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Sanskrit Path Mala Bhag 19

Satavlekar,damodar · 2012/08

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वेदका अभ्यास!
इस भागसे वेदका अभ्यास प्रारंभ किया जाता है। यदि
पाठकों के पूर्व के संपूर्ण भाग अच्छी प्रकार तयार हुए हो, तो
आगेकी पढाई उनके लिये कठिन नहीं होगी। इस लिये
निवेदन है कि यदि पूर्वके कुछ मांग पुनः देखने हों तो देखकर
ही आगेका अभ्यास प्रारंभ कीजिये । पहिली घुनियाद ठोक
पनेनेके बाद ही उसपर रची हुआं मकान ठीक प्रकार सड़ा
रहे सकता है। हमने तो अति सुगम रोति इस पुस्तकमे रखी है
जो बिना यत्न पाठक समझ सकेंगे। तथापि रीति कितनी भी
सुबोध क्यों न हो पाठकों के प्रयत्न की आवश्यकता तो होती ही
है, इसलिये प्रार्थना है कि पाठक अपनी प्रयत्न करें और
इस पद्धतिसे लाभ उंटावें।'

68) संस्कृत-पाठ-माला भाग १९ वाँ पाठ१ वेदकी पढाईके लिये शब्दोंकीसिद्धि कैसी होती है यह जानने की अत्यंत आवश्यकता है। धातुसे प्रत्यय लगकर शब्द वनते हैं, इस विषयमें इससे पूर्व बताया जा चुका है। शब्दमें धात्वर्थ प्रधान । होता है। इसीको यौगिक अर्थ कहा जाता है । धातु के अर्थ की प्रधानता यौगिक अर्थ में होती है। जो शब्द एक ही दिखाई देता है वह भी अनेक प्रकारसे वेदमें सिद्ध हुआ होता है, इस लिये. एक ही शब्दके अनेक अर्थ वेदमें होते हैं और लौकिक संस्कृतम भी एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं । इसकी कुछ कल्पना पाठकों को देने के उद्देश्यसे यहां कुछ शब्द सिद्ध करके बताते है- 'असुर। यह असुर शब्द ही प्रथम देखिये। सबसे प्रथम यह शब्द नन्तत्पुरुष है ऐसा दिखाई देता है जिसका विप्रह- न सुरः असुर. "जो सुर नहीं वह असुर समझना योग्य है। यह शब्द "असुर" ऐसा लिखना योन्य है। यह अर्थ वेदमें होगा तो बहुत ही अल्प स्थानों पर है। यह अर्थ आधुनिक ग्रंथो में बहुत प्रचलित है । वेदमें इसी शब्दके अन्यान्य अर्थ प्रचलित है जो हम इसी पाठमें आगे देते हैं- - - .

. असु+रः = असून राति ददाति । जो (असु) प्राण (राति) देता है, जो दूसरोको प्राणशक्ति देता है उसका नाम असुर है। असुका अर्थ है जीवनक्ति, उसका प्रदान करनेवाला परमात्मा है। इसलिये उसका नाम असुर है। यह शब्द 'असु+र' ऐसा लिखना चाहिये। इसके उदाहरण देखिये- १ स्वस्ति पूषा असुरो दधातु नः- (नः) हमें ( असुरः पूषा) जीवन शक्ति देनेवाला पोषक ईश्वर (स्वस्ति) कल्याण (दधातु) देवे । (०५:५१११) २ असुरः पिता ना (न) हम सबका (पिता) जनक (असु-रः) जीवन देनेवाला ईश्वर है । ( ० ५।८३।६) ३ जनानां यो असुरो विधर्ता (जनानां) लोगोंका जो जीवन- दाता ईश्वर(विधर्ता)विशेष धारण करनेवाला है।(ऋ०७१५६।२४) इन मंत्रों में असुर शब्द के ये अर्थ पाठक देखें। असुर शब्दका तीसरा अर्थ (असुपु रमते) असु अर्थात् प्राणोंमें जो रमता है. यह है। राक्षसवाचक असुर शब्द जिन मंत्रोंमें होता है उस समय यह अर्थ प्रधानतया होता है, क्यों कि जो अपने शारीरिक प्राणकी सजावट के लिये ही प्रयत्नशील होते हैं। असुरक्षा सपत्नहा। ०१०१९७०१२ "(असुरक्षा) राक्षसोंको मारनेवाला (सपत्नहा) शत्रुओं को मारनेवाला" इत्यादि प्रसंगोंमें असुर शन्दका अर्थ राक्षस है, ऐसे स्थानों में असुरका अर्थ जो सबसे प्रथम दिया है यह भी यदां लिया जा सकता है। "अस्" धातुका अर्थ "दूर फेंकना" है। इससे भी (अस्थति इति असुरः)जो चोर पाणीको शपर दूर फेकता है.यह असुर अर्थात् शापीर है । यह अर्थ भी घेद में कई स्थानों में है। इसका अपार होता है। .

एकही असुर शब्दके इस प्रकार तीन अर्थ होते हैं और औरभी अधिक अर्थ होने संभवनीय है। इन अर्थीका नाम यौगिक अर्थ है क्यों कि इन सब अोंमें धातुके मूल अर्थकी प्रधानता होती है। शब्दोंके अर्थोके तीन भेद होते हैं। १) एक यौगिक अर्थ,(२) दूसरे योगरूढिक अर्थ और (३) तीसरे केवल रूढि अर्थ । इनमें दिक अर्थ भाषामें प्रसिद्ध है। हाथी, घोडा, गाय आदि शब्द रूढिके हैं, इनका उच्चार करते ही विवक्षित जानवर की कल्पना सन्मुख आती है। इस शन्द का रूढार्थ यह है यह हरएकजानतही हैं परंतु संस्कृत में "अश्व " शब्द घोडेका वाचक होता हुआ भी मूल अर्थका बोध करता है जैसा (अश्नुते अध्यानम्) अर्थात् "जो मार्गको खाजाता है यह अभ्व है जिसको भाषामे घोडा कहते है । इसलिये अश्व शब्द रूढ अर्थ में प्रयुक्त होता हुआ भी यौगिक अर्थ को बताता है। इसी प्रकार 'पाचकः" (पकाने वाला, रसोईया) आदि बहुत शब्द हैं। इनको योगरूढी शब्द कहा जाता है। ये रूढ शब्द भी है और यौगिकभाव भी बताते हैं। केवल यौगिक शब्द कैसा विलक्षण अर्थ बताते हैं इसके उदा- हरण इससे पूर्व स्थल में दिये ही हैं। ये वेदके यौगिक और योग- कढिके शब्द संस्कृत भाषामे पूर्ण रूढिके शब्द बने हैं। रुढिके शब्द बननेपर भी उनका मूल यौगिक भाष विलकुल हटा नहीं है । इसीलिये संस्कृत भाषाके ग्राय सभी शब्द यौगिक हैं ऐसा कई व्याकरणाचार्य और प्रायः सभी निरुक्ताचार्य मानते हैं और वेद का अर्थ करनेवालो को या चेदका पठनपाठन करने की इच्छा करने वालों को इस प्रकार शब्दोंके मूल अर्थ जाननेकी शक्ति अपने अंदर बढानी चाहिये। क्योंकि इसीसे वेदका अर्थ जानने की संभावना है अन्यथा वेदका गूढार्थ जानना असंभव है। - . F

पाठ २
रामायणम्
धीरामचंद्रस्यादेशानुसारेण सर्वेऽपि पानरयोधा दक्षिण दिशं
प्रतस्थिरे। महेन्द्र अघ पर्वतं संप्राप्य रामः शिखरमारोह।
सधं मलयं च समतिक्रम्यानुपूव्येण सर्ये समुद्रमासेदुः।धीतोत्पला
घ पेलांपृथ्या राम उवाच "इयमत्र माता पूर्योपस्थितैव चिन्ता
सविद मस्त्यताम् मन्त्रः" इति।
सुप्रीपस्तदा सेनां तीरे म्ययेशयत् । सागरसमीपस्थित
तासन्यं द्वितीयःसागर य मिरराज । "सोगरधाम्यरमण्या,
अंयरं ध सागरोपमम् । सागराम्ययोर्मध्ये न कोऽपि विशेषी
श्यते। "ति पानराः परस्परं पदन्तस्तत्र सपि सागर
प्रशसुः।

(७) वाम् ।कुरुष मम वचनम् ।न्यायन यो राजकार्याणि करोति स एष निश्चितार्थमतिः पश्चान्न सन्तप्यते।" इति। रावणस्तु कालप्रेरितो विभीषणं हितं ब्रुवन्तमब्रवीत- "विभीषण ! त्वं तु शत्रुसेवी स्वार्थप्रयुक्तः सन् एवं भाषसे न त्वादशेषनार्येषु सौहदं संभवति । योऽन्य एवं ब्रूयात् अस्मिन्नेव मुहुर्ते स न भवेत् एवा हे कुलपसिन त्वां तु धिक् पवास्तु । नात्र तिष्ठ, गछान्यत्र कुत्रचित् ।" इति। न्यायवादी विभीषणंस्तु चतुर्भी राक्षस. सह तदा गदापाणि- म त्या उदतिष्ठद्मवीच्च रावणं- “हे रावण | न स्थितोऽसि धर्मपये, मान्तोऽसि । अनेनाधर्ममार्गेण गच्छन्नाशमेव शीघ्र गमिष्यसि । अप्रियस्य च पथ्यस्य वताश्रोताच दुर्लभ'। अतोऽहं गच्छामि त्वं आत्मानं स्वकीयां पुरी च यथासुखं रक्ष ।" इत्येवमुक्त्वा विभीषणो रामस्य समीपमाजगाम । चतुर्भिः सह राक्षसैरागच्छन्तं विभीषणं दृष्ट्वा सुग्रीव उवाच-"पश्यैष राक्षसोऽ स्मानेष हन्तुमत्राभ्येति । " इति । विभीषणस्तु तत्रागत्य नातिरे व्यतिष्ठत उवाच - ".दुर्व त. स्याहं रावणस्यानुजो विभीषणः । स तु मे हितमप्युक्तं न प्रतिजग्राह, दासवच्चाहं तेनावमानितः। अतः पुत्रदारांश्च त्यक्या राघवं शरणमागतोऽस्मि । निवेदयत मां तस्मै सर्वलोकशर- ण्यायरामाय"इति। सुग्रीवस्तु राममनवीत्। -" अतर्कित रानु समयं लभमा अस्मानिहन्यात् । अन्तर्धानगता होते राक्षसा अविश्वसनीयाः । न तेषां विश्वसेत् । " इति । श्रुत्वैतद्रामः सुग्रीवमुवाच --" परमर्पिणा फण्डुना पुरा गाथा प्रकीर्तिता यत्र तेन उत्तम शत्रुमपि दीनं याचन्तं शरणागतं न हन्यात् । आतॊ वा यदि वानातः परेषां शरण (८) 1 - नतारि प्राणानपि परित्यज्य कृतात्मना धीरेण रक्षितव्य । अत आनयैनं विभीषणमन । मया दत्तं अस्याऽभयं । असौ विभीषणों भवतु स्वयं वा रावणो भवतु ।" इति । सुग्रीवस्तदा प्रत्युवाच --" ममाप्यन्तरात्मा विभीषणं शुद्ध वेत्ति । अनुमानाच्च भावाच्चासौ सर्वतः सुपरीक्षितः । ससित्व- मभ्युपैतु तस्माद विभीषण । इति। विभीषणस्तत सनत सहानुचरो रामसमीपमुपसृत्योवाच- भरदतं दि में राज्यं जीवितं सुखानि च" इति । रामस्ततो राक्षसानां पलायलं तं पप्रच्छ । सोप्यारयातुमुप- चामे -"वरदानास्पयंभुव सर्वभूतानामयष्योऽयं दशनीयः । रावणान्तरो मम ज्येष्टश्च भ्राता कुम्भकर्णों युधि शानियलः। रावणस्य च सेनापतिः प्रहस्तो नाम विधुतो येन कैलासे मणिभद्र पराजित । इन्द्रजित्त पुत्रो रावणस्य पद्धगोलांगुलियोऽवध्य- कवचश्व संग्रामेऽस्ति । महोदर-महापा -कम्पनाश्चास्यानीकपा लोकपाल समा। विद्यन्ते चास्य रक्षसां दशकोटिसहस्राणि सैन्यो" इति। शुवैतद् विभीषणयची रामेण दानी हत्या विभीषणाय राज्य दानं तय प्रतिशतम् । समुद्राच्च जलमानीय लक्ष्मपाहरसेन रक्षसां राजेति तय चाऽसी विभीषणोऽभिपितः। ततो रामोऽममत्त नियम पालयन् दुशास्तीर्णायां सागर- चलायां तिनी निशा भतिशिशरये । तदा यानरसैन्यस्य प्रस्थानाय नलोपि धानरः तत्र सेतं. पतु प्रचत्रमे । पानरा पादपान् यमन्जुस्तान् समानयामास्थासागर- पूरणार्य ते पपंतपत्नस्तरामप्युत्पारयन्ते । प्रक्षिप्यमास्ते स. प्रतिरादिमि सहसा सागरजरमुगुतम् । रामस्यामापुर सर. in प्रयमेनामा चतुदंश योजनानि सेतुबंधनं रतम् । पन्चमि- 1 । स्त्वहोमि सेतुः संपूर्णः शुशुभे । असौ सेतुर्दशयोजनविस्तीर्णः शतयोजन आयतश्चासीत् । कोटिसहस्राणि वानराणां सेतु यध्या सागरस्य पारं जग्मुः। वानरयूथपास्ततो लंकायां भेरीमृदंगशब्द शुश्रुवुः । अमृध्यमाणाध तद्घोपं स्वयमपि घोपवत्तरं विनेदुः । प्लवंगगर्जितं च सदाक्षसैरपि धृतम् । ततोऽरिदमौ रामलक्ष्मणौ लंकामासेदुः। न्यविशन्त च लंकाम्। रामलक्ष्मणावुत्तरं द्वारं रुरुपतुः। नीलमैन्दद्विविदाः पूर्व द्वारम्, अंगदश्च दक्षिणं, पश्चिममपि हनूमान् रुरुधे । मध्यमे गुल्मे सुग्रीव. समतिष्ठत सह सुपर्णपचनादिभिर्धानरैः। सहजाम्बचांस्तु सुपेणो रामस्य पश्चिमेन तस्थौ । एवंदूमपाणिभिनिरैलेंका घायुनाऽपि दुष्प्रवेशा सर्वतः संवृता । ततो रामोऽगदं दशग्रीवं प्रति प्रेषयमास । संदिदेश च " येन बलेनाधममायया सीता हृतवानसि तदलमधुना दर्शय । अराक्षसं लोकं कर्ताऽस्मि यदि नाभ्येषि शरणं मां सीतामादाय । धर्मात्मा विभीषणश्च ध्रुनं लंकैश्वर्य प्राप्नोति । न हि क्षणमपि शक्यमधर्मण राज्यं त्वया भोकुम ।" इति। रामप्रेषितोऽगदोपि रावणं ददर्श सामाध्यम् । रामवचनं च तं धावयामास । तच्छु त्वा सरोपं रावण शशास- "वध्यता- ममिति ।" दीप्ताग्निरिव रजनीचरास्तं जगृहुः । अंगदोऽपि वलं दर्शयितुं स्वयमेवात्मानं प्राहयामास । पश्चाद् वाहुद्वयासकांश्च ताराक्षसानादायोत्पपात। तद्वेगेन निधूताश्च ते भूमौ निपतिता। चालिपुत्रोग्यदोऽपि सत्वरं रामपार्श्वमुपागतः । समासाः १ वानरयोधा. - वानराणां योधाः, ३ पूर्वोपस्थिता- पूर्व एव उपस्थिता । ३सागरसमीपस्थितं-सागरस्य समीपम्।सागरसमीपे स्थिती (१०) ॥ ४ कालप्रेरितः ५शत्रुसेवी ६ स्वार्थमयुक्तः ७ गदापाणिः ८ अधर्ममार्गः ९धर्मपथः १० अविश्वसनीयः ११ परमर्पिः १२ वृक्षप्रस्तरादयः कालेन प्रेरितः। शघ्रं सेक्ते इति । स्वार्थन स्वार्थाय वा प्रयुक्तः । गदा पाणौ यस्य सः। न धर्मः अधर्मः। अधर्मस्य मार्गः। धर्मस्य पंथाः। न विश्वसनीयः। मरमश्वासी ऋपिश्च । वृक्षाश्च प्रस्तराश्च वृक्षप्रस्तराः। ते आदिः येषां ते वृक्षप्रस्तरादय' सेतोः बंधन। दीतश्चासौ अग्नि। १३ सेतुबंधनं १४ दीप्ताग्निः 11 शब्दः। -धीर आदेश = आधा योधः प्रतस्थिरे - आमेदुः -प्राप्त हुप अंगरं -आकाश मानसेवी - शत्रुका आश्रय फरने वाला कुलपांसन -कुलका कलंक अप्रमत्त उन्मत्त न होता हुआ दुर्वृत्त = दुराचारी अनुज -छोटा भाई अतर्फित = जिसकी परीक्षा नहीं हुई है। अंतर्धान % गुप्तता एतात्मा 3 आत्मिक यलसे युक्त आत - दुसी पादप वृक्ष (११) पाठ ३ । घेदके शब्दोंके विषय थोडासा इससे पूर्व की अब और. थोडासा इस पाठमें कहना है। इस पाठके लिये हम "इन्द्र" शब्द लेते हैं- इन्द। इस शब्दकी उत्पत्ति कई प्रकार मानी हुई है। ऐतरेय उपनि इदंद्रि-इन्द्र (इदं) इसमें (इ) सुराख करनेवाला इसका भेदन करने- वाला, इसको तोडने मोडनेवाला। शरीरमें यह इन्द्र इन्द्रियोंक स्थानमें सुराख करता है, इस शरीरका भेदन करके अपने कार्य के लिये जैसे चाहे पैसे द्वार यनाता है, इसलिये इस आत्मा का विजुली भी इन्द्र कहलाती है इसलिये कि यह जहा गिरती है उसको छिन्न भिन्न करती है । उपनिषदों और ब्राह्मण प्रथों में दिये इन्दके ये अर्थ बडे मनन करने योग्य हैं । इन प्रथों में लिखा है कि पहिला शब्द 'इद द्र" था, जिसका सुगम रूप 'इन्द्र' बना है। यह यौगिक अर्थ देखनेकी पद्धति वेदाभ्यासीको विचार करने योग्य है । इन्द्रशब्दका दूसरा अर्थ- (इन् ) शत्रुओका(द्र) विदारण करनेवाला, शत्रुका नाश करनेवाला यह है। इन्द्र और राक्षसोंके युद्धोका वर्णन वेदमें यहुत स्थानों में है और हरएक स्थान में इन्द्र का विजय और राक्षसों का पराजय लिखा है। इस प्रकार यह अर्थ भी सार्थ प्रतीत होता है । इन्द्रशब्द का तीसरा अर्थ--

(१३)
इन्द्रं यो विश्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः।
अस्माकमस्तु केवलः ॥ ऋ० १७१०॥
(वःजनेभ्यः) आप लोगोंके लिये (विश्वतः परि) सबके
ऊपर (इन्द्रं हवामहे) प्रभुको प्रशंसा करते हैं। यह प्रभु
(अस्माकं ) हमारा ही केवल वनकर (अस्तु) रहे।
इन्द्रस्य न वीर्याणि प्रयोचं यानि चकार प्रथमानि घजी।
अन्नहिमन्यपस्ततर्द प्र पक्षणा अभिनत्पर्वतानाम् ॥ऋ०२।३३।१
(इन्द्रस्य) इन्द्रके (वीर्याणि) पराक्रम (नु) निश्चयसे
(प्रवोचं ) मैं कहता हूं (यानि) जो (प्रथमानि) पहिले
पराक्रम (वनी) वन लेनेवाला वीर (चकार) करता रहा।
उसने (अहिं) शत्रुका (अहन् ) वध किया (अपः अनुततर्द)
जल को फैलाया और (पर्वतानां) पर्वतोसे (वक्षणाः) नदियां
(: अभिनत् ) भेदन करके चलाई।
इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा शमस्य च भंगिणो वजयाहुः।
सेदु राजा क्षयति चर्षणीनामरान नेमिः परि ता बभूव ॥
ऋ० १२३२।१५.
(-वाहुः) वज्र हायमें पकड़नेवाला (इन्द्रः) प्रमु(यातः
अधसितस्य) जंगम और स्थावर का तथा (शमस्य भंगिणःच)
शांत और सींगवालों का (राजा) राजा है । (स राजा इत् उ)
वह राजा ही निश्चयसे (चर्पणीनां) प्रजाओंका (क्षयति)
निवास करता है। (अरान् नेमिःन) आरे जैसे रथचक्रकी
नाभीके साथ होते हैं उस प्रकार (ताः परि बभूव) वह प्रजाएं
उसके चारों ओर रहती हैं।
इस प्रकार पाठक इन्द्र के मंत्रोंका विचार करें। इन्द्र देवताकी
कल्पना इस प्रकार होसकती है और मंत्रोंकाइस ढंगसे पाठ करके
पाठक बहुत लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
।
।

पाठ ४ रामायणम् तत पृत्स्नं प्राकारपरिसान्तर घामरीस्तं सर्वे राक्षसा ददृशु । रामश्च मनसैध पीडद्यमाना सीता जगाम । क्षिप्रमाशापयामासच पानरान् द्विपता पधाय । तेऽपि वानरास्तृणपासुपर्वताप्रै परिखा पूरयन्तो लड्दा ममन्यु.। रायणोऽपि राक्षसाना सैन्यनिर्याण- माशापयामास । ततस्तेषा सप्रामो देवासुरसग्राम इवाऽतिघोर समपद्यत । राक्षसाना घागराणा घमासशोणितकर्दमः सपभूध । रात्रिश्च प्रवृत्वा तदा निशायुद्धममूत्। राक्षसा प्रयगान भक्षयन्त परिपेतु । युद्धे यलिनो पानरा राक्षसींचम्मझोमयन्। सदा भूमि शोणितसायवईमा यय।

