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Srot Sarvsam

Balaram · 2012/08

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श्रौतसर्वसम्
यदी
श्राद्धकृत्यमीमांसा, पिण्डपितृयज्ञमीमांसा,
महालयश्राद्धमीमांसा, च
पात्
शतपथ-गोपप-आदि ब्राह्मण तथा माश्वलायन शाहायन कात्यावन
बौद्धायन दाव्यायन शारडायन द्राह्मायण आपस्तम्ब प्रभृति
मुनि प्रणीत श्रौतसूत्रनामक कल्प सूत्रों द्वारा वैदिक मंत्रों का
विनियोग निरूपण पुरस्सर मृतपितरों के उद्देश्य से
पिण्डपितृयज्ञ निरूपणपूर्वक पाश्विनकृष्णपक्ष में
श्राद्धकर्तप्यता प्रतिपादन पर पूजित विचार,
श्रीमत्परमहंसनिखिल शास्त्रनिष्णातस्वामिषालरामोदासीनो-
भासित.
स्वाम्यात्मस्वरूपशास्त्रिकत अपीक्षतानुक्तपूरणविवरणोद्दीपित्त
औ संशोधित.
सिंधुदेश शेखर सिकारपुर की पियारी संगत के
इरिभगवानदास आदि सरसंगियों की मार्थना
से संकलित और मकाशित.
VILAS
PHARGA
पटना-"खविलास" प्रेस-बांकीपुर.
साहिबप्रसाद सिंह द्वारा मुद्रित,
१८६८.

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सीमनिखिलशास्त्र निशात म्मामी बायरामा

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उहामानामानन्द स्वरूप

. नमोऽतियोगिणे। नगः श्रीपूज्यपादशिक्षाप्रदभ्यः श्रीब्रह्मबूटाभिधेभ्यो गुरुभ्यः नयाधीशरणापन्नपरित्राणपरायणाय सर्वतन्यस्वतन्त्राय श्रीलपालरामाय गुरवे । दाम्यत, दत्त, दयध्वम् " वेद । संवोधन । आस्तिकजन! 'आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च तृप्ताः' इस कथन का अनु- सरण कर तीर्थयात्रा तथा धर्मोपदेश के लिये पंजाब, सिंध, काठीयावाड़, गुजरात, मालवा प्रान्त (१) स्थानों में पर्यटन करते हुये श्रीलनिखिलशास्त्रनिष्णात स्वामी चालराम उदा- सीन जी के दिये हुये व्याख्यानों का जिस प्रकार से इन स्थानों में असर हुआ है वह तो विदित ही है परन्तु इन स्थानों में जो स्वामी जी के श्राद्धविषयक व्याख्यान हुआ करते थे उन व्याख्यानों को श्रवण कर अनेक धार्मिक लोकों नेयह प्रार्थना कियी थी कि "यदि यह श्राद्धविषयक व्याख्यान पुस्तकाकार से मुद्रित होकर स्थान २ में प्रचलित हो जाय. तो बहुत ही भारत का उपकार होय" भी बीच में जब स्वामी जी सिंध सिकारपुर में पधारे थे तब वहां के निवासी पियारीसंगत के सत्सङ्गियों ने भी (२) विशेष कर के यह (१) कटाक्षराज, पिण्डदादनखान, भेहरा, रावलपिण्डी, टेराइस्मलखान, डेरागाजीखान, मुजफरगह, युलतान, सूजाबाद, वहावलपुर, सॅखर, सिकारपुर, किराची, गोमतीद्वारिका, बेटद्वारिका (पोरबन्दर), मदामापुरी, जूनागढ, प्रभास, थानादेवलीदरबार, भाउनगर, सिवहर, अहमदाबाद, नडियाद, डाकौर, रतलाम, मन्दसार, उज्जैन, इन्दौर इत्यादि प्रधान स्थानों में स्वामीजी के ध्याख्यानों का प्रभाव आघालवृद्ध प्रसिद्ध है। (२) यद्यपि पियारी संगत के सत्संगी अनेक हैं तथापि प्रधानता से कार्यवाहक-श्रीहरिभगवान रहेगा, श्रीपीसूमल्ल, श्रीचौथराम, श्रीतेजपानु- दास, श्रीउद्धवदास, श्रीसाजनदास, भीगलाराम यह सात महाशय है ।

संबोधन। प्रार्थना कियी थी कि (यहां के जो प्रियतमधर्मसभावाले समाजी है वह. श्राद्ध को वेदविहित नहीं मानते हैं औ कभी २ मान भी लेते हैं तो संग के संग यह कह देते हैं कि जेसे ब्राह्मण श्राद्ध के योग्य लिखे हैं वैसे अव मिलते नहीं, ओ संग के संग यह भी पुकारते हैं कि आश्विन के कृष्णपक्ष में जो श्राद्ध का प्रचार है वह अन्धपरम्परा है परन्तु आपके दिये हुये श्राद्धविषयकव्याख्यानों से उन समा- जियों के यह सव कथन यहां के लोकों को निर्मूल ओ उन्म- तमलपित भान होगये है, ओ वह समाजी भी आज कल मौन धारन करि बैठे हैं, इस लिये हमारी यह रुचि है कि इस श्राद्धविषयक व्याख्यानों का यदि मुद्रित कराकर प्रचार किया जाय तो अनेकों का भ्रम भजन हो जाय, इत्यादि- परन्तु स्वामी जी श्री द्वारिका-प्रभासक्षेत्र आदि तीर्थ- थाना के निमित्त से तथा पूर्व आरब्ध पातजलदर्शन के भापानुवाद में तत्पर होने से सावकाश नहीं ये इस लिये यह धन्ध सत्वर प्रस्तुत नहीं हुआ था फिर जव द्वारिका आदि की यात्रा को समाप्त कर डाकोर जी में आये तव पातंजल- दर्शन की समाप्ति कर उज्जैन जी की यात्रा तथा "श्रोतस- वस्व" का आरंभ किया सो अब पह भी सर्वान्तर्यामी की कृपा से समाप्त हो गया है, आप लोक इस का अवर लोकन कर जन्म भो स्वामी जी का परिश्रम सफल करें । संबोधक स्वामी आत्मस्वरूप शास्त्री।

श्री शिवहर्ष कवि कृत कविता। चारो वेद शिखा शब्द शास्त्र है सुचंचु स्वच्छ ज्योतिष रमल नेत्र शिक्षा गन्ध धाम हैं। कर्ण है निरुक्त कल्प न्यायसांख्य पन जाको नीति छंद पग वैन श्रुति अभिराम हैं ॥ सत यंथ धन देखि नितंत मुदित मन जैन यंध मर्पन ते कीनो महि. . पाम हैं । कहै शिवहर्प ब्रह्म ध्यान है अहार मंजु विद्यागन विपिन मयूर वालराम हैं ॥ १ ॥ आनन विचार चारु नासिका परिसकार चक्षु योग ध्यान काव्य शक्ति शिखा धाम हैं। साहिति मिमांसा कर्ण अर्थ शक्ति गर्न तीव्र वेदन की शाखा केश वृन्टन ललाम हैं ॥ कल्पना वक्तत्व .तीक्ष्या पंजा मजबूत अति हिरद पण्डौ मत गर्व कीनो पाम हैं। कहै शिवहर्ष कवि जंबूद्वीप मध्य एक विद्यामेरु कन्दरा मैं सिंह बालराम हैं ॥ २ ॥ देशन मो जाय जाय नास्तिक जमा ति मध्य लिक्चर सुनायो सोई बांस बुद्धि घर मै । कोरति सुपट चार ध्यान को सुगोट स्वच्छ जान को विवाद पट्ठा लगो सगसर मै ॥ कहैं शिववर्ष जाम उत्तम विचार गुच्छ गुण सूत विध्यो युक्ति दीखत फहर मै॥ उदासीन बालरामजू की शास्त्रदिग्विजै ध्वजा लहालह लहरात जंबुद्वीप भर मैं ॥ ३ ॥ जप तप है करार उत्तम विचार धार ध्यान सु भंवर युक्ति बीचि मन रंगिनी। सासन सुदेह योग माधन मगर महा मुद्रा बहु मीन झोंगा बुद्धि ब्रह्म संगिनी ॥ कहै शिवह जाम घाटन नखात गेको जैनमत गन्ध कूल वृक्षन को खंगिनी । संत शिरो- ।

[२]
मणि धी उदासी बालरामजू की जंबूद्दीप बढी शास्त्र कोरति
तरगिनी ॥ ४ ॥
जन्यो कैधों विधिनिज वेदले उधारिबे को कैी सनकादि
कीवे ब्रह्मगुन गान हैं। निज कृत सूबनको भाषा अर्थ भाषिवे
को कलि मध्य भयो बादमयन महान हैं। कैधोगमचरित
बखानिबे को चालमीक जैनमत खंडिबे को शंकर सुजान हैं ।
कहै शिवहर्ष कैंधों बालराम स्वामी भयो जान उपदेश दीवे को
नारद धिमान हैं ॥ ५ ॥
मन बच कर्म करि राखत सप्रेम पद माता पालिने मै बन्यो
शिष्यन को । बाल ब्रह्मचारो तैसो उत्तम विचारि ज्ञान
ब्रह्म ध्यान धारी ध्यान धारिन को यूप हैं । कहै शिवहर्य
गुरु
कृत यन्य युक्ति भाषि नास्तीक वृन्दने को करि देत चूप
यथा बादरायण के शिष्य शुकदेव भये तथा बालरामजू के
प्रातमस्वरूप हैं ॥ ६ ॥
विमल पयप मीर राजत बिचित्र प्रति सहज सुभाव बैन
बोलत सुधा सी हैं । षष्ट योग साधै ब्रह्म ध्यान अवराधै मंजु
इटी दश बाँधै ज्ञान रत्नन की रासी हैं ॥ शन्दशास्त्र न्याय माझ्य
कल्प वो निकल योग वेद उपवेद त्यो मिमांसक प्रकासी हैं
कहै शिवहर्ष कवि स्वामी बालरामजू को शिष्यवर प्रातमस्वरूप
जो उदासी हैं ॥ ७॥

ओम् यजु.. था. प्र. १. पनु..। नमो ऽन्तामिणे। ॥ पीठिका॥ "सद्योजातं * प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमः, भवे भवे नातिभवे भजस्व मां भवोद्भवाय नमः" "यद्वक्ताम्बुजनिःसृता सुललिता श्रौती सती भारती, पीता कर्णपुटेर्दुतं वितनुते श्रोतायने सन्मतिम्, आम्नाता श्रुतिमस्तमेयविषयां निष्ठां नि धत्ते हृदि, वन्देहं तमशेषदोपविधुरं श्रीदेशिकं नानकम्" इह किल ये केचित्कुलकज्जलाः पिण्डीशूरा + अना- घातप्राच्योदीच्यमीमांसागन्धाः (कथमन्यदीयेनानुष्ठानेनोदा- सीनेन्यस्मिन् जने फलं सं क्रमते न हि चैत्रेणोपचितस्य कर्माशयस्य विपाको मैत्रेणोपभुज्यते न हि वा जातु मेत्रो- अभ्यवहरति चेत्रश्च तृप्यतीति दृष्टचरं नाम) इत्येवं गेहविचि- तिनः (१) सन्तो ऽपत्यानुष्ठितपितृकृतेन प्रेतपितृप्रभृतितृप्ति- मपलपन्ति, प्रमाणयन्ति च “शास्त्रदेशितं फलमनुष्ठातरि" इति जैमिनीयं न्यायं. तेषां व्यामोहापोहाय मनाक् पराक्रम्यते। * सद्योजातनामकं यच्छिवस्य पश्चिमं वक्तं तत्प्रधानं महेश्वरमहं प्रपध= पामोमि, तस्मा एव च भवोद्भवाय संसारादत्रे में नमोस्त, किंच भवे भये- 'पौनः पुन्येन जन्मने मां न भजस्वमेश्य किन्तु अतिभय-संसारातिलयन- निमित्तं मां भजस्व तत्त्वज्ञानाय प्ररयेत्यर्थः ॥ न पिण्डाशनादन्यस्मिन् कार्ये निर्विक्रमाः ॥ (१) गेह एव स्थित्वेदं युक्तमिदमयुक्तपिति गे विचिन्यन्ति न विद्वद्गी- प्रयांत एवमभिधीयन्ते ॥

सूत्राशयमुपवण्ये, ननु नायं नियमः पुनधिपितृयज्ञादी व्यभि- २ पीठिका। तत्रेदमेव प्रथमतो वि विच्यते-योयं जमिनीयो न्याय उपोद्वलकत्वेनोद्घाटितः स किमप्रतिहतप्रसरत्वेन सार्वत्रिक उतोत्सर्गिकः, माये कथमृत्विगाद्यनुष्ठितक्रतोर्यजमानस्य तत्तत्फलावाप्तिः, कथं वा जालिकाच्चरितान्मन्त्राद् दृष्टस्य विपापगमः, द्वितीये सिद्धं सामान्यविधित्वं, तथा च निष्पन्नं नः समीहितं, विशेपवचनानननिरीक्षणेन प्रतिहतप्रसरत्वेन प्रेतकृत्यप्रभृतो तन्नथायाप्रवृत्तेः, अत एव"आत्मान्तरगुणा- नामात्मान्तरेऽकारणत्वाद्” इति सूत्रव्यारयावसरे शाङ्कर उपस्कारे (प्रत्यात्मनिष्ठाभ्यामेव धर्माऽधर्माभ्यां सुखदुःखे न व्यधिकरणाभ्यामन्यथा येन याहिंसादिकं न कृतं तस्य त- फलं स्यादिति मानिन्नाभ्यागमश्च प्रसज्येत, इत्येवं " घोरात् तथाहि-पुत्रेण कृतस्य श्राद्धादेः पितरि फेल्वश्रवणात् पिना च कृतायाः पुत्रेप्टेः पुत्रे फलश्रवणाद्न च स्वर्गभाग- पितृकत्वस्य तेजस्विपुत्रकत्वस्य च फलस्य पुत्रपितृगामितया सामानाधिकरण्यमेयेति वाच्यं श्रुतिविरोधात्-पितृतृप्त्यादेः पुत्रतेजस्वितादेरेव फलस्य श्रवणात् , फलान्तरस्य च गौर- वपराहतत्वाद्, अस्तु तीपूर्व फलं कर्तरि स्वर्गस्तु पितरीति चेन व्यापारस्य फलसामानाधिकरण्यनियमाद् , अन्यथा श्राद्धानन्तरं मुक्ते पुत्रे पितुः स्वर्गो नस्यात्, न स्यादिति चेन्न मुक्त पितरि साद्गादपि श्राद्धात्फलं न स्यादिति तुल्यत्वाद्, ऋतिज उप गायन्ति " इत्यविशेषेण श्रुतमापृत्विज्ञामु पणानं 'नाध्वर्युरुप गायति' इति विशेषश्रवणेनाध्वर्युव्यतिरिक्तविषय सत्तरप्यते तथा सामान्येन प्रवृत्तोप्ययं न्यायो विशेषश्रवणात् मेतकृत्यायति- रिक्तविषयोऽभ्यपेयत इत्यानम् । यया पीटिका। इत्येवमाशङ्ग्य शास्त्रदेशितं फलमनुष्टातरिइत्यस्यौत्सर्गिकत्वात् कचिद् बलवता बाधकेनापोद्यत्वात्, प्रकृते च पितृपुत्रगत- फलश्रवणस्यैव वाधकत्वात्, तथा सत्यतिप्रसङ्ग इति चेन्न तादृ: शश्रुतेरेवातिप्रसङ्गनिवारकत्वाद् ) इत्येवं समाधायास्यौत्स- गिकत्वमास्थापितं मित्रैः) एवं च (यस्य यत्फलमुद्दिश्य यत्कर्म विहितं तस्य तत्फलम्) इत्ययमेव न्यायो व्यभिचारविधुरत्वेन प्रचुरप्रचार आदरणीयो न पूर्वोक्त इत्यायातम् , अत एव (१) द्वादशलक्षण्यां (यद् इदं 'वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत्पने जाते' इतीष्टिं विधाथ यस्मिन् जात एतामिष्टिं निर्बपति पूत एव स तेजस्व्यन्नाद इन्द्रियावी पशुमान् भवति, इत्यादि फलमानायने तत्किमिष्टिकर्तुः पितुरुत पुत्रस्येति संशय्य कर्मानुष्ठानफलयोधुय्यधिकरण्यपरिहाराय पितुरेव फलमिति प्रत्यवस्थाय पुत्रोद्देशेन कृतत्वाद्, ' यस्मिन् जाते निर्वपति स पूतो भवति ' इति वाक्यशेपे स्पष्ट पुत्रगा- मित्वश्ररणाञ्च पुत्रस्यैव पूतत्वादिकं फलमित्याशयेन 'फलसंयोगस्त्वचोदितेन स्यादशेषभूतत्वाद्, इत्येवं समाहित जैमिनिना मुनिना + केचितु" संलापस्पर्शनिश्वाससहयानासनाशनाद् या जनाध्यापनाद्यौनात्पापं सं क्रमते नृणाम्” इति देवलव- चनचलेनेनस्विजनयाजनाध्यापनसहासनयानशयनयौनानुष्ठा- (१) अत एव-'यस्य यत्फलमविश्य यत्कर्म विहितं तस्य तत्फलम् , न्यायाङ्गीकारादेव । * जैमि० अ०४ था. ३ अधि० १७ । • 'शाखदेशितं फलमनुष्ठानरि' इति न्यायाङ्गीकारे विदं जैमिनीय समाधानं व्याप्यतेति भावः । 4 . पीठिका। तत्रेदमेव प्रथमतो वि विच्यते-योयं जैमिनीयो न्याय उपोद्वलकत्वेनोद्घाटितः स किमप्रतिहतप्रसरत्वेन सार्वत्रिक उतोत्सर्गिकः, माये कथमृत्विगाद्यनुष्ठितक्रतोर्यजमानस्य तत्तत्फलावाप्तिः, कथं वा जाइलिकाच्चरितान्मन्त्राद् दृष्टस्य विपापगमः, द्वितीये सिद्धं सामान्यविधित्वं, तथा च निष्पन्नं नः समीहितं, विशेपवचनानननिरीक्षणेन प्रतिहतप्रसरत्वेन प्रेतकृत्यप्रभृतो तन्नथायाप्रवृत्तेः, अत एव"आत्मान्तरगुणा- नामात्मान्तरेऽफारणत्वाद्” इति सूत्रव्याख्यावसरे शाङ्कर उपस्कारे (प्रत्यात्मनिष्ठाभ्यामेव धर्माऽधर्माभ्यां सुखदुःखे न व्यधिकरणाभ्यामन्यथा येन यागहिंसादिकं न कृतं तस्य त- त्फलं स्यादिति अतहानिरजाभ्यागमश्च प्रसज्येत, इत्येवं सूत्राशयमुपवर्य, ननु नायं नियमः पुत्रेष्क्षिपितृयज्ञादी व्यभि- घोरात् तथाहि--पुत्रेण कृतस्य श्राद्धादेः पितरि फलश्रवणात् पित्रा च कृतायाः पुत्रेप्टेः पुत्रे फलश्रवणाद्,न च स्वर्गभागि- पितृकत्वस्य तेजस्विपुत्रकत्वस्य च फलस्य पुत्रपितृगामितया सामानाधिकरण्यमेयेति वाच्यं श्रुतिविरोधात्-पितृतृप्त्यादेः पुत्रतेजसितादेरेव फलस्य श्रवणात् , फलान्तरस्य च गौर- वपराहतत्वाद्, अस्तु तर्खपूर्व फलं कर्तरि स्वर्गस्तु पितरीति चेन्न व्यापारस्य फलसामानाधिकरण्यनियमाद् , अन्यथा श्राद्धानन्तरं मुक्त पुने पितुः स्वर्गो न स्यात्, न स्यादिति चेन्न मुक्त पितरि साङ्गादपि श्राद्धारफलं न स्यादिति तुल्यत्वाद्, प्रविन उप गायन्ति " इत्यविशेषेण धुतमवृत्विनाम पगानं 'नाध्वर्युरुप गापति' इति विशेषश्रवणेनाध्वर्याव्यतिरिक्तविषय सराप्यते तथा सामान्येन प्रवृत्तीप्ययं न्यायो विशेपश्रयणात् मेतकत्सापति रिचाविषयोऽभ्यपेयत इत्यानम् । . * यथा पीटिका। ३ १ इत्येवमाशय शास्त्रदेशितं फलमनुष्टातरिइत्यस्यौत्सर्गिकत्वात् कचिद् वलवता वाधकेनापोद्यत्वात्, प्रकृते च पितृपुत्रगत- फलश्रवणस्यैव वाधकत्वात्, तथा सत्यतिप्रसङ्ग इति चेन्न ताद शश्रुतेरेवातिप्रसङ्गनिवारकत्वाद् ) इत्येवं समाधायास्यौत्स- गिकत्वमास्थापितं मित्रैः)एवं च (यस्य यत्फलमुद्दिश्य यत्कर्म विहितं तस्य तत्फलम्) इत्ययमेव न्यायो व्यभिचारविधुरत्वेन प्रचुरप्रचार आदरणीयो न पूर्वोक्त इत्यायातम् , अत एव (१) द्वादशलक्षण्यां (यद् इदं 'वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत्पत्रे जाते' इतीटिं विधाय यस्मिन् जात एतामिष्टिं निर्वपति पूत एव स तेजस्व्यन्नाद इन्द्रियावी पशुमान् भवति, इत्यादि फलमानायते तत्किमिष्टिकर्तुः पितुरुत पुत्रस्येति संशय्य कर्मानुष्ठानफलयोधैय्यधिकरण्यपरिहाराय पितुरेव फलमिति प्रत्यवस्थाय पुत्रोद्देशेन कृतत्वाद्- ' यस्मिन् जाते निर्वपति स पूतो भवति ' इति वाक्चशेपे स्पष्टं पुत्रगा- मित्वभरणाच पुत्रस्यैव पूतत्वादिकं फलमित्याशयेन 'फलसंयोगस्त्वचोदिते न स्यादशेषभूतत्वाद्, इत्येवं समाहित जैमिनिना मुनिना + केचिनु " संलापस्पर्शनिश्वाससहयानासनाशनाद् या जनाध्यापनाोनात्पापं सं क्रमते नृणाम्" इति देवलव- चनवलेनैनस्विजनयाजनाध्यापनसहासनयानशयनयोनानुष्ठा- (१) अत एव यस्य यत्फलमुद्दिश्य यत्कर्म विहितं तस्य तत्फलम्' न्यायाङ्गीकारादेव । * जैमि० अ० ४ पा० ३ अधि० १७ । +शाखदेशितं फलमनधातरि इति न्यागाहीकारे रिवद नैमिनी समाधान व्याप्यतेति भावः ।

. पीठिका। तत्रेदमेव प्रथमतो वि विच्यते-योयं जैमिनीयो न्याय उपोवलकत्वेनोद्घाटितः स किमप्रतिहतप्रसरत्वेन सार्वत्रिक उतोत्सर्गिकः, माये कथमृत्विगायनुष्ठितक्रतोर्यजमानस्य तत्तत्फलावाप्तिः, कथं वा जागुलिकोच्चरितान्मन्त्राद् दृष्टस्य विपापगमः, द्वितीये सिद्धं सामान्यविधित्वं, तथा च निप्पन्नं नः समीहितं, विशेषवचनानननिरीक्षणेन प्रतिहतप्रसरत्वेन प्रेतकृत्यप्रभृतो तन्नधायाप्रवृत्तेः, अत एव"आत्मान्तरगुणा- नामात्मान्तरेऽफारणत्वाद्” इति सूत्रव्यास्यावसरे शाङ्कर उपस्कारे (प्रत्यात्मनिष्ठाभ्यामेव धर्माऽधर्माभ्यां सुखदुःखे न व्यधिकरणाभ्यामन्यथा येन यागहिंसादिकं न कृतं तस्य त- स्फलं स्यादिति शतहागिरजाभ्यागमश्च प्रसज्येत, इत्येवं सूत्राशयमुपवर्य, ननु नायं नियमः पुनेक्षिपितृयज्ञादी व्यभि- चारात् तथाहि-पुत्रेण कृतस्य श्राद्धादेः पितरि फलश्रवणात् पित्रा च कुतायाः पुत्रेप्टेः पुत्रे फलश्रवणाद्, न च स्वर्गभागि- पितृकत्वस्य तेजस्विपुत्रकत्वस्य च फलस्य पुत्रपितृगामितया सामानाधिकरण्यमेयेति वाच्यं श्रुतिविरोधात्-पितृतृप्त्यादेः पुत्रतेजस्वितादेरेव फलस्य श्रवणात् , फलान्तरस्य च गौर- वपराहतवाद्, अस्तु तर्यपूर्व फलं कर्तरि स्वर्गस्तु पितरीति चेन्न व्यापारस्य फलसामानाधिकरण्यनियमाद् , अन्यथा श्राद्धानन्तरं मुक्ते पुने पितुः स्वर्गो नस्याद्, न स्यादिति चेन्न मुक्त पितरि साङ्गादपि श्राडात्फलं न स्यादिति तुल्यवाद, "प्रत्विज उप गायन्ति " इत्यविशेषेण श्रुतमप्पृत्विनाम- पगानं 'नाध्यमुरुप गायति' इति विशेषश्रवणेनाध्वर्युव्यतिरिक्तविषय सतलप्यते तथा सामान्यन मचोप्ययं न्यायो विशेपश्रवणात् प्रेतकृत्यायति. रिक्तविषयोऽभ्युपेयत इत्याफूतम् । * यपा पीठिका। ३ इत्येवमाशय शास्त्रदेशितंफलमनुष्यातरिइत्यस्यौत्सर्गिकत्वात् कचिद् बलवता वाधकेनापोद्यत्वात्, प्रकृते च पितृपुत्रगत- फलश्रवणस्यैव वाधकत्वात्, तथा सत्यतिप्रसङ्ग इति चेन्न तादृः शश्रुतेरेवातिप्रसङ्गनिवारकत्वाद् ) इत्येवं समाधायास्यौत्स- गिकत्वमास्थापितं मित्रैः,)एवं च (यस्य यत्फलमुद्दिश्य यत्कर्म विहितं तस्य तत्फलम्) इत्ययमेव न्यायो व्यभिचारविधुरत्वेन प्रचुरप्रचार आदरणीयो न पूर्वोक्त इत्यायातम् , अत एव (१) द्वादशलक्षण्यां (यद् इदं वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपत्पने जाते' इतीटिं विधाय यस्मिन् जात एतामिष्टिं निर्वपति पूत एव स तेजस्व्यन्नाद इन्द्रियावी पशुमान् भवति, इत्यादि फलमानायते तत्किमिष्टिकर्तुः पितुरुत पुत्रस्येति संशय्य कर्मानुष्ठानफलयोःय्यधिकरण्यपरिहाराय पितुरेव फलमिति प्रत्यवस्थाय पुत्रोद्देशेन कृतत्वाद्- ' यस्मिन् जाते निर्वपति स पूतो भवति ' इति वाक्चशेपे स्पष्ट पुत्रगा- मित्वरणाच पुत्रस्यैव पूतत्वादिकं फलमित्याशयेन 'फलसंयोगस्त्वचोदिते न स्यादशेषभूतत्वाद्, ® इत्येवं समाहितं जैमिनिना मुनिना है केचित्तु " संलापस्पर्शनिश्वाससहयानासनाशनाद् या जनाध्यापनायोनापापं सं क्रमते नृणाम्” इति देवलव- चनवलेनैनस्त्रिजनयाजनाध्यापनसहासनयानशयनयौनानुष्टा. (१) अत एव='यस्य यत्फलमद्दिश्य या विहितं तस्य तत्फलम् । न्यायाहीकारादेव । * जैमि० अ०१ पा० ३ अधि० १७ ॥ ''शाखदेशितं फलमनुष्टातरि इति न्यायाङ्गीकारे विदं जैमिनाएं समाधान व्याप्यतेति भावः ।

पाठिका। + नशालिनि जनेऽवृजिनपि पतितदुरितसंप्रचारोररीकारेण व्य- भिचारान्नायमपि न्यायः सार्वभीमः (१) किन्तु 'यथावचनं वाचनिकम्' इति जरदन्तर्वाणिवाणिरेष सरणिः श्रत ( २ ) एव “ तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति तुझ्दः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् ” "तस्य प्रिया ज्ञातयः सुकृतमुपयन्त्यनिया दु- प्कृतम्" (३) इत्येवं विद्वदनुष्ठितयोः सुकृतदुष्कृतयोर्विद्वत्रि- याप्रियकारिपु नरेपु संप्रचारं समामनन्तोऽनभवन्तः शाट्या- यनिनः कोपीतकिनश्च श्रद्धेयवचना मन्यन्त औपनिपदैः न्यायावतारे तुन हिं प्रियकारिणोऽप्रियकारिणो वा नरानु- विश्य विदुपा सुकृतं दुष्कृतं वाऽनुष्ठितमिति कधन्ते श्रद्धेय- वचनास्स्युरित्याहुः (+) यदि त्वमूर्तयोः पुण्यपापयोः सा- क्षादन्यत्र संप्रचारासंभवाद्विद्वत्परिचातिरस्क्रियाभ्यां विद्ध- निष्ठसुकृतदुष्कृततुल्ये सुकृतदुप्कृते उपासकसेवकासूयकयो- र्जायेते जातयोश्च फलत उपायनमत्र ( उपयन्ति ) इत्यने- नोच्यते तथा चोपासके सौहार्दमाचरणीयं न त्वसौहार्दमित्येवं प्रशंसापरमिदमुपायनवचनम् (७) एवमेव चाहुरशङ्कराचार्याः- "विद्यास्तुत्यर्थत्वाचास्योपायनवादस्य कथमन्यदीये सुकृतदु- (१) यस्य यत्फलमद्दिश्य यत्कर्म विहितं तस्य तत्फलम् । अयमपि न्यायो न सार्वत्रिक इति भावः । (२) वाचनिकऽर्थे न्यायानवतारादेव । (३) एतां श्रुतिमनुगच्छन्ती " मियेषु स्तेपु सुकृतमाप्रियप च दुष्कृतम् । विमृश्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्यति सनातनम्" इवि मानवी भारत्ययवादाच्या। (+) यदि नाम वन्नवलेनान्योद्देशेनाकृतयोरपि सुकवदुष्कृतयोर. न्यगागित्तमभ्युपैयते तदा कैव कथा पित्राद्देशेन कनस्य श्राद्धस्य पितृमीति. कररचमिति भावः। (*) एपेच च व्यवस्था पूर्वोक्तपतितदारतसंचारस्य शेया।

पीठिका। ) कृते अन्यैरभ्युपेयेते इति नातीवाऽभिनिवेष्टव्यम्” इति, इत्ये- वमास्थीयते तस्त्वयं न्यायः सार्वभौमस्तथापि न नो हानिः 'यस्य यत्फलमुद्दिश्य ' इत्याद्यनन्तराभिहितन्यायावतारेपि श्राद्धकृत्ये दोपाभावाद् । वस्तुतस्तु सम्पत्तिसंज्ञक कर्मनिरूपके वृहदा- रण्यके "तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यमाहुः (१) तस्मादेनमनु- शास्ति, स यदेवंविदस्माल्लोकात्त्यथेभिः प्राणैः सह पुत्र- माविशति, स यद्यनेन किञ्चिदक्ष्णयाऽकृतं भवति तस्मादेनं सर्वस्मात्पुत्रो मुश्चति तस्मात्पुत्रो नाम, स पुत्रेणैवामिंलोके प्रतितिष्ठति” इत्येवं पितुरेव पुत्ररूपेणावस्थानप्रतिपादनाद् ऐतरेयारण्यके च "सोऽस्यायमितर आत्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः * सम्पत्ति:--सम्पदानम्, येन कर्मणा पिता पुत्रे स्वात्यव्यापारसंमदानं करोति तत्कर्म सम्पत्तिसंज्ञकम् । (१) यस्माञ्च "वं ब्रह्मा त्वं यास्त्वं लोक" इत्येवमनुशिष्टः पुत्रः पित- रममाल्लोकाकर्तव्यताबन्धनतो मचिपति तस्मादनशिष्टं पुत्रं लोक्य = लोक- हितमाहुर्ब्राह्मणाः, अतएव ह्येनं पुत्रमनुशास्ति पिता लोक्योऽयं नः स्यादिति, स:-पिता यदा = यस्मिन् समय, एवंवित् = पत्रसतिकर्तव्यताक्रतुः, अस्माल्लोकात् प्रतिम्रियते, अथ - तटा, पभिः -प्रकृतेर्वाड्मन माणः, पुत्रम् आविशति व्यामोति, एतदुक्तं भवति-यस्य पितुरेवमनुशिष्टः पुत्रो भवति सोऽस्मिा लोके वर्तते पुत्ररूपेण नैव मृतो मन्तव्य इति ॥ इदानी धुननिर्वचनमाइ (प यदि) इति, यदि कदाचिद् अनेन %3D पिना, पक्ष्णया = कोण. छिन्द्रनाऽन्तराऽकृतं भवनि कर्तव्यं तस्मात् पित्राकृताल्लोकमाप्तिमतिरन्यरूपात् सर्वस्मात् स पुत्रो मुञ्चति-मोचयति तत्सर्व स्वयमनुतिष्ठन्पयित्वा, तस्मात्यू रणेन त्रायते स पितरं यस्मात् तस्मात्पुत्रो नाम इदं तत्पुत्रस्य पुत्रत्वं यत्पितुश्छिद्र पूरयित्वा त्रायते--स पिता मृतोपि सन्नैवंविधन पुत्रणामृन एवास्मिलूलोके प्रति तिष्ठति, इत्यर्थः।

पीठिका। - प्रति धीयते” इत्येवं स्पष्टमेव पुत्रस्य पितृप्रातिनिध्यवचनाच्च पुत्रानुष्ठितं पितृकृत्यं पित्रेवानुष्ठितमिति (१) नान वैय्यधिक- रण्यशङ्कापङ्ककलङ्काङ्कुर इति सर्व श्वःश्रेयसम् (२)। कया च प्रणाड्या पुत्रप्रत्तं धरामरेश्च भुक्तं श्राद्धीयद्रव्यं पितृनुपतिष्ठत इति त्वन्तर्वनानिदर्शनेन विस्पष्टमुपरिष्टा (श्राद्धकृत्यमीमांसायाम् ) उपपादयिष्यत इति तत एव कणेहत्य निरीक्षणीयमित्युदास्यत उदासीनेन, किं बहुना- "मोघमन्नं विन्दतेऽप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य, नार्यमणं पुप्यति नो सखायं केवलाघी भवति केवलादी मं०६ । • १९.८ १. २३ म... पा... म ११॥ (१) एवं च शास्त्रदशितं फलमनुष्टातरि इति न्यायस्वीकारे ऽपि न - सतिरिति भावः। (२) इस सब लेख का सार यह है कि कुछ यह नियम नहीं है कि जो कर्म करे सोई उस के फल का भागी होय क्योंकि ऐसे मानने से ऋत्विम् भादि कर किये हुये यज्ञ से यनमान को फल का लाभ नहीं होगा किन्तु जो कर्म जिस के उद्देश से विधान किया जाता है उस को उस कर्म का फल होता है यह नियम मानमा रचित है इसी से ही जैमिनि पुनिने पुत्र के नाम से किपी हुयी पुष्टि का तेनस्वितादि फल पुननिष्ठ माना है, चास्तव से तो जिस प्रकार वेदादिसच्छास्त्रों में उपदिष्ट है वही श्रद्धेय है वैदिक अनुष्ठान में तर्क की अपेक्षा नहीं है. इसी लिये ही मदिरापीने वाली रमनी के पति को पतित मानना तथा ब्रह्मोपासक के किये हुये पुष्प औ पापों का ज्ञानी के सेवक औ निन्दकों में संचार मानना तथा पतित के संग भोज- नादि करने वाले को पतिन संपन्धी पाप के फल का भागी मानना, यह 2- दिकसिद्धान्त संगत है, यदि जो करे सोई भोगे यह माना जाय तो यह वैदिक सिद्धान्त असत होगा:

