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Hum Chaker Raghunath Ke

Mitra Vimal · 2011/03

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हम चाकर रघुनाथ के

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हम चाकर रघुनाथ के विमल मित्र

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सुप्रसिद्ध देशसेवक, साहित्यसेवी, शिक्षाविद् और हिन्दी के सशक्त प्रहरी श्री सुधाकर पाण्डेय (मंसद सदस्य) को सादर समर्पित-

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O0 1 बचपन में मादमी जो सपने देखता है, बड़े होने पर क्या वे सब हमेशा पूरे होते ही हैं ? एक क्लास में एक साथ कितने ही सड़के पढ़ते हैं । कितने ही लड़के फस्टं पाते हैं और कितने ही फेल होकर एक ही क्लास में पड़े रह जाते हैं ! उसके बाद मादमियों की भीड़ में एक दिन कौन कहां खो जाता है, उसका फिर प्रता-पता भी नहीं मिल पाता। जिन्दगी-मर हो सकता है कि उन घनिष्ठ मित्रों के साथ फिर कभी मेंट-मुलाकात ही न हो ! हम लोगों के साथ पढ़ा करता था राजू । राजू के ऊपर मुझे बड़ी दया प्राती । सिर्फ मुझे ही नहीं, पलास के सभी लड़कों को राजू के प्रति बड़ी दया पाती। विधवा मा का इकलौता बेटा या राजू । मोर फिर राजू या भी एक ऐसा लड़का, जो कि अपनी मां को पागलपन की हद तक प्यार करता था। हम लोग वहया फुटबॉल खेलने के बाद गप्पें लड़ाने के लिए बैठ जाते । गप्पें लड़ाते-लडाते कभी रात के सात बजते तो कभी पाठ। उसके वाद पर पाने पर हम लोग मा-बाबू जी की डाट खाते। दरअसल हम लोगों का लीडर था नन्दू । नन्दु हम लोगों को कभी चिनियावादाम सिलाता तो कभी घुधनी। .

कभी-कभी आलूचाप और बैंगनी भी। इसीलिए नन्दू को हम लोगों ने
अपना लीडर मान लिया था। नन्दू जो कुछ भी कहता, हम लोग उसकी
बातों पर अमल करते।
नन्टू फुटबॉल के खेल में सेण्टर-फार्वर्ड से खेला करता। उसका खेल
देखने लायक होता था। उसके पैर के पास अगर फुटबॉल आ गया तो फिर
चाहे जैसे भी हो, वह गोल होगा ही।
और राजू
?
वह था गोलकीपर। उसमें दौड़ने की हिम्मत ही नहीं थी। एक जगह
खड़े रहने पर भी वह मानो बुरी तरह थक जाता। एक वार वचपन में
उसे टायफायड हुआ था, उसके बाद से ही वह बड़ा कमजोर हो गया था।
बाजार की बनी हुई कोई भी चीज़ वह अपने मुंह में नहीं रखता था।
हम लोग जब फुटवॉल के खेल के खत्म होने पर मैदान में गोल घेरा
बनाकर बैठते तो बहुधा हम राजू को भी बुलाया
करते
मैं कहता, "राजू, प्राग्रो न ! आज नन्दू हम लोगों को घुघनी और
पुचके खिलाएगा।"
राजू झट-पट घर लौट जाता।
कहता, "नहीं भाई, इन सब चीज़ों को खाने के लिए डाक्टर ने मना
कर रखा है।"
नन्दू कहता, "अरे, डाक्टर लोग तो वैसे ही वोला करते हैं। उनके
कहने से कोई घुधनी खाना छोड़ देगा क्या ?"
राजू कहता, "वे सब चीजें खराव तेल से बनी हुई होती हैं। उन
चीजों को खाने से मैं बीमार हो जाऊंगा।"
हम कहते, "तो फिर सिर्फ वैठे-बैठे हम लोगों के साथ बातचीत करो।
इतनी जल्दी घर लौटकर आखिर करोगे क्या?"
राजू कहता, "नहीं भाई."। मां नाराज़ होगी।"
8/हम चाकर रघुनाथ
के

हम कहते, "तू अपनी मां से इतना डरता है ?" राजू कहता, "मां के सिवाय तो मेरा और कोई भी नहीं है। उसकी चात तो मुझे माननी ही होगी।" हम सब ठहाका लगाते । कहते, "तू क्या विलकुल छोटा-सा मुन्ना है कि मां के डर से मह हा जमाना विलकुल बन्द कर देगा?" राजू कहता, "तुम लोग मेरी मा को नहीं जानते। घर से बाहर अधिक देर तक रहने पर मां बहुत चिन्ता करने लगती है। मेरी मा ने कहा है कि श्यादा अड्डेबाजी करना ठीक नहीं। मड्डेबाजी करने से प्रादमी का स्वभाव और चरित्र नष्ट हो जाता है।" हम लोग राजू की बातें सुनकर ठहाका मारकर हंस पड़ते। राजू हम लोगों के हंसी-ठट्टे का बुरा नहीं मानता। वह ज्याही मैदान से घर की तरफ पांव बढ़ाता, त्योही नन्दू दौड़कर उसकी धोती की लाग खोल देता। हम लोग राजू की हालत देखकर हंसी के मारे लोट-पोट हो जाते। हम लोग देखते कि इस तरह वेइज्जती होने पर राजू रोने लगता । उमकी अांखो से टप-टप प्रासुमों की वूदें टपकने लगती। लेकिन राजू की इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह किसी को कोई कड़ी बात कह पाता। लज्जा, अपमान और प्राघात पाने पर भी वह न तो विद्रोह करता और न ही दूसरे लड़कों की तरह झगडता । माथा झुकाए वह अपनी पोती को लांग ठीक करता और फिर अपने घर की तरफ बढ जाता। पढने मे राजू कच्चा नही था। जो भी होम-टास्क मिलता, उसे वह नियमपूर्वक घर से पूरा करके लाता। हम लोग, जो कि हमेशा पाकी दिया करते थे, उससे पूछने, "इतने सारे हिसाब तूने बनाए कैसे ?" राजू जवाव देता, "रात-भर जाग-जाग कर। कल मैं सारी रात हम चाकर रघुनाथ के/9

,
हिसाव बनाता रहा !
!"
"तुझे तकलीफ नहीं हुई ?"
राजू कहता, "नहीं तो। तकलीफ क्यों होती ?"
हम लोग कहते, "हमारी तो शाम होते ही पलकें झपकने लगती हैं।"
राजू कहता, "मेरी मां ने कहा है कि जो मन लगाकर पढ़ता है, बड़ा
होने पर वह बहुत तरक्की करता है। उसने यह भी कहा है कि मास्टर
साहब को वात हमेशा मानना। मास्टर साहब गुरुजन होते हैं । गुरुजनों
की बात माननी चाहिए। ऐसा करने पर भगवान भी उसपर कृपा
करता है।"
नन्दू कहता, "दुर्", भगवान कभी भी गरीब लोगों पर नज़र नहीं
रखता । वह तो कृपा करता है सिर्फ बड़े लोगों पर।"
राजू कहता, "नहीं, कभी नहीं। मां ने कहा है कि भगवान सब को
एक ही नजर से देखता है।"
नन्दू वोलता, "तेरी मां कुछ भी नहीं जानती।"
राजू कहता, "मेरी मां कुछ नहीं जानती और तुम्हीं लोग सब कुछ
जानते हो न? मेरी मां रामायण पढ़ती है, महाभारत पढ़ती है। मेरी
मां ही तो मुझे बंगला पढ़ाती है।"
"लेकिन गणित?"
राजू कहता, "गणित मैं अपने पड़ोस के राजेन मामा के पास सीख
पाता हूं।"
"राजेन मामा तेरे क्या लगते हैं ?"
.
राजू के राजेन मामा एक वृद्ध सज्जन थे। राजू के घर के पास ही उनका
मकान था । उनका पूरा नाम था राजेन्द्रनाथ सरकार। पेशे से वकील
थे वह।
10/हम चाकर रघुनाथ के

राजू की मां ने एक दिन जाकर उन्हें पकड़ा। राजू भी साथ ही था। गजेन वायू ने राजू की मा को देखकर पूछा, "क्यो राजू की मां. कहो, क्या हाल चाल है ?" राजू की मां ने कहा, "भैया, मैं अपने लड़के के बारे में बात करने के लिए प्राई हूं।" "बोलो, क्या बात है ?" राजू की मां ने कहा, "क्या भाप मेहरबानी करके मेरे लड़केको थोड़ा गणित सिखा देंगे? उसके लिए मैं मापको रुपये तो नहीं दे पाऊंगी, पर मापके लिए मेहनत-मजूरी जरूर कर दूंगी।" "मेहनत-मजूरी कर दोगी, इसका क्या मतलब ?" राजू की मा बोली, "जरूरत होने पर मुही तैयार कर दूगी, कपड़े धो दिया करूंगी भोर यदि आप कहेंगे तो धर्तन भी माज दूगी। भाप जो-जो काम बताएंगे, वे सभी काम कर दूंगी।" राजेन बाबू को मवस्या सराव नही थी। न ही उनके घर पर काम करने वाले प्रादमियों की कमी थी। उन्होंने कहा, "नहीं-नही, तुम्हे वे सब काम नहीं करने पड़ेंगे। मैं तुम्हारे लड़के को गणित पढा दिया करूंगा। मैं उसे अंग्रेजी भी सिखा दिया करूंगा।" उसके बाद राजू की तरफ देखते हुए उन्होंने कहा, "तुम बीच-बीच मे मा जाया करो, समझेन ? शर्म-संकोच की कोई बात नहीं है। अपने 'लरको को भी तो मैंने ही कभी पढाया था।" राजू की माने राजेन वावू के पर छुए पौर कहा, "भइया, मेरा मोर कोई भी नहीं है । इसे अकेला छोड़कर वे तो चले गए । एक बार भी उन्होंने मोघा तक नहीं कि मैं इसे किस तरह बडा करूगी। पाखिर दो भादमियो का पेट कैसे भरेगा! इतने दिनो तक दूसरो के घर पर काम- हम पाकर रघनाथ . काज करके मैंने दिन गुज़ारे हैं । अव यह ऊंची क्लास में चला गया है । इस समय अगर एक मास्टर रख पाती, तो अच्छा होता। लेकिन जो कुछ मैं कमा पाती हूं, उससे किस तरह मैं दो प्राणियों का पेट भरूं और भला मास्टर ही किस तरह रखू ?" राजेन वावू ने कहा, "तुम्हारे जेठ जी तो हैं । वे लोग तुम लोगों की देखभाल क्यों नहीं करते ?" राजू की मां बोली, "उनकी वात छोड़ दीजिए, भइया। वे सव देखभाल तो क्या करेंगे, बल्कि उल्टा काम करते हैं । मेरे राजू को तो छात्रवृत्ति भी मिलती है और वह परीक्षा में अच्छी तरह पास हो जाता है । लेकिन मेरे जेठ जी का लड़का हमेशा फेल होता है। इसीलिए वे हमसे इतना जलते हैं। और फिर भइया, वे जो कुछ छोड़ गए हैं, वही यदि हमें ठीक से मिलता तो फिर चिन्ता-फिक्र की वात ही क्या थी ?" वात विलकुल सच थी। राजू के ताऊ जी थे। राजू के पिताजी के मरने के पहले घर में दोनों परिवारों का खाना एक ही चूल्हे पर बनता था। उस समय उनका परिवार संयुक्त परिवार था। लेकिन जैसे ही राजू के पिताजी की मौत हुई, सब-कुछ उलट-पलट हो गया । राजू के ताऊजी ने पाकर राजू की मां से कहा, "वहू, जो होना था सो तो हो गया। अव बतायो, तुम क्या करोगी?" राजू की मां ने जवाब दिया, "अब तो आपका ही सहारा है। आप जैसा कहेंगे, वैसा ही होगा।" राजू के ताऊ जी बोले, "मैं कह रहा था कि हम दोनों भाइयों की जो सम्पत्ति है, उसका बंटवारा हो जाए। झूठ-मूठ दोनों परिवारों के एक साथ रहने से क्या फायदा ?" राजू की मां ने कहा, "पाप जो कुछ ठीक समझे, वही करें। मैं 12 / हम चाकर रघुनाथ के ठहरी एक विधवा औरत । मैं भला क्या जानूं और क्या समझू इन सब वातों को?" राजू उस समय बहुत छोटा था। विधवा मां को ही सारे घर का खाना पकाना पड़ता था। राजू को ताई जी मौका मिलते ही राजू की मां को सरी-वोटी सुनाने लगती। इतनी बेइजती होने पर भी मां के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकलता था। मा की बातें सोच-सोचकर उस छोटी-सी उम्र में भी राजू को बेहद तकलीफ होती। राजू रात में अपनी मां के पास ही सोता। राजू कहता, "मा, ताई जो तुम्हे इतनी बातें सुनाती हैं। लेकिन तुम कुछ भी वोलती क्यों नहीं?" राजू की मा जवाब देती, "वे कहती हैं तो कहें। उनकी बातों से मेरे बदन पर फफोले तो पड़ते नहीं। तेरी साई जी हम लोगों के लिए बड़ी है। बड़े लोग अगर कोई कड़वी बात भी कहें, तो उसका बुरा नहीं मानना चाहिए।" राज कहता, "तो क्या इसका मतलब यह है कि वे झूठ-मूठ तुम्हे गालियादेंगी?" मा कहती, "देख, भगवान तो सर्वत्र विद्यमान है । वह सब कुछ देर रहा है। उसके दरबार में अन्याय नहीं होगा। एक न एक दिन न्याय मिलेगा ही । उस दिन के इन्तजार में ही तो मैं जिन्दा हूं।" राडू को अपनी मां की बातों पर बड़ा भरोसा होता। वह पूटता, "अच्छा मा, बतामो तो, क्या सचमुच भगवान सब कुछ देख रहा है ?" मां कहती, "हो रे, भगवान इस दुनिया की सारी चीजें देख रहा राज पूछता, "तो फिर भला मेरे पिताजी की मौत ही क्यों हुई? म चाकर रघुनाथ के/13 आखिर पिताजी का क्या कसूर था ?" मां कहती, "भगवान की लीला को समझ पाना आदमी के बस की बात नहीं है। हो सकता है कि पिछले जन्म में मैंने ही कोई पाप किया हो ! इस जन्म में इसीलिए मुझे इतनी तकलीफ उठानी पड़ रही है। नहीं तो भला तुझे ही इतना कष्ट क्यों उठाना पड़ता?" राज कहता, "क्या मां, मैंने भी पिछले जन्म में कोई पाप किया । 'था?" । राजू की मां कहती, "वे सव वातें छोड़। रात होती जा रही है, सो जानो नहीं तो फिर कोई हमारी वातें सुन लेगा! फिर तो हमें तुम्हारी ताई जी से खूब डांट खानी पड़ेगी।" राजू उस समय सोने की कोशिश करता । लेकिन भला क्या नींद इतनी आसानी से आती है ! उसके बाद भी वह काफी देर तक जागता रहता । उनका घर गली के भीतर था। गाड़ियों का कोई शोरगुल वहां नहीं पहुंचता था। सारा वातावरण शान्त और निस्तब्ध रहता। कभी- कभी खिदिरपुर की तरफ से किसी जहाज़ का भोंपू सुनाई पड़ता । शायद गंगा से कोई जहाज छुटा हो ! या फिर कभी चिडियाखाना की तरफ से किसी बाध के दहाड़ने की आवाज़ पाती। उसके बाद कब वह नींद की दुनिया में खो जाता, इसका उसे कुछ ख्याल भी नहीं रहता। उसके बाद जव सूरज काफी ऊपर चढ़ जाता, तव उसकी नींद टूटती। नींद टूटने पर वह देखता कि मां उसके पास नहीं होती। सुबह से ही मां घर के काम-काज में डूब जाती। पूरे घर के लोगों के जागने के पहले ही मां जाकर चूल्हा सुलगा देती। उसके बाद मां ताई जी के बिछौने के पास जाकर गर्म चाय की प्याली रख पाती । उस समय से ही ताई जी की बक-भक शुरू हो जाती। ताई जी विंगड़ कर कहतीं, "यह चाय लाई हो या चिरायते का 14 | हम चाकर रघुनाथ के पानी ?" मा भट-पट जाकर चाय की प्याली में थोड़ा-मा दूध तया घोड़ी-मी चीनी डाल लाती। ताई जी वह चाय पीते-पीते मुह टेढ़ा कर कहती, "अपनी गाठ के पैसे से तो तुम्हें चीनी सरीदनी नहीं पड़ती । इमीलिए तुम एक मुद्री चीनी डाल कर चली गई। अपने पंमो से अगर तुम्हें चीनी गरीदनी पडती, तब तुम्हें पता चलता।" इमी तरह मा के दिन की शुरुआत होती। उसके बाद उनी तरह को डाट-फटकार रात के दम बजे तक जारी रहती। इसीलिए जब राजू के ताऊ जी ने अलग होने की बात छेडी, तब राज की मा बड़ी फिक्र में पड़ गई। राजू ने पूछा, "मा, अब हम लोगो का खर्च किम तरह चलेगा?" मा ने जवाब दिया, "जो भगवान को मंजूर होगा, वहीं होगा। मैं और कर भी क्या सकती हूं ?" राजू के पिता जी और ताऊ जी दो भाई थे। मकान का प्राधा- प्राधा बटयारा होना उचित था। लेकिन नही, वैसा नहीं हुमा। ताक जी ने कहा, "मैंने इस मकान के लिए बीस हजार रपमै दिये हैं। इस लिए मुझे हिस्से में अधिक मिलना चाहिए।" राजू की मा ने कहा, "मो पाप जैसा ठीक समझते हो, कीजिए में एक विधवा औरत हूं । भला मैं इन सब बातो को क्या समझूगी।" ताऊ जी ने अपने हिस्से में अधिक से अधिक से लिया। राजू की मा को मिली सिर्फ एक कोठरी। वह कोठरी भी ऐमी थी कि जिसमें न रोशनी माती थी और न ही हवा। दिन के समय भी बत्ती जलाकर काम करना पड़ता। राजू के ताऊ जी का लडका विनोद पढ़ने में तेज नही या । उमे - हम चाकर रघुनाथ के /15

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होता है ? राजू का दिमाग तेज है और विनोद का कमजोर या." ताई जी ने कहा, "यदि आप ऐसा कहते हैं तो प्रापको कल से विनोद को पढाने के लिए प्राने की ज़रूरत नहीं। इस वार में दूसरा मास्टर देवूगी।" उसी दिन मकान के बटवारे की बात उठी। ताई जी ने कहा, "काफी दिनों से दूध पिला-पिलाकर घर में साप पाल रही भी । बस, अब और नहीं। मुझे काफी शिक्षा मिल चुकी है।" राजू अपनी मा से कहता, "मां, तुम वहरी हो गई हो क्या? ताई जी हम लोगो को गालिया दे रही है और तुम चुपचाप बैठी हो । कुछ भी जवाब नहीं दे रही हो । तुम अगर कुछ नहीं बोलोगी तो फिर मैं इसका जवाब दूगा..." मां कह उठती, "देश मुन्ने, क्या तू चाहता है कि मैं गले में फांसी लगाकर मर जाऊं ? तो फिर जो तुम्हारे जी मे पाए, वही करो।" राजू कहता, "मां, मैं तुम्हारे पैरों पडता हूं। तुम उन लोगी की बातो का कुछ जवाय दो। नहीं तो में दूगा इसका जवाब...." मा शायद कुछ डर गई। मा ने कहा, "मैं तुझे सावधान कर रही हूं मुन्ने । अगर तू कुछ बोलने गया तो फिर मुझे जिन्दा नहीं देख पाएगा।" राजू ने कहा, "तो फिर मैं क्या करू, यही बता दो मा।मपने लिए मैं कुछ भी नहीं सोचता। लेकिन वे लोग तुम्हें गालिया देंगे तो क्या मुझे यह भी बर्दाश्त करना होगा ?" मा कहती, "वेटे, बचपन से ही सहन करना सीख । जो लोग सह पाते हैं, मासिर तक वे ही डटे रहते हैं।" "लेकिन मैं उन लोगों का क्या नुकसान कर रहा हूं, बतागो तो? 7111

द ने ठीक से पढ़ाई नहीं की और वह फेल हो गया । क्या यह भी
ही कसूर है ? आज मेरी वजह से ही तुम्हारी इतनी दुर्दशा हो रही
"
।
मां उसके वावजूद भी कहती, "वे सब तुझसे बड़े हैं, वे तेरे
है । गुरुजनों की बात सुननी ही पड़ती है। उनकी वातों पर कभी भी
नाराज़ नहीं होना चाहिए।"
00
उसके बाद ही राजू के घर के भीतर एक दीवार खड़ी कर दी गई।
राजू
के हिस्से में आया सिर्फ एक कमरा और विनोद के हिस्से में आया
आंगन और दो बड़े-बड़े कमरे । और वैसे देखा जाए तो
राजू
के पिता
जी और विनोद के पिताजी दोनों सहोदर भाई थे, दोनों को समान
हिस्सा मिलना ही उचित था।
राजू
और उसकी मां-दोनों ही राज-मिस्त्रियों को दीवार खड़ी
करते देखते रहे।
राजू ने कहा, "मां, यह कैसे हुआ ? दीवार हमारी तरफ खिसका-
कर क्यों खड़ी की जा रही है ?"
राजू की मां बोली, "छोड़ भी। "तू इस बात को लेकर उन
लोगों से कुछ भी नहीं कहना । हम दो प्राणी हैं, इतने में ही हमार
निर्वाह हो जाएगा।"
राजू ने कहा, "लेकिन पिताजी का तो इस मकान में आधा हिर
था । वह आधा हिस्सा तो हमें मिलना ही चाहिए। वह तो हमारा
। क्या ताऊजी वह भी हमें नहीं देंगे ?"
है
18 | हम चाकर रघुनाथ के

भी मां ने कहा, "ताऊ जी हम लोगों के गुरुजन है । उनी बात में मौत- मैव निकालना ठीक नहीं। मासिरकार इसी में तुम्हारी भलाई होगी, देख लेना।" ६ममे भला क्या भलाई होगी, यह बात राजू की ममझ में नहीं भाई। वह चुप रहा। दीवार की चिनाई पूरी होने पर उस तरफ कुछ दिखाई नहीं पड़ा। रसोई घर भी ताई जी के हिस्से में माया था। राजू ने अपनी मा मे पूछा, "मा, तुम खाना पहा पकामोगी ?" मां ने कहा. "कमरे के भीतर ही पकाऊगी। कौन सी भारी रसोई करनी है ? दो ही तो हैं खाने वाले। इसके लिए इतनी फिक चपा है ?" "लेकिन चावल-दाल, तेल-नमक और मालू-कुछ भी तो नहीं है हम लोगों के पास।" उम दिन से मा को घर से बाहर निकलना पड़ा। जीवन में कभी भी मां घर के बाहर नहीं निकली थी। विधवा होने के बाद पहली बार मां को घर से बाहर निकलना पड़ा। कहा चावल को दुकान है, यहां दाल को दुकान है और कहा तेल-नमक और पालू मिलता है। यह कुछ भी मा को पता नहीं था। मा के साथ राज भी बाहर निकला। राजू ने अपनी मा से कहा, "मां मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा।" मा ने कहा, "तू मेरे साथ चलकर क्या करेगा? उसके बजाय तो तू घर पर ही रहकर पढ़ाई-लिखाई कर । तू मगर किमी दिन बडा प्रादमी वन पाया, तो उस समय मेरे सारे दुःख-कष्ट मिटेंगे। भगवान के सामने उसी दिन मैं अपना मुह दिखा सकूगी। उस दिन मेरे सारे कष्ट सार्थक होगे।" राजू ने कहा, "नही, एक दिन अगर मैं नही पढूगा, तो कुछ नहीं हम चाकर रघुनाथ के/19 ।