विमानेन गत्वाऽपि सीता सर्वानिपतितान्ददर्श शरतल्पगती च रामलक्ष्मणौ दृष्ट्वा दुःखार्ता सीता करुणं विललाप- "उत्सादितं. कुलं त्वया, कैकेयि! कलहशीलया।हा हतास्मि विधवाममैवाना. या हेतोः सागरमुत्तीर्य रामो गोपदे इतका रामस्योपरिमांक्षिप्रं. घातय, रावण! संमानय यत्नात्पतिम् ।" इति । त्रिजटा तु राक्षसी परिदेवयमानां सीतामब्रवीत- "जीवति ते भर्ता । मा विषादं कृयाः।तथाहि वैदेहि! नेदं दिव्यं पुष्पक विमानं त्वां धारयेधघेतौ गतजीवितौ। नेमौ रणे सेन्ट्रैरपि सुरासरः शक्यौ जेतुम् ।" इति । एतस्मिन्नंतरे पुष्पकं लंकां विमानमाग- तम्। ततो भयाविष्टं सुग्रीवं विभीषणोऽत्रवीत्- "अलं त्रासेन। निगृ- ह्यतां यापवेगः। एवंप्रायाणि युद्धानि । नास्ति नैष्टिको विजयः। सभाग्यशेषताऽस्माकमस्स्येव यत पतौ घोरेण शरबन्धेनैव बद्धी दशरथात्मजी, नैतो मृतौ।" इति । अन्तरे तु राम स्थिरत्वात्सत्त्वयोगाच्च सलक्ष्मण प्रत्यबुध्यत । राघवौ नीरजौ दृष्ट्वा वानरयूथपाः सिंहनादं विनेदुः पुनश्च युद्ध कामा लंकाद्वाराण्युपाजग्मुः। रावणो नदतां वानराणां शन्दं श्रुत्वा राक्षसानाशापयामास "शायतां किमेतत्" इति । ते तु राक्षसाः राघवीशरबंधेन विमुक्ती दृष्ट्या विपेदुः । धुम्राक्षो नाम राक्षसो हनूमन्तं गदया मस्त- के प्राहरत्। हनुमानपि तस्य शिरसि महान्तं प्रस्तरमपातयत् । तस्मिन्राक्षसे मारुतिना हतेऽपरोऽपि वज्रदंष्ट्रो नाम राक्षस आगतः सोऽगदेन निपातितः । ततःसेनाध्यक्षेण प्रेषितोऽकम्पनो नाम राक्षसः आगतः स मारुतिना हतः ततः सेनापति प्रहस्तं स्वयं वृक्षमुत्पाटय नीलस्ताडयामास । विधनुश्च कृतोऽसौ नोलेन (१६) चाहिनीपति । सोऽपि नीलं मुसलेनाजधान ललाटे । अनन्तरे नीलन प्रहिता शिला प्रहस्तस्य शिरो विभेद । इते च प्रहस्ते स्वयं राक्षसराड् रावणो नियंयो। तमागतं उष्ट्या रामो सिमीपण- मुवाच- "महो' दुषेयो रावणी दीप्तमहातेजा आदित्य इव रश्मिभिः । विटया पापात्मा रष्टिपथं गत 'ति । ततो रामो रायणं अभ्यद्रवत् । तदा हनूमांस्तु तं प्रार्ययामास- पृष्ठं मे समाया राक्षसं शास्तुमईसि ।" इति । रामस्तेया राया रथस्य ददर्श रावणम् । इन्द्र इच पण मे तरसा याने नाउँ चासी जघान । रक्षोऽधिपतेरयणे किरीटं च चिच्छेद । निरत्तचापो हताश्यसतम्य मिलन राजा रायणो लंपा यियेश।

कुंभकर्णमागतं दृष्ट्या प्रथमं वानरा भीति प्राप्ताः । परंतु वालिसुतस्यांगदस्य प्रोत्साहनात्तु ते सर्वेऽपि क्रुद्धानं शिला. पादपादिभिर्निर्जप्नुः । असावपि वानरसैन्यानि ममन्य । वदा रामस्य सायकाः कुंभकर्ण विव्यथः। 'सोऽपि भंग नाम महार रामस्योपरि चिक्षेप रामस्तदा वायव्यास्त्रेणास्य बाहुं जहार। अन्योऽपि वाहुरेन्द्रेणास्त्रेण रामेण कृत्तः । तथैवास्य पादावपि रामेण बाणैलूनौ । अन्तं गत्वा ऐन्द्रं शरं निशितमादाय कुंभकर्णस्य शिरोऽपि रामश्चकर्त, तेन स राक्षसः पपात ममारच। पचं सर्वान्राक्षसान् हत्वा अन्ते रावणमपि संहन्य लंकाया राज्यं विभीषणाय रामः प्रददौ । सीतां चादाय, तस्या अग्निशुद्धि कृत्या, ततस्तां परिशुद्धां शात्या, तया सह पुष्पक विमानं समारा सर्वानरैः सह अयोध्यां प्राप्तो रामः । तदा रामं सर्वे अयोध्या- वासिनः राज्ये अभिपेचितवन्तः वस्य रामचंद्रस्य राज्ये सर्वेऽपि मानवा. हृष्टाः पुष्टास्तुष्टाः सन्तः इह लोके पुष्टिं लम्वाऽन्ते मुकि- मपि प्रापुः । इति । समासाः। १ प्राकारपरिखान्तरं प्राकारश्च परिखा च प्राकारपरिखे । तयोः अन्तरं । २ तृणपांसुपर्वतायाः - तृणं च पासुश्च पर्वताग्रं च । ३ देवतासुरसंग्रामः - देवताश्च असुराश्च । तेषां संग्रामः। ४ मांसशोणितकर्दमः- मांसं च शोणितं च । तयो कर्दमः । ५शोणितनावकर्दमा = शोणितस्य नावः । तेन कर्दमयुक्ता । ६ रामशरताडितः = रामस्य शरतेन ताडितः। ७ वालिपुत्रः = वालिनः पुत्रः । ८हताश्व - हतः अश्वः यस्य। ९ हतसारथिः = इतः सारधि यस्व । ra (१८) १०शरशल्याचितः = शरस्य शल्यं । तैः भाचितः । ११शरतल्पगतः-शरस्य तल्पं । तत्र गतः। १२ दुःपार्ता - दुःसेन आर्ता । १३ कलहशीला : कलहयकं शीलं यस्याः। १४ गतजीवितः = गतं जीवितं यस्मात् । १५ भयाविष्ट - भयेन आधिएं । १६ पानरयूथपा: = घानराणां यथानां पालफाः । १७ युद्धफामाः = युद्धं कामः येषां ते। १८ अफालयोधनं = न काल अकालः तस्मिन् घोधनं । १९. पालवृद्धायशेपिता = यालाच वृक्षाय । ते अपशेषिताः यत्र । सप्द। सरस्नं = संपूर्ण पांसु = धूलि प्राकार = कोलेपी दिवार तृणं - घास परिपा = संदक निर्याणं % प्रयाण शोणित = रक कर्दमः कीचड परयम::पानर प्राय : प्रयाद अंतरपीयत 5.गुप्त हुआ अनालयं नदीसनेवाला गोपदे =गायक पायको समान पायेगा = आसुगौका घेग डोट थानपर नष्ठिका-निधयसे मिटनेवाला नीरजी-मीरोग रमिः - किरण समरपुर पापन- जगाना दाकान्त पास पंदन = नारा निशिरा . सीमा परिशुद = पवित्र शित वीराका भाव इस शब्द में है। युद्ध उपस्थित होनेपर धीर है मरुत् कहलाते हैं। सच्च वीर ही भरने के लिये कटिबद रहते हैं, इसी लिये सच्चे वीरोंका वर्णन मयरसूक्तों में होता है। करनेपर मिलता है। जो रोते नहीं वेभरत कहलादेही हास्यमन्त्री पाठ५ मरुत्। मरुत् देवता इन्द्र के साथ रहनेवाली है। इसलिये इसका विचार इन्द्र देवता के साथ होना योग्य है। इससे पूर्व न्द्र देवताका विचार हुमा, अब इस पाटमें मरुत् देवताका विचार करते हैं- नियन्ते इति मतः" अर्थात् मरते कहते हैं।"मय, मर्य" मादि शब्दके समान अर्थ वाला होश धीर लोग युद्ध में मरने के लिये तैयार होते हैं, यह अर्थ मरुत् शब्द में देखा जाता है। इस कारण वेद में महेवता मंत्री बत कर के धोका ही वर्णन होता है, यही अर्थ- "मरउत्" इन शब्दों में देखा जाता है। मरने के लिये जो उठने मार" (मत् रोना) यह अर्थ इस प्रकार शद विभाग का इसलिये इनको मरुत् "मगत " शब्द है। लोग आनंद करते हैं, कभी डरते नहीं और कभी रोते नहीं। यह भी पूक्ति भाव के साथ मिलता जुलता है, यद्द बान पाटक मननपूर्वक देखें।

(२०) "माध्" (मत् प्रतिबंध करना)जो स्वयं किसीको प्रति चंध नहीं करते और जिनको कोई प्रतिबंध कर नहीं सकता। यह भी एक धीरोंकाही लक्षण है। क्यों कि वीर कभी दूसरों की उन्नति में रुकावट नहीं डालते, नाही अपनी उन्नति में किसी को रकावट डालने देते हैं। "मt+रुत् " (मत् शन्द करना) अर्थात् जो बहुत बोलते नहीं, यहुत यकवाद नहीं करते' जो करनेफा कर्तव्य हो वह फरते है परंतु बहुत शब्दजाल नहीं फैलाते । यह व्युत्पत्तिमी मरुतों का एक विलक्षण गुणधर्म यता रही है। घीरों के अंदर यह गुणधर्म अवश्य चाहिये, अन्यथा जिनकी शक्ति शब्दजाल फैलाने में व्यर्थ सर्च होगी, ये लोग पौरप कर्म कर ही नहीं सकेंगे। ॥ मयत् शब्द के ये यौगिक अर्थ निस्ककार के दिये हैं, पाठक इन अर्थो को देखें और जानें कि वेद के शब्दों के यौगिक अर्थ कैसे होते हैं । शब्द एक ही होता है, परंतु उस के विभाग करके प्रत्येक विभाग के अर्थ देसने से विविध सथों की प्राप्ति होती है। इन अों को ध्यानमें धरकर नीचे लिखे मंत्रोका अभ्यास अय कीजिये- ये शुभ्रा घोरयर्पसः सुक्षपासो रिशादसः । मरभिरग्न आगदि ॥ प्रा० ११ १२१५ (ये) जो (शुमाः) गौरपर्ण ( घोरपर्पसः) पदे शरीर- पाले (सु-समासः) उरम क्षत्रीय तथा (रिचादसः) शनुका माश करनेवाले हैं. उन (मदिः) मरतोंके साथ, है अग्ने, (भागट)आओ।

मरुतो यद्ध वो बलं जॉ अचुच्यवीतन । गिरीरचुच्यवीर्तन ॥ ऋ० ११३७ ११२ हे (मरतः) मरुतो ! (यत् है) जो निश्चयसे (व वलं) आपका बल है जिससे आप (जनान् ) लोगोंको (अचुच्य- घीतन) प्रेरित करते हैं और (गिरीन् ) मेघोंको भी (अचुच्यवीतन) हटा देते हैं। प्र यदित्या परावतः शोचिनं मानमस्यथ । कस्य ऋत्वा मरुतः कस्य वर्षसाकं याय के हधूतय ॥१॥ स्थिरा का सन्त्यायुधा पराणुदें वीळू उत प्रतिष्कमे । युमाकमस्तु तविपी पनीयसीमामय॑स्य मायिनः॥२॥ ऋ०१।३९1 है (मरुतः) महतो! (शोचिः न) प्रकाशके समान (पराधतः) दूरसे दिखाई देनेवाला (यत् मान)जों वीरताका प्रमाण आप (इत्या) इस प्रकार (प्र अस्यय) छोड देते हैं। (कस्य त्या) किस के कर्मसे (कस्य वर्पसा) किस के रूपसे या आकारसे आप (कं याय) किसके पास जाते हैं और तुम्हारी (धूतयः) कंपाने- पाली शक्तियां (क) किसको हिलाती है?h(धः आयुधा) आपके शस्त्र (स्थिरा. सन्तु) स्थिर हो, तुम्हारे शस्त्र ( परा-नुदे)शत्रु को दूर करनेवाले कर्मके लिये और (प्रतिष्कमे) शत्रुको प्रतिबंध करने के लिये (वीळू) बलवान हैं (युप्माकं ) आपकी (तविषी) शक्ति (पनीयसी) प्रशंसनीय ( अस्तु) होवे वैसी (मायिनः) कपटी (मर्त्यस्य)मनुष्यकी (मा) न हो।

(२२) मरतोंका यह वर्णन पाठक देखें। वि येनाजन्ते सुमखास ऋष्टिभिः प्रच्यावयन्तो अच्युता चिदोजसा । मनोजुवो यन्मरुतो रयेवा वृपवातासः पृपतीरयुग्वम् ॥ १ ॥८५४ हे (मस्तः) मरुतो! (ये) जो आप (सु-मखासः) उत्तम फर्म करनेवाले होकर (ऋटिभिः) शस्त्रोसे (वि-नाजन्ते) चमकते हैं और (ओजसा) शकि से (चित्) निश्चयपूर्वक (अ-च्युताः)न हिलनेवालों को भी (प्रच्यावयन्तः)हिला देते है। आप (मनोजुवः) मनके समान घेगवान होते हुए (वृष- घातासः) थैलों और गोषोंके अनेक झुंडोको पास रखनेवाले अपने (रयेषु) रयोंको (पृपतीः) नानारंगवाले पशुओंको (अयुग्ध्वम् ) जोतते हैं। यूयं तत्सत्यशयस आविश्कर्त महित्वना । विध्यता विद्युता रक्षः॥१०१।८६।९ (यूय) आप (सत्य-रावसः) सत्य घलयाले है। अपने (महित्वना) महत्वसे (आविश्कर्त ) प्रकट होते है और (विद्युता) बिजलीके समान चमकवाले शस्त्रसे (रक्षः) दुष्ट राक्षसोको (विध्यत) घेष फरते हो, फाटते हो। इस प्रकार मयत् देवताके मंत्रोफा अध्ययन पाठक करें और चीरताका पाठ सीसे।

पाठ ३ महाभारतम् । (भीष्मपर्व अ. ९९) सञ्जय उवाच। ततः शान्तनवो भीमो निर्ययौ सह सेनया। व्यूह चान्यूहत महत्सर्वतोभद्रमात्मनः ११॥ कृपश्च कृतवर्मा व शेभ्यश्चैव महारथः। शकुनिः सैन्धवश्चैव काम्बोजश्च सुदक्षिणः ॥२॥ भीष्मेण सहिताः सर्वे पुप्रैश्च तव भारत । अग्रतः सर्वसैन्यानां व्यूहस्य प्रमुख स्थिताः ॥३॥ द्रोणो भरिश्रवाः शल्यो भगदत्तश्च मारिप । दक्षिणं पक्षमाश्रित्य स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ॥४॥ अश्वत्थामा सोमदत्तश्चावन्यौ च महारथौ । महत्या सेनया युक्ता वाम पक्षमपालयन् दुर्योधनो महाराज त्रिगर्तेः सर्वतो वृतः । व्यूहमध्ये स्थितो राजन्पाण्डवान्प्रति भारत अलम्बु पो रयश्रेष्ठः श्रुतायुश्च महारथः। पृष्ठत सर्वसैन्यानां स्थिती व्यूहस्य दंशितो एवं च तं तदा व्यूहं कृत्वा भारत तायकाः। सन्नद्धाः समद्दश्यन्त प्रतपन्त इवाऽग्नयः ॥८॥ ततो युधिष्ठिरो राजा भीमसेनश्च पांडवः। नकुल सहदेवश्च माद्रीपुत्राघुमावपि (२४) ॥१४॥ अप्रतः सर्वसैन्यानां स्थिता व्यूहस्य दंशिताः। -धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्च महारथः स्थिताः सैन्येन महता परानीकविनाशनाः। शिखण्डी विजयश्चैव राक्षसश्च घटोत्कचः ॥१९ चेकितानो महावाहुः कुन्तिभोजश्च वीर्यवान् । स्थिता रणे महाराज महत्या सेनया वृताः ॥१२॥ अभिमन्युर्महेप्यासो द्रुपदश्च महायलः। युयुधानो मद्देप्यासो युधामन्युश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥ कैकया भ्रातरश्चैव स्थिता युद्धाय दंशिता पर्य तेऽपि महान्यूहं प्रतिव्यूह्य सुदुर्जयम् पाण्डयाः समरे शूराः स्थिता युद्धाय दंशिताः । तारकास्तु रणे यचा सहसेना नराधिपाः अभ्युचयू रणे पार्थान्भीष्म कृत्वाऽग्रनो नृप । तयैव पाण्डया राजन्भीमसेनपुरोगमाः भीम योद्धममीप्सन्त संग्रामे विजयैषिणः । स्वेडा:फिलकिलाशसान्झफचान्गोविषाणिकाः॥१७॥ मेरीमृदङ्गपणवान्नादयन्तश्च पुष्करान् । पाण्या अभ्यवर्तन्त नदन्तो भैरयारयान् ॥१८॥ मेरीमृदड्गशसानां दुन्दुभीनां च निःस्वनः । उारायसिंहनादेव पलिगतेच पृथग्विधैः घयं प्रतिनदन्तस्तानगच्छाम स्वरान्यिताः । सहसैयाऽमिसंक्रुदास्तदासीत्तुमुलं महत् ततोऽन्योन्यं प्रधायन्तः संप्रहार प्रचफिर। ततःशदेन महता प्रचकम्पे पसुंधरा ॥२०॥ २१॥

(२५) ॥२६॥ पक्षिणश्च महाघोरं व्याहरन्तो विषम्रमुः सप्रभवोदितः सूर्यो निष्प्रभः समपद्यत घवुश्च पातास्तुमुला. शंसन्त सुमहद्भयम् । घोरच घोरनिदा शिवास्तत्र पवाशिरे ॥२३॥ वेदयन्त्यो महाराज महद्वैशसमागतम् । दिशः प्रज्वलिता राजन्पांसुवर्षे पपात च ॥२४॥ रुधिरेण समुन्मिभ्रमस्थिवर्ष तथैव च । रुदतां वाहनानां च नेत्रेभ्य प्रापतज्जलम् ततः शांतनवः शंतनुपुत्रो भीष्म सेनयां सह निर्ययो। सर्वतो. भद्रं नाम महद्वयूहं च आत्मन सैन्यस्य अव्यूहत ॥ १॥ कृपश्च कृतवर्मा च महारथ शैब्यश्च शकुनिः सैन्धवः सिंधुराजः च सुद- क्षिण कांबोजा कंयोजदेशाधिपतिश्च एव ॥२॥ हे भारत' तव पुत्रै भीष्मेण च सहिता सर्वसैन्यानां अनत न्यूहस्य च प्रमुख रथाने स्थिताः॥३॥ हे मारिष! धृतराष्ट्र! द्रोणो भूरिश्रवा. शल्यः । भगदत्तश्च व्यूहस्य दक्षिणं पक्षं आथित्य दंशिता रक्षिताः । स्थिता ॥४॥ अश्वत्थामा सोमदत्त महारथी आवन्त्यो अवन्ति- देशीयो राजानी महत्या सेनया युक्ता व्यूहस्य वाम पावं अपा- लयन् ॥५॥ हे महाराज राजन् । त्रिगर्मी सर्वतो वृतः दुर्योधन । व्यूहमध्ये स्थित पांडवान् प्रति युद्ध कर्तुम् ॥६॥रथश्रेष्ठ अलं. बुष, महारथ. श्रुतायुश्च सर्वसैन्यानां व्यूहस्य पृष्टतः दंशिता स्थितौ ॥७॥हे भारत ! तावका तव संबंधिनः एवं च तं व्यूह कृत्वा सनद्धा सिद्धाः समदृश्यन्त यथां प्रतपन्तोऽग्नय ॥८॥ ततः राजा युधिष्ठिरः पांडवो भीमसेनश्च नकुलः सहदेवश्च उभी अपि माद्रीपुत्रौ ॥९॥ सर्वसैन्यानां व्यूहस्य अग्रत दंशिताः .

