Adarsh Library, Jaipur

Sipah Salar Khan

Shrma Vishwamitra · 2011/03

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सिपहसालार
২লান
विश्वमित्र शर्मा

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तुम्हारी मेंट कहानियां किसी एक देश या किसी एक व्यक्ति को पाती नहीं। ये देश-देशान्तर में इस तरह व्यापक हैं जिस प्रकार जीवनाधार वायु । वायु जिम प्रकार स्वच्छन्द, बै-रोकटोक घूमती और सब स्यानों पर पहुंचती है, उसी प्रकार कहानियाँ भी वीज रूप में इधर-से उधर घूमतो, विचरण करतो और बच्चों-बूढ़ों सभी के मन को आल्लादित करती हुई एक स्थान मे दूसरे स्थान पर पहुँचती रहती हैं । जब ऐमी हालत हो तो बताइए कि इन कहानियों को मैं अपनी कैसे कहूँ ? प्यारे बच्चो ! यह तो तुम्हारी अपनी कहानियां हैं, और मुझे इस रूप में इन्हें तुम्हारे सामने पेग करते हुए बहुत ही सुशी हो रही है। उम्मीद है कि ये कहानियां तुम्हें पसन्द आएंगी और तुम्हारा मनोरंजन करेंगी। यदि ये रोचक सिद्ध हुई तो मैं अपनी भेट सफल मानेगा। विश्वमित्र शम .

कहानी-क्रम
१
१४
एक
दो
२४
३६
तीन
चार
४३
सिपहसालार खान
सोने का हाथी
दुःख का जादू
तलवार का जादू
कुत्ते की दुम : गंजे के नाखून
एक
सौ
एक कहानियाँ
सोने के जूते
और भूत भाग गया
पांच
५६
छः
७१
सात
८४
आठ

: एक:
सिपहसालार खान
राहीरमानदार
कादर्जी
एक दिन लोगों ने बगदाद के चौक में एक दर्जी
को बैठे देखा । एक टूटी हुई मशीन एक तख्ते पर रखे
बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। टूटी, घिसी हुई मशीन
को छोड़ उसके पास और कुछ न था। हां, एक बड़ा.

कहानी-क्रम
१
१४
.
२४
३६
एक
दो
तीन
चार
पांच
४६
सिपहसालार खान
सोने का हाथी
दुःख का जादू
तलवार का जादू
कुत्ते की दुम : गंजे के नाखून
एक सौ एक कहानियाँ
सोने के जूते
और भूत भाग गया
५६
७१
८४
सात
आठ

: एक.
सिपहसालार खान
एक दिन लोगों ने बगदाद के चौक में एक दर्जी
को बैठे देखा । एक टूटी हुई मशीन एक तख्ते पर रखे
बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। टूटी, पिसी हुई मशीन
को छोड़ उसके पास और कुछ न था । हां, एक बड़ा-

( २ )
सा वोर्ड उसने ज़रूर लगा रखा था। उस पर लिखा
था--- "शाही खानदान का दर्जी।"
सुबह लोग उधर से गुजरने लगे और उस बोर्ड
को देख हैरानी में पड़ने लगे । पर जव उसकी मशीन की
ओर देखते तो मुह बनाकर आगे चल देते । कुछ लड़के
आते और मुंह चिढ़ाते हुए चले जाते-अजी वाह,
क्या कहने शाही खानदान के दर्जी साहब के !
पर वह भी एक ही था कि किसी की परवाह किये
बिना अपना हुक्का गुड़गुड़ाता रहा। पर ज्यों-ज्यों
लोग अपने घर के कामों से फारिग होकर उधर से
गुजरते, तो उस नये और अनोखे दर्जी को देखकर खड़े
हो जाते । सब हैरान थे कि यह रातों-रात कहाँ से
गया। उस दिन बहुत से लड़के देर से मदरसे
पहुँचे; बहुत से वाबू काफी लेट अपने कामों पर
हाज़िर हुए । बहुत-सी दुकानों पर काम करने वाले
नौकर काफी देर से दुकानें खोल पाए । यानी दिन
निकलते-निकलते सारे वगदाद में उस नये दर्जी की
धूम मच गई। यानी सारे बगदाद को पता लग गया
कि नया दर्जी आ गया है, और शाम तक बगदाद के
आधे से ज्यादा लोगों ने उसे देख भी लिया।
एक दिन गुजरा, दो दिन गुजरै, शाही खानदान

का दर्जी उसी तरह बैठा हुक्का गुड़गुड़ाता मिलता।
न जाने कब टट्टी-फरागत को जाता, कव खाना पकाता,
और नहाता-धोता भी या नहीं। आखिर तीन दिन
वीत गये । दर्जी की खबर बगदाद के खलीफा को भी
हो गई। चौथे दिन सुबह एक बूढ़ा मौलवी तरस खा
कर आगे बढ़ा और बोला-"शाही खानदान के दर्जी
को सलाम करता हूँ।"
"वाले कुम सलाम ।" तीन-चार दिन से लगातार
हुक्का पीते रहने से उसका गला वहुत भारी हो गया
था और न सोने से आंखें सुर्ख अंगारे जैसी दीख रही
थीं।
"आप कहाँ से तशरीफ ला रहे है ?" वुड्ढे
मौलवी ने पूछा।
"मैं अभी सीधा विलायत से चला आ रहा हूँ।"
"विलायत ! कसी विलायत ? किस विलायत से
आ रहे हैं आप ?" वुड्ढे मौलवी ने हैरान होकर
पूछा।
"कैसे जाहिल लोग है यहां के ! इन को विलायत
का ही पता नहीं, तो कपड़े क्या सिलवाएंगे," गाही
खानदान का दर्जी बड़बड़ाया।
"खैर, जाने दीजिए। पर यह तो बताइए कि

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भी विना वक्त मुकरर किये बात नहीं करते थे । यहां
का तो बाबा आदम ही निराला है। मैंने तो बगदाद
की तारीफ सुनी थी कि यहां के लोग इल्मो-हुनर में
बहुत आगे बढ़ चुके हैं। उन्हें सब तरीके आते होगे,
पर यहां तो आप जैसे वुजुर्ग को भी बात करने का
तरीका मालूम नहीं। मैंने बहुत गलती की यहां
आकर," शाही खानदान का दर्जी भनभनाया।
"ऐसा मालूम पड़ता है मुझ से कुछ गुस्ताखी हो
गई । अच्छा मुआफ़ कीजिए, पर यह तो बताइये कि
आपको भूख तो लगी ही होगी? आप चार दिन से यहीं
बैठे हैं। चलिए, मेरे घर । खाना खाकर फिर यहीं
आ जाइए,” मौलवी ने आवभगत कें खयाल से कहा।
"मुझे अफसोस है कि आप लोगों को व्यापार
करने के उसूल भी नहीं आते । बगदाद में क्या सभी
गये रहते है ?"
"तो क्या आप व्यापार के तरीके बता सकते है ?"
"व्यापार का तरीका ?"
"हां।"
"च्यापार का पहला उमूल है कि अपनी दुकान पर
जमकर बैठो।"
"जमकर बैठने का यह मतलव तो नहीं

( ६ )
आदमी भूखा ही मर जाये ।
"यही तो आपको पता नहीं, मौलवी साहब !
ग्राहक और मौत का कुछ पता नहीं होता।" शाही
खानदान का दर्जी अब ज़रा मौज में आ गया था और
हँसकर बात कर रहा था।
"अच्छा तो आप ग्राहक और मौत का इन्तज़ार
कर रहे थे ?" मौलवी भी ज़रा हँसकर बोला।
"जाइए, आपको कोई कपड़ा. सिलवाना हो तो
बात कीजिए, वरना तशरीफ ले जाइए।"
"पर आप यह भी तो बताइए कि आप कपड़ा
किस फैशन का सीते हैं ? सिला हुआ कपड़ा तो आप
के पास है नहीं। दिल जमई कैसे हो ?"
"आप तो नाहक दिमाग चाट रहे हैं। आपको
पता होना चाहिये कि विलायत से ही सारे फैशन चलते
हैं और उनको चलाने वाला मैं ही शाही खानदान का
दर्जी हूँ । बगदाद का सौभाग्य समझो कि मैं यहाँ चला
आया, वरना पता होता कि यहाँ ऐसे जाहिल आदमी
हैं, तो मैं कभी न आता ।"
"अच्छा तो साहब आप जमकर बैठे रहिए ।
देखिये, कहीं हिलिए नहीं," मौलवी यह कहता हुआ
चल दिया।
?
-
-

शाही दर्जी को बैठे हुए आज चार दिन हो गये और उसके पास कोई.ग्राहक नहीं आया। अब उसके दिल में कुछ उदासी के खयाल आने लगे और उरो अपने काम से नफरत हो चली, और वह लेट गया । उसके मुह पर पपड़ी जम गई और मक्खियां भिन- भिनाने लगीं। हुक्का उसने एक ओर पटक दिया । दर्जी निढाल पड़ा था और मक्खियों ने उसे घेर लिया था। अब उसने सोचा कि इस तरह पड़े-पड़े भी काम न चलेगा। उठकर कुछ तिकड़म करनी चाहिये । उसने मक्खियों पर जोर का हाथ मारा तो देखा तीस मक्खियां मरी पड़ी हैं। बस, अब क्या था ! दर्जी के दिल मे बड़ा अनूठा खयाल आया। वह उठा और अपने थैले में से कपड़ा निकाल कर एक पेटी सीकर उस पर लिख दिया- "सिपहसालार खान उर्फ तीस मार खान ।" उसी वक्त उसने अपनी मगीन बेचने का इन्त- जाम किया। चार दीनार में मगीन विक गई। टेढ दीनार का एक मरियल सा खच्चर खरीदा और सिपह- सालारों जैसी पोगाक पहन और पेटी डाल अपने टट्टू पर चढ़ कर चल दिया। चलते हुए बाजार से थोड़ी रोटी, थोड़ा पनोर और थोड़ा मांस का भुना हुमा -

(.)
टुकड़ा खरीद लिया। हाथ में लकड़ी का भाला ले
अकड़ता हुआ चला। शहर से बाहर पहुँचा तो भेड़ों
-
का झुण्ड चरता हुआ मिला। भेड़ें नीचे को सिर किये
चरती हुई आगे बढ़ रही थीं। सिपहसालार खान ने
-समझा कि धरती कूद रही है। वह अपना खच्चर

दौड़ाता हुआ वहां पहुंचा और भाला चलाने लगा।
इससे भेड़ों में खलबली मच गई। चरवाहा दौड़कर
आया -पर जब उसने उसके गले में 'सिपहसालार
खान तीस मार खान' की पट्टी देखी तो सहम कर दूर
हो गया और हाथ जोड़कर बोला-"सिपहसालार
खान साहब, क्यों तकलीफ करते हैं ? खड़े रहें और भेड़ें
अपने आप एक ओर हट जाएंगी।"
"क्या कहा तुमने ? ये भेड़ें हैं ?"
"हां, जनाव।"
"झूठ वकते हो, यह तो धरती कूद रही थी। हमें
देखते ही भेड़ की शकल में बदल गई," सिपहसालार
खान बोला।
गडरिये ने समझा यह तो कोई बुद्ध है। उसने दो
झापड़ दिये और दूर भगा दिया।
सिपहसालार खान आगे चला। दूर चलते-चलते
दूसरे राज्य में पहुंचा। वहां बाहर कुछ आदमी मिले ।
उन्होंने पट्टी देखी तो समझा कोई बहुत वहादुर आदमी
है। पूछने पर उसने बताया कि मैं अकेला तीस को
भार सकता हूँ और धरती के भी छक्के छुड़ा सकता
धरती के छक्के छुड़ाने की बात उनकी समझ में न
आई, पर वे बड़ी मिन्नत करके उसे अपने सुलतान के

(१०) ने पास ले गये। सुलतान ने उसकी बहादुरी की बातें सुनी तो बड़ी आवभगत की और अपने यहाँ नौकर रख लिया। यानी सचमुच सिपहसालार बना दिया । सुलतान के राज्य में दो भयंकर डाकू रहते थे । वे शहर के पास जंगल में डेरा डाले रहते और काफिलों को लूट लेते । सुलतान ने उन्हीं के लिए सिपहसालार खान को रखा था । एक दिन सुलतान उससे यह वात कह भी दी। सिपहसालार बोला, "अजी, दो डाकुओं की क्या मजाल, दस-बीस भी हों तो उनको भी बन्दा सीधे रास्ते पर ले आएगा । जिस दिन आपका हुक्म हो, सिर धड़ से अलग कर आपकी खिदमत में पेश कर दूंगा।" सुलतान बहुत खुश हुआ, पर उसने कहा, "अभी आप थके हुए दीखते हैं, महीना दो महीना आराम कर लें, फिर डाकुओं को मार लेना।" सिपहसालार के लिए एक अलग मकान का इंत- जाम कर दिया गया । सिपहसालार खान खूब आराम से रहने लगा । मुफ्त का माल खा-खा कर मोटा होने लगा। दो महीने इसी तरह बीत गये। अब सुलतान का अपना काफिला जाने वाला था। उसे भी डर था लुट जाने का। इसलिए एक. दिन

सुलतान ने सिपहसालार को बुलाकर डाकुओं को
मारने का दिन मुकर्रर कर दिया। माथ ही यह भी
कह दिया कि जितनी फौज चाहे साथ ले ले ।
सिपहसालार खान अपने मकान में आया तो डर
के मारे बेहोश हो गया-पर अब क्या हो सकता था !
आखिरकार वह दिन आया और सिपहसालार खान
फौज लेकर चला। कुछ दूर चलकर उसे सयाल
आया कि सबको साथ ले जाने से सबके सामने हँसी
होगी, इसलिए अकेले जाकर भुगत लिया जाये। उमने
फौजियों को दूरी पर ही रोक दिया और खुद खाली
हाथ चल पड़ा । हां, जेब में कुछ पत्थर अवश्य भर
लिये।
तीन-चार फलोग चला तो दूर एक पेड़ के नीचे
दो आदमी सोये हुए दिखाई दिये । सिपहसालार पान
जूते उतार कर पास के एक पेड़ पर चढ़ गया। उसने
अपने आपको पतों में छिपा लिया। थोड़ी देर में एक
पत्थर एक की नाक पर दे मारा। जिसे पत्थर लगा
वह तिलमिला कर उठा और दूसरे से बोला- "यह
मजाक ठीक नहीं। मेरी तो जान ही निकल जाती और
तुम्हारा मज़ाक ही होता ।"
"सुदा की कसम, क्या बात कहते हो ? ऐसा
.

