Sanmati Library, Jaipur
Ramaysaar Sateek
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मुरि श्री शांविसागराय नमः। आद्य निवेदन यह रयणसार नामक ग्रंथ प्राकृत भाषामें भगवान श्रीकुंदकुंद खामीने निर्माण किया है। इस छोटेसे सूत्र ग्रंथों श्रावकधर्म व मुनिधर्मका गूढ़ रहस्य गम्भीर और मधुर भाषामें ओतप्रोत भरा हुआ है। रयणसार दोहा की पथात्मक रचना किन महानुभावने की है यह स्पष्ट कहा नहीं जाता है तो भी रयणसार दोहा मूल प्रतिमें "पं० सदासुखकृत रयणसार दोहा" ऐसा उल्लेख है। पं० सदासुखजीका विशेष विवरण अज्ञात होनेसे विवेचन करनेमें असमर्थता है। दोहों की पथरचना छंद शानसे कहीं कहीं पर स्खलित है परंतु अर्यदृष्टिसे भावपूर्ण और हृदयहारिणी है। इस ग्रन्थका प्रकाशन--सज्जनोसम लाला छोटेलालजी मालिक फर्म-लाला न्यादरमलजी मक्खनलालजी जैन मेदावाले नयावास देहली वालोंने ज्ञानावरणीय कर्मके क्षयार्थ किया है। क्षुल्लक ज्ञानसागर
मुद्रक- श्रीलाल जैन काव्यतीर्थ
जैनसिद्धान्त प्रकाशक प्रेस
कलक्त्ता
श्रीवीतरागाय नमः।
रयासार
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ममिऊण वड्डमाणं, परमप्पाणं जिणं तिसुद्देण ।
बोच्छामि रयणसारं, सायारणयारधम्मीणम् ॥१॥
वर्धमान जिनदेवको, मनवचकाय त्रिशुद्ध ।
करि प्रणाम भासू समुनि-, श्रावकधर्म प्रसिद्ध ॥१॥
सार रंयण- अर्थ-श्री परमात्मा वर्धमान जिनेन्द्रदेवको मनवचनकायकी शुद्धिसे नमस्कार कर गृहस्थ और मुनिके धर्मका व्याख्यान करनेवाला 'रयणसार' नामका ग्रन्थ कहता हूँ॥१॥ पुवं जिणेहि भणियं, जहडियं गणहरेहि वित्यरियं । पुब्बाइरियकमजं,तं बोल्लइ जोहु सदिही ॥१॥ जो जिनवरने कहा, भाषा गणधर देव । अनुक्रम पूर्वाचार्यके, सम्यग्दृष्टि कहेव ॥२॥ अर्थ-सर्वज्ञ जिनदेवने अपनी दिव्यध्वनिसे यथार्थ उपदेश दिया था, चारज्ञानके धारक श्रीगणधर देवने उसीका विस्तार कर अल्पज्ञानी जीवोंको समझाया था। उसके बाद उत्तरोत्तर आचार्योंने उसी पदार्थका निरूपण किया, इस तरह पूर्वाचार्योंकी परंपरा चली आई। इस परिपाटीके अनुसार जो बोलता है, अद्वान करता है, वह सम्यग्दृष्टि है। भावार्थ-श्री सर्वज्ञ जिनदेव और गणधरदेवके पीछे उत्पन्न होनेवाले आचार्योंने मी वीतरागभावसे सर्वज्ञके वचनोंका ही प्रतिपादन किया है। इसी प्रकार जिन जिन भट्टारक या गृहस्थोंने वीतराग विशुद्धभावोंसे सर्वज्ञदेवके वचनोंको कहा है वे सब वचन २ सार रयण- सर्वज्ञदेवके ही हैं इसीलिये वे सब वचन प्रमाणभून है, सत्य मार्गानुसारी हैं, जिनागम हैं और श्रद्धा करने योग्य हैं। उन वचनोंसे जीवोंका कल्याण होता है। जो सर्वज्ञ- देवके वचनोंको वीतरागभावसे पक्षपात रहित प्रतिपादन करता है वह सम्यग्दृष्टी है। मोक्षमार्गानुसारी सत्य वचन कहनेवाला प्रामाणिक है किंतु जो मुनि प्रमचारी या पंडित जिनागरके वचनोंको अपने विषय कपाय मान बड़ाई रागद्वेष और पक्षपात- भावोंसे अन्यथा प्ररूपणा करता है, अर्थका विपरीत अर्थ करता है। वह मिथ्या- दृष्टि जैनधर्मसे वहिर्भूत है। मदिसुदणाणवलेण दु सच्छंदं वोलई जिणुचमिदि। जो सो होइ कुदिट्ठीण होइ जिणमग्गलग्गरवो॥३॥ मति श्रुत ज्ञान सुबल सुछन्द, भाषै जिन उपदिष्ट । जो सो होइ कुदृष्टि नर, नहिं जिनमारग इष्ट ॥३॥ अर्थ-जो मनुष्य मतिज्ञान या श्रुतज्ञानके अभिमानसे श्री जिनेन्द्रदेव द्वारा प्रतिपादित अर्थको स्वच्छन्द (अपने मनकल्पित यद्वा तद्वा विरुद्धार्थ अथवा आगमके सत्यार्थको छिपा कर मिथ्या अर्थरूप) कहता है वह मिथ्यादृष्टी है। वह जिनधर्मका पालन- PRIYA सार रयण- करता हुआ मी जैनधर्मसे सर्वथा पराङ्मुख है, जैनधर्मसे बहिर्भूत है, मिथ्यादृष्टी है। भावार्य-जिनको बुद्धि व ज्ञानकी प्रखरता है परन्तु दर्शनमोड़नीयकर्मका जिनके उदय है, ऐसे जीव जैनधर्मको धारण करके भी अपने ज्ञानके मिथ्या अभि- मानसे श्री जिनेन्द्र भगवानके द्वारा प्रतिपादित अर्थके स्वरूपको अन्यथा (आगमके विरुद्ध) कहते हैं, वे मिथ्यादृष्टी हैं। जो विषय कषाय मान बड़ाई आदि स्वार्थके वश होकर अथवा किसी कारणसे रागद्वेषके वश होकर अपने ज्ञानके अभिमानसे आगमके अर्थको अपने मनकल्पित अर्थके द्वारा अन्यथा प्रतिपादन करते हैं वे मिथ्यादृष्टी हैं। खरूप-विपर्यास, भेद-विपर्यास, लक्षण-विपर्यास, कारण-विपर्याससे वस्तुका स्वरूप अन्यथा हो जाता है। जो रागी द्वेषी पक्षपाती मनुष्य कुशिक्षा प्राप्त कर ज्ञानके मदमें विवेक और विचार रहित हो कर विषयकषायोंकी पुष्टिके लिये जिना- गमका अर्थ विपरीत करता है या अपने मन-कल्पित अर्थको जिनागमका स्वरूप बतला कर वस्तुस्वरूपमें विपर्यास उत्पन्न करता है वह पापी है, जैनी हो कर मी जैन- धर्मसे बहिर्भूत मिथ्यादृष्टी है। और जो मनुष्य सदाचारका-नीति-चारित्र और धर्मका. लोप कर अपनी पाप-वासनाको सिद्ध करनेके लिये : असदाचारको धर्मका PIYAN सार ५ स्वरूपं पतला कर जिनागमकी साख दे कर जिनागम पर अवर्णवाद लगाता है, वह भी पापी जिनधर्मसे वहिभूत मिथ्यादृष्टी है। जो मनुष्य तर्क या युक्तिके वल पर हिंसा झूठ और पापाचरणोंको धर्म सिद्ध करता है वह भी मिथ्यादृष्टी है तथा जो जिनागमको अपनी युक्ति पर ही सिद्ध करना चाहता है वह भी मिथ्यादृष्टी है। सम्मत्चरयणसारं मोक्खमहारुक्खमूलमिदि भणियं । तं जाणिजइ णिच्छयववहारसरूवदो भेदं ॥४॥ समकित रतन सुसार मइ, कयो मोक्षतरुमूल । सो निश्चय ख खरूपते, व्यवहार सु अनुकूल ॥ ४ ॥ अर्थ- सम्यग्दर्शन ही समस्त रत्नोंमें सारभूत रत्न है और वह मोक्षरूपी वृक्ष- का मूल है। सम्यग्दर्शनके निश्चयसम्यग्दर्शन और व्यवहारसम्यग्दर्शन इस प्रकार दो भेद हैं। भावार्थ--वाह्य और आभ्यंतर कारणोंके निमित्तसे जीवोंके परिणामोंमें जो विशुद्धता प्राप्त होती है उससे आत्माकी मतीति आत्माभिरुचि और आत्मिक गुणोंकी सार श्रद्धाका होना निश्चयसम्यग्दर्शन है। तथा आत्माकै स्वरूपको व्यक्त करनेवाले सच्चे देव शास्त्र और गुरुका श्रद्धान करना व्यवहार सम्यग्दर्शन है। आत्मा अनंत गुणोंका पिंड है, उन गुणोंमें एक सम्यग्दर्शन भी आत्माका गुण हैं। वह आत्माको अपनी आत्माके स्वभावमें स्थिर कराता है और उससे आत्मा अपने स्वरूपमें परिणमन करता है, अपने आत्मगुणोंमें अभिरुचि करता है और पर पदार्थोंको अपनेसे भिन्न समझ कर अपनाता नहीं है यही सम्यग्दर्शन है। भयविसणमलविवज़िय संसारसरीरभोगणिवण्णो। अहगुणंगसमग्गो दमणसुद्धो हु पंचगुरुभत्तो ॥५॥ सात विसन भयमल रहित, विरत भोगभवदेह । वसुगुण पूरण पंचगुरु, भक्ति सुदर्शन एह ॥ ५॥ अर्थ-साव व्यसन, सात प्रकारके भय और पच्चीस शंकादिक दोपोंसे रहित तथा संसार, शरीर, भोगोंसे विरक्तभाव और आठ निःशंकादिक गुणों सहित.पच परमेष्ठीमें भक्ति-भावना रखना विशुद्ध सम्यग्दर्शन है।
सार
णियसुद्दप्पणुरत्तो वहिरप्पावच्छवजिओ णाणी।
जिणमुणिधम्म मण्णइ गइदुक्खी होइ सदिडी ॥६॥
निज शुद्धापण अनुरकत, बहिर अवस्थ न कोह।
बुधमानत जिन मुनिधरम, समदिठि निरमदुख होइ ॥६॥
अर्थ-जो विचारशील भव्यात्मा अपनी आत्माके शुद्ध स्वभावमें अनुरक्त
(तन्मय) होता है और पर पदार्थजन्य पुद्गलोंकी शुभाशुभ पर्यायोंसे विरक्त होता
है, जो श्रीजिनेन्द्र भगवान् निग्रंथ (नग्न ) गुरु तथा जिनधर्मको श्रद्धागाव भक्ति-
पूर्वक मानता है वह संसारके समस्त प्रकारके दुःखोंसे रहित सम्यग्दृष्टी है।
भावार्थ- शुद्धबुद्ध ज्ञायकैक स्वभाव परमवीतराग आत्माके स्वभाव, वन्मय हो
कर देव-धर्म गुरुकी प्रतीतिसे वीतराग परिणतिमें स्थिर होनेकी भावना करना सो
सम्यग्दर्शन है।
मयमूढमणायदणं संकाइवसणभयमईयारं ।
जेसिं चउदालेदोण संति ते होंति संदिडी ॥७॥
सार रयण. भय मद मूढ़ानायतन, शंकादिक अतीचार । विसन जासु नहि चालचतु, सो समदिष्टी सार ।। ७॥ अर्थ-जिनके आठ मद, तीन मूढता, छह अनायतन, आठ शंकादिक दोष, सात व्यसन, सात प्रकारके भय और पांच अतीचार ये चवालीस दूषण नहीं हैं वे सम्यग्दृष्टी हैं। उहयगुणवसणभयमलवरग्गाइचारभत्तिविग्धं वा। एदे सत्तत्तरिया दसणसावयगुणा भणिया * ॥८॥ अर्थ---आठ मूलगुण और बारह उत्तर गुणों (बारहव्रत-अणुव्रत, गुणवत, शिक्षावत )का प्रतिपालन, सात व्यसन और पच्चीस सम्यक्त्वके दोषोंका परित्याग, बारह वैराग्यमावनाका चितवन, सम्यग्दर्शनके पांच अतीचारोंका परित्याग, भक्ति- भावना, इस प्रकार दर्शनको धारण करनेवाले सम्यग्दृष्टी श्रावकके सत्तर गुण हैं। देवगुरुतसमयमचा संसारसरीरभोगपरिचिचा। रयणत्तयसंजुत्ता ते मणुव सिवसुहं पत्ता॥९॥ * यह गाथा प्राचीन लिखित प्रतियों नहीं है तथा दोहा कविने इसके दोहें नहीं बनाये है। ८ रयण. सार .. देवसुगुरु श्रुत भक्ति जे, भवतनभोग विरत्त । जे रतनत्रय संजुगत, ते जन शिवसुख पत्त ॥९॥ अर्थ---जो देव जिनागम और निग्रंथ दिगंबर गुरुको मोक्षमार्गमें प्रापक तथा आत्माके कल्याण करनेवाले समझ कर श्रद्धापूर्वक भक्तिमावसे सेवा करते है और जो संसार शरीर भोगोंसे विरक्त हैं, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यक्चारित्ररूप रत्नत्रय सहित हैं ऐसे भन्योता मनुष्य ही मोक्षसुखको प्राप्त होते हैं। भावार्थ-सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होनेसे रत्नत्रयकी प्राप्ति स्वयमेव हो जाती है तथापि व्यवहार रत्नत्रयको धारण किये विना मोक्षमार्गकी व्यक्तवा नहीं है। जब तक सम्यक्चारित्रकी प्राप्ति नहीं है तब तक साक्षात् मोक्षमार्ग नहीं है । सम्यग्दर्शन होने पर भी एक सम्यक्चारित्रके विना अर्द्धपुद्गलपरावर्तनकाल पर्यन्तं परिभ्रमण होसक्ता है परंतु यथाख्यातचारित्रके होने पर स्वल्प समय में ही केवलज्ञान प्रकट हो.जाता इसलिये मोक्षमार्गकी प्राप्तिके लिये व्यवहार रत्नत्रय धारण करनेकी परमावश्य: कता है। दाणं पूजा सीलं उपवासं बहुविहं पि खवणंपि । सम्मजुदं मोक्खसुहं सम्मविणा दीहसंसारं ॥१०॥ YHIT TIMRON रयण- सार पूजा शील उपवास व्रत, बहुधा अथ मुनिरूप । समकित संजुत मोक्षसुख, विन-समकित भवकूप ॥ १॥ अर्थ-दान,पूजा,ब्रह्मचर्य, उपवास अनेक प्रकारके व्रत और मुनिलिंग धारण आदि सर्व एक सम्यग्दर्शन होने पर मोक्षमार्गके कारणभूत हैं और सम्यग्दर्शनके विना जप तप दान पूजादि सर्व कारण संसारको ही वढाने वाले हैं। दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेण विणा। झाणाझयणं मुक्खं जइधम्म ण तं विणातहा सोवि॥ ११ श्रावक धर्म सुश्रावगह, दान पूजमुख जानि । ध्यानाध्ययन जती सुमुख, तिन विन दुहू न मानि॥११॥ अर्थ-सुपात्रमें चार प्रकारका दान देना और श्री देव शास्त्र गुरुकी पूजा करना श्रावकका मुख्य धर्म है। जो नित्य इन (दोनों) को अपना मुख्य कर्तव्य समझकर पालन करता है वही श्रावक है, धर्मात्मा सम्यग्दृष्टी है तथा ध्यान और जिना. गमका स्वाध्याय करना मुनीश्वरोंका मुख्य धर्म है। जो मुनिराज इन दोनोंको अपना मुख्य कर्तव्य समझ कर अहर्निश पालन करता है वही मुनीबर है, मोक्षमार्गमें १० सार संलग्न है। यदि श्रावक दान नहीं देता है और न प्रतिदिवस पूजा करता है. वह श्रावक नहीं है जो मुनीश्वर-ध्यान और अध्ययन नहीं करता है वह मुनीश्वर नहीं है। भावार्थ---श्रावककी पहिचान (लक्षण) दान और पूजासे होती है और मुनि- वरोंकी.पहिचान ध्यान और अध्ययनसे होती है। दाणु ण धम्मु ण चागु ण भोगुण वहिरप्प जो पयंगो सो। लोहकसायग्गिमुहे पडिउ मरिउ ण संदेहो ॥१२॥ दान न धर्म न न भोगगुण, लो पतंग वहिरात । लोभ कषाय हुतासमुख, पर मरै विख्यात ॥१२॥ अर्थ-जो श्रावक सुपात्रमें दान नहीं देता है, न अष्टमूल गुणवत संयम पुजा आदि अपने धर्मका पालन करता है और न भोग ही नीतिपूर्वक भोगता है वह बहिरात्मा है मिथ्यादृष्टी है। जैनधर्म धारण करने पर भी जैनधर्मसे बहिर्भूत है। वह लोमकी तीव्र अग्निमें पतंगके समान पड कर मरता है इसमें संदेह नहीं है भावार्थ-जो श्रावक परस्पर विरोध रहित धर्म अर्थ और काम पुरुषार्थको सेवन सार रयण- करता है वह मोक्षमार्गमें संलग्न है, सम्यग्दृष्टी है। किंतु जो श्रावक मोहके वश होकर धर्म सेवन नहीं करता है और सुपात्रमें दान नहीं देता है तथा न भगवानकी पूजा ही करता है कितु खाना पीना आदि सर्व भूलकर केवल धन कमाने में ही अपना जीवन पूर्ण करता है वह लोभी निरंतर हिंसा आरंभ आदि घोर पापोंको ही संपादन कर संसारमें भ्रमण करता है। जिणपूजा मुणिदाण करेइ जो देइ सत्तिरूवेण। सम्माइही सावय धम्मी सोहोह मोक्खमग्गरओ ॥१३॥ यज्ञ करै जिन दान मुनि, देह सकति अनुसार समदृष्टी श्रावक धरम, सो उतरे भवपार ॥ १३ ॥ अर्थ-जो श्रावक अपनी शक्तिके अनुसार प्रतिदिवस देव, शास्त्र, गुरुकी पूजा करता है और सुपात्रमें चार प्रकारका दान देता है वह सम्यग्दृष्टी श्रावक है। दान देना तथा पूजा करना श्रावकका मुख्य धर्म है। जो भक्तिभाव और श्रद्धा पूर्वक अपने धर्मका पालन करता है सो मोक्षमार्गमें शीघ्र ही गमन करता है। संसार समुद्रसे पार हो जाता है। १२ रयण- पूयाफलेण तिल्लोके सुरपूज्जो हवेइ सुद्धमणो। . दाणफलेण तिलोए सारसुहं भुजदे णियदं ॥१४॥ मनसुध पूजै तासफल, त्रिजग ईस करि पूजि । दान फलै त्रैलोक मधि, नियमसार सुख भूजि ॥१४॥ अर्थ-जो शुद्ध भावसे श्रद्धा पूर्वक पूजा करता है वह पूजाके फलसे त्रिलोकके अधीश व देवताओंके इन्द्रोंसे पूज्य हो जाता है और जो सुपात्र में चार प्रकार दान देता है वह दानके फलसे त्रिलोक में सारभूत उत्तम सुखोंको भोगता है। दाणं भोयणमेचं दिण्णइ घण्णो हवेइ सायारो। पचापचविसेस सदसणे किं वियारेण ॥१५॥ दीने भोजन मात्र दत, होत धन्य सागार । पात्र अपात्र विशेष सत, दरशन कौन विचार ॥१५॥ अर्थ-भोजन (आहार दान)दान मात्र देनेसे ही श्रावक धन्य कहलाता है। पंचा- अर्यको प्राप्त होता है, देवताओंसे पूज्य होता है। एक जिनलिंगको देखकर आहार- दान देना चाहिये। जिनलिंग धारण करने पर पात्रापात्र की परीक्षा नहीं करनी चाहिये।
रयण. १४ भावार्थ-सर्वप्रकारकें परिग्रह और आरंभरहित नग्न दिगम्बर जिनलिंगको धारण करनेवाले मुनीश्वरों को आहारदान देनेके प्रथम यह विचार करना कि ये मुनीश्वरं द्रव्यलिंगी हैं या भावलिंगी हैं। जबतक इनको पूर्ण परीक्षा न होजायगी तब तक इनको आहार नहीं देना चाहिये। अथवा जिनलिंग धारण करनेवाले वीत- राग निर्ग्रन्थ मुनीश्वरों की परीक्षा कर आहारदान की प्रवृत्ति करना आदि समस्त विचार सम्यग्दृष्टीके लक्षणसे विपरीत भाव समझने चाहिये। परम निस्पृह-वीतराग-आरंभ परिग्रह रहित मुनीश्वरोंके छिद्र देखना, अपनी बुद्धि और तर्कके द्वारा जिनलिंगके विषयमें आगमके विपरीत.भावोंको प्रदर्शन कर जिनलिंग धारण करने वाले मुनीश्वरोंकी परीक्षा करना आदि सब मिथ्यात्वकर्मका उदय है। आहारदान प्रदान करने के लिये इस प्रकार कुचेष्टाओंके द्वारा जिनलिंगको धारण करने वालोंके उत्साह और चारित्रको मंद करना भी मिथ्यात्वका कार्य है। जिनलिंगको देखते ही उसको सुपात्र समझकर भक्ति भाव और श्रद्धापूर्वक नवषा- गुणसे आहारादि दानको देना श्रावकका धर्म है। श्रावकके लिये श्रीकुंदकंदभग- वान् की यही आज्ञा है कि जिनलिंग ही सुपात्रका चिन्ह है।. श्रावकको आहारदान देनेके लिये जिनलिंगको देखकर फिर यह द्रव्य लिंगी कुपात्र है. इस प्रकारकी-परीक्षा करनेका कोई भी अधिकार नहीं है और न इस प्रकार परीक्षा करनी चाहिये। ..
सार MEIVITRINEE रयण- १५ दिण्णइ सुपचदाणं विसमतो होइ भोगसग्गमही। णिवाणसुई कमसो णिदि जिणवरिंदेहि ॥ १६ ॥ दीन दान सुपात्र गइ, भोगभूमि सुरभोग। अनुक्रमतें निरवान सुख, यह जिन कयन वियोग ॥१६॥ अर्थ-सुपात्रको दान प्रदान करनेसे नियमसे भोगभूमि तथा स्वर्गके सर्वोत्तम सुखकी प्राप्ति होती है और अनुक्रमसे मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है ऐसा श्री- जिनेन्द्र भगवानने परमागममें कहा है। खतविसंस काले वविय सुवीयं फलं जहा विउल । होइ तहा तं जाणइ पत्तविसेसेसु दाणफलं ॥१७॥ ज्यों सुखेत सुभकाल जो, वपै वीज फलपूर । तैसें पान विशेष फल, जान सुदान अंकूर ॥ १७ ॥ अर्थ-जो मनुष्य उत्तम .खेतमें अच्छे चीजको बोता है तो उसका फल मनवां- च्छित पूर्णरूपसे प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्तम पात्रमें विधिपूर्वक दान देनेसे सर्वोत्कृष्ट सुखकी प्राप्ति होती है ॥१७॥ HER २५ सार- श्यण- इह णियसुवित्ववीयं जो ववइ जिणुत्व सत्तखेचेसु। सो तिहुवणरेजफलं भुजदि कल्लाणपंचफलं ॥१८॥ इह निज वित्त सुवीज जो, बपै जिनुक्त सतखेत । सोत्रिभुवनको राजफल, भोगि तीर्थकर हेत ॥१८॥ अर्थ--जो भव्यात्मा अपने (नीतिपूर्वक संग्रह किये हुये धन)द्रव्यको श्री- जिनेन्द्र भगवानके कहे हुऐसात क्षेत्रमें वितरण करता है वह पंचकल्याणकी महा विभूतिसे सुशोभित त्रिभुवनके राज्यसुखको प्राप्त होता है। मादुपिदुपुत्चमित्तं कलत्तघणधण्णवत्थुवाहणविसयं । संसारसारसौक्खं सव्वं जाणउ सुपत्तदाणफलं ॥१९॥ मात पिता सुत मित्र तिय, धन पट वाहन मेव । विभवसार संसार सुख, जानो पात्रदत हेव ॥ १९ ॥ अर्थ--माता पिता पुत्र स्त्री मित्र आदि कुटुंब परिवारका सुख और धन धान्य वस्त्र अलंकार रथ हाथी महल तथा महान विभूति आदिका सुख एक सुपात्र दानका फल है ऐसा समझना चाहिये। ६ . ..