(२६) रक्षिताः स्थिताः। धृष्टद्युम्नः विराटश्च महारयः सात्यकिश्च ॥१०॥ परानीकविनाशनाः शत्रुसैन्पविनाशकाः महता सैन्येन स्थिताः । शिखण्डी विजयोऽर्जुनय घटोत्कचोराक्षसध॥११॥ महायाः पेकितानः, धीर्यवान् कुन्तिभोजश्च । हे महाराज ! महत्या सेनया वृताः रणे स्थिताः॥१२॥ महेप्यासोऽमिमन्युः, महायलो द्रुपदध मद्देप्यासो युयुधानः, पीयेयान् युधामन्युध ॥ १३॥ केकया ब्रातरः चैय युद्धाय दंशिताः सुरक्षिताः स्थिताः । सेऽपि एवं दुयं महान्यूदं प्रतिव्यूख ॥ १४ ॥ शूराः पांध्याः समरे युद्धाय दंशिता स्थिताः । तायकाः तु सहसेनाः नराधिपाः रणे पत्ता: सिद्धाः॥१५॥ ! मीणं अप्रतः प्रत्या रणे पाधान् अम्युरापः। तयेप पांडपा.. हे राजन् ! भीमसेनपुरोगमाः ॥ १६ ॥ संग्रामे विजयेषिणः भीमं योगमभीप्सन्तः । येटाः दिलफिस्टा- शपायान् ऋकान् गोयिपालिकाः ॥१७॥ मेरी-मृदंग-पण. नप

समासाः
१ व्यूहमध्य-व्यूहस्य मध्यं ।
२परानीकविनाशन: परस्य अनीकी तस्य विनाशनः ।
३ विजयैपिन-विजयं इच्छति ।
४ मेरीमृदंगपणवान्न्मेरी च मृदंगश्च पणवश्च ।
५ उत्कृष्टसिंहनादः =उकृष्टश्चासौ सिंहनादश्च ।
६ सप्रम-प्रभया सहितः।
७ निषभः- निर्गता प्रभा यस्मात् ।
८ घोरनिर्हाद धोर: निर्दादा यस्य ।
९ पांसुव-पांसूनां वर्षे।
शब्द।
पक्षा विभाग, याजू
दंशित-रक्षित
सन्नद्ध-सिद्ध
अनीक सैन्य
पर शत्रु
घोरनिर्हादा:-बडेशब्दवाले
धेशसम्भय
अस्थिन्हही
महेवासा वडा धनुपधारी
अभ्युद्ययुः हमला किया
अभीप्सन-इच्छा करनेवाला
पल्गितम्शब्द, भाषण
क्ष्येडागर्जना
शिवागीदड, सियार
पांसु = धुली
वर्ष- वृष्टि

(२८)
पाठ ७.
।
रद शब्द के अर्थ मी पूर्ववत् अनेक प्रकारके होते हैं। ये
अर्थ अब इस पाठमें देखिये-
रोदिति इति रद्रः।
रोता है इसलिये इसफो रुद्र कहते हैं । जो बहुत पुरे कर्म
फरता है और उनका युरा फल भोगने के प्रसंगमें रोता है उसका
नाम रुद्र है। चोर, दुए इस अर्थसे रुद्र है । तथा-
रोदयति इति रुद्रः।
जो चलाता है उसका नाम रुद्र है। युरे कर्म करनेवालों को
फटोर दण्ड देकर जोरलाता है उसको रुद्र कहते है, परमेश्वर,
न्यायाधीश आदि सब इस अर्य से रुद्र हैं।
(८) शब्दका (द) भेदन करनेवाला रुद्र कहलाता है।
वाद को व्यक स्थितिमें प्रकट करनेवाला रुद्र है।
रत+रारद
(यत्) शब्दको (रा) देनेवाला जो है, जो शब्दका प्रेरक
देव है उसका नाम रुद्र है। शब्दका प्रेरक आत्मा, परमात्मा.
मेघस्थानीय विद्युत्, पका मादि है। ये सब इस कारण रद की
विभूतियां समजो जाती है।
इस रीतिसे ये मिन्न मिन्न व्युत्पत्तियां देपकर पाठक रुद्र
यता मंत्र पहेंगे, तो उनकी बहायाध मिल सकता है। यहां
उमंग नमूने के तौर पर दिये जाते है-

या ते रुद्र शिवा तनघोरापापकाशिनी।
तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताऽभिवाकशीहि ॥
यजु १६ १२
"हे (स्द्र) रुद्र! (या)जो (ते) तेरा (पापकाशिनी)
पापनाशक (अ-धोरा तन्ः) क्रूरतारहित शरीर है । हे (गिरि-
शन्त) वाक्शक्ति द्वारा सुख को फैलानेवाले देव । (तया
शन्तमया) उस सुख फैलानेवाले (तन्वा) शरीरसे (ना)
हम सबको (अभिवाकशीहि ) देख, सुखी कर॥"
इस मंत्रमें “गिरिशन्त"
शब्द बहुत विचार करने योग्य
है-- (गिरि) वाणीमें रहकर जो (शं+त) सुख फैलाता है,
उसको “गिरिशन्त " कहते हैं। वाणीके अंदर आत्मा की
शक्ति है और यह ही सच्चा सुख देखनेवाली है, इत्यादि भाव
यहां देखने योग्य है।
'असौ यस्ताम्रो अरुण उत बभ्रुः सुमंगलः ।
: ये चैनं रुदा अभितो दिक्षु धिताः सहस्रशोऽवैपां हेड ईमहे।
य०१६।६
(य असौ) जो यह (ताम्रः अरुणः उत बभ्रुः सुमंगल )
लाल, अरुणवर्णका, तथा भूरे वर्णवाला, मंगल करनेवाला रुद्र
है (ये) जो (सहस्रशः रुद्राः अभित दिक्षु पनं श्रिता.)
हजारों दूसरे रुद्र चारों ओरसे दिशाओंमें इसके आश्रयसे
रहते हैं (पपां इंडः अव ईमहे) इनका क्रोध हम भक्तिद्वारा दूर
.
करते हैं।
रुद्र सवको आधार देनेवाला मुख्य है और उसके
आधारसे अनेक हजारों रुद्र रहते हैं। मुख्य का नाम भी रुद्र
है और उसके आधार से रहनेवालोंका नाम भी रुद्र ही है।
यहां यह वर्णन समझने के लिये एक परमात्माके आधार से

(३०)
रहनेवाले अनेक जीवात्मा, पक सेनापतिके आश्रयसे रहनेवाले
हजारों सैनिक, एक राजाके आश्रयसे रहनेवाले हजारों राजपुरुष
आदि एक के आधारसे रहनेवाले अनेकों का संबंध यहां देखने
योग्य है । स्लानेवाला रुद्र होता है, राजा दुष्टोंको दण्ड देकर
रलाता है इस लिये यह रद है, उक कारण हीराजपुरुष भी रुद्रही
हैं। इनके शोधसे अपने आपको यचानेका यत्न हरएक करें।
इसी आध्यायमें-
नमो हिरण्यवाहये सेनान्ये ॥ १६ । १७
नमो दायाततायिने क्षेत्राणां पतये नमः।
नमः सतायावन्त्यै पनानां पतये नमः ॥१६॥१८
नमा मात्रणे पाणिजाय कक्षाणां पतये नमः ।
नम उच्चर्णपायाक्रन्दयते पचीनां पतये नमः ।
-

- (३१) यह देखें और रुद्र का अर्थ समझ लें. जनताको रुलानेवाले तो चोर डाकु आदिमी होते है इसलिये ये भी रुद्र ही है देखिये इनका वर्णन- स्तनानां पतये नमः॥ य० १६२० नमो वचते परिवञ्चते स्तायूनां पतये नमः। - नमो निषंगिण इपुधिमते तस्कराणां पतये नमः॥ नमः सकायिभ्यो जिघांसद्भयो मुष्णतां पतये नमः ।। नमोऽसिमद्यो नक्तंजर यो विकृन्तातां पतये नमः । य०१६।२१ (स्तेनानां पतये) चोरोंके स्वामीके लिये (नमः) शस्त्र या दण्ड दिया जावे। (वञ्चते, परिवञ्चते स्तायूनां पतये) ठगाने वाले, सब प्रकारसे ठगाने वाले, लुटेरों के स्वामीके लिये दंड दिया जावे। (निपंगिणे इषुधिमते तस्कराणां पतये नमः) पड्ग धारण करने वाले,वाण धारी चोरोंके स्वामी के लिये दण्ड दिया जावे ।(सृकायिभ्य जिघांसद्भयः मुंष्णतां पतये नम) शस्त्र- धारी घातपात करनेवाले डाकुओंके स्वामीके लिये दण्ड दिया जावे। (असिमद्यः नकं चरद्भधः विकृन्तानां पतये नमः) तलवारधारी, रात्रीके समय घूमनेवाले और काटनेवालों के मुखियाके लिये दण्ड दिया जावे। । इन मंत्रों में जो स्तेन आदि शब्द है ये सब रद्रोंके ही रूप हैं। येरुद्र जनताको स्लाते हैं, यह बात सब जान सकते हैं। चौर डाकू खूनी लुटरे ये जनताको कितने सताते हैं यह सब जानते ही है । ये रुलाते हैं इसी लिये ये रद्र हैं। पाठक यहां विचार करके देखें कि राजा और राजपुरुष दुष्टोको रुलाते इस कारण ही रुद्र है और ये चोर आदि जनताको रुलाते हैं इस कारण रुद्र हैं। दोनों में रुलानेका धर्म समान है। परंतु (३२) 1 नमः । शब्द के अर्थमें भेद है। के अर्थ- "नमन, वज्र, शस्त्र, दण्ड, मेघकी विद्युत्" आदि हैं। बज्र, शस्त्र और दण्ड ये शत्रुको तथा दुष्टों को नमाते हैं इसलिये इनक नाम "नमः" है। यहां भी पाठक नमः का यौगिक अर्थ ही देखें। नमः शन्दका यह अर्थ वैदिक कोश निघण्ट्रमें दिया है । पत्र अंदर ही दुष्टोको नम्र बनाने कासामर्थ्य है इसलिये पत्रकानाम नमः है। यह अर्थ लेकर उक्त मंत्र भागमै नमः का अर्थ शस्त्र या दण्ड किया है। । रुद्र नाम परमात्माका है क्यों कि यह दुष्टोको रुलाता है। फिर रुद्रों के रूपोंमें "चोर" किस प्रकारआगये हैं, यह शंका यहां पाठकोंके मनमें उत्पन्न हो सकती है, इसका समाधान पडे लये लेस से दिया जा सकता है, परंतु अतिसंक्षेपसे यहां इस का समाधान किया जाता है. पाठक उसका विचार करें- परमात्मा हृदयकी गुदामे छिपारहता है, चोर मी पहाड के गुहाम छिपा रहता है, कितना भी ढूंढा जाय तो भी परमात्म प्रत्यक्ष नहीं होता, उसी प्रकार प्रयीण चोर भी प्रत्यक्ष नहीं होता जिस प्रकार चोर न समझते हुए धन का अपहार करता है, ठी उसी प्रकार परमेश्वर भी जिस युरे मनुष्यका धन हरना चाहत है न समझते हुए उसका धन हरण करता है। इस प्रकार यदि समानता कविकी दृष्टीसे देवी जाय तोपाठकोकोपतालगजायग कि इनमें समानता कहां है और विपमता कहां है। यह पर गट विषय इसलिये इस समय समझमें आना कठिन है जो आगे विशेष अभ्यास होनेपर स्वयं पुल जायगा।

(३३) पाठ८ महाभारतम् । (भीष्मपर्व. अ. १००) सन्जय उवाच। अभिमन्युरथोदार पिशड्गैस्तुरगोत्तमैः । अभिदुद्राव तेजस्वी दुर्योधनबलं महत् ॥१॥ विकिरशरवर्षाणि वारिधारा इवाऽम्बुदः। न शेकुः समरे क्रुद्धं सौभद्रमरिसूदनम् शस्त्रीधिण गाहमान सेनासागरमक्षयम् । निवारयितुमच्याजो त्वदीयाः कुरुनन्दन ॥३॥ तेन मुक्ता रणे राजशरा शत्रुनिवर्हणाः । क्षत्रियाननयन्शूरान्प्रेतराजनिवेशनम् यमदण्डोपमान्धोराज्वलिताशीविपोपमान् । सौभद्रः समरे क्रुद्ध प्रेपयामास सायकान् ॥५॥ स रथारथिनस्तूर्ण हयांश्चैव ससादिन । गजारोहांश्च सगजान्दाग्योमास फाल्गुनिः ॥६॥ तस्य तस्कुर्वतः कर्म महत्संख्ये महीभृत । पूजयाञ्चक्रिरे हृष्टाः प्रशशंसुश्च फाल्गुनिम् ॥७॥ तान्यनीकानि सौभद्रो द्रावयामास भारत । तूलराशीनिवाकाशे मारत सर्वतोदिशम् ॥८॥ तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि भारत । प्रातारं नाध्यगच्छन्त पड्के मग्ना इव द्विपा ॥९॥ विद्राव्य सर्वसैन्यानि तावकानि नरोत्तम । अभिमन्युःस्थितोराजन्विधमोऽग्निरिवज्वलन्॥१०॥ नचैनं तावका राजन्विपेहुररिघातिनम् । प्रदीप्तं पावकं यद्वत्पतड्गा• कालचोदिता.॥ ११॥ ३ त्वदीयाः स्वपक्षीयाः अक्षयं सेनासागरं गाहमानं शस्त्रीषिणं अभिमन्यु आजौ युद्धे निवारयितुं अपि न शेकुः ॥ ३॥ हे राजन् ! तेन अभिमन्युनारणेमुका शत्रुनिवर्हणा शत्रुनाशकाः शराः वाणाः शूरान् क्षत्रियान् प्रेतराजनिवेशनं यमसदनं अनयन् ॥४॥ समरे क्रुद्धः सौभद्गःआशीविपोपमान यमदण्डोपमान् घोरान ज्वलितान् सायकान् वाणान् प्रेषयामास ॥५॥स फाल्गुनिः फाल्गुनस्य अर्जुनस्य पुत्रः तूर्ण सत्वरं सरथान् रथिनः, ससादिनी हयान्, सगजान गजारोहान् च दारयामास ॥६॥ तस्य तन्महत्कर्म संख्ये युद्धे कुर्वतः दृष्टा महीभृतो राजानः फाल्गुनि अभिमन्यु पूजयां- चक्रिरे तं प्रशशंसुश्च ॥ ७ ॥ हे भारत ! सौभद्रः तानि अनीकानि सर्वतोदिशं द्रावयामास, मारुतः तूलराशीन् आकाशे इव ॥८॥ हे भारत | तेन विद्राव्यमाणानि तव सैन्यानि, पंके कर्दमे भग्ना द्विपाः गजा इव, त्रातारं नाध्यगच्छन्त न जानन्तं ॥९॥हे नरोत्तम ! तावकानि सर्वसैन्यानि विद्राव्य, हे राजन् ! विधमोऽग्निरिव ज्वलन्, अभिमन्युः स्थितः ॥ १०॥ हे राजन् ! पनं अरिघातिनं अभिमन्यु तावका वीराः न विपेतुः। काल- चोदिताः कालप्रेरिताः पतंगा यद्वत् प्रदीप्तं पायकं ॥ ११ ।। पाण्डवानां महारयः महेष्वासः अभिमन्युः सर्वशत्रुभ्यः प्रहरन् सवज्रावासव इन्द्र इव अदृश्यत ॥ १२॥ हे राजन् ! अस्य हेमपृष्ठं धनुः दिशः विचरत् दहशे । यथा तोय देषु मेधेषु शतहदा विद्युत् राजमाना ॥ १३ ॥ हेराजन् ! निशितोः पीता शराः संयुगे युद्धे निश्वरन्ति स्म फुल्नुमात् चनात् भ्रमराणां मजा इव ॥१४॥ तथैव नस्य.महात्मनः सौभद्रस्य चरतः कान्चनांगेन रथेन अन्तरं ‘जना न ददृशुः ॥१५॥ कृपं द्रौणि अश्वत्थामानं सवृदयलं वृहद- लेन सहित सैधन्वं सिंधुरांज मोहयित्वा महेन्यासो, महाधनु- धारी लधु सुष्टु च व्यचरत् ॥ १६ ॥ हे भारत! अस्य तव चाहिनी - दहतः धनुः मंडलीकृतं सूर्यमंडलसंकाशं पर पक्ष्याम ।। १७ ॥ शूराः क्षत्रियाः तं तरस्विनं प्रतपन्तं दृष्ट्या, तस्य कर्मभिः इमं लोकं भूलोकं द्विफाल्गुनं मेनिरे ॥१८॥ हे महाराज! सा भारती महाचम् तेन अर्दिता । मदशा योपिदिव तत्र तत्रैव व्यभ्रमत् ॥ १९॥ महासन्यं द्रापयित्या महारथान कंपयित्वा, सहदःनंदया. मास, यासव इन्द्रो मयं जित्या इव ॥२०॥ भारत! वेन तय सैन्यानि संयुगे विद्राव्यमाणानि तव सैन्यस्य घोरं आस्विनं चः ।।२१ ।। मारतोद्धतवेगस्य सागरस्य पर्वणि इथ. हे राजन् ! तदा दुर्योधनः आयगि अलंयुपं राक्षसमभापत ॥ २२ ॥ समासाः। १ तुरगोत्तमः - तुरगेषु उत्तमः । २ दुर्योधनयलं = दुर्योधनस्य यलम् । ३ शरवर्षे = शरणां यर्पम् । ४ सेनासागर सेना पर सागरः। ५प्रेतराजनिवेशनम् = प्रेताना राजा । तस्य निवेशनम् । ६ यमदण्डोपमः यमस्य दण्डः। तस्य उपमा यस्मै। '७ विधमः = विगतः धूमः यस्मात् । ८ फुलमं = फुल्ला मा यस्मिन् । मारतोदतवेगः = मारतेन उदतः । उदतः वेगः यस्य । शब्द। प्रेतराज - यम तूल - कपास ठोयदः पंक कीचट छिय: दाथी गाहमान - तेरनेपाली कांचनं : सुषण, सोना पादिनी - सेना योपित् = स्त्री -- तुरगः - घोडा अम्युदः : मेघ

(३७)
-
पाठ ९
औषधि.
इस पाठमें वैदिक शब्द की एक विशेषतापतानी है। कई शन्दों
प्रथमाक्षर लुप्त हो जाते हैं। यह औषधि या ओषधि शब्द
स्तवमें " दोपधि" है, इसके प्रथम स्थानके दकार का लोप
कर 'दोषधि' का 'ओषधि' इनता है। इसका अर्थ-
दोष+धिन्दोपोंको घोनेवाली
ऐसा होता है । शरीरके अंदर जितने दोपा रोगबीज अथवा
क्षीण करनेवाले कारण होते हैं, उन सब दोपोंको धोकर
करनेवाली वनस्पति होने के कारण उसको वास्तव में "दोष
कहना चाहिये परंतु "ओषधि" कहते हैं। अब इसके
Pखिये-
या ओषधी पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा।
मनै नु पभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥ ५ ॥

! दहतः धनुः मंडलीकृतं सूर्यमंडलसंकाशं एव पदयाम || १७ सूराः क्षत्रियाः तं तरस्विनं प्रतपन्तं हवा, तस्य कर्मभिः इस लोकं भूलोक द्विफाल्गुन मेनिरे ॥ १८॥ हे महाराज सा भारती महाचमः तेन अदिता । मदवशा योपिदिव तत्र तत्रैव व्यभ्रमत् ॥१२॥ महासैन्यं द्राययित्वा महारथान् कंपयित्वा, सुहृदः नंदया. मास, वासव इन्द्रो मयं जित्वा इव ॥२०॥ भारत! तेन तक सैन्यानि संयुगे विद्राव्यमाणानि तव सैन्यस्य घोरं आस्विनं चकुः ॥२१॥ मारुतोद्धतवेगस्य सागरस्य पर्वणि इव, हे राजन् ! तदा दुर्योधनः आर्यनंगि अलंयुपं राक्षसमभापत ॥ २२ ॥ समासाः। १ तुरगोत्तमः - तुरगेषु उत्तमः । २ दुर्योधनवलं = दुर्योधनस्य बलम् । ' ३ शरव = शरणां वर्षम् । ४ सेनासागरः = सेना पव सागरः। ५प्रेतराजनिवेशनम् = प्रेतानां राजा । तस्य निवेशनम् । ६ यमदण्डोपमः यमस्य दण्डः । तस्य उपमा यस्मै। '७ विधमः = विगतः धूमः यस्मात् । : फुल्लद्रुमं - फुल्लाः दूमा यस्मिन् । ९ मारतोद्धतवेगः = मारतेन उद्धतः । उद्धतः वेगः यस्य । शब्द । तुरगः - घोडा प्रेतराज - यम अम्युदः = मेघ = कपास तोयदः पंक-कीचड द्विप - हाथी गाहमान - तैरनेपाला 'कांचन - सुवर्ण, सोना पाहिनी = सेना योपित् = स्नी 3D - पाठ ९ औषधि. इस पाठमें वैदिक शम्द की एक विशेषता बतानी है। कई शब्दों के प्रथमाक्षर लुप्त हो जाते हैं। यह औषधि या ओषधि शब्द वास्तवमै "दोषधि" है, इसके प्रथम स्थानके दकार का लोप होकर 'दोपधि' का 'ओपधि' बनता है । इसका अर्थ- दोप+धिन्दोपोको धोनेवाली ऐसा होता है । शरीरके अंदर जितने दोप: रोगबीज अथवा आयु क्षीण करनेवाले कारण होते हैं, उन सब दोपोंको धोकर शुद्ध करनेवाली वनस्पति होने के कारण उसको वास्तवमें "दोष +धि" कहना चाहिये परंतु "ओषधि" कहते हैं। अब इसके मंत्र देखिये- या ओषधी पूर्वा जाता देवेभ्यस्त्रियुगं पुरा। मनै नु पभ्रूणामहं शतं धामानि सप्त च ॥ ७५ ॥ यजु०१२।७५ (या ओषधी )जो औषधियां (देवेभ्य ) देवासे (त्रियुगं पुरा पूर्चा जाता ) तीन युग पहिले उत्पन्न हुई थी, उन (वभूणा) भरण पोषण करनेवाली औषधियोंके (शतं सप्त च धामानि) सौ और सात धाम है ऐसा मैं (मनै नु) मानता हूं। शतं वो अम्ब धामानि सहनमुत वो रुह । अधा शतक्रत्वो यूयमिमं मे अगदं कृत हे (अम्ब) रक्षक औषधि' (व शतं धामानि )आपके सौ धाम है (उत व रुहः सहस्रं) और आपके अंकुर हजारों है।

(अधा) तथा (यूयं शतक्रत्वः) आप सौ कर्म करनेवाली वन-
कर (इमं मे अगदं कृत) इस मेरे रोगीको नीरोग बना दो।
ओपधीः प्रतिमोदध्वं पुष्पवतीःप्रस्वरी।
अश्वा इय सजित्वरीरिधः पारयिष्यवः ॥ ७७॥
(पुष्पपतीः) फूलवाली (प्र-सूवरीः) सुख देनेवाली औष-
धियां (वीरुधः) वनस्पतियां (पारयिष्ययः) रोगोंके पार
पहुंचाने वाली हैं, ये (अश्वा इव सजित्वरीः) घोडों के समान
वेगवान अर्थात् अपना कार्य करने में पूर्ण समर्थ हैं, इन से (प्रति-
मोदध्वम् ) आनंदित होओ।
ओपीरिति मातरस्तद्वो देवीरुप ग्रुवे ।
सनेयमभ्यं गां वास आत्मानं तव पूरुप ॥७॥
औषधियां (मातरः) माताएँ है, हे (देवी) दिव्य औषधियों!
तथा हे पुरुष! (तत् वः उपवे) वह आपसे मैं कहता हूं कि
(अवं, गां, वासः, आत्मानं) घोडा, गाय, वस्न तथा अपने
आत्माको (सनेयं ) नीरोग होकर मैं प्राप्त करूं ।
यत्रौषधीः समग्मत राजानः समिताविव ।
विमः स उच्यते भिषग्रक्षोहाऽमीवचातनः॥८॥
(राजानः समिती इव ) राजा लोक जैसे युद्धों में जाते हैं उस
प्रकार (यप्र औषधीः समग्मत) जहां औषधियां इकट्ठी होती हैं
(सः विप्रः मिषक् उच्यते) उसी विप्रका घेद्य कहते है यह(अमीय
घातन , रक्षो-हा)रोगोंका दूर करनेवाला है और रोगयीजों
का भी नाश करता है।
इदिमा पाजयन्नहमोषधीईस्त आदधे ।
आरमा यमस्य नश्यति पुरा जीवगृभी यथा ॥८५॥

