Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Jinagyadeep Bhag Ii
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Smom
जिनामदीप.
सिझमूर्ति विवेकविलासः
भाग दूसरा.
कर्ता
युक्तिवारिधिः उपाध्याय श्रीरामशद्धि सारगणिः
२२ टोलोंकै अध प्रश्नोंका जवाब.
प्रकाशक
वैद्य पंमित जीवण महमुनिः हक्क विद्याशाला
के मालक उपाध्यायजी के शिष्य प्रेमचंद अमरचंद
बीकानेर.
मुबई-" निर्णयमागर" प्रेसमें बाळकृष्ण रामचन्द्र
घाणेरद्वारा मुद्रित
विक्रम संवत् १९६६ आवृत्ती १०००.
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जाहिर खवर तपागच्छी मुनिः वल्लभ विजयजी सवेगीने पालणपुर सं० १९६६ के चोमासमें दूढियोंको संप वावत कप दिखाणे चोपड़ी छपायके भेजी उसमें लिखा है वाईस टोलेवालोंका-संप करणेका विलकुल दिल नहीं दिखता क्योंकै २२ संप्रदायके तरफसें जो समाचार अहम्मदा- वादसें निकलता है उसमें दत्तसूरजीको कोकशास्त्रका वणाणेवाला लिखता है, इसवास्ते हमारा जवाव है श्री जिनवल्लभसूरिकै पट्टप्रभाकर लाखों घरोंकों जैन धर्म धराणेवाले दादा गुरुदेव जो जगे २ जैन सघसें पूजनीय इन श्री जिनदत्तसूरि ने तो कोईमी कोकसंबंधी ग्रंथ वणाया नहीं क्या समझकै लिखते हो दत्तसूरिः इस नामके दो तीन और मी भाचार्य हो गये हैं वेगड खरतरमें भये है उनोंने कोइ ग्रंथ वणाया सुणा नहीं एकदत्तरिः वायड गछमें भये है उनोंने विवेक विलास शकुन ग्रंथ जो की हीरालाल हसराजनें गुजरातीमें छापा है इत्यादि ग्रंथ इनोंने वणाया है न तो ये दत्तसूरिः परकाय प्रवेशनी विद्या सिद्ध थेन इनोंकै नामकै पिछाडी जिन संज्ञा है नहीं कोई इनोंने राजन्य वसी अन्य मतियोंको माहाजन वणाया है नदादाकै नामसें इनोंकी चरण थापना पूजे जाती है वायड गठी दत्तसूरिः सवत विक्रम १२७५ में भये हैं जिनोंने वस्तुपाल तेजपालकों उपदेश देकर द्रव्य मेषधारियोंका वंदन सत्कार सरू कराया है ये वात प्रबंध चिंतामणीमें लिखा है और दादा गुरुदेव श्रीजिनदत्तसूरिः खरतर गछ नायक जि- नोंने संदेह दोलावली चर्चरी,आदि अनेक धर्मी उपगारी ग्रंथ वणाया २ - - है उनोंका स्वर्गवास तो संवत १२११ में अजमेर नग्रमें हो गया इसवास्ते खरतर गछी श्री जिनदत्तसूरीश्वरनें तो कोई कोकसंबंधी शास्त्र वणाया नहीं अगर वणाया होय तो वो ग्रंथ कहां है क्या नाम है सो वाईस संप्रदाइयोंने नाम प्रगट जाहिर करणा लेकिन दुसरा जबाब यह हैकी ८४ गछकै किसीभी आचार्यनें पूर्वाचार्योंकै वचनोंकै : प्रमाणसें कोई भी ग्रंथ रचा होय तो सब गछवालोंकों यथार्थ माननीय है जेसें भद्रबाहू स्वामीनें जोतिषकै निमित्तके भद्रबाहू संहितादि ग्रंथ वणाया सामुद्रक वणाया तो इसमें दोष क्या है तीर्थंकर परमात्माकै ज्ञानमें कोईभी विद्या वाकी नहीं चवदै पूर्वसें बाहिर कोई भी अक्षर विज्ञान वचा नहीं २२ संप्रदाई द्वेषबुद्धि छोडकै ३२ सूत्रमें ही हृदय पट खोलकै तो देखे क्या इन सूत्रोंमें वैस्याओंका वर्णन विपाक सूत्रमें नहीं है और सुंदर स्त्रीका वर्णन क्या उवाई सूत्रमें नहीं है नगरकोट खाइ घोडा हाथी कोनसा वर्णन वाकी है जरा तत्व दृष्टीसें विचारो चार अनुयोग रूप सूत्रोंमें कोनसी वात वाकी है तो क्या अर्थ कह- वाले तीर्थंकर सूत्र रचणेवाले गणधरोंकों २२ संप्रदाई दोषारोपण करेगें ७२ कला ऋषभ प्रभूनें जाहिर किया और उस शास्त्रोंका सारांश प्रकरण आणेसें सूत्रकारोंने जगे २ दरसाया है उपदेश सब अनुयो- गका होता है आदेश एकांत निरवद्यका तीर्थंकर गणधरकी आज्ञा मुजब होता है इसवास्ते हे पक्षपातियों बहुश्रुतियोंकी सेवाकर शास्त्र रहस्य समझो जती साधू डंड रखते हैं वो ओपनाहिक उपगरण सूत्रों की आज्ञा मुजब है थिवर कल्पमें दंड रखणा सिद्ध है भगवती सूत्र तथा दसवैकालिक सूत्रमे दंडंवा १ कुंडंवा २ पडिलेहण करणा लिखा है बारे कालीमें नहीं चला है, एसी वात लिखणी चाहियै जो की ३ - शास्त्र सूत्रसे विरुद्ध नहीं होय एसे २ लेख अज्ञपणा सिद्ध करता है और हम तो तुमकों मित्र मावसे यथार्थ उत्तर लिखा है जो प्रश्न पूछेगा और झड़ा आक्षेप करेगा उसकू क्षयोपशम मुजव जवाव देणा जैन पंडितोंका धर्म है जो २२ संप्रदाई तथा मतांध लोक एक वडी जैन कोग्रेस भरकै, सुधारा और सपका प्रयत्न यांचे तो बहोतही कल्याण कार्य हो जाय पहला पक्षवादी जब पक्ष उठाता है तब यथार्थ प्रत्यन स्थान करणा होता है तुम पक्षपातकै नमूने दरसाते हो इसकूँ तदन बंध करो तो सब मिसल वैठ जाती है। हमारे इहां छपे भये तइयार ग्रंथ. दादा गुरु देव मत्र युक्त गायन पूजा परचोंका संक्षेप वृत्तांत मोलेचाणाक्यका अर्थ,शकुन,काम होगान होगा पासाडालणेका,स्वरोदय।।। सिद्धमूर्ति विवेक विलास मूर्ति स्थापना कायदेसें सिद्ध प्रथम भाग ॥ दूसरा भाग जिसमें ढूंढियोंकै ७४ प्रश्नाकाजबान द्रव्यपूजा३२सूत्रसें ॥ रत्नसमुच्चय ( रनसागर ) से अनेक वस्तुयें जादा प्रतिक्रमण चैत्य वदनादिक स्तोन चारे मासी तपस्याओकी विधि मंडल पूजा खरतरगच्छतपागच्छका एसा कोई कर्तव्य वचा नहीं सो इसमें नहीं हो एक पुस्तक पासमे होणेसें दुसरी धर्म क्रिया वावत श्राव- गोको २० पुस्तक नहीं चहिये ८०० पन्ने अठ पेजी पक्के पूढे ग्लेज कागज कम कीमत । पूजा महोदधी सरतरगच्छतपा गछकी गाणेकी ३७ पूजा मंत्र तया विधियुक्त. २॥ श्रावक व्यवहार चमत्कारी धर्मकै साथ रुजगार धन पैदा ४) करणका प्रय १ ४ , , , , , वैद्यदीपक इसमें ७ प्रकाश है प्रथम प्रकाशमैं जगत्का अनादि स्वरूप जीव कर्मका संबंध दरसाया है प्र०२ में वदनकै सब संचेंका खुलासा अंग्रेजी देसी दोनोंका सामिल किया है नाम देसी अंग्रेजी दोनों है प्र० ३ में, हवा, पाणी, विगडणेका कारण, पहचाण, सुधारणेकी तजबीज, प्लेग नही होसकै, वेमारी कोई भी नहीं हो सके, मकानके विगडी हवाकू पहचाणना, साफ करणा, अनाज फल फूल साग दूध दही मखन छाछ मसाला तेल घी चा इनोंका गुण अवगुण केसे खाणा पीणा जिससे तनदुरस्त रहै एसी विधि, स्नान, कसरत, मर्दन, दांतन, पानसुपारी इन सवोंका तनदुरस्तीकै साथ वर्ताव, छ ऋतुओंका पथ्य षटू रसका गुण अवगुण इत्यादि प्र० ४ था अपणी तासीर वायुकी है, या पित्तकी, कफकी, या खूनकी है, इसकी पहिचाण, वात पित्त कफ खून काहेसें खराब होकर, बेमारी आती है, वो सब दरसाया है फेर- नाडी, पेशाब, जीभ वगेरे, देसी, डाकदरी, दोनुं परीक्षा रोग पह- चानकी लिखी है, अपणी वेमारी आप पिछान सकता है प्र० ५ में घी, दवाका तेल, पाक, मुरव्वा, गोली, सरवत, काढा, चटणी, मल्लम, लेप, रस, गुलकंद, वगेरे सब चीजोंकै वणाणेकी विधि, जुलाब, उलटी कराणेके रोग, तथा विधि, गरम पाणीसें तथा ठंढे पाणीसें पेटमें विगर दवा दिये रोग मिटाणा, सब दवाइयोंकै गुण, अवगुण, तेतीसही अक्षर १४ स्वरोंकै दवाका नाम अनुक्रमसें, देसी दवा सोधनविधि, अनुपान रोग २ का जुदा २, अंग्रेजी तोल माप, मात्रा ऊमर मुजब देणेका प्रमाण, रोग २ प्रति मिटाणे . , ५ काढा, गोली, चूर्ण, देसी, तेसें अग्रेजी मिक्श्चर,मुसलमानी यूनानी नुसकै, होमियोपथी क्रोमोपैथी, इलाज सब रोगोंपर, प्र.६ में रोगके कारण लक्षण २० इलाज देसी डाकदरी हकीमी ओर होमी- योपथी पथ्य कुपथ्य फैर स्त्री रोग लक्षण इलाज पथ्य सतान पैदा करणा ऋतुधर्म वधनका इलाज वचोके रोग लक्षण इलाज पथ्य, जानवरोंके रोगोंके इलाज, जंगम जहरोंका इलाज, थावर सोमल अफीम पारा हरताल धतूरा कणेर डाकदरी जहर सबोंका इलाज, मरदमीका इलाज, ब्राम्ही मोहरा गुटिका वणाणेकी विवि, पुत्र पैदा करणा इत्यादि ग्लेज कागद ८०० पन्ने, ३५०० करीब ग्रंथ, जिसकी तारीफ लिखणे कलम चेहाल है हर गृहस्थियोंकों घरमें रखणे की जरूरी है, क्योंक पहली सुख निरोगी काया, दिव्य अक्षर, निर्णयसागर, मुबईका छपा. इन किताबोकै जो दाम लगाये है उसका कमीसन काटकै लिखा शकुन ग्रंथ खरतर गगचार्य दादा साहिब विरचित मूल भाषा छद की उपाध्यायजी इसमें विदेश विदा होते या हरकाम जाते जो शकुन ममुस आवै उसका फला देस छींकका अग फरकणेका वर्षात इस वर्षमें किस महीने वरसेगा पहले मालम होणा घर कराणे जमीन लेणा उसकी अच्छी बुरीकी परिक्षा नींव खोदते पदार्य निकले उसका शुभाशुभ फल इत्यादि दरसाकर गुरदेवनें एसा अजबी परीक्षा घरी है के कोई किसमका व्यापार करणेवाला चेत सुदि २ वरस वैठते चद्रमाका टग देखो मजाल क्या है मो धन न पैदा कर उस मुजब करे तो जरूर लाभ उठावै मारवाडी ५ है -- ६ भाषाकै सुभाषित राजियेके दोहे १२४ किताब रन छोटा मगर गुणका रन यथार्थ है. , अब छपता है सो ग्रंथ ओसवंश मुक्तावली. जैन धर्म चलता कम कैसें पडा फेर किस २ आचार्योंने गोत्र मा- हाजन किये प्रथम १८.गोत्र ओसियांमें होंणेका इतिहास साल संवत, वाद भोजकोंका इतिहास राजपूतोंकी जात तातेड वगेरे अठारोंकै नाम आचार्य रत्नप्रभसूरि प्रतिबोध बहुत विवरण है, सुहचिंती गोत्र, वर- ढियागोत्र, कोठारी वडेर चोपडा गांधी साख १२ धाडेवाटाटिया कोठारी, झावक झांमड झंवक, चोरडिये पारख गोलछे सावसुखा साखा प्रतिसाखे मिलकै ५० तीर्थभाई १८, भणसाली चंडालिया भूरावद्वाणी; लूंकड, आयरिया लूणावत, बहु फणा वापना गोत्र ३७ नाहटा पटवा साखा प्रतिसाखा, डागा मालू भाभू पारख छोरिया, रांका सेठी सेठिया जात ७ साखा प्रसाखा, राखेचा पूगलिया, लूणिया, डोसी सोनीगरा, सांखला सूराणा सियाल सांड सालेचा, आघरिया, दूगड सेखाणी कोठारी सुघड, मोहीवाल गांग दूधेडिया साखा १६, बोथरादसाणी फोफलिया वछावत साखा ९, गेलडा जगतसेठ, लोढा २ तरेके, बोरड, नाहर, सिंघी नवलखा, सालेचा बोहरा, वांगाणी,भंडारी डागा तिलेरा बोहरा ढढा श्रीपती, पीपाडा, घोडावत छज लाणी, कठोतिया, भूतेडिया, जडिया कांकरिया आचडा खटोल श्रीश्रीमाल वावेल संघवी गडवाणी भडगतिया रूणवाल वेगाणी पोकरणा कोचर मुंहतोका विस्तार वर्णन, वैद, मीनीखजानच भुगडी, मुहणोत पींचा, बाकबकारी खबर, कच्छ देसी श्रावकोंका वृत्तांत, श्रीमालगोत्र उत्पत्ती १३५ नख, पोरवालगोत्र उत्पत्ती २४ नख, हूंषडगोत्र, ' - श्रावगीगोत्र ८४ वघेरवाल गोत्र ५२ नरसिंघपुरा गोत्र २८ गौरारा गोत्र २२ अग्रवाला गोत्र १७॥ सतरे इन सबोंका इतिहास कोण राजपूत किसतरे जैनश्रावक भये सो कारण संवत् किस आचार्यनें प्रतिबोध दिया इत्यादिक बहुत विस्तार वाला अद्वितीय प्रमाण युक्त छपता है लेणेकी सीघ्रता करणा एसा दुनियांमें कोण होगा सो अपणे पूर्व वडेरोंकी वातोंसें वाकवकार न होय ८४ वणियोंकी जात १२॥ न्यात भोजेकोंके ऋपीगोत्र गांम वेद साखा प्रवर माता भेरूं गणेश सारी सोलेही गोत्रोंका विवरण इस ग्रंथमें निर्णय यथार्थ दर- साया है प्रथम मूल्य भेजणे वालोंमें टपालखर्च माफकर ११) सवा कलदार लिया जायगा जती पंडतोंकै वास्ते ये कल्पवृक्षही समझणा इसग्रंथकू रजीप्टर कराया सर्व हक्क कर्ता स्वाधीन है सो कोईभी लिखेगा या छापेगा वो दडका भागी होगा इसकेबाद स्वप्न जो प्राणियोंकू आता है उसका फल मिलाणेका शास्त्र और पुरपोकै बदनके सब शुम अशुभ लक्षण चार जातके पुरुप फेर स्त्रियोंके शुभाशुभ लक्षण चार जातकी त्री इसकै सग अनेकानेक वर्णन दुनिया में कामकै अर्थी प्राणियोंके हजार नेत्रका उजाला ये ग्रंथ कराणेवाला है छंद भाषा दोहा सोरठा वध उपाध्यायजी रचित है १) ये सव पुस्तक मिलणेका ठिकाणा बीकानेर राजपूताना मोहल्ला रांघडी उपाध्याय श्रीरामलालजी माहाराजकी विद्याशाला, पत्र देणा, प्रकाशक भत्री पडित वैद्य श्रीजीवणलालमुनिः सर्वहक मालक शिष्पपे- मचंद अमरचंद ।। टिकट मेज सूचीपत्र मंगा लीजिये वैरग नाटपेट पत्र न भेजें पुस्तक मंगाकै लोटायगा परदेससे वो परमेश्वरसें गुनहगार होगा लायकोंके लिये इतनाही वस है ।।