( १२ )
mine
मज़ाक मैंने कभी किया भी है ?" दूसरे ने जवाब दिया।
थोड़ी देर में दोनों फिर लेट गए, दोनों शराब के
नशे में थे । दर्जी ने थोड़ी देर बाद फिर एक पत्थर
दूसरे डाकू की नाक पर खींचकर मारा।
इस बार दूसरा तिलमिलाकर बोला, "वल्लाह,
क्या मज़ाक है ? क्या तुम मुझे कत्ल करके सारा लूट
?

। का हिस्सा खुद ही लेना चाहते हो ?" और उसने दूसरे साथी को गले से पकड़ लिया। बस फिर क्या था! दोनों हाकुओं में जोर की लड़ाई होने लगी। दोनों ने अपने छुरे निकाल लिए और एक-दूसरे के पेट में घुसेड़ दिये, और दोनों बुरी तरह जख्मी होकर गिर पड़े । ढेरों खून निकल जाने पर जब दोनों बेहोश हो गए, तो सिपह- सालार खान नीचे उतरा और दोनों की गर्दन पर छुरा फेर दिया । और दोनों के छुरे दोनों हाथों में लेकर अकड़ता हुआ अपने फौजियों के पास आ पहुंचा और उनसे उन डाकुओं की लाशें उठा लाने को कहा । अपने फौजियों को उसने बताया कि किस तरह उसने दोनों हाथों में छुरे लेकर उन मूजी डाकुओं से लड़ाई की। सुलतान ने जब यह मुना तो बहुत खुग हुआ और दरवार बुला कर सिपहसालार खान की खूब इज्जत की और इनाम-इकराम दिया। सिपहसालार खान ऊपर से खुश था, पर अन्दर ही अन्दर हर वक्त खुदा से यह प्रार्थना करता रहता था कि फिर कभी ऐसा दिन न दिखाना ।

: दो:.
सोनेका
हाथी
वात बहुत पुराने जमाने की है। उस वक्त सोने
का भाव भी सस्ता था और लोग खूब गहने पहनते
थे। आज जैसी गहनों पर पाबन्दी न थी कि खालिस
( १४ )

( १५
सोने के गहने नहीं बनवा सकते, केवल १४ करट के
ही बनेंगे।
हां, तो किसी नगर में एक सुनार रहता था।
उसका वहां के राजा के दरवार में भी काफी आदर
था। रानियाँ, महल के दूसरे अफसर और राजा की
रिश्तेदार औरतें उसी से गहने बनवाती। इस तरह
राज-दरवार में उसकी अच्छी तरह पहुँच थी।
इसी तरह वहां एक लुहार भी था। वह बहुत
होशियार लुहार था। सारे राज्य के लिए तलवारे,
भाले और तीर-कमान बनाना उसी का काम था।
सारे योद्धा, सिपाही, फौजी उसके हथियार लेकर ही
लड़ना पसन्द करते थे। राज-दरवार में उसका भी
कम मान-सम्मान न था। अनेक लड़ाइयां उसी के बनाये
हथियारों से लड़ी गई थीं। लड़ाई के वक्त लुहार की
पूछ होती, तो सुख-शान्ति और व्याह-गादियों में सुनार
की धूम रहती।
मान दोनों का कम न था, पर मजा यह कि दोनों
एक-दूसरे से चिढ़ते और एक-दूसरे को नीचा दिखाने
को ताक में रहते । दोनों अपने-अपने गुणो की तारीफ
करते व अपने को एक-दूसरे से बड़ा कहते । पर उन्हें
कोई मौका किसी को नीचा दिखाने का न मिलता।

mar
एक बार राजा को कोई यज्ञ करना था.। उसके
लिए एक सोने के हाथी की जरूरत थी। राजा के
लिए एक छोटा-सा हाथी बनवाने में क्या देर लगती !
उसने सुनार को बुलाया और एक सोने का हाथी बनाने
का हुक्म दे दिया। पर साथ ही यह भी शर्त लगायी
गई कि हाथी राजमहल में ही बैठकर वनाना पड़ेगा,
क्योंकि राजा चाहता था कि हाथी खालिस सोने का
बने ।
सुनार अब तक अनेक तरह के गहने और दूसरी
चीजें बनाता आया था और उस पर ऐसी कोई शर्त
नहीं लगाई गई थी। इसलिए वह सदा अपना काम
मन से और सच्चाई से करता और सोने में ज्यादा
खोट न डालता । इस बार राजा की यह पावन्दी उसे
अच्छी न लगी, पर राजा का कहा टाला भी न जा
सकता था।
इस बात की खबर लुहार को भी लगी, और उस
के मन में यह खटक गई कि हो न हो इस बार दाल
में ज़रूर कुछ काला है। सो, जिस दिन से सुनार ने
राजमहल में बैठ कर हाथी बनाना शुरू किया, लुहार
भी किसी-न-किसी बहाने वहाँ जाने लगा। और सारे
दिन वहीं रहने लगा। शाम को जव सुनार जाने
.

लगता तो उसकी तलागी ली जाती, तब जाने दिया
जाता।
लुहार इस बात से खुश था कि इस बार मुनार
अच्छा काबू आया। सुनार वंठा सोने का हाथी बनाता,
तो लुहार उसके आस-पास घूमता रहता और कोई न
कोई अड़गे का काम करता रहता ।
सुनार भी उस्ताद था। वह उसकी ओर ध्यान न

( १८ )
देता और अपना काम करता रहता । सुनार को हाथी
बनाने में कोई दो महीने लग गये।
आखिर सुनार ने ऐलान कर दिया कि हाथी पूरा
हो गया। फौरन दही मंगवाई जाये । राजा ने अपना
आदमी दही लेने भेजा। मौके की बात, कि ज्यों ही
आदमी महल से निकला, बाहर एक दही बेचने वाली
सिर पर मटकी लिये हुए आ रही थी। राजा के
आदमी ने उससे पूरी मटकी ले ली और सुनार के
सामने ला रखी। सुनार ने भी अपना सोने का हाथी
उसमें डुबोया और बाहर निकाल लिया और मटकी
वैसी की वैसी दही वाली को वापिस कर दी।
उसके बाद-सुनार ने हाथी को खूब घिसा-रगड़ा
और खूब चमका दिया।
राजा उस खूबसूरत हाथी को देख कर बहुत
खुश हुआ। दूसरे दरबारियों, अमीर-उमरा ने भी
देखा, वे भी बहुत खुश हुए । शहर के रहने वाले दूसरे
बहुत से बड़े आदमियों और पारखियों ने भी देखा
और सुनार के कौशल की तारीफ करने लगे।
राजा खुश था, दरबारी खुश थे, लोग खुश थे;
पर लुहार एक ओर बैठा जल-भुन रहा था। अब
उससे चुप न रहा गया और उठ कर वहाँ आया, जहां

२
हाथी रखा था और सब लोग उमकी तारीफ कर रहे
थे। आते ही वोला
"कौन कहता है, यह हाथी असली सोने का है ?"
"तुम्हारे पास क्या सबूत है कि यह असली सोने
का नहीं ?" एक राजदरवारी ने पूछा।
लुहार बोला, "मैं कोई भी शतं लगाने के लिए

(२०)
तैयार हूँ," और उसने अपनी बात पूरी किये बिना ही
अपना भारी घन उस हाथी पर गिरा दिया । कड़ाक से
हाथी के दो टुकड़े हो गये और सभी दरवारियों ने
हो-हल्ला मचा दिया । कुछ लोग तो लुहार को मारने
के लिए भी दौड़े, पर लुहार ने राजा साहब के सामने
हाथ जोड़ कर कहा :-
"यदि हाथी असली हो तो मुझे चाहे जो सज़ा
दी जाये। पहले इसकी जाँच तो करवाइये कि हाथी
पीतल का है या सोने का।
राजा ने देखा । उसे शक हुआ कि हाथी तो खालिस
पीतल का है। उसने जाँच करने वालों को बुलाया
हाथी सरासर पीतल का निकला।
अव सुनार का दम खुश्क हुआ। उसने यह मान
लिया कि हाथी पीतल का है। पर राजा हैरान था
कि रोज़ तलाशी लेने और इतना कड़ा पहरा लगाने
पर भी यह कैसे हुआ । उसने लुहार से पूछा कि तुम्हें
शक कैसे
हुआ
?
-
लुहार ने कहा, "मेरे खयाल में सुनार किसी न
किसी तरह सोना चुरा कर ले जाता था और उसकी
जगह पीतल लगा देता था।"
सुनार ने कहा, “महाराज, यह वात नहीं। यह

(२१)
miranton
ठीक है कि मैंने दो महीने में हाथी बनाया और लुहार
ने एक ही धन में उसे तोड़ दिया। सौ सुनार की
और एक लुहार वाली वात ठोक हो सकती है, पर
लुहार
जो
कुछ कहता है, वह सरासर झूठ है।"
"तो फिर सही माजरा यताओ," राजा ने कड़क
कर कहा।

( २२ ) "महाराज, मैं आपका इतने दिन से सोने का काम करता था, पर आपने मुझ पर कभी शक न किया था। इस बार आपने शक किया या किसी के कहने से ऐसा किया, यह मुझे अच्छा न लगा। इसके साथ एक बात यह भी थी कि लुहार मुझे नीचा दिखाना चाहता था, और मैं उसकी बात गलत सिद्ध करना चाहता था। राजा हैरान था। दरबारी हैरान थे और सभी सुनार से असली मामला सुनना चाहते थे । सुनार बोला, “महाराज, मैंने एक दिन भी राज- महल से सोना नहीं चुराया। यहाँ राजमहल में सोने का हाथी बनाता, तो रात को घर पर पीतल का वैसा ही हाथी बनाता था। दोनों हाथी साथ ही पूरे हुए और सोने को चमकाने के लिए खट्टे की जरूरत होती है । सो मैंने अपनी घर वाली को दही वाली बना कर उस दिन बुलवाया। दही की मटकी में पीतल का हाथी था। मैंने दही में डुबाने के बहाने सोने वाला हाथी उसमें रख दिया और पहले से रखा हुआ पीतल का हाथी निकाल लिया।" राजा, दरबारी और जनता सुनार की होशियारी पर मुग्ध थे । राजा ने सुनार को कोई सज़ा न दी।

और
सुनार ने अपने घर से सोने का असली हाथी ला
दिया।
लुहार ने तो अपनी ओर से बहुत कोशिश की
कि सुनार को नीचा देखना पड़े, पर सुनार की
होशियारी से सभी मुग्ध हुए और राजा को असली
सोने का हाथी भी मिल गया। इमलिए सुनार का कुछ
बिगड़ा नहीं।
किसी से वेकार की शत्रुता रखना उचित नहीं ।
RORREER
mum

( २२ ) "महाराज, मैं आपका इतने दिन से सोने का काम करता था, पर आपने मुझ पर कभी शक न किया था। इस बार आपने शक किया या किसी के कहने से ऐसा किया, यह मुझे अच्छा न लगा। इसके साथ एक बात यह भी थी कि लुहार मुझे नीचा दिखाना चाहता था, और मैं उसकी बात गलत सिद्ध करना चाहता था। राजा हैरान था। दरबारी हैरान थे और सभी सुनार से असली मामला सुनना चाहते थे । सुनार बोला, “महाराज, मैंने एक दिन भी राज- महल से सोना नहीं चुराया । यहाँ राजमहल में सोने का हाथी बनाता, तो रात को घर पर पीतल का वैसा ही हाथी बनाता था। दोनों हाथी साथ ही पूरे हुए और सोने को चमकाने के लिए खट्टे की जरूरत होती है । सो मैंने अपनी घर वाली को दही वाली बना कर उस दिन बुलवाया। दही की मटकी में पीतल का हाथी था। मैंने दही में डुबाने के बहाने सोने वाल हाथी उसमें रख दिया और पहले से रखा हुआ पीत का हाथी निकाल लिया।" राजा, दरबारी और जनता सुनार की होशिया थे। राजा सुनार को कोई सज़ा न दी ने पर मुग्ध

और
मुनार ने अपने घर से सोने का असली हाथी ला
दिया।
सुहार ने तो अपनी ओर से बहुत कोगिश की
कि सुनार को नीचा देखना पड़े, पर मुनार की
होशियारी से सभी मुग्ध हुए और राजा को असली
सोने का हाथी भी मिल गया। इसलिए मुनार का कुछ
बिगड़ा नहीं।
किसी से वेकार की गाता रखना उचित नहीं।
111101

: तीन :
दुख
का
जादू
पुराने जमाने में हस्तिनापुर बड़ा अच्छा राज्य
था । वहाँ अनेक राजा हो चुके थे । उनमें से एक राजा
का नाम सत्यजीत था। वह अच्छा राजा था । उन
दिनों यह काफी बड़ा राज्य था। प्रजा बहुत सुखी
( २४ )

(२५)
थी। न किसी लड़ाई-युद्ध का डर था, न राज्य में
किसी प्रकार का पाप, धोखाधड़ी का काम होता था।
राजा के खजाने में सूब धन-रत्न थे। उसे किसी प्रकार
की चिन्ता न थी।
राजा सुस भोगते-भोगते इतना उदास हो गया कि
उसे सुख से आनन्द नहीं मिलता था। एक अजीव
तरह का दुःख उसके दिल में घर करता जा रहा था,
क्योंकि अब ऐसी कोई चीज न रह गई थी जो कि उसे
और अधिक सुख देती।
राजा उदास होने लगा। राज-काज देशना भी
उसने छोड़ दिया। मन्त्रियों को चिन्ता हुई। उन्होंने
राजा से कहा, "महाराज हमें वताइये कि आपके लिए
पया किया जाये, जिससे आपको प्रसन्नता हो, उदासी
दूर हो, राज-काज में मन लगे।"
राजा ने लम्बी सांस छोड़कर कहा, "मुझे अब
किस चीज से आनन्द उठाने के लिए कहते हो ? मुझे
सब-कुछ घेकार दीयता है। किसी चीज़ में मेरे लिए
कोई भी स्वाद नहीं रह गया।"
राजा की बात सुन मंत्री बहुत चिन्ता करने लगे।
उन्होंने राज्य के एक बड़े भारी विद्वान को बुलाया कि
वह राजा को समझाये। पर उसके उपदेशो से राजा

