Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Navpadadi Tapvidhi Sangrah

Shri Jin Udaisagarsuri · 2010/08

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NAYPADADI TAPOVIDINI SANGRAISA
ANTHOLOGYJAIPUR/1980

प्रकाशकीय जन धर्म में तप का स्थान सर्वोपरि है। तप रूपी अग्नि में कर्म जलकर भस्मीभूत हो जाते हैं और आत्मा निर्मल तथा पवित्र बन जाती है। बाह्य और अभ्यन्तर ऋद्धि-सिद्धि तप के प्रभाव से ही उत्पन्न होती है। वैज्ञानिकों का भी यह मानना है कि अनेकों असाध्य रोग तप के प्रभाव से शमित किये जा सकते हैं। जैसे सुवर्ण में रही अशुद्धि अग्नि के ताप से दूर हो जाती है उसी प्रकार तप आत्मा के कर्म रूपी मैल को नाश करने का साधन है। अनेकों भवों के संचित कर्म तप द्वारा नष्ट किये जा सकते हैं। शास्त्रों में उल्लिखित है : अथिरं पि थिरं वंकपि, उज्जु दुल्लहं वितह सुलहं, दुरीज्झपि सुरज्झं, तपेण संपज्जए कज्जं ।। अर्थात्, तप के प्रभाव से अस्थिर भी स्थिर हो जाते हैं, वक्र भी सरल बन जाते हैं, दुर्लभ भी सुलभ हो जाते हैं, जो असाध्य हैं वह भी साध्य हो जाते हैं। इसलिये तप से सर्व कार्य सिद्ध हो जाते हैं। प्राचीन और अर्वाचीन इतिहास का अध्ययन करने पर अनेक उदाहरण सामने आते हैं जहां तप के द्वारा मोक्ष. फल प्राप्त हुआ है। श्रमण भगवान महावीर ने नन्दन मुनि के पचीसवें भव में ११ लाख ८० हजार ६४५ मास क्षमण किये तथा तीर्थंकर नाम कर्म गोत्र कर्म अजित किया। श्रीपाल राजा ने तप के प्रभाव से कोढ़ जैसे असाध्य रोग को नष्ट करके जन्म मरण से मुक्ति प्राप्त को। नरक में जीव करोड़ों वर्षों तक महान दुःखों को सहन करते हुये जो पाप कर्म काटते हैं उतने ही पाप कर्मों की निजरा सम्यग् --

( ४ )
दृष्टि आत्मा एक अठ्ठम तप करके प्राप्त करती है। तप आत्म शुद्धि
और आत्म विकास के साधनों में एक है। तप से आत्मा विकास कर
अंतत: परम पद की ओर अग्रसर होती है ।
'नवपदादि तप विधि संग्रह' अनेक तपस्याओं की पारंपरिक
विधियों तथा तत्संबंधी स्तवनादि का संग्रह है। हमें प्रसन्नता है कि
प० पू० प्राचार्य श्री जिन उदयागिरिसूरि जी म० सा० की प्रेरणा से
श्री सोहनलालजी गोलेछा ने इस पुस्तक के प्रकाशन का कार्य कुशल
संस्थान को सौंपा।
कटनी निवासी श्री सोहनलाल जी गोलेछा, जो कठिन तपस्या
करते हुए अपने जीवन को सफल बना रहे हैं, वधाई के पात्र हैं ।
हम प० पू० आचार्य महाराज के ऋणी हैं, जिनकी प्रेरणा से यह
प्रकाशन कार्य सम्पन्न हो सका है।
आशा है सभी भव्य पाठक गण
इस पुस्तक का अध्ययन कर यथा शक्ति तपस्या कर जीवन सफल
वनायेंगे।
उन सभी भव्य आत्माओं का धन्यवाद है जिन्होंने इस
प्रकाशन में आर्थिक सहयोग प्रदान किया। इस प्रकार के जीवनो-
पयोगी साहित्य के प्रचार प्रसार के लिये कुशल संस्थान निरन्तर
प्रयत्नशील है। आशा है पाठक अपना सक्रिय सहयोग तथा प्रेरणा
हमें प्रदान करते रहेंगे।
श्री जितेन्द्र संघी के सौजन्यपूर्ण व्यवहार तथा पुस्तक के
सुन्दर मुद्रण के लिये हम हृदय से उनके अभारी हैं।
राजेन्द्र कुमार श्रीमाल
सचिव
कुशल संस्थान, जयपुर।

se yo ra tu e. h lin es or :00 .no आर्थिक सहयोग : १. सौ. प्रभादेवी भण्डारी, श्री विमलचन्दजी सुबोधकुमारजो भण्डारी, भोपाल (म०प्र०) २. सौ० शान्ति देवी वैद, श्री लालचन्दजी, घनश्याम कुमारजी, लक्ष्मीचन्दजो, अशोककुमारजी वैद, जयपुर (उड़ीसा) ३. श्रीमती मदन देवी चड्ढा, वी०पी० एक्सपोर्टस्, २१०७, पंच- रत्न बिल्डिंग. ऑपेरा हाउस, बम्बई-४ ४. सौ. लीलादेवी कोठारी, श्री प्रतापचन्द, चेतनकुमार, विनय कुमार, नवीनकुमार कोठारी, लोहिया बाजार, लश्कर (म०प्र०) ५. एस० सोहनलाल, अशोककुमार, चन्द्रकुमार गोलेछा, सुभाष चौक, कटनी (म०प्र०) ६. रूप वर्षा, एस० त्रिलोकचन्द, ऋषभकुमार, महावीरकुमार, जवाहरगंज, जबलपुर (म०प्र०) idr adi TV le: asa lly he .n: ina

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तपस्वी-दर्शन तपस्वी श्री सोहनलालजी गोलछा : आपको स्वप्न में देवताओं ने नरक व स्वर्ग का स्वरूप दिखाया जिससे धर्म में श्रद्धा हो गई। यह घटना करीवन २५ से ३० वर्ष की उम्र में हुई थी। राई व देवसी प्रतिक्रमण करते हैं। तीन विगय का रोजाना त्याग रहता है। देसावगासिक में या सामायिक में प्रायः रहते हैं । सन् १९८० से लोच कराते हैं। जन्म ता. ३०-११-१९१५ को हुआ था । पालीताने में ६६वीं यात्रा कर रहे थे तब स्त्री मोहन देवी का स्वर्गवास वहीं पर ता. २०-४-५५ को हुआ था। ता. २३-४-५५ को चौथा व्रत (ब्रह्मचर्य) ग्रहण कर लिया था। प्रतधारी सोहनलाल जी गोलछा के प्राजीवन नियम (त्याग) कटनी (म.प्र.) : १. सन् १९३७ से चाय का त्याग । २. पान सुपारी का स्याग । ३. बाजारके बने हुए सामान का त्याग (सिर्फ दूध व मलाई खुल्ली)। ४. ता. १-१-७७ से शक्कर व शक्कर से बनी हुई मिठाइयों का त्याग ५. तेल से बने हुए सामान का त्याग । ६. कड़ाही विगय का त्याग । ७. हरे फल व हरे साग में सिर्फ केला तथा मौसमीकी वाकी का त्याग । ८. कम से कम ३ विगयों का रोजाना त्याग करना । ९. मुरब्बा, शरवत, पापड़, बड़ी, खोवा (मावा) का त्याग । १०. नारियल त्याग । ११. गन्ने के रस का त्याग । छूट ( ८ ) १२. अंजीर का त्याग। १३. भोजन में ज्यादा से ज्यादा ५ वस्तुए तथा जल के अलावा त्याग (कम हो तो आनन्द)। १४. दही बड़े तथा राइते का त्याग । १५. निजी घर में भोजन शुरू करने के पेस्तर जो सामान परोसा गया सो खाना इसके बाद दूसरी बार कुछ भी नहीं लेना । १६. कटनी में रात्रि को राई संथारा लेकर सोना । १७. भोजन मौन में करना। १८. भोजन के सब बर्तन धोकर पानी (धोवन) पी लेना। १९. एकासन तो तारीख ११-६-७३ से चालू है और सन् १९७५ से प्रथम सप्ताह से ठाम एकासनं चालू है । (वड़ी तपस्या के पारणो में २-३ दिन ठाम व्यासन करने की छूट) । २०. चातुर्मास में आखे (सेंगा) अनाजों का त्याग । २१. उभयकाल प्रतिक्रमण करना। २२. दिन में कई बार देसावगासी करना। २३. दाल, रोटी, परोठा, सोगरा, खिचड़ी, चावल आदि में ऊपर से घी नहीं लेना, कोई भूल से डाल देवे तो एक पक्की माला गिनना। २४. चप्पल व जूते का त्याग । २५. साबुन से स्नान का त्याग । २६. बेर याने बोर का त्याग। २७: कोंकनी केले का त्याग। २८. सिवैयां का त्याग। २६. घर में रूई से भरी रजाई, गद्दे तथा तकिये का त्याग। २०. टमाटर तथा तरबूज का त्याग । ३१. रेवड़ी का त्याग । नोट-गुड़ खुल्ला है । गुड़ या गुड़ से बना हुआ सामान यदि घर का बना हुआ हो या किसी गृहस्थ के घर का बना हुआ हो तो छूट, बाजार का त्याग ।

(E) आपने अब तक निम्न तपस्यायें की हैं- २ . विधिमाफिक उपवास से उपवास से उपवास से १. दस पच्खाण तप श्री बीस स्थानकजी की ओली तप ३. श्री ज्ञान पंचमी तप ४. श्री मौन ग्यारस तप ५. श्री भव आलोयण विधि से की ६. श्री चोदह पूर्व तपं ७. श्री पैतालिस आगम तप ८. श्री नवपद ओली (सिद्ध चक्राधन) तप उजमणा किया जबलपुर में १६-८-६७ को २१-४-६७ उपवास से उपवास से एक धान से अलूणी ९. श्री नवकार तप १०. श्री अष्ट-कर्म सुदन तप आयंम्बिल व ठाम एकासन से किया ११. श्री बीस स्थानकजी की ओली तप (दुवारा) एकासन से १२. श्री सोलिये तप १३. श्री इग्यारह गणधर तप १४. श्री अगियार अंग तप १५. . श्री ज्ञान दर्शन चारित्र तप १६. श्री श्रुत देवता तप उपवास से उपवास से ( १० ) छ8 से (बेला) उपवास से १७. श्री निर्वाण दीपक तप १८. श्री गणधर तपस्या १९. श्री आगमोक्त केवलि तप २०. श्री पंच महाव्रत तप २१. श्री चैत्री पूनम पर्व तप २२. श्री गौतम पडधा तप २३. श्री नवपद ओली (सिद्ध चक्राधन) तप अलूणी एक घान से (दूसरी बार) (तीसरी बार) २४. श्री नवपद ओली (सिद्ध चक्राधन तप) अलूणी एक धान से (जीवन पर्यन्त नवपद जी की ओली करने की सम्भावना है) उपवास से से २५. श्री वृहन्नद्यावर्त तप २६. श्री मेरू तेरस तप (चालू है १६-१-६९ से) २७. श्री पोष दशमी तप १६-१-६० से उपवास २८. श्री दश विधि यति धर्म तप उपवास से २९. श्री सात सौख्य आठ मोक्ष तप ठाम एकासन से ३०. श्री तीर्थकर वर्धमान तप ३१. श्री समवसरण तप . ३२. श्री सिंहासन तप एकासन से र1 ( ११ ) ३३. श्री श्रु त देवता तप ३४. श्री चतुर्विध संघ तप (आयंविल लगातार तथा एकासन से) ३५. श्री आयंमिल वर्धमान तप ता. २१-७-७७ से चालू किया है बिना नमक के ३६. चौदह पूर्व तप (दूसरी बार) ठाम एकासन से ३७. श्री तीर्थकर ज्ञान तप ठाम एकासन तथा से ३८. श्री सिद्ध चक्र जी की ओली (चौथी बार) चालू है ता. १८-१०-७७ से अलूणी ३६. बारह दिन का उपबास ता. ४-७-७८ से १५-७-७८ तक ता. ८-८-७८ सावन सुदी ४ को १०१ अलूणी चौउविहार और ता. ९-७-७८ से आयंबिल चालू कर दिये । ४१. कल्याणक अष्टान्हिका तप- ता. २८-४-१९५० से शुरू करके ता. १६-८-८८ को सम्पूर्ण किया, ठाम एकासन से । वड़ा तप होने के कारण बीच में जो तप चालू थे, उनका करना जरूरी था सो किये-जैसे ज्ञान पंचमी, मौन ग्यारस, मेरु तेरस, पोष दशमी, सिद्ध चक्रजी की ओली आदि। ४०. ४२. लोकनालितप- इसमें १६ एकासन, ह नीवी, ५ आयंबिल तथा २ उपवास करने पड़ते हैं सो किये ।

( १२) ४३. तीर्थकर ज्ञान तप- ता. १३-२-८४ से शुरू करके ता. १-९-८४ को सम्पूर्ण किया, लगातार ठाम एकासन से । ४४. वृद्धसिंह निष्क्रीड़ित तप- ६ वर्ष ४२ दिन में लगातार ठाम एकासन के साथ पूरा किया। ४५. ज्ञान, ४६-दर्शन, एवं ४७-चरित्र तप, उपवास एवं ठाम- एकासन की विधि से। ४८. लोकनालि तप- उपवास तथा ठाम एकासन विधि से दुबारा किया । ४६. दशविधयति धर्म तप- ठाम एकासन से। ५०. अण्टकर्म सूदन तप- ठाम एकासन एवं आयंविल से पूरा किया। ५१. कपाय तप-- (एकासन, नीवी, आर्यविल, उपवास) ऐसी विधि से ही करना पड़ता है सो किया।

( १३ ) चमत्कार-घर देरासर निधि में ता. २०-१०-८६ को प्रातः ११.३० से १२ वजे वीच में एक नवीन नागिन (अनुमान से १५-२० दिन की होगी) देखी। १ १/४ लाख व दुवारा १.१/४ लाख अथवा. २ १/२ लाख नवकार मंत्र का जाप किया। इसके पेस्तर ९ लाख नवकार मंत्र का जाप हो चुका। . ५२. अष्टापद पावड़ी तप तथा सिद्ध चक्रजी की ओली पांच-पांच हो चुकी है। अब छठवीं वार की ओली का दूसरा पद सम्पूर्ण किया है। नोट-सभी ओली अलूणी, एक धान ठाम एकासन से की है। -- ५३. वीस स्थानक तप ३री वार शुरू किया ता. ११-७-१९८७ से ठाम एकासन से जो कि प्रतिदिन कर रहे हैं। : "चमत्कार के दर्शन" • श्री पावापुरी महातीर्थ पर हर वर्ष निर्वाण के दिन भगवान् का : छत्र स्वयं अपनेआप (प्रातःकाल) में ४-५ मिनट तक हिलता चलता रहता है। यह चमत्कार भी सन् १९७५ में वीर सम्वत २५०० की समाप्ति एवं २५०१ की शुरूआत ( १४ ) पर देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस बार १०-१५ मिनिट के बाद दूसरी बार छत्र हिला यह विशेषता हुई। लोगों का कहना है कि वर्तमान में इतने तप किसी ने नहीं किये, ऐसा सुना है। खामेमि सव्वजीवे सव्वे जीवा खमंतु में । मित्ती में सव्वभूएसु बेरं मज्झ न केवई ।।

( १५) श्री नवपद महिमा (तर्ज-लावणी) जगतमें नवपद जयकारी, पूजता रोग टले भारी ॥ टेर ॥ : प्रथम पदें तीर्थपति राजे, रोग अष्टदशकू त्याजे । आठ प्रातिहारज जासु छाजे, जगत प्रभु गुण बारे राजे ॥ अष्ट करम दल जीत के, सकल सिद्ध ते थाय । सिद्ध अनन्त भजो वीजे पद, एक समय शिव जाय ।। प्रकट भयो निज स्वरूप भारी ॥ जगत में नव०॥१॥ सूरि पदमें गौतम केशी, ओपमा चन्द्र सूरज जैसी। उद्धार्यो राजा परदेशी, एक भव मांहे शिव लेसी ।। चौथे पाठक नमू, श्रुतधारी उवझाय । सर्व साधु पंचम पद समरू, धन धन्नो मुनिराय ।। बखाण्यो वीर जिणन्द भारी ॥ जगत में नव० ॥२॥ पद. द्रव्य षट् की श्रद्धा भावे, शम संवेगादिक पावे । बिना यह ज्ञान नहीं किरिया, जैन दर्शन से सब तिरिया। ज्ञान पदारथ सातमे, पद में आतमराम । रमता रम्य अध्यातम में, निज पद साधे काम ॥ . देखता वस्तु जगत सारी ॥ जगत में नव० ॥ ३ ।। जोग की महिमा बहु जाणी, चक्रधर छोड़ी सब राणी । यति दश धर्म करी सोहे, मुनिवर श्रावक मन मोहे ।।

( १६ ) +कर्म काष्ठ प्रति जालवा, परतिख अगनि समान । नवमो पद जो करे क्षमासू, कर्म मूल कट जाय ।। भजो तुम नव पद सुखकारी ।। जगत में नव० ।। ४ ।। श्री सिद्धचक्र भजो भाई !, आँविल नव दिन ठाई। पातिक तिहुँ जोगे पर हरजो; नृप श्रीपाल तणी करजो॥ उगणीसे समे, जयपुर शहर मझार ।। चैत्र धवल पूनम दिन कीनी, सफल भई निज आस । 'वाल' कहे नव पद छवि न्यारी ।। जगत में नव ।।५।। सतरा +ईस गाथा में पहले के तीन पद इस प्रकार से भी मिलते हैं. । करम निकांचितं कांपवा, तप कुठार कर ध्यान । क्षमा युक्त नवमां पद धारे, +a ( १७ ) ॥ श्री नवपद तपश्चर्या ग्रह्ण विधि ।। शुभ दिन नक्षत्रादि शुभ समय देखकर-उत्तम वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर, तिलक करके, हाथ में मौली बाँधके अक्षत चांवल सुपारी श्रीफल-नैवेद्य-यथाशक्ति रोकड़ नाणां लेकर गुरु महाराज के पास जावे, वहाँ नवकार गिनता हुआ श्रीस्थापना- चार्यजी की तीन प्रदक्षिणा देवे। बाद में श्रीगुरु महाराज के पास जावे। पांच साथिया करे । बाद ओली ग्राहक अपने हाथ में वासक्षेप लेके- । नमंत सामंत महीवनाहं, देवाय पूर्व सुविहेय पुव्वं । भत्तीइ चित्तं मणिदामएहिं, मंदार पुप्फ पसवेहि नाणं ।।१।। तहेव सढ्ढा मणि मुत्तिएहिं, सुगंध पु-फेहि वरंसिएहिं । पूयंति वदंति नाणं, नाणस्स लाभाय' भवक्खयाय ॥२॥ 1 ऊपर लिखित गाथाओं को पढ़कर वासक्षेप से ज्ञान पूजा करे और शक्ति मूजव. रोकड़ नांणा ज्ञान पर चढ़ावे, बाद खमा० देके इरियावही पडिक्कमे, प्रकट लोगस्स कहे। बाद खमा० "इच्छाकारेण संदि० भग० ! मुहपत्ति पडिलेहूँ इच्छं” कहके खड़े पैरोंसे बैठकर मुहपत्ति पडिलेहे। दो वांदणा. देवे । खमासमण देके "इच्छाकारी भगवन् ! नवपद ओलीतप गहणत्थं चेइयाई वंदावेह वासनिक्खेवं करेह" । गुरु. 'वंदावेमो करेमो' कहके शिष्यके शिर पर वासक्षेप डाले। बाद गुरुशिष्य दोनों बाँया गोडा ऊँचा करके चैत्यवन्दन कहके नमुत्थुणं० अरिहन्त चेइयाणं० अन्नत्थ० आदि कहके ४ थुईसे देव वन्दन करे। चौथी स्तुति कहे बाद नीचा बैठके नमोत्थुणं कहे। खड़े होकर "श्रीशांतिनाथ देवाधिदेव ।

( १८ ) अराधनार्थं करेमि काउसग्गं" वन्दणवत्तिआए० अन्नत्थ० कह कर एक लोगस्सका काउसग्गं करे । पार कर नमोर्हत कह के- श्रीमते शान्तिनाथाय, नमः शान्ति विधायिने । त्रैलोक्यस्यामराधीश, मुकुटाभ्यर्चितांघ्रये ॥१॥ यह स्तुति कह कर "शान्ति देवता अराधनाथ करेमि काउ- सग्गं" अन्नत्थ कह कर एक नवकारका काउसग्ग करे, पार कर नमोऽहत्० कह कर नीचे की स्तुति कहे-- शांतिः शांतिकरः श्रीमान्, शांति दिशतु मे गुरुः । शांतिरेव सदा तेषां, येषां शांतिगृहे गृहे ॥२॥ बाद में अनुक्रमसे श्रुतदेवता भवनदेवता और क्षेत्रदेवता का नाम लेके "अराधनार्थ करेमि काउसग्गं" अन्नत्थ० कह कर एक एक नवकारका काउसग्ग करे, पारके नमोहंत० कहकर अनुक्रमसे ही "कमलदल०, चतुवर्णाय०" और "यस्या क्षेत्र०" ये स्तुतियां कहे। बाद में "शासनदेवता अराधनार्थ करेमि काउसगं" अन्नत्य० कहके एक नवकारका काउसग्ग पार कर "नमोऽहत् कहके नीचे की स्तुति कहे- या पाति शासनं जैन, संघप्रत्यूह नाशिनी । साऽभिप्रेत समृद्धयर्थ, भूयाच्छासन देवता ॥१॥ बाद में "समस्त वैयावृत्यकर देवी देव अराधनार्थं करेमि काउसग्ग" अन्नत्थ०; कहके एक नवकारका काउसग्ग करे, पार कर नमोऽहत्० कहके स्तुति कहें- 1 (१९) श्रीशक्र प्रमुखा यक्षा, जिन शासन संस्थिता। देवा देव्यस्तदन्येऽपि, संघ रक्षन्त्वपायतः ।।१।। बाद में गोडालिये बैठकर नमुत्युणं. जय वियराय० पर्यन्त कहे, खमा० देके “इच्छाकारेण संदि० भगवन् ! नवपद ओलीतप गहणत्थं करेमि काउसग्ग" अन्नत्थ० कहके एक लोगस्सका काउसग्ग करे। पारके प्रकट लोगस्स कहे। खमा० देके तीन नवकार गिने । फिर खमा० देके "इच्छकारी भगवन् ! पसाओ करी नवपद ओलीतप गहण दण्डक उच्चारावोजी" गुरु 'उच्चरा. वेमो' कहके तीन नवकार गिन के नीचे का दण्डक तीन बेला उच्चरावे। (तपउच्चारण पाठ) अण्णं भन्ते ! तुम्हाणं समीवे नवपद ओलीतवं उवसंपिज्ज- ताणं विहरामि, तंजही-दवओ-खित्तमो-कालो-भावओ। दव्वओणं नवपद ओलीतवं, खित्तओणं-इस्थ व वा अन्नत्थ वा, कालओणं सड्ढचउबरिस परिमाणं, भावओणं जाव गहेणं न गहिज्जामि, छलेणं न छलिज्जामि, जाव सन्निवाएणं नाभिभ- विज्जामि, अण्णण व केणइ रोगायंकादि परिणामवसेण एसो मे परिणामो न पडिवडइ ताव मे एस तवो, (नन्नत्थ) रायाभियोगेणं बलाभियोगेणं, गणाभियोगेणं, देवाभियोगेणं, गुरुनिग्गहेणं, वित्ति कन्तारेणं, अन्नत्थणाभोगेणं, सहस्सागारेणं, महत्तरागारेणं, सव्व समाहि वत्तियागारेणं बोसिरामि । तीसरी बार उच्चराये बाद गुरु महाराज-"हत्येणंसुत्तेणं, मत्येणं, तदुभएणं, सम्म धारणीयं, चिरं पालणीयं, गुरु गुणेहिं ( २० ) वड्ढाहि नित्थारग पारगा होइ" कहते हुए शिष्यके शिर पर वासक्षेप डाले। वाद शिष्य गुरुको दो वांदणे पूर्वक वन्दन करके आँविलका पच्चक्खाण करे। वाद खमा० देके अविधि आशातना खमावे। - (तपश्चर्या पारण विधि) ज्ञान पूजा करके, इरियावाही पडिक्कमे; नवपद ओलीतप पारवा मुहपत्ति पडिलेहके, दो वांदणां देवे, वाद "इच्छा० संदि भग० ! नवपद ओलीतप पारावणत्थं काउसग्गं कारावेह" गुरु कहें "करामेवो' पीछे खमा० देके. "इच्छा कारेण तुम्हें अम्हं नवपद ओली तप पारावणत्थं चेइयाइं वंदावेह, वासनिक्खेवं करेह" कहे । बाद में गुरु "वन्दावेमो-करेमो” कहके शिष्य के शिर पर वास- निक्षेप करे, वाद में दोनों जणे ३ खमा० देकर बाँया गोडा ऊँचा करके गुरु नमुत्थुणं कहे। वाद शिष्य खमा० देके "नवपद ओली तप पारावणत्थं करेमि काउसग्ग" अन्नत्थ० कहके एक नवकार का काउसग्ग करे, पारके स्तुति कहे । बैठकर नमुत्थुणं कहे । भगवन् ! ओली तप करते अविधि-अशातना हुई हो सो सब मन-: वचन कायाएँ करी मिच्छामि दुक्कडं । ज्ञान भक्ति द्रव्य भावसे को हो वह प्रमाण फल दायक हो जो । गुरुवचन-नित्थारग पारगा होई। फिर यथाशक्ति प्रत्याख्यान करे। ओली तप आलोयण निमित्त कंरेमि काउसग्ग" अन्नत्थ० कहके चार लोगस्सका काउसंग्ग करे, पारके प्रकट लोगस्स कहे । अतिथि सत्कार करे,. यथाशक्ति उद्यापन करे। .

