यार धीम्या पायापसवा । वरुयोममिहाऽस्मि परम के पोतरागाय ॥९॥ पति कलिकाम्सजभीमपन्यापार्यविरपिते भीमहादेशस्तो सपोगणाऽपिविसासनसमाट्यम्मरम्मम्ममेतीबोंबारकाव्यम पार्माचार्म भीमधिगमनेमिधीभर पहावार सम्पमसान्तमापा- धर्मग्रीमदिनपरिवानपरीपर फारसिद्धान्तमहोवषिमातमिविशारदा- चार्गमीमनिस्सास्तूरस्रीधर-सिप्प पन्यासमीपतिपदविकाम- रिपिता कीर्विकममा मासा समाधा। ॥भीरत ॥gम मबत॥
॥ अर्हम् ॥ ॥ पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिविरचितकीर्तिकला- व्याख्यासहितानि पुस्तकानि ।। १. द्वात्रिंशिकाद्वयी-(क स श्रीहेम. विरचिताऽयोगव्यवच्छेद- द्वात्रिंशिकाऽन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिका च) कीर्तिकला- सस्कृतव्याख्यासहिता। २. द्वातिशिकाद्वयी-कीर्तिकलाहिन्दीभाषानुवादसहित । ३. श्रीवीतरागस्तव:-क. स. श्रीहेम विरचितः कीर्तिकला- सस्कृतव्याख्यासहितः। ४. श्रीवीतरागस्तव --कीर्तिकलाहिन्दीभाषानुवादसहितः । ५. स्तोत्रत्रयी—(क स श्री हेम विरचिता) कीर्तिकलासंस्कृत- व्याख्यासहिता। स्तोत्रत्रयी-कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहित । प्राप्तिस्थानः श्री जनकलाल कान्तिलाल । लिम्बडीशेरी पेटलाद वाया - आणद । (गुजरात)
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॥ अहम् ।। श्रीविजय-नेमि-विज्ञान-कस्तूर-सरिसद्गुरुभ्यो नमः । कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितं ॥ सकलाऽर्हत्स्तोत्रम् ॥ पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिविरचित- कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् । कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्राचार्यने त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र नामके महाप्रवन्धका प्रारम्भ करते हुए - उक्त महाप्रबन्धकी निर्विघ्न समाप्ति हो - इस कामनासे मगलाचरण रूपमें सकलार्हत्स्तोत्रकी रचना की थी। जिसमें चौवीस तीर्थंकरोंकी स्तुति करते हुए आदिमें आर्हन्त्य - तीर्थकरत्त्व - तीर्थकरके असाधारणभाव - तीर्थकरपनकी स्तुति करते हैं- सकलाऽहत्प्रतिष्ठानमधिष्ठानं शिवत्रियः । भूर्भुवः स्वस्त्रयीशानमाईन्त्यं प्रणिदध्महे ॥१॥ पदार्थ-सकलाहत्प्रतिष्ठानम् सकल - सर्व, अर्हत् - तीर्थ- कर, प्रतिष्ठा = पूजाके निमितभूत । सकलतीर्थंकरोंकी पूजाका इतुमूत - जिसके होनेसे तीर्थकर पूजित होते हैं, वह असाधारण d २ प्रले-पासाम, वीना मेको सबा बानो पात्य में, निजगन्मनस्क समस्तोत्रम् वमा अस्पैफिक माप । ममा सका तीर्थकर प्रतिमान भाई सिके ऐसा, सकस सीकरोंमें रहनेपाते, सभा, शिवमिया-क्षिण कस्माण मोस, मी लक्ष्मी समृद्धि, कत्याप या मोक्षसंपदामात्र, ममिष्ठानम् प्राप्तिका साधनहोनेसे मामयम्त, सभा, मुभूषा स्वसपीशानम्-मर् मागक, मुवर् मर्पसोक, स्र् स्वस्नेिक इनतीनो कमेकोंके खामीके से समष्ठ, माईन्स्पम् मान्त्यि तीकरत तीफरपन सीकरोंके ममापारण एवं महौकिक पतिशय मा क्यान आदि गुणस्म मात्र का, प्रणियमा अपिवान मन वपन, क्षमा परीरसे वादाम्पकी सामना करता हूँ-न करा ॥१॥ मात्राम-सीकरोंक सहर माथि भविश्य तथा केरमान आदि मसाधारण एवं ममेकिक गुपपी मार, मो उन तीमकी येगोसे की गमी माके हेतु वश शुमसम्पदामों एवं मुकि स्मीकी प्राप्तिके सामन है, सपा सर्ग-मर्म-पावासकों के सामीके से सोकर मना तीनों सोनके सामित्वका सपनरूप , मैं उन गुणा माईन्त्यका ध्यान करता ॥१॥ नामाप्रतिद्रम्पमाषः पुनातिनगन्जनम् । क्षेव पासे व सर्वस्मिमईवा समुपास्महे ॥२॥ पदार्प-सर्वस्मिन् समी, क्षेने क्षेत्रो स्थानाम, पता, त्रि - तीन, जगत् - लोक, नन - प्राणी, सामान्यरूपसे तीनों लोकों के नाम, आकृति - तीर्थङ्करोंकी प्रतिमा, द्रव्य - तीर्थकर होनेवाले जीव, प्राणियोंको उनके द्वारा किये गये तीर्थङ्करोके - नामस्मरण, ३ कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् प्राणियोंको, नामाऽऽकृतिद्रव्यभावैः नाम - ऋषभ, महावीर आदि 3 माच - अतिशय, केवलज्ञान आदि भावोसे युक्त तीर्थक्कर, ऋषभ महावीर आदि नामोंसे, प्रतिमा आदि रूपसे, तीर्थङ्करभावरहित ससारी अवस्थासे तथा तीर्थङ्कर रूपसे, पुनता=( स्मरण, दर्शन, सेवा तथा उपदेश आदिके द्वारा) पवित्र करनेवाले, अर्हतः अरिहन्तों - तीर्थकरोंकी, समुपासहे-उपासना करता हू ॥ २ ॥ भावार्थ-जो सभी क्षेत्रों तथा सभी कालों में तीनो लोकों के प्रतिमा आदिके दर्शन, वन्दन, ससारी अवस्थामें सेवा, उपदेशोंका श्रवण तथा पालन आदिसे चित्तशुद्धि होनेके कारण - पवित्र करते हैं। मै उन तीर्थङ्करोंकी भक्तिभावपूर्वक तन, मन तथा वचनसे उपासना करता हूं। (जिससे दूसरोंके जैसे ही मेरे चित्तकी शुद्धि तथा इष्टसिद्धि हो। क्योंकि चित्तशुद्धिके बिना कोईभी शुभकाम सागोपाग पूरा नहीं हो सकता - ऐसा अभिप्राय है) ॥ २॥ आदिम पृथिवीनाथमादिम निष्परिग्रहम् । आदिमं तीर्थनाथ च अपभस्वामिनं स्तुमः ॥३॥ पदार्थ-आदिमम् सर्वप्रथम, पृथिवीनाथम् पृथिवीके नाथ - ईश - राजा - पालक, राजाओंमें सर्वप्रथम, आदिमम् सर्व- प्रथम, निष्परिग्रहम् =निप्परिग्रही - स्त्री, पुत्र, राज्य आदि परिग्रहोंसे पसायोलम् रहित सनस्व के स्याग करनेवासे, त्यागियों में संपलम पथ, मादिमम्-समियम, तीर्थनापम्-तीपर, तीबहरोमै संग्राम, ऐसे, अपमस्वामिनम् -भीमपमनानकी, स्तुमा=मै सति करता मागाई-चो रामामों स्मारियों व्या तीवमें प्रिम है, में ऐसे भीऋपमनापकी पति करता है। गाविमें इन्द्रात देखोने मेफकी माला लिमे भीमनामन राम्मामिक किया गा। इसलिये पश्चिीम ये ही सर्वपभम राबा हुए । सागर- प्यपहारका प्रवर्तन किया था। एवं क्मसे ही तीनों शानोंसे युक होने के कारण तथा कन्सिक देवोकी मानासे सीपनके मि सर्वका त्यागकर मोक्षपातिकी माक्नासे भीमपमनाप्ने समयम दीय मेयी सवारिप पर उपदेश देकर पतुर्विधर्मपी च सापन किया था। इसम्मेि सर्वपम टीपार भीमपमनाय ही है-र ध्यान देने मोम्प ॥३॥ मन्तिममित विश्वकमलाकरमानम् । अम्मानकेबसाऽऽदयसम्मान्तमग स्तुपे ॥४॥ पदार्ष-विपकमलाकरमासम्=स्थि अगदपी कम साकर कामेंक माकर-साम-प्रमा मास्कर स्म, भिमपी कमम्ममूहों के लिये सूर्यसमान, अम्लानोवसायसमकान्त जातम् तम्मन-पमन-मग्नि नहीं ऐसा मति छ रिशुख, मा केसात मादर्स दर्पम सान्त प्रनिनिम्मित, गोचर
५
विम्बित - गोचर हे, अथवा जो विशुद्ध केवलज्ञानके द्वारा स्पष्टरूपसे
कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम्
जगत् विश्वके सर्वद्रव्यपर्याय, जिनके अत्यन्त स्वच्छ ऐसे केवल-
ज्ञानरूपी दर्पणमें सर्वव्यपर्याय प्रतिविम्बित - गोचरीभूत है ऐसे,
अर्थात् जैसे स्वच्छ दर्पणमें सभी पदार्थ प्रतिबिम्बित होते हैं, वैसे
जिनके विशुद्ध केवलज्ञान के सभी पदार्थ विषय हैं-जो केवलजानके
द्वारा सभी पदाथोंके जाननेवाले-सर्वज्ञ हैं। अर्हन्तम्-अरिहन्त,
तीर्थकर, अजितम् श्रीअजितस्वामिकी, स्तुवे=(मैं) स्तुति करता हू
भावार्थ-विश्वरूपी कमलाकरके प्रबोधित करनेमें सूर्यसमान,
अर्थात् नैसे सूर्य कमलसमूहोंको प्रबोधित - विकसित करते है, वैसे
ही विश्व के प्रबोधित करनेवाले - विश्वको सन्मार्गका प्रबोध देनेवाले,
तथा जिनके अत्यन्त स्वच्छ ऐसे केवलज्ञानरूपी दर्पणमें सम्पूर्ण विश्व
प्रतिविम्बित - गोचरीभूत है, अर्थात् जैसे स्वच्छ दर्पणमें सभी
पदार्थ स्पष्टरूपसे प्रतिविम्बित होते हैं अथवा जैसे स्वच्छ दर्पण
अत्यन्त स्पष्टरूपसे सभी पदार्थों के प्रतिविम्बका ग्रहण करता है, वैसे
ही जिनके विशुद्ध केवलज्ञानमें सभी द्रव्य तथा उनके पर्याय प्रति-
॥४॥
सभी पदार्थों का ग्रहण करते है - सभी पदोंको जानते हैं, अर्थात्
जो सर्वज्ञ हैं, ऐसे तीर्थङ्कर श्री अजितस्वामीकी मै स्तुति करता हूं।
(यहा - जो सर्वज्ञ हैं, तथा सम्पूर्ण विश्वके उपकारक है, उनकी
स्तुतिसे ही इष्टलाम हो सकता है-ऐसा ध्वनि है) ॥ ४ ॥
विश्वभव्यजनाऽऽरामकुल्यातुल्या जयन्ति ताः ।
देशनासमये वाचः श्रीसम्भवजगत्पतेः ॥ ५ ॥
ए समजोत्रम् पार्व-देशनासमये-(सम्बसरममें) देशना देने सम में, सा-आगोमे गणित, मसिन, मह, विन्तमम्पचनामा अस्यात्स्पारिप-नगद, सभी ममबन ममपाणी मुीि योम्यवापाले भाराम - उपवन बगीचा, कुस्मा नापी भाप वस्म-मान । विपके सभी मम्पपाणीसपी उपक्नकी मारके सन भीसम्मवज्रगस्पता-मगत्पति अगदीपर तीनो मे स्थानी ऐसे बिनेपर श्रीसम्मकनायकी वाचावामी प्राचन, उपरेस, जयन्ति सोकष्ट हैं ॥ ५ ॥ मावर्ष-(पैसे मारियों के द्वारा सस्त सिंचनसे उपलके इस प्ता बाविका पोपम एवं उसकी विसी है वैसे ही देम्बा- समयमै जिनकी वापीसे Aपके समी ममामा निपविशनिस पोस एवं सम्यगान माविकी पद्धि प्राप्तकरते है, मत पग) देवनाममममें विपके सभी मत्यमापीलमी उपानके लिये नामी समाम बमके सामी भीसम्मबजिनकी वापी निमम मारती है सस्तो। (महा जिससे सम्परावान माघहो तथा मो आमामा पेपन करे, पही पाणी सोकर है ऐसा पनि है) ॥ ५॥ अनेन्तमताम्मोपिसमडासनचन्द्रमा । दवादमन्दमानन्द मगगनमिनन्दनः ॥६॥ पदार्म-अनेछन्तमवाम्मोधिममष्ठासनचन्द्रमामे कान्त मत मत्पेसपा में भन्यभो प्रविपाइन परमेस मा सिदान्त दर्शन सादावदर्शन सम्मोपि समत, समहामन स्वरूपका प्रतिपादन करता है-ऐसा अभिप्राय है) ॥ ६ ॥ कीर्तिकलाहिन्दीमाषाऽनुवादसहितम् उल्लसितकरना - बढ़ाना - विकसितकरना, चन्द्रमा-चन्द्र । अनेकान्त- मतरूपी समुद्रके वढानेमें चन्द्रसमान, भगवान्=भग - ऐश्वर्य, धर्म, तप, ज्ञान, वैराग्य, अतिशय । सभी प्रकारके सहज आदि अतिशयसे युक्त, अभिनन्दनः = तीर्थंकर श्रीअभिनन्दनस्वामी, अमन्दम् = अत्यधिक, अनन्त - शाश्वत एव अखण्ड, आनन्दम् = आनन्द, भावार्थ-(जैसे चन्द्र समुद्रके समुल्लास - वृद्धि - भरतीका कारण है, वैसे तीर्थंकर स्याद्वादसिद्धान्तके समुल्लास - वृद्धि - प्रचारके कारण हैं, क्योकि वे ही स्याद्वादसिद्धान्तके उपदेशक हैं । इसलिये) स्याद्वादरूपी समुद्रके समुल्लास केलिये चन्द्र समान जिनेश्वर श्रीअभि- नन्दन स्वामी अनन्त, अखड एव शाश्वत आनन्द देवें । (यहा स्याद्वादके अनुसारी ज्ञानसे ही शाश्वत आनन्दमय मुक्तिका लाभ हो सकता है, अन्यथा नहीं। क्योंकि स्याद्वाद ही वस्तुके यथार्थ दद्यात्-देवें ॥ ६ ॥ द्युसत्किरीटशाणायोत्तेजिताधिनखावलिः । भगवान् सुमतिस्वामी तनोत्वभिमतानि वः ॥७॥ पदार्थ-धुसकिरीटशाणाऽयोत्तेजिताङ्घ्रिनखावलि घुसत् - देव, किरीट - मुकुट, शाण - सान, कसौटी, अग्र - मुख, ऊपर, उत्तेजित - तेजकिया गया - घसा हुआ, सान चढाया हुआ, नखावलि - नखके समूह, देवोंके मुकुट रूपी सानपर घसाकर तीक्ष्ण तथा चमकते हुए नखोसे विराजित, भगवान् सर्व सानके
पनि मटका सम्हा इसप्रकार देगोसे प्रणाम किये बारे
सरहामायोम्म्
एपसे मुफ, सुमतिस्वामी - प्रिनेपर मीमुमनियामी, कर
मयोंके, अमिमतानि-अमीट, तनोतु सिद्ध करें मनोरथ पूरे
मावार्थ-(मैसे सानपर पसार एम मावि तीक्ष्म हो
है, तमा चमकने माते है, उसीपकार साक्षिय भकिके पास
कारण मुटॉसे पसाकर जिनके पापोंके नस तीक्ष्य हो यो ।
या मषिक धमकने मो हैं। इसस्यि) देवोंके मुसपी समरर
मसाकर तीपण एवं समकते नसमासे भगवान श्रीनुमक्सिामी
मयों के मनोरयोको पूर्ण करें। (यहाँ से देगोसे सेमित होनी
कारण देशभिदेव हैं, वही मनोरम पूरा कर सकते। -
पनि है)।॥ ७॥
पचप्रमामो देशमासः पुष्जन्तु या मिपम् ।
अन्तरारिमपने कोपाष्टोपारिमायाः ॥८॥
पर्य--पचप्रमप्रमोः = जिनपरभीपापम पम - स्वामीमी,
मन्वयारिमयने मन्मा मन्तरामाके भूहिकमरमेक कारण
अन्तरंग भामसम्बन्धी, भरि पत्र की पाम पालिके, मलव
पसकरनेके समय, कोपाऽऽटोपादियकोप के मारे
भावेचसे इस वैसे अस्माकममा समान साम, दामासा-
दोन मास मरिमकान्ति बा-माप मम्मोकी, भिपस् समावि,
प्रमन्न-पो बा ॥ ८॥
.९ आप भव्योंकी सुखसमृद्धि वढाये। यहा - श्रीपद्मप्रभुस्वामी अन्तरग कीर्तिकलाहिन्दीमाषाऽनुवादसहितम् भावार्थ-जैसे युद्ध आदिमें अपने शत्रुओंके नाशकरनेके समय लोगोंके मुख, आँख आदि अग क्रोधसे लाल होजाते हैं, वैसे ही कर्म, कषाय आदि अन्तरंग शत्रुओके नाशकरने में जैसे क्रोधसेलाल हो गयीहो, इस प्रकारकी श्रीपाभस्वामीके देहकी लाल कान्ति शत्रुओंके नाशकरनेवाले हैं, तथा उनके शरीरकी कान्ति लाल है । इसलिये स्वय श्रीसम्पन्न तथा निर्दोष होनेके कारण लोगोंके श्रीके । । पोपक हैं - यह स्पष्टार्थ है ॥ ८ ॥ श्रीसुपार्श्वजिनेन्द्राय महेन्द्रमहिताञ्जये । नमश्चतुर्वर्णसङ्घगगनाऽऽभोगभास्वते ॥ ९ ॥ पदार्थ-चतुर्वर्णसङ्घगगनाऽऽभोगभास्वते-चतुर्वर्ण - चतु- विध (साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका - इन चारोंका) सङ्घ - सङ्घ- रूपीगगन - आकाश, आभोग विस्तार - विस्तृतगगनमडल, भास्वत् - सूर्य , चतुर्विध सघरूपी विस्तृतगगनके सूर्यसमान, तथा, महेन्द्रमहि- ताऽङ्घये-महेन्द्र - देव, असुर तथा नरोंके इन्द्र, महित - पूजित, अनि - पाँव, सुरेन्द्र आदिसे पूजित चरणवाले, श्रीसुपार्श्व- जिनेन्द्राय=जिनेश्वरश्रीसुपार्श्वनाथको, नमः=मेरा नमस्कार हो ।। ९ ॥ भावार्थ-(जैसे विशाल गगन मडलमें सूर्य-अप्रतिम तेजस्वी, विश्वप्रकाशक तथा लोकहितकारक हैं । उस प्रकार ही विशाल- चतुर्विघसघमें जिनेश्वर अप्रतिमतेजस्वी, सदुपदेशके द्वारा विश्वके प्रकाशक तथा अहिंसा आदिके द्वारा विश्वके हितकारकमी हैं।
.