(३९) (अहं यन् इमाः ओषधीः)मैं यदि ये औषधियां (वाजयन् हस्त आदधे) बल बढाता हुआ हाथ में पकडू तो (यमस्य आरमा नश्यति ) रोगकी जड नष्ट हो जाती है (यथा पुरा जीवगृमः), जिस प्रकार पहिले रोगसे पकडा हुआ प्राणी नष्ट होता यस्यौषधीः प्रसर्पयाडगमग परुष्पकः । ततो यक्ष्म वियाधस्व नो मध्यमशीरिव ॥८ हे औषधियो। ( यस्य अंग अंगं परुः परः) जिसके अंग अंगमें और जोड जोडमें तुम (प्रसर्पय) जाती हो (ततः यमं वि वाघस्य ) उसके याद तुम रोग को प्रतिबंध करती हो जैसे (उग्रः) क्षत्रिय (मध्यमशील) वीचके मर्मीको काटता ॥ या फलिनीर्या अफला याश्च पुष्पिणीः। वृहस्पतिप्रस्तास्ता नो मुञ्चन्याहसः ॥ ८९॥. (याः फलिनीः ) जो फल बाली, (या अफलाः) जो फल- रहित और (याः च पुपिणीः) जो फूलवाली औषधियां हैं (ता. वृहस्पतिप्रसूताः) पेशानी के द्वारा दिये जानेपर (न: अंहसः मुन्धन्तु ) हमें पापरूपी रोगोंसे बचायें । या ओपधी सोमराठीर्ययीः शतविपक्षणाः । तासामलि त्यमुत्तमारं कामाय शं हृदे ।।१२।। जो औषधियां (सोम-राही) जिनका राजा सोम है और जो (पही शतविचक्षणाः) बहुत सी प्रकारके शुभगुणों से युक्त है। (तासांत्वं उत्तमा असि) उनमें तू उत्तम है (कामाय अरं) प्सित कार्य के लिये पर्याप्त और (हदे) हृदयके लिये आनंद दायक है।

(४०) या ओषधीः सोमराशीविष्ठिता पृथिवीमनु । वृहस्पतिप्रसूता अस्यै संधत्त वीर्यम् ॥ ९३ ॥ जो सोम राजाके राज्यमें रहनेवाली औषधियां पृथ्वीपर (अनु- वि-स्थिताः) आकर रही हैं। वे (बृहस्पति-प्रसूताः) विद्वान द्वारा दिया जानेपर (अस्यै वीर्य संधत्त) इसके लिये वीर्य धारण करें। ओपघय समयदन्त सोमेन सह राशा । यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्तं राजन्पारयामसि ॥१६॥ सोम राजा के साथ औषधियां चोलती हैं कि जिसकेलिये ब्राह्मण हमें देता है, हे राजन् ! (तं पारयामसि)उसे हम पार ले जाती है। नाशयित्री पलासगार्शस उपचितामसि । अथो शतस्य यक्ष्मणांपाकारोरसि नाशनी ॥२७॥ (पलासस्य) कफ, (अर्शसः) यवासीर, (अपचितां) सूजन आदिकी (नाशयित्री असि) नाश करनेवालीत है। (अयो) और (यक्ष्मणां शतस्य) रोगोंके सेंकडों भेदोका तथा (पाकारो) पककर होनेवाले रोगोंकी (नाशनी मसि) नाश करनेवालीत है। इस प्रकार औषधि प्रकरण का पाठक अभ्यास कर सकते हैं

(४१)
पाठ१०
(महाभारत उद्योग० अ० ३३)
विदुर वाच ।
राजा लक्षणसंपन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् ।
प्रेप्यस्ते प्रेपितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिर ॥१६॥
विपरीततरश्च त्वं भागधेयेन संमत ।
अर्विषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविदः ॥१७॥
आनृशंस्यादनुक्रोशाधर्मात्सत्यात्परामात् ।
गुरुत्वात्वयि संप्रेक्ष्य यहून्क्लेशांस्तितिक्षते ॥१८॥
दुर्योधने सौबले च कर्णे दुशासने तथा।
पतेवश्वैर्यमाघाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ॥१९॥
आत्मशान समारंमस्तितिक्षा घर्मनित्यता ।
यमर्थानापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते
॥२०॥
निषेवते प्रशस्तानि निदितानि न सेवते ।
अनास्तिक श्रधान एतत्पंडितलक्षणम् ॥२१॥
क्रोधो हर्पश्च दर्पश्च न्हीस्तंभो मान्यमानिता।
यमर्थानापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥२२॥
यस्य कृत्यं न जानन्ति मंत्रं वामंत्रितं परे।
कृतमेवास्थ जानन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥२३॥
यस्य हरयं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रति,
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते
॥२४॥

(४२)
.
.
यस्य संसारिणी प्रशा धर्मार्यावनुपर्तते ।
कामादर्थे वृणोते यः स वै पण्डित उच्यते ॥२५॥
यथाशक्ति चिकीर्पन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
न किंचिदवमन्यन्ते नराः पण्डितयुद्धयः ॥२६॥
निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्यसति कर्मणः।
अवंध्यकालो पदयात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥ २७॥
आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते॥
दितं न चाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ ।॥ २८ ॥
न हृप्यत्यात्मसंमाने नायमानेन तप्यते।
गांगो हद इवाऽक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ।। २९ ॥
तत्वज्ञः सर्वभूतानां योगः सर्वकर्मणाम् ।
उपायक्षो मनुष्याणां नरः पण्डित उच्यते ॥ ३० ॥
श्रुतं प्रशानुगं यस्य प्रशा चैव श्रुतानुगा ।
असंमिनार्थमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः ॥३१॥
अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः ।
अर्थाश्चाकर्मणा प्रेप्सुढ इत्युच्यते युधैः ॥३२॥
स्वमर्थ यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति ।
मिथ्या चरति मिनार्थे यश्च मूढः स उच्यते ॥ ३३ ॥
अकामान्कामयति य. कामयानान्परित्यजेत् ।
यलयन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुढचेतसम् ॥ ३४ ॥
अमित्रं कुरते मित्रं मिनं द्वेष्टि हिनस्ति च ।
फर्म चारमते दुष्टं तमाहुर्मदचेतसम् ॥ ३५ ॥

(५३)
संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते ।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ ॥३६ ।।
श्रादं पितृभ्यो न ददाति देवतानि न चार्चति ।
सुहृन्मित्रं न लमते तमाहुर्मूढचेतसम् ॥३७॥
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भापते ।
अविश्वस्त विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥३८॥
परं क्षिपति दोपेण वर्तमानः स्वयं तथा ।
यश्च व्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः ॥ ३९ ॥
आत्मनो चलमक्षाय धर्मार्थपरिवर्जितम् ।
अलभ्यमिच्छन्नैष्कान्मूढधुद्धिरिहोच्यते ॥ ४० ॥
अशिष्यं शास्ति यो राजन्यश्च शून्यमुपासते।
कदर्य भजते यश्च तमाहुर्मुढचेतसम्
॥४१॥
अर्थ महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव था।
विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते ॥ ४२ ॥
एकःसंपन्नमवाति यस्ते पासश्च शोभनम् ।
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसरततस्ततः॥४३ ॥
एकः पापानि कुरुते फलं मुक्ते महाजनः ।
भोकारो विप्रमुच्यन्तै कर्ता दोषेण लिप्यते ॥४४॥
एकं हन्यान वा हन्यादिषुर्मुको धनुष्मता।
बुद्धिथुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्र सराजकम्॥ ४५ ॥
-एक विपरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते।
सराष्ट्र सप्रजं हन्ति राजानं मंत्रविप्लवः ॥ ४६॥

(१४) ॥४७॥ एका स्वादु न भुञ्जीत एकश्वार्थाप्न चिंतयेत् । पको न गच्छेदवान नैकः सुप्तेषु जागृयात् एकमेवाद्वितीयं तद्यद्राजन्नायुध्यसे। सत्यं स्वर्गस्य सोपान पारावारारस्य नौरिव ॥४ एकर क्षमावतां दोपो द्वितीयो नोपपद्यते। यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥४९॥ सोऽस्य दोषो न मन्तव्यः क्षमा हि परमं बलम् । क्षमा गुणो वंशकानां शक्कानां भूपणं क्षमा :, ॥ ५० ॥ क्षमा वशीकृतिलॊके क्षमया किंन साध्यते । शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः ॥५१॥ अतृणे पतितो घह्निः स्वयमेवोपशाम्यति । अक्षमावान्परं दोपैरास्मानं चैव योजयेत् ॥५२॥ पको धर्मः परंधेयः क्षमैका शांतिरुत्तमा। विधैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखायहा द्वाथिमी प्रसते भूमिः सो यिलशयानिय । राजानं चापिरोदार वालणं चाऽप्रवासिनम् ॥ दे कर्मणी नरः कुर्यनस्मिल्लोको विरोचते । अमुपपदपं किंचिदसतोऽनर्चयंस्तया म. मा. धो. ३३ पाठ ११ - सत्यं वृहहतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यक्षः पृथिवीं धारयन्ति । सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥१॥ अथर्ववेद. १२।१।१ (सत्यं) सत्य, (वृहत् ) वृद्धि, (ऋतं) न्याय व्यवहार, (उग्रं) क्षात्रतेज, (दीक्षा) दक्षता, (तपः) तपद्वंद्व सहन करने की शक्ति, (ब्रह्म ) ज्ञान, (यशः) शुभकर्म ये गुण (पृथिवीं धारयन्ति) मातृभूमिका धारण करते है ।(सा.नः पृथिवी ) वह हमारी मातृभूमि हमारे (भूतस्य भव्यस्य पत्नी) भूत भविष्य की पालन की है, वह (नः ऊरुं लोकं कृणोत्) हमारे लिये विस्तृत स्थान करे । अर्थात् हमें विस्तृत स्थान देवे [२] असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वत. प्रयतः पमं बहु । नानावीर्या औषधी बिभर्ति पृथिवी नः प्रथतां राध्यतां नः॥२॥ (यस्याः मानवानां मध्यवः) जिस मातृभूमिके मनुष्यों के अंदर (उद्यतः, प्रवत, समं बहु अ-संवाधं) उच्चता और नीचता तथा समता के विषयमें बहुत ही निर्वैरता है और (या नाना- वीर्या ओषधीः विभर्ति) नाना प्रकारके वीर्यों से युक्त औषधियोंको धारण पोषण करती है, वह (न पृथिवी ) हमारी मातृभूमि (नःप्रयतां राध्यतां) हमारी कीर्तिका साधन करे। अर्थात् इस मातृभूमिके कारण हमारी प्रसिद्धि होवे।

[३] यस्यायतन प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं कृष्टय संपनुः । या विमति यहुधा प्रापदेजत्सा नो भूमिगोप्वप्यन्ने दधातु Irell (यस्या पृथिन्या चतनःप्रदिशः)जिस मातृभूमिको चारों दिशाओं में (कृष्टय ) विविध सेतियां (यस्यां अनं संयम्युः) जिसमें सनको उत्पन्न करती हैं। और उससे (य) जो भूमि (एजत् प्राणत् यया विमति)मने फिरने वाले प्राणिमात्र को यहत प्रकारसे पुष्ट करती है (सानो भूमिः) यह हमारी मातृ. भूमि हमें (गोपु अग्ने अपि दधातु) गौमोमें तथा अप्नमें भी धारण करें। [४] (४७) यां रक्षन्त्यस्वप्ना विश्वदानी देवा भूमि पृथियीमप्रमादम् । सा नो मधु प्रियं दुहामथो उक्षतु वर्चसा ॥७॥ (विश्वदानी यां भूमि पृथिवीं) सब कुछ देनेवाली जिस विस्तृत मातृभूमि की (अ-स्वप्नाः देवाः) सुस्ती न करनेवाले देव(अ- प्रमाद रक्षन्ति) प्रमादरहित होकर रक्षा करते हैं (सा नः प्रियं मधु दुहां) वह हमको मीठे मधुर पदार्थ देतीरदे (अथो वर्चसा उक्षतु) और तेजके साथ हमें बदाये ॥ [६] यो नो द्वेपत् पृथिवि यः पृतन्याद्योऽभिदासान्मनसा योवर्धन। तं नो भूमे रंधय पूर्वकत्वरि ॥१४॥ है (पृथिवि) मातृभूमि ! (याना द्वेपत्)जो हम सब का द्वेष (य पृतन्यात् ) जो हमारे ऊपर सेना चलावे, (यः मनसा भदासात्) जोमनसे हमें दास धनानेका विचार करे तथा (यः न) जो वधसे हमारा नाश करनेका यत्न करे,हे (पूर्व-कृत्वरि) कर्नामें कुशल (नः भूमे) हमारी मातृभूमि तू (तं रंधय) तका पूर्ण नाश कर।

(४८) त्यज्जातास्त्वयि चरन्ति मास्त्वं विभर्पि द्विपदस्वं चतुष्पदः। तवेमे पृथिविपञ्च मानवायेभ्योज्योतिरमृतं मत्र्येभ्य उद्यत्स्यों रश्मिभिरातनोति ॥१५॥ हे (पृथिवि ) मातृभूमि! (ये माःत्वज्जाताः) जो हम सब मनुष्य तुझसे ही उत्पन्न हुए हैं और (त्वयि चरलि) तुझपर ही चलते हैं, (स्वं द्विपदः चतुष्पदः विभर्षि) तू दिपाद और चतु- पादोको धारण पोपण करती हो, (येभ्यः मार्येभ्यः) जिन मस प्राणियों के लिये (अमृतं ज्योतिः) अमृतमय प्रकाश (उद्या सूर्यः) उदय होनेवाला सूर्य (रदिममि. आतनोति) अप किरणोंसे फैलाता है, वे (इमे पंच मानवा ) ये सब पांच प्रकार के मनुष्य (तव पर) तेरे ही सुपुत्र है। [८] विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमि पृथिवीं धर्मणा धृताम् । शिवां स्योनामनुचरेम विश्वहा ॥ १७ ॥ (ओपधीनां मातरं) ओपधियोंकी माता अर्थात् उत्पाद (शियां) कल्याणकारक, (स्योना) सुखदायक, (धर्म धृतो) धर्मसे धारण की हुई, (ध्रुवां पृथिवी भाम)स्थिर विस्तृत भूमिको (विश्वदा) सर्वदा (विश्वस्वं) सर्वस्व अर्थ करके (अनुचरेम ) सेवा करेंगे।

संस्कृत-पाठ-माला।
चोवीस पुस्तकोंका मू० ६॥ ) और डा० व्य० ॥३) बारह
पुस्तकों का मूस्य ४) और डा.व्य.॥) प्रति भागका मून्य !)
आने और डा.प.-) एक आना। अत्यंत सुगम रीतिसे
संस्कृत मापाका अध्ययन करने की अपूर्व पद्धति ।
इस पद्धतिकी विशेषता यह है-
१ प्रथम द्वितीय और तृतीय भाग। इन भागोंमें संस्कृत के
साथ साधारण परिचय करा दिया गया है।
२ चतुर्थ भाग । इस चतुर्थ भागमै संधिविचार बताया है।
३ पंचम और पट भाग। इन दो भागों में संस्कृनके साथ
विशेष परिचय कराया है।
४ सप्तम से दशम भाग। इन चार भागों में पुलिंग, स्त्रीलिंग
और नपुंसलिंगी नामों के रूप पनाने की विधि बताई है।
५ एकादश भाग । इस भागमें "सर्वनाम" के रूप यताये है।
६ द्वादश भाग । इस भागमें समासोका रिचार किया है।
७ तेरहसे अठारह भाग तक ६ भाग। इन छ: भागों में
क्रियापदविचार की पाठविधि बताई है।
८ उन्नीससे चौपीस भागतकके भाग। इन छ: भागोम
दफे साथ परिचय कराया है।
अर्थात् जो लोग इस पद्धतिसे अध्ययन करेंगे उनको अप
परिशमसे पडा लाभ हो सकता है।
मंत्री-स्याप्याय-मंडर, आंघ (जि. सातारा)
मक तथा प्रकाशक-धी. दा. सातपळेकर, भारतमुद्रणालय
स्थाप्यायमंडल, आँध (जि. सातारा.)

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अंक२०
संस्कृत पाठ माला।
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(संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय)
भाग वीसवाँ।
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लेखक और प्रकाशक,
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
स्वाध्याय मंडल, औंध (जि. सातारा)
प्रथम वार.
संवत् १९८४, शक १८४९, सन१९२७
मूल्य पांच आने
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केन उपनिपद् । ६ढान्त, इस पुस्तकमें निम्नलिखित विषयोंका विचार हुआ है- १ केन उपनिषद् का मनन, १८ इंद्र कौन है? २ उपनिपद शान का महत्त्व, १९ उपनिषद् का अर्थ और ३ उपनिषद् का अर्थ व्याख्या, ४ सांप्रदायिक झगड, २० अथर्ववेदीय केन सूक्तका ५" केन " शब्द का महत्त्व, अर्थ और व्याख्या, २व्यथि, समष्टी और परमेष्टी ७ उपनिषदोंमें शानका विकास, २२ त्रिलोकी, ८अग्नि शब्दका भाव २३ अथर्वाका सिर, ९ उपनिषद् के अंग, २४ ब्रह्मज्ञानी की आयुष्य मर्यादा, १०शांतिमंत्रों का विचार, २५ ब्रह्मनगरी अयोध्या,आठवम. २१ तीनों शांति मंत्रों में तत्त्व- २६ आत्मवान् या, ज्ञान, २७ अपनी राजधानीमें ब्रह्मका १२ तीन शांतियोंका भाव, प्रवेश, १३ ईश और फेन उपनिषद्, २८ देवी भागवत में देवीकी कथा, १४"यक्ष कौन है? २९ वेदका वागांमृणी सूक, इंद्र १५ हेमवती उमा, सूक्त, चैकुंठ सूक्त, अथर्व सूक १६ पार्वती कौन है? ३० शाक्तमत, देव और देवता २७ पर्वत, पार्वती, रुद्र, सप्त अपि और अरंधती, ३१ वैदिक ज्ञान की श्रेष्ठता। इतने विषय इस पुस्तक में आगये हैं, इस लिये उपनिषदों का विचार करने वालों के लिये यह पुस्तक अवश्य पढ़ने योग्य है। मूल्य ३५) रु. डाकव्यय) है। मंत्री-स्वाध्याय मंडल, आँध. (जि. साताग) " की एकता,

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अंक २०
संस्कृत पाठ माला।
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(संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय)
भाग वीसवाँ।
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लेखक और प्रकाशक,
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
स्वाध्याय मंडल, औंध (जि. सातारा)
प्रथम वार.
संवत् १९८४, शक १८४९, सन१९२७
मूल्य पांच आने
वातीसम्मान

म्वरचिन्ह ।
नियम इस पुस्तक
-
वेदमें अक्षरों के नीचे और ऊपर स्वरचिन्ह दिये जाते है उन
को स्वर कहते हैं। इन स्वरोके
कुछ
में दिये
हैं। यदि पाठक इन नियमोंको ध्यानसे पढ़ेंगे तो उनको स्वर किस
नियमसे दिये जाते हैं और स्वर कैसे पदलते हैं इस यातका पता
लग जायगा | स्वर का प्रकरण पडा लया चौडा है, परंतु इस
मागको संक्षेप से यहां दिया है। इसलिये इसके मनन से पाठक
स्थरके विषयकी आवश्यक बात समझ सकते हैं।
औंध (जि. सातारा)
लेखक
श्रापाद दामोदर सातवळेकर
स्याध्याय मंडल
२०।११।२७
महक तथा प्रशाशक- श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
मारत मुद्रणालय, आँध (जि. सातारा)

संस्कृत-पाठ-माला।
भाग वीसवाँ ।
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पाठ १
इस पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिये-
नमस्ते हरसे शोचिपे नमस्ते अस्त्वचिंचे।
अन्यास्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य शिवो मय ॥
यजु.३६१२०
हे ईश्वर ! (हरसे) दुष्टताका हरण करनेवाले, (शोचिषे)
पवित्रता यढानेवाले और ( अचिपे) तेज फैलानेवाले (ते नमः,
ते नमः ) तेरे लिये हमारा नमस्कार (अस्तु ) है । (ते हेतयः)
तेरे शस्त्र (अस्मत् अन्यान् ) हमको छोडकर अन्य अर्थात् धर्म
फे शत्रुओंको (तपन्तु) ताप देते रहें। (पावकः) पवित्रता
करने वाला तूश्वर (अस्मभ्यं ) हम सयके लिये (शिवो भव)
कल्याण कारीवाये
परमेश्वर दुपता दूर करने याला, पवित्रता पढाने वाला और .
प्रकाश को फैलाने वाला है, इसलिये उसको ही नमन करना हम

(.)
सयको उचित है । हरएक मनुष्य उसीकी पूजा करे । हम सबका
आचरण ऐसा धर्म नियमों से युक्त होवे कि जिससे हमपर ईश्वर
का शासक दण्डन गिरे, यह दण्ड उनपर गिरे कि जोअधर्मावरण
करते हो। पवित्रता बढाने वाले ईश्वर की दया हम सब पर
घरसती रहे।
(२)
नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते म्तनयित्नवे।।
नमस्ते भगवन्नस्तु यतः स्वः समोहसे ॥
यजु.३६॥२१
हे ईश्वर ! (विद्युते ते नमः अस्तु) विशेष तेजःस्वरूप तेरे
लिये हमारा नमस्कार हो । (स्तनयित्नवे ते नमः) महान शब्द
करने वाले नेरे लिये मेरा नमस्कार हो । हे ( भगवन् ) ऐश्वर्य
संपश ईश्वर !(यतः) जिस स्थानसे तू (स्थः) अपने निजानंद
में (संहसे ) सम्यक् चेष्टा करता है, वहां (ते नमः अस्तु)
तेरे लिये मेरा नमस्कार हो।
श्वर परम तेजस्वी है, महान ऐश्वर्य संपन्न है और शब्दका
प्रवर्तक भी है तथा वह अखंड आनंदमय है। इसलिये उसको
नमस्कार करना चाहिये । उसी की पूजा करनी चाहिए। और
उसी की भक्ति करनी चाहिये।
(३)
यनो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु ।
शं नः कुरु प्रजाभ्योग्मयं नः पशुभ्यः॥
यजु.३६०२२
है ईश्वर ! (यतः यतः) जिस जिस स्थानसे तू (संहसे )
प्रेरणा करता है (ततः) उस उस स्थानसे (नः अभयं कुरु)
हम सबका अभय कर । (नः प्रजाभ्यः) हमारी सय प्रजाओ के
लिये ( शं अभयं) कल्याणकारक अभय (कुरु) कर और
(नः पशुभ्यः ) हम सबके पशुओं के लिये भी अभय दान कर
।