ॐ
ॐही अर्ह नमः
॥ श्रीजिनदत्तसूरिभ्यो नमः ।।
॥श्रीनवपदादि तपविधिसंग्रह ॥
।। अथ अरिहंतपद चैत्यवंदन ।।
-
जय जय श्रीअरिहंत भानु, भवि कमल विकाशी ।।
लोकालोक अरूपिरूपि, समस्त वस्तु प्रकाशी ॥१॥
समुद्घात शुभ केवले, क्षय कृतमल राशि ।।
शुक्लचरम शुचि पादसे, भयो वर अविनाशी ॥२॥
अंतरंग रिपु गण हणीए, हुए अप्पा अरिहंत ।।
तसुपद पंकजमें रहत, हीर धर्म नित संत ॥३॥

(२) ।। अथ अरिहंत पद स्तवन ।। श्रीतेरमगुण वसिके कंत, कर्मकुं भंजे श्रीअरिहंत । मनमानले । अष्ट समयमें समयतीन, सर्व पाहारथी हावे हीन । मन० ॥१॥ बादर काये मन वच भोग, तनु तनुसे पुन दृढ तनुयोग । मन० । सुखम कायते मन वच रोक, निजवीर्ये ताकु कर फोक । मन० ॥ २॥ संज्ञी- मात्रके मन व्यापार, बे इद्रीने वाक्य प्रकार । मन० । आदिसमय रह्यो पण कसु जोव, सुखम लो तिण जोग अतीव । मन० ॥ ३॥ एसा योगथी समय एक, होना संख गुणो करी छेक । मन० । समया संखे जोग निरोध, कृत्वा जो लह्यो जोगी शोध । मन० ॥ ४॥ वेदसमे अनाहार तापाय, कुशल, कहे ते श्रीजिनराय । मन० । तेरमें गुणमें गुण समे देव, पापो सा जगकुं नितमेव । मन० ॥ ५ ॥ ।। अथ अरिहंतपद थुई ।। सकल द्रव्य पर्याय प्ररूपक, लोकालोक सरूपोजी। केवलज्ञानको ज्योति प्रकाशक, अनन्त गुणे करी पूरोजी ।। artThy ( ३ ) बोजें भव थानक पाराधी, गोत्र तीर्थकर नूरोजो। बारे गुणा करी एहवा अरिहंत, पाराधो गुण भूरोजी ।। १ ।। . ।। अंध सिद्धपद चैत्यवंदन ।। श्रीशैलेशी पूर्वप्रांत, तनु होन तिभागी । पुव्वपय- योगप्रसंगसे, ऊरधगति जागी ॥१॥ समय एकमें लोक प्रांत, गये निगुण - नीरागी । चेतन भूपे प्रातम रूप, सुदिशा लही सागी ॥ २ ॥ केवल दसण नाण थीए, रूपातीत स्वभाव । सिद्ध भए तसु हीर धर्म, वंदे धरि शुभ भाव ॥ ३ ॥ ।। अथ सिद्धपद स्तवन ।। (थारे महिलां ऊपर मेह जरोखै बीजली ॥ए चाल) अष्ट बरस नग मास हीना कोड़ी पूर्वमें म्हारा लाल हो । उत्कृष्ट करै वास सयोगी धाममें म्हा० स० ॥ अजागी के अंत तजे भव भव्यता म्हारा० ॥ त० ॥ शैलेशी लहै कष्ट दलै गुणश्रेणिता म्हारा । द० ॥ १ ॥ ह्रस्वाक्षर पंच काल रहै ते :योगमें । म्हा० र० ॥ तेरस प्रकृतिनो अन्त करीने अन्तमें म्हा क० ॥

( ४ )
गमन करे नगरज्जसें। अक्रिय होयने म्हा० अ० ॥
पुचपयोग असंग स्वभाव प्रबंधने म्हा० स्व० ॥ २ ॥
इषु गुण नवपरिमाण जोजन लक्षेकही म्हा० जा० ॥
वर्तुल विशदा भाश निरालंबन सही महा० नि० ॥
मध्ये जोजन अण्म धना कृति अन्तमें म्हा० घ० ॥
मक्षी पक्षथी हीन भणी सिद्धांतमें म्हा० भ० ॥ ३ ॥
तनुप मारा नाम शिलासें जोयनें म्हा० शि० ॥
लघु अंगुल बत्तीस प्रमाण अवगाहना म्हा० प्र० ॥
वृद्धिधनु शत पंच गुणसें हीनता
गुणसें हीनता म्हा० गु० ॥
मिलिया एकमें नंत अबाधा नालही म्हा० अ० ॥ ३ ॥
अष्ट प्राण धरि रम्य सिरी हिजो सही म्हा सि० ।।
बीजो पद श्रीसिद्ध धरी मन गेहमें म्हा० धरो० ॥
कुशल भये जग जीव मिलोगा तेहमें म्हारा० मि० ॥ ४ ॥
॥ अथ सिद्धपदनी थुइ ।।
अष्ट करमकुँ दमन करीने, गमन कियो शिव
वाशीजी। अव्यावाध सादि अनादि, चिदानन्द चिद-
राशीजी । परमातम पद पूरण विलाशी, अघ धन दाघ
विनाशीजी । अनन्त चतुष्टय शिवपद ध्यावो, केवल ज्ञानी
भाषीजी इति ॥२॥

।। अथ प्राचार्य पद चैत्यवंदनम् ।। जिनपदकुल मुख रस अनिल । मितरसगुण धार प्रबल सबल घन मोहकी। जिणते चमु हारी ॥ १ ॥ रुज्वादिक जिनराजगीत । नय तन विस्तारी। कूपै पा पडत । जगजन निस्तारी ॥२॥ पंचाचारी जीवके । प्राचारज पदसार । तिन' वंदे हीर धर्म अठोत्तरसोवार र ॥ ३ ॥ इति ।। भव ॥ अथ आचार्यपदस्तवन ।। (नणदल बोंदलीले ए चाल) खंती खड्गथी जेणें । हण्यो क्रोध सुभट सम देणे हो । गणपति गुण पेखी। मान महागिरि वयरे। अति सोभन मद्दव वयरें हो । ग० । दंभरूप विषवेली । वर अज्जन कोलै ठेली हो । ग० ॥ मूर्छा वेलथी भरीयो । लोह सागर मुत्तेतरियो हो । ग० ॥ २ ॥ मदन नाग मद हीनो । जिणदम शम जंत्रे कोनो हो । ग० ॥ मोह महा- मल्ल ताड्यो । पुण वैराग सुगरे पाड्यो हो ॥ ३ ॥ दोष गयंद वस कीनो । धरी उपशम अंकुस लीनो हो । ग० ।।

अंतरंगरिपु भेद्या । सुरवर पिणजिण निषेध्या हो । ग० ॥ ४ ॥ रस कृती गुणथो लोनो। सूत्र अर्थे आगम पोनो हो० ।। ग० ॥ प्राचारिज पद एहवो । धरी जीव कुशलता सेवो हो । ग० ॥ ५ ॥ इति ॥ ३ ।। अथ आचार्यपदनी थुइ ।। पंचाचारकुं पाले उजवाल, दोष रहित गुण- धारीजी । गुण छत्तीसे आगमधारी, द्वादश अंग विचारीजी। सबल घन मोह हरणकुं। अनिल समो गुण वाणीजी। क्षमा सहित जे संयम पाल, आचारज गुण ध्यानीजी ।। इति ॥ ३ ॥ प्रबल ।। अथ उवझायपद चैत्यवंदनम् ।। धन-धन श्री उवझाय राय । शठता घन भंजन ।। जिनवर दशित द्वादशांग । धरकृतजनरंजन ॥ १ ॥ गुण- वणभंजण मण गयंद । सुयशृणि किय गंजण ॥ कुतप लोय लोयणे । जत्थय सुयं मंजण ॥ ३ ॥ प्राणमें जिन लह्यो ए । प्रागमसें पद तुर्य । तिन अहिनिश हीर धर्म । वंदे पाठकवर्य ।। ३ ॥ इति ॥ ४ ॥ M ( ७ ) || अथ उपाध्याय पद स्तवन ।। - (सांवलीया अलगा रहोने ए चाल) हुयनें ३ दूरी हुयनें । चेतन भाष शउने दूरी होयने तुं मुझ पास क्युं प्रावे दू० तुझने कुण बतलावे दू० ।। प्रांकणी ॥ तो संगै निज पंचेंद्रीनो। रचना चरम भुलाणो । नाणा वरणी खय उपशमसें । भावेंद्री मडाणो दू० ॥१॥ द्रव्ये ते पर जाप्तें कीना । जातिनाम व्यपदेश । एवं तो गो तुरग गजादिक । किण कर्मे उपदेश दू० ॥ २ ॥ इत्यादिक बहु मुझकुं शंका । तेरे संगं लागी। नीलवर्ण की शमतासेती। में भयो तोसुरागी दू० ॥ ३ ॥ उप कहिये हरणीयो भवियानो। अधियां लाभत प्राय आधी- नांमन पीडानामें मायोयेन विलाय दू० ॥ ४॥ आधिक्य स्मरायै वर आगम । सुत्रसे ते उवझाय तत्सेवा ते हणि सठताकुं । चेतन कुशलता थाय दू० ॥ इति ॥ ५ ॥ ॥ अथ उपाध्याय पद स्तुति ।। अंग इग्यारै चउदै पूरव, गुण पचवीसना धारीजी। सूत्र अरथधर - पाठक कहिये, जोग समाधि विचारीजी।

( 5 ) तपगुणसूरा आगम पूरा, नयनिक्षेपे तारीजी। मुनि गुण- धारी बुधविस्तारी, पाठक पूजो अविकारीजी ॥इति।।४।। ।। अथ साधुपद चैत्यवंदनाम् ।। दंशण नाण चरित्त करी। वरशीवपद गामी ।। धर्म शुक्ल शुचि चक्रसें। आदि मखय कामी ।। १॥ गुण पमत्त अपमत्तते। भये अंतर जामी। मानस इंदिय दमन- भूत शमदम अभिरामी ॥ २॥ चारुति घन गुणगण भर्यो ए। पंचमपद मुनिराज । तत्पद पंकज नमत है ॥ हीर धर्मके काज ॥ ३ ॥ - ।। अथ साधुपवद स्तन ।। (मालन मालन मति कहो ए-चाल) निकषाया जग जनक है। धारे चउगति वसनसें रोस हो मुनिदजी रागहीन भय तुं करै। साहिबाशिव रमणी से हेतहो मुनिदजी ।। १॥ सर्व प्रमाद तजी रहै सा० छठ पूरव कोड हो । मु० शत सोगम. आगम करै --

सा० लघु
--
(६)
काले
गुण आदी हो मु० ॥२॥ थिनद्धी निद्रा उदे
सा० यामें कर्म निकंद हो मु० प्रचला निद्रामें रही सा० ।
बारम गुणनो वासहो मु० ॥३॥ स्थितिरस घात प्रमुख
करै सा० जोगुण संख्यातीत हो मु० तोपिण तिण जगमें
लही सा० जोगण संख्यातीत हो मु० तो पिण तिण जगमें
लही सा० त्रिक धन गुण नोख्यात हो मु० ॥४॥ रयण
त्रयसें शिवपथे सा० साधन परवर जीव हो मु० ।
साधु हुवइ तसु धर्ममें सा० कुशल भवतु जगतीव
हो मु० ॥५॥ इति ॥
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।। अथ साधुपद थुई ॥
सुमतिः गुपति कर संजम पालै, दोष बयालीश
टालैजी
षद काया गोकुल रखवाले, नव विध ब्रह्मवत-
पालैजी। पंचमहाव्रत सुधापाले, धर्म शुक्ल उजवालेजी ॥
क्षपक श्रेणि करि कर्म खपावै, दमपद गुण उपजावैजी ।।
इति ॥ ५ ॥
।। अथ दर्शनपद चैत्यवंदनम् ।।
हुय पुग्गल परियट्ट । अढ परमित संसार ।।
गंठि भेद तव करि लहै । सब गुण प्राधार ॥१॥

(१०) क्षायक वेदक शशि प्रसंख । उवशमपण वार । विना जेण चारित्र नाण नहीं हुवै शिवदातार ॥२॥ श्रीदेवगुरु- धर्मनीए । रुचि लच्छन अभिराम । दरशनकुं गणि हीर धर्म । अहनिश करत प्रणाम ॥ ३ ॥ इति ॥ अथ दर्शनपद स्तवन ।। (रामचन्द्रके बाग प्रांबो मोहरह्योरी ए चाल) -- देव श्रीजिनराज । गुरुते साधु भण्योरी। धर्म जिनेश्वर प्रोक्त । लक्षण बोधि तणोरी ॥१॥ बोधि लाभके काज । सप्तम नरक भलोरी। तेण बिना सुरलोक । तातें अधिक बुरोरी ॥२॥ मिथ्या तापे तप्त । बोध ही छांह लहेरी । उपशम क्षायक वेद । ईश्वर तीन कोरी ॥ ३ ॥ भवसागर हे अपार । फुण अस्ताघ कशोरी । जसुलाभै ते होय । गोसप मात्र खरोरी ॥ ४ ॥ यद भावें अप्रमाण । नाण चारित्त भलोरी । बोध धर्ममें जीव । लाभ कुशल कलोरी ॥ ५ ॥ इति - ( ११ ) - ।। अथ दर्शनपद थुइ ।। जिन पन्नत्त तत्त्व सुधा सरधै, समकित गुण उजवालैजी। भेद छेद करी प्रातम निरखी, पशु टाली सुरपावैजी । प्रत्याख्याने समतुल्य भाख्यो, गणधर अरिहंत- शूराजी । ए दरशनपद नित नित वंदो, वंदो, भवसागरको तीराजी ।। इति ।। अथ ज्ञानपद चैत्यदंदनम् ।। क्षिप्रादिक रस राम वन्हि । मित आदम नाण । भाव मिलापसें जिन जनित । सुय वीश प्रमाण ॥१॥ भवगुण पज्जवसोहि दोय । मण लोचन नाण । लोका- लोक सरूप जाण । इक केवल भाण ॥ २ ॥ वरणीनासथीए। चेतन नाण प्रकाश । सप्तम पदमे हीर धर्म । नित चाहत अवकाश ॥ ३ ॥ इति नाणा ॥ अथ ज्ञानपद स्तवन ।। (मार अति उछरंगे ए चाल) जिनवर भाषित आगम भणिया। तत्व यथास्थिति गमियाजी म्हारै जगजन तारू । ते उत्तम वर नाण कहीय - ( १२) भविजन अहनिशि चाहै जी म्हा० ॥ १॥ भक्ष्या भक्ष्य कुपंथ सुपंथा। पेयापेय अग्रंथाजी म्हा० । देव कुदेव अहित- हित धारी । जाणे जेण विचारीजी म्हा० ॥२॥ श्रुति मति दोय छे इन्द्रीसारू । तेण परोक्ष विचारूजो म्हा० । मोहीमण केवल है वारू ॥ जीव प्रतक्ष सुधारूजी म्हा० ॥ ३॥ अज्जविजस्स बलेजग जाणें । लोकादिक अनुमानेजी। म्हा० । त्रिभुवन पूजे जासु पसायें । धारी शुभ अध्यवसायेंजी म्हा० ॥४॥ नाणा वरणो उपशम क्षयथो। चेतन नाणकुं विलाशैजी म्हा० ॥ सप्तम पदमें भविजन हरषै । निशदिन कुशलता निरखजी म्हा० ॥ ५ ॥ इति • - ।। अथ ज्ञानपद थुई ।। मति श्रुत इंद्री जनित कहिये, लहीये गुणगं भौरोजी । प्रातम धारी गणधर विचारी, द्वादश अंग विस्तारीजी । अवधि मन पर्यव केवल वलि, प्रत्यक्षरूप अवधारोजी। ए पांच ज्ञानकुं बंदो पूजो, भविजननें सुखकारोजी ।। इति ( १३ ) ३ ।। अथ चारित्रपद चैत्यवंदनम् ।। जस्स पसायें साहु पाय । जुग-जुग समितेंद । नमन करै सुभ भावलाय । फुण नरपति वृन्द ॥ १॥ जंप धरि अरिहंतराय । करि कर्म निकंद । सुमति पंच तीन गुप्ति- युतादै सुक्ख अमंद ॥ २॥ इषु कृति मान कषायथीए । रहित लेश सुचिवंत ।। जीव चारित्तक होर धर्म । नमन करत नित संत ।। ३ ॥ इति ॥ अथ चारित्रपद स्तवन ।। निर्विकल्प अजनिर्गुणी। चिदाभास निस्संग । (सुग्यानी सांभलो) भूतिहीन चेतन करै । रूपी पुद्गल रंग (सु०) ॥१॥ स्पर्द्धक कारण वर्गणा । कार्ये कारण भाव (सु०) कृत्वा जोग सुधामता। लब्धा · संख स्वभाव (सु०) ॥ २ ॥ पर्याप्ता लघु जोगमें। वृद्धिलहै जुगमान (सु०) मध्ये वसुसमय लहै । अंते द्वौते जाण (सु०) ॥ ३ ॥ सहकारी मानस मुखा । कारण रम्य बलेण (सु०) प्राप्ता घस्र प्रकारता । सप्त प्राभृतका तेन (सु०) ॥ ४ ॥ तद्रोधनरूपी भलो । चेतन संयम धाम (सु०) ( १४ ) कर घनमिलपद धर्ममें। कुशल भवतु अभिराम (सु०) ॥ ५ ॥ इति ॥ अथ चारित्रपद थुई ॥ करमअपचय दूर खपावै, प्रातम ध्यान लगावैजी । बारे भावना सूधी भावे, सागर पार उतारेजी । षट्खंड राजकुं दूर तजीने, चक्री संजम धारेजी। एहवो चारित्र नित नित वंदो पातम गुण हितकारैजी ॥ इति ॥ अथ तपपद चैत्यवंदनम् ।। श्री ऋषभादिक तीर्थनाथ । तद्भवशिव जाण । विहि अंतैरपि बाह्य । मध्य द्वादश परिणाम ॥ १॥ वसु करमित आमोसही। प्रादिक लब्धि निदान । भेदै समता- सुतखिणे । दृग्घन कर्म विमान ॥२॥ नवमो श्रीतपपद भलोए । इच्छा रोध सरूप । वंदनसें हिर धर्म । दूर भवतु भवकूप ॥ ३ ॥ इति (१५) ।। अथ तपपद स्तवन ।। बारस भेद भण्या जिनराज । बाह्य मध्य तणा जगकाजैरे (शिवपदश्रेणि) तिण भव सिद्धितणा बर ग्याता । जिनवर पिण तपना कर्त्तारे ॥ १ ॥ (शि०) समता सहिते जिनते भारी। भली कर्म चमुपिण हारी रे (शि०) जीव कनकसें कर्म कचोरा। दहै तप पावनका जोरारे (शि०) ॥२॥. तप तरुवरना कुसुम है ऋद्धि । देव नरनाफलते सिद्धीरे (शि०) पाप सकलहे. तमनी राशी । तप भानूसें जाये नाशीरे (शि०) ॥ ३ ॥ जस्स पसाये लहियै वारू । लब्धी सगली जगहित कारूरे (शि०) अति दुक्कर फुण साध्यताही ना। कामतातें वारू कीनारे (शि०) ॥४॥ इच्छारोधनरूपी कहिये । तपपद ही चेतन वहियैरे (शि०) पाठक श्री हीरधर्म से नवपद कुशल कू भासेरे (शि०) ॥५॥ इति ।। अथ तपपद थुइ ।। इच्छारोधन तपतें भाख्यो, आगम तेहनो साखीजी। द्रव्य भावसें द्वादश दाखी, जोग समाधि राखीजी। चेतन ( १६ ) निजगुण परणित पेखे, तेहीज तप गुण दाखीजी । लब्धि सकलनो कारण देखो, ईश्वरसे मुखभाषीजी ।। इति ॥ अथ अरिहंतना १२ गुण ।। १ अशोक वृक्ष प्रातिहार्य संयुताय श्री अरिहंताय नमः २ पुष्पवृष्टि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ३ दिव्यध्वनि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ४ चामर युगल प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ५ स्वर्णसिंहासन प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ६ भामंडल प्रातिहार्य संयुताय श्रोअरिहंताय नमः ७. दुंदुभि प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ८ छत्रत्रय प्रातिहार्य संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ६ ज्ञानातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः १० पूजातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः ११ वचनातिशय संयुताय श्रीअरिहंताय नमः १२ अपायापगमातिशय संयुताय श्रोअरिहंताय नमः ( १७ ) ।। अथ सिद्धना ८ गुण ।। १ अनन्त ज्ञान संयुताय श्रीसिद्धाय नमः २ अनन्त दर्शन संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ३ अव्याबाध गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ४ अनन्तचारित्र गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ५ अक्षयस्थिति गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ६ अरूपीनिरंजन गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ७ अगुरु लघु गुण संयुताय श्रीसिद्धाय नमः ८ अनन्तवीर्यगुण संयुताय श्रोसिद्धाय नमः ।। अथ प्राचार्यपदना ३६ गुण ।। प्रतिरूप गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः सूर्यवत्तेजस्वि गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः ३ युगप्रधानागम संयुताय श्रीआचार्याय नम ४ मधुर वाक्य गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः ५ गांभीर्य गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः ६ धैर्य गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः ( १८ ) ७ उपदेश गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः ८ अपरिश्रावी गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः ६ सौम्य प्रकृति गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः १० शीलगुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः ११ अविग्रह गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः १२ अविकथक गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः १३ अचपल गुरण संयुताय श्रोप्राचार्याय नमः १४ प्रसन्न वदन गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः १५ क्षमा गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः १६ ऋजु गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः १७ मूक गुण संयुताय श्रोप्राचार्याय नमः १८ सर्व संग मुक्ति गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः १६ द्वादशविधि तपोगुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः २० सप्तदशविध संयम गुण संयुताय श्रीप्राचार्याय नमः २१ सत्यव्रत गुणसंयुताय श्रीप्राचार्याय नमः २२ शौच गुणसंयुताय श्रीप्राचार्याय नमः २३ अकिंचन गुणसंयुताय श्रीप्राचार्याय नमः २४ ब्रह्मचर्य गुणसंयुताय श्रीग्राचार्याय नमः ( १९ ) २५ अनित्यभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः २६ अशरणभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः २७ संसारस्वरूपभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः २८ एकत्वस्वरूपभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः २६ अन्यत्वभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः ३० अशुचिभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः ३१ पाश्रवभाबनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः ३२ संवरभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः ३३ निर्जराभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः ३४ लोकस्वरूपभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः ३५ बोधिदुर्लभभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः ३६ धर्मदुर्लभभावनाभावकाय श्रीप्राचार्याय नमः । ।। अथ उपाध्यायना २१ गुणो ।। १ आचारांगसूत्र पाठनगुणसंयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः २. सुयगडांगसूत्र पाठनगुणसंयुताय श्रीउपाध्यायाय नमः ( २० ) ३ श्रीठाणांगसूत्र पाठनगुणसंपुताय श्रीउपाध्यायाय नमः ४ श्रीसमवायंगसूत्र पाठनगुणसंपुताय श्री उपा० नमः ५ श्रीभगवतीसूत्र पाठनगुणसंयताय श्री उपा० नमः ६ श्रीज्ञातासूत्र पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः ७ श्रीउपाशकदशाङ्गसूत्र पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः ८ श्रीअंतगडदशाङ्गसूत्र पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः ६ श्रीअणुत्तरोववाईसूत्र पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १० श्रीप्रश्नव्याकरणसूत्र पाठनगुणसंतुताय श्रीउपा० नमः ११ श्रीविपाकसूत्र पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १२ श्रीउत्पादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १३ श्रीप्राग्रायणीपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १४ श्रीवीर्यप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १५ अस्तिप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १६ ज्ञानप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १७ सत्यप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १८ प्रात्मप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः १६ कर्मप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः २० प्रत्याख्यानप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउ० नमः ( २१ ) २१ विद्याप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः २२ अविध्यप्रवादपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः २३ प्राणायामप्रवादपूर्व पाउनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः २४ क्रियाविशालपूर्व पाटनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः २५ लोकबिंदुसारपूर्व पाठनगुणसंयुताय श्रीउपा० नमः ।। अथ साधुपदना २७ गुण ।। १ प्राणातिपातविरमणव्रतसंयुताय श्रीसाधवे नमः २ मृषावादविरमणव्रतसंयुताय श्रीसाधवे नमः ३ अदत्तादानविरमणवतसंयुताय श्रीसाधवे नमः ४ मैथुनविरमणव्रतसंयुताय श्रीसाधवे नमः ५ परिग्रहविरमणवत्तसंयुताय श्रीसाधवे नमः ६ रात्रिभोजनविरमणव्रतसंयुताय श्रीसाधवे नमः ७ पृथ्वीकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः ८ अप्पकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः है तेऊकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १० वाऊकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः ( २२) ११ वनस्पतिकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १२ त्रसकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १३ एकेंद्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १४ बेइंद्रिजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १५ इंद्री जीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १६ चौरिद्रीजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १७ पंचेंद्रीजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १८ लोभनिग्रहकारकाय श्रीसाधवे नमः १६ क्षमागुणयुक्ताय श्रीसाधवे नमः २० शुभभावनाभावकाय श्रीसाधवे नमः २१ प्रतिलेखनादिक्रिया शुद्धकारकाय श्रीसाधवे नमः २२ संयमयोगसंयुक्ताय श्रीसाधवे नमः २३ मनोगुप्तिसंयुक्ताय श्रीसाधवे नमः २४ वचनगुप्तिसंयुक्ताय श्रीसाधवे नमः २५ कायगुप्तिसंयुक्ताय श्रीसाधवे नमः २६ शीतादिद्वाविंशतिपरीशहसहणतत्पराय श्रीसा० नमः २७ मरणांत उपसर्ग सहण तत्परायश्रीसाधवे नमः ( २३ ) - .. 11 अथ दर्शनपदना ६७ गुण ।। १ परमार्थ संस्तवरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः २ परमार्थज्ञातृसेवनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३ व्यापन्नदर्शन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४ कुदर्शन वर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ५ शुश्रूषारूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ६ धर्मरागरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ७ वैयावृत्यरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ८ अर्हद्विनयरूपं श्रीसद्दर्शनाय नमः ६ सिद्धविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १० चैत्यविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ११ श्रुतविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १२ धर्मविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १३ साधुवर्गविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १४ प्राचार्यविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १५ उपाध्यायविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १६ प्रवचनविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १७ दर्शनविनयरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः .

( २४ ) १८ संसारेजिनसारमिति चितनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः १६ संसारेजिनमतसारमिति चितनरूपश्रीसद्दर्शनायनमः २० संसारेजिनमतस्थित साध्वादिसारमिति चितनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः २१ शंकादूषणहिताय श्रोसद्दर्शनाय नमः २२ कांक्षादूषण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः २३ विधिकित्सारूप दूषणरहिताय श्रीसद्दशनाय नमः २४ कुदृष्टप्रंशसा दूषणरहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः २५ तत्परिचय दूषणरहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः २६ प्रवचनप्रभावकरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः २७ धर्मकथाप्रभावकल्प श्रीसद्दर्शनाय नमः २८ वादिप्रभावकरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः २६ नैमित्तकप्रभावकरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३० तपस्विप्रभावकरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३१ प्रज्ञश्यादिविद्याभृत्प्रभावकल्प श्रीसद्दर्शनाय नमः ३२ चूर्णाजनादिसिद्धप्रभावकरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३३ कविप्रभावकरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३४ जिनशासने कौशलभूषणरुप श्रीसद्दर्शनायनमः ( २५ ) ३५ प्रभावनाभूषणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३६ तीर्थसेवाभूषणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३७ धैर्यभूषणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३८ जिनशासने भक्ति भूषणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ३६ उपशमगुणरुप श्रीसदर्शनाय नमः ४० संवेगगुणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४१ निर्वेदगुणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४२ अनुकंपागुणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४३ आस्तिक्यगुणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४४ परतीर्थकारिवंदनवर्जनरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४५ परतीर्थकादिनमस्कारवर्जनरुप श्रीसददर्शनाय नमः ४६ परतीर्थकादियालापवर्जनरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४७ परतीर्थकादिसंलापवर्जनरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४८ परतीर्थकादिप्रसनादिदानवर्जनरुप श्रीस० नमः ४६ परतीर्थकादिगंधपुष्पादिप्रेषनवर्जनरुप श्रीस० नमः ५० राजाभियोगाकारयुक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ५१ गणाभियोगाकारयुक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ५२ बलाभियोगाकारयुक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः . -- 4 w- 1 ( २६ ) ५३ सुराभियोगाकारयुक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ५४ कांतारवृत्त्याकारयुक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः ५५ गुरु निग्रहाकारयुक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ५६ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्यमूलसितिचितन श्रीस० नमः ५७ सम्यक्त्वं चारित्रधर्मपुरस्यद्वारमिति चितन श्रीस० नमः ५८ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य प्रतिष्टानमिति चितन श्रीस० नमः ५६ सम्यक्त्वंचारित्रधर्मस्याधारमितिचितन श्रीसनमः ६० सम्यक्त्वंचारित्रधर्मस्यभाजनमितिचितन श्रीसनमः ६१ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य निधि संनिभामिति चितन श्रीसद्दर्शनाय ममः ६२ अस्तिजीवेति श्रद्धानस्थानयुक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ६३ सचजोवो नित्येति श्रद्धानस्थानयुक्ताय श्रीस० नमः ६४ सचजोवः कर्माणि करोतीति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ६५ सचजीवः कृतकर्माणि वेदयतीति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसदुदर्शनाय नमः न --- Art ( २७ ) ६६ जीवस्यांति निर्वाणमिति श्रद्धानस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ६७ अस्ति पुनर्मोक्षोपायेति श्रद्धालस्थान युक्ताय श्रीसद्दर्शनाय नमः ।। अथ ज्ञानपदना ५१ गुण ।। १ स्पर्शनेंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः २ रसनेंद्रिय, व्यंजनावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः ३ घ्राणेंद्रिय व्यंजनावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः ४ श्रोत्रंद्रिय .. व्यंजनावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः ५ स्पर्शेन्द्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः ६ रसेन्द्रिय अविग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः ७ घ्राणेंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः ८ चक्षुरिद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः है श्रोत्रंद्रिय अर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय नमः १० मनोअर्थावग्रहाय श्रीमति ज्ञानाय ज्ञानाय नमः ११ स्पर्शेन्दिय ईहा श्रीमति ज्ञानाय नमः (२८) १२ रसेन्द्रिय ई ईहा श्रीमति ज्ञानाय नमः १३ ध्राणेंद्रिय ईहा श्रीमति ज्ञानाय नमः १४ चक्षुरिंद्रिय ईहा श्रीमति ज्ञानाय नमः १६ मन ईहा श्रीमति ज्ञानाय नमः १७ स्पर्शन्द्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः १८ रसेन्द्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः १६ घ्राणेंद्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः २० चक्षुरिंद्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः २१ श्रोत्रंद्रिय अपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः २२ मनकरीअपाय श्रीमति ज्ञानाय नमः २३ स्पर्शद्रियधारणा श्रीमति ज्ञानाय नमः २४ रसेंद्रियधारणा श्रीमति ज्ञानाय नमः २५ घ्राणेंद्रियधारणा श्रीमति ज्ञानाय नमः २६ चक्षुरिंद्रियधारणा श्रीमति ज्ञानाय नमः २७ श्रोत्रंद्रियधारणा श्रीमति ज्ञानाय नमः २८ मनोधारणा श्रीमति ज्ञानाय नमः २६ श्रीअक्षर श्रुतज्ञानाय नमः ३० श्रीअनक्षर श्रुतज्ञानाय नमः ( २९ ) ३१ श्रीसंज्ञी श्रुतज्ञानाय नमः ३२ श्रीप्रसंज्ञी श्रुतज्ञानाय नमः ३३ श्रीसम्यक श्रुतज्ञानाय नमः ३४ श्रीमिथ्या श्रुतज्ञानाय नमः ३५ श्रीसादि श्रुतज्ञानाय नमः ३६ श्रीअनादि श्रुतज्ञानाय नमः ३७ श्रीसपर्यवसित श्रुतज्ञानाय नमः ३८ श्रीअपर्यवसित श्रुतज्ञानाय नमः ३६ श्रीगमिक श्रुतज्ञानाय नमः ४० श्रीअगमिक श्रुतज्ञानाय नमः ४१ श्रीअंगप्रविष्ट श्रुतज्ञानाय नमः ४२ श्रीअनंगप्रविष्ट श्रुतज्ञानाय नमः ४३ श्रीअनुगामि अवधिज्ञानाय नमः ४४ श्रीअननुगामि अवधिज्ञानाय नमः ४५ श्रीवर्द्धमान अवधिज्ञानाय नमः ४६ श्रीहीयमान अवधिज्ञानाय नमः ४७ श्रीप्रतिपाति अवधिज्ञानाय नमः ४८ श्रीअपतिपाती अवधिज्ञानाय नमः ४६ श्रीरुजुमति मनःपर्यवज्ञानाय नमः ५० श्रीविपुलमतिमनः पर्यवज्ञानाय नमः ५१ लोकालोकप्रकाशक श्री वलज्ञानाय नमः ॥ अथ चारित्रपदना ७० गुण ।। १ प्राणातिपातविरमणरूप श्रीचारित्राय नमः २ मृषावादविरमणरूप श्रोचारित्राय नमः ३ अदत्तादानविरमणरूप श्रीचारित्राय नमः ४ मैथुनविरमणरूप श्रीचारित्राव नमः ५ परिग्रहविरमणरूप श्रीचारित्राय नमः ६ क्षामाधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ७ आर्जवधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ८ मृदुताधर्मरूप श्रोचारित्राय नमः & मुक्तिधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः १० तपोधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः ११ संयमधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः १२ सत्यधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः na ( ३१ ) ३ शौचधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः १४ अकिचनधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः १५ ब्रह्मचर्यधर्मरूप श्रीचारित्राय नमः १६ पृथ्वोरक्षाससंयम श्रीचारित्राय नमः १७ उदकरक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः १८ तेउरक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः १६ वाउरक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २० वनस्पतिरक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २१ बेरिद्रिरक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २२ तेरितिरक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २३ चौरिदि रक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २४ पंचेन्द्रिरक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २५ अजीवरक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २६ प्रेक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २७ उपेक्षासंयम श्रीचारित्राय नमः २८ अतिरिक्त वस्रभक्तादिपरठण त्यागरूप संयन गुणयुक्ताय श्रीचारित्राय नमः २६ प्रमार्जनरूप श्रीचारित्राय नमः ( ३२ ) ३० मनःसंयमरूप श्रीचारित्राय नमः ३१ वाक्रसंयमरूप श्रीचारित्राय नयः ३२ कायासंयमरूप श्रीचारित्राय नमः ३३ अचार्ययावृत्यरूपसंयम श्रीचारित्राय नमः ३४ उपाध्याय वैयावृत्यरूप संयम श्रीचारित्राय नमः ३५ तपस्विवैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ३६ लघुशिष्यादि वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ३७ ग्लानसाधु वैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ३८ साधुवैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ३६ श्रमणोपासक वैयांवत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ४० संघवैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ४१ कुलवैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ४२ गणवैयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः ४३ पशुपंडगादि रहित वसति ब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः ४४ स्त्रीहास्यादिविकथावर्जनब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः ४५ स्त्रीग्रासनवर्जन ब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः ४६ स्त्रीअंगोपांग निरीक्षण वर्जन ब्रह्मगुप्तश्रीचारित्राय नमः वसन ( ३३ ) ४७ कुडयांतर सहित स्त्री हावभाव सुणन वर्जन ब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः ४८ पूर्वस्त्रीसंभोचिनवर्जनब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः ४६ अतिसरस आहार वर्जनब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः ५० प्रतिहार वर्जनब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः ५१ अंगविभूषावर्जन ब्रह्मगुप्त श्रीचारित्राय नमः ५२ अनशनतपोरूप श्रीचारित्राय नमः ५३ ऊनोदरीतपोरूप श्रीचारित्राय नमः ५४ वृतिसंक्षेपतपोरुप श्रीचारित्राय नमः ५५ रसत्यागतपोरुप श्रोचारित्राय नमः ५६ कायकिलेसतपोरुप श्रीचारित्राय नमः ५७ संलेखणातपोरुप श्रीचारित्राय नमः ५८ प्राछिततपोरुप श्रीचारित्राय नमः ५६ विनयतपोरूप श्रीचारित्राय नमः ६० वैयावच्चतपोरूप श्रीचारित्राय नमः ६१ सिज्जायतपोरूप श्रीचारित्राय नमः ६२ ध्यानतपोरूप श्रीचारित्राय नमः ६३ उपसर्गतपोरूप श्रीचारित्राय नमः . HAPariwaveram- Amritwan MARAwerpreneu--- ( ३४ ) ६४ अनंतज्ञानसंयुक्त श्रीचारित्राय नमः ६५ अनंतदर्शनसंयुक्त श्रीचारित्राय नमः ६६ अनंतचारित्रसंयुक्त श्रीचारित्राय नमः ६७ क्रोधनिग्रहकरणरूप श्रीचारित्राय नमः ६८ माननिग्रहकरणरूप श्रीचारित्राय नमः ६६ मायानिग्रहकरणरूप श्रीचारित्राय नमः ७० लोभनिग्रहकरणरुप श्रीचारित्राय नमः ॥ अथ तपपदना ५० गुण ।। १ यावत्कथक तपसे नमः २ इत्वरतपभेद तपसे नमः ३ बाह्यऊनोदरी तपभेद तपसे नमः ४ अभ्यंतरऊनोदरी तपभेद तपसे नमः ५ द्रव्यतपव्रत्ती संखेपतपभेद तपसे नमः ६ क्षेत्रतपव्रत्ती संखेपतपभेद तपसे नमः ७ कालतपव्रत्ती संखेपतपभेद तपसे नमः ८ भावतपव्रत्ती संखपतपभेद तपसे नमः ( ३५ ) है कायाकलेस तपभेद तपसे नमः १० रसत्याग तपैसे नमः इंद्रिकषाययोग विषयक संलीणता तपसे नमः १२ स्रीपशुपंडकादिजितस्थानअवस्थितसंलीणतातपसे नमः १३ आलोयण प्रायछित तपसे नमः १४ पडिक्कमण प्रायछित तपसे नमः १५ मिश्र प्रायछित तपसे नमः १६ विवेक प्रायछित तपसे नमः १७ उपसर्ग प्रायछित तपसे नमः १८ तप प्रायछित तपसे नमः १६ भेद प्रायछित तपसे नमः २० मूलप्रायछित तपसे नमः २१ अणवस्थित प्राछित तपसे नमः २२ अणवस्थित प्रायछित तपसे नमः २३ त्याग विनयरुप तपसे नमः २४ दर्शन विनयरुप तपसे नमः २५ चारित्र विनयरुप तपसे नमः . - t ( ३६ ) २६ गुर्वादिकप्रति मनविनयरुप तपसे नमः २७ गुर्वादिकप्रतिवचन विनयरुप तपसे नमः २८ गुर्वादिकप्रतिकाय विनयरुप तपसे नमः २६ उपचारिक विनयरुप तपसे नमः ३० प्राचार्य वेयावच्च तपसे नमः ३१ उपाध्याय वेयावच्च तपसे नमः ३२ साधु वेयावच्च तपसे नमः ३३ तपस्वि वेयावच्च तपसे नमः ३४ लघुशिष्यादि वेयावच्च तपसे नमः ३५ गिलाणसाधु वेयावच्च तपसे नमः ३६ श्रमणोपासक वेयावच्च तपसे नमः ३७ संध वेयावच्च तपसे नमः ३८ कुल वेयावच्च तपसे नमः ३६ गण वेयावच्च तपसे नमः ४० वायणा तपसे नमः ४१ पृछना तपसे नमः ४२ परावर्तना तपसे नमः ४३ अनुप्रेक्षा तपसे नमः .

( ३७ ) ४४ धर्मकथा तपसे नमः ४५ आर्तध्यान निवृत्त तपसे नमः ४६ रौद्रध्यान निवृत तपसे नमः ४७ धर्मध्यान चितन तपसे नमः ४८ शुक्लध्यान चितन तपसे नमः ४६ बाह्य उपसर्ग सहनरुप तपसे नमः ५० अभ्यंतर उपसर्ग सहनरुप तपसे नमः सया ।। अथ चैत्यवंदन नवपदनो।। उप्पन्न सन्नाण महोमयाणं । सप्पाडिहेरासण संठिाणं ॥ सद्देसणाणंदियसज्जणाणं । नमो नमो होउ जिणाणं ॥ १ ॥ सिद्धाण माणंदरमालयाणं । नमो नमोणंत चउक्कयाणं. ॥ समग्गकस्मक्खयकारयाणं...। जम्मंजरादुक्खनिवारयाणं ॥२॥ सूरीणदूरीकयकुग्गहाणं। नमोनमो सूरसमप्पहाणं ॥ सद्दे शणादाण समायराणं । अखंडछत्तीस गुणायराणं ॥३॥सुत्तथ्थविथ्थरणतप्पराणं । नमो नमो वायगकुंजराणं ॥ गणस्ससंधारणसायराणं ।

( ३८ ) सव्वप्पणावज्जिय मच्छराणं ॥ ४ ॥ साहूण संसाहिय संजमाणं । नमो नमो सुद्धदयादमाणं ॥ तिगुत्तिगुत्ताण समाहियाणं । मुणीण माणंदपयठियाणं ॥ ५ ॥ जिणुत्तत- तेरुईलक्खणस्स । नमो नमो निम्मलदसणस्स ॥ मिच्छत्तनासाइ समुगम्मस्स । मूलस्ससद्धम्महादुमस्स ॥६॥ अन्नाण संमोह तमो हरस्स । नमो नमो नाण दिवायरस्स ।। पंचपयारस्सुवगारगस्से । सत्ताण सव्वत्थपयासगस्स ॥७॥ आराहियाखंडिय सक्कियस्स । नमो नमो संयम वीरियस्स ।। सझावणा संग विवढियस्स । निव्वाण दाणाइ समुज्जयस्स ॥ ८ ॥ कम्मदुमुम्मूलण कुंजरस्स । नमो नमो तिव्वतवो- भरस्स ॥ अंणेगलद्वीणनिबंधणस्स । दुस्सज्ज अत्याण यसाहणस्स ॥६॥ इयनवपयसिद्धं लद्धिविज्जासमिद्धं । पयंडियसरवग्गं झीतिरेहा समग्गं ॥ दिसिवइ सुरसारं खोणिपोढावयारं । तिजय विजयचक सिद्धचक्कं नमामि ॥१०॥ इति ( ३९ ) ।। अथ सिद्धचकृस्तवनं ।।। - । नवपद० नवपदध्यान सदा जयकारी । नवपदध्यान सदा सुखकारी ॥ ए आंकणी ॥ अरिहंतसिद्ध आचारज पाठक । साधु देखो गुणरूप उदारी ॥ नवपद० ॥१॥ दरशनज्ञान चारित्र हे उत्तम । तप दोय भेदे हृदय विचारी ॥ ॥ २ ॥ मंत्रजडीअोर तंत्र घणेरा । उन सबकुं हम दूर विसारी बौतजीव भव जलसे तारे । गुण गावतहे बहु नरनारी ॥ नवपद० ॥४॥ श्रीजिनभक्त मोहन मुनीवंदन । दिनदिन चडते हरख अपारी । नवपद० ॥॥५॥ इति ।। अथ नवपदनी थुई ॥ ॥ नवपद० नितप्रति हुं प्रणमुं सिद्धचक्र शुभ भाव । हवे कारज सिद्धिनो लाधो एह उपाय । तुझ नाम पसाये आरति नाम पसाये प्रारति व्याधि पुलाय । इगतुझ अनुग्रहथी ग्रहयी सुखर्सपति मुझ थाय ॥१॥ श्री अरिहंत नमिय सिद्ध सूरी उवझाय । मुनिवर त्रिककरणे दंसण नाण सहाय । द्गविधि चारित्रों बुध विध तपमन भया । ये ( ४० ) नवपदध्यातां निरुपम शिवसुखथाय ॥२॥ विद्यापरवाद जाणो ए अधिकार । श्रीगुरु उपदेशे सिद्ध चक्र उद्धार । अनुसार भाख्यो एह विचार । भवि जन नित ध्यावो सुरतरु गुण भंडार ॥ ३ ॥ जियधरम अनुरागी चक्केसरि सुखकार । सेवकनें आप सुख संपति परिवार । हिव निधि उदयकरि चारित्र नंदी मन भाय । जिनचंदसूरोसर खरतर पति सुपसाय ॥ ४ ॥ इति ॥ अथ नवपदचैत्य वंदन ।। श्रीअरिहंत उदार कांति । अतिसुन्दररुप । सेवो सिद्ध अनन्तशांत । आतम गुण भूप ॥ १ ॥ आचारज उवझाय साधु । शमतारसधाम । जिन भाषित सिद्धांत अनुभव अभिराम ॥ २ ॥ बोधिबीजगुण संपदाए । नाण चरणतव शुद्ध । ध्यावो परमानन्दपद । ए नवपद अविरूद्ध ॥ ३ ॥ इह परभव आनन्दकंद । जगमांहि प्रसिधौ । चितामणि समजासजोग । बहुपुण्य लद्वौ ॥४॥ तिहुअणसार अपार एह महिमा मन धारो । परि हर परजंजालजाल । नित एह संभारो ॥५॥ सिद्धचक्रपद सेवतां । सहजानन्द ( ४१ ) स्वरूप । अमृतमय कल्याणनिधि । प्रगटे चेतन भूप ॥ ६ ॥ इति ॥ अथ नवपद स्तवन ।। (रागमारू) तीरथनायक जिनवरूजी अतिशयजास अनूप सिद्धअनंतमहागुणीजी परमानंद सरूप । भविक मन धा- रजोरे ॥१॥धारजो नवपदध्यान । भ० । श्रीपाजार- जगण धरूरे । गुणछत्तीश निवास । पाठक पदधर मुनि- वरूजी । श्रुतदायक सुविलास । भ० ॥२॥ सुमति गुप- तिधर सोभताजी । साधुसमता वंत । सम्यग् दर्शन सुंदरूजी । ज्ञानप्रकाशक अनन्त । भ० ।। ३ ।। संवरसाधना चरण छरे । तप उत्तमविधि होय । ए नवपदना ध्यानथीरे । निरूपाधिक सुख होय । भ० ॥ ४ ॥ अमृतसमजिन धर्मनोरे । मूल ए नवपदजाण । अविचल अनुभव कारणेजी। नितप्रति नमत कल्याण भ० ॥ ५॥ इति - ( ४२ ) ।। अथ नवपदनी थुई ।। जगनायक दायक सिद्धचक्र सुखकंद, जेहना जप तपथी भाजे भव भय फंद । श्रीपालने मयणा विधिथी एतपकीध, नवपदीपामें अष्टसिद्धनवनिध ॥१॥ जिनसिद्ध आचारिज पाठक श्रीमुनिराज, दर्शनज्ञान चारित्र नवमो तप कहेवाय । एक एक पद ध्याताजीव तर्यासंसार चोवीसी प्रणमु कीधो भवि उपगार ॥ २ ॥ पासूवलि चैत्र सूदि सातमथी जाण, अोली कोजैसुभ मन प्राबिल- करपचखाण । पदपद नोगुणनो. कीजै भावसुंजगीस आगममांही बोल्या ध्यावो तुम निसदीस ॥३॥ विमला- दिक देवादेवी चक्रेसरी जान, सिद्धचक्रना सेवक आपछि- तदान । खरतरगच्छदिनकर श्रीजिनअखयरिद चरणपसाये भाखे श्रोजिन चंद ॥४॥ इति ॥ अथ नवपदोली करण विधि ।। दिन क्रम वर्ण भोजन पदनां नामो नव- कर वाली काउस्सग लोगस्स खमासणा प्रदक्षीणा १२ १२ १२ श्वे (६) ८ २. سه ॐह्रीं नमो अरिहंताणं २० नमो सिद्धाणं २० नमो पायरियाणं २० नमो उवझायाणं २० "" नमो लोए सव्वसाहूणं | २० नमो दस्सणस्स नमो नाणस्स २० नमो चारित्तस्स २० नमो तवस्स २० ४ ३६ २५ २७ ६७ ५१ चोखा लाल घउ पोलो चणा नीलो मग कालो अडद श्वेत चोखा ३६ ३६ २५] २५ २७, २७ ६७] ६७ ५१/ ५१ ७० ५ २० ७ ७० ७० ० ५०० ५० ५० " ( ४४ ) . शुभमास शुभदिवसमां गुरूमहाराजनी पासे विधि पूर्वक प्रांबीलोलीनी तपस्या ग्रहण करे, पछे पा तप आसो सुदि अने चैत्र सुदि ७ कदाच तीथि घटी होय तो ६ अने वधी होयतो ८ थी पूनम सुधी नव प्रांबील करे, एम वरसमां बे वार करतां साडाचार वरसे नव अोली पूरी करवी, नवदिन सुधी देवसिराइपडिकमणो सांज सवारे बे वखत पडिलेहण, गुरूपासे पच्चखाण करे त्रिकाल देवपूजा करे, मध्याने आळ्थुइथी देव वांदे, हमेसा नवपदना नव चत्यवंदन करे जेटला गुरण होय तेटला साथीया प्रदक्षिणा काउस्सग्ग करे खमासमणा अने गुणणो हमेशां एकएक पदनो करे एकएक प्रदक्षीणा अने एकएक खमासणो दइने एकएक गुण कहे, पच्चखाणपार- वानो चैत्यवंदन करे बाद प्रांबील करी चैत्यवंदन करे सुति वखते संथारापोरिसी भणावीने भूमि संथाराउपर सोवे शीलव्रतपाले इत्यादि नव दिवस सुधी करवो ॥ अने काउस्सग करवू होय त्यारे इर्यावही पडिक्कमीने खमास- मणो दइने इच्छाकारेणसंदिस्सह भगवन, अमुकपद पाराधवा निमित्तं काउस्सग करु इच्छं अमुकपद -- ( ४५ ) - पाराधवानिमितं करेमिकाउस्सग्गं, वंदणवत्तियाए, अन्नऊ. पछे काउस्सग करीने प्रगट लोगस्सकहे आतप पूर्ण थया बाद शक्ति अनुसार उजमणुं करे ते गुरुमुखथी जाणवू. ।। अथ विशस्थानक तपकरण विधिः ।। सारा दिवसे गुरूने पासे विधि पूर्वक वीशस्थान- तपउच्चरे आतप दशवरषमांहे पूरो करवो. आतपनी अोली २० होय छे एकएक अोलो छछ मासे पूरी करवी, उपरांत भंग थाय, एकेएक अोली वीस अठम छठ अथवा उपवासथी थाय छे, दशवर्षे अठमथी करे तो ४०० अठम, छठथी करे तो ४०० छठ, उपवासथी करे तो ४०० उपपास थाय छे अने प्रांबील नीपीके एकासणा थी पण थाय छे, जे दिवसे पडिक्कमणो शक्ति होय तो पोषो अथवा देशावगाशिक करवं, देववंदन करवू, जेटला जे पदना गुण होय तेटला खमासणा साथीया प्रदक्षीणा अने लोगस्सना काउस्सग करवा, जे पद होय ते पदनी वीश माला दर उपवासे गणवी आतप संपूर्ण थया बाद शक्ति अनुसार उजमणो करे ते गुरूमुखथी जाणवू इति.

( ४६ ) अंक नाम काउ. खमा- सा- प्रद- माला. लोग सणा थीय क्षीणा १ नमो अरिहंताणं १२ १२ १२ १२ २० २ " सिद्धाणं ३१ ३१ २० mr २७ २७ २७ २७ २० पवयणस्स पायरियाणं ४ ॥ २० ५ ० १० १० १० २० w थेराणं १० ,, उवज्झायाणं २५ लोएसव्वसाहूणं २७ २५ २५ २५ २० ७ २७ २७ २७ ५१ ५१ २० ६७ ६७ ६७ २० ५२ ५२ ५२ २० ११ . " ७० ७० ७० ७० २० नाणस्स ५१ 8 दसणस्स ६७ १० विनयसंपन्नाणं ५२ चरित्तस्स बंभवयधारीणं १८ १३ किरियाणं २५ १४. तवस्सीणं १२ १५ गोयमस्स १२ १६. "" जिणाणं २० १८ ८ १८ २० २५ २५ २५ २० . १२ २० १२ १२ १२ १२ १ १२ १ २० . २० २० २० २० ( ४७ ) १७ . , चरणस्स १७ १७ १७ १७ २० ५२ ५२ ५२ ५२ २० १८ " नारगस्स १६. “, सुयनाणस्स २० तित्थस्स '२.० २० २० .२० २० ३८ ३८ ३८ २० ।। अथ प्रथम अरिहंतना १२ भेद ।। १ अशोकवृक्ष प्रातिहार्यसंयुताय श्रीअरिहंताय नमः २ पुष्पवृष्टि ३ दिव्यध्वनि ४ चामरयुग ५ स्वर्णसिंहासन ६ भामंडल ७ दुंदुभि ८ छत्रत्रय & ज्ञानातिशय १० पूजातिशय ११ वचनातिशय १२ अपायायगमातिशय ( ४८ ) ।। अथ बीजा सिद्धपदना ३१ भेद ।। १ मतिज्ञानावरणि कर्मरहिताय श्रीसिद्धाय नमः २ श्रुतज्ञानावरणि ३ अवधिज्ञानावरणि ४ मनपर्यवज्ञानावरणि ५ केवल ज्ञानावरणि ६ निद्रादर्शनावरणि ७ निद्रानिद्रादर्शनावरणि ८ प्रचलादर्शनावरणि ६ प्रचलाप्रचलादशनावरणि १० थीणद्धिदर्शनावरणि ११ चक्षुदर्शनावरणि १२ अचक्षुदर्शनावरणि १३ अवधिदर्शनावरणि १४ केवलदर्शनावरणि १५ शातावेदनीय १६ अशातावेदनीय -

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( ५० ) ।। अथ त्रीजापवयण पदना २७ भेद ।। १ सर्वतो प्राणातिपातविरताय श्रीप्रवचनाय नमः २ सर्वतो मृषावादविरतायः ३ सर्वतो अदत्तादानविरताय ४ सर्वतो मैथुनविरताय ५ सर्वतो परिग्रहविरताय ६ देशतो प्रणातिपात विरताय ७ देशतो मृषावाद विरताय ८ देशतो अदत्तादान विरताय ६ देशतो मैथुन विरताय १० देशतो परिग्रह विरताय ११ दिसिपरिमाणव्रत संयुताय १२ भोगोपभोगपरिमाणवत संयुताय १३ अनर्थदंड विरताय १४ सामायिकव्रत संयुताय १५. देसावकासिकव्रत संयुताय १६ पोषधोपवासव्रत संयुताय F ( ५१ श्रीप्रवचनाय नमः २७ अतिथीसंविभागवत संयुताय १८ विधिसूत्रागमाय १६ वणिकसूत्रागमाय २० भयसूत्रागमाय २१ उत्सर्गागमाय २२ अपवादांगमाय २३ उभयसूत्रागमाय २४ उद्यमसूत्रागमाय २५ सर्वनयसमूहात्मकाय २६ सप्तभंगोरचनात्मकाय २७ द्वादशांगीगणिपिटकाय Re- 11 अथ चोया प्राचार्यपदना ३६ गुण ।। १ प्रतिरूपगुणसंयुताय धोत्राचार्याय नमः २ तेजस्वीगुणसंयुताय ३ युगप्रधानागमसंयुताय ४ मपरवाश्यगुणसंयुताय ( ५२ ) श्रीप्राचार्याय नमः ६ ५ गंभीरगुण संयुताय ६ धैर्यगुण संयुताय ७ उपदेसगुण संयुताय ८ अपरिश्रावोगुण संयुताय ६ सौम्यप्रकृतिगुण संयुताय १० अविग्रहगुण संयुताय ११ अविकथकगुण १२ शीलगुण संयुताय १३ अचलगुण संयुताय १४ प्रसन्नवदनगुण संयुताय १५ क्षमागुण संयुताय १६ रूजुगुण संयुताय १७ मृदुगुण संयुताय १८ सर्वेसंगमुक्तिगुण संयुताय १६ द्वादशविध तपगुण संयुताय २० सप्तदशविध संजम संयुताय २१ सत्ववतगुण संयुताय २२ शौचगुण संयुताय .

