Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Matasya Puran Khand-1

Sharma,pt.shriram · 2012/08

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भूमिका . भारतीय पुराण-साहित्य बडा विस्तृत है। उसने मानव-जीवन के लिये आवश्यक किसो क्षेत्र को अछूता नहीं छोडा है। जो लोग समझते हैं कि पुराणो में केयन धार्मिक कथाएँ, ऋषि-मुनि मोर राजाओ का इतिहास, पूजापाठ की विधियों और तीर्थों का वर्णन मात्र है, वे वास्तव मे उनसे अनजान है। कितने ही पुराणो मे लौषधि विज्ञान, साहित्य और कला सम्बन्धी विवेचन, गृह निर्माण शास्त्र, साहित्य, संगीत,रत्न-विज्ञान, ज्योतिष विज्ञान, स्वप्न विचार आदि विविध विपयो की पर्याप्त चर्चा की गई है । 'अग्नि पुराण' मे तो विविध विषयक ज्ञान इतना अधिक संग्रह किया गया है कि लोग उसको प्राचीनकाल का विश्वकोश' कहते हैं । उसमे लगभग २००-२५० विषयो का परिचय दिया गया है। इस दृष्टि से 'नारद पुराण' भी प्रसिद्ध है जिसमें अनेक प्रकार की उपयोगी विद्याओ का गम्भीर रूप से विवेचन किया गया है। गर्ण पुराण' में चिकित्सा- शास्त्र और रत्न-विज्ञान की बहुत अधिक जानकारी भरी हुई है । 'पुगणी की इन्हीं विशेषताओं को देखकर प्राचीन साहित्य के एक बहुत बहे ज्ञाता ने लिखा था- "पुराणो में भारत की सत्य और शाश्वत आत्मा निहित है। इन्हें पढे विना भारत का यथार्थ चित्र सामने नही आ सकता, भारतीय जीवन का दृष्टिकोण सप्ट नहीं हो सकता। इनमें आध्यात्मिक, साधि- दैविक, आधिभौतिर सभी निद्यायो का विशद वर्णन है । लोग जीवन के समी पक्ष ( पहलू ) इनमे अच्छी तरह प्रतिपादित हैं। ऐसा कोई ज्ञान-- विज्ञान नहीं, मन व मस्तिष्क की ऐसी कोई कल्पना अयवा योजना नही, मनुष्य-जीवन का ऐसा कोई अग नहीं, जिसका निरूपण पुराणा हुआ हो। जिन दिपयो को अन्य माध्यमो से समझने में बहुत कठिनाई मेन ( ४ ) 1" होती है, वे बडे रोचक ढङ्ग से सरल भाषा में, पाख्यान आदि के रूप मे इनमे वर्णित हुए हैं।" पर सच पूछा जाय तो पुराणों का यही गुण कुछ 'आलोचको' की निगाह में उनका 'दोष' बन गया है । खण्डन की प्रवृत्ति वाले लेखक और सरसरी निगाह से पढ़ने वाले पाठक उनकी अद्भुत और चमत्कार पूर्ण कथाओ को पढकर तुरन्त शोर मचाने लगते हैं-"देखा. पुराणो मे कैसी गप्पाष्टके भरी पडी हैं । कहीं ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो एक महीना पुरुष और एक महीना स्त्री रहें और जिनके सी, रूप मे सन्तान भी होजाय । कही सौ-सौ और दो-दो सौ गज लम्चे मनुष्य भी हुआ करते हैं पर कदाचित् वे यह नहीं जानते कि वैज्ञानिको की खोज के अनुसार पृथ्वी पर आरम्भ का एक युग ऐसा भी था जिसमे सन्ताने नर- मादा द्वारा नहीं होती थी, वरन् किसी भी जीव से दूसरा जीव किसी तत्कालीन प्रणाली से उत्पन्न हो जाता था। निश्चय ही यह स्थिति करोडो वर्ष पहले थो, जब कि मानव-प्राणो तो दूर गाय, भैस और घोडे-हाथी जैसे पशु भी नहीं थे। पर कुछ भी हो उस समय पृथ्वी पर उन्ही जीवो का अस्तित्व था, चाहे वे मछली के रूप मे हो और चाहे किसी प्रकार के कीडे-मकोडो, छिपकली जैसे प्राणी आदि के रूप मे। इस वैज्ञानिक तथ्य को पुरान जमाने के साधारण मनुष्यो को, जब ज्ञान-विज्ञान की चर्चा बहुत ही कम फैली थी. समझा सकना असम्भव था। इस दशा मे यदि किसी पुराणकार ने 'इला' नामक राजपुत्र की कहानी गढ कर और उसका सम्बन्ध किसी ऐतिहासिक व्यक्ति या वश से जोडकर समझा दिया तो इसमे क्या हानि हो गई ? विद्वान उनका यथार्थ भेद जानते हैं और पौराणिक कथाओं के श्रोता वेवल 'पुण्य' के विचार से उन रोचक वर्णनो यो सुनते हैं और कुछ लोग उनसे सतमं करने की कुछ शिक्षा भी ग्रहण कर लेते हैं। पर 'अददग्ध' जीवो के लिए वे परेशानी का कारण बन जाती हैं, और वे इयर-उधर से दो चार प्रसगो को लेकर उन्हें अधूरे रूप में वर्णन करने सगते हैं, और पुराणो के खिलाफ दस-पांच घरी-चोटी बातें कहकर यपने को 'विद्वान् समझने का सन्तोष कर लेते हैं। पौराणिक साहित्य का विस्तार और महत्व- पर हम पाठकों को बतलाना चाहते हैं कि 'पुराण' धाप्नध में ऐसी निकम्मो'चीज नहीं है जमा वे स्वयम्भू विद्वान उनको सिद्ध करने का प्रयत्न किया करते हैं । कपर जो पुगपी के महत्व का उद्धरण दिया गया है वह भी ममम्म आयु वेदो का परिशीलन करने वाले एक विज्ञान याहै और वे वेदी तथा पुगणी का समन्वय र इसी निप्प पर पहुँचे थे कि "इतिहाम पुरणाम्या वैदे समुपयेत् ।' अपांत पुराणकारों ने मूल पदिक तयों को सर्व साधारण को समझाने की हष्टि में ही उनका विस्तार करके नाना प्रकार को क्याओं की रचना की है। इतना ही नहीं पुराणो का दावा तो इससे बहुत अधिक है । 'स्कन्द पुराण' के रेवाख' में कहा गया है- आत्मापुराण वेदाना पृथगङ्गानितानि पद। यञ्चदृष्टहि वेदेषु तदृष्ट स्मृतिभिः किल ।। उमभ्या यत्तुष्टहि तत्पुराणेपू गोयते । पुराण सर्वशास्त्राणा प्रथम ब्रह्मण स्मृतम् ॥ "पुराण वेदों की आत्मा हैं। 5. वेदाङ्ग उसे पृथा है । श्री पूल वेदों में देखा वहीं स्मृतियों में भी देखा गया । और वेद तथा स्मृति दोनी मे जो कुछ देखा गया वह सब पुराणों में गाया जाता है। इसमें भी सन्देह नहीं कि पुराणा को ब्रह्माजो ने सब शास्त्रों से पहले हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि जब वेदो को लोकमान्य तिलक जैस विद्वान् कम से कम दस हजार वर्ष पुराना बतलात ये, तब पुराणों का रचना काल दो हजार वप रे भीतर माना जाता है।

यही बात इन दोनी प्रकार के ग्रन्थो की भाषा की तुलना करने से प्रकट होती है । पर 'स्कन्द पुराण' के लेखक का क्यन केवल वर्तमान समय मे पाये जाने वाले हस्तलिखित तथा छपे हुए अठारह पुराणो के सम्बन्ध में नहीं है, वरन् पौराणिक शैली के समस्त साहित्य से है चाहे वह लिखा हो अथवा जवानी कहा और सुना जाता हो। इस कथन पर विचार करने से अन्त मे हमको यह स्वीकार करना पड़ता है कि वास्तव में वेद जैसी गम्भीर रचनाओ से पहले 'पुराण' जैसी लोक कथाओ का प्रचलन होना स्वाभाविक ही मानना चाहिये । सभी देशो और सभी कालो मे इस तरह का 'लोक-साहित्य' ही पहले उत्पन्न और प्रचलित होता है और तत्पश्चात् वही उन्नत और परिष्कृत होते हुए स्थायी और गम्भीर साहित्य के रूप में परिणित हो जाता है। इसी तथ्य को ध्यान मे रख कर किसी विद्वान् ने कहा था कि "ससार का सबसे पहला साहित्यकार कोई कहानी कहने वाला ही होगा अव रह गई पुराणो मे वर्णित धार्मिक विवरणो को अन्ध-विश्वासों का रूप देकर उनके आधार पर लोगो की अधश्रद्धा को जागृत करना और उसके द्वारा द न तथा पूजा पाठ के नाम पर मनमाना धन वसूल करना । इसके लिये पुराणो को दोष देना व्यर्थ है । यह काय तो प्रत्येक देश के धर्मजीवी ( पण्डा-पुजारी) करते आये हैं । चालाक और धूतं ध्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति में अपनी स्वार्थ सिद्धि का मार्ग निकाल ही लेते हैं। ऐसे ही लोगों ने पुराणों में तीयों तथा दान की अति प्रशसा भरदी और उनमें 'रस्न पवन दान' 'भूमण्डल दान' 'सन समुद्र दान' जैसे अपूर्व दानी का विधान भी सम्मिलित कर दिया। इस दोष का उसरदायित्व एक विशेष मनोवृत्ति के व्यक्तियो पर है जो सदा से मौजूद हैं और जब तक एव वडी 'ज्ञान-प्रान्ति' न हो जायगी तब तक बने रहेगे । पुराणो या परिवर्तित स्वरूप- पुराणों का विवरण लिखते हुए 'मास्यपुराण' तथा अन्य पुगणे A - में भी यह कहा गया है कि पहले एक ही पुराण या, फिर व्यास जी ने उस लोगों की सुविधा के निये अठारह पुराण के रूप में प्रस्तुत किया । पर यह सख्या अनारह पर ही समाप्त नहीं हो गई। अठारह 'महापुरानो' के पश्माद बारह 'उप-पुरगरा भी कार हो गये और उनके बाद भी लोगे ने 'लघु पुरावा' का निर्मात किया । वास्तव में अब 'पुरा' भन्द एव प्रकार के धार्मिक कथा-प्रत्यों के लिए काम बाने लगा है। इसीलिये इस आधुनिक युग में किसी लेखक ने 'गांधी-पुराण' भी लिखर तयार कर दिया है। पर इन बातों से 'पुरापा' का महत्व कम नहीं हो जाता। यदि हम पुराण में प्रचलित मस्करपो का भी यध्ययन करें तो तरह-तरह की कयात्रो के बीच में अध्याएम, ब्रह्म-मान, विज्ञान, चरित्र, नौनि आदि के सर्वोच्च तल मिले-जुले दिखाई पडते हैं । कहने के लिए सौ पुराण मूर्ति- पूजा, तीर्थ यात्रा, म्नान-दान आदि के मुख्य प्रचारक हैं पर साथ ही उनमें से अधिकाश में मृष्टि के मूल स्वरूप का जैसा वर्गन पाया वाता है वह माधुनिक विज्ञान की पहुँच से कहीं अधिक ऊंचा है। उनमें सृष्टि विज्ञान और प्रलय (सर्ग और प्रति-सर्ग) का दर्शन करते हुए सदैव यही प्रति- पादित किया है कि इस समस्त विश्व ब्रह्माण्ड समाविर्भाव एक प्रवक्त मौर निरासर तत्व से हुआ है, जिसरा कोई आदि अन्त नहीं है और न जिसके विस्तार की कोई सीमा है । समरत सूक्ष्म और म्यूल पञ्चभूत, समस्त देवता और सापारिक प्रापी उसी में से उत्पन्न होते है और कुछ समय तक पृथक रूप में दिखाई पडकर अन्त में उसी में सम हो जाते हैं । ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, परम आदि समस्त देवता इसी एस मूलति के विभिन्न रूस और नाम है। यद्यपि उस अब्यक्त और निराकार शक्ति की पासना का वास्तविक मार्ग योग बोर ध्यान है, पर यह बहुत ही पोडे लोगों के लिये सम्भव हो पाता है। शेष सामान्य स्तर के अनि किमी अव्यक्त और निराकार शक्ति का ध्यान कर सकने में असमर्थ होते हैं । ऐसे ही लोगो की सख्या १०० मे से ६० होती है । इसलिये उनकी सुविधा की दृष्टि से साकार मूर्तियो को योजना को गई है और उनकी प्रतिष्ठा के लिये मदिरो का निर्माण और तीयों को स्थापना आवश्यक हुई। जिन पुराणा मे किसी साधारण मन्दिर मे मूर्ति दर्शन करने या गङ्गा अपवा नर्मदा सो नदी में एक बार स्नान करने से करोडो वर्ष तक स्वर्ग सुख भोगने का लालच दिखाया गया है, उन्ही मे सृष्टि की वास्तविकता के उपरोक्त तक और विज्ञान के अनुकूल रूप का भी विवेचन किया गया है। इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आरम्भ मे पुराणो का उद्देश्य जन साधारण के बीच धार्मिक तत्त्वो का प्रचार करना ही था । यह भी असम्भव नहीं है कि पुगो को परम्परा का श्रीगणेश करने घाले वैवव्यास ही हो। इस अनुमान का कारण यह है कि ध्यासजी का 'महाभारत' भी एक प्रकार का पुराण ही है, यद्यपि उसमे धार्मिक बातो के साथ राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिर विषयो का विवेचन भी बहुत अधिक परिमाण मे मिलता है, जिससे उसे 'इतिहास' कहा जाने लगा है। पर हमारे कपन का आशय यह नहीं कि व्यासजी ने पुराणो को जो रूपरेखा बनाई वही अभी तक स्थिर है । भाषा और लिपि मे हबार पांच सौ वर्ष मे ही इतना अन्तर पड जाता है कि अधिकाश अन्यो का नया सस्करण करने की आवश्यक्ता पर जाती है। फिर पुराणो मे तो यह भी लिया है कि व्यासजी ने एक ही पुराण सहिता बनाई और उसका विस्तार उनके शिष्य और फिर उनके भी शिष्यों ने दिया- आरपानश्चप्युपाख्यानयाभि पल्पशुद्धिभिः । पुराण सहिता पर पुराणार्थ विशारदः।। प्रम्यानो ध्यास शिप्योऽभूत्सूतो वै रोमहर्षरण । पुराण सहिता तस्मै ददौ ध्यासो महामसि ।।

सुमतिश्चाग्नि वाश्य मित्रयुश्शांसपायन: अकृतगण सावर्णी पट शिप्यास्तस्य चाभवन् । काश्यपः संहिताकर्ता नावणिश्शांसपायनः । रोम हपंणिका चाचा तिसृणा मूल सहिता ॥ अर्याद--"फिर पुराना के माता व्यासजी ने वास्यान, व्याख्यान गाया और कलगुद्धि से युक्त 'पुराण सहिता' की रचना को ! इस पुराण सहिता का अध्ययन व्यामजी ने अपने सुप्रसिद्ध शिप्य रामपंण मूत को कराया ] रोम हपंग के शिप्य हुए-मुमति, अग्निदर्घा, मित्रायु, शामपायन, अकृतन्त्रण और वाणि । इनमें से काश्यप गोत्रीय मतप्रण सावपि भोर शापायन ने पृथक-पृथक तीन सहिवार्य रची। उन तीनो का मूल वाधार रोमहर्पण द्वारा रचि एक संहिता पी। इसके पसात भी इन सबरी आमानी शिष्य मरली में से अनेक विद्वान् अपने देश-काल के अनुसार उन महिलाओ की वृद्धि करते रहे, उनमें नये-नये प्रेरणाप्रद आध्यान और उपाध्यान रत्नर सम्मिनित करते रहै । ये सब क्यावाचा शिप्य 'भूत' या 'व्यासंगे' कहलाते थे। इनमें सभी प्रकार के व्यक्ति थे। कुछ विशेष स्ल से धर्मपरायण और परमार्यों ये तो कुछ में बानि परायणता और सामारिकता को मात्रा यधिक थी। यदि ऐने क्यायाचरी ने भी यात्रा, स्नान-दान और प्रोत्सद वाले बगों को ययाक्ति बहाकर अपन पाताओं को अधिका- Fधक दान देने की प्रेरणा की हो तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। पर हर अठारहों पुराणो पर एक विहमम ष्टि डालत हैं और उनको विषय भूचियों का विवेचन करते हैं, तो हमका यह प्रतीत होने लगता है कि सब पुराण एक ही दृष्टिकोण से नहीं रचे गये हैं। किसी में धर्म-साधन की प्रधानता है, किसी ने अप-तप द्वारा आध्यात्मिकता का महत्त्व विशेप चतुलाया है नोर किसी न हर तरह के दान-पुण्य पर ही अधिर बल दिया है । 'पस्यपुराम' में तीसरी श्रेणी के दन बहुत । अधिक संख्या मे थे। यद्यपि हमने वर्तमान सस्करण में उनमें से अधि- कांश को छोड दिया है, तो भी नमूने के तौर पर जिन 'व्रत' और 'दानो' का वर्णन आ गया है उनसे पाठक हमारे कथन को यथार्थता वा अनुमान कर सकेंगे। पुराणो की परमार्थ और अध्यात्म भावना-- पर इस एक बात से ही हम पुराणो को भलाई-बुराई का निर्णय मही कर सकते । हम इस बात को पूरी तरह नही समझ सकते कि जिस समय-अब से एक-डेढ हजार वर्ष पहले पुराण-साहित्य का इस प्रकार विस्तार किया गया, देश और समाज की क्या परिस्थिति थी। सम्राट भशोक से लेकर पृथ्वीराज चौहान तक के शासन काल के बीच देश की क्या राजनीतिक और सामाजिक स्थिति थी, इसका पता इतिहास थो से बहुत कम लगता है। पर पुराणो के विवरणो को समझने मे यदि अन्तष्टि से काम लिया जाय तो यह प्रतीत होता है कि इस हजार-बारह सौ वर्ष के युग एक देशव्यापी क्राति होकर नये समाज का सगठन हो रहा था । बौद्ध धर्म की प्रबलता ने प्राचीन भारतीय सामाजिक व्यवस्था को तोड़-फोड दिया था, उसी के भग्नावशेषो पर हमारे धर्माचार्य पुनः हिन्दू-धर्म-भवन के पुननिर्माण का प्रयत्न कर रहे थे। इस बीच में देश की अस्त-व्यस्त राजनीतिक अवस्था को देखकर यवन, हूण, शक, सिथियन आदि विदेशी जातियों ने आक्रमण भी किया था। उन माक्रमणकारियो मे से लाखो व्यक्ति यहाँ बस भी गये और देश के किसी भू भाग पर उन्होंने बहुत वर्षों तक शासन भी किया। ऐसो परिस्थिति मे जो पुराण अन्य रचे गये अथवा प्रचलित किये गये उनमे पूर्ण रूप से विशुद्ध वैदिक भादौ को स्थिर रखना के मभव हो सकता था? यूनानो-सम्राट सिकन्दर के आक्रमण तथा बुद्ध धर्म की प्रभुता होने से पूर्व, देश की वैदिक संस्कृति अक्षुण्ण पी। उसमे जो परिवर्तन होते पेये आन्तरिक कारणो के आधार पर ही होते थे। पर विदेशियो के + बाक्रमण और उनमें से लाखो, करोडो व्यक्तियो के भारतीय समाज में मिल जाने के पश्चाद परिस्थिति बहुत कुछ बदल गई और उसके बाद जो धार्मिक सगठन बनाया गया और धामिक नियम प्रचलित किये गये उनम देश काल की बदली हुई परिस्थिति का प्रभाव पडना मनिवार्य था । ससार के अन्य धर्म तथा जातियां तो इस प्रकार के आक्रमणो से सर्वथा हो नष्ट हो गये । जैसे यूनान, रोम, और ईरान की प्राचीन संस्कृति और धर्म का नाम ही इतिहास में शेष रह गया है । पर यह वैदिक धर्म की ही विशेषता थी कि विदेशी आक्रमणो और युद्ध धर्म द्वारा उत्पन्न गृह- क्लह के भयंकर आघात को सह कर भी उसने अपनी 'आत्मा' की रक्षा करला । हमारे तत्कालीन धर्माचार्यों ने नवीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियो के कारण पाह्य पूजा, उपासना, कर्मकाण्ड की विधियो मे परिवर्तन क्यिा, वैदिक यज्ञों का स्थान मदिर और तीर्थों की भक्तिमार्गीय उपासना-पनि ने ग्रहण किया, पर साथ ही वैदिक सिद्धान्तो और आदमों को उनमें बराबर समाविष्ट किया गया, प्रत्येक विधि-विधान में उन्हीं की घोषणा की गई। साथ ही समस्त पौराणि-धर्म क्लेवर का लक्ष्य भी वैदिक आध्यात्मिक सिद्धान्त ही रखे गये । इस तथ्य का विवेचन हमको "वायु-पुराण" के अतिम अध्याय "व्यास समय वरणन" मे मिलता है। उसमें पुराणों में वर्णित लौकिक धर्म विधियो का उल्लेख करते हुए अन्त मे मानवमात्मा के आध्यात्मिक लक्ष्य को ही प्रधानता दी गई है। उसमे स्पष्ट कहा गया है- 'हे मूतजी! आप तो भगवान के सच्चे भक्त हैं। व्यासजी की कृपा से आपने धर्म शास्त्रो का पूर्णतः अध्ययन कर लिया है। हे निष्पाप बापने अठारहों पुराणो और इतिहासों का आदि से अन्त तक अच्छी तरह वर्णन किया है । इन पुराणो म प्रापने बहुत से धर्मों का निरूपण किया है । उसमें गृहस्थ, त्यागी, सन्यासो, ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, स्त्री, सूद आदि के धर्म कर्तयों का वर्णन किया गया है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ( १२ ) । निजानियो तथा इनसे उत्पन्न जो अन्य सकर जातियाँ-गंगा आदि महा मादियों और यश, व्रत, तप, दान, यम-नियम, योगाभ्यास, साख्य-सिद्धान्त, भक्ति-मार्ग, ज्ञानमार्ग आदि सबका आपने वर्णन किया है। कर्मों और उपासना द्वारा चित्त की शुद्धि और धर्म प्राप्ति के सम्बन्ध में भी प्रापने बतलाया है। आपने ब्राह्म, शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर (सूर्योपासक ) तथा अहत (जैन बौद्ध आदि)-इन छ: प्रकार के दर्शनो का भी परिचय दिया है। इन सब तथा अन्य प्रकार के विषयो का पुराणो मे आपने विवेचन किया है। अब हम आपसे कहना चाहते हैं कि इनसे आगे भी क्या अन्य कोई उत्तम विषय जानने को दोष रह जाता है?" प्रश्नकर्ता मुनियो ने बहुत स्पष्ट रूप से कहा- न ज्ञायेत यदि व्यासो गोपायदथ भवान् । अत्र न सशय छिन्धि पूर्ण. पौराणिको यतः ।। अर्थात्-“यदि ध्यासजी ने क्सिी विषय का वर्णन न पिया हो अथवा आपने ही कुछ गोपन कर लिया हो-न बतलाया हो, तो अब उसे भी कहकर हमारे सशय को दूर कीजिए।" मूनजी ने कहा- "हे गौनक ! आप ध्यान पूर्वक सुनो, मैं आपके 'सुदुलंभ' (महत्त्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देता है। पराशर मुनि के पत्र महर्षि व्यास देव ने समस्त देदो पे अथं से समन्धित पौराणिक कथा की रपना करणे फिर चित्त में विचार किया कि मैंने वर्णों तथा आश्रमो के पालन करने वालों के धर्म का पनी भौति वर्णन कर दिया है और पेद से अविरोध रखते हुए बहुन प्रकार के मुक्ति मागों का भी निरूपण कर दिया है। मूको की व्याख्या करते हुये जीव, ईश्वर और ब्रह्म का भेद भी प्रपट क्या है और शुनि ( वेदो ) क सिदान्तानुसार परब्रह्म का स्वस मी लापा है । एक मात्र परम ब्रह्म हा आवनाशी तरय है औ उसीरो प्राप्त नेरे लिये ब्रह्मवारी से लेकर सायासी ताराबर याश्रमों के व्यक्ति 'वन' (धर्माचरण) किया करते हैं। मैं देहों के इस सिद्धान्त को भी जानता हूं कि यह समस्त विश्व ब्रह्म से प्रथक नहीं है वरन उसी से इस प्रकार उत्पन्न होता और मिटता रहता है जैसे बहते हुए फेनिल जल मे बुलबुने उठते और टूटते रहते हैं। पर किसी-किमी स्थान पर यही सुनने में आता है कि इस परम ब्रह्म के ऊपर भी 'गोलोक' में भगवान कृष्ण दीप्यमान होते हैं। इसका रहस्य जानना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।" बव व्यास जी बहुत कुछ कहापोह करने पर भी इस प्रश्न का सन्तोषजनक उत्तर न पा सक को उन्होंन निश्चय किया कि निर्णय केवल तप द्वारा हो सकता है । तद वे सुमेरु सद वे सुमेरु पर्वत की एक गुफा में जा बैठे और दीर्घकाल तक समाधि अवस्था में ध्यान करते रहे । अन्त में उनके सम्मुख वेद मूर्तिमान रूप में प्रकट हुए और उन्होंने दहा- है व्यारा! आप महान् प्राज्ञ है, शरीर धारण करने पर भी आप 'विष्णु प्रात्मा' हैं। आप अजन्मा होकर भी संसारी प्राणियों के उद्धार को इच्छा से यह सब कर रहे हैं। हमाग ठीक अर्थ वही है जो आपने प्रकट किया है । पुराण, इतिहासों और मूत्र प्रन्यों में उसे प्रापने अनेक प्रकार से प्रकट क्यिा है (ऐमा पात्र भेद से किया गया है)। तो भी हम आपके प्रश्न का उत्तर देते हैं कि परब्रह्म हो अविनाशी तत्व है और वही कारणों का भी कारण है। वह आत्मस्वरूप पुष को गन्ध की भांनि सदेव स्थिर रहता है । महाप्रलय हो जान पर उस बक्षर ब्रह्म से परे देवल 'रस' रहना है। पर हम शदात्मक होने से उस शब्दालीन तत्व का वर्णन करन मे समयं नगे हैं।" इस प्रकार पुरागा में सामान्य बुद्धि के मनुप्यों के लिये मन्दिर, तीर्थ आदि का माहात्म्य-वर्णन से लेकर पूर्ण पात्मज्ञानियों के लिए अक्षर- तत्व और 'रम' (भगवद्भक्ति और विश्वप्रेम) का भी निरूपण कर दिया गया है। उनमे धर्म-साधन के जो अनेक मार्ग बतलाये हैं उसका एक कारण तो सम्प्रदाय भेद है और दूसरा कारण उपासक की योग्यता और शक्ति है। प्रत्येक व्यक्ति उपनिषदो मे वर्णित आत्म तत्व और ब्रह्म-ज्ञान तथा माया-सिद्धान्त को हृदयङ्गम नही कर सकता है। इसलिये पुराणकारों ने उसे अनेक प्रकार से सरल रूमो मे वर्णित रिया है जिससे प्रेरणा लेकर हर श्रेणी और योग्यता के व्यक्ति न्यूनाधिक अशो मे धर्मा- चरण करते रहे । धर्माचरण ही व्यक्ति और समाज के उत्थान तथा कल्याण का मुख्य साधन है, और उसमे यथाशक्ति लगे रहना मानव मात्र का कर्तव्य है। 'मत्स्य पुराण' को विशेषताए'- इस प्रकार के पुराण-साहित्य में "मत्स्यपुराण" का दर्जा उभय- पक्षीय है । एक तरफ तो इसमे व्रत, पर्व, तीर्थ आदि में मधिकाधिक दान देने की प्रेरणा की है और दूसरी तरफ राजपमं, शासन व्यवस्था, गृह निर्माण, मूर्तिकला, शान्ति विधान, शकुन-शास्त्र आदि जीवनोपयोगी विषयों का भी विशद रूप मे विवेचन किया है। भारतीय साहित्य मे नारी जाति की गरिमा का परिचय देने वाला प्रसिद्ध 'सावित्री उपाख्यान' मुख्य रूप से इसी मे विस्तार पूर्व दिण गया है । वाराणसी, हिमाचल, नमदा आदि की प्राकृतिक सोभा का काव्यमय वर्णन साहित्यक दृष्टि से उच्चकोटि का माना जा सकता है । और भी क्तिने ही विषय ऐसे हैं जो इस पुराण को उत्कृष्टता तया उपादेयता को प्रमाणित परते है। यद्यपि अय परि- स्थितियों में बदल जाने से पधिकाश पाठक उनकी उपयोगिता बहुत कम मनुभव कर सकेंगे, पर अब से कुछ सौ वर्ष पहले ही हमारे देश मा एक वहा भाग उन्हीं का अनुसरण परने वाला था। राजधर्म वर्णन-- मास्य पुराण | राजपुरय' और 'राजयम' वर्णन विशेष रूप से महरप रखा है। इसमें रेवल प्रजा-पालन परने और दान-पुण्य का ही (१५) जिक्र नहीं किया गया है, वरन् साप्त तौर पर इस विषय का व्यावहारिक ज्ञान दिया गया है। पर्याप वर्तमान वंसानिक युग में ये बातें बहुत अधिक बदल गई हैं तलवार तया तीरों के युद्ध के बजाय वायुयानों से बम पर्षा और राकेटो से युद्ध होने का उमाना पा गया है, तो भी अब से दो-चार सौ वर्ष पहले तक मारतीय नरेशो के लिये राज व्यवस्था और शासन सञ्चालन के ये नियम और विधियों हो उपयोग में आती थी। प्राचीनकाल में राज्य का पूरा अस्तित्व एक मात्र राजा पर हो रहता था। यदि उसे किसी भी उपाय से नष्ट कर दिया जाय तो सारी रात्र- व्यवस्था खण्ड-खण्ड हो जाती थी। इसलिये अन्य दानो के साथ राजा को अपनी सुरक्षा के लिये भी सदैव सजग रहना पड़ता था। इस सम्बन्ध में 'मत्स्य पुराण' का निम्न वर्णन दृष्टव्य है। "राजा को सदैव कौए के समान शका युक्त रहना चाहिये । बिना परीक्षा किये राजा को कमो भोजन और शयन नहीं करना चाहिये । इसी भौति पहले से ही परीक्षा करके वस्त्र, पुष्प, बलकार तथा अन्य वस्तुओं को उपयोग में लाना चाहिये। कभी भीडभाड मे न घुमना चाहिये और न अज्ञात जलाशय मे उतरना चाहिये । इन सबकी परीक्षा पहले विश्वासी पुरुषो द्वारा करा लेनी चाहिये । राजा को उचित है कि अनजान हायी और घोडे पर कभी सवार न हो और न किपी अज्ञात स्त्री के सम्पर्क में पावे । देवोत्सव के स्थान में उसे निवास करना नहीं चाहिये । अपने राज्य तथा दूसरे राज्यों में भी उसको जाने हुयै विचक्षण वुद्धि वाले, कष्ट सहिष्णु और सकट से न घबडाने वाले, गुप्तचरो ( जामूर्यो) को नियुक्त करना चाहिये जो उसे सव प्रसार के रहस्यों की सूचना देते रहें। फिर भी राजा को किसी एक ही गुप्तचर के क्थन पर विश्वास नहीं कर लेना चाहिये । जब दो-चार गुप्तचरों की रिपोर्ट रो उस बात का समर्थन हो जाय तद उस पर भरोसा करे।" इस वर्णन में आश्चर्य या अविश्वास करने की पोई बात नहीं . है । अन्य लोगो से संघर्ष करने वाले प्रौर दूसरो का स्वत्व अपहरण करने वाले शारको को स्थिति ऐसे गतरे मे ही रहती है। पुरानी बातो को छोड दीजिये वर्तमान समय में भी जर्मनी के डिक्टेटर हिटलर को अपनी रक्षा के लिये, अपको शकल, सूरत से मिलते . हुए और वैसी ही पोशाक तथा रग ढग वाले कई व्यक्ति अपने निवास स्थान में रखने ,पडते थे जिससे कोई जल्दी ही असली हिटलर को पहिचान कर आक्रमण न कर सके । इसी प्रकार की सुरक्षा व्यवस्था वालकन प्रदेश के और भी कई शासक रखते थे, जहां पडयंत्रकारियो और गुप्त घातको का अधिक जोर था । अब भी ऐसे बडे शासको के प्राण-नाश के लिए तरह-तरह की चालाकियों से काम लिया जाता है। रूस के जार को मारने के लिये पडयनकारियो ने एक बडो घन्टा घडी तयार की थी जिसके भीतर डाइ- नामाइट का भयकर दम छुपा था। इस घडी को गुप्त रूप से राज- महल (विण्टर पैलेस ) के किसी कमरे मे लगवा दिया गया । एक नियत समय पर जब उसका घटा बजा तो उसकी चोट से बम फूट गया और महल का एक भाग उड गया। जब इस जन-जागृति के युग मे ऐसी घटनायें सभव हैं तो प्राचीनकाल के एकतन्त्र नरेशो को सावधान रहने की जितनी अधिक अवश्यकता थी, इसे स्वीकार करना ही पडेगा । प्राचीन काल की संनिक व्यवस्था- यह तो हुआ अपनी शारीरिक रक्षा का वर्णन । अब राज्य की रक्षा के लिये इससे कही अधिक तैयारियां करनी पड़ती हैं । 'मत्स्य- पुरण' के अनुसार दुर्ग या किले छः प्रकार के होते हैं-धनुदुर्ग, महीदुर्ग, मरदुर्ग, वादंदुर्ग, जलदुर्ग और गिरिदुर्ग। इनमे से अपनी परिस्थिति के अनुसार किसी एक प्रकार का किला बनवा कर उसमे रक्षा की सब प्रकार बी सामग्री इक्ट्ठी करनी चाहिए। इस सम्बन्ध में पुराणकार ने अस्त्र- शस्त्रों तथा अन्य सामग्री की जो सूची दी है, उससे हम प्राचीन काल के युद्धो के स्वरूप का बहुत कुछ अनुमान कर सकते हैं- १७ ) "दुर्ग में सभी प्रकार के आयुधो का संग्रह करना अत्यावश्यक है। इसके लिये राजा को धनुष, तोर, तलवार, तोमर, कवच, लछ, फरसा, परिप, पत्थर, मुगदर, त्रिशूल, पटिश, कुठार, प्राम, भाला, शक्ति, चत्र, चर्म आदि का संग्रह करना आवश्यक है । कुदाल, शुर, वैत, घास-फय और अग्नि को भी व्यवस्था रहे। ईधन और तेल का पूरा संग्रह होना चाहिये।" युद्धकाल मे सेना के लिये खाद्य और घायलों की चिकित्सा के लिये औषधियों का संग्रह भी आवश्यक है। इसका वर्णन करते हुये कहा है-"ओ, गेंहू, मूग, उदं, चावल आदि सब प्रकार के अन्न भट्ठे क्वेि जायें । सन, मूज, लाख, मुहागा, लोहा, सोना, चादी, रन, वस्त्र आदि सभी आवश्यक वस्तु, जो यहा कही गई हैं और नहीं भो कही गई हैं, राजा द्वारा सचित को जानी चाहिये । सब प्रकार की वनस्पतियां तथा औषधिया सजीवाण, काकोल, आमलको, शालपर्णी, मुम्दपर्णी मापपर्णी, सारिवा, बला, धारा, श्वसनी, वृष्या, वहती, कण्टकारिका, शगी, श गाटो, द्रोणी, वर्षाभू, दर्भ, रेणुका, मधुपणी, विदारीकन्द, महाक्षीरा, महानपा, महदेई, का, एरण्ड, पर्णी, शतावरी, फल्गु, सत्याप्टिका, शुक्रति शुक्रबा, अरमने, पानि छत्रका, वीरपा, इक्ष, इक्षविकार । सिरवा ), सिंही, अश्वरोघर, मधुक शतपुष्पा, मधुलिका, मधूर, पोपन, ताल, आन्मगुप्ता, पटुफना, दाविना, राजसीपंकी, राजसप ( सरसो ), धान्यार, उत्तटा, कामगार, पद्मनोज, गोवल्ली, मधुलिका, शीनपानी, युरेरी, कात्विा, रघुप्पिया प्रयुष, गुरुमातर, पुनर्नवा, सेम, पार काश्मीरी, वल्या, बालूर, मिर, सबनुष धान्य, समीमान्य, धोर, मोर, तर, तेल. वमा, मात्रा, घृत, नोम, पाराष्टर, सुग, आमत्र, मद, मण्ड आदि ममी का राग्रह जिया जाय।"

यह सूची बहुत बडी-इससे लगभग चार-पांच गुनी है। हमने केवल थोडे से नाम चुन कर दे दिये हैं, जिससे पाठक अनुमान कर सकें कि उस समय भी चिकित्सको को जड़ी-बूटियो का पर्याप्त ज्ञान था। आजकल भी युद्धक्षेत्र में सेनाओ के साथ बडे-बडे अस्पताल रखे जाते हैं, जिनमे सैकडों डाक्टर और नसें काम करती हैं। उनमें औपधियो का भी बडा भण्डार रहना है, जिसमे हजारो तरह के इन्जेक्शन, वैपसूल, टैबलेट, टिंचर, एसिड आदि होते हैं। पहले जगल की वनस्पतियो अपने असली रूप में ही अधिकतर काम में लाई जाती थी, अब इनको वैज्ञानिक प्रक्रिया से साररूप मे बदल कर इजेक्शन, टेवलेट आदि के रूप मे बना दिया जाता है । साथ ही घावों की चिकित्सा के लिए घी, तेल, चर्वी, मज्जा, अन्तडी, हड्डी आदि का प्रयोग भी किया जाता था । योग्य राज्य कर्मचारियो का चुनाव:- पर इन सब बातो से भी अधिक महत्वपूर्ण है योग्य गज्य- अधिकारियों और कर्मचारियो का चुनाव । इस प्रकरण के आरम्भ मे ही यह कहा गया है कि "चाहे कोई छोटा कार्य भी क्यो न हो पर उसे किसी अकेले व्यक्ति द्वारा पूरा किया जा सकना बड़ा कठिन होता है । फिर राज्य शासन तो परम विशाल और महत्व का कार्य है। अतएव नृपति को स्वय हो ऐसे कुलीन सहायकों का वरण करना चाहिए जो शूरवीर, उत्तम जाति के, बलशाली और थी सम्पन्न हो । इस सम्बन्ध मे राजा को यह ध्यान रखना चाहिये कि सहायक रूप और अच्छे गुणो से सम्पन्न सज्जन, क्षमाशील, सहिष्णु, उत्साही, धर्म के ज्ञाता और प्रिय वचन बोलने वाले हो। "सेनापति रामा का परम सहायक होता है। वह कुलीन, गोलस्वभाव से मुक्त, धनुविद्या का महान ज्ञाता, हाथियो और घोडो की शिक्षा में प्रवीण, शकुन-शास्त्र को ज्ञानन वाला, चिकित्सा के सम्बन्ध मे मान रखने वाला, कृतज्ञ, कमंशर सहिष्णु, मय प्रिय, गूढ तलों के विधान का नाता हो । ऐसे विशिष्ट गुणों से युक्त प्यक्ति को सेनाध्यक्ष बनाना चाहिए। राजा का दून ऐसा व्यनि होना चाहिये जो दूसरों के चित्त के मादी कोटी तरह समझता रहे। वह अपने म्यामो के कथन दै माशय को ठीक ढंग से प्रकट करने वाला, देश मापा का विद्वान् वाग्मी साहसी और देशवात की परिस्थिति को समझने वाला होना चाहिये, राजा के य गरक्षक हर तरह से मुम्नंद, वहादुर, दृढ राजभक्त और धदान हो । सधि और विरह का निर्णय करने वाला अधिवर्ण ( विदेश मचिद ) नीति मासो का पडित, देशमाषाओं का विद्वान, पड्गुग का साता और परम व्यवहार कुशल होना चाहिये । आय व्यय विभाग का अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति हो जो देश की उपज से अच्छी तरह परिचित हो । रसोई घर का अध्यक्ष पाकशास्त्र के साय ही चिकित्साशान का भी पूर्ण सावा हो।" 'मत्स्यपुराग' में राजा वे क्यों और राग्य पदम्पा का जो वर्णन किया है उससे विदित होगा है रि पुरान रमाने में भी राजामो का जीवन मा मुराद और ऐग माराप का न था. जंमा मनजान लोग बरनारया करते हैं । निस्सन्देह उसके सर पर रलटिठ मुकुट होता पा वह सोन रे बिहामन पर भेटता दी और उसमे महत में बीसियो रानिया और सैमहो दाम-दासी होते थे, पर वसे सदा प्राणी का खटका भी बना रहा था। जो राजा इन तथ्यों को अवहेलना करते थे, और राम-रग में इन पर दुसान करने सगन वे प्रार दूसरे राजरानों के पाश्मन स नष्ट घ्रप्ट हो जान । म लिये उस समय कामों को और नहीं तो अपनी मुरमा ६ स्थान में ही प्रजापालन और न्यायुत सवहार सामान रखना पटना या, चिमन उनी मिति र बनी रहे मोर पे बाहर आरमनों का मारमा समता पूर्वक पर सरे।

(२०) पुरुषाथकी प्रधानता- हमारे उपरोक्त म तव्य की पुष्टि पुराणकार ने भी एव अन्य प्रकार से की है । उसने 'राज धर्म के प्रराङ्ग मे एक अध्याय में यह प्रश्न उठाया है कि "देव और पुरुषार्थ मे कौन बड़ा है ?" इसके उत्तर में मत्स्य भगवान द्वारा कहलाया गया है कि "देव नाम वाला जो पल प्राप्त होता है यह भी अपना पूर्व वर्म ही होता है, इसलिये विद्वानों को सम्मति मे पुरुषार्थ ही सर्व प्रधान है। यदि देव प्रतिकूल भी होता है, तो उसका पौरप के द्वारा हनन हो जाता है । जो श्रेष्ठ आचार वाले और सदैव उत्थान का प्रयत्न करने वाले व्यक्ति होत हैं पुरपाय से प्रतिकूल देव को बदल डालते हैं । यह सत्य है कि कुछ उदाहरणो में अनेक व्यक्तियों को बिना पुरुषार्थ भी अच्छा फल, सौभाग्य युक्त स्थिति प्राप्त हो जाती है. जिसे पूर्व जन्मो के प्रारब्ध का परिमाण माना जाता है । पर यदि वर्तमान में भी पुरुषार्थ और सत्कर्म न किये जाये तो वह स्थिति प्राय थोडे ही समय रहती है। इसलिए हम कह सकत हैं कि देव, पुरुषार्थ और काल (परिस्थितियां) ये तीनो मिलकर ही मनुष्य को फ्ल देने वाले हुआ करते हैं। पर इनमे भी पुरुषार्थ को ही प्रधान सम- झना चाहिये, क्योंकि कहा गया है- नालसः प्राप्नवन्त्यर्थान् न च दैव परायणः । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन आचरेद्धमंमुत्तमम् ॥ अर्थात्-"जो व्यक्ति प्रालसी होते हैं अथवा जो केवल देव (भाग्य ) के ही भरोसे रहते हैं, वे धनोपार्जन मे सफल नही हो सकते। इसलिये सदैव प्रयत्नपूर्वक उत्तम धर्म (पुरुषार्थ ) का पालन करना चाहिये ।" जो लोग समझते हैं कि पुराने धर्म ग्रन्थो मे भाग्य को ही प्रधान बताकर मारतवासियो को 'भाग्यगदी' बना दिया है उनको 'मत्स्य पुराण' ये उपरोक्त वपन से शिक्षा ग्रहमा करनी चाहिये।

( २१ )
+4
-
भारतीय
गृह
निर्माणकला-
मत्स्य पुराणान्तर्गत गृह निर्माण सम्बन्धी वर्णन से सिद्ध होता है
कि प्राचीन काल मे भी इस विद्या की काफी खोज की गई थी। जो
लोग मारत के 'सद्धसम्य' कहते हैं और जिनका ख्याल है कि उस जमाने
में यहां के मनुष्य जङ्गली प्रदेशो के निवासियो को तरह केवल झोपड़ों
अथवा कच्नी मिट्टी के छप्पर वाले मकानो मे ही रहते थे, उसका क्थन
'मत्स्य पुराण' के वन मे अमत्य सिद्ध हो जाता है । उससे मालूम होता
है कि 'गृह निर्माण कला' का आरम्भ और प्रसार बहुत पहले हो नुका
था। अध्याय के आरम्भ मे हो प्राचान भारत के उन अठारह 'वास्तु विज्ञान
ज्ञाताओं ( इजीनियरो) के नाम दिये गये हैं जिन्होंने इस विषय मे विदोष
मनन और प्रयत्न करके प्रमिद्धि प्राप्त की थी-
भृगुरनिर्वशिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा।
नारदोनग्नजि चैव विशालाक्षा. पुरन्दर. ।।
ब्रह्माकुमारी नन्दीश: शौनको गर्ग एव च ।
वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक वृहस्पति ।।
अष्टादर्शते विख्याता वास्तु शास्त्रोपदेशक.।
सक्षेपेणोपदिष्टन्तु मनवे मत्स्य पिणा ।।
अर्थात् -- "मृयु, अधि, पशिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नानजित,
विशालाक्ष, पुरुदर, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश, शनिस, गर्ग, वासुदेव, अनि-
रुद्ध, शुक्र और वृहस्पति-ये अठारह प्रसिद्ध 'वास्तु शास्त्र' के उपदेशक
हैं और उन्ही की विधियो का वर्णन मक्षेप में 'मत्स्य भगवान्' ने मनु जी
सुनाया।"
मालूम होता है उस समय इन नामी अथदा उपनामो वाले मती.
पियों द्वारा रचित 'वास्तु विज्ञान' सम्बन्धी प्रय प्राप्त होगे और उन्ही मे
से एकाधिक प्रय के आधार पर प्रक्षेप मे 'मत्स्य पुराए' ने इस कला का

। २२ ) - परिचय दिया है । हो सकता है ब्रह्मा, द्र, विश्वावर्मा, युमार आदि का नाम इस विषय मे भी देवताओं की प्रधानता दिखाने लिये शामिल पर दिपा हो, तो भी प्राचीन समय मे कितने ही उच्चकोटि के विद्वानो ने इस विषय पर भी लिखा था, इसमे सन्देह नही । अब भी उनमे से 'मानसार' आदि दो-एक प्रथ देखने मे माते हैं जिनकी जानकार लोगों से बड़ी प्रशसा सुनने में आती है । 'मय' तो 'दत्य' जाति वालो का प्रसिद्ध शिल्प शास्त्र झाता प्रसिद्ध है। महाभारत के अनुसार महाराज युधिष्ठिर के लिये इन्द्र- प्रस्थ की अपूर्व राज सभा उसी ने बनाई थी। सभव है जिस प्रकार आर्य आति मे शिल्प विज्ञान के शाता को विश्वकर्मा' की परवी दी गई, उमी प्रकार आयों की विरोधी दैत्य जाति में शिल्प-कला के प्रमुख नाता को 'मय' के नाम से पुकार' जाता हो, और पाडवो को सयोगवश उसी जाति का कोई शिल्प विद्या विशारद मिल गया हो। कुछ भी हो 'मरस्य पुराण' मे सामान्य गृह, महल, भवन, प्रासाद, स्तम्भ, दजे, मडप, वेदी, आदि के जितने भेद बतलाये हैं और विस्तारपूर्वक उनकी विशेषतामो का धर्णन किया हैं, उससे यह अवश्य सिद्ध होता है कि उप्त जमाने मे भी इस कला की काफी खोजबीन की गई थी और तदनुसार अनेक छोटे-बड़े गृहो का निर्माण भी किया जाता था। विभिन्न प्रकार की आकृति के गृहो का वर्णन करते हुए पुराणकार ने लिखा है- "सबसे उत्तम गृह वह होता है जिसमे चारो तरफ दरवाजे और दालान होते हैं । उसका नाम 'सर्वतोभद्र' कहा जाता है और देवालय तथा राजा के निवास के लिये वही प्रशस्त होता है । जिसमें तीन तरफ द्वार और दालान होते है पर पश्विम की तरफ द्वार नहीं होता वह 'नन्द्यावत' कहलाता है। जिस भवन मे दक्षिण की तरफ द्वार नहीं होता वह 'बर्द्धमान' कहा जाता है। पूर्व की तरफ विना दरवाजा वाला 'स्वास्तिक' नाम से प्रसिद्ध है। उत्तर की तरफ द्वार से रहित 'चक' कहा जाता है." - "राजा के निवास गृह पांच प्रकार के होते हैं। जो सर्वोत्तम मान गया है उसको लम्बाई एक सौ बाठ हाय ( ५४ गज) होती है। इस घर को जो अन्य चार श्रेणियों होती है उनमें से प्रसंक की लम्बाई एक दूसरे से साठ हाप कम होती जाती है। इसी प्रकार य गज के प्रथम श्रेणी के महल को लम्बाई ८० हाय होती है और बाद को चार घेणियो दाले गृहों की लम्बाई क्रम से 6-8हाथ कम होती चली जाती है । इसी तरह सेनापति के उत्तम गृह की लम्बाई चीमठ हाथ, मन्त्रियों के घरों को साठ हाय, सरदारी और छोटे मत्रियों को घरो की अडतीस हाय होती है । शिल विमाग, व्यवस्था और मनोरंजन के अधिकारियों के घर अष्ट्रईस हाय लम्बे होने चाहिये । राजा के यहां नियुक्त बंद्य, ज्योतिषी, सभा के प्रबन्धक, पुरोहित के मकान चालीस हाय लम्बाई के होते हैं । इन सबकी चौडाई दर्जे के अनुसार लम्बाई ते एक तिहाई, चौपाई या छठवां भाग होती है।" पर्तमान समय में भी अधिकाश व्यक्ति पर के शुभ-अशुभ होने में बहुर विचार पिया करते हैं, और नरें घर में 'ग्रह-प्रदेश' का बड़ा महत्त्व माना जाता है । 'मत्स्य पुगण' में इस सम्बन्ध में बहुत अधिक विधि विधान दिमे मये हैं, और गृह निर्माण तथा गृह प्रवेश नि मृहुतों में किया जाय इस सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा गया है। प्राकृतिक शोमा वर्णन- यद्यपि प्राचीन काल में जितने सस्कृत प्रथ लिखे गये थे वे सभी पद्य में है, वैद्यक, ज्योतिष, शिल्प, कानून आदि सभी विषयो को भी कारणवश पद्यो में लिखा गया है, पर यह स्पष्ट है कि इस प्रकार को रचनाओं मे उच्च साहित्यिक गुण नहीं आ सकते। उनमे मुख्य रूप से उपयोगिता पर हो पान रखा जाता है, काश्य-सौष्ठव को गौण माना जाता है। पर 'मत्स्य पुराण' में अनेक स्थलों पर प्राकृतिक दृश्यों का जो ( २४ ) - वर्णन किया गया है वह इस दृष्टि से भी उसके नेखक की विद्वता को प्रकट करता है । वैसे साधारण रूप से भी इस पुराण की भाषा कितने ही अन्य पुराणों और उपपुराणो अधिक परिष्कृत जान पडती है, पर कवि की विशेषता राजवश, ऋषिश, पूजा उपासना को विधि, प्रायश्चित्त के विधान आदि विषयो का वर्णन करने में नहीं जानी जा सकती। इनमे तो उपयोगिता की दृष्टि से तुकबन्दी की जमी ही रचना करनी पडती है । पर जहाँ कहीं प्राकृतिक शोभा के वर्णन का अवसर आ जाता है वहीं कवि की कल्पना और प्रतिभा ऊंची उडान लेने लगती है मौर योग्य कवि अपनी विशेपता को प्रकट कर सकता है। 'मत्स्य पुराण' मे हिमालय पर्वत, कैलाश, नर्मदा, वाराणसी की शोभा का जो वर्णन किया है उसकी गणना भाषा और भाव की दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्तम कविता में को जा सकती है । यद्यपि इस प्रकार की पौराणिक रचनाओ की तुलना कालिदास, भवभूति, माघ आदि जैसे कवियो की रचनाओ से नहीं की जा सक्ती, जिनका मुख्य उद्देश्य कविता की उत्कृष्टता को ही दिखलाना होता है और जो कवि-कम को अपने जीवन का चरम ध्येय मानते हैं। पुराण रचयिता इसके बजाय अपना मुख्य उद्देश्य लोगो को सरल भाषा मे धर्मोपदेश देना पौर विविध प्रकार वे विधि विधानो का ययात था वर्णन करना समझाते हैं, मोर उसी ढग की रचना करते हैं । इस लिये साहित्यिक गरिमा किन्ही पुराणो मे विशेष स्थलो पर ही दिखाई पड़ती है। उदाहरण के लिये हम 'मत्स्य पुराण' के हिमालय-वर्णन का पूछ भशमीचे देते है- "परम पुण्यमयी सरिता का अवलोकन करता और उसके समीप विश्राम परताहमा पपिर जब महागिरि हिमालय के निकट पहुँचता है, तो उगा दर्शन पर परित होता है। इस हिमवान पर रे भूरे रग वास उच्च गियर पाराश को एने प्रतीत होते हैं। वे इतने के हैं कि पक्षी भी वही नही पच परते। वह नदियो रे जस से उत्पन होने -५ ) वाले महाशब्द के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का शब्द सुनाई नहीं पडता । वे सरितायें परम मनोरम और शीतल जल से परिपूर्ण हैं। देवदार के वृक्षों का जो वन पर्वत क निम्न भागों में लगा है वहीं मानो उसका हरित अधोवस्त्र है, और ऊपर क भाग में जो मेघ घिरे रहते है वही उत्तरीय ( ऊपर बोढने वाला वस्त्र ) है। सबसे ऊपर जो श्वेत वर्ण का वादल दिखाई पडता है वही उसकी पगडी है, जिस पर मूर्य और चन्द्रमा मुकुट के समान जान पड़ते हैं । इस प्रकार यह महागिरि एक नपति की भांति ही जान पडता है । उसका सर्वाङ्ग चन्दन की भांति श्वेत हिम से चचित रहता है और कही-कहीं सुवर्ण आदि धातुओ की मामा आभूषणो का उद्देश्य भी पूरा कर देती है । अनेक म्यानो पर हरितगा युक्त घास और झाडियां ऐसी घनी हैं कि उनमे हवा का भी प्रवेश नहीं होता है और कहीं रग विर गे सुन्दर फलो का बगीचा-सा लगा है। ऐसा यह महा पपंत "तपस्वि शरण शैल कामिनामतिदुर्लभम्" उपस्वियों के लिये उत्तम बाथय-स्थल घोर काम-सेवन करने वालों के लिये अत्यन्त दुर्लभ है।" साविती उपाख्यान- सावित्री उपास्यान पति व्रत धर्म की महिमा के लिये भारतीय साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है, और उसके आधार पर यहाँ के कवियो ने अनेक उत्कृष्ट कोटि की रचनायें प्रस्तुत की हैं । भारत ही नहीं इस उपा- ख्यान ने विदेशो क विद्वानी तक को आकृष्ट किया है और इसको लेकर यगरेजी मे भी सुन्दर काव्य लिये गये है। उस उपाध्यान का मुख्य उद्देश्य मारियो के सम्मुख पतिव्रत का बादशं उपस्थित करना ही है भंसा कि इस कयानक के आरम्म में कहा गया है- "इसके उपरान्त अपरिमित वल-विक्रम वाले उस राजा ( मनु ) ने देवेश मत्स्य से कहा- 'भगवन् ! पतिव्रता नारियो में कौन सी नारी श्रेष्ठ है और किसने अपने पतिव्रत के द्वारा मृत्यु को भी पराजित कर ( २६ ) दिया था? मनुष्यो को इस सम्बन्ध मे किसके परम शुभ नाम का कीर्तन करना चाहिये ? "मत्स्य भगवान ने कहा-"नि:सन्देह पतिव्रता का माहात्म्य इतना अधिक है कि मृत्यु का अधीश्वर यमराज भी ऐसी नारियों की अवमानना नहीं कर सकता। अव मैं तुमको एक ऐसी ही पापनाशक कथा सुनाता हूँ जिसमे एक परम श्रेष्ठ पतिव्रता ने अपने स्वामी को मृत्यु के पाश से भी छुड़ा लिया था।" इस वर्णन के आधार पर हम कह सकते हैं कि सभवतः यह 'सावित्री उपाख्यान' कवि-कल्पना-प्रसून ही हो और 'धर्म के अनुयायी' की महिमा को प्रदर्शित करने के उद्देश्य से ही इसकी रचना की गई हो। फिर भी ससार मे ऐसो नारियां हुई हैं जिन्होने वास्तव मे अपने पति को 'यमराज' के घर से लौटाया है । इतिहास मे एकाध ऐसी वोगगना का वर्णन मिलता है, जिसका पति युद्ध मे विषाक्त वाण लगने से मरने लगा, पर उसने तत्काल अपने मुह से दूषित रक्त को चूस कर बाहर निकाल दिया और अपने प्राणो की चिन्ता न करके प्रिय पति के प्राणो की रक्षा की । इसी घटना का वर्णन करते हुये ब्रजभाषा के एक आधुनिक कवि ने लिखा था- सहृदय प्यारी, मत्यु पराजित होत प्रेम सो निश्चय जानन हारी ।। वीरासन व भूपति पति को ले भुज लता सहारे । व्रण सो विष चूस्यो लगाय जिन मधुराधर अरुणारे ।। कुछ भी हो सावित्री उपास्यान' एक ऐसी महान् पतिव्रता की पल्पना है जिसने आज तक लाखों नारियो को प्रेरणा देकर उनको पति की सच्चो सहगामिनी बनाया है । यमराज के सम्मुख उसके द्वारा प्रकट दिये ये उद्गार आज भो पति की अनुगामिनी स्त्रियों के कानो मे गूंजते रहते हैं - ( २७ ) पतिहि देवत स्त्रीणा पतिरेव परायणम् । अनुगम्यः स्त्रिया साध्व्या पति प्राण धनेश्वर ॥ मितन्ददाति हि पिता मित भ्राता मित सुतः। अमितस्य च दातार भरि का न पूजयेत् ।। अर्थात्-"पति ही स्त्रियो का देवता है और उनकी पारायणता, भक्ति का पात्र होता है । साम्बी स्त्रियो को सदैव उसका अनुगमन करना ही चाहिये । किसी भी स्त्री को उसके पिता, भ्राता, पुत्र आदि सीमित रूप में ही प्रदान कर सकते हैं, केवल पति ही ऐसा है जो उसे अमित (सर कुछ) दे डालता है ! फिर ऐसे पति की पूजा कोन स्त्री न करेगी।" यमराज ने समझाया कि "ससार मे मनुष्य का परम धर्म अपने शास्त्रोक्त कर्तव्य का पालन ही है। धर्मशास्त्रो ने माता-पिता और गुरु की सेवा को तीनो प्रकार की अग्नियो को आराधना करने के समान फलप्रद बताया है। इससे मनुष्यों को अनायास ही सर्वश्रेष्ठ स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस सत्यवान ने इस धर्म कर्तव्य का पूर्ण रूप से पालन किया है, इस लिये इसकी सद्गति होने में कोई सन्देह नहीं। यह अपने पुष्य फल से महान् स्वर्गीय सुखो को भोगेगा । इस लिये तुम मेरा पीछा । न करके अब वापस जाकर अपना धर्म कर्तव्य पालन करो।" सावित्री ने कहा निश्चय ही 'धर्म' ही ससार की सारवस्तु और मानव-जन्म का प्रधान उद्देश्य है । उसके बिना किसी सुख अथवा कल्याण की अभिलाषा करना पन्ध्या के सुत के समान असम्भव है । इस कारण- बाल एव चरेद्वममनित्यं देव जावितम् । कोहि जानाति कस्याधमत्युरेवापतिप्पति ।। पश्यतोऽप्यास्य लोकस्य मरण पुरत. स्थितम् । अमरस्येव चरितमत्याश्चर्य सुरोत्तम ।। युवत्वापेक्षमा वालो वृद्धत्वापेक्षया युवा। मत्यासत्सङ्ग मारूढः :स्थविरः निमपेक्षते ।।

( २८ ) "धर्म का पालन तो बाल्यावस्था से ही करना आवश्यक है, क्योकि यह जीवन अनित्य है । कौन जानता है कि मृत्यु सामने खड़ी रहती है यह वास्तव मे भगवान की अदभुत लीला ही है। बुडढो का मरना तो स्वा. भाविक ही है, पर उनसे भी जल्दी युवा मर जाते हैं, और युवाओं की अपेक्षा वालक शीघ्र मृत्यु के पास बन जाते हैं ।।" सावित्री ने कहाकि "जय धम की इतनी महिमा है, तो मैं अपने धर्म से कैसे हट सकती हूँ। स्त्री का धर्म तो पति का अनुगमन करना ही बतलाया है, वही मैं पालन कर रही हूं। इस राजकुमार के माता- पिता बडी असहाय स्थिति में हैं, यदि आप इसको ले जायेगे तो उनको अपार कष्ट होगा । फिर धर्मरक्षार्थ पुन का होना भी आवश्यक है। बिना पति के मेरे पुन कैसे हो सकेंगे? जब आप मुझे पुत्रवती हाने का वरदान दे चुके हैं तो बिना पति के पुत्र कहाँ से होगे अत अब आपको इसको जीवनदान देना ही होगा।" इस प्रकार सावित्री ने अपनी दृढता और धर्मशीलता से अपने पति को पुनर्जीवित कर दिया । सत्य का आचरण वास्तव मे सदैव परम कल्याणकारी होता है। महान् से महान् आपत्तिकाल मे भो सत्य मनुष्य की रक्षा करता है और उसे सुख, श्री तथा शक्ति प्रदान करता है। 'सावित्री सत्यवान उपाख्यान का सन्देश मनुष्य मात्र के लिए यही है कि चाहे स्त्री हो या पुरुष, उसको धर्ममाग से कभो डिगना न चाहिये । जो धर्म की रक्षा करता है उसकी रक्षा भी धम द्वारा अवश्य होती है। इस प्रकार के अनेक उपयोगी और लोक-परलोक मे कल्याण करने वाले सदुपदेश पुराणो मे भरे पड़े हैं । निस्सन्देह उनके साथ बहुत- सी ऐसी प्रप्रासगिा और स्वार्थपरता की बातें भी उनमें मिलती हैं, जो अनधियरी व्यक्तियो द्वारा किसी हीन उद्देश्य स जोडदी गई है। हमारा पतंय है कि हम हस की तरह क्षीर-नीर विवक से काम लेकर थेष्ठ बातों को अपनायें और उनसे लाभ उठायें। पुराणा का भारतीय जन- ( जीवन पर बडा प्रमाव है, और सामान्य वर्ग के लोग उन्हीं के द्वारा धर्म के कुछ तत्त्वो का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। आजकल पुराने समय को तरह पुराणों को क्याएँ होनी बन्द होगई हैं और 'पुराण' लोग मगुलियो पर गिनने लाया सख्या में रह गये हैं, तो भी यदि हम चेष्टा करें तो किसी और उपाय से उनसे लाभ उठा सकते हैं। भारतवर्ष का प्राचीन इतिहास वहन वम मिलता है। पुराणो में यद्यपि सभी राजाओं तथा उनके कार्यों का वर्णन कवि-स्वभाव के अनुसार वडे प्रतिरजित रूप में किया है तो भो उसको क्याओं और वर्णनो का मार निकाला जाय तो प्राचीन समय की राजनीति, धर्मनीति और अर्थनीति सम्बपी वानों पर वहुत कुछ प्रकाश पड मक्ता है । इसलिये हमाग क्त्तव्य है कि दोपा- न्वेपण अथवा गण्डन-मण्डन की अनुचित प्रवृत्ति को त्याग कर उनमें जो श्रेष्ठ सारयुक्त लाभदायर हो उसे प्रत्ण करलें मोर शेप को मनो. रजक कथा भाग मानकर उमी माव से उसे पढ़ते रहें । कुछ भी हो वतं- मान समय मे क्या साहित्य ( उपायास, कहानी आदि) को स्वार्थी अपवा स्वय भ्रष्टाचार करने वाले लेखकों ने विस प्रकार पनित कर दिया है, उसको तुलना में पुराणो को धर्म या कल्याणकारी शिक्षा ही देती हैं । उनको यदि हम समयानुएल ए देवर सद शिक्षा का माध्यम रग तो यह भारतीय-जीवन को दृष्टि से उपयुक्त और हितमारी ही होगा। 'मत्स्यपुराण' पे इस संस्करण में से पुनरावृत्तियों को छोडकर वही क्यामी को छोटे आशर में करवं इसे सामाय पाटको ये पिये अधिक उपयोगी बना दिया गया है। आशा है पुराण का यह समोधित 7 नमोपमन्द मावेगा। -श्रीराम शर्मा आचार्य और बहुत विषय-सूची पृष्ठ १-३२ ... ... १ ... ... १४ २१ २५ ... .. ... ५० क्रम विषय भूमिका १-मत्स्यावतार वर्णन २-मत्स्य-मनु सम्वाद वर्णन ३-सृष्टि-प्रकरण ४-सरस्वती चरित्र ५-दक्ष प्रजापति को मैयुनी सृष्टि ६-कश्यपान्वय वर्णन ७-आधिपत्यभिषेचन ८-मन्वन्तर वर्णन 1-पृथ्वी दोहन १०-आदित्याख्यान ११-सूर्य वंश वर्णन १२-देवी के एक सौ बाठ नाम १३-पितृ वश बीर्तन १४-श्राद प्रकरण १५-साधारण बम्युदय कार्तन १६-एकोद्दिष्ट थाट प्रकरण ७-याद्धयोग्य नानांवर्णनम् ८-पयाति चरित्र ४६ ५३ ६२ ८६ ... ... ११८ " ..

... .. १४१ १४७ १५० ... ... १७४ १८० १८५ २६० १६८ ... ... १६-ययात्याष्टक सम्वाद वर्णन (१) २०-ययात्याप्टक सम्वाद.वर्णन (२) २१-यदुवश वर्णन २२-कोप्टुवश वर्णन ... २३-स्यमन्तक मणि का सक्षिप्त चरित्र २४-कृष्णोत्पत्ति वर्णन.. २५---कृष्ण सन्तान वर्णन २६-ययाति वश को शाखाम्रो का वर्णन २७-पुरुवंश वर्णन २८-कुरुवश वर्णन २६-अग्निवश वर्णन ३०-कर्मयोग वर्णन ३१-पुराण सख्या वर्णन ३२-नक्ष र पुरुष नाम बन कथन ३३-आदित्य शयन व्रत कथन ३४-रोहिणीचन्द्र शयन व्रत कथन ... ३५ -तहागाराम गादि प्रतिष्ठा विधि वर्णन .६-सौभाग्य शयन प्रत वपन ३७-अक्षय तृतीया और सरस्वती प्रत ३८-चन्द्रादित्योपसम मे स्नान विधि कपन ... ३१-सप्तमी स्नपन प्रत कथन ४०-भीम द्वादशी व्रत कथन ४१-ल्याण सन्तमी नयन ४२-विशोक द्वादशी वन पपन १३-पहचान्ति वर्णनम् ४४-शिव चतुर्दशी व्रत पपन ... २३१ २३६ २५० २५४ २५८ .... .... ... २७१ DE१ ૨૯૬ ३०४ ३.६ ... ३२० ( ३२ ... ... . ३२८ ३१३ ३३१ ३३४ ३४० ३४४ ३५८ ३६२ ... ... ... ४५-फन त्याग माहात्म्य कथन ४६--आदित्यवार व्रत कथन ४७--विभूति द्वादशी व्रत कथन ४८-स्नान महत्त्व वर्णन ४६-प्रयाग माहात्म्य वर्णन ५०-भारतवर्ष वर्णनम् ५१- हिमवद वर्णन ५२-लास वर्णनम् ५३--गृथिवी परिमाण वर्णन ५४---ज्योतिप चक्र वर्णन ५५- अमावस्या महत्त्व वर्णन ५६-चनुयुगमान वर्णन ५७-द्वापर और कलियुग वर्णन ५८: चातुयुग गति वणन १५-प्रलयकाल वर्णन ६०-यशावतार वर्णन ... ... ... ... ३६४ ४०३ ... ... ४३१ ... ... ४५४ ४५६+३२-४६१ मत्स्य पुराण १-मन्स्यावतार वर्णन प्रचण्डताण्डवाटोपे प्रसिप्तायेन दिग्गजाः । भवन्तुविघ्नमगाय भवन्य चरणाम्बुजाः ।। पातालादुत्लनिष्णो मकन्वसनयो यम्य पुन्वाभिघाता- दूध्वं ब्रह्माण्डबाटनिगरविहिन यत्पनेनापनन्ति ।।१ विगोम्मंत्म्यावतारे सक्लवमुमनीमण्डल व्यगुमान, तम्यास्योर्दारिताना ध्वनिरपहरताश्रियम्ब. श्रुतीनाम् ॥२ नारायरएं नमस्कृत्य नररुचंब नरोत्तमम् । देवी मरस्वती धान ततो जयमुदीग्देन् ।॥ ३ ॥ अजोऽपिय. क्रियायोगा नारायण इनिन्मृत. । विगुणायनिवेदाय नमम्नम्मं स्वयम्मुरे ॥४॥ मूतमेकान्तमानीन नमिपारण्यगामिन. । मुनयों दीर्घनमान्नेपप्रन्दीघनहिताम् ।।५।। प्रवृत्ता पुगणीपु धान ललितानु च । यामु जोनवाद्यास्नु अभिनन्द्य मुहमुंह ॥६|| राषितानि पुगणानि यान्यम्मार त्वयानघ । तान्येवामृतकल्यानि श्रोतुमिच्छामहेपुन. ॥७॥ (वे नगवान् भव के चरण कमल विनों के नाम करने के लिये हो। जिन्होंने अपने एम प्रचार तापब तप के बटोर में दिग्जी अपन दिनामी के अविनियों के गरों को भी प्रदान कर दिया था माद घटाकर फर दिया था जाल लोक में उन्यतन और २ मत्स्यपुराण तीनो ( साम, जिसके पुच्छ के अभिघात से ऊपर की ओर ब्रह्माण्ड के सण्डों के यार. कर से किये हुए व्यत्यम से मकरों की वस्तियां आकर गिरा करती हैं उन्द भगवान् विष्णु के मत्स्यावतार मे यह समस्त पृथ्वीमण्डल व्यशुमन हो गया है उनके मुख मे उदीरितो को ध्वनि आपकी श्रुतियो की अश्रीप अपहरण करे ॥२१॥ भगवान् नारायण और नरों में सर्वश्रेष्ट नरदय सरस्वती महामहिम महर्षि व्यासदेव को नमस्कार करके इसके अनन्त 'भगवान् की जय हा'-ऐमा मुख से उच्चारण करना चाहिए ।। ३ ॥ अजन्मायी है वह भी किन्तु क्रिया के योग से नारायण कहे गये हैं । तीनो गुणो ( सत्व, रज, तम ) से युक्त, यजु और मक वेदो वाले भगवान् स्वयम्भू की सेवा मे नमस्कार अपित है ।। एकान्त स्थल मे समासीन सूतजी से नैमिषारण्य के निवास करने वा मुनियों ने अपनी दीर्घमत्र की अवसान वेसा मे दोघ सहिता के विषय पूछा था ॥५॥ घम से सयुत परम ललित पुराणो को क्थाओ के प्रवृ होन पर शौनक आदि ऋपियों ने वारम्बार अभिनन्दन दिया था ॥ महर्षिया न सूत जी स कहा था-हे अनघ हम लोगो को कृपा कर थे पुराण सुनाय हैं वे सभी अमृत के ही विल्कुल तुल्य आयरे मुखारविन्द स उन्हें पुन श्रवण करना चाहत हैं ॥७॥ क्यससगंभगवान् लोग्नायश्चराचरम् । वस्माच्च भगवान्विष्णुमत्स्यरूपत्वमाश्रित ॥८॥ भैरवत्व भवस्यापि पुरारित्वञ्च गद्यते । यस्य तो पानित्य जगाम वृपभध्वजः ॥l सवमेतत्समाचक्ष्व मूत 1 विस्तरश जमाव । त्यवाक्यनामृतस्येव न तृप्तिरिहजायते ॥ १० ॥ पुष्य पवित्रमायुप्यमिशनी भ्रशुत द्विजा । माल्य पुगणमयिस्त यज्जागाद गदाधर ॥११॥ पुरा राजा मनु म चोणवान् विपुलतप.। - आपने जो N मत्स्यावतारवर्णन पुर्वराज्य समारोप्यक्षमावान् विनन्दन ॥१२ मलयस्यैकदेगेतु सर्वात्मगुणसयुत. समदुखमुम्पोदीनःप्रामवान योगमुत्तमम् ।। १३ वभूव वरदश्चास्य वर्षायुतशते गते। वरम्वृणीव प्रोवाच प्रोत. स कमनामन. ॥१४ लोगों के स्वामी भगवान ने इस चराचर सम्पूर्ण सृष्टि का रिस प्रसर मृजन किया था और रिम कारण से मावान शिपु ने माम्य का स्वरूप धारण क्यिा या ||८|| मगवान् भव की भी भग्द स्वापता पुरारित्व होना कहा जाया करता है अर्थात त्रिपुरामर में हनन करने वाले और भैरव स्वरूप धारण करने वाले मद को कहा करत हैं किन्नु ऐसा कोनमा कारण है जिसके होने से भगवान् वृषभवत्र प्रभु पाली नो गये हैं। ह मूतजी यह ममा कुछ पार विस्तारपूर्वक प्रम मे हमको बतलाने वा अनुग्रह करें। आपकी परम श्रेसनकरी मधुर वचनावली ही ऐनी है जो अमृन बैं ममान ही है कि इससे हम को कभी तृप्ति नहीं होती है । १०॥ थी मूतजी ने कहा है द्विजगा! इम समर में परम पुण्यमय-आयु को वृद्धि करने वाला और जति पवित्र मम्पूर्ण मत्स्य पुरान का ही आप लोग श्रवण करिये निमको भगवान् गदाधर ने स्वयं कहा था ।।११।। प्राचीनकान में मनु नामधारी एक राजा पाजो चोदाना और बहुत ही अधिक तपम्बी था। उसने अपन पुत्र पर ममम्त राज्य का भार सौरकर वह समादान रविनन्दन योगाभ्यासी होगया था ।१२। मलय देश एक भाग में यह सम्पूर्ण मामा क गुणों से सवृत होकर तपा मुग और दुख दोनों को समान भाव मे मानकर दौर उतम योग को प्राप्त हो गया था||१३|| जिन रामय में एक्नो दम सहन वर्ष यतीत हो गये थे तब वह भगवान् कमलामन परम प्रसन्न हो गये ५ और इसको वरदान देने वाले बन गये थे। उन्होंने मनु वे ममीप में सामान् समुाम्पित होकर कहा पा, नो चाहो वरदान मांग लो ||१४|| मत्स्यपुराण एवमुक्तोऽनवीदाजा प्रणम्य स पितामहम् । एकमेवाहमिच्छामि त्वत्तो वरमनुत्तमम् ।। १५ भत ग्रामस्य सवस्य स्थावरस्य चरस्य च । भवेय रक्षणायाल प्रलये समुपस्थिते ॥ १६ एवमास्त्वति विश्वात्मा ततौवान्तरधीयत। पुष्पवृष्टि सुमहती खात्पपात सुरार्पिता ॥ १७ कदाचिदाश्रमे तस्य कुवत पितृतपणम् । पपात पाण्योहपरि शफरी जलसयुता ॥१८ दृष्टवा तच्छपरीरूप स दयालुमहीपति । रक्षणायारोद्यत्न स तस्मिन् करकोदरे ॥१८ अहोरात्रोण चकेन पोडशागुलविस्तृत । सोऽभव-मम्यरूपेण पाहि पाहोति चाब्रवीत् ।।२० स तमादाय मणिक प्राक्षिरज्जलवारिणम् । तत्रापि चारााण हस्तत्रयमवधत ।। २१ जब गजा से इस तरह ब्रह्माजी के द्वारा कहा गया तो उसने पिनामह चाणा म प्रणाम किया था और फिर राजा ने कहा हे भगवन् । मैं आपसे वे वन ए ही अत्युत्तम वरदान प्राप्त करना चाहता हू ॥१५॥ जिम समय म इम सम्पूर्ण भूतो के समुदाय वा तथा समस्त स्थ. घर और घर मृष्टि का प्रलयकाल उपस्थित हा तो उस भीषण समय मे में रावतीक्षा न म स मममय हो जाऊ॥१६॥रा घर की याचना वा मु विश्व! 174 एवमर । प्रर्थात सा हाव । वह पहने वटाम हो वही पर अनन्ति हो गये थे उसी समय में अन्तरिक्ष से दवाण दाबी गई या भारी पुष्पा को पा हान सगी थी॥१७॥ गा अननरगिी गमय म वर मा आधम म आन पितृगण में निररहयता उना हाथा मशपरी (ममी) जलद मापही भाग पी॥१८|| उग या महीपति न उस परी ५ स्वरूप ।

मत्स्यावतारवर्णन ५ को देखकर उसी की रक्षा करने का यत्न क्यिा था और उसने उसे करवोदर में रख दिया था ॥१६॥ एक ही अधं रात्रि के समय में वह सोलह अगुल के विस्तार वाला हो गया था और वह मत्स्य रूप से सम्पन्न होकर उस राजा से "मेरी रक्षा करो -मेरी रक्षा करो"-यह बोला ।।२०।। उस राजा ने उस जलवारी को लेकर एक मणिक मे डाल दिया था । वहाँ पर भी वह एक ही रात्रि मे तीन हाथ का होकर बढ़ गया था ॥२१॥ पुनः प्राहार्तनादेन सहस्रकिरणात्मजम् । समत्स्यः पाहि पाहोति त्वामह शरणङ्गतः ॥२२॥ तत. स कूपेत मत्स्य प्राहिणोद्रविनन्दनः । यदा न माति तथापि कूपे मत्स्यः सरोवरे ॥२३॥ क्षिप्तोऽमौ पृथुतामागात्पुनर्योजनसम्मिताम् । तत्राप्याह पुनर्दीन. पाहिपाहि नृपोत्तम ।।२४ तत. स मनुना क्षिप्तोगङ्गायामप्यवधत । यदा तदा समुद्रत प्राक्षिपन्मेदिनीपतिः ॥२५ यदा समुद्रमखिल व्याप्यासी समुपस्थित. । तदा प्राह मनुर्भात कोऽपित्वमसुरेतरः॥६ अथवा वासुदेवस्त्वमन्य ईक्कथं भवेत् । योजनायुतविंशत्याकस्य तुरुप भवेद्वपु ॥२७ ज्ञातस्त्वमत्स्यरूपेण मा खेदयसिकेशव । हृषीवेप ! जगन्नाथ ! जगद्धाम ! नमोऽस्तुते ।।२८ उरा मत्स्य ने फिर उस सूय के पुत्र नृपति से बड़े ही आर्तनाद कहा था कि मेरी रक्षा करो-रक्षा करो-मैं तो इस समय मे प्रापकी रणागति मे आगया हू ।।२२।। इसके पश्चात उस रवि के पुत्र राजा ने कुए मे डाल दिया था। जब वह मत्स्य कुए मे भी नहीं माया था तो उस मत्स्य को एक सरोवर मे प्रक्षिप्त कर दिया था। इस मत्स्य ६ मत्स्यपुरण वहा पर भी वह बहुत बड़ा होकर एक योजन के विस्तार वाला हो गया था और वहा पर भी वह पिर अधिक दीन होकर राजा से बोला था- हे नृपश्रेष्ठ । मेरी रक्षा करो-रक्षा करी ॥२३॥२४॥ इस के अनन्तर उस मनु के द्वारा वह गङ्गा मे प्रक्षिप्त कर दिया गया था किन्तु वह बहा पर भी बढ गया था। ऐसा जिस समय में देखा तो उसी समय मे राजा ने उप्त मत्स्य को समुद्र मे डाल दिया था। जब यह सम्पूर्ण समुद्र में व्याप्त हाकर समुपस्थित हो गया था तो उस राजा मनु ने अत्यन्त भय- भात होकर उससे बोला था-तुम असुरेतर कौन हो । ॥२५।२६।। अथवा याप साक्षात् भगवान् वासुदेव ही हैं । अन्य इस प्रकार का विस तरह हो सकता है । आपका यह शरीर का प्राकार अयुत विशति योजन वाला हो गया है ।।२७११ हे केशव ! मैं अब भली भांति जान गया है कि भाप इस विशाल मत्स्य के स्वरूप मे समुपस्थित होकर मुझे खेद दे रहे हैं। हे हृषीकेश । हे जगत् के स्वामिन् ! हे जगद्धाम ! आपकी सेवा मे मेरा परम समर्पित है ॥२८॥ एवमुक्त सभगवान्मत्स्यरूपीजनादन । साघुमाध्वितिचोवाचसम्यग् ज्ञातस्त्वयाऽनघ ॥२६ अचिरेणव कालेन मेदिनी मेदिनीपते । भविमति जले मन. सशैलवनवानना ।। ३० नौरिय सवदेवाना निकायेन विनिमिता। महाजीवनिकायस्य रक्षणार्थ महीपते ॥ १ स्वदाण्डजोदिजोयेवैयेचजाबाजरायुजाः । अस्यानिघायसवास्ताननाथान् पाहिसुव्रत ॥३२ युगान्तवाताभिहता यदामवतिनोनप! शृङ्गाऽस्मि मम राजेन्द्र ! तदमा सयमिप्पमि ॥३३ ततालया ते सर्वरय म्यायरस्य चरस्यच । प्रजापतिस्त्य गविता जगत पृथिवीपते ॥३४ मत्स्यावतारवर्णन एवं कृतयुगस्यादौ सर्वज्ञो घृतिमान्नृपः। मन्दन्तराधिपश्चापि देवपुग्यो भविष्यसि ॥३५ इस प्रकार से राम ने जब मम्य में निवेदन मिला तो उस समय में मत्स्य स्वरूप को धारण करने दाल भगवान् जनार्दन ने कहा-बहुत मच्छा बहुत ही ठोर ! हे अनघ । तुमने मुजो अच्छी तरह ने पहिचान लिया है ।।२॥ है मेदिनी के स्वामिन् ! अब बहुत ही थोटे-से समय में यह पृथ्वो बल में मग्न हो जायगी। जिरा में ये समस्त पर्वत बन और कानन मभी इन मेदिनी के साय बल में हर जायेगे ॥३०॥ है महीपत्रे ! यह नौका ममस्त देवों के निकाय में निर्मित हुई नौर महान जीवों के निकाय को रक्षा के लिये ही इसका निर्मारा उत्तम है ।।३१॥ स सुदन ! जो भी स्वेदज-अण्डज-जरायुज और भित्र जीव है उन सब मनापो को इसी नौका में रखकर आप उनकी रक्षा कोविएगा ॥३॥ जिस युगान्त से अभिहत यह नौका होवे तव हे नृप ! हे राजेन्द्र ! इमो मेरे पृङ्ग मे स यमित कर देना ॥३३॥ हे पृथिवी पते ! इसके उपरान्त जिन समय में समस्त स्थवर और चर के लयका मन्त हो उस वक्त आप ही इस सम्पूर्ण जगन् । प्रजापति होगे ॥३४॥ इम प्रकार से सतयुग के कादि काल में सवा और पतिमान नृप बऔर देवी क द्वारा पूज्य मन्दन्तर का भी पाप होगा ॥३॥ ममय में की वायु २-मत्स्य-मनुसंवादयन एवमुक्तो मनुस्तेन पप्रन्छ मधुसूदनम् । भगवन् ! किद्भिवगविष्यत्यन्तन्क्षयः ॥१ सत्लानि च पथ नाय । रक्षिप्ये मधुसुदन! स्वरा मह पुनर्योग २५ वा मस्तिामम - G मरस्यपुराण अद्य प्रभृत्यनाटिभयिष्यति महीतले । यावर्षशत सामन्दुमिक्षमगुमावहम् ॥ ३ ततोऽल्पसत्वक्षयदा रश्मयः सप्त दारणाः। सप्तसप्तेर्भविष्यन्ति प्रतप्ताङ्गारणिन. ।। ४ और्वानलोऽपि विकृतिङ्गमिप्यति युगक्षये । विपाग्निश्चापि पातालारसइपणमुसच्युतः। भवस्यापि ललाटोत्यतृतीयनयनानल ॥ ५ निजगनिर्दहन क्षोभसमेप्यति महामुने ! एवदग्धा महीमा यदास्याद्भस्ममन्निभा ।। ६ आकाशमूष्मणा तप्तम्भविष्यति-परन्तप । तन सदेवनक्षन जगद्यास्यति सक्षयम् ॥ ७ श्री सूतजी ने कहा- उन मत्स्यावतारी भगवान के द्वारा इस प्रकार से कहे जाने पर राजा मनु ने मधुसूदन प्रभु से पूछा था-हे भग- वन् । यह अन्तर क्षय कितने वर्षों मे होगा ! ॥१॥ हे मधुसूदन ! हे नाथ | इन जीवो की रक्षा किस प्रकार से मैं करूंगा । फिर आपके साथ मे मेरा योग कैस होगा? २।। मत्स्य भगवान् ने कहा-आज ही से लेकर इस महीतल मे अनावृष्टि (वर्षा का अभाव) होगी। जिस समय तक साम सौ वष होगे तब तक यहाँ पर परम अशुभ का देन वाला अमाल हो जायगा ।।॥ इम के अनन्तर पूण प्रतप्त अङ्गार के वण के समान वण वाले सप्न सान सूर्य सात दारुण रश्मिया हो जायगी जो छोटे २ सत्वा के क्षय को कर देने वानी हैं ॥४॥ युग के क्षय मे औ. मल भी विकृति को प्राप्त हो जायग' । पाताल लोक से भगवान् स कषण के मुख स च्युत विपाग्नि भी विकृत स्वरूप धारण करेगा और महादव जो व ललाट म उस्थित तीसर नेत्र का अनल भी महान् विकृत रूप धारण करेगा ||५|| हे 'हामुने । इन तीनों लोको को निदाध करते हुए परम क्षाम को प्राप्त हो जायगा। इस तरह से यह सम्पूर्ण पृथ्वी -

m
मम्गावतारवर्णन
दम होकर उस समय में मम्म रे सहन हो जायगी उम ममय में
है परन्तप । रह समस्त शाकाम मण्डल उप्मा से एकदम तप्त हो
जायगा। इसो अनन्नर देगण और नक्षत्रो के सहित यह सभूर्ण
जगत् समय को प्राप्त हो जायगी
सम्वतों भीमनादच द्रोणरचण्डोबलाहक ।
विद्युत्पनाफः शोणतुमप्तंतेलववारदा.।।८
अग्निप्रस्वेदसम्भूता प्लामिप्यन्तिमेदिनीम् ।
समुद्राः क्षोभमागत्य चकत्वेन व्यास्थिता ॥
तिदावमवंरिप्यन्ति जगत्नयम् ।
वैदनामिमा
गृत्य सत्ववीजानि सवशः। १०
आरोप्य रज्जुयोगेन गत्प्रदतेन सुव्रत ।
सयम्य नावं मन्द मत्यभावाभिरक्षित. ॥११
एक. स्थास्यति देवेषु द घेतपि पर-तप
साममूर्यावह ब्रह्मा चतुझेरसमन्वित ॥१२
नमंदा चनदीपुण्यामावण्टेयोमहानरपि ।
भवोवेदा पुराणश्वविद्यामि.मवंतोयतम् ॥१३
त्वया साद मिद विश्व म्यास्यत्यन्तरमत्तये ।
एवमेकावे जाते चाक्ष पान्तसमये ॥११
सम्वतं-भीमनाद--द्रोण--वड- लाह्न-विध पताक और
मोण ये सात समार वा लप करने वाले मेन है ॥८] अग्नि के प्रस्वेद से
सम्भूत इम मेदिनी को य मध प्लावित कर देगे। समुद्र भी सब भाभ
को प्राप्त होकर एक 7 वाले व्यवस्थित हो जायेंगे। यह लोग हो
सम्पूर्ण को एक मारमय कर देंगे अर्थात पारों आर तोर में समुद्र
के अतिग्नि अन्य कुछ भी दिखाई नहीं देगा। उस समय मे हम वेद
नौका का प्रल कर मी ओर से सत्त्व वीजो को दममे स. रो पत
वरसे हे मुन! मेरे द्वारा दिये हुए रज्जु के ग से इस नाव का

10 मायरान सयमित परसे मेरे ही पल में मेरे प्रभाव मे गुरधिम होगा 1112mmail ॥११॥ हे परन्तप ! समस्त योग्य हो जाने पर भी एक देव उस समय में भी स्थित रहेगा । वह सोम और सूर्य समावहन परने वाले पारों लोको से समन्वित ब्रह्मा जी होगे ॥१५|| नर्मदा परम पुरमयी नदी है और माईण्डेय महान ऋषि है। सब वेद और पुराण तपा विद्याओ से सर्वत वृत्त यह विश्व आप पे साप अन्तर समय में रिपत रहेगा जबकि यह पाशुपान्तर सक्षय एकार्णव मात्र रहेगा ॥१३॥१४॥ वेदान् प्रवत्तयिष्यामि त्वत्सर्गादो महीपते । एवमुक्त्वा स भगवास्तत्रैवान्तरधीयत ॥१५ मनुरप्यास्थितोयोग वासुदेवप्रसादजम् । अभ्यसन यावदाभूतसंप्लव पूर्वमूचितम् ॥१६ काले यथोक्ने सजाते वासुदेवमुखोद्गते । शृङ्गी प्रादुर्वभूवाथमत्स्यरूपी जनादनः ॥१७ भु गोरज्जुरूपेणमनो पाश्वमुपागमत् । भूतान्सर्वान्समाकृष्ययोगेनारोप्यधम्मवित् ॥१८ भुजङ्गेरज्वा मत्स्यस्य शृङ्ग नावमयोजयत् । उपय्युपस्थितस्तस्या प्रणिपत्यजनार्दनम् ॥१६ आभू सप्लवे तस्मिन्मतीते योगशायिना। पृष्टेन मनुना प्रोक्त पुराण मत्स्यरूपिणा ।। तदिदानी प्रवक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमाः ॥२० यद्भवद्भि पुग पृष्ट सृष्टयादिक्महन्द्विजा । तदेवैयाणवे तस्मिन् मनु पप्रच्छ केशवम् ।।२१ हे महीपते । आपके स्वर्ग के आदिकाल मे मैं वेदो को प्रवृत्त पगा। इतना कहकर वह भगवान वही पर अन्तर्यात हो गये थे ॥ १५ ॥ महीपति मनु भी भगवान् वासुदेव के प्रसाद से समुत्पन्न योग मे समास्थित होगये थे जिसका अग्रास पूर्व मे सूचित जब तक भून सप्लव रहा तब तक करते रहे थे ।। १६ ।। भगवान् व सुदेव के मुख

मत्स्य मनुरावादवर्णनम्
द्वारा उद्गत गाभी कहा गया था उसी काल के समुपस्थित हो जाने पर
मत्स्य स्वरूप को धारण करने वाले जनार्दन श्रृङ्गो प्रादुर्भूति होगये ये
॥ १७ ॥ एक भुजग रज्जु ( रस्सा ) के स्वरूप में मनु के पावं में
समागत हो गया था। धर्म के वेता उस मनु ने समस्त भूतो का समा-
कपित करके योग के द्वारा समारोपित कर दिया था ।। १८ ।। उस
नौका को भुजग की रज्जु से मत्स्य के शृग मे योगित कर दिया था।
फिर भगवान् जनादन की सेवा में प्रणिपात करके उस नौका के ऊपर
स्वयं उपस्थित होगया था॥१६॥ उस आभूत संप्लव के समाप्त हो
जाने पर योगशायो मत्स्य रूपी मनु के द्वारा पूछे जाने पर यह पुराण
कहा गया था। उसे ही इस समय मे मैं कहूंगा । हे श्रेष्ठ पिगण ।
आप सब लोग उसका श्रवण कीजिये ।। २० ॥ है द्विजवृन्द ! आप लोगो
ने पहिले मुझसे सृष्टि प्रादि का वृत्तान्त पूछा था वही उस समय में जब
कि यह सम्पूर्ण जगत् एक अर्णव स्वरूप मे या मनु ने भगवान् केशव से
पूछा था ॥ २१ ।।
उत्पत्ति प्रलयञ्चव वंशमन्वन्तराणि च ।
वंश्यानुचरितञ्चैव भुवनस्यच विस्तरम् ॥२२
दानधर्मविधिञ्चव श्राद्धवत्पश्च शाश्वतम्।
वर्णाश्रमविभागञ्च तथेष्टापूर्तसशितम् ।।२३
देवतानां प्रतिष्ठादि यच्चान्यद्विद्यते भुवि ।
तत्सर्व विस्तरेण व धर्मव्यात्यातुमर्हसि ॥२४
महाप्रलयसालान्त एतदासीत्तमोमयम् ।
प्रसुप्तमिव चातय॑मप्रज्ञातमलक्षणम् ।।२१
अविज्ञेयगविज्ञात जगत् स्थास्तुचरिष्ण च ।
तत स्वयम्भूरव्यक्त प्रभव पुण्यकम्मणाम् ॥२६
व्यञ्जयन्नेतदखिल प्रादुरासीत्तमोनुद ।
योऽतीन्द्रियः परोव्यक्तादणुायान् सनातन ।

१२ मरस्यपुराण नारायण इति रयातः स एकः स्वयमुद्यभौ ॥२७ य: शरीरादभिध्याय मिसृक्षुविविध जगत् । अपएव ससर्जादो तासु बीजमवासृजत् ॥२८ मनु ने कहा-हे भगवन् ! इस विश्व की उत्पत्ति तथा इसको प्रलय-राजाओ आदि के वश तथा मन्वन्तर-वश में होने वाला अनुचरित और इस भुवन का विस्तार, दान, धर्म का विधान-शाश्वत श्राद्धकल्प- चारो वरणों तथा चारो आश्रमों का विभाग तथा इष्टापूतं सज्ञा वाला कर्म, देवगणी की प्रतिष्ठा आदि एवं अव्ययी जो कुछ भो इस भूमण्डल में विद्यमान है वह सभी कुछ विस्तार पूर्वक तथा धर्म की पूर्ण व्याख्या का कथन करने को आप परम योग्य हैं उसे अब कहिये ।।२२।२३।२४॥ मत्स्य भगवान ने कहा--यह तमोमय महा प्रलय का अ। काल है । यह प्रसुप्त की भांनि तर्क न करने के योग्य अप्रज्ञात और लक्षण शून्य ही होता है ।। २५ ॥ यह स्थावर और चर जगत् अविज्ञेय और अविज्ञात सा रहता है । इसके अनन्तर पुण्य कम्मों का प्रभव - अध्यक्त स्वमम्भू तम का नोदन करने वाले इस समस्त जगत् को प्रकट करते हुए प्रादुर्भूत हुए थे। जो इन्द्रियो को पहुँच से अतीत अव्यक्त से पर, अशु, ज्यामान् और समातन थे । इनका शुभ नाम नारायण प्रसिद्ध था, यह एक ही थे और स्वयं ही उद्भत हुए थे। ॥ २६ ॥ ॥ २७ ॥ जिन ने अपने शरीर से अमिध्यान करके इस विविध भांति के जगत की रचना करने की इच्छा वाले थे । इसीलिए सृजन किया था और आदि मे उन मे बीजो का अर सृजन किया था ।। २८ ।। तदेवाण्ड समभवद्धेमरूप्यमय महत् । संवत्सरसहरण सूर्यायुतसमप्रभम् ।। २६ प्रविश्यान्तमहातेजा स्वयमेवात्मसम्भवः । प्रभावादपितन्व्याप्त्याविष्णत्वमगमत्पुन ॥३० तद तभगवानप सूय्य समभवत् पुरा।

मत्स्य मनुमन दवर्णन सादित्यश्चादिभूतत्वात् ब्रह्माब्रह्मपठनभूत् ॥३१॥ दिव भूमि ममकरोत्तदण्डसकलद्वयम् । सचासगदिश सर्वामध्येव्योमच शाश्वतम् ॥३२ जर यमरमुग्याइन शैलान्तस्याभवस्तदा। यदुल्चन्तनू मेघन्तडिसघातमण्डलम् ॥३३ नद्याऽण्डनाग्न. सम्भूना. पितरोमनवस्तथा। सप्तयेऽमीममुद्राश्चतेऽपिचान्तजलोद्भवा । लवणेक्षुमुराद्याच नानार लममन्विताः ॥३४ स सिमृक्षुरभद्देवः प्रजापतिररिदम । तत्तजसश्च तप मातण्ट. समजायत ।। २५ मृतेऽडे जायने यम्मान्मात डस्तेन म-मृत.। रजोगुणमय यत्तद्रूप तस्य महात्मनः । चतुर्मुखः म भगदानभूल्लोकपितामहः ।। ३६ येन सृप्ट जगत्मर्व मदेवामुरमानुपम् । तमवेहि रजोम्पं महन्मत्वमुदाहृतम् ।।३७ वही अण्ड हेम रुप्यना महान हो गया था और एक सम मम्व- स्मर में ग्रह दश या सर्यों की प्रभा के ममान प्रमा वाना होगया या ।। २६ ।। महान तेज से मुक्त ग्राम सम्पत्र प्रांत म्यामू प्रम अन्तर मे स्वप हो प्रविष्ट होकर प्रभाव से भो उमकी माप्ति के .रा फिर वह विष्णुत्व को प्रारन हो गया था ।। ३० । सो अ नर में गये हुए यह भगवान् येत्रमा आदि होने 7 कारण ने प्राका पाठ करन हु आदि- हुए ॥ ३१ ॥ उन अन्ट के दो खण्डो ने दिन और भूमि को दिया था और उसने समा दिमागे को बनाया था तथा मध्य मे शाश्वत छोम की रचना की थी।॥ ३२॥ उम ममा में उसके जटायु शैल हुर श्रे। जो उल्लण था दही और विद्युत् के पहिल मूर और मुम्ब

मत्स्यपुराण
पितृगण और
सङ्घात का मण्डल होगया था !॥ ३३ ॥ उस अणु नाम से नदिया तथा
मनु
वर्ग हुए थे। जो ये सात समुद्र हैं वे भी अन्तर मे
जल से उद्भव प्राप्त करने वाले हो गये थे। जिनका लवण सागर इक्ष
समुद्र और सुरा सागर आदि कहा गया है वे सव अनेक रत्नो स समन्वित
होगये थे ॥ ३४ ॥ हे आरन्दय सृजन
करने की इच्छा वाले
वह
प्रजापति होगय थे। उनके तेज से वहा पर यह मातण्ड समुत्पन्न होगयाँ
था ॥ ३५ ॥ अण्ड के मृत होने पर जिससे यह समुत्पन्न होता है इसी
कारण से यह मार्तण्ड कहा गया है। उस महान् आत्मा वाले का यह
रजोगुणमय स्वरूप है । लोको के पितामह वह भगवान् चार मुखो वाले
होगये थे ॥ १६ ॥ जिसने इस सम्पूर्ण जगत् का सजन किया है जिसमे
देव-असुर और मानव सभी हैं उसको रजोगुण के रूप वाला समझलो
और महत्सत्त्व उदाहृत किया गया है ।। ३७ ।।
३--सृष्टि-प्रकरण
चतुर्मुखत्वमगमत्कस्माल्लोकपितामहः ।
कथ तु लोकानसृजत् ब्रह्मविदाम्बर ॥१
तपश्चचार प्रथमममराणा पितामहः।
आविर्भूनास्ततो वेदा. साङ्गोपागपदक्रमा ।। २
पुराण सर्वशास्त्राणा प्रथम ब्राह्मणा स्मृतम् ।
नित्य शब्दमयपुण्य शतकोटिविस्तरम् ॥३
अनन्तरञ्च वक्तेभ्योवेदास्तस्यविनि सृता. ।
मीमासान्यायविद्याश्चप्रमाणाष्टक्षसयुताः ।।
वेदाम्याममरतस्यास्य प्रजावामस्य मानसाः ।
मनस पूर्वमृष्टावं जातायत्तेनमानसाः ॥५

मत्स्यपुराण । शारीरानथ वक्ष्यामि मातृहीनाम प्रजापते. । अगृष्टाइक्षिणाद्दक्ष प्रजापतिरजायत IME घमस्तनान्तादभवत हृदयात्कुमुमायुधः । भ म यादमदतोधोलोभश्चाधरसम्भवः ।।१० बुद्ध मोह. समभवदहकारादभून्मदः । प्रमादचाभवत् ण्ठान्मृत्युलोचनता नृप ।११ भरत करमध्यातु ब्रह्मसूनुरभूत्तत । एते नव । सूता राजन् ! कन्या च दशमी पुन । अङ्गजा इति विरयाता दामी ब्रह्मण सुता ॥१२ बुद्ध र्मोह समभवदिति यत्परिकात्तितम् । अहङ्कार. स्मृत क्रोधोबुद्धिनामकिमु यते ॥१३ इस भांति ब्रह्माजी के भृगु पुत्र उत्पन्न हुए थे और तुरन ही स्वरूप समप मे नारद जी का प्रादुर्भाव हुआ था । इस प्रकार से ब्रह्माजी ने इन दश मानस मुनियो को समुत्पन्न किया था ।। ।। इसके उपरान्त अब मैं प्रजापति के माता से रहिन पुत्रो के शरीरो का वर्णन करता हूँ कि किस अङ्ग से किसको समुत्पत्ति हुई थो। ब्रह्मामी के दक्षिण अगुष्ठ से दक्ष प्रजापति का जन्म हुआ था ।। ६ ॥ स्तन क अन्तर से धर्म और हृदय से कुसुमायुध [ वामदेव ] हुआ था। भोटो के मध्य भाग से क्रोध की उत्पत्ति हुई थी तथा अधरो से लोभ समुत्पन्न हुआ था ॥ १०॥ बुद्धि से मोह पैदा हुआ और प्रकार से मद की ममुत्पत्ति हुई थी। हे नृप | ब्रह्माजी के का, भाग से प्रमोद का जन्म हुआ था और लोचनो से मृ यु की उत्पत्ति हुई ।। ११ । इसके उपरान्त ब्रह्माजी का पुत्र भरत उनके वर के मध्य भाग से उत्सन्न हुआ था । हे राजन् ! ये नौ तो ब्रह्माजी के सुत हुए थे और फिर दगमी कन्या ममुसान हुई थी। पह ग्रहमा की दशमी कन्या { पुत्री ] अगजा-इस शुभ नाम से विरयात हुई पो ॥ १२ ॥ मनु महर्षि ने कहा -हे भगन ! आपने अभी यह वणन !

मरम्पपुराण । कर दिया करती है |१५|| जब ये ही तीन गुण क्षोम को प्राप्त होते हैं तो इनसे तीन देव समुत्पन्न होकर तीन स्वरूपों में सामने आते हैं। सिद्धान्तत; यह एक ही मूति है और उम एक के ही ये तीन भाग ज या करते हैं जो ब्रह्मा-विष्णु और महेश-इन तीन शुभ नामो वाले होते हैं ।।१६।। वह विकार युक्त प्रधान से महत्तस्व समुत्पन्न होता है। इसकी 'महान्' यह स्याति इसी लिये है कि यह सदा लोको का होता है। ॥१७॥ मान के बढाने वाला अहवार महत्तत्व से समुत्पन्न होता है । इसके पश्चाद पांच ज्ञानेन्द्रियां होती हैं। जिनके विषय मे बतलायेगे तथा पांच अन्य कर्मेद्रियां होती हैं ॥ १८॥ पांचो ज्ञानेन्द्रियो के माम श्रोत्र त्वक् नेत्र-जिला और नासिका ये हैं । पायु उपस्थ-हस्त-पाद नाक-ये पांच कर्मेन्द्रियो के नाम हैं, यही दशो इन्द्रियो का संग्रह है ॥१॥ इन दशो इन्द्रियो के भि न २ अपने विषयो के कम स ही बसलात हैं। ज्ञानन्द्रियो के विषय शब्द-स्पर्श रूप रस और गन्ध है । कर्मेन्द्रियो के विषय क्रमश उत्सर्ग-आनन्द-दान गति और आलाप ये इनको क्रियाएँ हैं ॥२०॥ मन ग्यारहवीं सर्वोपरि इन्द्रिय है । इस में कर्म और बुद्धि दोनो ही गुणो का समावेश होता है। इन्द्रियो के अवयव बहुत ही सूक्ष्म होते हैं । मनीपीगण उसकी मूर्ति का समाश्रय ग्रहण करते हैं। गी कारण रो उनका शरीर त-मात्रा कहा गया है शरीर के हो योग से मह जीवात्मा भी बुधो के द्वारा शरीरी कहा नाया करता है ॥२१,२२।। श्रयन्ति यस्मात्तन्मात्रा शरीर तेन सस्मृतम् । शरीरयोगाजीवोऽपिशरीरोगतेबुध ॥२२ मन सृष्टि विकुरुते चाद्यमान सिमृलया। आकाशशब्दत मानादभूच्छन्दगुणात्मकम् ॥२३ आकाशविकृतेर्वायुः शब्दस्पर्शगुणोऽभवत् । वायाश्च स्पर्शत मात्रात्तेजश्चाविरभूतत ॥२४ त्रिगुण तद्विवारेण तन्छन्दस्पयरूपवत।

सृष्टि-प्रकरण १ तेजोविकारादभवद्वारि गजर वतुर्गुणम् ॥२५ रसतन्मात्रसम्भूत प्रायोरसगुणात्मकम् । भूमिस्तु गन्धतन्मानादभूत्पञ्चगुणान्विता ॥२६ प्रायागन्धगुणा सातु बुद्धिरेपा गरीयसी। एभिः सम्पादित भुङ्क्तेपुरुषःपञ्चविंशक. ॥२७ पूजन करने की इच्छा से प्रेरणा प्राप्त हुआ मन सप्ठि किया करता है । यह प्राकाश शब्द तन्मात्रा से हो समुत्पन्न होता है और इस आकाश का शब्द हो विशेष गुण होता है 1.२३॥ याकाश को विकृति से वायु को समुत्पत्ति होती हैं और इस वायु के शब्द और स्पर्श ये ही विशेश गुण हुआ करते हैं। वायु के स्पर्श तनमात्रा से शब्द गुण के स्वरूप वाला तेज प्रदुभूत हुआ करता है। इस तेजमें शब्द के अतिरिक्त स्पर्श और रूप के भो दो गुण और होते हैं । ऐमे यह तीन गुणो वाला होता है। तेज के विकार से जल की उत्पत्ति होती है । इस जल मे है राजद चार गुण होते हैं ॥२४, २१, यह इसकी तन्माना से समुदत होता है बतएव यह प्रायः इस गुण से समावित होता है । भूमि गन्ध की तन्मात्रा से उत्पन्न होती है और इसमे रूप-रस-स्पर्ण-शब्द और गन्ध ये पांच गुण होते हैं ।।२६॥ प्राय. यह गन्ध गण वाली ही होती है और यही गरीयसी बुद्धि भी है | इनके द्वारा सम्परराहित को यह पजविंश पुरुष भोजता है ॥ २७ ॥ ईश्वरेच्छावशः सोऽपि जीवात्मा कथ्यते बुधः। एव पर्दिशकप्रोक्त शरीरहमानदे ।। २८ सांस्यसंख्यात्मकत्वाच्चकपिलादिभिर-यते। एतत्तत्त्वात्मकंकृत्वाजगद्वे घाअजीजनत् ॥ २६ सावित्री लोकगृष्ट्यर्थ हदि कृत्वासमास्थितः । तत सजपतस्तस्यभित्वादेहमाम्मपम् !! यावदन्दशत दिव्यं यथान्यः प्राकृतो जन ।

२० मग्यपुराण तत पालेन महतातस्या पुरोऽभवन्मनुः ॥३१ स्वायम्भुव इति रयात स विराडिति न श्रुतम्। तद्रपगुणसामान्यादधिपूरप उच्यते ।। ३२ वराजा यक्ष ते जाता बहव शसिप्तप्रताः। स्वायम्भुवा महाभागा सप्त सप्त तथापरे ।। ३३ स्वारोचिपाधा सर्वे ते ब्रह्मतुल्यस्वरूपिण । औत्तमिप्रमुखा स्तटूद्य पान्त्व सप्तमोऽधुना ॥३४ वुधो के द्वारा वह जीवात्या भी ईश्वर की इच्छा के वश में रहन वाला कहा जाता है । इस प्रकार से इस मानवीय शरीर म छब्बीस तत्व युक्त या यह वदिशा इस नाम से कहा जाया करता है ।। २८ ॥ तत्वों की सख्या के स्वरूप वाला होने ही से कपिल आदि के द्वारा यह सास्य शास्त्र या दशन कहा जाता है। वेधा ने इस जगत् को एक तत्व के स्वरूप वाला समुत्पन्न किया है ॥२६॥ लोक की सष्टि के लिये सावित्री को अपने हृदय मे करक ही प्रजापाल समास्थित होते हैं । इसक उपरात भलीभांति जाप करते हुए उनके कल्मप सहित शरीर का भेदन करके ही सावित्री प्रकट हुई थी॥३०॥ जिस प्रकार से कोई प्राकृत मनुष्य होता है उसो भौति दिव्ध सो वष तक के बहुत महान् काल मे उसका अर्थात सावित्री का मनु पुत्र उत्पन्न हुआ था ।। ३१ ।। इसका स्वायम्भुव मनु-यह शुभ नाम प्रसिद्ध था वह महान् विराट् था-ऐसा हमने सुना है । उसके रूप गुण सामान्य से वह अधि पुरुष कहा जाता है ।। ३२ ।। जहाँ पर वे बहुत से शसित व्रत वाले वैराज ममुत्प न हुए थे तथा दूसरे सात सात महाभाग वाले स्वायम्भुव थे ॥ ३३ ॥ स्वारोचिष आदि वे सब ब्रह्मा के ही तु-य स्वरूप वाने थे। उसी तरह औत्तमि प्रमुख भी थे अर्थात् जिनमे औतमि प्रान था वे भी थे जिनमे आप इस समय में मानवें होते हैं ।। ४॥

२२ मरस्यपुराण आगे करक राप्तपि गण स्थित रहा परते है ।। ५॥ धन्या नाम धारिणी मनु की कन्या ने घव से शिष्ट को जन्म दिया था। शिष्टारमा अग्नि को वन्या सुच्छाया ने सुतो को समुत्पन्न किया था ॥ ६॥ कृप, रिपु, जय, वत्त, वृक तेजस, चाप ब्रह्म दौहित्री में और यह रिपुजय वारिणी में उत्पन्न हुए थे ॥ ७॥ वोरणस्यात्मजायान्तु चक्ष मंनुमजीजनत्। मनुर्वराजकन्याया नवलाया सचाक्षपः॥ जनयामास तनयान्दश शूरानकल्मपान । क : पूरु शतद्यु-नरतपस्वी सत्यवाक् हविः ॥६ अग्निप्टुतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चापगजितः । अभिमन्युस्तु दशमो नड्वलायामजायत 1100 ऊरोरजनयत् पुत्रान पडाग्नेयी तु सुप्रभान् । अग्निसुमनस ख्याति व्रतुमङ्गिरसङ्गयम् ॥११ पितृकन्या सुनीथातु वेनमगादजीजनत् । देनमन्यायिन विप्रा ममन्यस्तत्तराद्भूत ॥ पृथुमि महातेजा. स पुत्री द्वावजीजनत् ।।१२ अन्तर्धानस्तु मारीच शिखण्डिन्यामजीजनत् । हविर्धानात् पडाम्नेयी धिषणाऽजनयत् सुतान् । प्राचीनवहिष साग यम शुक्र बल शुभम् ।।१३ प्राचीनवहिभंगवान् महानासीत्प्रजापतिः । हविर्धाना प्रजास्तेन बहवः सम्प्रवत्तिता. ॥१४ वीरण की आत्मजा मे चक्षु को प्रसूत किया था और वैराज की कन्या नङ वला में सचाक्षुप मनु ने कल्मष से रहित महान् शूरवीर दश पुत्रो को जन्म ग्रहण कराया था। उन दशो के नाम- ऊर-पूरु-शतयुम्न-तपस्वी स यवाहवि-अग्निष्टुत्-प्रतिरात्र-सुद्युम्न- अपराजित और अभिमन्यु दशम था जो नड वला से उत्पन्न हुआ था। मनु ने मरम्वनी त्रि किया १०॥ कह से पहाग्नेयो ने सुन्दर प्रभा वाले पुत्रो को प्रमूत पा उन पुत्रों के नाम अग्नि-गुमन-स्यानि-ऋतु-अङ्गिरा और गर ये थे ।। ११ ।। पितृ कन्या जिसका शुम नाम सुनीषा तो बङ्ग से वैन को जन्म दिया था । राजा वेन बहुत ही अधिक अन्यायो हुना था। बतएव विनों ने उस को शाप देकर फिर उसके शरीर का मथन किया था। उसर हाथ से मन्यन करने पर पृथु गम पाला महान तेजस्वी का जन्म हुआ पा उस मृत्यु ने भी दो पुओं को प्रमूत किया था ॥१२सा इसने शिवण्डिनी में अन्तर्धान और मारीच नाम वाले पुत्रों को उत्पन्न किया था। धिषणा पहाग्नेयोने इविनि म सुतो को प्रमूत किया या जिनमें माप प्राचीन दहि-साङ्ग. यम, शुक्र, बल और शुभ घे ॥१३, प्राचीन हि भगवान् एक महन् प्रजापति हुए थे। उसने हविधान वहन मी प्रयाएँ सम्प्रवर्तित की थीं ॥१४॥ सवर्णायान्तु सामुद्रयान्दशात्त मुतान्प्रभु। सर्वपचेतसोनाम धनुर्वेदस्य पारणा ॥१५ तत्तपारक्षिता वृक्षा वभुर्लोक सम-तत । देवादेशाच तानग्निरदहदविनन्दन ॥१६ सोमकन्याऽभवत्पत्नी मारिया नाम विश्रुता तेभ्यस्तु दक्षमेक ता पुत्र मनयमजीजनत् ।।१७ दक्षादनन्तर वृक्षानौषधानि च सवशः । अजीजनत्सोमकन्या नन्दी चन्द्रवती तथा ॥१८ मोमाशम्यवतम्यापिदक्षम्वासीतिकोटय । तामातुविस्तर वक्ष्ये लोवे य मुप्रतिष्ठिन. ॥१६ दिपश्चाभवन् वैचित देचिद् वपदा नराः । वलोमुखा सयुवर्णा यणप्रापरणास्तथा ॥२. अध्यक्षमुया पेचित केचित् मिहाननान्तया। स्वप्रमुगा वेचित् । विदुष्ट्र मुखाम्नया ।

२४ मत्स्यपुराण प्रभु ने सवर्णा सामुद्रो मे दश सुतो को जन्म प्रदान किया था। ये सभी प्रचेतस नाम से प्रसिद्ध हुए थे ||१५|| उनके तप से सुरक्षित वृक्ष लोक मे सब ओर सुशोभित हुए थे । हे रविनन्दन ! देवो के आदेश से अग्नि ने उनको जला दिया था ॥१६।। मारिपा इस शुभ नाम से प्रसिद्ध उसकी पत्नी हुई थी उनसे एक अगय अर्थात् परमोसम दक्ष नाम वाले पुत्र को उसने प्रसूत किया था ।।१७। दक्ष के अनन्तर सभी ओर बहुत से वृक्ष और प्रौषधियां सोम कन्या ने समुत्पन्न की थी तया नन्दी चन्द्रवती का भी जन्म दिया था ||१८|| सोम के अश उस दक्ष के भी अस्सी कगेड हुए थे उनका विस्तार बतायेगे जो लोक मे सुप्रतिष्ठित हुआ था ॥१६॥ कुछ दो पद वाले और कुछ बहुत पद वाले नर हुए बनीमुख-शकु कण नया कण प्रावरण कुछ अश्व और रीछ के मुख वान तथा कुछ सिह के समान मुख वाले हुए थे । कतिपय कुत्ता और शूकर तुल्य मुख वान और कुछ ऊँट के समान मुख वाले हुए थे॥२०,२९॥ जनयामास वर्मात्माम्लेच्छान् सर्वाननेकश । मदृष्ट्वामनसादक्ष स्त्रिय पश्चादजीजनत् । ददो स दश धर्माय श्यपाय त्रयोदश । सप्तविंशति सामाय ददौ नक्षत्रसज्ञिता ॥ वासु मनुष्यादि ताभ्य सवमभूज्जत् ॥२३ उस धर्मात्मा न सब अनेको म्नेच्छा को भी जन्म दिया था। उादण न मा म राजन, करी पीछे स्त्रियो को जन्म दिया था ।२२॥ उसने उन मे म दश तो धम्म का दी थी-नरह कश्यन को प्रदान की थीं और सत्ताईस नक्षत्र सता वाली सोम को दी थीं। उही स्त्रियो से दद-गुर और मनुष्य प्रवृति का यह सम्पूर्ण जगत् हुमा था ।२३॥

६० प्रजापति ने मंघुनी मुष्टि
५- दक्ष प्रजापति से मैथुनी सृष्टि
देवानां दानवानाच गन्धोंग्गरजलाम् ।
उत्पत्तिविन्तरेणव मूत ! ब्रूहि यथातथम् !!
सङ्खलाहानात् सात् पूर्वपा मृष्टिमन्यते ।
दक्षात्माचेतसाध्वं मृष्टिमभुनसम्भवा ॥१
प्रजानृजेनि व्यादिष्टः पूर्व दत्तः स्वयम्भुवा ।
पया समज चंबाती तथव पुत द्विजाः ! ॥३
यदा तु मृजतम्तस्य दवपिगणपन्नगान् ।
न वृद्धिमगमल्लोपन्तदा मधुनयोगत ।
दक्षः पत्रममापि पावजन्यामजीजनन् ।
तान्तु द्वष्टा महाभाग. मिमक्ष दिविधा प्रजाः ।
नारदःप्रादयंश्यान् दक्षत्रान्ममागतान् ॥५
भुव. प्रमाण सर्वत्र ज्ञात्वोध्वंमध एव च ।
तत मष्टि दिपेण कुरध्वमूपितरामाः ॥६
ते तु तद्वचन ध्रुत्वा याताः सनोदिगम् ।
अद्यापि न निवर्तन्ते ममुद्रादिव निन्धवः ॥3

मस्यपुराण
था ।। विविध भांति को प्रजा की सृष्टि करने की इच्छा करने वाले
महाभाग ने उनको देख करक ना रहने समागत यश्व दक्ष के पुत्र
कहा था ।५। है ऋषि स तमो । सवत्र इस भ मण्डल वा पुमाण अन्व
भाग में और अधोभाग मे भली भात जान कर फिर विशेष रूप से
मष्टि की रचना करो।६। उहोने भी उन के इस वचन को सुन कर
सभी दिशाओ मे प्रयाण किया था और तब स गये हुए वे आज तक
भी वापिस नहीं लौटे हैं जिस तरह नदियों
समुद्र में जाकर फिर वापिस
नही लौटा करती हैं ।
हयश्देषु प्रणष्टेषु पुनदक्ष प्रजापति ।
वीरिण्यामेव पुत्राणा सहस्त्रमसुजत्प्रभु ॥
शबला नान ते विप्रा समेता सृष्टिहेतव ।
नारदोऽनुगतानप्राह पुनस्तानपूर्ववत्सतान ॥
भव प्रमाण सवत्र ज्ञात्वा भ्रातनथो पुन 18
आगत्य चाथ सृष्टिञ्च करिष्यथ विशेषत ।
तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुतन् यथा पुरा ॥१०
तत प्रभति न मातु कनीयानमामिच्छति ।
अविषन्दु खमप्नोतित तेन तत्परिवजयेत ॥ ११
ततस्तपु विनष्टेषु पष्टि या प्रजापति ।
वैरिण्या जनयामास दक्ष प्राचेतसस्तथा ।।१२
प्रादास दश धर्माय कश्यपाय प्रयोदश।
सप्तविंशतिसोमायचतम्रोऽरिष्टनेमय (मिने) ॥१३
द्वे चव भगुपुत्राय शाश्वाय धीमते।
द्व चवाङ्गिरस तद्वत्तासा नामानि विस्तरात् ॥१४
उन यो र नष्ट हो जान पर दक्ष प्रजापति ने पुन पीरिणी
में प्रभु ने एक सय पुत्रों का सुदन रिया ए १८१ वे विप्र सवल इस
नाम काल प और सभी मटि पे हेतु स्वरूप एकत्रित हुए । पिर उन

दक्ष प्रजापति से मैथुनी सृष्टि
अनुगत सुनो से पूर्व की भांति ही नारद ने कहा था कि इस भूमि का
सर्वत्र प्रमाण को जानकर कि यह कितनी विस्तृत है तथा अपने प्रथम
गत माइयों को भी जान कर फिर यहा आकर विशेष रूप से सृष्टि की
रचना करोगे । देवपि नारद जी के कहने पर वे समी उसो मार्ग से चले
गये थे, जिससे पहिले उनने वडे भाई लोग गये थे ।। ६,१०॥ तभी से
लेकर भाई के छोटे भाई उस मार्ग की इच्छा नहीं करता है। अन्वेषण
हुए दुःख को प्राप्त होता है बत्तएव इसी कारण से उसका परि-
वर्सन कर देना चाहिए ॥११॥ इसके अनन्तर उनकै भी विनष्ट हो
जाने पर प्रजापनि प्रायनस दल ने न णी में साठ कन्याओं का सृजन
पिया या अर्थात् उनको जन्म दिया था ॥१॥ उन्ही साट न्यानो में
से दक्ष ने दम न्यायें तो पर्म का दी थी-रह कश्यप ऋषि को प्रदान
की थी, सताईस मोम को प्रसान की थी-वार अरिष्टनेमि को दी थी।
अब उनके नाम विस्तारपूर्वक बतलाये जात है।।१३, १४॥
शृणुध्वं देवमातृणा प्रजाविस्तरमादित.।
मरुत्वती वमूर्यामो लम्बा भानुरन्धती ॥१५
मङ्कल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी।
धर्मपन्य समात्यातास्तामा पुत्राग्निवोधत ।।१६
विश्वेदेवास्तु विश्वाया साध्या साध्यानजीजनत।
मस्त्वत्या मरत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तया ॥१७
भानास्तु भानवम्तद्वन मुहूर्ताया मुहूतका।
सम्बायाघोपनामानानागवीथीतुयामिजा 1195
पृथिवीतलसम्भूनमधत्यामजॉयन ।
सङ्कल्पायास्तु सङ्घल्लो वसुसृष्टिन्निबोधत ॥१६
ज्योतिप्मन्तस्तुयेदेवाव्यापया पर्वतोदिशम् ।
वसवम्तममारयान स्तेपी सगंन्निबोधत २०
आपो प्रवश्न सोमाच घरचंवानिनोऽनलः ।
प्रत्यूपाच प्रमामय यसवोप्टोत्रकोतिताः॥२

ts मत्स्यपुराण अब आप लोग उन दवो की माताओ के परम शुभ नामो का तथा आदि से प्रजा के विस्तार का श्रवण क्रो-धम्मका जा यायें दश दी गयी थी उन धम की पत्नियो के नाम मरुत्वती-वसूर्यामी-लम्बा भानु-अरु घती-सङ्कल्पा-मुहूर्ता-साव्या-विश्वा और भामिनी ये थ। ये सब धम की पत्नियाँ समारयात हुई थी। अब उन दशा पत्नियो क उदर से जो पुत्र समुत्पन हुए थे उनको भी जान लो ।। १५, १६ ।। विश्वा के विश्वेदेवा पुत्र हुए थे और साध्या न साध्या को जन्म दिया था। मरुत्वती मे मरुत्वायो ने ज म ग्रहण किया था और वसू स वसूगण समुपन हुए थे ।। १७॥ भानु से भानुगण और उसी भाति महूर्ता म मुहूत्त को न ज म लिया था। नम्बा नाम की पत्नी मे घोष नाम वाले पुत्र हुए थे तथा यामि स जाम लेने वाले नागवीथी थे। अक्धती म पृथ्वी तत सम्भून का ज म हुआ था। सङ्कल्पा से सकल्प समुत्पन हुआ था। अब वसुकी सृष्टि का ज्ञान प्राप्त करलो ।। १८ १६ ॥ ज्योतिष्मान जो देव व्यापक हैं और सभी .िशाओ में है वे ही सब वसु गण नाम से समाख्यात हुए थे। अब हमसे जो सृष्टि हुई है उसको भी आप लोग समझ लो ।। २०॥ आप अर्थात् जल, ध्रुव, सोम धर, अनिल, अनल प्रत्युष, प्रभास ये आठ वसुगण कीर्तित किये गये हैं ॥ २१ ॥ जापस्य पुत्राश्चत्वार शान्तो वैण्डएवच । शाम्वोऽथमणिकनश्चयज्ञरक्षाधिकारिणा ॥२२ ध्रुवस्य कालपुत्रस्तु वर्चा सोमादजायत । द्रविणा हव्यावाहश्च धरपुत्रावुभौ स्मृतौ ॥२३ कल्याणिन्या तत प्राणोरमण शिशिरोऽपि च । मनोहराधरात्पुमानवापाथ हरे सुता ।।२४ शिवा मनोजव पुत्रमविज्ञानगति तथा । अवापाचानलात् पुप्रावग्निप्रायगुणी पुन ||२५ मरस्यपुराण - एतेपा मानसानान्तु निशूलवरधारिणाम् । कोटयश्चतुराशोतिस्तत्पुत्राश्चाक्षया मताः ॥३१ दिक्षु सर्वासु ये रक्षा प्रकुर्वन्ति गणेश्वराः । पुगौग्रसुताश्चते सूरभी गर्भसम्भवाः ।।३२ अज, एकपाद, आदि दुघ्न्य, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, त्र्यम्बक-सुरेश्वर-सोवित जयन्त - पिनाकीन्यपराजित-ये रुद्र समाख्यात हुए हैं । एकादश गणेश्वर हुए हैं । २६, ३० ॥ ये मानस त्रिशूलवद के धारण करने वाले हैं इनकी संख्या चौगसी करोड है और इनके पुन तो अक्षय माने गये है।। ३१॥ ये गणेश्वर सभी दिशाओ में रक्षा का काम किया करते है । पुत्र, पौत्र और ये सभी भी गर्म से सभूत होन वाले हैं ।। ३२॥ ६~ कश्यपान्बय वर्णन कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकान् । अदितिदितिदनुश्चंव अरिष्टासुरसातया ॥१ सुरभिविनता नद्वताभ्रा काधवशा इरा। पद्रविश्वा मुनिस्तद्वत्तासा पुत्रान्निबोधत ॥२ तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनो. । वैवस्वतेऽन्तरे चैते आदित्याद्वादशस्मृता. ॥३ इन्द्रोधाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथवरुणोयमः। विवस्वान्सवितापूषाअंशुमानविष्णुरेवच ॥४ एते सहस्रकिरणा आदिस्या द्वादश स्मृताः । मारीचात् कश्यपादाप पुत्रानदितिरुत्तमान (१५॥ पुत्रा देवप्रहरणाःस्मृताः । एते देवगणा विशा. प्रतिमन्वन्तरेषु च ॥६॥ भशाश्वस्य ऋपे.