का मन और भी उदास हो गया, ऊब गया ।
उन दिनों ऋषि-मुनि भी राजाओं के पास आया
करते थे। एक दिन शौनक नाम के एक मुनि दरबार में
आये । मंत्रियों ने राजा का सारा हाल उनसे भी कहा ।
शौनक मुनि बड़े समझदार थे और मनुष्य के भावों को
बदलने की विद्या जानते थे। वे अपने प्रभाव से मनुष्य

(२०)
के मन से जैसा करवाना या सोचना चाहते, करवा
सकते थे।
वे राजा से मिले और राजा को महल के सबसे
ऊँचे बुर्ज पर ले गये । वहां पहुंच कर मुनि ने राजा से
दक्षिण की खिड़की से देखने को कहा।
राजा ने दक्षिण की खिड़की से देखा कि राजा के
दिल की धड़कन बढ़ गई और होश गुम हो गए। राजा
ने देखा कि दक्षिण की ओर से किले की दीवार पर
शत्रु की सेना चढ़ी आ रही है। राजा ने कहा-
"महाराज, शत्रु मुझ पर हमला करना चाहता है।"
मुनि ने कहा. "जरा ठीक से देखिए कि कौन-सा
शत्रु आप पर हमला कर रहा है ?"
राजा ने दूसरी बार देखा तो वहां कुछ भी नहीं
था।
मुनि ने फिर कहा, "अब दूसरी खिड़की से देखिये।"
राजा ने देखा तो यमुना में भयंकर बाढ़ आती
दिखाई दी । ऐसा मालूम हुआ कि सारा नगर ही दूब
जायेगा। राजा डर के मारे चिल्लाया, "महाराज, नीचे
चलो, नहीं तो हम डूब जाएंगे।"
पर मुनि के कहने पर राजा ने दूसरी बार देखा
तो वहां कुछ भी न था।

तब मुनि ने तीसरी खिड़की से देखने को कहा ।
राजा उस ओर सदा हरी-भरी, लहराती फसलें देखता
था । आज उसे सूखा, झाड़ियों से भरा रेगिस्तान दिखाई
दिया। झाड़ियों के अलावा जानवरों की हड्डियाँ और
बड़े-बड़े पत्थर भी पड़े थे । राजा की आँखों में पानी
भर आया और घिधियाते हुए बोला, “महाराज! मेरा
तो राज्य ही नष्ट हो गया ।"
पर मुनि के कहने पर राजा ने आँसू पोंछे तो वही
फसलें और बाग लहराते दिखाई दिये । तब मुनि ने
राजा से उत्तर की खिड़की से देखने को कहा । राजा
ने देखा तो अपना माथा पकड़ कर बैठ गया । बोला,
"महामुनि, मैं अपने राज्य को इस तरह आग की लपटों
में नष्ट होता हुआ नहीं देख सकता ।"
परन्तु मुनि के दिलासा दिलाने पर वह फिर खड़ा
हुआ तो हस्तिनापुर पहले की तरह ही उल्लास से
पूर्ण था ।
राजा ने अपने आसन पर बैठते हुए पूछा, "महा-
मुनि, क्या आप बता सकते हैं कि जो दृश्य मैंने देखे,
वे सत्य हैं या भ्रम ? क्या कभी ऐसा हुआ था या होने
वाला है ?"
"राजन्, जो बात एक बार होती है, वह बार-बार

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घटित होती रहती है । जो कल होने वाला है, उसे यदि
माज देखें तो हमें नम मालूम देगा । ऐना मालूम देता
है जो कुछ आपने देखा, उससे आपको दुःख हुआ।
अच्छा रहेगा कि अब नहा-धोकर प्रसन्न हो जाएँ।
मुनि राजा को उस तालाब पर ले गया, जहां
राजा रोज किलोलें करता हुमा नी उदास बना रहता
था । पर आज ज्यों ही राजा पानी में उतरा, उने ऐसा

( ३० )
मालूम दिया कि उसने समुद्र में पाँव रख दिया हो और
उसमें तूफान आ रहा हो। राजा डूबता-उतराता हुआ
आज किसी तरह किनारे पहुँचा तो समुद्र के किनारे के
गांवों के लोग इकट्ठ हो गए और उसे बड़ी हैरानी
से देखने लगे।
"क्यों, क्या देख रहे हो ? क्या जानते नहीं, मैं
हस्तिनापुर का राजा सत्यजीत हूँ ?" राजा ने कहा ।
पर लोग राजा की बात सुन कर हँसने लगे। एक
बोला, "हमारे देश में कोई राजा-वगैरह नहीं। हमारा
अपना मुखिया है । पर तुमने सिर पर यह पीतल की-सी
टोपी क्यों पहन रखी है और यह साड़ी-सी क्या बाँध
रखी है ।" उन्होंने राजा के मुकुट और पहनावे की
ओर इशारा किया।
दूसरा बोला, "अफसोस है कि तुम ऐसे देश में आ
गए हो । यदि यहाँ मेहनत न करोगे तो भूखे मर
जाओगे।" उसने राजा का मुकुट और चोला उतार
कर समुद्र में फेंक दिया और उसके सिर पर तसला
और फावड़ा रख दिया।
"चलो, हमारे साथ," मुखिया ने इशारा किया
और राजा बेबस उनके पीछे चल दिया।
"मैं चल तो रहा हूँ, पर मुझे यह तो बताओ कि

(३१)
करना क्या पड़ेगा ?" राजा ने पूछा ।
"तुम्हें वोझ ढोना पड़ेगा," मुखिया बोला।
"पर मुझे बोझा ढोना नहीं आता," राजा ने
कहा।
"नहीं आता ! तुम
कैसे आदमी हो, जो बैल का
काम भी नहीं जानते ? यह कामतो गधे और बैल भी
कर लेते हैं। खैर, कोई बात नहीं, कुछ ही दिनों में
सीख जाओगे," मुखिया बोला।
घर पहुंचकर मुखिया ने अपनी पत्नी से कहा,
"देख, इस आदमी को वैल का काम भी करना नहीं
आता । सो, अभी इसे पिछवाड़े में बैलों के पास बांध
देना और थोड़ा दाना-पानी भी दे देना।"
राजा ने उस दिन दाना और घास खाया। अव वह
बैल बन गया । पर अगले दिन गुस्से के मारे वह काम
में अड़ने लगा, तो मुखिया ने उसे एक कोल्हू वाले के
हाथ बेच दिया। कोल्हू वाले तेली ने उसकी दोनों
आंखें बांध कर कोल्हू में जोत दिया। जब कभी वैल
अड़ता, तो तेली कोड़े जमाता और बुरा-भला कहता ।
बल सारे दिन कोल्हू में जुटा रहता, केवल दाना
खिलाने के लिए खोला जाता । इस तरह पांच साल
वीत गये।

( ३२ )
एक दिन कोल्हू के ऊपर छत गिर गई । राजा
वेहोश हो गया। पर जब उसे होश आया तो वह
-
आदमी की शक्ल में था; पर था किसी और ही देश
में। राजा एक तालाब के पास खड़ा था, जहां औरतें
कपड़े धो रही थीं।
इतने में एक औरत ने राजा के पास आकर पूछा
"तुम कौन हो ? इस देश के तो नहीं लगते !"

"हां, इस देश का नहीं। पर भूख लगी है, मुझे
कुछ उपाय बताओ पेट भरने का।"
"इस देश में जब तक आदमी के पास औरत नहीं
होती, उसे खाना नहीं मिल सकता। किसी से शादी कर
लो, तो रोटी मिलने लगेगी," उस औरत ने कहा और
अपना ध्यान दूसरी ओर हटा लिया ।
राजा ने फिर एक राह चलते आदमी से पूछा
कि खाना कहां मिलेगा।
उसने जवाब दिया, "जब तक इस देश में
तुम्हारी शादी नहीं होगी, तब तक खाना नहीं मिलेगा।
तालाव से नहाकर आने वाली सभी औरतों से पूछो
और किसी से शादी कर ली। देखो, पूछना सबसे;
छोड़ना किसी को मत !"
यह कह कर वह आदमी चला गया और राजा
राह में जाती हर औरत से पूछने लगा।
थोड़ी देर मे एक १८-१६ वरस की लड़की आई।
राजा ने पूछा, "तुम्हारी शादी हो गई क्या ?"
"हां, पिछले साल ही मैने एक किसान से शादी
की है," और वह चल दी।
इतने में पचास वरस की बुढ़िया उधर से गुजरी।
राजा ने सोचा, इससे क्या पूछे । पर उस आदमी की

। ३४ )
बात याद आई तो राजा ने उससे पूछा । बुढ़िया ने
जवाब दिया, "हाँ बेटा, विवाह हो चुका है।" इतना
कहकर वह भी चल दी।
थोड़ी देर ही हुई थी कि एक अस्सी बरस की
बुढ़िया आई। वह लाठी टेकती और राम का नाम
लेती हुई अपनी धुन में मस्त चली जा रही थी, पर
राजा के लिए तो सभी से पूछना ज़रूरी था। राजा
ने हँसते हुए उससे भी पूछा । राजा को खयाल था कि
यह तो बेटे-पोतों वाली होगी, पर उसकी हैरानी का
कोई ठिकाना न रहा, जब बुढ़िया ने राजा का हाथ
पकड़ लिया और कहा, “हाँ, मैं अकेली हूँ । चलो मेरे
साथ।"
राजा उसके साथ न जाना चाहता था, इस लिए
अपना हाथ छुड़ाकर तालाब की ओर भागा और उसमें
छलाँग लगा दी। पर उसकी हैरानी की कोई सीमा न
रही जब उसने देखा कि वह अपने ही तालाब में था ।
पर किनारे पर वह मुनि न था ।
राजा स्नान करके बाहर आया, परन्तु अब वह
जिस चीज़ को देखता उसे खुशी होती, आनन्द
अनुभव होता । उसका घर अव स्वर्ग के समान प्रतीत
हो रहा था । उसकी रानी अब अप्सराओं से भी सुन्दर

।
मालूम हो रही थी। उसने खाना खाया तो वह अमृत
तुल्य था। उसे ऐसा मालूम दिया जैसे बहुत दिन के
बाद उसने खाना खाया हो। अब उसके लिए चारो
और सुख ही सुख था।
राजा को सुखी देख सब दरवारी, मंत्री तथा दूसरे
अधिकारी भी खुश थे । अव राजा बहुत ही उत्साह से
राजकाज देखने लगा और दुखियों का दुःख दूर करने
-
लगा।
आदमी को सुख का उस समय तक पता नही
चलता, जब तक उसे दुखों का अनुभव न हो। और
सुख किन और कितनी चीजों से मिलता है-इसकी
कोई सीमा नहीं। असल में सुख अनुभव करने की
भक्ति भी कप्ट सहन करने की भक्ति से ही प्राप्त
होती है।
राजा और सभी दरबारियों ने मुनि का धन्यवाद
किया।

:चार:
तलवार
का
जादू
हिन्दुस्तान के ही किसी हिस्से की बात है, जहां पहले
एक राजा राज्य करता था। वह बहुत अच्छा था,
इसलिए उसकी प्रजा उससे प्रसन्न थी। उसके राज्य में
कोई झगड़ा न होता था । छोटा-मोटा कोई झगड़ा हो
( ३६ )

। ३७)
भी जाता तो पंचायतें ही आपस में उसका फैसला
कर देती।
वड़े-बड़े शहरों का तो कहना ही क्या,
छोटे-छोटे
गांवों के चौकीदार, नम्बरदार और पटवारी भी अपना
काम अच्छी तरह किया करते थे।
होली-दीवाली पर राजा सारी प्रजा को दरवार में
बुलाते और अच्छे पकवान खिलाते । मोची,धोवी,कुम्हार
और भंगी आदि को खुशी में इनाम-इकराम भी देते।
सभी स्कूलों के विद्यार्थियों को मिठाइयां बांटी जाती
थीं। दूर-दूर के अध्यापक-अध्यापिकाएं इन दिनों
राजा के दर्शन करने आते ।
राजा से सभी प्रसन्न थे। राजा की सात रानियां
थीं, परन्तु दुःख इस बात का था कि राजा के कोई
पुत्र न था। राजा कभी-कभी पुत्र के न होने से बहुत
उदास हो जाते । धीरे-धीरे उन्हे क्रोध भी आ जाता।
उस समय वह रानियों से बुरा-भला भी कह डालते ।
एक रात वह बड़ी रानी के महल मे सो रहे थे।
उन्होंने सपना देखा कि वह एक ऐसी जगह बैठे है, जहां
सोने के पेड़ है। उनमें सोने के ही पत्ते और हीरे-
मोतियों के फल लगे है। बड़ी रानी छोटी-सी लड़की
बनी हुई है और परियों को रानी से लड़का मांग रही
।

( ३८ )
है परी । ने वह सोने का पेड़ ही उसको दे दिया। राजा
बड़ा प्रसन्न हुआ।
परियाँ अभी नाच ही रही थीं और राजा ने सोने
का वृक्ष लेने के लिए हाथ फैलाया ही था कि रानी ने
उन्हें जगा दिया। जव रानी का हाथ लगते ही उनकी
आँख खुली तो उन्हें बहुत दुःख हुआ । उन्होंने क्रोध में
उस रानी को महल से बाहर निकाल दिया ।
रानी क्या करती ? वह जंगल में चली गई।
वहाँ उसे एक कच्चा-सा घर दिखाई दिया। वह वहाँ
गई । वहाँ एक साधु बैठा थीं। रानी महात्मा के पाँव
पड़ गई।
महात्मा ने कहा, "बेटी! दुःख मत करो। आराम
से यहाँ रहो।"
रानी वहीं रहने लगी। संयोग की बात, नौ
महीने बाद रानी के लड़का पैदा हुआ। महात्मा ने
उसका नाम अजयसिंह रख दिया। वह धीरे-धीरे बड़ा
होने लगा। जब वह छः साल का हुआ तो उसे स्कूल
में पढ़ने भेज दिया। वह बहुत दिल लगा कर पढ़ता
था। साथी उससे चिढ़ने लगे, क्योंकि वह सदा श्रेणी
में सबसे प्रथम रहता था।
लड़के उसे चिढ़ाने के लिए भिखारी का लड़का
कहने लगे। एक दिन वह पाठशाला से रोता हुआ आया