( ५३ ) श्रीप्राचार्याय नमः २३ : अकिंचनगुण संयुताय २४ ब्रह्मचर्यगुण संयुताय २५ अनित्यभावना भावकाय २६ अशरणभावना भावकाय २७ संसारस्वरूप भावना भावकाय २८ एकत्वस्वरूप भावना भावकाय २९ अन्यत्व भावना भावकाय ३० अशुचि भावना भावकाय ३१ प्राव भावना भावकाय ३२ संवर भावना भावकाय ३३ निर्जरा भावना भावकाय ३४ लोकस्वरूप भावना भावकाय ३५ बोधिदुर्लभ भावना भावकाय ३६ धर्मदुर्लभ भावना भावकाय ।। अथ पांचमा स्थविरपदना १० भेद ।। १ लोकिकस्थविरदेसकाय श्रीलोकोत्तरस्थविराय नमः २ देसस्थविर देसकाय - ( ५४ ) ३ ग्रामस्थविर देसकाय ४ कुलस्थविर देसकाय ५ लौकिकस्थविर देसकाय ६ लौकिक गुरुस्थविर देसकाय ७ लोकोत्तर श्रीसंघस्थविराय नमः ८ लोकोत्तर श्रीपर्यायस्थविराय नमः ६ लोकोत्तर श्रीश्रुतःस्थविराय नमः १० लोकोत्तर श्रीवयःस्थविराय नमः ॥ अथ छठा उपाध्याय पदना २५ ॥ १ प्राचारांगसूत्र पाठकाय श्रीउपाध्यायाय नमः २ सुयगडांगसूत्र पाठकाय ३ ठाणांगसूत्र पाठकाय ४ समवायांगसूत्र पाठकाय ५ भगवतीसूत्र पाठकाय ६ ज्ञातांगसूत्र पाठकाय ७ उपासकदसांगसूत्र पाठकाय

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( ५६ ) ।। अथ सातमा साधुपदना २७ भेद ।। १ प्रणातिपातविरमणवतसंयुताय श्रीसाधवे नमः २ मृषावादविरमणव्रतसंयुताय श्रीसाधवे नमः ३ अदत्तादानविरमणक्तसंयुताय श्रीसाधवे नमः ४ मैथुनविरमणव्रतसंयुताय श्रीसाधवे नमः ५ परिग्रहविरमणव्रतसंयुताय श्रीसाधवे नमः ६ रात्रिभोजनविरनणव्रतसंयुताय श्रीसाधवे नमः ७ पृथ्वी रक्षकाय श्रीसाधवे नमः ८ अप्काय रक्षकाय श्रीसाधवे नमः है तेउकायरक्षकाय श्रोसाधवे नमः १० वाउकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः ११ वनस्पतिकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १२ सकायरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १३ एकेन्द्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १४ बेन्द्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १५ तेन्द्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः १२ चरिद्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः (५७) -- १७ पंचेंद्रियजीवरक्षकाय श्रीसाधवे नमः- १८ लोभनिग्रहकारकाय १६ क्षमागुणसंयुताय २० शुभभावनाभावकाय २१ प्रतिलेखनादिक्रियाशुद्धकारकाय श्रीसाधवे नमः २२ संजमयोगसंयुताय २३ मनोगुप्तिसंयुताय २४ वचनगुप्तिसंयुताय २५ कायगुप्तिसंयुताय .. २६ शीतादिद्वाविंशतिपरीसहसहनतत्पराय २७ महणांतउपसर्गसहनतत्पराय . ।। अथ पाठमा ज्ञानपदना ५१ भेद ।। .. १ स्पर्शनेंद्रियव्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः २ रसनेंद्रियव्यंजनावग्रहाय ३ घ्राणेंद्रियव्यंजनावग्रहाय ( ५८ ) ४ श्रोतेंद्रियव्यंजनावग्रहाय श्रीमतिज्ञानाय नमः ५ स्पर्शनेंद्रियअर्थावग्रहाय ६ रसनेंद्रियअर्थावग्रहाय ७ घ्रणेंद्रियर्थावग्रहाय ८ चक्षुरिद्रियअर्थावग्रहाय & श्रोतेंद्रियर्थावग्रहाय १० मनोअर्थावग्रहाय ११ स्पर्शद्रियईहा १२ रसनेंद्रियइहा १३ घ्राणेंद्रियइहा १४ चक्षुरिंद्रियइहा १५ श्रोत्रंद्रियइहा १६ मनइहा १७ स्पर्शेद्रिय अपाय १८ रसनेंद्रियअपाय १६ घ्रणेंद्रियअपाय २० चक्षुरिद्रियअपाय २१ श्रोत्रंद्रियअपाय ( ५९ ) . २२ मनोअपाय श्रीमतिज्ञानाय नमः २३ स्पर्श द्रियधारणाय २४ रुसनेंद्रियधारणाय २५ घ्राणेंद्रियधारणाय २६ चक्षुरिद्रियधारणाय २७ श्रोत्रंद्रियधारणाय २८ मनोधारणाय २६ श्रीअक्षरश्रुतज्ञानाय नमः ३० श्रीअनक्षरश्रुतज्ञानाय नमः ३१ श्रीसंज्ञिश्रुतज्ञानाय नमः ३२ श्रीप्रसंज्ञिश्रुतज्ञानाय नमः ३३ श्रीसम्यगश्रुतज्ञानाय नमः ३४ श्रीमिथ्याश्रुतज्ञानाय नमः ३५ श्रीसादीश्रुतज्ञानाय नमः ३६ श्रीअनादिश्रुतज्ञानाय नमः ३७ श्रीसपर्यवसितश्रुतज्ञानाय नमः ३८ श्रीअपर्यवसितश्रुतज्ञानाय नमः ३६ श्रीगमिकश्रुतज्ञानाय नमः ४० श्रीअगसिकश्रुतज्ञानाय नमः ४१ श्रीअंगप्रविष्ठश्रुतज्ञानाय नमः । ४२ श्रीअनंगप्रविष्ठश्रुतज्ञानाय नमः । ४३ श्रीअनुगामिक अवधिज्ञानाय नमः ४४ श्रीअननुगामिक अवधिज्ञानाय नमः ४५ श्रीवर्द्धमान अवधिज्ञानाय नमः .. ४६ श्रीहोयमान अवधिज्ञानाय नमः ४७ श्रोप्रतिपाति अवधिज्ञानाय नमः । ४८ श्रोअप्रतिपाति अवधिज्ञानाय नमः . ४६ श्रीरूजुमतिमनःपर्यवज्ञानाय नमः ५० श्रीविपुलमतिमनःपर्यवज्ञानाय नमः ५१ श्रीलोकालोकप्रकाशक केवलज्ञानाय नमः ...... ।। अथ नवमा दर्शनपदना ६७ भेंद - १ परमार्थसंस्तवरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः २ परमार्थज्ञातृसेवनरूप ३ व्यापनदर्शनवर्जनरूप " ग (६१) ४ कुदर्शनवर्जनरूप श्रीसद्दर्शनाय नमः ५ शुश्वारूप ६ धर्मरागरूप ७ वैयावृत्त्यरूप ८ अहैद्विनयरूप ६ सिद्धविनयरूप १० चैत्यविनयरूप ११ श्रुत विनयरूप १२ धर्म विनयरूपः १३ साधुवर्ग विनयरूप १४ प्राचार्य विनयरूप १५ उपाध्याय विनयरूप १६ प्रवचन विनयरूप १७ दर्शन विनयरूप १८ संसारे जिनसारमिति चितवनरूप १६ संसारे जिनमतसारमिति चितवनरूपं २० संसारे जिनमत स्थित साध्वा दिसारमिति चितवनरूप " . .

( ६२ ) २१ शंका दूषण रहिताय श्रीसद्दर्शनाय नमः २२ कांक्षादूषणरहिताय २३ विचिकित्सारूप दूषणरहिताय २४ कुदृष्टिप्रशंसारूप दूषणरहिताय २५ कुदृष्टित्परिचयदूषण रहिताय २६ प्रवचन प्रभावकरूप २८ वादि प्रभावकरूप २६ नैमितिकप्रभावकरूप ३० तपस्विप्रभावकरुप ३१ प्रज्ञप्त्यादिविद्याभृत् ३२ चूर्णाजनादिसिद्ध प्रभावकरुप ३३ कवि प्रभावकरुप ३४ जिनशासने कौशलभूषणरुप ३५ प्रभावना भूषणरुप ३६ तीर्थसेवा भूषणरुप ३७ धर्यभूषणरुप ३८ जिनशासने भक्ति भूषणरुप ३६. उपशम गुणरुप ४० संवेग गुणरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ४१ निर्वेद गुणरूप ४२ अनुकम्पा गुणरूप ४३ आस्तिक्य गुणरुप ४४ परतीथिकादिवंदनवर्जनरुप ४५ परतीथिकादि नमस्कारवर्जनरूप ४६ परतीथिकादि पालापवर्जन ४७ परतीथिकादि संलापवर्जनरुप ४८ परतीथिकादि प्रशनादि दानवर्जनरुप ४६ परतीथिकादि गंधपुष्पादि प्रेषण वर्जनरुप " ५० राजाभियोगमागारयुक्त ५१ गणाभियोगयागारयुक्त ५२ बलाभियोगयागारयुक्त ५३ सुराभियोगआगारयुक्त ५४ कांतारवृत्यागारयुक्त ५५ गुरु निग्रहागारयुक्त ५६ सम्यक्त्वंचारित्रधर्मस्य मूलमिति चितवन रुप श्रीसद्दर्शनाय नमः विनयंधराय नमः " 1 १३ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्नसुविहि- तानाशातनाकरणरुप १४ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्न सुविहित भक्तिकरणरुप १५ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्न सुविहिता बहुमानकरणरुप १६ श्रीकोटिकादि गणोत्पन्न सुविहित स्तुतिकरणल्प १७ श्रीचतुविधसंघानाशातनारूप १८ श्रीचतुर्विधसंघभक्तिकरणरूप १६ श्रीचतुर्विधसंघबहुमानकरणरुप २० श्रीचतुर्विधसंघस्तुतिकरणरुप २१ श्रीशुद्धागमोक्तक्रियाकारकस्याना शातनाकरणरुप २२ श्रीशुद्धागमोक्तक्रियाकारकस्यभक्ति " in រ करणरुप २३ श्रीशुद्धागमोक्त क्रियाकारकस्य बहुमान करणरुप ६७ ) २४ श्रीशुद्धागमोक्त क्रिया कारकस्य स्तुति करण रुप विनयंधराय नमः २५ श्रीजिनोक्तधर्मस्थानाशातनाकरणरुप २६ श्रीजिनोक्तधर्मस्यभक्तिकरणरुप २७ श्रीजिनोक्तधर्मस्यबहुमानकरणरुप २८. श्रीजिनोक्तिधर्मस्यस्तुतिकरणरुप २६ श्रीज्ञानगुणप्राप्तस्यानाशातनाकरणरूप ३० श्रीज्ञानगुणप्राप्तस्यभक्तिकरणरूप ३१ श्रीज्ञानगुणप्राप्तस्यबहुमानकरगरूप ३२ श्रीज्ञानगुणप्राप्तस्यस्तुतिकरणरूप ३३ श्रीज्ञानानाशातनाकरणरूप ३४ श्रीज्ञानभक्तिकरणरूप ३५ श्रीज्ञानबहुमानकरणरूप ३६ श्रीज्ञानस्तुतिकरणरूप ३७ श्रीप्राचार्यस्यानाशातनाकरणरुप ३८. श्रीप्राचार्यस्यभक्तिकरणरुप ३६ श्रीप्राचार्यस्यबहुमानकरणरुप ४० श्रीआचार्यस्यस्तुतिकरणरुप . ( ६४ ) ५७ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मपुरस्य द्वारमिति चितवनरुप श्रीसद्दर्शनाय नमः ५८ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य प्रतिज्ञान मिति चितवनरुप ५६ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य धार मिति चितवनरुप ६० ० सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य भाजन मिति चितवनरुप ६१ सम्यक्त्वं चारित्र धर्मस्य निधि संनिभमिति चितवनरुप ६२ अस्ति जीवेति श्रद्धा न स्थानयुक्त ६३ स च जोवो नियेति श्रद्धा न स्थानयुक्त ६४ सच जीवः कर्माणि करोतीति श्रद्धा न स्थानयुक्त ६५ स च जीवः कृत कर्माणि वेदयतीति श्रद्धा न स्थानयुक्त ६६ जीवस्यास्तिनिर्वाणमिति : । - श्रद्धा न स्थान युक्त ( ६५ ) ६७ अस्ति पुनर्मोक्षोपायेति श्रद्धा न स्थान गुक्त श्रीसद्दर्शनाय नमः - ।। अथ दशमाविनयपदना ५२ भेद ।। १. श्रीतीर्थकरस्याना शातनारुप विनयंधराय नमः २ श्रीतीर्थंकरस्यभक्ति करणरुप ३ श्रीतीर्थंकरस्यबहुमान करणरुप ४ श्रीतीर्थंकरस्य स्तुति कररणरुप ५ श्रीसिद्धस्यानाशातनारुप ६ श्रीसिद्धस्यभक्तिकरणरुप ७ श्रीसिद्धस्यबहुमानकरणरुप ८ श्रीसिद्धस्य स्तुतिकरणरुप ६ श्रीसुविहितचन्द्रादि कुलानाशातना करणरुप १० श्रीसुविहितचन्द्रादिकुलभक्तिकरणरूप ११ श्रीसुविहितचन्द्रादिकुलबहुमान करणरुप १२ श्रीसुविहितचन्द्रादिकुलस्तुति करणरुप - ग ( ६८ ) ४१ श्रोस्थविरस्य भक्ति करण रुप विनयंधराय नमः ४२ श्रीस्थविरस्य भक्ति करण रुप ४३ श्रीस्थविरस्य बहुमान करुणरुप ४४ श्रीस्थविरस्यस्तुति करणरुप ४५ श्रीउपाध्यायस्यानाशातना करणरुप ४६ श्रोउपाध्यायस्य भक्ति करणरुप ४७ श्रीउपाध्यायस्य बहुमान करणरुप ४८ श्रीउपाध्यायस्य स्तुति करणरुप ४० श्रीगणावच्छेदकस्यानाशातना करणरुप ५० श्रीगणावच्छेदकस्य भक्ति करणरुप ५१ श्रीगणावच्छेदकस्य बहुमान करणरुप ५२ श्रीगणावच्छेदकस्य स्तुति करणरुप " ।। अथ इग्यारमा चारित्रपदना ७० भेद ।। श्रीचारित्राय नमः १ प्रणातिपातविरमणरुप २ मृषावाद विरमण रुप ३ अदत्तादान विरमणरुप ( ६९ ) श्रीचारित्राय नमः ४ मैथुन विरमण रूप ५ परिग्रह विरमण रूप ६ क्षमा धर्म रूप ७ आर्जव रुप ८ मृदुता धर्म रुप ६ मुक्ति धर्म रूप १० तपो धर्म रूप ११ संयम धर्म रूप १२ सत्य धर्म रूप १३ शौच धर्म रूप १४ अकिंचन धर्म रूप १५ बंभ धर्म रूप १६ पृथ्वी रक्षा संयम १७. उदक रक्षा संयम १८ तेऊ रक्षा संयम १६ वाऊ रक्षा संयम २० वनस्पति संयम २१ बेंद्रिय रक्षा संयम म (७०) २२ तेंद्रिय रक्षा संयम श्रीचारित्राय नमः २३ चरिद्रिय रक्षा संयम २४ पंचेंद्रिय रक्षा संयम २५ अजीव रक्षा संयम २६ प्रेक्षा संयम २७ उपेक्षा संयम २८ अतिरिक्त वस्त्रभक्तादि परठण त्यागरुप २६ प्रमार्जन रूप संयम ३० मनः संयम ३१ वाग संयम ३२ काय संयम -- ३३ प्राचार्य वैयावृत्यरूप ३४ उपाध्याय वैयावृत्यरूप ३५ तपस्वि वैयावृत्यरूप ३६ लघुशिष्यादिवैयावृत्यरूप ३७ ग्लानसाधुवैयावृत्यरूप ३८ साधुवैयावृत्यरूप ३६ श्रमणोपासकवैयावृत्यरूप ( ७१ ) ४० संघवयावृत्यरूप श्रीचारित्राय नमः 5. ४१ कुलवयावृत्य रूप ४२ गणवयावृत्यरुप ४३ पशुपंडकादिरहितवसतिवसनब्रह्मगुप्त ४४ स्त्रीहास्यादिविकथावर्जनब्रह्मगुप्त ४५ स्त्रीप्रासनवर्जनब्रह्मगुप्त ४६ स्त्रीअंगोपांगनिरीक्षणवर्जनब्रह्मगुप्त ४७ कुट्यंतरसहितस्त्रीहावभावश्रवणब्रह्मगुप्त ४८ पूर्वस्त्रोसंभोगचितवनवर्जनब्रह्मगुप्ते ४६ अतिसरसाहारवर्जनब्रह्मगुप्त ५० अतियाहारकरणवर्जनब्रह्मगुप्त ५१ अंगविभूषावर्जनब्रह्मगुप्त ५२ अनशनतपोरूप ५३ उनोदरितपोरूप ५४ वृत्तिसंक्षेपतपोरुप ५५ रसत्यागतपोरूप ५६ कायकिलेशतपोरुप ५७ सेलीनतातपोरुप ( ७२ ) श्रीचारित्राय नमः ५८ प्रायश्चित्ततपोरुप ५० विनयतपोल्प ६० बैयावच्चतपोरूप ६१ सज्जायतपोरुप ६२ ध्यानतपोरुप ६८ उपसर्गतपोरुप ६४ अनंतज्ञानसंयुत ६५ अनंतदर्शनसंयुत ६६ अनंतचारित्रसंयुत ६७ क्रोधनिग्रहकरणरूप ६८ माननिग्रहकरणरूप ६० मायानिग्रहकरणरूप ७० लोभनिग्रहकरणरूप ।। अथ बारमा ब्रह्मचर्य पदना १८ भेद ।। १ मनसायोदारिकविषयसेवनरुप श्रीब्रह्मचारिणे नमः -- ( ७३ ) - २ मनसाअोदारिकविषयक सेवावनरुप श्रीब्रह्मचारिणे नमः ३ मनसामोदारिकविषयअनानुमोदनरूप ४ वचसाप्रोदारिकविषयसेवनरूप ५ वचनसाअोदारिकविषयसेवावनरुप ६ वचसाप्रोदारिकविषयअनानुमोदनरुप ७ कायेनोदारिकविषयमसेवनरूप ८ कायेनप्रोदारिकविषयमसेवनरूप ६ कायेननोदारिकविषयअनानुमोदनरूप १० मनसावैक्रियविषयसेवनरूप ११ मनसावक्रिविषय प्रसेवावनरूप १२ मनसाक्रियविषयअनानुमोदनरूप १३ वचसावैक्रियविषयसेवनरूप १४ वचसावैक्रियविषयसेवावनरूप १५ वचसाबैत्रियविषयअनानुमोदनरूप १६ कायेनवैनियविषयमसेवनरूप १७ कायेनवैक्रियविषयसेवावनरूप ८ कायेनवैक्रियविषयअनानुमोदनरूप ( ७४ ) ॥ अथ तेरमा क्रियापदना २५ भेद ।। १ अशुद्धकायकोक्रियानिवर्तनरूप श्रीक्रियावते नमः २ अधिकरणकोक्रियानिवर्तनरूप ३ परितापकीक्रियानिवर्तनरूप ४ प्राणातिपातकीक्रियानिवर्तनरूप ५ प्रारम्भिकोक्रियानिवर्तनरूप ६ परिग्रहकीक्रियानिवर्तनरूप ७ मायाप्रत्ययिकी क्रियानिवर्तनरूप = मिथ्यादर्शनप्रत्ययिकीक्रियानिवर्तनरूप है अपच्चख्खाणिकीक्रियानिवर्तनरूप १० दृष्टिकोक्रियानिवर्तनरूप ११ स्पष्टिकोक्रियानिवर्तनरूप १२ प्रातीयत्यकीक्रियानिवर्तनरूप १३ सामंतोपनिपातकोक्रियानिवर्तनरूप १४ नैसृष्टिकोक्रियानिवर्तनरुप १५ स्वस्तिकीक्रियानिवर्तनरूप १६ आणवणोक्रियानिवर्तनरूप १७ विदारणिकोक्रियानिवर्तनरूप ( ७५ ) १८ अनाभोगप्रत्ययिकीक्रियानिवर्तनरूप १६ प्रणवकंखप्रत्ययिकीक्रियानिवर्तनरूप २० प्राज्ञापनप्रत्ययिकीक्रियानिवर्तनरूप २१ प्रयोगकोक्रियानिवर्तनरूप २२ समुदायिकीक्रियानिवर्तनरूप २३ प्रेमकीक्रियानिवर्तनरूप २४ द्वेषकीक्रियानिवर्तनरूप २५ इरियापथिकोक्रियानिवर्तनरूप ।। अथ चउदमा पद तपसीणंना १२ भेद ।। श्रीब्राह्यतपसे नमः १ प्रणसणतपरूप २ उणोदरीतपरूप ३ वृत्तिसंक्षेपतपरूप ४ रसत्यागतपरूप ५ कायक्लेशतपरूप ६ संलीनतातपरूप ७ प्रायश्चिततपरूप श्रीअभ्यंतरतप से नमः श्रीअभ्यंतरतपसे नमः ८ विनयतपरूप ६ वैयावृत्यतपरूप १० सज्जायतपरूप ११ यात्मध्यानतपरूप १२ काउस्सरगतपरूप ।। अथ पनरमा गौतमपदना १२ भेद ।। १ श्रीगौतमस्वामि गणधराय नमः २ श्रीअग्निभूतिस्वामि ३ श्रीवायुभूतिस्वामि ४ श्रीव्यक्तस्वामि ५ श्रीसुधर्मास्वामि ६ श्रीमंडितस्वामि ७ श्रीमौर्यपुत्रस्वामि ८ श्रीअकंपितस्वामि 8 श्रीप्रचलनातास्वामि १० श्रीमेनार्यस्वामि ११ श्रीप्रभासस्वामि १२ श्रीचतुविशतितीर्थकराणांचतुर्दशशत- हिपंचाशत गणधरेभ्यो नमः ( ७७ ) ॥ अथ सोलमां जिणाणंपदना २० भेद ॥ श्रीजिनेश्वराय नमः १ श्रीसीमंधरस्वामि २ श्रीयुगमंधरस्वामि ३ श्रीबाहुस्वामि ४ श्रीसुबाहुस्वामि ५ श्रीसुजातस्वामि ६ श्रीस्वयंप्रभस्वामि ७ श्रीरुषभाननस्वामि ८ श्रीअनंतवीर्यस्वामि ६ श्रीसूरप्रभस्वामि १० श्रीविशालस्वामि ११ श्रीवज्रन्धरस्वामि . " १२. श्रीचंद्राननस्वामि १३ श्रीचंद्रबाहुस्वामि १४ श्रीभुजंगस्वामि १५ श्रीइश्वरस्वामि १६ श्रीनमिप्रभस्वामि ॥

( ७८ ) श्रीजिनेश्वराय नमः १७ श्रीवीरसेनस्वामि १८ श्रीमहाभद्रस्वामि १६ श्रीदेवयसास्वामि २० श्रीअजितवीर्यस्वामि , ॥ अथ सतरमां संजम पदना १७ भेद ॥ १ प्राणातिपातविरताय श्रीसंयमधराय नमः २ मृषावादविरतराय ३ अदत्तादानविरताय ४ मैथुनविरताय ५ परिग्रहविरताय ६ रात्रिभोजनविरताय ७ इरियासमितिसंयुताय ८ भाषासमितिसंयुताय ६ एषणासमितिसंयुताय १० आदानमंडमत्तनिरखेवणासमितिसंयुताय ११ पारिठावणियासमितिसंयुताय ( ७९ ) श्रीसंयमधराय नमः १२ मनोगुप्तिसंयुताय १३ वचनगुप्तिसंयुताय १४ कायगुप्तिसंयुताय १५ मनोदंडविरताय १६ वचनदंडविरताय १७ कायदंडविरताय --- ।। अथ अढारमा ज्ञानपदना ५१ भेद ।।. श्रुतज्ञानाय नमः १ श्रीनाचारांग २ श्रीसूयडांग ३ श्रीठाणांग ४ श्रीसमवायांग ५ श्रीभगवतीग्रंग ६ श्रीज्ञाताधर्मकथांग ७ श्रीउपाशकदशांग ८ श्रीअंतगडदशांग ६ श्रीअनुत्तरोववाइअंग .

( ८० ) श्रुतज्ञानाय नमः " १० श्रीप्रश्नव्याकरणांग ११ श्रीकर्मविपाकश्रुतांग १२ श्रीउबवाइउपांग १३ श्रीरायपसेणीउपांग १४ श्रीजीवाभीगमउपांग १५ श्रीपन्नवणाउपांग १६ श्रीजंबूद्वीपपन्नतिउपांग १७ श्रीचंदपन्नत्तिउपांग १८ श्रीसूरपन्नतिउपांग १६ श्रीनिरियावलीउपांग २० श्रीपुफियाउपांग २१ श्रीपुत्फचूलियाउपांग २२ श्रीकप्पियाउपांग २३ श्रोवह्निदसाउपांग २४ श्रोचउसरणपयनो २५ श्रीग्राउरपच्चखाणपयन्नो २६ श्रीभत्तपरिन्नापयन्नो २७ श्रीमहापच्चख्खाणपयन्नो ( ८१ ) । श्रुतज्ञानाय नमः २८ श्रीतंदुलवैयालियपयन्नो २९ श्रीचंदाविजयपयन्नो ३० श्रीगणिविद्यापयन्नो ३१ श्रीमरणसंकाहिपयन्नो ३२ श्रीसंथारापयन्नो ३३ श्रीदेवेन्द्रस्तवपयन्नो ३४ श्रीदशवैकालिकमूल ३५ श्रीअावश्यकभूल ३६ श्रीपिंडनियुक्तिमूल ३७ श्रीउत्तराध्ययनमूल ३८ श्रीनिसीथछेद ३६ श्रीबृहत्कल्पछेद ४० श्रीव्यवहारछेद ४१ श्रीपंचकल्पछेद ४२. श्रीजीतकल्पछेद ४३ श्रीमहानिसीथछेद ४४ श्रीनंदीसूत्र ४५ श्रीअनुयोगद्वार ( ८२) श्रुतज्ञानाय नमः ४६ श्रीस्यादस्तिभंगप्ररूपकायस्याद्वाद ४७ श्रीस्यान्नास्तिभंगप्ररूपकायस्याद्वाद ४८ श्रीस्यादस्तिस्यान्नास्तिभंगप्ररूप- कायस्याद्वाद ४६ श्रीस्यादवक्तव्यभंगप्ररूपकायस्थाद्वाद ५० श्रीस्यादस्तिप्रवक्तव्यभंगप्ररूप-- कायस्याद्वाद ५१ श्रीस्यान्नास्तिप्रवक्तव्यभंगप्ररूप- कायस्थाद्वाद ५२ श्रीस्यादस्तिस्यान्नास्तिप्रवक्तव्य- भंगप्ररूपकायस्याद्वाद ।। अथ प्रोगणीसमां श्रुतपदना २० भेद ।। १ पर्याय श्रुतज्ञानाय नमः २ श्रीपर्यायसमास ३ श्रीअक्षर ४ श्रीअक्षरसमास ( ८२) श्रुतज्ञानाय नमः ४६ श्रीस्यादस्तिभंगप्ररूपकायस्याद्वाद ४७ श्रीस्याशास्तिभंगप्ररूपकायस्याद्वाद ४८ श्रीस्यादस्तिस्यान्नास्तिभंगप्ररूप- कायस्याद्वाद ४६ श्रीस्यादवक्तव्यभंगप्ररूपकायस्याद्वाद ५० श्रीस्यादस्तिप्रवक्तव्यभंगप्ररूप- कायस्याद्वाद ५१ श्रीस्यानास्तिप्रवक्तव्यभंगप्ररूप- कायस्याद्वाद ५२ श्रीस्यादस्तिस्यान्नास्तिप्रवक्तव्य- - भंगप्ररूपकायस्याद्वाद ।। अथ प्रोगणीसमां श्रुतपदना २० भेद ।। १ पर्याय श्रुतज्ञानाय नमः २ श्रीपर्यायसमास ३ श्रीअक्षर ४ श्रीअक्षरसमास ( ८२ ) 1 श्रुतज्ञानाय नमः ४६ श्रीस्यादस्तिभंगप्ररूपकायस्याद्वाद ४७ श्रीस्यान्नास्तिभंगप्ररूपकायस्याद्वाद ४८ श्रीस्यादस्तिस्यान्नास्तिभंगप्ररूप- कायस्याद्वाद ४६ श्रीस्यादवक्तव्यभंगप्ररूपकायस्याद्वाद ५० श्रीस्यादस्तिप्रवक्तव्यभंगप्ररूप- कायस्याद्वाद ५१ श्रीस्यान्नास्तिप्रवक्तव्यभंगप्ररूप- कायस्याद्वाद ५२ श्रीस्यादस्तिस्यान्नास्तिप्रवक्तव्य- भंगप्ररूपकायस्याद्वाद ।। अथ ओगणीसमां श्रुतपदना २० भेद ॥ १ पर्याय श्रुतज्ञानाय नमः २ श्रीपर्यायसमास ३ श्रीअक्षर ४ श्रीअक्षरसमास ( ८३ ) श्रुतज्ञानाय नमः ५. श्रीपद ६ श्रीदपसमास ७. श्रीसंघात ८ श्रीसंघातसमास ६ श्रीप्रतिपत्ति १० श्रीप्रतिपत्तिसमास ११ श्रीअनुयोग १२ श्रीअनुयोगसमास १३ श्रीपाहुडपाहुडा १४ श्रीपाहुडपाहुडासमास १५ श्रीपाहुडा १६ श्रीपाहुडासमास १७ श्रीवस्तु १८ श्रीवस्तुसमास १६ श्रीपूर्व २० पूर्वसमास ..