कश्यपान्वय वर्णन ३१ ३ उत्पद्यन्ते प्रलीयन्ते कल्पे ल्पे तथैव च । दिति. पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति न. श्रुतम् ॥७ श्री सूतजी ने कहा- अब मैं कश्यप ऋषि की पत्नियों से जो पुत्र और पौत्र आदि हुए हैं उनका हाल बतलाने को जा रहा हूँ। कश्यप महपि को पत्तियो के नाम अदिति-दितिदनु-अरिष्टा-सुरसा-सुरभि-विनता- ताना-क्रोध वशा-इरा-कडू-विश्वा-मुनि-ये थे। अब इन पलियों के उदर से जो पुन समुत्पन्न हुए थे उनको भी आप लोग जान लोजिए ॥१२।। तुबिना नाम वाले जो देवता चाक्षुष मनु के अन्दर मे हुए थे ये ही सब ववश्वत मन्वन्तर मे वारह आदित्य कहे गये हैं ।।३।। उन द्वादश आदित्यो के नाम इन्द्र-धाता भग-त्यष्टा-मित्र वसुण-यम विवस्वाम्-सविता-पूषा- अशुमान-विष्णु-य हैं ये ही सहस्त्र किरणो वाले बारह आदित्य कहे गये हैं। मारीच कश्यप महर्षि से अदिति ने परमोतम पुत्रो को प्राप्त किया था ॥४॥५।। भृगास्व ऋषि के पुत्र देव प्रहरण कहे गये थे । हे विप्रो ! ये सब देव गण प्रत्येक मन्यन्तर मे हुए हैं ॥६॥ ये सब उत्पन्न हुआ करते हैं और प्रलीन भी होते रहते हैं और कल्प कल्प में ऐसा ही होता रहता है । दिति नाम की जो महापि कश्य जी को एक पत्नी थी उसने कश्यप से दो ही पुत्रो की प्राप्ति की थी ऐसा सुना गया है ॥७॥ हिरण्यकशिपुञ्चैव हिरण्याक्ष तथैव च । हिण्यकशिपास्तद्वज्जात पुत्रचतुष्टयम् ॥८ प्रहलादश्चानुलादश्न सहलादोह्लाद एव च । प्रह्लादपुत्र आयुष्मान शिविर्वाष्पल एव च It विरोचनश्चतुथश्च स बलि पुत्रमाप्तवान् । बन्न: पुत्रशत सातीद्वारगज्येष्ठ ततोद्विजा ॥१० धृतराष्ट्रस्तथा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्राशुतापन । निकुम्भनामो गुवक्षः कुक्षिभीमो विभीषणः ॥११ एमाद्यास्तु बहवो वारणज्येष्ठा गुणाधिका ।

२ मत्स्यपुराण वाण सहस्रबाहश्च सर्वास्त्रगणसयुत ॥१२ तपसा तापितो यस्य पुरे वसति शूनभृत् । महाकालत्वमगमत्साग्य यश्च पिनापिन १३ हिरण्याक्षस्य पु नाऽभूदूलू शकुनिस्तथा । भूतसन्तापनश्चव महानाभस्तथैव च ॥१४ उन दिति के पुत्रो के नाम हिरण्य कशिपु और हिरण्याक्ष था । हिरण्य कशिपु के उसी भांति चार पुत्र हुए थे ।। ८ ।। उन चारो पुत्रों के नाम प्रह्लाद अनुह्लाद-सला और हताद य थे | प्रह्लाद के पुत्र आयुष्मान् शिवि वाष्कल तथा चौथा दिरोचन हुए थे। विशेचन ने वात मामधारी को पुत्र के रूप मे प्राप्त किया था । हे द्विजगण ! राजा बालक सौ पुत्र हुए थे नित मे वारा सबसे बडा पुत्र था। ॥६॥१०॥ धृतराष्ट्र- सूय-चन्द्र च द्राश-नापन-निकुम्म-गुवक्ष-कुक्षिभीम-विभीषण एव आदि गुणो म सव विक बहुत से पुत्र ये इनम वाण ज्येष्ठ था। दाण और सहस्त्र वाहु सभी प्रकार के अस्त्रो के समुदाय से समन्वित थे अर्थात सभी अस्त्रों के पूण ज्ञाता थे ॥११॥१२।। तपथार्या के द्वारा परम स तुष्ट हुए भगवन् शूलभृत् जिस के पुर मे ही निवास किया करते थ। और जो पिवा की प्रभु क साम्य महा कालत्व का प्राप्त होगया था। हिरण्याक्ष के पुत्र उलूक-शकुनि-भूत सन्नापन और महावाम हुए थे ॥१३॥१४॥ एतेभ्न पुत्रपौनाणा कोटय सप्तसप्तति । महाबला महाकाया नानारूपा महौजस ॥१५ दनु पुत्रशत लेभे कश्यपालदर्पितम् । विप्रचित्ति प्रधानोऽभूषा मध्येमहाबल ।।१६ द्विमूर्द्धा शकुनिश्चैव तथा शकुशिरोधर । अयोमुख शम्बरश्च कपिशो नामतस्तथा ।।१७ मारी चिर्मेघवाश्चैव इरा गशिरास्तथा।

कश्यपान्वय वर्णन ३ विद्रावणश्च केतुश्च केतुवोर्यः शतहदः ।।१८ इन्द्रजित सप्तजि चैव वज्रनाभस्तथैव च । एकचको महावाहुवज्राक्षस्तारकस्तथा ॥१६ असिलोमा पुलोमा च विन्दुर्वाणो महासुरः । स्वर्भानुर्वृषपर्वा च एवमाद्यादनो सुता. ॥२० स्वर्भानोस्तु प्रभा कन्या शची शैव पुलोमजा । उपदानवी मयस्यासीत्तथा मन्दोदरी कुहू ॥२१ इनसे जो पुत्र और पौत्र आदि हुए थे उनकी संख्या सतत्तर करोड थी। ये महान् वलशाली महान् शरीर के प्राकार प्रकार वाले, अनेक प्रकार के स्वरूप धारी मोर महान् ओज वाले सभी हुए थे ।।१।। दतु ने महा मुनीद्र कश्यप से वल के दर्द से समन्वित एक सौ पुत्रो का जन्म दिया था। इन सबके मध्य मे महान् वलवान और प्रधान विप्रचिति हुआ था ।। १६ । उन सौ दनु के पुत्रो मे कतिपप प्रयान पुत्रो के नाम यहां पर घतलाये जा रहे हैं-दिम्र्धा-शकुनि-शशिरोधर-अग्रोमुख- शम्वर रुपिरा-मारीचि मेयवास्-इरा-पशिरा-विद्रावण-केतु-केतु वीर्य- शतहद-इन्द्रजित-सप्तजित-वज्रनाम-एक चक्र-महा वाहु-वज्राक्ष-तारक- असिलोमा पुलोमा बिन्दु धारण-महासुर-वमनु वृषपर्वा एव आदि दतुके पुत्र हए थे जो कि प्रमुख थे ॥१७॥१८॥१६॥२०॥ स्वर्भानु की कन्या का नाम प्रभा था और शची थी तथा पुलोमजा मय की उपदान थी तथा मन्दोदरी और कुह थी ॥२१॥ शर्मिष्ठा सुन्दरी हौव चन्द्रा च वृषपर्वणः । पुलोमा कालका चैव वैश्वानरसुते हिते ।।२२ वह्वपत्ये महासत्वे मारीचस्य परिग्रहे। तयो. पष्टिसहस्राणि दानवानामभूत्तरा ॥२३ पौलोमान् कालकेयाश्च मारीचोऽजनयत्पुरा । अवघ्या येऽमराणा वै हिरण्यप रवासिनः ॥२४

३४
मत्स्यपुराण
।
चतुमुंखाल्लव्धवरास्ते हता विजयेन तु ।
विप्रचित्ति सैहिकेयान् सिंहिकायामजीजनत् ।।२५
हिरण्यकशिपोवैभागिनेयास्त्रयोदश ।
यस कल्पश्च गजेन्द्र नतो वातापिरेव च ।।२६
इल्वलो नमुचिाचव श्वसृपश्चाजनस्तथा ।
नरक कालनाभश्च सरमाणस्तथव च ।।-७
कालवीर्यश्च विख्यातो दनुववियधना ।
सलाझ्यस्य तु दैत्यस्यनिवातकवचा स्मृता ॥२८
वृषपर्वा को शर्मिष् । सु दरो और चन्द्रा थी वैश्वानर की दो सुतायें
हुई थी जिनका नाम पुलोमा और कालका था ।।२२।। महान सत्व वाले
और बहुत मी स तति से मर्मावत मारीच का परिग्रह था उन दोनो क
पुरातन काल मे साठ हजार दानव हुए थे ।२३। पहले म रीच ने पोलाम
और कानकेयो को जन्म दिया था। जो ऐसे वलशाली थे कि ये हिरण्यपुर
में निवास करने वाले सब देवगणो के द्वारा वध करने के योग्य नहीं थे
॥२४॥ वे सब चार मुखो वाले ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त करने वाले थ
विजय के द्वारा हत हु । थ। विप्रचित्ति सिंहिका में सैहिकेयों को ज म ग्रहण
कराया था । जो हिरण्य कशिपु के वभागो थे वे तेरह हुय थे । हे गजेन्द्र ।
उनके नाम ये है - व्यस कल्प नल वातापि इल्वल, नमुचि श्वसप,
भजन नरक काल नाम सरमाग पो कालवीय तथा विख्यात ये दनु के
वश के वधन बग्न गले हुए हैं। जो स हाट नामधारी दत्य था उसके
निवात कनच कहे गये है ॥२११२५।२६।२७।२८॥
अवध्या सवदेवाना ग धोरंगरक्षस म् ।
ये ना भगमाश्रित्य स्वर्जुनन रणाजिरे ॥२६ ।।
पटक या जनयामास ताना मारीचवीजत ।
काश्यनीच भासीचसुग्रीवीगृध्रिकाशुचि ॥३०
सुकी शुकानुनूकाश्च जनयामास धमत ।
श्यनी श्येनास्तथा भासी कुररातप्यजीजनत् ॥३५

कश्यपान्वय वर्णन M गृध्री गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान् । हससारसकौश्वाश्च प्लवान् शुचिरजीजनत् ॥३२ अजाश्वमेपोष्ट्रखरान् सुग्रीवो चाप्यजीजनत् । एपताम्रान्वयः प्रोक्तो विनतायांनिबोधत ॥३३ गरुडः पततांनाथो अरुणश्च पतस्त्रिणाम् । सौदामिनी तथा कन्या येयं नभसि विश्रुता ॥३४ सम्पातिश्च जटायुश्च अरुणस्य सुतावुभौ । सम्पातिपुत्रो वभ्रञ्च शीघ्रगश्चापि विश्रुत ॥३५ ये सभी महान वल विक्रमश ली थे और ऐसे वलिष्ठ थे कि समस्त देवगण तथा रन्धर्व-उरग बोर राक्षस भी इनका वध नहीं कर सकते थे। इनको रणक्षेत्र मे मार्ग का समाश्रय ग्रहण करके अर्जुन ने हो निहत किया था ।।२मारीच के वीयं से ताम्रान छै कन्याओ का प्रसव किया था। उन छओ कन्याओ के नाम ये थे-शुकी, श्येनी,भासी सुग्रीवी, गृध्रिका, शुचि ॥३०॥ शुकी ने शुको को तथा उलूबो को धर्म से जनम कराया था। श्येनी ने श्येनो को प्रसूत किया था और भाप्ती ने कुरगे को सम्भूत किया था ॥ ३१ ।। गृध्री ने गिद्धों को और कबूतगे, पारावत विहङ्गमो, हम, सारस, कोचो को जन्म दिया था तथा शुधि ने प्लवों को समुत्पन्न किया था ॥३२॥ सुग्रीवो नाम धारिणी ने अज,अश्व, मेप, उष्ट्र और खरों (गधी ) को जन्म ग्रहण कराया था। यहा तक यह ताम्र का यश वणित किया गया है अव यहा से आगे प्राप सब लोग विनता में समुसोत्पति हुई थी उसका भी ज्ञान प्राप्त करलो ॥३३॥ पतनशील चपिक्षयो का म्वामी गण्ड और पतत्त्रियो मे अरुण और सौदामिनी नाये माली एक कन्या जो नभ मे विश्रुत है । अरुण के सम्पाति और जटायु थे ! सम्पाति का पुत्र वभ्र था और शीघ्रगामी प्रमिद्ध हैं। जटायुपः कणिकार: शतगाती च विश्रतो । दो पुत्र हुए

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मत्स्यपुराण
सारसो रज्जुवालश्चभेरुण्डश्चापि तत्सुताः ॥३६
तेषामनन्तमभवत् पक्षिणां पुत्रपौत्रकम् ।
सुरसाया सहस्रन्तु सर्पाणामभवत्पुरा ॥३७॥
सहस्र शिरसाद सहस्रञ्चापि सुव्रत !।
प्रधानास्तेषु विख्याता पड्विंशतिररिन्दम ॥३८
शेषवासुकिकर्कोटशङ्खरावतकम्बलाः ।
धनञ्जयमहानीलपद्माश्वतरतक्षकाः ॥३६
एलापनमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहनाः।
शख पाल महाशख-पुष्पदष्ट्र-शुभाननाः ॥४०
शकुरोमाच वहुलो वामन पाणिनस्तथा।
कपिलोदुर्मुखश्चापि पतञ्जलिरितिस्मृताः ॥४१
एषामनन्तमभवत् सर्वेषां पूत्रपौत्रकम् ।
प्रायशो यत् पुराद-ध जनमेजयमन्दिरे ॥४२
जटायु के पुत्र कर्णिकार और शगामी ये दो परम प्रसिद्ध हुये
थे । सारस, रज्जुबाल और भेरुण्ड भी उसी के पुत्र थे ॥३६ । उनके पुत्र
और पोत्र जो हुए थे वे पक्षियो के अनन्त ही हुये थे। पुरातन समय मे
सुरसा के एक सहस्र सपं हुये थे । हे सुव्रत ! कद्र के सहस्र शिर वालो के
एक सहस्त्र सर्प हुए थे किन्तु हे अरिन्दय ! उनमे परम प्रमुख छब्बीस ही
विख्यात हुए हैं।।३७,०८। उन छब्बीस प्रकार के प्रधान सर्पो के नाम तथा
भेद इस प्रकार है-शेष-वासुकि-कर्कोट-शख-ऐरावन-कम्बल-धनञ्जय-
महानील -पद्म-प्रश्वतर-तक्षर-एलापत्र-महापदम-धृतराष्ट्र-बलाहक-
शखराल-महाशाख-पुष्पदष्ट्र-शुमानम-शकुरोमा-बहुल-वामन-पाणिन-
पपिल-दुमुंख और पतञ्जलि-इनन मो से छब्बीस कहेगये हैं । इन सबके
पुत्र और पौत्र जो हुए वे सबके अनन्त ही हुए थे ! वहुधा जनमेजय ने
अपने मन्दिर मे सरों के वंस करने वाले यज्ञ में प्राचीन काल मे टग्य
कर दिये थे॥ ३६॥४०॥४१॥४२॥

मुष्टि प्रारण
रसोग मोघवमा स्वनामानमजीजनत् ।
दष्ट्रिणा मियुत तेषा भीमसेनादगावक्षयम् ।।४३
रद्राणाञ्च गण तद्वद्गोमहिप्यो वराङ्गनाः ।
मुरभिजनयामास पश्यपात मयतव्रता ॥४१
मुनिमुनीनाञ्च गण गणमप्सरसा तया ।
तया सिन्नरगन्धनिरिष्टाऽजनयबहून् ।।४..
तृण वृक्षततागुल्ममिरा समजीनत् ।
विश्वा तु यक्षरशासि जनयामाम कोटिशः ४६
तत एकोनपञ्चागन्मरत कम्पपाहितिः ।
সমান্ত এলাৰ সলিলবলসার re
कोपवना नाम वाली पत्नी ने अपने नाम वारे रातोमण
से सम्म चापा । दाइ दामी उनके मंग्या में नियुत होरपंरिन्तु
मोम मेन में उनराय हो गया हो पा | उमी माति मुरमिनाम
पारजीससरीपनी पर पिसेही मयेन गो-मैग और
बराङ्गनाओं का सम्म पपन पर वासी होर दिस पा ॥४४॥ मुनि
माम की पग्लो ने मुनियों पर तपा ममराओं मन को मन पिया
पा। मरिश पत्नी ने पार किन्नरों और rad रोममुग्न पिया
पा॥५॥राने गमी तप, मता और मुम्मों को जन्म दिया
पापिय नाम दामोरीपान,
नेगेतीयों और रातमी
पोसन त्तिा पा॥४६॥ मरे मातर तिने सीमे
मम पारस नाम मरदानों को प्रगत पिया दारी परम :
और भी मार सिभी

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मरस्यपुराण
७ - आधिपत्याभिपेचन ।
मादिसगश्च यः सूत ! कथितो विस्तरेण तु ।
प्रतिसगञ्चयेयेषामधिपास्तान् वदस्व नः ॥१
यदाभिषिक्त सकलाधिराज्ये पृथुरित्र्यामधिपो बभूव ।
तदोषधीनामधिप चकार यज्ञवताना तपसाञ्च चन्द्रम् ॥२
नक्षत्र-तारा-द्विज-वक्ष-गुल्मलता-वितानस्य च रुक्मगभं।
अपामधीश वरुण धनाना राज्ञा प्रभु वैश्रवणञ्च तद्वत् ॥३
विष्णु रवीणामधिप वसूनामग्निञ्च लोकाधिपतिश्चकार ।
प्रजापतीनामधिप च दक्षञ्चकार शक्र महतामधीशम ।४
दत्याधिपानामथ दानवाना प्रह्लादमोशयम पितृणाम् ।
पिशाचरक्ष:-पशु-भूत-यक्ष वेतालराजन्त्वय शूलपाणिम् ॥५
प्रालेय शलञ्च पति गिरीणामोश समुद्र ससरिन्नदानाम् ।
गन्धर्वविद्याधरविन्नराणामीश पुनश्चित्ररथ चकार ॥६
नागाधिप वागुकिमुग्रवीय साधिप तक्षामादिदेश ।
दिशाङ्गजानामधिपचकार गजेन्द्रमैरावतनामधेयम् ॥७

N अधिपत्याभिषेवन किया या प्रजापतियों का प्रधान अधिप दक्ष को और मरुतो का स्वामी इन्द्र को बनाया गया था ।दत्यावियों का तथा दानवो का स्वामी प्रह्लाद को किया गया था और सब पितृगणों का अधीश यम को नियुक्त किया था। पिशाच, राक्षस, पशु, भून, यश, वेताल इन सवका राजा भगवान शूलपाणि को बनाया गया था |शा समस्त गिरियों का अधिप प्रालेय गिरि (हिमालय) का बनाया था तथा सब सर-सरित और नदों का अधीश्वर समुद्र को नियुक्त किया गया था। गन्धर्द-विद्यावर और किन्नरो का स्वामी फिर चित्ररय को ही किया गया था ॥६॥ जितने भी नाग नामधारी थे उनका अनीश उप्रवीर्य वासुनि को किया था और सो का स्वामी तक्षक को नियुक्त किया था । दिशागजी का स्वामी ऐरावत नामधेय वाले गजेन्द्र को किया था 1150 सुपर्णमीशम्मततामयाश्वराजानमुच्चं श्रवसञ्चकार । सिंहं मृगाणा वृषभ गवाञ्च वृक्ष पुन सर्ववनस्पतीनाम् ॥ पितामहः पूर्वमथाभ्यपिञ्चतान् पुनः सवदिशाधिनाथान् । पूर्वेश दिक्पालमयाभ्यपिञ्चन्ना सुधर्माणमरातिकेतुम् ।। ततोऽविण दक्षिणतश्चकार सर्वेश्वर शङ्खपदाभिधानम् । सकेतुमन्तञ्च दिगीशमीशश्नाकार पश्चाद्भुवनाण्डनर्म ९० हिरणारोमाणमुदग्दिगीश प्रजापतिर्देवमुनञ्चकार । अद्यापि कुर्वन्ति दिशामधीशाः शत्र न दहन्तस्तु भुवोभिरक्षाम् ।।११ चतुभिरेमि पृथुनामधेयो नृपोऽभिषिक्त प्रथम पृथिव्याम् । गतेऽन्तरे चाक्षुपनामधेये वैवस्वतास्ये न पुन प्रवृत्ते ॥१२ प्रजापतिः मोऽस्य चगवरस्य बभूव सूर्यान्वयवशचिन्ह. ॥१३॥ जो पलनशील पक्षिमण थे उनका राजा सुपर्ण को किया था और सभी प्रकार के प्रश्दी का राजा उच्चैः थय नाम वाले दोबना दिया था। जितने भी प्रकार के वन्य पशु हैं उन सबका शिरोभूषण स्वामी सिंह बनाया गया था-गौ जाति का अधिक षय को मत्स्यपुराण सम्पूर्ण वनस्पतियो का अघोश वृक्ष को बनाया गया था 14 पितामह ने सबसे पूर्व इनको अभिषिक किया और फिर उन्होने ही इन समात दिमाओं के अधिनायों का अभिषेक किया था। पूर्व दिशा में रिक पाप सुधर्मा माम वाले को बनाया था वो बराति तु है 11 इसके अनन्तर दक्षिण दिशा का पालक अधीश्वर शषपद अभिधान पाले सर्वेश्वर को बनाया था। फिर भुवनाण्ड गर्भ ने सवे तुमान ईश को दिगोश किया था ॥१० प्रजापति ने उत्तर दिशा का दिकपाल स्वामी देवसुत हिरण्य रोमा को बनाया था। ये सब दिक्पाल परम पुगतन समय में नियुक्त किये गये 4 किन्तु वे तभी से आज तक भी दिशाओ के अधीश्वर शत्रुओं का दाह करते हुए इस भू मण्डल की रक्षा कर रहे हैं ।११। इन चारों के द्वारा पृथु नाम वाला गया सर्व प्रथम पृथ्वी मे अभिषिक्त किया गया था । जब चाक्षुप नाम वाला मन्वन्तर समाप्त हो गया था और वैवस्वत नाम वाला मन्वन्त प्रवत हो गया था उस समय मे इस चराचर सम्पूर्ण विश्व का सूर्यान्वय वश के चिन्ह वाला प्रजापति हुआ था ।।१२, १३॥ ८-मनवन्तर वर्णन एव श्रुत्वा मनु प्राह पुनरेव जनार्दनम् । पूर्वेपाञ्चरित यूहि मचूना मधुसूदन ॥१ मन्वन्तराणि सर्वाणि मनूना चरितञ्च यत् । प्रमाणञ्चवकालस्यत कृणुष्वसमाहित ॥२ एकचित्त प्रशान्तात्मा शृणु मार्तण्डनन्दन । । यामनामपुरादेवास सारम्भुवान्तरे ॥३ सप्तरूपया पूर्वे ये मरी यादयः स्मृता । आग्नीघ्रश्चा िनव हुश्च सह सवन एव च ।।४ मनरन्तर वर्णन ज्योतिप्मान्य तिमान्हव्योमेघामेधा तिथिवंसुः । स्वायम्भुवस्यास्यमनोदशैतेवशवद्धनाः ॥५ प्रतिसर्गमिमे कृत्वा जग्मुर्यत्परमम्पदम् । एतत्स्वायम्भुवंप्रोक्त स्वारोचिषमतः परम् ॥६ स्वारोचिपस्य तनयाश्चत्वारो देववचंस. । नभो नभस्यप्रसृतिभानव. कीर्तिवर्द्धनाः ॥ श्री सून जी ने कहा- इस प्रकार से सबका श्रवण करके मनुनै पुनः भगवान् जनार्दन से कहा था कि हे मधुसूदन ! अब आप परमानुग्रह परके पूर्व में होने वाले मनुगण का चरित हमारे सामने दणित कीजिए ११॥ थी मत्स्य भगवान् ने कहा-अब आप सब लोग पूर्ण रूप से समा- हित हो जाइये और श्रवण करिये । म सम्पूर्ण मन्वलर और मनुष्यों के चरित्र तथा उनक काल का प्रमाण समी कुछ बनलाता हू ।२।हे मार्तण्ड नन्दन ! एकनिष्ठ चित्त वाले और परम प्रशान्त आत्मा वाले होकर आप सुनिए । पहिले परम पुरातन समय में यामा नाम वाले स्वायम्भुव मन्वनर मे देवता हुए ये 1३। मरीचि आदि पूर्व मे ये ही सप्त ऋषि हुए थे। आग्नीघ्र-अग्नि वाह-सह-सदन-ज्योतिष्मान् द्यु निमान-हन्य- मेवा-मेधातिथि-वसु यै दश ही स्वायम्भुव मनु के वश के वधंन करने बाले हुए हैं अर्थात् इन्हींने वश को बहाया या ॥४,शा प्रत्येक सर्ग मे ये परम पद को प्राप्त हुए थे-यही स्वायम्भुव मन्वन्तर का चरित है जो तुमको बना दिया गया है। अब इसके आगे स्वारोचिष मन्वनर आता है ॥६ स्वारोचिष मनु के देवो के समान वम वाले चार पुत्र हुए ये उनके सुम नाम ये हैं-नम-नमस्य-प्रमृति और भानु । ये समी कात्ति की वृद्धि करन वाले ये ७ दत्तोनिाच्यवनस्तम्व: प्राण कश्यप एप च । और्वो वृहस्पतिश्चंदसप्तैतेऋपेय स्मृता । देवाश्च तुपितानामस्मृता स्वारोचिपेऽन्तरे ।

४२
मरायपुराण
हबीन्द्रःमुकृतोमूर्तिरापोज्योतिरयरगयः ॥
पसिष्ठस्य मुताः राप्त ये प्रजापतयः स्मृताः ।
द्वितीयमेतत्कथित मन्वन्तत्मतः परम् ।।१०
यौत्तमीय प्रवक्ष्यामि तथामन्वन्तरं शुभम्।
मन मौतमियंस दशपुत्रानजीजनत् ।।११
ईपऊरव तजश्व शुचि: शुक्रस्तथैव च ।
मधुश्च माधवश्चैव नभस्योऽय नभास्तथा ।।१२
सह. कनीयानेतेपामुदार. कीर्तिवदं नः ।
भावनास्तन देवा.स्युर्जा. सप्तपयःस्मृताः ।। ३
कौकुर ण्डिश्च दालभ्यश्च शखः प्रवहण शिवः ।
सितश्चसस्मितश्चैत्रसप्तैतेयोगवईना. १४
स्वारोचिष मन्वन्तर में हत्त, निश्च्यवन, स्तम्व, प्राण, कश्यप,
और्व और वृहस्पति ये सात ही सप्तपि कहे गये हैं ॥ स्वारोचिप
मन्व तर मे देवता तो तुषित्स नाम वाले ही थे । हवीन्द्र, मुहत, मति,
आपज्योति, अयसमय ये सात वसिष्ठ ऋपि के पुत्र ही उस सयम में
प्रजापति कहे गये हैं । यह दूसरा जो स्वारोचिप नाम वाला मन्वन्तर था
उसका भी वर्णन कर दिया गया है। इससे आगे तीसरा मन्वन्तर का
वर्णन करते हैं । इसके समय मे औतमि नाम वाले मनु ने दश पुत्रों को
जन्म ग्रहण कराया था ||११ उन दशो पुत्र के शुभ नाम ये हैं- ईप,
ऊर्ज, तर्ज शुचि शुक्र, मधु, मात्र, नमस्य, नमा और सह । इनमे
कनीयान् जो था वह उदार और कीति वधंन था। उम औत्तमीय
मन्वन्तर मे मानना वाले देवगण थे और ऊर्ज सप्तपि हुए थे ॥१२, १३॥
करकुसुण्डि, दात्म्य, शख, प्रवहण, शिव, सिन, सरिमत ये ही सात योग
की वृद्धि करने वाले थे ॥१४
मन्वन्तर चतुर्थ तु तामस नाम विश्रुतम् ।
कवि पृथुस्तथैवाग्निरपि कपिरेव ।।१५

मनवन्तर-वर्णन तथैव जलधीमानो मुनयः सप्तनामतः । साध्या देवगणा यत्र कथितास्तामसेऽन्तरे ॥१६ अकल्मषस्तया धन्वी तपोमूलस्तपोधन. । तपो रति तपस्यश्च तपोधे तिपरन्तपौ ॥१७ तपो भागो तपो योगी धर्माचाररताः सदा। तामसस्य सुताः सर्वेदशवर्शाववर्द्धनाः॥१८ पञ्चमस्य मनोस्तद्वद्वतस्यान्तर शृणु। ऐन्द्रबाहु सुवाश्च पर्जन्य. सोमपो मुनिः ॥१६ हिरण्यरोमा सप्ताश्वः सप्तते ऋषयः स्मृताः । देवाश्चाभूतरजसस्तथाप्रकृतय शुभा ॥२० तीन मन्वन्तरी का वर्णन किया जा चुका है अब चौथे मन्वन्तर को बतलाया जाता है जिसका तामस नाम प्रसिद्ध है । कवि, पृथु, अग्नि, अकपि, कपि, अल्प और धोमान ये ही इन नामो वाले सात मुनिगण और साध्य नाम वाले देवगण इस तामस मन्वन्तर मे हुए थे ॥१५, १६॥ मापस मनु के भी दश पुत्र हुए थे जो सभी वश के वर्धन करने वाले थे। उनके नाम-अकल्मष, धन्वी, तशेमूल, तपोधन, तपोरति, तपस्य, तपोधुति, परन्तप, तपोभागी, तपोयोगी ये हैं और ये सदा धर्म के आचार मे ही रति रखने वाले थे ।।१७, १८॥ इसके अनन्तर अव उसी प्रकार से पञ्जयमनु रैवत नाम वालेक अन्तर आप लोग श्रवण करिये । इस पांचवें मन्वन्तर मे ऐन्द्रबाहु-सुवाहु-पर्जन्य-मुनि-हिरण्य सेमा और सप्ताश्च ये सात सप्तपि कहे गये थे । देवता आभूत रजस हुए थे तथा शुभ प्रकृतियाँ थी॥१६॥२०॥ अरुणस्तत्वदर्शीचधृतिमान्हव्यवान् कविः । युक्तोनिरुत्सुक सत्वानिमोहोऽयप्रकाशक ॥२१ धर्मवीयंवलोपेता दर्शते रवतात्मजा । भृगु सुधामा विरजा. सहिष्णुर्भाव एव चा ॥२२ मत्स्यपुराण विवस्वानतिनमा च षष्ठे सप्तपंयोऽपरे । चाक्षुपस्यान्तरे देवालेखा नाम परिश्रुता.॥१३ ऋभवोऽथ भाद्याश्चवारिमूलादिवौकसः । चाक्षुपस्या तरेप्रोक्तादेवानापन्नयोनयः ॥२४ रुप्रभृतयस्तद्वच्चाक्ष षस्य सुता दश । प्रोक्ताः स्वायम्भुवे वशे ये मयापूर्वमेव तु ।।२५ अन्तर चाक्षुष नौतन्मया ते परिकीत्तितम् । सप्तम तत्प्रवक्ष्यामि यद्वैवस्वतमुच्यते ॥२६ अविश्लीव वसिष्सूश्च कश्यपोगौतमस्तथा । भरद्वाजस्तथायोगीविश्वामित्रः प्रतापवान् ।।२८ अरुण-तत्त्वदर्शी-धृतिमान हव्यवान्-कवि-युक्त-निरुत्सुक-सत्त्व निर्मोह-प्रकाशक इन नामो वाले धर्म तथा वीर्यवल से समन्वित रैयत मनु के दश पुत्र समुत्पन्न हुए थे। भगु, सुधामा, विरजा, सहिष्णु नाद विवस्वाम, प्रतिनामा ये छठवें मन्वन्तर में दूसरे सप्तर्षि गण थे। चाक्षुष मावन्तर मे लेखा नाम वाले देवता हुए थे जो पूर्णतया परिक्षुत हैं ॥ २१, २२, २३ ।। चाक्षुष मन्वन्तर मे देवो की पांच योनियां बतलाई गयी हैं--ऋप ऋमाद्य-वारिमूल और दिनोवस ये उनके नाम हैं ।। २४ ॥ उसी प्रकार से चाक्षुष मनु के रुप प्रभृति दश पुत्र समुत्पन्न हुए जिनका वर्णन मैंने स्वायम्भुव के वश में पहिले ही कर दिया है ॥२५॥ इसके अनन्तर मैंने यह चाक्षुष मन्वन्तर परिकीर्तित किया है। म सातवां मन्वन्तर बतलाते है जिसको वैवस्वत मावन्तर कहा जाता है । इस मन्वन्तर में अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज तथा प्रताप वान् योगी विश्वामित्र और जय हानि ये सात इस वर्तमान समय मे सात महति हैं । ये सब धर्म की व्यवस्था करके परप पद को चले जते हैं । ॥२६॥२७॥२०॥ साध्याविश्वेशरुद्राकामस्तोवसवोऽश्विनी। आदित्याश्नसुरास्तद्वत्सप्तदेवगणा:स्मृता ॥२॥ थे मनन्तर वर्णन इक्ष्वाकुप्रमुखाश्चास्य दरापुत्रा. स्मृता भुवि । मन्वन्तरेषु सर्वेषु सप्त सप्तमहर्षयः ॥३० कृत्वा धम्मव्यवस्थान प्रयन्तिपरमम्पदम् । साययंस्यप्रवक्ष्यामिमनो चितथान्तरम् ॥३१ अश्वत्थामा शरद्वांश्चकौशिकोगालवस्तथा। दातानन्द काश्यपश्चरामश्चऋषयःस्मृताः ॥३२ धृतिवरीयान् यवसः सुवर्णो वृष्टिरेव च । चरिष्णुरोड्यः सुमतिर्वसु शुकश्च वीर्यवान् ।।३३ भविष्यादशसावर्णेनोःपुत्रा:प्रकीत्तिता । रोम्यादयस्तथान्येऽपिमनव. सम्प्रकीर्तिताः ॥३४ रुचेः प्रजापतेः पुत्रो रोन्यो नाम भविष्यति । मनुभूतिसुतस्तद्वद्भौत्योनामभविष्यति ॥ ३५ इस म वन्तर मे साध्य, विश्वेदेवा, रुद्र, मरगण, वसुगण, अश्विनि कुमार, आदित्य और सुरये उसी मांनि सात देवगण कहे गये हैं ||२६ इस वैवस्वत मनु के श्वाकु जिनमें प्रमुख थे ऐसे दस पुत्र इस भू मण्डल में बताये गये हैं। इन रीति से सभी मन्वन्तरो में सात-सात ही मपि हुए हैं ॥१०॥ ये सव महर्षि इमीलिये हुमा करते हैं कि अपने २ मन्वन्तर मे धर्म को ठीक व्यवस्था कर देखें । इसके उपरान्त ये सप्तपिपरम पद को चले जाया करते हैं । अव मावी मनु सावर्ण्य का अन्तर भी हम दनला दिये देते हैं । इस भावी मन्दन्तर में भी उमी भांति सात महर्षियो का गए होगा । अश्वत्थामा, भरद्वान्, कौशिक, गालव, प्रातानन्द, कश्यप और राम ये मात ऋषि कहे गये हैं। इस मनु के भो दश पुत्र हैं उनके नाम धुति वरीय न यवस, सुवर्ण, वृष्टि, चरिप्पु, ईड्य, सुमति, वसु, जो महान् वीर्य वाला है 1 ये आगे होने वाले सावणि मनु के दस पुत्र होगे जिनके नाम यहां पर कोतित कर दिये गये हैं। इनके अतिरिक्त रोच्य प्रभृति अन्य भी मनु बतलाये गरे हैं। रुपि नामधारी प्रजापति का

मत्स्यपुराण
पून रोच्य नाम वाला होगा। इसी प्रकार से भविष्य मे मतिकी पुत्र एक
भौत्य नाम वाला भी मनु होगा ॥३१, ३२, ३३, ३४, ३५॥
ततस्तु मेस्सावर्णिब्रह्मसूनुमनु स्मृत ।
ऋतश्च ऋतधामाचविष्वक्सेनोमनुस्तथा ॥३६
अतीतानागताश्चते मनव परिकीर्तिता ।
पडून युगसाहस्त्रमेभिर्व्याप्त नराधिप ॥३७
स्वेस्वेऽन्तरे सर्वमिदमुत्पाद्य सचराचरम् ।
कल्पक्षये विनिवृत्त मुच्यन्तेब्रह्मणा सह ॥३८
एतेयुगसहस्रान्तेविनश्यन्तिपुन पुन ।
ब्रह्माद्याविष्णुसायुज्ययातायास्यन्ति वैद्विजा ॥३६
इनके पश्चात् ब्रह्मा का पुत्र मेरु सावणि मनु बताया गया है ।
ऋत, ऋतधामा, विष्कसेन भी मनु व हे गये हैं जो सभी आगे समागत
समय मे ही होगे। जो मनु अव तक हो चुके हैं वे अतीत मन्वन्तर और
जो अब यहाँ से आने वाले मनु हैं उन सबको परिकीर्तित कर दिया गया
है । हे मराधिए ! इन मनुओ के द्वारा छ कम एक सहस्र युगो का समय
व्याप्त होता है। ये सभी मनु अपने २ अन्तर मे इस सम्पूर्ण चराचर विश्व
का समुत्पादन करके नव कल्प का क्षय होता है उस समय मे कल्प की
विनिवृत्ति मे ब्रह्मा के साथ ही मुच्यमान हो जाया करते हैं। इसी प्रकार
से ये सब एक सहस्र युगो के अन्त मे बारम्बार विनष्ट हो जाया करते
हैं। हे द्विजगण । ब्रह्मा आदि सभी विष्णु भगवान के सायुज्य मे गये हुए
चले जायेंगे || ३६, ३७, ३८,३६॥
8- पृथ्वीदोहन
बहुभिधरणी भुक्ता भूपाल श्रूयतेपुरा ।
पार्थिवा पृथिवीयोगात्पृथिवीकस्य योगत ॥ १

पृथ्वीदोहन
किमर्थञ्चकृतामज्ञाभूमे किंपारिभाषिणी।
गौरितीयञ्चविख्यातामूत ! कस्माद्वीहिनः।।
वशे स्वायम्भुवस्यागेदगो नाम प्रजापतिः ।
मृत्स्तुहितातेगपरिणीतामुदुर्मुखा ॥३
सुनीथा नाम तम्यान्तु वेनो नाममुतः पुरा ।
सधम्मनिरतश्चामीबलवान्वसुधाधिपः ॥४
लोकप्यवर्मकृग्जातः परभार्यापहारकः ।
धर्माचारस्य सिद्धचर्यजगतोऽयमहाँपमि. ॥५
अनुनीतोऽपि न ददावनुजा स यदा ततः।
शापेन मारयित्वनमराजकमयादिताः ॥६
ममन्यु ब्राह्मणास्तस्यवदेहमन्मपाः ।
पितुरशस्य चारोन धार्मिको धम्र्मचारिण ॥७
महपि गण ने कहा-यह सुना जाता है कि पहिले बहुत से
भूपालो ने इस पृथ्वी का भोग किया है । इस पृथ्वी के नाम से राजाओं
को इसका अधिय या भोग करने वाले होन से पायिद कहा गया है।
पृथ्वी का जो यह नाम हुआ है वह किसो योग रो पटा है ? भूमि की
यह सज्ञा (पृथ्वो) किन लिये हुई है और क्या परिभाषण परने वाली
है अर्यात इसमें क्या बतलाया जाता है। इस घरपी का 'गो'
यह
भो
नाम कहा जाता है और यह नाम भी परम विस्थान है-यह इसका
नाम किस कारण से पहा है यह कसा करके आप हमको बतला दीजिये
॥१॥२॥ मूजी ने कहा-स्वायम्मु मनु के दंग में अङ्ग नाम
वाला प्रजापति हुआ था। उसने मृत्यु को दुहिला मुदुमुंखा से परिणय
किया था ॥ ३ ॥ उसरा सुनीया नाम था और पहिले बैन नाम का सुन
यह वेन सर्वदा अधर्म में ही निरस रहा करता था और महार
बलवान् वमुधा का स्वामो था ॥ यह लोक में भी अधर्म दे करने
दाना हुआ था और यह पराई भार्या के अपहरण करने वाला था !

मत्स्यपुराण जगत् के धर्माचार की सिद्धि के लिये महपियो के द्वारा इसको अनुनीत भी किया गया था तो भी जिस समय में अनुशा नही दी तो पिगण ने शाप देकर उसके द्वारा इसका हनन कर दिया था और फिर वे अराज- क्ता के भय से अदित हो गये थे ।। ५ ॥६॥ कल्मप से रहित ब्राह्मणों ने बलपूर्वक उसके देह का मन्यन किया था । मन्थन की हुई उसको काया से म्लेच्छ जाति वाले लोग निययतित हुए थे ॥७॥ शारीरे मातुर शेन कृष्णाजनसमप्रभा. । पितुरंशस्य चाशेन धार्मिको धम्मंचारिणः ।। उत्पन्नो दक्षिणाद्धस्तात्स धनुः सशरोगदी। दिव्यतेजोमयवपु सरत्नकयचागदः ॥६ पृथोरेवा भवद्यत्नात् ततः पृथुरजायत । स विप्ररभिषिक्तोऽपितपः कृत्वा मुदारुणम् ॥१० विष्णोवरे। सर्वस्य प्रभुत्वमगमत्पुनः । नि स्वाध्यायवपटकारनिर्मिवीक्ष्य भूतलम् ।।११ दग्धुमेवोद्यत. कोपाच्छरेणामितविक्रम. । ततो गोरूपमास्थाय भूः पलायितुमुद्यता ।।१२ पृष्ठतोऽनुगतस्तस्या. पृथुर्दीप्तशरासनः। तत स्थित्वकदेशे तु किं करोमीतिचानवोत् ॥१३ पृथुरत्यवद्वाक्यमोप्सितं देहि सुव्रते। सर्वस्य जगतःशीघ्र स्थावरस्य चरस्य च ॥१४ मासा के अश से शरीर मे वे कृष्ण अञ्जन के समान प्रभा वाले हुए थे पिता के अश के द्वारा जो धर्मचारी था धार्मिक हुआ था ॥८॥ दाहिने हाप से धनुष-शर के सहित गदाधारी समुत्पन्न हुआ था। उस समुद्भूत व्यक्ति के शरीर का परम दिव्य तेज था और उसका वह हिग्य तेज पूर्ण शरीर रन जटित प्रवच और अङ्गदो से विभूषित पा Hn यह अधिक यत्न से समुत्पन्न हुआ था इसलिये यह पृथु ही हुआ पृथ्वी दोहन ४३ था। पित्रों के द्वारा राज्यासन पर उमा मि मीनिया गया था तो भी वह मुदारुण ता करके भगवान् विष्णु के वरदान में इस समम्न मू-मण्डल का प्रभु बन गया था। उसने भूमिपति होकर देखा था कि यह सम्पूर्ण भूतन स्वाध्याय वषटकार और मं मे रहिन हो गया है । ॥१०॥११॥ सम कारयित बल विक्रमाली राजरा ने जब भूतन का धर्म यून्य देखा तो उसे बडा भारी को हो गया था और पॉप से घर के द्वारा उठो दम कर देने को उद्यत हो गया था। जब रौंता का इस प्रकार का भीषण ऋोधावे देखा तो पि गौ च में ममास्थित होकर भय से वहा में मामन को उद्यत हो गई थी ॥१२॥ दीन शरामन वाले महाराज पृथु भी उमो के पीछे र अनुगमन करने लगे थे। इसके उपरान जब उसने देखा था राज, पीदै २ वदेहने हुए ही बर वर चले आ रहे हैं तो वह एक प्यान में पत्रहा कर नियत हो गई थी और राजा से बोली-मैं वा करू ? मुझे आप ही बतलायें ॥१।। पृपु ने भी यही कहा या-है मुव्रत | तो भी सर जमीप्ट पदार्थ हैं उनको तुम दो म्यावर और चर समूग जगत् का अभीष्ट तुम्हें देना चाहिए ।।१।। तयंव सा प्रवीभूमिटुंदोह स नराधिपः । स्वके पाणी पृयुवम कृत्वा म्दायम्भुव मनुम् ।।९५ तदनमभवन्छुद्ध' प्रजाजीदन्तियेन । ततस्तु ऋपिभिदु ग्धावत्म. सोमनदामवत् ।। १६ दोग्धावृहम्पतिरभूत्पात्र वेदन्तपोरन. । वेदश्च वसुधा दुग्धा दोन्धामियस्तदा भवत् ।।१७ इन्द्रोक्त्तः समभवद नीरमूजंस्करं वलम् । देवाना कान्चन पात्र पितृणा राजततया ॥१८ अन्तकरचामाबद्दपधायमोवत्स स्वद्या रसः। अनावुपात्र नागानातक्षकोवत्सम्भवत् ॥१६ विष क्षीर ततो दोन्धा धृतराष्ट्रोऽभवत्पुन ।

मन्स्यपुराण असुरंरपि दुग्धेयमायसे शकपीडिनीम् ॥२० पात्र मायामभूद्वत्स प्रालादिस्तु विरोचन । दाग्धाद्विमूर्धा नत्रासोन्मायायेनप्रवत्तिता ॥२१ भूमि ने उमी भाति कहा था और उस नराधिप ने दोहन कया था। पृथु ने अपने हाथ मे स्वायम्भुव मनु को वत्स बनाकर ही दोहन किया था ||१५। वह अन्न शुद्ध हो गया था जिससे प्रजा जीवित रहा करती है । इसके पश्चात फिर ऋषियो ने दोहन किया था उस समय मे बत्स सोम हुआ था ।।१६।। फिर दोग्या वृहस्पति हुए थे और पात्र तो वेद था तथा तप रस था । वेदों के द्वारा भूमि दोग्ध हुई थी उस समय मे दोहन रने वाले मित्र थे ॥ १७॥ इन्द्र वत्स बना था और उम का जो क्षीर था वह ऊर्जस्कर बल था। देवो का जो पात्र था वह तो सुवर्णमय अर्थात् सुवर्ण का था और गित गणो का पात्र राजत अर्थत चांदी का था ॥१८॥ जिस ममय मे अतक यमराज न भूमि का दोहन किया था और अनक स्वय दोग्धा बने थे उस वक्त यम वम और स्वधा रस था ! मागो का पात्र तो अलाव था और तक्षक वत्स बना था ॥१६॥ उम समय म विप ही क्षीर था। इसके अनन्तर पुन. घृतराद दोग्या इस का दोहन असुगे के द्वारा भी हुआ था प्रायस पात्र अर्थात् बोडे के शुत्रपीडिती थी दोग्न हुआ । पात्र मे माया को दुहा ण पोर उस समय में प्रता आदि विरोचन वत्स हुअा था । वहा पर दोग्धा दो मूर्दाओं वाला था जिसने माया को प्रवत्तित किया पा ॥२१॥ यक्षश्च वसुधा दुग्या पुरान्तर्धानमीपसुभिः । कृत्वा वैश्रवण वत्समामपात्रे महीपते ।।२२ प्रेतरक्षीगणदुंग्या धाग रुधिरमुल्वणम् । गैयनामोऽभवद् दोग्धा सुमाली वत्सएवच ॥२३ ग.धश्चपुरादुग्धा वसुधा सासरोगण । ।

पृथ्वी दोहन ५१ वत्संचत्ररथंकृत्वा गन्धान पद्मदलेतथा ॥२४ दोग्धा वररुचि मनाटयदेवस्य पारग । गिरिभिर्वसुधा दुग्धा रत्नानि विधानि च ।।२५ औपधानिच दिव्यानि दोग्धा मेरुमहाचलः । वत्सोऽभूद्धिमवास्तत्र पाबंशैलमयंपुन. ।।२६ वृक्षश्चवसुधादुग्धा क्षीरं छिन्नप्ररोहणम् । पालाशपातादोग्धातु शाल.पुष्पलताकुलः ॥२७ प्लक्षोऽभवत्ततो वत्सःसर्ववृक्षोधनाधिपः । एवम यश्च वसुधा तदा दु-धायथेप्सितम् ।।२८ पहिले अन्तर्धान की इच्छा रखने वाले यक्षो के द्वारा भी वसुधा हो गयी थी । हे महीपते ! उस समय में सामवेद को पात्र बनाया था तथा वैश्रवण (कुवेर) को वत्स बनाया गया था ।२२। इस घर का मोहन प्रेत और राक्षस गणों के द्वारा भी किया गया था अति बलवान हघिठ दुहा गया था । रौप्य नाम दोग्धा हुए थे और मुशाली वत्स हा पा ॥२३॥ पहिले काल में गन्धर्वो ने भी इस वसुधा को दुहा था जो कि अप्सराओ के गणो के साथ मिल कर ही दोहन किया गया था। उन्होंने चैत्र रथ को वत्स बनाया था और पदुमो के दलो मे गधो को दुहा था ॥२४॥ वररुचि नाम वासा तो वसुधा का दोषा हुआ था जो कि वर रुचि नाटय वेद का पारगामी पुरन्धर विद्वान् था । गिरियो के द्वारा इस वसुधा का दोहन किया गया था जिस में विविध भांति के रत्नो का दोहन हुआ था ॥२५) महान् अपल मे के द्वारा दिव्य औषधियो का दोहन हुआ था। उस दोहन के समय मे वत्स हिमाचल बना था और शैलमप ही पात्र था ।।१६॥ दक्षो ने दसुन्धरा का दोहन किया था जिस दोहन मे छिन्न हुए वृक्षो का पुन: प्ररोहण हो जाना क्षौर था । फ्लाश (टाक) का पात्र था और पुष्प तथा लताओ से समाकीर्ण शाल वृक्ष दोग्या अर्यात दोहन करने वाला था ॥२७॥ उस काल मे प्लक्ष पाखर) मत्स्यपुराण ही जो समस्त वृक्षो का धनाधिप है वत्स हुआ था। इसी रीति से इस वसुधा का उस काल मे अन्यो के द्वारा भी यथेच्छ रूप से दोहन किया मपा पा ॥२८॥ आयुर्धनानि सौख्यश्चपृथौ राज्यप्रशासति । न दरिद्रस्तदा कश्चिन्नरोगीन च पापकृत् ॥२६ नापसगभकिञ्चित् पृथीराजनिशासति । नित्य प्रमुदितालोका दुःखशोकविजिताः ॥३० धनुष्कोटयाच शैलेन्द्रानुत्सायंसमहाबलः । भुवस्तलसमश्चक्रे लोकानाहितकाम्यया ॥३१ न पुरग्रामदुर्गाणि नचायुधधरा नरा.। क्षयातिशयदु खञ्च नार्थशास्त्रस्य चादरः।।३२ धमकवासनालोका पृथौ राज्यं प्रशासति । कथितानिचपात्राणि यत्क्षीरञ्चमयातव ॥३३ यपा यत्र रुचिस्तत्तद्देय तेभ्यो विजानता। यज्ञश्राद्ध पु सर्वेषु मया तुभ्य निवेदितम् ॥३४ दुहितृत्वङ्गता यस्मात् थौधम्भवतो मही। तदानुरागयोगाच्च पृथियो विश्रुता बुधौः ॥३५ जिम समय में यहाँ पर भू मण्डल में महाराज पय राज्य की प्रशासन कर रहे थे म वास यष्टआयु-सोला और धन सभी कुछ था। उम पास में यहा पर कोई भी दीन दरिद्र नहीं था और न कोई रोग से हो समान व्यक्ति पा और न कोई भी पाप कम्मों में ही करने सामा पाषु रामा के शासन काल मे किमी भी प्रकार के मार्ग पर रिसी से भी नहीं था। सभी लोग निस्प हो परम प्रमुदिन थे और सभी योग हुनु तथा गोक से रहित ये ।।१०।। उस महार मानी राना में भरने प्रमुग मोमोटिन हताब विमाप्त ममुप मोनो रमम्ति बारेमसमोसमतसर दिया पासपा आदिश्याख्यान बड़ खाबडपन हटाकर लोकों के हित के सम्पादन मी कामना से परम न्दर इसको बना दिया था ।।३१। उस राजा के शासन काल मे नगर और ग्रामो में कोई भी सुरक्षा सम्पादनार्थ दुगं नादि को आवश्यकता ही वहीं पी। और कोई भी मनुष्य बायुधों को धारण करने वाले भी नहीं थे योकि अस्त्रायुधो की कोई आवश्यक्ता ही नहीं रही थी । क्षय के अतिशय होने का दुःख लेशमात्र भी नहीं था तथा प्रर्थशास्त्र का कुछ को समादर उस समय में नहीं रह गया था ॥३॥ राजा पृथु महाराज के द्वारा प्रशासन की बागडोर हाय में ग्रहण करने पर सभी लोग एक नात धम्मं की वासना रखने वाले हो गये थे। हमने दोहन के पात्र और सीर मन बतला दिये हैं ॥३३।। जिनकी जहा पर कचि थी वही विशेष झान रखने वाले पुरुष को उनको देना चाहिए। यशो मे और पाखो में सब में रुचि के अनुसार ही दान करना चाहिए यह हमने तुम को बतला दिया है ॥३४॥। क्योकि राजा पृयु के होने पर यह धर्मवती पृथ्वी उसकी दुहिता के स्वरूप पाली हो गई थी। यह उस में एक विशेष अनुराग का ही योग था इसी कारण से पृथु के ही नाम से इस वसुधा का नाम भी लोक में पृथ्वी यह विश्रुत हो गया था। जिसे बुध लोग कहा करते हैं ॥३४॥ ! १०-आदित्याख्यान आदित्यवंशमखिल बद सूत ! यथाक्रमम् । सोमवशञ्च तत्वज्ञ ! यथावद्वक्तुमर्हसि ।।१ विवस्वान् कश्यपात् पूर्वमदित्यामभवत्सुतः। तस्यपत्तीत्रयं तद्वरसज्ञा राज्ञी प्रभा त-1R रेवतस्य सुता राज्ञो रेवत सुपुवे सुतम् । प्रभा प्रभात सुपुवे वाष्ट्रीसंज्ञा तथा म म् ।

मत्स्यपुराण यमश्च यमुना चैव यमलो तु बभूवतुः । ततस्तेजामयं रूपमसहन्ती विवस्वतः ।।५ नारीमुत्पादयामास स्वशरीरादनिन्दिताम् । त्वाष्ट्रीस्वरूपेणनाम्ना छायेतिभामिनीता १५ किडगमीति पुरत स्थिता तामभ्यभाषत । छाये | स्व भज भरमस्मदीय वरानने ६ अपत्यानि मदीयानि मातृस्नेहेन पालय । तथेत्युक्ता तु सा देवमगमत् क्वापि सुव्रता ॥७ ऋषियो ने पूछा था-हे मूतजी ! सूर्य का सम्पूर्ण सम्पूर्ण वश आप हमारे सामने वर्णन कीजिए जो कि सब क्रमपूर्वक हो । हे तत्वो के पूर्ण शाता विद्वन् । इसी भांति चन्द्रवंश का भी यथावत वर्णन करने के लिये आप परभ योग्य हैं ॥1॥ महा मुनीन्द्र सून मी ने कहा-सबसे पूर्व मे कश्यप महषि मे अदिति नाम धारिणी पत्नी के उदर से विवस्वान् सुत ही समुम्पन्न हुभा था । उस विवस्वान (सूर्य) की तीन पलियां थी और उनके नाम सज्ञा - राज्ञो और प्रभा य थे॥२॥ राजी रेवत की पुत्री थी और उसने रंवत सुन को जन्म दिया था। प्रभा नाम वाली ने प्रभात को प्रसून किया था तथा व ष्ट्री सज्ञा ने मनु को समु प न किया था।३। यम ने यमुना समुदभूत की थी। ये ययत हुए थे। यह विवस्वान क उस तेजोमय स्वरूप को सहन करने वाली नहीं हो ॥४॥ उसने अपने शरीर से एक अनिन्दित नारी को समुपादित किया था। उस समय में यह मामिनी स्वरूप से स्वाष्ट्री और नाम से छाया थी |॥ ५॥ 'मैं इस समय में क्या करू"- यह कहने वाली जब सामने वह स्थित हुई तो उ से कहा था-है छाये ! हे वर आनन वाली ! तुम हमारे ही स्वामी म भजन करो ॥ ५, ६॥जो मेरी सन्तति हो उमे आप माना के समान स्नेह के दाग ही पासन करो। 'तथास्तु' अर्थात् ऐसा ही होगा--यह कह पर वह सुव्रता वहीं पर दव। समीर मे पच गई थी।

आदित्याम्यान
कामयामास देवोऽपि सज्ञयमितिचादरात् ।
जनयामास तस्यांतु पुत्रञ्च मनु पिणम् ॥
स्वर्णत्वाच्च सारिणम्मनोवैवस्वतस्य च ।
त शनिच तपतो विष्टि चव बेमेण तु ।
ठायाया जनयामास सज्ञेयमिति भास्करः।
छाया स्वपुत्रेऽम्यधिक स्नेहं चक्रे मनो तथा १०
पूर्वो मनुस्तु चक्षाम न यमः कोपन्छिनः ।
सन्तर्जयामासतदा पादमुद्यम्य दक्षिणम् ॥११
शशाप च यम छाया सततः वृमिसयुतः।
पादोऽयमेको भविता पृयशोणितवियव. ॥१२
निवेदयामास पितुर्धम्म: शापादर्पित ।
निष्कारणमह शप्तीमाता देव ! सकोपया १३
वालमावान् मया विञ्चदुद्यतश्चरण सवृत् ।
मनुना वार्यमाणापि मम शापमदाद्विभो ।।१४
वह देवी भी यह समा है-इसी आदर से उसको चाहने लगे थे।
उसमे उन्होंने मनुरूपी पुत्र को जन्म ग्रहण कराया था ।। ८ ।। वस्वत
मनु के सवर्ण होने से वह घावणि हुआ था। इसके पश्चाद क्रम में नि-
अपनी और विप्टिको समुत्पन्न दिया। भगवान् भास्कर ने
यह
सज्ञा दी है यह समझ कर छाया में ही समुत्पन्न विवे थे । छाया अपन
पुत्र मनु मे धिप अधिक संह क्यिा करती थी ॥१०॥ पूर्व मनु ने
तो देवा नहीं था किन्तु यम तो क्रोध से अत्यधिक मूच्छित होगया था ।
उस समय में उसने अपनी दाहिनी लात उराश भली भाडि ठमको डाट
फटकार दो पो॥११॥ त्यो छाया ने सम को नही दे दिया था
fr यह तेग एक पर जिसको तन स्टाकर मारने की धमकी दी यो
वृमियों से
युक्त क्षत वाला और मवाद तथा रक्त से दिसब हो जायगा
१२॥
स माप रो अपित होकर धम्म ने पिना से निवेदन किया

५ मत्स्यपुराण था -हे देव ! मुझे बिना हा किसी विशेष कारण ये माता ने शाप दिया है वह मुझ पर अत्यन्त ही कुपित हो गई है ॥ १३ ॥ बल के अभा होने के ही कारण से ते एक ही मार अपना परण अवश्य ही कुछ उद्य' किया था। हे विभो! मनु के झारा इसे निवाग्नि भी फ्रया पया था तो में मुझे माता ने शाप देही दिना हे ।। ४।। प्रायोन माता सास्माक शापेनाह यतो हत.। देवोऽप्यायम भूय किङ्करोमिमहामते ॥१५ मोत्किस्यनदुःखस्यादथवाकम्मंसन्तते । अनिवार्याभवस्यापिकाकथान्येपुजन्तुषु ।।१६ कृकवाकुर्मया दत्ता य कृमीन भक्षयिष्यति । वलेदञ्च रुधिररञ्चंच वत्सायमपनेष्यति ॥ ७ एवमुक्तस्तपस्तेपे यमस्तीव्र महायशा । गोकणतीर्थे वराग्यात् फलपत्रानिलाशनः ॥ १८ आराधयन् महादेव यावद्वर्षायुतायुतम् । वर प्रादान् महादेव. सन्तुष्ट. शूल भृत्तदा ॥१६ वव्रसलाकपालत्व पितृलोके नृपालयम् । घधित्मिकस्यापि जगतस्तुपरीक्षणम् ॥२० एव स लोकपालत्वमगम छूलपाणिन । पितृणाञ्चधिपत्यच्च धर्माधर्मस्य चानघ ॥२१ प्राय वह हमारी माता शाप के द्वारा मुझे कभी भी हत नहीं किया करती थी इसीलिये बडा दुख है । उस समय म देव ने भी फिर यम से कहा था-हे महामते ! बताओ, अब मैं इसमे क्या करूं? ॥१५॥ मूर्खता के कारण किसको दुख नही होता है अर्थात् सभी पूर्वता बश दुखित हुना ही परते हैं । अयदा यह को को सन्तति ऐसी अनिवार्य होती है जो भी जंपा कम करता है उसे उसका फल अवश्य हो भोगना ही पडता । । यह तो साक्षात् भगवान् भव को भी भोगनी पड़ती है आदित्याख्यान फिर अन्य साधारण जन्तुओं को तो क्पा ही क्या है ॥ १६ ॥ यह मैंने कवा दे दिया है जो कृमियों को खा जाएगा । हे वत्म ! यह ब्लेदन और रुधिर का भी अपनयन करेगा ||10| इस प्रकार से जब उससे वहा पया या तो उस महान् यशस्वी यम ने तीन तपश्चर्या का तपन किया था और वह तरस्या भी पल-पत्र और वायु का ही केवल नशन करके गोकर्ण नामक तीर्थ में की थी ।।१८।। अयुनायुत अर्शन दी हजार वर्ष पर्यन्त भगवान् महादेव का समाराधन किया था। तब तो इस उन्युन तप से महादेव परम सन्तुष्ट हो गये थे और उसी समय में शूलधारी प्रभु ने वरदान दिये 2 ||१६|| महादेव ने कहा था लोक्पालाना हो पायगी और पित लोक में नृपालप होगा । तुम्हारा कत्तव्य क्न यही होगा कि सम्पूर्ण जगत् का वम और अधर्म का आप परीक्षण क्यिा करेंगे कि कौन स्दिना धर्मनिष्ठ है और कौन घोर पापात्मा है-आपके द्वारा यह निर्णय होने पर ही वह दुःख दण्ड तपा सुख स्वर्ग का उपभोग किया करो ॥ २० ॥ हे अनध! इस प्रकार से शूलपाणि के प्रसाद से वह यम लोपाल हो गया था तथा पितृगण के अधिपति होने का पद तथा धर्मा- धर्म का निर्णायक बन गया था 1॥२१॥ विवस्वानय तज्ज्ञात्वा संज्ञायाः कर्मचेष्टितम् । त्वष्टु समीपमगमदाचचक्षे चरोपवान् ।। २२ तमुवाच ततस्त्वष्टासान्त्वपूवं द्विजोत्तमाः । तयामहन्ती भगवन् ! महस्तीव्रतमौनुदम् ॥२३ वडवारुपमास्याय मन्तकारामिहागटा। निवारिता मया सातु त्वमा चैव दिवाकर ॥२४ यस्मादविज्ञाततया मत्सकाशमिहागता। तस्मान्मदीय भवन प्रवेष्टु न त्वमर्हसि ॥५ एवमुक्त जगामाय मन्देशमनिन्दिता । वडवा ल्यमान्याय भूतले सम्प्रतिष्टिता ।।२६ मत्स्यपुराण तस्मात्प्रसादं कुरु मे यद्यनुग्रहमागहम् । अपनेप्यामि ते तेजो यन्त्र कृत्वा दिवाकर! ॥२७ रूपतवरिप्यामि लोकानादकरं प्रभो! तथेत्युक्तः स रविणा भूमो कृत्वा दिवाव रम् ।।२८ विवस्वान् ने इसके अनन्तर, संज्ञा के उस कमों के चेष्टित का ज्ञान प्राप्त किया तो वह त्वष्टा के समीप में आये और अत्यन्त रोप वाले होकर कहा था ।। २२ ।। हे द्विजोत्तम गण! इस पर त्वष्टा ने बहुत ही सान्त्वना पूर्वक उमसे निवेदन किया था-हे भगवन् ! यह विचारी उम को छिन्न-भिन्न कर देने वाले आपके इस तीव्र तेज को सहन न करती हुई वडवा के रूप में समास्थित होकर यहाँ मेरे समीप मे समायत हुई थी। हे दिवाकर | मैंने उसको निवारित किया था और आपने भी किया था ।। २३ ॥ ४ ॥ क्योकि वह अविज्ञानता के कारण से यहा पर मेरे समीप मे आ गई थी इस कारण से अब आप इस मेरे भवन मे प्रवेश करने के योग्य नहीं होती हैं ।। २५ ॥ मेरे द्वारा इस प्रकार से कही गयी वह अनिन्दिता मरु देश मे चली गयी थी और वह बड़वा का रूप धारण करके ही इस भूतल मे सम्प्रतिष्ठित हो रही है ।। २६ ।। हे दिवाकर देव! यदि मैं आपके अनुग्रह का भागी हूँ तो अब आप मुझ पर अपने प्रसाद की वृष्टि कीजिए । अब मैं यन्त्र मे करके आपके इस अत्युल्वण उग्र तेज का भी अपनयन कर दूंगा ॥ २७ ॥ हे प्रभो! आपका मैं अब स्वरूप ऐसा सुन्दर बना दूंगा जो लोको के प्रानन्द करने वाला ही हो जायगा। इस प्रकार मे कहे गये उसको रवि के द्वारा भ्रमि मे दिवाकर को कर दिया था ॥८॥ पृथक् चकारतत्तेजश्चक्र विष्णोरकल्पयत् । त्रिशूलञ्चापिरुद्रस्यवचमिन्द्रस्यचाधिकम् ॥ ६ दत्यदानवसहतु सहस्रकिरणात्मकम् । रूपञ्चाप्रतिमञ्चक्रे त्वष्टा पद्भयामृते महत् ।।३९

आदित्याख्यान
न शशाकाय तद्रष्ट्र पादरूपरवे.पुनः ।
अर्चास्वपि तत पादौ न कश्चित्कारयेत् क्वचित् ॥३१
यः करोति स पापिष्टा गतिमाप्नोति निन्दिताम् ।
कुष्ठरोगवाप्नोति लोकेऽस्मिन् दुःखसंयुतः ॥३२
यस्मा च धम्मंकामार्थी चित्र प्वायतनेषु च ।
न क्वचिकारयेत्पादी देवदेवस्य धीमत. ॥३३
तत. स भगवान् ! गत्वा भूलोक्ममराधिपः ।
कामयामाम कामातों मुखएव दिवाकरः ॥३४
अश्वरूपेण महता तेजसा च समावृतः।
सज्ञा च मनसा क्षोभमगमद्यविह्वला ॥३५
उस घ्रमि के द्वारा उमका जो उग्रतेज या उसके
पृयक
कर दिया
पा ओर उम पृयवकृत तेज से भगवान् विष्णु के सुदर्शन चक्र को रचना
कर डाली थी। उस नेज से भगवान् रुद्र के त्रिशूल की और इन्द्रदेव के
अधिक प्रभावशाली बज को रचना भी की गई थी ॥२६॥ दैत्यो और
दानको के सहार करने वाले का एक सहन किरणो वाले स्वरूप से
समवित अप्रतिम रूप की रचना त्वष्टा ने करदी थी जो महत् परों से
रहित था ।। ३० ।। फिर वह रवि अपने पदो के रूप को देखने में भी
असमर्थ हो गये थे। उसकी अर्चाओं में भी कोई भी कहीं पर उनके पादों
को सचितम न किया करे ॥ ३१॥ यदि कोई सूर्य के पादो का समर्थन
किया भी करता है तो वह परम निन्दिन और घोर पापष्ठि गति को
प्राप्त हुआ करता है। ऐसा करने वाला पुरुष इस लोक मे परम दु.ख से
सयुन होता हुआ कुष्ठ जैसे महान् घोर रोग की प्राप्ति किया करता है
॥ १२॥ इसी कारण से जो भी कोई धर्म और काम का अर्थी हो उसे
वित्रो मे तथा आयलनो मे भी कहीं पर भी धीमान देवो के भी देव के
पादों को रचना न करे और करावे।। ३३|| इराके पश्चात् यह भगवान्
अमगे का अधिष भूोक मे गये थे और केवल मुखरूप, दिवाकर
*

मरस्यपुराण कामात होकर कामना की थी।॥ ३४॥ अश्व के रूप से युक्त और महान तेज से समावृत थे। वह जो सशा थी वह भय से अत्यन्त विह्वल होती हुई मन से अत्यन्त क्षोम को प्राप्त होगई थी ॥३॥ नासापुटाभ्यामुत्सृप्टपरोऽयमितिशड्कया। तद्रेतसस्ततोजातावश्विनावितिनिश्चितम् ॥३६ दसौसुतत्वात्सातौ नासत्योनासिकाग्रत । ज्ञात्वाचिराच्च तं देवसन्तोपमगमत्परम् । विमानेनागमत् स्वर्ग पत्या सह मुदान्विता ॥३७ सावर्णोऽपि मनुमरावद्याप्यास्ते तपोधनः । शनिस्तपोबलादाप ग्रहसाम्यं तत. पुनः ॥३८ यमुना तपती चैवपुननद्यो वभूवतुः। विष्टि?रात्मिका तद्वत् कालत्वेन व्यवस्थिता ।।३६ मनौवैवस्वतस्यासन् दशपुत्रा महाबलाः । इलस्तु प्रथमस्तेषा पुत्रष्टया समजायत ।।४. इक्ष्वाकु. कुशनाभश्च अरिष्टो धृष्ण एवच । नरिष्यतः करूषश्च शातिश्च महाबलः ।। पृषध्रश्चाथ नाभागः सर्वे ते दिव्यमानुपाः ॥४१ अभिपिन्य मनु पुत्रमिल ज्येष्ठ स धार्मिकः । जगाम तपसेभूयः स महेन्द्रवनालयम् ॥२ यह पर है -इत शहा से नासा के पुटो से ही उत्सर्जन किया था किन्तु इसके अनन्तर उनके वीर्य से अश्विनीकुमार समुत्पन्न हुये थे- पह निश्चित है । नासिका के अग्र भाग से ये नासत्य दस सुत रूप से समुद्भूत हुए थे-बहुत ही अधिक समय के पश्चात् यह जानकर देव को परम सन्तोष हुआ था । वह मुदान्वित होती हुई पति के ही साथ विमान के द्वारा स्वर्ग को गयी थी ।। ३६, ३७ ।। सावणं मनु भी अधिक सपोधन भाज भी मेरु पर्वत में विद्यमान हैं । इसके अनन्तर वह शनि भी बल से - मत्स्यपुराण के सम्प्रघर्पित परते हुए उसने इस मही पर भ्रमण किया था ॥४३॥ प्रताप वाले उसने अश्व के द्वारा समाकृष्ट होकर घूमते हुए भगवान् गम्म उपवन मे वह चले गय थे। वह वन पल्पद म और लताओ से समा कीणं था और महत् वन का नाम शरवण या ॥४४॥ जिस वन सोमाद्ध' को शेखर मे धारण क ने वाले भगवान् शम्भु देवेश्वर उमादेवी के साथ रमण किया करते हैं । पहिले ही समय मे वहाँ पर शरवण में समय ( सङ्केत ) कर दिया गया था ॥४५॥ पुरुष सज्ञा वाला कोई भी जीव यदि तेरे इस वन म समागत होगा तो वह इस दश योजन के मण्डल मे तुरन ही स्त्रीत्व को प्राप्त हो जायगा चाहे कोई भी हो सभी के लिए यह प्रभाव अवश्य होगा ॥ ४६ ।। यह राजा इस इस समय का ज्ञान ही मही रखता था। यह यह भूल तथा अज्ञानवश उस शरवण नामक वन में पहुँच गया था और उसमे प्रवेश करते ही यह त्रीत्व को प्राप्त होगया था तथा जो इसकी सवारी का अश्व था वह भी बडवा घोडी) होगया था। हे नृप । जब समस्त पुरुषस्व के लभग हत हो गये थे तो इस राजा को बहुत ही अधिक विस्मय हुआ था जब कि उसने अपने आपको एक स्त्री के रूप मे पाया था। अब तो वह इल इला नाम वाली स्त्री हो गई थी जिसक पोन-3 नत प्रौर परम धनस्तन थे ।। ४७॥४८॥ उसी वन में भ्रमण करते हुए उस इला भामिनी ने विचार किया था कि ऐसी दशा मे मेरा यहाँ कोन तो पिता है अथवा कौन भाई है और कौन मेरी माता ॥४॥ ११-सूर्यवंश वर्णन। अथाविपन्तो राजान नातरस्तस्यमानवा । इक्ष्वाकुप्रमुखाजग्मुस्तदाशरवणान्तिकम् ।। ततस्तेददृशु सर्वे वडवामग्रत. स्थिताम् । रत्नपर्याणकिरणदीप्तमायामनत्तमाम् ॥२ सूर्यवश वर्णन ३ पर्याणप्रत्यभिज्ञानात् सर्वे विस्मय मागताः । अय चन्द्रप्रभो नाम वाजीतस्य महात्मनः ।।३ भगमद्वडवा रूपमुत्तमं केनु हेतुना । ततस्तु मैत्रावरुणि पप्रच्छुस्ते पुरोधसम् ॥४ किमित्येतदमूचित्रवदयोगविदाम्बर ! । वशिष्ठश्चानवीत सर्व दृष्ट्वा तद्धयानचक्षुपा ।।५ समयः शम्भुदयिताकृत. शरवणे पुरा । यः पुमान प्रविशेदन स नारीत्वमवाप्स्यति ॥६ अयमश्वोऽपि नारीत्वमगाद्राज्ञा सहैवतु। पुन. पुरुपतामेति यथासौ धनदोपम. ॥७ श्री महपि सूतजी ने कहा- इसके अनन्तर मनु के पुत्र मानव राजा के भाई लोम जब उसको लोटने में बहुत अधिक समय होगया तो उसकी खोज करते हुए इक्ष्वाकु प्रमुख सब उम शरवण नामक वन को गये थे ।।११। इसके अनन्तर जैसे ही वे उस वन के समीप तक ही पहुँचे थे कि उन्होने सबने सामने स्थित बडका को देखा पा जो रत्नों के पर्याण ( रत्न जटिन जीव ) को किरणो स परम दीप्त शरीर वाली थी भार अतीव उत्तम पी ॥२॥ उसके पर्याण के प्रत्यभिज्ञान से वे सभी लोग अत्यन्त विस्मित हो गये थे। उन्होने समझ लिया था कि यह तो उमी महात्मा इल राजा का चन्द्रप्रभ नाम वाला अश्व है ॥३॥ किन्तु करा हेतु हो गया है-जिससे इस वडवा का ऐसा अत्युत्तम स्वरूप हो गया है। इसके पश्चात् मा यणि नामक अपने पुरोहित से इस विषय में पूछा पा ॥४॥ है योग के ज्ञातापो में परम श्रेष्ठ | प्राप हम को यह बताइये कि यह एक विचित्र घटना क्या और कैसे हो गई है? सब तो महपि यनिष्ठ जी ने ध्यान के नेत्रो से यह सम्पूर्ण पटना को देख लिया पा और उनसे वे फिर बोले थे ॥५॥ प्राचीन समय में भगवान शमु को पिना उमा देवी ने इमरवण बन में प्रतिज्ञा की थी कि जो

६४
मत्स्यपुराण
कोई भी पुमान इस गरवण धन में प्रवेश करेगा वह निश्चित रूप से
स्त्रीत्व को प्राप्त हो जायगा ॥६॥ यह अश्व भी तो पुस्त्व सझा बाला
या अतएव यह मो राजा के साथ ही स्त्रीत्व को प्राप्त हो गया है
अर्थात् अश्व से बडवा बन गया है। यह धनद के समान उपमा
वाता पुन पुरुषत्व को प्राप्त जिस तरस से होता है उसका उपाय करना
होगा।
तथैव यत्न पतव्यश्चाराध्यव पिनाकिनम् ।
ततस्ते मानमा जग्मुपत्र देवो महेश्वर ॥६
तुष्टुवुविवि स्तोत्र पार्वतीपरमेश्वरी ।
तायूचतुरलपचोऽय समय विन्तु साम्प्रतम् ॥६
इक्ष्वागोरस्वमेधेनयतप न स्यातदावयो ।
दत्त्वा विम्मुरुपोवोरस भविष्यत्यसमयम् ॥१२
सपेत्युत्तास्ततस्तेम्नुजग्मुर्वेवस्वतात्मजा ।
वायोग्याश्वमेधेनवेल पिम्पुरषोऽभवत् ।।११
माममेवम्पमान्वीर स्त्रीच मासमभूत् पुन ।
बुधस्य भवन तिष्टानला गर्भधरोऽभवत् ॥१२
अजीजात पुत्रमेमनेरगुणमयुतम् ।
युधपोला त पुत्र स्वामिगत्तत ।.११
पम्प नाम्ना सम्पमिलायतमतदा ।
toranarmाखिसोभRITER ॥१५

-सूर्यवश वर्णन ह पब सधम करने के योग्य नहीं है इवाफ द्वारा निये मर वमेध से जो भी फल होगा उसको हम दोनो को देवर बद्द वीर विना क्सिी सशय के विम्मुाप हो जायमा ।।१०। तथास्तु अर्यात् ऐमा हो गा-यह कहकर वे सब वैवस्वत मनु के पुत्र वहा स च न दिये थे। बाक ने फिर अश्वमेघ यज्ञ किया था और उसस वह इस किस्पृश्य हो मा था ।।११।। इस का भी यह परिणाम हुआ था कि यह एक माम क तो नारी होकर रहा करता था और एक माम ता पर बन र,जीवन विताता था । जिस समय में यह युध न भवन स्थित रहा था और नारी के म्प मे था उसी समय मे इल न गर्भ धारण कर त्रिका १२|| फिर इसने अनेक सद्गुण गप म ममन्विन एक पुत्र को उन्न दिया था। बुध ने उम पुन को इम के उदर मे समुत्पादित " पर स्वर्लोक को चले गये थे ।।१३।। उसी समय में इनके प्रपं इलावृत इम नाम से प्रसिद्ध हो गया था। सोम प्रो में हम है यही इस सबमे प्रथम मनु का पुत्र हुआ या ॥१२॥ एव पुरूरवाः पुंसोरभवदशरदनः । इक्ष्वाकुर कंवशस्य तथैवोतम्नुपोटमा " इल. विम्पुरपत्वे च सुम्न नि । पुन. पुयत्रयमभूव सुद्य म्नम्याग । उत्कलो व गयस्तदन्तिाधारrz: उत्कलस्योत्कलानाम गया हरिताश्वस्य दिक्पूर्वी दि.z: प्रतिष्ठानेऽभिपित्र्याय - जगामेलान भो ! दृष्ट्वाकुज्येप्टदाराटीxx नरिप्यन्तम्य Ar,' नाभागम्यायगाया मुकाट ur मत्स्यपुराण धृतकेतुश्चितनाथो रणधृष्टश्च वीर्यवान् । आनों नाम शर्याते. सुकन्याचव दारिता ॥२१ इस प्रकार से पुरू रवा पुमान् के वश का वधंन करने वाला हुए था। उसी भौति मूर्य वश की वृद्धि करने वाला तपोधन इक्ष्वाक हुए या ऐसा ही कहा गया है ॥१॥ इल को किम्पुरुषत्व हो जाने प सुद्य म्न इम नाम से कहा जाता है । इसके पक्षात् सुधम्न के तीन अप राजित पुत्र हुए थे ॥१६॥ उन तीनो के नाम उत्कल, गय और वह वीर्यवान हरिताश्व ये थे । उत्कल की उत्कला नाम वाली-गय की ग' पुरी मानी गयो है ॥१७॥ हरिताश्व की कुरुओ के साथ पूर्वदिक वि हुई थी। उसने प्रतिष्ठान मे पुरूरवा पुत्र का अभिषेक किया था। दिव्य फलो के अशन वाले इला वृत वर्ष का उपभोग करने के लिये च गया था। ज्येष्ठ दायाद जो इक्ष्वाकु था उसने मध्य देश को प्राप्त कि था 11१८, १९॥ नारिष्यन्त का शुच नाम वाला महाद बल वाला प्रसूत हुआ था । नाभाग का पुत्र अश्वरीप हुआ था और घृष्ट के त पुत्र हुऐ थे ॥२०॥ उन तीनो के नाम धृष्ट वेतु चित्र नाथ और ती वीयवान् रण घृष्ट ये थे । शयति का पुत्र आत्ति नाम वाला उत्पन था तथा सुकन्या नाम धारिणी एक लड़की हुई थी ॥२१॥ आनतस्याभवत्पुनो रोचमान प्रतापवान् । मानों नाम देशोऽभू-नगरीच कुशस्थली ॥२२ रोचमानस्य पत्रोऽभूदेवोरैवत एव च । ककुद्मीचापरान्नामज्येष्ठ पुत्रशतस्य च ॥२३ रेवती तस्य सा कन्या भार्या रामस्यविश्रु ता । वरूपस्य तु कारूपावहव प्रथिताभुवि ।।२४ पृपध्रोगोवधा छूद्रो गुरशापादजायत । इक्ष्वाकुवश वक्ष्यामि शृणुध्वमृषिसत्तमा ॥२९ इक्ष्वाको पुत्रतामाप विकुक्षि म देवराट ।

सूर्यवश वर्णन ज्येष्ठः पुत्रशतस्यामोद्दश पञ्चच तासुता. २६ मेरारतरतस्तेतु जाताः पायिवसतमाः । चतुदंशोत्तरञ्चान्य, तमस्य तयामवत् ।।२७ मेरोदक्षिरगतो य दे राजानः सम्यकात्तिताः । ज्येष्ठः ककुत्स्थो नाम्नाऽभूत्तत्सुतस्तु सुयोधनः ॥२८ यानतं का पुत्र परम प्रताप वाला रोचमान हुआ था इस राजा के ही नाम मे देश का नाम भी आनत हो गया था और इसी नगरी का नाम कुशस्थली था ॥२२॥ रोनमान का पुन देव रवन हुआ था और कभी अपर नाम था जो सो पुत्रों में सबसे बडा ज्येष्ठ था ॥२३॥ उसको रेवती नाम वाली कन्या मगुनान्न हुई थी बो बलगमजी पी परम प्रसिद्ध मार्या यो । वरूप के बहुत-गे काही नाप धारी पुन्न यू मण्डल में प्रसिद हुए ॥२॥ गो वध से पन समुत्पन्न हुआ था गुरु मे हो गया था 1 है ऋपि श्रेष्ठो! अब मैं इश्वाकु के वर का वसन करता हूँ उम का आप नोग प्रवण कोधिए । २॥ विकुक्षि नाम वाले देवराट ने इक्ष्वा के पुत्र का स्थान प्राप्त किया था। यह सो पुत्रो में सबसे बड़ा पुत्र था ! इसके भी दस और पाच वर्षात पन्द्रह पुत्र हुए ये ॥२६॥ ये सब मेरु को उसर दिशा में श्रेष्ठ पार्थिव हुए थे। चतुर्दग से उत्तर अन्य इमका बंमा ही विधन हुमा मा ।। २७ ।। मेर के दक्षिण माग में जो भी राजा लोग कात्तित किये गये हैं सनमें ज्येष्ठ कास्य हुपा था। उसका पुत्र सुरोधन नाम गला पा 11२८11 तस्य पुत्रः पथुन म विश्वगश्च प्रयोः मुतः। इन्दुस्तस्यचप वोऽभ वनाश्वस्ततोऽभवत् ॥ श्रावस्तश्चमहातेजायलकस्तत्नुनोऽभवत् । निर्मिता येन धावस्तीगोदौहिजोत्तमा ॥३० श्रावस्ताद् दश्वोऽभूत दुबलाम्बस्ततोमवत । के शाप ६८ म यपुरुष धुन्धुमारत्वमगमद घु.धु ना ना हत पुग ॥३१ तस्य पत्रास्त्रया जाता इटाश्वो दण्ड एव च । कपिलाश्वश्च विरयातों धौन्युमारि प्रतापवान् ॥३' द्वढाश्वस्य प्रमादश्चयश्वस्तस्यचा मज । हयश्वस्यनिकुम्नाऽभूत्सहताश्वस्तताऽभवत ।।३. अकृताध्वोरणाश्वश्च सहताश्वसुतावुभौ । युवनाश्वोग्ण श्वस्य मान्धाताचतताऽभवत ॥३४ माधातु पम्वुत्ताऽद्वम्ममनाना पार्थिव । मुचकुन्दश्च विख्यात शगुजिन्च च प्रतापवान् ॥३५ सुयोधन के पुत्र का नाम पृथु और पृयु का आत्मज विश्वग नामधारी था। इसके पुत्र का नाम इन्दु था और इ दु का सुत युवनाश्व हुआ था ।। || भ्रावस्त महान् तेज वाला था। इसके सुत का नाम वत्मक था । हे द्विजगणो । इसी न गौड देश मे श्रावस्ती नाम वाली पुरी का निर्माण किया था । ३० ॥ श्रावस्त से वृहदश्व ने जन्म प्राप्त किया और इस पुत्र क नाम कुवलाव हुआ था । यह धुधु मारता को प्रप्त हा गया था क्योकि पहिल धु धु नामधारी का हनन किया था ।३१५ इसके तीन सुना न ज म ग्रहण किया था। उनके नाम दृढाश्व और दण्ड ५ तथा तासरा कपिलाश्व या जा प्रताप वाला धौ धुमारि नाम से विण्यात हुआ था ।। ३२॥ दृढाश्व का प्रमोट और प्रमोद का हबश्व पुत्र हुआ था । हयव का निकुम्भ सुत उत्प न हुआ था फिर इसका पुत्र सन्त श्व पैदा हुआ था ॥३३ ।। सहताश्व के अकृताव और उरणाव दा सूत हुए थे। उरणाश्व का पुत्र युवनाश्व हुआ तथा फिर इसके म ता नाम वाल ने जम ग्रहण किया था ॥ ३४॥ मा धाता के पुत्र मा नाम पुरुकुत्स पा प्रधनमन पार्थिव भी हुआ था एव मुचुकुद परम विभ्यास हुआ और प्रतापघारी शत्रुजित् भी हुआ था । ऐस य चार पुत्र पथ ॥३५॥ ये प सवश वर्णन पुरुकुत्सस्य पुरोऽभूसूदानर्मदापति । सम्भूतिस्तस्यपुत्रोऽभूत्तिधन्वा चततोम्भवत् ॥३६ निधन्वन सुतोजातस्त्रय्यारण इति स्मृत । तस्मात्सत्यव्रत्तोनामतस्मात्सत्यरथ स्मृत ॥३७ तस्य पुत्री हरिश्चन्द्रा हरिश्चन्द्राच्चरोहित.। रोहिताच्च वृको जातो वृकावाहुरजायत ।।३८ सगरम्तस्य पत्रोऽभूद्राजा परमधार्मिक. । ढे भाये मगरस्यापि प्रभाभानुमती तथा ताभ्यामाराधित पूवमौर्वोऽनि पत्रकाम्यया । औवस्तुप्टम्तयो प्रादाद्ययेप्ट वरमुत्तमम् ॥४० एका पसिहमाणि सुतमेक तथापरा। गृह्णातु वशवार प्रभाऽगृहलाद् बहू स्तदा ॥४१ एक भानुमती पुत्रमगृह्णादसमञ्जसम् । तत पप्टिसहस्राणि सुपुवे यादवीप्रभा ॥४२ पुरुकुत्स का पुत्र वमूद हुआ था जानमंद पनि था । इमका मुत मम्मनि था तथा सम्भूति म विधवा न जन्म रहण किया या ॥ ३६ ।। विधवा के पुत्र का नाम ग्याम्प कहा गया है। इसस सत्यवत और पत्य व्रत के पुत्र का नाम मत्यरथ या ॥३७॥ इस सत्य र कहा पुत्र का नाम हरिश्चन्द्र मादा जिमका पुत्र रोहित दृा था । रोहत वृष का जम हुप्रा था और य क पुत्र का नाम दाह था ॥३८॥ इम वाह रे सुन का नाम राजा सगर हुआ या बो परम धार्मिक महापति हुधा है। इस महाराज सगर को दोपनियां थी। एक का नाम प्रभा भौर दूसरी का नाम भानुमती था॥ ३६ || इन दाना ही पत्नियो ने पहिल पुत्र प्राप्ति की कामना स और अग्नि की समाराधना को यो। और्व इन समाराधन म परम स तृष्ट हा गया था और उसन उन दोनों १] यषष्ठ उत्तम घादान दिया था। उनम से एक तो साठ हजार

मत्स्यपुराण
और दूसरी एक पुत्र कर जो वा की वृद्धि करने वाला हा । उस समय
म प्रभा ने वहु-स पुत्रो की प्राप्ति का हो ग्रहण किया था ॥४०, ११॥
भानुमती नाम धारिणी सगर की भार्या न एक सुत ही प्राप्त किया था
जिसका नाम असमरजम था। इसक अनतर यादवो प्रमा ने साठ सहम
पुत्रो को प्रसूत किया था !४२।।
खनन्त पृथिवी दाधा विष्णुना येऽश्वमार्गणे ।
असमञ्जसस्तु तनयोर्योऽशुमान्लामविश्रुत ॥४३
तस्यपु नो दिलीपस्तु दिलीपातु भगीरथ ।
येन भागीरथी गङ्गा तप. कृत्वावतारिता ॥४४
मगीरथस्य तनयोनाभाग इतिविश्रुत ।
नाभागस्यावरीषाऽभूसिन्धुद्वीपस्ततोऽभवत् ॥४५
तस्यायुतायु पत्रोऽभूद्वतुपर्णस्ततोऽभवत् ।
तस्य वल्माषपाटस्तु सर्वकर्मा तत स्मृत ॥४६
तस्यानरण्य पत्रोऽभून्निघ्नस्तस्य सुतोऽभवत् ।
निघ्नपत्रावुभौजातो अनमित्ररघूनपी ॥४७
जनमित्रो वनमगाद् विता स कृते नप ।
रधारभद दिलीपस्तु दिलीपादज कस्तथा ॥४८
दोधवाहुरजाज्जातश्चाजपालस्ततो नृप ।
तस्माद्दशरथा जातस्तस्य पुनचतुष्टयम् ॥४
य साठ हजार जो पुत्र हुए थे इहान अश्वमध के घोडे की खोज
करने में भूमिका खनन क्यि था और खनन करत हुए ही विष्णु के द्वारा ये
दग्ध कर दिये गये थे असमञ्जस का पुत्र अशुमान् नाम से प्रसिद्ध हुआ था
१४३। इसके पुत्र का नाम दिलीप था और दिलीप नामधारी राजा से ही
भगीरथ ने जन्म प्राप्त किया था जिसने परभोगु तपश्चर्या करक भागी-
रची गङ्गा का यवतरण कराया था ।।४॥ मागीरय के पुत्र का नाम
नाभाग था जो परम पिट हुआ था। नाभाग का पुत्र अम्बरोप और

अवश वजन
के पुत्र का नाम सिन्धु द्वीप हुआ था ।४। सिन्बु द्वाप रा पुत्र अयुतायु
आ या और इसके पुत्र का न म ऋतुपर्ण था। ऋतुपर्ण का कन्मापपा:
और फिर इसका सुत सवकर्मा नामधारी हुआ था ॥४।। सर्वकर्मा का
ननरम्प हुआ और इस पुत्र का नाम निम्न हुआ था। इस निघ्न
क दो पुत्रा ने प्रसव प्राप्त किया था एक का नाम अनमित्र था और
दूपरा रघु नृप हुआ था ।। ४७ । अनमित्र जो या वह वन मे चला गया
था अतः रघु ने हो राम्गसन ग्रहण किया। राजा रघु क पुत्र का
नाम दिलोर हुना था। इस दिलीप का पुत्र अज हुआ था ।।४८ ॥
अज से दोपवाह ने जन्म प्रहप किया था और इसके अनन्तर अजपाल
ना हुआ था। इस अजपाल से महाराज दशरय न जन्म ग्रहण किया
था जिन महाराज दशरथ क चार पुन हुए थे। ये पागे ही पुत्र
नारायण म्वरूप थे जिनमें श्री रामचन्द्र सदमे वडे पुत्र थे। यह रावण
के अन्त करन वाले तथा रघुक्ल के रस को वृद्धि करने वाले हुए है
1४,५०॥
नारायणात्मका सर्वे रामस्तेप्वग्रजोऽभवत् ।
रावणान्तकरस्तवद्रघूणा वावधन. ॥५०
वाल्मीकिस्तस्य चम्ति चके भागवसत्तमः ।
तस्य पुत्री कुशलवाविक्ष्वाकुकुलवर्धनौ ॥"
अतिथिस्तु कुशाज्जज्ञे निपत्रस्तस्य चात्मज ।
नलस्तु नैपधस्तस्मान्नभास्तस्मादजायत ।।५२
नमस. पुण्डरीकोऽभूत क्षेमधन्वा तत स्मृत ।
तम्य पुनोऽभवद्वीरो देवानीक प्रतापवान् ।।५३
अहीनगुस्तस्य सुत सहाश्वतनः पर ।
ततनन्द्रावलोकन्तु तारापोटस्ततोऽभवत् ॥५४
तम्यात्मजरचन्द्रगिरिर्भानुश्चन्द्रततोऽभवन ।
श्रतायुरभवत्तस्माद्भागते यो निपातित ॥५५

मत्स्यपुराण मलौदाववविख्याती वशे कश्यपसम्भवे । वीरसेनगुतस्तद्वग्नपधश्च नराधिप. ॥५६ एते वैवस्वते वशे गजानो भूरिदक्षिणाः । इक्ष्वाकुवशप्रभवा: प्राधान्येन प्रकीतिता ॥५७ महर्षि प्रबर वाल्मीकि ने जो भार्गव श्रेष्ठ थे उनके चम्ति का निर्माण पन्थीकार मे किया था। महाराज श्रीराम के पुत्र श और लव ये दो हुए थे जा इक्ष्वाकु कुल के वर्धन करने वाले हुए थे ।। ५१ ॥ दुश से अतिथि ने जन्म ग्रहण किया था और इसके आत्मज का नाम निषध हुआ था। इसी निषध से नैषध नल हुप्रा था और नल से नभ ने जन्म लिया था.।। ५२ ।। नभ से पुण्डरीक सुत हुआ और इसके पश्चात् क्षेम धन्वा ने जन्म लिया था। इस क्षेमधन्वा का पुत्र वीर एव प्रताप वालो देवानीक हुआ था ।। ५३ ।। इसका पुत्र अहीन और इसके सुत का नाम सहमाश्व हुआ था। इसके उपरान्त चन्द्रावलोक हुप्रा और फिर इसकी सुत तारापीड समुत्पन्न हुआ था। इस तारापीड का सुत चन्द्रगिरि हुआ और चन्द्रगिरि से भानुचन्द्र ने जन्म ग्रहण किया था। इसके पत्र का नास श्रुतायु हुआ जो भारत में निपातित कर दिया गया था। कश्यप से सम्भूत वश मे दो ही नल विख्यात हुए है एक वारसेने का सुत और उसी भौति नराधिप नैषध प्रसिद्ध था । ५४ ॥ ५५ ॥ ५६ । इस प्रकार से वैवस्वत के वश में भूरि दक्षिणा वाले राजा लोग हुए थे। प्रधानतया ये सब राजागण इक्ष्वाकु वंश से उत्भत्र प्रकीर्तित हुए है।। ५७॥

देवीसमो प्राट नाम
१२-देयी के एक सौ आठ नाम
भगवन् ! श्रीनुमिता म पितृ.पा वगमुनमम् ।
ग्यवानाइदत्य गोमाय प विपतः।
एन्नत फपिप्यामि दिनमा मनमुत्तममू ।
रर्गेपिसगमा. मात्रयम्याममतप...
मूर्तिमन्नोऽय चार. मपाम मितीजम ।
अमराय. पितृगणा वगजन्य प्रजानिः
पति पान देशमा राजा Trयमा ।
दिरिनविदा प्रापना गमाननाम् ॥४
पुनविटा तं तु आयात ब्रह्मगदिमः।
मप्र स्मृति भूयो योग मारमनुत्तमम् ॥
मिदिमानियांगन पुनगतिसंभाम् ।
योगिनामानि सम्मामासानिमभिः ॥
nirt मानगोरमारानो हिमपामना ।
मैनाालयमा नयापन

मस्यपुराण
किया करत हैं। वे फिर उत्तम सास्य और योग की उसी स्मृति को
प्राप्त कर लिया करते हैं • ५॥ योग के द्वारा पुन आवृत्ति करन में
अत्यन्त दुलभ सिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं। अतएव ताओ के द्वारा
योगियो को ही श्राद्ध देने चाहिए ॥६॥ इनको जो मानसी क या हिम
वान् की पत्नी मानी गयी है । उसका दायाद मैनाक पर्वत है और झौञ्च
उसके उदर स अग्रज सुत समुत्पन हुआ है ।।७।।
क्रौञ्चद्वीप स्मृतो येन चतुर्थो घृतसवृत ।
मेनाचसुपुवेतिस्र कन्यायोगवतीस्तत ॥८
उमैकपर्णापर्णा च तोवव्रतपरायणा ।
रद्रस्यका सितस्यका जैगीपव्यस्यचापरा HE
दत्ता हिमवता वाला सर्वा लोक तपाऽधिका ।
स्माद्दाक्षायणी पूव ददाहात्मानमात्मना ।।१०
हिमवदुहिता तद्वत् कथ जाता महोतले ।
सहरन्ती विमुतासो सुता वा ब्रह्मसूनुना ॥११
दशेण लोगजननी
सूत
विस्तरता वद।
दक्षम्य यज्ञे वितते प्रभूतवरदक्षिणे ॥१२
सम हूतेषु दवपु प्रोवाच पितर सती ।
निमय तात । भर्ताम यज्ञेऽस्मिन्नाभिमन्त्रित १३
अयोग्य इति तामाह दक्षो यज्ञपु मूलभूत ।
उपसहारवृद्ध दस्तेनामंगलभागयम् ॥१४

। देवो वै एक सौ आठ नाम ७५ . मती ने किम कारण से अपने ही आप स्वयं अपने को दग्ध कर दिया था [१६, १०॥ फिर इस महीतल में उसो भांति वह हिमवान् को दुहिता कैसे और क्यो उत्पन्न हो गई थी महार करती हुई इस सुना से ब्रह्मा के पुन दक्ष ने क्या ६हा था जो कि समस्त लोको को जननी थी। हे सून जी । आप कथा को कृपया कुछ विस्तार के साय बनलाइये । मूतजी ने कहा-प्रजापति दक्ष यज्ञ विस्तृत रूप मे फैला हुआ चल रहा था और यह यज्ञ ऐसा पा जिस में प्रभूत मात्रा मे अप्ठ दक्षिणाएँ दी गई यौं ।।११, १२।। जिस समय में समस्त देवगण समाभूत किये गये थे और भगवान् शम्भु को आमन्त्रित नहीं किया था तो यह देखकर सहन न करते हुए सनी ने अपने पिता से कहा था-हे तात ! आपने क्सि कारण से केवल मेरे ही स्वामी को इस महान् विशाल यज्ञ मे निमन्त्रित नही किया है ? उम समय मे दक्ष ने उस जगदम्बा को यही उत्तर देते हुए कहा था कि वह शलपाणि यज्ञो मे सम्मिलित होने की योग्यता हो महीं रखते हैं अत: अयोग्य है क्योकि वह रुद्र तो ससार का उपसहार करने वाला है इसीलिये वह अमङ्गल भागी है ॥१३, १४) चुकापाथ सती देह त्यक्षामीति त्वदुद्भवम् । दशानान्त्वञ्च भविता पितृ णामेक पुषक. १५ क्षत्रियत्वेऽश्वमेधे च सद्रात्त्व नाशप्यसि । इत्युक्तायोगमास्थायस्वदेहोद्भवतेजसा ।।१६ निदहन्ती तदात्मान सदेवासुकिन्नरै । कि किमेतदिति प्रोक्ता गन्धवगणगुह्यक. १.५७ उपगम्याव बोद्दतः प्रणिपत्याथ दुखित.। स्वमम्य जगता माताजगत्सौभाग्य देवता ॥१८ दुहितृत्वङ्गता देवि ममानुग्रहकाम्यया । न त्वया रहित किञ्चित् ब्रह्माण्डेसचराचरम् ॥१६ प्रनाद कुरु धमा न मान्यक्त मिाहसि ।

मरस्यपुराण प्राह देवी यदारब्ध तत्कायं मे न संशय... जि ववश्य त्वया मत्ये हतयज्ञ न शुलिना । प्रसादेलोक्सृष्टययं तप.काय ममान्तिके ॥२१ यह कथन करमे के अनन्तर ही सती अत्यन्त कुपित हो गई थी और उसने कह दिया था कि तुझ मे समुत्पन्न मैं इस देह का भी अव त्याग कर दूंगी । और तू दशा पितृगण का एक पुत्र वाला हो जायगा को ॥१५॥ इस क्षत्रियस्व वाले अश्व मेध मे ही तुम रुद्र से ही नारा प्राप्त हो जाओगे। बस, इतना ही कह कर सती योग में समास्थित हो गई थी। उमक देह से ही एक प्रकार क तेज का उद्भव हुआ था ।।१६।। उसी तेज से उस समय मे सती ने आप दाह कर दिया था। निर्दहन करती हुई उसस देव-असुर-किन्न ग•धवगण और गुह्यक सभी ने उससे यही कहा था- यह क्या हो रहा है' । १७॥ फिर ता दक्ष स्वय उस सती के समीप मे आकर उपस्थिर हुआ था और प्रणिपात कर के सती स कहा था-आप ता इस सम्पूण जगत् की माता हैं और जगत्। सौभाग्य की देवता हैं ॥१।। हे देवि ! मेरे ऊपर अनुग्रह करने की ही कामना से आप मेरी पुत्री होने को स्वीकार किया था और दुहिता बन गयी थी। आपस हित इस ब्रह्माण्ड में सचराचर कुछ भी नहीं है 1॥१६॥ हे धमज्ञ ! अब प्रसाद (प्रसन्नता) कीजिए और मेरा त्याग करने के योग्य आप नही बनिये। इस पर देवी ने कहा था कि जो मैने आरम्भ कर दिया है वह मुझे करना ही है क्यो कि यह परम कर्तव्य हो हो गया है-इसमे कुछ भी सशय शेप नही है ॥२०॥ किन्तु अब यह परमावश्या ही है कि भब भगवान् शूली क द्वारा तेरा यह यज्ञ विध्वस्त हो हो जायगा तब उनक प्रसाद प्राप्त करने के लिये लोको की मृष्टिक वास्त मत्यं लोक मे मेर हो समीप मे तप करना चाहिए ।।२१11 प्रजापतिस्त्व भविता दशानामगजोप्यलम् । मदशेनाङ्गनापष्टि भविष्यात्यङ्गजास्तव ।।२२ के

देवी के एक सौ आठ नाम
मत्सन्निधौ तपः कुन् प्राप्यसेयोगमुत्तमम् ।
एवमुक्तोऽत्रवीदक्ष पुषमयाऽनये ।।२३
तीर्येषु च त्व द्रष्टव्या स्तोतव्या कैश्च नाममि.!
सर्वदा सर्वभूतेषु द्रष्टप्रा सर्वतो भुवि ॥२४
सवंलोवेषु यतविम्बिद्रहितं न मया विना।
। तथापियेषुस्थानेषुद्रष्टव्यासिद्धिमीप्सुभि ॥२५
स्मतत्याभूतिकामतानिवक्ष्यामितत्वत.।
वाराणम्याविशालाक्षीनमिपेलिङ्गधारिणी ॥२६
प्रयागे ललिता दवी कामाक्षो गन्धमादने ।
मानसे कुमुदा नाम विश्वकायातयाम्बरे ॥२७
गोमते गोमतीनाम मन्दरे कामचारिणी।
मदोत्कटा चतरथे जयन्ती हस्तिनापुरे ॥२८
दशोपा अङ्गन मी तुम समर्थ प्रजापति होओगे और मेरे अश
में सठ अङ्गनाएँ होंगो नथा तुम्हारे मगज हगि ॥२२॥ मेरी सन्निधि
में तपश्चर्या करत हुए उत्तम योग को प्राप्ति करोगे। अब इस प्रकार
मे जगदम्बा ने रहा था तो वह दक्ष देवी से घोला-है अनपे । मुझे
बग्यो दिन तीर्थों में दशन होगे और दिन २ नामो से आपको स्तुति
परनी चाहिए ? ॥२३॥ देवी ने कहा--दम मू मण्डन में सर्वदा सभी
मार ममम्न प्राणियों में मेरा दशन करना चाहिए । २४॥ समन लोको
मेरे बिना कुछ भी रहित पदार्थ या प्राणी नहीं है। तो भी यिदि को
पर रखने वाला ये 1 मिन स्याना में मेरा टशन करना चाहिए
तथा भूव की रामना रखन याला को मेरा स्मरण करन' चाहिये
उन नामो को मैं अब तस्वतः बनला देनी हूँ। मह स ही देवी के
पप्ट्रोतर नमामो का आरम्भ होता है-वाराणमी में मेरा विशालाक्षी
नाप लेकर स्मरण तपा सरन करना चाहिये । नमिप क्षेत्र म मंग
निवारिणी नाम मिद है ॥२५, २० प्रयाग में रमिता दवी और

मत्स्यपुराण गन्ध मादन मे कामाक्षी देवी है ! मानस मे मेरा कुमुदा नाम है तथा अम्बर में विश्वकाया नाम है । २७॥ गोमन्त मे गोमती नाम और मन्दर मे मेरा कामधारिणी यह शुभ नाम स्मरण के योग्य है । चेवरथ मे मदोत्कटा तथा हस्तिनापुर मे मेरा जयन्ती नाम लेकर ही स्तवन परे ॥२८॥ कान्यकृब्जे तथा गौरी रम्भा मलयपर्वते । एकाम्भकेतीतिमतीविश्वाश्वेश्वरेविदु ॥२८ पुष्करे पुरुहूतेति केदारे मार्गदायिनी। नन्दा हिमवत पृष्ठे गोकर्णे भद्रकणिका ॥३० स्थानेश्वरे भवानी तु विल्वके विल्वपत्रिका। श्रीशले माधवी नाम भद्राभद्रेश्वरेतथा ।।३१ जया वराहीले तु कामला कमलालये । रुद्रकोप्टवान्च रद्राणी काली कालजरेगिरी ।।३२ महालिंगे तु कपिला मर्कोटे मुकुटेश्वरो। शालिग्राम महादेवी शिवालगे जलप्रिया ॥३३ मायापुर्याकुमारो तु सन्ताने ललिता तथा । उत्पलाक्षी सहस्राक्षेकमलाक्षेमहोत्पला ॥२४ गगाया मगला नाम विमला पुरपोत्तमे । विपापायाममोपाक्षी पाटला पुण्यद ने ॥३५ रायपुर देग म गौरी-मलय पर्वत मे रम्मा-एकामा तिमो नया विशेष क्षेत्र में मेरा वि नाम हो लिया जाता है ॥२६॥ पुपर म पुरता-पदा क्षेत्र में मागंदायिनी-हिमाचल पर्वतरे पृष्ठ पर माम मादा तथा गोरगं में भागणिकर हर मुझे पार सिपाता है | स्थानावर में मेरा भवानी नाम है तथा fast में amera पत्रिका माम मार माण माविन पिया जाता है। पीमि में मेरा माघरी नाम है सपा महापर में भरा नाम से मेरा में देवी के एक सौ आठ नाम - स्मरण किया जाता है ॥३१॥ वराह शैल में जया नाम लेकर मेरा स्मरण किया जाता है और कमलान में मेरा ही नाम कामला है। रुद्रकोटि मे रुद्राणो कहकर मुझे पूजते हैं तथा बालजर गिरि में मेग हो नाय काली कहलाता है ॥२२॥ महालिङ्ग में मेरा कपिला नाम कहा जाता है और मोट में मुटेश्वरी मेरा गुभ नाम है । शालिग्राम मे महादेवी तथा शिवलित में मेरा ही नाम जल रिया ॥३३॥ मायापुरी मे कुमारी मेरा नाम है तथा सन्तान ललिता कही जाती है । सहस्ताक्ष मे उत्पलाशी तप ममताल में मुझे हो महोत्पता कहा जाता है ॥३४॥ गगा मे मङ्गला नाम पिड है तथा पुरुषोत्तम में मेरा ही नाम विमला देवों है । विपाशा में मुझे अमोपाती कहा जाता है और पुण्ड वर्धन मे मुद्दो पाटला यह कर पुकारते हैं ॥३॥ नारायणी सुपार्श्वे तु वियूटे भद्रमुन्दरी । विपुने विपुला नाम रूपाणी मलयाचले ॥३६ कोटवीवोटितीर्थे तु सुगन्धा माचवे वने ।। पुजाग्रके निसन्ध्यातुगगाद्वारेरतिप्रिया ।।३६ शिरपुण्डे सुनन्दा तु नन्दिनी देविकानटे । क्मिणी द्वारवत्यान्तु राधा वृन्दावने वने ॥३८ दवको मयुरायान्तु पाताले परमेश्नगे। चित्रकूट तथा सीतानिध्येविन्ध्य निवासिनी ॥ सह्याद्रावकवीरा तु हमनन्द्रेति चन्दिरा। रमणा गमतीर्थतु यमुनाया मृगावतो । करवीरे महालक्ष्मीरमादेवी विनापरे। अगगा बंधनाये तु महासात महेश्वरी अभपत्युगतार्येषु चामृता विध्ययान्दरे । माण्ड माष्टर नाम माहामाहेमरेपुरे ॥४२ पार मेरा माम नारायणो देवी है मौर विकट में सुन्दरी co मत्स्यपुराण मे मुझे ही कहते हैं । विपुल मे मेरा विपुनेश्वरी नाम है तथा मल याचल मे कल्याणी नाम लेकर मेरा स्मरण किया जाता है ॥३६॥ कोटि तीर्थ में कोटवो मेरा शुभ नाम है एव माधव वन मे सुगन्धा मुझे ही कहा जाता है । कुन्जाग्रक स्थल में त्रिसन्ध्या मुझे कहते हैं और गङ्गा द्वार मे रति प्रिया कहकर मेरा ही स्मरण किया जाता है ॥३७॥ शिव कुण्ड सुनन्दा-देविका सट मे नन्दिनी-द्वारावतीपुरी मे रुकिमणी और वृन्दावन मे मेरा ही नाम राधा है ॥ २८ ॥ मथुरा पुरी मे देवकी-पाताल में परमेश्वरी-चित्रकूट में सीता देवी था विन्ध्याचल मे विन्ध्यव सिनी देवी मुझे कहा करते हैं . ६॥ सहाद्रि मे एकवीग-हर्म चन्द्र'- चन्द्रिका मेरा ही शुम नाम है। राम तीर्थ मे रमण और यमुना में मृगा. वती मुझे कहा करते हैं ॥४०॥ करवीर मे मुझे ही मगलक्ष्मी पुकार जाता है तथा विनायक मे उमा देवो मेरा नाम विख्यात हैं। वैद्यनाथ में मुझे अरोगा कहा जाता है और महाकाल स्थान में महेश्वरी मेरा ही नाम है ।। ११ ।। उष्ण तीयों मे मुझे अभया और विन्ध्य के कन्दरा में अमृता मुझे ही कहा व से हैं। माण्डल्य - मेरा माण्डवी नाम लेकर स्मरण किया जाता है सपा महेश्वर पुर मे मुझे स्वाहा कहा करते है ॥४॥ छागलण्डे प्रचण्डातु चण्डिका मकरन्दके । सोमेग्यरे वरारोहा प्रभामे पुरावती ।।४३ देवमाता सरस्वत्या पारा पारातटे मता। मालये महाभागा पयोप्या पिङ्गलेश्वरो ॥४४ मिहिता तृतगोचेतु फात्तिकेये यशस्सरी। उपनावर पोला मुभद्रा कोणमङ्गमे ॥४५ माता गिद्धपुरं पश्मीरगना भरमाश्रमे । जालन्धरे विश्वमुपी ताग रिपि.धपवते ॥४६ देवदारकने पष्टिमंधावाग्मोरमण्डले ।

देवी के एक सौ आठ नाम
भीमा देवो हिमाद्रौतु पुष्टिविश्वेश्वरे तथा ॥४७
कपालमोचने शुद्धिांता कायावरोहणे।
शङ्खोद्धारे घरा नाम धृतिः पिण्डारके तथा [४८
पालातु चन्द्रभागाया मच्छोदे शिवकारिणी।
वेणायाममृता नाम वदर्यामुवशी तथा ॥४६
विभिन्न स्थलो मे विभिन्न नामो का स्मरण कर मेरी ही समा-
राधना की जाया करती है-छागलण्ड में प्रचण्टा-मकरन्दक में चण्डिका,
सोमेश्वर मे वरारोहा और प्रभास में पुष्करावी मेरा नाम लिया जाना
॥४३॥ सरस्वती के क्षेत्र में मुझे देव माता कहा जाता है और पारा-
तट में मेरा ही नाम पारा है । महालय मे मुझे महामाग कहते हैं तथा
पयोष्णी में मुझे पिङ्गलेश्वरी देवो कहकर मेरा स्तवन-स्मरण किया
जाता है ।।५४॥ कृतशीच मे सिंहिका मेरा शुभ नाम है और यातिपय
में मुझे ही यशस्करी कहा जाता है । ठत्पल्क वर्तक स्थान से मेरा हो
लोला नाम लिया जाता है। शोण के सङ्गम क्षेत्र में सुभद्रा नाम का
स्मरण किया जाता है।॥४५॥ सिद्धपुर में मेरा माता नाम लिया जाता
है तथा भरताश्रम मे लक्ष्मीअङ्गना कहते हैं । जालन्धर मे मुझे ही विश्व-
मुखी इस पवित्र नाम से पाद किया करते हैं तथा किष्किन्धा पर्वत में
तारा देवी कहकर मेरी उपासना करते हैं ॥ ४६ ।। देवदार पन मे पुष्टि-
मेरा नाम लिया जाता है और काश्मीर मण्डप में मेघा के नाम से मैं ही
पुकारी जाया करती हूँ। हिमाद्रि में मेरा ही नाम भीमा कहा जाया
करता है तथा विश्वेशर क्षेत्र में पुष्टि नाम है ।। ४ ।। कपाल मोचन में
शुद्धि और फायावरोहण मे माता कही जाती हूं। शखोद्धार में घरा नाम
स्मरण किया जाता है और पिण्डारक मे घृति मेरा नाम याद करते हैं
॥४८॥ पन्द्रभागा के तट में काला तथा मच्छोद में शिवकारिणी
मेरा नाम है। देणा मे अमृता कही जाती है तथा वदरी में उर्वशी कहत
हैं ॥४६॥

२
मत्स्यपुराण
ओषधा चोत्तरकुरी कुशद्वीपे कुशोदका।
मन्मथा हेमकूटे तु मुकुटे सत्यवादिनी ॥५०
अश्वत्ये वन्दनीया तु निधिर्वश्रवणालये।
गायत्री वेदवदने पावती शिवसन्निधौ ॥५१
देवलोके तथेन्द्राणी ब्रह्मस्येषु सरस्वती ।
सूर्यविम्बे प्रभा नाम मातृ णा वैष्णवीमत ॥५२
अरुन्धती सतीनान्तु रामोसु च तिलोत्तमा ।
चित्ते ब्रह्मकला नाम शक्तिःसर्वशरीरिणाम् ॥५३
एतदुद्देशतः प्राक्तं नामाष्टशतमुत्तमम् ।
अप्टोत्तरच तोर्थाना शतमेतदुदाहृतम् ।।५५
यः स्मरेच्छणुयाद्वापि मर्वपापै प्रमुच्यते ।
एषु तीर्थेपुयः कृत्वा स्नानंपश्यति मा नरः ।।५५
सर्वरापविनिमुक्त कल्प शिवपुरे वसेत् ।
यस्तु मत्परम काल करोत्येतेषु मानव ॥५६
म भित्वा ब्रह्मसदन पदमभ्येति शाङ्करम् ।
नाम्नामप्टशत यस्तु प्रावयेन्छिवसग्निधौ ॥५७
तृतीयागामथाष्टम्या बहुपुत्रो भवेन्नरः ।
कादाने श्राद्धसने वा अहन्यहनि वा बुधः ॥५८
देवाचन विधौ विद्वान् पठन् ब्रह्माधिगच्छति ।
एव वदन्ती सा तत्र ददाहात्मानमात्मना ॥५६
उत्तर गुरु प्रान्त में औषधो-दीप मे सुशोदका-हैमसूट में
मामपा मोर मुकुट में सरयवादिनी मेरा नाम लिया जाता है ।।..॥
पावत्य मे बन्दनोय -पवन मालय मे निधि-वेद वाम में गायत्री
गया भगवान् शिवको मन्निधि में मुझे पार्वती पहते हैं ॥५१॥ देवसो.
में जोरद्वाणो रही जाती है वह भी नही है और पितामह बहाली के
मुख मे हाती भी है। गूप विच मे प्रभा मेरा ही नाम एप

म वो के एक तो बाठ नाम रूप है तथा मातगण में रणवी में ही कही जाती हूँ ।। ५२ ।। समस्त तो नारियों में अपधती मेरा ही स्वरूप है। सम्पूर्ण रामामो मे मोतमा मैं ही हूँ । चित मे ग्रह्माला मेरा नाम है तथा समस्त शरीर- रियो में शक्ति मुझे ही समानता चाहिये ।। ५३ ।। यह अष्टोत्तर शत इम नामावली दमी उद्देश्य से यही गयो है कि यह इसी बहाने से टोतर शन सीयारे तुम नाम भी बता दिये गये हैं ॥५४॥ जो इस नेत्र का स्मरण करे या श्रवण करे वह ममी पापो से प्रमुक हो पाया रता है। ये जो उक्त ती यताये गये है उनमे को भी पोई मान पर दर्शन दिया मरता है वह सभी प्रकार पापो मे विमुक्त होकर एक प्प पर्यत शिवपुर में निरा गिरता है और जो मनुष्य उनमे पूरे अपनो मेरे ही समाराधन में लगा दिया करता है वह तो फिर ब्रह्मशस्त्र भी भेदन करणे शहर परको प्राप्त किया करता है । इन अप्टोत्तर नानोको भगवान गिदी सन्निध में स्पिक्ष होर भगवान को यण रामापरता है और यह भी तृतीया में या मष्टमी तिथि में श्रवण राता है तो वह मनुष्य प्रहार ही हो जाता है। गोसन में अपवा पाल न में जो दुध दिन प्रतिदिन देवाचन विवि मे विद्वान इस पाठ परता बहरह्मको अधिगत होना है। इस प्रसार यह जगदम्बा शक अमाप में पहनी हर ही अपने ही आप अपने तेज से उस देवी ने अपने पिरसदाहरनिया पा॥५५ ५६, ५७, १८, १६ ॥ म्यायम्भुयोऽपिकालेनदक्षः प्रायनसीभवत् । पावतीसामपदेयो गिदहादं पारिणी ॥१० मेनागभंसमुरसाना मक्तिमुक्तिमतप्रदा । अपनी अपनसत प्रप योगमनुत्तमम् ॥६१ पुरवार राजपिलो जयनामगाद । पानि. सामञ्च धनलाभच भार्ग ॥६ सपान्यदेवदत्यारप बाह्मणानियास्तपा।

मत्स्यपुर F हरे वश्या शूद्राश्चबहव. सिद्धिमीयुयथेप्सिताम् ॥६३ यत्रं तल्लिखित तिष्ठेत् पूज्यते देवसन्निधौ । न तत्र शोको दोर्गत्य कदाचिदपि जायते ॥६४ समय आने पर स्वामम्भव भी प्राचेतस दक्ष होगया था। वह र पार्वती हुई थी जो भगवान् शिव के अधं शरीर के धारण करने वाली ॥६०॥ वह फिर मेना के गर्भ से समुत्पन्न हुई थी और भक्ति तथा म दोनो ही के प्रदान करने वाली थी। इसका जप करती हुई अरु धन | अत्युत्तम योग को प्राप्त कर लिया था ॥६१।। पुरुरवा नाम वाले राय ने लोकमे विजय की प्राप्ति की थी। राजा ययाति ने पुत्र का लाभ लिन था और भार्गव ने धन का लाम प्राप्त किया था ।। ६२ । इसी अन्य भी बहुत से देवगण, दैत्य वर्ग,ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रक ने भी इसी के समाराधन से यथेष्ट सिद्धि को प्राप्त किया था ॥ ६३ यह देवी का अष्टोत्तर शत नामक स्तोत्र जहा पर लिखित रूप में कि रहता है और देव को सन्निधि म इसकी अर्चा की जाया करती है । पर कभी भी किसी भी प्रकार का शोक एव बैंसी भी दुर्गति कभी नहीं हुआ करती है ॥६॥ १३-पिन वंश कीर्तन विभाजानाम चान्येतु दिविसन्ति सुवर्चसः । लोवावहिंपदोयत्र पितरः सन्तिमुद्रता ॥१ यत्र पहिल्यूपतानि विमानानि सहस्रश । सङ्कल्प्य यहिपो यत्र तिष्ठन्ति पलदायिन ॥ यत्राभ्युदयशालागु मोदन्ते श्राद्धदायिन । याश्च देगसुरगणा गर्याप्सरसागणा ॥३

वश कीर्तन
.
यक्षरक्षोगणाश्चैव यजन्ति दिवि देवताः।
पुनस्त्यपुत्राः शनशस्तपोयोगसमन्विताः ॥
महात्मानो महामागा भक्तानामभयप्रदाः।
एतेपा पोवरौ कन्या मानसा दिविविश्रु ता ॥५
• योगिनी योगमाता च तपश्चक्र सुदारुणम् ।
प्रसन्नो भगवांस्तस्यावरंवयतु सा हरेः ॥६
योगवन्त सुरूपंच भरि विजितेन्द्रियम् ।
देहि देव ! प्रसन्नस्त्वं पति मे वदताम्वरम् ।।७
मूतजी ने कहा-दिप लोक में विघ्रज नाम वाले अन्य भी
... है जहा पर सुबन वहियह पितर लोक है ॥१॥ जहा पर वहिण
क सहस्त्रो विमान है और जहां सरल्प करके वहिप फ्लो क प्रदान
ने वाले समवस्थित रहा करते हैं |२० जहा पर अम्पुदप शालाओं में
८ देने वाले परम मोह से समन्वित होकर रहा करते हैं और जिनका
इन देवासुरगण या गन्धवों एव अप्सराओं का समूह भी किया करता
या और राक्षसों के गण भी तया दिदलोक मे देवता भी जिन
मनाचंन विया करते हैं। सैबडो ही पुलस्त्य मुनि के पुत्र जो तप
र योग से भी समन्वित महान् मात्मा वाले-महान भाग वाले
'रमतों वो अमादान देने वाले है। इनकी वीदरीमानसी कन्या
ग्लो में विद्युत है ॥४, ५।। यह योगिकी और योगमाता थी जिसने
म दापण तपसारा पी। उसपर जय भगवान् प्रसन्न हुए और उसमें
दान की याचना करने को कहा गया तो उसने हरि से यही वरदान
गया ॥६॥ उसने कहा है देव ! आप कृपा कर योग वाला-रूप
वण्य मे सचिइन्द्रियों को जीतने वाला, बोलने वालो में परम श्रेष्ठ
भरमसमें चाला प्रदान कीजिए यदि आप मेगे तों से परम
मन्न हो गो है 10
उपाय देवो नाविना व्यामपुत्रीयदा न ।
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" २६ मत्स्यपुराण भविता तस्य भार्यास्व योग चाय्यस्य सुव्रते ।। भविष्यन्ति च ते कन्या कृत्वी नाम च योगिनी। पाञ्चालाधिपतेर्दया मानुष्यस्य त्वया तदा RE जननीब्रह्मदत्तस्ययोग सिद्धा च गौःस्मृता। कृष्णागौर प्रभुशम्भुभविष्यन्तिचतेसुताः ॥१. महात्मानोमहाभागामप्यन्ति परम्पदम् । तानुत्पाद्य पुनयोगात्सवरा मोक्षमेष्यसि ॥११ सुमूर्तिमन्त. पितरो वशिष्टस्य सुता स्मृताः। नाम्ना तु मानसा सव सर्वैते धर्ममूर्तय. ॥१२ ज्योतिर्भासिपुलोकेषुये वसन्ति दिव. परम् । विराजमाना कीडन्तियनतेश्राद्धदायिनः ॥१३ सर्वकामसमृद्ध पुविमानेष्वपिपादनाः | [कि पुनः श्राददा विप्राभक्तिमन्तक्रियान्विता ॥१४ भगवान् ने कहा -जिस समय में कृष्ण द्वैपायन व्यास जी शुकदेव नामक पुत्र प्रसूत होगा तब उसकी तुम भार्या होपोगी। हे सुयुत वह योग के परम प्रमुख आचाय ही होगे ।।८।। उस समय मे वृत्खी नाम धारिणी योगिनी कन्या तरी उत्पन्न होगी। उस कन्या को तुझे पाञ्चार देश के अधिपति मनुष्य को ही प्रदान करनी होगी ||६|| ब्रह्मदत्त जन्म देने वाली और योगसिद्धा गौ कहो गयी है । उस समय मे कृष्ण- और पुत्र समुत्पन होगे ॥१०॥ महान् आत्मा वल महाभाग परम पद को गमन करेंगे। उनका समुत्पादन करके से वर सहित मोक्ष को प्राप्त करोगी ॥११॥ महामुनीन्द्र वसिष्ठ क पुत्र सुमूतिमान् पितर कहे गये हैं । नाम से तो ये सभी मानस पुत्र थे किन्तु वे मभी घम्म मूर्ति ये ॥ १२ ॥ दिवलोक से भी पर ज्यातिर्मासो लोको म जो निवास किया करते हैं जहां पर वे पार देने वाले विरामान होते हुए आनन्द को त्रीम क्रिया करते हैं, सर्व कामो से समृद्ध विमानों में भी A गौर-प्रभु शम्भु तेरे पुनः यो।

८८
मत्स्यपुराण
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काम और भोग के फल देने वाले थे ॥१॥ सुन्दर व्रत वाले सुस्वता
नाम वाले पितृगण जहा पर अवस्थित रहा करते हैं वे प्रजापति कदम
के लोको म बाज्यया नाम वाले हैं ॥२०॥ वे प्रलहागज के दायाद हैं
और उन मे वैश्य गण ही भक्ति की भावना रखा करते हैं। जहा पर
सब थ द्धो के करने वाल एक साथ गये हुए देखा करते हैं ।।२१।।
मातृभातृपितृष्वसृ सखिसम्बन्धिवान्धवान् ।
अपिजन्मायुतंदृष्टाननुभूतान्सहस्रशः ।।२२
एतेषा मानसी कन्या विरजानाम विश्रुता।
या पत्नीनहुषस्यासीद्ययातेजननी तथा ॥२३
एकाप्टकाऽभवत् पश्चाद् ब्रह्मलोके गता सती।
प्रय एतेगणा:प्रोक्ताश्चतुर्थन्तुवदाम्यतः ॥२४
लोकास्तु मानसा नाम ब्रह्माण्डोपारि सस्थिता ।
येपान्तु मानसी कन्या नर्मदा नाम विश्रुता ॥२५
सोमपानामपितरोयनतिष्ठन्तिशाश्वता. ।
कृत्वासृष्टयादिक्सवं मानसेसाम्प्रतस्थिता. ॥२६
नमंदानाम तेपातु कन्यातोयवहासरिता
भूतानि या पावयति दक्षिणापथगामिनी ॥२७
तेभ्य सर्वे तु मनव प्रजा सर्गेपु निर्मिताः।
नात्याशादानि कुन्तिधर्माभावेऽपिसर्वा ॥२८
तेभ्य एव पुनः प्राप्तु प्रसादाद्योगसन्ततिम् ।
पितृणामादिस तु श्रादमेवविनिमितम् ॥२६
वहाँ पर वे उन सक्षा दर्शन प्राप्त पिया करते हैं जिनको दशों
महान ज.मों मे भी कमो देवा पा मोर सहस्रो की संख्या में उनका
पृष्ठ भी बनुमय नहीं है। उनमें माता-पिता-माता-गिनी-सया.
मम्मामी और वाघ ये सभी होते है ।२२। इनकी मानसी कन्या गिरजा
माम में विधान है जो राजा नहप पी परनी हुई पो तथा राजा ययाति

नाद्ध प्रकरण
जननी थो॥३॥ पीछे ब्रह्म लोक में गयी हुई यह सती एकाष्टका
गई थी। ये तीन गण तो हमने पितरो के आप लोगो को पतला दिय
। अब आगे चतुर्थगग बतलात है ।।२४। जो मानस लोक हैं वे सब
ह्माण्ड
के ऊपर सस्थित हैं। जिनकी मानसी कन्या नर्मदा-इस नाम से
वधुन है ॥२॥ जहा पर सोमप नाम वाले शाश्वत पितृगण स्थित रहा
रत हैं मृष्टि आदि सब कुछ कर इस समय में मानस में ही सस्थित
॥२६॥ उनको नर्मदा नाम धारिणी पन्या तोय वहा सरित है जो
दक्षिण पथ का गमन करन वाली भूतों को पाचन क्यिा करती है ।। ७॥
उनसे सत्र मनुगण और सों म निर्मित प्रजा थाडो का ज्ञान प्राप्त करके
उनकी सर्वदा धर्म के अभाव में भी क्रिया करते हैं ||२८|उनमे ही
पुन' प्रमाद से योग सन्तति को प्राप्त करने क लिये पितृगणों के आदि
सग म यह याद ही विशेष रूप से निर्मित किया गया है।
१४-श्राद्ध प्रकरण
श्रुत्वंतत्सवमखिल मनुः पप्रच्छ वेशवम् ।
श्राद्धकालच विविध श्राद्धभेद तथैव च ॥१
श्राद्ध पुभोजनीयायेये च वाद्विजातय ।
स्मिन्वायरभागेवापितृभ्य श्राद्धमाचरेत् ॥२
यस्मिन्दत्त कथयाति प्रादन्तु मधुसूदन ।
विधिनाकेनकतव्य क्य प्राणातितपितृ न ॥३
दुर्यावरह श्राद्ध मन्नाद्यनादवेन दा।
पयामूलफलर्वापि पितृभ्य प्रातिमावा ॥४
नित्यन्नमितिककाम्यत्रिविधवाउमुच्यते ।
नित्यतावत्प्रवक्ष्यामिअर्धावाह्नजितम् ।।५

$ मत्स्यपुराण ने फिर अर्दव तद्विजानीयात् पार्वणं पर्वसु स्मृतम् पार्वण त्रिविधंप्रोक्त शृणुतावन्महीपते ! पावणे ये नियोज्यास्तु तान्छृणुप्व नराधिप ॥६ पन्चाग्निःस्नातकश्चंवत्रिसुपर्ण.पडङ्गवित् । श्रोत्रिय श्रोत्रियसुराविधिवाक्य विशारदः ॥७ महर्षि सूतजी ने कहा- यह सब कुछ श्रवण कर के मनु भगवान् शव से पूछा था कि श्राद्ध क जो अनेक काल होने हैं वे क्या और श्रादो क जो बहुत से भेद हुआ करते हैं वे कौन से हैं । ॥2॥ श्रादो मे जिन विप्रो को भोजन कराना चाहिए उन के समुचित स्वरूप क्या होने चाहिए और जो द्विजातिगण श्राद्ध में वर्जनीय है उनके क्या लक्षण होते हैं ? श्राद्ध दिन के किस भाग मे करना चाहिए जो कि पितृ गण के लिये समाचरित किया जाता है ? ॥२॥ हे मधु सूदन ! किस में दिया हुआ श्राद्ध किन प्रकार से जाकर वहा पहुंचता है ? यह भी कृपया बननाइये कि यह श्राद्ध किस विधि-विधान से करना चाहिए और यह विम प्रकार से पितृगणो को प्रसन्नता दिया करता है ? |॥३॥ मत्स्य भगवान् ने कहा-श्राद्ध प्रतिदिन ही करना चाहिए। इसे चाहे तो पन्नादि के द्वारा सम्पन्न करे अथवा उदक के द्वारा ही पूर्ण करे या पय-मून और फलो के द्वारा भी आद करे जो कि पितृगण की प्रीति का समावहन करने वाला है। श्राद्ध देने वाले का मतव्य है कि उसकी भावना सदा पितृगण की प्रीति को प्राप्त करने की अवश्य होनी चाहिए ॥४॥ नित्य-नैमित्तिा और काम्य-इस प्रकार से तीन तरह के बाद हुमा करते हैं । अब मैं नित्य जो थाद्ध होता है नो अर्घ और आवाहन स वजित है उसे बतलाता हू ॥५१॥ उसे अदेव ही जानना चाहिए । पर्व में होने वाला पार्वण बाद कहा गया है । हे महीपते ! यह पार्वण नामक घाट भी तीन तरह का कहा गया है-इसा भी श्रवण करिये ।।६।। नराधिप ! पार्षण भर में जो नियोजन करने योग्य होते हैं उनके पाद प्रकरण १ -- विषय ये भी सुन लीजिए। इसमे नियोजन करने के याग्य दाह्मण पंचाग्नि तपने वाला-स्नात-त्रिसुपर्ण-छहअङ्गशावो का ज्ञाता-श्रोत्रिय- योनिय पण्डित का पुत्र और विधि वाक्य का विशेष विद्वान ही होना पाहिए । तापमं यह है कि उपयुक गुणो मे से उस विप्र में कोई भी एक गुण अवश्य ही होना चाहिए। सर्वज्ञोवेदविन्मन्त्री ज्ञातवश. कुलान्यितः । पुराणवेता धम्मज्ञः स्वाध्यायजपतत्पः ।। शिवभक्तः पितृपरः सूप्यंभक्तोऽय चष्णवः ।। ब्रह्मण्यो योगविच्छान्तो विजितात्मा च शीलवान् । भोजयेच्चापि दोहित्र यत्नतः स्वसृहद्गुरुम् ।। विद्यति मातुल बन्धुमृत्विगाचायसामपान् । यश्चन्याकुरुतेवाक्ययश्चमीमासतेऽध्वरम् ॥१॥ सामम्वविधिज्ञश्च पक्तिपावनपावन.। साम ब्रह्मचारी च वेदयुक्तोऽयवह्मविच ॥ २ यौये भुजते श्राने तदेव परमार्थवित् । एते भोज्या प्रयत्नेन वजनीयालिबोध मे ॥१३ पाण धान में वही नियोज्य होता है जो या तो सर्वश हो या घेदी का वैता, मन्त्र शास्त्री-ऐसा जिसके वश का पूर्ण ज्ञान ही-मुन्दर फुल मे समुत्पन्न-पुराणों का ज्ञाता-धम्म राजान रखने वाला-वेदो के स्वाध्याय करने में तपा मात्र जाप में तत्पर हो ।॥८॥ जो विप्र भगवान् शङ्कर का परम भक्त हो वह-पितृगण म भक्ति रखार परापण रहने गला-भगवान भुक्न भास्कर का भवा-विष्णु का प्रक्त-माह्मण्य अर्थात ब्राह्मणों पर दया तथा भक्ति रखने वाला-पोग माम्य का ज्ञाता- परम शान्त स्वभाव से सम्पन्न विजितात्मा और पोल वाता बहाण ही पार्वण याद मे भोजन गना पाहिए। यदि दान प्राप्त हो तो यन पूर्वक उमे ही भोजन करावे अथवा माने मित्र ६२ मरस्य-पुराण -- - गुरु वर्ग को भोजन कराना चाहिए ॥६॥ १०॥ विद्यति-मातुल- वन्धु-ऋत्विक-आचार्या-सोमय--वह जो वाक्य का व्याकरण करता हो-वह जो आधार के विषय मे मीमांसा कर सकता हो-सामवेद के स्वरों को विधि का ज्ञाता--पाडि तपावन --सामग-ब्रह्मचारी-- वेद से युक्त अथवा ब्रह्म का वेत्ता इनमें से कोई भी जिस श्राद्ध में भोजन किया करता है वह ही उत्तम प्रकार का श्राद्ध है और वही परमार्थ का वेत्ता श्राद्धदाता होता है । इतने प्रकार के जो ब्राह्मण बतलाये हैं उन्ही मे से किन्ही वो प्रयत्नपूर्वक भोजन श्राद्ध मे कराना चाहिए । अब वे भी बतलाये जाते है जा श्राद्ध मे वजित विप्र होते हैं उनको भी मुझसे ही जानलो।। ११, १२, १३ ।। पतितोऽभिशस्त क्लाबश्च पिशुनव्यङ्गरोगिणः । कुनखीश्यावदन्तश्चकुण्डगोलाश्वपालकाः ।। १४ परिवित्तिनियुक्तात्मा प्रमत्तोन्मदारणाः । वैडाली वर्कवृत्तिश्च दम्भोदेवलकादयः ।१५ कृतघ्नान्नास्तिकास्तद्वन्म्लेच्छदेशनिवासिन । त्रिशङ्कवंरद्राववीतद्रविडकोकणान् ॥१६ वजयेल्लिङ्गिन सर्वान् श्राद्धकाले विशेषतः । पूर्वेद्य रपरेधुर्वा विनीतात्मा निमन्त्रयेत् ।।१७ निमन्त्रितान् हि पितर उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान् । वायुभूतानुगच्छन्ति तथासीनानुपासते ॥१८ दक्षिण जानुमालभ्यत्वमयातुनिमन्त्रित । एव निम.झ्यनियमश्रावयेपितृवान्धवान् ॥१६ असाधन शोचपरं सतत ब्रह्मचारिभिः । भवित-यं भवद्भिश्च मया च धाद्धकारिणा ॥ पितृया विनिवत्य तपंणाख्यातु योऽग्निमान् । पिण्डान्वाहायंक कुन्छिादमिन्दुक्षये मुदा ।।

श्रादप्रकरण
E
३
जो ब्राह्मण तो है किन्तु किसी कर्म वंश पतित हो गया हो उसे-
वह जो अमिशस्त होमलोच-पिगुन-विगत या विशेष अङ्ग वाला-
रोगी-कुनखो-कृष्ण वर्ण वाले जिमके दांत हो वह-कुण्ड -गोलक
और अश्वपालक ये ब्राह्मण बाद मे वर्जित हैं! । पति के रहते हुए पर
पुरुष से समुत्पन्न और पति के मृत होने पर पर पुरुप से उत्पन्न कुण्ड
और गोलक सज्ञा वाले होते हैं )।। १४६ परिवित्ति--नियुक्तारमा-
प्रमत्त-उन्मत्त-दारुण-चंद्राली-वरु के समान वृत्ति वाला-दम्भी-देवलक
आदि विष भी श्रद्ध में वर्जनीय होते हैं ।।१५। जो किये हुए उपकार को
नहीं मानन वाले हैं-ईश्वर को सता के नही मानने वाले-म्लेच्छो के
देश में निवास करने वाले-पिशकु-वर-द्रावनीन-द्रविड - कोण
में भी सब विप्र याद्ध में नियोजन के योग्य नहीं हैं और वजित हैं ॥१६॥
श्राद्ध के समय मे जितने भी लिङ्गधारी है उन सभी को विशेष रूप से
जिन कर देना चाहिए पहिले दिन में या उससे भी पूर्व दिन मे ही श्राद्ध
मे ब्राह्मण को निमन्त्रण दे देना चाहिए और परम विनीत भाव से सम्पन्न
होते हुए निमन्त्रित करे ।। १७ । जो ग्राह्यण श्राद्ध मे निमन्त्रित होते हैं
पितृगण उन्ही द्विजो पर उपस्थान किया करते हैं । वे वायु भूत होते हुए
उनका ही अनुगमन किया करते हैं प्रतएव जब वे रामासीन हो तो
उनकी उपासना करे । दक्षिण जानु का आलमन करके मैंने आपको
निमधित किया है-इस रीति से निमन्त्रित परके पित गन्धरों को
नियमों का श्रवण कराना चाहिए ॥१८, १। उन ब्राह्मणों से प्रार्थना
करते हुए याद कर्ता को बना चाहिये कि आप लोगो को क्रोध से
रहित सोच में परायण बोर निरन्तर ब्रह्मचर्या व्रत का परिपालन पूर्ण
एप से परने वाले होना ही चाहिए । मैं याद ना करने वाला हू मुझे भी
पितृयज को पूर्णतया सम्पन्न करके जिसका नाम तपंण है जो अतिमान
है उस इन्दुक्षय म परम प्रसन्नता स पिण्डादर दार्यक याद करना
धाहिए ॥२०॥२१॥

६
मत्स्यपुराण
गोमयेनोपलिप्ते तु दक्षिणप्रवणेस्थले।
श्राद्ध समाचरेद्भक्तथा गोष्ठे वा जलसन्निधौ ॥२२
अग्निमान्निवपेत्पित्य चरुञ्छसाममुष्टिभिः ।
पितृभ्योनिवंपामीतिसर्वदक्षिणतोन्यसेत् ।।२३
अभिधाय तत कुर्यान्निर्वापत्रयमग्रतः ।
तेपि तस्यायता.कार्याश्चतुरङ्ग लविस्तृता ॥२४
दर्वीत्रयन्तु कुर्वीत खादिर रजतान्वितम् ।
रत्निमात्र परिश्लक्ष्णं हस्ताकारानमुत्तमम् ॥२५
उदपारञ्च कास्यञ्च मेक्षणञ्चसमित्कुशान् ।
तिला पात्राणिसद्वासोगन्धधूपानुलेपनम् ॥२६
आहरेदपसव्यन्तु सर्व दक्षिणतः शनैः ।
एवमासाद्य तत्पवं भवनस्याग्रतो भुवि ॥२७
गोमयेनोपलिप्तायागोमूत्रणतुमण्डलम् ।
अक्षताभि सपुष्पाभिस्तदभ्यापसव्यवत् ।।२८
जो स्थल दक्षिण दिशा की ओर हो उसे ही गोमय से उपलिप्त
कर लेना चाहिए और वही पर परम भक्ति की भावना से पूरित होकर
श्राद्ध का समाचरण करना चाहिए। अथवा गोष्ठ मे श्राद्ध करने का
उत्तम स्थल रक्खे या किसी भी जलाशय को सन्निधि में थाद्ध का
समाचरण करे ।।२। जो अग्निमान् अर्थात् साग्निक हो उसे पित्य
पहका साम मुष्टियो से नियंपन करना चाहिए । 'मैं पितृगण के लिये
निवपन करता हूँ-यह रहते हुए सभी को दक्षिण की ओर न्यस्त करना
चाहिये ।।२३।। इसके उपरान्त मागे निवपित्रय अभिधाम्यं को करना
चाहिए । वे भी उसके पार अंगुस के विस्तृत आयत ही करने चाहिए
॥२४॥ वहाँ पर वोन दीं परे। देह खदिर निर्मित हों या रजत
मे समाग्दिन हों। ररिनमात्र-परिश्तक्ष्ण पोर एक हाथ आर वाला
उत्तम गेमा पाहिए ॥२५॥ जल का पात्र-शस्य-मेक्षण-समिधा-मुशा•
।

थाद्धप्रकरण उल-पात्र-सुन्दर वस्त्र-गन्ध धूप और अनुनेपन इन समस्त पदार्यों का रिसर में धीरे म दक्षिण की और ही आहरण करना चाहिए । इस वि स सबका समानान करके नवन के अगले भाग में भूमि में जा कि समय से उअलिप्त की हुई है उसमें गोत्र स म डर करे और कि पिस व्यवन पुनरों क सहित अक्षों ने उसका अम्पन करना चाहिए। ही सब श्राद करने के स्थल पर करक हो श्राद्ध का समारम्भ रे ॥२६॥२॥२८॥ विप्राणा क्षालयेत्वादावभिनन्ध पुन. पुन । आसनेयूपक्लुप्तेषु दभंवत्सु विधानपद ॥२६ उपस्पृष्टोदकान्विप्रानुपवेश्यानुमन्त्रयेत् । द्वो देव पितृकृत्ये त्रीनककमुभयन च ॥३॥ भोजयेदीश्वरोडीह न कुर्याद्विस्तर बुध । देवपूर्व नियोज्यायविप्रानयादिनाबुध: ॥३१ जनौ कुर्यादनुनातो विविप्रो यथाविधि । स्वगृह्योक्तविधानेन कास्पकृत्वाचरु तत ३२ अग्नीपोमयमाश्यान्तु कुर्यादाप्यापन बुध । दक्षिनाग्नोरतातेवा य एकाग्निद्विजोत्ता. ॥३ यज्ञापवीतो निवत्यं तत पक्षणादिकम् । प्रार्थनावातिना कायमत सर्व विजानता ॥३४ पट्चतस्मादवि शेपा पिण्डाकृत्वाततोदकम । दद्यादुदकपास्तु सतिल सबपाणिना ॥३५ जब विप्रगण जो कि श्रद्ध मे निमन्त्रित किय गय हैं उस स्पल पा पार्षण करें तो उनकी वारम्बार बन्दना करके सर्व प्रथम उनके चरणों का प्रभानन करना चाहिए। फिर विधान पूर्वक दर्षों से समन्वित उपवरप्त आसन है उन पर उन विरो को जिन्हनि बल से अपना उपम्प- मन कर लिया है उपमिन करे और अनुमभ्यग करना चाहिए।

का
मत्स्यपुरा
कृत्य मे दो तथा पितृ कृत्य मे तीन अथवा इन दोनो मे ही एक-एक ह
विप्र को निमन्त्रित करना चाहिए। इन्ही बाह्मणो को भोजन करारे
चाहे कोई आर्थिव पूर्ण समर्थता भी क्यो न रखता हो श्राद्ध कम में र
पुरप को इससे अधिक विस्तार नहीं करना चाहिए। हैव पूर्व नियोग
करके इसके अनन्तर ही बुध पुरुष को चाहिए कि निमन्त्रित विप्रो रे
अर्घ्य आदि उपचारो से उपसेवित करे ॥२६, ३०, ३१॥ विप्र को दि
के ही अनुसार उन निमन्त्रित विप्रा से अनुज्ञा प्राप्त करके अग्नि मे
का आरम्भ करना चाहिए। अपने गृह्य सूत्र के विधान के अनुसार।
फिर कांस्य पात्र मे चर को कर लेवे। फिर "अगित सोमयम्"-इना
बुध पुरुष को आच्यायन करना चाहिए । जो एवाग्नि द्विजोत्तम हो मे
दक्षिणाग्नि मे अपवा प्रतीत मे यज्ञो बीती होते हुए पयुक्षण आदि
निवर्त्तन करना चाहिए। इसलिय सबका ज्ञान रखने वाले पुरुष
प्राचीनावीति होरर ही करना चाहिए। उस हवि शेप से छ पिण्डों
रचना परसे फिर उदर देव और तिलो के सहित उदव को सम्य पात्र
से ही उदा पात्राम दाग देना चाहिए ॥३२, ३३, ३४, ३४॥
जान्यान्य सय्य यत्नेन दभयुक्तो विमत्सर ।
विधाय लेखा यत्नेन निपिप्ववनेजमम् ॥३६
दक्षिणाभिमुख पुर्यात् परे दर्वी निधाय ।
निधाय पिण्डमेरय सर्वदर्भध्वनुत्र मात् ॥३७
निनवेदय दर्भपु नागगोत्रानुषीतनः ।
से दर्भपु त हस्त निगृग्यास्लेभागिनाम् ॥३८
तव प तत. पर्यात पुन प्रत्यवनेजनम् ।
पडप्येनाममावृत्य गाधूपाणादिभ. ६
एयमावाब सन्नव वेदगावं पयोति ।
एकागरपएप स्यानिदिविधा तथा ॥४.
तत वातरेदशात्पनीयोलापुरा. ।