सूचना. इस जिनाज्ञा प्रदीप (सिद्धमूर्ति विवेकविलास) भाग दूसरेमें जो प्रतिमा उत्थापक मतकी उत्पत्ति लिखी है सो विक्रम संवत् १६०० से में त्यागी वैरागी क्रिया उद्धारी अकव्वरवादसाहकों सब दर्शनियोंसें पहले पहल खरतर गछाचार्य श्रीजिनचंद्रसूरीश्वर लाहोर नग्रमें दया- धर्मका उपदेश देकर अनेक तरेसें जैनधर्मका उद्योत करा, सर्व प्रजाका अत्याचार दुख, जो हुमायू बादसाने जारी किया था सो सव बंधकर- वाया इसबातका विवरण हमारा संग्रह किया भया ओस वंशमुक्ता- वली ग्रंथमें वोथरा वछावत वंशावलीमें लिखा भया देखणा, उन महाराजाके साधू शिष्यनें चोपई बणाकर लिखा वेसा हमनें लिखा है इन सूरीश्वरकै दोय साधू महाविद्वानोंकों वादसा अकबर गुरूकों अर्ज करकै अपणेकों धर्म शिक्षा होती रहै इसवास्ते दिल्लीमें संग लेगया था एक तो वेष हर्षमुनिः दुसरे परमानंदमुनिः । तपागछ खर- तर गछकै आपसमें बहोत संप चलता था इन दोनों खरतर गछी जतियोंने बादसाह अकबरसें सुपारस करकै तपागछ नायक हीर विजयसूरिकों गुजरातसें बुलाकर वादसाहसें अरज करकै मोहर छापकै कागद फुरमाण पत्र पंचतीर्थ जैनश्वेतांबरोंके कवजाकै लिये करवा दिये कारण ये समझके की जेसें श्रीजिनचंद्रसूरिः युगप्रधान जैनधर्मके प्रभावक तेसें ही हीरविजयसूरिः प्रभावक इससें अवल फुरमाण कर- मचंद वछावतईं गुरूमाहाराजनें सोंपा था सो बीकानेर बडे उपाश्र- यमें बडे भंडारमें मोजूद है नकल खरतर गछ श्रीपूज्यजीमाहाराजजी पास मौजूद है एसा २ विचार देख फुरमाण लिखवादिया तपागछी उसकी नकल यथार्थ सागर तपागछके पाटियादारनाणचदजी मुंबईसें मासि - or कपत्र विवेक प्रकाशमें छापी वो यथार्थ है, श्रीजिनचंद्रसूरिः परमत्यागवान बादशाइनें जो जो फुरमाण नजर किये वो सब करमचद वछावतकों बादसाहसें दिलादिया वो अरब्बीका लिखा हमनें आंखोसें देखा है फेर दिखा सकते हैं, (प्र०) आपने तो वेप हर्प परमानद जतीको खरतर गछका लिसा है और हमने एक प्रसिद्ध मोटेमाहाराजकै छापे भये और बणाये भये ग्रंथम पढा हैं के वेष हर्प परमानंद जती तपागली आचार्यके चेलेथे सो ये क्या बात है एसे जगप्रसिद्ध माहाराजका लेख मानता तुमारा लेख कोण मानेगा (उ०) अगर प्रमाण युक्त वचन किसीभी बुद्धिवांनका हो माननेमें हरजा नहीं वे प्रमाण अहकार बस फक्त अपणी बडाई रूप वचन कोइ लिखेतो माननीय कभी नहीं होसकते चाहै मोटे माहाराज हो चाहै छोटे माहाराज (प्र०) आप प्रमाण देकर उण जतियोंका खरतर गछीपणा सिद्ध करदोगे तो निरापेक्षी तो मांनहीं लेगें पक्षपाती नहीं माने तो क्या वो न्यायवंत कहलांयगे, कभी नहीं, लिख बताइये, (उ०) हे मित्र! सब प्रमाणोंमें प्रवल प्रमाण कोनसा है तो सब दुनियोंमें मसहर हैकी, प्रत्यक्ष प्रमाण, हे मित्र ले हम प्रत्यक्ष प्रमाणसें वो दोनूं साधू खरतरकै थे एसा सिद्धकर देते हैं वेपहर्षमुनिके शिष्य विजयहर्प उनके शिष्य शांतिहर्ष इनोंका शिक्ष जिनहर्प यो चारों पीढियोंकी निसाणी ये क्रिया उद्धारी रहै जिनहर्प जीने महावल मलयासुंदरीकी चोपई श्रावककी करणी लघु चोपई अनेक चोढालीये अयवंती सुकमालका नोढालीया सिझायों वगेरे अनेक भाषा अथ संस्कृत प्राकृत ग्रंथमें खरतर गछ श्रीजिनचंद्रसूरि चोथे पट्ट धर पूर्वोक्त चंद्रसूरीका राज्य शासन लिखते हैं क्योंकी खरतर १० A A गछमें । परंपरा है सो चोथे पाटधारी आचार्यका नाम श्रीजिनचंद्रसूरिः होता है जब रंगविजयगणीने रंगविजय खरतर शाखा फांटी तव शांतिहर्ष और जिनहर्षजी उस साखामें चलेगये वाद इनोंके केइ शिक्ष भये जिनोंकी नंदी (नाम) भिन्न २ श्रीजिनचंद्रसूरिः उस साखा. वालोंकीथा पना फेरदी कारण खरतर गछमें चोरासी नंदी चलती है चोरासी गछ इसमेंसें भये इसवास्ते मगर जो त्यागनत उत्कृष्टता रखता है वो किसी कारण नंदी आचार्यसें लेता है जेसें उपाध्याय क्षमाकल्याण- गणिः दीक्षाकी कल्याणनंदी है इनोंकै धर्मानंद धर्मविशाल दीक्षानंदी सुगणगणिः सुमति मंडण दीक्षानंदी ये संवेगी साधुओनें खरतराचार्य पास नंदीली और कोई नहीं लेकर अपणे पूर्वजोंकों आचार्य ने नंदी दी उसीपर ही चलता है इस वखत क्षमा कल्याणजी माहाराजकै सिंघाडे वाले जैसे राजसागर ऋद्धिसागर सुखसागर भगवानसागर सुमति- सागर मणीसागर इत्यादि प्रणाली चला रखी है वेसेंही चार पीढीतक वेषहर्ष साधूके संतान जिनहर्षजीतक हर्षनंदी चलाई 'बाद इनोंके शिक्ष प्रशिक्षोकी नंदी क्रम मुजब बदलाई गई जिनहर्षजीकै एक महा- विद्वान शिष्य श्रीसार जिसनें आनंद श्रावगकी गायनरूप संधी बनाई उसमें जिनहर्षगणीका आपशिक्ष लिखता है इसमें रंगविजय खरतरमेंसें श्रीसार गछ खरतर शाखा फेर फांटी एसे खरतर साखा ११ मूल खरतर १ एवं १२ आचार्य सबोंकी प्ररूपणा सामाचारी अभी भी एक है कोई बातका फरक किसीनें नहीं किया, इस प्रमाणकी प्रत्यक्ष सबूती उनोंकै शंतान रंगविजय साखा खरतर गछमें मौजूद है अब श्री परमानंदजी जैनधर्मकै महाप्रभावीका उपाध्यायपद श्रीजि , नचंद्रसूरिने स । १६२५ में इनायतकी और फरमाया तेने जैनधर्मके सघमें परमानद ही वरताया इसवास्ते तेरे संतानोंकी दिक्षा की नंदी आचार्य बदलायगें मगर प्रसिद्धनाम तो नदही रहेगा तवसें उनोंकै शिक्ष प्रसिक्षोंकी वो प्रनाली चली इसमें कलकत्तेमें खरतर भट्टारक गछकै आदेशी दुर्गानंदजी जिनोकै शिक्ष रत्नानंदजी उनोंका शिक्षविद्वान सदानंद नामका २५ वर्षमे देहांत भया तब रत्नानंदजी संवत् विक्रम १९३० मे क्रिया उद्धारी ५० हजारका द्रव्य त्याग महानती होगये श्रीजिन मुक्तिसूरीश्वरकै मवईकै श्रीमाहावीर स्वामीकै पाटियादार आ देशी सदानदजी ज्ञानानंदजी सं । १९५७ में देहांत भया कमलानंद मुनिका पोत्रा श्रीजिन कीर्तिसूरीश्वरका आज्ञाकारी हेमानंद अभी जालणे सहर दक्षण १९।६६ वर्तमान मोजूद है मंबई हमसें मिलणे संघयुक्त आया था उस वखत राय वद्रीदासजीकै मुनीम श्रीजमनालालजी कोठारी हमारेसें धर्मचर्चा प्रश्न पूछता था मेने कहा प्रत्यक्ष देखलो ये परमानंदजीका सोलमाशंतान प्रत्यक्ष हाजर है मनमें संका होय तो चिठीद्वाराया प्रत्यक्ष देख निश्चयकर सकते हो ये मेरा लिखा प्रतक्ष प्रमाण वडे २ कलकत्तेकै यती : सब गछकै और श्रावक सब रतानदजीकों देखणे वाले मोजूद है रायसाहव चद्रीदास- जीने तो दुर्गानंदजीका हजारों दिनोंतक धर्मध्यान सुणा हैं और भी बुढे श्रावक वाकयकार मोजूद है एसाई मवेईमें मोजूद है न मानो तो इहाकै रातदिन रहणेवाले सागर गछी नाणचंदजी अखैचदजी जतीसें निश्चय करलो इस बातक अहम्मदाबादी सूरती गोढ' वाडिये सव संघ वाकवकार है क्योंकी ९।