और कहने लगा-"मां, क्या में भिखारी का पुत्र हूँ ?
लड़के मुझे ऐसा क्यों कहते हैं ? क्या हम भिखारी है, ?"
मां ने कहा-"बेटा, ये महात्मा जी ही तुम्हारे
पिता है। ये भिखारी नहीं, महात्मा हैं।" पर अजय
कब मानने वाला था ! घर के कोने में छुरी उठा लाया
और बोला-"माता जी ठीक-ठीक वात बत

तो मैं इसे अपने पेट में घुसेड़ लूँगा और मर जाऊँगा।"
अन्त में रानी को सारा हाल बताना पड़ा । जब
अजय को राजा का लड़का होने की बात का पता चला
तो वह बहुत प्रसन्न हुआ। उसे जब राजा के स्वप्न की
वात मालूम हुई तो उसने कहा कि मैं सोने के वृक्ष का
पता लगा कर ही घर आऊँगा। माता और महात्मा
ने बहुत समझाया-बेटा, सोने का वृक्ष नहीं होता।
देखो, इधर-उधर फिरने से तुम्हें दुःख होगा, पर अजय
,
न माना।
और एक दिन वह लोटा-डोरी लेकर चल दिया ।
उसने जिस ओर मुंह किया उधर ही चल दिया। वह
छोटा बच्चा ही था, पर उसे आशा थी कि वह
सोने के वृक्ष का पता लगा लेगा । वह दिन भर चलता
रहा । साँझ होते-होते बहुत थक गया। उसे जोर से
प्यास लगी थी। उसने पास ही एक कुआँ देखा । वह
कुएँ पर गया। लोटा नीचे डाला। उसे ऐसा लगा
जैसे किसी ने उसका लोटा पकड़ लिया हो । डोर कुएँ
में गिर पड़ी। वह बहुत दुःखी हुआ।
थका हुआ अजय कुएँ पर बैठा सोच ही रहा था
कि थोड़ी देर में कुएँ से शव्द आया कि बहादुर हो तो
कुएँ में कूद जाओ। उसने देखा, अन्दर कुछ न था ।

-
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पहले तो वह डरा-और थोड़ी देर सोचा। प्यास से
भी मरना है, अन्दर कूद कर ही क्यों न देखू ? अजय
कुएं में कूद पड़ा। उसके पाँव पीतल की चादर पर
पड़े। उसने झुक कर देखा, तो वहां एक तलवार
पड़ी थी । थोड़ी देर में कोई फिर वोला-"यदि बहादुर
हो तो तलवार पीतल की चादर में घुसेड़ दो।"
अजय बोला-"अब कुएँ में तो कूद ही पड़ा, जो
कहोगे मै करूँगा, पर बोलने वाले, मैं छोटा-सा बच्चा
हूँ। मैं प्रार्थना करता हूँ कि मुझे दर्शन दो।"
"बेटा, डरो मत । जो आज्ञा दूं, करते जाओ।
दर्शन करके क्या करोगे ? पर अब रात हो गई है सो,
जाओ," आवाज आई।
अजय 'जो आज्ञा', कह कर एक कोने मे दुवककर
सो गया ।
दूसरे दिन प्रातःकाल अजय उठा । उसने तलवार
इतने ज़ोर से मारी कि पीतल की चादर के दो टुकड़े
होगये। अजय को एक दरवाजा दिखाई दिया। तलवार
लेकर वह उसमें घुसा। उसने देखा-वहां सब चीजें लोहे
की है। वह दुःखी हुआ कि मैं कुएँ मे क्यों कूदा ।
इतने में उसे एक ओर से चमक-सी दिखलाई दी।
उसने देखा, चांदी का महल है । वह कुछ प्रसन्न हु

( ४२ )
और उसमें चला गया।
एक कमरे में उसे एक परी सोती हुई दिखाई दी।
अजय के पैरों के शब्द सुन कर वह उठ बैठी । उसने
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अजय को अपने ही पलंग पर विठाया। अजय से सारा
समाचार पूछा । अजय ने सव-कुछ बताया । परी
बोली-"क्या तुम जानते हो कि सोने का पेड़ कहाँ है ?
वह कैसे मिलेगा ?"

वह बोला, "मैं तो जंगल का रहने वाला हूँ।
भेडें चराना और बांसुरी वजाना ही मेरा काम है।"
परी एक चांदी की बांसुरी लाई । अजय ने ऐसी
बांसुरी बजाई कि परी पलंग छोड़ कर नाचने लगी।
अजय अभी बांसुरी वजा ही रहा था कि वही न
दिखाई देने वाला फिर बोला-
"वहादुर वेटे हो तो ऐसी तलवार मारो कि सिर
धड़ से अलग हो जाये ।"
यह सोचने लगा-ऐसी परी को मारना ठीक
नहीं। वह सोच ही रहा था कि फिर वही शब्द कानों
में पड़े । अजय ने कहा-'यह तो मै कह ही चुका हूँ
कि जो कहोगे, वही करूंगा।"
वह राजा का बेटा तो था ही, उसने जोर की
तलवार मारी । तलवार लगते ही न जाने परी कहाँ
चली गई और उसके स्थान पर चांदी का अच्छा-सा
वृक्ष बन गया । अजय आंखें मल कर वृक्ष को देख हो
रहा था कि फिर कोई बोला-"तलवार मारो ।"
अजय ने तलवार मारी । वृक्ष की जगह वही सुन्दर
परी आ खड़ी हुई।
सांझ हो गई थी । अजय बहुत थक गया था ।
परी ने उसे अच्छे-अच्छे खाने खिलाये और बाग में

( ४४ ) - . को कहा । अजय परी के बाग में जाकर एक वृक्ष के नीचे सो गया। उसे खूब नींद आई। तीसरे दिन वृक्ष पर बैठी चिड़िया जब गाने लगी तो अजय की आँख खुली । उसने देखा सामने सोने जैसा पीला फल पड़ा है । अजय ने देखा वह चमक रहा था । अजय ने उसे उठाया । वह खड़ा हुआ तो उसे एक खिड़की दिखाई दी। अजय उसके पास गया था कि उसे कोई बोलता हुआ सुनाई दिया- "दायीं ओर का दरवाज़ा खोलो।" अजय ने दायीं ओर का दरवाज़ा खोला । देखा सभी-कुछ सोने का था। अजय चलते हुए एक अच्छे से कमरे में पहुँचा । सोने की परी सोई हुई थी। अजय के पांवों की खट-खट सुन वह जाग पड़ी। परी ने आंखें मल कर देखा। अजय को देखते ही बोली, "आओ राज- कुमार, यहाँ बैठो । अपना समाचार सुनाओ।" अजय ने कहा-"मैं राजकुमार नहीं । मैं तो जंगल का रहने वाला हूँ।" परी ने कहा--"अच्छा गाना तो सुनाओ!" अजय गाने लगा। उसका गाना सुन और परियां भी आ गईं। सब परियाँ नाचने लगीं। नाचना-गाना हो रहा था कि अजय के कानों में वही शब्द फिर पड़े ।

(४५)
1
वहादुर हो तो तलवार मारो और सिर धड़ से अलग
कर दो। और परियां तो भाग गई, सोने की वही परी
खड़ी रह गई । अजय ने तलवार चलाई। परी की
जगह सोने का पेड़ खड़ा था । अजय बहुत प्रसन्न
हुआ । सोने के वृक्ष पर हीरे-मोतियों के फल लगे थे।
कोई फिर बोला--"तलवार मारो।" अजय ने
तलवार मारी । सोने की परी सामने खड़ी थी। परी
ने सोने के थाल में खाना खिलाया । अजय को खाना
खाते-खाते नींद आ गई।
चौथे दिन वह उठा तो उसे अपनी बांसुरी दिखाई
दी। वह उसे वजाने लगा। इतने में चांदी और सोने
की दोनों परियां आ गई। उन्होंने कहा-अजय नहा-
धो कर कुछ खा लो । अजय नहाने गया, उसने ईश्वर
को याद किया और फिर खाने बैठा । परियां भी पास
ही आ बैठीं । खाना खाकर अजय फिर वाँसुरी वजाने
लगा और परियां नाचने लगीं।
यह नाच-गान हो रहा था कि वह न दिखाई देने
वाला बोला--"वहादुर बेटे हो तो ऐसी तलवार
चलाओ कि दोनों के सिर अलग हो जाएँ। अजय ने
तलवार चलाई। परियों की जगह सोने-चांदी के वक्ष
खड़े थे। उन पर हीरे-मोतियों के फल लदे ह
।

अजय उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। फिर तलवार
चलाने को कहा गया। अजय ने तलवार चलाई तो
वही परियाँ सामने खड़ी थीं।
17n
.
ed
-
?
परियाँ अजय के काम से बहुत ही प्रसन्न थीं।
उन्होंने कहा - "अजय हम जानती हैं कि तुम क्या
चाहते हो ? यह डण्डा लो। इसे मुँह से लगाओगे तो
बाँसुरी बन जाएगी। बाँसुरी वजाओगे तो हम अपनी
फौजें लेकर तुम्हारे सामने आ जाएँगी।"

अजय
ने कहा, "मुझे घर से निकले बहुत दिन
हो गये। मां उदास होगी।" परियों ने कहा, "आंखें
बन्द करो।" आंखें बन्द करने के बाद जब उसने
दोबारा आंखें खोली तो अपने को उसी जंगल के टूटे-
फूटे झोंपड़े के पास पाया। अजय घर आया तो माता
और महात्मा जी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे बड़े
प्यार से छाती से लगा लिया। अजय ने अपने साथ
बीती सारी बातें बताई तो दोनों बहुत प्रसन्न हुए।
अगले दिन अजय ने डण्डे को मुंह से लगाया।
वांसुरी बन गई । अजय ने बांसुरी बजाई तो सोने और
चांदी की परियां अपनी फोजो के साथ आ गई। अजय
ने चांदी-परी को कहा-"अपनी फौज से जंगल साफ़
करवाओ और यहाँ महल वनवा दो।" सोने की परी
से कहा-"महल को सजा दो और आस-पास के
सभी राजाओं को सभा में बुलाओ।"
ऐसा ही किया गया। अजय ने अपने पिता को
भी बुलाया था। जब राजा आ गए तो अजय परियों
के साथ दरवार में आया। अजय ने बांसुरी बजाई।
परियां और उनकी फौज नाचने लगी। सारा दरवार
उनका नाच-गान देख रहा था कि इतने में अजय ने
तलवार चलाई और दोनों परियों के सिर धड़ से:

{ ४८ )
-
हो गए । दरबारी और राजा डर गये। पर जब परियों
की जगह सोने और चांदी के वृक्ष बन गये, तो वे
अपनी-अपनी आँखें मलकर उनकी चमक देखने लगे ।
दरबार में अजय के पिता भी थे। उन्होंने जब
सोने-चाँदी के वृक्ष देखे तो उन्हें अपना पुराना स्वप्न
याद आ गया। उनकी आँखों के आगे वह पुरानी रात
घूम गई, जब उन्होंने रानी को महल से निकाल
दिया था।
वे दरबार में से उठ आये। बाहर उन्होंने एक
कच्चा-सा घर देखा । वे उसमें गए । वहाँ रानी उन्हें
देखते ही उनके पाँव पड़ गई। राजा को जब यह पता
चला कि अजय उन्हीं का पुत्र है, तो वह बहुत खुश
हुआ। उसकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा।
राजा, रानी और अजय प्रसन्नता से घर लौट आए।
फिर सव खुशी-खुशी अपने महल
में
सुख से रहने लगे।

: पोच,
कुत्तेकी
दुम
गंजे के
नारवून
एक लड़का बड़ा शंतान था, पर उसके मां-बाप
बहुत गरीब थे । वे एक जंगल के किनारे झोपड़ी
बनाकर रहते थे । जंगल से लकड़ियां काटते और अपने
गधे पर लादकर बाज़ार ले जाते । वहाँ लकडियां वेच

( ५० ) www ते और जो थोड़ा पैसा मिलता, उससे गुजारा करते । वे गरीब होने पर भी कोशिश करते कि उनका ड़का थोड़ा पढ़-लिख जाये। इसलिए बूढ़ा बाप कहीं किताबें माँग लाता, कहीं से स्याही-कलम, पर लड़का इतना शैतान था कि दूसरे ही दिन उन्हे बाज़ार में बेच देता और जो भी दो-चार पैसे मिलते, उनकी चाट- पकौड़ी खा जाता। स्कूल में न जाता और जंगल में इधर-उधर घूमता रहता, या फिर गलियों की धूल फाँकता। लड़के का नाम था बिज्जू । उसके पास एक कुत्ता भी था । मज़ा यह कि कुत्ता भी वैसा ही शैतान । दोनों साथी थे। सारे दिन इधर-उधर घूमते और शाम को झोंपड़े पर आ जाते । एक दिन लड़का बिज्जू अपने कुत्ते को साथ ले जंगल के दूसरे छोर पर पहुँचा । उसने देखा कि वहाँ एक झील है और उस झील के किनारे है एक सुन्दर-सा मकान-मकान क्या राजमहल-सा है। बिज्जू और कुत्ता बहुत देर खड़े हैरानी से उसे देखते रहे । उसके बाद उन्होंने उस महल और झील का चक्कर लगाना शुरू किया। पर वह झील इतनी बड़ी थी कि वे उस का चक्कर पूरा न कर सके और इतने में रात पर

(५१)
गई । रात का पड़ना था कि एक बहुत लम्बे-चौड़े
भूत जैसे लगने वाले आदमी ने उन्हें कान से पकड़
लिया और महल में अपने सरदार के पास ले जाकर
पेश कर दिया। क्योकि रात को उस इलाके में कोई
नहीं रह सकता था, बल्कि दिन में भी उधर आने की
किसी में हिम्मत न होती थी।
यह महल जादूगर का था। उसके नौकर भतगे।