दिप्रकरण ६७ तद्वपिण्डादिकेवर्यादावाहनविसर्जनम् ॥४१ ततो गृहोत्या पिण्डेश्योमात्राः सर्वाः अमेणतु । तानेववित्रानुप्रथमप्राशयेद्यनतोनर ॥४२ सत्य जान्वाध्य होकर यल पूर्वक मरसरता से रहित और दर्म- क्त होकर लेखा करे तथा फिर पन के साथ दक्षिणाभिमुख हो वो में रखकर नियो में अवतेजन करना चाहिय । एक-एक पिण्ड में रखकर अनुक्रम से सम्पूर्ण दमों में विनीत करे और उन दमों में बरा मिय नाम और गोत्र का भी कीर्तन करते हुए यह क्रिया सम्पन्न करनी पाहिए ॥३६.३७, ३८॥ उसी भांति में इसके पश्चात पुन: प्रत्यय ने जन करना चाहिए । इन छों पिण्डों को गन्ध धुप आदि की अहणा द्वारा नमस्कार करे ॥ ३६॥ यथोदित जो वेद के यन्त्र है उनके द्वारा हमी प्रकार से उन सबका आवाहन करना चाहिए। जो एकाग्नि हो उसका एक ही होना चाहिए तथा निर्वापोदक क्रिया भी वैसा ही हो ॥ ४०॥ इसके मनन्तर यह सब सम्पादित करके उसे अन्तर मे सुगो में उगकी नियो के लिये पन्न देना चाहिए । और इनके लिये मी उमी भांति पिण्ड आदि मे आवाहन प्रौर विसर्जन करने चाहिए ॥४१॥ इसके पश्चात् दन्हें ग्रहण करके पिण्डो से सब मात्रः पण अर्थात् क्रमपूर्वक इस श्राददाता पुरुष को यलपूर्वक उन्ही विप्रो को सर्व प्रथम खिला देनी चाहिये । यस्मादनात घृता मात्राभक्षयन्तिद्विजातय.। अन्वाहायमित्युक्त तस्मातचन्द्रसत्तये ॥४३ पूर्व दत्वातु तदस्तेसपवित्र तिलोदकम् । तत्पिण्डाग्रप्रयन्छेतस्वधपामस्वितन्त्र वन् । वर्णयन् भोजगेदन मिष्ट पूतञ्च सवंदा । वजयेत् शोधपरता स्मरश्नारायण हरिम् ॥४५ तृप्तान ज्ञात्वा तत. कुर्याद्विकिरन सावणिकम् ।

६८ मत्स्यपुरा सोदक चान्नमुद्धत्य सलिल प्रक्षिपेद्भुवि ।।४६ आचान्तेषु पुनदद्याज्जलपुप्पाक्षतोदकम् । स्वस्तिवाचनक सव पिण्डोपरिसमाहरेत् ॥४७ देवायत्त प्रकुर्वीतश्राद्धनाशोऽन्यथाभवेत् । विसृज्यव्राह्मणास्तद्वत्त पाकृत्वा प्रदक्षिणम् ॥४८ दक्षिणा दिशमाकाड क्षन् पित न यात्रेत मानव । दातारो नोऽभिवधता वेदा सन्ततिरेव च ॥४६ जिस अन्न से जो मात्रा वहाँ पर धृत की गई है द्विजाति गर उसका भक्षण करत हैं। इसको अन्वाहार्यक कहा गया है । इस कारण से उस चन्द्र के सक्षय में पहिले पवित्री के सहित तिलोदव को उनवे हाथ मे देकर फिर एपा स्वधा अस्तु' अर्थात् इनको म्वधा होवे - यह मुख स बालना हुआ उस पिण्ड का अग्रभाग देवे । फिर सर्वदामिष्ट तथा पूतं मन्त्र को प्रशसा का वर्णन करते हुए उनको भोजन कराना चाहिए। उस समय मे त्रोध की भावना को सर्वथा वजित कर देना चाहिए और श्री हरिनारायण का स्मरण करते हुए ही यह सब कम सम्पन्न करे ।।१३ ४४ ४५ ॥ जब यह जान लेवे कि विप्र भोजन से पूर्णतया तृप्त हो गये हैं तो फिर सावं वणिक विकिरन करना चाहिय । उदक के सहित अन्न को उद्धृत करक भूमि म जन का प्रभपण करे ।। ४६ ।। माचात हा नावें ता उहि पुन, जल पुष्प, अक्षत और उदर देव । स्वस्ति वाचनव सप का पण्ड़ा क ऊपर समाहरण करना चाहिय । सब देवायन कर अन्यथा श्राद का नाश हो जाता है । फिर ब्राह्मणो का विसजन करके उनकी प्रदक्षिणा पर । दक्षिण दिशा की ओर आकाक्षा करत हुए मनुष्य को पितृगण स याचना करनी चाहिये कि बाप सव दाता हैं और हमारे वेदो तया सन्तति का अविवद्ध न करें ॥४७,४८,४३॥ जब विध श्राद्ध प्रकरण श्रद्धाचनौमान्यगमत्वहृदयञ्चनोऽस्त्विति । अन्नञ्चनो बहुभवेदतियोश्च लभामह ॥५. याचितारश्च न सन्तुमाचयाचिप्मकञ्चन । एतदम्वितितत्प्रोक्तम-पाहायन्तुपावणम् ॥५५ ययेन्दुमक्षये तद्वदन्यत्रापि निगद्यते । पिण्डास्तुगोऽजविप्रभ्यादद्यादग्नी जलेऽपिवा 117 विप्राग्रता वा विकिरद्वयोभिरभिवाशयेत् । पत्नीतमध्यमपिण्ड प्राशयेद्विनयान्विता ॥५: आधत्त पितरोगभमत्र सन्तानवधनम् । तावदुरछेपण तिप्टेद्यावद्विप्रा विजिता (१५४ वैश्वदव तत. कुर्यान्निवृत्त पितृकर्मणि । इप्टै सह तत शान्ताभुजीत पितृमवितम् ॥५५ पुनर्भोजनमध्वान यानमायासमैथुनम् । श्राद्धकृच्छाभुक चंवसवमेनटिवजयत 1५६ स्वाध्याय कलह चव दिवास्वप्नच मर्वदा। अनेन विधिना वाद निरदन्येह निवपेत् ॥५७ कन्याकुम्भवृपग्थेऽर्के कृष्णपक्षेषु सर्वदा । यत्र यत्र प्रदातन्य सपिण्डिकरणात्परम् । तमानेन विधानेन दयग्निमता सदा ॥५० पितृगण स करबद्ध होकर परमपून भावना से यह भी याचना र कि आप ऐमी कृपा करें कि हमार हृदय से कभी भी घड़ा का व्यय- म न होवे और हमारे हृदय में बहुत अधिक दातृत्व शक्ति की वृद्धि वेि । हमार पाम अत्यधिक अन्न हाव और उस अतिथि गण प्राप्त करत है।॥ ५० ॥ हम लोगों से याचना करन वाल AIT हाब जिनको याच ना की पूत्ति म किया करें तय हम कभी भी क्मिी म याचना करन साले न बने । ऐसी ही कृपा आप लोग घर नि एमाली हो जाये ।

मत्स्यपुराण वति- । इसी को अन्वाहार्य पार्वण श्राद्ध कहा गया है ॥५१॥ जिम प्रकार से इन्दु के सक्षय में इसे कहा गया है उसी भाँति अन्यत्र भी इसको कहा जाता है । इन पिण्डो को फिर गो-अना और विनों को दे देना चाहिए अथवा इनको किसी पवित्र जलाशय मे या अग्नि में प्रसिप्त कर देना चाहिए ।। ५२॥ विप्रो के आगे विकिरण कर देवे अथवा पक्षियों को खिला देना चाहिये । पन्नी को मध्यम पिण्ड का प्राशन विनय से समन्वित होकर करना चाहिए ।। ५३ ।। इसमे पितृगण सन्तान के वर्धन करने वाला गभ रच दिया करते हैं। जब तक विप्रगण वहाँ से विसर्जित न हावे तब तक वह उनका उच्छिष्ट वैसे ही स्थित रहना चाहिये ।। ५४ ॥ इस पितृकर्म के साङ्ग सम्पन्न होकर निवृत्त हो जाने के पश्चाव वैश्वदेव करना चाहिए। इसके अनन्नर अपने समस्त इष्ट मित्रो तथा बन्धु-बान्धवो के साथ मिलकर परम शान्त भाव से युक्त हो उस पितृ सेवत अन्न को खावे ॥ ५५ ॥ श्राद्ध करने वाले पुरुष को उसी दिन में दूसरी व र भोजन करना, मार्ग का गमन करना, यान मे समारोहण करना, विशेष श्रम का काय करना, मैथुन नही करना चाहिये । इस भांति श्राद्ध भोजन करने वाले विप्र को भी इन नियमो का परिपालन करना चाहिए तथा दोनो को ही इनका विवर्जन कर देना चाहिए ॥५६।। श्राद्ध वाले दिन में स्वाध्याय भी न करे तथा किसी प्रकार का कलह और दिन मे निद्रा भी न लेवे और सर्वदा इसका ध्यान रखना चाहिए । इसो विधि-विधान में यहां पर श्राद्ध का निर्बपन करना चाहिए । कन्या राशि, कुम्भ और वृष राशि पर सूप के स्थित होने पर सर्वदा कृष्ण- पक्षो मे ही थान देना चाहिए । सापिण्डोकरण से आगे ही जहाँ-जहाँ पर धार देना चाहिये । जो साग्निक हो उसे भी इसी विधान से श्राद्ध देना चाहिए ॥ ५७ ।। ५८।।

साधारण बभ्युदय कीर्तन
१०१
।
१५--साधारण अभ्युदय कीर्तन
अतः परं प्रवक्ष्यामि विष्णुना यदुदीरितम् ।
श्राद्धं साधारणनामभुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥१
अपने विपुवे युग्मे सामान्ये चार्कसंक्रमे
अमावास्याप्टकाकृष्णपक्षे पञ्चदशीषु च ॥२
आर्द्रामघारोहिणीपु द्रव्यब्राह्मणसङ्गमे।
गजन्छायाव्यतीपाते विष्टि वैधतिवासरे ॥३
वंशावस्य तृतीयाया नवमी कार्तिकस्य च ।
पञ्चदशीच माघस्य नभस्येचत्रयोदशी ॥४
युगादयः स्मृता ह्येता दत्तस्याश्य्यकारिका. ।
तया मन्वन्तरादौचदेयवाद विजानता ॥५
अश्वयुक शुक्लनवमी द्वादशोकार्तिके तथा ।
तृतीया चैत्र मासस्य तथा भाद्रपदस्य च ॥६
फाल्गुनस्यामावास्यापोपस्यकादशीतया ।
आपाटस्याऽपिदशमीमाघमासस्यसप्तमी ७
श्रावणस्याप्टमो कृष्णातयापाढोचपूर्णिमा ।
कार्तिकीफाल्गुनीचैत्रीज्येष्ठपञ्चदशीसिता ॥
मन्वन्तरादयश्चता दत्तस्पाक्षयकारिकाः ॥
महा महर्षि श्री मूतजी ने कहा- इसने आगे मैं साधारण श्राद
को बनलाऊँगा जो भगवान् विष्णु ने कहा था । यह थाद भुक्ति-मुरि
के फल देन वाला है। इस श्राद्ध के देने के समय वठलाये जात हैं
अपन-विपुद-युग्म-सामान्य सूर्य सक्राति अमावास्या-अ टकाकृष्ण प
पञ्चादशी-आर्द्रा-मघा-रोहिंजो-द्रव्यवाह्मण सङ्गम-गजन्छाया ा
गत-विष्टि-निवासर वैशाख की ततोया-कात्तिक मासको नव.
तिथि-प को पञ्चदशो-नमस्य माप की त्रयोदशी तिपि ये युगात
हुए थन को क्षय करने वाले कह गये हैं। उसो मौलि मन्त्र

१०२
मत्स्यपुराण
के आदि मे विशेष ज्ञान रखने वाले पुरुष
को श्राद्ध देना चाहिए |
॥३, ४, ५।। अश्वयुक् वी शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि तथा कार्तिक
द्वादशी तिथि चैत्र और भाद्र पद मास की तृतीया तिथि-पाल्गुन में
अमावस्या और पौष मास को एकादशी तिथि-आषाढ की भी दशम
तथा माघ मास वी पप्तमी तिथि-धावण को अष्टमी कृष्ण पक्ष वाली-
आपाढी पूर्णिमा तथा कात्तिकी-फाल्गुनी-चैत्री और ज्येष्ठ की मित
पक्षदशी तथा मन्तिर दिये हुए श्राद्ध के अक्षय करने वाली टिचिय
हैं, ७, ८
यस्या मन्वन्त रम्यादौ रथमास्ते दिवाकरः।
माघमामस्यमप्तम्यामातु स्याद्रथसप्तमी ।।६
पानासमप्यत्र तिलदिमिश्र दद्यादिपतृभ्य. प्रयतोमनुष्य ।
श्राद्ध कृत तेन समा; सहस्र रहस्यमेतत् पितरो वदन्ति॥"
वैशाख्यामुप रागेपु तथोत्सवमहालये ।
तीर्थायतनगोष्ठेपु द्वीपोद्यानगृहेषु च ॥११
विविक्तपूपलिप्तेषु श्राद्ध देय विजानता।
विप्रान् पूर्व परेचाह्मिदिनीतात्मानिमन्त्रयेत् ॥१२
शीलवृत्तगुण पेगन् क्यारूपममन्वितान् ।
द्वौ दवे त्रीस्तथा पैन्ये एककमुभयत्रवा ।।१३
भोजयेत्सुसमृद्धोपिनप्रसज्जेतविस्तरे।
विश्वान्देवा न्यवैः पुष्परभ्यर्यासनपूर्वकम् ।।१४
मन्वन्तर के आद म जिस तिथि मे दिवाकर रथ में विराजमा
होते हैं वह माघ माम की सप्तमी तिथि है, अतएव वह रथ सप्तमी कई
भी जानी है 118) इग तिथि में यदि कोई प्रयत मनुष्य अपने पितृ
के लिये निलों में विमिश्रित जल मात्र भी सति कर देता है तो ऐ
मान लिया जाता है कि उस व्यक्ति ने एक सस वर्ष तक का था
कर 112-हा को पितृगण ही कहा करते हैं ॥१०॥ वैशा

साधारण अभ्युदय कीर्तन 1 मा मे-उपरागो मे-उत्सव महालय में-तीर्थ-देवायतन और गोष्ठ में- -उद्यान गृह मे तथा परम विविकत (एकान्त) और गोमय से उप न स्थल में विशेष ज्ञाता पुरुष का पितृगण के लिय थाद्ध देना चाहिए। या पर दिन में ही नियोजन के योग्य अधिकारी विनों को विनीत स्मा वाला परम विनम्र होकर निमन्त्रित कर देना चाहिए ॥११, १२॥ | भी विप्र श्राद्ध मे निमन्त्रित किये जावें वे शील-वृत्त और गुणा से न तथा वय एव रूप से समन्वित होन चाहिए । देव मे दो और पंन्य सोन ही विप्रो को प्राद्ध मे निमन्त्रण देना चाहिए अपवा इन दोनो हो एक-एक विप्र को नि:त्रित कर देना पर्याप्त होता है ॥१॥ हे कोई कितना ही अधिक समृद्धिशाली भी क्यों न हो मिस धन के गायक प्यथ होने की कुछ भी परवाह न हो तो भी श्राद्ध में विस्तार करने के लिए प्रसज्जित नही होना चाहिए । विश्व देवो को यवो के तथा पुरुषो के द्वारा आयचंन करत हुए पहिले आसन ग्रहण करना चाहिए ॥१४॥ पूरत्येपानयुग्मन्तु स्थाप्य दर्भ पवित्रकम् । शन्नोदेवीत्यप.कुर्याद्यवोऽसीतियवानपि ॥१५ गन्धपुप्पैश्च सपूज्य वैश्वदेव प्रतिन्यसेत् ।' विश्वेदेव.मइत्याभ्यामावाह्यविकिरेद्यवान् ।।१६ गन्धपुप्परलह कृत्ययादिव्यत्यपउत्सृजेत् । अभ्यच्यंताभ्यामुत्सृष्टपितृकार्य समारभेत् ॥१७ दर्भासनन्तुतत्त्वादौत्राणिपात्राणिपूरयेत् । सपवित्राणिकृत्वादोशन्नोदेवीत्यप,क्षिपेत् ।।१८ तिलोऽसीति निलान् कुगिन्धपुष्पादिक पुन । पात्र वनस्पतिमयतथापणमय पुनः ॥१६ जलज वाथ दुर्वीत तथा मागरसम्भवम् । । सौवर्ण राजन वापि पितृ णा पात्रमु-यते ॥२० त १०४ मत्स्यपुरु रजतस्य कथा वापि दर्शनं दानमेव वा। गजतैर्भाजनैरेपामथवा रजतान्वितः ।।२१ दो पात्रों की स्थापना करके दर्म और पवित्री के सहित जल उन्हे पूरित करे तथा "शन्नोदेवी"-इत्यादि मन्त्र के द्वारा जल कर चाहिए । “यवोऽसीति"-इत्यादि मन्त्र को उच्चारण करते हुए यवों भी डाल देवे ॥ १५ ॥ गन्ध और पुष्पो से वैश्वदेव का भली भांति पूर करके प्रतिन्यास कर देना चाहिय । 'विश्वेदेवास"-इत्यादि मन्त्रों द्वारा आवाहन करके यवों को विकीर्ण करना चाहिये ।।१६ ॥ गन्ध से नमलकृन करके 'या दिव्य" - इत्यादि मन्त्र को बोलते हुए जल क उत्सर्ग करे, उन दोनो से अभ्यर्चन करके फिर उत्सृष्ट पितृ कार्य समारम्भ कर देना चाहिए ॥१०॥ आदि में दर्भासन देकर तीन पात्र को पूरित कर देवे और आदि मे उन पात्रो को पवित्री के सहित करने फिर " शन्नोदेपी भिष्ठये". -इन्यादि मन्त्र के द्वारा जल का क्षेपण करना चाहिए ॥ १८ ॥ "तिलोऽसीति" मन्त्र को पढ़ते हुये तिलो का क्षय करे और फिर गन्ध, पुष्प आदि का क्षेपण करना चाहिथे । पात्र में बनस्पतियो से पूर्ण तथा पर्णमय कर देवे ॥ १६ ॥ अथवा जलजको तथा सागर सम्भव कर देवे । पितृगणो के पात्र सुवर्ण निर्मित अथवा रजत ( चांदी ) स बने हुए राजत कहे जाया करते हैं ।॥ २० ॥ रजत के कथा भी दर्शन और दान ही होना है। इन पितृगणो के लिये श्राद्ध मानि जो कुछ भी दिया जावे यह चादी के निमित पात्रों के द्वारा ही देना पाहिए अथवः चोटी से समन्वितों के द्वारा करना चाहिये ॥२१॥ वार्यपि श्रमया दत्तमक्षयायोपकल्पते । तथाघ्यपिण्डभोग्यादौ पितृणा राजतंमतम् ॥६२ सिननंतोद्भव यस्मात्तस्मात्तपितवल्लभम् । अमङ्गल तद्यनेन देवकार्येषु वर्जयेत् ।।२३ एव पात्राणि संप्य यथालाभविमत्सरः ।

साधारण अम्पुदय कीर्तन
१०५
यादिव्येतिपितुन मगोनं दंभेकरोन्यसेत ॥२४
पितृ नावास्यप्यामि कुवित्युक्तस्तु ते पुनः ।
उपन्तस्त्वा तयायन्तु ऋग्ध्यामावायेपितृ न ।।२५
यादिव्येत्यध्यमुत्सृज्य दद्याद् गन्धादिकास्ततः ।
हस्तात्तदुदक पूर्व दत्वा सयवमादितः ।।२६
पितृपाय निघायायन्युजमुत्तरतोन्यसेत् ।
पितृभ्य स्थानमसीतिनिधाय परिपेचयेत् ।।२७
तत्रापि पूर्ववत् कुर्यादग्निकार्य विमत्सरः ।
उभाभ्यामपि
हस्ताभ्यामाहत्य परिवेषयेत् ।
जो अपूर्वक देवन बन भी दिया गया है वह भो अक्षर
ही उपकालीन हो जाता है । इसी भांति से अध्य-पिण्ड भोग्य आदि के
क्म में पितृगणो के लिये राजन माना गया है ।। २२ ।। भगवान शिव के
नेत्रो से उत्पत्ति होती है इसी कारण से यह पितृगण का प्रिय है। जा
असहन है उसे यानपूर्वक देव कार्यों से वनित करना चाहिए ।। २३ ।।
इस रीति से पात्रों वा सङ्कल्प करके लामानुसार मत्सरता के
भाव से रहिन होकर हो “या दिव्या "-इत्यादि मन्त्र से पिता
के नाम गोत्रों से हाथ में दर्भ ग्रहण करने वाले को न्याम करना चाहिये
।। २ ।। "पित न् आवाहयिष्यामि" - अर्यात् मैं अपन पितृगणो का आवा-
हन कवंगा-- इस रोनि में अनुज्ञा प्राप्त करने के लिये पूछे । जर बाहाण
कर देवे कि 'कु' ---अर्याइ प्रावाहन करो तभी आवाहन पूछकर प्राप्ता-
नुशहाकर हो करे । 'उशानुस्वार 'तगायन्तु'-इन दो स्वामी के द्वारा
चितृमण का आवाहन को ||२५ । 'या दिव्या'-इस मन्त्र को पढ़कर
अर्घ्य का उत्सर्ग करक फिर पीछे गन्ध आदिक अन्य पूजनोपचारों का
हाथ में पूर्व प उम जल को देकर आदि से सुश्रव को
पितृगग के पात्र मे रखकर उत्तर की और न्युउन न्यास करना चाहिये ।
'पितृभ्यास्यनमस"---इस मन से रसकर परिषेदन करे ।। २६, २७ ।
दना चाहिए ।

१०६ मस्यपुराण वहाँ पर भी पूर्व की ही भाति मारसय स रहित होकर ही अग्नि काय करना चाहिये । दोनो हाथा स समाहरण करक ही परिवेषण करना चाहिये ॥२८॥ प्रशान्तचित्त सतत दर्भपाणिरशेषत । गुणाढ्यं सूपशास्तु नानाभक्ष्यविशेषत ॥२६ अनन्तु सदधिक्षीर गोघृत शक्तान्वितम् । मासम्प्रीणातिवैसर्वान् 'पतृ नित्याकेशा ॥३० यत्किञ्चिन्मसमिथ गोक्षीर घृतपायसम् । दत्तमक्षयमित्याहु पितर पूर्वदेवता ॥३१ स्वाध्याय थावयत पिन्न्य पुराणान्यखिलानि च । ब्रह्मविष्ण्वकरुद्राणा स्यवानि विविधानि च ॥३२ इन्द्राग्निसोमसूक्तानि पावनानि स्वशक्तित । वृहद्रथन्तरतद्वज्ज्यष्ठसामसरोहणम् ॥३३ तथैव शान्तिकाध्याय मधु ब्राह्मणमेव च । मण्डल ब्राह्मणतद्वत्प्रीतिकारितुयत् पुन ॥३४ विप्राणामात्मनश्चव तत्सव समुदीरयत। भुक्तवत्सु ततस्तेषु भोजनोपान्तिके नृप । ॥३५ निर तर श्राद्ध कम मे प्रशात चित्त वाला रहकर ही उसे करे पौर सवदा हाथ मे दम रखे । गुणो से युक्त सूप तथा शाक आदि अनेक प्रकार के भश्य पदार्थों का विशेष रूप से परिवेपण करे ॥ २६ ॥ जो भी अ न दिया जावे वह दधि-भोर और शवरा से समन्वित ही देना चाहिये । भावान् के शव ने कहा है कि इस तरह स दिया हुआ श्राद्ध एक माम पय्य त पितृगण को प्रस न किया करता है ।। ३० ॥ जो कुछ मधु से समिथित जो का क्षीर घृत पायम दिया हुआ है वह सब अक्षय अयात् क्षय स रहित हो जाया करता है - ऐसा पितृगण और पूर्व देवता त है ।। ३१ ।। पिय अर्थात् पितृगण स सम्बधित स्वाध्याय का श्रवण मी साधारण अभ्युदय कोन १०७ , - फरादे तथा ममी पुरागी को मुनाना चाहिये। बह्मा, विष्णु और मद्र के विविध स्तवो का श्रवण कराना चाहिए 11 ३२॥ इन्द्र-अग्नि और सोम के जो परम पावन मूक्त हैं उनका श्रवण अपनी शक्ति से करावे । इसी भांति वृहद् अन्तर और ज्येष्ठ साम सरोहिण का श्रवण भी शक्ति के अनुसार बन पड़े तो कराना चाहिए ।। ३३ । इसी तरह से शान्तिका- ध्याय मोर माधु ब्राह्मण एव मण्डल तथा प्राह्मण का श्रवण करावे । तात्पर्य यही है कि जो भी कुछ पितृगण के लिये प्रीति का करने वाला वही उस समय मे थवण कराना उचित होता है ।। ३२ ॥ हे ना ! इसके पश्चात् उन सबके मुकवान् हो जाने पर ही भोजर के समोप मे ही विगे का तथा अपना सब उदीरित करना चाहिए॥३५॥ सावर्णिकमन्नाद्य सन्नीयानपाव्य वारिणा । समुत्सृगेद् भुक्तवतामग्रतो पिकिरेद्भुवि ॥३६ अग्निदग्धास्तु ये जीवा यऽप्यदाधाकुले मम । भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु प्रयान्तु परमाङ्गतिम् ।।३७ येपा न माता न पिता न बन्धुर्न गोत्रशुद्धिनं तथान्नमस्ति । ततप्तयेऽन्न भुवि दत्तमेतत् प्रयातु लोके सुखाय तहत् ॥३० असस्कृतप्रमीतानान्त्यक्ताना कुल योपिताम् । अविष्टभागकेय स्याद्दर्भे विकिरयोश्चय ॥३६ तृप्ता ज्ञात्वोदक दद्यात् सद्विपकरे तथा । लिप्ले महीपृष्ठे गोशकृन्मूत्रवारिणा ॥४० निधाय दर्भान् विविधक्षिणान्प्रयत्नतः । सवंदणेन चान्ने न पिण्डातु पितृयज्ञवत् ।।११ अवनेजनपूर्वन्तु नामगोत्रण मानवः । गन्धधूपादिकं दद्यात् कृत्वा प्रत्यवनेजनम् ॥४२ सभी वर्गों का अन्न आदि का ग्रहण कर लेवे भौर उसको लाकर जन से प्लावित कर लेना चाहिए फिर उसको मुक्त हुओ के सामने १०० मस्स्यपुराण समुत्कृष्ट करना चाहिए और भूमि मे विकोणं कर देवे ॥३६॥ जिस समय मे भूमि मे अन्न को विकीर्ण करे उस समय मे "अग्नि- दग्धास्तु ये जीवाप्येयदग्धाः कुलेमम । भूमि......" इत्यादि मन्त्र का मुख से समुच्चारण करना चाहिए। इसका अर्थ है जो भी कोई जीव मेरे कुल मे आग से जलकर मृत हो गये हों अथवा जिनका कभी दाह ही नहीं किया गया हो और ऐसे ही वहीं मृत शव पडकर विनष्ट हुआ हो वे सभो भूमि मे समर्पित इस विकीर्ण अन्न से तृप्ति को प्राप्त कर तथा परम गात की प्राप्ति भी करें ॥ ३७ ।। जिनके कोई भी माता--पिता और बन्धु नही हैं-न उनके गोत्र की ही शुद्धि ह और न अन्न ही प्राप्त हैं उन सबको तृप्ति के लिये ही यह अन्न भूमि मे विकीण करके दिया गया है । यह लोको मे उन सबको उसी भांति सुख के लिये होवे ।। ३८ ।। असंस्कृत प्रमीत त्यक्त कुल योषिठों का उच्छिष्ट भाग घेय और और जो दर्भ मे विकीर्ण है वह होये ॥३६॥ जिस समय यह समझ लेवे कि भोजन करके विप्र प्राय तृप्त हो चुके हैं तब एक बार विध क कर मे उदक देना चाहिए । गौमय और गौमूत्र के द्वारा उपलिप्त भूमि के पृष्ठ भाग पर उन दों को निधापित कर देवे किन्तु विधिपूर्वक दक्षिण की ओर ही उन अग्रभाग होने चाहिये ऐसा ही प्रयत्न पूर्वक करे । सभी वर्गों वाले पुरुषो के अन्न से पितृ यज्ञ की भौति पिण्डो की रचना करनी चाहिए ॥ ४०, ४१॥ मानव को अवनैजन पूर्वक नाम और गोत्र के द्वारा गन्ध-घूप मादिक सभी समर्पित करे और फिर प्रत्यबने जन करना चाहिए। जान्वाच्यसव्य सव्येनपाणिनाथ प्रदक्षिणम् । पित्र्यमानीय तत्कार्य विधिवद्दमपाणिना ॥४३ दीपप्रज्वालनतद्वत् कुर्यात्पुप्पार्चन वुधः । अथानान्तेषु चाचम्यवारिदद्यातसकृतसकृत् ॥१४ अथ पुष्पा तान् पश्चादक्षग्योदकमेव च । - साधारण सभ्युदय कोन सतिल नामगोत्रेणदद्याच्छक्तयाचदक्षिणाम् ॥४५ गोमूहिरण्यवासासि भव्यानि शयनानि च । दद्यादिप्टं विप्राणामात्मन पितुरेव च ।।४६ वित्तशाठचन रहित पितृभ्य. प्रीतिमावहन् । तत स्वधावाचनक विश्वेदेदेषु चोदकम् ॥४७ दत्वाशी प्रतिगृह्मोयाद्विश्वेभ्य प्राङ्मुखो बुध । अघोरा पितर सन्तु सन्वित्युक्त पुनद्विज ॥१८ गोत्र तथावर्द्धन्तानस्तथेत्युक्तश्च तं पुन । दातारोनोऽभिवर्धन्तामिति चैवमुदीरयेत् ॥४६ सव्य पारिश से जान्दा वाध्य करे इसके अनन्तर पित्र्य को प्रदक्षिण लाकर दर्भयुक्न हाथ से विधिपूर्वक वह करना चाहिए ।।४३।। उसी तरह दीपक का प्रज्वालन करे और बुध पुरुष को पुष्पार्चन करना चाहिए। इसके पश्चात उन विप्रों के आचान्त होने पर और आचमन करके एक- एक बार जल देवे ॥४४|| इसक अनन्तर पुष्प और अक्षतों को तया अक्षय्य उदक जो तिलों के सहित हो नाम और गोत्र का उच्चारण करके रेला चाहिए तथा शक्ति के अनुसार दक्षिणा भी देवे ॥४शा दक्षिणा में - भूमि-सुवर्ण-वस्त्र बोर मन्य शय्या इनम अपना जो अत्यन्त प्रिय एव अभीष्ट हो तथा पिता को जो परम इप्ट पदार्थ हों उहीं को ब्राह्मणों को देना चाहिए ॥४६॥ दक्षिणा आदि को देने में वित्तशाठय से रहित होकर ही पिताण की प्रीति प्राप्त करता हुआ सकीर्णता दूर रहकर करे। इसके उपरान्त फिर विश्वेदेवो में प्रेरणा करने वाला स्वधा का चनक करे ॥४७॥ यह सव समर्पित करके दुध पुरुष का पूर्व की ओर मुख वाला होकर विश्वेदेवो से आशीर्दाद का प्रतिषहण करना चाहिए। फिर द्विजो के द्वारा पितृगण घोर होवे-इस प्रकार से कहा हुआ श्राद्ध- कर्ता हो-फिर उनके द्वारा कहा जावे-रमारा गोद वृद्धिशील होवे और के द्वारा यह सद ११० मत्स्यपुराण इसके अनन्तर हमारे दातागणो का वर्धन होवे-इस प्रकार से यह कहना चाहिए ॥४८, ४६॥ एता. सत्याशिषः सन्तु सन्त्वित्युक्तश्च ते. पुनः । स्वस्तिवाचनक कुर्यात् पिण्डानुद्धृत्य भक्तित. ॥५० उन्छेषणन्तु तत्तिष्ठेद्यावद्विप्रा विसर्जिताः। ततो ग्रहबलि कुर्यादिति धर्मव्यवस्थिति. ॥५१ उच्छेपण भूमिगतमजिह्मस्यास्तिकस्य च । दासवर्गस्य तत्पित्र्य भागधेय प्रचक्षते ।।५२ पितृभिनिर्मित पूर्वमेतदाप्यायन सदा । अपुत्राणा सपुत्राणा स्त्रीणामपि नराधिप ! ॥५३ ततस्तानग्रतः स्थित्वा परिगृह्योदपार कम । वाजेवाज इतिजपन् कुशाग्रेण विसर्जयेत् ॥ ४ वहिः प्रदक्षिणान्कुर्यात् पदान्यष्टावनुव्रजन् । बन्धुवर्गेण सहितः पुत्रभार्यासमन्वितः ॥५५ ये सभी आशीर्वाद सत्य होवे-उनक द्वारा पुनः यह कहा जावे कि अवश्य सत्य हो । भक्ति भाव से पिण्डो को उद्धत करक स्वस्तिवाचन करना चाहिये । ५०|| जब तक उस श्राद्ध के स्थल से ब्राह्मण लाग विसजित हो तब तक उन के भोजन का उच्छिष्ट उसी दशा मे स्थित रना चाहिए। इसके अनन्तर ग्रहबलि करे-यही इतनी धम्मं की व्ययस्था होती है । ५१॥ जो भूमि पर गिरा हुआ उच्छेपण है वह भी जिहा न हो तथा आस्तिक हो ऐसे दास वर्ग के लिये ही यह पित्य भाग आप्यायन (तृप्त हाना) पहिले ही निर्मित किया गया है। यह सभी के लिये है चाहे वे पुत्र पूरित हो या सपुत्र हो या स्त्रियां हो ॥५॥ इस अनन्तर उना यागे स्थित होकर उदक्ष पात्र यो परिगृहीत पर "वाजे वार"-यह जप करता हुआ वुदा थे अग्रभाग से पितृगण में ।

साधारण अभ्युदय कीर्तन विसर्जन करना चाहिये ।। ५४ ॥ आठ कदम तक अनुव्रजन करते हुए अर्थात् विप्रो के पीछे २ चलते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये । जिस समय मे प्रदक्षिणा करे उस समय में मव बन्धु वर्ग को भी साथ में रखना चाहिये तथा अपनी भार्या और पुत्रादि को भी साथ मे ले लेना चाहिए ॥५५॥ निवृत्य प्रणिपत्याथ पर्युक्ष्याग्नि समन्नवत् । वैश्वदेव प्रकुर्वीत नत्यक वलिमेव च ॥५६ ततस्तु वैश्वदेवान्ते सभृत्यसुतवान्धवः । भुजीतातिथिसयुक्तः सव पितृनिपेविनम् ॥५७ एतच्चानुपनीतोऽपि कुर्यात सर्वेषु पर्वसु । श्राद साधारण नाम सामफलप्रदम् ॥५८ भार्याविरहितोऽप्येतत प्रवासस्थोऽपि भक्तिमान् । शूद्रोऽप्यमन्त्रवत् कुर्यादनेन विधिना बुधः ॥५६ तृतीयमाभ्युदयिक वृद्धिश्राद्धं तदुच्यते । उत्सवानन्दसम्भारे यज्ञोहाहादिमङ्गले ॥६० मातर प्रथम पूज्या. पितरस्तदनन्तरम् । ततो मातामहा राजन् विश्वेदेवास्तथैव च ।।६१ इम विमर्जन की क्रिया से निवृत्त होकर प्रणिपात करे और इसके उपरान्त समन्च वत् अग्नि का पर्युक्षण करना चाहिए । वैश्वेदेव और नत्यिक चलि दते ॥५६॥ इस अनना वैश्वदेव के अन्न मे भृत्य-सुन और बान्धवो के सहित अतिथियो मे सयुक्त होकर समी पितृगण के द्वारा निषेवित किये हुए पदार्थों का मोनन करना चाहिए ॥ ५७॥ इस श्राद्ध का वह भी समस्त पों मे करे जिसका उपनयन सस्कार न हुआ हो। यह साधारण नाम वाला श्राद्ध है जो सम्पूण वामनाना के पलो को प्रदान करन वाला है ॥ ५८ ॥ जा कोई भार्या से भी विरहित हो तथा प्रवास म स्थिति रखन वाला हा और भक्ति भाव से सम्पन्न शूद्र भी हो मत्स्यपुराण रा निर्दपन परे ।। ६२॥ यह याद्ध मभ्युदय मे सम्पन्न होता है इसी ११२ जो मन्त्र रहित होता है उस वुध पुरुष को यह श्राद्ध विधिपूर्वक करना चाहिए ॥ ५६ ।। तोसरा आम्युदयिक श्राद्ध होता है जिसको वृद्धि श्राद्ध के नाम से कहा जाया करता है । उत्सवों के आनन्द सम्भार मे तथा यज्ञ और उद्वाह आदि के मङ्गलमय समय मे सर्व प्रथम मातृगण का अभ्यचंन करना चाहिए और इसके पश्चात् फिर पितरो का पूजन करे। हे राजन् ! इसके अनन्तर मातामहो का पू न करे और पीछे उसी भांति विश्वे देवाओ का अर्चन करना चाहिए ॥ ६०, ६१ ।। प्रदक्षिणोपचारेण दध्यक्षतफलोदकै.। प्राड्मुखो निवपेपिण्डान् दूर्वयाच कुशैयुतान् ॥६२ सम्पन्नमित्यभ्यदये दद्यादय द्वयोर्द्वयोः । युग्मा द्विजातय पूज्या वस्त्रकातस्वरादिभि ॥६३ तिलाथस्तु यवै कार्योनान्दिशब्दानुपूर्वक । माङ्गल्यानि च सर्वाणिवाचयेद्विजपुङ्गवै ।।६४ एव शूद्रोऽपि सामान्यवृद्धिश्राद्धेऽपि सवदा । नमस्कारेण मन्त्रण कुर्यादामान्नत सदा ॥६५ दानप्रधान शूद्र स्यादित्याह भगवान्प्रभु । दानेन सर्वकामाप्तिरस्य सजायते यतः॥६६ प्रदक्षिणा के उपचार से दधि-अक्षत-फल और जल के द्वारा पूर्व दिशा की ओर मुख वाला होकर दूर्वा और कुशा से युक्त पिण्डों लिये दो-दो को पध्यं देना चाहिए। वस्त्र और वास्विर (मुवर्ण) आदि युग्म हिनातियों का पूजन करना चाहिये ॥६।। नादि शम्दानु पूर्व निमार्य गरी यवों से ही सम्पन्न रिना चाहिए। हिज धेष्ठों में द्वारा सणं मानल्यो वा व्यपन परमा नाहिए ॥१४॥ इसी प्रकार मामान्य वृद्धि थार में भी सर्वदा गृह रो भी ममस्कार मन्त्री दारा ये अन्न ही मदा रना चाहिये ।।६।। भगवाद प्रभु ने वहा ।

मोदिष्टथाद्धप्रारण शूद को दान देने की प्रधानता वाला अवश्य होना ही चाहिये वारण है कि इस शूद्र वर्ग वाले पुरुष को वेवत दान से ही समस्त कामनाओ कलो की प्राप्ति हो जाया करती है इसी लिये शूद्र के लिये दान देन विशेष महत्व होता है ॥६६॥ १६-एकोदिप्टश्राद्धप्रकरण एकोद्दिष्टमतावक्ष्ये यदुक्त चक्रपाणिना। मृते पुतंयंयाकार्यमागीचच पितयपि ॥१ दशाह शावमाशीच ब्राह्मणेपु विधीयते। क्षत्रियेषु दश द्वेच पक्ष वैश्येपु चैवहि ॥२ शूद्रेपु मासमाशौच सपिण्डेपु विधीयते । नशम्वाऽकृतचूडस्य त्रिरात्रम्परतः स्मृतम् ॥३ जननेऽपवमेव स्यात् सर्ववर्णेषु सर्वदा । तथास्थिसच्चयाध्वमङ्गस्पर्शो विधीयते ॥४ प्रेनाय पिण्डदानन्तु द्वादशाह समाचरेत् । पाथेय तस्य तत् प्रोक्त यत प्रीतिकर महत् ।। तस्मात् प्रेतपुर प्रेतो द्वादशाह न नीयते । गृहं पुत्र कलत्रञ्च द्वादमाह प्रपश्यति ॥६ तस्मान्निधेयमाकाशे दशरान पयस्तथा । सर्वदाहोपशान्त्यर्थमध्वश्रमविनाशनम् ॥७ महर्षि प्रवर सूतजी ने कहा-अब तब पार्वण तथा साधारण दो यादि का वर्णन किया जिनके साथ आभ्युदायिक श्राद्ध को भी तला दिया गया था। अव एकोदिष्ट श्राद्ध के विषय में बतलाते हैं जिसे गवान् चक्र पाणि ने कहा है । पुत्रो के द्वारा पिता के मृत हो जाने पर जस प्रकार रो आशौच करना चाहिये-यह सभी कहा जाता है ।

अपने घर को,पुत्र को और भार्या को बराबर देखता रहता है। इस ११४ मत्स्यपुराण ब्राह्मणों में गाव (मृता) पाणीप दा दिन या माना जाता है-अपद मे यारह दिन वा मृाकागोय होता है और वैश्यों में एक पक्ष का आशौच हुआ करता है ॥२॥ शूटों में जो भी सपिण्ड होते हैं एक का आशोच रहा करता है । जो वासक चूहा सस्कार से रहित हो ना मागौच एक निशा पा या अधिक से अधिक तीन रात्रि का ही वह गया है ॥३॥ सर्वदा जिस प्रकार स विभिन्न वर्गों में मृतवागौच है उसी भांति जनन में भी हुआ करता है। तथा प्रस्थियों के सर करने से ऊध्वं मे अङ्ग स्पर्श का विधान है ॥४प्रेत के लिये पिण्डों। दान बारह दिन समाचरण करे । यह उसका यमपुरी के म.मं का पाव कहा गया है अर्थात् मार्ग भोजन है क्यों कि यह उसको महान् प्रीतिक करने वाला हुआ करता है | इसलिये यह सुसिद्ध है कि वारह दि तक प्रेत प्रेतों के पुर मे नही पहुँचाया जाता है । वह प्रेत बारह दिन त दश रात्रि पर्यन्त आकाश मे अर्थात् पीपल आदि वृक्ष पर पय (जलकुम्भ रखना चाहिये अर्थात् जलका पट भरे । यह सब प्रकार के दाह शान्ति के लिये और मार्ग के श्रम का विनाश करने के लिये ही होत है।191 तत एकादशाहे तु द्विजानेकाशव तु । क्षत्रादिः सूतकान्ते तु भोजयेदयुतो द्विजान् ॥६ द्वितीयेऽह्नि पुनस्तद्वदेकोद्दिष्ट समाचरेत् । आवाहनाग्नौकरणं देवहीन विधानतः ।।६ एक -वित्रमेकोघं एकः पिण्डो विधीयते । उपतिष्ठतामित्येतद्देय पश्चात्तिलोटकम् ॥१० स्वादित विकिरेवूयाद्विसर्गे चाभिरम्यताम् । शेष पूर्ववदत्रापि कार्य वेदविदा पितुः ॥११ सपिण्डीकरणादूर्व प्रेतः पार्वणभाग् भवेत् ।

एकोद्दिष्टवादप्रकरण
वृद्धिपूर्वेषु योग्यश्च गृहस्थश्च भवेत्तः ॥
सपिण्डीकरणे श्राद्ध देवपूर्व नियोजयेत् ।
पितृ नेवासयेत्तत्र पृथक् प्रत विनिदिशेत् ॥१३
गन्धोदकतिलयुक्त कुर्यात्पात्रचतुष्टयम् ।
अर्घायं पितृपारेषु प्रेतपानं प्रसेचयेत् ।।१४
इम पश्चात् दश रात्रि समाप्त होने पर पारहवें दिन एकादश
द्विजों को और क्षवियादि से मूनव के अन्त में प्रयुतों द्विजों को भोजन
कराना चाहिर 1111 दूसरे दिन में उसी तरह से फिर एकोद्दिष्ट थाद
करे। आवाहनागिन में विधान से देवहीन करे l एक पवित्री-एका
अर्घ और एक पिण्ड किया जाता है। 'उपतिष्ठनाम्'-दत्यादि के द्वारा
पोछे दिलोहक देना चाहिये ।.१०॥ 'स्वादित विक्रेत्'-इसको बोले
और विसम में 'मिरम्यताम्'-यह बोलना चाहिये । शेष सभी पूर्व को
ही भांति इम पिता के पाद में भी वेदों के ज्ञाता पुरुष करना चाहिो ।
।।१२।। मपिण्डो करण के पश्चात ही वह प्रेत पादप याद ग्रहण करने
का हकदार हुप्रा करता है । वृद्धि पूर्वो में योग्य और फिर गृहस्य होता
है ।।१२।। सपिण्ट्री करप धार में देव पूर्व का नियोजन करना चाहिये ।
वहा पर पितृगण का ही अधिवास करे और प्रेत को पृथक विनिर्दिष्ट
करना चाहिये ।।१३॥ गन्ध-उदक और निसों से युक्त चार पात्रों को
वहा पर रखना चाहिये। अर्घ के लिये पितृ पात्रों में प्रेत पात्र का प्रसं-
चत करे ॥१४॥
नद्वत्संकल्प्य चतुरः पिण्डान् पिण्डप्रदस्तदा ।
ये समाना इति द्वाभ्यामन्त्यन्तु विभत्रिधा ॥१५
चतुर्थस्य पुनः कार्य न कदाचिदतोभवेत् ।
तत. पितृत्वमापन्नः सर्वतस्तुष्टिमागतः ॥१६
अग्निप्वात्तादिमध्यत्त्वं प्राप्नोत्यमृतमुत्तमम् ।
सपिण्डीकरणाद्ध्वं तस्मै तस्मान्नदीयते ॥१॥

११६
मत्स्यपुराण
पितृप्वेव तु दातव्य तत् पिण्डोयेपु सस्थित ।
ततः प्रभृति सक्रान्तावुपरागादि पर्वसु ॥१८
त्रिपिण्डमाचरेल्छाद्धमेकोद्दिष्ट मृताहनि ।
एकोद्दिष्ट परित्यज्य मृताहे यः समाचरेत् ॥१६
सदैव पितृहा स स्यान्मातृभ्रातृविनाशक ।
मृताहे पावण कुवानधोऽधोयाति मानधः ॥२०
सपृक्त प्वाकुलीभाव प्रतेपु तु यतोभवेत् ।
प्रतिसवत्सर तस्मादेकोदिष्ट समाचरेत् ।।२१
उस समय मे उसी भांति सङ्कल्प करके पिण्डों के प्रदाता को
चार पिण्ड करने चाहिये । जो समान होते हैं। दो से जो अन्त्य है उसका
तीन भागो मे विभाजन करे ॥१५॥ जो चौथा है उसका पुनः कदाचित्र
इससे नहीं होवे । इसके उपरान्त ही सब ओर स तुष्टि को प्राप्त होता
हुआ वह युत पितृत्व को प्राप्त हो जाया करता है ।।१६।। अग्निष्का
तादि जो पितगण हैं उनके मध्यत्व को वह प्राप्त कर लेता है जो कि
अमृत और उत्तम है । सपिण्डी करण कर्म क करने के ऊवं मे फिर उम
युत के लिये इसी कारण से कुछ नहीं दिया जाया करता है ।।१७॥
तो पितृगणा मे ही देना चाहिय जिनमे पिण्ड सस्थित होता है । तमो
से लेकर सूय सक्रान्ति मे और उपराग आदि पर्वो मे मृत होने वाले दिन
मे तीन पिण्डों का समाचरण करे। यही एकोद्दिष्ट श्राद्ध होता है।
एकोद्दिष्ट का परित्याग करके जो मृत दिन मे किया करता है वह सदा
ही पितगण का हनन करने वाला है और माता तथा भाई का विनाश
करन वाला है । मृत दिन मे पार्वण श्राद्ध करने वाला मानव अधोभाग
स भी अधोभाग मे जाया करता है क्योकि सपृक्त प्रेतो मे याकुली भाग
हा जाया करता है। इसी कारण से प्रत्यक सम्वत्सर मे एकोद्दिष्ट
याद का अवश्य ही समाचरण करना चाहिये ॥ १८ ।। १६ ।।
फिर
२०॥ २१॥

एकोद्दिष्ट श्राद्ध प्रकरण यावदन्दन्तु योदद्यादुदकुम्भ विमत्मर । प्रेतायान्नसमायुक्त सोऽश्वमेघपल लभेत् ।।१२ आमवाद्ध' यदा कुर्याद्विधिज्ञ श्राद्धदस्तदा । तेनाग्नीकरणकुर्यापिण्डारतेनैवनिवपेत् ॥२३ त्रिभिः सपिण्टिकरणे भशेषत्रितये पिता। यदा प्राप्स्यतिकाजेनतदामुप येतवन्धनात् ।।२४ मुक्तापिलेपभागित्वप्राप्नोतिकुशमार्जनात् । लेपमानश्चतुर्थाद्या पित्राद्याःपिण्डमागिन । पिण्डद सप्तमस्तेपा सापिण्ड साप्तपौरपम् ।।२५ जब तक मृत को एक वर्ष पूर्ण हो उस वर्ष में बरावर जो कोई विगत मत्लग्ता वाला होकर पादरे सहित जल का कुम्म दिया करता है और प्रेन के लिये उसे अन्न से समायुक्त कर देता है वह एक अश्व- मेघ यज्ञ के करने के पुण्य-फल का नाम करता है ॥२३॥ जिस समय में विधान का शान रखने वाला श्राद्ध दाता आम श्राद्ध परे प्रर्यात कच्चा हो भन्नादि विना पाक किये हुए देवे तो उसस अग्निकरण अवश्य ही करना चाहिए और उसी स पिण्डो का भी नियंपन भी करे ।।२३।। तीनो के द्वार) अग्रेप त्रितय सपिण्डो करण में जब पिता प्राप्त होगा तो समप से वह उम समय मे बन्धन से मुक्त हो जाता है ॥२४ा मुन हा भी कुश दे माजन लेप मागित्व को प्राप्त किया करता है। चतुर्थाद्य लेप भागी है और पित्राय सब पिन्ड भागी हुआ करते हैं। तात्पप यह है कि चौथी पीढी से कार वाले वेधल लेप मापी ही हुआ करस हैं और चार पुन तक पिण्डो रे भागी होते हैं। उनका पिण्ड देने वाला सप्त होता है अबएव साप्त पौरुष मपिण्ड्य हुआ करता है | ११८ मस्त्यपुराण १७-श्राद्धयोग्यतीर्थानावर्णनम् । कस्मिन्कालेचत छाद्धमनन्तफलद भवेत् । कस्मिद् वासरभागेतुश्राद्धकृत छाद्धमाचरेत् ॥१ तीर्थेषु केषु च कृत श्राद बहुफल भवेत् । अपराहणे तु सप्राप्ते अभिजिद्रोहिणोदये ॥२ मच्चिद्दीयते तत्र तदक्षयसुदाहृतम् । तीर्थानि कानि शस्तानि पितृणा वल्लभानिच ॥३ नामतस्तानि वक्ष्यामि सक्षेपेण द्विजोत्तमाः।। पितृनाथ गया नाम सवतीथवर शुभम् ॥४ यत्रास्ते देवदेवेश. स्वयमेव पितामहः । तत्रषा पितृभिर्गीता गाथा भागमभीप्सुभि ॥५ एष्टव्या बहव पुत्रा योकोऽपि गयाव्रजेत् । यजेत वाश्वमेधेन नील वा वृषमुत्सृजेत् ।।६ तथावाराणसी पुण्या पितृणा बल्लभासदा । यत्राविमुक्तसान्निध्यभुक्तिमुक्तिफलप्रदम् ॥७ ऋषिगण ने कहा-हे भगवन् ! अब प्राप हम लोगो को यह बताने की कृपा कीजिएगा कि किस समय मे वह किया फल का देने वाला होता है। दिन के किस भाग में श्राद्ध का करने वाला उस पद का समाचरण करे। वे कौन से तीर्थ हैं जिनमे किया हुआ श्राद्ध बहुत अधिक फल का देने वाला हुआ करता है ? "महा महपि श्री सूतजी ने कहा-दिन मे जिस समय मे अपराह्न सम्प्राप्त हो जावे उसी समय में प्रमिजिद्रोहिणोदय में जो कुछ भी दिया जाया है वह अक्षय कहा गया है। कोन २ से तीर्थ परम प्रशस्त हैं और पितरो के अधिक प्रिय हैं उना भी सबका नाम ले लेकर हम बतलाते हैं । हे द्विोत्तमो 1 यह सब सक्षेप मे ही हम बतलायेंगे। गया नाम वाला पितृ तोय है जो कि समस्त तीयों में परम श्रेष्ठ एवं अति शुभ तीर्थ है ।।१, २, ३, ४॥ यह हुआ श्राद्ध अनन्त -

पाढयोग्यत्तीर्यानावर्णनम्
११६
-
गया वह उत्तम सीर्य है जहा पर देवो के भी देवेश्वर पितामह स्वयमेव
दिराजमान रहा करते हैं। यहा पर पितृगणो के द्वारा यह एक गीता
कही गयी है। इस गाया के भाग को अभीप्सा रखने के लिये वह है
११४, ५१ वह यही है कि सर्वदा बहुत से पुत्रों से प्राप्त करने की इच्छा
रखनी चाहिये । उन बहुत सारे पुत्रों में यदि कोई एक भी कभी गया
तीयं में चला जाये अथवा अश्वमेघ यज्ञ के द्वारा कमी यजन करे या
नील वृप का उसजन करे । तात्पर्य यही है कि जब बहुत पुत्रों की कामना
के अनुसार वे उत्पन्न होंगे तो उन में कभी कोई एक ऐसा भी समुत्पन्न
हो सकता है बो गय। यदादि करने वाला होवे। इसी भांति वाराणसी
परम पुण्यमयी पुरी है जो कि सदा ही पितृगण की अत्यन्त वल्लभा रही
है जहां पर अविमुक्त सान्निध्य प्राप्त होता है जो मुक्ति और मुक्ति दोनो
ही के पल को प्रदान करने वाला है ॥६,७||
पितषा वल्लभ ववत् पुण्यञ्च विमलेश्वरम् ।
पितृतीर्थ प्रयागन्तु सवकामकलप्रदम् ॥८
वटेश्वरस्तु भगवान् माधवेन समन्वित ।
योगनिद्राशयस्तद्वत् सदावसति केशव HE
दशाश्वमेधिक पुण्य गङ्गाहार तथव च ।
नन्दाथ ललिता तद्वत्तीर्थ मायापुरी शुभा ॥१०
तथा मित्रपद नाम तत केदारमुत्तमम् ।
गङ्गासागरमित्याहु सर्वतीयमय शुभम् ॥११
तीर्थ ब्रह्मसरस्तद्वच्छतद् सलिले ह्नदे।
तीर्थ-तु नंमिप नाम सवतीर्थफ्लप्रदम् ।।१२
गगोद्भदस्नु गोमत्या यनोभूत सनातन ।
तथा यज्ञवराहस्तु देवदवश्च शूलभूत् ॥१३
यत्र तत्ताञ्चन द्वारमप्टादशभुजोहर ।
नमिस्तु हरिचनस्य शीर्णा यत्रामवत्पुरा ।।१४

मत्स्य पुराण उसी भांति पितृगणों का अत्यन्त प्रिय और परम पुण्यमय विमले- स्वर है तथा पितृतीय प्रयाग तो समस्त कामनाओ के फलो का प्रदान करने वाला है ।।८। वटेश्वर भगवान् माधव से समन्वित है उसी भांति से याग निद्रा मे शयन करने वाले केशव वहा पर सदा ही निवास किया करते है ॥६ । दशाश्वमेधिक परम पुण्यशील है और उसी तरह से गङ्गा द्वार है। उसी रीति से नन्दा और ललिता एव अतीव शुभ माया पुगे तीय है ॥१०॥ तथा मिनपद नाम वाला और उससे मागे अत्युत्तम केदार तोय है । गङ्गा सागर जिसको कहा करते हैं वह तो सभी तीयों से परि- पूण शुभ है ।।११।। ब्रह्ममर एक महान् नार्थ है और शतद् सलिल वाले हृद मे नमिष नाम वाला तीर्य है ओ सभी मनोरथो को पूर्ण करने वाला और सम्पूण तीर्थों के पल को प्रदान करने वाला है ॥१२॥ गोमती मे गनोदभेद है जहा पर सनातन उद्भूत हए हैं । तथा यज्ञ वराह पोर देवो के भी दव शू मृत् प्रभु हैं ।।१३॥ जहां पर वह काञ्चन द्वार है और अठ रह भुजाओं वाल भगवान हर हैं । जहाँ पर प्राचानी काल मे भगवान हरि क गुदर्शन चक्र की नेमि शीणं हा गयी थी॥१४॥ तदेतन्नमिषारण्य सवंतीर्थनिषेवितम् । देवदवस्य तत्रापि वाराहम्य तु दशनम् ॥१५ य प्रयाति म पूतात्मा नारायणपद प्रजेत् । वृतशीच महापुण्य सर्वापानिपूदनम् ॥१६ यत्रारते नारमिहन्तु स्वयमेव जनादन । तीमिक्षमता नाम पितृ णा वरलभ सदा ॥९७ मङ्गमे यत्र तिप्रति गङ्गाया पितर. सदा। पुरुक्षेत्र माप मवंतीर्थममचितम् ॥15 तथा र सरयू पुण्या रावयनमस्ता। इगवती नदा तटन् पितृतीर्थाधिवासिनी ।।११ यता देरिया वाली चन्द्रभागा पद्धती।

पाद्धयोग्यतीर्थाना वर्णन १२१ नदी वेणुमती पुण्या परा वेदवती तथा॥२० पितृ णा वल्लभा ह्य ताः श्राद्ध कोटिगुणा मताः । जम्बूमार्ग महापुण्यं यत्न मार्गोहिलक्ष्यते ॥२१ वह ही यह न मिपारण्य हैं जिसको सभी तीर्थों ने समागत होकर निषेवित किया है । वहा पर भी देवों के भी देव वराह भगवान के दर्शन होते हैं ॥१॥ जो भी कोई वहा पर नाश करता है वह परम पूत आत्मा वाला होकर फिर भगवान् नारायण के ही पद को चला जाया करता है । यह शौच कर देने वाला, महान् पुण्य से युक्त और समस्त प्रकार के पापो का हनन कर देने वाला तीर्थ है ॥१६॥ जहा पर स्वय साक्षात् नार सिंह जनार्दन भगवान् विराजमान रहा करते हैं। एक भिक्षु- मती नाम वाला तीर्थ है जो सदा ही पितृगणो का परम वल्लभ है ॥१७॥ जहाँ पर भागीरथी गङ्गा के सङ्गम मे पितर गण सदा ही समवस्थित रहा करते हैं। कुरुक्षेत्र महान् पुष्पशाली तीर्थ है जो सम्पूर्ण तोर्यों से सयुत रहा करता है।।१८उसी प्रकार से सरयू नाम वाली सरिता अतीव पुण्यशालिनी है जिसको समस्त पगण नमस्कार किया करते हैं । उसो भांति इरावती नाम वाली नदी है जो पितृ तीयों की अधिवासिनी है ॥ १६ ॥ यमुना-देविका-काली-चन्द्रभागा-दृपद्वती-पुमती नदी तथा परम पुण्यमपी वेत्रवती नदी ये सभी सरितायें पितृगणो की अतीव प्यारी हैं और पाद में करोडो गुण वाली मानी गयो हैं। जम्बूमागं महान पुष्य- शाली है जहां पर मार्ग दिखलाई दिया करता है ।।२०,२१ ॥ अद्यापि पितृतीर्थं तत्सर्वकामफलप्रदम् । नोलकुण्डमितिख्यात पितृतीयं द्विजोत्तमा । १२२ तथा रुद्रसर. पुण्य सरामानसमेव च । मन्दाकिनी तथाच्छोदा विपाशाथ सरस्वती।।२३ पूर्वमित्रपदन्तद्वद्वद्यनाथ महाफलम् । शिप्रा नदी मह कालस्तथाकालजर शुभम् ।।२४ १२२ मत्स्यपुराण वंशोद्भद हरोफ़ेदं गङ्गोद्भदं महाफलम् । भद्रेश्वरं विष्णुपद नमदाद्वारमेव च ।।२५ गयापिण्डप्रदानेन समान्याहुमहर्षयः । एतानि पितृतीर्थानि सर्वपापहराणि च ॥२६ स्मरणादपि लोकाना किमु श्राद्धकृतानृणाम् । ओङ्कारपितृतीर्थञ्चकावेरीकपिलोदकम् ।।२७ सम्भेदश्चण्डवेगायास्तथैवामरकण्टकम् । कुरक्षेत्राच्छतगुण तस्मिन् स्नानादिक भवेत् ॥२८ उत्तम द्विजगणो ! अाज भी वह पितृतीर्थ है जो सभी मनोरथो के फलो को प्रदान करने वाला है। वह पितुतीय नीलकुन्ड इस शुभ नाम से विख्यात है ।। २२॥ उमी तरह से रुद्रसर पुन्यमय है और मान- सरोवर भी महान् पुण्ययुक्त है । मन्दाकिनी-अच्छोदा-विपाश -सरस्वती ये सभी सरिताये महान् पुग्यशालिनी हैं ॥२३॥ उसी प्राप्ति पूर्व मे मित्र पद है और वेद्यनाथ तीर्थ महान् फल देने वाला है । भद्रेश्वर- विष्णुपद-नर्मदा द्वार -क्षिप्रा नदी महाकाल तथा परम शुभ कालजर वागोभेद-हरोभेद और गङ्गोभेद महान् फल प्रदान करने वाले सभी पुण्य तीर्थ एव स्थल हैं ।।२४, २५|| इन सभी तीर्थों को महर्षि- गण गयातीर्थ मे पिण्ड प्रदान करने के समान ही कहा करते हैं। ये सभी पिततीय हैं और समस्त प्रकार के पापो का सहरण करने वाले है ॥२६॥ इन उपर्युक्त सभी तीर्थों की ऐसी महिमा है कि इनके केवल स्मरण मात्र से ही सब पाप नष्ट हो जाया करते हैं और जो लोग इनमे जाकर श्राद्ध किया करते हैं उनके पुण्य-पल के विषय मे तो कहा ही क्या जाये । मोटार पित्तीर्थ है और विरो-पिलोदक-चण्डवेगा पा सम्भेद तथा अमर कन्ट : ऐसा महान् तीथं है उसमे स्नानादिक I पल कुरुक्षेत्र से भी मौ गुना अधिक हुआ करता है ॥२७॥ गुक्रतीर्थच विख्यातं तो सोमेश्वर परम् ।

यादयोग्यनीना वर्णन सवव्याधिहर पुष्य नतोटिफनाधिनम् IIPE श्राद्ध दाने तया हामे बाध्याये जलमन्निधौ । कामपोत्ग नाम तया चर्मपनानती ॥३. गामती वस्णा तद्वत्तीर्थमाशनसम्परम् । भैरव मृगुतुङ्गश्च गौरीतीर्थमम् ॥३१ तीर्थ वनायक नाम भद्रेश्वरमत परम् । तथा पापहर नाम पुण्याथ तपतो नदी ॥३२ मूलनापीपयोप्सी च पयाणामङ्गमस्तया । महावारिपाटलाच नागतीथमतिका तयावेणा नदी पुण्या महागाल तथैव च । महारद्र महालिङ्ग दशार्णा च नदी शुभा ॥३४ शतदा शताता च तथा विश्वपद परम् । अङ्गारवाहिता तद्वन्नदो तो शोणपपरी ॥३५ शुक्र तीर्थ परम विन्यात है तथा सोमेश्वर भी परमोत्तम तीर्थ है को ममी व्याधियों के हरण करने वाला तथा महान पुण्य गाली और शत- कोटि फलों स भी अधिक फल प्रदान करन वाला है राधाद करन म-दान देने मे-होम कम करन में- स्वापाय परन म तया देवल जल की समिति म हो निदास करन म मनीव अधिक पुण्य फल होता । एक कायावराहण नाम वाला तीर्थ है तपा चमवती नही है उसी मानि गोमती एव वरुणा नदी महान् तीय है। उसी नाति औशनस परम तीर्थ है । भैरव मृगुतुङ्ग और गोरी तीय सर्वोत्तम तीर्थ है ॥३०, ३१॥ एक बनायक नाम वाला वीर्य है और इसमे भी परे भद्रेश्वर तीर्थ है तथा पापहर तीपं है। एव परम पुण्यमयी तपती नाम वालो नदी है ॥३२॥ मूलतापी-पयोणी तया पयोष्णी सङ्गम-महाबोधि-पाटला-नागतीर्थ- अवन्तिका तथा पुन्य मयो वष्ण नदी-महाशाल-महारुद्र-महालिङ्ग-तथा शाणा गरम शुभ मुरिता है । शतद्धा-शवाल-परम विश्वपद-अगर

१६४
मत्यपुराण
वाहिका और इसी प्रकार से शोण और पर ये दो परम विशाल पुन्य
शाली नद हैं । ये सभी अत्युत्तम सोपं स्थल हैं ||३३, ३४, ३५!
कालिवा च नदो पुण्या वितस्ता च नदी तया।
एतानि पितृतार्थानि शस्यन्ते स्नानदानयोः ॥३६
श्राद्धमेतेपु यद्दत्तन्तदनन्तपल स्मृताम् ।
द्रोणी वाटनदी धारासरित् क्षीरनदी तथा ॥३७
गोकर्ण गजकर्णञ्च तथा च पुरुपोत्तम ।
द्वारका कृष्णतीर्थन्च तथाबु'दसरस्वती ॥३८
नदी मणिमती नाम तथा च गिरिकणिका ।
धूतपाप तथा तीर्थ समुद्रो दक्षिणस्तथा ॥३६
एतेषु पितृतीर्थेषु श्राद्धमानन्त्यमशुते ।
तीर्थ मेघकर नाम स्वयमेव जनार्दन ॥४
यत्र शाङ्गधरो विष्णुमखलायामवस्थित ।
तथा मन्दोदरी तीर्थ तीर्थ चम्पा नदी शुभा ॥४१
तथा सामलनाथश्च महाशालनदी तथा ।
चक्रवाक चर्मकोट तथा जन्मेश्वर महत् ॥४२
वालिका नदी परम पुण्य शालिनी है तथा वितम्ता नाम धारिणी
नदी है । ये सब जो यहा तक बनाये गय हैं पितृ तीथ कहलाते हैं और
ये सभी स्नान तथा दान करन म अधिक प्रशस्त माने गये हैं {१३६।। इन
उक्त तीर्थों में जो भी कोई श्राद्ध दिया जाता है वह अनन्त फलो का
प्रदान करने वाला हुआ करता है ऐसा ही बताया गया है। इनके भी
अतिरिका और भी महान् तीर्थ हैं-द्रोगी-वाट नदी-धाय सरित्-क्षीर
नदी-गोकर्ण-गजकर्ण-पुरुषोत्तम-द्वारका- कृष्णा तीर्थ-प्रबुद सरस्वती-
मणिमती नदी-गिरिपम्पिका-धूनपाप नाम वाला तीर्थ तथा दक्षिण
समुद्र ये सभी महा महिमा मय तीथ हैं, इनमे जो कि पितृतीर्ण हैं जो भी
श्रद्ध दिया जाता है उसकी अनन्त फर शालिता हो जाया करती है ।

यादयोग्यतीर्याना वर्णन
१२५
एक मेध कर नामक तीर्य है जहां पर साक्षात् भगवान् जनार्दन स्दय ही
विराजमान रहा परते हैं ।।३७,३८, ३६, ४० जिस पुण्य मय क्षेत्र मे
शाङ्ग धनुय को धारण करने वाले भगवान् विष्णु उमको मेबला में
समनम्थित रहा करते हैं । उसी प्रकार से एक मन्दोदरी नाम वाला तीर्थ
है और दूसरा चम्पा नाम वाली परम शुभ नदी है जो एक तीर्थ स्थल
है ॥४१॥ उसी तरह से सामल नाय और महा शाल नदो है । चक्रवाक,
धर्म कोट और महान् तोयं जन्मेश्वर नाम वाला है ।।१२॥
अर्जुन त्रिपुर चैव सिद्ध श्वरमतःपरम् ।
श्रीशल शादूर तीर्थ नारसिंहमतः परम् ॥४३
महेन्द्रञ्च तथा पुण्यमय श्रीरङ्गसज्ञितम् ।
एतेष्वपि सदा श्राद्धमनन्तफलद स्मृतम् ।।४४
दशनादपि चैतानि सद्यः पापहराणि वै ।
तुङ्गभद्रा नदी पुण्या तथा भीमरथी सरित् ॥४५
भीमेश्वरं कृष्णवेणा कावेरी कुड्मलानदी।
नदो गोदावरों नाम त्रिसन्ध्यातीर्थमुत्तमम् ॥४६
तीर्थ होयम्बकं नाम सर्वतीर्थ नमस्कृतम् ।
यत्रास्ते भगवानीशः स्वयमेव त्रिलोचनः ॥४७
श्रादमेतेषु सर्वेपु कोटि कोटिगुण भवेत् ।
स्मर-दप पापानि नश्यन्ति शतधा द्विजः ॥४
श्रीपर्णी ताम्रपर्णी च जयातीर्थमनुत्तमम् ।
तथा मत्स्यनदी पुण्या शिवधारं तथैव च ॥४६
अर्जुन-निपुर-इससे भी परे मिद्धेश्वर-श्रीशैलशाङ्कर तीर्य और
इस्से पर नार सिंह नामक तीर्थ है ॥४३।। उसो भानि पुष्प शाली महेन्द्र
और श्रीरङ्ग नाम वाले तीथं हैं। इन तीर्यों में भी दिया हुआ थाद्ध
अनन्न पलो में प्रदान करने वाला हा करता है। श्राद्ध स्नान बादि के
द्वारा होने वाले पुण्य के विषय में तो कहा ही क्या जावे ये तो ऐसे महान

१२६ मत्स्यपुराण प्रभाव शाली तीय है कि इनो केवल दशन मात्र स ही तुरन्त सब पापो का हरण हो जाया करता है । तुगभद्रा पुन्यमयी नदी है तथा भीमरथी नाम वाली सरित है-भीमेश्वर-कृष्ण वेणा-यावरी-युडमला नदो- गोदावरी सरिता और उत्तम विमन्ध्या नाम वाला तीय है। यम्बक नामधारी तीथ सभी तीर्थों के द्वारा बन्धमान होता है जहा पर भगवान ईश स्वय ही साक्षात् त्रिलोचन प्रभु विराजमान रहा करते हैं। इन उप- रिकथित समस्त तीर्थों मे किया या दिया हुआ श्राद्ध कराडो-करोडो गुणों वाला हुआ करता है । हे द्विज गण | इन तीर्थों को तो ऐमी विलक्षण महिमा है कि इनक वे वल स्मरण मात्र से ही पाप शतधा हरण हो जाया करत हैं। श्रीपर्णी-ताम्रपर्णी -उत्तमजगा तीथ -पु-यमयी मत्स्य नदी और शिवधार ये भो महान् तीथ हैं ॥ ४४ ॥ ४५ ।। ४६ ॥ ४७ ।। ४८ 11 ४६॥ भद्रतीर्थञ्च विख्यात पम्पातीर्थञ्च शाश्वतम् । पुण्य रामेश्वर तद्वदेलापुरमल पुरम् ॥५० अङ्गभूतञ्च विख्यातमानन्दकमल वुधम् । आम्रातकेश्वर तद्वदेकाम्भकमत परम् ।।५१ गोवधन हरिश्चन्द्र कृपुचन्द्र पृथूदकम् । सहस्राक्ष हिरण्याक्ष तथा च दिली नदी ॥५० रामाधिवासस्तनापि त । सौमित्रिसङ्गम । इन्द्रकील महानादन्तथा च प्रियमेलकम् ।।५३ एतान्यपि सदा थाढे प्रशस्तान्यधिकानि तु। एतेषु सर्वदेवाना सान्निध्य दृश्यते यत ॥५४ दानमेतेषु सर्वेषु दत्त कोटिशताधिकम् । बाहृदा च नदी पुण्या तथा सिद्धवन शुभम् ।।५५ तीर्थ पाशुपत नाम नदी पार्वतिका शुभा। श्राद्धमेतेषु सर्वेषु दरा कोटिशतोत्तरम् ॥५६ श्राद्धयाग्यनीना वर्णन १२७ - भद्र तीथ परम विस्त तार्य है तथा शाश्वत पम्पा तीर्थ है- परम पुन्यमय रामेश्वर है और उसी भांति एलापुर नाम वाला परमोत्तम पुर है-अङ्गभूत विस्याद वाथ है---आनन्द कमल-दुध-मामात- कश्वर-~इसक आगे एकाम्भक तीर्थ है ।।५९, ५१॥ गोवर्द्धन-हरिश्चन्द्र - कृयुचन्द्र-यूदक-सहस्राक्ष-हिरण्याक्ष-कदली नदी-वही पर गमाधिवास है तथा सौमित्रि सङ्गम नाम वाला तीर्य है। इन्द्रकील- महानाद- प्रिय मेलक नाम वाले तीर्य है ।।५२।। ये सभी तीर्थ सदा श्राद्ध देने के लिये परम अधिक प्रशस्त माने गये हैं। एक बाहुदा नाम वाली अति पुन्य मयी नदी है तथा परम शुम सिद्ध वन नाम वाला तीर्थ है ॥५३, ५४॥ एक पाशुपन नाम वाला तोय है तथा परम शुभ पार्वत्रिका नाम धारिणी नदी है—-इन तीर्थों में दिया हुआ श्राद्ध कोटिशत से भी अधिक पुन्य-फल के प्रनान करने वाला हुआ करता है ॥५५, ५६॥ तर्थ व पितृतीर्थ न्तु यत्र गोदावरी नदी। युतालिङ्गसहस्रण सर्वान्तरजलावहा ॥५७ जामदग्न्यस्य तत्तीय प्रमादायातमुत्तमम् । प्रतोरस्य भयाद्भिन्न यन्त्र गोदावरी नदी ।।५८ तत्तीय हव्यकव्यानामप्सरोयुगसशितम् । थाद्धाग्निकार्यदानेषु तया कोटिशताधिकम् ॥५E तथा सहस्रलिङ्गञ्च राघवेश्वरमुत्तमम् । सेन्द्रफेना नदी पुण्या यनेन्द्रः पतितः पुरा ॥६० निहत्य नमुचि शस्त सा स्वर्गमाप्तवान् । तन दत्त नरं श्राद्धमनन्तफलद भवेत् ।।६१ तीर्थ न्तु पुष्कर नाम शालग्राम लय व च। सामपानञ्च विप्यात यन वैश्वानरालयम् ॥६२ तीय सारस्वत नाम स्वामितीयं तय व च। मलन्दरानदी पुण्या कौशिकोचन्द्रिका तथा । ६३ १२८ मरम्पपुरन उसी भांति वह पितृ तीर्थ है जहां पर गोदावरी नदी है जो सहस्र लिङ्गो से सयुत सर्वान्तर जलावहा है ॥५७॥ वह महर्षि जामदाय का तीर्थ है जो अत्युत्तम है और प्रम से समायान हुआ है। प्रतीक के भय से भिन्न है जहा पर गादावरी नदी है ।।५८|| वह तीर्थ हव्य और कव्यो का है जो अप्सरो युग को सजा वाला है । यह श्राद-अग्नि काय्य और दानो के देने मे संबडो करोड अधिक पल देने वाला है ।।५।। उसी भाँति सहस्र लिङ्ग- उत्तम राघवेश्वर-पुन्य पालिनी सेन्द्रपेना नदी है जिस स्थल पर प्रानीन कान मे इन्द्र पतित हो गया था। इन्द्र ने नभुचि का निहनन करके फिर घोर तपश्चर्या की थी जिसके प्रभाव से उसने स्वर्ग को प्राप्त किया था। वहां पर मानवो पे द्वारा दिया हुआ श्राद्ध अनन्त फल का प्रदान करने वाला हुआ करता है ।।६०, ६१॥ पुष्कर नाम वाला तीर्थ है और उसी तरह से शालग्राम तीर्थ है। सोम- पान तीर्थ भी परम विख्यात तीथ है जहा पर व वानर का आलय है । एक सारस्वत नाम वाला तीर्थ है तथा वही पर कौशिकी और चन्द्रिका नामो वाली भी दो नदियाँ हैं जा कि महन् तार्य हैं ॥१२, ६३॥ वैदर्भावाथ वैरा च पयोष्णी प्राइमखापरा । कावेरी चोत्तरापण्या तथाजालन्धरोगिरि ॥६४ एतेषु श्राद्धतीर्थपु श्रासमानन्त्यमश्रते । लोहदण्ड तथा तीर्थ चित्रकूटस्तथ व च ।।६५ विन्ध्ययोगश्च गङ्गायास्तथी नदीतट शुभम् । कुब्जाम्रन्तु तथा तीथ उवशी पुलिनतथा ।।६६ संसारमोचन तीर्थ तथैव ऋणमोचनम् । एतेषु पितृतीर्थेपु श्राद्धमानन्त्यमधु ते ॥६७ अट्टहास तथा तीर्थ गौतमेश्वपमेव च । तथा वशिष्ठ तीर्थन्तु हारित तु तत परम् ।।६८ ब्रह्मावर्त कुशावत हयतीर्थ तथव च । पिण्डारवञ्च विख्यात शसोद्धार तथं व च ॥६६

यादयोग्यतीना वर्णन
१२६
घण्टेश्व विल्वाञ्च नीलपवंतमेव च।
तथा च घरणीती रामतीर्य तथव च ॥
इनके अतिरिक्त वैदर्भावरा-पोप्यो-प्राहमखापप-कादेरी-उत्तरा
दुमा नदियां भी परम पुधमय तीथं म्दस्या है तथा जालन्धर नायक
वहीं पर एक गिरि है ।।६४॥ ये सभी घार देने वाले वीप हैं जिनमें
दिया हुआ प्राद अनन्तता के पल दाला हो जाया करता है। लोहदन्ड
नान दालों तीर्थ है तया चित्ररट तो है ॥शा दिल्य योग और
गङ्गा का भुभ नदी वट है । एक कुम्बाम्र तोयं है और वगी पुलिन
वीर्य है। संसार मोचन और ग मोचन नाम वाले भी तीर्य इन
पितृ तीयों में दिया हुआ बाद पाखरे करने वाले मानव को अनन्त फलों
का भोग कराया करता है ॥६६, ६॥ महान वीर्य है मौतनवर
तोर्य है। एक वरिष्ठ नानक वो है मोर इच बागे हारित नाम दाना
तौर्य है। ब्रह्मावत-कुशादत्त-हयाय-दिन्यात मिडाक ठी
ठया जोहार मन्टेश्वर-दिल्यदक-नील पर्वत--धरपी ती या
रानडीयं चै ममी पितृतीय हैं जिनमें प्राद्ध दादा प्राद देकर परसाद की
प्राप्ति किया करते हैं ॥६,६,७०"
अश्वतीर्थञ्च विख्यातमनन्त प्राद्घदानयोः ।
तीय वेदधिरो नाम तवौघवती नदी ॥७१
तीर्य वमुप्रदं नाम छागलाई तयव च।
एतेषु श्राददातार प्रयान्ति परम पदम् I
तथा च ददरीतीयं गणतीयं तव च।
जयन्त विजयवंच शुक्रतोय तयंव च
यीपतेश्च तथा तीय"तो" रंवतकं तया ।
तथव शारदातोयं भद्रकालेश्वरं तथा ४
वतीयच पर भीमेश्वरमयापि वा।
एतेपु याददातार प्रयान्ति परमा गतिम् ॥

१३० मत्स्यपुराण सीथं मातृगृह नाम करवीरपुर तथा । कुशेशरञ्च विख्यात गौरीशिखरमेव च ॥७६ नकुलेशस्य तीर्थञ्च कदमाल तथैव च। दिण्डिपुण्यकरं तद्वत् पुण्डरीकपूर तथा ॥७७ श्राद्ध पोर दान-इन दोनो ही के लिये अश्व तीर्थ परम विख्यात । एक वेदशिर नाम वाला तोर्थ है और शोधवती नदी है। वसुप्रद तीर्थ है और उसी तरह से एक छागलाण्ड नामक तीर्थ है । इन तीर्थों में श्राद्ध दाता लोग परमोत्तम पद को प्राप्त किया करते हैं ।।७१,७२१॥ बदरी तीर्थ-गण तोय -जयन्त-विजय-शुक्र तीर्थ-श्रीपति का तीर्थ- रैवतक तोप-शारदा तीर्थ-भद्रकालेश्वर--बैकुन्ठ तीर्थ- भीमेश्वर तीय ये सभी तीर्थ पितृ तीय' हैं और इन तीथों मे पहुंच कर श्राद्धो के देने वाले मानव परम गति की प्राप्ति का लाभ लिया करते है ।।७३, ७४॥ मातृगृह नाम वाला तीर्थ-करवीरपुर-कुशेशर-विख्यात गौरी शिखर नाम का तीर्थ -ननुलेश का तीर्थ-कदमाल--दिण्डि पुयकर और पु.धरीक पुरनाम वाला तीर्य है।।७५,७६, ७७॥ सप्त गोदावरी तीर्थ सर्वतीर्थेश्वरम् । तम श्राद्ध प्रदातव्यमनन्तफलमीप्सुभिः ॥७८ एपदंशतः प्रोक्तस्तीर्थाना सग्रहोमया । वागीशोऽपिनशक्रोतिविस्तरान् किमुमानुप. १७६ सत्य तीर्थ दया तीथ तीर्थ मिन्द्रियनिग्रहः । वर्णाश्रमाणा गेहेऽपि तीर्थन्तु समुदाहृतम् ।।८० तएत्तीर्थपु यच्छाद्ध तस्कोटिगुणमिप्यते । यस्मात्तस्मात् प्रयत्नेन सोय श्राद्ध समाचरेत् ॥८१ प्रातः कालोमुहूर्तास्त्रिीन् सङ्गवस्तावदेव तु । मान्याह्नस्त्रिमुहतस्यादपराहणस्ततः परम् ।।८२ सापानस्त्रिमुहूतः स्पाच्छा तमनकारयेत् ।

पाद्धयोग्यतीर्थाना वर्णन १२१ ३ १ राक्षसी नामसा वेला गहिता सर्वकर्मसु ।।२३ अनी मुहूर्तो विख्याता दश पञ्च च सर्वदा । तत्राष्टमो मुहूर्ताय सकाल कुतपः स्मृत ॥८४ सप्त गोदावरी तीर्थ समस्त तीथों का ईश्वर तीर्थ है । जो थाद्ध के देने के अनन्त फल प्राप्त करने के इच्छुक मनुष्य है उनको वहा पर श्राद्ध अवश्य ही देना चाहिये ॥७॥ यह श्राद के उद्देश्य को लेकर हमने तीर्थों का एक संग्रह आप लोगो के समक्ष म कह दिया है। इन समस्त तीर्थों का विस्तार तो बहुत ही विशाल है जिसको विचारे मानव को तो शक्ति ही क्या है वृहस्पति भी नहीं कह सकते हैं जो वाणी के ईश कहे जाते हैं । ७६।। वस्तुत. विचार किया जावे तो सत्य का पूर्ण परि- पालन करना भी तोर्थ है-प्राणिमात्र पर दया करना भी एक प्रकार का महान् तीर्थ है तथा अपनी सब इन्द्रियों पर पूर्ण निग्रह रखना भी तीर्थ है। वो और माश्रमो का गेह में भी इस प्रकार से ती विद्यमान हैं को समुदाहृत किये गये हैं। इन तीर्थों में जो भी याद दिया जाता है उसका करोड गुना फल हुअा करता है। अतएव जिस-तिस प्रयत्ल से तीर्थ में अवश्य ही मनुष्य को याद्ध देना चाहिए ।।७६, ८०॥ प्रात वाल में तीन मुहूर्त तक उतना हो सङ्गव होता है। फिर मध्याह्न मे तीन मुहूतों वाला होता है उसके पश्चात् आराह्न होता है । सापाटन मे तीन मुहूर्त वाला है उसमे याद कभी नही करना चाहिये । यह राक्षसी नाम वाली बेला हुआ करती है जो सभी को मे हित मानी गयो है । सर्वदा दिन के मुहूर्त' को दश और पांच घडियाँ विख्यात है। सनमें मो अष्टम मुहूरी होता है उसी काल को युतुप काल कहा गया है ।।८१, २, ८३, ८४|| मध्याहले सर्वदा यस्मान्मन्दोभवति भास्करः। तस्मादनन्तफलदस्तदारम्भी भविष्यति ॥८५ मध्याहनखड्ग पाश्रञ्च तथा नेपालकम्बल ।

१३२
मत्स्य-पुराण
रूप्यं दर्भास्तिला गातो दौहित्रश्चाष्टम. स्मृतः॥८६
पाप कुत्सितमित्याहुस्तस्य सन्तापकारिणः ।
अष्टावेतेयतस्तस्मात् कुतपाइति विश्रुता ॥८७
ऊध्वं मुहूर्तात् कुतपाद्यन्महूर्तचतुष्टयम् ।
मुहूतपञ्चकञ्चतत्स्वधाभवन मिष्यते ।।८
विष्णोदेहसमुद्भूता कुशाः कृष्णास्तिलास्तथा ।
श्राद्धस्य रक्षणायालमेतत् प्राहुदिवौकस.स
तिलोदकालिय जलस्ोस्तीर्थवासिभिः।
सदर्भहस्तेनैकेन श्राद्धमेव विशिष्यते ॥६०
श्राद्धसाधनकाले तु पाणिनकेन दीयते ।
तर्पणन्तू भयेनैव विधिरेप सदा स्मृत. ॥६१
अत. मध्याह्न काल मे सर्वदा जिस समय मे भगवान् भास्कर
मन्दीभूत हो जाया करत हैं। उस काल मे थाद्ध दिया हुआ अनन्त
पल देने वाला होता है तभी उसका आरम्भ होगा || मध्यान
पग-पात्र नेपाल कम्बल-रूप्य-दर्भ-तिल-गोएँ और आठवा दोहित्र
कहा गया है । सन्ताप कारी उसका बुत्सित पाप कहा जाता है । क्योकि
ये आठ है इसी लिये ये कुतुप कहे गये हैं और इसी नाम से विद्युत मी
हैं ।।८६, ८७|| कुतुप मुहूर्त से ऊध्वं में जो चार मुहूर्त हैं इस तरह से
यह मुहूरी पञ्चर स्वधा का भवन अभीष्ट हुआ करता है | कुश
और कृष्ण तिस पे भगवान् विष्णु ये देह से ही समुद्भूत हुए हैं ये थाट
की रक्षा करने के लिये समयं होते हैं-ऐसा देवगण ने कहा है |
तिलों से युक्त जस की अमरि जल में स्थित हुए तीय वासियों को
देनी चाहिए। दर्भ सहित एष हाप से परे। इस प्रकार से पार
विशेषता वाला होता है ।।६०॥ श्राद के साधन बास में एक ही हाप
मे दिया जाता है। तर्पण होता है भय ही से होता है। सदा यह
निधि पदी गयी है ॥६॥

पुण्यं पविवमायुष्यं सर्वपापविनाशनम् । पुरा मत्स्येन कथितन्ती श्राद्धानुकीर्तनम् ॥ मृणोति यः पठेद्वापि श्रीमान सन्मायते नरः ॥२॥ यादकालेच वक्तव्य तथा तीर्थ निवासिमिः। सर्वपापोपशान्त्यर्थ मलक्ष्मीनाशनं परम् ॥३ इदं पवित्र यशसो निधानमिदं महापापहरञ्च पुमान। ब्रह्माकंरुदैरपि पूजितच श्रादस्य माहात्म्यमुन्ति 1411 मपि मृतजी ने कहा-इन तीपों में श्राद्ध कर उन प्राचीन काल में मत्स्य भगवान ने कहा था। परन्तु की वर्धन करने वाला और सब प्रकार म्हाद चन्द का विनाश करने वाला है। जो इम तोयं याद कर लिया करता है अथवा इसको पढता है वह मदृष्ट प्रदान ग्रहण किया करता है ॥३२॥ श्राद के मन्य निकी मे बोलना चाहिये । यह सदं पापों के टापटि अप नाश करने वाला होता है ॥६३|| यह दीदार है और पुरंपों के माद पापों का महासकारण महा-अ और रुद्र के द्वारा महिना. पुरुष इस बाद के माहात्म्य की 18 १३४ मत्स्यपुराण ताभि सखीभि सहिता. सर्वाभिमुदिता भृशम् । बीडन्त्योऽभिग्ता सर्वा पित्यो मधु माधवम् ॥३ खादन्त्यो विविधान् भक्ष्यान् फलानि विविधानि च । पुनश्च नाहुपो राजा मुगलिप्सुयंद्वन्छया ॥ तमेव देश सप्राप्तो जललिप्सु. प्रतपितः । ददर्श देवयानीञ्च शमिष्ठान्ताश्च योपित ॥५ पिबन्त्यो ललनास्ताश्च दिव्याभरणभूपिताः । उपविष्टाञ्चदद्वशेदेवयानीशुचिस्मिताम् ॥६ रूपेणाप्रतिमा तामा स्त्रीणामध्येवराननाम् । शर्मिष्ठयासेव्यमानापादसम्वाहनादिभि. ॥७ शौनक मुनि ने कहा-हे नृपोत्तम । इसके अनन्तर बहुत लम्बे समय के बाद वर वणिनी वह देवयानी उसी वन में क्रीडा बिहार करने के लिये निकल कर गयी थी ।।१। उस समय मे एक सहस्र दासी और शमिष्ठा के साथ उसी देश मे वह सम्प्राप्त हुई थी और उसने इच्छा के अनुपार वहा पर विचरण किया या ||२| उन्ही सब सखिगो के साथ अत्यन्त ही मुदिन थी। सब क्रीडा करती हुई अभिरत थी तथा माधव मधु का पान कर रही थीं। अनेक प्रकार के भक्ष्यो को खा रही थी तथा नाना भाँति के फलो का अशन करती जारही थीं। पुन मृगया को इच्छा रखने वाला नाहुष राजा यद्वच्छा से उसी देश में सम्प्राप्त हो गया था। वह गजा ल की लिप्सा रखने वाला और प्रत्याधिक प्यासा था। उसने देवयानी को तथा शमिष्टान्स अन्य सभी योपितो को वहां पर देखा था । ॥३, ४, ५॥ वे सभी ललनाऐं दिव्य आभरणो से विभूषित थी और पान कर रही थी। वही पर उसने शुचि स्मित वाली उपदिष्ट देवयानी को भी देखा था ॥६॥ वह देवयानी उन समस्त ललनामों के मध्य में विराजमान रूप लावण्य से अनुपम और परम सुन्दर एव श्रेष्ठ मुख वाली थी शर्मिष्ठा के द्वारा वह सेग्यमान थी जो कि देवयानी क पाने का सम्वाहन आदि कर रही थी। -

ययाति चरित्र
द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यांद्व कन्येपरिवारिते।
गोकनामनोचवद्वयोः पृच्छाम्यतोह्यहम् ।।८
आख्यास्याम्यहमादास्ववचन मेनराधिपः ।
शुकोनाम,सुरगुरः सुताजानीहितस्यमाम् ॥E
इयं च मे सखी दासी यत्राह तत्र गामिनी ।
दुहितादानवेन्द्रस्यशर्मिष्ठावृषपर्वणः ।।१०
कथ तु ते सग्यो दासी कन्येय वरवर्णिनी ।
असुरेन्द्रसुता सुZ ! पर कौतूहल हि मे ॥११
सवमेव नरव्याघ्र विधानमनुवत्तंते ।
विधिना विहितं ज्ञात्वा माविवित्रमन कृथाः ॥१२
राजवटू पवेषो ते ब्राह्मी वाचं विपि च ।
किं नामा त्व कुतश्चासिकस्यपुत्रश्चशंसमे ॥१३
ब्रह्मचर्येण वेदो मै कृतस्नः श्रुतिपथ गतः ।
राजाहं राजपुत्रश्च ययातिरितिविश्रुतः ।।१४
राजा ययाति ने कहा- ये दो सहस्त्र कन्यामो के द्वारा को
कन्याएं परिवारित है। अतएव मैं बाप दोनो के गोत्र और नाम पूछता
हूं 14|| देवयानी ने कहा-हे नराधिप ! मैं अब कहती हूं, आप मेरे
धचन को ग्रहण कीजिए। शुक्राचार्य नाम वाले असुरों के गुरु हैं उन्ही
को पुभी मुझको आप बानिय ॥६॥ यह मेरी सती दासी है। जहा पर
मी में जाती हूं वहीं पर यह भी मेरे ही साथ में गमन करने वाली होनी
है। यह तो दानवेन्द्र वृषपर्वा की दुहिता गर्मिष्ठा है ।।१०॥ राजा
यपाति ने कहा-यह वरवणिनी कन्या तुम्हारी दासी सखी कैसे।
गई है ? हे सुभ्र! यह तो सुरेन्द्र की सुता है । यह आपकी दासो कैसे
यनगई है ? मेरे हृदय में इस बात का अत्यधिक कौतूहल हो रहा है।
॥२१॥ देवयानी ने कहा-हे नर व्याघ्र ! इस संसार में सभी कुछ
विधाता के द्वारा किये हुए विधान का ही अनुवतन मया करता है ।

१३६ मत्स्यपुराण विधि के द्वारा किये हुए विधान को समझ पर मन में किसी भी प्रकार का कौतूहल मत करिये ॥१२॥ मापका रूप और वेप-मुपा तो एक राजा के ही समान है और जो वाणी बोल रहे हैं वह ब्राह्मी है। आप यह बतलाइये कि आपका शुभ नाम क्या है भोर पाप वहा से आये हैं तथा किसके आप पुत्र हैं ? ॥१३॥ ययाति ने कहा- सम्पूर्ण वेद का अध्यपन मैंने ब्रह्मचर्य या पूर्ण पालन करते हुए किया है--में अवश्य ही एक राजा और रजा का ही पुत्र हु तथा मेरा नाम ययाति-यह विद्युत है ॥१४॥ केन चार्थेन नृपते ! धन देश समागत । जिवृक्षुर्वारि यत्किञ्चिदथका मृगलिप्सया ॥१५ मृगलिप्मुरह भने ! पानीयार्थ मिहागत । बहुधाप्यनुयुक्तोऽस्मि त्वमनुज्ञातुमर्हसि ॥१६ द्वाभ्याकन्यासहस्राभ्यादास्यामिष्ठयासह । स्वदधीनास्मिभद्र तेसखे । भचिमेव ॥१७ विध्यौशनसिभद्रतेनत्वदोऽस्मिभामिनि । अविवाह्या स्मराजानोदेवयानि । पितुस्तव ॥१८ ससृष्ट ब्रह्मणा क्षत्र क्षत्र ब्रह्मणि सश्रितम् । पिश्च ऋपिपुत्र श्च नाहुषाद्यभजस्वमाम् ।।१६ एकदेहोद्भवा वर्णाश्चत्वारोऽपिवरानने। पृथधर्मा पृथक् शोचास्तेपावैब्राह्मणोवरः ।।२० पाणिग्रहो नाहुपाय न पुभिः सेवित. पुरा । त्वमेनमग्रहीदने वृणोमि त्वामह तत. ॥२१ कय तुमेमनस्विन्या-पाणिमन्य.पुमानस्पृशेत् । गृहोतमृपिपुत्रेणस्वयवाप्यषिणात्वया ॥२२ देवयानी ने कहा है राजन् ! यहाँ पर इस देश में किस प्रयो- जन से समागत हुए हैं ? आप क्या कुछ जलपान करने के इच्छुक हैं या पातिचरित्र मृग्या को इन्ठा ने ही इस स्पन पर आपने पदारंप दिया है?॥१५॥ ययाति ने उत्तर दिया है म !में मृा की शिकार को करने का इच्छुक ही है यहां पर तो केवल बल पीने के हो लिये बा मया हूँ। मैं बहुधा अनुयुक्त भी हुआ हूँ। आपको कुछ देवा हो तो आप मुझे अनुना प्रदान कौजिए॥१६॥ देवानी ने कहा- म । आरका परम कल्याण हो- मैं दो महत कन्याओं से युक्त नया दानो गमिष्ठा के महिन प्रब आरके ही अधीन होगई हूँ। अब आर ही मेरे मना हो जाइरे ॥ १३ ॥ राजा यराति ने उनर दिया है नर्गमन आप विधि के उशना अर्यात मुशाचार्य की पुत्री हैं। आपका परम कल्याण हो। मैं आपके पति बनने के योग्य नहीं हूँ। हे देवानि ! अप पिता के यहा राजा लोग विवाह करने के योग्य नहीं हो तरते है॥१०॥ देवयानी ने कहा-ब्रह्मा ने ही सबका सुमन किया है। अन ब्रह्मा के द्वारा क्षत्रिय वर्ग समुष्ट है तथा हा में क्षा समिधित है। ऋषि और ऋपियों के पुत्र सभी तो उन्ही हुए हैं। इसमें कुछ मा भेद-भाव नहीं है। नाप ! मन नाप मुझे स्वीकार कर लीजिए॥१६॥ ययानि ने कहा है वरानने । यह टोर है कि चारों हो व एक ही ब्रह्माजी के देह से समुद्भूत हुए हैं किन्तु यह भी तो है कि ये वर्ष के पद २ धनं-गौच और आचार हुआ करते है और उन मदों में ब्राह्मण वा मर्दथेष्ठ वर्ग होता है ।। २० ॥ देवयानी ने कहा- है नहुर महाराज के पुत्र ! मेरे पानि (हाय ) का प्रहण इस ममय से पूर्व में पिसी भी पुरुष बारा सेवित नहीं हुआ है। मारने ही सबसे प्रागे इसे पहण किया है । इसीलिए मैं तो आरोही परम करती हूं ॥२१॥ अब मनन्दिनी मेरा यह पाणि मि तरह कोई भन्न पुरुष मयं करेगा। पाप के पु ने सपा स्वप नाबाद पि भारन इसको हम दिया है ना है दादाशीविपात्मपरिवलनारसवंतीनुखान् । दुराध्यंतरी विष पुरपेग दिजानना २३ १ मरस्यपुराण कथमाशीविषारसज्ज्विलनात्सर्वतोमुसात् । दुराघपतरोविप्र इत्यात्थ पुरुषर्षभ ।।२४ दशेदाशीविपस्त्येक शरणकरच वध्यते । हन्तिविप्र सराप्ट्राणि पुराण्यपिहिकोषितः ।।२५ दुराधपतरो विप्रस्तस्मात् भीर ! मतोमम । अतो दत्ताञ्चपित्रात्वा भद्रे ! नविवहाम्यहम् ॥२६ दत्ता वहस्व पियामांन्वहिराजन् ! वृतोमया । अयाचतो भयं नास्ति दत्ताञ्चप्रतिगृह्णतः।।२७ राजा ययाति ने कहा -अत्यन्त क्रुद्ध सर्प से तथा सर्वतोमुख अग्नि से भी अधिक विप्र विज्ञान रखने वाले पुरुष के द्वारा दुराधर्षतर हुआ करता है ॥ २३ ॥ देवयानी ने कहा-हे पुरुषो मे परमश्रेष्ठ । आप यह समझाइये कि आशीविष स्पं से और सभी भोर मुख वाले मग्नि से विप्र दुराधर्ष तर कैसे होता है ? ॥ २४ ॥ राजा ययाति ने कहा- आशीविष सर्प तो एक ही किमी का दशन किया करता है पोर वह एक शस्त्र के द्वारा वध किया जाता है। यदि कोई कुपित हो जाता है तो यह राष्ट्रो के सहित समस्त पुरो का दाह कर दिया करता है। विप्र के वचन और शाप मे तो महान् प्रबल शक्ति विद्यमान रहा करती है । है भीरु ! इसी कारण से विप्र अधिक दुराधर्ष मेरे विचार से माना गया है । इसीलिये हे भद्रे ! आपके पिता के द्वारा भी दी हुई आपके साथ मैं विवाह नहीं करता हूँ ॥२५, २६ ।। देवयानी ने कहा-हे राजन् ! आप मेरे पिता के द्वारा प्रदान की हुई मुझे वरण करो क्योकि मैंने तो आपको ही वरण कर लिया है । बिना यावनो किये हुए प्रापको कुछ भी भय नहीं है और दी हुई मुझको आप ग्रहण कीजिए ॥२७॥ त्वरितदेवयान्याथ प्रेपिता पितुरात्मनः । सर्व निवेदयामास धात्री तस्मै यथातथम् ॥

ययाति-चरित्र
१३६
ध्रुत्ववच स राजान दर्शयामास भार्गव ।
दृष्टवेवमागत विप्र ययाति पृथिवीपति ॥२६
ववन्दे ब्राह्मणं काव्य प्राञ्जलि प्रणन स्थित ।
त चाप्यन्यवादकाव्य साम्नापरमवल्गुना ॥३०
राजाय नाहुपस्तात दुगमे पाणिग्रहीत् ।
नमस्ते देहि मामस्मै लोकेनान्य पतिं वृणे ॥३१
वृतोऽनया पतिवार ।
सुतया व ममेष्टया।
गृहाणे मा मया दत्ता महिपी नहुँपात्मज | ॥३२
अधर्मोमा मृशेदव पापमस्याश्चभागव ।
वणसकरताब्रह्मन् । इतित्वा प्रवृणाम्यहम् ।।
अधर्मात् त्वा विमुञ्चामि वर वरय मितम् ।
अस्मिन् विवाहे त्व श्लाघ्यो रहापापन्नामि ते ॥३३
वहम्ब भाया धर्पण दवयानी शुचिस्मिताम् ।
अनया सह सप्रीतिमतुला समवाप्नुहि ॥३४
इय चापि कुमारी ते शर्मिष्ठ वापपवणी ।
रापूज्य सन्तत राजन् । नचनाशयनेह्वय ३५
एवमुक्तो ययातिस्तु शुभ वृत्वा प्रदक्षिणम् ।
जगामस्वपुर हृष्ट सोऽनुज्ञाता महात्मना ॥३६
शौनक महपि ने कहा-इसके अनन्तर देवयानी न तुरन ही
मरने frता क समीर मधागे को प्रेषित कर दिया था। उस भेजी गयी
धात्री ने उनको सपी कुछ ओर- निवदन कर दिया था । धात्री के
द्वारा राजा का यही पर भागमन सुनते हो मागंव मुनि ने रामाश वहाँ
उपित होरदशन किया था। राजा पयाति न वही पर ममाधान
हुए र वित्र का दर्शन किया तो बरे वग के साथ उमर ययाति न
पाह्मण शुक्रवदना की थी और दोनों हाप जाकर प्रहात हात हुए
उना मन में स्थित हा गया था। मार्गव मुान न भी राजा हान र

१४० मत्स्यपुराण नाते परम वल्गु साम के द्वारा उस ययाति का प्रत्याभिवादन किया था ॥२८, २९, ३० ।। देवयानी ने कहा--हे तात ! यह नहुष के पुत्र ययाति नामधारी राजा हैं । इन्होने दुगम दशा मे मेरा पाणि का ग्रहण किया था। मैं आपकी सेवा में प्रणाम समर्पित करती है। आप मुझको इ ही की पत्नी के रूप मे प्रदान कर दीजिये क्योंकि मैं लोक मे अन्य किसी को पति के रूप मे वरण नही करूंगी ।। ३१ ।। शुक्र ने कहा-हे वीर! इस कन्या देवयानी ने आपको ही अपना पति वरण कर लिया है । यह मेरी परम प्रिय इष्ट सुता है । हे नहुषात्मज ! अब मेर द्वारा समर्पित की हुई इमको ग्रहण कीजिए और अपनी महिषी इमे बना लीजिये !! ३२ ॥ राजा ययाति ने कहा-हे भार्गव ! इस प्रकार से करने पर तो अधर्म मुझे स्पश करेगा और इसे स्वीकार करने में पाप होगा। हे ब्रह्मन् । यह तो वो का सङ्कट हो जायगा-इसीलिये मैं आपस निवेदन करमा हू । शुक्राचार्य ने कहा-मैं इस अ-म से आपका विमोचन किये देता है। आपको जो भी कुछ अभीप्ट वरदान हो वह अब मुझसे मांगलो इस विवाह के करने में प्राप श्लाघ्या के ही योग्य होगे और यह सो कुछ भी पाप है उमसे मैं आपका उद्धार कर दूंगा ।। ३३ ।। हे राजन् । धम से इस शुचि स्मित वाली देवयानी को आप भार्या के स्वरूप मे वहन कीजिये । इसके साथ आप आतुला प्रीति प्राप्त करेंगे ।। ३ ।। यह तुम्हारी कुमारी शर्मिष्ठा व पंपणी है । हे गजन् । निरन्तर भली भांति पूजन करके इसके साथ गयन मत करना ।। ३५॥ महर्षि शौनकजी न वहा~-इस प्रकार से कहे ययाति ने शुक्राचार्य की परिक्रमा दी और परम प्रस न हाकर अनुज्ञा प्राप्त होन पर जा मि महारमा शुक्र ने दी थी वह अपने पुर में चला गया या।। ३५, ३६॥

ययात्यप्टकसम्बादवर्णन १३-ययात्यष्टकसम्बादवर्णन यदा वसन्नन्दने कामरूपे सवत्सराणामयुतं शतानाम् । कि कारणं कातंयुगप्रधान हित्वा तद्वै वसुधामन्वपयः ॥१॥ ज्ञाति सुहृत् स्वजनो यो यह क्षीणे विते त्यज्यते तानवहिः । तया स्वर्गे क्षीणपुण्य मनुष्यन्त्यजन्ति सद्य: खेचरा देवसपाः ॥२ कथं तस्मिन् क्षीणपुष्पा भवन्तुि संमुह्यते मेऽत्रमनोऽतिमात्रम् । किं विशिष्टाः कस्य धामोपयान्ति तद्वं ब्रूहि क्षेतवित्त्व मतो मे।।३ इमं भौम नरकन्ते पतन्ति लालप्यमाना नरदेव ! सर्वे । ते कगामायुपलागनार्य क्षितो विवृद्धि बहधा प्रयान्ति ।। तस्मादेवं वर्जनीयं नरेन्द्र दुष्टं लोके गर्हणीयश्च कम्मं । त्यात ते पार्थिव सर्वमेतत् भूयश्चेदानो वद किन्ते वदामि ।।५ पदा तु तांस्ते दितुदन्ते वांसि तथा गृध्राः शितिकण्ठाः पतङ्गाः। का भवन्ति कथमाभवन्ति त्वत्ता भीम नरकमह शृणोमि ॥६ सप्टक ने कहा--काम सा नन्दन वन में एक से अयुन (दश सहन) सम्वरसरों तक वास करते हुए कातं युगप्रधान उसका काम करके पुनः इस यमुशा पर प्राप्त हो गया या- इसका क्या कारण है ? ॥१॥ स्यानि ने रक्षा-जिम सरह से यहां पर ति से सीप हो जाने पर मानों के द्वारा अपनी मावि दाला-मुहद और स्वजन त्याग दिया जाया परता है उसो भौति स्वर्ग में येवर देवों के सघ में भी लोग पुग्य वाले मनुष्य को तुरन्त ही मार दिया परते है ॥२॥ बटा ने कहा-वहा पर पुण्यों को क्षीण करने वाले से हो जाते है-इन पिपप में मेरा मन अम्पधिर मोहित हो जाता है । रिम पिरोपना मे युक्त पुरष किपरे धाम पोरापा करते है-यह मबार हमको बताइये कोकि मेरे विचार में पाप पूर्णशया क्षेत्र है येता है ॥६॥ पनि ने पहा हे नरदेव ! मारप्यमान र ग मारे भूमि में रहने वाले नरक में गिरा करते हैं।

१४२ मत्स्यपुराण वे कङ्क-गोमायु पलाशन के लिये बहुधा भूमि मे विशेष वृद्धि को प्राप्त होते हैं ॥४॥ हे नरेन्द्र । इस कारण से इस प्रकार से लोक मे दुष्ट और गर्हणा के योग्य कर्म का वर्जन कर देना चाहिए । हे पार्थिव ! यह सभी कुछ आपको बता दिया गया है और फिर अब बतलाइये कि आपको मैं क्या बतलाऊँ ? ॥५॥ अष्टक ने कहा-जिस समय मे वे पक्षी तथा गृध्र-शितिकण्ठ और पतङ्ग उनको उत्पीडित किया हैं ? मैं आपसे ही इस अत्यन्त भयानक नरक के विषय मे श्रवण करना चाहता हूँ ।।६।। । ऊध्वं दहाकर्मणो नृम्भमाणात् व्यक्त पृथिव्यामनुसञ्चरन्ति । इम भौम नरवन्ते पतन्ति नावेक्षन्ते वर्षपूगानने कान् ।।७ पष्टि सहस्राणि पतन्तिव्योम्नि तयाशीतिञ्चैव तु वत्सराणाम् । तान्व तुदन्ते प्रपतन्त प्रयातान् भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदष्ट्रा. ८ यदेतांस्ते सपततस्तुदन्ति भीमा भौमा राक्षसास्तीक्ष्णदष्ट्राः । कथ भवन्ति कथमाभवन्ति कथ भूगर्भभूता भवन्ति ॥६ अमृग्रेत पुष्परसानुयुक्त अन्वेति सद्य. पुरुषेण सृष्टम् । तद्वै तस्यारज आपद्यते च स गर्भभूतः समुपैति तत्र ॥१० वनस्पतीनोपधीश्चाविशन्ति अपो वायु पृथिवीञ्चान्तरिक्षम् । चतुष्पद द्विपदञ्चापि सर्व एव भूता गर्भभूता भवन्ति ।।११ अन्यद्वपुर्विदधातोह गर्ने उताहोस्वित् स्वेन कामेन याति । आपद्यमानो नरयोनिमतामाचक्ष्व में सशयात् पृच्छतस्त्वम् ॥१२ शरीरदेहादिसमुच्छयञ्च चक्षुःश्रोत्र लभते केन सज्ञाम् । एतत् सवतात आचक्ष्व पृष्ट क्षेत्रज्ञ वा मन्यमाना हि सर्वे ॥१३ ययाति ने पहा-जम्ममाण देहाकर्म से ऊध्यं में व्यक्त रूप से पृथिवी में अनुमवरण दिया करते हैं . वे इस भूमि में रहने वामे आपके नरस में गिरा परते हैं और बनेर वर्षों के समूह को नहीं देखते हैं ॥७॥ गाट गाह्म तथा अस्मो सहस पं तर व्योम मे गिरा करते है प्रयाण रत हुए उनको प्रपतन परत हुए तीक्ष्ण दाता पाले महा भयानक मोम ययात्यय्टकसम्बादवर्णन १४३ रामर पीडित किया करते हैं | अप्टक ने कहा--जिस समय में दे सपतन करते हुए तीक्ष्ण दष्ट्राओं वाले भयानक भौम राक्षस इनको उत्पीडित किया करते हैं तो में होने है-कम चारों बोर होते हैं और और कैसे भूमि के गर्भ में गत हुआ करत हैं । ॥ ययारि ने कहा--- पुरष के द्वारा सृष्ट रेस पुष्प रस से अनुयुक्त बसक { रक्त ) तुरन्त ही मनुगमन करता है। वह उसका रज प्रापन्न होता है और वह वहाँ पर गर्मभूत होता हुआ समुपगमन क्यिा करता है ॥१०}} वनस्पति और औषधियों में माविष्ट होते हैं-जल-वायु-पृथिवी-अन्तरिक्ष-चतुष्पद-- द्विपद ये सब इस प्रकार से होते हुए गर्मभूत होते हैं ॥११॥ अष्ट ने कहा---पहा गम में कोई मन्य वपु धारण करता है अथवा अपनी ही इच्छा म जाया करता है जब कि इस नर योनि को प्राप्त होता हुआ रहना है-यह सब मुझे सलाइये, मैं सशय होने कारण से आपसे पूछ रहा हू॥ १२॥ शरीर देहादि का समुच्छय-चक्ष और श्रोत्र शिमम सना को प्राप्त किया करता है? हे तात! आप से पूछा गया है बार यह समो कुछ बतलाइये। थापको सभी क्षेवन मानने हैं ॥१३॥ वायु समुत्तपति गर्भयानिमृतौ रेत.पुप्परसानुयुक्तम् । स तय तन्मात्रकृताधिकार क्रमेण सवर्धयतोह गर्भम् ।।१४ स जायमानाऽय गृहोतगानः सजामधिष्ठाय ततो मनुप्य. । स श्रोत्राभ्या वेदयतोह शब्द स वै रुप पश्यति चक्षुपा च ॥१५ प्राणेन गन्ध गिरापायो रसञ्च त्वचा स्पर्शमनसा वेदभावम् । इत्यप्टके होपवित हि विद्धि महात्मन. प्राणभूत. शरारे ॥१६ य. सस्थित. पुरुषो दह्मते वा निसन्यते वापि निकृप्यते वा । अभावभूतः स विनाशमेत्य कनारमान चेतयते पुरस्तात् ॥१७ हित्वा सोभून सुप्तवन्निप्टिनत्वात पुरोयाय सुकृत दुपतञ्च । अन्या योनि पुण्यपापानुसारा हित्वा देह भजते राजसिंह ॥१८ १४४ मास्यपुराण पुण्या योनि पुण्यकृतो विशन्ति पापां योनि पापकृतो यजन्ति । कोटाः पतङ्गाश्च भवन्ति पापन्न मे विवक्षास्ति महानुभाव ।।१६ चतुष्पदा द्विपदा. पक्षिणश्च तथा भूता गर्भभूता भवन्ति । आख्यातमेतन्निखिल हि सर्व भूयस्तु किं पृच्छसि राजसिंह ।।२० राजा ययाति ने कहा-पुष्प रस से अनुयुक्त रेत को ऋतु काल मे वायु समुत्कर्पित किया करता है। इतना ही अधिकार करने वाला वह वहा पर क्रम से गर्म को सधित किया करता है ।।१४। इसके उपरान्त जब वह जायमान होता है तो गात्र को ग्रहण करने वाला हो जाता है । इसके पश्चात् वह मनुष्य सज्ञा को अधिष्ठित हुआ करता है। वह श्रोत्रो से यहा पर शब्द का ज्ञान करता है और वह रूप को चक्षु से देखता है ॥१५॥ प्राण से गन्ध को पहिचानता है तथा जिह्वा से रस और त्वचा से स्पर्श और मन से भेदभाव को जानता है । प्राणधारी महात्मा के शरीर मे इस अष्टक मे उपचित समझलो ।।१६। अप्टक ने कहा-जो सस्थित पुरुष जला दिया जाता है- गाड दिया जाता है अथवा निकृष्ट किया जाता है अभावभूत वह विनाश को प्राप्त होकर फिर किस के द्वारा आगे आत्मा को चतन्य स्वरूप देकर प्रदशित किया करता है ॥१७॥ राजा ययाति के कहा- वह प्राणो का त्याग करके एक सुप्त की भांति निष्ठित होने से अपने जीवन मे विहित सुकृत और दुसकृत आगे रखकर ही पुण्य पाप के अनुसार अन्य योनिको भजता है और इस देह का त्याग कर दिया करता है । हे राजसिंह ! प्रधम शरीर के त्याग के बाद ऐसा ही हुआ करता है जिसमें पुण्य-पाप की प्रधानता होती है । ॥१८|| जो पुण्य कम्मों के करने वाले लोग होते हैं वे पुण्य योनि में ही प्रवेश किया करते है और जो पापकर्म करने वालेहैं वे पाप योनि मे जाया करते हैं । हे महानुभाव | कोट और पतङ्ग पाप से होते हैं यह मेरी विवक्षा नहीं है ।१६।। चतुष्पद-द्विपद और पक्षी वर्ग उस प्रकार से हुए गर्भभूत होते हैं यह हमने सभी कुछ कह दिया है । हे राजसिंह ! पुनः भव क्या पूछते हैं ? ॥२०॥ !

ययात्याकसम्बाद वर्णन १४५ . . किस्वित् कृत्वा लभते तात संज्ञा-मयः श्रेष्ठां तपसा विद्यया वा। तन्मे पृष्टः शंस.सर्वययावच्छुमान् लोकान् येन गच्छेत् क्रमेण ॥२९ तपश्च दानञ्च शमो दमश्च होराजवं सर्वमतानुकम्पा । स्वर्गस्य लोकस्य वदन्ति सन्तो द्वाराणि सप्तव महान्ति पुसांम् ॥रर सर्वाणि चंतानि यथोदितानि तपप्रधानान्पभिमशकेन। नश्यन्ति मानेन तमाऽभिभूताः पुमः सदैवेति वदन्ति सन्तः ॥२३ शेपानः पण्डित मन्यमानो यो विद्यया हन्ति यशः परस्य । तस्यान्तवन्तः पुरुषस्य लोकानचास्य तवाफल-ददाति ।।४ चत्वारि कर्माणि मगचराणि भयं प्रयन्त्यययाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुतमानमौनं माननाघोतमुतमानयन: ।।२५ न मान्यमानो मुदमाददीत न सन्तापं प्राप्नुयाच्वावमानात् । सन्तः सतः पूजयन्तीह लोके नासाधवः साधुवृद्धि लभन्ते ।।२६ इति दद्यादिति यवेदित्यधीयीत मे वृतम् । इत्येतान्यमयान्याहस्तान्यवानिनित्यशः ॥२७ येनाप्रयं देदयन्ते पुराणं मनोपिणो मानसे मानयुक्तम् । तन्निर्थ यस्तेन संचागमत्य पर शान्तिं प्राप्नुयुःप्रेत्य चेह ॥२९. अष्टक ने कहा- हे तात ! क्या कर्म करक मनुष्य श्रेष्ठ सजा को प्राप्त किया करता है तपश्चर्या से अयदा विद्या है? यही मेरे द्वारा आप पूवे जा रहे हैं सो समी पावत् कहिए और यह भी दतलाइये कि जिस कम से वह शुभ लोकों को चना जाता है ययाति ने कहा- दप-दान-समन्दम-सजा-आर्गव और समस्त प्राणियों पर. दया- सात हो पुरुषों के महान् द्वार है जिनको स्वर्ग लोक के भी सन्त लोग कहा करते हैं ।।२२।। ये सब जो भी सदित किये गये हैं वे तप: प्रधान ही होते है यदि इन सभी में तपश्चर्या को ही प्रभुषवा हुआ करती है । जो उभोगुण ने अभिभूत होते हैं वे अभिमक मान से नष्ट हो जाते वह पुरुष को सदा ही होता है. यही पन्न'पुरुष कहते हैं ।।२३।। अधी- १४६ मत्स्यपुराण यान अर्थात् पूर्णतया पठित पुरुष अपने आपको पण्डित मानता हुआ प्रर्थात् अपने पाण्डित्य का अभिमान रखने वाला है और जो विद्या के बल स दूसरे के यश का हनन किया है उस पुरुष के अत में होने वाले सीक नहीं हुआ करते हैं और न उसको वह ब्रह्मफल ही दिया करता है ।।२।। ये चार कर्म महान् भयङ्कर हुमा करते हैं और अयथाकृत ये भय दिया करते हैं-मानाग्निहोत्र-मान मौन-मानसे आधीत और मान- यज्ञ वे ये ही पार हैं ॥२५॥ मान्य मान वाला कभी मुद प्राप्त नहीं किया करता है और वह सन्ताप को भी अब मान हाने से नहीं प्राप्त किया करता है इस मोक मे स त पुरुष सरसुरुषों का ही पूजन हैं और जो असाधु पुरुष होते हैं वे कभी भी साधु बुद्धि को प्राप्त नहीं किया करते हैं ।।२६।। मेरा श्रुत तो यह बतलाता है कि इसका इतना दान करे-यह यजनाचन करना चाहिये और यह अध्ययन करे- इसी हेतु से यह मय से रहित है और उनको नित्यही अनजनीय कहा जाता है। ॥२७॥ पुराण जिससे आश्रय का वेदन मनीषिगण किया करते हैं जो मानस में मानयुक्त है वही निश्रेय है उससे सयोम प्राप्त करके यहाँ मृत होकर परा शालि को प्राप्त किया करते हैं ॥रा किया करते THI २०-ययात्यष्टकसम्बाद वर्णन चरन् गृहस्थ. कथमेति देवान् कथ भिक्ष कथमाचार्यकर्मा। वानप्रस्थ सत्पये सन्निविष्टो वहून्यस्मिन् सप्रति वेदन्ति । आहूताध्यायी गुरुकमसु चोद्यत पूर्वोत्थायी चरमञ्चोथशायी। मृदुर्दान्तो धृतिमानप्रमत्त स्वाध्यायशील सिद्धयति ब्रह्मचारी ॥२ धर्मागत प्राप्य धन यजेत दद्यात्सदैवातिथीन् मोजये च । अनादानश्च पर्ररदत्तं सैपां गृहस्थोपनिषत्राणी ॥३ पवाष्टकम्बाददर्षन सवाच्यंजीवी वृजिनानिवृत्ती दाना परेभ्यो न परोपजापी। वाङ्मुनिः चिद्धिमुपैठि मुत्या वसन्नरम्ये नियवाहारवेष्टः ॥४ अशिलजीवी दिगृहश्च नित्यं जितेन्द्रिय: सर्वतो विप्रमुक्तः । अनोकशायी लधु नियमानावरन देशानाम्वर मिश: 2 रान्यायया चाभिरवाश्च लोका भवन्ति कामामिडिताः सुखेन च। तामेव रात्रि प्रस्तुत विद्वानस्पस्यो मदिनु यतात्मा ॥ दर्शद पूर्वान् त चापरांस्तु मातीस्तयात्मानमर्यकविंशम् । बरपवासी मुकृतं दधाति मुक्तवावरचे स्वशरीरधातून् ।।७ बटा ने कहा--एक माहंम्य आश्रम में मचरण करने वाना पुष्प किस प्रकार से देवों को प्रात किया करता है कि (संन्यासी) किम विधान मे पोराचार्य का कम्मं करने वाला है वह किस रीति से देवगन के समीर में पहुँचा करता है तथा बो वानप्रस्थाश्रमी पुरुष है और मुत्पर्य में सन्निविष्ट है उसकी क्या विधि है ? इस विषय में बच सी बाते देदन की बाती है। राजा ययाति ने कहा--जिस समय में उनको अपन करने के लिये पाहून करें तो उन भावार्य दर की सन्निधि में समुपस्थित होकर अध्ययन करने वारा-गुरुजी के सन् कम्नों के समादन करने क लिये मम उद्यत रहने वाना-पुरुचरण से पहिने शम्मा त्याग कर उठने बाना और उनके गबन करने के पश्चात् सोने वाला-गरम दु रमनजोर-पतिमान-अामत्त एवं बो सर्वदा म्वाध्याय करने के यौन वाला है वहीं इमापारी सिद्धि प्राप्त किया करता है। धन के द्वारा समापन धन से परन करना चाहिए और सदा हो अतिपियों को, रान देखें तपा-उनको भोग्न करादे-दूसरों के द्वारा नहीं दिये हुए को नहीं पहन करता हुवा रहस्य को होना चाहिए-यही माहंम्पाश्रम में रहने वाले की परम पुराउन अनिषत् है ।।३॥ मरने हो हनदीप से बीवन यापन करने वाला पाप गर्न ते निवृत्त रहने वाला- दूसरों को दान देने वाला तथा दूसरों को कभी भी पता न देने वाला इस ४८ मत्स्यपुराण प्रकार की रहनी रहने वाला मुनि को नियत थाहार करने की चेष्टा रखते हुए वन में निवास क्यिा करता है वही परम मुख्य सिद्धि का लाम लेता है ॥४॥ जो किसी भी प्रकार के शिल्प कौशल से जीवन का यापन नहीं किया करता है तथा विना गृह वाला है-नित्य ही अपनी इन्द्रियों को जीत पर रखने वाला है और सभी ओर से प्रमुक्त अर्थात् बधन रहित है-किसी भी गृह में शयन न करने वाला तथा बहुत ही स्वस्म लिप्सा रखने वाला-एक ही वस्त्र का धागे और अनेक देशों में विचरण करने वाला जो होता है वही भिक्षु (सन्यासी) 11 जिस रात्रि से लोक अभिरत होते हैं तथा सुख से कामाभिजित होते हैं विद्वान पुरुष को उसी रात्रि में प्रयत्न करना चाहिये कि वह प्रयत आत्मा वाला अरण्य में सस्थित रखने वाला होवे ॥६॥ वह अरण्य में निवास करने वाला अपने शरीर की धातुओं को अरण्य मे ही त्याग करके परम सुकृत को धारण किया करता है। वह अपने से पूर्व मे हुए दश पुरुषो को और दश दूसरे शातियो को तथा इक्कीसवां अपने आपको सभी का अपने . तपोबल से उद्धार कर दिया करता है ॥७॥ कतिस्विदेवमुनयो मौनानि कतिचाप्युत। भवन्तीति तदाचक्ष्व श्रोतुमिच्छामहे वयम् ।। अरण्ये वसतो यस्य ग्रामा भवति पृष्ठत । ग्रामे वा वसतोऽरण्य स मुनि स्याज्जनाधिप 16 कथस्विदसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठत । ग्रामे वा वसताऽरण्य कथ भवति पृष्ठत ॥१० न ग्राम्यमुपयुजोत य आरण्यो मुनिर्भवेत् । तथास्य वसतोऽरण्ये ग्रामो भवति पृष्ठत ॥११ अनग्निरनिकेतश्चाप्यगोत्रचरणो मुनि । पापीनाच्छादन यावत्तावदिच्छेन्च चीगरम् ॥१ यावत्प्राणाधिसन्धान तादिन्छन्चभोजनम् ।। V 'ययात्यष्टकसम्बाद वन १४ तदास्यवसतोप्रामेऽरप्पभवति पृष्ठतः ॥१३ प्रप्टक ने कहा-कितने देवपण और मुनिगम मौन होते हैं- ५६ व बार मुझको बतलाइये। हम सब यह श्रवण करना चाहते हैं। 11 पाति ने कहा है जनाधिप ! बाप में निवास करने वाले जिसको प्राम पृष्ठ भाग में रहता है दधा -साम में निवास में यम्म्य को पृष्ठ में छोड़ देता है वही मुनि होता है । अटक ने पूछा-अरष्य में निवाब करने वाले का नाम किस तरह से पृष्ठ में होता है अपवा शाम में निवास करने बाने का परम्प कैसे पृष्ट मे होता है ? ॥१०॥ राजा ययाति ने कहा--जो मारय मुनि हो उसे कभी भी ग्राम का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसी तरह रो-सरप में निवास करने वाले इसका प्राम पृष्ठ भाग में हो जाया करता है ॥११॥ बिना अग्नि वाला अर्थात् निरम्नि- रिना पर बनाकर रहने वाला-अगोत्रचरण वाला-जो मुनि है उसको जितना मी कौपीन और समान्छादन करने के लिये चाहिये उतने ही वस्त्र की इच्छा करनी चाहिये ॥१२॥बने से अपने प्राणो का मिसन्धान रहे उतना ही बाहार प्राप्त करने की इच्छा रखनी चाहिये। उस समय में ग्राम में निवास करने वाले इसको भरख्य भी पड़ जाया करता है ॥१३॥ यस्तुकामान्परित्यज्यक्तजितेन्द्रियः । आतिप्ठेतमुनिमोनंसलोकेसिद्धिमानुपाद ।।१४ घौतदन्तं कृत्तनखं सदास्नातमलङ्कृतम् । असितं सितकर्मस्थ कस्तनाचितुमहंति र तपसाकशितःक्षामाक्षीणमासास्यिशोणित:। यदाभवतिनिईन्द्वो मुनिमानं समास्थित.।।१६ अथलोकमिमजित्वा लोकरचापि जयेत्परम् । आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनिः । अथास्थ लोक: सर्यो यः सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥१८ . पृष्ठ माग में १५० 'मरस्यपुराण - जो समस्त प्रकार की इच्छानों को त्याग करने मम्मों को छोड कर पूर्णतया इन्द्रियो के ऊपर आना नियन्त्रण रखने वाला समास्थित हुमा करता है और मौनमत धारण करता है वही मुनि लोक मे सिद्धि को प्राप्त किया करता करता है|१४॥जो धौत दन्तो वाला है- नाखून जिसके कटे हुए रहा करते हैं-सदा स्नान करके साफ-सुथरा रहता है और भली भांति अलकृत रहा करता है और असित तथा सित कर्मों में स्थित रहने वाला सन्यासी है उसे कौन अचित करने की भावना रखता है अर्थात् ऐसे भिक्षु की समचर्चा की योग्यता ही नही होती है । ॥१॥ जो तपश्चर्या से कशित-दुबला-पतला-क्षीण मात अस्थि और रक्त वाला जिस समय मे निद्वन्द्व होता है वह मुनि मौन व्रत 'मे समा- स्थित हुआ करता है ॥१६। इसके अनन्तर इस लोक को जीतकर पह परलोक पर भी विजय प्राप्त किया करता है । मुनि अपने मुख से गौ को भांति ही जब माहार को ग्रहण किया करता है तथा खोजता है इस दशा के होने के अनन्तर इसको जो भी सब लोक है वह अमृतत्व के लिये ही कल्पित होते हैं ॥७॥ २१-यदुवंश वर्णन इत्येतच्छौनकाद्राजा शतानीकोनिशम्य तु । विस्मित परयाप्रीत्यापूर्णचन्द्र इवाबभौ ॥१ पूजयामास नृपतिविधिवच्चाथ शौनकम् । रत्नामि सुवर्णश्च वासोभिविविधस्तया ॥२ प्रतिगृह्य ततः सर्व यदाज्ञा प्रहित धनम् । दत्त्वा च ब्राह्मणेभ्यश्च शौनकोतरधीयत ॥३ ययातिवं शमिच्छाम श्रोतु विस्तरतो धद । यदुप्रभृतिभिः पुत्रयदा लोके प्रतिष्ठितः॥४ बटुवंशवपन .. यदोदेयं प्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योतमतेजसः। विस्तरेणानुपूा च गदती मे निवोधत ५ यदोः पुत्रा बभूवुहि पञ्च देवसुवोपमाः । महारथा महेष्वासानामतस्ताग्निवोचत । सहनजिरयोज्येष्ठ कोष्टुनीलोऽन्तिकोलघुः । सहस्रस्तुदायादोशतजिनामाथिवः ।। महा महर्षि श्री मूतजी ने कहा-पानीक राजा ने पौनक से यह बब घवण किया था तो वह विस्मित होगमा या बौर पराठि से पूर्ण चन्द्र की भांति प्रकाश मान हो गया था ॥१॥ फिर उस राजा ने पूर्ण विधान के माय शोनका पूजन यिा पात पूजन के उपचारों में बहुमूल्य रल-गो-नुवर्ष और अनेक भांति के दान वादि सभी पे || जो भी राजा के द्वाय धन हित किया पाक्स सदश प्रविहम काफ ओर वाहापों को दान करके फिर महर्षि गौनक वहीं पर अन्तहित हो गये थे ||३॥ ऋषियों ने कहा-है मगवन् !-अब हम सर लोग राजा ययाति के वश का विस्तार प्रदन करना चाहते हैं। पार परमानुकम्मा करके उसका बिस्तर वगन कीजिए रिस समर में रह इस लोक में यदुप्रभृति पुत्रों से समन्दित होकर प्रतिष्ठित छापा | श्री सूतजी ने कहा- सबसे ज्येष्ठ और उत्तम सेज वाले यदु के ग का मैं वर्णन कहंगा और विम्ठार उपा आनुपुर्व के माप ही कहूंगा। बाप मोय मव कहने वाले मुझने सर कुछ समय सीजिए १५॥ महाराज मदु के देवताओं के समान पार पुन सुमुत्पन्न हुए थे। पांचों हो महारषो और महान् इप्दास को धारण करने वाले थे। इनमें सदई बड़ा को या वह सहमति १९ और सबसे छोराको अन्तिम पुत्र पा कोष्टुनील था। सहनजि का दायाद गति नाम धाये पार्थिव समुठ हा रा॥७॥ शतजेरपि दायादास्त्रयः परपकोतयः। - १ मत्स्यपुराण हैहयश्च हयश्चैव तथा वेणुहयश्च यः ॥ 'हैहयस्य तु दायादो धर्मनेत्र. प्रतिश्रुतः। धर्मनेत्रस्यन्तिस्तुसहतस्तस्य चात्मजः ॥ 'सहतस्य तु दायादो महिष्मान्नामपार्थिवः । आसीन्महिष्मतः पुत्रीरुद्रश्रेष्य प्रतापवान् ।।१० वाराणस्यामभूद्राजां कथित पूर्वमेव तु । रुद्रप्रेणस्य पुत्रोऽभूर्दमो नाम पार्थिवः ॥११ दुइमस्यसुतोधीमान्कनकोनामवीय्यवान् । कनकस्यतुदायदाश्चत्वारोलोकविश्रुताः ॥१२ ' कृतवीयं कृताग्निश्च कृतवर्मा तथैध व।। कृतोजाश्च चतुर्थोऽभूत्कृतवीर्यातुसोर्जुनः ॥१३ जातः करसहस्रण सप्तद्वीपेश्वरो नृपः। वर्षायुत 'तपस्तेपे 'दुश्चर पृथिवीपतिः ॥१४ जि नाम वाले पुत्र के भी दायाद परम कीति वाले तीन हुए पे जिनके शुभ नाम हैहय-हय और वेणुहय थे ॥८॥ हैहय का गो दायाद उत्पन्न हुआ था वह धम्ममेत्र इस शुभ नाम से प्रतिश्रुत हुआ था । धर्म- नेत्र का दायाद कुन्ति हुमा और कुन्ति का आत्मज सहत नाम वाला हुआ पा 11 संहत के पुत्र महिष्मान नाम वाला पार्थिव हुआ था । महिष्मान का पुत्र परम प्रताप घरी रुद्रघेण्य ने जन्म ग्रहण किया था ॥१०॥ यह वाराणसी मे रामा हुआ था जिसका वर्णन पूर्व मे ही किया जा चुका है। रुद|ग का पुत्र दुईम नाम वाला राजा हुआ था ॥११॥'पिर इस 'दुईम का पुत्र परम बुद्धिमान और बल वीर्य से सयुत कनक नाम वाला हुमाया । इम पना के पार दायाव लोक में परम प्रसिट हुए थे ॥१२॥ इन पारों के नाम सौर्य-ताग्नि-कृतवर्मा और पोपा कृतोत्रआये थे। इतबीयं दे पुत्र से ही सहस्रार्जुन समत्तपन्न हुमा पा ||१३ा इसके एक "हम हाथ येमा इमने ग्राम ग्रहण किया था और यह सातो दीपों का शत पदुवा वर्णन a राजा हुआ पा । इस राजा नै दश सहस्र वर्ष तक परम दुनर तपस्या की थी॥१४॥ दत्तमाराधयामास कार्तवीर्योऽत्रिसम्भवम् । तस्मै दतावरास्तेनचत्वारः पुरुषोत्तम् ।।१५ पूर्व वाहुसहस्रन्तु वने राजसत्तमः। अधर्म चरमाणस्य सद्भिश्चापिनिवारणम् ||१६ युद्धन पृथिवी जित्वा धर्मणवान्पालनम् । समामे वर्तमानस्य पधश्चवाधिकाद्भवेत् ॥१७ तेनेय पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपवंता। समोदधिपरिक्षिप्ता क्षासेण विधिना जिता ॥१८ जज्ञे वाहुसहस्रं वै इक्छतस्तस्य धीमत.। रथो ध्वजश्च सज इत्येवमनुशुश्रुमः ॥१६ दशयशसहस्राणि राशा द्वीपेषु वै तदा । निरगला निवृत्तानि भूयन्ते तस्यधीमतः॥२. सर्वे यज्ञा महाराशस्तस्यासबभूरिदक्षिणा । सर्वेकान्वनयूपास्तेसर्वाः काञ्चनवेदिका ॥२१ इम कात'वोयं ने अत्रि के पुत्र दत्तात्रेय को समाराधना को पी। 'हे पुरषोत्तम ! उसके द्वारा इसको चार वरदान दिये गये थे ।। १५ ।। सबसे प्रपम उस रामप्रेष्ठ में एक महम बाहु प्राप्त करने का वरदान मांगा पा। अधर्म का समापरण करने वाले पा सत्पुरपो से निवारण करमा प्राप्त किया था ॥१६॥ युद्ध के द्वारा सम्पूर्ण भूमाल पर विजय प्राप्त र धर्म पे हो द्वारा सब पृथ्वी का अनुपालन करना प्राप्त किप था । सग्राम में यमान पथ भी हो तो रिसा अधिक से ही होये १७॥ उस सहयवाह ने इस पृपिवी को बो सम्पूर्ण सात दीपों से मुक्त पी के सहित पोर समुद्र से घिरी हुई थी उस सरको क्षात्र विधि के द्वारा ही जीत लिया था।।१८॥ उस धोमान् पो मोठा पी उसी में अनुसार १५४ मत्स्यपुराण . एक सहस्र बाहु समुत्पन्न हो गयी थी। रथ और ध्वज भी समुत्पन्न हए थे ऐसा ही अनुश्रवण करते हैं ॥१६॥ उस समय मे उस राजा के द्वारा द्वीपो मे दश सहसू यज्ञ निगल उस धीमान के , निवृत्त हुए थे ऐसा मो सुना जाता है ।।२०।। उस महान् राजा के सभी यज्ञ अत्यधिक दक्षिणा वाले सम्पन्न हुए थे। उन सभी यशो मे सुवर्ण के यूप थे और सभी सुवर्ण की वेदियों वाले थे ॥२॥ सर्वे देवः सम प्राप्तैर्विमानस्थरलड कृता. गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नित्यमेवोपशोभिता ॥२२ तस्य यज्ञ जगी गाया गन्धर्वोनारदस्तथा । कर्तवीर्यस्यराजमहिमाननिरीक्ष्य सः ॥२३ न नून कातवीर्यस्य गति यास्यन्तिक्षत्रिया यशंदनिस्तपोभिश्च विक्रमेणश्रुतेन च ।।२४ स हि सप्तसु द्वीपेसु खड्गी चक्रीशरासनी। रथीद्वीपान्यनुचरन्योगीपश्यतितस्करान् ॥२५ पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणा स नराधिप । स सर्वरत्नसम्पूर्णश्चक्रवर्ती बभूव ह ।।२६ स एव पशुपालोऽभूत् क्षेत्रपाल स एव हि । स एव वृष्टया पजन्यो योगित्वादज्जुनोऽभवत् ॥२॥ सब विमानों में स्थित देवो के साथ प्राप्त हुए गघवं पौर अप्स- राओं से सम्मात नित्य ही उपशोभित रहा करते थे॥२२॥ उमरे पा में गन्यतया माग्द ने बाप्तबीयं राजपि की महिमा को देखकर उनकी गापा का गायन रिया था ॥२३॥ निश्चय ही क्षत्रिय गण पातं. पीपीगति नहीं प्राप्त होगे जिस प्रहार कइसके यश-मान-सप- किम और पत आदि है इस तरह क सभी विधान भन्य क्षत्रियों के पपा है ही नही॥४॥6 महसबा रामा माग धारण करने वाला तरा पयमन प्रगति हुए रपी मातो द्वीपों में अनुसरण करते हुए पवश वर्णन योगी तस्करों को देखा करता था ।। २५॥ वह नराधिप पिरासी पहन वर्षों तक सम्पूर्ण रानों से सम्पन्न होता हुआ इस भूमण्डल का "परवर्ती सम्राट हुआ था ।।२६ ॥ वही पशुओं के पालन करने वाला हुआ था और वह ही दोनपाल भी हुमा पा! यह वृष्टि के द्वारा पजन्य हुआ था और योगी होने के कारण से वही अर्जुन हो गया था ॥२७॥ योऽसौ वाहु सहस्रेण ज्याघातकटिनत्वचा। भाति रश्मिसहस्रण शारदेनैवभास्कर ॥२% एप नाग मनुष्येषु माहिष्मत्या महाधुति. कर्कोटकसुतजित्वापुर्या तमन्यवेशयत् ॥२३ एप वेग समुद्रस्य प्राषट्काले भजेन वै। मीहान्नेव सुखोशिन्न प्रतिसातोमहीपति ॥३० ललता क्रीडता तेन प्रतिस्र दाममालिनी। कमि भृकुटि सन्यासाचकिताभ्येतिनम्मंदा ॥३१ एका बाहुसहस्रेण वगाहे स महार्णव । करोत्युह्यतवेगान्तु नर्मदाप्रावृह्यताम् ॥३२ तस्य बाहुसहस्रण क्षोभ्यमाने महोदधी। भवन्त्यतीव निश्चेप्टापातालस्था महासुरा ॥३३ पूर्णीकृतमहावीविलीनमोनमहातिमिम् । मारुतावितफेनोपमावाक्षिप्त सहम् ॥३. करोत्यालोऽयन्नेव दोसहस्रण सागरम् । मन्दारक्षोमचकिता एमृतोत्पादक्षुिता ॥३॥ सदा निश्चलमूर्शनो भवन्ति च महोरेगा.। सायालेरदलीखण्डानिर्वास्तिमिताइव ।। यह समार एक महान वाहओं के द्वारा धनुष की सारी के घाटों कदिन स्वा स युत पारदशत रा एक सहम गमिया से सम्पन हो १५६ मस्त्याराण रहा था ॥२८॥ महान् छ ति वाले इसने महिष्मती पुरी में मनुष्यों के मध्य मे कर्कोटक के पुत्र नाग को जीतकर उसी पुरी मे निवेशित कर दिया था ||१६|| यह प्रावट काल मे भी समुद्र के वेग का सेवन किया करता था। यह महापति प्रतिस्त्रोत मे सुख से उद्भिता होता हुमा क्रीडा करता हुआ था विवरण किया करता था ।। ३०।। उसने प्रातप्रदाय मालिनी ललता क्रीडित की थी। ऊमि भृकुटी मे सन्त्रास से नर्मदा चकित होकर उसके समीप मे आ गई थी ॥३१॥ वह एक अपनी सहस्रबाहुमों से महार्णव के अवगाहन करने पर उहत वेग वाली नर्मदा को प्रावृद्ध हाता करता है ।। ३२ ।। उसकी सहस्रबाहुप्रों से महोदधि के क्षोम्यमान होने पर पाताल मे सस्थित महासुर अत्यन्त ही निश्चेष्ट हो जाते हैं ॥३३ सहस्र हाथो से सागर का भालोडन करता हुआ ही उसको तोडी हुई महान् तरङ्गो मे विलीन मीन और महातिमि वाला-मारत से आविद्ध फेनों के भोप याला तथा आवतों (भंवरो ) के समक्षिप्त होने से दु सह करता है । उस समय मे मन्दार के क्षोभ से चकित अमृत के उत्पादन की शङ्का वाले महारङ्ग निश्चल मूर्दा वाले हो जाते हैं । जिस प्रकार से सायाह्न समय मे निर्वात से स्तिमित कदली खण्डो की दशा होती है वैसी दशा महोरगो की थी॥३४, ३५, ३६ ।। एव पध्वा धनुायामुतासिक्त पञ्चभिःशरं । लङ्कायांमोहयित्वातुसबलरावणबलात् ॥ ३७ निजित्यवध्वाचानीयमाहिष्मत्याम्बवन्धच। सतोगत्वापुलस्त्यस्तुअर्जुनसप्रसादयत् ॥३८ मुमोच रक्ष पौलस्त्य पुलस्त्येनेहमान्वितम् । सस्यवाहुसहस्रण बभूव ज्यातलखन. ॥३६ युगान्ताम्रसहस्य आस्फोटस्वशनेरिव । महोदत विधयिं भागवोऽय यदाच्छिनत् ।।४० सद सहस्र वाहूनां हेमतालवन यथा।

यदुवा वर्णन पत्रापवस्तु संऋदो हजुनं शप्तवान् प्रभुः ।।४१ यस्मादनं प्रदग्ध वै विधुत मम हैहय । तस्मात दुष्कर कामं कृतमन्योहरिष्यति ॥४२ लकापुरी में सरल रावण को बलपूर्वक मोक्षित करके पांच पगे म उरिसक करके धनुष की ज्या में इस प्रकार से बांध दिया था और उसको जीत रके तमा बद्ध करके माहिष्मती अपनी पुगे में से पाया था तपा बांधकर रख छोडा था। इसके अनन्तर पुलस्त्य ऋपि वहां बाये थे और उन्होंने सहमार्जुन को प्रसन्न किया था ।। ३७ ॥ ३८ ॥ पुलस्त्य ऋषि ने यहां पर सान्त्वना दी थी और फिर पौलस्य (रावण) को छोड दिया था। उसकी सहन दाहुओ से ज्या तत्व का शब्द हुमाया ॥ ३६॥ यह पोप उसी मैति हुमा या पेसारि युगान्त के समय में होने वाले सहस्रों मेघों के प्रास्फोट से शनि का घोप हुआ करता है। वही हो प्रसन्नता को बात है कि विधाता के वीर्य इन मागंद ने हिन्न किया था।॥४०॥ जिस समय में भार्गव प्रभु न इसकी सहस्रवाहनों मा छेदन हमताल वन की भांति किया था और जहाँ पर पाप प्रमु ने सकट होकर पर्जुन को शाप दिया था-हे हैहय ! क्योकि मेरा परम विश्रत पस तुमने प्रानकर दिया या इसलिये इस दुस्तर कम्मं को कृतमग्य हरण ani..|| छिया वाहसहस्र ते प्रथमनरसा बली। तपस्वी ब्राह्मणश्च त्वासवधियतिमार्गव ४ तस्प रामस्तदा वासीन् मृत्युः शापेन धीमता चिरस्वन्तु राजपः स्वयमेव दतः पुरा ॥४॥ तस्य पुतशतं त्वासीत् पञ्च तर महारणः । कृतास्त्रा लिन पूरा धम्मरिमानो महावला: ॥१५ गुरसेनाच शूरश्च धृष्टः कोष्टस्तपंद च । जयध्वजश्च देकता अन्तिश्च विशाम्पते ।

१५८ मत्स्यपुराण जयध्वजस्य पुत्रस्तु तालजयो मुहावल । तस्य पुत्रशतान्येव तालजंघा इति श्रुता ॥१७ तेषापञ्चकुलाख्याता हैहयानामहात्मनाम् । वोतिहोत्राश्चशार्याताभोजाश्चावन्तयस्तया ॥४ कुण्डिकेराश्च विक्रान्तास्तालजघास्तथैवच । वीतिहासमुतश्चापिआनतोनामवीय्यवान् । दुर्जेयस्तस्य पुत्रस्तु वभूवामित्रकशनः ॥४६i बलवान तपस्वी और ब्राह्मण भार्गव पहिले वेग के साथ देरी सहस्र वाहओ का छेदन करके फिर तेरा वही वध भी कर देंगे ॥५३|| सूतजी ने कहा-उस समय में उसकी मृत्यु शाप के द्वारा राम ही थे। घीमान् ने राजर्षि से पहिले ही इस प्रकार का वरदान म्वय ही वरण कर लिया था ॥४४॥ उसके एक सौ पुत्र हुए थे उनमें पांच तो महारय थे । ये सब कृतास्र बलशालो-शूरवीर-धर्मात्मा और महान बल वाले थे। ॥४५॥ हे विशाम्पते । शूरसेन-शूर-घृष्ट-क्रोष्ट-जयध्वज-वैकत्ता और अवन्ति ये उनके नाम थे ॥४६॥ जयध्वज का पुत्र महान् बलवान् ताल. जड़ हुआ णा । उसके भी एक सौ पुत्र ये जो सव तालजङ्घ-इसी नाम से प्रसिद्ध थे ।।४७।। उन हैहय महात्माओ के पांच कुल विख्यात ये । वाति होत्र-शार्यात -- भोज-अवन्तिप--कुण्डिकेरा-विक्रान्त और ताल- जघ थे। वीतिहोत्र का पुत्र भी आनर्स नाम वाला महान् वीर्यवान हुआ या। उसका पुत्र दुर्जय या जो शत्रुमो का कशन करने वाला था। । सद्भावेन महाराज प्रजा धर्मेण पालयन् । कातवीर्यार्जुनी नामराजा बाहुसहस्रवान् ।।५० येन सागरपयंन्ता धनुषा निजिता मही। यस्तस्य कीर्तयेन्नाम कल्यमुत्थाय मानव ॥५१ न तस्य वित्तनाश स्यान्नष्टञ्च लभते पुनः।

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कोष्टुरेशवर्णन
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कात्तवीर्यस्य यो जन्म कययेदिह धीमतः ॥
|| यथावत् स्विष्टपूतात्मा स्वर्गलोके महीयते ॥४२
हे महाराज ! कातवीर्यार्जुन नाम वाला राजा एक सहस्रबाहुमो
समन्वित या और सदभावना से धर्म के साप प्रज्ञा का परिपालन
किया करता पा ॥५०॥ वह ऐसा प्रतापी राजा हुआ था जिसने अपने
धनुष के द्वारा सागर पर्यन्त भूमि को जीत लिया था। जो मानव प्रात.
काल में ही उठकर उसके शुभ नाप का कीर्तन किया करता है उसके
वित का कभी भी नाश नहीं होता है और जो किसी का वित्त नष्ट भो
हो गया हो तो वह मष्ट हुआ धन पुनः प्राप्त हो जाया करता है । परम
धोमान् कातवीय के जन्म को गायों को कोई कहता है तो वह मानव
पथावत् स्विष्ट पूतात्मा होकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठा प्राप्त किया करता
है ॥५१,५२॥
। २२-योष्टुवंश वर्णन
कमर्थं तद्वनं दग्धमापवस्य महारमनः।
कार्तवीर्येण विक्रम्य सूत ! प्रदूहि तत्वतः ।।
रक्षिता स तु राजपि. प्रजानामिति नः धुतम् ।
सकथंरक्षिताभूत्वा अदहत्तत्तपोवनम् ॥२
आदित्यो द्विजरूपेण कार्तवीर्यमुपस्थितः।
तृप्तिमेको प्रयच्छस्वआदित्योऽहनरेश्वर ॥३
भगवन् ! केन तृप्तिस्ते भवत्येव दिवाकर ।
'पोरं भोजनंददिम यातु विनधाम्यहम् ।।
स्थावरन्देहि मे सर्वमाहारन्ददता वर ।
तेन तृप्तो भवेयं वै सा मे तृप्तिहिं पार्थिव ॥५
.

