Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Jainagam Naye Sangrah
Front matter
प्राप्तिस्थान- जैन-शास्त्रमालाकार्यालय, जैन उपाश्रय लुधियाना मुद्रक- दी मंटिल अलैक्ट्रिक प्रेस गोकुल रोड लुधियाना में मारटर लम्भृगम धवन के प्रवन्ध में छपी ।
प्राक्कथन पदार्थों के ज्ञान के लिए और उन का सम्यग्बोध करने के लिए आगमों मे प्रमाण और नय ये दो मार्ग प्रतिपादन किए गए हैं । प्रमाण सर्वांशग्रोही होता है । और नय, पदार्थ के देश धर्म को ग्रहण कर उसका वर्णन करता है वर्तमान युग मे न्याय को दो शैलियां प्रचलि- त है, जैसे-प्राचीन न्याय, और नव्यन्याय । प्राचीन न्याय शब्दाडम्बर को छोड कर अर्थावबोधविशेप रहता है और नव्यन्याय मे अर्थावबोध को अपेक्षा शब्दाडम्बर । जैन, बौद्ध तथा वैदिक आचार्यों ने न्याय शास्त्र बहुत ग्रन्थ निर्माण किए है और उन पर टीका टिप्पण भी यथा बुद्धि किए है जो आज कल पाठशालाओं के पाठ्य क्रम मे नियुक्त भी है । अस्तु, इस जटिल तथा दुरूह विषय के सम्बन्ध मे मेरा य बहुत दिनों से यह विचार था कि जो विद्यार्थी न्यायकक्षा मे न्याय अध्ययन कर रहे है से
या कर चुके हैं उन को प्राचीन आगमों में वणन किए हुए प्रमाण ओर
नय-वाद का ज्ञान प्राप्त होना आवश्यक है । एतदर्थ इस लघु पुस्तिका में
अनुयोगद्वार सूत्र, नन्दीसूत्र, ठाणांग सूत्र,भगवतीसूत्र, प्रज्ञापन सूत्र, तथा
उत्तराध्ययन सूत्र, आदि जैनागमों से प्रमाण और नय तथा आत्मवाद
आदि विपय स्वाध्याय शील विद्वानों के अवलोकन के लिए संक्षिप्त रूप
से संग्रह किए गए हैं। जिन को विशेषप्रमाण और नय-वाद आदि विषयों
को देखने का अभिलापा होवे जैनागमां का सप्रेम स्वाध्याय कर और
यथोचित लाभ उठाएं।
इस पुस्तिका मे प्राचीन टीकाओं के साथ साथ आगम पाठ
का भी संग्रह किया गया है आशा है विद्वान् लोग इस पुस्तक को पढ़ कर
मेरे परिश्रम को सफल करेगे । अलविद्वत्सु ।
चैत्र शुक्ला प्रतिपदा
सं० २००६
जैन उपाश्रय
आचाये-
आत्माराम
लुधियाना
दो शब्द जैन शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान् पूज्य आचार्य श्री आत्मो राम जी महाराज वे विशेष सहवास से मुझे भी जैनागमों के देखने का सौभा- ग्य प्राप्त होता रहा है । पूज्य श्री जी की कर लेखनी से जैन जगत् तथा जैनेतर विद्वज्जन सुपरिचित ही है । मैंने आचार्य श्री जी द्वारा प्रकाशित अनेकों ग्रन्थ पढ़े, जो साधारण तथा असाधारण जनता के लिए उप- योगी सिद्ध हुए हैं। मेरी आरम्भ से ही पूज्य श्री जो से सानुरोध प्रार्थना रही है कि जैनागमों मे इतस्तत विखरे हुए न्याय- शास्त्र सम्बन्धित पाठों का एक पुस्तक के आकार में प्रकाशन होना अत्यावश्यक है। हर्ष का विषय है कि पूज्य श्री जी ने मेरी इस प्रार्थना को साकार रूप देकर मुझ पर ही नहीं किन्तु न्याय-शास्त्र के जिज्ञासुओं पर महान् उपकार किया है। प्रूफ आदि सशोधन कार्य-भार अपने ऊपर लेकर इस पुस्तक के मूर्तरूप देने मे जैन मुनि रत्नचन्द्र जी महाराज तथा प्रकाण्ड पण्डित शान्त मुद्रो प० श्री हेमचन्द्र जी महाराज के सुशिष्य मुनि श्री स्वरूप- चन्द्र जी महाराज और कान्ति मुनि जी ने अपने कर्तव्य का पालन किया है। इसके लिए इन तीनों मुनिजनों का विशेप धन्यवाद । निवेदक चैत्र शुक्ला प्रतिपदा भरलाल शास्त्री स०२००६ जैन उपाश्रय लधियाना
धन्यवाद
जालन्धर (छावनी) निवासी श्रीमान् लाला तेलूराम जी जैन
समाज के मान्य व्यक्तियों में से एक हे आरम्न से ही आप सामाजिक
सत्कार्यो मे अपने द्रविण का सदुपयोग करते आये हैं। आप के
अन्तस्तल मे धार्मिक भावना सदैव जागृत रही है और उन्हीं सद्
भावनाओ से प्रेरित हो आप ने अनेक ग्रन्थ प्रकाशित किए हैं, प्रस्तुत
पुस्तक का प्रकाशन भार भी गणावच्छेदक श्रो
१००८
श्री
रघुवरदयाल
जो महाराज की सत्प्रेरणा से आप ने अपने ऊपर लिया है। अतः मैं
"जनशास्त्रमालाकार्यालय लुधियाना को ओर से सेठ तेलूराम जी जैन
ईम जालन्धर छावनी का शतश: बन्यवाद करता हूँ।
आशा है. अन्य धनो महानुभाव भी लाला जो का अनुकरण
करते हुए अपने धन का सदुपयोग करंगे ।
नोट .- यद्यपि प्रस्तुत पुस्तक के प्रफ, सशोधन आदि मे अति
मावधानी रग्बी गई है, फिर भी यदि दृष्टिदोप से कोई अशुद्धि रह
गई हो, तो पाठक महानुभाव सुधार कर पढे ।
आपका-
मन्त्री, जैनशास्त्रमालाकार्यालय
लुधियाना।
समर्पितम् यह 'लवु निबन्ध' स्वर्गीय श्री श्री १००८ गणी श्री उदयचन्द्र जी महाराज के कर कमलों मे समर्पण किया जाता है । आप की प्रथम ही यह उत्कृष्ट भावना थी कि जैनागमों मे निर्दिष्ट प्रमाण और नय-वाद आदि का वोध न्याय शास्त्र के जिज्ञासुओं के लिए आवश्यक है। अत में उसी भावना से प्रभावित होकर यह शास्त्रीय निवन्ध आप श्री जी की सेवा मे समर्पित कर के हषातिरेक का अनभव कर रहा हू। भवदीय आचार्य जैन मुनि, आत्माराम
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णमोऽत्थुणं समणस्स भगवओ महावीरम्स जैनागमन्यायसंग्रहः . अथ भावप्रमाणमभिधित्सुराह- मूल-से कि त भावप्पमाणे ?, २ तिबिहे पएणत्ते, तंजहा- गुणप्पमाणे नयप्पमाणे संखप्पमाणे (सू० १४३ ) से कि तं गुणप्पमाणे १, २ दुविहे पण्णत्ते, तंजहा—जीव गुणप्पमाणे अजीवगुणप्पमाणे अ। से किं तं अजीवगुणप्पमाणे ?, २ पंचविहे पएणत्ते, तं जहा-वएणगुणप्पमाणे गधगुणप्पमाणे रसगुणप्पमाणे फासगुणप्पमाणे संठाणगुणप्पमाणे, से किं तं वरण गुणप्पमाणे १, २ पंचविहे पण्णत्ते, तं जहा-कालवएण- गुणप्पमाणे जाव सुकिल्लवगणगुणप्पमाणे, से त वएणगुणप्प- माणे । से कि तं गंधगुणप्पमाणे १, २ दुविहे पण्णत्ते, तजहा- सुरभिगंधगुणप्पमाणे दुरभिगंधगुणप्पमाणे, से तं गंधगुणप्प- माणे । से किं तं रसगुणप्पमाणे ?, २ पंचविहे पएणत्ते, तंजहा- तित्तरसगुणप्पमाणे जाव महुररसगुणप्पमाणे, से तं रसगुणप्पमाणे । - जैनागमन्यायसंग्रहः , से कि तं फासगुणप्पमाणे ?, २ अढविहे पएणते, तंजहा--- कक्खडफासगुणप्पमाणे जाव लुक्खफासगुणप्पमाणे से तं फामगुणप्पमाणे । से किं तं संठाणगणप्पमाणे ?, २ पंच विहेपरणत्ते, तंजहा-परिमंडलस ठाणगुणप्पमाणे वट्टसं० तंम० चउरंस० आययसंठाणगुणप्पमाणे, से त संठाणगुणप्प- माणे, से तं अजीवगुणप्पमाणे | टीका :-भवनंभावो-वस्तुन परिणामो बानादिर्बादिश्च, प्रमिनि प्रमीयते अनने प्रमीयते स इति वा प्रमाणं, भाव एव प्रमाण भाव प्रमाण, भावसाधनपक्षे प्रामति. -वस्तुपरिच्छेदस्तद्धेतुचाद भावम्य प्रमाणताऽवसेया, तच्च भावप्रमाणत्रिविध प्रज्ञात, तद्यथा- गुणप्रमाण, मित्यादि, गुणो-जानादि. स एव प्रमाण गुणप्रमाण, प्रमीयते च गुणैर्दव्यं, गुणाश्च गुणरुपतया प्रमीयन्तेऽतः प्रमाणता, तथानीतयो नया-अनन्तधर्मात्मकस्य चम्तुन एकाशपरिच्छिन्नयः त एवं प्रमाण नयप्र- मागा, मख्यानं गंख्या संवप्रमाण संन्याप्रमाण, नयसंख्ये अपि गुणत्वं न व्यभिचरत , केवलं गुणप्रमाणात पृथगमिधाने कारणमुपरिष्टाद्वक्ष्यते, जगप्रमाणं द्विधा जीवगुणप्रमाणं च अजीवगुणप्रमाण च तत्राल्प- वाव्यवादजीवगुणप्रमाणमेव तावदाह-से कि में अजीगुणप्पमाणे, य, एतत्सर्वमपि पाठगिढ़, नवर परिमण्डलसस्थान वलयादिवत, যুদখানালক व्यन्त्र-त्रिकोण, शृङ्गाटकफलवत्- चतुरस्र- समचतुष्कोणम, श्रायतं-दीमिति । - . -- :- .
भावप्रमाणम मूल-से किं तं जीवगुणप्पमाणे?, २ तिविहे पएणत्ते, तंजहा-णाणगुणप्पमाणे दंसणगुणप्पमाणे चरित्तगुणप्पमाणे । से कि तं णाणगुणप्पमाण १ , २ चउविहे पएणत्ते, तंजहा- पच्चक्खे अणुमाणे ओवम्मे आगमे । से किं तं पच्चक्खे १, २ दुविहे पण्णते, तंजहा-इंदिअपच्चक्खे अ णोइंदिअपच्चक्खे अ। से कितं इंदिअपच्चक्खे ? पंचविहेपण्णत्ते, तंचहा-सोइंदिअपच्चक्खे चक्खुरिदियपञ्चक्खे घाणिदिअपञ्चक्खे जिभिंदिअपच्चखे फामिंदिअपचवखे, से तं इंदियपञ्चवखे । से कि तंणोइंदियपञ्चवखे ?, २ तिविहे पएणत्ते, तंजहा-योहिणाणपञ्चक्खे मणपज्जवनाणपञ्चक्खे केवलणाण-पञ्चक्खे, से तं णोदियपच्चक्खे, से तं पञ्चक्खे । , प्रश- टीका :-जीवस्य गुणाः-ज्ञानादयस्तद्रूपंप्रमाण जीवगुणप्रमाणं तच्च ज्ञानदर्शनचारित्रगुणभेदात्रिधा, तत्र ज्ञानरूपो यो गुणस्तद्रूपं प्रमाण चतुर्विधं, तद्यथा- प्रत्यक्ष-मनुमानमुपानमागमः, तत्र अशू अश व्याप्तां' वित्यस्य धातोरश्नुते-ज्ञानात्मना अर्थान् व्याप्नोतीति अक्षो जीव, भोजने' इत्यस्य वा अश्नाति-भुक्त पालयति वा सर्वार्थानित्यक्षो-जोव एव प्रतिगतम्-आश्रितमक्षप्रत्यक्षमिति, अत्यादयः क्रान्ताद्यर्थे द्वितीयये (का० रु० ४३०) तिसमास , जीवस्यार्थसाक्षात्कारित्वेन यद् ज्ञानवर्तते तत्प्रत्यक्षमित्यर्थः, अन्ये वक्षमनं प्रतिवर्तत इत्यव्ययीभावसमास विदधति, न युज्यते, अव्ययीभावस्य नपुंसकलिङ्गत्वान्, प्रत्यज्ञशब्दस्य तच्च ४ जैनागमन्योयसंग्रह: त्रिलिङ्गता न स्यात्, दृश्यते चेयं, प्रत्यक्षा बुद्धिः प्रत्यक्षो बोधः प्रत्यक्ष ज्ञानमिति दर्शनात् , ततो यथादर्शितस्तत्पुरुष एवायं, तच्च प्रत्यक्षं द्विविध- इन्द्रियप्रत्यक्षं नोइन्द्रियप्रत्यक्षं च, अत्रेन्द्रियं-श्रोत्रादि तन्निमित्तं-सहका- रिकारणं यस्योत्पित्सोस्तदलिङ्गिक शब्दरूपरसगन्धस्पर्शविषयज्ञानमिन्द्रिय प्रत्यक्षम्, इदचेन्द्रलक्षणजीवात् परं व्यतिरिक्तनिमित्तमाश्रित्योत्पद्यते इति धूमादाग्निज्ञानमिव वस्तुतोऽर्थसाक्षात्कारित्वाभावात् परोक्षमेव, केवल लोकेऽस्य प्रत्यक्षतया रुढत्वात् सव्यवहारतोऽत्रापि-तथोच्यत इत्यलंविस्त, रेण, तदाका ड्क्षिणा तु नन्द्यध्ययनमन्वेषणीयम् । इन्द्रिय प्रत्यक्षं तु यन्न भवति तन्नोइन्द्रियप्रत्यक्ष, नो शब्दस्यसर्वनिपेधपरत्वात् यत्रेन्द्रिय सर्वथैव न प्रवर्तते किन्तु जीव एव साक्षादर्थ पश्यति तन्नोइन्द्रिय प्रत्यक्ष- अवधिमन पर्यायकेवलाख्यमिति भावार्थः । सूल : -से कि तं अणुमाणे ? २ तिविहे पएणत्ते, तंजहा- पुन्ववं सेसवं दि[साहम्मवं । से कि तं पुनवं १ २ माया पुत्तं जहा नह, जुवाणं पुणारागयं । काई पच्चभिजाणेज्जा, पुवलिङ्गण केणई ॥११५ ।। तंजहा–खत्तेण वा वएणेण वा लकणेण वा मसेण वा तिलएण वा, से तं पुव्यवं । से कि त सेमवं ?, २ पंचविहंपएणतं, तंजहा-कज्जेणं कारणेणं गुणेणं अवयवेणं यासएणं । से कि तं कज्जेणं ?, संखं सद्देणं भेरि ताडिएणं वमभं ढक्विएण मोरं किंकाइएणं हयं हेसिएणं गयं गुलगुलाइएणं रहं घणघणाइएणं, से तं कज्जेणं । से ? - , 4 भावप्रमाणम् ५ किं तं कारणेणं १, २ तंतवो पडस्स कारणं ण पडो तंतुकारणं वीरणा कडस्स कारणं ण कडो वीरणाकारणं मिप्पिंडो वडस्स कारणं ण घडो मिप्पिंडकारण, से तं कारणेण । से कि तं गुणेण?, २ सुवरणं निकसेणं पुप्फ गधेण लवणं रसेणं मइ श्रासायएणं वत्थं फासेणं, से तं गुणेणं । से कि तं अवयवेण?, २ महिसं सिगेणं कुक्कु डंसिहाएणं हत्थिं विसाणेणं वराहं दाढाए मोरं पिच्छेणं आसं खुरेणं वग्नहेण चमरि वालग्गेणं वाणरं लंगुलेण दुपयं मणुस्सादि चउपयं गवमादि बहुपयं गोमि आदि सीहं केसरेणं वसहं कुक्कुहेणं महिलं वलयवाहए, गाहा- परिअरवंधेण भडं जाणिज्जा महिलिग्रं निवसणेणं । मित्थेण दोणपागं कविं च एक्काए गाहाए ॥११६ ॥ से तं अवयवेणं । से कि तं आसएणं १, २ अग्गिं धृमेणं सलिलं वलागेणं वुद्धि अव्मविकारेणं कुलपुत्तं सीलसमायारेणं [इंङ्गिताकारितैज्ञयः, क्रियाभि पितेन च । नेत्र वक्त्र विकारेश्च- गृह्यतेऽन्तर्गतमनः ॥१॥] से तं आसएणं । से तं सेसवं । टीका :--अनु-लिङ्गग्रहणसम्बन्धस्मरणस्य पश्चान्मीयते-परिच्छि- द्यते वस्त्वनेनेति अनुमान, तञ्चत्रिविध पूर्ववन् शेपवत् दृष्टसाधर्म्यवच्चति । से किं तं पुव्यव' मित्यादि, विशिष्ट पूर्वोपलब्धं चिन्हमिह पूर्वमुच्यते, " ६ जैनागमन्यायसंग्रह तदेव निमित्तरुपतया यस्यानुमानस्यास्ति तत्पूर्ववत्, तद्द्वारेण गमकमनु- मान पूर्ववदिति भावः । तथा चाह 'माता पुत्र' मित्यादिश्लोक; यथा माता स्वकीय पुत्र बाल्यावस्थायां नष्टं युवानं सन्तं कालान्तरेण पुनः कथमप्यागतं काचित्तथाविवस्मृतिपाटववती, न सबो , पूर्वदृष्टेन लिङ्गन केनचित् क्षतादिना प्रत्यभिजानीयात्-मत्पुत्रोऽमिति अनुमिनुयादित्यर्थः, केन- पुनर्लिङ्ग नेत्याह-'क्षतेन वे' त्यादि, स्वदेहोद्भवमेव क्षत, आगन्तुकस्तु श्वदष्ट्रादिकृतो व्रण लाञ्छनमपतिलकास्तु प्रतीता., तदयमत्र प्रयोगो--मत्, पुत्रोऽयम्, अनन्यसाधारणक्षतादिलक्षणविशिष्टलिगोपलब्धेरिति, साध- म्यधर्म्यदृष्टान्तयो. सत्त्वेतराभावादयमहेतुरिति चेत्, नैव, हेतो परमार्थे- नैलिन्तणत्वात, तद्वलेनैव गमकत्वोपलव्धे , उक्त च न्यायवादिना पुरुपचन्द्रण-" अन्यथाऽनुपपन्नत्वमानं हेतो. स्वलक्षणम् । सत्वासत्वे हितगुमौं, दृष्टान्तद्वयलक्षणे ॥ १॥ तद्धर्माविति-अन्यथाऽनुपन्नत्वधर्मों, कथम्भूते सत्वासत्वे इत्याह-साधर्म्यवैधर्म्यरूपे दृष्टांतद्वये लक्ष्यते- निश्चीयते [अथ यदि ] दृष्टातद्वय लक्षणेन च धर्मिसत्तीया धर्मा सर्वेऽपि मवेदा भवन्त्येव, पटादे शुक्लत्वादिधर्म य (ख्य) भिचारात, ततो दृष्टांतयो सत्वासत्वधौ यद्यपि क्वचिद्धेतौ न दृश्येते तथापि धर्मिस्वरूप- मन्यथानुपपन्नत्व भविष्यतीति न कश्चिदविरोध इति भावः । यत्रापि धृमादौ वष्टांतयोः सत्यासत्वे हेतो श्येते तत्रापि साध्यान्यथानुपपन्नत्वस्यैव प्राधान्यात्तस्यै वे कस्य हेतुलक्षणा ताऽवसेया, तथा चाह-"धूमादेर्यद्यपि न्याता, मत्वामत्वे म्बलक्षगे। अन्यथानुपपन्नत्वप्राधान्याल्लक्षणेकता ॥१॥ किंच यदि दृष्टान्ते मत्वामत्वदर्शनाद्धेतुर्गमक इप्यते तदालोहलेख्यं वन पाथिवत्वात् काष्ठादिवदित्यादेरपि गमकत्वं स्यात , अभ्यधायिच. , भावप्रमाणम . "दृष्टान्ते सटसत्वाभ्यां, हेतु.सम्यग् यदीप्यते । लोहलेल्यंभवेद्व, पाथिवत्वाद् द्रुमादिवद् ॥२॥ इति । यदिच-पक्षधर्मत्वसपक्षसत्वांव- पचानत्वलक्षणंहेतोस्त्रैरुयमभ्युपगम्यापियथोक्तदोपभयात् साध्येन सहान्यथानुपपन्नत्वमन्वेषणीय तर्हि तदेवैक लक्षणतयावक्त मुचित- किंरुपत्रेयणेति, आहच-"अन्यथानुपपन्नत्वं, यत्र तत्र त्रयेण कि ? । नान्यथानुपपन्नत्वं, यत्र तत्र त्रयण किम् ॥१॥” इत्यादि, अत्रबहुवक्तव्य । तत्तु नोच्यते, ग्रन्थगहनताप्रसङ्गात , अन्यत्र यत्नेनोक्तत्वाच्चेति । आह- प्रयत्क्षविषयत्वादेवात्रानुमानप्रवृत्तिरयुक्ता, नैव, पुरुपपिण्डमात्रप्रत्यक्षता- यामपिमत्पुत्रो न वेति सन्देहाद्युक्त एवानुमानोपन्याम इति कृत प्रसङ्ग न । 'से किं तं सेसव' मित्यादि, पुरुषार्थोपयोगिन.परिजिज्ञासितानुरगादे- रथादन्यो हेपितादिरर्थ शेप इहोच्यते, सगमकत्वेन यस्यास्ति तच्छेपवद- । नुमानं, तच्च पचविधं, तद्यथा,-कार्येणेत्यादि, तत्र कार्येणकारणानुमानं यथा-हयम्-अश्व हेपितेन अनुमिनुते इत्यध्याहार, हेपितस्य तत्कार्यत्वात् , तटाकर्ण्य हयोऽत्रेति या प्रतीतिरूत्पद्यते तदिह कार्येण –कार्यद्वारेणोत्पन्न शेपबदनुमानमुच्यते इति भाव , कचित्तु प्रथमत शग्य शब्देनेत्यादि दृश्यते तत्रोक्तानुसारत सर्वोदाहरणेपु भावना कार्या । 'से कि त कारणेण मित्यादि, इह कारणनकार्यमनुमीयने, यथा विशिष्टमेघोन्नतिदर्शनात कश्चित् वृष्टयनुमान करोति, यहाह- "रोलम्बगवलच्यालतमालमलिनविप । वृष्टिं व्यभिचरन्तीह. नैव प्राया पयोमुच. ॥ १ ॥” इति एव चन्द्रोदयाज्जलधे द्धिरनमीयत कुमुद विकाशश्च, मित्रोत्याज्जलरुहप्रवोधोधूकमहमोक्षश्च. तथाविधधर्पणान. सत्यनिप्पत्तिः--कृपिवलमन प्रमोदश्च त्यादि, तदेव शारणमेवानुमा ८ जैनागमन्यायसंग्रहः - साध्यस्यनाकारणं, तत्र कार्यकारणभाव एच केषांचिद् विप्रतिपत्तिं पश्यन्तमेव तावन्नियतं दर्शयन्नाह तन्तब पटस्य कारणं नतु पटस्तन्तूना कारणम् पूर्वमनुपलब्धस्य तस्यैवतद्भावेउपलम्भाद्, इतरेपांतु पटाभावेऽयुपलम्भाद् अत्राह- ननुयदा कश्चिन्निपुणः पटभावेन सयुक्तानपि तन्तून् क्रमेणवियोजयति तदा पटोऽपि तन्तूनां कारणं भवत्येव, नैवं,-सत्वेनोपयोगाभावात, यदेवहि लव्धसत्ताकं- मतास्थानभावेन कार्यमुपकुरुते तदेव तम्य कारण-त्वेनोपदिश्यते, यथा मृनपिण्डोघटम्य, ये तु तन्तुवियोगतोऽभावीभवता पटेन तन्तवः समुत्प-- चन्ते तेपा कथ पट कारण निर्दिश्यते,नहियराभावेन भवत आरोगिता- मुपम्य घर. कारणमिति शंक्यते वक्त्त , यद्यवं पटेऽप्युपद्यमाने तन्तयोऽभावी भवन्तीति तेऽपि तत्कारण न स्युरिति चेत , नैवं, तन्तु- परिणामरूप एवहि पटो यदि च तन्तव. सर्वथाऽभावी भवेयुस्तदा मृदभावे घटम्येव पटम्य सर्वथैवापलब्धिने स्यात् , तस्मात् पटकालेऽपि तन्तय सन्तीति मन्यनोपयोगात्ते पटस्य कारणमुच्यन्ते, पटवियोजनकाले लेककतत्ववम्याया पटो नोपलम्यते अतस्तत्र सत्वेनोपयोगाभावान्नानी- तपा कारण, एव वीरणकटादिप्यपि भावना कार्या, तदेवं यद्यस्य कार्यस्य गारगत्वेन निश्रित तत्तम्य यथा समभव गमकत्वेन वक्तव्यतमिति । ‘से नि नं गुण' मित्यादि, निकपः कपणपट्टगतापितसुवर्णरंग्या तेन युवरणमनुमीयते, यथा पञ्चदशादिवर्णकोपतमिद सुवर्ण, तथाविधनिकपो- पलन्मान , पूर्वापत्नव्याभयमम्मनसुवगावत , एव शतपत्रिकादि पुप्पमत्र, नया विवगन्धोपन्नम्भात , पूर्वापत्नव्यवस्तुवन् , एव लवणमदिरावस्त्रादयो- उनकभेदसम्मकोऽनियनम्बम्पा अपि प्रतिनियत तथाविध रसास्वादस्पर्श- भावप्रमाणम् है अत्र . दिगुणोपलव्धे प्रतिनियतत्वरूपा सावयितव्याः । ‘से कि त अवयवेण? मित्यादि, अवयवदशेनेनावयवी अनुमीयते, यथा महिप , तदविनाभूतशृगोपलब्धे , पूर्वोपलब्धोभयसम्मतप्रदेशवत् , अयंचप्रयोगो- वृत्तिवरण्डकाद्यन्तरितत्वादप्रत्यक्ष एवावयविनि द्रष्टव्य , तत्प्रत्यक्षतायाम- ध्यक्षत एव तत् सिद्धरनुमानवेयर्थ्यप्रसङ्गादिति एव शेपोदाहरणान्यपि भावनीयानि, नवर द्विपदमनुष्यादीत्यादि, मनुष्योऽयंतदविना भूतपद । द्वयोपलंभात् , पूर्वबष्टमनुप्यवत् एव चतुष्पदबहुपदेवपि, ' गोम्ही' कएर्णशृगाली, 'परियरवंघेणभड' मित्यादि, गाथा पूर्व व्याख्यातेव, तदनुसारेणभावर्थोऽप्यूह्य इति, । 'से किं तं''आसएण' मित्यादि, श्राश्रयतोत्याश्रायो-धूमवलाकादिः, तत्र धूमादग्न्यनुमान वलाकादेस्तु जला- द्यनुमानंप्रतीतमेव, आकारेगितादिभिश्चपूर्वव्याख्यातम्यरुपैर्देवदत्ताद्या- श्रितैस्तदन्तर्गतमनोऽनुमानसुप्रसिद्धमेव, अत्राह-ननु-धूमस्याग्निकार्य त्वात्पूर्वोक्तकार्यानुमानएव गतत्वात् किमिहोपन्यास. १, सत्यं, किन्त्वग्न्या- श्रयत्वेनापि लोके तस्यरुढत्वादत्राप्युपन्यासः कृत इत्यदोप , तदेतत् शेपवदनुमानम् । मूलः-से कि तं दिट्ठ माहम्मवं ?, २ दुविहं पगण, तं जहा सामन्नदिट्ठ च विसेसदिट्ठ च । से कि तं मामएण- दिट्ठ १, २ जहा एगो पुरियो तहा वहवे पुरिया जहा वहवे पुरिमा तहा एगो पुरिसो जहा एगो कग्मिावणो तहा वहवे करिसावणा, जहा बहवे करिमावणा-तहा एगो करिमावणो, से तं जैनागमन्यायसंग्रहः सामरणदिव। से कितं विसेसदिट्ट, २ से जहाणामए केई पुरिसे कंचि पुरिसं वहूणं पुरिसाणमज्मे पुचदिट्ठ पच्चभिजाणेज्जा- अय से पुरिसे वहूण करिसावणणं मज्झे पुन्वदिट्ठ करिसावणं पच्चभिजाणिज्जा अयं से कारिसावणे । तस्स समासोतिविहं गहरणं भवड, ते जहा–अतीयकालगहणं पडुप्पएणकालगहणं अणागय कालगहण । से कि तं अतीय कालगहणं ?, २ उत्तणाणि वणाणि निफरण मस्सं वा मेडणि पुण्णाणि अ कुण्डसरणई दीहि यातडागाईपासित्ता तेण माहिज्जइ जहा -सुवुड्डी पासी, से तं अतीय काल गहणं । से कि तं पडुपएणकालगहणं १, २ मा. गोयग्ग्गयं विच्छडिअपउरभत्तपाण पासित्ता तेणं माहिज्जड जहा मुभिक्खे वट्टई, से त पट्टप्पण्ण काल गहणं । से कि तं पणागयकाल गहणं ?, २ अभस्स निम्मल कसिणा य गिरी सविज्जया मेहा । थणियां वा उभामो संझा रत्ता पणिहा द्वा) य ॥ ११७ ।। बारुणं वा यहिद वा अण्णयरं वा पमन्थं उपायं पासित्ता तेणं साहिज्जइ जहा-सुवुट्टी भविस्मइ, से -अणागयकालगहणं । हामि चेव विवज्जासे तिविह- गहरां मनड, तं जहा–अतीयकाल गहरणं पडुप्परगा कालगहरणं अणानयकाल गहणं । से कि तं अतीयकालगहणं ?, नित्तिणाई 4 भावप्रमाणम् ११ २ वणा: अनिमारणसम्सं वा मेइणी सुक्काणि अ कुडसरण - ईटीहियतडागाई पासिचा तेणं साहिज्जइ जहा--कुबुट्ठी आसी, से तं अतीयकालगहणं । से कि तं पडुप्पएण कालगहणं ? साहुँ गोअग्ग्गगयं भिक्खं अलभमाणं पासिचा तेणं साहिज्जइ जहा-दुभिक्वेवट्टइ, से तं पड़प्पएण काल गहणं । से कि तं अणागयकालगहणं १, धृमायतिदिसाया मं (१) विअमेडणी अपडिवडा । वाया नेरड्या खलु कुबुट्ठोमेनिवेयंति ॥ ११८ ।। अग्गेयं वा वायव्वं वा अरणय वा अपसत्थं -उप्पायं पासित्ता तेणं साहिज्जड जहा-कुचुट्ठीभविस्सह, से तं अणागयकाल गहां, से तं विसेमदिव', सेतं दिट्ठमाहम्मद, से तं अणुमाणे । टीका :-दृष्टेन पूर्वोपलव्धनार्थेन सह साधम्य दृष्टमाधयं, तद् गमकत्वेन विद्यते यत्र तद् दृष्टमाधयवत् , पूर्वदष्टश्चार्थ कश्चित् सामान्यत कश्चित्त विशेपतो दृष्ट स्यात , अतन्तभेदादि द्विविध, सामान्यतो दृष्टार्थयोगात सामान्यदृष्टं, विशेषतो दृष्टार्थयोगात् विशेषष्ट तत्र सामान्यदृष्ट यथा एकः पुरुयस्तया बद्दव. पुरुषा इत्यादि, इदमुक्तं भवति --नालिकरद्वोपादायात कश्चित् तत्प्रथमतया कश्चन पुरुपं दृष्ट्वा अनुमान करोति यथा अयमेक परिदृश्यमान पुस्प एतदाकारविशिष्टस्तथा वहयोऽत्रापरिदृश्यमाना अपि पुरुषा निदाकार- सम्पन्ना एव, पुरुपत्वावशेपाद, अन्याकारत्वे पुम्पत्वहानिप्रमझात, गादिवत् , बहुपु तु पुरुषेपु तत्प्रथमतो योक्षितप्वेवमनुमिनोनि यथाऽमी सामान्यत १२ जैनागभन्यायसंग्रह एवाय परिदृश्यमाना पुरुपा एतदाकारवन्त तथाऽपरोऽप्येकः कश्चित् पुरुपः एतदाकारवानेव, पुरुपत्वात् , अपराकारत्वेतद्धानिप्रसङ्गात् , अश्वादिव- दिति, एवकार्पापणादिध्वपिवाच्य, विशेषतो दृष्टमाह-' से जहानामए' इत्यादि, अत्र पुरुषाः सामान्येन प्रतीता एव, केवलं यदा कश्चित् कचिन्- कश्चित् पुरुपविशेपं दृष्ट्वा तद्देशनाहितसंस्कारोऽसंजाततत्प्रमोप: समयान्तरे बहुपुरुपसमाजमध्ये तमेवपुरुपविशेपमासीनमुपलभ्यानुमानयति पूर्वमयोपलब्धः स पुरुपः, तथैव प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् , उभयाभिमत पुरुपवदिति, एतत्तदा विशेषदृष्टमनुमानमुच्यते, पुरुषविशेप- विषयत्वाद्, एवं कार्पापणादिप्वपि वाच्यं । तदेवमनुमानस्य त्रैविध्यमुप- दर्यसाम्प्रतं तस्यैव कालत्रयविपयतां दर्शयन्नाह -' तस्स समासओ तिविह गहरणमित्यादि, तस्येतिसामान्येनानुवर्तमानमनुमानमात्र सम्बध्यते, तस्यानुमानस्य त्रिविध ग्रहणं भवति, तद्यथा-अतीतकालविपयं ग्रहणं - वन्तुन परिच्छेदोऽतोतकालग्रहण, प्रत्युत्पन्नो- वतेमान कालस्ताविपयं ग्रहणंप्रत्युत्पन्नकालग्रहणं,अनागतो- भविष्यत्कालस्तविषयग्रहणमनागतकालग्रहणम् कालत्रय वर्तिनोऽपि विपयस्यानुमानात् , परिच्छेदो 'उत्तिणाई ति उद्गतानि तृणनि येपु वनेषु तानि तथा, अयमत्र प्रयोग'-सुवृिष्टि- रितामोद् , उत्तृणवननिष्पन्नसस्य पृथ्वीतलजलपरिपूर्णकुण्डादिजलाशय प्रभृतितकार्यदर्शनात अभिमतदेशवदित्यतीतस्य वृष्टिलक्षण विपयम्य- परिच्छेदः, साधुच 'गोचराप्रगत' भिक्षाप्रविष्टं विशेपेण छर्दितानि- गृहन्यदेत्तानि प्रचुरभक्तपानानि यस्य म तथा त तादृशं दृष्ट्वा कश्चित् माधयति-मुभिक्षमिह वर्तते, सावूना तद्ध'तुकप्रचुरभक्तपानलाभदर्शनात् , १ - ग्रापस्य - भवतीत्यर्थः, तत्र भावप्रमाणम् १३ पूर्वदृष्टप्रदेशवदिति । 'अब्भस्स निम्मलत्तं गाहा सुगमा, नवरं स्तनितं. मेघगर्जितं 'वाउभामो' त्ति तथाविधो वृष्टयव्यभिचारी प्रदक्षिण दिक्षु भ्रमन् प्रशस्तो वात. 'वारुण' ति आमूलादिनक्षत्रप्रभव माहेन्द्ररोहि- णीज्येष्ठादिनक्षत्रसम्भवं अन्यतरमुत्पातम् उल्कापातदिग्दाहादिकं प्रशस्तं वृष्टयव्यभिचारिणम् दृष्ट्वाऽनुमीयते, यथा-सुवृष्टिरत्रभविष्यति, तद्व्यभिचारिणामभ्रनिर्मलत्वादीना समुदितानामन्यतरस्य वा दर्शनात् , | यथाऽन्यदेति, विशिष्टा ह्यभ्रनिर्मलत्वादयो वृष्टिं न व्याभिचरन्त्यतः प्रतिपत्नैव तत्र निपुणेन भाव्यमिति, 'एएसिंचेव विवज्जासे? इत्यादि, एतेषामेवोत्तृणवनादीनामतीतवृष्ट्यादिसाधकत्वेनोपन्यस्ताना हेतूनां व्यत्या- से-व्यत्यये साध्यस्यापि व्यत्यय. साधयितव्योः यथा कुवृष्टिरिहासीन्नि- स्तृणवनादिदर्शनादित्यादिव्यत्यय सूत्रसिद्धो नवरमनागतकालग्रहणे माहेन्द्र- वारुणपरिहारेणाग्नेयवायव्योत्पाता उपन्यस्ताः तेषां वृष्टिविघातकत्वादित- रेषां सुवृष्टिहेतत्वादिति । ‘से तं विसेसदिलं, से तं दिट्ठसाहम्मव? मित्येतन्निगमनद्वयं दृष्टसाधर्म्यलक्षणानुमानगतभेदन (द्व) समर्थनानन्तरं युज्यते, यदि तु सर्ववाचनास्वत्रैव स्थाने दृश्यते, तदा- इष्टसाधर्म्यवतोऽपि सभदेस्यानुमानविशेषत्वात् , कालत्रयविषयता योजनीयैवातस्तामप्यभिधाय ततो निगमनद्वयमिदमकारीति प्रतिपत्तव्यम् तदेतदनुमानयिति । अथोपमानमभिधित्सुराह- मूलः-से कि तं अोवम्मे १ २ दुविहे पएणत्ते तं जहा साहम्मोवणीए अवेहम्मोवणीए अ। से कि तं साहम्मोवरणीए १, यस्य १४ जैनागमन्यायसंग्रहः २ तिविहे पण्णत्ते, तं जहा-किचिसाहम्मोवणीए पायसाहम्मोव- णीए सव्वसाहम्मोवणीयए । से कि तं किचिसाहम्मोवणीए १, २ जहादगे तहा सरिसवो जहा सरिसवो तहा मंदरो जहा समुद्दो तहा गोम्पयं जहा गोप्पयं तहा समुद्दो जहा आइच्चो तहा खज्जोतो जहा खज्जोतो तहा श्राइच्चो, जहा चन्दो तहा कुमुदो जहा कुमुदो तहा चंदो, से तं किचिसाहम्मो० । से कि तं पायसाहम्मोत्रणीए ?, २ जहा गो तहा गवो जहा गवनी नहा गो, से तं पायसाहरमो० । से कितं सव्वसा- हम्मावणीए ? २ सन्चमाहम्मे ग्रोवम्मे नत्थि, तहावि तेणेव नम्म प्रोवम्मं कीग्इ जहा अरिहंतेहिं अरिहंतसरिसं कयं चक्कवट्टिणा चक्कबट्टिमरिसं कयं, चलदेवेण बलदेवेमरिसं कयं, वासुदेवेणा वासुदेवसरिसं कयं साहुणा साहुसरिसं कयं से नं सब्बसाहम्मे, से तं साहम्मोवणीए । से किं तं वेहम्मो- नगीए १, २ तिविहे पराते, तं जहा–फिचिवेहम्से पाय- वहम्मे मब्बवेहम्मे । से कि तं किचिवेहम्मे ! २ जहा सामलेरो न नहा बाहुलेग, उहा वाहुलेगे न तहा मामलेगे, से तं किंचि वेहम्मे । से फिन पाय वहम्मे ? जहा वायमो न तहा पायमो, जहा पायगीन तहा वायनो, से तं पायवेहम्मे । से कि तं सबवेहम्मे ?, -- , , भावप्रमागम १५ :- - २ सव्ववेहम्मे ओवम्मे नत्थि, तहावि तेणेव तस्स प्रोवर्म कीरइ, जहा पीए गोअसरिसं कय दासेण दाससरिसं कयं काका काकसरिसं कयं सारेण सागासरिसं कयं पाणेण पाणसरिसं कां, से तं सबवेहम्मे । से तं वेहम्मोवणीए । से तं अोवम्मे । टीका :-उपमीयते-सहशतया वस्तु गृह्यते अनयेत्युपमा सैयो पम्यं, तच्च द्विविधं-साधम्र्येणोपनीतमुपनयो यत्र तत् माधो-पनीत वैधयेणोपनीतम् - उपनयो यत्र तवैधर्म्यम्योपनीतम् तत्र साध- र्योपनीतं त्रिविध-किञ्चित् साधादिभेदात्, किचित् साधर्म्यच मदर सर्षपादीनां, तत्र मदर सर्पपयोद योरपि मूतत्व सादृश्य, समुद्र गोष्पदयो सोदकत्वमात्रम्, आदित्यखद्योतयोराकाशगमनोद्योतकत्वरुप, चन्द्रकुमुदयो शुक्लत्वमिति । ‘से कि तं पायसाहम्मे' इत्यादि, खुरककुदविपाणलाङ्ग, लादेव योरपि समानत्वात्, नवरं सकम्बलोगोवृ त्तकण्ठस्तुगवय इति प्राय साधर्म्यता । सर्व साधर्म्यन्तु क्षेत्रकालादिभिर्भेदात् न कस्यापि केनचित् सार्द्ध संभवति, सम्भवेत्वेकता प्रसङ्ग तर्हि-उपमानस्य तृतीय- भेदोपन्यासोऽनर्थक एवेत्यशङ्कयाह-तथापि तस्य विवक्षितस्याहदादे- स्तेनैवअहंदादिना औपम्य क्रियते, तद्यथा --'अर्हता अर्हत्सदृशकृतं' तत् किमपि सर्वोत्तमं तीर्थप्रवर्तनादि कार्यमहता कृतं यदहन्नेव करोति नापरः कश्चिदिति भाव., एवं च स एव तेनोपमीयते, लोकेऽपिहिकेनचिदत्यद्- भुते कार्ये कृते वक्तारो दृश्यन्ते-तत् किमपीद भवद्भि कृत यद्भवन्त एव कुर्वन्ति नान्य कश्चिदिति, एव चक्रवर्तिवासुदेवादिष्वपि वाच्यम् ' से किं - १६ जैनागमन्यायसंग्रहः - नं वेदम्मोवणीए' इत्यादि, यथेति-यादशः शवलायाः गोरपत्यं शोवलेयो न तादृशो बहुलाया अपत्यं बाहुलेयो, यथाचायं न तथेतरः, अत्रचशेष- धर्मेन्तुल्यत्वाद्भिन्ननिमित्तजन्मादिमोत्रतस्तु-वैलक्षण्यात् किंचिद् वैधये भावनीयम. 'से कि तं पायवेहम्मे इत्यादि, अत्र वायसपायसयोः सचेतन- त्वाचेतनत्वादिभिर्वहुभिर्धर्मेविसंवादात् अभिवानगतवर्णद्वयेन सत्वादि मात्रतश्च साम्यात्प्रायो वैधर्म्यता भावनीया, सर्ववैधय॑न्तु न कस्यचित् केनापि संभवति, सत्त्वप्रमेयत्वादिभि सर्वभावानां समानत्वात. तैरप्य- गगन वेऽमन्वप्रसङ्गात् , तथापि तृतीयभेदोपन्यास वैयर्थमाशक्याह-- तथापि तस्य तेनैवोपम्यक्रियते यथा नीचेन नोचमदृशं कृतं गुरुघातादि-इत्या दि. 'प्राह -नीचेन नीचसदशं कृतमित्यादि त्रु वता साधभ्यमेवोक्त स्यान्न वैधय, सत्य, किन्तुनीचोऽपिप्रायो नैवं विध महा पापमाचरति किपुनरनीच,, नन सकल जगविलक्षण प्रवृत्तत्वविवक्षया वैधम्येमिह भावनीयम् , एवं दामा पदाहरण पपिवाच्यम् । 'से तं सव्यवेहम्मे' इत्यादि निगमनत्रयम् । मृलः-से कितं अागमे १, २ दुविहे पएणते, तं जहा- लोटा अलाउत्तरिए अ। से मि तं लोइए १, २ जगणं इमं अगणागि हिं मिच्छादिविएहिं सच्छंदबुद्धिमइविगप्पियं, जहा--भारह गमायणं जाव चत्तारि वेया सगावंगा, सेतं लोए श्रागमे । से कि लोउत्तरिए ?, २ जगणं इमं अरिहंतेहि भगवाह उम्परागणाणदसणवरहितीयपच्चुप्पएणमणागयजा- गादि निलुक्कवहिपहिअपूडएहिं सत्रएहिं मच्चदरसीहि पीय दबालमगगनिपिडगं, तंजहा-यायागे जाव दिट्टि- भावप्रमाणम् १७ आत्मागमो, यथा-वीर्थकराणामयन्यात्मागमः, स्वयमेवकेवलो ( लेगो) वाओ। अहवा आगमे तिविहे पएणत, तंजहा-सुत्तागमे अत्थागमे तदुभयागमे । अहवा-आगमे तिविहे पएणत्ते, तंजहा–अत्तागमे अणंतरागमे परंपरागमे, तित्थगराणं अत्थस्स अत्तागमे गणहराणं सुत्तस्स अत्तागमे अत्थस्स अणंतरागमे गणहरसीसाणं सुत्तस्स अणंतरागमे अत्थस्स परंपरागमे, तेण परं सुत्तस्सवि अत्थस्सवि णो अत्तागमे णो अणंतगगमे परंपरागमे, से त लोगुत्तरिए, से तं आगमे, से तं गाणगुणप्प- माणे॥ टीका:-गुनगरम्पर्येणागच्छतीत्यागमः, श्रा-समन्ताद गन्यन्ते -जायन्ते जीवादच कर्या अनेनेति वा आगमः, अयं च द्विधा प्रनप्न., तद्यथा-'लोइए इल्लाद इद चेहैव पूर्व भाववृतं विचारयता व्याख्यातं, यावत् से तं लोडर में किं तं लोगुत्तरिए अागमचि; 'अहवा आगमे तिविहे' इत्यादि, क सुत्रमेव सूत्रागम., तदभिवेवश्चार्थ एवार्थागम , सूत्रार्थोभयरुपस्तु दुनयानः, अथवा अन्यन प्रारंणागमस्त्रिविधः प्रज्ञप्त, तद्यथा-अामागन इत्यादि, नत्र गुम्पदेशमन्तरेणात्मन एव भागम पलब्धेः, गणधराणां तु मूत्रन्यात्मागमः, वयमेव अधितत्वाद् , स्पशेमान न्तरागम , अनन्तरमेव तीर्थकरादागतत्वाद् , उक्तं च- "भासह २५२६॥ सुत्त गंथंति गणहरा निउण, मित्यादि, गणधरशिष्षणो जम्मू-नाशि- तीना सूत्रस्यानन्तरागम., भव्यवधानेन गणधरादेव तक, ourist .