.
-
विगड़ेगा ? मैं तुम्हारे साथ चलूंगा। तुम तो अपनी जिन्दगी में कभी भी
घर से बाहर निकली नहीं।"
मां ने पूछा, "सोना-चांदी की दुकान किधर है ? क्या तू बता सकता
है मुझे ?"
राजू ने पूछा, "सोना-चांदी की दुकान ? वहां जाकर भला तुम क्या
खरीदोगी?"
"खरीदूंगी नहीं, वेचूंगी।"
"क्या वेचोगी?"
मां ने कहा, "अपने सोने के गहने ।"
"सोने के गहने तुम बेच दोगी? नहीं मां, तुम्हें मैं गहने नहीं बेचने
दूंगा । किसी भी
हालत में नहीं..."
मां ने कहा, "गहने नहीं वेचूंगी तो तू खाएगा क्या? रुपये कहां से
आएंगे ? तू क्या नौकरी करके तनख्वाह लाता है कि मैं उससे तेरा पेट
भरूंगी?"
यह बात सुनकर राजू की आंखों से आंसू बहने लगे। राजू ने कहा,
"तो फिर मां, मैं नौकरी करूंगा।"
"कैसी नौकरी करेगा तू ? तुझे नौकरी देगा कौन ? क्या यह तेरी
नौकरी करने की उम्र है ?"
राजू ने कहा,"हां मां, मैं नौकरी करूंगा।"
"कैसी नौकरी करेगा, यह भी तो वता?"
राजू ने जवाब दिया, "क्यों, नौकरी की क्या कमी है ? कलकत्ता में
कितनी ही तरह की नौकरी मिल सकती है। मैं दूसरे लोगों के घर में
नौकर का काम करूंगा। तुम घर लौट चलो मां। मैं तुम्हें गहने नहीं
बेचने दूंगा।"
मां परेशान हो उठी।

देखती रहूंगी,
चलते-चलते उसने कहा, "तू जरा चुप भी तो रह । वैकार फा
गाल बजाना अच्छा नहीं लगता। तू तो पराये घर में नौकर का काम
करेगा और मैं
चुपचाप
यही कहना चाहता है क्या? अगर
इम उम्र मे तुझे दूसरे के घर में नौकर का काम करना पडे तो फिर
भला मेरे जिन्दा रहने का क्या लाभ ?"
राजू अपनी मा के पीछे-पीछे चलता रहा और वार-बार अपनी उमी
रट को दुहराता रहा। प्रापिरकार बाजार के पास प्राते ही एक सोने-
चादी की दुकान दिखाई पड़ी।
मा दुकान के भीतर गई।
दुकानदार मुह नीचा किए कोई गहना गढ़ रहा था।
पर की प्रायाज़ सुनकर उसने सिर उठाया और कहा, "पाइए"
कहिए, क्या चाहती हैं पाप ?"
मां ने कहा, "मेरे पास एक जोड़ी सोने के कर्णफूल है। उसने
में एक मैं बेचना चाहती हूँ।"
"कहां है वह कर्णफूल, जरा दिवाइए तो!
मा ने अपने पाचल की गाठ खोलकर एक कर्णफूल निकाल कर
सामने रख दिया । सुनार ने उसे कसौटी-पत्थर पर रगडकर देगा और
फिर उमे वजन किया। उसके बाद वह बोला, "इसकी कीमत अधिक नहीं
मिल पाएगी। इममे सये मे पाठ माना गोट है।"
मा ने पूछा, "फिर भी माप इसकी क्या कीमत दे सकेंगे?"
दुकानदार ने कहा, "मैं इसके लिए मापको सिर्फ इकतीस रुपये दे
मकता हूं।"
"सिर्फ इकतीस रुपये ? क्या कुछ और ज्यादा नहीं दे सकते?
"दे सकता, अगर इसमे इतनी सोट न होती।"
मा के ये कर्णफूल न जाने कय के ये! गायद गादी के समय के हो।
हम चाफर रघुनाथ के/21

भी नहीं शायद पिताजी ने तैयार करवा कर दिए हों। उस समय एक जोड़ा कर्णफूल की कीमत शायद पन्द्रह रुपये ही पड़ी हो । अब सोने की कीमत बढ़ी है। इसीलिए एक कर्णफूल के बदले में इकतीस रुपये मिल रहे हैं ! मां ने कहा, "तो फिर वही दीजिए। मुझे रुपयों की सख्त जरूरत है। इसीलिए इसे वेचना पड़ रहा है।" मां ने इकतीस रुपये लिए और उन नोटों को अच्छी तरह अांचल में बांध लिया। उसके बाद रास्ते में आकर मां ने राजू से कहा, "चल, भात पकाने के लिए मिट्टी की हांडी खरीदनी होगी।" भात पकाने का वर्तन वगैरह कुछ भी ताई जी ने मां को नहीं दिया था। और देखा जाए तो वर्तनों में भी आधा हिस्सा राजू की मां को मिलना चाहिए था। लेकिन इसके बारे में मां ने ताई जी से कुछ कहा। भगवान के ऊपर भरोसा करके निश्चिन्त होकर मां ने सारी वर्वादी को सिर-माथे पर लिया। "चलो, अब चावल खरीदना होगा।" मां ने मिट्टी की हांडी, चावल और दाल खरीदी। उसके बाद तेल, नमक और आलू । एक-एक कर सारी चीजें वह राजू के हाथ में देती गई। वोझ काफी हो गया था। मां ने पूछा, “इतनी चीजें ले जाने में तुझे कोई तकलीफ तो नहीं हो रही है ?" राजू ने जवाब दिया, "नहीं।" मां ने कहा, "थोड़ी तकलीफ अगर हो रही है तो होने दे। तकलीफ पाना अच्छा है रे मुन्ने । तू जितने कष्ट झेलेगा, भगवान उतनी अधिक तेरे ऊपर दया रखेगा । वह उतना ही अधिक तुझसे स्नेह करेगा। राजू की बनी की वैसी हालत देखकर हम लोगों को भी दया आती। रूखा- 22 / हम चाकर रघुनाथ के मूषा चेहरा, शायद पेट-भर भात भी उमे मिल नहीं पाता था। मेला पंट और मली ही कमीज..!" हम लोग राजू से पूछते, "यह क्या राजू ? तेरी मूरत कैसी हो गई है?" राजू कहता, "ताई जी ने हमे अलग कर दिया है भाई।" हम कहते, "तव तो तुम लोगों पर भारी मुसीबत मा गई है। राजू कहता, "मुसीवतें प्राती हैं तो पाने दो। मां ने कहा है कि मैं जितने कष्ट झेलूगा, भगवान उतनी ही अधिक दया रसेगा मेरे प्रति । भगवान मुझे उतना ही अधिक प्यार करेगा।" "लेकिन इस तरह तुम्हारा गुजारा कैमे होगा?" राजू ने कहा, "मां के कानो में सोने के कर्णफूल थे। मां ने एक फर्णफूल बेच दिया है। मा को इकतीस रुपये मिले हैं उसके बदले में। उन्ही रुपयो गे मां ने हाडी, फड़ाही, चावल, दाल, तेल, नमक, मालू पादि पीजें बरीदी हैं। मालू भात साकर ही प्राज मैं स्कूल पाया हूं।" 'वे ये कितने दिनो तक चलेंगे ? उसके बाद क्या होगा ?" "मां का दूसरा कर्णफूल बचा हुआ है । मां उसे भी वेच देगी।" राजू का भगवान के ऊपर इतना विश्वास देखकर हम मापम में सूब हंमते । राज़ के कार हमे दया माती। वैचारे के पिताजी इतनी कम उम्र में स्वर्ग सिधार गए और उसके बावजूद भी राजू को किसी से भी कोई शिकायत नहीं थी। यह बात हमे वही अद्भुत लगती। नन्दू कहता, "तू भगवान की बातें छोड। तेरी ताई जी ने तो तुम लोगो को इतनी बुरी तरह ठग लिया। फिर भी भला उनकी क्या हानि हुई है, जरा घता तो सही ! क्या तेरी ताई जी का कुछ भी बिगडा है ? वे तो मजे में साती हैं, पीती हैं और घूमती-फिरती हैं।" उसके बाद राजू को चिढ़ाने के लिए वह फिर कहता, "पाज की ही हम चाकर रघुनाथ के /23 तो वात है । मैंने बाज़ार में देखा कि तेरी ताई जी पन्द्रह रुपये किलो की मछली खरीद रही थीं । और एक दिन मैंने उन्हें चौदह रुपये किलो वाला मांस खरीदते देखा था। और तुम ? तेरी मां तुझे .थोड़ी-सी झींगा-मच्छी भी खिला पाती है क्या ?" राजू कहता, "मेरी मां तो गरीव है भाई। वह किस तरह मछली खरीद सकेगी? और फिर मुझे मछलियों का कोई शौक भी नहीं। मैं आलू और दाल के साथ मज़े में भात खा सकता हूं।" नन्दू कहता, "तुम लोग गरीव हो, इसीलिए तुम्हें ऐसे ही चलाना पड़ता है । मछली अगर मिले तो भला छोड़ता कौन है ?" राजू कहता, "मां ने कहा है कि गरीबों का भगवान होता है । जिनकी देख-भाल करने वाला कोई नहीं होता, उनकी देख-भाल खुद भगवान करता है।" नन्दू कहता, "भगवान-भगवान की तू रट तो खूब लगा रहा है और भगवान है भी या नहीं, इसका ही कोई ठिकाना नहीं। और तू उसी भगवान के नाम की माला फेरे जा रहा है । अपने ताऊ-ताई पर तूने मामला-मुकदमा क्यों नहीं किया ? तुम लोगों के मकान का तीन-चौथाई भाग तेरी ताईं जी ने हथिया लिया और तू बुद्ध की तरह सव चुपचाप मान गया।" राजू कहता, "इसमें हमारा क्या नुकसान है भला? हम लोग तो हैं सिर्फ दो प्राणी। मैं और मेरी विधवा मां...। ज्यादा जगह लेकर हम करते भी क्या ?" "इसका मतलब क्या यह है कि तुम अपना सव हक छोड़ दोगे ? इस दुनिया में क्या कोई भी समझदार आदमी इस तरह अपना हक छोड़ता है भला?" राजू फिर भी हार नहीं मानता। वह कहता, "ताई जी ने हमें बाहर 24/हम चाकर रघुनाथ के रास्ते में नहीं सदेडा, यही श्या कम है ? प्रगर ताई जी हमें घर में ही निकाल देती तो भला हम क्या कर लेते? हम लोग तो कोर्ट में जाकर मामला-मुकदमा कर नहीं पाते।" "क्यों, तुम मामला मुकदमा क्यों नहीं कर पाते ?" राजू जवाव देता, "मा कहती है कि सिर के ऊपर भगवान तो है ! और फिर भगवान के कोर्ट मे वहा कोटं भी नहीं है दुनिया में। माय ही भगवान से बढकर और कोई जज भी नहीं है। इमलिए भगवान के कोर्ट में नालिग करना ही काफी है।" नन्दू कहता, "बस, यही सब सोच-मोचकर हाथ पर हाय घरे बैठे रहना । उसके सिवाय तुम करोगे भी क्या ?" इसके बाद फिर राजू वहस नहीं करता। और उसके बाद ही मास्टर साहब क्लास मे मा जाते । राजू नन्दू को चुभती हुई बातो मे छुटकारा पाता। लेकिन जिस दिन परीक्षा-फल मुनाया गया, उस दिन राजू का चेहरा देखकर हम सभी तारजु में पह गए। मैंने पूछा, "क्यों रे, तेरा चेहरा दम तरह मुरझाया हुप्रा क्यों है ? तू तो फस्ट पाया है रे तूने तो गढ जीन लिया है राजू । फिर भी तेरे होंठों पर हसी क्यों नहीं है रे?" राजू अपने घर की तरफ पांव बढाने लगा। उसने कहा, "भाई, मुझे माज घर जाने मे यहा डर लग रहा है।" "क्यों?" राजू ने कहा, "माज ताईजी चीख-चीख कर पासमान मिर पर उठा लेंगी। पाज ये मेरी मा को मुना-मुनाकर खूब गालियां देंगी। हमने पूछा, "तुम्हारी मा को वे गालियां क्यो देंगी?" राजू ने कहा, "बी-सेक्शन में मेरे ताऊ जी का लहका विनोद तीन हम चाकर रघुनाप के 125 ?" विषयों में फेल हुआ है। उसे प्रोमोशन नहीं मिला है। अब क्या होगा ?" "अगर विनोद फेल हुआ है तो इसमें तुम्हारा क्या कसूर ?" राजू कहता, "क्या मालूम यह कहकर वह अपने घर की तरफ बढ़ गया। किन्तु उसे जिस वात का डर था, वही वात हुई। वाहर रास्ते में काफी देर तक चक्कर काटने के बाद जब वह घर पहुंचा, तो उसने देखा कि घर पर कुछ गोलमाल हो रहा था। बाहर से ही उसे ताई जी के चीखने-चिल्लाने की आवाज़ सुनाई पड़ी। ताई जी अपने घर के आंगन में खड़ी-खड़ी चिल्ला रही थीं, "जितने भी मास्टर हैं, सब के सब मुए अंधे हो गए कि मेरे लड़के को फेल कर दिया है । मैं एक-एक से बदला लेकर रहूंगी।" ताऊ जी कह रहे थे, "तुम झूठ-मूठ मास्टरों के मत्ये दोप क्यों मढ़ रही हो ? उनका क्या कसूर है ? इस तरह से चीखने-चिल्लाने से क्या कोई फायदा होने वाला है ?" ताई जी बोली, "हां-हां चिल्लाऊंगी, जरूर चिल्लाऊंगी। मैं किसी का खानी हूं कि पहनती हूं? आप कैसे मर्द हैं जी? आप मास्टर साहब के पास जाकर क्या कुछ कह नहीं सकते ? घर के भीतर मेरे ऊपर तो आप खूब रोव झाड़ते हैं. उनके पास जाकर नहीं कह सकते कि आपका भतीजा राजू नकल करके पास हुअा है।" ताऊ जी ने पूछा, "राजू नकल मारकर पाम हुआ है, यह तुमसे किसने कह दिया ? वह तो, मुना है कि फर्स्ट पाया है।" नाई जी ने कहा, "तो नकल करके फर्स्ट पोजीशन नहीं लाई जा सकती है क्या? उसके मामले में तो कोई कुछ भी नहीं कहना । जितना भी गुम्मा है, मब हमारे विनोद पर ! भला हमारे विनोद ने उन मुए मान्टगे का क्या बिगाडा है कि वे उममे इतना जलते है ?" . 26 / हम चाकर रघुनाथ के पास ही शायद विनोद खड़ा-खड़ा सिसककर रो रहा था। ताई जी ने विनोद की तरफ देखकर कहा, "श्यों रे, रो क्यों रहा है ? क्या तू भी राजू की तरह कितावें देख-देखकर परीक्षा में नकल नहीं कर सकता था ? तुम्हारे दिमाग मे थोडी-सी भी वुद्धि नहीं है क्या ?" ताऊ जी ने कहा, "क्या कह रही हो तुम? क्या राज कभी किताबें देखकर परीक्षा में नकल करेगा?" ताई जो ताऊ जी पर बरस पड़ी। वेचारे ताऊ जी चुप हो गए। ताई जी ने कहा, "माप रकिए भी। पाप वादा कीजिए कि आप कल ही स्कूल जाकर इस मामले को निबटाएंगे । तभी मैं चुप हो मकूगी।" "मैं स्कूल जाकर इसका क्या समाधान करूगा ?" ताई जी ने कहा, "समाधान भला और क्या करना है ! आप जाकर मास्टर माहब से कहिएगा कि यह राजू की तरह नकल नहीं कर पाया, इमीलिए फेल हो गया है । विनोद को किसी भी तरह पास करना ही - होगा।" ताऊ जी बोले, "यह सब में कैसे कह सकूगा, बताओ तो? तुम ठहरी औरत को जात, घर के भीतर ही रहती हो । अाखिर तुम इस मामले में इतना चीस क्यों रही हो? ये सब बातें कहने पर स्कूल के मास्टर क्या सोचेंगे, बोलो तो एक बार फेल होने पर क्या कोई उसे पास कर सकता है ?" ताई जी ने कहा, "हा-हा, जरूर कर सकता है। आपके सिवान और सभी लोग कोशिश-परवी करके कोई भी काम कर सकते हैं। मारको कोमिग-परवी करने में अगर इतनी शर्म आती है तो फिर आप मद से ही क्यों हैं, बताइए तो ? फिर तो माप औरत होकर घूघट निमा रसोईघर में रसोई ही क्यो नही करते ! फिर में ही पर निकलूगी।" - हम पाकर रघुनाय के 127 ताऊ जी को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा, "ठीक है, तुम्हीं घर से बाहर निकलो । तुम्ही रोज़ बाजार से सौदा ले आया करो और तुम्ही कचहरी में जाकर मोहरगिरी करके रुपये भी कमाकर लाया करो। चलो, मेरी तो जान बचे। मैं रोज घर पर खाना पका दिया करूंगा। वस छुट्टी...। मुझे तो फिर पाराम ही आराम है।" ताई जी ने कहा, "देखिए, दिल्लगी करने की ज़रूरत नहीं। और तो आपकी कोई मुराद नहीं है, बस ठट्ठा करना सीखा है आपने। लड़का फेल हो गया है, इस बात का आपको थोड़ा-सा भी अफसोस नहीं। कैसे बाप हैं आप ? मेरी किस्मत फूट गई थी, इसीलिए तो मैं आप-जैसे आदमी के 'पल्ले पड़ी हूं।" राजू और खड़ा नहीं रह सका । दरवाजे पर उसने धीरे-से दस्तक दी और पुकारा, "मां, यो मां..." एक बार पुकारते ही मां ने दरवाजा खोल दिया। मां शायद अपने वेटे का इन्तज़ार ही कर रही थी। मां ने दबी जुबान में पूछा, "क्यों रे, स्कूल से लौटने में इतनी देर क्यों हो गई मुन्ने ? मैं तो मारे फिक्र के मरी जा रही थी।" राजू ने इस बात का जवाब दिए विना कहा, "मां, चिल्लायो नहीं। विनोद फेल हो गया है।" "और तू ?" "वताता हूं...। ज़रा धीमे बात करो। मैं फर्स्ट आया हूं। मैंने सबसे ज्यादा नम्बर पाए हैं।" मां कांप उठी। उसने कहा, "वेटे, तूने यह क्या सर्वनाश कर दिया ! 'अब क्या होगा?" राजू ने कहा, "मैं क्या करता मां ? क्या मैं जान-बूझ कर फर्स्ट आया हूं? अगर मास्टर साहब ने मुझे फर्स्ट कर दिया है तो मैं कर भी । । 28/हम चाकर रघुनाथ के क्या सकता हूं?" "तो क्या तू मास्टर साहब से यह-सुनकर विनोद को पास नहीं करया मकता?" राजू ने कहा, "मैं विनोद को कैसे पाम करवा सकता हूं, बोलो तो? क्या मेरे कहने पर कोई उसे पास कर देगा? क्या मुझमे इतनी क्षमता है?" मा ने कहा, "तोतू परीक्षा में अपने परचे जरा सराब भी तो कर मकता था ! तो फिर मुझे इतनी गालियां तो नही सुननी पडती । अब देश तो, कैमा सत्यानाश हुग्रा है। मैं अब क्या कर, बता तो?" राजू ने कहा, "भला मैने ही ऐसा कौन-सा अन्याय कर दिया है मां, बताग्रो तो?" पोष, दुःख पोर अपमान से मां एकबारगी रो पड़ी। उसने कहा, "तो तू फेल नहीं हो सकता था क्या ? कम से कम में मुह दिखाने लायक तो रहती । अब क्या होगा, बता तो? यह गाली-गलौज तो एक दिन में यन्द होगी नहीं।" मचमुच उन गालियों का दौर एक दिन में रुका नही । दीवार के उन पार मे गालियो की बौछार जारी रही और दीवार के इस पार कोई कान बन्द करके तो बैठा नहीं रह सकता। राजू ने कहा, "मा, तुम क्या उनकी गालियो का जवाब नहीं दे सकती?" मा ने कहा, "ऐसी बातें नहीं करते बेटे। वे हमारे गुरुजन हैं। क्या पही गुरजनों की बातों का जवाब दिया जाता है ?" "लेकिन हम लोग मौर कब तक सहते रहेंगे? हम लोगों ने तो उन के प्रति कोई अन्याय नहीं किया है।" मां बोली, "इसका जवाय भगवान देगा। भगवान तो सिर के ऊपर हम पाकर रघुनाय के 129 है ही। वह तो सब कुछ देख रहा है। वहीं एक दिन इसका जवाब देगा।" राजू ने पूछा, "मां, तुम्हारा भगवान सचमुच है भी क्या? अगर भगवान होता, तो क्या वह इन सब झमेलों का अब तक कोई अन्त नहीं करता?" . मां ने कहा, "हम लोगों के नियम के साथ भगवान के नियम का कोई मेल नहीं है रे। भगवान के कानून-कायदे कुछ अलग ही हैं । चित्र- गुप्त की वही में सारा हिसाव लिखा जा रहा है। वहां भूल-चूक होने की कोई गुंजाइश है ही नहीं।" राजू ने पूछा, "अगर यह वात है तो फिर मेरे पिताजी की मौत क्यों हुई ? आखिर पिताजी का कसूर क्या था? तुम्हारे चित्रगुप्त की वही में अगर भूल-चूक नहीं होती, तो फिर हमें क्यों इतनी गालियां और वेइज्जती सहनी पड़ रही हैं ?" मां ने कहा, "वेटे तर्क नहीं किया करते । भगवान के बारे में तर्क करना ठीक नहीं । तुम्हें तो मैं वार-बार समझाती हूं कि भगवान पर कभी भी अविश्वास नहीं करना चाहिए। राजू ने कहा, "यह बात तो मैंने समझ ली। लेकिन इस समय अगर ताईजी हमें इस घर से भी निकाल दें, तब क्या होगा ? तब क्या तुम्हारा भगवान हमारी खोज-खबर लेगा ?" मां को इतनी बातें करने की फुर्सत नहीं थी । एक ही तो कमरा था। उसी कमरे के एक कोने में रसोई की व्यवस्था की गई थी। मां कोयले का चूल्हा सुलगा रही थी। तभी उस पार से ताई जी की आवाज़ सुनाई पड़ी, "अजी, सुनते हैं ? कोयले के धुएं से समूचे घर में अंधेरा हो गया। अजी, सुनते हैं ? कहां गए पाप ?" ताऊ जी उस समय कहीं पास ही थे। ताई जी ने कहा, "याप कान से तो बहरे हो गए हैं, ठीक है । लेकिन 30/ हम चाकर रघुनाथ के आपकी माखो को और प्रापके दिमाग को क्या हो गया?" "क्यों, क्या हो गया फिर?" ताई जी ने कहा, "धुनां दिखाई नही पड रहा है क्या? हम मब की मांखें जल रही है।"और क्या प्रापकी प्रासें घुमां लगने पर भी नहीं जलती ?" "सचमुच इतना घुमा प्राखिर पाया कहां से ?" ताई जी ने कहा, "धुपा और कहा से पाएगा? पास के घर में ही पा रहा है। सोने के कमरे में चूल्हा जलाने पर धुमा नहीं होगा गया?" - घर, यह ताऊ जी बोले, "सो किरा भी क्या जा सकता है, वतामो? सिर्फ एक कमरा है । प्रांगन तक नहीं है कि वहा रसोई की जा सके धुप्रा अधिक देर तक रहेगा नहीं। थोड़ी देर में ही कोयले मुलग जाएगे और धुमां कम हो जाएगा । थोड़ी देर की तकलीफ है, सहन करनी ही । होगी।" ताऊ जी ने अगर कुछ बर्दास्त करने की कोगिरा की, तो वह भी ताई जी से महा नहीं गया। उन्होंने कहा, "तो फिर माप घर मे रहिए । जव तक धुमा वम नहीं होता, तब तक मैं घर के बाहर जाकर इन्तजार करती हूं। जरा लोगो को भी पता चले कि मापने मुझे कितना सुख दे रखा है।" 'ताऊ जी बोले, "तो फिर मैं उन लोगो से जाकर बहू कि वे घर छोड कर चले जाए।" ताई जी ने कहा, "यह सब भाप समझिए । वह मापके छोटे भाई की बहू है" प्रापको क्या करना है, यह पाप ही ममभिए । मैं तो पराये घर में पाई हूं। मैं किसी को पर छोडकर चले जाने के लिए कह, यह शोभा नहीं देता।" हम चाकर रघुनाप के/31 " ताऊजी शायद फिर ताई जी की और फटकार बर्दाश्त नहीं कर पाए । वे तुरंत राजू के घर का दरवाजा खटखटाने लगे...! "रा. मो रा? राज ने कहा, "नां, ताऊजी बुला रहे हैं। क्या मैं जाऊं?" मां ने कहा, "हां, जाओ। दरवाजा खोल दो। ताऊ जी क्या कह रहे हैं, वो।" सने दरवाजा खोलते ही तालजी गरज उठे, "क्यों रे, तेरी मां कहा है पर इजना जुला क्यों हो रहा है ? इस धुएं के मारे हमारा रहा है। हमें घर में रहने नहीं दोगे क्या? जरा अपनी मां को तो दुको...." - डूंद निकलकर वाई-सी अपने जेठ जी के सामने - R- नेहा. कनों हू, तुमने क्या समझ लिया है ? तुम्हारे रू इन लोग घर छोड़कर भाग जाएं ?" सरकारही जवाब दिया, "कोयले का थोड़ा धुआं तो होगा है. इन नहीं करनीजन नहीं चल सकता।" - -- निती भी तनप चूल्हा जलाकर बैठ जा लगाने का भी को एक समय होता है। हम लोग भी से उन्नते हैं। हम करतो म्हारी तरह किसी को तकलीफ नहीं नसतो तोहोनी हो चाहिए...." कालकर पक ज्ञान निपटाने के बाद चूल्हा कल रोकाको नक्षरों के घरों में काम करना कर रहे हो लिकर करे नहीं रखा करो। उसे रास्ते कलेजले लग जाएं, तव चूल्हा भीतर ले कर रघुनार के T " पापा करो।" अचानक न जाने कहा से ताई जी प्रगट हो गई । उन्होने कहा, "चून्हा तो हम भी जलाते है, खाना भी पकाते हैं । पर हम लोग तुम्हारी तरह जान-बूझकर दूसरों को परेशान नहीं करते।" मा ने कहा, "मैंने जान-बूझकर किसी को परेशान करने के लिए चुन्हा नहीं जलाया दीदी । रात के अतिरिक्त तो मुझे समय मिल नहीं पाता, इसीलिए इस समय मैंने चूल्हा जलाया है। राजू को कुछ बनाकर बिना दूगी। वह अभी ही राजेन भइया के घर से पदकर पाया है।" ठाई जी ने कहा, "सो यदि तुम यहा नहीं निभा सकती तो, यह घर छोडकर रोई और घर देखो। गरीबो के मुहल्ले में बहुत-से घर किराये पर मिल जाएंगे। वहा जाकर दिन-रात, दोपहर-दाम जव चाहे सुशी से मुन्हा जलाती रहना, वहा तुम्हे कोई मना नहीं करेगा। यह तो सरासर जान-बूझकर दूसरे को परेशान करना है।" मा ने कहा, "नही दीदी, मैं तुम्हारे पाव छूकर कहती है किसी गो परेशान करने की मेरी इच्छा नहीं थी। रात को छोडकर तो और खाना पाने का समय ही नहीं है मेरे पास । दो घरी का काम निपटाकर घर पाती हू और भात पकाती हू । मैं तो विधवा औरत हूं, रात में न भी घाऊ तो कोई हर्ज नही । लेकिन राजू सुवह खाकर स्कूल जाता है और उसके बाद वह राजेन भइया के पास पढने चला जाता है। में मां होकर ने खाना पका कर भी नहीं सिला सकती क्या? मुझे प्राप लोगों ने सि एक कमरा दिया है। इस कमरे को छोडकर कही चुल्हा सुलगाने को जगह भी नहीं है। मैं क्या करू, तुम्हीं वतामो दीदी..." ताजी बोले, "क्यो, घर के सामने रास्ता नहीं है क्या ? क्या राने के किनारे चूल्हा नहीं सुलगा सकती ?" नाई जी ने कहा, "दरअसल लड़का फर्ट जो पाया है, उसका घमण्ड हीं होगा क्या? हम क्या कुछ समझते ही नहीं ? इस घर को छोड़कर तुम लोगों को कोई और इन्तजाम करना होगा, मैं साफ-साफ कहे जा रही हूं।" मां ने कहा, "यह मेरे श्वसुर का घर है। इस घर को छोड़कर मैं कहां जाऊंगी, तुम्ही वतायो दीदी ?" ताई जी बोली, "यह श्वसुर जी का घर है, यह मुझे सुनाने की ज़रूरत नहीं। यह मुझे भी मालूम है । लेकिन यह नया मकान तुम्हारे जेठ जी के रुपयों से बनाया गया है, यह भी क्या तुम्हें बतलाना पड़ेगा?" मां के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला । उसकी आंखों से आंसू वह निकले। ताई जी ने कहा, "रोने से ही सात खून माफ नहीं हो जाते, समझी ? साफ बात में डर कैसा? ज़रा बतायो तो सही, देवर जी कच- हरी से भला कितने रुपये कमाकर लाते थे ? तुम्हारे जेठ जी अगर अपने खून-पसीने की कमाई से इस घर को न सींचते तो क्या तुम लोग इतने आराम से रह पाते? मुंह से कभी कुछ मैंने कहा नहीं, इसीलिए क्या ? इस मकान का जो हिस्सा तुम्हें दिया था, उसका जरा भी लिहाज़ नहीं तुम्हें ? तुम इतनी वेशर्म हो गई हो ? और फिर सुना रही हो कि मेरे श्वसुर का घर है । श्वसुर के घर के नाम पर तो था सिर्फ टीन की छप्पर वाला एक कमरा । उस घर से यह पक्का मकान किसकी वजह से बना है, जरा बताना तो? तुम्हारे जेठ जी अगर नौकरी करके यहां पक्का मकान, वरामदा और प्रांगन न बनवाते तो क्या यहां तुम लोग सिर छिपा सकते थे?" राई-सी बात थी, पहाड़ बन गई। मामूली-से कोयले के धुएं को लेकर राजू के छोटे-से कमरे के वीच लंका-काण्ड घट गया। राजू की मां ने कहा, "तुम अगर यही कहती हो तो मैं यह घर हो . 34 / हम चाकर रघुनाथ के । दूगी दीदी । लेकिन इमी क्षण तो घर छोड नहीं सकेंगी। मुझे दो दिन की मुहलत दो दीदी । घर ढूंढने में थोड़ा समय तो लगेगा ही। प्राजयल क्या इतनी ग्रासानी में मकान मिलता है?" ताई जी ने कहा, "ठीक है, वही करी । हमारा भी पिड टूटे.." यह कहकर ताई जी मट-पट चली गई। उनके पीछे-पीर ताऊ जी भी चले गए। पत्थर की मो उम ममय तक भी गे रही थी । राजू मूग्त बना वहा यहा था। थोड़ी देर बाद उसने कहा, "मा, तुमने यह क्यों कहा कि तुम मकान छोड़ दोगी? यह मकान तो हम लोगों का है।" भा उसी तरह प्रांतो पर प्राचल रसे रो रही थी।मा ने कोई जवाब नहीं दिया राज ने फिर कहा, "मां, प्रो मा । तुमने तो कह दिया है कि तुम यह घर छोड़कर चली जामोगी।" भा ने फिर भी कुछ न कहा । वह सिर्फ रोती रही। राजू मो के पास द पाया। उसने कहा, "मा, तुम बोलती क्यो नहीं ? कुछ तो योलो। तुमने ताई जी मे घर छोड़ने का वादा क्यों किया मा?" मां ने फिर भी कुछ नही पहा । वह उनी तरह प्राखो पर प्राचन रमे रोती रही। राजू ने यहा, "तुम तो वहा करती हो कि भगवान है, मो कहा गया तुम्हारा भगवान ? भगवान यदि सब कुछ देखता है तो क्या हमारी तकलीफें उसे दिखाई नहीं देती ?" भगवान की बात सुनते ही मा ने माखो मे प्राचल हटाया और कहा, "यह सब तुम्हारे कारण ही हुआ है । तुम्हारे कारण ही भाज यह झट- हम चाकर रघनाथ के 135