मत्स्यपुगण ? ॥२॥ 1 भगवान् न शक्याः स्थवराः सर्वे तेजसाचवलेतच । निदग्धु तपताश्रीष्ठा तेन त्वांप्रणमाम्यहम् ॥६ ऋषिगण ने कहा-हे सूत जी ! महात्मा आपव का वल किस प्रयोजन के लिए कार्तवीर्य ने विक्रम करवे दग्ध कर दिया था ? इस गाथा को तात्विक रूप से वतलाइये ॥१॥ यह राजपि तो प्रजाओं की रक्षा करने वाला था ऐसा हो हमने सुना है फिर वह रक्षिता होते हुए उस तपोवन को दग्ध करने वाला कैसे और क्यो बन गया था सूत जी ने कहा---एक बार ऐसा हुआ था कि आदित्य एक के स्वरूप मे होकर कातवीय के समीप मे समुपस्थित हुये थे और उन्होंने कात्तवीय्यं से कहा था कि हे नरेश्वर ! मैं प्रादित्य हू हमको एक तृप्ति दीजिये ॥३॥ राजा ने कहा-हे भगवन् । हे दिवाकर देव ! किस से आपको तृप्ति होती है ? आप मुझे बतलाइये कि किस प्रकार का भोजन मैं आपको समर्पित करू । यह आप जब मुझे आज्ञा देंगे तो उसका श्रवण करके ही मैं प्रस्तुत करू ॥४॥ आदित्य देव ने कहा-हे पार्थिव | भाप तो दान शोलो मे परम श्रष्ठ महानुभाव हैं । आप मुझे स्थावरो का सब आहार प्रदान कीजिये उपस में तृप्त हो जाऊ गा। वही मेरी पूर्ण तृप्ति होगी ॥५।। कातवीय ने कहा-हे तपनशीलो मे परम श्रेष्ठ । तेज के द्वारा और बल के द्वारा सम्पूर्ण स्थावर निर्दग्ध नहीं किये जा सकते हैं। इसलिये मैं आपको.प्रणाम करता हूँ ॥६॥ तुप्टस्तेऽह शरान् दमि अक्षयान् सर्वतोमुखान् । ये प्रक्षिप्ता ज्वलिष्यन्ति मम तेज समन्विता ॥७ ||आविष्टाममतेजोनिशोषयिष्यन्तिस्थावरान् । । शुकानभस्मीकरिष्यन्तितेनतृप्तिनराधिप ॥८ ॥ तत शरास्तदादित्यस्त्वजुनाय प्रयन्जत । ततेो ददाह सप्राप्तानस्थावरान्सवमेवच ।। ग्रामास्तथाश्रमाश्चंद घोषाणि नगराणि च।

रोवश वर्णन १६१ तथा वनानि रम्याणि वनान्युपत्रनानि च ॥१० एव प्राचीसमदद तत: सर्वाश्चपक्षिण, निवृक्षा निस्तृणाभूमिहनाधोरेण तेजसा ॥११ एतस्मिन्नेव कारे तु आपको जलमास्थित । दश वषसहस्राणि तत्रास्तेसमहानृषिः ॥१२ पूणे अते महातेजा उददिष्ठस्तपोधनः । सोऽपश्यदाश्रम दाघमजुनेन महामुनिः ।।१३ जोन्छशाप राजपि कीर्तित वो यया मया । मोप्टो शृणुतराजवंधमुत्तमपौरपम् ॥१४ बादित्य देव ने कहा-मैं तुमसे परम सन्तुर हूँ। मैं आपको अक्षय और सर्वतोमुष वाले शरों से प्रदान करता हूँ। जो प्रक्षिप्त हुए जला देंगे क्योंकि वे सब मेरे तेज से समन्वित हो ७11 मेरे तेर से ममावेश होन से वे समस्त स्थायरों का शोपन कर देंगे। है नराधिप ! वे शुष्कों को भस्मीभूत कर देंगे । उसो से मेरी तृप्ति होगी। IIEI मून जी ने कहा-इसके अनन्तर यादिश्य देव ने उनकारों को अर्जुन के लिए दे दिये थे । इसके पश्चात् सभी सम्प्राप्त स्थावरों को दम्य कर दिया था Ital ग्राम, आश्रम, धोप, नगर, पेन और सुरम्य उपदन समो का दाह कर दिया था ॥१०॥ इस प्रशर से सम्पूर्ण प्राची दिशाको तया सभी पक्षिओ को निय कर दिया पा। उस समय में इस महादाह के होने से सम्पूर्ण भूमि वृक्षो से रहित और तणों से एकदम शून्य उस महान् घोर तेज हो गई यो तथा हवाया हो गई थी ॥११|| इमीगाल मे मापदी बस में समास्थित थे। वह महान् एपिदा सहन वर्ष पर्यन्त पहा पर ये ||१२|| ना यह जल में स्थित रहकर frये जाने वाला पद पूर्ण हो गया था तो वह ठपोपन टटकर उडे हुए थे। उस धमय में उम महामुनि ने देखा पानिश वह सम्पूर्ण बाधम पर्जुन ने दग्धकर दिया था।१६। उस महामुनि को महान योग समुत्पन्न

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मत्स्यपुरम
होगया था उन्होंने राजपि कानवीयं को तभी शाप दे दिय था जैस कि
मैंने याको बतलाया था। हे राजपिवर | अब मुइरस गोष्टु को र
पोश्य दाना दश वग करो।। १४ ।।
यस्यान्ववाये सम्भूतो विष्णणिकुलोदह ।
क्रोष्रेवाभवत् पुनो वृजिनीवान महारय ॥१५
वृजनीवतश्च पुत्रोऽभूत् स्वाहोनाममहावल ।
स्वाहपुत्रोऽभवद्राजन् । स्पगुवंदतावर ॥१६
स तुप्रसूतिमिच्छन् वरुपङ्ग सौम्य पात्मजम् ।
चित्रश्चितरथश्चास्य पूत्र समभिरन्वित ॥१७
अथ चपरथिर्वीरो जज्ञ विपुलदक्षिण ।
शशविन्दुरिति ख्यातश्चक्रवर्ती बभूव ह ॥१८
अनानुवशश्लोकोऽय गीतस्तस्मिन्पुराऽभवत् ।
शविन्दोस्तु पुनाणा शतानामभवच्च्तम् ।।११.
धीमता चाभिरूपाणा भूरिद्रविणतेजसाम् ।
तेपा शतप्रधानाना पृथुसाना महाबला ॥२०
पृथुश्रवा पृथुयशा पृथुधर्मा पृथुञ्जय ।
पृथुकोत्ति पृथुमना राजान शशविन्दव १२१
जिसके वश मे वृष्णि कुल का उदान करने वाले भगवान् विष्णु
ने समुद्गति प्राप्त की थी उस कोष्टु के महारय वृननिवान् नाम वाला
पुत्र प्रमून हुआ था ॥११॥ वृजनी का पत्र महान् वल विक्रम शाली स्वाह
माम वाला समुत्पन्न हुआ था। हे राजन् । स्वाह के पुत्र का नाम
स्पगु था जो बोलन वाले वक्ताओं में अतीव थोष्ठ था । ।।१६।। उपङ्ग.
ने जब अपनी परम सौम्य सन्तति के हाने की इच्छा की दी तो इसस
चित्र पौर विश्रय हुए थे | इसरे क्मो से समन्वित चंबरथि वीर ने
जन्म ग्रहण किया था जोकि बहुत ही अधिक दक्षिणा देन वाला या । यह
पाशविन्दु • इसी नाम स विध्याव हुआ था और चश्वर्ती राजा होमया

काटुवशवम १६३ था ॥ १७॥१२॥ इसमें यह अनुबंश का नोक प्राचीन जग समय में गाया गरा या कि शशविन्दु के मौ पुत्रों के मो ही पुत्र हुए थे ॥१॥ वे नमी परम घोमान-अमित्त और बहुत अधिक द्रविण और तेज वाले हुए थे। उन शन प्रशानी के महाबलशाली युवाहर हुए ये ॥ २० ॥ तुका, युया, युधर्मा, पृथुनय, पृयुकोति, पृथुमता शशविन्दु के राजा हुए थे ॥२१॥ शसन्ति च पुराणज्ञा पृथुप्रयसमुत्तमम् । अन्तरस्य सुयहस्य सुयज्ञस्तनयोऽभवत् ।।२. उशना तु सुयज्ञस्य यो रक्षन्पृथिवीमिमाम् । आजहाराश्वमेघानाशतमुत्तमघार्मिक. ॥२३ तितिक्षुरभवत् पुत्र नौशन. शव तापन. । महत्तस्तस्य तनयो राजीणामनुतम. ।।२४ आसीन्मसत्ततनयो वीरः कम्बलहिपः। पुत्रस्तु रुक्मकवचो विद्वान्कम्बलबहिषः ॥२५ निहत्य समावन परान् कवचधारिणः । धन्विनोविविधगिरवाप्यपृथिवीमिमाम् ।।२६ अश्वमेधे ददो राजा ब्राह्मणेभ्यस्तु दक्षिणाम् । यज्ञेतु रुकमकवच कदाचित्परवीरहा २७ जज्ञिरे पञ्चपुत्रास्तु महावीर्या धनुर्भूतः । रुखमेषु पृथरुवमश्च ज्यामयः परियो हरिः॥ जो पुराणो के ज्ञाता महामनीपो है वे उत्तम पृथुपवा की बहुत अधिक प्रासा किया करते हैं। बनर मुपज्ञ के सुया तनम हुआ था ।२२। उम मुयश का पुत्र उशना समुत्पन्न हुआ था जिस परम उत्तम धाम्मिर राजा ने इस पृथ्वी को रक्षा करते हुए ए सो मश्वमेध यस किये थे॥२३ ।। उस उशना या पुर यौगन शुओ को ताप देने वाला विध उत्पन्न हुआ था। इसरे पुत्र । नाम मरत्त पा जो राजपियों में १६४ मत्स्यपुराण । परमोतम ५। ।। २४॥ इस मरुत का पुत्र अनिवोर कम्बल वहिप नाम व ला हुआ था । कम्बल वहिप के पुत्र का नाम रुक्म क्वच था जो महान् विद्वान् हुआ था ।। २५॥ इस रुकम कवच ने दूसरे कवचधारी और धवियो का अनेक प्रकार के वाणों के द्वारा मिहनम करके इस पृथिवी को प्राप्त किया था ॥ २६॥ फिर उस राजा ने इस भूमि को अपने बल विक्रम से प्राप्त करके भी अश्वमेध यज्ञ में ब्राह्मणों के लिए दक्षिणा के रूप में प्रदान कर दी थी। किसी समय मे वीर शसुश्री के हनन करने वाल रुक्म कवच ने यज्ञ मे पांच पुत्रों को जन्म दिया था। ये पाचों पुत्र महान बलवीर्य वाले और धनुषधारी हुए थे। रुक्मों मे पृथुरुक्म-ज्यामध- परिघ-हरि थे ।। २७, २८॥ परिघ च हरि चैव विदेहेऽस्थापयपिता। रुक्मेपुरभवद्राजा पृथुरुक्मस्तदाश्रय. ॥२६ तेभ्य प्रवाजितो राज्यातूज्यामघस्तुतदाश्रमे । प्रशान्तश्चाश्रमस्थश्चद्राह्मणेनाववाधित ॥३० जगाम धनुरादाय देशमन्य ध्वजी रथी। नम्मदा नृपएकाकी केवल वृत्तिकामत ॥३१ ऋक्षवात गिरिं गत्वा भुक्तमन्यैरुपाविशत् । ज्यामघस्याभवद्भार्या चैत्रापरिणतासती ॥३२ अपुरो न्यवसद्राजा भार्यामन्यान्नविन्दत । तस्यासीद्विजयो युद्धतत्रकन्यामवाप्पसः ॥३३ भार्यामुवाच सन्त्रासात् स्नुपेय ते शुचिस्मिते। एवमुक्तात्रयोदेनकस्यचेयस्नुपेति च ॥३४ पितान परिप और हरि को विदेह में स्थापित किया था। एक्मो पृथुस्तम राजा उसके आश्रय वाला हुआ था ॥२६॥! उनमें से ज्यामाच राज्य से प्रवाचित हो गया था और उस आश्रम में रहने लगा था। वह परम प्रशान्त होकर पाश्रम में स्थित रहता था तया दाह्मण के द्वारा अब

फोटुवंश वर्णन
१६५
घोधित किया गया ॥३॥ ध्वजो रपी धनुर लेकर अन्य देश को चला
गया था। वह नुप केवल वृति को कामना से मना ही नर्मदा पर चना
गया था ॥३॥ अन्नं के द्वारा मुक्त क्षमा नाम गिरि पर जाकर वह
उपविष होमपा या ज्यापद की भार्या चैत्रा परिनत और सती यो।
॥३२॥ यह राजा दिना ही पुत्र दाना रहा करता था दोर इसने अन्य
किमी भी भार्या को नहीं प्राप्त किया था। उसका युद्ध में विजय हुआ था
वहाँ पर एक कन्या को प्राप्त किया या ॥५३॥ उनने मन्त्राम से अपनी
भार्या से कहा था कि हे शुचि स्मिते ! यह कन्या लेरी स्तुपा है उद राय
ने भार्या से इस तरह मे कहा था तो वह उसमे दोनी दी कि ग्रह किन
पी स्नुषा है?|३॥
यस्तेवनिप्यते पुत्रस्तम्य भार्या भविष्यति ।
तस्मात्सातपसोपणकन्याया सम्प्रसूरत ॥३५
पुत्र विदर्भ सुभगा चंगा परिणता सती।
राजपुत्र्यावविद्वान्सस्नुपायाळयवैथिको ।।
लोमपाद तृतीयन्नु पुत्र परमधामिकम् ॥३६
तस्या विदभाजपच्छ्राणाविशारदान् ।
लामपादान्मनु पुनोज्ञान्तिम्यनुचात्मज ॥३७
कैशिकम्य चिदि. पुत्रो तस्माच्या नृपाः स्मृताः ।
भयो विदर्भपुतस्तु कुन्तिस्तस्यात्मनोभवत् ॥३८
पुरतेष्टा सुतो बन्ने रपवृष्टः प्रतापवान् ।
धृष्टस्यपुनोधर्मात्मानिवृति परवीरहा ॥३६
तदेको निर्वृतेः पुनो नाम्ना सतुविदूरयः ।
दयाहस्तस्यदपुत्रोव्योमस्तस्यचवामृत.॥
दागार्हाच्वंद व्योमात्त.पुत्रो जोमृत उच्यते पट.
जीमूतपुत्रो विमनस्तम्यभामरथ नुतः।
मुना मीमग्यम्यानी स्मृतोनवरय दिन ॥४॥

१६६ मत्स्यपुराण तस्य चासीद्वढरथः शकुनिस्तस्यचात्मज । तस्मात्करम्भ कारम्भिर्देवरातोवभूवह ।।४२ राजा ने अपनी भार्या के इस प्रश्न पर उत्तर दिया था कि जो पुत्र तेरे उदर से जन्म ग्रहण करेगा उसी की यह भाया होगी इससे उसने अत्यन्त उग्र तपश्चर्या की थी फिर उस मुभाग-परिणता-सती चैत्रा ने उस कन्या के लिये विदर्भ पुत्र को प्रसूत किया था उस विद्वान् ने राजपुत्री मे क्रथ-कंशिक और तृतीय परम धाम्मिक लोमपाद को जन्म दिया था। । ३५, ३६|| उसमे विदम ने रण के महान् विशारद अत्यन्त शूरवीर पुत्रों को समुत्पन्न किया था । लोमपाद से मनु पुत्र उत्पन्न हुमा था और उसका आत्मज ज्ञाति हुआ था। कशिक का पुत्र चिदि नामधारी उत्पन्न हुआ थे । उससे जो समुत्पन्न हुए थे वे चंय ना कहे गये थे। विदभ का पुत्र ऋथ हुआ था और उसका आत्मज कुन्ति नाम वाला उत्पन्न हुआ था ।।३७, ३८॥ कुति से धृष्ट नामक सुत ने जन्म ग्रहण किया था जो रण मे परम धृष्ट ही था और परमाधिक प्रताप वाला था। धृष्ट पुत्र धर्मात्मा निति नामधारी हुआ जो शत्रुवीरो का हनन करने वाला था ॥३६ || उस निति से केवल एक ही पुत्र उत्पन्न हुआ था जिसका नाम विदूरथ था। इसके जो पुत्र प्रसूत हुआ था उसका नाम दशाह पा तथा इस दशाह के ही पुत्र का नाम व्योम हुआ था। इस दाशार्ह व्योम स जीमूत कहे जाने वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया था ॥४॥ जीमूत का पुत्र विमल हुआ था और फिर हज का पुत्र भीमरथ उत्पन्न हुआ पा। इस भीमरथ का जो दायाद हुआ था वह नवरय कहा गया है । ।।४।। इसका पुत्र दृढरथ हुआ तथा दढरप का शकुनि नाम वाला आरमन उत्पन्न हुमा था। इससे करम्भ और कारम्भ से कारम्भि देव. का रात ने जन्म प्राप्त पिया या ॥४२॥ देवक्षत्रोऽभवद्राजा देवरातिनंहायशा । दमभममा जश दवनक्षत्रनन्दन ॥४३ कोदश दर्मन मधुर्नाम महातेजा मयोः पुरवसत्तथा। नासीत् पुरवसः पुत्र. पुरधान् पुम्पोत्तमः || अन्नुजंजय दैदा भन्यांपुरुद्धनः । ऐश्वाकीचाभरद्धाजन्तीत्तस्थामजायत ४१ सास्वतः सत्वन युक्त सालतांकोनिक्दनः । मा विनृष्टिविनायग्नानघम्चमहात्मनः ।। प्रजावानति सायुज्य राजः नामस्म धीमतः॥४६॥ नात्वतात्तत्वसम्पन्लान्कौशल्यानुपुनेनुतान् । मजिनमजमानन्नुदिव्यदेवावृधनप ! ॥४. अन्धकच महाभोज वृष्णि च यदुनन्दनम् । तेषांनु सर्गाश्चवारीविस्तरेणंवता ॥४८ भजमानत्यमृज्जन्यावाहकाया वाह्याः। मृञ्जयस्य महेनुबाह्य स्तुतदाभवन १४६ तम्यमागिन्यो ? मुपुवाते वहून मृतान् । निमिरचमिनचंदपिरपजयम् ।। ते वाहाया नृजच्या भजमानादिमिरे ॥५॥ देवरान का पुत्र देवरादि देवत्र ने प्रमः प्राप्त किया था जो महान् पश वाला राग बाया। देवभत्र का पुत्र देवगर्भसम उनान्त हुआ या ॥४३ मा नाम दाना महान देयम्मी मा पा इन मधुपुर- घम ने जन्म प्राप्त किया। पुखय का पुत्र पुस्यों में उत्तम पुष्द्वान् हुना या ॥४॥ पुग्द्वान् ने वैदर्भी भरेना में उन्तु ने जन्म लिया था। इस जन्तु की भारी ऐश्वशको नाम वाली हुई पो । उस भाषा में सत्व से सम्पन्न मात्र नाम वाा मात्वों की कीति के दर्शन करने वाला पाहा या । महाका ज्यामर की इस विशेष सृष्टि का इन प्राप्त बरलो हो त रोगि हुई थी। शेमान् राजा मोम का सायुम जारान् चलता है ।।४६|| गल्ला ने तत्व से मुसम्पन्न सात्वतों के १६८ मत्स्य-पुराण ! प्रसूत किया था। हे नृप ! भजिन-भजमान-दिव्य-देवावृध-अन्धक- महाभोज और वृष्णि हे यदु नन्दन ! ये उत्पन्न हुए थे। उनके चार प्रमुख सर्ग थे । अब विस्तार से उनका श्रवण करो ॥४७,४८॥ भजमान के सृञ्जयो मे और वाधुका मे वाह्यक हुए थे। सृञ्जय की दो सुताएँ थी। उस समय मे वाह्यक हुए थे ॥४६॥ उसको दोनो बहिनें भार्याएँ थीं जिन्होंने बहुत से सुतो को प्रसूत किया था । निमि-कृमिल-वरिण और परपुरञ्जय ये सब वाह्यका और सञ्जयो मे भजमान से समुत्पन्न हुए थे ॥५०॥ जो देवावृधो राजा बन्धूना मित्र द्धनः । अपुत्रस्त्वभवद्राजा चचार परमन्तपः।। पुत्र. सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्पृहन् ॥५१ सयोज्य मन्त्रमेवाथ पर्णाशाजलमस्पृशत् । तदोपराशनात्तस्य चकार प्रियमापगा।५२ कल्याणत्वान्नरपतेस्तस्मसानिम्नगोत्तमा । चिन्तयाथपरीतात्माजगामाथविनिश्चयम् ।।५३ नाधिगच्छाम्यह नारी यस्यामेवविधः सुत. । जायेत तस्माद्दद्याह भवाम्यथसहस्रशः ॥५४ अथ भूत्वा वुमारी सा बिभ्रती परमं वपुः । शापयामास राजान तामियेप महाव्रतः ॥५५, अथ सा नवमे मासि सुपुवे मरिता वरा । पुत्र सर्वगुणोपेत बभ्र देवावधान्नपात् ।।५६ वापुओं का मित्र वधन राजा देवध ने जाम ग्रहण दिया था रिन्तु यह राजा पुत्रहीन ही हुआ था और इसने परम उग्र तप का समा पाणु पिया था। उसकी यही इच्छा थी कि मेरा जो पुत्र हो यह समस्त गुणों से मुगम्पन्न होना चाहिये ॥५१|| इसके अन्तर मना संयोगन परके मन पगला के जल का उपपर्णन किया था। उस समय में उसके कोष्टवश वर्णन उपस्पर्शन से उस सरिता ने उसका प्रिय कर दिया था॥५२॥ नरपति के कल्याण के हेतु से वह नदी उसके लिये अत्युत्तमा हुई थी। वह चिन्ता से परीत आत्मा वाता था किन्तु इसके उपरान्त यह विनिश्राम को प्राप्त हो गया या ॥५३॥ मेरे पास ऐसौ नारी ही नहीं प्राप्त है जिसमें इस प्रकार का सकल गुणाही उमन्वित पुत्र समुत्पन्न होवे। इसलिये में आज सहसा होता हू॥५४॥ इसके अनन्तर वह परम सुन्दर शरीर धारण करन वाती कुमारी होकर उसने राजा को सापित किया था और उस महाना न उसा कुमारी का प्राप्त करने की इच्छा की थी ॥५५फिर इसके उपरान्त उस सरितामा मे परम श्रेष्ठा न नवम माम म दवध नृप से समरत्त गुणगण से युका व नामक पुत्र को प्रसूत किया था ॥५६॥ अनुवशे पुराणज्ञा गायन्तोतिपरिथतम् । गुलान् देवावृपस्यापिगीतंयन्तो महात्मनः ॥५७ यर्थव शृणुमो दूरादपश्यामस्तथान्तिकाए । वनः श्रेष्ठोमनुष्याणा देवर्देवावृध.सम ॥५८ पष्टिश्च पूवपुरपाः सहस्राणि च सप्तति । एलेऽमृतत्व सप्राप्ता बभोर्देवावृधान्नृप ! ॥५६ यज्वा दान पतिर्वीरो ब्रह्मण्यश्च द्वढव्रत । रूपवान्तुमहातेजाः धृतवीय्यधरस्तथा ॥६० मथ कइस्य दुहिता सुधुवे चतुर सुतान् । कुकुर भजमानन्च शि कम्बलपिम् ।।६१ कुकुरस्यसुतोवृष्णिवृष्णेस्तुननयाधुति । कपोतरोमातस्थापतत्तिरिस्तस्यात्मनः ॥६२ तस्यासीतनुजापुस्रो सखाविद्वान्नल किल । स्यायतेतस्पनाम्नाचनन्दनादरदुन्दुभि ॥६३ पुराणों के ज्ञाता विद्वान इस अनुवश में इस परिश्रुन आख्यान का गायन किया करते हैं और महान आत्मा वाल देववृध के गुणो का भी १७० मस्म्यपुराण पीर्तन किया करते हैं । जिस तरह से हम दूर से श्रवण किया करते उसी भांति समीप मे पहुँच कर देखते -वज्र, मनुष्यो में परम श्रेष्ठ है और देवा वृधदेवो के ही समान है ।।५७, ५८॥ हे नृप ! साठ और सत्तर सहस्र पूर्व पुरुप देवावृध वन्न के अमृतत्व को प्राप्त हो गये थे। ॥५६॥ यह यजन करने वाला-दानवलि-वीर-ब्रह्मण्य-दृढवत वाला- रूप लावण्य से युक्त-महान तेज वाला तथा श्रुतवीय॑घर या ॥६॥ इसके अनन्तर कङ्क की पुत्री ने चार सुतो को प्रसूत किया था। उनके माम कुकुर--भजमान -- शशि और कम्बल वहि थे ।।६१।। कुकुर को पुत्र वृष्णि समुत्पन्न हुआ था और वृष्णि का सुत धृति हुआ था। इसका दायाद कपोतरोमा था और उसका आत्मज तैत्तिरि सनु-पन्न हुआ था। ।।६२।। उसके तनुजा का पुत्र सखा तथा विद्वान् नल था । उसके नाम न नन्द नोदर दुन्दुभि स्यात होता है ॥६३।। तस्मिन्प्रदितते यज्ञे अभिजातः पुनर्वसुः । अश्वमेध च पुत्रार्थमाजहार नरोत्तम. ॥६४ तस्यमध्येतिरात्रस्यसभामध्यात्समुत्थित. । अतस्तुधिद्वान्कर्मज्ञोयज्वादातापुनर्वसु ॥६५ तस्यासीत् पुनमियुन बभूवाविजित किल । आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातमतिमतावर ॥६६ इसाश्चौदाहरन्त्यत्रश्लोकान्प्रतितमाहुकम् । सोगसङ्ग नुकणासध्वजानावरूथिनाम् ।।६७ रथाना मेघघोपाण सहस्राणि दर्शव तु । नासत्यवादी नातेजा नायज्वा नासहस्रद ॥३८ नाशुनिप्पविद्वान् हियामोजेय प्रजायन । आहास्यभूति प्राप्जाइ-येतद्वादुच्यते ॥६६ अदाश्चाप्ययन्तीपुस्पसारवाहकी ददौ। भागन्याश्यपुहिता दो पुतौसमस्यत । ७० कोष्टुवश वर्णन १७१ उस यज्ञ के दितत होने पर पुनर्वसु अभिजात हुआ था। नरी में उत्तम उसने पुत्र की प्राप्ति के लिये अश्वमेध यज्ञ किया था ॥ १४ ॥ अतिराव उसके मध्य में समा के मध्य से समुत्ति हुआ था। इसीलिय पुनवंसु यत्वा ( यज्ञ न करने वाला )-विद्वान् कर्मों का ज्ञान रखन वाला और दानशील था । हे मतिमानो मे परमश्रेष्ठ ! आपके अविजित पुत्रो का एक जोडा समुत्पन हुआ था जिनके नाम आहुक और आएको प्रसिद्ध हुए थे।॥६५॥ यहाँ पर उस आक के प्रति इन प्रलावा वो उहत करते हैं कि उपासनानुकमों के सहित और वजामा क सहिन-बल्थी-मेघधोप रयो की दम सहप्स सध्या उसक पास थी। वह असत्यवादी नहीं था-गेजहीन-यजमन करने वाला और एक सहस्र स कम देने वाला नहीं था । ६६, ६७ ॥ वह अशुचि-अविद्वान भी नही था। जो मोगो में अमिजात हुआ था। आलुक को भूति का प्राप्त हुए थे-यदो कहा जाता है ।।६८, ६६ ॥ आहुक न अब-तीयो म आहुको को दिया था । माहुक से काश्य दुहिता न दो पुत्रो को प्रमूल किया था ॥२०॥ देवकरचोग्रसेनश्च देवगभपमाबुभो। देवकस्य सुना वीरा जगिरे निदशापमा ७१ देववानुपदवश्च सुत्रो देवरक्षित । तेपा स्वसार सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ १७२ देवकी श्रनदेवी च यशादा च यशापरा। श्रीदेवो सत्पदवी चसुतापो चेतिसप्तमी ।७३ नाममनस्या सुता कशस्तेपातु पूर्वज । भ्यग्राश्च सुनामा च कशङ्काच भूयस ॥४ सुनन्तराष्ट्रालश्वयुद्धमुष्ट सुमुष्टिद । तेवा स्वसार पञ्चामन् कमाफसवता तथा ७५ रतला राष्ट्राली चकड़ा नेपगना।

१७२ मत्स्यपुराण - उग्रमेन सहापत्यो व्याख्यातःकुकुरोद्भवः ॥७६ भजमानस्य पुत्रोऽथ रथिमुख्यो विदूरथः । राजाधिदेव. शूरश्च विदूरथसुतोऽभवत् ।।७७ उन दोनो का देवक और उग्रसेन ये दो नाम थे। ये दोनों देव- गर्भ के समान थे । देवक के सुत परम वीर और देवो के ही समान थे ।।७१ ।। उनके नाम देववान-उपदेव-सुदेव और उपरक्षित थे । इनकी सात भगिनियां थीं जो वे सब बसुदेव के लिये ही गयो थीं ॥७२॥ इन सातों के नाम देवको-श्रु तदेवी-यशोदा-यशोधरा-श्रीदेवी-सत्यदेवी और इनमें सातवी बहिन का नाम वसुतापी हुआ था ॥७३ ।। महाराज उग्रसेन के नौ सुत हुए थे उन सबमे कस सबसे बड़ा प्रथम पुत्र था। शेप नो में से पाठ के नाम-न्यग्रोध-सुनामा-कर-शकु-सुतन्तु- राष्ट्रपाल-युद्धमुष्टि और समुष्टिद थे। उनकी बहिनें भी पांच यों- कमा-सावती-मुत-तु-राष्ट्राली और कहा ये उन पापों के नाम हैं । ये सभी घराङ्गनाऐ थी। उग्रमन सहापत्य कुकुरोद्भव घ्या. स्यान दिया गया है । यजमान का पुत्र रथियो मे प्रमुख मोर राजाधिदेव विदरण हुआ पा । विदूरय के यहाँ भर नामक पुत्र ने जन्म लिया था। ।। ७४,७५,०६, ७७ ।। राजाधिदेवस्य सुतो जज्ञाते देवसमिती। नियमव्रतप्रधानो शोणाश्व श्वेतवाहन. ॥७८ शोणाश्वस्यमुताः पञ्चशूरारणविशारदाः । शमीच वेदार्मा च निकुन्त.शश जित् ।।७६ समिपत्रः प्रतिक्षत्र प्रतिक्षत्रस्य चात्मजः । प्रतिक्षेत्र मुतोभोजोहृदीवस्तस्य चात्मजः ॥८० हवीरस्याभवन् पत्रा देश भीमपराक्रमाः । धृतवर्माग्रजातपा शतधन्वा च मध्यग. 1151 देवायद नामश्च भीषणश्च महायस. ।

कोप्टुवश वर्णन
अजातो वनजातश्च कनं यकारम्मको २
देवाहस्य सुनोविद्वानजने कम्बलवहिपः ।
असमञ्जाः सुतस्तस्य तमोजास्तस्यचात्मज. ॥८३
अजाताना विक्रान्तास्त्रय. परमवीतय ।
सुदष्ट्रश्च सुनामश्च कृष्ण इत्यन्धकामता ॥
अधिकानामिम वश यः कीर्तयतिनित्यश ।
आत्मनो विपुल वर्श प्रजावानाप्नुते नर.14
राजाधिदेव के दो पुत्रो ने जम ग्रहण किया था और ये दोनों
ही देवों के सदृश थे। दोनो के नियम और प्रत की प्रधानता यो।
इनके
शुम नाम शोणारख मोर श्वेत
वाहन
थे॥७॥शोशाश्व के परम
शूरवीर और रण विद्या के महा विद्वारा पांच पुत्रों ने जन्म धारण किया
था। शमी वेदशा-निकुन्त-शकारित-ये उन पांचो के शुभ नाम
है । गमी का पुत्र प्रतिमात्र हुमा और प्रतिसत्र का आत्मज प्रतिक्षेत्र पा।
प्रतिक्षेत्र का सुन मोन और उसका आस्मज हदीक उत्पन्न हुमा पा॥७३,
८०॥ हृदोक के भीम पराक्रम वाले दश पुत्रों ने न्म लिया था । उनमें
वर्मा सबसे प्रपम उत्सान हुआ था और शतम्या उनमे मध्यम पुष
था।॥१॥ दोष देवाह-नाम- मीषण-महावल-अजात-वनात
मनीपक-रम्मक ये नाम हैं ।। ६२॥ देवाह की भार्या में देवाहं से
अतिपय विद्वान् कम्बल वहिं ने प्रसव प्राप्त किया था। उसके पुत्र
मसमजाया और इसरे पुत्र तमोगा समुत्पन्न हुमा पा॥३॥ प्रजात
के परम विक्राना प्रति वर विकर वाले और वयम कीतिशाली तीन
पुष हुए थे। सुदष्ट-पुनाम और कृष्ण ये उन दोनों के गुम नाय थे।
ये सब अन्धक माने गये हैं ।। ४॥ अन्धकों के इस वाबो कोई
पुष्प
नित्य ही कौतन किया करता है वह प्रजावान नर अपने आपका
दिन वापरता है।

मस्त्यपुराण
२३--स्यमन्तकमणि का संक्षिप्त चरित्र
गान्धारी व माद्री च वृष्णिभार्येवभूवतुः ।
गान्धारी जनयामास रामिन मियनन्दनम् ।।१
माद्री युधाजित पल ततो वे देवमीढुषम् ।
अनमित्र शिबिचैव पञ्चम कृतलक्षणम् ।।२
अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्यापितुद्वौ सुतौ ।
प्रसेनश्चमहावीर्य शक्तिसेनश्च तावुभौ । ३
स्यमन्तक प्रसेनस्य मणिरलमनुत्तमम् ।
पृथिव्या सर्वरत्नानाराजावं सोऽभवन्मणि ॥४
हदिकृत्वातुबहुशो मणिन्तमभियाचितम् ।
गाविन्दोऽपिनत लेभेशक्तोऽपिनजहारस ।
पदाचिन्मृगया यात प्रसेनस्तेन भूपित ।
यपाशब्द स शुश्राव बिले सत्वेन पूरिते ॥६
ततः प्रविश्य स बिल प्रसेनो सक्षमंत्तत।
ऋक्ष प्रमेनञ्च तथा ऋक्षवप्रसेनजित् ॥७

१७५ स्तनमान का सक्षिप्त चरित्र ने भी उमको प्राप्त नहीं किया। वह सर्व समर्थ होते हुए भी उसका हम उन्होंने नही स्त्रिया ।। ५। किसो समच में उसो मणि से भूपित होकर प्रसन मृगया वो ग्रीडा करने के लिये चला गया था। पिसी हिमा पशु जैमा उसने दिल मे गन्द का श्रवण किया था जो कि सस पूरित या ॥ ६ ॥ इस पश्वात् मृगया के मत्त प्रसेन ने उममे प्रवेग किया था। वहां पर उमर ऋक्ष को देखा था। वर्ग पर शेगो ऋक्ष और मन में युद्ध हुआ अन्त में ऋक्ष ने प्रसेन पर विजय प्राप्त करली था॥७॥ हत्या ऋक्षः प्रसेनन्तु ततस्त मणिमाददात् । अट्टप्टस्तु तस्तेन अन्तपिलगतस्तदा । प्रननन्तु हत ज्ञात्वागोविन्द परिशङ्कितः। गाविन्देन हताव्यक्त प्रमेनोमणिकारणात् ।।६ प्रसेनस्तु गतोऽरण्य मणिरत्नेन भूपित.। त द्वष्ट्वा स हतस्तेन गोविन्दः प्रत्युवाच ह ॥ हन्मि न दुराचारं शत्र भूत हि वृष्णिपु ॥१०॥ भय दोघेण कालेनमृगयानिर्गत.प न । यद्वन्ध्याच गोविन्दोविलम्याभ्यासमागमत् ।।११ त दृष्ट्वा तुमहाराब्दसचाक्षराट् ली। शब्द थ त्वातु गोविन्द सङ्गपाणि प्रविश्यसा ।। अपश्यग्जाम्बवन्त त एक्षराज महाबलम् ।।१२।। सतस्तूर्ण हृषीकेशम्तमृक्षपतिमञ्जसा । जाभ्यन्त स जग्राह प्रोध सरक्त लोचनः ।।१३ तुष्टावन तदा शुक्ष. कर्मभिर्वप्णवःप्रभुम् । ततस्तुष्टस्तु भगनान् वरेणं नमरोचयत् ॥१४ नम ने प्रसेन पायध से उमर यह मणि पहण फरसो पो। उस समय में वह न हा रिमो मे द्वारा भी नहीं देखा गया था और १७६ मत्स्यपुराण विल के अन्दर चला गया था ॥८॥ प्रसेन को हम जानकर गोविन्द बहुत अधिक परिशक्ति हो गये थे। यही उग समय में स्पष्टतया प्रतीत हो गया था कि गोविन्द ने ही स्यमानक मणि के कारण से उमा हनन क्यिा है ॥ ६॥ प्रसेन तो उम मणि रत्न से विभूषित होकर ही अरण्य मे गया पा। उसको देखार उसी के द्वारा उसयो हत किया गया है- यही गोविन्द ने उत्तर दिया था। मैं वृष्णियों पत्र के समान उस दुराः पारी का अवश्य ही हनन करूंगा ।। १० । इसके अनन्तर बहुत लम्बे समय के पश्चात् यह इच्छा से गोविन्द पुन: मृगया के लिये निकल कर गये थे। विचरण करते हुए यह इच्छा से ही गोविन्द उसी विल के समीप में प्राप्त हो गये थे ॥११॥ उनको देख कर पली ऋक्षराट ने महान् शब्द किया था । उप्त ऋक्ष के महारव को श्रवण करके गोविन्द ने हाथ मे खङ्ग धारण करके उस बिल मे प्रवेश किया था और वहाँ पर महान् बलशाली क्षराज उस जामवन्त वो जाकर देखा था ॥१२॥ उसको देखकर क्रोध से रक्त नेत्रो वाले होकर हृषीकेश ने तुरन्त ही एकदम उस ऋक्षपति जामवन्त को पकड लिया था ॥१३ ।। उस समय मे ऋक्षराज जामवन्त ने वैष्णव कर्मों के द्वारा इन प्रभु की स्तुति की थी। इसके पश्चात भगवान् परम सन्तुष्ट हो गये थे और वरदान के द्वारा इसको भी प्रसन्न कर दिया था ।।१४॥ इच्छे चक्र प्रहारेणत्वत्तोऽहं मरणंप्रभो ! । कन्याचेयममशुभा भर्तारत्वामवाप्नुयात् ।। योऽय मणि. प्रसेनन्तु हत्वा प्राप्तो मया प्रयो ॥१५॥ तत सजाम्बवन्त त हत्वाचक्रणव प्रभुः । कृतकर्मा महाबाहुः सरन्यं मणिमाहरत् ।।१६ ददो सत्राजितायन सर्वसात्वदससदि । तेन मिथ्यापवादेन सन्तप्ता ये जनार्दने ॥१७ ततस्ते यादवाः सर्वे वासुदेवमथाब्रुवन् । 1 स्पमन्धकमणि का सक्षिप्त चरित्र sa अस्माकन्तु मतियासीत्प्रसेनस्तुत्वयाहतः॥१८ ककैयस्य सुता भार्यादशसत्राजितः शुभाः। तामूत्पन्नाः सुतास्तस्य सर्वलोकेपुषिश्रुता.॥ ख्यातिमन्तो महावीर्या भङ्गकारस्तु पूजः ॥१६ अथ प्रतवती तस्मात् भङ्गकारात्त पूवजात्। सुपुर्व मृकुमारीस्तु तिन.कमललोचनाः ॥ २० सत्यभामा वरास्त्रोणा तिनीयदृट्वता। तथा पद्मावतीनैवत्ताश्च कृष्णायसोऽददात् ॥२१ जाम्बवन्त ने कहा-हे प्रभो ! मैं तो अब आप से ही चक के प्रहार के द्वारा मृत्यु को ही इन्वा करता हूं। यह एक मेरी परम शुम एक कन्या है वह पाप को ही अपना मर्ता प्राप्त कर लेवे 1 है प्रभो ! मैंने ही प्रसन का हनन करके यह मणि प्राप्त की है ॥१शा इसके अनन्तर उन प्रभु ने चक्र के द्वारा जाम्बवन्त रा उमो को इच्छा के अनुसार हनन कर दिय पा पार कर्म समाप्त करके महान वाहुओं वाले प्रमु उम कन्या के साथ ही मरिण का समाहरण कर लिया था ॥११॥ फिर द्वारका में समस्त सात्वतों यो समा मे बुलाकर उस मणि को सत्राजित को दे दिया था। फिर जो जनार्दन प्रभु के विषय मे मिथ्या अपवाह लगा रहे घे वे बहुत ही सतप्त हुए ये ॥१७॥ इसके उपरान्त सभी यादवों ने भगवान् वासुदेव से रहा पा कि हमारा सबका विचार तो यही निश्चित हो गया था कि प्रसेन को भारने हो मार दिया है ।।१८। बीररी दम मुम सुनाएँ सारिन् सी माए दी। उस सारित के उन दसो मात्रिो में समुत्पन्न पुन समस्त तो में विश्रये ॥ ये सब रडी ही अधिक साडि वाले ये मोर महान बल-वायं में मुमम्पन्न हुए हैं। इनमें भृङ्गार मदमे प्रथम उपान दामा ओम या। इसके बनानर स पूर्वज मार से उनकी पत्नी में कमल के महा नेत्रों वाली परम मुन्दगे तीन मुजुमारी कन्यामो को प्रमूत किया था ॥२०॥ सत्यभामा समो स्त्रियों में परम धेष्ट पो- मत्स्यपुराण वतिनी सुदृढवत बाली थी और तीमरी पद्मापती थी। उन तीनों के हो उसने श्रीकृष्ण के लिये दे दिया था॥१२॥ अनमित्रात शनिर्जज्ञे कनिष्ठाद् दृष्णिनन्दनात् । सत्यवास्तस्य पुअन्तु सात्यकिरतस्य चात्मजः ।।२२ सत्यवान्युयुधानस्तुशिनेनंप्ताप्रतापवान् । असङ्गोयुधानरयद्यम्निस्तरयात्मजोऽभवत् ।।२३ युम्नेयुगन्धर:पुत्रइतिशैन्याः प्रकीत्तिताः । अनमित्रान्वयोह्येषव्याख्यारोवृष्णिवशजः।।२४ अनभित्रस्य सजज़ पृथ्व्या वीगेयुधाजितः । अन्योतु तनयो वीरो वृपभः क्षमएव च ॥२५ बृपभः काशिगजस्य सुता भार्यामविन्दत । जयन्तस्तु जयन्त्यान्तुपुत्र समभव छुभः ॥२६ सदा यज्ञोऽति वीरश्च श्रतवानतिथिप्रियः । अक्र:सुपुवे तस्मात्सदायज्ञोऽतिदक्षिणः ॥२७ १८० मत्स्यपुराण पुत्र हुए थे उनके शुभ नाम 11३१॥इस के पश्चात् आम्बिनी जो ये होते है -पृयु, विपृयु, अश्वत्थामा, सेवाहु, सुपार्श्वक, गवेषण, वृष्टिनेमि, मुशर्मा, शर्याति, अभूमि, वर्णभूमि, मिष्ठ, थवण । इस मिथ्या अभिशस्ति को जो जो भगवान् कृष्ण से अपोहित की गयी है जो भो कोई जानता है तथा नित्य नियम से इसका पाठ तथा श्रवण किया करता है वह पुरुष कभी भी किसी के भी द्वारा मिथ्याभिशाप से अमि- शाप्य नहीं होगा ॥३२॥३३॥३४॥ २४-कृष्णोत्पत्ति वर्णन ऐक्ष्वासी सुपुवे शूर स्यातमद्भुतमीदुपम् । पौरपाजनिरे शूरात् भोजायापुसवादश ॥१ वसुदेघो महावाहु पूर्वमानादुन्दभिः । देवमार्गस्ततो जज्ञे ततो देवश्रवाः पुनः॥२ अनाधृष्टिशिनिश्चैव नन्दचय ससृजयः। श्याम मा सयुप पञ्चचास्यवरागनाः॥३ मतकोति पृया पव तदेवोधतश्रवाः । राजाधि देवो न तपा पता वीरमातरः ॥४ वृतम्य तु ता देवी मुग्रह गपुये सुतम् । ग्या श्रुतकार्यान्तु ज सोनुव्रतोप. ॥५ भनयामि चम्प गनीयः ममत। नापिया धामंशारीर म पवारिमर्दनः ।। *च गान पदगो निमारगुतांददो। विनोमगारयातायमदेवरवसा पपा ॥७ १८२ मत्स्यपुरण पष्ठो भद्र विदेहश्च कंसः सर्वानघातयत् ॥१३ प्रथमाया अमावास्या वापिकी तु भविष्यति। तस्या जज्ञे महावाहुः पूर्वकृष्ण प्रजापतिः ॥१४ वसुदेव ने उस को पाण्डु के लिये प्रदान कर दी थी जो कि उस की परम प्रशस्त भार्या हुई थी। उसने पाण्डु के अर्थ के द्वारा महारथ देव पुत्रों का जन्म दिया था। धर्म से युधिष्ठर ने जन्म लिया था। वायु देव से बृकोदर मे प्रसव प्राप्त किया था। इन्द्रदेव मे धनञ्जय को समुत्पन्न किया था जो शक्र के ही तुल्य वल परात्रम वाला हुआ था। Pel माद्रवती मे तो ऐसा सुनते हैं अश्विनी कुमारो से दो पुत्र नकुल और सह समुत्पन्न हुए थे जो रूप लावण्य शील और अनेक गुण गणों से समन्वित थे॥१०॥ पौरवी रोहिणी नाम वाली माया ने आनक दुन्दुभि से परम विख्यात ज्येष्ट सुत बलराम की प्राप्ति का लाभ उठाया था और उस प्रिय सुत का सारण भी हुआ था ।।११।। अन्य सुन थे उनके नाम इस प्रकार से हैं-दुईम-दमन--सुभ्र --पिण्डारक महा- हनु । उस समय मे चित्रा अक्षी दो कुमारियो ने भी रोहिणी मे ज.म ग्रहण किया था ॥१२।। देवको मे शौरि से कीनिमान् सुपेण – उदासी- भद्ररोन तथा ऋषिवास-छटवां पुत्र भद्र नाम वाला था और विदेह ये पुत्र समुत्पन्न हुए थे किन्तु कस ने सभी का घात कर दिया था ||१३|| प्रथम अमावस्या से वापि की होगी। उसमे महान् वाहुप्रो वाले प्रजापति श्री कृष्ण पूर्व मे समुत्पन्न हुए थे ॥१४॥ अनुजात्व भवत् कृष्णात् सुभद्राभद्रभापिणा • देवक्यान्तु महातेजा जज्ञे श्रीमहायशा. १५ सहदेवस्तु ताम्राया जज्ञ शोरिकुलोद्वहः । उपासङ्गधर लेभे तनय देवरक्षिता॥ एषा वन्य व सुभगाइ सस्तामभ्यघातयत् ॥१६॥ विजय राचमानञ्च वद्ध मानन्तु देवलम् । - कृष्णोति वर्णन १८३ एते सर्वे महात्मानोपदेव्याः प्रजजिरे॥१७ अवगाहो महात्मा च वृकदेध्यामजायत । वृकदेच्या स्वय जज्ञ नन्दको नामनामतः ॥१८ सप्तमं देवको पुत्र मदन सुपुवे नृप । गवेपण महामाग समामेव पराजितम् ।।१६ श्रद्धा देच्या विहारे तृ बने हि विचरन पुरा । वैश्यायामदधात् शौरि.पुत्र कौशिकमग्रजम् ॥२० सुतनूरथराजी च चोरेरास्तां परिग्रहो। पुण्ङ्गश्च कपिलरचव वसुदेवात्मजो बली ।।२१ कृष्ण से पीछे एक अनुशा सुभद्रा नाम माली समुत्पन्न हुई पो जो परम भद्र भाषण करने वाली थी। देवकी में देजम्वी तना महा यशस्वी गूर ने जन्म प्रहण किया था ॥१५॥ शौरिकुल का उदहन करने वाले सहदेव ने ताम्रा जन्म प्राप्त किया था और देवशक्षिता ने उपासङ्ग- घर पुत्र प्राप्त करने का सोम उठाया था। परम सुभगा एक कन्या म मुत्पन्न हुई यो किन्तु उसी समय मे दुष्ट कंस ने उसका पार कर दिया पा॥१६॥ विजय-रोचमानबर्द्धमान-देवल ये समस्त महान आत्माओ दाले पुत्रों ने उपदेयो के सदर से जन्म प्राप्त किया था ॥20॥ महात्मा अवगाह वादेवी में उत्पन्न हुआ था। वादेवी मे नन्दक नाम धारी ने यस जन्म राप्त किया था 10 है नप ! देवकी ने सातवा पुत्र माना का प्रत किया था और सग्रामों म परास्ति न हो। बाने महाभाग भवे- या नामक पुत्र को उत्पन्न क्यिा या १६ पाम प्राचीन समय में श्रद्धा देशी पन में बिहार के समय में विवरण परते हुए शौरि ने येमा में अप पुत्र गिक को धारण किया था ॥२०॥ सुनन् रयराजों ये हो दो गोरि के परिषद हुए ये ॥२॥ जरानाम नियादोऽभूत् प्रथम. स धनुर्धरः। सोभद्रश्च भरीव महासत्वो बभूवतुः ॥२२

१८४
मत्स्यपुराम
देवभागसुतश्चापि नाम्नाऽसावुद्धवः स्मृतः।
पण्डितं प्रथमं प्राहुर्देवधवः समुद्भवम् ।।२३
ऐक्ष्वाक्यलभतापत्य अनाधृष्टेयंशस्विनो।
निर्धू तसत्वं शत्रुघ्न श्राद्धस्तस्मादजायत ।।२४
करूपायानपत्याय कृष्णस्तुष्टः सुतन्ददौ ।
सुचन्द्रन्तु महाभाग वीर्यवत्त महावलम् ॥२५
जाम्बवत्याः सुता वेतो द्वौ च सतृक्तलक्षणो।
चारदेष्णश्च साम्बश्ववीयवन्तो महावलो ॥२६
तन्तिपालश्च तन्तिश्च नन्दनस्य सुतावुभौ ।
समीकपुत्राश्चत्वारोविक्रान्ता.सुमहावला. ।।
विराजश्व अनुश्चेव श्याम्यश्च सञ्जयस्तथा ॥२७
अनपत्योऽभवच्छयाम शमी कस्तुवनंययो।
जुग समानोभोजत्वं राजपित्वमवाप्तवान् ॥२८
प्णास्य जन्माभ्युदय र कोतयतिनित्यशः ।
शृणोति मानवोनित्यसर्वपापः प्रमुच्यते ॥२६

Tसन्तान वर्णन
१०५
पे जिनके नाम विराज-धनु-श्याम और सृघ्नय थे ॥२७॥ इनमें
भयाम अपत्य से रहित हो गया था अनि उसरे कोई भी सन्तति नहीं
हुई थी। शमीक दो वन में चला गया था और भोजत्व को जगुप्सा परता
हुआ वह राजपि के पद को प्राप्त हो गया था ॥२। यह श्रीरप्ण के
अन्म का अभ्युदय है इसको जो पुरुष नित्य ही नियम में कोतित निया
करता है अयवा सायम किया करता है वह मानव समस्त प्रार
के पापों से मुक्त हो जाता है ।।२६।।
२५---कृष्णमन्तान वर्णन
अथ देवो मदेव पूर्व कृष्णः प्रजापतिः ।
विहाराचं स देवेशा मानुपेप्विह जायते ॥
देवक्या वसुदेवस्य तपमा पुष्करेक्षण ।
चतुम्तिदा जातोदिव्यम्पोजलन्धिया ॥२
श्रीवत्सलक्षण देवं दृष्ट्वा लक्षणः ।
उवाच वसुदेवस्त रूप सहर वै प्रभो ॥३
भीतीह देव ! कसस्य ततस्स्वेतदयामि ते ।
ममपुवाहतास्तेगरोटारतभोमविक्रमा ॥४
यमुदेववषः रवा रूप सहरतेऽच्युत. ।
अनुमाप्य तत. जौरि नन्दगोपगृह जयत् ।।५
दावन नन्दगोरस्य पनामिति चारवीन् ।
अतस्तु मब कल्याणणदवानामविष्यति ॥६
महामहरिधी भूसीहा-मो मागर महान देशव
प्रमात श्री में विहार निरे ही वह दोषा 1 समार मे
मनुष्यों में ममुगम हमारत है ॥१॥ मुवमेना.महो देसी
पुप-चार पुगोस EिTA TRI मे TREE.

१८६ मत्स्यपुगण मान होते हुए उस समय मे प्रादुर्भूत हुए थे ॥३॥ श्रीवत्स के धारण करने के लक्षण वाले तथा दिव्य लक्षणो से सयुत देव का उस समय मे दर्शन करके ही वसुदेव ने उनसे प्रार्थना की थी कि हे प्रभो ! आप अपने स्वरूप को सहृत कर लीजिए ॥३॥ हे देव । मैं राजा कस से अत्यन्त ही भय- भीत हो रहा हूँ इसीलिये आपसे यह निवेदन करता है। इस दुष्ट क्स ने मापसे पहिले समुत्पन्न हुए आपके ज्येष्ठ भाई मेरे पुत्रों का हनन कर डाला है जो कि भीम वल पराक्रम स युक्त ये ॥४॥ वसुदेव की प्रार्थना के इन वचनो का श्रवण करके भावान् अच्युत ने अपने उस दिव्य स्वरूप का संवरण कर लिया था। इसके उपरान्त उन्हाने शौरिकी अनुज्ञापन दिया था और वह उनको नन्द गाप क गृह मे ले गये थे ॥ ५॥ इनको वसुदेव ने नन्द गोप के सुपुद करके यह कहा था कि आप ही मेरे इस पुत्र की रक्षा कीजिए। इस ही सब यायो का कल्याण होगा ॥६॥ क एप वसुदेवस्तु देवकी च यशस्विनी । नन्दगोपश्च कस्त्वेष यशोदा च महाव्रता 10 यो विष्णु जनयामास यञ्च तातेत्यभाषत। या गर्म जनयामास याचन स्वभ्यवर्द्ध यत् ।। पुरुष कश्यपस्त्वासीददितिस्तु प्रिया स्मृता । ब्रह्मण कश्यपस्त्वाश पृथिव्यास दितिस्तथा ॥६ अथ कामान् महावाहुर्देवक्या. समपूरयत् । ते तया काह क्षितान्त्यिमजातस्यमहात्मन. ॥१० सोऽवत ! मही देव प्रविष्टो मानुपीतनुम् । मोह्यन्सवभूतानियोगमा योगमायया ।।११ नप्टे धर्म तथा जज विष्णुणिले प्रभु । वतु धम्मस्य सम् असुराणाप्रणाशनम् ।।२ रदिमणीसत्यभामाचर त्याना नतितथा।

कृष्णसन्तान वर्णन १८७ सुभामाचतथागव्यागाधारीलक्ष्मणा तथा ॥१२ मित्रविन्दा चकालिन्दीदेवीजाम्बवतीतथा। सुशोलाचतयामाद्रीकौशल्याविजयातया ।। एवमादीनि देवीनां सहस्राणि च पोड़रा १५ मुनिगण ने कहा-यह वसुदेव कौन ये यौर परम यशस्विनो यह देवकी कौन थी? नन्द नाम वाला यह जो गोप आपने बतलाया था यह मी कौन हुआ था तथा महान् यत वालो यशोदा कौन थी ? ||७॥ जिसने भगवान् विष्णु को पुत्र के रूप के रूप में जनन दिया था और जिसोलाल कह कर पुका था जिसने अपने गर्भ में रखकर इनको जन्म प्रहण कराया था और जिसने इनका वारपावस्या में परिवद्धन दिया था ॥८}} मूनजी ने कहा-कश्यप नाम वाले पुरुप थे और अदिति नाम वाली उनकी प्रिया लाई गयी है। यह कश्यप तो ब्रह्मा जी क श और अदिति पृथ्वी का यश हुई थी। इसके उपरान्त महान् वाहपो वाले प्रभु ने देवकी की कामनाओं को पूर्ण कर दिया था। बा नित्य ही अबात है ऐसे अजन्मा प्रभुको उसने पुत्र के रूप में देखने की इच्छा की थी॥१०॥ इसा लिये वह देव इस मही मण्डल में अवतीण हुए पे और फिर मानुषी तनु में उन्होंने प्रदेश दिया था। यह प्रभुतो योगात्मा थे। इन्होने अपनी योग माया से हो समस्त भूतो को मोहित कर दिया था ।।११। जिस समय "मैं इस मही महर में धर्म नष्ट हो गया था उसी समय मे प्रभु विष्णु न वृष्णि कुर में जन्म ग्रहण किया था। इन वृष्णि कुल में उत्पन्न कर अवतार धारण करने का प्रमुख प्रयोजन ही धम का सस्थापित करना और बढ़े हुए दुष्ट अपुग का नश करना ही या ॥ १२॥ जव प्रभ ने ' पावतार धारण किया था उस ममम मे म वी पाहश सहस्र पत्निया ची। उनमें प्रमुख नामों काही योहा सा प्रदर्शन यहाँ पर किंग जाना है-हकमणो-पत्यभामा - मया-नारनजिती- सुमामा-ना-गाधारी-दमण-मित्रविदा-वालिन्दी देवी- १८८ मन्स्यपुराण जाम्बवनी--सुशीला--माद्री-कौशल्या तथा विजया एव मादि देवियाँ थी ॥१३, १४॥ रुक्मिणी जनयामास पुत्र रणविशारदम् । चारुदेष्ण रणे शूरं प्रद्युग्नञ्च महाबलम् ॥१५ सुचारु भद्रचारच सुदष्ण भद्रमेव च । परशुञ्चारु गुप्तञ्च चारु भद्रं सुचारकम् ॥ चारहास कनिष्ठञ्चकन्या चारुमती तथा ॥१६॥ जजिरे सत्यभामाया भानुभ्रमरतेक्षणः । रोहितोदीप्तिमाश्चैव ताम्रश्चक्रो जलन्धमः ॥१. चतस्रो जज्ञिरेतेपास्वसारस्तुयवीयसी. । जाम्भवत्या.सतोजन साम्ब समिति शोभन. ॥१८ मिनवामित्रविन्दश्चमित्रविन्दावसङ्गना। मित्रबाहु.मुनीथश्चना नजित्या:प्रजाहिसा ॥६ एवमादीनि पुत्राणा सहस्राणि निबोधत । अशीतिश्च सहस्राणिवासुदेव सुतास्तथा ।। लक्षामेक तथा प्रोक्त पुत्राणाञ्च द्विजोतमा ।।२० उपासङ्गस्य तु सुतो वच. सक्षिप्त एव च । भूगेद्रमेनो भूरिश्च गवेपण सुतावुभौ ॥२१ गिमणी देवी ने रण मे विशारद पुत्र को जन्म दिया था। चार देष्ण विधा में महान पूर पा-प्रद्य म्न महान बलवान् पा-मुबह-भः चार-मुझेष्ण-भद्र-पशु-प.गुप्त चाभर-गुवाहा-धारहास-निष्ठ से गुपए ये सपा चारमी नाम वामी एक या थी ॥१५, १९॥ सरय. भामा मे मनुषमरतेक्षण-रोहित-दोनिमान -नाम-जनम म पुराहुए थे और उन मन की पारी बहिनो न मम्म ग्रहण किया ५. बातो के म मति गोमन साम्य पुत्र ने जन्म लिया था ॥१॥ 1. faltkarमिन और मिशिल पुष हुए थे। माता कृण सामानवनि १८E - की प्रथा मित्रवाह और मुनोथ हुई थी यदि इन नाम्नों वाले पुत्र ने प्रपत्र प्राप्त किया था। इस प्रकार से महलों ही पुत्र ममुरसान हर ऐसा ही समम नेना चाहिए। यम्सी सहन तो दामुदेव प्रभु के ही पुत्र समुन्यल हुए थे। है दिनों में परमौतम गम ! फिर उन पुत्रों के जो पुर हए ये उनी सरा एक लाख पो १६, २०॥ उमङ्ग के यम और मक्षिप्त ये दो मुव हुए थे। भूरोन्ट सेन और मूरि ये दो पुत्र गरेपण के समुन्नए ये ॥२१॥ प्रद्य म्नम्य तु दायारो वैदया बुद्धिसत्तमः । अनिरुद्धारणे रदः जनऽम्पमृगकेननः ॥२२ काश्या मुपास्वतनयामाम्बान्तेभेतरस्विनः । सत्यप्रकृतयोदेवा.पञ्चधीरा.प्रकीतिताः ॥२३ किन पोट्य प्रवीराणां यादवाना महात्मनाम् । पप्टिः शरमहलागि वीर्यवन्तो महाबलाः । देशमव एवंह उत्पन्नास्ते महोजसः ॥२४ देवामुरे हता ये च प्रमुरा ये महाबलाः। होल्पना मनुष्येपुवाइने सवमानवान् ॥२: तेपामुनमादनार्यात उत्पन्ना यादवे कुते। मुनानौ गतमेन यादवानां महात्मनाम ॥ ६ मर्यमेतत युत यावतते यंप्णन युले। पिप्रान्तेषा प्रणेता च प्रभुत्वे व व्यवस्थितः ।। निम्पा पनन्तम्प पप्यन्त मवादमा ॥२७

१६०
मत्स्यपुराण
।
वाले और महान बलवान् हुए थे। ये महान् ओज वाले सभी यहा पर
देवताओ के अशावतार ही समुत्पन्न हुए थे ॥२४॥ देवासुर संग्राम मे जो
महान् बलवान् असुर हत हो गयेथे । वे ही सब यहाँ पर मनुष्यों में समु.
स्पन्न होगये थे जो कि स्व मानवो को वाधाएं पहुंचाया पाते हैं । उन
सबके उत्पादन करने के लिये ही यादव कुल मे उत्पान्न हुए थे । महात्मा
यादव कुलो का एक शत परिवार था यह समस्त कुल अब तक वैष्णव
में
कुल मे वत्तंमान है । भगवान् विष्णु उनके प्रणेता थे और प्रभुत्व
व्यवस्थित थे। समस्त यादवगण उनके निर्देश मे स्थित रहने वाले कहे
जाते हैं ॥२६, २७॥
२६- ययाति वंश की शाखाओं का वर्णन
तुवसोस्तुसुतोगर्भोगोभानुस्यचात्मज. ।
गाभानोस्तुसुतोवीरस्त्रिसारिरपराजितः ॥१
करन्धमस्तु – सारिभरतस्तस्य चात्मजः ।
दुप्यन्त पोरवस्यापि तस्यपुत्रो ह्यकल्मषः ॥२
एव ययातिशापेन जरासक्रमणे पुरा।
तुवसो पौरव वश प्रविवेश पुरा दिल ॥३
दुप्यन्तस्य तु दायादावस्थोनामपार्थिवः ।
वरूयात्त तथावीरः सन्धानस्तस्यचात्मज. ॥"
पाण्यश्चकेरलचंचोल.कणस्तथैवच ।
तेपा जनपदास्फीताः पाण्याचाश्नोला.सकेरलाः ॥५
दृह्यस्य तनयो शूरो मेतु. केतुस्तथैव च ।
सैतु पुत्रः शारदास्तु गन्धारस्यस्यचात्मजः ॥६
स्यायते यस्य नाम्नास गन्धारविषयो महान् ।
आरदेशजास्तस्य तुरगावाजिनावराः ॥७
महा महर्षि प्रपर यो सूना ने कहा - तुईमुगा सुत गर्भ हुआ
पा पोर इसा प्रारम गोमानु था। गोभानु । पुत्र अपराजित पौर

ययाति वश को शाखामो का वर्णन निसारि तान्न हुआ था ॥१॥ कराधम त्रिसारि का अात्मज था और इसका पुत्र भरत समुत्पन्न हुआ था। पौरव का पुत्र दुष्यन्त या तथा उमका पुत्र अकरमध हुमा या ग|| इस प्रकार से प्राचीन काल में ययाति के शाप से पहिले जरा के सक्रमण मे तुबसु के पौरव वश ने प्रवेश किया या । ३॥ दुग्यत का दायाद दस्थ नाम वाला पार्थिव हुआ था। वरुथ मे सन्धान वीर पुत्र हुआ था। इसके आत्मज पाण्डम- केरल-बोल और कण थे। इनके जनपद भी महान् स्फीत थे जो पाण्डडय-नोल और केरल नाम वाले ही हुए थे ॥४, २॥ द्रुह्य के दो पुत्र थे जो बड़े ही शूर ये उनके नाम सतु और केतु ध । सेतु का पुत्र शरद्वान् हुआ था और फिर इम का पुत्र गान्धार नाम वाला था. इसी के नाम स महान् देश भी गातार ख्यात हुआ था। उसके पार देश में उत्पन्न होने वाले तुरगा आची मरम थठ थे ७॥ गन्धारपुत्रोधम्मरतु घृतस्तस्यात्मजोऽभवत् । घृता चविटुपोजज्ञे प्रचेतास्तस्यचात्मज 15 प्रचेतसः पुत्रशत राजानः सब एव ते । म्लेच्छराष्ट्राधिपा सर्वे उदोवान्दिशमाश्रिता ॥ अनोश्चन सुता वीरास्त्रय परमधार्मिकाः। समानरश्वाशुपश्च परमे तथैव च ॥१० सभान स्यपुषस्तु विद्वान्कोलाहलो नृपः । कोलाहलस्य धर्मात्मा सञ्जयोनामविश्रुतः ।।११ सञ्जयस्याभवत् पुनो वीरो नाम पुरजयः। जनमेजयो महाराज 1 पुजयसुतोऽभवत् ॥१२ जनमेजयस्य राजमहाशालोऽभवत् सुत । आसोदिन्द्रममो राजा प्रतिष्ठिनयशाभवत् ॥१३ महामना सुतस्तस्य महाशानस्य धामिक । सतहीपेश्वरो जज्ञ चक्रवर्ती महामनाः ॥१४ १६२ मत्स्यपुराण । उस गा धार का पुत्र धम्म हुआ था और उसका आत्मज घृत नाम वाला या । विद्वान् घृत से प्रचेता न ज म प्राप्त किया था |८ प्रचेता के एव सौ पुत्र हुए थे वे सभी राजा हुए थे। ये सव म्लेच्छ राष्ट्रों के अधिप थे और सभी ने उत्तरी दिशा का समाश्रय ग्रहण किया था। HE11 अनु के तीन परम धाम्मिक तथा वीर पुत्रो ने जन्म प्राप्त किया था। उन तीनो के नाम सभानर-चाक्षुप और परमेषु ये तीन थे ।।१०।। सभानर का पुत्र परम विद्वान् कोलाहल नामधारी नृप हुआ था फिर इस कोलाहल का पुत्र भी धर्मात्मा सञ्जय नाम से विश्रुत उत्पन्न हुआ था। ॥११ । सञ्जय के पुत्र का नाम वीर पुरञ्जय हुआ या । हे महाराज के जनमेजय पुरञ्जय के ही आत्मज हुए थे ।१२॥ राजर्षि जनमेजय महाशाल नाम वाले पुत्र ने जन्म ग्रहण किया थ । यह राजा इन्द्र के हो समान प्रतिष्ठित यश वाला हुआ था ॥१२।। इस महाशाल के महामना नाम वाला परम धार्मिक पुत्र उत्पन हुआ था। महामना सातों द्वीपो का स्वामी चक्रवर्ती सम्राट पैदा हुआ था ॥१४॥ महामनास्तु द्वौ पुत्री जनयामास विश्रुतौ । उशीनरञ्च धमज्ञ तितिक्ष चैव तावुभी १५ उशीनरस्य पुत्रस्तु पञ्चराजपिसम्भवा । भशा कृशानवा दर्शा या च देवी दृषद्वती ॥१६ उशीनरस्य पुत्रास्तु तासुजाता कुलोद्वहा । तपसा ते तु महता जातावद्वस्यधामिका । भृशायास्तु नृग पुत्रो नवायानब एवच । कृशायास्तु वृशा जज़ दर्शाया सुदतोऽभवत ।। दृषद्वत्या सुतश्चापि शिविरौशीनरो नप ॥१८ शिवेस्त शिवय पुत्राश्चत्वारो लोव विश्रु ता । पृथुदभ सुवीरश्च केक्यो भद्रास्तथा ।।१० तेषां जनपदा स्फीता कक्याभद्रकास्तथा ।

ययाति वंस की शाखाओ का वर्णन .40 सौवीराश्चवपोगश्च न गत्यफेकयास्तथा ॥२० स्व्रतस्य तथाम्वष्ठा कृशस्य वृपला पूरी। नवस्य नवराष्ट्रन्तु तितिक्षोस्त प्रजा श्रृणु ॥२१ महाराज महामना ने परम प्रसिद्ध दो पुत्रों को जन्म दिया था। उन दोनो मे धर्म का ज.ता एक उशीनर था और दूसरे का नाम तितिक्षु था ॥ १५॥ उपोनर के पुत्र पञ्च राजपि सम्भव थे। उशोनर की मंशा कृशानवा-दर्शा और पद्धती देवी ये पलियाँ थीं ॥१६॥ उही में उसी- नर के कुल के उद्वहन करने वाले पुत्र समुत्पन्न हुए थे। वे महान् तर के कारण परम धार्मिक हुए थे ।। १७ ।। भृशा के पुत्र का नाम नृग था। नवा का नव था । कृशा का कृष हुआ था और दर्शा के पुत्र का नाम सुप्रत पा । तथा दृपती के पुत्र का शुभ नाम ओशीनर शिवि नृप हुआ था ॥ १८ ।। राजा शिवि के शिवय चार पुत्र लोक मे परम प्रसिद्ध समु- थे। उनके नाम पृथुदर्भ-सुबीर-क्य और भद्रक थे ॥१६॥ उन चारों के जो जनपद थे वे भी अतीव फैले हुए विशाल थे जो उन्ही के नाम से प्रसिद्ध थे । वैकय-भद्रक-सौवीर-पौर तथा नग वेश्य थे सुव्रत को अम्वष्टा तथा कृश की पुरी का नाम वृषलाया। नव के नव राष्ट्र था ! प्रब यहाँ से आगे तितिक्षु को जो प्रजा हुई थी उसको सुनिये ॥२०,२१॥ तितिक्षुरभवद्राजा पूर्वरस्यां दिशि विश्रुतः । वृपद्रयः सुतस्तस्य तस्य सेनोऽभवत्सुतः ॥ २२ सेनस्य सुतपा जज मुतपस्तनयोवलि । जातो मानुपयोन्यान्तु क्षीणे यो प्रजेच्छया ॥२३ महायोगी तु स बलियो बन्धमहात्मना । पुतानुत्पादयामास क्षेत्रजानपञ्चपायिवान् ।।२४ अङ्ग स जनयामास वङ्ग सुहा तथैव च । पुण्ड कलिङ्ग च तथा वाय क्षेत्रमुच्यते ।। त्पन्न हुए १६४ मत्स्यपरण वालेया ब्राह्मणाश्चैव तस्य वशकरा प्रभो ।।२५ बलेश्च ब्रह्मणा दत्ता वर प्रीतेन धीमत । महायागित्वमायुश्च कल्पस्य परिमाणकम् ॥२६ सग्रामे च प्यजेयत्व धर्म चवोत्तमा मात । काल्य-शन चैन प्रधान्य प्रसवे तथा ॥२७ जयञ्चामतिम युद्ध धर्मे तत्त्वार्थदशनम् । चतुरो नियतान् वर्णान् सर्व स्थापयिताप्रभु ॥२८ तेपाञ्च पञ्च दायादावगागा सुह्मकास्तथा । पुण्ड्रा कलिङ्गाश्च तथा अङ्गस्यतुनिवोधत ॥२६ तितिक्ष पूर्व दिशा मे एक महान् प्रसिद्ध राजा हुआ था। इसके जो पुत्र उत्पन्न हुआ था उसका नाम वृपद्रग था और इसवे पुत्र का नाम सेन था ।। २।। सेन के यही सुतपा नामधारी पुत्र या तथा सुनपा का पुत्र बलि हुआ था। गश के क्षीण होने पर प्रजा की इच्छा से यह मानुष योनि मे प्रसूत हुआ था ।।२३ ।। यह महान् योगी बलि महात्मा के द्वारा बन्धों से बद्ध हुआ था। इसने क्षेत्रज पाँच पार्थिव पुत्रों को समुन्पादित विया था। उसने अङ्ग-बग-सुहा-पुण्ड कलिङ्ग को जन्म दिया था। वातेयक्षेत्र कहा जाता है । हे प्रभो ! वातेय और ब्राह्मण उसके व शकर हुए थे ।। २४, २५॥ बुद्धिमान बलि को परम प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने घरदान प्रदान किया पामि महायोगित्व प्राप्त होवे-एक कल्स पयत आयु हो जावे --संग्राम में अजेयत्व की प्राप्ति हा-धर्म मे अत्युत्तम मत होवे-सोनों कानो में देधने का ज्ञान होय-प्र व में प्रधानता हो तथा युद्ध में अप्रतिम विषय हो और धम मतस्याप पा दान प्राप्त हो । ये सभी ब्रह्मागे प्रदान किया वरदान | पारी नियर वर्षों का स्थापन करने वाला प्रभुषा था ।। २६ ॥ २७ ॥ १८॥ उना पांच याद 4-बग-अ ने जन्म लिया और ययाति वश की शाखाओ का वर्णन १६५ । सुहाक-पुण्ड और कलिङ्ग। अब अङ्ग के विषय में शास प्राप्त करो ॥६॥ वलिस्तानभिनन्द्याहान्चपुत्रानकल्मपान् । कृतार्थः सोऽपिधर्मात्मायोगमायावृत.स्मयम् ॥३० अदृश्य. सवभूताना कालापेक्ष स वै प्रभु । तत्राङ्गस्यतुदायादोराजासीह धिवाहन. ।।११ दधिवाहनपुत्रस्तु राना दिविरथः स्मृत.। भासीदिविस्थापत्य विद्वान् धर्मरथोनृप ३२ स हि धर्मरथः श्रीमास्तेन विष्णुपदे गिरी। सोम. शुक्रण व राजासहपोतो महात्मना ॥३३ अथ धर्मरयस्याभूत पुत्रश्चित्ररथ. किल । तस्य सत्यरथ पुत्रस्तस्मादशरथः किल ॥३४ लोमपाद इति ख्यातस्तस्य शान्ता सुताभवत् । अथ दाशरथिर्वीरश्चतुरङ्गोमहायशा. ॥३५ महागज बलि ने उन परमप पांचों पुत्रों का अभिनन्दन दिया था और वह धर्मात्मा भी कृतार्य हो गया था। फिर वह स्वय योग- माया वृत हो गया था || ३० ।। वह सब प्राणियो से बदृश्य रहते हुए पाल की अपेक्षा करने वाला हो गया था। उसमे अङ्ग का जो दायाद था वह दधिवाहन राजा हुआ था ।। ३१ ।। दधिवाहन का जो पुत्र हुमा वह दिविरथ नाम से कहा गया था। फिर दिविरष से जो सन्तति हुई पो यह परम विद्वान् धर्मरपनप पापा ।। ३२ ।। वह धर्मरथ परम श्रीमान नप या। उसने विष्णुपद गिरि मे महारमा शुत्र के साथ राजा ने सोम का पान किया था ।३३। इसके अनन्तर उस धर्मरथ के यहाँ विवरय नाम वाले बारम ने जन्म लिया था। इसका पुत्र सत्यरय पैदा हुआ था और सत्पर से दशरथ न बाम ग्रहण किया था ।।३४॥ यह सोमपाद-इस शुभ नाम से विस्मात हा या . इसके शाता नाम-

१६६
मत्स्यपुराण
धारिणो एक कन्या हुई थी। इसके अनन्तर दशरथ का पुत्र महान् यथ
वाला दाशरथि चतुरङ्ग हुआ था ।।३।।
ऋष्यशृङ्गप्रसादेन जी स्वकुलवर्धन ।
चतुरङ्गस्य पुत्रस्तु पृथुलाक्ष इमि स्मृतः ॥३६
पृथुलाक्षमुतश्चापि चम्पनामा बभूव है ।
चम्पस्य तु पुरी चम्पा पूर्व या मालिनोऽभवत् ॥३७
पूर्णभद्रप्रसादेन हर्यङ्गोऽस्य सुतोभवत् ।।
जज्ञे विभाण्डकाच्चास्यवारण शुत्रु वारणः ॥३८
अवतारयामास मही मन्त्रहिनमुत्तमम् ।
हर्यङ्गस्य तु दायादी जातो भद्ररथः किल ॥३६
अथ भद्ररथस्यासीत् वृहत्व र्मा जनेश्वरः ।
वृहद्भानु सुनस्तस्यतस्माज्जा महात्मवान् ॥४०
वृहद्भानुस्तु राजेन्द्रो जनयामास वै सुतम् ।
नाम्नाजयद्रथं नाम तस्मातवृहद्रथो नृपः ॥४१
आसीबृहद्रयाच्चविश्वजिज्जनमेजयः ।
दायादस्तस्यचाङ्गोवैतस्मात् कर्णोऽभयन्नप. ॥४२
य: ऋष्यशृङ्ग के प्रसाद से ही बुल के वर्धन करने वाला समु.
त्पन्न हुआ था। चतुरम के पुत्र का नाम पृथुखाक्ष रहो गया है ।।३।।
पृथुलाक्ष पुत्र पम्प नाम दासा समुत्पन्न हुमा पा । चम्प की पुगे
पमा थी जो पहिले मासी बीपी ।। ३७ ॥ पूर्णभद्र ये प्रसाद से इसके
यहाँ नाम वाले पुत्र ने प्रमव प्राप्त किया था। विभाड से इसमें
गोंगवण ने पासा बारण ने लिया था। इसने मात्रों के
धारा इस मो माल मे उत्तम वाहन प्रस्तारित किया था। हर्यशा
सायद अर्थात बारमा माय ने जाम प्राण पिया था॥३६॥ इसके
IIIR उग हाय सर्मा अनेसा समापन हुआ था। उमरे "
मा नाम वृक्षापा र उमगे गहारमा घाम ने जग प्राप्त किया
ये

ययाति वंश की शाखाओं का वर्णन . धाका ४० ॥ राजाओ में इन्द्र के समान महान् प्रतापी वृद्भानु ने एक सुन को प्रसूत निया, जिसका नाम जयद्रन था कि इससे वृहस्प नृपं समुत्पन्न हुआ था ॥ ४१।। इस वृहद्रथ से विश्वजित जनमेजय ने जन्म प्राप्त किया था। इसका आत्मज अङ्ग हुआ और उस अङ्ग से वर्ण नाम वाले नृप ने जन्म ग्रहण किया था॥४२॥ कर्णस्य वृपसेनस्तु पृथुसेनस्तथात्मजः एतेऽङ्गस्यात्मजाः सर्वेराजनःकीर्तिता मया । विस्तरेणानुपूर्व्याच्च पूरोस्तु श्रन द्विजा ११४३।। कथं सूतात्मजः कर्ण कपमङ्गस्य चात्मजः । एतदिच्छामहेश्रोतुमत्यन्तकुशलोह्यसि ।।४४ वृद्धानुसुतो जा रजा नाम्ना वृहन्मना । तस्य पत्नीद्वय ह्यासीच्छेव्यस्य तनये 'ह्य भे ।। यशादेवी च सत्यों च तपोवंशश्च मे शृणु ॥४५॥ जयद्रथन्तु रामनं यशोदेवा हमीजनत् । सा वृहन्मनस सल्या विजयनाम तिथु तम् ॥४६ विजस्य वृहत्पुतस्तस्य पुत्रो वृहद्रथः । वृहद्रथम्य पुत्रस्तु सत्यकमिहामन ॥४७ सत्यकर्षणोऽधिरथ: सूतश्चाऽधिरथः स्मृतः । य वर्ण प्रतिजग्राह तेन कर्णस्तु सूतज: ।। 'ताचेद सर्वमारयात कणं प्रति यथोदितम् ॥४॥ कर्ण नप का पुत्र पसेन हुआ और फिर इससे पृथुमेन ने जन्म लिया था। इसने ये सब अङ्ग के प्रोमा हुए थे जो सभी राग थे। मैंने इन सब नामों को बतला दिया है। अब हे द्विजगण विम्तापूर्वक तथा आनुपूर्वी के अम से जैसे प्रो एक के पीछे दूसरा हुआ या उपो पूर्वा- पर वे कम से के विषय मे आर लोग श्रवण कंगे ॥४३॥ ऋषियो ने कहा-है भगवन् ! सूत का मात्मज णं या वह रामा अङ्ग का आत्मज

मत्स्यपुराण
कैसे हुआ था । हम अब यही सुनना चाहते हैं । आप तो सभी कुछ
के
माता एवं परम कुशल हैं ॥४४॥ श्री सूतजी ने कहा-वृहद्भानु का पुत्र
बृहन्मना नाम वाला राजा उत्पन्न हा या। इस राजा की दो पलिया
थी जो कि शव्य को परम शुभ पुत्रियां थी। एक यशोदेवी. थी और
दूसरी सत्या थी । अब उन दोनो के वश को मुझसे आप थवण कीजिये
॥४शा यशोदेवी ने जयदय नाम वाले राजा को प्रसूत किया था, वह
जो
दूसरी सत्या नाम वाली पत्नी थी उसने वृहत्मना
से विजय नाम वाले
परम विद्युत पुत्र को जन्म दिया था ।। ४ ।। विजय का वृहत्पुत्र
और
फिर इसका पुत्र वृहद्रथ था। इस वृहद्रथ के पुत्र का नाम महामना
सत्यवर्मा हुपा था ॥ १७ ॥ सत्यकर्मा का पुत्र अधिरप,या मोर वह
मधिरप ही सूत कहा गया था जिसने कर्ण को प्रतिग्रहीत किया था। इसी
कारण से कण सूता कहा गया था। यह मैन सभी कुछ कह दिया है
जो कि कर्ण के प्रति कहा गया है ।।४।।
२७--पूरुवंश वर्णन
पूरीः पुत्रो महातेजा राजा स जनमेजयः।
प्राचीततःमुतस्तस्ययःप्राचीमकरोदियम् ॥१
प्राचीततस्य तनयोगनस्युश्च तथाभवत् ।
राजा पीतायुधो नाम मनस्योरभवन मुतः ॥२
दायादस्तस्यचाप्यासीदपुगपुनर्नाममहीपतिः ।
पुन्धोयविध.पुत्रःसम्पामिस्तस्यचारमज. ॥३
समातेस्तु रह नर्पा भद्रावस्तचारमजः ।
भदायस्पतामांतुदमापारसि गूनवः ।।
धोनयुदन पेयुप बसेयुप रागेयुफः ।
पतेमुश्च दिनेष्य स्थलेपश्व पत्तमः ॥

पूरुवश वर्णन धर्मयु सन्नतेयुश्च पुण्येयुश्नेति ते दश । औचयोज्वलना नाम भार्या तक्षकात्मजा ॥६ तस्या स जनयामास अन्तिनार महीपतिम् । अन्तिनारो मनस्विन्या पुत्रान् जने परान् सुभान्। ७ पूरु का पुत्र महान तेज वाला वह राजा जनमेजय हुआ था। उमसे फिर प्राची नाम धारी पुत्र हुग्रा या जिसने प्रावी दिशा को किया या ॥१॥ उसके पुत्र का नाम प्रावीत या मोर फिर इसका तन्य मनस्यु हुआ था। मनस्यु का सुत पोतायुध राजा हुआ था |२|| उसका भी दायाद धुन्धु नाम बाला महीपति हुआ था। धुन्धु के यहा बहुविध नामक पुत्र ने जम लिया था फिर इसका आत्मज सम्पनि प्रसून हुआ था ॥३॥ सम्पति का दागद रहवर्चा था और इसका पुत्र भद्राश्च न प्रसव प्राप्त किया । मद्राश्व क घुना नाम वाली अप्सरा म दश पुत्र समुत्पन्न हुए 11 उन दशो क नाम औचेयु-होयु-क्षयु-सनयुक - घृतेयु- विनेयु-स्थलयु-धर्मयु-सन्नतयु और पुग्यतयुय थे। औचेयु की ज्वलना नाम वाली भार्या था जो कि तक्षक की पात्मजा योउस भार्या म प्रोवेयु ने अन्तिनार नामक महीपत को जम ग्रहण कराया था। उस आननार न मनस्विनी नाम वाली भार्या में परम शुभ पुत्रो को जन्म प्रदान किया था। अमृतरयसवोर निवतञ्चैवधामिकम् । गौरी कन्या तृतीया च मान्धातुजननी शुमा II इलिनातुयमस्यासीत्कन्यायाजनयन् सुतान् । ब्रह्मयादपरान्ताराम्भमात्विलिनाभन IME सुतान् लेभे चतुरस्त्विलिनात्मजात । सुप्यन्तमथ दुष्प त प्रवीरमतव तया ॥१० चक्रवर्ती तता जने दुप्यात समितिञ्जय । शकुन्तलाया भरनो यस्य नाम्नावभारता ॥११ उपदानवी सुतान् माम ऋष्यन्त-दुष्यन्त-प्रवीर और अनद्य थे11१०1। इसके पश्चात् राजा से चक्रवर्ती समितिन्जय ने जम्म ग्रहण किया था तथा शकुन्तला २०० मत्स्यपुगण दौष्यन्ति प्रति राजान वागूचे चाशरीरिणी। माताभस्त्रापितु.पुत्रोयेनजात सएक्स ॥१२ भर स्वपुन दुष्यन्त ! मावमस्था शकुन्तलाम। रेतोधा नयते पुत्र परेत यमसादनात् ॥ त्व चास्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला ॥१३ भरतस्य विनष्टेषु तनयेषु पुरा किल । पुत्राणामातृकात कोपात सुमहान सच्य. कृत ॥१५ ततो मद्भिरानीय पुत्र स तु वृहस्पते. । सवामितो भरद्वाजो मरुद्भिर्भरतस्य तु ॥१५ उन पुत्री के नाम अमूर्तरय सवीर और परम धामिक त्रिवन थे। तीसरी गौरी नाम वाली कन्या थी जो मान्धाता की शुभ जननी हुई थी। ॥८॥ इलिना यम की कन्या थी जिसने ये सुता को किया था। समुत्पन्न ब्रह्मवाद मे पराक्रान्त हुए थे और इलिना शुम्मदा हुई थी।।६।। उपदानवी ने इलिना के आत्मज से चार पुत्री का जन्म प्राप्त किया था उन चारों के दुष्यन्त नाम वाली पत्नी मे भरत नाम वाला महान् प्रतापी राजा उत्पन्न हुआ पा जिसके नाम से भारत हुए हैं ॥११॥ राजा दौन्ति के प्रति बिना परीर वाली वाणी ने कहा था कि माता भस्त्रा पिता का पुत्र वह ही समुपन्न हुआ है । हे दुष्यन । अपन पुत्र का भरण करो और इम रेतोया शकुन्तला का अवमान मत करो। पुत्र परेत को यम सदन से प्राप्त किया परता है । आप ही इसके गम व धाता है-यह बान शकुन्तला जो इस समय में रह रही है वह बिस्तुप सत्य है ।।१२, १३॥ पुरातन समय में निश्चय ही भरत रे पुत्रों के विरप्ट हो जान पर माता को में पुत्रों का महान् सय किया गया पाइसरे अनन्तर वर বুলব না যুগ মার গা নগর বা যক্ষাৰি বিঘা चा॥१५॥ - जिसस

पुरुषश वर्णन
२०१
ततो जाते हि वितथे भरतश्च दिव यपी।
भरद्वाजो दिव यातो ह्यमिपिच्यसुत मृपि ॥१६
1 दायदो वितथस्यासीद्भुवमन्युमहायशा ।
महाभूतोपमा पुत्राश्चत्वारो भुवमन्यव ॥१७
वृहत्क्षेत्रो महावीय नरा गगश्व वीय्यवान् ।
नरस्य सति पुत्रस्तस्य पुत्रो महायशा ॥१८
गुरुधीरन्तिदेवश्च सत्कृत्यान्तावुभौ स्मृती।
गगस्य व दायाद शिदिविद्वानजायत ॥१६
स्मृता शव्याप्ततो गर्गा क्षत्रोपेता द्विजातय ।
आहायतनयरचव धोमानासोदुरक्षव ॥२०
तस्य भाया विशाला तु सुपुवे पुत्रकत्रयम् ।
त्र्यूषण पुष्करि चैव कवि चैव महायशा ॥२१
इसक अनम्तर दितथ के समुत्पन होने पर मरत दिवलोक को
चना गया था। भरद्वाज ऋषि भी सुन का अभिषेक करके दिघलोक को
चले गये थे।१६। विनय नामधारो महीपति का प्रात्मन महान परा वाला
भवम यु समुत्पन हुप्रा था । इस भूवमयु क महाभूनो के तल्प चार पुदी
मे जम ग्रहण किया था। इन चारों के नाम वृहत्ये-महा वार्य-
नर और दीयवान् गग थे। इस नर का पुत्र सात हुआ था और
सकृति का सुन महायगा समुपम हुभ्रा पा 9, १८) गुरुयो और
अन्तिदेड ये उनक नाम थे। ये दोनों सागल कहे गये थे। गग का जो
दायाद उन्पल हुआ या उसका नाम शिविया और वह बहुत बड़ा विद्धन
हुआ था। इसके उपरात गग शव्य और क्षत्रोपेन द्विजाति कहे गय है ।
साहाय का पुत्र रम बुद्धिमान दुरुयव ठसन हुआ पा(६, २०॥
उसकी भार्या विशाला यो जिसने तीन पुत्रों को प्रसूत किया था। ये
महान् यश वाने थे और इन तीनों के नाम न्यूरग-पुकार और कवि
ये ॥२१॥

२०२
मसराम
जरावा. स्मृता घते सर्वे ग्राह्य गताङ्गता ।
काध्यानान्तु वग ह्य ते प्रय प्रोतामहपया ॥२२
गर्गा. सकृतप काम्या क्षत्रोपेतादिजातय. ।
सभृताङ्गिरसो दक्षा वृहत्क्षत्रस्यक्षिति ॥२३
वृहत्क्षरस्य दायादा हस्तिनामा बभूव है।
तेने निर्मित पूर्व पुरन्तु गमसाह्मयम् ।।२४
हस्तिनीय दायादारमय परमजीतंय ।
अजमोटा दिम दमप एरमोडरतपय व ॥९५
घरमादस्य पल्यन तिर दुरसोदाहा।
मालिनीमिनीव रेगिना व वियता
म नामु पनामा पत्रान् वदवयसि ।
समास्तमहात आता पधामिया ॥ ७
MERIEन तिर सपु मे भा।
बसमीपार समझाया

पूक्ष वश वर्णन २०३ F है में विस्तार का श्रवण आप लोग..मुझसे भली भांति करिये । बज उस अजमीढ का पुत्र केशिनी मे जो उत्पन्न हुआ था उसका नाम । कम्य था ॥ २८11- संघातिथिः सुतस्तत्य तस्मात्काण्वायना द्विजाः । रजमोढ-य भूमिन्याजले वृहदनुपः ॥२६- हदनोवृहन्तोऽथ वृहन्तस्य वृहन्मनाः । वृहन्मनः सुतश्चापि वृहदनुरितिः श्रुतः ॥३० वृहदनोवृहदिपुः पुत्रस्तस्य जयद्रथः ।। प्रश्वजितनयस्तस्य सेनजित्तस्य चात्मजः ॥३१ अथ सेनजितः पुत्राश्चत्वारो लोकविश्रुताः । चिराश्वश्चकाव्यश्च राजा द्वढरथस्तथा ॥३२ वत्सश्चावतको राजा रास्यते परिवत्सकाः । चिराश्वस्य दायाद पृयुमेनो महायशाः ॥३३ पृथुसेनस्य पौरस्तु पोरानीपोऽथ जज्ञिवान् । तोपस्यैकशतत्वासोत् पुत्राणाममितौजसाम् ॥३४ नीपा इति समाख्याता.राजान. सवंएवते। तैपावशकर.श्रीमान नीपाना कौतिवद्धं नः ।।३५ उस पद के पुत्र का नाम मेधातिथि था इसलिये ये काण्वायन दिन कहे गये थे। मी अनमोड का भूपिनो नाम दानी पत्नी में वृहदनु नृप ने जन्माप्राप्त किया था |॥ २६॥ वृहदनु का, पुत्र वहन्त और इसके जो पुर हुआ वह वृहन्मना नामधारी था । इसके मुत का नाम बृहनु पा जो कि विश्रुत था ।। ३० ।। वृहदनु का दायाद बृहदषु था और इस आत्मज का नाम जयद्रथ हुआ ।-जयद्रय का सुत अश्वजित और सेनजित समुत्पन्न हुआ था ॥३१|| इस सेनजित चार पुत्री ने जन्म प्रहा किया था जो लोक मे अधिक दिय त थे। जिनके नाम ये -विराश्व-व्य-राजा इदरप-वत्स और आवतंक राजा था जिसके इमका पुत्र २०४. मम्म ये परिवरसा है। कपिराका दायाद महान यशस्वी पृथुमेन हुआ। पृथुसेन । पुत्र और और इमरा भारमननी जन्म लिया था। इस मीर के एक सौ अमित ओर वाले पुत्रों को समुत्पत्ति हुई थी ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ३५॥ वे सभी लोग नो-इस नाम से समाख्यात हुए थे। उन नीपों का वंश करने वाली थीमान् पीतिवर्धन पा ।।३५॥ काव्याच्च समगे नाम सदेप्टसमरोऽभवत् । समरस्य पारसम्पारा सदश्व इति ते प्रय. ॥३६ पुत्राः सर्वगुणोपेता जाता व विश्रुता भुवि । पारपुत्रः पृथुर्जात पृथोस्तु सुकृतोऽभवत् ॥३७ जज्ञे सर्वगुणापेतो विभाजस्तस्यचात्मजः । विभाजस्यतुदायादस्त्वणुहोनामवोय्यवान् ॥३८ बभूव शुजामाता कृत्वोभर्ता महायशाः । अणुहस्य तु दायादो ब्रह्मदत्तो महीपतिः ॥३६ युगदत्त सुनस्तस्य विष्वक्सेनो महायशाः । विभाज पुनराजातो मुकृतेनेह कर्मणा४० विष्वक्सेनस्य पुत्रस्तु'उदक्सेनो बभूव है। भल्लाटस्तस्य पुत्रस्तु तस्यासीजनमेजयः ।। उग्रायुधेन तस्यार्थे सर्वे नीपा: प्रणाशिताः ॥४१ 'उग्रायुध. कस्य सुतः कस्य वशे स कथ्यते । किमर्थतेनते नीपा: सर्वेचैव प्रणाशिता १४२ काव्य से समर नाम वाला सदेष्ट समर हुआ था। उस समर तीन पत्र उत्पन्न हुए थे-पार-सम्पार और सदश्व ये उनके नाम थे ॥३६ ॥ ये सभी सुत सकल गुण गण से समन्वित थे और 'परम प्रसिद्धि प्राप्त करने वाले हुए थे । पार का पुत्र पृथु हुभा और पृथ से 'सुकृत पुत्र को उत्पत्ति हुई यो । ३७ ॥ इसका दायाद सब गुणो से 1 के मै भूमण्डल २०५ पूर वंश वर्णन युक्त विघ्राज ने जन्म लिया था। विनान का पुत्र महान् बलवीयं दाला अगुह नाम वाला हुआ था ।। ३८॥ शुरु जामाता और महापया कृत्वी मा हुआ। इस अणुह का मारना महीपति ब्रह्मदत समुत्पन्न हुमा ॥३६॥ उमा दायाद युग्दत्त हुला या और फिर इसका पुत्र महायश ला विष्वक्सेनो हुआ था । यहाँ पर सुन कर्म स विवार पुन. नात हुआ था ।। ४०॥ विष्वक्मेन के मुत का नाम उदक न या और इसका पुत्र मल्लाट त्या भन्नाट का मुन जनमेजय पा। उपायुध । उसके लिये समन नीपों को प्रभारित कर दिया था ॥४१॥ कृषियों ने कहा- उपायुध किसका पुन मा मौर रिसने वश में कहा जाता है उमने किनलिये सब नौगे का विनाश कर दिया था। ॥४२॥ उपायुधः सूर्य्यवश्यम्तपम्तेपे वराश्रमे। स्थाणुभूतोऽष्टसाहस्रन्न भेजे जनमेय ।।४३ तस्य गज्य प्रतिश्रुत्य नीपानाजनिवान्प्रभु। उवाचसान्त्वविविध जघ्नुन्तेवा भावा ॥४४ हन्यमाना गतानूचे यम्माद्ध तोनं मे बच । शरणागतरक्षार्थ तस्मादेव शामिव ॥४ यदि मेस्ति तपस्नप्त सवानयतु दो यमः। ततस्तात् कृप्यमाणान्तु यमेन परत म तु ॥४६ कृपया परयाविष्टो जनमेजयमूचिवान् । गनानेनानिमान् बोरास्त्व मे रक्षितुमर्हसि ॥ys . बरे पापा । दुगचारा । भवितारोस्यकिङ्कराः । तयुक्तस्ततो गजायमेनय यधेचिरम् ॥४८ व्याधिभि खोरेयमेन सह तान् वलात् । विजित्व मनादात्तदद्भुतमिवाऽमवत् ।। विश्वर मूनजी न वहा उपयुध सूर्य वय में समुत्पन्न हुआ २०६ मत्स्यपुराण 1 - । या इसने वराश्रम में प्रत्यत्त घोर तपस्या की थी। स्थाणु भून होर पाठ सहस्र वप तक तप पिया या उममा जनमेजय न मवित रिय पा॥४॥ उसक राज्य को प्रतिश्रुत परक उस प्रभु न नोों का हनन क्यिा था । विविध प्रकार के सान्त्वना ये वचन बोना था। उन्होंने दोनों का हनन कर दिया था ||४|| हन्यमान गय हुओ स बोता था कि जिस कारण स मेरा वचन नही है। इसी स शरणागत रक्षा के लिय में आपको शाप दे देता हूँ ॥४५।। यदि मेरा तप तप्त है त) यमराज आप सबको हो ल जावे । इसके पश्चात् यम के द्वारा कृष्यमाण उनका प्रागे हाकर उपन अत्यन्त दया से समाविष्ट होकर जनमेज से कहा था कि गये मेरे वीरो की मार रक्षा करने के योग्य हैं ॥४५, ४७॥ जनमे जय ने कहा-अरे पापियो । हे दुष्ट आचार वाला | इसके किदूर होओगे। इसके पश्चात् तथा इस प्रकार से कहे गये उस राजा ने चिर काल तक यम के साथ युद्ध किया था। नारकीय घोर व्याधियों से यम के साथ बलपूर्वक उनको विजित करके मुनि को दे दिया था यह सब परम अद्भुत सा ही हुआ था।।४ः ४६॥ यमस्तुष्टस्ततस्तस्मै मुक्तिज्ञान ददौ परम् । सर्वे यथाचितकृत्वा जग्मुस्तेकृष्णमव्ययम् ॥५० येषातु चरित गृह्य हन्यन्ते नापमृत्युभि । इह लोके परे चव सुखमक्षय्यमश्रुते ॥५१ अजमीढस्य धूमिन्या विद्वाजज्ञेयवीनर । धृतिमास्तस्य पुत्रस्तु तस्य सत्यधुतिस्मृत । अथ सत्यधृते पुत्रो दृढनेमि प्रतापवान् ॥५२ दढनेमिस्तश्चापि सुधर्मा नाम पार्थिव । आसात् सुतमंतनय सावभौम प्रतापवान् ॥५३ सावभौमेति विरयात पृथिव्यामेराड्वमौ । तस्यान्ववाय महति महापौरबनन्दन ॥५४ ।

पूस वध वर्णन २०० महापौरवपुस्तु राजा खमरथ.स्मृतः । अथरामरयम्याचोन् सुपारवानामपार्थिवः ॥५५ सुपारवंतनपश्चापि सुमतिनाम धार्मिकः । मुमतेरपि धर्मात्मा राजा सातमानपि ॥५६ इसके अनन्तर यमराब उसे परम सतुष्ट हो गया था और उसने परम मुन्तिा मान प्रदान किया था। सबने फिर ययोचित किया था बऔर फिर दे मगर श्री कृष्ण के समोर चले गये ये ॥५०॥जिनके चरित्र को पहन करके अपमृत्युनों में कमी भी हन्धमान नहीं हुआ करते हैं । इस लोक में और परलोक म उभयत्र असाध्य मुख का समोर क्यिा करता ॥५१॥ अजमोट की एक पन्नी मिनो नाम बाती थी उन में परम विद्वान यवानर न जन्म प्राप्त किया या! उसका पुत्र प्रतिमान् और इसका पुन र मलति सपुषन हुआ था। इसके पश्चात सत्यति का दायाद महान् प्रताप वाला हदमि हा या ॥५२॥ इम दृढनेमि से सुधा नामधारी राजा न उन्म महा यिादा। इस सुधा का पुत्र प्रताप पाला नार्वभौन हुमा या १५३॥ यह साबमोम-इनी नाम ते विण्यात या यह इस पृपियो । एक ही राजा ज्ञामिन हुआ था। उस के वश में बो एक महान् पा महापोरव नाम वाता पुत्र समुनन्न हुपा था ॥५॥ इन महानोर का बो पुत्र हुआ था वह राजा सररय नाम से कहा गया ' ' हम पश्चान इसका को दादाद टाल द्या हा वह सुपावं नाम वाला महीपति या ॥५५॥ सुराव का पुत्र परम धाम्मिक सुमति प्रमूत हुआ था . इस सुमति का बात्मा मो अयन्त धर्माना राजा सन्नतिमान ५.४६॥ तस्यासीत् सन्नतिमतः तो नाम सुतो महान् । हिरप्पनाभिनःशिप्य कोचल्यस्पोरालस्यमहात्मन। २५ चनुर्विविधा येन प्रोक्ता व सामस ताः। स्मृतास्तेप्रा-समामान.कार्तानामेहसामगाः ।।५८

२०८
मत्स्यपुराण
कातिरुग्रायुधः
सो वे महापौरववदनः।
। वभूय येन विक्रम्य पृथुकस्य पिता हतः ॥५६
नालो नाम महाराजः पञ्चालाधिपतिवंशी ।
उग्रायुधस्य दायादः क्षेमा नाम महायशाः ।।६०
क्षेमात् सुनोथ. सजज्ञं सुनीथस्य नृपञ्जयः ।
नृपजया च विरथ इत्येते पौरवाः स्मृताः । ६१
इस सन्नतिमान का पुत्र कृत नाम वाला एक महान पुरुष हुआ
था । यह महान् आत्मा वाले हिरण्य नाम कौशल्य का शिष्य था ॥५७।।
जिसने सामवेद की सहिता के चौवीस भेद कहे हैं । वे प्राच्य सामान
स्मृत किये गये हैं यहां पर कात्तों के साग थे ॥५८। वह उग्रायुध
महा पौरव वर्धन हुआ था जिसने अपना विक्रम करके पृथुक के पिता को
हत कर दिया था ।। ५६ ॥ नील नाम वाला महाराज वशी और पश्चाल
का अधिपति था। उग्रायुध के दायाद का नाम महायशस्वी क्षेम था।
क्षेम से सुनीथ हुआ और सुनोग का पुत्र नृपजय था । नृपञ्जय
से
विरथ हुआ था-ये सब पौरव कहे गये थे ॥६०, ६१ ।।
कीति
२८-कुरुवंश वर्णन
अजमीढस्य नीलिन्यां नीलः समभवन्नृपः ।
नीलस्य तपसोग्रेण सुशान्तिरुपपद्यत ।। १
पृरुजानुः सुशान्तेस्तु पृथुस्तु पुरजानुतः ।
भद्राश्वः पृथुदायादो भद्राश्वतनयानशृणु ॥२
सुद्गलश्च जयश्चैव राजा वृहदिपुस्तथा ।
यवीनरश्च विक्रान्तः कपिलश्चैव पञ्चमः ।।३

कुरुषश दर्णन
पञ्चानाञ्चव पञ्चलानेतान् जनपदान् विदुः ।
पञ्चाल रक्षिणो ह्य तेदेशानामिनिन. श्रुतम् ॥४
मुद्गलस्यापिमौद्गल्या क्षत्रापेता द्विजातयः ।
एते ङ्गिरसः पक्ष संश्रिता. काण्वमुद्गला. ॥५
मुद्गल यमुताजज्ञ वरिष्ठ सुमहायशा.।
इन्द्रसेनःसुतस्तस्य विन्ध्याश्वस्तस्यचात्मज.॥६
विन्ध्याश्वान्मियुन जज्ञ मेनकायामितिश्रुतिः ।
दिवोदासश्च राजापिरहल्याचयशस्विनी
महा महर्षि श्री सूतजी ने कहा-अजमीढ को एक पत्नी का
नाम नलिनी था उस नील नृप ने जन्म ग्रहण किया था। नीस का
अति उग्रनप था उसके प्रभाव से उसके सुशान्ति नाम वाले पुत्र की समु.
त्पत्ति हुई थी ||१|| सुशान्ति का सुत पुरुजानु और इसका प्रात्मज पृथु
उत्पन्न हुआ था। पृथु का पुत्र प्रदाश्च हुआ था। अब भदाश्व के जो तनय
समुत्पन्न हुए थे उनके विषय में श्रवण करिए ॥२॥ मुद्गल-जय राजा
वृहदिपु-यवीनर और पांचवा महान् विश्मशाली कपिल था ॥३॥ इन
पांवों के ही ये पञ्चास जनपद हुए थे। हमने ऐसा श्रवण किया है कि
पञ्चाल देशो के य रक्षा करने वाले महीपति हुए हैं 11४|| मुद्गल के भी
जो हुए थे वे मौदगल्य धरोपेत द्विजाति थे। ये काण्व मुगल अङ्गिरस
पक्ष के सथय करने वाले हुए थे ।।५।। मुद्गल के जो सुत समुत्पन्न हुआ
था वह सुन्दर और महान यश वाला ब्रह्मिष्ट था। इसका पुत्र इन्द्रसेन
नामधारी हुआ था तथा फिर इस इन्द्रमेन का सुन विध्यापन हुआ। इस
विध्याश्व से मेतका मे एक जोडा समुत्पन्न हुआ था--ऐसा गुना जाना
है। दिवोटदास एक राजपि हुभा या और परम यशस्विनी अहल्या ने जन्म
ग्रहण किया था ,
शरदतस्तु दायादमहल्या सम्प्रसूयत ।
शतानन्दपिथेष्ठ तस्यापि
सुमहातपाः ।।

दिवोदासपी जो सन्तति समुत्पन्न हुई थी उसे बतलाता हूँ॥१२॥
२१०
मत्स्यपुराण
सुत सत्यधृति म धनुर्वेदस्य पारग ।
आसीत् सत्यधृतेः शुक्रममोघ धार्मिकस्य तु ।।
स्कन्न रेत सत्यधृतेष्ट्वा चाप्सरसजले।
मिथुन तन सम्भूत तमिन् सरसिसम्मृतम् ॥१०
तत ससि तस्मिस्तु क्रममाण महीपति ।
द्वष्ट्वा जग्राह कृपया शन्तनुमृगया गत ११
एते शरद्वत पुत्रा आख्याता गौतमावरा ।
अत ऊध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्यवप्रजा ॥१२
दिवादासस्य दायादो मिष्ठो मित्रयुनृपः ।
मैत्रायणावर सोऽयमैत्रयस्तुतत स्मृत ॥१३
एतेवश्यायते पक्षा क्षनापेतास्तु भार्गवा ।
राजा चैद्यवरो नाममंत्रयस्य सुत स्तृत ॥१४
उस अहल्या ने शरद्वान् से एक दायाद का प्रसव क्या था जो
शतानन्द परम थेष्ठ ऋपि थे। उसके भी
मुमहान् तपस्वी
वाला सुत समुत्पन्न हुआ था जो धनुर्विद्या पारगामी प्रौढ विद्वान था।
परम धाम्मिक उस मत्यति कर शुक्रवीर्या अमोघ या 10 स
सत्यधृति का वीयंजल मे स्कन्न हो गया था। उसको देख कर वहां पर
सगेवर मे अप्सराओ का एक मिथुन सम्भूत हो गया या ॥१०॥ इसके
पश्चात् उस सर मे क्रममाण होते हुए उसके देखकर
मृगया
गपे हुए महीपति शन्ननु ने कृपा पर उसे ग्रहण कर लिया था 11११||
ये राब गौतम वर शरदान के पुन विख्यात हुए थे। अब इसके आगे मैं
सत्यधुत नाम
करने के लिये
दिवोदास का पुत्र अतीव धम्गिष्ठ नप मित्रयु उत्पन्न हुआ था । वह मा
पण पर पा और और इराये अनन्तर मय कहा गया था ॥१३।। ये
वश्यापति के पक्ष है मेसोपेत मागव थे । मैत्रेय के पुत्र का नाम पंछ.
।
बरहा पा ॥१५॥

२१२ मस्यपुर, थे कुरुक्षेत्र को कल्पना की थी ।।२०।। बहुत वर्षों तक महाराज कृष्य हुए इस प्रकार से जब कृष्पमाण हुए तो इन्द्र ने मय से उसको वरदान येि थे ॥२१॥ पुण्यञ्चरमण यज्चकुरक्षेत्रन्तु तत्स्तृतम् । तस्यान्ववाय सुमहान् यस्यानाम्नातुकोरवा । २२ कुरास्तु दयिता. पुत्रा सुधन्वा जनु रेवच । परीक्षिच्चमहातेजा प्रजनश्चारिमदन ॥२३ सुधन्वनस्तुदायाद पुत्रो मतिमतावर । च्यवनस्तस्य पुत्रस्तु राजा धर्मार्थतत्त्ववित् ॥२४ च्यवनस्य कृमि पुत्र ऋक्षाज्जज्ञ महातपा । कृमे पुत्रो महावीय ख्यात इन्द्रसमो विभु ॥२५ चैद्योपरिचरो वीरो वसुर्नामान्तरिक्षग । धो परिचराज्जज्ञ गिरिका सप्त वै सुतान् ॥ ६ महारथो मगधराट् विश्रु तो यो वृहद्रथ । प्रत्यश्रवा कुशश्चैव चतुर्थो हरिवाहन ॥२७ पश्चमश्च यजुश्व मत्स्य कालीच सप्तमी। वृहद्रथस्य दायाद कुशाग्रो नामविश्रुतः ॥२८ परम पुण्यमय और अत्यन्त रमणीय वह कुरुक्षेत्र विस्तृत हुआ था। उसका वश भी बहुत विशाल था जिसके नाम से ये सब कौरव हुए हैं ।। २२॥ महाराज कुरु के प्रिय सुन सुधन्वा और जनु थे। तथा महान् तेजयुक्त परीक्षित और शत्रुओ का मर्दन करने वाला प्रजन या ॥२३॥ उम मुध वा का पुत्र यतिमानो में परम श्रेष्ठ च्यवन हुआ जो धर्माय सत्व का वेत्ता राजा हुआ था ।। २४ ।। च्यवन के पुत्र का नाम म था जो महान तपम्धी ऋक्ष स समुत्पन्न हुआ था। इस कृमि का पत्र व मम न विशु और महावीय ख्यात हुआ था ॥ २५ ॥ चा परिवर पीर बमु नाम वाना अन्तरिक्ष मामी था। चंद्य ने परिचर से २१४ मत्स्य पुराण जरासन्ध महान बलवान् हुअा था ।। ३२॥ इस जरासन्ध का पुत्र प्रताप शाली सहदेव उत्पन्न हुा । सहदेव का आत्मज श्रीमान् सोवित् था और वह महा तपस्वी था ।। ३३॥ फिर सोमादि से श्रुतश्रवा हुआ था। ये सव मागध नाम से ही परिकीतित हुए हैं। जनु ने सुरथ नामक भूमिपति पुत्र को उत्पन्न किया था ॥ ३४। इस सुरथ का दायाद परम वीर राजा विदूरय हुआ और विदूरथ का पुत्र मार्वभौम नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥३५॥ सार्वभौमात् जयत् सैनो रुचिरस्तस्य चात्मज । रचिरात्तु ततो भौमस्त्वरितायुम्ततोऽभवत् ॥३६ अक्रोधनस्त्वायुसुतस्तस्माद्देवातिथि स्मृत । देवातियेस्तु दायदो दक्ष एव वभूव ह ॥३७ भीमसेनस्ततोदक्षादिलीपस्तस्यचात्मज । दिलीपस्यप्रतीरस्तुतस्यपुत्रास्त्रय स्मृताः ।।३८ देवापि. शन्तनुश्चैवते वालोकश्चैवते त्रय । बालीकस्य तु दायादा सप्त बालीश्वरानृप ! देवापिस्तु ह्यपध्यात प्रजाभिरभवन् मनि ॥३६ प्रजाभिस्तु किमर्थ वै अपध्यातो जनेश्वर । को दोषो राजपुनस्य प्रजाभि समुदाहृत ॥४० किलासीद्राजपुषस्तुकुष्ठित नाभ्यपूजयन् । भविष्यकीतयिष्यामिशन्तनोस्तुनिवोधत ॥४१ श तनुस्त्वभवद्राजा विद्वान् सो वै महाभिषक् । इद चोदाहरन्त्यत्र श्लोक प्रति महाभिषक् ॥४२ सार्वभौम से जयरमेन ने जन्म ग्रहण किया तथा फिर इसका पुत्र रुविर उत्पन हुआ । रुचिर का पुत्र भौम और भौम का सुत त्वरिताय हुआ ।। ३६ ॥ त्वरितायु का अक्रोधन और फिर इससे देवतिथि ने समुत्पत्ति प्राप्त की थी। देवातिथि का दायाद दक्ष नाम घाला हुआ कुशवर्णन ।।३७11 सदन में भीममेन ने जन्म प्राप्त किया था और इसका अमा दिलोर हुआ था। दिलाप का पुत्र प्रतीर ससन्न हुआ और ४सरे र तीन पुत्र बताये गये हैं ।। ३।। वे तीन देवापि- शान्तनु और वालोंक ये थे। दालोक के दायाद है नए ! सात बाहीश्वर हुए ।।३६॥ देवादि अप ध्यान होकर प्रधानों न पिर मुनि हो गया। मुनिगम ने कहा-वह उनेश्वर प्रजारों में रिस प्रकार अपघात हो गया पा । प्राओ ने उस रात्र का कोरमा दोष बनाया था ? ||४०॥ सूतजी ने कहा-वह राजपुत्र कुष्ठिठ था अतएव प्रजात्रो ने उसका पूरन नहीं दिया। मैं भविष्य का कीर्तन कागा अब मन्ननु के विषय में समझ लो ।। ४१ || जन्तुनु जो राजा हुमा पा परमोच्च कोटि ना विद्वान् पा और महान मिपर भी पा । इस विषय में यह श्लोक उप महानिपत सम्बन्ध में उराहत पिया जाता है ॥४॥ य व नराम्रा स्मृति जीर्ण रोगिणमेश्च । पुन वा च भवति तस्मात शन्तनु विदुः ॥४३ तत्तस्य शन्तनुत्व हि प्रजामिरिह कीत्यते। ततो वृणुत भाषं गन्तनु वो नप !!५४ तम्या देवरत नाम कुमार जनयत् विभुः । वाली विचित्रवीर्यन्तु मानेयोऽजनपद मुनम् १४५ शन्ननोदंवित शानात्मानमालमपम् । कृष्णपापनो नाम ये वैचित्रवाच ॥४६ धृतराष्ट्रव पापच बिदुर चाप्यजीजनत् । घृतराष्ट्रानुगान्या पुत्रानजनजयन् शतम् ॥४१ तेपा दुर्योधन धेष्ठः मदक्षतम्य दं प्रभु । मादी कुन्ती तथा चेत्र पाडी िवभूवतु ॥४२ देवदताः मुताः पञ्च पाण्डोग्य भिजमिरे। धर्माधिष्टिगेज माग्नाच वृशोदर. ive

मत्स्यपुराण
उस राजा शन्तनु में ऐसी एक विशेषता थी कि वह जिस-जिसके
शरीर का अपने करो से केवल स्पर्श ही करता था वह चाहे कैसा ही
जीर्ण रोगी क्यो न हो सब रोगो से मुक्त होकर पुन: युवा हो जाया
करता था। इसी कारण से इसका नाम शन्तनु यह कहा गया || ४३ ॥
उस राजा के शन्तनु होने को उसकी प्रजाओ के द्वारा कीतित किया
जाता था। इसके उपरान्त उस राजा शन्तनु ने अपनी भार्या बनाने के
लिये जाह्नवी का वरण किया था ।।४४ ॥ उस गङ्गा मे उस विभु ने
देवव्रत नाम वाले कुमार
को
उत्पन्न किया था। काली ने विचित्र वीर्य
को जन्म दिया था। जिसने दास मे सुत को जन्म दिया ॥ ४५ ॥ शननु
का पुत्र अत्यन्त प्रिय-शान्तात्मा और कल्मष रहित था। कृष्ण द्वैपायन
ने विचित्र वीर्य के क्षेत्र मे धृतराष्ट्र–पाण्डु और विदुर को उत्पन्न किया
था। धुतराष्ट्र ने गान्धारी नाम वाली भार्या मे सौ पुत्रो को जन्म दिया
था ।। ४६, ४७ ॥ उन एक सौ पुत्रो मे दुर्योधन श्रेष्ठ था जो समस्त
क्षत्रियो का प्रमु हुआ था। माद्रो और कुन्ती ये दो भार्याऐ पाण्ड की
हुई गी॥४८॥ देवो के द्वारा दिये हुए पाँच पुष पाण्दु के अर्थ मे समुत्पन्न
हुए थे। धर्म से यु-िष्ठिर ने जन्म ग्रहण किया और मारुत से वृकोदर की
समुत्पत्ति हुई थी ।।४६ ॥
इन्द्राद्धनञ्जयश्चीव इन्द्रतुल्यपराक्रमः ।
नकुल सहदेवश्व माद्रयशिवाभ्यामजीजनत् ॥५.
पोते पाण्डवेश्यस्तु द्रौपद्या जज्ञिरेसुताः ।
द्रौपद्यजनयच्छेप्ठप्रतिविध्ययुधिष्ठिरात् ॥ १
श्र तसेन भीमासेनाच्छुतकीर्ति धनञ्जयात् ।
चतुर्थ श्रतकर्माण सहदेवाद जायत ।।५२
नकुलाच शतानीक द्रौपदेया. प्रकीर्तिताः।
तेभ्योऽभरे पाण्डवेया.पडेवान्येमहारथाः ॥५३
हैडम्यो भीमसेनात. पुत्रो जशे घटोरकरः ।
।

कुरु वश वर्णन ०१६ काशीवलधरावभीमाज्जवसर्वगसुतम् ॥५४ सुहोत्र तनय माद्री सहदेवादसूयत। करेणुमत्या चंद्याया निमित्रस्तुनाकुलिः ॥५५ सुभद्राया रथी पार्थादभिमन्युर जायत । योम देवकीचैव पुत्र यज्ञ युधिष्ठिरात् ।।५६ महाराज इन्द्रदेव से धनन्जय का जन्म हुआ था जो पूर्णरूप से इन्द्र के समान ही पराकम वाला था। माद्री ने नकुल और सहदेव को अशिवाओं से जन्म दिया था ॥ ५० ॥ ये पांच पाण्डवों से द्रौपदी मे सुत समुत्पन्न हुए थे। द्रौपदी ने युधिप्टिर से श्रेष्ठ पुत्र प्रतिविन्ध्य को जन्म दिया था। भीमसेन से अतसेन को और श्रुतिकोनि को घमन्त्रय से तथा चौथे वनकर्मा को सहदेव से एवं शतानीक नामक सुन को नकुल से उत्पन्न किया था। ये सभी पुत्र द्रौपदेय कीर्तित हुए थे। इनसे भी दूपरे पट् अन्य महारथ भो पाण्डवेय हुए थे ।। ५१ ।। ५२ ।। ५३ ।। भीमसेन से हिडम्ब का पुत्र हैडम्ब पटोत्कच उत्पन्न हुआ । पाशीवलधर भोम से सवंग मुत ने जन्म ग्रहण किया था ॥ ५४ 19 मादी ने महदेव से मुहोय नामक तनय को उत्पन्न किया था। करेगुमती चंदा में नकुल से नालि निरमिन नामक पुत्र ने जाम धारण किया ॥५५॥ पार्य अर्जुन से सुभद्रा पत्नी मे यो अभिमन्यु ने समुत्पत्ति प्रान्त की थी। देवकी ने योय नामधारी पुत्र मंत्र युधिष्टिर से जन्म दिया अभिमन्यो: परितित्तु पुत्रः परपुर-जय. । जनमेजय परिक्षितः पुत्रः परमागिका ॥५७ ब्रह्माण कल्पयामाम सब वाजसनेयकम् । स वैशम्पायनेनैव सप्त. फिल महापणा ॥५८ न स्थास्यती हर्बुद ! तर्वतद्वचनं भुवि ।

२१८ मत्स्यपुराण यावत् स्थास्यसि त्व लोकेतावदेप्रपत्स्यति ।।५६ क्षत्रस्य विजय ज्ञात्वा तत. प्रभृति सर्वशः । अभिगम्य स्थिताश्चैव नृपञ्च जनमेजयम् ॥६० ततः प्रभृति शापेन क्षत्रियस्य तु याजिनः । उत्सन्ना याजिनो यज्ञ तत: प्रभृति सर्वशः ॥६१ क्षत्रस्ययाजिनःकेचित् शापात्तस्यमहात्मनः । पौर्णमासेनहविषा इष्ट्वात स्मन्प्रजापतिम् ।। स वैशम्पायनेनैव प्रविशन् वारितस्तत ॥६२ परिक्षितः सुतः सो वै पौरवो जनमेजयः । द्विरश्वमेधमाहृत्य महावाजसनेयकः ॥६३ अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु से परयुञ्जय अर्थात् शत्रुओ के पुरों पर विजय प्राप्त करने वाले परीक्षित नामक पुत्र का जन्म हुआ था। परीक्षित से परम धार्मिक जनमेजय पुनने ज म धारण किया था।५७। उसने समस्त वेद को वाजसनेयक कल्पित किया था। उसको महषि वैशम्पायन ने शाप दे दिया था 1५८। महर्षि ने यही शाप दिया था कि हेदुष्ट बुद्धि वाले ! यह तेरा वचन भूमण्डल मे स्थित नहीं रहेगा। जब तक तू इस लोक मे स्थित रहेगा तभी तक यह रहेगा ॥५६॥ क्षत्रिय की विजय को जानकर तभी से लेकर सभी ओर से नृप जनमेजय के समीप मे भिगमन करके स्थित हो गये थे ।६०। सब ही लेकर यजन करने वाले क्षत्रिय के शाप से सभी ओर से याजोगण यज्ञ में उत्पन्न हो गये थे ।।२१।। कुछ क्षत्रिय के याजी उम महात्मा के शाप से पौर्णमास रवि के द्वारा उसमे प्रजापति का यजन पर फिर वह वैशम्पायन के द्वारा ही प्रवेश करते वारित हुआ था १६२। उस परीक्षित के पुत्र पौरव जनमेजय ने दो प्रश्वमेधो का आहरण पर वह महावाब सनेयक होगया पा ॥६३॥ प्रवतयित्वा त सर्वेमृपि वाजसनेयकम् । विवादे ग्राह्मण. सामभिशप्तो वन ययौ ॥६४

दुहवंश वर्णन
२६
।
पुर,
जनमेजयाच्छतानीकस्तस्माज्जास वीर्यवान् ।
जनमेजयः शतानोक पुत्र राज्येऽभिपितवान् १६५
अथाश्वमेधेनततःशतानीकस्यवीयवान् ।
जधिसोमकृष्णाख्य साम्प्रत यो महायशाः ॥६६
तस्मिन् शासति राष्ट्रतु घुष्माभिरिदमाहृतम् ।
दुरापं दीघंस वै त्रीणि वर्षाणि पुष्करे ।।
वपद्वय कुरुक्षेत्र द्वपदत्या द्विजोत्तमाः ॥६७
भविष्य धातुमिच्छामः प्रजा लोमहपणे।
किन यदेतद्वं व्यतीत कीर्तितं त्वया ॥६८
येपुवै स्थास्यतेक्षन उत्पत्स्यन्ते नृपाश्चये।
तेपामायः प्रमाणञ्चनामत व तान्नृपान् । ६६
कृतयुगप्रमाणञ्च त्ताद्वापरयोस्तथा ।
कलियुगप्रमाणञ्च युगदोप युगक्षयम् 11७०
उस सब वाजसनेयक को ऋषि मे प्रवृत्त कराकर ब्राह्मणों के
साथ विवाद में अभिशप्न होकर वह फिर वन मे चला गया था ।।६।।
उस जनमेजय से महान वर वीर्य वाले शतानीक ने जन्म धारण किया
पा। जनमेजय ने उस अपने पुत्र शतानीक को राज्य के मिहामन पर
अभिषिक्त कर दिया थो॥६५॥ फिर शतानीक के अपनो गया
अधिसाम कृष्ण नामधारी ने जम ग्रहण किया था जो इस समय में

मत्स्यपुराण
बननाने की कृग कीजिए । कृतयुग का प्रमाण तथा त्रेता और द्वापर का
प्रमाण और कालयुग का प्रमाण भी बनलाइये युगो के दोष तथा युगो का
क्षय भी करने की अनुकम्मा कीजिएगा ॥६६, ७०॥
सुखदुःखप्रमाणञ्च प्रजादोप युगस्य तु ।
एतत्सवं प्रसख्याय पृच्छता वहि नः प्रभो ॥७१
यथा मे कीतित पूर्व व्यासेनाक्लिप्टकर्मणा ।
भाव्य कलियुगञ्चैव तथा मन्वन्तराणि च ।।७२
अनागतानिसर्वाणि व्रवता मे निबोधत ।
मत व प्रवक्ष्यामि भविष्या ये नपास्तथा ।।७३
ऐडेवाकान्वये चव पोरवे चान्वयेतथा।
येपु मस्थास्यये तव ऐडेक्वाकुबुलं शुभम् ॥
तान् सर्वान् कोत्तयिप्यामि भविष्ये कथितान्नुपान्म७१
तेभ्योऽपरेऽपियेत्यन्येा परस्यमोनपा:पुनः ।
क्षत्रा पारशवाःशूद्रास्तथान्ये महीश्वराः ॥७१
अन्धा:शका पुगिन्दारचलिकायनास्तथा ।
पवर्तामीरशवरायेचान्यम्ले छसम्मवाः ।।
पर्यायतः प्रवक्ष्यामि नामतरीय सान्नुपान् ।।७६
अधिसोमणश्चतेषां प्रथमवत्तं तेनृपः ।
तस्यान्ववाश्यामि भविष्येषितान्नपान 10

२२१ कुरु वश दर्णन - जिनमे सस्थित रहेगा वह एक्ष्वाकुल शुम है। उन सभी भविष्य मे कथित नगो को में बताऊंगा ।।s४. उन से मो और दूसरे जो अन्य नृप पुनः उत्सन्न होग वे क्षत्रिय-नारशवा-नूद्र तथा अन्य जो भी महीश्वर भविष्य मे होंगे उन्हें भी बनला दिया जायगा !!७॥ मन्ध-शक- पुलिन्द-चूलिक-यवन-क्वत-आमीर-शवर और जो अन्य म्लेच्छ सम्भव हैं उन सबको मैं पर्याय से तया नाम से नृपो को बतलाऊँगा ।।७।। इन सब में अधिमोम कृष्ण प्रयम नृप । अब उसके अन्दाय (वश) में भविष्य में कपिउ नृपों को मैं आप लोगों को सव बतलाऊँगा आप लोग सब ध्यानपूर्वक प्रवण वाजिए ।।७।। अधिमोमकृष्णपुत्रन्तु विवक्ष वितानृपः । गगया तु हते तस्मिन नगरे नागाहये ॥७० त्यक्त्वा विवक्षुर्नगरकौशाम्ब्यान्तुनिवत्स्यति । मविप्याप्टौमृतास्तस्यमहावलपराक्रमाः ॥७९ भूरियेप्ठ.सुतस्तस्यतस्यचित्ररय. स्मृतः। गुचिद्रवश्चित्ररथात् वृष्णिमाश्चमुचिद्रवात् ।।८० वृष्णिमत सुपेणश्वभविष्यतिशुचिन पः । तस्मात् सुपेणातभवितासुनीथोनामपार्थिवः ।।१ नृपात् मुनीथाद्भविता नचक्षु सुमहायशाः । नचक्ष पस्तु दायादो भत्तिा व सुखीयल ॥२ मुसोवलसतश्चापि भावी राजा परिणवः। परिष्णवमुतश्चापि भविता सुतपा नृपः ।।३ मेधावी तस्य दायादोभविष्यति न समय. । मेधाविनः सुतश्चापि भविष्यति पुरज्जयः । अधिसोन कृष्ण का पुत्र विवक्षु नाम वाला नृप होगा । उन नागमाप नगर मे गड़ा के द्वारा हन हो जाने पर अर्थात् गङ्गा के नार का त्याग कर देने पर वह राजा शिवशु उस अपने नगर का त्याग .