( ८४ ) ।। अथ वीसमां तोर्थपदना ३८ भेद ।। १ प्राणातिपातविरतिवंत श्रीसाधुतीर्थाय नमः २ मृषावादविरतिवंत ३ अदत्तादानविरतिवंत ४ मैथुनविरतिवंत ५ परिग्रहविरतिवंत ६ पृथवीकायजीवरक्षकाय ७ अप्कायजीवरक्षकाय ८ तेउकायजीवरक्षकाय है वाउकायजीवरक्षकाय १० वनस्पतिकायजीवरक्षकाय ११ त्रसकायजीवरक्षकाय १२ क्रोधदोषरहिताय १३ मानदोषरहिताय १४ मायादोषरहिताय १५ लोभदोषरहिताय १६ रागांशदोषरहिताय १७ द्वेषांशदोषरहिताय . , (८५) श्रीदेशविरतितीर्थाय नमः १८ लज्जागुणयुताय १६ दयागुणयुताय २० मध्यस्थगुणयुताय २१ सौम्यगुणयुताय २२ गुरगरागरूप २३ अक्षुद्रतागुणयुताय २४ धर्मप्रभावकगुणयुताय २५. सौम्यप्रकृतिगुणयुताय २६ जनप्रियगुणयुताय २७ मनोज्ञरूपगुणयुताय २८ पापभीरुगुणयुताय २६ असढगुणयुताय ३० दाक्षिन्यतागुणयुताय ३१ अक्रूरतागुणयुताय ३२ सत्कथकगुणयुताय ३३ सुपक्षगुणयुताय ३४ दीर्घदशितगुणयुताय ३५ विशेषज्ञगुणयुताय . .

( ८६ ) श्रीदेशविरतितीर्थाया नमः ३६ वृद्धानुगामिगुणयुताय ३७ विनयगुणयुताय ३८ कृतज्ञतागुणयुताय ।। अथ वीसस्थानक चैत्यवंदन ।। अतिशयवंत महांत रूप, अनुपम गुणधारी । आराधे जिनकुं सकल, तीर्थंकर शिवगामी ॥१॥ अरिहंत सिद्ध प्रवचन गणी, स्थिर बहु श्रुत जान । तपसी श्रुत दर्शन विनय, आवश्यकवली दान ॥२॥ शील क्रिया तप धारिए, वैयावच्च समाधि । ज्ञान ग्रहण श्रुत भक्ति तीर्थ, सेवन त्याग उपाधि ॥ ३ ॥ ऐ विशति स्थानक अमल, सेवो सरधा युक्त । परमातम संपद प्रगट, कारक बंधन मुक्त ।। ४ ।। मनवंछित सह सिद्धि कर, ज्ञायिक सुख भर कंद । जिनको वंदे भावधर, श्रीकुशलेंदु गणींद ॥५॥ ।। अथ वीसस्थानक थुइ ॥ तिरमल पातम भाव भाव प्रकाशक, कारक क्षायिक भावोजी। जिनपद वर्धक कर्म निकंदक, वीस स्थानक ( ८७ ) भवो सेवोजी । जिनवर सहु जे स्थानक सेवे, एक अनेक भव तीजेजी । आराधन ते साधन भावे,. मन वंछित सब सीजेजी ॥१॥ अरिहंत सिद्ध प्रवचन आचारज, स्थविर बहु. श्रुत तपसीजी । श्रुत दरसन विनयी आवश्यक, शोल क्रिया तप.वासीजी। गणधर वैयावच्च सुसमाधो, ज्ञान ग्रहण श्रुत भगतीजो। प्रवचन एवींशती पद भाषक, जिनः नमिए सहु. जुगतीजी ॥२॥ अठम छठ उपवास अांबील तप, एकाशन निज सगतेजी। करिए अोलीषट्मास भीतर, आराधन बहुभगतेजी। प्रारंभ टाली पोषधधारी, दोय सहस जप गणिएजी। काउस्सग्ग निज पद परिमाणे, देवपूजन श्रुत भणिएजी. ॥३। शासन रक्षक समकितधारि, सहुसुर सुरि वृंदाजी । सानिध कर ज्यो ते तप करता, वधते भाव अमंदाजी । श्रीजिनलाभसूरीश्वर शाखा, श्रीकुशलेंदु गणींदाजी । तस पद सेवक मङ्गलमतिगणी, जपे श्रीबालचंदाजी ॥४॥ इति जे ।। अथ वीसस्थानकनुं स्तवन ।।. वीसस्थानक पद सेवीयें, धरिकरी शुभभाव लालरे । वीजे भव सेव्यों थको, बांधे तीर्थंकर नाम लालरे वीस० ..

( ८८ ) ॥१॥ तपश्चर्या अधिकी कही, ज्ञाता अंगमझार लालरे । सुण ज्यो भवी तुमें भावसुं, किंचित करिये उच्चार लालरे । वोस० ॥२॥ सुविहित गुरु पासे ग्रहे, वीसस्थानक तप एह लालरे । निरदूषण शुभ मुहूरते, उचरि जे ससनेह लालरे ॥वीस० ॥३॥ अरिहंत सिद्ध प्रवचन नमुं, सूरि स्थविर उवज्झाय लालरे। साधुनाण दंसण अरु, विनम नमुं उलसाय लालरे ॥ वीस० ॥४॥ चारित्र बंभ क्रियापदे, तप गोयम जिण ईश लालरे चारित्र ज्ञानने श्रुतभणी, नम तीर्थ पद वोस लालरे॥ वीस० ॥५॥ वीस दिवसमें एकही, पदगुणनो कर मेव लालरे । अथवा दिन वीशांलगे, वीशे पद गुण मेव लालरे। वीस० ॥६॥ एक अोलीषटमास में, पूरो जो नवि होय लालरे। फिर नवि करणी पडे, पीछली निष्फल होय लालरे । वीस० ॥७॥ छठ अठम उपवाससुं, अथवा देखी शक्ति लालरे। पोषध करी आराधीये, देव वांदे निज भक्ति लालरे ।। वोस० ॥८॥ संपूर्ण पद सेवता, पोषधनो नही जोग लालरे । ताहि सात पदे सही पोषध करीये संजोग लालरे । वी० ॥६॥ सूरिस्थविर पाठक पदे साधु चारित्र सुजाण लालरे । गोतम तीर्थ पदे सहि, सात स्थानक मनमान लालरे । वीस० ॥१०॥ पदपद दीठ करे सदा, दोय दोय जाप हजार लालरे। पडिक्कमणो दोय टंकही, करिये पूजा सार लालरे ॥११॥ शक्ति मुजब तप

( ८६ )
।
कीजिये, एक अोली करो वीस लालरे । वीशावीशी
च्यारसे, तप संख्या कही एम लालरे । बीस० ॥ १२ ॥
जिस दिन जो पद तप करे, तिसके गुण चित्तधार लालरे ।
काउस्सग परदक्षणा, मुख भणिये नवकार लालरे ॥वीस०
॥१३॥ जिस पदकी स्तवना सुणे, कीजे जिन पद भक्ति
लालरे । रात्रिजोगो कीजिये, खरची जे धन शक्ति लालरे
॥ वीस० ॥ १४ ॥ मृतक जनम ऋतुकालमें, वली धार्यो
उपवास लालरे । सो लेखे नहीं लेखवो, निःकेवल तपजास
लालरे । वीस ॥ १५॥ सावद्य त्याग पणो करे, शोक न
धारे चित्त लालरे। शील आभूषण आदरे, मुखK बोले
सत्य लालरे । वीस० ॥ १६ ॥ जेठ प्राषाढ़ वैशाख में,
मिगशिर फाल्गुन माह लालरे । ए षट् मासे मांहिने, व्रत
गृहोये वड भाग लालरे । वीस० ॥ १७ ॥ तप पूरण
हुवां थकां, उजमणो निरधार लालरे । कीजे शक्ति
विचारीने, उच्छव विविध प्रकार लालरे ।। वीस० ॥१८॥
वीशवीश गणती तणां, पुस्तक पुंठा आदि लालरे ॥ वीस०
।। १६ ।। फलोधी नगरनी श्राविका विविध चित्तलाय
लालरें। जनम सफल करवा भणी, एहीज
मोक्ष उपाय
लालरे । वीस० ॥ २० ॥

(६०) कलश इय वीर जिनवर तणी, आज्ञा धारे चित्तमझार ए। सह देख पागम तणी, रचना रुचि तप विध सारए । वसु निधिसिद्धिससी वरस, उजल चैत्रमास सुहं करुं। मुनि केशरीचंद गच्छखरतर, भणी स्तवना मनहरु।२१। ॥ अथ दीवालीपर्व- गुणणो । १ श्रीमहावीर स्वामि सर्वज्ञाय नमः। रात्रे बीजा प्रहरे २ श्रीमहावीरस्वामि पारंगताय नमः। रात्रे त्रीजा प्रहरे ३ श्रीगौतमस्वामि सर्वज्ञाय नमः । रात्रे चौथा प्रहरे या गुणणानो दीवालीने रात्रे वीस वीस नवकार वाली गणवी अठम करे तो तेरसथी, छठ करे तो चउदसथी, उपवास करे तो दीवालीने रोज तप करे, रात्रि जोगो करे, अने प्रभु निर्वाण समये देरासरमां जइने लाडु आदि अष्ट द्रव्य चढ़ावे, आरती करे, चैत्य वंदन करे, दीवालीनो स्तवन कहे, निर्वाण कल्याणकनो अधिकार सुणे, अने श्रीगौतमस्वामिनो मोटो रास सांभले पछे पारणो करे, इति ।

(६१) ॥ अथ ज्ञानपंचमी पर्व अधिकार ।। कातिक सुदि पंचमी ज्ञान पंचमी नामथी पर्व कहेवाय छे आ पर्व आराधन करवाथी गुणमंजरी अने वरदत्तनी माफक ज्ञानावरणी कर्म नाश थाय छे, कोढादि द्रव्य रोग नाश थाय छे, सर्व उपद्रव नाश थाय छ, संपूर्ण मनोरथ पूर्ण थाय छ । ज्ञानपंचमी उपवास सुदिमां करवो कदाच रोगादिक कारणे अने भूली जाय तो बदिमां करवो, ज्ञानपंचमी तप जघन्यथी पांच मास, मध्यमथी पांच वर्ष अने पांच मास अने उत्कृष्टथी जाव जीव सुधी थाय छे, उपवास चोविहार करवो, चोवीहार न बनी शके तो तिविहार करे, जघन्य मध्यम उत्कृष्ठ ज्ञानपंचमीनुं तप न बनी शके तो अवश्य कार्तिकशुदि पंचमीनो तो उपवास करबो, ते दिवसे. शण- गारेलो ज्ञान कोटडीने पागल पांच अथवा एकावन साथीया करीने तेना उपर फल फूल चढाववा, पांच बत्तीनो दीवो करवो, धूप उखेववो ज्ञान पूजानी ढाल कहोने वासक्षेप करे पुस्तक पर रोकड़ नाणो चढावे, अने कागल कलम सलेट ( ९२ ) पेन शीसापेन दवात आदि चढावे द्रव्यपूजा करीने भावपूजा करवी ते प्रथम इरियावहि पडिक्कमीने खमा० दइने मुहपत्ति पडिलेहीने बे वांदणा पांच खमासमणा दइने चैत्य- वंदन करे। ।। अथ चैत्यवंदन ॥ सकल वस्तु प्रतिभास भानु, निरमल सुख कारण । सम्यग्दर्शन पुष्ट हेतु, भव जलनिधि तारण ।। संजम तप पाणंद कंद, अन्नाण निवारण । मार विकार प्रचार ताप, तापित जन ठारण ॥१॥ स्याद्वाद परिणाम धर्म, परिणति पडिवोहण । साहु साहुणी संघ सर्व, आराधन सोहण । मोहतिमिर विध्वंस, सूर मिथ्यात्व पणासण आतम शक्ति अनंत शुद्ध, प्रभुता परगासण ॥२॥ मति श्रुति अवधि विसुद्धनाण, मणपज्जव केवल । भेद पचास क्षयोपशमिक, एक क्षायक निरमल । दोय परोक्ष प्रथम तिहां, दुग परतक्ष दीसंता सकल परतक्ष प्रकाश भास, ध्र व केवल अपरिमित ॥३॥ धर्म सकलनो मूल शुद्ध, त्रीपदी जिन भाखे । बाहिर अंग प्रधान खंध, गणणर सुप्रकाशे । शाखा श्रीनियुक्ति भाष्य, ( ६३ ) पडिशाखा दीपे । चूरणी टोका पत्र पुष्प, 'संशय भव जीपे ॥४॥ पचांगो सार बोध कहो, जिन पंचम अंगे। नंदी अनुयोगद्वार, शाखा मानो मनरंगे । वीर परंपर जीत, भव उपगारी । अभ्यासो पागम अगम, निरुपम सुखकारी ॥५॥ मोह पंकहर नीरसम, सिद्धांत अबाधे । देवचन्द्र प्राणा सहित नय भंग अगाघे ज्ञान सोहामणो, सकल मोक्ष सुख कंद । भगते सेवो भविकजन, पामो परमानन्द ॥६॥ जंकिंचि० नमुत्थुणं० जावंति चेइयाइ० जावंतकेचि. नमोर्हत्० प्रणमुं श्रीगुरूपाय० ज्ञानपंचमिनु स्तवन जयवीय अरिहंत चेइयाण एक नवकार। काउस्सग्ग करीने थुइ कहे । वंदण० अन्नत्थ० ।। अथ थुइ [बसंततिलका] । देविदवंदियपएहिपरूवियाणि, नाणाणि केवलमणो हि मई सुयाणि । पंचावि पंचम गई सियपंचमीए, पूयात्तवो गुणरयाण जियाण दित ॥१॥ पछे. खमा० दइने इच्छा० सं० भ० पंचज्ञान प्राराधवा निमित्तंकाउस्सग्ग करु इच्छं ( ६४ ) पंचज्ञान आराधवा निमित्तं करेमि काउस्सगं वंदण० अन्नत्थ० कहीने पांच अथवा ५१ लोगस्सनो काउस्सग करीने प्रगट लोगस्स कहे । पछे संसारदावानी बोधागाढनामनी त्रीजी थुइ कहे प्रदक्षिणा होय तो प्रदक्षिणा खमा समणा पांच अथवा ५१ ज्ञान संबंधि नमस्कार करे । यथा पांच नमस्कार ज्ञानाय नमः १ श्रीमति २ श्रीश्रुत ३ श्रीअवधि ४ श्रीमनपर्यव ५ श्रीलोकालोकप्रकाशककेवल अथवा ५१ ज्ञानना नमस्कार श्रीमतिज्ञानाय नमः १ स्पर्शनेन्द्रियव्यंजनावग्रह २ रसनेन्द्रियव्यंजनावग्रह ३ घ्राणेंद्रियव्यंजनावग्रह ४ श्रोत्रंद्रियव्यंजनावग्रह ( ९५ ) श्रीमतिज्ञानाय नमः " ५ स्पर्शनेंद्रियअर्थावग्रह ६ रसनेंद्रियप्रर्थावग्रह ७ घ्राणेंद्रियप्रर्थावग्रह ८ चक्षुरिद्रियप्रविग्रह ९ श्रोत्रंद्रियअर्थावग्रह १० मनोअर्थावग्रह ११ स्पर्शनेंद्रियइहा १२ रसनेंद्रियइहा १३ घ्राणेंद्रियइहा १४ चक्षुरिद्रियइहा १५ श्रोत्रंद्रियइहा १६ मनइहा १७ स्पर्शनेंद्रिय अपाय १८ रसनेंद्रिय अपाय १६ घ्राणेंद्रिय अपाय २० चक्षुरिद्रियअपाय २१ श्रोत्रंद्रियअपाय २२ मनपाय ( ९६ ) श्रीमतिज्ञानाय नमः २३ स्पर्शनेंद्रियधारणा २४ रसनेंद्रियधारणा २५ घ्राणेंद्रियधारणा २६ चक्षुरिंद्रियधारणा २७ श्रोत्रंद्रियधारणा २८ मनोधारणा २९ अक्षर श्रीश्रुतज्ञानाय नमः ३० अनक्षर ३१ संज्ञी ३२ असंज्ञी ३३ सम्यग ३४ मिथ्या ३५ सादि ३६ अनादि ३७ सपर्यवसित ३८ अपर्यवसित २६ गमिक ४० अगमिक 1 ( ९७ ) श्रीश्रुतज्ञानाय नमः श्रीअवधिज्ञानाय नमः ४१ अंगप्रविष्ट ४२ अनंग प्रविष्ट ४३. अनुगामी ४४ अननुगामी ४५ वर्द्धमान ४६ हीयमान ४७ प्रतिपाति ४८, अप्रतिपाति ४६ ऋजुमति ५० विपुलमति ५१ लोकालोकप्रकाशक श्रीमनःपर्यवज्ञानाय नमः श्रीमनःपर्यवज्ञानाय नमः श्रीकेवलज्ञानाय नमः पछे (ॐ ह्रीं नमोनाणस्स) या पदनी २० माला फेरवी, पाठ थुइथी देव बांदवा, अने स्थिरता होय तो ११ अंगली सज्झाय सांभले । पौषध लीधेलो होयतो बीजे दिवसे पौषध पालीने द्रव्यपूजा करे शीलवत बे टंक पडि- क्कमणुं प्रादि श्रावकनी करणी करे उजमणा मादिनी बीजीविधि ज्ञानपंचमीला मोटा स्तवनथी जाणवी ।

(६८) अथ प्रथम प्राचारांगनी सज्झाय . (ढाल होलानी) हेलो अंग सोहामणोरे लाल, अनुपम अाचारांगरे सुगणनणनर । वीर जिणंदेभाखियोरे लाल, उववाइ जास उपांगे सुगु० ॥१॥ बलिहारि ए अंगनीरे लाल, हुँ जाउं वारंवार रे सु० । विनये गाचरी आदरेरे लाल, जिहांसाधु तणो प्राचररे सु० ॥ २ ॥ सुयखंध दोय छे जेहनारे लाल, प्रवर अध्ययन पचवीसरे सु० ॥ उद्दे- शादिक जाणीयेरे लाल, पिच्याशी सुजगीशरे सु० । ब० ॥ ३ ॥ हेतु जुगति करी शोभतारे लाल, पद अढारे हजाररे सु० ॥ अक्षर पदने छेहडेंरे लाल, संख्याता श्रीकाररे सु० ॥ ब० ॥ ४ ॥गमा अनंता जेहमारे लाल, वलि अनंत पर्यायरे सु० । सपरित्ततो छ इहारे लाल, थावर अनंत कहायरे सु० ॥ ब० ॥ ५॥ निबद्ध निका- चित शाश्वतारे लाल, जिन प्रणीत ए भावरें सु० । सुणता आतम उल्लसेरे लाल, प्रगटे सहज स्वभावरे सु० ॥ ब० ॥ ६॥ सुगुण श्राविकारे लाल, अगेधरीय उल्लासरे सु० । विधि पूर्वक तुमे सांभलोरे लाल, गीतारथ रूपासरे सु०॥

(६६) ब० ॥ ७॥ ए सिद्धांत महिमा निलोरे लाल, उतरे भवपाररे सु० । विनयचंद्र कहे माहरेरे लाल, एहीज अंग आधारे सु० । ब० ॥ ८ ॥ इति. । अथ बीजी सुयगडांगनी सज्झाय ।। ( ढाल रसीयानी ) बोजोरे अंग तुमे सांभलो, मनोहर श्रीसुगडांग (मोरा साजन ) त्रणसे त्रेसठ पांखडो तणो, मत खंडयो धरि रंग मो० ॥१॥ मोठीरे लागे वाणी जिन तणी, जागे जेहथोरे ज्ञान० । ए वाणी, मनभावी माहरे, मानुं सुधारे समान मो० । मीठी० ॥ २ ॥ राय पसेणी उपांग छे जेहनो, ए तो गंभीर मो० । बहुश्रुत अरथ जाणे सहु, क्षीरनीर धनुर तीर मो० । मो० ॥३॥ एहनारे सुयखंध दोय छे, वलि अध्ययन त्रेवोश मो० । उद्दशा समुदै शा तिहां भला, संख्याये वीश मो० । मी० ॥ ४॥ नयनिक्षेप प्रमाण भर्या, पद छत्तीस हजार मो० । संख्याता अक्षर पदमाहे, कुणलहे तेहनोरे पार मो०। मो० ॥ ५ ॥ गमा अनंता पर्याय वली, भेद अनंत जिणमांहे मो० । गुण अनंत त्रस सूत्र .

( १०० ) परित कहां, थावर अनंत जेमांहि मो० । मी० ॥ ६ ॥ निबद्धनिकाचित जेसा सयकडा, जिनपन्नत्तारे भाव मो० । भाखीरे सुंदर एह प्ररूपणा चरण करणलोरे जाव मो० । मो० ॥ ७ ॥ करीये भगत जुगति ए सूत्रनो लहीयेरे मुक्ति मो० । विनयचंद्र कहे प्राटे एहथी, प्रातम गुणनोरे शक्ति मो० । मी ॥ ८ ॥ ।। अथ त्रोजी ठाणांगनी सज्झाय ।। (ढान-पाठ टके कंकणो लीयोरी-ए चाल) त्रीजो अंग भलो कह्यो रे जिनजी, नामे श्री ठाणांग मोरो, मन मगन थयो, हारे देखी देखी भाव, हारे जीवा जीव स्वभाव, मोरो० । सबल जगत करी छाजतोरे जिनजी, जीवाभिगम उपांग मो० ॥१॥ एह अंग मुझ मन वस्योरे जि० जिम कोकिल दल अंब मो० गुहिर भावकर जागतोरे जि० आजतो एह बालंब मो० ॥ २ कूट शेल शिखरी शिलारे जि० कान नमे वनि कुंड मो० । गह्वर नागर द्रह नदीरे जि० जेहमें अछरे उदंड मो ॥३॥ दशाणा अति दीपतारे जि० गुण पर्याय प्रयोग मो० ।

( १०१ ) परित्त जेहनी वाचनारे जि० संख्याता अनुयोग मो० ॥४॥ वेष्ट शिलोक निजुत्तसुरे जि० संगहणी पडिचित्त मो० । ए सहु संख्याता जिहारे जि० सुणतां उलसे चित्त मो० ॥५॥ सुयसंध एक राजतोरे जि० दश अध्ययन उदार मो० उद्देशादिक वीशछेरे जि० पद बहुत्तर हजार मो० ॥६॥ रागो जिनशासन तणोरे जि० सुणे सिद्धांत वखाण मो० । विनयचंद कहे ते हुवेरे जि० परमारथना जाण मो० ॥ ७ ॥ इति ॥ अथ चोथी समवायांगनी सज्झाय ।। (ढाल-थारा महिला उपर मेह झवोके वीजली-ए चाल) चोथी समवायांग सुणो श्रोता गुली हो लाल, सुणो० । पन्नवणा उपांम करी शोहावणी हो लाल, करी ० ॥ अरथ मागधी भापा शाखा सुरतणी हो लाल, शाखा ० । समकित भाव कुसुम परिमल व्यापी घणो हो लाल, परि० ॥१॥ जीव. अजोवने जीवा जोव समासथी हो लाल, जीव० । लहीये एहथी भाव विरोध कांइ नथी हो लाल, ( १०२) विण, भांगा तीन स्व समयादिकना जाणीये हो लाल, यादि० । लोक अलोकन लोकालोक वखाणीये हो लाल, लोक० ॥ २ ॥ एक थकी छे सात समवाय प्ररूपणा हो लाल, सम० । कोडा कोड प्रमाणक जीव निरूपणा हो लाल, जो० । बारसविह गणिपिटक तणी संख्या कही हो लाल, त० । शाश्वता अरथ अनंतक छे एहना सही हो, लाल, छे ॥ ३ ॥ सुयखंध अध्ययन उद्देशादिके हो लाल, उ० । संख्याए एक एक प्रत्येके गुणनिला हो लाल, प्र० । पद एक लाख चोमालीस सहस तेउत्तरा हो लाल, स० । पदने अग्रउदग्र संख्याता अक्षरा हो लाल, सं० ॥ ४ ॥ भाष्यचूरणि नियुक्ति करी सोहे सदा हो लाल, क० । सुणतां भेद गंभीर त्रिपत न होय कदा हो लाल, त्रि० । जेह नमश्वे अंगकी अंतरगति हसी हो लाल, अं० । जलवर्षते जोर कुण न हुवे खुसी हो लाल, कु० ॥५॥ जाग्यो धरम सनेह जिणंदसुं माहरो हो लाल, जि० । तजिया शास्त्र मिथ्यात सूत्र जाण्यो खरो हो लाल, सू० । जिम मालती लही भृग करीरे नवि रहे हो लाल, क० । इश्वर शिर- सुरगंग तजी परिनवि वहे हो लाल, त० ॥ ६॥ ए प्रवचन निग्रंथ तणो जुगते वडो हो लाल, जु०। शाकर सेलडी Pinni ( १०३ ) द्राख थकी पण मीठडो हो लाल, थकी० स्यु कहीये बहु बात विनयचंद इम कहे हो लाल, वि० । एहना सुणीने भाव श्रोता अति गहगहे हो लाल, श्री ॥७॥ इति . . ।। अथ (५) भगवतीसूत्रनी सज्झाय ।। (ढाल-पंथीडानी) पंचम अंगे भगवती जाणीयेरे, जिहां जिनवरना वचन अथाघरे । हिमवंत परबत सेतो नीकल्यारे, मानु परतक्ष गंगा प्रवाहरे । पंच० ॥ १ ॥ सूरपन्नत्ती नामे परगडी रे, जेहनी छे उद्दाम उपांगरे । सूत्र तणी रचना दरीयाजिसीरे, माहिला अरथ ते सजल तरंगरे। पं० ॥२॥ इहां तो सुयखंध एक अति भलोरे, एकसो एक अध्ययन उदाररे । दश हजार उद्देशा जेहनारे, जिहांकिण प्रश्न छत्रीस हजाररे । पं० ॥३॥ पदतो दोय लाख अरथे भर्यारे, उपरि सहस अठयासी जाणरे, लोकालोक स्वरूपनी वर्णनारे विवाह पन्नत्ती अधिक प्रमाणरे । पं० ॥४॥ करीये पूजा अने परभावनारे, धरिये सद्गुरू उपर रागरे । सुणीये सूत्र ( १०४ ) भगवती रागसरे, तो होय भवसागरनो त्यागरे । पं० ॥५॥ गोतमनामे द्रव्य चढाइयेरे, सम्यग् ज्ञान उदय होय जेमरे । कीजे साधु तथा साहमी तणोरे भगति जुगति मनमाणो प्रेमरे पं० ॥ ६ इण विधि सुं एह सूत्र आराधतार, इण- भवसोझे वंछित काजरे । परभव विनयचंद कहे ते लहेरे, मोहन मुगतिपुरीनो राजरे पं० ॥७॥ इति ।। अथ (६) ज्ञातासूत्रनी सज्झाय ।। (ढाल-कितलख लागा राजाजीरे मालिये-ए देशी) छठ्ठा अंग ते ज्ञातासूत्र वखाणीयेजी, जेहना छ अरथ अधिक उदंडहो, ह्मारा सुणजा धरिनेह सिद्धांतनी वातडीजी । श्रवणे सुणतां गाढो रस उपजेजी, मधुरता तजित जिम मधुखंड हो, ह्मांरा० ॥ १ ॥ जंबूद्दीवपन्नत्तो उपांग जेहनोजी, इणमाहे जिन पूजानी विधिजो रहो। ह्यां० । अचिक सुणि परम शांतिरस अनुभवेजी, चचिक चुणिकरे समसोर हो । ह्मां० ॥२॥ नगर उद्यान चैत्यवन खंडसोहागणोजो, समवसरण राजाना . मातने तातहो, .