प्रामप्रस्थोत्रम्
इसलिम स्त्वमी उनके परमोकी पूजा करते है। इसनि) पर
सहरूपी विस्तृतमानके सर्मसमान मा महेन्द्रो मरेन्द्र मारेन
सपा नरेन्द्रोंसे पूवित परमवाले पिनेवरभीपापमुपो मेरा नमस्कार
प्रपाम हो। (यो ग्रेगों केम्मेि सर्वसमान मासिन्य रो, नसा
प्रणाम करना ही चाहिये - य मान) ॥ ९॥
पन्द्रममप्रमोचन्द्रमरीधिनिषयोजना
मर्षि सितष्पाननिर्मितेव बिपेस्तु मा ॥१०॥
फ्धार्म चन्द्रप्रमप्रमो. मोपन्द्रमममम स्वामीकी, मूर्ष
सितम्याननिर्मिवा पम्मूर्त प्रथिवी भातिके नैसे रूप, रस
गुणोसे पुक, सित-माम असम्यान, निर्मित बनामी गमीत
जैसे, वैसे मूर्त ऐसे सम्मानसे बनामी गमी हो इस प्रकारकी,
या चन्द्रमरीपिनिषयोन्यसान्द्र, मरीति रिम निकम राधि
पुर, उमा चन्द्रकी किरणके पुंके मान समकती, भूचि-
भरीर विष वा-मापमम्मोकी, भियसलसमदि फेम्मेि, वस्तु
रो, सससमति दे ॥१०॥
माय-बैसे मुख ऐसे समानसे स्नायी गमी हो इस
प्रभरसे समया मियोप व पकिन तम चन्द्र निमगोके समान
चमकती विनश्वरभीपदसमस्लामीकी मर्ति भाप मम्मोकी मुसम्म
माये । (मनोहर निदान तथा परित पदार्थ सब भीपा
होने के कारण पूसरेकी मीसम्पया पाते हैं करवा ॥१॥
कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् करामलकवाद्विश्वं कलयन् केवलश्रिया । अचिन्त्यमाहात्म्यनिधिः सुविधिोधयेऽस्तु वः ॥११॥ पदार्थ-केवलश्रिया केवल - केवलज्ञान, श्री - माहात्म्य, ऐश्वर्य, प्रभाव, शक्ति, केवलज्ञानकी महिमासे, विश्वम् लोकालोक को, करामलकवत्=कर - हाथ, आमलक - ऑवला, वेत् - समान, हाथके ऑवलेके जैसे, कलयन् जानते हुए - जाननेवाले, अत एव, अचिन्त्यमाहात्म्यनिधिः अचिन्त्य- कल्पनातीत, माहात्म्य महिमा, निधि - खान, कल्पनातीतमहिमाकी खानसमान, सुविधि: जिनेश्वर श्रीसुविधिनाथ, वा-आप भव्यों के, बोधये-सम्यग्ज्ञानके लिये, अस्तु हों। ज्ञानप्रद हो ॥ ११ ॥ भावार्थ-जैसे किसीको अपने हाथमें रहेहुए आँवलेका स्पष्ट ज्ञान होता है, उस प्रकारही जो केवलज्ञानकी महिमासे विश्व समस्तद्रव्य तथा उनके पर्यायोंको जानते हैं, अर्थात् विश्वको करामलकवत् साक्षात् देखते हैं, ऐसे कल्पनातीत महिमाकी खान- समान जिनेश्वर श्रीसुविधिस्वामी आप भव्योंके ज्ञानप्रद हों। (यहां- जो विश्वका जाता है, वही यथार्थज्ञान दे सकता है - यह आशय है) के ॥ ११॥ सत्त्वानां परमानन्दकन्दोद्भेदनवाऽम्वुदः । स्याद्वादाऽमृतनि:स्यन्दी शीतल पातु वो जिनः॥१२॥ पदार्थ-स्याद्वादाऽमृतनिःस्यन्दी स्याद्वाद - अनेकान्तबाद, अमृत-अमृत, पानी, नि स्यन्दी-सींचनेवाले, वरसनेवाले, उपदेशक Pr(प, मोस) मादारसी भम पत पर सवा =परम सोचम नेहरा गये मोती सामने यी द-मकुरखना . मदत् । सोर (मात्रामसके) सिमामी, प. ॥ १२॥ माला- नेमकर करा देनेर सचिी। निराला या घर-मर्मविमिति - निर्यन और र रतियार - रामरेन टर, सम्मान म. मुरमाडीमा सड़म - -मीराता -- परम से सेपासे शरीर । tो स्मरा है आम स्पोत्र म . माप अफारसे सर्व चमकसी दिनेश नाये। (मनोहर होनेके कारण दूसरे मग मी उम्म ने की।
૧૨ कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् दुःखोंसे पीडित प्राणियों के लिये । अगदङ्कारदर्शनः अगदकार वैद्य, दर्शन - देखाव, देखना अथवा स्याद्वादरूपी सिद्धान्त, वैद्यसमान दर्शनवाले । अर्थात् जिनके दर्शनसे भवपीडा नष्टहो, तथा जिनके सिद्धान्तमें भवरोगनाशक उपाय बताये गये है - ऐसे । तथा, निःश्रेयसश्रीरमणः नि श्रेयस - मोक्ष, श्री-लक्ष्मी, समृद्धि, रमण- उपमोगकरनेवाले. मोक्षकी लक्ष्मीका उपभोगकरनेवाले - सच्चिदानन्द- मय - सिद्धस्वरूप, श्रेयांस: जिनेश्वर श्रीश्रेयासस्वामी, वा-आप मन्योंके, श्रेयसे-कल्याणके लिये, अस्तु हों, कल्याणप्रद हो -- ॥ १३ ॥ . भावार्थ- (जैसे वैद्य रोग एवं उसकी पीडाको दवा आदिके प्रयोगसे दूरकरता है, वैसे ही जिनेश्वर मुक्तहोनेके कारण अपने दर्शनसे तथा स्याद्वादके उपदेशसे भवरोग दूरकरते हैं। इसलिये ) मव - जन्मके कारण होनेवाले कायिक, वाचिक, मानसिक-इन त्रिविधतापों - अथवा जन्म, जरा, मरणरूपी रोगों - से पीडित जनता के लिये जिनका दर्शन वैद्य समान है, अर्थात् जिनके दर्शनमात्रसे सासारिक त्रिविधताप दृरहो जाते हैं, अथवा भवके उच्छेदका उपाय बतानेके कारण जिनका दर्शन-स्याद्वाढनामक सिद्धान्त भवसम्बन्धी या भवरूपी - रोगसे पीडित जनताके लिये वैद्य समान है। अर्थात् जिनके देखनेसे तथा उपदेशसे भवदु खकी निवृत्ति होती है। तथा जो मुक्तिके अनंत, अखड तथा शाश्वतसुखके उपभोगकरनेवाले - मुक्त - सिद्धात्मा हैं। ऐसे जिनेश्वर श्रीश्रेयासनाथ आप भव्योंके कल्याणकारक हो। अर्थात् लोग भक्तिपूर्वक श्रीश्रेयासनाथके दर्शन १२ सम्पप्रस्नोम् सादावरूपी ममतसमान मसके सीखनेवाले-परसनेवाले, उपदेश, मत पर, सवानाम्-पागियोक, परमानन्दमन्दोदनवाप्रपा • =परम सर्वोधम, मानन्द सस, मोममुस, कन्द कनमून, उमेद-मकरसाना, प्रकट करना, मव भीन, मपूर्व, सोन्म, भर बादल। सर्वोत्तम मानन्दम्पी फन्दके अंकुरित-प्रकारकरनेमें मन (मापारमासके) वादग्के समान मिना जिनेवर, भीमा-श्री सीतमयामी, बा-आप मोका, पातु मनान, दुस माविसे रख्न करें ॥ १२ ॥ मावा--(से नपीन बार पानी परसार प्रमिली में रहेहुए कन्दोमै मकर उत्पापरता से ही जिनेवर पमृतके समान भामरत्वक देनेगाहे स्माद्धावदर्भमका अदेस कर मोहमसका माम मगट कर देते हैं। इसलिमे) ममसरेवास स्वादरूपी पानी के सिंचन पदेठकरनेवासे मोक्षसम्मी कन्दा मकर माके मगटफरनेमे मीन (भाषावमासके) बावम्के समान जिने पर भीश्वीतम्लामी माप मम्पोका मासे रमण फरें। (हां तत्तनामसे ही मुछि मिती, पालद्धावके सिवाम दारा दी है। समा सके उपदेशक बिनेपर ही १ मा मात्र)॥ १२ ॥ भवरोगाऽऽयम्तूनामगारवर्षनः। निभेपसमीरममा मेपोसा मेयसेऽस्तु वा ॥१५॥ फ्या-मबरोगापजन्तूनाम्मा संसार रोग दुख, भाभि, भारी पीति, मन माणी। माकेदु सो असा मारपी ।
१३३ कीर्तिक्लाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् दुखोंसे पीड़ित प्राणियों के लिये । अगदवारदर्शनः अगटङ्कार - वैद्य, दर्शन - देखाव, देखना अथवा स्याद्वादरूपी सिद्वान्त, वैद्यसमान दर्शनवाले । अर्थात् जिनके दर्शनसे भवपीडा नष्टहो, तथा जिनके सिद्धान्तमें भवरोगनाशक उपाय बताये गये है - ऐसे । तथा, निःश्रेयसश्रीरमणः निःश्रेयस - मोक्ष, श्री-लक्ष्मी, समृद्धि, रमण- उपभोगकरनेवाले. मोक्षकी लक्ष्मीका उपभोगकरनेवाले - सच्चिदानन्द- मय - सिद्धस्वरूप, श्रेयांस: जिनेश्वर श्रीश्रेयासस्वामी, व आप मन्योंके, श्रेयसे-कल्याणके लिये, अस्तु हो, कल्याणप्रद हो ॥ १३ ॥ भावार्थ--(जैसे वैद्य रोग एव उसकी पीडाको दवा आदिके प्रयोगसे दूरकरता है, वैसे ही जिनेश्वर मुक्तहोनेके कारण अपने दर्शनसे तथा स्याद्वादके उपदेशसे भवरोग दूरकरते हैं। इसलिये ) भव - जन्मके कारण होनेवाले कायिक, वाचिक, मानसिक-इन त्रिविधतापों - अथवा जन्म, जरा, मरणरूपी रोगां - से पीडित जनता के लिये जिनका दर्शन वैद्य समान है, अर्थात् जिनके दर्शनमात्रसे सासारिक त्रिविधताप दुरहो जाते हैं, अथवा भवके उच्छेदका उपाय वतानेके कारण जिनका दर्शन-स्याद्वाढनामक सिद्धान्त भवसम्बन्धी या भवरूपी - रोगसे पीडित जनताके लिये वैद्य समान है। अर्थात् जिनके देखनेसे तथा उपदेशसे भवदु खकी निवृत्ति होती है। तथा जो मुक्तिके अनत, अखड तथा शाश्वतसुखके उपभोगकरनेवाले - मुक्त - सिद्धात्मा हैं। ऐसे जिनेश्वर श्रीश्रेयासनाथ आप भव्योंके कल्याणकारक हो। अर्थात् लोग भक्तिपूर्वक श्रीश्रेयासनाथके दर्शन
समयोत्रम्
स्या उपदेशसे माधुःसोसे छपरा परें । (मी यो स्वयं मुभा
समा तपमानके उपदेशक है, वहीं मुधि दे सकते है म
है) ॥ १३ ॥
वियोपकारकीभूतवीर्षकस्कम निर्मितिः ।
मुरासुरनाम्यो मासुपून्पापुनातु का ।। १४ ॥
पदार्य-विश्वोपकार कीभूतवीर्यककर्मनिर्मिति - विभ-
तीना शेळके प्राणी, उपकारकीमत उपचरक, तीन सर,
कर्म मामफर्म निर्मिति निर्माण उपाचन ठीनों मेफोक उपकारक
ऐसे धीर नामकर्मके उपान करनेवाले मत एर, सरामुरनरे।
=देव ममुर त मनुमोसे, पूज्या चित, वासुपूज्या मिनेन
भीमामपूपनाम, पा-पाप मम्मोंको पुनातु-पक्षित करे ॥ १ ॥
मामाल-चिन्होंने वीरनामकर्मका-उसके ममाग
सम्मारिका उपदेश देकर तीनों लोकों के उपकारके लिये पनि
किया है ऐसे, मुर, ममुर सपा मनुप्योंके पूष्म सिनेमा
भीमासुपूम्मनाम माप मम्मोको (पर्सन, उपदेश मायारा)
पविम करें । (मां सीमर नामकर्मके उपार्जन करनेवासे
ही विभके उपयरक समा विष पूष्प हो सकते हैं। क्या उमरे
दर्शन एवं उपदेशसे दो पारमा पवित्र होती है यह पनि है)
विमलस्वामिनो वाचा धोरसोदया।
अयन्ति सिजगवतोयसनेमस्पतयः ॥१५॥
१५ घोदसोदरा कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् पदार्थ-विमलस्वामिनः जिनेश्वर श्रीविमलनाथकी, कतक- =क्तक - कतकनामके वृक्षके फल, क्षोद - चूर्ण, सोदर- समान। कतकके चूर्ण के समान, त्रिजगचेतोजलनैर्मल्यहेतवः त्रिजगत् - तीनों लोक, चेतस् - मन, जल, नैल्य - निर्मलता शुद्धि, हेतु - कारण, करनेवाले। तीनों लोकोके प्राणियों के चित्तरूपी जल को शुद्ध करनेवाली, वाचा उपदेशवाणी, प्रवचन, जयन्ति सभी अन्य वाणियोंसे अधिक महत्त्वकी है ।। १५ ।। भावार्थ - (जैसे कतकके चूर्ण डालनेसे पानी स्वच्छ हो जाता है, उसप्रकार ही जिनेश्वरकी वाणीसे चित्तशुद्धि होती है - चित्तके सारे दोष दूर हो जाते है। इसलिये) जिनेश्वर श्रीविमलस्वामीकी, कतकके चूर्णके समान तीनों लोकोंके प्राणियोंके चित्तरूपी जलको शुद्ध करनेवाली वाणी-उपदेश अन्य सभी वाणियोंसे अधिक महत्त्व- वाली है। (यहा-जो वाणी चित्तशुद्धिमें सहायक हो, वही सर्वश्रेष्ठ । है - ऐसा भाव है) ॥ १५ ॥ स्वयम्भूरमणस्पधिकरुणारसवारिणा । अनन्तजिदनन्तां वः प्रयच्छतु सुखश्रियम् ॥ १६ ॥ पदार्थ-अनन्तजित्-जिनेश्वर श्रीअनन्तजित्स्वामी, स्वयम्भू- रमणस्पर्धिकरुणारसवारिणा स्वयम्भूरमण - स्वयम्भूरमण नामके अन्तिमसमुद्र, स्पर्धि - स्पर्धा करनेवाले - होड़ करनेवाले, करुणारस - करुणारूपी रस, वारि - पानी, अत्यधिक होनेके करण स्वयम्भूरमण नामके अन्तिम एवं अन्य समी सागरोंसे विशाल समुद्र के साथ भी के भमके लिये 'सयम्भूमणस्पर्षी 'समकार दीप इकारान्त र मोवा--जिनपर भीअनन्तजित्माष, स्वयम्मरमपवार समयके रस बरसेमी अषिक फरमाबपी रससे-मप्सीमामासे या मध्यौको मनन्त सुमसम्पदा देव। (यहाँ मिनधर सीमारासस माहिम मनौरव पूर्णकरमेमे फस्पामसपर्माणम् सदुम पप- १९ सम्योगम् होर करनेगाले कस्पारसमी मासे, मार मनोका, ममता शाधत, असा तथा मनन्त, सुस्वधियम्मुखसम्पदा, प्रपन्न -देवें । मथवा पल्मारमयारिणा करमारसपी सौ, स्वपम्म रमणस्पर्धा स्वयम्भगमनामक सागरके सामी होह के कनन्तभिवस्वामी-इसमकारसे भी पार्ष सम्म है। किन्तु समर समाना पाहिये ॥ १६॥ ६ सयाम्पसे मभिध मामा दान दिया जाता है, एष भर , बिस्के लिये भन्न्तमुलभीका दाम योम्प का है पर गांव है । मथवा मफ्नी पादपी रसके शरा स्वयम्भक समुप्रने भी बीनने वारे मिनभर भीभनम्त शिस्वामी भाप मन्पोको मनन्तपुससम्मा देखें। यहाँ मसीमदपाठ तथा मनन्तजिसके लिये मन्मुस सम्पदाका गान ही मोम्मको यह समय उपयुक मत है।॥१३ कम्पनुमसषमागमिष्टमाशो परिणाम् । पसुधिर्मदेशार धर्मनापमपामरे ॥ १७ ॥ पवार्य-शरीरिनाम्बानियोकी इएमासो-अमिममिती P, स्थर्मा सम्मन कस्यसमग्रम, तथा, वर्धाधर्मदेष्टारमण १७ रवा हू ॥ १७ ॥ चतुर्धा - चारप्रकारके, धर्म, देष्टा • उपदेश करनेवाले, दान, शील, ही जिनेश्वर प्राणियों के सभी इष्ट - मुक्ति आदि देते हैं। इसलिये) तथा भाव - इन चार प्रकारके धर्मों के उपदेश करनेवाले जिनेश्वर श्रीधर्मनाथकी मै उपासना करता हू। (यहा- धर्मसे ही इष्ट मुक्ति आदिकी प्राप्ति होती है। इसलिये धर्मके उपदेश करनेवालेकी ही अमृत, सोदर - तुल्य, वाग् - वाणी, ज्योत्स्ना - चन्द्रिका, किरण, अमृततुल्य वाणी रूपीकिरणोंसे प्रकाशित किया है - पवित्र किया है पवित्रकरनेवाले, मृगलक्ष्मा-मृग-हरिण, लक्ष्म - लाछन, मृगलाछन- कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् प तथा भाव - इन चार प्रकारके धमों के उपदेश करनेवाले, धर्म- यिम्-जिनेश्वर श्रीधर्मनाथस्वामीकी, उपासहे=मै उपासना - भक्ति मावार्थ- (जैसे' कल्पवृक्ष सभी मनोरथ पूरा करता है. वैसे पाणियों के मनोरथ पूराकरनेमें कल्पवृक्षसमान तथा दान, शील, तप इष्ट - सिद्धिके लिये उपासना करनीचाहिये - यह भाव है) ॥ १७ ॥ सुधासोदरवाग्ज्योत्स्नानिर्मलीकृतदिड्मुखः । मृगलक्ष्मा तमाशान्त्यै शान्तिनाथजनोऽस्तु वः ॥१८॥ पदार्थ-सुधासोदरवाग्ज्योत्स्नानिर्मलीकृतदिङ्मुखः-सुधा- प्रकाश, निर्मलीकृत - प्रकाशित, पवित्रीकृत, दिक्-दिशा, मुख - अन्त, दिगन्त जिसने - अमृततुल्य वाणीरूपी किरणोंसे दिगन्तको प्रकाशित- - वाले - चन्द्र, शान्तिनाथजिन, शान्तिनाथजिना=जिनेश्वर श्रीशान्ति- नाथ, वा=आप भव्योंके, तमाशान्त्यै-तम - अज्ञान, अन्धकार, १८ माया-(मसे मृगनयनवाले पत्र मफ्नी भन्तुस्पतियों समर्षयानम् शान्ति-नाश, भवानरूपी मन्पफारक मासके लिये, बस्तुबों से दिगन्तपर्यन्त प्रकाश मकर अन्यकारका माशकर देता है। पैसे मृगमनमा जिनेवर भीशान्तिनाग मपनी अमृततुस्प पीने सभी मागियोंके लयको पत्रिकर अज्ञानका नामकर देते हैं। इसस्येि) ममूनुस्य वाणीन्यपी किरणोसे विगतके प्रकासित पान- मासे सभा मृगहांछनबाले जिनेवर मीचान्तिनाव माप मप्यों के मार सिपी भन्धकारका नाशकरें। (यह नेिघरकी मामी माननासा है पह पनि है) ॥ १८॥ भीडन्पुनाथो भगवान् सनायोऽतिशयदि मिः। मराभुरनूनापानामकनायोस्तु पाभिये ॥ १९ ॥ पाप-प्रविशर्दिमिा-मविशम मसिद्ध भतिस्प, सस १ कर्मक्षपा देक्त मानिहार्म) मादि समृद्धि पुरता मनिना, सहर भादि मतिप्पाकी समृदिसे, सनाया-पुत पिरामि) इमसिये मुरासुरनूनापानाम्-सुर अपुर, म मनुष्प मा मो माम मामी इदा पकनापा पक एकमात्र मर्मभेष्ठम्मामी मगवान्-प्रशममीप सा प्रचुर धर्म सान भारिसे युरू भीर पुनायाविनेभर भीन्पुनाथ, भाप मप्पांनी भिपे-सुम्बम्पदाले सिमे अस्तुते । सम्पदा ३३ ॥ १ ॥ माय सामी १९ मात्र है) ॥ १९ ॥ प्रकाशवान - ऐश्वर्यगाली है, तथा अपनी किरणोंसे सभी पदार्थोकी कीर्तिकला हिन्दीमापाऽनुवादसहितम् भावार्थ-सहन, कर्मक्षयजन्य, देवकृत तथा प्रातिहार्य - इन प्रसिद्ध तथा प्रचुर अतिशयोंसे विराजित, देव, असुर, मनुष्य नथा देवेन्द्र आदिकेभी एकमात्र स्वामी (देवाधिदेव ) भगवान् जिनेश्वर श्रीकुन्यु- नाथ आप भव्योंकी सुखसम्पदा वढ़ायें। (यहा - जो ऐश्वर्यशाली है, बही सभीका स्वामी होता है, तथा किसीको ऐश्वर्य देता है-यह अरनाथः स भगवांश्चतुर्थाऽरनभोरविः । चतुर्थपुरुषार्थश्रीविलास वितनोतु वः ॥ २० ॥ पदार्थ-चतुरनभोरविः चतुर्थ - चौथा, अर - द्वादशार- कालचक्रका दु पमयुपमानामका भाग, नभ-आकाशमंडल, रवि-सूर्य, चोथा अर रूपी गगनमंडलके सूर्य, भगवान् प्रचुर तथा प्रशंसनीय ऐश्वर्य, ज्ञान आदिसे युक्त, सः प्रसिद्ध, अरनाथ =जिनेश्वर श्रीअरनाथ, व =आप भाव्योंका, चतुर्थपुरुषार्थश्रीविलासम् चतुर्थ, पुरुषार्थ- मोक्ष, श्री-साधनसम्पदा, विलास - शोमा, चौथे पुरुषार्थ मोक्षके (ज्ञान, चारित्र आदि) साधनोंकी शोभा, वितनोतु करें - बढ़ायें ॥ २० ॥ भावार्थ-(जैसे सूर्य गगनमडलमे सब ग्रहों नक्षत्रोंसे अधिक 7 श्रीवृद्धि करता है। उस प्रकार ही चौथे दुषमसुषमा अरमें जिनेश्वर तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ तथा मोक्षमार्गके प्रदर्शक होनेसे उसकी श्रीवृद्धि करते हैं ! इसलिये --) चौथे अर रूपी गगनमडल के सूर्यरूपीमगवान् श्रीअरनाथ आप भव्योंकी (धर्म - अर्थ-काम मोक्ष - इन १८ मावार्थ-(जैसे मृगमनबाले पत्र मफ्नी अमृतसर सामन्तोनम् शान्ति-नाश, मज्ञानपी मन्धकारके नासक सिमे, वस्तु में ॥ १८॥ से विगतपर्यन्त म क का नाशकर देख वैसे मृगामेछनमा प्रिनश्वर मीशान्तिनाम अपनी मसूततस्म सभी प्राणियों के समको पत्रिकर मन्नानका माछकर दते हैं। सम्येि) ममृतस्य वापीसपी किरणोसे दिगन्त के प्रति करके गाले सवा मृगगनाले पिनेश्वर श्रीशान्तिनाम माप मयों के मन सिपी अन्मकारका नाशकरें। (महा जिनपरकी मामी महामन्यास है यह पनि है) ॥ १८ ॥ भीइन्पुनायो भगवान् पनापोऽविशाईमित । मुरासुरनूनामानामेकनायोश्तु पाभिमे ॥१९॥ पमा-प्रविशदिमिमविरुप प्रसिद्ध प्रतिस्प, साय १ कक्षपस देशात मातिहर्म) भनि समृद्धि पुरता भषिक्स, सवा बादि भनिभ्योकी समृपिसे सनापा-मुक विराकि इसलिये सुरासुरन्नापानाम्-मर, सर, म- मनुष्य तया उनके नाम स्वामी होक, एकनापा-एक एकमात्र सभेष्ठम्यामी मगवान्-असमीय सम पुर धर्म सात भारिसे युछ भीडन्युनापाविनेश्वर भीन्धमाष, पाम् भाप मम्पाकी, थिये मुलसम्पदा के लिये, मस्सन्हौ। सुखम्पा देव ॥ १० ॥ माम मामी त्तिा महान आत्मा हैं - यह ध्वनि है) ॥ २२ ॥ उठन्त = फैरती हुई, चारिप्लवा वारि - जल, प्लव-प्रवाह - धारा, J . २१ है समी प्राणी, महामोह-महान् अज्ञान, निद्रा - नींद, प्रत्यूष - उषाकाल- मात, समय, उपमा - तुल्य, संसारके सभी प्रणियोंकी महान् अज्ञान- जिनेश्वर श्रीमुनिसुव्रतनाथकी, देशनावचनम् = उपदेशवाणीकी, पात काल सभीकी नीद तोड़नेवाला है, वैसेही जिनेश्वर अपनी उपदेश आणियोंके द्वारा सभी प्राणियों के महान् अज्ञानका नाशकर देते हैं। सलिये~) ससारके सभी प्राणियों के महान् अज्ञानरूपी नीदके सोड़नेमें प्रातःकाल समान, श्रीमुनिसुव्रतनाथकी देशनावाणीकी स्तुति करते हैं। (यहा- ज्ञानप्रा वागी ही प्रशसनीय है, अत उसके कीर्तिकलाहिन्दीमाषाऽनुवादसहितम् तथा मुक्त है, वही स्तुतिपात्र है-ऐसा अभिप्राय है) २१॥ जगन्महामोहनिद्राप्रत्यूपसमयोपमम् । मुनिसुव्रतनाथस्य देशनावचनं स्तुमः ॥ २२ ॥ पदार्थ-जगन्महामोहनिद्राप्रत्यूपसमयोपमम् जगत् ससार, रूपी नोंदके तोड़नेमें उषाकाल के समान, मुनिसुव्रतनाथस्य- मावार्थ - (जैसे प्रातःकालमें सभीकी नींद टूट जाती है, या तुम =स्तुति करते हैं ॥ २२ ॥ लुठन्तो नमतां मूर्ध्नि निर्मलीकारकारणम् । वारिप्लया इव नमः पदार्थ-नमताम् = प्रणामकरनेवालोंके, मूर्ति - मस्तक पर, पान्तु पादनखांऽशवः ॥ २३ ।। % सरमखोरम् - पार पुरुषामि) भौये मौसहपी पुरुषार्यकी शानदारिन भावि सम- सम्पदा गायें। (महा उत्तमोत्तम यति ही उम्मोपम मशिन- देसक्या है यह तात्पर्य है)। २०॥ सुरासुरनराधीशमपुरनववारिवम् । कर्ममन्मूलने इस्तिमई मछिममिष्टुमः ॥ २१॥ पवार्म--सुरासुरनराधीशमयूरनववारियम् =धर, मुर नर, अमीश स्त्र मगर, नर नवीन-मम बम्से मरा हुआ मपार महीने बारिद सदन, देवेन्द्र मसुरेन्द्र नरेन्द्र मावि मागीलपी मपूरकेलिये हवेनवाने नवीन पावत अपी, या इन्मूलने फर्म शुभ मशुम पुष्प, पाप, पस, उमरून उसाद मा, नाशकरना दूरकरना कर्मरूपी एसके ऊमारने में हस्तिमाल -ऐरावत हाथी समान महिम्-जिनपर भीमनिमामकी अमिनुष- दम स्तुति करता है ।। २१॥ मावार्य (नबीन काले बादस्मे देसकर मसूर पैसे मांग उठना है, देवन्द्र भादिमी मनिसय मकि होने के कारण निमपर देखते ही भरपन्त सर्पित ऐ गाते हैं, क्योंकि वैसे ऐराम हामी मोंको तसा मला है, जैसे ही मिनभरनेमी कर्मसी का मग मूसमे नएफर दिया है वमा उपदेशके द्वारा दूसग के कर्मसभी नाशकरते है। इसलिमे-देवेन्द्र मादिसपी मरोहति मन पादपी तमा काम्पी साधे जया फॅनेगसे ऐसी शिधर श्रीमतिकी मे मन करता है। (मी यो समीम २१ ॥ २१॥ समी प्राणी, महामोह-महान् अज्ञान, निद्रा - नींद, प्रत्यूष - उषाकाल- प्रभात, समय, उपमा - तुल्य, संसारके सभी प्रणियोंकी महान् अज्ञान- रूपी नींदके तोड़ने में उषाकालके समान, मुनिसुव्रतनाथस्य- . जिनेश्वर श्रीमुनिसुव्रतनाथकी, देशनावचनम् = उपदेशवाणीकी, प्रात काल समीकी नींद तोड़नेवाला है, वैसेही जिनेश्वर अपनी उपदेश वाणियोंके द्वारा सभी प्राणियोंके महान् अज्ञानका नाशकर देते हैं। इसलिये-) ससारके सभी प्राणियोंके महान् अज्ञानरूपी नीदके कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् प्रिय है तथा मुक्त है, वही स्तुतिपात्र है-ऐसा अभिप्राय है) जगन्महामोहनिद्राप्रत्यूपसमयोपमम् । मुनिसुव्रतनाथस्य देशनावचनं स्तुमः ॥ २२ ॥ पदार्थ-जगन्महामोहनिद्राप्रत्युपसमयोपमम् जगत् संसार, मावार्थ - (जैसे प्रात कालमें सभीकी नींद टूट जाती है, या स्तुम =स्तुति करते हैं ।। २२ ।। तोड़नेमें प्रात.काल समान, श्रीमुनिसुव्रतनाथकी देशनावाणीकी स्तुति करते है। (यहा - ज्ञानप्रवाणी ही प्रशसनीय है, अत. उसके वक्ता महान आत्मा हैं - यह ध्वनि है) ॥ २२ ।। लुठन्तो नमतां मूर्ध्नि निर्मलीकारकारणम् । वारिप्लवा इव नमेः पान्तु पादनखांऽशवः ॥ २३ ॥ पदार्थ-नमताम् = प्रणामकरनेवालों के, मूर्वि - मस्तक पर, लुठन्त = फैलती हुई, वारिप्लवा. वारि - जल, प्लव-प्रवाह - धारा, २२ सरसोनम् पानीकी पारा, इव मैसे निर्मलीकारभारणम् = निर्मसीकार शुध करना, कारण साधन, शुदकरनेका सापनस्म शुबकरनेवाले, नमे -दिनेश्वर भीनमिनापकी, पादनखशिव =पाव पाप, मस, शु- किरण, पावके मसोसी किरणें, पासु-(माप मोंकी) रक्षाकरें । ॥ २५॥ माया (असे पानीकी धारा मसको बोकर मांबा भादि गोको पवित्र करती है, वैसे ही जिनपरके पांगके मकी किराये मनकपर पानेसे पणाम करनशको पवित्र करदेती है। इसम्मेि-) मतिश्चम भफिसे अत्यन्त झुककर प्रणाम करनेवागेके मस्तक पर फैम्ती हुई, एवं पानीकी पाराके समान पयि करनेवाली पिनेपर श्रीनमिनाबके पापोंके मलाकी फिरणे माप मम्माकी रमा करें। (यहाँ जो पवित्र करे, वास्तवमै नही रक्षक है सबा मिनपरके प्रमामसे भेक पवित्र होते है ऐसा भासम ) ॥ २ ॥ पदुसमन्दा कमकबहुताशनः । अरिएनेमिमगवान् भूयारोऽरिष्टनाशनः ॥ २४ ॥ पदार्प-पक्षसमतेन्दुमदु यदुममके रामा स मन्तान कुल समद न्दु पन्त्र महापी समुद्र के लिये पन्द्र सपी मयाहुवापन =कर्म पुष्पपाप, कम पन, हुतासन भमि कमापी नकस्मेि भमिरूपी मगवान्-भान मादि गुमासे सिभित भरिएनेमिानिनवर भीनेमिनाथ पाप मोंक, रिटनायना- भरिष्ठ उपमा, उपदप, मासन मारकरनेवाले समी कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् ૨૨ उपद्रवोंके नाशकरनेवाले, भूयात् होवें ऐसी मेरी प्रार्थना है ॥ २४ ॥ देता है यह प्रसिद्ध है। भावार्थ-(चन्द्र समुद्रको बढाता है तथा अग्नि वनको जला जिनेश्वरने भी यदुकुलमे जन्म लेकर उसको वढाया - प्रख्यात किया है, तथा ज्ञान एवं चारित्रके बलसे समी कमोंको जला दिया है - नागकर दिया है। इसलिये) यदुकुल रूपी समुद्र के लिये चन्द्ररूपी तथा कर्मवनके लिये अग्निरूपी जिनेश्वर श्री अरिष्टनेमिनाथ भगवान् आप भव्यों के उपद्रवोंका नाशकरें । (यहा-जो अरिष्टों-उपद्रवोंके लिये नेमि - चक्रधारारूपी हैं, तथा कर्म - सासारिक उपाधियोंसे रहित हैं, वे ही उपद्रवोंका नाशकर सकते हैं - यह अभिप्राय है) ॥ २४ ॥ कमठे धरणेन्द्रे च स्वोचितं कर्म कुर्वति । प्रभुस्तुल्यमनोवृत्तिः पार्श्वनाथः श्रियेऽस्तु वः ॥२५॥ पदार्थ-स्वोचितम् अपने अपने स्वभावके अनुरूप, कर्म- क्रिया, क्रमश उपसर्ग तथा उसका निवारणरूप क्रिया, कुर्वति करनेवाले - करतेहुए, कमठे-कमठनामके असुरके विषयों, च= और, धरणेन्द्रे धरणेन्द्रनामके नागराजके विषयमें, तुल्यमनोवृत्तिः =तुल्य - समान, मनोवृत्ति - भावना समानभावनावाले - पक्षपातरहित- समदर्शी - उदासीन - मध्यस्थ, पार्श्वनाथ:-जिनेश्वर श्रीपार्श्वनाथ, प्रभुः स्वामी, व आप भव्योंकी, श्रिये -सुखसम्पदा केलिये, अस्तु =हो, सुखसम्पदा वढायें ॥ २५ ॥ - २४ सरमखोपम् मा। मावा-(बब भीपार्श्वनाथ मनिमाबित थे, तो उनके पान मंगफेसिये पूर्वमन्मके बैरक फारम कमठनामके अमरने अनेक उपसर्ग कियेये, तया मिनेघरमक होने कारण नागराम परणेचने अपनी शकिसे उन उपसार निवारण किमावा। रिमी मगवान् दोनों के लिपपमें समयसी , किसी के उमा उनको राग का माँ इस बयाके मनुसन्पानसे विकरते कि) मानी मपनी प्रतिके अनुसार उपचव दया उसका निवारण करनेवासे कमठ नामके ममुर या भरणेन्द्रनामळे नागरामके विपममें समदी मीतराग मिनेघर भीपालनाथस्वामी भाप भन्योंकी मुससम्पदा बम में। (यहाँ प्रभु पीतराग हैं, सबा वीतराग ही उसके मूसरे मह भार है) ॥ २५॥ वापराभेपि बने रूपामन्परवारयो। ईपराप्पा मोमई श्रीपीरविननेतयोः ॥ २६ ॥ इति सिकाससक पहेमद्रमार्यविरक्तिं सामहस्ताने समाम् ॥ पार्यमाऽपरापे किया है मपराप निम्न ऐसे अपरापकर बाहेक उपर अपिम्मी पामन्मरणारयो कपा दस मन्थर-बिर पारा-सिक काले माम मांस वारे दमासे सिर मस्तिों के सारे बिनके दमापूर्णरविसे मवस्थ, ईपमापा यो-इ-कुछ, बाय-भार भाई मांगे मासे उमा आये मांसुओंसे मुझमांगे श्रीपीरजिननेतयोगविनेश्वर परम - सीतिरादिन्दीमातानुपादरास्तिम् तीर्थकर श्रीमहावीरस्वामीके दोनों नेत्रोंका, भद्रम् मगर हो । श्रीवीरजिनके नेत्र सकल मगलकी खान है ॥ १६ ॥ भावार्थ- (निनेश्वर श्रीमहावीरके ध्यानकी इन्द्रसे की गयी प्रशमाकी परीक्षा करनेकेलिये पृथिवीपर आकर मगमनामके सुरने उनका ध्यान तोडनेकेलिये अनमो भयकर उपसर्ग किये, किन्तु असफल होकर लौटनेकेसमय उस असुरके विषय में 'आततायी इस देवकी क्या गति होगी 2' इस आशकासे श्रीवीरजिनकी आखों में दयामे आसू उमड़ आये तथा उसको स्थिरदृष्टि - एकटकसे देखने लगे - उस कथाके अनुसन्धानसे स्तुति करते है कि-) अपराधकरने- वालेके ऊपरभी दयासे स्थिर तथा आसूसे भरे जिनेश्वर श्रीमहावीर स्वामीके नेत्रका मगल हो - वह सर्वमगलकारक है। (यहा - जो नेत्र अपगधीके ऊपर भी दयापूर्णहों, वैसे नेत्रवाले ही सकल मगलकारक है, तथा जिनेश्वर अपरावीके प्रतिभी दयालही होते हैं-यह आशय है) |॥ २६ ॥ इति सकलाऽर्हस्तोत्रे तपोगच्छाधिपतिशासनसम्राट्कदम्बगिरि- प्रमृत्यनेकतीर्थोद्धारकवालब्रह्मचार्याचार्थवर्यश्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वरपट्टा लकारसमयज्ञशान्मूर्त्याचार्यवर्यश्रीविजयविज्ञानसूरीपट्टधर - सिद्धान्त- महोदधि - प्राकृतविद्विशारदचार्यवर्य विजयश्रीकस्तुरमुरीश्वरशिष्य- पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिविरचित कीर्तिमलाख्यहिन्दी- भाषानुवाद समाप्त ॥ - ॥ श्रीवीरजिनस्तोत्रम् ॥ कझिालसमझमीहेमन्त्रापर्यने परिशिष्टपर्वनामके परिसमान्य का प्रारम्भ करतेहुए मंगलसिमे भीमहावीरस्वामीको प्रणाम करते है- भीमत पीरनाथाय सनायापासवधिया। महानन्दसरोराजमरालायार्णवे नमः ॥ १ ॥ पवार असमिया-मनुव बामकारक, मी-अतिसय सम्पदा, आकारक पतिसपसम्पदाओंसे सनापाप-पुक- विरानित, महानन्दसरोराजमरालाप-महानन्द महानन्दनी, सरस खानस सरोवर स्वारस्म मरम्ह सके राजा रस्त्येत महान् भानन्दतमी सरोवरके राबासमवस बसि परिन्त तीघर बिनेपर भीमवे श्रीमान् वीरनाथाय-महावीरस्वामीफा नमा-मेरा नमस्कार हो ॥१॥ मापर्य-(वैसे सरोबरम राबहस सकि सोमासम्पन्न सभा मष्टविहारफरनेराम सरोपरके ममम बाहि सम्पदामोश पोर उपमेग करनेवाम होता है सेही बिनपर भनेक मविसमांसे विराबिस एवं मुक्त ऐनेसे बनन्त साथस या भसी ऐसे महान् मानन्दा रमेर उपमोग करनेवाले है। इसथिय) असापारण तमा ममेलि होनेसे मामयकारक सम मावि मसिमोसे निरनित एवं महान् मनन्त, सात सय मोर भामन्द मोषपनरूपी २७ कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् सरोवरके रानहसस्वरूप चरम तीर्थकर श्रीमान् महावीरस्वामीको मेरा प्रणाम हो - मै प्रणाम करता हूं। (यहां जो अद्भुत अतिशयोंसे विराजित तथा मुक्त हैं, वही नमस्कारयोग्य तथा मगलकारक हैं- यह भाव है) ॥ १॥ - ध्यान करता सर्वेषां वेधसामाद्यमादिम परमेष्ठिनाम् । देवाधिदेवं सर्वज्ञ श्रीवीरं प्रणिदध्महे ॥ २ ॥ पदार्थ-सर्वेपाम् सभी, वेधसाम् ज्ञानियों के अथवा वासुदेव- अर्धचक्रियोंके, आद्यम् = मुख्य अथवा प्रथम, तथा, परमेष्ठिनाम्- प्रसिद्ध पच परमेष्ठियों के, आदिमम् = सर्वप्रथम - गणनीय - अग्रगण्य, देवाधिदेवम् देवाधिदेव - देवोंकेभी सेव्य, सर्वज्ञम् सर्वज्ञ - केवल- ज्ञानी, श्रीवीरम् चरम तीर्थंकर श्रीमहावीरस्वामीका, प्रणिदध्महे= हूँ॥ १॥ भावार्थ-जो सर्वज्ञ होने के कारण सभी ज्ञानियों के मुख्य हैं, अथवा समी अर्धचक्री वासुदेवों के प्रथम हैं, ( यहाँ - प्रथम चक्रवर्ती भरतके पुत्र मरीचिका जीव त्रिपृष्ठनामके प्रथम वासुदेव हुए थे, तथा वह त्रिपृष्ठवासुदेवका जीवहीं चरमतीर्थकर श्रीमहावीरस्वामी हुए-ऐसा आगममें वर्णित है,यह ध्यान देने योग्य है । ) तथा जो अतिशयों, निर्हेतुककृपा एव सभी प्राणियोंका उपकार आदिगुणों के कारण, अहत् - सिद्ध - आचार्य - उपाध्याय साधु - इन पच परमेष्ठियोंमें अर्हत् - शब्दसे सर्वप्रथम कहे जाते हैं तथा अग्रगण्य हैं, ऐसे देवाधिदेव- देवोंकेभी पूज्य सर्वज्ञ चरमतीर्थकर श्रीमहावीरस्वामीका मै ध्यान भीषरमिनम्वोत्रम करता है। (महाँ मानकी कामनावालेडेम्मेि तकगुपविशि तीनकर ही म्य- अभिप्राय है)॥२॥ कल्पापपादपाजामे अवगङ्गा हिमाफ्लम् । विश्वाऽम्मोजरवि देव बन्दे भीमावनन्दनम् ॥ ३॥ पदार्म कल्याणपादपाऽरामम् पाल्याण शुम, पादप-ना, भायम उपक्न, बगीचा कमाणही रखकेलिये उपरनामी, भूत महाहिमाघसम्मुस भागम, गक्ष गग्गन्धी मापस हिमालय पर्वव, आगमङ्कपी गंगानीकेलिमे हिमाम्पपर्वतरूपी, पिमाम्मोज- रविम्-तिम संसार संसारके सभी माली मम्मोस-कमक रपि-पर्म, संसारी मागीलपी गमगेकेम्मेि सूर्यनापी, देरम् - देवाधिदेव, भीमावनन्दनम्-श्रीशाप्त समाची शाला पाठक नन्दम- पुत्र वर्षक, (परमतीकर मीमहावीरस्सामी की कदे मै बन्दना करता ॥३॥ भावार्य---(जैसे उपक्नमें अच्छे का पोपण, समर्पन एवं रक्षम होवा, उसपफार ही करमापक पोपम समसमा रक्षण करनेवाले स्यामपद है। त्या, असे रिमामय पर गंगा मदीका उपमसान है वैसे ही भो मागमों के उनमसान-माया। हमा सूर्य से कमात्र प्रयोनि विमिन करता है वैसे ही यो भारी मागीको सदुपदेशक मारा मनोविन प्रते है--सुथा मान रते हैं। इसलिये ) कस्त्यापरपी को उपानसपी, भागमापी गानी हमाम्पापी तवा ममपानी पी करके सूर्यमा कीर्तिकलादिन्दीभापाऽनुवादसहितम् जातकुलोद्भव चरमतीर्थकर देवाधिदेव श्रीमहावीर स्वामीकी मै वन्दना करता हूँ। (यहा-शुभकारक, शास्त्रप्रवर्तक, ज्ञानप्रट तथा उच्चकुलोत्पन्न एव देवोंकेभी वन्दनीय ही वन्दनीय हो सकते हैं-यह भाव है) ॥३॥ पान्तु वः श्रीमहावीरस्वामिनो देशनागिरः । भन्यानामान्तरमलप्रक्षालनजलोपमाः ॥ ४ ॥ इति कलिकालसर्वजश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचित श्रीवीरजिनस्तोत्र समाप्तम् ॥ पदार्थ-भव्यानाम् भविष्यमें सिद्धि प्राप्तकरनेवाले - भव्य- प्राणियोंके, आन्तरमलप्रक्षालनजलोपमाः आन्तर 'अन्तरग, मल. दोष - राग, द्वेष, कषाय आदि, प्रक्षालन • धोना, शुद्ध करना, दूर करना, जल, उपमा - समान, अन्तरग-रागद्वेप कषाय आदि - दोषों के दूरकरनेमे निर्मलजलसमान, श्रीमहावीरस्वामिनः = चरमतीर्थंकर श्रीमहावीरस्वामीकी, देशनागिरः उपदेशवाणी - प्रवचन, व: आप- भव्योंकी, पान्तु रक्षाकरें, आत्मशुद्धिके द्वारा कल्याणप्रद हो ॥ ४ ॥ भावार्थ - (जैसे निर्मल जल - शरीर वस्त्र आदिके मैलको साफ करदेता है, वैसेही तीर्थकरकी वाणी सम्यग् ज्ञानका प्रतिपादन करनेके कारण आत्माके दोषों-रागद्वेष कपाय आदि-को दूर करनेवाली है। इसलिये ) भव्यप्राणियों के अन्तरग दोषोंके दूरकरने में निर्मल- जलसमान, चरमतीर्थकर श्रीमहावीरम्वामीकी देशनावाणी आपकी रक्षाकरें - अन्तरग दोषोंको दूरकर आत्माकी शुद्धि करें। (यहा- भीपीरजिनसोयम् अन्तरग दोपोंके दूर करनेवाले ही वासनिक रक्षक है-या आसन है)॥ १॥ इति भीनीरपिनस्तोत्रे वपोगधाधिपति-शासनसमाट-कामगिर प्रमत्पनेवीगेंदारफनाममपार्यापार्यभीम विवमवेमिसूरीश्वरपास- रम-समय-मान्मत्याचार्यवर्मभीविनयविज्ञानशरीपरापर-सिद्धान्त महोदपि प्राकसविविधारवाचार्यकर्षभीविश्यकस्तरमरीपरचिय-पन्या सधीकीविचन्द्रविजयगनिविरचित कीर्तिकलाममहिन्दीमापाऽनुवाद समास ॥ ।। श्रीरस्तु ॥ अमं मबह ॥
पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिविरचितकीर्तिकलाव्याख्यसहितानि पुस्तकानि- 구 १. द्वात्रिंशिकाद्वयी (अयोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकाऽन्ययोगव्यवच्छेद- द्वलिंगिका च ) कीर्तिकलाव्याख्याविभूपिता । २. द्वाविंगिकाद्वयी-कीर्तिकलाहिन्दीभाषानुवादसहित । ३. वीतरागस्तव :-कीर्तिकलाव्याख्याविभूषित. । ४. वीतरागस्तव :-कीर्तिकलाहिन्दीभाषानुवादसहित । स्तोतत्रयी (सकलाऽर्हत्स्तोत्र-वीरजिनस्तोत्र-महादेवस्तोत्राणि) कीर्तिकलाहिन्दीव्याख्यासहिता । ६. स्तोत्रलयी - कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहित । अध्यात्मसार:-कीर्तिकलाव्याख्यासहित (यन्त्रस्थ.)। ( सम्पूर्ण-भागों में)। प्राप्तिस्थान श्रीजनकलालकान्तिलाल। लिम्बडीशेरी, पेटलाद, वाया-आणन्द, (गुजरात)।
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॥ अहम् ॥ श्रीविजय-नेमि-विज्ञान-कस्तूर-सरिसद्गुरुभ्यो नमः । कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचितं ॥ श्रीमहादेवस्तोत्रम् ॥ पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्रविजयगणिविरचित- कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् । श्रेय प्राप्ति के लिये महादेवकी आराधना करनेकी शास्त्रोंमें आज्ञा है। महादेव ही शिव, महेश्वर आदि शब्दोंसे सम्बोधित किये जाते हैं। किन्तु उनके स्वरूपके विषयमें सम्प्रदायोंका भिन्न भिन्न मत है। इसलिये कलिकालसर्वज्ञ श्रीहेमचन्द्राचार्यजीने महादेवके पारमार्थिक स्वरूपके परिचयकेलिये श्रीमहादेवस्तोत्रकी रचना की है। जिसमें शिव, महेश्वर, महादेव आदि शब्दोकी : व्याख्याके द्वारा श्रीमहादेवस्तोत्रका प्रारम्भ करते हैं- प्रशान्त दर्शन यस्य सर्वभूताऽभयप्रदम् । मङ्गल्यं च प्रशस्तं च शिवस्तेन विभाव्यते ॥१॥ पदार्थ-यस्य-जिस देवका, दर्शनम् देखाव, देखना, प्रशा न्तम् शान्त, शमभावनाका उद्बोधक, आत्मामें रहे हुए उपशमभावका a २ मत मा देव मिश्र मापसोत्रम् त्यमा, मो तम या उगवना नहीं हो ऐसा, या, समता- ऽमयप्रदम् सभी प्राणियोक अभय देनेवासा, मो किसीके सिने भी मयकारक नहीं रो ऐसा, तमा, मस्पम् मासकारक एवं मगर- सरूम, एन, प्रश्नस्तम्-शुम, प्रशसनीय तपाइए है, वेनवनय मशान्त परि हानेके कारण, शिमागुम, शिम ऐसे, विमाम्पते- समसे माते है कहे जाते हैं॥१॥ मावा-मिस देवका देसाब शान्ठ है तथा भयकारक नही है, तब मंगलकारक एवं प्रशंसनीय है। मपवा जिस देखके देसमेसे शान्ति मिसती है या मम मही होठा, स्पा मास होता है, इसलिये विस देवका देसना गुम तमा इए है। व्या समझे बाते है। (निस देवका देसाप पखामारिक-मनेक मेन मुख भारिसे तलकोप भादिसे एवं सम भारिसे युक होमेक कारण उस एवं मपश्य तथा मम एवं मुण्टमाग माविसे एक होनेके कारण मर्मगड एवं निन्दनीय है। ममा म प फित भंग तपा समाविसे मुक होने के कारण मिस देब देसनेसे सोम, मम एवं मगर होते है, इसलिये किसका देखना मनिष्ट है। देव शिष नही कदे वा सफते । स्पोक शिवसम्वका भर्ष शुम तय शुभफारफ-पेसा ही होग है। इसलिये मन्यठीनिकोंके पिये शित भाताले कोपी दिगम्बर एवं समाविसरिस को , पा सम्बमानसे ही शिव, मासे महा-ऐसा ममिमाम है)॥१॥ प्रवास का दूसरा मामी हो सकता है। जैसे-पस्म- जिस देसे प्रतिपादित, पर्शनम् बर्मन भिवन्त, पक्षान्तम्-मान्त ३ कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् है, तथा, सर्वभूताऽभयप्रदम् सभी प्राणियों के अभय देनेवाला है । तथा, मङ्गल्यम् च, कल्याणकारक है, तथा, प्रशस्तम् च-प्रशसनीय तथा इष्ट है। तेन उक्त गुणों के कारण (वह देव) शिवः शिव- शुमप्रद, विभाव्यते-कहे तथा माने जाते हैं ॥ १ ॥ भावार्थ- जिस देवका सिद्धान्त मुक्तिका प्रतिपादन करनेके कारण शान्तिकी राह बताता है, इसलिये प्रशान्त है । तथा अहिंसा आदिके उपदेशके द्वारा सभी प्राणियों के अभय देनेवाला, शुभमार्गके उपदेश देनेके कारण कल्याणकारक है, इसलिये वह दर्शन प्रशंस- नीय तथा इष्ट है । वह देव शिव शब्दसे कहे जाते हैं, तथा शिव समझे जाते हैं। (अन्यतीर्थिकों के प्रसिद्ध शिवका दर्शन-सिद्धान्त हिंसा आदिसे होनेवाले यज्ञ आदिका प्रतिपादन करने के कारण अशान्त, भयप्रद एव अशुभानुवन्धी है, इसलिये अमगल तथा अत वह देव गळमात्रसे शिव हैं, अर्थसे नही- निन्दनीय है । ऐसा अभिप्राय है ॥ १॥ महत्त्वादीश्वरत्वाच्च यो महेश्वरतां गतः । रागद्वेषविनिर्मुक्त वन्देऽहं त महेश्वरम् ॥ २॥ पढार्थ--यजिस देवने, महत्त्वात् महिमासे, च-तथा, ईश्वरत्वात् ऐश्वर्यसे, महेश्वरताम् = महेश्वरपन-बड़प्पन, गतः प्राप्त किये हैं, रागद्वेपविनिर्मुक्तम् राग तथा द्वेपसे विनिर्मुक्त-रहित- चीतराग ऐसे, तम्-उस, महेश्वरम्=महेश्वर कहे जानेवाले देवकी, Y महायतोषम् माम्मे, पन्दे-वन्दना करता है मै उस मरेपर देवको प्रणाम करता ॥२॥ मामा-जिस देवने निरीक्षय तमा केस-पर्धन, शाम चारित्र पानि बसाधारण एवं मौकिक गुणहपी महिमासे तमा सहज भावि अतिशयरूपी ऐमर्यसे महेपरफ्न मार किये हैं-महेभर कई गमे। मे मीसराग ऐसे उस महेपर देनको प्रणाम करता है। (जिन परसीपिकों के महेश्वरकी महिमा अधिक एवं मसाभारण नहीं, किन्तु अगाका पाउन सहार मावि लौक्तिकही पदी गयी है, तमा सहम मावि पविश्य नहीं कहे गये है एव भी आदि परिमह सत्रुनिमह-मशानुमा माविके कारण मो वीतराग नहीं है। ये शम्दसे ही महेभर है, मसे नहीं। इसलिये पे मुमामोंके प्रणम्प नही - ऐसा अभिप्राय है ) ॥२॥ महामान मयस्स लोकालोकपासकम् । महादया-रम- म्यान महादेवा स उम्पते ॥३॥ फार्म-यम-निस देवका महामानम्-महान् भन्म मानों की भपेमसे उतम, रिगुखनित्य पर मनन्त, मान सिमान, लोलोफप्रकाशकम-सेफ संसार तथा संसारमें रहनेवासे मूत मरिप्य सपा ममान समी ब्रम्प सभा उसह पयाम, मोक-संसारसे पारमा माषपस उम दानाका मासा प्रण करमेशला मानने पसदे, भमा परस्प्रेमप यसक होने के कारम लिनका शान महाशान है तथा, महादपा दम-पानम्-महान् सशीरा मी कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् होनेसे अन्यकी अपेक्षासे उत्कृष्ट ऐसी दया तथा, महान् - असाधारण, दम इन्द्रियमनोनिग्रह, एव महान् - निर्विकल्पक होनेसे सर्वोत्तम, ध्यान - शुलध्यान है, सः वह देव, महादेव =महादेव, उच्यते-कहे जाते हैं ॥३॥ भावार्थ-~-जिस देवका लोक तथा अलोक दोनों के जानने चाला ऐसा महान् ज्ञान है, अर्थात् जो देव केवलज्ञानी है, अथवा जिस देवका महान् ज्ञान लोक तथा अलोक दोनोंका प्रकाशक । तथा जिस देवकी दया, दम तथा ध्यान महान् है, अर्थात् जिस देवकी दया सर्वजीवोंके प्रति है, दम कभी भग नहीं होनेके कारण अमाधारण है, एव ध्यान निर्विकल्पसमाविरूप शुक्लव्यान है, वह देव महादेव कहे जाते है । (अन्य तीर्थकों के महादेव शब्दसे ही महादेव हैं। क्योंकि वे केवलज्ञानी नहीं है, तथा सृष्टिका सहार करने के कारण उनकी दया महान् नहीं है, उनका दमभी उनके परिग्रही होने के कारण महान् नहीं है, तथा ध्यान भी रौद्र होनेके कारण महान् नहीं है - यह तात्पर्य है) ॥ ३ ॥ महान्तस्तस्करा ये तु तिष्ठन्तः स्वशरीरके । निर्जिता येन देवेन महादेवः स उच्यते ॥ ४ ॥ पदार्थ-स्वशरीरके अपने शरीरमें, तु-हीं, ये-जो, तिष्ठन्तः=रहे हुए, रहनेवाले, महान्ता=बहुत बड़े, तस्करा: चोर वह, येन=जिस, देवेन-देवसे, निर्जिताः जीते गये हैं, सः= वह देवहीं, महादेव महादेव, उच्यते-कहे जाते हैं ॥ ४ ॥ हैं, म्सरेमतोत्रम् मावाल--अपने शरीरमें हीमो पन, पशु बाहि पुरानेवाले पारोकी भपमासे परिक बलवान् तथा मौफिक पोर जिसको नहीं पुरा सकते ऐसे सम्पावन, शान मावि भास्माके सर्वस्वक पुराने- मासे इन्द्रियरूपी महान् चोर रहे हुए हैं उनको जिस अनन्तवान माहिसे युक्त देवने जीव लिए यह प्रितेन्द्रिय देवी महान् पोरोंके जीतनके कारण महादेव कहे प्यते है। (फिन्त परती- कक महादेव तो सी बाहि परिहवाले है, इसलिमे थे मपने भरीरमें रहे हुए उन महान् पोरोंके जीतनेवाले नही हैं। फिन्त उन पोरोंक ही मधीन है। मन घे ममात्रसे ही महादेव है- का भाव है)॥॥ गगोपी महामको दुमयी येन निर्मिती । महादेव तु मन्ये शेपा नामपारका ॥ ५ ॥ पवार्म-येन-विस देवने, रागद्वेपी-राग पहपी, दुर्जयो- दुर्मय पर कष्टसे मील्ने योम्य, महामलो-महान् म इमामों- को निर्मितीचीतलिमे है वम् उस देशको नौ महादेवम्- महादेव, मन्पे-मैं मानता है। क्षेपामाथिए उस देवके मविरिष्ठ दूसरे देव अन्यत्रीषिकों के महादेव, पैसो, नामधारका महादेव ऐसे मामपारण करनेपासे ही हैं। (किन्तु मा महान् देव होनेके घरण महादेव नहीं है)॥५॥ माथ-त्रिम देव (जिनेवर)न रागद्वेफरसी (मनादि काम्से सनेके कारण मत्पन्त पहबान् हानेसे) दुर्गम ऐसे महान् ही महादेव कहना योग्य है। त्याग कर दिया है, उन देव (वीतराग जिनेश्वर)को ही मैं महादेव मानता हू। अर्थात् दूसरे देवोंसे अजेयके जीतनेवालेको परिग्रह तथा शत्रु आदिके निग्रह आदिमें प्रवृत्त होनेसे रागद्वेष के जिनशासने-जिनेश्वरसे उपदिष्ट सिद्धान्तके अनुसार माने गये कीर्तिकलाहिन्दीभापाऽनुवादसहितम् मल्लोंको जीत लिये है, अर्थात् आत्मामें अनादिकालसे रहनेके कारण अत्यन्त दृढ़ होनेसे दुस्त्याज्य ऐसे रागद्वेषोंका जिस देवने अन्य तीर्थिकों के देवतो नामसे ही महादेव हैं। (अर्थ तथा गुणसे नहीं। क्योंकि वे स्त्री आदिका ही अधीन हैं, उसके जीतनेवाले नहीं। इसलिये वे वास्तविकरूपसे महादेव नहीं हैं - यह अभिप्राय है) ॥ ५ ॥ शब्दमात्रो महादेवो लौकिकानां मते मतः । शब्दतो गुणतश्चैवार्थतोऽपि जिनशासने ॥ ६ ॥ पदार्थ-लौकिकानां लौकिक विषयोंकी प्राप्तिसे ही कृतार्थ ऐसे साधारण जनों (अन्यतीर्थिकों के, मते मतमें, मत माने गये, महादेव महादेव, शब्दमात्र नाममात्र ही हैं। किन्तु, महादेव, शब्दतः नामसे, अर्थतोऽपि अर्थसे भी, गुणतश्चैव और २ गुणसे भी, (महादेव हैं ) ॥६॥ भावार्थ- सम्यक्तुरहित तथा वस्तु के अनेकान्तात्मक स्वरूप के नहीं जाननेवाले लौकिक पदार्थ स्त्री, पुत्र तथा धन आदिको ही सर्वस्व माननेवाले मुक्तिमार्गसे वचित ऐसे लौकिक - अन्यतीर्थिकों के मतमें माने गये महादेव नाम मात्रसे महादेव हैं (गुण तथा अर्थसे ८ मसरेपोत्रम् नहीं। क्योंकि वे मितेन्द्रिय पीवराग मावि गुमोसे मुकना है।) बिनशासनमें माने गये जिनेवरस्पी महादेव मे शम महादेव ऐसे नामसे, पर्व महान् - कवम्यान भादि होनेके कारण भन्मदेनोंसे श्रेष्ठ देव ऐसे बर्षसे दबा ऊपर वर्णित गुपोंसे मी महादेव हैं ॥६॥ शक्तितो व्यक्तित्व विमानाष्ठषणाचया । मोहमाल इस येन महादेवः स उच्यते ॥ ७॥ पवार्य-पेन-बिस देवने, मोहमालम् =मोह ममताके साल समाको सभी प्रकारकी ममतामोको नासकर दिया हे त्याग कर दिया है साह देव, शक्तिया शक्तिसे ग्पक्तित्व-ता अकिस्ससे विज्ञाना= विशिष्टझाम केवम्मानसे सपा-भौर, सक्षणाव समापसे महादेवा-महादेव, उम्पसे-कहे जाते हैं। अपर जिस देखने सकिसाम्भपने श्यपिक मनन्त मास्मीसे मा केवलज्ञान प्रभारसे ग्पकिवा एक एक करके, मोहोका नासकिया है क सक्षणात म्मोहनाप्लप मक्षगसे, महादेव करे आते ॥७॥ भाषर्म-रस (जिनेभर) देवने सभी प्रकारकी ममता भाका म्याग कर दिया ही मरक्य नाश करनेवाले सफल कर्मके अपसे भानित भनन्त मारमपी तमा सय भादि मसितपाले मसापारव तथा मस्पैकिक म्पन्ति पर्व कापान भौर कहे गये सा मागे रहे मामेवाने स्वम इन सभी पुपों के होनेसे महादेव ९ नहीं हैं - यह आगय है) ॥ ७ ॥ ऐसे वह (जिनेश्वर) देवहीं महादेव कहे जाते है । (अन्यतीर्थिकों के शक्तिआदि गुण नहीं होनेके कारण गुणसे या अर्थसे महादेव अहकारसे, विवर्जित रहित, निरभिमानी महालोमविनिर्मुक्त != हे महान् गुणोंसे समन्वित - विभूपित', महादेव ! हे महादेव ।, जिनेश्वर, ते आपको, नमा=(मेरा) नमस्कार, अस्तु हो ॥ ८॥ कीर्तिकला हिन्दीमाषाऽनुवादसदितम् कहे जाते है। अथवा जिस देवने अपने क्षायिक अनन्त आत्मवीर्य और केवलज्ञान के प्रभाव से एक एक करके मोहोका नाश कर दिये हैं, के महादेव, स्त्रीपुत्र आदिमे ममत्व होनेके कारण तथा उक्त प्रकार- नमोऽस्तु ते महादेव ! महामदविवर्जित ! । महालोमविनिर्मुक्त ! महागुणसमन्वित ! ॥ ८॥ महामदविवर्जित ! हे महान् मद -उद्दण्डता- महान् लोभसे, विनिर्मुक्त रहित, निर्लोभी, महागुणसमन्वित ! भावार्थ - ज्ञान आदिका उत्कर्ष रहने पर भी उसके मदसे रहित होनेके कारण तथा किसीमी प्रकारके मद नहीं रहनेके कारण महान् निरभिमानी, किसीभी प्रकारके परिग्रह नहीं रहनेसे तथा समी प्रकारके लोभसे रहित होने के कारण महान् निर्लोभी, असा- धारण एव अलौकिक निरभिमानता, निर्लोभता, सभी प्राणियोका उपकार तथा केवल ज्ञान आदि महान् गुणों से विभूषित ऐसे हे महादेव। जिनेश्वर! आपको मेरा नमस्कार - प्रणाम है। (अन्य तीर्थिकोंके महादेव तो वल आदिके अभिमान तथा श्मशानवास, पदार्थ हे . % 3D
मसरेमतोत्रम्
मृत्य मावि मतजनों के योम्म मि.मामासे मुक्त होनेके कारण मत्पत
मत पूमानवेप माविका कोम होने के कारण मान् लामी, मत एप
उपम गुणोसे रहित होनेके कारण महादेव नहीं है, इसलिये
पन्दनीय भी नही है ऐसा मभिप्राय है)॥८॥
महारागो महादेपो महामोहस्तयैव च ।
फसायम इतो येन महादेवः स उच्यते ॥९॥
पदार्थ-येन-मिस देवने, महारागा-महान जिसका स्पम
मासम्म है ऐसा, अत्युत्कट, राग विषयासक्ति तव प-मौर
महापा-महान्-मत्सन्कट तूप भनिष्ट पिपोम मप्रीति, एवं,
महामोह-महान् मोह ममल पसभा, कपाया कमाय कोष,
माम, माया, सोम स सभीका इनाम किये है, स्पाय किये
६ सा-ऐसे बह (जिमश्वर ) देव ही, महादेवा महादेव, उच्यते
को वाते है॥९॥
भावार्थ-(म पारण पर भलौकिक मतिश्प सकि, शान
माविसे एफ) किस देक्ने (भनादि काम्से राहनके कारण) महान्-
अत्यन्त र एवं मुर्मय ऐसे राग, द्वेष, व्या महान्-विवेकच्चे मा
फरनेवास मोह एवं मान् कोष मान मामा समा होमरूप कराया
इन सभीक त्याग कर दिये। परेप ही महादेव कोमाते
ह। (इन सभी गुणांसे युक्त जिनपर ही इसलिये वही महादेव
है अन्म तीकिक इष्ट महारबके यह सब गुण माही हे मना वे
नाम्मारी मादेव दी १-मह मासप)॥९॥
११
जाते है ॥ १० ॥
भयोंसे रहित - अत्यन्त निर्भय हैं ।
कीर्तिकलाहिन्दीमाषाऽनुवादसहितम्
महाकामो जितो येन महाभयविवर्जितः ।
महावतोपदेशी च महादेवः स उच्यते ॥ १० ॥
पदार्थ-येन-जिस देवने, महाकामा महान् अत्यन्त
उत्कट काम - कामना • वासना - कामिनी जिज्ञासा आदिका, हता
नाश - त्याग किया है, तथा जो, महाभयविवर्जित: महान् भयसे
विवर्जित-रहित हैं, च तथा, महावतोपदेशी-महान् व्रतोंके उपदेश
करनेवाले हैं, सा-वह देव ही, महादेव महादेव, उच्यते-कहे
भावार्थ - जिस देवने अत्यन्त उत्कट ऐसी मोग तथा उप-
मोगकी इच्छारूपी महाकामका (चारित्रके पालन आदिसे ) त्याग -
दमन किया है, अर्थात् जो सर्वथा निष्काम हैं, तथा जो (सकल
काँका क्षय करनेसे) जन्म जरा मरण आदिरूप भवके महान्
एव सत्य, अहिंसा, अस्तेय
ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह रूपी पाच महान् व्रतोंके उपदेश करनेवाले
हैं, वह देव ही महादेव कहे जाते हैं। (जिनेश्वरमें यह सभी
गुण है, इसलिये वही महादेव है । अन्य तीथिकोंके महादेव तो
स्त्री आदि परिग्रहोंसे युक्त होनेके कारण कामी, शत्रु आदिसे
भयभीत एव हिंसासे होनेवाले निकृष्ट यज्ञ आदिके उपदेशक होनेसे
शब्दसे ही महादेव हैं गुणोंसे नहीं-यह तात्पर्य है ) ॥ १ ॥
महाक्रोधो महामानो महामाया महामदः।
महालोभो हतो येन महादेवः स उच्यते ॥ ११ ॥
१२ महादेवसोषम् पाप-येन मिस देखने महाकोषा-महान् मन स्म कोप, महामानामहान् अत्पपिक मान ममिमान मईयर महामाया-महान् मपार माया-शमा, महामद-महान् मन्त्र पिक मद पल दिया ऐधर्म भादिके भमिमानसे हुई उदास सया, महालोम-महान् अत्यन्त स्पेम, इन समी दोपोकर, हव- नास किये है-स्याग कर दिये है, स-पद देग, महादाम महादेव, उम्पत-बहे गाते हैं ॥११॥ भावार्थ - मिस देवेने (मान तमा पारिबके पसी) नस्पति उत्कर, हिंसादिमें पापि करान 41 सापी एवं मषिक परिमाणमें जानके कारण महान् कोष गुरु माविकी मला करानेगले तथा मत्सरिक होने के कारण मान-निपार पत माविका मभिमान अपार माया, मस्निय माहिक प्ररक तमामरम बस भारिफ मस्मिानमे बनेगरी महान् उद्भवता एवं दुम्स्याम्म मम इन सभी दास-कापा मार-पग किया है। मपात हा देव फाप विनिमय माग पद मात। (वीतराग जानी वं मपमी दोन कारण जिनेवर उस सी काप मारि कपामा सपा मासे रवि उमरिय वीमादेव है। मनीषिकि माादेव पुराण मारिमें मोदी मानी भार समे गणित, इमरिये यह मानदेय मी. 'मा अभिम) १५॥ मानन्ददय पाप महायानी महापा। महायोगी महामोनी मारेषा म उम्पत ॥ १२ ॥ होनेमे महान् ।
पर्याय विपक्क्होनेसे सर्वश्रेष्ठ जानी-जानवाले, केवलज्ञानी महातपाः% कीर्तिकलादिन्दीभाषाऽनुवादसदिनम् पदार्थ-यस्य जिस देवके, महानन्ददये-आनन्द तथा दया महान् सर्वोत्कृष्ट हैं। तथा जो देव, महाज्ञानी-महान् सर्वव्य- महान् दूसरोंसे अत्यधिक तपम्बी, महायोगी-महान्-असाधारण योगी, महामौनी महान् - विशुद्ध मौनी - मौनव्रतपालक तथा मुनिके महान् - उत्कृष्टलक्षणोंसे युक्त है। सा=बही, महादेव महादेव, उच्यते-कहे जाते है ॥ १२ ॥ भावार्थ-जिस देवका आनन्द महान्-शाश्वत, अखण्ड, अनन्त एव निरूपाधिक तथा निर्विकल्प होने के कारण सर्वोत्तम है, तथा जिस देवकी दया महान्-सब जीवोंके प्रति समान रूपसे होनेके कारण अन्यदेवों की अपेक्षासे अत्यधिक है । तथा जो देव अनन्त तथा सर्वपदार्थविषयक होनेसे महान् ज्ञानवाले-केवलज्ञानी, दुष्कर, विशुद्ध एवं अत्यधिक अनशन आदि तप करनेके कारण महान् तपस्वी, सहन आदि अतिशयोंका कारणभूत होनेसे असाधारण एव अलौकिक योगसे युक्त तथा मुनियोंके सर्वोत्तमभावों एव क्रियाओंसे वह देवहीं महादेव कहे जाते हैं। (परतीथिक देव उक्त सभी गुणोंसे रिक्त होनेके कारण वास्तविक रूपसे महादेव नहीं कहे जा सकते-ऐसा भाव है) ।। १२ ।। महावीर्य महाधैर्य महाशील महागुणः । महामञ्जुक्षमा यस्य महादेवः स उच्यते ॥ १३ ॥ पदार्थ-यस्य जिस देवके, महावीर्यम्=वीर्य-आत्मबल महान्- सर्वाधिक हैं, महाधैर्यम् धैर्य-सन्तोष महान् - सर्वोत्कृष्ट हैं, महाशीलम् युक्त हैं।
मसरेक्योमम् -धीन-पारिन महान्-मसापारण एवं सर्वोपम है, महागुन सम्मदर्शन, मन आदिगुण महान् मसापारण पर्व मौकिक है सपा महामम्पमा बिनकी क्षमा अपराधी सानठीसता मान् मञ्चसनीम सर्वारिक अत एव मजु-मनोहर है, साद देव, महादेवा =महादेव उच्पते को बाते हैं ॥ १३ ॥ मानार्थ-जिस देके माममा एवं उत्साह शामिक होने के कारण मनन्त है, सन्तोप कमी अस्प नहीं होनेके कारण सिर एवं सर्वाधिक पारित्र भसाधारण भकिक एवं सोकर। सम्पम्पर्शनमादि गुण अप्रतिपाती एवं मनन्त ,धमा पसिनीम से असाभारणा देवहीं महादेव को जाते हैं। (मस्तीकि देवों के ये गुण नहीं है। क्योंकि ये राग्छेप वादिसे ममित है। इसपिये वे महादेव नहीं करवा सकते । किन्तु रिनेपर ही उक गुणोंसे धोमित होनेके कारण महादेव है-यह अमिपाम है)॥ १३ ॥ सायम्भूव यतो मान सोकाठोकप्रश्नसकम् । मनन्तवीर्यपारित भयम्भ। सोऽमिपीयते ॥१४॥ पवार्म-यमा भिम देषके, सोकासोसम्मममम् लोक तथा ममक वोनोफा माधक-बाननेवाग, मानम्वेवस्थान, पम्म तम्-म-गुरुके उपदेसके बिना ही माने भाप मूत-मगट हुन्ध है, सब मिस दमक, बनन्तबीयचारितम्-नारित ताबीर्य मनन्त है, अश्या स्वपम्मत सपमिमी देव आविध कृपा भाविक बिना ही कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् अपने आप भूत प्राप्त हैं, सः वह देवही, स्वयम्भूः स्वयम्भू , उच्यते-कहे जाते हैं ॥ १४ ॥ भवार्थ-जिस देवके लोकालोकके परिच्छेद करनेवाला-तीनों कालमें सर्वद्रव्यपर्यायका ग्रहण करनेवाला-केवल ज्ञान गुरु आदिके उपदेशके विना ही जन्मसे ही ज्ञानत्रय युक्त होनेके कारण चारित्र. पालनसे कर्मों के नाश हो जानेसे अपने आप प्रगट हो गया है । तथा जिस देवके चारित्र एव आत्मबल क्षायिक होनेसे अनन्त हैं, अथवा जिस देवके लोकालोकप्रकाशकज्ञान तथा अनन्तवीर्य एव चारित्र स्वयभूत-कर्मों के सर्वथा क्षय हो जानेसे (बादलोंके हट जानेसे सूर्यके जैसे ) अपने आप प्रगट हो गये हैं, वह देवहीं स्वयम्भू कहे जाते हैं । (ऐसे स्वयभूत-ज्ञान, वीर्य तथा चारित्रवाले जिनेश्वर ही हैं, दूसरे देव नहीं। इसलिये जिनेश्वर ही एकमात्र परमार्थ रूपसे स्वयमू हैं, दूसरे तो नामधारी ही है-यह भाव है) ॥ १४ ॥ शिवो यमाज्जिनः प्रोक्तः शङ्करश्च प्रकीर्तितः । कायोत्सर्गी च पर्यवी स्त्रीशस्त्रादिविवर्जितः ॥ १५ ॥ भावार्थ---यस्मात् चूकि, जिन-जिनेश्वरदेव - ऋषभनाथ आदि तीर्थक्कर, कायोत्सर्गी कायोत्सर्ग मुद्राके धारण करनेवाले, च-तथा, पर्यवी-पर्यङ्कासनके धारण करनेवाले, एव, स्त्रीशस्त्रादि- विवर्जिता स्त्री, शस्त्र आदिसे रहित हैं-स्त्री शस्त्र आदिका त्याग कर दिये हैं, इसलिये वे, शिवः शिव, प्रोक्ता कहे गये हैं, च- पाले एवं निर्विकश्य, निमाम्प सभा निरूपाक्षिक समापिरिम मसदेपस्तोत्रम् स्या परा-मार, प्रकीवि-कहे गये है-शिप समाधार सम्बोसे उनका वर्णन किमा चाता है।॥ १५ ॥ मावा-यूकि प्रिनेपर मषम्नाय भावि तीर ही भी भी जीपको विरापना नहीं ह ऐसे कार्योस्सर्गाके पारण करने पर्यशम्नसे रहनेवाले वना मी शस मादि परिमहसे रहित है। मर्थात् पारिश्का यावत् पालन हो इसरिये मिन्होंने उचित मा एवं भासनका स्वीकार किया हे समा मी शम भादि समी परिमो- का त्याग कर दिया है । इसलिय प पिनेश्वरदय ही शिष कस्पाय मम एवं कस्माणमय होनेके कारण शिव तथा भार सम्बोसे करे गमे ६ वर्णित है। (दूसरे देव तो भी सम बावि परिमा रोनसे यसमादिसु तिवसे एवं बीब विराधनाके विवेकके बिना ही स्वेच्छ, निन्दनीम मुदा एवं भासनके पारप करनवासे, माम मासन एवं वासे रमित होनेके कारण शिपस्काप परे कस्माष कारक नहीं है किन्तु शमादि पारण करनेसे भमरर एवं मनिा करनेवाले दी है। सम्मेि पर माममानसे बि मा पर है, गुम तबा मर्मसे नहीं पा मभिप्राय )॥५॥ साकारोऽपि मनाकारो मर्यो मर्चस्ववैव प । परमास्मा च मामारमा सोऽन्तरस्मा वैव च ॥१६॥ पदा-हि-कि, सा=जिनेवरदेव साभरासरीरी है, इसलिये, माकप, स्पर्क पनि गुणवम स्शुष है। और १७ वाह्यात्मा औदारिकादि शरीररहित तथा सिद्धि रहित केवल कर्म होनेसे कथंचित् मूर्त - व्यक्त है । तथा सिद्ध अवस्थामें शरीररहित एवं देही अवस्थामें अन्तरात्मा भी हैं । कीर्तिफलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् तथैव उसी प्रकार अनाकार:-(सिद्ध अवस्थामें) आकार-शरीर रहित हैं इसलिये, अमूर्त रूप स्पर्श आदि गुणरहित - अव्यक्त है । च-पुनः, तथैव उस प्रकार हीं, परमात्मा-सिद्धस्वरूप, च-तथा, शरीरसे युक्त, तथा, अन्तरात्मा देहो है ॥ १६ ॥ भावार्थ-श्रीजिनेश्वर देव सिद्धिलाभसे पूर्व शरीरी होनेके कारण आत्माके स्वभावतः अमूर्त होने परभी उसके प्रदेशों के कर्मयुक्त होनेसे अमूर्त - पौद्गलिक उपाधिरूप गुणसे रहित-अव्यक्त हैं । तथा तीर्थकर एव सिद्ध अवस्थामें परमात्मा, विग्रहगति कालमें वाह्यात्मा । (इसलिये अन्यतीर्थिक सगुण आदि रूप परमार्थसे जिनेश्वरमें ही घटित होते अन्य देवके विषयमें तो शब्दमात्र ही हैं - यह भाव है) देवके वर्णित ॥ १६ ॥ दर्शनज्ञानयोगेन परमात्माऽयमव्ययः । परा क्षान्तिरहिंसा च परमात्मा स उच्यते ॥ १७ ॥ पदार्थ-अयम् यह जिनेश्वर देव, अव्ययः अविनाशी मुक्त होनेके कारण जन्म मरणादिरूप अपाय रहित, तथा, दर्शन- ज्ञानयोगेन-दर्शन - सम्यग्दर्शन तथा केवलदर्शन एवं ज्ञान सम्यग्ज्ञान तथा केवलज्ञानके योग - सम्बन्धसे, परमात्मा परम : सर्वोत्कृष्ट आत्मा है । तथा सांसारिक अवस्थामें भी, क्षान्तिः क्षमा, b ८ म्सदेपस्वोत्रम् प-सभा, अहिंसा, परा-कभी मन नहीं होनेवासी, भमलिक मसापारण, सवारिक, सर्वोत्तर है, इसम्मेि, सना आत्मा हैं, परमारमा परम मस्ट गुणवान् आत्मा परमात्मा, उम्पते-सी भाती है।॥ १७॥ मावार्य - विनवरदेव तीमार अम्माम सकल मिशन हो बानेसे नित्य अनन्म वर्मन ज्ञान होनेके कारण ममय मुफ अम अरा मरण भावि अपापांसे रहित मरिनाक्षी निर्गुन परमात्मा है। सभा सांसारिक अक्सा मा दवा मस्सिा भाति गुणा के सर्वोकृष्ट सर्वाधिक सपा सजीवरिपरक होमेके फास्म कर सगुण परमारमा है । (क्योंकि परमगुणोंके होनेसे ही मानाचे परमात्मा कहा जाता है। मन्य देव मान, वर्शन एवं क्षमा महिंसा भादि गुणोंसे रहित होने के कारण नाम मात्रसे ही सगुण निर्गुप परमारमा रे-ऐसा तात्पर्य है) ॥१७॥ परमात्मा सिदिप्राप्तो पापात्मा तु ममान्तर । मन्तगस्मा भवेदे इस्पेप लिपिमः शिवा ॥१८॥ पवाब-सिदिप्राप्तौ = सिद्धि मिस माने पर पर्यात् मुक मपम्बामे परमास्मा-परम-सर्वोक्स मारमा परमात्मा तु-तथा भवान्तरे-यो मों के मध्यकी भासामें मास् किरगतिकामें, पापात्मा-बाप मौवारिक भादि पार सरीरसे बहिर्मस मामा तथा देहे-देहस होनेपर अर्वात देही मक्लामें अन्तरात्मा- मानर देरक मध्यसती मामा मचेस है, इतिदम मार एप विविधः तीन प्रकारके है ।। १८ ।। प्रशान्तदर्शन आदि गुणोंसे विराजित - प्रस्तुत, शिव शिव - जिनेश्वर, अन्तरात्मा, वाह्यात्मा तथा परमात्मा-इन त्रिविध रूपोसे युक्त है। जैसे-सिद्धि प्राप्त होनेपर, अर्थात् मुक्त अवस्थामें अनन्त-दर्शन, जान, चारित्र तथा वीर्य आदि सिद्ध होनेसे वह परमात्मा कहे जाते छोड़कर जिनेश्वरकी आत्मा परभव ग्रहण करने के लिये विग्रहगतिमे रहती है, तब वह वाह्यात्मा है। क्योकि उस अवस्थामें वर आत्मा कार्मण शरीरके सिवाय अन्य सभी शरीरोंसे बाहर रहता जन्म ग्रहणके बाद शरीरस्थ रहने के कारण अन्तर - शरीरमें रहन- वाली आत्मा- अन्तरात्मा है । इस प्रकार जिनेश्वर त्रिविध आत्मस्वरूप कीर्तिकलाहिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् भावार्थ-- प्रशान्त दर्शन आदि गुणोंसे युक्त शिव जिनेश्वरही है। क्योंकि सिद्ध आत्मासे अधिक उत्कृष्ट गुण अन्य आत्मा नहीं होते। इसलिये वह परम-सर्व श्रेष्ठ आत्मा है। तथा सिद्धि- की प्राप्तिसे पूर्व जब भवावस्थाम जन्म ग्रहण केलिये पूर्व भव है। इसलिये वाह्या - वाहर रहनेवाली आत्मा - वाह्यात्मा हैं । एव है। (अन्य तीथिको के शिवम इस प्रकारसे तीनों अथ घटित नहीं होनेके कारण वह नामधारी ही है--ऐसा भाव है) ॥ १८ ॥ सकलो दोपसम्पूर्णो निष्कलो दोपवर्जितः ।। पञ्चदेव विनिर्मुक्तः सम्प्राप्तः परमं पदम् ।। १९ ।। पढाथ-दोपसम्पूर्णः ढोप - कर्म जन्म, राग द्वेप आदिने सम्लः = कला - भवावस्थामें होनेवाले मम्पूर्ण • सहित होनेपर ।
१८ म्हरेषस्तोत्रम् तथा, अहिंसा, परा-कभी मन नही होनेवासी, भौतिक भसापारम, सर्वाधिक, सर्वोत्कृष्ट है इसम्मेि, सपा मारमा परमारमा परम परम गुणवान् आत्मा परमात्मा, उन्पत-श्री आती है।॥ १७॥ भावार्थ - यह दिनेश्वरदेव तीर्थदर असा सकस मकस हो बानेसे निस्य अनन्त दर्तन सान होने के कारण मन्मय मुरु, जन्म बरा मरण मावि अपायोसे रहित मरिनाशी निर्गुण परमात्मा है। तमा सांसारिक भवसामें क्षमा तपा मरिसा आदि गुणाके सोकर सर्वाधिक सपा सर्वग्रीवविषयक होने के कारण र सगुरु परमारमा है । (क्योंकि परमगुणोक होनेसे ही मात्माको परमारमा कहा जाता है। मन्म दर ज्ञान, दर्शन एवं क्षमा मासा भानि गुणोस रहिव होनेक कारण नाम मात्रसे ही सगुण नर्गम परमारमा --एसा तात्पर्य है) ॥१७॥ परमात्मा सिविप्राप्तौ पापात्मा तु मवान्तर । अन्तगरमा ममेरो इस्पेप विविधा क्षिपः ॥ १८ ॥ पसाब-मिदिमाता - मिति निस जाने पर, भीत् मुक्त अगम्मा परमारमा परम-सर्वोकर मारमा परमात्मा, तु-बा, भगन्सर-दा मार मध्यी मासा मवात् दिगमिकासमें, पापारमा पाम भावारिप मादि पार भरीरसे पम्ति भारमा, ना होम होनेपर ममात देही मासा, मन्तरारमा मा दाके मध्यपी मामा मरेवर पति-दस मम्मर एप विविध. तीन प्रकारके हैं ॥ १८ ॥ भावार्थ- प्रशान्तदर्शन आदि गुणोंसे विराजित - प्रस्तुत शिव शिव - जिनेश्वर, अन्तरात्मा वाह्यात्मा तथा परमात्मा-उन त्रिविध रूपास युक्त जैसे-सिद्धि प्राप्त होनेपर. अर्थात् मुक्त अवस्थामे अनन्त-दर्शन, जान, चारित्र तथा वीर्य आदि सिद्ध होनेसे वह परमात्मा कहे जाने की प्राप्तिसे पूर्व जब भवावस्थाम जन्म ग्रहण केलिये पूर्व भव छोडकर जिनेश्वरकी आत्मा परमव ग्रहण करने के लिये विग्रहगतिमें आत्मा कर्मिण शरीरके सिवाय अन्य सभी गरीरोंसे बाहर रहना वाली आत्मा - अन्तरात्मा है । इस प्रकार जिनेश्वर त्रिविध आत्मस्वरूप कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् [-प्रशान्त दर्शन मादि गुणोंसे युक्त शिव जिनेश्वरहीं हैं। है। क्योंकि सिद्ध आमासे अधिक उत्कृष्ट गुण अन्न आत्मारे नहीं होते। इसलिये वह परम-सर्व श्रेष्ठ आत्मा है। तथा सिद्धि- रहती है, तब वह वाह्यात्मा है। क्योंकि उस अवस्थामें वर है। इसलिये वाह्या - वाहर रहनेवाली आत्मा - वाह्यात्मा हैं । एव चन्म ग्रहणके वाद गरीरस्थ रहने के कारण अन्तर - शरीरमें रहने- है। (अन्य तीर्थकोंके शिवम इस प्रकारसे तीनो अथ घरिन नहीं होनेके कारण वह नामधारी ही है-ऐसा भाव है) ॥ १८ ॥ मकलो दोपसम्पूणों निष्कलो दोपवर्जितः ।। पञ्चदेहविनिर्मुक्तः सम्प्राप्तः परमं पदम् ।। १९ ॥ पदार्थ --दोपसम्पूर्णः=ढोप - म. जन्म, राग द्वेष आदिने सम्पूर्ण - महित होनेपर साल = क्ला - भवास्थामें होनेवाले २ मातस्तोत्रम् वापोसे सदिस साल सगुण है। दोपभर्जितानोप उक्त माघरो रागभावि दोपसे पति रति होनेपर मुफ अवस्थाम, पचदेहरि निर्सका पम पांच, देह शरीरोसे विनिर्मक रहित, तवा- परमम् सर्वोच, सर्वोत्तष्ठ - सिद्धिशिपाप, परम्पर स्थानाने, सम्प्राप्त आतकरने पर, निष्फल-उछ मारकी कमसे रहित निर्गुण हैं ।। १९ ॥ मावाम-बिनेश्वर देव, सांसारिक अवस्थामै संसारमें होने पाले फर्ममनित अन्म, बरा मरण, राग, ट्रेप मावि दोपा से ममा कमस्म दोपसे युक रहते हैं। इससिमे उस भवस्थामें वे सकत- कला सत्तरनस् सपा स्मस् इनतीनों गुणोसे युक होनेसे सगुण मा पारित्र पाम्न माविक ममापसे उक दोपोसे रवि होनेपर उन दोपोंके कारण होनेवाले मौवारिक, क्रिम, माहारका तेजस प्रथा कर्मप न पाच शरीरोंसे मुक्त होकर सिदशिम सस परम पयको मात करते हैं, उस भवसा निष्फस-कमसे रमिक निर्गुण है। (दूसरे देव तो परिमह आविके कारण दोप सपूर्म हो है। इसलिये यह मामपारी निकर या निर्गुण है स्तरिक रूपसे तो सदा सका पा स्गुण हो-या माय है) ॥१९॥ एकमर्पिलयो मागा प्रभविष्णमोसः । त एकच पुनस्का शानचारिशदर्शनाव ॥२०॥ पदा-मिनेभर) एकमर्पिमपि-सरूप - सरीर-म्पकि- से एक मौर, ममविष्णुमरेपरा:म्मा, विष्णु का महेन
नायगा-यह जानना चाहिये। ॥ २० ॥
कीर्तिकलाहिन्दीमाषाऽनुवादसहितम्
२१
इन नामोंके, त्रय =तीन, भागा =भाग - अश-पर्याय हैं । च-तथा,
ते वे तीनों माग, एव = ही, ज्ञानचारित्रदर्शनात् = ज्ञान, चारित्र
तथा दर्शन शब्दोंसे क्रमश , पुन:फिरसे - शब्दान्तरसे, उक्ता =
, कहे गये हैं ॥ २०॥
भावार्थ-जिनेश्वर रूपी एक मूर्ति हैं, तथा उसके ब्रह्मा,
विष्णु तथा महेश्वर - इन नामोंके तीन पर्याय है । वह तीनों
पर्याय ही ज्ञान, चारित्र तथा दर्शन शब्दो से कहे जाते है । अर्थात्
ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर एव ज्ञान, चारित्र तथा दर्शन ये शब्द
क्रमश पर्याय शब्द हैं । इस प्रकार अन्यदर्शनमें बताये गये (एक
मूर्ति तीन भाग) जिनेश्वर हीं है। दूसरे देवके विषयमें 'एक मूर्ति
तीन भाग' यह उक्ति असगत है, जिसका प्रतिपादन आगे किया
एकमूर्त्तित्रयो भागा ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ।
परस्पर विभिन्नानामेकमूर्तिः कथ भवेत् १ ॥ २१ ॥
पदार्थ—एकमूर्तिः एक मूर्ति, और, ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः=
ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर - ये, त्रय =तीन भागा =भाग - अंश हैं।
किन्तु, परस्परम् परस्पर, एक दूसरेसे, विभिन्नानाम् विभिन्न -
पृथक् खरूप - शरीरवालोंकी, एकमूर्ति एक शरीर,
कथम् कैसे,
भवेत् १ = हो सकती है? अर्थात् परस्पर भिन्न शरीरवालोंकी तीन
मूर्तिया होंगी, एक नहीं ॥ २१ ॥