~ एर, १६ जैनागमन्यायसंग्रहः परम्परागमः गणवरेणैव व्यवधानात् , तत ऊचे प्रभवादीनां सूत्रस्यार्थस्य च नामागमो नानन्तरागमः, तल्लक्षणायोगात् , अपितु परम्परागम अनेन चागमस्य तीर्थकरादिप्रभवत्वभणनेनैकान्तापौरुषेयत्वं निवारयति, पौरुपताल्यादिव्यापारमन्तेरेण नभसीय विशिष्टशहानुपलब्धे., ताल्वादिभिरभिव्यज्यत एव शब्दो नतु क्रियते इति चेत्, ननु यद्येवं तर्हि सर्ववचसामपौरुषेयत्वप्रसङ्गः, नेगा भाषापुर जनिष्पन्नवाद , भापापुद्गलानां च लोके सर्वदैवावस्थानतो- ऽपूर्वक्रियमाणताऽयोगेन ताल्यादिभिरभिव्यक्तिमात्रस्यैव निवर्तनात , नच वक्तव्यं-वचनस्य पौद्गलिकत्वमसिद्वम महाध्वनिपटलपूरितश्रवण बाविर्य कुड्यग्वलनाअन्यथानुपपत्तेः, तस्मान्नैकान्तेनापौरुपेयमागमवचः, ताल्यादिव्यापाराभिव्यग्यत्वात् , देवदत्तादिवाक्यवत, इत्यायन बहुवक्तव्यं तत्तु नोच्यते स्थानान्तर्रानर्णातत्यादिति । ‘से तं लोगुत्तरिए ' इत्यादि निगमनत्रयम् ॥ उक्त मानगुणप्रमाणमथ दर्शगुणप्रमाणमाह- मृलः--से कि त दंगणगुणप्पमाणे १, २ चउब्दिहे पगगने, नंजहा-चकम्युमणगुणप्पमाणे अचकखुदंसणगुण- पमाणे आहिदंगणगुणापमाणे कंवलदगण गणप्पमाणे चक्ग्यु- दंगण चकादंमणिस्म घडपड कडाहाडद इब्वेसु अवाखुर्दसण प्रयायुदंपरिणम्य प्राय भावे आहिदसणं आहिदसणिस्स गचनविदब्बेमु न पुग मद्धपज्जवेसु केबलदंगणं केवलदंसणिस्स मवदन्येमु य मञ्चपज्जवेमु अ, से तं दंसणगुणापमाणे ।
भावप्रमाणम १६ तत्र टीका:-दर्शनावरणकम क्षयोपशमादिजं सामान्यमानग्रहणं दर्शनमिति, उक्त च--'जं सामन्नग्गहणं भावाणं नेय कटुमागार । अविसेसिऊण अत्थे दंसणमिइ बुच्चए समए ।।१।। तदेवात्मनो गुण स एव प्रमाण दर्शनगुणप्रमाणम् , इदच चक्षुर्दर्शनादिभेदाच्चतुर्विधम् , भावचक्षुरिन्द्रियावरणक्षयोपशमाद् द्रव्येन्द्रियानुपघाताच्च चक्षुर्दर्शनिनः--चक्षुदर्शनलब्धिमतो जीवस्य घटादिपु द्रव्येषु चक्षुषो दर्शनं चक्षुर्दर्शनम् , भवतीति क्रियाध्याहार , सामान्यविषयत्वेऽपि चास्य यद् घटादिविशेषाभिधानं तत्सामान्यविशेषयो. कथञ्चिदभेदादेकान्तेन विशेषेभ्यो व्यतिरिक्तस्य सामान्यस्याग्रहणख्यापनार्थम् , उक्त'च-"नि विशेष विशेषाणां ग्रहोदर्शनमुच्यते' इत्यादि, चक्षुबर्जशेषेन्द्रिय चतुष्टयं मनश्चचक्षुरुच्यते, तस्य दर्शनमचक्षुर्दर्शन, तदपि भावाचक्षुरिन्द्रियावरण- क्षयोपशमात् द्रव्येन्द्रियानुपघाताच्च अचक्षुर्दर्शनिन -अचक्षुर्दर्शनल- ब्धिमतो जीवस्यात्मभावे भवति, आत्मनि-जीवे भावः-संश्लिष्टतया सम्बन्धो, विषयस्य घटादेरित गम्यते, तस्मिन् सति इद प्रादुर्भवतीत्यर्थः- इदमुक्त भवति-चक्षुरप्राप्यकारि ततो दुरस्थमपि स्वविषयं परिच्छिनत्ती- त्यस्यार्थस्य ख्यापनार्थ घटादिषु चक्षुर्दर्शनं भवतीति पूर्व विषयस्य भेदेनाभिधानं कृतं, श्रोत्रादीनि तु प्राप्यकारीणि ततो द्रव्येन्द्रिय संश्लेष द्वारेण जीवेन सह सम्बद्धमेव विषयं परिचछिन्दन्तीत्येतदर्शनार्थमात्मभावे भवतीत्येवमिह विषयस्याभेदेन प्रतिपादनमकारीति, उक्त च- "पुढे सुणेइ सई रुवं पुण पासई अपुढ'तु” इत्यादि । अवधेर्दर्शनमवधिदर्शनम् , अवधिदशेनिन अवधिदर्शनावरणक्षयोपशमसमुद्भ तावधिदर्शनलब्धि- मतो जोवस्य सर्वेष्वपि रुपिद्रव्येषु भवति, न पुनः सर्वपर्यायेषु,यतोऽ एव, १८ जैनागमन्यायसंग्रहः परम्परागमः गणधरेणैव व्यवधानात् , तत अध्वं प्रभवादीनां सूत्रस्यार्थस्य च नात्मागमो नानन्तरागमः, तल्लक्षणायोगात् , अपितु परम्परागम अनेन चागमस्य तीर्थकरादिप्रभवत्वभणनेनैकान्तापौरुषेयत्वं निवारयति, पौरुषताल्वादिव्यापारमन्तेरेण नमसीव विशिष्टशब्दानुपलब्धेः, ताल्वादिभिरभिव्यज्यत एव शब्दो नतु क्रियते इति चेत्, ननु यद्येवं तर्हि सर्ववचसामपौरुषेयत्वप्रसङ्गः, तेषां भाषापुद्गजनिष्पन्नत्वाद् , भाषापुद्गलानां च लोके सर्वदैवावस्थानतो- ऽपूर्वक्रियमाणताऽयोगेन ताल्चादिभिरभिव्यक्तिमात्रस्यैव निवर्तनात् , नच वक्तव्यं -वचनस्य पौद्गलिकत्वमसिद्धम् महाध्वनिपटलपूरितश्रवण वाधिर्य कुड्यस्खलनायन्यथानुपपत्तेः, तस्मान्नैकान्तेनापौरुषेयमागमवच', ताल्यादिव्यापाराभिव्यग्यत्वात् , देवदत्तादिवाक्यवत्, इत्याद्यत्र वहुवक्तव्यं तत्तु नोच्यते स्थानान्तरनिर्णीतत्वादिति । ‘से तं लोगुत्तरिए ' इत्यादि निगमनत्रयम् ।। उक्त ज्ञानगुणप्रमाणमथ दर्शगुणप्रमाणमाह- मल:--से कि तं दसणगुणप्पमाणे १, २ चउबिहे पण्णते, तंजहा-चक्खुदसणगुणप्पमाणे अचक्खुदसणगुण- प्पमाणे ओहिदंसणगुणप्पमाणे केवलदसणगुणप्पमाणे चक्खु- ; दंसण चक्खुदमणिस्स घडपडकडरहाइएसु दव्वेसु अचक्खुदसण अचक्खुदंसणिस्स आयभावे ओहिदसणं ओहिदसणिस्स सव्वरुविदव्वेसु न पुण सधपज्जवेसु केवलदंसणं केवलदंसणिस्स सव्वदब्येसु अ सबपज्जवेसु अ, से तं दसणगुणप्पमाणे । - , १६ भावप्रमाणम टीकाः-दर्शनावरणकम क्षयोपशमादिजं सामान्यमात्रग्रहणं दर्शनमिति, उक्त'च-'जं सामन्नग्गहणं भावाणं नेय कट्टुमागार । अविसेसिऊण अत्थे दसणमिइ वुच्चए समए ।।१॥ तदेवात्मतो गुण स एव प्रमाण दर्शनगुणप्रमाणम् , इदच चक्षुर्दर्शनादिभेदाच्चतुर्विधम् , भावचक्षुरिन्द्रियावरणक्षयोपशमाद् द्रव्येन्द्रियानुपप्याताच्च चक्षुर्दर्शनिनः--चक्षुदर्शनलब्धिमतो जीवस्य घटादिपु द्रव्येषु चक्षुषो दर्शन चक्षुर्दर्शनम् , भवतीति क्रियाध्याहार , सामान्यविषयत्वेऽपि चास्य यद् घटादिविशेषाभिधानं तत्सामान्यविशेषयो कथञ्चिदभेदादेकान्तेन विशेषेभ्यो व्यतिरिक्तस्य सामान्यस्याग्रहणख्यापनार्थम् , उक्तच-"नि विशेष विशेषाणा ग्रहोदर्शनमुच्यते” इत्यादि, चक्षुर्वर्जशेषेन्द्रिय चतुष्टयं मनश्चचक्षुरुच्यते, तस्य दर्शनमचक्षुर्दर्शन, तदपि भावाचक्षुरिन्द्रियावरण- क्षयोपशमात् द्रव्येन्द्रियानुपघाताच्च अचक्षुर्दर्शनिन.-अचक्षुर्दर्शनल- ब्धिमतो जीवस्यात्मभावे भवति, आत्मनि-जीवे भावः-संश्लिष्टतया सम्बन्धो, विषयस्य घटादेरिति गम्यते, तस्मिन् सति इद प्रादुर्भवतीत्यर्थः- इदमुक्त भवति-चक्षुरप्राप्यकारि ततो दुरस्थपि स्वविषयं परिच्छिनत्ती- त्यस्यार्थस्य ख्यापनार्थ घटादिपु चक्षुर्दर्शनं भवतीति पूर्व विषयस्य भेदेनाभिधानं कृतं, श्रोत्रादीनि तु प्राप्यकारीणि ततो द्रव्येन्द्रिय संश्लेष द्वारेण जीवेन सह सम्बद्धमेव विषयं परिचछिन्दन्तीत्येतदर्शनार्थमात्मभावे भवतीत्येवमिह विषयस्याभेदेन प्रतिपादनमकारीति, उक्वच- "पुटसुणेइ सद्द रुवं पुण पासई अपुट्ठ'तु” इत्यादि । अवधेर्दर्शनमवधिदर्शनम् , अवधिदर्शनिन - अवधिदर्शनावरणक्षयोपशमसमुद्भू तावधिदर्शनलब्धि- मतो जीवस्य सर्वेष्वपि रुपिद्रव्येषु भवति, न पुनः सर्वपर्यायेषु,यतोऽ . - २० जनागमन्यायसंग्रहः , वधेरुत्कृष्टतोऽप्येकवस्तुगता. सख्येया असंख्येया वा पर्याया विषयत्वेनोक्ता , जघन्यतस्तु द्वौ पर्यायौ द्विगुणितो, रुपरसगन्धस्पर्शलक्षणाश्चत्वारः पर्याया इत्यर्थ , उक्त च “दव्वओ असंखेज्जे संखेज्जे आवि पज्जवे लहइ । दो पज्जवे दुगुणिए लहइ य एगाउ दवाओ ॥१॥ अत्राह - ननु पर्याया विशेषा उच्यन्ते, नच दर्शनं विशेषविषयं भवितुमर्हति, ज्ञानस्यैव तद्विषय- त्वात् , कथमिहावधिदर्शनविषयत्वेन पर्यायानिर्दिष्टाः, सोधूक्त, केवलं पर्यायैरपि घटशरावोदञ्चनादिभिमदादिसामान्यमेव तथा तथा विशिष्यन्ते न पुनस्ते तत एकान्तेन व्यतिरिच्यन्ते, अतो मुख्यतः सामान्य गुणीभूतास्तु विशेषा अप्यस्य विषयी भवन्तीति, ख्यापनार्थोऽत्र तदुपन्यास केवलं-सकलदृश्यविषयत्वेन परिपूर्ण दर्शनं केवलदर्शनिन -तदावरण- क्षयाविर्भूततल्लब्धिमतो जीवस्य सर्वद्रव्येषु मूर्तामृर्तेषु सर्वपर्यायेषु च- भवतीति । मनः पयार्यज्ञानं तु तथाविधक्षयोपशमपाटवात् सर्वदाविशेषा नेव गृह्णदुत्पद्यते न सोमान्य, अतस्तद्दशनं नोक्त मिति, तदेतदर्शनगुण प्रमाणम् ॥ मूलः-से कि तं चरित्तगुणप्पमाणे १, २ पंचविहे पएणत्ते, तंजहा-सामाइअचरिचगुणप्पमाणे छेत्रोवट्ठावण- चरित्तगुणप्पमाणे परिहारविसुद्धिअचरित्तगुणप्पमाणे सुहुमसंपराय चरित्तगुणप्पमाणे अहक्खायचरित्तगुणप्पमाणे । सामाइअचरित्त- गुणप्पमाणे दुविहेपएणत्ते, तंजहा-इत्तरिए अ आवकहिए अ। छेत्रोवट्ठावणचरित्तगुणप्पमाणे दुविहे पएणचे, तंजहा- भावप्रमाणम् २१ साइबारे अनिरइआरे अ। परिहारविसुद्धि चरित्तगुएप्पमाणे दुविहे पण्णात्ते, तंजहा निविसमाण य निविट्ठकाइए अ। सुहुमसंपरायगुणप्पमाणे दुविहे पएणत्ते, तंजहा—(संकिलिस्स- माणए य विसुज्झमाणए य, अहक्खायचरिचगुणप्पमाणे दुविहे पन्नत्ते, तंजहा-) पडिवाई अ अपडिवाई अ । (अहवा) अहक्खायचरिचगुणप्पमाणे, दुविहे पएणचे, तंजहा- छउमथिए अ केवलिए य । से तं चरिचगुणप्पमाणे, से तं जीवगणप्पमाणे, से तं गुणप्पमाणे (सू० १४४) टीका :--चरन्त्यनिन्दितमनेनेति चरित्रं तदेव चारित्रं, चारित्र मेवगुण. २ स एव प्रमाणं २ सावद्ययोगविरतिरुपं. तच्च पंचविधम्, सामायिकादि, पचविधमप्येतदविशेषत: सामायिकमेव, छेदादि विशेषैस्तु विशेष्यमाणं पञ्चधा भिद्यते, तत्राचं विशेषाभावात् सामान्यसंज्ञायामेवा- वतिष्ठते सामायिकमिति, सामायिक पूर्वोक्तशब्दार्थ तच्चत्वरं यावत्कथितं च तत्रेत्वरं भाविव्ययदेशान्तरत्वात् स्वल्पकालं, तच्चाद्य चरमतीर्थकर- कालयोरेव यावदद्यापि महाव्रतानि नारोप्यन्ते तावच्छिष्यस्य संभवति, आत्मन कथां यावदास्ते तद् यावत् कथं-यावज्जीवमित्यर्थ. यावत्कथमेव यावत्कथिकम् , एतच्च भरतैरावतेष्वाद्य चरमवर्जमध्यमतीर्थकरसाधूनां महाविदेहतीर्थकरयतीनां च संभवति, पूर्वपर्यायस्य छेदेनोपस्थापनं महा- व्रतेषु यत्र तच्छेदोपस्थापनं, भरतैरावतप्रथमपश्चिमतीर्थकरतीर्थ एव, नान्यत्रप तच्च सातिचारं निरतिचारं च तत्रेत्वरसामायिकस्य शैक्षकस्य .
है २२ जनागसन्यायसंग्रहः यदारोप्यते तीर्थान्तर वा सक्रामत साधोयथा पार्श्वनाथतीर्थान्महावीर- तोर्थ संक्रामतस्तन्निरतिचारं, मूलगुणघातिनस्तु यत् पुनर्वतारोपणं तत्सातिचारं । परिहार -तपोविशेषस्तेन विशुद्धं, अथवा परिहार. अनेष- णीयादेः परित्यागोविशेषेणशुद्धो यत्र तत्परिहारविशद्ध तदेव परिहार- शुद्धिकम्, तदपि द्विविध-निविश्यमानकं निर्विष्टकायिकं च तत्र निर्वि- श्यमानकम्-ओसेव्यमानम् , अथवा तदनुष्ठातार साधवो निर्विश्यमा- नकाः तत्सहयोगात्तदपि निर्विश्यमानकं, निर्विष्ट-आसेवित प्रस्तुत तपो विशेष. कायो येपां ते निर्विष्टकाया , त एव निर्विष्टकायिका साधवः, तदाश्रयत्वाद् प्रस्तुतचारित्रपि निर्विष्टकायिकं, इदमत्र हृदयम्-तीर्थकर- चरणमूले येन तीर्थकरसपीपे अद प्रतिपन्नपूर्व तदन्तिके वा नवको गण परिहारविशुद्धिचारित्रं प्रतिपद्यन्ते, नानस्य समीपे, तत्रैक कल्प- स्थितो यदन्तिके सर्वा सामाचारो क्रियते, चत्वारन्तु खाधवो वक्ष्यमाणं तप कुर्वन्ति, ते च परिहारिका इत्युच्यन्ते, अन्ये तु चत्वारो वैयावृत्य कर्तृत्वं प्रतिपद्यन्ते, तेचानुपरिहारिका इति व्यपदिश्यन्ते, तत्र परिहार- काणां तपः प्रोच्यते-ग्रीष्मे जघन्यतश्चतुर्थ मध्यम पदे षष्ठ उत्कृष्टतस्त्वष्टमं शिशिरे जघन्यमध्यमोत्कृष्टपदेषु यथा संख्यपष्ठमष्टमदशमं च, वर्षासु जघ- न्यादिपदत्रये पि यथाक्रममष्टमं दशमं द्वादशं च, शेषास्तु कल्पस्थितानु- परिहारिकाः पचापि प्रायो नित्यभक्ता नोपवासं कुर्वन्ति, भक्तं च पञ्चानामप्याचामलमेव. नान्यत्, ततः परिहारिकाः षण्मासान्यावद्यथोक्त तप कृत्वा अनुपहारिकता प्रतिपद्यन्ते, अनुपरिहारिकास्तु परिहारिकता, तैरपि परमासान्यावद्य दा तपः कृतं भवति तदा कृततपसामष्टानां मध्यादेक: कल्पस्थितो व्यवस्थाप्यते, अग्रतनश्चासौ षड्मासान्यावद्यथोक्तं तपः , भावप्रमाणम २३ करोति, शेषास्तु सप्तानुचरतामाश्रयन्ति, एवं चाष्टादशभिर्मासैरयं कल्प' समाप्यते तत्समाप्तौ च भूयस्तमेव कल्प जिनकल्पं प्रति पोरन् गच्छं वा प्रत्यागच्छेयुरिति त्रयीगतिः, अपरं चैतच्चारित्रं छेदोपस्थापनचरणवतामेव भवति, नान्येषामित्यलमतिप्रसंगेन, तदेवमिह यो यस्तपः कृत्वा अनुपरिहारिकतां कल्पस्थिततां वाऽङ्गी करोति तत्सम्ब- न्धी परिहारविशुद्धिक निर्विष्टकायिकमुच्यते, ये तु तप' कुर्वन्ति तत्स- म्बन्धि निर्विश्यमानकमिति स्थितम् । संपरैति-पर्यटति ससारमनेनेति सम्पराय क्रोधादिकांयः, लोभाशमात्रावशेषतया सूक्ष्म सम्परायो यत्र तत्सूक्ष्मसम्परायम् इदमपि संक्लिश्यमान विशुध्यमानकभेदात् द्विधैव, तत्र श्रेणीमारोहतोविशुध्यमानकमुच्यते, ततः प्रच्यवमानस्य' सक्लिश्यमा- नकमिति, 'अहक्खायं ति अथ शब्दोऽत्रयाथातथ्य्ये आडभिविधौ आ- समन्ताद्याथातथ्येन ख्यातमथाख्यातं कषायोदयाभावतो निरतिचारत्वात पारमाथिकरूपेण ख्यातमथाख्यातमित्यर्थ , एतदपि प्रतिपात्यप्रतिपाति भे- दात् द्वधा, तत्रोपशान्तमोहस्य प्रतिपाति क्षीणमोहस्यत्वप्रतिपाति, अ- थवा केवलिनश्छमस्थस्यचोपशान्तमोहक्षीणमोहस्य तद् भवत्यत स्वामी । भेदात् द्वविध्यमिति । तदेवच्चारित्रगुणप्रमाणम् , तदेत्तज्जीवगुणप्रमा- ण, तदेतद्गुणप्रमाणमिति ।।१४४॥ तदेवजीवाजीवभेदभिन्नं गुणप्रमाणं प्रतिपाद्य क्रमप्राप्तं नयप्रमाण प्रतिपादयन्नाह मूलः-से कि तं नयप्पमाणे १, २ तिविहे पएणत्ते, तंजहा-पत्थगदिट्ठ तेणं वसहिदिट्टतेणं पएसदिट्ट तेणं । से किं तं पत्थगदिट्ट तेणं १, २ से जहानामए केई ।
२४ , जैनागमन्यायसंग्रह: पुरिसे परसु गहायअडवीसमहुत्तो गच्छेज्जा, तं पासित्ता केई वएज्जा-कहिभवं गच्छसि ?, अविसुद्धोनेगमो भणइ-पत्थगस्स गच्छामि, तंच केई छिदमाणं पासित्ता वएज्जा-किभवं छिदसि १, विसुद्धोनेगमो भणइ-पत्थयं छिदामि, तंच केई तच्छमाणं पा- सित्ता वएज्जा--किंभवं तच्छसि १, विसुद्धतरात्रो णेगमोभणइ पत्थयं तच्छामि, तंच केई उक्कीरमाणं पासित्ता वएज्जा-कि भवं उक्कीरमि ?, विसुद्धतरायो णेगमो भणइ पत्थयं उक्कीराम, तंच केई (वि) लिहमाणं पासित्ता वएज्जा-किं भवं (वि) लिहसि ?, विसुद्धतराअोणेगमो भणइ पत्थयं (वि) लिहामि । एवं विसुद्धतरस्स णेगमस्स नामाउडिअो पत्थो, एवमेव ववहार- स्सवि, संगहस्स चियमियमेज्ज समारूढो पत्थो, उज्जुसुयस्स- पत्थयोऽविपत्थरोमेज्जपि पत्थरो तिरह सद्दनयाण पत्थयस्म अत्यादिगारजाणो जस्स वा वसेण पत्थरो निप्फज्जइ, से तं पत्थयदिट्ट तेणं ॥ . टीका :-अनन्तधर्मणो वस्तुन एकांशेन नयनं नय: स एव प्रमाणं नयप्रमाणं, त्रिविध प्रजप्तमिति, यद्यपि नैगम संग्रहादि भेदतो बह्वो नयास्तथापि प्रस्थकादि दृष्टान्तत्रयेण सर्वेपामिह निरुपयितु मिष्टत्वात्रैविध्यमुच्यते, तथाचाह-तद्यथा-प्रस्थकदृष्टान्तेनेत्यादि, २५ . यद्यप्यत्र भावप्रमाणम् प्रस्थकादिदृष्टान्तत्रयेण हेतुभूतेन त्रिविधं नयप्रमाणं भवतीत्यर्थः, तत्र प्रस्थक दृष्टान्त दर्शयति,-तद्यथानामकः कश्चित्पुरुषः परशु-कुठारं गृहीत्वा अटवीमुखो गच्छेदित्यादि, इदमुक्त भवति--प्रस्थको-मागधदेशप्रसिद्धो धान्यमानविशेषस्तद्धेतुभूतकाष्ठकर्तनाय कुठारव्यग्रहस्तं तक्षादि पुरुषमटवीं- गच्छन्तं दृष्ट्वा कश्चिदन्यो वदेत्-क भवान् गच्छति १, तत्राविशुद्ध भैगमो भणति-अविशुद्धनैगमनयमतानुसारी सन्नसौ प्रत्युत्तरयतीत्यर्थः, । किमित्याह प्रस्थकस्य गच्छामि, इदमुक्त भवति-नैके गमा - वस्तुपरिछेदा यस्य अपि तु वहव स निरुक्तवशात् ककारलोपतो नैगम उच्यते, अतो प्रस्थककारणभूतकाष्टनिमित्तमेवगमनं, नतु प्रस्थकनिमित्तं, तथाऽप्यनेकप्रकारवस्त्वभ्युपगम परत्वान् कारणे कार्योपचारात् तथाव्यवहार दशेनादेवमप्यभिधत्तेऽसौ-प्रस्थकस्य गच्छामोति, तंच कश्चित् छिन्दन्तं, वृक्षमिति गम्यते, पश्येद् , दृष्ट्वा च वदेत्-किं भवान् छिनत्ति ?, तत प्राक्तनात् किंचिद्विशुद्धनैगमनयमतानुसारी सन्नसौ-भणति-प्रस्थक छिनद्मि, अत्रापि कारणे कार्योपचारात्तथाव्यवहृति दर्शनादेव काष्ठेऽपि छिद्यमाने प्रस्थकं छिनमीत्युत्तर, केवलं काष्ठस्यप्रस्थकं प्रति कारणता- भावस्यात्र किंचिदासन्नत्वाद्विशुद्धत्वं, प्राक् पुनरतिव्यवहितत्वात् मलीम- सत्वम् , एवं पूर्वपूर्वापेक्षया यथोत्तरस्य विशुद्धता भावनीया, नबरं तक्ष्णुवन्तं तनूकुर्वन्तं उकिरतं वेधनकेन मध्याद् विकिरन्त विलिखन्तं- लेखन्या मृष्ट कुर्वाणं, एवमनेनप्रकारेण तावन्नेय यावद्विशुद्धतरनैगमस्य 'नामाउडिउत्ति आकुट्टितनामा प्रस्थकोऽयमित्येवनामाङ्कितो निष्पन्नः प्रस्थक इति, । एवमेव व्यवहारस्यापीति, लोकव्यवहारप्राधान्येनायं व्यव- हारनय , लोके च पूर्वोक्तावस्थासु सर्वत्र प्रस्थकव्यवहारो दृश्यतेऽतो २६ जैनागमन्यायसंग्रह . १ व्यवहारनयोऽप्येवमेवप्रतिपद्यते इति भाव । 'संगहस्से' त्यादि, सामान्यरुपतया सर्व वस्तु संगृह्णाति-क्रोडीकरोतीति संग्रहस्तस्य मतेन चितादिविशेषणैविशिष्ट एव प्रस्थो भवति, नान्यः, तत्र चितो-धान्येन- व्याप्तः, सच देशतोऽपि भवत्यत आह 'मित ' पूरित:, अनेनैव प्रकारे- ण मेयं समारुढं यत्र साहितादेराकृतिगणत्वान्मेयसमारुढः, अयमत्र भावार्थ:-प्राक्तननयद्वयस्याविशुद्धत्वात् प्रस्थककारणमपि प्रस्थक उक्त: अनिष्पन्न प्रस्थकोऽपि स्वकार्याकरणकालेऽपि प्रस्थक इष्ट , अस्य तु ततोविशुद्धत्वाद्धान्यमानलक्षण स्वार्थ कुर्वन्नेव प्रस्थक तस्य तदर्थत्वात् , तदभावे च प्रस्थकव्यपदेशेऽतिप्रसङ्गादिति यथोक्त एव प्रस्थक , सोऽपि प्रस्थक सामान्याव्यतिरेकात् व्यतिरेके चाप्रस्थकत्व प्रसंगात् सर्व एक एव प्रस्थक इति प्रस्तुतनयो मन्यते, सामान्यवादित्वादिति, । "उज्जुसुयस्से? त्यादि ऋजुसूत्रः-पूत्रोक्तशब्दार्थः तस्य निष्पन्नस्वरुपोऽर्थक्रियाहेतुः प्रमथको- ऽपि प्रस्थक , तत्परिछिन्नं धान्यादिकमपि वस्तु प्रस्थक , उभयत्र प्रस्थ- कोऽयमिति व्यवहारदर्शनात , तथाप्रतीते , अपरं चासौ पूवस्माद्विशुद्धत्वा- द्वर्तमाने एव मानमेये प्रस्थकत्वेन प्रतिपद्यते, नातीतानागतकाले, तयोविनष्टानुत्पन्नत्वेनासत्वादिति 'तिएहसद्दनयाण' मित्यादि, शब्दनया - शब्दसमभिरुवंभूताः, शब्देऽन्यथा स्थितेऽथमन्यथानेच्छन्न्यमी, किन्तु ?, यथैव शब्दो व्यवस्थितस्तथैव शब्देनार्थ गमयन्तीत्यतः शब्दनया उच्यन्ते, द्यास्तु यथाकथश्चिच्छब्दा प्रवर्तन्तामर्थी एव प्रधानमित्यभ्युपगमपरत्वा- .र्थनया प्रक्रीय॑न्ते, अत ---एपां त्रयाणां शब्दनयानां, 'प्रस्थकार्थाधि- कारजः' प्रस्थकस्वरुपपरिज नोपयुक्त प्रस्थक , भावप्रधाना ह्यते नयाइत्यतो शव्दप्रधाना नयाः भावप्रमाणम् २७ भावप्रस्थकमेवेच्छन्ति, भावश्च प्रस्थकोपयोगोऽत स प्रस्थकः, तदुपयोग- वानपि च ततोऽव्यतिरेकात् प्रस्थक , योहि यत्रोपयुक्त सोऽमीषा मते स एवभवति, उपयोगलक्षणो जीव उपयोगश्चत् प्रस्थकादिविषयतया परीणत किमन्यज्जोवस्य रुपान्तरमस्ति ?, यत्र व्यपदेशान्तरं स्यादिति भाव 'जस्सवावसेणे' त्यादि, यस्य वा प्रस्थककर्तुगतस्योपयोगस्य वशेन प्रस्थको निष्पद्यते तत्रोपयोगे वर्तमान कर्ता प्रस्थको, नहि प्रस्थकेऽनुपयुक्त प्रस्थकं निवर्तयितु कर्ता समर्थ , ततस्तदुपयोगानन्यत्वात् स एव प्रस्थक , इमां च तेऽत्र युक्तिमभिदधति-सर्ववस्तु स्वात्मन्येव वर्तते, नत्वात्मव्यति रिक्त आधारे, वक्ष्यमाण युकत्या एतन्मतेनान्यस्यान्यत्र वृत्त्ययोगात्, प्रस्थक श्च निश्चयात्मकं मानमुच्यते, निश्चयश्च ज्ञान, तत्कथं जडात्मनि काष्ठ- भाजनेवृत्तिमनुभविष्यति ?, चेतनाचेतनयो सामानाधिकरण्याभावात् , तस्मात् प्रस्थकोपयुक्त एव प्रस्थक । 'सेत' मित्यादि निगमनम् ॥ मूल. से कि तं वसहिदिड तेणं १, २ से जहानामए केई पुरिसे कंचि पुरिसं वएज्जा-कहि भवं वससि १, तं अवि- सुद्धो णेगमो भणइ-लोगे वसामि, लोगे तिविहे पएणत्ते, तंजहा- उड्ढलोए अहोलोए तिरिअलोए, तेसु सव्वेसु भवं वससि ?, विसुद्धो णेगमो भणइ-तिरिअलोए वसामि, तिरीअलोए जंबुद्दीवाइबा सयंभूरमणपज्जवसाणा असंखिज्जा दीवसमुद्दा पएणता, तेसु सव्वेसु भवं वससि ?, विसुद्धतराअोणेगमो भणइ- जंबुद्दीवे बसामि, जंबुद्दीवे दस खेचा, पण्णत्ता, तंजहा-भरहे- . - २८ जैनागमन्यायसंग्रहः एरवए हेमवए एरण्णवए हरिवस्से रम्मगवस्से देवकुरू उत्तरकुरू पुव्वविदेहे अवरविदेहे, तेसु सव्वेसु भवं वससि ?, विसुद्धतरात्रो णेगमो भणइ-भरहे वासे बसामि, भरहे वासे दुविहे पण्णते तंजहा- दाहिणड्ढभरहे उत्तरड्ढभरहे अ, तेसु सव्वेसु (दोसु) भवं वससि? विसुद्धतरामो णेगमो भणइ-दाहिणड्ढभरहे वसामि, दाहिणड्ढ- भरहे अणेगाई गामागरणगरखेडेकब्बडमडंवदोणमुहपट्टणासम- संवाहसएिणवेसाई, तेसु सव्वेसु भवं वससि ?, विसुद्धतरात्रो णेगमो भणइ-पालिपुत्ते वसामि, पाडलिपुत्ते अणेगार्ड गिहाई तेसु सव्वेसु भवं वससि ?, विसु० णेग० भणइ-देवदत्तस्स घरे वसामि, देवदत्तस्सघरे अणेगा कोहगा, तेसु सव्वेसु भवं वससि ?, विसु. णे० भणइ-गब्भ घरे वसामि, एवंविसुद्धस्स णेगमस्स वसमाणो, एवमेव ववहारस्सवि, संगहस्स संथारसमारूढो वमइ, उज्जुसुअस्स जेसु आगासपएसेसु प्रोगाढो तेसु वसइ, तिएहंसद्दनयाणं आयभावे वसइ । से तं वसहिदिट्टतेणं । टीका:-वसतिः निवासस्तेन दृष्टान्तेन नयविचार उच्यते, तथा नामक कश्चित्पुरुष: पाटलिपुत्रादौ वसन्तं कञ्चित्पुरुपं वदेत् क भवान् वसति १ तत्राविशुद्धनैगमो भणति अविशुद्धनैगमनयमतानुसा- री सन्नसौ प्रत्युत्तरं प्रयच्छति-लोके वसामि, तन्निवासक्षेत्रस्यापि चतु- दशरज्ज्वात्मकलोकादनन्तरत्वाद् इत्थमपि च व्यवहारदर्शनात् , विशु- .
भावप्रमाणम् २६ द्धनैगमस्त्वतिव्याप्तिपरत्वादिदमसङ्गतं मन्यते, सतस्तियलोके वसामी- संक्षिप्योत्तरं ददाति, विशुद्धतर स्त्विदमप्यतिव्याप्ति निष्ठं मन्यते, ततो जम्बूद्वोपेवसामीति संक्षिप्ततरमाह, एवभारतवर्षदक्षिणार्द्धभरतपाटलि- पुत्रदेवदत्तगृहगर्भगृहेष्वपि भावनीयम् , एवं 'विसुद्धस्सणेगमस्स वस- माणो वसइ' एवमुत्तरोत्तरभेदापेक्षया विशुद्धतरनैगमस्य वसन्नेव वसति, नान्यथा, इदमुक्तं भवति-यत्र गृहादौ सर्वदा निवासित्वेनासौ विवक्षि- त. तत्र तिष्ठन्नेव एष तत्र वसतीति व्यपदिश्यते, यदि पुन. कारण- वशतोऽन्यत्र रथ्यादौ वर्तते तदा तत्र विवक्षिते गृहादौ वसतीति न प्रो- च्यते, अतिप्रसङ्गादिति भावः, 'एवमेवे' त्यादि, लोकव्यवहारनिष्ठो हि व्यवहारनयो, लोके च नैगमोक्तप्रकार सर्वेऽपि दृष्यन्ते इति भाव , अथ चरमनैगमोक्तप्रकारो लोफे नैष्यते, कारणतो ग्रामादौ वर्तमानेऽपि देवदत्ते पाटलिपुत्रे एष वसतीति व्यपदेशदर्शनादिति चेत् , नैतदेवं, प्रोषिते देवदत्ते स इह वसति नवेति केनचित्पृष्टे प्रोषितोऽसौ नेह वसतीत्यस्यापि लोकव्यवहारस्य दर्शनादिति । 'संगहस्से' त्यदि, प्राक्त- नात् विशुद्धत्वात् सग्रहनयस्य गृहादौ तिष्ठन्नपि संस्तारकारूढ़ एव श- यनक्रियावान् वसतीत्युच्यते, इदमुक्तं भवति-संस्तारकेऽवस्थानादन्यत्रनि- वासार्थ एव न घटते, चलनादिक्रियावत्त वात् , मार्गादिप्रवृत्तवत् संस्तरके च वसतो गृहादौ वसतीति व्यपदेशायोग एव, अतिप्रसङ्गात् , तस्मात कासौ वसतीति निवासजिज्ञासायां सस्तराके-शय्यामात्रस्वरूपे वसतीत्ये तदेवास्य मतेनोच्यते, नान्यदिति भावः, स च नानादेशादिगतोऽप्येक एव संग्रहस्य सामान्यवादित्वादिति ? ऋजुसूत्रस्य तु पूर्वस्माद्विशुद्धत्वाद् येष्वाकाशप्रदेशेष्ववगाढस्तेष्वेव वसतीत्युच्यते न संस्तराके, सर्वस्यापि m जैनागमन्यायसग्रहः वस्तुवृत्या नभस्येवावगाहात् , येषु प्रदेशेषु सस्तारको वर्तते संस्तारके णवाक्रान्ता वर्तन्ते, ततो येष्वेव प्रदेशेषु स्वयमवगाढस्तेष्वेव वसतीत्यु- च्यते, सच वर्तमानकाल एवास्ति, अतीतानागतयोविनष्टानुत्पन्नत्वेनैतन्मतेऽ- सत्वादिति ।। त्रयाणां शब्दनयानामात्मभावे-स्वस्वरूपे सर्वोऽपि वसति अन्यस्यान्यत्रवृत्ययोगात् , तथाहि अन्योऽन्यत्र वर्तमानः किं सर्वात्मना वर्तते देशात्मनावा ?, यद्याद्यः पक्षस्तर्हि तस्याधारव्यतिरेकिणास्वकोयरू- पेणाप्रतिभासनप्रसङ्गो, यथाहि संस्तारकाद्याधारस्य स्वरूपं सर्वात्मना तत्र वृत्त न तद् व्यतिरेकेणोपलभ्यते एवं देवदत्तादिरपि सर्वात्मना तत्राधीयमानस्तद् व्यतिरेकेण नोपलभ्यते, अथ द्वितीयो विकल्पः स्वी- क्रियते, तर्हि तत्रापि देशे अनेन वर्तितव्यं, तत पुनरपि विकल्पद्वयं-कि सर्वात्मनावर्त्तते देशात्मनावेति १ सर्वात्मपक्षेदेशिनो देशरूपताऽऽपत्ति, देशात्मपक्षे तु पुनस्तत्रापिदेशे देशिना वर्तितव्यं, ततः पुनरपि तदेव वि- कल्पद्वयं, तदेवदूषणमित्यनवस्था, तस्मात्सर्वोऽपि स्वस्वभाव एव निव- सति, तत्परित्यागेनान्यत्र निवासे तस्य निःस्वभावता प्रसंगादित्यलं बहुभा- पितया । ‘से त' मित्यदि निगमनम् मूलः-से किं तं पएसदिट्टतेणं १, २ णेगमो भणइ- छएह पएसो, तंजहा-धम्मपएसो अधम्मपएसो अागासपएसो जीवपएसो खंधपएसो देसपएसो, एवं वयंतं णेगमं संगहो भणई-ज भणसि-छएहंपएसो तं न भवइ, कम्हा ?, जम्हा जो देसपएसो सो तस्सेव दव्बस्स, जहा को दिट्ठतो ?, दासेण मे खरो कीओ दासोऽवि मे खरोऽवि मे, तं मा भणाहि-छएहं , - . #
भावप्रमाणम्
३१
~
पएसो, भणाहि पंचएहं पएसो, तंजहा-धम्मपएसो अधम्मपएसो
आगासपएसो जीवपएसो खंधपएसो, एव वयंत संगहं ववहारो
भणइ-ज भणसि-पंचएहं पएसो, तं न भवइ, कम्हा ?, जइ
जहा पंचएहं गोढिाणं पुरिसाणं केइ दव्व जाए सामएणे भवइ
तंजहा-हिरणे वा सुब्बएणे वा धणे वा धरणे वा तं न ते जुत्तं
। वत्तं जहा पंचण्हं पएसो, तं मा भणिहि-पंचएहं पएसो,
भणाहि-पंचविहो पएसो, तंजहा-धम्मपएसो अधम्मपएसो
आगासपएसो जीवपएसो खंधपएसो, एवं वयं ववहारं उज्जु-
सुरो भणइ-जं भण सि-पंचविहोपएसो, त न भवइ, कम्हा १,
(जइ ते पंचविहो पएसो एवं ते एककेको पएसो पंचविहो एवं
ते पणवीसतिविहो पएसो भवइ-तं मा भणाहि-पंचविहो पएसो,
भणाहि-भइयव्बो पएसो-सि धम्मपएसो सिअ अधम्मपएसो
सित्र आगासपएसो सिअ जीवपएसो सिम खंधपएसो, एवं
वयंतं उज्जुसुयं सपइ सद्दनो भणइ-जं भणसि भइयव्बो पएसो,
तं न भणइ, कम्हा ?, जइ भइअव्वो पएसो, एवं ते धम्मपएसो
ऽवि सिअ धम्मपएसो सिअ अधम्मपएसो सिथ आगासपएसो
सिअ जीवपएसो सिथ खंधपएसो, अधम्मपएसोवि सिब
धम्मपएसो जाव खंधपएमो, जीवपएसोऽवि सिअ धम्मपएसो
३२
जैनागमन्यायसंग्रह
-
जाव सिअ खंधपएसो, एवं ते अणवत्था भविस्सइ, तं मा भणाहि-
भइयव्वो पएसो, भणाहि धम्मे पएसे से पएसे धम्मे, अहम्मे पएसे
से पएसे अहम्मे, आगासे पए से से पए से श्रागासे, जीवे पएसे
से पएसे नो जीवे, खंधे पएसे से पएसे नोखंधे, एवं वयंत
सदनयं सभिमरूढोभणइ-जं भणसि-धम्मे पएसे से पएसे धम्मे
जाव जीवे पएसे से पएसे नोजीवे खंधे पएसे से पएसे नोखंधे,
तं न भवइ, कम्हा ?, इत्थं खलु दो समासा भवंति, तंजहा-
तपुरिसे अ कम्मधारए अ, तं ण णज्जइ कयरेणं समासेणं
भणसि ?, कि तप्पुरिसेण किं कम्मधारएणं ?, जइ तप्पुरिसेणं
भणसि तो मा एवं भणाहि, अह कम्मधारएणं भणसि तो विसेस
ओ भणाहि, धम्मे असे पएसे अ से पएसे धम्मे हम्मे असे
पएसे असे पए से अहम्मे, आमासे असे पए से असे पएसे आगार
जीवे असे पएसे असे पए से नोजीवे, खंधे असे पएसे असे
पए से नोखंधे, एवं वयं समभिरूढ संपइ एवंभूत्रोभणइ-ज जं
भणसि तं त सव्वं कसिणं पडिपुरणं निरवसेस एगगहण गहियं
देसेऽवि मे अवत्थू पएसेऽवि मे अवत्थू से तं पएसदिट्टतेणं ।
से तं नयप्पमाणे (स० १४५)
,
, भावप्रमाणम् ३३ टीका:-प्रकृष्टोदेशःप्रदेशो-निर्विभागो भाग इत्यर्थ, स एव दृष्टान्त स्तेन नय मतानि चिन्त्यन्ते--तत्र नैगमो भणति-षणा प्रदेश. तद्यथा- 'धम्मपएसे' इत्यादि, धर्मशब्देन धर्मास्तिकायो गृह्यते, तस्य प्रदेशो धर्म- प्रदेश , एवमधर्माकाशजीवास्तिकायेष्वपियोज्यं, स्कन्ध --पुद्गलद्रव्यनिचय स्तस्य प्रदेशः स्कन्धप्रदेश., देश -एषामेव पंचानां धर्मास्तिकायादिद्रव्याणा प्रदेशद्वयादिनिवृत्तोऽवयवस्तस्य प्रदेशो देशप्रदेश, अय च प्रदेश सामान्या व्यभिचारात् षण्णां प्रदेश इत्युक्त, विशेषविवक्षायां तु षट् प्रदेशा । एवं वदन्तं नैगर्म ततो निपुणतर' संयहो भणति-यद् भणसि पएणां प्रदेश इति, तन्न भवति-तन्न युज्यते, कस्मात् ?, यस्मात् यो देश प्रदेश इति षष्ट स्थाने भवता प्रतिपादितं, तदसङ्गतमेव, यतोधर्मास्ति कायादिद्रव्यस्य सम्बन्धी यो देशस्तस्य य प्रदेश स वस्तुवृत्या तस्यैव द्रव्यस्य यत्सम्बन्धो देशो विवक्ष्यते, द्रव्याव्यतिरिक्तस्यदेशस्य यः प्रदेशः स द्रव्यस्यैव भवति, यथा कोऽत्र दृष्टांन इत्याह-'दासेणे' त्यादि' लोकेऽ- प्यवं व्यवहति श्यते, यथा कश्चिदाह-मदीय दासेन खरः क्रीतः, तत्र दासोऽपि मदीय , खरोऽपि मदीय , दासस्य मदीयत्वात् तत्क्रीतः खरोऽपि मदीय इत्यर्थः, एवमिहापि देशस्य द्रव्यसम्बन्धित्वात्तत्प्रदेशोऽपि द्रव्यसन्बन्थ्येवेति भाव , तस्मान्मा भण - षण्णां प्रदेश., अपित्वेव भण- पञ्चानां प्रदेश इति, त्वदुक्त-षष्ठप्रदेशस्यैवाघटनादित्यर्थ . तदेव दर्शयति- तद्यथा-धर्मप्रदेश इत्यादि, एतानि च पच द्रव्याणि तत्प्रदेशाश्वत्येवमप्य- विशुद्धसंग्रह एव मन्यते, अवान्तर द्रव्ये समान्याद्यभ्युपगमात, विशुद्धस्तु द्रव्यवाहुल्य प्रदेशकल्पनां च नेच्छत्येव, सर्वस्यैव वस्तुसामान्य क्रोडी- कृतत्वेनकत्यादित्यल प्रसगेन । प्रकृतमुच्यते-एवं वदन्तं संग्रहं ततोऽपि .