॥ो३म् ॥
॥ नमोऽ तामिणे ॥
“उपोद्घात।
"तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयाद्"
• यज.पारस.प्र.१.प.1
"
म.
" एक विवेकं नुमः
धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः"
सात्त्विकजन!
पूर्वकाल में हमारे यहां भारत में यह परिपाटी थी
कि जव किसी सनातन वैदिकधर्मावलंबी आर्य सत्संतान
कुलीन जनों को कभी किसी मार्गगत प्रमत्त नास्तिक की
अकस्मात् कुत्सित उक्ति से देवात् स्वकीय कार्याऽकार्य
में चित्त आन्दोलित सा हो जाता था तो वह एकवार ही
संस्कृत स्वकीय चितभित्ति में उस उक्ति को चित्रित कर
सज्जित नहीं कर देते थे किन्तु धर्माऽधर्मरूप अतीन्द्रिय अर्थ
को केवल वेदैकमेय जान कर शिष्टपरंपरासंमत श्रुतिप्रति-
पादित कर्तव्यजात के आलोचन पूर्वक उस आन्दोलन को
निवारण कर,
"येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः *।
तेन यायात्सतां मार्ग तेन गच्छन्न रिप्यते"॥
मनु.प. हौ.१०८
* अर्थात जिस श्रौतमर्गके अनुसार अपने पिता पितामह धर्मका पालन

t या पारखश रिचाध्याय ११पउवाक । उपोद्घात । इस मानव रव-पर निर्भर कर अपने पिता पिता- मह प्रभृति सेवित सत्पथ को ही कल्याणकारी जान कर निःसन्देह वैदिक धर्म के अनुष्ठान में तत्पर होते थे, एवं यदि उन को किसी वेदप्रतिपाद्य अर्थ में भी कभी सन्देह उपस्थित होता था तो भी वह अपनी मनमानी गणना से उस सन्देह का निवारण नहीं करते थे किन्तु, "अथ। यदि ते कर्मविचिकित्सा वा रत्तविचि- कित्सा वा स्याद् ये तब ब्राह्मणाः संमर्शिनः युक्ता आयुक्ता आलूक्षा धर्मकामा स्युः यथा ते तत्र वरन् तथा तत्र वत्तथा । इस वेद के उपदेश को शिरोधारन कर महात्माओं द्वारा संदेह का उन्मूलन कर सदाचार में तत्पर होते थे, सो करते चले आये हैं उसीक अनुमार ही सम्मार्ग पर आरूढ़ होना चाहिये कुछ कुतर्कों से उस का परित्याग न को क्योंकि "तेन गच्छन् न रिष्यते " अर्थात् तिस पितृपितामहमभृति संचित मार्ग से पर्म का पालन करताभा पुरुप स्वार्थ से भ्रष्ट नहीं होता है। * मनजी का वचन । नई शिष्य ! यदि तुम को किसी कर्म के अनुरान में (विचिकित्सा) संशय हो, अथवा किसी वृत्त-वर्णाश्रमाचार की कर्तव्यता में संदेह हो तो तुम अपने मन से उस संदंड का निवारण मत करना किन्तु वहाँ पर विधमान जो ( संमशिनः ) सम्यविचारशील, तथा (युक्ताः ) नित्यनैमित्तिक कर्म के अनुदान तथा (आय काः) विश्वासपूर्वक वैदिक कर्म में निष्ठावालं नथा ( आल्क्षाः ) कक्षपाषण तया क्रोध औ आग्रह से रहित, एवं लाभपूजा ख्याति से बिना केवल धर्म की कापनाकाले शिष्ट व्राह्मण हैं वह जिस प्रकार में उस कर्म का अनुष्ठान करें या जिस आचार का संबन करें तिस प्रकार ही तुम को अनुष्ठान करना होगा विपरीत नहीं, यह इस का भाव है। ७ + तत्प,

उपोद्घात ।
इस प्राचीन परिपाटी का भाजकल ऐसा तिरोधान हुआ है
कि शिष्टाचार का अनुसरण करना तो दूर रहा पर जिन
कर्तव्यों का वेदादिसच्छास्त्र में दृढ शास्त्रीय शंका-समाधानों
द्वारा मार्जित कर विस्तृतरूप से प्रतिपादन किया है उस
पर भी आधुनिक नवयुवक लोक निर्भर नहीं करते हैं
किन्तु असंस्कृत अपने आचमनी समान मन में जो जमा
उस को मान कर अन्य को अपने पूर्वज गंभीराशयों की
भूल बतलाते हुए अपने को उस श्रेणी से अलग होने का
परिचय देते हैं बहुत क्या कहैं यहां तक आधुनिक अनेक
लोक अविवेक के सेवक बने हुए हैं कि-
"मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारक,
गच्छतामिह जंतूनां वृथा पाथेयकल्पनम्+" ।
ऐसे २ चार्वाकघूकों के कुपद्य की गंध से मुग्ध हो कर
भारतसोभाग्यकर वैदिक पिण्डदानादि क्रिया को भी
तिलाञ्जलि डाल वैठे हैं, भला आप तो वह यमयातना के
भाजन वनने के लिये श्रौतस्मातकर्म का उल्लइन कर यथे-
टाचरण वने ही हुए हैं परंतु जो सरल आस्तिक सत्संतान
वैदिक श्राद्धादि क्रिया के अनुष्ठान में तत्पर हैं उन के प्रति
* सन्ध्यासमय में आचमन का साधनभूत जो क्षुद्र चमचा है वह आचमनी
जाननी।
4. यदि श्राद्धरूप कर्म मृतक जन्तुओं की तृप्तिकारक है तो परदेश में
गमन करने वाले जो जीवत जन्तु हैं उन के लिये मार्ग का खरच देना व्यर्थ
है क्योंकि उन के नाम से यहां पर ब्राह्मण भोजन करा देने से वह आप ही
तृप्त होजायंगे, यह भाव है।

१ उपोद्घात । भी (जव जीवते जीव को परदेश में श्राद्ध द्वारा तृप्ति नहीं होती है तो मृतकों की कैसे, तुम्हारे पितरों को कैसे मालूम पड़ा कि हमारे पुत्र ने हमारे लिये श्राद्ध किया है, क्या मरने के अनंतर वह सर्वज्ञ हो जाते हैं, यदि तुम्हारे पितर मर कर पशु वा पक्षी योनि में गये होंगे तो उनके लिये ब्राह्मणों को घास आदि ही देना चाहिये न कि क्षीर पूरी) ऐसे २ आसुर वचनों को सुना कर उन के चित्त को भ्रांत सा कर देते हैं। कुछ सरल आस्तिकों के चित्त को भ्रांति युक्त कर देना ही इन अविवेकी प्रच्छन्न चार्वाकों के कुवाक्यों का चरमकृत्य नहीं जानना किंतु यदि इस अविवेक गद की चिकित्सा सद्यः की जायगी तो यहां तक संभावना हो सकती है कि यह अविवेक कहीं दाद श्री खुजली की तरह पाद पसार कर- 'पतंति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः' इस गीता वाक्य को भी सत्य न कर दिखावे अतः इस अनर्थकर अविवेक के निराकरणार्थ तथा सरलथास्तिकों की भ्रान्ति के दूर करने के लिये पितृकृत्यविपयक वैदिकसिद्धान्त निरूपण पर एक अपूर्व पूजित विचार का आरंभ किया जाता है जिस से (श्राद्ध किस कृत्य का नाम है, औ किस प्रकार मृतकों को पहुंचता है, ओ कौन पहुंचाने वाला १ पिण्ड तर्पण आदि पितृ क्रिया के लुप्त होने पर पितर नरक में पतित रोते हैं, यदि पितरः इस पद से देवताप पितरों का ग्रहण किया जाय तो 'पतन्ति' इस पद का अर्थ 'पातपन्ति' यह करना, अति-यदि पित्कृत्य न किया जायगा तो पितर रुष्ट होकर न करने वाले को नरक में गिरा देंगे।

उपोद्घात ।
है औ क्यों करना चाहिये, औ न करने से क्या हानि है)
इत्यादि विषयों के यथार्थ ज्ञान पूर्वक आस्तिकों की पितृकृत्य
में रुचि होय औ कुमार्गियों के फंदों से किनारे हो कर
सनातन मार्ग पर आरूढ़ हो कर स्वर्ग तथा अपवर्ग के
भागी होय।
"देवपिटका-भ्यां न 'प्रमदितव्यम्” यमु. . भा. १५.
( उपोद्घातस्समाप्तः)

उम्
नमोऽतामिणे
श्राद्धकृत्यमीमांसा।
" यद्वनाम्बुजनिःसृता सललिता श्रौती सती भारती,
पीता कर्ण पुटै हतं पि तनुते श्रोतायने सन्मतिम् ,
आन्नाता श्रुतिमस्तमयविषयां निष्ठां नि घने हदि,
चन्देहं तमशेषदोपविधरं श्रीदेशिक नानकम् ।
प्रथम पूर्वोक्त पांचविपयों में से आदि के तीन विषयों
का निरूपण किया जाता है,
तहां-
"अर्थतन्मनुः। श्राद्धशब्दं कर्म प्रोवाच प्रजानिः-
श्रेयसार्थ तत्र पितरो देवता ब्राह्मणस्त्वाहवनीयार्थे
मासि मासि कार्यमपरपक्षस्यापराह्नः श्रेयान्" ।
4.
* श्राद्ध किस कृत्य का नाम है, औ कैसे पहुंचता है औ कौन पहुंचाने
पाता है। इन तीनों विषयों का ।
"भादमिति शब्दो पाचको यस्य तत्कर्म भादशब्दम्" इति मदनपारिजातः
अर्थात्-मना के कल्याण के लिये वेदार्थ ज्ञाता मन जी ने एक ऐसा कर्मः
उपदेश किया है जिस का नाम श्राद है, तहाँ जैसे देवयज्ञ में इन्द्रादि देवता
पूजनीय होते हैं औ आइयनीय अग्नि उन की तृप्ति के लिये होम का आधार
होता है, तैसे इस पितृयज्ञ में पूजनीय देवता तो पितर हैं, औ धन की वृमि
लियामाधार अनि की जगह ब्राह्मणों का मुख है, यह कर्म पास में
करना चाहिये परन्तु कृष्णपक्ष का अपराह काल इस क्रिया के अनुष्ठान में
श्रेष्ठ है, यह सब भागे स्पष्ट होगा।

श्राद्धकृत्यमीमांसा।
इस आपस्तम्बीय मनुसंमत वचन
से
मृतकपितरों के
निःश्रेयस के उद्देश से पितृदेवताओं के यजनार्थ जो होम
पिण्डदानादि ब्राह्मण भोजन रूप सक्रिया है वह श्राद्धपद
का वाच्य जानना ।
यद्यपि श्रद्धायुक्त यावत्कर्म का ही श्राद्ध शब्द से बोध
होता है तथापि 'अकालमृत्यु' इस पद की तरह श्राद्धशब्द
को पारिभाषिक मान कर शास्त्रीय पितृकृत्य ही श्राद्धशब्द
का अर्थ जानना, इसी से ही कोशकारों ने-
'श्राद्धं तत्कर्म शास्त्रतः
यह कहा है।
ब्रह्मपुराण में भी-
"देशे काले च पात्रे च श्रद्धया विधिना च यत्,
पितॄनुद्दिश्य विप्रेभ्यो दत्तं श्राद्धमुदाहृतम्"
इस वाक्य से शास्त्रीय पितृकृत्य को ही श्राद्ध कहा है।
अर्थात्-जैसे परमात्मा की सृष्टि में देवलोक आदि
अन्य लोक हैं औ उन के अधिष्ठाता इन्द्रादि देव हैं तेसे-
* जैसे ( अकाल मृत्य) इस पद का अर्थ यह नही है कि रिना काल
से मरजाना क्योंकि ऐसे मानने से “नाकाले म्रियते जन्तुः माले काले न
जीवति" इत्यादि वचन जो बिना काल के गरण का निषेप करते हैं यह
असंगत हो जाय गे, किन्तु पशु-पक्षी मकर मृग शृङ्गी दष्ट्री नखी-पतन-अनशन
पज अभिविप पन्धन जान्छ-शस्त्र आदि जन्य जो मरण है उस का नाम अका.
लमृत्य,
है, क्योंकि इन सर मरणों में मरणकाल के समय जो स्लान भूमिशयन
दीपदानादि सामग्री होती है वह प्राणी को नहीं मिलती है, नैसं श्रद्धायुक्त
का नाम श्राद्ध नहीं है किन्त पित्कृत्य काही है।
कर्ममात्र

शरिया मतपष-1211. , श्रादकृत्यमीमांसा। "कर्मणा पितृलोकः” "दक्षिणाप्रवणो वै पितृलोकः” इत्यादि श्रुतियों के प्रमाणसे एक पितृलोक भी स्वतन्त्र लोक है जिस के अधिष्ठाता अर्यमा तथा अग्निप्वात आदि पितृदेव हैं, यह जो अर्यमादि पितृदेव हैं वही इस श्राद्ध- कर्म में पूजनीयदेवता हैं, ओ इन्हींकोही वेद में देवगन्धवों से शतगुणित अधिक आनन्द का भागी कहा है, औ मरन से अनन्तर पुरुप किस योनि में गया है औ कौन देश में है श्री उस के नाम पर उस के वंशीय पुरुषों ने क्या कृत्य किया है इस के वह समालोचक हैं, औ वही पितृदेव वैदिक मंत्रों से आहूत हुये मृतपितरों के वंशीय पुरुषों कर किये हुये श्राद्ध कर्म में उपस्थित होते हैं और श्रद्धाप्रदत्त आहुति तथा भक्ष्य भोज्य आदि के सारांश को वासनारूप से ग्रहण कर श्राद्धकर्ता के प्रति प्रसन्नता पूर्वक आशीर्वाद देकर वैदिक मंत्रों से विसर्जित हुये मृतपुरुषों को यथायोग्य सुख का भागी करते हैं, ( यह सब आगे सप्रमाण स्पष्ट होगा) यद्यपि उन पितरों का स्वरूप हम चर्मचक्षु से * सर्वोच, सार्वभौम, चक्रवर्ती, निप्पण्टकराज्यभोक्ता, निखिलक- लाविशिष्ट जो अतिवलिष्ट सम्राट् है उस को जो आनन्द होता है (जिस को मनप्यानन्द की सीमा कहा जाता है) इस मनुष्यानन्द में सतगुणित अधिक आनन्द मनुष्यगन्धों को है, औ इन से शतगुणित अधिक आनन्द देवगन्धों को है औ इन से शतगुणित अधिक थानन्द पितृलोकनिवामी रित की है, यह सब तैत्तिरीयारण्यक तथा वृहदारण्यक में स्पष्ट है। १ वा सब वैदिक मंत्र सप्रमाण आगे कहे जायगे। - " श्राद्धकत्यमीमांसा अवलोकन नहीं कर सकते हैं तथापि शास्त्रीय पुरुष के मन में पितरों का अदृश्य हो कर आना कुछ असंभव नहीं है क्योंकि योगशास्त्र में यह विपय स्पष्ट है कि यदि काय- रूप में पुरुष संयम करे तो वह पुरुप अन्य कर अदृश्य हो कर यावद् व्यवहार कर सकता है,जब पुरुषों में इस सामर्थ्य- विशेष का संभव है तो " पितृणामय॑माचास्मि इस भगवद् वाक्यसिद्ध ईश्वर रूप पितरों में इस सामर्थ्य का असंभव कैसे हो सकता है। औ (किस प्रकार यह पितर श्राद्धीय पदार्थों के सारांश को ग्रहण करते हैं ) यह भी कुछ हमारे लिये आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि जब हम पशु पक्षि कीटों में परमेश्वर प्रदत्त अलौकिक सामर्थ्य को प्रत्यक्ष देख रहे हैं तो पितरों प्रति प्रदत्त अलौकिक सामर्थ्य हम को कैसे आश्चर्यजनक होगा। अर्थात् जैसे परमात्मप्रेदत्त अलौकिक शक्ति विशेष से हस्ती कपित्य फल को भक्षण कर उस के अन्तर्गत सारांश को ग्रहण कर फिर लीद के संग यथावस्थित उस फल को निकास देता है, औ जैसे मधुमक्खियां पुष्पों से • मकरन्द ग्रहण कर मधु रचना करती हुई पुप्प के किसी अंश को ह्रास न कर उसके सारांश को ग्रहण कर लेती हैं जेसे वा जलौका (जोंक) मिश्रित रक्त में से विकृत रक्त रूप एकांश को ग्रहण कर लेती है जेसे वा कमल के किसी १ योगदर्शन के तृतीय विभूतिपाद के २१ चे सूत्र में यह रूप है। २०१० श्लो०२९-पितृलोकनिवासी जो अर्यमा नामक पितर है वह मेरा स्वरूप है यह गीतावाक्य का अर्थ है । ३ पूर्वोक्त अर्थ को स्पष्ट करते हैं "अर्थात्" इत्यादि से । . . r श्राद्ध कृत्यमीमांसा। अंश को भी न घटाता हुआ भ्रमर कमल गर्भ केशर मक- रंद को ग्रहण कर लेता है, जैसे वा जल मिश्रित दुग्ध में से हंस जल को पृथक् कर देता है', तेसे परमात्मप्रदत अलौकिक शक्तिविशेष से पितर देवता भी श्राद्धीय पदार्थों के सारांश का ग्रहण कर लेते हैं यहां पर इतना विशेष यह भी जान लेना कि जैसे देवदत्त आदि शब्दों कर के न केवल शरीर मात्र ही कहा जाता है औ न केवल आत्मामात्र किन्तु शरीरविशिष्ट आत्मा ही कहा जाता है, तैसे श्राद्धकर्म में संप्रदानभूत जो प्रितृ-पितामह प्रपितामह-शब्द उच्चारण किये जाते हैं वह भी न केवल मृतपितरों के वाचक हैं न पितर देवताओं के याचक है, किंतु वसु आदिक अधिष्ठातृ देवतारूप पितरों के विशिष्ट जो मृत पितृ आदि हैं उन के वाचक हैं। , इसी प्रकार जड लोहे में भी चरक के सन्निपान से अलौकिक शाक्ति तथा अंगुलि के स्पर्श करने से लजावती लता में संकुचित होन की शक्ति भी जान लेनी, यदि पदार्थों की विचित्र शक्तियों का निरूपण किया नाप तो एक वृहस्था ही हो जायगी, इस से इतने में ही सन्तुष्ट होवो, यदि अंग्रेजी दा हो तो यूरोपियन हारवियन की रितार देखो जिस में सागरस्य जन्तुपों की अलौकिक शक्तियों का निरूपण है। २ तहां इतना विशेष है कि मृतपितृविशिष्ट वसुदेवता तो पितृपद का चाप्य है औ मृतपितामहविशिष्ट रुद्र देवता पितामह पद का वाच्य है औ मृत प्रपितामहविशिष्ट अदिनिमत (आदित्य) देवता मपितामहपद का वाच्यारे, इस अभिमाय से ही मन जी में "यमन् वदन्ति तु पितृन् रुदाधव पिताम- न, पितामहाँस्तथादित्याव्यतिरेपा सनातनी" अ ३ श्लो. २८१ इस मामय से बसु रुद्र भादित्य, इन तीनों को पिट पितामह मपितामह नाम से निर्देश किया है।

११ श्राद्धकृत्यमीमांसा एवंच जैसे गर्भिणी अवला किसी अन्य पुरुष कर प्रदत्त गर्भ-पोषणार्थ अन्नादि को भक्षण कर स्वत: तृप्त हुई अपने उदर गत गर्भको भी तृप्त करती है औ गर्भ पोषणो. पयुक्त अन्न देने वाले को भी प्रत्युपकार रूप फल से संयुक्त करती है तैसे श्राद्भदेव जो वस्त्रादि पितर हैं वह श्राद्ध कर के तृप्त हुए स्वसंगत पितरों को भी तृप्त करते हैं मौ श्राद्ध कर्ता को भी स्वर्गादि फल से संयुक्त करते हैं, इस अभि- 'प्राय "देवान् वै पितॄन् प्रीतान् , मनुष्याः पितरोऽनु- प्रीयन्ते , * तिस्र आहुतीर्जुहोति , त्रिनिदधाति, से ही। अ ययुभारण्यश पट.१पध्याचमु-१. षट् संपद्यन्ते" ४ , इस वेदवाक्य ने पितरदेवताओं के अनन्तर मृतमनुष्य पितरों की तृप्ति कही है, योगीयाज्ञवल्क्य मुनि जी ने आचाराध्याय में भी “वसुरुद्राऽदितिसुताः पितरः श्राहदेवताः, प्रीणयन्ति मनुष्याणां पितॄन् श्राद्धेन तर्पिताः२६९ * देवताम्प पितरों के तृप्त होने से अनन्तर मनुष्यरूप पितर भी हो जाते हैं, इसी से ही प्रथम देवताका पितरों के अर्थ तीन आहुति करना चाहिये औ फिर मृत मनुष्यरूप पितरोंके अर्थ तीन पिण्ड देने चाहिये, इस प्रकार पद ६ संपन्न होते हैं, यह इस श्रुनि का अर्थ है। वसु तथा रुद्र एवं अदितिसुत यह तीनों पितर जो श्राद्ध के देवता हैं बा श्राद कर के तृप्त हुये मनुष्यों के पितरों को भी, तृप्त करते हैं औ श्राद्ध- फर्ता के प्रति भी आयु, मजा, धन, विद्या, स्वर्ग, मोक्ष, यथायोग्य मार मदान करते हैं, यह याज्ञवल्यमुनि जी के वचन का परमार्थ है। तृप्त - ,

श्राद्ध कृत्वमीमांगा।
आयुः प्रजां धनं विद्यां स्वर्ग मोक्षं सुखानि च
प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः"२७०
इन वाक्यों से यही दृढ़ किया है ओ भीष्मपितामह
जी के प्रति शंतनु जी ने भी-
"आप्यायित्ताश्यते सर्वे पुनराप्याययन्ति"
यही समाधान दिया है इतना विशेष यहां पर और
भी जान लेना कि जो मृतपुरुप सामर्थ्य से विहीन हुए
श्राद्ध देश में आगमन नहीं करसकते हैं उन के प्रति मंत्रों
के बल से तथा पितृदेवताओं के अलौकिक पुरुषार्थ से उसी
स्थान में ही फल प्राप्त हो जाता है।
अब यह सब जिस प्रकार पुराणों में शंका समाधान
द्वारा विस्पष्ट रूप से प्रतिपादन किया है सोई प्रकार संक्षिप्त
रूप से में प्रदर्शन करता हूं, तहां प्रधम जो पुराणों में
श्रान्डविपयक शंकापर वाक्य है उन का उपन्यास किया
जाता है
" कथं कव्यानि दत्तानि हव्यानि च जनेरिह,
गच्छन्ति पितृलोकं वा प्रापकः कोऽत्र गद्यते"
अर्थात्-जनों कर के दिया हुआ हव्य कव्य पितृ-
लोक को कैसे प्राप्त होता है श्री कोन पहुंचाने वाला है,
पादम, माक्य ।
१ यह सब शिरपुराणी धर्म संहिताके भाद्ध कला के ६२ अमें स्पष्ट है।
२ पितरों के उद्देश से जो अन्न है वह कव्य है, देवताओं के प्रति जो
देय भन्न है यह हव्य जानना ।

पि.पु.॥
कान्दा
श्राद्धकृत्यमीमांसा।
तृप्तये जायते पुंसो भुक्तमन्येन चेत्ततः,
दद्यात् श्राद्धं श्रद्वयाऽन्नं न वहेयुः प्रवासिनः "
अर्थात्-यदि अन्य के भोजन से अन्य की तृप्ति होती
है तो परदेश में गये हुए पुरुष के निमित्त भी श्राद्ध करने
से उस की तृप्ति होने से क्यों वह मार्ग में अन्न का भार
उठाते हैं।
"मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धमाप्यायते ततः,
निर्वाणस्य प्रदीपस्य तैलं संवईयेच्छिखाम्"
अर्थात्-यदि मृतपुरुष की भी श्राद्ध से तृप्ति होय
तो वुते हुए दीपक की शिखा को भी तैल वढा सकता है ।
"किमर्थं क्रियते श्राद्धममावास्यादिषु द्विजैः,
मृताश्च पुरुषा विप्र स्वकर्मजनितांगति,
गच्छन्ति ते कथं तस्य सुतस्याश्रममाप्नुयुः"
अर्थात्-- अमावास्यादि तिथियों में श्राद्ध करने का
क्या काम है क्योंकि अपने २ कर्मों के अनुसार भिन्न २
योनि को प्राप्त हुये मृतपुरुषों का पुत्र के गृह में श्राद्ध काल
में गमन करना असंभव है।
इदानीं जो इन आक्षेपों के परिहार पर वाक्य हैं सो
निरूपण किये जाते हैं।
"नामगोत्रं तु पितृणां प्रापकं हव्यकव्ययोः,
श्रावस्य मंत्रास्तबच्चोपलभ्यानि भक्तितः"
स्का. नागरखंड
मान्य पादमा

श्राद्रकृत्यमीमांसा
विधातर
अर्थात्-पितरों का नाम तथा गोत्र एवं श्राद्ध मंत्र
यह सब पितरों के प्रति हव्य तथा कव्य के प्रापक हैं परन्तु
भक्तिपूर्वक इस को जानना चाहिये ।
एते श्राद्धं सदा भुक्ता पितॄन् सन्तर्पयन्त्युत ।
यत्र वचन धर्मज्ञा वर्तमानान्हि योगतः॥"
अर्थात-वसु आदिक जो पितरदेव हैं वह श्राद्धभोजन
कर आप तृप्त हुये मृतपुरुपों को तृप्त कर देते हैं चाहे वह
किसी योनि में होंय क्योंकि वह धर्मज्ञ पितर योगबल से
सव के ज्ञाता हैं।
विस्तर के भय से अन्य वचनों का उपन्यास नहीं
किया गया है, जिसे इच्छा होय वह वायवीय वा वाराह के
श्राद्धकल्प को देखे।
जो कि यहां पर एक यह क्षुद्र शंका उत्थित होती है
१ वा सर मन्त्र आगे कहे जायगे ।
* यद्यपि निग्विल पुराणों में ही पादपकरण है तथापि अग्निपुराण के
१६३ अध्याय में भी मार्कण्डेयपुराण के १०.३१-३२-३३ अध्यायों में भी
नारदीप के २६ भ० में, औ वराहपुराण के १३ १४ अ० में औ मत्स्य.
पुराण के १६-१७ १८ १९-२०-२१.२२ अ० में भी कर्म पुराण के २०.२१-२२
अ० में, औ लिङ्गपुराण के ४५ भ० में यह प्रकरण विस्तृत है, अत: जिन को
विशेष रुचि होय वा वहां पर रशिपात करें।
यदि भादविषयक निखिल अनुष्ठेय के जानने की रुचि है तो चतुर्वी
चिन्तामणि के भाद्धलण्ड को देखो जिस के श्राद्ध के निरूपण में ही एक हजार
सात सौ सतरह १७१७ पत्र है, स्वामी जी ने तो केवल (भाधर्म वैदिक
भी अवश्य करना चाहिये) इस लिये यह नूतन आरम्भ किया है क्योंकि इस
मार का मकरण अभी तक किसी ने रचा नहीं है।
+

“ श्रादकृत्यमीमांसा कि ( मृत पुरुषों को स्वकीय पुण्य पाप रुप कर्म के बै- चित्र्य से भिन्न २ योनियों की प्राप्ति होने से पशु पक्षी आदि योनि को प्राप्त मृतपुरुप मनुष्य भोजन से कैसे तुप्स होंगे क्योंकि जिस जाति में जो उत्पन्न होता है उस को उसी जाति का भोग ही तृप्ति कर होता है अन्य जाति का नहीं) इस का समाधान देवल मुनि ने देवो यदि पिता जातः शुभकर्मानुयोगतः तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्वेप्यनु गच्छति गान्धर्व भोग्यरूपेण पशुत्वे च तृणं भवेद् श्राद्यान्नं वायु रूपेण नागत्वेप्यनु गच्छति पानं भवति यक्षत्वे राक्षसत्वे तथामिषम् दानवत्वे तथा मांसं प्रेतत्वे रुधिरोदकम् मनुष्यत्वेऽनपानादि नानाभोगरसो भवेद यह दिया है, अर्थात्-जिस जाति में वह उत्पन्न होता है उस जाति का ही भोग उस को पितर देवता पहुंचा देते हैं, औ जो पितर उत्कृष्ट योनि की प्राप्ति से श्राद्ध देश में नागमन की शक्तिवाले हैं वह निमन्त्रित ब्राह्मणों के शरीर में वायु रूप से प्रविष्ट हो कर श्राद्ध देश में उपस्थित हो तृप्ति को प्राप्त हो जाते हैं। १ यदि नर शुभकर्मानुसार सं मर कर देवता बनेगा तो उस को वह श्राद्धान्न अमृतरूप से पास होता है, एवं गान्धर्वनाति में भोग्यरूप से, पश- योनि में तृणरूप से, नागयोनि में वायु रूप से, यक्षयोनि में मदिरा से, राक्षसयोनि में आमिषरूप से, दानवयोनि में मांस रूप से, मंतयोनि में रुधिर- रूप से, मनुष्यपानि में अन्नपानादिरूप से, बद्द आदान प्राप्त होता है।

भादकृत्यमीमांसा।
इस आशय से ही मनुभगवान् जीने अ० ३ में
"निमन्त्रितान् हि पितर उप तिष्ठन्ति तान् द्विजान्,
वायुवच्चानुगच्छन्ति तथाऽऽसीनानुपासते” १८४॥
इस वाक्य से निमन्त्रित ब्राह्मणों के शरीर में अदृश्य
वायुरुप से पितरों का प्रवेश कहा है।
अतएव जब पुष्कर यात्रा में वियोगवापी के समीप
रामजी ने श्राद्ध किया था तव जानकी जी ने निमन्त्रित
ब्राह्मणों के शरीरों में दशरथ आदि को देख कर उन से
लज्जा कर अन्यत्र गमन कर अपने को छिपा लिया था।
इस प्रकार श्रुति-स्मृति-युक्ति तथा पुराणों द्वारा
(श्राद्ध किस कृत्य का नाम है, ओ केसे मृतकों को
पहुंचता है, ओ कोन पहुंचाने वाला है,) इन विषयों का
निरूपण किया, इदानीं, ( क्यों यह पितृकृत्य करना चाहिये)
इस के समाधानार्थ तथा जो पुरुप यह कहते हैं कि ( वेद
में पितरों के निमित्त श्राद्ध का विधान नहीं है, है तो जीवत्
पितरों के लिये ही है कुछ मृतक पितरों के निमित्त नहीं)
इस संदेह के उच्छेदनार्थ श्राद्धविषयक वैदिक प्रमाणों का
उपन्यास किया जाता है।
तहां-"विधिविधेय:तर्कश्च वेदः” कां० २ ० ६ सू०५
इस पारस्कर सूत्र से विधि, मंत्र, अर्थवाद, भेद से
वेदको तीन प्रकार का होने से प्रथम मंत्ररूप वेद का उपर
न्यास किया जाता है।
१ यह सब पद्मपुराण के पाताल खण्ड में सटहै।
२ यद्यपि विधि, मात्र, नामधेय, निषेध, अर्थवाद, इन भदों से मीमांसक

श्राद्धकृत्यमीमांसा। * नमोहिरण्यवाहवे हिरण्यवर्णाय हिरण्यरूपाय हिरण्यपतयेऽम्बिकापतय उमापतये पशुपतये नमो नमः तयशुतनि पारस-१. प्र. १८ मु. म १ + इदंपितृभ्यो नमोऽस्त्वद्यये पूर्वासो यउपरास ईयुः ये पार्थिवे रजस्यानिपत्ता ये वा नूनं सुटजनासु विक्षु॥ घगवे पटक ० प-या रग१० मपल १० अनुवाक १ मत १५-- मन्न १ गुल यजुवेद अध्याय १८ मन्त्र ६८ क्षणयजुद-काण १ प्रपाउस ( पनुवाक १२ मन र अन्वयार्थः-~ये (पूर्वासः) पूर्वे पितरः (ईयुः) स्वर्ग प्राप्ताः, ये च (उपरास:) उपरतव्यापाराः कृतकृत्याः सन्तः परं भासाः, यद्वा ये (पूर्वासः) यजमानोत्पत्ते पूर्वमेवोत्पन्ना ज्येष्ठभ्रातृपि- तामहादयः, ये च (उपरास:) यजमानजन्मन उपर्युत्पन्ना लोक वेद को पांच प्रकार का मानते हैं तीन प्रकार का नहीं, तथापि विधिपद से निषेध का औतश्च -इस 'च' पद से नामधेय का ग्रहण कर यहां पर भी पांच भेद मान लेने । तहां साक्षात् जो विधायक वा निषेधक ब्राह्मणवाक्य है उन का नाम विधि-निषेध रूप वेद है, औ ब्राह्मणवाक्यों कर जिनों का किसी कर्म में विनियोग किया जाता है वह मंत्ररूप वेद है, प्रशंसा तथा निन्दा द्वारा जो विहित तथा निपिद्ध में प्रवृत्ति नित्ति कराने वाला वाक्य है वह अर्थवाद का घेद है, जो किसी पदार्थ की समावांधन करने वाले वाक्य हैं वह नाम- धेय हैं। * तहां निराकारमात्र ही वेद प्रतिपाद्य है, इस दुराशय को शान्त करते हुये प्रथम वेदोक्त नमस्कारात्मकमगल का उपन्यास करते हैं "नमो हिरण्यवा- हरे" इति । प्रथम जिन मंत्रों का लिङ्गद्वारा श्रादविषय में विनियोग है वह मन उपन्यस्त करते हैं, 'इदंपितृभ्यः' इति, यह मन्त्र श्राद्धकाल में आहूत पितरों के प्रति नपस्कार करने में विनियुक्त है।

१८ वाद्धकृत्यमीमांसा। कनिष्टभ्रातृस्वपुत्रादयः ( ईयु. ) पितृलोकं प्राप्ताः, येप्यन्ये (पार्थिवेरजसि) पृथिवीसंवन्धिनि रजोगुणकार्येऽस्मिन् पि- तृयज्ञाख्यकर्मणि (पानिपत्ताः) हवि. स्वीकर्तुमागत्योपविष्टाः, येवा (सुजनासु ) धनसमृद्ध्या श्राद्धादिकर्मपरासु (विक्षु ) यन्धुरूपासु प्रजासु (नून) निश्चयेन (आनिपत्ताः) श्राद्धादि- स्वीकारायागयोपविष्टाः, तेभ्यः सर्वेभ्यः पितृभ्यो ( अद्य ) अस्मिन् पितृयज्ञास्ये कमणि (नमोऽस्त) अयमाहुतिप्रदान- पूर्वको नमस्कारो भवतु। भाषा-( ये पूर्वासः ) जो हम से पूर्व होने वाले ज्येष्ट- भ्राता पिता आदि पितर औ जो (उपरासः ) हम से पश्चात् होने वाले कनिष्ठभ्राता आदि (ईयु.) मर कर पितृलोक को प्राप्त भये हैं, हो जो ( पार्थिवे रजसि) पृथिवी संवन्धि- रजोगुणयुक्त इस पितृयज्ञरूप कर्म में (आनिपत्ता.) अदृश्य- रूप से हविग्रहण करने को उपस्थित हुये हैं, औ जो (सुवृ- जनासु विक्षु) श्राद्धकर्म में निष्ठावाले बन्धुवर्गों में ( नूनं ) निश्चय कर ( आनिपत्ताः) श्राद्ध के स्वीकारार्थ उपस्थित हुये हैं, तिन सर्व पितरों के प्रति (अद्य) इस आरब्ध पितृ- यज्ञकर्म में आहुति प्रदानपूर्वक मेरी नमस्कार होय। अग्निप्वात्ताः पितर एह गच्छत सदः सदः सदत सुप्रणीतयः। अत्ताहवींपि प्रयतानि यहिष्यथा रयिं सर्ववीरं दधात नः, ११ मं- , श.प.६.१४ मे १.न.स. १५.० शु. य... #त. य. का ३ प ... में १ "ज्यते - परित्यज्यने दारिद्यमनेनेति मन धन तत् शोभन यामा तामुननाः, ताशीपु" इतिसायणः ।