१२ NYYY सार रयण सत्तंगरज णवाणिहिभंडारसंडगवलवउद्दहरयणं । छण्णवदिसहसिच्छिविहउ जाणउ सुपरदाणफलं ॥२०॥ सप्तराज अंग नितिनव, कोस शृंग षटसेन । रतन दुसत त्रियछिनव, सहस जान पात्रदानेन ॥२०॥ अर्थ-सात प्रकार राज्यके अंग, नवनिधि, चौदह रत्न, माल खजाना, गाय हाथी घोड़े सात प्रकारकी सेना, पटखंडका राज्य और छयानवे हजार रानी ये सर्व सुपात्र दानका ही फल है ऐसा समझना चाहिये। । सुकुल सुरूव सुलक्खण सुमइ सुसिक्खा सुसील सुगुणचारित। सुहलेसं सुहणायं सुहसाद सुपत्तदाणफलं ॥२१॥ सुकुल रूप लक्षण सुमति, शिक्षा सुगुण सुशील । शुभ चरित्र सब अक्ष सुख, विभव पात्रदतलील ॥२१॥ अर्थ--उत्तम कुल, सुंदर स्वरूप, शुभलक्षण, श्रेष्ठ बुद्धि, उत्तम निर्दोषशिक्षा, उत्तम शील, उत्तम उत्कृष्ट गुण, अच्छा सम्यचारित्र, उत्तम शुभलेश्या, शुभनाम और २ :! सार श्यण- १८ समस्त प्रकारके भोगोपभोगकी सामग्री-आदि सर्व सुखके साधन सुपात्रदानके फल्स प्राप्त होते हैं। जो मुणिभुत्वसेसं मुंजइ सो झुंजए जिणुवद्दिद। संसारसारसोक्खं कमसो णिव्वाणवरसोक्खं ॥२२॥ जो मुनि भोजन शेष भुक, भाष्यौ जिनवर देव । भोगि सार संसारसुख, अनुक्रम शिव सुख हेव ॥ २२ ॥ अर्थ-जो भव्यजीव मुनीश्वरोंको आहारदान देनेके पश्चात् अवशेष अन्नको प्रसाद समझ कर सेवन करता है वह संसारके सारभूत उत्तम सुखोंको माप्त होता है और क्रमसे मोक्षसुखको प्राप्त होता है ऐसा श्रीजिनेन्द्र भगवानने कहा है। भावार्थ-जिस :थालमें मुनिराजको आहारदान दिया है .उस थालमें बचे हुए अन्नको मुनिराजका प्रसाद (गुरु प्रसाद) समझ कर सेवन करना चाहिये। 'दान- शासन' आदि कितने ही ग्रंथोंमें आचाोंने यही आज्ञा प्रदान की है कि मुनिराजकी भक्तिका अवशेष अन्न सेवन करनेका फल मोक्षकी प्राप्ति है। १८ - रयण- १९ सीदुण्ह वाउपिउलं सिलेप्तिम मह परीसमन्वाहिं। कायकिलेसुवासं जाणिज्जे दिण्णए दाणं ॥ २३॥ शील उसन अथवा विपुल, श्लेष्म परिश्रम व्याधि । कायकिलेश उपवासजुत, तिनहि दान आराधि ॥ २३ ॥ अर्थ-श्रीमुनिराजकी प्रकृति शीत है या उष्ण, वायु वातरूप है या श्लेष्मारूप है या पितरूप है। मुनिराजने कायोत्सर्ग और विविध प्रकार आसनोंसे कितना श्रम किया है, गमनागमनसे कितना परिश्रम हुआ है, मुनिराजके शरीरमें ज्वर संग्रहणी आदि व्याधिकी पीड़ा तो नहीं है। कायक्लेश तप और उपवासके कारण मुनिराजके कण्ठ आदिमें शुष्कता तो नहीं है इत्यादि समस्त वातोंका विचार कर उसके उपचार स्वरूपं योग्य आहार औषधी दुध गर्मजल आदि देना चाहिये। भावार्थ-मुनिराज की प्रकृतिको विचारकर और द्रव्यक्षे कालके स्वरूपको लक्षमें रखकर दान देना चाहिये । दाताके सातगुणों में सबसे मुख्य विवेकगुण माना है विवेक और विचारके विना भक्तिभाव यद्वा तदा दान देनेसे विशेष हानि होने की समावना और पापकर्मकी प्रवृति होसकती है। मुनिराज को गर्मी और. शुष्कता.बढ़ रयण- सार रही हो ऐसे समयमें यदि विवेक और विचारके विना विशष गम पदार्थ दान दिया जाय तो वह दान विशेष हानिप्रद ही होगा। इसी प्रकार आहारकी सामग्री तैयार करने में विशेष हिंसा और मलिनताका विचार अवश्य ही रखना चाहिये। हियमियमण्णं पाणं णिरवजोसहिणिराउलं ठाण। सयणासणमुवयरणं जाणिचा देह मोक्खरवो ॥२४॥ हिंत मित भेषज पांन भख, रहन निराकुल-थान । सज्या आसन उपकरन, जो दे शिवसुख मान ॥२४॥ अर्थ-हित मित मासुक शुद्ध अन्न पान, निर्दोष हितकारी औषधी, निराकुल स्थान, शयनोपकरण,: आसनोपकरण, शास्त्रोपकरण आदि दानयोग्य वस्तुओंको सुपात्रकी आवश्यकतानुसार सम्यग्दृष्टी प्रदान करते हैं। २० १-शयनोपकरण-घास चटाईफलक (लकड़ीका तखत) आदिको कहते हैं। मासनोपकरण- लकड़ीका पाटला चौकी तबत बैठने के साधनको कहते है। सामोपकरण-शाल और उसके साधक जान बडानेवाले को कहते है। शौचोपकरण-पीछी कमंडलू माविको कहते हैं !
रयण- २१ भावार्थ-सुपात्रकी प्रकृति और द्रव्य क्षेत्र कालके निमित्तसे होनेवाली रत्न- त्रयकी शिथिलता एवं देवनिमिचसे होनेवाले मोक्षमार्गके साधनके विघ्नोंको दूर करनेके लिये, मोक्षमार्गको सतत प्रकट करनेके लिये, धर्मकी प्रभावनाके लिये, जिन- शासनकी स्थिरताके लिये, असमर्थ सुपात्रोंके उत्साहकी वृद्धि और वात्सल्यभावके लिये हित मित भोजन पान, मठ आदि निवास स्थान औषधि और उपकरण आदि सम्यग्दृष्टीको प्रदान करना चाहिये । जो भव्य जीव द्रव्य क्षेत्र कालकी परिस्थितिको विचार कर उसके योग्य चार प्रकारका दान सुपात्रमें देता है वह मोक्षमार्गमें अग्र- गामी है। अणयाराणं वेजावचं कुजा जहेह जाणिच्चा। गम्भभवेव मादा पिदुवाणिचं तहा णिरालसया ॥२५॥ अणगारह वैयावरत, करै जथा जो नित्त । मात पिता-जैसें गरम, पाल निरालस चित्त ॥२५॥ अर्थ-जिस प्रकार माता पिता अपने गर्भसे होनेवाले बालकका. भरणपोषण लालनपालन और सेकासुरूषाः तनमनकी एकाग्रता और प्रेमभावसे करते हैं, सर्व- २१ रयण- सार २२ प्रकारसे चालकको सुरक्षित रखते हैं, इसी प्रकार सुपात्रकी 'वैयावृत्य सेवासुश्रूषा आहार पान व्यवस्था निवासस्थान आदिके द्वारा पात्रकी प्रकृति कायक्लेश वात- पिच आदि व्याधि और द्रव्यक्षेत्रकालके.उपद्रवोंको विचार कर करनी चाहिये। भावार्थ-यदि सुपात्र (मुनिमार्ग) सुरक्षित है.तो धर्म सुरक्षित है। मुनिमार्गके नष्ट होने पर धमका सर्व प्रकारसे लोप हो जाता है। गृहस्थधमकी स्थिरतामी मुनिमार्ग पर ही अवलंवित है। जिनशासनका प्रकाश मुनिमार्गसे ही है इसलिये जिस प्रकार हो सके सर्व प्रकारके प्रयत्नोंसे मुनिमार्ग स्थिर करना चाहिये, मुनिमार्ग बढ़ाना चाहिये, सर्वप्रकारकी आपदाओंसे सुरक्षित और निराकुल बनाना चाहिये। मुनिधर्मको सर्व प्रकारसे निराकुल करना ही वैयावृत्य है। मुनिधर्मका प्रभाव प्रकट करना सेवासुश्रूषा करना आहारदान देना औषधदान देना वसतिका दान देना सो सर्व वैयावृत्य है । * हाथ पैर दबाना, मल मूत्र दूर फेंकना, लार कफ आदिको दूर करना आदि यह सर्व वैया. वृत्य है तथा मुनिराजके स्थानको साफ करना, बीमारी में टहल करना, शौच के लिये गर्म पानी देना, आहार औषधी पीछी कमंडल शाल गादि उपकरण देना, राजभय लोकमय मिथ्याष्टियों. के उत्पातसे बचाना यह सर्व घेयावृत्य है। २२ रयण- २३ संप्पुरिसाणं दाणं कप्पतरूणां फलाणसोहवहं । लोहीणं दाणं जइ विमाणसोहास जाणे ॥२६॥ सतपुरुषनके दानकी, सुरतरु सुफल सुशेभ । लोमी जनिको दान ज्यों, शवविमान सम शोभ ॥२६॥ अर्थ-धर्मात्मः सम्यग्दृष्टीका दान कल्पवृक्षके फलके समान महान शोमाको प्राप्त होता है और लोभी पुरुषका दान मृतक पुरुषके विमान ( ठाठरी) के समान है। भावार्थ-धर्मात्मा सम्यग्दृष्टी पुरुषोंका सुपात्रमें दान, श्रद्धा, भक्ति आर भावपूर्वक होता है इसलिये वह दान पंचाश्चर्य विभूतिके साथ स्वर्गमोक्षके महान फलको प्राप्त कराता है परन्तु लोमी पुरुषका दान मान बडाईकी इच्छासे दिया जाता है इसलिये वह मुर्दाकी ठठरीके समान है। जसंकित्तिपुण्णलाहे देह सुवहुगंपि जत्थ तत्थेव । सम्माइ सुगुणभायण पत्तविससं ण जाणंति ॥२७॥ १-अपनी मान बड़ाई और कीर्ति के लिये मिथ्यादृष्टी पुरुषों को मिथ्यामत की वृद्धि के लिये दान देना दीर्घ संसारका ही कारण है । अपनेको जैनधर्मकां श्रद्धांनी जनी माननेवाला श्रीमान् अपनी २३ जस कीरति-शुभलामको, जहं तहं बहुत सुदेहि । भाजन सुगुण सुपात्रको, नहिं विशेष जानेहि ॥२७॥ अर्थ-लोमी: अज्ञानी पुरुष अपनी कीर्ति-यश मान बडाई और पुण्यलाभकी इच्छा से कुपात्र अपात्र आदि अयोग्य मिथ्या अनायतनोंमें बहुत दान देते हैं परन्तु को सम्यक्त्वरत्नसे सुशोभित अनेक गुणोंकी खानि ऐसे सुपात्रकी पहिचानही नहीं है। २४ ख्याति लाभ मान प्रतिष्ठा और खुशामदके गौरवमें पड़कर मिथ्यात्वको वृद्धि के लिये मिथ्यामार्ग. में दान प्रदान करना तो भी संसारका ही कारण है। जैनयात्रा प्रतिष्ठा संघ रथोत्सव जिनविंध: निर्माण मादिके लिये प्रदान किया हुआ दान, मान बड़ाईके कारण विधवाश्रम स्कूल और घोडिंग मादिमें लंगा देना भी संसारका ही कारण है। जिन जिन कारणोंसे जैनधर्मका हास, देव-शास्त्र गुरुका अवर्णर्वाद और चारित्रका लोप होता हो ऐसे कारणों में दान देना संसारका ही कारण है। कुशिक्षा, हिंसा, मोर पापके कार्यो में दान देना भी अयोग्य है। इसी प्रकार मान बड़ाईके लोभमें पात्र अपात्रकी .परीक्षाका . विचार किये बिना यद्वा तद्वा अपात्र कुपात्रमें दान देकर खुश होना और सत्पात्रकी निंदा करना आदि सब मिथ्यात्वकर्मके दयसे ही होता है। पंचमकालमें इसीलिये दानके फलसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं है। विवेक मोर मानके विना उत्तम दान और उत्तम पात्र में किस प्रकार हो सका है। २४ २५ जंत यंतं तंतं परिचरियं पक्खवायपियवयणं । पडुच्च पंचमकाले भरहे दाणं ण कि पि मोक्खस्स ॥२८॥ जंत्र मंत्र तंत्र हि प्रवृति, पक्षपात प्रियवैन । पर्दू काल पंचम भरत, दान मोक्ष कछु हैन ॥२८॥ अर्थ यंत्र मंत्र और तंत्रकी सिद्धि और जनतामें अपनी प्रवृत्ति, पक्षपातकी सिद्धि और खुशामदका लक्ष रखकर इस भरतक्षेत्र पंचमकालमें जो दान दिया जाता है वह दान मोक्षका साधक (मोक्षफलका देनेवाला) नहीं होता है। दाणीणं दालिदं लोहीण किं हवेइ महाइसरियं । उहयाणं पुवजियकम्मफलं जाव होइ थिर ॥२९॥ १-यत्र मंत्र और कुवासनाको इच्छासे दान उत्तम फलका देनेवाला नहीं है। पक्षपातले यद्वा सहा पात्र अपात्र में दिया हुमा दान उत्तम फलको प्राप्त नहीं करता है। खुशामदसे मिथ्या. दृष्टी अपात्र अनायतनों में प्रदान किया दुभादान संसारकं बनता है। इसी प्रकार केवल मान प्रतिष्ठाके गौरवके लिये मिथ्यादृष्टी मपात्र और मिथ्या मनायतनमें दान देना संसारका कारण है। HEAD ग्यण- सार. २६ : दानीके दालिद किम, लोभी मह ईसत्व । दुहुन पूर्वकृत कर्मफल, होत विपाक महत्व ॥२९॥ अर्थ--दानी पुरुषोंको दरिद्रता और लोमी पुरुषोंको महान विभवकी प्राप्ति होना अपने अपने पूर्वजनितकर्मोंका फल है। इसलिये भव्यजीवोंको चाहिये कि जबतक पूर्वकोंके फलका उदय है तबतक अपनी अवस्थापर हर्ष या ग्लानि नहीं करे और न यह विचार करे कि मैं धर्मसेवन करते हुये भी दरिद्र क्यों होगया और पापी पुरुष धनवान क्यों होगये? भावार्थ- धर्मका सेवन सदैव सुखका प्रदान करनेवाला है। दानका फल सदैव सुखकर है परन्तु पूर्वजनित पापकर्मोंका फल जो इस समयमें उदयरूप होरहा है उसके निमित्तसे दरिद्रता आदि सर्व दुखकर सामग्री प्राप्त होजाय तो उसके भोगनेमें शोक और विषाद क्यों करना चाहिये ? परन्तु भावपूर्वक धर्मका सेवन विशेषरूपसे करना चाहिये जिससे पाप कर्मोंका उदय पुण्यरूप होकर परिणमन करे। घणघण्णाइ समिद्धं सुहं जहा होइ सम्बजीवाणं । मुणिदाणाइ समिद्धं सुह तहा त विणा दुक्ख ॥३०॥ RANIKAN २६ सार रयण- २७ धनधानादि समृद्धि सुख, ज्यों सब जीवन छोड़। त्यों मुनिदानहिते सकल, सुख तिहि दुख विन लोइ ॥३०॥ अर्थ--जिस प्रकार धन धान्य आदि भोगोपभोग सामग्री और विभूतिसे सुखकी प्राप्ति होती है उसी प्रकार समस्त प्रकारके परिग्रह और आरंभ रहित वीतराग मुनीश्वरोंके दानके फलसे समस्त प्रकारके सर्वोत्कृष्ट सुख स्वयमेव प्राप्त हो जाते हैं। पत्त विणा दाणं च सुपुत्त विणा बहुधनं महाखत्तं । चित्त विणा वयगुणचारित्तं णिकारणं जाणे ॥३१॥ पात्र विना दत्र सुपुत्त विन, बहुधन अर यह खेत । चित्त विना वृतगुण चरित, जानि अकारन एत ॥३१॥ अर्थ-जिस प्रकार सुपुत्रके विना महान विभूति महल और अपार धन व्यर्थ है। भावोंके विना व्रत तप और चारित्रका पालन करना व्यर्थ है, इसी प्रकार सुपात्रके विना दान देना व्यर्थ है। सुपात्रमें खल्प भी दान वटके सूक्ष्म वीजके समान महान फलको प्रदान करता है, नारायण मतिनारायण चक्रवर्ती इन्द्र धरणद्रेकी अतुल विभूतिको प्रदान २७. SERIYAR रयण. सार २८ करता है और क्रमसे मोक्षसुखको भी देता है। परन्तु अपात्र में प्रदान किया हुआ दान संसारका बढ़ानेवाला और घोर दुःखका देनेवाला होता है। जिद्धारपत्तिहा जिणपूजातित्थवंदण विसेय । घणं जो भुजह सो भुंजइ जिणदिड णरयगयदुक्खं ॥३॥ (१) श्री भगवान कंदकुंद स्वामीने यहांपर निर्माल्यसेवनका पाप नहीं बतलाया है किंतु एक मनुष्यने श्रीजिनेन्द्रमगवानकी नित्यपूजा यावचन्द्रदिवाकर सतत. कायम रहनेके लिये पांच हजार रुपये धर्मार्थ दान किये और उसकी व्याजमें भगवानकी नित्य पूजा होतो रहे पैसो भावना की और इसीलिये दान किया, परन्तु कालान्तरमें उस रुपयाको हजम फरजाना और भविष्य में होनेवाली पूजाका विध्वंस करना सो इसप्रकार पुना प्रतिष्ठा तीर्थयात्रा मादि धात्मक मायतनोंका द्रव्य खाजाना और भविष्य में होनेवाले धार्मिक कार्यको विध्वंस करदेना सो यह सर्व नरकगतिका कारण है। पूजामें मष्ट द्रव्य चढ़ाने के बाद जो निर्माल्य द्रव्य होता है सफा फल तो पूजक भव्य पुरुषने भगवान की पूजा करते ही प्राप्त कर लिया। उसीप्रकार प्रतिष्ठा आदि के लिये रखेहुए द्रव्यका फल भविष्यमें प्रतिष्ठा करते समय प्राप्तहोगा १६ प्रष्ठिा के लिये रखेहुए द्रव्य को बाजाने से नष्ट होगया और प्रतिष्ठा से होनेवाली प्रभावना मी नष्ट होगई इस प्रकार धामिक कार्यको कायम रखनेके लिये प्रदान कियेहुए दानको भक्षण करनेसे नरक की गति होती हैं। निर्माल्य भक्षण करनेसे केवल मंतरायकर्मका ही बंध होता है पेसा श्रीराजवातिकमें कहा है इससे स्पष्ट है किनिर्माल्य सक्षणसे पूजा प्रतिष्ठा मादिका संरक्षित वन्य माण करना महापाप है।
सार रयण- २९ जिन उद्धार प्रतिष्ठा पूजा जिनकी करै । वंदन तीर्थ विशेष जास धनकौं हरै ॥ भूजै भोग अज्ञान काज धर्म नहिं धरै । कहिउ जिनेश सो पुरुष.नरक्रके दुख भरै॥ अर्थ-श्रीजिनमन्दिरका जीर्णोद्धार, जिनबिम्ब प्रतिष्ठा, मंदिर प्रतिष्ठा, जिनेन्द्र भगवानकी पूजा, जिनयात्रा, तीर्थयात्रा,. रथोत्सव और जिनशासनके आयतनोंकी रक्षाके लिये प्रदान किये हुए दानको जो मनुष्य लोभ मोहवश ग्रहण करे, उससे भविष्यमें होनेवाले धर्मकार्यका विध्वंसकर अपना स्वार्थ सिद्ध करे तो वह मनुष्य नरकगामी महा पापी है ऐसा श्रीजिनराजने कहा है। पुत्तकलितविदूरो दारिदो पंगु मूकवहिरंधो। चंडालाइकुजादो पूजादाणाइदव्वहरो॥३३॥ पुत्रं कलिन विना दलिद, पगुमकवहिरंध । चांडालादि कुजाति हुइ, महदतधनहर मुंध ॥ ३३ ॥ अर्थ-जो मनुष्य पूजा प्रतिष्ठा तीर्थयात्रा आदिके लिये संरक्षित द्रव्यका अप- हरण करता है वह पुत्र स्त्री आदि कुटुंब परिवारसे रहित होता है । दरिद्र पंगु मूक बहिरा अंधा होता है और चांडालादिक कजातिमें उत्पन्न होता है। २९ .