नू
( ५२ )
wom
नू को जादूगर
के सामने पेश किया गया। लड़के
निडरता और शरारतों के बारे में सब बातें भूत से
T करवा ली गई थीं। जादूगर ने लड़के से कहा, "तू
रा-मारा क्यों फिरता है ? कुछ काम क्यों नहीं
रता ?"
-
.
"जादूगर साहब, आप ही बताइये कि आप क्या
काम करते हैं ? सब दिन मौज-मज़ा उड़ाते हैं।"
लड़के ने निडर होकर कहा ।
"अरे विज्जू, तू नहीं जानता कि मैंने भूतों को
वश में कर रखा है, उन्हीं की वजह से मैं मौज करता
हूँ ?" जादूगर ने कहा।
"तो महाराज, मुझे भी एक भूत दे दीजिए। मैं भी
कुछ दिन मौज कर लूं, तो क्या कोई हर्ज़ है ?" लड़के
ने बड़ी नम्रता से कहा।
"नहीं बिज्जू, हर्ज़ तो कुछ नहीं, पर क्या तू भूत
को सम्भाल सकेगा ? जव उसके पास कोई काम न
रहेगा तो तेरी गर्दन पकड़ लेगा और तेरी जान निकाल
देगा। बोल, तुझे मंजूर है, तो मैं अभी एक भूत दे
देता हूँ।
"हाँ साहब, मुझे मंजूर है । मुझे जल्दी से एक
भूत दे दीजिए।" बिज्जू ने कहा ।

( ५३ )
जादूगर ने विज्जू को एक भूत दे दिया, जो देखने मे
बहुत ही भयानक, लम्बा-चौड़ा और काला-स्याह था ।
विज्जू ने वहीं से भूत को हुक्म दिया कि फौरन
इस जंगल के दूसरी ओर एक बड़ा-सा महल बनाओ
और उसमें सारे सुख के साधन जुटाओ ।
भूत के लिए क्या देर थी ! उसने झट से एक
शानदार महल खड़ा कर दिया। विज्जू के मां-बाप ने
जब महल देखा तो बड़े हैरान हुए, पर भूत के कहने से
महल में आराम से रहने लगे।
महल बनाने के बाद भूत ने काम पूछा तो विज्जू
को अपनी पढ़ाई याद आ गई। उसने सोचा की
मदद से सारी किताबें पढ़ लूं, तो क्या बुरा है । उसने
भूत को हुक्म दिया कि मुझे दुनिया भर की कितावें
पढ़ा दो और सारा ज्ञान दे दो।
भूत के लिए यह क्या मुश्किर था ! उसने दुनिया भर
की कितावें और ज्ञान इकट्ठा करके उनका चूर्ण बना-
कर बिज्जू पर बुरक दिया । बस, बिज्जू दुनिया का
एक बड़ा विद्वान आदमी बन गया । पर भूत को इससे
क्या, उसे तो काम चाहिए था। उसने बिज्जू से काम
मांगा । अब चूंकि उसे सारी दुनिया का ज्ञान हो
था, उसने दुनिया के हर काम में कमियां निकालन

( ५४ )
र दी। पर भूत को काम चाहिए था और विज्जू
मालूम था कि यदि भूत को काम न दिया गया तो
ह उसका गला पकड़ लेगा और उसके हाथ जान
गवानी पड़ेगी।
विज्जू ने उसे काम बताया कि मेरे साथ पढ़
वाले ही नहीं, उस स्कूल के हर लड़के के लिए आली
बता दो और उन्हें सब सुख पहुंचा दो।

भूत को भूत तीन-चार दिन उस काम में लगा रहा और उसने हजारों आलीशान महल तैयार कर दिये । भूत फिर विज्जू के पास आया और काम पूछने लगा । अब विज्जू डरा, पर उसने अक्ल से ही काम लिया । उसने हुक्म दिया कि दुनिया भर में जितने गंजे और दाद वाले है, उनको खाज वन्द कर दो, पर यह याद रखो कि खाज बंद हो जाये परन्तु उनके नाखून बरकरार रहें । और देखो, यह मेरा प्यारा कुत्ता टिंगू है, इसे भी ले जाओ और इसका पूंछ हिलाना भी बंद कर दो, क्योंकि इसकी टेढ़ी दुम और दुम हिलाना हमे अच्छा नहीं लगता। चूंकि अब हम एक बड़े आदमी हो गये हैं इसलिये अब हमारे कुत्ते को भी अकड़ से रहना चाहिए । देखो, दोनों काम एक साथ हों। भूत अपने खयाल में था कि यह भी कोई काम है, मिनटों में करता हूँ। उसने दुनिया भर के गंजे और खाज वालों को इकट्ठा किया और उनकी मरहम- पट्टी की, पर ज्यों ही पट्टी खोलता, वे फिर खाज करने लगते । उसे गुस्सा भी आता कि उनके नाखून ही उड़ा दे, पर मालिक का ऐसा हुक्म न था। दूसरी ओर टिंगू की पूंछ में उसने लकड़ी वांधी और लोहे की नली में बंद किया। पर जब भी निकाला, दुम ।

सौएक
एक
कहानियाँ
11-/-
एक राजा था। उसे हर रोज़ एक शादी करने का
। पर साथ ही सबसे बुरी बात यह थी कि
से रात को शादी करता, उसे अगले.
( ५८)

(५१) - दिन सुबह मरवा देता। इस तरह सैंकड़ों लड़कियां मौत के घाट उतार दी गई। लोग अन्दर ही अन्दर राजा से डरते पर कुछ कह न पाते, क्योंकि उसकी फौज बहुत बड़ी थी और सभी फौजी अफसर उसके रिश्तेदार थे। उन दिनों वोट देकर सरकार न बनती थीं। या तो राजगद्दियां दादा-पर- दादा से चली आती थीं, या फिर कोई ताकतवर आदमी अपने साथियों को लेकर कहीं भी कब्ज़ा जमा लेता । तलयार खां भी इसी तरह राजा वन वंठा था। एक दिन ऐसा आया कि शहर के कसाई की बेटी ने राजा को शहर में आते देखा और उस पर मुग्ध हो गई । उसने अपने पिता से कहा कि मै राजा तलयार खां से शादी करूंगी। कसाई ने अपनी बेटी को बहुत समझाया कि क्यों बलि का बकरा बनना चाहती है। पर वह अपने पिता से बोली, "पिताजी जिस तरह आप भेड़-बकरियों को मौत के घाट उतारते हैं, उसी तरह तलयार खां लड़कियों को । पर मैं उसकी यह आदत छुड़वाना चाहती हूँ। मै रोज-रोज़ लड़कियों को मौत के घाट उतरना नहीं देखना चाहती।" लड़की सयानी थी। पिता ने उसकी हठ जान राजा से शादी करवा दी। पर लड़की अपनी छोटी ।

: छः :
एक सौएक
कहानियाँ
-
स्व
एक राजा था। उसे हर रोज़ एक शादी करने का
शौक था। पर साथ ही सबसे बुरी बात यह थी कि
वह जिस लड़की से रात को शादी करता, उसे अगले
( ५८ )

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( ६० )
बहन को भी साथ ले आई।
X
X
X
कसाई की लड़की रानी बन कर महलों में आ गई।
रात को तलयार खाँ जब उसके महल में आया तो
कसाई की लड़की ने उसकी खूब आवभगत की । दूसरी
लड़कियाँ तो डरती हुई बात भी न करती थी, क्योंकि
उन्हें पता होता था कि अगली सुबह मारी जाएंगी।
पर कसाई की लड़की ने खूब बातें कीं और राज-काज
के बारे में वहुत-सी बातें पूछी भी।
इस तरह काफी देर के बाद खाना खिलाया ।
खाने में अनेक तरह के व्यंजन और पकवान थे, जो
राजा ने कभी न खाये थे । राजा खुश भी था और देर
भी हो रही थी।
आखिर सब लोग खा-पीकर सोने लगे तो कसाई
की छोटी लड़की अपनी बड़ी बहन की बगल में
आकर बैठ गई । बोली, "दीदी, आज कहानी न सुना-
ओगी क्या ? तुम जानती हो कि मुझे तो कहानी सुने
विना नींद नहीं आती।"
देर पहले ही बहुत हो चुकी थी। पर रानी ने
अपनी छोटी बहन को कहानी. सुनानी शुरू की :
"एक राजा था। उसके दरबार में चार विद्वान्
?

आदमी थे। एक ज्योतिप जानने वाला नजूमी, एक
सैनिक, एक झीमियागार वैद्य और एक बढ़ई। एक
khapho
दिन राजा की बेटी महल पर खडी होकर धूप में अपने
बाल सुखा रही थी कि उसके रूप पर मुग्ध एक
जादूगर उसे उड़ा कर ले गया।"
तलयार खां को भी कहानी में दिलचस्पी

( ६२ ) वह भी सुनने लगा और वार-बार पूछने लगा कि फिर क्या हुआ। रानी कहानी कहती गई । उसने सुनाया : "लड़की के उड़ा लेने पर राजा वड़ा दुःखी हुआ। उसने ऐलान करवाया कि जो कोई राजकुमारी की खोजकरेगा, उसके साथ उसका व्याह कर दिया जाएगा। राजा ने चारों ओर अपने आदमी भी भेजे । राजा के दरबार के चारों आदमी भी राजकुमारी की खोज के बारे में सोचने लगे। "ज्योतिषी ने अपने ज्योतिष से यह पता लगाया कि लड़की अमुक दिशा में मिलनी चाहिए। अब वहां तक पहुँचे कैसे । बढ़ई ने चार घोड़े बनाये, जो उड़ सकते थे। सैनिक ने अपने हथियार लिये और वैद्य ने दवाइयाँ । बस, फिर चारों चल दिये। "चलते-चलते उन्हें एक टापू दिखाई दिया । वहां जादूगर का महल था । जादूगर राजकुमारी से शादी की तैयारियाँ ही कर रहा था कि चारों वहाँ पहुँचे । पहुँचते ही बहादुर सैनिक ने जादूगर को अपनी तलवार से काट दिया। पर साथ ही साथ जादूगर ने राज- कुमारी का भी सिर धड़ से अलग कर दिया। परन्तु वैद्य ने फौरन ही संजीवनी बूटी से उसे ज़िन्दा कर

। बढ़ई ने महल में से जादू का घोड़ा ढूढ
काला और फिर पांचों राजधानी वापिस लौट आये।
"राजा ने जव यह सुना तो उसको बड़ी खुशी
हुई । पर दिक्कत यह हुई कि राजकुमारी की गादी
किस से की जाये, क्योकि अब तो हकदार चार थे।"
रात बहुत हो गई थी। कसाई की लड़की रानी ने
तलयार यां से पूछा कि आप बताइये कि राजकुमारी

( ६४ )
फिर
दिया
निष
की शादी किससे की गई ? तलयार
न सूझा । राजा ने रानी से ही जवाब
बोली, "देखो, छोटी बहन सो गई है,
तीसरा पहर है । मुझे भी ज़ोर की नींद
आप भी सो जाइये और मैं भी सोऊँ । इस ने
कल दूंगी।"
अगले दिन राजा बहुत देर से सो कर उठा
सीधा दवार में चला गया। आज उसे रानी को
मरवाने का हुक्म देना याद न रहा और याद भी आता
तो कहानी के चक्कर में शायद हुक्म देता भी नहीं।
X
X
X
।
दूसरी रात को राजा खा-पीकर पलंग पर बैठा तो
उसने पूछा कि “राजकुमारी की शादी किससे हुई ?"
रानी ने बताया कि राजकुमारी ने एक चिता तैयार
करवाई और कहा कि जो मेरे साथ इस चिता में चढ़ेगा,
मैं उसी के साथ शादी करूँगी। ज्योतिषी ने पता लगाया
कि चिता के नीचे सुरंग है, इसलिए राजकुमारी मरेगी
नहीं। ज्योतिषी राजकुमारी के साथ चिता पर चढ़
गया और दोनों सुरंग की राह राजमहल में बच
निकले । फिर दोनों की शादी हो गई।
रानी की छोटी बहन अनीस ने दूसरी कहानी

मुनाने को कहा । रानी कहानी सुनाने लगी :
"एक लड़की थी । मां-बाप उसके व्याह की
तयारियां करने लगे। चारों ओर लड़के की खोज होने
लगी । बहुत खोज के बाद एक दिन एक ही समय
लड़की के लिए तीन मंगनियां, तीन रिश्तेदारों के पास
आई और तीनों मंजूर कर ली गई । एक दूसरे को
वात का किसी को पता न चला । तैयारियां खूब जोर
से हुई । चारों ओर इस शादी की चर्चा होने लगी।
मज़ा यह कि तीनों जगह से विवाह का दिन भी एक
ही नियत किया गया और अंत में तीनों वरातें एक
हो साथ आ पहुंची।"
तलयार खां ने सोचा कि उसके बाद जोर की
लड़ाई हुई होगी और जो लोग तगड़े होंगे, वे लड़की को
ले गये होंगे । पर रानी बोली, "नहीं, यह बात नहीं ।
बात यह हुई कि लड़की को घर के अन्दर कोने मे
सजाया-संवारा जा रहा था कि एक सांप ने उसे
काट खाया, और वह मर गई। अक्सर गांवों में ऐसे
घर होते हैं जहां सामान भरा रहता है और कोई नही
जाता । पर खैर, तीनों वरातों के तीनों दुल्हे बड़े सोच
में पड़ गये। एक तो इतना दुखी हुआ कि वह तो
लड़क के साथी ही चिता मे जल मरा । दूसरे ने भगवान

की आराधना की और संजीवनी बूटी हासिल कर ली।
तीसरे ने अनशन शुरू कर दिया। संजीवनी वाले ने
लड़की की चिता पर बूटी का पानी छिड़क कर दोनों
को जिन्दा कर लिया । अब सवाल यह आया कि लड़की
की शादी किसके साथ हो।"
रानी ने राजा से पूछा कि “बताइए, लड़की की
शादी किससे हो ?"
राजा बोला, “यह मैं क्या जानूं, तुम्हीं बताओ
रानी बोली, "अनीस सो गई और रात भी तीन
पहर बीत गई। मेरी आंखों में नींद भर रही है । आप
को भी सुवह राज दरबार में देर हो जाएगी। सो आप
भी सो जाइए । कल बताऊँगी कि शादी किससे हुई।"
।
X
अगली रात जब राजा आया तो रानी ने बताया
कि जिसने लड़की को जिन्दा किया, वह तो रिश्ते में उस
का पिता हुआ । और जो उसके साथ जीवित हुआ वह
हुआ भाई । तीसरे वर से ही लड़की की शादी होनी
चाहिए।
राजा तलयार खां इस उत्तर को सुन कर बहुत
प्रसन्न हुआ। इस तरह उसे कहानियों का चस्का लग
गया और अपना कुकर्म भूलने लगा।
x
x
x