इम पुरया मानी पुत्र उव उत्पन होगा और उसस २२२ मत्स्यपुराण करके फिर कौशाम्बी में निवास करेगा । उसके आठ पुत्र समुत्पन्न जो महान् बल और पराक्रम से समन्वित होगे ॥ ७८ ॥ ७६ ।। उनमे सबसे ज्येष्ठ जो पुत्र होगा वह भूरि होगा । फिर इसका जो पुत्र होगा उसका नाम चित्ररथ होगा। उस चित्ररथ से शुचिद्रव जम लेगा। फिर उस शुचिद्रव से वृष्णिमान् समुत्पन्न होगा ॥८॥ वृष्णिमान् रा । का पुत्र परम शुचि नृप सुपेण जन्म ग्रहण करेगा । फिर उस सुषेण से सुनीथ नाम वाला नृप समुत्पन्न होगा ।। ८१ ॥ इसके अनतर उस सुनीथ नामक नृप का पुत्र महान् यश से समुत्पन नृचक्ष होगा । इस न चक्षु राजा का दायाद सुखीवल ज म ग्रहण करेगा 11८२ ॥ सुखीवल का पुत्र भविष्य मे होने वाला राजा परिष्णव उत्पन्न होगा । इस परिष्णव का पुत्र सुतया नाम वाला नृप होगा ।। ८३ । इस सुतया का दायाद मेधावी उत्पन्न होगा- इसमे कुछ भी सशय नहीं है। मेधावी का पुत्र पुरञ्जय होगा ।।४।। उर्वोभाव्य सुतस्तस्य तिग्मात्मा तस्य चात्मज । तिग्मात वृहद्रथो भाव्यो वसुदामा वृहद्रथात् ॥५ वसुदाम्न पतान का भविष्योदयनस्तत । भविष्यते च दयनात् वीरो राजा वहीनर ॥६६ वहीनगत्मजश्चैव दण्डपाणिर्भविष्यति । दण्डपाणे निरामित्रो निरामित्रात्त क्षेमक || ८७ अन्ना-वशश्लोकोऽय गीतो विप्रै पुरातन । ब्रह्मक्षग्रस्ययो योनिर्व शो देवपिसत्कृत। क्षेमक प्राप्य राजान सस्थास्यति कलो युगे ।।८८ इप्येप पोरवो वशो यथावदिह कीतित । धीमत पाण्डुपुत्रस्य अर्जुनस्य महात्मन ॥८६ भारमज निमारमा हागा। निगमात्मा का पुत्र वृहद्रथ जाम लगा और

अग्नि दंघ वर्गन
२२३
दृहद्ध मे व नुदामा त पुत्र शतानीक जन्न धारण करेगा और फिर
शतानीक से दयन पंदा होगा। इस दयन के पुत्र का नाम वीर राना
यही नर होगा। वही नर गजा वा आत्मत्र द पापि समुत्पन्न होगा
फिर दण्ड हामि से निरामित्र पुत्र को उत्पत्ति होगी और निरामित्र से
सोयक नाम वाला उन्म लेगा। यहा पर पुरातन चित्रों के द्वारा यह अनु
वग का लोक गाया गया है। ब्रह्मण और क्षत्रिय की जोयोनि है वह
वर देवपियों के द्वारा मना है । क्षेमक राजा से प्राप्त करके इस
करियुग पे मंस्थित होगा ।।८६, ८, ९ ॥ इस प्रकार से यह पौरव
का यहा पर ययावत कोविन कर दिया गया है जो धोमान गाण्ड के पुत्र
महान प्राप्मा वारे अर्जुन का है |
२६- अग्नि वंश वर्णन
ये पूज्या.स्युद्विजातीनामनिय.मूत ! मवंदा।
तानिदानी समाचश्व तश चानुवंशः॥१
योऽमावन्निभोमानी म्मृत- स्वायम्मुवेन्तरे ।
ब्रह्मणो मानमः पुत्रस्तस्मात् स्वाहा व्यजीजनत् ।।२
पावक पवमान चचिरग्निश्च यः स्मृताः।
निमथ्य पवमानोऽग्निर्वा तः पावकात्मजः ॥३
शुचिरग्नि स्मृत मौरः स्यावरारचंवतस्मृताः ।
परमानात्मजो हाग्निहन्यवाह पटच्यते ॥४
पाक्तिः सहरसस्तु हन्यवाहमुखः गुचिः ।
देवाना हम्यवाहोऽग्निः प्ररमो ब्रहा मुतः ॥५
सहरक्ष नरानान्नु यानान्ते प्रयोऽनयः।
एतेषां पुत्रपौवाव नस्तारिशनव च ॥

२२४
मत्स्यपुराण
।
प्रवक्ष्ये नामतस्तान्वैप्रतिभागेन तान् पृथक ।
पावनोलौकिको ह्याग्निःप्रथमोब्रह्मणश्चय.।"
ऋषिगण ने कहा-हे सूतजी ! जो अग्नियां द्विजातियों की
परम पूज्य हैं उनके विषय मे इस समय मे बतलाइये और उनका वश की
आनुपूर्वी के क्रम से कहने की कृपा कीजिये ॥१॥ महर्षि श्री सूतजी ने
कहा-जो यह अग्नि अभी मानी है जो कि स्वायम्भुव अन्तर मे कहा
गया है वह तो ब्रह्मा का मानस अर्थात् मन से समुत्पन्न पुत्र है फिर
उससे स्वाहा ने जन्म ग्रहण किया था ॥२॥ पावक-पवमान-शुचि
और अग्नि ये नाम इसके कहे गये हैं। निर्मथ्य-पवमान अग्नि है तथा
पावकात्मज वैद्य त अग्नि है ॥ ३ ॥ शुचि अग्नि सौर होता है । वे सब
स्यावर ही कहे गये हैं। पवमानात्मज जो अग्नि है वह हव्यवाह वहा
जाता है ॥ ४ ॥ पावकि सहरक्ष होता है और हव्यवाह मुख शुचि होता
है । देवो का अग्नि हव्यत ह होता है । प्ररम अग्नि ब्रह्मा का सुत था
॥ ५॥ सुरो का सहरक्ष होता है। वे तीनो के तीन अग्नियाँ हैं । इन
अग्निया के पुत्र और पोन चालीस है। अब उनके नाम लेकर प्रतिभाग के
द्वारा उनका पृथक् बनलायंगे । लौकिक अग्नि पावन होता है जो प्रथम
ब्रह्मा का सुत है ॥ ६,७ ।।
ब्रह्मोदनाग्निस्तत् पुत्रोभरतो नाम विश्रुतः ।
वैश्वानरा हव्यवाहो वहन् हव्यममारसः ॥
समृतोऽथर्वणः पुत्रो मथित. पुष्करोदधिः ।
योध्या लौकिको ह्यग्निदक्षिणानि स उच्यते ॥६
भृगो प्रजायताथर्वाह्यगिराथर्वणःस्मृत ।
तम्यह्यलोकिकोयग्निदक्षिणाग्निासः।।१०
अथय पवमानस्तु निर्मथ्योऽग्नि,थ उच्यते ।
सच वै गाहात्योऽग्निः प्रथमोग्राण.स्मृतः॥११
तत सभ्यावसथ्यौन सशत्यास्तो गुतावुभौ ।
।

अग्नि श वर्णन और हत्य नतः पाडशनद्यस्तु चकमे हव्यवाहनः।। य: खल्वाहवनीलोऽग्निरभिमानी द्विजैः स्मृतः ॥११ कावेरी कृष्णवेणीञ्च नमंदा यमुना तथा। गोदावरी वितम्ताच्च चन्द्रभागामिरावतीम् ।।१३ विपाशा कौशिकीजोव शतद्रू सरय्तथा। सीता मनस्विनीञ्चैव नदिनी पावना तथा ॥ १५ जो ब्रह्मादोनाग्नि है उसका पुत्र भरत- इस नाम से विश्रुत है । वश्वानर-हस्यवाह को वहन करता हुआ ममारस और समृन यह अथर्वण अग्नि होता है । मथित पुष्करी धि पुत्र है । जो अर्वा है वह लौकिक अग्नि है और वह दक्षिणाग्नि कहा जाया करता है ।।८।। प्रया भृगु से प्रजात हुआ था और अथर्वण अङ्गिग कहा गया है । उसका अलौकिक अग्नि है वह दक्षिणाग्नि कहा गया है ॥१०॥ इसके अनन्तर जो पबमान है वह निमय्य अग्नि कहा जाता है । और वह गार्हपत्य अग्नि है जो प्रथम ब्रह्मा का कहा गया है ।।११। इसके पश्चात् सम्य और अद- सम्य ये दोनो सशनि के मुत थे। इसके अनन्नर हाय बाह्न ने पोडश नदियो को पादविक्षिप्त किया था। जो आहब नील अग्नि है वह द्विजी के द्वारा अभिमानी कहा गया है ॥१२॥ यावेगे-कृष्णवेणी-नमंदा- यमुना-गोदावरी-वितस्ता-चन्द्रभागा- इरावती-विपाशा-कोशिकी- शनद्र-सरयू-सीता-मनस्विनो-नदिनी-पावला ये सोलह नदिया हैं उनमे मोलह मो मे आत्मा को पृथक २ प्रविभक्त करक उस समय मे मन नदिनों में बिहार करते हुए वह विच्छ हो गया था ।।१३।। 17४,१५॥ तासुपोडसधारमान प्रविभज्य पृथपृथक् । तदातु विहरस्तामु घिण्ये छ सबभूवह ॥१५ स्वानिधानस्थिता विष्ण्यास्तासुत्पन्नाश्च घिष्णवः । धन्येषु जज्ञिरे यस्मात् ततस्त धिष्णव. स्मृता ॥१६ मत्स्यपुराण इत्येते वै नदीपुत्रा धिष्ण्येषु प्रतिपेदिरे । तेषा विहरणीया ये उपस्थेयाश्च ताण ॥ विभुःप्रवाहणोग्नोऽध्रस्तत्र I धिष्णवोऽपरे ॥१७॥ विहरन्ति यथास्थान पुण्याहे समुपक्रमे । अनिर्देश्यानिवार्याणामग्नीना शृणुत क्रमम् ॥१८ वासवोऽग्निःकृशानुयॊद्वितीयोत्तरवेदिक. । सम्राडग्नि सुतोह्यष्टावुपतिष्ठन्तिाद्विजा ॥१६ पर्जन्य. पावमानस्तुद्वितीयःसोऽनुदश्यते । पानकोष्णःसमुह्यस्तुवोत्तरेसोऽग्निरु- यते ॥२० हव्यसूदोह्यसमृज्यः शामिय. सविभाव्यते । शतधामासुधाज्योति रौद्रेश्वयं.सउ यते ॥२१ अपने अमिधान मे स्थित धिष्ण्य उनमे समुत्पन्न है और विष्णु हैं । क्योकि उन्होंने धिष्ण्यो मे जाम ग्रहण किया था अतएव वे घिष्णु में प्रातपन्न हुए थे । जो उनके विहरणीय तथा उपस्थेय हैं उनके विषय मे गे सुनलो । प्रवाहण अग्नीध्र विभु है और उसमे स्थित अप धिष्णु हैं । ॥१७॥ किसी पुण्याह क समुपक्रम होने पर यथास्थान मे विहार किया करते हैं । अनिर्देश्य और अनिवार्य अग्नियो का क्रम श्रवण करो ॥१८॥ यमव अग्नि-कृशानु और जो द्वितीय उत्तरवेदिक है । सम्राट् अग्नि हे द्विजगण ये आठ उनका उपस्थान किया करते हैं ॥१६॥ पर्जन्य - पवमान वह द्वितीय अनुदृश्यमान होता है । पात्रकोष्ण और समुह्य अग्नि उत्तर में कहा जाता है ॥२०॥ हम्य सूद और अस मृज्य शामित्र सबिभावित हाता है । शतधामा-सुधा ज्याति वह रोपवयं कहा जाया करता ॥ २१ ॥ ब्रह्मज्योतिवसुधामा ब्रह्मस्थानीय उच्यते । अजयपादुस्थेय ग वै गालामुयोयतः ।।२२ - - अग्नि दश वर्णन अनिर्देश्योह्यहिबुध्नो वहिरन्ते तु दक्षिणी। पुत्राह्येते तु सर्वस्य उपस्थेगद्विजे स्मृता १०३ ततोविहरणोयास्तुवक्ष्याम्यष्टौतुतान् सुतान् । होत्रियम्यसुनो ह्यग्निर्वहिपो ह यदाहन ॥२१ प्रशस्योऽग्नि प्रचेतास्तुद्वितीय ममहायक. । सुताह्यग्ने विश्ववेदाब्राह्मणाच्छसिरु यते ।।२५ सपायोनि स्मृत म्वाम्म सेतुर्नाम विभाव्यते । घिण्यआहरणाह्येनेमोमेनेज्यन्तवंद्विज ॥२६ तना य पाया नाम्ना य सद्भिर्योग उ-यते। अग्नि सोऽवभृथेने योवरुणेन सहेज्यते ।।३७ हदयस्य सुतो ह्यग्नेजठरेऽगो नृणा पचन् । मन्युमान् जाठरश्चाग्निविद्धाग्नि सतन स्मृत १२८ ब्रह्म ज्योति और वमुवामा अग्नि ब्रह्मस्थानीय कहा जाता है । अजैकपाद उपस्थेय है क्योति वह शालामुख होता है ।।२५॥ अनिदेश्य- अहिदुल वाहिर अन्त में दक्षिण हैं य मर्व के पुत्र है और द्विजो द्वाग उपम्यान करने योग्य कहे गय है।॥२३॥ इमबनावर विहरणीय न पाठ मुनो के विषय में बतलान हैं। होत्रिय का वहिप हम वाह्न अग्नि सुत है ॥२४॥ प्रशस्य अग्नि प्रचेता दूसरा ससहायक होता है। विश्ववेदा भाग्न का गुत है और वाह्मणाच्छामि कहा जाता है ॥२५.। अपायोनि स्वामह कहा गया है तथा सनु नाम विभावित हाता है . य सब धिण्य बइप है और दिनों के द्वारा सोम स इश्वमान होत है ।।२६। इसके पात् जो पाया जा सत्तुरुषों के नाम स याग कहा जाता है या अग्नि प्रवभृउ म हो जानना चाहए यह वरंग के साथ ग्यमान होता है ॥२७॥ डा मनुष्पा क जठर म पार हुए पदार्थो वा पाचन करता है वह हृदय को आगन मुत है । आउर अग्नि वा मन्युमान निल्नर वह विद्धाग्नि पहा गया है।।२। - मत्स्यपुराण परस्परात्थितो ह्यग्निभूतानीह विभुर्दहन् । अग्नेमन्युतम पूनो घोर सम्वतक स्मृत ||१६ पिबनानि स वसति समुद्र वडवामुसे। समुद्रवासिन पुन सह रक्षो विभाव्यते ॥३० सहरक्षस्तुवामान्गृहसवसतेनृणाम् । कव्यादग्नि सुतस्तस्य पुरुपान्याऽत्तिवपृतान् ॥३१ इत्येतेपावकस्या नेद्विज पुना प्रकीत्तिता । तत सुतास्तु सौवीर्याद्गन्धर्वैरसुरहता ॥३२ मथितोयस्त्वरण्यान्तुमाऽनिरापसमिन्धनम् । आयुर्नाम्नातुभगवान् पशौयस्तुप्रणीयते ॥३३ आयुपो महिमा-पुत्रो दहनस्तु तत सुत । पाकरज्ञष्वभीमानीहुत हव्य भुनक्ति य ॥३४ सवस्माद्दव नोकाच्च ह य कव्य भुनक्ति य । पुत्रोऽस्य सहितो ह्यग्निद्भुत समहायशा ॥३५ परस्पर मे यमुस्थत अग्नि यहा पर विभुम्तो का दाह करता है वर अग्निका म युनम घार पुत्र सम्बतक कहा गया है। पता हुआ वह अनि समुद्र मे बडवा के मुख म वास किया करता है। समुद्र में वास करने वाले का वह पुत्र मारक्ष बिभावित होता है ॥२६, ३०1। जो सह- रक्ष नाम वाला अग्नि है वह सब कामो को पूर्ण क्यिा करता है और मनुष्यो के घर मे ही निवास करता है । क्रव्याद नामक अग्नि उसका पन है जो मृत हुए मनुष्यों को खा जाता है अर्थात् शव को भस्मीभूत जनाकर कर दिया करता है ॥३१॥ ये इतने द्विजो के द्वारा पावक अग्नि पुत्रो का प्रीतन किया गया हैं। इसके अन-नर जो सुत हुए थे वे सौर्य स ग घव और असुरो के द्वारा हृत हो गये हैं ॥३२॥ जो अरणी म मथित परो समु पन हुधा अग्नि है वह आप समि धन हाता है । व भगवा । नाग स न यु हाता है जा तु म प्रतीयमान होता है २३० मत्स्यपुगण वान् ये ही आठ कीत्तित किये गये हैं । यह समस्त प्रजा शुन्यग्नि का है और इस तरह से चौहद अग्नि है । इतने ये अग्नि बतला दिये गये हैं जा अध्वर मे प्रणीत होते हैं । सर्ग के समतीत होने पर जो सुरोतम यामो के सहित स्वायम्भुवअन्तर मे पूर्व मे अग्नि वे तब प्रभोमाना है। ये विहार करने के योग्य चेतन और अचेतनो मे यहाँ पर स्थानाभिमानी हव्य वाहन अग्नीध्र पहिले थे ॥३६, ४०, ४१॥ सकाम और नैमित्तिक आद्य वे हैं जो कम्मे मे समवस्थित रहा करते हैं ॥४२॥ पूर्वे मन्वन्तरेऽतीते शुक्रर्यामश्च तं सह । एते देवगण साद्ध प्रथमस्यान्तरे मनो ।।४३ इत्येता योनयो ह्यता स्थानाख्याजातवेदसाम् । स्वारोचिवादिपुज्ञ या.सवर्णान्तेषुसप्तपु ॥४४ तैरेवन्तु प्रसंख्यात साम्प्रतानागतेष्विह। मन्वन्तरेषु सर्वेषु लक्षण जातवेदसाम् ।।४५ मन्वन्तरेषु सर्वेषु नानारू प्रयोजन । घत्त ते वर्तमानश्च यामर्दवै सहा नयः ॥४३ अनागत सुरं साद्धं वत्स्यन्ता नागतास्त्वथ । इत्येष प्रयोऽग्नीनामयाप्रोक्तोयथाक्रमम् । विस्तरेणानुपूर्व्या च किमन्यच्छातुमिच्छ्थ ।।४७ पूर्व मन्वन्तर के अतीत हो जाने पर उन शुक्र यामो के सहित प्रथम मनु के अन्तर मे ये सब देव गणो के साथ मे हैं ॥४३॥ इतनी से सब स्थानास्य जात वेदाओ की योनियां यनल यी गई हैं वे सब मवणान्त सात स्पारोचिप आदि मे जाननी चाहिए ॥ १४ ॥ इस प्रकार से उनके द्वारा ही प्रसत्यात हैं। इस समय में यहाँ पर अनागत सव मन्यन्तगे मे न ना रूप वाले प्रयोजनों से युक्त मौर वर्तमान याग तथा देवो के साय अग्नि हैं ।। ४६॥ अनागत गुरों के साथ वे भी आगत नहीं है-इस प्रकार से यह अग्नियों का प्रचय मैंने प्रम के अनुसार बता दिया है जो २३१ कर्मयोग वर्णन विस्तार के साथ और आनुपूर्वी के सहित ही कहा गया है । अब इसक मागे आप लोग मुझसे क्या श्रवण करना चाहते है ॥४७॥ ३०-कर्मयोग वर्णन इदानी प्राह यद्विपण पृष्टः परममुत्तमम् । तमिदानी समाचश्व धर्माधर्मस्य विस्तरम् ॥१ एवमेकार्णवे तस्मिन् मत्स्यरूपी जनार्दनः । विस्तारमादिसगंस्य प्रतिसर्गस्य चाखितम् र कथयामाम विश्वात्मा मनवे मूर्यसून थे। क्रम्मंयोगञ्च साह्वयञ्च यथावद्विस्तरान्वितम् ॥ श्रोतुमिच्छामहे सूत ! वर्मयोगम्य लक्षणम् । यस्मादविदित लोके नकिञ्चित्तवसुव्रत ।।४ कर्मयोगच्च वक्ष्यामि ययाविष्णुविभापितम् । ज्ञानयोगमहन्वाद्धि कम्मयोगःप्रशस्यते 12 फर्मयोगोद्भवं ज्ञान तस्मात्तत्परम्पदम् । वम्म ज्ञानोद्भव ब्रह्म नव मानमरम्मंग तस्मातमंणियुक्तात्मातत्वमाप्नोतिबाट वेदोऽनिलोधनमलमाचारमचंदनदिनमा

२३२
मत्स्यगण
कर्म योग तथा सांस्य योग को भी बतलाया था ॥ २, ३ ।। ऋषिगण ने
कहा-हे सूतजी ! हम इस समय मे वम योग का लक्षण प्रवण करना
चाहते हैं । हे सुव्रत ! कारण यह है कि आप तो सर्व ज्ञाता महान् परुप
हैं फिर ऐसा अवसर हमको कब मिलेगा। ऐसी कोई भी बात नहीं है
जिसको आप नही जानते हो ॥ ४ ॥ सूतजी ने कहा-जिस प्रकार से
ठीक २ भगवान् विष्णु ने भाषित किया था। उमी कम योग को हम
बतलाते है । कर्म योग की बडी प्रशसा भी है। यह एक सहस्र ज्ञानयोग
से भी कही अधिक प्रशस्त माना जाता है॥५॥ मम योग से र मुत्पन्न
जो ज्ञान है उसी से वह परम पद प्राप्त होता है। कम ज्ञान से उद्भूत
होने वाला ब्रह्म है ज्ञान कम से उदभव होने वाला नहीं है ।। ६ ॥ इस
लिये कर्म योग की उपासना ही सर्वश्रेष्ठ है । जो मनुष्य कम मे
युक्त आत्मा वाला है वह शाश्वत तत्व को प्राप्त किया करता है। अखिल
वेद मूल धन है और उसका हित करने वाला आचार भी है ।। ७॥
अष्टावात्मगुणास्तस्मिन् प्रधानत्वेन सस्थिताः ।
श्या सर्वेषु भूतेषु क्षान्तीरक्षातुरस्य च ॥८
अनसूया तथा लोके शौचम-बहिद्विजा ।
अनायासेपु कार्येषु माङ्गल्याचारमेवनम् ॥६
न च द्रव्येषु कापण्यमार्तेपू जितेषु च ।
तथा स्पृहा परद्रव्ये परस्त्रीषु च सर्वदा ॥१०
अप्टावात्मगुण प्रोक्ता पुराणस्यतुकोविद ।
अयमेव क्रियायोगो ज्ञानयोगस्यसाधक ।।११
कम्मंयोग विना ज्ञान व स्यचिन्ह दृश्यते ।
अमित्यक्षित धर्ममुपतिप्ठेत्प्रपत्नत. ॥१२
देवताना पितृ णाञ्च म प्यारणाञ्च सवदा।
कुर्यादहाह्याभूतपिगणतपणम् ॥१३
स्वाध्यायरचंयेच्चीन होमविहान् यथाविधि ।
पितृ न श्राद्धं रनदानभूतानिवलिकर्माभः ।।१४

कर्मयोग वर्णन आ3 गुण है दोन उनमात्मा में प्रधान रन संन्धित हैं। सनम्न प्राणी मात्र पर दया और जो आतुर पुरुष हो उसका रक्षा करना भी अला का एक प्रधान गुहा लोक में अमूचा (किमा के भी गुण-दोषो का वर्णन कर बुगई न उरना ) हे द्विजाम ! बाहिर और अन्दर की मुचिता दिना हो अन्यास (अन के होने वाले कार्यों में माङ्गल्य आचार का सेवन करना भी गुण है । जो बातें हैं टन रिपथ में उजिजाये हुए धनों में पता नहीं करनी चाहिए। यह व्दार भाव मी एक विशेष गुण होता है । पराई ची भौर पराया धन में नमा भून कर भी स्पृहा नहीं करनी चाहिए । माता के समान पराई स्त्री और पराप मुवर्ग को भी मिट्टी वे टेले २ समान ही देखना आ ना का एक विशेष गुण है ॥१०॥ इस प्रकार से पुरमों क विद्वानों ने ये आ3 आत्मा के गुम लाये है-यही मानवोग का सार शिश योग ॥१॥ इस कम योग के बिना यहां पर ज्ञान जिसी को भी नहीं हुआ करता है जो कि दिखलाई देव । अबएव पूत तथा स्मृति के द्वारा कहा गया जो धर्म है उसी पर प्रयत्न पूर्वक उपस्थित रहना चाहिए। १२॥ देवगों का-पितृदों का और तिर मनुष्का का सर्वदा प्रति दिन पनों के द्वारा नून और पिपणा तप करना चाहिये। १३ ऋषियों का अर्चन देवो स्वाध्याय द्वारा परना चाहिए और विद्वान् पुरुष को विधान व अनुनार होमो के द्वारा मी पवन करना परमादायक है। पितृमा मम्मन यादो के द्वारा बरे अन्न के दानों मे उपालि कमी के दान समम्त नूनों का समर्थन करना वाहिए ॥४॥ पवने विहिता यमा पञ्चमूनापनुराये। वन पेपगी चुन्नी जलकुम्मो प्रमानी १५ पन्चनना गृहम्यम्य तेन वन गन्द्रशि त्यापनातनायामी पञ्चयज्ञाः प्रीतिता ॥१६ २३४ मत्स्यपुराण द्वाविंशति तथाष्टौ च ये संस्काराः प्रकीत्तिता । तात्तोऽपि न मोक्षाय यस्त्वात्मगुणवर्जित. ॥१७ तस्मादात्मगुणोपेतः श्रुतिकम्म समाचरेत् गोब्राह्मणानां वित्तेन सर्वदा भद्रमाचरेत् ।।१८ गोभूहिरण्यवासोभिर्गन्धमाल्योदकन च । पूजयेद् ब्रह्मविष्ण्वकद्रवस्वात्मक शिवम् ।।१ व्रतोपवासविधिवत् श्रद्धया च विमत्सरः। योऽसावतीन्द्रिय शान्त. सूक्ष्मोऽव्यक्तः सनातन ।' वासुदेवो जगन्मूर्तिस्तस्य सम्भूतयोहमा ।।२० ब्रह्मा विष्णुश्च भगवान् मातण्डो वृषवाहन । यष्टी च वसवस्तद्वदेकादशगणाधिपाः ।। लोकपालाधिपालंश्च पितरो मातरस्तथा ॥२१ इमा विभूतय प्रोत्ताश्चराचरसन्विताः । ब्रह्माद्याश्चतुरो मलमन्यक्ताधिपति स्मृत. ॥२२ गार्हस्थ्य आथम मे रहने वालो को प्रतिदिन स्वाभाविक स्वरूप से ही स्वत: पाँच प्रकार के पाप कम अनजान मे बन जाया करते हैं। उन पाच पाप कर्मों की अपनुत्ति के लिये ये पांव प्रकार के पशो के करन या विधान करना परमावश्यक है । वे पांच पाप ये हैं -मण्डनी कमजो आवश्यर रूप से घरो मे होता ही है । छपी से छानना हा वण्डनी पहा जान है। पेषणी ची आदि से पीसने का काम-चुल्ली पूल्ह' जलाना- जलकुम्भी वह स्थल जहाँ पर जल आदि को रखा जाता है है और पाचवा प्रमार्जनी-- युद्वारी आदि परिप्यार करना। ये पाय गून (पार या हत्या गृहस्थ का हुआ ही परते हैं । इसी से वह स्वग प्राति नहीं पिया करता है । उना हो। वाल पापों फ नाश लिपे हो ये पाव निर प्रत्यावश्या या वीतिन पिये गये हैं ।। १५ ॥१॥ बाईम और भार जो मारमा पर बताये गये है जिनसे आत्मा की बी कर्मपोर वर्णन - शुदि हमारती है इन समारों से मुन की हो तो नीरा आत्मा के उक्त पुणे में रहित होना है की मोक्ष नहीं होनी है। अनु यह सिद्ध है कि कल्याण के लिये अष्ट आत्मा के गुणों का होना परमार सर है ॥ १७॥ अतएव आत्मा के गुमो युक्त होरर प्रतिनिहित रमों का मगवरण बरसा पाहिए। से धन पान में न्यायोजित हो उसमें सर्वदा गो और दाह्मणों को कल्याण कर्म करना चाहिए । १८ ।। सौ- हिरम-बम-ग-माला-उल बादि द्वारा ब्रह्मा-विपु-मूर्य- र' उमु स्वरूप शिव का निय पूजन करना चाहिए ॥१६॥ मसरवा के भाव से रहित होरर पाम प्रजा से विधि पूर्वक एवं उपवानों का समामरर करें । जी इन्द्रियों को पत्र से भी परे हैं- परम मन-मूक्ष्म स्वप वाला-अयन - मनाउन जामूनि मा- पान वायुदेव हैं उन्हीं को ये मद मम्भूतिया है 1२ ॥ ब्रह्मा-विरा- भगवान् मातंगड-पवाहन-आठ बमुगप--एकादश गर्गों में अधिर- लोकपाल और अधिमा मदित पितगत तया मातृ वर्ग-३ घर पराचर से ममन्दिन विनि: बन गया है। ब्रह्मा आदि चार मूग है जो अयक्त के प्रति बताये गये हैं ।।२१, २२।। ब्रह्मणा वाघ मूग विष्णुनाव शिवेन वा । अभेदात्पूजिनेन स्यात्पूजित मवरावरम् ॥३ ब्रह्मा दाना परल्याम थापामपि सस्थिति। वेदमूक्तिः पूषा पूजनीय प्रबलतः ॥२४ तम्मादमिद्विजमुपान् हत्या सपूजरविमान् । दानंरतोपवामंच उपहोमादिना नर.। इति नियायोगपरायणम्य दानगाम्नामनिवसतम्य । दिवम्म मोलम्य मदान शिञ्चित् प्रावधान्ताह पर सारे नहा-~ry रविमो नमो अमे समा परहोमोति करे ऐमा बर मार नामसनमाने २३६ म म्यपुराण पर सभी चगवर वा समर्चन हो जाया करता है ।।२३ । ब्रह्मा आदि तीनो की जहा सस्थिति है वही परम धाम है। वेद मूर्ति पूषा का सक्ष प्रय न पूर्वक पूजन करना चाहिए ॥२४॥ इसी लय इन सबका पूजन कर अग्नि और द्विको को मुख बनाकर ही करना चाहिए अर्थात् अग्नि तथा द्विजो के द्वारा ही इनका अम्यचन हुआ करता है । दान-- व्रत-उपवास- जय और होम आदि के द्वारा मनुष्य को उक्त अभीष्ट देवो का समचन करते रहना च हिए ॥२५॥ इमी क्रियायोग मे तत्पर तथा वेदान्त शास्त्र और स्मृति से प्यार करने वाला और विकर्मों अर्थात् बुरे कर्मों स भीत रहने वाले को सदा इस लोक और पर लोक म कुछ भी प्राप्त करने के योग्य नहीं हता है ॥२६॥ ३१- पुराणसंख्या वर्णन पुराणसखयामाचक्ष्व सूत । विस्तर प्रमात् । दानधम्ममशेषन्तु यथावदनुपूवश ।। इदमेव पुराणेषु पुगणपुरुषस्तैदा । यदुक्तवान् स विश्वात्मा मनवे तन्निवोधन २ पुराण सर्वशास्त्राण' प्रथम ब्रह्मणा स्मृतम् । अनन्तरञ्चवक्त्रेभ्यो वेदास्तस्वनिगता ॥३ पगणमेक्मेवासीत् तदा कल्पान्तरऽनघ ।

पुराणसध्या वर्णन मुनिगण ने कहा- हे सूतजी ! अब माप पुरागो की संख्या चालाइये और विस्तार के साथ क्रम से कहने की कृपा कोजिए और यथावत् सम्पूर्ण दान धर्म आनुश्वी के सहित बतलाझे ॥१॥ मूनजी ने यहा-उप समय में विश्व की आत्मा उन पुराण पुरुप ने यह ही जो पुराणों में मनु को कहा था उन को आप लोग समझ लीजिए ॥२॥ भावान् ने कहा-ब्रह्मा जी ने समस्त पापो मे पुराण को ही सबसे प्रथम कहा था । इमा अननर उनके मुखों से वेदो का निर्गमन हुप्रा था ॥३॥ हे प्रनघ ! उस समय मे स्यान्तर में एक ही पुराण था । यह त्रिदर्ग का गाधन-युष्यमय और शतकोटि विस्तार वाला था ॥४॥ जब सब लोक निर्दग्ध हो गये थे तब मैंने दाजि सासे चारो वेद-उन के अङ्ग शास्त्र- पुराण-न्याय का विस्तार-मीमासा और धर्म शास्त्र परिगृहीत करत मैंने विष थे। फिर कल के आदि में उदार्णव मे मत्स्यरूप से यह अरोप सदक से अन्तर्गत रहते हुए कहे थे । इनका श्रवण परके चतुर्मुख ब्रह्माजी न मुनिपो और देवो के प्रति इनको वहा था || ५, ६,७॥ प्रवृत्ति सवग त्रागा पुराणस्यामवततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य ततो ! 113 व्यासस्पमह कृत्वा सहरामि युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ॥ तयाऽष्टाददावा कृत्वा मूलाकेऽस्मिन् प्रकाश्यते । अद्यापि देव नारेऽम्मिन् सनकाटिप्रविस्तरम् ।।१० तदयोंऽत्र चतुलंस सक्षेपेण विशेपितम् । पुगणानि दशाप्टौ च माम्प्रत तदिहोज्यते ॥११ नामतम्तानि वक्ष्यामि शृगाव मुनिसत्तमाः !। ब्रह्मणामिहिनं पूर्व याममात्र मरोनये ॥१२ जातान्त्रिदशमान पुराण परिपत्यते। लिम्पित्य नन्च योदचारजननुसमन्वितम् ।। नृप

२३८
मस्त्यपुराण
वैशाखपूणिमायाञ्च ब्रह्मलोके महीयते ॥१३
एतदेव यथा पद्मम भूद्ध रण्मय जगत् ।
तवृत्तान्ताश्रय तद्वत् पायमित्युच्यते वुधैः ।।
पाम तत् पञ्च पश्चाशत् सहस्राणीह कथ्यते ।।१४।।
फिर समस्त शास्त्रो की प्रवृत्ति पुण से ही हुई थी। फिर
कुछ काल में पुराणो का ग्रहण न देखकर हे नृप । मैं फिर व्यास रूप को
धारण करके युग-युग मे सहरण किया करता हूं। सदा द्वापर मे चार
लाख के प्रमाण से सहरण दिया था ||क्षा फिर उन पुराणो के
अठारह भेद करके इस लोक मे प्रकाशित किया जाता है । इस समय मे
भी इस देव लोक में सौकराड विस्तार है ||2011 तदर्थ यहाँ पर चार
लाख सक्षेत्र से विशेषित किया है ? ॥११॥ हे मुनि सत्तमो ! अब उनके
नाम लेकर कहता हूँ। आप श्रवण कीजिए । पहिले ब्रह्माजी ने मरीचि
के लिये यावन्मात्र कहा था ।।१२।। ब्राह्म पुर ण तरह सहस्र परिकीर्तित
किया जाता है । जो कोई उसको हाप से निखकर जलधेनु से संयुक्त
करके वैशाख माम की परिणमा तिथि मे दान करता है वह अन्त मे ब्रह्म
लोक मे जाकर प्रतिष्ठित होता है ॥१३॥ यह ही जैसे जगत् हैरणय
पद्म हो गया था उसी के वृत्तान्त का आश्रय ग्रहण करके उसी की भाति
बुध लोगो के द्वारा 'पाद्मम'-~यह नाम कहा जाता है । वह प्यपुराण
यहाँ पर पचपन सहस्र कहा जाता है ।।१४।।
तत्पुगणञ्च यो दद्यात् सुवणकलशान्वितम् ।
ज्येप्टेमास तिलयुक्तमश्वमेधफललभेत् ।।१५
पाराशरसवृत्तान्तमधिकृत्य पराशर ।
यत्प्राह धमानखिलान् तद्युक्त वष्णव विदु.॥ ६
नदापाडे च यो दद्यात् घृतधेनुसमन्वितम् ।
पौर्णमास्याविपूतात्मा म पदयातिवारुणम् ।।
नया शतिसार तत्वमाण विदुयुधाः ।।१५

पुराणसध्या वर्णन श्वेतकल्पप्रसङ्गन धर्मान् वायुरिहाबवीत् । चन तद्वायवीयस्यात् रुद्रमाहात्म्यसयुतम् ॥ चतुर्विशसहसाण पुराण तदिहोच्यते ।।१० श्रावण्या श्रावणे मासि गुडधेनुसमन्वितम् । या दद्यात् पसयक्त ब्राहाणायकुटुम्बिने । सवलाके सनात्मा वल्पमेक वसंतर. ॥१६॥ यत्राधिकृत्य गायत्रो वष्यते धम्मविस्तरः। वृत्रासुरवधोपेत तद्भागवतमु यते ।। सारस्वतस्य कलास्य मध्ये ये स्युनरोत्तमाः । तवृत्तान्तोद्भव लाके तद्भागवतमुच्यते ॥२१ इस पुगग को जो कोई पुरुष सुवर्ण को कला से युक्त से तथा निलो से समति य मास में दान में देता है वह अश्वमेघर के पुग्प - फल को प्राप्त किया करता है ॥१शा वाराह कल्प के बत्तन्त का पाश्रय लेकर पराशर ने जो समस्त धर्मों का कहा था उससे मुक्त कर जानना चाहिए ।। ६|| उसको पापाद मास मे घृत धेनु से मन्वित कर के पूर्णमासो तिथि में जो मनुष्य दान में देता है यह विशेष रूप से पून यारमा वाना होकर वारण पद को प्राप्त किया करता है। घुघ लोग इस राप्रमाग सेईम सहम पुराण बताया पर हैं ॥१७॥ यहा पर वायुदेय नविन 'प्रसङ्ग में धर्मों को बताया था। जिसमे इन धर्मों का कपन दिया था वही बायनवीय अर्थात वायुपुराण हुआ या ना भगवान द्र क महात्म्य से समन्वित पा ! यह पुराण चौवीस सहन्न लोगों की सच्या २ प्राय वाला पुगण हा बाता है ।।१८॥ यावग मास में भी णमा निधि में गुड और धेनु मे सन्दित तथा उप से सयुक्त वर जो हाई कुटुम्मी बाह्मण लिए दान में देना में दता है वह मनुष्य पवित्र - मावासा हर एक पम्न गिदलो में निवास मिया FAL है। १९ जिसमें यो अधिकार बरखे जो धर्म के विस्तार मत्स्य-पुराण का वर्णन किया जाता है वह वृत्रासुर के यध की कथा से युक्त भागवत पुराण कहा जाता है ।।२०।। सारस्वत वल्प के मध्य मे जो नरोत्तम हुए थे उनके वृत्तान के उद्भव वाले को लोक में उसी को भागवत कहा जाता है ॥ २१॥ लिखित्वा तच्च योदयाद्ध मसिंहसमन्वितम् । पौणमास्याप्रोष्ठपद्या स यातिपरमागतिम् ।। अष्टादशसहस्राणि पुराण तत् प्रचक्षते ॥२२॥ यत्राह नारदा धर्मान् वृहत्कल्पाश्रयाणिच । पञ्चविंशत्सहस्राणि नारदीयं तदुच्यते ॥२३ तदिद पञ्चदश्यान्तु दद्याद्ध नुसमन्वितम् । परमा सिद्धिमा-पोत पुनरावृत्तिदुलभाम् ॥२४ यत्राधिकृत्य शकुनीन् धर्माधमविचारणा । व्याख्यातावमुनिप्ररने मुनिभिर्धमचारिभिः ।।२५ मार्कण्डेयेन व थित तत्सर्व विस्तरेण तु । पुगण नवसाहस्र मार्कण्डेय मिहोन्यते ॥२६ प्रतिलिरयचयोदद्यात् सौवर्णकारसयुतम् । कात्तिक्यापुण्डरीक्स्ययज्ञस्यफलभाग्भवेत् ।।२७ यत्तदाशानक कल्प वृत्तान्तमधिकृत्य च । वशिष्ठायाग्निना प्रोक्तमाग्नेय तत्प्रचक्षते ॥२८ इसको हाथ से लिखार हेम के सिंह से रामावत परके जो प्रोटपदी पूर्णिमा तिथि में अर्थात् भाद्रपद मास की पूर्णमासी मे दान विया परता है उम मनुष्य की परम गति हो जाया करती है। इस पुराण अनुष्टुप श्लोको का प्रमाण अठारह सहर वा जाता है ।शा जिम्मे परत वर का आधा लेकर देवपि नारदजी ने धर्मों का वर्णन wal है । यह नारतीय अर्थात् नारद पुराण पहा जाता है। इसके शयोको मा प्रमाण पग सम्म है। इस पुराण को पूर्णिमा तिथि में । वे मुराण संस्था वर्णन तु से समन्वित करके दान में दिया जाता है तो वह दानदाता पुरुष रम सिद्धि को प्राप्त क्यिा करता है जो सिद्धि पुनरावृत्ति दुर्लभ होती ॥ २३, २४ । जिसमे शकुनियो को अधिकृत करके धर्म और क्षधर्म विषय मे विचार किया गया है और यह ध्यास्यान मनि के प्रश्न पर मचारी मुनियो के द्वारा ही किया गया है ।।२५!! मार्कण्डेय गुनि ने वडे विस्तार के साथ कहा है। यह पुराण नौ सहस अनु. पोक के प्रमाण वाला है और यहाँ पर यह भाण्डेय पुराण Iम से रहा जाता है ।।६।। इस पुगग को हाय स लिखकर सुवर्ण मिमिन हाथी सहित जो इसका कोई दान दिया करता है चोर वह भी तिकी पूर्णिमासी को दिया जाता है तो उस दान व दाता को पुण्डरीक पुण्य का कर प्राप्त हो जाता है ॥२ ।। जो दह ईशानक बल्प वृतान्त है उसको अधिन करके अग्निदव ने महर्षि पमिष्ठ जी से कहा । वही पुराण आग्नेय नाम से प्रसिद्ध है अर्थात् इसी को अग्निपुराण महा रा है ॥२८॥ लिखित्वा तच्च यो दद्यादेमपद्मरामन्यितम । मागंशोप्या विधानेन तिलधेनुमन्वितम् ।। तच्च पाउसाहन्न मवक्रतुफपदम् ॥२६ यवाधियुत्य माहात्म्यमादित्यभ्यचतु खः । अघोरकल्पवृत्तान्तप्रसङ्गन जगत्स्यितिम् ॥ मनवे कथयामाम भूतग्रामस्य लक्षणम् ॥३०॥ चतुदशमहाणि तथा पश्चशतानि । भविष्यचरितप्राय भविष्यन्तविहोचते ॥३१ तसोपेमारसयोदयात् पौर्णमाम्या विमस्मर. । गुडाम्मममायुवाग्निप्टोमपलभवेद ॥२ रयतास्पारस्य वृत्तानमधिकृत्य च । सागि नारदाय वृष्णमाहात्म्यमुत्तमम् ॥३३ वृत्तान्त तो इस दाता को अग्निष्टोमयाग का फन मिला करता है ।।३२॥ रप तर रम्य बनाया है जिनमें पुन. ब्रह्मवराह का प्रेरणा किये हुए कोणित स्या है वह अठारह सहस अनुष्टुप लोगो के प्रमाण वासा पुराणहा. दिन में जो कोई इसा लिसार दान दिया करता है वह २४२ मत्स्यपुराण यत्र ब्रह्मवराहस्य चोदन्तं वर्णित मुहुः । तदष्टादशसाहस्र ब्रह्मवैवर्तमुच्यते ।।३४ पुराण ब्रह्मवैवत्तं यो दद्यान्माघमासि च । पौर्णमास्या शुभदिने ब्रह्मलोके महीयते ॥३५ इसको हाथ से लिख कर जो हेमनिमितपद्म से समन्वित दान देता । और मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा मे धान पूर्वक तिल तथा ६नु से सयुत करके यह दान दिया जाता है तो समस्त ऋतुओं के पुण्य फल को प्रदान करने वाला होता है। इस पुराण के श्लोको का प्रमाण सोलह सहस्र है | जिस पुराण मे चतुर्मुख भगवान् ने आदित्य देव के माहात्म्य का आश्रय प्राप्त करके अघोर कल्प के के प्रसङ्ग से इस जगत् की स्थिति को भूतग्राम का लक्षण महाराज मनु से कहा था। ॥३०॥ जिसका प्रमाण चौहद सहस्र पांच सौ है और जिसमे बहुधा भविष्य मे होने वाल चरित हैं उसको हो भविष्य पुराण कहा जाता है । ॥३१॥ उसको पोप मास की पूर्णिमा तिथि के दिन विगत मत्सरता वाला होकर दान दिया करता है और इपके साथ गुड कुम्भ एक वल्प है उस कल्प मे जो कुछ घटित हुआ उसी वृत्तान्त करके साणि ने देवपि नारद के लिये प्रत्युत्तम वासुदेव कृष्ण का माद वैवर्त नाम से कहा जाता है ।।३३, ३ माघ मास की पूर्णिमा तिथि मोर मे महान् मिति पद पर अधिरित हुमा करता है ॥१५॥ यनामिलिङ्गमध्यस्थ, प्राह देयो महेश्वरः । धमायाममाक्षार माग्नयमधिकृत्य च ॥३६ पमान समित्यात पुगणप्रहाणा स्वयम् । भी होना चाहिए को अधिकृत

२४३
पुराण सरूपा वर्णन
तदेकाशसाहस्र फल्गुन्यांय प्रयच्छति ॥
तिलधेनुसमायुक्त स याति शिवसाम्यताम् ॥३७
महावराहस्य पुनर्माहात्म्यमधिकृत्य च ।
विष्णुनाभिहित क्षोप्य तद्वाराहमिहोच्यते ॥३८
मानवस्य प्रसङ्गन कल्पत्यमुनिसत्तमा..
चतुर्विशत्सहस्राणि तन् पुराणनिहो यते
काञ्चन गरुड कृत्वा तिलधेनुसमन्वितम् ।
पौर्णमास्या मधौदद्यात् ब्राह्मणायपुटुम्बिने ।
वराहस्य प्रसादेन पदमप्नोति वैष्णवम् ॥४.
यत्र माहेश्वरान्धर्मानधिकृत्य च पण्मुखः ।
कल्पे तत् पूरप वृत्तञ्चरितमग हितम् ।।४१
स्कन्द नाम पुराणच ह्य काशीति निगद्यने ।
सहस्राणि शत चकमिति मत्र्येषु गद्यते ।।१२

२४५ पुराण सस्था वर्णन वाता परम शिव पुराण है दिमका प्रमाण दश सहन्न लोको का हाता है । जो कोई पुरुष शरद् विषुव मे इमरा दान दिया करता है वह दंष्णव पद की प्राप्ति किया करता है ।।४४,४५॥ रिसमे भगवान् कूम रूप- घारी जनार्दन ने धर्म-अर्थ-बमों का और रसातल मे मोक्ष का माहा- रम्य वहा है तथा इन्द्रद्युम्न के प्रमङ्ग से इन्द्र की सन्निधि में ऋषिगण को बताया गया है वह लदनोरम्प का अनुषङ्गिक है तथा इसका प्रमाण अठारह साव माना गया है । इसको जो भी काई सुवर्ण व द्वारा निर्माण पराये हुए मं से मुक्त दूर्म पुगण का दान रिया करता है वह मनुष्य एक हजार गौओं के दान करने का पुण्य-कत प्राप्त किया करता है । ॥४६, १७, ४-II जिस दल के आदि में भगवान् उनादन ने धुतियों को प्रवृत्ति के लिये मस्य दे स्वरूप से मनु क नि नरसिंह भगद न का वर्णन किया है । है मुनीश्वरो । सात रुपो का हाल वा साधय लेकर बोला है उसी को मास्य जान लो। इसका प्रमाण बौदह सहस्र होता है ॥४६,५०॥ विपुवे हेममत्स्येन धेन्वा चैव समन्वितम् । योदद्यातपृथिवी तेन दत्ताभवति चासिला ॥५१ यदाचगान्डेकल्पे विश्वाण्डात् गरडोद्भवम् । अधिकृत्याऽब्रवीत्कृप्णोगारडंतदिहोच्यते ॥५२ तदप्टादशकञ्चव सहस्रागोह पठ्यते । सौवर्ण हसमयुक्त या दवाति पुमानिह 1॥ स सिद्धि लभते मुख्या शिवलोके च सस्थितिम्।।१३।। ब्रह्मा ब्रह्माण्डमाहात्म्यमधिकृत्याब्रवीत् पुन. । तच्चद्वादशसाहस्र ब्रह्माण्डद्विशताधिकाम् ।।५१ भविष्याणाञ्च कल्लाना श्रूयते यत्र विसर । तद्ब्रह्माण्डपुराणञ्च ब्रह्मणा समुदाहतम् ॥५॥ दद्यात्तद्वचतोपाते पीतोर्णायगमयुतम ।।

सुराण संख्या वर्णन नन्दाया यत्र माहात्म्य कार्तिकेयेत वय॑ते । नन्दीपुराण तल्लोकेराख्यातमिति कोयते ॥६० यत्र शाम्ब पुरस्कृत्यभविष्येऽपिकथानकम् । प्रोच्यतेतत्पुनर्लोके शाम्बमेतन्मुनिव्रता ॥६१ पुरातनस्य कल्पस्य पुगणानि विदुर्बुधाः । धन्य यशस्यमायुप्य पुराणानामनुक्रमम् ॥ एमादित्यमज्ञा च तव परिगद्यते ॥६२|| अष्टादशभ्यस्तु पृथक् पुराणयत्प्रदिश्यते । विजानीध्वद्विजधेष्ठा । स्तदेतेभ्योविनिर्गतम् ॥६३ अद्भुत कम्ों वाले भगवान् कृष्ण द्वैपायन ब्यास जी ने इसको चार लात प्रमाण वाला बतलाय है मेरे पितामह ने पिताजी को पिताजी ने मुझको मैं रे आप से निवेदित कर दिया है ।५७। परमहपि न लोक व हित का सम्पादन करने के लिये इमको सक्षिप्त किया है। यह आज भी देवों मे सौ करोड विस्तार से सम्पन्न है ।५८|| अब इसके उपभेदो को बतलाऊंगा जो कि लोक सम्प्रतिष्ठित हैं । वहाँ पादम पुराण मे नरसिंह भगवान् का उपवर्णन किया गया है। उसका प्रमाण अठारह सहस है और यहा पर वह नारसिंह पुराण के नाम स कहा जाता है ।।५।। जिसमे नन्दा के माहात्म्य को स्वामी कात्तिकेय भगवान के द्वारा वर्णन किया जाता है उसी को लोगो के द्वारा नन्दी पुरण नाम से कहा जाता है-ऐसा ही कीर्तन किया जाता है ॥६०॥ जिसमे भगवान् शाम्व को पुरस्कृत करके भविष्य में कथानक है ऐसा कहा जाता है कि वह पुन लोक मे हे मुनिव्रतो । शाम्य-इस नाम वाला हो गया है । परम पुरावन कल्प के पुराणो को बुध पुरुष जानते हैं। यह पुराणों का अनुक्रम परम धन्य-आयु की वृद्धि करने वाला है। इस प्रकार से वहीं पर आदित्य सज्ञा भी कही जाती है ॥६१, ६२॥ अठारह पुगणो से पृथक् पुराण

२४८
मत्स्यपुराण
जो भी कुछ प्रदिष्ट किया जाता है है द्विज श्रेष्ठो ! उसे इन्हीं पुराणों से
विनिर्गत हुआ समझ लेना चाहिए ।।६३।।
पञ्चाङ्गानि पुराणेपु आस्यानमिति स्मृतम् ।
सगंश्च प्रतिसगश्च वशो मन्वन्तराणिच !!
वशानुचरितच्चव पुराण पञ्चलक्षणम् ॥६४)
ब्रह्मविष्ण्यरुद्राणा माहात्म्य भुवनस्यच ।
ससहारप्रदानाञ्च पुराणे पञ्चवणके ॥६५
धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्चवावीत्यते ।
सर्वेष्वपि पुराणेषु तद्विरुद्धञ्चयत्फ्लम् ॥६६
सात्विकेषु पुराणेषु माहात्म्यमधिक हरे. ।
राजसेपुच माहात्म्यमधिक ब्राह्मणोविदुः॥६७
तद्वदग्नेश्च माहात्म्य तामसेषु शिवस्यच ।
सकीर्णषु सरस्वत्या पितृ णाञ्च निगद्यते ॥६८
अष्टादश पुगणानि कृत्वा सत्यवतीसुत ।
भारताख्यानमखिलञ्चक्र तदुपवृहितम् ।।
लक्षणकेन यत् प्रोक्त वेदार्थपरिवृ हितम् ।।६६
वाल्मीकिना तु यत् प्रोक्न रामोपाख्यानमुत्तमम् ।
ब्रह्मणाऽभिहित यच्च शतकाटिप्रविस्तरम् ॥७०
इन समस्त पुराणो के पांच अङ्ग हुप्रा करते हैं जो आख्यानक
कहा गया है । सर्ग-प्रनिसर्ग-वश और मन्धानर तथा वशों का अनु
चरित जिनम होता है-वही पुराण कहा जाता है और यही पुराणो का
पच लक्षण होता है ।।६।। ब्रह्मा-विष्णु-सूर्य और रुद्र इनका माहात्म्य
और भवनका ससहार प्रदानो का वणन होता है जो भी उपयुक्त पांच
वर्ग वाला पुराण होता है अर्थात् जिसके पांचो लक्षण हो ऐमा पुराण
होता है ॥६५॥ इसमे 44-अर्थ-काम और मोक्ष का कीर्तन किया
नाया करता है । सभी पुराणों में उसके विरुद्ध जो पल है सारिता पुराणो
.

पुराण या वर्णन मे हरिका माहात्म्य ही अधिक होता है। जो राजस पुराण होत है उनम ब्रह्माजी का माहात्म्य अधिक होता है। उसो भौति तामस पुराणों में अग्निका और शिव का माहात्म्य अधिकाग रूप स हुआ परता है । जा सकीर्ण पुराण हैं उनमें सरस्वती देवी का तथा पितृगण का माहात्म्य अधिकहा जाया करता है ।।६६, ६७, ६८॥ सत्यवती रे पुत्र भगवान् श्री कृष्ण द्वैपायन मुनि ने अठारह पुराए । की रचना करके उनसे समुपवृहिन सम्पूर्ण भारत के आख्यान का वर्णन किया है जो एक लक्षण स वदो क अयं स परिवृहित ही बनाया है अर्थात् कहा है ॥६६॥ वाल्मीकि महर्षि ने जो परमोत्तम श्रीराम का प्रास्यान कहा है और जो ब्रह्माजो न कहा है दह सौ करोड विस्तार वाला है १७०॥ आहृत्य नारदायैव तेन यात्मोकये पुन । वाल्मोजिनाच लोकेषु धर्मकामार्थसाधनम् ।। एवं सपादा पञ्चैते लक्षा मत्ये प्रकोतिता ॥७१ पुरातनस्य कल्पस्य पुराणानि विदुवुधा । धन्य यशस्यमायुप्य पुराणानामनुनमम् ।। य पठेणुयाद्वापि स शाति परमानतिम ॥७२॥ ३द पवित्र यशसो निधान इद पितृ णामतिवल्लभञ्च । इदच देवेष्वमृतायितञ्च नित्य विद पापहरच पुमाम ।।७३|| उसका पहरण करके नारद के लिये और फिर उसन वाल्म कि के लिये कहा था और फिर इमरे पश्चात् आदि काब महर्षि वाल्मीकि न लोगों में इसको धर्म कामार्थ का साधन स्वरूप वहा था। इस प्रकार स ये सभी सवा पांच लाख को राया वाल हैं जो हम मनुष्य ल द मे मकीर्तित किय जाते हैं।।७१॥ परम प्राचीन पल्प म जो भी पुराण हुए हैं उनको तो विद्वान पुरुष ही जानत है । यह अवश्य ही है कि ऐसा यह पुराणों का जो अनुक्म है वह परम धन्य है ~ आयु में दधन करने पापा तथा यग की वृद्धि प्रदान करने वाला है ॥ २॥ इन पुरागो का २५० मत्स्यपुराण जो भी कोई भाग्यशाली पुरुष पठन किया करता है या इनका नेवल श्रवण ही करता है वह निश्चित रूप से परम गति को प्राप्त करता है ।।७२॥ यह परम पवित्र है-यश की खान -यश की खान है और यह पितृगण का अत्यन्त प्यारा होता है । यह देवों मे अमृतायित होता है और पुरुषो का यह नित्य ही पापो के हरण करने वाला होता है 11७३॥ ३२-- नक्षत्रपुरुप नाम व्रत कथन अतः पर प्रवक्ष्यामि दानधर्मानशेषत । व्रतोपवाससयुक्तान् यथा मत्स्यादितानिह ॥१ महादेवस्य सवादे नारदस्य च घीमत । यथा वृत प्रवक्ष्यामि धर्मकामार्थसाधकम् ॥२ कैलासशिखरासीनमपृच्छन्नारदः पुरा। बिनयनमनङ्गारिमनङ्गाङ्गहर हरम् ॥३ भगवन् ! देव । देवेशन ब्रह्मविष्ण्विन्द्रनायक !। श्रीमदारोग्यरूपायुर्भा यमौभग्यसम्पदा । सयुक्तस्तव विष्णोर्वा पुमान् भक्त, क्थ भवेत् ॥४॥ नारीवाविधवासर्वगुणसोग्यसयुता। कमानमुक्तिदन्देव । किञ्चिद्वतमिहोन्यताम् ॥५ सम्यक पृष्टत्वयाब्रह्मन् । सर्व नोकहितावहम् । श्रु तमप्यय यच्छान्त्य तद्वतशृणुनारद !!६ नक्षलपु पनाम व्रत नारायणात्मकम् । पादादि कुर्याद्विधिवत् विष्णुनामानुकीर्तनम् ॥७ महामहिम महर्षि श्री सूतजी ने कहा-इसस आग अब हम दान धर्मा का पूर्ण रूप से कहता हूँ जो कि प्रत और उपवासों से ही पुष्प नाम प्रत क्यन समन्दित है। जिस प्रकार से भगवान् मल्य ने यहां पर रहे हैं 1१॥ धीमान देवपि नारद के और महादेव के सम्बाद में सो रिस तरह से धर्माय काम का साधक हुमा या उसे ही मैं कहता हूं ॥२॥ परम प्राचीन समय को बाउ है उद कि देवपि नारद जी ने कैलाज गिरि के शिखर पर समासीन-तीन नेत्री वाल-अनङ्ग वो भन्म करने दाले तथा अनङ्ग के मङ्गों का हरप करने वाले-भगवान् हर से पूछा था ॥३॥ देवर्षि नारद जी ने कहा- हे भगवन् ! हे देव ! हे देवों के स्वामिन ! आप तो ब्रह्मा-विष्णु और इन्द्र इन सबके नाया है तथा श्रीमान् -आयु-प्रारोग्य-रूप-माम और सौभाग्य की सम्पदा से संयुत हैं । कृपया यह बतलाइये कि आपका क्या भगवान् विष्णु का नन्नत पुरुप कम होता है ? ॥४॥ हे देव ! नारी चाहे वह विधवा हो प्रयवा सर्वगुण और सौभाग्य से सयुता हो, माप ऐसा कई बन बनलाइन जो क्रम से मुक्ति के प्रदान करन वाला हो ।।५।। ईश्वर ने कहा-है ब्रह्मन् ! आपने इस समय में यह बहुत ही श्रेष्ठ प्रश्न पूछा है । यह समौ लोगों के हित का नावाहन करने वाला है। यहां पर शान्ति के लिये ऐसा भूत भी किया है । हे नारद ! उसरी व्रत का प्रथम मरौ ॥६॥ एक नमत्र नाम वाला व्रत है जो सामान् नारायण के स्वरूप से परिपूर्ण है। इसका पादादि विधिपूर्वक विष्णु नामों का अनुपालन करे ॥७॥ प्रतिना वासुदेवस्यमूलादिषु चाचयेत् । चैतमाम समासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥ मूले नमो विश्वधराय पादौ गुल्फादनन्ताय व रोहि.पु । जमिपूज्य वरदाय चंब द्वे जानुनी वाश्चिकुमार ऋक्षे ME पूर्वोत्तरापाटयुगे तयोरू नम शिवायेत्यभिपूजनीयौ। पूर्वोत्तराफगनि युग्मके च मेट नम पञ्चशराय पूज्यम् ॥१० कटिं नम शाङ्गधराय विष्णो समूजयेनारद ! कृतिकानु।

२५२ मस्यपुराण यथार्चयेत् भाद्रपदाद्वये च पार्वे नम केशिनिषूदनाय ॥११ कुक्षिद्वय नारद । रेवतीषु दामोदरायेत्यभिपूजनीयम् । ऋक्षेऽनुराधासु च माधवाय नमस्तथोरस्थलमेव पूज्यम् ॥१२ पुष्ठ धनिष्ठासु च पूजनीयमघौघविध्वसकराय तन्च । श्रीशङ्खचक्रासिगदाधराय नमो विशाखासु भुजाश्च पूज्या ॥१३ हस्ते तु हस्ता मधुसूदनाय नमोऽभिपुज्या इति कैटभारेः । पुनर्वसावङ्ग लिपूर्वभागा साम्नामधीशाय नमोऽभिपूज्या ॥१४ मूल नक्षत्र आदि मे भगवान् वासुदेव की प्रतिमा का अचन करना चाहिए । जब चैत्र मास आ जाये तो उसको प्राप्त करके ही ब्राह्मणो का वाचन करना चाहिए । इसमे प्रत्येक नक्षत्र में भगवान के प्रत्येक अङ्गो का अपचन करे । मूल नक्षत्र मे विश्वधर के लिए उनके चरणो को नमस्कार करे । अन त भगवान के लिए उनके गुल्पो को रोहिणी नक्षत्रा मे मर्माप्त करना चाहिए । अश्विनी नक्षत्र मे वरद प्रभु के लिय उनकी दोनो जपाओ का तथा जानुश्री का अभिपूजन करे ।। ८. ॥ पूर्वाषाढा और उसाराषाढ़ा इन दोनो नक्षत्रों में भगवान शिव के लिये उनो दानो ऊरुषो का पूजन करना चाहिए । पूर्वा फाल्गुनी और उत्तरा पाल्गुनी-इन दोना नक्षत्रो ग पर प्रभु ये मे का पून परे ।। १० ।। हे नारद ! कृत्तिका आदि नाम शाङ्गपर भगदान विष्णु को कटि का अचन करना चाहिए। पूर्वा भाद्रपद और उत्तरा भाद्रपद इन दोनो नक्षत्रों में भगवान् शिनपूदन को नमस्कार करे और उनके दानो पाश्यों का पूजन करना पाहिए ॥ ११ ।। हे नारद ! रेवनी नागा नाम " भगवान् दामादर वी शेती क्षियो वा अर्धन पर पागा नसर में गाय प्रम का नमसार कर उनसे उरारपस या अमिन परना पाहिए ।। १२ ।। अशेर आप का विवाह करन वासे प्रमुरे पृष्ट भाग पा यमन घनिष्ठ भो म करे। पाप-पत्र-सि थोर गार पापरा पास प्रभु को नववा न" में . नक्षत्र पुरुष नाम द्रा कपन उनको मुमात्रा का पूजन करना चाहिए ॥ १३ ॥ हस्त नक्षत्र म कंटभ के जरि प्रमु मवुन्दन व लिन नमबार कर हाया का पूजन करे । सामा क अधोश प्रभु को नमस्कार पुनवंमु नपत्र में उनके अगुलियों के पूर्व मामा का अभिाजन करना चाहिए ॥१४॥ भुनङ्गनक्षत्रदिने नखानि सपूजयेन्मत्स्यशरीरभाज । कृपस्य पादौ शरण व्रजामि ज्येष्ठासु कणे हरिरनिीय ॥१५ धान वराहाय नमाऽभिपूज्या जनार्दनस्य श्रवणेन सम्यक । पुप्पे मुख दानवम्दनाय नमा नृसिंहाय च पूजनीयम् ॥१६ नमानम कारणवामनाय स्वातोपु दन्ताग्रमथानिीयम् । जाम्य हरेर्भागवनन्दनाय सम्पूजनीय द्विजवारणे तु ॥१७ नमोऽस्तु रामाय मघामु नासा मपूजनाया रघुनन्दनम्य । मृगातमाङ्ग नयनेऽमिपूज्य नमोऽस्तुते रामविघूणिताक्ष | ॥१८ बुद्धाय शान्ताय नमो ललाट चिनानु सपूज्यतम मुरारे । शिरोऽमिपूज्य भग्णीषु विष्णानमाऽस्तु वश्वेश्वर । कल्किरुपिणे॥१८ बाानु कशा पम्पोत्तमम्बराजनीग हरये नमस्ते । उपोपित नक्षदिनपु मक्तया द्वि.पुङ्गवा स्यु ॥२० नुजङ्ग नयन वे दिन में मत्स्य स्वरप क धारण करन वाल भावान के नक्षा का पूजन करना चाहिए। भगवान् कूर्म च की शरणानि म जाता है-यह निवदन करत हुए ज्यष्ठा नक्षत्र में माथान् हरि + कण्ठ का ममचन करना चाहए ॥ १५॥ प्रवण नमत्र म वगह निय नमन करके जनादन प्रमुक पात्रा का भलो माति पूषन पर। पुष्प नषत्र म दाना क मूदन करन दाल प्रभु का प्रणाम वरक और नृसिंह प्रभु का नमस्कार करक उना योमुख का पूजन करना चाहिए ॥१५॥ स्वानी नत्र वारण क अप वामन म्बरून धारण करने वान प्रनु वारम्दार नम्बार कर दवा अग्रभागा पूग्न कर। भागनदन रे नि नमन TV द्विज नारप म भगवान् हरि क २५४ मल्यपुराण बास्य वा भलो भांति अर्चन करना चाहिए ॥ १७ ॥ राघवेन्द्र थोराम के लिये नमस्कार हो-इस मन्त्र का उच्चारण करके मघा नक्षत्र में थी रघुनन्दन भगवान् को नासिका का पूजन करना चाहिए। हे विधूणित नेको वाने श्रीगम ! प्रापको सेवा में नमस्कार समर्पित हो-ह प्रार्थना करते हुए मृगोतमाङ्ग में भगवान के दानो नयनो का पूजन करे ||१|| परम मान स्वरूप भगवान् बुद्ध के लिए नमस्कार है-यह कहकर चित्रा नक्षत्र में मुरारि प्रभु के ललाट का भली भांति पूजन करना चाहिए। है विश्वेश्वर ! पलि रूप धाले आरके लिये नमस्कार है-यह मन उन्धारण कर भरणी नक्षत्र मे भगवान् विष्णु के गिर का अभिपूरन बरना चाहिए ॥ १९॥ भगवान् हरि के लिय नमामार है-यह कहार आदर्श नक्षत्र में पुरुषोतम प्रभु ये शो का समर्थन करे । उपोषित होने पर शुभ दिनो मे भक्ति की भावना से जि श्रेष्ठोपा माछी राति पूमन वरना पाहिए ।। २०॥ ३३-आदित्य शयन ब्रत कथन उपवायेपणासस्य सदेव पनमित्त.. अनम्यागन रोगादा विमिष्ट तमुत्तमम् । उपवासप्यासाना नक्त भोजनमिप्यते । यस्मिन् वने तदप्यत्र धूपतामाय महत् ॥२ धादियशमन नान पपावाटगठनम् ।

कादिपरपनवदन समापदेवादिन भेदोदश्यते चित्। पस्मात्तस्मान्मुनि! रहे प्रामुमने ॥ हस्ते व नाप नमोस्तु पादायकांच चित्रानुनु गुफदेचन । स्त्रीतीपु ष पुरपातमाप धाने विशाखातु च भानुदेशन ।। देवा श्री नारद ने कहा यदि कोई वास स्ले में मन हो और पर दही बाहना हो तो वा हि कौनका दत इट एक जतन होता है। उदास करने में मगन्ता अचान के न होने से अपक्ष किलोको रोग के कारण हो सकती है ॥१॥ ईश्वर ने कहा-बो दिन कर का पूरा राम न कर सकें उनको रात्रि में एक बार मोरन करता भी अभीष्ट हो जाता है। जो अोरात्र के पूरे दन का प्ल होता है वही इसमें भी होता है। दमका र महर का करी-1 वादिरशन नाम वाना द्रव पथारीवि भपवान् शहर को नमन है। पुरानों के जना विद्वान् रिन नसरों के योगों में यह होता है ये रहवे है ॥३॥ वि समय में हस्त नक्षत्र के साथ सप्तमी दिदि में आदिक या दिन होने और मून की सान्दि हो तो वह वियि मस्त कामनाको को पूर्ण करने वाली है। ४१ उमा और महेश्वरी की चर्चा को मूर्म के नामों से यर्विन करना चाहिए और पूर्व की च को शिवलिङ्ग में करता हा पूछना चाहिए ॥५॥ठमा के पति भगवान शिव का और रविका कहीं पर भी कोई मंद नहीं दिखनाई देता है। कारन से हे मुनि! गृह में हो सम्मु का पवन करना चाहिए ॥शा हस्त नक्षत्र में भगवान मूर्य क लिप नमस्कार हो यह उचाम्प कर चरणों का पूजन करे।वित्रा नमन्त्र में अर्क के लिये नमस्कार हो-यह कहकर गुरु देवा का का अवन करना चाहिए। सानी म पुस्योत्तम के लिरे नमकार है-इसके द्वारा दोनों बडापो का पूजन करे और विशाखा में धाता के लिय नमस्कार हो-इपस बानु देश का बदन करे in वयानुराधानु नमोऽनिप ज्वम द्वमन्चैव ववभानोः.

२५६ मत्स्यपुराण ज्येष्ठास्वनङ्गाय नमोऽस्तु गुह्यमिन्द्राय सोमाय कटी च मुले ।।८ पर्वोत्तरषाणढयुगे च नाभिन्त्वष्ट्र नम. सप्ततुरङ्गमाय । तीक्ष्णाशवे च श्रवणे च कुक्षौ पृष्ठ धनिष्ठासु विक्र्तनाय । चक्षुस्थल ध्वान्तविनाशनाय जलाधिपक्ष परिपूजनीयम् । पूबात्तराभाद्रपदाद्वये च बाहू नमश्चण्डकराय पूज्यौ ॥१०॥ साम्नामधीशाय करद्वयञ्च सपूजनीय द्विज ! रेवतीपु। नखानि पूज्यानि तथाश्विनीषु नमोऽस्तु सप्ताश्वधुरन्धराय ॥११।। कठोरधाम्ने भरणीषु कण्ठ दिवाकरायेत्यभिपूजनोया । ग्रीवाग्नि ऋक्षे धरमम्बुजेशे सपू जयेन्नारद ! रोहिणीषु ॥१२ भूगोतमाङ्ग दशना मुरारे सपजनीया हरये नमस्ते । नम सविने रसना शङ्करे च नासाभिप ज्या च पुनर्वसौ च ॥१३ ललाटमम्भोरुहवल्लभाय पुष्पेलकावेदशरीरधारिणे । शर्षेऽय मौलि विबुधप्रियास मघासु वर्णावितिगो गणेशे ।।१४ तथा अनुराधा नक्षत्र मे नमस्कार करके सहस्रभानु के दोनो अरुणो का अभिपूजन करना चाहिए । जठा नक्षत्र मे अनन नमस्कार होवे-इसके द्वरा गुह्यका यजन करे। इन्द्र सोम के लिये नमस्कार होवे-इससे कोटि और मूल मे पूजन कर ॥८॥ पूर्वापाड़ा और उत्तरापाढा इन दोनो म त्वष्टा के लिये तथा सप्ततुरङ्गमो दाले पे निये नमस्कार होरे-यह उच्चारण परवे नाभि का पूजन करे। थवण मे तीक्ष्ण किरण याल के निये नमस्कार अपित हावे- इससे कुक्षि मे पूरन परे तथा धनिष्ठा में विपतन के लिये ममस्कार हो-इसके द्वारा पृट भाग का अचंग वरना पाहिए ॥ ॥ ध्वात्तर ( अन्धकार ) में रिनाग परने वाले के लिए प्रणाम रामरित होवे-यह महार पशुस्थल बापजन करे और हम नाना का जलाधिप नक्षत्र मे करना चाहिए। पर्वा मारमा म और उत्तरा भाद्रपद मात्र मे पण्ड पर लिये नमस्कार - गई दारा दानो या यों का पूजन पणा पाहिए | ol है जि! के लिये २५७ नक्षतपुरुष नामदन कथन - - -- रेवती में सामो के अधीश के लिये नमस्कार हो-इस मन्त्र -इस मन्त्र को कहकर दोनों करो का पूजन करना चाहिए। तथा अश्विनी मे सात अश्वो से धुरन्धर को प्रणाम अपित हो--इसके द्वारा नखो का अभ्यर्चन करे ।।११॥ भरणी मे कठोर धाम दिवाकर की सेवा मे नमस्कार होवे- इसे कहकर कण्ठ का अभिपूजन करे और अनि नक्षत्र मे ग्रीवा का यजन करना चाहिए । हे नारद ! रोहिणी मे मम्बुनेश को "प्रणाम हो--इससे घर का पूजन करे ।। १२॥ मृगोतमाङ्ग मे हरि को नमन हो--इरासे मुरारि के दशनों का यजन करना चाहिए। पुनर्वसु मे सविता के लिये नमस्कार हो-हमके द्वारा रसना का तथा शङ्कर को नमस्कार हो- इससे नासिका का पभिपूजन करना चाहिए ॥ १३ ॥ अम्भोरुहो के बल्लभ के लिये नमस्कार हो इसके द्वारा पुष्य नक्षत्र मे सलाट का पूजन करे। वेदो के शरीर को धारण करने वाले को प्रणाम होवे- इससे शाप मे पूजन करे। विनुधो के प्रिय के लिए नमस्कार हो -इससे भोतिका यजन करे और मघा मे गणेश को प्रणाम हो-इससे दोनो बानो का पूजन करना चाहिए ॥१४॥ पूर्वासु गोब्राह्मणवन्दनाय नेत्राणि सम्पूज्यतमानि शम्भो । अयोत्तराफ्ल्गुनि भे भ्रवौ च विश्वश्वरायेति च पूजनीये ॥१५ नमोऽस्तु पाशडकुशशूलामक्पालसन्दुधनुधराय । गगासुरानगपुरान्धकादिविनाशमलाय नमः शिवाय ।।१६ इत्यादि चास्त्राणि च नित्य विश्वश्वरायेति शिराभिप ज्य। भाक्तव्यमत्र वमतलशाकममासमक्षारमभुक्त शेषम् ।।१७ पूर्वा फाल्गुनी मे गौ और ब्राह्मणो क वन्दन के लि५ नमस्कार है-इसे कहकर शम्भु क नत्रा का ली भाति से पूजन करे। इसक अनन्तर उत्तराफ रुगुनी में विश्वेश्वर के लिये नमस्कार हो- इस मन्त्र के द्वारा दोनों भ्रओ का पूजन करना चाहिए ॥ ५॥ पाश-अपुश- मूल-पध-कपा-सर्प-इन्दु और धनुष धारण करन वाले तथा गज- मरस्यपुराण असुर-अनङ्ग-पुर-अन्धक आदि वे विनाश करने के मूल भगवान् । शिव के लिये नमस्कार समर्पित होवे-इस मन्त्र के द्वारा इत्यादि अहजोका पूजन करके विश्वेश्वर के लिये प्रणाम है-इससे शिरा का अमिपूजन करे और फिर यहाँ पर ही तंल शान मास और क्षार से रहित अमुक्त शेप का भोजन करना चाहिये ॥१६, १७॥ ३४--रोहिणीचन्द्र शयन व्रत कथन दीर्घायुरारोग्यकुलाभिवृद्धियुक्त पुमान् भूपकुलायत स्यात् । मुहुर्म हुर्जन्मनि येन सम्यक् व्रत समाचक्ष्व तदिन्दुमोले | ॥१॥ त्वया पृष्टमिद सम्यक उक्तञ्चाक्षय्यकारकम् । रहस्य तव वक्ष्यामि यत्पु राणविदोविदु ॥२ रोहिणीचन्द्रशयन नामव्रतमिहोत्तमम् । तस्मिन्नारायणस्यामचयेदिन्दुनामभि ॥३ यदा सोमदिने शुक्ला भवेत् पञ्चदशी क्कचित् । अथवा ब्रह्मनक्षत्र पौणमास्या जायते ॥४ तदा स्नान नर कुर्यात् पञ्चगव्येन सषणै । आप्यायस्वेति तु जपेत् विद्वानष्टशत पुन १५ शूद्रोऽपि परया भक्तयापाषण्डलापर्वाजत । सोमाय वरदायाथ विष्णवे च नमोनम ॥६ कृतजप्य स्वभवनादागत्य मधुसूदनम् । पूजयेत् फलपुष्पश्च सोमनामानि कोतयन् ॥७ देवपि नारद जी ने कहा-बार वार जाम मे जिससे भली भांति पुरुप दीघ आयु वाला -स्वस्थता में सम्पन तथा कृल की अभिवृद्धि ग युक्त और भूप के पुन स रायुत हात' है । हे इदु को मौलि मे धारण करने वान ! उमा दन को आप वन की दया कीजिए ॥१॥ श्री भगवान् रोहिणीचन्द्र शयन व्रत कथन । वर्ण वाला कहा-आपने यह बहुत ही अच्छा पूछ लिया है इसको अक्षय कारक बतलाया है । अब उमका जो रहस्य है उसे वनलाना हू जिस पुराणों के ज्ञाता विद्वान् जानते हैं ॥२॥ रोहिणी चन्द्र शयन नाम वाला वन यहा पर एक अति उत्तम व्रत है । उम व्रत मे भगवान् नारायण की अर्चा होती है जो इन्दु के नामो के द्वारा अर्चन करना चाहिए ॥३॥ जब भी किसी समय में सोमवार के दिन म मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चदगी पूर्णिमा) तिथि हो यपदा ब्रह्म नक्षत्र पूर्णमासा होता हो उस समय में मनुष्य को सर्पप ( सरसो) और पचगव्य से स्नान करना चाहिए। फिर विद्वान् पुरुष को “मायायस्व"-इत्यादि मन्त्र का एक सौ आठ बार जप करना चाहिए ।। ४, ५॥ यदि कोई शूद भी हा तो उमयो भी पराकादि की भक्ति से पापण्ड और आलाप से रात होकर "वरदान देने वाले सोम और विष्णु के लिये बारम्बार प्रणाम है"-इमका जप करके अग्ने भवन आकर मोम के नामों का कीर्तन करते हुए फल पुष्पा के द्वारा भगवान् मधुसूदन का पूजन करना चाहिए ॥', ७|| सोमाय शान्ताय नमोऽस्तु पादावनन्तधाम्नेति च जानुजये । ऊरुद्वयञ्चापि जलोदराय सजगे मेट्रमनन्तवाहये ।। नमा नमः कामसुखप्रदाय कटि. शशाङ्कम्य सदाचनीया। तयोदरञ्चाप्यमृनादराय नाभि शशाङ्काय नमोऽभिपूजा नमोऽस्तु चन्द्राय मुखञ्च पूज्य दन्ना द्विजानामधिपाय पूज्या । हास्य नमश्चन्द्रमसेऽमि पूज्यमाष्ठौ कुमुदन्तवनप्रियाय ।१० नासा च नाथाय वनोपघाना मान दभुताय पुन भ्रुवो च। ननद्वय पद्मिानमनयेन्दाग्न्दिीवरश्यामकराय शोर ॥११ नम ममस्ता वन्दिताय कणद्वय दैनिपूदनाय । लाटमिन्दान्दधिरियाय क्शा मुपुग्नाधिपत प्रज्या ॥९२ शिर शशावार नमो मुगरविश्वश्वरायेति न्म विगैटिन । पदमप्रिय राहिणि नाम लक्ष्मी मामा यमोस्याम्नचारमाये ॥१३ मस्त्यपुराण देवी च संपूज्य सुगन्धपुप्पन वेद्यपुप्पादिभिरिन्दुपत्नीम् । सुप्त्वाऽथ भूमौ पुनरुत्यितेन स्नात्वा च विप्राय हविष्ययुक्तः ॥१४ पूजन करने का क्रम और प्रत्येक अङ्ग तथा उनके अर्चन करने के भिन्न २ मन्त्रो को बतलाते हुए कहते हैं-शान्त सोम के लिये प्रणाम है - इसे कहकर मधुसूदन के सर्व प्रथम चरणो का अभ्यर्चन करे। अनन्तधाम वाले को नमस्कार है-इससे जानु और जवाओ का यजन करे । जलो- दर को नमन है-इसके द्वारा दोनो अरुओ को पूजे । अनन्त बाहुप्रो वाले को सेवा मे प्रणाम है-इससे मेदू वा अर्चन करे ॥८॥ काम के सुख को प्रदान करने वाले के लिये बारम्बार नमस्कार है- इस मन्त्र से सर्वदा शशाङ्क को कटि का प्रचंन करना चाहिए । अमृतोदर की सेवा मे प्रणाम प्रपित है-इससे उदर का अभ्यर्चन करे और शशाङ्क के लिये नमस्कार है- इसे कहकर नाभि का पूजन करे || चन्द्र को प्रणाम है- इससे मुख और द्विजो के आधिप के लिये नमस्कार है-इसके द्वारा दांतो का पूजन करना चाहिए। चन्द्रमस को प्रणाम है - इससे हास्य कुमुदो के वन के परम प्रिय को वन्दना है-इसका उच्चारण करके दोनो होतो का पूजन करना चाहिये ॥१०॥ वनौषधियो क नाथ की वन्दना है--इसके द्वारा तथा फिर यानन्द स्वरूप को नमस्कार है-इससे पुन दोनो भौंहो का यजन करे। इसीवर के समान श्याम करो वाले को प्रणाम है-इसर शौरिके तथा पद्मिनी के भर्ता-इन्दु के दोनो नेत्रो का अर्चन करे ।। ।। समस्त अध्वरो मे वन्दित और दैत्यो के निषूदन परने वाले को प्रणाम है - इससे दोनो कों की अर्चना करे। उदधि के परम प्रिय की सेवा में प्रणाम है--इस मन्त्र से इन्दु के ललाट का नया सुपुम्ना के अधिपति के वशों का पूजन करना चाहिए ।।१२।। शशाक किये प्रणाम है--इममे शिरवा पूजन करे तथा विश्वेश्वर किरीट धारी वो नगसार है मग मृगरि वा शिर का यजन करे । हे पद्मो की या ! ह राहिणो ! जि I नाम लक्ष्नो है । हे सौभाग्य और सौम्य के

रोहिणीचाद्र शयन व्रत कथन
२६१
रूपी
अमृत से चार काया वाली ! ये कहते हुए सुगन्धित पुप्पो के तथा
नैवेद्य आदि अन्य उदित पूजनौपचारी से इन्दु को पत्नी देवी का भली
भौति पूजन करना चाहिए और फिर भूमि में ही शपन करे और पुन:
उठकर स्नान करे तथा हविष्य मुक्त होकर विष के लिये प्रभातवेला में
पापो के विनाश करने वाले को नमस्कार है-इससे सुवर्ण का निर्मित
बत पा कुम्भ दान करना चाहिए ।।१३, १४॥
यथा त्वमेव सर्वेपा परमानन्दमुक्तिदः ।
भुक्तिमुक्तिस्तथा भक्तिस्त्वयि चन्द्रास्तु मेसदा ॥१५
ति ससारभीतस्य मुक्तिकामस्य चानघ ! ।
रूपारोग्यायुपामेतद्विधायकमनुत्तमम् ॥१६
इदमेव पित पा च सर्वदा वल्लभ मुने! ।
त्रैलोक्याधिपतिर्भूत्वा सप्तकल्पशनत्रयम् ।।
चन्द्रलोकमवाप्नोति विद्यु दु भूत्वा तु मच्यते ॥१७
नारी वा रोहिणोचन्द्रशयन या समाचरेत् ।
साऽपितत्फलमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ।।१८
इति पठति शृणोत वा य इत्थ ।
मधुमथनाचंनमिन्दुकानेन नित्यम् ।।१६
मतिमपि च ददाति सोनिशोरेभवनगतः।
परिपूज्यतेऽमरोघः ॥२०
इसके अनन्तर प्रार्थना करे--हे देव ! जिस प्रकार से आप ही
सबको परम आनन्द और मुक्ति के प्रदान करने वाले हैं उसी तरह से
हे चन्द्र ! मेरी सदा पाप मे भक्ति होवे और भुक्ति एव मुक्ति भी मुझे
प्राप्त होवे । हे अनघ ! यह व्रत सप्तार को दाधाओं से मौत और मुक्ति
प्राप्त करने की कामना वाले को अनीव उत्तम है जो स्प-आरोग्य और
आयु का करने वाला होता है ॥१२॥ हे मुने ! यही ब्रा पितृगण को
भी सवंदा प्रिय होता है । इसको करने वाला पुरुष सम्पूर्ण बिलोको का

मत्स्यपुराण
स्वामी होकर तीन सौ सात कल्प तक चन्द्र लोक की प्राप्ति किया करता
है तथा विद्युत् होकर ही मुक्त हुआ करता है ॥१६॥ चाहे कोई पुरुष
हो या नारी हो जो भी इस रोहिणी चन्द्र शयन नामक व्रत का समाचरण
करता है वह नारी भी पुन आवृत्ति अर्थात् ससार मे जन्म ग्रहण करने
को दुबारा आगमन से दुलभ यह व्रत है और उसी फल को प्राप्त किया
करती है ॥१७ । इस तरह से भगवान् मधु दैत्य क मथन करने वाले का
अभ्यचन जो इन्दु के शुभ
नामो के कीर्तन के द्वारा सम्पन्न झ्यिा जाता
है उसका पठन या श्रवण मात्र किया करता है और अपनी बुद्धि को भी
इसमे लगा देता है वह पुरुष भी भगवान् शौरि के ही भवन मे पहुंच कर
अमरो के समुदाय के द्वारा परिपूजित हुआ करता है ऐसा इस व्रत के
श्रवण--पठन और मनन मात्र का हो माहात्म्य होता है ॥१८,
१६,२०॥
३५-तड़ागारामकूपादि प्रतिष्ठा विधि वर्णन
जलाशयगत विष्णुवाच रविनन्दन ।
तडागारामकूपाना वापीपु नलिनीषु च ॥१
विधि पृच्छामि देवेश । देवतायतनेषु च ।
के तत्र चत्विजोनाथ । वेदी वा कीद्वशीभवेत गार
दक्षिणावलय काल स्थानमाचार्यएवच ।
द्रव्याणिकानि शस्तानिसमाचक्ष्वतत्त्वत ॥३
शृणुगजन्महाबाहो । तडागादिपुयो विधि ।
पुराणेविहासोऽय पठ्यतेवेदवदिभि ॥४
प्राप्य पक्षं शुभ शुक्लमतीते चोत्तरायणे।
पण्येऽनि विप्रथिते कृत्वा ग्राह्मणवाचनम् ॥
प्रागुदप्रवणे देशे तडागस्य समीपतः।

तहागारामकूपादि प्रतिष्ठा विधि वर्णन - चतुहंस्ता गुमा वेदि चतुरना चतुर्मुखाम् ॥६ तथा पोशहस्तः स्यान्मण्डपश्च चतुर्मुखः। वैद्याश्च परितोगा रत्निमानास्ति मेखला 19 महामहिम महपि यी मूतजी ने रहा-रवि के पुत्र ने एक बार जलाशय अपांत क्षार सागर में गउ अर्यात् सेप गम्मा पर स्थित मा. वान् विष्णू में कहा था-नानाद -आराम ( उद्यान ) और कुरीका तथा वावही और ननिनियों के निर्माण राम की विधि मैं आपसे पूछता हूँ। हे देवेश्वर ! हे नाय ! और देवा , आयननी की रचना कराने में वहा पर कौन ऋत्विम होत हैं और पिम प्रकार की वेदी की रचना की जाया काती है। दक्षिणावय-काल-म्यान और वाचार्य मा कोन होना चाहिये तथा इसरे ममादन करने के लिये प्रनम्न दृश्य कौत से होते हैं ? यह ममी तास्त्रिाम से क्थन करने की कृपा कीजिए। ॥१, २,३॥ मम्य भगवान ने कहा, महान् वाहनो वाले गन् अब आप यवन परिव । तालावबादि की रचना कराने में जो भी विगन है उमे बनलाग जाता है। पुगत में वेदों के बाद करने वाले विद्वानों के द्वारा यह इतिहास पटा जाया करता है ।।४॥ उत्तरायण • अनीन होन पर माम , परम गुम गुरुनरम को प्राप्त कर पिनी भी विसरा बताये गये परम पुर दिन में ब्रह्मा वाचन करे । ॥ ५ ॥ जो देश ऐसा हो बिममें जप से अधिरता रहती है उस उसक प्रवा देश में तहाग रे ही समीर में एर गुभ वेदी वो रचना करावे गो चार हाप प्रमाग वालो हो-चौकोर और नार मुनो वालो हो चाहिए ॥६॥ तया वहाँ पर सोना हाय प्रमाण वास ए वतुमुंग मगर बनाये। और देरी चारों ओर मतं होवें सपा लि प्रमाण पानी मसला होनी चाहिए ।।७।। नव सप्ताय वा पर नातिरिक्ता नपात्मज । विस्तिमात्रा यानि. म्यान् पल्मनाङ्गतिविम्नृता ।

यज्ञ के सभी उपकरण भी रहने चाहिए-यजन--शुध्रचार तथा
मागम
गस्पितयमारता:म्युग्मिपर्वो इतमैराला ।
संयंतरतुसवर्णा.स्प:पताnager: ITE
अश्वत्योदुम्बरापास्तानि तु ।
मण्डपस्य प्रतिलिराण्येतानि कारयेत १०
शुमास्तमारहाताराद्वारपालाम्तयाष्ट वं।
मटातुजापवा वार्या ग्राह्मणावेदपारगाः॥११
सर्वलक्षणसमूणी मन्नविद्विजितेन्द्रियः।
प्रेष्ठ द्विज होना चाहिए ।। १२ ।। प्रत्येक गर्त मे कलश होवे और
दुसशीलसमायुक्तः परोधा.स्यादाद्वजोत्तमः ॥१२
प्रतिगर्तेषु कलशा यज्ञोपकरणानि च ।
वजनञ्चामरे शुभ्र ताम्रपाने मुविस्तृते ।।१३
सतम्त्वनेकवर्णा स्यश्चरवः प्रतिदेवतम् ।
आचार्य प्रक्षिपैद्भूमावनुमन्न्य विचक्षण. ॥१४
है नपाग्मज ! वह मेखला नौ-सात अथवा पांच होनी चाहिए
इससे अतिरिक्त न हो । छै-सात अंगुलियों के समान विस्तृत एक
वितस्ति ( विलश्त ) प्रमाण उस वेदी की योनि होनी चाहिए । ८॥
पार ही गत्तं प्रशस्त होते हैं और तीन पवों के तुल्य उछित मेखल ये
होनी चाहिये। सभी ओर से वर्णों से युक्त तथा पताका एवं ध्वजाओ से
युक्त होनी चाहिए । ६ ॥ अश्वत्य ( पीपल ) उदुम्बर ( गूलर ) प्लक्ष
पाखर ) और वट ( वड) की शाखाओं के द्वारा बनाये गये प्रत्येक
दिशा में मण्डप के द्वार बनवाने चाहिए ॥ १० ॥ वहाँ पर आठ ही होता
परम शुभ है तथा पाठ ही द्वारपाल होने चाहिए। अठही जप करने
वाले जापक रक्खे जो कि वेदो के पारगामी विद्वान ब्राह्मण होने चाहिये
॥ ११ ॥ इसका जो पुरोहित हो वह सभी लक्षणों से परिपूर्ण हो-
मन्त्री का ज्ञाता-विजित इन्द्रियो वाला तथा कुल और शौल से समन्वित

तडागारामकूपादि प्रतिष्ठा विधि ३० सुविस्तृत तथा ताम्र पात्र होवें ॥१३॥। इसके उपरान्न वहां पर अनेक वर्ण वाले प्रत्येक देवता के चर होने चाहिए। विवक्षण अर्यात परम कुशल प्राचार्य को अनुमन्त्रित करके मूमि म प्रक्षप करना चाहिए ॥१४॥ व्यरलिमात्रोयूप स्यात्क्षीरवृक्षविनिर्मित । यजमानप्रमाणावासस्थाप्याभूतिभिन्छता ॥१५ शुक्लमाल्याम्बरधर शुक्लगन्धानुलेपन । सवौंपध्युदकस्तत्र स्नापितो वेदपारग .१६ यजमान सपत्नीक पुत्रपौत्रसमन्वित । पश्चिम द्वारमासाद्य प्रविशेद्यागमण्डपम् ॥१७ ततो मङ्गलशब्देन भेरीणा निस्वनेन च । अजसा मण्डल कुर्यात् पञ्चवर्णेन तत्त्ववित् ॥१८ पोडशारन्ततश्चक्र पद्मगर्न चतुर्मुखम् । चतुरसञ्च परितो वृत्त मध्ये सुशोभनम् ।।१६ वेद्याश्चोपरि तत् कृत्वा ग्रहान् लोकपतीस्तत । सन्यसेन्मन्त्रत सर्वान् प्रतिदिक्ष विचक्षण |.. धर्मादि स्थापयेन्मध्ये वारण्या मन्त्रमाश्रित । ब्रह्माणञ्चशिवविष्णु तत्र वस्थापयेवुध ॥२१ तीन मालि के प्रमाण वाला वहां पर यूप होना चाहिये जो से बनाया गया है जिसमे दूध रहता हो । अथवा मूर्ति की इच्छा रखने वाले का यूयका यजमान के तुल्प ही प्रमाण रखना चाहिए ॥ १५॥ यजमान को शुक्न वर्ण के वस्त्र और माला धारण परने व ला रहना चाहिए। जो गध का अनुलेपन दिया जाये यह भी शुक्ल ही होना चाहिए। वहाँ पर जो वेदो का शान रखने वाले पार- गामी मनीपी है उनके द्वारा सोपशि सवित जलो के द्वारा हो उस मनमान का स्नाणित कराना पाहिए॥१६॥ फिर वह पजमान माती किसी ऐसे

२६६
६
मध्यपुराण
पत्नी के सहित तथा पुत्रपौत्रादि मे मयुन होकर जो मण्डप का पश्रिम
दिशा म द्वार है उसी से वर याग मण्डप में प्रवेश प्राप्त करें ।। १७ ॥
इसके अनन्तर मङ्गलमग शब्दो की धनि से तथा भेरियों के उद्घोष के
साथ ही यजमान का प्रवेश होता है। तत्त्वों के वेता आचार्य को चाहिए
कि तुरन्त ही मण्डल को पञ्चवण से युक्त कर देवे ।। १८॥ इसके
पश्चात् सोलह अरो वाला चक्र करे जिसके गम है पद्म हो और चार
मुखो से युक्त हो-चौकोर चारो मोर से वृत्त तथा मध्य मे शोभन होना
चाहिए ।। १६ ।। फिर विद्वान् पुगेधा को वेदी के ऊपर समस्त ग्रहो तथा
लोकपतियो को स्थापित करे और प्रत्येक दिशाओ मे सबका न्यास मानो
के द्वारा ही करना चाहिए ।। २. ॥ मन्त्रो का समाश्रय ग्रहण करने वाले
को वारुणी दिशा मे मध्य मे कूर्म आदि की स्थ पना करनी चहिए और
बुध पुरुष का कर्तव्य है कि वही पर ब्रह्मा-शिव और भगवान् विष्णु की
स्थापना भी कर देवे।।२१।।
विनायकञ्च विन्यस्य कमलामम्बिका तथा ।
शान्त्यर्थसवलाकाना भूतग्राम
न्यसेत्तत । २
पुष्पभक्ष्यफलयुक्तमेवकृत्वाऽधिवासनम् ।
कुम्भान्सजलगर्भा स्तान्वासाभि.परिवेष्टयेत् ॥२३
पष्पगन्धरलडकृत्य द्वारपालान् समन्ततः ।
पठध्यमिति तान् ब्रूयादाचार्यस्त्वभिपूजयेत् ॥२४
बढची पूर्वत स्थाप्यो दक्षिणेन यजुर्विदौ ।
सामगौ पश्चिमे तद्वदुत्तरेण त्वथर्वणौ ॥२५
उदड्मुखी दक्षिणतो यजमान उपाविशेत् ।
यजध्वमितितान् याद् हौतिकान्पु नरेव तु ॥२६
उत्कृष्टान् म.प्रजापेन तिष्ठनमिति जापकान् ।
एवमादिश्य तान् सर्वान पक्ष्याग्नि स मन्त्रवित् ॥२७
जहयाद्वारुणमंस्त्र राज्य च समिधस्तथा ।

सहागारामादि प्रतिष्ठा विधि वर्णन २६७ ऋत्विग्भिश्चाथ होतव्य वारुणरेव सर्वत २० वहाँ पर विघ्न विनाशक विनायक-क्मला-अम्बित्रा का विशेष रूप से न्यास करे तथा सम्पूर्ण लाकों को शान्ति-रक्षा के लिये भून ग्राम का भी ग्यास वहां पर करे ॥२२ ।। पुप्प-भक्ष्य फलो से युक्त इस प्रकार से वहाँ अधिवास करे। जो कुम्म वहाँ पर जलों से भरे-पूरे स्थापित हैं उनको वस्त्रों से परिवेष्टित कर देना चाहिए ॥ २३ ॥ ममी और में जो द्वारपाल हो उनको पुष्प और गन्धो से समङ्गत करक फिर उनसे प्राचार्य को निदेश देना चाहिए कि आप लोग पाठ आरम्भ कर देखें और उसे फिर अमिपूजन करना चाहिए ॥४॥ ऋत्विजों मे बढच हो उन्हो को पूर्व दिशा में स्थापित करे अर्याद ऋग्वेद के ज्ञाताई को पूर्व दिशा में रक्खे । यजुर्वेद के विद्वानों को दक्षिण म-मा-वेद के ज्ञाताओ को पश्चिम में और जो अपर्व के विद्वान् हा उनको उत्तर दिशा मे सम्यापित करे ॥ २५ ॥ जो यजमान है उसको उत्तर की प्रोर मुख करके दक्षिण दिशा में उपविष्ट होना चाहिए । जब यह व्यवस्था पूर्ण होकर सभी यथास्थान स्थित हो जावे तो पहिले आचार्य को चाहिए कि उन गत्रको निदेश देवे कि मजन का मार कर देखें फिर जो होषित हो उनको भी आदेश देव ॥ २६ ॥ जो वहाँ पर मन्त्रों के जाप ब्राह्मग हैं उनको भी ऐमा निदेश करना चाहिये कि आप लोग उत्कृष्ट मन्त्रों के जप का पारम्म करने वाले सस्थित होवें। इस तरह से उन सबको यथोचित कम्म के समारम्भ करने का आदेश देकर फिर उस मन्त्रों के वेत्ता थाचार्य को अग्नि का पम्युषण करना चाहिए ।। २७॥ फिर दारुण मन्त्रों के द्वारा पा और समिधाओं का हवन करे यौर जो ऋत्विक होता वहा पर है उन सबको भी सव मोर से दारण मन्त्रों के द्वारा ही हवन परना चाहिए । ग्रहेन्यो विधिवद्हुवातयेन्द्रायेश्वराय च। मरम्मोलोकपालेश्याविधिव द्विश्वकर्मणे ॥२६

मत्स्यपुराण
राक्षिसूक्तञ्च रौद्रश्च पावमानं सुमङ्गलम् ।
जपेयु पौरप सूक्तं पूर्वतो बढचाः पृथक ।।२०
शाक रोद्रञ्च सौम्यच कूष्माण्ड जातवेदसम् ।
सौग्सूक्त जपेन्मन्त्र दक्षिणेन यजुर्विद. १॥३१
वराज्य पौरुष सूक्त सौवर्ण रुद्रसहिताम् ।
शैशव पञ्च निधन गायत्र ज्येष्ठसाम च ।।३२
बामदेव्य वृहत्साम रौरवं सरथन्तरम् ।
गवा व्रत च काण्वञ्च रक्षान वयसस्तथा ।।
गायेयुः सामगा राजन् ! पश्चिम द्वारमाथिता ॥३३
अथर्वणश्चोत्तरत: शान्तिक पौष्टिक तथा ।
जपेयुर्मनसा देवमाश्रित्य वरुण प्रभुम् ॥३४
पुर्वेद्युरमितो रात्रावेव कृत्वाधिवासनम् ।
गजाश्वरथ्यावल्मीकात् सङ्गमाद्धदगोकुलात् ।।
मृदमादाय कु भेषु प्रक्षिपेच्चत्वरात्तथा ।३५

मत्स्यपुराण हे विशाम्पते ! फिर वेला हो जाये तो उस समय मे एक मो अथवा अहसठ गौओं का दान ब्राह्मणो के लिये देना चाहिए । इतनी न हो सकें तो पचास अथवा छत्तीस या पच्चीस ही गोत्रो का दान अवश्य करना चाहिए ॥३८।। इसके अन- न्तर साम्वत्सर प्रोक्त अर्थात् वर्ष में कथित शुभ लग्न और शुभ दिन में वेदो के शब्दो की ध्वनियो से तथा अनेक प्रकार के गान्धर्व वाद्यो से सुवर्ण से समलंकृत करके गौ को जल में अवतारित कर । उस गौ को साम वेद के गायक ब्राह्मण के लिये दान मे दे देनी चाहिए । ॥३६, ४०।। सुवणं के द्वारा विनिर्मित तथा पांच प्रकार के रलों से सयुत लेकर फिर सब मकर-मत्स्य आदि का निपेक्ष कर के वेदो और वेदो के अङ्ग शास्त्रो के पारगामी विद्वान् चार प्रकार के विप्रो के द्वारा वह धारण कीजिये ४१॥ महानदीजलोपेतां दध्यक्षतसमन्विताम् । उत्तराभिमुखी धेनु जलमध्ये तु कारयेत् ॥४२ आथर्वणेन सस्नाता पुनमित्यथेति च । आपोहिष्ठेति मन्त्रण क्षिप्त्वाऽऽगत्य च मण्डलम् ॥४३ पूजयित्वा सरस्त त्र वलिं दद्यात् समन्ततः । पुनदिनानि होतव्य चत्वारि मनिसत्तमाः ॥४४ चतुर्थी कर्म कर्तव्य देया तत्रापि शक्ति । दक्षिणा राजशार्दूल ! वरुणक्षमापनं ततः ॥४५ क्सिी महा नदी के जल से समुपेत तथा दधि अक्षतो से युक्त और उत्तर दिशा की ओर मुख करने वाली उस धेनु को जल के मध्य करा देवे ॥४२॥ अथर्व वेद के पुनर्माम” इत्यादि मन्त्र मे सस्नान करके फिर "आपोहिष्ठा" इत्यादि मन्त्रों से क्षेण परे और फिर मण्डल मे आगमन परे ॥४३॥। वहा पर सर का पूजन कर सभी ओर वलि देनी माहिए । हे मुनिश्रेष्टो । पुन चार दिन पर्यन्न हवन करना चाहिए । इसके पश्यात् चतुर्थी सम्म करना चाहिए वहा पर शक्ति पूर्व दक्षिणा मे सौभाग्य प्रापन इतक्यन भी देनी चाहिए । हे राव घाल! इसके अनन्तर वरुण देव से क्षमापन करना चाहिए ॥४४, ४] ३६-सीमाग्य शयन व्रत कयन तर्थवान्यत् प्रवक्ष्यामि सर्वकामफ्लप्रदम् । सौभाग्यशयन नाम यत्पुराणविदोविदु ॥१ पुरा दग्येपु लोकेषु मूभुवम्वमहादिषु । सोनाग्य मवभूतानामेकस्थमभवत्तदा ।। वैकुण्ठ स्वगमासाद्य विष्णोर्वक्षस्थलस्थितम् ॥२॥ तत कालेन महता पुन सगंविधौ नृप ।। अड्वारावृते लाके प्रधानपुरपास्विते ॥३ स्पधायाच प्रवृत्ताया कमलामनकृष्णया । लिङ्गानागममुद्भूता दह्नज्वालातिभीषणा ।" तयाभितप्तम्ब हदक्षनम्ननि मृतम् ।।४ वक्षस्थलसमाश्रित्य विष्णा सोभाग्यमास्थितम् । रसत्पन्ततोपावत्प्राप्नोनिवमुत्रानलम् ॥ उदक्षिप्तमन्नरिक्षे तद्ब्रह्मपुत्र ण धीमता। दक्षेण पीतमानन्तदू पलाचण्यकारकम् ॥६ वल तेजो महज्जात दक्षस्य परमेष्ठिन.। शेप यदातद्भूमावष्टधा समजायत ॥७ मत्स्य भगवान् ने वहा-उसी प्रकार म एक अन्य समस्त मनोरयों क फों का प्रदान करन दान द्रत का वान करता हू जिस व्रत का नाम सौभाग्य शयन है जिस पुराणों क बना धिन पुरुष भली भांति जानन हैं ।।१॥ पुरातन समर म नू-व-स्व और मा आदि लारों क २७२ मत्स्यपुराण दग्ध हो जाने पर उस महान् भीषण वाल में समस्त भूतों का सौभाग्य एक मे ही स्थित हो गया था।२। यह सौभाग्य वैकुण्ठ और स्वर्ग में पहुंच पर भगवान् विष्णु के वक्ष स्थल में स्थित हो गया था। है नृप पश्चात् बहुत अधिक काल के हो जाने पर पुन: सर्ग मी विधि प्राप्त हुई तो उस समय मे यह लोप अहवार से यावृत और प्रधान पुरुष से सम. वित या ॥३॥ भगवान् श्री कृष्ण और कमलासन ब्रह्माजी इन दोनों में स्पर्धा की भावना की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई थी। ऐसी दशा मे एक लिङ्ग के आकार वाली अग्निकी भीषण ज्वाला समुद्भूत हुई थी और अत्यन्त अभितप्त भगवान् हरि के वक्षस्थल से वह नि सृत हुई पी ॥४॥ इस वसुधा के तल में जो भी कुछ रस और रूप जितना भी प्राप्त होता है वह सभी सगवान् विष्णु के वक्ष स्थल का समाश्रय ग्रहण करके तमस्त सोभाग्य वही पर समास्थित हो गया था ॥शा परम धीमान ब्रह्माजी के पुत्र दक्ष ने पीतमात्र उस रूप लावण्य के करने वाले को अन्तरिक्ष में सक्षिप्त कर दिया या ॥६॥ परमेष्ठी दक्ष का बल और तेज महान हो गया था। शेष जो भी कुछ भूमण्डल में गिरा था वह आठ प्रकार का हो गया था॥७11 ततोजनानासजाता.सप्तसौभाग्यदायकाः । इक्षवोरसराजाश्चनिष्पावाजानिधान्यकम् ॥ विकारवच्च गोक्ष र कुसुम्भ कु कुम तथा। लवण चाष्टमन्तद्वत् सौभाग्याष्टकमुच्यते I16 पोत यत ब्रह्मपुत्रेण योगज्ञानविदा पुन । दुहिता साऽभवत्तस्य या सतीत्यभिधोयते ॥१० लोकानतीत्य लालित्यात् लालता तेन चोच्यते । लाक्यसुन्दरीमेनामुपयेमे पिनाक्धृक् ।।११ यादेवीसौभाग्यमयी भुक्तिमुक्तिभलप्रदा। तामाराध्य पुमान् भवतयानारीवाविन्नविन्दति ।।१२

२७४
मत्स्य-पुराण
।
स्नापयित्वाऽर्चयेत् गोरीमिन्दुशेखरसंयुताम् ॥१७
नमाऽस्तुपाटलायतुपादौदेव्या.शिवस्यतु ।
शिवायेतिचसंकीर्त्यजयायगुल्फयोद्वंयोः ॥१८
निगुणायेति रुद्राय भवान्य जंघयोयुगम् ।
शिवः रुद्रेश्वराय च विजयायेति जानुनी ।।
सङ्घीयं हरिकेशाय तथोरू वरदे नमः ।।१६
ईशायंच कटिं देव्याः शङ्करायेति शङ्करम् ।
कुक्षिद्वयञ्च कोटव्यं शूलिने शूलपाणये ।।२०
मङ्गलायै नमस्तुभ्यमुन्दर चाभि पूजयेत् ।
सर्वात्मने नमो रुद्रमोशान्यच कुचद्वयम् ॥२१
मत्स्य भगवान् ने कहा-हे जन प्रिय ! वसन्त मास को प्राप्त
परके शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि में पूर्वाहन के समय में तिलो से स्नान
करना चाहिए ॥१॥ उस दिन मे वर वणिनो वह देवी सती विमा
के साथ पाणिग्रहण के मन्त्रो में निवास करने वाली हुई थी।१५।। उसी
देवी के साथ ही तृतीया मे देवेश का भी अचंन करना चाहिये । फल
अनेक प्रकार व हां उनम-धूप-दीप और नवेद्य रो सयुत करक प्रतिमा
पा पजाय गे पोर गयो से स्नयन कराकर फिर इन्दुगर से
गन्वित गौरी का प्रायन बता माति.. मिरे

सौभाग्य सबर देत कपन है-इससे भगवान् शवार को कटिका पूजन करे। कोठवी तपा शूलपाणि शली की सेवा मे प्रणाम अपित हो-इन से दोनो कुक्षियो का बचन करना चाहिये ॥२॥ मङ्गला आपके लिये नमस्कार है - इसका उज्या. रण करके उदर का पूजन करे। सर्वात्मा के लिये नमस्कार है-इससे रुद्र का अर्चन करे तथा ईशानो की सेवा मे प्रणाम है-इससे देवी दोनों स्तनो का अम्यान करना चाहिए ॥२१॥ शिवं वेदात्मने तद्वद् द्राव्य कण्ठमर्जयेत् । त्रिपुरघ्नाय विश्वेशमनन्तायै करद्वयम ॥२२ त्रिलोचनाय च हर बाहुकालानलप्रिय । सौभाग्यभवनायेति भूषणानि सदार्चयेत् ।। स्वाहा स्वधायै च मुखमीश्वरायेति शूलिनम् ।।२३।। अशोकमधुवासिन्य पूज्याकोष्ठौ च भूतिदी। स्थावेतु हरं तद्धास्य चन्द्रमुखप्रिये ॥२४ नमाऽर्द्धनारीशहरमसिताङ्गीति नासिकाम्। नम उग्राय लोकेश ललितेति पुनको ॥५ शर्वाय पुरहन्तार वास यतु तथालकान् । नम. श्रीकण्ठनाथाय शिवकेशास्ततोऽचंयेत् ।। भामोग्रसमरूपिण्यं शिरः सर्वात्मने नमः ॥२६ शिवमभ्यच्यविधिवत्सौभाग्याष्टकमग्रतः । स्थापयेद् घृतनिष्पावकुसुम्भक्षीरजोरकान् ॥२७ रसराजञ्च निवरण कस्तुम्वस्मथाष्टकम् । दत्त सौभा यमित्यस्मात् सौभाग्याष्टकमित्यतः ॥२८ देदात्मा को प्रणाम है-इससे शिका और रुद्राणी को प्रणाम है... इससे देवो के कण्ठ का पूजन करे । विपुर के हनन करने वाले को प्रणाम है-इससे देवी क दोनो करो का पूजन करे ॥२२॥ त्रिलोचनाय नम अर्थात् तीन लोचनो बाले को प्रणाम है-इस मन को पढ़कर २७६ मस्यपुराण भगवान् हर का तथा हे बाहु कालानल प्रिये ! सौभाग्य भवना के लिए प्रणाम है-इस से सर्वदा भूपणो का अभ्यर्चन करना चाहिए । स्वाहा स्वधा को नमस्कार है-इससे देवी के मुख का और ईश्वर के लिए नमस्कार है--इससे शूलि की अर्चना करे ॥२३।। अशोक मघुवासिनी को प्रणाम अर्पित हो-इस नन्त्र से देवो के मूर्ति प्रदान करन वाले ओष्ठ का पूजन करना चाहिए। उसी भाति स्थणु के लिए नमस्कार है--इसरे हर का अर्थन करे । हे चन्द्रमुख प्रिये ! आपको नमस्कार है-इससे धास्प अर्चन करे अर्धनारीश हर को तथा आसिताङ्गो को नमस्कार है - इन मन्त्रो के द्वारा नासिका का अभ्यर्थन करे | उग्र के लिये प्रणाम है-इससे लोकेश का तथा ललिता को प्रणाम है-इससे देवी के दोनो भृकुटियो क अर्चन करना चाहिए ॥२४, २५।। 'शर्वाय नमः" अर्थात शवं की सेवा मे नमस्कार अपित है-इस मन्त्र से पुर के हनन करने वाले प्रभु का और “वासुत्र्य नमः" अर्थात् वासुकी के लिये प्रण म है- इससे देवी के अलको का अर्जन करे। श्री कण्ठनाथाय नमः' अर्थात श्री कण्ठ की स्वामिनी को नमस्कार है इमसे देवी के केशो का और फिर शिव के केशो का पूजन करे। "भीमोन सम रुपिण्यं नम"-इस मन्त्र से देवी के तपा "सर्वात्मने नम:"-इस मन से देवेश के शिर का पूजन परना चाहिए ॥६॥ इस प्रकार से विधि के साथ भगवान शिव का समर्थन करके उनके आगे फिर सौभाग्याष्टा की स्थापना करनी चाहिए। उम सौभाग्य के आठ पदार्थों के नाम, पृत, निष्पात, कुसुम्भ, क्षीर, और, रमराज, सवण भोर तुम्बा य हैं । इन्हीं का सहा समुदाय अष्टक होता है हम अस्टक से गौभाग्य या प्रदान किया था अतएव इसका नाम सौभा• ग्याएर हो गया है ॥२७, २८॥ एव निवेद्य तत्सर्वमग्रत गिवयो. पुन । गत्री शृङ्गो प्राश्य तद् भूमाफिया ! ॥२६ पुन प्रभान तु नया वृतम्नानमः सुनि सपज्य द्विजदाम्पत्य वस्त्रमारयविभूषण ।।३० .

सोमाग्य शयन व्रत कयन २७७- सौभाग्याप्टकसयुक्त सुवर्णचरणद्वयम् । प्रीयतामर ललिता ब्राह्मणाय निवेदवत् ॥३१ एनसम्बरसरयावतृतीयायासदामनो!। फत्तव्यविधिवद्भक्तपासवसौभाग्यमीप्सुभिः ॥३२ प्राशने दानमन्त च विशेपोऽयन्निवोधमे । शृङ्गोदकञ्चत्रमासे वंशाखे गोमय पुन १३३ ज्येप्ठेमन्दारयुसुम विल्वपत्र शुचीस्मृतम् । श्रावणेदधि सम्प्राय नभस्येचकुशोदकम् ॥३४ क्षीरमारवाजेमासि कातिक पृषदायकम् । मार्गमासेतु गामू पोपे समायेघृतम् ॥३५ इस प्रकार से उस सबको शिव और शिवावे आगे निषेदन करके त्रि में मनोदक का प्राशय परक उसी भांति भूमि में परिन्दम को राये ॥ २६ ॥ पुनः प्रात.पाल वो बेला मे स्नान और जाप करके परम मुचि होकर वात्र-माला और भूपणी के द्वारा ब्राह्मण द पनि का भली पूजन करना चाहिए ॥ ३०॥ सोशम्पाटक से सात सुवर्ण निमित दो चरणो को इसमे ललिता देवी प्रसन्न हो-मह उच्चारण करते एमाह्मण को दान देना चाहिए इसी प्रकार से एक वर्ष पर्यन्त है मनो! सनीया तिपि में सदा निधि सहित पवित्र की भावना में सर्व सौभाग्य क पुरुषो को इस व्रत को करना चाहिए ॥३१, ३२ ॥ प्राशन में और दान के मन्त्र में यह यहां पर विशेषता है उसे आप मुगमे समदा यूम लो। र माप में गडोरशाब मे गोमय । प्रागन करना पाहिये ।। ३३ ।। गोष्ठ मास मे मदार रा कुमुम और आपार में विस्य परमहा गया है। श्रावण में दधि का सम्मान करे और मारपद में पुणोदकपा प्रागन करना चाहिए ॥ ३४॥ पाश्विन मास में शीर और पारिश में पदम तपा मार्गशीर्ष में गोमूत्र का प्राशन को। पोप माग मेंन करना चाहिए ॥३॥ all's

मासतीश पवा पप्प पथा लाभही प्रशस्त हान है। मौरसार
२७५
मत्स्यपुगण
माधै कृष्णतिलतद्वत् पञ्चगव्यञ्ज फाल्गुने ।
ललिाविजयता भद्राभवानी कुमुदाशिवा ॥३६
वासुदेवी तथा गौरी मङ्गला कमलासती ।
उमाच दानकालेतु प्रीयतामिति कीर्तयेत् ।।३७
मल्लिकाशोककमल कदम्वोत्पलमालती ।
कुब्जक करवीरञ्च वाणमल्मामकुंकुमम्॥३८
सिन्दुवारञ्च सर्वेषु मासेपु क्रमशः स्मृतम् ।
नापकुसुम्भकुसुम मालती शापत्रिका ॥३६
यथालाभ प्रशस्तानि करवीरच सर्वदा।
एव सम्वत्सरं यावदुपोध्य विधिवन्नर ||४.
स्त्रीभक्ता वा कुमारी वा शिवमभ्यन्यं भक्तितः।
व्रतान्ते शयन दद्यात् सर्वोपस्करसयुतम् ॥१
उमा महेश्वर हैम वृषभञ्च गवा सह ।
स्थापयित्वाऽथ शयने ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥४२
माघ मास मे काले तिलो का नया फाल्गुन मे पञ्चगर का
प्राशन करना चाहिए। बारहो मासो के दान काल के भो पृयक २ नाम
हैं कम से समझ लना चहिए-ललिता-'वजया-भद्रा--भवानी-
कुमुदा-शिवा-वामुदेवी-गौरी-पगला-कमला-सनी और उमा
ये
बारह नाम पूर्वोतम से दान के समय मे प्रत्येक नाम का उच्चारण
परा प्रसन्न हों ऐसा कोतंन परा यथा 'उमा प्रीयताम्' यहो कम है।
॥३. 1३७ ॥ इसी प्रकार से पुष्पो का भी एक म है उसी के अनुः
मार प्रणा परक पारन करे-मल्लिका-प्रनक-NAR-दम्ब-पल
मासनी-कुटा-रवीर-गाण-प्रम्लाभदु कुम-गि पुवार इन पुष्पो
सभी मासों मे प्रमपूर्ण पूजन करना कहा गया है । - मुम्भ अमुम
तो शमी सम में प्रशस्त है। इस तरह एक वर्ष 16 पूर्ण है।

सौभाग्य प्रायन व कपन मनुष्य का विधि के साप पवाम ग्ना चाहिए ॥ ३९,३६,४० ॥ मक कोई स्त्री हो या कोई कुमारी हो भगवान् नि का भारत माव से पचन पर जब ब्रत का समाप्ति हो तो उस व्रत करने वाले को सभी उपस्करों से युक्त म्या का दान करना चाहिए। उमा और मदेश्वर और घपम मुवर्ष के निर्मित कराकर गो के साथ शयन में स्थापित कराकर बाह्मण को दान में देनी चाहिए। अन्यान्यपि यथाशमया मिथुनान्यम्बरादिभि धान्यालद्धारगोदानरभ्यर्चेद नसञ्चयः॥ वित्तशाख्यन रहित पूजयेत् गतविस्मः ॥४३॥ एवं करोतिय सम्यक सौभाग्यशयनद्वतम् । मर्वान् कामानवाप्नोति पदमत्यन्तमश्नुते ।। फ्नम्यकम्य स्थान बनमेतत्समाचरेत् ॥४॥ य इन्छन् कोतिमाप्नोति प्रतिमासनराधिप । मोमाग्यागेग्यस्पायुवस्वालङ्कारमपणं ।। नवियुत्तो भवेद्राजन् ! नवावु दगतमयम् ॥४॥ यस्तु द्वादश वर्षाणि सौमाग्यशयनद्रतम् । परोति सप्त चाप्टौवा औरष्टभवनेऽमरं । पूज्यमानो वसेत् सम्यक यावलल्लायुतययम् ॥४६ नारोवा कुरते वापि कुमारीवा नरेश्वर । सापि ततफ्नमाप्नोति देण्यनुग्रहलालिता ॥४७ शृणुयापिपरचेव प्रदद्यादयवा मतिम् । सापिविद्याधरी भत्वाम्बोगके चिरवमेत् ।।५८ इमिह मनेन पूर्वमिष्ट शतघनुपा वृनवीयमूनुना छ । नमय वरणेन नन्दिना वा पिमु जननाय तनो यदुद्भवम्यात् ।।४ मय-दर मिथुनों रा या rf दम्ब बाहिर द्वारा सपा धाप-अलदार और मो-दाना एवं धन के सबरों द्वारा मन मा अनन्तर परुण ने, मन्दी ने विया था। हेमनोके नाप इससे २८. मत्स्यपुराण करे । पूजन वित्त की शठता से रहित होकर ही विस्मय से हीन रह कर ही करना चाहिए ॥४३॥ इस विधान से जो भी कोई इस सौभाग्य शयन व्रत को भली भांति प्रिया करता है वह सभी कामनाओ का फल प्राप्त कर लिया करता है और फिर अत्यन्त उन्नत पद का लाभ करता है एक फल के त्याग से इस व्रत का समाचरण करना चाहिए ।४४। जो नराधिप चाहता है वह प्रतिमास कोनि की प्राप्ति किया करता है । हे राजन् । इस व्रत को करने वाला पुरष सौभाग्य-- आयु: आरोग्य-रूप-लावण्य-वस्त्र-अपहार और भूषणो स तीन सौ नव अर्बुद पर्यन्त कभी वियुक्त नहीं हुआ करता है ।। ४५ ॥ जो पुरुष वारह वर्ष तक इस शौभाग्य शयन व्रत को करता रहता है अपवा सात या आठ वर्ष तक किया करता है वह अमर गणो के साथ भगवान थी कण्ड के भवन मे पूज्यमान होकर तीन अयुत कल तक मच्छी तरह निवास किया करता है ॥ ४६॥ हे नरेश्वर ! नारी हो या कुमारी हो जो भी कोई इस व्रत को करती है वह भी देवी के अनुग्रह रो लालित होकर इसके पन को पूर्णतया प्राप्त कर लिया करती है ।। ४७ ।। जो कोई इस व्रत को क्या का श्रवण भी कर लेता है या इसमें अपनी मति को लगा देता है वह पुरप भी विद्याधर होकर स्वर्गलोक मे विरकाल पर्यन निवास किया करता है ॥ ४॥ इस कन यो पूर्व मे यहाँ पर मदन ने किया था पिर शत धनुषो वाले वृतवीय के पुत्र न इसको किया था। जाए० को उत्पन होता है उस विषय मे क्या कहतकामा जाये। वापय है कि कोई भी प्रारतम्य शेष नही रहता है-यह इस महान का मादरम्य ॥ell

असय तृतीया और सरस्वती व्रत
३७- अक्षय तृतीया और मरस्वती व्रत
अथायामपि वक्ष्यामि तृतीया सर्वकामदाम् ।
यस्या दत्त हुत जप्ततवं भवति चाक्षयम् ॥१
वैशाखशुक्लपक्षे तु तृतीया यं रुपोषिता ।
अक्षयं फलमाप्नोति सर्वस्य सुकृतस्य च ॥२
सा तथा कृत्तिकोपेता विशेपेण सुपूजिता ।
तत्र दत्त हुत जप्तं सर्वमक्षयमुच्यते ॥३
अक्षयासन्ततिस्तस्यास्तस्यागुतमक्षयम् ।
अक्षतस्तुनरा स्नातापिप्णोदत्वातथाक्षतान् ।।
विप्रेषु दत्वा तानेव तथा सक्तून् मुसस्कृतान् ।
यथानभुना महाभागः फ्लमक्षयमानुते । ५
एकामप्युक्नवत् कृत्या तृतीया विधिवनारः।
एतासामपि सर्वायातृतीयाना फलमवेत् ॥६
तृतीयाया समभ्यच्य सोरकासो जनार्दनम् ।
राजसूयफल प्राप्यगतिमनचाच विन्दति । ७
ईश्वर ने कहा-इसके अनन्तर में अक्षय तृतीयाना भी
वर्णन करता हूँ जो सब कामनाओं को प्रदान करने वाला है। त्रिम
दिया ओ भी हो हव-म भाषि मभी अभय हो जाया करते है
॥१॥ मैशाण माप ने गुल पा यो जोतीया होती है उसका
चिन पुरषों ने उगल दिया है या क्रिया परते हैं वे सभी मुहर का
माय फम पाने पालम विचारते है ॥॥ बह विचिकृतिका में
पैन हा विषय से मुरजित होती है । उमर मभी दान पिया
हवा-हवन किया था और आप रि हुमा सय रहा है |
उसकी मनमी पक्ष बदरभो भी रोग होने वानी होती है
मोर मया हुश गुपए भी धार होता है। यों में स्नान fre
1

२८२
मस्यपुराण
हुए मनुष्य भगवान् विष्णु की सेवा में अक्षतों को समर्पित कर उन्हों
को
सुसस्कृत सतुआ कराकर विप्रो को दान में दिया करते हैं वे यथा
अन्न मुक् महाभाग उसका अक्षय फल प्राप्त किया करते हैं ॥४,५ ।।
उका विधान के अनुसार मनुष्य एक भी तृतीया का व्रत किया करते
वे इन सम. तृतीयाओ का फल प्राप्त कर लिया करते हैं । तृतीया क
दिन उपवास के सहित रह कर जो भगवान् जनार्दन का अभ्यचंन करता
है वह मनुष्य राजसूय यज्ञ का पुण्य फल प्राप्त करके अस्तुत्तम गति की
प्राप्ति किया करते हैं ।। ६,७॥
मधुरा भारती केन व्रतेन मधुसूदन ! ।
तथैव जनसौभाग्य मति विद्यासुकौशलम् ॥८
अभेदश्चापि दम्पत्यो स्तथा वन्धुजनेन च ।
आयुश्च विपुल पुसा तन्मे कषय मारव ! 10
सम्यक् पृष्ट त्वया राजन् ! श्रुणुसारस्वतव्रतम् ।
यस्य सातिनादेव तुष्यतोह सरस्वती ॥१०
यो यद्भक्त:पुमान् कुर्यातएतद्वतमनुत्तमम् ।
तद्वासरादौसम्पूज्यविप्रानेतानसमाचरेत् ॥११
अथवादित्यवारेण ग्रहतारावलेन च ।
पायस भोजयेद्विप्रान् कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ।।१२
शुक्लवस्त्राणि दत्त्वा च सहिरयानि शक्तितः ।
गायत्री पूजयेद्भक्तया शक्लमाल्यानुलेपनः ।।१३
यथा न देवि ! भगवान् ब्रह्मलोके पितामहः ।
त्वा परित्यज्य सन्तिष्ठेत्तथा भव वरप्रदा ॥१४
मनु ने कहा-हे मधुसूदन ! यह मधुरा भारती किस व्रत से प्राप्त
हुआ करती है ? तथा जनों का सौभाग्य-ति और विद्याओं में परमाधिक
कौशल-दम्पति में किसी भी प्रकार के भेद-भाव का न होना तथा बन्धु
जन के साथ भी भेद की भावना का अमाव-आयु की विपुलना ये सब

अक्षय तृतीया और सरस्वती व्रत पुरुषों को कौन मेश्रा--विधान से हुआ करता है ? हे माधव 1 यहा आप कृपा कर हमका वनलाइये || भगवान मरस्य ने कहा है राजन् । आपने यह तो बहुत ही अच्छा इस समय म प्रश्न पूछा है । अच्छा तो अब सारस्वन व्रत का श्रवण कीजिए जिसके करन की तो बात हो पया है केवल कीतन मात्र के करने ही स देवी सरस्वनी शोक में परम सन्तुष्ट एव प्रसन्न हो जाया करती हैं ॥१०॥ो इसका भक्त पुरुष इस परमोत्तम प्रत को करता है उम उसका सर क आदि म इन विप्रा का भली भांति पूजन स ही इस व्रत का समाचरण करना चाहिए ॥११॥ अपवा रविवार का ग्रहो क पोर ताराओं के बल स इसका आरम्म परे । बाह्मण वाचन करक वित्रो को पायम का भोजन कराना चाहिए 10 परमोग्गल भुवन सज और इन साय म अग्नी शक्ति के अनुमार मुदप भी देर शुक्र माल्य और शुक्ल ही अनुलपन आदि उपचार के द्वारा भक्ति की भावना म गायत्री देवी का अभ्यर्चन करना चाहिए ।।११) पूजन की वेना में देवी म यही प्रार्थना करे-हे देवी। जिस प्रकार से ब्रह्म लोर में भगवान पितामह आपका परित्याग करा सा मात्र को भी सस्पन नहीं रहा परत है उसी प्रकार से आप वरदान देन वाली हो जाइये ॥४॥ वेदा शास्त्राणिमाणिगीतनृत्यादिवञ्चयत । ननिहोनत्वयादव ! तधाममन्तुसिद्धयः ।।१५ समामधा घराष्टिगोरोतुष्टाप्रभामनि एतामि पाहि अष्टाभि स्तनूभिर्मा सरस्वती ॥१६ एव सम्पूज्यगायत्री वाणीतयनिवारिणीम् । शुक्लपुपाक्षर्तमायासकमण्डलुपस्त वाम् ।। मानवतन भुजीत साय प्रातस्तु धम्मवित् ॥१॥ वेद और सम्पूर्ण गाम हया गोत्र और नार प्रादि मला है देखि! मार से होन न हो इसी प्रकार की मेरी मितियां हो जानी चाहिए मत्स्यपुराण ॥१५॥ है सरस्वती देवि ! आप लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरी, तुष्टा, प्रमा, इन आठ तनुओ से संयुता होकर मेरी रक्षा करिए ।।१६। इस प्रकार से क्षय का निवारण करने वाली वाणी गायत्री देवी का भली भांति पर्जन करके जो शुक्ल पुष्प मौर अक्षतो से सयुत है और भक्ति के द्वारा कमण्डलु एव पुस्तक को धारण करने वाली है फिर मौन प्रत पूर्वक धर्म के ज्ञाता पुरुष को सायकाल मे और प्रात: काल मे अशन करना चाहिए ॥१७॥ ३८--चन्द्रादित्योपराग में स्नान विधि कथन चन्द्रादित्योपरागेतु यत्स्नानमभिधीयते । तदहयातुमिच्छामि द्रव्यमन्त्रविधानवित् ॥१ यस्य राशिसमासाद्य भवेद्ग्रहणसप्लवः । तस्य स्नान प्रवक्ष्याभि मन्त्रीपविधानतः ॥२ पन्द्रोपरागसम्प्राप्य कृत्वामाह्मणवाचनम् । सपूज्यचतुरो विप्रान् शुक्लमाल्य नुलेपनं ॥३ पूर्वमेयोपरागस्य समासाचौपधादिकम् । स्थापयेच्चतुरः पुम्भानपणान सागरामिति ।'४ गजायरप्यायल्मीपराङ्गमाघदगोकुलात । राजमारप्रदेशाप मृदमानोय पाक्षिपेत् ॥५ पागम्यब्ध कुम्भ शुदमुक्ताफलानि च। रोचना पद्मशरतोष पपरलसमन्वितम् ॥६ चन्द्रादित्योपराम में स्नान विधि वपन २८१ मस्य भगवान् ने कहा-जिम राशि को प्राप्त करके प्रण का सप्लद होता है उसका म्नान मय और औषधि के विधान में मैं आपको दव- लाता हू॥ १,२॥ वन चन्द्रमा का राम ( ग्रहम । सम्प्राप्त हो तो उस समय में ब्राह्मग वाचन करे और चार विधी का मुक्त माल्या तया शुक्स अनुलेपनो के द्वारा भनो मांति पूजन करे। नर उपराग का यारम्भ हो उससे पूर्व हो औपधि आदि का समासादन परे। पार कुम्मों को स्थापना करे जो द्रों स रहित हों। ये कुम्भ ठागर स्पा- लोप होते हैं ॥३, ४३१ गजगाया-अश्वगामा-वल्मीक (मांर को दामी) मङ्गमदूर-गोवल ( गायों के दम्ने तया बंधने आखिरक) राउद्धार राप्रवेग-इन स्थलों में मृत्तिका का प्रानयन करके टप्सका प्रसर करना चाहिए ॥२॥ कम्मो के पक्षगर (गो का दूध-दही-पत मूत्र और गोमय-इन सबका सम्मिया) शुद्ध मुक्ताफल राचना, पद्य, शख तथा पांचों प्रकार के रत्न, म्फटक, नन्दन वन, तीर्थो का जल, सरसों, राज- दन्त, कुमुद उगीर । मम । मोर गूगल इन समस्त पदार्थों को एकत्रित कर लेना चाहिए ॥६॥ स्फटिक चन्दन श्वेत तोचवारि गसपंगम् । राजदन्त सकुमुद तथंदाशीर गुग्गुलम् ।। एतन्नव धिनिक्षिप वुम्भेष्वावायेत मुरान् ।।७ मव ममुद्रा: गरितम्तोर्यानि जलदा नदा:। मायान्तु यजमानस्य दुरितत्तकारकाः ॥ योमो वचधरो दव आदित्यानां प्रमुमैनः । सहस्रनयनानेन्द्रो प्रहपीडा मोतु ॥६ मुमय मवंदेवाना मनाचिरमितति । चन्द्रापरागसम्भूता अनि. पोटा याह्न १० य कममाक्षी भूताना धमों महिपवाहन.. पमाचन्द्रागगाया ममा अपातु ॥११ २८६ मत्स्यपुराण नागपाशधरो देव. साक्षान्मकरवाहन । स जलाधिपतिश्चन्द्रग्रह पीडा व्यपोहतु ॥१२ प्राणरूपेण यो लोकान् पाति कृष्ण मृगप्रिय । वायुश्चन्द्रोपरागोत्या पीडामन व्यपोहतु ॥१३ योऽसौ निधिपतिर्देवः खङ्गशूलगदाधर । चन्द्रोपरागकलप धनदो,मे व्यपोहतु ।।१४ उपयुक्त पदार्थों का सबका उन कुम्भो मे निक्षेप करके फिर उनमें सुरो का आवाहन करना चाहिए ॥७॥ आवाहन के समय मे प्रार्थना करे- सब समुद्र, समस्त सरिताऐ, तीर्थ, जलद, नद यहां पर आने की कृपाकरें जो कि यजमान के दुरितो के क्षय करने में समर्थ हैं ।८। जो यह बच के धारण करने वाले देव आदित्यों के प्रभु माने गये हैं वही सहस्र नेत्रो वाले इन्द्रदेव ग्रहों की पोडा का व्यपोन करे।।। अपरिमित श्रुतिवाले सप्तचि समस्त देवों का मुख है । अग्नि, चन्द्र के उपराग से होने वाली पीडा का व्यपह्न कर जो भूतो के विदित कर्मों का ( बुरे-भले जैसे भी हो) साक्षी है वह घम महिष के वाहन वाला यमराज चन्द्र के उपराग से समुत्पन्न मेरो पीडा को दूर करे ॥१०, ११।। नागो के पाश को धारण करने वाले साक्षात् मकर के वाहन वाले देव जल के अधिपति चन्द्र ग्रह को पीडा का व्ययोहत करं ।१२। कृष्ण मृग पर प्यार करने वाले वायुदेव जो प्राणो के रूप से समस्त लोको का प्रतिपालन किया करते हैं यहां पर इस चन्द्रमा के उपगग से समुत्थिन पीडा का निवारण कर देवे । जो यह निधियो का स्वामी सङ्ग, शूल और गदा के धारण करने वाले देव धदि हैं वे मेरे चन्द्रोपगग के कलुष को दूर करे ।।१३,१४॥ योऽमो विन्दुधरो देवः पिनाकी वृषवाहनः। चन्द्रोपरागजा पाडा विनाशयतुशवर ॥१५ लाक्ययाशिभूतानि स्थावराणिचराणिव । ब्रह्मविष्ण्वय बतानि तानि पापदह तुवै ॥१६ चन्द्रादित्योपराग में स्नान विधि कथन २८७ एवमामन्यते कुम्भर भिषिक्तोगुणान्वितः । ऋग्यजु. साममन्त्रश्च शुक्लमाल्यानुलेपनैः।। पूजयेद्वस्त्रगोदानबाह्मणानिष्टदेवताः ॥१७॥ एतानैव ततोमन्नान विलिबेतरकान्वितान् । वस्त्रपट्टऽ. वा पद्मे पञ्चरत्नसमन्वितान् ॥१८ यजमानस्य शिरास निदध्य स्तेद्विजोतमाः। ततोऽतिवाहयेद्वेलामुपरागानुगामिनीम् ।।१६ प्राड मुख: पूजयित्वा तु नमस्यनिष्टदेवताम् । चन्द्रग्रहे विनिवृत्ते कृतगोदानमङ्गलः ।। वृतस्नानायत पट्टे वाह्मणाय निवेदयेत् ॥1010 अनेन विधिना यस्तु ग्रहस्नान समाचरेत् । न तस्य ग्रहपीडा स्यानच वधुजनक्षयः ।।२१ परमा सिद्धिमाप्नोति पुनरावृतिदुर्लभाम् । सूर्यग्रहै सूर्यनाम सदा मन्त्रेषु कोतयेत् ।।२२ को यह बिन्दु के घाण करने वाले वृप के वान बाने पिन की देवगएर है दे मेरी चन्द्र के ग्रहण से उत्पन्न होने वाली पोडामा विनागर देवें ॥ १५ ॥ इस मिलोगे में जो भी स्थावर और पर भूत है जो ब्रह्मा, विष्णु और सूप से सयुक्त है वे सब पापोमा दाह परे ॥ १६ ॥ इस तरह गे मामा कर फिर गुणों से समन्विन उन पभो मे मिपिया होरर शुक-यजु योर मापोर मात्रों के द्वारा एव शुष मात्य और अनुपनों से हट देवोम अपन परे वया वस्त्र मोर गोशनों रे दारा द्राह्मणों रायन ररना चाहिए ॥ १७ ॥ पिर सोमाणीकरतानबरोमिगे जो दीव रानी में भी समन्वित सन मन्त्रों कोमी वस्त्र पट्ट पर प्रधा पदम पर लिगना चाहिए १ उतम जोरों यजमान र गिर पर है रगना चाहिए। पर उस कागग का अनुगामिनो यम का अविाहन परे ।। १६ ॥ पूर्व मत्स्यपुराण २८८ दिशा की ओर मुख वाला होकर पूजन परे तथा अपने इष्ट देवो को नमस्कार करे। जब यह चन्द्रमा का ग्रहण निवृत हो जाये तो गोदान और मङ्गत मं करने वाले को स्नान रिये हुए ब्राह्मण के लिय उम पट्ट को निवेदित कर देना चाहिये ॥ २० ॥ इस विधान के साथ जो प्रह स्नान का समाचरण किया करता है उमको कभी भी ग्रहो को पाहा नही हुआ करती है और न कभी व.धुजना का दाय होता है। यह मनुष्य पुनरावृत्ति दुलंभ परम मिद्धि की प्राप्ति दिया करता है । सूय ग्रह मे सूर्य देव के नामो का सदा मन्यो मे मीतित करना चहिए। ॥ २१ ॥ २२॥ ३६-सप्तमीस्नपन व्रत कथन किमुद्वैगाद्भते कृत्यमलक्ष्मी. केन हन्यते । मृतवत्साभिषेकादि कार्येषु च किमिष्यते ॥१ पुरा कृतानि पापानि फलन्त्यस्मिस्तपोधन । रोगदौर्गत्यरूपेण तथैवेष्ट वधेन च ।।२ तद्विघाताय वक्ष्यामि सदा कल्याणकारकम् । सप्तमीस्नपननाम जनपीडाविनाशनम् ॥३ वालाना मरण यत्र क्षीरपाना प्रवश्य तम् । तद्वत्वृद्ध तराणाश्च यौवने चापिवतंताम् ॥४ शान्तये तत्र वक्ष्यामि मृततत्साभिपेचनम् । एतदेवाद् तोद्वेगचित्तभमविनाशनम् ।।५ भविष्यतिच वाराहो यत्र कल्पस्तपोधन ।। वैवस्वतश्च तत्रापि यदा तु मनुरुत्तम ॥६ भविष्यति च तव पञ्चविंशतिम यदा।