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श्राद्धकृत्यमीमांसा
अन्वयार्थ:-हे ! ( अग्निष्पाताः) अग्निनाऽऽस्वादिता
वा अग्निप्यात्तनामानः पितरः, यूयं ( एह) अस्मिन् पितृ-
यज्ञाख्ये कर्मणि आगच्छत, आगत्य च (सुप्रमीतयः)
अभिपूजितप्रणयनाः सन्तः (सदः सदः) स्वस्वस्थानं (सदत)
यथेष्टमुपविशत, उपविश्य च ( वर्हिपु ) कुशेष स्थापितानि-
(प्रयतानि) शुचीनि हवींपि (अत्ता.) भक्षयत, अथ च
सर्वेः वीरैः पुत्रैरुपेतं ( यि ) धनं च (नः ) अस्मभ्यं
(दधात) दत्त,
भाषा-हे ! (अग्निष्वाताः ) अग्नि में दग्ध होने से
'अग्निकर आस्वादित, वा अग्निप्वात्तनामक पितरो! आप
(एहगच्छत) इस पितृयज्ञरूप में आगमन करो, औ आकर
(सुप्रणीतयः) पूजा को प्राप्त हुये (सदासदः) अपने २ स्थान
में (सदत) यथा-काम निवास करो, फिर (धर्हिषु) कुशों के
उपर स्थापित जो (प्रयतानिहवींपि) पवित्र हविरूप भोजन
तिस को आप ( अत्ता) भक्षण करो (अथ) पुनः (सर्ववीरं
रयिम् ) सर्ववीरपुत्रों के सहित धन को (न: ) हमारे प्रति
(दधात ) प्रदान करो।
आच्याजानु दक्षिणतो निषद्येमं यज्ञमभिगृणीत विश्वे,
मा हिंसिप्ट पितरः केनचिन्नो यह आगः पुरुपता
कराम, मं६
अन्वयार्थः--हे विश्वे सर्वे पिलर, यूयं ( जानुपाच्य )
म. प.स.१८१.पन.१ मू. १५१८.
ग. य. १८ भ.१
१ यह पत्र पितरदेवताओं के आवाहन तथा उपवेशन में विनियक्त है,
यह सब आगे पिण्डपितृयज्ञमीमांसा में स्पष्ट होगा।

२०
भादकत्यमीमांसा।
वामजानु भूमौ पातयित्वा (दक्षिणतो निषध ) दक्षिणापा
उपविश्य इममस्मदीयं यज्ञम् (अभिगृणीत) साधुरयं यज्ञ
इत्येवमभिष्टुत अपि च (क) युष्माकं, यत्किञ्चिद् (भाग.)
कर्मवैगुण्यजनितमपराधम् (पुरुषता ) मनुष्यत्वेन हेतुना
{ कराम ) वयं कृतवन्तः हे पितरः तेनकेनचिदपराधेन (न:)
अस्मान् मा (हिंसिष्ट ) वधिष्ट ।
हे (विश्वे ) निखिल पितरो ! आप (जानुवाच्य)
वामजानु को भूमि पर निपात कर (दक्षिणत: निषद्य) इस
अग्नि से दक्षिण की ओर स्थित हो कर ( इमं यज्ञम् ) इस
हमारे यज्ञ को (अभिगृणीत) स्तवन कीजिये, ओ (पुरुपता)
चाञ्चल्यस्वभाव रूप मनुष्यत्व से, आप का ( यद् आगः)
जो कुछ कर्मवैगुण्ययुक्त अपराध ( कराम) किया हो तो
तिस किसी अपराध से (न.) हम को (मा हिंसिष्ट) हिंसन
मत करो।
स्वमग्न * ईडितो जातवेदोऽवाड्ढव्यानि सुरभीण
कृत्वा, प्रादाः पितृभ्यः स्वधया ते अक्षन्नति त्वं देव
प्रयता हवीषि,
अन्वयार्थ:-हे अग्ने ! खमस्माभिः (ईडितः) स्तुतः
हव्यानि अस्मदीयानि सुगन्धीनि कृत्वा ( अवाट् ) अवा.
क्षीत् प्राप्तवानसि ऊद्धा च ( स्वधया) पितृमंत्रेण पितृभ्यः
म पर १५ भए १.१५परम .
रा-यप एररुय. (११म..
* सामवेदीयमंनाह्मण के दि० प्रया० ०० खण्ड में तो "अभूमो दूतो
इविपो जावदा अवाढव्यानि सुरभीणि कृत्वा, प्रादाव पित्म्यः स्वधया
तेऽक्षन् गजानने पुनरहि योनिम्" १५ मे, इस प्रकार का पाठ है।

श्रादकृत्यमीमांसा।
(प्रादाः) दत्तवानसि, ते च पितरस्तद् हविः (अक्षन् )
भाक्षितवन्तः हे जातवेदस्त्वमपि (प्रयता) पवित्राणि हवींषि
(अद्धि) भक्षय ।
भाषा-हे अग्ने हमकर (इंडित:)स्तुत हुये (स्वं) आप (हव्या-
निसुरभीणि कृत्वा अवाड् ) हमारे दीये हुये हव्य को सुगन्धित
कर हवन द्वारा स्वीकार किया, औ स्वीकार कर फिर(स्वधया)
पितृप्रिय स्वधा इस मंत्र से (पितृभ्यः प्रादाः) हमारे पितरों
के प्रति प्रदान किया है अतः आप कर प्रदान किया हुआ
जो हवि है उस हवि को (ते) हमारे पितर (अक्षन् )
भक्षण करते हैं, हे ( जातवेदः) दिव्यप्रकाशस्वरूप अग्ने
( त्वम् ) आप भी (प्रयता हवींपि ) इन शुद्ध हवियों को
(अद्धि) भक्षणकरो।
येऽग्निदग्धा येऽनग्निदग्धा मध्येदिवःस्वधया
मादयन्ते, तेभिः स्वराडससुनीतिमेतां यथावशं तन्वं ।
कल्पयस्व,
मं०
०१४
अन्वयार्थः-ये (अग्निदग्धाः) श्मशानं प्राप्ता: ये च
(अनग्निदग्धाः) श्मशानकर्म न प्राप्ता ये च (दिवो)
युलोकस्य मध्ये स्वधया (माद्यन्ते) तृप्ताश्चरन्ति, हे (स्वराट्)
दीप्यमान अग्ने (तैः पितृभिः) ते भ्यः पितृभ्यः ( असुनी-
तिम् ) प्राणयुक्ताम् ( एताम् ) भक्षण योग्यां तनू (यथा
वशं) यथा कामं त्वं कल्पयस्व ।
* यहां पर जो अग्निदग्धपद से जीवित पितरों का ग्रहण करते हैं उनके
प्रति तो "ब्रह्मापि तं नरं न रज यति" यह ही कहना पडेगा।
+ यजुर्वेद में (कल्पयाति) यह पाठ है ।
मा.प.व.१८ म.१.प.१.१५ पट..
गु. य.प.१९-००-

श्रादकत्यमीयांसा। भापा-हे स्वराट-दीप्यमान अग्ने ! ( ये अग्निदग्धाः) जो हमारे पितर अग्नि में दग्ध हवे श्मशान संस्कार को प्राप्त हुवे हैं औ ( येऽनग्निदग्धाः ) जो श्मशान संस्कार को नहीं प्राप्त हुवे हैं ओ जो (दिवोमध्ये ) अन्तरिक्ष लोक में वा स्वर्ग लोक में स्वधामंत्र संस्कृत अन्न की प्राप्ति से (माद्यन्ते) तृप्त होकर विचर रहे हैं ( तैः पितृभिः) तिन पितरों के प्रति ( असुनीति ) प्राण युक्त ( एताम् ) हवि भक्षण के योग्यता वाली (तनं ) देह की कल्पना करो जिस से (यथा कामम् ) यथेष्ट यहां आकर हवि भक्षण करें। ये निखाता ये परीप्ता ये दग्धा येचोधिता, सर्वास्तानग्न आवह पितॄन् हविषे अत्तवे ॥ भापा-(येनिखाताः) जो हमारे पितर भूमि में गाडे गये हैं ओ (ये परीप्ताः) नदी में वहाये गये हैं ( ये दग्धा जो अग्नि में जलाये गये हैं (ये च उद्धिताः ) जो पृथ्वी में किसी कारण से गाडे जाने पर फिर निकाल कर जलाये गये हे हे अग्ने ! ( सान् पितॄन् ) तिन सवपितरों को (हविपः अत्तवे ) हवि भक्षण के अर्थ यहां (आवह ) प्राप्त कर । इसी प्रकार अथर्व वेद के १८ वें काण्ड में ३४ प्रपाठ- कान्तर्गत चतुर्थ अनुवाक में- “यारते धाना अनुकिरामि तिलमिश्राः स्वधावतीः १ अर्थात् श्राद्ध देश में आगमन शक्ति से रहित हमारे पितरों को अपनी अलौकिकशक्ति से किसी अदृश्य शरीरकरयुक्त कर आप यहां उपस्थित करो, पा इस श्राद्धकर्म से उन को अन्यशोभन देह युक्त करो। २ जो स्वागंन से सिल मिश धानों को में यनमान भापके लिये पिण्डों -काड पा. २३ पशु. १ मे. २

२
श्रादकृत्यमीमांसा।
तास्ते सन्तु विभ्वी:- प्रभ्वीस्तास्ते यमो राजानु-
मन्यताम् ॥ मं'४३,
इस मंत्र से लेकर
स्वधा पितृभ्यः एथिविपद्न्यः १८ स्वधा पि-
तृभ्यो ऽन्तरिक्ष सद्यः' ७९ ‘स्वधा पितृभ्यो
दिविषद्भ्यः' ८०॥
इत्यादि प्रकार से अष्टादश काण्ड की समाप्तिपर्यन्त
यही श्राद्धविपय निरूपणं किया है विस्तर भय से हम ने
निखिल का उपन्यास नहीं किया है।
इसी प्रकार सामवेदीय मंत्र ब्राह्मण के द्वितीयप्रपाठक
के तृतीयखण्ड में भी-
" स्वाहा सोमाय पितृमते
इत्यादि १९ एकोनविंशमन्त्रों से श्राद्धकर्म का निरू-
पण किया है।
इस प्रकार चारो वेदों के मंत्रों से मृत पितरों के उद्देश
से विहित पितृयज्ञ का लिङ्गद्वारा निरूपण करे अव वेद के
के सन्निधान में अग्नि की साक्षिता में फेंकता हूं, सो आप को विशेष समर्थ
वाली तथा प्रभु शक्तिबाली होकर उपस्थित होवें, औ यमराजा भी इस कर्म
को अनुमोदन कर जिसमें आपको सुखका लामहोय, यह इमका तात्पर्य है।
२ जिस प्रकार से इन १९मत्रों का श्राद्धकर्म में विनियोग है, वह प्रकार
गोभिलगृह्य सूत्र १, ३, २, से लेकर १, ४, २१ पर्यन्त स्पष्ट है।
२ अर्थात्-श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समास्या, यह पद
प्रमाण वेद के वायों का कर्म में विनियोजक हैं, यह जैमिनीयदर्शन के तृती-
याध्याय में स्पष्ट है, तहां लिङ्गदारा जो वेद के गन्न श्राद्धकर्म का प्रतिपादक

२४ पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। मंत्रों का पितृयज्ञ में विनियोग कथन करने वाले तथा श्रुतिरूप से पितृयज्ञ को विधान करने वाले जो शतपथ आदि ब्राह्मणरूप वेद तथा आश्वलायनीय आदि श्रोत तथा पारस्कराचार्य आदि प्रणीत गृह्यसूत्र हैं उन द्वारा पितृयज्ञ का निरूपण करते हैं- पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। तहां प्रथम सङ्ग के सङ्ग शतपथ आदि श्रुतियों के वाक्यों का उपन्यास करते हुये । ऋगवेदीय श्रौतसूत्रों से पिण्ड- पितृयज्ञ के विधान का निरूपण किया जाता है। "अमावास्यायामपराह्ने पिण्डपितृयज्ञः भागमायनीतमा प० २ कठिाम. हैं उन का उपन्यास कर अव जो साक्षात् श्रुतिद्वारा पितृयज्ञ के विधायक चंदवाक्य हैं उन का उपन्यास किया जाता है। + यहाँ इतना विशप यह भी जान लेना उचित है कि-ऋगमंत्रों का तथा ऋग्वदीय कर्मों का व्यवस्थापक ऐतरेयादि ब्राह्मण तथा आरण्यक एवं आपलायन औ शाशयन श्रौतमूत्रनामक कल्पसूत्र हैं। यजमन्त्रों का व्या यजुर्वेदीय कर्मों का शतपयादि ब्राह्मण तथा, कात्या- यन, चौधायन, आएनम श्रीतसूत्रादि व्यवस्थापक हैं। एवं साममंत्रों का तथा सामंचदीपकमाँ का ताण्ड्यमहामाह्मण आदि एवं लाव्यायन, द्राहायण आदि श्रौतसूत्र व्यवस्थापक है, एवं अधर्वमन्त्रों का तथा अथर्ववेदीयकृत्यों का गोपयवाह्मण वथा शौनक कौषीवकी श्रौतमूत्र व्यवस्थापक है, इन से विरुद्ध जो मनमाना वेह के तात्पर्य को मानेगावा नास्तिक जानना, अत: इसी क्रम से ही यह मीमांसा आरम्भ किया जाता है। .

पिण्डपित्यज्ञमीमांसा। पिण्डैः क्रियमाणो यः पितृणां यज्ञः सपिण्डपितृयज्ञः, अतः पितृदेवत्यकर्मनामधेयमिदमिति बोध्यम् , सच कस्मिन् समयेऽनुष्टेय इत्याकाङ्क्षा शान्तयति- 'अमावास्यायामपराहे ' इति । भत्र यदधिकं मीमांसनीयं तद् आपस्तम्बायश्रीत्रसूत्रो- पन्यासावसरे मीमांसयिष्यत इति नैतावता सन्तोष्टव्यम् । भाषा-अमावास्या तिथि में अपरान्ह समय में पिण्ड. पितृयज्ञ का अनुप्टान करे यह संक्षिप्त सूत्रार्थ है' यहां पर जो विशेपमीमांसा आवश्यक हे वह आपस्तम्वीय श्रोत्र सूत्र की व्याख्या में आगे कही जायगी, यद्यपि अमावास्यायामपराहे पिण्डपितृयज्ञेन चरन्ति इस श्रुति से पिण्डपितृयज्ञ का अनुष्टान काल अमा- वस्या तिथि निर्णित हे तथापि अमावास्या में अवश्य करना १ "पिण्डपितृया" इति वक्ष्यमाणस्य कर्मणः समानसंशा, सा च पिण्डदानपदार्थस्यैवाऽनुगमाद, पिण्डै पितृणां यश इति पिण्डपितृयज्ञः , तश्च होमनपादयस्तदनाः, मयोजनं चिन्तापास्तदकरणंऽभ्यात्तिन होमादेः, इति कर्माचार्यः। अर्थात् वक्ष्यमाण कर्म में पिण्डदान प्रधान है औ होम जप आदिक अङ्ग है, इस से पिण्डदान नामक कर्म का नाम पिण्डपितृयज्ञ जानना। २ पिण्डदान द्वारा क्रियमाण जो पितरोंगा यजन या पिण्डपितृ यहा है। ३ इस श्रुतिरिपया विशेष मीमांसा दर्शनीय हो तो "जमिनीयरर्शन के चतुर्थाध्याय के चतुर्य पाद में "पितृयज्ञः कालत्वादन स्याद्" इस अष्टमअ- विकरण के शारभाप्य तथा तन्त्रवाति का आलोकन करो, नहीं तो स्वामी जी कृत जैमिनीयदर्शन की व्यारया को देखो।

२६ पिण्डपितृयज्ञमीमांपा। चाहिये इस नियम की पुष्टि करनेवाले जो वेद में अर्थ बाद रूप इतिहास हें उन का संक्षेप से उपन्यास करते हैं जिस से यह निश्चय हो जाय कि यह कर्म आवस्यक है- "प्रजापतिं वै भूतान्युपासीदन् प्रजा वै भूतानि वि नो धेहि यथा जीवामेति, ततो देवा यज्ञोपवीतिनो भूत्वा दक्षिणं जान्वाच्योपासीदेस्तानब्रवीद् यज्ञो वोऽनममृतत्वं व ऊर्छ सूर्यो वो ज्योतिरिति ॥ १ ॥ अथेनं पितरः प्राचीनावीतिनः सव्यं जान्वाच्योपा- सीदस्तानववीन्मासिमासि वोडशनं स्वधा वो मनो- जवश्चन्द्रमा वो ज्योतिरिति ॥ २॥ अथैनं मनुष्याः प्राटता उपस्थं कृत्वोपासीदस्तानब्रवीत् सायं प्राता ऽशनं प्रजा यो मृत्युरनिर्वो ज्योतिरिति ॥ ३ ॥ भापाभावार्थ-देवता तथा पितर ओ मनुष्य यह तीन प्रकार के भूत (जिस प्रकार से हमारा जीवन हो सो प्रकार हमारा आप विधान करें) इस कथन के अभिप्राय से प्रजा. पति के समीप गमन करते भये, तहां पहिले देवताओं ने यज्ञोपवीत० को धारण कर दक्षिण जानु का भूमि पर पात य.-t.प्र.पा.४ * दक्षिणं पाहमहृत्य शिरोऽवधाय सऽ प्रतिष्ठापयति दक्षिण कक्षामन्यववलम्मं भवतीत्येव पोपीती भवति ॥ १-२-२-इस गोभिलसूत्र से दक्षिण बाहु को ऊपर उठा कर शिर का अपमान कर वाम कथं पर स्थापित किया हुया जो चसन या अजिन या गून दक्षिण कोख के नीचे आलम्बन करता है वह यज्ञोपवीत जानना।

पिण्डपितृयज्ञ मीमांसा। कर प्रजापति के सन्मुख उपस्थित होकर जीविका की याचना की तव प्रजापति ने यह कहा कि यज्ञ आप का अन्न है अमृत आप का ऊ (वीर्य्यप्रद) है औ सूर्य आप के लिये प्रकाश है। फिर पश्चात्-प्राचीनावीती हुये' वामजानु को भूमि पर निवाय कर पितरलोक उपस्थित हुये तव उन पितरों के प्रति प्रजापति ने यह कहा कि मास मास में अमावास्या के दिन आप का भोजन होगा औ स्वधारूप मंत्र आप का मनोजवे हे ओ चन्द्रमा आप की ज्योति है। फिर प्रावृन ( निवीती') हुये दोनों जानुयों को भूमि पर निवाय कर मनुष्य उपस्थित हुये तब उन को प्रजापति ने यह कहा कि सायं यो प्रातःकाल आप का भोजन है श्री पुत्रपौत्रादि प्रजा आप लोकों का मृत्यु है श्री अग्नि आप की ज्योति है। यद्यपि यहां पर श्रुति में सामान्य से ही (मासि मासि) इस वाक्य से मास मास में पितरों को भोजन कहा है, तथापि- १ "राव्यं वाहपहृत्य शिगेवधार्य दक्षिणेऽशे प्रतिष्ठापयति सव्यं कक्षम- न्वयलं भातीत्येवं प्राचीनापीती भवति" इस गांभि०१-२-३ सूत्र से वाम पाहु को ऊपर उठा कर शिर को नम्र कर दक्षिण कन्चे पर स्थापित हुया जो सूत्र आदि पामकक्ष को आलम्बन करे वद्द माचीनाचीत जानना। २ मतसरीखे वेग से आप के प्रति भन्न पहुंचाने वाला है। ३ "निर्यात कण्ठलम्बितम्' अर्थात्-गले में माला की तरह जो मूत्र पहिना नाय वद निवीत जानना, विशेष निधी ताधिकरण में देखो।

२८ पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। "एष सोमो राजा देवानामन्नं यच्चन्द्रमा स एतां रात्रि क्षीयते तस्मिन् क्षीणे ददाति +". इस अग्रिम श्रुति से अमावास्या का ग्रहण करना । एवं च हर अमावस्या में न करने से प्रजापति की माज्ञा के भङ्ग जन्य प्रत्यवाय तथा पितरों के कोप से अनर्थ की प्राप्ति होने से यह अवश्य अनुष्ठेय है यह वोधन किया। यजुर्वेदीय तेत्तिरीय ब्राह्मण के प्रथमाष्टक में तृतीया- ध्याय के दशम अनुबाक में भी अर्थवाद रूप इतिहास से अमावास्यातिथि में पिण्डपितृयज्ञ का अनुष्ठान आवश्यक रूप से कहा है। "इन्द्रो टनं हत्वा, असुरान् परिभाव्य सोऽमा- वास्यां प्रत्यागच्छत् , ते पितरः पूर्वेधुरागच्छन् पितृन् यज्ञोऽगच्छत् , तं देवाः पुनरयाचन्त, तमेभ्यो न पुनरददुः, तेऽब्रुवन् वरं तृणामहै, अथ वः पुनर्दा- स्थामः, अस्मभ्यमेव पूर्वेयुः क्रियत इति १, तमेभ्यः पुनरददुः, तस्मारिपतृभ्यः पूर्वेयुः क्रियते, यत्पितृभ्यः पूर्वेयुः करोति पितृभ्य एव तद् यज्ञं निष्क्रीय यज- मानः प्रतनुते, सोमाय पितृपीताय स्वधा नम इत्याह" भाषाभावार्थ--जव इन्द्रदेव जी युद्ध द्वारा वृत्रासुर को +यश. २-३-४-७। यह साम राजा देवों का अन्न है जिस का द्वितीय नाम चन्द्रमा है सो यह चन्द्रमा इस अमावस्या को क्षीण हो जाता है, निप्त चन्द्रक्षय के दिन बाद पिण्डदान करना चाहिये, यह श्रुति का +. भाव है।

पिण्डपितृयज्ञमोगांसा। हनन कर औ असुरों को पराभव कर दर्शयाग के दिन अपने स्थान में आये थे तव उस से एक दिन पूर्व ही पित- रलोक वहां पर आन पहुंचे थे तब दर्शादिक यज्ञ भी पितरों को प्राप्त होते भये, तब पितरों के प्रति इन्द्रादि देवताओं ने यह कहा कि यह यज्ञ हमारे हैं सो आप हम को समर्पण करो तव पितरों ने उन को यज्ञ न समर्पण कर यह कहा कि प्रथम आप इस यज्ञ लेने के बदले में हम को कुछ वर- रूप उत्कोच प्रदान करो तब हम आप के प्रति यज्ञ का प्रत्यावर्तन कर देंगे-तव देवताओं ने कहा कि आप इस के वदले क्या चाहते हो तब पितरों ने कहा कि जिस दिन (शुक्लपक्ष की प्रतिपद् को) आप के नाम का दर्शयाग होता है उस से पूर्व दिन अमावास्या में प्रथम हमारे निमित्त याग होना चाहिये। तब देवताओं ने इस कथन को स्वीकार किया औ पितरों ने उन के प्रति यज्ञ का प्रत्यर्पण किया, तस्मात् पितृभ्यः पूर्वेयुः क्रियते इस कारण से ही अमावास्या के दिन पितृयाग किया जाता है। जिस हेतु से देवताओं ने मूल्य अर्पण कर पितरों से यज्ञ ग्रहण किया है इस हेतु से उस मूल्य के सधानेके लिये १ अमावास्या के दिन अन्वाधान कर शुलपतिपद के दिन दर्शयाग फा आरम्भ किया जाता है। १ उत्कोच नाम उस का है जिस को घूस वा रिस्वत कहते हैं।

सत. का.म.ना. ४.- पिण्ड पितृयज्ञमीमांसा प्रथम पितृयज्ञ का अनुष्ठानकर फिर दर्शयाग का यजमान अनुष्ठान करे नहीं तो प्रत्यवाय होगा यह श्रुति का भाव है। अमावास्यातिथि में भी किस काल में करे, इस आका- ङ्क्षा के होने पर कहा है कि- "अपराहे" इति, अर्थात्-अपराह काल में करे । “सवाऽपराह ददाति, पूर्वाहो वै देवानां मध्य- न्दिनो मनुष्याणाम् , अपराह्नः पितृणां तस्मादप- राहे ददाति'" इस शतपथ में, तथा "अपराह्नभाजो वै पितरः, तस्माद् अपराहे पितृयज्ञेन चरन्ति" पूर्वभाग म० २ सं० १, इस गोपथ श्रुति में भी अपराह्न काल में ही पितृयज्ञ के श्रारम्भ करने का उपदेश किया है। तहां दिन के समान तीन विभाग करने से जो तृतीय भाग है वह अपराह जानना । औ कोई एक तो दिनके समान दो भागोंमें से द्वितीय भाग को अपराह कहते हैं। १ अपगह में पितृपा करे क्योंकि देवों को भानने में पूर्याइ प्रिय है और पसरलो, मसल्द मियदे, भीटरचा मह पिपदै, इसमें अपरा में ही पिनरों को दे। २ अर्थात्-पितर अपराको सेवन करते हैं, इससे जागहमें पितृपक्ष करे। ३ तहां मथम फर्कोपाध्याय के कथनानमार अपराह्न का निर्वचन करते हैं [ तहां ] इत्यादि से ।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा।
औ कोई एक दिन के समान पांचभागों में से पञ्चम
भाग को अपराक कहते हैं-
औ कोई एक दिन के नवभाग करने से जो सप्तम
भाग है उस को अपराह कहते है।
औ (१) कोई एक तो दो २ घटिका के विभाग से रौद्र,
चैत्र, मैत्र, सावट, सावित्र, जयन्त, गान्धर्व कुतप, रोहिण,
विरञ्चि, विजय, नेत्रत, माहेन्द्र, वारुण, भट्ट, इन पन्द्रह
मुहूतों का दिनमान मान कर यह कहते है कि-जव दिन
का दो विभाग किया जाय तो अष्टम मुहूर्त से लेकर पश्चिम
सन्ध्या के प्रारम्भ पर्यन्त अपराह जानना,
नौजव दिन का तीन विभाग माना जाय तो एकादशमुहूर्त
से ले कर पश्चिमसन्ध्यापर्यन्त अपराह जानना, औ जब चार
विभाग किया जाय तो दशममुहूर्त के द्वितीयपाद के उत्तरार्द्ध से
ले कर द्वादश महूर्त के आद्यपाद के अवसान पर्य्यन्त अपराह्न
जानना औ पञ्चधाविभाग कियाजाय तो दशममुहूर्त से ले
कर द्वादशमुहूर्त के अवसान पर्य्यन्त अपराहकाल जानना.
सर्वथा ही तृतीयप्रहर पितृयज्ञ के प्रारम्भ का काल है
यह निर्विवाद है,
बहुत से निवन्धकार तो +
(१) चतुर्गचिन्तामणि में जो अपराह्न के लक्षण कहे हैं उन का उपन्यास करते
हैं (भी) इत्यादि से
+ चतुर्वर्गचिन्तामणि का श्राद्धखण्ड देखो।

, रायु. समाव. पिण्डपित्यज्ञमीयांसा। "कुं यत्र गोपतिर्गोभिः कास्र्नेन तपति क्षणे, स कालः कुतपो ज्ञेयः तत्र दत्तं महाफलम् "मुहूतत्सिप्तमादूर्व मुहूर्तान्नवमादधः स कालः कुतपो ज्ञेयः पितॄणां दत्तमक्षयम् "दिवसस्याप्टमे भागे मन्दो भवति भास्करैः स कालः कुतपो ज्ञेयः पितृणामन्नमक्षयम् " अन्हो मुहूर्ता विख्याता दश पञ्च च सर्वदा (४) तत्राष्टमो मुहूर्तो यः स कालः कुतपः स्मृतः मध्यान्हे सर्वदा यरमान्मन्दोभवति भास्करः तस्मादनन्तफलदस्तत्रारम्भो विशिष्यते" इत्यादि प्रमाणों से दिन का अष्टम अंश जो कुतप- नाम मुहूर्त है वही पितृयज्ञ के आरम्भ का काल है, यह कहते हैं"- १ (यत्र) जिस समय में (गोपतिः) सूर्य ( गोभिः) अपनी किरणों से (कुं) पृथिवी को (कार्नेन ) संपूर्ण रूप से व्याप्त हो कर ताना है सो काल कुतप जानना चाहिये, तिस समय पितरों के प्रति प्रदत्त महाफलवाला २ सप्तम मुहूर्त मे ऊपर भी नवम मुहूर्त से पूर्व जो पहूर्त है वह कृतप है, तिस समय पितरों के प्रति दिया हुया अक्षय होता है। २ जिस दिवस के अष्टम भाग में सूर्य तेज हो कर मन्दप्रकाशवाटा होता है वह काल कुतप जानना, इस काल में पितरों के मति दीया हुया अभ अक्षय होता है। ४ दिन के जो ५ पञ्चदश मुहूर्त है उन में से जो अष्टम मुर्त है यह कुतप कहा जाता है, जिस हेतु से बस मध्यान्हकाल में मूर्य मन्द होता है इस हेनु से अनन्तफल के देनेवाले भाव का भारम्भ उस काल में भंट है।

.
पिण्डपिठ्यज्ञमीमांसा।
मनुजी ने भी
"त्रीणि' श्राद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिला:"
इस वाक्य से कुतपकाल को श्रेष्ठ कहा है,
भी कोइ एक तो
"मध्यान्हः (३) खड्गपात्रं च तथा नेपालकंवलः,
रूप्यं दर्भास्तिला गावो दौहित्रश्चाष्टमो मतः
पापं कुत्सितमित्याहुस्तस्य सन्तापकारिणः
अष्टावेते यतस्तस्मात्कुतपा इति विश्रुताः"
इस वचन से मध्यान्ह नादि आठ पदार्थों का नाम
कुतप मानते हैं।
इन सर्व वचनों का सार यह है कि मध्यान्ह के अवसा-
नकाल से लेकर सायान्ह से पूर्व पूर्व ही पितृयज्ञ के अनु.
धान का काल है।
इति आश्वलायनीय श्रौतथून द्वितीयाध्याये पष्ठी कण्डिकायां प्रथमसूत्र व्याख्यानम्
इस प्रकार पितृ यज्ञ का काल निरुपण कर अव उस
का अनुष्ठान प्रकार कहते हैं-
१ (दौहित ) स्वकीय कन्या का पुत्र तथा फतर औ तिल यह तीन
पदार्थ भाद में पवित्र हैं, अ० ३ श्लो० २३५ ।
२ मिताक्षराकार विज्ञानेश्वर आदि निवन्धकार ।
३ मध्यान्ह, सद्गपात्र, नेपालकंबल, रूपा, दर्भ, तिल, गाय, दौहित्र,
इन आगे का नाम कुत्ता है, क्योंकि कु नाम कुत्सित पाप का है भी यह आठो
पाप को संताप करने वाले हैं अर्थात् यह आगे पाप के नाशक है, इस से
इन का नाम कुतप है।
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A पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। सू० दक्षिणाग्नेरेकोल्मुकं प्रागदक्षिणाप्रणयेत् । "ये रूपाणि" इति, २-६-२-- अन्वयार्थः-दक्षिणाग्नेः सकाशाद् ( एकोल्मकम् ) एकतः प्रदीप्तमुल्कं गृहीत्वा तस्मादेव दक्षिणाग्नेः प्राग्द- क्षिणस्यां दिशि स्थापयेत् (ये रूपाणि ) इति मन्त्रेण, भापा–दक्षिणाग्नि से एक उल्मुक को ग्रहण कर फिर "ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमानाऽसुराः सन्तः स्वधया चरन्ति, परा पुरो निपूरोये भरन्त्यनिष्ठां लोकान् प्रणु- दात्यस्माद् इस मंत्र को पढ़कर उस दक्षिणाग्निके (की) पूर्व दक्षिण दिशा में (प्रणयेत ) स्थापन करे, उल्मुक स्थापन क्यों किया जाता है इस का कारण शतपथ में निरूपण किया है-तथाहि - २-३ ४- स यदानिधायोल्मुकमथैतत् पितृभ्यो दद्यादसुर- रक्षसानि हेपामेतद् विमथ्नीरस्तथो हेतत्पितॄणाम- यशु.१.१.१. १ एक और (तरफ) अमि से प्रज्वलित काष्ट को उल्पक कहते हैं। २(येऽसुराः) जो असुर (रूपाणि मतिश्चमानाः सन्तः) अपने रूप को छिपा कर पितरों के समान रूप को धारण करते हुये ( स्वभया) पितृभन्न के निमित्त (चान्ति) इस पितृया के स्थान में विचर रहे हैं, जो (परा पुरः) स्थूल शरीर (निपुरः) निकष्टपूरी अर्यात् , सूक्ष्म शरीर को (भरन्ति) धारण पर है (नान) उन अमुर्गे को या उल्मुकम्र अमि (अस्मालो- कान्) इम पितृयज्ञस्थान से (मण्टाति ) दुर करें तथा

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा ।
सुररक्षसानि न विमन्नते तस्मात्परस्ताद् उल्मुकं नि
दधाति १४ स निदधाति “ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना
असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति ,, इति
अर्थात्-यदि उल्मुक को न स्थापन कर पितरों के
प्रति पिण्ड प्रदान किया जाय गा तो असुर और राक्षस
उन्मथन करें गे इस से असुर इस यज्ञ के भागी मत होंय
किन्तु यहां से चले जाय इस लिये
उल्मुक
को स्थापन करे।
सू० सर्वकर्माणि तांदिशम् २-६-३
। अन्वय-उल्मकस्थापनवद् इतराण्यपि सर्वाणि कर्माणि
तां प्रारदक्षिणां दिशम्, अभिमुखानि कर्तव्यानि ।
भाषा--जिस दक्षिणदिशा की तरफ उल्मुक स्थापन
किया है उसी दिशा के अभिमुख ही और सब कर्म करना
चाहिये।
इस दिशा की ओर क्यों करे इस में कारण शतपथ में
कहा है यथा-
एतस्यां हि दिशि पितृलोकस्य द्वारम्
" दक्षिणाप्रवणे कुर्यादित्याहुः । दक्षिणाप्रवणों
वे पितृलोकः"
अर्थात्-दक्षिणदिशा के तरफ पितृलोक का द्वार है
इस से दक्षिणदिशा के अभिमुख ही पिण्डदानादि करना
चाहिये।
दक्षिण की और निम्न स्थान में पितृयज्ञ करे ऐसे तत्त्ववेता कहते हैं,
क्योंकि इसी ओर पितृलोक है ।
"
"
शतपथ को १३५.८वा..