(७)
-
तीसरी रात को जव तलयार खां आया तो छोटी
बहन की जगह उसने स्वयं कहानी सुनने को चाह प्रकट
की। रानी ने कहानी आरम्भ की ।
"एक गांव में एक किसान परिवार रहता पा।
उनकी छोटी-सी खेती थी। एक गाय और एक भंस
भी थी। उनके दो लड़के भी थे। घर अच्छा और
खुशहाल था।"
तलयार खां ने आज तक कभी बच्चों के बारे में
सोचा भी नहीं था । उसके दिल में बच्चे के लिए दवी
चाह जाग उठी । पर मुंह से कुछ बोला नहीं, कहानी
सुनता रहा । रानी कहानी सुना रही थी :
"पर उनकी सुशहाली देखकर उनके बहुत से
रिश्तेदार मन में जलन रखते थे। एक बार गांव में
एक ऐसी वोमारी फैली कि बहुत से लोग मर गये ।
संयोग की वात उन लड़कों के मां-बाप भी उनको
अनाथ छोड़ कर चल दिये । अब क्या था, उन लड़कों
के चाचा ने दोनों लड़कों को एक लकड़ी के बक्से में
वन्द कर दिया और समुद्र में फेंक दिया । और
उनके घर पर अपना कब्जा कर लिया।
"चाचा ने समझा कि अव उसे कौन पूछने वाला
है, पर जिसकी रक्षा भगवान करता है उसे कोई,

। ६८)
मार सकता । संयोग की बात, तीसरे ही दिन उस
बक्से को समुद्र में डूबते-उतराते देख मछुओं ने जाल
फेंका और बक्सा किनारे पर खींच लिया। आसपास
के सारे मछुए इकट्ठे हो गये । उन्होंने उन बच्चों को
बक्से समेत राजा के दरबार में पहुँचा दिया ।
"राजा ने जब उन लड़कों को देखा तो उसने
पूछा कि तुम लोग कितने दिन से इस बक्से में बन्द

(६९)
.
ये। एक लड़का बोल उठा--'तीन दिन से।' राजा
हैरान था।"
रानी ने देखा कि अनीस सो चुकी थी । उसने
तलयार खां से पूछा । "आप बता सकते हैं कि लड़के
ने कैसे बताया कि वे तीन दिन से बंद थे?"
"यह तो बड़ी हैरानी की बात है कि लड़के ने
कसे बता दिया । तुम बताओ न !"
"यह आप जानते हैं रात तीन पहर बीत चुकी है
और अनीस भी सो चुकी है । अगर मैं अब यता दूंगी
तो वह फिर मुझ से पूछेगी और आप को भी सुबह
दरवार जाने में देर हो जाएगी। इसलिए इसका जवाब
कल दूंगी।"
इस तरह रानी ने तीन दिन में राजा का मन
बहुत कुछ बदल दिया, पर वह जानती थी कि उसकी
आदत को छुड़ाने के लिए तीन दिन कुछ नही होते ।
इसलिए वह एक-सौ-एक दिन लगातार इसी तरह
कहानियां सुनाती रही।
राजा बहुत कुछ बदल चुका था। और वह इस
रानी से बहुत खुश भी था । इसलिए अब उसने रानी
पर अपनी इच्छा प्रकट कर दी। और अपना इरादा
बता दिया कि यह अब उसके सिवा और
..

(७. ) शादी न करेगा और उससे होने वाले बेटे को ही राजगद्दी का मालिक बनाएगा। उस दिन राज्य भर में खुशियां मनाई गईं और खूब जलसे-जश्न हुए। सारी प्रजा रानी की अक्ल- मंदी के गुण गाने लगी। राजा-रानी भी सुख रहने लगे। से

: मात:
सोने
के
जूते
किसी स्थान पर एक आदमी रहता था। उसके
पास रुपया-पैसा बहुत था। उसके एक ही पुत्र था।
उसकी इच्छा थी कि एक पुत्री और होती, जिससे
भाई-बहन की जोड़ी बन जाती। उस आदमी की

( ७२ )
rama
रत मन्दिर में जाती, ईश्वर को मनाती। सब कुछ
रती; परन्तु उसके कन्या न हुई ।
एक दिन शहर के
बाहर वाग में एक महात्मा
नाये । वह औरत भी उन्हें देखने वहां गई। महात्मा
ने उसका नाम पूछा-औरत ने अपना नाम कमला
बताया । महात्मा ने कहा-"कमला यहां से बहुत
दूर एक परी रहती है, उससे जाकर पुत्री मांग, वह
देगी।"
कमला चल पड़ी। चलते-चलते वह एक जंगल
में पहुँची। वह बहुत थक गई थी। बहुत भूखी और
प्यासी भी थी। उसे लकड़ियों का घेरा-सा दिखाई
दिया । कमला ने समझा यही परी का घर होगा।
वह उस घेरे के दरवाजे पर जाकर बैठ गई ।
सांझ को एक काली-सी औरत आई । उसकी नाक
लम्बी थी, कान छाज जैसे थे, ओंठ मोटे-मोटे डरावने
थे । उसने कमला से पूछा- “यहाँ क्यों बैठी हो?"
कमला बोली-"महात्मा ने बताया था कि हमारे
शहर से दूर एक परी रहती है, मैं उसी से पुत्री मांगने
आई थी।"
वह बोली-“मैं तो परी नहीं; मैं तो भूतों की
मा हूँ। हाँ, तुम चाहो तो तुम्हें लड़की मिल सकती

( ७३ )
है। देखो जनवरी का महीना सर्दी का होता है ।
इस महीने यदि मेरे बेटों के लिए रोटी बनाती रहो,
तो तुम्हें पुत्री मिल जाएगी। न बनाओगी तो तुम्हें
मार डालूंगी।"
"कमला मान गई । वह महीना भर रोटियाँ
बनाती रही। महीने के बाद प्रसन्न होकर भूतों की
मां ने उसे एक चमेली का फूल दिया और कहा कि
इसे चांदनी रात में खायेगी तो सफेद परियों जैसी
लड़की होगी। यदि अंधेरी रात में खायेगी तो मेरे
जैसी काली-कलूटी लड़की पैदा होगी।
भूतों की मां ने उसे आँखें बन्द करने को कहा।
कमला ने जब आखें खोली तो वह अपने घर में बैठी
थी। उसने घर वालों को सारी बात सुनाई। सव
पड़े प्रसन्न हुए। चांदनी रातें आई। कमला बहुत
प्रसन्न हुई। उसने चमेली का फूल खाने की सोची।
चांद निकला हुआ था । कमला ने फूल को
खांड में मिलाया और ईश्वर को याद करके मुंह में
रख लिया । फूल मुंह में रखना था कि एकदम
बादल छा गये और चांदनी रात काली गई।
कमला डरने लगी कि कही लड़की काली न हो।
नौ महीने बाद कमला के लडकी पैदा हुई । लड़की

.. anani पेट से ऊपर काली थी और पेट के नीचे सफेद । लड़की के पैदा होने के कुछ साल बाद कमला मर गई। लड़की का नाम भूतपरी रखा गया । उसका मुंह भूतों जैसा और पाँव परियों जैसे थे । लड़की अपनी माँ को बहुत याद करती थी। कमला के मरने पर भूतपरी के पिता ने दूसरी औरत से विवाह कर लिया । उस औरत के दो लड़कियाँ हुईं । वे भूतपरी को बहुत दुःखी रखने लगीं । भूतपरी की मां को जहाँ जलाया गया था, वहाँ वह रोज सवेरे जाती और उस पर चमेली के फूल चढ़ा आती। इसी तरह दिन बीतने लगे। X X एक दिन उस देश के राजकुमार ने सब अखबारों में यह समाचार निकलवाया कि देश की सबसे सुन्दर कन्या को रानी बनाया जाएगा। देश भर की सभी लड़कियां तैयारी करने लगीं। दिवाली की रात को सब को राजमहल में बुलाया गया था । उन दिनों बाजार में बहुत अच्छी-अच्छी साड़ियां और वास्कटें खूब विकीं । भूतपरी की बहनें भी राज- --

( ७५ )
महल में जाने की तैयारियां कर रही थीं । वे भूतपरी
को चिढ़ाती, कि क्या तू भी वहां चलेगी।
भूतपरी एक दिन अपनी मां के जलाने की जगह
गई तो उसे वहां एक चिड़िया मिली। चिड़िया ने
भूतपरी से कहा-"वेटी, मैं जानती हूँ तू दुखी है ।
मैं तेरी इच्छा जानती हूँ। मैं परी हूँ। तू जो कुछ
कहेगी मैं करूंगी।"

(. ७६ )
भूतपरी ने कहा-"माँ, मैं भी दिवाली की
रात राजमहल में जाना चाहती हूँ । क्या मैं वहाँ.
जाने के योग्य हो सकूँगी ?"
चिड़िया ने कहा-"हां, क्यों नहीं ?"
दिवाली का दिन आया। सारे देश की सुन्दर
लड़कियां वहां जमा हो रही थीं। भूतपरी की बहनें
बार-बार उसे चिढ़ातीं-क्या तू भी चलेगी ? भूतपरी
कहती-"मैं न तो सुन्दर हूँ और न मुझमें कोई
गुण है। मैं वहाँ क्या जाऊँगी ?"
साँझ होते ही भूतपरी की बहनें राजमहल की
ओर चल पड़ीं । भूतपरी को आज घर का सारा काम
करना पड़ा। उसे बहुत देर हो गई। जल्दी-जल्दी
उसने सारा काम किया और अपनी चिड़िया-माँ के
पास आई। माँ वहाँ पहले ही बैठी थी। बोली-
"बेटी, तूने इतनी देर क्यों कर दी ?"
भूतपरी वोली-"मां क्या करूँ, बहनें बहुत काम
करवाती हैं । तुम मुझे जल्दी तैयार कर दो। तुम
चाहो तो मैं अब भी सब से पहले पहुँच जाऊँगीं।"
माँ ने एक छड़ी घुमाई । भूतपरी के लिए सुन्दर
घोड़ा-गाड़ी आ गई। फिर छड़ी घुमाई । गाड़ी में
चार सफेद घोड़े आ लगे । इतने में गाड़ी चलाने वाल
-

भी ला गया। एक
रबर
नोकरला गये।
मां ने भूतारी :-.-न बने
के लिए गाड़ी में मदद।
भूतपरी बोली- काहे के देशों में
गन्दे हैं और मेरा कर देगार हा मेन
घुसने देगा?"
परी ने फिर कान छड़ी मात्रा का
परियों जैसे सुन्दर दनमः। नगन्दी दी और
वास्कट आदि कपड़े कोने-चांदी बनाने हो।
परी ने उसे सोने का जूता ने पहनने नेदित।
भूतपरी चलने नगी । नन्हा-बेटी करा
होने से पहले घर ना जाना । निम्नने से पहले
न नामोगी तो फिर वंची ही होबाजोगी।"
भूतपरी चली। पोड़ी देर में
दह राजमहल
दरवाजे पर थी। चौहार ने अन्दर जाकर सदर
दी कि बाहर एक रामारी नही है। इन पाने
को ही थे कि उस चौरदार की ओर देखने को।
राजकुमार स्वयं गहमारी सेनेने बाहर।
राजकुमारी आई तो नव नरियां कर देखने की।
उसके कपड़ों और चेहरे पर इतनी चमक पी

( ७८ )
.
किसी की आँख उस पर टिकती न थी। राजकुमार
ने उसे खाना खिलाया । भूतपरी की बहनें भी पास
ही वैठी थीं; पर वे भी उसे पहचान न सकीं।
राजकुमार ने उसे सारा महल दिखाया। रात
बहुत हो गई थी। सब को नींद आने लगी। भूतपरी
ने घड़ी देखी, सबेरा होने ही वाला था । वह सबको
छोड़ घर को भागी । अपनी बहनों के घर पहुँचने से
पहले ही वह घर आकर सो गई।
दिन निकला। भूतपरी की बहनों ने उससे कहा-
“भूतपरी, कल एक बहुत अच्छी राजकुमारी आई थी।
वह हमारे ही पास बैठी थी।" भूतपरी ने कहा- "बैठी
होगी, मुझे क्या पता । मुझे तो राजमहल की राह
का भी पता नहीं।"
साँझ हुई । भूतपरी की बहनें फिर खा पी कर
और अच्छे कपड़े पहन कर राजमहल की ओर चलीं।
भूतपरी ने घर का सारा काम किया। आज फिर
उसे बहुत देर हो गई । आधी रात को वह चिड़िया मां
के पास आई । मां से बोली-“माँ, क्या करूँ, बहनें
सब कुछ इधर उधर फैला देती हैं । वर्तन गन्दे करके
छोड़ जाती हैं । कपड़े भी धोने को कहती हैं। उनके
धुले हुए कपड़ों पर इस्तरी भी करनी होती है।

(७)
इसीलिए देर हो जाती है।"
परी ने कहा-"अच्छा बेटी, और दो दिन की
बात है । फिर तू राजकुमारी बन जायगी।"
"मेरी प्यारी मां, तुम बहुत अच्छी हो !"भूतपरो
मागले लिपट कर रोने लगी।
मां ने कहा-"अच्छा बेटी, जल्दी जा, नहीं
-

( ८० )
सब लोग उठ जायेंगे। पर याद रखना कि जल्दी लौट
आना । दिन निकलने लगेगा तो तू वैसी ही बन
जाएगी।"
भूतपरी राजमहल पहुंची।
आज फिर चौकीदार अन्दर गया । राजकुमार
को बाहर बुला कर आया। राजकुमार ने कहा-
"आप इतनी देर से क्यों आती हैं ? कल आप जल्दी
ही चली गईं।"
राजकुमारी ने कहा-"मां की सेवा में देर हो
जाती है।"
राजकुमार यह बात सुन कर बहत प्रसन्न हुआ।
उसने कहा-"आज तुम्हारी खुशी के लिए परियाँ
नाचेंगी। अन्दर चलो।"
भूतपरी अन्दर गई तो सभी की आंखें फिर उसे
देखने लगीं। राजकुमार ने और किसी से बात भी
नहीं की। पहले सबने खाना खाया, फिर परियाँ नाचने
लगीं। नाच बहुत देर तक होता रहा । भूतपरी को
समय का कुछ पता न चला। परियों के नाच में
दिन निकलने ही को था कि वह भागी। दौड़ते हुए
जल्दी में उसका एक जूता वहीं रह गया ।
राजकुमार उदास हो गया । नाच-गान वहीं रुक

गया । सभा में सन्नाटा छा गया। राजकुमार दो दिन
में ही उसे इतना चाहने लगा था कि यह सब चीजें
उनके विना नीरस हो गई थी। यह आज ही उसे रानी
Si
बनाना चाहता था, पर राजकुमारी पेग तरह एका.
एक गले जाने में यह बहुत दु.पी हो -

(८०)
सब लोग उठ जायेंगे । पर याद रखना कि जल्दी लौट
आना। दिन निकलने लगेगा तो तू वैसी ही बन
जाएगी।"
भूतपरी राजमहल पहुंची।
आज फिर चौकीदार अन्दर गया। राजकुमार
को बाहर बुला कर आया । राजकुमार ने कहा-
"आप इतनी देर से क्यों आती हैं ? कल आप जल्दी
ही चली गईं।'
राजकुमारी ने कहा-"माँ की सेवा में देर हो
जाती है।"
राजकुमार यह बात सुन कर बहत प्रसन्न हुआ।
उसने कहा-"आज तुम्हारी खुशी के लिए परियाँ
नाचेंगी। अन्दर चलो।"
भूतपरी अन्दर गई तो सभी की आँखें फिर उसे
देखने लगीं। राजकुमार ने और किसी से बात भी
नहीं की। पहले सवने खाना खाया, फिर परियां नाचने
लगीं। नाच बहुत देर तक होता रहा । भूतपरी को
समय का. कुछ पता न चला। परियों के नाच में
दिन निकलने ही को था कि वह भागी। दौड़ते हुए
जल्दी में उसका एक जूता वहीं रह गया ।
राजकुमार उदास हो गया । नाच-गान वहीं रुक
.