सप्तमानपन न कयन २८६ पृतं नामयग तत्र हैल्यान्वयनद्धनः । भावता नृपतिरि. कृतीयः प्रतापवान् ।।७। देवर्षि श्री नारद जी ने कहा-उदे ग से अदमुन दशा के पाप होने पर क्या कृत्य करना चाहिए ? किस कर्म के करने से यह अनपपी का हनन किय जाता है नथा मृतवत्सा आदि कार मे क्या इष्ट प्रद हुधा वरता है ? श्री भगवन ने कहा-हे तपोरन । इस मनुष्य जीवन में पूर्व जन्मो मे किये हर पाप ही फल दिया करते हैं। इस जीदन मे रोगों की उत्पनि-महा दुर्गति के स्वरूप से और इष्ट क बघ हो . से अर्थात जो भी कुछ अमीप्ट हो उसका विनाश के हाने से मनुष्य को उन पूर्व कृत पापों का पल मिला करता ॥१, २१ इन सब के विधात करने के लिरे सा कल्याण के करने वाले तथा अनो की पीडात्म विनाश कर दे। वाले सप्तमी स्नपन नाम वाले व्रत को बतलाते हैं ॥३॥ जहा पर दुधमुंहे छोटे २ बच्चो का मरण दिखलाई दिया करता है और उसी भांति जो अभी वृद्धावस्था में प्राप्त नहीं हुए हैं ऐसे यौवन मे रहने वालों का मरण होता है वहा पर शान्ति के सम्पादन करने के लिये मृनवासा. मिषेचन बतलाते हैं । यही अद्भुत उग और चित्त दे भ्रम का विनाश करने वाला होता है ॥४, ५|| हे तपाधन । जिस समय में वाराह यल्प होगा और वहीं पर जब उत्तम वैवस्वत मनु हागा । वही पर जद पत्री. सरा कृन युग नाम वाला युग होगा और उस समय में हैहय के वश की वृद्धि करने वाल' महान् प्रताप दाता वीर कृतवार्य नामक एक नृप ते होगा। , समप्तद्विपमखिले पालयिष्यति भूतलम् । यावद्वपसहस्राणि सप्तसप्तति नारद ! 12 जातमात्रन्च तस्यापि यावत् पूतशत तथा । च्यवनस्पतु भापेन विनासमुपयास्यति । सहसवाश्च यदा भविता तस्यवं सुतः ।

२०० संपादन के लिये अभी बतला दूंगा। हेनारद ! मतवत्सा स्त्री के समुत्पन्न मस्त्याण करङ्गनयन श्रीमान सस्मृतो नपलक्षण. ॥१० कृतवीर्यास्तदाराध्य सहस्रांशु दिवाकरम् । उपवासैवतदिव्योर्वेदसूक्तेश्च नारद !। पत्रस्य जीवनागलमेतत्स्नानमवाप्स्यति ।।११ वृतवीर्योण गै पृष्ट इद वक्ष्यति भास्करः । अगेपदुष्टशमन सदा कल्मपनाशनम् ॥१२ अल क्लेशेन महता पुत्रस्तव नराधिप !। भविष्यति चिरञ्जीवो किन्तु कल्मपाशनम् ॥१३ सप्तमी स्नपन वक्ष्ये सर्वलोकहिताय थे। जातस्य मृतवत्साया सप्त मे मासि नारद ! ।। अथवा शुक्लसप्तम्यामेतत् सर्व प्रशस्यते ॥१५ वह गजा सातो द्वीपो के सहित समस्त भूतल का पा पालन फरेगा। हे नारद ! सततर सहस्र वर्ष पर्यन्त बह पालन करेगा ॥६॥ उसके भी उत्पन्न मात्र हुए एक सौ पुत्र सबके मब च्यवन क श प मे विनाश को प्राप्त हो जायेंगे। जिस समय मे उसका पुत्र सहस्रबाहु होगा जो मृग नेत्रो वाला-श्री से सम्पन्न और नृप के लक्षणो से युक्त होगा ॥११. उस समय मे राजा कृतवीर्य सहस्राशु भगवान् दिवाकर की आराधना करके जो कि उपवास-व्रत-और हे नारद ! दिव्य वेदो के सूक्तो के द्वारा की गयी थी-पुत्र के जीवन के लिय यह पर्याप्त स्नान प्राप्त करेगा ॥११ । राजा कृतवार्य के द्वारा पूछे गये भास्कर प्रभु इस व्रत को उसे बतलायेंगे । यह व्रत सम्पूर्ण कल्मषो का नाश करने वाला और अशेष दुष्टो का भी शमन करन वाला है ।।१२॥ भगवान् भुवन भास्कर ने कहा थाहै नराधिप ! अब आप यह मह न क्लेश मत करो आपका पुत्र चिरजीवी होगा किन्तु पापो के नाश करने वाला सप्तमी स्नपयन करना होगा जिसको कि मैं सब लोगों के हित सपा के समान सुन्दर सम्पूर्ण

सप्तमी स्वपन वन क्थन
२६१
वुध.!
होने वाले के सातवें माम में अथा गुन ११ को सप्तमी तिथि में यह
सब प्रशस्त होगा ॥१३, १४||
ग्रहताराबलं लब्ध्वा कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ।
चालस्य जन्मनत्तत्र वजयेत्ता तिथि
तवृद्धतराणाञ्च कृत्यम्यादित रैपु च ॥१५
गोमयेनानुलिप्ताया भूमावकाग्निवत्तदा ।
तण्डुलेरक्तशालीयश्चमगोक्षीरसंयुतम् ।।
निपेत सूर्यद्वाभ्या तन्मन्त्रात विधानतः ।।१६
कीर्तयेत् सूर्यदेवत्य सप्तचि च घृताहुतो ।
जुहुयाद्र द्रसूक्त न तद्वद दार नारद । ५७
होतव्याः समिवश्चार तथवाकपलाशया: ।
यवकृष्णति लामः क्त्तव्याऽष्टशत पून. १८
व्याहृतीमिस्तयाज्येन तर्धवाप्टशत पुनः ।
हुत्वा स्नानन्च क्त्तव्यं मङ्गल यन धीमता १
विप्र वेदविदुपा विधिवहमपाणिना।
स्थापयित्वा तु चतुरः कुम्भावोगेषु शोभनान् । २०
प्रहों के तया तारामों के बल को प्राप्त कर प्रर्यात् जब सब
पह और तारा अपने अनुकूल शुम हों ऐसे ममय में शायण वाचा का।
बुध पुरुष रो चाहिए कि बालक के जन्म का नक्षत्र मोर उस विपि को
वरिन कर देवे। इसी भांति जो वृद्धों से इनर मन युवा हैं उनका
और इसरोंग भी कृय होता है ११॥ गोमय से अनुनिप्त भूमि में
एकाग्नि वे समान उस समय में पक जातीय तण्दुनों में गोरक्षीर से
सपुत घर का मूर्य स्टक उन मन्त्रों से विधान पूर्वक निर्वचन मा
चाहिए ॥१६॥ मूपंदैवन्ध गा कीर्तन करे ठप सप्तचि को पुठ की
माहुतियों के द्वारा हान करना चाहिए । ह नारद! उसी प्रकार से रुद्र के
निस सपूकर हवन करे। १७॥ उसी प्रकार से प्रो (प्राक मोर पलाय
(17) की समिधानोराहवन करना चाहिए। रियर और बाल विना

२६२ मत्स्यपुराण से अष्टोतर शत होम करना चाहिए या भाग्य (न) के द्वाग व्याहृतियो रा एक सौ पाठ वार पुनः हान करके मङ्गन स्नान करना च हिए । वेदो के विद्वान धीमान् दम हाय में रखने वाले विश्वे द्वारा चार परम शोभन तुम्मो को कोणो मे स्पायित करार विधि को मुम• म्पन्न करे ॥१६, २०॥ पञ्चमञ्च पुनमंध्ये दध्यक्षतविभूषितम् । स्थापयेदवण कुम्भ सप्तर्चेनामिमन्त्रितम् ॥२१ सौरेण तीर्थतोयेन पूर्ण रत्नसमन्वितम् । सर्वान्सर्वोपयुक्तान् पञ्चगव्यसमन्विताम् ।। पञ्चरत्नफ्ले. पुष्पर्शसोभिः परिवेष्टयेत् ।।२२।। गजाश्वरथ्यावल्मीकात्सङ्गमाद्धदगोकुलात् । सशुद्धां मृदमानीय सर्वेष्वेवविनिक्षिपेत् ॥२३ चतुर्वपि च कुम्भेषु रत्नगर्भपु मध्यमम् । गृहीत्वा ब्राह्मणस्तत्र सोरान्मन्त्रानुदीरयेत् ॥२४ नारीभि. सप्तसत्यामिरव्यङ्गाङ्गीभिरत्र च । पूजिताभिर्यथाशक्तया माल्यवस्त्रविभूषणः ।। सविप्राभिश्च कर्तव्य मृतवत्साभिषेचनम् ॥२५ दीर्घायुरस्तु वालोऽय जीवत्पुत्राच भामिनी । आदित्यश्चन्द्रम साद्ध ग्रहनक्षत्रमण्डलः ॥२६ सशका लोकपाला वै ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा. । एते चान्येच देवीघा. सदापान्तुकुमारकम् ॥२५ मित्रोशनिर्वा हुतभुक् ये च बालग्रहाः कचित् । पोडा कुवन्तु बालस्यमामातुर्जनकस्यवै ॥२८ फिर मन्य मे पांचवें कुम्म को दधि-अक्षत से विभूषित करके विना व्रण वाले कुम्भ को सात ऋचाओ से अभिमन्वित करके स्थापित करना चाहिए ।।२१।। सौर ऋचाओ से अभिमन्त्रित करके तीयों के जल से परिपूर्ण करे तथा रत्नो से समन्वित करे। सभी कुम्भो को सवैषिधि - पुत्र के सहित रवि और भगवान् शकर को प्रणाम करके उस चरुकोजो 1३ ।। भोजन करके गुरु । यह मन्त्रो की सन्तति का उच्चारण करना करें और सर्वदा वरदान देने वाले होवें-इस प्रकार के वाक्यो को बोलने वाले गुरु का अभ्यर्चन करे ।।३३॥ अपनी शक्ति के अनुसार एक कपिला गो का दान करे फिर प्रणाम करक गुरु का विसर्जन कर देना चाहिए। स्वप्नो प्रशस्त माना जाता है॥३४॥ कसका जन्म दिन और कास्याग करके सदा हा पूजन करे।, मास के शुक्ल पक्ष की २६४ मत्स्यपुराण चरुञ्च पुत्रसहिता प्रणम्य रविशङ्करौ॥३३ हुतशेष तदाश्नीयादादित्याय नमाऽस्त्विति । इदमेवाद्भुताद्वेगदु स्वप्नेषु प्रशस्यते ॥३४ कतु'जन्मदिनक्षञ्च त्यक्त वा संपूजयेत् सदा। शान्त्यर्थ शुक्लसप्तम्यामेतत्कुर्वन सीदति ।।३५ इसके अनन्तर शुक्ल वस्त्र धारण करनी वाली कुमार और पति से समन्वित भक्ति से स्त्रियो के सप्तक का पूजन करे पुनः इसके बाद गुरु का यजन करे ॥२६। इसके उपरान्त ताम्रपात्र के ऊपर स्थित धर्म- राज की सुवर्ण की प्रतिमा को करे और फिर उस गुरुजी के लिये निवेदित कर देना चाहिये । ३०॥ वित्त की शठता से रहित होकर अर्थात् धन होते हुए कृपणता न करके उसी भांति ब्राह्मणों का वस्त्र- सुवर्ण-रत्नो का समूह-भक्ष्य-धृत और पायस से पूजन करना चाहिए। चाहिए-यह बालक दीर्घायु हो और सौ वर्ष तक सुखी रहे ॥३२॥ कुछ भी इसका दुरित (पप) हो उसको बंडवानल में क्षिप्त कर दिया जावे ब्रह्मा-रुद्ध-वसु-स्कन्द-विष्णु-शक-हुताशन ये सब दुष्टो से रक्षा जो हुत से शेष बचकर रह गया है उसको-"आदित्याय नमोऽस्तु" -- इस मात्र क साथ उभी समय मे प्राशन कर लेवे। यह ही अद्भुतो गदुः सप्तमी मे शान्ति के लिय करता हुआ मानव कभी दुःखित नहीं होता

सप्तमी स्नपन व्रत कथन
सदग्नेन विधानेन दीर्घायुरमवन्नर ।
सम्वत्सराणा प्रयुत शशास पृथिवीमिमाम् ॥३६
पुण्य पवित्रमायष्य सप्तमीस्नपन रवि. ।
कथयित्वा द्विजश्रेष्ठ! तत्र वान्तरधीयत ॥३७
एतत् सर्व समास्यात सप्तमोस्नानमुत्तमम् ।
सर्वदुष्टोपशमन बालाना परम हितम् ॥३८
आरोग्य भास्करादिच्छेद्ध ताशनात् ।
ईवश्वराज्ज्ञानमिच्छेन्च मोक्षमिच्छेन्जनार्दनात् ।।३६
एतन्महापातकनाशन स्य त्पर हित वालविवर्द्धनञ्च ।
शृपोति यश्चनमन यचेत.स्तस्यापि सिद्धि मुनयो वदन्ति॥४०
इसी विधान से मनुष्य दीर्घायु हुआ है एक प्रपुर सम्बत्सरो तक
दस पुरवी का शासन किया था ।। ३६ ।। भगवान् रविदेव इस परम
पृष्यपप-महान् पवित्र और अन्यु की वृद्धि करने वाले सप्नमा स्नपन
नामर व्रत को कहकर हे द्विज श्रेष्ठ ! वहीं पर मन्तहित होगये थे
॥ 01 यह सब उत्तम सप्तमो नपन वणित कर दिया गया है जो
सब दुष्टो के उपशमन करने वाला तथा दालो का परम हितप्रद है
॥ ३८॥ यारोग्य भास्कर देव से चाह और यदि धन की इच्छा करे तो
हताशन देव से करे । ईश्वर से ज्ञान की इच्छा करनी चाहिए तथा
बनार्दन प्रभु से मास की इच्छा करे ।। ३ ।। यह सप्तमी स्नपन महान्
पातकों का नाश करने वाला है और परम हितार तथा वालो पा विशेष
वर्धन करने वाला है। जो कोई अनन्य चित्त वाला होकर इसका
प्रवण करता है उसको भी सिद्ध होती है-ऐसा मुनिगण कहा परते
है।॥ ४०॥

शल्पपश्चर्या से महान् फ्ल का वर्णन अब आप की जए॥1॥ मराय
मम्यपुराण
४०-भीमद्वादशी व्रत कथन
पुरा रथातरे कल्पे परिपृष्टा महात्मनः ।
मदरस्थो महादेवः पिनाकी ब्रह्मणा स्वयम् ॥१
कथमारोग्यमश्वयंमनन्तममरेश्वर ।
स्वल्पेन तपसा देव । भवेन्मोक्षोऽयवा नणाम् २
किमज्ञात महादेव ! त्वत्प्रसादादधोक्षज ।।
स्वल्पकेनाथ तपसा महत्फलमिहो यताम् ॥३
एव पृष्टः स विश्वात्मा ब्रह्मणो लोकभावन.।
उमा तिरुवाचेद मनसः प्रीतिकारकम् ॥४
अस्माद्रथन्तरात्यल्पात् त्रयोविंशात्पुनयदा।
धार हो भविता कल्पस्तस्यमन्वन्तरे शुभे।५
ववस्वतास्ये सजाते सप्तमै सप्तलो कृत् ।
द्वापरारय युगतद्वदष्टाविंशतिमञ्जगु ॥६
तम्यान्ते स महादेवो वासुदेवो जनादनः ।
भारामतरणायि त्रिधा विष्णुभविष्यति ॥
मरस्य भगवान ने कहा--प्रानीन काल मै रचन्तर नाम वाले
के रूप मे महान आत्मा वाले ब्रह्माजी के द्वारा मन्दराचल मे समस्थित
निधारी महादेव जी से स्वयं पूछा गया था ।। ब्रह्माजी ने कहा था-हे
अमरेवर हे देव ! अनन ऐश्वयं और आरोग्य कैस हुआ करता है जो
गि अत्यन्त वल तप से हो हो सस्ता हो अथवा मनुष्यो का आवागमन
से छुटव रा मा किस प्रकार से होता है ? हे महादेव ! हे अधोक्षज!
आपका जब प्रम द हो जावे तो फिर क्या कुछ अज्ञात रह सकता है ?
अर्थान् भापके प्रमान से तो सभी का मन हा जाया करता है । अत्यात
प्रभु ने कहा - ६५ प्रकार स ब्रह्माजी ने वारा वह विश्वामा पूछे गये थे
?

मोम बादशी व्रायन
तो लोक भावन उमापति ने मनकी प्रीति को करने वाला यह दवन कहा
थाईश्वर ने कहा था-जिम समय में इसके मनन्तर इस तेईसवें
रथन्तर फ्ल्प से वाराह कल होगा। उसक परम शुभ मन्वन्तर में
सप्तम वैवम्बत नाम वाल के समुत्पन्न हान पर सप्तलोक कृत द्वापर
नामक युग होगा जिसको अट्ठाईनयां कहते हैं ॥५॥६॥ उसक अन्त में
वह महादेव वासुदेव जनादंत भार को मवतारण करने के लिय विष्णु के
तीन प्रकार के स्वरूप होंगे।
द्वैपायन ऋपिस्तद्वद्रोहिणेयोऽव वेशव ।
कसादिदपमथन केशव क्लेमनाशान. ।
पुरी द्वारवती नाम माम्प्रत याकुशस्थली।
दिन्यानुमावसयुक्तामधिवासाय शाङ्गिण ॥
खप्पा ममाजया तद्वत् करिप्यति जगलते |
तम्या वदाचिदासीन' मुभायाममिनद्यति ।
मार्याभिवृष्णिभिश्चैव भूभृद्भभूग्दिक्षिण ॥१०
भिर्देवगन्धवरभित कैटभादन ।
प्रवृत्त मु पुराणासु धम्मसम्बधिनापु च ॥११
कया ते भाममनेन परिपृष्ट प्रतापवान् ।
सया पृष्टस्य प्रम्मत्त रहस्यस्यास्य भेदकृत् ॥१२
भविता स तदाब्रह्मन् ! कर्ताचवमादर ।
प्रवत सोम्य धम्मस्य पानामहाबल. १३
यम्य ताक्ष्यो वृक्नामजठर हव्यवाहन।
मया दत्त स धम्माला तेनवासोवृकादर. ॥१४
इमोमांस पारन ऋषि -रोहिप उशव और कम आदि
दुष्टों के पंरा मन कर देन वाले बला नारा कान वाले देशव
होस समय में दागनी नाम व नो पुरी जो कापली है
उसको ओपि अनुपावास मयुर है मेरा हो पात से स्वप्टा विश्वकर्मा

मध्यपुराण २६ - - भगवान् शाङ्गों के अधिवास करने के लिये वो इस सम्पूण जगत् का पति है उसी प्रकार से निर्मित करेगा 10 उस द्वारावती पुरी में किसी समय मे सभा मे विराजमान अमित द्य ति वाले भार्यानो से-वृष्ण गणो से- भूरिदा क्षीण वाले भूभृतो से-कुरु गणो से-देवो से और गन्धर्वो से चारो ओर से कैटभार्दन प्रभु घिरे हुए थे। उसी समय मे धर्म को बढाने वाली पुराणो की कथाएं प्रवृत्त हो रही थी ॥१०॥१॥ जब कया का अत हो गया तो भीमसेन ने प्रतापवान् प्रभु से पूछा था। आपके द्वारा पूछे गये इस धर्म के रहस्य का भेदकृत हे ब्रह्मन् ! उस समय मे वृकोदर ही कर्ता होगा। इस धर्म का प्रवर्तक महान् बलवान् पाण्ड पुत्र ही है। जिसके जठर मे परम तीक्ष्ण वृक नाम वाला हव्यवाहन है । मेरे ही द्वारा वह धर्मात्मा दिया गया है इसी से यह वृकोदर नाम से कहा जाया करता है।१२।१३॥१४॥ मतिमान्दानशीलश्च नागायतबलोमहान् भविष्यत्यरजाः श्रीमान् कन्दर्प इव रूपवान् ॥१५ धार्मिकस्याप्यशक्तस्य तीवाग्नित्वादु गोषणे । इद प्रतमशेषाणा प्रतानामधिक यतः॥१६ कथयिष्यति विश्वात्मा वासुदेवो मगद्गुरुः । अशेपयज्ञफलदमशेपापविनाशनम् ॥१७ अशेपदुष्टशमनशेषसुरपूजितम् । पवित्राणा पवित्रञ्च मङ्गलानाञ्च मङ्गलम् । भविष्यच्च भविष्याणा पुराणाना पुरातनम् ॥१८ ग्द्यष्टमी चतुर्दश्योर्द्वादशीवथ भारत ।। अन्येष्वपि दिनःषु न शक्तस्त्वमुपोषितुम् ॥१६ तत पुण्यान्तिथिमिमा सवपापप्रणाशनीम् । उपोप्यविधिनानेन गच्छविष्णा परम्पदम् ॥ माघमासस्य दशमी यदा शुक्ला भवेत्तदा ।

भीम द्वादशी द्रवपन
घृतेनाभ्यञ्जन कृत्वा तिले स्नानं समाचरेत् । २१
मतिमान् - दान देन के शील स्वभाव वाला और एक अयुत
नागों के बल से मुममान महान्-श्रीमान् बोर कदयं के तुल्य रप
लावण्य से परिपूर्ण अरजा होगा । १५ ।। परम धाम्मिक या तो भी
टीवानि के होन के कारण से उपोषण करने में अशक्त था । उमरे लिये
ही यह प्रत कहा गया है जो कि अरोष बच व्रतों से यह अधिक है ।१६॥
इम जगत् के गुरु विश्व की आत्मा भगवान् व सुदेव कहेंगे। यह अशेष
यज्ञों के पलों का प्रदान करने वाला और समस्त प्रशर के अघों का
विनाश कर देने वाला ॥१७॥ सब दुष्यों के शमन करन वाला और
द्वारा ममपित है। सभी पवित्रों में यह महा पवित्र है
ओर सब मङ्गनों में महान् मङ्गन स्वरूप है भविष्यो का भविष्य और
पुराणों में परम पुरस्न है ॥१८॥ भवन् गमुदेव न कहा पाहे
भारत । यदि अमी, चतुरशी और द्वा सोनमें तथा अन्य दिनों और
नक्षत्रों में भी क्मिी में भी माप उपयाम करने में समर्थ नहीं हैं ॥१॥
तो परम पुण्यमयी और सब पारों का विनाश करने वाले इस तिथि का
म विधान से उपवास करो जिसमे दिर के पाम पद का चले जाओ।
॥२०॥ माघ मस की दशमी तिथि जिम समय में गुबर प म हो
म समय में पा से अभ्यन्त्रन पर तिलों से न न का समावरण करना
समस्त सुरगण
चाहिए ।
तथैव विष्णुमायच्य नमोनारामणेर च।
कृष्णाय पादौ सम्पूज्य शिर: सर्वात्मनेनम ॥२
वण्ठायेति बकुण्ठमुर. धोवत्सधारिणे ।
अखिने चहिणे तहद् गदिन वरदाय व ॥
सर्वे नारायणम्यंत्र सज्या. वाह्व. क्रमात् ।।२३
दामादरायेत्युदर मेट पञ्च शराय ।
Feat. नाथाय जानुना भूतघ रिणे ॥२॥

३
३००
मत्स्यपुरन
.
नमो नीलायवैजपादौ विश्वसृजे नमः।
नतो देव्यै नमः शान्त्यै नमोलक्षागनम श्रिये ॥ ५
नमः पुष्ट्यै नमस्तुष्ट्यं धृष्ट्य हृष्ट्यः नमोनमः ।
नमो विहङ्गनाथाय वायवेगाय पक्षिणे।
विपप्रमाथिने नित्य गरुड़ञ्चाभिपूजयेत् ॥२६
एव सपूज्य गोविन्द उमापतिविनायको।
गन्धर्माल्यौस्तथा धूपेभोनानाविधैरपि ॥२७
गव्येन पयसा सिद्धड्कृसरामथ वाग्यतः ।
सपिषा सह भुक्तवा च गत्वाशतपद बुधः ॥२८
उसी भाति "नमो नारायण"-इस मन्त्र के द्वारा भगवान् विष्णु
का अभ्यर्चन करना चाहिए। श्रीकृष्ण के लिए नमस्कार है-इससे
कृष्ण के चरणो का अच्छी तरह पूजन करक "सर्वात्मने नमः" --- इससे
शिर का यजन करे । "कुण्ठाय नम." -- इससे वैकुण्ठ का तथा 'श्री
वत्स धारिणे नम:"-इससे उरः स्थलका पूजन करे । ' शखिने नमः-
चरिणे नमः-गदिने नम.-वरदाय नमः"--इन चार मन्त्रों के द्वारा
नारायण की सब वाहुओं का भली भारि क्रमसे पू न करना चहिए ।
।।२२।२३।। 'दामोदराय नम."--इससे उदार और "पजशराय नम
-इससे मेढू का पूजन करे। "सोभाग्यनाथाय नमः" इससे दोनो
अरुओ का और 'भूतधारिणे नम"-इस मन्त्र का उच्चारण कर दोनों
जानुमो का अभ्यर्चन विधि सहित करना चाहिए ॥२४॥ नीलाभ नमः"
--

भीम द्वादशी व्रत कथन ३०१ हृष्टि-इन आठों देवियो का पूजन उक्स मन्त्रो का उच्चारण करके ही करना चाहिए । “विहङ्गनाथाय नमः-वायुवेगाय नम:--वायु वेगाय पक्षिणे नम:--विध प्रमायिने नमः"--इन मन्त्रो के द्वारा नित्य ही गरुड का पूजन करना चाहिए ॥२॥२६॥ इस तरह मे श्री गोविन्द प्रम का पूजन करके उमापति और विनायक का पूजन करे । मन्य-माल्य-धूप- भक्ष्य जो अनेक प्रकार के हो--गव्य पय से यजन करना चाहिए। फिर सिद्ध कृमरा को मौन रहकर घृत के साथ खाकर बुध पुरुष को सो कदम भ्रमण करना चाहिए ||७॥२८॥ नयग्रोधं दन्तकाष्ठमथवा खादिरं बुधः । गृहीत्वा घावयेद्दन्तानाचान्तः प्रागुदङ्मुखः ॥६ यात् सायन्तनी कृत्वा सन्ध्यामस्तमिते रवी। नमोनारायणायेति त्वामह शरणङ्गतः ॥३० एकादश्यांनिहार:समभ्य यंचकेशवम् । रात्रिञ्चशकलांस्थित्वास्नानञ्चपयसातथा !!३१ सपिपा चापि दहन हुत्वा ब्राह्मणपुङ्गवः । सहैव पुण्डरीकाक्ष ! द्वादश्यां क्षीरभाजनम् ।। करिष्यामि यतात्माऽहं निर्विघ्नेनास्तु तच्च मे ॥३२॥ एवमुक्तवा स्वपेद्भूमावितिहासकथा पुनः । धुत्वा प्रभाते सजाते नदीगत्वा विशाम्पते ! ॥ स्नान कृत्वा मुदा तद्वत् पास्त्रण्डानभिवर्जयेत् ॥३३॥ उपास्य सन्ध्यांविधिवत् वात्वा चपितृतर्पणम् । प्रणम्य च हृपीकेशसप्तलोकंकमीश्वरम् ॥३४ गृहस्य पुरतो भक्तया मण्डप कारयेद् वुधः । दशहस्तमयाष्टो वा करान कुर्याद्विशाम्पते ! ॥३५ न्यग्रो (कर) का का दन्त काष्ठ (दांतुन) अथवा खदिर का दांतुन बुध को ग्रहण करके फिर उससे धावन करे अर्यात दातुन करे।

के हो जाने पर नदी पर जोकर स्नान करके मृतिका से तद्धत् पाखण्डो
योनिवञ्च तत् कृत्वा प्राह्मण.पयसपिपी।
मत्स्य-पुराण
३०२
फिर आचान्त होकर अति आवमा परके पूर्व में उत्तर की ओर मुख
वाला हो जावे। रवि के अस्ताचलगामी हो जाने पर सायन्तनी
सध्योपमना करे और हे नारायण ! आपके लिये मेरा नमस्त्रम् है- मैं
तो अब आपसी शरणागति मे सम्प्राप्त होगया हूं। एकादशी मे निराहार
रहकर भगवान केशव का ममम्यचन करके तथा सम्पूर्ण रात्रि में
स्थित होकर और पय से स्नान और घृन से दहन में हवन करके हे
पुण्डरीकाक्ष । श्रेष्ठ ब्राह्मणो के ही साथ द्वादशी मे मीर का भोजन
करूंगा। मैं यतात्मा होकर ही इसको करूगा और वह मेरे लिए
निर्विघ्नता क साथ हो जावे -यह इस प्रकार से बहकर गत्रि में भूमिपर
सो जावे । हविशाम्पते ! इतिहास की कथा का श्रवण कर फिर प्रमत
का अभिवर्जन कर देथे ॥ २६ ॥ ३०॥ ३१ ॥ ३२॥ ३३ ॥ विधिपूर्वक
सन्ध्या की उपासना करक पितृगण का तपण करे और फिर सातो लोकों
के एक स्वामी भगवान् हृषीकेश को प्रणाम करे । गृह के आगे ही दुध
पुरुष को भक्ति की भावना से मण्डय की रचना करानी चाहिए ।
हे विश्राम्यते ! दश हाथ अथवा आठ हाथ का करना चहिए।
॥३४॥३५॥
चतुहस्ता शुभा कुर्याद्वदोमरिनिषूदन ।।
चतुर्हस्तप्रमाणञ्च विन्यसेतत्र तोरणम् ॥३६
प्रणम्य कलश तत्र माघ प)मात्रेण सयुतम् ।
छिद्रेण जलसम्पूर्णमथ कृष्णाजिनस्थितः ।।
तस्य धारा च शिरसा धारयेत् सकलानिशम् ॥३७
तथैव विष्णा शिरसि क्षीरधारा प्रपातयेत् ।
अरलिमात्र कुण्डञ्चकुर्यात्तत्र निमेखलम् । ३८
तिलाश्चविष्णुदेवत्यमन्त्र रेकाग्निवत्तदा ॥३॥

भीम दादशी व्रत कथन हुत्वा च वैष्णवंमम्यकचरु गोक्षीरसंयुतम् । निप्पावाद प्रमाणावधारामाज्यस्यपातयेत् ॥१० जलकुम्भान् महावीर्य ! स्थापयित्वा त्रयोदश । भक्ष्यानाविधयक्तान सितवस्त्रं रलकृतान 11४१ युक्तानोदुम्बरः पात्र पञ्चरत्नसमन्वितान् । चतुभिवढचोमस्तत्र कार्य उदड मुखैः।।४२ स्द्रजापश्चतुर्मिश्च यजुर्वेदपरायणः । गैष्णवानि तु सामानि चतुरः सामवेदिनः ।।४३ अरिष्टवर्गसहितान्यभित परिपाठयेत । ४४ हे अरिनिपूदन ! चार हाय प्रमाण पाली परम शुभ वाली परम शुम वेदी बनावे और चार हाथ प्रमाण वाला तोरण का विन्यास करना च हिए। वहां पर कलश को प्रमाण करके जो माप मात्र से सयुत है और जल से सम्पूर्ण है। कृणा जिन पर स्थित होकर छिद्र के द्वारा पूरी रात्रि में उसकी धारा को शिर से धारण करे ।। ३६, ३७ ॥ उसी तरह से भगवान् विष्णु के शिर पर क्षीर को धारा का प्रपातन करे । यहाँ पर एक अरलि मात्र प्रमाण वाला तथा तीन मेखलाओ से समन्वित एक कुण्ड की रचना करनी चाहिए । योनि वक्त्र वाला उसे करके फिर ब्राह्मणो के द्वारा पय-धृत और तिलो का उस समय मे एकाग्नि की तरह विष्णु देवत्य मन्त्रों से हवन करे और सम्यक् वैष्णव परु वनावे मो गौ के क्षीर स सयुत होवे । निष्पावाई प्रमाण वाली घृत की धारा का प्रातन करवे ॥ ३८,३६, ५० ॥ हे महावीयं ! वहाँ पर तैरह जल के कुम्मों को स्थापित कराकर नाना मांति के भक्ष्यों से उन्हें सयुत करे और सफे वस्त्रो से अलकृत करे । उदुम्बर से निर्मित पानों से युक्त तया पांचो रनों से समन्वित करे, वहां पर चार यस्तचो के द्वारा जिनका मुत्र पर की ओर हो होम करना चाहिए। चारों के द्वारा रुद्र का जाप करावे ला कि यजुर्वेद के परायण हो। गैष्णव सामो का चार

महार्णव से उत्तारण कराने वाले हैं। ऐसा कोई दम हमको बतलाइये जो
ईश्वर ने कहा--अब मैं सौर (सूर्य से सम्बन्धित ) धर्म को बतलाता
विशोक सप्तमी भी होती है जो फनो से माड्य है और समस्त पापों का
नाश कर देने वाली होती है ॥२॥ उमी भांति परम पुण्यमयी शरा
माप
सामवेदो परे। रिट वर्ग हित र मोर परिपाठ वा पहिए
४१, ४२,४५,४४॥
•४१ --कल्याण सप्तमी व्रत कथन
भगवन् ! भर ! समाग्मागरोनारवारम!।
फिश्चिद्वतममाचक्ष्वम्वर्गारोग्य गुखप्रदम् ।।१
सौरं धर्म प्रवक्ष्यामि नाम्ना पल्याणसप्तमीम् ।
विशोकसप्तमी तदत् पलायां पापनाशिनीम् ॥
शकंगमनमी पुण्या तथा कमलसप्तमीम् ।
मन्दारमप्तमी तद्वच्छुमदा गुभमप्तमीम् ॥३
सानिन्तफला. प्रोक्ताः सर्वा देवपिपूजिताः।
विधानमासा वक्ष्यामि यथावदनुपूवराः ।।४
यदा तु शुक्लसप्तम्यामादित्यस्य दिनं भवेत् ।
सातु कल्याणिना नामविजयाचनिगद्यते ॥५
प्रातर्गव्येन पयसा स्नानमम्या समाचरेत् ।
ततः शुक्लाग्वरः पद्यमक्षताभि प्रकल्पयेत् ॥६
प्राडमुखोऽष्टदल मध्ये तद्वद् वृत्ताञ्च करिणकाम् ।
पुष्पाक्षताभिर्देवेश विन्यसेत् सर्वतः मात् ॥७
ब्रह्माजी ने कहा-हे भगवन् ! हे भव ! आपतो इस संसार रूपी
स्वर्ग और प्रारोग्य तथा सब प्रकार का सुख प्रदान करने वाला हो।।१।।
जो नाम से कल्याण सप्तमी व्रत कहा जाया करता है उसी प्रकार
से

कसान सप्तमी द्रत दयन
सप्तमी होती है और कमर सप्तमी भी हुआ करती है तथा इसी भांति
सन्दार सप्तमी और सुमों का प्रदान करने वाली शुभ सप्तमी भी होती
है ॥३॥ ये समी सप्तमियां अनन्त फलों वाली होती है-ऐसा हो कहा
गया है। सभी देवपियों के द्वारा पूरित है। बद हम इन ममस्त सप्त.
मियों का विधान बतलाते है जो ठीक २ यथावद और नुपूर्वी के सहिश
होगा ॥४॥ जिस समय में मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी में वादित्य का
दिन होवे बहो सप्तमी स्ल्याग करने वाली विषया नाम भी जितका
कहा जाता है इस सप्तमी के दिन में प्रातःकाल ही में गम्म पय से
स्नान करना चाहिए। इसके अनन्नर शुक्ल वस्त्रधारी होकर शवों से
पय की कल्पना करनी चाहिये ॥१,६॥ प्राङ्ग मुष्ठ होकर अष्ट
रन वाले कपल के मध्य में उसी भांति वृत्ताकार कमिका को रचना
करे पोर सब ओर कम से पुष्प यासतों से देदेव का दिन्यास करना
चाहिए ।
पूर्वेण तानायेति मार्तण्डायेति चानले।
याम्ये दिवाकरायेति विधान इति नैऋते ॥
पश्चिमे वरमायेति भास्करायेति चानले ।
सौम्यं वेकतनायेति रवये चाप्टमे दलै
वादावन्तेच मध्येच नमोऽस्तु परमात्मन ।
मन्त्र रेमि समभ्यच्यं नमस्कारान्तदीपिट. १०
शुल्कवस्त्र: फलक्ष्यधूपमाल्यानुलेपनः ।
स्थण्डिले पूजयेद्भक्तया गुडेन लवणेन च ॥११
ततो न्याहृतिमन्त्र गविसर्जेंद्विजपुङ्गवान् ।
शक्तिः गजमेद्भक्तया गुहसीरघृतादिभिः।
तिलपात्र हिरण्यं च ब्राह्मणाय निवेदयेत् ।।१२
एद नियमकृवसुप्त्वा प्रातरुत्याय मानवः ।
कृतस्नानजसो विप्रे. सहैव घृतपायसम् ।।१३

मत्स्यपुराण भुक्तवा च वेदविदुपि विडालव्रतवजिते। घृतपात्र सकनकं सोदकुम्म निवेदयेत् ॥१४ प्रीयतामत्र भगवान् परमात्मा दिवाकरः। अनेन विधिना सर्व मासिमासि व्रतचरेत् ॥१५ पूर्व दिशा मे तपनाय नम:'-इस मन्त्र से अग्निकोण में 'मार्स- ण्डाय नम:'-समे-चाम्य दिशा में "दिवाकराय नम:'-इससे-नैऋत्य मे विधात्रे नम"इससे पश्चिम में 'वरुणाय नम:'-इस मन्त्र से- अनिल दिशा मे 'भास्कराय नमः' -इससे सौम्य दिशा में 'वैकतं नमः' इससे रवये नम:'-- इससे अष्टम दल मे पूजन करे ॥८, ६॥ आदि में और अन्त मे "परमात्मने नमोऽस्तु" इम मन्त्र से अध्यन करे। इन उपयुक्त मन्यो से समभ्यर्चन करके जो अन्त में नमस्कार से दीपित होते हैं फिर शुक्ल वस्त्रो के द्वारा फल-भक्ष्य-धूप-माल्य और अनुलेपनो से गुड और लवण से भक्तिभाव के साथ स्थण्डिल में पूजन करना चाहिए ॥१०, ११॥ इस अनन्तर व्याहृति मन्त्र से द्विजश्रेष्ठों का विसर्जन करे । शक्ति से भरसक पूर्णतया भक्ति पूर्वक गुड-क्षीर और घृत प्रादि पदार्थों के द्वारा अर्चन करे । तिलो से परिपूर्ण पात्र और सुवर्ण ब्राह्मण की सेवा मे निवेदित करना चाहिए ॥ २॥ इस प्रकार से नियमो को करने वाला पुरुष शयन करके प्रातः काल की बेला मै उठकर खडा हो जावे । स्नान और जाप करके विप्रो के हो माय ही घन और वायस का भोजन करे । वेदो का विद्वान् हो और बिडाल व्रत से रहित हो ऐसे किसी योग्य ब्रह्मण को सुबर्ण के सहित था का पात्र अर्याद घृत से भरा हुआ पात्र और जल से युक्त कुम्भ निवेदित करे। उस समय मे यह कहे कि यहा पर भगवान् परमात्मा प्रसन्न होवें। इसो विधान से सब मास-मास मे इस व्रत का सराचरण करना चाहिये ।।१३, १४, १५॥ विशारसप्तमी तद्वद्वक्ष्यामि मुनिपुङ्गव ! । यामुप्योप्य नर. शोक न कदाचिदिहाथ ते ॥१६ ।

मत्स्यपुराण ही द्वारा शोक से रहित रहता है-यह प्रार्थना करे। फिर यह भी निवेदन करे कि उसी प्रकार से मेरी भी विशोकता होवे अर्थात मैं भी शोक से बिल्कुल रहित हो जाऊँ और प्रत्येक जन्म में आपके चरणो मे मेरी सुदृढ भक्ति भी होवे ॥१६॥ इस प्रकार से पष्ठी तिथि में पूजन करके फिर भक्ति पूर्वक द्विजगणो का अभ्यर्चन करे । गोमूत्र का प्राशन करके शयन करे और उठकर नत्यिक कृत्य का सम्पादन करे ॥२०॥ विप्रो का अन्न से भली भौति पूजन करके फिर गुड पात्र से संयुक्त हो वस्त्र और वह पद्म ब्राह्मण की सेवा मे निवेदित कर देना चाहिए। ॥२१।। सप्तमी मे तेल और लवण से रहित भोजन करके मौन व्रत सयुत रहे फिर भूति की इच्छा रखने वाले को पुराणो का श्रवण करना चाहिए ॥२०॥ इसी विधि से दोनो पक्षों मे सब करे जब तक माघ शुक्ल पक्ष की सप्तमी पुन आवे करता रहे ॥ ३॥ ४२-विशोक द्वादशी व्रत कथन किमभीष्टवियोगशोकसपादलमुद्धतुमुपोषण व्रत वा । विभवोद्भवकारि भूलनेऽस्मिन् भवभीतेरपि सूदनञ्च पुस ॥१ परिपृष्टमिद जगत प्रियन्ते विबुधानामपि दुर्लभ महत्वात् । तत्र भक्तिमतस्तयापि वक्ष्ये प्रतमिन्द्रासुरमानवेषु गुह्यम् ॥२ पुण्यमारवयुजे मासि विशोष द्वादशीव्रतम् । दशम्या लघुभुविद्वाना भेन्नियमेनतु ॥३ उदङ्मुख प्राड मुखो वा दन्तधाव नपूर्वकम् । एक्दश्यानिराहार समभ्यर्गतुपूर्वकम् ॥ निय वाऽभ्यन्य विधिवद्मोक्ष्यामि त्वपरेऽहनि । ॥ एव नियमसत्सुप्ता प्रातरुयाय मानव ।

३०६ मोकादशी व्रत कपन स्तान सबाप यालम्चनयजनेन तु ॥ गुसमास्याम्बरधरः पूजयेन्कीशमुसलंः ।।५।। विशोकाय नमः पादौ बधे च वरदाय वे। घोशाय जानुनी तहटम र जलशायिने ॥६॥ नन्दाय नमो गुह्य माधवाय मनः कटिम् । दामोदरायत्युदरम्माश्व च विपुलाय ने ॥७ मनु महाराज ने कहा-है नगवन् ! क्या कोई नूमण्डन में ऐसा दन दोर सदाम है दो अमीष्ट की सिद्धि करने वाना हो और वियोग तपाक के मुघान सदर करने के निदे ममय हो व्या वमन के उद्भव को करने वाला हो तथा पुरुष के हृदय में बो एक इस मुसार का भर गहना है उनको नष्ट कर देन बाना मी हो ? ॥१॥ मस्प भासन ने रहा भार का यह पता पूर्ण पद के नि प्रिय है और महन्व की दृष्टि में यह देवों के लिये भी परम दुनंन है। यह न तो ऐसा ही मुड मुड कर देने वाला है और इन्द्र-अमुर और मानों में अति मोरनी है तो मी गति बाप किमान है इसी निरै बता रहा है । सा यावर मास में परम पुम्बनय यह विटोक दास्यों का दा होता है । दशमी लिपि में विद्वान् पुल अव म भोग्न करे और फिर निरम पूर्वक इसका ममारम्म बर देना चाहिए ॥३।। उत्तर की ओर मम् वारा पा पूर्व दिशा की तरफ मुख वाना होकर धावन भाद दैनिक कृत्य को पहिने करते हर एकादमी में निराहार रहकर पूर्व में मरम्पत करना चाहिर पहिने विधि पूर्व यो का पूजन करके सरे दिन में भोजन करपा-ऐने नियम का नाम करके पन करे और प्रमान में ठार माघ मानव को सर्वोधियों में मिश्रित बन में और पत्र पार के जल से स्नान करना चाहिए। रिमति स एकत्र धार होकर उसनों में प्रोजन का पान करला पाहिए ॥२॥ 'दिमा. पाय नम '-दसमें चरमोतपरसार नम.' इसमें दोनों का परन मस्यपुराण करे,। "श्रीशाय नम' इससे जानुओं का, 'जलशायिने नम. इससे यहओं का पूजन करे ॥६॥ 'कन्दाय नमः' इम मन्त्र से गुह्य का तथा 'माधवाय नग'-इसका उच्चारण कर कटिका पूजन करना चाहिए । 'दामोदराय' इससे उदर का और 'विपुलाय नम' इससे दोनो पाश्वों का वचन करे ॥७॥ नाभिञ्च पद्मनाभाय हृदय मनन्याय व । श्रीधराय विभोवक्ष. वरौ मधुजिते नम ॥ चविणे वामबाहुञ्च दक्षिणङ्गदिने नम । वैकुण्ठाय नम कण्ठमास्य यज्ञमुखाय वै॥६ नासामशोकनिधये वासुदेवाय चाक्षिणी। लालट वामनायेति हरयति पुनवौ ॥१० अलकान् माधवायोति किरीट विश्वरूपिणे । ततस्तु मण्डभ कृत्वा स्थाण्डिलकारयन्मृदा ।।१२ चतुरस्र समन्तान्च रलिमात्रमुदप्लवम् । Prem नग्निो विपत्रयसमावतम् ॥१३ विजोक द्वादशी व्रत कथन द्वारा इस भांति गोविन्द का भी प्रांति पूजन करके फिर इसके उपरान्त मादल का निर्मान कराकर मृत्ति का से स्थग्डित को रचना करनी चाहिः ।। १२ ।। सभी ओर से चौकोर और रलिमात्र उदरप्लव वाला-लक्षण-हृद्य ( मनोहर ) दोनों बौर विप्रनय से समावत बनाना चाहिए ॥१३॥ बङ्ग लेनोन्ता विप्रास्तद्विस्तारस्तु व्यङ्ग ल.। स्थण्डिलस्योपरिप्टान्च भित्तिरप्टाङ्गला भवेत् ।।१४ नदीवालुकयालक्ष्म्या प्रतिकृतिन्यसेत् । स्थाण्डितेशूर्पमारोप्यलक्ष्मीमित्यर्चयेवुधः ॥१५ नमो देव्यै नमः शान्त्यै नमोलक्ष्म्यं नम.थिय । नम.पुष्ट्यनमस्तुष्ट्यवृष्ट्यहृष्ट्यनमोनमः ॥१६ विधोकादुःखनाशायविशोकावरदास्तु मे। विशोकाचास्तुसम्पत्त्यं विशोकासर्वसिद्धये ।।१७ एक अंगुल विप्र तच्छूित हो और उसका विस्तार दो अंगुल का होना चाहिए । स्थण्डिन के कार जो मित्ति हो वह आठ अगुल प्रमाण वाली रहनी चाहिये ॥१४॥ नदी की पालुका से निर्मित हुई लक्ष्मी की प्रतिकृति का न्यास शूपं में करे। फिर उप्त स्थग्हिल में सूर्य का आरोप करके दुध पुरुष लक्ष्मी का अभ्यर्चन करना चाहिए ॥१॥ अर्चना के समय में उच्चारण किये जाने वाले मन्त्र ये है-"देव्यै नमः, शान्त्य नमः लक्ष्म्य नमः', श्रियै नमः, पुष्टयं नमः, तुष्टय नमः, हृष्टय नमः, ' हे देवि ! आप दुःखों का नाम करने के लिये विमत शोक वाती हैं। प्रार्थना है कि मुझ पर भी बार अव विशोका हो जाई । सम्पत्ति के लिये विशोका हो और सब प्रकार की सिद्धि के लिये भी विद्योता हो को इस तरह जावें ॥१६, १७॥

३१२ मत्स्यपुराण ४३ ---ग्रह शान्ति वर्णनम् वैशम्पायनमासीनमपृच्छन्छौनकः पुरा । सर्वकामाप्तयेनित्यकथंशान्तिकपोष्टिकम् ॥१ श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रहयज्ञ समारभेत् । वृध्यायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन पुनः ।। येन ब्रह्मन् ! विधानेन तन्मे निगदतः शृणु ॥२॥ सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्यसक्षिप्यग्रन्थविस्तरम् । ग्रहशान्तिप्रवक्ष्यामिपुराणश्रुतिनोदिताम् ॥३ पुण्येऽह्नि विप्रकथिते कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् । ग्रहान्ग्रहादिदेवाश्चस्थाव्यहोम समारभेत् ॥४ ग्रहयज्ञस्त्रिधा प्राक्तः पुराणश्रुतिकोविदः । प्रथमोऽयुतहोम स्याल्लक्षहोमस्ततःपरम् १५ तृतीतः कोटिहोमस्तु सवकामफलप्रदः । अयुतेनाहुतीनाञ्च नवग्रहमखः स्मृतः । ६ तस्य तावद्विधि वक्ष्येपुराणश्रुतिभाषितम् । गतस्णेत्तरपूर्वेण वितास्तद्वयविस्तृताम् ।।७ महामहिम श्री गुनगी ने कहा-पुरातन समय मे एक स्थल पर समासीन चम्पायन मुनि से शोना जी ने पूछा था कि समस्त कामनाओं की प्राप्ति के लिये नित्य ही शान्तिक और पौष्टिक कैसे होगा अर्थात इसका साधन किस प्रकार से किया जा सकता है-यह पतलाइये ।।१।। भगवान् पैशायन जी ने कहा-धी की कामना करने वाला कोई पुरुष हो या शान्ति की इच्छा रखो घाला कोई होवे उन दोनो ही प्रकार के पुरुषो को ग्रह या करने का समारम्म कर देना चाहिए। बृद्धि-मायु सपा दृष्टिको रामना वाला हो तथा कोई अभिवार रे करने की छा वाला हो उसको भी वैपाही करना चाहिये । हे ब्रह्मन् ! सि विधान

मह शाति वर्णी
३१३
म करना है उसको कम करने मुझमे श्रवण करलो ||२|| समस्त शास्त्री
का अनुक्रमण करको और अाप के विस्तार का सर करके पुराण और
श्रुति के द्वारा कथित प्रहो की शान्ति को बतलाते हैं।।३।। विप्रो के द्वारा
पताये हुए किसी भी पुण्य
दिन म ब्राह्मणों का वाचन करके फिर प्रहा
को-ग्रहा के आदि देवों को स्थापित करके होम का समारम्भ कर देना
चाहिए ॥४॥ पुराणों न तथा श्रुति महा मनीषियो ने ग्रहयज्ञ तीन प्रकार
का कहा है । प्रथम तो वह है जिस प्रह यज्ञ म दश सहस्र आहूतियो का
होम किया जाता है, द्वितीय वह होता है जिस ग्रह यज्ञ मे एक लाख
प्रातियों का होम किया जाता है || तीसरा जो इस ग्रह यज्ञ का
भेद है उसमें एक करोड आहूतियों का होम होता है। यह तो समस्त
कामनायो के फलों का प्रदान करने वाला हुआ करता है । जिसमेशद
सहस्र आहूतियों दी जाया करती हैं वह नवाह मस के नाम से कहा गया
है ॥६॥ उसको जो विधि पुगणों के तथा ऋति के द्वारा भापित की गयी
है उसे ही बतलाऊसा । जो गर्त हो उसके उतर और पूर्व दिशा मे दो
विस्ति (वालिश के विस्तार वाली को बनाये 1010
प्रद्वीयावृतादि वितस्त्युच्छ यसम्मिताम् ।
सस्थापनायदवानाञ्चतुरस्रामुदङ्मुखाम् ।।
अग्निप्रणयन कृत्वा तस्यामावाहयेत्सुरान् ।
देवतानातल स्थाप्यावितिदिशाधिका।
सूय्य सोमस्तथा भौमावुधजीवसितापजा ।
गह केतुरिति प्रोक्ता ग्रहा लोकहितावहा ॥१०
मध्येतु भास्कर विन्द्याल्लोहित दक्षिणेन तु ।
उत्तरेण गुरु विन्द्यालबुध पूर्वोतरेण तु । ११
पूर्वण भागव विन्द्यात् साम दक्षिणपूक्के ।
पश्चिमेन शनि विन्द्याद्रहु पश्चिमदक्षिणे॥
पश्चिमोत्तरत केतु स्थापय छुवलतण्डुल ॥१९॥

से सब हो के प्रधि देवता होते हैं । अग्नि-आप (जल)-शिति-fवरण। ३१४ मत्स्यपुराण भास्करस्येश्वरंविन्द्यादुमाञ्चशशिनस्तथा । स्कन्दमङ्गारकस्यापिबुधस्यचवथाहरिम् ॥१३ ब्रह्माणञ्च मुरोविन्द्यान्छुकस्यापि शचीपतिम् । शनैश्चरस्यतुयमं राहोःकाल तथैवच ॥१४ केतो चित्रगुप्तञ्च सर्वेषामधिदेवताः । अग्निरापः क्षितिविष्णुरिन्द्र ऐन्द्रीच देवताः ॥१५ उस वेदी को दो वप्रो से बावृत करावे और एक वितस्ति ( विलाँद ) उच्छ! (ऊचाई । से सा मत करे। यह देवगणो की सस्थपना करने के लिये ही चौकोर और उत्तर की ओर मुख दाली निर्मित करानी चाहिए ।।८।। अग्नि देव का प्रणयन करके उसी वेदी में सुरगणो का आवाग्न करना चाहिए। वहा पर द्वादश अधिक विंशति अर्थात् बत्तीस देवताओ की स्थापना करनी चाहिए ॥६॥ सूर्य-सोम-- मङ्गल-बुध-गुरु-शुक्र-श ने-राहु-केतु ये लोको के हित के करने वाले प्रह कहे गये हैं ॥५०॥ उसमे मध्य भाग मे भगवान् नास्कर की स्थापना करे जो लोहित वर्ण का होवे और दक्षिण दिशा की भोर ही रहना चाहिए। उसके उत्तर की ओर गुरु को स्थापित करे और पूर्वोत्तर में बुध ग्रह को स्थापित करना चाहिये ॥१४॥ पूर्व दिशा में शुक्र को तथा दक्षिण पूर्व मे सोम की स्थापना करे। पश्चिम में शनि को तथा पश्चिम दशिण मे राहु को स्थापित करे । एव पश्चिम उत्तर भाग में केतु ग्रह की स्थापना शुक्ल तण्डुलो से करनी चाहिये ।। १२॥ भास्कर ग्रह का अधि- देवता ईश्वर है और चन्द्रमा पा उमा भीम का स्कन्द अधिदेव होता है एव प्रधका हरि है |१३|| गुरु का अघि देवता बह्मा है तथा शुक्र ग्रह पा स्वामी शविपति इन्दु है । शनश्वर का अघिदेव यम और राहु का पाल बताया गया है तथा केतु का अधिदेवता चित्रगुप्त है-इस प्रकार - - इन्द्र और ऐन्द्री देवता हैं ॥१५, १५॥

मरगा । मी तदनुकूम ही होता है | सोम र लिय पर और पायस धरित करे । मौन पो सपाय मपित करे और युथ ये सियार पाप्टर व ॥१६॥ गुरु को भि और मोदन दवे तथा गुरु दरो गुहौदन अस्ति कर । शनि पोपसर गहु और केतु को पित्रोदन देव । इस प्रसार सभा को भक्ष्य पदाप है उही सबा अपनगरना चाहिय ||२011 प्रागुतरेण तस्माच्च दध्यक्षतविभूपितम् । घूतपल्लवस-छान पलस्त्रयुगान्वितम् ॥२१ पञ्चरत्नसमायुक्त पञ्चमङ्गसमन्वितम् स्थापयेदवण कुम्भवरण तत्र विन्यसेत् ।। गगाद्या सरित सर्वा समुद्रापघसरासिच । गजाश्वरथ्यावल्मीक्सङ्गमाद दगोकुलात् ॥२२ मृदमानायविप्रेन्द्र ! सोपधिजलान्वितम् । स्नानर्थविन्यसत्तत्र यजमानस्यधर्मवित् ॥२॥ सर्वे समुद्रा सरित सरासिच नदास्तथा । आयान्तु यजमानस्पदुरितक्षयकारका । २५ एवमावाहयेदेतानमरान मुनिसत्तम । । होम समारभेत् सपियवव्रीहितिलादिना ।।२६ के पालाशखदिरावपामागोऽथपिप्पल । औदुम्बर शमीदूर्वाकुशाश्चसमिध मात् ॥३७ एकैकस्याष्टकशतमष्टाविंशतिमेव वा। होतधामधुसपिभ्या दना चव समन्विता ॥२८ इसके पूर्व मोर उत्तर में दधि-अक्षते से विभूषित-आम के पल्लवो से सछन-फल और दो वस्त्रो से सावत-पांच प्रकार के रलो से युक्त और पञ्चभङ्ग पञ्जभङ्ग से सयुत बिनावण वाला वरुण देवता के कुम्भ की स्थापना कर वि यास करना चाहिए ॥२१, २२॥ गङ्गा आदि सभी सरिताएँ–समुद और सटो का भी दियास करे। गज-मश्व को

३१७
ग्रह शान्ति वर्णन
शाला-रप्या (गली)--वल्मीक ( सापको वामो)-सङ्गम-हद और
गौओं के रहने को भूमि इनसे मृत्तिका का आहरण करे। हे विप्रेन्द्र !
वहां पर धर्म के ज्ञाता पुरुष को यजमान के स्नान के लिये सोपधि और
जल से परिपूर्ण कुम्भ का विन्यास भी करना चाहिए ॥२३, २४॥ उस
समय में निम्न प्रकार से सम्पूर्ण जलाशयों का प्रावाहन करे-सभी
समुद्र-सरिताएं-रोवर और नर यहां पर आवें जो यजमान के हरितों
(पाप कर्मों • के क्षय करने वाले हैं ॥२५॥ हे मुनियो मे परम प्ठ !
इसी प्रकार स इन समस्त देवो का भी वहां पर आवाहन करना चाहिए
और इसके अनन्तर फिर घृत-यह-मोहि और मिल मादि के माकल्प से
होम का आरम्भ करे ॥२६॥ क्रम से समिधाएं भी हो जो अकं (माक)
पनाग (दाक ) खदिर-अपामार्ग-गोपल-गूलर-शमी (छौंकर)-
दूर्वा और कुशा ये होती हैं ॥२७॥ एक-एक के लिये अष्टोत्तर शत
(एक सौ आठ) अथदा केवल अट्ठाईस ही बाहुतियां मधु और
मृत से और दधि से समन्दित करके देनी चाहिए अर्थात् हवन
करे ।। २८॥
प्रादेशमानाशिफा अशाखाअपलाशिनीः ।
समिधःवल्पयेत्प्राज्ञः सर्वसम्मंसुसवदा ॥२६
देवानामपि सर्वपामुपाशु परमार्थवित् ।
स्वेन स्वेनैव मन्त्रण हातम्याः समिधः पृथक् ॥३०
होतन्यं च घृताभ्यक्त' चरु भन्मादिकं पुन.।
मन्नं दंशाहतोत्वा होमं व्याहृतिभिस्ततः ॥३१
उदङ्मुखाः प्राङ्मुखावाकुयुबाह्मणपुङ्गवाः ।
मन्त्रवन्तश्च कर्तव्याश्चरव. प्रतिद्वतम् ।।३२
हत्वा च तांतचरून राम्पक ततो होम समाचरेत् ।
आकृष्णेति च सर्याय होमः कार्यों द्विजन्मना ॥३३
‘माप्यायस्वेतिम्रोमायमणहयात् पुनः ।

मन्स्यपुगण - अग्निर्मूर्द्धादिवो मन्त्र इतिभौमायकीर्तयेत् ॥३४ अग्ने ! विवस्वदुपस इति सोमसुताय वै । वृहस्पते ! परिदीया रथेनेति गुरोमंतः ॥३५ सर्वदा सभी कर्मों में प्राज्ञ पुरुष को प्रादेश मात्र-अशिका- विनाशाखा वाली और पत्रो से रहित ही समिधामो की कल्पना करनी चाहिए ॥ २६॥ परमार्थ के ज्ञाता पुरुष को सभी देवो के लिये उपाश होते हुए ही अपने २ उनके मन्त्रो के द्वारा पृथक् २ समिधाओ की आहु. तियां देनी चाहिए ॥ ३०॥ चरु और भक्ष्यादि को घृत से अन्य करके हो हवन करना चाहिए। मन्त्रो के द्वारा द्वादश आहुतियो का हवन करके फिर व्याहृतियों के द्वारा होम करना चाहिए ॥ ३१ । श्रोठद्र ह्मण या तो उत्तर की ओर मुखों वाले रहें या पूर्व की ओर मुख करने वाले होने पाहिए । जो मन्त्रो वाले हैं उनको प्रत्येक देव के घर करने चाहिए। उन घरमो का हवन करके भली भांति होम का समाचरण करे । द्विजन्मा के द्वारा 'आकृष्ण'- इत्यादि मन्त्र के द्वारा ही सूर्य के लिये होम करना चाहिए ॥ ३२॥ ३३ ॥ "आप्यापस्" इत्यादि मान्न से चन्द्रमा के लिए हवन परे। 'अग्निमूर्दादियो" इत्यादि मन्त्र भीम के हवन के लिये उच्चदित परे ॥ ३४॥ "अग्ने ! विवस्वदुषम " इत्यादि मन्त्र का प्रयोग सोम सुत बुध के लिए करे तथा 'वृहस्पते ! परिधीया रथेन' इत्यादि मन पा प्रयोग गुरु के लिए माना गया है ॥३॥ शुमन्ते अन्यदिनिच शुभस्यापि निगद्यते । शनैश्चरायेति पुनः शन्नो देवीति होमयेत् ।। पयानश्चिय आभुय इति राहोरदाहृतः ॥३६॥ तु पृण्वन्नपि न यात् केतनामपि शान्तये । थायो गजेति नद्रस्य यतिहोम समाचरेत् ।। आपोहिष्टेत्युमायास्तु स्योनेयाति स्वामिनस्तथा ॥३७॥ विष्णोरिद विष्णुराित तमाशेति स्वयम्भुवः । ।

प्रह शान्ति वर्णन इन्द्रमिद्देवतायेति इन्द्राय जुहुयात्ततः ॥३८ तथा यमस्यचार्य गोरिति होमः प्रकीत्तितः। कालस्यब्रह्मयज्ञानमिति मन्त्रविदो विदुः ॥३६ चित्रगुप्तस्य चाज्ञातमिति मन्त्रविदो विदुः । अग्नि दूतं वृणीमह इति वढेरुदाहृतः ।।४० उदुत्तम वरुणमित्यपा मन्यः प्रकीर्तितः । भूमे पृथिव्यन्तरिक्षमिति वेदेषु पठ्यते ॥४१ सहस्रशीर्पा पुरुष इति विष्णोरदाहृतः ॥४२ इन्द्रायेन्दो मरुत्पत इति शक्रस्य शस्यते ॥४३ 'शुक्रत्ते अन्यद्" इत्यादि मन्त्र के लिये हवन करने मे बोला या करता है। "शन्नोदेवी" इत्यादि मन्त्र का उच्चारण शनिदेव के होम के लिये करना चाहिए और "कयानश्चिन आभूव"-इत्यादि मन्त्र । राहु के लिए होम बताया गया है।। ३६ ॥ "केतु कृण्वन्नाप" इत्यादि मन्त्र का उच्चारण के तुओं को शान्ति के लिये करना चाहिए। 'आयोराज' इत्यादि मन्त्र के द्वारा रुद्र का वलि होम समाचरित । 'आयोदिष्ठा' - इत्यादि मन्त्र से उमादेवी का तथा 'स्योन' इत्यादि से स्वामि कात्तिकेय का वलि होम करे ॥ ३७॥ "इदविष्णु" इत्यादि मन्त्र से भगवान विष्णु का तथा 'तमीशेति' इत्यादि के द्वारा स्वयम्भू का और 'इन्द्रापिदेवताय' इत्यादि से इन्द्रदेव के लिये हवन करना चाहिए ॥ ३८॥ यम के लिए 'अयं गौरिति' इत्यादि मन्त्र के द्वारा होम करे-ऐसा कीर्तित किया है। 'कालस्य ब्रह्मय जानम्' इत्यादि को काल के लिये मन्त्री के वेता लोग जानते हैं ।। ३६ ।। चित्रगुप्त के लिये 'अमातम्' इत्यादि को मन्त्रो के माता बानते हैं । 'अग्निदूत दणीमहे'- इत्यादि को मन्त्र बलिदेव के लिये बताया गया है ॥॥ 'उदुस्तम वरुणम्' इत्यादि अपो का मन्त्र कहा गया है और 'पृथव्यन्त रिक्षम्' इत्यादि मन्त्र को भूमि के लिये वेदों में पड़ा जाया करता है ॥४॥ सहस्रशीर्षा पुरप'-इत्यादि मात्र भगवान्

३२०
मत्स्यपुराण
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विष्णु के लिए कहा गया है और 'इन्द्रामेन्दो मरुत्वत' इत्यादि मन्त्र शक
के लिए प्रशस्त माना जाता है।।४२, १३॥
उत्तापर्णे सुभगे इति देव्याः समाचरेत् ।
प्रजापते: पुनर्होमः प्रजापतिरिति स्मृत. ॥४४
नमाऽस्तु सभ्य इति सणा मन्त्र उ यते।
एप ब्रह्माय ऋत्विज्यइतिब्रह्मण्युदाहृत. ॥४५
विनायकस्य चानृ नमिति मन्त्रो वुधै. स्मृतः।
जातवेदसे सुनवामितिदुर्गामन्यउच्यते ॥४६
आदिप्रत्नस्य रेतस आकाशस्य उदाहृत ।
प्राणाशिशुमंहीनाञ्च वायोपत्र. प्रकोत्तितः ।।४
एपो उपा अपूर्वादित्यश्विनोमन्त्र उच्यते।
पूर्णाहुतिस्तु मुर्दान दिवइत्यभिपातयेत् ॥
"उत्तायणे सुभगे" ~ इत्यादि मन्त्र का प्रयोग देवी के लिये करना
चाहिए। प्रजापति का पुनः होय "प्रजा पति" इत्यादि के द्वारा बताया
गया है ॥४॥ "नमोऽस्तु सर्वेण्णः" इत्यादि मान्न सो वा उदाहृत
किया
गया है । "एप ब्रह्माय ऋत्विज्य" इत्यादि मन्त्र को ब्रह्मा के विषय में
प्रयुक्त करना चाहिए। विनायक का 'घानूनम्' - इत्यादि मात्र है।
जिसको युध लोगों ने कहा है । जात वेदा के लिये 'मुन थाम्" इत्यादि
दुर्गामना कहा जाता है। मालिप्रलय रेतस" इत्यादि म माथ
पा उदाहत किया गया है । "प्राणा शिशु महो नाग" हरयाहि मन
मशिनी कुमारों के लिये कहा जाता है। इस परमात् जो पूर्णाहुति हो
हो जाने वह 'मूनि दिव" इस्पादि मनन के द्वारा ही अभिपारित करानी
पाहिए ॥४५,४६, १७, ४८॥

! थिव चतुर्दशी व्रत कयन ४४-शिव चतुर्दशी व्रत कथन भगवन् ! भूतभव्येश ! तथान्यदपि यच्छ तम् । भुक्तिमुक्तिफलायाल तत्पुनर्वक्तुमहसि ॥१ एत्रमुत्तोऽन्नवीच्छम्भुरय वाड मयपारगः । मत्समस्तपसा ब्रह्मन् ! पुराणध्रुतिविस्तरैः ॥२ धर्मोऽय वृपस्पेण नन्दीनाम गणाधिपः । धर्मान् माहेश्वरान् वक्ष्यत्यत: प्रभृतिनारद ? ॥३ शृणुप्वावहितोब्रह्मन् ! वक्ष्येमाहेश्वर व्रतम् । त्रिपुलोकेषुवित्यात नाम्नाशिवचतुर्दशी ॥४ मार्गशीर्ष त्रयोदश्या सितायामेकभोजनः । प्रार्थयेद्देवदेवेश ! त्वामह शरण गतः ।।५ चतुर्दश्या निगहारः सम्पगभ्यच्यं शङ्करम् । सुववृपम दत्त्वा भोक्ष्यामि च परेऽहनि ॥६ एव नियमकृत् स्तुत्वा प्रातस्त्थाय मानव. । कृतस्नानअप. पश्चादुमया सह शङ्करम् ॥ पूजगेवमले. शुगंन्धमाल्यानुलेपनः ॥७॥ देवर्षि यो नारदजी ने कहा-हे भगवन् ! हे भूत भश्य के ईश ! बापरे मुखारविन्द से अन्य जो भी कुछ श्रवण रिया है वह भुक्ति और मुक्ति दोनों के फल प्राप्त करने के लिये पर्याप्त है उमे पुन. आप कहने रे योग्य होते हैं ॥१॥ इस प्रकार से जब भगवान् शम्भु से कहा गया तो उन्होंने कहा था कि यह हे ब्रह्मान् ! पुराण और श्रुति के विस्तारो से सपा तपश्चर्या से दार मय का पारगानी मेरे ही समान है । है नारद ! नन्दियों का गणाधिप वृष रूप से यह धर्म है जो पहा से आगे माहेर घम्मों को बतायेगा ॥६॥ मत्म्य मावान् ने कहा- हे ब्रह्मन् भय पार पूर्णतया माशान होर धवन कोप्रिए। हम गहवर तो विषय मे परेंगे। यह निव मतुवंशी रा न तीनों लोगों में परम ३२२ मत्स्यपुराम विख्यात है ॥४1 मार्गशीर्ष मास मे शुक्ल पक्ष मै त्रयोदशी के दिन केवल एक ही बार भोजन करे और प्रार्थना करनी चाहिये - हे देव देवेश ! मैं आपकी शरणागति मे सम्प्राप्त हो गया हूं ॥२॥ चतुर्दशी के दिन पूर्णतया प्राहार से रहित होकर शकर का भली भांति अम्यनि कर के हो मैं सुवर्ण का निर्मित वृषभ का दान करके दूसरे दिन भाजन करूंगा-ऐसा मन मे सकल्प करे ॥ ६॥ इस प्रकार से नियम करने वाले पुरुष को स्तवन करके शयन करना चाहिए और प्रभात वेला मे उठकर स्नान जप आदि सम्पूर्ण नत्यिक कर्मों का सुसम्पादन करके फिर जगज्जननी उमा के सहित भगवान् शकर का शुभ्र यमलो और गन्ध तथा माल्य एव अनुलेपन आदि उचित उपचागे से पूजन करना चाहिये ॥७॥ पादो नम शिवायेति शिरः सर्वात्मने नमः। ग्रिनेत्रायेति नेत्राणि ललाट हरये नमः ।। मुखभिन्दुमुखायेति क्रीय व्यायेतिकन्धराम् ! सद्योजाताय कणोतु वामदेवायवभुजौ ।।। अघोरहृदयाति हृदयञ्चाभिपूजयेत् । स्तनी तत्पुर पायेति तथेशानाय चोदरम् ।।१० पाय चानन्तधर्माय ज्ञानभूतायवे व टिम् । उरू चानन्तवैराग्यसिंहाय त्यभिपूजयेत् ॥११ अग तश्वर्यानाथाय जानुनीचाचंय दबुध.। प्रधानायन गोजथे गुल्पोम्योगात्मनेनमः ।.१५ ध्योमवेदात्मम्पायये शान् पृष्ठञ्चपूजयेत् । गमःपुष्टचनमस्तुप्टचे पावतीञ्चापिपूजयेत् ।।१३ ततस्तु वृषभ है ममुख्युम्भगमन्वितम् । मुवगमाल्याम्बरधर पञ्चरलसमन्वितम् ।। भक्ष्योनानाविधंयोग, ग्राहाणाय नियेदर्य त् ।।१४ शिव चतुर्दशी व्रत कथन ३२३ 1 'नमः शिवाय'- इससे चरणों का यजन करे। 'सर्वात्मने नमः' इस मन्त्र के द्वारा शिर का पूजन करे। "त्रिनेत्राय नम.-इससे नेत्रों का 'हरये नम:'- इससे ललाट का पूजन करना चाहिये । 'इन्दुमुखाय नम.'-इसके द्वाग मुख का- 'क्रीकण्ठाय नमः' इससे कन्धरा का- 'सघो जाताय नम'-इससे कानों वा 'वाम देवाय नमः-इस मात्र से भुवाओं का बर्चन करे। 'अघोर हृयाय नम.'-इससे हृदय का अभिपूजन चरना चाहिए । 'सन्युम्पाय नम-इससे स्तनो का यजन करे। 'ईशानाय नम:'-इमसे उदर का-'अनन्त धर्माय नम.' इससे पावों का 'शानभूताय नम.' इसके द्वारा कटिका-'अनन्त वैराग्य निहाय नमः'-इससे अरमो का अमिपूजन करना चाहिए । 'अनन्तश्वयं नाथाम नम, । इससे युध पुरुष को दोनों जानुओं का समर्थन करना चाहिए । 'प्रधानाय नम:'- इसके द्वारा जांघों ६६, व्योमात्मने नमः । इसका उच्चारण कर गुल्फों का, व्योमकेशात्मसम्माय नम' इससे केशो का और पृष्ठभाग का पूजन करे । 'पृष्ठयं नम:-नुहय नम:"-इन मन्त्रों म पार्वती का भी पूजन करना चाहिए । इसके अनन्तर वृक्षम का यनन करे त्या मुवणं निर्मित कुम्भ को जन से पूर्ण कर अवल माल्य और अम्बर को धारण करने वाला करके पन्च ग्लो से युक्त रफ ज्या अनेक प्रकार के भक्ष्य पदापों से समन्वित करके ब्राह्मण के लिये दान देना चाहिए ।।८, ६। ॥१०, ११, १२, १३, १४॥ ततोविप्रान् समाहूय तपंर्यद्भक्तितः शुभान् । पृषदाज्यञ्च सप्राश्य स्वपेद्भूमावुदह मुखः ॥१५ पञ्चदश्याततःपूज्य विप्रान भुञ्जीतयाग्यत.। तद्वत् कृष्णचतुर्दश्यामैतन् मर्वममाचरेत् ॥१६ चतुर्दशीषु सर्वामु कुर्यात् पूर्ववदर्चनम् । यतुमासे विशेषाः स्युस्तान्निबोधनमादिह ॥१७ मागशीपादिमासेषु अमादेतदुदीरयेत् ।

मत्स्यपुराण शङ्कराय नमस्तेऽतु नमस्ते करवीरक ! |१८ न्यम्बकाय नमस्तेऽस्तु महेश्वरमतः परम् । नमस्तेऽस्तु महादेव ! स्थाणवेच ततः परम् ।।१६ नम पशुपते नाथ ! नमस्ते शम्भवे पुनः। नमस्ते परमानन्द । नमः सोमाद्धधारिणे ॥२० नमो भीमाय इत्येव त्वामह शरण गतः । गोमूत्र गोमय क्षीर दधिसपि कुशोदकम् ।।२१ पञ्चगव्य ततोविल्व कर्पूरश्चागुरु यवाः । तिला कृष्णाश्च विधिवत्प्राशन क्रमशःस्मृतम् ।। प्रतमास चतुर्दश्योरेकैक प्राशन स्मृतम् ॥२२॥ मन्दारमालतीभिश्च तथा धत्तूरकरपि । सिन्दुवाररशोकश्च मल्लिकामिश्च पाटलैः ॥२३ अपप्प. कदम्बैश्च शतपदा तथोत्पलं. । एवं केन चतुर्दश्योरचयत्पावतीपतिम् ॥२४ फल साम माहात्म्य कथन प्राम बस्ति होदे । भीम लिए नमस्कार है-इस प्रकार म कहकर मन्नु में प्रार्थना करे कि मैं आपकी मरणागति में प्राप्त हो गया है। गौम्य-गोमय-झीर-दक्षि-घृत-कुशोदक-पजपन्य- विस–कर्पूर-अपुरु-यव-कृष्ण उिन इनका विधिवद कम स प्राश्न कहा गया है। प्रति माम में दोनों चतुर्दशियो में एक-एक का प्राशन बताया गया है ,२०,२१ २॥ मन्दार-मारती-धत र-सिन्धुवार यशोक-मन्तिका-पाटस-अर्क पुष्य-कदम्ब-पत्रपत्री र पुप-उत्सर-इन पुनों में में क्रमश: एक एक के द्वारा दोनो चतुर्दगियों में पार्वती के स्वामी रा वर्जन करना चाहिए ।।२६,०४॥ ४५-फल त्याग माहात्म्य कथन फ्लत्यागम्य माहात्म्य यद्भवैच्छणु नारद ।। यदचय पर लोक सर्वकामपनप्रदम् ।।। मार्गशो शुभ मानि तृतीयाया ग्ने ! बनम् । द्वादश्यामयवाप्टमा चतुर्दश्यामथापि वा। धारभेच्छुक्लपक्षस्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम् ॥२॥ यन्येप्यपि हि म सेपु पुण्य षु मुनिसत्तम !। सदन्निरमायतेन भोजयक्तितोद्विजान् । ३ अष्टादशाना धान्यानमवद्य फलमूलवः। वजयदन्दमेकन्तु हने औषधवारणम् ।। सदृप वान्चन मद्र धम्मराजन्च कारवेद ॥४॥ कूष्माण्ड मानुलिङ्गन दातारमनमनथा। साम्राम्रातापित्यानि लिङ्गमयवालम्॥५ श्रीप लाश्वत्यदरजम्बीर वदलीपनम् । काश्मरन्दाहिम यस्तया कालघोडानिपोश ॥६ ३ मत्स्यपुराण मूलकामलकं जम्बूतिन्तिड़ीकरमदकम् । कङ्काललाकतुण्डोरकरीर कुटज शमो १७ नन्दिकेश्वर ने वहा हे नारद ! फल के त्याग करने का जो माहात्म्य होता है उसका श्रवण करो। जो लोक मे परम अक्षय होता है और सब कामो के फल का प्रदान करने वाला है |॥ १॥ हे मुने ! यह मार्गशीर्ष शुम मास मे तृतीया-द्वादशी-अष्टमी अथवा चतुर्दशी तिथि में होता है। ब्राह्मण वाचन करके शुक्ल पक्ष में इसका समारम्म करना चाहिए ।। २ ।। हे मुनिसत्तम । अन्य पुण्य मासो में भी दक्षिणा के सहित यथा शक्ति पायस से द्विजो को भोजन कराना चाहिए ॥ ३॥ औषध के कारण के बिना अठारह धान्यो के अवघता का वर्जन कर देना चाहिए और एक वर्ष तक फल मूलो से रहे । वृप के सहित सुवर्ण का रुद्र और धर्मराज निर्मित करावे ॥ ४॥ कूष्माण्ड - मातुलिङ्ग-वकि- आम्रातक पित्थ-लिङ्ग--आतुक-श्रीफल-अश्वत्थ--वदर-जाम्बार- कदली फल-काश्मर दाडिम इन सोलह को शक्ति पूर्वक कलधौत (सुवर्ण) के करावे ।। ५, ६ || मूली-आवला जम्बू-तिन्तड़ी-करमर्दक-कोल- एलाक-तुण्डीर-करीर-कुट न-शमी-~और दुम्बद- मालिकेर-द्राक्षा- दोनो वृहती इन षोडश फलों को शक्ति के अनुसार रौप्य अथात् चाँदी से निर्मित करावे ॥ औदुम्बरं नालिकेर द्राक्षाथ वृहतोद्वयम् । रोप्यानि कारयेच्छवत्या फलानीमानिषाड़श ॥ ताम्र तालफ्ल कुर्यादगस्तिफलमेव च । पिण्डारमाश्मय्यफल तथा सूरणवन्दवम् ॥६ रक्तालुकाकादकञ्च कनकावञ्च चिाभटम् । चित्रवल्लीफल तद्वत्कूटशाल्मलिजम्फलम् ।।१० आम्रनिष्पावमधुकबटमुद्गपटोलकम् । ताम्राणि पोदशतानि कारयेच्छविततोनर. ॥११ उदवु म्मद्वयबुद्धिान्योपरि सवस्त्रकम् ।

फरत्याग माहात्म्य धन ततश्च कारमय्या यथोपरि सुवाससौ ।।१२ भक्ष्यपात्रत्रयोपेत यमरद्रवृपान्वितम् । धेन्वा सहैव शान्ताय विप्रायाथ कुटुम्बिने । सपत्नीकाय सपूज्य पुण्यऽह्नि विनिवेदयत् ।।१३ ताल फल और प्रगस्ति फरको ताम्र से निर्मित करावे । पिण्डार काश्मयं फल-सूरण फन्द-रक्तालु वन्द-वनकाल-चिमिट दिवल्ली फल-इसी भांति कूटशाल्मलिज फल-अम्न निष्पाव-मधुव- घट-मुदा-पटोलक इन सोलह को मनुष्य के द्वारा शक्ति पूर्वक ताम् के निर्मित कराना चाहिये ॥८,६,१,११॥ धान्य के ऊपर दो जल से पूर्ण कुम्भों को वस्त्र के सहित स्थपना परे । इसके अन तर सुन्दर पस्त्रों से समन्वित शय्या ऊपर करावे ॥१२॥ तीन भक्ष्य पात्रो से उसे सयुत करे भोर यम-रुद्र तया वृप से सयुक्त करे तय, धेनु वे सहित किसी परम शन्त स्वभाव वाने कुटुम्बा पत्नी के सहित विप्र का मसी भांति अचन करके किसी भी पुष्प दिवस म उसको ये सब विनिवेदित कर देना पाहिए ॥१॥ यथा फलेषु सर्वेषु वसन्त्यमरकोटय । तथा सर्वपलत्यागवताद्भक्ति शिवेऽस्तु मे ॥१४ यथा शिवच धम्मच सदानन्तफ्लप्रद्रो। ता तफ्लदानेन तो स्याता मे वरप्रदौ ॥१५ यथा पलानन्यनन्तानि शिवभक्तपु सवदा। सथानन्तपलावाप्निरम्नु जन्मनि जन्मनि ॥१६ यया भेदनपश्यामि शिवविष्ण्वापद्मजान् । तथा ममास्तु विश्वात्माराइर शङ्कर.सदा । १७ इति दत्त्वा च तत्सर्वमलकृत्य च भूपणं । सातिश्चच्छयन दद्यात्सार्वोपस्वरमंयुतम् । १. अशाप्नु पनान्येव ययोक्तानि विधानत ।

मस्त्यपुराण तर कुम्भसयुक्तौ शिवधमौ च काञ्चनौ ॥१ निसाय दत्त्वा भुजीत वाग्यतस्तैलवजितम् । अन्यान्यपि यथा शवस्या भोजयेच्छक्तितो द्विजान ॥ प्रकार से सब फलों म अमरो की कोटिया निवास किया कर उसी भांति सब फलो के त्याग द्रतो से मेरी भगवान् शिव में मला हो ॥१४॥ जिस तरह से भगवान शिव और धम्मं सदा अनन्त मोके परान करने वाले हैं सो युक्त फलदान के द्वारा वे दोनो मुझे परसा करने वाले होवे ॥१५ । जिस मॉनि शिव के भक्तो मे सर्वदा मा फर होते हैं उसी तरह से मुझे जन्म - जन्म मे अनन्त फलो की रित होने ॥१६॥ जिस रीति से शिव विष्णु सूय को नहीं देखता हू अर्थात् इनमे कुछ भी भेद भाव नहीं समझता हूँ उसी पकार से मेरे लिए विश्वात्मा शङ्कर सदा शङ्कर हावे अर्थात कल्याण- कारी होगे ॥१७॥ यह कहकर वह सब भूषणो से समलकृत करके दान मरे और शक्ति हो तो विधान से प्योत्तम फलो का ही दान करे तथा का से रानाशिव पोर म कञ्चन से निर्मित करावे । विप्र को दान कर मोर प्रत पूर्वके तेन से रहित भोजन करे। अपनी अनुसार और दूसरे भी जो और ब्रह्मा रामा

मादित्यवार 43 क्यन
तदाराध्य पुमान् विष प्राप्नोतिकुशल सदा।
उस्मादादित्यवारेण सदा नक्ताशनोमवेत् ।।३
पदा हस्तेन मयुक्तमादित्यस्य च वासरम् ।
तदा शनिदिने कुर्यादेकभुक्न विमत्सरः ॥४
नक्तमादित्यवारेण भोजयित्वा द्विजोत्तमान् ।
पत्रंदिवासयुक्त रक्तचन्दनपङ्कजम ॥५
विलिस्य विन्यसेत्सूर्य नमस्कारेग पूर्वनः ।
दिवाकर तथाग्नेय विवस्वनमतः परम् ॥६
भगन्तु नैते देव वरण पश्चिमे दले ।
महेन्द्रमनिले तद्वदादित्यञ्च तयोत्तरे ।।७
देपि नारद जी ने कहा-हे नन्दीश । जो भी पुरुषो को आगेग्य
के करले वाला हो और जो अनन फलो वा प्रदान करने वाला हो तश
जो मनुष्यों को शान्ति के लिये हो उसी व्रत को कृपा पर पहिए ।
नन्दिकेश्वर ने कहा-नो विश्वात्मा का ब्रह्म सनातन परम धाम
है पद सूयं-अग्नि और चन्द्र के रूप से इस जगत् मे तीन प्रकार मा
स्थित है । है विप्र ! उसकी माराधना करवे पुरप मदा कुशल को सप्त
किया करता है । इसलिये सदा आदित्य के वार के दिन अर्थात् रविवार
को रात्रि में ही अपना वाला होना चाहिए ॥२, ३।। जिस समय मे
हस्त से युक्त मूर्य का वार होवे उम समय में शनिशर क दिन मामरता
से राहत रहकर एक बार ही भोजन करना चाहिए ॥१॥ रविवार के
दिन में राधिके समय में विमेको भोजन वरार पत्रो में रक्त चन्दन
के पद से बारह से मयुक्त लिमार मूर्य का विन्याम करे नमार से
पूर्व में दिवार को विन्यस्त करना चाहिए "दिवाकराय नम.'- यह
वारण करते हा हो दायाम करे। 57 रान माग्नेय दिशा में
विशाम् को-नस में भगबो-पश्चिम टल में वरण देवी-
पनिरोग में मदद को तथा उमर में उत्तर दिशा में आदिश्य
रोदियरना चाहिए । ६
.॥

३३०
मत्स्य-पुराण
शान्तम शानभागे तु नमस्कारेणविन्यसेत् ।
कणिका पूर्वपत्रे तु सूर्यस्यतुरगात्न्यसेत् ।
दक्षिणेऽयमनामान मार्तण्ड पश्चिमे दले।
उत्तरे तु रवि देय कणिकायाञ्च भास्करम् ॥६
रक्तपुष्पोदकेनाध्य सतिलारणचन्दनम् ।
तस्मिन् पद्म ततो दद्यादिम मन्त्रमुदीरयेत् ।।१०
कालात्मा सवभूतात्मावेदात्मा विश्वतोमुख ।
यस्मादग्नीन्दरूपस्त्वमत पहिदिवाकर ।।११
अग्निमीले नमस्तुभ्यमिषेत्वार्जेचभास्कर ।
अग्न आयाहि वरद । नमस्तेज्योतिषाम्पते । ॥१२
अध्य दत्त्वा विसृज्याथनिशितलविवजितम् ॥१३
ईशान दिशा के भाग की ओर शान्त को नमस्कार के सहित
विन्यस्त करना चाहिए । कणिका के पूर्व पत्र मे सूय्य देव के प्रश्वो का
विन्यास करना चाहिय ।।८। दक्षिण मे अर्थमान नाम वाले का तथा
पश्चिम दल म मार्तण्ड का, उत्तर मे रवि देवका और कणिका मे भास्कर
का न्यास करके रक्त ष्षो के सहित जल से जिसमे तिल, अरुण चदन
भी हो उस पद्म मे निम्न मन्त्र का उच्चारण करत हुए अध्यं देना
चाहिए ।।८, ६, ७॥ वह मन यह है-'हे दिवाकर' आप काल की
आत्मा हैं या क ल स्वरूप ही है तथा समस्त भूतो क आत्मा है- वेदो
की आत्मा और आम विश्वतामुख है क्योकि आप अग्नि इन्द्र रूप वाले
हैं अतएव आर मेरी रक्षा करो॥१३॥ अग्निमीले आपके लिये नमस्कार
है । हे भासर । इत्योजें आपके लिये प्रणाम है । हे वरद ! आप यहाँ
पर पधारिये । हे ज्योतियों के स्वामिन् ! आपके लिये प्रणाम समर्पित
है । इस प्रकार से मूर्य देव को अप्प देवे और फिर विसजन करके रात्रि
म तैलीय पदार्थों स रहित भाजन करना चाहिये ।।१२, १३॥

विभूति द्वादशी व्रत कथन
.
४७-विभूति द्वादशी व्रत कथन
श्रणु नारद ! वक्ष्यामि विष्णोर्वतमनुत्तमम् ।
विभूतिद्वादशी नाम सर्वदेवनमस्कृतम्
कातिके चरवंशासे मागतो च फाल्गुने ॥१
आपाढे वा दशम्यान्तु शुल्कायालघुभुइनरः ।
कृत्वासायन्तनीसन्ध्या गृणीयान्नियमवुध IR
एकादश्या निराहारःसमभ्यर्च जनार्दनम् ।
द्वादश्याद्विजसयुक्तः करिष्ये मोजन विभो ! ॥३
तदविघ्नेन मे यातु सफल स्य- च केशवा ।
नमोनागयणायेति वा यञ्च स्वपता निशि ॥४
तत: प्रभात उत्यायसावित्यष्टशतजपेत् ।
पूजयेत् पुण्डरीकाक्ष शुलमाल्यानुलेपनं. ५
विभूतयेनम.पादावशोकायच जानुनी ।
नम शिवायेत्यूमच विश्वमत ! नम. कटिम् ॥३
कन्दर्पायनतामढ़ फल मारायणायच ।
दामोदरायत्युदर वासुदेवाय च स्तनो ॥७
नन्दिर प्रमु । कहा है न रद ! आप प्रवण कीजिए । अब
हम भगवान् विष्णु का सर्वोत्तम दर के विषय में वर्णन कर रहे हैं । इस
वन का शुभ नाम विभूति द्वादशी है और यह प्रत ऐमा उत्तम है कि
सभी देवगणों के द्वारा बन्यमान होता है | इस यन को कई मासो में
बारम्म किया जा साता है । कात्तिा-व-वंशाप या फल्गुन मास मे
परे अपवा आपाद माम मे करे। जब भी इमरा समायर परे उम
समय गुरुप पारो छामी दामो म अत्यन्त ही स्वल्प हसरा भोजन
पाना चाहिए। मनुश्य को मो करना चाहे उमे सायनालीन मासे
NET सेना ॥ सा 'नयर को ग्रहग रना चाहिये ।।

३३२ मन्स्यपुराण एकादशी के दिन बिल्कुल भी आहार न करके भगवान् जनार्दन का अभ्य- र्चन करूंगा और द्वादशी के दिन दिजो से सयुक्त होकर ही हे विभो ! मैं फिर भोजन करूंगा--इस प्रकार सकल्प करके नियम ग्रहण करे और फिर प्रार्थना करे हे केशव । सो यह व्रत मेरा निविघ्न सफल हो जावे । इसके पश्चात् "नमो नारायणाय' अर्थात् नारायण प्रभु के लिये नमस्कार है-इसका मुख से उच्च रण करके रात्रि मे शयन करे ॥३, ४॥ इसके उपरान्त प्रमात वेला मे उठकर भगवती सावित्री का अष्टोत्तर शन जाय करना चाहिये और भगवान् पुण्डरीकाक्ष का शुक्ल मात्य एव अनुलेपन भादि समुचित उपचारो से पूजन करना चाहिये ॥५॥ 'विभूतमे नम'- इस मन्त्र का उच्चारण कर चरणो का यजन करे "अशोकाय नम"- इससे जानुभो का-"नम. शिवाय"-इसके द्वारा अरुओ का दैविध्वमुर्ते । तुम्य नम ' इससे कटिका अर्जन करना चाहिए ।।६॥ "वन्दपाय मम.": इससे मेढूवा तथा 'नारायणाय नम." इसके द्वारा फल का पूजन करे। 'नमो दामोदराय"-इस मन्त्र से उदर वा-व सुदेवाय नम."-इससे दोनो स्तनो का अर्चन करना चाहिए ॥७॥ माधवायेत्युरोविष्णो कण्ठस्तकण्ठिने नमः । श्रीधरायमुखकेशान् वेशव,येतिनारद ! 12 पृष्ठ शाङ्ग धरायेतु श्रवणा वरदाय में स्वनाम्ना शहरवासिगदाजलजपाणये ॥६ शिरः सर्वात्मने ब्रह्मन् । नमइत्यभिपूजयेत् ।। अल्पवित्तो यथाशक्त्या स्तोकस्तोक समाचरेत् ।१० य.पाप्यतीवनि.स्य स्याक्तिमानमाधवप्रति । पृषार्थविधानेन स युवत्सरद्वयम् ॥११ अनेन विधिना यस्तुविभूतिद्वादातम् । पुर्यात पापविनिमुक्त पितृणां सारयन्तम् ॥१२ जन्गनां शतसादा न शपिपलमा गये।

विभूति द्वादशी व्रत क्यन
करके
न च व्याधि वेतस्य न दारिदन बन्धनम् ।।१३
वैष्णवोवाथ शवोवा भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥१४
यावयुगसहस्राणां शतमप्टोत्तरं भवेत् ।
तावतस्वर्गे वसेद्ब्रह्मन् ! भूपतिश्च पुनर्भवेत् ॥१५
"माधवाय नम:-इम मन्त्र के द्वारा विष्णु के उरः स्वन का
"उन्नष्ठिते नमः' इससे कष्ठ का- 'श्रीधराय नमः' इसका उच्चारण
'मुन का और हे नारद! "केशवाय नमः"-इसके द्वारा केशों का
अन करे 'पाङ्गघराय नमः" इस मन्त्र को बोलकर पृष्ठ भाग
का, 'परदाय नमः' इसने यवणों का पूजन करना चाहिये । अपने नाम से
'म चा असि गता जतज पाणये 'सन्मिने नम.' इससे हे ब्रह्मन् ! प्रभु
के गिर का अर्जन करना चाहिर Mall जिसके पास बहुत ही थोडा सा
धन है उपरी थोडा-पोडा हो दान आदि से इस दतके अङ्गो का समादन
रना चाहिए योर अपनी शक्ति के अनुसार ही करे ।।१०। जो अत्यन्त
ही धनहीन हो और जिसके पास कुछ भो सघन न हों वह भी निधन
इसको कर माता है। उनै तो केवर भगवान् माधव के प्रति भक्ति
होनी चाहिये और वह केवर पुनों के द्वारा ही अन्न का विधान करके
दो वर्ष पूर्ण करे ||११|| इस विधि से जो मो कोई इस विभूनि द्वादशी
न किंग करता है वह समस्त पापो से निमुक्त होकर अपने शत.
पारितगणों का उद्धार कर दिया करता है ।।१२।। सो सहन उन्मों
कमी उमको कमी भी शो का फल नहीं होता है और उसे कोई भी
माधि नहीं होती है। न कभी दरिद्रता होती है और न साधन ही हुआ
करता है । १३॥ यह जन्म-जम में या तो वायद होता है या शिक्षका
भगत और हो हमा करता है ।।१४|| हे दमन् ! इस 11 का वन का
सामान्य है जब तक एक महान युगो को पदोना न सहरा सम्पूर्ण
नहीं होती है तब तक वह स्वां में निवास ग्यिा करता है और यहा पर
यहा सम्म महत पर भूपति होता है ॥१५॥

मस्यपुगण ४८-स्नान महत्व वर्णनम् नमल्य भावशुद्धिश्च विना स्नान नधिद्यते । तम्मान्मनोविशुद्धयर्थ स्नानमादौ विधीयते ॥१ अनुद्ध तैरुद्ध तैर्वा जल स्नान समाचरेत् । तीथञ्च कल्पयेद्विद्वान्मन्त्रण मन्त्रवित् ।। नमो नारायणायेति मूलमन्त्र उदाहृत ॥॥ दर्भपाणिस्नु विधिना आचान्त प्रयत शुचि । चतुहम्तसमायुक्त चतुरस्र समन्तत ॥ प्रकल्प्यावाहयेद्गङ्गामेभिमन्नं विचक्षण 1॥३॥ विष्णो पादप्रसूतासिवैष्णवाविष्णुदेवता । वाहिनस्त्वेनसस्तस्मादाजन्ममरणान्तिकात् ॥४ तिस्र गोटयाऽद्ध काटीचतीर्थानावायुरब्रवीत् । दिविभूम्यन्तरिक्षेचतानितेसन्तुजाह्नवि ।।५ नन्दिनीत्येव ते नाम देवपुनलिनीति च । दक्षा पृथ्वी चविहगा विश्वमायाऽमृताशिवा ॥६ विद्याधरी सुप्रशान्ता तथा विश्वप्रसादिनी । क्षेमा च जाह्नवीचव शान्ताशान्तिप्रदायिनी ॥७ एतानि पुण्यनामानि स्नानकाले प्रवीतयेत् । भवेरसन्निहिता तय गङ्गा त्रिपथगामिनी ।। भगवान् नदिनेश्वर ने पदा-स्नान के किये बिना निमलता और भावों की पुष्टि नहीं हुआ करती है। इसलिये मन को रिदिने सिय सयम आदि में मानव को स्नान कराा पाहिए ॥१॥ जस पातो परमादि स उदपन यि गय हों या सिौ जलाशय अनुदार रण हो उही स स्ना रामापरण गरे । विद्वान् पुष को जाकिमों पूण जाता है उस मूर मारा उम्ही जोमतीय पीला स्नान महत्व वर्णन ३३५ कर लेनी चाहिये ॥२॥ "नमो नारायणाय" यही मूल मन्त्र बताया गया है । विचक्षण को हाय मे दर्म का ग्रहण करपे विधि पूर्वक आचान्त होकर परम प्रयत और गुचि हो जाना चाहिये । चार हाय के प्रमाण से समायुक्त और सभी ओर से चौकोर स्थल की प्रकल्पना करके नीचे दिये हुए मन्त्रा में भागीरथी गङ्गा का आवाहन करना चाहिए ॥३॥ आवाहन मन्त्र ये हैं-है नव ! आप भगवान् विष्णु के चरणों से प्रसूत हुई हैं। आप परम वैष्णवो पौर विष्णु के हो देवता वाली हैं। इमसे मेरे जन्म मरणान्तिक पाप से मेरी रसा कीजिए || गवान् वयुदेव ने कहा है कि आप साढे तीन करोड तीर्थों का निवास स्थल हैं। विलोक - भूमि ओर अन्तरिक्ष में वे सब पार में रहते हैं ॥।॥ है देगि ! आपका देवो में नन्दिनी और नलिनी यह नाम है । आप अन्य भी बहुत से परम पुण्य मय शुम नाम है-जैसे-दक्षा-पृथ्वी-विश्वकाया-अमृता-शिवा- विद्याधरी-मुप्रशान्ता-विश्व प्रमादिनी-क्षेमा-शान्ता-शान्ति प्रदायिनी योर जाह्नवी हैं । इन परम पुण्यमय नामो का स्नान के समय में कीर्तन करना चाहिए । इस कीतन के करने से यहीं पर भागीरथी गङ्गा जो विपयों में गमन करने वाली है बर्थान् स्वर्ग-भूमि बोर पाताल तल मे जाने व नौ है स्वय सन्निहित हो जाया करती हैं ।।६, ७, ८॥ सप्तवारामिजप्तेन वरसपुटयोजित । मूनि कुर्याज्जल भूपस्निचतुः पञ्चसप्तकम् ।। स्नान कुन्मृिदा तद्वदाम व्य तु विधानत या अश्वक्रान्त रयाने विष्णुकान्ते वसुन्धरे । मृत्तिके ! हर मे पाप यन्मयादृप्नवृतम् ॥१० उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतवाहुना । नमम्ने सर्वाना प्रभवारणि सुव्रते ॥११ एव स्नात्वा तत पश्चादाचम्य च विधाननः । उत्याय नाससी गुवले गुहेतु परिधायद ।।

मत्स्यपुराण - ततस्तु तपंण कुर्यात्न लोक्याप्यायनाय वै ॥१२ देवायक्षास्तथानागागन्धर्वाप्सरस. सुराः । क्रूरा सर्पा सुपर्णाश्चतरवोजम्बुका खगाः ॥१३ वाय्वाधारा जलाधारास्तथैवाकाशगामिन । निराधाराश्च ये जीवा येतु धर्मरतास्तथा ॥१४ तेषामाप्यायनायतद्दीयते सलिल मया । कृतोपवीती देवेभ्यो निवीतो च भवेत्तत. ॥१५ हाथो के सम्पुट मे जल को योजित करके स त वार अभिजाप करे और फिर मूर्द्धा मे जल को डाले। फिर तीन-चार-पांच और सात बार स्नान करना चाहिए। इसी भांति विधान के साट आमन्त्रित करके मृत्तिका से स्नान करे । अभिमन्त्रित करने का मन्त्र यह है-हे मृत्तिके ! आप अश्वों के खुरो से क्रान्त होने वाली है-रथो के चत्रो के द्वारा भी क्रान्त होती हैं । आप विष्णु भगवान् के द्वारा क्रान्त हैं । हे वसु-घरे ! जो भी मैंने दुष्कृत किये हो उस सम्पूर्ण पाप का आप सहरण कर दो। ॥६, १०॥ हे सुव्रते ! शत वाहुप्रो वाले वराह श्रीकृष्ण मे आपका उद्धरण किया है अर्थात् आपको उठा लिया है। समस्त लोको के प्रभव (जन्म ) के लिये अरणी के समान विनाश करने वाली श्राप हैं । तात्पर्य यह है कि जन्म-मरण के प्रापागमन को छुडाकर मोक्ष प्रदान किया करती हैं ऐसी प्रापको सवा मे मेरा नमस्कार अर्पित है । इस प्रकार से स्नान करके पीछे विधिपूर्वक भाचमन करे मोर स्नान स उठकर फिर परम शुद्ध एव शुक्ल वस्त्रो को धारण करना चाहिए। इसके अन तर प्रलोक्य की सतृप्ति के लिये तर्पण करना चाहिए ॥११, १२।। देव- यक्ष-माग- गन्धर्व-अप्सराऐं - सुर-कर-सर्प--सुपर्ण-तरुगण- अम्बुर-सग-वायु वे आधार वाले प्राणी-जल का आश्रय ग्रहण करने धाले जीव-आकाश मे गमन करने वाले प्राणो और ऐसे जीव जिनका १६ भी आधार ही नहीं होता है तथा धम्म में रति रखने वाले जीव - ना मह व वर्णन ३३७ उन सबको तृप्ति के लिये मेरे द्वारा यह जल दिया जाता है। देवो के लिये कृतोपवीती होकर तर्पण करे और फिर निवीती हो आना चाहिए ॥१३, १४, १३॥ मनुष्यास्तपंयेद्भक्तया ब्रह्मपुत्रानृषीस्तथा । सनकश्च सनन्दश्च तृतीयश्च सनातनः ॥१६ कपितश्चारिश्चव वोढुः पञ्चशिखस्तथा। सर्वे ते तृप्तिमायान्तु महत्तेनाम्बुनासदा ।।१७ मरीचिमाङ्गरसं पुलस्त्यं पुलह ऋतुम् । प्रचेतसं वशिष्ठञ्च भृगुन्नारदमेव च ।। देवब्रह्म मपीन् सर्वास्तवैदक्षतोदकंः ॥१८ अपसव्यं ततः कृत्वा सव्य जान्वाच्च भूतले । अग्निप्वात्तास्तथा सौम्या हविष्मन्तस्तथोष्मपाः ॥ १६ सुकालिनो वहिपदस्तथान्ये वाज्यपाः पुनः। सन्तप्यं पितरो भक्तयासतिलोदकचन्दनः ।।२० यमाय धर्मराजाय मृत्यवे चान्तकाय च । वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च ।।२१ औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने। तृकोदराय चित्राय चित्रगुप्ताय वे नमः ।। दभपाणिस्तु विधिना पित न सन्तपंयेद् बुधः ॥२२॥ भक्ति की भावना से मनुष्यों का तर्पण परे-ब्रह्मा के पुची का मापियो का तर्पण करे। सनक-सनन्द और तीसरे सनातन, कपिल, मार, दोड, पञ्चशिखये सभी मेरे द्वारा प्रदत्त किये हुए जल से सदा प्ति प्राप्त परें ।।१६, १७॥ मरीचि मात्र, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, म. प्रचेता, वसिष्ठ, भृगु और नारद इन देवषि और वापि सयको सनों से मिधित जसो से तर्पण करना चाहिए ॥१८॥ इसके पाचात् सय रके सम्प जानु भूना में टक्कर अग्निवाता-वहिप-प्रय मत्स्यपुराण ३३८ प्राज्यप पितरो का भक्ति भाव से तिलोदक चन्दन के द्वारा भली भांति तर्पण करना चाहिए। फिर धर्मराज, मृत्यु, अन्नक, वैवस्वत, काल सर्वभूत क्षय-प्रोदुम्बर-पद्म-नील-परमेष्ठी-वृकोदर--चित्र और चित्रगुप्त के लिए नमस्कार है। डाम हाय मे ग्रहण करने वाले बुध पुरुष को विधि के साथ पितगणो का तपंण करना चाहिए ॥ १६, २, २१,२२॥ पित्रादीन्नामगोत्रेण तथा मातामहानपि । सन्तयं विधिना भक्तया इम मन्त्रमुदीरयेत् ॥२३ ये वान्धवा वान्धवेया येऽन्यजन्मनि वान्धवा । ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति ॥२१ ततश्चाचम्य विधिवदालिखेत्पद्ममग्रत । अक्षताभि सपुष्पाभि सजलारणचन्दनम् ॥ अयं दद्यात्प्रयत्नेन सूर्य्यनामानि कीतयेत् ॥२५॥ पिता आदि का नाम और गोत्र का उच्चारण करके तथा माता- मह आदि का भी नाम गोत्र कहकर विधि पूर्वक भली भांनि तर्पण करके भक्ति के साथ इस मन्त्र को उच्चारित करे 1 २३॥ जो मेरे बान्धव वान्धवेय हो तथा जो मेरे अन्य जन्म मे बान्धव रहे हो वे सब तस्ति को प्राप्त हो और वह भी सन्तृप्त हो ज वे जो मुझसे अर्थात् मेरे द्वारा दिरे हुए जल प्राप्त करने की इच्छा रखना हो ।। २४ । इसके पश्चात पाचमन करके विधिपूर्वक आगे पद्म का विलेख न करे । पुष्ो वे सहित अक्षतों मे अरुण चन्दन से समन्वित जल का अर्घ्य देना चाहिये तथा प्रयल सूर्य के नामों का कोर्शन करे ॥२५॥ नमस्ते विष्णुस्पाय नमो विष्णमुखाय वै । सह रश्मये नित्य नमस्ते सर्वतेजसे ॥२६ नमस्तेशिव ! सर्वेश ! नमस्तेसर्ववत्सल । जगत्स्वामिन्नमस्तेऽस्तु दिव्यचन्दनभूपित ॥२५ और

स्नान महय वर्णन
३३६
पद्मासन ! नमस्तेस्तु कुण्डलाङ्गदभूपित ।
नमस्ते सवलोकेश! जगत्सवं विवाघसे ॥२८
सुकृत दुष्कृत चंव सर्व पश्यमि सवंग ।
सत्यदेव ! नमस्तेऽस्तु प्रमीद मम भास्कर २८
दिवाकर ! नमस्तेऽन्तुप्रभाकर । नमोऽस्तुते ।
एवसूर्यनमस्कृत्यत्रि कृत्वाथप्रदक्षिणम् ।।
द्विजगा काञ्चन स्पृष्ट्वा ततो विष्णुह द्रजेत् ॥३०॥
विष्णु के रूप दाने मापक लिये नमस्कार है । विष्णुपुम यापरे
लिन प्रणाम है। सहसविणों वाले के लिए नमस्कार है । सवर तज
सम्र आपके लिये नमस्कार है 11२६।। ह शिव ! आपके लिये नमस्कार
है । हे सदर ! हे सद पर वात्मन्य रखने वाल | प्रापक लिये नमम्कार
।। है जगत् के स्वामिन् ! दिन्च चन्दन स भूपिन ! यापरी सेवा म
इमस्कार है । हे पद्मासन ! आपको प्रणाम है । हे कुण्डली और अङ्गदों
वरित ! अपको नमसार है। हे सब लोगो के ईग! आपकी सेवा
गाम है। बाप ही इम सम्पूर्ण जगन् वा विशेप वोधन दिया करते
बार ही मुकृत और दृप्कृत सबको है सर्वत्र गमन परने
गने ! देवा करते हैं। है सयदेव । हे भास्कर | आपकी सेवा में
गमगार है। आप मेरे कार प्रसन्न होइए । है दिवाकरदव ! आपको
समार है। प्रमार! भारी सवा में प्रशाम है । इस प्रशर 8
पूर्व को नमार र तीन बार प्रदक्षिणा करनी चाहिए। फिर सिी
दिर को तथा गौ का एवं काञ्चन वा स RE रि विष्णु गृह को
बाना पाहिए । यर्याद विष्णु भगवान् र मन्दिर मै गमन करे ।। २७॥
3
२८॥१०॥

३४० से है और वह नरों का किस प्रकार का है? वहां पर जो निवास करके स्नान किया करते हैं उनको क्या फल मिला करता है जो सर्वदा प्रयाग मत्यपुराण ४६-प्रयाग माहात्म्य वर्णनम् भगवन् ! श्रोतुमिच्छामिपु.कल्पेयथास्थितम् । ब्रह्मणादेवमुख्येनयथावत्कथितमुने । १ कथ प्रयागे गमनं न पाणां तत्र कीदृशम् । मृतान कागतिस्तग्रस्नातानातत्रकिम्फलम् ॥ ये वसन्ति प्रयागे तु ब्रूहि तेपां च कि फलम् ॥२॥ कथयिष्यामितेवत्स ! यच्छेष्ठंनत्रयत्फलम् । पुराहिसर्वविप्राणाकथ्यमानमयाश्रुतम् ॥ आप्रयागप्रतिष्ठानादापुराद्वासुकेहदात् । कम्वलाश्वतरो नागौ नागश्च बहुमूलकः॥३ एतत्प्रजापतेः क्षेत्र त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥४॥ तत्र स्नात्वा दिव यान्ति ये मृतास्ते पुनर्भवाः । ततो ब्रह्मादयो देवा रक्षा कुन्ति सङ्गता ।।५ अन्ये च बहवस्तीर्थाः सवपापहराः शुभाः । न शक्या कथितुराजन् ! बहुवर्षशतरपि ॥ सक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्य तु कीर्तनम् ॥६॥ पष्टिधंनुःसहस्राणि यानि रक्षन्ति जाह्नवीम् । यमुना रक्षति सदा सवितासप्तवाहनः ॥७ धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा- हे भगवन् ! पुरातन मे जो यथा स्थिन हो उसका मैं धवण करना चाहता हूँ । हे मुने ! देवो मे मुख्य ब्रह्माजी ने यथावत् कथन किया है ॥१॥ प्रयाग में गमन किस प्रकार मृत हो जाते हैं उनको क्या गति होती है और जो वहाँ पर पहुंच कर मे निवाम लिया वरते हैं उन क्या फर हुआ परता है ? ओ हमा ४१ प्रसार महात्म्य दर्मन पता है ? ॥२॥ मद्दपि प्रदर मावजी ने कहा-हे दम ! वहाँ पर वो भो छतम पल हा करता है उसको मैं आपको बसमाना । हिले प्राचीन समय में समन्त्र चित्रों का कम्पमान (रहा हुआ ) ने सिम किया है ॥३॥ प्रवास के प्रतिष्ठान से लेकर और दामुक्ति के उदरी पुर के पचन तक कम्बन और अम्वतर दो भाग हैं और दहालक ग है । यह ही प्रजातिका क्षेत्र है जो तीनों लोग मे विधुत है ॥३, ॥ वहां पर मनुब म्नान करके विमाफ क. चले जाया करते हैं और जिनकी वहाँ पर मृत्यु हो जाती है उनका पुनर्भव नहीं होता है । इसके पार में ब्रह्मा बादि देव सत्र सङ्ग होकर रक्षा दिया करते हैं ॥२॥ हे राजन् ! अग्य भी बहुत से तीर्थ है जो समस्त पारों के हररा करने कराने और परम सुन है। उन सदको कहा नहीं . सकता है चाहे नों ही दर्षों तक नगें न वर्णन कोई करता रहे । अब मैं मति समे में प्रयाग का कुछ माहाम्न कीतित कगा॥६॥जो साठ धनु सहन्न हैं वे जलवी को रक्षा किया करते है और सप्त वाह्न सवितादेव पना को रक्षाच्या करते हैं ।।। प्रयागत विटषेण सदा मिति वासवः। मण्डल रक्षति हरिदेवत: मह नगत. 15 त वट रक्षतिसदा शूलपाणिमहेस्बरः । स्थान रनन्ति वै देवा सर्वपापहर शुनम् ।। धर्मगावृतो लाग्नद गच्चति वसदम् । स्वल्पमल्लतर पाप यदा त स्यान्नराधिप । प्रयाग म्मरमाणम्य सर्वमापति मंझयम् ॥१. दानात्तस्य तोयंस्य नाम अट्रीत्तनादपि । मृतिका सम्मनादापि नर. पापात्प्रमुच्यते ।११ पञ्चकुण्डानि राजेन्द्र । तेषा मध्य तु जानवी। प्रयागन्य प्रवेगेनुपापनश्यदिनसमा १ ३४२ मस्पुराण योजनाना सहस्रपु गगायाः स्मरणान्नरः। अपि दुप्कृतका तु लभत परमागतिम् ।।१३ कोतनान्मुच्यते पापाद् द्वष्टवाभद्राणिपश्यति । अवगाह्यचपीत्वातुपुनात्यासप्तमङ्कलम् ॥१४ विशेषता के साथ वासव देव सदा प्रयाग की रक्षा करते हैं। उस सम्पूर्ण मण्डल की रक्षा देवो के साथ सङ्गत होकर भगवान हरि किया करते हैं ।। ८॥ उस वट की सदा शूलपाणि महेश्वर रक्षा करते हैं। समस्त पापो के हरण करने वाले परम शुभ स्थान की रक्षा देवगण किया करते हैं ।। ६।। अधर्म से लोक से आवृत हो उस पद के चला जाया करता है। हे नराधिप । जिस समय में स्वल्प और स्वल्पतर आपका पाप होता है तो वह जब भी प्रयाग का स्मरण पाप करेंगे उसी समय तुरन्त सब सक्षय को प्राप्त हो जायगा। प्रयाग के केवल स्मरण मात्र का ही इतना महान् फल होता है ।।१०।। उस महान तीर्थ के दर्शन से तथा उस तीथ के नाम का सङ्कीर्तन करने से भी एव वहा पर कवल मृतिका के लम्भन मात्र से भी मनुष्य पाप से मुक्त हो जाया करता है ॥११॥ हे राजेन्द्र | वहाँ पर पञ्चकुण्ड हैं उनके मध्य में जाह्नवी है। प्रयाग के अ दर प्रवेश करने पर उसी क्षण मे तुरन्त पापो का नाश हो जाया करत है। सहस्रो योजनो पर रहते हुए ही गङ्गा के स्मरण करने मे दुष्कृतो के करन वाला भी मनुष्य परम मद्गति की प्राप्ति किया करता है ॥ १२, १३ । गङ्गा के शुभ नाम का कीर्तन करने से पापो से मुक्त हो जाता है और दशन करक भद्रो का देखा करता है अर्थात् दशन से भल इयां दिखलाई देती हैं। अवगाहन करके तथा पान करके सात कुल तक का पवित्र कर दिया करता है ।।१४।। सत्यवादी जितक्रोधा अहिसायाव्यवस्थित । धर्मानुसारातत्वज्ञोगोब्राह्मणहितेर ॥१५ गगायमुनयोमध्येस्नानोमु येतपिल्विपात् ।

प्रयाग माहात्म्य वर्णन मनसाचि ननकानामाप्नोतिसुपुष्कलान् ॥१६ ततो गत्वा प्रयाग तु सर्वदेवाभिरक्षितम् । ब्रह्मचारी वसेन्मास पित न्देवाश्चतपयेत् ।। ईप्सितान् लभते कामान् यत्र यत्राभिजागते ।।१७।। तपनस्य सुता देवी त्रिपु लोक्पु विश्रुता । समागता महाभागा यमुना तत्रनिमगा।। तत्र सन्निहितो नित्य साक्षाद्देवो महेश्वर. ॥१८॥ दुष्प्राप्य मानुपं पुण्य प्रयागन्तु युधिष्ठिर । देवदानवगन्धर्वा ऋपय सिद्धचारणा ।। तदुपस्पृश्य राजेन्द्र ! स्वर्गलोकमुपासते ॥१॥ सत्य बोलने वाला-क्रोध को जीतने वाला-अहिंसा में व्यवस्थित- धर्म का अनुसरण करने वाला -तत्वों का ज्ञाता-गो और ब्राह्मणों में रति रखने वाला गङ्गा और यमुना के मध्य में स्नान दिया हुआ पुरुष किन्धिप से मुक्त हो जाया करता है । मन क द्वारा चिन्तन क्यि हुए कामनाओ को जो बहुत ही अधिक है प्राप्त क्यिा करता है ।।:५, १६॥ इसके अनन्तर प्रयाग में पहुँच कर बो मर देवों के द्वारा अभिरक्षित है, ब्रह्मवागे को एक मास पर्यन्न वहाँ पर निवास करना चाहिये । जहाँ- जहां पर अमिजान होता है ईप्सित कामों अर्थात मनोरफों को प्राप्त किया करता है ॥ १७ ॥ तपन अर्यात मूर्य को पुती ६वी तीनो लोको मे परम विध त हैं । वह मह भागा यमुना नदी पहा पर समागता हुई है। वहीं पर साक्षात् देव महेश्वर नित्य हो सन्निहित रहा करत है ॥१६॥ है युधिष्ठिर! मनुष्यों के द्वारा दुष्प्राप्य पुण्य वाला प्रयाग है दव-दानव • ग-ध-ऋपिगम-सिद और चारण हे राजेन्द्र ! उसका उप स्पर्शन करके स्वर्गलोक की उपासना किया करते हैं।। १५॥

मत्स्यपुराण
५०-मारतवर्ष वर्णन
यदिदं भारतवर्ष यस्मिन् स्वायम्भुवादयः ।
चतुर्दशव मनवः प्रजासगं ससजिरे १
एतद्वेदितुमिच्छामः सकशात्तव सुव्रत !
उत्तरश्रवण भूय: प्रव हि वदता वर !..
एतच्छ,त्वा ऋषीणा तु प्रायवील्लोमहर्षणिः ।
पौराणिकस्तदासत ! ऋपीणां भावितात्मनाम् ॥३
बुद्ध्या विचार्य बहुधा विमृश्य च पुन पुनः ।
तेभ्यस्तु कथयामास उत्तरश्रवण तदा ॥४
अथाह'वर्णयिष्यामि वर्षेऽस्मिन् भारते प्रजाः ।
भरणात्प्रजना व मनुभंरत उन्यते ॥५
निरुक्तवचनश्चैव वर्ष तद्भारत स्मृतम् ।
यत स्वगश्च मोक्षश्च मध्यमश्चापि हि स्मृतः ॥६
न खल्वन्यत्र माना भूमोकपविधि. स्मृतः ।
भारतस्यास्य वपस्य नवभेदान्निबोधत ||
ऋषिगण ने कहा-जो यह भारतवर्ष है जिसमे स्वायम्भुव
अादि मुनिगण अर्थात मनु नौदह ही हुए हैं जिन्होने प्रत्रामो के सर्ग की
रचना को थी ॥ १॥ हे सुन ! मैं आपके सकाश से यह जानना चाहता
हूँ। हे बोलने वालों में परमश्रेष्ठ! आप उत्तर प्रवण को पुनः बो लये
॥२॥ ऋपियो के इस वचन को सुनकर उस समय में लोम हपणि
पौराणिक सूनजी भविनाग्मा प्रपियो से कहा ॥३॥ बुद्धि से बहुत सार
विचार करके और पुन: पुन विमर्श करने उस समय में उनसे उत्तर
श्रवण को वह था || ४ ।। सूतजी ने कहा-इसके अनन्तर इस भारत'
वर्ष मे प्रजामो का मैं वर्णन करूगा। भरण करने से और प्रजनन करने
से मनु मरत इस नाम से कहा जाता है॥५॥ निरुत वचनो के द्वारा

भारतवर्ष वर्णन हो यह वर्ष भारत कहा गया है क्योंकि यहाँ स्वर्ग-मोश और मध्यम कहा गया है ॥६॥ अन्य किसी भी स्थान में भूमि में मनुष्यों की कम विधि नहीं कही गयी है। इस भारतवर्ष के नौ भेदों को समझ लो॥७॥ इन्द्रद्वीपः मरपच ताम्रपर्णी गमस्तिमा। नागद्वीपस्तथा सौम्योगन्धवम्त्वयवारण । ८ अय तु नवमम्तेपा द्वीप. सागरमवृत । योजनानां सहस्रन्तु द्वीपोऽय दक्षिणोत्तर. 15 आयतस्तु कुमारीतो गङ्गाया प्रवहावधिः । तिपगूद्ध्वातुविस्तीर्ण सहस्राणि दर्शव तु ॥१० द्वीपोरा पनिविष्ठोऽय म्लेच्छरन्तेषु मवंशः । यवनाश्च किनाश्च तस्यान्ते पूरिचमे ॥११ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये मद्राश्च भागश । इज्यायतवणिज्जादि वतयन्तो व्यवस्थिता ॥१२ तेषां मव्यवहारोऽयं वर्तनन्तु परस्परम् । धर्मार्थकाममयुको वर्णानान्नु स्वाममु १३ सकपपञ्चमानान्तु आप्रमाणा यथाविधि। इह स्वर्गापार्थ प्रवृत्तिरिह मानुषे ।।१४ इन्द्रद्वीप-मर-ताम्ररण-गमम्निमान्-नागद्वीप-सौम्य गन्धवं-बामण-यह उनपे सागर में सवृन नवम दी है। यह दीप दक्षि- पोतर एक महन्न योजनों वाला है। इसका आयतन का वृमारी में गङ्गा के प्रवह की अवधि है । तियर कोर में दश सहन विस्तार में युक्त है 11,१॥द्वार यह उअनिविप है और सब और अन्न भागो में मठों गिरा हुआ है। यवन और fla उसके अन्त में पूर्व मम्यगण पश्चिम में हैं। मध्य में भाग से ब्रह्मण--क्षत्रिय वैश्य और शूद्र है । इज्या युत वाणिज्य आदि का वतन करते हुए व्यवस्थित हैं ।।११, १२॥ उनका यह सभ्यवहार है और परस्पर मे पतन हैं । वर्गों का अपने कम्मों मे धम्म-अप और काम से सयुक्त है। सकल्प पञ्चमो आश्रमो को यहाँ पर यथाविधि स्वगं और अपवर्ग के लिये मानुप जीवन मे प्रवृत्ति होती है ।।१३, ४॥ यस्त्वय मानवो द्वीपस्तियंग्यामः प्रकीत्तितः। य एन जयते कृत्स्न स सम्राडिति वीत्तितः । १५ अय लोक्स्तु वै सम्राड-तरिक्षजिता । स्वराठसौ स्मृतो लोक पुनर्वक्ष्यामि विस्तरात् ।।११ सप्त चास्मिन् महाव विश्रुता कुलपर्वता । महेन्द्रो मलय सह्य शक्तिमान् प्रक्षयानपि ॥१७ विन्ध्यश्च पारियात्रश्च इत्येते कुलपवंता । पवतास्तु समीपत. ॥१८ अभिज्ञातस्ततश्चान्ये विपुलादिचत्र सानय । अन्यतेभ्य परिमाता हस्वा हस्वोपजीयिन: १६ तयिमिश्रा जानपदा आर्या म्ले धारप मवंतः । पिवन्ति बहला नद्यो गङ्गासिन्धु सरस्वती ॥२. पतवाद्र मागा प यमुना सरयू तपा। गवतो दितस्मा पदिशामा देविया ॥२॥ गोमती शैत पाप याहा पदपतो। गैगिकी तु मोपायनिश्पसागण्डली तपा।। दशुमोहितमिसेता हिमायनि मृगा ॥२॥ तेप सहस्रशचान्ये

भारतवर्ष वर्णन
वे अन्य वत
जीत लेता है वह लोक मे स्वराट् कहा जाता है । अव पुनः विस्तार
पूर्वक कहूगा ॥१६।। इम महावर्ष में सात कुल पवंत प्रसिद्ध है । उन
सातों के नाम ये है-महेन्द्र, मलय, सह्य, शक्तिमान्, ऋक्षवान्, विन्ध्य,
पारिमात्र, ये हो सात कुल पर्वत कहे जाते हैं। उन कुल के सहस्रो
समीप में अन्य पर्वत भी होते हैं । इनके पश्चात्
से विचित्र
शिखरों व ले अभिज्ञात हैं। उनसे भी अन्य ह्रस्व और ह्रस्वों के उपजीवी
परिज्ञात है ।।१७, १३, १ ॥ उनसे मिले हुए जनपद हैं जो सब ओर
आर्य और म्लेच्छ हैं। गङ्गा, सिन्धु और सरस्वती इन बहुत-सी नदियों
का दान किया करते हैं । ॥ शननु चन्द्रभागा, यमुना, सरयू ऐरावती
वितस्ता, विशाला, देविका, बहू, गोमती, धोनपापा, वाहुआ, इपद्वती,
कोशिकी, तृतीया, निश्चला, गडकी ग्झुप्रोमोहित, ये इतनी नदिया
हिमवान् के पाव भाग से नि मृत हुई हैं।।२१, २२॥
वेदस्मृतिवेत्रवती वृतघ्नी 'सन्धुरेव च ।
पर्णाशा नमदा चव कावेरी महतो तथा ॥२३
पारा च धन्वतीरूपा विदुपावणमत्यपि ।
शिप्रावन्तो कुन्ती च पारियात्राश्रिता.स्मृताः ॥२४
मन्दाक्निीदशार्णा च चित्रक्टा तथैव च ।
तमसापिप्पलीश्येनी तथा चित्रोत्पलापि च .२५
विमला चन्चलाव तथा च धूतवाहिनी ।
शुक्तिमन्ती शुनी लज्जामुकुटाहदिकापि च ॥
ऋष्यवन्तप्रसूतास्तानथामलजला. सुभा lirail
तापपीयोष्णा निविध्यातिप्रा च ऋषभा नदी।
वेणावतरणी चैव विश्वमालाकुमुद्वती।।२७
तोया नैव महागौरीदुगमातुशिला तथा
विन्ध्यपादप्रमूतास्ताः
सर्वा.शोतजला शुभा. २२
गोदावरी भामरयो कृष्णवेगी च वजुला ।

३४८ मत्स्यपुराण तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा बाह्याकावेरी चैव तु ।। दक्षिणापथनद्यस्ता सह्यपादाद्विनि सृता ॥२६ वेदस्मृति, वेत्रवती, वृत्रध्वी, सिन्धु पर्णाशा, नर्मदा, कावेरी, महती, पारा, धवन्तीरूपा, विदुशा, वेणुमती, शिप्रा, अवन्ती, कुन्ती, ये समस्त नदिया पारियात्र नाम वाले कुल पर्वत के आश्रित रहने वाली हैं ऐमा हो कहा गया है ॥२३, २४॥ मन्दाकिनी, दशा, चित्रकूटा, तमसा, पिप्पली, श्येनी, चित्रोत्पला, विमला, चञ्चला, धूत, वाहिनी, शुक्ति- मन्ती, शुनी, लज्जा, मुकुटा, हृदिका, ये सब नदियो का उद्गम स्थल ऋष्यवान् कुल पर्वत होता है । इनके जल बहुत ही अमल और शुम हैं ॥२५, २६ तापी, पयोष्णी, निदिया, क्षिप्रा, ऋपिभा, वेणा, वैतरिण', विश्वम ला, कुमुद्रतो, तोया, महदगौरी, दुर्गमा, शिला, ये समस्त नदिन विन्ध्य कुल पर्वत स उत्पन्न हुई हैं । ये सब परम शीतल और शुभ जल वाली होती है ।।७, Pall गोशवरी, भीमरथी, कृष्ण वेणी, बम्जुला, तुगभद्रा, सुप्रयोगा, वाह्या कावेरी, ये समरत नदियाँ दक्षिणा पथ वाली हैं और सह्याद्रि कुल पर्वत के पाद से विनि स्स हुई हैं ॥२॥ वृतमाला ताम्रपर्णी पुष्पजा ह्य त्पलावती। मलयप्रसूता नद्य सर्वा. शीतजला: शुभा ॥३० त्रिभागा ऋपिकुल्या चक्षुदा त्रिदिवाचला। ताम्रपर्णी तथा मली शरवाविमला तथा।। महेन्द्रतनया सर्वा. प्रख्याता शुभगामिनी. ॥३१॥ याशिवासुकुमारो च मन्दगामन्दवाहिनी। पपा च पाशिनीचैव शुक्तिमन्तारमजास्तुताः ॥३२ सर्या पुण्यजला पुष्पा सवगाश्च समुद्रगा । विश्वस्य मातर सर्वा सर्वपापहरा शुभाः ॥३३ तामा न पनपश्च शतशोऽथ सहसा । तारिवमे पुरुषाचाला वाल्वार य राजाहला ॥३४ भारतवर्ष वर्णन शूरसेना भद्रकारा वाह्याः सहपटचरा: । मत्स्याः किराताः कुल्याश्च कुन्तला काशिकोशलाः ।। आवन्ताश्च कलिङ्गाश्च मूकार वान्धकः सह । मध्यदेशाजनपदा प्रायशः परिकीतिताः ॥३६ कृनमाला-नामयी-पुष्पजा- उत्पलावतो-ये सम नदियां मलय मादि प्रमून होने वाली हैं और ये सभी अति शीतल एव परम शुभ जल वाली है ॥३०॥ विभागा, अपि,कुल्या, इक्षुदा,विदिचला, ताम्रपर्णी,मली, शरवा, विमला ये सब नदियां महेन्द्र गिरि से समुत्पन्न होने वाली हैं पौर शुभगमन करने वाली प्रत्यात है ॥३१॥ काशिका सुकुमारी, मन्दा मन्द माहिती, कृरा-पाशिनी ये सब नदियां शुक्तिमन्त कुल पर्वत से प्रसव प्राप्त करने वाली हैं। ये सभी पुण्य जलदाली, पुण्यमयी, सर्वनगमन करने वाली और समुद्र गामिनी है । ये सभी इस विश्व को माताएं हैं और सब पापो के हए करने वाली तया परम शुभ हैं ॥३२,३३१] इन सरिताओ के जिनके नामों का यहाँ पर अभी उल्लेख किया गया है इनको मकडों और सहनो ही अन्य नदिया तथा उपनदियां हैं ! इनमें ये कुरु-पान्चाल-चाव- सजाङ्गल -शूरसेन-भद्रकार-वाहा-सहपरच्चर- मस्य- किरात-कुल्य-कु तल-काधिको शल-अवन्त लिङ्ग भूक- अन्धाक ये सब मध्यदेश के जानपद परिकीर्तित किये गये हैं ॥ ३१, राह्यस्यानन्तरे ते तन गोदावरी नदी। पृथिव्यामपि कृत्स्नाया स प्रदेशो मनोरम. ॥३७ यत्र गोवर्धनो नाम मन्दरो गन्धमादन. । रामप्रियार्थ स्वर्गीयावृक्षादिव्यास्तयोषधीः ॥३८ भरद्वाजेन मुनिना प्रियार्थमस्तारिताः तत. पुष्पवरो देशस्तेन जझं मनोरमः ॥३६ वाल्हीका वाटधानाश्च आमीरा. कालतोयका ।

मत्स्यपुराण पुरन्ध्राश्चेव शूद्राश्च पल्लवाश्चातखण्डियाः ॥४० गान्धारा यवनारीव सिन्धुसौवीरमद्रकाः। शकाद्र ह्या पुलिन्दाश्चपारदाहारमूत्तिकाः ॥११ रामठा:कण्टकाराश्च कैकेया दशनामकाः। क्षत्रियोपनिवेश्याश्च वैश्याः शूद्र कुलानि च ॥४२ अत्रयोऽथ भरद्वाजा:प्रस्थलाः सदसेरकाः। लम्पकास्तलगानाश्च सैनिकाः सह जाङ्गलः ।। एते तेशा उदीच्यास्तु प्राच्यान्देशान्निवोधत । ४३|| ये सभी सह्य अद्रि के अनन्तर मे हैं वहीं पर गोदावरी नदी है । सम्पूर्ण पृथ्वी मे वह प्रदेश परम सुन्दर है ।।३७।। जहाँ पर गोवद्धन नाम वाला मन्दर और गन्धमादन है तथा श्रीराम प्रिपार्थ स्वर्गीय वृक्ष तथा दिव्य औषधियां हैं ॥३८।। भरद्वाज मुनि के द्वारा प्रियार्थ अवतरित किये गये हैं। इसके पश्चात उसने पुष्पवर एक मनोरम देश उत्पन्न किया था ॥३६॥ वाह्नीक-वाटधान आभीर-कालतोयक-वरन्ध्र- शूद्र-पल्लव-आत्तरखण्डिक• गान्धार-यवन-सिन्धु सौवीर मद्रक-शक-द्र ह्य- पुलिन्द पारदा हारमूत्तिक--रामठ - कण्टकार के य दशनामक क्षत्रियो के उपनिवेश के योग्य तथा वैश्य और शूद्र कुल है ॥ ४०, ४१, ४२ ।। अत्रय -मारद्वाज-प्रस्थल--सहसेरक--लम्परतलगान और जाङ्गलो के साथ सैनिक ये सब उदीच्य ( उत्तर दिशा में होने वाल ) हैं । अब जो प्राची ( पूर्व दिशा में होने वाले ) देश है उनको भी समझ लो॥४३॥ अङ्गा वङ्गा मद्गुरका अन्तगिरिबहिगिरी। सुहात्तरा प्रविजया. मार्गमागेयमालवा ॥४॥ प्राग्ज्योतिपाश्च पुण्ड्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तका. । शाल्वमागधगोनद प्राच्या जनपदा स्मृताः ।।४५ तेपा परे जनपदा दक्षिणापथवासिन, ।

भारतवर्ष दर्शन ३५९ पाण्ड्याश्च केरलारोव चोलाः कुल्यास्तथैव च ॥१६ सेतुका सूतिकारचव गुपयावाजिवामिकाः । नवरराष्ट्रामाहिपिकाः कलिङ्गाश्चैवसर्वशः ।।४७ कारूपाश्चसहपीका माटव्या.सवरास्तथा । पुलिन्दाविन्ध्यपुषिरा वैदर्भा दण्डक.मह ।४ कुलोयाश्च सिरालाश्च स्पसास्तापसःसह । तथाततिरिकाश्चेव सर्व कारस्काराम्सया ॥ बङ्ग-बङ्ग-मद्गुरक-अन्तगिरि-वाहिगिर-मुह्योत्तर-अविजय- मार्गचागेय मालव-प्राग्ज्योतिष--पुण्ट्र-विदेह-सामूलिप्तक-शाल्व- मागधा-गोनई ये सब प्राच्य अर्याद पूर्व दिशा में होने वाले जनपद कहे गये हैं ॥ ४४, ४५॥ उनसे भी पर अनाद दक्षिण पयवासी हैं। पाण्डय केरल चील-मुल्य- सेतृ~~विक बोर गुपयावाजि, नासिक ये नक राष्ट्र माहिपिक हैं और कारङ्ग सभी ओर हैं ।। ४६, ४७ ॥ कार--सदेपोक-आटय-वर-पुलिन्द-विन्ध्यषिक वैदर्भ- दण्डक कुलीय-सिराल-पस-तापस-ततिरक तया सब कार- स्कार है।४८,४६॥ वासिकाटीच ये चान्ये ये चैवान्तरनम्मंदाः । भारमच्छा.समाहेया सह सारस्वतस्तया ५० काच्छीकाश्वसौराष्ट्रा आनाप्रद सह । इत्येतेअपरान्तास्तुग ये विन्ध्यवासिनः ॥५१ मालवाचकरपाश्चमेकलाश्चोकले.सह । मोण्ट्रामापादशाारच मोजा किष्किन्ध मह ॥५२ स्तोशला कोसलाश्चैव वैपुरा वदिशास्तया। तुमुगस्तुम्वराश्नैव पद्गमा नपधे सह ॥५३ अम्पा:शौण्डिकेराश्च वीविहोत्रा अवन्तयः। एते जनपदा स्याताविन्ध्यपृष्ठनिवासिनः ॥५४

३५२
मत्स्यपुराण
अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पवंतायिणश्च ये ।
निराहाराः सर्वगाश्चकुपथा अपथास्तथा ॥५५
कुथप्रावरणानौव ऊर्णादर्वा सशुमकाः ।
विगर्ता मण्डलाश्चैव किराताश्चामरैः सह ॥५६
चत्वारि भारतेवर्षे युगानि मुनयोऽव वन् ।
पृत नेता द्वापरञ्च वलिश्चेति चतुर्युगम् ॥
तेपा निसर्ग वक्ष्यामि उपरिष्टाच कृतस्नः ॥७॥

२५६
भारतवर्ष वर्णन
जम्बूखण्डस्य विस्तार तथान्येपाविदाम्वर ! ।
द्वोपानां वासिनापावृक्षाणां प्रप्रवीहि नः ॥६०
पृष्टस्त्वेव तदा विप्रेययाप्रश्न विशेषतः ।
उवाच ऋषिभिर्सेप्टं पुराणाभिमतं यथा ॥६१
शुश्रूपवस्तु यद्विप्राः शुश्रू पध्वमन्द्रिताः।
जम्बूवर्पःकिंपुरुपः सुमहानन्ददोपमः ॥६२
दशवपंसहस्राणि स्थितिः किम्पुरुप स्मृता ।
जायन्ते मानवास्तत्र सुतप्तकनकप्रभाः ॥६३
मत्स्य भगवान् ने कहा-उन ऋषियों ने यह श्रवण करके पुनः
उत्तर श्रवण करने की इच्छा वाले उन ऋपियो ने लोमहपि से अच्छी
तरह से कही ।। ५८ ।। ऋषियों ने कहा-हे भगवन् ! आपने भारत का
वर्णन तो कर दिया है । अब जो विम्पुरुष वर्ष तया हरिवर्ष है उनका
भी वर्णन यथातत्त्व करने की कृपा कोप्रिये ॥ ५६ ॥ हे विदाम्बर !
जम्बू खण्ड का विस्तार तथा अन्य द्वीपो का भी विस्तार उनके वासियो
के एवं वृक्षो के विषय मे हमको वतलाईये ।। ५६, ६० ॥ उस समय में
वित्रों के द्वारा इस प्रकार से पूछे गये महपि ते विशेष रूप से प्रश्नो के
अनुगार हो जसा कि ऋषियों ने देखा था और जो पुराणों मे अभिमत था
कहा था ।। ६१।। महर्षि प्रवर श्री सूतजी ने कहा-हे विप्र प्रवरो !
पाप लोग सब जो भी श्रवण करने की इच्छा वाले हो उसको अब
श्रुतन्द्रित होकर श्रवण कीजिए । जम्बू वर्प और किम्पुरुष सुमहान और
नन्दन के समान हैं । दस सहन वर्ष तक किम्पुरुष मे स्थिति कही गई है।
वहा पर भली भाति तपाये हुए सुदर्ण की कॉन्ति के समान कान्ति वाले
मानव उत्पन्न हुआ करते हैं ।।६२, ६३!!
वर्षे किंपुरुपे पुण्ये प्लक्षो मधुवहः स्मृतः ।
तस्य किंपुमपाः सर्वे पिवन्तो रसमुत्तमम् ॥६४
अनामया ह्यशाकाश्च नित्य मुदितमानसाः।

मस्त्यपुराण सुवणवर्णाश्चनरा स्त्रिश्चाप्सरस स्मृता ॥६५ तत पर किम्पुस्पात् हरिवप प्रचक्षते । महार मतसङ्काशा जायते यत्र मानवा ॥६६ देवलाक-युता सर्वे बहुरूपाश्च सवश । हरिवर्षे नरा सर्व पिय तीक्षुरस शुभम् ॥६७ न जरा बाधते तत्र तेन जीवन्ति ते चिरम् । एकादशसहस्राणि तेपामायु प्रकीतितम् । ६८ मध्यम त मया प्रोक्त नाम्ना वपमिलावृतम् । न तत्र सूयस्तपति नच जीर्वात मानवा ॥६॥ चन्द्रसूय्यौं सनक्षत्रावप्रकाशाविलावृते । पद्मप्रभा पद्मवर्णा पद्मपत्रनिभेक्षणा । ७. परम पुण्यमय किम्पुरुष वप मे एक मधु के वहन करने पाला नक्ष को बतलाया गया है । उस प्लभ अयुत्तम रस को सभी किम्पुरुप पान करने वाले हैं ॥६४|| वे सभी प्रामय ( रोग से रहित-शोक से वजित और नि य ही परम मुदित मन वाले हैं । वहा के नर सुवण उल्य वण वाले हैं और स्त्रियां भी इतनी अधिक सुदरी हैं कि वे सब अपाराएँ ही कही गयी है ।।६५1) उससे आगे अर्थात् किम्पुरुष के पीछे हरि वप कहा जाता है जहा पर महान् रजत के तुल्य मानव समुत्पन हुआ करते हैं । ६। सभी वहा के मनुष्य देव लोक च्युत हुए हैं और सब सभी पोर बहुन रूप वाले हैं । उस हरि ३५ मे सब मनुष्य परम शुम इशु का रस पोया करते हैं ।६७ । उन मनुष्यो को वृद्धता कुछ भी बाधा नहीं दिया करती है इसीनिये वे लोग चिरकाल तक जीवित रहा करते है। उन पुरुषों की आयु ग्यारह महस वप को बनलायी गयी है ॥१॥ मध्यम जो हमन वतनाया है वह इलावृत वप नाम वाला है। वहा पर कभी भी मूय का ताप नहीं रत है और वहा मानव भी जीवित नही रहा करत है ॥६६॥ इलावर वप मे नक्षत्रो के महित मूय और चद्र भारतवर्ष वर्णन ३५५ दोनों ही प्रकाश रहित रहते हैं और वहा के रहने तथ्य उत्पान होने वाले मानवो को पद्म के सदृश प्रभा होती है--पद्म के तुल्य ही उनका वर्ण होता है भोर पद्म पत्र के समान ही उनके नेत्र हुमा करते हैं ॥७॥ पद्मगन्धाश्च जायन्ते तत्र सर्वे च मानवा.। जम्बफलरसाहारा अनिष्पन्दा. सुगन्धिन. ७१ देवलोकच्युता. जायन्ते तत्र सर्वे च मानवाः । त्रयोदशसहस्राणि वाणान्ते नरोत्तमाः ।।७२ आयु प्रमाण जीवन्ति ये तु वर्षइलावृते । मेगेस्तु दक्षिणे पावें निपधस्योत्तरेण वा ॥७३ सुदर्शनो नाम महान् जम्बूवृक्षः सनातन । नित्यपुष्पफलोपेत सिद्धचारणसेवित: ॥७४ तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्बूद्वीपो वनस्पते । योजनानासहस्रञ्च शतधाचमहान्पुन. ॥७५ उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवमावृत्य तिष्ठति । तस्य जम्बूफलरसो नदो भूत्वा प्रसर्पति १७६ मेरू प्रदक्षिण कृत्वा जम्वृमूलगता पुनः । त पिबन्ति सदा हुष्टा जम्बूरमिलावृते ॥७७ जम्बूफलरस पीत्वा न जरा वाघतेऽपि तान् । न धान क्लमो वापि न दु.खञ्च तथाविधम् ॥७८ इलादत मे जो भी उत्पन्न हुआ करते हैं उन सभी मनुष्यो मे पद्म के समान गन्ध हुआ करती है। वे सब जम्बू फलो ने रस का माहार करने वाले-निष्पादन से रहित और सुगध वाले होते हैं ॥७१। वे सब देव लोक से ही न्युन होने वाले हैं और महान् रजत के वस्त्र धारी हैं। उन नरोतमों को आयु तेरह सहस्र वर्षों की हुआ करती है ।।७२ । जो इलावृत मे रहते हैं वे सब बरनी पूर्ण आयु तक जीवित रहा करते हैं .