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा । -सू. उपसमाधायौभौ परिस्तीर्य दक्षिणाग्नेः प्रागुदक प्रत्यगुदगवैकैकशः पानाणि सादये च् चरुस्थालि* शूर्पस्फ्योलूखल मुशलनुवध्रुवकृष्णाजिनसकृदाच्छिन्ने- ध्ममेक्षणकमण्डलून, २-६-४- एकेनैव प्रयत्लेन छिन्नाः कुशा-सकदाच्छिन्नाः कुशाः, अ०चरुस्थाली-वाशब्दयोश्चान्दसंहस्वत्वं ज्ञेयम्, निगदव्या- ख्यात मितरत् । भापा--(उभौ) श्रौत वा स्मार्त अग्नि को, (उपसमाधाय) स्थान परिप्कारपूर्वक अभिमुख स्थापन कर, ( परिस्तीर्य ) चारो ओर(१) और चार २ कुशों से आच्छादित कर फिर । • (म् ) पुरोडाशादिसंबन्धिनां ब्रह्मादीनां निस्तुपीकरणोपयोगि पापम् , ( स्फ्यः ) ग्वदिरका निमितोऽरविपरिमितो दीपश्चतुरंगुलपरिमित विस्तारस खड्गसदशाकारवान् पाऋषिशेपः, (उलूखलम् ) पलाश कानिर्मितं द्वादशांगुलपरिमितीच्यायमुपरितना भागेविलयुक्त प्रवादिकण्डमोपयोगिमात्रम् (मुसलम् ) उलूपदाधिगणा- पाम सदिरकाएनिमितमुयमननिपातनेन कण्डनोपयोगि, ( सुबः) खदिरकाप्ठ- निमितोऽनिमात्रदीर्घः अग्रभागेऽङ्गठपर्वमाप्रवर्तुलपिळयुक्त आग्यहोमादीक- रणभूतः "सरत्याज्यादिद्रव्यमस्माद " इतिव्युत्पत्तिसिद्धः पात्रविशेष: (भुवा) मुहूसमानाका चिकनकानिर्मिता होमायर्थ स्रवण रयमाणस्याज्यस्याधारभूता यागावसानपर्यन्तं बंद्यां विद्यमानत्वेन स्थिम्भूता "धुवति अपचलिता भवति" इत्यन्वर्थः पात्रविदोपः (कृष्णाजिनम् ) श्रीसाघवयातकाले उलूखलस्यायः स्थापनोपयोग कृष्णमृगचर्म, (सकदाच्छिन्नाः) एकनैव प्रयनोत्पाटिता: फुगाः, ( इध्म ) होमोपयोगि पञ्चदशसरुपा काष्टम् ( पेक्षणम् ) अश्वत्यकाष्ठ-, निमित्तम् अरनिपरिमितम् अग्रभागे चतुरगुल चतुरसफलकयुतं, फलपारशिष्टभा- पदण्ड यतं पानम् , ( कमण्डलु) जलाधारः पात्रविशेषः मसिद्ध एव । (1) पोदशाभिर्दभैरः प्राच्यादिप परिस्तृतिः" इतिवचनार-पूर्व ,

१७
पिण्डपितृयज्ञमीमांसा ।
दक्षिणाग्नि के पूर्व-उत्तर वा पश्चिम उत्तर की ओर
एक एक पात्र स्थापन करे, वह पात्र कौन है, इस पर
कहते हैं " चरुस्थाली” इति, अर्थात्-चरु बनाने के
लिये स्थाली, (शूर्प ) बांस कर निर्मित ब्रीहि आदि के
वितुषी करने का पात्र (स्फ्य ) खदिरकाष्टनिर्मित भी
अरनिपरिमितदीर्घ तथा चार अगुल परिमित विस्तार
वाला खड्गसदृश पात्र, ( उलूखल ) पलाशकाष्टनिर्मित तथा
द्वादशअंगुलपरिमित उचायीवाला तथा आधे भाग में ऊपर
जा कर विलयुक्त व्रीहि आदि के कण्डन का उपयोगी पात्र
( मुशल ) खदिरकाप्टनिर्मित औ उलुखल के अर्द्धभाग से
त्रिगुणविस्तारवाला व्रीहि के कण्डन करने वाला दण्डविशेष
(ब) खदिरकाष्टनिर्मित अरनिमात्र दीर्घ औ अग्रभाग में
अंगुष्ट के पर्वमात्र परिमाणवाला वर्तुलविल से युक्त घृतके
होम का साधनभूत पात्रविशेष (ध्रुवा) विकतनामक
वृक्षसंवन्धिकाष्टनिर्मित तथा होमार्थस्थापित घृत का आधार
विशेप ( कृष्णाजिन ) ब्रीहि के कूटने काल में उलूखल के
तले स्थापन का उपयोगी कृष्णमृग का चर्म, ( सकृदाच्छिन्न)
एक व्यापार से ही उत्पाटन किये हुये कुशे ( इध्म
माच्या प्रथममेखलोपरि चतुभिर्दर्भस्तयैव दक्षिणस्यां प्रतीच्यामुदीच्या च
ऋपण स्तरणम् , परिस्तरणपदार्थः।
१ एक ही यन से ब्रीही छेदन करे इस में कारण तैतिरीय ब्राह्मण में
कहा है यथा -"सकदाच्छिन्नं वर्भिवति, सकृदिव हि पितरः" तै० वा.
)
अर्थात् --पिण्डों के अधोभाग में जो कुश विछायी जाती है वह एक ही

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा । पंचदशसंख्यक काष्ट (मेक्षण ) अश्वत्थकाष्टनिर्मित भरक्षि मात्रपरिमाणवाला अग्रभाग में चारअङ्गुल चतुष्कोणफलक- युक्त जो दर्वीसदृशपात्र वह मेक्षण- जानना, कमण्डलु प्रसिद्ध ही है, इन पात्रों को दक्षिणाग्नि के उत्तर ओर स्थापन करे। सू० दक्षिणतोऽनिष्टमारुह्य चरुस्थाली वीहीणां पूरणं निमजेद-२-६-५- अन्वय०-(अग्निष्टं ) शकटं दक्षिणत आरुह्य, तत्रैव शूचे स्थाली निधाय व्रीहिभिरापूरयेद् तां पूर्णां ( निमृज्याद् ) यथोपरितनाद् विलदेशाच्छूपोंपरि पतेयुस्तथाकुर्याद् । भाषा-दक्षिणाग्नि से ईपत् दक्षिण की ओर स्थित जो बीहिपूरित शकट है तिस (अग्निष्ठं ) शकट को (दक्षि- णत आरुह्य) दक्षिण की तरफ से आरोहण कर तिस शकट के मध्य में शूर्प रख कर फिर शूर्प के वीच में (चरुस्थाली) चरु बनाने वाली स्थाली को स्थापन कर ब्रीहि से पूरण करे फिर (ब्रीहीण पूरणं ) ब्रीहिकर पूरित उस स्थाली को (निमजेद् ) शोधन करे अर्थात् इस प्रकार उस स्थाली को दोनों हस्तों से हिलोरा दे जिस में स्थाली के वरावर ब्रीहि उस में रहजाय और शेय उस शर्प में गिर पड़े। पापार से जितनी छेदन फियी जाय उतनी ही लेनी चाहियं कुछ वारंवार दात्र का ब्रापार न करें क्योंकि “सदियहि पितरः" अर्थात् -जिस हेतु से पितरलोक एक ही बार माण से पितृभाव को माप्त भये हैं कुछ पितृत्त्व के लिये वारंवार नही मरे हैं इस हेतु से वारंवार छेदन न करे, इसी प्रकार शत्ताय में कहा है।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा ।
सू० परिशन्नान् निदध्याद्-२-६-६
अन्वयार्थः-(परिशन्नान् ) स्थाल्यास्यदेशाच्छूपर्पोपरि ये
पतितास्तान् शकटे निदध्यात्-
भाषा-(परिशन्नान्) हिलोरा देने से स्थाली के मुख
से जो धान्य शूर्प में गिरे होंय उन ब्रीहियोंको (निदध्याद् )
फिर शकट में स्थापन करे ।
सू० कृष्णाजिन उलूखलं कृत्वेतरान्
पत्नयवहन्यादविवेचम् २-६-७
अ० (इतरान्) व्रीहिन् स्थाल्यन्तर्गतान्, (अविवेचम् )
अविविच्य, अविच्य हन्यात् , सरलार्थमन्यत् ।
भाषा-कृष्णमृग के चर्म के ऊपर उलूखल को स्थापन
फर ( इतरान् ) स्थालीअन्तर्गत ब्रीहियों को पत्नी अवहनन
फरे अर्थात्-हिलोरा देने से जो स्थाली में शेष धान्य रह गये
थे उन को उलूखल में गेरकर कूटे, परन्तु हनन करने से अ.
नन्तर (अविवेचम् ) धान्यों का विवेक मत करे।
अर्थात्-शूर्प में गेर कर दो तीन बार ही उन धानों
को फटकारे कुछ तुप सहित धान्यों से तुपरहितों को
पृथक करने के लिये अमनीया मत करे ।
सू० अवहतान् + सकृत्प्रक्षाल्य दक्षिणाग्नो
अपयेद्-२-६-८
भाषा-(अवहतान् ) कूटे हुये उन धान्यों को (सकृत्)
+ भवहतेषु अवहतवचनं शूर्पेण पुनः पुनर्निप्नुपीकरणरूपफलीकरणनि-
हत्यर्थम्,

.१५८ पिण्डपितृयज्ञमीमांसा । एकवार (प्रक्षाल्य ) प्रक्षालन कर, (१) दक्षिणाग्नि में (भपयेत् ) पकावै। स्० अर्वागतिप्रणीतात् स्फ्येन लेखामुल्लिखेद् "अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषदः” इति २-६-९ भाषा-"अपहता* असुरा रक्षांसि वेदिषदः" इस मंत्र को पढ़ कर स्फ्य से एक रेखा का उल्लेख करे, कौन स्थान में रेखा करे, इस पर कहा है कि (अर्वागतिप्रणीता) अर्थात्-दक्षिणाग्नि भौ अतिप्रणीता के मध्य में रेखा निकासे। सू० तामभ्युक्ष्य सकृदाच्छिन्ने रेवस्तीर्य आसा दयेदभिघार्य स्थालीपाकमाज्यं सर्पिरनुत्पूतं नवनीतं ध्रुवायामाज्यं कृत्वा दक्षिणतः २-६ १० अन्वय०-तां लेखामभ्युक्ष्य सकृदाच्छिन्नेश्चावस्तीर्य ध्रुवा- यामाज्यं कृत्वा दक्षिणाग्नेर्दक्षिणतः निधाय, तेन आज्येन स्थालीपाकमभिधार्य दक्षिणाग्नेः पश्चादासादयेद्, याद नव- नीतमाज्यकाव्यं स्यात् तदास्याग्निसंयोगेन विलापनमानं कृत्वा अन्यस्मिन् पात्र आनीय पवित्राभ्यां तूप्णीमुत्पूय ततो ध्रुवायां कृत्वा तेनाभिघार्यम्, द्वितीयाज्यग्रहणस्येदं प्रयोजनं १ अर्थात् --अनेस्चार प्रक्षालन मत करे । * (वैदिपदः) प्रछन्नरूपेण वेघांस्थिता ये असुगस्तै ( अपहताः) अप. गता भवन्तु तथा रसांस्यपि (अपहतानि) भपगतानि भवन्तु । अर्यात् --वेदि में स्थित जो अमुर भी राक्षस हैं वह यहां से अपगव रॉय अर्थात् यहां से दूर गमन करें।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा
११
यत्पात्रान्तरस्थमुत्पूय पश्चाद्धृवायां ग्रहणमित्येवमर्थम्, सर्पिः=
पक्कं धृतं, नवनीतम्-अपक्वम् ।
भाषा--(तामभ्युक्ष्य) तिस रेखा को जल से प्रोक्षण
कर फिर (सकृदाच्छिन्नेः) एक प्रयल से उत्पाटन हुये कुशों
से (अवस्तीर्य) उस रेखा को आच्छादित कर फिर (ध्रुवा-
यामाज्यंकृत्वा ध्रुवानामक पात्र में घृत कोस्थापन कर औ(दक्षि-
णतः) दक्षिणाग्नि की दक्षिण और ध्रुवा को रख कर तिस
धृत से (स्थाली पाकम्) स्थाली में पके हुये चरु को (अभि-
चार्य) अभिधारण ७ कर (आसादयेद् ) दक्षिणाग्नि की
पश्चिम तरफ यजमान स्थित हो जाय, यदि घृत के स्थान
में (भनुत्सूतं नवनीत) गरम कर वस्न से न पूत हुवा माखन
होय तो उस को ( सर्पिः) अन्य पात्र में गरम कर पूतकर
फिर ध्रुवा में गेर कर उस से अभिधारण करे ।
सू. आञ्जनाभ्यञ्जनकशिपूपवर्हणानि: २-६-१०
अन्वया० एतानि दक्षिणामेर्दक्षिणतो निदध्याद्,
भापा--(आक्षन) कज्जल, (अभ्यञ्जन) अवटन, (कशिपु)
मंचस्थानापन्न रूईदार गदेला, ( उपवर्हण ) सिरहाना, इन
को भी वहां पर स्थापन करे।
*क्षरघृतेन सेकोऽभिधारणम् , गरम घृत स सेचन करने का नाम
भभिधारण है।
+भाईपद अज्यतेऽनेनेति व्युत्पत्या कजळादि आञ्जन--पदेनोच्यते,
अभितः अझं सर्वमज्यते येनेति व्युत्पत्याऽभ्यगसाधनं द्रव्यमभ्यञ्जनमित्युच्यत,
कार्यासपूर्णमासनं मृदुतरं कशिपुपदवाच्यम् , कार्पासपूर्ण शिरसोऽधस्तान्
शयनकाले यद ध्रियते तदुपपईणपदवाच्यम् ।
१ भर्थात्-जहां पर दर्भ के ऊपर स्थालीपाक स्थापन किया गया है
उस के समीप इन को भी स्थापन करे।

१२ विण्डपितृयामीमांसा सू० प्राचीनावीतीध्ममुपसमाधाय मेक्षणेनादाया- वदानसंपदा जुहुयात् 'सोमायपितमते स्वधा नमोऽन्नये फव्यवाहनाय स्वधानम' इति, २-६-१२- अन्वया० इध्यम्-इति जातावेकवचनम्, होमार्थ पञ्च- दश संख्यकानि काष्टानि उपसमाधाय, मेक्षणेन चरुमादाय अवदानसंपदो जुहयादित्यर्थः, नात्र स्वाहाकारः प्रयोक्तव्यः स्वधानमः शब्दस्यैव प्रदानार्थवेनोपादानाद्, स्पष्टं चेतत् तैत्तिरीयघ्राह्मणे-१३।१०।२ भाषा-प्राचीनावीती हो+ कर ( इध्ममुपसमाधाय) होम के लिये १५ काष्टों को अभिमुख अग्नि में स्थापन कर फिर मेक्षण से चरु को (शादाय) ग्रहण कर (अवदानसंपदा) होम परिमितभाग के खंडनादिद्वारों ( जुहुयाद् ) अग्नि में हवन करे। किन मंत्रों से हवन करे, इस पर कहा है कि "सोमाय पितृमते स्वधा नमः अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नमः" इति। १ अवदानसंपत्% उपस्तरण, द्विावदान, इविपोऽभिधारणं, मत्यभिधा. रणं च, तयाऽवदानसंपदा जुहुयादित्वर्यः। + २६ इस पृष्ट के टिप्पण में देखो। २ उपस्तरणपूर्वक हवि का अभिधारण कर फिर होमपरिमित भाग को खंड-काट कर अभिधारण कर होम करें। न पितृसंयुक सोमदेव के प्रति नमस्कार पूर्वक यह पित्रुदेश्यक इवि प्रदत्त हो, ततिरीयब्राह्मण में तो (पिपीताय ) यह पाठ है, पितरदेवों कर पीत जो साम है, यह उस का अर्थ है, (कव्यं पितृदेवत्वं चिः , तद् वा. - +

,
पिण्डपितृयज्ञमीमांसा
मंत्रों के मध्य में जो (स्वधानमः) शब्द है वह पितरों के प्रति
हविप्रदानार्थ है, इसी से ही यहां पर स्वाहाकार के प्रयोग की
आवश्यकता नहीं है।
इस प्रकार तैतिरीय ब्राह्मणोक्त क्रम से होम का विधान
कर इदानीं यजुर्वेदीयमंत्रों के पाठक्रम से हवन विधान
करते हुये पक्षान्तर कहते हैं।
सू० स्वाहाकारेण वा आग्नं पूर्व यज्ञोपवीती २-६:१३'.
अन्वया० (वा) अथवा यज्ञोपवीती भूत्वा स्वधानमः
शब्दस्य स्थाने स्वाहाकारं कृत्वा पूर्व अग्निं जुहुयाद्, 'अग्नये
कव्यवाहनाय स्वाहा, इति मंत्रं पूर्वमुचार्य जुहुयादित्यर्थः ।
भाषा-(वा) अथवा यज्ञोपत्रीती हो कर (स्वाहाकारेण)
स्वधानमः शब्द के स्थान में स्वाहा-इस पद का प्रयोग कर
(पूर्व ) पहिले ( अग्निम् ) अग्नि को उद्देश कर होम करे
अर्थात् "अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा" ® इसमंत्र को प्रथम
उच्चारण कर होम करे।
इस + पक्ष में एक तो मंत्रों का विपर्यायी एक स्वधा-
नमः शब्द के स्थान में स्वाहा शब्द का प्रयोग भी एक
यज्ञोपवीतित्व, यह तीन प्रकार का विशेष है।
सोति कन्यवाहनः तस्मै, अमये ) अर्थात्-पितरोददेश्यक अन्नए काव्य को
प्राप्त कराने वाले अभिदेव के प्रति यह हवि पदस हो।
१ यहां पर "तिसभाहती होति" इस श्रुति के अनुमार
द्विरस्वते पितृमते स्वाहा" तृतीय मंत को उच्चारण कर एक आहति और
भी करनी, यह सब आगे शांख्यायनादि सूत्रों में स्पष्ट है । * यमु० अ०२२९
भूति तथा श्रोत सूत्रों के प्रमाण से दोनों पक्ष समीचीन जानने ।
२ अर्थात्-"अग्नये कन्यवाहनाय". इस का प्रयगोचारण औ (सोमाय)
इस का अनन्तर उच्चारण यह विपर्यय है।
यमाया-

22
,
..
मण्डपितृयज्ञमीमांसा ।
सू० मेक्षणमनुप्रहृत्य प्राचीनावीती लेखां त्रिरुदफे-
नोपनिनयेत् “शुन्धन्तां पितरः, शुन्धन्तां पिता-
महाः, शुन्धन्तां प्रपितामहाः, इति-२-६१४
अ.प्राचीनावीतीग्रहणं स्वाहाकारपक्षेमेक्षणप्रहरणोत्तर
कालमपि प्राचीनावीतित्वप्रापणार्थ, उभयस्मिन् पक्षेऽपि
मेक्षणमभावनुप्रहर्तव्यमेव, लेखायां निभिर्मपिण्डस्थानेषु वा-
रत्रयमुदकं निनयेत् ।
भाषा-(मेक्षणम् ) जिस मेक्षण से होम किया था
तिस मेक्षण को ( अनुप्रहृत्य ) अग्नि में फेंक करे प्राचीना-
वीती हो कर (लेखाम् ) पूर्वोक्तरेखा को ( त्रिः) तीन वार
(उदकेन) जल कर (उपनिनयेत्) शोधन करे।
अर्थात्-शुन्धन्तां पितरः इस मंत्र को पढ़ कर रेखा
के
मूल
में जल गेरे औ (शुन्धन्तां पितामहाः) इस मंत्र को
पढ़ कर रेखा के मध्य में जल गिरावे ओ (शुन्धन्तां प्रपिता-
महाः) इस मंत्र को पढ़कर रेखा के अग्रभाग में जल गिरावे'।
सू० तस्यां पिण्डान निटणीयात्पराचीनपाणिः
पित्रे पितामहाय प्रपितामहाय “ एतत्तेऽसौ ये च
त्वामवानु" इति २-६---१५-
१ पूर्व सूत्र में कथित जो स्वहाकार करन पक्ष है तिम पक्ष में भी मेक्षण
को अग्नि में फेंककर फिर प्राचीनापीती हो जाय इस के वोपनार्थ
माचीनावीती पद का पुन: उपादान किया है।
२ "तूप्णी पक्षणपादधाति" इस तेचिरीय ब्राह्मण के पचन से मेक्षण के
होगकाल में किसी मंत्र का उच्चारण न करे यह भी जानो।
३ वक्ष्यमाण कात्यायन औतसूत्र से रेखा के ऊपर दर्भ भी बिछाना।

पिण्डपितृपक्षमीमांसा । अन्वया० तस्याम्-लेखायाम्, निपणीयाद्-दद्याद्, निपरणं चात्र पित्र्येणेव तीर्थेनानुष्ठेयम् अत एवोत्तानपाणिरित्यर्थक पराचीनपाणिरित्युपात्तम्-असावित्यस्य स्थाने संबुळ्यन्तानि पित्रादीनां नामानि गृहीयाद्- भापा-(पराचीनपाणि) उत्तानहस्तवाला यजमान (तस्याम् ) तिस लेखा में (पिण्डान् ) होमशेषभूत चरुनि- मित विल्वफलतुल्य गोलाकार अन्न को (निपणीयाद ) पितृतीर्थ से स्थापन करे, इन पिण्डों का संप्रदान कौन है इस पर कहा है कि (पित्र-पितामहाय-प्रपितामहाय)-किस मंत्र को उच्चारण कर प्रदान करे इस आकांक्षा के होने पर कहा है कि " एतत्तेऽसौयेचत्वामत्रानु" इति, अर्थात्-(एतत् ते पितर्देवशर्मन्ये च त्वामत्रानु) इस मन्त्र को उच्चारण कर रेखा के मूल में पिता के लिये प्रथम पिण्ड स्थापन करे फिर पिता इस पद के स्थान में पिता- मह शब्द उच्चारण कर रेखा के मध्य भाग में प्रथमपिण्ड से आग्नेय कोण में पितामह के लिये द्वितीय पिण्ड स्थापन करे, फिर प्रपितामह पद का उच्चारण कर रेखा के अग्रभाग १ जर पितृतीर्थ से पिण्ड का स्थापन किया जायगा तनी हस्त उत्तान होता है इस से उतान हस्त कथन से पितृतीर्थ का लाभ जानना, अगष्ट औ प्रदेशिनी के अन्तराल का नाम पित्तीर्थ है। २ जिस के प्रति दान किया जाय वह दान का संमदान है। ३ हे देवदत्तशर्मन् पितः (एतत्) यह पिण्ड (त) आप के अर्थ में स्थापन करता हूं, औ ६ पिता (ये च) जो अन्य (वामन) आप के अनुयायी लेपभुक हैं उन के प्रति भी यही स्थापन करता हूं।

१४
डिपितृयज्ञमीमांसा।
सू० मेक्षणमनुप्रहत्य प्राचीनावीती लेखां त्रिरुदफे-
नोपनिनयेत् “शुन्धन्तां पितरः, शुन्धन्तां पिता-
महाः, शुन्धन्तां प्रपितामहाः, इति-२-६१४
अ.प्राचीनावीतीग्रहणं स्वाहाकारपक्षेमेक्षणप्रहरणोत्तर
कालमपि प्राचीनावीतित्वप्रापणार्थ, उभयस्मिन् पक्षेपि
मेक्षणमग्नावनुप्रहर्तव्यमेव, लेखायांत्रिभित्रैपिण्डस्थानेषु वा-
रत्रयमुदकं निनयेद् ।
भाषा-(मेक्षणम् ) जिस मेक्षण से होम किया था
तिस मेक्षण को ( अनुप्रहृत्य ) अग्नि में फेंक कर प्राचीना-
वीती हो कर (लेखाम् ) पूर्वोक्तरेखा को (त्रिः) तीन वार
(उदकेन) जल कर (उपनिनयेत्) शोधन करे।
अर्थात्-शुन्धन्तां पितरः इस मंत्र को पढ़ कर रेखा
के मूल में जल गेरे औ (शुन्धन्तां पितामहाः) इस मंत्र को
पढ़ कर रेखा के मध्य में जल गिरावे औ (शुन्धन्तां प्रपिता-
महाः) इस मंत्र को पढ़कर रेखा के अमभाग में जल गिरावे।
सू० तस्यां पिण्डान् निटणीयात्पराचीनपाणिः
पित्रे पितामहाय प्रपितामहाय " एतत्तेऽसौ ये च
त्वामत्रानु" इति २-६-१५-
१ पूर्व सूत्र में कथित जो स्वहाकार करन पक्ष है निस पक्ष में भी मेक्षण
को अग्नि में फेंककर फिर प्राचीनावीती हो जाय इस के बोधनार्य सूत्र में
भानीनावीती पद का पुन: उपादान किया है
२ "तूष्णीं मैक्षणमादधाति" इस तैत्तिरीय ब्राह्मण के पचन से मेक्षण के
होगकाल में किसी मंत्र का उच्चारण न करे यह भी जानो।
३ वक्ष्यमाण कात्यायन भौतसूत्र से रेखा के ऊपर दर्भ भी बिछाना ।
--

४५
पिण्डपितृपक्षमीमांसा।
अन्वया० तस्याम् लेखायाम्, निपणीयाद्-दयाद्, निपरणं
चात्र पित्र्येणैव तीर्थेनानुष्टेयम् अत एवोत्तानपाणिरित्यर्थक
पराचीनपाणिरित्युपातम्-असावित्यस्य स्थाने संबुद्ध्यन्तानि
पित्रादीनां नामानि गृह्णीयाद्--
भाषा-(पराचीनपाणि) उत्तानहस्तवाला यजमान
(तस्याम् ) तिस लेखा में (पिण्डान् ) होमशेपभूत चरुनि-
मित विल्वफलतुल्य गोलाकार अन्न को (निपूणीयाइ )
पितृतीर्थ से स्थापन करे, इन पिण्डों का संप्रदान कौन है
इस पर कहा है कि ( पित्रे-पितामहाय-प्रपितामहाय)-किस
मंत्र को उच्चारण कर प्रदान करे इस आकांक्षा के होने पर
कहा है कि " एतत्तेऽसौयेचत्वामत्रानु” इति,
अर्थात्-(एतत् ते पितर्देवशर्मन्ये चत्वामत्रान) इस
मन्त्र को उच्चारण कर रेखा के मूल में पिता के लिये प्रथम
पिण्ड स्थापन करे फिर पिता इस पद के स्थान में पिता-
मह शब्द उच्चारण कर रेखा के मध्य भाग में प्रथमपिण्ड
से आग्नेय कोण में पितामह के लिये द्वितीय पिण्ड स्थापन
करे, फिर प्रपितामह पद का उच्चारण कर रेखा के अयभाग
१ जब पितृतीर्थ से पिण्ड का स्थापन किया जायगा सवी स्त उत्तान
होता है इस से उत्तान हस्त कथन से पितृतीर्थ का लाभ जानना, अगष्ट औ
भदेशिनी के अन्तराल का नाम पितृतीर्थ है ।
२ जिस के प्रति दान किया जाय वह दान का संभदान है।
३ हे देवदत्तशर्मन् पितः (एतत्) यह पिण्ड (ते) आप के अर्थ में स्थापन
करता हूं, औ ह पितः (ये च) जो अन्य (त्वामन) आप के अनुयायी केपभुक
हैं उन के मति भी यही स्थापन करता हूं।
।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। में द्वितीय पिण्ड से आग्नेय कोण में प्रपितामह के लिये तृतीय पिण्ड स्थापन करे । सू० तस्मै तस्मै य एषां प्रेताःस्युरिति गाणगारिः प्रत्यक्षमितरानर्चयेत् तदर्थत्वाद् २-६-१६ अन्वया० एपाम्-पित्रादीनां मध्ये ये प्रेताः स्युः तस्मैर पिण्डदानस्, इतरान् जीवतः प्रत्यक्षमर्चयेद्, इतिगाणगारेम- तम्, तत्र हेतुः तदर्थवाद-कर्मणः पितृप्रीत्यर्थत्वादित्यर्थः । भाषा-(एषाम्) इन पितृ आदि तीनों के मध्य में से (ये प्रेता स्युः) जो भृत हैं (तमे) तिनर के प्रति पिण्डदान करे ओ (इतरान्) अन्य जीवत् पितरों को (प्रत्यक्षम्) साक्षात् (अर्चयेद् ) पूजन करे, क्योंकि (तदर्थत्वाद् ) इस कर्म को पितरों की प्रीति के अर्थ होने से, यह गाणगारिनामक नाचाय्यं का मत है। (मनुजीने भी श०३ श्लो०२२०में यह पक्ष अनुमोदित किया है) सू० निएणीयादिति तोल्वलिः क्रियागु- णत्वाद् २--६--१७. सर्वेभ्य एव पिण्डदान से जीवित्पुरपी की तृप्ति का असंभव होने से सर के प्रति पिण्ड प्रदान न करे किन्तु मा पितृ भादियों में से मृत हैं उन के प्रति पिण्डदान करे औ जीवतों के प्रनि साक्षान् भांजन प्रदान कारे । "भियगाणे मु पितारे पूर्वपा मंच निषेद , विषवद् वाऽपि तं श्रादे स्वर पितरमागद " अर्थात्-यदि श्राद्धरा का पिता जीवत् हो तो पिता माह मपितामह को ही पिण्डदान करे भी उन्ही के नाम से ब्राह्मणों को भोजन करावे जीवत् पिता के नाम से कुछ न करे, भश्वा ब्राह्मणों की तरह जीवपिता को भी प्रत्यक्ष भोजन करावे ।

पिण्डरितृशयममिांसा । अन्वया० सर्वेभ्यः मृतेभ्यो जीवद्भ्यश्च पित्रादिभ्यस्त्रि- भ्यो, निपृणीया-पिण्डान्येव दद्याद्, क्रियायामुदेशकारकवे न पितृणां गुणभूतत्वाद्, न तेपां प्रीति, शास्त्रतो लोकतो वा ऽवगम्यते, इति तौल्बलिमन्यते । भापा-(सर्वेभ्यएव ) पितृआदिक तीनों में जो मृत हैं औ जो जीवत् हैं उन सब के प्रति ही (निपूणीयाद् पिण्डनदान करे क्योंकि (क्रियागुणत्वाद् ) पिण्डदान रुप क्रिया में पितृ आदि को गुणभृत होने से, यह तौल्वलि आचार्य का मत है। सू० अपि जीवान्त आ त्रिभ्यः प्रेतेभ्य एव निएणी. यादिति गौतमः क्रिया ह्यर्थकारिता--२-६--१८ अन्वया० प्रोदिमध्यान्त शब्दैःपितृ-पितामहप्रपिता- महा उध्यन्ते, जीयोऽन्तो यस्य स जीवान्त, एवं जीवमध्यः जीवादिः जीवसव', नयाणामेकस्मिन् द्वयोः वा सर्वेषु जीवत्सु यावदर्थं परान् पितॄन् गृहीत्वा प्रेतेभ्यस्त्रिभ्यो दद्याद् हित्यत इयं क्रिया मरणपदार्थप्रवृता, इति गौतमो मन्यते । भाषा-(जीवान्तः ) जिस का अन्न का अर्थात् प्रपि- तामह जीवना हो अथवा जिस का आदि पिता-जीवता हो १ कुछ जीवत् की वृति अपेक्षित नहीं है किन्तु विधिपूर्वक क्रिया की पूर्ति, एव च पितृ आदि तीनों में से चाहे कोई जीवत् हो चाहे मृत हो सप के प्रति पिण्डपदान करे प्रत्यक्ष नहीं। २ अन्तशब्द आदि मध्ययोरुरलक्षणं तदेवाह"आदिमध्यान्त"इत्यादि ना। ३ अन्त नाग भन्तले प्रपितामह का है, अन्त शब्द को उपलक्षण जान- कर आदि-मध्य का भी ग्रहण कर लेना इसी से कहा है (अथवा) इत्यादि।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। अथवा जिस का मध्य-पितामह जीवता हो अथवा सवी जीवते हों (अपि) वह भी (आनिभ्यः) पित्रादि तीन को वर्ज कर जो उन के परे 'प्रेत हैं तिन के प्रति पिण्ड प्रदान करे क्योंकि (हिं ) जिस हेतु से (क्रिया) यह पिण्ड- यज्ञरूप क्रिया (अर्थकारिता) मृत पुरुषों के अर्थ ही कियी जाती है कुछ जीवतों के अर्थ नहीं। इस प्रकार अन्य मुनियों के मत को उपन्यास कर इदानीं निर्णयार्थ उपक्रम करते हैं। सू० उपायविशेषो जीवमृतानाम् २-६ १९ भाषा-( जीवभूतानाम् ) जीवत् वा मृत पितरों को किस प्रकार पिण्डदान करना चाहिये इस में उपाय विशेष कथन करते हैं, तहां प्रथम उपन्यस्त पक्षों को अनभिमत कहते हैं, सू० न परेभ्योऽनधिकाराद् नप्रत्यक्षं न जीवेभ्यो निष्टणीयाद् २-६-२० गौतम-गाणगारि तौल्वलीनां क्रमेण दूपणानीमानि । भाषा--- ( परेभ्यः) प्रपितामह से परों को लेकर जो गौतम जी ने कहा था सो (न ) समीचीन नहीं क्योंकि ( अनधिकाराद् ) विधि के अभाव से योग्यता का अभाव होने से, (न प्रत्यक्षम् ) इस से गाणगारि के मत को असं- अर्थात्-जिस का पिता जीवत् हो वह पितामह औ प्रपितामह तथा मपितामह के पिता को पिण्डमदान करे औ जिस के पिता पितामह दोनों जीवत् हो वह प्रपितामह तथा प्रपितामह के पिता औ पितामह के प्रति दान 1 करे औ जिस के तीनों ही जीवत् हो वह आगे के तीनों के नाम से करे परन्तु करे तीन पिण्ड प्रदान अवश्य ।

पीदं दूपणम्,
पिण्डपित्यज्ञमीमांसा।
गत कहा, औ" न जीवेभ्यः" इस से तौल्वलि के मत को
असमीचीन कहाँ।
सुन जीवान्तर्हितेभ्यः । २-६-२१
जीवव्यवहितेभ्योपि न निघणीयाद् इत्यर्थः, सर्वव्या-
सर्वत्रा निधिकारादिति हेतुः ।
भाषा-जीवत् पित्रादि के व्यवधान वाले जो मृत हैं
उन के प्रति भी न करे, क्योंकि “ जीवन्तं नातीयाद् " इस
निषेध से उन के प्रति अधिकार का अभाव है। तो फिर
क्या करे इस आकाङ्क्षा होने पर सिद्धान्त कहते हैं-
सू० जुहुयाज जीवेभ्यः । २-६-२२
(जीवेभ्यः ) जीवत् पुरुषों के अर्थ होम करे,
अर्थात्-पितृ आदि तीनों में से जो जीवते हों उन के
नाम से पिण्डों का अग्नि में हवन करे औ जो मृत हैं उन
के नाम से रेखा पर विछी हुर्या दर्भ पर पिण्ड रक्खे ।
सू० सर्वहुतं सर्वजीविनः २-६-२३
सनजीविना सर्वे पिण्डा होतव्या इत्यर्थः,---
अर्थात्-जिस के पिता आदि तीनों ही जीवते हों
यह तीनों ही पिण्डों का होम करें।
१ सब मतों की असंगतता में ( अनधिकाराद) यह हेतु है, विधि के
अभाव से या निषेधसत्व से योग्यता का अभाव है, यह इम का अर्थ है,
तहां (जीवन्तं गातीयाद) यह निपेयक वाक्य है, अर्थात्-जीवत् को सल्ल.
दयन कर पिण्डदान मत करे।
२ जिस का पिता जीयता हो वा पितामह जीवता हो या दोनों जीयते
हो वह केवल होम पर्यन्त ही पितृयज्ञ करे वा आरम्भ ही न करे, यह यहां
पर तत्व है, इमी से ही ( होमान्तं वा) यह शहायनमनि ने कहा है।
.