ईश्वर हम सबको अभय देवे, हमारी प्रजाओं और हमारे
पशुओंको भयरहित करे अर्थात् हम सबका पूर्ण कल्याण करे।
वह तो सब प्रकार से कल्याण करता ही है। परंतु यहां यह
प्रार्थना है। इस प्रकार की प्रार्थना मनुष्य करें और उसकी
निर्भयतामें सदा रहै।
(४)
नमः सायं नमः प्रातर्नमो राज्या नमो दिया।
भवाय च शर्वाय चौभाग्यामकरं नमः॥
अथर्ववेद ११।२।१६
(भवाय) सबके उत्पादक ईश्वर के लिये और (शर्वाय)
सबका दुःख निवारण करने वाले ईश्वर के लिये सायंकाल,
प्रातःकाल, रात्रीके समय और दिनके समय (नमः अकर)
नमस्कार करते हैं।
दिनमें प्रातःकाल, दोपहरके समय, सायंकाल और रात्रीमें
सोते समय ईश्वर की स्तुति प्रार्थना उपासना भक्तिसे और प्रेम
से करनी चाहिए।
। स्वराज्य
ता अस्य नमसा सहः सपर्यन्ति प्रचेतसः।
व्रतान्यस्य सश्चिरे पुरूणि पूर्वचित्तये वस्वीरन स्वराज्यम्॥
ऋग्वेद १।८४ । १२
अनु
वस्वीः) स्वराज्य प्राप्तिके अनुकूल व्यवहार
करने वाले (ताप्रचेतसः) वह ज्ञानी जन (अस्य सहः) इस
ईश्वरकी शक्तिका ( नमसा सपर्यन्ति ) नमस्कारोंसे पूजन करते
हैं । तथा (अस्य पुरूणि व्रता) इसके विविध नियमों का (स.
श्चिरे) पालन करते हैं इसलिये कि उससे (पूर्व चित्तये) अपूर्व
लाभ प्राप्त हो।

अपना अभ्युदय चाहने वाले सब लोक परमेश्वर की शक्तियों
का, उसके महान काँका और उसके अनंत यश का चिंतन
फरें और अपनी भक्तिसे उस की पूजा करें । ऐसा करने से ही
उनको अपूर्व लाम प्राप्त हो सकता है।
यदिन्द्र ब्रह्मणस्पतेपि मृषा चरामसि ।
प्रचेता न आंगिरसा दुरितारपावंहसः॥
अथर्ववेद. ६।४५।२
हे ( इन्द्र ) प्रभो ! हे ( ब्रह्मणस्पते)शानके स्वामिन् ! (यत्)
यदि (अपि पा चरामसि ) असत्य आचरण हमसे हुआ हो,
(दुरितात् अंहसः)तो उन सब पापोंसे (आंगिरसः प्रचेताः)
विशेष शानी विद्वान् (नः पातु ) हमको बचाये।
इस जगत् का एक ही प्रभु है वह सर्वक्ष है, वही सपसे श्रेष्ठ
और सर्वोपरि है । कोई भी मनुष्य उस से छिपकर कोई पाप कर
नहीं सकता। इस लिये सयको उचित है कि वे उस ईश्वर की
मकि करें और श्रद्धासे उसकी प्रार्थना करें कि यह हम सयको
ऐसी प्रेरणा करें कि हमसे कमी युरा आचरण न हो और हम
सय सदा पापसे पचते रहें।
सूचना ।
पाटक इस प्रकार मंचोंके शब्दोका अर्थ करें और शम्दार्य के
अनुसार मनन करके मंत्रका भावार्य दे ।छोटेसे मंत्र का मी
मानार्य पहा गंभीर हो सकता है, क्यों कि मायार्थ में एक एक
सप्तके आशय का सीकरणके साथ तात्पर्य लेना होता है।
इस टंगसे अभ्यास करनेसे पाठकों को यदा लाम होगा।
43790ELE+
।

(७)
पाठ २
वैदिक स्वर ।
उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च स्वरास्त्रयः।
इस्वो दीर्घ प्लुत इति कालतो नियमा अचि ॥
शिक्षा. १९
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित ये तीन स्वर हैं और उच्चारण
के लघुदीर्घ भेद मे हस्व, दीर्घ, प्लुत
ये भी तीन भेद होते
इनमें उदात्त अनुदात्त और स्वरितये स्वरके भेद ऊपर नीचे के
आघात के कारण बनते हैं और न्यून अधिक काल लगने के
कारण हस्व दीर्घ प्लुत होते हैं ।
हस्व स्वर-अ, उ, ऋ,ल।
दीर्घ स्वर--आई,ऊ, ऋ, , ए, ऐ, ओ, औ।
हस्व स्वरका काल एक, दीर्घस्वर का काल दो और प्लुत
स्वरका काल तीन मात्रा होता है। अर्थात् -हस्व स्वर ही दो गुणा
लंधा करनेसे दीर्घ और दीर्घ स्वर और अधिक बढाने से प्लुत
बनता है। देखिये-
हस्व-हे राम-1
दीर्घ - हे रामा:-5-1
प्लुत - हे रामा 5-5-5-1
एक ही अकार दो गुणा और तीन
गुणा
लंया करने से दीर्घ
और प्लुत क्रमश. होता है । इसी प्रकार अन्य स्वरोके विषयम
समझना योग्य है।
-

इन वैदिक स्वरोका उच्चारण भिन्न भिन्न रीतिसे होता है। अर्थात् उदात्त अनुदात्त और स्वरित स्वरोका उच्चार मिन्न भिन्न रीतिसे होता है। और यदिइन स्वरों के उच्चारण में अशुद्धि हुई तो अर्थका अनर्थ भी होता है । इस लिये वेदोच्चार करने के लिये इन स्वरोंके ठीक ज्ञान होनेकी अत्यंत आवश्यकता है। आग्निीळे पुरोहितं यज्ञस्य॑ देवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ऋ. १ । १ ।१ यह मंत्र देखिये । इसमें कई अक्षरो के नीचे रेपा है, कईयो के सिर पर रेपा है और कई अक्षर इस प्रकार की रेपाओसे रहित हैं। ये स्वर चिन्ह ऐसे क्यों आते हैं और इसका इन अक्षरोसे क्या संबंध है यह अय देखना है। यदि पाठक इस विषयक लेख आगे के पाठों में विशेष ख्याल से पढ़ेंगे तो उनको इस विषयका आरश्य ज्ञान हो जायगा । इस लिये पाठकोंमे निवेदन है कि वे इस स्सस्योधक पाठोंका अध्ययन विशेष मनन से करें और लाभ उठायें। पाठ ३ इस पाठ में निम्न लिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिप- पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धर्तेरराव्णः । पाहि रीपत उत या जिघांसतो वृहदानी विष्ठय । ऋग्वेद १ '३६ । १५ हे (पृहत्-मानी) विशेप तेजस्यी ! है (यविष्ठय) पलयान् ( अग्न ) प्रकाश देय या !(न ) म सयको (रक्षसः) (११) राक्षसोंसे (पाहि ) बचाओ । (धूर्तेः अ-राणः) धूर्त स्वार्थियों से (पाहि) यचाओ। (जिघांसतः) हनन करनेवाले शत्रुसे (उत या) तथा (रीपतः ) विनाश करनेवाले शत्रुसे (पाहि) हम सथको पवाओ। हे ईश्वर ! त हम सयका पचाय क्रूर, राक्षस, दुष्ट, धूर्त, स्यार्थी आदिसे कर । तूही सबमें समर्थ, सयको तेज देनेवाला सयका प्रेरक देव है। इसलिये हम सबको अपने यचाय करने के लिये समर्थ बनाओ और हमें तेजस्वी तथा यशस्वी कर । विजानीहार्यान्ये च दस्यवो धर्हिप्मते रन्धया शासदवतान् । शाकी भव यजमानस्य चोदिता विश्वेत्ता ते सधमादेपु चाकन ॥ ऋग्वेद.११५१।८ हे ईश्वर ! (आर्यान् विजानीहि) अोंको अर्थात् सत्य धर्मीयों को जान लो और (येच दस्यवः ) जो चोर हैं और घातक तथा हिंसक हैं उनको भी जान लो । (बर्हिष्मते ) सत्कर्म करने वाले के लिये (अ-व्रतान् ) नियम तोडनेवालों को (शासत्गंधय) शासन करते हुए दण्ड दो । तू (शाकी भव) समर्थ है। तथा तु ( यजमानस्य चोदिता) कर्मण्य पुरुष को प्रेरणा करने घाला है (ते) ये (ता विश्वा) वे सय कर्म मैं (सधमादेषु ) आनंद प्राप्तिके पुरुषार्थ ( चाकन) चाहता हूं। हे ईश्वर ! हम सबमें जो सच्चे धर्मात्मा हैं और जो दुराचारी अधार्मिक हैं तथा नियमविरद्ध आचरण करने वाले है उन सबको देख लो! जो सज्जन हैं उनकी रक्षा कर और जो दुर्जन हो उनको दण्ड दो। त् ही यह सब कर्म करने के लिये समर्थ है ।तू ही सब को पुरुषार्थ करने की प्रेरणादेता है और तुम्हारे ही कर्म हम सबको आनंद बढाने के कार्य में सहायकारी होते हैं, इसलिये हम सब यह प्रार्थना कर रहे हैं। ऐसे मंत्र मनुप्योंको भी धर्म के नियम बताते हैं इस लिये इन से जो बोध लेना उचित है वह यहां बताया जाता है- (१) मनुष्य प्रथम सज्जन कोन है और दुर्जन कौन हैं इस का विचार करे, (२) उनमें पुरुषार्थी कौन हैं और नियम तोड़ने घाले कौन है यह देखे, (३) पश्चात् सज्जनों की रक्षा करे और दुर्जनों को दण्ड देवे, (४) अपना सामर्थ्य यढाये,(५) सत्की पुरुषार्थीयोकी सहायता करे, (६) इस प्रकार व्यवहार करके जगत में उन्नतिको प्राप्त हो। इन आशयोको प्रकट करने वाले इस मंत्र के ये शब्द हैं- (१) आर्यान विजानीहि ये च दस्यवः, (२-३) यहिप्मते भासत, अवतान् रन्धय, (४ शाकी भव, (५) यजमानस्य नोदिता, (६) ते ता विश्वा सधमादेप चाकन । पाठक इस रीतिसे मंत्रोद्वारा अपने आचरण के लिये घोष प्राप्त करें । घेद के मंत्रोंसे मनुष्योकं व्यवहार में बोध इस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है। घधैर्दुःशंसा अप दूढयो जहिदूर या ये अन्ति वा केचिदत्रिणः । अधा यमाय गणने सगं ध्यग्ने सस्ये मा रिपामा घयं तव । ऋग्वेद.१।२४।९ हे (अग्ने ) प्रकाश नेवाले प्रभो ! ( वधैः) वध साधन- भून शास्त्रोंसे (दुःशंसान ) दुष्ट (ढय ) दुर्घ दिवालों का (अपजहि) मार । जो (दरे या ये अन्ति वा) दूर है अयया जो पास दो नथा (ये के च) जो कोई (अत्रिणः)सर्वमक्षक स्वार्थी हैं। उन सब को दण्ड दे । (अधा) पश्चात् (यमाय गणते) यन परनगाले तोताको (सग धि) सुगम मार्ग कर। हे प्रभो ! नरो (मष्णे) मित्रता (वयं मा रियाम) हम नष्ट नहीं होंगे। ।

(१३) हे ईश्वर ! दुष्ट दुर्जनों को, जो पास हो या दूर हो, एकदम हम से दूर कर दे । स्वार्थी खुदगर्ज केवल अपने पेट भरने वाले ही जो हैं उनको भी योग्य दण्ड दे । तथा जो यक्ष कर्ता है उसकी उन्नति का मार्ग सुगम कर । हे प्रभो ! हम तुम्हारी मित्रतामें रहेंगे तो कभी नष्ट नहीं होंगे। इस मंत्र व्यवहार का बोध इस प्रकार लिया जाता है-(१)दुष्ट को अपराध के योग्य दण्ड देना चाहिये, (२) म्यार्थी स्वयंभोगी लोगों को भी योग्य मार्गपर लाना चाहिये, (३) सत्कर्मी पुरुषार्थी जो हो उनकी उन्नति का मार्ग मुगम करना चाहिये, (४) जो मनुष्य ईश्वर की भक्ति करते हो उनका कभी नाश नहीं होगा। यहां पाठक देख लें कि किस वेदवाक्य का कौनसा अर्थ होता है और उससे भावार्थ तथा बोध कैसा प्राप्त किया जाता है। (४) इन्द्रातिभिर्महुलाभिर्नो अद्य याच्छ्ष्टाभिर्मयवर जिन्य । यो नो द्वेश्यधरः मस्पदीष्ट यमु द्विप्मस्तमु प्राणो जहातु ।। ऋग्वेद.३१५३ । २१ हे (इन्द्र ) प्रभो ! ( अद्य ) आजही (बहुलाभिः ऊतिभिः) अनेक क्षणों के साथ (नः) हमारा रक्षण कर । है (मघवन् ) धनवान् ! हे शूर [ हम सबको ( श्रेष्टाभिः) श्रेष्टताओंके साथ (यात् ) आगे (जिन्व ) बढाओ। (यः नः द्वष्टि ) जो हम सब का द्वेष करता है उसको (अधरः सस्पदीए) नीचे दबाओ। हम सब (यं उद्विष्मः) जिसका द्वेष करते हैं (तं उ) उसको (प्राणः जहानु)प्राण छोड देवे ॥ हे ईश्वर हमारी रक्षा कर।हे ऐश्वर्यमय प्रभो !हम सबको श्रेष्ठ गुणों के साथ आगे चढाओ। जो अकेला हम सबका निष्कारण द्वेष करता है इस कारण जिसका हम सब द्वेष करते हैं वह हमसे दूर हो।

(१४) सूचना । पाठक यहा प्रथम मंगोंके पद अलग अलग करना सीखें। तत्पश्चात् उन पदोंका अन्यय करें। अन्वयके पश्चात स्थर्य अर्थ करने का यत्न करें। और यदि अर्थ नहीं हुआ तो फिर यहा दिया हुआ अर्थ पढकर ठीक अर्थ लगा। इस प्रकार प्रयत्न के साथ अध्ययन करेंगे तो वे बहुत उन्नति प्राप्त कर सकते हैं। (५) तवाहमग्न ऊतिमिर्मित्रस्य च प्रशस्तिभि । द्वेपोयुनो न दुरिता तुर्याम मानाम् ॥ ऋग्वेद.५।९।६ पद- तव । अह । अग्ने । ऊतिमि मित्रस्य । च । प्रशस्तिमि उप +युत ।न। दुरिता । तुर्याम । मानाम् । अन्वय- हे अग्ने ! मिरस्य तव प्रशस्तिभि ऊतिभि द्वेष भ्युत. न माना दुरिता तुर्याम । अर्थ-हे ( अग्ने) प्रकाश देनेवाले ईश्वर ! (मिनस्य तव)तू जो मिन उसकी (प्रशस्तिमि ऊतिमि ) प्रशसनीय रक्षणों से सुरक्षित होकर (द्वप +युत न ) द्वेष युक्त लोगोंके समान अहित करनेवाल (मत्यांना) मनुष्योंके (दुरिता तुर्याम) दुष्ट कमोसे दूर होकर सुरक्षित होग। भावार्थ-ईश्वर ! त् हमारा मित्र है और हमारा उत्तम सर-- क्षण करता है । तेरे अद्भुत संरक्षणसे युक्त होते हुए हम दुष्ट- मनुष्यों के स्तों से अपने आपको यचायेंगे, क्योंकि जो मनुष्य तेरी रक्षा ओगया है उसको डरानेघाला इस जगत् में कौन हो सकता है? "अग्नि "शन आग का वाचक है, परतु अग्निको भी जिसने पनाया उमका मा नाम येमें" अग्नि "ही होता है।

"न " शब्द निषेध, नकार अर्थमें आता है, परंतु येदमें "" (समान) अर्थमें आता है। पाठक इसप्रकार मंत्रों के अर्थ लिखनेका यत्न करें मंत्रोको कंठभी करने जांय । ऐसा करने से उनको यडा लाभ हो सकता है। पाठ४ वैदिक स्वर। वेदमंत्रों के अक्षरों के ऊपर और नीचे जो रेपाएं होती है उनको म्बर कहते हैं और उनके भेद उदात्त, अनुदात्त और स्वरित है इस विषयमें इससे पूर्व पताया जा चुका है। इन रेषाओं के अनु- सार ऊपर अथवा नीचे आघात करके मंचाक्षरोंका उच्चारण किया जाता है अथवा वैसा करना चाहिये, अन्यथा कभी कभी अर्थमें भी विपरीत परिणाम होता है। उदात्त पर के लिये कोई चिन्ह लिखा नहीं होता है अर्थात् साधारणतया स्वरचिन्ह रहित अक्षर उदात्त समझना योग्य है। अनुदात्त स्वरका चिन्ह अक्षर के नीचे रेपा (6) पेमी दी जाती है और स्वरित चिन्हकी रेषा अक्षरके सिरपर ऊपर खड़ी (1)ऐसी रहती है । प्रायः प्रत्येक शब्दमें एक स्वरको छोड कर शेष सब स्वर अनुदात्त होते हैं- अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ॥ अष्टाध्यायो.६।१।१५८ पदमे एक स्वरको छोडकर शेष स्वर अनुदात्त होते हैं।" उदात्त का उच्च उच्चारण, अनुदात्तका नीच भागमें दया हुआ उच्चारण और दोनों का संयुक्त उच्चारण स्थरित स्वर- का होता है-

(१६)
उच्चैरुदात्त । नीचैरनुदात्त ।
समाहार स्वरित ॥ अष्टाध्यायी १।२।२९-३१
उदात्तका उच्चारण उच्च, अनुदात्त का नीच और स्वरित का
उच्चारण मिश्रित होता है ।
यद्यपि ऐसा कहा है तथापि इससे सब बातोका स्पष्टीकरण
नहीं होता है । इस लिये इसका अधिक सुबोध विवरण करना
चाहिये । पाठकम्मरण रखें कि वेदमत्रोंका उच्चार करते समय
इन स्वरचिन्होंकी ओर ध्यान देना अग्यत आवश्यक है, अशद्ध
स्वरोच्चार से मरका भार यदल जाता है, इस विषय में व्याकरण
शिक्षा का वचन देखने याग्य है-
मत्री हीन स्वरतो वर्णता वा
मिथ्या प्रयक्तो न तमर्थमाह । शिक्षा ४९
स्सर और वण बरे उच्चार के कारण मत्र अपने याग्य
अर्थ को प्रकट नहीं कर सकता।" तथा-
व्याघ्री यथा हरत्पुत्रान्दयाभ्या न च पीडयेत।
तद्वद्वर्णा प्रयोक्तव्या ॥ शिक्षा।
'शरणी जैमी अपने सच्चोंको अपने जयड में पकडकर ले
जाती है, परतु बच्चोंका दात नहीं लगाती, उसी प्रकार समाल कर
अक्षरोंका उच्चारण करना चाहिय ।'
इत्यादि सब कथन इस लिय कहा गया है कि अक्षरोंका उच्चा
रण योग्य रीतिसे किया जाये । इसीलिये ऐसा कहा है कि याग्य
गरुके पास से वेद मीसना चाहिये । स्वरका गलत उन्चार करने
न्दिरा पद का बिल्कुल उल्टा अर्थ होता है, यह उदा
हरण मी शिक्षामय में इसीलिय दिया है । इत्यादि वर्णन से पाठक
जान गय होंगे विदिक मापा म्यगेंका महत्व क्तिना है।
"

(१७)
उदात्त अनुदात्त और स्वरित ये स्वर अथवा इनके स्वर चिन्ह
केवल स्वरोंके साथ ही संबंध रखते हैं, इनका व्यंजनोंके साथ
कोई संबंध नहीं है यह बात पाठकोंको विदित ही है।
प्रत्येक शब्दमें एकसे अधिक उदात्त स्वर नहीं होता है यह सर्व
साधारण नियम इससे पूर्व यताया ही है। सामासिक शब्दों में
कई स्थानोपर एकसे अधिक उदात्त स्वर रहते हैं। येह सब
बातें ध्यानमें लेनेसे शब्दोंके नऊ भेद होते हैं यह पाठकों के
ध्यानमें आ जायगा। ये भैद यहां दिये हैं-
१ अंतोदात्त- जिसमें अंतभागमें उदात्त स्वर होता है । जैसा-
" अग्निः'
२ आद्यदात्त- जिसमें प्रथम स्वर उदात्त होता है। जैसा-
"सोमः।'
३ उदात्त- केवल उदात्त स्वर युक्त शब्द । जैसा ""
४ अनुदात्त- अनुदात्त म्वर युक्त शब्द । जैसा- "
५ नीच स्वरित-निम्न स्वरसे उच्चारा जानेवाला स्वरित स्वर
वाला शब्द । जैसा- “वीय,
६ मध्योदात्त- मध्य स्वर जिसमें उदात्त होता है। जैसा-
“
हुवि"
७ स्वरित- उदात्त और अनुदात्त इन दोनों स्वरोके धर्मों का
संयोग जिसमें होता है, ऐसे स्वरयुक्त शब्द 1 .
जैसा-""
८ द्वथुदात्त- जिसमें दो उदात्त स्वर होते हैं । जैसा-"बृहस्पति:"
९ त्र्युदात- जिसमें तीन उदारा स्वर होते हैं। जैमा-
"इन्द्राबृहस्पती
।
.