जैनागमन्यायसंग्रहः ? " निपुणो व्यवहारो भणति, यद् भणसि पश्चानां प्रदेश इति, तन्न भवति युज्यते, कस्मात् ? यदि यथा पञ्चानां गोष्ठिकानां किञ्चद् द्रव्यं सामान्य-एकं भवति, तद्यथा-हिरण्यवेत्यादि, एवं यदि प्रदेशोऽपि स्यात्तत्तो युज्यते वक्तु-पञ्चानां प्रदेश इति इदमुक्तं भवति-यथा के- पाश्चित् पंचानां पुरुषणां साधारणं किञ्चद्धिरण्यादि भवति, एवं पश्चा- नामपि धर्मास्तिकायादिद्रव्याणां यद्येक कश्चित्साधारण: प्रदेशः स्यात्त- देयं वाचो युक्ति घटते, नचैतदस्ति प्रतिद्रव्यं प्रदेश भेदात, तस्मान्मा। भण-पंचानां प्रदेशः, अपि तु भण- पचावध:-पचप्रकार. प्रदेशः, द्र व्यलक्षणस्याश्रयस्य पंचविधत्वादिति भाव , तदेवाह-धर्मप्रदेश इत्यादि, एवं वदन्तं व्यवहारमृजुसूत्रो भणति-यद् भणसि पंचविध. प्रदेशः तन्न भवति, कस्मात् ? यस्माद्यदि ते पचविध. प्रदेश एवमेकैको धर्मास्ति- कायादिप्रदेश. पविधः प्राप्तः, शब्दादत्र वस्तु व्यवस्था, शब्दाच्चैवमेव प्रतीतिभर्वति एवं च सति पंचविंशतिविध प्रदेश -- प्राप्नोति, पंचविध. किन्त्वेवं प्रदेश., म्याद्धमस्येत्यादि, इदमुक्नं भवति-भाज्यो- विकल्पनीयो विभजनीय. प्रदेश , कियद्भिविभागैः १ स्याद्धर्मप्रदेश इत्यादि पचभिः, ततश्च पंचभेद एव प्रदेश सिध्यति, स च यथा स्वमात्मीया- त्मीय एवास्ति न परकीय , तस्याक्रियाऽसाधकत्वात् प्रस्तुत नयमतेनाम- त्वादिति । एव भणन्तमृजुसूत्रं साम्प्रतं शब्दनयो भणति-यद्भास-भाज्य प्रदेश , तन्न भवति, कुतो ?, यतो यदि भाज्य. प्रदेशः, एवं ते धर्मास्तिकाय प्रदेशोऽपि कदाचिद् धर्मास्तिकायादिप्रदेश. स्याद्, अधर्मातिकायप्रदेशोऽपि कदाचिद् र्धास्तिकायादि प्रदेश स्याद्, इत्थमपिभजनाया अनिवारित्वात, तस्मान्मा भरण प्रदेशः, भरण-भाज्य: - भावप्रमाणम् ३५ यथा एकोऽपि देवदत्तः कदाचिद्राज्ञोभृत्य कदाचिदमात्यादेरिति, एवमाका- शास्तिकायादिप्रदेशोऽपिवाच्यं, तदेव नैयत्याभावात्तवाप्यनवस्था प्रसज्येतेति तन्मैव भण-भाज्य प्रदेशः, अपितु इत्थ भण-'धम्मे पएसे' [ से पएसे धम्मे] इत्यादि, इदमुक्तं भवति धर्म प्रदेश इति-धर्मात्मक प्रदेश इत्यर्थः अत्राह-नन्वयं प्रदेश सकलधर्मास्तिकायादिव्यतिरिक्त. सन् धर्मात्मक इत्युच्यते, आहोस्वित्तदेकदेशाव्यतिरिक्त सन् यथा सकलजीवास्तिकायै- कदेशैकजीवद्रव्याव्यतिरिक्त सॅस्तत्प्रदेशो जीवात्मक इति व्यपदिश्यत इत्याह 'से पएसे धम्मेऽत्ति स प्रशोधर्म -सकलधर्मास्तिकायादयतिरिक्त-इत्यर्थः, जीवास्तिकाये हि परस्परं भिन्नान्येवानन्तानि जीवद्रव्याणि भवन्ति, अतो य एकजीवद्गव्यस्य प्रदेश स नि शेष जीवास्तिकायैकदेशवृत्तिरेव सन् जीवा- त्मक इत्युच्यते, अत्र तु धर्मास्तिकाय एकमेव द्रव्यं तत सकलधर्मास्तिकाया व्यतिरिक्त एव सॅस्तत्प्रदेशो धर्मात्मक इत्युच्यत इति भाव , । अधर्माकाशास्ति- काययोरप्येकैकद्रव्यत्वादेवमेव भावनीयम् । जीवास्तिकाय तु 'जीवेपएसे से पएसे नोजीवे, त्ति, जीव प्रदेश इति जीवास्तिकायात्मकः प्रदेशः इत्यर्थ. . सच प्रदेशो नोजीव , नोशब्दस्येह देशवचनत्वात् सकलजीवास्तिकायैकदेश वृत्तिरित्यर्थः यो ह्ये कजीवद्रव्यात्मक प्रदेश स कथमनन्तजीवद्रव्यात्मके समस्त जीवास्तिकाये वर्तेत इति भाव , एव स्कन्धात्मकः प्रदेशो नो स्कन्ध , स्कन्ध- द्रव्याणामनन्तत्वादेक देशवर्तिरित्यर्थ , । एव वदन्तं शब्दनयं नानार्थसम- भिरोहणात् समभिरूढ़ स प्राह-यगणसि-धर्म प्रदेश. सप्रदशो धर्म इत्यादि, तन्न भवति-न युज्यते कस्मादित्याह-इह खलु द्वौ समासौ भवतः, तद था-तत्पुरुष कर्मधार्यश्च, इदमुक्तं भवति,- धम्मे पएसे से पएसे धम्मे इत्युक्ते समासद्वयारम्भकवाक्यद्वयमत्र सम्भाव्यते, तथाहि-यदि धर्म शब्दात - ३६ जैनागमन्यायसंग्रहः सप्तमीयं तदा सप्तमीतत्पुरुषस्यारम्भकमिदं वाक्यं, यथा वने हस्तीत्यादि, अथ प्रथमा तदा कर्मधारयस्य, यथा नीलमुत्पलमित्यादि, ननु यदि वाक्यद्वयमत्र सम्भाव्यते तर्हि क्थं द्वौ समासौ भवत इत्युक्तम् ?, उच्यते, समासारम्भक वाक्ययोः समासोपचारात्, अथवा अलुक्समासविवक्षया समासावप्येतो भवतो, यथा करठेकाल इत्यादीत्यदोषः, यदि नाम द्वौ समासावत्र भवतस्ततः किमित्याह तन्न ज्ञायते कतरेण समासेन भणसि ?, किं तत्पुरुषेण कर्मधार- येण वा ? यदि तत्पुरुषेण भणसि, तन्मैवं भण, दोषसम्भवादितिशेष स चायं दोषो-धर्मे प्रदेश इति भेदापनि , यथा कुण्डेवदराणीति, न च प्रदेशेदेशिनौ भेदेनोपलभ्येते, अथ अभेदेऽपि सप्तमीदृश्यते यथा घटेरूपमित्यदि, यद्येवमुभयत्रदर्शनात् संशयलक्षणो दोष स्यात, अथ कर्म धारयेण भरणसि । ततो विशेषेण भण, धम्मे अ से पएसे य से त्ति, धर्मश्च स प्रदेशश्च स इति समानाधिकरण: कर्मधारयः, एवं च सप्त म्याशङ्काभावतो न तत्पुरुपसम्भव इति भावः । आह-नन्वयं प्रदेशः समस्तादपि धर्मास्तिकायादव्यतिरिक्त. सन् समानाधिकरणतयानदि- श्यते ? उत तदेकदेशवृत्ति सन यथा जीवास्तिकायैकदेशवृत्तिर्जीवप्रदेश- इत्याशंक्याह - 'से पएसे धम्मेत्ति, स च प्रदेशः सकलधर्मास्तिका- यादव्यतिरिक्तो न पुनस्तदेकदेशवृत्तिरित्यर्थ., शेषभावना पूर्ववत, से 'पएसे नोजीवे से पएसे नोखन्धे' इत्यत्रापि पूर्ववदेवार्थकथनम् । एवं वदन्तं समभिरूडं साम्प्रतमेवंभूतो भणति-यद्यद्धर्मास्तिकायादिकं वस्तु 'भणसि तत्तत् सर्व समस्तं कृत्स्नं देशप्रदेशकल्पनारहितं प्रतिपूर्णम्-आत्म- स्वरुपेणाविकलं निरवेशेष-तदेवैकत्वान्निरवयवमेकग्रहणगृहीतम एकाभिधाना भिधेयं नानाभिधानाभिधेयं, तानि ह्य कस्मिन्नर्थेऽसौ नेच्छति, अभिधानभे- ३७ भावप्रमाणम् दे वस्तुभेदाभ्युपगमोत्, तदेवंभूतं तद्धर्मास्तिकायादिकंवस्तु भण, नतु प्रदेशादिरूपतया, यतो देशप्रदेशौ ममावस्तुभूती, अखण्डस्यैववस्तुन:- सत्त्वेनोपयोगात्, तथाहि-प्रदेशप्रदेशिनोभेंदो वा स्यादभेदो वा १ यदि प्रथमः पक्षस्तर्हि भेदेनोपलब्धिप्रसंगो, न च तथोपलब्धिरस्ति, अथा- भेदस्तर्हि धर्मप्रदेशशब्दयो पर्यायतैव प्राप्ता, एकार्थविषयत्वात्, न च पर्यायशब्दयोयुगपदुच्चारणं युज्यते, एकेनैव तदर्थप्रतिपादने द्वितीयस्य । वैयर्थ्यात, तस्मादेकाभिधानभिधेयं परिपूर्णमेकमेववस्त्विति, तदेवमेतेनिज- निजार्थसत्यताप्रतिपादनपरा विप्रतिपदन्ते नया', एते च परस्पर निरपे- क्षा दुर्नयाः, सौगतादिसमयवत, परस्परसापेक्षास्तु सुनयाः, तैश्चपरस्पर सापेक्षैः समुदितैरेव सम्पूर्ण जिनमतं भवति, नैकैकावस्थायाम, उक्त च स्तुतिकारेण-"उदधाविवसर्वसिन्धव , समुदीर्णास्त्वयि नाथ । दृष्टय न च तासु, भवान् प्रदृश्यते, प्रविभक्तासु सरित्स्विवोदधिः ॥ १ ॥ एते च नया ज्ञानरूपास्ततो जीवगुणत्वेन यद्यपि गुणप्रमाणेऽन्तर्भवन्ति तथापि प्रत्यक्षादि प्रमाणेभ्यो नयरूपतामात्रेण पृथक् प्रसिद्धत्वाद्वहुविचार विषयत्वाजिनागमे प्रतिस्थानमुपयोगित्वाच्च जीवगुणप्रमाणात् पृथगुक्ता तदेत् प्रदेशदृष्टांतेनेति निगमनम् । प्रस्थकादिद्दष्टातत्रयेण च नयप्रमाणं प्रतिपाद्योपसहरति-तदेतन्नयप्रमाणमिति । अनेन च दृष्टांतत्रयेण दिग्मा- त्रदर्शनमेव कृतं, यावता यत्किमपि जीवादि वस्त्वास्ति तत्र सर्वत्र नय- विचार. प्रवत ते, इत्यलं बहुजल्पितेनेति ॥ १४५ ।। अनुयोगद्वारसूत्र-मलधारीयावृत्तिः, प्रमाणद्वारम् । .
| बच्चइ अथ नयहारमभिधित्सुराह-- मूलः -से कि तं णए ? सत्त मूलणया पएणत्ता, ।। तंजहा- णेगमे संगहे ववहारे उज्जुसुए सद्दे समभिरूढे एवं भूए, तत्थ-णेगेहि माणेहिं मिणइति णेगमस्स य निरुत्ती । सेसाणंपि नयाणं लक्खणमिणमो सुणह वोच्छं ॥ १३६ संगहिअपिडिअत्थं संगहवयणंसमासो विति विणिच्छिअत्थं ववहारो सव्व दव्वेसु ॥१३७॥ पञ्चु - प्पन्नग्गाही उज्जुसुत्रो णयविही मुणेअव्यो । इच्छइ विसे सियतरं पञ्चु प्पण्णं णो सद्दो ॥ १३८ । वत्थूलो संकमणं होइ अवत्यू नए समभिरूढे । वंजण अत्थ तदुभयं एवंभूत्रो विसेसेड् ॥ १३६ ॥ अथ कोऽयं पूर्वोक्त शब्दार्थो नयः । तत्रोत्तरभेदापे- नया सप्तैव मूलभूता नया. मूल नयाः, तद् यथा नैगम इत्यादि तत्र 11 व्याचिख्यासुराह-णेगेहिमित्यादि गाथा, व्याख्या-न एकं नैक भूतानीत्यर्थः नैकर्मानैः-महासत्तासामान्यविशेपादिक्षानैमिमीते- मिनोति वा वस्तूनि परिच्छिनत्तीति नैगमः इतीयं नैगमस्य निरुक्ति:- ३८ टीका :- - नयद्वारम ३६ व्युत्पत्तिः, अथवा निगमा-लोके वसामि निर्यग्लोके वसामीत्यादय पूर्वोक्ता एव वहवः परिच्छेदास्तेषु भवो नैगमः, शेषाणामपि नयानां संग्राहादीना लक्षणमिदं शृणुत वक्ष्येऽहमिति गाथार्थ ॥ यथा प्रतिज्ञात- मेवाह "संगहि” गाहा, व्यख्या-सम्यग् गृहीत-उपात्त संगृहीत पि- ण्डित एकजातिमापन्नोऽर्थो विषयो यस्य सग्रहवचनस्य तत् सग्रहीतपिण्डितार्थ संग्रहस्यवचनं सग्रहवचनं समासत, सक्षेपतो ब्रु वतो तीर्थकरगणधाराः, अयहि सामान्येमेवेच्छति न वि- शेषान, ततोऽस्य वचन संगृहीतसामोन्याथेमेव भवति, अत एव सङ्गृह्णाति- सामान्यरूपतया सर्व वस्तु क्रोडीकरोतीति सग्रहोऽयमुच्यते, युक्ति श्चात्र लेशतः प्राग्दर्शितैव, “वच्चई' त्यादि, निराधिक्ये चयनं चय' पिण्डीभवनं अधिकश्चयो निश्चय -सामान्य विगतो निश्चयो विनिश्चयो- सामान्याभाव तदर्थ-तन्निमित्त व्रजति-प्रवर्तते, सामान्याभावायैव सर्वदा यतते व्यवहारो नय इत्यर्थः, क्व ? 'सर्व द्रव्येषु' द्रव्य विषये, लोके हि घट स्तम्भाभोरुहादयो विशेषा एव प्रायो जलाहरणादि क्रियासूपयुज्य- माना दृश्यन्ते न पुनस्तदतिरिक्त सामान्यम्, अतो लोकव्यवहारानगत्वात् सामान्यमसौ नेच्छती ति भोवः, अत एव लोकव्यवहार प्रधानोनयो व्यवहारनयोऽसावुच्यते, युक्तिश्चात्रापिलेशत प्रागुक्तैव, अथवा विशेषेण निश्चयो विनिश्च -आगोपालाद्यंगना (घ) वबोधो न कतिपय विद्वत्सम्बद्धः तदर्थ ब्रजति व्यवहारनयः सर्व द्रव्येपु इदमुक्त भवति यद्यपि निश्चयेन घटादिवस्तूनि सर्वाण्यपि प्रत्येक पचवर्णानि द्वि- गंधानि पचरसान्यष्टस्पर्शानि तथाऽपि गोपालागनादीना यत्रैव कांच कस्मिन् स्थले कालनीलवर्णादौ विनिश्चयो भवति तमेवासौ सत्त्वेन जैनागमन्यायसंग्रहः इति भावः, अथवा परेसिं च, प्रतिपद्यते न शेषान्, लोकव्यवहारपरत्वादेवेति गाथार्थः ॥ ‘पच्चुप्पन्न गाहा' साम्प्रतमुत्पन्नं प्रत्युत्पन्नमुच्यते प्रत्युत्पन्नमुच्यते वर्तमानकालभावीत्यर्थः, तद् ग्रहीतु शीलमस्येति प्रत्युत्पन्नग्राही ऋजुसूत्रो नयविधिमुणितव्य , तत्रातीतानागतयाभ्युपगमकुटिलतापरिहारेण ऋजु-अकुटिल वर्तमान काल भावि वस्तु सूत्रयतीति ऋजुसूत्र , अतीतनागतयो विनाशानुत्पत्तिभ्यामसत्वात्. असदभ्युपगमश्च कुटिल ऋजु-अवक्र श्रुतमस्येति ऋजुश्रुत:' शेषज्ञानमुख्यतया तथाविधपरोपकारासाधनात् श्रुतज्ञानमेवैक मिच्छतीत्यर्थः, उक्तंच-सुयनाणे अनिउतं केवलेतयाणंतरं । अप्पणो य जम्हा तं परिभावगं ॥ छाया || श्रुतज्ञाने च नियुक्तं (नियोक्त्तु योग्य) केवलेतदनन्तरम् । आत्मनश्च परेषाञ्च यस्मात्तत् परिभावकम् ॥१॥" त्ति, अयश्च नयो वर्तमानमपीच्छन् स्वकीयमेवेच्छति. परकीयस्य स्वाभिमत कार्य्यसाधकत्वेन वस्तुतोऽसत्वादिति, अपरश्च-भिन्न लिगैमिन्नवचनैश्च शब्दैरेकमपि वस्त्वभिधीयते इति प्रतिजानीते-- तटी तटमित्यादि, तथा गुरुगुर्वः इत्यादि, तथा इंद्रा- दे मस्थापनादिभेदान् प्रतिपद्यते, वक्ष्यमाणनयस्त्वतिविशुद्धत्वात् लिंगवचनभेदात वस्तुभेदं प्रतिपत्स्यते, नामस्थापनाद्रव्याणि च नाभ्युप- गमिप्यतीति भावः, इत्यक्त ऋजुसूत्र. ॥ अथ शब्द उच्यते-तत्र “शप आक्रोश" शप्यते अभिधीयते बस्न्बनेनेति शब्दः, तमेव गुणीभूतार्थ मुग्व्यतया यो मन्यते स नयोऽयुपचाराच्छब्दः, अयश्च प्रत्युपत्पन्न वर्तमान तदपि ऋजुमूत्राभ्युपगमापेक्षया विशेपित्तरमिच्छति, तथाहि तट- स्तटी तटमित्यादि शब्दानां भिन्नान्येवाभिधेयानि, भिन्नलिंगवृतित्वात , यथा तट तथा नयद्वारम् स्त्रीपुरुषनपु'स्क शब्दवदित्यसौप्रतिपद्यते, गुरुगुरवः इत्यत्राप्याभिधेयभेद एव, भिन्नवचनवृत्तित्वात्पुरुषः पुरुषा इत्यादिवदिति, नामस्थापनाद्रव्यरूपाश्च नेन्द्राः, तत् कार्याकरणात खपुष्पवदिति प्राक्तनाविशुद्धत्वाद्विशेषिततरोऽस्याभ्यु- पगमः, समानलिंगवचनानां तु बहूनामपि शब्दानामेकमभिधेयमसौ मन्यते, यथेन्द्रः शक्रः पुरन्दर इत्यादि इति गाथार्थ ॥ “वत्थूओ” इत्यादि, वस्तुनः- इद्रादेः सक्रमणमन्यत्र शक्रादाविति दृश्य, भवति अवस्तु अभवतीत्यर्थः, कत्याह नये-समभिरूढे, समभिरूढनयमतेनेत्यर्थः, तत्र वाचकभेदेनापरापरान् वाच्यविशेषान् समभिरोहति समभिगच्छति प्रति- पद्यत इति समभिरूढ., अयमत्रभाव!ः-इंद्रशक्रपुरन्दरादिशब्दान् अनन्तरं शब्दनयेन एकाभिधेयत्वेनेष्टानसौ विशुद्धतरत्वात् , प्रत्येकं भिन्नाभि- धेयान प्रतिपद्यते, भिन्नप्रवृत्तिनिमित्तत्वात् सुरमनुजादि शब्दधन्, तथाहि-इन्दतीति इन्द्र शक्नोतीति शक्रः पुरं दारयतीति पुरदर , इह परमेश्वर्यादीनि भिन्नान्येवात्र प्रवृत्तिनिमित्तानि, एवमप्येकार्थत्वे अति- प्रसगो, घटपटादिशब्दानामप्येकार्थताऽऽपत्तेः, एवं च सति यदा इन्द्रशब्दः शकशब्देन सहकार्थ उच्यते तदा वस्तुन परमैश्वय्यस्य शकनलक्षणे वस्त्वन्तरे संक्रमण कृतं भवति, तयोरेकत्वमापादितं भवतीत्यर्थ, तच्चा- • सम्भवित्वादवस्तु, नहि य एव परमैश्वर्य्यपर्याय स एव शकनपर्यायो भवितुमर्हति, सर्वपयोयसाडकर्यापत्तितोऽतिप्रसंगादित्यलं विस्तरेण, उक्तः समभिरूढः । 'वंजण अत्थे। त्यादि, यत् क्रियाविशिष्टं शब्देनो- च्यते तामेवक्रिया कुर्वद् वस्त्वेवभूतमुच्यते, एवं यः शब्देनोच्यते चेष्टाक्रियादिकः-प्रकारस्तमेवभूत प्राप्तमितिकृत्वा, ततश्चैवंभूतवस्तुप्रति , ४२ जैनागमन्यायसंग्राह . पादको नयोऽप्युपचारादेवंभूत , अथवा एवं-यः शब्देनोच्यते चेष्टाक्रि- यादिकः प्रकारस्त विशिष्टस्यैव वस्तुनोऽभ्युपगमात्तमेवंभूत-प्राप्त एवंभून इत्युपचारमन्तरेणापि व्याख्यायते, स एवं भूतोनय. किमित्याह व्य- ज्यतेऽर्थोऽनेनेति व्यञ्जनं शब्द अर्थस्तु तदभिधेयवस्तुरूप व्यञ्जनञ्चा- र्थश्च व्यञ्जनार्थों तौ च तौ तदुभय चेति समासः व्यञ्जनार्थशव्दयो- यस्तनिर्देश प्राकृतत्वात्, तद्व्यञ्जनार्थतदुभयं विपयति-नयत्येन स्थापयति, इदमत्र हृदयम्-शब्दमर्थनार्थं च शब्देन विशेषयति, यथा “घ. ट चेष्टायां घटते योपिन्मस्तकाद्यारूढश्चेष्टते इति घट इति, अत्र तदे- बामौ घटो यहा योपिन्मस्तकाचारूढतया जलाहरणचेष्टावोन नान्यदा, घटध्वनिरपि चेष्टां कुर्वत एव तस्य वाचकोनान्यादेत्येव चेष्टावस्थातोऽन्य त्र घटस्य घटत्वं घट शब्देन निवत्येते, घटध्वनेरपि तदवस्थातोऽन्यत्र घटेन म्बवाचकत्व निवर्त्यते इति भाव इति गाथार्थ ।। उक्ता मूल नया एपाश्चोत्तरोत्तरभेदप्रभेदा आवश्यकादिभ्योऽवसेयाः एते च सावधा- रणा मन्तो दुर्नया , अवधारणविरहितास्तु मुनया, सधैश्च सुनयैर्मी- लित म्याद्वाद इत्यलं बहुभापितया ॥ अत्राह कश्चित् -- नन्क्ता एते केवलं प्रस्तुते किमेत प्रयोजनमिति नावगच्छाम उन्यते, उपक्रमेणोपक्रान्तस्य निक्षपेण निक्षिप्तस्यानुगमेनानुगतम्य च प्रक्रान्तमामायिकाध्ययनस्य विचारणाऽमीपां प्रयोजनम् । पुनरध्याह नन्वेपा नयैर्विचारण किं प्रतिसूत्रमभिप्रता सर्वाध्ययनस्य वा ? यद्याद्य पक्षः स न युक्त, प्रतिसूत्रं नयविचारस्य " न नया समोयरति इह "मित्यनेन निपिद्धत्वात, अथोपर. पक्षः मोऽपि न युक्त , समस्ताध्ययन विपयस्यनयविचारस्य प्रागुपोद्घातनियुक्ती नया, . च यथासम्भव , नयद्वारम ५३ नए समोयारणाणुमए " इत्यत्रोपन्यस्तत्वात्, न च सूत्रव्यतिरिक्त मध्ययनमस्ति यन्नयैर्विचायते, अत्रोच्यते, यस्तावतप्रतिसूत्रं नय- विचारनिपेध प्रेयेते तत्राविप्रतिपत्तिरेव, किं च-आसज्ज उ सोयार नए विसारयो वया ।। छाया-आसाद्य तु श्रोतारं नयान् नय विशारदो वयात् इति, इत्यनेनापवादिक सोऽनुज्ञात एव, यदप्युच्यते-समस्ता- ध्ययनविपस्य नयविचारस्य प्रागुपोद्घाते" त्यादि, तत् समयानभि- जस्यैव वचनं, यस्माद्दिमेव चतुर्थानुयोगद्वारं नयवक्तव्यताया मूल- स्थानम् , अत्र सिद्धानामेव तेषां तत्रोपन्यास'; यदप्युक्त " नच सूत्र व्यतिरिक्तमध्ययन' मित्यादि, तदप्यसारंसमुदाय समुदायिनो कार्यादिभेदत कथञ्चिद्भेदसिद्धे , तथाहि-प्रत्येकावस्थायामनु- पलब्धमप्युद्वहन सामर्थ्यलक्षणं कार्य शिविकावाहकपुरुषसमुदाये उपलभ्यते, एवञ्च प्रत्येकनमुदितावस्थयो कार्यभेद शिविकावाह नादिपु सामर्थ्यासामर्थ्य लक्षणो विरुद्धधर्माध्यासश्च दृश्यते, यदि चाय मपि न भेदकस्तर्हि सर्व विश्वमेक स्यात् ततश्च सहोत्पत्त्यादि प्रसङ्ग , तस्मात् कार्यभेदाद् विरुद्धधर्माध्यासाच्च समुदाय समुदायिनोभेर्दै प्रत्तिपत्तव्यः, एवं सख्या सत्रादिभ्योऽपि तद्भदो भावनोय , तस्मात् कश्चित् कचित् सूत्र विषय समस्ताध्ययन विपश्च नय विचारो न दुष्यति, भवत्वेव तथा ऽप्यध्ययनं नयैर्विचा-माण किं सर्वैरेव विचायते ? आहोस्विट् कियद्भिरेव १ यदि तेपाम संख्येयत्वेन तैविचारस्य कर्तुमशक्यत्वात् , तथाहि-यावन्तो वचन मागा स्तावन्त एव नया , यथोक्तम्-जावइया वयणप्पहा तावइया चेव हॉनि नयवाया ।। लावइया नयवाया तावइया चेव परममया ॥१॥छाया- . सर्वैरिति पक्ष. स न युक्त, जैनागमन्यायसग्रह ४४ . श्यामः, यावन्तो वचनपथास्तावन्तश्चैव भवन्ति नयवादाः । यावन्तो नय वादा स्तावन्तश्चैव पर समयाः ॥ १॥ नच निजनिजाभिप्राय विरचितानां वचनमार्गाणां संख्या समस्ति, प्रतिप्राणि प्रायोः भिन्नत्वादभिप्रायाणां, नापि कियद्भिरिति वक्त' शक्यम् , अनवस्था प्रसङ्गात् , संख्यातोतेषु हि तेषु यावदेभिर्विचारणा क्रियते तावदेभिरपि किं नेत्यनवस्थाप्रेरणायां न नैयत्यावस्थापकं हेतु मुत्प अथापि स्यादसंख्येयत्वेऽप्येषां सकलनयसंग्राहिभिनयैर्विचारो विधीयते, ननु तेषामपि समाहिनयानामनेकविधत्वात् पुनरनवस्थैव, तथाहि-पुर्वविद्भिः सकलनयसग्राहीणि सप्तनयशतान्युक्तानि, यत् प्रतिपादकं सप्तशतारं नय चक्राध्ययनमासीद् , उक्तञ्च, एक को य सयविहो सत्त नय सया हवंति एवमेवेत्यादि, छाया-एकैकश्च शतविध. सप्तशतानि नया भवन्ति, एवमेव, सप्तानां च नयशतानां संग्राहकाः पुनरपि विध्यादयो द्वादशनयाः यत् प्ररूपकमिदानीमपि द्वादशारं नयचक्रमस्ति, एतत् संग्राहिणोऽपि सप्तनैगमादि नया, तत् संग्राहिणी पुनरपिद्रव्यपर्यायास्तिको नयौ ज्ञानक्रियानयो वा निश्चय व्यवहारौ वा शब्दार्थनयौवेत्यादि, इति संग्राहक नयानामप्यनेकविधत्वाद् सैवा- नवस्था, अहो अति निपुणमुक्त, किन्तु प्रक्रान्ताध्ययने सामायिक विचार्यते, तचमुक्तिफलं ततो यदेवास्य मुक्तिप्राप्तिनिबंधनंरूपं तदेव तत्वज्ञानक्रियात्मकमेव, ततो जानक्रियानयाभ्यामे वास्य विचारो युक्ततरो नान्यै ॥ तत्र ज्ञाननयो ज्ञानमेव मुक्तिप्रापक तया प्रतिजानीते, ततस्तन्मताविष्करणार्थमाह मूलः--णायंमि गिरिहअव्वे आगिबिहअवमि चेव विचारणीयं, नयद्वारम् ४५ . अत्थमि । जइअव्वमेव इइ जो उबएसो सो नो नाम ॥१४०॥ सव्वेसिपि नयाणं बहुविहवत्तव्वयं निसामित्ता। तं सब नयविसुद्ध जं चरण गुणट्टिो साहु ॥१४१॥ से तं नए। अणुयोगद्दारा सम्मत्ता (सू. १५२ ) टीका:-"ज्ञाते" सम्यग्-अवगते । गिरिहयव्वे” ग्रहीतव्ये उपादेय इत्यर्थः "अग्रहीतव्ये अनुपादेये, सच हेय उपेक्षणीयश्च द्वयोरप्यग्रहणाविशेषात् , च शब्द उक्त समुच्चये, अथवा अग्रहीतव्य शब्देन हेय एवैको गृह्यते उपेक्षणीयं त्वनुक्तमप्ययमेव चकार ममुच्चिनोति, एवो गाथालकारमात्रे, " अत्थमित्ति " अर्थे , ऐहि- कामुष्मिके, तत्र ऐहिको ग्रहीत्तव्य स्रक्- चन्दनागनादि अग्रहो- तव्योऽहिविपकण्टकादिरुपेक्षणीयस्तृणादि , आमुज्मिको ग्रहोतव्य- सम्यग्दर्शनचारित्रादि अग्रहीतव्यो मिथ्यात्वादिस्पेक्षणीयस्तुस्व- गविभूत्यादि, एवंभूतेऽर्थे यतितब्यमेवेति, अत्रैव कारोऽवधारणे, तस्य च व्यवहित प्रयोगः तद् यथा ज्ञात एवेति, तदयमों- ग्राह्याग्राह्योपेक्ष- णीयेऽर्थे ज्ञात एव तत् प्राप्तिपरिहारोपेक्षार्थिना यतितव्यं, प्रवृत्यादि लक्षण. प्रयत्न. कार्य इति, "इति” एवभूत सर्वव्यवहाराणां ज्ञान निवन्धनत्व प्रतिपादनपरो य उपदेशः स किमित्याह-" नय " इति प्रस्तावाज् ज्ञाननयो "नामेति । शिष्यामंत्रणे इत्यक्षरघटना ॥ भावार्थ- स्त्वयम्-इह ज्ञाननयोज्ञानप्राधान्यख्यापनार्थ प्रतिपादयति-नन्वैहिका मुष्मिकफलार्थिना तावत्सम्यग्विज्ञात एवार्थे प्रवर्तितव्यम्, अन्यथा प्रवृत्तौ फलविसंवाददर्शनाद् आगमेऽपि च प्रोक्त-पढम नाणं तोदए।
४६ जैनागमन्यायसंग्रह त्यादि, जंअन्नाणी कम्म खवेई, त्यादि, तथा अपरमप्युक्तम् । पाबाओ विणियत्ती पबत्तणा तह य कुसल पक्वमि । विणयस्स य पडिवत्ती तिन्निवि नाणेसमप्पति ।। १॥ छाया । पापाविनिवृत्ति प्रवर्तना तथा च कुशलपक्ष। विनयस्य च प्रत्तिपत्तिस्त्रीण्यपि ज्ञानात् समाप्यन्ते ॥१॥ तथान्यैरप्युक्त-"विज्ञप्ति फलदा पुसा न क्रिया फलदा मता । मिथ्या ज्ञानात्प्रवृत्तस्य फलासवाददर्शनात् ॥ १ ॥ इति, इतश्च ज्ञानस्यैव प्राधा- न्य यतस्तीर्थकरगणधरैरगीतार्थाना केवलानां विहारोऽपि निपिद्ध , तथा च तद वचनम --' गीयत्यो य विहारो बोओ गीयत्थमीसियो भणियो । इत्तो तइयविहारो नाणुनाओ जिणवरेहि ॥ छाया-गीतार्थश्च विहारो द्वितीयो गीतार्थमिश्रितो भणित । एताभ्यां तृतीयो विहारो नानुज्ञातो जिनवरै ॥१॥ न यस्मादन्धेनान्ध समाकृष्यमाण सम्यक पंथानं प्रति पद्यत इतिभाव , एव तावत् क्षायोपशमिकं ज्ञानमधिकृत्योक्त, क्षायिक मायगी कृत्य विशिष्टफल साधकत्त्व तस्यैव विजेयं, यस्मादहतोऽपि भवा- म्भोधितटस्थम्य दीक्षा प्रतिपन्नस्योतकृष्टतपश्चरणवतोऽपि न तावदपवर्ग प्राप्ति. संजायते यावदखिल जीवादि वस्तुम्तोमसाक्षत्करणदक्षं केवलनानं नोत्पन्न, नन्माजनानमेव पुरुषार्थमिद्धेनिवन्धन, प्रयोगश्चात्र यद् येन विना न भवति तत्तन्निबन्धनमेव, यथा बीजाद्य विनाभावी तीनवन्धन एवाडकुरो, नानाविनाभाविनी च सकलपुरुपार्थसिद्धि रिति, ततश्चायं नयश्चतुर्विधे सामायिक - सम्यकत्वसामायिकश्रुतसामायिके एवाभ्युपगच्छति, ज्ञाना- मान्यन प्रधानमुक्तिकारणत्वान , देशविरतिसर्यविरति सामायिके तु नन्छति, ज्ञान कार्यत्वने गौणत्वात् तयोरिति गाथार्थ ॥ विचारितं . ।
नयद्वारम् ४७ जाननयमतेन सामायिकम , अथ क्रियानयमतेन तद विचार्यते-तत्रामो क्रियैव सकलपुरुषार्थसिद्धेः प्रधानं कारणामेति मन्यमानो जाननय मतव्याख्यातामेवमेवगाथामाह-"नायम्मी” त्यादि, इय च क्रियानय मतेनेत्यव्याख्यायते-इह ज्ञाते ग्रहीतव्ये अग्रहीतव्ये चैवार्थे सर्वामपि परुपार्थसिद्धिमभिलपता यतितव्यमेवप्रवृत्यादिलक्षणा क्रियैव कर्तव्येति, एवमत्र व्याख्याने एवकारः म्वस्थान एव योज्यते, एवच पति नातेऽग्यर्थे क्रियेव माध्या, ततो जान क्रियोपकरणत्वाद्गौणमित्यत समलस्यापि पुरुषार्थस्य क्रियेव प्रधान कारणमित्येव य उपदेश स नय प्रस्तावात् क्रियानय', शेपपूर्ववत् । अयमपि स्वपक्षसिद्धये युक्तीरुभावांत- ननु क्रियैव प्रधान पुरुषार्थसिद्धिकारण, यत आगमेऽपि तीर्थकरगणधरै क्रिया विकलाना ज्ञान निष्फलमेव उक्त, सुबहुपि सुयमहीयं कि काही चरण विमुक्कस्स । अन्धस्स जह पलित्ता दीवसयसहस्म कोडीवि ।। १ ।। छाया-सुबहपि श्रुतमधीतं किं करिष्यति चरण विप्रमुक्तस्य । अवस्य यथा प्रदीप्ता दीपशन सहस्त्रकोट्यपि ॥ नाण सविसयनियय न नाण मित्तण कल निप्फत्ती, मग्गएणू दिलुतो होइ सचिट्ठो अचिट्ठो य ॥ ।। छाया-नान स्वविपय नियन न ज्ञानमात्रेण कार्यनिष्पत्ति । मानो दृष्टान्तोभवति सचेष्टोऽचेपश्च ॥ २॥ जाणतोऽविय तरिट का यजोगं न जुजई जो । सो वुझड मोपण एव नाणी चरणहीणो । ३॥ छाया--जानन्नपि तरीतु कायिकयोग न युनक्ति यन्तु । स उद्यते स्त्रोतमा एव ज्ञानी चरणहीन ॥ ३ ॥ जहा स्वरो चढण भारवाही , इत्यादि, छाया--यथा खरश्चन्दन भारवाही' इत्यादि, तथा अन्यरप्युक्तम् --- क्रिय फलदाप सा नजान फलद मतम । यत स्त्रीभक्ष्य भोगनो न बानाल्लु ग्वितोभवेद् ॥१॥ इति एव तायत चायोपशमिकी चरणक्रियामङ्गीकात्य - ४८ जैनागमन्यायसंग्रहः कोरणं, प्राधान्यमुक्तम् । अथ क्षायिकीमप्याश्रित्य तस्या एव प्राधान्यमवसेयम् । यस्मादहतोऽपि भगवतः समुत्पन्न केवलज्ञानस्यापि न तावत् मुक्त्यावाप्तिः संपद्यते यावदखिलकर्मेन्धानानल ज्वाला कलापरूपायां शैलेश्यवस्थायां सर्वसंवररूपां चारित्र क्रियां न प्राप्नोति तस्मात् क्रियैव प्राधाना सर्व पुरुषार्थ सिद्धि प्रयोगश्चात्र यद्यत्समनान्तरभावि तत्तत् कारणं यथा अन्त्यावस्था प्राप्त पृथिव्यादिसामग्रयनन्तरभावी तत् कारणोऽकुर क्रियानन्तरभाविनी च सकलपुरुषार्थसिद्धिरिति, ततश्चैप चतुर्विधेसामायिके देशविरति सर्व विरतिमामायिके मन्यते, क्रियारूपत्वेन प्रधानमुक्तिकारणत्वात् क्व श्रुतसामायिके तु तदुपकारित्वमात्रनो गौणत्वान्नेच्छति इति गाथार्थ ॥ ननु पक्षद्वयेऽपि युक्तिदर्शनात् किमिह तत्त्वमिति न जा- नीम इति शिष्यजनसम्मोहमाशक्यजानक्रियानयमतप्रदर्शनानन्तरं स्थि- त पतं दर्शयन्नाह- ग्व सम्य- - "सव्वेसिपिगाहा, न केवलमनन्तरोक्त नयद्वयस्य' किं तर्हि ? मर्वेपा- मपि' स्वतत्रसामान्यविशेपवादोनां नामस्थापनादिवादीना वा नयानां "वक्तव्यतां, परस्परविरोधिनी प्रोक्ति “निशम्य” श्रुत्वा तदिह "सर्व- नयविशुद्ध सर्वनयसम्मत तत्त्वरूपतया ग्राह्यौं, यत् किमत्याह- यच्चरण गुग्गस्थित माधु'' चरण चारित्रक्रिया गुणोऽत्रज्ञानं तयोस्तिष्ठतोति घरगगुराणम्य , नानक्रियाभ्यां द्वाभ्यामपि युक एव साधुः मुक्तिसाधको न पुनरकेन केनचिदितिभावः, तथाहि-यत्तावज्ञानवादिनाप्रोक्त-यद्येन विना न भवति तत्तन्निबन्धमवेत्यादि, तत्र तदविनाभावित्त्वलक्षणो हे- तुरसिद्ध एव. ज्ञानमात्राविनाभाविन्याः पुरुषार्थसिद्धेः काप्यदर्शनात् न हि ४६ एव नयद्वारम् दाह पाकाद्यर्थिना दहन परिज्ञानमात्रादेव तत् सिद्धिर्भवति, किन्तु तदा- नयनसंधुक्षणज्वालादिक्रियानुष्ठानादपि, न च तीर्थकरोऽपि केवलज्ञान मात्रान्मुक्तिं साधयति, किन्तु यथाख्यात चारित्रक्रियातोऽपि , तस्मात् सर्वत्र ज्ञानक्रियाविनाभाविन्येव पुरुषार्थसिद्धि., ततस्तदविनामावित्वलक्ष- यो हेतुर्यथा पुरुषार्थसिद्ध ननिबन्धनत्व साधयति तथा क्रियानिबन्धन- त्वमपि, तामप्यन्तरेण तदसिद्धरित्यनेकान्तिकोऽप्यसाविति, एवं क्रिया वा- 'दिनापि यद्यत्समनन्तरभावि तत्तत् कारणमित्यादि प्रयोगे यस्तदन- न्तरभावित्त्वलक्षणो हेतुरुक्तः सोऽप्यसिद्धो नैकान्तिकश्च तथाहि-स्त्री भक्ष्य भोगादिक्रिया कालेऽपि ज्ञानमस्ति तदन्तेरणतत्र प्रवृत्तरेवायोगात् , शैलेश्यवस्थाया सर्व सवर रूप क्रिया कालेऽपि केवलज्ञानमस्ति, तदन्तरेण तस्या ण्वाप्राप्तेः, तस्मात् केवल क्रियानन्तर भावित्वेन पुरुषार्थस्य काप्यसिद्धर सिद्धो हेतु , यथा च तदनन्तरभावित्वलक्षणो हेतुः क्रियाकारणत्वं मुक्तयादि पुरुषार्थस्य साधयति तथा जानकारणत्वमपि, तदप्यन्तरेण तस्य कदाचिदप्यभावातदित्यनॅकान्तिकताऽप्यस्येति, तस्मात् ज्ञान क्रियोभय- माध्यैव मुक्तयादि सिद्धि', उक्तञ्च-य नाणं कियाहीण हया अन्नाणो किया । पासतो पंगुलोढढ्ढो धावमाणो य अधओ ॥ १॥ छाया-हनं भान क्रिया होन हता अज्ञानत. क्रियापश्यन् पंगुर्दग्धो धावश्वान्धः ।। सयोग सिद्धी अ फलं वयति नह एग चक्केण रहो पयाइ । अँधो य पंग य वणे समजा, ते सपउत्ता नयर पविठ्ठा ।। २ ।। छाया-संयोग सिद्धयाफल फलं वदति नैक चक्रण रथः प्रयाति, अन्धश्च पंगुश्च बने समेत्य तो सम्प्रयुक्तो नगर प्रविष्टौ ।। २ ।। इत्यादि, अत्राह नन्वेवं मान क्रिययोमुक्त्यवापिका शक्ति प्रत्येकमसती समुदायेऽपिक्यस्यात ? - जैनागमन्यायसंग्रहः , नहि योपु प्रत्येकं नास्ति तत्तेपुसमुदितेष्वपि भवति, यथा प्रत्येक मसत् समुदितेष्वपि सिकताकणेपु तैलं, प्रत्येकमसती च ज्ञानक्रिययोमु. क्त्यवापिका शक्ति', उक्तञ्च -पत्तेयमभावाश्रो । निव्वाणं समुदियासुवि न जुत्तं । नाण किरियासु वोत्तुसिकता समुदाय तेल्लं व ॥१॥ छाया- प्रत्येकमभावान्निर्वाणं समुदितयोरपि न युक्तम् । ज्ञान क्रिययोर्वक्तु सिकता समुदाय तैलमिव ॥ १॥ उच्यते, स्यादेतत् , यदि सर्वथा प्रत्येक तयोर्मुक्त्यनुपकारिताऽभिधीयेत यदा तु तयो प्रत्यक देशोपकारिता समुदाये तु सपूर्ण हेतुता तदा न कश्चिद्दोपः, आह च वीमुन सव्वहच्चिय सिकता तेल्लं व माहणाभावो । देसोवगारिया जा सा समवायं मि सपुण्णा ।। छाया -विष्वक् न सर्वथैव सिकना नैलवत् साध- नाभाव. । देशोपकारिता या सा समवाये सम्पूर्णा ॥१।। अत: स्थित- मिदं-शान क्रिये समुदिते एव मुक्ति कारणं न प्रत्येकमिति तत्त्वम् । तथा च पूज्या नाणाहीणं मन्च नारण नो भणइ किं च किरियाए ?। किरियाग चरण नयो तदुभयगाहो य सम्मत्त ॥१॥ ज्ञानाधीनं सर्व ज्ञाननय भणति किं च क्रियया । क्रियया (अधीन) चरण न यस्तदुभय ग्राहश्च सम्यकत्वम् ।। १ ।। तम्माद् भाव साधु सवैरपि नौरिष्यत एव, सच ज्ञान क्रिया युक एवेत्यता व्यवस्थितमिद -तत्सर्वन प्रविशुद्धं यच्चरण गुग्ण व्यवस्थित माधुरिति ॥ तदेव समर्थित नय द्वारं तत्समर्थ ने च समर्थितानि च वायप्युपक्रमादीनि द्वाराणि, तत् समर्थने च चानुयोग द्वारशास्त्र समानम।
, अथश्र तनिश्रितम् मूलः-से कि त सुनिस्सिअं ? २ चउन्विह पएणतं, तंजहा उग्गह १ ईहा २ अवाओ ३ धारणा ४ (सू० २७) टीका :-"से किं त" मित्यादि, अथ किं तच्छु तनिश्रितं मतिज्ञानम् । गुरुराह-श्रुतनिश्रतं मतिज्ञानं चतुर्विधं प्रज्ञप्त, तद्यथा अवग्रह ईहा अपायो धारणा च, तत्र अवग्रहणमवग्रह अनिर्देश्यसामान्य मानरूपार्थग्रहणमित्यर्थः, यदाह चूर्णिकृत् “ सामन्नस्सरुवादि विसेसण रहियस्स प्रनि सस्स अवग्गहणमवगह” इति । तथा ईहनमीहा, सद्भूतार्थ पर्यालोचनरुपा चेष्टी इत्यर्थः, किमुक्त भवति-अवबहादुत्तर कालमवायात्पूर्व सद्भूतार्थ विशेषोपादानाभिमुखोऽसदभूतार्थ विशेष परित्यागाभिमुख. प्रायोऽत्र मधुरत्वादय शंखादि शब्दधा दृश्यन्ते न खरककेश निष्ठुरतादय शार्दादि शब्दधा इत्येवरूपो मतिविशेष ईहा,- आहच भाप्यकृत भूयाभूय विसेमादाणच्चायाभिमुहमीहा" तथा तस्यैवा व प्रहीतस्येहितस्यार्थस्य निर्णयरूपोऽध्यवसायोऽवाय शाख एवाचं शाह एवा ( व वा ) यमित्यादि रूपोऽवधारणात्मक प्रत्ययोऽवाय इत्यर्थ तस्यैवार्थस्य निणीर्तस्य धरण धारणा. साच विधा-अविच्युतिर्वासना स्मृतिश्च, तत्र तदुपयोगादविच्यवनविच्युति साचान्तमुहूर्तप्रमाणा, जैनागमन्यायसंग्रहः - ततस्तयाऽऽहितो यः संस्कारः स वासना, सा च संख्येयमसंख्येयं वा कालं यावद् भवति, ततः कालान्तरे कुनश्चित्ताहरा र्थ दर्शनादि कारणात् संस्का- रस्य प्रवोधे यज ज्ञानमुदयते-तदेवेदं यत् मया प्राग् उपलब्धमित्यादि रूपं सा स्मृति., उक्तञ्च तदनतरं तदत्याविच्चवणं जो उ वासणा जोगो । कालं- तरेण जं पुण अनुसरण धारणा सा उ ॥ १॥ छाया-तदनन्तरं तदर्थ विच्यवन यस्तु वासना योगः। कालान्तरे यत् पुनरनुस्मरणं धारणा सा तु ॥१॥ एताश्चाविच्युतिवासनास्मृतयो धारणालक्षण सामान्या- न्यर्थयोगाद् धारणा शब्द वाच्या ।। मूलः-से कि तं उग्गहे ? उग्गहे दुविहे पण्णत्ते, तंजहा- अत्थुग्गहे अ वंजणुग्गहे अ (सू० २८) टीका :-"से किं त" मित्यादि; अथ कोऽयमव ग्रहः ? सूरि राह अवग्रहो द्विविधा प्रनप्त तद्यथा-अर्थावग्रहश्च व्यञ्जनावग्रहश्च, नत्र अद्यते इत्यथे. अर्थस्यावग्रहणं अर्थावग्रहः-सकल रूपादिविशेप निरपेक्षा निर्देश्यसामान्यमात्र रूपाथ ग्रहणमेकसामयिकमित्यर्थः, वथा व्यज्यते अनेनार्थऽप्रदीपेनेव घट इति व्यञ्जन, तच्चोपकरणेन्द्रियस्य श्रोत्रादेः शब्दादिपरिणत द्रव्याणां च परस्परं सम्बन्धः, सम्बन्धे हि सति मोऽर्थ शब्दादि रूप श्रोत्रादीन्द्रियेण व्यञ्जयितु शक्यते, नान्यथा, तन सम्बन्धो व्यञ्जनं, तथाचाह भाष्यक्रत्- "बंजिज्जइ जेणऽथो घडोव विण वंजण तं च । उवगरणिदि य सदाइ परिणयदव्य संवधो ॥ १॥ छाया-व्यज्यते येनार्थो घट इव दीपेन व्यञ्जनं तच्च । उपकरणेन्द्रिय शब्दादिपरिणतद्रव्यसम्बध ॥१॥ व्यजनेन सम्बन्धेनावग्रहणः .