१० वर्षही उनोंकों मरेवीता है १२ मोटे माहाराज अगर इस अपेक्षासें लिखते होयकी खरतर गछ तपगछ दोन एकही है और तत्वदृष्टिसें एकही है तब तो कोई दुसरी बात नहीं अगर अहंकार द्वेषापत्तीसें लिखा है अपणे पक्षकी महत्वता दिखाणे तब तो जो कुछ प्रमाण युक्त है सो हमनें लिखदिया है इसमें कोई दलील नहीं है और हे श्रावको तुमारा तो ये हाल इस वखत पक्षपात दृष्टि रागसें वणरहा है जैसें एक किसीने कहा अरे बैठा क्या देखता है तेरा कान वो कउआ अभी लेकर उडगया तब वो कउएके तरफ देखता है मगर घरका कान नहीं संभालता जरा किसीने त्यागीपणेकी अथवा कडाकै निकालणे शीतउष्ण सणे आदि ढंग दिखाया जब एक चला तो दुसरा तीसरा एवं गडर प्रवाह सरू होजाता है जेसे (दोहा) एक भेड आगेचली, पीछे चली कतार, एक भेडकूएपडी सबी भेड उसलार इसवजै भारतवर्षकै बुद्धिहीन केइ अद- म्योपर इतिहास तिमिर नासमें लिखा हैं एक सेठसाहबकों जोतसी जीकै वचनोंका पूरा विश्वास था मानूं परमेश्वरही है उनोंने जन्मपत्रीमें ४५ वर्षहीकी ऊमर सेठजीकी वीथी अमुक लग्नमें उसदिन देह छूटेगा बस लोकोंसें सेठसाहब फुरमाणे लगे हम उसदिन निश्चै मर- जायगें घरवाले रोणे पीटणे लगे किसी बुद्धिमानने समझाया अरे क्यों रोतेहो एसा क्या जोतषी कुछ केवली तो है ही नहीं ५ बात मिल जाती ५ नहीं भी मिलती रागद्वेशका भरा महत्वपणेका भरा एसेंकों एका एक परमेश्वरतुल्य मानना ये कोई बात है किसी आपके बडेरेकी बनाई पोथी थोथीसें लिख मारा होगा एसा समझाकर धीरज दिया बस वोदिन निकल गया महीनावरस निकलगया लोक कहणे लगे १३ क्यों सेठसाहिब जन्मपत्रीका लेख कैसा है सेठसाहिवने फरमाया सव सच है हमतो उसी दिन मरचूके थे जो दिन पडितजीने फरमाया था क्या कमी पंडतजीका लेख झूठा होसकता है आगू उनोंकी लिखी बीसों वात सच्च निकली तो ये वात कभी झूठ नहीं है, बस भाई विश्वासधारियोंका एसा ढंग, इस वखत चलता है चाहै केसाही हो बस मोटेमाहाराज लिखगये गप्पसप्प ग्रंथपर धप्प लगाणेवाला लिखता है कल्पित पट्टावली मोटे महाराजनें लिखी है सो प्रमाण करणे लायक नहीं ये लिखणेवाले भी जगप्रसिद्ध पुरुष है बस विचार करो गुरु अगर असत्य बात लिखदी है तो चेलेजी ज्ञानवंत न्यायवंतकै खटकती ही है इसवास्ते हे धर्मवंधुओ एकता कर संप करो आनंद- धनजी क्या लिखते हैं, गछना भेद बहु खेद निहालतों तत्वनी वात करता नलाजै उदरभरणादि० जिम २ पहुश्रुत बहुजन सम्मत बहु शिष्यपर वरियो तिम २ जिनसासननोवैरी निश्चै भवजल दरियो १ यशो विजयोपाध्याय इस वचनमें कमाल करगये हैं जो बहुश्रुती बहु- तोंका पूजनीक बहुत चेलोवाला होता है तेसें २ जिनआज्ञा विरुद्ध प्ररूपणा करणेवाला होकर भवसमुद्रमें गोते खाता है सो हाल प्रत्यक्ष देखा वणगया इसवास्ते सर्व संघकै त्यागी एकता कर जैनधर्म बढे एसा प्रयत्न बांधो सामाचारी निज २ का झगडा छोड एक जिन- आज्ञा स्याद्वादसें चलो ५० अथकी सम्मती भद्रवाहूस्वामी प्रमुख श्रुतकेवलीकी आणा जो सामाचारी प्रमुख आचरते हैं एसे खरे साधकों असाधू कहणा मूल है जिनवाणीकै अनुयोगकै पढणेवाले क्रियावंत तपेश्वरीकों असाधू किस न्यायसें कोइ कहसकता है साधूकू असाधू कहणा मूल है जैसे ८४ गच्छाचार्यनें जैनधर्म सपसें चलाया एसे १४ चलाणा ही उदयका कारण है इसबखत खरतर गछ तपगछ कमला गछ आंचल गछ विजय गछ तथा जिनप्रतिमांकै माननेवाले गुजराती नागोरी उत्तराधी ये सब मिलकै लोंकागछ सबोंकों अपणे प्राणवत् समझो ये सब गछवाले जिनप्रतिमाके जैनसूत्रागमकै वंदक पूजक माननेवाले हैं क्योंकै गुजराती लोंकागछी नरपति चंद्राचार्यकै हुकमसें मनसुखलालजी ऋषीने धर्मसिंधु पुस्तक छापा है उसमें सर्व विद्यमान लोकागछ कुवरजी पक्ष धनराजजी पक्ष तथा नागोरी, उत्तराधियोंकी सर्व सम्मती जिनप्रतिमा जिनसारखी मानते हैं कोई संका नहीं इसवास्ते सम्यक्ती धर्म बंधु है॥ (प्र०) जतीलोक श्वेतांबरी तो आपसमें मिलते हैं तब तो हमने पूर्वोक्त गच्छीयोंकों बहोत ही संप करते देखा है एक २ को वंदन आपसमें आहार पाणी आदि एकही मानूं देखा है भिन्नता देखी ही नहीं कोण जाणे प्रमादी गुणठाणे वर्त्तने लगे इसवास्ते सामाचारीका झगडा नहीं करते होंगे और नहीं करते हैं मगर हमने तो इंसवखत नई रोसनीवाले जो त्यागी वैरागी बडे २ माहाराज विजयजी सागर- जीकै तो आपसमें बडाई ही सामाचारीकै झगडेकीही देखी है माहाराज आत्मार्थी होकर दोनों ८४ गछमेंकै एक गूरूके चेले होकर द्वेषभाव क्यों रखते हैं ये होणा बुरा है (उ०) हां भाई तदन बुरा है इनोंकों चाहिये गृहस्थों को अपने मंतव्यकों पंचागी सिद्धांत प्रमाण उपदेस करते रहै आपसमें न झगडै श्रावककों संका पड़े तो दोनोंका प्रमाण पूछ निश्चय करलेवै जिसके पास जादा ग्रंथोंकी सम्मती वो तो यथार्थ खरा और नयवादका कारण अपेक्षाकै कोई वचन किसी ग्रंथमें y 1 ।
, , होय तो वो नयवाद भी सच्चा मगर कारण विचारणा संका त्याग श्रद्धापूर्वक धर्म करते रहणा सामाचारीका झगडा वृथा है ग्रंथसूत्रकै वचनोंमें नयवाद है, आगे २ पूर्वाचार्योंका लेख देखते हैं तो एकांत पक्ष नहीं लिखा देखते हैं एकक्रिया लिखकर लिखा है केइयक आचार्य फेर एसा भी कहते हैं, एसा लिखा है मगर आजकल वालोंकी तरे एकांत पक्ष ठहराणा नहीं दिखता क्योंकै एक तपागच्छमेंसें १३ संप्रदाय निकली, केइ आगमिया पाटणिया काजा कडुआ साकर कोयला आत्म इत्यादिक १३ सें भी ओर २ मतांतर निकले ये सब गुजरातमें, रविसागरके चेले शांतिसागर संवेगीने इछामत निकाला अहम्मदाबादमें, प्रतिमा उत्थापकमत भी गुजरातमें, तपागछकी समाचारीको क्या समझ २ छोड २ कै नई.२ कल्पना करते गये इसतरे पचमकालका स्वरूप वणणेसें एसा २ हाल वणता गया पार्थचद्रजी भी तपागछमेंसें भिन्न सामाचारी निकाली इसवखत वड गछकै आचार्य स । १९।६६. कार्तिकमें सिंहसूरी हमसें मंबईमें मिलै और अपणा प्रवाह पट्टावली अविछिन्न परपरा वडगछमें मिलाई तव हम तो अचरजमें रहगय की मोटे महाराज तो लिखते हैं तुपागछ है सोही वडगछ है और फेर ये वडगछ कहांसें आगया इसतरेका स्वरूपमें क्या समझमें आणेकी बात है केवली मगवान ही जाणे यस आखिरकों सब गछवालोंसे मे अल्पबुद्धि क्षमापन मांगता हूं चार चोकडी उपशमावै क्षयोपशम करै क्षय करै वो अन्यदर्शनी मी परित्त ससारी होता है तो क्रोष मान २ माया ३ लोभ ४ घटाणे वाला जैनधर्मी मुक्ति जावै इसमें संका नहीं। आपका अमिन्न हृदय उपाध्याय श्रीरामलालगणिः शिष्य पेमचंद अमरचंद
१६
५
२॥
॥
हमारे छपे भये ग्रंथ.