पिण्डपितृयतमीमांसा
सूनामान्यविद्वाँस्तत पितामह प्रपितामहेति २-६-२४
भापा-यदि अपने पिता आदि का नाम परिज्ञात न
होय तो तत-पितामह-प्रपितामह ऐसेही उच्चारण कर पिण्ड
प्रदान करे।
इति द्वितीय पट्टी कण्डिका-
सू० निष्टताननुमन्वयेत, “अत्र पितरो* मादयध्वं
यथाभागमाटपायध्वम्” इति, २-७-१
निपूर्तान्-इति प्राप्ते निवृतानिति छान्दसम् + कर्मणि
कृते पश्चात तत्कर्मकरणमन्त्रोच्चारणमनुमन्त्रणम् ।
भाषा-(निपृतान् ) दर्भ ऊपर स्थापित पिण्डों को
(अनुमन्त्रयेत) अनुमन्त्रण करे अर्थात्-अत्र 'पितरः' इत्यादि
मन्त्र का जप कर प्रार्थना करे, (हे पितरो हर्षपूर्वक इन
पिंडो को भक्षण करो ) कर्म करने के अनन्तर तिस कर्म के
करण भूत मन्त्र के जप करने का नाम अनुमन्त्रण है,
अतएव शतपथ में २-३-४
* यज० अ० २०३१ पूर्वार्द्ध-" ई तिरी यम् । अत्र ) बीपि
(मादयध्वम् ) हा भवत, (यथा भागम् ) यो यस्य भागस्तमनतिक्रम्य ( आत
पायध्वम् ) पा इवाचरत-महाभियोसैरतान् पिण्डानश्नीत् " । अर्थात्-डे
पितरो आप ( अत्र ) इस दर्भ के कार ( मादयध्वम् ) हर्पपूर्वक स्थित होवो
आ (यथा भागम् । जो जिस का भाग ई उम को न उल्लघन कर ( आपा-
यध्वम् ) वृष (बैल) की तरह पर आचरण करो अर्थात्-वृप की तरह महान्
ग्रामों द्वारा इन पिण्डों को भक्षण करा ।
निपुनीनेव पिण्डाननुवयने न हुतानित्सवपर्ष नितानिति, नेन सर्व
होमे इदमनुमन्नण न भरनीति, बोध्यम् ।

पिण्डपितृयज्ञपीपांमा। "तत्र जपति अत्र पितरो मादयध्वं यथा भाग- मावृषायध्वमिति यथाभागमनीतेत्येवैतदाह” २० इस श्रुति से यहां पर जप का विधान किया है। यद्यपि यहां पर पिण्डों का ही अनुमन्त्रण, उपस्थान तथा प्रवाहण विधान किया है तथापि मन्त्रों को पितृलिङ्ग- वाले होने से पिण्डों को ही पितर जान कर इन मंत्रों से पितरों का ही अभिधान जानना ( उपस्थान अग्रिम सूत्र में औ प्रवाहण ६ सूत्र में है ) सू० सव्यावृदुदङावृत्य यथाशक्तयप्राणन्नासित्वा ऽभिपर्यावृत्य "अमीमदन्त पितरो । यथा- भागमावृषायिषत" इति-२-७-२ अ० अनुमंत्रयेदिति शेषः, सव्येनाङ्गेनावर्तमानः सव्यावृदि- त्युच्यते, यथाशक्तयनुच्छसन् शासिस्वा पुनरभिपर्यावृत्य (अमीमदन्त) इत्येवमनुमंत्रयेद् इत्यर्थः । भाषा-(सव्यावृद्) सव्य अङ्ग से आवर्तमान हुवा, (उद्ङ् आवृत्य) उत्तर की तरफ आवृत्ति कर अर्थात् उत्तर मुख हो कर (यथाशक्तिअप्राणन् आसित्वा) शक्ति के अनु- सार स्वास को रोक कर यत्किञ्चित् काल स्थित होकर फिर १ (यथाभागमापायध्वम् ) इस मंत्रभाग का ( यथाभागमश्नीत) यह विवरण है। जिन पितरों के प्रति यह कहा था कि आप हर्षपूर्वक पिण्ड भक्षण करा वह पिता अब हर्पयन य पिण्डों का भक्षण कर चुके, यह इस मंत्र का भाव है।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा।
(अभिपर्यावृत्य) पिण्डों के सन्मुख होकर (अमीमदन्तोइलादि
मंत्र का जप करे।
अर्थात्-जिस समय पितर लोक पिण्डभक्षण करें उस
समय पिण्डों की ओर दृष्टिपात न करे किन्तु सव्य अंग से
आवर्तन कर उत्तरमुख हो कर प्राणायाम करे फिर जब
भोजन कर लें तव पिण्डों की ओर मुख कर (अामदन्त)
इत्यादि मंत्र का जप करे ।
भोजन के समय पितरों की ओर दृष्टिपात न करे, इस
में क्या कारण हे वह शतपथ में कहा है, तथाहि-
“अथ पराङ् परावर्तते, तिर इव वे पितरो मनुष्ये-
भ्यः, तिर इव वे तद् भवति, सवै आतमितोरासीते-
त्याहुः, एतावानेवह्यसुरिति,सवै मुहूर्तमेवासित्वाऽथो-
पपल्यय्य जपति (अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृ-
पायिपतेति यथाभागमाशिपुरित्येवैतद् आह"
२-३-४-२१
भाषा-(अथ) हे पितरो तुम हर्ष पूर्वक भोजन करो
इस अर्थ वाले ( अत्र पितरोमादयध्वम् ) इस मंत्र जप से
अनन्तर (पराङ् परावर्तते) पिण्डापेक्षया पराचीनो यथा भवति
तथा, उपविष्ट एवाऽप्रदक्षिणं भ्रमन्निव गच्छति, अर्थात-बैठा
१ यजु० अ० २० ११ उतरार्द्ध, (यथाभागमापायिपत ) इस मंत्र
भाग का (यथाभागमाशिषः ) यह विवरण है अर्थात्-~-यथाभाग आप लोकों
न पिण्डभक्षण किया।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा । हुवा ही भ्रमण कर उत्तर की तरफ मुख करे, क्यों उत्तर मुख होवै,इस पर कहते हैं कि (तिर इव वै पितरो मनुष्येभ्यः) अर्थात्-भोजन करते हुये पितर लज्जायुक्त होकर मनुष्यों सेतिरोभाव की इच्छा करते हैं (अपने आप को छिपाया (१) चाहते हैं ) इस से ( तिर इव वै तद्भवति ) अर्थात्-उत्तर मुख होने से वह यजमान पितरों को तिरोहित करता है, कितनी देर तक उत्तर मुख स्थित होवे, इस पर कहा है कि ( आतमितोः ) अर्थात्-स्थासनिरोध- जन्य पीडा के होने पर्यन्त, क्योंकि ( एतावानेवासुः ) अर्थात्--श्वास के रोकने से अनन्तर जो पीड़ा होती है तहां पयन्त ही पुरुषों का जीवन है अधिक नहीं, इस प्रकार एक मुहूर्तपर्यन्त उत्तर मुख स्थित होकर फिर (उपपल्यय्य) पिण्डों के सन्मुख दक्षिण मुख होकर (अमीमदन्त इत्यादि मंत्र का जप करे। इसी प्रकार तैत्तिरीय ब्राह्मण में कहा है, "पराङ आवर्तते ५ ह्रीका हि पितरः औष्मणो (*) व्यावृत उपास्ते ऊष्मभागा हि पितरः " .. (१) अर्थात्-जसे लोक में पूजनीय प्रभु भोजन करने के समय में किसी के राष्टगांचर नहीं होते हैं तमे पूजनीय पितर भी पिण्डभक्षण काल में अन्य की दृष्टि का अभाव चाहते हैं। +राणायणीयसूत्रकार गोभिलाचार्य ने तो उत्तर से दक्षिण की ओर भ्रमण करन के समय (अपीमदन्त) इस मंत्र का जप कहा है, शाखाभेद से सभी समीचीन है। ()याय पिण्डपमानिगच्छति तस्य व्यावत्-परमः, आऊष्मणः व्यावता, पिण्ड,मापगम मादीकृसत्यर्थः।

५४
पिण्डपितृयज्ञमीमांसा
अर्थात्-जिस हेतु से पितर ( ह्रीकाः ) लज्जायुक्त हैं
इस से उन के भोजन के समय उत्तर मुख हो कर स्थित
होवे, कितनी देर तक स्थित होवे इस पर कहा है कि (ो-
प्मणोः व्यावृतः)अर्थात् जव तकपिण्ड उरण रहें क्योंकि पितर
लोक उप्ण अन्न के ही भागी होते हैं शीत के नहीं।
सू० घरोः प्राणभक्षं भक्षयंद-२-७-३
भापा-पिण्डों से अवशिष्ट स्थाली में स्थापित जो
अन्न है वह चरु कहा जाता है, तिस चरु को (प्राणभक्ष)
नासिका से वहन शील प्राण द्वारा जेसे भक्षण होय नैसे
( भक्षयेद् ) भक्षण करे, अर्थात्-स्थाली में पड़ा हुवा
जो
पिण्डों से अवशिष्ट अन्न हे तिस को नासिका से अवधात
करे अर्थात् सुंघे,
आपस्तम्बीय श्रोत सूत्र में भी
(यःस्थाल्यां शेषस्त मवजिघति')
इस वाक्य से पिण्ड शेषका आधाण कहा है, वेद में भी
विचार पूर्वक अर्थवादद्वारा पिण्ड शेष अन्न के अवघाण का
विधान किया हे-तथाहि-
* ब्रह्मवादिनो वदन्ति प्राश्यां ३ न प्राश्यां ३म् इति,
१ प्रथम प्रश्न तुनीपटल ९ क १२ सू. अर्थात्-स्थाली में जो शेप अन्न
हैं उस का अवघाण करे, आचाप अवघ्राण सूंघने को कहते हैं,
निरीय सामण-१.३.१०
२ प्राश्यारम् ति पुना विचारार्थः, प्राशनपक्षे धीजभक्षणपदनपिस्यामानान्
धितो यजमानो नियंत अपाशने त सर विशे पस्य भक्षणदर्शनाद् इर्द
विरेव न साद् अनाय पितृभ्यो पिउिचताना दोपद्यपरिहाराय पात्रगतम.
अपरजियेत् तदवघ्रात प्राशितं न भवति निगरणाभावाद्, अमाशितमपि न
भवति नायगन्धस्यान्तः परेशाद् इत्यर्थः ।
,

I. BP..मामामा। यत्प्राश्नीयाज जन्यमन्नमद्यात् प्रमायुकः स्याद् , यन्न प्राश्नीयाद् अहविः स्यात् पितृभ्य आदृश्यतेति अव- घेयमेव तन्नेव प्राशितं नैवाप्राशितम् ” इति, भाषा--ब्रह्मवादी लोक निर्णय के लिये यह विचार करते हैं कि ( प्राश्यं न प्राश्यम् ) अर्थात-पिण्डशेष अन्न का भक्षण करना चाहिये वा न भक्षण करना चाहिये, तहां यदि भक्षण किया जायगा तो वीज भक्षण प्रयुक्त अन्य अन्न के प्रभाव से यजमान क्षुधा से (प्रमायुक: ) मृत हो जायगा (१) औ यदि नहीं भक्षण किया जायगा तो वह हवि न होने से पितरों को नहीं पहुंचेगा, इस से दोनों दोपों के परिहारार्थ उस अन्न का अवधाण करे क्योकि सूंघना जो हे वह निगरण " का अभाव होने से न तो भक्षण ही कहा जाता है श्री तिस की गन्ध का भीतर प्रवेश होने से न वह अभक्षण ही कहा जाता है किन्तु भक्षण के तुल्य अ- भक्षण हे इससे हवि बनाने के लिये अवश्य उस अन्न को सूंघे। सू० नित्यं निनयनम्-२-७-४ (१) अर्थात्-स्थाली में जो शेप अन्न है वह पिण्डों का जनक होने से बीम के समान है एवंच जैसे लोक में खेत में होने वाले बीजों को भक्षण करने वाला र अन्य नये अन्न की उत्सव के अभाव से मीडिब रा मर जाता है जैसे यह यजमान भी बीज भक्षण से मर जायामा इस से बीज के समान पिण्ड शेप अन्न को भक्षण न करे, एवं अन्यत्र सर्वत्र वैदिक कर्मों में हविकेशंप भाग का भक्षण ट है तो यदि यहां पर भक्षण न किया जायगा तो इस अन्न को हवि रूप न होने से यह पिण्ड पितरों को प्राप्त न होगा। (निगरण) गले के अधोभाग में अन्न के संयोग होने का नाम निगरण है। २ इसी संही लोक में ( आघ्राणंचाई भोजनम् ) यह कहते हैं, जो कि पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। भापा-(नित्यं) अवश्य (निनयनम्) पिण्डों पर जल गेरे अर्थात्-जैसे पहिले ( शुधन्तां पितरः ) इत्यादि तीन मंत्र पढ कर रेखा पर तीन वार जल गिराया था उसी प्रकार इस समय भी करे, अर्थात्-जैसे लोक में भोजन से पूर्व श्री भोजन से अनन्तर हस्तशोधन किये जाते हैं तैसे यहां पर भी जो प्रथम जल गेरा था वह भोजन से पूर्व हस्त शोधनार्थ था औ जो इस समय जल का गिराना है वह भोजन से उत्तर काल में हस्त शोधनार्थ है, इस लिये दो चार जल का प्रदान करना लगता है, क्या उच्चारण कर, जल का प्रदान करे इस का निर्णय शतपथ में है तथाहि "अथोदपात्रमादायावनेजयति, असाववननिक्ष्वेत्येवं यजमानस्य पितरम्-असावनेनिक्ष्वेतिपितामहम्, असाववनेनिक्ष्वेतिप्रपितामहम-तद् यथा ‘जक्षुषेऽ भिपिञ्चदेवंतद् इति, २-५-४ अर्थात-जैसे ( जापे ) कृतभोजन के प्रति हस्त शोधनार्थ भृत्यलोक जल देते हैं तैसे उदपात्रमादाय ) जलपात्र कम- को लेकर पितरों के प्रति भवनेजन करे' -शौनक आवंग सूत्र में, तथा पियलादश्राद्ध कला में नया शालं कायन मुनि ने (इदमार्शमूनामिदमाशंमपानानामित्यन्नन प्रम परिविकरणम् ) इत्यादि से शेष अन्न का विकरण कहा है वह पार्वण श्राद्ध में जानना । १ इस शोधनार्थ जल प्रदान करे, वहां इतना विशेष है कि जो पूर्व का प्रदान किया है उस का नाम अवनेनन है औ जो अब पिण्ड भक्षण में पश्चात् जल प्रदान किया है इस का नाम प्रत्यंने जन है औ कहीं पर दोनों पोती अवनेनन कहा है परन्तु पूर्वले १४ इस सूत्र में (त्रिरदन) इस प्रकार वि-पद का उपादान होने से अबनेजन औ प्रत्सरोजन तीन बार करे, लोक भी यही रीति हष्ट है।

१७ पिण्डपितृयज्ञमीमांसा सू० असावभ्यक्ष्वासावक्ष्वेति पिण्डेप्यभ्य- अनाञ्जने-२-७-५- भाषा हे ७ देवदत्तशर्मन् पितः, त्वम् ( अभ्यय ) इत्यादि प्रकार से पितं आदि का नाम उच्चारण कर (पिण्डेपु) पिण्डों के ऊपर (अभ्यञ्जन) अवटन दे औ (हे पितः अ- च) इत्यादि उच्चारण कर अञ्जन दे, परन्तु ( अजनाक्ताः शलाकाः प्रतिपिण्डं निदधाति ) इस मैत्रायणीयपिण्डपितृ- यज्ञसूत्र से दर्भशलाका के अग्रभाग में लगा कर असन देना। सू० चासो दद्याद् दशामूणास्तुका वा पञ्चाशद्- वर्षताया ऊर्दू स्वलोम (एतद्वः पितरो वासो मानोऽतो न्यत् पितरो युङ्गध्वम् ) इति-२-७-६ । (एतेषामन्यतमं द्रव्यं वासार्थ पिण्डेषु दद्याद् ।) भाषा-(एतद् वः पितरों वासः) इस मंत्र को उच्चारण कर (वासो दद्याद) पिण्डोंके ऊपर पितरों के अर्थ वस्त्र प्रदान करे, कोन वस्त्र दे. इस पर कहा है कि (दशाम्) अर्थातवस्त्र के अन्त का प्रदेश, अथवा ( ऊर्णास्तुका ) अर्थात् भेड़ी के रोम, श्री यदि यजमान (पञ्चाशद्वर्पतायाऊई ) अर्थात् (*) सूत्र में ( असा ) यह पद संयुझ्यन्त पिपितामहादि का बांधक है, इस आशय से कहते हैं ( है ) इत्यादि, ( अभ्यक्ष्य ) अबटन लगायां (अश्व ) अञ्जन करा। (१) पितृ आदि-इस आदि पद से पितानह औ पितामह का ग्रहण ) . करना।

पिण्ट पितृयज्ञमीमामा। पचाशवर्ष से अधिक श्रायुवाला होवे तो ( स्वयंलोम ) अर्थात् अपने रोम दे, यद्यपि यहां पर सामान्य से ही लोमप्रदान कहा है तथापि "उद्धं वे पुरुषस्य नाभ्य मेध्यमवाचीनममेध्यम" इस श्रुति से ओ (पञ्चाशत ऊर्द्धमुरोलोम यजमानस्य) इस शाट्यायनि मुनि के वचन से नाभि के ऊपरले भाग में उर- स्थल के लोम लेने। यह दशा प्रदान आदि क्यों करना चाहिये इस का प्रयोजन वेद में कहा है तथाहि-"वीरं वे वा पितरः प्रयन्तो हरन्ति, वीरं वा ददति, दशां छिनत्ति, हरणभागा हि पितर', पितृनेव निरवदयते, उत्तर आयुपि लोम छिन्दीत, पितॄणां खेतहि नेदीय" अर्थात्-जिस समय पितर लोक पिण्डभक्षण कर (प्रयन्तः) गमन करते हैं उस समय यजमान के (वीरं हरन्ति) वीर पुत्र का हरण करते हैं अथया ( बीरं ददति ) वीर पुत्र का प्रदान करते हैं, अर्थात्-यदि साङ्गोपाङ्ग पितृयज्ञ का अनुष्ठान किया जाय तो यजमान के प्रति पुत्र का प्रदान घ...श.101 (१) नाभि से ऊपर का भाग ( मेध्य ) पवित्र है, औ नीच का भाग अपविन है यह श्रुति का भाव है। (२) पचाश वर्ष से अधिक वय वाला यजमान (उरोलोम ) हृदयस्थ रोम का प्रदान करे, वोवामन मुनि ने तो (कई पदपष्टिभ्यश्च वर्षेभ्योऽभ्यश्च मासेभ्यः ) इस वाक्य से आठमास अधिक ६६ वर्ष से कार आयपाला यज- मान लोमपदान को यह रहा है। (३) यहां पर (वासः ऊो दा दाऽभ्युक्ष्य पिण्डदेशे निदधाति ) इस मानवमनायगीपपिण्डापितृपरस्त्र के अनुसार प्रोक्षण कर दशा आदि का न करना यह भी जानो।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा । करते हैं औ यदि अङ्गहीन यज्ञ अनुष्ठान किया जाय तो यजमान के पुत्र को मार देते हैं, सो साङ्गोपाङ्ग अनुष्ठान होना दुप्कर है इस से पुत्र की जगह में पितरों के लिये (दशां छिनत्ति) वस्त्र का अग्र भाग छेदन कर प्रदान करे क्योंकि पितर जो हैं वह (हरणभागाः) अपहरण को सेवन करने वाले हैं अर्थात्-कुछ ले कर ही जाने वाले हैं, इससे (पितॄन् निरवदयते) वस्त्र के शेपभाग दान से पितरों को विसर्जन करे,अथवा (उत्तर आयुपि) यदि यजमान पचाश- वर्ष से ऊपर आयु वाला होवै तो अपने ( लोम छिन्दीत) हृदय के लोम छेदन कर, देवै, क्योंकि ( एतर्हि ) इस वृद्ध अवस्था में यह पुरुष आसन्नमरण होने से (पितॄणां नेदीयः) पितरों के समीपवर्ती होने वाला है। सू० अथैतानुपतिप्ठेत नमोवः पितर इषे,नमो वः पितर ऊर्जे, नमोवः पितरः शुष्माय, नमो वः पित- रो घोराय, नमो वः पितरो जीवाय, नमो वः पितरो रसाय, स्वधा वः पितरो नमोवः पितरो नम, एता (*) (उत्तरे आयुषि) शतवर्ष के परिमाण से पचाशवर्ष आयका पूर्व भाग है औ पचाश वर्ष स आगे आयु का उत्तर भाग है, इमी आशय से सूनकारों ने पचाश वर्ष से ऊपर कहा है। (न) आसन्नमरण-समीपमरण वाला। (१) अर्थात्-समीप मरण वाला होने से यह भी अा अल्प काल में पिता धनने वाला है, यस का अग्र भाग भी श्वन है औ ऊणा भी पंत है इस से रोम भी घेत होने चाहिये इसलिये पचाश वर्ष से अधिक आय वाले के प्रति ही रोग प्रदान की आज्ञा है न्यून आयु वालं के प्रति नहीं, यह भी जानो। - . पिण्वपितृयज्ञमीमांसा । युष्माकं पितर इमा अस्माकं जीवा वो जीवन्त इह सन्तः स्याम २-७-७ । भापा-(अथ) वस्त्रप्रधान से अनन्तर (नमो वः पितर इपे) इत्यादि मंत्रों का उच्चारण कर ( एतान् ) इन पितरों को (उप तिप्टेत) अललि बान्ध कर प्रणाम करे । शबपथ में तो २-४-५ । * “ अथ नीविमुबृह्य नमस्करोति पितृदेवत्या नीविः तस्मान्नीविमुदृह्य षट्कृत्वो नमस्करोति, षट वा ऋतवः ऋतवः पितरः तस्मात् पटकृत्वो नमस्क- इस वाक्य से 'नमो वः पितरो रसाये। रोति" २२ (.)'अय' अवनेनादि से अनन्ता (नीधिमुद्रा).वामरक्षा में जो गनीय परन दशा तिस का नाम नीधि है तिम को उन्मोचन (बोल) कर पितरो नमस्कार को, निस हेतु से यह नीपि पितृदेवतावाली है इससे उस को पोल कर ६ मेवार नमस्कार करे ६छ ही ऋतु है भी नतु काही पितर इससे पार नमस्कार करे, "मन खलु यै देवाः पितरः" इरा त्तिरीय- अनि में भी पितरों को प्रतुरुप कहा है। (१) अर प्रतों के नाम से युक्त जोपनासकारमंत्र है उन का उपन्यास करते हैं, (नमो वः पितरा रसाय) इत्यादि-गज-अ-२-म-३२-तहांचागत प्रत में मधु आदि रस का प्रादुर्भाव रोनो रा प से पमत अन रेना, भापधियों के दशेपा कारण होने से शोष पद से ग्रप्पिसन लेना, पी द्वागणीवन पाहत होने से जीव पद से वर्षाऋतु लना, "भागस्ट" इस श्रुति से स्वधापद कर मस्ट्नानु रेना, शीत द्वारा दERIA दोने मे घोर पद से हेमन्तातु सेना, ओ मन्य पद से शिशिर ऋतु FIT, अर्थात हे पितगे पानुरूप जो आप हो तिन के मति मेरा नमस्कार पात्र में गो नमस्कार की पुनरक्ति है यह भारगर्थ जाननी ।

पिण्डपित्यज्ञमीमांसा नमो वः पितरः शोपाय, नमो वः पितरो जी- वाय, नमो वः पितरः स्व(यै, नमो वः पितरो घो- राय, नमो वः पितरो मन्यवे, नमो वः पितरः पित- रो'चः" । इस यजु का उपस्थान में विनियोग कहा है। ो तेत्तिरीयन्त्राह्मण में- "नमस्करोति, नमस्कारो हि पितृणाम्, नमो वः पितरो रसाय, नमो वः पितरः शुष्माय, नमो वः पितरो जीवाय, नमो वः पितरः स्वधायै, नमो वः पितरो मन्यचे,नमो वः पितरो घोराय, पितरो नमो वः" इत्यादि प्रकार से उपस्थान कहा है। (शाखा भेद से सवी समीचीन हैं।) यहां पर "गृहान्नः पितरो दत्तेति गृहाणां हि पितर इशते एप एतस्याशी: कर्मणः” इस शतपथ के प्रमाण से "गृहान्नः . पितरो दत्त सतो वः पितरो देम" इस मंत्र को पढ़ कर अपनी पत्नी की ओर वा गृह की ओर यजमान दृष्टिपात करे यह विशेष भी जान लेना। (१) जिस हेतु से गृह आदिकों के पित्तर ईश है इस हेतु से (गृहान्नः पितरो दत्त) इस को उच्चारण कर अपने गृह को देखे, यही पितृयक्षरूप कर्म में मार्थना है, यह भाव है। (२) हे पितरो ! आप (न:) हमारे प्रति (हान) घर-पुत-कलत्र भादि (दत्त) मदान करो, औ ( सतः) आप कर प्रदत्त होने से विद्यमान तिन गृहादिकों से (कः) आप के पति हम पितृयत द्वारा सत्कार प्रदान करें।

- पिण्डपितृपशमीमांसा । एवं वक्ष्यमाणशाड्खायन-कात्यायन श्रोत्रसूत्रों से-- "उज वहन्तीरमृतं * घृतं पयः कीलालं परित्रुतं स्वधा स्थ तर्पयत मे पितॄन्" को उच्चारण कर अपनेजनशेय जो कमण्डलु जल है उस को पिण्डों पर वा पिण्डों के समीप भूमिपर गिरावें। एवं ( अथावजिघूति । प्रत्यवधाय पिण्डान्, स यज- मान भागः ) इस शतपथसे तथा वक्ष्यमाण शाइवायनादि श्रोत सूत्रों से तीनों पिण्डों को स्थाली में रख कर यजमान भायाण करे यह भी जान लेना। सु० मनोऽन्वाहवामह, इति च तिसृभिः-२-७-८ भाषा-(मनोऽन्वाहवामहे) इत्यादि तीन ऋचों को पढ़ कर फिर पितरों का उपस्थान करे, अर्थात्- "मनो ऽन्वाहामहे नाराशंसेन स्तोमेन, पितृणां च मन्मभिः'" "आ न एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय (.) ई जल अमृतरूप से घृत रूप से पयादग्धरूप से कीलाल- मिटमल रूप से (परिस्तुत ) निःसृत हुये आप जो ( उजवदन्ती) पुरुषों के प्रति अनेक प्रकार वा पल प्रदान करते हैं सो मा स्वधारूप हो कर मेरे पितरों को इस करो। + (भय) नमस्कार से अनन्नर (पिण्हान् प्रत्यवधाय) पिण्डों को स्थाली में पापा कर (अवनिप्रति) नासिका से आघात करे कि यह जो सूचना है सो यनमान का भाग अाद-संस्कार है। (३)नारास नामक (स्तामेन) स्तोत्र से तथा पितरी कर (मन्मभिः) -

पिण्डपितृपक्षमीमांसा।
जीवसे, ज्योक् च सूर्य दृशे" "पुनर्नः पितरो मनो
ददातु देव्यो जनः, जीवं बात सचेमहि"
य.प.५५२५४५५
इन तीन मंत्रों को पढ़ कर अंजलि वांध कर प्रार्थना
करें।
सू० अर्थतान् प्रवाहयेत् (परेत नः पितरः सो.
म्यासो गम्भीरेभिः पथिभिः पूर्विणभिः, दत्तायास्मभ्यं
द्रविणेह भद्रं रयिं च नः सर्ववीरं नियच्छत) इति,
२-७-९।
भाषा-(परेतनः) इत्यादि मंत्र को पढ़ कर पितरों का
प्रवाहण अर्थात् विसर्जन करे ।
सू० अग्निं प्रत्ययाद् ( अग्ने तमद्यावं न स्तोमैः )
इति-२-७-१०॥
मननीय स्तोनों से हम लोक (न) शीघ्र ही (पन:) मन अभिमानी देवता का
भादान करते हैं।
(१) (क्रत्वे) यज्ञ के लिये (दक्षाय) चातुर्य के लिये तथा (ज्योक्जीन से)
चिरकाल पर्यन्त जीवन के लिये तया सूर्य के दर्शनार्थ ( न. ) हमारा मन
फिर (आएत) आगमन करे ।
(२) हे पितरो ! (दैव्योजन:) देवों कर माननीय जन (न) हमारे प्रति
मन का फिर प्रदान करे, जिस मन कर के हम लो (जीवातम्) जीवतेहुये
पुनादि समूह का (सचेमहि) सेवन करे ।
(३) हे पितर लोको ! आप जिस गंभीर दक्षिण मार्ग से आये हो उसी
मार्ग से फिर वहां गगन करो औ हमारे प्रति सुख औ धन तथा वीरपुत्रादि
का प्रदान करो।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। भाषा-"अग्ने ७ तमद्यावं न स्तोमः क्रतुं न भद्रं हृदि स्पृशं, ऋध्यामा त ओहेः" इस मन्त्रका उच्चारण कर दक्षिण मुख होकर (अग्नि) दक्षिणाग्निके प्रति (एयात्) गमन पूर्वक उपस्थित होय । सू० गार्हपत्यं (यदन्तरिक्ष एथिवीमुत द्यां यन्मा- तरं पितरं वा जहिसिम, अग्निर्मा तस्मादेनसो गाह- पत्यः प्रमुञ्चतु करोतु मामनेनसम्) इति २-७-११ । भाषा-( यदन्तरिक्षम् ) इत्यादि मंत्र को जप कर गार्हपत्य अग्नि का उपस्थान करे । सू० • वीरं मे दत्त पितर इतिपिण्डानांमध्यमम् २-७-१२ भापा-वीरं मे दत्त पितर) इस को उच्चारण कर पिण्डों में से (मध्यमम्) धीच के अर्थात्-पितामह के पिण्ड को यजमान ग्रहण करे । ( * ) पन० अ० १५ । में०.४४ यहां पर दोनों नकार उपमार्थ हैं, (न) जैसे ( अश्वम् ) अश्वमेघ मंन्धी अश्व को (स्तोः ) स्तत्तियों से समृद्धियुक्त करते है और न ) से ( हृदिस्पृशं ) मन में होने वाले ( भद्रं कृतम् ) शुभ संकल्प को महाम्लोक समृद्ध करते हैं तैसे ( अघ) भान हम हे अमे (ते) थाप के इस प्रसिद्ध यज्ञ को (ओ) आ समन्ताद् यदन्ति = त्यसमरूप- नामानि प्रतिपादयन्ति ये ते ओहाः अर्थात-आप की प्रशंसा निरूपण पर सांत्रो सहम (माध्यामा) समृद्ध वारते है। [1] अन्तरिक्ष भी पृथिवी तथा स्वर्ग एवं माता पिता के प्रति जो मन (जहिसिम ) हिंसा सश अपमान किया है ( तस्माद् एनस:) तिस अप- मानजन्य पाप से गाईपत्यनामा अग्नि मुझ को मोचन करे, अति-मुझको निष्पाप करें। [१] हे पितरो ! भाप मो मति पीर पुत्र का प्रदान करो।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा सू० पत्नी प्राशयेद् “आधत्तपितरौ गर्भ कुमार पुष्करस्रजं, यथायमरपा असद्" इति २--७-१३ । भाषा-तिस मध्य के पिण्ड को अपनी पत्नी के प्रति भक्षण करावे, अर्थात्-पुत्रकामनावाली यजमान की पली (माधत्त) इत्यादि मन्त्रको पढ़कर उस पिण्ड को भक्षण करे। मनुभगवान ने भी “पतिव्रतो धर्मपनी पितृपूजनतत्परा, मध्यमं तु ततः पिण्डमद्यात्सम्यक्सुतार्थिनी" इस वाक्य से मध्यमपिण्ड की यही गति कही है। सू० अप्स्वितरौ, अतिप्रणीते वा २-७-१४।१५। भापा--(इतरी) इतर दोनों पिण्डों को (अप्सु) जल में (१) यज अ० २ ० ३३ में तो (यथायमरणा) इसके स्थान में) (यथाह पुरुषः) यह पाठ है-हे पितरो । (यथा) जिस प्रकार (इह) इस ऋतु (पुरुप:) देवादिकर अपेक्षित अर्थ के पूरण करनेवाला पुत्र होय तिम प्रकार आप कुमा. रमा गर्भ के आधान का संपादन करो, कैसा कुमार हो कि पुष्करलगम् कम- लपप्प की मालावाला होने से अति सुन्दर । (२)तिरों के पूजन में तत्पर जो पतियता यजमान की पनी यह सुत की कामना वाळी ही मध्यम पिण्ड को भक्षण को, म० भ०३ श्लो०२६२। यहां पर “अन्यदेशगता पनी गर्भिणी रोगिणी नथा, तदा तं जीर्णटपभः छागो वा भोक्नुमति" दृहस्पतिः " यदि पनी रिदेशस्था उच्छिष्टा यदि चा मृता, दुरात्मा नानुमूला च तस्य पिण्डस्य का गतिः, आकाशं गमयत्पिण्डं नळस्थो दक्षिणामुख', पितॄणां स्थानमाकाशं दक्षिणा दिक् तथैव च ,, इत्यादि वाक्यों से यह विशेष भी जान लेना कि यदि यजमान की पत्नी गाभणी वा रोगिणी होय तो वृद्ध बैल वा छाग उस पिण्ड को भक्षण करे, भी यदि पत्नी परदेश में हो वा रच्छिष्ट वा मृत वा दुरात्मा वा प्रतिकुल होय तो भाका की तरफ पिण्ड को फेंक दे वा दक्षिणमुख हो कर जल में गेरदे क्योंकि आकाम तथा दक्षिणदिशा पितरों के निवास का स्थान है।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा फेंक देवा' अथवा अतिप्रणीत नामक अग्नि में फेंक कर दग्ध कर दे। सू. यस्य वाऽऽगन्तुरन्नकाम्याभावः स प्राश्नीयाद् २-७-१६। भापा-(वा) अथवा (यस्य) जिस पुरुप को (आगन्तुः अकस्मात् ही अन्नकाम्याभावः) अन्न भक्षण की इच्छा का अभाव है अर्थात् अजीर्ण रोग है सो पुरुप उन दोनों पिण्डों को (अश्नीया) भक्षण करे' । सू० महारोगेण वाभितप्तः प्राश्नीयादन्यतरां गति गच्छंति २-७-१७॥ भापा--(वा) अथवा क्षय कुष्ठ आदिक महारोग कर के जो (अभितप्तः पीड़ित पुरुप है वह उन पिण्डों को भक्षण करे क्योंकि पिण्डभक्षण से वह पुरुप (अन्यतरां गतिं ग- ध्छति ) अर्थात्—या तो शीघूही मर जायगा, औ या शीघ ही नीरोग हो जायगा। सू० एवमनाहिताग्निः, नित्ये श्रपयित्वाऽतिप्र- णीते जुहुयाद् २-७-१८ । भाषा-(अनाहिताग्निः ) अग्नि के आधान से रहित पुरुप भी (एवम्) इसी प्रकार पिण्डपितृयज्ञ करे, अग्नयाधान के अभाव से वह पुरुप चरुपाक ी होम किस अग्नि में (१) अर्थात् उस पिणके भक्षण से अजीर्ण रोग की निवृत्ति होजाती है। (२) अर्थात् सर्वथा ही दुःखभोग से रहित होगा। ) मुट्यपिदमिति चिन् ।

पिण्डपिठ्यक्षमीमांसा। करेगा इस आकाङ्क्षा के वारणार्थ कहा है कि (नित्ये श्रप- यित्वा) अर्थात्-ौपासने अग्नि में चर का पाक कर अति प्रणीत नामक अग्नि में हवन करे । सू० द्विवत् पात्राणामुत्सर्गः २-७-१९ । भाषा-(द्विवद्) दो दो करके पात्रों का (उत्सर्ग) त्याग करें। सू० तृणं द्वितीयमुद्रिक्ते २-७-२० । भाषा-(उद्विक्त) यदि मिला कर दो दो गेरने से एक पात्र अधिक हो जाय तो एक तृण मिला कर दो पूरे कर पात्रों का त्याग करे । हरिः, ऑ, तत्तत् । +इदानीं जिन श्रौतसूत्रों से शालायनमुनि ने पिण्ड पितृयज्ञ का निरूपण किया है उन श्रौतसूत्रों का उपन्यास किया जाता है। सू० *पिण्डपितृयज्ञोऽपराहेऽमावास्यायाम४-३-१। (१) विवाह काल में होम का आधारभूत जो स्मार्त अग्नि है उसे भोपा- सनाग्नि जानना । इसी अग्निने उद्धृत कर जो दक्षिण की तरफ अग्नि स्थापन किया जाय वह अति प्रणीत जानना । (२) जो नुवा आदि पात्र हैं उन को एक एक कर के मत फेके किन्तु मिला कर दो दो गरे। इस प्रकार ऋग्वेदीय आश्वलायन श्रौतसूत्रों से पिण्डपितृयज्ञ का निरूपण कर अब ऋग्वदीयशाबायन श्रौतसूत्रों से उसका निरूपण करते हैं, "इदानी" इत्यादि से। (+) अमावास्या में अपपाइकाल में पिण्डपितृयज्ञ का अनुष्ठान करे। -

६८
पिण्डपित गहमीमामा।
सू० दक्षिणानेः' पुरस्ताच खूष स्थाली स्पेयं पात्री-
मुलूखलमुशले च संसाद्य, गार्हपत्यस्य पश्चाद् दक्षि-
णाग्रेषु कुशेषु स्यं निधाय,उपरिष्ठाद् ब्रीहीन पात्र्या-
म् , पुरस्ताच् छूपे स्थालीम, आच्य सव्यं जानु
नीचा मुष्टिना ब्रीहीन् ग्रहाति पितॄन् ध्यायन्, यथा
ऽधोविलाशतः स स्यात् ,२।३।४।५।६।७।
सू०पल्या संकृत्फलीकृतान् दक्षिणाग्नी श्रपयि-
त्वाऽभिघार्य प्रत्यञ्चमुद्वास्यावसवि परिसमुह्य
परिस्तीर्य पर्युक्ष्य दक्षिणं जान्याच्य यज्ञोपवीती
प्राङासीनो मेक्षणेन जुहोति ४-३-८।
(१) दक्षिणाग्निसे पूर्व और शूर्प स्थाली आदि पात्रोंको स्थापन कर औ
गाईपत्य अग्नि से पश्रिम भार दक्षिणान कुशों के ऊपर स्पय नामक पात्र को
स्थापन कर गपं में स्थानी गो रख कर सव्य जान को निधाय कर पितर्ग
या ध्यान करता हुआ नीची मष्टि से शकट पर से पात्री में प्रीतियों का ग्रहण
को, इननी ब्रीहि ग्रहण करे जैसे हिलारा देने से अघोविल बास कुछ नीति
भूप में गिर पर, यह इन छ सूत्रों का भाव है।
(२) पनी कर एक बार फूट कर फली किये हुए उन धानों को
दक्षिणाग्नि में पका पर फिर उस को अभिधारण भी उदवासन कर फिर
परिसम्हन परिस्तरण-पर्युक्षण कर दक्षिण जानु को निकाय कर यज्ञोपवीती
हो कर मक्षण से हवन कर ।
तीन दी से अग्निस्थापन के स्थान को धूलि दूर करना परिसमूहन
कहा जाता है, औदर्भ से अग्नि की ईशानादि कोण से आछादित करणा-
भस्तरण जानना, नक ने मोक्षण का नाम पर्युक्षण है।