गया । सभा में सन्नाटा छा गया । राजकुमार दो दिन
में ही उसे इतना चाहने लगा था कि यह सब चीजें
उनके विना नीरम हो गई थीं । वह आज ही उगे रानी
बनाना चाहता था, पर राजकुमारी के इस तरह एका-
एक चले जाने में वह बहुत दुःखी हो।
। पर

( ८२ )
राजकुमारी का सोने का जूता ही अब उसकी खोज
का आधार था।
-
सब लड़कियां अपने घर चली गई । राजकुमारी
का जूता सोने का था । राजकुमार ने कहा कि जिस
के पाँव में यह जूता ठीक आ जायेगा, उसी को
राजकुमारी बनाया जायेगा।
राजा के आदमी घर-घर जाते और सब लड़कियों
को
वह जूता पहना कर देखते, पर वह किसी के पाँव में
ठीक न आता । दूसरे दिन भूतपरी के घर भी वह जूता
आया । भूतपरी की बहनों ने भी जूता पहन कर
देखा, पर वह उन के भी पैरों में ठीक न आया ।
भूतपरी भी पास ही खड़ी थी। उसने कहा-
"कहो तो मैं भी पहन कर देख लूँ ।" बहनें हँसी और
वोली - "ले देख, चली है सोने के जूते पहनने !
कभी हाथ में भी लिए हैं ऐसे जूते ?"
भूतपरी ने जूता पहना । वह उसके पाँव में ठीक
आ गया। उसने अपनी धोती में से दूसरा भी निकाला
और पहन लिया । जूता पहनते ही भूतपरी फिर वही
राजकुमारी बन गई । राजा के आदमी उसे राजकुमार
के पास ले गये । वह अपनी दोनों बहनों को भी
साथ ले गई । राजकुमार उसे देख बहुत प्रसन्न हुआ।

और उसे अपनी रानी बना लिया । सब नुज से रहने
सगे । राजा ने उसका नाम स्वर्णपरी रानी रगा और
राज-काज उसकी सलाह ने करने लगा।
स्वर्णपरी गरीबों के दुःस जानती थी, इसलिए वह
गरीबों-निर्धनों का बड़ा ध्यान रपत्ती । उसने राज्य
में कई काम चालू करवाए, जिससे निधन लोगों को
आमदनी होने लगी । यह ऐसे काम थे, जिन्हें वे
मिलकर करते थे और मुनाफा आपस में बांट लेते थे।

( ८२ )
min
राजकुमारी का सोने का जूता ही अब उसकी खोज
का आधार था।
सब लड़कियां अपने घर चली गई। राजकुमारी
का जूता सोने का था । राजकुमार ने कहा कि जिस
के पाँव में यह जूता ठीक आ जायेगा, उसी को
राजकुमारी बनाया जायेगा।
राजा के आदमी घर-घर जाते और सब लड़कियों
को वह जूता पहना कर देखते, पर वह किसी के पाँव में
ठीक न आता । दूसरे दिन भूतपरी के घर भी वह जूता
आया । भूतपरी की बहनों ने भी जूता पहन कर
देखा, पर वह उन के भी पैरों में ठीक न आया ।
भूतपरी भी पास ही खड़ी थी। उसने कहा-
"कहो तो मैं भी पहन कर देख लूँ ।" बहनें हँसी और
बोली - "ले देख, चली है सोने के जूते पहनने !
कभी हाथ में भी लिए हैं ऐसे जूते ?"
भूतपरी ने जूता पहना । वह उसके पाँव में ठीक
आ गया। उसने अपनी धोती में से दूसरा भी निकाला
और पहन लिया । जूता पहनते ही भूतपरी फिर वही
राजकुमारी बन गई । राजा के आदमी उसे राजकुमार
के पास ले गये । वह अपनी दोनों बहनों को भी
साथ ले गई । राजकुमार उसे देख बहुत प्रसन्न हुआ
।

और उसे अपनी रानी बना लिया । सब सुख से रहने
लगे । राजा ने उसका नाम सपंपरी रानी रया और
राज-काज उसकी सलाह से करने लगा।
स्वर्णपरी गरीबों ने दुःरा जानती थी, इसलिए वह
गरीबों-निर्धनों का बड़ा ध्यान रखती। उसने राज्य
में कई काम चालू करवाए, जिससे निधन लोगों को
आमदनी होने लगी । यह ऐसे काम थे, जिन्हें वे
मिलकर करते थे और मुनाफा आपस में बांट लेते थे।

: आठ: और भूत भाग गया या एक समय की बात है कि यूनान की राजधानी में एक प्रसिद्ध डॉक्टर रहता था। उसका नाम 'हैलमण्ड' था। वह नित्य नये-नये आविष्कार करने के लिए तरह- तरह के प्रयोग किया करता था। कुछ दिन बाद उसे

willnutriWrnwww
यह धुन सवार हुई कि मरे हुए मनुष्य को जीवित
किया जाए, इसलिये डॉक्टर प्रतिदिन गत को एक
मुरदा चुन लाता और उस पर तरह-तरह के प्रयोग
करता।
भयानक रात थी। सर्दी बढ़ती जा रही थी।
बाजारों में बिजली के मम्मों का प्रकाग बंधकार को
चीरता-सा लगता था । सारा बाजार बंद हो रहा था।
गढ़कें मुनसान हो गई थीं । कभी-कभी कोई मोटर
करर्राटे भरती हुई सड़क पर से गुजर जाती थी। चारों
और सर्वत्र मान्ति फैली हुई थी । इतने में डॉक्टर
हैलमण्ड की कार सड़क पर होती हुई 'हेलमण्ड-बलीनिक'
के सामने की। यह डॉक्टर की छोटी-मी प्रयोगमाला
थी । उस कार में मे दो आदमीएक वर्षमे को
हाथों में उठाये हुए कार में बाहर निकले । शायद
यं दिमी मजदूर थे । उनके उतरने के बाद कार
की आगे की पीली रोगनी वाली बत्ती बुझी योर एक
आदमी और कार में से निकला । उस आदमी ने एक
लम्बा भूरे रंग का ओवरकोट पहन रखा था बार
गिर पर एक बड़ा-सा हंट लगा रखा था। वह यादमी
जगमग माढ़े-टः फुट का था, देखने में लगता
था। यह डॉक्टर हैलमण्ड ही या, जो
F

: आठ: और भूत भाग गया . 5. एक समय की बात है कि यूनान की राजधानी में एक प्रसिद्ध डॉक्टर रहता था। उसका नाम 'हैलमण्ड था । वह नित्यं नये-नये आविष्कार करने के लिए तरह- तरह के प्रयोग किया करता था। कुछ दिन बाद उसे ८४ )

यह धुन सवार हुई कि मरे हुए मनुष्य को जीवित
किया जाए, इसलिये डॉक्टर प्रतिदिन रात को एक
मुरदा चुन लाता और उस पर तरह-तरह के प्रयोग
करता।
भयानक रात थी। सर्दी बढ़ती जा रही थी।
वाज़ारों में विजली के खम्भों का प्रकाश अंधकार को
चीरता-सा लगता था । सारा बाजार बंद हो रहा था।
सड़कें सुनसान हो गई थीं । कभी-कभी कोई मोटर
फर्राटे भरती हुई सड़क पर से गुजर जाती थी। चारों
ओर सर्वत्र, गान्ति फैली हुई थी। इतने में डॉक्टर
हैलमण्ड को कार सड़क पर होती हुई 'हैलमण्ड-बलीनिक'
के सामने रुकी । यह डॉक्टर की छोटी-सी प्रयोगशाला
थी । उस कार में से दो आदमी एक वक्से को
हाथों में उठाये हुए कार से बाहर निकले । शायद
ये आदमी मजदूर थे । उनके उतरने के बाद कार
की आगे की पीली रोशनी वाली बत्ती बुझी और एक
आदमी और कार में से निकला । उस आदमी ने एक
लम्वा भूरे रंग का ओवरकोट पहन रखा था और
सिर पर एक बड़ा-सा हैट लगा रखा था। वह आदमी
लगभग साढ़े-छ: फुट का था, देखने में रोबीला लगता
था । यह डॉक्टर हैलमण्ड ही था, जो एक नए शव को-

प्रयोग करने के लिए लाया था । डॉक्टर ने कार का दरवाज़ा झटके के साथ बंद किया और बाहर बक्सा लिये हुए मजदूरों को आदेश- दिया और मज़दूर आज्ञाकारी सेवक की भाँति अन्दर एक बड़े-से कमरे की ओर चल दिये । उन्होंने बक्से को मेज़ पर रख कर उसमें से शव को निकाल कर एक परीक्षण मेज़ पर रख दिया। रात के अन्ध- कार में शव बड़ा भयानक प्रतीत हो रहा था । डॉक्टर ने मजदूरों को पैसे देकर बाहर भेज दिया और शव को ठीक तरह देखने लगा। जिस कमरे में शव रखा हुआ था, वह बड़ा भयानक प्रतीत हो रहा था। कमरे में दो रोशनदान थे । और एक छोटी-सी खिड़की, जो दूसरे कमरे में निकलती थी। कमरे में दो दरवाज़े थे और कमरे के बीचों-बीच एक बड़ी मेज़ रखी हुई थी, जिस पर शव पड़ा हुआ था । कमरे की दीवारों के सहारे शीशे की अलमारियाँ कायदे से रखी हुई थी और उन अलमारियों में कायदे से तरह-तरह के चमचमाते औज़ार लटक रहे थे। डॉक्टर ने एकवारगी कमरे में चारों ओर नज़र दौड़ाई और एक बोतल खोज निकाली । उसने अपने छुरी-काँटों से शव को हिलाया, पर शव बिल्कुल

( ८५
५७)
www
निढाल था। उसमें जान होने की कोई निशानी न थी।
डाक्टर ने अपने हाथ में रबड़ के दस्ताने पहने और
उस शीशी को चार-छ: वार हिलाया । उस शीशी पर
लेविल लगा था-'आकाश की बिजली ।' डाक्टर ने
एक लम्बी-सी पिचकारी निकाली और उसमें एक सुई
लगाई । शीशी में पिचकारी की सुई को घुसेड़ कर फिर
वाहर निकाल लिया । पिचकारी खाली

( ८६ योग करने के लिए लाया था। डॉक्टर ने कार का दरवाज़ा झटके के साथ बंद किया और बाहर बक्सा लिये हुए मजदूरों को आदेश- दिया और मज़दूर आज्ञाकारी सेवक की भाँति अन्दर एक बड़े-से कमरे की ओर चल दिये । उन्होंने बक्से को मेज़ पर रख कर उसमें से शव को निकाल कर एक परीक्षण मेज़ पर रख दिया। रात के अन्ध- कार में शव बड़ा भयानक प्रतीत हो रहा था । डॉक्टर ने मजदूरों को पैसे देकर वाहर भेज दिया और शव को ठीक तरह देखने लगा। जिस कमरे में शव रखा हुआ था, वह बड़ा भयानक प्रतीत हो रहा था। कमरे में दो रोशनदान थे । और एक छोटी-सी खिड़की, जो दूसरे कमरे में निकलती थी। कमरे में दो दरवाज़े थे और कमरे के बीचों-बीच एक बड़ी मेज़ रखी हुई थी, जिस पर शव पड़ा हुआ था। कमरे की दीवारों के सहारे शीशे की अलमारियाँ कायदे से रखी हुई थीं और उन अलमारियों में कायदे से तरह-तरह के चमचमाते औज़ार लटक रहे थे। डॉक्टर ने एकवारगी कमरे में चारों ओर नज़- दौड़ाई और एक बोतल खोज निकाली । उसने अप छुरी-काँटों से शव को हिलाया, पर शव बिल्कु

[ ९७ )
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निढाल था। उसमें जान होने की कोई निशानी न थी।
डाक्टर ने अपने हाथ में रबड़ के दस्ताने पहने और
उस शोशी को चार-छ: बार हिलाया। उस शीशी पर
लेविल लगा था-'आकाश की विजली।' आपटर ने
एक लम्बी-सी पिचकारी निकाली और उसमें एक सुई
लगाई । शीशी में पिचकारी की सुई को घुसेड़ कर फिर
बाहर निकाल लिया । पिचकारी खाली-सी