रयण- इत्थीयफलं ण लन्भय जई लब्भइ सोण भुजदेणियदं। वाहीणमायसेसो पूजादाणाइदम्बहरो॥ ३४ ॥ अर्थ-जो मनुष्य पूजाके निमित्त प्रदान किये हुए द्रव्यका अपहरण करता है वह इच्छित फलको कदापि प्राप्त नहीं होता। उसके पुण्यका उदय कभी नहीं होता है। कदाचित इष्टवस्तुका संयोग प्राप्त हो जाय तो भी वह उसका फल भोग नहीं ३० सकता। गयहत्थपायणासिय कणउरंगलविहीणदिट्ठीए। जो तिव्वदुक्खमूलो पूजादाणाह दव्वहरो॥३५॥ गत कर पद नासा कणव, जो अंगुलि दिठि हीन । तीबदुक्खको मूल हुइ, पूजदान धनलीन ॥ ३५॥ अर्थ--जो मनुष्य पूजा प्रतिष्ठादिके निमित्त प्रदान किये हुए द्रव्यका अपहरण करता है वह हाथ पद (पैर) नासिका कर्ण अंगुलि आदि रहित हीनांग होता है। आंखोंसे अन्धा होता है और तीवतर दुःखको प्राप्त होता है।
-- सार रयण- ३१ खयकुंडमूलसूला ल्यभयंदरजलोदरखिासरो। सीदुण्हवाहिराइ पूजादाणांतरायकम्मफल ॥ ३६॥ कुष्टसिरह क्षय मूल लूत जलोइभगइ रुज । वात पित्तकफमूल पूजदान अन्तरायफल ॥ ३६॥ अर्थ-जो मनुष्य लोभ मोहके वश होकर श्रीजिनेन्द्रभगवानकी पूजाके निमित्त दान किये हुऐ व्यका अपहरण कर पूजादि धार्मिक कार्योंमें अंतराय करता है, विघ्न करता है, पुण्योत्पादक कायका विध्वंस करता है वह क्षय कोड़ शूल लूता जलोइर भगंदर गलकुष्टि वात पित्त कफ और सन्निपात आदि रोगोंकी तीव्रवेद- नाको प्राप्त होता है भावार्थ-जिनशासन और धर्मायतनोंको उद्योत करने वाले पूजा प्रतिष्ठारथ- यात्रा तीर्थयात्रादि धार्मिक कार्योंके लिये प्रदान किये हुऐ द्रव्यको वह धार्मिक कार्य होनेके प्रथमही अपहरणं कर धार्मिक कार्यमें अंतराय करना अथवा धा क कार्योंकी व्यवस्था में विघ्न करना, धार्मिक कार्योंमें दान देने वाले भाइयोंको रोकना, सुचारु रूपसे कार्य करने वाले धार्मिक कार्योंमें रोड़ा अटकाना, मन्दिके छत्र चमर आदि १ ३१ रयण- सार ३२ . विभूतिका लोप करना मन्दिरकी द्रव्यसे आजीविका कर मन्दिरके कायको बंद करना आदि अनेक प्रकार पूजा और दानके कार्योंमें अंतराय करनेसे दुःख प्राप्त होता है। णरइतिरियाइदुरइदरिहवियलंगहाणिदुक्खाणि । देवगुरुसत्थवन्दणसुयभयंसज्झादाणविषणफलं ॥३७॥ अर्थ-जो मनुष्य देव-गुरु शास्त्रके उद्धार, चंदना और पूजा प्रतिष्ठा आदिके निमित्त होनेवाले दानमें अथवा प्रदान किये हुऐ दानमें, श्रुतकी वृद्धि पाठशाला विद्यालय और स्वाध्याय आदिके लिये दानमें विघ्न करता है उसको तरक तियेच आदि दुर्गतिके दुःख और मनुष्यगतिमें दरिद्रता विकलांग तथा विविध प्रकारके दुःख पास होते हैं। सम्मविसोही तवगुणचारित्तसपणाणदानपरिधीणं। भरहे दुस्समकाले मणुयाण जायदे णियदं ॥ ३८॥ समकितसुध तपंचरिच, सतज्ञानदान परधान। भरतकाल पंचममनुष, निहाचै उपज महान् ॥३०॥ अर्थ--इस दुस्सह दुःखम (कलिकाल) पंचमकालमें मनुष्योंके नियमपूर्वक . ३२ रयण शुद्ध सम्यग्दर्शन सहित तप व्रत अठाईस मूलगुण चारित्र सम्यग्ज्ञान और सम्यग्दान आदि सर्व होता है। भावार्थ-भरतक्षेत्र पंचमकालमें अठाईस मूलगुण धारक तप व्रत और चारित्रके पालन करनेवाले मुनीश्वर होते हैं और शुद्धसम्यग्दर्शनको धारण करनेवाले मुनीश्वर व गृहस्थ होते हैं। णहि दाणं णहि पूया णहि सीलं णहि गुणं ण चारित्तं । जे जइणा भणिया ते णरया हुंति कुमाणुसा तिरिया ॥३६॥ नहीं दान नहीं पूज नही शील गुणहि चरित्र । मणिया ते नारकि कुमनु तिरजग होत परित्र ॥ ३९॥ अर्थ-जिन जीवोंने मनुष्यपर्याय प्राप्त कर सुपात्रमें दान नहीं दिया, श्रीजिनेन्द्र भगवानकी पूजा नहीं की, शीलवत (स्वदारसंतोष-परस्त्रीत्याग) नहीं पालन किया, मूलगुण और उत्तरगुण पालन नहीं किये, चारित्र धारण नहीं किया और श्री- जिनेन्द्रदेवकी आज्ञा पालन नहीं की वे मनुष्य मर कर परलोकमें नारकी, तिर्यच अथवा मनुष्य होते हैं। ३:३ रयण- सार ANYAR ३४ ण विजाणइ कजमकज सेयमसेयं च पुण्णपावं हि । तंचमतच्चं धम्ममधम्म सो सम्मउम्मुको ॥४०॥ काज अकाज न जानही श्रेय अश्रेय.पुन्य पाप । तत्व अतत्व अधर्म धर्म सो समकित विन आप ॥४०॥ अर्थ-जो मनुष्य सम्यग्ज्ञान के साथ अपना कार्य अकार्य, अपना हित अहित; तत्व अतत्त्व, धर्म अधर्म और पुण्य पापको नहीं जानता है वह सम्पदर्शनसे रहित मिथ्याष्टी है। ण विजाणइ जोग्गमजोरगं णिचमाणिचं हेयमुवदेयं । सच्चमसचं भव्वमभव्वं सो सम्मउमुक्को॥४१॥ जोग अजोगरु नित अनित, सत्य असत्य न जानि । हेय अहेय न भवि अभवि सोसमकित विन मानि ॥ ४१॥ अर्थ--जो मनुष्य योग्य अयोग्य, नित्य अनित्य, हेय उपादेय, सत्य असत्य संसार और मोक्षको नहीं जानता है वह सम्यग्दर्शनरहित मिथ्यादृष्टी है। ३४ सार रयण- लोइयजणसंगादो होइ मइमुहरकुडिलदुम्भावो। लोइय संगं तहमा जोइ वित्तिविहेण मुंचाहो ॥४२॥ लौकिक जन संघात मइ, मुखुर कुटिल दुरभाव । होइ संग ताते तजौ, मन वच तनकर जाव ॥ ४२ अर्थ-लौकिक मनुष्योंकी संगतिसे मनुष्य अधिक. बोलनेवाले ..(वाचाल) पकड कुटिल परिणाम.. और दुष्ट मावोंसे अत्यंत क्रूर हो जाते हैं इसलिये लौकिक मनुष्योंकी संगतिको मन वचन कायसे छोड़ देना चाहिये । भावार्थ-धर्माचरण विहीन-नास्तिक मनुष्योंकी संगति और उनकी कुशिक्षा- से मनुष्य वाचाल हो जाते हैं। इससे वे पापकर्म-हिंसा झूठ चोरी और व्यभिचार आदि अनीतिके कार्य करने में जरा भी नहीं हिचकते हैं बल्कि उस कुशिक्षाके प्रभव से पापकर्म करते हुए अपनी सफाई खूब बड़ाईके साथ पुकार पुकार कर गाते हैं। अपनेको जैन बतलाते हुए भी लौकिक जनकी संगतिसे जैनधर्मके विरुद्ध आचरण करते हैं। दुष्ट भावोंको रख कर अधर्मकी वृद्धि कर मिथ्यात्वको बढ़ाते हैं इसलिये लौकिक जनकी संगतिका परित्याग करना चाहिये । ३५ RATAN रयण- सार ३६ उग्गो तिब्बो दुट्ठो दुब्भावो दुस्सादो दुरालावो। दुमदरदो विरुद्धो सो जीवो सम्मउमुक्को॥४३॥ उग्र तीव्र दुर्भाव दुठ श्रुत दुर आलाप । दुरमत रत अविरुद्ध जिम सो विन समकित आप ॥४३॥ अर्थ-उग्र प्रकृतिवाले, तीव्र क्रोधादि प्रकृतिवाले, दुष्ट स्वभाववाले, दुर्भाववाले, मिथ्या शास्त्रोंके श्रवण करनेवाले, दुष्ट वचनके कहनेवाले, मिथ्याभिमानको धारण करनेवाले, आत्मधर्मसे विपरीत चलनेवाले और अतिशय क्रूर प्रकृतिवाले मनुष्य सम्यक्त्व रहित होते हैं। खुद्दो रुद्दो रुडो अणि?पिसुणो सग्गस्थि असुइउ । गायणजायणभंडनदुस्सणसीलो दु सम्मउमुको ॥४४॥ क्षुद्र रुद्र रोषी पिशुन गरवी निंद्य अनिष्ट । गायण जाचक दोषकथ भडन समकित नष्ट ॥४४॥ अर्थ-क्षुद्र प्रकृतिवाले, रुद्रपरिणामी, क्रोधी, चुगुलखोर, कामी, गर्विष्ठ, अस- हनशील, द्वेपी, गायक, याचक, लड़ाई झगड़े करनेवाले, दूसरोंके दोषोंको प्रकट करने वाले, निंद्य पापाचारी और मोही मनुष्य सम्यक्त्वरहित होते हैं। ३६ सार रयण- वाणरगद्दहसाणगयावग्धवराहकराह । पक्खिजलूयसहाव णर जिणवरधम्मविणासु॥४५॥ वानर गर्दभ अरु महिष गज वाघ वराह कराह । पति जलूक खभावनर जिनवर धर्म न ताह ॥ ४५ ॥ अर्थ-बंदरके स्वभाववाले, गदहाके स्वभाववाले, भैसा हाथी बाध शूकर कक्षप पक्षी जलूकादि स्वभाववाले मनुष्योंके श्रीजिनेन्द्रदेवका धर्म धारण नहीं होता है । कुतवकुलिंगकुणाणी कुवयकुमीलकुदंसणकुसत्थो। कुणिमित्त संथुय थुइ पसंसणं सम्महाणि होइ णियमं ॥४६ ॥ अर्थ-मिथ्यातपश्चरण करनेवाले, कुत्सित मेपको धारण करनेवाले, मिथ्याज्ञान- की आराधना करनेवाले, कुत्सित व्रताचरणोंको पालन करनेवाले, कुशीलसेवन करने वाले, मिथ्यादर्शनके भाववाले, मिथ्याशास्त्रोंका पठन पाठन और स्वाध्याय करनेवाले, कुत्सित आचरण करनेवाले, मिथ्याधर्म, मिथ्यादेव और कुगुरुकी प्रशंसा करनेवाले मनुष्य सम्यक्त्वरहित होते हैं। उनके नियमपूर्वक सम्पग्दर्शन नहीं होता है। ३७ YA सार रयण- ३८ सम्मविणा सण्णाणं सच्चारित्रण होइ णियमेण । तो रयणत्तयमज्झे सम्मगुणकिडमिदि जिणुदिहं ॥४७॥ समकित विन सतज्ञान सतचारित नियत न जोय । रत्नत्रय सम्यकगुण जिनकहि उत्तम होय ॥४७॥ अर्थ--सम्यग्दर्शनके बिना सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र नियमपूर्वक नहीं होते हैं। जिसके सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्ररूप रस्नत्रय है उसके ही सम्यक्त्व गुण प्रशंसनीय हैं ऐसा श्रीजिनेन्द्र भगवानने कहा है। तणुकुडी कुलभंगं कुणइ जहा मिच्छमप्पणो वि तहा। दाणाइ सुगुणभंगं गइभंगं मिच्छसेव हो कह ॥४८॥ तनकुष्ठी कुलभंग ज्यों करै जथा ज्यों जानि । त्यों दानादिक सुगुण बहु कर मिथ्याती हानि ॥४८॥ अर्थ-जिस प्रकार कोढ़ी रोगवाला मनुप्य कुष्टके कारण अपने कुलको नष्ट करता है ठीक इसी प्रकार मिथ्यादृष्टी जीव दान पूजा-चारित्र और धर्मायतनोंका विध्वंस करता है इसलिये मिथ्यात्वका सेवन करना विशेप दुःखका प्रदान करनेवाला है। Ph ३८
रयण-
सार
३९
मिथ्यात्वसे समस्त आत्मीयगुण नष्ट हो जाते हैं और सच्चे देव शास्त्र गुरु तथा
धर्माचरणोंसे विपरीत भाव हो जाते हैं। इसलिये मिथ्यात्वका सेवन करना संसार-
के दुखोंका ही कारण है।
देवगुरुधम्मगुणचरितं तवायारमोक्खगइभेयं ।
जिणवयणसुदिठिविणा दीसड़ किह जाणए. सम्मं ॥४९॥
देव धरम गुरुगुण चरित शुभ तप शिव गति मेव ।
जिनवर वचन सुदिष्टि विन अंधक सम्यक वेव ॥४९॥
अर्थ-सम्यक्दर्शनके विना देव गुरु धर्म क्षमादिक गुण, चारित्र तप मोक्ष मार्ग-
तथा श्री जिनेन्द्र भगवानके वचन (जिनवाणी) को नहीं मानते हैं।
भावार्थ-जिनके सम्यग्दर्शन नहीं है उनके देव शास्त्र गुरुका श्रद्धान भी नहीं
है । तथा व्रत तप चारित्र और मोक्ष मागभी नहीं होता है।
एक्कु खणं ण विचिंतेइ मोक्खणिमित्तं णियप्पसाहावं ।
अणिसं विचिचपावं बहुलालावं मण विचिंतेइ ॥५०॥
रयण- सार खिन न चिंतय शिव निमित्त निज आतम सदभात्र । अह निश चिन्तय पाप बहु मन चिन्तइ आलाव ॥५०॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टी जीव एक क्षणमात्रभी मोक्षकी सिद्धिके लिये अपने आत्म- स्वरूपका चिंत्तवन नहीं करता है, परंतु रात्रि दिवस पापके कार्योंका वारवार विचार करता है तथा परवस्तुकी निरंतर अभिलापा करता है। मिच्छामइमयमोहासवमत्तो वोलए जह भुल्लो । तेण ण जाणइ अप्पा अप्पाणं सम्मभावाणं॥५१॥ मिथ्या मति मदमोह भुल्ल वकत जिम मत्त । तैसे जानत नांहिं निज अरु समभावहि तत्त ॥ ५१ ॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यावुद्धिके अभिमानसे मदोन्मत्त होकर मदिरा पान- करने वाले भुल्लड़ मनुष्यके समान यद्वा तद्वा मिथ्या प्रलाप करते हैं। परंतु वे मोह- के उदयसे अपनी आत्माको नहीं जानते है और आत्माके समताभावको सर्वथा नहीं जानते हैं। ४० 1 सार रयण- ४१ मिहरो महंधमारं मरुदो मेहं महावणं दाहो। वज्जो गिरिं जहाविय सिंज्जइ सम्मे जहाकम्मं ॥५२॥ महाअंध्यारो रवि मरुत मेघ महावन दाह । पर्वत व विनाशए समकित कर्म अपाह ॥५२॥ अर्थ-जिससप्रकार सूर्य अंधकारको तत्काल नष्ट कर देता है । वायु मेघका नाश करती है । दावानल वनको जला देता है । वन पर्वतोंको भेदन (चूर्ण) करदेता उसी प्रकार एक सम्यक्त्व समस्त कौंको नाश कर देता है। मिच्छंधयाररहियं थियमझं मिव सम्मरयणदीव कलावं । जो पज्जलइ स दीसइ सम्मं लोयत्तयं जिणुदिई॥५३॥ पखि अंध्यारे गेह मधि दीपकला परगास । समकित नग प्रज्वले दिपै तीन लोक जिन भास |॥५३॥ अर्थ- जो धर्मात्मा अपने हृदय मंदिरमें सम्यक्त्वरत्नरूपी दीपक प्रज्वलित करता है उसको त्रिलोकके समस्त पदार्थ स्वयमेव प्रतिमा सित होते हैं। CC रयणन सार ४२ कामदुहि कप्पतरूं चिंतारयणं रसायणं य समं । लद्धो भुंजइ सोक्खं जहच्छियं जाण तह सम्मं ॥ ५४॥ कामदुधा तरकल्प रससार रसायण चिंत। मणि लाभै सुख मुंजए इच्छित जिमि सम दित ।। अर्थ--जिस प्रकार भाग्यशाली मनुष्य कामधेनु, कल्पवृक्ष, चिंतामणि रत्न और रसायणको प्राप्त कर मनवांच्छित उत्तमसुखको प्राप्त होता है उसीप्रकार सम्यग्दर्शन- से भव्य जीवोंको सर्वप्रकारके सर्वोत्कृष्ट सुख और समस्त प्रकारके भोग्योपभोग स्वयमेव प्राप्त होजाते हैं । कतकफलभरियणिम्मल ववगय कालिया सुवणञ्च । मलरहियसम्मजुत्तो भव्ववरो लहइ लहु मोक्खं ॥ ५५॥ अथ-जिस प्रकार कतक ( निर्मली) के संयोगसे जल निर्मल होजाता है। अग्नि तथा रसायणके वलसे सुवर्ण किट्टिमा रहित निर्मल होजाता है। उसी प्रकार सम्यग्दर्शनसे यह जीव समस्त प्रकारके कर्ममल रहित शुद्धस्वभावको प्राप्त हो जाता है और उसको सहज लीलामात्रमें ही मोक्षकी प्राप्ति होती है। ४२ सार श्यण- ४३ पुवट्टियं खवइ कम्मं पइसुदु णो देइ अहिणवं कम्मं । इहपरलोयमहप्पं देइ तहा उवसमो भावो॥५६॥ पूरव थित खपै करम नव नाहिं देत प्रवेश । देय महातम लोक द्वय उपसम भाव नरेश ॥ ५६ ॥ अर्थ-भव्य जीवोंको उपशम भाव पूर्ववद्ध कर्मोकी निर्जरा करता है । (पूर्ववद्ध कर्मोंकी स्थितिका क्षय करता है ) और नवीन कर्म बंध होने नहीं देता हैं (नवीन कर्मोंका आस्रव नहीं होता है। इसलिये उपशमभाव दोनों लोकमें अपूर्व माहात्म्य प्रगट करता है। सम्माइडी कालं बोलइ वेरग्गणाणभावेण । मिच्छाइडी वांछा दुब्भावालस्सकलहेंहि ॥५॥ अर्थ--सम्यग्दृष्टी पुरुष समयको वैराग्य और ज्ञानसे व्यतीत करते हैं । परंतु मिथ्यादृष्टी पुरुष दुर्भाव आलस और कलहसे अपना समय व्यतीत करते हैं। अज्जविसप्पिणि भरहे पउरा रुद्दट्टआणया दिहा। पहा दुहा कहा पायिड़ा किण्णणीलकाऊदा ॥५८॥ ४३ ४४ YEARNER आज भरत अवसव सरपिणी प्रचुरात अतिरुद्र । नष्ट दुष्ट पापिष्ट कठ त्रयलेश्या जुत क्षुद्र ।। ५८ ।। अर्थ-इस भरतक्षेत्र अवसर्पिणी पंचमकालमें दुयानी रुद्रपरिणामी कृष्णादि अशुभ लेश्याके धारक क्रूर स्वभाव बाले नष्ट दुष्ट पापिष्ट और कठोर भावोंको धारण करनेवाले अधिक मनुष्य उत्पन्न होते हैं । अज्जविसप्पिणि भरहे दुस्ससया मिच्छपुब्बया सुलया। सम्मत्तपुवसायारणयारा दुल्लहा होति ॥ ५९॥ अवसर्पिणि दुःखम भरत सुलभ पूर्वमिथ्यात । समकित पूरख जति गृही दुर्लभ धर्म विख्यात ।। ५९ ॥ अर्थ-इस भरतक्षेत्र अवसार्पणी पंचमकालमें मिथ्यात्वी मनुष्य अधिक हैं। परंतु सम्यग्दृष्टी मुनीश्वर और गृहस्थ दुर्लभ हैं। भावार्थ-जैनधर्मको धारण करनेवाले धर्मात्मा सम्यग्दृष्टी गृहस्थ और मुनीश्वर अत्यन्त दुर्लभ हैं। मिथ्यामतको धारण करनेवाले मिथ्यात्वी अधिक हैं-सुलभता से प्राप्त होते हैं। ४४ R सार -- रयण- अज्जविसप्पिणि भरह धम्मज्झाण पमादरहियमिदि। जिणुदिहं णहु मुण्णइ मिच्छादिठी हवे सोहु ॥६०॥ अवहू अवसर्पिणि भरत बिन प्रमाद धर्मध्यान । होत यह बिधि जिन कह्यो जो कुदिष्टि नहिं मान ॥६॥ अर्थ-इस भरतक्षेत्र अवसर्पिणी पंचमकालमें श्रीमुनीश्वरोंके प्रमाद रहित धर्म- ध्यान होता है ऐसा श्री जिनेन्द्रदेवने कहा है। जो इसको नहीं मानता है वह मिथ्यादृष्टी है। भावार्थ-अप्रमाद अवस्था सातवें गुणस्थानमें होती है । भरतक्षेत्र पंचमकालमें सातवें गुणस्थानवर्ती मुनीश्वरोंके ममाद रहित धर्मध्यान नियम पूर्वक होता है, ऐसा श्री जिनेन्द्र भगवानने परमागममें कहा है । जो जैनी इस पंचमकालमें सातवें गुण- स्थानवर्ती मुनिधर्म (मुनीश्वरोंका अस्तित्व ) तथा प्रमाद रहित धर्मध्यानको नहीं मानता है वह मिथ्यादृष्टी है, जैनधर्मसे पहिभूत है। असुहादो णिरयादो सुहभावादो दु सग्गसुहमाओ। दुहसुहभावं जाणइ जं ते रुच्चे दणं कुणहो ॥ ६ ॥ ४५ सार रयण- ४६ है असुभभावतें नरकगति शुभ मुरग सुख आव । दुखसुख भावह जानि तुव रुचै सु करि अनुराव ॥६॥ अर्थ--अशुभभावसे नरकादि दुर्गति होती है। शुभ भावोंसे स्वर्गके अनुपम सुख प्राप्त होते हैं। दुःख और सुखकी प्राप्ति अपने शुभाशुभ भावों पर ही निर्भर हे भव्य आत्मन् ! जो तुझको अच्छा मालूम होता हो वह कर । भावार्थ:--अशुभ भाव करेगा तो दुःख होगा। शुभ भाव करेगा तो सुख होगा इसलिये अशुभ भावोंका त्याग कर । हिंसाइसु कोहाइसु मिच्छाणाणे सु पक्खवाएसु । मच्छरिएसु मएसु दुरिहिणवेसेसु असुहलेसेसु ॥१२॥ विकहाइसु रुद्दट्ठज्झाणेसु असुयगेसु दंडेसु । सल्लेसु गारवेसु चाएसु जो वइए असुहभावो ॥१३॥ हिसादिक क्रोधादि अरु मृपा ज्ञान पक्षपात । • अभिनिवेश दुर्मद मच्छर अशुभ लेसि विख्यात ॥६२॥ ४६ सार रयण- ४७ विकथादिक दुयान असय रौद्र परिणाम | शल्य गारव ख्याति में अशुभ भाव मद काम ॥१३॥ अर्थ--हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील, और पापाचरणरूप परिणाम, क्रोधमान माया लोभ-मोह रूप परिणाम, मिथ्याज्ञान,पक्षपाव, सप्ततत्वोंके परिज्ञानमें संशय विप- रीत और अनध्यवसायरूप परिणाम, मत्संरभाव, अशुभलेश्या विकथादिक प्रवृत्तिरूप परिणाम, आर्त रौद्र परिणाम, असूय परिणाम (दुसरेके गुणोंको सहन नहीं होनेके भाव) निंद्य परिणाम, मिथ्या माया निदान शल्ययुक्त परिणाम, रसगारव आदि अपनी पूजा प्रतिष्ठा कीर्ति मानबडाईके परिणाम इत्यादि अनेक प्रकारके दुर्भाव अशुभ भाव हैं। भावार्थ-जिन कारणोंसे जीवोंके परिणामों में रागद्वेषकाम क्रोध मोह आदि विकार अथवा राग द्वेष रूप विकारी परिणाम हों उनको अशुभ भाव कहते हैं। दव्वत्थकायछप्पणतच्चपयत्येसु सत्तणवएसु । बंधणमुक्खे तक्कारणरूये वारसणुवेक्खे ॥६॥ रयणत्तयस्स रूवे अज्जाकम्मो दयाइसद्धम्म । इच्चेवमाइगो जो वह सो होइ सुहभावो ॥६५॥ SAR सार ४८ अस्तिकाय पण द्रव्य षट् तत्व सात नव भाव । बंध मोक्ष कारण सरुव द्वादश भावन ध्याव ॥६४॥ रत्नत्रयहि स्वरूप अरु आरिज दयादि धर्म । एसे मारग वर्तई सो शुभ भाव सुसर्ग ॥१५॥ अर्थ-पंच अस्तिकाय, छहद्रव्य, सात त्तत्व, नव पदार्थ, बंधमोक्ष, दयाक्रोध, वारह भावना, रत्नत्रय, आर्जवभाव क्षमाभाव और सामायिकादि चारित्रमय जिन भव्य जीवोंके भाव व हैं , वे शुम भाव हैं। सम्मत्तगुणाइ सुग्गइ मिच्छादो होइ दुग्गई णियमा । इदि जाण किमिह बहुणा जंते रुचेइ तं कुणहो ॥६६॥ समकित गुणते शुभसुगति दुर्गति देव मिथ्यात | यह जानि भव्य जो रुचै करुहु नियम अवदात ।। ६६॥ अर्थ-सम्यग्दर्शनके प्रभावसे जीवोंको नियमसे शुभगति होती है और मिथ्यात्वसे नियम पूर्वक दुर्गति होती है इसलिये हे भन्य! तुझको जो अच्छा लगे वह कर, अधिक क्या कहें। ४८ रसाए ४९ मोह ण च्छिजइ अप्पा दारुण कम्मं करेइ बहुवारं। णहु पावइ भवतीरं किं वहु दुक्खं वहेइ मूढमई ॥६७॥ मोहक्षय जिय नहीं करे करे पाप बहुवार । नहिं पावे भवपार किम सहिह दुक्ख गंवार ॥ ६७ ॥ अर्थ-यह आत्मा मोहका क्षय तो करता नहीं है और अपने मन वचन कायसे कठिन कार्यों (व्रततपश्चरणं आदि) को बार बार करता है क्या इससे संसार समुद्रसे पार होगा- व्यर्थ ही मूर्ख दुःखोंको सहन करता है। धरियउ वाहिरलिंगं परिहरियउ बाहिरक्खसोक्खं हि। करियउ किरिया कम्मं मरिउ जमिउ वहिरप्पुजिय ॥६॥ द्रव्यलिंग धरि परिहस्यो वाहिज इन्द्रिय सुख । क्रिया करम करि मरि जनम, वहिरातम सहदुःख ॥ ६८॥ ... "अर्थ-द्रव्यलिंग [सम्यक्त्वरहित जिनलिंग मुनि अवस्था] को धारण कर और प्रकट रूपसे इन्द्रियोंके वाह्य सुखका परित्याग कर अनेक प्रकारके कठिन व्रताचरण किये परन्तु फिर भी पहिरामा मिथ्यादृष्टि जीव जन्म मरणके दारुण दुखोंको प्राप्त होता ४९ रयण- सार ५० ही रहा, एक सम्यदर्शनके बिना जिनलिंग भी संसारका नाश नहीं कर सकता है। मोक्खणिमित्तं दुक्खं बहेइ परलोयदिद्वितशुदिट्ठी। मिच्छाभाव ण च्छिजह कि गावइ मोक्खसोक्खं हि ॥ १९ ॥ मोक्ष निमित्त दुख वहे तन दण्डों दिहि परलोक मिथ्याभाव न छीजह किम पावइ शिव थोक ॥१९॥ अर्थ-मिथ्यादृष्टी यहिरात्मा जीवने मोक्षकी प्राप्तिके लिये चार चार अनेक प्रयत्न किये और व्रततपश्चरणके द्वारा शारीरिक अनेक कष्ट भी सहन किये परंतु मिथ्या भावोंका परित्याग नहीं किया. इसलिये यह अज्ञानी आत्मा मोक्षके सुखको किस प्रकार प्राप्त कर सक्ता है? ण हुदंड कोहाई देहं दंडे कहं खवइ कम्म । सप्पो कि मुवई तहा वम्मिउ मारिउ लोए ॥ ७॥ नहिं दं? क्रोधादि तन दंड विपै किम कर्म । तैसें नाग कहा मुझे लोक वंवि हन भर्म ॥ ७ ॥ अर्थ--हे पहिरात्मन् । तू क्रोध, मान, मोह आदि दुर्भावोंका त्याय (दंड) नहीं . KHERI सार रपण OTO करता है और व्रत तपश्चरण: आदिके द्वारा शरीरको दंडाकृष्ट] देता है इससे तेरे कर्म नष्ट हो जायंगे क्या... कदापि नहीं. क्योंकि सर्पके, विलको मारनेसे सर्प नहीं मरता है। उपसम भवभावजुदो णाणी सो भावसंजुदो होई णाणी कसायवसगो, असंजदो होड़ सो ताव ॥ ५१ ॥ उपशम तप.भावह जुगत तावत संजम ज्ञान । ज्ञानी भयो कपाय वश ताव असजम थान ॥ ७१ ॥ अर्थ--उपशम भावसे व्रत तपश्चरण चारित्र आदि धारण किये जाय, तो वे समस्त संयमभावको प्राप्त हैं। परन्तु, कपायके वश व्रत तपश्चरण धारण किये जाय तो भी वे असंयमभावको ही प्राप्त होते. हैं । भावार्थ-सम्यग्दृष्टि जीवोंके. उपशमभावसे जबतक व्रतादिक होते हैं तातक उनके संयम,भाव होता है और अनेक शास्त्रोंका ज्ञाता महाज्ञानी पुरुष अपने ज्ञानके अभिमानमें कपायोंसे ब्रतादिकको. धारण करता है परंतु भावोंमें कलुपित परिणाम होनेसे असंयत, भाव ही रहते हैं। :५१ :
सार णाणी खवेइ कम्म णाणवलेणेदि सुबोलए अण्णाणी। विजो भेसनमहं जाणे इदि णस्सदे वाही ॥७२॥ ज्ञानी खेपै ज्ञानवल कर्म न मान अज्ञान । पीजै भेषज ज्ञान यह व्याधि नाश इति मान ॥ ७२ ॥ अर्थ---ज्ञानी पुरुष अपने ज्ञानके वलसे कर्मोंको नष्ट कर देता है ऐसा जो कहता है सो अज्ञानी है. क्योंकि. विना चारित्रके अकेले ज्ञानसे कभी कर्म नष्ट नहीं हो सकते: । मैं सब औषधियोंको जानता मैं एक अच्छा वैद्य हूं, ऐसा कहनेमात्रसे क्या व्याधियां नष्ट हो जाती हैं ? कभी नहीं। भावार्थ-जिसप्रकार रोग और औषधिके जानने मात्रसे व्याधि दूर नहीं होती उसी प्रकार अकेले ज्ञानसे कर्म नष्ट नहीं होते किंतु, जैसे औषधिको घोट छानकर पीनेसे व्याधि नष्ट होती है उसी प्रकार चारित्रसे कर्म नष्ट होते हैं। पुव्वं सेवइ मिच्छामलसोहणहेत. सम्मभेसजं । पच्छा सेवइ कम्मामयणासणचरियसम्मभेसजं ॥७३॥ ५२ .