रत्नसागर ( रत्नसमुच्चये)
जैन सूत्रोंसें वैद्यदीपक भाग पहिला
५
पूजा महोदधी खरतर गछ तपागछ पूजा ३७
२॥
श्रावकोंका रुजगारी ग्रंथ
चाणक्य १६ अर्थ, जैन स्वरोदय, शकुनावली
मूर्ति मंडण प्रथम भाग
मूर्ति मंडण भाग २
तेजी मंदी काल जमाना शकुन वगेरे बहोत संग्रह
दादा साहबके परचैका मंत्र गायन पूजा
1.
छपेगासो ग्रंथ,
ओसवंस १४४४ गोत्र इतिहास उत्पत्ती
स्वप्नेका फल अंगके शुभाशुभ चिन्ह फल जैन
धूर्ताख्यान १८ पुराणोका
ईश्वरकी परिक्षा
-१
परदेसी ग्राहकोंकों पोष्ट खरच जुदा लगेगा नाटपेट पत्र नहीं लिया
जायगा अछे निर्णयसागर छापेके मनोहर टाईप, ग्लेज वढिया कागद,
मजबूत पूढ़ तारीफ पढणेसें मालम होगा पुस्तक मिलणेका ठिकाणा-
वीकानेर राजपूताना विद्याशाला उपाध्याय श्रीरामलालगणिः मंत्री पं०
श्री जीवणमल प्रेमचंद अमरचंद प्रकाशक ॥
4
-
श्रीजिनाय नमः . अथ विज्ञापन ॥ ॥ मालमकरणेमें आता है श्रीयुत पारखगयवरचंदजीने सांडकसरी- चंदजीके संग पजाबके द्वढियोंकी तरफसें छपी जो पुस्तक सो हमारे पास भेजकर उसमें लिसे ५ प्रश्न उसका जबाव मांगा सो प्रश्नका सारांस एसा है (प्रश्न पहिला) २४ तीर्थंकरोंके चक्रवर्तीदिक घणे श्रावक मये उसमेंसें किसने मंदिर वणवाया वणवायगा सो पूजेगा और कोण विधिसें वणवाया उनोंका नाम सूत्र और अध्ययन लिख- णा (प्रश्न दूसरा) आचारांग सूत्रमें कहा है ससारके जीवछकार- णसें हिंसा करतें है प्रथम आजीविकावास्ते १ दुसरा प्रससाके वास्ते २मानके वास्ते ३ पूजाके वास्ते ४ मुक्तिकेवास्ते ५ छठे रोगादिक मिटाणे- वास्ते उनोंको अहितका कारण होगा बोधवीजका नास होगा मिथ्यालका कारण होगा तो तुम मूर्तिपूजांसें धर्म केसे मानते हो २ (प्रश्न तीसरा) प्रश्न व्याकरण सूत्र में पांच आश्रवद्वारमें मंदिर प्रतिमा चरणपादुका आश्रवद्वारमें लिखा सवरद्वारमे मदिर प्रतिमाका नाम नहीं दया संजमकू संबर लिखा है तो तुम मदिर प्रतिमा धर्ममें केसे मानते हो ३ (प्रश्न चोघा) कामदेवजी श्रावग• पोसामें देवताने उपसर्ग कीया तो भी डिगे नहीं तव भगवानने तारीफ किया लेकिन किसी प्रतिमा पूजणे वालेकी तारीफ करी होय तो बतलावो ४ (प्रश्न ५ मां बहोत जीवोंकों तपस्या करते लवधियां उपजी अन विज्ञान उपजा लेकिन प्रतिमा पूजणेसें किसक लब्धि और ज्ञान उपजा सो २ जबाब लिखो भगवानकी द्वादशांगी बाणी प्राकृतमे हैं लेकिन संस्कृत और भाषामें नहीं है इसवास्ते हम तुमको संस्कृत तथा भाषा नियुक्ती टीका वगेरा नहीं पूछते हैं सूत्रका अध्ययनका उद्देसाका नाम लिखणा ये ५ प्रश्नोंका जबाब भव्यजीवोंके उपगारार्थ आत्मकल्याणार्थ सूत्र- सिद्धांतकी साक्षीसें न्याययुक्त जबाब लिखा है, सिद्धमूर्ति विवेक विलास जिन आज्ञा प्रदीपका भाग दूसरा है, जिन २ धर्ममूर्तियोंने इस ग्रंथकू छपाणे पहली मदत करी है उनोंकों धन्यवाद और धर्मलाभ . स्वर्ग मुक्तिके लिये होगा, जो कोई पापंडी निन्हवोंके खोटे उपदेससे तीर्थंकरके कहै सनातन धर्मसें डिगता होय, उन २ जीवोंकों स्थिरकर- णेकों एकेक पुस्तक दे दे कर मुक्तिसुख उपार्जन करो श्रीरस्तु: श्रीजिनाय नमः श्रीधर्मशीलसद्गुरुभ्यो नमः श्रीसरस्वत्यै नमः अथ भूमिका हितोपदेश अहो जैन धर्मियो धर्म भाइयो तुम लोकोंने पूर्व पुण्यके उदयसें आर्यदेस मनुष्यजन्म उत्तमकुलं माहाजनवंश श्रावक धर्म पाया है श्रीमहावीरतीर्थकरके उपदेशानुसार उनोंके चेले गणधरोनें जो द्वाद- शांगी रची उसमें छउं भाषा विज्ञान सर्वतत्व भरा है बोप्रवाहसें चलती २ काल दोष बुद्धिकी हीनतासें ज्ञानका तिरोभाव होणे लगा तब वाराकालीके अंतमें खंद्धिलाचार्यजी तथा दुसरी बार देवद्धिंगणी क्षम श्रमणनें शत्रुजयतीर्थके अधिष्ठायक गोमुख कवडयक्षकों आराधकर उसकी मदतसें राजादिक महर्द्धिक श्रावकोंसें ज्ञान द्रव्य एकठा करा- कर देवताने १२ हज्जार स्वेतांबर यती साधुओंकों सोरठ देसकी वल्लभी नगरी ( बला) में एकठे किये उस जगे साधुओंकों जो जो ३ कठामपाठ सिद्धांत याद था सो ताडपत्रॉपर लिखा जो थल पूरा न मिला छोडदिया एसे क्रोड ग्रथ लिखे जिनका नाम नंदीसूत्र मेंदरज है फेरचौद पूर्वधर श्रुतकेवलीमद्रयाहू स्वामीके बनाये सूत्र नियुक्तियें लिखी दस पूर्वधर उमास्वातीके बनाये पांचसे ग्रंथ लिखे इसतरे द्वादसांगी वाणीका रहा मया जो अंसभाग याद था सो लिखा तात्पर्य इय हेकी बेतांवर मात्र जैन उस ग्रंथोंकों मानना फर्ज है उसमें विवरेवार श्रावकके सम्यक्तकी करणीमें जिनराजकी मूर्तिकों साक्षात् जिनराज तुल्यमानना लिखा है और द्रव्य मावसें पूजा करणी लिखी है वस पांचमा आरा कलियुगके प्रभावसे एक लिखणेके रुजगारीने द्वेषबुद्धिसें लिखाई वावत रत्नशेखरसरि आचार्य तथा अहम्मदावादके संघसें तकरार कर अपणी प्रतिष्ठा जमाणेकू जिनप्रतिमा निषेधरूप मत कदा- ग्रह खडा किया विक्रमसंवत् १५३१ में उसका उपदेस माननेवाले लोपक कहलाये लोपक शब्दका अर्थ एक पडित व्याकरणीने एसा किया (लोपयति जिनाज्ञां इति लोपकः) इसके गछमें विक्रम संवत् १७०९ में अहम्मदाबादमें वजरग लोपकका चेला लवजी गुरूकों भ्रष्ट समझ लोपकमतका वाना छोडकर नया मेप बनाया लोपकजती ओघेकी डंडी २४ अंगुलकीरखै, ढूढकलवजीने वेप्रमाण दोहाथकी डंडी ओषेमें डाली, निसीत सूत्रमें लिखा है जो साधू ओघेकी डंडी वे प्रमाण रक्खे तो प्रायश्चित्त आवे, इस सूत्रकों जलांजली दी, लोपक मुखपर पट्टी नहीं वांधता लवजीनें मूंपर वस्त्रकी पट्टी बांधी डोरा डालकै, आचारांग सूत्र दुसरा श्रुतस्कंध तीसरे उद्देसेमें कासलेते छींकलेते डकार लेने इत्यादिवेगोंकी वखत साधू हाय मुख सामने देवै, या वस्त्रसामने देदै - ४ - - इसवास्ते सिद्ध भयाकै मूंपर वस्त्र बांधणेकी आज्ञा नहीं, हाथमें वस्त्र रखकर वोलते समय यतना करै, इस सूत्रकी मर्यादा लोपी, लोपकजती गोचरीलाते वखत हाथकी कलाई पर झोली धरकै वस्त्रसे ढककरलाता लवजीने मुसलमांन