( १०५) - मा० । धर्माचारज धर्म कथा तिहां दाखवीजी, इह लोक- परलोक रूद्धि विशेष सुहातहो, ह्य० ॥३॥ भोग परि- त्याग प्रव्रज्या पर्पदाजी, सूत्रपरिग्रह वारु तपउपधान हो । मा० । संलेहण पच्चस्खाणा पादपोपगमनतजी, स्वर्गगमन शुभकुल उतपत्ति हो । मा० ॥४॥ बोधि लाभ वलितंत ते अंतक्रिया कहीजो, धर्म कथाना दोय छे सुयखंधहो । ह्मां०। पहिलाना उगणीश अध्ययन ते अाजछे जी, बीजाना दशवर्ग महा अनुबंधहो मां० ॥५॥ उंठकोडी तिहां सबल कथानक भाषियाजी, भाष्याबलि उगणीश उद्देश हो मां० । संख्यता हजार भला पद एहनाजी, एहथकी जाये कुमति कलेश हो मा० ॥६॥ विनय करे जे गुरुनो बहु परेजी, तेहने श्रुत सुणतां बहु फल होय हो। मां० ते रसिया मनवसि या विनयचंदनेजी, सोमांहेमिले जोयां एकके दोयहो मां० ।।७।। इति - - (१०६) ।। अथ (७) उपाशकदर दशासूत्रनी सज्झाय ।। (ढाल-विछियानी) हवे सातमो अंग ते सांभलो उपाशकदशा नामे चंगरे । श्रमणोपाशकनो वर्णना, जसुचंदपन्नत्ती उपांगरे ॥१॥ मन- लागो मोरोसूत्रथी, एतो भववेराग तरंगरे । रसराता ज्ञाता गुण लहे, परमारथ सुविहित संगरे । मन० ॥२।। इण अंगे सुयखंध एक छे, अध्ययन उद्देश विचाररे । दशदश संख्याये दाखव्या, पदपिण संख्यात हजाररे ।म० ॥३॥ आणंदादिक श्रावक तणो, सुणतां अधिकार रसालरे । रस लागे जागे मोहनी, श्रोता जननें ततकालरेम० ॥४॥ श्रोता आगलतो वांचतां, गीतारथ पामे रीझरे । जे अर्द्धदग्ध समझे नही तेहसुं तो करवी धीजरे । म० ॥५॥ दश श्राव- कतो इहां भाखिया, पण सूत्र भयो नहीं कोयरे । ते माटे शुद्ध श्रावक भणी, एक अरथनी धारणा होयरे । म०॥६॥ साचो होय ते प्ररूपीये, निस्संक पणे सुजगीशरे। कवि- विनयचंद कहे स्युं थयो, जो कुमति करस्ये रीशरे । म० ।।७।। इति - ( १०७ ) अथ ८ अंतगडदशांगनी सज्झाय ( ढाल वीरवखारणी राणी चेलणाजी ए देशी) आठमो अंतगडदशांगजी, सुणी करो कान पवित्र । अंतगडं केवली जे थयाजी, तेहनारे इहां आठ चरित्र ॥१॥ कर्म कठिन दल चूरताजी पूरता जगनी आस । जिनवर देव इहां भासताजी, शाश्ववता अरथ सुबिलाश ॥ पाठ० ॥ २ ॥ सकल निक्षेप नय भंगथीजी, अंगना भाव अभंग । सहज सुखरंगतो तल्पिकाजी, कल्पिका जासु उपांग पाठ ॥ ३ ॥ एक सुयखंध इण अंगनोजी, वर्ग छे आठ अभिराम आठ उद्देशा छे वलिजी, संख्याता सहस पदठाम ।। पाठ० ॥ ४ ॥ पाठमां अंगना पाठमेंजी, एहवो अच्छेरे मीठास । सरस अनुभव रस उपजेजी, संपजे पुन्यनी रास ॥ आ3० ॥ ५ ॥ विषयलंपट नर जे हुवेजी, निरविषयी सुण्या थाय । जिम महाविष विषधर तणोजी नागमंत्रे सुण्या जाय ॥ आः ॥ ६ ॥ अमृत वचन मुख वरसतीजी, सरस्वती करोरे पसाय ॥ जिम विनयचंद्र इण सूत्रनाजी, तुरत लहे अभिप्राय माठ० ॥ ७ ॥ इति - ( १०८ ) ।। अथ (६) अनुत्तरोववाइ अंग सज्झाय ।। (ढाल-नणदल विदली ले-ए देशी) नवमो अंग अनुत्तरोववाई, एहनी रूचि मुझने आई हो। (श्रावक सूत्र सुणो) सूत्र सुणो हित प्राणी, एतो वीतरागनी वाणीहो ॥ श्रा० ॥१॥ जसु कल्पावतंसिका नामे, सोहे उपांग प्रकामे हो ॥ श्रा०॥ एतो श्रागमने अनुकुला, मार्नु मेरू शिखरनी चूलाहो ॥ श्रा० ॥ २ ॥ एतो सूत्रनो नाम सुणी जे, तिमतिम अंतर गति भी जेहो . । श्रा० । प्रगटे नवल सनेहा, एहथी उलसे मोरी देहा हो ॥ श्रा० ॥ ३ ॥ अनुत्तर सुरपद पाया, तेहना गुण इणमें- गाया हो । श्रा० । नगरादिक भाव वखाण्या, ते तो छठे अंगे आण्याहो ॥ श्रा० ॥ ४॥ इहां एक सुय खंध वारू, त्रण वर्ग वलि मनोहारा हो । श्रा० । उद्देशा त्रण सनूरा, संख्याता सहस पद पूरा ॥ श्रा० ॥ ५॥ सूत्र सुणावू असे तहने, साची श्रद्धा हुये जेहने हो । श्रा०। श्रोताथी प्रीत लगावं, निंदकने मुह न लगाईंहो ॥ श्रा० ॥ ६ ॥ जे सुणतां करे बकोर, तेतो माणस नहीं पण ढोर हो । श्रा० । कवि विनयचंद कहे साचो श्रुत रंगे सहु कोई राचोहो ।। श्रा० ।। ७ ।। इति .

( १०६ ) ॥ अथ (१०) प्रश्न व्याकरणांग सज्झाय ।। (ढाल-पाघा आम पधारो पूज्य-ए देशी) दशमो अंग सुरंग सुहावे, प्रश्न व्याकरण नामे । सूत्र कल्पतरु सेवे ते तो, चिदानद फल पाले । आवो आवो गुणना जाण, तुमने सूत्र सुणावें ॥ १ ॥ पुष्प कली ज्यु परिमल महके, गुरु परागने रागे । तिम उपांग पुप्फिका एहनो, जोर जुगति करो जागे ॥ आवो० ॥ २ ॥ अंगुष्टादिक जिहां प्रकास्या, प्रश्नादिक अति रूडा । ते छे अष्टोत्तर सत ए तो, सूत्र मध्य मणि चूडा ॥ आ० ॥३॥ आश्रवद्वार पाँच ईहाँ प्राण्याँ, पांचे संवर द्वारा। महामन्त्र वाणीमा लहीये, लब्धि भेद सुखकारा ॥ प्रा० ॥ ४ ॥ सुयखंध एक छे दशमें अंगे, पण यालीस अज्झ- यणा । पण यालीस उद्देश वली पद, सहस संख्यात नोरयणा ॥ प्रा० ॥५॥ जे नर सूत्र सुणे नहीं काने, केवल पोषे काया । माया मांहि रहे लपटाणा, टे नर ईम होज पाया ॥ प्रा० ॥ ६ ॥ सूत्रमाहि तो मारग दोय छे निश्चय नय व्यवहारा । विनयचंदद कहेते प्रादरिये, तजि मन मदन विकारा ।। प्रा० ॥ ७ ॥ इति .

( ११० ) ॥ अथ (११) विपाकसूत्रनी सज्झाय ।। ( ढाल-कडखानी ) सुणोरे विपाक श्रुत अंग इग्यारमो, तजो विकथा वृथा जे अनेरी । ललित उपांग जसु प्रवर पुष्पचूलिका, मूलिका पाप आतंक केरी । सुणो० ॥१॥ अशुभ किपाक सम दुष्कृत फल भोगवी, नर कमां गरक थया जेह प्राणी । सुकृत फल भोगवी स्वर्गमां जे गया, तास वक्तव्यता इहां आणी ॥ सु० ॥२॥ दोय श्रुत खंधने वीश अध्ययन वली, वीश उद्देश इहां जिन प्रयुंजे । सहस संख्यात पद कुंद मच कुंद जिम, बहुल परिमल भ्रमर चित्त गुंजें ॥ सु० ॥३॥ सरस चंपक लता सुरभि सहुने रूचे, अन्य उपगारनो बुद्धि- माटे। सूत्र उपगार तेहथी सबल जाणीये, जेहथी पुरुष सुख अचल खाटे ॥ सु० ॥ ४ ॥ बन्धने मोक्षना वेउ कारण अछे, दुष्कृतने सुकृत जोवो विचारी। दुष्कृतने परिहरी सुकृतने प्रादरी, जिन वचन धारिये गुण संभारी ॥ सु० ॥ ५ ॥ मकररे मकर निंदा निगुण पारकी, नारकी तणी गति कांइ बांधे । नारकी प्रकृति तजि सहज संतोष भज, लाग श्रुत सांभली धरम धन्धे ॥ सु० ॥ ६ ॥ सुखने ( १११ ) दुख विपाक फल दाखव्या, अंग इग्यारमें वीतरागे । चिर जयो वीर शासन जिहां सूत्रथी, कवि विनयचंद गुण ज्योति जागे । सु० ॥ ७ ॥ [ कलश ] (ढाल-वढावानी) अंग इग्यारह में थुएया, साहेलीए । आज थया रंगरो- लकि, सानंदी सूत्रमाहि एहनो ॥ सा० ॥ भास्यो सर्व निचोल ॥ सा० ॥१॥ सहेलीए आज वधामणी, पसरी अंग इग्यारनी। सा० । मुझ मन मंडप वेलकि, सा० ॥ सींचु ते हरखे करी, सा० ॥ अनुभव रसनी रेल की, सा० ॥२॥ हेज धरी जे सांभले, सा० । कुण बुढा कुण बालकि, सा० ॥ तोते फल लहे फूटरा, सा० ॥ स्वादे अंतिहि रसालकि, सा० ॥ ३ ॥ हरण अपार धरी हीये, सा० ।। अहम्मदाबाद मझारकि, सा० ॥ भास करीए अंगनी, सा० ॥ वरत्या जयजयकारकि, सा० ॥४॥ संवत सतर पचावने, सा० ॥ वरसा ऋतु नभ मासकि, सा० ।। दशमी दिन शुद्धि पक्षमा, सा० ॥ पूरण थई मन आशकि, ( ११२ ) सा० ॥ ५ ॥ श्री जिनधर्मसूरि पाटवी, सा० ॥ श्रीजिन- चन्द्र सूरि शकि, सा० ॥ खरतरगच्छना राजिया, सा० ॥ तसुराजे सुजगीशकि, सा० ॥ ६ ॥ पाठक हरख निधानजी, सा० ॥ ज्ञान तिलक सुपसायकि, सा० ॥ विनयचंद कहे में करी. सा० ॥ अंग इग्यार सज्झायकि, साहे० ॥ ७ ॥ . ॥ इति ज्ञानपंचयी पाराधन विधि सम्पूर्णम् ॥ ।। अथ मौनएकादशी पर्व अधिकार ।। मगशिर सुदि ११ इग्यारस मौन एकादशी नामथी पर्व प्रसिद्ध छे, आ दिवसे १५० दोढसो जिन कल्याणक थया छ, यथा श्रीमल्लिनाथना जन्म १ दीक्षा २ केवलज्ञान ३ पात्रण कल्याणक श्रीअरनाथनी दीक्षा १ कल्याणक अने श्रीनमिनाथनो केवल ज्ञान १ कल्याणक थयो छे, तेथी प्रावर्त्तमान चोवीशीमां पांच कल्याणक थया एवी रीते बोजा चार भरत अने पांच ऐरवतने विष पांच-पांच कल्याणक होवाथी दश क्षेत्र सम्बंधि १० वर्तमान जिन चोवीसीमा ५० पचास कल्याणक थया वली अतीत वर्तमान अने अनागत ३० जिन चोविशीमां १५० दोढसो कल्याणक थाय छे, ते कारणथी प्रा दिवस पर्व तरीके मोटो गणाय छे, वली प्रा दिवसे मौन सहित उपवास करवो, शक्ति होय तो पोषध करवो तेनी पण शक्ति न होय तो देशावगाशिक के सामायिक अवश्य करवो, अने पोषध आदि व्रतमां मौन- पणे १५० मालानो गुणणो करे, प्रा तप जघन्यथी ११ मास मध्यमथी ११ वर्ष भने ११ मास उत्कृष्टथी जाव जीव सुधी उपवास आदिथी सुदि एकादशी आराधे, कदाच रोगादि कारणे वदमां करे तो व्रत भंग न थाय, या पण न बनी शके तो मागशिर सुदि मौन एकादशी ने दिवसे उपवासादिकथी या पर्वनी आराधना करे, तथा ११ खमासमणा ११ साथीया ११ लोगस्सनो काउस्सग (श्री मल्लिनाथ सर्वज्ञाय नमः) आ पदनी २० माला प्रा वाना दरेक शुदि ११ ने दिवसे करवा बोजी प्रतिक्रमण आदि- क्रिया नित्य कुत्यनि माफक समजवी, प्रा व्रत पूर्ण थये छते : ज्ञानपंचमनी माफक उजमणो समजवो, पण एटलं विशेष छे के पांच पांच वस्तुने ठेकाणे इग्यार-इन्यार वस्तु समजवी ( ११४ ) ।। अथ मौन एकादशीनो १५० गुणणा ।। [१] जम्बूद्वीप भरतक्षेत्रे अतीत जिन चोवीसी पांच कल्याणक नाम ४ श्री महायश ६ श्रीसर्वानुभूति ६ श्रीसर्वानुभूति ६ श्रीसर्वानुभूति ७ श्रीधर सर्वज्ञाय नमः अर्हते नमः नाथाय नमः सर्वज्ञाय नमः नाथाय नमः [२] जम्बूद्वीह भरतक्षेत्र वर्तमान जिन चोवीसी पांच कल्याणक नाथाय नमः अर्हते नमः १८ श्रीअर १६ श्रीमल्लि १६ श्रीमल्लि १६ श्रीमल्लि २१. श्रीनमि नाथाय नमः सर्वज्ञाय नमः सर्वज्ञाय नमः । ११५ ) [३] जम्बूद्वीप भरतक्षेत्रे अनागत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीस्वयंप्रभु सर्वज्ञाय नमः ६ श्रीदेवश्रुत अर्हते नमः ६. श्रीदेवश्रुत नाथाय नमः ६ श्रीदेवश्रुत सर्वज्ञाय नमः ७ श्रीउदय नाथाय नमः [४] घातको खंड पूर्व भरते अतीत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीअकलंक. सर्वज्ञाय नमः ६ श्रीशुभंकर अर्हते नमः ६ श्रीशुभकर नाथाय नमः ६ श्रीशुभंकर सर्वज्ञाय नमः ७ सप्त नाथाय नमः [५] घातकीखंडे पूर्वभरते वर्तमान जिन चोवीसी पांच कल्याणक १८ श्रीगांगीलनाथाय १६ श्रीगुणनाथग्रहते १६ श्रीगुणनाथनाथाय नमः १६ श्रीगुणनाथसर्वज्ञाय नमः २१ श्रीब्रह्मद्रसर्वज्ञाय नमः नमः. नमः नमः ( ११६ ) [६] घातकी खंडे पूर्व भरले अनागत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीसंप्रतिसर्वज्ञाय ६ श्रीमुनिनाथअर्हते नमः ६ श्रीसुनिनाथनाथाय नमः ६ श्रीमुनिनाथसर्वज्ञाय नमः ७ श्रीविशिष्टनाथाय नमः [७] घातकोखंडे पश्चिमभरते अतीत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीसर्वाथसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीहरिभद्रअर्हते ६ श्रीहरिभद्रनाथाय नमः ६ श्रीहरिमद्रसर्वज्ञाय नमः ७ श्रीमगधाधिनाथाय नमः [८] घातकोखंडे पश्चिमभरते वर्तमान जिन चोवीसी पांच कल्याणक १८ श्रीमल्लिसिंह नाथाय १६ श्रीप्रक्षोभअहंते १६ श्रीप्रक्षोभनाथाय नमः १९ श्रीप्रक्षोभसर्वज्ञाय नमः २१ श्रीप्रयच्छसर्वज्ञाय नमः नमः (११७) नमः नमः [] घातकीखंडे पश्चिमभरते अनागत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीआदिकरसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीधनदर्हते श्रीधनदनाथाय नमः ६ श्रीधनदसर्वज्ञाय ७ श्रीपोषनाथाय [१०] पुष्करार्द्ध पूर्वभरते अतीतजिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीमृदुनाथाय ६ श्रीव्यक्तमहते ६ श्रीव्यक्तनाथाय नमः ६. श्रीव्यक्तसर्वज्ञाय नमः ७ कलाशतसर्वज्ञाय नमः [११] पुष्करार्द्ध पूर्वभरते वर्तमानजिन चोवीसी पांच कल्याणक १८ अयश्रीगानाथाय १६ श्रीयोगनाथअर्हते नमः १६ श्रीयोगनाथनाथाय १६ श्रीयोगनाथसर्वज्ञाय २१ श्रीअरण्यवाससर्वज्ञाय नमः नमः नमः नमः नमः.

1 (११८) [१२] पुष्शरार्द्ध पूर्वभरते अनागत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीपरमसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीशुद्धात्तिग्रहते ६ श्रीशुद्धात्तिनाथाय नमः ६ श्रीशुद्धातिसर्वज्ञाय नमः ७ श्रीनिष्केशनाथाय नमः [१३] पुष्करार्द्ध पश्चिमभरते अतीत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीप्रलम्बसर्वज्ञाय ६ श्रीचारित्रनिधिग्रहते नमः ६ श्रीचारित्रनिधिनाथाय नमः ६ श्रीचारित्रनिधिसर्वज्ञाय नमः ७ श्रीप्रशमजितनाथाय [१४] पुष्करार्द्ध पश्चिमभरते वर्तमान जिन चोवीसी पांच कल्याणक १८ श्रीप्रसादनाथाय १६ श्रीविपरितअर्हते नमः १६ श्रीविपरितनाथाय १६ श्रीविपरितसर्वज्ञाय २१ श्रीस्वामिसर्वज्ञाय नमः नमः नमः नमः नमः (११६) [१५] पुष्करार्द्ध पश्चिमभरते अनागत जिन चोवीसी पांच कल्याणक श्रीअघटितसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीभ्रमणेद्र अर्हते नमः ६ श्रीभ्रमणद्रनाथाय नमः ६ श्रीश्रमणेद्रसर्वज्ञाय नमः ७ श्रीरुषभचंदनाथाय नमः [१६] जम्बूद्वीपे ऐरवतक्षेत्रे अतीतजिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीदयांतसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीअभिनंदनग्रहते ६ श्रीअभिनंदननाथाय नमः श्रीअभिनंदनसर्वज्ञाय नमः ७ श्रीरत्नेशनाथाय नमः [१७] जम्बूद्वीपे ऐरवतक्षेत्रे वर्तमान जिन चोवीसी पांच कल्याणक १८ श्रीअतिपार्श्वनाथाय नमः १६ श्रीमरुदेवअर्हते १६ श्रीमरुदेवनाथाय १६ श्रीमरुदेवसर्वज्ञाय २१ श्रीशामकाष्टसर्वज्ञाय नमः नमः नमः नमः नमः 11 htra om ममः (१२०) [१८] जम्बूद्वीपे ऐरक्तक्षेत्रे अनागत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीनंदिषेणसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीवतधरअर्हते नमः ६ श्रीव्रतधरनाथाय नमः ६ श्रीवतधरसर्वज्ञाय ७ श्रीनिर्वाणनाथाय नमः [१६] घातकीखंडे पूर्वऐरवते अतीत जिन चोवीसी पांच - कल्याणक ४ श्रीसौदयसर्वज्ञाय नमः ६ श्रोत्रिविक्रम ग्रहते ६ श्रीत्रिविक्रमनाथाय नमः ६ श्रीत्रिविक्रमसर्वज्ञाय ७ श्रीनरसिंहनाथाय नमः [२०] घातकोखंडे पूर्वऐरवतक्षेत्रे वर्तमान जिन चोवीसी पांच कल्याणक १८ श्रोकामनाथाय नमः १६ श्रासंतोषितहते १६ श्रीसंतोषितनाथाय १६. श्रीसंतोषितसर्वज्ञाय २१. श्रीखेमंतसर्वज्ञाय नमः नमः नमः ( १२१. ) (२१) धातकीखंडे पूर्वऐरवतक्षेत्रे अनागत जिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्री मुनिनाथसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीचंद्रदाहाहते ६ श्रीचंद्रदाहनाथाय नमः ६ श्रीचंद्रदाहसर्वज्ञाय नमः श्रीदिलादित्यनाथाय नमः नमः (२२) धातकीखंडे पश्चिमऐरबतक्षेत्रे अतीतजिन चोवीसी पांच कल्याणक नमः, ४ श्रीपुरुषसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीअवबोधग्रहते नमः ६ श्रीअवबोधनाथाय ६ श्रीअवबोधसर्वज्ञाय नमः ७ श्रीविक्रमेंद्रनाथाय नमः (२३) धतकी पश्चिम ऐरवतक्षेत्रे वर्तमानजिन चोवीसी पांच कल्याणक 1 १८ श्रीनंदकेशनाथाय नमः .

(१२२) *. नमः १६ श्रीहरअर्हते १६ श्रीहरनाथाय १६ श्री हर सर्वज्ञाय २१ श्रीसुशांतसर्वज्ञाय नमः नमः (२४) धातकी पश्चिम ऐरवतक्षेत्रे अतीतजिन चोवीसी पांच कल्याणक नमः ४ श्रीमहामृगेंद्रसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीप्रसौचितहते ६ श्रीप्रसौचितनाथाय ६ श्रीप्रसौचितसर्वज्ञाय नमः ७ श्रीधर्मेंद्रनाथाय नमः नमः (२५) पुष्करार्द्ध पूर्व ऐरवतक्षेत्रे अतीतजिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीअष्टाहिकसर्वज्ञाय नमः ६ श्रीवणिकअर्हते नमः ६ श्रीवणिकनाथाय नमः ६ श्रीवणिकसर्वज्ञाय ७ श्रीउदयज्ञाननाथाय नमः (१२३) (२६) पुष्कराई पूर्व ऐरवतक्षेत्रे वर्तमान जिन चोगोसी पांच कल्याणक नमः नमः १८ श्रीखेमंतनाथाय १६ श्रीसायकाक्षाहते नमः १६. श्रीसायकाक्षनाथाय १६ श्रीसायकाक्षसर्वज्ञाय नमः २१ श्रीतमोकंदनसर्वज्ञाय नमः (२७) पुष्करार्द्ध पूर्वऐरवतक्षेत्रे अनागतजिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीनिर्वाणसर्वज्ञाय ६ श्रीरविराजअर्हते ६ श्रीरविराजनाथाय नमः ६ श्रीरविराजसर्वज्ञाय ७. श्रीप्रथमनाथाय नमः नमः तमः नमः (२८) पुष्कराई पश्चिम ऐरवतक्षेने अतीतजिन चोवीसी पांच कल्याणक ४ श्रीअश्ववृदसर्वज्ञाय ६ श्रीकुटिलग्रहते नमः नमः नमः नमः ( १२४ ) ६ श्रीकुटिलनाथाय ६ श्रीकुटिलसर्वज्ञाय ७ श्रीवर्द्धमाननाथाय (२६) पुष्करार्द्ध पश्चिम ऐरवतक्षेत्रे वर्तमानजिन चोवीसी पांच कल्याणक नमः नमः नमः . १८ श्रीविवेकनाथाय १६ श्रीधर्मचन्द्रअर्हते १६ श्रीधर्मचंद्रनाथाय १६ श्रीधर्मचंद्रसर्वज्ञाय २१ श्रीनंदिक सर्वज्ञाय नमः नमः नमः (३०) पुष्करार्द्ध पश्चिम ऐरवतक्षेत्रे अनागत जिन चोवीसी पांच कल्याणक नमः नमः ४ श्रीकलापसर्वज्ञाय ६ श्रीविलोमन्नर्हते ६ श्रीविसोमनाथाय ६ श्रीविसोमसर्वज्ञाय ७ श्रीप्रारणनाथाय नमः नमः नमः इति मौन एकादशी १५० गुणणो . ( १२५ ) पौषवढी १० दशमी तपनु अधिकार प्रा तप. पोषवदि एटले गुजराती मागशरवदि १० ने दिवसे थाय छे, केमके ते दिवसे श्रीपार्श्वनाथन जन्मकल्याणक छे, तेमां प्रथम नवमीने दिवसे साकरना पाणीनुं ठाम चोविहार एकासगुं करवू, इग्यारसने दिवसे पडिक्कमणो देवपूजा करवी, ब्रह्मचर्य पालवं, शक्ति होयतो पोषो करवो, आतप दश वरष दश मास सुधी दरेक दशमने दिवसे एकाशणु करवू ा तप करनार सूरदत्तनी माफक प्रा लोक परलोकनेविषे सुखी थाय छे, अनुक्रमे मोक्षना सुख पामे, दशमीने दिवसे [श्रीपार्श्वनाथ अर्हते नमः] आ पदनी २० वीश मालां फेरवी अरिहंतना वार गुण होवाथी १२ साथीया १२ खमासणा १२ प्रदक्षिणा १२ लोगस्सनो काउस्सग करवो, उजमणामां ज्ञानदर्शन चारित्रनी दश दश वस्तु समजवी । .