सार यणः मिथ्यामल शोधन प्रथम समकित भेषज सेय। पीछे सेवइ करम रुज नाशन चारित हेव ॥ अर्थ-भव्य जीवोंको सबसे प्रथम मिथ्यात्वरूपी मलका शोधन सम्यक्त्वरूपी रसायनसे करना चाहिये। पुनः चारित्ररूपी औषधका सेवन करना चाहिये । इस- प्रकार आचरण करनेसे कर्मरूपी रोग तत्काल ही नियमपूर्वक नाश हो जाता है। भावार्थ-सम्यग्दर्शनके विना ज्ञान और चारित्र निष्फल हैं कर्मोंका नाश सम्पक्चारित्रसे ही होता है। यदि सम्यग्दर्शनपूर्वक चारित्र है तो कर्मोके नाश होने में कुछ भी विलंब नहीं है । सम्यग्दर्शन होने पर भी जबतक सम्यक् चारित्र पूर्ण- रूपसे प्राप्त नहीं है तबतक फर्मोंका नाश कदापि नहीं होगा और मिथ्यात्वक साथ चारित्र धारण किया जाय तो केवल संसारका ही वर्द्धक है कर्मोका नाश करने वाला नहीं है। इसलिये सबसे प्रथम मिथ्यात्वका नाश कर चारित्र धारण करना पाहिये। अण्णाणी विसयविरचादो होइसयसहस्सगुणो। गाणी कसायविरदो विसयासचो जिणुद्दिटुं॥७४ ॥ ५३
रयण-
सार
५४
--
प्रिज्ञांनी विषयविरत अरु कषाय विन होयः।
तातें शानी विषय जुत जिन कहि लख गुन सोय ॥ ७४ ॥
अर्थ-मिथ्यादृष्टी ( अज्ञानी)जीव विषय और कपायोंसे विरक्त होक
फल प्राप्त करता है सम्यग्दृष्टी जीव विषय कपायोंको सेवन करते हुए भी उससे लाख.
गुणा फल अनायास ही प्राप्त कर लेता है ऐसा श्री जिनेन्द्र भगवानने कहा है।
. भावार्थ-विषय कपायको सेवन करते हुए भी सम्यग्दृष्टी पुरुपोंको मिथ्यादृष्टी
जिनलिंग धारीकी अपेक्षासे असंगात गुणी कमांकी निर्जरा होती है। प्रथम तो
मिथ्या दृष्टीको काँकी निर्जरा ही होती नहीं है कदाचित् वह मिथ्यादृष्टी मोहनीय
कर्मके मंदोदयसे श्री जिनेंद्र भगवान कथित चारित्रको धारण कर लेवे और समस्त
प्रकारकी विषय कपायका परित्याग कर देवे तो भी कर्मोंकी निजरा मिथ्यादृष्टीकों
नहीं होती है। हां, पुण्यकी प्राप्ति अवश्य ही होती है , इसलिये मिथ्यादृष्टीका विषय
कपायोंका परित्याग कार्यकारी नहीं है और सम्यग्दृष्टी पुरुषोंको विषय केपायको
सेवन संसारके बंधको कारण सर्वथा नहीं है।
विणओ भक्तिविहीणो महिलाण सेयणं विणा णेहं।
चागो वेरंग विणा एदं दो वारिया भणिया ॥७५॥
सारे श्यण- ५५ विनय भक्तिं विन रुंदन त्रिय विना नेह ज्यों कोय । त्यौं गृहत्याग विराग विन दुचरित यह होय ||७५ ॥ अर्थ-भक्तिके विना विनय, स्नेहके विना स्त्रियोंका रुदन, वैराग्य भावके विना योगे, यह सव विडंबना है। ... भावार्थ- भक्तिके विना विनय करना छल ना विडंवना है, प्रेमके विनी स्त्रियों का रोना विडवना है, उसीमकार वैराग्य उत्पन्न हुए विना घरंका त्याग कर वल विडंबना है। सुहडो सूरत्त विणा महिला सोहग्गरहियपरिसोहा। रंग्ग णाणसंजमंहीणी खवणा णं किं वि लेभंते ॥७॥ सुभट शक्ति विन कॉमिनी विन सौहाँग सौभत । संजम शान निरोग विनं; ज्यौं मुनि कछु न लहन ॥७६॥ अथ-शूरवीर शक्तिके बिना, स्त्री सौभाग्यके विनो जिस प्रकार कार्यकारी नहीं है उसी प्रकार सैयम ज्ञान और वैराग्यकें विना मुनीश्वर भी यथेष्ट सिद्धि EANETAHESHYANENERNETARY ::५५ करता है। .
H . सार 'भावार्थ-संयम शान और वैराग्य भावमासे ही सुनीश्वर मोक्षकी सिद्धि कर सक्त है। वत्युसमग्गो मुढो लोहिय लहिए. फलं जहा पच्छा। अण्णाणी जो विसयपरिचत्तो लहइ तहा चेव ॥ ७७॥ वस्तुपूर लोभी मुगध, जो पीछे फल लेत। जो अज्ञान विषयां रहित लाभइ जानहु एत ॥७७॥ अर्थ---जिस प्रकार मूर्ख लोभी पुरुष समस्त प्रकारकी वस्तुकी परिपूर्णता होने पर उसका फल भोग नहीं सक्ता है। ठीक उसी प्रकार अज्ञानी मिथ्यादृष्टी पुरुष विषयोंसे रहित होने पर.मी उसका फल प्राप्त नहीं कर सक्ता है। भावार्थ-समस्त सामग्री और भोगोपभोग साधनोंका समागम प्राप्त होनेपर लोमी मनुष्य उनका भोग नहीं करता है किंतु लोभसे वह पापोंका ही संग्रह करता है। ठीक इसी प्रकार मिथ्यादृष्टी. जीव व्रत तपश्चरण आदि कर उसके फलसे संसारकी वृद्धि ही करते हैं । अज्ञानी मिथ्यादृष्टी जीवोंका तपश्चरणं मी पापका ही कारण है वत्थुसमग्गो णाणी सुपत्तदाणी फलं जहा लहइ । णाणसमग्गो विसयपरिचचो लहइ तहा चेव ॥७८।। EARHETANFEMATERNMEASEACHERNMEGETAS ५६ रयण- सार बस्तु सहित ज्ञानी सुपत दान जया फल लेत। ज्ञान सहित विपया रहित लाभइ लाजहु एत ॥७० अर्थ--सम्यग्दृष्टी ज्ञानी पुरुष धन संपत्ति और वैभवको सुपात्रमें दान कर चक- वर्ती तीर्थकर इन्द्र नागेन्द्र के पदको प्राप्त कर मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं । इसी प्रकार ज्ञानी विषय कपायोंसे विरक होकर और चारित्रका धारण कर मेक्षिका उसी भक्से प्राप्त कर लेते हैं। भावार्थ-सम्यग्ज्ञानी पुरुष सुपात्र दानके फलसे इन्द्र चन्द्र आदिके उत्तम पद प्राप्त कर कितने ही भवमें मोक्षको प्राप्त करते हैं और सम्यग्ज्ञानी पुरुष चारित्रको धारण कर उसीसे मोक्ष प्राप्त कर लेता है। सम्यग्दृष्टी ज्ञानी पुरुषके सभी कार्य आलौकिक हैं। भूमहिला कण्णाइ लोहाहि विसहरं कह पि हवे। सम्मतणाणवेरग्गो सहमतेण जिणुद्दिटुं॥७९॥ भू स्ववरण तिय लोम अहि विषहारनु किम होई। सम्यक ज्ञान विराग सह मंत्र जिनोकत सेइ ॥७९॥ .५७ रयण- सार ५८ अर्थ-भूमि (राज्य) महल आदिकी प्राप्ति, स्त्री कन्या आदिका लाभ और सर्प विच्छू आदिके विषोंके निवारणके लिये एक सम्यग्दर्शन सहित ज्ञान तथा वैराग रूपी अमोघ मंत्र ही फल प्रदं है ऐसा श्री जिनेन्द्र देवने कहा है। पुवं जो पंचेंदियतणुमंणुचि हत्यपायमुडाउ। पच्छा सिरमुंडाउ सिवगइ पहणायगो होइ ।।८०॥ प्रथम पंचेन्द्रिय मन वचन, तन कंपाय हरतपदं मुंड | पीछे सिर मुंडन करहुं तिय शिव होइ अखंड ॥ ८॥ अर्थ- सबसे मथमं अपनी पांचों इन्द्रियों का निग्रह करना चाहिये। फिर क्रमे अपने मन वचनं काय और हाथ पाद आदिको वश करना चाहिये। पीछे शिरका मुंडन करना चाहिये । इससे भव्य जीवोंको मोक्षमार्गकी प्राप्ति शीघंही होती है। भावार्थ:--प्रथमें अपने भावों में सम्यक्त्वपूर्वक जिनदीक्षा धारण कर पुनः जमसे 3री- ग्य और ज्ञान मावेनासे मन वचन काय और पांचो इन्द्रियको वंश करनी चाहिये। भावचारित्र और द्रव्यनारित्र के द्वारा संवरको प्रकटकर नवीन कर्मोके आश्रवको रोकना चाहिये । यदि मावदीक्षा है..तो द्रव्यदीक्षा उपयोगी है यदि भावदीक्षा EMA ५४ R सार रयण- ५९ नहीं है केवल द्रव्यदीक्षाहीको लाभकारी और उत्तम समझना प्रेम है । परन्तु इसका यहभी अभिनाय नहीं है कि केवल मावदीक्षासे गोक्षकी सिद्धि हो जायगी फिर द्रव्य दीक्षा धारण करनेकी क्या आवश्यकता है ! द्रव्य दीक्षा [ जिनलिंग] धारण किये विना भावदीक्षा सर्वथा कार्यकारी नहीं है। इसीलिये मोक्षमार्गकी सिद्धि द्रव्य दीक्षापर ही अवलंबित है। द्रव्यदीक्षा धारण करनेपर भावलिंग हो सकती है परंतु फेल भावलिंग द्रव्यलिंगके बिना कुंछ भी उपयोगी नहीं है । 'पतिभत्तिविहीण सदी भिंचोयं जिणसमयेभचिहीण जई। गुरुभत्तिविहीण सिस्सो दुग्गंई मग्गाणुलग्गणो णियमा ।। वाम भक्ति पतिभत्ति नि जिनश्रुति भक्ति न जैन । गुरु भक्ति विन सिक्षा लग जिय दुरगति गत ऐन ॥१॥ अर्थ-पतिकी भक्तिसे रहित स्त्री स्वामीकी भक्तिसे रहित सेवक, श्रुत (शास्त्र) की भक्तिसे रहित यतिराज और गुरुकी भक्तिसे रहित शिष्य निंद्य व दुर्गतिका पात्र है गुरुभत्तिविहीणाणं सि साणं सबसंगविरदाणं । ऊसरछेचे वैविय सुवीयसमं जाण सचणुटाणं ॥८२ ॥ MEINSTEINEERINNERATEASE ५.२ अथण- गुरुन भक्ति विन शिव करन सर्व संग विरतानि । ऊसर धरि बयं वीस सम नेटा सुजानि ॥ ८२॥ अर्थ--यदि सर्व प्रकारके वाद्य और आभ्यंतर परिग्रहसे रहित शिष्य यतीश्वरोंमें गुरु (श्री आचार्य परमेष्ठी) की भक्ति नहीं है तो उनकी सर्व क्रियाएँ ऊपर भूमिमें पतित अच्छे बीजके समान व्यर्थ हैं। भावार्थ-जिस प्रकार उत्तम वीज मी यदि ऊपर भूमिमें बो दिया जाय तो वह व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है और वोनेवाला का श्रम मी व्यर्थ जाता है। इसी प्रकार यदि यह परिवार आदि सर्व परिग्रह छोड़कर नग्न तनको धारण कर अनेक प्रकारका कठिन तपश्चरण किया परंतु गुरुभक्ति (पंच परमेष्ठी और जिनागम जिनधर्म जिन- चैत्य जिन चैत्यालय इस प्रकार नव देवकी भक्ति) नहीं है तो सर्व श्रम करना व्यर्थ है। रजं पहाणहीणं पतिहीणं देसगामरट्ट बलं । गुरुमत्तिहीण सिस्सा णुहाणं णस्सदे सम्बं ॥८३॥ विन प्रधान राजा नगर देश राष्ट्र घल हीन । गुरु भक्ति विन सिह तस नेष्टा हुई सब छीन ।। ८३ ॥ YER सार श्यण. ६१ अर्थ-जिस प्रकार प्रधान रहित राज्य और स्वामी रहित देश ग्राम संपत्ति सैन्य आदिकी विभुता निरुपयोगी है, व्यर्थ है उसी प्रकार गुरुकी भक्तिसे रहित शिष्यगणोंके सब आचरण व्यर्थ है। सम्माणविणय रुई भत्तिविणा दाण दयाविणा धम्म । गुरुभत्तिविणा तवचरियं णिफ्फलं जाण ॥ ८४॥ विनय भक्तिसनमान रुचि विन दत दया विन धर्म । तप गुन गुरुकी भक्ति विन निरफल चारित कर्म ॥ ८ ॥ अर्थ-जिसमकार सन्मानके बिना रुचि वा प्रेम नहीं होता. भक्तिके विना दान नहीं दिया जाता और दयाके विना धर्म नहीं होता उसी प्रकार गुरुकी भक्तिके बिना चारित्रका पालन करना व्यर्थ है। हाणादाण बियारविहीणादो वाहिरक्खसुक्खं हि। किं तजियं कि भजियं किं मोक्खु दि जिणुदिई ।। ८५॥ हीनादान विचार विन वाहिज इदिय सुख । कहा त अरु भने कहा जो नही शिव सनमुख ।। ८५॥ ६१ रयण- अर्थ-कौनसी वस्तु ग्रहण करने योग्य है और कौनसी वस्तु त्याज्य है इस प्रकार आत्महितके लिये सम्यक विचार कर एवं संसार शरीर मोगोपभोग पदार्थासे विरक्त होकर जो जिनलिंगको धारण कर तपश्चरण [ ध्यान ] करता है वह मोक्षके सुखका अधिकारी है। सत् असत् योग्य अयोग्य हित अहित ग्राह्य अग्राह्य बस्तुके विचार रहित केवल. वाह्य, सुखका परित्याग करनेसे मोक्ष सुखकी प्राप्ति नहीं सार भावार्थ:--जिनको आत्माका परिज्ञान है स्वानुभव है और जिन्होंने मेद विज्ञान द्वारा आत्मीय और अनात्मीय वस्तुका विचार कर आत्मीय क्षमा मार्दन आदि गुणोंको धारण कर पर पदार्थ अनात्मीयं कर्म चेतन और कर्म फल चेतनाका परित्याग कर दिया है तथा संसारके स्वरूपको हेय व दुखकारी समझकर वैराग्यभावसे जिन लिंगको धारण कर कठिन व्रत तपश्चरण के द्वारा कर्ममलको दूर कर दिया है वे ही मोक्ष सुखके अधिकारी है। किंतु. जिनको आत्मज्ञान नहीं है न हेयाहयका विचार है. केवल. वाह्य सुखका त्यागकर साधु बन गये हैं वे कठिन तपश्चरण करने पर भी मोक्ष सुखके कदापि अधिकारी नहीं है । सम्यग्दर्शन की प्राप्तिके साथ साथ जो जिनलिंगको धाशार कर तपश्चरणः करते हैं. वे.ही. शिव सुखको प्राप्त होते हैं।
रयण कायकलसुवासं दुद्धस्तवंसरणकारणं जाण। त णियसुद्ध सरूवं परिपुष्णां चेदि कम्मणिस्मूलं ॥६६॥ दुद्धर तप.उपवास सत्र कायकलेश हि जान.। जो रुचि निजशुद्ध आतमा सर्वक क्षयमान ।। ६६ ।। * अर्य-जो अपने आत्माके शुद्ध स्वरूप में अपने आत्मभावोंकी परिणति है तो दुद्धर तपश्चरपा और विविध प्रकारके उपवास गादिके द्वारा कायक्लेश. करना कमोंके नाश ६ भावार्थ-जिनको जिनलिंग नहीं है उनके कर्मोका नाश कदापि नहीं होता है। वे तो अनुतः संसारी ही हैं। जिनने जिनलिंग धारण कर लिया है परन्तु सम्यग्दर्शन नहीं है वे भी संसारी ही हैं, किंतु जिन भव्य पुरुषोंने सम्यग्दर्शनके साथ साथ जिन लंग धारणा कर तपश्चरण व्रत क चारित्रका पालन कर आत्माका ध्यान किया उनके ही कमीका नाश होता है। कम्मुण खवे जोहु परवह्मण जाणेह सम्मउमुक्को। अत्थु ण तत्थु ण जीको लिंगं घेत्तूण किं करई ॥८७ ॥ १३. NERAYER -- सार १४ करम न क्षयै न ब्रह्म पर जो विन सम्यक मुक्त। लिंग धरनु वस्तरति जनु सो जिय खेद अजुक्त ॥ ८७ ॥ अर्थ-जो जीव परब्रह्म परमात्माको नहीं जानता है और जो सम्यग्दशनसे रहित है वह जीव न तो गृहस्थ अवस्थामें है और न साधु अवस्थामें है केवल लिंगको धारण कर क्या करते हैं। कोका नाश वो सम्यक्त्व पूर्वक जिन लिंग धारण करनेसे ही होता है। भावार्थ-सम्यग्दर्शनको विना धारण किये व्रत तप आचरण और साधु अवस्था व्यर्थ है, संसारको बढाने वाली ही है। संसारमें अनेक मनुष्य साधुका भेष धारण कर अपनेको महंत मानकर अनेक प्रकारके प्रपंच रचकर संसारके जीवोंको ठगते हैं और विषय कषायोंसे अपनी आत्माको ठगते हैं। वे कर्मोंका नाश नहीं कर सके हैं। वे अम (आत्मा] को नहीं जान सक्ते हैं । इसलिये सम्यग्दर्शनको धारण कर आत्माके स्वरूपको सबसे प्रथम जानना चाहिये पुनः दीक्षा ग्रहण करना चाहिये । अप्पाणं पिणपिच्छइ ण मुणइ णवि सद्दहइ ण भावइ । बहुदुक्ख भारमूलं लिंगं चित्तूण किं करई ॥८॥ ६४ रयण- नहिं आतम पेखइ मुणहि नहि सरदह भावेइ । बहुत दुःख भर मूल धरि लिंग कहा कारेइ ।।८८॥ अर्थ-जो अपनी आत्माको नहीं देखता है, नहीं जानता है, आत्माका श्रद्धान नहीं करता है, न आत्माके स्वरूपको अपने भावोंमें लगाता है और न यह आत्मा अपनी आत्मपरिणतिमें तल्लीन होता है तो फिर बहुत दुःखका कारणभूत साधु अवस्थाको धारण कर क्या लाभ लेता है ? भावार्थ-कमोंका नाश, दुखकी निवृत्ति और सुखकी प्राप्ति, आत्मस्वरूप में परणति होनेसे होती है। जब तक आत्माका श्रद्धान नहीं है, स्वानुभव ही नहीं है और जब आत्मस्वरूपकी प्राप्ति नहीं है तब तक कोंका नाश कदापि नहीं होगा। जिनलिंगको धारण करलेने पर भी सुखकी प्राप्ति नहीं होती है। जाव ण जाणइ अप्पा अप्पाणं दुक्खमपणो तावं । तेण अणंत सुहाणं अप्पाणं भावए जोई ॥ ८९॥ जाव न जाणहि आतमा निज दुखदाता भाव । तातें ब्रह्म अनंतसुख मय ध्यावै मुनिराव ।। ८९॥ अर्थ-जबतक अपनी आत्माका सत्यस्वरूप नहीं जाना गया है तबतक इस AREER ५ सार रयण- आत्माको कर्मजन्य दुखका भार है ही और जब यह, आत्मा अपने शुद्धस्वरूप टको- स्कीर्ण ज्ञायकस्वभाव आत्माको जान लेता है, अपने शुद्ध स्वभावको प्राप्त हो जाता है उसी समय अनंत सुखको खयमेव प्रांत हो जाता है। इसीलिये मुनिगण शुद्ध- स्वरूप अपने आत्मस्वभावका ध्यान करते हैं, अपने शुद्धस्वरूपमें तन्मय हो जाते हैं और मोक्षसुखको प्राप्त करते हैं। भावार्थ-जबतक अपनी आत्माके शुद्धस्वरूपकी भावना नहीं है, स्वस्वरूप- की प्राप्ति नहीं है और जबतक अपने भावोंकी स्थिरता अपनी आत्माके शुद्धस्वरूपमें दृढतासे नहीं है तबतक जिनलिंग धारण कर कठिन तपश्चरण करना उत्तम सुखका कारण नहीं है। इसलिये स्वात्मस्वरूपको जानकर तपश्चरण करना स्वेष्ट- सिद्धिके लिये लाभदायक है। इसका अभिप्राय यह भी नहीं है कि अपने आत्म- स्वरूपको जाने विना जिनलिंग धारण करना . व्यर्थ है। जिनालिंगको धारण कर अभव्यजीवभी नवम ग्रैवेयिक पर्यन्त उत्तम अहमिन्द्रोंके सुख प्राप्त कर सक्त हैं। जिनलिंग धारण करनेका माहात्म्य ही अद्भुत और लोकोत्तर है । जो पुण्य किसी भी कठिनसे कठिन कार्यसंपादन करने पर प्राप्त नहीं हो सके वह महान पुण्य एक जिनलिंगको धारण कर प्राप्त होता है। एक जिनलिंगके सिवाय यदि अन्य श्वेतांवर IP HTRAN रयण- ६७ या त्रिदंडि संन्यासी आदि मिथ्यामेष धारण किये जाय तो अनंत संसारके ही कारण हैं। अन्य भेपोंको धारण कर कठिन तपश्चरण (पंचाग्नि आदि) दुर्गतिके दाता और दारुण दुःखांके ही कारण हैं। तपश्चरण भी दयामय फलप्रद है। परंतु दयाका सत्यस्वरूप एक जिनागमसे ही जाना जाता है। जिसने जिनागमको जान कर जिनलिंग धारण किया है तो उसका तपश्चरण सुखदायक ही है । चाहे उसके भावों में सम्यक्त्वकी जाग्रति न हो तो भी दयामय तपश्चरण सुखप्रद है। णियतच्चुवलद्धि विणा सम्मत्तुबलद्धि णत्थि णियमेण । सम्मत्तुबलद्धि विणा णिव्वाणं णत्थि जिणुदिह ॥९॥ निज आतम उपलब्धि विन, समकित लहै न कोय । समकितकी प्रापति विना, निश्चय मोक्ष न होय ॥१०॥ अर्थ-अपने आत्मस्वरूपकी प्राप्तिके विना सम्यक्त्वकी प्राप्ति नहीं है और सम्यक्त्वके विना मोक्षमाप्ति सर्वथा नहीं है। यह श्रीजिनेन्द्रदेवका सुदृढ निश्चित सिद्धान्त है। ६७ स्यंण- ६८ भावार्थ-सम्यग्दृष्टी भव्य जीव ही जिन लिंगको धारण कर मोक्षके अधिकारी हैं । निर्वाणप्राप्तिकी योग्यता सम्यग्दृष्टि जीवोंको ही है। सम्यग्दर्शन की प्राप्ति आत्माके स्वरूपको जाननेसे ही होती है। जिनने आत्माके स्वरूपको जाना उनने समस्त तत्वोंको जान लिया है । इसलिये तच्चोंकी यथार्थ प्रतीति और निर्दोष परिज्ञान आत्माके स्वरूपको जाननेवाले भव्यात्माको ही है और उनको ही सम्यग्दर्शन है। पवयणसारासं परमप्याज्झाणकारणं जाणं। कम्मरखवणणिमित्वं कम्प्रक्खवणेहि मोक्खसोक्खं हि ॥११॥ प्रवचनसार अभ्यास विदि परम ध्यानको हेत। ध्यान कर्म खेपे करम खिपै मोक्ष सुखदेत ॥११॥ अर्थ-आत्माके शुद्ध स्वरूपकी प्राप्तिका अभ्यास ही परब्रह्म परमात्माके ध्यानका कारण है। विशुद्ध आत्माके स्वरूपका ध्यान ही कोंका नाश व मोक्षसुखकी प्रासके लिये प्रधान कारण है। भावार्थ-जीवोंको कर्मबंध राग द्वेप काम मोहादि विकारभावोंसे और मन SURYAN ६० सार वचन कायकी चपलतासे होता है । संसारी जीवोंके मन वचन काय द्वारा और रयण- पूर्व-संबंधित कर्मोके उदयसे जो जीवोंके भावोंमें राग द्वेष मोह कामादि विकाररूप अथवा हिंसा झूठ चौरी कुशीलादि पापाचरणरूप जो परिणति होती है उससे ही ६९ नवीन कर्म बंध होता है फिर उस कर्मबंधसे पुनः जीवके भावोंमें राग द्वेषादि विकार भावोंका परिणमन होता है इसप्रकार संततिरूपसे जीव कोंका बंध अनादिकालसे कर रहा है। इस कर्मबंधका नाश तब ही हो सक्ता है जब कि नवीन कर्मबंध न हो और पूर्व बद्ध कर्मोंकी निर्जरा हो जाय । कर्मबंधके कारण जीवोंके राग द्वेषादिरूपभाव और मन वचन कायकी प्रवृत्तिको रोक देनेसे नवीन कर्मका बंध नहीं हो सकता है। कारणका नाश होने पर कार्य नहीं हो सकता है । राग द्वेषादिरूप भावों की परिण- तिका अभाव और मन वचन कायकी प्रवृत्तिका अभाव एक अपनी आत्माके शुद्ध स्वरूपका एकाग्ररूपसे अविचलतापूर्वक ध्यान करनेसे होता है। इसलिये ध्यान ही कर्मोंके नाशका प्रधान कारण और मोक्षसुखकी प्राप्तिका प्रधान कारण है। सम्यक्ष्यांन आत्मस्वरूपको जाननेसे होता है । अथवा यह समझना चाहिये कि जिनको विशुद्ध सम्यक्त्वपूर्वक निर्दोष चारित्र है उनको ही सम्यक च्यान होवा ६९ :: रयण- ७० परिणामोंकी विशुद्धता हुए विना आत्माके भाव अपनी आत्माके शुद्ध स्वरूपमें कदापि एकाग्रता पूर्वक स्थिर नहीं रह सक्त हैं। मोहोदयसे जीवोंके भावों में राग द्वेष की मलिन परिणति नियमपूर्वक अवश्य ही होती है और राग द्वेषसे आ रौद्र अप्रशस्ते ध्यान दुर्गतिके कारण होते हैं। सालविहीणो राउ. दाणदया धम्मरहिय गिह सोहा । णाणविहीण तवो विय जीवविण। देहसोहं च ॥ ९२॥ साल राज बिन दान दय धर्म रहित गृह देखि । ज्ञान होन तप जीव विन देह सोभ ज्यों पेखि ॥ १२॥ अर्थ--जिस प्रकार परिकोटा (नगररक्षाका कोटा) के विना राजाकी शोभा, दान दया और धर्मके विना गृहस्थकी शोभा, जीवके विना मृतक शरीर की शोभा विफल है उसी प्रकार ज्ञानके विना तपकी शोभा भी विफल है। भावार्थ-सम्यग्ज्ञानके साथ तपश्चरण कोंके नाशका कारण है । अनेक प्रकार- की ऋद्धि, प्रभुता सर्वलोककी पूज्यता आदिका कारण भी सम्यग्ज्ञानपूर्वक तप- धरण ही है।