फकीरों की तरे हाथमें लटकती झोली भिक्षा लाणे लगा, एक घरका आहार दुसरे घर दिखाणे लगा, ओघ नियुक्ती सूत्र के विरुद्ध वरताव करणे लगा, लोपकजती दसहाथकी चद्दर ५ हाथकी पांगरणी ५ हाथका चोल पट्टा रखता, लवजीने भीलोंकी तरेगांठे लगा २ कर पांचहाथके टुकडे या कम वेसी वांधणा सरू करा, ओपनियुक्ती सूत्रकी आज्ञा तोडी, चवदे उपगरण सूत्र सुजव नहीं, इसतरे न तो तीर्थकरगण धरोंका कहावाना ( छाप) रखा, न अपणे लोंके गुरूका, इत्यादि अनेक आचरणा सूत्रविरुद्ध धारण कर मतचलाया कोइ वंदन करे तो हाजी भाई, अथवा दयापालो कहणा सरू करा, और व्यवहारसूत्र में लिखा है साधू धर्म लाभ विगर गृहस्थके घरमें नहीं घुसें इस सूत्रमर्यादाकों लोप किया, क्यों के हाजीपठाणने वरदान दिया था, मेरा नाम लेते रहणा और बुतपरस्ती नहीं करणा तेरा मत चलेगा इसवास्ते वंदन करै ताकू हाजी भाई कहणे लगा जव मत वढगया तब कहणेलगा हाजी दया- पालो तेरापंथी अभी फकत हाजीभाई इतनांही कहते हैं धर्मकों ढूंढताहूं सो मिला नहीं तब लोक ढूंढक कहणे लगे, सूत्रोंमें एक पात्र पाणीलाणे, एक भिक्षालाणे, एक मात्रक पात्र सो दुसरासंभोगी साधू भाजावै तो तीसरे पात्र में भिक्षा उस साधूकों लादेवै तब वो साधू माया भया अपणे पात्रमें लेके भोजन करै मगर तीसरे पात्रकू मुनि अपने भोगमें न लेवै अनामतरखै, लवजीने भिक्षाके पात्रमेंही दस्तपे 1 - प १ - , सावका काम लेणा सरू करा, जहां साधू चोमासा करै उहां गृहस्थसें मट्टीका तीन पात्र-अलग लेवै दस्तकू १ पेसावकू २ और खंखारकफथू- कणेकू ३ सोलबजीने सूत्र मर्याद लोपी, इसतरे अनेक विरुद्ध क्रिया सूत्रोंसें सरूकी निसीत सूत्रमें लिखा है आहार करते दस्तपेसावा- दिकरते जो लोकीकमे साधू धर्मकी हीलना करवावे तो बोधवीजरहित दडका मागी होय, इस लवजीके देखादेख विना गुरू धर्म दास छीपा वगैरे २२, अदम्योंने नई २ कल्पना और मनोक्त क्रिया सरू की, बगचूलिया सूत्रमें लिखा है २२ गोठीला जिनप्रतिमाकी हीलना निंदा गर्हणा करणेवाले कल्पित उन्मार्ग लोकोंकों परूपेंगें सो बाइसगोठीलाशब्दको विगाड लोक वाईसटोला कहणे लगे ' जेसें सुणा हो प्रतिष्ठाशब्दको बहोत लोक पिष्टाकहते हैं, माहावीर स्वामीके निज संतानी ८४ गच्छ जो है सो आपसमें वंदना आहार पाणी एक मंडलमें बैठ करते है लोंका गछके २ नागोरी दोय २ गुजराती तथा उत्तराधी जिनप्रतिमाका वदन पूजन भावसे करणे लगे इसवास्ते ८४ गच्छके साथ आहार वंदनके सगसामिल वर्म भाईमाने जाते है लोंका पूर्वोक्त पांचोंमें नामी विद्वान पीछेसें जती होगये उनोंने झूटा क- दाग्रह आत्मार्थीपणेसें बहुतोंने छोडदिया, जैनहितेच्छु पत्रसंपादक मताभिमानी ढकमतको सनातन धर्मलिखता है कुछभी परभवका टर लिखते नहीं रखा सनातन जैनधर्म उसका नाम है जो की ऋपभ देव भगवंतसे यती साधूका है तुम खुद अकवाल हो १५३१ में लोपक, स १७०९ वाईस गोठीले, १८१८ भीपमपथी, सनातन जब माना जावेजोकी अविछिन्न परंपरा तीर्थंकरोंसें मिले लोपकके गुरूका ६ 4 नाम क्या है और कोनसा धर्म वो मांनता था इत्यादि सबूत तुमारे पास कुछ नहीं सो तुमारे लिखणेसें ढूंढक धर्मकों सनातन, को न बुद्धि- मान मान सकता है गौतमगणधरके विद्यमान वखतकी गौतम वगेरे इग्यारे गणधरोंकी मूर्ति गुणशिल पुर और राजगृही आदि पहाडों पर मोजूद है उसमूर्तिकें मूंपर कपडाबंधा नहीं है हाथमें मुखवस्त्रिका दीखती है मूर्तियांहजारों लाखों वर्षकी प्रत्यक्षमें मोजूद है हजारों वर्षके बनाये भये मंदिर मोजूद है तो बुद्धिवान आपही जाण सकता है के सनातन धर्म जिनमूर्ति माननेवालोंका है, जरा पक्ष- पात छोडके विचार करणा चाहियै जो जिनेश्वर देवके भक्त थे उनोंने जिनमंदिर बणवाया है या और किसीने इस हिसाब एसा प्रश्न करणे- वाला जैनधर्मका अजाण मूर्ख ठहराया नहीं के २४ तीर्थंकरोके घणे श्रावक भये सो किसनें मंदिर करवाया मुख बांधणेवालोंकी सबूती · अन्यदर्शनी वैदधर्मी गेरूरंगित भेषवाला सोमल सन्यासी तो देता है उसने काष्ठकी पट्टीसें मुख वांधा था ये लेख भगवती तथा निरयावली सूत्रमे है स्यात् इसकी परंपरा २२ गोठीलोनें चलाइ होय जैनके किसी भी साधूने मुंपर वस्त्र नहीं बांधा है लेकिन सोमल सन्यासीनें मूर्ति वावत कोई भी दलील नहीं की है लेकिन ढूंढकोंने दलीलकी इसवास्ते आत्मारामजी संवेगी महाव्रती साधू ढूंढक मत विनापरंपरा गुरू विनाका देख समुछेमपंथ लिखा है जेसें लवजीने वजरंग लोपक अपणे गुरूको भ्रष्ट कह कै ढूंढक मत खडा किया तेसें इसरु गनाथढूंढककाचेला. भीषमने रुघनाथकों भ्रष्टाचारी कुगुरु वाईसटोला जिनाज्ञाविराधक कह कर प्रथम तेरे वातमें मन कल्पना - - - लगाई सो तेरे वात भीपमपंथीयोंके समाधान रूप तीसरा भागमें लिखेंग, तेरे आदमी एकठ होकर पथ चलाया तेरा पथी इनोंको लोक कहणे लगे, इंढकका मूंका पट्ट चौडा, तेरे पंथियोंका लंबा ये उडदी वदलाई, बाकी तो जैसे भूतनाथ, वेसाई प्रेतनाथ, इन भीपम गार मलको भृष्ट समझ चंद्रमाण अलग भया रायचदकों भ्रष्ट समझ फतेचद अलग भया जीतमलों भ्रष्ट समझ छोटाछोगमल वडा छोगमल वगेरे अलग भये एसे बहुतसें निकले किसीकी दालगल गई किसीकी नहीं लेकिन सवोंने अपणी २ खिचडी अलग २ ही पकाई इसीतरे वाईसोंमें अजीव पंथी अठकोटी - पञ्चखाणवाले नव कोटीवाले इन वाइसोंकी श्रद्धा आपसमें बहोत फर्क है एक टोलेवाला दुसरे टोले वालेकों साधू नहीं मानता नहीं वंदना व्यवहार करते इसतरेका फजीता देख किसकों साधू समझाजावै फेर भी न मालम कालांतरमें ये अल्पज्ञ रागी द्वेपी क्या क्या मनकल्पनासें फजीता करते जायगें एक झूठ बोलणेवालेकी ओलाद अनेकानेक झूठ बोले इसमें ताज- । यही क्या इसवास्ते सनातन धर्म जती साधुओंका जिनोंके, लिखे सूत्र सिद्धांत और जिनोके प्रति चोघे राजन्यवंसी श्री श्री माल श्री माल ओसवाल पोरवालं वायडे इत्यादिकोंसें । सनातन धर्म पचम आरेके अंततक