. पिण्डपित्यङ्गमीमामा । ६९ सू० अन्नये' कव्यवाहनाय स्वाहा सोमाय पितृ- मते यमायाऽङ्गिरस्वते पितमते स्वाहेति-2-४-१ । सू० मेक्षणमनुप्रहृत्य दक्षिणा दक्षिणाग्नेः (अप- हता असुरा रक्षांसि वेदिषद) इति स्फ्येनोन्मृज्याभ्यु- क्ष्य "ये रूपाणि प्रतिमुश्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति, परा पुरो नि पुरो ये भरन्त्यग्निष्टॉल्लोकान् पूणुदात्यस्माद) इत्युल्मुकमुन्मृष्टस्य दक्षिणार्धे निधाय मूले कुशान् सकृल्लूनानुन्सृष्टे निधाय (असाववनेनि- क्ष्व ये च त्वामत्रानु) इति पितुर्नामादिश्य कुशेष्वपो निषिञ्चति अवाचीनपाणिना, एवं दक्षिणतः पिताम- हस्य,प्रपितामहस्य च, असावेतत्ते ये च त्वा मवान इति पिण्डान् यथावनेजितं निधाय २३।४।५। सू० उभावकस्मिन् पितृभेदे,न जीवपितुरस्ति, न (१) जिन मंत्रों को उच्चारण कर होम किया जाता है उन मंत्रों का उप- भ्यास करते हैं ( अग्नये ) इत्यादि से । (२) पेक्षण को अग्नि में फेंककर (अपहता) इत्यादि मंत्र दक्षिणाग्नि के दक्षिण और स्फ्य से एक रेखा निकास कर फिर अभ्युक्षण कर (रूपाणि) प्रत्यादि मंत्र को पढ कर रेखा के दक्षिणा भाग में उल्पक को स्थापन कर फिर रेखा के ऊपर सकृदाच्छिन्न कुशों को विछाय औजलसेचन कर उत्तान- हस्त से पिण्ड स्थापन करे औ स्थापन काल में 'असावेतत् ' इत्यादि का सञ्चारण करे इसी प्रकार ही मंत्र उच्चारण कर दक्षिण की ओर पितामह तथा प्रपितामह के प्रति पिण्डप्रदान करे (ययावनैजित) जहाँ २ पर अपनेजन किया है वही २ पर पिण्ड रखे, यह इन चार सूत्रों का भाव है। (१) यदि यनमान के दो पिना होय अर्थात्-एका साक्षात् पिता श्री

७०
पिण्डपितृयज्ञयामासा।
जीवान्तर्हिताय, येभ्यो वा पिता तेभ्यः पुत्रः, होमान्ते
चा ६७८।९।१०।
सू०'अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागं पितर आरषा-
यध्वम् इति, उदङ् पाहत्य, त्रिरातमनादासित्वा,
अमिदन्त पितरो यथाभागमवीरपतेति प्रतिपा-
हत्य, तथैवाचनेज्य १३।१२।१३।१४।१५।
सू०
नमो वःपितरो जीवाय नमो वःपितरः शोषाय
नमो वः पितरो घोराय नमो वः पित्तरो रसाय नमो
वः पितरो वलाय नमो वः पितरो मृत्यवे नमो वः
पितरो मन्यवे नमो वःपितरः स्वधायै नमोवःपितरः
पितरो नमो व:* येऽत्र पितर: स्थ यूयं तेषां श्रेष्ठा
एक गोद लेने से धर्म का पिता होय वो एक रेखा में दौर पिण्ड स्थापन करे,
परन्तु मिस का पिता जीवता होय वह पिता के नाम से पिण्ड मत रखे।
एवं जीवत्पिता आदि के व्यवधानवाले जो अन्य मृतक है उन के मति
भी पिण्यदान मत करे, भयया जिनों के प्रति पिता ने पिण्ड दिया। उन्हों
फे प्रति रोपुर पिण्ड प्रदान करे, अपना जीवत् पिता वाला पुत्र होमपर्यन्त
ही पिण्डपितृपा करे पिण्डदान न करे, कर तो उन पिण्डोंका थग्निमेंही होम
कर, यह विचार पूर्व स्पष्ट है इस से फिर किसने की कुछ आवश्यकता नहीं
यह इन पांच सूत्रों का भाव है,
(१) पिण्डदान से अनन्तर (अत्रपिता) इत्यादि मंत्र का जप कर फिर
सनर की और पर्यावर्नन कर तीन प्राणायाम करणपूर्वक यहां पर निवास कर
फिर दक्षिणमुस हो कर ( अपीमदन्त ) इत्यादि जप करे, फिर अवमेजन कर
(नमायः ) इत्यादि का जप करे।
* ई पिवरी को पिलरोक में अप पिचर है उनमें से श्रेष्ठ आप होवो

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। ७१ भूयास्थ य इह पितरो मनुप्या वयं तेषां श्रेष्ठा भू- यास्मया अत्र पितर: स्वधायुष्माकं सा य इह पितरः राधतु* अस्माकं स गृहान्नः पितरोदत्तेति ४।५।१ । सू० एतहः पितरो वासो वध्वं पितर इति त्रीणि सूत्राण्युपन्यरय, 'ऊर्ज वहन्तीरमृतं घृतं पय. कीलालं परिस्रुतं स्वधा स्थ तर्पयत नः पितृन्' इत्युदकशेष निनीय, अवाय पिण्डान, अवधाय प्राश्नीयात्, ब्राह्म- णाय वा दद्यात्, अपो चाऽभ्यवहरेत् २।३।४।५।६१७॥ सू० मध्यमपिण्डं पत्नी पुत्रकामा प्राश्नीयात् (आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्करस्रजं यथेह पुरुषो ऽसद्) इति ८॥ सू०उल्मुकमग्नौ कृत्वा, सकृदाच्छिन्नाननुप्रहत्या९१० औ जो मनुष्य लोक में पितर हैं उन में से श्रेष्ठ हम हावे, औ जो पिमिय स्वधा वह आप की होय औ जो इस लोक में समृद्धि है वह हमारी होय, हे पितरो आप हमारे प्रति गृह पत्र आदि का प्रदान करो। (*) एधतु-इस पाठ में आर्ष औ द्धि अर्थ जानना । (१) (एतहः) इत्यादि पद कर पिण्डों पर तीन सूत्र को रख कर फिर (ऊर्जा) इत्यादि पढ़ कर अवनेजनशेप जल को वहां गिरा कर, पिण्डों को स्थाली में रख कर भक्षण करे या बाह्मणों के प्रति प्रदान करे वा जल में फेंक दे यह ६ सूत्रों का भाव है। (२) पुत्र की कामना वाली यजमान की पनी (आधत्त) इत्यादि पढ़ कर मध्यम पिण्ड को भक्षण करे। (3) उल्मुक को औ सकृदाच्छिन्न फुशों को अग्नि में फेंक कर पितृयज्ञ को समाप्त करे। सूंघ कर, :

पिण्डपित्यज्ञमीमांसा। सू० अग्निहोत्र: यवाग्वैव सायप्रातः, स्वयं होमश्च पर्वणि ११११२ । एतेनैव धर्मणानाहिताग्नेः पिण्डपितृयज्ञः क्रियेत् , ......। हरिः, ग्री, भातत् सत् । ( यजुर्वेदीयकात्यायनीतसूत्राणि) सू० +अपराहे पिण्डपितृयज्ञश्चन्द्रादर्शनेऽम.वा- स्यायाम् ४११११ सू० देक्षिणानोश्रपणं, होमश्च २।३ । सू० परिस्तीर्य तं पूर्ववत्पात्रासादनमेकशः,४ अप- रेण गार्हपत्यं चस्मपूर्ण सुचं वा तूष्णीं गृहीत्वोत्तरेण (१) सायं श्री प्रातः काळ यवागू से अग्निहोत्र करे, औ पर्व में स्वयं आप ही यजमान होम करे (चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या, पूर्णिमा, रविवार, संक्रान्ति, यह छ पर्व है। (*) इसीप्रकार से भनाहितानि-अग्नि के आधान से रहित भी पुरुष पिण्डपित्यज्ञ का अनुष्ठान करे । (1) चन्द्रमा के क्षय कर के युक्त जो अमावस्या है विस में अपरान के समय में पिण्डपितृयज्ञ करे । (२) दक्षिणामि में चर का पाक को भी उसी में होम करे । (३) पूर्वोक्त पौर्णमास याग की तरह तिस आग्नि को कुशों से आच्छा- दित कर दक्षिणाग्निके उत्तर और स्फ्य आदिक एक २ पानों को स्थापन को, गाईपत्य से पश्चिम दिशा में ( अपूर्ण) ब्रीरिकर न पूरित स्थाली वा खुम् को स्प्णी ग्रहण कर फिर दक्षिणाग्नि से उत्तर और दक्षिणमुख स्थित छोकर ब्रीहियों को कूटे, परन्तु कटे हुये उन धान्पों को एक बार ही फटकारे पारंवार नही, यह उक्त सलों का भाव है , पिण्डपितृयज्ञमीमांसा । दक्षिणाग्निमवहन्ति तिष्ठन् ५ सकृत् फलीकरोति ६ । सू० सारतण्डुलमपूर्ण अपयित्वाऽभिघार्योदवास्य मेक्षणेन जुहोति, अग्नय इति सोमायेतिच ७। *प्राप्य तद् दक्षिणेनोल्लिखति (अपहता) इत्य- . परेण वा ८॥ सू० उल्मुकं परस्तात्करोति (येरूपाणि) इति ९। सू० उदपात्रेणावनेजयति अपसव्यं सव्येन वोद्धरणसामर्थ्याद् (असाववनेनिक्ष्वेति) यजमानस्य पिटप्रभृतीन् त्रीन् १०॥ सू० उपमूलं सकृदाच्छिन्नानि लेखायां कृत्वा [१] जैसे पके हुये चरु से स्थाली पूर्ण न होय ऐसे तुपादिरहित उन तंडलों को पका कर औ अभिधारण कर ( उदास्य) दक्षिणाग्नि से उत्तर स्थापन कर (अमये) इत्यादि पढ़ कर मैक्षण से तीन पार अग्नि में वन करे । * तिस मेक्षण को दक्षिणाग्नि में फेंक कर फिर अग्नि से दक्षिण वा पचिप की और 'अपडता' इत्यादि पढ़ कर स्पय से एक रेखा निकासे । नये रूपाणि-इस को पढ़ कर रेखा से दक्षिण मदेश में उल्युक स्थापन करे। (२)(असाववननिक्ष्व) यह पढ़ कर यजपान अपने पिता पितामह मपितामह के प्रति कमण्डलु द्वारा अवजन करावे । (३) मूल के समीप एक ही प्रयत्न से उत्पाटित कुशों को इस रेखा पर विजय कर जहाँ २ पर अवनेनन किया है वहां १ पर पिण्ड स्थापन करे, भी स्थापन करने के समय में असावेतत्ते यह उच्चारण करे, एके-कोई एक यह कहते हैं कि (येचत्य मनु ) यह भी संग उच्चारण करे, यह दोनो मतों का भाव है।

७४
पिण्डपितृयज्ञमीमांसा।
यथावनिक्तं पिण्डान् ददाति (असावेतत् त) इति ११|
सू० ये च त्वामनु) इति चेके १२ ।
सू० अत्र पितर इत्युक्तोदलास्ते आतमनाद्१३ ।
सू० आटत्य (अमीमदन्त) इति जपति १४ ।
सू० 'अवनेज्य पूर्ववन्नीविं विस्रस्य ( नमो व)
इत्यञ्जलिं करोति १५।
सू० * एतद् व, इत्युपास्यति सूत्राणि प्रतिपिण्डम्१६
ऊर्णा दशा वा १७॥वयस्युत्तरे यजमानलोमानि वा१८
सू० ऊर्जमित्यपो निषिश्चति १९ ।
सू० अवधायावजिघ्रति यजमानः २० ।
(१) अन पितरो मादयध्वम् इत्यादि पद कर उत्तर ओर मुख कर तीन
माणायाम करे, फिर दक्षिण मुख होकर अमीपदन्त इत्यादि का जप करे, यह
दोनों सूत्रों का भाव है।
(२) पूर्व की तरह अपने मन कर नीवि को खोलकर (नमोवा) इत्यादि
मंत्रों से छै वार प्रणाम करे ।
(-) (एतद् वः पितरो वासः) यह १८ कर प्रत्येक २ पिण्डों पर तीन २
मंत्र स्थापन को, पा भेडी के रोम प्रदान करे, अथवा वस्त्र की दशा का
मदान करें, वा पचाशवर्ष से अधिक अवस्थावाला यजमान होय तो अपनी
छाती के रोम प्रदान करे, यह-१६ । १७ । १८ इन नीन सूत्रों का भाव है।
(३)(ऊ वहन्तीः) इत्यादि को पढ़ कर अपने जनशेष जल को पिण्डों
-
पर गरे।
(१) पिण्डों को पाली में रख कर यजमान उन का आघाण को, औ
परमुक भी फलों वो अग्नि में फेके, यह दोनों मूत्रों का भाव है

.
4
पिण्डपिठ्यापीमांसा
सू. उल्मुकसकृदाच्छिन्नान्यग्नौ २१ !
सू० आधत्त-मध्यमपिण्डं प्राश्नाति पुत्रकामा २२।
सू० प्रेतेभ्यो ददाति २३ ।
हरिः, श्री, चोम् तत् सद् ।
वोधायन मुनि ने भी (अथैतास्तिलमिश्रापः छ प्रति-
प्राह्य गन्धेन माल्येन चालकृत्याग्नौ करिष्यामीत्यनुज्ञातो-
ऽग्निमुपसमाधाय संपरिस्तीयं तिस्त्र आहुतीर्जुहोति । इस
प्रकार श्राद्ध का विशेष निरूपण किया है, विस्तरभय से
निखिलसूत्रों का उपन्यास नहीं किया गया है ।
+ इदानीं कुछ विशेष वोधनार्थ आपस्तम्बीयश्रौतसूत्रों
का उपन्यास किया जाता है,
(आपस्तम्वीयश्रौतसूत्राणि )-
माधत्त) इत्यादि मंत्र को पढ़ कर पुत्र की कामनावाली यजमान
की पत्नी मध्यम पिण्ड को भक्षण करे ।
(२) यह जो पिण्डप्रदान कहा है सो मृतकों के प्रति ही कहा है कुछ
जीवतों के मति नहीं।
* ब्राह्मणों के उपवेशन से अनन्तर विलमिश्रित जल को ब्राह्मणों
के हाथ में दे कर औ गन्धमाल्यादि से उन को अलंकृत कर (मैं अब अमि
में होम करता हूं) इस प्रकार ब्राह्मणों की आहा को लेकर अग्नि को संमुख
स्थापन कर कुशों से आच्छादित कर तीन आहुति करे ।
+शलयजुर्वेदीय कात्यायन बोधायन पनियों के वचनों की संमति
कहकर अब कृष्णयजुर्वेदीय आपस्तम्बात सूत्रों की संमति दिखात (इद्वानी)
इत्यादि से।

पिरपितृयज्ञमीमांसा सू० अमावास्यायां यदहश्चन्द्रमसं न पश्यन्ति तदहः पिण्डपितृयज्ञं कुरुते १ । प्रथम -प्रत्र,०, परब,.. भापा-जिसदिन चन्द्रमा को लोक न देखें उस दिन अमावास्या में पिण्डपितृयज्ञ करे। ७ यद्यपि अमावास्या कथन से ही चन्द्रमा के अंद- र्शन का लाभ हो सकता है तथापि राजसूयादि यज्ञों में क्रियमाण जो अमावास्या नामक कर्म है उसका ग्रहण मत हो जाय, इस लिये (जिसदिन चन्द्रमा का अभाव होय) यह कहा है। एवं चन्द्रमा का अदर्शन कभी मेघों द्वारा अन्य दिन में भी हो सकता है, इस लिये ( अमावास्यायाम् । यह + वास्तव से तो “या पूर्वाऽमावास्या सा सिनीवाली योत्तरा सा कुहूः” इस श्रुति + से 'दृष्टचन्द्रा सिनीवाली नष्टचन्द्रा * यहाँ पर अमावास्यापामित्यक्ते दाक्षायणराजसूयकाण्डपापिना- मयनसारस्वतसतादौ पक्षमध्ये अमादास्प पिण्डपितृयज्ञमाप्तः तद्न्यावृत्यर्थ चन्द्रादर्शन-इति विशेषणम्, चन्द्रादर्शनमभ्रादिनापि भवतीत्यतोऽमावास्या मिति चन्द्रादर्शनशन्देनात्र चन्द्रपातः परमक्षयो लक्ष्यते न क्षयमानं तस्य प्रतिदिनं सद्भावाद् , अतएव (सीणे ददादि) इति श्रुतिः संगच्छते" पाध्याय ने एतत्सूत्रसमानार्थक कातीपमूत्रों की व्याख्या में पदकत्स किया है उस के अनुसार से कहते हैं, " यद्यपि " इति । भर स्वामीजी अपनी कहा से पदों की व्यवस्था करते हैं. ( ar- स्वर ) इत्यादि से । +सामबंदीय पाशवाह्मण ४ मपा० ख० ६ । इसप्रकार कर्को-

७७
पिणपितृपङ्गमीमांसा
कुहूर्मता' इस स्मृति से अमावास्या दो प्रकार की है एक
तो चतुर्दशी तिथि में अपराहकाल में होनेवाली दृष्टचन्द्रा,
मो एक अपराह्न के उत्तरकाल में प्रतिपद् के योगवाली
नष्टचन्द्रा, तहां जो पूर्व अमावास्या दृष्टचन्द्रा है उस का
नाम सिनीवाली है यो जो उत्तर अमावास्या नष्टचन्द्रा हे
उस का नाम कुहू है, तहां कुहू नामक अमावास्या का महण
होय सिनीवाली का नहीं इसलिये (चन्द्रमसं न पश्यन्ति)
यह कहा हे ।
सू० अपराह्नेधिवक्षसूर्ये वा पिण्डपितृयज्ञेन
चरन्ति १-७-२।
भाषा-अपराह्नकाल में अथवा अधिक्षकसूर्यकाल में
पिण्डपितृयज्ञ करे।
सू० अपां मेध्यं यज्ञियम् इति समूलं सकृदा-,
च्छिन्नं बर्हिराहरति १-७-३।
भाषा-(अपां मेध्यं यज्ञियं + सदेवं शिवमस्तु मे आच्छता
* कालपाधवीये व्यासः।
• यहां पर अधिक मीमांसा की आकाक्षा होय तो निर्णयामृत पा
मदनपारिजात के समय स्तवक को अशोकन करो।
जिस समय में पृथिवी को त्याग कर केवळ वृक्षों के ऊपरी
सूर्य की किरणों का निवेश होता है उस काल का नाम अधिक्षमूर्य है।
• पजु, से, मा, को, ३ प्र, ७ अनु ४, अर्थात् नलों का सारभूत श्री
पवित्र सधा यज्ञयोग्य, औ देवोपयोगी जो वाह सो मेरे प्रति कल्याणकारी
होय, माप को छेदन करने वाला जो मैं हूं सो हिंसागन्य पार से युक्त
हुवासित मत होई किन्तु शतवर्ष जीवनयाला हो।

७८ पिण्डफ्तियज्ञमीमामा। वो मा रिपं जीवानि शरदः शतम् । इस मंत्र को पढ़ कर मूल के सहित एक प्रयत्न से उत्पाटित कुशों का आहरण करे। सू० सकृदाच्छिन्नानि वा तृणान्युपमूलं दिनानि (४) सू० दक्षिणाप्रागर्द दक्षिणाग्निं परिस्तीर्य द- क्षिणतः पश्चाहा दर्भान् संस्तीर्य दक्षिणाप्राञ्चि एक- कशः पिण्डपितृयज्ञपात्राणि प्रयुनक्ति स्फ्यं मेक्षणं कृष्णाजिनमुलूखलं मुसलं शूर्पमाज्यस्थाली चरु- स्थाली येन चान्येनार्थो भवति (५) सू० दक्षिणत: प्रागीपं ब्रीहिमच्छकटमवस्थित भवति (.६) सू० अध्वर्युरुपवीती स्थालीमेकपवित्रेणान्तर्धाय तया दक्षिणतः शकटादधिनिर्वपत्युत्तरतो वा (७) A (2) अपवा (उपमझ ) मूल के समीप से एकवार (दिनानि) छेदन किये हुये दर्भतृण वा अन्य यज्ञोपयोगी तृणों का आहरण करे । (५) दक्षिण की ओर अप्रनाले वा प्राग्भग्रवाले कशों से दक्षिणामि को भाच्छादित कर फिर दक्षिण वा पधिप की और दों को विछाय कर दक्षिणपूर्व कोण में समय आदि एक २ पात्रों को स्थापन करे । अर्यात्-निन२ पात्रों का मयोजन होय उन सब पानों को वहां पर स्थापन करे। (६) दक्षिण से ईपत् पूर्व की ओर एक नीदि का शकट स्थापन करे । (७) अध्वर्य वा यनपान यज्ञोपवीती हो कर एक बस से स्याली को दांप पर शाट के दक्षिण की ओर से वा उचर की ओर से शकटारोपण कर शकंद में से उस पात्र में प्रीहि को निकासे ।

१
।
पिण्हपित्यज्ञमीमांसा।
सू० तां पूरयित्वा निमार्टि [८] |
सू० मृन्मये निर्वपत्ति पितृभ्यो वो जुष्टं निर्वपा-
मीति तणी वा [९]।
सू० अपरेणान्वाहार्य पचनं प्रत्यगुदग्यीवे
कृष्णाजिनउलूखले प्रतिष्ठिते दक्षिणाप्राची तिष्ठन्ती
पत्नयवहन्ति परापावमविवकम् [१०] ।
सू० सकृत्फलीकरोति [११] ।
सू० दक्षिणानौ जीवतण्डुलं अपयति [१२] ।
सु० अपहता असुरा रक्षांसि पिशाचा वेदिसदः
इत्यन्तरा गार्हपत्यान्वाहार्यपचनी दक्षिणपूर्वेण वा
ऽन्वाहार्यपचनं दक्षिणाप्राचीमेकस्मयां पराची वेदि-
मुद्धृत्य (शुन्धतां पितर) इत्यद्भिरवोक्ष्य (आयन्तु
-~-(८) उस पात्र को पूरण कर फिर हिलोरा दे कर घान्यों को स्थाळी के
के
(९) पितृभ्यः इत्यादि पढ़कर वा मौन धारण कर उन धान्यों को मृतिका
के पान में स्थापन करे।
(१०) दक्षिणमि से पश्चिम और पश्चिमोत्तर ग्रीचा वाले कृष्ण मृगचर्य के
ऊपर ऊखल रख कर दक्षिण पूर्व स्थित हुई यजमान की पनी उन धान्यों
को फूटे, (परापावम्) परापूय पराप्य, (अधिवेक) अधिविच्याऽविषिच्य,
ण तुपमोहण परावपन, सतपचितुषाणां पृथक् करणं विवेकः, अर्थात् एक बार
सूर्य से फटकारे अमनीया मत करे । (११) यह सून स्पष्टार्य है।
(१२) जिस तरह से निखिल रूप से तण्डलों का पाक न होय किन्तु
कुछ २ जीवते रहें इस प्रकार उन तण्डलों को पकाचे ।
घरावर करें।
.

८० पिण्यपियामीमांसा। पितरो मनोजवसः) इत्यभिमन्य सकृदाच्छिन्नं बर्हि- रूर्णा (मृदु स्योनं पितृभ्यस्त्वाभराम्यहं अस्मिन् सी- दन्तु मे पितरः सौम्याः पितामहाः प्रपितामहाश्चा- नुगैः सह ) इति सकृदाच्छिन्नेन बहिषा वेदि स्तृणाति [१३]। इति सप्तमी कण्डिका। सू० उत्पूतेन नवनीतेनानुत्पूतेन वा सर्पिषा स्थालीपाकमभिघार्य एकस्फ्यायां मेक्षणमासाद्य स्थालीपाकमासादयात [१] । सू० दक्षिणतः कशिपूपवर्हणमाजनमभ्यञ्जनमुद- कुम्भमित्येकैकश आसादयति [२] । सू० अध्वर्युरुपवीती दक्षिणं जान्वाच्य मेक्षणमुप- स्तर्य तेनावदायाभिघार्य सोमाय पितृपीताय स्वधा (१३) ( अपहता) इत्यादि पढ़ कर गाईपत्य औ दक्षिणाग्नि के मध्य में पा दक्षिणाग्नि से दक्षिण-पूर्व की ओर स्पप से दक्षिणपाची एक रेखा निकासे फिर (शुन्धन्ताम् ) इत्यादि पढ़ कर जल गिरावे फिर ( आयन्तु) इलादि से अभिमंत्रण कर सकदाच्छिम कुशों को लेकर (मृदुस्योनम्) इत्यादि मंत्र को पट कर स्थान के लिये पितरों की प्रार्थना कर वैदि को उन कुशों से भाच्छादित करे। (१) गरम कर पूत हुये पाखन से वा घृत से स्यालीपाक को अभिधारण कर रेखा के ऊपर मेक्षण को रख कर वहां स्थालीपाक को स्थापन करे । (१) स्थालीपाक से दक्षिण तरफ--पंच, मिरहाना, कज्जल भवटन, जल कुम्भ को स्थापन करे।

पिण्डपितृयज्ञमीमांसा नम इति दक्षिणानौ जुहोति (३) (यमायाङ्गिरसे पि- तृमते स्वधा नम) इति द्वितीयाम्, (अग्नये कव्यवाह- नाय स्वधा नम) इति तृतीयाम् (४)। सू० ये मेक्षणे तण्डुलास्तान हुत्वा तूष्णीं मेन- णमादधाति (५)। सू० न यमाय जुहोत्येके (६) । सू० अपयन्वसुराः पितृरूपा ये रूपाणि प्रति-, मुच्याचरन्ति, परा पुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टोललो- कान् प्रणुदात्यस्मात् (ये देवा: + पितरो ये च मानु- (१) अध्वर्यु वा यजमान उपवीती होकर दक्षिणनानु को निवाय कर मेक्षण का उपस्तरण कर तिस मेक्षण से चरु का रखण्ड कर भी अभिधारण कर (सोमाय ) इत्यादि पद कर दक्षिणाग्नि में हवन करे। (2) फिर ( यमाय) इत्यादि पढ़ कर द्वितीय आहुति करे, फिर 'अग्नये' इत्यादि पढ़ कर तृतीय आहुति करे । () माहुति से अवशिष्ट जो मेक्षण में संश्लिष्ट तण्डुल है उन का होमकर मौन धारण कर मेक्षण को अग्नि में फेंके, यह जो मेक्षण के संग लगे ये चरु का शेप रा है मरेतीशी आहुति में जानना कुछ गृह नहीं जानता कि रई चतुर्थी आहुति का विधान है क्योंकि ऐसे माननेसे (तिस आहुती र्जुहोति ) इम श्रुति के सह विरोध होगा। (६) कोई यह कहते हैं कि यम के नाम का होम न करे । जो देवतारूप पितर हैं, औ जो मानुषरूप पिता हैं अथवा जो गर्भ में ही मर गये हैं औ जो बगल में फेंके गये हैं औ जो गाड़ कर निकामे गये हैं, औजो पृथिवीमें गाड़े गये हैं सो सभी यहां आन कर भली प्रकार से ही को मास होवें।

पिण्डपित्यसमीमांसा घे ये गर्भ मरुत ये परास्ता, य उद्धता उत ये नि- खातास्ते सम्यश्च इह मादयन्ताम्) (ये रूपाणि प्रति- मुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति, परा पुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टांल्लोकान् प्रणुदात्यस्माद्) (ये ज्ञातीनां प्रतिरूपाः पितृन् माययाऽसुराःप्रविष्टाः परा पुरो निपुरो ये भरन्त्यग्ने तानस्मात्प्रणुदस्व लोकाद) इति दक्षिणाग्नेरेकोल्मुकं धूपायद् हसति (७) । सू० दक्षिणपूर्वमवान्तरदेशंसकृत् स्फ्येनोल्लिख्य 'उ- दीरतामवर' इत्यद्भिरवोक्ष्योल्लिखितान्ते निदधाति(८) सू० यजमानोऽत ऊई प्राचीनावीती कर्माणि करोति (९)। (७) माया कर हमारे पितरों के समान रूप को धारण करने वाले जो असुर हैं सो इम स्थान से दूर गमन करें इस अर्थ वाले " अपयन्तु इत्यादि मंत्रों को पा कर दक्षिणानि से एक उल्मुक को ग्रहण करे, उल्मुक कैसा हो कि "धूपायद्" धूमवाला। (८) दक्षिणपूर्वरूप अन्तर देश को एक वार स्फ्य से उल्लेखन कर (दीरताम् ) इत्यादि मंत्र पढ कर जल से उस रेखा को प्रोक्षण कर उस के समीप उरमुक को स्थापन करे, "उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः साम्पासः असु य ईयाटका मनज्ञास्तेनोऽवन्तु पितरो इवेषु" यज०म०१९ मं १९ यह संपूर्ण मंत्र है, जो हमारे पितर जिस २ स्थान में है वह उस २ से उत्कृष्ट स्थान को प्राप्त हो औ नोचायु रूप तया सत्यवादी सर्व के मित्र हमारे पितर हैं वह इस यज्ञ में आगमन कर हमारी रक्षा करें, यह मंत्र का भाव है। (१) इदानी भो कर्म आगे किये जायेंगे बद्द अध्ययु मत करें किन्तु प्राचीनावीवी से कर यजमान ही करे।

पिण्डपित्यज्ञमीमांसा!
सू० मार्जयन्तां मम पितरो मार्जयन्तां मम पिता-
महा मार्जयन्तां मम प्रपितामहा, इति एकस्फ्यायां
वीनुदकाञ्जलीन् निनयति (१०)।
सू० प्रसव्यं वा त्रिः परिषिञ्चति (११)।
सू० त्रीनुदपात्रान् वाजसनेयिनः समामनन्ति (१२)।
इत्यष्टमी कण्डिका।
सू० सव्यं जान्वाच्यावाचीन पाणिः सकृदाच्छिन्ने
बर्हिषि दक्षिणापवर्गान पिण्डान ददाति एतत्ते तता-
सौ ये च त्वामनु इत्येतः प्रतिमन्त्रम् (१) ।
सू० तूष्णीं चतुर्थम् (२) स कृताऽकृतः (३)
प्रपितामहप्रकृतीन वा (४)।
(१०) (मार्जयन्ताम्) इत्यादि पढ़ कर उस रेखामें तीन अञ्जलि जलकी गरे।
(११) अथवा प्रसव्य होकर उस स्फ्यकृत रखाके चारो ओर जळ गिरावै
बीच में नहीं।
(१२) शुक्लयजुर्वेदी तो अञ्जलि के स्थान में तीन जळपात्रों के ही स्थापन
की आज्ञा देते हैं।
(१) बामजान को निवाय उत्तानइस्तवाला हो कर सकृदाच्छिन्न कुशों
के ऊपर दक्षिणापवर्ग तीन पिण्डों को स्थापन करे, औ स्थापन काल में
(एतत् ते) इत्यादि का उच्चारण करे ।
(२) मौन धारण कर एक चतुर्थ पिण्ड और स्थापन करे ।
(३) यह चतुर्थ पिण्डदान किसी शाखा में लिखा है किसी में नहीं इस
लिये किया भी जाता है जो नहीं भी किया जाता है।
(8) अथवा मपितामह से आदि ले कर पिण्ड प्रदानादि करे, अर्थात्-
चाहे पिता पितामह मपितामह इस मकार से चाहे मपितामह पितामह पिता इस
प्रकार से पिण्डमदान करे।

८१ पिण्डपित्यज्ञमीमांसा सू० नाऽनाम गृहीतं गच्छति (५) यदि वन्धून् न विद्यात स्वधा पितृभ्यः पृथिवीषद्भ्य इति प्रथम पिण्डं दद्यात्, स्वधा पितृभ्योऽन्तरिक्षसभ्य, इति द्वितीयम, स्वधा पितृभ्यो दिविपद्भ्य, इति तृती- यम् (६)। सू० यदि द्विपिता स्यादेककस्मिन् पिण्डे हो हावुपलक्षायेद् (७)। सू० यदि जीवपिता न दद्यादाहोमात् कृत्ला विरमेद् (८)। सू० यन्मे माता प्रममाद यच्चचाराननुव्रतं, तन्मेरे- तः पिताटङ्क्तामाभुरन्योपपद्यताम्, पितृभ्यः स्वधा- विभ्यः स्वधा नमः, पितामहेभ्यः स्वधाविभ्यः स्वधा नमः, पूपितामहेश्यः स्वधाविभ्यः स्वधानमः, इत्युपस्थाय अत्र पितरो यथाभागमादयध्वम्, इत्युक्ता पराङ्आ वर्तते (९)। (५) बिना नाम के गृहण से पितरों को प्राप्त नहीं होता है इस से अवश्य नाम ग्रहण करे। (६) यदि नाम न मात हो तो (स्वधा ) इत्यादि मकार से मदान करें। (७) यदि दो पिता होय तो एक पिण्ड में दो दो का नाम उच्चारण करे । (6) पदि यजमान के पिता आदि में से कोई जीवता हो तो पिण्ड- दान मत करे किन्तु होमपर्यन्त कर्ग कर पितृयज्ञ को समाप्त करे। (९) जो मेरी माता ने प्रमाद से पातिनलत का भार किया है तिस पर- पिण्ड पितृयज्ञमीमांसा। सू० उष्मणो व्यावृत्त उपास्ते (१०)। सू० अमीमदन्त पितरः सोम्या, इति व्याटत्त ऊष्मणि अभि पर्यावर्ततेऽव्यारत्ते चा (११)। 'सू० यः स्थाल्यां शेषस्तमवजिघ्रति (ये समानाः सुमनसः पितरो यमराज्ये तेषां लोकः स्वधा नमो यज्ञो देवेषु कल्पंतां, वीरं धत्त पितर) इति (१२)। सू० आमयाविना प्राश्योऽन्नाद्यकामेन प्राश्यो योऽलमन्नाधाय सन् नाद्यात् तेन वा प्राश्यः (१३)। सू० पूर्ववंदेकरफ्यायांत्रीनुदकाञ्जलीनुपनिनीयाss- जनाऽभ्यञ्जने वासश्च त्रिरनुपिण्डं ददाति (१४) । पुरुपसंचन्धि संकल्परूप दोप से दुध जो मातासंबन्धी रज है उस को पिता शोधन करे इस अर्थ वाले ( यन्मे माता) इत्यादि मंत्र तथा (पितृभ्यः) इत्यादि मंत्र से पितरों का उपस्थान कर फिर ( अत्र पितरः) इत्यादि पढ़ कर वहां से फिर कर उत्तरमुख हो कर स्थित होवे। (१०) जब तक पिण्डों में उष्णता की निवृत्ति न होय सर तक उत्तरमुख स्थित होवे । (१) जगता के नित्त हो जाने पर का कुछ उगता रहने पर फिर दक्षिणमुख हो औ ( अमीमदन्त ) इत्यादि का जप करे । (१२) (ये समाना ) इत्यादि मंत्र पढ़ कर जो स्थाली में शेप अन्न है उस को मूंधे। (११ क्षय आदि रोग कर के युक्त जो पुरुप है यह स्थाली शेप चर को भक्षण करे अथवा जो अनाधकाम है अर्थात् अन्न के होने पर भी अजी- र्णरोग से मुक्ति शक्ति से शून्य है वह उस को भक्षण करे । (११) पूर्व की तरह स्फ्यकृत रेखा में तीन नल की अञ्जलियों को सम- पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। सू० आह्व ततासावाझ्व पितामहासावा- क्ष्व प्रपितामहासावित्याञ्जनम्, एवमभ्यञ्जनमभ्य- झ्वेति मंत्रं सं नमति (१५। १६)। सू० यदि नामानि न विद्याद् (आञ्जतां मम पितर आजतां मम पितामहा आजतां मम प्रपि- तामहा) इत्याञ्जनम्, एवमभ्यञ्जनमभ्यञ्जतामिति मंत्रं सं नमति (१७)। इति नवमी कण्डिका । सू० (एतानि वः पितरो वासांस्यतो नोऽन्यत् पितरो मा योप्ट) इति वाससो दशां छित्त्वा नि दधाति ऊर्णास्तुकां वा पूर्व वयसि, उत्तर आयुपि स्वं लोम (१)। पण कर फिर मत्येक २ पिण्डों के ऊपर तीन पार कज्जल, अवटन, वसन का मदान करे। . (१५-१६) ( भारस्य तत ) इत्यादि पढ़ कर अञ्जन समर्पण करे, एवं ( अभ्पजनमभ्पहत्व तत) इत्यादि पढ़ कर भवटन समर्पण करें। (१७) यदि पिता आदि का नाम परिझात न होय तो (आअताम) इत्यादि पढ़ कर अञ्जन औ अभ्पसन प्रदान करे। कहीं (आअन्ता) यह पाठ है। (१) पंचाश वर्ष से न्यन अवस्था पाया यजमान होप तो (एतानि का) इत्यादि पद कर वस्त्र की दशा वा भेरी के शेमों को छेदन कर पिण्डों पर रक्खे औ यदि पंचाश वर्ष से अधिक पप पाला हप तो अपनी गती के हीराम छेदन कर स्थापन करे।