13 प्तानामवग्रह श्रुतनिश्रितम सम्बध्यमानस्य शब्दादि रूपस्यार्थस्याव्यक्तरूप परिच्छेदो व्यञ्जनावग्रह., अथवा व्यज्यते इति व्यञ्जनानि, 'कृबहुल' मिति वचनात् 'कर्मण्यनट' व्यञ्जनानां शब्दादिरूपतयापरिणताना दन्याणामुपकरणेन्द्रियसम्प्रा- अव्यक्तरूप. परिच्छेदो व्यजनावग्रह , व्यज्यतेऽनेनार्थ प्रदीपेनेव घटः इति व्यञ्जन-उपकरणेन्द्रियं तेन स्वसम्बद्धस्यार्थस्य-शब्दादे रवग्रहणम्-अव्यक्तरुप. परिच्छेदो व्यञ्जनावग्रहः, इयमत्र भावना-उप- करणेन्द्रियशब्दादिपरिणतद्रव्यसम्बन्वे प्रथम समयादारभ्यार्थावग्रहात प्राक् या मुप्तमत्तमूञ्छित्तादिपुरुपाणामिव शब्दादिद्रव्यसम्बन्धमान विपया काचिदव्यक्ता ज्ञानमात्रा सा व्यञ्जनावग्रहः, स चान्तमु हूत्तप्रमाण । "प्रवाह - ननु व्यञ्जनावग्रहवेलायां न किमपि सवेदन सवेद्यते, मानरुषो गीयते ? उच्यते, अव्यतत्वान्न संवेद्य ते, ततो न कश्चिदोप , तथाहि-यदि प्रथमसमयेऽपि शब्दादिपरिणतद्रव्यैरुपकरणेन्द्रियस्य सम्प्रातौ काचिदपि न ज्ञानमात्रा भवेत्. ततो द्वितीयेऽपि समये न भवेत, विशेपाभावान्, एवं यावचरमसमयेऽपि, अथ च चरमसमये ज्ञानम- विप्रहरूपं जायमानमुपलभ्यते, तत प्रागपि कापि कियती ज्ञान मात्रा द्रष्टव्या, अथ मन्येथा -माभूत् प्रथमसमयादिपु शब्दादिपरिणत द्रव्य सम्बन्धेऽपि काचिदपि ज्ञानमात्रा, शब्दादिपरिणतद्रव्याणां तपु समयेपु स्तोत्यात, चरमसमये तु भविष्यति, शब्दोदिस्पपरिणतद्रव्य ममूहस्य तदानी भूयमो भावात् , नदयुक्त, यतो यदि प्रथमसमयादिपु शब्दादिद्रव्याणा स्तोकल्यात् सन्पृक्तायव्यवहाऽपि काचिदपि ज्ञानमात्रा न समुल्लसेत् , नर्हि प्रभूतसमुदायनम्पर्केऽपि न भवेत , न खलु सिक्ता तत् कथमसौ , च अय जैनागमन्यायसंग्रहः कणेषु प्रत्येकमसति तैललेशे समुदायेऽपितैलं समुद्भवदुपलभ्यते, अस्ति च चरमसमये प्रभूतशब्दादिद्रव्यसम्पृक्तौ ज्ञानं तत प्राक्तने प्वपि समयेपु स्तोकस्तोकतरैरपि शब्दादिपरिणतद्रव्यै सम्बन्धे का चिदव्यक्ता ज्ञानमात्राऽभ्युपगंतव्या, अन्यथा चरमसमयेऽपि ज्ञानानुपपत्तेः तथा चोक्त-"जं सव्वहा न वीसु सव्वेसुवि तं न रेणुतेलंव । पत्ते- यमणिछंतो कहमिच्छसि समुदये नाणं ॥१॥ छाया- यत् सर्वथा न विष्वक सर्वेष्वपि नत् न रेणुतैलवत् । प्रत्येकमनिच्छन् कथमिच्छसि समुदाये ज्ञानम् ।। १॥ ततः स्थितमेतत्-व्यञ्जनावग्रहो ज्ञानरूपः केवल तेषु जानमव्यक्तमेव वोद्धव्य । शब्दौ स्वगतानेकभेदसूचकौ । ते च स्वागता अनेक भेदो स्वयमेव सूत्रकृता वणेयिष्यन्ते, पाह-प्रथम व्यजनावग्रहो भवति ततोऽर्थावग्रह , तत कस्मादिह प्रथममर्थावग्रह उपन्यस्तः ? उच्यते, स्पष्टतयोपलभ्य मानत्वात, तथाहि-अर्थावग्रह स्पष्टरूपतयासर्वैरपि जन्तुभि संवेद्यते, शीघ्रतरगमनादौ सकृत् सत्वरमुपलम्भे मया किञ्जिद दृष्टं परं न परि भावितं सम्यगिति, व्यवहारदर्शनात् , अपि च-अर्थावग्रहः सर्वेन्द्रियमनो- भावी व्यञ्जनावग्रहन्तु नेति प्रथममर्थावग्रहः ॥ सम्प्रतितु व्यञ्जनावग्रहाद् ऊर्ध्वमर्थावग्रह इति क्रममाश्रित्य प्रथमं व्यञ्जनावग्रह स्वरूप प्रतिपिपादयिपु शिप्य प्रश्नं कारयति- मृल :-'से किं तं वंजणुग्गहे ? वंजणग्गहे चउविहे एण्णत्ते, तंजहा सोडदिन वंजणुग्गहे घाणिदिय वंजणुग्गहे जिमिंदिय वंजगुग्गहे फासिदिय वंजगुग्गहे । से तं वंजणु- उक्त श्रुननिश्रितम गगहे (मू २६) टीका :-'से किं त? मित्यादि, प्रथ कोऽयं व्यञ्जनावमह प्राचार्य श्राह- व्यनजावग्रहश्चतुर्विध प्राप्त , तद्यथा- "श्रोत्रेन्द्रय- व्यञ्जनावग्रह' इत्यादि अत्राह-सत्सु पश्चस्विन्द्रियेपु पप्ठे च मनसि कस्मादयं चतुर्विधो व्यावय॑ते ?, उच्यते, इह व्यजनमुष्करणेन्द्रियस्य शब्दादिद्रव्याणाञ्च परस्पर सम्बन्ध उच्यते सम्बन्धश्चतुर्णामय श्रोत्रेन्द्रि यादोना, न नयनमनसो तयोरपोप्यकारित्वात् , अाह-कथमप्राप्यका- रित्व तयोरवसीयते १ उच्यते विपयकृतानुग्रहोपघाताभावान तथाहि- यदि प्राप्तमर्थ चतुर्मनो वा गृहोयात् तर्हि यथा म्पर्शनेन्द्रिय सक चन्दनदिक अद्गारादिक च प्राप्तमर्थ परिच्छिन्दत्ततकृतानुग्रहोपघातभा- ग भवति तथा चक्षुर्मनमी अपि भवेता विशेपामायात न च भवत नस्मादप्राप्यकारिणी ते, ननु दृश्यते एव चक्षुपोऽपि विपयकृतानुग्रहोप- धातो. तथाहि-धनपटलविनिमुक्त नभसि मयतो निविटजरटिमोपन-कर प्रसरमभिमर्पयन्तमशुमालिनमनवरतमवलोकमानम्य भवति चक्षुमो पि- घात , शाइकरकटम्बक यदिवा तरङ्गमालोपशोभित जल तममण्डलम्च शाद्वल निरतर निरीक्षमाणम्य चानुग्रह , तदेतहपरिभाविभापित, या न ज म सर्वथा विपयकतानुपग्रहोपघातौ न भनन , किनावदेव य. दामो-यदा विष विषतया चतरवलम्यते तदा तत्कृतामनुप्रापयानो तस्य न भवन इति तदप्रापारि, नेपाल तु प्राप्ननाश्वानकनोपयानो भविपति मनवाहकाण चानना . तवाशमालिनो रश्मय मर्वत्रापि प्र. मरमुपदधाना यदाऽगुमालिन मन्मन्पमीनतं तदा ने चर्देशाप प्रा.
स्वभावत एव ५६ जैनागमन्यायसंग्रहः प्नुवन्ति ततश्चक्षु सम्प्राप्तास्ते स्पर्शनेन्द्रियमिव चक्षुरुपघ्नन्ति, शीताशुरश्मयश्च शीतलत्वादनुग्राहकाः, ततस्ते चक्षुःसम्प्राप्ता सन्तस्ते स्पर्शनेन्द्रियमिव चक्षुरमुगृह्णन्ति, तरंग मालासंकुलजलावलोकने च जलकणसपृक्तसमोरावयवसंस्पर्शतोऽनुग्रहो भवति, शाब्बलतरुमण्डलावलोकनेऽपि शाड्वलतरुच्छाया सम्पर्कशीती भूतसमीरणसंस्पर्शात, शेषकालं तु जलवालोकनेऽनुग्रहाभिमान उपघाताभावादबसेय., भवाते चोपधाताभावेऽनुग्रहाभिमानो यथाऽति सूक्ष्माक्षरनिरीक्षणविनिवृत्य यथासुखं नीलीरक्तवस्त्राद्यावलोकने, इत्थ चैतदङ्गीकर्तव्य अन्यथा समाने सपर्के यथा सूर्यमीक्षमाणस्य सूर्यगोपघातो भवति तथा हुतबहजलशूलाद्यालोकने दाहक्लेदपाट- नादयोऽपि कस्मान्न भवन्तीति ? । अपि च यदि चक्षु प्राप्यकारि तहि स्वदेशगतरजोमलाञ्जनशिलाकादिक कि पश्यति १, तम्माप्राप्यकार्येवचक्षु । ननुयदि चक्षुरप्राप्यकारितहि मनोवत कस्मादविशेपेण सर्वानपि दूर व्यवहितादीनर्यान् न गृह्णाति ? यदि हि प्राप्तेरिच्छिन्द्यात्तर्हि यदेवानावृत्तमदूरदेशं वा तदेव गृहोयात् नावृत्तं दूरदेश वा, तत्र चतुरश्मीना गमनामभवः सम्पर्काभावात् , तनो युज्यते चनुपो ग्रहगाग्रहणे, नान्यथा, तथाचा स्तं-प्राप्याकारिचक्षुः उपलब्ध्यनुपलब्योरनावरणेनरानपेक्षणात् अरेतरापेक्षणाच्च" यदि हि चक्षुरप्राप्यकारिभवेत्तदाऽऽवरणभावादनुपलब्धि अन्यथोपलब्धिरिति # म्यात , नहि नहावरणमघातकरणमा समर्थ, प्राग्यकारित्वे तु मूर्तद्रव्य प्रनिधानाद उपपत्तिमान व्याधानोऽनिदृरे च गमनाभावादिति, प्रयोगश्चा प्र--न चनु विषयपरिमाण, अप्राप्यमारित्वात् मनोवत् तदेतदयुक्ततरम न .
५७ - श्रुतनिधितम दृष्टान्नस्य माध्यविफलत्वात् , न ग्वनु मनोऽप्यशेपान् विषयान् गृहाति, नन्यापि सूक्ष्मेवागमगम्यादिप्वर्थेषु मोहदर्शनात् , तम्माद् यथा मनोऽप्रा- प्यकार्यपि स्यावरणनयोपशममापेत्तत्वात नियतविषय तथा चक्षुरपि स्वाव- राजयोपशममापनत्वत्प्राप्यकार्यपि योग्यदेशावस्थितनियतविपयमिति न अमहिनानामुपलम्भप्रसद्गो नापि दूरदेशस्थितानामिति । अपिच दृष्टम- प्राप्यकारित्वेऽपि तथाम्बभारविशेपादयोग्यदेशापेक्षण, यथाऽयम्कान्त- स्य न ज्वल्ययाकान्तोऽयमोऽप्राप्यकर्षण प्रवर्तमान मर्वस्याप्ययसो जगद् वतिन पाकपको भवति, किन्तु प्रतिनियतम्यैव, (यत्तु) शकरस्वामी प्राह- "अयस्कान्तोऽपि प्राप्यकारी, अयस्कान्तच्छायागुभिः सह समाकृप्यमाण वस्तुन सम्बन्धभावात् , केवल ते छायाणव सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते'' इति तदेतदुन्मत्तप्रलपितु , तद्ग्राहकप्रमाणभावात् , नहि तत्र छायागुसम्भवप्रा- हकं प्रमाणमन्ति, न चाप्रमाणकं प्रतिपत्तु शक्नुम., अथास्ति प्राहक प्रमा णमनमान, इर. यदाकर्षण तन मसर्गपूर्वकं यथाऽया गोलकन्य सन्दशे- न पाकर्पणं चायनोऽयम्कान्तेन. नत्र मानादयस्वान्ते मसर्गः प्रत्यन वाधित इत्यर्थात छावाणुभि मह द्रष्टव्य इति, तदपि वालिशल्पिन, ई- तोरनेवान्तिकत्वात् मत्रेण व्यभिचारात् तथाहि-मत्र स्मय॑माणोऽपि विचलित वम्याकर्पति नच तत्र योऽपि समर्ग इति अपिच-यथा चा- चागाव प्राप्नमय समाकपन्ति तथा काष्ठादिकमपि प्राप्त सम्मान्नान्निा, जातिप्रनिनियमादिनि चेन ननु म शक्तिप्रति नियमाऽप्राभायपि तुल्य एपेनि व्यर्थ छायारणुपरिकल्पन । 'अन्यन्चार - अग्नि चक्षुप प्राप्पका- रित्वे व्यहिनानुपलब्धिरनुमान प्रमाग. नहाल, 'प्रत्रापि हतारने यानिकन्यात. पाचारटलम्फटिफरन्तरितस्याप्युपलव्धे , प्रधनमा . , जनागमन्यापराग्रह. अन्यथा चक्षीधा -नायना रश्मयो निर्गत्य तमर्थ गृह्णन्ति, नायनाश्च रश्मयस्तैज- सत्वान्न तेजोद्रव्यैः प्रतिस्वल्यन्ते, ततो न कश्चिद्दोष , तदपि न मनोरम महाज्वालादौ स्खलनोपलब्धेः, तस्मादप्राप्यकारि चक्षुरिति स्थितं ।। एवं मनमोऽप्राप्यकारित्वं भावनीय, तत्रापि विपय कृतानुग्रहोपघाताभावाद, तोयादिचिन्तायामनुग्रहोऽग्निशस्त्रादिचिन्तायांचोपघातो भवेत् , ननु दृश्यते मनसोऽपि हपादिभिरनुग्रह , शरीरोपचयदर्शनात्, तथाहि- हर्पप्रकर्षवशान्मनसोऽपि पुष्टता भवति, तद वशाच स्वशरीरस्योपचयः, । तथोपघातोऽपि शोकादिभिदृश्यते, शोकादिभिदृश्यते, शरीरदौर्बल्योर क्षतादिदर्शनात् , प्रतिशोककरणतोहि मनसो विघात सम्भवति ततस्तद् वशाच्छरोर दौर्बल्य- मतिचिन्तावशाच हृद्रोग इति, तदेतदतीवासम्बद्धं यत इह मनसोऽप्राप्यका- रित्वं माध्यमानं यतेते, विषयकृतानुग्रहोपघाताभावात्, न चेह विपयकृता- नुग्रहोपघाती त्वयामनसोदयेते तत कथं व्यभिचार ?, मनस्तु म्ययं पुदगल मयत्वाच्छरीरस्यानुग्रहोपघाती करिष्यति, यथेष्टानिष्टरूप आहार , तथाहि- इएम्प अाहार परिभुज्यमानः शरीरस्यपापमाधत्ते, अनिष्टरूपस्तूपसंघातं (म्तृपयातं ), तथा मनोऽयनिष्टपुदगलोपचितमति शोकादिचिन्तानिय न्धन शरीरस्य हानिमानवाति, इष्टपुदगलोपचित्तं च हर्षादिकारण पुष्टि, उच्च " इट्टानिट्टाहारऽभवारे होति पुट्टिहारिणो । जहतह- मरगनो नायो पुग्गलगुग्ण उनि का दासो ? ॥ १ ॥ छाया--इष्टानिष्टाहारा- भ्यवहारे भवत पुष्ट्रिहानी । यथा नया मनसस्ते पुदगलगुणत्वादिति को दोप. १ ॥ १ ॥ तम्मान्मनोऽपि विपयकृतानुग्रहोपघाताभावादप्राप्यकारीति यितं, दह मुगतमतानमारिण: श्रात्रमप्यप्राग्यकारि प्रपद्यन्ते, तथा चनदनथ "चतुःश्रोत्रमनाऽप्राप्यकारी " ति तदयुक्त, इहा प्राप्यकारि た शुननिश्रिनम ननिरन शम्यने बम्प विपयकृतानुग्रहोपघाताभावो, यथा चनुर्मनसोः, श्रोत्रग्य च शब्दकृत उपघाती श्यते, नद्योजात बालकत्व समीप महा-- प्रयन्नताटिनमन्लरोमान्कार श्रवणतो यद्वा विद्युत् प्रपाते तन प्त्यान- न्नदेशानिना निर्वोपश्रवणतो बधिरीभावदर्शनात, शब्दपरमाणवी हि उत्पत्तिदेशादारभ्य सर्वतो जलतरङ्गन्यायन प्रसरमभिगृहाना. श्रीन्द्रिय- देशमागच्छन्ति, तत मम्भवत्युपति , ननु यदि ओनेन्द्रिय देश प्राप्त- मेव शब्द गृहाति नाप्राप्तं तर्हि यथा गन्यादौ गृह्यमाण न तत्र दूरासन्नादि नया भदप्रतीतिरेव शब्देऽपि न स्यात. प्राप्नो हि विपय परिच्छिचमा- न' सर्योऽपि सन्निहित ग्व, तत स्थं तत्र दृरामन्नादिभेदप्रतीतिर्भवितु- मति ?, 'प्रय च प्रतीयते शब्दो दराजन्नादितया, तथा च लोक वक्ता- र श्रयत, पम्यापि दृरे शब्द इति, अन्यन्च-यदि प्राप्तः शब्दो गृपने शान्द्रियेण तर्हि चाण्डालोक्तोऽपि शब्द श्रोत्रियेण श्रोत्रेन्द्रिवनस्पृष्टो गृपते प्रति श्रोत्रन्द्रियस्य चाण्डालस्पर्गदोपप्रमग, तन्न श्रय श्रोत्रेन्द्रियस्य प्राग्यरित्वं, तदत तिमहामोहन्य मलीमसभापित त (च) तो यद्यपि शन्द प्राप्यो रगत प्रवेन्द्रियेण तथापि यत उत्थित शब्दम्नम्य दृरासानन्वे देऽपि स्वभाववैचित्यमभवाह गमन्नादिभेदप्रतीनियनि. तथाहि-दरा- र दागत' शब जीरगस्तिकापातग्पिन्न उपनियतं अस्पष्टम्पो वा, नता लोको वदति-दरे शब्द अपने 'अन्य च वाक्यम्पाय भावार्थी-इरादाग- त गद. अरते दति, स्यादनत्यमनि प्रमा प्राप्नोति. तवाहि-निटीप पपत्तु गण्यते-हरे समुपलभ्यते, किमुप्त भान -दूगर र पनुपन पते पति, नतमचरपि प्रापारि प्राप्नोति, नयने. तमा- स्त ममीचीनमिनि, तपन यन र पो पानामनुप्रावधानी तु वर्तमानो दूरदेश जैनागमन्यायसंदहः नोपलभ्येते, श्रोत्रेन्द्रियस्य तु शब्दकृत उपघातोऽस्ति, एतच्चप्रागेवोक्तं, ततो नातिप्रसंगापानमुपपत्तिमत् , अन्यञ्च-प्रत्यासन्नोऽपि जन पवनस्य प्रति- कूलम वतिष्ठमानः शब्दं न शृणोति, पवनवमनि स्थितोऽपि शृणोति, तथाचलोके वक्तारो-न वयं प्रत्यासन्ना अपि त्व- दीयं वच शृणुम., पवनस्य प्रतिकूलमवस्थानात, यदि पुनरप्राप्तमेव शब्दं रूपमिव जनाः प्रमिणुयु , तर्हि वातस्य प्रतिकूलमप्यवतिष्ठमाना रूपमिवशब्दं प्रमिणुयुः, न च प्रमिण्वन्ति, तस्मात् प्राप्ता एव शब्द परमाणवः श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यन्ते इति अवश्यमभ्युपगन्तव्यम् , तथा च मति पवनस्य प्रतिकूलमवष्ठिमानानां श्रोत्रेन्द्रियं न शब्दप्रमाणवो वै- पुल्येन प्राप्नुवन्ति, तेपामन्यथा वातेन नीयमानत्वात् , ततो न ते शृ- एवन्तीति न काचित क्षति , यदपि चोक्तं चाण्डालस्पर्शदोप प्राप्नोती 'ति: नदपि चेतनाविकलपुरुपभापितमिवासमीचीन, स्पर्शास्पर्शव्यवस्थाया लो- के काल्पनित्वात् , तथाहि-न स्पर्शव्यवस्था लोके पारमार्थिकी, तथाहि- यामेव भुवमग्र चाण्डालः स्पृशन् प्रयाति तामेव पृष्टत श्रोत्रियोऽपि, तथा यामेव नावमारोहति स्म चाण्डालस्तामेवारोहति श्रोत्रियोऽपि, तथा स एव मारुनश्चाण्डालमपि स्पृष्ट्वा श्रोत्रियमपि स्पृशति, न च तत्र लोके स्पर्शटोपन्यवस्था, तथा शब्दपुद्गलम्पर्शऽपि न भवतीतिनकश्चिद्दोप., अपि च-यथा केतकीदलनिचर्य शतपत्रादिपुप्पनिचयं वा शिरसि नि- वय वपुपि वा मृगमदचन्दनाद्यवलेपनमारचय्यविपणिवीथ्यमागत्य- ' चाण्डालोऽवतिष्ठते तदा तगनकेतकीटलादिगंधपुद्गलाः श्रोत्रियादि नामिकापि प्रविशन्ति, ततस्तत्रापि चाण्डालस्पर्शदोपः प्राप्नोतीति तद् दोपभयान्नासिकेन्द्रियमप्राग्यकारि प्रतिपत्तव्यं, न चैतद् भवतोऽप्यागमे - श्रुतनिश्चितम ६१ प्रतिपागतं. तनो बालिशजल्पितमतदिति कृतं प्रसगेन ॥ पेचिन्पुनः श्रोत्रेन्द्रिन्य प्राप्वकारित्वमभ्युपगन्छन्त' शबम्बाम्बरगुणत्व प्रतिपद्यन्ने, तदयुक्त, अकाशगुग्णताया शब्दस्यामृत्तत्त्वप्रमत्तं , योहि यत्गुण म तननमानधर्मा, यथा नानमात्मन , तथाहि-अमूर्न अात्मा, तनन्तद गुणो मानमप्यमृतमेव, एव शब्दोऽपि यद्याकाशगुणस्ता काशम्यामृतत्वा- छन्नम्याप तदगुणवेनामृतता भवेत , न चानी युक्तिमगता, तल्ल- जगाचोगात , मृतिविरहो घमूर्त्तताया लक्षण, न च शब्दाना मूतिविरह , स्पशयत्यात , तथाहि - स्पशेवन्त शब्दा, तन्मंपादपघातदर्शनाल्लोष्ट- पत , न चायममिद्धो हेतु , यतो दृश्यते सद्योजानवालकाना क्एणदे- शाभ्यर्णी कृतगाढारफालितझनरीझात्कारश्रवणत श्रवणरफोटो, न चे- त्यमुपचानकृत्त्वमम्पशवत्वे सम्भवति, यथा विहायस , नतो विपने गम- नासम्भवान्नानकान्तिकोऽपि. 'प्रतश्च स्पशवन्त शब्दाः, तैभिघाने गिरि- गारभित्यादिपु शब्दोत्थानान्लोष्टयन, अयमपि हेतुमभयोरपि निद्धि तथानि-- श्रयन्ते तोवप्रयत्नोच्चारिनशब्दाभिघातगिरिगहरादिपु प्रनिशब्दा पनि दिफ , तन स्पर्शवत्त्वान्मृत एव शब्टा , "स्पन्दादिमन्निवेशो मृत्ति, रिति वचन प्रामाण्यात , तन फयमिवाकाशगत्व शब्दानामुपतिमन, ।। 'अपि च तदाकाशमेवमनेकं वा १ चोक तर्हि चोन्नलजादपि अग्ने, 'पाकासम्पत्वेन शब्दम्य नद्गुणतया दुरामन्नादिभेदाभावात. यानरम- प मति यदना एव म विदाते पनि पथ भिन्नदेगपतिनि प्राभि भवते ?, पदनदेशापाशगगनमा तय भोगगनभेनियागमनन्दन्यामागन पध र भोदियापागमबन्धनरा नन्दराममान्यने, नगरा गुणत्या गुपगम' पडत्य मेवान, नन्याकागानुसत्त्वमनरेगा -- ६२ जैनागमन्यायसंग्रह स्थानमेव नोपपद्यते, अवश्यहि पदार्थेन स्थितिमता भवितव्यं, तत्र रूपरस- स्पर्शगंधानां पृथिव्यादिमह भूतचतुष्टयमाश्रयः, शब्दस्य त्वाकाश- मिति, तदयुक्त, एवं सति पृथिव्यादीनामप्याकाशगुणत्वप्रसक्ते , तेपामप्याकाशाश्रितत्वात, खल्वाकशमन्तरेणपृथिव्यादीनामप्य- न्यदाश्रयः, अगुणत्वात्पृथिव्यादीनामाकाशगुणत्वमनुपपन्नमितिचेत, न, आकाशाश्रितत्त्वेन भवन्नीत्यावलादपि तद् गुणत्वप्रसक्ते , अथ ना- श्रयण मात्रं तद् गुणत्व निवन्धन किन्तु समवायः, सचास्ति शब्दस्याकाशे न तुपृथिव्यादीनामिति, ननुकोऽय समवायो नाम ? एकत्रलोलीभावे नावस्थानं यथा पृथिव्यादिरूपाद्योरितिचेत्, न तर्हि शब्दस्य काशगुत्व माकाशेनसहैकन लोलीभावेन तम्याप्रतिपत्ते , अयाऽऽकाशे उपलभ्यमानत्वा त्तद्गुणनाशब्दस्य, तूलकादेरपि ताकाशे उपलभ्यमानत्वात्तद्गुणत्वं प्राप्नोति, श्रथ तृलकादेः परमार्थत पृथिव्यादिस्थानमाकाशेतूपलम्भो वायुना सञ्चार्यमाणत्वात, यद्यव हि शब्दस्यापि न परमार्थत. स्थान- मोकाश किन्तु श्रोत्रादि, यत पुनराकाशेऽवस्थानमुपलभ्यते तद् वायुना सञ्चाय॑माणवादबसेय, तथाहि ---यतो यतो वायु सञ्चरति ततस्तत शब्दोऽपिगन्छति, वातप्रतिकूलशब्दम्याश्रवणात, उक्त च-"यथा च प्रयते तृलमामा मातरिश्वना । तथा शब्दोऽपि कि बायोः, प्रतीपं कोऽपि शब्दचित" तन्नाकाशगुणः शब्द. किन्तु पुद्गलमय इति स्थितम् ।। मृलः-से कि तं यत्युग्गहे ? अत्युग्गहे बबिहेपण्णत्ते, जहा मोटदिग्रन्थग्गहे चक्विंदिअ अत्युग्गहे, घाणिदिन अत्युग्गहे । जिभिदिन अत्थुग्गहे फासिदिय अत्युग्गहे नोई . अनिबिनम दिन अन्धुग्गहे ॥ (पू. ३०) टीका :-अथ कृतिविधोऽवमर्थावग्रह १, नृरिराह-विरह पटविध प्रतप्त , तम्यथा यथा- 'श्रोत्रन्न्यिाविना इत्यादि. श्रोत्रन्ति यायावर, (प्रोजेन्द्रियेण ) व्यञ्जनावनोत्तरसालमे कमामायिकमान- ज्यसामान्यम्पार्था वग्रहयात्रोत्रन्द्रियार्थावग्रह , एव ब्राजिहावर्णनेन्द्र- यो नहेप्यपि वन्यं, चक्षुर्मनमोस्तु व्यञ्जनावग्रहो न भवति. नतम्तयो प्रथममेव सम्पद्रव्यगुणक्रियाचिकल्पनानोनमनिन्य सामान्यमात्राम्पा. अंग्रामविग्रहोऽयः । तत्र "नादिव अ-यावही तिनो इन्द्रिय -- मनः, नचद्विधा-दन्यम्प भावम्प च, नत्र मन पाप्निनामक मंदियना यन मनः प्रायोग्यवर्गग्गादलिरमादाय मनग्वेन परियमित तदधम्प मन , चार चगिंग कृत "मगपत्ति नाम सन्मादयत्रो नजोग मरगाह पन भागकोण परिणामिया यादव्यमा भाग" तथा द्रव्यमनोऽ प्रप्टम्मन जोत्रम्य यो मननपरिणाम र भावमन नया चार रिण- पार --"जीग पुग्ग मगणपारामकिरिया पन्नो भारमा, कि- रिणय हो ?-मागदव्यालयगी जीवरम मगाया याग भारमगो, भार" दता भायमनमा प्रधानन, नदन रंगद्रव्यमनमामि ग्राम- नि, द्रव्यमनाऽन्तरेणभारमनमाजमन्मधात, भारमनी बिनापिचर मना भवान, यया भवनिन का -भारमन प्रगान. नर नोनियग-भागमनमा यांनी दोन्द्रयामागम पहाट पर पग्निागनाभिनय प्राकमामागिरमागरागमन रिसोनियमामा मानचिनात्मवाचीन इन्द्रियादीवरः ।।
६४ जैनागमन्यायसग्रहः , भूल -तस्स णं इमे एगढिया नाणाघोसा नानावंजणा पंच नामधिज्जा भवन्ति, तंजहा-ओगेएहणया उवधारणया सव- णया अवलंबणया मेहा । सेत्त उग्गहे (सू० ३१) टोका: "तस्या सामान्येनावग्रहस्य “ण” मिति वाक्यालंकारे 'अमूनि वक्ष्यमाणानि एकाथिकानि 'नाना घोसाणि त्ति घोपाः- उदात्तादयः स्वरविशेपाः, आह च चूर्णिकृत्- "घोसा उदात्तादओ सरविसेसा" नाना वोपा येपा तानि नानाघोपाणि, तथा नानाव्यञ्जनानि-कादीनि येषां तानि नाना व्यञ्जनानि, पञ्चनामान्येव नामधेयानि भवन्ति, 'तद्यथे। ति तेपामेवो. पदर्शने, 'ओगिरहणया' इत्यादि, यदा पुनरवग्रहविशेपानपेक्ष्यामूनि पश्चापिनामधेयानि चिन्त्यन्ते तदा परस्परभिन्नार्थानि वेदितव्यानि, तथाहि-इहावग्रहस्त्रिधा, तदयथा-व्यञ्जनावग्रह मामान्यार्थावग्रहो वि- शेपमामान्यार्थावग्रहश्च, तत्र विवेपगामान्यर्थावग्रह औपचारिकः, सचा- नन्तरमेवाग्र दर्शयियते, तत्र 'श्रोगिएहणयत्ति अवगृपतेऽनेनेति - वग्रहगा, करणेऽनट. व्यतनावग्रहप्रथमसमयप्रविष्टशब्दादिपुद्गलादान- परिणाम , तद भावोऽवग्रहणता । तथा 'उवधारणया त्ति धार्यतेऽने- नेनिधारण, उप-मामी येनवारग। उपधारणं-व्यञ्जनावग्रहेऽपि द्वितीयादि समये पुप्रनिमम यमपयापूर्वेशव्दादि पुदगलादानपुरस्मरं प्राक्तनप्राक्तन- ममयगृहीनन्दादिपुदगलधारणपरिणाम तद् भाव उपधारणता, तथा “म वगाया ति अयतऽनेनेति श्रवणम - एकसामायिक मामान्यार्थावग्रहरूपो योधपरिणामः नदभाव. श्रवणता, नया अवलंबणयाति अवलम्यते इति अवलम्बने, 'कृदयरल मिति वचनात कर्मण्यनट् , विशेषमामान्यार्थावग्रहः .
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६४ जैनागमन्यायसग्रहः भूल -तस्स णं इमे एगहिया नाणाघोसा नानावंजणा पंच नामधिज्जा भवन्ति, तंजहा-ओगेएहण्या उवधारणया सव- ण्या अवलंबण्या मेहा । सेत्त उग्गहे सू० ३१) टोका :--'तस्या सामान्येनावग्रहस्य “ण” मिति वाक्यालंकारे 'अमूनि वक्ष्यमाणानि एकाथिकानि 'नाना घोसाणि त्ति घोपाः- उदात्तादयः स्वरविशेपाः, आह च चूर्णिकृत् - "घोसा उदात्तादओ सरविसेसा” नाना घोपा येपा तानि नानाघोपाणि, तथा नानाव्यञ्जनानि-कादीनि येषां तानि नाना व्यञ्जनानि, पञ्चनामान्येव नामधेयानि भवन्ति, 'तद्यथे तितेपामेवो. पदर्शने, 'प्रोगिण्हणया' इत्यादि, यदा पुनरवग्रहविशेपानपेक्ष्यामूनि पश्चापिनामधेयानि चिन्त्यन्ते तदा परम्परंभिन्नार्थानि वेदितव्यानि, तथाहि--इहावग्रहस्त्रिधा, तद्यथा-व्यञ्जनावग्रह सामान्यार्थावग्रहो वि- शेपमामान्यार्थावग्रहश्च, तत्र विवेपसामान्यर्थावग्रह औपचारिकः, सचा- नन्तरमेवाग्रदर्शयिष्यते, तत्र 'ओगिरहणय' त्ति अवगृह्यतेऽनेनेति श्र- वग्रहां, करगोऽनट, व्यन्जनावग्रहप्रथमसमयप्रविष्टशब्दादिपुद्गलादान- परिणाम., तद भावोऽवग्रहणता । तथा 'उवधारणय' त्ति धार्यतेऽने- ननिधारण, उप-मामी यनधारणं उपधारण-व्यञ्जनावग्रहेऽपि द्वितीयादि समय पुतिममयमपचापूर्वशब्दादि पुद्गलादानपुरस्मरं प्राक्तनप्राक्तन- समयगृतीनशब्दादिपुदगलवारणपरिणाम तद् भाय उपधारणता, तथा “म वाय" ति श्रयतेऽनेन नि श्रवणम - एकसामायिक सामान्यार्थावग्रहरूपो वोपरिगामः नदभाव श्रवणता, तथा अवलंबणयाति अवलम्च्यते इति अवलम्बन, 'दयाल' मिति वचनात कर्मण्यनट , विशेषसामान्यार्थावग्रहः 4 स 9. -28 श्रुतनिश्रितम् ६५ । कथं विशेपसामान्यार्थावग्रहोऽवलम्वनमिति १, चेत् , उच्यते, उच्यते,-इह शब्दो ऽयमित्यपि ज्ञान विशेषावगएनरूपत्वाअवायज्ञानं, तथाहि-शब्दोऽयं नाशब्दो-रूपादि . इनि शब्दस्वरूपावधारणं विशेषावगम', ततोऽस्मात् यत्पूर्वमनिर्देश्यसामान्यमात्रग्रहणमेकसायिक पारमार्थिकार्थाव ग्रह'. तत ऊवं तु यत्किमिदमिति विमर्शन सा ईहा, तदनन्तरं तु यच्छन्द स्वरुपावधारण शब्दोऽयमिति तदवायज्ञान, तत्रापि यदा उत्तरधर्म जिनासा भवति-किमय शब्द शाड्ड किं वा शाङ्ग १ इति तदा पाश्चात्य शब्द इति ज्ञानं विशेषावगमापेक्षया सामान्यम त्रालम्बनमित्यवग्रह इत्युपचयंते, स च परमार्थत सामान्यविशेपरूपालम्बन इति विशेष सामान्यार्थावग्रह इत्युच्यते, इदमेव च शब्द इति ज्ञानमवलम्व्य किमयं शाख ? किं वा शाङ्ग ? इति ज्ञानमुदयते, ततो विशेपसामान्या- र्थावग्रहोऽवलम्वन इत्युक्त., ततोऽवलम्बनस्य भावोऽवलम्बनता, ततोऽप्यूज़ किमयं शांख कि वा शाङ्ग इतीहित्वा यच्छाख एव शाङ्ग एव वेति नानं तदवायज्ञानं, तदपि च किमयं शांग्वोऽपि शब्द. मद्रः किं वा तार १ इत्युत्तर- विशेप जिज्ञासायां पाश्चात्य पाश्चत्यमवायज्ञानमुत्तरोत्तरविशेपावगमापेक्षया सामान्यार्थावलम्बनमित्यवग्रह इत्युपचयंते, किं मन्द्र ? किं वा तार ? १ इतीह तार एवायमित्यवायः, एवमुत्तरोत्तरविशेष जिज्ञासाया ज्ञानमुत्तरोत्तर विशेपाव गमापेक्षया सामान्यार्थावलम्बनमित्यवग्रह इत्युपचर्य ते, यदा उत्तरधर्मजिज्ञासा न भवति तदा तदत्य विशेपनानमवाय ज्ञानमेव, नावग्रह इन्युपचयंते, उपचारनिवधनाभावात्, उत्तरविशेपा- काक्षाया अपगमात्, ततस्तदनन्तरमविच्युतिरूपाधारणा प्रवर्तते, वास- मन्द्र एवाय पाश्चात्य पाश्चात्यमवाय , ६६ जैनागमन्यायसंग्राहः - नास्मृती तु सर्वेष्वपि विशेषावगमेषु द्रष्टव्ये, तथा चाह प्रवचनोपनिषदवेदो भगवान् जिनभद्रगणिक्षमाश्रमण: " सामन्नमेत्तगहणं निच्छयो समयमोग्गहो पढ़मो । तत्तोऽणंतरमीहिय वत्थु विसेसस्स जोऽवाओ ॥१॥ छाया--मामान्यमात्रग्रहणं निश्चयतः समयमवग्रहः प्रथमः । ततोऽनन्तर मोहितवस्तुविशेषस्य योऽपाय: ॥१॥ सो पुणरीहावायाविक्खाओ उग्गहत्ति उवयरिओ। एस विसेसावेक्खा सामन्नं गेहए जेण ।। २ ॥ छाय -स पुनरीहापायापेक्षयाऽवग्रह इति उपचरित । एष विशेषापेक्षया सामान्यं गृह्णाति येन ।। २ ॥ तत्तोऽणंतरमीहा तो अवाओ य तबिसे सस्म । इह सामन्न विसेसाऽवेक्खा जावंतिमो भेओ ।। ३ ॥ छाया- ततोऽनन्तरमीहा ततोऽपायश्च तद्विशेपत्य । इह सामान्यविशेपापेक्षा यावदन्तिमो भेदः ॥ ३॥ सव्वत्थेहावाया निच्छयो मोत्तुमाइसामन्नं । संबवहारत्थं पुण सव्वत्थावगहोऽवाओ ।। ४ ।। छाया सर्वत्रेहापायी निश्चयतो मुक्त्वाऽऽदि सामान्यम् । सव्यवहारार्थ पुनः सर्वत्रावग्रहोऽ पायः ॥ ४॥ तरतमजोगाभावेऽवाओ चियधारणा तदंतमि । सव्वत्थ योमणा पुरण भणिया कालंतरमई य ।। ५॥" छाया-तारतम्ययोगाभावेऽ- पाय ण्य धोरगा तदन्त । सर्वत्र वामना पुनर्भणिता कालान्तरस्मृतिश्च ।।५।। त्ति, तथा 'मेह चि मेधा प्रथम विशेषमामान्यार्थावग्रहमितिरिच्योत्तरः मोऽपि विशेषमामान्यार्थावग्रहः ॥ तदेवमुक्तानि पञ्चापि नामधेयानि भिन्नार्यानि, यत्र तु व्यजनावग्रहो न घटते तत्राद्य भेदद्वयं न द्रष्टव्यं, 'सेनं उग्गा ति निगमनम। मृत्ल " से कि तं ईहा ?, २ छबिहा पएणत्ता, तंजहा-मार्ट दिनईहा चक्विटिय ईहा धाणिदिईहा जिभिदिअईहा -- , श्रुतनिश्रितम् ६७ फासिदिअईहा नोइंदिन ईहा, तीसे णं इसे एगडिया नाणाघोसा नाणावंजणा पंच नाम धिज्जा भवंति, तं जहा-आभोगणया मग्गणया गवसणया चिता विमंसा, से तं ईहा II ( सू० ३२) टीका :-अथ केयमीहा ?, ईहा षड्विधा प्रज्ञप्ता, तद्यथा- श्रोत्रेन्द्रियेहा इत्यादि, तत्रोत्रेन्द्रियेणेहा श्रोत्रेन्द्रियेहा, श्रोत्रेन्द्रियाथोवग्रह मधिकृत्य या प्रवृत्ता ईहा सा श्रोत्रेन्द्रियेहा इत्यर्थ., एवं शेषा अपि साधनी- याः। 'तीसे ण' मित्यादि सुगमं। नवर सामान्यत एकार्थिकानि, विशेष चिन्तायां पुनभिन्नार्थानि, तत्र आभोगणया ति आभोग्यतेऽनेनेति आभोगनं -अर्थावग्रहसमनन्तरमेव सद्भतार्थविशेषाभिमुखमालोचन तस्यभाव आभोगनता, तथा मार्यतेऽनेनेति मार्गणं-सद्भतार्थ विशेषाभि- मुखमेव तदूर्वमन्वयव्यतिरेकधर्मान्वेषणं तद्भावो मार्गणता तथा-गवेश्यते- ऽनेनति गवेषणं-तत ऊर्ध्व सद्भूतार्थविशेषाभिमुखमेव व्यतिरेकधर्मत्या गतोऽन्वय वर्भाध्यासालोचनं तद भावोगवेषणता, ततो मुहुमुह क्षयोप- शविशेषतः स्वधर्मानुगतसद्भूतार्थविशेषचिन्तन चिन्ता, कवक्षयोपशमविशेषात् स्पष्टतरं सद्भूतार्थविशेषाभिमुखमेव व्यतिरेक धर्मपरित्यागतोऽन्वयधर्मापरित्यागतोऽन्वयधर्मे विमर्शनं विमर्शः । 'से तं ईहे' त्तिनिगमनम् ।। मूल:--" से किं तं अवाए १२ अवाए छबिहे पएणत्ते, तंजहा सोइंदिअप्रवाए चक्खिंदिअप्रवाए घाणिदिअप्रवा जिभिदिअप्रवाए फासिदिअप्रवाए नोइदिअप्रवाए तत् ? ए ६८ जैनागमन्यायसंग्रहः तस्स णं इमे एगढिया नाणाघोसा नाणावजणा एंचनामधिज्जा भवन्ति, तं जहा-आउट्टणया पचाउट्टणया अवाए बुद्धि विएण- णा, से तं अवाए ॥ ( सू० ३३) टीका:-अत्र श्रोत्रेन्द्रियेणावाय श्रोत्रेन्द्रियावाय , श्रोत्रेन्द्रियनि मित्तमर्थावग्रहमधिकृत्य य प्रवृत्तोऽपाय स श्रोत्रेन्द्रियापाय इत्यर्थ , एवं शेपी अपि भावनीया ।' तस्स ण ' मित्यादि प्रागवत् अत्रापि सामान्यत एकाथिकानि, विशेषचिन्तायां पुनर्नानार्थानि, तत्र आवर्नते-ईहातो निवृत्यापायभावं प्रत्यभिमुखो वर्त्तते येन बोधपरिणामेन स आवर्तनस्तद्- भाव आवर्तनता, तथा आवर्तनं प्रति येगता अर्थ विशेपपूत्तरोत्तरेपु विवक्षिता अपायप्रत्यासन्नतरा बोधविशेपास्ते प्रत्यावर्तना तद्भावः प्रत्या- वर्तनता, तथा अपायो-निश्चय. सर्वथा ईहाभावाद् विनिवृत्तस्यावधारणा- अवधारितमर्थमवगच्छतो यो बोधावशेपः सोऽपाय इत्यर्थः, ततस्तमेवाव- धारितमर्थ क्षयोपशमविशेपात स्थिरतया पुन , पुन स्पष्टतरमवबुध्यमानस्य या बोधपरिणति मा बुद्धि , तथा विशिष्टं ज्ञानं विज्ञान-क्षयोपशमविशेषा- देवाचवारितार्थविपय एव नीव्रतरधारणा हेतुबोधविशेप , ' से तं अवाप उनि निगमनम् ।। मूल :-से कि तं धारणा ? धारणा छबिहा पएणत्ता, जहा सोटिअधारणा चक्विंदियधारणा पाणिदिन- घागमा जिभिदियधारणा फामिदियधारणा नोटंदिय- धारमानीसे शं इमे एगद्विया नाणाघोमा नाणावंजणा पंच ना. , LA श्रतनिश्रितम् ६६ मधिज्जा भवंति, तंजहा धारणा साधारणा ठवणा पडट्ठा कोट्ठ, से तं धारणा ॥ (सू० ३४ ) टीका - 'से किं त? मित्यादि सुगम यावद्धारणा इत्यादि, अत्रापि सामान्यत एकार्थानिविशेषार्थचिन्ताया पुनर्भिन्नार्थानि, तत्रापायानन्तर- मवगतस्यार्थस्याविच्युत्याऽन्तर्मुहूर्त्तकालं यावद्धरण धारणा, ततस्तमेवार्थमु- पयोगात् च्युतं जघन्यतोऽन्तमुहूर्तादुत्कर्षतोऽसंख्येयकालात् परतो यत्- स्मरणं सा धारणा, तथा स्थापन स्थापना, आपायावधारितस्यार्थस्य हृदि- स्थापन, वासेनेत्यर्थ., अन्ये तु धारणास्थापनयोर्व्यत्यासेनस्वरूपमाचक्ष- ते, तथा प्रतिष्ठापन प्रतिष्ठा-अपायावधारितस्यैवावर्थस्य हृदिप्रभेदेन प्रतिष्ठापनमित्यर्थः, कोष्ठ इव कोष्ठ अविनष्टसूत्रार्थधारणमित्यर्थ. । 'से तं धारण सेयंधारणा।