चलेगा अब घुद्धिवानोंने सोचना चाहियै सो क्या जैनधर्मका सम्यक्तकुं जडोंकी तरकारी है सो किसीनें किसीसेलिया और किसीने किसीसें कोई तो माहाजन केता है मेनें समकित पूजक चोरी मलजीका लिया है और कोई कहता है मेनें पूजपकोडी मल- जीका सम्यक्त लिया है सच है दुकानेंभीतोकुंजडोंकीतरे अलग " + २ मंडगई है और वो कहा भी करते हैं लोरेवायां भायां हमारो समकितलेलो अरे भोले भाइयो सम्यक्तचीज एक और ही रत्नपदार्थ है सो पूरे ज्ञान विगर वोरत्न प्राप्त होणा दुर्लभ है आप दलद्री दूसरें- .' को केसें धनवान कर सकताहै बाह्य क्रियाका आडवर देख गडर प्रवाही परमार्थशून्य वाडेके बछडे वन बैठते हैं सम्यक्त उसका नाम हे जो की राजन्य वंसीपणेमें तुमारे वडेरोंकों मदिरामांस सिकार रात्री भोजनवाईस अभक्ष छोडाकर श्रीचोवीस तीर्थंकरोंकी जिनमूर्ति द्वारा द्रव्य भावभक्ती नवतत्वका जाणपणा श्रावग धर्मका आचार और भगवंत वीरके परंपरागत शिष्य शुद्ध उपदेशक यती धर्मपालणे वाले गुरु एसा श्रीरत्नप्रभसूरिः तथा दादा श्रीजिनदत्तसूरिः प्रमुख आचार्योंने तुमारे वडेरोंकों जोश्रद्धा देकर जब क्षत्रीधर्मसें महाजन कुलस्थापन किया वस सम्यक्त रत्न वो था अब तो तुम लोक निन्हवोकी पट्टीमें चढकर उस रत्नको मलीनकरतेहो अथवा गिराते हो फकत कायक्ले सादिक तप करणेसेंही साधू तीर्थ करने नहीं फरमाया है सूयगडांग सूत्रमें लिखा है नंगा रहै मासक्षमण तपकरे डांस मच्छरा दिठंढ उसका परी सहस है, एसा दर्शनी देवलोकादिकका सुख भोगके अनंत संसारमें रुलै जहांतक वीत रागकी आज्ञा नहीं आराधै उहांतक कभी मुक्ति नहीं जावै तो विचारलो इस क्रियासें क्या होणा है जहांतक सब सूत्रोकों नहीं मानते अपने मन कल्पित मतसें मिलती वातें कोई तो आचायोंके बनाये ग्रंथोंकी कोई २ मान लेते और जो कोई वात ढूंढक- मतकों धक्का लगाणेवाली होय तो अपणे माने ३२ सूत्रकी भी नहीं मानते अर्थोका अनर्थ करणा व्याकरणकोशविरुद्ध उत्सूत्रं वोलके मृषा वाद- । है है ।
, ९ से दुर्लभ योधीपणा उपार्जन करते हो जिनप्रतिमासे द्वेपत्रुद्धिपणा करते हो सो साक्षात् जिनराजसें ही तुमारी बुद्धी द्वेषकी सिद्ध होती है जिनमती गृहस्थकों नहीं करणे देणा इस अभिप्रायसें अनेक कु युक्तियें ठगाते हो देव मूर्तिको रायप्पसेणी जीवामिगम सूत्रमें गणधर देवजीने साक्षात् जिनराज फुरमाया है उस मूर्तिकों तुम कहते हो पत्थरकी मूर्ति शिलावटेकी वनाई हम; क्या तारेगी एसे २ कठोर वचन कहकर, जिनाज्ञा विराधते हो सच है अमधीकों जिनराज भी नहीं तार सफने है कोइ तो गृहस्थीं ढूंढकों की क्रीया काटता देखकर कोई मागवानकी खुमांमदीसें कोई भाजीविका वास्ते यानें सेठजी साधोंके जाते हैं में भी जाउगा तो प्रसन्न हो कर साधर्मी जाण गुमास्ता रखलेंगे यारकमकी मदत देकर व्यापार करा देंगें कोई सीके प्रेमसे कहणेसें कोई बहुत लोकोंकी जमात देसके कोई मदि- रकी मक्कीमें धनका सरच देखकर केइएक अछलकी अजीर्णतासे द्रव्य पूजामें हिंमा मानकै इत्यादि अनेक कारणमें चिंतामणी रनरूप सनातन धर्मको लोट जिनमूर्तिकी द्रव्य भावभक्ती छोड़ दूंढकोंके उपासक हो जाते है तुगारे ढूंढक माधू जब किसी सनातन धर्टीके घर पहिरणे जाते है तब वो गृहस्स आहार देणे लगता है तब कहते ६ पण मुषणेका सोगन लो बमका अगुफ चीनकी सोगन लो तो पहरता हू इमनरे हठकरके सोगन गागू भी किसी गाधूने दिलाया है पा तुमाराही चलाया भया अपणा मन बहाक ये जाल सग किया है आहार देणे गृहस्थी जय बताण मुणगेका मोगन ले लेता है माता जाता है नप सन घासी गृहस्य मिलकै उमें दवाते है पूजजीरोगम १० कितलेलो पूजजी फुरमाते हैं, अरे भाया भगवान मुगत गया उणारी भूरति वनाय फूलफल चढाव त्यागीने भोगी कर छकायांरी हिंसा करतां धर्म किम नीपजै, तब सब गृहस्थ क है तहत्तसामी, इसतर उस गृहस्थकू उलटा फंदे में डालकै अपणा समकित झलावै, तीर्थंकरोंका सम्यक्त छुडावै, हम तुमें पूछते है आहार लेते गृहस्थळू सोगन दिलाणा किस सूत्रमें लिखाहै, सो तुमारे साधू दिलाया करते हैं तब एक जिज्ञासूनें कहा हम तो दयामें धर्म मानते हैं और जैनधर्मका यही सार है इसवास्ते ढूंढक मतकों सच समझ दया धर्म कबूल किया जिनमूर्तिकी द्रव्य पूजामें हिंसा है इसवास्ते हमने छोडी वाकी धर्म तो हम लोकोंने अगलाई रखा है जबाबमें मालम होय असंक्षावर्ष भया इस अब सप्पणीमें ऋषभ देवतीर्थ करसें जैनधर्म चला तब ऋषभ प्रभूके उपदेससें भरत चक्रवर्तने अष्टापद' पर मंदिर करवाया सर्बुजयका संघनिकाला बाहूबलजी प्रमुख अनेक मुनि संगथे शचुंजय तीर्थपर पहला उद्धार कराया रत्नमई मूर्तिस्थापनकीयेसर्व अधिकार अठारेसें वर्षका लिखा भया सर्बुजयमाहात्म · तथा युगादिदेसना ग्रंथमें है भरतराजाके पाट असंक्षाराजा सूर्य यश वगरोंने जिनमंदिर जिनमूर्ति भरवाई और चोवीसही तीर्थंकरों के शिष्य आचार्य उपाध्याय साधुओंने उस मंदिर मूर्तियोंकी प्रतिष्ठा करी हजारो ग्रंथों में ये वात लिखीभई है तो तुम दो सो चार सो वर्षके निकले महाभिमानी अणपढोंकी मूंकी कही कल्पित वात मांन या त्यागी वेरागी महाव्रती श्रुतकेवली आचार्योंकी लिखी वात सच मानें लिखा तो दूर रहा लेकिन चोदे पूर्व धारी रत्न प्रभसूरिःजोकी पार्श्वनाथके छठे पाटधारीक- ११ १ शी कुमारजीके पोतेकी हाथकी प्रतिष्ठित महावीर भगवानकी मूर्ति बोसियां नगरमें मोजूद है वैदगोत्र इस वखत वजता है इनोके वडेरे राजा उपलदेव पमार माहाजन भये वाद मदिर वणाया सका होयतो जाके देखलो दस पूर्व धारी श्रुतकेवलीकी प्रतिष्ठित महावीर भगवानकी मूर्ति १५ वर्ष भये जर्नल कनिक होम साहबको मिली शिला लेख समेत एसे हम प्रत्यक्ष हजारों तुमें आंखोंसें दिखा सकते हे उन चारनधारियोंकों हिंसा प्रतिष्ठा कराते सूझी नहीं सो श्राव- कोंको उपदेस देकर मंदिर करवाया और प्रतिष्ठा हाथसें करी इस अपेक्षा तुम बुद्धिसे