रयण- अज्ञानी लोगोंका मिथ्या तप शरीर को कष्टदायक और दुर्गतिका कारण है। तपकी शोभा सम्यग्ज्ञानसे ही है। ज्ञान विना तपश्ररण केवल क्लेशकारी दी है। सम्यग्ज्ञानी पुरुप तपश्चरणके द्वारा देवोंसे पूज्य और त्रिलोकमें सम्मानित होता है, परंतु अज्ञानी पुरुपोंका तपश्चरण केवल हास्यका ही कारण होता है। मक्खि सिलिम्मे पडिओ मुवइ जहा तह परिगहे पडिउं । लोही मूढो खवणो कायकिलेसेसु अण्णाणी ॥ ९३ ॥ ज्यों मक्खी सिल पडि मुई परिगहपर पड़िउ अगाध । लोभी मुढ अज्ञान ज्यौं काय कलेशी साध ॥ ९३ ॥ अर्थ-जिस प्रकार मक्खी श्लेष्मा (कफ) में पड़ कर तत्काल ही मर जाती है उसी प्रकार लोभी अज्ञानी मुनि परिग्रहके लोभमें पड़कर केवल काय क्लेश मात्रका ही भागी होता है, कर्मोका नाश नहीं कर सकता है। भावार्थ--खानेके लोभसे मक्षिका विना विचारे (ज्ञानके विना) श्लेष्मामें पड़ कर मर जाती है उसी प्रकार साधु भी परिग्रहके लोभमें पड़कर अपने तपकी महिमाको नष्ट करते हैं।
सार ७२ णाणब्भासविहीणो सपरं तच्चं ण जाणए किंपि। णाणं तस्स ण होइ हु ताव ण कम्मं खवेइ णहु मोक्खो॥१४॥ ज्ञानाभ्यास विन सुपर तत्त्व न कुछ जानंत। ध्यान न होइ न कर्मक्षय मोक्ष न है तावंत ॥ ९ ॥ अर्थ--सम्यग्ज्ञानके अभ्यास विना यह जीव मेद विज्ञानको प्राप्त नहीं होता है। आत्मतत्त्व और परतत्वको सर्वथा ही नहीं जानता है । स्वपरके ज्ञान विना ध्यान नहीं होता है और सम्यक् ध्यानके विना कर्मोंका क्षय और मोक्ष कदापि नहीं होती है। इसलिये सम्यग्ज्ञानका अभ्यास अवश्य ही करना चाहिये। भावार्थ-मिथ्या शास्त्रोंके अभ्याससे आत्मामें मिथ्या श्रद्धान पूर्वक कुतत्वका ही ज्ञान हेता है, सम्यग्ज्ञान नहीं होता है। जीवोंको मिथ्या शास्त्रोंका अभ्यास प्रत्यक्षमें ही गृहीत मिथ्यात्वको बढ़ानेवाला और धर्मकर्मसे शून्य बनानेवाला है। नास्तिकताके भाव और बुद्धिमें मिथ्यात्वकी प्रवृत्ति करानेवाला है । जीवोंको जितनी बड़ी भारी हानि मिथ्याशास्त्रोंके “अभ्याससे होती है उतनी हानि कुदेव सेवन हिंसा झूठ और पापाचरणके सेवन करनेसे नहीं होती है क्योंकि मिथ्या- शास्त्रों के अभ्यासका असर बुद्धि-ज्ञान और आत्माके. भावोंमें महामलिन परिणमन .७२ सपी सार रयण- ७३ कराकर सम्यग्मार्गसे पतन कराकर कुमार्गगामी एवं हिताहितके विचार रहित विवेक- शून्य बना देता है । इसलिये जीव अपने कर्तगसे शून्य ग्रहिल और व्यामोही वन जाता है। सारासारके विचारसे रहित धर्भशून्य प्रशचारी हो जाता है। भावभुत और द्रव्यश्रुतका परिज्ञान जिनागमके अभ्याससे ही होता है। आत्मा- का सत्य स्वरूप एक जिनागमसे जाना जाता है । आश्रव, यंत्र, संवर, निर्जरा और मोक्षका सत्य सत्य परिज्ञान एक जिनागमसे ही होता है। सम्यक् ध्यान वस्तुका यथार्थ स्वरूप जान लेने पर होता है। इसलिये सम्यक् ध्यानकी प्राप्तिके लिये जिनागमका ही अभ्यास करना चाहिये, मिथ्या शास्त्रोंका नहीं। अज्झयणमेव झाणं पंचेदियणिग्गहं कसायं पि। तचे पंचमकाले पवयणसारम्भासमेव कुज्जा हो॥१५॥ एक अध्ययनही ध्यान है निग्रह अक्षकषाय । काल पंचमे प्रवचन सार अभ्यास कराय ॥९५॥ अर्थ--प्रवचनसार (जिनागम) का अभ्यास, पठन-पाठन चितवन-मनन और वस्तु स्वरूगका विचार ही ध्यान है। जिनागमके अभ्याससे ही इन्द्रियोंका निग्रह, ७३ रयण- सार ७४ . मनका वशीकरण और कषायोंका उपशम होता है इसलिये पंचमकाल भरतक्षेत्रमें एक जिनागमका ही अभ्यास करना श्रेष्ठ है। कर्मोंके नाश करनेका यही कारण है। भावार्थ-श्री जिनेन्द्र भगवानका प्रणीत सत्यार्थका प्रकाश करनेवाला आगम है । जिनागमके अभ्याससे भावश्रुत और द्रव्यश्रुतकी प्राप्तिके साथ मन और इन्द्रियोंका पूर्ण निग्रह होता है और विषय कषाय तथा काम क्रोध मान माया राग द्वेषादि विकारभावोंसे आत्माकी परणति रुक जाती है इसप्रकार राग द्वेषकी परणतिका संरोध होनेसे आत्मा अपने शुद्ध स्वसमयरसमें तल्लीन हो जाता है । स्वात्मस्वभाव में स्थिर होना ही ध्यान है। धम्मज्झाणभासं करेड़तिविहेण जाव सुद्धेण । परमप्पज्झाणचेतो तेणेव खवेइ कम्माणि ॥१६॥ धर्मध्यान अभ्यास करि भाव शुद्ध त्रिविधेन । चेष्टा आतमध्यानपर करम खपत है तेन ॥ अर्थ-मन वचन कायकी विशुद्धतासे अपने आत्माके परिणामोंसे होने वाले अशुभ संकल्प विकल्पोंको रोककर धर्मध्यानका अभ्यास करना चाहिये । · उस धर्म- सार रयण- ৩৭ ध्यानके फलसे ही आत्मामें परम विशुद्ध निर्विकल्पक शुल्क ध्यान होता है जिससे यह आत्मा अपने शुद्धस्वरूपमें तन्मय होकर समस्त प्रकारके कौका नाशकर स्व- स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। भावार्थ-पिंडस्थ पदस्थादि भेद रूप अथवा आज्ञाविचयादिरूप धर्मध्यान- का अभ्यास होनेसे आत्माके भावों में परम विशुद्धता प्राप्त होती है और अशुभ रागा. दिक भावोंके संकल्प विकल्प स्वयमेव शांत हो जाते हैं । यह धर्मध्यान शुक्लध्यान- के उत्पन्न होनेका प्रधान कारण है। इसलिये धर्मध्यानका अभ्यास कर काँके नाश करनेका प्रयत्न करना चाहिये। जो भव्य यह समझते हैं कि इस समय शुक्लध्यान तो होता ही नहीं है कर्मोंका नाश शुक्लध्यानसे ही होता है इसलिये ध्यानका आराधन करना व्यर्थ है । परन्तु आचार्य महाराज अपने अनुभवको प्रत्यक्ष रखकर कहते हैं कि धर्म ध्यान ही शुक्लध्यानका कारण है इसलिये धर्मध्यानका अभ्यास करना श्रेष्ठ है। पावारंभणिवित्ती पुण्णारंभे पउत्ति करणं पि । णाण धम्मज्झाणं जिणंभणियं सव्वजीवाणं ॥९७॥ ७५ सार रयण- ৩৭ पापारंभ निवृत्ति हय प्रवृत्ति पुण्य आरंभ । धरम ध्यान कह्या ज्ञानको जिन सब जीवन यंभ ॥ ९७ ॥ अर्थ--पाप कार्यकी निवृत्ति और पुण्य कार्यों में प्रवृत्तिका मूल कारण एक सम्यग्ज्ञान है । इसलिये मुमुक्षु जीवोंके लिये सम्यग्ज्ञान ही धर्मध्यान श्रीजिनेन्द्र देवने कहा है। भावार्थ-सम्यग्ज्ञानसे तत्व अतत्त्व, धम अधर्म, पुण्य पाप, हित अहित, योग्य अयोग्य, कर्तव्य अकर्तव्य, ग्राह्य और अग्राह्यका बोध होता है । भव्य जीव सम्यग्ज्ञानसे अपनी आत्माका शुद्ध स्वरूप विचार कर अपने आत्मपरिणामोंको छोड़कर पर पदार्थों पर राग द्वेष नहीं करते हैं और न विपय कपायों की सिद्धिके लिये इष्टानिष्ट वाह्य पर पदार्थों में शुभाशुभ संकल्प विकल्पही करते हैं। इसलिये सम्यग्ज्ञानी पुरुपकी स्वाभा- विक स्वयमेव ऐसी विशुद्ध परणति हो जाती है कि जिससे उनकी हिंसादिक पाप कार्यों में प्रवास नहीं होती है। वे पुण्योत्पादक शुभ चारित्र की निरन्तर प्रवृत्ति करते हैं। इसीलिये सम्यग्ज्ञानसे जीवोंके भावोंमें साम्यभावकी स्थिरता प्रकट होती है। राग द्वेपादि चिकारभावरहित साम्य अवस्था ही धर्मध्यान है। सम्यक्चारित्रके अभ्यास बिना धर्मध्यान कदापि नहीं होता है। सम्यक् ७६ सार रयण- चारित्रकी प्राप्ति ही धर्मध्यानका स्वरूप है । सम्यक्चारित्र सम्यग्ज्ञानसे ही होता है इसलिये सम्यग्ज्ञान ही धर्मध्यान है। सुदणाणभासं जो कुणह सम्म ण होई तवयरणं । कुव्वं जइ मृढमइ संसारसुखाणुरत्तो सो॥९८॥ जो श्रुतज्ञान अभ्यास कर समकित नाहिं विचार | करे ज्ञान बिन मुढतप सो सुखात संसार |॥ ९॥ अर्थ--जो मुनि अच्छी तरह जिनागमका अभ्यास नहीं करता है और विना जिनागाके अभ्यासके ही तपश्चरण करता है, वह अज्ञानी है और सांसारिक सुखें लीन है ऐसा समझना चाहिये। भावार्थ-जिनागमके अभ्याससे ही भव्यजीवोंको सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति आर वस्तु स्वरूपका यथार्थ बोध होता है । इसलिये जिनागमका अभ्यास ही भावभुत और द्रव्यश्रुतका प्रधान कारण है । जिन भव्य यतीश्वरोंको जिनागमकै अभ्यास द्वारा सम्यग्दर्शन प्राप्त होगया है वे ही सम्यक् तपश्चरण कर कर्मोंका नाश कर मोक्ष सुखके अधिकारी होते हैं। मिथ्या शास्त्रोंका पठन पाठन और मिथ्या शास्त्रोंका विशाल ज्ञान भी यतीश्वरों REPRES को अज्ञान भावका प्रकट करनेवाला है। ऐसे महान विशाल ज्ञानसे यतीश्वरोंको भी वस्तुस्वरूपका यथार्थबोध कदापि नहीं होता है। बल्कि मिथ्याज्ञानभावसे उनका तपश्चरण भी आत्मबोध रहित होनेसे संसारका ही कारण होता है। रयण- सार ७८ जब कि यतीश्वरोंको भी मिथ्याशास्त्रों मभ्यास सम्यग्दर्शनको नष्ट करनेवाली और संसारका कारण है तो गृहस्थों को मिथ्याशास्त्रोको अभ्यास तो केवल पापकार्योकाही प्रधान कारण समझना चाहिये। गृहीतमिथ्यात्वका मूलकारण कुशास्त्रोंका अभ्यास है जो गृहस्थ केवल मिथ्याशास्त्रोंका अभ्यास कर पंडित या ज्ञानो बनते हैं वे हिताहितके विचार रहित निरंतर पापकार्यों की प्रवृत्ति कराने वाले और आत्मज्ञानसे शून्य होते है। उनको सम्यक् बारित्र रुचिकर नहीं होता है। वे मिथ्याचारित्रसे ही मात्माको हित समझते है । कभी कभी मिथ्याशास्त्रोंका पठनपाठन कर महान शान संपादन कर अनेक जैनी पंडित व ब्रह्मचारी सम्यक् चारित्रके विरोधी बनकर पापकार्यामें ही चारित्र मानते हैं। इस प्रकारले यह विपरीतभाव संसारको ही बढ़ानेवाला है और मिथ्यात्वका कारण है। मिथ्या शास्त्रों का ज्ञान आत्माके। भाषों में ऐसी : विलक्षण परिणति निरंतर करता है कि जिससे हिताहितको विचार ही नहीं होता है ! केवल विषयसुखको कामना होती रहती है । ७८ -- YLIYOY SSA रयण . ७९ तच्चवियारणसीलो मोक्खपहाराहणासहावजुदो। अणवरयं धम्मकहापसंगदो होइ मुणिराओ॥ ९९ ॥ तत्त्व विचारक मोक्ष पथ आराधकी सुभाव ।। होइ प्रसंगी धरम तिह निरंतर मुनिराय ॥ ९९ ॥ अर्थ-जो मुनिराज सदा आत्मतत्वके विचार करने में लीन रहते हैं मोक्षमार्ग को आराधन करनेका जिनका स्वभाव हो जाता है और जिनका समय निरंतर धम कथामें ही लीन रहता है वे ही यथार्थ मुनिराज कहाते हैं। मुनिराजोंका यही स्वरूप है। विकहाइविप्पमुक्को आहाकम्माइविरहिओ णाणी। धम्मुद्देसणकुसलो अणुपेहाभावणाजुदो जोई ॥१०॥ विकथा बिन आधा करम विन ज्ञानी मुनि सोय धर्मदेशना निपुन अनुप्रेक्ष भावना होय ॥ १०० ॥ अर्थ-विकथा हास्यवचन और निंद्यवचनको नहीं कहने वाले, आधादिकर्मसे उत्पन्न हुए दोषों रहित चर्या करने वाले, सतत धर्मका उपदेश करने वाले, और . ७९ रयण सार ८० बारह भावनाओंके द्वारा तत्व स्वरूपका विचार करनेवाले ज्ञानी भव्य जिनलिंग धारक सुमुक्षु यतीवर होते हैं। भावार्थ-यतीश्वरोंका स्वरूप चार लक्षणोंसे प्रकट होता है। यतीश्वर विकथादि पापजन्य बातें और परिग्रह विषय कपायोंको बढ़ानेवाली किस्सा कहानियां नहीं करते हैं । आधादि कर्मके दोषोंसे उत्पन्न हुए आहारको ग्रहण नहीं करते हैं। उनका समय जिन शासन की वृद्धिके लिये निरंतर धर्म देशना (धीपदेश) में ही व्यतीत होता है और वे सतत बारह भावनाओंसे संसार-शरीर भोग आदिकसे विरक्त होकर अपने आत्मतत्वके विचारमें लीन रहते हैं। अवियानो णिईदो णिम्मोहो णिकलंकओ णियदो। णिम्मल सहावजुत्तो जोई सो होइ मुणिराओ॥१०१॥ अविकल्पी निरकुंदनर मोह निय न निकलंक । निर्मल जुक्त सुभाव मुनि सो योगीश निसंक ॥१०१॥ अर्थ-परमोत्कृष्ट मुनीश्वरका स्वरूप बतलाते हैं। जो यतीश्वर शुभाशुभ संकल्प विकल्पोंसे रहित है,, निद्व है, निमाह है, निष्कलंक है, अपने स्वरूपमें स्थिर है और निमल स्वात्म स्वभाव सहित है वही मुनिनाथ है। '८० भावार्थ--मुनीश्वर संज्ञा छठे गुणस्थानसे प्रारंभ होती है और चौदहवें गुणस्थान पर्यन्त उसका ही उत्तरोत्तर विशेष उत्कृष्ट स्वरूप होता है । सर्वोत्कृष्ट मुनीश्वरका स्वरूप छठे गुणस्थानमें प्रकट नहीं होता है। सर्वोत्कृष्ट मुनीश्वरका स्वरूप इस गाथामें बवलाया है निर्मोह, निष्कलंक, निद्व आदि गुण यद्यपि छठे गुणस्थानवर्ती सामान्य मुनी- श्वरके भी यत्किचित् स्वरूपसे होते हैं । परंतु तेरहवें गुणस्थानवती यतीश्वरोंमें ही उक्त गुणोंकी पूर्णता होती है जिंदावंचणदूरो परीसहउवसग्गदुक्खसहभावो । सुहझाणज्झयरणदो गयसंगो होइ मुणिराओ ॥१०२॥ निंदा वचन विन सहत दुख उपसर्ग परीस । अध्ययन रु शुभध्यानरत विनपरिग्रह मुनीस ॥१०२॥ अर्थ-जो निंदादिक गर्दा वचनोंसे रहित वचन गुप्तिके प्रतिपालक हैं, परीषह और उपसर्गके भयंकर दुःखको सहन करनेवाले, साम्यभावके धारक, शुभध्यान और जिनागमके अध्ययनमें तत्पर तथा चौबीस प्रकारके परिग्रहसे सर्वथा रहित नग्न दिगम्बर हैं, वे ही यंतीश्वर होते हैं । .... ६
रय
सार
भावार्थ:: उत्तम, संहननके.धारक और मूलगुण तथा उत्तर गुणों के प्रतिपालक
तद्भवमें मोक्षकी प्राप्ति करनेवाले यतीश्वरोंका स्वरूप बतलाते हैं जो यतीश्वर समस्त
प्रकारके उपसर्ग व समस्त प्रकार की परीपहले दुखोंका अनुभव न कर अपने स्वात्म-
शुद्ध स्वभावमें स्थिर रहते हैं, वचन गुप्सिका पालन करते हैं द्वादशांग श्रुतज्ञानका
अभ्यास करते हैं, शुभध्यानमें तत्पर रहते हैं और परिग्रहरहित जिनलिंगको
धारण करते हैं वे ही परम यतीश्वर हैं।
यद्यपि मुनीश्वरोंका वाह्य स्वरूप जिनलिंग ही है जिन भव्य मुमुक्षु जीवोंने परिग्रह
का परित्याग कर निशल्यभावसे जिनलिंग (नग्न दिगम्बरत्व को धारण कर मूल-
गुणकी आराधना की है वे ही मुनीश्वर हैं । सामान्यरूपसे सर्व मुनीश्वरोंके उत्तम
संहनन नहीं होता है। जिन मुनीश्वरोंको उत्तम चवृषभनाराच संहनन है । वे
उपसर्ग व समस्त प्रकारकी परीषहोंको सहन कर सोम्यभाव की प्राप्ति करते हैं,
द्वादशांगके पाठी और भावभुतके धारक होते हैं।
तिव्व कायकिलेंसं कुव्वतो मिच्छभावसंजुत्तों।
सवण्णुवएसेसो णिव्वाणसुहं ण गच्छेई ॥१०॥
श्यण. सार 'काय किलेश तीवर करे मिंध्याभाव न जुक्त। सर्वज्ञको उपदेश यह सो नहिं शिव सुखमुक्त ॥१०॥ अर्थ-जो मिथ्यात्वकर्मके उदयसे होनेवाले भावोंको धारण करता है परंतु काय क्लेश अत्यंत तीव्र करता है। ऐसा जीव भी मोक्ष सुखको प्राप्त नहीं हो सकता। यही सर्वज्ञ देवका उपदेश है । अभिप्राय यह है कि तीव्र तपश्चरण करने पर भी जब तक मिथ्यात्वको धारण करता है तबतक उसे कभी भी मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो सकती। रायाइमलजुदाणं णियप्परूवं ण दिस्सये किं पि। समलादरिसे रूवं ण दिस्सए जह तहा णेयं ॥ ११४॥ रागादिक मल जुगत निज रूप तनक ना दीख । समल आरसी रूप जिम नाहिं जयावत दीख ॥ १०४ ॥ अर्थ-जिस प्रकार मलिन दर्पणमें अपना यथार्थ रूप. दिखाई नहीं देता उसी प्रकार जिनका आत्मा राग द्वेष आदि दोपोंसे मलिन हो रहा है उस मलिन आत्मामें आत्माका यथार्थ स्वरूप कुछ भी दिखाई नहीं देता है। भावार्थ- अपनी शुद्ध आत्माका अनुभव करने के लिये आत्माकै निर्मल होने की
यण
आवश्यकता है क्योंकि निर्मल आत्मामें ही आत्माका अनुभव होता है । जो
आत्मा राग-द्वेषसे मलिन है उसमें आत्माका अनुभव कमी नहीं हो सकता। इसलिये
साधुओंको सबसे पहले अपने रागद्वेष आदि दोषोंका त्याग कर आत्माको निर्मल
बनाना चाहिये, जिससे अपने आत्माका अनुभव हो सके।
दंडत्तयसल्तचयमंडियमाणो असूयगो साह ।
भंडणजायणसीलो हिंडह सो दीहसंसारे॥१०५॥
दंडशल्यत्रय मुंडियो निंदक साधु जु होय ।
भंडण जाचण शील है हिंडे वहुभव सोय ।। १०५॥
अर्थ--जो मुनि मन वचन कायको अपने वशमें नहीं रखते,. माया मिथ्या
निदान इन तीनों शल्योंको धारण करते हैं जो दूसरोंसे ईया धारण करते हैं जो लड़ाई
अगडा करते हैं और याचना करते हैं वे साधु इस संसारमें दीर्घ कालतक परिभ्रमण
करते हैं।
देहादिसु अणुरचा विसयासचा कसायसंजुचा।
अप्पसहावे सुचा ते साह सम्मपरिचत्ता॥१०६॥
रयण.