दर्शनविषयः मृलः-दुविहे दंसणे पन्नत्से तं०-सम्मदसणे चेत्र मिच्छादसणे चेव १ सम्मबसणे दुविहे पंतं०-णिसग्गसमम्हसणे चेव अभिगमसम्म(सणे चेव २ णिसग्गसम्मद्दसणे दुविहे पं, तं०-पडिबाई चेव अपडिवाई चेव ३ अभिगमसम्मद्दसणे दुविहे पं, तं०- पडिवाई चेव अप्पडिवाई चेव ४ मिच्छादसणे दुविहे प, तं0- अभिग्गहियमिच्छदंसणे चेव ५ अणभिग्गहिय मिच्छादंसणे चेव अभिग्गाहियमिच्छांदसणे दुविहे पं, तं०- सपज्जवमिते चेव अपज्जवसिते चेव ६ एवं अणभिगहितमिच्छा- दमणेऽवि७ (सू० ७०) टीका :- 'दुविहे दमणेइत्यादि सूत्राणि सप्त सुगमान्येव, नगर, दृष्टिदर्शनम्-तत्त्वेपु रुचि सभ्यग- अविपरीत जिनोक्तानुमारि, तथा मिस्था-विपरीतमिति । 'सम्मदंसणे' मुन्यादि, निसर्गः स्वभावोऽनुपदेश इत्यनर्थान्तरं, अभिगमोऽधिगमो गुरुपदेशारिनि, ताभ्यायत्तत तथा, क्रमण क्रमण मरुदेवीभरतवदिति, 'निर्ग. त्यादि, प्रतिपतनशीलं प्रतिपाति सम्यग दर्शनमौपशमिकं क्षायोप- मिा च, अप्रतिपाति क्षायिक, तपा कमेण लनगां-इहोपशमिकी श्रे- तच्च औपर्शामवंतु - दर्शनविषयः ७१ णीमनुप्रविष्टस्यानन्तानुवन्धिनां दर्शनमोहनीयत्रयस्य चोपशमादौपशमि- कं भवति, यो वाऽनादिमिथ्यादृष्टिरकृतसम्यकमिथ्यात्वमिश्रामिधान शु- द्धाशुद्धोभयरूपमिथ्यात्वपुद्गलत्रिपुञ्जीक एव अक्षीणमिथ्यादर्शनोऽक्षपक इत्यर्थः, सम्यक्त्वं प्रतिपद्यते तस्यौपशमिकं भवतीति, कथं १.--इह यहस्य मिथ्यादर्शनमोहनीयमुदीर्ण तदनुभवेनैवोपक्षीणमन्यत्तु मन्दपरिणामतयो नोदितमतस्तदन्तमुहूर्त्तमात्रमुपशान्तमास्ते, विष्कम्भितोदयमित्यर्थ., तावत कालमस्यौपमिकसम्यक्त्वलाभ इति, आह च- 'उवसामगसेढिगयस्स' होइ उवसामिअंतु सम्मत् । जो वा अकयतिपुञ्जो अविर्यामच्छो लहइ सम्मं ॥ छाया- उपशमश्रेणिगतस्य भवति सम्यक्त्वम् यो वाऽकृतत्रिपुञ्जोऽक्षपित मिथ्यात्वो लभते- सम्यक्त्वम् ।। १॥ खीणम्मि उदिन्नमि अणुदिज ते य सेसमिच्छत्ते । अन्तोमुहूत्त कालं उवसमसम्म लहइ जीवो ॥ २॥" छाया-क्षीणे उढीर्ण अनुदीर्णे च शेषमिथ्यात्वे । अन्तमुहूर्त्तकालमौपशमिकसम्यकत्व लभते जोवः ।।२। ति । अन्तमुहूर्तमात्रकालत्यादेवास्य प्रति पातित्त्व, यच्चानन्तानुबन्ध्युदये औपशमिकसम्यकत्वान् प्रतिपतत सा- स्वादनमुच्यते तदोपशमिकमेव तदपि च प्रतिपात्येव, जघन्यत समयमात्र- त्वादुतकृष्टतस्तु पडावलिकामानत्वादस्येति, नथेह यदस्य मिथ्यादर्शन दलिकमुदीणं तदुपक्षीणं यच्चानुदीर्णं तदुपशान्तम्, उपशान्तं नाम विष्क- म्भितोदयमपनीतमिथ्यस्वभाव च, तदिहक्षयोपशमस्वभावमनुभूयमानं क्षायोपशमिकमित्युच्यते, नन्वौपशमिकेऽपि क्षयश्चोपशमश्चतथेहापोति- कोऽनयोर्विशेप ?, उच्यते, अयमेवहि विशेष -यौदह वेद्यते दालक न तत्र, इह हि क्षायोपशमिके पूर्वशमितमनुसमयमुदेति वेद्यते तीयते च, - , ७२ जैनागमन्यायसंग्राह औपशमिके तूदर्यावष्कम्भणमात्रमेव, आहच-मिच्छत्तं जमुइन्नं तं खीण अणुइयं च उबसंत । मीसीभाव परिणयं वेइजतं खओवसमं ॥१॥ छाया-मिथ्यात्वं यदुढीण तर क्षीण अनुदीर्णं चोपशान्तम् । मिश्रीभाव परिणतं वेद्यमान क्षायोपशमिकम् ।। १ ॥ त्ति, एतदपि जघन्यतोऽन्त- मुहर्न स्थितिकत्यादुत्कर्पतः पटपष्ठि सागरोपस्थितिकन्वाञ्च प्रति पानीति. यदपि च क्षपकम्य सम्यग्दर्शनदलिकचरमपुदगलानुभवनरूपं वेद कमिन्युच्यते तदपि बायोपशमिकभेदत्वात् प्रतिपात्येवेति, तथा मि यात्वनम्यामिथ्यात्वसम्गत्वमोहनीयक्षयात् , नायिकमिति, श्रारच -- "वीण दमणमाहे तिविहंमिविभवनियाभूयंमि। निपच्च वायमइल सम्मत्तं वाइय होद।। १ ।। छाया-क्षीणे दर्शनमोहे त्रि- विपि भरनिदानभूते । निप्रत्यपायमतुल सम्यक्त्वं क्षायिक भवति ।। १ । ति, उदत नायित्वादेवाप्रतिपाति, अत एव सिद्धत्वेऽ प्यनुमति इति । 'मिछादमग त्यादि, अभिग्रतः- कुमतपरिग्रह 4 यत्रास्ति नहामिग्राहिक नद विपरोनम-~अनभिग्रतिकमिति । 'श्रामग्गाहिए। उन्यादि 'भिमाहिक मियादशेन सपर्यमित --सपर्यवमान सम्यक्त्व प्राप्ती अपमिनमभव्यम्य सम्यकत्याप्राप्ते , तब मि यात्व मात्रमायतीन नयानुयाभियाटिकामति व्यापदिश्यते, अनीभग्राहिक मर्यासिमितरम्यापर्णवमितामति, Pा व्याः। दर्शनमारताय तानमभिधीयते, ना दुविहे नागे शादी न पावरमग वाग्नि दृचिंह इत्यादि सत्रावसानानि यो विश- नि सवाति॥ , यात वाह- दर्शनविषयः ७३ मूल -दुविहे नाणे पं० त०-पच्चक्खे चेव परोक्खे चेव १, पच्चरखे नाणे दुविहे पन्नत्ते तं०-केवलनाणे चेव णोकेवलनाणे- चेत्र २, केवलणाणे दुविहे पं० २०-भवत्थकेवलनाणे चेव सिद्धके चलनाणे चेत्र ३ भवत्थकेवलणाणे दुविहे पं० तं०-सजोगिभवत्थ केवलणाणे चेत्र, अजोगिभवत्थकेवलणाणे चेव ४, सजोगि भव- स्थकेवलणाणे दुविहे पं० सं०-पढमसमयसजोगिभवत्थकेवलणा- णे चेत्र अपढभमयसजागिभवत्थ केवलणाणे चेव ५, अहवा चरिमसमयसजोगिभवत्थकेवलणाणे चेव अचरिमसमयसजोगि भवत्थ फेवलणाणे चेव ६, एवं अजोगिभवत्थ केवलनाणेऽवि ७, ८, सिद्धकेवलणाणे दुविहे पं० २०-अणतरसिद्धकेवलणाणे चेव परंपरसिद्ध केवलणाणे चेव ६, अणंतरसिद्ध केवलनाणे दुविहे पं० तं०-एक्काणंतरसिद्धकेवलणाणे चेव अणेक्काणंतरसिद्धकेवल- णाणे १०, परंपरसिद्ध केवलणाणे दुविहे पं० तं०-एक्कपरंपरसिद्ध केवलणाणे चेव अणेक्कपरंपरसिद्धकेवलणाणे चेव ११, णोके चलणाणेदु विहे पं० त०–ोहिणाणे चेव मणपज्जवणाणे चेव १२, ओहिणाणे दुविहे ५० तं०--भवपच्चइए चेव खोवसमिए चेव १३, दोएहं भवपच्चइए पन्नत्त, तं०-देवाणं चेव नेग्डयाणं चेव १४, ढोण्ह खोवसमिए पं० त०–मणुस्साणं चेव पंचिदिय - ७४ जैनागमन्यायसंग्राहः तिरिक्खजोणीयाणं चेव १५, मणपज्जवणाणे दुविहे ५०तं 0-3. ज्जुमति चेव विउलमति चेव १६० परोक्खणाणे दुविहे पन्नत्ते, तं- आभिणिवोहियणाणे चेव सुयनाणे चेव, १७ आभिणिवोहियाणे दुविहे पं०२०---सुयनिस्मिए चेव असुयनिस्सिए चेव १८, मुयनिस्सिए दुविहे पं० तं०-अत्थोग्गहे चेव वंजणोग्गहे चेव १६, असुनिस्सितेऽवि एमेव २०, सुयनाणे दुविहे पं० तं०- अंगपवि? चेव अंगवाहिरे चेव २१, अंगवाहिरे दुविहे पं० तं०- आवस्मए चेव श्रावस्सयवइरित्ते चेत्र २२, आवस्सयवतिरित्ते दुविहे पं० २०-कालिए चेव उक्कालिए चेव ॥२३॥, (सू० ७१) टीका:- सुगमानि, नवर 'ज्ञान' विशेगावबोध अनाति-भुक्ते अभुते वा-ज्याप्नोति ज्ञानेनार्थानित्यक्ष-अत्मा तं प्रति यद्वर्तते इन्द्रिय. मनोनिरपे तत्वेन तत् प्रत्यक्षम -अव्यस्तित्त्वनाथेमाक्षातकरणदक्षमिति, " अग्यो जीवो अथव्यावरणभायण गुणरिणो जेण । तं पर घट्टः नागणं जं पगम्य तमिह निविह ।।१।” छाया--अक्षो जीवोऽर्थव्यापन भोजनगुणान्वितो येन । तं प्रति वर्तते नान यतप्रत्यक्ष तदिविविधम ॥2॥ नि' परेम्य -अचापेक्षया पुद्गलमयत्वेन द्रव्येन्द्रियमनोभ्योऽ- सम्य-जीवन्ग यननपरोक्ष निम्म्यशादिनि, श्राइच-अक्वस्सपोग्ग लक्या ज दधिदियमणा पग तण । तहितो जं नागां परोकावमिह तमगुमा. छाया-नान पुद्गलमयानि यद्रव्येन्द्रियमनांसि - गाय।।१॥"
दशनविषयः ७५ पर । पराणि तेन । तेभ्यो यद् ज्ञान परोमिह तदनुमानमिव, ॥ १॥" ति, अथवा परैरुक्षा-सम्बन्धन जन्यजनकभावलक्षणमस्येति परोक्ष-इन्द्रिय मनो- व्यवधानेनात्मनोऽथेप्रत्यायकमसाक्षात्कारीत्यर्थः।। 'पञ्चक्खे' त्यादि केवल- एकं ज्ञानं केवलज्ञानं तदन्यन्नोकेवलज्ञानम्-अवधिमन पर्यायलक्षण मिति । 'केवले' त्यादि, “ भवत्थकेवलनाणे चेव" त्ति भवस्थस्य केवल- २. ज्ञानं यत्तत्तथा, एवमितरदपि, 'भवत्थे। त्यादि, सहयोगैः-कायव्यापारादि भिर्यःस सयोगी, इन्समासान्तत्वात् स चासौ भवस्थश्च तस्य केवल- ज्ञानमितिविग्रहः, न सन्ति योगा यम्य स न योगीति वा योऽसावयोगी- शैलेशीकरणव्यवस्थित., शेषं तथैव, 'सयोगी । त्यादि, प्रथम समयः सयोगित्वे यस्य स तथा, एवमप्रथमो-द्वयादिसमयो यस्य स तथा, शेपं तथैव, अथवे' त्यादि, चरम अन्त्य समयो यस्य सयोग्यवस्थाया स तथा, शेप तथैव, 'एव' मिति सयोगि सूत्रवत्प्रथमाप्रथमचरमाचरमविशेषण. । युक्तमयोगिसूत्रमपिवाच्यमिति, 'सिद्धेः त्यादि, अनन्तर सिद्धो य सम्प्रति समयेसिद्ध , सचैकोऽनेको वा, तथा परम्परसिद्धो यस्य द्वयादय समया सिद्धस्य सोऽप्येकोऽनेकोवेति, तेषा यत् केवलज्ञानं तत्तथाव्यपदिश्यत इति । 'श्रोहिनाणे' इत्यादि, 'भवपञ्चइए? ति क्षयोपशमनिमित्तत्वेऽ- प्यस्य क्षयोपशमस्यापि भव प्रत्यत्त्वेन तत्प्राधान्येन भव एव प्रत्ययो यस्य तद् भव प्रत्ययमिति व्यपदिश्यत इति, इदमेवभाष्यकारेण साक्षेपपरिहार मुक्तं, तवाक्षेपः-"ओहीखोवसमिए भावे भणितो भवो तहोदइए। तो किह भवपञ्चइओ वोत्तुजुत्तोऽवही दोण्ह १॥ छाया--अवधि.नायोप- शमिके भावे भाणोतो भवस्तथौदयिके । तत कथं भव प्रत्ययिको वक्तु युक्तोऽवधि यो: ? ॥१॥ (दोण्ह) ति देवनारकयो , अत्रपरिहार.-सोऽवि जैनागमन्यायसंग्राह तिरिक्खजोणीयाणं चेव १५, मणपज्जवणाणे दुविहे ५०तं ०-उ- ज्जुमति चेत्र विउलमति चेव १६० परोक्खेणाणे दुविहे पन्नत्ते, तं- आभिणिवाहियणाणे चेव सुयनाणे चेव, १७ आभिणिवोहियणोणे दविहे पं०२०-मुयनिम्भिए चेव असुयनिस्सिए चेव १८, मयनिम्मिाए दविहे पं० २०–अत्थोग्गहे चेव वंजणोग्गहे चेव १६, अमुनिस्मितेऽवि एमेव २०, मुयनाणे दुविहे पं० तं० अंगपविट्ठ चेव अंगवाहिरे चेव २१, अंगवाहिरे दुविहे पं० २०-- आवम्मा चेव आवम्मयवइरित्ते चेव २२, आवस्सयवतिरित्ते दुविहे ६०२०-कालिए चेव उक्कालिए चेव ॥२३।।, (सू० ७१) टीकाः-सुगमानि, नवरं 'नान' विशेषावबोध, अनाति-भुक्ते पाने वा-यानोति मानेनार्थानित्यन –अत्मा तं प्रति यद्वर्तते इन्द्रिय. मनोनिरपेनत्वेन तन प्रत्यक्षम -अव्यवहितत्त्वेनाथेमाक्षातकरणदक्षमिति, 'आह च -" प्रयो जीवो अत्यव्यावरणभायण गुणरिणो जेण । तं पर बट्टा नागा जं पक्वं तमिह तिविह ॥१॥" छाया-अक्षो जीवोऽर्थव्यापन भारनगुणान्वितो येन । तं प्रति बर्तने नान यतप्रत्यक्षं तदिहत्रिविधम ॥ ॥ “नि परेम्य.-अनापेक्षया पुद्गलमयत्वेन द्रव्येन्द्रियमनोभ्योऽ- नम्य-जोबस्य बत्तनपरोक्ष निमन्वशादिति, आहच-अक्वम्सपोग्ग लक्या ज विदियमणा पग तंग । तेहितो नं नार्ग परोकावमिह नमामा- चाया-अनात पुद्गलमयानि यद्रव्येन्द्रियमनांसि राय॥१॥"
दशनविषय ७५ - पराणि तेन । तेभ्यो यद् नान परोमिह तदनुमानमिव, ॥१॥" ति, अथवा परैरुक्षा-सग्बन्धनंजन्यजनकभावलक्षणमस्येति परोक्ष-इन्द्रिय मनो- व्यवधानेनात्मनोऽथेप्रत्यायकमसाक्षात्कारीत्यर्थ ।। 'पञ्चक्खे. त्यादि केवलं- एकं ज्ञानं केवलज्ञानं तदन्यन्नोकेवलज्ञानम्-अवधिमन पर्सायलक्षण मिति । 'केवले' त्यादि, " भवत्यकेवलनाणे चेव त्ति भवस्थस्य केवल- ज्ञान यत्तत्तथा, एवमितरदपि, ‘भवत्ये' त्यादि, सहयोगैः-कायव्यापारादि भिर्यास मयोगी, इनसमासान्तत्वात् स चासो भवस्थश्च तस्य केवल- ज्ञानमितिविग्रहः, न मन्ति योगा यम्य स न योगीति वा योऽसावयोगी- शैलेशीकरणव्यवस्थितः, शेपं तथैव, ‘सयोगो । त्यादि, प्रथम समयः सयोगित्वे यस्य स तथा, एवमप्रथमो-द्वयादिसमयो यस्य स तथा,शेपं तथैव, ॥ अथवे" त्यादि, चरम प्रन्त्य ममयो यस्य सयोग्यवस्थाया स तथा, शेष तथैव, 'एव' मिति मयोगि सूत्रवत्प्रथमाप्रथमचरमाचरमविशेपण. युक्तिमयोगिसूत्रमपिवाच्यमिति, 'सिद्धेः त्यादि, अनन्तर सिद्धो य सम्प्रति समयसिद्ध , सचैकोऽनेको वा, तथा परम्परसिद्धो यस्य द्वयादय समया सिद्धस्य सोऽप्येकोऽनेकोवति, तेषां यत् केवलज्ञानं तत्तथाव्यपदिश्यत इति । "प्रोहिनाणे इत्यादि, 'भवपञ्चइए' ति क्षयोपशमनिमित्तत्वेऽ- प्यस्य क्षयोपशमस्यापि भव प्रत्यत्त्वेन तत्प्राधान्येन भव एव प्रत्ययो यत्य तद् भव प्रत्ययमिति व्यपदिश्यत इति, इदमेवभाष्यकारेण साक्षेपपरिहार मुक्तं, तत्राक्षेप -- " श्रोहोखोवममिए भावे भरिणतो भवो तहोदइए । तो किह भवपाइयो वोत्तु जुत्तोऽवही दोण्ह १॥ छाया-अवधि चायोप- शमिफे भावे भाणीतो भवस्तधोदयिके । तत कथ भव प्रत्यायको वक्तु युकोऽवधियो ? ॥१॥ (दोण्हं) ति देवनारक्यो , अत्रपरिहार -सोऽवि ?
दशनविषय ७७ द् वा श्रोत्रादिप्रभव तदश्रुतनिश्रितमिति, आह च-"पुब्ब सुयपरिकन्मिय मतिस्स ज सपय मुयाइय । (त्त) सुवास्सियमियर पुण अणिस्मियमइ च उक्क्क (त) ॥ १ ॥ छाया-- पूर्व श्रुतपरिकमिनमतेयत् साम्प्रत श्रुतातीतम् । तन्निश्रितमितरत पुनरनिश्रित मतिचतुष्क तत् ॥१॥" ति 'मुए त्यादि, अयोगहे' त्ति अर्यते-अधिगम्यतेऽयंते वा अन्विष्यत इत्यर्थः, नम्य सामान्यरुपस्यअशेषविशेपनिरपेक्षानिर्देश्यस्य रूपादेरेवयहणं-प्रथम परिच्छेदनमर्थावग्रह इति निर्विकल्पक ज्ञान दर्शनमिति यदुन्यते इत्याये , स च नैश्चायको य स सामयिको यस्तु व्यव- हारिक शब्दोऽयमित्याद्युल्लेखवान स प्रान्तमौहत्तिक इति, अयं चेन्द्रियम- न सम्बन्धात् पोढा इति, तथा व्यज्यतेऽनेनाथे प्रदीपेनेव घट इति व्य- जन, तच्चोपकरणेन्द्रियं शब्दादित्यपरिणतद्रव्यसघातो वा, ततश्च व्य- ब्जनेन-उपकारणेन्द्रियेण शब्दादित्यपरिणनद्रव्याणा व्यञ्जनानामवग्रहो व्यजनावग्रह इति, अथवा व्यजन-इन्द्रियशब्दादिद्रव्यसम्बन्ध इति, प्राह च- "वजिज्जइ जेणऽत्यो घडोव्य दीवेण वजण तान । उवगरणिाढय सदादि- परिणयद्दल सबन्धो ॥१॥" छाया- व्यज्यते येनार्थी घट इव दीपेन व्यजन ततस्तत् उपकरणेन्द्रियशव्दादिपरिणतद्रव्यसम्बन्ध. ||| 'त्ति' अय च मनो नयनवर्जन्द्रियाणा भवतोति चतुद्वा, नयनमनमोरप्राप्तायपरिच्छदक त्यात इतरेपा पुनरन्ययेति, ननु व्यंजनावग्रहो ज्ञानमेव न भवति, इन्द्रियश. व्दादिद्रव्यसम्बन्धकाले तदनुभवाभावात, बविरादीनामिवेति, नैव, व्यजना वग्रहान्ते तद्वस्तु ग्रहणदेवोपलब्धिमभागात, इह यस्य शेयवन्तु ग्रह- णस्यान्ते तत एप ज्ञयवस्तूपादानात् उपलब्धिर्भवति तत् ज्ञान दृष्ट , यथाs- विग्रहपर्यन्ते तत एवाचावग्राह्यवस्तु ग्रहणाद् ईहासद्भावात् अर्थावन- दर्शनविपय ७६ श्राहच-"ममणेण सावरण य अवस्म कायवयं हवइ जम्हा । अतो अहो- णि मस्स य तम्हा आवस्मयंनाम ||१||छाया-श्रमणेन श्रावकेण चावश्यं कर्तव्यं भवति यम्मात् । अतेऽन्होनिशश्च तस्मादावश्यक नाम।।१।। आरश्यकाद् व्यतिरिक्त ततो यदन्यदिति । "श्रावस्मगवतिरित्त, इल्गदि यदिह दिवसनिशाप्रथमपश्चिमपौरुपीद्वय एव पठ्यते तत् कालेन निर्वृत्तं कालिकम्--उत्तराध्ययनादि, यत पुन. कालवेलावर्जपठ्यतेतदूध पालिकादित्युत्तरकालिक-दशकालिकादीति ।। उक्त ज्ञान, चारित्र प्रस्ता- चयति- मूलः-दुविहे धम्मे पं० तं०-सुयधम्मे चेव चरित्तधम्मे चेत्र, सुयधम्मे दुविहे पं० न०-सुत्तसुयधम्मे चेव अत्थमुयधम्मे चेव, चरित्तधम्मे दुविहे पं, तं०-अगारचरित्तधम्मे चेव अणगारचरित्तधम्मे चैव, दुविहे मंजमे पं० २०-सगगसजमे चेव वीतगगमंजमे चेव, मगगसंजमे दुविहे पं० त०-मुहमसंपगय मरागमंजमे चेव, वादरमंपरायमगगसंजमे चेव. सुहमसपगय मरागसंजमे दुविहे पन्नत्ते ६०-पढमसमयमुहम परायसगग- मजमे चेव अपटमममयमु०, अथवा चरमसमय सु० अचम्म समय सु०. श्रवा मुहुममंपगयमगगमंजमे दुविहे पं, तं० मंकिलेममाणए चेव विसुज्झमाणए चेव. वादग्रूपगयमगग- मंजमे दुविहे ६० तं०-पटमसमयवादरमं० अपटमसमय वादर जैनागमन्यायसग्रह. . जानमिति, 'प्राह च "अन्नाण सो बहिराइण व तकालमणुवलंभाओ। [प्राचार्य:] न तदन्ते तत्तोच्चिय उवलंभाप्रोतयं नाणं ।।१॥ छायो- मानं न चधिरादीनामिव तत कालमनुपलम्भात। न तदन्ते तदेवोपलम्भात्त क्न मानम ||१|| ति, किन- व्यजनावग्रहकालेऽपि ज्ञानमस्त्येव, सूक्ष्मा- व्यानवान नोपलभ्यते, सुप्त का विज्ञानदिति हादयोऽपि श्रुतनिश्रिता 73, नास्ता , हिन्यानसनुरोधादिति । "प्रस्मयनिरिमण्ऽवि एमेवः ति अ- विनय जना पनाभेदेनाश्रुतनिश्रिनमपि द्विधैवेति, इदं च श्रोत्रादिप्र- भवमेव, गन प्रोत्पत्तिम्यागश्रुतनिश्रितं नवार्थावप्राःसम्भवति, यदाह- पनि नाहीगो जुमे विवेण उग्गहो रहा । किं सुमिलिट्ठमवाप्रो द- पण मन विनि ||१||" छाया-कथं प्रतिष्टिहीनो युध्यति बिम्बनाव- माझि मुश्लिष्टमयाया दर्पणसंक्रान्तबिम्बमिति ॥ १ ॥ न तु जनावमाः तम्गेन्द्रियाश्रितत्वोत , बुद्धीनान्तु गानसत्वात , ਰ बुटियोऽन्यत्र व्यंजनावग्रहोमन्तव्य इति । 'मुयग्णाणे' इत्यादि प्रवगनापुर पस्यामानीत्रामानि तंपु प्रविष्टं-तदभ्यन्तरं तत म्वरूपमित्यथः, नगमावर "उत्पन्न उवे त्यादि मातृका पदत्रयमभवं या ध्रुव श्रुतं या प्राचादि, यापुने. -स्यविरकृतं मातृकापवयव्यतिरिकव्याकरण नियतमपश्रुतं बोत्तराध्ययनादि तरंग वामिति ॥ पाहच-"गणहर ? अंगात 'प्रामा मुख्यागरायो वा २। धुव १ चल विसेमणाश्रो २ 'प्रगारगंगगनाणात" ||१|| छाया--गणधर विरादिकृतं श्रादेशान् मुफ यसमाती वा । पचल विशेषग्गाद्वा अशानद्या. नानान्त्रम् ॥१॥ प्रगलागी न्यादि अवश्यं क्त्तव्यमित्यावश्यक-सामायिकादि पधिम , दर्शनविपच गाच-"मणा नारा र असम्म कायययं बह जम्मा । नो प्रो- णि मग्न य नम्हा श्रावस्मयनाम ||छाया-अमगेन प्रावण चार पर्त भरति यम्मान । अंतऽन्होनिशश्व तम्मादारण्यक नाम|| पारन्यसाद व्यनिरिम: ननो यदन्यदिति । "श्रारम्लायतिरित्त · उत्यादि यदि दियनिशाप्रयमपश्चिमपोम्पीद्वय एर पठ्यते तन कालन निच कालिकम्--उत्तराध्ययनादि, यन पुन, कानवेलावर्जपठ्यतेनदृत्र पालिकादित्युत्तरकालिक-दशकालिकादीति ।। उस नानं, चारित्र प्रता- र्यात- मूलः-दुविहे धम्मे पं० २०-सुयधम्म चेव चरित्तधम्मे व. मुयधम्मे दविहे. पं० त०-मुत्तसुयधम्मे चैव अन्धसुयधम्म चव, चग्निधम्मे दविह पं. २०-यगारचरित्तधम्म चव अरणगारचरितधम्मे चेव, दुविहे मंजमे पं० २०-गगमजमे पेव वीनगगमंजमे चैव, मगगमंजमे दविहे पं० २०-सुमनपगय गगगगंजमे चेव. वाढरपगयमगगनजमे चव. गहमन्न पगय मरागसजमे दुविहे. पन्नने १०-पटमसमयमुहमसंपरायमगग- मनमे व अपटमममयमु०, अथवा चरमसमय सु० अनरम समय मु०. पहवा मुहमनपगयनगगनजम दविहे पं, नं0- गफिनेगमाराए चेव विमुभ.माणए चेव. वादग्र पगयमगग- मंजमे दुविहे ६० तं०-पटमनमयवादग्नं० श्रपटमसमर दादर - जेनागमन्यायसग्रह. नोपलभ्यते, सुप्न । हवानमिति, पाल च "अन्नाणं सो बहिराइण व तकालमणुवलंभाओ। [प्राचार्य.] न तदन्ते तत्तोन्चिय उवलमा प्रोतयं नाणं ।।१॥ छायो- समान म नभिरादीनामिव नत कालमनुपलम्भात। न तदन्ते तदेवोपलम्भात्त न जानम ॥१॥ नि, किन - व्यंजनावमाकालेऽपि ज्ञानमस्त्येव, सूक्ष्मा- गरबान कवितानवदिति हादयोऽपि श्रुतनिश्रिता य, ननाना , दिल्यानकानुरोधादिति । 'अम्मुनिम्मिाऽवि एमेव ति -प्र- विनय जना पदभेदेनाशुनिश्रितमपि द्विवेति, इद घ श्रोत्रादिप्र- भरमेय. गत प्रोपनिाया श्रुतनिश्रितं नवार्थावग्रह.सम्भवति, यदाह- ""पटि दीगो नाम विग्ण उग्गोला । किं सुमिलिट्ठमवाप्रो द- पण मन विति ||" छाया प्रतिकुपटीनो युभ्यति विम्वेनाव- प।कि मुश्लिष्टमाया दर्पणसंक्रान्तविम्बमिति ॥ १ ॥ न तु याना.. नगेन्द्रियाश्रितत्यात , बुद्धीनान्तु मानसत्वान् , तता गुलियोनयर जनायनामन्तव्य इति । 'मुयगणा' इत्यादि प्रवचनपुर पस्या मानीयानानि तप प्रविष्ट-तदभ्यन्तरं नत म्वरूपमित्यथः, नाम "उपनं वे" त्यादि मात्रता परनयमभयं वा ध्रुव श्रुतं ना 'मानादि, गतपुनःस्थविरतं मातृकापत्रयव्यतिरिकव्याकरण निगम आशुत बोनमध्ययनादि नग वामिनि ॥ ग्राहच--- "गणार ? ग: 'पारमा मुधबागमणी बा । धुव १ चल विगेमणाी २ गुनागर " ||१|| छाया---गगावर ग्यविरादिकृतं श्रादेशात् मुफ र पान विशेषगाना अमानजयो. नानाम् || म. त्याद अवश्यं कनयामन्यावश्या-मामायिकादि पविधम ।
दशेनश्यिय मान-निमणा मारा प्रयास कायव्यय जमा । तो 7- Fmमय नन्दा प्रायम्नयनाम ॥शाछाया-अमगेन पार कंग चाय व भानि यम्मान | प्रतन्दोनिगश्च न्मादायक नाम।।।। प्रारम्यवाद व्यनिरिण ततो यदन्यदिति । "श्रावग्मावतरित्त याटि दिर, दिवसनिशाप्रथमपश्चिमपोम्पीद्वय एवं पश्यने नन गन्तन निच कानिकम--उत्तराध्ययनादि, चन पुन कालचेलायजपथ्यतेनदार पालिकादित्युत्तरकालिक-दागकालिकादीति ।। उफ नान, चारित्र प्रना- पति- मृल:-दुविहे धम्मे पं० २०-सुयधम्म चेव चरितधम्मे पंच. सुयधम्मे दविहे पं० त०-गुनसुयधम्मे चैव अन्यमुयधम्मे चव, चरिनामे दुविहे पं. नं०-अगाग्चरित्तधम्म चैत्र अरणगारचरितधम्म चत्र. दुविहे मंजमे पं० २०-गगरजमे पंव वीनगगगंजमे चेव, मगगनंजमे दविह. पं० न०--मुमपराय गगगगंजमे व. वादग्पगयमशगजम चव. गहमनपगय मगगमजमे दविहे पन्नने १०-पटमममयगुर मनपरायगगग- मजमे चैव 'प्रपटमसमयमु०, अथवा चरमसमय सु. अचम्म समय नु०. प्रहावा सुहमनपरायनगगनंजी दहि. पं, नं.---- शिलगमागा व विमुज्भमागा चव, वादन पगयनगग- मंजमे दुविर 10 नं0-~-पटमसमयवादरम० श्यपटमनमय दादर --
जनागमन्यायसंग्रह
,
सं०-अहवा चरिमसमय० अचरिम समय०, अहवा वायरसंपराय
सरागसंजमे दुविहे पं० २०-पडिवाति चेव अपडिवाति चेन,
वीयरागसजमे दुविहे पं० २० - उवसंतकसायवीयरागसंजमे
चेव खीणकसायवीयरागसंजमे चेव, उवसंतकसायवीयराग
सजमे दुविहे पं० तं०-पढमसमयउवसंतकसायवीतरागसंजमे
चेव, अपढमसमयउव०, अहवा चरिमसमय० अचरिमसमय०,
खीण कसायवीतरागसंजमे दुबिहे ६० तं०-छउमत्थखीणकसाय
बीयरागसंजमे चेव केवलिखीणकसायवीयरागसंजमे चेब,
छउमत्थखीणकसायवीयरागसंजमे दुविहे पं० २०-सयबुद्ध
छउमत्थखीणकसाय० बुद्धवोहियछ उमत्थ०, सयंबुद्धछउमत्थ०
दुविहे प० तं०-पढमसमय० अपढमसमय०, अहवा चरिमसमय
अचरिमसमय०, बुद्धवोहियछउमत्थखीण दुविहे पं० २०-
पढमासमय० अपढमसमय०, अहवा चरिमसमय० अचरिमसमय०,
केवलिखीणकसायवीतरागसंजमे दुविहे पं० तं०-सजोगि
केवलिखीणकसाय० अजोगिकेवलिखीणकसायवीयराग०,
सजागिकेवलिखीणकसायसेंजमे दुविहे पं० तं०- पढमसमय
अपढमसमय०, अहवा चरिमसमय० अचरिमसमय०, अजोगि
केवलिखीणकसाय. संजमे दुविहे पं० त०-पढमसमय०
,
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८२ जैनागमन्यापसंग्रह छाया -क्रोधाद्या संपरायास्तैयुत संपरैति संसारम्। स च लोभकषायरूप: उपशमकस्य क्षपकस्य वा यस्य स सूक्ष्म संपराय साधुस्तस्य सरागसंयमः, विशेषणसमासो वा सरणनीय इति, वादग:-स्थूराः सम्परायाः कषाया यस्य साधो यस्मिन वा संयमेः स तथा--सूक्ष्मसम्परायप्राचीनगुणस्थानकेपु, शेष प्रागवदिति । सुहुमे' त्यादि, सूत्रद्वये प्रथमाप्रथमसमयादिविभागः केवलज्ञानवदिति । अहवे त्यादि, संक्लिश्यमान' संयम उपशमश्रेण्या प्रतिपतत , विशुद्धधमानस्तामुपशमश्रेणी वा समारोहत इति । 'बादरे त्यादि सूत्रद्वयं, बादर सम्पराय सरागसंयमस्य प्रथमाप्रथमसमयता संयम प्रतिपत्तिकालापेक्षया चरमाचरमसमयतातु यदनन्तरं सूक्ष्मसम्परायता असंयतत्वं वा भविष्यति तदपेक्षयेनि, 'अवे' त्यादि, प्रतिपाती उपशमकस्यान्यस्य वा अप्रतिपातीक्षपकस्येति । सरागसयन उक्तोऽतो वीतरागसंयममाह - 'वोयरागे त्यादि, उपशान्ता• प्रदेशतोऽप्यवेद्यमाना यस्मिन् वा स तथा साधु. सयमोवेति - एकादश गुणस्थानवताति, क्षीणकपायो द्वादशगुणस्थानवाति, 'उवसंते' त्योदि सूत्रद्वयं प्रागिव 'खीणे त्यादि, छादयत्यात्मस्वरूपं यत्तत् छद्मज्ञ नावर- णादिघातिकर्म तत्र तिष्ठनोति छद्मस्थ -अकेवली, शेषं तथैव, केवलम उक्तस्वरूपं ज्ञानं च दर्शनं चास्यास्तीति केवलोति । 'छउमत्थे' त्यादि, स्वय बुद्धादिस्वरूप प्रागिवेति, 'सयबुद्ध' त्यादि ना सूत्राणि गतार्थान्येवेति ॥ (स्थानाङ्ग सूत्र ७२ उद्देश १) कषाया यस्य मूल:-"अथवा तिविधे ववसाते पं० तं०-- पच्चक्खे पञ्च- तिते आणुगामिए ॥ ५, दर्शनविपय ८३ वलाख्य . AN टीका :-व्यवसायो-निश्चय., स च प्रत्यक्षोऽवधिमन पर्यायके- प्रत्ययोत्-इन्द्रियानिन्द्रियलक्षणान्निमित्ताज्जात प्रायिकः साध्यम् –अग्न्यादिकमनुगच्छति साध्याभावे न भवति यो धूमादिहेतु सोऽनुगामी ततो जातमानुगामिकम-अनुमान तद्पो व्यवसाय आनुगा- मिक एवेति , अथवा प्रत्यक्ष स्वयदर्शनलक्षण प्रात्ययिक -आप्तवचन- प्रभव , तृतीयस्तथैववेति ५ । (स्थानांग सू० स्थान ३ उ ३ सू १८५) मूलः-चउविहेणाते पं० तं०-अाहरणे पाहणतद्द से आहरणतदोसे उवन्नासोवणए १ आहरणे चविहे पं० २०- अवाते उवाते ठवणाकम्मे पडुप्पन्नविणासी २, आहरणत से च. उबिहे पं० तं०-अणुसिट्ठी उवालंभे पुच्छा निस्सावयणे ३,आ- हरणतद्दोसे चउबिहे ५० त०-अधम्मजुत्ते पडिलोमे अंतोवणी ते दुरुवणीते ४ उवन्नासोवणए चउबिहे पं० त०-तव्वत्थुते तद- न्नवत्थुत्ते पडिनिभे हेतु ५ हेऊचउव्विहे - पं० २०–जावतें थावते वसते लूसते, अहवा हेऊचउबिहे प० तं०-पच्चक्खे अणुमाणे प्रोवम्मे आगमे, अहवा हेऊचउबिहे पं० २०-अत्थितंअस्थि- सो हेऊ १ अत्थित्तंणत्थि सो हेऊ २ णत्थित्तं अत्थि सो हेऊ३ णत्थित्तं णत्थित सो हेऊ ४ (सू० ३३८) टीका -तत्र ज्ञायते अस्मिन् सति दान्तिकोऽर्थ इति अधिक- रणे क्तप्रत्ययोपादानात् ज्ञातं- दृष्टान्तः, साधनसद्भावे साध्यस्यावश्यभावः . ५ ८४ जैनागमन्यायसंग्राहः साध्याभावे वा साधनस्यावश्यमभाव इत्युपदर्शनलक्षणो, यदाह-"साध्येनासु- गमो हेतोः, साध्याभावे च नास्तिता । ख्याप्यते यत्र दृष्टान्तः, स साधर्मेतरो द्विधा ॥११॥” इति, तत्र साधर्म्यदृष्टान्तोऽग्निरत्र धूमाद् यथा महानस इति, वैधर्म्य दृष्टान्तस्तु अग्न्यभावे धूमो न भवति, यथा जलाशये इति, अथवा अख्यानकरूपं ज्ञातं तच्च चरितकल्पितभेदात् द्विधा, तत्र चरितं यथा नि- दानं दुखाय ब्रह्मदत्तस्येव, कल्पितं यथा प्रमादवतामनित्यं यौवनादीतिदेश- नीयं, यथा पाण्डुपत्रेण किशलयानां देशितं, तथा हि—'जह तुब्भे तह अम्हे तुब्भेऽविय होहिहा जहा अम्हो अप्पाहेइ पडतं पंडुयपत्तं किसलयाणं . ॥१॥ छाया-यथा यूयं तथा वयं यूयमपि भविष्यथ यथा वयम् शिक्षयति पतत्पांडुपत्रं किशलयान् । इति, अथवोपमानमात्र ज्ञातं सुकुमारः करः किशलयमिवेत्यादिवत् अथवा ज्ञात-उपपत्तिमात्रं ज्ञातहेतुत्वात्, कस्मोद्- यवाः क्रीयन्ते १ यस्मान्मुधा न लभ्यते इत्यादिवदिति, एवमनेकधा साध्य- प्रत्यायनस्वरूपं ज्ञातमुपाधिभेदात् चतुर्विधंदर्शयति-तत्र आ-अभिविधिना हियते प्रतीतौ नीयते अप्रतीतोऽर्थोऽनेनेत्याहरणं, यत्र समुदित एव दाष्टीन्तिकोऽर्थः उपनीयते यर्थापापं टुःखाय ब्रह्मदत्तस्येवेति, तथा तस्य- आहरणार्थस्यदेशस्तद्देशः स चासावुपचारादाहरणं चेति प्राकृतत्वात आहरणशब्दस्य पूर्वनिपाते आहरणतःश इति, भावार्थश्चात्र-यत्र- दृष्टान्तार्थदेशेनैव दाष्टान्तिकार्थस्योपनयनं क्रियते तत्तद्देशोदाहरणमिति, यथा चन्द्र इव मुखमस्या इति, इह हि चन्द्र सौम्यत्वलक्षनणेनैव देशेन मुखस्योपनयनं नानिष्टेन नयननासावर्जितत्वकलंकादिनेति, तथा तस्यैव- आहरणस्य सम्बन्धीसाक्षात् प्रसंग सम्पन्नो वा दोषस्तद्दोषस चासो धर्मे धर्मिण: उपचारादाहरणं चेति प्राकृतत्वेन पूर्वनिपातोदाहरण तद्दोष - दर्शनविषय इति, अथवा तस्य-श्राहरणस्यदोषो यस्मिंस्तत्तथा, शेषं तथैव, अयमत्र भावार्थ – यत् साध्य विकलत्वादिदोपदुष्ट तदोपहरण, यथा नित्य शब्दोऽमूर्त्तत्वात घटवत् इहसाध्यसाधनवैकल्यं नामदृष्टान्तदोपो, यच्चासभ्यादिवचनरूपं तदपि तदोषाहरण, यथा सर्वथाऽहमसत्यं- परिहरामि गुरुमस्तककर्तनादिति, यद वा साध्यसिद्धिं कुर्वदपि दोषा- न्तरमुपनयति तदपि तदेव, यथा सत्यंधर्ममिच्छन्ति लौकिक मुनयोऽपि- "वरंकूपशताद् वापी वरं वापीशतात् क्रतुः । वरं क्रतुशतात पुत्रः सत्यं पुत्रशताद् वरम् ।। १ ॥ इतिवचन वक्तृनारदवदिति, अनेन च श्रोतु पुत्र क्रतुप्रभृतिषु प्राय संसारकारणेपुधर्मप्रतीतिराहितेति अाहरणतदोषतेति, यथा वा-बुद्धिमता केनापि कृतमिद जगत् सन्निवेशविशेषवत्वात् घटवत् सचेश्वर इति, अनेन हि स बुद्धिमान् कुम्भकारतुल्योऽनीश्वर सिद्धयतीति, ईश्वरश्च स विवक्षित इति, तथा वादिना अभिमतार्थसाधनायकृते वस्तूप- न्यासे तद् विघटनाय य प्रतिवादिनाविरुद्धार्थोपनय क्रियते पर्यनु योगोपन्यासे वा य उत्तरोपनय स उपन्यासोपनय , उत्तररूपमुपपत्तिमात्र मपि ज्ञातभेदो ज्ञातहेतुत्वादिति यथा अकर्ता आत्मा अमूर्त्तत्वात् आकाश- वदित्युक्ते अन्य आह-आकाशवदेवाभोक्तेत्यपि प्राप्तमनिष्टचैतदिति, यथा वा मांसभक्षणमदुष्ट प्राण्यङ्गत्वादोदनादिवत् अनोहान्य.-श्रोदनादि वदेव स्वपुत्रादिमांसभक्षणमप्यदुष्टमिति, यथा वा त्यक्तसगा वस्त्र पात्रा- दि सग्रहं न कुर्वन्ति ऋषभादिवत्, अत्राह कुण्डिकाद्यपि ते न गृह ति तद्- वदेवेति, तथा कस्मात् कर्मकुरुषे यस्माद् धनार्थीति इह प्रथमं ज्ञातं समग्र- साधये द्वितीयं देशसाधर्म्य तृतीयं सदोष चतुर्थ प्रतिवाद्युत्तररूपमित्यय मेषां स्वरूपविभाग इति, इह देशतः संवाद गाथा-चरियं च कप्पिय वा .