बिपियामीनीमा!
सू० वीतोप्मसु पिण्डेपु 'नमो वः पितरो रसाय,
इति नमस्कारान् जपति (२)।
सू० (ग्रहाना पितरो दत्त सदी वः पितरो
देष्म ) इति पितनुपतिष्ठते (३)।
म. (उर्ज वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं
परिमृतं, स्वधा स्थ तर्पयत में पितॄन् ) इत्युदकं
नि नयति (१)।
सू० (मनोऽन्बाहुवामह) इति मनस्वतीभिरुपतिष्टते(५)
म० (उत्तिष्टत पितरःप्रेत राग यमस्य पन्यामनुवेता
पुराणं, धत्तादस्मासु द्रविणं यन भद्रं प्रणो ब्रूताद्
भागधां देवतासु) इति पित्तनुत्थापयति (६) ।

८८
पिण्डपितृयज्ञमीमांसा
सृ० (परेत पितरः सोम्या ) प्रवाहण्या पितृन्
प्रवाहयति (७)।
सू० (प्रजापते न त्वदेतानि) इति यज्ञोपवीती
गार्हपत्यदेशं गच्छति (८)।
सू० 'यदन्तरिक्षम्' इतिपङ्क्तया गार्हपत्यमुप
तिष्ठते (९)।
सू० अपान्त्वौषधीनां रसं प्राशयामि भृतकृतं
गर्भ धत्स्व इति मध्यमं पिण्डं पत्नये प्रयच्छति (१०)
सू० (आधत्त पितरो गर्भ कुमारं पुष्कर
(७) (परेत पितरः ) इत्यादि पढ़ कर पितरों की प्रवाहणी करे, प्रवाहणी
नाम (प्रस्थान)का है।
(८) "मनापते न त्वदेतान्यन्यो विश्वा रूपाणि परिता बभूव, यकामास्ते
जुहुमस्तन्नोऽस्तु वयं स्याम पतयो रयीणाम् ” यजु० अ० २३ मं० ६५ इस को
पद यज्ञोपवीती होकर गाईपत्य अनिके समीप उपस्थित होय । हे प्रजापते आप
से अन्य कोई भी देवता अनेक रूप वाला नहीं है इससे आप ही अनेक रूप
पाले हो कर प्रपंच का परिभव ( संहार ) आदि करते हो, हे अन! जिस का-
मना से हम लोक शेप करते हैं सो वामना हमारी पूर्ण होय भी धन के इम
सामी होय, यह इस मन का भाव है, करवंद में तो (विश्वा रूपाणि) इम
के स्थान में (विश्वा जातानि) यह पाठ है औ यज्ञ के १० अ० २० मंत्र में
तो ( यत्कामास्ते जुहपस्तमोऽस्त्वयममुप्य पितासारस्य पितावयस्याम पतपो-
रयीणाम् ) इतना विशेष है।
(९) ( यदन्तरिक्षम् ) इत्यादि पतिउन्द वाले मंत्र को पढ़ कर गाईपत्य
भनि का उपस्थान करे।
(१०) (अपान्त्वौषधीनाम् ) इत्यादि पढ़ कर मध्यम पिण्ड का पत्नी के
भति प्रदान करे।

पिण्डपित्यज्ञमीमांसा। यथेह पुरुषोऽस) इति तं पत्नी प्राश्नाति पुमांसं ह जानुका भवतीति वि ज्ञायते (११) । सू० (ये सजाता: + समनसो जीवा जीवेषु मा- मकाः, तेषां श्रीमयि कल्पतामस्मिन् लोके शतं समा) ..इत्यवशिष्टानां यजमानः प्राश्नाति न वा (१२) । सू० स्थाल्यां पिण्डान् समवधाय (ये समाना) इति सकृदाच्छिन्नमग्नौ प्रहरति (१३) । सू० "अभून्नो दूतो हविषो जातवेदा अवाड ह- व्यानि* सुरभीणि कृत्वा। प्रादाःपितृभ्यः स्वधया ते अक्षन् प्रजानन्नने पुनरप्येहि देवान इत्येकोल्मुकं प्रत्य- पिसृज्य प्रोक्ष्य पात्राणि इन्द्वमभ्युदाहरति (१४)।. (११) ( आपत्त) इत्यादि मंत्र पढ़ कर यजमान की एनी उस मध्यम पिण्ड को भक्षण करे, ऐसे करने से अवश्य ही वह पुत्रजननशीला होगी। न यजु अ० १९ मं० १६ में तां (ये समाना: ) यह पाठ है, इन नीयते हुये जनों में जो समनस जीव हमारे समान गोत्रषाले इम से स्पर्दा करते हैं उनकी संपत्ति की मेरे में कल्पना होय अर्थात् उन को त्याग कर लक्ष्मी हमारे को माधयण करे औ वह लक्ष्मी अनेक वर्ष तक स्थिर रहे यह इस का भाव है। (१२) 'ये' 'सभाता' इत्यादि मंत्र को पढ़ कर अवशिष्ट दोनों पिण्डों में से एक पिण्ड को यजमान भक्षण करे (न वा) अथवा न भक्षण करे, अर्थात् किसी रोगादि की निवृत्ति कामना होय तो खाय नहीं तो न खाये। (१३ ) भक्षण के अभाव पक्ष में उन पिण्डों को स्थाली में रख कर (पे समाना) यह पूर्वोक्त मंत्र पढ़कर सकृद् आच्छिन्न कुशों को अग्नि में फेंके । * पूर्व २० पृष्ठ में इस का अर्थ देखो। (१४) (अभून्नो दुतः ) इत्यादि मंत्र को पढ़ कर उल्मक औ पातों को फेंक कर फिर मोक्षण कर दो दा मिला कर उन पात्रों का ग्रहण करे। .

पिण्डापत्यज्ञमीमांसा ।
सू० सन्तिष्ठते पिण्डपितृयज्ञः (१५)।
सू० अप: पिण्डानभ्यवहरेद् ब्राह्मणं वा प्रा-
शयेद् (१६)।
सू० सोऽयमेवं विहित एवानाहिताग्नेः (१७)।
सू० ऑपासने श्रपणधर्मा होमश्च, अतिप्रणात
वा जुहुयाद् ( १८१९)।
सू० यस्मिन् जुहुयात् तमुपतिष्ठेत (२०)।
सू० तत्र गार्हपत्यशब्दो लुप्येत संस्कारप्रतिपे
धाद् (२१)।
इत्यापस्तम्बीघे श्रौतसूत्र पिण्डपितृपक्षः ।
(१५) इस प्रकार पिण्डपितृयज्ञ समान हुआ।
(१६) यदि यजमान उन पिण्डों को न भक्षण करे तो उन शेष पिण्डों
को जल में फेंके, वा ब्राह्मण के मति भक्षण करावै ।
(१७) अग्नि के आधान से रहित पुरुष के प्रति भी यह या इसी
प्रकार ही विहित है अर्थान् उस को भी यह या अवश्य करना होगा।
(१८१९) अग्नि के आधान से रहित जो पुरुष है वह आपासन
अग्नि में ही चरु को पका भी उसी में होम करे, अथवा औपासन में पका-
कर अतिमणीत नामक अग्नि में होम करे।
(२०) निस अग्नि में ( औपासन वा प्रणीत में) होम करे तिमी
अग्नि का ही (यदन्तरिक्षम् ) इत्यादि मंत्र से एपस्थान करे ।
(२१) भोपासन वा अनिमणीत अग्नि का जा उपस्थान किया जायगा
तत्र ( पदन्तरिताम् ) इस मंत्र में जो गाईपत्य शब्द है उस का उच्चारण न
करे क्योंकि अनादिताग्नि के यहां आधान संस्तारनिपित्तक गाईपत्य भनि
फा अभाव है।
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पिण्डपितृयज्ञमीयांसा। सामवेदीय श्रोतसूत्रकार लाट्यायन तथा द्रारायण मुनि ने भी “अमावास्ये पितृयज्ञः" इस प्रकार इस पितृयज्ञ कां निरूपण किया है। शौनकाथर्वणसूत्रों में भी इसी प्रकार से पितृ कृत्य का विधान कहा है। एवं गोपितृयज्ञ तथा महापितृयज्ञ का भी वेद में निरूपण किया है परन्तु विस्तर भय से"उन सब का उपन्यास नहीं किया जाता है। इस प्रकार पितृयज्ञ के अनुष्ठान से जो नरों को लाभ होता है वह तो पूर्वोक्त पिण्डपितृयज्ञ के निरूपण से ज्ञात हो ही चुका है परन्तु अब जो साक्षात् वेद के वाक्य वैदिक- कर्म के न अनुष्ठान करने में अनिष्ट बोधन करते हैं उन का संक्षेप से उपन्यास किया जाता है जिस से यह दृढ़ होजाय कि यह वैदिक कर्म अवश्य ही अनुष्ठेय है। एप * पन्था एतत्कमैतद् ब्रह्म तत् सत्यं “१० प्रपाठक १२० ६ । लाय्यायनमुनि तथा द्राहायणमुनि प्रणीत श्री- तसूत्रों में प्रायः सूत्रपाठ समान ही है, यह भी जानो। (१) मृत पितरों की सद्गति, तथा सत्संतान की प्राप्ति, तथा धनधान्य की समृद्धि, आदि रूप लाभ जानना । एवं च (क्यों करना चाहिये ) इस चतुर्थ संशय का निवारण हुआ, "त् वेदविहित तथा अनेक कल्याणपद होने से करना चाहिये , (न करने क्या हानि है ) इस पंचम संदेह के निराकरणार्य अग्रिम वेदवाक्य का न्यास जानना। * एतच्छन्दः सन्निहितार्थपरामर्शकः, सन्निहितश्वार्थोऽतीत आगामी या द्विविधः , तथा च (एप ) उभयविधोप्यर्थः (पन्याः), पुरुषार्थस्य :, साधनपिति यावद्, तदुभयं विस्पष्टं निर्दिश्यते (तत्का, एतद ब्रह्म) ग्नि मील इत्यारभ्य, अन्दो रूपम् इत्पन्तेनातीतसन्निहितग्न्येन प्रतिपादित . .

पिण्डपितृपक्षमीमांसा तस्मान्न प्रमाद्येत्तन्नातीयाद् न ह्यत्याय नपूर्वे येऽत्यायं- स्ते पराबभूवुः तदुक्तमृपिणा-'प्रजा ह तिस्रोऽत्या- यमीयुर्व्यन्या अर्कमभितो विविश्रे, रहद् ह तस्थौ भुव- नेप्वन्तः पवमानो हरित आ विवेश ” इति, 'प्रजा- ह तिस्रो ऽत्यायमीयुरितियावे ता इमाः प्रजास्तिस्रो- ऽत्यायमायंस्तानीमानि वयांसि वङ्गावगधाश्चरपादाः, न्यन्या अर्कमभितो विविश्रे' इति, ता इमा:प्रजा अर्कमभितो निविष्टा इममेवानि, रहद् ह तस्था भुव-* नेष्वन्तः इति, अद उ एव वृहद् भुवनेष्वन्तरसाया- यत्कर्म तथा उक्यम् इत्याभ्य आचार्य इत्यन्तन सहितेनारध्यक- द्वपक्षणोत्तरग्रन्यन निरूपितं यत्सगुणं निर्गुण च ब्रह्म एतद्भयमपि पुकपार्य- सापन, व्यवहारपरमार्यभेदेनोभयमपि सत्यम्, अब कर्मशन्दन तज्ज्ञानपर्वकमन- द्वान ब्रह्मशब्देन च तद्विपयं नमात्रं गृह्यते, याक्तस्योभयविधस्य मार्गवं हृदयनुमयोगव्यात्तिमन्ययोगव्यात्तिं च वियते (सस्मान्न प्रमाघेत ) कर्मानु धानब्रह्मज्ञानयोरसंपादनं प्रमादः, तथा सम्शदायत प्रवृत्तंनाऽप्यालस्यादिना रुत्तरित्यागोऽपि प्रमादः, एय तदभयं न क्याट, अनेनाऽयोगच्यावृत्तिरुक्ता, कपिाणिज्यादौ वा शासान्तामिद्धे नत्यवन्दनादौ वा पुरुषार्थसाधनबस्या या प्रवृत्तिः सायं पूर्वोक्तमार्गादन्पपांगः, तव्यावृत्तिः वनातीयाद इत्यनेनोच्यते (सद् ) पूर्वोक्ताभयं, न अतिक्रमदित्य, तमेवानतिक्रम स्वपक्षसाधनपरपक्ष- दूपणाभ्यां रदयति (न प्रत्यापन) इत्यादिना, मनुवसिष्ठादय एतं पन्धानं नेपाऽस्यत्रामन् य त नास्तिका अत्यकामन ते पराववा-पुरुषार्थाद् भ्रष्टा भूता इत्ययी, ग्राहणेनो कस्पार्थस्य दाध्याय मन्त्रमदाहरति । (नयुक्तमृपिणा) इति फन चिन्मन्त्रदाना पुरुपण तनमन्त्ररूपया घाचा कयाचिद् ऋचा मोक्त मित्यर्थः, तस्सा माचा प्रयमपादं याचष्टे-या पैता इमा इत्यादिना, एवम ऽपि वाध्यम + पिण्डपितृयज्ञमीमांसा। दित्यः “पवमानो हरित आधिवेश, इति, वायुरेव पव- मानो दिशो हरित आविष्टः” । अषद-गरपारपाक १ ४.१ र भाषा० (एतत्कर्म- एतद् ब्रह्म ) यह जो पूर्वोत्तर ग्रन्थ से कर्म श्री ब्रह्म का निरूपण किया है ( एप पन्थाः ) यही पुरुषार्थ का मार्ग है अर्थात् भोग मोक्ष के देनेवाला है ( ए- तत् सत्यम् ) यही (वेदोक्त कर्म तथा ब्रह्मज्ञान) अवश्य फल देने से सत्य है, श्री अन्य जो अवैदिक अनुष्ठान हैं वह अ. नर्थ पर्यवसायी होने से मिथ्या हैं (तस्मान्न प्रमायेत् ) तिस आम्नायमार्ग से प्रमाद न करे औ (तन्नातीयाद्) तिस मार्ग का अतिक्रमण भी मत करे किन्तु आलस्य तथा अन्य कुमार्गों को त्याग कर इसी का ही अनुसरण करे, इसी से ही ( सात्यायन् पूर्वे ) जो पूर्व मनु वसिष्ठ आदि महापुरुष हुये हैं वह इस मार्ग का अतिक्रमण ( उल्लइन ) नहीं करते भये औ ( येऽत्यायन् ) जो नास्तिक लोक इस मार्ग का अतिक्रमण करते भये ( ते परा वभूवुः ) वह पुरुषार्थ से भ्रष्ट हुये निरादर को प्राप्त हुये हैं। इस ब्राह्मण उक्त अर्थ की दृढता के अर्थ मंत्र का प्रमाण टेते हैं ( तदुक्तमृपिणा ) इति, अब इस मंत्र का स्वयं ही ब्राह्मण व्याख्यान करता है कि (प्रजा ह निस्रो ऽत्याय- मीयुः इति, यावै ता इमाः प्रजास्तिस्रो ऽत्यायमायन् तानी- मानि वयांसि बङ्गा अवगधाश्चेरपादाः) अर्थात् ब्राह्मणादि * लोके हि गुरुवाखोपदशहितानां बाहुल्यमुपलभ्यत तत्मसिद्रियोत- नार्थों (हशब्दः ।

. पिण्डपितृपक्षमीमांसा । भेद से जो अनेक प्रकार की प्रजा हैं उन में से तीन भाग जो प्रजा हैं वह वैदिक कर्म के उलहन करनेवाली हैं भो एक भाग वैदिक कर्म में निष्टावाली हैं, तहां जिन प्रजाओं ने वैदिक कर्म का त्याग किया है उन प्रजाओं की गति कहते हैं-(तानीमानि वयासि ) अर्थात् जिन्हों ने प्रीत- कर्म का त्याग किया है उनमें से एक भाग तो काक भादि पक्षियोनियों को प्राप्त होते है जो कि आकाश में विचरने वाले हैं ओ एक भाग बैग भी अवगध हैं अर्थात् भूमि में होनेवाले वन के वृक्ष तथा ब्रीहि यव आदि ओपध हैं औ एक भाग ईरपाद हैं अर्थात् पृथ्वी के दिल में निवास करने वाले पादोदर (सर्प) आदि हैं, अर्थात् जिन लोकों ने पूर्वोक्त श्रीत मार्ग का त्याग किया है वह मर कर नरक भोग से अनन्तर पशु-पक्षि कीट स्थावर आदि अनेक तिर्यग् योनि- यों को प्राप्त होते हैं इस प्रकार वैदिकमार्ग के अतिक्रमण करने वाली तीन प्रकार की प्रजा की व्यवस्था कह कर इदानीं एक भाग बाली जो आस्तिक प्रजा है उस की गति द्वितीय पाद से कहते हैं “ न्यन्या अर्कमभितो विवि" इति । इसी का विवरण करते हैं ( ता इमाःप्रजा अर्कमभितो निविष्टा इममेवाग्निम् ) इति, अर्थात् आस्तिक प्रजा में से कोई एक तो माहवनीय रूप (अर्क) अर्चनीय जो भनि है १ ( वरः) पनगता वृक्षाः, अवगधा-अवन्ति = रक्षन्ति मनुष्यादीन इति अदाः, ध्यन्त = अभिशारक्ष्यन्वे नमैरिवि गधा, वनस्पतिकपा माहित पवादिरूपा भोपपय, इत्यर्थः।

पिण्डपिहयज्ञमीमांसा
उस की उपासना करते हैं औ कोई एक ( वृहद ह तस्थी
भुवनेष्वन्तः) इसी का विवरण कहते हैं कि ( अद'उएव
बृहद् भुवनेष्वन्तरसावादित्यः) इति, अर्थात् यह जो ब्रह्माण्ड
में व्यापक तेजोमय मार्तण्ड है उस की उपासना करते हैं,
औ कोई एक (पवमानो हरित प्राविवेश) इस का विवरण--
( वायुरेव पवमानो दिशो हरित आविष्ट ) इति, अर्थात् नि-
खिल दिशा में संचारी जो पवित्ररूप वहनशील वायु है तिस
की उपासना करते हैं, अर्थात समष्टि वायु रूप हिरण्यगर्भ
की उपासना करते हैं।
भाव यह है कि आस्तिक लोक अग्नि आदि की उपा-
सना द्वारा सद्गति को प्राप्त होते हैं, औ नास्तिक लोक
पक्षि आदिरूप अधोगति को प्राप्त होते हैं ।
मनु भगवान् एवं योगी याज्ञवल्क्य मुनि ने भी-
अकुर्वन् विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन् ।
प्रसक्तश्चेन्द्रियार्थेषु प्रायश्चित्तीयते नरः* म.....
विहितस्याननुष्ठानानिन्दितस्य च सेवनान् ।
अनिग्रहाचेन्द्रियाणां नरः पतनमृच्छति
इन वाक्यों से विहित कर्म के न करने से प्रत्यवाय ओं
पातित्यरूप अनिष्ट घोधन किया है।
* विहित कर्म के न करने से औ निपिद्ध कर्मों के आचरण से तथा
विषयों में अति आसक्त होने से पुरुष पायाश्चत्त का भागी होता है यह मनु
जी के वाक्य का अर्थ है।
नविहित कर्म के न अनुष्ठान से औ निन्दित ( परस्त्री गमनादि) के
सेवन से तथा इन्द्रियों को न रोकने से पुरुप पाप को प्राप्त होता है।

, 2 पहालयश्राद्धमीपांसा। एवं च वेदविहित होने से, तथा न करने से अनिष्टप्रद हानसे यह पितृयज्ञ अवश्य ही करना चाहिये यह सिद्ध हुना। महालयश्राद्धमीमांसा । अप जो पुरुप यह सन्देह करते हैं कि (विशेष कर के आश्विन के कृष्णपक्ष में ही यह पितृकृत्य क्यों किया जाता है) इस के समाधान अर्थ अन्य विचार का प्रारम्भ किया जाता है। तहां आश्विनकृष्णपक्ष में विशेपरूप से श्राद्धविधान वोधन के लिये पहिले सामान्य रूप से श्राद्ध के. कालों का परिगणन किया जाता है । "अमावास्याऽष्टका वृद्धिः कृष्णपक्षोऽयनदयम्, द्रव्यं ब्राह्मणसंपतिर्विषुवत्सूर्यसंक्रमः २१७ । व्यतीपातो गजच्छाया ग्रहणं चन्द्रसूर्ययोः, श्राद्ध प्रतिरुचिश्यैव श्रादकालाः प्रकीर्तिताः"२१८ (बाजरला पाचाराधायचा.. अर्थात्-अमावास्या. अटका वृद्धि, कृष्णपक्ष, उत्तरायण, दक्षिणायन, द्रव्य, ब्राह्मणसंपत्ति, विपुवत्, सूर्य्यसंक्रम, व्य- तीपात, गजच्छाया, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, प्रतिरुचि, यह सब श्राद्ध के काल है। तहां अमावास्या तिथि में जिस प्रकार श्राद्ध का विधान १ आश्विन कृष्णपक्ष, मतपक्ष, पितृपक्ष, महालय, यह सब शब्द एकार्थक हैं। कन्या युक्त आधिनकुष्णपक्ष का ही नाम महालय है। केवल का नहीं यह भी मत है।

महालय श्राद्धमीमांसा। - वह तो पूर्व सविस्तर कथन किया ही गया है परन्तु तना विशेष यहां पर यह भी जानना आवश्यक है कि कोई एक आचार्य तो होम तथा पिण्डप्रदान तथा ब्राह्मणभोजन इन तीनों का जो समुदाय उस का नाम श्राद्ध मानते हैं औ कोई एक पिण्डपितृयज्ञ को श्राद्ध मान कर होम तथा ब्राह्मणभोजन को उस श्राद्ध का अङ्ग कहते हैं, औ कोई एक तो (पितृयज्ञं तु निर्वर्त्य विप्रश्चन्दुक्षयेऽग्निमान्, पिण्डान्वाहार्यकं श्राद्धं कुर्य्यान्मासानुमासिकम्) इस मानव- वचन से पिण्डदान ब्राह्मणभोजन का नाम श्राद्ध मानते हैं, + सर्वथा ही अमावास्या श्राद्ध का काल है श्री अमा- वास्या के दिन होम पिण्डप्रदान ब्राह्मणभोजन अवश्य कर्तव्य है यह निर्विवाद है। एवं मार्गशीर्ष, पोप, माघ, फाल्गुन, मास के कृष्णपक्ष. की जो चार अष्टमी हैं वह अष्टका भी श्राद्ध का काल जानना, तहां अष्टका शब्द से इन तिथियों के पूर्व जो सप्तमी तथा इन से उत्तर जो नवमी तिथि हैं उन का भी ग्रहण कर लेना, (१) कात्यायनश्राद्धसूत्रभाष्यकार कर्क उपाध्याय आदि । * अग्नि के आधान वाला जो यजमान है घह (इन्दुक्षये ) अमावास्या तिथि में पितृयज्ञ को समाप्त कर फिर श्राद्ध का आरम्भ करे, औ यह श्राद पिण्डपितृपन्न से पश्चात् होता है इस लिये इस श्राद्ध का नाम (पिण्डान्वा- हार्यक) ई औ प्रत्येक मास में करना होता है इस से इस को (मासानुमा- सिक) भी कहते हैं। (अ०३ श्लो० १२२)। मनुनी न पितृयज्ञ से अनन्तर श्राद्धके करने को कह कर फिर पिण्ड- मदान ब्राह्मणभोजन आदि का विधान किया है इस से होम का नाम पितृ- यह भी पिण्डपवान तथा बामणभोजन का नाम श्राद्ध यह अर्थात् सिद्ध है।

महालयवादमीमामा । अत एव आश्वलायनमुनि ने तृ० अध्याय ४ कंडिका में हेमन्तशिशिरयोश्चतुर्णामपरपक्षाणामष्टमीप्वष्टकोः' इस प्रकार अष्टका श्राद्ध का विधान कर फिर "पूर्वेयुः पितृभ्यो दद्याद" ७ (अपरेचुरन्वष्टक्यम् ) इस प्रकार से -सप्तमी तथा नवमी को श्राद्ध का विधान किया है। एवं वृद्धि अर्थात् पुत्रजन्म प्रादि भी श्राद्ध का काल है, एवं सामान्य से संपूर्ण मासों का कृष्णपक्ष भी श्राद्ध का काल हे, उत्तरायण, दक्षिणायन, प्रसिद्ध हैं, औ जिस दिन कृसर घृत दुग्ध तंडुल आदि द्रव्म का विशेष लाभ हो जाय वह भी श्राद्ध का काल जानना । एवं जिस दिन सदाचार उत्तम ब्राह्मण का लाभ हो (१) हेमन्त तथा शिशिर ऋतु में ( मार्गशीर्ष पोप माघ फाल्गुन इन चार मासों में) जो कृष्णपक्ष की अष्टमी है उन में अष्टका श्राद्ध करे । * इन अष्टमियों से पूर्वले दिन में भी पितरों के प्रति प्रदान करे भी अनिमदिन नवमियों में भी अन्वष्टका श्राद्ध करे, परन्तु (पिण्डपितृकोन) २।५। ३ इस आश्वलायन मुनि के वचन से यह अष्टकामाद भी पिण्ड- पितृपक्ष के तुल्य करे। (२) इसी का नाप आभ्युदयिक भाद कहते हैं अर्थात् " पुत्रजन्मषिवा- हादौ वृद्धिभादमुदाहृतम्, १० वसि० "यज्ञोद्वाहमतिष्ठास मेखलारन्धमोसपोः, पुत्रजन्मटपोत्सर्गे वृद्धिश्रादं समाचरेत्" (जावालिः) इत्यादि वचनों से पुत्र. जन्म, विवाह, मतिष्ठा, या, मेखला, पन्धन से मोचन होना, पोत्सर्ग, इन का नाम रदि है, इतना विशेष यहां पर यह भी जान लेना कि जैसे भमा- पास्याबाद में अमिताना आदि का आवाइन होता है तैसे वृदियाद में नान्दीमुख नामक पितरों का आवाहन होता है। (३) अर्थात्-माप भी श्रावणमास के आरंभ का दिन । (मृग कट- संक्रानी दे तूदग् दक्षिणायने ) ०६० .

महालय श्राद्धमीमांसा । . जाय वह भी श्राद्ध का काल जानना, विषुवत् नाम मेप यो तुला की संक्रान्ति ® का है औ सूर्य्यसंक्रम नाम सामान्य संक्रान्ति का है, व्यतीपात नाम योगविशेपका है, अथवा "श्रवणाश्विधनिष्ठानागदेवतमस्तकैः, न यद्यमा रविवारेण व्यतीपातः स उच्यते" इस वृद्धमनु के वचन से श्रवण अश्विनी धनिष्ठा आर्द्रा नागदेवत मस्तक, इन छः नक्षत्रों में से किसी एक नक्षत्र और रविवारके योगवाली जो अमावास्याहे उस का नाम व्यतीपात जानना, एवं गजच्छाया भी श्राद्ध का काल है,अब जिस प्रकार से चतुर्वर्ग चिन्तामणि में गजच्छाया का सप्रमाण लक्षण किया है वह निरूपण किया जाता है। "यदेन्दुः पिटदैवत्ये हंसश्चैव करे स्थितः, तिथिर्वश्रवणी या च गजच्छायेति सा स्मृता" वन्दपुरापा * (विपुवे द्वे तुलामेपो गोलामध्यं ततोऽपराः) वृद्धवशिष्ठ- (१) यद्यपि संक्रांतिग्रहण से ही मेप तथा तुला संक्रान्ति का ग्रहण हो सक्ता है तथापि विशेष रूप से भिन्न निर्देश उत्तपता के अर्थ जानना, अर्थात् और न होय तो इन में अवश्य ही करें । नागर्दैवत नाम अश्लेषा नक्षत्र का है औ मस्तक नाम मृगशिर नक्षत्र (२) अर्थात्-जिस प्रयोदशी में मघानक्षत्र में चन्द्रमा स्थित होवे औ इस्तनक्षत्र में सूर्य विद्यमान हो उस का नाम गजच्छाया है, यह सर इन पचनों का भाव है । बौधायन मुनि ने तो "इंसे हंसस्थिते या तु अमावास्या करान्विता, साया कुचरच्छायेत्येवं बौधायनोऽब्रवीत्" इस प्रकार से इस्तस्थित सूर्य औ मघास्थित चन्द्रमा के योग वाली जो अमावास्या है उस को गम. छाया माना है।

नरसिंहपुरा
भराष
माभारत
महार यथादमीमांसा।
(इन्दु-चन्द्रमाः, पितृदेवत्ये-मघानक्षत्रे, हंसः सूर्यः,
कर-हस्तः, वैश्रवणी त्रयोदशी)
"हंसे हंसस्थिते या तु मघायुक्ता त्रयोदशी,
तिथिर्वेश्रवणी नाम सा छाया कुञ्जरस्य तु"
"योगो मघात्रयोदश्योः कुञ्जरच्छायसंज्ञकः
भवेन्मघायां संस्थे च शशिन्य करस्थिते” इति,
जो कि-"हस्तिच्छायासु विधिवत् कर्णव्यजनवीजितः"
"अपि नः स कुले भूयाद् यो नो दद्यात् त्रयोदशीम् ।
पायसं मधुसर्पियो प्राक्छाये कुञ्जरस्य च"
"वनस्पतिगते सोमे छाया या प्राङ्मुखी भवेद,
जो कि "सहिकेयो यदा सूर्य प्रसते पर्यसन्धिप, गगच्छाया तु सा भोक्ता
खस्यो भाई मकल्पयेत्" इस वाक्प से सूर्यग्रहण को गच्छाया कहा ई सो
पावल्यय जी के वाक्य में सूर्यग्रहण का पृथक् ग्रहण होने से यहां पर नहीं
रेना।
• हस्ती के कर्णरुप व्यजन से घोजित हुभा गजच्छाया में विधिपूर्वक
भाद करे, यहां पर हस्ती के कान की वाय से वीजित हुआ यह कहने से
प्रसिद्ध हस्ती की छायारूप देश का ही ग्रहण है कुछ पूर्वोक्त काल का नही।
+पितरलोक प्रार्थना करने हैं कि हमारे कुल में ऐसा कोई उत्पन्न
वे जो त्रयोदशी के दिन गधुघृतमिश्रित पायस का हमारे प्रति प्रदान करे,
सपा जिस देश में हस्ती की पूर्वमुखी छाया होय उस देश में मदान करें।
() चन्द्रमा के वनस्पति विषयक गमन समय में जो पूर्व मुखी आया है,
मा...।

महालयश्रामीमांसा।
माडे ।
गजच्छाया तु सा प्रोक्ता तस्यां श्राद्धं प्रकल्पये"
"भोजयेत्तु कुलेऽस्माकं छायायां कुञ्जरस्य च
आकल्पकालिका तृप्तिस्तेनास्माकं भविष्यति"
पिसुधर्मोत्तर।
इत्यादि वाक्यों में प्रसिद्ध हस्ती की छायारूप देश विशेष
का कथन किया है सो यहां पर काल का प्रकरण
होने से नहीं लेना।
एवं चन्द्र श्री सूर्यका ग्रहण भी श्राद्धका काल जानना।
परन्तु"त्रिदशाः स्पर्शसमये तृप्यन्ति पितरस्तथा,
मनुष्या मध्यकाले तु मोक्षकाले तु राक्षसाः"
इस वृद्धवशिष्ट जी के वाक्य से स्पर्श काल ही श्राद्ध
क काल जानना मध्य औ मोक्षकाल नहीं।
यद्यपि." चन्द्रसूर्यग्रहे नाद्याद् " "सूतके मृतके चैव
ग्रहणे चन्द्र सूर्ययोः। छायायां कुञ्जरस्याय भुक्ता चान्द्रायणं
चरेद्" इत्यादि वचनों से सूतक पातक गजच्छाया ओ ग्रहण
में भोजन करना निषिद्ध है तथापि "आपद्यनग्नौ तीर्थे च
घह गजच्छाया माननी तिसमें श्राद्ध करना चाहिये, (त्रिमुहूर्त वसेदर्के त्रिमत
जले वसेद्, प्रिमुहूर्त वसेद् गोषु त्रिमुहूर्त वनस्पतौ" इस भूति से अमावास्या
के अपराह काल में चन्द्रमा का वनस्पति में निवास जानना औ जो तिस
समय में हस्ती की पूर्वमुखी छाया है वह गजच्छाया जाननी।
(१) हमारे कुल में ऐसा सत्संतान उत्पन्न हो जो कि गज की छाया
में ब्राह्मणों को भोजन करावै क्योंकि ऐसा करने से हमारी कल्पपर्यन्त तृप्ति
हो जाती है (पह पितरों का कथन है।)
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महालयवादपीमौसा। महणे चन्द्रसूर्ययोः। आमश्राद्धं द्विजैः कार्य शूद्रेण तु सदेव हि" इत्यादि वाक्यों से सूतकादि में भाम श्राद्ध जानना । एवं श्राद्धकर्ता की जिस दिन रुचि होय वह भी श्राद्ध का काल जानना, एवं युगादि तथा मन्वादि तिथियों को भी श्राद्ध का काल जानना विस्तर भय से नहीं लिखा गया । यद्यपि इस याज्ञवल्क्य जी के वचन से तथा- "योऽपक्षीयतेसि पितरः" इस श्रुतिसे तथा "इत- रेषु पित्रयाणि" "अपरपक्षे पित्याणि" (१) आपत्काल में, अग्नि के अभाव समय में, तथा ग्रहण में, कचा अन से पितरों के निमित्त देवे, औ शूद्र तो सर्वदा ही आम थाद करें। * अर्थात्--सत्य, प्रेता, द्वापर, कलि, इन चारों युगों का यथाक्रम भारम्प का काम जो वैशाख शुरू तृतीया कार्तिक शुक्ल ९ भादकपण १३ माघ की पूर्णिमा रूप निधि हैं वह युगादि काल जानने, एवं स्वायम्भुव ? स्वारोचिप २ उत्तम तामस । रैवत ५ चाक्षप ६ ववस्वत ७ साणा ८ दस सावणिः ९ ब्रह्मसाणि १० धर्मसावणि ११ रुद्रसावणि १२ देवसावाण ११ इन्द्रसावणि १४ इन चतुर्दश मनुओं का यथाक्रम आरम्भ का काल जो आश्विन शुक्ल ९ कार्तिक शुक्ल १२ माघ शु० ३ भाद्र ० ३ फालान अमाव- स्या पोप शु. ११ आषाढ ०५० माघ १०७ श्रावण १०७ आपाद पू. णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, फाल्गुन पू० चैत्र पू. ज्येष्ठ पू• यह चतुर्दश तिथि पर मन्वादि हैं, "युगादयः स्मृता होता दत्तस्याक्षयकारकाः" "मन्वन्तरादयश्चते दतस्पाक्षधकारकाः इत्यादि मत्स्यपुराण के वाक्यों से इन युगादि वया- पन्नादि तिथियोंको भी आद का प्रशस्त काल मानना- +नो पक्ष चन्द्रपाके क्षय करके युक्त है सो पिता है अर्थात् पितोंका है। (२) जैमिनिपुनि ने अ०६पा०८६उदयनपूर्वपक्षादपूर्वाद्वेषु देवामि" इस मूल से उत्तरायण तथालपक्ष की पूझि में देवकार्य का विधान कयन कर फिर इतर में पितृकार्य का विधान किया है इस से दक्षिणायन तथा कृष्णपक्ष भी अपराहकाल पितृकल का सगय जानना । * आपस्तम्बप्रथमपटल-मू०७॥