झमेला हुआ है।"
राजू ने कहा, "वाह रे, मैंने भला क्या किया है ?"
मां ने कहा, "तूने ही तो सारा सत्यानाश किया है। परीक्षा में फर्स्ट
होने की तुझे क्या पड़ी थी ? किसने तुझसे कहा था फर्स्ट पाने के लिए?
अव तू ही समझ।"
राजू ने कहा, "अगर मुझे फर्स्ट कर दिया गया है तो इसमें मेरा क्या
कनुर ? मैं क्या जान-बूझकर फर्स्ट आया हूं ?"
मां ने कहा, "तो क्या इसी लिए ठीक जिस बार विनोद फेल हुआ है,
उसी वार तुझे फर्स्ट होना चाहिए था ?"
गजू ने कहा, "तो क्या विनोद को मैंने फेल करवा दिया है ? विनोद
के फेल होने में मेरा कोई कसूर है क्या? वह अगर फेल हो गया, तो मैं
क्या कर सकता हूं ! आखिर राजेन मामा ने मुझे इतनी अच्छी तरह
पढ़ाया क्यों?"
मां शायद सोच रही थी कि किस तरह यह घर छोड़ देगी। यह
घर छोड़ने के बाद वह कहां जायेगी।
उसने कहा, "याज की रात बीत जाने दे। तू खा-पीकर सो जा।
कुछ करना है, करूंगी।"
राजू ने पूछा, "तुम्हें कहां मकान मिलेगा? तुम्हें कौन किराये पर
मकान देगा? इतने रुपये तुम कहां से लायोगी?"
मां ने कहा, "सिर के ऊपर भगवान तो है । वह सब कुछ देख रहा
है। वहीं सारा इन्तज़ाम कर देगा। मैंने तो अपनी समझ में किसी का
कुछ नुकसान किया नहीं, अपनी समझ में किसी का बुरा चाहा नहीं और
सपने में भी मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा कि किसी का बुरा हो । तो फिर
हमारा
कुछ बुरा क्यों होगा?"
राजू ने पूछा, "तो फिर अव तुम क्या करोगी मां?"
कल में जो
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36/ हम चाकर रघुनाथ के

मां ने कहा, "इम समय तू खा-पीकर सो जा । उसके बाद सोचकर देपती हूं कि कहां जाने पर किराये का घर मिल सकता है।" "लेकिन कही घर अगर मिल भी गया तो भी हमे भाडे के रपये तो गिनकर देने पड़ेंगे। कौन देगा हमे वे रुपये ?" मा ने कहा, "भगवान देगा।" "भगवान किस तरह देगा ?" मा ने कहा, "भगवान क्या मेरी हथेली में रूपये रग जायेगा भला? शायद वह मुझे और दो घरों में काम दिलवा देगा । तीस रुपये भी अगर मुझे मिल जाएं तो मैं काम करने के लिए तैयार हूं। उन रुपयों से मैं एक यामरा किराये पर ले लूगी।" "तीस रपयों में क्या किराये का घर पा सकोगी?" "पौर कही अगर पर न भी मिले तो जेलपाड़ा के गरीबो के मुहल्ले में जरूर मिट्टी का एक पर पा जाऊंगी। तू इसके बारे में बिलकुल फिक मत कर । भगवान की कृपा रही तो जरूर एक घर मिल जायेगा । तू इम ममय सानीकर सो जा। प्राज में और कुछ नहीं बनाऊंगी। तू सिर्फ बालू भात सा ले।" उसके बाद रात गहराती गई। राजू सा-पीकर अपनी मां के पाम मो गया था। लेकिन राज़ की मां की माखों में उस समय नीद न थी। मा उस ममय एकान मन से भगवान से विनती कर रही थी- "हे भगवन्, मेरे राजू पर नजर रमना । राजू को मैं पाल-पोस कर यहा कर पाऊं ! तुम में मैं और कुछ भी नहीं मागती । मैं अपना कुछ भी भला नहीं चाहती, तुम सिर्फ राजू को अपने परों पर खड़ा कर दो। मैं अपनी माखो में देखना चाहती हूं कि वह अपने परों पर पड़ा है । मुझे गुद अपने लिए कुछ भी नही चाहिए..." दिन भर मे पार परों का काम करने पर थकावट तो होगी ही। । हम पाकर रघुनाथ के 137

द उसे अपने घर पर पाकर भी रसोई बनानी पड़ती थी और
भी मांजने पड़ते थे। उस थकावट में चूर मां की प्रांख कब लग गई
: उसे पता भी नहीं चला।
"अभी तुम
जू के मुंह से ही हम लोगों ने पहली बार सुना कि उन लोगों ने घर
दल लिया है।
हमने पूछा, "घर क्यों बदल लिया है रे राजू तुम लोगों ने ? वह
घर तो तुम लोगों का अपना घर था।"
"ताऊ जी ने हमसे चले जाने को कहा था। इसलिए हम उस घर से
निकल गए।"
लोग कहां हो?"
"जेलेपाड़ा मुहल्ले में । ठीक पोखर के किनारे ही।"
"वहां तो नल का पानी और बिजली की रोशनी, कुछ भी नहीं है।
अच्छा, यहां किराया कितना देना पड़ता है ?"
राजू ने कहा, "वीस रुपये।"
राजू की मां दूसरों के घरों में महरी का काम करके घर का खर्च
चलाती थी, यह हमें मालूम था। फिर भी उनको एक सुविधा थी कि
उन्हें मकान-भाड़ा नहीं देना पड़ता था।
राजू ने कहा, "मां ने और दो घरों का काम पकड़ लिया है। वहां वह
वर्तन मांजती है और कपड़े भी धोती है।"
नन्दू ने कहा, "तब तो तुम्हें ज़रूर मुकदमा ठोक देना चाहिए था
ताऊ जी पर तुमने मुकदमा क्यों नहीं कर दिया ? मामले-मुकदमे
38 / हम चाकर रघुनाथ के

इतना डरते क्यों हो? मेरे पिताजी तो वकील हैं। मुकदमा करने पर मेरे पिताजी ज़रूर तुम लोगों को जिता देते।" राजू ने कहा, "नहीं, मां कहती है कि इसका फंसला खुद भगवान ही करेगा।" नन्दू ने कहा, "तुम लोग बस भगवान भगवान करते ही खत्म हो जाप्रोगे । भगवान ही यदि सारे फैमले कर देगा तो फिर इतने वकील, इतने जज और इतने वैरिस्टर किसलिए हैं ? क्या घास छीलने के लिए ?" राजू ने कहा, "नहीं भाई, मां कहती है कि गरीबों का कोई नहीं होता । एक मात्र भगवान को छोड कर गरीबो का मौर कोई भी नहीं होता !" "नहाता कहा है तू?" "क्यों हमारे घर के पास ही तो ताताव है। मुहल्ले के सभी लोग वही नहाते हैं।" नन्दू ने कहा, 'देखना, तुझे जरूर एक दिन धुम्बार पाएगा। नहीं तो किगी दिन तुझे साप काट खायेगा...।" लेकिन नहीं। हजारो तकलीफी के बावजूद किसी भी दिन राजू को बुपार नहीं पाया। राजू कहता, "दुख और तकलीफें सहन करना ही अच्छा है । जिन्दगी में एक न एक दिन इसका फल मिलेगा ही।" गजू की तकलीफें देखकर हमे कोई सहानुभूति नही होती, वरन् हमे मजा ही माता। हम लोग पूछते, "तेरी मां तो सुबह से ही घर-घर वर्तन मांजती फिरनी है । तो फिर भात कोन पकाता है ?" राजू कहता, "क्यो ? मैं जो ह.." "क्या तू भात पका सकता है ?" "हा भाई, मैं भात-दाल सब कुछ पका मकता है। पाल और भार हम चाकर रघुनाय के 139

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।
बुलवाकर उन्होंने न जाने क्या लाने का हुक्म दिया।
राजू ने देखा कि वह नौकर एक तश्तरी से माया जिस पर दो
मंदेश और दो राजभोग रसे हुए थे।
राजेन मामा ने कहा, "पहले यह सब खा लो। उसके बाद पढना।
तुम किताव रखकर पहले साना शुरू करो।"
की प्रांखों में प्रासू मा गए।
उसने यहा, "मुझे तो अभी भूख नही लगी है। प्रापने ये चीजें क्यो
मंगावाई हैं ?"
राजेन मामा ने गम्भीर स्वर मे कहा, "जो कुछ कहता हूं, वही करो।
तुम्हारे लिए मैंने कुछ भी नहीं मंगाया है। मेरे समधी के घर में कुछ
मिठाई प्राई थी। उसी मे से मैंने तुम्हें भी मिठाई दी है । लो, सामो।"
राजू ने तस्तरी से मिठाई उठाकर धीरे-धीरे साना शुरू किया। उम
समय भी उसकी मासों से प्रामू बह रहे थे।
राजेन मामा ने पूछा, "तुम रो क्यो रहे हो? रोने की क्या बात हो
गई ?"
राजू
की प्रांसो से और भी मासू बहने लगे। वह कुछ कहना चाहता
था, पर उसका गला रंध गया।
राजेन मामा ने पूछा, “बोलो, क्या कहने जा रहे थे?"
राज ने कहा, "मां ने कहा था कि गरीबों की तकलीफें भगवान ही
समझ मकता है।"
राजेन मामा बोले, "हा, तुम्हारी माने तो ठीक ही कहा है । भगवान
तो गरीबों की तकलीफें समझता ही है । इससे क्या हुमा
राजू ने कहा, "नहीं, मा की यातों पर प्रय विश्वास हो रहा है।"
यह कहकर राजू फिर मिठाई ग्याने लगा। उसके बाद खाना शेप होने
पर उसने पूछा, "यह तस्तरी मैं कहां धोऊ ?"
हम पाकर रघुनाथ के/41

। राजेन मामा ने कहा, "नहीं, तुम्हें तश्तरी धोने की ज़रूरत नहीं। तुम गिलास का पानी लेकर अपने हाथ धो लो। यही काफी है।" "लेकिन मैंने तश्तरी को जूठा कर दिया है।" राजेन मामा ने कहा, "उससे क्या हुआ ? हमारे घर पर वर्तन मांजने के लिए आदमी है। वही तश्तरी धो लेगा।" उसके बाद कुछ रुककर उन्होंने कहा, "तुम कह रहे थे न कि तुम्हारी मां कहती है कि भगवान ज़रूर है । सो तुम्हारी मां ने झूठी बात नहीं कही है। जानते हो, एक दिन मैं तुमसे भी गरीब था। तुम्हारे कम से कम मां तो है। लेकिन दुनिया में जिसे अपना कह सकू, ऐसा मेरा कोई भी नहीं था। मेरा अगर कोई था तो सिर्फ भगवान ही। उसी भगवान पर विश्वास करके ही मैं आज इतना बड़ा हुआ हूं। आज तुम यह जो तीन-तल्ला मकान देख रहे हो, इतने नौकर-चाकर जो हमारे घर में काम कर रहे हैं, यह सभी भगवान की देन है। भगवान के ऊपर हमेशा विश्वास रखना। तो फिर एक दिन मेरी तरह बड़े आदमी बनोगे। लेकिन एक बात गांठ में वांध लो। कभी भी झूठ मत बोलना और कभी भी घमण्ड नहीं करना। तभी तुम्हारी तरक्की होगी।" काफी रात को घर लौटने पर राजू ने देखा कि उस समय तक मां उसके लिए बिना खाए बैठी थी। मां जहां काम करती थी, वहां से उसे एक यादमी का खाना मिलता था। उसी भात को दो हिस्सों में बांट कर राजू और उसकी मां-दोनों खा लिया करते थे। लेकिन उस दिन राजू ने कहा, "आज सारा भात तुम खा लो मां।" "क्यों रे?" राजू ने जवाब दिया, "मैं खाकर आया हूं, मां।" "कहां खाया तूने ? किसने खिलाया है रे ?" राजू ने कहा, "राजेन मामा ने।" - 42/ हम चाकर रघुनाथ के "क्यों? यह क्या हुमा ?" राजू ने कहा, "मेरा मूसा मुखडा देखकर शायद राजेन मामा समझ गए थे कि मैंने कुछ खाया नहीं है । उन्होने मुझसे पूछा-~-तुमने अाज श्या साया है ? मैंने जवाब दिया-रोटी। राजेन मामा समझ गए कि मैंने वासी रोटी साई है। इसीलिए घर के भीतर से एक तस्तरी में उन्होने दो बड़े- बड़े सन्देश और दो राजभोग मेरे लिए मंगवा दिए।" "लेकिन प्राज वे तुम्हें खिलाने क्यों लगे ?" "उन्होने कहा कि समधी के घर से मिठाई माई है । उसी में से उन्होंने मिठाई दी थी।" उसके बाद कुछ रुककर राजू ने कहा, "जानती हो मा, खाते-साते मुझे बहुत रुलाई पा रही थी।" "क्यों रे?" राजू ने जवाब दिया, "मन्देश मौर राजभोग पाने में इतने मीठे थे कि बम नुम्हारी याद मा रही थी। सोच रहा था कि सुद न साकर वह मिठाई गाल-पत्ते के दोने मे रखकर घर ले प्राता तो हम दोनो मिल वाट- कर साते । तुम अगर एक बार भी साती तो हमेशा याद रसती । इतनी वदिया थी वह मिठाई..।" मा ने कहा, "इससे क्या हुमा ? मिठाई यहां नहीं लाए हो, यह तुमने टोक ही किया है। तुमने खा लिया है तो; यस समझ लो कि मैंने भी मा लिया। तेरे पिताजी जब जिन्दा थे, उस समय मैंने खूब रसगुल्ले और सन्देश पाए हैं।" राजू ने कहा, "राजेन मामा ने और क्या कहा, जानती जानती हो? ? तुम जो कुछ कहा करती हो, राजेन मामा ने भी वही बात कही। उन्होंने कहा कि भगवान ऊपर से सब कुछ देस रहा है। राजेन मामा भी बचपन में हम लोगों की तरह ही गरीब थे। अपना पहने को राजेन मामा या कोई न । हम चाकर रघुनाथ के/43 . था। उसके बाद भगवान पर विश्वास रखने के कारण आज उनके पास तीन-तल्ला मकान है, वे इतने बड़े प्रादमी हो गए हैं।" मां इस बात का भला क्या जवाब देती! उसने सिर्फ यही कहा, "तो फिर ठीक है !" राजू ने कहा, "मां, मेरे पास भी जब तीन-तल्ला मकान हो जाएगा, तव मैं तुम्हें दूसरों के घर काम नहीं करने दूंगा। तुम सिर्फ वैठी रहोगी उस समय । मैं तब तुम्हें रोज़-रोज़ बड़े-बड़े सन्देश और राजभोग 'खिलाऊंगा। तुम खाकर देखोगी कि मिठाई कैसी स्वादिष्ट लगती है !" अगले साल विनोद फिर फेल हो गया। इस वार किस पर गुस्सा उतारा गया, मालूम नहीं । शायद स्कूल के मास्टरों पर ही गुस्सा उतारा गया हो! ताऊ जी इस वार भी हेड मास्टर साहब के पास जा धमके। कहने लगे, "मेरा लड़का फेल हो गया है । इस बार अगर मेहरवानी करके उसे अगली क्लास में प्रोमोशन दे दें तो मैं उसके लिए और एक मास्टर रख दूंगा।" हेड मास्टर अवनी वावू ने कहा, "पिछले साल भी आपने ऐसी ही वातें कही थीं। इसीलिए पिछले साल मैंने विनोद को प्रोमोशन दे दिया था। लेकिन इस बार वह अगली क्लास में नहीं जा पाएगा। वह परीक्षा में किताव देखकर नकल करता है, क्या यह आपको मालूम है ? उस बार मैंने उसे माफ कर दिया था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा।" ताऊ जी ने कहा, "अापके स्कूल में पढ़ाई भी अच्छी नहीं होती...।" अवनी बाबू ने कहा, "अगर हमारे स्कूल में पढ़ाई अच्छी नहीं होती, तो फिर आप ही के भतीजे राजू की इतनी उन्नति कैसे हो रही है ? आप अगर चाहें तो अपने लड़के को किसी दूसरे बढ़िया स्कूल में ट्रांसफर करवा सकते हैं ! देखिए, वहां जाकर ?" पास होता है या . 44/हम चाक फैल!" ताऊ जी अवनी वायू की बातें सुनकर कुछ नरम पड़े । उन्होंने कहा, "मेरा मतलब यह नहीं था। में तो यही रह रहा था कि उसे इस बार प्रोमोगन दे दीजिए; मैं उसके लिए अच्छा ट्यूटर रस दूगा। मैं वादा कर रहा हूं।" अवनी वा और क्या करते ? इस बार भी उन्होंने विनोद को अगली क्लाम में प्रोमोशन दे दिया। । राजू को जिन्दगी में बचपन से ही बहुत-से तूफान पाए हैं। किन्तु वह हमेगा हृदय में दृढ विश्वास लिए वढा जा रहा था। नन्दू अब तक दूसरी तरह का लड़का बन चुका था। हम लोग भव राजू मेहसी-मजाक नहीं करते । सचमुच दिन-ब-दिन राजू को देश-देख- कर हम लोगो को उसके प्रति श्रद्धा होने लगी थी। सचमुच भगवान ने राजू की अच्छी तरह देख-भाल की थी। उनकी मां दूसरो के घरो मे काम करती। दूसरों के घरों का काम- काज निपटाकर मा देर मे घर लौटती। और सुबह पाच बजे दूसरो के घर पर काम करने के लिए जाते वक्त मा राजू को जगा देती। राजू मुबह पाच बजे से ही अपना पाठ याद करने बैठ जाता। उसके बाद दस बजे पालू या बैंगन के मुरते के साथ रात का वासो भात गाकर राजू दरवाजे पर ताला बन्द करता और स्कूल चला जाता। मा जब सारे काम काज निपटाकर घर लौटती, उस समय दोपहर हो जाती। मां अपने हाथों में अपने लिए भात-तरकारी लेकर माती। हम चाकर रघुनाथ के/45 । । उसका आधा हिस्सा खाकर, वाकी मां रख दिया करती। उसका राजू स्कूल से लौटकर वही भात जो खाएगा...! छुट्टी के दिन एक बार हम लोग राजू का घर देखने गए थे। बाबा रे, कैसी गन्दी वस्ती थी! उस बस्ती को हम लोग जेलेपाड़ा वस्ती कहा करते थे। जितने भी गरीब आदमी थे, सब वहीं रहते थे। बस्ती में नल का पानी नहीं था। वहां के सभी आदमी नलकूप से पीने के लिए पानी लाते । उसके अलावा नहाना -धोना और वर्तन मांजना -सभी काम पोखरे के पानी से किया जाता। हमें देखकर राजू बहुत खुश हुअा। उसने पूछा, "क्या तुम लोग मुड़ी सानोगे?" "मुड़ी !" हम लोगों ने पूछा, "क्या घर पर मुड़ी है ?' राजू ने कहा, "नहीं, घर पर तो मुड़ी नहीं है । मैं दुकान से ग्वरीद- कर ले ग्राता हूं।" हम लोगों ने कहा, "क्यों झूठ-मूठ हमारे लिए तुम पैसा बर्बाद करोगे?" गजू ने हमारी बात नहीं मानी। वह मुड़ी की दुकान की तरफ भाग बड़ा हया । उसने कहा, “मैं अभी तुरन्त मुडी लेकर ग्राना हूं। मैं गया और पाया' | तुम लोग पागम मे बैठो।' हम चागे नरफ देव न लगे। पुवाल का बना पर था। सिर्फ एक कमरा था। मिट्टी के फर्ग पर चटाई बिछी हुई थी। उमी चटाई पर मा और बेटा माते थे। एक लालटेन टंगी हुई थी। पास ही एक छोटी चौकी के ऊपर मा काली की तस्वीर खीहई थी। घर का माल-पत्र जो कुछ था, वम यही था। गज देखने ही देखने मुटी लेकर हाजिर हो गया। उसने कामे की क नदनरी में मुट्टी डाल दी। उसके बाद उसने कहा, "मैं मुड़ी के माथ 466, हम चाकर रघुनाथ के