क जैनागमन्यायसग्राह दुविहं तत्तो चउव्यिहे क्केक । आहरणे तद्दे से तहोसे चेवुवन्नासा ॥१॥ छाया-चरितं च कल्पिक वा द्विविध ततश्चतुविधमेकैकं आहरणं तद्देश: तदोषश्च व उपन्यासः ॥ १॥ इति, “ अवाये। अपायः-अनथे स यत्र द्रव्यादिष्वभिधीयते यथतेषु द्रव्यादिविशेष्वस्त्यपायो विवक्षितद्रव्यादि- विशेषेष्विव, हेयता वाऽस्य यत्राभिधीयते तदाहरणमपाय इति, स च चतु र्धाद्रव्यादिभि:-तत्र द्रव्यात् द्रव्ये वाऽपायो द्रव्यमेव वा तत् कारणत्वादपायोद्रव्यापाय, एतद् हेयतासाधकं एतत्साधकं वाऽऽ- हरणमपि तथोच्यते, तत् प्रयोगो-द्रव्यापाय परिहार्य्यस्तत्र वाऽपायो वर्तते- देशान्तरगमनेनोपार्जितद्रविण्योस्तल्लोभात् परस्परमारणपरिणतयो स्व ग्रामाद् वहिः प्राप्तावनुतापात् हृदत्यक्तमत्स्यगिलित तद् वित्तयोर्मत्स्यबन्ध- कपाश्र्वान् गृहीतस्य तस्यमत्स्यस्य विदारणेऽवाप्त तद्रुव्यलुब्धभगिन्या मत्स्य- च्छेदकशस्त्राभिघातेन तदुद्दालनप्रवृत्तिमारित मातृकायास्तथाविधव्यतिकर- दर्शनोत्पन्नसंवेगात् प्रतिपन्नप्रव्रज्ययोर्धात्वणिजोरिव, तत् परिहारश्च प्रव्रज्यया तत्त्यागादिति, आहरणता चास्यदेशेनोपनयस्याविवक्षणादिति, तथाक्षेत्रात क्षेत्रे वा क्षेत्रमेव वाऽपाय क्षेत्रापाय , शेषं तथैव, एवमुत्तरत्रापि तत् प्रयोग'-अपायवत् क्षेत्रं वर्जयेत् जरासन्धाभिधानप्रतिवासुदेवात् सम्भावितापायां मथुरानगरी यथा दशार्हचक्र वर्जयामासेति, अथवा सम्भ- वत्यपायः स प्रत्यनीक क्षेत्रे ससप्र्पग्रहवत्, कालापायो यथा-सापायकाल वर्जने यतेत, द्वैपायनो द्वारकामावर्षद्वादशकाद्धक्ष्यतीति श्रुतनेमिनाथ वचनोद्वादशवर्पलक्षणसापायकालपरिजिहीर्षयोत्तरापथप्रवृत्तो द्वापा- यनोयथेति, अथवा सापायोऽपिभवति कालो रुद्रादिवदिति, तथा भावापा- यथाभावापायं परिहरेत् महानागवत् नागदत्तक्षुल्लकवद् वेति ,तथाहि- चालत्व एव दर्शनविपयः किल कश्चित् 'तपकः प्रस्तुतपारणक सक्षुल्लक समारब्धभिक्षार्थभ्रमणक कथञ्चिन्मारितमण्डूकिक क्षुल्लकरितोऽप्रतिपन्नतद्वचनः पुनरावश्यक काले स्मारिततदर्थ समुत्पन्नकोपः क्षुल्लकोपघाताया म्युत्थितो वेगादागच्छन् स्तम्भ आपतितोमृतो ज्योतिप्केषूत्पन्नोऽनन्तरच्युतो जातिस्मरणदृष्टिविषसर्प- तयोत्पन्न' सप्पडष्टमृत् पुत्रेण च सप्पुकुपितेन गज्ञाऽऽदिएजनमार्यमा- णेषु नागेपु नाविनाशकनरेण केनाप्योषधिवलादाकृप्यमाणो दृष्टको- पविपाकतया च मदृष्टिविपेण मा घातकपुरुषविघातो भवत्विति भाव- नया पुच्छतो निर्गच्छन् यथानिगमञ्च खण्ड्यमानः कोपलक्षणभावापाय परिहृतवानिति, तथा स एवानन्तर नागदत्तभिधानराजसुततयो पन्नो प्रतिपन्नप्रव्रज्योऽत्यन्तसविग्नस्तिर्यग्वाभ्यासाच्चात्यन्त सुधालुरादित्योदयादस्तमयं यावद् भोजनशीलोऽसाधारणगुणावर्जित देवताभिवंदितोऽत तद्गच्छगतमासादिक्षपक चतुष्टयस्येर्पाविषयी भूतो विनयार्थ तेप'मुपदर्शितस्वार्थानीतभोजनः तेश्च मत्सरादभोजन मध्यनिष्ठय तनिष्ठीवनोऽत्यन्तोपशान्तचित्तवृत्तितया य सञ्जातकेवल. पुर्देवतावन्दितस्तेषामपि क्षपकाणासवेगहेतुत्वेन केवलज्ञानदर्शनसमृद्धि सपादक' कोपरूप भावापायं परिजहारेति अथवा कोपादिलक्षणो भावोऽपा- ( योभवति क्षपक्स्येवेति, गाथे इह क्षपस्येवेति, गाथे इह - दन्यावाए दुन्नि उ वाणियगा भायरो वण- नित्ति । वहपरिणयमेक्कमिक्क दह मि मच्छेण निव्वेओ ।। १॥ खित्तमि अबक्कमण दसारवग्गस्स होइ अवरेण । दीव यणो य काले भावे मण्डूक्क- याखमओ ।। २ ।। छाया - द्रव्यापाये द्वौ वणिग्भ्रातरौ धनानमित्तम् । वध. परिणतौ एकैकस्मिन् हृदे मत्स्येन निर्वेदः ॥ १॥ क्षेत्रेऽवक्रमण दशाह वर्गस्य भवत्यपरस्याम् । द्वीपायनश्च काले भावे मण्डूकिका क्षपक ॥२॥ इति, एव ८८ जनागमन्यायसंग्रहः 'उवाए। त्ति उपाय:-उपेयं प्रतिपुरुषव्यापारादिकासाधनसामग्री स यत्र द्रव्यादावुपेये अस्तीत्यभिधीयते यथैतेषु द्रव्यादिविशेषेषु साधनीयेष्वस्त्यु- पायो विवक्षितद्रव्यादिविशेषवत् , उपादेयता वाऽस्य यत्राभिधीयते तदाहर- रणमुपाय इति, सोऽपिद्रव्यादिभिश्चतुबैर्व, तत्र द्रव्यस्य सुवर्णादे प्रासुको दकादेर्वा द्रव्यमेव वा उपायो द्रव्योपाय , एतत्साधनमेतदुपादेयता साधनं वाऽऽहरणमपि तथोच्यते, तत् प्रयोगश्चैवम् अस्तिसुवर्णादिषूपायः उपाये- नैव वा सुवर्णादौ प्रवर्तितव्यं, तथाविधधातुवादसिद्धादिवदिति, एवं क्षेत्रोपाय'-क्षेत्रपरिकर्मणोपायो यथा अस्त्यस्य क्षेत्रस्य क्षेत्रीकरणोपायो लागलादिस्तथाविधसाधव्यापारो वा तेनैव वा प्रवर्तितव्यमत्र तथा विधान्य- क्षेत्रवादति, एवं कालोपाय कालज्ञनोपाय , यथा अस्तिकालस्य ज्ञाने उपायः धान्यादेरिव, जानीहि वा कालं घटिकाच्छायादि नोपायेन तथा भूतगणित- नवदिति, एवं भावोपायो यथा भावज्ञाने उपायोऽस्ति भावं वोपायत्तो जा- नीहि, वृहत् कुमारिका कथाकथनेन विज्ञातचौरादिभावाभयकुमारवाति, तथाहि-किल राजगृहनगरस्वामिनः श्रेणिकराजस्य पुत्रोऽभयकुमाराभि- धानो देवता प्रसादलब्धसर्वत्तु कफलादिम्मृद्धारामस्याम्रफलानां अकाला- म्रफलदोहदवद्भा-दोहद पूरणार्थं चाण्डालचौरेणापहरणे कृते चौरपरि ज्ञान / नाट्यदर्शननिमित्तमिलितबहुजनमध्ये बृहत कुमारिका कथामच- कथत् , तथाहि काचिद् वृद्धकुमारिका वाञ्छितवरलाभायकामदेवपूजार्थ- मारामे पुष्पाणि चोरयन्ती आरामपतिना गृहीता सद्भावकथने विवाहि- तया पत्या अपारमुक्तया मत्पाघे समागन्तव्यमित्यभ्युपगमं कारियित्वा- । ततः कद चित् विवाहिता सती पतिमापृच्छय रात्रावारामपतिपार्वे ८६ दशनविषयः गच्छन्ती चौरराक्षसाभ्यां गृहीता सद्भावकथने प्रतिनिवृत्तया भवत्पावें आगतव्यमिति कृताभ्युपगमामुक्ता आरामेगता आरामिकेण सत्यप्रतिज्ञे त्यखण्डितशीलाविसर्जिता इतराभ्यामपि तथैव विसर्जिता पतिसमीपमागतेति, ततो भो लोका पत्यादीना मध्ये को दुष्करकारक इति चासौ पप्रच्छ तत ईर्ष्यालुप्रभृतयः । पत्यादीन् दुष्करकारित्वेनाभिदधु , चौरचाण्डालस्तु चौरा- निति, ततोऽसावनेनोपायेनभावमुपलक्ष्य चौर इति कृत्वा तं वन्धयामासे. ति, अत्रापि गाथे 'एमेव चउविगप्पो होइ उवाओऽवि तत्थ दवम्मि । धारव्वाओ पढमो णंगलकुलिएहिं खेत्तं तु ॥१॥ कालोऽवि नालियाईहिं होइ भावम्मि पंडिओ अभओ। चोरस्स कए णट्टि य वड्ढकुमारि परि- कहिंसु ॥२॥' छाया-एवमेव चतुर्विकल्पो भवत्युपायोऽपि तत्रद्रव्येधातुवादः प्रथम' लांगूलकुलिक क्षेत्रन्तु ।।१॥ कालोऽपि नालिकादिभि भवति भावे पंडितोऽभय चोरस्य कृते नृत्ये वृद्धकमारी कथा परिचख्यौ ।।२।। इति, "ठवणा कम्मे" त्ति स्थापनं प्रतिष्ठापनं स्थापना तस्याः कर्म-करण स्थापना कम्में येन ज्ञातेन परमत दूषयित्वा स्वमतस्थापना क्रियते ततस्थापनाक- तच्च द्वितीयाग द्वितीयश्रुतस्कन्धे प्रथमाध्ययनं पुण्डरीकाख्यं, तत्र ह्यु क्तमस्ति- काचित् पुष्करिणी कदमप्रचुरजला तन्मध्यदेशे महत्तपुण्ड- रीक नदुद्धरणार्थ चतसृभ्यो दिग्भ्यश्चत्वार पुरुषा सकद्द ममार्ग. प्रवेष्टु- मारव्धा , ते चाकृततदुद्धरणा एवं पङ्क निमग्ना , अन्यस्त तेटस्थोऽ- सस्पृष्टकई म एवामोधवचनतया तदुद्धृतवानिनि ज्ञात, उपनयश्चायम- त्र:कई मस्थानीया विषया पुण्डरीकं राजादिव्यपुरुषः चत्वारः पुरुषा परतीर्थिका पंचम पुरुषः साधुः अमोघवचनं धर्मदेशना पुष्करिणी संसारः तदुद्धारोनिर्वाणमिति, अनेन च ज्ञातेन विषयाभिष्वगवता तीथिकानां भ- मेति भाव ६० जैनागमन्यायसंग्रहः " खण्ड- व्यस्य संसारानुत्तारकत्वं साधोश्च तदविपयेयं वदता आचार्येण परमत दूपणेन स्वमतं स्थापितमतो भवतीदं ज्ञातं स्थापना कार्मेति, अथवाऽऽपन्न दूषणमपोह्य स्वभिमतस्थापना कार्येत्येवंविधार्थप्रतिपत्तिर्यतो जायते तत् स्थपनाकर्म, किल मालाकारेण केनापि राजमार्गपुरीपोत्सर्गलक्षणापराधी- पोहाय तत् स्थाने पुष्पपुञ्जकरणेन किमिदमिति पृच्छतो लोकस्य हिंगु शिवो देवोऽयमिति वदता व्यन्तरायतन स्थापनाकृतेति, एतस्मात् किला- ख्यानकादुक्तार्थ प्रतीयते इतीदं स्थापनाकमैति, तथा नित्यानित्यं वस्त्वि- त्य संगतं जिनमतं विरुद्धधर्माध्यासादिति दूषणमापन्नमेतद् व्यपोहायोच्य- तेविरुद्धधर्माध्यासो न भेदनिबन्धनं विकल्पस्येव, विकल्पोहि क्रमभावि- वर्णोल्लेखवान् विरुद्धधर्मोपेतो भवति, न च कथञ्चिदेको न भवति, शो विभक्तस्य तस्य स्वरूपलाभाभावात् प्रवृतिनिवृत्योरकारणताम्यादसमंजसं चैवमिति, एवञ्च विरुद्धधर्माध्यासस्य कथञ्चिदभेदकत्वे सति न केवल नि- त्यानित्यं न भवतीति दूषणमपोढमपि तु सर्वमनेकान्तात्मकमिति विकल्प- ज्ञानेन स्वमतं प्रसाधितम , अतो विकल्पज्ञात स्वमतस्थापनेन स्थापनाकम्र्मेति अत्र नियुक्तिगाथा --'ठवणाकम्मं एक [अभेदमित्यर्थ ] दिढतो तत्थ पुंडरीयंतु । अहवाऽाव सन्नढक्कण हिंगुसिवकयं उदाहरणं ।।१।।' छाया स्थापनाकर्म अभिन्नं दृष्टान्तस्तत्र पुण्डरीक तु-अथवापि सज्ञाच्छादकहिंगु शिवदेवकृतमुदाहरणम् ।।१।। इति, सव्यभिचारो हेतुये सहासोपन्यस्तस्तस्य समर्थनार्थ यो दृष्टान्त पुनरुपन्यस्यते स स्थापनकर्मेति, उक्तञ्च-सव्वाभ- चारं हेउ सहसा वोत्तु तमेव अन्नेहि । उबबूहइ सप्पसर सामत्थ चऽप्पणो गाउं ॥१॥" छाया-सव्यभिचारं हेतु सहसोक्त्वा तमेवान्यै , उपबृहयति सप्रसंगं सामर्थ्य चात्मनो ज्ञात्वो ॥१॥ ति, तद् यथा-अनित्यः शब्दः कृत- .
दर्शनविषय -६१ कत्वात् , अथ वर्णात्मके शब्दे कृतकत्व न विद्यते वर्णानां नित्यतयाऽभि हितत्वादिति व्यभिचार., समर्थनापुनवेर्णात्माशब्दः कृतको निजकारणभेदेन भिद्यमानत्वाद् घटपटादिवत् , घटादिदृष्टान्तेन हि वर्णानां कृतकत्वं स्था- पितमिति भवत्ययं स्थापनाकति, 'पडुप्पन्नविणासि' ति:-प्रत्युपन्नस्य तत्कालोत्पन्नवस्तुनो विनाशोऽभिधेयतया यत्रास्ति तत् प्रत्युत्पन्नविना शीति, यथा केनापि वणिजा दुहित्रादिस्त्रीपरिवारशीलविनाशरक्षार्थं तदा- सक्तिनिमित्तस्वगृहासन्नराजगान्धर्विकगुणनिकायो स्वगृहहे कुलदेवतानि- वेशनात् गुणनिकाकाले तस्या देवताया अग्रत आतोद्यानादव्याजेन राजा- पराधपरिहारेण विनाशः कृत , एवं गुरुणो शिष्यान् कचिद् वस्तुन्यध्युप- पद्यमानानुपलभ्य तस्य तदासक्तिनिमित्तत्वमुपहन्तव्यमित्येव प्रत्युत्पन्नविना- शनीयता ज्ञापकत्वात् प्रत्युत्पन्नविनाशिज्ञातता गन्धर्विकाख्यानकस्यावगन्त- व्येति, उक्तञ्च होतिपडुप्पन्नविणासणमि गंधव्विया उदाहरणं सो सो- ऽवि कत्थइ जइ अज्झो वज्जेज नो गुरुणा ॥१॥ छाया-भवति प्रत्युत्प- नविनाशने गांधर्विकोदाहरणम् शिष्योऽपि कुत्रापि यदि अध्युपपद्येत तदा गुरुणोपायेन वारयितव्य ॥१॥ वारेयव्बो उवाएणं' इति, अथवा अ- कत्ति आत्मा अमूत्वात् आकाशवत् इत्युत्पन्ने आत्मनोऽकर्तृत्वापत्तिलक्षो- णे दूषणे तद् विनाशायोच्यते-कत्र्तवात्मा कथंचिन्मूत्वात् देवदत्तदिति । व्याख्यातमाहरणं, आहरणताचैतभेदाना देशेनदोषवत्तया चोपनयाभा- वादिति, अथाहरणत शो व्याख्यायते-स च चतुर्द्धा, तत्र अनुशासन- मनुशास्ति -सद्गुणोत्कीत्तनेनोपबृहण सा विधेयेति यत्रोपदिश्यते साऽ- नुशास्तिः, यथा गुणवन्तोऽनुशासनीया भवन्ति, यथा साधुलोचनपतितजः करणापनयनेन लोकसम्भावितशीलकलंका तत्क्षालनायराधितदेवताकृतप्राति- ।
६२ जैनागमन्यायसंग्रहः हार्या चालनीव्यवस्थापितोदकच्छोटनोद्घाटितचंपागोपुरत्रया सुभद्रा अहो शीलवतीति महाजनेनानुशासितेति, उक्तञ्च-आहरणं तद से चउहा अणुसहि तह उवालंभो । पुच्छानिस्सा वयणं होइ सुभद्दाऽणुसट्ठीए ॥१॥ छाया-आहरणं तद्देशे चतुर्धा अनुशास्तिस्तथोपालंभः। पृच्छा निश्रा- वचनं भवति सुभद्रानुशास्तौ ॥ १॥ साहुक्कार पुरोयं जह सा अणुसासिया पुरजणेणं । वेयावच्चाईसुवि एव जयंतेव चूहेज्जा ॥२॥ छाया- साधुकार पूर्वकं यथासाऽनुशिष्टापौरजनेन । वैयावृत्यादिष्वपि एवं, यतमानानप्युपबृहयेत् ॥२॥ इति, इहच तथाविधवैयावृत्यकरणादिना- प्युपनय. सम्भवति तत्त्यागेन च महाजनानुशास्ति मात्रेणोपनयः कृत इत्याहरण तद्देश इति, एवमनभिमतांश त्यागादभिमतांशोपनयनमुत्तरे ध्वपि-भावनीयमिति, तथा उपालम्भनं उपालम्भो-भगयन्तरेणानुशासन मेवस यत्राभिधीयते स उपालंभो यथाकचिदपराधवृत्तयो विनेयाउपालम्भनीय यथा महावीर समवसरणे सविमानागत चन्द्रादित्योद्योतेन काल विभागम- जानती मृगावती नाम्नी साध्वी स्थिता ततस्तद्गमनेऽतिकालोऽयमिति सम्भ्रान्ता सह साध्वीभिरायचन्दना समीपं गतो तयाचोपालब्धा-अयुक्त- मिदं भवाहशीनामुत्तमकुलजातानामिति, तथा पृच्छा-प्रश्न. किं कथं केन कृतमित्यादि सा यत्र विधेयतयोपदिश्यते सा पृच्छा यथा प्रच्छनीया ज्ञानिनो निर्णयार्थिभिर्यथा भगवान् कोणिकेन पृष्टः, तथाहि किल कोणिक. श्रेणिकराजपुत्रः श्रमणंभगवन्तं महावीरं पमप्रच्छ । तद् यथाभदंत ! चक्रवर्ति नोऽपरित्यक्त कामाः मृताः क्वोत्पद्यते ? भगवताऽभिहितंसप्तमनरकपृथिव्यां, ततोऽसौ वभाण-अह कोत्पत्स्ये । स्वामिनोक्त षष्टयां, स उवाच-अहं किं न सप्तम्याम् ? स्वामिनाजगदे-सप्तम्यां चक्रवर्तिनो यान्ति, ततोऽसाव. ?
दर्शनविषय. ६३ भिदधौ, किमहं न चक्रवतो ? यतो ममापि हस्त्यादिकं तत् समानमस्ति, स्वामिना प्रत्यूचे-तव रत्ननिधयो न सन्ति ततऽसौ कृत्रिमाणि रत्नानि कृत्वा भरतक्षेत्र साधन प्रवृत्त कृतमालिकयक्षेण गुहाद्वारे व्यापादितः षष्ठी गत इति, तथा ' निस्सावयणे' त्ति निश्रया वचनं निश्रावचनं, अयमर्थः- कमपि सुशिष्यमालम्ब्य यदन्य प्रबोधार्थ वचनं तन्निश्रावचनं तद्यत्र- विधेयतयोच्यते तदाहरणं निश्रावचन यथा असहनान् विनेयान् माईव सम्पन्नमन्यमालंव्य किञ्जिद् ब यात्, गौतममाश्रित्य भगवानिवेति तथाहि- किल गौतमतापसादि प्रत्रजितानां केवलोत्पत्तावनुत्पन्न केवलत्वेनाधृतिमन्तं चिरसश्लिष्टोऽसि गौतम | चिर परिचितोऽमि गौतम | मा त्वमधृत्तिं कार्षी रित्यादिनावचनसंदोहेनानुशासयता अन्येऽप्यनुशासिता. तदनुशास- नाथे द्रुमपत्रकाध्ययनं च प्रणिन्ये इति, उक्तञ्च- 'पुच्छाए कोणिए खलु- निस्सावयणमिगोय मस्सामि । छाया-(पृच्छायां कोणिकः खलु निश्राव- चने गौतमस्वामी) । इति, ॥ व्याख्यातं तद्देशोदाहरणम् । तदोषोदाहरणमथ व्याख्यायते, तच्चचतुर्द्धा तत्र 'अहम्मजुत्ते' ति यदुदाहरणं कस्यचिदर्थस्य साधनायोपादीयते केवलं पापाभिधानस्वरूपं येन चोक्तेन प्रतिपाद्यस्या- धर्मबुद्धिरुपजन्यते तदधर्मयुक्तं तद्यथा उपायेन कार्याणि कुर्यात् कोलि- कनलदामवत् , तथाहि-पुत्रग्वादकमत् कोटकमार्गेणोपलब्धबिलवासनामशे- षमत्कोटकानां तप्तजलस्यविले प्रक्षेपणतो मारणदर्शनेन रञ्जितचित्त चणक्यावस्थापितेन चौरग्राहनलदामाभिधानकुर्विदेन चौर्यसहकारि तालक्षणोपायेन विश्वासिता मिलिताश्चौरा विषमिश्रभोजनदानतः सर्वेव्या पदिता इति, आहरण तद्दोषता चास्याधर्मयुक्तत्वात् तथाविधश्रोतुरधर्मबुद्ध जनकत्वाच्चेति, अत एवं नैवं विधमुदाहत्तव्यं यतितेति 'पडिलो । त्ति ६४ जनागमन्यायसग्रहः प्रतिकूल यत्र प्रातिकूल्यमुपदिश्यते यथा शठप्रति शठत्वं कुर्यात् यथाचण्ड- प्रद्योते तदाहरणार्थ तदपहृताभयकुमारश्चकारेति, तदापताचास्य श्रोतु परापकारकरण निपुणबुद्धिजनकत्वात् , अथवा धृष्ट प्रतिवादिना द्वावेव राशी जीवश्चाजीवश्चेत्युक्ते तत्प्रातघाताथ कश्चिदाह - तृतोणेऽप्यस्ति नोजीवाख्यो गृहकोलिकादिच्छिन्नपुच्छवदिति, अस्यापि तदापताऽपसिद्धांताभिधाना- दिति, अत्तोवणीए त्ति आत्मैवोपनोत. -तथा निवेदितो नियोजितो यस्मि स्तत्तथा येन ज्ञातेन परमतदूषणायोपात्तेनात्ममतमेव दुष्टतयोपनीयते यथा पिगलेनात्मा तदात्मोपनीतं, तथाहि - कथमिदं तडागमभेदं भविष्यतीति राज्ञा पृष्टः पिगलाभिधान स्थपतिरवोचत् भेदस्थाने कपिलादिगुणे परुषे निखाते--सतीति अमात्येन तु स एव तत्र तद्गुणत्वान्निखात इति तेनात्मैव नियुक्त, स्ववचनदोषात् तदेवंविधमात्मोपनीतमिति, अत्रोदाहरण यथा सर्वेसत्वा न हन्तव्या इत्यस्यपक्षस्य दूषणाय कश्चिदाह-अन्यधर्मस्थिता हन्तव्या विष्णुनेवदानवा इत्येव वादिना बात्माहन्तव्यतयोपनीतीधर्मान्तर- स्थितपुरुपाणामिति, तद्दोषता तु प्रतोतैवास्येति 'दुरुवणीए' त्तिदुष्टमुपनोतं- निगमित योजितमस्मिन्निति दुरुपनीतं परिव्राजकवाक्यवद्, यथाहि किल कश्चित् परिव्राजको जालव्यग्रकरोमत्स्यबन्धाय चलितः केनचित्धूर्तेन किञ्चिदुक्त स्तेन च तस्योत्तरमसङ्गतं दत्तम् , अत्र च वृत्तं 'कथाऽऽकचार्याऽघ नतेननु शफरवधे जालमनासि मत्स्यांस्तेमेमद्योपदशान् पिबसि ननु ? युतोवेश्ययायासि वेश्याम् । दात्त्वाऽरीणां गलेऽह्रि क नु तत्र रिपवो ? येषु सन्धि छिनमि, चौरस्त्वंयूतहेतोः कितव इति कथं येन दासी सुतोऽस्मिथ इत्येवं प्रकृतसाध्यानुपयोगिस्वमत दूपणावह 'यद् तद् दार्टान्तिकेन सह साधाभावात् दुरुपनोतमिति, दशेनविषय. ६५ तथा -- यथा नित्य शब्दो घटवद् इह घटे नित्यत्व नास्त्येवेति कुतस्तत् साधाच्छब्दस्य नित्यत्वमस्तु १ अपित्वनित्यत्वात्घटस्य तत्साधाच्छब्दस्यानित्यत्वमेवानभिमत सिध्यतीति साध्यानु- पयोगीदमुदाहरणम् सन्तानोच्छेदोमोक्षो दीपस्येवेत्य- भ्युपगमे दीपदृष्टान्तादनादिमतोऽपिसन्तानस्यावस्तुता प्रतीयते, तथाहि- दीपस्यात्मनश्च सन्तानोच्छेद उत्तरक्षणाजनकत्वात् , तत्त्वे चार्थक्रिय'कोरि- त्वलक्षणसत्वाभावादन्त्यक्षणस्यावस्तुत्वम् , अवस्त्त्वजनकत्वात् पूर्वक्षणस्या- पि तत एव पूर्वतरस्यापोत्येव समस्तस्यापि सन्तानस्यावस्तुत्वम् । अथक्ष णा- न्तरानारंभेऽपि स्वगोचर ज्ञानजनन लक्षणार्थक्रियाकारित्वादन्त्यक्षणो वस्तु भविष्यति, नैवम्, एवं हि भूतभाविपर्याय परम्परााप योगिज्ञान स्वविषयमुत्पादयतीति वस्तुत्त्वं स्वीकृर्यात् , तन्न क्षणान्तरानारभे वस्तुत्त्व मित्यतो भवति दीपज्ञातं स्वमतदूषणावहमिति, अथवा अनित्य शब्द कृतकत्वाद् घटवदिति वक्तव्ये सम्भ्रमादनित्योघट कृतकत्वांछन्ददिति वदतो दुरुपनीतमिति विपर्ययोपनयनाादति अत्र गाथा - 'पढमं अहम्म- जुत्त पडिलोमं अत्तणो उवन्नासो दुरुवणिय च चउत्थ अहम्मजुत्तमि नलदामो । १ ॥ छाया-प्रथममधर्मयुक्त प्रतिलोमात्भन उपन्यास:, दुरुपनीत च चतुर्थमधर्मयुक्ते नलदामः ॥ १ ॥ पडिलोमे जह अभओ पज्जोयं हरइ अवहिओ संतो' इति “अत्त उवन्नासंमि य तलायभेयमि विंगलो थवई । अणिमिसगेण्हणभिच्छुग दुरुवणोए उदाहरण ।। १ । " छाया- प्रतिला म्नि यथाऽभय. प्रद्योत हरति अपहृत सन् । आत्मोपन्यासे च तडाक भेदे पिंगल स्थपतिः । अनिमेषग्राहकभिक्षुदु रुपनीते उदाहरणम् ॥ १॥ इति, उक्त आहरणतदोषोऽधनोपन्यासोपनय उच्यते स च 'चतुर्दा, तत्र , ६ ६६ जैनागमन्यायसंग्रहः तव्वत्थुए, त्ति तदेव- परोपन्यन्तसाधन वस्त्विति - उत्तरभूतं वस्तु यस्मि- न्नुपन्यासोपनये स तद्वस्तुकोऽथवा तदेव-परोपन्यस्तं वस्तु तद्वस्तु तदेव तद्वस्तुकं तयुक्त उपन्यामोपनयोऽपि तद्वस्तुक इत्युच्यते एवमुत्तेरत्रापि, यथा कश्चिदाह-समुद्रतटे महान् वृक्षोऽस्ति तच्छारवा जलस्थलयोरुपरिस्थि- ताः, तापत्राणि च यानि जले निपतंति तानि जलचरा जीवाभवंति यानि च स्थले निपतंति तानि स्थलचरा इति, अन्टस्तदुपन्यस्तमवे तरुपत्रपतन- वस्तु गृहीत्वा तदुक्त विघटयति, यदुत यानि पुनमध्ये तेषां का वात- त्येतदुपपत्तिमात्रमुत्तरभूतं तद्वस्तुक उपन्यासोपनयो, ज्ञातत्त्वं चास्य ज्ञात- निमित्तत्त्वाद्, अथवा यथारूढमेव ज्ञातमेतत्, तथाहि एवं प्रयोगोऽस्य- जलस्थलपतितपत्राणि जलचरादिसत्वा सम्भवन्ति, जलस्थलमध्यपतितपत्रवत् तन्मध्यपतितपत्राणां हि जलस्थलपतिप- त्रतजलचरत्वादिप्राप्तिवदुभयरूपप्रसंगो, नचोभयरुपा सत्वा अभ्युपगता इति , अथवा नित्यो जीव अमूर्त्तत्वादाकाशदित्युक्त आह- अनित्य एवास्तु अमूर्त्ततत्वात कमेवदिति । तथा ' तयन्नवत्थुए ' ति तस्मात् परो- पन्यस्ता वस्तुनोऽन्यदुत्तरभूतं वस्तु यस्मिन्नुपन्यासोपनये स तदन्यवस्तुको यथा जले पतितानि जलचरा इत्युक्ते एतत् विघटनाय पतनादन्यदुत्तरमाह- यानि पुन. पायित्वाखादति नयति वा तानि कि भवन्ति १ न किञ्चिदित्य र्थोऽयमपि ज्ञापकतया ज्ञातमुक्त , अथवा यथारूढमेव ज्ञातमेष , तथाहि-न जलस्थलपतितानि पत्राणि जलचरादिसत्वा सम्भवंति, मनुष्यद्याश्रितानीव, अयमभिप्रायो यथा जलाद्याश्रितत्वात् जलचरादितया तानि सम्पद्यते तथा मनुष्याद्याश्रिततया मनुष्यादिभवयूकादितयाऽपि सम्पद्यताम् , आश्रितत्व- कस्याविशेपात् , न च तानि तथाऽभ्युपगम्यन्ते इति जलादि गतानामपि ज- , .
६७ दर्शनविषयः लचरत्वाद्यसम्भव इति, तथा 'पडिनिभे त्ति यत्रोपन्यासोपनये वादिनो- पन्यस्तवस्तुन. सदृशं वस्तूत्तरदानायोपनीयते स प्रतिनिभो यथा कोऽपि प्रतिजानीते यदुत-यो मामपूर्व श्रावयति तस्मै लक्ष्यमूल्यमिदं कटोरकं ददामीति, स च श्रावितोऽपि तन्नापूर्वमिति प्रतिपद्यते, तत् एकेन सिद्धपुत्रेणोक्तं-'तुझ पिया मज्झ पिउणो धारेइ अणूणय सयसहस्स । जइ सुयपुव्वं दिज्जउ अह न सुय खोरयं देहि ॥१॥, छाया-तव पिता मम पितुर्धारयत्यनून शतसहस्रम् । यदि श्रुतपूर्व ददातु अथ न श्रुतं क्षौरकं देहि ॥१।। इति प्रतिनिभता चास्य सर्वस्मि- न्नप्युक्ते श्रुतपूर्वमेवेदं ममेत्येवमसत्यं वचो त्रु वाणस्य परस्य निग्रहाय तव पिता मम पितुर्धारयति लक्षमित्येवावधस्य द्विपाशरज्जुकल्पस्यासत्यस्यैव वचस उपन्यस्तत्वादिति, अस्य चोपपत्तिमात्ररूपस्याप्यथज्ञापकतया ज्ञातत्व- मुक्तमिति, अथवा यथारूढमेव ज्ञातमेष , तथाहि अत्रायं प्रयोगः नास्त्यश्रु- तपूर्व किञ्चत् श्लोकादि ममेत्येवमभिमानधनं व मो वयम्-अस्ति तवाश्रुत- पूर्व वचनं तव पित मम पितुर्धारत्यनून शतसहस्र मिति यथेति, । तथा 'हेउ, त्ति यत्रोपन्यासोपनये पर्यनुयोगस्य हेतुरुत्तरतयाऽभिधीयते स हेतुरिति, यथा केनापि कश्चित् पर्यनयुक्त – अहो किं यवा. क्रीयन्ते त्वया ?, स त्वाह-येन मुधैव न लभ्यन्ते इति तथा कस्मात् ब्रह्मचर्यादिकष्टमनुष्ठीयते १ यस्मादकृततप सां नरकादौ गुरुतरावेदना भवतीति, इदमपि उपपत्तिमात्रमेव ज्ञातत्वेनोक्त- मर्थज्ञापकत्वादिति, अथवाऽयमपि यथारूढ ज्ञातमेव, तथाह्यस्यैव प्रयोगः कस्मात् त्वया प्रव्रज्या क्रियत इति पृष्ट. सन् केनापि साधुराह --यतस्तां वि- ना मोक्षो न भवति एतत् समर्थनायैव साधुस्तमाह-भो यत्रग्राहिन् । कि- मिति त्वया यवाः क्रीयन्ते ? स त्याह-येन मुधा न लभ्यन्ते, साधोश्चायम- ६८. जैनागमन्यायसंग्रहः - - भिप्रायो यथा-मुधालाभाभावात् तान् क्रीणसि त्वमेवमहं तां विना तदभा, वात्तां करोमीति, इह च मुधा यवालास्मस्य क्रयणे हेतोः सतो दृष्टान्ततयोप न्यस्तत्वाद्धेतूपन्यासोपनयज्ञाततेति, इह च किञ्चविशेषेणैवंविधा ज्ञातभेदाः सम्भवन्त्यन्येऽपि किन्तु ते न विवक्षिता. अन्तर्भावो वा कथञ्चि- त् गुरुभिर्विवक्षितो न च तं वयं सम्यग् जानीम इति । अथ ज्ञातानन्तरं ज्ञातवद्धतोः साध्यसिद्धघनत्वात् तदुभेदान हेऊ इत्यादिना सूत्रत्रयेणाह- व्यक्तं चैतत्, नवरं हिनोति गमयति ज्ञयमिति हेतुः -अन्यथा- ऽनुपपत्तिलक्षणः, उक्तञ्च-"अन्यथाऽनुपपन्नत्वं, हेतोर्लक्षणमीरितम् । तद्- प्रसिद्धिसन्देहविपर्यासैस्तदाभता ॥१॥” इति, प्रागुक्तश्च हेतु पर्यनयुक्तस्योत्तर- रूपमुपपत्तिमात्रमयं तु साध्यं प्रत्यन्वयव्यतिरेकवान् तथाविधदृष्टान्तस्मृत- तद्भाव इति, स चैकलक्षणोऽपि किञ्चद्विशेषाच्चतुर्धा, तत्र 'जावए त्ति या पयति-वादिनः कालयापनां करोति, यथा काचिदसती एकैकरूपकेण एकैकमुष्ट लिण्डं दात्तव्यमिति दत्ताशिक्षस्य पत्युत्तद्विक्रयार्थमुज्जयनोप्रेषणोपायेन विटा सेवायां कालयापनां कृतवतीति यापकः, उक्तश्च – 'उब्भामिया य महिला जाव' गहेउम्मि उट्टलिडाई ।, इति, इह वृद्धाख्यातम्-प्रतिवादिनं ज्ञात्वा तथा तथा विशेषणबहुलो हेतु: कर्त्तव्यो यथा कालयापना भवति, ततोऽसौ नावगच्छ- ति प्रकृतमिति, स चेहशः संभाव्यते-सचेतना वायव. अपरप्रेरणे सति ति- यनियतत्वाभ्यां गतिमत्त्वात् गोशरीरवदिति, अय हेतुर्विशेषणबहुलतय परस्य दुरचिगमत्वाद् वादिनः कालयापनां करोति, स्वरूपमस्यानववुद्धथा- मानो हि परो न झगित्येवान कान्तिकत्वादिदूषणोद्भावनाय प्रवर्तितु श- कोति, अतो भवत्यस्माद् वादिनः कालयापनेति,'अथवायोऽप्रतीतव्याप्तिक- व्याप्तिसाधकप्रमाणान्तरसव्यपेक्षत्वान्न, झगित्येवसाध्यप्रतीतिं करोति दशनविषयः अपि त कालक्षेपेणेत्यसौ साध्यप्रतीति प्रति कालयापनाकारित्वाद् यापकः, यथा क्षणिकं वस्त्विति पक्ष बौद्धस्य मत्त्वादिति हेतुः, नहि सत्त्वश्रवणादेव 'क्षणिकत्त्व प्रत्येति पर इत्यतो बौद्धः सत्त्वं क्षणिकत्त्वेन व्याप्तमिति प्रसा- धयितुमुपक्रमते, तथाहि-सत्त्वं नामार्थक्रियकारित्वमेव, अन्यथा वन्ध्यासुत- स्यापि सत्त्वप्रसङ्ग , अर्थक्रिया तु नित्यस्यैकरूपत्वोन्न क्रमेण नापि यौगपद्येन क्षणान्तरे अकर्तृत्त्वप्रसंगादित्यतोऽर्थक्रियालक्षणं सत्त्वमक्षणिकान्निवर्त्त- मानं क्षणिक एवावतिष्ठत इत्येव क्षेपेण साध्यसाधने कालयापनाकारित्वाद्या- पक. सत्त्वलक्षणो हेतुरिति । तथा स्थापयति पक्षमतेपेण प्रसिद्धव्याप्तिकत्वात् समर्थयति; यथा परिव्राजकधूर्ते लोकमध्यभागे दत्तं बहुफलं भवति तञ्चा- हमेव जानामीति मायया प्रतिप्राममन्यान्यं लोकमध्य प्ररूपयति सति तन्नि प्रहाय कश्चित् श्रावको लोकमध्यस्यैकत्वात् कथं बहुषु प्रामादिषु तत्सम्भव इत्येवंविधोपपत्या त्वदर्शितो भो । लोकमध्यभागो न भवतीति पक्ष स्थापितवान् इति स्थापको हेतुः, उक्तश्च-लोगस्स मम जाणण थावगहेऊ उदाहरणं' इति, स चायं-अग्मिरत्र धूमात् तथा नित्यानित्यं वस्तु द्रव्य पर्यायतस्तथैव प्रतीयमानत्वादिति, अनयोश्च प्रतीतव्याप्तिकतया अकालपेण साध्यस्था- पनात् स्थापकत्वमिति । तथा व्यसयति-परं व्यामोहयति शकटतित्तिरीया. हकधूर्त्तवद् यः स व्यंसक इति, तथाहि-कश्चिदन्तराललब्धमृततित्तरी युक्तेन शकटेन नगरं प्रविष्टः उक्तो धूर्तेन यथा-शकटतित्तिरी कथं लभ्य- ते ?, स च किलायं शकटस्य सत्कां तित्तिरी याचत इत्यभिप्रायादवोचत् तर्पणालोडिकयेति, सक्त्वालोडनेन जलाद्यालोडितसक्तुभिरित्यर्थः, ततो धूर्तः साक्षिण आहृत्य सतित्तिरीकं शकट जग्राह, उक्तवांश्च मदोयमेतद्' अनेनैव शकटतित्तरीति दत्तत्वादिति, मया त शकटसहिता तित्तिरी शक्ट १०० जैनागमन्यायसग्राह तिरत्तिीति गृहीतत्वादिति, ततो विषण्ण: शाकटिक इति, अत्रोक्तम् -' सा सगडतित्तिरी वंसगमि हेउंमि होइ णायव्वा ॥” इति, स चैवं - अस्ति जीवोऽस्ति घट इत्यभ्युपगमे जीवघटयोरस्तित्वमाविशेषेण वर्त्तते ततस्तयोरे- कत्वं प्राप्तमभिन्नशब्दविषयत्वोदिति व्यंसको हेतु: घटशब्द विषयघटस्वरूप वत्, अथास्तित्वं जोबादौ न वर्तते तनो जीवाद्यभावः स्यादस्तित्वाभावादिति व्यंसकः प्रतिवादिनो व्यामोहकत्यादिति, तथा 'लू सएत्त लूषयति-मुष्णा- ति व्यंसकापादितमनिष्टमिति लूषको हेतुः, स एव शाकटिको, यथा-धूर्ता- न्तरशिक्षितेन हि शाकटिकेन तेन याचितोऽसौ धूर्त तर्हि देहिमेतर्पणालो- डिकामिति, तत धूर्तेनोक्ता स्वभा--देह्यस्मै सत्कुनालोड्य ति, ताञ्च तथा कुर्वन्ती तद्भार्या गृहीत्वाऽसौ प्रस्थितोऽवदिच्च धूर्त्तमभि-मदीयेयं तर्पणमिति सत्कुनालोड्यतीति तर्पणालोडिकेति भवतैव दत्तत्वादिति, स चायं यदि जीवघटयोरस्तित्ववृत्या एकत्वं सम्भावयसि तदा सर्वभा- वानामेकत्वं स्यात् सर्वेष्वग्यस्तित्ववृत्तेरविशेषात्, न चैवमिति, इहास्तित्व वृत्त रविशेपादित्ययं लूषको जीवघटयोरेकत्वापादनलक्षणस्याभावापत्तिलक्ष- णस्य वाऽनिष्टस्य परापादितस्यानेन लूपितत्वादिति, अथवेति हेतोः प्रकारा- न्तरताद्योतको विकल्पार्थो हिनोति-गमयति प्रमेयमर्थ स वा हीयते-अधि- गम्यते अनेनेति हेत:-प्रमेयस्य प्रमिती कारणं प्रमाणमित्यर्थः, स चतुर्वि- धः स्वरूपादिभेदात्, तत्र ‘पञ्चक्खे' त्ति अनाति अश्नते-व्याप्नोत्यर्थानि त्यक्ष:-आत्मा तं प्रति यद्वर्तते ज्ञानं तत्प्रत्यक्षं निश्चयतोऽवधिमनःपर्या, यकेवलानि, अक्षाणि वेन्द्रियाणि प्रति यत्तत्प्रत्यक्षं व्यवहारतस्तचक्षुरादि- प्रभमिति, लक्षणमिदमस्य-'अपरोक्षतयाऽर्थस्य, ग्राहकं ज्ञानमीदृशम् । 'त्यक्ष". .त ज्ञेयं, परोक्षं ग्रहणेक्षया ॥१॥7 ग्रहणापेक्षयेति भावः , । 'दर्शनविषयः अन्विति-लिङ्गदर्शनसबन्धानुस्मरणयो. पश्चान्मान-ज्ञानमनुमानम्, एत- ल्लक्षणमिदम् –'साध्याविनामुवो लिंगात्, साध्यनिश्चेायकं स्मृतम्। अनु- मानं तदभ्रान्तं प्रमाणत्वात् समक्षवद् ॥ १॥” इति, एतच्च साध्याविनाभू तहेतुजन्यत्वेनाप्युपचाराद्धेतुरिति, तथा उपमानमुपमा सैवोपम्यं अनेन गवयेन सदृशोऽसौ गौरिति सादृश्यप्रतिपत्तिरूप, उक्तश्च –' गा दृष्ट्वाऽयम- रण्येऽन्यं गवय वीक्षते यदा । भूयोऽवयवसामान्यभाज वत्तु लकण्ठझम् ।।१।। तस्यामेव त्ववस्थाया यद्विज्ञान प्रवर्तते । पशुनैतेन तुल मोऽसौ गोपिण्ड इति सोपमा ॥ २ ॥” इति, अथवा श्रुतातिदेशवाक्यस्य समानार्थोपलम्भनेसंज्ञा सज्ञिसंवन्धज्ञानमुपमानमुच्यत इति, आगम्यन्ते-परिच्छिद्यन्ते अर्था अनेने त्यागमः आप्तवचनसपाद्यो विप्रकृष्टार्थप्रत्ययः, उक्तञ्च-दृष्टष्टाव्याहताद् वाक्यात् परमार्थाभिधायिनः । तत्त्वग्राहितयोत्पन्न मानं शब्द प्रकीर्तितम् ।।१।। आ- तोपझमनुल्लध्यमदृष्टेष्टविरोधकम् । तत्वोपदेशकृत् सार्व शास्त्र कापथघट्टनम्- ॥१॥ इति, इहान्यथानुपपन्नत्वलक्षणहेतुजन्यत्वादनुमानमेव कार्ये कारणो- पचाराद्धेतु., स च चतुर्विधः चतुर्भगीरूपत्वात् , तत्र अस्ति-विद्यते तदिति लिङ्गभूतं धूमादिवस्तु इति कृत्वा अस्ति स. अग्न्यादिकः साध्योऽर्थ इत्येव हेतुरिति अनुमानम् । तथा अस्ति तदग्न्यादिकं वस्त्वतो नास्त्यसौ तद्वि- रुद्धः शीतादिरर्थ इत्येवमपि हेतुरनुमानमिति, तथा नास्ति तदग्न्यादिकमतः शीतकालेऽस्ति स शीतादिरर्थ इत्येवमपि हेतुरनुमानमिति, तथा नास्ति तवृक्षत्वादिकमिनि नास्ति शिशपात्यादिकोऽर्थ इत्यपि हेतुरनुमानमिति, इह च शब्दे कृतकत्वस्यास्तित्वादस्त्यनित्यत्वं, घटवत्तथा धूमस्यास्तित्वदिहा- स्त्यग्निर्ममहानस इवेत्यादिकं स्वभावानुमान कार्यानमानंच प्रथमभंगकेन जैनागमन्यायसग्रहः १०२ सूचितं १, तथा अग्नेरस्तित्वाद्भूमास्तित्वाद् वा नास्ति शोतस्पर्श इत्यादि विरुद्धोपलम्भानुमानं विरुद्धकार्योपलम्भानुमानश्च, तथाऽग्ने—मस्य वाऽस्ति त्वान्नास्ति शीतस्पर्शजनितदन्तवीणारोमहर्षादिः पुरुषावकारो महानसवदि. त्यादि कारणविरुद्धोपलम्भानुमानम् । कारणावरुद्धकार्योपलम्भानुमानं च द्वि- तीयभंगकेनाभिहितं २ तथा छत्रादेरग्नेर्वा नास्तित्वादस्ति कचित् काला- दिविशेषे तपः शीतस्पर्टी वा पूर्वोपलब्धप्रदेश इवेत्यादिक विरुद्धकारणा- नुपलम्भानुमान विरुद्धानगलम्भानुमानञ्च तृतीयभगकेनोपात्तं ३ तथा दर्शन, सामग्ग्रयां सत्यां घटोपलम्भस्य नास्तित्वान्नास्तीह घटो विवक्षितप्रदेशवदि- त्यादि स्वभावानुपलब्ध्यनमानं तथा धूमम्य नास्तित्वान्नास्त्यविलको धूम- कारणकलापः प्रदेशान्तरवदित्यादि कार्यानुपलब्ध्यनुमानम्, तथा वृक्षनास्ति- त्वात् शिशपा नास्तोत्यादि व्यापकानुपलम्मानमानं तथाऽग्ने स्तित्वाद्ध - मो नास्तीत्यादिकारणानुपलम्भानुमानं च चतुर्थभंगकेनावरुद्धमिति न च वाच्यं न जैनप्रक्रियेयं, सर्वत्र जैनाभिमतान्यथानुपपन्नत्वरूपस्य हेतुलक्ष- णस्य विद्यमानत्वादिति ॥४॥ स्थनांगसूत्र स्थान ४ उद्देश ३ मूल :-कतिविधे णं भंते ! इंदियअवाए प० १, गो. ! पंचविधे इंदियअवाएं पं, तं०-सोतिदियअवाए जाव फासिं- दियअवाए, एवं नेरइयाणं जाव वेमाणियाणं, नवरं जस्स जइ इंदिया अस्थि । कतिविहा णं भंते ! ईहा पं० १, गो० : पंचविहा ईहा पं० २०-सोतिदिईहा जाव फासिदियईहा, एवं जाव वेमाणियाणं, णवरं जस्स जइ इंदिया ८। कलिविविधे णं भंते ! + दशनविषयः १०३ उग्गहे पं० १, गो० !, दुविहे उग्गहे पं०, तं०-अत्थोग्गहे य वंजणोग्गहे य । वंजणोग्गहे णं भंते ! कतिविधे पं० १ गो० ! चउन्विहे पं०, तं०-सोतिदियवंजणोग्गहे पाणिदियवंजणोग्गहे जिभिंदियवंजणोग्गहे फासिंदियवं० । अत्थोग्गहे ण भते । कति- विधे पं० १, गो० ! छविहे पं.. तं०-सोतिदियअत्थोवग्गहे चक्खेिदियत्र० जिब्भिदिय० फासिदियअ० नोइंदिय अत्थो । नेरइयाणं भंते ! कतिविहे उग्गहे पएणते १ गो! दुविहे पं,००-अत्योग्गहे यजयोग्गहे य, एवं असुरकुमाराण जाव थणियकुमाराणं । पुढविकाइयाण भंते ! कतिविधे उग्गहे, पं० १, गो० दुविधे उग्गहे पं०-अत्थोग्गहे य वंजणोबग्गहे य । पुढविकाइयाणं भते ! वंजणोग्गहे कतिविधे पं० १, गो० ! एगे फासिंदियवंजणोग्गहे पं० | पुढविकाइयाणं भंते ! कतिविधे अत्थोग्गहे पण्णते?, गो० एगे फामिदिय अत्थोग्गहे पं० एवं जाव वणस्सइकाइयाण, एवं वेइंदियाणवि, नवरं बेइंदियाण वंजणोराहे दुविहे पं०, अत्योग्गहे दुविहे प० एवं ते इंदिय चउरिदियाणवि, रणवरं इंदियपरिबुड्ढी कायव्वा, चउरिदियाणं वंजणोग्गहे तिविधे प०, अत्थोग्गहे चउविधे ५०, सेसाणं जहा नेरइवाणं जाव वेमाणियाणंह, १० (सू० २०० ) .