२५६
मरस्यपुराण
अर्थात् मध्य में किसी की भी मृत्यु का अवगर यहा पर आता ही नहीं
1 मेरु पर्वत के दक्षिण पाश्व मे और निपध के उत्तर की और एक
महान् सुदर्शन नाम वाला जामुन का वृक्ष है जो हमेशा मे चले पाने
वाला सनातन है । उस वृक्ष पर नित्य ही पुण्य और पा रहा करते हैं।
।।७३, ७४।। उमी वनस्पति के नाम से जम्बूद्वीप समात्यात हो गया है।
उस वृक्ष का महान उत्सेध ( ऊचाई है जो एक सहर एक सौ योजन
है । यह वृक्षराज दिव लोक को समावत कये ही यहा पर स्थित रहता
है । उसके जम्बूफल भी बड़े ही विशान होते हैं जो कि उनके रस में एक
सरिता की रचना होकर वह प्रसपंण दिया करती है। यह नदी मेरु को
प्रदक्षिणा करके उस जम्बू के मूल मे पुनः गई थी । इलावृत मे वहा के प्राणी
सर्वदा प्रसन्न होते हुए उस जम्बू रस का पान किया करते हैं ॥७५||
।।७६, ७७। उस जम्वू वक्ष के रस को पीकर उन्हें फिर वृद्धता कभी
बाघा न किया करती है। उन्हें न तो कभी शुधा ही सताती है और
न कोई कमम ही हुआ करता है तथा उस प्रकार का कोई दुख ही हुआ
करता है ||७८11
तत्र जावूनद नाम कनकं देवभूषणम् ।
इन्द्रगोपकसङ्काश जायते भासुरञ्च यत् ७६।।
सर्वेपा वपवृक्षाणा शुभ फलरसस्तु सः ।
स्कन्नन्तु काञ्चन शुम्र जायते देवभूपणम् ॥10
तेपा मूत्र पुरेप वा दिक्ष्वष्टासु च सवश.)
ईश्वरान ग्रहाद्भूमिमृताश्च नसतेतु तान् ॥८१
रक्षः पिशाचा यक्षाश्च सर्वे हेमवतास्तु ते ।
हेमकूटेतु विज्ञ या गन्धर्वा साप्सरोगणार
सर्वनागा निपेवन्ते शेषवासुक्तिक्षका ।
महामेगै त्रयस्त्रिशत् क्रीडन्ते यनिया शुभा ॥८३
नीलवैदूर्य युक्त ऽस्मिन् सिद्धाब्रह्मर्पयोऽवसन् ।

भारतवर्ष वर्णन
दैत्याना दानवानाञ्च श्वेतः पर्वत उच्यते ॥४
शृङ्गवान् पर्वतश्रेष्ठ पितृणा प्रतिसञ्चर ।
इत्यतानि मयोक्तानि नव वर्षाणि भारते ५
भूतैरपि निविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च ।
तेपा वृद्धिबहुविधा दृश्यते देवमानुपे ।।८६
अशक्या परिसरयातु श्रद्धया च विभूपता ॥६॥
वहा पर जाम्बूनद नाम वाला सुवर्ण देवों का भूपण होता है जो
इन्द्रगोप के सदृश मौर भासुर हुमा करता है ||७ वह फ्लो का रस
सव वर्ष के वृक्षो का परम सुम होता है। जब स्पन्न होता है तो वह
शुभ्र देव काञ्चन हो जाता है ॥८॥ उनका मूत्र और पुरीप पाठो
दिशाओं में सन ओर जाता है । ईश्वर के अनुग्रह से भूमि मृत उनको
ग्रमा करती है ।८१॥ राक्षम -पिशाच-यक्ष सब वे हेमदत है। हम
में गन्धर्व और अप्सरा गण जानने चाहिए अर्थात् गन्धर्व और अप्स-
रायें
रहा करते हैं। शेप-वामुवि और दक्षक धादि सव नार उसका
सेवन क्यिा करते हैं । महा मेरु मे तेतीस पानिय क्रीडा किया करते हैं ।
11८२, ८३॥ नीलमरिण और क्यमणि से युक्त इसमे सिद्ध और ब्रह्मपि
गण निवास क्यिा करते थे। दैत्यों का और दानवों का पर्वत श्वेत कहा
जाता है ।।८४॥ शृगवान् श्रेष्ठ पवंत पितृगण का सञ्चर स्थल है । ये
मैंने भारत मे नौ वर्ष बतला दिये हैं 11८1 य भूतो के द्वारा भी निविष्ट
हैं-गतिमान हैं और प्रव हैं। उनकी बुद्धि देव मानुषों के द्वारा बहुत
प्रकार की दिखलाई दिया करती है। वह परिसख्या करने में अशक्त है-
थता करने के योग्य है और विभूपत है ॥८६॥

मत्स्यपुराण ५१---हिमवद् वर्णनम् आलोकयन्नदी पुण्यान्तत्समीपहृतश्रम. । स गछन्नेव दृद्वशे हिमवन्त महागिरिम् १ खमल्लिद्भिवहुभिवृतं शृङ्गस्तु पाण्डुरैः । पक्षिणामपि सञ्चारविना सिद्धगति शुभम् ॥२ नदीप्रवाहसजातमहाशब्दः समन्ततः । असंश्रु तान्यशब्दन्त शीततोयं मनोरमम् ॥३ देवदारुवनले कृताधोवसनं शभम् । मेघोत्तरीय शैल दो स नराधिप. ॥४ वेतमेघकृतोष्णीष चन्द्राकमुकुट क्वचित् । हिमानुलिप्तसर्वाङ्ग क्वचिद्धातुविमिश्रितम् ॥ चन्दनेनानुलिप्ताङ्गदत्तपञ्चाङ्गल यथा। शीतप्रद निदाघेऽपि शिलाविव टसङ्कटम् ।। सालक्तरप्तरसा मुद्रित सारण. कचित् ॥६॥ ववचित्सपृष्टसूर्या शु क्वचिच्च तमसावृतम् । वरीमुखः क्वचिद्भीम. पिवत्त सलिल महत् ।।७ महा महर्षि श्री सूतजी ने कहा -परम पुण्यमयी नदी का प्रव लोकन करता हुआ उसक समीप मे हतश्रम वाला होकर बह जाता हुआ ही महान गिरि हिमवान को देखता था ॥१॥ यह हिमवान् पाण्डुर वर्ण घाले-आकाश को छने वाले बहन से शिखरो से वृत है और पक्षियो के सञ्चारी के बिना परम शुभ और सिद्धगति वाला है ॥२॥ नदियों के प्रवाह के कारण समुत्पन्न महान् घोर शब्दों से सभी और अन्य कोई भी मन्द वहाँ सुनाई नहीं देता है और वह परम मनोरम तथा शीतल जल वाला है ।। ३ ॥ देवदार के नील वर्ण वाले वन जो उसके नीचे वाले भाग में हैं वेहो मानों उसका अतीय शु. अधोवसन हिमवद् वर्णन है और वो उसके कार मेयो का घिराव रहता है वही उसका उत्तरीय पात्र है ऐसा यह छल एक राजा हो री भांति दिसलाई देना था । मवेत वर्ण का जो मेघ है वही माना उसक मस्तरु को पाडी है। कहीं पर चन्द्रमा और सूर्य ही उसक मुकुट की शोभा दिया करते हैं । हिमालय सर्वदा हिम से अनुलिप्त समस्त अङ्गा वाला है और वही पर धातु से भी विमिश्रित है। अांद हिमालय में बहा-तहा धातुएँ भी दिखलाई दिया करती हैं ॥५दत्त पन्चागुल को मौत चन्दन स अनुलिप्त अङ्गो पाला है और ग्रीष्म ऋतु में भी जीत प्रदान करन वाला है तथा विकर विज्ञान शिलाओं से सट्टी है। वही पर अलक्त जिनमें लगा हुआ है ऐमे अप्पगों के चरणों से भी विलित है ॥६॥ हिमालय ऐसा एक परम शिाल पर्वत है कि कहीं पर तो उसमें मूर्य की किरणों रा सस्पर्श होता है और कहीं पर एक दम बन्यकार से ही समावृत रहा करता है। किमी स्थल पर ऐनी विशाल गुफाएं हैं जो महान मोपण दिखनाई दिया करती हैं वीर उसके द्वारा सलिल का पान अत्यधिक्ता के साथ किपा परता है ॥७॥ क्वचिदिद्याधरगणं क्रोद्मिापशोभितम् । उपगीत तय मुख्य किन्नराणाङ्गणे क्वचित् ।। आपानभूमो गलितगन्धर्वाप्सरसा क्वचित् । पुष्पः सन्नानकादीना दिव्यस्तमुपशोभितम् ।। सुप्तोत्थितामि शय्याभि कृसुमाना तया ववचित् । मृदिताभि समाकीर्ण गन्धर्वाणा मनोरमम् ॥१० निम्द्धपवनदर्शीलशाहलमण्डित । क्वचिच्च कुसुमयुक्तमत्यन्तचर शुभम् ॥११ तपस्विशरण शल कामिनामतिदुलभम् । मृगयथानुचरितन्दन्तिभिन्नमहाद्र मम् ॥१२ यन सिहनिनादेन वातानां भैरव रवम् ।

AD मरस्यपुराण दृश्यते न च सश्रान्त गजानामावुल कुलम् ॥३ तटाश्च तापसंयत्र कुजदेगरल कृता । रत्नर्यस्यसमुत्पन्नस्त्रलोक्यसमलडकृतम् ॥१२ इस हिमालय पवन राज पर कही पर कुछ ऐसे भी स्थल विद्य- मान है जो पीडा करने वाले विद्याधर गणो के द्वारा उपमोभित रहा करते हैं और किसी स्थान पर मुग्य किनारो के गण गीतो का गायन किया करते हैं ।। कही पर आपान भूमि में गन्धव और अप्सरामी के गलित ( गिरे हुए ) सन्नानक आदि देव वृक्षो के पुरुषो से वह उपशोभित रहता है । ६॥ कुछ स्थल ऐसे भो इस हिमालय मे हैं जो गन्धवों की सोकर उठाई हुई पुरुषो की मृदित शय्याओ से समाकाण और मनोरम हैं ॥१०॥ कही पर ऐसे भी स्थल हैं जो नील वण की शाद्वल (घास ) से विभूषित और जिनमे पवन का एकदम निरोध रहता हो ऐसे देशों से तथा कुसुमो स युक्त और अत्यत ही रुचिर एव शुभ हैं । ११॥ यह पवन हिमवन तपस्विनो की पूर्णतया रक्षा करत वाला है और जो काम वासना वाले लोग हैं उन को तो अत्यत ही दुर्लभ है। यह हाथियो के द्वारा भिन महा द्रुमो वाला है तथा मृगो को मौत अनु चरित है। ॥१२॥ यह हिमवान् ऐपा गरि है जिसरे सिंहो की गजना को मैख ( भयावह) ध्वति नहीं होती है जिससे कि भयमीत य ज तु कोई भीति सूचक शब्द किया करे । वहा पर हाथियों का समुदाय सश्रा त और समाकुल नही दिखल ई दिया करता है ।।१३ जिसमे कुजदेश तापसों से तट मयलकृत रहा करत हैं । हिमालय मे अनेक अद्भूत महा मूल्यवान रत्न समुप न हुआ करते हैं जिनसे यह सम्पूर्ण त्रैलक्य विभूापन होता है ॥१४॥ अहीनशरण नित्यमहीनजनसेवितम् । अहोन पश्यति गिरि महोन रत्नसम्पदा ॥१५ अल्पेन तपसा यत्र सिद्धि प्राप्त तापसा । यस्य दशनमाण सवाल्मपनाशनम् ।।१६ हिमवद वर्णन महाप्रपातसम्पातप्रपातादिगताम्बुभि.। वायुनी सदा तृप्तिकृतदेश क्वचित् चित् ॥१७ समालब्धजलं शृङ्गः क्वचि चापि समुछित. । नित्यर्कतापविमरगम्यंमंनसा युतम् ॥१८ देवदारमहावृक्षवजशाखानिरन्तर । वशस्तम्बवनाकारः प्रदेशरपशोभितम् ॥१६ हिमच्छरमहाशृङ्गप्रपातशतनिझरम् । शब्दलभ्याम्बुविषम हिमसरुद्धकन्दरम ॥२० दृप्टय त चारनितम्बभूमि महानुभाव स तु भद्रनाथ । बभ्राम मन व मुदा समेतस्थान तदा विञ्चिदथाससाद ।। २१ ॥ यह हिमवान् नित्य ही अहीनो का शरण अर्यात प्राश्रय तथा रक्षक होता है और अहीनो के द्वारा ही भली भांति सेवित रहा करता है । जो बहीन होता है वही इस गिरि को देखना है तथा यह सवदा रलो को सम्मति से अहीन हो रहता है ॥१५॥ इसमे बहुत ही स्वल तपश्चर्या से तापस लोग सिद्धि की प्राप्ति कर लिया करते है जिसके केवल दशन से ही सब प्रकार के कल्मषो का तुरन्त ही विनाश हो जाया करता है । ॥१६. महान् प्रपातो (अग्नों) क सम्पात से अन्य प्रपात आदि मे गत जलो के द्वारा जो कि वायु के द्वारा इधर-उधर किये जाते हैं यह कही- कहीं पर पूर्णतयो तृप्ति युक्त प्रदेश वाला रहता है। कहीं पर तो इसकी चौटियां ऐसी हैं जहाँ जल समालब्ध रह करता है और कही पर ये ही शिखरे अत्यन्त ऊंची है जो नित्य ही सूर्य के ताप से विपमता युक्त हैं एव अगम्य हैं । इसी प्रकार से यह वनसे युक्त है ॥१५, १६॥ इस गिरि राज मे ऐसे प्रदेश हैं जहां पर देवद रु के महान् विशाल वृक्षा का समुगय रहता है और उनकी शाखा ऐनी फैली रहा करती हैं कि कुछ भी अवकाश नही रहता है अर्थात् एक दूसरे वृक्ष से धमाघस हैं । वांशो के बडे २ स्तम्बो से विषम वनों दाले प्रदेश से यह शोभा युक्त है। १।।

मत्स्यपुगण बर्फ के ही छत्र से युक्त इस की महान् शिखरें विराजमान रहा करती हैं और संकडो ही प्रपातो का निर्झरण इसमे होता रहता है । शब्द के द्वारा ही प्राप्त करने के योग्य जल से यह अत्यस विषम है और इसकी जो कन्दरायें हैं वे भी सर्वदा हिम (बर्फ) से सरुद्ध रहा करती हैं ॥ २ ॥ अत्यन्त सुन्दर नितम्बो की भूमि वाले उस गिरिराज का देख कर ही वह महानुभाव भद्र नाथ वही पर बहुत ही आनन्द क साथ भ्रमण किया करते थे और उस समय मे कोई समेत स्थान उन्होंने प्राप्त कर लिया था॥२१॥ ५२-कैलास वर्णन तस्याश्रमस्योत्तरस्त्रिपुगरिनिषेवित । नानारत्नमय श्रृङ्गः कल्पद्र मसमन्वित ॥ मध्ये हिमवत. पृष्ठे कैलासो नाम पर्वतः । तस्मिन्निवसति श्रीमान् कुबेर. सह गुह्यकः ॥२ अप्सरोऽनुगतो राजा मोदते ह्यलकाधिपः।

कैलास वर्णन मूतजी ने कहा-उनके भायम से उत्तर दिशा की ओर भगवान् निपुरारि गिव के द्वारा निवित तथा क्ल्पद मो से सयुत् एव अनेक प्रकार के रलों से परिपूर्ण शिखरों से समन्दिन हिमवान् के मध्य में पृष्ठ पर कलास नाम वाला पर्वत है उसमें कुदेर अपने गुपको को साप म लेकर निवास किया करते हैं ॥१,गा वहाँ पर मलका पुरी का स्वामी कुवेर राजा सर्वदा अप्सराओ से अनुगन होकर प्रसन्नता का अनुभव । किया करते हैं। वहाँ कसास फे पाद से समुत्पन्न परमरम्म एवं शुम शीतल बल है ॥३॥ जो जल मन्दार नाम वाले देववृक्ष के रज पगग से पूरित रहा करता है और देव के ही सदृश है। उसी जल से एक मन्दाकिनी नाम वाली सरिता जो परम दिव्य है और मत्यन्त शुभ है वहन किया करती है ॥४॥ उस नदी के तौर पर ही वहां पर अनीव दिव्य एव महान् वन है जिसका शुम नाम नन्दन है । कैलास गिरि से पूर्वोत्तर में एक अति दिव्य सौगन्धिक गिरि है ॥शा यह समस्त धातुओ से परिपूर्ण- दिव्य और पर्वत के प्रति सुन्दर वेल वाला है। एक चन्द्रप्रभ नाल वाला भी वहां पर पर्वत है जो परम गुन और रत्न के तुल्य है ।। ६ ।। उपके हो समान में एक परम दिव्य अच्छोद नाम से प्रसिद्ध सरोवर है। उस सट से एक शुम अच्छोदिका नाम वाली नदी उत्पन्न होती है ॥७॥ तस्यास्तीरे वनं दिव्य महोत्ररथ शुभम् । तस्मिन् गिरी निवसति मणिभद्र. सहानुगः ॥ यक्षसेनापति. करो गुपक. परिवारित.। पुण्या मन्दाकनी नाम नदी मच्छोका गुमा 18 महीमण्डलमध्ये तु प्रविष्टे तु महोदधिम् । क्लासदक्षिणे प्राच्या शिव सवौषधि गिरिम् ॥१० मन.शिलामय दिव्य सुवेलपर्वत प्रति । लोहितो हेमशृङ्गस्तु गिरिः सूर्यप्रमो महान् ॥११

क्लास वर्णन
तम्मात् प्रमवते
पुधा सरयूोक्यावनी,
तम्यास्तीरे वन दिन्य वभ्राज नामविघुतम् ॥१.
दुवेरानुचरतस्मिन् प्रतितनयो दशी।
ब्रह्मवाता निवसनि राक्षनोऽनन्तविक्रमः ॥१८
पंतासात् पश्चिमामामा दित्य नापधिगिरि.
अमरा पर्वतश्रेष्ठो स्वमातृविभूपित ॥१६
भवस्य दयित श्रीमानपात्रताहेमनिमः ।
सानोम्ममयंदिन्य गिलाजाले गमाचित.
रानसरसंम्नापनीयः अझंदिवमिवोल्लिम्वन् ।
गंगवान् मुमहादियो दुग शैनीमहावित ॥२१
तस्मिन् गिरी निवसति गिरिशो धूम्रलोचन ।
तम्य पादान प्रभवति शेगोदनाम तत्पुर ।
उग पद्मान में कुपो दमा दत्तति होती है। वह दिना
जन वारा निकुद के प्रति दस है ॥ १५॥ दहीं पर सम्पूर्ण
धातुओं में परिपूत एक अयन्त महान वैर त नाम वाला पिरि है। उस
पन में पाद में एक अयन दिर मानन म म दाना सरोदर है दो महा
सिदों के द्वारा वित रहा करता है | उस सरोदर में परम
पुण्यमयी लोगों को पान कर देने वाली मरवू नाम का नदी ममुग्न
दश करती है। टस 3ट पर एक अान्न दिशान देनार नार में
प्रसिद्ध दिग्ध वन है ।। १31 वहां पर घर का अनुबर वर्गा प्राति
का पुत्र ब्रह्मवाता निशम किया करता है वह रामन यनन विकम दाला
था॥१८ ला व पस्चिम दिशा में एक अनिदिव्य मदोपधि
गिरि है। वह पान मा पर्वतों में य-प्रमा वर्ग वाला और रकम
(मुवर्ण) बानु विनि हाता है। 150 यह न मर
दिन गिलाओं काम चारों और समाधित है और इन मटन श्री
मनन म पदंत भगदद का अपत्र प्यारा है 100 में की

मत्स्यपुराण तस्यपादे महदिव्यं लोहितं सुमहत्सरः। तस्मान् गिरी निवसति यक्षोमणिधरोवशो १२ दिव्यारण्य विशोकञ्चतस्य तोरे महद्वनम् । तस्मिन् गिरौ निवसति यक्षोमणिधरोवशी ॥१३ सौम्यः सुधार्मिकश्च व गुह्यकैः परिवारियः । कैलासात् पश्चिमोदोच्या ककुमानौषधी गिरिः ।।१४ उस अच्छोदिका सरिता के तट पर एक अत्यन्त शुभ-दिव्य और महान् चत्ररथ नाम वाला वन है । उसमे गिरि पर अपने अनुचरो के साथ मणिभद्र निवास किया करते हैं ॥ १॥ यह यक्षों का अन्यन्त कर सेनापति है जो सर्वदा गुह्यको से परिवारित रहा करता है और वहाँ पर परम पुण्यमयी मन्दाकिनी नाम वाली अच्छोदिको शुभ नदी बहा करती है ।। ६॥ मही मण्डल के मध्य में महोदधि मे प्रविष्ट होने पर फलास के दक्षिण पूर्व मे शिव सर्वोपिधि गिरि है ।। १०॥ मैंनसिल से परिपूर्ण पर्वत के प्रति सुवेल और दिव्य-हेम की शिखर वाला-लोहित नाम वाला एक महान सूर्य प्रम गिरि है जिसको प्रभा सूर्य के समान है । उस पर्वत के निचले भाग मे महान् दिव्य लोहित नाम वाला ही एक सर है । उसी सर से लौहित्य नाम वाला एक विशाल नद वहन किया करता है ।। ११, १२ ।। उस नद के तौर पर एक अति महान्-दिव्य विशोका रूप है। उसमें पवंत पर वशी यक्ष मणिधर निवास किया करता है। वह परम सौम्य और सुधार्मिक गुह्यको से चारो भोर मे घिरा हुआ रहा करता है । कैलास पर्वत से पश्चिमोत्तर दिशा मे ककुमान् नाम वाला औपधियों का गिरि है ॥१३, १४॥ ककुप्रति च रुद्रस्य उत्सत्तिश्च ककुधिनः । तदजनन : ककुदं शैलन्त्रिककुद प्रति ॥१५ सर्वधातुमयस्तत्रसुमहान् वैद्यु तो गिरिः । तस्य पादे महदिदव्य मानस सिद्धसेवितम् ॥१६

कलास वर्णन
तस्मात् प्रभवते पुथ्या सरयूलॊकपावनी।
तस्यास्तीरे वनं दिव्यं बघ्राज नामविथु तम् ।।१७
कुवेरानुचरस्तस्मिन् प्रहेतितनयो वशी।
ब्रह्मधाता निवसति राक्षसोऽनन्तविक्रमः ॥१८
कलासात् पश्चिमामाशा दिव्यःसर्वोपधिगिरिः।
अरुणःपर्वतश्रेष्ठो रुक्मधातुविभूपितः ॥१६
भवस्य दयितःश्रीमान्पार्वतोहेमसन्निमः ।
मातकौम्भमयदिव्य.शिलाजाल समाचितः ॥२०
शतसरयस्तापनीयः अङ्ग दिवमिवोल्लिखन् ।
गंगवान् मुमहादिव्यो दुगः शैलोमहाचित ॥२१
तम्मिन् शिरो निवसति गिरिशो धूम्रलोचनः ।
तस्य पादात् प्रभवति शेलोद नाम तत्सर । २२
उन ककुद्मान में बुझी रुद्र को उत्पत्ति होती है। वह बिना
जन वारा त्रिकुद के प्रति ककुद जल है ॥ १५॥ यहीं पर सम्पूर्ण
धातुओं मे परिपूर्ण एक अत्यन्त महान् वैद्य त नाम वाला गिरि है। उम
पर्वत के पाद में एक अत्यन दिख मानस नाम वाला सरोवर है जो मदा
मिद्धों के द्वारा नेविन रहा करता है ॥१६॥ उस सरोवर से परम
पुण्यमयी लोगो को पावन कर देने वाली मग्यू नाम ना नदी ममुत्पन्न
हमा करती है। उनके तट पर एक अत्यन्त विशाल वैघ्राज नाम से
प्रसिद्ध दिव्य चन है ॥ १७ ॥ वहाँ पर कुरेर वा मनुवर वनो प्रोहित
मा पुन ब्रह्मा गाता निधाम क्या करता है वह रासस बनल विषम वाला
या ॥१८ लास पर्वत में पश्चिम दिशा में एक अनिदिव्य सर्वोपधि
गिरि है । यह पर्वत सम्पूर्ण गवंतो में अंक-प्राण वर्ग वाला और रुकम
( मुदण) पातु मे विभूषित होता है ॥१६॥ यह मानकोन मय
यि गिलाओं के बालों से चारो और समाहित है और हम महरा श्री
मम्मन्न यह पर्वत ममा भव का अन्चल प्यारा है ॥२०॥ संकटों की
1

मरापपुराण सध्या वाले तापनीय पिपरा से हिवरा मन में नरूलेघ मरता हुमा--महान् दिव्य शृङ्गवान् महापिन शा दुर्ग+ गमान है ॥२१॥ उस वृक्ष पर धूमलोवन गिरिश निवास परत है। उम पर्वत पर भाग स शेलोद नाम वासा र सरोवर का प्रभव ( उत्पति) होता है॥२॥ तस्मात् प्रमयतेपुण्या नदीशेलोदकासुमा । सा चक्षुसी तणेमध्ये प्रविष्टापश्चिमोदधिम् ।२३ यम्त्युत्तरेण कलासाविछव. सौषधोगिरिः । गौरन्तु पर्वतश्रेष्ठ हरितालमय प्रति ॥२४ हिरण्यशङ्ग सुमहान् दिव्योपधिमयो गिरिः। सस्यपादे महद्दिव्य सर काञ्चनवालुकम् ।।२५ रम्य विन्दुसरो नाम यत्र राजा भगीरथ । गगार्थ स तु गजपिरुवास वहुला समाः ।।२६ दिव यास्यन्तु मे पूर्वे गगातोयाप्लुतास्थिका: 1 तत्र त्रिपथगा देवी प्रथम तु प्रतिष्ठिना ।।२७ सोमपादात् प्रसूता सा सप्तधा प्रविभज्यते । यपाणिमयास्त विमानाश्च हिरण्मया ॥२८ तत्ष्ट्वा तुभि सिद्ध शक सुरगणे सह । दिव्यच्छायापथस्तवनक्षत्राणान्तुमण्डलम् ॥२६ उम सर से परम पुण्यमयी और अत्यन्त शुभ शैलोदका नाम वाली न. समुत्पन होकर बहती है । वह उन दोनो के मध्य में चक्षुषी पश्विम सागर में प्रविष्ट होती है ॥२३॥ वनास के नत्तर भाग में सवेपिध शिव गिरि है । यह श्रेष्ठ पर्वत गौर है और हरिताल मय ही होता है । हिरण्य भृग बहुत ही महान और दिव्योपधियो से परिपूर्ण गिरि है । उसके चरणो के भाग में एक महान् दिव्य सर है जिसकी वालुका काञ्चन मयी है। वहां पर एक परम रम्य विन्दुसर न म वाला कैलास वर्णन मरोवर है जहां पर गङ्गा के लाने के लिये तपश्चर्या करता हुआ रामपि राजा भगोरप बहुत से वर्षों तक रहा पा ।।२४, २५, २६ ।। राजर्षि का क्यन था कि पहिले गङ्गा के पवित्र जल मेप्नुन मेरो अस्थियां दिन- लोक को चली जावे । वहीं पर त्रिपय गामिनी देवी सर्व प्रथम प्रनिहित हुई थी । २७ । सोमपाद से समुत्रन हुई वह सात भागो में प्रविभक्त की जाती है। वहाँ पर मपियों परिपूर्ण भूप है और मुवर्ण से परिपूर्ण अर्थात् स्वयं निर्मित विमान हैं ।। २८ ।। वहीं पर सुग्गणों क सहित इन्द्र- देव ऋतुओं के द्वारा यजन करके सिद्ध हुआ या अर्थात् सिद्धि प्राप्ति की थी। वहां पर नक्षत्रों का माल दिवलोक का दिय छाया पस है ।। २६॥ द्वश्यते भासुरा रात्रौ देवी त्रिपथगा तु सा । अन्तरिक्ष दिव चैव भावयित्वाभुवगता ॥३० भवोतमागे पतिता सत्ता योगमायया! तम्या ये विन्दव.केचिता दायाः निताभुवि । ३१ कृतन्तु तैवंहसरस्ततो विन्दुसर. स्मृतम् । ततस्तस्या निरुद्धाया भवेन सहमा रुपा ॥३२ ज्ञात्वा तम्या ह्यभिप्राय कर देश्याश्विकोर्पितम् । भित्ता विशाम पाताल प्रोतमा गृह्य शङ्करम् ।।३३ अथावलेपत ज्ञात्वा तस्याः क दन्तु शहर ) तिरोभावयितु बुद्धिरामोदप्ता नदीम् ॥३४ एतस्मिन्नेव वाले तु दृष्ट्वा राजानमग्रत । घमनोमन्नतमीण च धाव्याकुलितेन्द्रियम् ॥३५ गति के समय में वह देवी विषयगा मामुर दिसलाई दिया करती है। वह अन्तरिक्ष पोर दिवलीक वो पावित परके पीछे नुमोक में गई पी11३०॥ प्रारम्भ में जा यह इम बुलो में आई थी मपय न मिद ये मस्तक पर पतिन हुई थी और वहीं पर योग माया द्वारा यह सब ३६८. मम्यपुगण हो गई थी। उस समय मे सरोध होने के कारण इसको महान् क्रोध उत्पन हो गया था। उस द्धावस्था वाली उसकी जो कुछ विन्दु इस भू मण्डल मे पतित हुई थी। उनसे यहा पर बहुत से सरो की रचना हो गई थी। इसके पश्चात् यह विन्दुसर कहा गया है । इसके अनन्तर श्रीमव ने निरद्ध हुई उसका सहस्र क्रोध से युक्त देवी के क्रूर अभिप्राय समझ लिया था। उसका यही चिकोपित था कि शिव के मस्तक का भेद न करके अपने स्त्रोत के द्वारा शङ्कर का ग्रहण करके पाताल लोक में प्रवेश कर जाऊँगी ॥३१, ३२, ३३।। इसके उपरान्त भगवान् शङ्कर उसके क्रोध युक्त इस प्रकार के अवलेपन (नीच घमण्ड ) को जानकर उनकी ऐसी बुद्धि हो गई थी कि उस नदी को अपने ही अङ्गो में तिरो- भूत कर लिया जावै ॥३४|| इसी बीच मे उस राजषि भगीरथ को भगवान् शिव ने अपने समक्ष ही मे खडा हुआ देख लिया था जो धमानयो से मन्तत क्षण वह था और शुधा से व्याकुलित इन्द्रियो वाला हो रहा था॥३५॥ अनेन तोषितश्चाह नद्यर्थे पवमेव तु । बुध्वास्य वरदानन्तु तत कोप न य छत ॥३६ ब्रह्मणो वचन श्र त्वा यदुक्त धारयन्मदीम् । ततो विसर्जयामास सरुद्धा स्वेन तेजसा ॥ ७ नदी भगीरथस्यार्थे तपसोग्रेण नोपित । ततो विसजयामास सप्तस्रोतासि गङ्गया ॥३८ श्रीणि प्राचीमभिमुस प्रतोचीन्त्रीण्यथैव तु । स्रोतासि पियायास्तु प्रत्यपद्यन्तसप्तधा ।।३६ नलिनी लादिनी चैव पावनी व प्राच्यगा। सीता चक्ष श्च सिन्धुश्च तिरस्ता व प्रती- यगा ॥१० सप्तमी स्वनुगा तासां दक्षिणेन भगोरयम् । तस्मात् भागीरथी सा वै प्रविष्टा दक्षिणोदधिम् ।।११

कनारा दर्जन
३६६
I
शिवने जैरी ही उसको देखा उनसे उसी समय ध्यान हो बाम
पाकि इस राषि ने तो बत्यधिक समय तक तपस्या करके इसौ नदी के
पहा लाने के लिये ही मुझे पूर्णतया प्रसन्न एव तुष्ट कर लिया पा कि
मैंने तब इसको वरदान भी दिया या-यह सब स्मरण पय में लाकर
फिर जो क्रोध उस समय में उन्हें आया था वह गन्न हो गया था ॥३६॥
ब्रह्माजी का रचित वचन का पदभ करके इस नदी को धारण कर रहे
थे। इसके पश्चात उस नरुद्ध हुई नदी तो अपने ही तेव ने विविध कर
दिया था ॥३॥ रारा भगीरप दे निचे उसी अत्युर तपस्या से नदी
को छोड देन को भवान् गिव तारित हो गरे थे। और गिर गड़ा के
द्वारा सातत्रोतों का विसर्जन कर दिया गया था ॥३८॥ टनमें से तीन
पोप्रचो को पार हुए ये और तीन पश्चिम दिशा की ओर चल दिये
ये। इस तरह से इस विपयमा गङ्गा के स्रोत सात भागों में उत्पन्न हो
गये पे ॥३६॥ उन लोगों में ननिनी-नादिनी-पावनी ये तो प्राच्या
मर्यात पूर्व को मोर नमन करने वाले धे । मीता-चक्षु और मिन्यु ये
दीन उसके मोत पश्चिम की ओर गमन करने वाले य॥४०॥
इस प्रकार में ये स्त्रोत नो उक्त दिशाओं में गमनमीत हुए
घ
योर उन सातों में जो मानवां सोत, या दह दक्षिण की ओर राजा
भगीरप रा अनुगमन करने वाला हुन पा। इसोतिर उसका नाम
भागीरथी गङ्गा हुया या और वह तिर दक्षिा सागर में प्रविष्ट हो गई
सप्त चेताः प्लावयन्ति वर्षन्नु हिमसायम् ।
प्रमूदाः सप्त नद्यस्तु गुमा विन्दुनराद्भवाः ।। ५२
तान्देशान् प्लावयन्ति स्म म्लेन यायाश्च सवरा ।
सर्शलान् कुकुरान रोप्रान् दबंरान् यदनान खसान् ॥८३
पुलिवारच कुलत्याश्च अङ्गलोचान्वराव यान् ।
कृत्वा द्विधा मिवन्त प्रविष्टा दतिगोदसि ।।
पी ॥४॥

३७० मत्स्यपुराण अथ वीरभरू श्रीव कालिकाश्वशूलियान् । तुपारान् वर्वरानङ्गान्यगृह्णा पारदानशकान् । ४५ एतान् जनपदाश्चक्ष प्लावयित्वोदधिङ्गता। दरदोजगुण्डायैव गान्धारानीरसानुकुहून ॥४६ शिवपौरानिन्द्रमरून वसतीन समतेजसम् । संन्धवानुर्वसान वर्वान् कुपश्रान् भोमरोमकान् ।।४७ शुनामुखाश्चोदमरून् सिन्धुरेताग्निवते। गन्धर्वान् किन्नरान्यक्षान् रक्षोविद्याधरारगान् । ४८ कलापग्रामकाश्य व तथा किंपुरुषा-मरन् । किराताश्न पुलिन्दाश्च कुरून वै भारतानपि ॥४. पाश्चालान् कौशिकान् मत्स्यान मागधाङ्गास्तथैव च । ब्रह्मात्तराश्च वङ्गाश्च ताम्रलिप्तास्तथैव च ।।५० एतान् जनपदानार्यान् गङ्गा भावयते शुभा। तत. प्रतिहता विन्ध्येप्रविष्टादक्षिणोदधिम् ।।५१ ये सातो सोत हिम साहवय वर्ष को नावित कर दिया करते हैं। फिर विन्दु मगेवर से उद्भव प्राप्त करने वाली परम शुभ सात सरिता समुत्पन्न हुई थीं ॥४२॥ वे सब ओर से म्लेच्छप्राय उन देशो को नाधित पर रहीं थीं। लो के सहित ये देश कुकुर रोधू-वर्यर-यवन- आस-पुलि और कुलत्थ थे तथा जो वर भङ्गसानप थे। उस सरिता ने हिमवान् दो भागों में करो फिर यह प्रन्त मे दक्षिण सागर में प्रदेश पर गयी थी। ५३, ४४॥ इमके उपरान्त वीर मरु-कालिका-शूलिक- तुणर-दर-अनन-गारद और धो को ग्रहण किया था। इन उक्त जनरसेको प्याक्ति से यह वा भी उदधि में चली गयी थी। दरदो गुगड गान्धार-अनौरस-पृह-शिव पोर-इनः मरुवसन्ती- समतेत्रम-11-34म-पर्व-युध-भीम गेमप-पुरामुष और उद- महादेशो वामिण सबा पिया घरता है। गन्धय-रि-यक्ष- कला वर्णन ३७१ राक्षस-विद्याधर-द्वारा पलाप प्रामक-विम्पुरुप-नर-किरात-पुलिन्द- मत्स्य-कुरु-भारत-पाञ्चाल-कौशिक-माय-ब्रह्मोत्तर-घङ्ग और तान जिप्त -इन देशों को जो बाय्यं हैं उनको मुभा गला भावित किया करती है। फिर वह विध्म में प्रतिहत होती है और मन्त में दक्षिण उदधि में प्रवेश कर गयी है ॥ ४५। १६ । ४७ | १८ | ४६ । ५०.५१॥ ततस्तु हतादिनी पुण्या प्राचीनाभिमुखा ययो। प्लावयन्युपकाश्चैव निपादानायि सर्वश ॥५२ धीवरानपिकारचं व तथा नीलमुखानपि । केकराने कर श्च विरावानपि चंव हि ॥५३ कालिन्दगतिकाश्च व कुशिकान्स्वगंभीमकान् । सामण्डले समुद्रस्यतीरेभूत्वातुसवश ॥५४ ततस्तु नलिनीचापि प्राचीमेव दिश ययौ। कुपथान प्लावयन्ता सा इन्द्रद्य म्नसरास्यपि ॥५५ तथा खरपयान् देशान् वेत्रराट्व, पथानपि । मध्येनोज्जान मस्न कुयप्रायरान् ययौ ॥५६ इन्द्रद्वीपसमीपे तु प्रविष्टा लवणोदधिम् । नलम्त पावनी ॥mत पानीमाजवेन .

३७२ मस्यपुराणे खरपथ देशो को-क्षेत्र शकु पयो को-मध्य में नोज्जानक सरो को और कुध प्रावरणो को चली गयी थी। 1५५, ५६। फिर वह इन्द्रद्वीप के समीप में लवणोदधि में प्रवेश कर गयी थी। इसके उपरान्त यावनी नाम वाली बड़े वेग से पूर्व दिशा को चली गयी थो॥५७॥ तोमरान् प्लावयन्तीचहसमार्गान् सपृहकान् । पूर्वान्देशांश्च सेवन्तीभित्वासाबहुधागिरिम् ।। कणप्रावरणान् प्राप्य गता साश्वमखानपि ।। ५८॥ सिक्त्वा पर्वतमेरु सा गत्वा विद्याधरानपि । शैमिमण्डलकोष्ठन्तु सा प्रविष्टा महत्सरः ॥५६ तासा नापनद्योज्या शतशोऽथ सहस्रशः । उपगच्छन्तिता नद्यो यतोवपति वासव. ॥६० तोरे वशीकसाराया. सुदभिर्नाम तद्वनम् । हिरण्यश्रृङ्गा वसतिविद्वान् कौवरको वशी ॥६१ यज्ञादपेत. सुमहानमितौजा सुविक्रम । तत्रागस्त्यं. परिवृता विद्वद्भिवहाराक्षस. ॥३२ कुवेरानुचरा ह्य ते चत्वारस्तत्समाश्रिताः। एवमेव तु विज्ञ या सिद्धि पक्तवासिनाम् ।।६३ वह पावनी सरिता का स्रोत जो उन उपयुक्त सात स्रोतों मे से एक थी तोमा दशो का प्लावन करती हुई हस मार्गों को-समूहको को और पूर्व देशो का सेवन करती हुई वह प्राय गिरिओ का भेदन करके वर्ण प्रावरणो मे पहुँच कर वह अश्व मुखों को चली गयी थी ।।५८) वह मेरु पर्वत का सेवन करखे पिर विद्याधरों में पहुंच कर अन्त में जमि मण्डल को महान सर मे प्रवेश कर गयी है। उन सातों नरियो मे में अन्य संकटों और महसों ही नदियों तथा उप नदियां उप गमन पिया परती हैं। वे ऐनी नदिया है जिन म इन्द्र दव पर्ण किया करते हैं। पोर माग तट पर गु नि नाम वाला एव विशाल धन है । यही कलाम वर्णन ३७३ पर हिरण्य शृङ्गवशी विद्वान कौवरक निवास किया करता है । वह या से अपत-सुमहान् -अपरिमिन ओज पाला-सुन्दर बलविक्रम सम्पन्न है। यहां पर अगस्त्यो के द्वारा परिवृत तथा विद्वान् ब्रह्म राक्षसो से परिवृत ये चार कौर के अनुचर हैं जो उसके सराश्रय मे रहा करते हैं। इसी प्रकार से पर्वतों में निवास करने वालो की सिद्धि को सरझ लेना चाहिये ॥५६६०६१६६३॥ परस्परेण द्विगुणा धम्मतः कामतोऽर्थतः । हेमकूटस्य पृष्ठे तु सपणा नदसर स्मृतम ॥६१ सरस्वती प्रभवति तस्माज ज्योतिप्यतीत या । अवगाढे ा भयत. समुद्री पूर्वपश्निमो ॥६५ सरो विष्णुपद नाम निपधे पर्वतातमे। यम्मादग्ने प्रभवति गन्धर्वानुमुले च ते ॥६६ मेरोः पाववि प्रभवति ह्रदश्चन्द्रप्रभो महान् । जम्वुश्च व नदी पुण्या यस्या जाम्बनद स्मृतम् 11६७ पयोदस्तु हृदो नीलः स शुभः पुण्डरीकवान् । पुण्डरीकात् पयोदाच्च तस्माद् वै सम्प्रसूयताम् ॥६८ सरसस्तुस रस्त्वेतत् स्मृतमुत्तरमानसम् । मग्याच मृगकान्ताव तस्मादेसम्प्रसूयताम् । ६६ हृदाः कुम्पु विरूपाता: पद्ममीनकुलाकलाः । नाम्रा ते वैजयानाम द्वादशोदधिसन्निभाः ॥ ७० वह सिद्धि परस्सर मे धर्म-मयं मोर नाम से दिगुण हाती है। हेमबूट के पृष्ठ पर जो सर है वह सपा का वाया गया है। उस सर से सरस्वती की उत्तति हुआ करती है जो कि ज्योतिगती है अवगड मे दोनो ओर पूर्व सागर और पश्चिम समुह है ॥६४, ६-१ पर्वतों में मायुतम गिरि निषध में विपा पर नाम वासा सर है जिससे आगे वे पनि प्रा हो हैं ।।६६।। मेरु गिरि के पावं भाग से चन्द्रम- .

३०४ मापरपन एक महान हरभूत होता है और परम पुष्पालिको सम्यूनती है जिसे पाया पहा गया है |७|| पद मोरहा है और यह परम शुम तपा पुरीया है। पुण्डरीफ और पोदर दा होता है ६|| सरा यह सरोवर है और इसको उमर मामाहा गया है। उस सर से मृग्या धौर मग पान्ता ये दो नदिया प्रगूत है। पो पोर मोनो से रामावी हद बुर देशों मे विम्यात हैं । नाग में ये बंजर रहे जाते हैं और पे यारह है जो उदधिरे ही तय है ॥६६७.॥ तेभ्य. शान्तीच मध्वीच नद्यो सम्प्रसूयताम् । मिपुरुपाद्यानि यान्यष्टोतेषुदेवोनयति ॥७१ उद्भिदान्युदवान्यत्र प्रवन्ति सरिद्वरा । वसाहकश्च ऋपभो चनो मनाक एव च ॥७२ विनिविष्टा.प्रतिदिश निमनालवणाम्बुधिम् । चन्द्रकान्तस्तथा द्रोण.सुमहाश्चशिलोरचय 11७३ उद्गायता उदीच्यान्तु अवगाढा महोदधिम् । चत्रो वधिसश्चैव तथा नारदपवत ७१ प्रतीचीमायतास्ते में प्रतिष्ठास्ते महोदधिम् । जीमूतो द्रावणश्चेव मनावश्चन्द्रपर्वतः । ७५ आयतास्ते महार्शलाः समुद्र दक्षिणम्प्रति । चक्रमैना योमध्ये दिवि सदक्षिणापथे ॥७६ तत्रसवर्तको नामसोऽग्निः पिवति तज्जलम् । अग्निः समुद्रवासस्तु और्वोऽसौवडवामुख ॥७७ उन ह्रदो से शान्ती और मध्वी दो नदियाँ प्रसूत हुई हैं। उनमें किम्पुरुप आदि जो आठ हैं वे ही रहा करते है और उनमे देव वर्षा नहीं करता है ।७१।। वे ऐसे ही स्थल हैं जहां पर उदक उमिद ही होते हैं तथा श्रेष्ठ नदियों ब्रहा करती हैं जिनके नाम बलाहक- ऋषभ-चक्र और मैनात हैं। ये प्रत्येक दिशा में विशेष रूप निविष्ट हैं और अन्त में कैलास वर्णन सार सागर में निमग्न हो जाते हैं। इन्द्र कान्त-द्रोण और पहान शिलोच्चय उत्तर दिशा में उगान करने वाले हैं तथा महा सागर में घवाढ होते हैं। चक्र-रिक और नारद पद ये पूर्व दिशा में प्रायत है और वे महोदधि में प्रतिष्ठित हैं । जीमूत-द्रावण मैना और पद्र पर्वत ये महान विशाल शेल है जो अति विस्तृत हैं तथा दक्षिण समुद्र के प्रति रहते हैं और पत्र एवं मैनाक के मध्य मे दिवलोक में दक्षिणापय मे है ॥२,७३, ७५, ७५, ७६|| वहा सवर्तक नाम वाला है और वह भनि उसके जल को पी जाया करता है। समुद्र में निवास करने वाला अग्नि और होता है जो कि बावामुख नाम बाला है।॥७७॥ इत्येते पर्वताविष्टाश्चत्वारो लवणोदधिम् । विद्यमानेषु पक्षेपु पुरा इन्द्रस्य व भयात् 11७८ तेपातु दृश्यते चन्द्र शुक्ने कृष्णे समाप्लति.। ते भारतस्य वपस्थ भेदा येन प्रकोत्तिता ७६ इहोदितस्य दृश्यन्ते अन्ये त्वन्यत्र चोदिताः। उत्तरोत्तरमेलेपा वर्षगुदिन्यते गुण १८० भाराग्यायु प्रमाणाम्या धम्मंतःमतोऽर्धक । सवितानि भूतानितेषु वर्षेषुभागश. ॥८१ तसन्ति नानाजातीनि तेषु सर्वेषु तानि । इत्येतद्वारयद्विश्व पृथ्वी जगदिद स्थिता ।।२ ये बारीपात सबोदधि को आविष्ट किये हुए हैं । प्राचीन समय में इन्द्रदेव के द्वारा पो के पशो का घेवन कर दिया गया था जिससे उडकर वेष्टयान जासकें तो पक्षों के हियमान होने पर वे इन्दु के म के प्रारण हो समुद्र में समाविष्ट हो गये हैं 11७11 उमर चन्द्र में पुलक मे और कृष्ण पक्ष म समाप्तुति दिवसायी दिया करती है । वे भारत वर्ष के अंदा है अतएव वोतित नहीं किये गये हैं 1191 यहाँ -

पुर
पर उतरे दिवाई दिया । और शेममय किन
मप्रेरित हो । उत्तरोतर (भाग आग में) इमां वर्ष दुजों द्वारा
महिमा कहे जाते है । धारोग्य और और मायु के प्रभागों काम
और अपं से उन वर्षों में भागनः प्राणी गम्वित या बात है। उन
सब में ये भनेक प्रकार की जातियो नियाम किया करती है। इन सबको
विश्य धारण रिया करता है और यह जगत जो है वही पृथ्वी रिचा है।
1601511
५३-पृथिवी परिमाण वर्णन
मत उद्ध्वं प्रवक्ष्यामि मूर्याचन्द्रमसोगतिम् ।
सूर्याचन्द्रमसावेतौ भ्राजन्तीयावदेवतु ॥१
सप्तद्वीपसमुद्राणा द्वीपाना माति विस्तरः ।
विस्तराद पृथिव्यास्तु भवेदत्यन वाहतः ।।२
पर्यासपरिमाणञ्च चन्द्रादित्यो प्रकाशतः ।
पर्यासपारिमाण्यात्तु बुधस्तुल्य दिव: स्मृतम् ॥३
श्रीन् लोकान् प्रतिसामान्यात् सूर्यो यात्यविलम्वतः।
अचिरात्त प्रकाशेन अवनात्तु रविः स्मृतः ॥४
भूयो भूयः प्रवक्ष्यामि प्रमाण चन्द्रसूर्ययोः ।
महितत्वान्महच्छब्दोह्यस्मिन्नर्थेनिगद्यते ॥५
अस्य भारतवर्षस्य विष्कम्भात्तुल्यविस्तृतम् ।
मण्डलंभास्करस्याययोजनस्तन्निबोधत ॥६
नवयोजनसाहस्रो विस्तारो मण्डलस्य तु ।
विस्तारत्रिगुणश्चापिपरिणाहोऽत्र मण्डले ।
महर्षि श्री सूतजी ने कहा-अब इससे आगे हम सूर्यदेव और
चन्द्रमा की गति का वर्णन करेंगे। ये दोनों सूर्य और चन्द्रमा जितनी दूर

पृथिवी परिमाण वर्णन सक भाषमान हुआ करते हैं। सातो द्वीपी के समुद्रो का तथा द्वीपों का महान् विस्तार शोभित एवं दीप्त होता है। इस विस्तार का आधा भाग पृथ्वी का अन्यत्र और वाह्य हुआ करता है 1 9, 31 पर्यास के परि- माप तक चन्द्र मार सूर्य प्रकाश दिया करते हैं। पर्यास के परिमाण्य से बुधों के द्वारा दिवलोक के तुल्य कहा गया है 11 ३1 प्रति सामान्य से दिना बिलम्ब किये हुए सूम्यं तीन लोको को जापा करता है । शीघ्र ही प्रकारा देने के कारण से तथा अवन करने स यह रवि पहा गया है 111 मैं बारम्बार चन्द्र और सूर्य का प्रमाण हगा। महितत्व होने से मन- यह गाद इस अयं मे निगदित किया जाता है ||५|| इस भारतवर्ष के विसम्म से तुल्य विस्तृत भगवान भुवन भास्कर मण्डल है । इसके प्रतलर अव योजनों के परिमाण में भी उसका ज्ञान प्राप्त कर लो। नौ सहल योजन मडल का विस्तार है और विस्तार से तिगुना परिणाह भा इस मडल मे होता है ।।७।। विष्कम्भान् मण्डला व भास्कराद् द्विगुण, शशो । अत पृथिव्या वक्ष्यामि प्रमाण याजन पुन । सप्तद्वीपसमुद्राया विस्तारो मण्डलस्य तु । इत्येतदिह सख्यात पुराणे परिमाणत II तदृश्यामि प्रसरयाय साम्प्रतवाभिमानिमि । अमिमानिनो हाता ये तुल्यास्ते सा प्रतरित्वह् । १० देयदेवरतीतास्तु रूप मभिरेव च । तस्माद साम्प्रतवक्ष्यामि वसुधातलम् ॥११॥ दिव्यस्य सन्निशोर्य साम्प्रतरेवरस्नशः । शतार्स कोटि विस्ता पृथिवीयरस्नश स्मृता ।।१२ तस्याश्चादप्रमाणञ्च मेरोकोत्तरम् । मेरोमध्ये प्रतिदिश कोटिरेवातु सा स्मृता ॥१३ तथा तमसाण मेमोननवति पुन..

मरम्यपुराण
--
पञ्चाशच्च सहस्राणि पृथिव्यद्धस्य विस्तरः ॥१४
विष्काम और मण्डल से भास्कर से दुगुना शशि है। इससे पुन:
योजनो के द्वारा पृथिवी के प्रमाण के बतलाऊंगा ॥८॥ सात द्वीप
और सात समुद्रों वाली के मडल का विस्तार यहा पर यह इतना ही
सख्यात पुराण मे परिमाण से किया गया है । ॥ उसको प्रशख्यात
बतलाऊंगा। जो इस समय में अभिमानियो के द्वारा किया गया है।
जो अभिमानी गण व्यतीत हो गये हैं वे यहाँ पर इस समय में होने वालों
के ही तुल्य हैं ।।१०।। देवदेव रूप और नामों से अतीत हो चुके हैं।
इसी कारण से इस समय में होने वाले देवो से वसुधा तल का बतलाता
हूँ॥ ११ ॥ साम्प्रतो के द्वारा दिव्य का सन्निवेश कृत्स्न नहीं है। पूर्ण
रूप से यह पृथिवी शत के अर्ध कोट विस्तार वाली पूर्णतया बतलाई
गयी है ।। १२ ।। उस पृथिवी का अर्ध प्रमाण उत्तरोत्तर मेरु का ही है ।
मेरु के मध्य मे प्रत्येक दिशा में एक करोड वह कही गई है। इस प्रकार
से सौ सहस्र नवासी और फिर पचास सहस्र पृथिवी के अर्ध भाग का
विस्तार है ।। १३, १४ ॥
पथिव्या विस्तर कृत्स्न योजनस्तन्निबोधत ।
तिस्र कोटयस्तु विस्तारात् सख्यातास्तु चतुर्दिशमा१५
तथा शतसहस्राणामेकोनाशातिरुज्यते ।
सप्तद्वीपसमुद्राया. पृथिव्याः स तु विस्तरः ॥१६
विस्तारत्रिगुणञ्चीवपृथिव्यन्तरमण्डलम् ।
गरिणतयोजनानान्तुकोटचस्त्वेकादशस्मृता. ॥१७
तथा शतसहस्राणा सप्तत्रिंशाधिकास्तु ता ।
इत्येतद्वैप्रसख्यात पृथिव्यन्तरमण्डलम् ।।
तारकासनिवेशस्य दिवि यावत्तु मण्डलम् ।
पर्याप्तसग्निवेशस्य भूमेस्तावत्तु मण्डलम् ॥१८
पर्यासपरिमाणञ्च भूमेस्तुल्य दिवः स्मृतम् ।

३७६
पृथिवो परिमाण वर्णन
मेरोःप्राच्यादिशायान्तुमानसोत्तरमूर्द्धानि ॥१६
वस्त्वेकसारामाहेन्द्री पुण्या हेमपरिष्कृता ।
दक्षिणेन पुनर्मेरोनिसस्य तु पृष्ठत. ॥ ०
ववस्वतो निवसति यमः संयमने पुरे ।
प्रतीयान्तु पुनर्मेरोनिसस्य तु मूनि ॥२१
अब पृथिवी का पूर्ण विस्तार योजनो के द्वारा समझ लो। चारी
दिशाओ मे विस्तार से तीन करोड सख्यात हैं ।। १५ ।। इस मांति से
सात द्वीप समुद्रो वाली पृथिवी का वह विस्तार सौ सहन उन्यासी रहा
जाता है ।। १६॥ पृथिवी का अन्तर मन्डल का विस्तार विगुण है ।
योजनों का गणित किया गया है जो एकादश करोड कहा गया है । इस
रीति से सो सहस्र और संतास अधिक वे हैं - इतना ही यह पृषियी का
अन्नर महल होता है।॥ १७ ॥ दिन मे तारकाओं के निवेश पा
जितना मडर है उतना ही पर्यप्त सन्निवेश वाली भूमिका मन्न
॥१८॥ दिव का पर्याप्त परिमाण भूमि के ही तुल्य कहा गया है। मेर
से पूर्व दिशा में मानसोत्तर मूर्दा में वास्त्वक मार वाली पुण्य मन्त्री हेग
से परिष्कृत है । पुन: मेह के दक्षिण में और मानम के पृष्ठ भाग -
मनपुर में वैवस्वत यम निवास किया करना है । पुनः मेरो परिगम और
मानस के मूधों में वरण देवकी पुरी है ॥१६, २०, २१॥
सुपा नाम पुरी रम्या वरुणस्यापि धीमगः ।
दिश्युत्तराया मेरोस्तु मानसस्यय मा नि ,
तुल्या महेन्द्रपुर्यापि सोमस्यापि यिमाए।
मानसोत्तरपृष्ठे तु लोपालपादिगम् ।।
स्थिता धर्मव्यवस्था मोकामनायथ ।
लोकालोपरिष्टान. गरिमाया।
काष्ठागतस्य मूय्यंग्य गमित्र नियाधान।
दक्षिणोपक्रम गण्यं बिपि मग ॥२५

३८० मत्स्यपुराण ज्योतिपाचक्रमादाय सतत परिगच्छति । मध्यगश्चामरावत्या यदा भवति भास्वर ॥२६ ववस्वते सयमने उद्यन सूय्य प्रभ्यते । सुपायामर्द्ध रावस्तु विभावर्यास्तमेति च ॥२७ ववस्वते सयमने मध्याह्न तु विर्यदा। सुपायामथ वारुण्यामुत्तिष्ठन् स तु दृश्यते ॥२८ उस धीमान् वरुणदेव की पुरी का नाम सुपा है जो परम रम्य है जो मेरु के उत्तर दिशा मे और मानस के मूर्धा मे है । महेन्द्र की पुरी तुल्य ही सोम की भी विभावरी हैं। मानस के उत्तर पृष्ठ मे चारों दिशाओ मे लोकपाल हैं जो घम की व्यवस्था करने के लिये तथा लोको के सरक्षण करने के लिये ही हैं । इन लोकपालों के ऊपर सब और दक्षिण अयन मे सूर्य की गति के विषय में ज्ञान प्राप्ति करलो ॥ २२, २३ २.।। वहाँ पर दिशाओ मे गमन करने वाले भगवान् सूय्यदेव को जो गति होती है उसको समझ लेना चाहिए। दक्षिण के उपक्रम में सूय की ही भांति प्रसर्पण किया किरते हैं ।। २४।। जिस समय मे भग- धान् भास्करदेव अमरावती मे मध्य मे गमन करने वाले होते हैं उस समय मे ममस्त ज्योतिपियो के चक्र को लेकर सतत् परिगमन किया करते हैं ॥ २५ ॥ वैवस्वत सयमन मे उदित होते हुए सय दिखलाई दिया करते हैं । सुपा मे अघ रात्रि वाला है और विभावरी म अस्तता को प्राप्त होना है ।। २६, २७॥ जिस समय मे वैवस्वत सयमन मे मध्याह्न की चेल म रवि हुमा करते हैं उस समय मे वारुणी जो सुपा पुरी है उसमे उरित होते हुए वे दिधलाई दिया करते हैं ॥२८॥ विभावर्यामद्धरात्र माहेन्द्रयामस्तमेव च । सुपायामथ वारण्या मध्याह्न तु रविया ॥२६ विभावा सोमपुर्या उत्तिष्ठति विभावमु । महन्द्र स्यामरावत्यामुद्गच्छति दिशाबर १३० सूय क्षिप्त पृथिवी परिमाण वर्णन अद्ध रात्र संघमने वारुण्यामस्तमेति च । स शीघ्रमेव पर्येति भानुरालातचक्रवत् ॥३१ भ्रमन् वै भ्रममाणनि ऋक्षाणणि चरते रविः । एवं चतु' पार्वेषु दक्षिणा तेषु सर्पति ॥३२ उदयास्तनये वाऽसावुतिष्ठति पुनः पुनः । पूर्वाह्न चापराह्ने च द्वौ द्वौ देवालयो तु सः ॥३३ पतत्येकन्तु मध्णढे भाभिरेव च रश्मिभिः । उदितो वर्द्ध मानाभिमंध्याह्ने तपते रविः ॥३४ अतः परं ह्रमन्तीभिगोभिरस्त स गच्छति । उदयास्तमयाभ्या च स्मते पूर्वापरे तु वै ॥३५ विभावरी में अधं रात्रि का समय होता है और माहेन्द्री में अप्त- गत हो जाया करते हैं जब कि वरुण की पुरी सुपा में मध्याह्न में सूर्य होते हैं ।। २६ । सोम की पुरी विभावरी में विभावसु उदित होता है और महेन्द्र देव को अमरावती में दिवाकर उद्गत हो जाया करते हैं । 11 ३० ।। संयमन में अर्थ रादि होतो है तथा वारुणी पुरी मै यस्तगत हुआ करते हैं। वह मानु एक आलात के चक्र की भांति ( आलात-जलती हुई लकहो के अङ्गार के सहम) शीघ्र ही परिगमन किया करता है ।। भूम माण ऋक्षो ( नक्षत्रों के समीप में भ्रमण करता हुप्रा रवि विचरण किया करता है। इस प्रकार से उन चारों पायो म दक्षिणा को वह प्रमाण किया करता है ।।३२॥ उदय और प्रस्त के समय में यह पुनः पुनः उत्तिपमान हुमा करता है। पूर्वाह्न (दोपहर का प्रथम भाग) और यपराहत (दोपहर का पिछला भाग ) में वह दो-दो देवालयो मे पतन क्यिा करता है ।। ३३|| अग्नी प्रभामों के द्वारा मध्याहन पतन करके प्रकाशित किया करता है तथा बर्द्धमान अपनी रश्मियों (रिणों ) के द्वारा यह रवि मध्याह्न को वेला में तपता है ॥३४॥ इसके पश्चात हाय को नः शनैः प्राप्त होने वाती शिरणों के द्वारा

मत्स्यपुराण
अस्ताचलगामी हो जाया करता है । इस उपशाल और यस्तपालों के
द्वारा ही ये पूर्व तथा पर बताये गये हैं ।।३।।
यादृर पुरस्तात्तपति या पृष्ठे तु पाश्वयो ।
योदयस्त दृश्येत तेपासउदय स्मृतः ११३६
प्रणाश गच्छते यत्र तपामस्त स उच्यते ।
सर्वेषामुत्तरे मेरलोलोकस्य दक्षिणे ॥३७
विदूरभावादकम्य भूमेरेपा गतस्य च ।
श्रयन्ते रश्मयो यस्मात्तेन रात्री न दृश्यते ॥३८
ऊवं शतसहस्रांशु स्थितस्तत्र प्रदृश्यते ।
एव पुष्करमध्ये तु यदा भवति भास्करः ॥३६
त्रिंशद्भागध मेदिन्या मुहूर्तेन स ग यति ।
योजनाना सहस्रस्य इमासख्या निवोधत ॥४०
पूर्ण शतसहस्राणा एकविंशच्च सास्मृता ।
पञ्चाशच्चसहस्राणितथान्यान्यधिकानिच ॥४१
मौतिकी गनि पा सूर्यस्य तु विधीयते ।
एतेन भयोगेन यदा काष्ठान्तु दक्षिणाम् ॥४२
परिग- छति सूर्योऽसौ मास काष्ठामुदक् दिनात् ।
मध्येन पुष्करस्याथ भूमते दक्षिणाने १४३
जिस प्रकार का पहिले तपना है और जैसा पादों के पृष्ठ भाग
मैं होता है । जहाँ पर इसका उदय दिखलाई दिया करता है उनका यह
उदय कहा गया है ।। ३६५ जहाँ पर यह विनाश को प्राप्त हो जाया
करता है उनका वह अस्तकाल कहा जाता है। सब वर्षों के उत्तर मे
मेरु होता है और लोकालोक पर्वत के दक्षिण मे है ॥ ३७॥ इस भूमि
से सूर्य के विदूर भाव होने के कारण यह गत हु को रश्मियो का सेवन
पिया करते हैं । इसी कारण से उसके दर्शन रात्रि मे नही हुआ करते हैं
॥२८|| यह शत सहस्राशु अवं भाग में स्थित होता है वहा पर

पृथिवी परिमाण वर्णन
दिखलाई दिया करता है । इस रीति से जिम समय में भास्कर पुष्कर
के मध्य में होता है वह मेदिनी के विशत् गण की मुहत्तं मात्र में
चला जाया करता है। यह संस्था सहन योजनों को समझ लो ॥३६,४०॥
वह सो सहस और इकत्तीम हो गई है तथा पचाए सहन्न और अधिक
है।।४१ ।। सूर्य का यह गति मोहूतिको की जाती है । इसी क्रम के
योग मे जिम समय में यह दक्षिण दिशा में परिगमन किया करता है तो
यह सूर्य दिन से उत्तर दिशा में एक मास रहता है और पुष्कर के मध्य के
द्वारा दक्षिणायन में भमण पिया करता है ।।४२, ४३।।
मानसात्तरमेरोस्तु अन्तर त्रिगुण स्मृतम् ।
सर्वतो दक्षिणायान्तुकाष्ठायातन्नियोधन ॥४४
नवकोटयः प्रसख्याता योजनः परिमण्डतम् ।
तथा शतसहस्राणि चत्वारिंशञ्च पन्चच । ४५
अहोरात्रात् पतङ्गस्य गतिरेपा विधीयते ।
दक्षिणादि निवृत्ताऽसौ विपुवस्थोयदारविः ॥४६
क्षीरोदस्य समुद्रम्योतरताऽपि दिश वरन् ।
मण्डस विपुव चापियोजनस्तनिवोधन. ।।४७
तिम्र. कोटयस्तु सम्पूण विपुवस्यापि मण्डलम् ।
तथा शतमहम्राणि विशत्येकाधिकानि तु । ४८
धावणे चौतर काप्ठा चियमानुयदा भवेत् ।
गोमेदस्य परद्वीपे उत्तराञ्च दिश चरन् ॥४
मानम के उत्तर मेंक का अलर त्रिगुण कहा गया है। मर ओर
से उमहोदक्षिण दिशा में जान लो ॥४४॥ गेजनों द्वारा परिमन्डल
नौ करोड प्रमख्यात है। तथा सो सहन और पैतालीम है ।। ४५॥ एर
प्रहोरात्र से मूर्य की यह गति हो गयी है। किम समय में यह रवि
दलित दिशा म निवृत्त होकर विश्व में दिन होता है भीर मगर के
उतर दिगा में विचरण करता हुमा दिपुरन माहत में आता है उसको

मत्स्यपुराण भी योजनो के द्वारा ही समझलो ।। ४६, ४७॥ विषुव का मन्डल सम्पूर्ण तीन करोड तथा शत सहस और नीस अधिक है ॥४८॥ श्रावण जिस समय में उत्तर दिशा मे चित्र भानु होता है तो गामेद वे परद्वीप में उत्तर दिशा में विचरण करता हुआ होता है ॥१६॥ उत्तरायाः प्रमाणन्तु काष्ठाया मण्डलस्य तु । दक्षिणोत्तग्मध्यानि तानि विन्द्याद्यथाक्रमम् ।५० स्थान जरद्गव मध्ये तथरावतमुत्तरम् । वैश्वानर दक्षिणतो निर्दिष्टमिह तत्त्वत ॥५१ नागवीथ्युत्तरा वोथो ह्यजवीथिस्तु दक्षिणा। उभे आपाढमूल तु अजवीच्यादयस्त्रय ॥५२ अभिजित् पूर्वत स्वातिनागवीथ्युत्तरास्त्रय. । अश्विनीकृत्तिकायाम्यानागवीथ्यस्य स्मृता ॥५३ रोदिया मृगशिरो नागवीथिरिति । पुष्याश्लेपा पुनर्वस्वोर्वीयो चरायती स्मता ॥५४ निसस्तु वीथया ह्य ता उत्त मार्ग उच्यते। पूर्वउत्तरपरगुन्यो मघा चामो भवेत् ।। ५ पूर्वोत्तरप्रोप्टपदी गोवीथी रेवती स्मृता । श्रवणश्च धनिष्ठा च वारणच जरद्गवम् ।।७६ उत्तर दिशा मडस का प्रमाण उनशीपचारम दक्षिणोत्तर मध्यों को ही जानना चाहिए ॥५० मध्य प जरद्गय स्थान है तथा उत्तर मएरावत है। यह परक्षण म सत्या श्वानर निरिट किया गया है ।।५१ नागवीची उत्तरा वीपि है और प्रवीपि दक्षिणा है। ये दोनो मापार भूष और प्रायोयि बाद सीन है। पूनम मिनित- शनि और मागीवि पतीन उत्तरा। स्विनी-इतिका-याम्या तीन माघीपी की गयी है ।।४३ । गहिणी--मगिरा और पास-यह माम पीपीपी पी है। पुष्प-सा और पुनगुको बीपि गवती यो परिमाण वर्णन बड़ी मयो है । ये तीनों दोषिया उतर मार्प कहा जाना है। पूर्वा ओर उत्तरा फाल्गुनी तथा पा ये मापं भी होते हैं 11| पूर्वा और उत्तरा प्रोष्ठपदा दोनो तथा रेवती गोषोयी नही गयी है। था- धनिष्ठा और वारुण जाङ्गव हैं ॥५॥ एतास्तु वीथयस्तिसो मध्यमोमार्ग उच्यते । स्तचित्रातथास्वातोपजवोथिरितिस्मता ॥५७ जेष्ठा विशाखा मैत्रञ्च मगधोधी तथाच्यते । मूल पूर्वोत्तरापाढे वीथोवैश्वानरी भवेत् ॥५८ स्मृतास्तवस्तु वौथ्यस्ता मागे व दक्षिणेपुन । काष्ठयारन्त चततक्येयोजन पुन ॥५६ एतच्छतसहस्राणामेकत्रिशत्तु वे स्मृतम् । शतानि त्रीणि चा यानि स्त्रिशत्तथैव च ॥६० फाप्ठयोरन्तर ह्येतद्याजनाना प्रकीतितम् । काष्ठयोलखयोश्व अयने दक्षिणोत्तरे।६१ ते वक्ष्यामि प्रसख्याय योजनस्तु भियोधत । एकमन्तर तयुक्तान्येतानि सप्तभि: 11 सहस्रेणातिरिक्तो च तताऽन्या प-शिति । लेखयो. काष्ठयोश्चंग बाह्याभ्यन्तरस्योश्चरन् ॥६३ सायन्तर स पति मण्डलान्युत्तरायणे। वाहता दक्षिणेनेव सतत सूययमण्डलम् ॥ ६१ ये तीनों पोषिो मध्यम मार्ग कहा जाया करता है। इस-चित्रा तथा स्दाती-यह अबोयो-इस नाम से हो गयी है ॥ ५४॥ स्पेष्ठ -सिखा और मेक इन मुगीयो कही जाती है। मुम-पूर्वी और उत्तरा आपा हानी दीयों होती है। ये तीनो कौथिया दक्षिण माग में बनायी गयी है। शिको आना है चमो गुन योजना बतलाये। र अन्नर एन । M

३८६
मत्म्यपुराण
योजन का कहा गया है। तीन सौ और अन्य तेतीस दिशाओ मे योजनो
का अन्तर कीर्तित किया गया है। दिशाओ मे-नेखो मे और दक्षिणोत्तर
बयन मे जो अन्नर है उसको प्रसख्यात करके योजनो के द्वारा समझिये।
एक-एक का अन्तर है और उसी की तरह सातो से ये युक्त है । एक
सब से अतिरिक्त अय पच्चीस योजन वाह्य और आभ्यन्तर लेखो और
दिशाओ मे विचरण करता हुआ वह अभ्यन्तर मे मण्डलो को जाना करता
है। उत्तरायण मे वाह्य स और दक्षिण से ही निगनर सूर्य मण्डल
विचरण किया करता है ॥५८१५:१६८।६११६२३ ३।६४॥
चरग्नसावुदी याञ्च ह्यशीत्या मण्डलान् श तम् ।
अभ्यन्तर स पयति मने मण्डलानि तु ॥६५
प्रमाण मण्डलस्यापि योजनानान्निबोधत ।
योजनाना सहस्राणि दश चाप्टो तथा स्मृतम् ॥६६
अधिका-यप्टपञ्चाशद्याजनानि तु वे पुन ।
विप्वम्भो मण्डलस्यव तियक स तु विधीयते ॥६७
अहस्तु चरतेगाभे सूर्यो व मण्डलक्रमात् ।
चुनालचनपयन्ता यथा चन्द्रो रविस्त । ॥६८
दक्षिणे चक्रवत् सूर्यस्तयाशीघ्र निवत्तते ।
तस्मात्प्रष्टा भूमि तु वालेनाल्पेनगच्छति II
मूर्यो द्वादशभि मोघ्र महूदक्षिणायने ।
जयादशा मृक्षाणां म ये पति मडलम् ॥७.
इस प्रकार म विचरण पाता हपा यह उत्तर मे एगो अरसी
मरहमों में अररिगमन पिरतापौर मण्डमो मेमण परता
है॥ मगम पा भी प्रमाण यानो मे समा लो। एक
पर अाह यात्रा पाय और अटर वा यात्रा पोरगी yिr
पुन र गर । वा मन भि for frपा आता है।
.१६७दिन म गृः प्रम मभन मला पण ॥

सूर्यगति वर्णन । करता है । कुलाल ( कुम्हार वर्तन वनान वाला ) के चाक पर्यन्त जिस प्रकार से चन्द्रमा है उसी भांति रवि भी होता है। दक्षिण मे चक्र की हो तरह सूर्य उस भांति शीघ्रता से निवृत हुआ करता है कि प्रकृष्ट अर्थात् अति दूर में रहने वाली भी भूति को अति अल्प काल मे चला जाया करता है । ६८, ६६|| यह सूर्य दक्षिणायन मे अत्यन्त शीध्र ही प्रयोदश के बारह मुहों से आधे ऋक्षो के मध्य में मण्डल का नरम पिया करता है ॥७॥ मुहूर्तरतानि मृक्षाणि नत मष्टादशश्चरन् । कुाललचक्रमध्यस्थो यथा म द प्रसपति ॥७१ उदमान नया मूव्य रायते मन्दविनमः। तस्माद्दोघेण कालेन भूमि सोऽल्पा प्रसपति ।। सूरोऽष्टादशभिरह्नो मुहूर्तरदगायने ॥७२ त्रयोदशाना मध्ये तु ऋदाणा चरते रवि । मुहूर्तस्तानि ऋक्षाणि रात्री द्वादशभिश्चरन् ॥७३ तता मन्दतर ताभ्या चक्रन्तु अमते पुन । मुत्पिण्ड इव मध्यस्था भ्रमतेऽमोध्रुवम्तथा 11७४ महतस्त्रिशता तावदहोरान ध्रुवो अमन् । उभयो. काष्ठयोमध्ये भमते मण्डलानि तु ॥७५ उत्तरामणेऽस्य दिया मन्दगति स्मृता। तस्यैव तु पुनर्नत शाघ्रा सूय्यम्य वं गति ॥७६ दक्षिणप्रक्मे वापि दिवा शीघ्र विधीयते । गनि. सूर्यस्य व नक्त मन्दा चापि विधीयते 11६७ एव ग तविरपेण विभजन रात्यहानि तु । अजवाच्या दक्षिणाया लोकालोक्म्य चोत्तरम् ॥७८ राधि के समय में न नक्षत्रों को अठ रह मुहतों म विचरण करता हुआ दुलाल र चत्र को मध्य में स्थित होने की भौति मा प्रपण ३८८ मत्स्यपुराण किया करता है ।। ७१ ॥ उत्तर की पोर गमन करने पे सूर्य म द विक्रम वाला होकर ही गमन किया करता है । इसो मन्दगति होने के कारण से वह बहुन अधिक लम्बे समय से बहुत ही अल्प भूमि का प्रसर्पण किया करता है । उदगायन अर्थात् उत्तरायण मे दिन को अठारह मुहूतों मे सूर्य प्रयोदश ऋक्षो के मध्य मे चरण किया करता है और उन्हीं ऋक्षों को रानि मे बारह मुहूतों मे चरण करता है ।।७२, ७३ ।। इसी से उन दोनो से चक्र अधिक मन्द भ्रमण किया करता है। एक मिट्टी के पिण्ड को भाति ही मध्य में स्थित यह ध्रव की भांति भ्रमण करता है। तीस मुहूर्तों में एक अहोरात्र मे ध्र व भ्रमण करता हुआ दोनो दिशाओ के मध्य मे मण्डली का भ्रमण करता है 1७४, ७५ ॥ सूर्य को उत्तर क्रमण मे दिन मे मन्द गति कही गयी है। उसी सूर्य की फिर रात्रि के समय मे शीघना वाली गति हो जाया करती है । दक्षिण के प्रक्रमण करने में भी दिन मे शीघ्रता का विधान कहा जाता है और रात्रि में सूर्य की गति मन्द हो जाया करती है। इस प्रकार से रात और दिन को अपनी गति की विशेषता के द्वारा विभाजन करता हुआ दक्षिग अजवीथी मे लोका- लोक के उत्तर में चरण किया करता है ।।७६,७१,७८॥ लोकसन्तानतोह्येष वैश्वानरपाद्वहि. । व्युष्टिर्यावत् प्रभा सोरी पुष्कराव सप्रवर्त्तते ॥७६ पार्वेभ्यो वाह्यतस्तावल्लोकालोकश्च पर्वत । योजनाना सहस्राणि दशोद्ध्वं चो छनो गिरि १५० प्रसाशश्चाप्रकाशश्च पवत परिमण्डल । नक्षत्रचन्द्रसूर्याश्च ग्रहास्नारागणं सह ॥८१ अभ्यन्तरे प्रवाशन्ते लोगालोमस्य व गिरे । एतावानेवलोरस्तु निरालोवस्तत परम् ॥८२ लोक आलोवने धातुनिरालोरस्त्वतोक्ता। लागालोगो तु सधत्त तस्मा बसूर्य परिभूगर ॥८३ एम सूर्य पति वर्णन तस्मात्सन्ध्येतितामाहेरपाव्युष्टयथान्तरम् । उपारारि स्मृताविप्रेव्यु प्टिश्चापिअह स्मृतम् ॥८४ लोक सन्तान से यह वैश्वानर पथ से वाहिर ही भ्रमण करता । जब तक पुष्टि होती है यह सूर्य की प्रभा पुप्पार से संप्रवृत्त हुआ करती है ।। ७६ || पाश्वों से बाहिर के भाग मे लोकालोक नाम वाला महान पर्वत है। यह गिरि एक सहस्र दग योजन ऊर्च मे उच्छित है 11८० ॥ यह परिमण्डन पर्वत प्रकारा और अप्रकाश वाला है। नक्षत्र- चन्द्र और सूर्य ग्रह तारा गगो के साथ लोकालो पर्वन के अभ्यन्तर में ही प्रकाश दिया करते हैं। इतना ही लोक होता है उसके आगे शेष तो सव निरालोक अर्थात् प्रकाश रहित ही हुआ करता है ! लोक आलो- मे धातु है और निर लोक आलोक्ता है। इसी से सूर्य परिभ्रमण परता हुआ लोक और अलोक दोनो का सन्धान किया करता है ।।८१ 1८1८३।। इसी कारण उसको सन्ध्या-इस नाम से कहते हैं। यथान्तर ध्युटो से उपा कही जाती है। उषा रात्रि कही गई है और विप्रो यो द्वारा न्युष्टि दिन कहा गया है ॥४॥ विशत्कलो मुहूर्तस्तु अहस्ते दापच च । ह्रासो वृद्धि रह गदिवसाना यथा तु । ८५ सन्ध्या मुहूर्त मात्राया ह्रासवृद्धी तु ते स्मृते । लेखाप्रभृत्यधादित्ये विमुहूर्तागते तु वै ।।-६ प्रात.स्मृतस्ता कालोमागाश्चाहुश्च पञ्चच । तस्मात् प्रातर्गतासालान्मुहूर्ता सङ्गवस्त्रयः ॥६७ मध्याह्नस्त्रिमुतस्तुतस्मात्कालादनन्तरम् । तस्मा-मध्यन्दिनाकालाअपगाइतिस्मृतः ।।८८ श्रय एव मुहूर्तास्तु काल एपस्मृतो वुध । अपराह्मव्यतीताच्च काल साय स उच्यते ।। दशपञ्च मुहूर्ताह्नो मुहूर्तास्त्र एव च । दशपञ्च मुहूर्त व अहस्तु विपुवे स्मृतम् ।।६० मन्स्यपुराण वर्धत्यतो ह्रमत्येव अयने दक्षिणोतारे । अहस्तु ग्रसते रानि रानिस्तु ग्रसते अह 11६१ तीस कला वाला मुहून और पन्द्रह का दिन हो । है । दिवसों के भार्गों से दिय में हस और वृद्ध भी यथा रीति हुआ करते हैं । मुहूर्त मान मे सन्ध्या होती है और वे ह्रास तथा वृद्धि बताये गये हैं । तीन मुहूत समागत अादित्य मे लेखा प्रभूति होती है। फिर वह काल प्रात कहा गया है और पांच भाग कहे गये हैं। उस गत काल से तीन सङ्ग व गहूर्त होते हैं । मध्य न जो होता है वह तीन मुहूतौ का होता है फिर उस काल के अनन्तर उस मध्य दिन के काल से अपराह्न बहा गया है ।। ८५, ६,६७ ८६ ।। बुध लोगों ने इस पल को तीन ही मुहत बताया है । उस राहत क व्यतीत होने स जो काल होता है उसी को मायद्वाल कहा जाता है | ८६, पन्द्रह मुहूर्त वाले दिन का तीन मुहूत हो स य होता है। विपुत्र मे यह दिन दश और पांच मुहूर्त वाला ही कहा गया है।६। इसी कारण से दक्षिणायन और उत्तग- यण मे यह दिन बढ़ जाता है और फम भी हो जाया करता है अर्थात दिन बडे छोटे हुआ करत हैं। दिन ता रात्रि का ग्रास कर जाता है और रात्रि दि को प्रम जाया करती है । तात्पर्य यही है कि दिन छाटे हैं तो गति बड़ी हो जाती है और रात्रि सटी होती है सो दिन बा हो जाया परता है। पारद्वसन्तयोमध्य विपुवातुविधीयते । आनोकान्त स्मतोलोयो लोपाश्चालौर उज्यते । १२ मारपात्रा स्थितास्तत्रलोलोवरय मध्यत । चत्वारस्ते महात्मागस्तिष्टन्त्याभूतसप्लवम् ।।३ मुशामा चैव चंगज. पदमश्च प्रजापति । हिरोमापजन्य वे तुमान राजसश्च स १६४ तिद्वन्दा निरभीमाना निस्तन्द्रा निप्परिहा । लोपाला सितारते लोकालो पतुर्दिशम् ।१५

२११
ह
सूरं पति-वर्णन
•
उत्तरं यदगस्यस्य शृङ्ग वेपिसेवतम्
पितृयान. स्मृतः पन्था वैश्वानरपथावहि ॥६६
तपासते प्रजातामा ऋषयो येऽग्निहात्रिण. ।
लोकम्य सन्तानकरा:पित्यानेपथिस्थिता ॥६७
भूतारम्भकृत काम आशिपश्चविशाम्पते ।।
प्रारम्भन्ते लोककामास्तपापन्था:सदक्षिण. HE
परद् और वसन्न के मध्य मे दिपव का विधान किया जाता है ।
यह लोक आलोकाना कहा गया है और लोक बालोक कहा जाया करता
॥३२॥ उस तोकालीक के मध्य मे वहाँ पर लोपाल समबन्धित
रहा करते हैं। ये महान् मात्माओ वाले लोकपाल चारु है जो अब तक
भूत-सप्नव होता है तब तक वहां पर स्थित रहा करते हैं ।। ६२॥ इन
घरों मे सुशमा वैराज होता है -प्रजापति वर्दम है-हिरण्यरोमा पर्जन्य
है और चौथे वह राजन केतुमान होता है ।। ६४ ॥ य लोकालोक पर्वत
में चारो दिशाओ में लोकगाल स्थति रक्खा करते हैं । ये चागे ही बडे
निन्द-अभिमान से रहित-तन्द्रा शून्य और विना परिग्रह पाले हुआ
करते हैं ।। ३५॥ उत्तरमा मे जो शिखर है जिसका देवगए सेवन
किया करते हैं। वह वैश्यानर पप से वाहिर पितृगन मार्ग बताया गया
॥६६॥ वहाँ पर प्रजा को कामना रखन वाल ऋषिगण रहा करते
हैं जो कि अग्निहोत्र करने वाल मा करत हैं। ये इस नार की वृद्धि
करने वाले हैं और पितृयात के पय में स्थित रहा करते हैं ॥ १७ ॥ ह
विशाम्पते! य लो को वामना रखने वाले भूतो के आरम्भ के लिए किया
हमा कर्म और आशीर्वादो का प्रारम्म पिया करते हैं और उनका पन्या
सदक्षिण होता है ।
चलितन्ते तुनधर्म स्थापयन्ति युगे युगे।
सन्तप्ततपसा चंय मर्यादाभिः श्रुतेन च ।
जायमानास्तु पूर्व व पश्चिमाना गृहेषु ते ।

स्यिपुराण
पश्चिमाश्चैव पर्वेषां नायन्ते निधनेष्विह ॥१.०
एवमावर्तमानाते वर्त त्याभूतसप्सवम् ।
अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणां गृहमैधिनाम् ॥१०१
सवितुर्दक्षिण मागमाश्रित्याभूतसप्लवम् ।
नियावता प्रसरयंपा ये श्मशानानि भेजिरे १०२
लोकमव्यवहारार्थ भूतारम्भकृतेन च ।
इछाद्वेषरताच्चैव मैथुनोपगमा च वै ॥१०३
तथा कामकृतेनेह सेवनाविपयस्य च।
इत्येते कारण सिद्धाः श्मशानानीह भेजिरे ।।१०४
प्रजेपण. सप्तश्पयो द्वापरेविह जज्ञिरे ।
सन्तति ते जुगुप्स.ते तस्मा मृत्यूजितस्तु ते...०५
वे लोग युग मुम मे जो धर्म चलित हो जाया करता है उस धर्म
को पुन. स्थानिकपा करते हैं और धर्म की सस्थापना भली भांति किए
हए तप से ---मर्यादाओ से और थत के द्वारा ही किया करते हैं ॥६६ll
पहिले होने वाले वे पीछे हो। वातो के गृहो में जायमान ( समुत्पन्न)
दुमा परते हैं और जो पश्चिम अनि पीछे होने वाले हैं वे पूर्व पुरषो के
निधन हो जाने पर यहां पर जन्म ग्रहण किया करते हैं । इस गैति रो
आयमान होने वार अनि एक दूसरे के पीछे इम ससार में जाम ग्रहण
फरने को पुन पुन बात्ति काने वाले दे भूत संप्लव जय होता है तब
तर यहां पर दतमान रहा परते हैं। यह इन अपियो की सपा जो
गृहगेगे है पासी गहए ॥ १.०।१०१॥ ये सबिता के दक्षिण
माग का मारहण धरोही भून सं होता है हा क्रिया
वाले रहा परत है इनको समय यही है जो उपयुवन । पशामा
का भी साम्त है । मोर सम्पहार के लिए और भूतारमा
पारा ये हा तपादप में भी रति रखने वाले है तथा पुष
का भी उपगम 4tgiffe a लिए मारते हैं । इस गतिरो

1
सूर्यगति वर्णन
कामना के होने के कारण से ये विषयों का सेवन क्यिा करते हैं। यही
कुछ वारण हैं जिनके द्वारा ये सिद्ध लोग शमशानी का सेवन किया करते
पे। यहां पर प्रजा की इच्छा वाले सात ऋषि द्वापर में समुत्पन्न हुए
पे। फिर उन्होंने सातति को निन्दा को थी और इसी कारण से उन्होंने
मृत्यु को जीत लिया था।।१०२, १०३,१०१,१०५।।
अष्टाशीतिसहस्राणि तेपामप्यूध्वंरेतसाम् ।
उदक पन्थानपर्यन्तमाश्रित्याभूतसप्लवम् ।।१०६
ते सम्प्रयोगाल्लोकस्य मिथुनस्य च वर्जनात् ।
ईप्यद्विपनिवृत्त्या च भूतारम्मविवजनात् ।।१०७
इत्येते. कारणः शुद्ध स्तेऽमतत्व हि भेजिरे ।
आमूतसप्लवस्थानाममृतत्व विभाव्यते ॥१०८
लोक्यस्थितिकालो हि न मुनर्मारगामिनाम् ।
भृणहत्याश्वमेधादि पापपुण्पनिभ. परम् ।।१०६
आभूतसप्नवान्ते तु क्षीयन्ते चोर्ध्वरेतसः ।
कर्बोत्तरमृपिमस्तु ध्रुवो यत्रानुसस्थित ॥११०
एतद्विप्गुपद दिश्यतृतीय-योम्नि भास्वरम् ।
यत्रगत्वा नशोचन्तितद्विष्णो परमम्पदम् ॥
धर्मभ्रवस्य तिष्ठन्ति येत लोमस्य का क्षणः ॥१११
कर्बरता उन अटासी सहन ऋपियो ने उदक पय पयन्त समा-
थप दिया था और वह भी आभूत सप्लव तक वे दहां समवस्थित रहे
पे। वे लोक के सम्प्रयोग में और मिथुन के वर्जन से तथा इच्छा और
देष भाव को निवृत्ति से और भृतों का समाराम करने के वजन
से इन्हीं वतिपय कारणों के होन से वे परम विशुद्ध हो गये थे
और उन्होंने अमृतत्व को प्राप्त कर लिया था। उनका वह
अमृतव मा जब तब भूतो का सप्लव मा पा तभी तर रहा
पा और वे वनों पर बरावर स्पिड रहा करते थे। जो लोग वाम के

मत्स्यपुराण
मार्ग के गमन करने वाले हैं उनका लोक्य स्थिति काल नहीं होता है
क्योकि भ्रूण हत्या आदि महापापो से और अश्वमेध आदि पुण्य
कर्मों से
वह परिपूर्ण हुआ करता है ॥ १०६, १०७, १०८, १०६ ॥ जिस समय
में यह समस्त भूतो का सप्लव होता है तो उसके अन्त मे ऊर्वरता लोग
भी क्षीण हो जाया करते हैं। उत्तर ऋषियो से नहा ध्र व मस्थित
होता है । यह विष्णु का व्योम मे तृतीय परम भास्कर एष दिव्य पद है
जहा पर पहुँच कर उस विष्णु के परम पद की चिन्ता नही किया करते
हैं और जो लोभ की आकाक्षा रखने वाले हैं वे ध्रुव के ही धर्म मे स्थित
रहा कते हैं ।। ११०,१११।।
५४-ज्गेतिप चक्र वर्णन
एवं धत्वा कथा दिव्यामन वन् लोमहर्पणिम् ।
सूर्याश्चन्द्रमसोवारं ग्रहाणार्चव सवंश ॥१
भ्रमन्ति कथमेतानि ज्योतीपि रविमण्डले।
अव्यूहेनैव सर्वाणि तथा चासरेण वा ॥२
यश्च भ्रामयते तानि भूमन्ति याद वा स्वयम् ।
एतद्वदितुमिच्छामस्ततो निगद सत्तम ! ॥३
भूतसमोहन हतावतो मे निबोध तम् ।
प्रत्यक्षमपि दृश्य तत् समोहयति व प्रजा ॥४
योऽमो चतुदशःषु शिशुमारो व्यवस्थितः ।
उतानपादपुत्रोऽमो मेढीभूतो ध्रुवोदिवि ॥५
संप ममन भामयते चन्द्रादित्यो प्रहै: सह ।
भमन्तमनुसपन्ति नक्षत्राणि प पावत् ॥६
प्रवरय मनमा यो व भमने ज्योतिपाङ्गण. ।
यात नोकमपंयन्धं बद्ध प्रगपति ॥७

मोतिपचक्र वर्णन ऋषिगण ने कहा इस प्रकार से ग्रहों की स्थिति की कथा का श्रवण परके जो परम दिश्य यो वे फिर सूत जी बोले- मूर्य चन्द्रमा का चरण सौर सब ग्रहों का चरण किस प्रकार से हुआ करता है । ये समस्त ज्योतिया रवि के मण्डल में किस प्रकार से भ्रमण किया करती है ? वे सब अलग २ व्यूह राहत होकर या असहर भाव से भ्रमण करती हैं उनका कौन को प्रामण कराया करता है अथवा वे स्वयं ही ब्रमण किया करती हैं-हम अब यही ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं अतएव हे श्रेष्ठ तम ! इसका वर्णन कीजिए ॥१, २, ३॥ श्री मूजी ने कहा- यह भूत्रों का समोहन करने वाला है । उमगे आप लोग मेरे द्वारा जान लो! प्रत्यक्ष होते हुए भी वह दृश्य है और निश्चय ही प्रजात्रो को संमोहित करता है । जो यह चतुर्दश नक्षत्रों में गिशुमार व्यवस्थित है वह उत्तानपाद का पुत्र है जो दिवलोक में मेढीभूत घव है ॥४, ५॥ वही यह प्रमण करता हुआ ग्रहो के साथ चन्द्रमा और सूर्य को प्रमण करावा है । भ्रमण करते हुए उसके पीछे मर नक्षत्र चक्र पी भांति अतुमर्पण किया करते हैं । प्रव के मन से जो ज्योनियो का गग भ्रमरा परता है वह वातानीक मय वन्धों से घव मे वद होकर ही प्रमण क्यिा करता है।॥६,७॥ तेपां भेदश्च योगश्च तथा कालस्व निरचयः । अस्तोदयास्तयोत्पाता अयनेदक्षिणोत्तर ... विपुवग्रपंच सर्वमेतद् ध्रुवेरितम् । जीमूता नाम ते मेघा यदेभ्यो जीवसम्मवः ।। द्वितीय आवहन वायुमंघास्ते त्वमिश्रिताः । इतायोजनमानाच्च अध्यदं विकृताअपि !! वृष्टिमगस्तया तेषा धागधारप्रकोतिताः । पुष्करावतका नाम ये मेघाः पक्षमम्मवाः ।।११ सकण पक्षाश्मिा व पवंताना महोजसा ।

मन्स्य पुराण
उदहिमवत. शैलस्योत्तरे चैव दक्षिणे।
पुण्ड नाम समाख्यात सम्वग्वृष्टिविवृद्धये १२३
तस्मिन् प्रवर्तते वर्ष तत्तुपारसमुद्भवम् ।
ततो हिमवतो वायुहिम तर समुद्भवम् ।।२४
आनयत्यात्मवेगेन सिञ्चयानो महागिरिम् ।
हिमवन्तमतिक्रम्य वृष्टि शेष ततः परम् ।।२५
इभास्येचतत पश्चादिदम्भूतविवृद्धये ।
वषय समाख्यात सम्यग् वृष्टिविवृद्धये ।।२६
मेघाश्चाप्यायन चैव सर्वमेतत् प्रकीत्तितम् ।
सूर्य एव तु वृष्टीना स्रष्टा समुपदिश्यते ।।२७
वर्ष धर्म हिम रा सन्च्ये चैव दिन तथा ।
शुभाशुभफलानीह ध्रुवात् सर्व प्रवत्तते ।।२८
हिमवान् पर्वन के उत्तर भाग से पर्वत के दक्षिण और उत्तर में
भती भांति वृष्टि की वृद्धि के लिये पुण्ड्र नाम वाला बाताया गया है ।
उसमे
तुषार
वर्षा प्रवृत्त हुआ करती है । इसके उपरान्न वायु
हिमवान् से हिम को जो कि वही पर समुद्भन हुआ है अपने वेग से महा
गिरि का सेचन करता हुआ ले आया करता है । हिमवन का आतक्रमण
करके उसके बाद मे वृष्टिशेष होता है। इसके पश्चात् इस ( गज ) के
आस्थ मे यह भूतो की विवृद्धि क लिये दो वष समाख्यात किये गये हैं
जो अच्छी तरह वृष्टि की विवृद्धि के लिये होता है ॥२३, २४, २॥
॥२६॥ और मेरे पाप्यायन ( सतृप्ति ) होते हैं जो सर्वत्र प्रकीर्तित है ।
प्टियों का सृजन करने वाल भगवान् मूर्य ही समुपदिष्ट हुआ करते हैं ।
वर्ष-धर्म-मि-रात्रि-दोनो सन्च्या काल-दिन और यहाँ पर शुभ तथा
अशुभ फन सब धू.व स प्रवृत होते हैं ।।२७, २८।।
धु वेणाधिप्टिताश्चाप सूर्यो । गृह्य तिष्ठति ।
सवभतशरीरेषु त्यापो ह्यानुश्चिताश्चया. ॥२६
से समुद्भूत

ज्योनिप चक्र वर्णन
दह्यमानेषु तेग्वेह जङ्गमस्थावरेषु च ।
धूमभूतास्तु ता ह्यापो निष्काम तोह सर्वशः ॥३०
तेन चास्त्राणि जायन्ते स्थानमभूमयं स्मृतम् ।
तेजोभि. सर्वलोकेभ्य आदत्ते श्मिभिजलम् ॥३१
समुद्राद्वायुसयोगात् वहन्त्यापो गभस्तयः ।
ततस्त्वृतुवशात्कालेपरिवर्तन दिवाकरः ॥३२
नियन्त्यापो मेघेभ्यः शुक्ला शुक्लस्तुरश्मिभिः ।
अस्था.प्रपतन्त्यापोवायुनासमुदीरिताः ।।३३
ततो वर्षति पल्मासान् सर्वभूतविवृद्धये ।
वायुभिस्तनितचैव विद्युतस्त्वग्निजाःस्मृताः ॥३४
मेहनाच मिहेर्धातोर्मेषत्व व्यञ्जयन्ति च ।
न भूश्यन्ते ततोह्यापस्तस्मादभस्यवस्थितिः ।।
स्रष्टाऽमो दृष्टिमर्गस्य ५ वेणाधिष्टितो रविः ।।३५
धव के द्वारा अधिष्ठिन जल को सूर्य ग्रहण करके स्थित होता
है । समस्त भूतों के शरीरो मे जो जन आनुपिचत हैं। उनके जगम और
स्थावगे मे दह्यमान होने पर वह समस्त जल घूममूल अर्थात् धूआ
होकर सब थोर से निस्ल जाया करते हैं। और उमसे असज उत्पा
हुआ करते हैं जो कि स्थान अभ्रमय कहा गया है । समस्त लोको मे तेज
पूर्श रश्मियो के द्वारा जल का का आदान किया परता है ।।२६,३०,३१॥
गम्पिया समुद्र से वायु
के सयोग से जल का वहन परती हैं । इसके अनन्तर
के वश में होने के कारण दिवार समय पर परिवर्तित होता हुमा
मेषो के लिये शुआन रश्मियो से शुक्लही जल दिया करता है। मेर
मे स्थित जल नीचे गिरा बरते हैं जवान वे वायु के द्वारा समुदारित होने
हैं । इसो अरान्त सररत मतोको विवृधि लिये ; मास तक वर्षा
करता है । वायु के द्वारा सिनित और अग्नि से समुपन यिय त कहे
गये है। भेदन करने में "मिहि"-हम धातु से मेघ व प्राट मिया मरते

मत्स्यपुराण
हैं उनसे जल भ्रंशमान होकर नीचे वही गिरा करते हैं ऐसी ही अन्नकी
स्थिति है । वृष्टि के सर्ग को सृष्टिका करने वाला यह रवि ध्रव के द्वारा
अधिष्ठिन है ॥३२, ३३, ३४, ३५॥
ध्रवेणाधिष्ठितो वायुवृष्टि सहरते पुन ।
महानिवृत्या सूयत्ति चरते ऋक्षमण्डलम् ॥३६
चारस्यान्ते विशत्यक घ वेण समधिष्ठितम् ।
अत सूर्यरथस्यापि सन्निवेश प्रचक्षते ॥३७
स्थितेन त्वैकचक्रण पञ्चवारेण विनामिना ।
हिरण्मयेनाणुना व अष्टचक्र कनेमिना ॥३८
शतयो जनसाहस्रो विस्तारायाम उच्यते ।
द्विगुण च रथोपस्थादीपादण्ड प्रमाणत ।।३६
स तस्य ब्रह्मणा सृष्टो रथार्थवशेन तु ।
असङ्ग. काञ्चनो दिव्यो युक्त पर्वतगहयः ।।४०
च्छन्दोभिर्वाजिरूपरतयंथाचक्र समास्थित..
पारणस्य रथस्येह लक्षणः सदसएच स ॥११
तेनासौचरतिष्योम्निभास्वाननुदिनन्दिवि ।
अथाङ्गानितु सूध्यस्थप्रत्यङ्गानिरपस्यच ॥
सम्पासरस्यावयवै कल्पितानि यथान मम ।।४२
प्रद से अधिप्टिन वायु पुन' दृष्टि का सहरण किया ६ रता है।
सूर्य ग्रह से निवृत्ति प्राप्त कर फिर ऋक्ष मण्डल में पण रिपा करता
है। उस चारण के अन्त मे पद से समघिठित सूर्य मे प्रवेश
पिया करता है। इसलिये सूर्य से रथ का भी निवेश
पतलाया जाता है। रामं के रस में एक ही चक्र ( पहिपा) होता
है और उस में पाए रा होते है तथा सीन नामि हुमा रती हैं।
यह हिरण्मय गु और अदरक नाभ वाले पहरे द्वारा मारवमान
प्राण वाये रथ गे माय गो महस योजना के विस्तार रो भाषाम
मामाहा बाता है। स्पोवरपरी ६पा दण्ड प्रमाप में हिगुण है। वह

ज्योतिष-चक्र वर्णन - उसरा रथ ब्रह्मा के द्वारा अर्थ के वश सृजन किया गया या जो असन- काञ्चन--दिव्य और पवत गामी अस्वी से युक्त पा । चक्र के अनुसार समास्थित-वाजिरूप इन्दो से सयुत था। वह लक्षणो से वरुण के रथ के, हो सदृश था। उसी के द्वारा आकाप्न में यह भास्वान् प्रतिदिन दिव मे चरण किया करता है । इसके बनन्तर सर्दी के अङ्ग और रथ के प्रप्तङ्ग यथाक्रम सम्वत्सर के अवयवो से कल्पित किये गये हैं ॥३६, ३७, ३८॥ ॥३६,४०, ४१,४२॥ अहर्नालिस्तु सूर्यस्य एकचक्रास्य व स्मृत । अगत सम्वत्सरास्तस्य नेभ्यः पड़ तवः स्मृता ॥४३ राविर्वस्योधम्मश्चध्वऊवं व्यवस्यित.। अक्षकोटय युगान्यस्यअतवाहा.कना स्मृता । ४४ तस्त्र काष्ठा स्मृता घोणा दन्तपक्ति: क्षणास्तु वै निमेपश्चानुक्र्पोऽस्य ईपा चास्य कला स्मृता १४५ युगाक्षकोटी ते तस्यअर्थकामावुभौस्मृतौ । सप्ता(मा)श्चम्पान्दासिवन्तेवायुरहता ॥४६ गायत्री चैव त्रिष्टुप् च जगत्यनुष्टुप् तथैव च । पतिश्च वृहतीयेव उष्णिगेवतुसप्तमः ।।४७ चक्र मक्षे निवद्धन्तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः। सहचत्रौ भमत्यक्षः सहक्षोभमति ध्रुवम् ॥४८ अक्षः सहैव चक्रेण भूमतेऽसौ ध्रुवेरित. . एवमर्थवशात्तस्य सनिवेशो रथस्य तु ॥४८ एप चक्र वाले सूग्य का दिन नामि है। उसके अरसे सम्बरसर हैं और उसको नेमियों के ऋतुर रही गयी है ।।४ ॥ वरुप राधि है बोर ध्वं में व्यवस्थिा मज धर्म है । इमको अक्ष कोटियाँ युग है और वर्गवाह बना कही गयी है।॥४४॥ वाप्टाएँ उसकी पोणा (नातिया) बनायी गयी है और क्षण संतो को पक्ति है। निप इस। अनुवर्ष है

मस्यपुराण
और इसकी ईषा सा नही गयी है ॥४॥ उसकी ये मुगादा कोटी
दोनो अर्थ और काम बताये गये हैं । सात प वान छन्द वायु के वेग से
वहन किया करते हैं। गायत्री-विटुप्-जगतो-अनुष्टुप-पश्टि-
घहती-उष्णिक -ये सात छन्द हैं । चक्र अदा में निवद्ध है और वह भरा
घु व मे समर्पित है। चक्र के साथ अक्ष प्रमण करता है और अदा के
सहित वह घ व प्रमा करता है ।।.६, ४७, ४८॥ध्रुव के द्वारा प्रेरित
हुआ अक्ष चक्र के साथ ही घूमा करता है। इस प्रकार का अपं धश
रथ का सन्निवेश होता है ।।४।।
तथा संयोगभागेन सिद्धो 4 भास्करो रथः।
तेनाऽसौ तरणिमध्ये नभभःसर्पतेदिवम् ॥५०
युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्पन्दनस्य तु ।
भ्रमतो भ्रमतो रश्मी तोचक्रयुगयोस्तुवै ॥५१
मण्डलानि भूमे तेऽस्य रथस्य तु ।
कुलालचक्रभूमवन्मण्डल सवंतादिशम् ॥५२
यगाक्षकोटि ते तस्य वातोर्मीस्यन्दनस्य तु।
सक्रमे ते ध्रुवमहो मण्डले पर्वतोदिशम् ॥५३
भमतस्तस्यरश्मी ते मण्डले तूत्तरायणे।
वर्तते दक्षिनेष्वत्र भूमतो मण्डलानि ॥५४
युगाक्षकोटीसम्बद्धौ द्वे रश्मीस्यन्दनस्य ते ।
ध्र वेण प्रगृहीती तो रश्मी धारमतारविम् ॥५५
आकृष्यते यदा ते तु ध्रुवेण समधिष्ठितं ।
तदा सोऽभ्यन्तरे सूय्यो भमते मण्डलानि तु ॥५६
अशीतिमण्डलशत काष्टयोरुभयोश्चरन् ।
ध्रुवेण मुन्यमाने न पुनारश्मियुगेन च ॥५७
तर्थव वाह्यत: सूर्यो भमते मण्डलानि तु ।
उदृष्टयन्वैवेगेन मण्डानि तु गन्छति ॥५८

४०३ अमावस्या महत्त्व वर्णन उस प्रकार से संयोग के माग से यह भगवान् भास्कर का रथ सिद्ध हुधा है । उसी रथ के द्वारा यह सूर्य देव प्राकाश के मध्य मे दिव में प्रसर्पण किया करते हैं ॥५०॥ उसके रथ को वे युगाक्ष कोटी दक्षिण में भ्रमण करती हैं और चक्र युगों को वे दोनो रश्मियां प्रभा करती हैं। बाकाश में चरण करने वाले इसके रथ के भ्रम में मण्डत है। और कुम्हार के चाक की भांति मण्डल सब दिशाओं में भ्रमता है। उसके ग्य को वे युगाक्ष कोटी वनोर्मी हैं । मण्डल में पर्वतों की दिशाओ में वे धव को संक्रमित किया करती हैं । भ्रमण करते हुए उसकी रस्सियां और वे मण्डल उत्तरायण में वद्धिन होते हैं । रथ की वे दो रश्मियाँ युगाक्ष कोटियों से सम्बद्ध ध्रुव के द्वारा वे दोनो रमियां प्रगृहीत हैं जो रवि को धारण करने वाले घु व के द्वरा भावपित किया न ता है । जिस समय में वे पु.व के साथ समधिष्ठिर होते हैं उस समय मे वह सूर्य मण्डलो को अम्यन्तर में भ्रमण किया करता है। दोनो काष्ठाओ मे अस्सी मण्डन शल में चरण करता हुआ रहता है । पुन घु.व के द्वारा मुच्यमान् रश्मि युग से चरण करता है । उसी भांति वहिर्मणा मे यह मूर्य मण्डलो को भ्रमण किया करता है । वेग के साथ उद्वेष्टन करता हुआ यह मण्डलों को गमन किया करता है ।। ५११ १२ । ५३६ ५४ । ०५। ५६ ॥ 231१८॥ ५५-अमावस्या महच्च वर्णन कथ गच्छत्यमावास्या मासिमासि दिवं नृप । ऐलः पुरूरवाःसूत ! तर्पयेत कथ पितम् ॥ एतमिच्छामहे श्रोतु प्रमावन्तस्य धीमतः ।।१।। तस्य चाह प्रवक्ष्यामि प्रभाव विस्तरेण तु । ऐलस्य दिवि सयोग सोमेन सह धीमता र ४.४ भागपुराव सोमान्चेवामृतप्राप्तिः पितृ.णां तर्पणं तथा । सौम्या वहिपद याव्या अग्निध्यातास्तव च ॥३ यदाचन्द्रश्च सय्यंश्च नक्षयाणा समागतो। अमावास्या निवसत एकस्मिन्नथ मण्डले ॥४ तदा रा गच्छति द्रष्टु दिवाकरनिशाकरी। अमावास्याममावास्या मातामहपितामहो ।।५ अभिवाद्य तु तो तत्र कालापेक्षः स तिष्ठति । प्रचस्कन्द ततःसोममर्चयित्वा परिश्रमात् ॥६ ऐलः पुरुरवा विद्वान् माति थादचिकीपया। ततः स दिवि सोमवं ह्य पतस्ते पितृ नपि ॥७ ऋपियो ने कहा-हे श्री सूतजी! पुरुरवा ऐल नृप मास-मास में अर्थात् प्रति मास में अमावस्या मे दिवलोक मे कैसे जाया करता है और किस प्रकार से पितृगण का तपण करता है ? उस घामान के इस प्रभाव के श्रवण करने की हम लोगो की इच्छा है । सूतजी ने कहा- मैं अब उसके प्रभाव को विस्तार के साथ बतलाता हूँ । ऐल का दिवलोक मे धीमान् सोम के साथ सयोग होता है । सोम से ही अमृत की प्राप्ति हुमा करती है तथा पितगण का तर्पण होता है। सौम्य-वत्पिद्याव्य और उसी भांति अग्निष्वात्त है॥ १, २, ३ | जिस समय में चन्द्र और सूर्य नक्षत्रो मे समागत होत है अमावस्या मे एक ही मण्डल मे निवास किया करते हैं ॥४॥ उस समय में वह मातामह पितामह दिवाकर निशाकरो को देखने के लिये अमावस्या-ममावस्या मे जाया करता है । वहा पर वह उन दोनो का अभिवादन करके काल को अपेक्षा करने वाला स्थित हो जाया करता है । इसके उपरान वह बड़े ही परिश्रम से सोम का अभ्यचंन करके पुस्कन्दित होता है । महा विद्वान् पुरुरवा ऐल मास मे श्राद्ध करने की इच्छा से दिवलोक मे साम का और पितृगण का उप- स्थान किया करता है ।। ५,६,७॥

अमावस्या महत्व दपन हिनवुहमानञ्च तादुमी तु निधाय सः । पिनीवाली प्रमाणालाहनावव्रतोदये । कुहूमात्र पित्रु द्देश ज्ञात्वा कुहमुपासते । तमुपाम्य ततः मोम कलापेनी प्रतीक्षते ॥ स्वधा मृतत मोमाद्वंदम तपाञ्च तृप्तये । दशभिः पन्चभिश्चैव स्वधाऽमृतपरितवैः।। कृष्णपक्षभुजा प्रीतिढुंहने परमाभिः ॥१०॥ मद्योमिक्षता तेन सौम्येन मधुना च सः । निवापेप्दय दत्तेपु पित्येण विधिना तु वै ।।११ स्वधा मतेन सौम्येन तपंयामास व पिन् । मौम्या वहिंपदः काव्या अग्निप्यात्तात्तथैव च ॥१२ ऋतुरन्नि स्मृतो विप्रेतु सम्बत्सरविदु । चजिरे ऋतवन्नम्मानभ्यो ह्यार्त्तवामवन ।।१३ रितगेवाड़ मामा विवा ऋतुमूनवः। पितामहा तु ऋतवो मावास्यावदसूनव ॥ प्रपितामहाः स्मृता देवाः पश्चाब्द ब्रह्मण मुता. ॥१४ दिलब और बुहू मान इन दोनों को वह रखकर मिनीवाली क प्रमाग से अन्य वुह मात्र व व्रतोदय में कुहू मात्र यो स्तिगप का उद्देश जानकर कुहू को ही पानना क्या करता है। उनकी उपासना परक इन उपरान वह कमाती मोम की प्रतीक्षा विमा करता है ॥८॥ बहा यान करता हुआ नीति के लिये मोम ते म्वधामृत ग्रहण करना है । दा और पांच अर्थात पन्द्रह दशामृत परिस्तबाग कृष्णासस में भोग करने वालों को प्रीति होती है जो परमाणुओं के द्वारा दोहित को जाती है ॥१०॥ तुरन्त अभिभरप करने पान उन सौम्य मधु से यह रिपन र लिये साई हुई विधि मे निकायों के देन पर मोम्ब मुशा- मृत मे नि:पका नाम दिया वर या मोर-बाहाद।

सध्योर उभी राति बालावात है ॥११.१६॥ पनि अनुहा गया है और ोिधारा शुको एम्यहमर कहा जाता है। प्रो. उससे समुत्पन्न हुए और प्रोगे आहए ॥१३॥ ऋतुओं के गुगु पितर मशः माम जानने पहिए। पितामह स है जो बा• वस्याग्द वे भूनु है । प्रपितामहदेव कहे गये गये हैं। १म्चाम्द ब्रह्माजी पूत हैं ॥ १४॥ सोस्याहिपद.काव्या अग्निप्वात्तातिविधा। गृहस्थायितु यज्वानो हविर्यज्ञावाश्चये ॥ म्मता वहिपदस्त व पुगणे निश्चय गताः ॥१५॥ गृह धिनश्च यज्वानो अग्निप्वात्तालवा. रनता । अप्टका पतयः काव्याः पञ्चाव्दास्तु निबोधत १६ रोपुसम्वत्सरोया नःपूर्यस्तु परिवत्सरः । सामस्त्विवत्सरचंववायुश्वानुवानुवत्सरः ॥१७ स्द्रस्तवत्सरगतपा पञ्चादाये युगात्मका. । कालेनाधिष्ठितम्तेपु चन्द्रमा प्रवते सुधाम् ॥१८ एते स्मृता देवकृत्या. सोमपाश्चाप्मपाय। तास्तेन तपयामास यावदासीत्पुरूरवा. ॥१६ यस्माप्रत्सूयतेसामो मासिमासिविशेषत । नत स्वधामृततद्वै पितृणा सोमपायिनाम् ।। एतत्तदमृत चैव हि ॥२०॥ ततः पीतसुध सोम सूर्योऽसावेकरी मना। आप्यायते सुषुम्णेन सोमन्तु सामपायिनम् ॥२१ वे सौम्य-बहिषद काव्य और अग्निप्वात इस तरह से तीन प्रकार के हैं। जो गृह य यज्वा हैं और जो हवियज्ञातंक हैं वे पुराम मे निश्चय को प्राप्त हुए बहिपद कहे गये हैं ।। १५॥ गृह मेधी यज्वा अग्नि- प्वात्तव कहे गये है । अष्टका यति काव्य है । अब पञ्चान्छो के विषय सोममवाप मधु अमावस्या महत्व वर्णन में समझ लो ॥ १६ ॥ उनमें सम्वत्सर अग्नि है और सूर्य परिवत्सर है। सोम इवत्सर है और वायु अनुवत्सर है उनका रुद्रवत्सर है । ये पवाद युगात्मक हैं। काल से प्रवितिहमा कमा उनमे सुधा का लवण किया करता है ॥ १७, १८॥ ये इतने देवकृत्य बताये गये हैं। मोमय और उमय जो हैं उनको उसी से पुरया जब तक रहता है तृप्त किया करता है। क्यों के सोम मास-मास में विशेष रूप से प्रसव किया करता है । वह स्वधामृत सोमगायो पितृगो के लिए है । यह सोम अमृत और मधु को प्राप्त करता है ।। ११, २०६। इसके अनन्तर सुधा का पान किये ए पोम को यह सूर्य एक रश्मि के द्वारा सोमपानी सोम को सुपुम्णा से बाप्याबित किया करता है ॥२१॥ निःशेषावकलापूर्वायुगपद्व्यापयन्पुरा । सुपुमणाप्यायमानस्य भाग भाममहःकमात् ॥२२ कला. क्षीयन्ति कृष्णांस्ताः शुक्ला ह्याप्याययन्ति च । एवं सा सूर्यवीर्येण चन्द्रस्याप्पायिता तनुः ॥२३ पौर्णमास्या सदृश्येत शुक्ल सम्पूर्णमण्डलः । एवमाप्यायितः सोमः शुक्लपक्षेप्यह प्रमात् ।। देवः पीतसुधं सोम पुगपश्चालिवेद्रविः ॥२१ पीत पञ्चदशाहन्तु रश्मिनैकेनभास्करः । आप्पाय यत् सुषुम्णेन भाग भागमहः क्रमाद ॥२९ सुपुम्पाप्यायमानस्य शुक्लाबद्ध न्तिवकलाः । तस्माद्धसन्तिवकृष्णाःशुक्लाप्याययन्तिय ॥२६ एवमायायते सोम क्षीयते च पुनः पुनः । समृद्धिरेव सोमस्य पक्षपोः शुक्लकृष्णयो ॥२७ इत्येप पितृमान् सोमः स्मृतस्तद्वव सुधात्मकः। काना:पञ्चदशः साई सुधामृतपरिसवः ॥२८ माम्यपुराण पहिसे सम्पूर्ण पूर्व कला एक ही साथ व्यापित हुई थी। मुपुरणा के द्वारा अध्याय मान का दिन के क्रम से माम-भाग हो गरे । ये कृष्ण क्लाऐं क्षीण हुआ करती हैं । और पुक्लपक्ष की पलाए आप्यायन दिया करती है । इस प्रकार से सूर्य के हो वीर्य से चन्द्रमा का तनु आप्यायिता है ॥२२, २३॥ शुक्लपक्ष का सम्पूर्ण मण्डल पूर्णमासी मे दिखलाई दिया करता है। इस प्रकार से ही दिनो के प्रम से शुक्लपक्ष मे सोग आप्यायिता होता है। देवो के द्वारा जिसकी मुग का पान कर लिया गया है उस सोम के पहले और पीछे वि पान क्यिा करता है ॥२४॥ भास्कर एक रश्मि ये द्वारा पन्द्रह दिन तक पीत को यहकम से भाग- भाग करके सुषमा के द्वारा आप्यायन किया करता है । सुयुम्णा के द्वारा आप्यायमान की शुरुनकलाऐ वढा करती हैं। इस कारण से वृष्णपक्ष की क्लाओं का ह्राम होता है और शुक्ल कलाऐ आप्यायन किया करती हैं ।। ०५, २६॥ इसी माँन यह सोम पुन: पुन. आप्यायित होता है और क्षीण हुआ व रता है। शुक्ल तथा कृष्ण पक्षो मे इसी प्रकार से सोम की समृद्धि एव क्षय हुआ करता है ।। २७ ।। इस रीति से यह पितृमान् सोम बताया गया है औ उमी प्रकार मे यह सुधात्मक है । सुधामृत परिस्तदो के द्वारा पञ्चदश हैं उसके साथ ही यह कान्त है ।।२८॥ अत पर प्रवक्ष्यामि पर्वाणा सन्धयश्च याः। यथा ग्रनन्ति पर्वाणिआवृत्तादिक्षुवेणुवत् ॥ तथाब्दमासा पक्षाश्च शुक्ला कृष्णास्तु वे स्मृता । पौणमास्यास्तु यो भेदो ग्रन्थ यः सन्धयस्तथा ।।३० अर्द्ध मासस्य पर्वाणि द्वितीयाप्रभृतीनि च । अन्याधाक्रिया यस्मानीयन्ते पर्वसन्धिषु ॥३१ तस्मात्तु पवगोह्यादौ प्रतिपद्यादिसन्धिषु । सायात अहमत्याश्च डौलदो काल उच्यते।।

४०६ अमावस्या महत्व वर्णन और कृष्ण हुआ लवी द्वावेव राकाया कालो शेयोऽपराणिकः ।।३।। प्रकृतिः कृष्ण पक्षस्य कालेऽतीतेऽपराणिके। सायाह्ने प्रतिपद्य प स कालः पौर्णमासिकः ॥३३ ध्यतीपाते स्थिते सूर्ये लेखादूर्व युगान्तरम् । युगान्तरोदिते चैवचन्द्रे लेसोपरिस्थिते ॥३४ पूर्णमासव्यतीपातौ यदा पश्येत्सरस्परम् । नौ तु वैप्रतिपद्यावत्तस्मिन्काले व्यवस्थितौ ।।३५ तत्काल सूयमुद्दिश्य दृष्ट्वा सख्यातुमर्हसि । सौव सक्रियाकाल पष्ठ कालोऽभिधीयते ।।३६ इसके आगे जो पर्यों को सन्धियाँ होती हैं उनके विषय में वर्णन करते हैं। जिस प्रकार से आवृत्त से ईख क बांस की तरह पर्व प्रथित करते हैं। तथा अब्द--मास-पक्ष शुक्त बहे गये हैं पौर्णमासी वा जो भेद होता है वे ग्रन्थियाँ और सन्धियाँ हैं ।। २९, ३० ।। अर्घ मास के द्वितीया प्रभृति जो तिथि हैं। ये ही पर्व है जिससे पर्व सन्धियो मे प्रान्याधान क्रिया प्राप्त की जाया करती हैं उसमें प्रतिपदा प्रादि सन्धिपो मे पर्व के प्रादि में होता है । सायाह्न मे और अनुमति का दो लव काल कहा जाया करता है। दो लव ही गवा का अपराहिल काल जानना चाहिए ॥३०,३२॥ अपराहिला काल क मौत हो जाने पर कृष्ण पक्ष को प्रकृति है । सायाह्न मे प्रतिपदा मे वह यह पाल पौर्णमासिक होता है ।। ३३ । व्यतीपात में सूर्य के स्थित होने पर लेख से कार में युगान्तर होता है । लेखा के कार में स्थित चन्द्रमा के युगा. लर मे उदित होने पर पूर्णमास और व्यतीपात जिस समय मै परस्पर मे देखते हैं। वे दोनों जब तक प्रतिपत् है उस काल में व्यवस्थित होते हैं। वह काल सूर्य का उद्देश करये देखकर सध्या करने के योग्य होता है और वह ही सारया वा काल है जो कि पष्ठ बाल कहा जाता है ॥३४ 1३६॥३६॥ .