( १२६ ) अथ मेरु तेरसतपनो अधिकार आ तपनो माघवदि गुजराती पोषवदि १३ तेरसने दिवसे प्रारंभ थाय छे, ते दिवसे श्रीरुषभदेवनुं निर्वाण कल्याणक थयुं छे तेथो ए दिवस महात्म्य घणु मोटुं छे, ते दिवसे चउविहार उपवास करवो, शक्ति न होय तो तिविहार करवो, रत्नना सोनाना चांदीना अथवा घीना पांच मेरु करवा, ते मेरु चारे दिशामां चार अने तेना वोचमां एक मोटो मेरु करवो, जो गाममां वाजा गाजा सहित फेरावं होयतो, ते मेरुने थालमा राखीने फेरवीने देरासरमां जइने चारे दिशामां तथा एक वीचमा नंदावर्त साथीया (गुहली) पाच करीने तेना उपर मुकीने दीप धूप प्रमुखथी पूजा करवी, आ तप तेर मास अथवा तेर वरस सुधी करवू, ते दिवसे [श्रीरुषभदेव पारगताय नमः] आ पदनी २० वीसमाला गणवी साथीया खमासणा प्रदक्षिणा काउस्सग्ग बार बार करवा ।

(१२७ ) अथ रोहिणी तप अधिकार या तप रोहिणी नक्षत्रमा थाय छे, तेथी ते रोहिणी तप कहेवाय छे, ते तप अक्षय तृतीया अथवा पागल पाछल रोहिणी नक्षत्र आवे त्यारे सरू थाय छे, ते तप श्रीवासुपूज्यस्वामीनी पूजापूर्वक सात वरस सात मास सुधी थाय छे, जे जे मासमां ज्यारे रोहिणी प्रावे, त्यारे उपवास प्रांबील अथवा एकाशणाथी ते तप करवो, कदाच भूल थइ जाय तो पाछो फरीथो करवो, देवपूजा प्रतिक्रमण देववंदन शीलवत आदि क्रिया करवी, उजमणामां रूप्य सुवर्णमय अशोकवृक्ष प्रादि करवो, आ तपथी अक्षयसुख मीले छे [श्रीवासुपूज्यसर्वज्ञाय नमः] आ पदनी वीशमाला फेरववी साथीया खमासणा काउस्सग्ग प्रदक्षिणा बार बार जाणवा। * ॥ अथ सोलीया (कषाय जय) तपनी विधिः ।। क्रोध १ मान २ माया ३ लोभ ४ मा चार कषायना सोल भेद थाय छे यथा अनंतानुबंधी ४ अप्रत्याख्यानी ४ ( १२८ ) प्रत्याख्यानी ४ संज्वल ४ आ कषायने जीतवाने चार अोली करवी, यथा पहेले दिवसे एकासणुं बीजे दिवसे नीवी त्रीजे दिवसे प्रांबील चोथे दिवसे उपवास करवाथी एक अोली पुरो थाय छे । एवी रीते चार अोली करवाथी १६ दिवसे या तप पूरो थाय छे, प्रा तप पूर्ण थया बाद ज्ञानपूजा पूर्वक १६ मोदक फलफूल आदि अष्टद्रव्यथी जिनेश्वरनी पूजा करवी, (सर्वकषाय जप तपसे नमः) ए पदनी दररोज २० वीशमाला गणवी, अने साथीया विगेरे सोल सोल करवा, प्रतिक्रमण देववंदन आदि क्रिया हमेसानी माफक समजवी । ।। अथ पखबासो तप विधिः ।। प्रथम शुभदिने गुरू पासे तप ग्रहण करे, पछे सुदि एकमथी लगाथीपूनम सुधी १५ उपवास भेगा करे पनर उपवासनी शक्ति न होय तो प्रथम सुदि पक्षनी एकमे उपवास करवो, पछे बीजे मासे सुदि बीज त्रीजे मासे सुदि त्रीज एम अनुक्रमे पनरमे मासे पूनमनो उपवास *- ( १२६ ) करवो, त्यारे या तप पूरो थाय छे, जे दिवसे उपवास होय ते दिवसे (श्रीमुनिसुव्रतस्वामी सर्वज्ञाय नमः) प्रा पदनी २० माला गणवी, साथीया आदि बार बार समजवा, प्रतिक्रमण देववंदनादि क्रिया सर्वे करवी । ।। अथ छमासी तपविधिः ।। श्रीमहावीरस्वामीना शासनमा उत्कृष्ट छमासी (उप- वास १८० नो) तप थाय छे तेथी तेने पाश्रीने एकसो ऐसी उपवास एकांतरीया पारणावाला करवा उजमणामां १८० लाडु फल विगेरे प्रभुने पागल राखवा, तपस्याने दिवसे (श्रीमहावीरनाथाय नमः) आ पदनी वीश माला साथीया विगेरे बार बार करवा, अथवा एकांतरीया उपवास छमास सुधी करवा, तेमां चउदशे खवाय नही, चोमासीनो छठ करवो, शरु करतां छठ तेमज पारणुं पण छठे थाय छे, प्रा छमासी तपमां ६० उपवास थाय छ, देववंदनादि क्रिया करवी, एवीरीते आठमासी तप करवो होयतो पाठमास करवा । - ( १३० ) ।। अथ वरषीतप विधि ।। श्रीरुषभदेवस्वामीए चैत्र (गुजराती फागण) वदि ८ मे दीक्षा लइने बीजा वरषनी अखात्रीजे (चारसो उपवासे) पारणो कर्यो तेथी आने वरषीतप कहे छे, श्रा तप चैत्रवदी पाठमथी सरु करतां त्रीजे वर्षे अखा- त्रीजनो पूर्ण थाय छे, प्रा तपमां एकांतरीया उपवास करवा, तप करतां वचली अखात्रीजमां पारणो आवे तो ते दिवसे उपवास करवो, पण पारणो न करवो, छेले दिवसे देवगुरुनी पूजा पूर्वक स्वामीवत्सल करीने पारणो करवो, तपस्याने दिवसे (श्रीरुषभदेवनाथाय नमः) प्रा पदनी वीश माला फेरवी, साथीया विगेरे बार बार समजवा। (बीजीरीत) श्री रुषभदेव स्वामीना शासनमा उत्कृष्ट तपस्या बार मासनी होवाथो आखात्रीजे एकांतरीया उपवास सरु करीने बीजे वरषे आखात्रीजनो पारणो करे बाकी विधि ऊपर प्रमाणे- हालमां आ तप करवानो प्रचार प्रा प्रमाणे छः 1.

( १३१ ) चैत्रवद ८ ने दिवसे उपवासथी सरु करी एकांतरे पारणे बेयासणु करी तेर मास अने अगीचार दिवसे एटले आखात्रीजे पारण करे छे, पारणे १०८ घडा सेलडीनो रस अथवा साकरनो पाणी पीए छ, घडो रूपानो घणो नानो बनावे छ।] श्रा तपमा चउदशनो पारणो न करवो जोइए तेम त्रण चोमासी (१४-१५) ना छठ करवा जोइए, अने छेवटे छठथी ओछे तपे पारणुं न करवं जोइए, सेलडीनो रस बे पहोर पछे अभक्ष्य थाय छे तेथी ताजो वापरवो, उपवासने दिवसे देववंदनादि क्रिया करवी । ।। अथ २८ लब्धि तपविधि ।। श्रा तप एक एक लब्धिनो एक एक एकांतरीया उपवास करवाथी अठ्ठावीस उपवासे पूरो थाय छे, प्रने जे लब्धिनो उपवास चालतो होय, ते लब्धिनी २० माला फेरवी, अने देववंदनादि क्रिया करवी प्रा तपस्या करवाथी पाणंद थाय छ ।

(१३२) ॥ २८ लब्धिनो गुणणो । लब्धये नमः १ श्रीग्रामोसही २ श्रीवीपोसही ३ श्रीखेलोसहो ४ श्रीजल्लोसही ५ श्रीसव्वोसहो ६ श्रीसंभिन्नसोयोसही • ७ श्रीअवधि ८ श्रीरुजुमद ६ श्रीविपुलमा १० श्रीचारण ११ श्रीपासीविस १२ श्रीकेवल १३ श्रीगणधर १४ श्रीपूर्वधर १५ श्री अरिहंत १६ श्रीचक्रवति (१३३) लब्धये नमः १७ श्रीबलदेव १८ श्रीवासुदेव १६ श्रीअमृताश्रव २० श्रीकुठबुद्धि २१ श्रीपदानुसारि २२ श्रीबीयबुद्धि २३ श्रीतेजोलेश्या २४ श्रीयाहारक २५ श्रीशीतलेश्या २६ श्रीवैक्रिय २७ श्रीअक्षीणमानसी २८ श्रीपुलाकन ॥ अथ १४ पूर्व तपविधिः ।। , आ चउद पूर्वनी तपस्या एकांतरीया चउद १४ उपवास पूरा करवाथी थाय छ, जे दिवसे जे पूर्व नु उपवास होय, ते दिवसे ते पूर्वनी २० माला गणे, ( १३४ ) आ तप सुदि १४थी सरु करवो, अने साथीया विगेरे कोष्टमां देखवा देववंदनादि सर्व क्रिया करवी तप पूर्ण थया उजमणो ज्ञान पंचमी सरखो जाणवो। अथ १४ पूर्वनो गुणणो आदि +- सा. ख. लो. माला पूर्वाय नमः १४-१४-१४-२० १ श्रीउत्पाद २ श्रीअग्रायणी ३ श्रीवीर्यप्रवाद २६-२६-२६-२० १६-१६-१६-२० २८-२८-२८-२० ४ अस्तिप्रवाद १२.-१२-१२-२० २-२-२-२० १६-१६-१६-२० ३०-३०-३०-२० ५ श्रीज्ञानप्रवाद ६ श्रीसत्यप्रवाद ७ श्रीवात्मप्रवाद ८ श्रीकर्मप्रवाद 8 श्रीप्रत्याख्यानप्रवाद १० श्रीविद्याप्रवाद ११ श्रीकल्याणकप्रवाद १२ श्रीप्राणावाय २०-२०-२०-२० १५-१५-१५-२० १२-१२-१२-२० १३-१३-१३-२० (१३५) १३ श्रीक्रियाविशाल १४ श्रीलोकबिंदुसार ३०-३०-३०-२० २५-२५-२५-२० R अथ तिलक तपविधि आ तप त्रीश उपवासे पुरो थाय छे तेमां श्रीरुषभदेव- स्वामी सम्बन्धी ६ छ उपवास करे, पछे अजितनाथ आदि बावीस तीर्थङ्करों सम्बन्धी एक एक उपवास करे अने महावीरस्वामी सम्बन्धी बे उपवास करे गुणणो जे तीर्थङ्कर सम्बन्धी उपवास होय, तेनो गुणणो करे, साथीयो विगेरे बारबार, देववंदनादि सर्व क्रिया करे । गुणणो सर्वज्ञाय नमः १ श्रीरुषभदेव २ श्रीअजितनाथ ३ श्रीसम्भवनाथ ४ श्रीअभिनन्दन ५ श्रीसुमतिनाथ ६ श्रीपद्मप्रभु " (१३६) सर्वज्ञाय नमः -- . ७ श्रीसुपार्श्वनाथ ८ श्रीचन्द्रप्रभु ६ श्रीसुविधिनाथ १० श्रीशोतलनाथ ११ श्रीश्रेयांसनाथ १२ श्रीवासुपूज्यस्वामी १३ श्रीविमलनाथ १४ श्रीअनन्तनाथ १५ श्रीधर्मनाथ १६ श्रीशांतिनाथ १७ श्रीकुंथनाथ १८ श्रीअरनाथ १६ श्रीमल्लिनाथ २० श्रीमुनिसुव्रत २१ श्रीनमिनाथ २२ श्रीनेमिनाथ २३ श्रीपार्श्वनाथ २४ श्रीमहावीर - (१३७) ।। अथ ४५ आगम तपविधि ।। . पा तप ४५ उपवास करवाथी पूरो थाय छ, प्रा तपना उपवास एकांतरीया अथवा ज्ञानादि तिथीमा छुटा छुटा पण थाय छे, जे सूत्र चालतो होय ते सूत्रनी वीश माला गणवी. साथीया विगेरे कोष्टक प्रमाणे जाणबा । प्रथम ११ अंग गुणणो सा. ख. लो. माला १ श्रीपाचारांगसूत्राय नमः २५-२५-२५-२० २ श्रीसुगडांगसूत्राय नमः २३-२३-२३-२० ३ श्रीठांणांगसूत्राय नमः १०-१०-१०-२० ४ श्रोसमवायांगसूत्राय नमः १०४-१०४-१०४-२० ५ श्रीभगवतीसूत्राय नमः ४२-४२-४२-२० ६ श्रीज्ञातांगसूत्राय नमः १६-१६-१६-२० ७ श्रीउपाशकदशांगसूत्राय नमः १०-१०-१०-२० ८ श्रीअंतगडदशांगसूत्राय नमः १६-१६-१६-२० ६ श्रोअनुत्तरोववाइसूत्राय नमः २३-२३-२३-२० १० श्रीपन्नावागरणसूत्राय नमः १०-१०-१०-२० ११ श्रीविपाकसूत्राय नमः २०-२०-२०-२० ( १३८ ) बार उपांग १२ श्रीउववाइसूवाय नमः १३ श्रीरायपसेणीसूत्राय नमः १४ श्रीजीवाभिगमसूत्राय नमः १५ श्रीपन्नवणासूत्राय नमः १६ श्रीजम्बूद्दिवपन्नत्तीसूत्राय नमः १७ श्रीचंदपन्नत्तीसूत्राय नमः १८ श्रीसूरपन्नत्तीसूत्राय नमः १६ श्रीकप्पिया २० श्रीकप्पडिसिया २१ श्रीपुफिया २२ श्रीपुप्फचलिया २३ वह्निदशा २३-२३-२३-२० ४२-४२-४२-२० १०-१०-१०-२० ३६-३६-३६-२० ५०-५०-५०-२० ५०-५०-५०-२० ५७-५७-५७-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२०. १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० ६ छ छेद सूत्र *-- २४ श्रीव्यवहार सूत्राय नमः २५ श्रीबृहत्कल्प २६ श्रीदशाश्रुतस्कन्ध २७ श्रीनिशीथ २०-२०-२०-२० ३-३-३-२० १६-१६-११-२० १६-१६-१६-२० A FIN ४२-४२-४२-२० ३५-३५-३५-२० भाजोतिसकरंडक ( १३९ ) २८ श्रीमहानिशीथ २६ श्रीजीतकल्प १० पयन्ता ३० श्रीचउसरणपयन्ना सूत्राय नमः ३१ श्रीसंथारापयन्ना ३२. श्रीतन्दुलपयन्ना ३३ श्रीचन्दाविज्झा ३४ श्रीगणिविज्जा ३५. श्रीदेविदथुप्रो ३६ श्रीवीरथुप्रो ३७ श्रीगच्छाचार ३६ श्रीमहापच्चक्खाण . १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० १०-१०-१०-२० : ४ मूलसूत्र ४० श्रोआवश्यकसूत्राय नमः ०१ श्रीउत्तराध्यन ४२. श्रीग्रोधनियुक्ति ४३ श्रीदशवैकालिक ३२-३२-३२-२० ३६-३६-३६-२० १०-१०-१०-२० १४-१४-१४-२० ( १४० ) । बे छुटक सूत्र ॥ ४४ श्रीअनुयोगद्वारसूत्राय नमः ४५ श्रीनन्दीसूत्राय नमः ६२-६२-६२-२० ५१-५१-५१-२० ११ गणधर तप आ तप दरेक एक एक गणधरनी एक एक उपवास अथवा प्रांबील करवाथी पूरो थाय छे तेमा जे गणधर नो उपवास होय ते दिवसे ते गणधरनो जाप २० मालानो करवो, अने साथीया विगेरे इग्यार इग्यार समजवा बीजी क्रिया बधि सरखी करवो । .. गणधरनो जाप गणधराय नमः . १ श्रीइन्द्रभूति २ श्रीअग्निभूति ३ श्रीवायुभूति ४ श्रीब्यक्तभूति ५ श्रीसुधर्मा ६ श्रीमंडित ( १४१ ) ७. श्रीमौर्यपुत्र ८ श्रीप्रकम्पित है. श्रीअचल १० श्रीमेतार्य ११ श्रीप्रभास || नवकार तपविधि ।। प्रा तप जेटला अक्षर होय, तेटला उपवास करवाथी पूरो थाय छे जे दिवसे जे पदनो उपवास होय, ते .. पदनी २० माला गणवी बधा नवे पदना ६८ उपवास थाय छे । साथीया आदि जेटला जेपदना अक्षरो होय, तेटला समजवा । उपवास ७ ५ गुणणो १ नमो अरिहंताणं २ नमो सिद्धाणं ३ नमो पायरियाणं ४ नमो उवज्झायाणं ५ नमो लोए सव्वसाहूणं ६ एसो पंच नमुक्कारो ७ ७ है ८ ( १४२ ) उपवास गुणणो ७ सव्वपावप्पणासणो ८ मंगलाणं च सव्वेसि ६ पढमं हवइ मंगलं इन्द्रिय जय तप पुरिमढ्ढ, बेचासणुं, नीवी, प्रांबील अने उपवास ए प्रमाणे पांच दिवसे करवाथी एक इन्द्रिय जयनो तप थाय छे, ए रीते पांच इन्द्रियोना जय माटे पांच अोली करवाथी पचीस दिवसे या तप पूरो थाय छे, जे इन्द्रियनो तप होय, ते तपनों जाप करवो । सा. ख. लो. माला ८ २० ५ ५ २० अोलीमा स्पर्शन्द्रिय तपसे नमः २ अोलोमां रसेंद्रिय ३ अोलीमां घ्राणेंद्रिय ४ अोलीमा चक्षुरिद्रिय ५ अोलीमां श्रोत्रंद्रिय २ २. or २० ५ ५ ५. २० ५ ५५ २० ( १४३ ) ८ कर्मसुदन तप आ तपनी आठ अोली होय छे, एक एक अोली आठ पाठ उपवासनी होय छे, तेमां प्रथम अठम करवो, पछे एकांतरीया ६० उपवास करीने उपर एक अठम करवो बधामीलीने ६६ उपवास थाय छे, ६२ पारणा थाय छ । अथवा बोजी रीती पहेले दिवसे उपवास बीजे दिवसे एकासणो त्रीजे दिवसे ठाम चोवीहार एकदाणानो आंबील करवो, चोथे दिवसे एकलठाणु (चोवीहार एकासगुं) करवू, पांचमे दिवसे ठामचोबोहार एकदत्ती (एक वखते भाणामां पडेलुज खावू ते) नुं एकासणुं करवं, छठे दिवसे लुखी नीवी सातमे दिवसे प्रांबील आठमे दिवसे अठकवलनु एकासगुं करवं, प्रा रीतीथी आठ दिवसमां ा तप पूरों थाय छे साथीया विगेरे जेटली जे कर्मनी प्रकृतिप्रो होय तेटला करवा, माला २० गणवी उजमणामां मूल पाठ कर्म उत्तर प्रकृति १५८ होवाथी रूपानो एक वृक्ष कराववो, ते पण आठ शाखा अने १५८ पानडा सहीत कराववो, तेना मूलमां कर्मरूप वृक्षने छेदवाने सोनानो कुहाडो राखवो जे दिवसे जे कर्मनो तप चालतो होय, ते दिवसे तेनो गुणणो आदि करवो।

( १४४ ) ५ 8 26 w गुणणो ख. लो. सा. माला १ श्रीअनन्तज्ञान गुणधारकाय नमः ५ २० २ श्रीअनन्तदर्शन २० ३ श्रीअव्याबाध २ २ २ २० ४ श्रीक्षायिकसम्यक्त्व २८-२८-२८-२० ५ श्रीअक्षयस्थिति ४ ४ ४ २० ६ श्रीप्रमूत्ति १०३-१०३-१०३-२० ७ श्रीगुरुलघु २ २० ८ श्रीअनन्तवीर्य ५ ५ २० २ २ ५ - चन्दनवालानो अठम तपविधि कोइपण दिवसे आ अठमतप करवो, पारणे अडदना बाकला मुनिने वहोराचीने पोते पण तेनोज पारणो करे, पारणे आंबीलनो पच्चक्खाण करे, अने ठाम चोवीहार करवो, प्रा तपना पारणे रुपानी सूपडीने खुणे अडदना बाकडा भरीने बहोरावे, ते साथे रुपानाणाथी गुरुनी पूजा करे, वहोरावती वखते पगमां तथा हाथमा सुतरनी अथवा रेशमनी फालकानी प्रांटी नाखवी, वली पातपमा (श्री महावीरनाथाय नमः) या पदनी वीश माला.गणवी साथीया विगेरे बार बार समजवा ।

(१४५.) ।। अथ पञ्चकल्याणक तपविधिः ।। प्रा तप पांच वर्षमा पुरो थाय छे, अने उपवास प्रांबील नीवी अथवा एकासणाथी प्रा तप कराय छे, एक एक कल्याणकनो एक एक उपवास करवो, जे तिथिये एक, बे, त्रण, चार के पांच कल्याणक होय तो, ते तिथिये प्रतिवर्ष एक एक उपवास करीने तप पुरो करवो जे कल्याणक नो उपवास चालतो होय तेनो गुणणो २० माला साथीया काउस्सग विगेरे बार बार जाणवा, बीजी क्रिया नित्य- क्रिया माफक । पञ्चकल्याणकनुं गुणणो कल्याणक केवल जनम तिथि कात्तिक (गुजराती प्रासो) वदि ५ श्रीसंभवनाथ सर्वज्ञाय नमः १२ श्रीपद्मप्रभु अर्हते नमः. १२ श्रीनेमिनाथपरमेष्टिने नमः . . १३. श्रोपद्मप्रभुनाथाय नमः ))श्रीमहावीर पारंगताय नमः . दीक्षा मोक्ष (१४६) कातिक सुदि केवल केवल ३ श्रीसुविधिनाथ सर्वज्ञाय नमः १२ श्रोअरनाथ सर्वज्ञाय नमः मागशोर (गु० कातिक) वदि ५ श्रीसुविधिअर्हते नमः ६ श्रीसुविधिनाथाय नमः १० श्रीमहावीर नाथाय नमः ११ श्रीपद्मप्रभ पारंगताय नमः दीक्षा दीक्षा मोक्ष मागशीर सुदि १० श्रीअरनाथ अर्हते नमः १० श्रीअरनाथ पारंगताय नमः ११ श्रीअरनाथनाथाय नमः ११ श्रीमल्लिनाथ अर्हते नमः ११ श्रीमल्लिनाथ नाथाय नमः ११ श्रीमल्लिनाथ सर्वज्ञाय नमः ११ श्रीनमिनाथ सर्वज्ञाय नमः १४ श्रीसम्भवनाथ अर्हते नमः •५ श्रीसम्भवनाथ नाथाय नमः मोक्ष दीक्षा जन्म दीक्षा केवल केवलं जन्म दीक्षा (१४७) पोष (गु० मगशीर) वदि जन्म दीक्षा १० श्रीपार्श्वनाथअर्हते नमः . ११ श्रीपार्श्वनाथनाथाय नमः १२ श्रीचन्द्रप्रभअर्हते नमः १३ श्रीचन्द्रप्रभनाथाय नमः १४ श्रीशीतलनाथ सर्वज्ञाय नमः दीक्षा केवल पोष सुदि केवल ६ श्रीविमलनाथ सर्वज्ञाय नमः ६ धीशांतिनाथ ११ श्रोअजितनाथ १४. श्रीअभिनन्दन १५. श्रीधर्मनाथ " ११. माघ (गु० पोष) वदि ६. श्रीपद्मप्रभ परमेष्टिने नमः १२ श्रीशीतलनाथ अर्हते नमः १२ श्रीशीतलनाथ नाथाय नमः १३. श्रीऋषभदेव पारंगताय नमः ०))श्रीश्रेयांसनाथ सर्वज्ञाय नमः च्यवन जन्म दीक्षा मोक्ष केवल (१४८), माघ सुदि जन्म केवल 'जन्म २ श्रीअभिनन्दन अर्हते नमः २ श्रीवासुपूज्य सर्वज्ञाय नमः ३ श्रीविमलनाथ अर्हते नमः ३ श्रीधर्मनाथ अर्हते नमः ४ श्रीविमलनाथ नाथाय नमः ८ श्रीअजितनाथ अर्हते नमः है श्रीअजितनाथ नाथाय नम: १२ श्रीअभिनन्दन नाथाय नमः १३ श्रीधर्मनाथ नाथान नमः जन्म दीक्षा जन्म दीक्षा दीक्षा दीक्षा फागण (माघ) वदिः ६. श्रीसुपार्श्वनाथ सर्वज्ञाय नमः ७ श्रीसुपार्श्वनाथ पारंगताय नमः ७ श्रीचन्द्रप्रभ सर्वज्ञाय नमः है श्रीसुविधिनाथ परमेष्टिने नमः ११ श्रीरुषभदेव सर्वज्ञाय नमः १२ श्रीश्रेयांसनाथ अर्हते नमः १२ श्रीमुनिसुव्रत सर्वज्ञाय नमः १३ श्रीश्रेयांसनाथ नाथाय नमः केवल मोक्ष केवल च्यवन केवल जन्म केवल दीक्षा जन्म दीक्षा १४ श्रीवासुपूज्य अर्हते नमः 2))श्रीवासुपूज्य नाथाय नमः फाल्गुन सुदि २ श्रीअरनाथ परमेष्टिने नमः ४ श्रीमल्लिनाथ परमेष्टिने नमः ८ श्रीसम्भवनाथ परमेष्टिने नमः १२ श्रीमल्लिनाथ पारंगताय नमः १२ श्री मुनिसुव्रत नाथाय नमः चैत्र (गु० फागण) वदि श्रीपार्श्वनाथ परमेष्टिने नमः श्रीपार्श्वनाथ सर्वज्ञाय नमः ५. श्रीचंद्रप्रभ परमेष्टिने नमः ८ श्रीऋषभदेव अर्हते नमः ८ श्रीऋषभदेव नाथाय नमः च्यवन च्यवन च्यवन मोक्ष दीक्षा च्यवन. केवल च्यवन जन्म दीक्षा चैत्र सुदि ३ श्रीकुंथुनाथ सर्वज्ञाय नमः ५ श्रीअजितनाथ पारंगताय नमः ५ श्रीसंभवनाथ पारंगताय नमः ५ श्रीअनंतनाथ पारंगताय नमः 1 केवल मोक्ष मोक्ष मोक्ष ( १५० ) मोक्ष केवल जन्म केवल ६ श्रीसुमतिनाथ पारंगताय नमः ११ श्रीसुमतिनाथ सर्वज्ञाय नमः १३ श्रीमहावीर अहंते नमः १५ श्रीपद्मप्रभ सर्वज्ञाय नमः वैशाख [गु० चैत्र] वदि १ श्रीकुंथनाथ पारंगताय नमः २ श्रीशीतलनाथ पारंगताय नमः ५ श्रीकुंथुनाथ नाथाय नमः ६ श्रीशीतलनाथ परमेष्टिने नमः १० ० श्रीनमिनाथ पारंगताय नमः १३ श्रीअनंतनाथ नाथाय नमः १४ श्रीअनंतनाथ अर्हते नमः १४ श्रीअनंतनाथ सर्वज्ञाय नमः १४ श्रीकुंथुनाथ अर्हते नमः मोक्ष मोक्ष दीक्षा च्यवन मोक्ष दीक्ष जन्म केवल जन्म वैशाख सुदि च्यवन च्यवत ४ श्रीअभिनंदन परमेष्टिने नमः ७ श्रीधर्मनाथ परमेष्टिने नमः ८ श्रीअभिनंदन पारंगताय नमः ८ श्रीसुमतिनाथ अर्हते नमः मोक्ष जन्म arestu . दीक्षा केवल च्यवन च्यवन ६ श्रीसुमतिनाथ नाथाय नमः १० श्रीमहावीर सर्वज्ञाय नमः १२ श्रीविमलनाथ परमेष्टिने नमः १३. श्रीअजितनाथ परमेष्टिने नमः जेठ (गु० वैशाख) वदि ६ श्रीश्रेयांसनाथ परमेष्टिने नमः ८ श्रीमुनिसुव्रत अर्हते नमः ६ श्रीमुनिसुव्रत पारंगताय नमः १३ श्रीशांतिनाथ अर्हते नमः १३ श्रीशांतिनाथ पारंगताय नमः १४ श्रीशांतिनाथ नाथाय नमः च्यवन जन्म मोक्ष .. जन्म मोक्ष दीक्षा जेठ सुदि मोक्ष च्यवन ५ श्रीधर्मनाथ पारंगताय नमः ६ श्रीवासुपूज्य परमेष्टिने नमः १२ श्रीसुपार्श्वनाथ अर्हते. नमः १३ श्रीसुपार्श्वनाथ नाथाय नमः प्राषाढ (गु० जेठ) यदि जन्म दीक्षा ४ श्रीऋषभदेव परमेष्टिने नमः ७ श्रीविमलनाथ पारंगताय नमः मोक्ष ( १५२ ) दीक्षा च्यवन मोक्ष मोक्ष मोक्ष च्यवन जन्म च्यवन 8- श्रीनमिनाथ नाथाय नमः आषाढ सुदि ६ श्रीमहावीर परमेष्टिने नमः ८ श्रीनेमिनाथ पारंगताय नमः १४ श्रीवासुपूज्य पारंगताय नमः श्रावण (गु० आषाढ) वदि ३ श्रीश्रेयांसनाथ पारंगताय नमः ७ श्री अनन्तनाथ परमेष्टिने नमः ८ श्रीनमिनाथ अर्हते नमः ६ श्रीकुंथुनाथ परमेष्टिने नमः श्रावण सुदि २ श्रीसुमितनाथ परमेष्टिने नमः ५ श्रीनेमिनाथ अर्हते नमः ६ श्रीनेमिनाथ नाथाय नमः ८ श्रीपार्श्वनाथ पारंगताय नमः १५ श्रीमुनिसुव्रत परमेष्टिने नमः भादरवा (गुं० श्रावण) वदि ७ श्रीशांतिनाथं परमेष्टिने नमः ७ श्रीचन्द्रप्रभ पारंगताय नमः श्रीसुपार्श्वनाथ परमेष्टिने नमः च्यवन जन्म दीक्षा मोक्ष च्यवन - च्यवन मोक्ष च्यवन (१५३) . मोक्ष भादरवा सुदि ६ श्रीसुविधिनाथ पारंगताय नमः प्रासो (गु० भादरवा) वदि १३ श्रीमहावीर परमेष्टिने नमः ०) श्रीनेमिनाथ सर्वज्ञाय नमः आसोज सुदि १५ नमिनाथ परमेष्टिने नमः गर्भापहार केवल. च्यवन ।। अथ गोतमपात्रो तपविधि ।। आ तपमा दरेक पूर्णिमाए उपवास करवो, श्रीगोतम- स्वामीनी पूजा करवी, एवी रीते १५ पूर्णिमा सुधी तप करवो, तप पूर्ण थाय पारणे रूपानो पात्र करावी तेमां खीर भरी झोली सहित गोतमस्वामि तथा महावीरस्वामीनी आगल पात्र राखवो, अने साधुना पात्रामा खीर बोरावीने पोछे, खीरनो पारणो करे स्नात्र आदि पुजा करावे, उप- वासने दिवसे (श्रीगोतमस्वामिने नमः) पा पदनी २० माला साथीया विगेरे सतावीस सतावोस जाणवा ।