. जेनागमन्यायसग्रह टीका:- "कतिविहेणं भंते । इंदियअवाए पं०० इत्यादि तत्रावग्रह- ज्ञानेनावगृहीतस्य ईहाज्ञानेन ईहितस्यार्थस्य निर्णयरूपो योऽध्यवसाय सोड पायः, शांख एवायं शाङ्ग एव वायं इत्यादिरूपोऽवधारणात्मकोनिर्णयोऽ- वाय इतिभाव । ईहा इति, 'ईह चेष्टायां' ईनमोहा, सद्भूतार्थपर्यालोचन- रूपा चेष्टा इत्यर्थः, किमुक्त भवति ?–अवग्रहादुत्तरकालमवायात् पूर्व सद्- भूतार्थविशेपोपादानाभिमुखोऽसद्भूताविशेपपरित्यागाभिमुखः प्रायोऽत्र मधुरत्वादय शंखादिशब्दधमा दृश्यन्ते न कर्कशनिष्ठुरतादयः शाििदशब्द- धर्मा इत्येवंरुपो मतिविशेष ईहा, आह च भाष्यकृत् - "भूयाभूयविसेसादा णचायाभिमुहमीहा। [ भूताभूतविशेषादानत्यागाभिमुख्यमीहा] - दुविहे ओगहे पं०, तं०-वंजणोगहे य अत्थोग्गहे य? इति, अवग्रहो द्विविधः- अर्थावग्रहो व्यञ्जनावग्रहश्च, तत्र अवग्रहणमवग्रहः अर्थस्यावग्रहोऽर्थावग्रह , अनिर्देश्यमामान्यरूपाद्यर्थग्रहणमिति भावः, आइ च नन्द्यध्ययनचूणिकृन् सामन्नस्म रूवाइ विसेमणरहियश्स अनि स्सस्समवग्गहणं अव गह' इति, तथा व्यज्यतेऽनेनार्थ प्रदापेनेव धेट इति व्यञ्जनं, तच्च उपक- रणेन्द्रियस्य शब्दादिपरिणत द्रव्याणा च यः परस्परं सम्बन्ध , सम्बन्धेहि सति सोऽथे श्रोत्रादोन्द्रियेण व्यञ्जितु शक्यते नान्यथा तत सम्बन्धो व्यञ्जन, प्राह च भाष्यकृत्-" वंजिञ्जइ जेणत्यो घडीव दीवेण वंजणं तं च । उवगरणिदियसदाइपरिणयद्दव्यसबंधो ॥ १ ॥ छाया-व्यज्यते येनार्थो घट इव दीपेन व्यंजनं, तच्चोपकरणेन्द्रिय शब्दादिपरिणतद्रव्यसंबन्ध ॥ १॥ व्यजनेन-सम्बन्धेनावग्रहणं – सम्बध्यमानस्य शब्दादिरूपस्यार्थ- स्याव्यक्तरूप. परिच्छेदो व्यञ्जनावग्रह., अथवा व्यज्यन्ते इति व्यञ्जनानि कृबहुल' मिति वचनात कर्मण्यनट, व्यञ्जनानां -शब्दादिरूपतया परि- नाना द्रव्याणामुपकरणेन्द्रियसम्प्राप्तानामावग्रह अव्यक्तरूप. परिच्छेदो दर्शनविषयः १०५ व्यञ्जनावग्रह', आह-प्रथम अर्थावग्रहो भवति ततोऽर्थावग्रहस्तत कस्मोदिह प्रथममर्थावग्रह उपन्यस्त ? उच्यते, स्पष्टतयोपलभ्यमानत्वात्, तथाहि- अर्थावग्रहः स्पष्टरूपतया सर्वैरपि जंतुभिः संवेद्यते शीघ्रतरगमनादौ सकृ- त्सत्वरमुपलभ्यते, किञ्चिद् दृष्टं न परिभावितं सम्यगिति व्यवहारदर्शनात अपिच अर्थावग्रहः सर्वोन्द्रयमनोभावी व्यञ्जनाबग्रहस्तु नेति प्रथममर्थाव- ग्रह उक्त । सम्प्रति व्यञ्जनावग्रहादूध्व अर्थावग्रह इति क्रममाश्रित्य प्रथम व्यञ्जनावग्रहस्वरूपं प्रतिपिपादयिषु प्रश्नं कारयति शिष्य-' भंजणोगहे ण भते । कइविहे पं० इत्यादि, इह व्यञ्जनमुपकरणेन्द्रियस्य शब्दादिपरि- णतद्रव्याणां च परस्परं सम्बन्ध इत्युक्त प्राक्, ततश्चतुणोमेव ओबादी नामिन्द्रियाणां व्यञ्जनावग्रहो न नयनमनसोः, तयोरप्राप्यकारित्वात्, सा चाप्राप्यकारिता नन्दयध्ययनटीकायां प्रदर्शितेति नेह प्रदाते, अर्थावग्रहः षड्विधः, तद्यथा-'सोइंदियअत्थुग्गहे' इत्यादि, श्रोनेन्द्रियेणार्थावग्रहो व्यञ्जनावग्रहोत्तरकालमेकसामयिकमनिर्देश्यं सामान्यमात्रार्थग्रहणं श्रोत्रेन्द्रि- यार्थावग्रह एवं घ्राणजिह्वास्पर्शनेन्द्रियार्थावग्रहेष्वपि वाच्यं, चक्षुर्मनसो स्तु व्यञ्जनावग्रहो न भवति, ततस्तयो प्रथममेव स्वरूपद्रव्यगुणक्रियाकल्प- नातोतमनिर्देश्यसामान्यमात्रस्वरूपार्थावग्रहणमर्थावग्रहोऽवसेय', ' नोइंदि यश्रत्थावग्गहो' इति नोइन्द्रिय-मनः तच्च द्विधा-द्रव्यरूपं भावरूपश्च, तत्र मन पर्याप्तिनामकर्मोदयतो यत् मनःप्रायोग्यवर्गणादलिकमादाय मनस्त्वेन परिणमनं-तद् द्रव्यरूपं मनः, तथा चाह नन्द्यध्ययनचूर्णिकृत् '-मणपज्जत्ति- नामकम्मोदयो जोग्गे मणोदव्वे वित्त मणत्तेण परिणामिया दव्वा दव्व- मणो भन्नइ' इनि, तथा द्रव्यमनोऽवष्टम्भेन जोवस्य यो मन परिणाम स भावमन तथा चाह नन्यध्ययनचूर्णिकृदेव-"जीवो पुण मणपरिणामकि- १०६ जैनागमन्यायसंग्रहः रियावंतो भावमणो, किं भणिय होइ-मणहव्वालंबणो जीवस्समणवा- वारो भावमणो भएणइ” इति, तत्रेह भावमनसा प्रयोजनं, तद्ग्रहणे ह्यवश्यं द्रव्यमनसोऽपि ग्रहणं भवति, द्रव्यमनोऽन्तरेण भावमनसोऽसंमवात् , भावमनो विनापि च द्रव्यमनो भवति यथा भवस्थकेवलिनां, तत उक्त भावमनसा प्रयोजन, तत्र नोइन्द्रियेण-भावमनसाऽर्थावग्रहो-द्रव्ये- न्द्रियव्यापा निरपेक्षघटाद्यर्थस्वरूपपरिभावनाभिमुखः प्रथममेकसामयिको रूपाद्य_कारादिविशेषचिन्ताविकलोऽनिर्देश्यसामान्यमात्रचिन्तात्मको बो- धो नोइन्द्रियार्थावग्रह., अवनग्रहणं चोपलक्षणं तेन नोइन्द्रियाथावग्रहस्य साक्षादितरयोस्तु ( ईहापाययोः ) उपलक्षणत उपादान, विचित्रत्वात सूत्र- गतेरित्यदोष। प्रज्ञापना सूत्र पद १५ उद्देश २ सू० २०० -- मूल :-काविहाणं भंते ! आया पएणत्ता ?, गोयमा! अट्टविहा आया पएणत्ता, तंजहा-दवियाया कसायाया योगा- या उवओगाया णाणाया दंसणाया चरित्ताया वोरियाया । जस्स णं भंते ! दवियाया तस्स कसायाया जस्स कसायाया तस्स दवि- याया ?, गोयमा ! जस्स दवियाया तस्स कसायाया सिय अत्थि सिय नत्थि जस्स पुण कसायाया तस्स दवियाया नियमं अत्थि। जस्म णं भंते ! दविया तस्स जोगायाया ?, एवं जहा दवियाया कसायाया भणिया तहा दवियाया जोगाया भाणियव्वा । जस्स दशेनविषयः १०७ ण भंते ! दवियाया तस्स उवोगाया एवं सव्वत्थ पुच्छा भाणि- यव्वा, गोयमा ! जस्स दवियाया तस्स उवोगाया नियमं अत्थि, जस्सवि उवोगाया तस्सवि दवियाया नियमं अस्थि, जस्स दवियाया तस्स णाणाया भयणाए जस्स पुण णाणोया तस्स दवियाया नियमं अस्थि, जस्स दवियाया तस्स दंसणाया नियम अत्थि जस्सवि दंसणाया तस्स दवियाया नियमं अत्थि, जस्स दवियाया तस्स चरित्ताया भयणाए जस्स पुण चरित्ताया तस्स दवियाया नियम अत्थि, एवं वोरियायाएवि समं । जस्स णं भंते ! कसायाया तस्स जोगाया पुच्छा, गोयमा ! जस्स कमायाया तस्स जोगाया नियमं अत्थि, जस्स पुण जोगाया तस्स कसाया- या सिय अत्थि सिय नत्थि, एवं उवोगायाएवि समं कसायाया नेयव्वा, कसायाया य णाणाया य परोप्परं दोवि भइयवाओ, जहा कसाया य उवयोगाया य तहा कसायाया य दंसणाया य कसाया य चरित्ता य दोवि परोप्परं भइयव्वाश्रो, जहा कसायाया य जोगाया य तहा कसायाया य वीरियाया य भाणियव्वाश्रो, एवं जहा कसायायाए वत्तब्धया भणिया तहा जोगायाएवि उव- रिमाहिं समं भाणियव्वाश्रो । जहा दवियायाए वत्तव्वया भणिया तहा उवयोगायाएवि उवरिल्लाहिं सम भाणियव्वा । जस्य नाणाया जैनागमन्यायसंग्रह: तस्स चरित्ताया तस्स दंसणाया नियमं अत्थि जस्स पुण दंसणाया तस्स हाणाया अयणाए, जस्स नाणाया तस्स चरिताया सिय अत्थि सिय नत्थि जस्स पुण चरित्ताया तस्स नाणया नियमं अत्थि, णाणाया वीरियाया दोवि परोप्परं भयणाए । जस्स दंसणाया तस्स उव- रिमाओ दोवि भयणाए, जस्स पुण ताओ तस्स दंसणाया नियमं अस्थि । जस्स चरित्ताया तस्स वीरियाया नियम अत्थि जस्स पुण वीरियाया सिय अत्थि सिय नत्थि ॥ एयासि-णं भंते ! दवियायाणं कसायायाणं जाव वीरियायाणं य कयरे २ जाव विसेसा० गोयमा ? सव्वत्थोवाओ चरित्तायाओ नाणायात्रो अणंतगुणाः ओ कसायाश्रो अणंत जोगायायो वि० विरियायाओवि उव योगदवियदंसणायानो तिन्निवि तुल्लाश्रो वि०॥ (सू० ४६७ आया भंते ! नाणे अन्नाणे ?, गोयमा ! आया सिय नार सिय अन्नाणे णाणे पुण नियनं आया ॥ आया भंते ! नेरइ- याणं नाणे अन्ने नेरईयाणं नाणे १ गोयमा! आया नेरइयाणं सिय नाणे सिय अन्नाणे नाणे पुण से नियमं आया एवं जाव थणियकुमाराणं, आया भंते ! पुढवि० अन्नाणे अन्ने पुढविका- इयाणं अन्नाणे ?, गोयमा ! आया पुढविकाइयाणं नियम दर्शनविषय १०६ जवाहर अन्नाणे अन्नाणेवि नियमं आया, एवं जाव वणस्सइका०, nिt बेईदिय तेइंदिय जाव वेमाणियाणं जहा नेरइयाणं । आया भंते दसणे अन्ने दंसणे १ गोयमा ! आया नियमं दंसणे दंसणेवि नियम वा? श्राया । श्राया भंते ! नेर० दंसणे अन्ने नेरइयाणं दंसणे १, उम। गोयमा ! आया नेरड्याणं नियमा दंसणे दंसणेवि से नियम आया एवं जाव वेमा० निरंतरं दंडअो ॥ (सू० ४६८) 1 ब - टीका:-'कइविहा रण' मिति, 'आय' त्ति अतति-सततं गच्छति । अपरापरान् स्वपरपर्यायानित्यात्मा, अथवा अतधतोगेमनार्थत्वेन ज्ञानार्थ- त्वादतति-सन्ततमवगच्छति उपयोगलक्षणत्वादित्यात्मा, प्राकृतत्वाच्च सूत्रे स्त्रीलिंगनिर्देश. तस्य चोपयोगलक्षणत्वात् सामान्येनैकविधत्वेऽप्युपाधिभे- दादष्टधात्वं ,तत्र 'दवियाय' त्ति द्रव्य -त्रिकालानुगाम्युपसर्जनीकृतकषायाद गरे पर्यायं तदप आत्मा द्रव्यात्मा सर्वेषां जोवानां, 'कसायाय! ति क्रोधादिकषाय of विशिष्ट आत्माकषायात्मा अक्षीणानुपशान्तकषायाणाम्' 'जोगाया त्ति योगा- । मन प्रभृतिव्यापारास्तत्प्रधान आस्मा योगात्मा योगवतामेव, 'उवओगाया' त्ति उपयोग.- साकारानाकारभेदस्तत्प्रधान आत्मा उपयोगात्मा सिद्धसंसा- रिस्वरूप. सर्वजीवानां, अथवा विवक्षितवस्तूपयोगापेक्षयोपयोगात्मा, 'ना- णाय' त्ति ज्ञानविशेषित उपसर्जनीकृतदर्शनादिरात्मा ज्ञानात्मा सम्यग्दृष्टे' एवं दर्शनात्मादयोऽपि नवरं दर्शनात्मा सर्वजीवानां, चारित्रात्मा विरतानां वीर्य-उत्थानादि तदात्मा सर्वसंसारिणामिति, उक्तं च-जीवनां द्रव्यात्मा- । शेय. सकषायिणां कषायात्मा । योगः सयोगिनां पुनरुपयोगः सर्वजीवा- --- जैनागमन्यायसंग्रह: , तस्स दसणाया नियमं अत्थि जस्स पुण दंसणाया तस्स हाणाया भयणाए, जस्स नाणाया तस्स चरिताया सिय अत्थि सिय नत्थि जस्स पुण चरित्ताया तस्स नाणया नियमं अत्थि, णाणाया वीरियाया दोवि परोप्परं भयणाए । जस्स दंसणाया तस्स उव- रिमाओ दोवि भयणाए, जस्स पुण ताओ तस्स ढंसणाया नियमं अत्थि । जस्स चरित्ताया तस्स वीरियाया नियम अत्थि जस्स पुण वीरियाया तस्स चरित्ताया सिय अत्थि सिय नत्थि ॥ एयासि–णं भंते ! दवियायाणं कसायायाणं जाव वीरियायाणं य कयरे २ जाव विसेसा० गोयमा ? सव्वत्थोवायो चरित्तायाो नाणायात्रो अणंतगुणा- प्रो कसायाो अणंत० जोगायाप्रो वि० विरियायामोवि उव- योगदवियदंसणायाओ तिन्निवि तुल्लाओ वि०॥ (सू० ४६७) आया भंते ! नाणे अन्नाणे ?, गोयमा ! आया सिय नाणे सिय अन्नाणे णाणे पुण नियनं आया ॥ आया भंते ! नेरइ- याणं नाणे अन्ने नेरईयाणं नाणे १ गोयमा! पाया नेरइयाणं सिय नाणे सिय अन्नाणे नाणे पुण से नियमं आया एवं जाव थणियकुमाराणं, आया भंते ! पुढवि० अन्नाणे अन्ने पुढविका- । इयाणं अन्नाणे ?, गोयमा ! आया पुढविकाइयाणं नियम दर्शनविषयः १०६ अन्नाणे अन्नाणेवि नियमं आया, एवं जाव वणस्सइका०, बेइंदिय तेइंदिय जाव वेमाणियाणं जहा नेरइयाणं । आया भंते दंसणे अन्ने दंसणे १ गोयमा ! आया नियमं दंसणे दंसणेवि नियम आया । आया भंते ! नेर० दंसणे अन्ने नेरइयाणं दंसणे १, गोयमा ! आया नेरइयाणं नियमा दंसणे दंसणेवि से नियम आया एवं जाव वेमा० निरंतरं दंडओ ॥ (सू० ४६८) टीका :-'कइविहा ण' मिति, 'आय' त्ति अतति-सततं गच्छति अपरापरान् स्वपरपर्यायानित्यात्मा, अथवा अतधतोगेमनार्थत्वेन ज्ञानार्थ- त्वादतति-सन्ततमवगच्छति उपयोगलक्षणत्वादित्यात्मा, प्राकृतत्वाच्च सूत्र स्त्रीलिंगनिर्देश. तस्य चोपयोगलक्षणत्वात् सामान्येनेकविधत्वेऽप्युपाधिभे- दादष्टधात्वं ,तत्र 'दवियाय' त्ति द्रव्य -त्रिकालानुगाम्युपसर्जनीकृतकषायाद पर्यायं तद्प आत्मा द्रव्यात्मा सर्वेषां जोवानां, 'कसायाया त्ति क्रोधादिकषाय विशिष्ट आत्माकषायात्मा अक्षीणानुपशान्तकषायाणाम्' 'जोगाया त्ति योगा- मन प्रभृतिव्यापारास्तत्प्रधान आस्मा योगात्मा योगवतामेव, 'उवओगाया' त्ति उपयोग.- साकारानाकारभेदस्ततप्रधान आत्मा उपयोगात्मा सिद्धसंसा- रिस्वरूप. सर्वजीवानां, अथवा विवक्षितवस्तूपयोगापेक्षयोपयोगात्मा, 'ना- णाया त्ति ज्ञानविशेषित उपसर्जनीकृतदर्शनादिरात्मा ज्ञानात्मा सम्यग्दृष्टे. एवं दर्शनात्मादयोऽपि नवरं दर्शनात्मा सर्वजीवाना, चारित्रात्मा विरतानां वीर्य-उत्थानादि तदात्मा सर्वसंसारिणामिति, उक्त च-जीवनां द्रव्यात्मा- सय सकषायिणां कषायात्मा । योगः सयोगिनां पुनरुपयोगः सर्वजीवा- , ११० जैनागमन्यायसंग्रह नाम् ॥ १॥ ज्ञानं सम्यग्दृष्टदर्शनमथ भवति सर्वजीवानाम् । चारित्रं विरतानां तु सर्वसंसारिणां वीर्यम् ॥२॥ इति ॥ एवमष्टधाऽऽत्मनं प्ररूप्यथ यस्यात्मभेदस्य यदन्यदात्मभेदान्-रं युज्यते च न युज्यते च तस्य तदर्शयितुमाह-'जस्स ण' मित्यादि, इहाष्टौ पदानि स्थाप्यन्ते, तत्र प्रथमपदं शेषैः सप्तभिः सह चिन्त्यन्ते तत्र यस्य जोवस्य 'द्रव्यात्मा' द्रव्यात्मत्वं जीवत्वमित्यर्थः तस्यकषायात्मा स्यादस्ति , कदाचिद- स्ति सकपायावस्थायां 'स्यान्नाति? कदाचिन्नास्ति क्षीणोपशोन्तकषायावस्था- यां, यस्य पुनः कषायात्माऽस्ति तस्य द्रव्यात्मा द्रव्योत्मत्वं -जीवत्वं नियमा- दस्ति. जीवत्वं विना कषायाणामभावादिति । तथा यस्य द्रव्यात्मा तस्य यो- गात्माऽस्ति, योगवतामिव, नास्ति योगिसिद्धानामिव, तथा यस्य योगा- स्मा तस्य द्रव्यात्मा नियमादस्ति, जीवत्वं विना योगानामभावात्, एत- देव पूर्वसूत्रोपमानेन दर्शयन्नाह-‘एवं जहा दवियाये' त्यादि । तथा यस्य जीवस्य द्रव्यात्मा तस्य नियमादुपयोगात्मा, यस्याप्युपयोगात्मा तस्य नियमाद् द्रव्यास, एतयोः परस्परेणाविनाभूतत्वात सिद्धस्य, तदन्यस्य द्रव्यात्मास्त्युपयोगात्मा चोपयोगलक्षत्वाज्जीवानां , एतदेवाह-'जस्स दवियाये? त्यादि । तथा 'जस्स दवियाया तस्स नाणाया भयणाए जस्स पुण नाणाया तस्स दवियाया नियमं अस्थि: त्ति यस्य जीवस्य द्रव्यात्मा तस्य ज्ञानात्मा स्यादस्ति यथा सम्यग्दृष्टीनो स्यान्नास्ति यथा मिथ्यादृष्टीनामित्येवं भजना, यस्य तु बानात्मा तस्य द्रव्यात्मा नियमादस्ति, यथा सिद्धस्येति 'जस्स दवियाया तस्स दसणाया नियम अथिति यथा सिद्धस्य केवलदर्शन 'जस्स वि दंसणाया तस्स दवियाया नियमं अस्थि' त्ति यथा चक्षुर्दर्शनादि यथा च - दशनविषय १११ दर्शनवतां जीवत्वमिति, तथा 'जस्स दवियाया तस्स चरित्ताया भयणाए' त्ति यत सिद्धस्याविरतस्य वा द्रव्यात्मत्वे सत्यपि चारित्रात्मा नास्ति विरताना चास्तीति भजनेति, 'जस्स पुण चरित्ताया तस्य दवियाया नियम' अत्थि, त्ति चारित्रिणां जोवत्याव्यभिचारित्वादिति, ‘एवं वीरयातेवि सम' ति यथा द्रव्या मनश्चारित्रात्मना सह भजनोक्ता नियमश्चैवं वीर्यात्मनाऽपि सहेति, तथाहि- यस्य द्रव्यात्मा तस्य वीर्यात्मा नास्ति, यथा सकरणवीर्यापेक्षया सिद्धस्य . तदन्यस्य त्वस्तीति भजना, वीर्यात्मनस्तु द्रव्यात्माऽस्त्येव यथा संसारिणामि- ति ।।। अथ कषायात्मना सहान्यानि षटपदानि चिन्त्यन्ते-जस्सणा- मित्यादि, यस्य कषायात्मा तस्य योगात्माऽस्त्येव, नहि सकषायोऽयोगी भव- ति, यस्य तु योगात्मा तस्य कषायात्मा स्यादवा न वा, सयोगानां सकषा- याणामकष याणां च भावादिति, 'एव उवोगाया, एवी' त्यादि, अयमर्थ यस्य कपायात्मा तस्योपयोगात्माऽवश्य भवति, उपयोगरहितस्य कषायाणाम- भावात् , यस्य पुनरुपयोगात्मा तस्य कषायात्मा भजनया, उपयोगात्मताया? सत्यामपि कषायिणामेव कषायात्मा भवति निष्कषायाणा तु नासाविति भजनेति, तथा 'कसायाया य नाणाया य परोप्पर दोवि भइयव्योओ त्ति कथ यस्य कषायात्मा तस्य ज्ञानात्मा स्यादस्ति स्यान्नास्ति, यत कषायण सम्य- गडण्टेर्ज्ञानात्माऽस्ति मिथ्यादृष्टेस्तु तस्य नास्त्यसाविति भजना, तथा यस्य ज्ञानात्मास्ति तस्य कषायात्मा स्यादस्ति स्यान्नास्ति, ज्ञानिना कषायभावात् तदभावाच्चेति भजनेति, ' जहा कसायाया उवओगाया य तहा कसायाया य दसणाया या त्ति अतिदेश, तस्माच्चेद लब्ध ...' जस्स कसायाया तस्स दंसणाया नियम अत्थिा दर्शनरहितस्य घटादे कषायात्मनोऽभावात् जस्म पुरण दसणाया तस्स कसायाया सिय अस्थि सिय नत्थिर दश - - ११२ जैनागमन्यायसग्रहः कपायसद्भावात्तदभावाच्चेति, दृष्टान्तार्थस्तु प्राक् प्रसिद्ध एवेति, 'कसा- याया य चरित्ताया य दोवि परोप्परं भइयव्याओ' त्ति भजना चैवं-यस्य कपोयात्मा तस्य चारित्रात्मा स्यादस्ति स्यान्नास्ति, कथं ?, कषायिणां चारि- त्रस्य सद्भावात् प्रमत्तयतीनामिव तदभावाचासंयतानामिवेति, तथा यस्य चारित्रात्मा तस्य कथायात्मा स्योदस्ति स्यान्नास्ति, कथं १, सामायिकादि चा- रित्रिणां कपायाणां भावाद् यथाख्यातचारित्रिणां च तदभावादिति, 'जहा कसायाया य जोगाया य तहा कसायाया वीरियाया य भाणियव्वाओ' त्ति दृष्टांतः प्राक् प्रसिद्धः, दान्तिकस्त्वेवं यस्य कषायात्मा तस्य वीर्यात्मा नियमादस्ति, नहि कषायवान् वीर्य्य विकलोऽस्ति, यस्य पुनर्वीर्यात्मा तस्य कपायात्मा भजनया, यतो वीर्यवान् स कषायोऽपि स्थाद् यथा संयत अकपायोऽपि स्याद् यथा केवलीति ॥६॥ अथ योगात्माऽतनपदैः पश्चभिःसह चिन्तनीयस्तत्र च लाघवार्थमनिदिशन्नाह एवं जहा कसाया- याए वत्तव्यया भणिया तहा जोगायाएवि उपरिमाहिं समं भोणियव्य त्ति, साचैवं -यस्य योगात्मा तस्योपयोगात्मा नियमाद् यथा सयोगानां, पुनरुपयोगात्मा तस्य योगात्मा स्यादस्ति यथो सयोगानां स्यान्नास्ति यथाऽयोगिनां सिद्धानाच ति, तथा यस्य योगात्मा तस्य ज्ञानात्मा स्वादस्ति सम्यग्दृष्टीनामिव स्यान्नास्ति मिथ्यहिष्टानामिव यस्य ज्ञानात्मा तस्यापि योगात्मा स्यादस्ति सयोगिनामिव स्यान्नास्त्यो गिनामिवेति, तथा यस्य योगात्मा तस्य दर्दनऽऽत्माऽस्त्येव योगिनामिव यस्य च दर्शनात्मा तस्य योगात्मा स्यादस्ति योगवतामिव स्यान्नास्त्ययोगिना- मिव, तथा यस्य योगात्मा तस्य चारित्रात्मा स्यादस्ति विरतानामिव स्यान्ना- स्त्यावरतानामिव, यस्यापि चारित्रात्मा तस्य योगात्मा स्यादस्ति सयोगचा- यस्य दर्शनविषयः ११३ ग्त्रिवतामिव स्यान्नास्त्ययोगिनामिवेति, वाचनान्तरे पुनरिदमेवं दृश्यते- जस्स चरित्ताया तस्स जोगाया नियमा त्ति तत्र च चारित्रस्य प्रत्युपेक्षणादि व्यपाररूपस्य विवक्षितत्वात्तस्य च योगाविनाभावित्वात् यस्य चारित्रात्मा तस्य योगात्मा नियमादित्युच्यत इति, तथा यस्य योगोत्मा तस्य वीर्यात्माऽ स्त्येव योगसद्भावे वीर्यस्यावश्यम्भवात, यस्य तु वीर्यात्मा तस्य योगात्मा भजनया यतो वीर्य्यविशेषवान् सयोग्यपि स्याद् यथा सयोगकेवल्यादि अयोग्यपि स्याद् यथाऽयोगिकेवलीति ॥५॥ अथोपयोगात्मना सहान्यानि चत्वारि पिन्त्यन्ते तत्रातिदेशमाह-'जहदवियाये? त्यादि एवञ्च भावना कार्या-यस्योपयोगात्मा तस्य क्षानात्मा स्यादस्ति यथा सम्यग् दृशा स्यान्नास्ति यथा मिथ्यादृषां, यस्य च ज्ञानात्मा तस्यावश्यमुपयोगात्मा सि- द्धानामिवेति, ॥१॥ तथा यस्योपयोगात्मा तस्य दर्शनात्मऽस्त्येव यस्यापि द- नितमा तस्योपयोगात्माऽस्त्येव यथा सिद्धादीनामिव ति २ तथा यस्योपयोगा- स्मातस्य चारित्रात्मा स्यादस्ति यथा सयतानामसंयतानां च यस्य तु चारित्रा- त्मा तस्योपयोगात्माऽस्त्येवति यथा संयतानां ३ तथा यस्योपयोगात्मा तस्य वीर्यात्मा स्यादस्ति ससारिणामिव स्यान्नास्ति सिद्धानामिव यस्य पुनर्वीर्यात्मा तस्योपयोगात्माऽस्त्येव ससारिणामिवेति ४ । अथ ज्ञानात्मना सहान्यानि त्रीणि चिन्त्यन्ते 'जरस नाणे' त्यादि, तत्र यस्य ज्ञानात्मा तस्य दर्शनात्मा स्त्येव सम्यग्दृशामिव, यस्य च दर्शनात्मा तस्य ज्ञानात्मा स्यादस्ति यथा सम्यग्दृशां स्यान्नास्ति यथा मिथ्याशामत एवोक्त 'भयणाए' त्ति १ तथा 'जस्स नाणाया तस्स चरित्ताया सिय अत्थिः त्ति, संयतानामिव सिय नस्थि, त्ति, असंयतानमिव 'जस्स पुण चरित्ताया तस्स नाणाया नियम अत्थि, त्ति ज्ञानं विना चारित्रस्याभावादिति २ तथा 'णाणाये ११४ जैनागमन्यायसंग्रहः १ त्यादि अस्यार्थः-यस्य ज्ञानात्मा तस्यवीर्यात्मा स्यादस्ति केवल्यादीना- मिव स्यान्नास्ति सिद्धानामिव, यस्यापि वीर्यात्मा तस्य ज्ञानात्मा स्यादस्ति सम्यग् हष्टेरिव स्यान्नास्तिमिथ्यादृश इवेति ३ ॥ अथ दर्शनात्मना सह द्वचिन्त्येते 'जस्स दंसणाये' त्यादि, भावना चास्य -यस्य दर्शनात्मा तस्य चारित्रात्मा स्यादस्ति संयतानामिव स्यान्नस्त्यसंयतानामिव, यस्य च चा- रित्रात्मा तस्य दर्शनात्मानस्त्येव साधूनामिवेति १ तथा यस्य दर्शनात्मा तस्य वीर्यात्मा स्यादस्ति संसारिणमिव स्यान्नास्ति सिद्धानामिव, यस्य च वो- र्यात्मा तस्य दर्शनात्माऽस्त्येव संसारिणामिवेति २॥ अथान्तिम पदयोर्यो- जना 'जस्स चरित्तै त्यादि, यस्य चारित्रात्मा तस्य वीर्यात्माऽस्त्येव वीर्य विना चारित्रस्याभावात् , यस्य पुनर्वीर्यात्मा तस्य चारित्रात्मा स्यादस्ति साधूनामिव स्यान्नस्त्यिसयतानामिवेति अधुनैषामेवात्मनामल्पबहुत्वमुच्यते 'सव्वत्थोवाओ चतित्तायाओ' त्ति चारित्रिणां सख्यातत्वात् 'णाणाया- ओ अणत गुणाओ' त्ति सिद्धादोनो सम्यग् दृशां चारित्रेभ्योऽनन्तगुणत्वा- त् 'कसायाओ अणंतगुणाओ' त्ति सिद्धेभ्य कपायोदयवतामनन्तगुण त्वात् जोगायाो विसेसाहियाओ' त्ति अपगतकपोयोदयैर्योगवद्भिरधि- का इत्यर्थ 'वीरियाओ विसेसाहियाओ' त्ति अयोगिभिरधिका इत्यर्थः अयोगिनां वीर्यवत्वादिति, 'उवोगदवियदसणायाओ तिरिणवि तुल्ला- श्रो विसेसाहियानो' त्ति परस्परापेक्षया तुल्या', सर्वेपी सामान्यजीवरूप- वान् वीर्यात्मभ्यः सकाशादुपयोद्रव्यदर्शनात्मानो विशेषाधिका यतो वी- र्यात्मान' सिद्धाश्च मोलिता उपयोगाद्यात्मानो भवति, ते च वोयत्मिभ्य. सिद्वराशिनाऽधिका भवन्तीति, भवतिं चात्र गाथा ---कोडी महम्स पहुत्तं ईण तो थोवियाओ चरणाया । णाणायाऽणंतगुणा पडुच्च सिद्धे य- - दर्शनविषय. ११५ सिद्धाओ ॥१॥ छाया-यतीनांकोटी सहस्रपृथकत्व ततः स्तोकाश्चरणात्मा- न. । ज्ञानात्मनोऽनन्तगुणाः सिद्धा सिद्धान् प्रतीत्य ।।१॥'होति कसायायाओ ऽणंतगुणा जेण ते सरागाणं । जोगाया भणियाओ अयोगि वज्जाणतो अहिया ॥ २॥ छाया-कषायात्मानोऽनन्तगुणा भवन्ति यतस्ते सरागाणाम् । ततो योगात्मानोऽधिका अयोगिवा यतोभणिता ॥२॥' ज सेलेसि गयाणवि लद्धी विरिय तो समहियाओ । उवोगदविय दंसण सव्वजि- या ण ततो अहिया ॥३॥ इति, छाया-यच्छैलेशीगतानामपि लब्धि- वीर्य ततस्ते समधिका। उपयोगद्रव्यदर्शनात्मानः सर्वे जीवास्ततोऽधि- को ॥३॥ इति । अथात्मान एव स्वरूपनिरुणायाह-'आया भंते । नाणे इत्यादि, आत्मा ज्ञानं योऽयमात्माऽसौ ज्ञानं न तयोर्भेदः अथात्म- नोऽन्यज्ञानमिति प्रश्नः, उत्तरं तु-आत्मा स्याजज्ञानं सम्यक्त्वे सति मत्यादि ज्ञान स्वभावत्वात्तस्य, स्यादज्ञानं मिथ्यात्वे सति तस्य मत्यज्ञाना- दि स्वभावत्वात्, ज्ञानं पुनर्नियमादात्मा आत्मधर्मत्वाज्ज्ञानस्य, न च सर्व- था धर्मो धर्मिणोभिंद्यते, सर्वथा मेदे हि विप्रकृष्ट गुणिनो गुणमात्रोपल- धौ प्रतिनियतगुणिविषय एवसशयो न स्यात्, तदन्येभ्योऽपि तस्य भेदाविशेषात्, दृश्यते च यदा कश्चिद्धरिततरुतरुणशाखाविसररंध्रोदरान्तरतः किमपि शुक्ल पश्यति तदा किमियंपताका किमियं बालका ? इत्येवं प्रतिनि- यतगुणिविषयोऽसौ, नापि धर्मिणो धर्म सर्वथैवाभिन्न , सर्वथैवाभेदेहि संशयानुत्पत्तिरेव, गुण ग्रहणत एव .गुणिनोऽपि गृहीतत्वादत कथञ्चि- दभेदपक्षमाश्रित्य ज्ञानं पुनर्नियमादात्मेत्युच्यत, इति इह चात्मा ज्ञानं व्यभिचरति ज्ञान त्वात्मानं न व्यभिचरति खदिरवनस्पतिवदिति सूत्रगर्भार्थ इति ।। अमुमेवार्थ दण्डके निरूपयन्नाह-'आये त्यादि, नारकाणां' आ- .
११६ जेनागमन्यायसंग्रहः - त्मा' आत्मस्वरूपं ज्ञानं उतान्यन्नारकाणां ज्ञानं ? तेभ्यो व्यतिरिक्तमित्यर्थः इति प्रश्नः, उत्तरं तु आत्मा नारकाणां स्याज्ज्ञानं सम्यग्दर्शनाभावात् स्यादज्ञानं मिथ्या दर्शनाभावात् ज्ञानं-पुन. 'से' 'से, त्ति तन्नारक सम्बन्धि आत्मा न तद्व्यतिरिक्तमित्यर्थः ॥ 'आया भंते ! पुढविक्काइ- याण' मित्यादि, 'आत्मा' आत्मस्वरूपज्ञानमुतान्यत्तत्तेषां ? उत्तरं तु आत्मा तेषामज्ञानरूपो नान्यत्तत्तेभ्य इति भावार्थ एवं दर्शनसूत्राण्यपि, नवरं सम्यग्दृष्टिमिथ्यादृष्टयोदर्शनस्याविशिष्टत्वादात्मा दर्शनं दर्शनमप्या- त्मैवेति वाच्यं, यन हि धर्म विपर्ययो नास्ति तत्र नियम एवोपनीयते न व्यभिचारो, यथेहैव दर्शने, यत्र तु विपययोऽस्ति तत्र व्यभिचारो नियमश्च यथा ज्ञाने आत्मा ज्ञानरूपोऽज्ञानरूपश्चति व्यभिचार , ज्ञानं त्वात्मैवेति नियम इति ॥ मूल : आया भंते ! रयणभापु० अन्ना रयणप्पभा । पुढवी ! गोयमा ! रयणप्पभा सिय आया सिय नो आया सिय अवत्तव्यं आयति य नो आयाइ य, से केंण?ण भंते ! एवं वुच्चइ रयणप्पभा पुढवी सिय आया सिय नो आया सिय अवत्तव्यं प्रातातिय नो प्रातातिय ? गोयमा ! अप्पणो आदिट्ठ आया परस्स आदिट्ठ नो आया तदुभयस्स आदितु अवत्तव्यं रयणप्पभा पुढवी पुढवी आयातिय नो आयतिय य, से तेणेट्टणं तं चेव जाव नो आयातिय । आया भंते ! सक्करप्पभा पुढवी जहा रयणप्पभा पुढवी तहा सक्क, ..
दर्शनविषय. ११७ रप्पभाएवि, एवं जाव अहे सत्तमा । प्राया भंते ! सोहम्मकप्पे पुच्छा, गोयमा ! सोहम्मे कप्पे सिय आया सिय नो पाया जाव नो आयाति य, से केण?णं भंते! जाव नो आयातिय ?, गोयमा ! अप्पणो आइट्ठ आया परस्स आइ8 नो आया तदु- भयस्स आइड' अवत्तव्य आताति य नो आताति य, से तेण- तुणं तं चेव जाव नो आयाति य, एवं जाव अच्चुएकप्पे । आया भंते ! गेविज्जविमाणे अन्ते गेविज्जविमाणो एवं जहा रय- रणप्पभा तहेव, एवं अणुत्तरविमाणावि, एवं ईसिपम्भारावि । आया भंते परमाणपोग्गले अन्ने परमाणपोग्गले ?, एवं जहा सोहम्म कप्पे तहा परमाणुपोग्गलेवि भाणियब्वे ।। आया भंते दुपएसिए खंधे अन्ने दुपएसिए खंधे १ गोयमा ! दुपएसिए खंधे सिय आया १ सिय नो आया २ सिय अवत्तव्यं आयाइ य नो आयातिय ३ सिय आया य नो आया य ४ सिय आया य अवत्तव्यं याति य नोआयातिय ५ सिय नो आया य अवत्तव्यं आयाति य नो आयाति य ६, से केणढणं भंते ?, एव तं चेव जाव नो आयाति य अवत्तव्वं अयाति य नो आयाति य गोयमा ! अप्पणो आदिट्ठ आया १ परस्स आदितु णो आया २ तदुभय- स्स आदिट्ठ अवत्तव्वं दुपएसिए खंधे आयाति य नो आयाति ११८ जैनागमन्यायसंग्रहः य ३ देसे आदि8 सम्भावपज्जवे देसे आदितु असम्भावपज्जवे दुप्पएसिए खंधे आया य नो आया यः ४ देसे आदितु सब्भा- वपज्जवे देसे आदितु तदुभयपज्जवे दुपएसिए खंधे आया य अवत्तवं आयाइ य नो आयाइ य ५ देसे आदिट्ठ असम्भाव- पज्जवे देसे आदितु तदुभयपज्जवे दुपएसिए खंधे नो आया य अवत्तव्यं आयाति य णे आयाति य ६ से तेण?णं त चेव जाव नो आयाति य ॥ आया भंते ! तिपएसिए खंघे अन्ने तिप- एसिए खंधे ?, गोयमा १ तिपएसिए खंधे सिय आया १ सिय नो आया २ सिय अवतव्यं आयाति य नो आयाति य ३ सिय आया य नो पाया य ४ सिय आया य नो भायात्रो य । सिय आयाउ य नो आया य ६ सिय आया य अवत्तव्वं श्रा.. याति य नो आयाति य ७ सिय आयाइय अवत्तव्वाई आयात्रो य नो आयाओ य ८ सिय पायायो य अवत्तव्यं आयाति य नो आयाति यह सिय नो आया य अवचव्यं आयाति नो प्रा- याति य १० सिय पाया य अवत्तवाडं आयाओ य नो आया य ११ सिय नो आयात्रो य अवत्तव्यं आयाइ य नो आयाइ य १२ सिय पाया य नो आया य अवत्तव्यं आयाइ य नो श्रा- याइय १३ से केणढणं भंते १, एवं वुच्चइ तिपएसिए खंधे सिय
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१२०
बेनागमन्यायसग्रहः
आदिव असम्भावपज्जवे देसा आदिवा तदुभयपज्जवा तिपएसिए
खंधे नो आया य अवत्तव्बाई आयाओ य नो आयाओ
य ११ देसा आदिवा असम्भावपज्जवा देसे अदिट्ठ
तदुभयपज्जरे तिपएसिए खंधे नो आयात्रो य अवत्तव्यं आया-
तिय नो पायाति य १२ देसे आदि सम्भावपज्जवे देसेग्रादिछ
अमभावपज्जवे देसे आदितु तदुभयपज्जवे तिपएसिए खंधे
आया य नो आया य अवत्तव्यं आयाति य नो आयाइ य १३
से तेणढणं गोयमा ! एवं बुच्चइ तिपएसिए खंधे सिय आया तं
चेव जाव नो आयाति य ॥ आया मंते ! चउप्पएसिए
खंधे अन्ने पुच्छा, गोयमा ! चउप्पएसिए खंधे सिय आया
१ सिय नो आया २ सिय अवत्तव्यं प्रायाति य ना
अायाति य ३ सिय आया य नो पायाय ४ सिय आया य
अवत्तव्यं ४ सिय नो पाया य अवत्तव्यं ४ सिय आया य नो
आया य अवतव्यं प्रायाति य नो पायातिय १६ सिय आया य
नो आयाय अत्रत्तवार्ड पायात्रा य नो यायायो य १७ सिय
पाया य नो पायायो य अवत्तव्य प्रायाति य नो आयाति य
१८ सिय यायायो य नो यायाय प्रवत्तव्यं यायाति य नो
आयानि य १६ से केण? णं भंते ! एवं बुच्चइ चउप्पएसिए खंधे
दर्शनविषय.
१०६
तदुभयण
य
सिय आया य नो आया य अवत्तव्यं तं चेव अट्ठ पडिउच्चारे-
यव्वं ?, गोयमा ! अप्पणो आदि8 आया १ परस्स आदितु नो
आया २ तदुभयस्स आदितु अवत्तव्यं आयाति य नो आयाति
य ३ देसे आदितु सम्भावपज्जवे देसे आदितु असम्भाव
पज्जवे चउभंगो, सम्भावपज्जवेणं तदुभयेण य चउभगो
असम्भावणं
चउभंगो, देसे आदि
सम्भावपज्जवे देसे आदितु असम्भावपज्जवे देसे आदिट्ट
तदुभयपज्जवे चउप्पएसिए खंधे आया य नो आया य अवत्तव्य
आयाति य नो आयाति य, देसे आदिट्ठः सम्भावपज्जवे देसे
आदिट्ठ असम्भावपज्जवे देसा आदिट्ठा तदुभयपज्जवा चउप्पएसिए
खंधे भवइ आया य नो आया य अवत्तव्वाइं आयात्रो य नो
आयाओ य १७ देसे आदितु सब्भावज्जवे देसा आदिट्ठा
असम्भावपज्जवा देसे आदि8 तदुभयपज्जवे चउप्पएसिए सं.