(२०) पाठ ५ इस पाठमें निम्न लिखित मंत्रों का अध्ययन कीजिये- । विशां कविं विश्पति शश्वतीनां नितोशनं वृषभं चर्षणीनाम् । प्रेतीपणिमिपयन्तं पावकं राजन्तमग्नि यजतं रयीणाम् ।। ऋग्वेद.६।१।८ पद-विशां । कवि । विश्पति । शश्वतीनां । निस्तोशनं । वृपमं । चर्पणीनां । प्रेति इपणि । इपयन्तं । पावकं राजन्त । अग्नि । यजतं । रयीणाम्। अन्वय-शश्वतीनां विशां कविं विश्पति नितीशनं चर्षणीनां वृपमं प्रेतीपणी इपयन्तं पावकं रयीणां यजतं राजन्तं अग्नि स्तुमः)। अर्थ-(शश्वतीनां विशां कवि) शाश्वत प्रजाओं का कवि अर्थात् वाणीका प्रेग्क, (विश्-पति ) प्रजापालक, (निम्तोशनं) शत्रु- नाशक (चर्षणीनां वृषभ) मनुष्योंके बलोका वर्धक, (प्रेतीपी) प्रेरक (इपयन्तं) अनादिको सिद्धता करने वाला (पावकं) पवित्रता करनेवाला (रयीणां यजतं) धनोंका दाता (राजन्तं अग्नि)प्रकाशमय तेज के देवकी हम प्रशंसा करते हैं। भावार्य- अग्निको भी उष्णता देने वाला ईश्वर है, वह सब प्रजाओं को पारशक्ति देता है, वही सब का पालनकर्ता है, वही दुटोंकों दूर करता है, वही मनुष्योंके बलौकी वृद्धि करता है, सय को उन्नति के मार्ग पर चलाता और सयको अम आदि देता है। यही सबको पवित्रता करता है और सयकी शोभा बढाता है।यही एक देव हम सयको नमस्कार करने योग्य है।

(२) नाना १ नेवसे स्पर्धन्ते रायो अर्य । तूर्यन्तोदस्युमायवो प्रतै सीक्षन्तो अग्रतम् ॥ ऋग्वेद६।१४।३ पद-नाना । हि । अग्ने । अरसे । स्पर्धन्ते । राय । अर्थ । तन्त । दस्यु । आयव ॥ वतै ।सीक्षन्त । अव्रतम् । अन्यय-अग्ने ! अर्य नाना राय अवसे स्पर्धन्ते । आयव दस्यु तुर्पन्त प्रतै अग्रत सीक्षात । अर्थ-ह (अग्ने ) तेजस्विता के देघ ! (अर्थ) शत्रुके (नाना राय ) नाना प्रकारके धन (अवसे स्पर्धन्ते) अपनी रक्षा लिये यडा स्पर्धा कर रह हैं । (आयव ) मनुष्य (दस्यु) शत्रुको (तुर्यन्त )नट करते हुए अपने (पते ) वताचरणोंस (अ-वत) धर्म नियमोंका पालन न करने वाले मनुष्यका (सीक्षन्त ) परा भूत करते हुए मागे पढते हैं। भावार्थ-हे ईश्वर ! शत्रुके नाना प्रकारकं धन अपने बचाव के लिये प्रयत्न कर रहे हैं, परतु उनका प्रयत्न अय निष्फल है। क्यों कि हमारे मनुष्य शत्रुका पराभव करत हुए अपने शुद्धधर्माचरणों से अधर्मिकों को हटाते हैं । अर्थात हमारे नियम पालन करने वाले लोगोंके सामने शत्रु ठहर नहीं सकते। हे ईश्वर ! यह तुम्हारी हमपर बडा कृपा है। (३) सुधीररयिमाभर जातवेदो विचर्षणे । जदिरक्षासि सुतो। मुग्वेद ६१६ ॥२९ पद- सुवोर । रयिं । आ भर । जातवेद । वि चर्पणे । जहि । रक्षासि । सुक्रता अन्वय-हे जातवेद विचर्षणे ! सु-वीर रयिं आभर । हसु- मतो! रक्षासि जहि।

(२२) अर्थ-हे (जात-वेदः) सयके शाता ! हे (विचर्पणे ) सर्व साक्षी ईश्वर ! (सुधीरं रयि) उत्तम वीरों से युक्त धन को हम (आ भर) दो और हे (सु तो) उत्तम कर्म करने वाले ! (रक्षांसि जहि ) दुष्टोका नाश कर । भावार्थ-हे शानी सर्वसाक्षी ईश्वर ! हमें ऐसा धन दो कि जिसके साथ उत्तम पीर रहें। तथा हे उत्तम कर्म करने वाले ईश्वर ! कर कर्म करने वाले दुष्पोको दूर कर ॥ इस मंत्रम " सुधीरं रयि आभर " ये शब्द प्रयोग महत्त्व रखते हैं । धन ऐसा चाहिये कि जिसके साथ वीरता भी वसती हो । अर्थात् वीरता के साथ जो धन रहता है वही सुरक्षित रहता है । जिस धनके साथ वीरता नहीं रहती यह सुरक्षित नहीं रहता। यह मंत्र घोध देता है कि अपने धनकी सुरक्षितता के लिये प्रत्येक मनुष्य अपने में वीरता यढाये। अशक्त मनुष्योका धन कोई भी छीन सकता है। इन्द्रः सुत्रामा म्बवा अयोभिः सुमृळोको भवतु विश्ववेदाः। याधता द्वेपो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम ॥ ऋग्वेद.६४७ । १२ पद-इन्द्रः । सुत्रामा । स्व-यान् । अयोभिः। मळीकः भवतु विश्व-वेदाः। बाधतां । द्वेपः। भयं । कृणोत् । स धीर्यस्य । पतयः। स्याम। - है अन्यय-सुत्रामा स्ववान् सुमृळीकः विश्ववेदाः इन्द्रः अघोभिः भयतु । द्वेषः पाधतां । अभयं कृणोतु । सुवीर्यस्य पतयः स्यामा अर्थ- (स- प्रामा) उत्तम रक्षक, (स्य-वान् ) आत्मिक शाकिसे युक्त, (सुमृळीकः ) उत्तम सुसदेनेवाला । (विश्य-घेदाः) सर्य, (इन्द्रः) प्रभु अपनी (अयोमिः) संरक्षक शक्तियों के साथ (२३) हमारा सहायक (भवतु ) होये । यह (द्वेषः याधतां) द्वेप करने वालों को करे। (अमयं कृणोतु) हमें निर्भय करे। हम (सुवीर्यस्य पतयः स्याम ) उत्तम शौर्य के स्वामी पर्ने । भावार्थ- परमेश्वर हमारा उत्तम रक्षण करनेवाला है, उसमें विलक्षण आत्मिक शक्ति है, यही सयको सख देनेवाला है और सर्वज्ञ भी वही है। वह अपनी रक्षक शक्तियों से हमारी रक्षा करे, द्वेष भाव दूर करे, हमें निर्भय करे। हम उसकी कृपासे शौर्य धैर्य वीर्यादि गुणों के स्वामी बनें। - तस्य वयं सुमतौ यक्षियस्यापि भद्रं सौमनसे स्याम । स सुत्रामा स्ववा इन्द्रो अस्मे आराच्चिदद्वेषः सन्तयुयोतु ।। ऋग्वेद.६।४७ । १३ पद-तस्य । वयं । सुमतौ । यशियस्य । अपि । भद्रे । सौम- नसे । स्याम । सः । सु-त्रामा । स्व चान् । इन्द्रः। अस्मे। आरात् । चित् । द्वेषः । सनुतः । युयोतु ॥ अन्यय-तस्य यज्ञियस्य सुमतौ भद्रे सौमनसे च वयं स्याम । सः सुत्रामा स्वधान् इन्द्रः अस्मे आरात् चित् दे॒पः सनुतः युयोतु ॥ अर्थ- (तस्य यशियस्य) उस पूजनीय परमेश्वर की ( सुमतौ भद्रे सौमनसे च) सुमति और उत्तम मन के अंदर (वयं स्याम) रहेंगे। अर्थात् हम ऐसा आचरण करेंगे कि हमारे विषय में उसका मन सदा प्रसन्न रहेगा । (सः) वह ( सु-त्रामा) उत्तम रक्षक और ( स्ववान् ) आत्म शक्तिसे युक्त (इन्द्रः) प्रभु है वह ( अस्मे आरात् चित् ) हमारे पाससे और दुग्से भी (द्वषः) द्वेष करनेवाले शत्रुओंको ( सनुतः) अंदर ही अंदरसे (युयोतु) नष्ट करे॥

भावार्थ- परमेश्वर परम पूज्य है। हम ऐसा आचरण करेंगे कि उसका मन हमारे विषयमें सदा प्रसन्न रहेगा और उसकी दया इमपर बरसती रहेगी। वह प्रभु ही हमारा आम रक्षक, अप्रतिम आत्मिक पलसे युक्त और सबसे थेष्ट है। इस लिये हम उत की प्रार्थना करते है कि यह हमारे सब शत्रुओको दूर भगा देये। सूचना। पाठक इस प्रकार पद अन्वय पदार्थ और भावार्थ स्वयं करने का यत्न करें । यदि यत्ल करने पर न यना तए उतनी ही सहायता यहा के पद पदार्थोसे लें। यदि पाठक इस प्रकार स्वावलंबन करते जायगे तो उनकी वेदमंत्रों का अर्थ बनानेमें बडी उन्नति होगी। 3 पाठ वैदिक स्वर। भगवान पाणिनिमुनिने अपने धातुपाठमें करीब दो हजार धातु दिये हैं और ये धात दस गोंमें विभक्त किये हैं। इन धातुओंमें कौनसा धातु उदात्त और कौनसा अनुदात्त है यह सब उन्होंने दे रखा है। इसी प्रकार शब्द सिद्धिके प्रत्यय मी उदात्त अनुदात्त या स्वरित, जैसे है वसे बताये हैं। धातु और प्रत्यय से शब्द यनता है। इसलिये धातु का स्वर और प्रत्ययका स्वर यदि विदित हुआ तो शब्द का स्वरसमझमें आने में कोई रुकावट नहीं हो सकती। यहुनपे स्वर इस रोतिसे स्वयं निश्चित हो जाते हैं। देखिये-

(२५)
.
प्रत्यय
अग् + नि = अग्नि
यह +नि-बहि
ये शब्द सिद्ध हुए। इनमें “ अग् और यह " ये दोनों धातु
उदात्त हैं तया "नि भी
उदात्त ही है । अर्थात् यहां धातु
और प्रत्यय भी उदात्त ही हैं। इसलिये यह शब्द केवल उदात्त
ही होना चाहिये था, परंतु यहां और एक नियम ऐसा है कि
- शब्द- का अंत्य स्वर उदात्त रहता है, इस नियम
के अनुसार इन शब्दोंका अंतिम स्थर उदान रहा और "अग्नि
बहि." ये शब्द स्वरसहित इस प्रकार पन गये। यद्यपि इन
रान्दोंके केवल पद स्थितिमें ये ऐसे स्वर होते हैं तथापि जिस
समय इनका उपयोग मंत्रों में होता है उस समय भी आगे पीछेके
शन्दोंके संबंध से इन स्वरोंमें परिवर्तन हुआ करता है। इसी
'कारण शब्द मंत्रमें रहने के समय उसका स्वर अन्य होता है
और मंत्रके पंद लिखने समय उसका स्वर अलग होता है।
यह सय यात स्पष्ट नीतिसे दर्शाने के लिये एक मंत्र यहां लेते हैं-
अग्निमीळे पुरोहित यज्ञस्य देवमृस्विजम् ।
होतारं रत्नधातमम् ॥
ऋग्वेद०१।११
यह मंत्र ऋग्वेद का प्रथम मंत्र है। अब इसके पद देखिये-
अग्निम् । ईळे । पुरः 5 हितम् । यज्ञस्य॑ । देवम् ।
ऋत्विजम् । होतारम् । रत्न धावमम् ।।
पाठक मंत्र के घर और पदों के स्वरोंमे जो फरक हुआ है.
वह यहां देखें। पद पाटके पदोंके स्वर मंत्रमें जानेपर बदलते
। इस विषयका विचार यह है-
.

"
१" अग्नि" शब्द पहिला है। इसका
अग" धातु उदात्त
"नि " प्रत्यय भी उदार है । परंतु उदात्त धातुके परे उदारा
प्रत्यय आनेसे शब्द " अन्त्योदात्त" पन गया । अर्थात् पहिला
स्वर अनुदात्त पना और अन्यस्वर उदात्त रहा और "अग्नि
यह रूपयन गया।
२ " ई क्रियापद है,क्रियापद प्रायः अनुदार ही होते हैं। इस
नियमको अपवाद भी हैं, उस का विचार पीछेसे किया जायगा ।
३ " पुरः हितम् ' इस पदमें पु अनुदारा है, र उदार है, हि
स्वरित है और त अनुदार है। यह अनुदात्त होते हुए
भी
त अक्षरके नीचे रेपा नहीं है, इसका कारण यह है कि यह त
स्वरित स्वर के पश्चात् आगया है और वीचमें और कुछ मी
नहीं है। इसका नियम यह है कि- स्वरित स्वर के पश्चात् यदि,
अनुदात्त स्वर आगया तो वह उदात्ततर किया सन्नतर कहलाता
है और उसके लिये कोई चिन्ह नहीं होता है। इसका नाम
एकति भी होता है।
४ "यक्षस्य " इस पदमें " य और स्य" ये
वस्तुतः अनुदान
हैं, परंतु अनुदानका चिन्ह य के नीचे है और स्पनीचे वैसा
चिन्ह नहीं है। उदात्त के पीछे अनुदात्त आगया तो यह स्वरित
होता है, इस नियम के अनुसार स्य स्वरित यन गया है।
५ “डेयम् " शब्दमें दे अनुदात्त है और उसका चिन्ह उसके
नीचे है। व उदात्त है, उदात्तके लिये कोई चिन्ह नहीं होता, यह
पाठक जानते ही हैं।
ऋत्विजम् " इसमै" यशस्य " के अनुसार ही समझना
चाहिये । अर्थात् ऋ अनुदात्त, ज भी अनुदात्त है, परंतु यह उदात्त
विकपीछे आनेसे स्वरित यन गया है।
६

त
होतारम् " इस पदमें हो उदाच है, ता अनुदात्त है, परंतु
वह उदात्तके पश्चात् आनेसे पूर्ववत् स्वरित यन गया है और
उसके पीछेका र अनुदात्त है, परंतु यह अनुदात्तके पीछे आनेले
इसको अन्दात्ततर कहा जाता है ।
८ " रत्न - धा - तमम् " यह शब्द
यह शब्द है, इसमें रत्न ये दो
अनुदात्त हैं। धा उदात्त है। इस उदात्तके पश्चात् अनुदात्त त
आगया है इसलिये उदात्त के पीछे आनेवाला अनुदात्त स्वरित
होता है, इस नियमके अनुसार यह त स्वरित हुआ है और
उसके पश्चात् का म अनुदाशतर हुआ, धास्तवमें यह अनुदारा
-
यहां तक पदों के स्वरोंके विषयमें विवरण हुआ। यह विवरण
पाठक वारंवार पढे और जब तक ठीक समझमें आ जाये तब
तक मननपूर्वक पढते जाय । ऐसा करने से ही यह विषय ठीक
समझमें आ सकता है। अप पुनः दृढीकरणार्थ स्वरोंके नियम
यहां देते है-
१ स्थरोच्चारणमें कालमर्यादाके न्यून और अधिक होनेसे
स्वरके " -हस्व, दीर्घ, प्लुत " ये तीन भेद होते हैं।
२ स्वर के आवास के भेद से उदात्त, अनुदान और स्वरित
ये भेद होते हैं, उदात्त का आघात मुखके उच्च भागमे, अनुदात्त
का नीच भागमें और स्वरित का दोनों भागों में होता है।
३ अनुदात्त स्वर का चिन्ह अक्षरके नीचे रेपासे बताया
जाता है। उदात के लिये कोई चिन्ह नहीं है और स्थरित
का चिन्ह अक्षर के सिरपर खडी रेपा से बताया जाता है।
४प्रायः शब्द में एक स्वरको छोड कर शेष सब स्वर अनुदात्त
होते हैं।

(२८) ५शब्द में यदि एक ही स्वर रहा तो वह प्रायः उदात्त होता - ६ वेदके शब्द यौगिक है अर्थात् घे धातु और प्रत्यय लगकर बने हैं। ७ धातुके स्वर धातुपाठमें पताये हैं और प्रत्ययके स्वर व्याक- रणमें पताये हैं। दोनों के मेलसे शब्दका स्वर बहुत करके निश्चित होता है। ८ प्रायः पद का अन्त्य स्थर उदात्त रहता है। ९ साथ साथ दो स्वरित चिन्ह ( अर्थात् सिरपर खडी रेषा के चिन्ह ) कभी नहीं आते । अनुदात्तके निन्ह साय साथ अधिक भी आते हैं। १० उदात्त के परे उदात्त आनेसे अन्त्य उदात्त रहता है और पीछे का अनुदात्त यनता है। ११ सय क्रियापद प्रायः अनुदात्त होते हैं । १२ स्वरित के परे अनुदात्त आगया तो उस अनुदात्त के लिये नीचे स्वर चिन्ह नहीं लगाया जाता। १३ उदात्त के पोछे अनुदात्त आगया तो वह स्वरित बन जाता है। इस समय तक इतने नियम दिये हैं। येह सय नियम विवरण के साथ और उदाहरणके साथ दिये हैं। इस लिये पाठक इनका मननपूर्वक अभ्यास करेंगे तो यह स्वर की यात उनके ध्यानमें आजायगी । आशा है कि पाठक इस का अध्ययन विशेष प्रयलके साय करेंगे।

पाठ ७
इस पाठमें निम्न लिखित मंत्रीका अध्ययन कीजिये-
1
पाहि नो अग्ने रक्षसो अजुष्टात्पाहि धूर्तरररुषो अघायोः ।
त्वा युजा पृतनायू रभि घ्याम् ॥
ऋग्वेद ७११।१३
पद-~~ पाहि । नः । अग्ने । रक्षसः। अ-जुष्टात् । पाहि । धूतः ।
अररुषः । अघ आयोः। त्वा । युजा। पृतना-यन् । अभि । स्याम् ॥
अन्वय-हे अग्ने ! अनुपात् रक्षस' नः पाहि । अररुषः धूर्तेः
अघायो न पाहि । त्या युजा पृतनायून् अभिप्याम् ।।
अर्थ- है ( अग्ने ) नेजस्वी ईश्वर ! ( अजुधात्) होन (रक्षस
राक्षसों से (नः पाडि ) हम सब की रक्षा कर॥ (अररुपा धूर्तेः)
अनुदार धूर्त (अघ-आयोः) पापीसे हमारा (पाहि) पचाव
कर । (त्या युजा) तेरे साथ रहते हुए हम (पृतनायून् ) सेना
लेकर चढाई करने वाले शत्रुका (अभिप्याम ) हम पराभव
भावार्थ-हे ईश्वर ! दुष्ट, दुर्जन, धूर्त, धोखेबाज, पापीइस प्रकार
के लोगोंसे हमारा पवाय कर । तरी कृपा हमपर रही तो हम
सय प्रकारके शत्रुओं का पराभव कर सकेंगे।
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अमयं कृधि । मधवञ्छन्धि तव
तन्न ऊतिभिर्वि द्विषो वि मृधो जहि ॥ ऋग्वेद.८१६११३
पद-यतः। न्द्रा भयामहे । ततः निः। अभयं । कृधि । मघ.
यन् । शग्धि । तत्र । तत् । नः। ऊतिभिः। वि। द्विषः । विमृधा।
अहि।

अन्वय-हे. इन्द्र! यतः भयामहे, ततः नः अभयं कृधि । हे मघवन् ! शन्धि ! तय ऊतिभिः नः द्विषः मृधः च वि वि अहि । अर्थ-हे (इन्द्र) प्रमो ! (यतः भयामहे ) जहांसे हमे भयो होता है ( ततः) वहांसे (नः) हमारे लिये ( अभयं कृधि) अभय फर। हे (मघवन् ) धनसंपन्न प्रभो ! तू शन्धि शाकि- मान हो, इसलिये (तय ऊतिभिः) तेरी रक्षाकी शक्तियों द्वारा (नः द्विपः) हमारे द्वेषकर्ताओ का तथा हमारे (मृधः) हिंसक का (विवि जहि) विशेष पराभव कर । माघार्थ-हे परमेश्वर ! हमें निर्मय कर, किसी भी दिशा हमें भय प्राप्त न हो । तू समर्थ है इसलिये तेरी रक्षाकी शक्तियों द्वारा हम सुरक्षित हो गये तो हमें किसी सेमी भय नहीं हो सकता। क्यों कि सूही हमारे शत्रुओं, द्वेपकर्ताओं और हिंसकों का नाश करेगा और तेरी रक्षासे सरक्षित होकर हम सदा विजयी होने रहेंगे। । त्यं न पश्चादधरादुत्तरात्पुर न्द्र नि पाहि विश्वतः। आरे अस्मत्हणुहि दैव्यं मयमारे हेतीपदवीः ॥ ऋग्वेद.८।६१ । १६ पद-त्यं । नः । पश्चात् । अधरात् । उत्तरात् परः।न्द्र । नि । पाहि । विभ्यतः। आरे । अस्मत् । कृणुहि । दैव्यं । भयं । आरे । हती। अदेषी। अन्यय-हेन्द्र! त्वं पश्चात्, अपरात्, उसरात्, पुरः च विश्वतः धनि पाहि दिव्यं मयं अस्मत आरे फणुदि। अदेयी हेती आरे॥ अर्थ- है (न्द्र) प्रमो! (स्वं) तू (पश्चात्, अधरात्। उनरान् ) पीछेमे. नीचंस, ऊपरसे पुनः विध्यतःच) आगेमे और सये और में हमारी ( नि पाहि) रक्षा कर । तथा (देयं भयं) देयिक भयको (अम्मन् आर) म सबसे (रणदि)

(३१)
कर तथा ( अदेवीः हेतीः) राक्षसी शस्त्र भी हम सबसे (आरे)
दूर रहें।
भावार्थ- हे ईश्वर ! तू हम सबका सब ओर से रक्षण कर,
हमें सब ओर से निर्मय धना । विद्युत्पात् अवर्षण आदि देषी
आपत्ति हम सबसे दूर रहे और अन्य विपत्तियां भी हमसे दूर
रहे।
(४)
यदिन्द ब्रह्मणस्पतेऽपि मृषा चरामसि ।
प्रचेता न आंगिरसो दुरितात्यावंहसः॥ अथर्व० ६।५।२
यद- यत् । इन्द्र । ब्रह्मणस्पते । अपि । मृपा । चरामसि ।
प्रचेता । नः । आंगिरसः । दुरितात् । पातु । अंहसः।
अन्वय-दं इन्द्रं । ब्रह्मणस्पते यत् अपि मृपा चरामसि दुरि.
तात् अंहसः आंगिरसः प्रचंताः नः पातु ॥
त्वं विश्वस्य मेधिर दियश्च ग्मश्च राजसि ।
स यामनि प्रति भूधि ॥ ऋग्वेद. १ । २५।२०
पद-त्वं । विश्वस्य । मधिर । दियः ।च | ग्मः । च राजसि।
सः । यामनि । प्रति। श्रुधि ॥
अन्वय-हेमेधिर ! त्वं विश्वस्य दिवः ग्मः च राजसि । सत्वं
यामनि'प्रति थुधि॥
अर्थ-हे (मेधिर ) पधि प्रदाता ईश्वर ! (त्वं)तू (विश्वस्य
दिपः रमः च ) सप धुलोक और भूमिका ( राजसि) राजा
। यह त हमारी (यामनि प्रतिश्रुधि ) प्रार्थना श्रवण कर।
भावार्य-हे युद्धिप्रदाता ईश्वर ! तूही संपूर्ण जगत् का सच्चा
। यह तू हमार्ग प्रार्थना श्रवण कर।
पदराजा