हरी मिर्च भी लाया हूं । तुम लोग हरी मिचं चबाते चबाते मुडी मामी,
मुडी ग्वाने में बही जायकेदार लगेगी।"
नन्दू ने पूछा, "यहां चौकी के ऊपर मा वाली की तस्वीर क्यों रणी
राजू ने कहा, "हम लोग रोज मा काली की पूजा जो करते हैं ! में
भी पूजा करता हूँ मोर मा भी।"
"पूजा करते समय तुम मा काली से क्या कहते हो?"
राजू ने जवाब दिया, "मा मे यही प्रार्थना करता हूं कि सब का शुभ
हो, मंगल हो।"
"तुम पूजा करते हो, इसीलिए फस्ट पाते हो न?"
राजू ने कहा, "यह तो मुझे नहीं मालूम । मा ने पूजा करने के लिए
कहा है, इसीलिए पूजा करता हूँ। पूजा करने पर मन को गति मिलनी
है, पोर कुछ नही ।"
नन्दू ने पूछा, "यहा मिट्टी के फर्श पर सोने में क्या तुम लोगों को
तकलीफ नही होती ?"
राजू ने कहा, "तकलीफ अगर समझेंगे, तव न तकलीफ होगी।
पहले तो हम पक्के मकान में रहते थे। वहा हम जैसे थे, यहा भी ठीक
उमी तरह ही हैं । मिर्फ मा को दूमरी के घरों में काम करने में कुछ ज्यादा
तकलीफ होती है।"
"तो तुम्हारा भगवान तुम्हें तो परीक्षा में फरटं करवाना है और
फिर तुम्हारी मां के कष्ट क्यो नहीं मिटाता वह
राजू ने जवाब दिया, "मां कहती है कि भगवान जो कुछ भी करना
है, भले के लिए ही करता है।"
नन्दू ने पूछा, "इसमे तेरी मा का कौन-सा भला हुआ है
राजू ने कहा, "यह तो मैं नहीं जानता। लेकिन जरूर इसमे भगवान
।
हम चाकर रघनाथ के/47

- - का कोई उद्देश्य छिपा हुआ है।" हम लोग हमेशा जिस तरह राजू की बातों पर हंसा करते थे, उस दिन उसकी बातें सुनकर हम हंस नहीं सके। हमें राजू के प्रति बड़ी सहानुभूति और ममता होने लगी। अहा, राजू स्कूल में फर्स्ट ज़रूर आता है। लेकिन उसे कितनी तकलीफें उठानी पड़ रही हैं । और फिर तकलीफों को वह तकलीफ समझता भी नहीं । यह कैसे संभव हो रहा है ? इसी तरह दिन बीत रहे थे । हठात् एक दिन मां बहुत धवराई-सी घर में पाई। घर में आते ही उसने कहा, "अरे राजू, सुना है कि तेरे ताऊ जी को एक बड़ी सराव वीमारी हो गई है रे । अब क्या होगा, मैं तो यही सोच रही हूं !" राजू ने कहा, "इसीलिए पिछले कई दिनों से विनोद स्कूल में दिखाई नहीं दे रहा।" मां ने कहा, "नहीं रे, सुना है कि विनोद को साथ लेकर तेरी ताई जी अपने मैके चली गई हैं।" "तो फिर ताऊ जी की देखभाल कौन कर रहा है ?" "कोई भी नहीं।" राजू ने पूछा, "ताऊ जी को क्या बीमारी हुई है ?" मां ने कहा, "चेचक'" राजू ने पूछा, "तो क्या मां, मैं जाकर ताऊ जी को देख पाऊं?" मां ने कहा, "तू जाकर क्या करेगा?" राजू ने कहा, "मैं जाकर डाक्टर को बुला लाऊंगा। मैं उन्हें दवा खिलाऊंगा, उनका माथा सहला दूंगा और पैर दबा दूंगा।" मां ने कहा, "चल वुद्ध कहीं का, चेचक निकल पाया है। इसमें डाक्टर क्या करेगा ! तुझे तो स्कूल जाना है, पढ़ाई-लिखाई देखनी है। उसके अलावा क्या तू जानता है कि रोगी की सेवा किस तरह की जाती है। . - 48/हम चाकर रघुनाथ के ह-3 ? में कहा, "मगर मैं नहीं जाऊंगा तो कोन आएमा तुम तो वा नहीं मानी। नन्हें तो कितने ही घरों में काम करने हैं। वह शाम तो दुर होड़ नहीं मनोगी।" पकिन क्या वही वही बात है रै? और उस तरफ जो एर मादमी घर में पडा-पडा कराह रहा है, उसे एक बूंद पानी तक देने वाला भी कोई नहीं है। अब मैं क्या करूं, बता तो?" राज ने कहा, "ठीक ऐमी विपत्ति के समय ताई जी मयों चली गई मां? विपनि के समय ही तो मादमी-मादमी की देख-भाल करता है। ताई जी नो ताऊ जी को बिलकुल भपनी हैं, हम तो ठहरे पराये। हम लोगों को ताई जी ने कितना मताया है, क्या वह सब तुम भूल गई मा ने कहा, "अरे राजू किसी के भी विपत्ति में पड़ने पर ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए । ठीक इसी समय तेरी मासिरी परीक्षा होने वाली है। तुझे यहा अकेला छोड़कर भी तो में वहां कैसे जाऊं?" राजू ने कहा, "उसके बजाय तुम यहा रुको। में जाकर देश भाता हूँ। वहा से लौटकर मैं तुम्हें पूरी खबर दूंगा।", मा ने कहा, "नही रे, चेचक बड़ा ही छुप्राछूत का रोग है। मगर तुझे भी चेचक हो गया तो फिर न तो तू बच पाएगा पोर न ही मैं बचूगी। उसके बजाय तो मैं ही वहां जाकर उनकी देखभाल करती है। इसमे मेरा जो भी हो, देखा जाएगा।" इसके बाद कुछ रुककर उसने फिर कहा, "तेरी ताई जी को कसा हो गया है, जरा देर तो ! छूत के डर से ताऊ जी को अकेला छोड़कर मे अपने मायके चली गई। ताऊ जी को कोन देखेगा, उनका क्या होगा; यह दीदी ने एक बार सोचा तक नहीं।" राजू "ठीक है। सूब वढिया हुमा है। जिस तरह ने कहा, हम चाकर रधुनाथ के/49 उन्होंने हमें घर से अलग कर दिया और फिर घर से बाहर निकाल दिया, उसी तरह की उन्हें भी सीख मिल गई है।" मां बिगड़ उठी। उसने कहा, "ये सब बातें जुवान पर नहीं लाते । तुम अब बड़े हो गए हो, लिख-पढ़ गए हो । ये सब बातें क्या तुम्हें शोभा देती हैं ? ऐसी बातें फिर कभी भी मुंह से नहीं निकालना । ऐसी बातें सोचना भी पाप है।" मां बहुत चिन्तित लग रही थी। मां के पास उस समय भी सोने का एक गहना वचा हुआ था। उसके हाथ में सोने का एक तावीज़ था। वात की बीमारी के कारण पिता जी ने वह तावीज़ बनवा दिया था। मां ने कहा, "मैं पाती हूं, तू घर पर ही बैठा रह।" मां को लौटने में करीव आधा घंटा लगा। मां आकर बोली, "यह ले पचास रुपये। ये रुपये तू अपने पास रख ले। और मैं अपने पास दस रुपये रख रही हूं। शायद कुछ खरीदना पड़े।" यह कहकर मां थोड़ी देर के लिए रुकी और फिर उसने कहा, "तू कुछ दिनों तक स्कूल मत जा। घर पर रहकर ही पढ़ाई कर । स्कूल जाकर तू कह था कि ताऊ जी की बीमारी के कारण तू स्कूल नहीं पा पाएगा।" राजू ने पूछा, "लेकिन मैं क्या खाऊंगा? और तुम ही भला क्या खामोगी ?" मां ने कहा, "मेरी तो उपवास करने की आदत है । औरतु कुछ दिनों तक खुद भात पकाकर नहीं खा पाएगा क्या ? उधर एक आदमी की जिन्दगी खतरे में है, और ऐसे समय में खाना-पीना ही तेरे लिए बड़ी बात है क्या?" "लेकिन तुम जिनके घरों में काम करती हो, वे क्या करेंगे? वे अगर 50/ हम चाकर रघुनाथ के

तुम्हें बुलाने के लिए पाएं तो मैं क्या जवाव दूगा?"
"जो सच्ची बात है, वही बताना । कह देना कि ताऊ जी बीमार हैं,
मां दही गई है।"
यह कहकर मा चली गई। वह और यहा रुकी नहीं।
।
राजू
को
स्कूल
में गैरहाजिर देखकर गणित के मास्टर साहब ने पूछा,
"माज राजू कहां है? क्या राजू नहीं पाया है ?"
गणित के मास्टर साहब का चहेता छात्र या राजू । और सिर्फ गणित
के मास्टर साहब का ही क्यों, मब का चहेता था राजू । राजू के क्लास में
न पाने पर मानो मध्यापकों को पटाने में मानन्द ही नहीं भाता था।
पासिरकार जब बारह बज गए, तब राजू माया । वह क्लास में नहीं
माया, सीधा हेडमास्टर साहब के पास चला गया।
हेडमास्टर साब भी राजू को सूब प्यार करते थे। उन्होंने पूछा,
"क्या बात हुई ? तुम कैसे पाए हो?"
राजू ने कहा, "मैं प्रापके पास छुट्टी मागने माया हूं सर।"
"क्यों?"
हेडमास्टर साहब तो ताज्जुब में पड़ गए थे। राजू तो जीवन में
फभी भी छुट्टी नहीं लेता था।
उन्होंने पूछा, "हायर सेकेण्डरी को परीक्षा बिलकुल करीब है। ऐसे
समय में तुम छुट्टी मांग रहे हो? तुम ही हो हमारे स्कूल के सबसे बढ़िया
छान । तुम्हारे ऊपर हमारी वहुत-सी माशाएं हैं। तुम प्रासिर पट्टी को
माग रहे हो?"
राजू ने कहा, "मेरे ताऊ जी
बहुत बीमार हैं, सर।"
"ताऊ जी? ताऊ जी बीमार हैं ? ताऊ जी के घर में तो तुम लोग
अलग हो गए हो न? तुम्हारे ताऊ जी ने सो तुम लोगो को घर से निकाल
हम पाकर रघुनाथ के 151

दिया है, ऐसा सुना था। तुम लोग तो इस समय अलग घर में रहते हो। उनकी बीमारी से तुम लोगों को क्या लेना-देना है ?" राजू ने कहा, "ताई जी विनोद को साथ लेकर अपने मायके चली गई है। ताऊ जी को चेचक हो गया है। उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है । एक बूंद पानी तक देने वाला कोई नहीं। इसीलिए मां उनकी मेवा-टहल करने चली गई है । और मैं अपने हाथों से भात पका- कर या लिया करता है।" "और पढ़ाई-लिखाई ? पढ़ाई-लिखाई कब करते हो?" राजू ने जवाब दिया, "पढ़ाई-लिखाई तो दिन-भर ही करता हूं और जहां मैं समझ नहीं पाता हूं, उमे राजेन मामा के पास जाकर समझ लेता हूं।" "अच्छा, ठीक है। जितनी जल्दी हो सके, स्कूल प्राने की कोगिम करना । कुछेक वढिया विद्यार्थियों के लिए हम लोग म्पेगल कोचिंग क्लास का इन्तजाम करेंगे । मैं चाहता हूं कि तुम भी म्पेगल कोचिंग क्लाम में गामिल होमको।" हडमास्टर माहब को प्रणाम करके वापस घर लौट पडा। - राज मन की मा जैग ही अपने पुश्तैनी घर के भीतर पहुंची, उसके जेठ जी नक्षी स्वर में गुहा, "कौन है ?" उसके बाद गन की मा को देवकर गज़ के नाऊ, जी गेने लगे। करने लंग, 'तम ग्राई हो बद? यह देखो, मैं तो मरने की हालत में हूं। यहा घर पर कोई नहीं है । तुम्हारी जेठानी तो अपने लड़के को लेकर प्रेम 52 हम चाकर रघुनाथ के - समय में अपने बाप के घर चली गई है।" राजू की मां ने पूछा, "क्या थोड़ा पानी इं, पिएंगे?" राजू के ताऊ जी ने कहा, "तुम्हें पानी कहां मिलेगा?" राज को मां बोली, "मैं देखती हूं कि पानी कहा है !" यह कहकर राजू की मा एक गिलास में पानी ले पाई। उसने रहा, "प्राप मुंह धरा ऊपर कीजिए । मैं थोड़ा-थोडा पानी पापके मुह में डाल देती हूं।" राज के ताऊजी बहुत कमजोर हो गए थे। पानी पीने पर ऐमा लगा कि मानो उन्हें बहुत प्राराम मिला हो । सारा शरीर चेचक के दानों से भर गया था। बातचीत करने में भी उन्हें तकलीफ हो रही थी। राजू की मा ने पूछा, "क्या बाजार से मापके लिए कुछ दूप मोर फल सादू, खाएंगे ?" राजू के ताऊ जी की प्रासें भर माई। कहने लगे, "यहू, तुम भी भला थयों प्राई हो ? इस रोग के रोगी के पास भला कोई प्राता है ?" राजू की मा ने कहा, "देखती हूं कि आपके लिए थोड़े-में दूध का इन्तजाम कर पाती हूं कि नहीं।" "तुम पैसे कहां से लामोगी? मेरे रपये-पैसे सभी तो तुम्हारी जेठानी के पास ही रहते थे। वह शायद सारे रुपये-प में लेकर चली गई है।" राजू की मां ने पाहा, "मेरे पास रपये हैं । मैं अभी दूध पोर फल ले माती हूं।" राजू के ताऊ जी ने कहा, "भला तुम ही मेरे लिए इतना क्यो करोगी, वह ? मैंने तो तुम लोगों पर बहुत अत्याचार किए हैं । मैंने तुम लोगों का चूल्हा-चौका अलग कर दिया था मोर उसके बाद मैंने तुम लोगों को घर से बाहर निकाल दिया था। तुम क्या सोचती हो कि मुझे मेरे पापों को सजा नही मिलेगी?" हम पाकर रघुनाथ के 153 तो तुम उसके बाद कुछ रुककर उन्होंने कहा, "और फिर देखो बहू, जिनकी बातों में पाकर मैंने तुम लोगों पर इतने जुल्म ढाए, वे सभी मुझे विपत्ति के मुंह में अकेला छोड़कर चले गए हैं । और तुम हो कि नाज मुझे बचाने आई हो !" "पाप शान्त रहिए। आपको तकलीफ होगी:: "तकलीफ ? मेरी तकलीफों की बात कर रही हो? लेकिन मैंने भी लोगों को क्या कम तकलीफें दी हैं, बोलो तो?" राजू की मां ने कहा, "आप थोड़ी देर इन्तजार कीजिए। मैं अभी आपके लिए दुकान से थोड़ा-सा दूध ले पाती हूं।" यह कहकर राजू की मां रसोईघर से एक कटोरा लेकर बाहर निकल गई। रास्ते के मोड़ पर ही एक बड़ी मिठाई की दुकान थी। उसने वहां से पाव-भर दूध खरीदा और फिर एक फल की दुकान से एक नारंगी ली। उसके पास जो दस रुपये थे, उन्हीं रुपयों से दूध और फल खरीदकर वह अपने जेठ जी के घर लौटी। दरवाजा खोलने या बन्द करने के लिए भी कोई श्रादमी नहीं था। चोर या डकैत--कोई भी जब चाहे भीतर घुस सकते थे। पर उन्हें रोकने वाला भी कोन था ? राजू के ताऊ जी ने, राजू की मां के आने की आहट पाकर पाखें खोल दी। उन्होंने पूछा, "कौन है ?" राजू की मां ने कहा, "मैं आपके लिए नारंगी लाई हूं। थोड़ा-सा नारंगी का रस पी लीजिए। उसके बाद थोड़ा दूध ले लीजिएगा।" "तुम्हें रुपये कहां से मिले बहू ? तुम्हारे पंसों से लाई हुई चीज़ क्या मैं खाऊंगा? क्या यह भी मेरी किस्मत में लिखा था ?" राजू की मां ने कहा, "पाप ज़रा मुंह खोलिए।" राजू के ताऊ जी ने कहा, "नहीं, मैं हगिज़ मुंह नहीं खोलूंगा । मैं न तो नारंगी का रस पिऊंगा और न ही दूध ।" - 54/ हम चाकर रघुनाथ के मा ने कहा, "लेकिन साए वगर माप बचेंगे कैसे ?" ताऊ जी ने कहा, "मुझे अव जिन्दा रहने की इच्छा नहीं है बहू । जो मेरे अपने थे, जिन्हें में सबसे बढ़कर अपना मानता था, वे ही जब मुझे विपनि के समय अकेला छोड़कर चले गए हैं और सारे रपये-पमे अपने साथ ले गए हैं, तो फिर मैं जिन्दा रहकर क्या करूंगा बहू ? अब किसके लिए इस घर-संसार की माया में अटका रहूं? उन लोगों के कारण मैंने तुम लोगो की कितनी बेइजती तक की है।" मा ने कहा, "छोड़िए भी, उन सब बातो को प्रभी रहने दीजिए। माप जरा मुंह खोलिए तो।" बहुत प्रारजू-मिन्नतो के वाद ताऊजी ने मुंह खोला। मां ने उनके मुंह में थोड़ा-सा नारंगी का रस डाल दिया। उसके बाद फिर मुंह खोलने पर उमने ताऊ जी को एक कप दूध पिला दिया । इमी तरह रोज चल रहा था। रोज ही मा दिन-रात जाग-जागकर ताऊ जी की सेवा करती। एक दिन ताऊ जी ने पूछा, "अच्छा बहू, तुम जो मेरी इतनी सेवा कर रही हो; परन्तु यह तो बताभो कि तुम कब खाती हो, क्या साती हो?" मां ने कहा, "मैं ठहगे एक विधवा पौरत । मेरी तो निराहार रहने की पादत है। इस बात की मापको चिन्ता-फिक्र करने की जरूरत नहीं।" "मोर राजू ? तुम्हारा लडका?" "वह उसी जेलेपाड़ा की झोपड़ी में है।" "उम घर का किराया कितना लगता है ?" 'वह तो मिट्टी को झोपड़ी है और उसका छप्पर पुवाल से बना हुमा है। प्रोर फिर नल का पानी भी वहा नहीं है। सिर्फ पास ही में एक बड़ा तालाब है । सभी लोग यही नहाते-घोते हैं।" हम चाकर रघुनाथ के /55 "किराया कितना लगता है, यह बताओ न?" "वीस रुपये।" "वीस रुपये भाडाचुकाने पर तुम गृहस्थी कैसे चला पाती हो? खाने- पीने के खर्च के अलावा राजू की स्कूल-फीस का भी तो खर्च है !" मां ने कहा, "राजू की फीस माफ है। राजेन भइया से हेडमास्टर साहब के नाम एक दरख्वास्त लिखवाकर दी थी। हेडमास्टर साहब ने राजू की फीस माफ कर दी है।" "और तुम जो इस समय जी-जान से मेरी सेवा कर रही हो। इस समय राजू की देखभाल कौन करता है ? वह क्या खाता-पीता है ?" मां ने कहा, "अपने लिए वह खुद भात पका लेता है।" "क्या वह खुद खाना पकाता है ?" मां ने कहा, "वह एक समय खाना पकाता है और दोनों समय वही भात खा लेता है। मैं उसके पास पचास रुपये रख आई हूं।" "और तुम जो मेरे लिए नारंगी और दूध खरीदकर ले पाई हो, उसके लिए पैसे कहां से पाए ?" मां ने कोई जवाब नहीं दिया । ताऊ जी बोले, "बहू, मेरे सवाल का जवाव दो। बतानो, तुम्हें रुपये कहां से मिले ?" फिर भी मां ने कुछ भी कहना पसन्द नहीं किया । ताऊ जी का शरीर कमजोर हो गया था। बातचीत करने में बड़ी तकलीफ हो रही थी। फिर भी वे बार-बार जिद करने लगे, "बतायो बहू। मेरे खानदान की बहू होकर तुम्हें दूसरों के घरों में महरी का काम करना पड़ रहा है, यह मैंने सुना है । लेकिन एक साथ तुम्हें इतने रुपये कहां से मिले ?" मां ने कहा, "मेरे पास गहने-वहने तो कुछ थे नहीं। सिर्फ मेरे हाथ में 56/ हम चाकर रघुनाथ के