महालयभादमीमांसा । प्रथम तो इत्यादि सूत्रों से सामान्य से कृष्णपक्ष में श्राध का विधान होने से ओ कर्ता की रुचि को भी श्राद्ध में निमित्त होने से आश्विन कृष्णपक्ष में श्राद्ध करना निर्विवाद है। तथापि विशेष रूप से जो आश्विन कृष्णपक्ष में श्राद्ध के विधायक पाक्य हैं उन का अव उपन्यास किया जाता है जिस से यह दृढ हो जाय कि आश्विन में श्राद्ध अवश्य करे । गजच्छाया में जो श्राद्ध का विशेष विधान हे वह भी आश्विन के श्राद्ध में प्रमाण है क्योंकि हस्तनक्षत्र- स्थित सूर्य के समय में जो चन्द्राधिष्ठित मघानक्षत्र के संग त्रयोदशी का योग रूप गजच्छायासंज्ञक काल विशेष पूर्व निरूपण किया है वह काल विशेप आश्विन कृष्णपक्ष में ही संभव हे अन्य में नहीं, इसी से ही मनु जी ने- "नभस्यस्यापरः पक्षो यत्र कन्यां व्रजेद् रविः स महालयसंज्ञः स्याद् गजच्छायादयस्तथा" इस वाक्य से कन्यासंक्रान्ति युक्त ( नभस्य) भाद्रपद के कृष्ण पक्ष को महालय श्री गजच्छाया कहा है। एवं “यत्किञ्चिन्मधुना मिश्रं प्रदद्यात् तु त्रयोदशी तदप्यक्षयमेव स्याद् वर्षासु च मघासु च" (१) यद्यपि इस वृद्धमनुनी के वाक्य में भाद्रपद का कृष्णपक्ष कहा है आधिन का नहीं तथापि मुख्य चान्द्रपास के मान से जिस को दाक्षिणात्य भाद्रका कप्णाक्ष मानते हैं उसीको ही गौणचान्द्रमासके मानसे पाचात्य लोक आशन का कृष्ण पक्ष मानते हैं, यह सर धर्मशास्त्रों के निपन्धों में स्पष्ट है। - " चन प्रविद्म यज-ते. प्रा. सा.प्र... पन.१ ( याभ्या,) १०४ महाल यथाद्धमीमांसा। इस वाक्य से मनु जी ने जो वर्षाऋतु में मघानक्षत्र- युक्त प्रयोदशी' में श्राद्ध का अक्षय फल कहा है सो भी माश्विन के श्राद्ध में प्रमाण जानना । एवं-"उपहताः * पितरो ये मघासु मनोजवसः सुकृतः सुकृत्याः, ते नो नक्षत्रे हवमागमिष्ठाः स्वधः- भिर्यज्ञं प्रयतं जुषन्ताम् (परीनुवाक्या ) "येऽग्निदग्धा ये नाग्निदग्धा येमुं लोकं पितरः क्षियन्ति, याँश्वविद्म याँउ मघासु यज्ञ सुकृतं जुषन्ताम् " इत्यादि वेदमन्त्रों में जो मघानक्षत्र में पितरों के आवाहन का विधान है सो भी इस में प्रमाण जानना । बृहन्मनु में तो आषाढीमवधिं कृत्वा पञ्चमं पक्षमाश्रिताः (१) अर्यात्-यहयोग आश्विन के कृष्णपक्ष में होता है, : * जो पितर ( मनोजवस:) मन सरीखे वेगवाले हैं तथा (सुकता) गुमकर्म करने में समर्थ है तथा ( सुकृत्याः) शोभन कृत्य वाले हैं वह पितर इस मयानक्षत्र में भाहून हुये (नो हवम् ) हमारे इस यज्ञ के प्रति 'आगमिष्ठा भागमन करें औ पितृपियस्वधारूप अन्नों से (प्रयतं ) संस्मृत जो यज है उस को (जुपन्ताम् ) सेवन करें, + जिन पितरों को हम जानते हैं औ मिन को नहीं जानते हैं ऐसे नो अमिदग्ध वा अग्नि के दाह से रहित हमारे पितर (अमुं लोकं) स्वर्गक में (क्षिपन्ति ) निवास करते हैं वह सब इस मपानक्षत्र में आकर हमारे यह को सेवनकरें। ( यहाँ पर मन जी के वार से एकवाक्यता के लिये मघायुक्त प्रयोदशी लेनी) (२) केश कर युक्त जो पितर हैं पर आपात्र की पूर्णिमास भरषि

महालयश्राद्धमीमांसा।
कामन्ति पितरः क्लिप्टा अन्नमप्यन्वहं जलम्।
तस्मात् तत्रैव दातव्यं दत्तमन्यत्र निष्फलम्"
इस वाक्य से साक्षात् ही आपाढ की पूर्णिमा से पञ्चम ।
पक्ष में श्राद्ध का विधान किया है।
एवं "नभस्यकृष्णपक्षे * तु श्राद्धं कुर्यादिने दिने"
मनापा
फानन
गतम।
माणेय
"नभस्यस्यापरे पक्षे श्राद्धं कुर्य्याददिने दिने"
इत्यादि वचन भी प्रमाण जानने । जो कि-
"कन्यागते सवितरि यान्यहानि तु षोडश (१)
क्रतुभिस्तानि तुल्यानि सम्पूर्णवरदक्षिणेः"
"कन्यागते सवितरि दिनानि दश पञ्च च, (२)
पार्वणेनैव विधिना श्राद्धं तत्र प्रकल्ययेद्"
इत्यादि वाक्यों में कन्याराशिस्थित सूर्य के समय
से लेकर जो आश्विन कृष्ण पक्ष रूप पश्चम पक्ष है तिस को आश्रित हुये प्रति
दिन अन्न जल की आकांक्षा करते हैं इम मे आश्विन कृष्णपक्ष में अवश्य देना
चाहिये क्योंकि जो इस पक्ष में श्राद्ध नहीं करता है उस के किये हुये अन्य
सब श्राद्ध निष्फल होते हैं।
निर्णयामृत में तो (आश्वयुकृष्णपक्षे तु) यह पाठ है, अर्थात् आश्विन
के कृष्णपक्ष में पतिदिन श्राद्ध करे ।
( १ ) कन्या राशि में सूर्य होने पर जो शुक्लपतिपद् के सहित कृष्णपक्ष
की पन्द्रह तिथि हैं वह संपूर्ण तथा उत्तम दक्षिणा वाले यज्ञा के तुल्य
(२) कन्यार्क में पन्द्रह दिन पार्वणश्राद्ध करे (न्या नाम कन्या राशि
में स्थित सूर्गय का है)।

महाळयादमीमांसा में श्राद्ध करने को प्रशस्त कहा है सो भी केवल कन्या नहीं लेना किन्तु कन्यार्कयुक्त आश्विनकृष्णपक्ष ही लेना, इसी से ही शाट्यायनि मुनि ने "नमस्यस्यापरे पक्षे तिथिषोडशकं तु यत् (१) कन्यास्थाान्वितं चेत्स्यात्स कालः श्राद्धकर्मणः" इस वाक्य से कन्यार्क युक्त आश्विन कृष्णपक्ष को श्राद्ध का काल कहा है केवल कन्या को नहीं। श्री कोई एक तो- "पंक्षान्तरेपि कन्यास्थे रवी श्राद्धं प्रशस्थते" इस आदि पुराणके वाक्य में (यदि आश्विनकृष्णपक्ष से अन्य पक्ष में भी कन्यार्क होय तो भी श्राद्ध करना प्रशस्त है) इस प्रकार कथन से केवल कन्यार्क भी श्राद्ध का काल है यह मानते हैं। एवं आश्विन कार्तिक यह दोनों ही मास श्राद्ध के मुख्य काल हैं यह निश्चय हुआ (२) । इसी अभिप्राय से ही शतपथ में-१३चार (१) आश्विन के कृष्णपक्ष में गुल परिपत् सहित १५ तिथि यदि कन्या युक्त होय तो श्राद्ध का काल है। (२) अर्थात् कमी कम्पार्क आश्विन के कृष्णपक्ष में होता है औ कभी पुल में होकर कार्तिकमास में भी.कुछ काल रहता है, एवं च आश्विन कृष्ण- पक्ष तो साक्षात् विधान होने से श्राद्ध का काल है औ कार्तिक कन्या के सावन मे श्राद्ध का काल है यह सिद हुवा !

१०७ महालयश्रादमीमांसा। अथास्मै श्मशानं कुर्वन्ति * यो वै कश्चन घियते स शवस्तस्मा एतदन्नं करोति, शवान्नं ह वै तच्छ्मशानमित्याचक्षते परोक्षम् इत्यादि वाक्य से मृतक के निमित्त अन्न (श्राद्ध) का विधान कर “शरदि कुर्यात्” इस वाक्यसे आश्विन कार्तिक- रूप शरदऋतु में+ मृतकके लिये श्राद्ध का विधान किया है। औ शाट्यायनिमुनि तो "पुण्यः कन्यागतः सूर्यः पुण्यः पक्षश्च पञ्चमः कन्यास्थार्यान्वितः पक्षः सोऽत्यन्तं पुण्य उच्यते" इस वाक्य से यह कहते हैं कि-कन्यार्क भी श्राद्ध का पुण्यकाल है औ आश्विन का कृष्णपक्ष भी श्राद्ध का युक्त जो आश्विन का कृष्ण पक्ष है सो अत्यन्त पुण्यकाल है, वास्तव से तो- आषाढीमवधिं कृत्वा यः पक्षः पञ्चमो भवेद् तव श्राद्धं प्रकुर्वीत कन्यास्थोऽर्कोभवेन्न वा" पुण्यकाल है औ कन्यार्क * जो कोई पुरुप मरता है उस का नाम शव है उस के लिये जो अन्न है उसका नाम शबान है, शवान्न को ही परोक्षरूप से श्मशान कहा जाता है, (विस्तरभय से समन श्रुति का उपन्यास नहीं किया है।) - "इपश्चार्जश्व शारदात्" अ० २१ मं१६ इस यजुर्वेद के प्रमाण से आश्विनकार्तिक को शरदऋतु जानना । * आपाट की पूर्णिमारूप अवधि से जो आश्विन कृष्णपक्ष रूप पंचम- पक्ष है तिस में श्राद्ध करे फन्पार्क हो चाहे न हो ।

भन्दिा
महालयश्राद्धमीमामा ।
"अगतेपि रयो कन्यां श्राद्धं कुर्वीत सर्वथा, (१)
आषाव्याः पञ्चमः पक्षः प्रशस्तः पित्तकर्मसु,
इन ननु-जावालि मुनि आदि के वचनों से आश्विन
कृष्णपक्ष ही श्राद्ध का प्रशस्त काल जानना, इसी से ही
सर्व निवन्धकारों ने तया सर्वदेशीय शिष्टों ने इस पक्ष को
मुख्य मान कर सर्व देशों में प्रचलित किया है।
इतना विशेष यहां पर यह भी जान लेना कि यदि
संपूर्ण कृष्णपक्ष में श्राद्धकरने में पुरुप असमर्थ होय तो-
"आपाध्याः पञ्चमे पक्षे कन्यासंस्थे दिवाकरे,
मृतेहनि पितुर्यो वै श्राद्धं दास्यति मानवः ।
तस्य संवत्सरं यावत्संतृप्ताः
तस्मात् तत्र प्रकर्तव्यं श्राद्धं श्रद्धापरेनरः।"
इस निर्णयदीपकोपन्यस्त नागरखण्ड के प्रमाण से
पिता आदि का जो मरणदिन है उसी एक तिथि में ही
करे, परन्तु करे अवश्य क्योंकि यह श्राद्ध नित्य है (२) कुछ
काम्य नहीं।
पितरो ध्रुवम्।
.
(१) कन्यार्क न भी होवे को भी पंचम पक्ष में श्राद्ध करें क्योंकि विश्कर्म
में पंचम पक्ष की प्रशस्त है कुछ कन्या युक्त ही नहीं।
* एवं "भदौ मध्येऽवसाने का यत्र कन्यां बजेट रचिः । स पक्षः सकल:
पूज्यः भादपोटरा मति" यह कार्णानिनि का वचन भी इस पक्ष में प्रमाण
जानना क्योंकि आश्विन कृष्णपक्ष के आदि वा मध्य वा अन्त में कन्या
संबन्ध माय कर के अवश्य होता है।
(२) इसी से ही भनि मुनि ने " सूर्ये कन्यां गते श्राद्धं यो न कुर्याद

महालयथादमीमांसा
भाव यह है कि नित्य-नैमित्तिक-काम्य भेद से श्राद्ध
तीन प्रकार का है, तहां-
"कुर्यादहरहः नांदमन्नायेनोदकेन वा"
इस वाक्य से जो प्रतिदिन विधान किया है वह नित्य
.जानना।
तथा "मृताहेऽहरहः दर्शश्राद्धं यच्च महालये।
तन्नित्यमुदितं सद्भिर्नित्यवधि विधानतः"
इस कात्यायनमुनि के वाक्य से मृतदिन, प्रतिदिन,
अमावास्या, महालय में जो कियाजाय वह भी नित्य
जानना, एवं अष्टका व्यतीपात आदि नियत काल में जो
किया जाय वह भी नित्य जानना (१)।
जो अनियत पुत्रजन्म आदि काल में किया जाय
वह नैमित्तिक जानना ।
श्री जो फलविशेप की कामना के लिये भिन्न २ तिथि
नक्षत्र-वारों में किया जाय वह काम्य जानना (२)।
गृहाश्रमी । धनं पुत्राः कुतस्तस्य पितृनिःश्वासपीडया इस वाक्य से इस में
श्राद्ध न करने वाले के मति पितरों के शाप से सन्तान धनादि का नाश रूप
अनर्थ चौधन किया है।
(१) अर्थात्-मृतदिन तथा अमावास्या, अष्टका, व्यतीपात,महालय आदि
जो काल हैं वह अपने २ समय में नियम से होने से नियनकाल कहे जाते हैं
औ पुनजन्म-ग्रहण आदि अनियमसे होने से अनियत कहे जाते हैं, वहां जो
नियत काल में किया जाय वह नित्य है औ जो अनियत काल में किया
जाय वह नैमित्तिक नानना, न करने से पाप का जनक होने से जो अवश्य
किया जाय यह नित्यनैमित्तिक का साधारण लक्षण है।
(२) अर्थात्-कन्या, जामाता, अनाभादिपशु, सत्संतान, धूतविजय,

१११ महालपानीमांसा अव यदि जो कोई यह संदेह करे कि (जो आप ने वृद्ध मनु के नाम से वाक्य लिखे हैं वह वृद्धमनु क्या है) तो उस संदेह के निवारणार्थ नारदस्मृति के प्रारम्भ का पाठ प्रदर्शन किया जाता है जिस से यह दृढ निश्चय हो जाय कि आज कल प्रचलित मनुस्मृति का मूलभूत . जो मानव धर्मशास्त्र है वह धृद्धमनु है । "इह हि भगवान् मनुः* प्रथमं सर्वभूतानुग्रहा- पठिप्यति, नमेऽस्ति वित्तं न प नचान्यन्नादस्प योग्यं स्वपितृन् नतोस्मि, तृप्यन्तु भक्तथा पिनरो मयैतौ भनी ततौ वर्मनि मारुतस्प' वाराहा. अ. १३ श्लो० ५७५८ इस में प्रमाण हैं। * भगवान् मन ने पहिले सर्वभूती पर अनुग्रह के लिये आचारस्थिति का हेलभूत एक शाररा निर्माण किया,निप्त में लोक सृष्टि, १ भूतविभाग, सद्देशप्रमाण, ३ पर्पनका लक्षण, ४ वेदविचार, ५ वेदाङ्गविचार, ६ याविधान, ७ आचार, व्यवहार, कण्टकशोधन,१० रामवृत्त, ११ वर्णाश्रमविभाग, १२ विधाइन्याय, २३ स्त्रीपुतविला १४ दायानकाप, १५ श्राद्धविधान, १६ शौचाचारविकल्प, १७ भक्ष्याऽभक्ष्यरक्षण, १० वियाऽविक्रेयमीमांसा, १९ पापों के भेद, स्वर्गनरकमदर्शन, २१ प्रायश्चित्त, २२ ब्रह्मज्ञान, २३ रहस्यस्थान, २४ यह चौबीस प्रकरण हैं, फिर मन जी ने इन सब प्रकरणों को एक सरस अशीति ८० अध्यायों में एफलक्ष श्लोकों द्वारा उपनिबद कर लोक में प्रचार के लिये देवपिनारद के प्रति प्रदान किया, नारदजी ने अध्ययन कर मन में यह विचारा कि महान विस्तीर्ण होने से मनुष्यों कर धारण करना यह सुकर नहीं से पारह हमार श्लोक में उस का संक्षेप किया भी मार्कण्डेय के प्रति प्रदान किया, औ मपति भार्गर (मार्कण्डेय) ने भी मनुष्यों की आय के हास से अहाशक्ति मान कर उस को चार सस श्लोकों से संक्षेप कर लोकों में प्रचार किया, तहां जो रक्ष श्लॉप स्वरूप है उस का देवादि अध्ययन करते इता का मनुष्य अध्ययन करते हैं, इनमें से जो लक्ष भी चारह हजार श्लोकाला शास्त्र है यह दृद्धमनु औ वृहन्मन इस नाम से व्यवहन होता है भी ८ . है -- , महालय श्राद्धमीमांसा । र्थमाचारस्थितिहेतुभूतं शास्त्रं चकार, यत्र लोकसृष्टि: भूतविभागः, सद्देशनमाणं, पर्षल्लक्षणं, वेद, वेदाङ्ग, यज्ञविधानमा, चारो, व्यवहारः, कण्टकशोधनं,राजरत्तं, वर्णाश्रमविभागौ, विवाहन्यायः, स्त्रीपुंसविकल्पो, दाया- ऽनुक्रमः,श्राद्धविधान,शौचाचारविकल्पो,भक्ष्याऽभक्ष्य- लक्षणं, विक्रेयाऽविक्रेयमीमांसा, पातकभेदाः, स्वर्ग- नरकानुदर्शनं, प्रायश्चित्तान्युपनिषदो, रहस्यस्था- नानि, इति चतुर्विंशतिप्रकरणानि १ तदेतदत्रश्लोक- शतसहस्रेण साशीतिनाध्यायसहस्रेण च भगवान्मनु- रुपनिवध्य देवर्षये नारदाय प्रायच्छत् २ स च तस्मा- दधीत्य महत्वान्नायं ग्रन्थः सुकरो मनुष्यरेव धारयितु- मिति द्वादशभिः सहस्तेः संचिक्षेप तं च महर्पये मार्कण्डेयाय प्रायच्छत् ३ सुमतिरपि भार्गवस्तस्माद- धीत्य तथैवायुसादल्पीयसी शक्तिर्मनुष्याणामिति चतुर्भिः सहस्रः संचिक्षेप तदेतत् पितृमनुप्या ह्यधी- यते, विस्तरेण शतसहस्रं देवगन्धर्वादयः, तत्राय. माद्यः श्लोकः-आसीदिदं तमो भूतम्' इत्यादि जो आज कल प्रचलित मनुस्मृति है वह भार्गवकृत संग्रह है इसी से इस के अध्यायों के अन्तों में 'भृगुप्रोक्तं ' यह लिखा है यद्यपि कुन्भट्ट की टीका के अनुसार इस मनुस्मृति का तीन सहस से भी न्यूनश्लोक हैं तथापि अन्य टीकामों के देखने से चार हजार तक संख्या का संभर जान लेना क्योंकि सर्वज्ञनारायण,राघवानन्द, रामचन्द्र, गोविन्द आदि व्याख्याकारों ने पहन से ऐसे श्लोकों का व्याख्यान किया है जो कि कुल्लूक ने छोड दिये हैं। .

महारयाद्धपीमांसा।
भव प्राचीननिवन्धकारों ने जो जो वचन गृहन्मनु तथा
युद्धमनु के नाम से लिखे हैं उन वचनों का कुछ उपन्यास
किया जाता है जिस से यह निश्चय हो जाय कि उन के
समय में वह मानवशास्त्र प्रचलित था,
"मध्ये वा यदि वाप्यन्ते यत्र कन्यां रविजेत् (१)
पक्षः स कालः संपूर्णः श्राद्धं तत्र विधीयते” इतिचन्दिना ।
तृणं वा यदि वा काष्ठं पुष्पं वा यदि वा फलम् (२)
अनाप्टष्टं तु गृह्णानो हस्तच्छेदनमर्हति ।
पिता पितृव्यो भ्राता वा चैनामध्यापयेत्पुरा, (३)
स्वगृहे चैव कन्याया भक्ष्यचर्या विधीयते
वर्जयेदजिनं दण्डं जटाधारणमेव च"
"विवाहबतचूडासु माता यदि रजस्वला । (४)
तस्याः शुद्धेः परं कार्य मङ्गलं मनुरब्रवीत् वाभिमार।
...
मुनिचन्द्रिका
(१) जिस पक्ष के मध्य का अन्त में कन्या में सूर्य होर वह संपूर्ण पक्ष ही
श्राद्ध का काल है।
(२) तृण का पुष्प, फल को विना भाशा से ले तो उस का हाथ काटे ।
(३) पिता वा पिता का भ्राता वा अपमा भ्राना ही कन्या के प्रति
पदाचे अन्य नहीं, औ अपने घर में ही कन्या के लिये भिक्षाचरण का विधान
ई अन्य घर में नहीं, भी जैसे ब्रह्मचारी के लिये धर्म तया दण्ड एवं जटाधारण
का विधान किया है तैस कन्या के लिये नहीं, अर्थात् इन सब का त्याग करें।
(१) विवाह, व्रत, चूडाकर्म में यदि माता रजस्वला होय तो शुदि से
भनन्तर यह महल कृत्य करना चाहिप यह मनु जी रा कथन है।

महालय श्राद्धमीमांसा। शनमकरणे चतुर्गचितामणी मादि सन्ध्ययोरुभयोर्जप्ये भोजने दन्तधावने, (१) पितृकार्ये च देवे च तथा मूत्रपुरीषयोः, गरूणां सन्निधौ दाने योगे चैव विशेषतः, एषु मौनं समातिष्ठन् स्वर्ग प्राप्नोति मानवः, द्रतखड़े हेमाद्रि--- विहितस्याननुष्ठानमिन्द्रियाणामनिग्रहः । (२) निषिद्धसेवनं नित्यं वर्जनीयं प्रयत्नतः याइखएइमाट्रि - “यत्किञ्चिन्मधुमंमिश्र गोक्षीरं घृतपायसं । दत्तमक्षयमित्याहुः पितरस्त्वेव देवताः।"(३) गते देशान्तरे पयो गन्धमाल्याञ्जनानि च (४) दन्तकाष्ठं च ताम्बूलं वर्जयेद् वनिता सती” स्मृतिरपाकर । . (१) प्रातः तथा सायंसंध्या में, तथा जप, भोजन, दन्तधावन के करने समय में एवं दैत्र तथा पितृकार्य में, औ मून तथा मळ के त्यागराल में औ गुरुओं के समीप तथा दान काल में एवं योगाभ्यास समय में जो पुरप मौन को धारन करता है वह स्वर्ग को प्राप्त होता है। (२) वेदविहित कर्म का न करना तथा इन्द्रियों का अनिग्रह तथा निपिद्ध सेवन यह तीनों' अवश्य ही प्रयत्न पूर्वक पुरुप को त्यागना चाहिये । (३) मधुकर मिश्रित गोक्षार वा घृत वा पायस जो कुछ पितरों के मति दिया जाय उस को पितररूप देवता अक्षय कहते हैं। (४) पति के परदेश जाने पर पतिव्रता स्त्री गन्ध, माला, अञ्जन, दन्त- धावन, ताम्बूल, इन का परित्याग करे ।

२१८ .
.
परामरमापर.
महाक्यथामीमांसा
जपस्तपस्तीर्थसेवा प्रव्रज्या मन्त्रसाधनं, (१)
देवतासाधनं चैवं. स्त्रीशूद्रपतनानि पट्” मूमला।
"यः कारणं पुरस्कृत्य व्रतचा निषेवते (२)
पापं व्रतेन संछाद्य बैडालं नाम तद् व्रतम्"
"सर्वदेशेषु पूर्वाह्ने मुख्यं स्यादुपनायनम् (३)
मध्यान्हे मध्यमं प्रोक्तमपराहे च गर्हितम् tenreler
"जातकर्मादिमंस्काराः स्वकाले न भवन्ति चेद् (४)
चौलादर्वाक प्रकुर्वीत प्रायश्चित्तादनन्तरम्"
"भरणं पोप्पवर्गस्य प्रशस्तं स्वर्गसाधनं (५)
नरकंपीडने चाऽस्य तस्माद्यत्नेन तं भरेत्" विवादमा
नारायभायोगर ।
(१) जप, तप, तीर्थसेवन, संन्यास, मन्यसाधन, देवतासाधन, यह छ:
कर्म सी तथा रद्ध के लिये पापजनक है।
(२) जो पुरुष किसी पाप की निति का कारण के लिये व्रतचा को
सेवन करता है औ प्रतद्वारा अपने पाप को छिपाया चाहता है उस पुरुष का
किया हुभा नत घेडालन कहा जाता है ।
१) सर्व देशों में पूति उपनयन का मुख्य काल है औ मध्यान्ह मध्यम
काळ ई भी अपरान निन्दित है।
(१) यदि जातक नामकरण आदि संस्कार अपने उचित करल में न
होय ती मायश्चित कर चूडाकर्म से पूर्व ही उन को करें देर न करे ।
(५).सी, पुत्र, भृत्य आदिक पाप्य वर्ग का जो पालम है पद स्वर्ग का
साधन है औ इन को जो पीडा देनी है यह नरक का साधन है इस से इन
घा वश्य पापण करे।

महालय श्रादमीमांसा
मिताचरा।
"पतितस्तु सुतः क्लीवः पंगुश्चोन्मत्तको जडः (१)
अन्धोचिकित्सरोगातॊ भर्तव्यास्ते निरंशकाः" दायक्रम मया ।
"मानुषास्थि शवं विष्टा रेतो मूत्रार्तवं वसा (२)
स्वेदाश्रुदूषिकाश्लेष्ममद्यं चामेध्यमुच्यते"
इमनु-(मदनपारिभात )
" न पिवेन च भुजीत द्विजः सव्येन पाणिना
एकहस्तेन न जलं शूद्रेणावर्जितं पिवेद " (३)
ताम्रपात्रे न भुजीत भिन्नकांस्ये मलाविले,
पलाशपद्मपवेषु गृही भुक्तैन्दवं चरेद् ” (४)
छीवाद्या नोदकं कुर्युः स्तेनबात्या विधर्मिणः
गर्भभद्रुहश्चैव सुराप्यश्चैव योषितः” (५)
(१) पतित, नपुंसक, पगु, उन्मत्त, जड़, अन्ध. अनिवार्य कष्ट आदि
रोगयुक्त, जो पत्र है वह पिता के अंश का भागी नहीं होता है किन्तु भोजना,
च्छादन का अधिकारी होता है।
(२) पुरुप की हड़ी, मरदा, विष्टा, वीर्य, मूत्र, स्त्री का ऋतकालिक रज,
चरवी, पसीना, नेत्र का जल, कान की मल, श्लेष्म, मदिरा, यह सब पदार्थ
अमध्य ( अपवित्र ) हैं।
(३) ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य वामहस्त से न भोजन करें औ न जलपान करें
औ एक हाथ से जल भी न पी एवं शुद्र का दिया हुवा जल भी न पीयें।
(कलिकाता सोसायटी मदिन पत्रात ३२९)
(४) ताम्र के पात्र में तथा फूट हये कांस्यपात्र में तथा मलयुक्त पात्र में
गृहस्थी भोजन न करे, औ यदि गृहस्थी पलाश तथा पन के पन में भोजन
फरे तो चान्द्रायण व्रत कर नहीं तो पाप होता है ( पृ०३२९)।
(द) नसक, चौर, संस्कार रहित, विधर्मी पुरुष तथा गर्भपातक, पति-
.

कासवादीक्षा
महानद्यन्तरं यत्र गिरिर्वा व्यवधायक:
वाचो यत्र विभिद्यन्ते तद्देशान्तरमुच्यते " (५)
"श्रवणाविधनिष्ठाद्रीनागदेवतमस्तके,
यद्यमा रविवारेण व्यतीपात: स उच्यते" (१)
"न नियुक्तः शिखावर्जमाल्यं शिरसि धारयेद् (२)
जीवन जातो यदि ततो मृतः सूतकमेव तु
सूतकं सकलं मातुः पित्रादीनां त्रिरात्रकम् " (३)
"नाध्यापयति नाधीते स ब्राह्मणत्रुवः स्मृतः
जरा
"राजा लन्था निर्षि दय? भ्य में हिन: पुन: (४)

१२१ महालय श्राद्धमीमांसा। विहानशेषमादद्यात्स सर्वस्य प्रभुर्यतः इतरेण निधौ लब्धे राजा षष्ठांशमाहरेद अनिवेदितविज्ञाता दाप्यस्तं दण्डमेव च” दायात “शूद्रोप्येवंविधः कार्यो विना मंत्रेण संस्कृतः” (१) "वस्त्रेणाच्छाद्य तु करं दक्षिणं य: सदा जपेत् (२) तस्य तत्सफलं जप्यंतहीनमफलं स्मृतम्"पापारमा । "स्त्रीधनं स्यादपत्यानां दुहिता च तदर्थिनी, (३) अप्रत्ता चेत्समूढा तु लभते मानमात्रकम्"यनारमपूछ । "पतत्यर्ध शरीरस्य भार्या यस्य सुरां पिवेत् (४) संस्कारगया। से अर्धभाग ब्राह्मणों को दे, औ यदि ब्राह्मण को निधि भास होय तो यह सघ ही ग्रहण करे क्योंकि ब्राह्मण सर्व का स्वामी है, यदि वैश्य आदि को निधि का लाभ होय तो राजा के प्रति छठा ६ अंश प्रदान करे, औ न निवे. दन करे तो उस के प्रति राजा दण्डप्रदान करे। (१) शूद्र के भी जातकर्म आदि संस्कार करे परन्तु वैदिक मंत्रों के उच्चा- रणपूर्वक न करे। (२) जो अपने दक्षिणदस्त को वस्त्र से आच्छादित कर जप करता है उस का जप सफल है औ अन्य का निष्फल है। (३) स्त्री के धन का अधिकारी पुत्र तथा कन्या है परन्तु यदि कन्या अविवाहिता होथै तब तो पूर्ण अधिकारवाली है औ विवाहिता होवे तोकळ२ सत्कार की अधिकारिणी है। (४) जिस की भार्या सुरा पान करती हो वह पुरुप भी शरीर से अर्ध- पतित जानना, असे पतित का भी विना मरणान्त मायचित से अन्य कोई प्रायश्चित नही है। M

महाळयथाद्धमीमांसा।
पतितार्धशरीरस्य निष्कृतिन विधीयते" भाचिनमयूण ।
"श्यालके तत्सुते चैव सद्यः स्नानेन शुद्ध्यति (१)
। पण्डं तु ब्राह्मणं हत्वा शूद्रहत्यायूतं चरेद" मूवमलाकर ।
"पिता पितामहो भ्राता ज्ञातयो गोत्रजोऽग्रजाः (२).
उपायनेऽधिकारी स्यात्पूर्वाभावे परः परः” सिसिन्धु ।
“यो भाटयित्वाशकटं नीत्वा नान्यत्र गच्छति, (३)
भाट न दद्याद दाप्योसावनूढस्यापि भाटकम्” ।
त्रयोदश्यान्तु सप्तम्यां चतुर्थ्यामर्धरात्रत: (४)
अर्वाक् नाध्ययनं कुर्यादिच्छेत् तस्य परायणम् ।
रात्रौ यामहयादाक् यदि पश्येत् त्रयोदशीम्
--
विवाधिनतामपि।
(१) साला तथा साले का एत्र यदि मरे तो शीघ्र ही सानपात्र से
शुद्धि माननी, औ यदि नपुसक ब्राह्मण की हत्या करे तो दहत्या का
प्रायश्चित करे।
(२) पिता पितामह भ्राता, ज्ञाति, गौत्रन, अग्रन इन में से पूर्व २ के
अमाव होने पर पर २ को उपनयन कराने में अधिकार जानना।
(३)नो गाडी भाडाकर अपने गृह में लेजाकर फिर किसी प्रतिवन्धक
से न जाने पर भाटा न दे तो राना को उचित है कि न भी सवारी करे तो
भी भाटा दिवाये।
(१) त्रयोदशी सप्तमी चतुर्थी इन तिथियों में अर्धरामि से पूर्व अध्ययन
मद करे किन्तु पारायण करे, औ यदि द्वादशी के दिन अर्थरात्रि से पन
प्रयोदशी का योग होय तो स रात्रि में महादेव जी के आराधन से विना
और कोई काम न करे क्योंकि अन्य सर कामों के वह नाश करने वाली है।

१२३
महालय श्राद्धमीमांसा।
सा रात्रिः सर्वकर्मघ्नी शङ्कराराधनं विना" स्मुगिरमाएर ।
'दशाहाभ्यन्तरे वाले प्रमीते तस्य वान्धवैः (१)
शावाऽऽशौचं न कर्तव्यं सूत्याशौचं विधीयते” मिशाचरा ।
"येन शुलीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृता:(२)
मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्ति विधास्यति"
भागवतस्क.३.१यो.१६ टोकर।
विस्तरभय से अन्य वचनों का उपन्यास नहीं किया
गया है।
ओम्-श्री।
व्यूहक्लेशाङ्कभूवर्षे वैक्रमे वैक्रमे पुरे *
माघमासाऽसिते पक्षे गुरौ याम्ये तिथौ शुभे,
(१) दश दिन के भीतर ही यदि उत्पन्न हुआ पालक मृतक हो जाये
तो उसका पातकाशौच मत करे किन्तु सूतकाशौच करे ।
(२) जिस परमात्मा ने हंसों को श्वेत किया है औ शुकों को हरित
किया है औ मयूरों के पांखों को चित्रित किया है सोई तुमें जीविका प्रदान
करेगा सोच मत करो।
* इसी प्रकार से 'मधुपर्के च सोमे च तांबूलस्य च भक्षणे, फलमूले
चक्षुदण्डे न दोपं माह वै मनुः" इत्यादि प्रकार के मनु के नाम से जो पुगण
तथा रामायण भारतादिकों में श्लोक आते हैं वह भी वृद्धमनु के जानने,
मधुपर्क, सोमरस, फल, मूल, इक्ष, तांबूल इन के भक्षण के पश्चाद आचमन न
भी करे तो कुछ दोप नहीं है।
* अर्थात् महाकाल महेश्वर के निवास भूत विक्रम जी की उज्जयिनी
,

महालयमादमीमांसा
महाकालालये श्रोतसवस्व पूर्णतामितम्”
नमोऽतमिणे गुरवे ।
হার নিষ্কিহাৱানােনৰামামাবর্ষীনামামির
श्रीनसर्वस्वम् ।
नामक पुरी में विक्रम जी के १९५४ वर्ष में माघकृष्ण पक्ष गुरवार त्रयोदशी
को यह ग्रन्थ समाप्त हुआ।
हरि रोम् शान्तिः ।
इति श्रीमदासीन स्वाम्यात्मस्वरूपोद्दीपितमपक्षितानुक्तपूरण विवरणम्

Srot Sarvsam

Author
Balaram
Title
Srot Sarvsam
File name
Srot Sarvsam
Text
OCR done
Citation
1898
Published
2012/08
Publisher
Patna.,khand Vilas Press
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405297
Barcode
99999990292383.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
v62HKautYDO
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