आया य नो आयात्रो ये अवत्तव्यं आयाति य नो आयातिय
१८ देसा आइट्ठा सम्भावपज्जवा देसे आइ8 असम्भावप०
देसे प्राइडे तदुभयपज्जवे चउप्पएसिए खंधे आयामो य नो
आया य अवत्तव्यं आयाति य नो आयातिय १६ से तेणढण
गोयमा ! ऐवं बुच्चइ चउप्पएसिए खंधे मिय आया मिय ना
१२२ जैनागमन्यायसंग्रहः आया सिय अवत्तव्वं निक्खेवे ते चेव भंगा उच्चारेयव्वा जाव नो आयाति य ॥ आया भंते ! पंचपएसिए खंधे अन्ने पंचपएसिए खंधे ?, गोयमा ! पंचपएसिए खंधे सिय आया १ सिय नोभाया २ सिय अवत्तव्यं आयाति य नो अायाति य ३ सिय पाया य नो पाया य सिय अवत्तव्यं ४ नो पाया य अवचव्वेण य ४ तियग संजोगे एकोण पडइ, से केणढणं भंते ! तं चेव पडिउच्चा रेयव्वं ?, गोयमा ! अप्पणो आदिट्ठ आया १ परस्स आदितु नो आया २ तदुभयस्स आदितु अवत्तव्वं ३ देसे आदिव' सम्भाव पज्जवे देसे आदितु असब्भावपज्जवे एवं दयग संयोगे सव्वे पति तियग संजोगे एक्कोण पडइ । छप्पएमियस्स सव्वे पडंतिजहा छप्पएसिए एवं जाव अणंतपएसिए । सेवं भंते । सेवं भंते त्ति जाव विहरति ॥ (सू० ४६६) ॥ दसमो उद्दे सो समत्तो ॥ वारसमं सयं समत्तं ॥ १२-१० ॥ टीका:-आत्माधिकाराद् रत्नप्रभादिभावानात्मत्वादिभावेन चि- न्तयन्नाह-'पायाभंते' इत्यादि, अतति-सततं गच्छति तांस्तान्पर्यायानि त्यात्मा ततश्चात्मा-सद्पारत्नप्रभापृथिवा 'अन्न' त्ति अनात्मा असद्- रुपेत्यर्थ. 'सिय आया सिय नो आया त्ति स्यात्सती स्यादसती 'सिय श्र- वत्तव्यं त्ति आत्मत्वेनानात्मत्वेन च व्यपदेष्टुमशक्यं वस्त्विति भावः, थमवक्तव्यम् । इत्याह-आत्मेतिच नो आत्मेति च वक्तुमशक्यमित्यर्थ, क- दर्शनविषयः १२३ 'अप्पणो आइट्ट, त्ति आत्मनः-स्वस्य रत्नप्रभाया एव वर्णादिपर्यायः 'श्रा दिट्ठ' आदेशेसति तैर्व्यपदिष्टा सतीत्यर्थः आत्मा भवति, स्वपर्यायापेक्षया सतीत्यर्थः 'परस्स आइ8 नो आया त्ति परस्य शर्करादिपृथिव्यन्तरस्य- पर्यायैरादिष्ट-आदेशेसति तैयपदिष्टा सतीत्यर्थः नो आत्मा- अनात्मा भवति, पररूपापेक्षयाऽसतीत्यर्थः, 'तदुभस्य आइट्ट अवत्तव्वं त्ति तयोः स्वपरयोरुभयं तदेव वोभयं तदुभयं तस्य पर्यायैरादिष्टे-आदेशे सति तदुभ यपर्यायैर्व्यपदिष्टेत्यर्थ 'प्रवक्तव्यम्' अवाच्यं वस्तु स्यात् तथाहि- न घसौ आत्मेति वक्तुं शक्या, परपर्यायापेक्षयाऽनात्मत्वात्तस्याः, नाप्यना- मेति वक्तु शक्या, स्वपर्यायापेक्षया तस्या आत्मत्वादिति, अवक्तव्यं चा- मानात्मशब्दापेक्षयैव न तु सर्वथा श्रवक्तव्यशब्देनैव तस्या उच्यमान- त्वात् अनभिलाप्यभावानामपि भावपदार्थवस्तु प्रभृतिशब्दरनभिलाप्यशब्देन वाऽभिलाप्यत्वादिति, एवं परमाणु सूत्रमपि ॥ द्विप्रदेशिक सूत्रे षड्भंगाः तत्राद्यस्त्रयः सकलस्कन्धापेक्षा. पूर्वोक्ता एव, तदन्ये तु त्रयोदेशापेक्षाः तत्र च 'गोयमे' त्यत आरभ्य व्याख्यायते 'अप्पणो त्ति स्वम्य पर्यायः 'अदिट्ठति आदिष्ट ~आदेशे सति आदिष्ट इत्यर्थः द्विप्रदेशिकस्कन्ध- आत्मा भवति १ एवं परस्य पर्यायैरादिष्टोऽनात्मा २ तदुभयस्य-द्विप्रदेशि- कस्कन्धतदन्यस्कन्धलक्षणस्य पर्यायैरादिष्टोऽसाववक्तव्यं वस्तु स्यात् , कथम् ? आत्मेति चानात्मेति चेति ३ तथा द्विप्रदेशत्वात्तस्य देश एक अदिष्टः, सद. भावप्रधाना सत्तानुगताः पर्यवायस्मिन् स सद्भावपर्यव , अथवा तृतीयबहु- वचनमिदं स्वपर्यवैरित्यर्थः, द्वितीयस्तु देश आदिष्टः असद्भावपर्यवः पर- पर्यायैरित्यर्थः , परपर्यवाश्च तदीय द्वितीयदेशसम्बन्धिनो वस्त्वन्तरसम्ब न्धिनो वेति ततश्चासौ द्विप्रदेशिकः स्कन्ध. क्रमेणात्मा चेति नोआत्मा चेति १२४ जैनागमन्यायसंग्रहः ४, तथा तस्य देश आदिष्टः सद्भावपर्यवो देशश्चोभयपर्यवस्ततऽिसावात्मा चाववतव्यंचेति ५ तथा तस्यैव देश आदिष्टोऽसद्भावपर्यवोदेशस्तूभयपर्यव स्ततोऽसौ नोआत्मा चावक्तव्यं च स्यादिति ६ सप्तमः पुनरात्मा च नोआत्मा चावक्तव्यं चेत्येवंरूपो न भवति द्विप्रदेशिके, द्वयंशत्वादस्य त्रिप्रदेशिका- दो तु स्यादिति सप्तभंगी ॥ त्रिप्रदेशिस्कन्धे तु त्रयोदश भङ्गास्तत्रपूर्वो- क्तपु सप्तस्वाद्या सकलादेशास्त्रयस्तथैव, तदन्येषु तु त्रिषु त्रयस्त्रय एक- वचनबहुवचनभेदात् सप्तमस्त्वेकविध एव स्थापनाचेयम् यच्चेह प्रदेशद्वये- - . More अव नी आ नो १ अव १ आ १ नौ १ अब आ आ ~ २ ~ne ऽन्येकवचनं कचित्तत्तस्य प्रदेशद्वयस्यैकप्रदेशावगाढत्वादि हेतुनैकत्ववि- धनगात् , भेदविवक्षायां च वहुवचनामिति ॥ चतुष्प्रदेशिकेऽप्येवं, नगरमेकोनविंशतिभङ्गाः तत्र त्रयः सकलादेशाः तथैव शेषेषु चतुर्प , प्रत्येक चत्वारो विकल्पाः ते चैवं चतुर्थादिपु त्रिपु सप्तमस्त्वेवं- - १११ ११२ १२१ २११ पंचप्रदेशिके न द्वाविंशतिस्तत्राद्यास्त्रयस्तथैव, तदुत्तरेषु च त्रिपु प्रत्येकं चत्वारो विकल्पा १२५ दर्शनविषयः स्तथैव, सप्तमे तु सप्त, तत्र त्रिकसंयोगे किलाष्टौ भंगका भवन्ति तेषु च सप्तैवेह ग्राह्याः, एकस्तु तेषु न पतत्यसंभवात् , इदमेवाह-'तिगसजोगे त्यादि, तत्रैतेषां स्थापना १११ ११२ १२१ १२२ २११ २१२ २२१ . ? यश्च न पतति- स पुनरयम् २२२, षट्प्रदेशिके त्रयो विंशतिरिति ॥ द्वादशशते दशमः १२, १० समाप्तं च द्वादशशत विवरणम् ।। सू० ४६६ व्याख्या प्र शतक १२ उद्द० १० मुल.-अद्दायं पेहमाणे मरणूसे अद्दार्य पेहति अत्ताणं पेहइ पलिभागं पेहति ? गोयमा ! अद्दायं पेहति नो अप्पाणं पेहति पलिभाग पेहति, एवं एतेणं अभिलावेणं असि मणि दुद्ध पाणं तेल्लं फाणियं वसं (सूत्र १९७) टीका- अहायं पेहमाणो' इत्यादि, 'अदाय? मिति आदर्श 'पेह- माणे' इति प्रेक्षमाणो मनुष्यः किमादर्श प्रेतते आहोश्विदात्मानं ? अत्रात्मशब्देन शरीरमभिगृह्यते, उत' पलिभाग' मिति प्रतिभागं प्रतिवि- म्बं ? भगवानाह-आदर्श तावत् प्रेक्षत एव तस्य स्फुटरूपस्य यथावस्थित- तया तेनोपलम्भात्, आत्मानं-आत्मशरीरं पुनर्न पश्यति, तस्य तत्राभावा- त्, स्वशरीरं हि स्वात्मनि व्यवस्थितं नादर्श ततः कथमात्मशरीरश्च तत्र पश्येदिति ? प्रतिभागं-स्वशरीरस्य प्रतिविम्बं पश्यति, अथकिमात्मकं प्रति- विम्बम् १ उच्यते, छायापुद्गलात्मकं, तथाहि-सर्वमै न्द्रियक वस्तु स्थूलं चयापचयधर्मकं रश्मिवञ्च, रश्मय इति छाया पुद्गलाः व्यवह्रियन्ते १२६ जैनागमन्यायसंग्रह: छायापुद्गला. प्रत्यक्षत एव सिद्धाः, सर्वस्यापि स्थूलवस्तुनः छाया, अध्य- क्षत प्रतिप्राणि प्रतीते . अन्यच्च यदि स्थूलवस्तु व्यवहिततया दूरस्थिततया वा नादर्शादिष्ववगाढरश्मिर्भवति, ततो न तत्र तद् दृश्यते तस्मादवसीयते सन्ति छाया पुद्गलाः इति, ते च छायापुद्गलास्तत्तत् सामग्रीवशाद् वि- चित्र परिणमनस्वभावास्तथाहि -ते छाया पुद्गला दिवा वस्तुन्यभास्वरे प्रतिगताः सन्तः स्वसंबंधि द्रव्याकारमाविभ्राणाः श्यामरूपतया परिणमन्ते निशि तु कृष्णभाः, एतच्च प्रसरति दिवसे सूर्यकरनिकरे निशि तु चन्द्रो. द्योते प्रत्यक्षत एव सिद्ध, त एव छाया-परमारणवः आदर्शदिभास्वर द्रव्यप्रतिगताः सन्त स्वसंबंधिद्रव्याकारमादधानाः याग वर्ण. स्वसम्ब- धिनिद्रव्ये कृष्णो नीलः शित पीतो वा तदाभाः परिणमन्ते, एतद- प्यादर्शादिष्वध्यक्षतः सिद्धं, ततोऽधिकृतसूत्रेऽपि ये मनुष्यस्य छायापर- माणवः श्रादर्शमुपसंक्रम्य स्वदेहवर्णतया स्वदेहाकारतया च परिणमन्ते तेपां तत्रोपलब्धिर्न शरीरस्य, ते च प्रतिविम्बशब्दा वाच्या अत उक्तं- न शरीरं पश्यति किन्तु प्रतिभागमिति, नैवेतत् स्वमनीषिकाविजृम्भितं, यत उक्तमागमे-'सामा उ दिया छाया अभासुरगता निसिं तु कालाभा । सा चेव भासुर गया सदेह वण्णा मुणेयव्वा ।। १॥ छाया-श्यामा तु दिवा छाया अभास्वरगता निशि तु कालाभा । सैव भास्वरगता स्वदेह- वर्णा ज्ञातव्या ।। १॥ जे आदरिसस्सन्तो देहावयवा हवंति सकता। तेसि तत्थुवलंभो पगासजोगा न इयरेसिं ॥२॥ छाया-ये आदशे- स्यान्तदेहावयवा भवन्ति संक्रान्ताः । तेपां तत्रोपलम्भः प्रकाशयोगात् नेतरेपाम् ।।२।। मूलटोकाकारोऽप्याह-यस्मात् सर्वमेवहि ऐन्द्रियकं स्थूलं दर्शनविषयः १२७ द्रव्यं चयापचयमिकं रश्मिवञ्च भवति, यतश्चादर्शादिषु छाया स्थूलस्य दृश्यते अवगाढ रश्मिनः ततः स्थूलद्रव्यस्य कस्यचिद्दर्शन भवति, नचान्तरितं दृश्यते किश्चित अति दूरस्थं वा अत पलिभागं प्रति भागं' पेहति , पश्यतीति । एवमसिमण्यादि विषयाण्यपि षट् सूत्राणिभावनीयानि, सूत्रपाठोऽप्येवम्-'असि देहमाणेमणूसे किं असिं देहइ अत्ताणं देहइ पलिभाग देहइ १ इत्यादि, गोयमा ! असिं देहइ नो अत्ताणं देहइ पलि भागं देहइ' इत्यादि । प्रज्ञापना सूत्रपद १५ उद्दश १ सू० सं १९७॥
ज्ञान विषयः 'यथोद शस्तथा निर्देश' इति न्यायतोज्ञानभेदानाह- तत्थ पंचविहं नाणं सुरं आभिणि वोहियं । श्रोहियनाणं तइयं मणनाणं च केवलं ॥ उत्तराध्ययन-सूत्र मोक्षमार्ग गत्यध्ययन २८, गाथा, ४ ।। टीकाः-तत्र' इति तेपु ज्ञानादिपु मध्ये 'पञ्चविध' पञ्चप्रकार, किं तत् ? जानं, क एते पञ्च प्रकारा इत्याह-श्रूयते तदिति श्रुतं-शब्द मात्र, तच्च द्रव्यश्रुतमेव, यत् पुनः शब्दमाकर्ण यत. स्वयं वा वदतः पुस्तका- दिन्यस्तानि वा चक्षुरादिभिरक्षण्युपलभमानस्य शेषेन्द्रियगृहीतं वाऽर्थ विकल्प- यतोऽक्षरारूपित विज्ञानमुपजायते तदिह भावश्रुतं श्रुतशब्देनोक्त', तथाऽ- भिमुखो योग्यदेशावस्थित वस्त्यपेक्षया नियतः स्वस्वविषयपरिच्छेदकतयाऽ- वयोधः-अवगमोऽभिनिबोध. स एवाभिनिबोधिकं, विनयादित्वात् स्वार्थिकष्ठक, 'श्रोहि त्ति अवशब्दोऽध शब्दार्थः, ततश्चाधः इत्यधस्ता द्वावति अधोऽधा विस्तृतविपयवेदकतयेत्यवधि., औणादिको डि , यद्वा 'अवेत्यध एव धानं धातृनामनेकार्थत्वात् परिच्छेदोऽवधिः, उपसर्गे घो: किरिति (पा. ३-३-६२) किः, अथवाऽवधिः-मर्यादा रूपिष्वेव द्रव्येपु परिच्छेदकनया प्रवृतिरित्येवरुपा, तदुपलक्षितं ज्ञानमप्यवधिः, जायतेऽ- नेनेति नातिर्वा ज्ञानं ततोऽवधिश्चासौ ज्ञानं चावधिज्ञानं, तृतीयं तृतीय ज्ञानविषयः १२६ स्थानवर्तित्वात्,' मणणाणं' ति मनः शब्देन द्रव्यपर्याययो. कथञ्चिद भेदात् मनोद्रव्यपर्याया गृह्यन्ते, तेषु तत्तत् संज्ञिविकल्पहेतुषु ज्ञानं मनो ज्ञान, तानेव हि मनः पर्यायज्ञानी साक्षादेव वुध्यते नतु वाह्यान, अनुमान गम्यमानत्वात्तेषाम् ; उक्त हि-'जाणति वन्मेऽणुमाणाओ' त्ति च. समुच्चये भिन्नक्रमस्ततः केवलं च, तत्र केवलम्-एकमकलुषं सकलम- साधारणमनन्तं च ज्ञानमिति प्रक्रम , उक्त हि- केवलमेगं सुद्धं सकलमसाधारणं अणंत च' छाया-केवलमेकं शुद्धं सकलमसाधारण मनन्तं च । आह-नन्द्यादिषु मतिज्ञानानन्तरं श्रुतज्ञानमुक्त तदिह किमर्थमादित एव श्रुतोपादानं ? उच्यते, शेषज्ञानानामपि स्वरूपज्ञानस्य प्रायस्तदधीनत्वेन प्राधान्यख्यापनार्थमिति सूत्रार्थः ।। साम्प्रतं ज्ञानशब्दस्य सम्बन्धि शब्दत्वाद् येषां तज्ज्ञानं तान्य- भिधातुमाह- मूल -एयं पंचविहं नाणं दव्वाण य गुणाण य । पज्जवाणं च सव्वेसि, नाणं नाणीहि देसिय ॥१॥ टीका : 'एतद् अनन्तरोक्तं पश्वविधं ज्ञानं द्रवन्ति गच्छन्ति तीस्तानपर्यायानिति द्रव्याणि-वक्ष्यमाणलक्षणानि तेषां 'च' तद्गताने- कभेदख्यापको, गुणानां-रूपादीना, च प्राग्वत्, परीति-सर्वतः, कोऽर्थ ? द्रव्येषु गुणेषु सर्वेष्ववन्ति-गच्छन्तीति पर्यवास्तेषा च ‘सर्वेषाम्' अशे- षाणां, केवलापेक्षया चायं द्रव्यकान्ये, सर्व शब्दः शेष ज्ञानापेक्षया प्रकारकास्न्ये, प्रतिनियतपर्यायग्राहित्वात्तेषां, 'ज्ञानम् - (al १३० जैनागमन्यायसंग्रह अवबोधकं 'ज्ञानिभिः' अतिशयज्ञानोपेतै केवलिभिरिति यावत् 'देशित कथितम् । अनेन च यदाहुः-ज्ञान ज्ञानस्वरूपस्यैव ग्राहक, वाह्यभिमत- स्य वस्तुनो ज्ञानातिरिक्तस्यासत्वाद्, अत एवोक्त-स्वरूपस्य स्वतो गति रिति, तन्निरस्तम्, अन्त सुखादिप्रतिभासवद् वहि. स्थूलप्रतिभासस्यापि स्वसविदितत्वात् , न च युगपद्वेद्यमानयोरेकस्य तात्त्विकत्वमित्त- रस्य वन्यथात्वमिति निमित्तं विना कल्पयितु शक्यं, अथैकत्राविद्योपद- शितत्वं तत् कल्पनिमित्त', न यतस्तदितरत्रापि किं न कल्प्यते ?, निमित्तं विना कल्पनाया उभयत्राविशेपात् , तथा च ज्ञानस्यप्यभावेन सर्वशून्यता- पत्तिरित्यलं प्रसंगेनेति सूत्रार्थ । अनेन द्रव्यादिविषयत्वं ज्ञानस्योक्तं, तत्र च द्रव्यादीनि कि लक्षणानी इत्यत आह- मूल -गुणाणं आसो दव्यं, एगदव्वंस्सिया गुणा । लक्खणं पज्जवाणं उभो असिया भवे ॥६॥ टीका : 'गुणानां' वक्ष्यमाणाना 'आश्रय' आधारो यत्रस्था- स्त उत्पद्यन्ते उत्पद्ये चावतिष्ठन्ते प्रलीयन्ते च तद् द्रव्यम् , अनेन रूपा- दय व वस्तु न तव्यतिरिक्तमन्यदिति तथागतमतमपारतं, तथाहि- यदत्पादविनाशयोन यस्योत्पादविनाशौ न तत्तत्तोऽभिन्नं, यथा घटात्पटो, न भवतश्च पर्यायोत्यादविनाशयोव्यस्योत्पादविनाशी, न चायमसिद्धो हेतु , स्थासकोशकुशूलाद्यबस्थामु मृदादिद्रव्यस्यानुगामित्वेन दर्शनात् , न चास्य मिथ्यात्व कहाचिदन्यथादर्शनानि , उक्त हि-"योद्यन्यरूपमवेद्यः, संवेद्यतान्यथा पुन । स मिथ्या न तु तेनैव, यो नित्यमवगम्यते ।।१।।" तु --- ज्ञानविषय. १३१ - तथैकस्मिन् द्रव्ये स्वाधारभूते आश्रिता स्थिता.-एकद्रव्याश्रिताः, के ते ?- 'गुणाः' रूपादय., एतेन च ये द्रव्यमेववेच्छन्ति तद्व्यतिरिक्तांश्च रूपा- दीनविद्योपदर्शितानाहुस्तन्मतनिषेध कृतः, सविन्निष्ठा हि विषयव्यव- स्थितयो, न च रुपाद्युत्कलितरूप कदाचित्केचिद् द्रव्यमवगतमवगम्य ते वा, अथ तद्विवर्त्त एव रूपोदयो न तु तात्त्विका. केचन तद्भेदेन सन्ति, नन्वेवं रूपादिविवर्तो द्रव्यमित्यपि किं न कल्प्यते ? अथ तथैव प्रतीतेः, एवं सति प्रतीतिरुभयत्र साधारणेत्युभयमुभयात्मकमस्तु, लक्ष्यतेऽ- नेनेति लक्षण 'पर्यवाणा' वक्ष्यमाणरूपाणां तु विशेषणे 'उभयो । द्वयोः प्राकृतत्वाद् द्रव्यगुणयोराश्रिताः ‘भवे' त्ति 'भवेयु. स्युः । अनेन च य एव. माहुः ~यदाद्यन्तयोरसत् मध्येऽपि तत्तथैव, यथा मरीचिकादो जलादि, न सन्ति च कुशूलकपालाद्यवस्थयोर्घटादिपर्यायाः, ततो द्रव्यमेवादिमध्या- न्तेषु सत्, पर्यायाः पुनरसत्यैराकाशकेशादिभि. सदृशा अपि भ्रान्तैः सत्य- तया लक्ष्यन्ते, यथोक्तम्- "दावन्ते च यन्नास्ति मध्येऽपि न तत्तथा । वितथै सहशा सन्तोऽवितथा इव लक्षिता ॥ तेऽपाकृता , तथाहि- आद्यन्तयोरसत्त्वेनमध्येऽपिअप्यसत्त्वं साधयतामिदमाकूतं यत् क्वचि- दसत्तत्सर्वस्मिन्नसदिति, ततश्च मृद्रव्येऽप्यद्रव्यस्यासत्त्वात्सर्वेस्मि- न्नप्यसत्त्वप्रसगः, अथेष्टमेवैतत् , सत्तामात्रस्यैव तत्त्वत इष्टत्वात्, उक्त हि--"सर्वमेकं सदविशेषात्" नन्वेवमभावे भावाभावाद्भावस्यापि सर्वत्राभाव प्रसङ्गः, तस्माद्बाधकप्रत्ययोद्य एवासत्त्वे निवन्धनमिति न कचिदसत्त्वे तस्यावश्यंभाव , ततो द्रव्यवत्पर्यायाणामप्यबाधितबोधविषयत्वे सत्त्वमस्तु, तथा गुणेष्वपि नवपुराणादिपर्याया प्रत्यक्षप्रतीता कियत्कालभाविन', प्रतिसमयभाविनस्तु पुराणत्वाद्यन्यथानुपपत्ते १३२ जैनागमन्यायसंग्रहः , तोऽवसीयन्ते, ततश्च द्रव्यगुणपर्यायात्मकमेकं, शबलमणि वच्चित्रप- तंगादिवद् वस्त्विति स्थितमिति सूत्रार्थः ॥ आह--गृह्णीमो 'गुणा- नामश्रयो द्रव्यामिति द्रव्यलक्षणं' तञ्चैवलक्षणं द्रव्यं किमेकमेवोत तस्यभेदा अपि सन्तीत्याह- मल:-धम्मो अधम्मो आगासं कालो पुग्गलजंतवो। एस लोगुत्ति पन्नत्तो, जिणेहिं वरदंसिहि ॥७॥ टीका:-'धर्म' इति धर्मास्तिकायः 'अधर्म' इत्यधर्मास्तिकायः 'आकाश' मित्याकाशास्तिकायः काल' अद्धासमयात्मकः 'पुद्गलजन्तवः, इति पुद्गलास्तिकायः जीवास्तिकायः, एतानि द्रव्याणीति शेपः प्रसंगतो लोकस्वरूपमप्याह-एप इत्यादि, सुगममेव, नवरमेप इति-सामान्यतः प्रतीतो लोक इत्येवं स्वरूपः, कोऽर्थः १, अनन्तरोक्तद्रव्यपटकात्मक , उक्तं हि-'धर्मादीनां वृत्तिव्याणां भवति यत्र तत्क्षेत्रम् । तैव्यैः सह लोकस्तविपरीतं पलोकाख्यम् ॥शा इति सूत्रार्थ । आह किमेतेऽपि धर्मादयो भेदवन्त उतान्यथा उभयथाऽपीति व मातथाचाह मूल:-"धम्मो अधम्मो आगासं, दव्वं इक्किक्क माहियं । अणंताणि य दव्वाणि कालो पुग्गल जंतवो ॥८॥ टीका:-धर्मोऽधर्म आकाशं द्रव्यमिति धर्मादिभिः प्रत्येक योज्य ते ए 'एकैकं एक संख्यायो एवैतेपु भावाद् आख्यातं तीर्थकद्भिरिति गम्यते तत कि कालादिद्रव्याण्यप्येवमेवेत्याह-' अनन्तानि' अनन्तसंख्यानि स्वगतभेदानन्त्यात् 'चः' पुनरर्थे उत्तरत्र योक्ष्यते, कानि । द्रव्याणि, १ ज्ञानविषय. १३३ कतमानि ? काल पुद्गल जन्तवश्चोक्तरूपाः, कालस्य चानन्त्यमतीता- नागतापेक्षयेति सूत्रार्थः । एषां परस्परभेदनिवन्धनं लक्षणभेदमाह- . मूल : गइलक्खणो उधम्मो, अहम्मो ठाणलक्षणो। भायणं सन्वदव्वाणं, नहं ओगाहलक्खण ॥६॥ वत्तणालक्खणो कालो, जीवो उवोगलक्षणो । नाणेणं देसणेण च सुहेण य दुहेण य ॥१०॥ नाणं च दंसणं चेव चरित्त च तवो तहा । वीरियं उवयोगे य, एयं जीवस्स लक्खणं ॥२॥ सद्दधयार उज्जोरो, पभा छाया तवुत्ति वा । वरणरसगंधफासा, पुग्गलाणं तु लक्खणं ॥१२॥ टीकाः- गमनं गति -देशान्तरप्राप्तिः लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणं, गतिर्लक्षणमस्येति गतिलक्षणः, तु, पूरणे, कोऽसौ ? धर्मास्तिकायः, आह-सिद्धे सति वस्तुनोऽस्तित्वे इदमनेन लक्ष्यत इति वक्तु युक्तम्, अस्य तु सत्त्वमेवासिद्धम्, अत्रोच्यते, यद्यच्छुद्धपद वाच्यं त यथा स्तम्भादिः, शुद्धपदवाच्यश्च धर्मनामास्तिकायो, नचा धर्म इत्यस्यैतद् वाचकस्यासमस्तपदत्वेन तथाऽभिधेयार्थवाधक भावात्, प्रमाणान्तर बाधितविषयत्वाख्यदोषरहितत्त्वेन च नच खपुष्पादिषु संकेतितैर्दु:खादि शुद्धपदैरनेकान्तो, सतविषयाणामेवशुद्धपदानां वाच्यत्वस्येह हेतुत्वेनेष्ट ? , १३४ जैनागमन्यायसग्रहः प्रतिपत्राभाव्यम्, अन्यथा धूमादेरपि गोपालघटादिष्वन्यथाभाव- दर्शनादेप प्रसङ्गो दुर्निवार स्यात्, उक्तञ्च – 'अथित्ति निव्बियप्पो जीवो नियमा उ सहतो सिद्धी । कम्हा ? सुद्ध पयत्ता घडरवरसिगाणुमाणाओ ॥ १॥ छाया-अन्तीति निर्विकल्पो जीवो नियमात् शब्दत एव सिद्धि. । कस्मात् १ शुद्धपदत्वात् घटखरशृंगानुमानात् ।। १ ॥ इत्याचलं प्रसङ्गन, तथा 'अधर्मः अधर्मास्तिकाय. स्थिति स्थानं गतिनिवृतिरित्यर्थः । तल्ल- जाणमस्येति स्थानलक्षण. स हि स्थितिपरिणताना जीवपुद्गलाना स्थितिलक्षणकार्य प्रत्यपेक्षाकारणत्वेन व्याप्रियत इति तेनैव लक्ष्यत इत्युच्यते, अनेनाप्यनुमानमेव सूचितं, तच्चेदम् -यद्यत्कार्य तत्तदपेक्षा कारणवद् , यथाघटादि, कार्यचासौ स्थिति , यच्च तदपेक्षाकारणं तधर्मा- स्तिकाय इति, अत्र च नैयायिकादिः सौगतो वा वदेत्-नास्ति अधर्मा- स्तिकाय., अनुपलभ्यमानत्वात, शशविपाणवत्, तत्र यदि नैयायिकादि- स्तदाऽसौ वोच्यः-कथं भवतोऽपि तिगादयः सन्ति ? अथ दिगादिप्रत्यय- लक्षणकार्यदर्शनात्, भवति हि कार्यात् कारणानुमानम् । एवं सति स्थिति- लक्षणकार्यदर्शनादयमत्यस्तीति किं न गम्यते । अथ तत्र दिगादि प्रत्यय- कायस्यान्यतोऽसभवात् कारणभूतान् दिगादीननुमिमीमह इति मतिः, दहाप्याकाशादीनामवगाहदानादिस्वस्वकार्यव्यापृतत्वेन ततोऽसभवादधर्मास्ति कायस्येव स्थितिलक्षणं कार्यमिति कि नानुमीयते ? अथासौ न कदाचिद दृष्टः ? एतद्दिगादिम्यपि समानम् । अथ सौगतः सोऽप्येवं वक्तव्यः यथा-भवन' कथं वाघार्थसंसिद्धि. १ नहि कदाचिदसौ प्रत्यक्ष गोचर', माफारनानवादिनः सदा तदाकारस्यैव संवेदनात् ; तथा च तस्या अनुपलभ्यमानत्वादभाव एव, अथाकारमंवेदनेऽपि तत् कारणमर्थः परि- , ज्ञानविषय १३५ कल्प्यते, धूमज्ञान इवाग्नि. एवं सनि स्थितिदर्शनेऽपि किं न तत् कारणस्या- धर्मास्तिकायस्य निश्चय. ? अथायमभिदधीत-न कदाचिट सौ तत् कारणत्वेनेक्षित इति, ननु वाह्यार्थेऽपि तुल्यमेतत्, नहि सोऽपि तदाकार कारितया कदाचिदवलोकित', अथ मनस्कारस्य चिद्रूपतायामेव व्यापारो नतु नियता (त) कारणत्वे, अतस्तत्रार्थ. कारण कल्प्यते, एव तर्हि जीव पुद्गलौ परिणाममात्र एव कारणं, स्थितिपरिणतौ पुनरधर्मास्तिकायोऽ- पेक्षा कारणत्वेन व्याप्रियत इति किं न कल्प्यते ? अथासौ सर्वदा सर्वस्य सन्निहित इत्यनियमेन स्थिति-कारणं भवेत, नन्वेवमर्थोऽपि किं सन्नि- हित इत्येव स्वाकारमपेयति १ अथ चक्षुरादि व्यापारमयमपेक्षते, अधर्मा- स्तिकायोऽपि हि स्वपरगतौ विसाप्रयोगावपेक्षत इति नानयोर्विशेप- मुत्पश्यामः, तथा भाजनम्' आधार, ' सवद्रव्याणा जीवादीना 'नम, आकाशम्, अवगाह - अवकाशस्तल्लक्षणमस्येत्यवगाहलक्षण तद्धयव गादु प्रवृत्तानामालम्बनी भवति, अनेनावगाहकारणत्वमाकाशस्योक्त कारणत्वमसिद्ध, यतो यद्यदन्वयतिरेका- नुविधायि तत्तत् कार्य, यथा चक्षुराद्यन्वयव्यातरेकानुविधायि रुपादि विज्ञानम्, आकाशान्वयव्यतिरेकानुविधायीचावगाहः, तथाहि-शुपिर रुपमाकाशं, तत्रैव चावगाहो, न तु तविपरीते पुद्गलादो, अ काशेऽपि कथं नावगाह ? उच्यते, स्यादेव यदि कश्चिवगाहि तत्र तु धर्मास्तिकायस्य जीवादीनां चासत्त्वेन तस्यैवाभाव समस्तु ? नन्वेवमपि न तत् सिद्ध , हेतोरसिद्धत्वात् , 15 भावत्, न्नति हि-तस्मिन् भवनमन्वयो, न च तत् याभावे च व्यतिरेकस्याप्यसिद्धिरिति, ननु कथं न . न चास्य तत ~ १३६ जैनागमन्यायसंग्रह ? भित्याद्यभाव एवाकाशमिति, एवं सत्याकाशाभाव एव भित्त्यादय इत्यपि कि न भवति १ अथ तेषां प्रमाणप्रतीतत्वात्. इहापि किं न प्रमोणप्रतीति ? तथाहि - वियति विहग इत्यादि, प्रतीत्यन्यथानुपपत्याऽनुमानतस्तत् सिद्धः नचेयं प्रतोतिरन्यथाऽपि संभवतीति न ततस्तत् सिद्धिरिति (वक्तु) युक्तं एवं हि भित्त्यादिप्रतीतेरपि भित्त्याद्यभावेऽपि भावकल्पनया तेषामप्यभावप्र- सक्ति , अथ तत् प्रतीते. प्रामाण्यनिश्चय इति नान्यथात्वकल्पना, एवं तर्हि वक्तव्यं-कुतोऽस्या प्रमाणनिश्चय ? कि प्रमाणान्तरानुग्रहात्, वाधकाभावाद् वा ? यदि प्रमाणान्तरानुग्रहात् , किं तत् प्रमाणान्तरं ? य इहाबाधितप्रत्ययः स सर्वः प्रमाणं, यथा सुखादिप्रत्यय,: बाधितप्रत्यया- श्चामी भित्यादिप्रत्यया इत्यनुमानमितिचेत् यद्यवमिहापि यो य इह प्रत्यय स सर्वः सालम्बनो यथेह कुण्डे दधीति प्रत्ययः इह प्रत्ययश्चायम् इह विहग इति प्रत्यय इत्यनुमानमस्त्येव, अथैवमाधारमात्रस्यैव सिद्धिः नत्वाकाश- स्य कथं न तत् सिद्धिः ? यदेव ह्याधारमात्रं तदेवाकाशमिति वयं त्रु म , अथ वाधकाभावात् , ननु वाधकमपि विपरीत प्रत्ययोत्पत्तिरूपं तदभावश्चोभयत्र समान इति न भित्याद्यभाव एवाकाशं किंतुशुपेर रूपमन्यदेव, ततस्तद्भावभावितत्त्वादवगाहस्य कथं तत् कारणत्वसिद्धिराकाशस्य ? एवञ्च स्थितमेतद् - एवञ्च स्थितमेतद् - अवगाहेन कार्यरूपेण लक्ष्यमाणत्वादवगाहलक्षणं वर्त्तन्ते- भवति भावास्तेन तेन रूपेण तान् प्रतिप्रयोजकत्वं वर्त्तना सा लक्षणं - लिगमस्येति वर्तना लक्षण, कोऽसौ १ कालः, इदमुक्त भवति-यदमी शीतयानातपादय. ऋतु विभागेन भवन्ति यश्च केचिच्छशधरकरनिकरा- न नमः, तथा - २ ज्ञानावपय १३७ परागभाजः च नुकारिपारतीप्रसवा अन्ये तु तुहिनशिलाशकलविशदकुन्दमालतोकुसुमवा- सवाहिन अपरे च केशरतिलकुरुवकशिरीषाङ्कोल्लप्रसूनज़म्भमाण तदितेर करिदशनसकलधवलमल्लिकाबहलपारमल हारिण: परे च कदम्बकेतकरज पूरपूरिताम्बरा अपरे तु सप्तच्छद कुसुमरजोधूलिधूसरितविश्वविश्व भरा. अविशिष्टविशिष्टवस्तव प्रकाशन्ते क्रमेणैव भुवनभागांस्तदवश्यममीषां नैयत्यहेतुना केनापि भवितव्यं, म च काल इत्यलं प्रसगेन, सर्वथा वर्तनया लक्ष्यमाणत्वादस्ति काल इति स्थित, तथा 'जीव.' जन्तुरूपयोगो-मतिनानादि लक्षण-रूप यस्या- सौ उपयोगलक्षणो, मतिज्ञानादिको ह्यु पयोगस्तद्धर्म , स च स्वसविदित एवेति, तदनुभवतो रूराद्यनुभवादिव घटादिर्जीवो लक्ष्यत इति तल्लक्षणमु- च्यते, अपश्चितं चैतदिहैव प्रागन्यत्रचेति न पुन प्रतन्यते, अत एव 'ज्ञानेन' विशेषग्राहिणा ' दर्शनेन च । सामान्य विषयेण 'सुखेन च । आह्नादरूपेण दुखेन च-तविपरीतेन प्रक्रमाल्लक्ष्यत इति गम्यते, न हि ज्ञानादीन्यजीवेषु कदाचिदुपलभ्यन्त इतिकृत्वा । सम्प्रति विनेयानां दृढतर- संस्काराधनाय उक्तलक्षणमनूद्य लक्षणान्तरमाह-' ज्ञान च' रूपमेवं दर्शन चैव चरित्रं च तपस्तथा 'वीर्य' वीर्यान्तरायक्षयोपशम समुत्थ सामर्थ्यलक्षणम् 'उपयोगश्च' अवहिततत्वं, किमित्याह-' एतत् । ज्ञानादि जीवस्य लक्षणम्, एतेन हि जीवोऽनन्यसाधारणतया लक्ष्यत इति । इत्थ जीवलक्षणमभिधाय पुद्गलानां लक्षणमाह-'शब्द ' ध्वनि 'अंधकार' तिमिरम्, उभयत्रसूत्रत्वात् सुपोलुक् , ' उद्योत.' रत्नादिप्रकाश. 'प्रभा' चन्द्रादिदीधितिः 'छाया' शैत्यगुणा. 'आतप , रविविम्बजनित उष्णप्रकाशः इति शब्द आद्यर्थः, ततश्च सम्बन्धभेदादीना परिग्रह., व उक्त १३६ जैनागमन्यायसंग्रह .. भित्याद्यभाव एवाकाशमिति, एवं सत्याकाशाभाव एव भित्त्यादय इत्यपि कि न भवति ? अथ तेषां प्रमाणप्रतीतत्वात्. इहापि किं न प्रमोणप्रतीति ? तथाहि - वियति विहग इत्यादि, प्रतीत्यन्यथानुपपत्याऽनुमानतस्तत् सिद्धः नचेयं प्रतोतिरन्यथाऽपि संभवतीति न ततस्तत् सिद्धिरिति (वक्तु) युक्तं एवं हि भित्त्यादिप्रतीतेरपि भित्त्याद्यभावेऽपि भावकल्पनया तेषामप्यभावप्र- सक्ति', अथ तत् प्रतीते प्रामाण्यनिश्चय इति नान्यथात्वकल्पना, एवं तर्हि वक्तव्य-कुतोऽस्या' प्रमाणनिश्चयः ? कि प्रमाणान्तरानुग्रहात्, वाधकाभावाद् वा ? यदि प्रमाणान्तरानुग्रहात् , किं तत् प्रमाणान्तरं ? य इहाबाधितप्रत्यय. स सर्वः प्रमाणं, यथा सुखादिप्रत्यय,: बाधितप्रत्यया- श्चामी भित्यादिप्रत्यया इत्यनुमानमितिचेत् यद्यवमिहापि यो य इह प्रत्ययः म सर्व. सालम्बनो यथेह कुण्डे दधीति प्रत्ययः इह प्रत्ययश्चायम् इह विहग इति प्रत्यय इत्यनुमानमस्त्येव, अथैवमाधारमात्रस्यैव सिद्धिः नत्वाकाश- स्य कथं न तत् सिद्धिः ? यदेव ह्याधारमानं तदेवाकाशमिति वय त्रुम , अथ वाधकाभावात् , ननु वाधकमपि विपरीत प्रत्ययोत्पत्तिरूपं, तदभावश्चोभयत्र समान इति न भित्याद्यभाव एवाकाशं किंतुशुपिर रूपमन्यदेव, ततस्तद्भावभावितत्त्वादवगाहस्य कथं तन् कारणत्वसिद्धिराकाशस्य ? एवञ्च स्थितमेतद् - अवगाहेन कार्यरूपेण लक्ष्यमाणत्वादवगाहलक्षणं वर्तन्ते- भवति भावास्तेन तेन रूपेण तान् प्रतिप्रयोजकत्वं वर्त्तना सा लक्षणं लिद्गमन्येति वर्तना लक्षण., कोऽसौ ? कालः, इदमुक्त भवति-यदमी शीतवातातपादयः ऋतु विभागेन भवन्ति यच्च केचिच्छशधरकरनिकरा- न नमः, तथा ज्ञानविषय १३७ परागभाजः नुकारिपारतीप्रसवा अन्ये तु तुहिनशिलाशकलविशदकुन्दमालतीकुसुमवा- सवाहिन अपरे च केशरतिलकुरुबकशिरीषाकोल्लप्रसूनजृम्भमाण तदितेर करिदशनसकलधवलमल्लिकाबहलपरिमल हारिणः परे च कदम्बकेतकरजःपूरपूरिताम्बरा अपरे तु सप्तच्छद कुसुमरजोधूलिधूसरितविश्वविश्वभरा अविशिष्टविशिष्टवस्तव' प्रकाशन्ते क्रमेणैव भुवनभागांस्तवश्यममीषां नैयत्यहेतुना केनापि भवितव्य, म च काल इत्यलं प्रसंगेन, सर्वथा वर्तनया लक्ष्यमाणत्वादस्ति काल इति स्थित, तथा 'जीवः' जन्तुरूपयोगो-मतिज्ञानादि लक्षण-रूपं यस्या- सौ उपयोगलक्षणो, मतिज्ञानादिको ह्यु पयोगस्तद्धर्म , स च स्वसविदित एवेति, तदनुभवतो रूगद्यनुभवादिव घटादिर्जीवो लक्ष्यत इति तल्लक्षणमु- च्यते, प्रपश्चितं चैतदिहैव प्रागन्यत्रचेति न पुन. प्रतन्यते, अत एव 'ज्ञानेना विशेषग्राहिणा ' दर्शनेन च । सामान्य विषयेण 'सुखेन च । आह्नादरूपेण दु खेन च-तद्विपरीतेन प्रक्रमाल्लक्ष्यत इति गम्यते, न हि ज्ञानादीन्यजीवेषु कदाचिदुपलभ्यन्त इतिकृत्वा । सम्प्रति विनेयानां दृढतर- सस्काराधनाय उक्तलक्षणमनूद्य लक्षणान्तरमाह रूपमेवं दर्शन चैव चरित्रं च तपस्तथा । वीर्य वीर्यान्तरायक्षयोपशम समुत्थं सामर्थ्यलक्षणम् 'उपयोगश्च' अवहिततत्वं, किमित्याह-' एतत , ज्ञानादि जीवस्य लक्षणम्, एतेन हि जीवोऽनन्यसाधारणतया ल इति । इत्थं जीवलक्षणमभिधाय पुद्गलानां लक्षणमाह 'अंधकारः तिमिरम्, उभयत्रसूत्रत्वात् सुपोलुक् ,' 'प्रभा' चन्द्रादिदीधिति. 'छाया' शैत्यगुणा. 'आत उष्णप्रकाशः इति शब्द आद्यर्थः, ततश्च सम्बन्ध जान च, उक्त १३८ जैनागमन्यायसग्रहः समुनये, वर्णश्च नीलादि रसश्च-तिक्तादि गन्धश्च-सुर- भ्यादि स्पर्शश्च-शीताहिरेपा द्वन्द्व , इति शब्देन चाद्यार्थेनैषां ग्रहणेऽपि पुनरुतादान - सर्वत्रानुयागितल्यापनार्थे, 'पुद्गलानां स्कन्धादीनां 'तुः, पुनरर्थ लक्षणम् एतैरेव तेषां लक्ष्यत्वात्, श्राह-पौद्गलिकत्वे शब्दा- दीना पुद्गललक्षणत्व युक्त तच्च क्थम् १ उच्यते, शव्दस्तावन्मूर्त्तत्वात् पौदगलिको मृतिभावोऽन्य प्रतिघातविधायित्वादिभ्य. उक्त हि-"प्रतिघात विधायित्वाल्लोष्टयन्मत्तता ध्वने । द्वारवातानुपाताञ्च धूगवञ्च परिस्फुटम् ।१।।" अन्धकारोद्योत प्रभागा तु पौद्गलिकत्व चक्षुर्विज्ञानविपयत्वात्, प्रयोग श्रात्र-यत्यौदगलिक न भवति तचतुर्विज्ञानविषयमपि न भवति, यथाऽऽत्मादय , चचर्विज्ञानविषयाश्चान्धकारादय , अथालोकाभावोऽन्ध- वार, तथा च निरुपास्यत्वेन तम्या सत्त्वमुच्यते, न, सतः सर्वथा निरन्व- याभावर पाभावेनामावरूपत्वेऽपि निरुपाख्यत्वासिद्धेः, तथाहि-घटस्य कपालाख्यपर्यायान्तरोत्पत्तिरेवाभावो न पुनरुच्छेदमात्रम्, एवमलोक म्य"यन्धकारान्यपर्यायान्तरोत्यत्तिरेवाभावो न तु तथाविधपरमाणुरूपत गाऽयभाव पब, इत्थ चैतत , परिणामित्वाद्वन्तुन', परिणामस्य च सत ग्य वस्तुन पूर्वरुपपरित्यागेन रुपान्तरोत्पत्तिरूपत्वात्, उक्त हि- 'परि- रगामो घान्तरगमनं न च सर्वथा व्यवस्थानम । न च सर्वथा विनाश. परि- गामनदाविटामिष्ट ।। 2 | छायाऽऽतपयोरपि पौद्गलिकत्व वस्तु- त्वच भावनीयं , तथा म्पर्शनग्राम्यत्वाचानयो पौदगलिकत्व , तथाहि- छाय या शैन्यमातपन्य चौगाव प्रतिप्राणि प्रतीतमेवेति, अतश्च यत् शिन्यते-शब्दोऽम्बर गुगण इत्यादि, तपास्तं भवति, उसञ्च-अणन सर्वपक्षिन्याभेदमसनम छायाऽऽतपम्तम शब्दभानेन . - , , , ज्ञानविषयः १३६ परिणामिन ॥ १ ,, इत्यादि,वर्णादीना च पौद्गलिकत्व सुप्रसिद्धमेवेति सूत्रचतुष्टयार्थ ॥ अनेन द्रव्यलक्षणमुक्त, पर्यायलक्षणमाह- मूल:-एगत्तं च पुहुत्तं च, सखा संठाणमेव य । संजोगा य विभागा य, पज्जवाण तु लक्षणं ॥१३॥ टीका:--एकस्य भावः एकत्वं-भिन्नेष्वपि परमाण्वादिपु यदेकोऽय घटादिरिति प्रतीतिहेतु सामान्यपरिणनिरूप, च शब्द उत्तरा- पेक्षया समुच्चये, पृथग्भाव' पृथक्त्वम्-अयमस्मात्पृथगिति प्रत्य- योपनिबन्धन, ' च । सर्वत्र प्राग्वत्, सख्यानसंख्या-यत एको द्वौ त्रय इत्यादिका प्रतीतिरुपजायते, संतिष्ठतेऽनेनाकारविशेषेण वस्त्विति सस्थावं-परिमण्डलोऽयमित्यादिबुद्धिनिबन्धनम् , एवेनि पूरणे, 'सयो- गा' अयमगुल्यो संयोग इत्यादि व्यपदेशइतव , ' विभागाश्च । अयमि- तो विभक्त इति बुद्धिहेतवः, उभयत्र सम्बन्धिभेदेन भेदमाश्रित्य बहुवच- ननिर्देश', चशब्दोऽनुक्तनवपुराणत्वादिपर्यायोपलक्षक., ' पर्यवाणाम् ' उक्तनिरुक्तानां, 'तु ' पूरणे 'लक्षणम्' असाधारणरूपम् , अयमभिप्राय य. कश्चिदस्खलित प्रत्यय स सर्व सनिबन्धनो, यथा घटादिप्रत्यय , अस्खलितप्रत्ययाश्वामी एकोऽयमित्यादिप्रत्यया ततोऽवश्यममीषां निब- न्धनेन भवितव्य, तच्च न द्रव्यमेव, तस्य सदाऽवस्थितत्वेन प्रतिनियत कालैकत्वादिप्रत्ययानुत्पत्तिप्रसगात्. ततश्च यदमीषा कालनियमेनोत्पत्ति निबन्धन न तत्पर्यवेभ्यस्तत्तत्परिणतिविशेषरूपेभ्योऽन्यत्, गुणाना तु लक्षणानभिधानं रूपादिरूपाणां तेषामतिप्रतीत्वात्प्रायो विप्रतिपत्त्य- विषयत्वाच्चेति सूत्रार्थ ॥ उत्तराध्ययन सू० मोक्षमार्ग गत्यध्ययन-२८ .
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155156*
जैन स्तोत्र रत्नमाला.
(जेनी अंदर नवस्मरण उपरांत
वीजा उस्तोत्रो ने.)
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उपाची प्रसिद्ध करनार
कोगरी कसलचंद नीमजी.
SROSCARROR
अमदावादमा
राजनगर मिन्टींग प्रेसमां गपी.
वीर संवत २४३३ संवत १६३
୫
मूल्य चार आना.
****
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५
५
अनुक्रमणिका.
विषय.
पृष्ट.
१ नवकार.
२ नवसग्गहर.
३ संतिकर स्तोत्र.
४ तिजयपहुत्त स्तोत्र
५ नमिकण स्तोत्र. १४
६ श्रीअजितशांति स्तवन. २०
उक्तामर स्तोत्र.
३६
कल्याणमंदिर स्तोत्र.
ए बृहबांति स्तवन. ६७
१० जयतिहुश्रण स्तोत्र.
ՄԱ
११ जीनपंजर स्तोत्र.
Ե
५१