।
सोने का एक छोटा तावीज था। उसे ही बेचने पर साठ रुपये मिले थे।
मैंने दस रुपये प्रपने पास रख लिए थे। उन्हीं रुपयो से मैं दूध मोर नारंगी
सरीदकर लाई हूं।"
ताऊ जी ने सारी बातें चुपचाप मुनी। कुछ देर तक दोनो मे से किसी
ने भी कुछ न कहा। थोड़ी देर बाद उनकी पाखो मे टप-टप मामू टपरने
लगे।
मां ने धीरे-धीरे ताऊ जी के प्रांसू पोछ दिए।
उसके बाद उसने कहा, "पाप रो क्यो रहे हैं ? इस तरह रोने मे नो
अापकी तबीयत और भी खराव हो जाएगी।"
"देखो यहू, मैं और ज्यादा दिनों तक शिन्दा रह गा नहीं। लेकिन तुम्हें
तो मालूम है कि यह छूत का रोग है। छून कसे होने की वजह से ही
तुम्हारी जेठानी विनोद को माथ लेकर अपने में बनी गई है। और
तुम
पराई होकर भी और यह छूत का रोग है -
ह'
भीगे इतनी
सेवा कर रही हो । क्या तुम समझनी हा टस न पा गा"
उसके बाद उन्होंने थोडा दम कि
बाद टीने पूछा,
"तुम्हारे राजन भइया तो वरील है -
मां ने कहा, "हा।"
"कैसे प्रादमी है वे"
"मादमी खूब यदिदा है 777 में पाते है।
एक पैसा भी नहीं लेते। म मन में बाट
और ममता है।"
ताऊ जी ने पूछा, टुनटारमा
मेरे पास ला सकोसी कट्टरवाट "
"किसलिए मार बन्द हुन,
"मैंने कहा न कि इस मा।

छूत के रोगी के घर पाएंगे?" मां ने कहा, "मैं एक बार कहकर देखूगी।" "तुम उनसे कहना कि जो कुछ भी फीस लगेगी, मैं दूंगा। मेरे मर जाने पर इस सम्पत्ति से वे अपना प्राप्य पा सकेंगे।" मां ने कहा, "मैं उनसे कहूंगी।" "तुम एक बार इसी समय चली जायो। और ज्यादा देर मत करो। जाने के वक्त दरवाजे पर बाहर से ताला लगाती जाना। नहीं तो कुत्ते- बिल्ली और चोर-डकैत, कोई भी घर के भीतर घुस सकते हैं।" मां ने कहा, "ग्राप कहते हैं तो जा रही हूं।" उसके बाद कुछ रुककर मां ने फिर कहा, "मैं जाऊंगी और तुरंत लौट आऊंगी। इस बीच आप उठकर बैठने की कोशिश मत कीजिएगा। राजेन भइया इस समय तक शायद कचहरी से लौट आए होंगे।" DO हर रोज की तरह उस दिन भी गजू घर पर लैम्प जलाकर पढ़ने बैठा था। सुबह उसने खाना पकाकर रखा था । उमी मे ने थोड़ा-मा भात उमने गत को रख दिया था। उसकी फाइनल परीक्षा भी बिलकुल करीब थी। इस परीक्षा में यदि उमका अच्छा रिजल्ट ना तो जिस तरह मन का नाम गंगन होगा, उसी तरह वह खुद भी बहुत-सी मुविधाएं पा मयेगा। उसे छात्रवृनि मिल सकती है, स्कूल की तरफ से पदक भी मिल सकता है। विव में भी उसकी फीम माफ हो सकती है। अचानक ग्रागन में किमी के चलने की अावाज सुनते ही उसने देखा विमा ग्रा रही थी। उसने पूछा, "मां, तुम ?" । । 58 , हम चाकर रघुनाथ के मां ने कहा, "मैं तेरे राजेन मामा के पास जा रही थी। इसीलिए मैंने सोचा कि एक बार तुझे देख जाऊं। साना-पीना ठीक चल रहा है न? अाज तूने क्या पकाया था?" राजू ने जवाब दिया, "भात"] भात मे ही एक प्रालू डाल दिया या। नमक-तेल देकर मैंने भालू का मुरता बना लिया और उसी के साथ भात पा लिया। और तुमने क्या खाया है मां ?" "मैं ? मेरी वात छोड़ दे। तेरे ताऊ जी की हालत बहुत खराब है रे। उनकी देसभाल करते-करते मैं अपना साना-पीना तक भूल गई हूं।" राजू ने पूछा, "सो राजेन मामा के पास क्यो जा रही हो?" "तेरे साऊजी ने उन्हें एक बार बुलाया है । मैं उन्हें बुलाकर ले जाने के लिए ही माई हूं। रास्ते मे अचानक तेरी बात याद मा गई । इसी- लिए तुझे देखने के लिए मैं चली माई हूं।" राग ने कहा, "तुम एक बार ताई जी को खवर तो कर दो मा। ताई जी के माने पर तुम्हें थोड़ा माराम मिलेगा।" मां ने कहा, "नही रे, जब तक तेरे ताऊ जी को यह बीमारी रहेगी, तब तक ताई जी इस घर में नहीं पाएगी। यह रोग छुवाछून का रोग है न, इसीलिए।" "लेकिन तुम ? तुम जो ताऊ जी को छूती हो। तुम्हे भी तो यह रोग हो सकता है।" मा ने कहा, "सिर के ऊपर भगवान तो मौजूद है। उमी पर पूरा भरोसा है । और फिर मैं तो एक विधया पौरन है। मैं मर भी जाऊ तो क्या है ? जैसा मेरा जीना, वैमा मेरा मरना । मेरे लिए जीना-मरना सय वरावर है।" राजू ने कहा, "मा, तुम ऐसी बातें मत किया करो। ये बातें मुनकर मुझे बहुत तकलीफ होती है।" हम चाकर रघुनाथ के /59 मां ने कहा, "मेरी तरह तू भी भगवान पर भरोसा रखा कर। देखना, सब ठीक हो जाएगा।" "मां, तुम कुछ खायोगी क्या ?" "क्या खाऊंगी? क्या घर में कुछ है भी?" राजू ने कहा, "मुड़ी है। मैं आज दुकान से मुड़ी खरीदकर लाया था। कुछ मैंने खा ली है और कुछ रख दी है कल के लिए । वह मुड़ी तुम्हें दूं क्या !" मां ने कहा, “दे दे। कल तू फिर मुड़ी खरीद लेना ! तेरे पास रुपये तो हैं न?" "हां, तुम्हीं ने तो मेरे पास पचास रुपये रख दिए थे। उन रुपयों में से सिर्फ चार रुपये खर्च हुए हैं, वाकी रुपये बचे हुए हैं।" मां ने कहा, "छोड़, मुड़ी देने की जरूरत नहीं। बल्कि तू अपने पास के रुपयों में से मुझे दस रुपये दे दे। मेरे पास जो दस रुपये थे, वे सभी खर्च हो गए हैं । मेरा हाथ अभी विलकुल खाली है।" राजू ने कहा, 'मुड़ी की जगह मेरा पानी दिया हुअा भात है। वहीं खा लो।" "तो फिर तू क्या खाएगा?" राजू ने कहा, "मेरे लिए तो बस एक रात की ही बात है । एक रात अगर न भी खाऊं, तो क्या होगा? नहीं तो आज मुड़ी ही खाकर काम 'चला लूंगा।" मां ने कहा, "तो फिर मुझे मुड़ी ही दे दे।" राजू ने कांसे की एक तश्तरी में अपनी मां को मुड़ी दी। मां ने कहा, "तश्तरी की मुड़ी मेरे अांचल में डाल दे। तेरी तश्तरी मैं छुऊंगी नहीं। दे, डाल दे अांचल में मैं मरूं या वचूं, यह बड़ी बात नहीं है । तेरे जिन्दा रहने से ही मेरी सारी साध पूरी हो जाएगी।" । 60/ हम चाकर रघुनाथ के

नमानी मां के भांवत में मुही डाल दी।
मा ने कई दिनों से कुछ भी नहीं सावा या। पोड़ी-सी मुहीमाकर
उन्हें वही तृप्ति अनुभव हुई।
उनके बाद उसने कहा, "अपने पास के सों में में मुझे दर
सदे दे दे। पता देना।"
राडूने मना ने दम सर्व मानीना के मांचन में डाल दिए। मां
ने मावन की माने दांत्र लिए।सके बाद उसने कहा, "जा
रही हूं मुन्ने, तु होमिवार रहता । चारों तरह यही रोग फैल रहा है।"
पह रहकर मांगन पार करनां बाहर रास्ते पर चली गई।
-
na
राडू के राजन माना पाती राजेन्द्रनाय सरकार दे खुद कमी करे,
इसलिए भार इदने ना होने पर भी उन्होंने गरीबों के दुःख-द
चोदना नहीं दिया। कोर्ट-कचहरी और मुवक्किनों के बीच बन्द
रहने के बावजूद का निते ही दोन-दुखियों की मदद करते। इस
दह ने मार दे किली मुक्किन को निहारतुद पाउदी देबिन
पौर लिए ही में मुकदनविदा देते। लेकिन सूबमा देने पर
वे सचमुच के मारियों का मुकदमा पत्ते हाय में नहीं हैं। कहने
"उस समय का दुइ कार नहीं था, उदनं ऐशयार किया?
मैं तुम्हारे निरनी नहीं कर सका।"
और निर राव की मां, बहात महिला को मिल सकता
मदद करके दे सुश होवे।
वन्होंने ना कि रात कोदाई ने उन्हें घर

तव उन्होंने राजू की मां से कहा था, "तुमने घर क्यों छोड़ा राजू की • मां ? उस समय क्या मुझे तुम एक वार बता नहीं सकती थी ? मैं उस समय कोर्ट में तुम्हारे जेठ के नाम एक मुकदमा ठोक देता।" राजू की मां को वह बात अभी तक याद है। राजेन भइया ने फिर कहा था, "तुम्हारा एक भी पैसा खर्च नहीं होगा । मैं खुद तुम्हारे जेठ को कोर्ट में खींच लाऊंगा और उसे नेस्त- नाबूद करके छोड़ दूंगा।" राजू की मां ने कहा था, "आदमियों के कोर्ट में में कोई फरियाद करना नहीं चाहती राजेन भइया । भगवान के कोर्ट में एक दिन इसका ठीक-ठीक न्याय होगा ही।" सो अाज इतने दिनों के बाद भगवान के कोर्ट में ही इसका फैसला होने का दिन आ गया । अव राजू के ताऊ जी ने समझ लिया था कि अगर राजू की मां न पाती, तो क्या होता ! मुंह में एक बूंद पानी तक डालने वाला कोई नहीं था। राजेन्द्रनाथ सरकार उस तरह के एडवोकेटों में से थे, जो रुपयों के बजाय गरीबों के दुःख-दर्दो को ज्यादा मूल्य देते हैं । उस दिन राजेन भइया को घेरकर वहुत-से मुवक्किल बैठे हुए थे। राजू की मां को देखते ही उन्होंने कहा, “क्या बात है राजू की मां ? तुम्हारी ऐसी हालत कैसे हो गई है ? कैसी सूरत बना रखी है . तुमने ?" राजू की मां ने कहा, "राजू के ताऊ जी की मरने की-सी हालत हो गई है । मैं ही इतने दिनों से उनकी सेवा-सुश्रूपा कर रही हूं।" राजेन मइया ने कहा, "तुम्हारे राजू के मुंह से मैं सब कुछ सुन चुका हूं। सो तुमने तो यही चाहा था कि भगवान के कोर्ट में ही तुम्हारे जेठ जी के मुकदमे का फैसला हो, मनुष्यों के कोर्ट में नहीं।" 62/ हम चाकर रघुनाथ के राजू की मां ने कहा, "नहीं भइया, अपनी समझ मे तो मैंने कभी- किसी का बुरा चाहा नहीं। मैंने कमी नहीं चाहा कि किसी को ऐमा रोग हो जाए।" "तो फिर तुम न तो प्रादमी के कोर्ट का न्याय चाहती हो और न फिर भगवान के कोर्ट का ही । तो फिर तुम प्रासिर चाहती मा हो, यही बता दो।" राजू की मा ने जवाब दिया, "मैं यही चाहती हूं कि मेरे जेट जी स्वस्थ हो जाएं।" "यह वात तो प्रच्छी ही है। मैं तो तुमसे यह नहीं कह रहा था। मैं तो यही कहना चाहता था कि पापी को उसके पाप को सजा मिलनी ही चाहिए।" राजू की मां ने कहा, "मैं यह भी नहीं चाहती, मइया।" "तो फिर तुम चाहती क्या हो?" "मैं चाहती है कि वे स्वस्थ हो जाएं । वे कितनी नकलीफ पा रहे है, यह आंखो से देखा नहीं जा सकता। इसीलिए में भगवान में प्रार्थना करती है कि है भगवान्, तू मेरे जेठ जी को चगा कर दे। न तो में किमी को 'गप की सजा दिलवाना चाहती हू और न ही मैं चाहती हूं कि किमी मुकदमे का फैसला हो।" राजेन मइया ने पूछा, "तो इस समय तुम मेरे पास ययो पाई हो?" राजू की मा ने कहा, "राजू के ताऊ जी ने पापको बुलवाया है। प्राप मेहरवानी करके एक वार वहा चलिए। उन्होंने मुझसे बार-बार कहा है कि मैं आपको लेकर ही माऊं।" राजेन भइया ने कहा, "मैं क्या उस चेचक के रोगी के घर पर जाऊंगा? अाखिर क्यो ? प्राप्पिर क्यो बुलाया है उन्होंने मुझे? पहले हम चाकर रघुनाथ के/63 - - यह तो बतायो।" राजू की मां ने कहा, "उन्होंने यह तो मुझे बताया नहीं। ऐसा लगता है कि वे आपसे कुछ कहना चाहते हैं। आप वकील हैं । हो सकता कि वे अपनी आखिरी बात आपको बता जाना चाहते हों।" राजेन मइया ने कहा, "मैं जा सकता हूं, लेकिन सिर्फ तुम्हारी बात रखने के लिए। तुम्हारा इसमें अगर कुछ भला हो, तो यही सोच- कर मैं जा सकता हूं।" राज की मां ने कहा, "मेरा और क्या भला होगा मइया ? जिस दिन में विधवा हो गई, उसी दिन मैंने समझ लिया कि एक भगवान के सिवाय और कोई भी मेरा भला नहीं कर सकता है।" गजेन भइया ने कहा, "भगवान तो खुद किमी का मला नहीं करना । वह किसी को भेज दिया करता है, जो पाकर मला करके चला जाना है। चलो, चलें..." दूसरे मुवक्किलों को बैठा छोडकर गजेन भइया उठ बडे हुए। उन्होंने कहा, "आप लोग थोडा इन्तजार कीजिए, मैं अभी लौट ग्राता - । हूं।" यह कहकर राजेन मइया मां के माथ चल पड़े। राज की मा प्राग-पागे चलने लगी और उसके पीछे-पीछे चलने लगे गजन बाव। घर के पाम पाकर मा ने मदर दरवाजे का ताला खोला। फिर वहान बनी जला दी। उसने कहा, 'ग्राहा गजेन मइया, भीतर 64 हम चाकर रघुनाथ के है-4

ग्राहए।"
जिस कमरे में राजू के ताऊ जी सोये हुए थे, उसकी बत्ती पहले
जल रही थी। राजू के ताऊ जी विष्टौने पर वेमुध पड़े थे। फिर
माने को प्रावाज सुनकर वे अपनी पाखें मलने लगे।
राजू को मा अपने जेठ जी के पास जाकर पुकारने लगी, "
भाई साहब, कौन पाए हैं। पाखें सोलिए."
सामने राजेन बाबू को देसने पर ताऊ जी की आखों से ग्रामू निक
लगे।
राजेन वावू ने पूछा, "क्या हुअा है अापको?"
राजू के ताऊ जी कहने लगे, "मैं अब और यचूगा नही राजेन व
इसीलिए मैंने आपको एक बार बुलवाया है।"
राजेन वावू ने कहा,
क्या कर सकता हूं? अब माप भगवान
नाम लीजिए। यदि प्रापको कोई बचा सकता है, तो भगवान ही
सस्ता है।"
राजू के ताऊ जी ने कहा, “आप मुझे प्रापार बचाएं, इसके
मैंने आपको नहीं बुलवाया है राजेन धावू । पाप सिर्फ मेरा कुछ इन्त
कर दीजिए । मैं एक वसीयतनामा तैयार करवाना चाहता हूं।"
"वसीयतनामा?"
"हा, मैं अब और ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रहूंगा। मैं म
सारी सम्पत्ति का वसीयतनामा तैयार करवाकर जाना चाहता हूं
कुछ करना है, पाप कर डालिए राजेन बाबू । जरा जल्दी कीजिएगा
मेरे जाने का वक्त बहुत ही करीब भा गया है।"
"किसके नाम वसीयतनामा तयार करता है ?"
राजू के ताऊ जी ने कहा, "राजू के नाम।"
राजेन वावू ने कहा, "लेकिन रावती नावालिग है।"

राजू के ताऊजी ने कहा, "राजू जव तक बालिग न हो जाए, तब तक उसकी विधवा मां अभिभावक की हैसियत से देखभाल करेगी। जरा जल्दी कीजिएगा राजेन वावू । मेरी आयु अव और अधिक दिनों तक की नहीं है।" राजेन बाबू ने पूछा, "पीर आपकी पत्नी और आपका नाबालिग लड़का।" - "उन्हें मैं कुछ भी नहीं दूंगा, राजेन वावू । इतने दिनों से मैं उन्हें अपना समझता था। उन्हीं के कारण मैंने अपने छोटे भाई की स्त्री को और अपने भतीजे को इस घर से बाहर निकाल दिया था। क्या मेरे उन पापों का कोई प्रायश्चित हो सकता है ?" कहकर ताऊ जी फूट-फूट कर रोने लगे। राजेन वावू ने कहा, "आप रो क्यों रहे हैं ?" राजू के ताऊ जी ने कहा, "रोऊंगा नहीं क्या ? क्या कह रहे हैं आप ? मैं क्या पत्यर हूं कि मुझे रुलाई नहीं पाएगी? मैं बीमार हूं तो क्या आप सोचते हैं कि मैं कुछ भी देख नहीं पा रहा हूं? मेरे छोटे भाई की विधवा स्त्री मेरी जो सेवा कर रही है, मैं वह नहीं देख पा रहा हूं क्या ? और फिर आप ही उससे पूछिए न कि मैंने राजू के ऊपर और उसके ऊपर कितने अत्याचार किए हैं ! जिनकी वजह से मैंने राजू और उसकी मां पर अत्याचार किए, वे ही मुझे छोड़कर चले गए हैं । और जिस पर मैंने अत्याचार किए हैं, वह मेरे लिए क्या नहीं कर रही है ! मैं तो खुद अपनी आंखों से देख रहा हूं, राजेन वावू । बहून तो रात में सो पाती है और न ही दिन में खाने-पीने का ठिकाना है। यादमी बहुत पुण्य करने पर रोग के समय इतनी सेवा-सुधूपा पाता है। पर मेरे जैसे पापी को इतनी सेवा क्योंकर मिल रही है ?" राजेन वायू बोले, "तो फिर ठीक है। मैं उसी तरह कागज-पत्र तैयार । 66/ हम चाकर रघुनाथ के पर डालूंगा 1 लेकिन बाद में माप अपना विचार बदलेंगे तो नहीं ?" "नहीं, हगिज नहीं । मैं अपना विचार बदलने दाला नहीं। अगर मेरी पत्नी भी मेरे पैर पकड कर गिड़गिड़ाए, तो भी मैं प्रपना निर्णय नहीं बदलूंगा।" राजेन भइया वहा और अधिक देर तक रके नहीं। उन्होंने कहा, "तो फिर आपका नाम-टिकाना में राजू की मा के पास गे ले लूंगा। लेफिन बैंक में प्रापके कितने रपये हैं, मुझे यह जानकारी भी चाहिए । पौर फिर इसके अलावा और कोई सम्पत्ति हो, तो मैं उसकी भी जानकारी हासिल करना चाहता हूं।" राजू के ताऊ जी बोले, "पोर कही भी मेरा कोई मकान या जमीन- जायदाद नहीं है। मेरे जो कुछ भी थोडे-मे रपये बैंक में जमा हैं, उन्हें भी मैं राजू के नाम कर जाना चाहता हूं। साफ-माफ लिख दीजिएगा। माप इस तरह वसीयतनामा नयार कर दीजिए कि मेरे मरने के बाद को सम्पत्ति मिलने में किसी तरह का गोलमाल न हो।" राजेन भइया ने कहा, "ठीक है । लेकिन जब भापकी पत्नी लौटकर पाएगी, तब मुझे बदनाम तो नहीं करेगी !" राजू के ताऊ जी ने कहा, "उसके लिए कह दीजिएगा कि मैं ही जिम्मेवार है । कह दीजिएगा कि मैंने अपनी इच्छा में प्रापगे यमीपत- नामा तैयार करने के लिए कहा था। जितनी भी जल्दी हो सके, पाप यह काम कर डालिए। मैं और ज्यादा दिनों तक जिन्दा रहने वाला नहीं हूं। पाप तो मेरी हालत देय ही रहे हैं।" राजेन भक्ष्या ने कहा, "तो फिर में प्रव चलता है।" राडू के ताऊ जी ने कहा, "ठीक है, लेकिन मेहरबानी करके वमीयत- नामा जल्दी तैयार कीजिएगा। मैं प्रय मोर जिन्दा नहीं बचूगा । जिन्दा रहने को मय कोई ख्वाहिस भी नहीं रही।" - - हम चाकर रपनाथ के167

। भइया के घर से निकलने के साथ ही मां भी
होंने पीछे से पुकारा, "यो राजेन भइया ।"
जन भइया रुक गए। उन्होंने कहा, "मुझे बुला रही हो राजू की
राजू की मां ने कहा, "मुझे बड़ा डर लग रहा है भइया।"
राजेन भइया ने पूछा, "क्यों ? तुम्हें डर किस बात का है ?"
राजू की मां ने कहा, "यदि वे घर-मकान, जमीन-जायदाद और
प-पैसे सब कुछ मेरे राजू के नाम कर जाएंगे तो फिर क्या होगा?
। जेठानी जी जब आएंगी, तब मैं उन्हें अपना मुंह भी कैसे दिखा
ऊंगी?"
"क्यों, तुम्हें शमिन्दगी किस बात की होगी ? तुम ज़ोर-ज़बर्दस्ती
जमीन-जायदाद तो हड़प नहीं रही हो। राजू के ताऊ जी अगर अपनी
मर्जी में तुम लोगों को सब कुछ दे जा रहे हैं, तो इसमें तुम्हें डरने की
क्या ज़रूरत है ?"
राजू की मां ने कहा, "लेकिन भगवान तो सब कुछ देख रहा है । मैं
उसको क्या जवाब
राजेन भइया ने कहा, "इसमें भला भगवान को क्यों खींच रही हो
राजू की मां? तुम तो जानती ही हो कि भगवान जो कुछ भी करता है,
वह सभी भले के लिए ही करता है।"
"लेकिन मइया, पूरा मकान तो हमारा अकेले का नहीं है। प्राधा
मकान मिलने पर मैं भले ही ले सकती हूं।"
"देखो, मैं एक वकील हूं। वे जब अपनी मर्जी से सब कुछ तुम
लोगों को देकर जाना चाहते हैं तो कानून
में सव पर तुम
लोगों
का हक हो जाएगा । समझ लो कि यही परम पिता परमेश्वर की इच्छ
है। नहीं तो ठीक इसी समय तुम्हारी जेठानी जी अपने लड़के को सा
दूंगी ?"
की नज़र
के
68/हम चाकर रघुनाथ