( ८८ )
है। डॉक्टर ने शव की बाँह में उस सुई को घुसेड़
दया-मानो इंजेक्शन लगाया हो ।
इंजेक्शन लगा कर डॉक्टर ने हाथों पर से दस्ताने
उतार दिये और अपनी कुर्सी पर बैठ कर 'आकाश की
विजली' के इंजेक्शन का असर देखने लगा। डॉक्टर
के दिमाग में तरह-तरह के विचार आ रहे थे और
भूतों के बारे में सुनी कहानियाँ भी याद आ रही थीं,
जो बचपन में उसकी दादी सुनाया करती थीं।
डॉक्टर अपने हाथों पर माथा टिकाये कुछ सोच
रहा था कि उसे कुछ खट-पट सुनाई दी । ऐसा मालूम
दिया कि कोई वक्से में से निकल कर फर्श पर भाग
रहा है। डॉक्टर के दिमाग में भूतों वाली कहानियाँ
चल रही थीं। उसने समझा शव जाग उठा है। वह डरा
और भागने लगा, पर जब उसने देखा कि शव तो वैसे
ही पड़ा है तो डॉक्टर वहीं बैठ गया। पर उसके दिल
में डर बैठ गया था। थोड़ी देर में फिर आवाज़ हुई,
डॉक्टर ने देखा कि शव हिल रहा है । घड़ाकर वह
अपनी कुर्सी पर से भागा और दरवाज़ा खोल कर ऊपर
की मंज़िल में जाने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। ऊपर
पहुँच कर उसने अन्दर से दरवाजा बंद कर लिया। पर
भूत उसका पीछा करता हुआ उसके पीछे तक आगया

डॉक्टर पलंग के नीचे छिपा हुआ था । उसने देखा कि जिन्दा शव बिजली के यन्त्र की तरह चला आ रहा है, उसे न दरवाजे की चिन्ता थी, न खिड़को की । सो, भूत ने जोर की टक्कर दी कि किवाड़ खड़खड़ा कर गिर पड़ा । डॉक्टर की चीखें निकल गयीं । आस- पास के मकान वालों ने डॉक्टर के क्लीनिक में गड़बड़ मुनी और रोशनी मे दीवाने-से भूत को घूमते देखा तो वे भी चिल्ला उठे । पर ऐसा दीखता था कि भूत पर किसी बात का कोई असर नहीं। जिस तरह मशीनी हथोड़ा यह नहीं देखता कि किसी का हाथ नीचे आने वाला है या लोहा, वह खटाखट चोट करता है, उसी तरह भूत मशीनी आदमी मालूम होता था। पर असलि. यत का किसी को पता न था और न किसी ने समझने की कोशिश की। खैर, भूत ने इतनी बुरी तरह से डॉक्टर का पीछा किया कि डॉक्टर को तीसरी मजिल से नीचे कूदना पड़ा । भूत की बेवकूफियों से उस मकान में आग लग गई । अब लोगों ने इधर आग बुझाने वाली दम- कलों को बुलवाया और उधर पुलिस को भी खवर दे दी । दमकलें आने तक कई मकानों मे आग पहुँच गई और पुलिस के आने तक लोगो में भगदड़ मच गई।

और मजा तो यह कि भूत आग में घूमता-फिरता नज़र
आता रहा।
दमकल वालों ने आते ही पानी की बौछारें छोड़ी,
पर पानी ने तेल का काम किया और भूत उछलने-
कूदने लगा । उसकी उछल-कूद से आग और फैलने
लगी। दमकल वाले भी हैरान थे।
पुलिस वालों ने हर तरह की कोशिश की और
कई जाल डाले पर भूत काबू में न आया । अन्त में
पुलिस कप्तान ने गोली चलाई, पर दीवारों से टकराने
के सिवाय गोली का कोई असर न हुआ । आखिर
पुलिस कप्तान जैसे-जैसे भूत के करीब पहुँचा, कप्तान
का आधे से अधिक शरीर झुलस गया । पर ज्यों ही
कप्तान ने उसे पकड़ना चाहा, कप्तान को इतने ज़ोर
का धक्का लगा कि वह तीसरी मंजिल से नीचे आ
गिरा और बेहोश हो गया।
अब लोगों में भगदड़ मच गई । दिन निकलते-
निकलते आधा शहर खाली हो गया। सुबह जिन्होंने
भी सुना, वे इधर-उधर भागे । दोपहर होते-होते
सारा शहर ही खाली-सा दीखने लगा। बाहर जाने
वालों का तांता-सा लग गया । शहर के लोग अनेक
pergange fine

में चल रही थी एक औरत जिसके हाथ में एक छोटा-
सा बच्चा था । यह सारी भीड़ सारी रात अपना
सामान बटोरने और बांधने में या इधर-उधर की बातें
सुनने में लगी रही । इसलिए वे सब चलते ऊंघ
रहे थे । औरत के हाथ से बच्चा गिर-गिर पड़ता था,
क्योंकि उसे भी झपकियां आ रही थीं। यह भी सम्
।

( ६२ )
aum
रात सोई न थी । आखिर झपकी में बच्चा उसके हाथ
से गिर गया और पीछे से एक तेज़ गाड़ी के नीचे
आकर दब कर मर गया । औरत रोती-चीखती अपने
बच्चे को गोद में ले सड़क के एक ओर बैठ गई।
औरत के पीछे कुछ लोग आ रहे थे। उनमें एक
नौजवान भी था । उसने औरत के हाथ मरा हुआ.
वच्चा देखा, तो वह उसे समझाने वुझाने लगा। उसने
बहुतेरा समझाया पर वह औरत डॉ० हैलमण्ड का नाम
लेकर बार-बार कहती कि उसे कहो वह इसको ज़िन्दा
कर दे । वह युवक समझाता कि डॉ० हैलमण्ड ने एक
ही आदमी को जिन्दा किया था, उसी की वजह से यह
सारा शहर उजड़ा जा रहा है । अव और किसी को
ज़िन्दा करने की बात न करो । औरत को समझाते-
समझाते रात हो गई। वे दोनों सड़क से एक ओर हट
कर बैठ गए।
अव सड़क भी सुनसान हो गई। लोग बहुत आगे
जा चुके थे । रात का अंधकार फैलता जा रहा था।
इतने में पास ही ज़ोर-ज़ोर की सांय-साँय सुनाई दी।
औरत डर गई, पर नौजवान डण्डा हाथ में लेकरतैयार
हो गया। थोड़ी देर बाद नौजवान ने देखा कि दो
चमकती हुई आँखें उनकी ओर बढ़ रही हैं। कुछ ही

देर में पता चला कि बड़ा भारी अजगर नांप है।
औरत को डर के मारे कांपते देख सांप वोला-"डरो
नहीं, यह मेरा जंगल है। मैं विना अपराध के किसी
को नहीं सताता। यह बताओ कि तुम इस समय यहां
कैसे बैठी हो?"
सांप को वोलता देख दोनों को बड़ी हैरानी हु,
पर सांप के समझाने पर उन्होंने हैलमड़ के विलेने
लेकर बच्चे के मरने तक की नारी कहानी सुना दी।
कहानी सुन कर सांप बोला, "मैं आदमियों के डर की
वात जानता हूँ। उन्हें यह नहीं पता कि भूत होता भी
है या नहीं ? भूत यानी जो कभी या हो चुका ।
हैलमण्ड का भूत हो सकता है, जो वा हो। और हां,
देखो, अभी यह औरत का बच्चा मरा नहीं। यह चोट
लगने से वेहोग है। जंगल में ने बूढी ताकर इस पर लेप
करो तो यह एक-दो दिन में जी टटेगा।" इतना कह
कर सांप कुछ का । फिर थोड़ी देर बाद बोला, "मैं
एक जादूगर हूं। मैं अपने जादू से भी इ जिन्दा कर
देता, पर जादू सदा नहीं रहताः योड़ी देर के लिए
होता है । इसलिए बच्चे का इलाज करो जोर मेरेनाप
चलो। में
को भी देखना चाहता है।"
इतना यह सांप उनको अपने साथ है
।
उन भूत

(६४)
कुछ दूर जाकर एक बूटी दिखाई। नौजवान ने एक
पत्थर पर बूटी रगड़ कर बच्चे को सुधाई और चोट
वाली जगह लेप किया। बरा, अब क्या था ! बच्चा एक
दम उठ कर बैट गया और गां-गाँ करता हुआ खाना
मांगने लगा । साँप ने सीटी बजाई और एक दर्जन साँग
निकल आये और उन्होंने देखते-देखते बढ़िया-बढ़िया
खानों का ढेर लगा दिया । बच्चा खा-पीकर सांपों से
खेलने लगा।
सांपों के राजा ने कहा कि अब तुम मुझे शहर ले
चलो और वह भूत दिखाओ । अजगर ने अपने जादू से
एक घोडागाड़ी बनाई और चारों उसमें बैठ कर चले।
गाड़ी में चार राफेद घोड़े गुते थे और गाड़ी चारों
ओर से बंद थी, पर चौड़ी खिड़कियों में से सब कुछ
दिखाई देता था। अजगर ने राजा जैरा जादुगर का
रूप बनाया और गोचवान रो गाड़ी चलाने को कहा।
दिन निकल आया था। गाड़ी जब जंगल रो
रास्ते पर आ गई और शहर की ओर चलने लगी तो
राब लोगों को बड़ी हैरानी हुई, क्योंकि ये राब तो शहर
छोड़कर भाग रहे थे और घोड़ागाड़ी उधर को जा
रही थी।
एक आदगी ने गोवान से पूछा, "क्यों भाई !

(६५)
किधर जा रहे हो ? लोग तो शहर छोड़कर भाग
रहे हैं और तुम उधर को लपके चले जा रहे हो !"
कोचवान ने झिड़कते हुए कहा "हटो रास्ता
छोड़ो। हमारे जादूगरों के बादशाह तुम्हारे भूत को
देखने जा रहे है । हटो, हटो।"
लोगों में यह बात फैलते देर न लगी और भागते
हुए लोग रुक गये । कुछ दुविधा में पड़ गये और सोचने
लगे । जादूगरों का बादशाह अजगर शहर की ओर
लता गया। जव उसके तेज घोड़ों ने मिनटों में
रास्ता पार कर लिया और शहर के दरवाजे पर पहुंचे
सो शहर लगभग सारा खाली हो चुका था। सभी
शहरी बाहर निकल कर बैठे थे । वे उदास थे।
जादूगर को शहर में घुसते देख उनकी जान में जान
आई।
नौजवान जादूगर अजगर को हैलमण्ड के क्लीनिक
फे पास ले गया। वह मकान जला पड़ा था। एक उदास
आदमी उस मकान के पास एक कोने में दुबका खड़ा
था।
कोचवान ने गाड़ी रोक दी। नौजवान और
जादूगर बाहर निकले । गली के कोने में दुवके हुए
भादमी ने उत्सुकता से उनकी ओर देखा। ऐसा मा

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M
SA
ka
-- RE
12
हो। यह क्या सूझी?" पाल ने पूछा।
"अरे भाई, तुम तो जानते ही हो, मुझे विजली
के आदमी से काम लेने की कितनी धुन थी-पर जव
विजली का आदमी खड़ा हो कर चलने लगा, तो में
खुद डर गया और बिजली के कनेक्शन ठीक न कर
पाया, जिससे यह आग लगी और सव स्वाहा हो
गया।"

६८ )
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ने
पूछा।
"पर लोग क्यों भाग खड़े हुए ?" पाल
"उनकी मैं क्या जानू । जब बिजली का आदमी
पुलिस के काबू में न आया तो सब डर गये। पर बिजली
का आदमी तो किसी इंजीनियर के काबू में आता,
पुलिस को तो यह पता भी न चला कि वह बिजली
का आदमी था।"
"पर तुम्हें आग लग जाने का ज़रा भी अफसोस
नहीं ?" पाल ने फिर पूछा।
"अरे भाई ! भगवान ने जब दो हाथ और दिमाग
दिया है तो एक मकान जल गया तो क्या हुआ,
सही-सलामत रहा तो दस और ऐसे खड़े कर दूंगा।
पर अब तो तुम आ गये हो-जादूगरों के बादशाह;
अब मुझे किस चीज़ की कमी ?" यह कहते हुए दोनों
भाई फिर गले लिपट गये और एक-दूसरे को चूमने
लगे।
"पर मैं महल खड़ा करूँ और तुम कहीं से भू
पकड़ लाओ, तो क्या होगा ?" पाल ने हँसते
कहा ।
"अव की वार मैं भूत का स्विच अपने हाथ
रखूगा और अब उससे डरूँगा भी नहीं, क्योंकि
तो मुझे पता लग गया," हैलमण्ड बोला।

(६९)
www
।
-
.
"अच्छा तो आँखें बंद करो," पाल ने कहा।
सबने आँखें बन्द की। और थोड़ी देर में खोली तो
देखा सामने आसमान से बातें करता महल बढ़ा था।
उसके सामने के मैदान में बहुत सुन्दर वाग था,
घास के मैदान थे, रंग-बिरंगे, खुमबूदार फूलों की
कलियां थीं और अनेक फब्बारों से चांदी-का-मा पानी
उछल रहा था।
"चलो, अन्दर नौकर हमारी इन्नुसार कर दे
है", पाल वोला।
"पर कही तुम्हारे जादू का यह महल हमारे
अन्दर जाते ही गायव तो नहीं हो जाएगा ?"ननाद
ने
पूछा।
"भाई, वात यह है कि तुम नोदईविधान हो और
जानते हो कि इस संसार में हर ची कनीन की
नष्ट हो जाती है । सो, यह महल एक दिनकर
जाएगा। पर तुम यह दद्वात्रि को नही
आएगा ?" पाल ने हमले हुए कहा ।
"भूत तो भाग गया। वह इन
ने कहा और सब महल में बने ।

हमारा पुरस्कृत साहित्य
रामकृष्ण शर्मा
-
अणुयुग का नया सवेरा
सोरों का सन्त
२००
(यूनेस्को द्वारा पुरस्कृत)
-डॉ० अरुण रश्मि २.५०
(यूनेस्को द्वारा पुरस्कृत)
२. जय जवान
-धर्मपाल शास्त्री एम० ए०
(भारत सरकार की शिक्षा मन्त्रालय द्वारा पुरस्कृत)
४. प्रेरक प्रसंग
-रामकृष्ण शर्मा
(शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)
५. जंगल में खुशहाली नाचे ---शंकर वाम १.५०
(शिक्षा मन्त्रालय भारत सरकार द्वारा पुरस्कृत)
६. गुलाव
के
फूल
शंकर वाम २.५०
(उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पुरस्कृत)
७. अपना विकास आप कीजिए - श्यामचन्द कपूर
(दिल्ली प्रशासन द्वारा पुरस्कृत)
२०६३

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Sipah Salar Khan

Author
Shrma Vishwamitra
Title
Sipah Salar Khan
File name
Sipah Salar Khan
Text
OCR done
Citation
1900
Published
2011/03
Publisher
Lahore,the Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
118
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Geography
DLI number
552229
Barcode
4990010032976.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
v1xJbphnwBo
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Sipah Salar Khan