(३२) ६ । स नो दूराच्चासाच्च नि मल्यांदघायोः । पाहि सदमिद्विश्वायुः। ऋ.१।२७।३ पद-सः। नः1 दूरात् । च । आसात् । च। नि। मात् । अघायोः। पाहि । सदं । इत् । विश्व-आयुः। अन्वय- हे ईर! सः त्वं दूरात् च आसात् च अधायोः मात विश्वायुः सदंइत् नः नि पाहि । अर्थ-हे ईश्वर ! (सः त्वं ) वह तू (दूरति च आसात् दूरसे और पाससे ( अघ-आयोः मात्)पापी मनुष्य से (विश्व- आयुः सदं इत्) सय आयुमरमें सदा सर्वदा (नः) हम सबकी (नि पहि) रक्षा कर। (७) त्वं हि नः पिता घसो त्वं माता शतक्रतो वभूविय । अघा ते सम्नीमहे । कम्येद.८१९८१ ११ पद- त्वं हि नः। पिता। वो। त्वं माता । शत-तो। यविय । अधा । ते । सुम्नं । ईमहे ।। अन्धय-- यसो शवकतो! त्वं हिना पिता च त्वं माता बमयिय । अधा ते मुम्न ईमहें। अर्थ-है (यसो) सय निवासक (शतकतो) सैंकड़ों सन्रत्य करने पालं घर! (त्वं हि नः पिता) त् हि हमारा पिता और (वं माता पविष ) त् माता होता है। (अघा) इसलिये हम सब ( ते मु-म्नं तेरे उत्तम विचार को (ईमहे । प्राह करते हैं। भाग-र!त् ही हम सपका पिता और माता है. इमलिय ने दया ही हम चाहते हैं।

सूचना। पाठक इस प्रकार मंत्रोंक अर्थ लगानका यत्न करें। इस दंगसे प्रयत्न करनेसे उनकी मंत्रार्थ लगाने में प्रगति शीघ्र हो सकती है। जहां तक हो सकता है वहां तक यत्न करके पाठक मंत्रों को कण्ठ करनेका भी पुरुषार्थ करें। पाठ८ । - वैदिक स्वर । पूर्व पाठोंमें बहुत सा वैदिक म्वरोका विचार हुआ है । प्रत्येक पदके स्वरका भी विचार किया है । अब ही पद मंत्रमें किस प्रकार आगये और उनके स्वर किस कारण बदले हैं इसका विचार करना है। देखिये वही मंत्र- अग्निमीके पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्त्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ।। ऋग्वेद १।११ १ इसमें पहिला अ अनुदात्त है और उसका चिन्ह उसके नीचे आया है। २ दूसरा अक्षर ग्नि उदात्त है इसलिये उसको कोई चिन्ह नहीं है। ३ तीसरा अक्षर मी है। यह वास्तव में अनुदात्त है, परंतु यह उदात्त के पश्चात् आगया है, इसलिये नियमानुसार स्वरित हुआ । (नियम १३ देखिये) इस नियमके अनुसार स्वरित होने के कारण इसके सिर पर स्थरितका चिन्द खडी रेपा आगया ३

(३४)
४ चतुर्थ अश्नर अथवा डे अनुदात्त है, परंतु यह अनुदान
के पश्चात् आया है इसलिये इमको अन्दात्ततर कहते हैं । अतु
दात्त होनेसे इसके लिये कोई चिन्ह नहीं है।
५पंचम अक्षर पु अनुदात्त है और उसका चिन्ह उसके नीचे
है । यह अक्षर भी पूर्व नियमानुसार अनुदात्त के पीछे आनेके
कारण अनदात्ततर होना चाहिये था, परंतु उसके परे रो उदार
आने के कारण पु अक्षर उदात्त ही रहा है।
६ छठां अक्षर गे उदात्त है, इसलिये उसके साथ कोई चिन्ह
नहीं लगा।
सातवां अक्षर हि पूर्ववत् स्वरित हुआ है जिसका चिन्ह
उसके मिर पर पड़ा है।
८ आठयां अक्षा तं पूर्ववत् अनुदात्ततर है । इसलिये उसका
कोई चिन्ह नहीं है।
९ नवम अक्षर य अनदात्त है जिसका चिन्ह उसके नीचे है।
१० दशम अक्षर न उदात्त है इसलिये उसका कोई चिन्ह
नहीं है।
ग्यारहवां अक्षर स्य स्थरित है उसका स्वरित चिन्ह उसके
सिरपर रहा है।
१२ यारहवां अश्नर दे अनुदात्त है । स्य स्वरितके आगे दे
अनुदात्त आनेसे थाम्नबमें वह अनुदात्ततर होना चाहिये था,
परंतु उसके आगे उदात्त व आने के कारण यह अनुदात्त ही रहा
और उमको अनुदात्तका नीचे चिन्ह लगा है।
१३ तरहयां अक्षा व उदात्त है, इसलिये उसकी कोई चिन्ह
नहीं है।
१ चौदहयां अक्षर मृ अनुदात्त है । उदात घ के आगे आनके
कारण पूर्वोक्त स्य के ममान म्यग्नि होना चाहिये थापरंतु आगे

उदात्त अक्षर वि आनेके कारण स्वरित नहीं बना और
अनुः
दात्त ही रहा, इसलिये उसके नीचे स्वर आगया है ।
१५ पंद्रहवां अक्षर वि उदात्त है। इस कारण उसके लिये कोई
स्वर चिन्ह उसके साथ नहीं है।
१६ सोलहवां अक्षर ज अनुदात्त है, परंतु वह उदात्तके पीछे
आनेसे स्वरित चिन्ह उसके सिर पर लग गया
२७ सतरहवां अक्षर हो है। यह उदात्त है, इसलिये कोई चिन्द
।
उसकी नहीं लगा।
• १८ अठारहवां अक्षर ता अनुदात्त है परंतु यह उदात्तके पीछे
आनेके कारण स्वरित घना है । जिस कारण उसके सिरपर स्वर
लगा है।
१९उन्नीसवां अक्षर र अनुदात्त है परंतु यह पूर्वोक्त प्रकार अनु
दात्ततर हुआ है और इसकारण उसको कोई स्वरचिन्ह नहीं लगा।
२० चीसवां र भी उसी प्रकार अनुदात्ततर है ।
२१ इक्कीसवाल अनुदात्त है, आगे धा उदात्त आने के कारण
इसके नीचे स्वर चिन्ह लगा है।
२२ बाइसवां अक्षर धा उदास है, इसलिये चिन्ह रहित है।
२३ तेईसवां अक्षर त पूर्वोक्त कारण ही स्वरित पना और
उसका चिन्ह उसके सिरपर खडा रहा।
२४ चोचीसवा अक्षर म पूर्वोक्त प्रकार ही अनुदात्ततर है
इसलिये उसका कोई स्वर चिन्ह नहीं लगा।
इस विवरण से पाठकों को पता लग जायगा कि स्वरित
घर कहां बनता है और अनुदात्तत्तर कहां होता है।
समास में स्वर
समास में स्वरोका कुछ हेर फेर होता है। इसचिपय का
सामान्य नियम ऐसा है--
1

पद में एक स्वर को छोड़ कर सब अन्य स्वर अनुदात्त होते है । इसलिये समासमें संमिलित हुए पदों के कैसे भी स्वर हुप तीभी उनका समास बनने पर उनमेंसे एक का ही उदात्त अव- शिष्ट रहता है और शेष स्वर अनुदात्त होते हैं। • समासों में सामान्यतः नियम यह है कि अन्य समासो में उत्तर पद अपना स्वर स्थिर रखता है और पिछले पद के स्वर अनुदात्त होने है तथा वहुव्रीहि समास में ही पूर्वपद अपना स्वर स्थिर रसता है और पिछले पदों के स्वर अनुदात्त बन जाते हैं । ३ तत्पुरुष समासों में भी प्रायः पूर्ववत होता है। ४ कृदन्त और उत्तरपद समासों में भी पूर्वपद का उदात स्थिर रहता है और उत्तर पद का स्वर बदल जाता है। पूर्वोक्त में प्रमें "पुरो-हितं और "रत्न-धा-तमं " ये पद समाम है । पूर्वोक्त नियमों के अनुसार पुरः " शन्दका उदात्त बदला नहीं, परंतु “हितं" पदही अनुदात्त रहा। वस्तुतः 'पुरः" और " हितं " ये दोनों शब्द अन्तीदात्त हैं तथापि पूर्वोक्त नियम के अनुसार पहिले पद का स्वर स्थिर रहा और दूसरे पद के सय स्थर अनुदात्त यने, परंतु उदात्त के पीछे अनु. दाच आने में हि" स्वरित चिन्ह याला बन गया । रत्न-धा-तमं " शन्दमें तीन माग है। इसमें पहिला "न" शब्द आधुदार है. परंतु मागे धा धातु आने से और उपपद पूर्व तत्परुष समास यनने से रत्नया शब्द अन्तोदात पनगया और "तम " प्रत्यय स्वयं अनुदात्त है, इस के त का स्वरित पूर्व नियम के अनुसार यन गया और म अनुदात्ततर हो गया । इस के नियम पहिले यताये ही हैं। अय और नियम देखिये- (१)संपायन कंसद तथा क्रियापद फेशब्द पायों में प्रायः । - । इस का आजायगा। शक्ति प्रशंसाके योग्य है।सको उल्लांधने याला अर्थात इसकी (३७) अनुदात्त रहते हैं । परंतु यदि ये वाक्य के या मंत्रपादके प्रारंभ में आगये तो उसके स्वर अन्य नियमानुसार हो जाते हैं। (२) उदात्त और अनुदात्त म्परोके संधि होनेपर उदात्त स्वर की प्रधानता रहती है । जैसा - "आ + इह संधि उदात्त स्वर यक्त “पहि" ऐसा होता है। इस प्रकार सामान्य नियम हैं । पाठक यदि इनका विचार वारंवार मनन करके करेंगे तो उनको स्वर विषयक अत्यावश्यक शान प्राप्त होगा। यह विषय थोडा कठिण है तथापि यहां अति- सगम बनाकर लिख दिया है, वारंवार पढनेसे पाठको के समझमें पाठ ९ इस पाठ में निम्न लिखित मंत्रों का अभ्यास कीजिये- (१) नकिरस्य सहन्त्य पर्यंता कयस्य चित् । याजो अस्ति श्रवाय्यः । पद - नकिः । अस्य । सहन्त्य । पर्येता । कयस्य । चित् । याजः। अस्ति । श्रवाय्यः। अन्धय - हे सहन्त्य ! वाजः श्रवाय्यः अस्ति । अस्य यस्य चित् पर्येता नकिः। अर्थ - है (सहन्त्य ) बलवान ईश्वर ! तेरा ( वाजः) पल श्रयाय्यः अस्ति) प्रशंसनीय है (अस्य कपस्य चित् ) इस का (पर्येता) उल्लंघन करनेवाला (नकिः) कोई भी नहीं है। भावार्थ - परमेश्वर सय पलवानों में यलवान है इसलिये उसकी ऋग्वेद ११ २७1८ -- शक्ति को दयानेघाला कोई नहीं है।

(३८)
न यस्य देगा देवता न मर्ता आपश्चन शवसो अन्तमापु.।
स प्ररिदरा लक्षसा मो दिवश्व मरुपानी भरविन्द्रऊती।।
ग्वेद १.००१५
पद न । यस्य । देवा । दयता । न । मर्ता । आप ।। न ।
शरस । अन्त । आपु । स । प्ररिक्वा । त्वक्षसा । म I दिव ।
च। मरुत्वान् ।न भितु । इन्द्र । ऊनी।
अन्वय यस्य शरस अन्त देना दवता न, मता न, आप.
च न आपु, स मरुत्वान् इन्द्र दिव क्ष्म च वक्षसा परिक्यान
ऊती भवतु ।
अर्थ (यम्य शरस ) जिस ईश्वरके बलका (अन्त) अन्त
देव या देवता (न)न प्राप्त कर सकते, (मर्ता न) मनप्य भी
न प्राप्त कर सकते तथा ( आप च न आपु )जल भी नहीं प्राप्त
कर सकते । (स मवान् इन्द्र') यह प्राण शक्तिस युक्त इन्द्र
(दिव क्ष्म च)द्युलोक और पृथ्वी लोक को (त्वक्षसा परिक्वा)
चलसे पूरित करने वाला ईश्वर (न ऊती भवतु ) हम सबका
रक्षण करने वाला हो।
भावार्थ परमेश्वर की शक्ति इतनी अगाध है कि उस शक्ति
का अत कोई दव देवता मनुष्य या अन्य कोई भी नहीं पा सकता।
घह जीवनशक्ति से परिपूर्ण ईश्वर जा कि धुलोक और पथ्वि
लोक का अपनी शक्तिसे परिपूर्ण कर रहा है, यह हम सब का
उत्तम रक्षा करे।
(३)
प्रतुविद्युम्नस्य स्थविरस्य घवेदियो ररप्श
महिमा पृथिव्या । नास्य शत्रुर्न प्रतिमानमस्ति
न प्रतिष्ठि पुम्मायस्य सहो । ग्वेद ६१८।२-

।
-
प्रतिष्ठिःन ।
पद-भातुवि-धु-म्नम्य । स्थविरम्य । घृष्येः। दिवः ।
ररप्शे। महिमा। पृथिव्याः। न । अस्य । शत्रः । न। प्रतिमानम् ।
अस्लिान । प्रतिष्ठिः । पुरुमायस्य । सह्योः ।
अन्वय-तुविद्युम्नम्य स्थविरस्य धृष्वेः महिमा दिवः पृथिव्याः
मररप्शे । न अस्य शत्रुः । न प्रतिमानं अस्ति । पुरुमायस्य सह्योः
अर्थ- (तुवि- द्युम्नस्य) अत्यंत तेजस्वी (स्थविरस्थ) स्थिर
अथवा पुराण पुरुष और (घृप्वः) दुष्टताको पीसनेवाले ईश्वर
की (महिमा) महिमा ( दिवः पृथिव्याः) घलोक और पृथिवी
लोक के भी (भ ररप्शे) याहर फैला है। (न अस्य शत्रुः)
इसका कोई शत्रु नहीं है, (न अस्य प्रतिमानं ) न इसकी
कोई प्रतिमा या उपमा है । इस (पुरु-मायस्य ) अनंत प्रशायाले
और (सह्योः) शक्तिवाले ईश्वर के लिये भी कोई दूसरा
(प्रतिष्ठिः न) आधार नहीं है। अर्थात् यही सब का आधार है।
भावार्थ-ईश्वर अन्यंत तेजस्वी दुष्टता का नाश करनेवाला और
यहा पुराण पुरुष है। उसकी महिमा सब जगत में फैली है। इसका
कोई शत्रु नहीं और ना ही इसकी कोई उपमा है। इस अनंत शक्ति
वाले ईश्वरको छोडकर और कोई दूसराआधार किसीकोनही है।
।
स नः पितेव सूनवे भने सूपायनो भव ।
सचस्या नः स्वस्तये ।।
भाग्येद १ । २६ । ३
पद- सः । न । पिता । इव । सून। अम्ने । सु- उपायनः। भया
लचस्व नः । स्वस्तये ।
अन्चय- हे अग्ने! सः त्वं सूनवे पिता इव नः सूपायनः भव ।
नःस्वस्तये सचस्व ।
अर्थ-६ (अग्ने) प्रकाश देनेपाले प्रभो! (स:व) यहत (सूनवे

1
अन्यय
न यस्य देवा देवता न मर्ता आपश्चन शवसो अन्त्तमापुः।
स परिक्ष्या स्वक्षसा मो दियश्च मरुत्वानो भयविन्द्रऊती।।
ऋग्वेद ११००१५
पद-न । यस्य । देवाः । देवताः। न । मर्ताः। आपः । च । न ।
शवसः। अन्तं । आपुः । सः । प्ररिक्या । त्वक्षसा । मः । दिवः ।
च । मरुत्वान् । नः । भवतु । इन्द्रः । ऊती।
यस्य शयसः अन्तं देवाः देवताःन, मताः न, आप:
च न आपुः, स मरत्वान् इन्द्रः दियः म. च त्वक्षसा परिक्यान
ऊती
भवतु॥
अर्थ - (यम्य शयसः) जिस ईश्वरके वलका (अन्तं) अन्त
देय या देवता (म) न प्राप्त कर सकते, (मर्ता न) मनप्य भी
न प्राप्त कर सकते तथा (आप च न आपुः) जल भी नहीं प्राप्त
कर सकते । (सः मरुत्यान् इन्द्रः) यह प्राण शक्तिसे युक्त इन्द्र
(दिवः क्ष्मःच)द्युलोक और पृथ्वी लोक की (स्वक्षसा परिक्या)
पलसे पूरित करने वाला ईश्वर (नः ऊती भवतु ) हम सबका
रक्षण करने वाला होवे ।
भावार्थ - परमेश्वर की शक्ति इतनी अगाध है कि उस शक्ति
का अंत कोई देय देवता मनुष्य या अन्य कोई भी नहीं पा सकता।
घह जीधनशक्ति से परिपूर्ण ईश्वर जो कि धुलोक और पृश्चि
लोक को अपनी शक्तिले परिपूर्ण कर रहा है, यह हम सय की
उत्तम रक्षा करें।
प्रतुधियुम्नस्य शविरम्य वृदियो ररप्श
महिमा पृथिन्या: 1 नास्य शत्रुन प्रतिमानमस्ति
न प्रतिष्ठि पुरमायस्थ महोः ।। प्रद १८०१२

(३९)
पद-म । तुवि-द्युम्नम्य । स्थविरस्य । धृष्वः । दिवः ।
रो। महिमा । पृथिव्याः । न । अस्य । शत्रः । न! प्रतिमानम्।
अस्ति। न । प्रतिष्ठिः। पुरुमायस्य । सह्यो ।
अन्यय- तुविद्युम्नस्य स्थविरस्य धृष्वेः महिमा दिवः पृथिव्याः
परयो । न अस्य शत्रुःन प्रतिमानं अस्ति । पुरुमायस्य सहा
।
:
।
प्रतिष्ठिान।
अर्थ- (तुधि- द्युम्नस्य) अत्यंत तेजस्वी (स्थविरस्य) स्थिर
अथवा पुराण पुरुष और (घृथ्वः) दुष्टताको पीसनेवाले ईश्वर
की (महिमा) महिमा ( दिवः पृथिव्याः) धुलोक और पृथिवी
लोक के भी (प्रररप्शे) बाहर फैला है। (न अस्य शत्रुः)
इसका कोई शत्रु नहीं है, (न अस्य प्रतिमान) न इसकी
कोई प्रतिमा या उपमा है । इस (पुरु-मायस्य ) अनंत प्रज्ञावाले
और (सह्योः) शक्तिवाले ईश्वर के लिये भी कोई दूसरा
(प्रतिष्ठिः न ) आधार नहीं है। अर्थात् यही सय का आधार है।
भावार्थ-ईश्वर अन्यंत तेजस्वी दुष्टता का नाश करनेवाला और
बडा पुराण पुरुष है! उसकी महिमा सब जगत में फैली है। इसका
कोई शत्रु नहीं और ना ही इसकी कोई उपमा है। इस अनंत शक्ति
चाले ईश्वरको छोडकर और कोई दूसराआधार किसीकोनहींहै।
स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव ।
सद्यस्वा नः स्वस्तये।
ऋग्वेद १ ॥ २६ ॥ ३
पद- स । न । पिता । इव 1सूनये। अग्ने ।सु- उपायनः। भव।
सचस्व ।नः। स्वस्तये।
अन्वय हे अग्ने! सः त्वं सूनवे पिता इव नः सूपायनः भय ।
ना स्वस्तये सचर।
अर्थ-६ (अग्न) प्रकाश देने वाले प्रमो) (सः त्व) यह त (स्नये

उपायन: (४०) पिता इव)पुत्र के लिये पिताके समान (नः)हम सबके लिये (स- उत्तम प्रात होने वाला (भय ) हो। (नः) हम सब का ( स्वस्तये ) कल्याण के लिये (सचम्ब ) हमारे साथ रह । भावार्थ- हे प्रकाश देनेवाले प्रभो! जैसा पिता पुत्रका सहायक होना है वैसा तू हम सबका सहायक हो और हमारा कल्याण करने के लिये हमें सहायक हो। आ हि मा स्नये पिताऽपिर्यजत्यापये। सखा सख्ये घरेण्यः॥ ऋग्वेद १।२६।३ पद- आ । हि । स्म । सूनये । पिता 1 आपिः। यजति । आपये। सखा। सख्ये । वरेण्यः । अन्यय और अर्थ-- जिस प्रकार (पिता सूनये ) पिता पुत्र लिये (आदिः आपये) बंधु बंधु के लिये तथा (घरेण्यः सखा सख्ये) श्रेष्ठ मित्र मित्र के लिये (आ यजति स्म) सहायता करता है उस प्रकार ईश्वर !तू हमारी सहायता कर । भावार्थ जैसा पिता पुत्र की, भाई भाई की, और मित्र मित्र की सहायता करता है उस प्रकार ईश्वर हमारी सहायता करे। न्यमाने प्रमतिस्त्वं पितासि नस्त्यं वयस्कृत्तव जामयो ग्यम् । सं त्या रायः शतिनः सहनिणः सुधीरं यन्ति व्रतपामदाभ्य। ऋग्वेद १।३१ । १० पद-त्वं । अग्ने । ममतिः । त्वं । पिता। असिनः । त्वं । घयस्रुत् । तव । जामयः । ययम् । सं। वा। रायः शतिनः । मानिणः । सुधीरं । यलि । घतां । अदाभ्य । अन्वय-हे अग्ने स्वं प्रमतिः, त्वं नः पिताअसिात्वं वयस्कृत् । पपं तय जामयः । हे अदाभ्य ! सुचौरं प्रतपां त्या शतिनः