मकर ने माप कसा सोई है ? विसतिरे पर जोमाने बीनार पनि रोहवरमान मापरे चनो गर उपमा मनुदरहा जा नाता है मगर नुन भरने के जी को देख भाल न करनी तो उन्हें निपार पा चुने नोचार मा जाते। पारिरहगेमाने नहरनडरर दम तोड देने। मरने के वस उन्हें जो कुछ मेवा-सुषमा मिल रही है. यह भी उनके दिमी पिटने पुरमा पन है। इनमें तुम कोईमापति मत करो।" कर रहकर राजेन बाबू चने गए। उनके घर पर उन मगर मुर. विकल बैठे हुए थे। भोर देर तक स्कना उनरे लिए संभव नहीं था। जाते वक्त वे गडू को मा में पड़ गए, "तुम पिसी दिन मम निराल- पर गाम के वक्त मेरे पाम पाना । समभी?" गजेन बाबू के बाद राजू की मा को न जाने का भी नि यह गुद खेलेपाड़ा की तरफ चलने लगी। जैसेपाटा मुहल्ले में उस समय हरेक घर में घूहा मुनगाया गया पा चारों तरफ घुमा हो घुमा या । इतना सादा धुमा फि राइको मो मी भाग जतने लगी। उसके बाद अपने घर के प्रांगन में जाकर उसने देगा कि वहा घुमा भरा हुमा था। भी माफ दिगाई नही पड़ रहा था। घर के बरामदे में लालटेन जलाफर रात पड़ने पंठा था। पपानफ मा को माया देसकर वह ताज्जुब में पड़ गया। उसने पूछा, "मो, तुम तुम इस समय कैसे भा गई ? ताऊ जी कैसे है ?" राजू बरामदे से उठकर अपनी मां के पास पला पाया था। मा ने कहा, "मेरे पास तू मत मा । मैं रोगी पे पास से माई है। इस गमय मुझे मत छूना।" हम धाकर रघुनाथ के 169

उसके बाद उसने पूछा, "तेरी पढ़ाई-लिखाई कैसी चल रही है ?
राजू ने जवाब दिया, "पढ़ाई ठीक ही चल रही है। जहां मैं समझ
नहीं पाता हूं, उसे राजेन मामा के पास जाकर समझ लेता हूं।"
मां ने कहा, "देख मुन्ने, जरा मन लगाकर पढ़ाई किया कर । देख,
ऐसा न हो कि मैं मुंह दिखाने लायक न रहूं।"
ने कहा, "मां मैं तो पूरी कोशिश कर रहा हूं ।"
"हाय राम, तेरी थाली-कटोरी सव तो जूठी ही पड़ी हुई है। क्या
इन्हें तूने साफ नहीं किया ?"
राजू ने कहा, "पहले यह किताव पढ़कर समाप्त कर लूं। उसके
वाद भात खाने के पहले वर्तन साफ कर लूंगा, तुम किसी बात की
फिक्र मत करो।"
मां ने कहा, "उस घर में रहने पर भी हरदम तेरी ही बातें सोचती
रहती हूं रे ! लेकिन वहां तेरे ताऊ जी को उस हालत में छोड़कर आ
भी नहीं सकती। क्या जाने कव वेचारे दुनिया से कूच कर जाएं, कौन
कह सकता है ?"
उसके बाद कुछ रुककर मां ने फिर कहा, "तो फिर मैं जिस काम
से यहां आई हूं, वही बताती हूं। क्या तू कल समय निकाल कर एक
जगह जा सकेगा?"
"कहां मां?"
मां ने कहा, "विनोद की ननिहाल में...!"
"विनोद की ननिहाल में ?"
"हां विनोद की ननिहाल तो तू पहचानता है न ?"
राजू ने कहा, "हां, काफी दिनों पहले बचपन में मैं एक बार गया
था। वहीं श्यामवाज़ार में ही तो?"
.
70/हम चाफर रघुनाथ
के

मा ने कहा, "ताई जी के पास जाकर सबर दे देना कि ताऊ जी बीमार हैं। बीमारी बहुत बढ़ गई है। मगर भागिरी मुलाकात करने की इच्छा हो तो वे पा जाएं । मुझे उनकी हालत ठीक नहीं लग अपनी मा की बातें सुनकर राजू ने कहा, "धे मव नही पाएंगे मा। फिर उन्हें झूठ-मूठ बुलाने में क्या फायदा?" मा ने कहा, "देव वेदे, मासिरी समय सभी अपने लोगों को देखना चाहते हैं। वे लोग अपना कत्तंव्य सुद करेंगे। लेकिन हमे तो सपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए।" राजू ने पूछा, "वे लोग अगर मुझे अपमानित कर भगा दें तो?" "अगर भगा देंगे तो भगा देंगे, लेकिन बाद में प्रगर वे ताना मारेंगी कि इतनी बडी विपत्ति में तुमने एक बार सवर तक नहीं भेजी, तब क्या होगा? उम समय में क्या जवाब दूगी ? उस समय मैं क्या कैफियत पेश कहंगी?" उसके बाद उसने फिर कहा, "मोर एक उरूरी बात है। तेरे ताऊजी मभी क्या कह रहे हैं, जानता है ? वे कह रहे हैं कि वे घर-मकान, जमीन-जायदाद, रपये पैसे सब कुछ तेरे नाम कर जाएंगे । इगीलिए तो तेरे ताऊ जी ने राजेन मामा को बुलवाया था।" राजू ने पूछा, "मोर विनोद ? क्या ताऊ जी विनोद को कुछ नहीं दे जाएगे?" मा ने कहा, "नही । इसीलिए तो मैं तुझे उनके पास सबर देने के लिए भेज रही हूं। कल मुबह भात पकाकर तू श्यामबाजार चला जाना। उसके बाद लौटने परतू भात सा लेना।" राजू ने कहा, "लेकिन प्रगर ताऊजी सारी सम्पत्ति हमे देकर जाना चाहते हैं तो उन लोगों को इसकी गवर देने मे क्या फायदा होगा? हम हम चाकर रघुनाय 171 लोग तो जोर-जबर्दस्ती ताऊ जी से सम्पत्ति अपने नाम लिखवा नहीं रहे हैं।" मां ने कहा, "छि:, परायी सम्पत्ति का लालच नहीं करते। भगवान ने जिसको जो कुछ दिया है, उसी में सन्तुष्ट रहना उचित है । क्या यह बात तुझे बतलानी पड़ेगी ?" "लेकिन अगर ताऊ जी सारी सम्पत्ति हमारे नाम लिख जाएं, तो क्या हम वह सम्पत्ति लेंगे नहीं ?" मां ने कहा, "नहीं, हगिज़ नहीं लेंगे। ऐसा करने पर भगवान नाराज हो जाएगा।" "लेकिन मेरे पिताजी का हिस्सा भी तो है उस मकान में । वह हिस्सा तो हम पाएंगे न ? वह हिस्सा तो हमें मिलना उचित है।" मां ने कहा, "देख वेटे, वहस न कर । हर समय यह बात गांठ में बांधे रहा कर कि भगवान जो कुछ भी करता है, अच्छा ही करता है । उस घर से एक दिन उन्होंने हमें निकाल दिया था, तो क्या हम मामला-मुकदमा करने गए थे ? राजेन भइया ने तो कितनी ही बार मुकदमा ठोक देने की बात कही थी। लेकिन मैंने क्या राजेन भइया की बात मानी, जब कि इस मुकदमे में हमारा एक पैसा भी खर्च नहीं होता।" मां की बात राजू ने जीवन में कभी भी काटी नहीं थी इसीलिए वह मां ने राजू को चुप देखकर कहा, "वे लोग अगर हमें उस घर से निकाल नहीं देते तो क्या तुम इतना कष्ट झेलने की आदत बना पाते ? कष्ट सहने पर ही कृष्ण मिलते हैं, यह जानते हो न? कष्ट सहने के कारण ही प्रत्येक वार तुम इम्तहान में अव्वल आते हो । तुम जितनी ही तकलीफें उठायोगे, उतनी ही तकलीफ सहने की तुम्हारी क्षमता बढ़ेगी। विनोद की तरह मौज-मस्ती में अगर तुम रहते, तो तुम्हारी हालत भी 72/हम चाकर रघुनाथ के माने विनोद जैसी होती। इसीलिए तो भगवान दुप-कष्ट देकर हमारी परीक्षा लिया करता है। मगवान देखता है कि दुःस के समय हम भगवान में अपना विश्वास कायम रस पाते हैं या नहीं। समझे ?" राजू अपनी मां की सारी बातें चुपचाप सुनता रहा । पहा. "मैं प्रब चलती हूं। तेरे ताऊ जी प्रकेसे हैं। इननी देर तक शायद वे मैले बिछौने पर पडे कराह रहे होंग प्रौर वार-बार मुझे पुकार रहे होंगे।" राजू ने पूटा, "मां, पौर कितने दिनो तक तुम इस तरह पाए-पिए बिना चला पामोगी?" मा ने कहा, "जब तक भगवान की इच्छा होगी।" "लेकिन तुम्हारा परीर तो टूटा जा रहा है मां।" मां और फिर रकी नहीं। उमे बहुत-में काम करने हैं । दिन-भर में दसौं वार उसे अपने जेठ जी का विस्तर वदलना पड़ता है। जेठ जी के मैले कपडो को मावुन से साफ करना पडता है । भीगे कपडो को मुगाना पडता है । रोगी यो मेवा करना क्या प्रासान काम है ! उसके बाद है उन्हे सिलाना। यह भी यहाटेढा काम है। ताऊ जी किसी भी तरह गाना पाहेगे ही नहीं। इस रोग में इलाज का कोई भारी रार्च नहीं है, यह बात सच है। फिर भी पश्य तो करना ही पड़ता है । इसलिए रात में नीद माने पर भी बार-बार उटना पडता है। राजू के ताऊ जी मिर्फ पुकारते, "वहू, मो बहू।" बहू भट-पट उठ बंटती और पूछती, "मुझे कुछ यह रहे है क्या ?" राजू मे ताऊ जी कहते, "कहा, मैंने तो तुम्हें बुछ भी नही पहा ।" सो हो सकता है। शायद राजू की मा न कुछ भूल में मुना हो। पा फिर यह मपना ही देख रही हो। एक बार फिर रोगीशी घादर ठीर कर मां पर्श पर फिर से सोने की कोशिश करने लगती। हम पाकर रघुनाथ के 173

काफी दिनों पहले बचपन में राजू विनोद के मामा के घर गया था! इतने
दिनों के बाद फिर रास्ता देखते-पहचानते उस जगह जाना था। श्याम
बाज़ार कोई नज़दीक तो है नहीं। घर के सामने पहुंचकर राजू पुकारने
लगा, "विनोद, गोविनोद...... !"
भीतर से किसी औरत की आवाज़ आई, "कौन है ? कौन विनोद
को बुला रहा है ?"
राज ने कहा, "मैं राजू हूं।"
साथ ही साथ सदर दरवाजा खुल गया। राजू ने देखा कि सामने
ताई जी खड़ी थीं। राजू ने ताई जी के पैर छूकर उन्हें प्रणाम किया ।
और पूछा, "ताई जी, आप अच्छी तो हैं न ?'
"हां"। लेकिन तू यहां क्यों आया है ?"
इसी बीच घर के भीतर से विनोद भी बाहर आ गया। विनोद ने
पूछा, "क्या है राजू, तू कब आया ?"
राजू ने जावाव दिया, "मां ने मुझे भेजा है। मां ने आपके लिए
एक खवर भेजी है। ताऊ जी बेहद बीमार हैं । बीमारी काफी बढ़ चुकी
है। लगता है कि ताऊ जी और ज्यादा दिनों तक बच नहीं सकेंगे। मां ने
आप लोगों को वहां एक बार चलने के लिए कहा है।"
"तेरी मां ? तेरी मां तो जेलेपाड़ा के मुहल्ले में रहती है न ? तुम ।
लोगों को यह खबर कैसे मिली कि ताऊ जी वीमार हैं ?"
राजू ने कहा, "मुहल्ले के लोगों ने ही हमें खबर दी थी।"
विनोद की मां ने कहा, "तो क्या तेरी मां खुद एक वार जाकर
तेरे ताऊ जी को नहीं देख सकती थी? उसने बस तुझे मेरे पास खवर
देने के लिए भेज दिया !"
राजू ने कहा, "मेरी मां ही तो पिछले पन्द्रह दिनों से ताऊ जी की
सेवा-सुथूपा कर रही है।"
...
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74/ हम चाकर रघुनाथ के

"तेरी मां?" "तेरी मां को हमने घर से निकाल दिया mrat घर के भीतर कदम रखने की हिम्गरा मरो की परभीतर मागे की इजाजत किसने दी है, जरा मुझे भी सो गागो!" ने कहा, "इजाजत कौन देता? गुणगे गोगों पाकर मा खुद वहाँ गई थी। यह जो यहो गई, उसके पाद ही . "मा वही रह गई है ? तुम लोग मागिर फिरा grimurt: भीतर गए हो, यह तो यतानी ? यह पर गुग गोगों मारे गामा? हमारे घर में घुसने का तुम लोगों को हुमग पिगो दिया?" गजू ने कहा, "मैं तो पाप गोगों के घर भीतर गया गई।" "तो फिर तू कहा रहता है ?" "मैं तो अपनी जेलपाड़ा वाली मोगरी गमा।" "पौर तेरीमा?" मा ती दिन-गन नारीपरपरही!! Itram- जागकर नाऊजीको गया कर रही है। नारी का प्रतिम धामा है। मीनिामा में ग्राप मांगों को गुलवाया।" नानी ने कहा, "तेरी मा यही तीन? मोminा, तेगमा गोभी बह गंग होम व 17 माना के गेनी के. पाम भनागपाला? natinati नउदीर जाना चाहिय? गंग नगर है।" गदने बहा, "मेरिन मामा कालीप्रामा नात्री दयमावर करता?" कात्री ने कहा, "मतगई है। #मन #tim हनाकर रहार178 तेरी मां का मतलब क्या है ? उसने सोचा है कि इस विपत्ति के समय वह अपने जेठ जी से सारी सम्पत्ति अपने नाम लिखवा लेगी। मैं यह होने नहीं दूंगी। जाकर अपनी मां से कह देना कि उसके मंसूवे पूरे होने वाले नहीं । मैं ऐसा कभी नहीं होने दूंगी। तेरी मां अगर तेरे ताऊ जी से सारी सम्पत्ति अपने नाम लिखवा भी ले तो भी मैं देख लूंगी। मैं भी कोर्ट- कचहरी में जाना जानती हूं।" राजू ने कहा, "इसीलिए मैं कह रहा हूं कि आप एक दिन ताऊ जी को देखने के लिए चलिए। और फिर अगर जमीन-जायदाद पाने के लिए ही मां ताऊ जी की सेवा कर रही होती, तो वह मुझे आपके पास भेजती ही क्यों ?" विनोद ने कहा, "मां, पिताजी बहुत बीमार हैं। तुम एक बार वादामतल्ला चलो न !" ताई जी ने विनोद को बुरी तरह डांटा और कहा, "तू जरा रुक भी। तुझे बड़प्पन दिखाने की कोई जरूरत नहीं । हर बात में तू अपनी टांग क्यों अड़ाता है, वोल तो? मैं जो कुछ ठीक समझूगी, वही करूंगी।" राजू ने पूछा, "तो क्या आप जाएंगी नहीं ?" ताई जी ने कहा, "मैं जाऊंगी या नहीं, यह मैं देखूगी। वह मेरा घर है, मेरी गृहस्थी है--वहां तेरी मां क्यों गई है, पहले इस बात का जवाब दे।" राजू ने कहा, "मैं तो आपके घर में पैर रखने गया नहीं। मेरी मां ने आपके घर के भीतर कदम जरूर रखा है। मां के मामले में आप मुझे क्यों डांट रही हैं ? मैं चलता हूं। मुझे जो कुछ कहना था, कह चुका । अब आप जो कुछ उचित समझे, वही करें।" इसी समय एक बूढ़े सज्जन वहां या धमके। उन्होंने पूछा, "क्या हुआ है रे ? इतनी चीख-पुकार क्यों मचाई जा रही है ?" . 76/ हम चाकर रघुनाथ के नाईजी ने मारी बातें बताई। वे बूढे सज्जन शायद ताईजी के पिताजी । उन्होंने कहा, "देखो, ऐसे वक्त तुम लोगों का यहां माना टीर नहीं हुना । अब अगर ज़मीन-जायदाद हाथ मे निकल गई तो? जवाई बाबू अगर तेरे ऊपर नाराज होकर सारी जमीन-जायदाद तेरी देवरानी के नाम निय दे तो? फिर क्या होगा?" "जमीन-जयदाद क्या ऐसे ही हाय मे निकल जाएगी? तमामा है क्या कोर्ट-कचहरी नहीं है ? कानून नाम की कोई चीज नहीं क्या 7 है क्या?" तो उम मज्जन ने कहा, "देखो, प्रापिरी समय में तुम्हारा वहां मौजूद रहना उचित है । तेरी देवरानी बड़ी चालाक औरत है । हो सकता है कि वह सब कुछ अपने नाम लिखवा ले। कुछ भी कहा नहीं जा सकता । धन- सम्पत्ति के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है !" नाई जी ने कहा, "धावू जी, लेकिन आप तो समझ नहीं रहे हैं। उम रोग के रोगो के पास रहना क्या ठीक है ? अगर मुझे भी छूत का यह गेग हो गया तो? और विनोद को ही यदि यह रोग हो गया फिर क्या होगा?" "तो तुम चेचक का टीका लगवाकर चली जायो !" ताई जी ने कहा, "चेचक का टीका लगवाने के बावजूद भी क्तिनी ही वार चेचक निकल पाता है। मैंने सुद बहुतो को देखा है.....।" इसके बाद राजू फिर वहां और रुका नहीं । ताई जी को खवर देनी थी, मो वह खबर दे चुका था। वस उसका काम खत्म ! राजू ने घर लौटने के लिए फिर बड़े रास्ते की तरफ अपने कदम बढाए। हम चाकर रघनाय के/11 पास वस से उतरते ही मानो किसी ने पुकारा, "प्रो राजू... राजू ने पीछे मुड़कर देखा । वहां नन्दू खड़ा था। नन्दू ने पूछा, "क्या हां गया था तू ?" राजू ने जवाब दिया, "श्यामवाज़ार गया था, विनोद के मामा के ..!" "कौन विनोद ?" राजू ने जवाब दिया, "मेरे ताऊ जी का लड़का विनोद! पिछली वार वह फेल हो गया था। इस समय वह हम लोगों से एक क्लास नीचे पढ़ रहा नन्दू ने पूछा, "पढ़ाई कैसी चल रही है ?" राजू ने कहा, "पढ़ाई ठीक नहीं हो पा रही है। घर पर मा नही हैं न ! खुद ही खाना पकाना पड़ता है और वर्तन भी मांजने पड़ते है। और फिर बाज़ार से सौदा लाना, कपडे धोना, घर में झाडू देना-ये सभी काम मुझ अकेले को ही करने पड़ते हैं। मां के रहने पर मा ही मारे काम किया करती थी और मैं अपनी पढ़ाई में लगा रहता था।' "क्यो, कहा गई नेगमा ?" गज़ न कहा, "ताऊ जी बहन बीमार है। टमलिए उनकी देखभाल करने के लिए मा हम लोगों के पुराने घर पर ही रहती है। मैं अकेला जलपाटा की बस्ती में अपने घर पर रहता ह। बर.... तू कहा जा रहा ?" नन्द ने कहा, 'हम लोग सभी मिनेमा देखने जाएंगे। इसीलिा टिक. खरीदने के लिा लाइन में बडा होना पडेगा। क्या तु जागा गज न करा. नही भाई. मग मा नागज होगी।" "अरे भाई तुझे तो टिकट के पंग देने नही पड़ेंगे। ग्वब दिया पिर लगी है । नाच-गाना और मार-धाड मे भरी हई पिक्चर है। चल न. के 78 'हम चाकर रघुनाथ राजू बोला, "नहीं भाई "। मैंने कहा न कि मां नाराज होगी।" "अरे मा को पता ही कैसे चलेगा? तेरीमा तो तेरे ताऊ जी के घर राजू ने जवाब दिया, "पता नहीं चलने में क्या हमा? मैंने मा को वचन दिया है कि मैं दिन-भर पढ़ाई-लिखाई करता रहूंगा।" "अरे हम लोग तो साढे छह बजे तक घर तोट पाएंगे । मा को अगर पता चल भी जाए तो कह देना कि फुटबॉल खेलने के लिए मैदान चला गया था।" राजू ने कहा, "तो फिर यह तो झूठ बोलना होगा। मा के सामने मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं कभी भी झूठ नहीं बोलूगा। मा ने कहा है कि भूट बोलने के बराबर कोई पाप नहीं है।" "तेरी मा तो पुराने जमाने की औरत है, इसीलिए वह ऐमा वहा करती है। अाजकल तो सभी झूठ बोलते हैं । मुझे ही देख ले । मैं तो मगर मूठ बोलता है। यता तो, इसमें मेरा क्या बिगड़ गया है ?" राजू ने कहा, "देख भाई, तुम लोग बडे प्रादमी हो । तुम लोगों की बात ही अलग है। हम लोग तो तुम्हारी तरह वई प्रादमी हैं नही । हमारा मच बोलना ही ठीक है । इमी में भगवान सा रहता है । भगवान मुग होने पर हमारी भलाई करेगा। मा वहा करती है कि जिनका कोई नहीं है, उनका भगवान है।" नन्दू ने पहा, "देग रहा है कि मेरी 'भगवान-भगवान' को भय भी तक मिटी नहीं है। मैं तेरे भगवान को नहीं मानता। इससे भला मेग क्या बिगड़ गया है ?" राजू ने कहा, "नही भाई.."मा ने कहा है कि भगवान के बारे में वहस करना ठीक नही । किताबों में भी यही लिया है।" नन्द उमके बाद और रका नही। उमे मिनेमा की टिषट के लिए हम चाकर रघुनाय के/79 लाइन में जाकर खड़ा होना था। आखिरकार अगर टिकट नहीं मिली तो। नन्दू चला गया। राजू धीरे-धीरे ताऊ जी के घर की तरफ बढ़ने लगा। सुवह का उसका सारा समय बर्वाद हो गया था। अव तक वह काफी पढ़ाई कर सकता था। लेकिन पढ़ाई की कितनी भी वर्वादी क्यों न हो, मां की वात वह टाल नहीं सकता था। ताऊ जी के घर के सामने पाकर उसने सदर दरवाजे का कड़ा बजाना शुरू किया। उसने पुकारा, "मां, यो मां...!" भीतर से प्राकर मां ने दरवाजा खोल दिया। उसने पूछा, "क्या रे, क्या हुया ? श्यामवाज़ार गया था क्या ?" राजू ने जवाब दिया, "हां, वहीं से सीधा यहां आ रहा ।" "क्या ताई जी से मुलाकात हुई ?" "हां, तुमने जो कुछ कहने के लिए कहा था, मैंने कह दिया। लेकिन ताई जी ने कहा है कि छुवाछूत के रोग के रोगी के पास जाना ठीक नहीं। रोग ठीक हो जाने पर वे पाएंगी।" मां ने कहा, "तुमने यह क्यों नहीं कह दिया कि ताऊ जी और ज्यादा दिनों तक वचने वाले नहीं। आखिरी समय एक बार मुलाकात कर लेनी चाहिए...!" राजू ने कहा, "मैंने यह भी कह दिया था। तुमने जो कुछ कहने के लिए कहा था, मैंने सब कुछ कह दिया। ताई जी के पिताजी ने भी उनको यहां चले पाने के लिए बहुत समझाया। लेकिन ताई जी ने किसी की भी वात नहीं मानी।" मां बोली, "ठीक है। अगर वे न पाएं तो भला मैं क्या करूंगी और तू ही क्या करेगा! हमलोगों का फर्ज़ था खवर देने का, सो हमने खबर दे दी । अव जैसी उन लोगों की मर्जी !" - 80 / हम चाकर रघुनाथ के ह-5 । उनके बाद उसने कहा, "तू मय पर चला जा। माना-माना तो युध साया नहीं तूने"। तेरा माज कोई भी काम नहीं हुमा । पहाई-लिखाई भी प्राज हो नही पाई, जब कि परीक्षा इतनी नजदीक है।" राजू ने पूछा, "रात में एक बार पर मामोगी, मां?" "क्यों रे ? शायद अकेले-अकेले तुझे अच्छा नहीं राग रहा है न?" "अकेले अच्छा क्या लगेगा भता? हमेशा तुम्हारे साथ सोने की प्रादत हो गई है। अगर तुम प्रामोगी तो मैं तुम्हारे लिए भी भात पका- कर तैयार रस दूगा । तुम पांच मिनट मे सा-पीकर फिर लोट माना।" मां ने कहा, "मैं नही पा सकूँगो रे । तेरे ताऊ जी को हालत माग वहत बिगड़ गई है । में पांच मिनट के लिए भी नही मा सकूँगी । इसी- लिए तो मैंने तुझे ताई जी को बुला लाने के लिए यहा था।" राजू और क्या करता ! वह फिर जेलेपाडा की तरफ कदम याने लगा। "बहू"!"युदबुदाते हुए राजू के ताऊ जी ने पुकारा राजू की मां को शायद झपकी मा गई थी। अपने जेठ जीबी पायाज सुनते ही वह हड़बड़ाफर उठ बैठी। उसने पूछा, "प्यास लग गई क्या ? योड़ा पानी दूं...?" राजू के ताऊ जी ने पूछा, "तुमने तो राजू को पामपाचार भेजा था। क्या उन लोगो ने कोई खबर भेजी है ?" राजू की मां को कुछ न सूझा कि वह क्या जवाब दे ! ताऊ जी ने फिर पूछा, "यह क्या, तुम कुछ भी बोल नहीं रही हो? हम पाकर रपुनाप के/81 ग राजी-खुशी हैं न ?" राजू की मां बोली, "हां, राजू को मैंने भेजा था। वहां सभी अच्छी ह ही हैं।" "हां, वे सब भले-चंगे ही रहें ! इसीलिए तो वे लोग मुझे छोड़कर ले गए हैं। मैं महं या वचूं, इससे उनका कुछ बनता-विगड़ता नहीं । सर, जाने दो। भगवान उन्हें खुश रखे।" इसी समय दरवाजा खटखटाने की आवाज़ सुनाई पड़ी। राजू के ताऊ जी ने कहा, "मोह, शायद वे लोग आ गए हैं। एक बार देखो तो कौन है !" दरवाज़ा खोलने पर मां ने राजेन भडया को देखा। राजेन भइ कचहरी मे सीधे चले पाए थे। उन्होंने पूछा, "क्या खबर है ? तुम् जेठ जी की तबीयत आज कैसी है ?" राजू की मां ने कहा, "याइए भइया। सोच रही थी कि शायद आज की रात भी ये नहीं निकाल पाएंगे।" राजेन भइया ने कहा, "उनका वसीयतनामा बिलकुल तैयार करके ले आया हूं। क्या वे अपने हाथ मे वसीयतनामा लिम्व पाएंगे? अगर ऐसा हो सके, तो अच्छा होगा। नहीं तो आखिर में इसे लेकर तुम्हारी जेठानी जी मामला-मुकदमा कर सकती हैं।" "लेकिन वे तो अपने हाथों मे लिख नहीं पाएंगे। इतनी ताकन उनके गरीर में नहीं है।" "चलो, भीतर चलें । देखें, वे क्या कहते हैं।" घर के भीतर जाकर राजेन भइया सीधे वहीं गए, जहां ताऊ सोए हुए थे। उन्होंने पूछा, "इस समय आपकी तबीयत कमी है राजू के ताऊ जी ने पूछा, "मेरे वसीयतनामे का आपने क्या किय "उसी का मसविदा तैयार करके ले पाया हूं। अपने पाप हाथ । ?" :- . 1 82 / हम चाफर रघुनाथ के लिप पाएंगे क्या? क्यादा बडा नहीं है। प्राए मगर ने अपने हाथ में लिख पाएं, तो बहुत बढ़िया होगा। तो फिर इसे लेकर कोई मामला- मुकदमा नहीं कर सकेगा । प्रामिरकार प्रगर प्रापती पत्नी लौटकर रामू को मा पर मुकदमा करे तो?" राजू के ताज जी बोले, "मैं लिय मगा। लाइए, मैं कोगिन करना यह कहकर उन्होने अपना हाथ मागे बढा दिया। "पहले पाप मुन लीजिए कि मैंने क्या लिखा है !" यह कहार गजेन वायू न ममूचा ममविदा पढकर सुनाया। सीधी-मीधी बातें थी, संक्षेप में । पटकर गुनाने में ज्यादा समय नहीं लगा। उममे लिखा था, "मैं अपनी सारी चल-अचल सम्पनि मूव गोच- समझकर अपनी मर्जी में अपने स्वर्गवामी भाई के नाबालिग पुत्र राजू नाम लिख रहा हूं। जय तक वह नावालिग रहेगा, तब तक उनकी मा उगकी मम्पति की देखभाल करेगी।" राजेन भइया ने ताऊजी को एक सादा कागज दिया। फिर उन्होंने उन्हे अपनी कलम भी दी। ताऊजी ने काफी तकलीफ उठाकर चे सारी वातें पागज पर लिख दी और अपना दम्न-वत कर दिया। उसके बाद उन्होंने कहा, "इन रजिस्ट्री करने में जो भी पचं लगेगा, वह गजू की मा मापको दे पाएगो राजेन वायू । मैं तो इस समय उट नहीं मरना। माप मेहरबानी करके अपने पास से ही रपये वर्ष करके रजिस्ट्री करवा दीजिएगा । अापके रपये में अपनी घडी विकवाकर दे दूगा। माप कुछ फिक नहीं कीजिएगा। सोच नीजिएगा कि एक दरिद्र मादमी पर माने उपकार किया है।" रामेन वायू ने कागज-कलम वापिस लेकर कहा, "सो मापको मी हालत में यह सब मोचना नहीं चाहिए।"