महारेस्तोत्रम् । - मावार्म-भन्यतीपिकांका भमिपाम है अपस्म पर व्यकिके ही प्रमा विष्णु सथा महेपर ये तीनों मठ हैं। यह प्रम उठता है कि प्रमा विष्णु सपा महेश्वर तीनों परस्पर एक दूसरेसे भिन स्पस्पपासे है। तो इन तीनोंकी एक मूर्णिया एक मूर्तिके ये तीनों माग कैसे हो सकते है। (एक मर्णिके तीन भक्या हो सकते हैं किन्तु प्रमक रही दुई तीन मतियां एक मर्सि था एक मूर्षिके मागसप तीन मूर्तिमा नही हो सकती । जो जिसका माग होता है यह एकय नहीं रहनेसे मपूर्ण होता है। या तो मा सम्पूर्ण हैं सपा प्रमा, विष्णु एवं महेभरमी एम एफ सम्पूर्ण ही है। इसलिमे एकका दूसरा माग है ऐसा काना भयुक है. सा तारपर्य)॥ २१॥ कार्य विष्णु क्रिया प्रमा कारण तु मोघः । कार्यकारणसम्पभा एफमतिः कर्ष मवेद ? ॥ २२ ॥ पर्म-विष्णु विष्णु नानक देव सायम्=कार्य-फल-पुत्र है प्रमाप्रपा नामके देव रियारियासप वार ? समा, महेपर-महेश्वरनामके देव फारमम्-कारण-निमित है । इस प्रकार, कार्यकारणमम्पमा कार्यकारण भावको माप्त हुई तीन महिमा, एममूर्चिएकमूर्ति कपम्=कैमे भवेत् यो सफती हैं, माद नहीं हो सकती ॥ २२ ॥ मार्ग-पौराणिका करना है कि-महेपरी प्रेरणासे प्रमाके मीरसे रिप्णु मारए । । एसी म्पनिम मोधर निमिप २३ - प्रकारसे एक मूर्तिके तीन भाग हैं-~-ऐसा अभिप्राय है) ॥ २२ ॥ नामकी, स्मृता कही गयी है। -एकमूर्ति, कथम्-कैसे, भवेत् हो सकती है। अर्थात् नहीं हो कीर्तिम्ला हिन्दीभाषाऽनुवादसहितम् हुए, ब्रह्मा द्वार हुए, तथा विष्णु कार्य हुए । (जैसे दण्ड निमित्त है, चक्रका घूमना द्वार है, घट कार्य है । यहाँ ब्रह्मा वीचमें रहनेसे चक्रके घूमनेके जैसे द्वार माने गये है-यह व्यान देने योग्य है।) हम प्रकार ये तीनों कार्यकारणभावको प्राप्त हैं। तो एक मूर्ति कैसे हा सकते हैं ? । (एक ही व्यक्तिमे कार्यकारणभाव नहीं होता, किन्तु भिन्न व्यक्तियोंमे होता है, जैसे दण्ड तथा घटमे । दण्ड तथा घट एक मूर्ति हे-ऐसा तो बालकमी नहीं कह सकता। इसलिये तीनोंकी एकमूर्ति नहीं हो सकती। किन्तु जिनेश्वरके ही उक्त प्रजापतिसुतो ब्रह्मा माता पद्मावती स्मृता । अभिजिजन्मनक्षत्रमेकमूर्तिः कथं भवेत् ॥ २३ ॥ पदार्थ-ब्रह्मा ब्रह्मानामके देव, प्रजापतिसुत =प्रजापति द्विजके पुत्र हैं। तथा, माता ब्रह्माकी माता, पद्मावती पद्मावती समयका नक्षत्र, अभिजित् अभिजित् नामका है । तो, एकमूर्ति , सकती ॥ २३ ॥ भावार्थ- (एक मूर्तिके ही भिन्न भिन्न अवस्थाओं के सूचक ये नाम हैं-ऐसा नहीं कहा जा सकता ! क्योकि इन तीनोंके माता पिता आदि भिन्न भिन्ननामके है । जैसे-) ब्रह्मा नामके देव प्रजापति नामक द्विजके पुत्र हैं उनकी माताका नाम पद्मावती है। तथा २४ मासदेपसारम् बन्मनक्षत्र ममिमित है। ऐसी सितिमें एकति से हो साने है।। (एक म्यति ही मिल मिल माता पिता का सन्म नक्षत्र नहीं होते। इसलिये ममा विष्णु एवं महेश्वर एक मक्षिके तीन मात्र मही हैं-ऐसा अमिपाम है। पुरनमें प्रभापति के पुत्रको प्रभाव स्वतR कहा गया है। उसके अनुसार महा माता पिता माविका व्स है। ऐसे तो प्रमा विष्णुळे नामिकमासे उसन तथा सरिक कर्ण माने माने-मम्मान देने योग्य है)।॥ २३ ॥ पसुदेवसतो विष्णुमावा च देवकी स्मवा । रोहिणी अन्मनधसमेकमूति य मवेद ! ।। २१ ।। पदार्य-विष्मा-विष्णु मामक देव-सम्प, महदेवसुतः समयमनामक राजाके पुर। प-वा, मावा-हणकी मात्रा देवकी-देवकी मामी स्मृता-करी गमी है। जन्मनषसम्म कष्मके सन्म प्रमान मात्र, रोहिणीरारिणी नामका है। तो एकमूर्षिय कबम-कैसे ममेद हो सकती है रजा भाषा-विष्णु बमदेव राबाके पुत्र है, उनकी माताका नाम देवकी, मोर सनका बन्मनक्षत्र रोहिमी है। ऐसी सिनिमें पनि तीन माग कैसे हो सकते हैं ।। (पकम्पतिके मोक माता पिता मां हो सकते। इससिमे एफ मर्पि सीन भाग करना मसात है । पुरापोमें प्यारे विष्णु मातार हा गया है। तदनुसार यहाँ उपर्युक बा भी गया है मगनना चाहिये) ।।२।
२५
जन्मनक्षत्र मूल है। ऐसी स्थितिमें एकमूर्ति तीन भाग कैसे हो
कीर्तिकलाहिन्दीमाषाऽनुवादसहितम्
पेढालस्य मुतो रुद्रो माता च सत्यकी स्मृता ।
मूल च जन्मनक्षत्रमेकमूर्तिः कथ भवेत् ? ॥ २५ ॥
पदार्थ-रुद्र. रुद्र - महेश्वर, पेढालस्य-पेढालनामकद्विजके,
सुतः पुत्र हैं। च=तथा, माता-रुद्रकी माता, सत्यकी=सत्यकी
नामकी, स्मृता-कही गयी है। च=तथा, जन्मनक्षत्रम्-रुद्रके
जन्मका नक्षत्र, मूलम् मूलनामका है। तो, एकमूर्ति एकमूर्ति,
कथम् कैसे, भवेत् हो सकती है । ॥ २५ ॥
मावार्थ-रुद्र, जो पुराणों में महेश्वरके अवतार कहे गये हैं,
वह पेढाल द्विजके पुत्र है, उनकी माताका नाम सत्यकी है, तथा
सकते हैं ? (जो तीन भाग कहे गये हैं, उनके प्रत्येकके माता
पिता तथा जन्मनक्षत्र भिन्न भिन्न हैं। किन्तु एकमूर्त्तिके माता आदि
एक ही होते हैं। इसलिये ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर एकमूर्तिके
तीन भाग नहीं है—यह आशय है) ॥ २५ ॥
रक्तवर्णो भवेद्ब्रह्मा श्वेतवों महेशरः ।
कृष्णवणों भवेद्विष्णुरेकमूर्तिः कथं भवेत् ? ॥ २६ ॥
पदार्थ-ब्रह्मा-ब्रह्मानामके देव, रक्तवर्ण =लाल कान्तिवाले,
मवेत् है। महेश्वर =महेश्वरनामके देव, श्वेतवर्ण =शुक्ल कान्ति-
वाले है। तथा, विष्णु =विष्णुनामके देव, कृष्णवर्ण =कृष्णकान्ति-
वाले, भवेत् है । तो, एकमूर्ति =एकमूर्ति, कथम्=कैमे, भवेत्=
हो सकते हैं ॥ २६ ॥
महादेपोत्रम् भापाप-पुराणों में तीनों देवोंकी घरीरफान्ति मिस मिल वर्मकी कही गयी हैं। जैसे प्रमा मल कान्तिमा, महेभर भूत कान्नि पाले समा विष्णु कृष्ण कान्प्रियासे कई गमे है। किन्तु एक मूर्णिी एक प्रकारफी ही कन्नि होती है, मनक मकारकी मही। इसलिये मिल भिन्न पर्णके दानके फारम तीनां रेप मिल ही है, एक मूर्गिक तीन भाग नहीं । इससिप उन सीना देवाको एक म िसीन भाग कहना अपुक है ऐसा भन्प्रिाय है ॥२६॥ अक्षम्वी भवेष्मना द्वितीयः शूलधारकः । दसीय सहयफाइ एकति कम ममेव ! ॥२७॥ पार्ष-प्रमा-ममा नामके देर, अक्षयली = मसूत्रके मानवाले मवेदन द्वितीय-इसरे, भात् महेन्चर नामके देव, शुलधारक = धूछ त्रिशूल पारफ-पारप करनपाले भात् विशूस- गठनबारे समा, तृतीया-तीसरे विष्णुनामके देव, न पक्राह शम्ब तपा पर गर-साम्म्नषाले कदे गये हैं। वो, एकत्ति =एममूर्ति स्यम्-कैसे, मवेत ? हो सकते हैं! माता-पुराणाम मयेक देवहन मिम मिन्न प्रकार के को गमे हैं। जैसे प्रसका मन मशास्त्र महेन्दरका मन मिशन समा विष्णुका माउन सिपक रे गये है। यहाँ या मानमें रममा पाहिये कि एक देवक भनेक मक्स्पर होने परमी मेछन पुसरा
२७
नहा हो सकते, किन्तु भिन्न मूर्ति ही है। ऐसी स्थितिम एक मूर्ति
तीन माग कहना अत्यन्त अयुक्त है ॥ २७ ॥
है, अथ-सथा, महेश्वर -महेश्वर नामके देव, त्रिनेल. तीन नेत्र
नेत्रवाले नहीं।) तथा महेश्वर त्रिनेत्र कहे गये हैं, (किन्तु चतुर्मुख
नहा ।) विष्णु चतुर्भुज कहे गये है, (किन्तु चतुर्मुख या त्रिनेत्र
कीर्तिकलादिन्दीमापाऽनुवादसहितम्
नहीं होता। इसलिये लाछन भिन्न होनेसे उक्त नीनो देव एकमूर्ति
चतुर्मुखो भवेद्रमा विनेलोऽथ महेश्वरः ।
चतुर्भुजो भवेद्विष्णु रेकमूत्तिः कथं भवेत् ? ॥ २८ ॥
पदार्थ-ब्रह्मा=ब्रह्मानाम के देव, चतुर्मुखः चारमुखवाले, भवेत्
वाले हे, विष्णुः=विष्णु नामके देव, चतुर्भुज =चार भुज-वाहुवाले,
। तो, एकमूर्ति =एक मूर्ति, कथम्=कैसे, भवेत् हो
भावार्थ-पुराणोंमे ब्रह्मा चतुर्मुख कहे गये हैं, (किन्तु तीन
नहीं ।) तो एक मूर्ति तीन भाग कैसे हो सकते है । यदि मूर्ति
एक माना जाय तो विष्णुकोभी त्रिनेत्र तथा चतुर्मुख, एव महेश्वरकोभी
चतुर्मुख तथा चतुर्भुज तथा ब्रह्माकोभी त्रिनेत्र तथा चतुर्भुज कहा
जाता। किन्तु ऐसा नहीं हैं, चतुर्मुजसे विष्णु तथा त्रिनेत्रसे केवल
महेश्वर तथा चतुर्मुखसे केवल ब्रह्मा ही समझे जाते है। इसलिये
एक मूर्ति तीन भाग नहीं, किन्तु तीनों पृथक् पृथक् मूर्ति ही हैं
भवेत् है । तो, एकमूर्ति
सकते हैं । ॥ २८ ॥
॥ २८॥
। महारपस्तोत्रम् । म्यवहार नहीं है । इसझिये तीनोंदेव एकमपि सीनमाग नहीं है- मह माव ) ॥ २१॥ फते जातो मवेशमा समायां च महसर' ! विष्णुप द्वापरे जात एफमूर्ति कर्षमषेद ! ॥ ३२ ॥ पदाथ-~-मामा-प्रमानामक वेब, सतयुग-समयुग्म, खाद्या उत्पन्न मवेद हुए थे, पतमा महनारामहेश्मनामके देव वायाम् त्रेतायुगमें (उपन्न हुप मे ।) और विष्णुा- विष्णुनामके देग, वापरे द्वापरनामक युगमें, आमः-उत्पन्न हुए थे। तो एकमूचिः = एकमूर्ति, फयम् = कैमे, मवेत् ? = हो सकते हैं।॥ ३२ ॥ मापार्य-पुराणोंमें सत्म्युग के द्वापर तथा कलियुग ये पारयुग कहे गये है। सपा सम्पुगमे प्रमाका श्रेठपुगमै मा श्वरका, द्वापरयुग विष्णुका मातार मर्पित है। ता पकर्ति कैसे हो सकते हैं। (यदि एफपि हा तो प्रत्येक देषका प्रत् मक्तार का वर्णन मयुक्त हो मायगा । एकठि मानने पर एक देवका भवतार दूसरे देवकामी मार कदर रामगा। किन्तु ऐसा म्पहार मही है। एक देवरा व्यसार पूसरे देसका महा पदा माता। इसस्मि तीनों देव एकमर्ति नही है-ऐसा माशय है) प्रान मिष्णुः सदा मोई प्रमा धारिसमुम्पते । सम्पासंतु ३३ ॥
कीर्तिकलाहिन्दीभापाऽनुवादमहितम् ३१ पदार्थ-ज्ञानम- केवलजान, सदासर्वदा, विष्णुः विष्णु, प्रोक्तम्=कहा गया है, चारित्रम् चारित्र - सर्व सवाद्यविरति - सयम, ब्रमा ब्रह्मा, उच्यते कहा जाता है, तु-तथा, सम्यक्त्वम्- सम्यक्त्व - सम्यग्दर्शन - जिनोक्ततत्त्वों में श्रद्धा, शिव =शिव - महेश्वर, प्रोक्तम्=कहा गया है। इसलिये, अर्हन्मृत्ति =तीर्थङ्करकी मूर्ति- तीर्थकर, त्रयात्मिका तीनों - ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरखरूप है ॥ ३३ ॥ भावार्थ -(उपर्युक्त विवेचनसे यह सिद्ध हो चुका है कि परतीथिकोके महादेवके विषयमें 'एकमूर्ति तीन भाग' वाली वात घटित नहीं होती। तथा पूर्वमें यह भी कहा जा चुका है कि अर्हत् ही ज्ञान, चारित्र तथा दर्शनके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर खरूप हैं। उसका स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं कि -) केवल- ज्ञान सदा ही विष्णु कहा गया है। (पुराणोमें पालक तथा व्यापक देवको विष्णु कहा गया है। केवलज्ञान कर्मशत्रुका नागकरके उससे रक्षण करता है, तथा सर्वद्रव्यपर्यायविषयक होनेसे व्यापक- भी है, इसलिये पारमार्थिक रूपसे केवलजान ही विष्णु है - यह भाव है।) चारित्र सदा ब्रह्मा कहा जाता है। (पुराणों में जगत् के सर्जन करनेवालेको ब्रह्मा कहा गया है । चारित्रभी सिद्धिरूपी सृष्टिका करनेवाला - सिद्धिप्रद है, इसलिये वास्तविक रूपसे चारित्रहीं ब्रह्मा है-यह अभिप्राय है ।) तथा सम्यक्त्वको शिव कहा गया है। (पुराणोंमें नगतके सहार करनेवालेको शिव-महेश्वर कहा गया है। सम्यक्त्वमी कर्मों के क्षयोपशमका हेतु होनेसे गिव कहा
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महारेषखोरम्
बावा है । स्मोकि बस्सतःकर्मके माशसे ही बगत्-मकका नाम
होता है। इसलिये सम्यक्त्त तात्विक रूपसे शिव है या
भाशय है ।) न तीनों गुणों से युक मईस तीमार हैं। इसम्मेि
वेही एकमर्षि तीन अमा, विष्णु सथा महेश्वरनप माग है
मर्थात् तीवार एकमर्पि है, एवं उनके केवल दर्शन झान का
पारिवरूपी तीन पर्याय ही प्रमा विष्णु ज्या मरेपरम्प भाग -
ऐसा तालय है ॥ २३ ॥
पितिश्लपवनहुवाशनपनमानाकासोमवसियाः ।
इस्पतेश्टी मगरति गीता पीतरागे सुगुमाः ॥ ३४ ॥
पदार्थ क्षितिजलपमनासाशनयमानाकाशसोमसूर्या-
स्पा:-विति पृषिमी मस, पवन, हुवान-ममि, यमान प्रती,
माकास स्प्रेम पत्र मा सूर्य भास्मा नामबासे इति एवेन्ये
सभी बटौ-माठ, सुगुमा =उज्मगुण मगवति मायान् वीत
रागेनीवरगम पीता वर्णित है ॥३१॥
मामा--(पुराणों में परवीकि महादेवकी पृश्निी मावि भाठ
मर्षिया कही गयी है। किन्तु एकमर्षि मणमपि नही हो सकते -
परमात पूर्वमें एकमर्तिके सीनमति नहीं होनेमें की गयी युपियाँसे
हस्सा है। किन्छ गीतरागके मिति, म, पान, हवामान,
स्थान, भाकप, सोम तथा पूर्व ये गाठ उमगुम कहे गये हैं।
(एसस्मेि मीठरम ही नामुमपन होनेके कारण भाति है र
मस)॥१॥
कीर्तिकलाहिन्दीभापाऽनुवादसहितम् क्षितिरित्युच्यते क्षान्तिर्जलं या च प्रसन्नता । निःसङ्गता भवेद्वायु हुताशो योग उच्यते ।। ३५ ।। पदार्थ-शान्ति. क्षमा, क्षितिः क्षिति, इति इस शब्दसे, उच्यतेकही जाती है। च-और, या जो, प्रसन्नता-निर्मलता- रूप गुण है, वह, जलम् जल (कहा जाता है ।) निःसङ्गता- वीतरागपन, वायुः पवन नामका गुण, भवेत् है । तथा, योग = शुक्लध्यान, समाधि, हुताश = अग्मिनामका गुण, उच्यते = कहा जाता है ॥ ३५ ॥ भावार्थ--(वीतरागके क्षिति आदि आठ गुणोका स्वरूप वताते हैं, जैसे-) क्षिति - पृथिवी सर्वसहा कही जाती है। वह शुभ या अशुभ - सब कुछ सहन करती है। इसलिये शक्ति रहने परभी किसी के अपराधका सहनरूप क्षमा ही क्षितिनामका गुण कहा गया है। जल निर्मल होता है तथा दूसरेको मी निर्मल करता है, इसलिये कर्मके सर्वथा क्षय होजानेसे आत्माकी निर्मलताही जलनामका गुण है। किसी भी विषयमें रागका नहीं होना - वीतरागता ही पवन नामका गुण है । क्योकि पवन मिट्टी या पानीके जैसे किसीभी वस्तुमें आसक्त नहीं होता। तथा अग्नि समी पदार्थोको जला देता है, योगभी सकल कमोंका नाश करता है। इसलिये योग अग्नि- नामका गुण कहा गया है ॥ ३५ ॥ यजमानो भवेदात्मा तपोदानदयादिभिः अलेपकत्वादाकाशसङ्काश. सोऽभिधीयते ॥ ३६॥ - मादेस्तोत्रम् फार्म-आस्मा = जीप, वीर्यहरकी बास्मा, पोपान दयादिमिमप दान स्मा दया माहिगुमोसे, पबमानः पवमान पती, भवेद-होती है। क्या, स.मा मात्मा, बलेपकत्वाद कहीभी सित भासा नहीं होनेसे, ममना कर्ममलसे सिम नहीं होने के कारण माकासाम आफास्सन्स, अमिपीयवे-श्री माती है ॥ ३६॥ माता 1-मामा तप, दान, दया बादि गुणों के होनेसे मनमानरूप है। मर्वाद प दान दमा मावि ही यवमान नामके गुण हैं। सपा उनगुर्पोक होनेसे मारमा ही यजमान है। मोकि मोके पाम्न करनेवालेको ही पवमान कहा जाता है। स्म पर मात्मा फसे रहित होनेसे निर्सग होमाटी है। मर्यात् एकसार सकसकर्मोक सम होगाने पर पुन उसमें कर्मठेप नहीं माता । इसलिये निर्मम मामा मानवस्य पडी बाटी है। भवार मास्माकी निमता पाकाश मामका गुण ॥ ६ ॥ सौम्पमूर्तिराषिपन्द्रो पीतरागा समीक्ष्यते । झानप्रवासमस्पेन स आदिस्योऽमिषीयते ॥२७॥ पाप-पीतरागा = पीतराग भीनिनेपर, सौम्पम्पि रुपिा-मौम्प मधुर मूपि शरीर, रुषि अनि, मधुर - सरीर कान्टिवाते है इसम्मेि, पन्द्र पदमाके पैसे, समीक्ष्यते-दीसते F। था, सम्मा कीतराग मिनेश्वर, मानप्रासलेनमान शानके द्वारा प्रमाणपत मशरन मसरिवारनेर समापसे ..