विचारो असक्षावर्षसे जैनधर्मी सम्यक्ती श्रावग मदिर कराते प्रतिमा पूजते चले आये वोतो सव २४ तीर्थंकरोंका कहा भया धर्मकों तुमनें मिथ्यात्व और हिंसा ठहराई और ४०० से वर्ष भये सो सम्यक्त रूप जैनधर्म लोपक ढकको मिला अगले जिनमूर्तिकी द्रव्य भाव पूजा करकै सब तुमारे वडेरे नरक गये लोपक ढूंढकनें तुमारे वास्ते स्वर्गका विमान हाजर कर दिया और मुक्तिका दरवजा खोल दिया बुद्धिमान श्रावग होगा सोतो इतनेमें ही समझजाता है सो लिखा और एक वका सो मूर्ति पूजकोंके पास तो हजारों वर्षका लिखा भया सास्न हाजर है, तुमारी फकत मुख- जवानी दलील है, कहो हा कम इनसाफकी डिगरी किसकू देगा विचारलों सास्त्रमें इनसाफ है जवरन नहीं है इसवास्ते हे मित्र धर्म खाली दया २ में नहीं है धर्म तीर्थंकर केवलीकी आज्ञारूप दयामें हैं केवली जिन बातोंको करणेका हुकम देते हैं वो दीखतमें चाहै हिंसाही दीखती होय वो स्वरूप हिंसा कहलाती है भावमें दया है जैसे - १२ साधु पडकमणा. करते ऊठेवेठे वायूकायहणीजै, मासकल्पसे विहार करणेकी आज्ञा रस्तेचलते पंचेद्रीतक जीवोंकी हिंसा, नदी उतरणेकी आज्ञा पंचेंद्रीजीवों तककी हिंसा साधवीकू मकानके दरवजा बंधकर- णेकी आज्ञा इसतरे वहोत साधुओंके वास्तें हिंसादीखती है लेकिन केवलीका हुकम हे सो भाव दया है इसीतरेही साधु घरपर आवे तो ऊठबैठ वंदना आहार देते जीव हिंसा होती है लेकिन गृहस्थकों लामका कारण, इसतरे जो फल दानशील तप भावनाका सोही फल जिनमंदिर कराणेका इस पुन्यसें १२ मेंदेवलोक श्रावक जावै ऐसी केवलीकी आज्ञा दीखतमें हिंसा इसतरे बहुत वातोंका हुकम साधु श्रावकोंके लिये शास्त्रोंमें लिखा है व्यवहार दया- तो अन्य दर्शनी तथा निन्हवभी पालते हैं उसदयासें फकत पुन्यवंधता है दया नाम ही पुण्यका हेतु है: व्याकरणीसें दया शब्दका अर्थ कराकर सुणोगे तो मालम होगा तीर्थंकरकी आज्ञा है सो अहिंसा है गृहस्थ श्रावग वहोत विवेकी समझा होय तो सवाविश्वा दया पालसकता है असत् भारंभी गृहस्थकों जिनमूर्तिकी द्रव्य भावभक्ती संसारसें तारणेवाली तीर्थकर फुरमाते हैं, ढूंढक पंथ कबूल कर तुमनें जिनमूर्तिकी द्रव्य पूजा छोडकर खरूप हिंसाके त्यागी वणबैठे, मगरकेवली भगवानने श्रावककों सम्यक्तकी. करणीमें द्रव्य भाव पूजा करणेकी आज्ञादी उस आज्ञाकों तोडणेसें भाव हिंसक अनंत. संसारी जरूर तुम लोक हो वैठे, इतना सुणतेही भडक उठाकी सूत्रोंमें किसी भी जगे श्रावगर्व मंदिर कराणेका तथा द्रव्य युक्त पूजा करणेका अधिकार हेही नहीं तुम हमें भाव हिंसक केसे कहते हो, अगर होयतो क्या हमारे *.
१३ साधुजी सूत्र नहीं वांचते हैं ३२ सूत्रमें किसी भी जगे मंदिर प्रति- माका अधिकार हेही नहीं घरवारघानमाल जिनोंने छोडा सूत्रोमें लिखा होता तो वे क्यों छिपाते, हे मित्र द्रव्य परिग्रह छोडा होय तो ता जव नहीं सो वाततुलछीदासजीने कही है (दोहा) कंचन तजवो सहज है, सहज त्रियाको नेह, परनिंदा परईरपा, तुलछी दुरलभ एह, और छोडासो- धन्य, इसवास्ते हे मित्र इसमतकी जडही अभिमान इर्ष्यासें पैदा भई है सो पीछे लिखादेखलै चलाणेवाला चलागया पिछले तो गडर प्रवाही है इतना व्याकरणादि पद्शास्त्रका ज्ञान कहां है सो सच झूठका इनसाफकर डाले और बहुतोंने कर लिया इनसाफ, तब तो सत्यधर्म कबूल करही लिया, सइकडोंनें, इसवास्ते वाजे जव समझ लेते हैं तव भेप चाहै दूढककाही रखते मगर इस वातकी तकरार नहीं करते एसा हमने कइयक ढूंढिये सावोंकों देखा है अपणे पक्षके श्रावकोंसे डरते जाहिरामें उपदेस नहीं करते हैं, क्योंके इढियोंके श्रावकोंका ये स्वभाव है जो इंढिया साधु उत्कृष्टी क्रियावाला भी होय मगर मंदिर तथा जिनप्रतिमाकी निंदा नहीं करै, नहीं उत्यापै तो, उसकी विशेष भक्ती मानता भी नहीं करै, अगर भोले भाव मंदिरोंकी पुष्टिका शब्द किसी दूढिये साधुके मूसे निकल जाय तो फेर तो वो गृहस्थ लोक ढीला पासत्या प्रष्ट उसकों कणासरू कर दे नहीं वदना नहीं आहार देवै, इसवास्ते वाजे इढिये जाणके भी अजाणपणे चलते हैं इसवास्ते हे मित्र तेरा झुठा पक्ष तो इतने परही सिद्ध होता है तूं कहता है मंदिर तथा जिनमूर्ति पूजा तो ३२ सूत्रोंमें नहीं लिखीहै, ३२ सूत्र सचे हैं चाकी सूत्र अथ झूठे हैं ये वात तेनें और तेरे गुरुनें १४ किस ज्ञानसें जाणी है तब बोला हम मिलती वात मानते हैं सो मिलती वात ३२ सूत्रोंमें हैं बाकी सूत्र आपसमें मिलते नहीं, हे मित्र तेरे लोपकनें जोमत निकाला उससे मिलती वातही तूं मानता है तीर्थंकर गणधरके कहे सूत्रधर्मकू नहीं मानता तव वोला अजी हमारे मतकी मिलती नहीं ३२ सूत्रोंमें तों आपसमें विरोध नहीं आता. बाकी सूत्रोंमें एकसे एककी बात मिलती नहीं इसवास्ते ३२ ही मानते हैं, इस तेरे माने भये ३२ सूत्रोंके जो आपसमें विरोध - आता है सो हम आगे लिखेगें मगर तूं वतला इस ३२ सूत्रोंकों किसने लिखे और वाकी सूत्र किसने ताडपत्रपर पहले पहल लिखै, तब वोला लिखातो उनही आचार्योने है जिसका तुमने पेस्तर नाम लिखा है तो हे मित्र क्या ३२ लिखते उन आचार्योंकों केवल ज्ञानका स्वरूप दरसगया था वाकी लिखते विभंग तब बोला लोंकेजीने ३२ ही कबूल किये इसवास्ते पीछले भी ३२ ही मानते हैं, हां मित्र ये बात सच है लोकें जी की मोहर छापके ३२ है गणधर देवजीकी छाप तो कोड ग्रंथ लिखे उन सबोंपर है देखलोंकेजीने ३२ - माने उसका पूरा खुलासा खरतर गछाचार्य युग प्रधान अक्कवर वादसाहकों दयाधर्म धारण कराकरहिंदमें अमार उद्घोषणा फिराणे वालोंने जो विक्रम संवत् १६०५ की सालमें लोपककी उत्पत्ती लिखी सो हम इहां लिखते हैं लेक्का नामका पुरुष अहम्मदाबादमें जैनधर्म वालोंकी पुस्तक लिखणेसें लक्कानाम उसकू गुजराती भाषामें कहते थे ... संस्कृत और कुछ नहीं पढाथा तब रत्नशेषरसूरि तपागच्छाचार्यनें लक्केकों भगवती लिखणे दी लिखतदोससें जंघाचारण विद्याचारण