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चंकार पोस्ट-मॉपिम में मेरे जोराने जमा. पोगामारी
जेठानी मपने माप से गई है। उसके पापिस पानेको र
कार है।"
मह कहार साऊथी हांफने सगे ।
राजू मी मा ने पहा, "पाप ये गय पात योग को
चुछ करना होगा, मैं बहंगी। पाप दस गमागोडा मागीली
लीजिए।"
राजू के साऊ जी ने माहा, "पप साय का पानी ?
गाही
तो तुमने नारंगी पा रग दिया गा। तुगमयों गुम गा गया.
की कोगिरा किया करती हो?"
राजू पी मो योनी, " गो पाय TTी पनीर पाही
।
"गो छोटो भी मेरे लिए तो मा intenturt
हैं। प्रापिर मेरे लिए गुमनाम पर ही हो?"
राज पी मा पम्पग ग राय का 1.
at
हाली लगी, परन्तु राय का पानी पीने MRI राम
का पानी गालो के कार यसरी गिगासगा।
उसके याद एकबारगी एक गापामांमी."
00
उम गमय गर बाकी हीरोया। गत मामाका frien
बंगामा | उमा बास गनी प्रान यही farm
जाार नेट गया।इटान नी मादीधावान गुमारी
हम ना MR

" "अरे राजू, । "अरे राजू। राजू, यो राजू।" झट-पट राजू विछौने से उठ पड़ा। दरवाजा खोलते ही उसने देखा. के बाहर मां खड़ी थी। तेरे ताऊजी का शरीर शान्त हो गया है।' राजू चौंक उठा । उसने कहा, "तो फिर?" "अभी तो उन्हें श्मशान ले जाना होगा । तेरे पास कुछ रुपये-पैसे हैं. कि नहीं? इस समय तो रुपयों की जरूरत पड़ेगी।" राजू ने कहा, "लेकिन इतनी रात में उन्हें कोन श्मशान ले जाएगा? मुझ अकेले से तो होगा नहीं } कम से कम और तीन प्रादमी तो चाहिए ही । इस समय क्या कोई चलने के लिए तैयार होगा?" राजू की मां ने कहा, ''अव जो तेरी मर्जी हो, वही कर। इस समय मुझे कुछ भी नहीं सूझ रहा है। मैं चलती हूं।" यह कहकर मां चली गई। गज ने कह तो दिया, लेकिन वह वहा का नहीं। दरवाजे पर नाला लगाकर वह भी बाहर निकल पडा । दम समय मब के मिर पर परीक्षा मवार थी ये समय में अपनी पढ़ाई-लिलाई छोड़कर भला कौन किसी चनक के योगी को इमान ले जाने के लिए तैयार होगा? रियर नाम ना कारत् समय है। दही नानी ने उन्हें कितनी नक- दी। शिन चे नव वाले म समाज को याद नही पा रही थी नसी मान हो गई थी, उनका अन्तिम मरकार तो करनाही होग। मनमा घणा. ग्राकोटा या क्रोध कुछ भी करना उचित नही। मानवागिर र भगवान तो ? । वही मात्र कष्ट देश रहा है। उमा भाग अादमी पार-ता का माग लखा-जोबा लिया या उमर गम भुला नहीं होती। वहीं ग्राग्विार हम लोगो का गला करेगा। म लोगो को चाहिए कि हम अादमी के साथ है । 26, हम नाकर ग्घुनाथ के.

प्रच्छा व्यवहार करें। मादमी के भीतर जो भगवान है, उसके प्रति श्रद्धा रसे। हम लोगो के दोस्त सरोज का घर सबसे नजदीक पा । गबगे पहले राजू उसी के पर पर गया। काफी पुकारने के बाद सरोज की नीद टूटी । उमने बाहर पाकर पूछा, "राजू तुम ? इतनी रात मे पाए हो...! माखिर बात क्या है राजू ने कहा, "मेरे ताऊ जी की मौत हो गई है भाई। दमशान चलने के लिए तुझे बुलाने पाया हू । तू चल सकेगा क्या ?" सरोज ने कहा, "तेरे ताऊजी गुजर गए क्या ? चलो, मच्छा ही हुप्रा । तेरे ताऊ जी ने तुम लोगो को जिस तरह तकलीफें दी थी, उसी तरह उन्हें फल भी मिल गया।" राजू ने कहा, "दुर, किसी मादमी के मर जाने के बाद उसके बारे में इस तरह की बातें नहीं करते । मौर फिर ताऊजी तो मेरे गुरुजन थे। गुरुजनो के बारे में ऐसी बात कहना ठीक नहीं।" "साक गुरुजन थे वे ! गुरुजन होने पर तो गुरुजन की भाति उन्हे व्ययहार करना चाहिए था। तुम लोगो के साथ क्या तुम्हारे ताऊ जी ने गुरजनो जैमा व्यवहार किया था? ताऊ जी मर गए, चलो पिण्ड छूटा।" राजू ने कहा, "भाई, ऐमी यातें मत करो । गुरुजनो को निन्दा नहीं करनी चाहिए। मेरी मा ने कहा है कि गुरुजनो के प्रति श्रद्धा रसनी पाहिए।" मरोज बोला, "उनकी बातें छोडो। उस पेचक के रोगी की लाश को लेकर मैं श्मशान में जाऊं, मेरी बना मे में नहीं जा सगा। तुम मौर किमीको लो।" हम चाकर रघुनाथ वे , 87

-
राजू निराश होकर लौट आया। उसके बाद वह रमेश के घर पर
गया। रमेश ने भी इंकार कर दिया। उसने कहा, "भाई, मैं श्मशान
नहीं जा पाऊंगा। मैंने बाबा तारकेश्वर का एक तावीज़ पहना है । इस
अवस्था में श्मशान जाना मना है।"
राजू वहां से भी लोट आया। अब वह कहां जाए ! उसे नन्दू की
याद आई।
नन्दू ने सारी बातें सुनने के बाद कहा, "तो फिर तूने ठीक ही कहा
था। सचमुच भगवान है तो सही। ताऊ जी ने जिस तरह तुम लोगों को
घर से खदेड़ दिया था, उस तरह उन्हें सजा भी मिल गई है। बूढ़ा जव
मर ही गया है, तब तेरे लिए उचित है कि तू काली-मन्दिर में जाकर
प्रसाद चढ़ा कर पाए
।"
राजू बोला, "नहीं भाई, वे मेरे अपने ताऊ जी हैं। उन्हें लेकर मुझे
श्मशान जाना ही पड़ेगा।"
"लेकिन तेरे ताऊ जी का लड़का विनोद कहां गया? उसे खबर
दे या न। उसीका तो वाप है, उसे तो सबसे पहले ट्मशान तक जाना
चाहिए।"
राजू बोला, "भाई, विनोद नही आएगा। उसकी मां ने मना कर
दिया है।"
नन्दू ने कहा, "ताऊ जी का अपना लडका ही नहीं जाएगा तो फिर
हम क्यो जाएंगे ? ने ताऊ जी के हम क्या लगते है ? हम लोग तो
पराा है।"
गन उसके बाद पीर कहीं भी नही गया। वह नाऊ जी के घर
लोट पाया।
उमन बाहर में
मा उम ममय ताऊ जी की लाग के पास बैठी थी। गज़ की
पुकाग, "मा !
88/हम चाकर रघुनाथ के

आवाज सुनकर वह बाहर पाई। उसने पूछा, "यह कमा, मोर लोग पहा हैं ?" राजू ने जवाब दिया, "मां, कोई भी माने के लिए राजी नहीं हुमा।" मा ने पूछा, "तो फिर क्या होगा?" राजू ने कहा, "सब ने कहा है कि विनोद को बुला लो।" मा ने कहा, "विनोद क्या माएगा भला? अगर वह माना चाहे. तो भी उसकी मा उमे माने नहीं देगी।" राज ने कहा, "तो फिर मैं मगान के पास में सटिया परोहकर लाता हूँ। प्रौर पमे देकर कुछ मादमी भी जुटा लूगा। पैसो के मोभ में बहुत मे प्रादमी मा जाएंगे।" "तो फिर ऐमा ही करो। मेरे पास तेरे ताऊ जी की घड़ी बेचने से मिले रुपये हैं । उन रपयों में से बीस रपये दे रही हूं, ले जा।" आखिरकार वहीं किया गया। वादामतल्ला से दसमान अधिक दर नहीं है । श्मशान के पास ही सटिया मिलती है । वहा भिसारियो का अड्डा है । वे लोग पसे पाने के लोभ में चले पाए । सिर्फ उन्हे में ही नहीं देने पड़े, मालूदम प्रौर परीछे भी खिलाने पड़े। लेकिन मारिखर में बीस रुपयों में काम नहीं निपट मका। मा मिलाकर चालीस रुपये सर्च हो गए। भिखारियों के माय राजू ने भी कंधा दिया । जव ताऊ जी वी लाश चिता पर रस दी गई, उन मनन राज की प्रांखें डबडबा पाई थी। ताऊ जी से अपने पुत्र के होते हर भी उसे ही मुखाग्नि देनी पडो। फिर तो उसकी भावों में मामूक न सरे । सारा क्रिया-कर्म राजू को ही करना पड़ा। लेकिन ताई जी तक खबर कौन पहनाएगा ? कहा, "तू ही चला जा बेटा तू मामबाडार जाहर नाई जी को खबर दे मा । नहीं तो प्रासिरकार दीदी कहेंगी रिपाली । माने हम चाकर रघुनाय के 89 जू या और मैंने उन्हें खबर तक नहीं दी।" को सारी रात जागना पड़ा था। सुबह श्मशान जाकर वाकी दूरे कर वह लोटा था। उसी हालत में खाली पैर, खाली बदन यामवाज़ार की तरफ चल पड़ा, ताईजी को यह खबर देने के लिए। राजेन भइया को भी सवेरे खबर मिली। खुद राजू की मां उन्हें खबर देने गई थी। उसने कहा, "अब में क्या करूं भइया ? मेरी जेठानी जी और उनका लड़का, कोई भी तो नहीं आया। मैं भला उस घर को छोड़कर अपने घर कैसे आऊंगी?" राजेन भइया बोले, "तुम वह घर क्यों छोड़ दोगी? जेलेपाड़ा वान्ने घर के लिए बीस रुपये भाडा देने की क्या ज़रूरत है ? तुम्हें तो मैं तुम्हारे जेठ जी का रजिस्ट्री किया हुअा वमीयतनामा दे चुका हूं। अब तो वह मकान तुम्हाग और तुम्हारे गज़ का है । तुम्हारे गज़ का है। तुम उमी मकान में रहोगी। यदि वे लोग तुम्हारे जेठ जी के मरने की ग्वबर पाकर पाएं ना भी तुम उस मकान में अपना दग्वल मत छोडना । कहना टम मकान तुम लोगो का कोई हक नहीं है। यह मकान हम लोगो का है।" मामा करना ठीक होगा भरया ?' र क्यों नही होगा - तुम्हारे जेटी मकान तुम लोगों के नाम जब गा है। उन्होन अपने हाथो वमीयतनामा लिया है और अपने हाथ म दस्तावन भी किया है। कोर्ट में वसीयतनामे की जिम्ट्री भी हो चु है। हम भला अपनी जेटानी जी की बात क्यों मुनोगी ?" यदि वे कहें कि मैन जोर-जबर्दम्नी अपने जेट जी मे लिग 91) हम नाकर रघुनाथ के लिया है, तब ?" राजेन भइया बोले, "तब तो फिर मैं हूं ही। उस समय जो युए 'करना होगा, मैं करूंगा। मुख्य बात यह है कि तुम मकान से अपना दाल मत छोड़ना.. और फिर उसके बाद भी यदि वे जबर्दस्ती तुममे मकान छुड़वा दें तो मुझे खवर देना । फिर कोर्ट-कचहरी में जो कुछ करना होगा, मैं करूंगा। उसके लिए तुम्हें किसी तरह की फिक्र करने की जरूरत नहीं।" राजू की मा वोली, "नही भइया, में यह सब नहीं कर गगी। चाई जान भले ही चली जाए, पर यह सब मुझ से नही होगा।" गजेन भइया ने कहा, "तो फिर सम्पत्ति तुम्हारे हायों से निकल जाएगी, यह कहे देता हूं।" "मम्पत्ति हाय में निकल जाती है तो निकल जाए ! सम्पत्ति के जाने पर कोई हर्ज नहीं । लेकिन पाप सिर्फ यही प्राचीर्वाद दीजिए कि हमारा गजू पढ़-लिसकर वडा प्रादमी बन सके । इतने दिनो तक वह भार ही की वजह से फट प्राता रहा है। इस वार उमकी प्राग्निरी परीक्षा है। इस परीक्षा में भी, देखिए, यह फन्ट हो।" "उमकी परीक्षा कर शुरू होगी ?" "परमो मे हो।" राजन भइया ने कहा, "इम वार भी तुम्हारा लड का फन्टं पाएगा, देख लेना । वह बहा तेज तडका है, उसे यादा समझाने को जमात नही पहनी । एक बार समभा देने पर ही वह अपना पाठ ममझ लेता । राजू की मा ने कहा, "मैं रात-दिन भगवान से यही विनती करती ह भइया कि मुझे न तो रुपये पंगे चाहिएं और न ही उमीन-जायदाद, तुम मिर्फ मेरे राजू को लायक प्रादमी बनाना । रूपये-पी मोर हम चाकर रघुनाथ के/91 । -- जमीन-जायदाद बहुत देख चुकी हूं, इस ज़िन्दगी में। यह सब चीजें जैसे आती हैं, वैसे ही चली भी जाती हैं। कितने ही लोग मेरी नजरों के सामने ही रातों-रात बड़े आदमी बन गए और फिर रातों-रात ही वे फकीर भी हो गए। आखिर में उन्हें घोर दुर्दशा झेलते हुए मर जाना पड़ा। मरने पर उनके अन्तिम संस्कार का खर्च भी नहीं जुट सका, यह भी मैंने देखा है। उन सब चीजों पर मेरा' कभी लोभ नहीं रहा । राजू के पिताजी कचहरी में मामूली-सा काम करते थे। लेकिन उन्होंने अपने जीवन में कभी भी घूस नहीं ली। वे कहा करते थे, 'मैं जहां काम करता हूं, वहां खूब घूस मिल सकती है। लेकिन राजू की बात सोचकर, राजू के भविष्य की बात सोचकर घूस नहीं ले सकता । सिर्फ यही सोचता हूं कि मेरे पाप का फल कहीं राजू को न भुगतना पड़े।" राजेन भइया बोले, "सो तुम जो कुछ ठीक समझो, वही करो। वसीयतनामा तुम्हें सौंप देना मेरा कर्तव्य था । वह कर्तव्य मैंने पूरा किया । अव जो कुछ तुम ठीक समझो, वही करो।" । -- राजू को फिर तो दिन और रात का होश नहीं था। सिर्फ पढ़ाई और पढ़ाई...! पढ़ाई के सिवाय उसे और कोई भी चिन्ता नहीं थी। कितनी ही बार वह खाना भी नहीं पकाता । राजू की मां ताऊजी के घर के सदर दरवाजे पर ताला लगाकर राजू के पास चली आई थी। अपने लड़के को अकेला छोड़कर वह कितने दिनों तक अपने जेठ जी के मकान में पड़ी रहती! राजू की मां ने पहले-पहल सोचा था कि उसके जेठजी की मौत की 92 | हम चाकर रघुनाथ के पवर मुनकर उसकी जेठानी जी अपने लडके के माय स्वामयाजार छोडकर वादामतल्ला चली आएंगी। लेविन सारे दिन इनकार करने भी जब वे लोग नहीं पाए, तब वह सीधी जेलेपाहा यस्तो फे अपने पर में चली आई। मा को देखकर राजू हैरान रह गया। उसने पूछा, "मा, तुम वर्षों बनी आई हो ? वह मकान तो अब हम लोगों का है।" मा ने कहा, "छिः छिः, ऐसी बातें नहीं करते । वह मकान अब भी तुम्हारी ताई जी का है।" गनू ने कहा, "लेकिन राजेन मामा ने तो मेरे नाम पर उस मकान का नमीयतनामा तैयार कर दिया है!" मा ने कहा, "ष्टिः, ऐमी वाते नहीं सोचनी चाहिएं। इस तरह लासच करना ठीक नहीं।" "लेकिन लालच की बात क्यों कह रही हो मा? जय ताऊत्री मकान मुझे दे गए हैं तो कानून के मुताविक हम लोग ही उस मवान के प्रधिकारी है।" मा ने कहा, "देव बेटे, सरकार के कानून से बढ़कर भी भौर एक कानून है । वह है भगवान का कानून ! भगवान का कानून सबसे घडा है। ताऊ जी ने गुस्से मे माकर मकान हमारे नाम पर लिरा दिया है। इसलिए हम लोगों के लिए उस मकान पर अपना हक समझना ठीक नहीं।" "तो फिर तुमने जो इतने दिनो तक बिना कुछ साये पिये ताकत्री की मेवा की, क्या उसका कोई मोल नहीं? उस समय तो विनोद मा विनोद की मां, कोई एक बार भी देखने के लिए नहीं माया| तो क्या हम लोग हमेशा-हमेशा के लिए इम गन्दी यस्ती में इस पुवात के छप्पर के नीचे ही पड़े रहेगे?" हम चाकर रघुनाथ के/93 - मां ने कहा, "भला कौन कह सकता है ? भगवान की कृपा होने पर भी एक दिन सुख मिलेगा । उस समय तुझे भी फिर इस तरह तक- क नहीं उठानी होगी। भगवान जिस पर कृपा करता है, पहले उसकी क्षा लेता है । यह वात जानते हो न?" वात पूरी हुई भी नहीं थी कि इसी बीच विनोद का हाथ थामे ताई तो वहां आ पहुंची। अपनी जेठानी जी को देखते ही मां रोने लगी। उसने कहा, "वहन, आपने बड़ी देर कर दी। और दो दिन पहले अगर आप आ जातीं, तो राजू के ताऊ जी को बड़ी शान्ति मिलती ! वे आप लोगों को देखकर जा पाते।" ताई जी ने कहा, "इन सब दिखावटी बातों को रहने दो। मैं तुमने पूछ रही हूं कि तुम मेरे मकान पर ताला कसे लगा पाई ? क्या तुमने समझ लिया कि हम लोग कभी लौटकर पाएंगे ही नहीं ?" मां ने कहा, "हाय राम, आप कैसी बातें कर रही हैं ? घर खुला रहने पर तो उसमें चोर-डकैत घुस जाते, इसीलिए मैंने ताला लगा दिया है।" "मेरे घर पर ताला लगाने का अधिकार तुम्हें कहां में मिल गया है, जरा में भी तो सुनें ! वह क्या तुम्हारा मकान है कि तुमने उसपर ताला लगा दिया ?" इस वार राजू अपने-आपको रोक नहीं पाया। उसने कहा, "हाँ वह मकान तो अव हमारा है। ताऊ जी वह मकान मेरे नाम लिख ग हैं।" "तू चुप रह तो! मरते हुए आदमी के हाथ से ज़ोर-जबर्दस्ती वसीय नामा तैयार करवा लिया गया है। क्या तुम सोचते हो कि मुझे इ खबर नहीं है ? मैं वहां बैठी-बैठी सारी खबर पा रही थी।" - 94/हम चाकर रघुनाथ के . "मैं कहती हूं कि मकान की चाबी मुझे दे, "उसके बाद राजू वी मा की और देगने हुए ताई जी ने कहा, "दो। जल्दी दो..." राजू को गुम्मा मा गया। कहा, "प्राप मा पर पयो झट-भटनागर हो रही है ? मैंने जव प्रापयो श्यामबाजार जाकर ताऊ जी की बीमारी को गवर दी, तब क्या प्रापन यहा प्राने की तकलीफ की ? मां थी, दनी वजह मे ताक जी को मरने के पहले थोड़ी मेवा मिल सकी।" ताई जी ने पहा, "परे तू तो बडा मिजाज दिपा रहा है ! एक तमाचा दूगी, तब पता चलेगा।" यह कहकर ताई जी मन नहीं रय मरी । उन्होंने प्रागे धडकर राजू के गाल पर एक तमाचा मारा। राजू को मा ने भट-पट प्रपने लड़के को अपने पाम पीन लिया और उमे अपने दोनों हाथो मे जकड कर पकट लिया ।मा ने कहा, "टि, बना गुरुजनो के माय ऐमी याने करनी चाहिएं ?" नाई जी ने कहा, "जगी मा है. यंमा हो लटका है । मा के पाम में उमे जमी शिक्षा मिली है, वमा ही तो वह बनेगा।" यहा, "लेकिन ताई जी ने मुझे क्यों मारा ? मैंने का गजू ने मा में कमूर किया है " मा ने गज को धीरज बघाना। यहा, "टि , गुरजनो मे ऐसी बातें नहीं पहनी चाहिए। जरा देय तो, भला विनोद ने परा मुझे धुछ भी यहा?" ताई जी ने मां की बाते मनमुनी करते हुए कहा, "पही है मेरे पर की चावी ? नलो, मुझे पावी दे-दो।" मा ने तुरत अपने मानल में चादी गोनपर, अपनी जेठानी जीवों मोपदी। राज एक प्रोर सुपचाप गडा था। उसने कहा, "मां, नुमने भावी हम पाकर रघुनाप के/95 मां राजू ताई जी ने अपने आंचल में चावी वांधते-बांधते कहा, "देगी नहीं तो करेगी क्या? क्या अपने पास रख लेगी? क्या अपने पास चावी रख लेने का हक है, तेरी मां का! श्रोह, इतना धमंड ?" यह कहकर ताई जी विनोद के साथ चली गई। राजू ने कहा, "मां!" मां खोई-खोई सी उस समय भी एकटक अपनी जेठानी के जाने की राह की तरफ देख रही थी। राजू ने कहा, "मां, तुम कुछ भी बोल क्यों नहीं रही हो? कुछ बोलो तो सही ! तुमने आखिर चाबी क्यों दी? उस घर से एक दिन उन लोगों ने हमें धक्का देकर निकाल दिया था, क्या यह तुम्हें याद नहीं ? बोलो न मां, तुम सब कुछ भूल गई क्या ?" हठात् को अपनी छाती से लगाकर रोने लगी। मां की आंखों में निकले आंसू टप-टप करके राजू के माथे पर गिरने लगे। मां ने रोते-रोते कहा, "भूल कैसे सकती हूं वेटा? मुझे सब कुछ याद है, मव कुछ याद है...। लेकिन...!" "लेकिन क्या ?" रोते-रोते कहा, "मैं अगर भूल भी जाऊं, तो भगवान को सब कुछ याद रहेगा । जिस दिन तू बड़ा होकर अपने पैसों से मकान बनवाएगा, उसी दिन के लिए मैं ज़िन्दा हूं बेटे। उसी दिन के इन्तजार में मैं उस समय का सारा अपमान भूली हुई हूं। मेरी उस पास को पूरा नहीं करेगा बेटे ?" राजू ने कहा, "तुम तो सिर्फ भगवान-भगवान रटती रहती हो । यदि सचमुच भगवान होता तो क्या हम लोगों को प्राज इतनी तकलीफें उठानी पड़ती ? भगवान तो कुछ भी देख नहीं पाता है ! यदि भगवान देख मां ने उसी तरह - - - 96/हम चाकर रघुनाथ के