कीर्तिकलाहिन्दीमापाऽनुवादसरितम्
होनेके कारण, आदित्यः सूर्यसमान, अभिधीयते-कहे जाते हैं
॥३७॥
भावार्थ-वीतराग श्रीजिनेश्वरके शरीरकी कान्ति मधुर है,
इसलिये वह चन्द्रके जैसे दीखते हैं। अर्थात् उनके शरीरकी मधुर
आहादक कान्ति चन्द्रनामका गुण है । (क्योंकि चन्द्रभी आहादक
है।) तथा वे ज्ञानके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करते है।
अथात् सभी प्राणियको सम्यग्ज्ञानका उपदेश देकर उनके अज्ञानरूपी
अन्धकारका नाश करते हैं, तथा मुक्तिमार्गका प्रकाशन करते है।
अथवा वीतरागका ज्ञान सर्वपदार्थको ग्रहण - प्रकाशित करता है,
इसलिये वे ज्ञानके द्वारा सम्पूर्ण जगत्में प्रकाशमान है, अत: वे
सूर्यसमान कहे जाते हैं। (क्योंकि सूर्यभी अपने किरणों के द्वारा
सम्पूर्ण जगतको प्रकाशित करता है। इसलिये वीतराग जिनेश्वरका
ज्ञानके द्वारा सम्पूर्ण जगत्का प्रकाशन सूर्यनामका गुण है - यह भाव
है। यहाँ इस प्रकार क्षिति आदि आठ गुणों के होनेसे वीतराग
जिनेश्वर अष्टमूर्ति हैं। किन्तु परतीर्थिकोंके अनुसार एकमूर्तिका
अष्टमूर्ति होना असम्भवित है । इसलिये परतीथिकोंके इष्ट महादेव
अष्टमूर्ति नहीं हैं। तथा उनमें रागद्वेष आदि होनेसे क्षमा आदि
उक्त कारके आठ गुणमी नहीं हैं। अत इस प्रकारसे भी वे अष्ट-
मूर्ति नहीं होसकते। किन्तु शब्दमात्रसे ही अष्टमूर्ति हैं - यह
निष्कर्ष है) ॥ ३७॥
पुण्यपापविनिर्मुक्तो रागद्वेषविवर्जितः ।
अहंस्तस्य नमस्कारः कर्त्तव्यः शिवमिच्छता ॥ ३८ ॥
मनासखोलम् पदार्थ-बहन = पीवीतराग भरिन्स तीर, रागर विमर्मित =राम-विषयाससि, देप भनिष्ट विषयोमें प्रीति, विस- रहित, रम्गद्वेफ्से रहित हैं-वीतरा है। इसम्मेि, पुम्पपापविनिर्मक -पुष्प-शुमर्म, पाप गुमफर्म, विनिर्मक्त रहित, पुष्प तया पापसे रहित मुक हैं। पत, शिवम् = कस्यामकी, एन्छता - सा करनेवालेको-कस्माण पानेवालेको सस्प-ठस वीतराग मरि- हन्तका ही, नमस्कार नमस्कार प्रणाम-मदन-मकि, कम्य:- करना चाहिये । फस्पाम पाहनेवाले पीतरागकी ही मक्कि करें ॥२८॥ मावा पीकर रागदेवसे रहित वीतराग वा सम्पमा अन ए पारित्रक पाम्नसे उनके समी फोका बम हो गया है। मुक्त है। क्योंकि रमापसे सय पुष्प पापसे मुसी मुक को गाते है। इसरिये कास्माण बाहने पालेको उनकी ही मकि करनी चाहिये। (यो देव रमझेप भाविसे युक है, वे मुफ नहीं है। मानकी मतिसे रागदेवकर ही मम हो सकता है फायाम मुफिका नही। मस भन्म देपोटी मक्ति स्याम्प है-मह मान) ॥ २८॥ मकारेण मवेद्विष्णू रफे प्रमा म्पपस्पिता। एकारेण हरा प्रोक्तलखान्ते परमं पदम् ॥ ३९ ॥ पदार्य- मनरेप म । मह मन्त्र अपने मास्मि सित भकारत्म कर्मसे, विष्णुः-विष्णुप मोदी य रेफे- म। इस मंत्र के रेफरस बम, प्रभा - प्रभा माम देव, पठ वे कीर्तिकलाहिन्दीमाषाऽनुवादसहितम् ३७ - - व्यवस्थित रहे हुए है। हकारेण='अहँ ' इस मन्त्रके हकार- रूप वर्णसे, हर =महेश्वर, प्रोक्त =कहे गये हैं। तस्य-उस हकार- रूप वर्णके, अन्ते अन्तमें-ऊपरमें रहा हुआ अर्घचन्द्रविन्दु, परमम् सर्वोच्च, पदम्पद - सिद्धशिला है ॥ ३९ ॥ भावार्थ - जिनेश्वर श्री अरिहन्त देवका 'अहं, यह मन्त्र ब्रह्मा, विष्णु, महादेव तथा परमपद स्वरूप है। जैसे अकाररूप वर्ण- अच्युत आदि विष्णुवाचक शब्दों में अकार होनेसे - विष्णुका प्रतीक है। तथा रेफरूप वर्ण-ब्रह्माशब्दमें रेफ होनेसे - ब्रह्माका प्रतीक है। एव हकाररूपवर्ण - हर आदि महेश्वरवाचक शब्दोमें हकार रहनेसे • महेश्वरका प्रतीक है। तथा अर्धचन्द्रविन्दु सिद्धाशिलाके आकारका होनेसे - परमपदका प्रतीक है। और 'अहँ, इस मन्त्रके देवता तीर्थकर जिनेश्वर हैं। इसलिये जिनेश्वर, शब्दसे ब्रह्मा आदि स्वरूप हैं । गुणसे जिनेश्वरका ब्रह्मा आदि स्वरूप होनेका पूर्वमें प्रतिपादन किया जा चुका है ॥ ३९ ॥ अकार आदि धर्मस्य मोक्षस्य च प्रदेशकः । स्वरूपं परमज्ञानमकारस्तेन प्रोच्यते ॥ ४० ॥ पदार्थ - अकार ='अर्हन्' इस पदके आदिका अकाररूप वर्ण, आदिधर्मस्य आदि - मुख्य तथा सर्व प्रथम उपदिष्ट होने के कारण सभी धमोंके आदिभूत धर्मका च-तथा, मोक्षस्य-मोक्षका, आदि मोक्षका, प्रदेशक =प्रतिपादक है । तथा, स्वरूपम्-अरिहन्तके स्वरूपभूत, परमज्ञानम्=परम - सर्वोत्कृष्ट ज्ञान - केवलज्ञान • आदि महागतोयम् पाम है, सेन-इसरिये, मकार-ईन् पक्का माविम्त काम प्रोन्पसे कहा माता ॥ १० ॥ मावा पकाररूप वर्ग मातुपाठमें मम अक्षर है, व्य भन् परकेभी माधिमें है। इसलिम्मे पा, तीबरने मुसहर सर्वप्रथम पुग्नदिमें धर्मका उपदेश किया था, दमा केही सामान पारिवका पान कर मुफ हुए थे, एवं थे परमशान केन्मान स्वरूप में इन सभी मायोका पोसफ है। इसलिये महन् पर माविमें भकार कहा गया है। मर्मस् पनि पाका ममम कर मकार पीकरसे उपविष्ट धर्म हो भावि धर्म है, समाये ही मार मुक पर भावि केयरमानी है-ऐसा एपित करता है। इन सभी मयोंकी सूचना फेलिमे ही भईन् पछमें सर्वप्रथम पकाररूप मार का मासा है-यह भाम्प ॥१०॥ रूपिद्रम्पस्वस्म वा रष्ट्रा मानेन पापा । र सौष्मलोक बा कारस्तेन प्रोग्यसे ॥१॥ पवार्य-मानेन-मानहप, पापा-नेवसे पिम्पस्वरूपम् कापि मूर्व दम पुनम, स्वरूप तत्व, पुनमक भनेकान्तरस पगाको रटा मानकर, पा-पुन , सोकम् पौदह रम्जुपमाम मेरकासमें मनस्ति सभी द्रम्पों तथा उनके पापापो, पाप अतोफम्मेफसे मतिरिक्त पोकाकासको, प्यम्=(केवमान रूपी नेत्रसे) माने में सेनासहिये रघरन् पदमें रेप, पोम्पवे-कहा मावा है || कीर्तिक्लाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् ३९ ३ C भावार्थ - तीर्थकरने संसारी अवस्थामें मति, श्रुत तथा अवधि- जानसे युक्त होनेके कारण सभी फुदलों के यथार्थ तत्त्वको ज्ञानरूपी नेत्रसे जानकर, (दीक्षा ग्रहण के बाद घातिकमों के क्षयसे केवलज्ञान होनेपर उस केवलज्ञानरूपी नेत्रसे) लोक तथा अलोकको देखे-जाने थे। इसलिये अर्हत् पदमें प्रथम रूपी द्रव्योंके पश्चात् सभी पदार्थों के क्रमश. जानका सूचक रेफ कहा जाता है। (क्योंकि रूपिशब्दमेंभी रेफ वर्ण है, तथा अर्हन् - तीर्थंकर केवलज्ञानी हैं। इसलिये दोनोंके क्रमका सूचन रेफके द्वारा किया जाता है) ॥ ४१ ।। हता रागाश्च द्वेपाश्च हता मोहपरीपहा । हतानि येन कर्माणि हकारस्तेन प्रोच्यते ॥ ४२ ॥ पदार्थ - येन चूकि, रागाः = विषयासक्तियोंका, च और, द्वेपाः अनिष्ट विषयमें अप्रीतियोंका, हताः नाश - त्याग किये, च= पुनः, मोहपरीपहा =मोह - ममता, परीपह-भूख, प्यास, ठढी, गरमी आदि बाईम परीपह - इन सभीका, हता =नाश - त्याग तथा सहन किये हैं। तथा, कर्माणि शुभ तथा अशुभ कमोंका, हतानि क्षय किया है, तेन-इसलिये - राग, द्वेष, मोह, परीषह तथा कर्मोंका नाश करने के कारण, हकार =अर्हन् पदमें हकाररूप अक्षर, प्रोच्यते कहा जाता है ॥ ४२ ॥ भावार्थ - चूंकि तीर्थंकरदेवने सभीप्रकारके राग, द्वेप, मोह, परीषह तथा कोंका (अपने असाधारण एवं अलोकिक ज्ञान तथा मपदेस्तोत्रम् चारित्र पठसे) माश किया है। इसलिये राग भारिके हननम सूचक हकाररूप मक्षर भईन् परमें कहा माता ॥ २ ॥ सन्तोपेणाऽमिसम्पूर्ण प्राविहार्याष्टकेन च । मास्वा पुण्य पपापं प नाररसेन प्रोम्पते ॥४३॥ पदार्थ पुभ्यम्-शुभकर्म, च-और, पापम्-मशुमको, -मी, पास्वागनकर, सन्तोपेम-सन्ताप भास्मतभिसे, अमि सम्पूर्ण-समी मकारसे मरे हुए---मात्ममुलमम, पता, प्राति सार्याऽटकेन-चैत्यरक्ष छत्र दुन्दुमि भावि माठ मातिहासि (ममिसम्मा-विरानिस ) है । तेन-इसम्मेि, नफारामान् पर नकाररूप अक्षर प्रोम्पका बाता है ॥ १॥ माता मरिहन्त भीतीफर देवने पुष्प सवा पाप (पप उनके खमों)को मानकर (समान मात्र होनेसे पासपोकर स्पाग फरके) सन्तोप-उपशमसे युछ हुए तमा मसिधमके ममावसे समा सरणमें पेस्पात, छत्र, दुन्दुमि भावि प्रातिदायों से निरापित हुए । इसलिये भान् पदमें नकार कहा जाता है। अर्थात् मईन् परमें सा हुमा नकार तीर्थकरक पुष पापके तत्वज्ञान उपचम या मातिहा प्रकका सूपक है ॥ ५॥ मनपीनारजनना पगादयः क्षयमुपगवा यस्य । प्रया पा विष्णुर्वा हरो बिनो वा नमस्तस्मै ॥१५॥ इति कनिकासनवमीहेमन्त्राचार्यविरचितं मीमहादेवम्तोत्र समासम् ॥
कीर्तिक्लाहिन्दीमापाऽनुवादसहितम् ४१ - पदार्थ~यस्य-जिसदेवके, भववीजाऽड्कुरजनना: भव - ससार, बीजाऽङ्कुर - मूलभूतकारण, जनन - उत्पन्नकरनेवाले - साधन - संसारके मूलभूत कारणरूप कर्म तथा जन्म आदिके हेतुभूत, रागा- दयः रागद्वेष आदि, क्षयम्-नाशको, उपगताः प्राप्त होगये हैं - नष्ट होगये हैं। वह, ब्रह्मा = ब्रह्मानामके देव हों, वा = अथवा, विष्णुः विष्णुनामके देव हो, वा अथवा, हर महेश्वरनामके देव हो, वा अथवा, जिन: जिनेश्वर तीर्थकर हों, तस्मै उन वीतराग- देवको, नमा-मेरा नमस्कार है ॥ १४ ॥ , भावार्थ-भवके आदि तथा मुख्यकारणरूप रागद्वेप आदि जिन देवके नष्ट होगये हैं, अर्थात् जो देव वीतराग है। वे नामसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर या जिनेश्वर - कोईभी हों, उनको मेरा प्रणाम है। (क्योंकि गुणसे ही किसीकी पूजा होती है, केवल व्यक्तिकी नहीं। ऊपरके विवेचनोंसे - जिनेश्वर ही वीतराग है, ब्रह्मा आदि देव नहीं-यह स्पष्ट हो चुका है। फिरमी अपनी तटस्थता सुचित की गयी है। व्यक्ति कोईमी हों, गुणग्राहीको व्यक्तिके विषयमें पक्षपात नहीं होता है, किन्तु गुणके विषयमें ही पक्षपात होता है - यह ध्यान देने योग्य है ॥ ४४ ॥ - इति श्रीमहाटेवस्तोत्रे तपोगच्छाधिपतिशासनसम्राटकदम्बगिरि- प्रभृत्यनेकतीर्थोद्धारकवालब्रह्मचार्याचार्यवर्यश्रीमद्विजयनेमिसूरीश्वर-पट्टाल- धार - समयज्ञ - शान्तमूर्त्याचार्यवर्यश्रीविजय विज्ञानसूरीश्वर - पट्टधर - मसरेवस्तोत्रम् सिमान्तमहोदपि-माहतविदिशारदापायाभीरिवपकम्तरतरीधरशिय- पन्याममीसीविचन्द्ररिजपगगिविरचित, फोतिफलाएपो हिनी मातानुवाद समाप्त । ॥ धीरस्तु ।। शुभ मस्तु ।
पन्यासश्रीकीर्तिचन्द्र विजयगणिविरचित कीर्तिकलाव्याख्या-सहितानि पुस्तकानि- द्वनिशिकाद्वयी (क स. हेम. विरचिता-अयोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिका तथा अन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिका) कीर्तिकलासंस्कृतव्याख्या सहिता । द्वातिशिकाद्वयी कीर्तिकलाहिन्दीभाषानुवादसहिता । श्रीवीतरागस्तवः ( क स हेम विरचित ) कीर्तिकलासंस्कृतव्याख्या- सहित । श्रीवीतरागस्तवः कीर्तिकलाहिन्दीभापानुवादसहित. । स्तोतत्रयी (क स हेम विरचितानि सकलाहस्त्रोत्रवीरजिनस्तोत्र- महादेवस्तोत्राणि) कीर्तिकलाल्यसंस्कृतहिन्दीव्याख्यासहिता । स्तोत्रत्रयी कीर्तिकलाहिन्दीभाषानुवादसहिता । प्राप्तिस्थानम्- श्रीजनकलाल कान्तिलाल लिम्बडी शेरी, पेटलाद वाया-आणन्द (गुजरात)
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