सार
८५
देहादिक अनुरत विलीन कपाय संजुक्त।
सोबत आप सुभावतें सो मुनि समकित मुक्त ॥ १०६ ॥
अर्थ-जो मुनि शरीर भोग वा सांसारिक कार्याम अनुरक्त रहते हैं, जो विपयोंके
सदा आधीन रहते हैं, कपायोंको धारण करते हैं और अपने आत्माके स्वभावमें सदा
सोते रहते हैं, आत्माके स्वभावको प्रगट करनेमें कभी जागृत नहीं होते ऐसे मुनियों-
को सम्यक्त्वरहित मिथ्यादृष्टी ही समझना चाहिये ।
आरंभे धणघण्णे उवयरणे कक्खिया तहा सूया।
वयगुणसीलविहीणा कसायकलहप्पिया मुहुरा ॥ १०७॥
संघविरोहकुसीला सच्छंदा रहियगुरुकुला मूढा।
रायाइसेवया ते जिणधम्म विराहिया साहू ॥१०८॥
है आरंभ धनधान उपकरणइच्छ अरु जाच ।
व्रतगुणशील विना कलह प्रिय कषाय बहुवाच ॥१०७॥
मूद कुशील विरोधसंघ गुरुकुल रहे स्वछंद ।
राजसेव कर जिन धरम है विरोध मुनिमंद ॥१०८॥
रयण- , अर्थ-जो मुनि होकर भी किसी आरंभकी, धनकी, धान्यकी वा किसी उपकरणकी इच्छा करते हैं, जो अन्य साधुओंसे ईर्ष्या करते हैं, जो व्रत समिति गुप्ति तथा शीलसे रहित हैं, जो कषायके वशीभूत हैं, कलह करनेवाले हैं और बहुत बोलते हैं, जो संघसे विरोध करते हैं, कुशीलता धारण करते हैं, जो गुरुके आधीन न रह कर स्वतंत्र रहते हैं, गुरुके समीप नही रहते अथवा गुरुकी आज्ञानुसार नहीं चलते, जो अज्ञानी हैं और राजादिककी सेवा करते हैं उन साधुओंको जिनधर्मके विरोधी समझना चाहिये। जोइस विजामंत्तोपजीवणं वा य वस्तववहारं । धणधगपडिग्गहणं समणाणं दूसणं होई ॥१०९॥ ज्योतिषविद्या मंत्र उपजीवन वर्ष व्योहार । धनधान्यादिक प्रतिग्रहण मुनिदूसन परमाद ॥ अर्थ-जो मुनि ज्योतिषशास्त्रसेवा किसी अन्य विद्यासे चा मंत्र तंत्रोंसे अपनी उपजीविका करता है, जो वर्पतकके व्यवहार करता है और धनधान्य आदि सबका प्रहण करता है वह मुनि समस्त मुनियोंको दूषित करनेवाला होता है । .
सार श्यण- . ८७ जे पावारंभरया कसायजुत्ता परिग्रहासत्ता। लोयववहारपउरा ते साहू सम्मउम्मुक्का। ११०॥ जुत कपाय रतपापरंभ जो परिग्रह भरतार । प्रवर लोकव्यवहारतें साधु न समकित धार ॥ ११०॥ अर्थ-जो साधु पापरूप कार्योंके आरंभ करनेमें लीन रहते हैं, जो कपाय सहित हैं, परिग्रहमें सदा लीन रहते हैं और जो लोकव्यवहारमें सदा लगे रहते हैं ऐसे साधुओंको सम्यक्त्व रहित ही समझना चाहिये। चम्मट्टि मंसलव लुद्धो सुणहो गजए मुणिं दिट्ठा। जह पाविडो सो धम्मिटुं दिट्ठा सगीयट्ठो॥ १११॥ ..अर्थ-जिस प्रकार चर्म, हड्डी, और मांसके टुकड़ोंमें लोभ करनेवाला कुत्ता मुनिको देख कर भोंकता रहता है उसीप्रकार पापी पुरुप. धर्मात्माओंको देखकर भोंकतारहता है। ण सहंति इयरदप्पं थुवंति अप्पाण अप्पमाहप्पं । जिब्भ णिमित्त कुणंति .ते साहसम्म उम्मुका॥ ११२॥ ..
रयण ८८ इतर दर्प नहिं सहि सकत अनु आप महिंत । जीवनिमित कारजकरें ते मुनि न हिं समाकिंत । ११२ ॥ अर्थ-जो मुनि दूसरेके अभिमानको वा ऐश्वर्य बड़प्पन आदिको सहन नहीं कर सकता जो अपने आप अपनी महिमा प्रगट करता है और वह भी केवल जिह्वाके स्वादके लिये। . अर्थात् जो केवल स्वादिष्ट भोजन मिलनेके लिये अपनी प्रशंसा करता है उस साधुको सम्यक्त्वरहित समझना चाहिये। मुंजेह जहालाहं लहेइ जइ णाणसंजमणिमित्तं । झाणज्झयणणिमित्त अणियारो मोक्खमग्गरओ॥ ११३॥ जथा लाभ लहि अँजिए संजमज्ञान निमित्त । ध्यान अध्ययन कारने ते मुनि शिवमगरत्त । ११३॥ अर्थ-जो मुनि केवल संयम और ज्ञानकी वृद्धिके लिये तथा ध्यान और अध्ययन करनेके लिये जो मिल गया-भक्ति पूर्वक जिसने जो शुद्ध आहार दे दिया उसीको ग्रहण कर लेते हैं वे मुनि अवश्य ही मोक्षमार्गमें लीन रहते हैं। ८८ . S सार रयण- ८९ उवरग्गिसमणमक्ख मक्खण गोयारसम्भपूरणभमरं। णाऊण तप्पयारे णिचव भुंजए भिक्खु ॥११॥ उदरअगिनि उपशम खमन गोचर भ्रामरि परि । जिहिं प्रकार हित जान निज तिमि भुंजा नित सूर ॥११४ ॥ अर्थ-मुनियोंकी चर्या वा आहार लेनेकी विधि आचार्योंने पांच प्रकारकी बतलाई है। उदराग्निपशमन, अक्षप्रक्षण, गोचरी, श्वभ्रपूरण और भ्रामरी। मुनियों- को इन सब भेदोंको समझना चाहिये और इन्हींके अनुसार आहार ग्रहण करना चाहिये। जितने आहारसे उदरकी अग्नि शांत हो जाय उतना ही आहार लेना अधिक न लेना उदराग्निप्रशमन है। जिस प्रकार गाडीको चलानेके लिये उसके पहियोंकी कीली पर तेल डालते हैं क्योंकि विना तेलके वह गाड़ी चल नहीं सकती उसी प्रकार यह शरीर भी विना आहार दिये चल नहीं सकता इसलिये इस शरीरको मोक्ष तक पहुंचानेके लिये आहारं देना अक्षपक्षण विधि है। जिस प्रकार गायको चारा डाला जाता है उस समय वह डालनेवालेकी सुंदरता वा आभूषण आदिको नहीं देखतीं केवल चारेको देखती है उसी प्रकार आहारके समय अमीर गरीव घरको न देखना किसीकी सुंदरताको न देखना केवल आहारसे प्रयोजन रखना गोचरी वृत्ति ८९ an रयग- सीह ܘ4 कहलाती है। जिस प्रकार किसी गढ़को मिट्टी कूड़ा 'आदि चाहे जिससे भर देते हैं उसी प्रकार इस पेटको अच्छे बुरे चाहे जैसे आहारसे भर लेना शभ्रपूरण विधि है। भ्रमर जिस प्रकार फूलोंको कष्ट न देता हुआ उनका रस लेता है उसी प्रकार किसी भी गृहस्थको कष्ट न देते हुए आहार ग्रहण करना भ्रामरी वृत्ति है। इस प्रकार इन आहारकी विधिऑको जाम कर इनके अनुसार आहार ग्रहण करना चाहिये। रसरुहिरमंसमेदसुिकिलमलमुत्तपूयकिमि बहुलं। दुग्गंध मसुइ चम्ममयमणिच्चमचेयणं पउणं ॥११५॥ बहुदुक्खभायणं कम्मकारणं भिण्णमप्पणो देहो। तं देहं धम्माणुहाणकारणं चेदि पोसए भिक्खू । ११६ ॥ रसशुक्रमज्जा अस्थिपल पूय किरिमि मलमुत्त । बहुदुर्गव चरममय अशुचि अनित अचेतन जुत्त ।। ११५ ॥ दुखभाजन कारन कर्म भिन्न आतमा देह । तथा धर्म अनुठान विदि पोसै मुनि नहिं देह ॥ ११६ ।। FO LIVE ९१ :' ' 'अर्थ-यह शरीर रस, रुधिर, मांस, मेदा, हड्डी, वीर्य, मल, मूत्र, पीच और अनेक प्रकारके कीडोसे भरा हुआ है। इसके सिवाय यह शरीर दुगंधमय है, अपवित्र है, चमड़ेसे लपेटा हुआ है अनित्य है, जड़ है और नाश होनेवाला है । यह शरीर अनेक प्रकारके दुःखोंका पात्र है, कर्म आनेका कारण है और आत्मासे सर्वथा भिन्न है। ऐसे शरीर को मुनिराज कभी पालन पोपण नहीं करते हैं किंतु यही शरीर धी. नुपानका कारण है । यही समझ कर इस शरीरसे धर्म सेवन करने के लिये आर मोक्षमें पहुंचनेके लिये मुनिराज इसको थोड़ासा आहार देते हैं विना आहारके यह शरीर चल नहीं सकता और विना शरीरके धर्मानुष्ठान हो नहीं सकता बा चारित्र पालन हो नहीं सकता इसीलिये इसको आहार देकर इससे चारित्र पालन कराया जाता है। मुनिराजो- के आहार ग्रहण करनेका यही कारण है और कुछ नहीं। कोहेण य कलहेण य जायण सीलेण संकिलेपण। रुद्देण य रोसेण य मुंजइ किं तिरो भिक्खू ॥ ११७॥ क्रोध कलह कर जांचिके संकलेश परिणाम | रुद्र रोस करि मुंजए नाह साधू अभिराम ॥ ११७॥ अर्थ- जो मुनि.क्रोध दिखलाकर आहार लेता है, कलह कर आहार लेता. . TI याचना कर आहार लेता है, वा संक्लेश परिणामों को धारण करता हुआ आहार लेता है, अपने रौद्र परिणामोंसे आहार लेता है वा क्रोध करता हुआ आहार लेता है। वह साधु नहीं है किंतु उसे व्यतर समझना चाहिये । भावार्थ-व्यंतर नीच देव होते हैं । क्रोध कलह करना, रौद्र परिणाम धारण करना, संक्लेश परिणाम करना आदि उनका कार्य रहता है । मुनियोंका यह कार्य नहीं है। इसलिये जो मुनि होकर भी ऐसे मलिन परिणाम रखता है वह नीच व्यंतरके समान है। दिव्युत्तरणसरित्थं जाणिच्चाहो धरेइ जइ सुद्धो। तचायसपिंडसमं भिक्खू तुह पाणिगयपिंडं ॥११८॥ दिव्यु तिरन सम जानिये शुद्ध है धार अहार । तपत लोह सम पिंड तुज मुनिवर कवलहि धार ॥ ११८॥ अर्थ-हे मुनिवर ! तेरे हाथपर रक्खा हुआ आहारका पिंड यदि तपाये हुए लोहेके गोलेके समान अत्यंत शुद्ध है तो तु उसे संसारसे पार करदेनेवाला समझकर ग्रहण कर । ९२.
सार भावार्थ-मुनियोंको शुद्ध और निर्दोष आहार ही ग्रहण करना चाहिये तथा उस आहारको मोक्षका कारण भान कर केवल शरीरसे तपश्चरण करनेके लिये और इसीलिये उसे बनाये रखने के लिये ग्रहण करना चाहिये। संजमतवझाणज्झयविण्णाणये गिण्डए पडिग्गहणं । वच्चइ गिण्हइ भिक्खूण सकदे वजिदुं दुक्खू ॥११९ ॥ संजम तप ध्यानाध्ययन पडिगह गहे विज्ञान । ऐते संग्रह साधुके वंचि सके दुख तानि ॥ ११९ ॥ अर्थ-साधुओंको संयम बढ़ानेके लिये तपश्चरण करनेके लिये, ध्यानकी शक्ति बढ़ानेके लिये, शास्त्रोंका अभ्यास करनेके लिये और तचोंका स्वरूप जाननेके लिये प्रतिग्रह (आहार स्वीकार करनेके लिये प्रार्थना) स्वीकार करना चाहिये । जो साधु इन ऊपर कहे हुए कारणों को छोड़कर केवल शरीरको पुष्ट बनानेके लिये आहार लेता है वह साधु संसारके जन्ममरणरूप कभी दुःखोंसेनहीं छूट सकता । अविरददेसमहव्वयआगमरहणं विचार तचण्हं। पत्तंतरं सहस्सं णिद्दिठं जिणवरिंदेहि ॥ १२० ॥ .
रयण- सार '.९४ अविरत देश. महाविरत श्रुति रुचिरत्न विचार । पात्र नु अंतर सहसगुन कहि जिनपति निरधार ॥१.२०॥ अर्थ-अविरत सम्यग्दृष्टी, देशवती श्रावक और महाव्रतियोंके मेदसे आगम में रुचि रखनेवालोंके मेदसे और तचोंके विचार करनेवालोंके मेंइसे भगवान जिनेन्द्रदेवने हजारों प्रक्र.रके पात्र बतलाये हैं। भावार्थ-मुनि उत्तम पात्र है, श्रावक मध्यम पात्र है और अविरत संम्य- ग्दृष्टी जघन्यपात्र है । इनमें भी मुनियोंमें अनेक मेद हैं श्रावकों में अनेक मेद हैं और अविरत सम्यग्दृष्टियों में अनेक भेद हैं। इस प्रकार पात्रों के अनेक भेद हैं। उवसम णिरीह झागंज्झयंणाइमहागुणा जहाँ दिट्ठा । जेसि ते मुणिणाहा उत्तमपत्ता तहा भणिया ॥ १२१ ॥ उपशमध्यानाध्ययन महा अच्छक दिए। : जे मुनि एते गुण सहित पात्र कहे उत्कृष्ट ॥१२॥ : अर्थ-उपशम परिणामोंको धारण करनेवाले, बिना किसी इच्छाके ध्यान करने वाले तथा अध्ययन करनेवाले मुनिराज उत्तमपात्र कहे जाते हैं । मुनियों के इन महा गुणोंकी जैसी जैसी वृद्धि होती जाती है वैसे ही वैसे पात्रताकी उत्कृष्टता उनमें आती रयण- ९५ जाती है। पात्रताकी उत्कृष्टता गुणोंके अधीन हैं जैसे- ध्यानादिक गुण बढ़ते जायंगे वैसे ही वैसे उनमें उत्तमता आती जाती है। इसप्रकार उत्तम पात्रोंमें भी अनेक मेद हो जाते हैं। '. दसण सुद्धो धम्मज्झाणरदो संगवज़िदो णिमल्लो। पत्त्रविसेसो भणियो ते गुणहीणो दु विवरीदो॥ १२२ ॥ अर्थ---जिस मुनिका सम्यग्दर्शन अत्यन्त शुद्ध है, जो धर्मध्यानमें सदा: लीन रहता है, जो सब तरहके परिग्रसे रहित है और माया गिथ्यात्व और निदान रूप तीनों शल्योंसे रहित है ऐसा जो मुनि है उसको विशेष पात्र कहते हैं । .. जिस मुनिमें ये ऊपर कहे हुए गुण नहीं हैं वह उससे विपरीत अर्थात् अपात्र है। सम्माइगुणविसेसं पत्तविसेसं जिणे हि णिहिटुं॥ अर्थ--भगवान जिनन्द्रदेवने कहा है कि जिसमें सम्यग्दर्शनकी विशेषता है उसीमें पात्रपनेकी विशेषता समझनी चाहिये। भावार्थ--जैसा जैसा सम्यग्दर्शन विशुद्ध होता जाता है वैसी वैसी ही पात्रता- में विशेषता वा निर्मलता आती जाती है।
सार १७ णवि जाणइ जिणसिद्धसरूव तिविहेण तह णियप्पाणं । जो तिव्वं कुणइ तवं सो हिंडह दीहसंसारे ॥१२४॥ नहि जाने जिन सिद्ध अरु निज स्वरुप त्रिवि हि । सो तप तीव्र करे तऊ भ्रमै दीर्घ भव लेह ॥ १२४॥ अर्थ--जो मुनि न तो भगवान अरहंत देवका स्वरूप जानता है, न भगवान सिद्ध परमेष्ठीका स्वरूप जानता है और न पहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्माके मेदसे अपने आत्माका स्वरूप जानता है वह मुनि यदि तीव्र तपश्चरण करे तो भी वह इस जन्म मरण रुप महासंसारमें दीर्घ कालतक परिभ्रमण करता है। भावार्थ---पंच परमेष्ठिका तथा आत्माका स्वरुप जानना सम्यग्दर्शनका साधन है। जो इनका स्वरुप नहीं जानता वह सम्यग्दर्शनको भी प्राप्त नहीं कर सकता । तथा विना सम्यग्दर्शनके तीव्र तपश्चरण करने पर भी वह संसारमें ही परिभ्रमण करता रहता है। णिच्छयववहारसरूवं जो रयणतये ण जाणइ सो। जं कीरह तं मिच्छारूवं सव्वं जिणुहि । १२५॥ d.. .