पाता तो हम लोग भी गुरा से रहते । भाग उस परो माग में जाकर
रहते।"
मा ने पहा, "इस तरह सातव मा फरो। म
राणा
ठीक नहीं । अपनी कोगिनों से गुम यहें पगोगे और पानी कोष in
ही पक्का मकान बनवामोंगे। पायद भगवान की पही गीगी.
लिए शायद हम ताऊ जी याना ममान छोड़कर पणा माना ।
भगवान जो कुछ करता है, हमारी भलाई के लिए ही गागा
यह तुम्हे मालूम नहीं?"
राजू ने कहा, "सिर्फ
सुम भगवान-भगवान पीटगानी नगी
हो। और कोई नो इस तरह भगवान के नाम की गलामह MEI
मेरे दोन इमीलिए मुझे कितना पिढ़ाते हैं. पया तुम जानती हो?"
मां ने पहा, "ये गिटाते हैं तो पिठाए । गमिए मेंट
भी बुरा मन मानना । तुम गिमन गगाकर अपनी पारीका
, जामी।"
गन ने यहा, "मैं तो मन लगाकर ही पढ़ा।"
"हा. मी नाह मन मगाकर पदों रही। गीगे नगगन भर
प्रमन्न होगा।"
राज के पाम पोर बातें करना गमय नही था। वर, पानी नाय
कापिया लेकर पदने बैटगरा।
दम ममय राज थी परीक्षा परी दी। दीकिर mat
जगहों में वन मारने का काम शुरु सहितयार लिम
हन पाकर मनाय/97

.
करके वापिस लौटते ही वह अपने लड़के के इन्तजार में बरामदे में बैठी
रहती । राजू के आते ही वह उठ खड़ी होती । पूछती, "वेटे, आज परीक्षा
कैसी हुई है ? अच्छी तो हुई है ?"
राजू कहता, "क्या जाने मां!"
"सारे सवालों का जवाब तुमने लिखा तो है ना?"
राजू कहता, "हां, मां।"
मां कहती, "मैं भगवान से रोज़ प्रार्थना करती हूं कि हे भगवन्, मेरा
राजू अच्छी तरह परीक्षा में पास हो जाए । मेरा राजू मेरा नाम ऊंचा
कर सके !"
प्रत्येक दिन राजू परीक्षा देने जाता और घर लौटते ही फिर
वही सवाल उससे पूछा जाता, "अाज परीक्षा कैसी हुई है मुन्ने ?
अच्छी न।"
OD
उस दिन कचहरी से लौटते समय रास्ते में राजेन भइया से राजू की मां
की मुलाकात हो गई।
राजेन भइया ने कहा, "यह क्या राजू की मां, तुमने अपनी जेठानी
जी को उस घर की चाबी दे दी है ?"
राजू की मां ने कहा, "हां, भइया।"
"तुमने चाबी क्यों दे दी? वह मकान तो अब तुम लोगों का है।
यह मकान तो तुम्हारे जेठ जी तुम्हारे राजू के नाम लिख गए हैं।"
"छोड़िए भी भइयाभगवान तो सब कुछ देख रहा है।"
राजेन मइया ने कहा, "लेकिन अगर वसीयतनामे की बात छोड़ भी
98/हम चाफर रघुनाथ
के

दें, दोनो कम से कम मकान के मारे थप ५९ मा सो
भषिकार है। उत्त मा भाप पर तुम ना होती
हो?"
"उत्ते मी मगमान देख रहा है।"
राजेन मइसा ने कहा, "भगवान सत्र ५। देश Krite inf|
लेकिन फिर कोर्ट-कपहरी गौर धीमदिर its final
तुम कुछ भी फिट मत करो। मैं उन लोगो पर हा htiane
मुकदमा ठोक देता।"
राजू की मां ने माहा, "गो गाजीपमा
ठहरी एक भराहाय पोरत । TR HITी ?"
राजेन मइया ने कहा, "टीक हैnitinute
जो कुछ करना है, मैं ही महंगा।"
-
राजेन भच्या ने उग याद पाकिमा नाम 144
घर पर कोर्ट में एक समन पाया।
विनोद की मां गमन देताना mentinumti
अपने पिताजी के पाग पागवानी गरे।
विनोद के नाना नीबू पानी पीने वन-ARRITAMIL
में पानी जिन्दगीमागमा ना111111111
मुकदर किस यग सभी rinkinilm
उन्होंने कहा, "मुरी ARMIR1101
कांगदुन्दारे मसाला "
अपने मटर मार माह Emfandi"
हिाजीर"RAMInfattar
---

तुम्हें उनके पास रहना चाहिए था ! तुम्हारी देवरानी ने शायद सारी सम्पत्ति अपने नाम लिखवा ली है ! उसे ही सारी सम्पत्ति मिलेगी।" उसके बाद कुछ रुककर उन्होंने फिर कहा, "देखता हूं कि मैं क्या कर पाता हूं!" यह कहकर वे दौड़े-दौड़े वकील के घर पर परामर्श करने के लिए चले गए। उसके बाद कोर्ट में मुकदमा शुरू हुआ। राजू की ताई जी ने एक दिन राजू की मां को अपने पास बुल- वाया। राजू की मां के आते ही उन्होंने पूछा, "क्यों बहू, आखिर तुमने मेरे ऊपर मुकदमा कर ही दिया ? तुम क्या मुझे घर छुड़वाकर रास्ते पर बिठाना चाहती हो? तुम्हारा मिजाज क्या इतना बढ़ गया है क्या?" . राजू की मां ने कहा, "वहन, यदि मेरा मिजाज बढ़ गया होता, तो क्या मैं आपके बुलाने पर यहां आती ?" "तो फिर तुमने मुकदमा क्यों किया?" "मुकदमे के बारे में मैं कुछ भी नहीं जानती वहन । जो कुछ किया मेरे राजेन भइया ने ही किया है । मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं जानती।" "अच्छा बतायो तो, राजू के ताऊ जी राजू के नाम, क्या वसीयत- नामा कर गए हैं ? उस वसीयतनामे में क्या लिखा है ?" है, वह 100/ हम चाकर रघुनाथ के "वे अपनी सारी सम्पत्ति राजू के नाम लिख गए हैं।" "मायद तुमने उनमे जबर्दस्ती सारी सम्पत्ति राजू के नाम लिखवा ली है !" राजू की मां बोली, "बहन, मैं क्यों जबर्दस्ती लिखवा लेती? वे सुद ही अपने हाथों में सब कुछ लिख गए हैं। राजेन भझ्या को बुलवा- कर उन्होंने अपने हायों में लिखा है । मैंने उन्हें बहुत मना किया, फिर भी वे माने नहीं।" विनोद की मां ने कहा, "ये मब झूठी बातें हैं !" राजू की मा ने कहा, "मैं भगवान की कसम खाकर कहती हूं कि मैंने जो कुछ भी कहा है, सच कहा है । मैंने जरा भी झूठ नहीं कहा, ना ही कुछ बढा-चढ़ा कर प्राप को बताया है।" "तो फिर क्या चाहती हो? क्या तुम मुझम घर छुड़वानोगी ? क्या तुम मुझे दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर कर दोगी?" राजू की मां ने कहा, "दीदी, आप ऐसी बातें क्यों कर रही हैं ? मैंने तो ऐसा मपने में भी कभी नहीं सोचा । वरन् वात तो उल्टी ही..." "उल्टी वात कमी ?" "एक दिन तो आपने ही मुझमे घर छुडवा दिया और मुझे राम्ने की भिखारिन बना दिया! आप तो अपनी प्रायों से देख पाई हैं कि मैं किस तरह गरीबों के मुहल्ले में कितनी तकलीफें उठाकर अपने सड़क के माथ रह रही हूं। दूसरे के घरों में महरी का काम करके, मुझे अपने लड़के का पालन-पोषण करना पड़ रहा है।" "तो फिर तू मुकदमा उठा ले न !" राजू की मां बोली, "किन्तु राजेन भइया मुकदमा उठाने के लिए मना कर रहे हैं !" विनोद की मां ने कहा, "मैं सब कुछ ममम रही हूं। माग हम हम चाकर रघुनाथ के / 101 . पराये हो गए हैं और जाने कहां के राजेन भइया, तेरे लिए अपने आदमी बन गए हैं !" "लेकिन आप गुस्सा क्यों कर रही हैं ?" "गुस्सा नहीं आएगा क्या? तुमने सारी लाज-शरम को ताक पर रखकर, अपनी विधवा जेठानी पर मुकदमा कर दिया। सारे मुहल्ले के लोग तुम्हारे ऊपर हंस रहे हैं।" राजू की मां ने कहा, "जिस दिन आप लोगों ने हमें अलग कर दिया. था, मुझे अपने लड़के के साथ बाहर निकाल दिया था, उस दिन मुहल्ले का कोई भी आदमी मुझपर नहीं हंसा था। वरन् प्राप पर ही लोग थू-धू कर रहे थे ! उस दिन की बात शायद आपको याद नहीं । वह वात याद रखने की है भी नहीं ! वह वात किसी को भी याद न रहे ! जिस दिन मेरे जेठ जी को बीमार छोड़कर आप अपने मायके चली गई थीं, उस दिन भी कोई मुझपर नहीं हंसा था। वरन् सभी ने आपकी ऐसी कारस्तानी देखकर आप ही की निन्दा की थी।" विनोद की मां ने कहा, "मेरे बाप का घर था, इसीलिए मैं गई थी। मैं तो और किसी का खाने-पहनने गई नहीं। तो फिर किसने मेरी निन्दा की और किसने बड़ाई, इस बात से मेरा क्या आता-जाता है ?" राजू की मां ने कहा, "मुहल्ले के लोगों की बात का जिक्र तो मैंने शुरू नहीं किया है। आपने ही वह बात उठाई, इसीलिए मुझे कहना - पड़ा।" "मां!" ह्वात् राजू की आवाज सुनकर मां चौंक पड़ी। राजू कब अचानक चुपचाप घर में घुस आया था, इसकी किसी को भी खवर तक नहीं थी। मां ने पूछा, "क्यों राजू, तू कब आया ? क्या तेरी परीक्षा खत्म हो गई?" 102 / हम चाकर रघुनाथ के "हा, मा ! घर पर तुम्हे न पाकर मैंने समझ लिया कि तुम यहां आई हो।" राजू की मां ने कहा, "चल, घर चल । तुझे खाना देती है।" यह कहकर राजू की मां चलने लगी। ताई जी ने पीछे से पूछा, "तो फिर तुम मुकदमा वापस नही लोगी ?" राजू की मां ने कहा, "राजेन भइया गदि मुकदमा उठा लेने को कहैं, तो मैं मुकदमा उठा लूगी।" "और राजू के ताऊ जी का वसीयतनामा ?" "वह भी मेरे पाम पड़ा है।" ताई जी ने कहा, "अच्छा, ठीक है । देखूगी कि मैं क्या कर पाती हू!" अगर उस दिन राजू वहा न पहुंचा होता तो शायद बात काफी बढ जाती। लेकिन अच्छा ही हुप्रा । राजू को पाखिरी परीक्षा थी । वह सवेरे थोड़ा-सा भात खाकर गया था, इस समय उसे जोरो की भूख लग रही थी। इसलिए मां वहां फिर और रक नहीं पाई। मा ने राजू से पूछा, "हा रे, प्राज कमी परीक्षा हुई ? ठीक तो हुई है ?" राजू ने कहा, “क्या जाने मां, कैसी हुई है !" "लेकिन उस दिन तो राजेन भइया कह रहे थे कि तेरी परीक्षा खूब बढिया जा रही है।" राजू ने कहा, "राजेन मामा प्रश्न-पत्र हाय मे लेकर मुझसे पूछने लगे कि मैंने क्या-क्या उत्तर लिखा है और मैं बताता गया। उसके बाद राजेन मामा ने बताया कि मैंने बिलकुल सही उत्तर लिखा है।" "तो फिर तुझे सन्देह किस बात का हो रहा है ?" राजू ने जवाब दिया, "जब तक रिजल्ट नही निकल जाता, तब तक क्या कहा जा सकता है ?" हम चाकर रघुनाथ के / 103 यह कहकर वह मां के साथ-साथ चलने लगा। मां ने कहा, "तेरा रिजल्ट निकलने दे। मैं काली-मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर पाऊंगी। देख वेटा, मैं मुंह दिखाने लायक बची रहूं ! मुहल्ले के लोगों के बीच मेरा सम्मान बचा रहे !" परीक्षा समाप्त हो जाने के बाद हम लोगों में से, वहुत-से लड़के बाहर घूमने चले गए। लौटने पर मैंने सुना कि राजू स्कूल में फर्स्ट पाया था। सिर्फ यही नहीं, सरकार की तरफ से अच्छे छात्रों को जो छात्रवृत्ति मिलती है, वह भी राजू को मिली है। यह खवर सुनकर नन्दू ने कहा, "राजू तो छुपा रुस्तम निकला भाई। फोकट में फर्स्ट मार गया है..." हम लोगों ने पूछा, "ऐसा क्यों कह रहे हो ?" नन्दं ने कहा, "फोकट में न कहूं तो और क्या कहूं ? 'भगवान- भगवान' रट कर उसने ठीक अपना काम निकाल लिया।" पहले हम लोग राजू के बारे में आपस में बातें कर पानन्द उठाया करते थे । पर उस दिन हम हंस नहीं सके। हमें ऐसा महसूस हुआ कि राजू ही ठीक कहा करता था और हम लोग जो कुछ कहते थे, वह गलत था।" - उसके बाद हम लोगों की आपस में मुलाकातें ज्यादा नहीं हुई। जिसे जिस कॉलेज में दाखिला मिला, उसी में वह भर्ती हो गया। लेकिन राजू था छात्रवृत्ति पाने वाला लड़का। सरकार की तरफ से उसे प्रति माह पचहत्तर रुपये मिलते । कॉलेज में उसे फीस भी नहीं देनी पड़ती। वह 104 / हम चाकर रघुनाथ के विना किसी कोशिश-परवी के प्रेसिडेन्सी कॉलेज में दाखिला पा गया। और उसके बाद जब में और भी बड़ा हुआ, तब फिर किसी के साथ भी कोई सम्पर्क नही रहा। हम लोग सभी जीवन-संग्राम मे लडते घायल हुए जा रहे थे। नौकरी की कोशिश करते थे, पर नोकरी मिलती नहीं थी। दपतरों की खाक छानते फिरते थे हम । वाढ के पानी में पड़े तिनको की भांति हम लोग भी कहा बहे जा रहे थे, उसका कुछ अता-पता भी हमे नही था। 00 इस तरह कितने ही दिन बीत गए, इसका कुछ ख्याल नहीं। राजू जिस बस्ती में रहता था, उसे उजाडकर, वहां एक पन्द्रह-तल्ला बिल्डिग बनवाई गई थी। यह मैंने खुद देखा था। इसी बीच में पटना की सड़क पर पंदल चला जा रहा था कि प्रचा- नक मैंने देखा कि एक गाड़ी मेरे पास प्राकर रुक गई । और उस गाड़ी में से एक आदमी बाहर निकलकर मुझमे बोला, "अरे, तुम यहा कैसे ?" पहले-पहल मैं पहचान नहीं पाया। मैं अचकचा गया। मन में मन्देह हुा-यह कही राजू तो नही है! राजू ने मुझे दोनों हाथो से पकड़ लिया। राजू ने पूछा, "यहा तुम क्या कर रहे हो?" मैंने कहा, "मैं एक कन्ट्रैक्टर के पास नौकरी कर रहा हूँ। यहां एक इन तैयार हो रही है, उसे ही देखने आया हूं। आज रात की गाड़ी मे ही मैं लौट जाऊंगा। और तुम कहाँ हो ?" राजू ने कहा, "मेरी बदली कलकत्ता से पटना हो गई है। मैं यहां हम चाकर रघनाथ के 105 एजुकेशन सेक्रेटरी हू। आई० ० ए० एस० की परीक्षा पास करके अव धीरे- धीरे मैं इस पद पर पहुंच गया हूं।" मेरी तो मानो बोलती ही वन्द हो गई। कुछ देर तक एकटक मैं राजू की तरफ देखता रहा । उसके बाद मैंने राजू से कहा, "तुमने सचमुच हम सबका नाम रोशन किया है। अच्छा, बतायो तो, यह सब कैसे संभवः हुना ?" राजू ने कहा, "सब भगवान की कृपा से ही संभव हुआ है।" मैंने देखा कि राजू ठीक पहले-जैसा ही था। सिर्फ उसकी वेश-भूपा बदली थी। राजू हमारे दूसरे साथियों के बारे में पूछने लगा। मैंने कहा, "भाई राजू, किसी से भी अव मुलाकात ही नहीं होती। कौन कहां छिटक कर जा पड़ा है, पता नहीं।" कुछ रुककर मैंने फिर पूछा, "अच्छा राजू, आखिरकार तुम्हारी ताई जी वाले मुकदमे का क्या नतीजा निकला ?" राजू ने जवाब दिया, "ताऊ जी के वसीयतनामे को मां ने ताई जी के सामने ही फाड़ कर फेंक दिया। घर का अपना हिस्सा भी मां.ने ताई जी के नाम लिख दिया। मुझे उस समय नेशनल स्कालरशिप मिल चुकी थी। फिर हमें रुपयों की वैसी तंगी नहीं रह गई थी।" "और तुम्हारी ताई जी ?" राजू ने कहा, "ताई जी इस समय बड़ी तकलीफ में हैं । इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट ने ताऊ जी का मकान तुड़वा दिया और वहां रास्ता बना दिया । मुमावजे के रूप में जो रुपये मिले, उससे एक घर किराए पर लेकर 'ताई जी विनोद के साथ रहने लगीं। लेकिन विनोद वे सारे रुपये खा. गया। उसके बाद एक दिन शादी करके न जाने वह कहां गायव हो गया।" "तो फिर तुम्हारी ताई जी का अव गुज़ारा कैसे होता है ?" . 106 / हम चाकर रघुनाथ के - ܕ राजू ने कहा, "मैं हर महीने ताई जी के पास दो सौ रुपये भेजता हूं! उन्हीं रुपयों से वे किसी तरह अपना काम चलाती हैं । ताऊ जी तो पहले ही जा चुके थे और फिर विनोद ने भी उनकी देख-भाल नही की। उनमी देख-भाल करने के लिए उनके पास कोई नहीं है। दुर्गा-पूजा के समय में उन्हें कुछ कपड़े-लत्ते भी भेजता हूं। मां ने कह दिया है कि कुछ भी हो, मासिर वे हैं तो गुरुजन ही!" "और तुम्हारी मां? मा कैसी है ? कहां है ?" राजू ने कहा, "यहीं है, मेरे पास । उसके सिवाय और वह जाएगी भी कहा ? मा ने जिन्दगी भर मेरे लिए बहुत-मे कष्ट उठाए हैं । अब मैं जितना भी सभव हो पाता है, मां को सुखी करने की कोशिश करता हूं मां ही तो मेरे लिए सब कुछ है । दरअसल तुम लोग तो कोई भगवान पर विश्वास करते नहीं थे। मैं जव भगवान की बात छेड़ता, तब तुम लोग मेरा मजाक उडाया करते थे। लेकिन मैं तो भाई अव भी भगवान पर विश्वास करता है। सच पूछो तो भगवान जरूर है। वही सब कुछ है । हम लोग तो झूठ-मूठ मह मिया मिठू बना करते हैं।" उसके बाद कुछ रुककर राजू ने कहा, "अाज शाम को हमारे घर पर आयो न ।" मैंने कहा, "मुझे प्राज ही चले जाना होगा। आज और समय निकाल नही पाऊगा भाई। अगली बार पाने पर मैं ज़रूर तुमसे मिलूंगा।" उमके बाद राजू फिर अपनी गाडी मे बैठ गया। गाडी घुमा उडाती हुई पाखो मे ओझल हो गई। मैं खडा-खड़ा सोचने लगा, "सचमुच भगवान जरूर है। नहीं तो." अपने मुह

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Hum Chaker Raghunath Ke

Author
Mitra Vimal
Title
Hum Chaker Raghunath Ke
File name
Hum Chaker Raghunath Ke
Text
OCR done
Citation
1910
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
109
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
552151
Barcode
4990010032873.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
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utZUYcNf8y9
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