( १५४ ) पञ्चरङ्गी तप पांच जणा पांचपांच उपवासवाला, पांच जणा चार चार उपवासवाला, पांच जरगा त्रण ऋण उपवासवाला, पांच जणा बबे उपवासवाला, पांच जणा एक एक उपवास- वाला, बधा मीलीने २५ जणा होवा जोइए, वधारे होय तो हरकत नहीं, अने छेले दिवसे बधा जणानो पारणो आववो जोइये। - नवरङ्गी तप प्रा तपस्यामा ८१ जणा होवा जोइये केमके नव जणा नव नव उपवासवाला उतरतां उतरतां अनुक्रमे छेला नव एक एक उपवासवाला समजवा, पारणो एक दिवसे बधानो श्राववो जोइये। . - अांबील वर्द्धमान तप प्रा तपमां एक प्रांबील करी उपवास पछी बै प्रांबील करी उपवास पछी त्रण आंबील करी उपवास यावत् अनु- क्रमे १०० सो प्रांबील करी उपवास करवो या तप लागट ( १५५ ) करे तो १४ वर्ष त्रण मास २० दिवसे पुरो थाय छे, पा तप शरु करतां प्रथम पांच अोली लागट करवी, प्रा तपमां हमेशां तपने दिवसे. (नमो अरिहंताणं) पा पदनी २० माला अने साथीया विगेरे बार बार समजवा । अथ नन्दीश्वर तप विधिः आ तप श्रीनन्दीश्वरद्वीपमां. ५२ शाश्वता चत्य श्राश्री ५२ उपवास करवाथी पुरो थाय छे, ते बावन उपवासो अमावास्याने दिवसे करवाना छे, प्रा तप दीवालीनी अमावास्याये शरु करवानो छे, जे दिवसे उपवास होय ते दिवसे (श्रीनन्दीश्वर शाश्वत जिन चैत्याय नमः) श्रा पदनी २० . माला गणवी, साथ या विगेरे बार बार समजवा। दर्शन तप विधिः प्रां तप एक अउम तप करवाथी अथवा एकांतरीया ३ उपवास करवाथी थाय छे।

( १५६ ) ज्ञान तपविधि प्रा तप एक अठम अथवा एकांतरीया त्रण उपवासथी पुरो थाय छ। चारित्र तपविधि आ तप एक अठम अथवा एकांतरीया त्रण उपवासथी पुरो थाय छ । श्रा त्रणे तपनो गुणणो आदि नवपदविधि प्रमाणे करवो। धर्मचक्र तप प्रथम छठ करीने पारणो करवो पछे एकांतरीया ६० उपवास करवा, अरिहंत पदनुं गुणगुं आदि अरवं । . . योगशुद्धि तप मनोयोग प्राश्री प्रथम दिवसे नीवि बीजे दिवसे प्रांबील त्रीजे दिवसे उपवास करवो एवी रीते वचन योगनी अने काययोगनी ओलि करवी । प्रा तप त्रणे पोलीए पुरो थाय छे, गुणणो २० माला साथीया खमा० काउस्सग्ग ३ त्रण त्रण करवा प्रथम अोलीमा मनोयोग ( १५७ ) तप से नमः बीजी अोलीमां वचोयोग तपसे नमः त्रीजी अोलीमां कामयोग तपसे. नमः । अठ्ठाइ तपः आ तप आसो चैत्र सुदि आठमथी शरु थाय छे, आठमथी पूनमसुधी आठ दिवसोमां एकासणु नीवी प्रांबील अथवा उपवास करवा पा तप सात वरसे पुरो थाय छ । चांद्रायण तपः आ तपना बे भेद छ, सुदि एकसे एक कवल बीजे बे कवल एम एक एक कवलनी वृद्धि करवाथी पूनमने दिवसे १५ कवल लेवा, वदि एक में १५ कवल पछे एक एक कवल अोछो करवाथी अमावास्याये एक कवल लेवो, एक मासमा प्रा तप पूरो थाय छ, प्रा तपने यव.मध्य चांद्रायण कहे छे, वदि एकमें एक कवल, बीजे बे कवल एम एक एकनी वृद्धि करवाथी अमावस्याये १५ कवल लेवा सुदि एकमे १५ कवल पछे एक एक कवल ओछो करवाथी पूनमने दिवसे एक कंवल लेवो पा तप पण एक मासमा पुरो थाय छ ा तपने वजमध्य चांद्रायण कहे छ ।

(१५८) तीर्थङ्कर वर्धमान तपः आ तप एकासणा नीवी प्रांबील अथवा उपवासथी थाय छे, तेमा प्रथम श्रीऋषभदेवस्वामीनु एक एकासणु बीजा अजितनाथना बे एकासणा एक एक एकासणानी वृद्धि करतां चोवीसमा महावीरस्वामीना २४ एकासणा करवा । पछे महावीरस्वामीनु एक एकासणु पार्श्वनाथना बे एकासणा एम एक एक एकासणानी वृद्धि करतां श्री ऋषभदेवस्वामीना २४ एकासणा करे एम एक एक तीर्थ- करना २५ एकासणा थाय छे उपवास प्रादिथी पा प करवो होय तो उपर कहेल विधिथी २५-२५ उपवास करवा एकांतरिया करवा होय अथवा छुटापण उपवास करी शकाय छ जे तीर्थकरनो तप चालतो होय ते तीर्थंकरनो जाप करवो, बाकी अरिहंत पदनी जेम समजवो । परम भूषण तपः या तपमा बत्रीस लागट प्रांबील करवा, अथवा एकांतरीया एकासणावाला ३२ धांबील करवा गुणणो प्रादि अरिहंत पदनी जेम।

(१५९) तीर्थकर दीक्षा तपः श्रा तपमा जे जे तीर्थंकरोए दीक्षा लेती वखते जे तप कर्यो छे ते तप एकी साथे अथवा एकांतरिया उपवासथो पूरो करवानो छ । सुमतिनाथे एकासणो करीने दीक्षा लीधी छे तेथी एकासणो करवो, वासुपूज्यस्वामिए उपवास करीने दीक्षा लोधी छे ते पाश्री एक उपवास अने मल्लिनाथ अने पार्श्वनाथे अठम करीने दीक्षा लीधी छे ते पाश्री अठम अथवा एकांतरिया त्रण उपवास बाकी २० तीर्थकरोए छठ करीने दीक्षा लीधी छे ते पाश्री छठ अथवा एकांतरीया बे उपवास करवा, गुणणामां जे तीर्थकरती तपस्या चालती होय ते तीर्थकरना. नामने पागल नाथाय नमः जेम श्री ऋषभदेवनाथाय नमः बाकी अरिहंत पदनी जेम समजवो । -- तोर्थङ्कर ज्ञानतपः श्रा तपमा जे जे तीर्थंकरोने जे जे तपस्याथी केवल ज्ञान उपनु छे ते तप एकी साथे अथवा एकांतरिया उपवास करवाथी पूरो थाय छे श्रीऋषभदेव मल्लिनाथ नेमिनाथ पार्श्वनाथ ने केवलज्ञान अठम तपथी उपनु छे तेथी चार अठम अथवा एकांतरिया उपवास करवा, ( १६० ) वासुपूज्यस्वामिने केवलज्ञान एक उपवासथी उपनु छे तेथी एक उपवास करवू, बाकी १६ तीर्थकरोने केवलज्ञान छठ तपथी उपनु छ तेथी १६ छठ अथवा एकांतरिया उपवास करवा । जे जे तीर्थंकरनो तप चालतो होय ते ते तीर्थंकरनो गुणणो करवो । श्रीऋषभदेव सर्वज्ञाय नमः, इत्यादि साथिया आदि अरिहंत पदनी जेम समजवा । : तीर्थंकर निर्वाण तपः आ तपमा जे जे तीर्थङ्करों जे जे तपश्चर्याथी मोक्षे गया छे ते तप एकी साथे अथवा एकांतरिया उपवास करवाथी पूरो थाय छ, श्रीऋषभदेव छ उपवासथी मोक्ष गया छे, महावीरस्वामी छठ करीने मोक्ष गया छे, अने बाकी २२ तीर्थङ्करो एक मासना एटले ३० उपवास करीने मोक्ष गया छे, ते एकीसाथे अथवा एकांतरिया अथवा छुटा उपवास करवाथी ा तप पुरो थाय छे साथिया आदि अरिहंत पदनी जेम गुणणो पारंगताय नमः जे तीर्थकरनी तपश्चर्या चालती होय ते तोर्थकरना नामने पागल जोडवो जेम श्रीऋषभदेव पारंगताय नमः इत्यादि ।

( १६१ ) चतुर्विध संघ तपः मा तपमा प्रथम एक छठ करीने पछे एकांतरिया ६० उपवास करवा, गुणणो मनोतित्थस्स २० माला साथिया विगेरे ६२ बासठ बासठ समजवा । तीर्थंकर च्यवन तपः आ तप एक एक तीर्थङ्करोना च्यवन कल्याणक आश्री एक एक उपवास करवाथी पूरो थाय छे ते चोवीस उपवास एकांतरिया अथवा छुटा कराय छे. गुणणांमा जे तीर्थङ्करनो तप चालतो होय ते तीर्थंकरनाम पागल परमेष्ठिने नमः जोडवं जेम श्रीऋषभदेव परमेष्ठिने नमः बाकी अरिहंत पदना जेम । . तीर्थंकर जन्म तप: आ तप पण च्यवन कल्याणकनी जेम समजवो, परन्तु गुणणामां अर्हते. नमः कहेवो, जेमके श्रीऋषभदेव अर्हते नमः । संवत्सर तप एक वर्षमा चोवीस पाखी सम्बन्धी पालोयणाना २४ उपवास त्रण चोमासी सम्बन्धी प्रालोयणाना ६ ( १६२ ) उपवाष संवच्छरी सम्बन्धी पालोयणना त्रण उपवास सर्व मीली ३३ उपवास एकांतरिया अथवा छुटा करवाथी श्रा तप पूरो थाय छे गुणणो संवच्छर तपसेनमः बाकी अरिहंत पद जेम। पद्मोत्तर तपोलो आ तपमा एक एक अोली एकांतरिया आठ आठ उपवासनी थाय छे एवी नव अोली करवाथी प्रा तप पूरो थाय छे बधा मिली ७२ उपवास थाय छे गुणणो आदि अरिहंत पदनी जेम समजवो, आ तप सुदि नवमीथी सरु करवो । समवसरण तपः प्रा तप १६ दिवसे पुरो थाय छे, भादरवा (गु० श्रावण) वदि ४ थी सरू करीने भादरवा सुदि ४ सुधी कराय छे तेमां पहेले दिवसे एकासणो बीजे दिवसे नीवी त्रीजे दिवसे प्रांबील चौथे दिवसे उपवास करवो एवी रीते चार ओली करवी। साथीया माला दिवसे १ श्रीभावजिनाय नमः २० १. २ श्रीश्रुतसमवसरण जिनायनमः २ & २० ( १६३ ) ३ श्रीमनःपर्यवजिनाय नमः ४ श्रीकेवलि जिनाय नमः साथीया माला दिवसे १२ २० २० ४ ॥ दशविधि यति धर्म तप ।। आ तप दश एकांतरिया उपवास करवाथी पुरे थाय छे अने सुदिमां सरु थाय छे तपने दिवसे गुणणु विगेरे १० माला या प्रमाणे- १. क्षमागुणधराय नमः २ मार्दवगुणधराय नमः ३ आर्जवगुणधराय नमः ४ मुक्तिगुणधराय नमः ५ तपोगुणधराय नमः ६ संयमगुणधराय नमः ७ सत्तगुणधराय नमः ८ शौचगुणधराय नमः ६ अकिचन गुणधराय नमः १० ब्रह्मचर्यगुणधराय नमः -o- पञ्चपरमेष्टि तपः पहेले दिवसे उपवास बीजे दिवसे एकलठाणु त्रीजे दिवसे प्रांबील चौथे दिवसे एकासणु पांचमे दिवसे नीवी छठे दिवसे परिमढ्ढ अने सातमे दिवसे वेयासणु ए प्रमाणे सात दिवसोनी एक अोली थाय छे एवी रीते पांच प्रोली करवाथी आ तप ३५ दिवसोमां पूरो थाय छ ।

( १६४ ) ३ गुणणो १ नमोअरिहंताणं २ नमोसिद्धाणं ३ नमोपायरियाणं ४ नमोउवझायाणं ५ नमोलोएसव्वसाहूणं एक एक अोलीमां गुणणो साथिया विगेरे एक एक नवपदोलीमां कहेल प्रमाणे पदनो सात सात दिवस सुधी करवो। सर्वाङ्ग सुन्दर तपः आ तप पाठ एकान्तरिया उपवास करवा पारणे श्राम्बील करवाथी पाठ उपवास अने सात प्राम्बील मिली ने १५ दिवसे पूरो थाय छ । आ तप सुदि एकमथी शरु थाय छे अने पुनमे समाप्त थाय छे गुणणो आदि अरिहत पदनी माफक । निरूक्सिंह तप एनुं तप सर्वाङ्ग सुन्दर तपनी जेम समजवो पण एटलुं विशेष छे वदि एकमनो शरु करवो अमावस्याये पुरो थाय छ । सौभाग्य कल्पवृक्ष तप एकान्तरिया १५ उपवास करवाथी आ तप त्रीस दिवसमा पूरो थाय छै चैत्र सुदि एकमनो या तप शरु थाय छे गुणणो अरिहंत पदनी जेम। अष्टापद पावडी तप अोली प्रा तपट एकासणा नीवी ८ आम्बील अथवा ८ उपवासथो थाय छे असो सुदि ८ थी लइने पुनम सुधी ८ आठ ( १६५) . एकासणादि करवाथी एक अोली थायं छे एवीरीते आठ प्रोली करवायी ८ वर्षे या तप पूरो थाय छे गुणणो श्रीअष्टपदतीर्थाय नमः माला २० साथिया आदि ८ आठ अदुःखर्दिश तपः आ तपमा पहेले मासे सुदि बीजे मासे सुदि २. त्रीजे सुदि ३ एम वधता पनरमे मासे सुदि १५ नुं उपवास कराय छ एम पूरो थाय छ अरिहंतपदन गुणणु आदि । कर्मचतुर्थ तपः आ तप प्रथम अठम पछे एकांतरिया ६० उपवास पछे अन्तमां ऊपर एक अठम करवाथी पूरो थाय छे पा तप प्रांतरा रहित करवो बधा ६६ उपवास थाय छे गुरगणो आदि अरिहंत पदनी जेम । कर्मचक्रवाल तपः प्रा तप प्रथम अठम पछे एकान्तरिया ६४ उपवास उपर अठम तप करवाथी पुरो थाय छे बधा ७० उपवास थाय छे गुणणु आदि अरिहंत पदनी जेम । चत्तारि अठ दस दोय तपः प्रथम चार पछे आउ पछे दश पछे बे उपवास करवाथी. प्रा. तप पूरो थाय छे अष्टापदं तीर्थाय नमः साथिया विगेरे २४ । है ( १६६ ) ... गौतम कमल तपः आ तपमा नव उपवास एकांतरिया करवा गुणणो श्रीगौतमस्वामिने नमः साथिया विगेरे २७ सतावोस । १६. जिन तप आ तपमां एक एक तीर्थङ्कर आश्री एक एक उप- वास करवाथी ६६ उपवास थाय छे जे तीर्थङ्करनो उपवास चालतो होय तेनो गुणणो साथिया विगेरे बार बार नहीं आवतो होय तो नमो अरिहंताणंनी माला फेरववी । १७० जिन तपः आ तपमा १७० उपवास कराय छ जे जे तीर्थ- डुरनो तप चालतो होय तेहनो अथवा नमो अरिहंताणंनो गुणणो साथियादि अरिहंत पदनी जेम । देवल इण्डा तपः आ तपमां बेसणापांच एकासणा ७ नीवी नव आंबील पांच एक उपवास होय छे २७ दिवसमां पा तप पूरो थाय छे गुणणो नमो अरिहंताणं साथियादि बार ( १६७ ) करवा, अष्टकर्मोत्तर प्रकृति तप आठ कर्मनी उत्तर प्रकृति १५८ होवाथी या तप १५८. उपवास करवाथी. पूरो थाय छे तेमां ज्ञानावरणी कर्मना पांच, दर्शनावरणी कर्मना नव वेदनीकर्मना बे मोहनी कर्मना २८ आधुः कर्मना ४ नाम कर्मना १०३ गोत्र कर्मना २ अन्तराय कर्मना पांच उपवास करना, पण ते एकांतरिया नमोसिद्धाणंनो गुणणो करवो साथिया विगेरे सिद्ध पदनी जेम। पांच पच्चख्खाण प्रथमे दिवसे उपवास बीजे दिवसे बेयासणों त्रीजे दिवसे एकासणो चोथे दिवसे नीवी पांचमे दिवसे प्रांबील श्रा एक अोली थाय छे एवी पांच अोली करवाथी पचीस दिवसोमां प्रा तप पुरो थाय छे नमोसिद्धाणं गुणणो साथिया विगेरे पाठ पाठ पंचमहावत तप आ तपमा एकांतरिया पांच उपवास करवा नमो लोएसव्वसाहुणंनो गुणणो साथिया विगेरे २७ सतावोस । तपस्या पुरी थाय बाद शक्ति अनुसार उजमणो करवो। ॥ इति श्रीजिनदत्तसूरिगुरु प्रसादात् श्रीनवपदादि विधिसंग्रहः ।। समाप्तः ( १६८ ) --- आप्तोष्टादशदोषशून्यजिनपश्चाहन्देवो मम । त्यक्तारंभ परिग्रहः सुविहितो वाचंयमः सद्गुरुः ॥ धर्मः केवलिभाषितो वरदयः कल्याणहेतुः पुन- रहत्सिद्धसुसाधुधर्मशरणं भूयात्रिशुध्ध्याभवं ॥१॥ अर्थ-यथार्थ वक्ता अढार १८ दोषरहित जिनेश्वर एवा अरिहंत मारा सुदेव छे, प्रारम्भ परिग्रह रहित सूत्रने अनुसार किया करनारा एवा साधु मारा सुगुरु छे, श्रेष्ट दयावालो कल्याणनो करनारो एवो केवलिभाषित मारे सुधर्म छे, ज्यां सुधी पा संसारमा रहुं, त्या सुधी मारे शुद्ध मन वचन कायाथी अरिहंत सिद्ध साधु अने केवलीभाषित धर्मनुं शरणुं थानो। भूतानागतवर्तमानसमये यदुष्प्रयुक्त मनो- वाक्कायैः कृतकारितानुमतिभिर्देवादितत्वत्रये ॥ संधे प्राणिषुचाप्तवाच्यनुचितं हिंसादि पापास्पदं । मोहांधेन मया कृतं तदधुनागर्हामि निंदाम्यहम् ॥२॥ अर्थ-प्रतीत भविष्य भने वर्तमान कालमा अशुद्ध मन वचन अने कायाथी पोते करवो बीजा पासेथी करा- ववो करता होय तेनी अनुमोदना करवाथी देवादि त्रण तत्वने विषे चतुर्विध संघने विषे प्राणियोनि विषे प्राप्त - ' ( १६६ ) वचनने विषे मोहथी अन्ध थई में जे अनुचित कयु होइ, हिंसादि. १८ पापस्थान कीधां (सेव्यां) होय तेने हुं हमणा गुरुशाखे गहूं छु, प्रात्मशाखे निदं छु ।।२।। अर्हत्सिद्धगणोंद्रपाठकमुनि श्राद्धावतिश्रावका- द्यर्हत्वादिकभावतद्गतगुणान् मार्गानुसारीन् गुणान् ।। श्रीअहंद्वचनानुसारिसुकृतानुष्टान सद्दर्शन- ज्ञानादीननुमोदयामि सुहितैर्योगैः प्रशंसाम्यहम् ॥३॥ अर्थ-अरिहंतोना अरिहंतपणाना, सिद्धोना सिद्धप- गाना, प्राचार्योना आचार्यपणाना, उपाध्यायोना उपा- ध्यायपणाना, साधुनोना साधुपणाना, श्रावकोना श्रावक- पणाना, अविरित श्रावकोना समकितपणाना, भावोने तथा उपरोक्त परिहंतादिकना गुणाने, तथा मार्गानुसारी गुणोने तथा श्रीअरिहंतना वचन अनुसार सुकृत अने अनुष्टान [क्रिया] ने, सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रादिकने, हुं अनुमोदना करु छु, अने प्रशंसा. करुंर्छ । संसारेऽत्रमया स्वकर्मवशगा जीवा भ्रमंतोऽखिलाः । क्षाम्यते क्षमिताः क्षमंतु मयि ते केनापि सार्द्ध मम ॥ वैरं नास्ति च मैत्रिताऽस्ति सुखदा जीवेषु सर्वेषु मे । यश्चितित भाषितप्रविहितं मिथ्याऽस्तुतदुष्कृतम् ।४।

( १७० ) अर्थ-मा संसारने विषे पोतपोताना कर्मनेविषे वश (आधीन) थएला चार गतिमां भमता सर्व जीवोने हुँ खमार्बु छु, ते पण खम्या छतां मारा उपर क्षमा करो, कोइनी साथे मारो वैरभाव नथी, सर्वजीवोने विषे सुखने देवावाली मारी मित्रता छ, जे मनथी दुष्ट चितलेल, वचनथी भाषेलं, अने कायाथी करेलु, ते दुष्कृत (पाप) मिथ्या थारो ॥४॥ तच्चायास्यति मे कदा दिनमहं यत्पालयिष्येऽमलं । चारित्रं जिनशासनं गतसुनेर्मार्गे चरिष्याम्यहम् ।। मुक्तो जन्मजरादिदुःखनिवहात्संवेनिर्वेदता- प्तोक्तास्तिक्यदयालुताप्रशमता धर्ना भविष्याम्यहम् ॥५॥ - अर्थ-ते दिवस मारो क्यारे प्रावशे, के जे दिवसे निर्मल चारित्र अने जिन प्राज्ञाने पालीस, पूर्वमुनियोना मार्गमां चालीश, जन्म जरा मुत्यु आदि दुःखना समुदायथी मुक्त थइस, संवेग (संसारिक सुखने दु.खरूप मानवु ते) निर्वेदता (संसारने केदरूप मान, ते) प्राप्त [जिनेश्वर] कहेल वचन उपर श्रद्धारूप ते आस्तिकता दयालुता प्रशमता आदि गुणोने धारण करनारो थइश ।।

।
१७१ )
सकल तीर्थ नमस्कार
(स्नग्धरा वृत्तम्)
सद्भक्तया देवलोके रविशशिभवने, व्यंतराणां निकाये,
नक्षत्राणां निवासे ग्रहगणपटले तारकाणां विमाने
पाताले पन्नगेंद्रे स्फुटमणिकिरणे ध्वस्तसांद्रांधकारे,
श्रीमत्तोर्थकराणां प्रतिदिवसमहं तत्र चैत्यानि वंदे ॥ १ ।।
वैताड्ये मेरूशृंगे रूचकगिरिवरे कुंदले हस्तिदंते,
वरकारेकट नंदोश्वरकनकगिरौ नैषधे नीलवंते,
चैत्रे शैलें विचित्रे यमकगिरिवरे चक्रवाले हिमाद्रौ ॥श्रीमत्ती०॥२॥
श्रीशैले विध्यशृंगे विमलगिरिवरे ह्यर्बुदे पावके वा,
सम्मेते तारके वा कुलगिरिशिखरेऽष्टापदे स्वर्ण शैले,
सह्याद्रौ चोझयंते विमलगिरिवरे गुर्जरे रौहणाद्रौ ॥श्रीमत्ती०॥३॥
आघाटे मेदपाटे क्षितितटमुकुटे चित्रकूटे त्रिकूटे,
लाटे नाटे च घाटे विटपिघनतटे हेवकूटे च विराटे,
कर्णाटे हेमकूटे विकटतरकटे चक्रकूटे च भोटे ॥श्रीमत्ती०॥४॥
श्रीमाले मालवे वा मलयिनि निषधे मेखले पिच्छले वा,
नेपाले नाहले वा कुवलयतिलके सिंहले केरलेवा,
क्षहाले कोशले वा विगलितसलिले जंगले काठमाले ॥श्रीमत्ती०॥५॥
अंगे. बंगे कलिंगे सुगतजन पदे सत्प्रयागे तिलंगे,
गौड चौडे मुरंडे वरतरद्रविडे उद्रियाणे च पौंड्र,
आर्द्र माद्रे पुलिंद्रे द्रविड कवलिये कान्यकुब्जे सुराष्ट्र ॥श्रीमत्ती०॥६॥

F-PERPRs.k PART- Parvourist ...-DAHARAMAmarati ( १७२ ) चंद्रायां चंद्रमुख्यां गजपुरमथुरापत्तने चोज्जयिन्यां, कौशांव्या कोशलायां कनकपुरवरे देवगिर्यां च काश्यां, रासक्ये राजगेहे दशपुरनगरे भद्दिले ताम्रलिप्त्यां ॥श्रीमत्ती०॥७॥ स्वर्गे मत्येतरिक्षे गिरिशिखरहृदे स्वर्णदीनीर तीरे, शैलाने नागलोके जलनिधिपुलिने भूरूहाणां निकुजे, ग्रामेऽरण्येवने वा स्थलजल विषमेदुर्गमध्ये त्रिसंध्यं ॥श्रीमत्ती०॥८॥ "श्रीमन्मरौ कुलद्रौ रूचकनगवरे शाल्यलौ जुबुवृक्षे, चौज्जन्ये चैत्यनंदे रतिकररूचके कौंडले मानुषांके, इक्षुकारे जिनाद्रोच दधिमुखगिरौ व्यंतरे स्वर्गलोके, ज्योतिर्लोके भवंति त्रिभुवन वलये यानि चैत्यालयानि" ॥ ६ ॥ इच्छं श्री जैन चैत्यस्तवनमनुदिनं ये पठति प्रवीणाः, प्रोद्यत्त्कल्याणहेतु कलिमलहरणं भक्तिभाजस्त्रिसंध्यं ।। तेषां श्रीतीर्थयात्राफलमतुलमलं जायतै मानवानां, कार्याणां सिद्धिरूच्चःप्रमुदित मनसां चित्तमानंद करि ॥ १० ॥ . . '- शुद्धि पत्र पृष्ठ लाइन अशुद्ध शुद्ध मुख पृष्ठ १ कुशल पुष्ष-२ कुशल पुष्प-३ mo जन धर्म जैन धर्म ४ ६ उदयगिरिसूरि उदयसागरसूरि १० घान धान १७२ ५ कुंदले द कुंडले

Navpadadi Tapvidhi Sangrah

Author
Shri Jin Udaisagarsuri
Title
Navpadadi Tapvidhi Sangrah
File name
Navpadadi Tapvidhi Sangrah
Text
OCR done
Citation
1989
Published
2010/08
Publisher
Jaipur, Rajendra Kumar Shri Maal Sachiv Kushal Sansthan
Language
Sanskrit
Pages
194
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
325955
Barcode
99999990002357.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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uoWI97Hb4DZ
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