४१०
मत्स्यपुराण
पूर्णन्दुः पूर्णपक्षे तु रात्रिसन्धिषु पूर्णिमा।
तस्मादाप्यायते मक्तपौर्णमास्या निशाकरः ॥३७
यदान्योन्यवती पाते पूर्णिमा प्रेक्षते दिवा ।
चन्द्रादित्योऽपराणे तु पूर्णत्वात् पूर्णिमा स्मृता ।।३८
यस्मात्तामनुमन्यन्ते पितरो देवत. सह ।
तस्मादनुमति म पूर्णत्वात् पूर्णिमा स्मृता । ३६
अत्यर्थ राजते यस्मात् पौर्णमास्या निशाकर. ।
रञ्जनाच्चोव चन्द्रस्य राकेति कवयो विदुः ॥४०
अमावमेतामृक्षे तु यदा चन्द्रदिवाकरो।
एका पञ्चदशी राविरमावस्या ततः स्मृता ।।४१
उद्दिश्य ताममावास्या यदा दश समागतो।
अन्योऽन्य चन्द्रसूय्यौं तु दर्शनाद्दर्श उच्यते ।।४२
पूर्ण पक्ष मे पूर्ण इन्दु होता है और रात्रि सन्धियों मे पूर्णिमा
होती है । इसी से पूर्णमासी में रात्रि मे निपाकर आप्यायन प्रप्त किया
करता है ।। ३७ ।। जब अन्योन्यवती पूर्णिमाकार क्षण करके दिव प्रेक्षण
करता है और अपराह्न मे चन्द्र और आदित्य होते हैं तब पूणत्व होने
से पूर्णिमा कही गयी है ।। ३८ ॥ क्योकि पितृगण देवताओं के साथ
उसको मानते हैं इसी कारण से उसका अनुमन्य मान होन से अनुमति
यह नाम हुआ है भौर पूर्णत्व होने से पूर्णिमा है ।। ३६ || पौर्णमासी
में निशा कर बहुत ही अधिक दीप्तिमान होता है यही कारण है कि
चन्द्रमा के रञ्जन होने ही से कविगण उसको राका कहते हैं ॥४०॥
जिस समय मे चन्द्रमा और दिवाकर दोनो ऋक्ष मे अमावसित होते हैं
वह एक ही पञ्चदशी रात्रि होती है जिसको अमावस्या की रात्रि कहा
गया है ।।४१॥ उस अमावस्या का उद्देश कर जब दर्शक समागत होते
है और चन्द्र तथा सूर्य अन्योन्य को मिलते हैं तो दशन होने के कारण
से ही उसका दशं यह नाम कहा जाता है ॥४२॥

अमावस्या महत्व वर्णन दो द्वौ लबाबमावास्यां स काल: पर्वसन्धिपु । द्वयसरः कुहूमात्रश्च पर्वकालस्तु स स्मृतः॥४३ हप्टचान्द्रा त्वमावास्या मध्याहतप्रभूतोह वे। दिवा तदर्व राज्यान्तु सूर्य प्राप्ते तुचन्द्रमाः ॥४॥ सूर्यरण सहसौद्गच्छेत्तत. प्रातस्तनात्त वै ॥४५ समागम्य लवी द्वौ तु मध्याह्नानिपतनविः । प्रतिपच्छुक्लपक्षस्य चाट्रमा सूर्यमण्डलात् ४६ निर्मच्यमानयामध्येतंयोमण्डलयोस्तु च । स तदावाहुतेः कालोदशस्यच वपक्रियाः ॥ एतहतुमुसं ज्ञेयममावास्यान्तु पार्वणम् ॥४७ दिवा पद त्वमावास्या भोगेन्दो धवले तु । तस्मादिवा त्वमावास्या गृह्यते यो दिवाकर ४८ पुति कोकिलेनक्ति यस्मात् काला समाप्यते । तत्कालसनिता होपा अमावास्या कुहू स्मता 11४ दो-दो लव अमावस्या में हैं वह काल पद मधिपा मेयर और हि मात्र है । वह पर्व कल कहा यक्ष है ॥४३॥ जिनमें चन्द्रमा दिन- साई दिया गया हो वह अमावस्या यहाँ र. मध्याह्न श्मृति है दिया है उस से कई में रात्रि में सूर्य के प्राप्त होने पर नन्द्रमा मूर्प के साथ सहसा उदित हो उसके पश्चात प्राव कालीन होता है II ४४, १५ ॥ पोलदों का समागम करे मध्याहन से रवि निपतित हो रहा हो और सूर्य मदर से चन्द्रमा दिरामाई दे तव शुक्ल पक्ष प्रतिपद होती नियम न उन दोनो माडलों के मध्य में बहराल जो होता है माहति माल है और सि वषट् रियारा है। मावस्था में यह नु- मुध पाप बानना चाहिये ।। ४६,४७॥ धवन की इन्दु के होने पर ममारस्पा में टिका पर्व हरा है। इसी से अमावस्या में ओशिर Ray firwaar tit हर रोहित दारा हा सा ४१३ अमावस्या महत्त्व वर्णन दिवसो के क्रम से होती है। इसो से पन्वदश सोम में पौडशी कला नहीं है। इससे है विप्र! मैंने सोम का पन्चादशी में धाय कहा है 1५५,५६ ॥ इश्यते पितरोदेवा. सामाः सोमदर्दनाः। आया ऋतबोऽयाव्दा देवास्तान् भावयन्ति हि । ५७ अतः पर प्रवक्ष्यामि पितृ न श्राद्धभुजस्तु ये । तेषां गतिञ्चसत्तत्वप्राप्तिश्राद्धस्यनैव हि ॥५८ न मृतानाङ्गतिः शक्या ज्ञातु वा पुनरागतिः । तपसा हि प्रसिद्धन किं पुनमा सचक्षुपा ॥५६ अन्न देवान् पितृ र ते पितरो लौकिकाः स्मृताः । तेपान्ते धम्मसामर्थ्यात् स्मृताः सायुज्यगा द्विज ॥ ६० यदि दाश्रमधर्मेण प्रज्ञानेपु व्यवस्थितान् । अन्येचात्र प्रसादन्ति श्राद्धयुक्त पु कम्मसु ।।६१ ब्रह्मवर्येश तपसा यज्ञेन प्रजया भुवि । धादन विद्यया चैव चान्नदानेन सप्तधा ।।६२ कम्मस्वेतेषु ये सक्तावत्तन्त्या देहपातनात् । देदैस्ते पितृ भि. सादं मप्म.सोमपंस्तथा । स्वर्गता दिवि मोदन्त पितृमन्त उवासते ॥६॥ ये इनने पितरदेत--सोमय-सोमवद्धन आत्त व-स्तव हैं। इस अनन्तर अध्यदेव उनको माविता किया करते है ।। ५७ ॥ इसके मागे जो अद्धभोगी रितर है उनको वलाता है। उनकी गति-सत्तत्व धौर श्राद्ध की प्राप्ति के विषय में कहता हूं ॥ ५८ ॥ जो मृत हो जाते है। उनकी यनि तथा पुनरागनि जानी नहीं जा सकती है। यह यह प्रसिद्ध तप के द्वारा भी तद नहीं आनी जाती है तो मेरी तो दान ही क्ग जो च न युक्त है ॥५६॥ यहां पर देवो को पितरो को साया गया है । ये पितर लोक्कि हे गये हैं। उनमें वे धर्म की सामर्थ्य

मस्ययुगण
जिस काल से समाप्त किया जाता है उभी वान से राजा बासी यह ममा-
वस्या बुहू-इस नाम से कही गयी है ।।४६॥
शिनीवालीप्रमाणन्तु क्षीणोपी निशाकरः ।
अमावास्या विशत्पर्क सिनीवाली तदा स्मृता १५०
( अनुमतिश्च राकां च सिनीवाली मुहस्तथा ।
एतासा द्विलयः कालः मुहूमात्रा हू. स्मृताः ॥५१
इत्येप पवसन्धीना बालोवंद्विलव.स्मृतः ।
पर्वाणान्तुल्यकालस्त तुल्याहुतिवपबियाः । ५२.
चद्रमूर्यव्यतीपाते समे वे पूर्णिमे उभे ।
प्रतिपत्प्रतिपन्नस्त पर्वकालो हिमालक. ॥५३
काल कुहू सनीवाल्योः समुद्धो द्विलव, स्मृत ।
अर्कनिर्मण्डले सोभे पर्वकाल कला. स्मृताः ॥५४
यस्मादपूर्यते सोमः पञ्चदश्यान्तु पूर्णिमा '
दशभिः पञ्चभियनीय कलाभिदिवसत्रमात् ।।५५
तस्मात् पञ्चदशे सोमे कला दे नास्ति पोडशी।
तस्मात् सोमस्य विप्रोक्तः पञ्चदश्या भया क्षय. ११५६
मिनी वाली का प्रमाण तो यही है कि निशाकर क्षीण दोप होता
है और अमावस्या अर्क मे प्रवेश किया करती है उस समय में यह सिनो
वाली कही गयी है ।।५०अनुगति राका -सिनी बाली तथा बहू इन
सबका हिलव काल होता है। पुहू कही गई है ॥५१॥ पर्व सन्धियो
का यह काल हो तब कहा गया है। पत्रों का तुल्य काल तुरुय आहुति
वपट् क्रिया वाला है । चन्द्र सूर्य के व्यतीपात मे दोनो पूणिमा, समान
हैं प्रतिपदा से प्रतिपल द्विमात्र पर्वकाल हुआ करता है ।। ५२, ५३ ।।
और सिनी वाली दोनो का समृद्धशाल द्विलव कहा गया है। अके
निमंन्डन सोम में पर्व काल कला कही गयो है ।। ५४|| क्या सोम
पञ्चदशी में पुरित नहीं होता है । पूर्णिमा पांच और दश वल जीन

अमावस्या महत्व वर्णन दिवसो के क्रम से होती है । इसी से पञ्वदश सोम मे पोटशी क्ता नहीं है। इमसे हे वि! मैंने सोम का पन्बादशी में क्षय कहा है इत्यते पितरोदेवा सामाः सोमवद्ध ना.। आरीवा ऋतवोऽयान्दा देवास्तान भावयन्ति हि । ५७ मतः पर प्रवक्ष्यामि पितृ न् श्राद्धभुजस्तु ये । तेषां गतिञ्चसत्तत्वप्राप्तिश्राद्धस्य-व हि ।।५८ न मृतानाङ्गतिः शक्या ज्ञातु वा पुनरागतिः । तपसा हि प्रमिद्धेन किं पुनर्मा सचक्षुपा ॥५६ अन देवान् पितृ ते पितरो लौकिकाः स्मृता. । तेपान्ते धम्मसामर्थ्यात् स्मृता. सायुज्यगा द्विज ।। ६० यदि वाथमधर्मेण प्रज्ञानेषु व्यवस्थितान् । अन्येचार प्रसादन्ति धाद्धयुक्त पु कम्मसु ।।६१ ब्रह्मचर्येण तपसा यज्ञेन प्रजया भुवि । धान विद्यया चेव चावदानेन सप्तधा ॥६२ कर्मस्वतेषु ये सक्तावतन्त्या देहपातनात् । देदस्त स्तृिभि. साईमप्म.मोमपंस्तथा ॥ स्वगता दिवि मोदन्ते पितृमन्त उवासते ॥६॥ ये इनन पितरदेव-सोमय-सोमबद्धंन आत्तव-ऋतर हैं। इस अनन्तर अन्ददेव उनमो भादिता किया करते है ।। ५७। इसके आगे जो श्रद्धमोगी पितर हैं उनको वालाता हूँ। उनकी गति-सत्तत्व और श्राद्ध को प्राप्ति के विषय में कहता हूं ॥ ५८ || जो मृत हो जाते है। उनकी गति तथा पुनरागति जानी नहीं जा सकती है। यह यह प्रसिद्ध तप के द्वारा भी तद नहीं जानो जाती है तो मेरी तो बात ही क्या जो चक्षु से युक्त है ।।५।। यहाँ पर देवो को पितरो को बताया गया है । ये पितर लोरिक बहे गये हैं। उनमें ने धर्म की सामर्म्य

मत्स्यपुराण
-
से द्विजों के द्वारा सायुज्य में गमन करने वाले बताये गये हैं।। ६०11
यदि धा पाश्रम धम्म से प्रमानो में व्यवस्थितो को कहा गया है और
यहाँ पर अन्य श्राद्ध युक्त कम्मो मे प्रसन्न हुमा करते हैं । ब्रह्मचर्य---
तपस्या-यश- भूलोक मे प्रजा-श्राद्ध-विद्या और अन्न ये सात प्रकार
है । इन कर्मों में जो सक्त हैं और देह का पातन जब तक होता है
तब तक रहा मरते हैं वे देवो--पितृगणो के साथ तथा सोमप
और ऊष्णवो के साथ स्वर्गलोक मे गये हुए दिविलोक मे आनन्द भी
प्राप्ति किया करते हैं और पितृ मन्त उपासना किण करते हैं ।। ६१ ॥
प्रजावता प्रसिद्ध पा उक्ताश्राद्धकृताञ्च वै।
तेषा निवापे दत्त हि तत् कुलीनस्तु बान्धवः १६४
मासश्राद्धं हि भुञ्जानास्तेऽप्येते सोमलौकिका।
एते मनुष्या पितरो मासश्राद्धभुजस्तु वै ॥६५
तेभ्योऽपरे तु येत्वन्ये सङ्कीर्णाःकर्मयोनिषु ।
भृष्टाश्चाश्रमधर्मेपुरवधास्वाहाविवजिताः ॥६६
भिन्ने देहे दुरापन्नाः प्रेतभूता यमक्षये ।
स्वकर्माण्यनुशोचन्तो यातनास्थानमागताः॥६७
दोघरिवातिशुष्काश्च श्मश्रुलाश्च विवासस ।
क्ष तपिपासाभिभूतास्तै विद्रवन्ति वितस्ततः ॥६८
सरित्सरस्तडागानि पुष्करिण्यश्चसर्वश ।
परान्नान्यभिकाङ्क्षत काल्यमानाइतस्तत ॥६६
स्थानेषु पात्यमाना ये यातनास्येपु तेपु वै ।
शाल्मल्या वैरिण्याञ्चकुम्भीपाकेद्धवालुके .१७०
जो प्रजा वाले लोग हैं उनके यहाँ यह प्रसिद्ध है और जो श्राद्ध
करने वाले हैं उनके यहां यह कहा गया है । उनके कुल मे होने वाले
वाग्धयो के द्वारा नियाय मे दिया हुआ थाद्ध अर्थात मास श्रास का भोग

अमावस्या महत्व वर्णन किये हुए करने वाले हैं वे भी ये सोम लौकिक हैं। ये मनुष्य पितर हैं जो कि मास प्राद का भोजन करने वाले हैं ।।६४, ६५ ॥ उनसे दूसरे जो अन्य हैं जो कर्म योनियो में सङ्कीर्ण हैं वे आश्रम यो मे महान् परिभ्रष्ट हैं और स्वाहा तथा स्वधा-इन दोनो से विवाजित हैं। मिन्न देह मे दुर्लभ- प्रतभूत और यमक्षय मे अपने कृत कर्मों की चिन्ता करते कों का दन्ड भोगने का जो स्थान था उस पर लाये गये हैं ॥६६, ६७॥ दोघं-अत्यन्त शुष्क दाढी मूछों वाले-वस्त्रो से रहित-भूख और प्यास से सताये हुए वहां पर इधर-उधर भागे २ फिरते हैं ॥ ६८ | जल के प्राप्त करने के लिये किसी सरिता - सरोवर-तडाग और पुष्करिणियों को सब और खोज करते हुए दौड लगाते फिरा करते हैं । इधर-उधर कात्यमान होते हुए परात की इच्छा रखते हुए रहा करते हैं किन्तु वे उन यातनायें भोगने के स्यानो मे वरवा पटक दिये जाया करते हैं- नारकीय यातना भोगने के नाम ये हैं --शामलो-वैतरिणी-कुम्भीपाक- इसवालुक आदि हैं ।।६६, ७०॥ असिपत्रवनेनोवयात्यमाना स्वमंभिः । तत्रस्थानान्तु तेषा व दु.खितानामशायिनाम् । तपा लोकान्तरस्थान वान्धवर्तामगोत्रतः। भूमावसव्य दर्भेषु दत्ताः पिण्डास्तयस्तु वे ॥७० प्राप्तास्तु तर्पयन्त्येव प्रेतस्थानेष्वधिष्ठितान् । अप्राप्ता यातनास्थानप्रभृष्टा ये च पञ्चधा॥७३ पश्चाद्यै स्यावरान्त नै भूतानीक स्वकमभिः । नानास्पासु जातीनां तिर्यग्योनिपुमूर्तिपु ।।७४ यदाहारा भवन्त्येते तासु तास्विह योनिषु। तस्मितस्मिस्तदाहारेश्राद्ध दत्तन्तु प्रीणयेत् 11७५ काले न्यायागतम्माने विधिना प्रतिपादितम् । माप्नुवन्त्यन्नमादत्त यत्र यत्रावतिष्ठति ।।

मरमपुराण सनत्कुमार प्रोवाच यथा गोपु प्रनष्टासु वत्सो विन्दति मातरम् । तथा श्राद्धेषु दृष्टान्तो मन्त्र प्रापयते तु तम्।।७६ एव विक्ल प्राज्ञ श्राद्धादत्त मनुरब्रवीत्। पश्यन् दिव्येन चक्षुपा ॥७७ अपने ही वृत कर्मों के द्वारा नारकीय मानव असिपत्र वन नान वाले नरक मे डाल दिये जाते हैं जहां पर चरो ओर घरछी और तलवारें लगी रहा करती हैं । यहाँ पर जो स्थित रहते हैं वे अत्यधिक दुखित रहा करते हैं और उन्हें शयन करने तक का कोई वहाँ स्यान नहीं होता हैं । ऐसे अन्य लोगो में स्थित उनके वान्धवो के द्वारा जो नाम और गोत्र का उच्चारण करने अगसव्य हो भूमि मे दो पर तीन पिण्ड दिये गये है ।।७१, ७२॥ प्रत स्याना में अधिष्ठित्तो को प्राप्त हुए उनको ये पिण्ड तृप्त किया करते हैं । जो यातना के स्थान म अप्राप्त हैं वे प्रध्रप्ठ होकर पांच प्रकार से विभा होते हैं । पीछे जो अपने कर्गों से प्रारो स्थावरान्त मे भूत हैं ये तिर्यक योनि वाली मूत्तियो मे तथा जातियो के नाना रूपो मे जब आहार होते हैं तो उन उन योनियो मे उस उस आहार मे दिया हुआ श्रादउनको प्रसन्न एव तप्त किया करता है। समय पर न्याम पूवता पात्र में विधि के सहिन प्रतिपादित एव आदत अन्न को जहा-जहा पर अवस्थित होता है प्राप्त किया करत हैं 11७३, ४४, ७५ | जिस प्रकार से गौओं के प्रनष्ट होने पर वत्स माता को प्राप्त किया करता है उसी प्रकार से पाखो मे यह दृष्टान्त है कि भन्म उसको प्राप्त कराया काता है ||६६॥ इसा प्रकार से थक्षा से दिया हुआ थविल श्राद्ध है- ऐमा ही मनु ने रहा है। अपने दिम नत्रो के द्वारा देवार भगवान सनरमार ने रहा है ॥७७|| गतागतज्ञ प्रेताना प्राप्ति श्राद्धस्य चैव हि। कृष्णपक्षस्त्वहस्तपा शुक्ल.स्वप्नाय शरी॥ श्येत पितरो क्या देवाश्च पितरश्चगे।

४१७
अमावस्या महत्व वर्णन
अन्योन्यपितरोह्येते देवाश्च पितरो दिवि IISE
एते तु पितरो देवा मनुष्या पितरश्व ये।
पिता पितामहश्चेव त्येव प्रपितामहः ॥८०
इत्येप विषय. प्रोक्तः पितृणा सोमपायिनाम् ।
एतत् पितृमहत्त्व हि पुरापानश्चयंगतम् १८१
इत्येप सोमसूर्याभ्यामलस्य च समागम. ।
अवाप्ति श्रदयाचंद पितृ.पाञ्चवतपणम् १२
पर्वणाञ्चंब यः कालो यातनास्थानमेव च ।
समासाद कीर्तितस्तुभ्यं समएप सनातनः ॥२३
वरप्य येन तत्सर्वं कथितन्त्वेकदेशिकम् ।
अशक्य परिसस्थातुश्रद्धेय भूतिमिच्छना १८४
स्वायम्भुवस्य देवस्य एप सर्गो मयेरित ।
विस्तरेणानुपाच्च भूय. किं कथयामि वः॥८५
प्रेतों के गतागत कामाता और धाद की प्राप्ति इसके लिये
वृष्ण पक्ष के ही दिन है और जो शुक्र पस होता है वह तो उनके शयन
के लिये रात्रि होती है ॥७॥ ये इनने पितर देव है-देव पितर हैं । ये
यन्योन्य में पितर है और दिव नोक में देव पितर है 1७1 ये पितर देव
हैं और जो देव पितर है तथा मनुष्य पितर है एव पिता-पितामह और
प्रपितामह है 1८०॥ यह इतना सोमपायो पितृगणों का विषय बदला
दिया गया है । यह पितगण का महत्व पूराा में निश्चय को प्राप्त हुआ
है ।1८१॥ यह सोम और सूर्यों का वर्षण तथा पर्वो का काल और
यातना भोगने का स्थान यह सभी सक्षेत्र के साय तुम्हारे सामने वर्णित
कर दिया है । यह सम और सनातन है। जिसके द्वारा वरन्य होता है
वह सभी एक देशिक कह दिया गया है। इसको परिमस्या नहीं की जा
सकती है । वो भूति को इच्छा करने वाला है उगे श्रद्धा करनी चाहिये।
॥८२, ८३, ८४॥ स्वायम्भव देव का यह समं विस्तार के साथ और
.

मरमपुराण मानुपूर्वी के सहित मैंने आपको सब बतला दिया है । अब अगे आप लोगों को में वफा तलाऊ-मह कहिए ॥६॥ - ५६ -चतुर्युग मान वर्णन चतुर्युगानि यानि स्यु पूर्व स्वायम्भवेऽन्तरे । एषा निसर्ग सरयाञ्च गोतुमिच्छाम विस्तरात् ॥१ एतच्चतुयुग व तद्वक्ष्यामि नियोधत । तत्प्रमण प्रमख्याय विस्तराच्चैव वृत्स्नश २ लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दन्तु मानुषम् । तेनापीह प्रसख्यायवक्ष्यामि तु चतुयुगम् । ३ काष्ठा निमेषा दश पञ्च व त्रिशच्च काष्ठानयेत, कला तु त्रिंशत्कताश्चैव भवेन् मुहूर्तस्तस्त्रिशता रात्र्यहनी समेते ॥ ४ ॥ अहोरान विभजते सूर्यो मानुषलौविके । राति स्वप्नाय भूतानाञ्चेष्टाय कर्मणामह । ५ पित्र्ये रात्यहनी मास प्रविभागस्तयो पुन कृष्णपक्षस्त्वहस्तेषा शुक्ल स्वप्नाय शबरी ॥६ त्रिशा मानुपा मासा पत्रो मास स उ. यते । शतानि जीथि मासाना पप्ठ्या चाभ्यधिकानि तु । पंत्र रावत्सरो राप मानुषेण विभाव्यते ॥७॥ ऋपियो ने वहा-पूर्व स्वायम्भुव अन्तर मे जो चतयुग हैं । अब हम लोग उनका निसग और उनका सरूपा काल श्रवण करना चाहते हैं और पूर्व विस्तार व साथ उसे सुनना चाहते हैं 18 श्री सूतजी ने पहा-यह जो चारो युगा को चौपडी जिस प्रकार से है उसको मैं बतलाता हू उस मली भाति समदानी । उनका जो प्रमाण होता है उसको ४१६ चतुयुग मान वर्णन F प्रमत्यात करके पूर्ण रूप से विस्तार के सहित मैं दतला रहा हूँ ।।२।। लौकिक प्रमाण के द्वारा मानुष वर्ष का निष्पादन करके उमी के द्वारा यहा पर प्रमरयात करक मैं चारों युगो का वर्णन करू गा ॥३॥ पन्द्रह निमेप की काप्ठा होती है और तीस कापायो को एक कला गिनी जाती है। तीस कलामो का एक मुहूर्त होता है और तीस मुहूर्तों का एक अहोरात्र हुआ करता है ।।४।। सूर्य भानुप लौकिक- अहोरात्र मे विभक्त होता है। रात्रि का समय प्राणियो के शयन कर न्द्रा लेने का होता है और दिन विविध भांति के कम्मों की चेष्टा करने के लिये हुअा करता है ||५|| पितृगण का मास गवि और दिन हुमा करता है उन दोनो का प्रतिभा इसी भांति हुआ करता है कि उनका कृष्ण पक्ष मास का दिन हुआ करता है और वो मास का शुक्ल पक्ष होता । वही शर्वरी स्वप्न के लिये होती हैं ।।६।। जो ये तीस मानु । मास है यह पत्र मास कहा जाया करता है। तीन सौ साठ मासो का पैन सम्वत्सर होता है जो मानुष के द्वारा विभा- वित हुआ करता है ॥७॥ मानुषेणेव मानेन वर्षाणा य छत भवेत् । पितृ णा तानि वर्षाणि सस्यातानि तु त्रीणि वै । दश च ह्यधिका मासा पितुसरयेह कीर्तिता। लौकिकेन प्रमाणेन अब्दो यो मानुपः स्मृत । एतदिव्यमहा रात्रमित्येषा वैदिकी श्रुति ॥ दिव्ये राष्पहनी वप प्रविभागस्तयो. पुन । अहस्तु यदुदक चंव रात्रिर्या दक्षिणायनम् ॥ एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसख्याते तयो. पुन: ॥१०॥ विशद्यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासम्तु स स्मृत.। मानुपाणा शत यच्च दिव्या मासास्त्रस्यतु ।। तथैव सह सरयातो दिव्य एप विधि, स्मृत. ॥११ त्रीणि वर्षशतान्येव पष्टिवपस्तथैव च । -- ४२० मत्स्यपुराण दिव्य. सम्वत्सरोोप मानुषेण प्रकीर्तितः ।।१२ त्रीणि वर्षसहस्राणि मानुषेण प्रमाणतः। त्रिंशदन्यानि वर्षाणि स्मृतः सप्तर्षिवत्सरः ॥१३ नव यानि सहस्राणि वर्षाणा मानुषाणि । वर्षाणि नवतिश्चैव ध्रुवसम्वत्सरःस्मृतः ।।१४ मानुष मास के मान के द्वारा हो जो वर्षों का एक शतक होगा वे पितृगण के तीन वर्ष संख्यात किये गये हैं । दश अधिक मास होते हैं । यहाँ पर यही पितृसंख्या कौतित की गयी है । लौकिक प्रमाण से जो मानुष अब्द कहा गया है-यह दिव्य अहोरात्र होता है-इस प्रकार से यही वैदिको श्रुति है | दिव्य रात्रि भोर दिन एक वर्ष होता है और उन दोनों का विभाग इसी प्रकार से हुआ करता है कि जो उत्तरायण है वह दिन होता है और जो दक्षिणायन होता है वही रात्रि होती है । ये ही राति और दिन दिव्य उनके प्रसस्यात किये गये हैं ।।१०।। तीस जो वर्ष होते हैं वही दिव्य मास कहा गया है । मनुष्यो के जो शत है वे दिव्य तीन मास होते हैं । इसी भौति से यह सख्यात हुआ करता है और मही दिव्य विधि बतलायी गयी है ॥११॥ तीन सौ साठ वर्ष का इस प्रकार से एक दिव्य सम्वत्सर मानुष के द्वारा प्रकीर्तित किया गया है ।।१२।। म'नुप प्रमाण से जो तीन सहय वर्ष होते हैं और तीस और होते हैं वही सप्त. पियों का वत्सर कहलाता है। नो सहसमानुप वर्ष और नव्वे अधिक अर्थात् नौ हजार नये वर्ष का ध्रुव सम्वत्सर कहा जाया करता है। ॥१३, १४॥ पदिशतु सहस्राणि वाणां मानुपाणि च । पष्टिश्चव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया ।। दिव्यं यपंसहमन्तु प्राहुः संख्याविदा जनाः ॥१५ इस्पेनपिभिर्गात दिव्यया संस्यया द्विजाः । दिध्येनंय प्रमाणेन युगरांच्या प्रयत्पता ।।१६

४२१
चतुयुग मान वर्षन
चत्वारि भारते वर्षे युगानि ऋषयोऽब्रुवन् ।
कृतप्रेता द्वापरञ्च कलिश्चैव चतुयु गम् ।।१७
पूर्व कृतयुग नाम ततस्त्रताभिधीयते ।
द्वापररुच कलिश्चैव यगानि परिकल्पयेत् ॥ ८
चत्वार्याहुः सहस्राणि वणिा तत् कृत युगम् ।
तस्य तावच्छती सन्ध्या सत्यशश्च तथाविध. ||१६
इतरेपु ससन्ध्येपु ससन्ध्याशेषु च विपु ।
एक्पादे निवर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ॥२०
घेता त्रीणि सहस्राणि युगसंख्याविदो विदु. ।
तस्यापि त्रिशती सन्ध्या सध्याश. सल्यया समः ॥२१
जो सख्या के वेत्ता पुरुष हैं वे छत्तीस हजार मानुष घर्ष और
साठ हजार सख्या के द्वारा जो सस्यात किये गये हैं उनको दिव्य सहस
कहा
करते हैं ॥१॥ द्विजगण ! ऋषिपणों के द्वारा दिव्य संख्या
से यहाँ बनाया गया है और दिम्य प्रमाण के द्वारा ही युग सख्या भी
प्रकीर्तित की गयी है । ऋषियो ने भारत वर्ष में चार युग पतलाये हैं ।
उर चारो युगों के नाम कृतयुग-क्षेतायुग - द्वापर मोर कलियुग हैं।
ये चारों युग क्रम से ही हुमा करते हैं। सबसे पूर्व कृतयुग होता है ।
उसके पश्चात् यतायुग कहा गया है और फिर द्वापर तथा कलियुग
होता है । चार सहस्र वर्षों का कृतयुग होता है। उस कृतयुग को उतनी
ही शत वाली सन्ध्या हाती है बोर उसी प्रकार का साध्याश होता है ।
।।१६, १७, १८, १६॥ इतर तीनों मे सध्या से युक्त मोर सन्ध्याश से
युक्तों में एक पाद मे सो सहन निवृत्त हो जाते हैं । २०॥ युग सख्या के
वेत्ता लोग त्रेता को तीन सन कहा करते हैं । उसको भी तोन शत
Hilelil होती है और सन्ध्या के समान ही सन्ध्याश होता
है ।। २१॥
वर्ष

५२२ मत्स्यपुराण द्वे सहस्र द्वापरन्तु सन्ध्याशी तु चतु शतम् । सहस्रमेक वर्षाणा कलिरेव प्रकीर्तित ।। हशते च तथान्ये च सन्ध्या साध्याशयो स्मृते २२ एपा द्वादशसाहस्री युगसस्या तु सज्ञिका। कृतता द्वापरुच कलिश्चेति चतुष्टयम् ।।२३ तत्र सम्वत्सरा सृष्टा मानुपास्तान्निबोधत । नियुतानि दश द्व च पञ्च चैवात्र संख्यया ॥ अष्टाविशत्सहस्राणि कृत युगमयोच्यते ॥२४ प्रय तन्तु तथा पूण दे चान्ये नियुते पुन । पप्णवतिसहस्राणिसख्या तानिच सख्यया ।।९५ तायगस्य सरयंपा मानुषेण तु सज्ञिता । अप्टी शतसहणि पर्णाया मानुपाणि तु ॥ चतु पष्टिसहस्राणि वर्षाणा दू पर युगम् ।।२६।। चत्वारि नियुतानि स्युवर्षाणि तु कलियुगम् । द्वानिशच्च तथान्यानि सहस्र णि तु सख्यया ।। एतालियुग प्राक्त मानपेण प्रमाणत ॥२७॥ एपा चतुयुगावस्या मानुषेण प्रकीतिता। चतयंगस्य सख्याता साया सध्याशक सह ॥२८ ४२३ "चतुर्युग मान वर्णन तथा छियानवे सहस सस्था के द्वारा त्रेतायुग की यह सरया मानुष प्रमाण से सज्ञा पाली को गयो है । मानुप वपं आठ सौ सत्रह और चौसठ हजार पर्षों के प्रमाण वाला द्वापर युग कहा गया है ।। ५, २६॥ चार नियुत और अन्य पत्तीस सहस्र वर्षों की सस्था वाला कालयुग मानुप प्रमाण से कहा गया है ॥२७॥ यह चारो युगो की अवस्था म नुप प्रमाण के द्वारा पीतित की गयी है और चारो युगा की सस्या उनकी सन्ध्या और सध्याश से सहित सध्यात की गयी है ॥२८॥ एषा चतुयुगास्या तु साधिका त्वेकसप्तति । कृतनतारियुक्ता सा मनोरन्तरमु-यते ॥२६ मन्वन्तरस्यसख्या तु मानुपेण निबोधत । एकत्रिंशत्ताकोट्य सख्याता सख्ययाद्विजं ॥३॥ तथा शतसहस्राणिदशचान्यानि भागश । सहस्राणि तु द्वानिशच्छवान्यष्टाधिकानि च ॥३१ अशातिश्चैव वर्षाणि मासारवाधिकास्तुपट् । मन्वन्तरस्यसत्मपामानुषेण प्रकीर्तिता ॥२२ दियेन च प्रमाणेन प्रवक्ष्याम्यन्तर मनो । सहस्राणा शतान्याहु सच वै परिसख्यया ॥३३ चत्वारिंशत् सहस्राणि मनोरन्तरमुच्यते । मन्वन्तरम्य कालस्तु युग सह प्रकीर्तिता ।।.४ एपा चतुर्युगाख्या तु साधिका ह्यवसप्तति । ममेण परिवृत्ता सा मनोरन्तरमुच्यते ।।३५ एतन् चतुदशगुण वल्पमाहुस्तु तद्विद । ततस्तु प्रनय कृत्स्न स तु सप्रलयो महान् ॥३६ इन चारो युमो की साधिका इकहत्तर चौकडो जिसम कृत त्रेता मादि सभी युग होत हैं एक मनु का अगर होता है। अब उसी मन्वन्तर यो राक्ष्या मानुष प्रमाण स भी समय यो । द्विजगणा के द्वारा सध्या से ।

१२४ मत्स्यपगत - - इकत्तीस करोड़ संख्यात की गयी है। पापी सहस और अन्य दा सहस्र एवं अधिक बत्तीस सौ वर्ष एवं छ मास अधिक मानुष प्रमाण से यह सध्या गन्वन्तर की कही मयी है ।। २६, ३०, ३१, २२, अब मैं दिव्य प्रमाण से मनु का अन्तर बतलाता है। यह परिसंख्या से सो सहन कहा गया है । चालीस राहत मनु का अन्तर बतलाता है। वह परिसख्या से सो सहल कहा गया है। बालोस सहस मनु का अन्तर कहा जाता है। उसके ज्ञाता लोग इसका चौदह गुना पल्प कहा करते हैं और मन्वन्तरों का काल युभों के साथ ही कहा गया है। ये चारो युगो की नाम वाली साधिका इकहत्तर चौकड़ी की होती है और कम से यह परिवत होती है तो वही मन्वन्तर कहा जाता है। कल्प के बाद पूर्ण प्रलय होता है । वह महान् सप्रलय होता है ।। ३३,३४, ३५, ३६ ॥ वलप्रमाणो द्विगुणों यथा भवति संख्यया। चतुर्युगास्या व्याख्याता कृतंत्रतायुगञ्च ॥३७ त्रेतासृष्टि प्रवक्ष्यामि द्वापर कलिमेव च । युगपत्समवेतो द्वौ द्विधा वक्तु न शक्यते ॥३८ क्रमागत मयाप्येतत्तुभ्य नोक्त युगद्वयम् । ऋषिवशप्रसङ्गन व्याकुलत्वात्तथा क्रमात् ॥३६ नोक्त त्रेतायुगे शेष तद्वक्ष्यामि निबोधत । मथ तायुगस्यादौ मनुः सप्तयश्च ये॥ श्रौतस्मात ब्रुवन्धम ब्रह्मणा तु प्रचोदिताः ॥४॥ दाराग्निहोत्रसम्बन्ध ऋग्वजु सामसहिताः । इत्यादिवहुल श्रोत धम सप्तर्षयोऽब्रुवन् । ४१ परम्परागत धर्म स्मातंत्वाचारलक्षणम् । वर्णाश्रमाचारयुक्त मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।।४२ जिस प्रकार से सख्या से कहप का प्रमाण दिगुण होता है । कृत.

४:५ चतुर्युग मान वर्णन प्रय होता को सृष्टि को बतलाऊंगा। द्वापर और कलियुग को भी बत- लाऊंगा। एक ही साय समवेत ये दोनो दो प्रकार से नहीं बतलाये जा एकते हैं । क्रम से प्राप्त इन दोनो युगो को मैंने भी आपको नहीं पतलाया है। ऋषियों के वश के प्रसङ्ग से व्याकुलता होने के कारण तया क्रम से प्रेतायुग में शेष नहीं बतलाया है । उसे रद बतलायेगे भनी भौति समझ लो। इसके अनन्तर त्रेता युग के आदि में मनु और पो सप्तपि हैं उनको घौत एव स्मात धर्म को बतलाते हुए ब्रह्माजी फे द्वारा प्रेरित किया गया था। ३०, ३८, ३६, ४०॥ दारा-अग्निहोत्र का सम्बन्ध- ऋक्, यजु और साम सहिताऐ -इत्यादि बहुलता वाला योत धर्म सप्तपियों ने कहा था। स्मात व आचार क लभरण दाला और घर्णायमों के आचार से युक्त परम्परा क द्वारा आया हुआ धर्म इस सबको स्वायम्भुव मनु ने बतलाया था॥४१, ४२॥ सत्येन ब्रह्मचर्येण श्रुतेन तपसा तथा । तेषा सुतप्ततपसा मार्गेणानुक्रमेण ह १४३ सप्तर्षीणा मनोरचंद आदौ त्रेतायुगे तत. । अवुद्धिपूर्वक तेन सकृत् पूर्वमेव च ॥४४ अभिवृत्तास्तु ते मन्त्रा दर्शनम्तारकादिभि । आदिकल्पेतुदेवाना प्रादुर्भूतास्तुतेस्वयम् ॥४५ प्रमाणेप्वथ सिद्धानामन्यपाञ्च प्रवतते । मन्त्रयोगो व्यतीतेषु वल्पेप्वथ सहस्रश ॥ ते मन्त। वे पुनरतेषा प्रतिमायामुपस्थिता ॥४६ ऋचो यजूपिसामानिमन्त्राश्चायवणास्तु ये। सप्तपिभिश्चयेप्रोता.स्मात्तन्तु मनरखवीत् ॥४७ वेतादो सहता वेदा केवल धम्मसेतव । सरोधादायपश्चंय यस्यन्ते द्वापरे च॥ ऋषयस्तपसा वेदानहोरानमधीयत | अनादिनिधना दिव्या पर्व प्रोक्ताः स्वयम्भुवा ।

४२६ ६ मत्स्यपुराण - गये स्वधर्मसवृता साझा यथा धर्म युगे युगे। विलियन्ते स्वधर्म-तु वेदवादाद्यथायुगम् ॥६॥ सत्य से ब्रह्मचर्य से- श्रुत- तप स और उनके भली भांति तपे हुए तप से अनुक्रम मार्ग से बतलाया या ।।४३।। इसके पश्चात् आदि त्रेतायुग मे सप्तपियो क और मनु के अबुद्धि पुरस्सर ही एक बार पहिले ही उसने मन्त्रो को अभिवृत्त किया था। वे हो अभिवृत्त मन्त्र तारक आदि दर्शनों के द्वारा देवो के आदि कल्प मे स्वय ही प्रादुर्भूत हो थे ।। ४४, ४५ ॥ इस अनन्तर वै सिनो के तथा अन्यो के प्रमाण मे प्रवृत्त हुए हैं। इसके पश्चात सहस्रो बस्यो के व्यतीत होने पर यह मन्त्र घोग रहा है ॥४६॥ फिर उनके वे मन्त्र प्रतिमा के रूप में उपस्थित हुए थे । मचाऐ--यजु-साम और जो अथववेद क मात्र है तथा सप्त. पियो के द्वारा जो मन्त्र कहे गये है और स्मात इनको मनु ने कहा था। त्रेतादि मे सहत हुए वेद क्वल धर्म के सेतु थे। फिर आयु के सराध होने से वे ही द्वापर मे व्यस्थित हुए हैं । ऋविंगण 14 के द्वारा रात दिन वे.) का अध्ययन किया करत थे ।। ४७, ४८॥ भगवान् स्वयम्भू ने पूर्व मे अनादि निधन अर्थात् आदि-अत से रहित दिव्य वेदो को वहा था। मे युग-युग में धर्म के अनुसार ही अङ्गो २ सहित स्वधर्म यु के अनुसार वेदवाद से अपने धर्म को विकृत किया करते हैं || १६ आरम्भयज्ञः क्षयिंज्ञा विश. स्मृता । परिचारयज्ञा शूद्राश्च जपयज्ञाश्च ब्राह्मणाः ।।५० तत समुदिता वर्णास्त्रोताया धर्मशालिन । त्रिपावन्त प्रजावन्त समृद्धिसुखिनश्च पै ॥५१ ब्राह्मणश्च विधीयन्ते क्षत्रिया क्षत्रिपवित्र । वैश्यान शूद्रानुवर्तन्ते शूद्रात् परमनग्रहात् ।।१२ मुभा. प्रकृतपस्तपा धर्मा वर्णाश्रमाश्रयाः । सहरिपतेन मनसा वाचा या हस्तम्भणा ॥ साहुए 'चतुयुग म.न वर्णन नेतायुगे ह्यविकले कमरिम्भः प्रसिध्यति ।।३।। आयूरूपं वलं मेधा आरोग्य धम्मशीलता। सर्वसाधारण ह्य तदासीत्रेतायुगे तु वे ॥५४ वर्णाश्रमव्यवस्थानमेषां ब्रह्मा तथाकरोत् । सहिताश्च तथा मन्त्रा आरोग्यधर्मशीलता ॥५५ सहिताश्च तथा मन्त्रा ऋपिमिब्रह्मण सुतः । पशः प्रतितश्चैव तदा ह्येव तु देवतः ।।५६ याम. शुवलेजयश्चैव सवसाधनसभृतः । विश्वसृभिस्तथा साद्धं देवेन्द्रेण महौजसा ।। स्वायम्भुवेन्तरे देवस्ते यज्ञाः प्राक्प्रवर्तिताः .१५७।। आग्म्म यज्ञ क्षत्र हदि था, फिर वैश्यों के यज्ञ कहे गये हैं । शूद्र परिचार यशो वाले थे तथा जप यज्ञ वाले ब्राह्मण हुए थे। ५० ।। इसके उपरान्त त्रेता मे धर्मशाली वर पा समुदय हुआ था। वे स्व त्रियाओ से सम्पन्न प्रजात्रो वाले और सुख समृद्धि से युक्त थे। ब्राह्मणो के दाग क्षत्रियों का विधान किया गया था-क्षत्रियो के द्वारा वैश्यो का दिया गया था। यूद वैश्यो का अनुवत'न करते थे और शूद्रो पर परम अनुग्रह था। उन सबकी प्रकृतियां परम शुभ थी और धर्म भी वर्गों और पाश्रमों के सागश्रा वाला था। उस पूर्ण त्रेता युग मे सङ्कलित मन से-वाणी से किये क्म में वह कम्पों का समारम्भ प्रसिद्ध हुआ या ॥५१, ५२, ५३ ।। उस त्रेता युग मे आयु-रूप-बल-मेघा- आरोग्य ओर धर्मशीलता यह सब कुछ सबके लि' साधारण था। ब्रह्मा- • जी ने इन सवी वरों और आश्रमो की उस प्रकार की व्यवस्था करदी • थी कि आरोग्य-धमंगोलता-मन्त्र और संहिता उसी तरह की थी।। ५४ ५५ ।। ब्रह्माजी के पुत्र ऋपियो के द्वारा सहिताएं और मात्र प्रवृत्त किये "गये थे। उस समय में ही देवतो के द्वारा यश प्रवर्तित किया गया था। समस्त साधनो से संभन याम-शुक्ल-जपो के द्वारा तथा महान् ओज वाले और हाथों के द्वारा मत्स्यपुराण देवेन्द्र ने विश्व सृजो के साथ देवो ने सब यश स्वायम्भुव अन्तर मै पहिले प्रवर्तित किये थे।। ५६,५७ ॥ सत्य जपस्तपोदान पूर्व धर्मोऽयमुच्यते। यदा धम्मंस्य ह्रसते शाखा धर्मस्य पद्धते ॥५८ जायन्ते च तक्ष शूराआयुष्मन्तो महाबलाः । न्यस्तदण्डा महायोगायज्वानोब्रह्मवादिन ॥५॥ पनपत्रायताक्षाश्च पृथुवमा सुसहता । सिंहोरस्का महासत्वा मत्तमातङ्गगामिनः ॥६० महाधनु राशीव ओताया चक्रवर्तित । सर्वलक्षणपूर्णास्ते यग्रोधपरिमण्डला. १६१ न्यग्रोधौ तु स्मृतीवाहू व्यामोन्यग्रोधउच्यते । व्यामेन तूच्छयोयस्तअतउध्वन्तदेहिन ॥ समु-छयो परीणाहो न्यग्रोधपरिमण्डल ||६२|| चक्र रथो मणिर्भार्या निधिरश्वोगजस्तथा। प्रोक्तानि सनरत्नानि पूर्व स्वायम्भुवेऽन्तरे ।।६३ सबसे पूर्व सला-जप-तप और दान यही धर्म कहा गया था। जिस समय मे धर्म का कुछ हास होता है तो धर्म की शाबा की वृद्धि हुआ करती है ।।५८॥ उस समय मे गूरो की समुत्पत्ति हुआ करती थी जो शूर आयुष्मान और महान बलवान थे। ये शूरन्यस्त दण्ड-महान् योग वाले यज्वा-ब्रह्मवादी-पद्म पत्र के तुल्य आयत नेवो वाले-पृथु वा-सुसहत-सिंह के समान उर स्थल चाले-महासत्त्व तथा मस्त हाथी के सदश गमन करने वाले थे। उस समय मे होने वाले शूर महान् धनु- शरी थे और ता मे चक्रवती हुए थे। वे शूर समस्त पक्षणो से परि- पूर्ण एव पोध परिमण्डल बाले थे ||५६, ६०, ६१|| दोनो म्यग्रोध दो बाहू कहे गये हैं और व्याम को न्यग्रोध कहा जाता है जिसका उछम व्याम के समाा है इसे उपरान्त देह धारी का समुम्छम न्यगोध परिमल चतुर्युग मानवर्णन परीगाह होता था ॥ १२॥ पहिले स्वायम्भुव वन्तर में चक्र- रष-मणि-मार्या-निधि-अश्व--गज ये सात रत्न दताये गये है॥३॥ विष्णोरशेन जायन्ते पृथिव्यां चक्रवर्तिनः । मन्वन्तरेषु सर्वेषु ह्यतीतानागतेपु वै ॥६४ भूतभव्यानि यानोह वर्तमानानि यानि च । नेतायुगानि तेप्वत्र जायन्ते चक्रवतिनः ॥६५ भद्राणामानि तेपाञ्च विभाज्यन्ते महीक्षिताम् । अत्यद्भ तानि चत्वारि वलधर्म सुख धनम् ।।६६ अन्योन्यस्त्राविरोधेन प्राप्यन्ते नृपतेः समम् । अर्थोधम्मश्च कामश्च यशोविजयएव च ।।६७ ऐश्वर्येणाणिमायेन प्रभुशक्तिवनान्विताः श्रुतेन तपसा चैव ऋपोस्तेऽभिभवन्ति हि । ६८ वलेनाभिमवन्त्येते तेन दानवमानवान् । लक्षणंरचंव जायन्ते शरीरस्थरमानुपं. ॥६६ केशास्थिता ललाटेन जिह्वा च परिमार्जनी । श्यामप्रमाश्चतुदंष्ट्राः श्रवसाश्चोर्ध्वरेतसः ॥७० यो व्यतीत हो गये हैं और पाने वाले हैं उन सभी मन्वन्तरों में इस पृथ्वी मण्डल में चक्रवर्ती नृप भगवान् विष्णु के अंश से ही समुत्पन्न हुआ करते हैं ॥६४।। भूत, मध्य और वर्तमान को भी यहाँ पर त्रेता युग हैं उनमें चक्रवर्ती समुत्पन्न हुआ करते हैं। उन मही के पालक नृपों के बहुत ही मद नाम होते हैं बोर उनमे वन-धर्म-सुख और धन ये चार वस्तुएँ अत्यन्त ही अद्भुत हुआ करते हैं ।।६५. ६६॥ अन्योन्य के परसर में विरोध न होने से नृपनि के अर्य-धर्म-काम-यश और विजय समान ही होते थे अणिमा प्रादि के ऐवयं से प्रभु शक्ति के बल से समन्वित ते नृपतिगण युत एव तप के द्वारा ऋषियों को भी अभिभूत करने वाले

मत्स्यपुराण
-
हुआ करते थे ॥६७, ६८ अमानवीय शरीरो मे स्थित लक्षणो के द्वारा'
वे उत्पन्न हुआ करते थे और ये उस बल के द्वारा दानव-मानबो को
तिरस्कृत किया करते थे ॥६॥ ललाट पर उनके केश स्थित होते थे
तथा जिह्वा परिमार्जन करने वाली थी-श्याम उनकी प्रभा थी--चार
द्रष्ट्राओ वाले-श्रवस और ऊर्ध्वरेता होते थे ।।७०॥
आजानवाहवश्चैव तालहस्तौ वृपाकृती।
परिणाहप्रमाणभ्या सिंहस्कन्धाश्च मेधिनः ॥७१
पादयोश्चमत्स्यौ तु शङ्खपन च हस्तयो ।
पञ्चाशीति सपस्राणि जीवन्ति जरामयाः ।।७२
असङ्गा गतयस्तेषा चतस्रश्चक्रवर्तिनाम् ।
अन्तरिक्षे समुद्रेपु पाताले पर्वतेषु च ॥७३
इज्यादानन्तप, सत्यन्त्रोताधर्मास्तु व स्मृता ।
तदा प्रवनते धर्मों वर्णाश्रमविभागशः ॥७४
मर्यादास्थापनार्थञ्च दण्डनीतिः प्रवर्तते ।
'हृष्टपुष्टा जना' सर्वे आरोगा पूर्णमानसा ॥७५
एको वेदश्चतुष्पादरनेतायान्तु विधि स्मृत. ।
पोणि वर्षसहस्राणि जीवन्तेतरता:प्रजा ॥७६
पुत्रपौत्रसमाकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण ताः ।
एते बनायुगे भावस्त्रोतासरया निवोधत ।.७७
शेतायुगस्वभावेन सघ्यापादेन वर्तते ।
सन्ध्यापाद. स्वभावाच्च योऽश पादेनतिष्ठति ||
उनकी वाहपे जानु पर्यन्त सम्बी होती थी-ताल वृक्ष En
राय होते पं तया वृप में तुल्य अाति हुमा बरती थी। परिणाह और
प्रमान सिंह के मनात स्वन्धों वाले मेघा युक्न थे। उन परणो मैं
गाना माप घिद हुभा परत पे एव हाबी म श और पदुम होते
। सय घरा और रोग ग रहित होपर पिध सी हुशार वर्ष पम्पत

. द्वार और कलियुग वर्णन जीवित रहा करते थे। उन चरत्तियों को चार सङ्ग रहित गतियाँ हुआ करती थी-समुद्रों में, अनरिस में, पाताल म और पवनो में सर्वत्र पनि रहा करती थीं 11७१, ७२, ७३॥ इग्या-दान-नप मौर साय ये त्रेतायुग के धम्मं बनाये गये है। उस समय में वर्षों और आश्रमों का विभाग वाला धम्म प्रवृत्त रहा करता था ||७४|| सासारिक समान कार्यों को मर्यादा की स्थाप । वरने लिये दण्ड नीति की प्रवृत्ति हुआ करती थी । वह ममय ऐना होता था कि उसमे प्रायः सभी मनुष्य हृष्ट पुष्ट और पूर्ण मानस वाले रोगो स रहिन रहा करते थे। एक वेद और चार पाद पे-यही विधि त्रेता में कही गयी है। ठम समय मे वे सव • प्रजाजन तीन हजार वप तक जीवित रहा करते थे ।।७५, ७६|| समी लोर पुत्रों एव पौत्रो में समाकीर्ण होने वाल रहार क्रम से ही मृत्यु को प्रान हुया हुमा करते हैं । तात्पर्य यह है विरों क रहने हुए छोटो की करती थीं। यह ही त्रेतायुग का भाव था अब त्रेता की सम्परा को भी समझ लो ॥७॥ त्रेतायुग के स्वभाव से सन्या का पाद से रहती थी और स्वभाव स सन्ध्या या पाद जो है वह जो अब है पाद से ही स्थित रहा करता था ॥७॥ मृत्यु न” पुनः ५७-द्वापर और कलियुग वर्णन मत दिर्घ प्रवक्ष्यामि द्वापरस्य विवि तन वेतायुगे क्षोणे द्वापर प्रतिपद्यते ॥१ द्वारादो प्रजानान्तु मिद्धिस्नेतायगे तु या। परिवृत्ते युगे तस्मिस्तत. सावप्रणश्यति ॥२ तत. प्रत्तिने तासा प्रजाना द्वापरे पुन । लोभोतिवणिग्युद्ध तत्त्वानामविनिश्चय. ॥३ प्रावमद व वर्णाना कम्मणान्तु विपर्यय ।

४३२ मत्स्यपुराण यात्रा बधःपरोदण्डोमानोदर्पोक्षमाबलम् ॥४ तथा रजस्तोमोभूयः प्रवृत्ते द्वापरे पुनः । आद्यवृतेनाधर्मोऽस्ति स नेताया प्रवर्तितः ॥५ द्वापरे व्याकुलो भूत्वा प्रणश्यति कलो पुनः । वर्णाना परेधर्माःसङ्घीयन्ते तथाश्रमाः ॥६ द्वैधमुत्पद्यते चैव युगे तस्मिन्श्रुतिस्मृतौ । द्विधाश्रुति स्मृतिश्चैवनिश्चयो नाधिगम्यते । ७ महा महर्षि सूतजी ने कहा-इसके आगे अब मैं द्वापर की विधि फा वर्णन परूगा । उस त्रेता युग के क्षीण होन पर द्वापर युग प्रतिपन्न हुप्रा करता है । प्रजाजनो को जो त्रेतायुग मे सिद्धि थी वह द्वापर के आदि काल तक रही थी किन्तु ज्यो ही उस युग का परिवर्तन हुआ वैसे ही वह प्रेता युग की सिद्धि नष्ट हो गई थी। उन्ही प्रजाओ को द्वापर मे युग के प्रवृत्त होने पर लोभ-ति-वाणीयुद्ध और तत्वो के विषय मे विशेष निश्चय का अभाव हो गया था ।। १, २, ३॥ वर्ण जो ब्राह्मण- क्षत्रिय-वैश्य और शद्र ये वारो का एक सुन्दर क्रम चला आ रहा था उसका प्रध्वस हो गया था और जो लोगो के वर्णों के अनुसार मर्यादित कम होते थे उन सबमे विपरीत भाव उत्पन्न हो गया था । यात्रावध- परदण्ड-मान-दर्प-अक्षमा-अबल ये सब उस समय मे पनप गये थे और द्वापर युग के प्रवृत्त होने पर रजोगुण तथा तमोगुण की विशेषता

४३३
द्वापर और कलियुग वर्णन
अनिश्चयावगमनाद्धर्मतत्वं न विद्यते ।
धर्मतत्त्वे ह्यविज्ञाते मतिभेदस्तु जायते ।
परस्पर विभिन्नास्ते दृष्टीनां विभ्रमेण तु ।
अतो दृष्टिविभिन्नरतैः कृतमत्याकुलन्त्विदम् ॥
एको वेदश्चतुष्पादः संहृत्य तु पुनः पुनः।
संक्षेपादायुपश्चैव व्यस्यते द्वापरेप्विह ॥१०
वेदश्चैकश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिपु ।
पिपुत्र: पुनर्वेदा भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रम. ॥११
ते तु ब्राह्मणविन्यासः स्वरक्रमविपर्ययः ।
संहृता ऋग्यजु साम्ना संहितास्तमहर्षिभिः ॥१२
सामान्याद्वंकृताच्नौव दृष्टिभिन्नः क्वचित् क्वचित् ।
ब्राह्मणं कल्पसूत्राणि भाष्यविद्यास्तथैव च ॥१३
अन्ये तु प्रस्थितास्तान्वं केचित्तान् प्रत्यवस्थिताः ।
द्वापरेषु प्रवर्तन्ते भिन्नार्थस्तैः स्वदशनः ।।१४
जब किसी भी निश्चय का अवगमन नही होता है धम्म' का
तत्त्व विद्यमान नहीं रहा करता है । धर्म के तत्त्व के विज्ञात न होने
पर मति मे भेद स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो जाता है ।। ८॥ इस तरह
दृष्टिकोणो के विभ्रम होने से वे सब परस्पर मे विभिन्न हो जाते हैं ।
अतएव विभिन्न दृष्टि वाले उनके द्वारा यह सब संसार मति से आकुल
हो जाया करता है ।। ६॥ वेद वस्तुतः एक हो है किन्तु उसके चार पाद
पुनः पुनः संहृत करके किये गये थे। द्वापर युग मे आयु के सलेप से यह
ऐसी व्यवस्था की गयी थी। एक ही वेद के चार भेद द्वापररादि मे
व्यवस्थित किये गये थे। दृष्टि के विभ्रम वाले ऋषियो क पुत्रो के द्वारा
फिर वेदो के भेद किये गये थे॥१०, ११॥ ब्राह्मण विन्यास और
स्वर क्रम के विपर्पयो से वे वेद सहृत किये गये हैं और उन महपियो के
ऋक् यजु और सामवेदो को सहिताएं की गयी थी ।। १२ ।। सामान्य

द्वापर और कलियुग वर्णन उपद्रव समुन्पन्न हो जाते हैं ॥१५, १६, १७, १८ ।। इसके पश्चात् वाणी-मन और कर्मों के द्वारा जो दुःख होते हैं उनमे निवेद उत्पन्न होता है । जब निर्वेद होता है तो उनको दुख से मोक्ष प्राप्त करने की विचारणा होती है । उस दुखो से छुटकाग पाने की विचारणा मे वैराग्य यो होता है उस राय से दोनों का दर्शन हुआ करता है। जब दोपो पर दृष्टि जाने से वे दोष सप्नया दिखाई दिया करते हैं तो उस दोप दर्शन से ज्ञान की समुत्पत्ति होती है । यह ज्ञाा की उत्पत्ति उन्ही मेघावी पुरुषों को होती है जो पहिने मध्य स्वायम्भुव अन्तर में थे। द्वापर युग में ससार में शास्त्री का विरोध करने वाले लोग उत्पन्न हो जाया करते है ॥ १६,२०, २१॥ आयुर्वेदविकल्पाश्च अङ्गानाज्योतिपम्यच । अर्थशास्तयिकल्पाश्च हेतुशास्त्रविक्ल्पनम् ।।२२ प्रक्रियाकल्पसूनाणामाप्यविद्याविकत्यनम् । स्मृतिशास्त्रप्रभेदाश्चप्रस्थानानिपृथक्पृथक् ।।२३ द्वापरेप्वमिवर्तन्ते मतिभेदास्था नृणाम् । मनसा कर्मणा वाचा कृपाद्वार्ता प्रसिध्यति ।।२४ द्वापरे सर्वभूताना काल क्लेशपर. स्मृतः। लोमो तिवणिग्युद्धन्तत्त्वानामविनिश्चय. ॥२५ वेदशास्त्रप्रणयन वर्णाना सङ्करस्तथा। वर्णाश्रमपरिध्वस. कामद्वेपो तथैव च ॥२६ पूर्ण वर्षपहले द्वे परमायुस्तदा नृणाम् । नि शेप द्वापरे तस्मिस्तस्य सन्ध्या तु पादत ॥७ गुणहीनास्तु तिष्ठन्ति धम्मस्य द्वारपरस्य तु । तथैव सन्ध्या पादेनअरस्तम्याप्रतिष्ठित. द्वापर मे प्रायुर्वेद विकल-ज्योतिष के अङ्गशास्त्र-अर्य शास्त्र विकल्प-हेतुशास्त्र विकल्प-कल्प सूत्रो की प्रक्रियामाप्य विद्या वित्यन-

मत्स्यपुराण
स्मृति शास्त्र के प्रभेद इस प्रकार से पृथक्-पृथक प्रस्थान उस युग
अभिवत्तित होते हैं और मनुष्यो मे मति के भेद हो जाते हैं अर्थात् सभी
मनुष्यो की मति विभिन्न हो जाती हैं और किसी की मति किसी से मेत
नहीं खाती है। मन-कर्म और वचन से बहुत ही कष्ट से वार्ता प्रसिद्ध
होती है । २२, २३, २४ ।। द्वापर-युग का समय ऐसा ही था जो समस्त
भूतों के लिये परम क्लेश से परिपूर्ण था। प्राणियो मे लोभ की मात्रा
अधिक हो गई थी-ति-वणियुद्ध और तत्त्वों का विशेष निश्चय नहीं
पा। वेदो और शास्त्रो का प्रणयन-वों का सर दोष-वों और
आश्रमो का सर्वतोभाव से नाश-काम वासना और द्वेप सबमे छाया
हुआ था ।। २५, २६ ॥ उस समय मे मनुष्यो की परमायु पूरे दो सहम
वर्ष की थी। द्वाहर युग के निशेष हो जाने पर उसके एक पाद की
उसको सन्ध्या का काल या। द्वापर युग के धर्म को ऐसी दशा थी कि
सब गुणहीन रहा करते थे। उसी प्रकार से उस साध्या मे उसका एक
पाद से अश प्रतिष्ठित रहता था ॥२७,२८ ।।
द्वापरस्य तु पर्येषा पुष्यस्य च निबोधत।
द्वापरस्याशशेषे तु प्रतिपत्तिः कलेरथ ॥२६
हिंसास्तेयानृतं माया दम्भश्चैव तपस्विनाम् ।
एते स्वाभावा- पुष्यस्य साधयन्ति च ताः प्रजाः ॥३०
एप धर्म स्मृतःकृत्स्नोधर्मश्चपरिहीयते ।
मनसाकर्मणावाचावार्ताः सिद्ध्यन्ति वानवा ।।३१
कलिः प्रमारको रोगः सतत चापि क्षुद्भयम् ।
अनावृष्टिभयञ्चैव देशानाञ्च विपययः ।।३२
न प्रमाणे स्थिति ह्य स्तिपुष्ये घोरेयुगेकली।
गर्भस्थोनियतेकश्चिद् यौवनस्थस्तथापरः ।।३३
स्थावयें मध्यकौमारे म्रियन्ते च कलो प्रजाः ।
भरपतेजोयसाः पापा महायोपा ह्यधार्मिकाः ॥३४

द्वापर और कलियुग वर्णन अनतव्रतलुब्धाश्च पुष्ये चैव प्रजा स्थिता । दुरिप्टरचीतश्च दुराचान्दुरागर्म ॥३५ तापर युग की यही पर्यंपा है। अब पुष्य के विदय में भी जान लेना चाहिए। द्वापर के बश देश में ही कलियुग की प्रतिपत्ति हो जाती है। जो तपस्विजन होत थे उनमे भी हिंसा-अस्तेय-अनृत (मिथ्या) और महान दम्भ माव होता था। पुष्य के ये ही स्वभाव होते थे और वे प्रजाओं का साधन रिया करते थे ॥३०॥ यही उस सपय का धर्म कहा गया है वो वास्तविक जो धर्म या वह पूर्ण रूप से होन हो गया था मन-वचन और कम्मं से वाताएं सिद्ध हों अथषा न होवें। यह कलियुग एक ऐसा प्रमारक रोग जैसा है। निरन्तर ही लोगो को राधा और भय रहा करता है । पर्वा दृष्टि क न होने का भय बना ही रहता है और देशों का विपर्मप होता है ॥ ३१ ॥३२॥ पुष्य घोर कलियुग में प्रमाण में कोई भी स्थिति नहीं होती है। कोई कोई तो गर्म में स्थित होते हुए ही मर जाया करता है और कोई अपनी युवावस्था मे पहुँच कर मृत्यु को प्राप्त हो जाया करता है ।। ३३ ।। इस कलियुग मे प्रजाजन प्राय स्थविरता मे तथा मध्य कौमारावस्था में मर जाया करते हैं। सभी लोग अत्यल्प तेज और बल विक्रम वाले-महान पापी--अत्यधिक क्रोध से युक्त और अधाम्मिक होत हैं ।।३४ ।। पुष्य में सभी प्रजा जन बुरी इच्छा वाले-दुग्धात - दुगवार और दुरागर्मों से युक्त एवम् मिथ्या व्रत वाले और लुब्धक हुआ करत विप्राणा कम्मदोपस्तं प्रजाना जायते भयम् । हिंसा मानस्तयेाच प्रोधोऽसूयाऽक्षमाऽात. ॥३६ पुष्ये भवन्तिजन्तूनालोमोमोहश्चसवश । सोमोजायतेश्यर्थकलिमासाद्यवयुगम् ।।३७ धीरात तथा वेदाग्यजन्त व द्विजातय.।

४३६ भस्म्यपुराण उत्सोदन्तियथाजैववरय.मा न्तुक्षत्रिया:॥३८ शूद्राणां मम्सयोनिस्तु सम्बन्धो ब्राह्मणः सह । भवतीहकलो तस्मिन्शयनासनमाजनैः ॥३६ राजानः शूद्रमयिष्ठा पापण्डानांप्रवृत्तयः । कापायिणश्चनिष्कच्छास्तयाकापालिनश्वह । १० ये चान्ये देवतिनस्तथा ये धर्मदूपकाः। 'दव्यवृत्ताश्च ये केचिद्वृत्त्यथ श्रुतिलिङ्गनः॥४१ एवस्विधाश्च ये केचिद्भवलीह कलौ युगे। अधीयते तदा वेदान् शूद्राधर्मायकोविदाः ॥४२ वित्र अपने कर्मों से दूषित हो गये थे और उनके हो कम्मों के दोषो के कारण प्रजामो का भय उत्पन्न हो जाया करता है। पुष्य मे जन्तुओ मे हिंस -मान-ईर्ष्या-क्रोध-असूया-अक्षमा-प्रति-लोभ और सब ओर मे मोह.ये अवगुण हो जाया करते हैं। इस कलियुग को प्राप्त करके अत्यन्त सक्षोभ जीवो मे समुत्पन्न हो जाया करता है ॥ ३६, ७॥ द्विजानि गण वेदो का अध्ययन नही दिया करते हैं और न वे यजन ही करते हैं तथा क्षत्रिय लोग वैश्यो के साथ ही सब उत्पन्न हो जाते हैं । ॥३८॥ शूद्रो का ब्राह्मणो के साथ मन्त्र और योनि का सम्बन्ध होजाता । इस घोर कलियुग मे शुद्रो का ब्राह्मणों के साथ शयन-आसन और भोजन के द्वारा भी सम्बन्ध हो जाया करता है ।। ३६। राजा लोगो मे प्राय. शूदो की अधिकता होती है तथा पाखण्डियो को प्रवृत्तियाँ बढी-चढी होती हैं । सभी और काय वस्त्रों के धारण करने वा-सिकच्छ और कापालिक दिखलाई दिया करते हैं । और जो अन्य कोई देवव्रती हैं तथा जो धर्म दूपक हैं एवम् जो कोई दिठा वृत्त वाले हैं वे भी सब वृत्ति में ही लिए थनि लिङ्गो के धारण करने वाले होते है अर्थात् सबका लक्ष्य केवल धार्मिक आडम्बर दिखाकर रोजी के कमाने का ही हुआ परता है । इस कलियुग मे जो कोई भी होते हैं वे इसी प्रकार के हुआ

दापर और कलियुग वर्णन
करते हैं । बलि से शूद्र लोग देदो का अध्ययन किया करते हैं और वे हो
घमं तथा अर्थ के विद्वान होते हैं ।।४०,४१, ४२।।
यजन्ति ह्यश्वमेधस्तु राजान शूद्रयोनय ।
स्नीवालगोवध कृत्वा हत्वा चैव परस्परम् ॥४३
उपत्य तथान्यान्य साधयन्ति तदा प्रजा.।
दुखप्रचुरताल्पाय देशोत्साद सोगता ॥४४
अधर्माभिनिवृत्तत्व क्लोवृत्त वलौस्मृतम् ।
अणहत्या प्रजानाञ्च तथा ह्येव प्रवत्तते ॥४५
तस्मादाय बल स्प प्रहीयन्त क्लीय गे।
दुखेनामिप्लुताना च परमाय शत नृणाम् ।।४६
भूत्वा च न भवन्तीह वेदा.कलिय गेऽखिला ।
उत्सोदाते तथा यज्ञाः केवल धर्महेनवः ॥५७
एपायलिय गावस्यासन्च्यासौतु निबोधत ।
युगेयुगे तु हीरन्तेत्रीस्तीन् पादाचमिदय ॥४८
युगस्वभावा सन्च्यासुअवतिप्यन्ति पादतः ।
सन्ध्यास्वशावास्वाशेषुपादेनंबावतस्थिरे ॥४६
शूद्र योनि से समुत्पन्न राजा लो। इस कलियुग मे अश्वमेध यज्ञों
के द्वारा यजन किया करते हैं। ये लोग स्त्री-दाल और गौ का वध करके
भूया पासर में हनन करत हुए अन्योन्य का अपहरण करके उस समय म
प्रजा का साधन क्यिा करत है। दुखो की बहुतायत-मायु का रवल्प
होना-देश का उत्सादन-रोगो के सहित रहना और अधर्माििनवृत्तम
यह इस कलिका वृत है जो कि कलियुग में कहा गया है। प्रजाजनो की
भ्रूण हत्या (गर्भस्य बालक को भण कहते हैं। इसी प्रकार से सबकी
प्रवृत्तियां कलि मे होती हैं। इसी कारण से इस कलियुग मे अयु-वल
और रूप लावण्य की हीनता हुआ करती है। दुम्रो को इसनो अधिक्ता
जीवो को रहा करती है कि इस काल मे दुखो से अभिप्लुत मनुप्यो की

४४० मत्स्यपुराण परमायु अर्थात् अधिक से अधिक उम्र सौ वर्ष की ही हुआ करती है । ॥४३. ४४, ५५, ४६|| इस कलियुग मे समस्त वेद होकर भी नहीं हुआ करते हैं अर्थात् होते हुए भी वे सब निष्फल ही होते हैं । केवल धर्म के हैतु यज्ञ उत्सीदमान हुआ करते हैं । यह ऐसी इस कलियुग की अवस्था होती है । अब उस युग को सन्ध्या और सन्ध्याशो को भी समझ लो। युग-युग मे सिद्धियां तीन-तीन पाद हीन हुआ करती हैं । युग के स्वभाव सन्ध्याओ मे भी पाद से अवस्थित रहा करते हैं। अपने भशो मे सन्ध्या के स्वभाव एक पाद से अवस्थित रहा करते थे ॥ ४७ ४०।४।। एवं सन्ध्याशकेकाले सम्प्राप्त युगान्तिके। तेषामधर्मिणा शारता भृगुणाञ्च कुले स्थितः ॥५॥ गोनेण वे चन्द्रममे नाम्नाप्रमतिरुच्यते । कलिसन्ध्याशभागेषु मनो:स्वायम्भुवेऽन्तरे ॥५१ समास्त्रिशत्तुसम्पूर्णाःपर्यटन्ववसुन्धराम् । अस्त्रकर्मा स वै सेनाहस्त्यश्वरथसङ्क लाम् ॥५२ प्रगृहीतायुविनः शतशोऽथ सहस्रशः । स तदात.परिवृतोम्लेच्छान् सर्वाग्निजनिवाच ।।५३ स हत्वा सर्वाश्चंव राजानः शूद्रयोनयः ॥५४ पापण्डान् स तदा सर्वाग्नि.शेषानकरोत् प्रभुः ॥५५ अधामिकाश्च येकेचित्तान्सर्वान् हन्तिसर्वशः । औदीच्यामध्यदेशाश्चपावंतीयांस्तथैवच ॥५६ इस प्रकार से युग के अन्त करने वाले सभ्याश काल के सम्प्राप्त होने पर उन अमिपो या शारान करने वाला भृगुओ दुल मे स्थित पन्द्रमस पोल मे युक्त नाम से प्रति कहा जाता है। सिके सम्योश भागों में मनु स्वायम्भुव अन्तर मे जब तीस वर्ष पूर्ण हो जाते हैं तो भाव न बासा इस वसुन्धरा पर पय्यंटन करते हुए एक विशाल रोमा

द्वापर और कलियुग वर्णन
४४१
लेकर निकलता है जिस सेना में हाथी-घोड़े और और रथ सभी होते हैं
और इनसे वह संकुल हुआ करती है। सभी प्रकार के आयुधो को ग्रहण
करने वाला वह हजारो और सैकडो विप्रो के सहित रहता है। उसके
साथ उस समय मे वह परिवत रहकर समस्त म्लेच्छो को निहनन कर
दिया करता है ।।३०, ५१, ५२, ५३।। वह सभी ओर मे जो राजा शूद्र
योनि पाले होते हैं उनका हनन कर देता है । उस समय में वह प्रभु सभी
पाखण्डियो को नि शेष कर देता था ॥५४, ५५।। जो भी कोई अघाम्मिक
होते थे उन सबको सभी ओर से मार गिराता है। जो औदीच्य हैं
अर्यात उत्तर दिशा में रहने वाले हैं-मध्य देश के निवासी हैं तथा
पर्वतीय भागों के रहने वाले हैं इन सबका अन्त कर देने वाला वह
था ।।६।।
प्राच्या प्रतीच्यांश्च तथा विध्यपृष्ठापरान्तिकान् ।
तथैव दाक्षिणात्याश्च द्रविडान सिंह लैः सह ॥५७
गन्धारान पारदाश्चैव पलवान् यवनान् शकान् ।
तुपारान् बर्वशान् श्वेतान पुलिन्दान् बवरान् श्वसान।।५८
लम्पकानान्ध्रकाश्चापि चोरजातीस्तव च ।
प्रवृत्तचको बलवान्शूद्राणामन्तकृद् वभौ ।।५५
विद्राव्य सर्वभूतानि चचार वसुधामिमाम् ।
मानवस्य तु वशे तु नृदेवस्येहजशिवान् ॥६०
पूर्वजन्मनि विष्णुश्च प्रमतिमि वीर्यवान् ।
स्वतः स वै चन्द्रमसः पूर्व कलियुगे प्रभुः ॥६१
द्वात्रिंशेऽभ्युदितेवर्षे प्रकान्तो विशतिसमाः।
निजध्नेसर्वभूतानिमानुषाण्येवसर्वशः ।।६२
कृत्ववीजापशिष्टान्तापृथ्वीरेणकर्मणा ।
परसरनिमित्तेन कालेनाकस्मिकेन च ॥६३
प्राच्य-प्रतीच्य तथा विध्य के पृष्ठ वासी-अपरान्तिक-दाक्षि-

मत्स्यपुराण का णात्य (दक्षिण दिशा वाले }--द्रविड-सिंहल-गा-धार-पारद-- पहलन-पवन--शक-तुपार-ववश-श्वेन-पुलिन्द-वर्वर-श्वस--लम्पक- आन्ध्रक तथा घोर जाति वाले सबका शूदो का अन्त कर देने वाला वह बलवान् प्रवृत्त चक्र होकर सुशोभित हुआ था ॥५७, ५८, ५६|| सभी भूतों को विद्वावित करके वह इस पृथ्वी पर सचरण किया करता था। वह यहाँ पर नृदेव मावि के वश मे समुपन्न हुआ था ।६०} पूर्व जन्म में वह विष्णु वीर्यवान् प्रमिति नाम वाला था पूर्व में वह प्रभु युग मे घद्रमा के कुल मे था। बत्तीसवें वर्ष के अभ्युदित होने पर यह प्रान्त हुआ था। जब बीस वर्ष हो गय तो इमने सभी ओर से मानुप सभी भूतो का निहनन कर दिया था। परस्पर मे निमित्त आकस्मित काल के द्वारा तथा कर यमं से पृथ्वी को वीजावशिष्टा त कर दिया था। ६१ . ॥६,६३॥ सस्थिता सह सायासे सेना प्रमतिना सह । गङ्गायमुनयोमध्यसिद्धिप्राप्ता समाधिना ॥६॥ ततस्तेषु प्रनप्टेषु सन्ध्याशे क रयम्मषु । उत्साद्य पार्थिवान् सर्वान् तेवतीतेषु वै तदा ।।६५ तत सन्ध्याशवे वाले सप्राप्ते च युगान्तरे। स्थिता स्वल्लावशिष्टासु प्रजास्यिह परचित् याचित्। स्थाप्रदानास्तयाते लोभाविष्टास्तुवृदिश । उपहिन्ति चान्यो यम्लुमन्तिपरस्सम ६० अराजये युगाशे तु सहाये गमुपस्थिते । प्रजास्ता व तदा सर्वा परसरभयादिता.॥ ग्यालामा पगनायजर दयगृहाणि तु । स्था स्थान प्रापानवेशन्तो निष्पारण्यात मुखिता। नष्ट गोतामने धर्म वामा | निमर्यादा निगनदा निहाना ४४३ द्वापर और कलियुग व प्रमति के साथ वह सेना सायास में सस्थित हो गई थी। गङ्गा और यमुना के मध्य म समाधि के द्वारा सिद्धि को प्राप्त हुए थे। इसक पश्चात साध्योश मे उन क्रू र कम्मों वालों के प्रनष्ट हान पर उस समय मे उनके अतीत होने पर सभी पाथिवो का उत्सादन कर दिया था। इसके प्रनन्तर युग का अन्त पणे वाले सघ्याशक काल के सम्प्राप्त होने पर यहाँ ससार मे कही-कहीं पर प्रजाजनो के मयन्त अल्प रह जान पर वे स्थित थे। समूहो के रूप म धन न देने वाले और लोभ स आदिष्ट चित्त वाले वे सब परस्पर म प्रलुम्पन करत थे और एक दूसर का उप- हिंसन किया करते हैं ।। ६४, ६५, ६६, ६७ ।। वह युगाश अराजक जैसा पा और उसमे सक्षय क समुपस्थित होने पर वह ऐसा समय था जिसमे सम्पूर्ण प्रजाजन परस्पर म भय से अदित हो रहे थे। वे सब प्रजाऐ देव गृहा का परित्याग करके परावृत्त हो गये य । अपने २ प्राणी को देखते हुए निष्कारण्य भाव से वे सब अच्छी तरह दुखित हो गय थे। ॥६॥६६॥ श्रोत तथा स्मात्तं धर्म के नष्ट हो जान पर सब लोग काम और क्रोध क वश म होकर उनके ही अनुयायी बन गय थे । सब मर्यादा से रहित-आनन्द स शून्य - स्नह होन और निलज्ज बन गये थे।॥ ७० ॥ नप्टे धर्मे प्रतिहता ह्रस्वा पञ्चविंशका । हित्वा दाराश्च पुनाश्च विपादव्याकुल प्रजा ॥७१ मनावृष्टिहतास्तेचे वार्तामुत्सृज्यदुखिता । चीरकृष्णाजिनधरा निष्कद्धानिप्परिग्रहा ॥७० वर्णाश्रमपरिभ्रष्टा सङ्करडघोरमास्थिता । एव वप्टमनुप्राप्ना ह्यल्पसपा. प्रजास्तत ॥७३ ज तवश्च क्षुधाविष्टा दु खानिर्वेदमागमन् । सधयन्तिच देशास्ताश्चनवत् परिवतना । ७४ तत प्रजास्त ता सर्वा मासाहाग भवन्ति हि।

द्वापर और कलियुग वर्णन
४४५
अथ दोघेण कालेन पक्षिणः पशवस्तथा ।
मत्स्याश्व हताः सर्वः क्षुधाविष्टश्चसवंश ॥८०
नि शेपेप्वय सर्वेषु मत्स्यक्षिपशुप्वय ।
सन्ध्याशे प्रतिपणेतु नि शेपास्तु नदा कृता 11८१
तत: प्रजास्तु सम्भूप कन्दमूलमयोऽसनन् ।
फलमूलाशना सर्वे अनिकेतास्तथैव च ॥२
वल्कलान्यथ वासासि अघ शय्याश्च सर्वशः।
परिग्रहो न तेष्वस्ति घनशुद्धिमवाप्नुयु ॥३
एवायगमिष्यन्ति यल्पशिष्टाप्रजास्तदा ।
तासामल्पावशिष्टानामाहारा वृद्धिरिष्यते ॥४

मरस्यपुराण । भृगान् वराहान वृपभान्ये चान्ये वनचारिणः ॥७५ भक्ष्याश्चैवाप्यभक्ष्याश्च सर्वास्तान भक्षयन्ति ताः । समुद्र सथिता यास्तु नदीचव प्रजास्तु ता: ७६ तेऽपि मत्स्यान् हरन्तीह आहारार्थ च सर्वशः। अभक्ष्याहारदोपेण एकवणगता प्रजाः ॥७७ धर्म के नष्ट होने पर स्व प्रतिहत-ह्रस्वक मोर पञ्चविंशक हो गये थे। अपनी दाराओ और पुत्रो का त्याग करके सब प्रजा विपाद से भ्याकुल थी । अनावृष्टि के कारण हत हुए वे सब वार्ता का त्याग करके अत्यन्त दुखित थे । चीर तया कृष्ण जिन ( काला मृग नर्म ) को धारण करने वाले-निष्ऋद्ध और सब बिना परिग्रह वाले थे । वर्ण और आश्रम से परिघ्रष्ट हुए घोर सङ्करावस्था मे समस्थित थे। इस प्रकार से कष्ट को प्राप्त हुई सब प्रजाऐ अल्प शेष रह गई थी ॥७१, ७२७३ ॥ जन्तुगण सब भूख से आविष्ट हुए अत्यन्त दुःख से निर्वेद को प्राप्त हो गये थे। चक्र की भांति परिवर्तन करने वाले उन देशो का सधय किया करते थे। इसके उपरान्त वे समस्त प्रजाऐ मास का आहार करने वालों हो गई थी। कुछ लोग मृगो को खाते थे तो कुछ वाराह-वृषभ और अन्य वनचारियों का भक्षण किया करते थे।।७४॥ ७॥ वे सब प्रजाऐं उस समय मे ऐसी हो गई थी कि चाहे भक्ष्य हो या अभक्ष्य हो सभी का भक्षण किया करते थे। कुछ प्रजाजन समुद्रो मे तथा कुछ नदियो का संश्रय किया करते थे वे भी अपने आहार के लिये सर्वत्र मत्स्यो का हरण किया करते थे । अभक्ष्य आहार के करने के दोष से सब प्रजा एक वर्ण गत होगई थी ।। ७६ ।। ७७ ॥ यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत्किल । तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूता प्रजास्तथा ॥७८ एव वपशत पूर्ण दिव्य तेषा न्यवर्तत। पत्रिंश च सहस्राणि मानुपााण तु तानि वै ७६ द्वापर और कलियुग वर्णन ४४५ अथ दीघण कालेत पक्षिणः पशवस्तया। मत्स्याश्व हताः सर्च: क्षुघाविष्टश्चसवंश ॥६० नि शेपेप्वय सर्वेषु मल्याक्षिपगुप्वय । सन्ध्याशे प्रतिपन्नेतु नि शेपास्तु नदा कृता ॥१ ततःप्रजास्तु सम्भूय कन्दमूलमयोऽग्वनन् । फ्लमूलाशनाः सर्वे अनिकेतास्तथैव च ॥२ वल्कलान्यथ वासाशि अधाशय्याश्च मर्वश.। परिग्रहो न तेष्वस्ति घनशुद्धिमयाप्नुयु 113 एवंक्षयगमिप्यन्ति ह्यल्पशिष्टा प्रजास्तदा । तासामल्पावशिष्टानामाहाराट् वृद्धिरिप्यते ॥८४ जिस प्रकार से पूर्व मे वृत युग में सभी प्रजाजन एक ही वर्ण वाल थे कि उस आदिकार में वर्षों की कोई भी व्यवस्था ही नहीं बनी थी उसी भांति इस पलियुग के इस अन्तिम काल में सभी लोग शूद्रीभूत हो गये थे क्योंकि दों के वर्म धर्म सभी छोडकर एक वर्ण जैसे बन गये थे। इस प्रकार से पूर्ण दिय एक सौ वर्ष उनके व्यतीत हो गये थे जो कि मानुप वर्ष तीस हजार होने थे || ७८,७६ ॥ इसके अनन्तर बहुत अधिर दोध काल तक भूख से व्याकुल लोगो के द्वारा सभी कोर में समस्त पशु-पक्षी और मत्स्य मार दिये गरे में और खा लिये गये ये ।।८० ॥ उस कालयुग के सन्ध्याश बाल मे जब कि यह प्रतिपन्न हो गया था सम्पूर्ण पक्षी-पशु और मत्स्यो के निशेप हो जाने पर सभी समाप्त हो गये थे। जब कोई भी जीव प्रजा के लोगो को खाने के लिये रहे ये तो फिर उन्होंने भूमि से कन्द मूनो को खोदने का प्रारम्भ कर दिया था। सर लोग फल-मूल और कन्दों को खाने वाले और बिना घरी वाले हो गये थे। सबके वस्त्र वृक्षों की डाल के ही थे और सब नीचे भूमि पर शयन करने वाले थे। उन लोगो में कुछ भी परिग्रह शेष नही रह गया था और सब लोगो ने धन की शुद्धि को प्राप्त कर लिया १४६ मरस्यपुराण पा। इस प्रकार से उस समय में जो भी यहन घोडी-गी प्रजा अय. शिष्ट रह गई थी वह हाय को प्राप्त हो जायगी। उन प्रायल्प पेप बने हुओ के आहार से वृद्धि अभीष्ट हुआ करती है ।। ८१ ॥८॥ ॥८३ । ८४॥ एच वर्षशत दिव्य साध्याशस्तस्य वर्तते । ततो यपसहलान्ते अल्पशिष्टा स्त्रिय सुता: १८५ मिथुनानितुता सर्वा ह्यन्योन्यसप्रजज्ञिरे । ततस्तास्तु नियन्तेवं पूर्वोत्पन्ना प्रजास्तुमा ६ जातमागेष्वपत्येषु तत कृतमवर्तत । यथा स्वर्गे शरीराणि नरके व देहिनाम् । ८७ उपभोगसमर्थानि एव कृतयुगादिपु । एव कृतस्य सन्तान. क्लेश्चैव यस्तथा ॥८८ विचारणात्तु निर्वेदः साम्यावस्थात्मना तथा । ततश्चैवात्मसम्बोध सम्बोधाद्धर्मशीलता ८६ कलिशिष्टेपु तेष्वेव जायन्ते पूर्ववत् प्रजा । भाविनोऽर्थस्य च बलात्ततः कृतमवर्तत || अतीतानागतानि स्युर्यानि मन्वन्तरेविह ।। एतेयुगस्वभावास्तु मयोक्तास्तु समासत ||६१ इस रीति से उस कलियुग का वह सन्ध्याश काल दिव्य सो वर्ष का होता है। जब यह सौ वर्ष समाप्त हो गये थे तब इनके अन्त में बहुत ही थोडे स्त्रीजन और उनके सुत अवशिष्ट रह गये थे। उनके वे मिथुन सब प्रन्याय मे समुत्पन्न हुए थे । इसके उपरान्त जो पूर्व में उत्पन्न प्रजाये थी वे मर जाया करती थी। फिर सन्तानो के जात मात्र होने पर कृत युग वत्त मान होने लगा था । जिस तरह देहधारियो के शरीर स्वर्ग मे और नरको मे रहा करते हैं ॥८५, ८६, ८७ ।। इस प्रकार से कृत युगादि में देहधारियो के शरीर उपभोग करने में समर्थ

द्वापर और कलियुग वर्णन
थे। इसी रीति से कलियुग का क्षय और कृत युग की सन्तति हुई थी
।1८८ ।। साम्यावस्थात्मा के द्वारा विचार करने से निवेद होता है और
फिर उस निर्वेद से आत्मा का भली भांति ज्ञान समुत्पन्न हुआ करता है।
जव सम्बोध हो जाता है तो धर्मशीलता का प्रादुर्भाव स्वभाविक रूप से
हो जाया करता है ।।८६) इस रीति से उस कलियुग में जो अवशिष्ट
रह जाया करते हैं उनसे पूर्व की भांति प्रजाऐ जन्मग्रहण किया करती
हैं फिर भावी अर्थ के बल से कृत युग वरता करता था। इस संसार में
मन्वन्तरों में जो भी कोई अतीत और अनागत हैं वे हुआ करते हैं । ये
सय युगों के स्वभाव मैंने अत्यन्त सक्षेप के साथ सब बतला दिये हैं।
1180,821
विस्तरेणानुसूचि नमस्कृत्य स्वयम्भुवे ।
प्रवृत्ततु ततस्तस्मिन् पुनः कृतयुगे तु वै ॥६२
उत्पन्नाः कलिशिष्टेषु प्रजाः कार्तयुगास्तथा ।
तिप्ठन्ति चेह ये सिद्धा अदृष्टा विहरन्तिच ॥६३
सह सप्तपिभिये तु तत्र ये च व्यवस्थिताः ।
ब्रह्मक्षत्रविशः शूद्रा वीजार्थे य इह स्मृताः ॥६४
तेषां सप्तपंयो धर्म कथयन्तीह तेषु च ।
वर्णाम्पमाचारयुत श्रोतस्मातविधानतः ॥१५
एव तेपुनियावत्सु प्रवर्तन्तीह व वृते ।।६६
श्रौतभार्गस्थितानान्तु धर्म सप्तपिशिते ।
ते तु धर्मव्यवस्थार्थ तिष्ठन्तीह कृते युगे ॥६७
मन्चतराधिकारेपु तिष्ठन्ति ऋपयस्तु ते।
पया दावप्रदग्धेषु तृणेप्देवापनक्षितौ ॥१८
स्त्रयम्भू भगवान को नमस्कार करके मैंने विस्तार से और आनु-
पूर्वी से सभी बुध बता दिया है। फिर इसके बाद मे पुनः उम वृतयुग
की प्रति हो जाया करती है। उसके प्रदत्त याने पर जो कलियुग में

ए?
मत्स्यपुराण
।
थोड़े से बचे खुचे रह जाते हैं उन्हीं में कृतयुग की प्रजाऐं समुत्पन्न हुआ
करती हैं । जो यहां पर सिद्ध गण स्थित रहा करते हैं वे अदृष्ट होते हुए
विहार किया करते हैं । सप्तपियो के साथ वहाँ पर जो व्यवस्थित रहते
हैं वे यहा पर वीजार्थ में ब्राह्मण -क्षत्रिय-वैश्य और शूद्र बतलाये गये
हैं । उन लोगो को उनके सप्तषिगण श्रौत-स्मात्तं के विधान से वर्णों और
आश्रमो के आचार से युक्त धर्म को कहा करते हैं । इसी प्रकार से कृतयुग
मे क्रियावान् उनमे वे सब प्रवृत्त हुआ करते हैं ।।६२, ६३, ६४, EIL
।।६६।। थौत और स्मात धर्मो मे स्थित रहने वालो को सप्तपियों के
द्वारा प्रदर्शित धर्म मे वे यहा पर उस कृतयुग मे धर्म की व्यवस्था के लिये
ही अवस्थित रहा करते हैं। वे ऋषिगण यन्वन्तरो के अधिकारो मे उसी
तरह से स्थित रहा करते है जैसे आपन क्षिति में दावाग्नि से प्रदग्ध हुए
तृणो में वनो की स्थिति हुआ करती है ॥६७, ६८il
वनाना प्रथम दृष्ट वा तेषा मूलेषु सम्भवः ।
एव युगायुगाना वै सन्तानस्तु परस्परम् IIBE
प्रवत्तं ते ह्यविच्छेदाद्यावन्मन्वन्त रक्षयः ।
सुखमायुबलं रूप धर्माथी काम एव च ॥१००
युगेष्वेतानि हीयन्ते त्रय. पादा. क्रमेण तु ।
इत्येषः प्रतिसन्धिवः कीत्तितस्तु मया द्विजाः ! ॥१०१
चतुर्युगाणा सर्वेषामेतदेव प्रसाधनम् ।
एषा चतुर्युगाणान्तु गणिता येकसप्तति. १०२
क्रमेण परिवृत्तास्ता मनोरन्तरमुच्यते ।
युगाख्यासु तु सर्वासु भवतीह यदा च यत् ॥१०३
तदेव च तदन्यासु पुनस्तद्वं यथाक्रमम् ।
सर्गे सगें यथा भेद ह्युत्पद्यन्ते तथैव च ॥१०४
चतुर्दशसु तावन्तो ज्ञेया मन्वन्तरेष्विह।
आसुरी यातुधानी च पैशाची यक्षराक्षसी ।।१०५

मस्त्यपुरा
एते युगस्वभावा व परिक्रान्ता यथाक्रमम् ।
मन्वन्तराणि यात्यस्मिन् वल्पे वक्ष्यामि तानि च ।। १.८
प्रत्येक युग मे उस समय मे जो भी प्रजा होती है उनके विषय में
अब श्रवण करो। प क नुसार युगा के साथ वह प्रजा भी तुल्य लक्षों
वाली होती है । यही पुगो का यथानम लक्षण बताया गया है ।।१०।।
चिर काल में प्रवृत्त अतियुग के स्वभाव से मन्वन्तरों के परिवर्तन होते
हैं । क्षप पोर उदय होने के कारण से परिवत्त मान यह बीवलोक क्षण
भर सस्थित नहीं रहता है। ये युगों के स्वाभाव मानुसार हमने आप
लोगों को परिक्रान्त कर दिये हैं । इस क्ल्प मे बो भी मन्वन्तर होते हैं
उनको भी हम बतलायेंगे ॥१०७, १०८॥
५८ -चतुयुग गति वर्णन
चत्वार्याहु सहस्राणि वर्षाणान्त पृत युगम् ।
तस्य ताबच्छती सन्ध्या द्विगुणा रविनन्दन ॥१
यत्र धर्मश्चतुष्पादस्त्वधम पादविग्रह ।
स्वधमनिरता सन्तो जायन्ते यत्र मानवा ॥२
विप्रा स्थिता धमपरा राजवृत्ती स्थिता न.पा ।
कृष्यामभिरता वश्या शुद्रा शुश्रूषव स्थिता ॥३
तदा सत्यञ्च शौचञ्च धपश्चंव विवधते।
सद्भिराचरित कर्म क्रियते ख्यायते च वै ॥४
एतत् कार्त युग वृत्त सर्वेषामपि पार्थिव ।।
प्राणिनाधमसङ्गानामपि वे नीचजन्मनाम् ।।५
श्रीणि पसहस्राणि ताय गमिहो यते ।
तस्यतावच्छतीसम्यादिगुणा परिवोर्त्यये ॥६

४५१
चतुयुग गति दर्णन
।
द्वाभ्यामधर्मः पादाभ्यात्रिभिधोव्यवस्थित.।
यत्र सत्यञ्च सत्वञ्चन्त्रताधर्मो विधायते।७
मत्स्य भगवान ने कहा-चार सहन वर्षों का कृत युग कहा
जाता है और उस युग की उतने ही सौ वर्ष की सघ्या होती है जो
द्विगुणा हे रविनन्दन ! हुमा करती है ॥ १॥ जिस कृत युग मे धर्म के
चार पाद पूर्ण होते हैं और अधर्म का विग्रह केवल एक ही पार होता
है । जिस युग मे समी मनुष्य अपने २ धर्म में निरत रहा करते थे ।
उस समय में सभी वित्रगण धर्म में तत्पर होकर रहा करते थे और
नृपो के वर्ग राजवृत्ति में स्थिर रहा करते थे । वैश्य लोग कृषि के कर्म
में स्थित थे और शूद्र रोवा धर्म के करने वाले हुआ परते थे ।।२, ३ ।।
उस समय मे सत्य, शौच और धम्म विशेष रूप से वर्षित हुमा करते
थे। सत्पुरुपो के द्वारा सत्कर्म का समाचरण किया जाता था और वही
स्यात हुआ करता था। हे पारिव! इस प्रकार का नीच जाति में भी
जन्म ग्रहण करने वाले प्राणी भी सब धर्म को ही सङ्ग रखने वाले
जिसमे होते थे। वह कृतयुग का समय हुआ था ॥४॥५॥ तीन
हजार वर्षों की अवधि वाला त्रेता युग कहा जाता है उस युग की
उतने ही सौ वर्ष वालो दुगुती सन्ध्या होती है । इस युग में धर्म
के देवल तीन ही चरण होते हैं और यम दो पादो वाला रहा
करता है। जिसमे सत्य और सत्व वेता का धर्म हुआ करता है
।
त्रेताया विकृति यान्ति वर्णास्त्वतेन संशयः।
चतुवरणस्य ववृत्याद्यान्ति दौर्बल्यमाश्रमा ।
एण तोतायुगगनि विचित्रा देवनिमिता।
द्वापरस्य तु या नेष्टा तामपि. श्रीतुमर्हसि ।।
द्वापरन्द्वे सहले त वाणा रविनन्दन !।
तस्य ज्ञावच्छतो साध्या द्विगुणा युगमुच्यते ॥१०

मत्स्यपुराच
तत्र चार्थपराः स प्राणिनो रजसा हताः ।
सर्ने नष्कृतिका क्षुद्रा जायन्ते रविनन्दन ! ॥११
द्वाभ्यां धर्म. स्थित पदभ्यामधमस्त्रिभित्थित ।
विपर्णयाच्छनधर्म क्ष्य मेत्ति कलौय गे ॥१२
ब्राह्मण्यभावस्य ततो तथोत्सुक्य व्यशीर्यते ।
व्रतोपवासास्यज्यन्ते दापरे य गपर्यये ॥१३
तथा वषसहस्रन्तु वर्षाणां द्वेशते अपि ।
सन्ध्ययासह सरूपात क्रू रइलिय ग स्मृतम् ।१४
-
त्रेता मे ये चारो वर्ण विकृति को प्राप्त हो जाया करते हैं--
इसमे कुछ भी सशय नहीं है। चारो वर्षों की विकृति से चारो आश्रम
भी दुर्बलता को प्रप्त हो जाया करते है ।।८। यही इस त्रेता युग की
गति है जो अति विचित्र और देवो के द्वारा निर्मित है । अब द्वापर युग
की जो चेष्टाएँ हैं उन्हें भी आप श्रवण करने के योग्य होते है । हे रवि-
नन्दन । द्वापर युग को अवधि दो सहस्र वर्षों की होती है और उसकी
उतने ही सौ वर्ष की दुगुनी सन्ध्या है-इस प्रकार से यह युग कहा जाता
है 118, १०॥ उस युग मे सभी प्राणी रजो गुण से हत होते हुए अर्थ-
परायण हुआ करते है । हे रविनन्दन । सभी प्राणी इस युग मे नष्कृतिक
और अत्यत क्षुद्र होते है । धर्म केवल दो ही चरणों वाला स्थित रहता
है और अधर्म के तीन पाद समुस्थित होकर रहा करते हैं । कलियुग में
बिल्कुल विपर्यय हो जाने धम क्षय को शने -शनैः प्राप्त हो जाया करता
है ॥२१, १२।। फिर ब्राह्मण्य भाव का विनाश और औत्सुका थी विगीर्ण
हो जाया करता है । द्वापर युग मे विपर्यय हो जाने पर व्रत और उपवास
आदि सब त्याग दिये जाया करते हैं ॥१३॥ फिर एक सहस्र वर्ष की
अवधि वाला तथा दो सो दप की सध्या व सहित यह महान फर वलि.
युग सख्यात करख वाया गया है ॥१४॥

चतुप गनि वर्णन
यत्राधर्मश्चतुष्पादः स्याद् धर्मापादविग्रहः ।
कामिनस्तपसाच्छन्नाजायन्ते तत्र मानवाः ।।१५
वातिसात्त्विक, कश्चिन्न साधुनं च सत्यवाद ।
नास्तिका ब्रह्मभक्ता वा जायन्ते तत्र मानवाः ॥१६
अहङ्कारगृहीताश्च प्रक्षीणस्नेहबन्धनाः ।
विधा: शूद्रसमाचारा सन्ति सर्वे कलो युगे ॥१७
आप्रमाणा विपर्यास: कलौ सपरिवर्तते।
वर्णानाञ्चव सन्देही युगान्ते रविनन्दन ! ११८
विद्याद् द्वादशसाहस्री युगारला पूनिमिताम् ।
एव सहस्रपपात तदहो ब्राह्ममुच्यते ॥१६
जिस वलियुग मे अधर्म वारों पादो से युक्त रहा करता है और
धर्म का केवल एक ही धरण अवशिष्ट रहता है । इस यग मै मानव तप
मै समाधान होकर का भी उत्पन्न हुआ करते हैं ।।१॥ प में न
को कोई प्रयन्त सात्विक हो होता है और न कोई भी साघु एव सत्य
पाणी बोलने वाला हुआ परता है। इसम तो सभी मानव नास्तिक मपया
अन्यमान उत्पन हुआ करत है ।।१६। सभी अहद्वार रो अकडे हुए और
मीण
स्नह
के बन्धन व ले होते हैं । इस कलियुग में सभी विध राह के
समान आचरण करने वाले हो जाया करते हैं इलियुग में भली भाति
परिवर्तित होकर जाधमो का विपर्यास हो जाया रता है । है रविनन्दन ।
युग
के अन्त मे लो वो का भी सन्देह हो जाया करता है। पूर्व में
निर्माण की हुई यह युगो की आस्या धारह सहस्र वर्षों को जाननी चाहिए।
इस प्रकार से एक सहा पर्यन्त वह ब्रहा का दिन नहा बाया करता है।
१७:१॥१६
ततोऽहनि गते तस्मिन सर्वपानेव जीविनाम् ।
सगेरनिवृति दृष्ट्वा सो सहारबुद्धित ॥२०
देवतानाच सर्वाता ब्रह्मादीनामहीपते !!

मत्स्यपुराण --- दैत्याना दानवानाच यक्षराक्षसपक्षिणाम् ॥२१ गन्धर्वाणामप्सरसा भुजङ्गानाच पार्थिव ! । पर्वताना नदीनाञ्च पशूनाञ्चव सत्तम । ॥२२ तियायोनिगतानाश्च सत्वाना कृमिणान्तया । महाभूतपति. पञ्च हत्या भूतानि भूतकृत् ॥२३ जगत्सहरणार्थाय कुरुते वैशस महत् । भूत्वा सूर्यश्चक्षुषी चाददातो भूत्वावायु प्राणिना प्राणजालम। भृत्वा वहिनिर्दहन्सर्व लोकान्भूत्वा मेघोभूय 'उनोऽध्यवर्षत् ।।२४ उस ब्रह्मा के एक दिन के ममाप्त हो जाने पर सभी जीवधारियो के शरीर को निति को देखकर लोको के सहार को युति से हे महीपते । समस्त देवताओ-ब्रह्मादिको- दैत्यो~दानवो-यक्ष, गक्षस, पक्षियों- गन्धा-अप्सरागणो-है पार्थिव । पर्वती-नदियो-हे श्रष्ठतम । पशुओ विर्ययोनियों मे रहने वाले सरयो और कृमियों के भूतो के करने वाले महा. भूतो के पति पाचो भूतो का हरण करके जगत् के सहरण करने के लिए महान वंशप्त किया करते हैं। सबके चक्षुओ को आदान करने वाले होकर -सब लोगों का निर्दहन करता हुआ वहित होकर एवं फिर भत्युम मेप होकर वर्क दिया करता था ॥२०॥२॥२२॥२३॥२५॥ ५६-प्रलयकाल वर्णन भूत्वा नारायणो योगी सत्वमूतिविभावसु ।। मस्तिभि प्रदीप्ताभि सशोपति सागरान् ॥१ सत. पीत्वाणवान सर्वाद नदी पोश्च सर्वशः। पवतनाश्च सलिल सर्वमादायरश्मिभिः ॥२ मित्वा गरितभिरव महीङ्गत्या रातिलात ।

१
प्रलयकार दपन
पातालजनमादाय पिवन्नु रसमुत्तमम् ॥३
मूनामृक्नेदमन्यञ्च यदस्ति प्रापिपु ध्रुवम् ।
तत् सर्वमरविन्दाक्षमादत्ते पुरुषोत्तम. ॥ १
यायुश्च भगवान् भूत्वा विधुन्वानोऽखिल जगत् ।
प्राणापानममानाचात् वायूनापते हरिः ॥५
ततो देवगणा. सर्व भूतान्येव च यानि तु ।
गन्धोत्राण शरीरञ्च पृथिवी सश्रितगुणाः॥६
जिह्वा रमश्च स्नेहश्च संधिता.सलिले गुणा ।
स्प चक्षुर्विपाकञ्च ज्योतिरेवाश्रितागुणा. IN
श्रीमत्स्य भगवान ने कहा-सवको मूर्ति योगी नारायण विभावमु
होकर अपनी अन्यन्त प्रदीप्त गम्तियो के द्वारा समस्त सागरों का सशो-
पण पिया करते हैं । ॥ इसके अनन्तर मुद मर्मवों का-नदियों का और
समी ओर पो के जल को पीकर तथा रन्नियों के करा व पवतों के
सनिल को ग्रहण करक-अपनी किरणों में मही का भेदन करके नीचे
पन कर रसातल से पाताल रे जल का पान करके वहाँ के उत्तम फूप
को ग्रहण कर लेते हैं। सूत्र-अमृरु तपा अन्च हो भी क्वेदन करने पापा
प्राणियों में होता है निश्चय ही उस सब भरविन्दास को पुरुषोत्तम ले
लिया करते हैं ।।२, ३, ४। समस्त जगद का विधनन रस वाला
भगवान् वायु होकर फिर थीहरि प्राणायाम समान मादि वायुयोरा
समापण पिया व.रते है॥५॥ दस अनन्नर सब देवगण बोर जी
सद भूत हैं उनका भी समावर्षण कर लिया करते हैं । गन्ध प्राप को
सया गरीर पृथ्वी को सब गुग
पर है। बिह्वा-रस और
स्नेह ललित म गुमक्षित होते हैं। रूम, चक्षु और विचार ज्योति रा
हो समायय करने वाले गुण है ।। ६,७॥
सश. प्राणश्च चेप्टा च पवनेमश्रितागुणाः ।
शब्द श्रीपञ्च खान्येव गगनेमथितागुणाः ।।
समित हुप्रा

मत्स्यपुराण
1
लोकमाया भगवता मुहूर्तेन विनाशिता ।
मनोबुद्धिश्च सपा क्षेत्रज्ञश्चेति यः श्रतः ।।
त वरेण्य परमेष्ठि हृषीकेशमुपाश्रिताः ।
ततो भगवतस्तस्य रश्मिभिः परिवारितः ॥१०
वायुनाम्यमाणासु द्रुमशाखासुचाश्रिताः ।
तेपा सघर्पणोद्भूतः पावकः शतधाज्वलन् ॥११
अदहाच तदा सर्व वृतः सम्वतंकोऽनलः ।
सपर्वतद्रुमान् गुल्मान् लतावल्लीस्तृणानिच ॥१२
विमानानि च दिव्यानि पुराणि विविधानि च ।
यानि चाश्रयणीयाति तानि सर्वाणि सोऽदहत् ॥१३
भरमीकृत्वाततःसर्वान गोकानलोकगुरहरिः ।
भूयोनिर्वापयामासयुगान्तेन च कर्मणा ।। ११
स्पर्श-प्राण और चैप्टा पवन में सरित गुण है। शब्द-थोत्र
और मामा गगन सय वरने वाले गुण है । मगशन ने एक ही
मुहत में मोरमाया का विनाश कर दिया था । सयरे मन-पुद्धि और
कोटा गुना गया है ये सब उस वरेण्य परमेष्ठी हपोरेगा उपायय
परने पासे हुए । इससे परचार उन भगवान को मियो से सब
परिवारिस हो गया था ॥८॥६॥१०॥ वायु दारा की
पापात्रो के आप माण होने पर माथित हो गये थे। उनमें से
पमुन्पग्न पावर संपदा होसे जमनामा हो गया था। उस समम में
सो बनाए गायब अगप ने जण दिशा पामों से युक्त
पीवी-मोको-रसा रस्ता और मृगोरो-हिम विमानोको-
विवियुगेको और जो भी आधीय प उन सामने पापापा
॥११, १२.00 Rai पीमित सांगे
को माया र ममा बम mera rut
था।11४1

प्रलयकाल वर्णन ४५७ सहस्रवृष्टिः शतधा भूत्वा कृष्णो महाबलः । दिव्यतोयेन हविषा तर्पयामास मेदिनीम् ॥१५ ततः क्षीरनिकायेन स्वादुना परमाम्भसा । शिवेन पुण्येन महीनिर्वाणमगमत् परम् ॥१६ सेन रोधेन सं-छन। पयसा वर्षतो धरा। एकार्णवजलीभूता सर्वसत्वविवजिता ॥१७ महासत्वान्याप विभुप्रष्टान्यमितौजसम् । मष्टापवनाकाशे सूक्ष्मे जगति रावृते ।।१८ सशोपमात्मना कृत्या समुद्रापि देहिनः । दग्ध्वा सप्लाव्य च तथा स्वपित्येक. सनातनः ॥१६ पौण रूपमास्थाय स्वपित्यमितविक्रमः । एकार्णवजलव्यापी योगी योगमुपाश्रितः ॥२० बनेकानि सहस्राणि युगान्येकार्णवाम्भति । न चनं कश्चिदव्यक्तं व्यक्त वेदितुमर्हति ॥२१ महार वल से सम्पन्न प्रोकृष्ण ने संबडो प्रकार से सहन वृष्टि वाले होकर दिय तोय हवि के द्वारा इस मेदिनो को तृप्त कर दिया था।॥ १५॥ इसके उपरान्त क्षीर सागर में रहने वाले परम स्वाद से युक्त शिव बोर पुण्य जल के द्वारा इस मही का परम निर्वाण हो गया था।॥१६॥ फिर रोध से यह मेदिनी सच्छन्न हुई जलो की वर्षा से एकाको भूत मेल पूर्ण हो गई थी और यह सब सरवो से विजित पी ।। १७ ।। सूर्य-पवन और प्रकाश के नष्ट होने पर इस सूक्ष्म जति का सम्बरण हो जाता है और यज्ञ सत्य भी अमित ओम वाले विभु मे सस्पष्ट हो जाया करते हैं ।। ६८11 अपने ही आपकी प्रारमा से समस्त समुद्रो का तथा देहधारियो का संशोषण परके सबको दाण करके तथा सप्ला- वित परके सनातन प्रभु एक ही उस समय में सयन किया करते हैं ॥१६॥ अमित विक्रम पाले प्रभु पोराणप में समस्थित होवर सपन करते हैं ४५८ मरस्यपुराण और एकार्णव के जल मे व्यापक योगी योग का उपाश्रय किया करते हैं ।। २०॥ उस एकमात्र सागर मे इस प्रकार से योग निद्रा के आनन्द मे शयन करने वाले प्रभु को अनेको सहल युग व्यतीत हो जाया करते हैं। उस अवस्था में इस अव्यक्त को कोई भी व्यक्त रूप से जानने के योग्य नहीं हुआ करता है ।।२१॥ करीव पुस्पोनाम कि योग कश्चयोगवान् । असो कियात कालञ्च एकाणविधिप्रभुः ॥२२ करिष्यतीति भगवानिति कश्चन्न बुध्यते । न द्रष्टा नैव गमिता न ज्ञाता नैव पारनंग. ॥२३ तस्य न ज्ञायते किञ्चित्तमृते देवसत्तमम् । नमः क्षिति पवनमप प्रकाशप्रजापति भुवनधर सुरेश्वरम् । पितामहश्रुतिमिलयमहामुनि प्रशाम्य भूय शयनारोचयत् ।।२४ यह पुरुप नाम वाला कौन है-योग क्या है और कौन इसके करने वाला है -यह विभु भगवान् कितने काल पर्यन्त इस एक मात्र सागर मे शयन करते रहने की विधि को करेंगे इसको काई भी नही जानता है। न तो कोई इसके देखने वाला है-म कोई इसका ज्ञान प्राप्त करने वाला है न कोई ज्ञाता तया पाश्च॑ मे गमन करने वाला ही हाता है ।। २२, २३ || उस देवो मे श्रेष्ठ के बिना उसक विषय में कोई भी यज्ञावतार वर्णन [१५६+३२ भूमिका-४३१ ६०-यजावतार वर्णन एवमेकार्णवोभूते गेले लोके महाद्युति । प्रछाद्यसलिलेनोर्वी हसो नारायणस्तदा ।।? महतो रजसो मध्ये महार्णवसर मुवै। विरजस्क महावाहमक्षय ब्रह्म य विदु ॥२ आत्मरूपप्रकागेन तममा सदृत प्रभुः । मन मात्विकमाधाय यत्र तत् सत्यमापन ||३ याथातथ्य पर ज्ञान भूतन्तब्रह्मणापुरा। रहन्यारण्पकादिष्ट यच्चौपनिपद स्मृतम् ।।४ पुरुषोयज्ञइत्येतत् यतार परिकीर्तितम् । यश्चान्य. पुपाख्य स्यात् म एप पुरषोतम ॥५ ये च यज्ञकरा विप्रा येचत्विज इतिस्मृता । अस्मादेवपुरा भूता यज्ञेभ्यः श्रूयता तथा ।।६ ब्रह्माण प्रथम वनादुद्गादारञ्च सागरम् । होतारमपि चाध्वर्यु बाहुभ्याससृजत् प्रभु ॥५ श्री मरस्य भगवान ने कहा-~इस प्रकार स एकावी भूतलाक में उस समय मे महान् युति दान हप नारायण सलिल स उवीं का प्रवादन करने शयन क्यिा करते हैं ॥१॥ महान् रजोगुण के मध्य मे, महार्णवसरों मे जो दिरजम्क रजोगुण स रहित ) महान् दाही वाला असय है जिसको ब्रह्म जानते हैं ।। २॥ अपने रूप के प्रकाश से तम से सवत प्रभु सास्विक मन का आधान करके जिसमे रहते हैं वह सत्य है ॥३॥ पहिले ब्रह्मा के द्वारा यह यथातथ्य परम ज्ञान प्राप्त हुप्रा पा जो रहस्पारण्यक उद्दिष्ट था और जो औमिपद मान कहा गया है ॥४॥ जो परपुरप एज-यह परिवौतिन दिया गया है और जो अन्य है। रिसा नाम पुस्प है वह हो पुरषासम दम है ।।५॥ जामो म सम्पादन करने वाले विष है देशविर दहे गये हैं । पहिले इनो सपना यज्ञावतार वर्णन सहित उपनिषदो की क्रियाएं हैं। यह एकार्णव में शपन किया करते हैं जो पहिले बडा भारी उपश्वयं हुआ था । हे विषगण ! जिस तरह से माण्डेय को कुतुहल हुआ था। उसका अब आप लोग श्रवण करो। यह महामुनि उन भगवान् की कुक्षि में ही गीर्ण हो गय थे ! वरदान के तेज से उनकी आयु बहुत से सहस्रो वर्षों की हुई थी॥ १२ ॥ १३ 1॥१४॥ अटस्तीर्थप्रराङ्गन पृथिवीतीर्थगोचरान् । आश्रमाणि च पुण्यानि देवतायनानि च ॥१५ देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च । जपहोमपर शान्तस्तपोधोर समास्थितः ।।१६ मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनववाद्विनिः सृतः । स निष्प्रामनवात्मान जानौते देवमायया । १७ निष्कम्पाप्पस्प वदनादेकाणवमथो जगत् । सर्वतस्तमसान्छन्न मावण्डेयोऽन्वक्षत ।।१८ तस्योत्सन्न भय-तोत्र संशयश्चादमजीविते। देवदर्शनराहुप्टो विरमय परगङ्गतः ॥१६ चिन्तयन् जलमध्यस्थो मार्कण्डेयोऽन्वक्षत । किन्तु स्यामम चिन्तेय मोह स्वप्नोऽभूयते ।।२० व्यक्तमन्यतमोभायस्पा सम्भावितो मम । नहीहदा जगत् योशमयुक्त सत्पमति ॥२१ तीयों के प्रसङ्ग से पृथिवी में स्थित प्रत्यक्ष तीर्थों का पर्यटन वया पुष्पमय मात्र देवो वे आयतन-देना-राष्ट्र-विचित्र एव अनेक पुरो का अटन करते हुए जय एव होम में परायण नैया परम शान्त होकर घोर तप में समास्थित हो गये थे ॥१५॥१६॥ इसके पयात् उनके भुप से शन माप विनि.गृत होगये थे 1 वह निष्क्रमण परत हुए देव को माया से अपने आपको भी नहीं जानते थे अनि उनको अपने

४६.२
मत्स्यपुराण
फर्मानुष्ठान को करने के लिये जो हुए थे उनके विषय मे धक्षण करो
॥ ६॥ प्रभु ने प्रथम मुख
ब्रह्मा को और उद्गाता सागर को फिर
बाहुओ से होता और अव्वयु को सृजित किया था |७||
ब्रह्मणो ब्राह्मणाच्छसि प्रस्तोतारञ्च सर्वशः।
तो मित्रावरुणो पृष्ठात् प्रतिप्रस्ताग्मेव च ।।८
उदरात् प्रतिहत्तार होतारञ्चैव पार्थिव !।
अच्छावाकमथोव्यानेष्टारजौव पार्थिव ! ME
पाणिभ्यामथ चाग्नीध्रसुब्रह्मण्यञ्च जानुतः ।
ग्रावस्तुतन्तु पादाभ्यामुन्नेतारञ्च याजुषम् ॥१०
एवमेवैप भगवान् पोडशव जगत्पतिः।
प्रवक्तन् सर्वयज्ञानामृत्विजोऽसृजदुत्तमान् ॥११
तदेष वै वेदमय पुरुषो यज्ञसस्थित ।
वेदारचंतन्मयाः सर्वे साङ्गोपनिषदतियाः ॥१२
स्वपित्येकाणवे चंव यदाश्चर्यमभूत्पुरा ।
श्रूयन्ता तद्यया विप्रा ! मार्कण्डेयनुतूहलम् ॥१३
गोणा भगवतस्तस्य कुक्षावेव महामुनि ।
बहुवर्षसहस्रायुस्तस्यैव वरतेजसा ॥१४
उस प्रभु ने ब्रह्म से ब्राह्मणो को और सब प्रस्तोता को सजत
किया था। दोनों मिलावरुषों को और प्रति प्रस्तार को पृष्ठ से सृजित
किया गया था। हे पार्थिव ! उदर त प्रतिहत्ता और होता का सृजन
पिया गया था। दोनो ऊरओ से अच्छा वार तथा नेष्टा की रचना की
थी। दोनो हापो से आग्नीधु यो तथा जानु से मुब्रह्मण्य को रवा पा ।
पानोरी
प्रापरतुन और पाप उन्नेता का गृजन लिया था। इस प्रकार
से ही इन जगत् के पति भगव न न सोस हो सम्पूर्ण यशो में प्रयत्ता उत्तम
शहिजो सजन दिपा पा ||८||१०॥११॥ वही यह पेक्ष्मय
पुरुष तो सचिन है। नीम परिपूर्ण गापूण देश है तथा पगा

यमावतार वर्णन सहित उपनिषदों को क्रियाएं हैं। यह एवार्णर में शयन किया करते हैं जो पहिले बहा भारो उपश्चर्या हुया था । हे विप्रगण ! जिस तरह से मार्कण्डेय को कुतूहल हुआ था। उसका लब बाप लोग श्रवण करो। वह महामुनि रन भगवान की कुक्षि में ही गीर्ण हो गये थे। दरदान के तेज से उनकी बायु भी बहुल से महतो वर्षों की हुई यो ॥ १२ ॥१३ 1॥१४॥ अटस्तीथंप्रसङ्गन पृथिवीतीथंगोचरान् । आश्रमाणि च पुण्यानि देवतायनानि च ॥१५ देशान् राष्ट्राणि चित्राणि पुराणि विविधानि च । जपहोमपर. शान्तस्तपोधार समास्थितः ।।१६ मार्कण्डेयस्ततस्तस्य शनीवत्राद्विनिः मृतः। स निकामनचात्मान जानोते देवमायया 1:१७ नितम्याप्यस्य वदनादेकार्णवमयो जगत् । सर्वतस्तमसान्छन्न मार्कण्डेयोऽन्वक्षत ॥१८ तस्योलन्न भयन्तोर मरायश्चात्मजोविते। देवदर्शनसहप्डो विस्मय परमङ्गतः ॥१६ चिन्तयन् जलमध्यस्था मार्कण्टेयोन्वनेक्षत। किन्तु म्यान्मम चिन्तेयं मोहःपनोऽशुभूयते ॥२० व्यक्तमन्यतमीभावस्तेया सम्भावितो मम । नहींश जगत् कोशमयुक्त सत्यमहति ॥२१ तोर्यों के प्रसङ्ग से पृथिवी में स्थित प्रत्यक्ष तीयों का पर्यटन तया पुण्यमय प्राथम-देवो ने भायन-देश-राष्ट्र-विचित्र एव अनेक पुरी का अटन करते हुए जय एव होम में परायणतया परम शान होकर घोर तपश्चर्या में समान्थिन हो गये ये ९१६।। इसके पयात उनके मुप से जन माय विनि.मृत होगये थे। यह निश्मण परत हुए देव की माया में अपने प्रापको भी नही जानने पे अनि उनको अपने ४६४ मत्स्यपुराण स्वरूप का भी ज्ञान नहीं था ।। १७ ।। मार्कण्डेय मुनि ने इनके मुख वाहिर निकल कर भी इस सम्पूर्ण जगत् को सप ओर अन्धकार से समाच्छन्न और एकमात्र सागरमय देखा था ।।१८।। जब यहाँ पर इस प्रकार जगत् का स्वरूप देखा था तो उसके हृदय मे अत्यन्त सीख भय समुत्पन्न हो गया था और अपने जीवन के रहने में भी संशय हो गया था। जब देव का दर्शन प्राप्त किया तो उससे वह अत्यधिक प्रसन्न हुआ और उसे महान् विस्मय समुत्पत्न गया था ।। १६11 जल के भध्य में स्थित मार्कण्डेय महर्षि ने चिन्तन करते हुए यह सब कुछ देखा था अपन हृदय मै ऐसा विचार हो गया था कि क्यो ऐसी मेरी चिन्ता हो रही है ? क्या यह एक मोह है अथवा स्वप्न का अनुभव किया जा रहा है ।।२०॥ व्यक्त उनका अन्यतम भाव मुझे सम्भावित हुआ था। यह मत्य जगत् इस प्रकार के आयुक्त वलेश के योग्य नहीं होता है ॥२१॥ नष्टचन्द्रा पवने नष्टपर्गतभूतले । पतमः स्यादय लोक इति चिन्तामवस्थितः ॥२२ पदशं चापि पुरुष स्वपन्त पर्वतोपमम् । सलिलेऽद्धमयो मग्नं जीमूतमिव सागरे ॥२३ जलार्तामय तेजोभिगोयुक्तमिव भास्करम् । दायर्या जाग्रतमिय भासन्त स्वेन सेजसा ॥२४ देवन्द्रष्टु मिहायात पो भवानिति विस्मयात् । तथव स मुनि पुत्ति पुनरेव प्रवेशित १.२५ सम्प्रविष्ट पुन मुक्षि मापंण्डेयोऽतिविस्मय । तथैव च पुन यो विजानन स्वप्नदर्शनम् ॥२६ ग तथैव यथा पूर्व यो धरागटते पुरा । परतीर्थजोगता विविधान्याश्रमाणि प ॥२७ प्रमियजमानांन ममानियरदक्षिणान ।

यजावतार वर्णन ४६५ आपश्यदेवकुक्षिस्थान् याजकान् शतशोद्विजान् ॥२८ माश को प्राप्त हुए चन्द्र-सूर्य और पवन वाले तथा विनष्ट पर्वत एवं भूतल वाले इममे यह कौन सा लोक होगाइमी चिन्ता मे वह बहुत समय पर्यन्त अवस्थित रहा था ॥२२॥ पर्वत की उपमा वाला अर्थात् महान् विशाल शयन करते हुये एक पुरुष को देखा या जो उसया मागर से एक जीमूत की भाति आधा भाग सलिल मे मग्न हो रहा था ॥२३॥ जो इतना तेजोमय था कि अग्नि के समान जाज्वल्यमान था- किरणों से युक्त मास्कर वे सदृश था और राति में अपने तेज से भासमान जाग्रत् की भांति दिखलाई दे रहा था ॥२५॥ वह विरमय से यह ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से कि प्राप कौन है देव का दर्शन प्राप्त करने के लिये यहाँ पर आये थे ज्योही वह आये थे वैसे ही वह मुनि उसी भांति कुक्षि में पुन प्रवेशित हो गये ॥ २५ ॥ पुनः कुक्षि में सम्प्रविष्ट हुए मार्कण्डेय मुनि अत्यन्त विस्मित हो गये थे। फिर दूसरी बार भी उसी भौमि स्वरन-दर्शन को वे जानने लगे थे । वह भी पूर्व की ही भांति घरामण्डल में पर्यटन किया करते हैं। जो धरा परम पुण्यमय वीयों के जलों समुपैन थी और इसी माति अनैद आथमो में भी माह न करते हैं । उस समय मे ऋतुओ के द्वारा समाप्त करदी है प्रष्ट दक्षिणा जिनके ऐसे मनमानो को और देव को दुहित मे स्पिन संबडो याजक हिमो यो उसने देवा पा २६, २७, २८॥ सद्वृत्तमास्थिता सय वर्णाब्राह्मणपूर्वराः चत्वारस्थाश्रमाः सम्यश्ययादिप्टागया तव ॥ एव वर्षशत सान मारण्यस्य धीमतः। चरत. पृथियो सर्वान युदयात, समीक्षित. १३० सत कदाविदय वं पुनर्मवाद्विनिस्रात । न्यनोशासाया वालमेव निरंत ॥३१ तयाजले नोहारेणरतापरे।

मत्स्यपुराण अव्यग्नः क्रीडते लोके सर्वभूतविजिते ॥३२ स मुनि विस्मयाष्टिः कौतूहलसमन्वितः । बालमादित्यसङ्काश नाशकोदभिवीक्षितुम् ।।३३ सचिन्तयस्तथैकान्ते स्थित्वा सलिलसन्निधौ। पूर्वदृष्टमिद मन्ये शद्धृितो देवमायया ॥३४ अगाधसलिले तस्मिन् मार्कण्डेयः सुविस्मयः । प्लवस्तथातिमगमत् भयात् सन्त्रस्त लोचनः ।।३५ ब्राह्मण जिनमे सर्व प्रथम है ऐसे चारो वर्ण वाले लोग सवृत (चरित ) मे समास्थित थे । ब्रह्मचर्य पादि चारो आधम भी जोसे मैंने तुमको वनलाये थे भली भांति व्यवस्थित थे। इस प्रकार सम्पूर्ण पृथ्वी पर सञ्चरण करते हुए धीमान् मार्कण्डेय मुनि को डेढ सो वर्ष व्यतीत हो गये थे किन्तु वह फिर भी उस कुक्षि का अन नहीं देख पाये थे। इसके उपरान्त फिर किसी समय मे पुनयह मुख से बाहर निकल पडे धे और उन्होंने ग्यग्रोध की शाखा मे छिपे हुए एक बालक को देखा था। मोहार म समावन जिसा अम्बर है ऐसे उम एवार्णव जल मे, जहाँ कि सभी प्रकार के भूतो वा अभाव था, ऐगे तोर में वह प्ययता रहित होपर पीट करता है ॥ २६, ३०, ३१, ३२ ।। उससे देवार यह मुनि बाप से पूर्ण तथा समाविष्ट होकर कोहल से सयुन हो गया था। यह काला मूर्प के तुप सेज से परिपूर्ण पानि उसको वह देय नहीं सपा पा ||३३॥ उसने चितन परते हुए सलिस की सन्निधि मे सी भाति एकान्त में स्थित होकर देवकी माया मावाना होररा जयपूर्व की ति या प्रा मानने मगता है ।।३४ ॥ अस्य विस्मय गंगयुम होगा उग भगा जल में पय ग गन्धान गो पाला यह मापन समान होता आया हो पर प्रारहा गया॥३५॥ गह भगवागार स्वागत वावयागवान।

४६८
मत्स्यपुराण
कर रहा है ? मुझको माकण्डेय--ऐसा कहार मृत्यु को देखने के लिये
योग्य होता है ? उस माकण्डेय मुनि ने उससे अत्यन्त क्रोध से इस प्रकार
कहा था तव उसी भाँति भगवात् मधुसूदन पुन उससे कहने लगे थे।
॥३६,४०, ४१॥
अह ते जनको वत्स । हृषीकेश पिता गुर ।
आयु प्रदाता पौराण किं मान्त्वन्नोपसपसि ॥४२
मा पुत्रकाम प्रथम पिता तेऽङ्गिरसोमुनि ।
पूवमाराधयामास तपस्तीव्र समाश्रित ॥४३
ततस्त्वा घोरतपसा प्रावृणोद मितौजसम् ।
उत्तवानहमात्मस्थ महर्षिभिमतौजप्तम् ॥४४
क समुत्सहते चान्यो यो न भूतात्मकात्मज ।
द्रष्टुमेकाण्वगत बीड त योगवत्मना ॥१५
तत प्रहृष्टवदनो विस्मयोत्पुल् ललोचन ।
मनि बद्धाजलिपटो माकडयो महान्पा । ४६
नामगोने तत प्रोच्य दीर्घायुलॊकजित ।
तरमै भगवते भक्त या नमस्कारमथाकरोत् ।।४७
श्री भगवान ने कहा-हे वत्स ! मैं तेग जनक हूँ। मैं परम पुरा
तन-पोवेश-पिता-गुरु और आयु के प्रदान करने वाला हूँ। क्यों तू
मेरे समीप नही आ रहा है ॥२॥ पहिले पुर की कामना रखने याने
तरे पिता प्रतिरग मुनि न परम तीव्र तपस्या का समाश्रय ग्रहण करके
मरी ही समाराधना वी पी ।।४। इराक अन तर आय त घोर ११ रो

यज्ञावतार वर्णन ४६ उसने अमित मोज वाले तुमको प्राप्त करने का वरदान प्राप्त कर लिया या। इसके परवार मेरे ही अन्दर स्थित अपरिमित ओज पाले महपि से मग कहा था जो भूतारमकात्मज न हो ऐसा अन्य कौन है ओ योग के माग से क्रीडा करते हुए एकार्णव में त को देखन का उत्साह दिया करता ? । ४४, ४।। इसके पश्चात् प्रहृष्ट मुख वाला-विस्मय से समुत्फुल्ल लोचनो से सयुत--मस्तक म अन्जलि पुट को बद्ध करते हुए महान् तपस्वी मार्कण्डेय अपने नाम और गोत्र का उच्चारण के दोर्शयु पौर लोक पूजिन ने उन भगवान् को भक्तिमाव से नमस्कार किया था ॥४६॥४७॥ इच्छेय तत्वतो मायामिमा ज्ञातु-तवानघ'। यदेवाणवमध्यस्थ शेपे त्व बालरूपवान् ॥४८ कि सज्ञश्चय भगवन् । लोके विज्ञायसे प्रभो ।। तकये त्वा महात्मान को ान्य स्थातुमहति ॥४८ अहनारायणो ब्रह्मन् । सर्वभू सर्वनाशन । अह सहरसीपाख्येय पदैर्गमसक्षित ॥५० आदित्यवर्ण पुस्पो मसे ब्रह्ममयो मख । अहनिह याहो यादराा पतिरव्यय ॥५१ अहमिन्द्रपदे शको वर्षाणा परिवत्सर । यह यागी युगाख्यश्च युगान्तावर्तएव च । ५२ अह सर्वाणि सत्वानि देवतान्यखिलानि तु। भुजङ्गानामह शेपो तार्यो वै सवक्षिणाम् ॥५३ पृतात सवभूताना विश्वपा कालसजित । अह धम्मस्तपरवाह सर्वाथमनिवासिनाम् ॥५४ १०० मन्स्यपुराण अह चैव सरिद्दिव्या क्षीरोदश्च महार्णवः । यत्तत् सत्य च परममहमेक प्रजापति. १५५ अह साख्यमह योगोऽयह तत्परमम्पदम् । अहमिज्या क्रिया चाहमहविद्याधिप स्मृत ॥५६ मार्कण्डेय महामुनि ने कहा है अनध ! मैं अब तस्विक रूप से आपको इस देव माया के ज्ञान को जानने की मैं इच्छा करता हूं कि जो बाल रूप वाले भाप इस एकाण व के मध्य में स्थित होकर शयन कर रहे ।।१८।। हे प्रभो । हे भगवन् ! आप इस लोक में किस सज्ञा वाले होकर जाने जाते हैं अति लोक में प्रापका क्या नाम प्रसिद्ध है। मैं ऐमा अनु- मान करता हूँ कि महात्मा आपको कोई अन्य स्थित करने के योग्य होता है। श्री भगवान ने कहा है ब्रह्मन् ! मैं सवको उत्पत्ति करने वाला तथा सबका नाश करने वाला नारायण हू मैं सहम शीर्षा नाम वाले पदों से अभिसशित होता हू॥५०॥ मैं सूय के समान वर्ण वाला पुरुष और मन में ब्रह्ममय मख हूँ। मैं हम्य का वहन करने वाला अग्नि है तथा मैं अविनाशी यादवो का स्वामी हु।५१॥ मैं इन्द्र के पद पर

यज्ञावतार वर्णन
में ही इज्या और क्रिया हूं तय मुझे ही विद्या का मधिप कहा गया है ।
॥५४,५५,५६||
अहं ज्योतिरहं वायुरहं भूमिरह नमः।
महमापः समुद्राश्च नक्षत्राणि दिशोदश ॥५७
अह वर्षमह सोमः पर्जन्योऽहमह रविः ।
क्षीरोदसागरे चाहं समुद्र वडवामुखः ॥५८
वह्निः संवर्तको भूत्वा पिवंस्तोयमयं हविः ।
अह पुराणः परमं तर्थवाह परायणम् ॥
अहं भूतस्य भव्यस्य वर्तमानस्य सम्भवः।
यत् किश्चित् पश्यसे विप्रा यच्छगोपि च किञ्चन ।
यल्लोके चानुभवसि तत् सर्व भागनुस्मर ।
विश्वसृष्टंमयापूर्व सृज्यं चाद्यापि पश्यमाम् ॥६१
युगे युगे च वक्ष्यामि मार्कण्डेयाखिलं जगत् ।
तदेतदसिल सर्व मार्कण्डेयावधारय ॥६२
शुधूपुमंम धर्माश्च कुक्षो चर सुखं मम ।
मम ब्रह्मा शरीरस्यो देवश्च पिभिः सह ॥६३
में ही ज्योति, वायु, भूमि, नभ, गप (जल), समुद्र, नमत्र,
दग दियाएँ, वर्ष, सोम, पर्जन्य, रवि हूं अर्थात् पवन भूमि आदि समस्त
मेरा ही एक दूसरा स्वरूप है। सीरसागर में मैं विद्यमान ह सया समुद्र में
पहलानल मेरा ही रूप है। सम्परांक भनि होरर समय हदि का पान

५०२
मत्स्यपुराण
करने वाला मैं परम पुरातन एवं परायण मैं हू । मैं ही अतीत होने वाले.
भव्य (भविष्य ) और वर्तमान काल को समुत्पन्न
फरने वाला है। हे
विप्र ! इस लोक मे जो भी कुछ तुम देखते हो, श्रवण करते हो और
जिसका भी कि किंचितमात्र अनुभव किया करते हो वह सभी मुझको ही
अर्थात् मेरा ही स्वरूप समझना चाहिये । मेरे ही द्वारा यह सम्पूर्ण विश्व
पहिले सृजित किया गया है और जो भी आज भी सृजन करने
के योग्य है उस सभी को मुझे ही देख लो १५७, ५८, ५६, ६०, ६१।।
हे मार्कण्डेय! प्रत्येक युग में इस सम्पूर्ण जगत को मैं ही सृजित किया करता
हूं इसीलिये यह सभी
कुछ
जो भी है मेरा ही स्वरूप है और मुझ
तुम समझ लो ॥६॥ मेरे धम्मो के श्रवण करने की इच्छा वाले यदि तुम
हो तो तुम मेरी ही इस कुक्षि मे सुख पूर्वक सचरण करते रहो । यह
ब्रह्मा भी मेरे इसी शरीर में स्थित है और राव देवगण भी उसके साथ मे
विद्यमान रहा करते हैं ॥६३||
कोही
व्यक्तमव्यक्तयोग मामवगच्छासुरद्विषम् ।
अहमेकाक्षरो मन्त्रस्त्यक्षरीव तारकः ॥६४
परस्त्रिवर्गादोङ्कारस्त्रिवर्गार्थनिदर्शनः ।
एवमादिपुराणेशो वदन्नेव महामतिः ।।६५
वक्त प्रमाहृतवानाशु मार्कण्डेय महामुनिम् ।
ततो भगवतः कुक्षि प्रविष्टो महामुनिम् ॥६६
स तम्मिन् सुखमेकान्ते शुथूपुहं समव्ययम् ।
योऽहमेव विविधतर्नुपरिश्रितो महाणवे ध्यपगयचन्द्रभास्वरे ।
पानश्चरन् प्रमुरपि हससंमितोऽमृजं जगद्विरहितकालपर्यये ॥६७

यज्ञावतार दन
घत-अन्यक्त योग वाला-मसुरों का द्वेष्टा मुझको ही समझ
लो। एकाक्षर और तीन अक्षरों वाला तारक मन्त्र भी मेरा ही एक
स्वरूप है ।।६४11 त्रिवर्ग से पर ओङ्कार और त्रिवर्ग के अयं का निदर्शन-
महामति आदि पुराणेशने इस प्रकार म महामुनीश्वर मार्क डेय से वढे
हुए ही अपना मुख आहृत कर दिया था और इसके उपरान्त वह मुनि
श्रेष्ठ उनको कुक्षि में प्रविष्ट हो गये थे ॥६५, ६६॥ वह उसमें एकान्त
सुख पूर्वक अविनाशी हम वा श्रवण करने वाले होकर कुक्षि में सब-
रण करते हैं । जो यह मैं ही नाना भांति दाले ठनुओ का परिश्रम करके
इस महामंत्र में नियमे सूर्य और चद्र यादि समी व्यपगत है हम को संज्ञा
दाला प्रभु मी धीरे चरण करता हुआ विरहित् काल पर्यय मे इस
जगत् का सृजन मैन ही किया है ॥६॥

तन्त्र महाविज्ञान लोक में व्याप्त विभिन्न प्रकार के तन्त्र सम्बन्धी भ्रमो को दूर करने और तात्रिक विषयो का जनोपयोगी बौद्धिक व वंज्ञानिक विश्लेषण करने वाली वर्षों की अपक खोज का परिणाम, दो खण्डो में प्रकाशित यह पुस्तक मौलिक सूझ बूझ से ओत प्रोत हैं । जनसाधारण मे फैले उपेक्षा भाव को यह आर्पण मे परिवर्तित कर देगो, ऐसा हमारा विश्वास है क्योंकि तन्त्र एक उच्चकोट की वैज्ञानिक साधना प्रणाली है जिसकी सहायता से साधक भौतिक व आत्मिक दोनो क्षेत्रो मे अभूतपूर्व सफलता प्राप्त कर सकता है। प्रथम खण्ड मे तन्त्र की महत्ता, प्रमाणिकता, प्राचीनता, गोपनीयता उसके प्रथं, सिद्धान्त, भाव, आचार व पूना पर प्रकाश डाला गया है। पञ्चमकारों की तथाकथिन पृणित साधनाओं का वास्तविक रहस्य समझाया गया है। शक्तिपात, नाद, विन्दु, कला, मन्त्र, वर्ण, मात का, मन्त्र, बीजाक्षर आदि विषयो का वैज्ञानिक स्पष्टीकरण किया गया है जिसमे तन्त्र की वैज्ञानिकता पर कुछ भी सन्देह नहीं रह जाता। दूसरे खण्ड मे शक्ति साधना के विश्वव्यापी प्रसार, इतिहास, विज्ञार, दार्शनिक रूप, तात्विक विवेचन व मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण पर खोजपूर्ण सामग्री दी गई है । वेद, उपनिषद्, पुराण योग वसिष्ठ, महाभारत, गीता, भारण्यक वेदान्त व साख्य में प्राप्य शक्ति की का दिग्दर्शन किया गया है । दुर्गा, लक्ष्मी, कानी, सरस्वती व दस महाविद्याओ काली, तारा, पोडशी, भुवनेश्वरी, छिन्नमाता, भैरवी, धूमावती, दल्गामुखी, मातङ्गी और कमला के स्वरूप व साधना विधानो या विशद वर्णन किया गया है जिससे साधक इच्छिन तान्त्रिक सिद्धियो को प्राप्त कर सकता है । इस तरह से तान्त्रिक विषयो वा वैज्ञानिव प्रतिपादन और साधना विधान दोनो इनमें मा गये हैं जिससे ग्रन्थ अन्यन्न उपादेय बन गया है। मूल्य २ खण्ड १५) मात्र माय - संस्कृति संस्थान, बाजाकुतुब, परेली (उ० प्र०) महत्ता

Matasya Puran Khand-1

Author
Sharma,pt.shriram
Title
Matasya Puran Khand-1
File name
Matasya Puran Khand-1
Text
OCR done
Citation
1970
Published
2012/08
Publisher
Barely.,chamanlal Gouttam Sanskriti Sansthan
Language
Sanskrit
Pages
483
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313009
Barcode
99999990321740.00
Scanning centre
Banasthali University
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