सार श्यण- RINA ९७ जो निश्चय व्यवहार, रत्नत्रय जाने नहीं। सो तप करइ अपार, मृपारूप जिनवर कयो ॥१२५॥ अर्थ-जो मुनि न तो निश्चय रत्नत्रयके स्वरूपको जानता है और न व्यवहार रस्नत्रयके स्वरूपको जानता है, वह जो कुछ करता है वह सब मिथ्या है, विपरीत हैं, ऐसा भगवान जिनेन्द्रदेवने कहा है। भावार्थ-रत्नत्रय ही मोक्षका कारण है। जो व्यवहार रत्नत्रय और निश्चय रत्नत्रयका पालन नहीं करता उसे मिथ्यादृष्टी समझना चाहिये। उसे मोक्षकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती। किं जाणिऊण सयलं तचं किच्चा तवं च किं बहुलं। सम्मविसोहिविहीणं णाणतवं जाण भवबीयं ॥१६॥ तत्त्व सकल जाने कहा, कहा बहुत तप कीन । जानहु समकित शुद्ध विन, ज्ञान तप जु भवबीज ॥१२६॥ अर्थ--आचार्य कहते हैं कि बिना शुद्ध सम्यग्दर्शनके समस्त तत्वोंको जान लेनेसे भी क्या लाभ है तथा विना शुद्ध सम्यग्दर्शनके घोर तपश्चरण करनेसे ९७ RER सार रयण- ९८ भी क्या लाभ है । शुद्ध सम्यग्दर्शनके विना ज्ञान और तप दोनों ही संसारके कारण समझने चाहिये। भावार्थ- सम्यग्दर्शनके साथ साथ होनेवाला ज्ञान और तप मोक्षका कारण है, विना सम्यग्दर्शनके ज्ञान और तप दोनों ही मिथ्या कहलाते हैं। तथा मिथ्या ज्ञान और मिथ्या तप दोनों ही संसारके कारण हैं। वयगुणसीलपरीसहजयं च चरियं च तवं षडावसयं । झाणज्झयणं सब्बं सम्मविणा जाण भवबीयं ॥१२७॥ व्रतगुणशील परीपजय आवसि तप चारित्र । ध्यानाध्यन सम्यक्त्व विन भवह वीज सरवत्र ॥१२७॥ अर्थ-विना सम्यग्दर्शनके व्रत पालन करना, गुप्ति समिति पालन करना, शील पालन करना, परीपहोंको जीतना, चारित्रका पालन करना, तपश्चरण करना, छहों आवश्यकोंका पालन करना, ध्यान करना और अध्ययन करना आदि सब संसारके कारण ही समझना चाहिये । भावार्थ-बिना सम्यग्दर्शनके ये सब मिथ्या है, इसलिये बिना सम्यग्दर्शनके ये सब संसारके कारण हैं। ९८ TRA रयण- सार ९९ खाईपूजालाई सकाराई किमिच्छसे जोई। इच्छसि जइ परलोयं तेहिं किं तुज्झ परलोयं ॥१२८॥ ख्याति पूज सत्कार लम किम इच्छइ जोगीश । जो इच्छइ परलोक तिहिं ते परलोक न कीश ॥१२॥ अर्थ-हे मुनिराज ! यदि तू अपने परलोकको सुधारनेकी इच्छा करता है तो फिर अपनी प्रसिद्धिकी इच्छा क्यों करता है, अपना बड़प्पन प्रकट करनेकी इच्छा क्यों करता है, किसीके लामकी इच्छा क्यों रखता है और किसीसे भी आदर सत्कार करानेकी इच्छा क्यों करता है। हे मुनि! इन सब बातोंसे तेरा. परलोक कभी नहीं सुधर सकता। भावार्थ-परलोकमें आत्माको सुखकी प्राप्ति होना, मोक्षकी प्राप्ति होना, पर- लोकका सुधरना है । मोक्षकी प्राप्ति आदर सत्कार वा ख्याति पूजा लामसे नहीं हो सकती । इसलिये इनकी इच्छा करना सर्वथा व्यर्थ है । मोक्षकी प्राप्ति रत्नत्रयसे होती है, इसलिये हे मुनिराज ! रत्नत्रयका पालन कर । P रयण- २९ सार १०० कम्मादविहावसहावगुणं जो भाविऊण भावेण । णियसुद्धप्पा रुचइ तस्त य णियमेण होइ णिव्वाणं ॥१२९॥ करमविभावविख्यात, चहभावेइ सुभावगुण । रुचे सुद्ध निज आत, तिह निश्चै निरवान हुइ ॥१२९॥ अर्थ-जो मुनिराज कर्मके उदयसे होनेवाले आत्माके वैभाविक गुणोंका (राग- द्वेष मोह मद मत्सर कपाय आदि भावोंका) चितवन करता है तथा उन कर्मोंके नाश होनेसे प्रगट होनेवाले उत्तमक्षमा मार्दव आर्जव आदि आत्माके स्वाभाविक गुणोंका चितवन करता है। इन दोनोंके यथार्थ स्वरूपका चितवनकर जिसको अपने शुद्ध आत्मामें प्रेम होता है, जो अपने शुद्ध आत्माका श्रद्धान करता है उसको अवश्य ही मोक्षकी प्राप्ति होती है, इसमें कोई संदेह नहीं है। मूलुत्तरुत्तरदम्बादो भावकम्मदो मुक्को। आसववंधणसंवरणिज्जर जाणेह किं बहुना ॥१३०॥ मूल उतर उत्तरउतर द्रव्यकर्म ना भाव । आनव संवर निर्जरा बंध जानि वद्ध काव ॥१३०॥ १०० १०१ अर्थ-ज्ञानावरणादिक कर्म द्रव्यकर्म कहलाते हैं, उनकी मूल प्रकृतियां ज्ञानावरणादिक और उत्तरप्रकृतियां मतिज्ञानावरण आदि । अपग्रह ईहा अवाय धारणा वा स्मरण चिंता आदिको आवरण करनेवाले कौंको उत्तरोत्तर प्रकृ. तियां कहते हैं। जो मुनि मूलप्रकृति उत्तरप्रकृति तथा उत्तरोत्तर प्रकृतिरूप द्रव्य- कर्मोंसे सर्वथा रहित है और राग द्वेष आदि मावकोंसे भी सर्वथा रहित हैं. वे ही आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष आदि समस्त पदार्थाको जानते हैं। विसयविरत्तो मुंचह विसयासतो ण मुंचए जोई। वहिरंतरपरमप्पाभेयं जाणेह किं बहुणा ॥. १३१ ॥ विषयविरत मुंचकविषय शक्त न मुंच मुनीश । वहिरंतर परमातमा मेद जानि वहु कीश ॥ १३१॥ अर्थ-जो मुनि इन्द्रियोंके विषयोंसे विरक्त है वह इस द्रव्यकर्म और भाव- कर्मसे छूट जाता है तथा जो मुनि विषयासक्त है वह इन कर्मोंसे कभी नहीं छूट सकता । इसलिये है मुनिराज ! बहुत कहनेसे क्या लाभ है आत्मा जो वहिरात्मा अंतरात्मा और परमात्माके मेदसे तीन प्रकार है पहले उसका स्वरूप समझ । .
रयण FRIERNE .. १०२ भावार्थ-आत्माके इन तीनों मेदोंको समझानेसे विषयोंकी आसक्ति अपने आप छूट जाती है । इसलिये पहले आत्माका स्वरूप समझ लेना चाहिये। अप्पाणणाणज्झाणज्झयणसुहमियरसायणप्पाणं । मोतूणक्खाणसुहं जो भुंजइ सो हु बहिरप्पा ॥ १३२॥ ब्रह्मज्ञानध्यांनाध्ययनसुखअमृतरसपान । त्यागि अक्षसुखभोगवे सो वहिरातम जान ॥१३२ ॥ अर्थ-ज्ञान ध्यान और अध्ययनसे उत्पन्न होने वाला सुख अमृतके समान है। तथा वह अमृतरूप सुख केवल आत्मासे उत्पन्न होता है। इसलिये आत्मासे उत्पन्न होनेवाला वह ज्ञान ध्यानरूपी सुखामृत एक अपूर्व रसायनके समान है। इस आत्म- जन्य सुखासुंतरूपी रसायनके पीनेको वा अनुभवको छोड़कर जो इन्द्रियोंके सुखोंका अनुभव करता है, इन्द्रिय जन्य सुखोंमें लीन रहता है, उसे पहिरात्मा समझना चाहिये । भावार्थ-ज्ञान ध्यानको छोड़कर जो केवल इन्द्रियोंके सुखोंमें लीन रहते हैं । बहिरात्मा हैं। मा १०२ k उ सार । इन्द्रायण मानि। .१०३ किंपायफलं पकं विसमिस्सिदमोदर्गिव चारुमुहं । जिन्भसुहं दिहिपियं जह तह जाणक्खसोक्ख पि ॥१३॥ विषमोदक किंपाकफल भा रसनासुख और दृष्टिप्रिय तथा अक्ष सुख जान ॥ १३३॥ अर्थ-किपाक फल एक विषफल होता है जो देखने में अत्यंत सुंदर और खानेमें अत्यंत मीठा खादिष्ट होता है। पकनेपर वह बहुत ही मीठा और सुंदर हो जाता है। परंतु वह विषफल है उसके खाते ही मनुष्य मर जाता है। जिसप्रकार किंपाकफल खानेमें स्वादिष्ट जिह्वाको सुख देनेवाला और देखनेमें सुंदर होता है उसीप्रकार इन्द्रि- योंके सुख क्षणभरके लिये इन्द्रियों को सुख देनेवाले होते हैं और उस समय अच्छे जान पड़ते हैं परंतु जिसप्रकार किंपाक फलके खानेसे मनुष्य दुःख भोगता है और मर जाता है उसीपकार इन इन्द्रियोंके सुखोंसे भी जीव अनेक प्रकारके दुःख भोगते हैं और दीर्घ कालतक संसारमें परिभ्रमण किया करते हैं । अथवा विष मिले हुए लाडू जिंसमकार देखनेमें सुंदर और खानेमें मीठे होते हैं उसीप्रकार ये इन्द्रियोंके सुख हैं उन लड्डुओंके खानेसे जैसे मनुष्य मर जाता है उसीपकार इन्द्रियोंके सुखोंका फल भी नरक निगोद आदि योनियोंमें अनेक बार मरना है । इसलिये जिसप्रकार सुख चाहने- १०३ रंवण- सार १०४ वाले मनुष्य किंपाकफलको नहीं खाते वा विष मिले लड्डुओंको नहीं खाते उसीप्रकार अक्षय सुख चाहने वाले जीवोंको इन्द्रियोंके सुखोंका सर्वथा त्याग कर देना चाहिये आत्माका कल्याण इसीसे हो सकता है। देहकलत्तं पुत्तं मिचाइ विहावचेदणारूवं । अप्पसरूवं भावइ सो चेव हवेइ वहिरप्पा ॥ १३४ ॥ तन कलत्र सुत मित्र वहु चेतनरूप विभाव भावह आपनुरूप सो वहिरातमा लखाव ॥ १३ ॥ अर्थ--जो जीव इस शरीरको आत्मस्वरूप मानता है, स्त्री पुत्र मित्र आदिको अपने आत्मस्वरूप मानता है अथवा राग द्वेष मोह आदि आत्माके वैभाविक परि. णामोंको आत्मस्वरूप मानता है वह आत्मा अवश्य ही वहिरात्मा है। भावार्थ-शरीर पुत्र मित्र कलत्र आदि सब इस आत्मासे भिन्न पदार्थ हैं। राग द्वेप आदि वैमाविक परिणाम भी आत्मासे मिन्न हैं क्योंकि वे कर्मके उदयसे होते हैं। जिसप्रकार स्फटिक पापाणके पीछे लाल फूल रख देनेसे उस पापाणमें लाली दिखाई देती है परंतु वह लाली उस पापाणसे सर्वथा मिम है । इसीप्रकार राग द्वेषादि १०४ सार रयण. भी कर्मके उदयसे होते हैं इसलिये वे आत्मासे सर्वथा भिन्न है यदि उनको आत्मासे भिन्न न माना जायगा तो फिर मोक्ष अवस्थामें भी उनकी सत्ता माननी पड़ेगी, परंतु मोक्ष अवस्थामें इनकी सत्ता नहीं रहती। कर्मोके सर्वथा नाश होनेके कारण उन राग द्वेषादिकका भी सर्वथा नाश हो जाता है। इससे स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि रागद्वेषा- दिक भी आत्मासे सर्वथा भिन्न है फिर भी जो इनको आत्मस्वरूप मानता है, इनको आत्माका रूप वा आत्माका स्वभाव मानता है उसे पहिरात्मा ही समझना चाहिये । जो अपने स्वरूपको न जाने, अपने आत्माके स्वरूपसे परान्मुख हो वही. बहिरात्मा है। इंदियविसयसुहाइसु मूढमई रमइ ण लहइ तच्चं । वहुदुक्खमिदि ण चिंतह सो चेव हवेइ वहिरप्पा ॥१३५॥ अक्षविषयसुख मूढमति रमह तत्त्व नहिं पाई। बहु दुख इह चिंता न सो वहिरातमा कहाइ ॥१३॥ अर्थ-जो अज्ञानी मनुष्य इन्द्रियोंसे उत्पन्न होनेवाले विषय सुखोंमें सदा लीन रहता है तथा इन इन्द्रियोंके विषयोंसे अनेक प्रकारके दुःख होते हैं इस बातका ०.
१०६ जो विचार.ही नहीं करता वह आत्मतचका स्वरूप वा जीवादिक समस्त पदार्थोंका स्वरूप कभी नहीं जान सकता । ऐसे अज्ञानी जीत्रको वहिरात्मा कहते हैं। भावार्थ-इन्द्रियजन्यसुख नरंक निगोदके कारण हैं। जो मनुष्य केवल इन्हीं में लीन रहता है और इनमें लीन रहनेके कारण आत्मतत्वको भी नहीं जान सकता उसे आचार्योंने बहिरात्मा ही बतलाया है। जं जं अक्खाणमुहं तं तं तिव्वं करेइ बहुदुक्खं । अप्पाणमिदि ण चिंत सो चेव हवेइ वहिरषा ॥१३६॥ - 'अर्थ--संसारमें इन्द्रियजन्यजितने सुख हैं वे सब इस आत्माको तीव दुःख देते हैं । इसप्रकार जो मनुष्य इन इन्द्रियजन्य विषयों के स्वरूपका चितवन नहीं करता वह वहिरात्मा कहलाता है। भावार्थ-जिस पदार्थका जैसा स्वरूप है उसका उसीरूपसे श्रद्धान करना सम्यग्दर्शन है। इन्द्रिय जन्य सुखोंका स्वभाव आत्माको तीव्र दुःख देते हैं। इस बातको सब कोई जानता है. । परन्तु जो अज्ञानी इन सुखोंका स्वरूप कभी चिंतपन नहीं करता तथा बिना इनका स्वरूप जाने सदा इनमें लीन रहता है वह मिथ्यादृष्टी है.और इसीलिये वह वहिरात्मा कहलाता है। १०६ UARY सार रयण- १०७ जोर्स अमेज्झमज्झे उप्पण्णाणं हवेइ तत्थेव रुई। तह वहिरयाणं वाहिरिंदियविसएसु होइ मई ॥१३.७॥ जो अमेधि मधि उपजिके वहुरि रुचै तिहि सोय। त्यों वाहिज वहिरात्मा अक्षविषय मय होय ॥१३७॥ अर्थ-जिसमकार जो कोई जीव विष्ठामें कीडा उत्पन्न होता है तो फिर वह उसी स्थानमें और उसी योनिमें प्रेम करने लग जाता है। उसी प्रकार जो जीव पहि- रात्मा हैं उन्हें बाह्य इन्द्रियोंके विषयों में ही प्रेम हो जाता है भावार्थ-जो जीव आत्माके निज स्वभावको नहीं जानते वे किसी भी पदार्थके यथार्थ स्वरूपको नहीं जानसकते। वहिरात्मा आत्माके स्वरूपको नहीं जानता वह आत्माके स्वरूपसे परांमुख है इसीलिये बहिरात्मा कहलाता है। ऐसा पहिरात्मा इन्द्रियों- के सुखोके वास्तविक स्वरूपको भी नहीं जान सकता । वे इन्द्रियजन्य सुख तीव्र दुःख देनेवाले हैं इस बातको भी वह नहीं जानता इसीलिये वह इन्द्रिय जन्य सुखमें लीन रहता है । तथा इसी कारण वह फिर इस अनन्तसंसारमें परिभ्रमण किया करता है। सिविणे विण मुंजइ विसयाई देहाइभिण्णभावमई। भुंजइ णियप्परूवो सिवसहरचो दु मज्झिमप्यो सो ॥१३८॥ .१०७ hama सारः १०८ सपनेहु न भुजह विषय मिन्न भाव देहात । रूप निजातम भुंज शिवसुखरत मध्यम आत ॥१३॥ अर्थ-जो आत्मा अपने आत्माको शरीरादिकसे सर्वथा भिन्न मानता है तथा जो विषयोंका अनुभव कभी स्वप्नमें भी नहीं करता। जो सदा अपने आत्माका अनुभव करता रहता है और मोक्षके सुख में सदा लीन रहता है। उसे मध्यम आत्मा अथवा अंतरात्मा कहते हैं। भावार्थ--जो आत्माके निज स्वरूपको जानता है और इसीलिये जो शुद्ध सम्यग्दृष्टी है, विषयोंको इन्द्रियजन्य सुखोंको आत्मासे सर्वथा भिन्न और तीव्र दुःख देनेवाले समझता है इसीलिये जो उन विषयोंका कभी सेवन नहीं करता। वह केवल अपनी आत्माको ही अपना समझता है अतएव उसीका सदा अनुभव करता रहता है। तथा मोक्षके अनंत सुखको प्राप्त करनेकी सदा लालसा करता रहता है उसके लिये सदा प्रयत्न करता रहता है और उसीकी सदा भावना रखता है। एक प्रकारसे यों कहना चाहिये कि उसी मोक्षके सुखमें सदा लीन रहता है ऐसा शुद्ध सम्यग्दृष्टी आत्मा अंतरात्मा कहलाता है।
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HRINKU रयण- १०९ मलमुत्तघडव्वं चिर वासिय दुबासणं ण मुंचे। पक्खालियसम्मत्तजलो यण्णाणम्मएण पुण्णो वि ॥ १३९॥ चिरयासित मलमत्रघट दुरभाजन नहिं मुंच । तिमि पखाल सम्यक्त्वजल ज्ञान अमियकर संच ॥ १३ ॥ अर्थ-जिस घड़ेमें बहुत दिन तक मल मूत्र भरा रहा है उसको यदि बहुतसे जलसे भी धोया जाय तो और उसमें मुंहतक अमृत भर दिया जाय तो भी वह घड़ा अपनी चिरकाल की दुर्गधको नहीं छोड़ सकता । थोड़ी बहुत दुगंध उसमें बनी ही रहती है। इसीप्रकार यह जीव अनादिकालसे इन्द्रियजन्य विषयोंका सेवन करता चला आ रहा है । यदि इसको काललब्धिके अनुसार सम्यग्दर्शन मी उत्पन्न हो जाता है, उसके बलसे यद्यपि यह उन इन्द्रियजन्य विषयोंका त्याग कर देना चाहता है या त्याग कर देता है तथा अपने आत्मजन्य सुखामृतसे भरपूर हो जाता है तथापि अनादिकालसे लगी हुई वह विषयोंकी वासना लगी ही रहती है। भावार्थ---दर्शन मोहनीय कर्मके उपशम, क्षय वा क्षयोपशम होनेसे यद्यपि अंतरात्माके सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो जाता है. तथापि जबतक चारित्र मोहनीय १०९ ११. कर्मका उदय बना रहता है तबतक विषयवासनाका त्याग 'सर्वथा नहीं होता। अनादिकालसे लगी हुई वह वासना बनी रहती है। वह वासना चारित्र मोहनीय कर्मके नाश होनेपर नष्ट होती है। सम्माइही णाणी अक्खाणसुहं कहंपि अणुहवइ । केणाविण परिहारण वाहणविणासण? भेसज ॥१४०॥ समदिठि ज्ञानी अक्षसुख कैसे अनुभव होइ । काहू विधि परिहार नहिं रुजहर मरि हि कोइ ।। १४०॥ अर्थ-सम्यग्दृष्टी आत्मज्ञानी पुरुप इन्द्रियोंके सुखोंको अनिच्छा पूर्वक किसी मी प्रकारसे अनुभव करते हैं, जिसमकार कोई पुरुप रोगको दूर करनेके लिये औष- धिका सेवन करता है उसीप्रकार वह सम्यग्दृष्टी पुरुप उन विषयोंका अनुभव करता है । जिसमकार औषधिका सेवन करना किसीको इष्ट नहीं है, औपधिका सेवन करना सब घुरा समझते हैं तथापि रोगके हो जानेपर उसका सेवन करना ही पड़ता है। वह औषधिका सेवन कुछ इच्छापूर्वक नहीं होता तथापि जबतक रोग है तबतक उसका त्याग भी नहीं किया जा सकता । इसीप्रकार सम्यग्दृष्टी पुरुप विषयोंके सेवन करने रपण- सार को बुरा समझता है तथापि जबतक चारित्र मोहनीय कर्मका उदय है तबतक उस कर्मके उदयसे उन विषयोंका सेवन करना ही पड़ता है। यद्यपि वह उन विषयोंका सेवन इच्छा पूर्वक नहीं करता तथापि जबतक चारित्र मोहनीय कर्मका उदय है तव तक उनका त्याग भी नहीं कर सकता । चारित्रमोहनीयकर्मका जब मंदोदय होता है तभी विषयोंका त्याग होता है। किं वहुणा हो तजि वहिरप्पसरूवाणि सयलभावाणिः । भजि मज्झिमपरमप्पा वत्थुसरूवाणि भावाणि ॥१४१॥ बहुत कहा कहि रूप तजि सर्व भाव वहिरात । वस्तुखरूप खभावमइ भजि मध्यम परमात ॥१४१॥ अर्थ----हे भव्य जीव ! बहुत कहनेसे क्या लाभ है । थोड़ेसे में इतना ही समझ लेना चाहिये कि वहिरात्माके स्वरूपको धारण करनेवाले जितने भाव हैं उन सबका त्याग कर देना चाहिये और मध्यम आत्मा तथा परमात्माके जो यथार्थ स्वभाव हैं उन सबको धारण कर लेना चाहिय । भावार्थ- बहिरात्माके भात्र धारण करना तीव्र दुःखके कारण हैं इसलिये रयण- ११२ बहिरात्माके समस्त भावोंका त्याग कर देना चाहिये और अंतरात्मा बन जाना चाहिये । अंतरात्मा बन करके भी परमात्माका ध्यान करना चाहिये तथा अनुक्रमसे परमात्माका समस्त स्वरूप धारण कर लेना चाहिये । यही आत्माका निज स्वभाव है, शुद्ध स्वभाव है और इसीमें अनन्त सुख है। चउगइसंसारगमणकारणभूयाणि दुक्खहेऊणि । ताणि हवे वहिरप्पा वत्थुसरूवाणि भावाणि ॥१४२॥ चतुगतिभय कारण गमन परम महादुख देत । भावन वस्तुस्वरूप नहिं सो वहिरातम वेत ॥१४२॥ अर्थ-वहिरात्मा जीवोंके जो भाव होते हैं वे चारों गतियोंमें परिभ्रमण करनेके कारण होते हैं और अनेक महा दुःख देनेवाले होते हैं। भावार्थ-बहिरात्मा अपने आत्माके स्वरूपसे सदा परान्मुख रहता है इसीलिये उसके जितने भाव होते हैं वे सब संसारमें परिभ्रमण करनेकेही कारण होते हैं। उन विभावभावों के द्वारा वह चारों गतियों में परिभ्रमण किया करता है और अनन्तकाल तक नरक निगोद वा अन्य गतियोंके महा दुःख भोगा करता है। इसलिये वहिरात्माके भावोंका त्याग कर देना ही जीव का कल्याण करनेवाला है। ११२ सार श्यण :::: मोक्खगइगमणकारणभूयाणि पंसच्छपुण्णहेऊणि । ताणि हवे दुविहप्पा वत्थुसरूवाणि भावाणि ॥ १४३ ॥ शिवगतिगमकारण जननु पुण्यप्रशस्तह हेत। सो दो विधि आतम दरव भावसरूप समेत ॥१४३॥ अर्थ-अंतरात्मा और परमात्माके जो वास्तविक भाव होते हैं वे मोक्षगतिमें पढुंचनेके कारण होते हैं और अतिशय पुण्यके कारण होते हैं। भावार्थ-अंतरात्मा जीवके भाव साक्षात पुण्यके कारण होते हैं और परंपरासे मोक्षके कारण होते हैं । इन्द्र धरणेन्द्र गणधर आदि महा पुरुषोंके पद अंतरात्माको ही प्राप्त होते हैं तथा अंतमें तीर्थकर वा अन्य केवलीपद पाकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। परमात्मा उसी भवमें सिद्ध पद प्राप्त करता है तथा साथमें समवसरण वा गंधकुटी- की अनुपम विभूतिका अनुभव करता जाता है। यह उसके सातिशय पुण्यकी महिमा है। इसलिये अंतरात्मा बनकर परमात्मा बननेका प्रयत्न करना चाहिये जिससे शीघ्र ही मोक्षपदकी प्राप्ति हो। ८ -- रयण सार: ११४ दव्वगुणपजयहिं जाणइ परसमयससमयादिविभयं । अप्पाणं जाणइ सो सिवगइपहणायगो होई ॥१४॥ द्रव्य सुगुण परजाइ वित परखसमय वयमेव । आतम जान सुमोक्खगति पथनायक होइ तेव ॥ १४४ ॥ अर्थ-आत्माके दो भेद हैं । एक खसमय और दूसरा परसमय । जो अपने शुद्ध खभावमें स्थिर रहता है उसको स्वसमय कहते हैं और जो अपने शुद्ध स्वभावमैं स्थिर नहीं रहता उसको परसमय कहते हैं। जो आत्मा इन दोनों प्रकारके स्वरूपको जानता है, इनके द्रव्यरूप असंख्यात प्रदेशोंको जानता है अथवा इनको द्रव्यरूपसे जानता है, इनके समस्त गुणोंको जानता हैं, स्वभाव-विभावभावोंको जानता है और इनकी समस्त पर्यायोंको जानता है। वह आत्मा मोक्ष तक जानेवाले मार्गका नायक समझा जाता है। भावार्थ-जो शुद्ध सम्यग्दृष्टी आत्मा इन दोनोंका स्वरूप जानेगा वह स्वसमय 'अथवा परमात्मा होनेका प्रयत्न करेगा। वथा जो परमात्मा होनेका प्रयत्न करेगा वह अवश्य ही मोक्षपद प्राप्त करेगा। इसलिये स्वसमयका वा परमात्माके स्वरूपका ११५ रयण- सार जानना अत्यावश्यक है । परमात्माका स्वरूप जाने विना उसका ध्यान नहीं हो सकता । तथा परमात्माका ध्यान किये विना यह आत्मा परमात्मा बन नहीं सकता। अतएव इस आत्माको परमात्मा बननेके लिये परमात्माका स्वरूप जानकर उसका ध्यान करना चाहिये । जो भव्यजीव इसप्रकार परमात्माका ध्यान करता है वह अवश्य ही मोक्ष पहुंचता है। बहिरंतरप्पमेयं परसमयं भण्णए जिर्णिदेहि । परमप्पो सगसमयं तब्भेयं जाण गुणठाणे॥१४५॥ वहिरंतर जिय परसमय कहे जिनेश्वर देव । परमातम खसमय यह मेद मुगुन ठानेव ॥ १४५॥ अर्थ-भगवान जिनेन्द्रदेवने वहिरात्मा और अंतरात्माको परसमय बतलाया है तथा परमात्माको स्वसमय बतलाया है। इनके विशेष मेद गुणस्थानोंकी अपेक्षा समझ लेने चाहिये । सो ही आगे बतलाते हैं। मिस्सोत्ति वाहिरप्पा तरतमया तुरिय.अंतरप्पजहण्णा। संचोचिमज्झिमंतर खीणुचर परमजिणसिद्धा ॥१४६॥ .११ . सार रमा मिश्र लगै बहिरातमा अंतर तुरिय जघन्यः । मध्य संत उत्तम द्विदश परमसिद्ध जिन मन्य ॥ १४६॥ अर्थ- पहले दूसरे और तीसरे गुणस्थानमें रहने वाले जीव बहिरात्मा है। चौथे गुणस्थानमें रहनेवाले सम्यग्दृष्टि जीव जघन्य अंतरात्मा हैं। फिर पांचवें गुणस्थानसे लेकर ग्यारहवें गुणस्थान तक ऊपर ऊपर चढ़ते हुए अधिक अधिक विशुद्धि धारण करते हुए मध्यम अंतरात्मा हैं। वारहवें गुणस्थानवी जीव उत्तम अंतरास्मा हैं। तेरहवें चौदहवें गुणस्थानवी केवली भगवान सकलपरमात्मा हैं और सिदपरमेष्ठी निकलपरमात्मा हैं। . मूढचयसल्लत्तयदोसत्तयदंडगारवत्तयेहि । . परिमुक्को जोइ सो सिवगइपहणायगो होई ॥१४७॥ मूढशल्यत्रयदंडत्रय त्रयगारवत्रयदोष । सो जोगी इनर्ते रहित,नायक पंथगति मोष ॥ १४७ ॥ अर्थ-जो योगी देव मूढता, गुरुमूढता और लोकमूढता इन तीनों मूढताओंसे रहित है, माया मिथ्यात्व और निदान इन तीनों शल्योंसे रहित है, : राग देष और रयण सार ११७ मोह-इन तीनों दोपोंसे रहित है, तीनों दंडोंसे रहित है और ऋद्धियोंका मद आदि तीनों गारवोंसे रहित है वही मुनि मोक्ष तक पहुंचनेवाले मार्गका स्वामी होता है। भावार्थ--जो मुनि ऊपर कहे हुए दोषोंका सर्वथा त्याग कर देता है वह अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करता है। रयणत्तयकरणत्तयजोगचयगुत्तित्तयविसुद्धेहिं । संजुत्तो जोई सो सिवगइपहणायगो होई ॥ १४८.॥ रत्नत्रय, करणत्रय जोगगुप्तित्रय शुद्ध । सो जोगी संजुगत शिव गतिपथनायक उक्त ॥१४॥ अर्थ-जो मुनि रत्नत्रयसे सुशोभित है, जो अधाकरण, अपूर्वकरण, अनिवृति- करण इन तीनों करणोंसे सुशोभित है, मन वचन कापस शुद्ध है और शुद्धरीतिसे तीनों गुप्तियोंका पालन करता है वह योगीमोक्ष तक पहुंचनेवाले मार्गका स्वामी होता है। भावार्थ-जो रत्नत्रय आदिको अत्यंत निर्मल रीतिसे पालन करता है वह अवश्य हीमोक्ष प्राप्त करता है।
रयण- सार ११८ SEASEANILEARNER वहिरभंतरगंथविमुक्को सुद्धोवजोयसंजुत्तो। मूलुत्तरगुणपुण्णो सिवगइपहणायगो होई ॥१४९।। वहिरभ्यंतरग्रंथ विन शुद्धि जोग संयुक्त । मूलुत्तरगुणपूर शिव गतिपथ नायक उक्त ॥१४६॥ अर्थ-जो मुनि वाह्य आभ्यंतर दोनों प्रकारके परिग्रहोंसे रहित है, जो सदा शुद्धो- पयोगमें लीन रहता है और जो मूलगुण और उत्तर गुणोंको पूर्ण रीतिसे पालन करता है वह मुनि अवश्य ही मोक्ष प्राप्त करता है, इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है। जं जाइजरामरणं दुइदुट्ठविसाहिविसविणासयरं। सिवसुहलाई सम्म संभावइ सुणह साहए साह ॥१५॥ जन्म जरा व्यय दुष्ट दुय अहिविष नाश करेइ । सो समकित शिवलाम मुनि सुनि भावइ धारेइ ॥१५०॥ अर्थ-मोक्षको सिद्ध करनेवाले हे साधु ! सुनो और इसकी भावना करो कि यह सम्यग्दर्शन जन्म मरण और बुढ़ापा आदिके समस्त दुःखोंको दूर करनेवाला है भारीसे भारी विपोंको दूर करनेवाला है और सर्प विच्छ आदिके समस्त विपीको दूर ११८
यण.
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करनेवाला है। इसके सिवाय यह सम्यग्दर्शन मोक्षसुखको प्राप्त करानेमें प्रधान
कारण है यह निश्चय जानो।
किं बहुणा हो दविंदाहिंदणरिंदगणारदेहि।
पुजा परमप्पा जे तं जाण पहाण सम्मगुणं ॥१५१॥
बहुत कहा कहि हुइ फनिंद इंद नरिंद गणिंद।
पूज परम आतम जिके समकित प्रधान विंद ॥ १५१ ॥
अर्थ-बहुत कहनेसे क्या लाम है थोड़ेसेमें इतना समझ लेना चाहिये कि भगं-
वान- अरहंत परमात्मा और सिद्धपरमात्मा जो देवेन्द्र, धरणेन्द्र, चक्रवर्ती और गण-
घर देवादिकके द्वारा पूज्य हुए हैं सो सम्यग्दर्शन गुणकी प्रधानतासे ही हुए हैं।
भावार्थ-सम्यग्दर्शनके माहात्म्यसे ही अरहंत और सिद्धपरमेष्ठी पद प्राप्त
होता है। इसलिये सम्यग्दर्शनको धारण करना प्रत्येक भव्यजीवका कर्तव्य है।
उवसमईसम्मच मिच्छत्तवलेण पेल्लए तस्स।
परिवहंति कसाया अवसप्पिणिकालदोसेण ॥१५२॥
सार १२० उवसमसमकित वले, पेलतु है मिथ्यात । होत प्रवर्ति कषाय, अवसर्पिणि दोष विख्यात ॥१५२॥ अर्थ-इस अवसर्पिणि कालमें इस कालके दीपसे मिथ्यात्व कर्मका तीव्र उदय उपशम सम्यक्त्वको नाश करदेता है तथा कपायोंकी वृद्धि होती रहती है। अभिप्राय यह है इस अवसर्पिणीकालमें कपायोंकी वृद्धि अधिक होती है और मिथ्यात्वका प्रवल उदय रहता है जिससे उपशम सम्यक्त्व भी हो नहीं सकता और यदि होता है तो शीघ्र नष्ट होजाता है। गुणवयतवसमपडिमादाणं जलगालण अणत्यमिय। दसणणाणचरिच किरिया तेवण्ण सावया भणिया ॥ १५३ ॥ गुणवत तप प्रतिमा समिक, दिनछत भक्ष जलगाल । दान ज्ञान दरशन चरित, ग्रह त्रेपन क्रियपाल ||१५३।। अर्थ-गुणवत, अणुव्रत, शिक्षाव्रत, तप, ग्यारह प्रतिमाओंका पालन करना,चार प्रकारका दान देना, पानी छान कर पीना, रातमें भोजन नहीं करना तथा सम्यग्द- र्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यकचारित्रको धारण करना। इनको आदि लेकर शास्त्रोंमें १२० रयण- १२१ श्रावकोंकी तिरेपन क्रियाएँ निरूपण की हैं उनका जो पालन करता है वह श्रावक गिना जाता है। भुत्तो अयोगुलोसइयो तत्तो अग्गिसिखोपमो यज्जे। भुंजइ ये दुस्सीला रतपिंडं असंतो॥१५॥ मुक्त अजुक्त जुठानिये, तपशिखा शिखि मानि । जो भुंजइ जु दुशील रत, पिंड असंजत जान ॥१५॥ अर्थ-जिसप्रकार जलती हुई अग्निशिखामें जो डालो सो भस्म हो जाता उसीप्रकार जो योग्य अयोग्य सबका भक्षण कर जाते हैं तथा जो शील रहित (मूल- गुण उत्तरगुणोंको न पालनेवाले ) रातमें भी भक्षण करते हैं उनको असंयमी सम- झना चाहिये। भावार्थ-जिनके भक्ष्य अभक्ष्यका कुछ विचार नहीं है तथा जो रातमें भी भोजन करते हैं वे सब असंयमी समझने चाहिये। णाणण झाणसिज्झी झाणादो सव्वकम्मणिज्जरणं । णिज्जरणफलं मोक्खं गाणब्भासं तदो. कुज्जा॥१५५॥ १२१ सार १२२ ज्ञान ध्यान सिधि भ्यानते, कर्म निर्जरा सर्व । निजर फलतें मोक्ष है, ज्ञानाभ्यास सुइ कर्व ॥ १५५ ॥ अर्थ--आत्मज्ञानसे ध्यानकी सिद्धि होती है, ध्यानसे समस्त कर्मोंकी निर्जरा होती है तथा समस्त कर्मोंकी निजरा होजानेसे मोक्षकी माप्ति होती है। इसलिये भव्य जीवोंको मोक्ष प्राप्त करनेके लिये सबसे पहले ज्ञानका अभ्यास करना चाहिये । कुसलस्स तवो णिवुणस्स संजमो समपरस्स वेरग्गो। सुदंभावणेण तत्तिय तम्हा सुदभावणं कुणह ॥ १५६ ।। तप आचरण प्रवीन, संजमसम वैराग्य पर। श्रुतभावन मइ तीन, ताते करि श्रुतभावना ॥१५६॥ अर्थ--जो मुनि आत्माके स्वरूप जानने में कुशल है और तपश्चरण करने में निपुण है उसके संयम पालन अच्छी तरहसे होता है तथा जिसके संयमका पालन अच्छी तरहसे होता है उसके वैराग्यकी वृद्धि होती है और जो अवज्ञानकी भावना करता है श्रुतज्ञानका अभ्यास करता है उसके तपश्चरण, संयम और वैराग्य तीनोंकी ही प्राप्ति हो जाती है । इसलिये तपश्चरण, संयम और वैयग्यकी प्राप्ति करनेके लिये सबसे पहले श्रुतज्ञानका अभ्यास करना चाहिये । THA १२२ सार रयण- १२३ ER भावार्थ-श्रुतज्ञान वा भगवान अरहंतदेव प्रणीत शास्त्रोंका अभ्यास करनेसे आल्पज्ञानकी प्राप्ति होती है । आत्माके ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेसे वैराग्य संयम और तपश्चरणकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहती है । इस प्रकार इन सबका मूलकारण शास्रोंका अभ्यास है । इसलिये भव्यजीवोंको सबसे पहले शास्त्रोंका अभ्यास करना चाहिये। कालमणतं जीवो मिच्छसरूवेण पंचसंसारे। हिंडदि ण लई सम्म संसारम्भमणपारंभो ॥ १५७॥ काल अनंतह जीव यह, मृषा पंचसंसार । हिंडे समकित ना लहे, भवभव भ्रमण प्रकार ॥ १५७॥ अर्थ-अनादिकालसे संसारमें परिभ्रमण करनेवाला यह जीव मिथ्यात्वंकर्मके उदयसे द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव, भावरूप पंच परावर्तनमय संसारमें परिभ्रमण करता आया है। इस अनंतकालमें भी इस जीवको अबतक सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं हुई। भावार्थ- सम्यग्दर्शनके प्राप्त होनेसे फिर यह जीव पंच परावर्तनरूप संसारमें परिभ्रमण नहीं करता; परंतु यह जीव बरावर संसारमें परिभ्रमण कर रहा है। इससे सिद्ध होता है कि इसको अभी तक सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं हुई। इसलिये भव्य जीवोंको सबसे पहले सम्यग्दर्शन धारण करनेका प्रयत्न करना चाहिये । १२३ सार रया- १२४ सम्मइसणसुद्धं जावदु लभते हि ताव सुही। सम्मइसणसुद्धं जावण लभते हि ताव दुही ॥१५८॥ सम्यग्दर्शन शुद्ध, जान लाभ तावत सुखी । नहिं समदर्शन शुद्ध, महा दुखी तावत करो ॥ १५८ ।। अर्थ-इस जीवको जब शुद्ध सम्यग्दर्शन प्राप्त हो जाता है तभीसे यह.जीव सुखी परम सुखी हो जाता है तथा जबतक इस जीवको सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति नहीं होती तवतक यह जीप महा दुखी रहता है। अभिप्राय यह है कि सम्यग्दर्शन ही समस्त सुखोंका कारण है तथा सम्यग्दर्शनका न होना वा मिथ्यात्वका होना समस्त दुःखोंका मूल है। वचणेण दु सव्वं दुक्खेव सम्मत्तविणा। सम्मत्तेण विजुत्तं सव्वं सोक्खव जाण खु॥१५९॥ वहुत वचन करिके कहा, विन समकित सब दुक्ख । जो समकित संजुगत तो, जानि येह सब सुक्ख ॥ १५९ ॥ अर्थ-आचार्य कहते हैं कि वचनोंके द्वारा बहुत कहनेसे क्या लाभ है। बस किं बहुणा १२४ ..
रयण- • . १२५ इतना ही समझ लेना चाहिये कि बिना सम्यग्दर्शनके इस - संसारमें चारों ओर सब दुःख ही दुःख हैं तथा यदि सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति हो जाय तो..फिर सर्वत्र सुख ही सुख हैं। भावार्थ-सम्यग्दर्शन ही सुख है क्योंकि अनंत सुखका कारण है और मिथ्यात्व ही दुःख है क्योंकि अनंत कालतक होने वाले तीव्र दुःखोंका कारण है। णिक्खेवणयप्पमाणं सद्दालंकार छैदलहि पुणं । नाटयपुराणकम्मं सम्मविणा दीहसंसारं ॥ १६०॥ नय प्रमाण निक्षेप छंद लहि शब्दालंकार । नाटक पुराण कर्म समकित विन बहु संसार ॥१६॥ अर्थ- यदि कोई जीव प्रमाण नय निक्षेपका स्वरूप अच्छी तरह जानता हो, छंद, शब्दालंकार, अर्थालंकार, नाटक, पुराण अच्छी तरह जानता हो. तथा अन्य कितने ही कार्योंमें निपुण हो तथापि विना सम्यग्दर्शनके उसे दीर्घसंसारी ही सम-: झना चाहिये। भावार्थ-कोई चाहे जैसा विद्वान् क्यों न हो तथापि चिना सम्यग्दर्शनके उसे १२५ अण- १२६ अनैतकाल तक बरावर संसारमें परिभ्रमण करना पड़ता है । संसारसे पार कर देने वाला एक सम्यग्दर्शन ही है । सम्यग्दर्शनके सिवाय अन्य किसीसे भी मोक्षसुखकी प्राप्ति नहीं हो सकती। वसहीपडिमोवयरणे गणगच्छे समयसंघजाइकुले। सिस्सपडिसिस्सछत्ते सुयजाते कप्पडे पुच्छे ॥१६॥ पिच्छे संत्थरणे इच्छासु लोहेण कुणइ ममयारं । यावच्च अदृरुदं ताव ण मुंचेदि ण हु सोक्ख ॥ १६२॥ वसत पडिम उपकरण गुण, गच्छसमय संघ जाति। कुल शिष प्रतिशिष छात्र सुत, जात सुपट पुथाति ॥ १६१॥ पिछि साथरउ त्यागसुख, लोम करइ ममकार । तावत आरत रुद्र सुख नहिं, मुंचत अनगार ॥ १६२ ।। अर्थ-वसतिका, प्रतिमोपकारण, गण, गच्छ, समय, जाति, कुल, शिष्य, प्रतिशिष्य, विद्यार्थी, पुत्र, पौत्र, कपड़े पुस्तक, पीछी, संस्तर (विछोना) इच्छा आदिमें लोभसे जो साधु ममत्व करता है तथा ममत्व करनेके कारण जवतक आर्तध्यान और रौद्र- १२६ १२७ ध्यान करता है तब तक क्या वह मोक्षके सुखसे वंचित नहीं रहता? नहीं नहीं, वह अवश्य बंचित रहता है। भावार्थ--जो मुनि किसीसे भी ममत्व करता है वह मोक्षके सुखसे अवश्य वैचित रहता है उसे मोक्षका सुख कभी प्राप्त नहीं हो सकता। रयणत्तयमेव गणं गच्छं गमणस्त मोक्खमग्गस्त। संघोगुणसंघाओ समयो खलु णिम्मलो अप्पा ॥१६॥ रतनत्रय ही गण जु गच्छ, गमन करन शिवपंथ । संघ समूह जु गुणसमय, निर्मल आतम ग्रंथ॥१६३ ।। अर्थ--मोक्ष मार्गमें गमन करने वाले साधुका रत्नत्रय ही गण और गच्छ है तथा गुणोंका समूह ही संघ है और निर्मल आत्मा ही समय है। भावार्थ-साधुओं को रत्नत्रयसे, उत्तम क्षमा आदि गुणोंसे और निर्मल आत्मासे प्रेम करना चाहिये । इनमें सर्वथा लीन हो जाना चाहिये। यही साधु का गण है यही संघ है और यही समय है इन्हीं में लीन होनेसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। १२७ रयण- १२८ जिणलिंग धरो जोई विरायसम्मत्तसंजुदो णाणी। परमोवेक्खाइरियो सिवगइपहणायगो होई ॥१६४॥ "जिन लिंगी जोगी जुगत, सम्यकज्ञान विराग । परम विरागी मोक्षगति, पथनायक होइ जाग ॥ १६४ ॥ अर्थ-जिस मुनिने जिनलिंग धारण किया है, नग्न दिगम्बर , अवस्था धारण की है, जो आत्मज्ञानसे परिपूर्ण है, परम वैराग्य को धारण करता है, जिसका सम्य- ग्दर्शन अत्यंत शुद्ध है और जो रागद्वेपसे सर्वथा रहित है, उत्कृष्ट उपेक्षाभाव व वीतरागभावको धारण करता है ऐसा मुनि मोक्षका स्वामी अवश्य होता है। भावार्थ-सम्यग्दर्शनकी अत्यंत शुद्धता, दिगम्बर अवस्था और परमं वैराग्य ये सब मोक्षप्राप्तिके साक्षात कारण हैं। सम्म णाणं वेरग्गतवोभावं णिरीहवित्तिचारि। गुणसीलसहावं उप्पजह रयणसारमिणं ॥ १६५॥ समकितं ज्ञान विराग तप, भाव अच्छक वृत्ति । शील सुभाव चरित्रगुण, रयणसार यह दित्ति॥ १६५॥ . १४ ..
रयण १२६ अर्थ-जिसमें रत्नत्रयका वर्णन किया गया है ऐसा यह रत्नसार वा रयणंसार नामका ग्रंथ सम्यग्दर्शनको प्राप्त कराता है, सम्यग्ज्ञानको प्राप्त कराता है, वैराग्य उत्पन्न करता है, तपश्चरणकी वृद्धि करता है, सब तरहकी इच्छाओंसे रहित ऐसे वीतराग चारित्रको बढ़ाता है, उत्तम क्षमा आदि गुणोंकी वृद्धि करता है, उत्तर गुणोंकी और भावनाओं की वृद्धि करता है और आत्माके स्वभावकी वृद्धि करता है। भावार्थ-इस रयणसार ग्रंथके पढ़नेसे मनन करनेसे और इसके अनुकूल अपनी पूर्ण प्रवृति करनेसे, मोक्षके समस्त साधनोंकी प्राप्ति हो जाती है । तथा उन साधनोंके माप्त होनेसे शीघ्र ही मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है। गंथमिणं जो ण दिइ. ण हु मण्णइ ण हु सुणेइ ण हु पढई। ण हु चिंतइ-ण हु भावइ सो चैव हवेइ कुहिट्ठी ॥ १६६ ॥ यहे ग्रंथ जो नहि दिखइ नहि माने न सुणेइ । चिंतइ भावइ पढ़इ नहि होइ कुनिट्टी जेइ ॥ १६६ ॥ अर्थ-जो मनुष्य इस ग्रंथको न देखता है न मानता है, न सुनता है न पढता है न चितवन करता है और न इसकी भावना करता है उसको मिथ्यादृष्टि समझना चाहिये।
इदि सज्जणपुज्जं रयणसारं गंथं णिरालसो णिच्चं । जो पढइ सुणइ भावइ पावइ सो सासयं ठाणं॥१६७ ॥ रयणसार यह मह सजन ग्रंथ निरालस नित्ति । पढह सुनइ जो वर्णये भावइ लहइ निर्वृत्ति। ॥ १६७ ॥ अर्थ-यह रयणसार नामका ग्रंथ बड़े बड़े सज्जनोंके द्वारा पूज्य है ऐसे इस ग्रंथको जो पुरुप आलस छोड़कर प्रतिदिन पढता है सुनता है, और इसकी भावना करता है इसके अनुकूल अपनी प्रवृत्ति करता है वह अविनार मोक्ष . स्थानको अवश्य प्राप्त होता है। Rahe kahashikant रयणसार समाप्त LYRIYA
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