।
(४१)
सहनिणारायः संयन्ति ।
अर्थ- है (अग्ने) प्रकाश देनेवाले ईश्वर! तू(प्रमतिः) विशेष
बुद्धिमान हो, तू हम सबका पिता है । तूहि (वयः कृत् ) जोधन
देनेवाला है। (वयं ) हम सब (वय) तेरे (जामयः) बंधु हैं।
हे (अदाय) दयनेवाले ईश्वर ! (सुवीरं बसपा ) उत्तम
चोरोंसे युक्त नियमों के पालक तुझ ईश्वर के प्रति सौ और
सहस्रों (रायः) धन (संयन्ति ) इकट्ठे होते हैं ।
भावार्थ-हे ईश्वर! तू हि सब में अत्यंत युद्धिवान् हो, तहि हम
सबका पिता हो और तहि लबको जीवन देनेघाला हो । तेरे ही
हम सब भाई है । हे न दब जानेवाले ईश्वर ! तू अनेक वीरताके
गुणों से युक्त तथा उत्तम नियमोंक चलाने वाले हो, इसलिये
सेंकडौं धन तेरे पास इकठे होते हैं । अर्थात् जो इस प्रकार उत्तम
नियोका पालन कर्ता और वीरताक गुणों से युक्त होगा वह भी
अनेक धोको अपनेपासधारण कर सकेगा और धनी बन जायगा।
पाठक इस प्रकार मंत्रीका अध्ययन करें।
पाठ १०
1
अयं शूरेभिरस्तभिरिन्द्र त्वया युजा वयम् ।
सासघाम पृतन्यतः॥
ऋद १८४
अन्वय-वयं त्वया युजा अस्तुभिः शूरेभिः (च सह) वयं
पृतन्यतः सासह्याम ।
अर्थ- हम सय तेरे (युजा) साथ और (अस्तृभिः)अस्त्री-
का प्रयोग करनेवाले (भिः) भरपोरों के साथ हम (पृतन्यतः)
सेनासं हमला करनेवाले शत्रुका (सासाम) परामव करेंगे।
मावार्थ- ईबर! तेरी सहायता लेकर तथा शरधारोकीसहा.
यता लेकर हम शत्रुका पराजय करेंगे।

(४२) वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदया भरे भरे। अस्मभ्य मिन्द्र परिवः सुगं कृधि प्रशत्रूणां मघवन वृष्ण्यारुज ॥ ऋग्वेद.११ १०२ 1४ अन्यय और अर्थ-हे (मघवन्) धनैश्चर्य संपन्न प्रभो ! (त्वया युजा)तेरे साथ युक्त हो कर (वयं घृतं जयेम) हम सब घेरने वाले शत्रका पराभव करेंगे । (मरे भरे) हरएक प्रकारके युद्ध में (अस्माकं अंश)हमारे मागका (उदय) उत्तम रक्षण कर! हे (इन्द्र) प्रभो! (अस्मभ्यं ) हम सबके लिये (वरियः सुगं कृधि ) धन सुखसे प्राप्त होने योग्य कर । (शत्रूणां वृष्ण्या) शत्रुओं के पल (प्र रुज)नष्टभ्रष्ट कर ॥ भावार्थ-हे प्रभो ! तेरी कृपा प्राप्त करके हम सब प्रकार के शत्रओपर विजय प्राप्त करेंगे। है ईश्वर !हर एक प्रकारके युद्ध हमारा कर्तव्यका भाग हमसे ठीक प्रकार हो जाये, ऐसी उन्नति हमारी हो जाये । हे देव ! हमें सब प्रकारके धन सगमता प्राप्त हो और तेरी प्रेरणासे हमारे शत्रुओंके यल पूर्णतासे नष्ट घर कर और सदा हमारा विजय हो । स्व इन्द्राप्यमम विना धियं बनम ऋतया सपत्तः । अवम्ययो धीमहि प्रशस्ति मस्ते रायो दायने स्याम || मा.२॥ ११ ॥१२ अन्यय और अर्थ-ह (इन्द्र) प्रभो ! म सय (विना) शानी लोग (स्पे अभूम) तेरे अंदर अर्थात् तेरे होफर रहेंगे। (तया सपन्तः ) मोध मार्गसे व्ययहार करते ६५ (धियं बनेम) पुद्धि और कर्म की सिद्धि ग्राम करेंगे हम सब (अवस्थया) अपनी रक्षा करने का यत्न करने वाले लोग (प्रशस्ति धीमति) नगणोशी मनमें धारण करेंगे । (मधः)नमालद्दी (गरः

(४३)
तेरे धनके (दापने) दान के लिये हम योग्य (स्याम) होंगे ।
भावार्थ-हे ईश्वर ! हम सब लोग तेरे घनकर रहेंगे। सीधे
मार्गसे चल कर फर्म की सिद्धि प्राप्त करेंगे। हम सब अपनी रक्षा
करने का पुरुषार्थ करेंगे और
सदा । तेरे शभगुणोंका ध्यान करेंगे।
ऐसा करनेस तेरे धन के दानके भागी हम सब बन जायगे।
(४)
यो जात एव प्रथमो मनस्थान देयो देवान्क्रतुना पर्यभूषत ।
यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेतां नम्णस्य महा स जनास
ऋग्वेद २।१२।१
अन्यय तथा अर्थ- (यः प्रथमः देवः) जो आदि देव (जातः
एव) प्रकट होते ही (मनस्तान्) मनन शक्तिसे श्रेष्ठ होकर अपने
(ऋतुना) कर्मसे (देवान्
पयंभूषत) देवोंको
शोमायुक्त
करता रहा । (यस्य शप्मात्) जिप्तके यलसे (रोदसी।)
धुलोक और पृथ्वी लोक (अभ्यसेता ) कांपती है (सः) वही
देव, हे ( जनासः) लोगो ! (नृम्णस्य मना) मानसिक शक्तिके
महत्त्वसे युक्त (इन्द्र ) प्रभु है ।
भावार्थ-आदिदेव परमेश्वर पहलेसेही महती मानस शकिसे
युक्त है और अपने प्रशंसनीय कर्मसे संपूर्ण देवताओंको सशो-
मित करता है । इसका वल इतना है कि उसके भयसे द्यावापृथिवी
मी कांपते हैं ॥ हे लोगो ! यही सब जगत् का एक प्रभु है।
और यही सबसे अधिक समर्थ है।
यस्मान मते विजयन्ते जनासो यं युद्धधमाना अयसे यन्ते।।
यो विभ्यस्य प्रतिमानं यमव यो अच्युतच्यत्स जनास इन्द्रः॥
३.२।१२।९
अन्वय और अर्थ-हे (जनासः) लोगो ! (यम्मान प्रत) जिसके

(४४) विना (जनासः न विजयन्ते ) लोग विजय प्राप्त नहीं कर सकते, (युद्धधमानाः) लडते हुए ( अवसे) रक्षा के लिये (यं हवन्ते) जिसकी प्रार्थना करते हैं और (य:) जो (विश्वस्य प्रति मानं वय) विश्यका नमूना हुआ है तथा जो (अच्युत-व्युत् ) न हिलने पालो कोभी हिला देनेकी शक्ति रसता है, हे लोगोघही इन्द्र है॥ भावार्थ-- परमेश्वरकी कृपा न हुई तो लोगोंका कभी विजय नहीं हो सकता, इसलिये युद्ध के समय सय लोग उसी की प्रार्थना मनोभावनास करते हैं, जो प्रभु जगत् बनने के लिये आदर्शरूप हुआ वह इतना समर्थ है कि वह बड़े प्रभावशालियों को भी हिला देता है, परतु उसको हिलाने वाला कोई नहीं है । अस्माकमग्ने मप्रयत्सु धारयानामि क्षत्रमजरं मवीर्यम्। चयं जयेम शतिनं सहस्रिणं वैश्वानर वाजमने तयोतिभिः । क्र.६।८।६ अन्वय के साथ अर्थ-हे (वैश्वानर अग्न)विश्वके संचालक प्रकाश देनेयाले देव ! (अम्मा मघासु) हमारे धनिकों में (सु-वीर्य) उत्तम वीरता से युक्त(अ-नामि)कभी न नम्र होने वाला (अ-जर क्षनं) कभी क्षोण न होने वाला क्षात्रा तेज (धारय) धारण कर (तय अतिभिः ) तेरी रक्षा शक्तियोंसे (बा) बल प्राप्त करके (वयं) हम सब (शनिनं सहनिणं) सौ और हजारों सैनिकों के साथ हमला करनेवाले शत्रु को (जयेम) पराजित करेंगे। भावार्थ-हे जगत् के संचालक प्रभु! हमारे में जो धनी हैं, उनमें उत्तम शौर्य वीर्य, धैर्य, स्थापन फर अर्थात् धनी लोगशूर डरपोक न हों, कभी किसीले घे न डरें और अपनी रक्षा करने में में समर्थ हो । तेरी रक्षाओंसे सुरक्षित हो कर ही हम यह बलवान् यनेंगे और सैन्यके साथ हमपर हमला करनेवाले शत्रु' हो और

(४५)
'ओको भी परास्त करेंगे।
सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते ।
त्वाममि प्र णोनुमो जेतारमपराजितम् ॥ ऋ. १११११२
अर्थ - हे (शवस: पते इन्द्र) पलके स्वामी प्रभो ! (ते
सख्ये) तेरी मित्रता हम (वाजिनः) बलवान् होने के कारण
(मा भेम) किसीसे भी नहीं डरते । तू (जेतार) विजयी और
अ -- पराजितं) कमी पराजित न होनेवाला है इसलिये ( त्यां
अभि प्र णोनुमः) तुझे ही नमन करते हैं ।
भावार्थ हे सर्व समर्थ प्रभो। तेरी मित्रतासे हम घलशाली
होने के कारण हम किमीसे नहीं डरेंगे। क्योंकि तु सदा विजयी
हो और तुम्हारा पराजय कभी नहीं होता। इसलिये हम तेरी ही
शरण आते हैं, नेरी ही भक्ति करते हैं और तुझे छोडकर किसी
अन्यकी उपासना नहीं करते।
सूचना
पाठक इस प्रकार मंत्रोका अर्थ करें। हरएक मंत्र कण्ठ करे,
और उसके पद पदार्थ अन्वय और भावार्थ स्वयं करनेका यत्न
करें। जहां समझमें न आवे वहाँ ऊपर दिये अर्थकी सहायता लें।
इस प्रकार करने से उनकी प्रगति चेदविद्यामें शीघ्र होगी।
-
पाठ ११
(म. भा. द्रोणपर्व अ. ३६)
सञ्जय उवाच।
'सौभद्रस्तद्वयः श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः ।
अचोदयत यन्तारं द्रोणानीफाय भारत ॥ १ ॥
तेन संचोधमानस्तु याहि याहीति सारथिः।
प्रत्युवाच ततो राजनभिमन्युमिदं वचः॥२॥

अतिभारोग्यमायमनाहितस्वयि पाण्डथै । सम्प्रधार्य क्षण पद्धया ततस्व योद्धमहसि ॥ ३ ॥ आचार्यों हि रतीद्रोण परमास्त्रे तश्रम । अत्यन्तसुससपद्धस्त्व चाऽयुविशारद ॥४॥ तताऽभिमन्य प्रहसन्सारथि बास्यमन्त्रीत् । सारथ को न्यय द्राण समग्र क्षत्रमेव वा ॥५॥ एराक्तगत शक सहामरगणैरहम् । अथवा रुद्रमीशान सर्वभूतगणार्चितम ॥ योधयेय रामखे म सक्षग्य विम्मय ॥६॥ न भमेतद्विपत्सैन्य कलामहति पोडशीम् । अपि विश्वजित विष्णु मातुल प्राप्य सूतज ॥ ७॥ पितर धाजन यद्धे न भीमामपयास्यति । अभिमन्युश्च तावाच कद रत्य सारथे ॥ ८॥ 630 याहीत्यवानगीदन दाणानीकाय मा चिरम् ॥ स जय उवाच ह मारत! धीमता बुद्धिमतो धर्मराजस्य तद्वच নন অন্য নাম না। নাধিন তালাৰীক্ষায় होणस्य सैन्याय अचादयन प्रेरितवान ॥ १॥ तेन द्रौपदी पुत्र अभिम युना “ याहि याहि " गछ गछ इति सन्चधमान सप्रे- माण सारथिस्तु, ह राजन् । तत तदनतर इद चव इद वचन अभिमन्यु प्रयुवार ॥ ह आयुष्मन् अभिमन्यो । पाण्डवैस्वपि अय अतिमा आहित स्थापित । युद्धद्या क्षण समधार्य विचार्य तत तदनतर चबाई अहसि ॥३॥ हि आचार्य द्रोण एनी एतकाय परमात्मनश्रम । वच अयुद्धविशारद ने युद्धविशारद अत्यतसससंवृद्ध च ॥ ८॥ ततोऽमिमन्यु महसन् सारयिं इद पायय अश्यात् । हे सारथ ! का नु अय द्राण ! ममप्र सपूर्ण धाव भवियर या ॥ ॥ ऐरावतात अमरगणे

(४७)
'सह शकं इन्द्रं वा, अथवा सर्व भूतगणार्चितं सर्वभूतपूजितं
ईशानं रुद्रं वा रणमुखे योधयेयम्। अद्य क्षत्रे मे विस्मयो न ॥ ६ ॥
एतत् द्विपत्सैन्यं शत्रुसैन्यं मम पोडशी कलां न अर्हति। हे सूतज!
मातुलं विश्वजितं विष्णुं प्राप्य ॥ ७॥ अपि पितरं अर्जुनं चाऽपि
प्राप्य मां भीःन उपयास्यति॥ अभिमन्यः च तां सारथेः वाचं कद-
थीकृत्य ॥८॥ "द्रोणानीकाय याहि, मा चिरं" इत्येव पनं अनधीत्॥
ततः संनोदयामास हयानाश निहायनान् ॥९॥
नाति हृष्टमनाः सूतो हेमभाण्डपरिच्छदान् ।
ते प्रेषिताः सुमित्रण द्रोणानीकाय वाजिनः ॥ १० ॥
द्रोणमभ्यद्रवन् राजन् महावेगपराक्रमम् ।
तमुद्रीक्ष्य तथा यान्तं सर्वे द्रोणपुरोगमाः ॥
अभ्यर्तन्त कौरव्याः पाण्डवाश्च तमन्वयुः॥ ११ ॥
ते विंशतिपदे यत्ताः संग्रहारं प्रचक्रिरे ।
आसीदांग इयायतों मुहूर्तमुदधाविव ॥ १२ ॥
शूराणां युद्धयमानानां निघ्नतामितरेतरम् ।
संग्रामस्तुमुलो राजन्प्रापर्तत सुदारुणः ॥ १३ ॥
प्रचर्नमाने संग्रामे तस्मिन्नतिभयङ्करे ।
द्रोणस्य मिषतो व्यूह भित्या प्राविंशदानिः ॥ १५ ॥
तं प्रविष्ट विनिघ्नन्तं शत्रुसंघान्महाबलम् ।
हस्त्यश्वरथपत्त्योधाः परिवरुदायुधाः ॥ १६ ॥
नाना चादिनिनदैः वंडितोकृष्टगर्जितः ।
हुंकारैः सिंहनादैश्च तिष्ठ तिष्टेति निःस्वनैः ॥ १७ ॥
घोरहलहलाशब्देमांगास्तिष्ठहि मामिति ।
असावहममिति प्रवदन्ती म्हुमुहुः ॥१८॥
वृहितैः सिमितहासः करनेमिस्यनैरपि ।
सन्नादयन्तो यसुधामभिदुद्रघुराज निम् ॥ १९ ॥

(४८) तेषामापततां वीरः शीघ्रयोर्धा महायल। क्षिप्रास्नो न्यवधीद्राजन्मर्मशो मर्मभेदिभिः॥ २० ॥ ते हन्यमान विवशा नानालिंगैः शितैः शरैः। अभिपेतुः सुबहुशः शलभा इव पावकम् ॥ २१ ॥ ततः सूतो हेममाण्डपरिच्छदान् सुवर्णालंकारयुक्तान् निहाय- नान त्रिवर्षीयान् हयान् अध्यान आश संनोदयामास । सुमित्रेण सारथिना द्रोणानीकाय प्रेषितास्ते वाजिनः अश्वाः ॥ १० ॥ हे राजन! महायेगपराक्रमं द्रोणं अभ्यद्रयन्। तथा यान्तं तं अभिमन्यु उद्वीक्ष्य दृष्ट्या, सर्वे द्रोणपुरोगमाः तं अभ्यवर्तन्त, पाण्डवाश्च तं अन्वयुः ।। १९ ॥ ते विंशतिपदे यत्ताः संयत्ताः संग्रहारं प्रचक्रिरे । उदधौ समुद्र गांगः आवर्त इव मुहूर्त आसीत्॥१शाशराणां युद्धयः मानानां इतरेतरं निध्नता, हे राजन् ! सुदारुणः तुमलः संग्रामः प्रावर्तत ॥ १४ ॥ तस्मिन् अतिभयंकरे संग्रामे प्रवर्तमाने द्रोणस्य मिपतः पश्यतः एव आज निः अभिमन्युः व्यहं भित्त्या अभ्यन्तरं प्राविशत् ॥ १५ ॥ तं महायलं व्यूहमध्ये प्रविष्टं शत्रुसंघान् विनि- नन्तं उदायुधाः उद्यतायुधाः इस्त्यश्यरथपत्यौघाः परियनुः परितः यत्रः ॥१६॥ नानावादित्रनिःस्यनैः श्वेडितोत्कृष्टर्जितैः गर्जनः हुंकार: सिंहनादैः च "तिष्ठः तिष्ठ" इति निःस्वनैः ॥१७॥ घोरें हलहला शब्दैः “मा गाः, तिष्ठ, मा पहि, अमित्र ! असो अहं" इति मुहुः मुहुः वारंवार प्रवदन्तः ॥ १८ ॥ यहितैः सृजितः दासः करनेमिस्वनैरपि वसुधां संनादयन्तः आज नि अभि दुद्रुयुः॥ १९ ॥ शीघ्रयोधी महायलो घीरः क्षिप्रास्त्रः अभिमन्युः। राजन् ! यद्धमर्मशः अभिमन्युः मर्मभेदिभिः नानालिंगैः शरैः अगपतनात न्ययधीत् ॥ २० ॥ नानालिगे. शितैः शरैः पियशा. हन्यमानाम्ने धीराः पाव शलभा व सयदुशः अमिपेतुः॥२१॥ ..

संस्कृत पाठ
पाठमाला।
पुस्तकोका मूल्य म. आ. से ३) रु. और वी.पी सं४)रू,
प्रति भाग का मूल्य ।-) पांच आने और डा. व्य..) एक माना ।
अत्यंतसुगमरीतिसे संस्कृत भाषाकाअध्ययन करनेकी अपर्व पद्धति
इस पद्धतिकी विशेषता यह है-
१ प्रथम द्वितीय और तृतीय भाग ।
न भागोमे संस्कृत के साथ साधारण परिचय करादिया गया है।
२ चतुर्थ भाग।
इस चतुर्थ भागमें संधि विचार बताया
३ पंचम और षष्ठ भाग।
इन दो मागोमें संस्कृतके साथ विशेष परिचय कराया गया है।
४सप्तम से दशम भाग।
इन चार भागोंमें पुल्लिंगा, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंगी नामोंके
रूप बनानेकी विधि यताई है।
५पकादश भाग।
इस भागमें "सर्वनाम के रूप पताये हैं।
६द्वादश भाग।
इस भागमें समासोंका विचार किया है।
७ तेरहसे अठारहवें भाग तकके भाग ।
इन छ: भागोंमें क्रियापद विचार की पाठविधि बताई है।
८उनीलसे चाचीसचे भागतकके ६ भाग।
छ भागोंमें चेदके साथ परिचय कराया है।
'अर्थात् जो लोग इस पद्धतिसे अभ्ययन करेंगे उन को अलग
परिश्रमसे पड़ा लाभ हो सकता है।
स्वाध्याय मंडल, आँध (जि. सातारा)

महाभारत
(हिंदी-भाषा-भाष्य- समंत)
तैयार हैं।
(१) आदिपर्व! पृष्ठ संख्या ११२५ मुल्य म. आ.से६)
(२) सभापर्व । पृष्ठ संख्या ३५६ मूल्य म. आ. सेर) ६
(३) वनपर्व । पृष्ठ संख्या १५३८ मूल्य म, आ. से८).
(४) विराटपर्व। पृष्ठ संख्या ३०६ मूल्य म. आ. से,
(५) उद्योगपर्व । पृष्ठ संख्या ९५३ मूल्य म.आ से५)
(६) भीमपर्व । पृष्ठ संख्या ८०० म. म. आ. से ४) रु.
[७] महाभारत समालोचना।
१ प्रथम माग । मू म. आरसे ॥) पी.पी से Ha)आने ।
२द्वितीय माग । मू.म.आईरसे ॥) पी. पी से आने ।
महाभारत के स्थायी प्राहकों के लिये १२०० पृष्ठोका६)स.मूल्य होगा।
मुद्रक तथा प्रकाशक धी.दा.सातपळेकर
भारतमुद्रणालय- स्वाध्याय मंडल, आंघ (जि.सातारा)

FIRE
:::
अंक
Weeeeeeeeeeee
संस्कृत पाठ माला।
(संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेका सुगम उपाय)
भाग इक्कीसवाँ।
ईसी
लेखक और प्रकाशक,
श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
स्वाध्याय मंडल, औंघ (जि. सातारा)
प्रथम आपत्ति
'संघत् १९८४, शक १८४९, सन१९२७
मूल्य पांच आने
NROEMEERUDRAMROHAR

निरुक्ति।
-
घेदमंत्रों का मनन करने के समय वैदिक शब्दों की निरुक्ति
जानने की आवश्यकता होती है। यह निरुक्तिका विषय अब इस
के आगे घताना है। यदि पाठक इन स्थानों में दिये हुए रियम
और उदाहरण मननपूर्वक पढेंगे तो उनको वैदिक शव्दीकी
निरुक्तिका उत्तम ज्ञान हो सकता है । इसलिये आशा है कि पाठक
इस सुगम पाठविधि से लाभ उठावेंगे।
निवेदक.
स्थाध्यायमंडल
औध (जि. सातारा
९।१२।२७
श्रीपाद दामोदर सातवळकर
मुद्रक नया प्रकाशक- श्रीपाद दामोदर सातवळेकर,
भारत मुद्रणालय, म्याध्याय मंडल, आंध (जि. सातारा)

संस्कृत-पाठ-माला। भाग इक्कीसवा। । पाठ १ शब्दोंकी निरुक्ति। वैदिक पदोकी निरुक्ति करने के लिये वह पद किस धातुसे बना है यह जानने की आवश्यकता है । धातुके अक्षरोकी समानता पदमें देखनेसे प्रायः पता लग सकता है कि यह शब्द इस धातुसे पना है। जैसा- "गौ" शब्द लीजिये । इस में "ग" अक्षर है और वह “गम् ' धातु में है, इसलिये अनुमान हो सकता है कि यह पद गम् धातुसे हुआ है। दूसरा गति अर्थ वाला " गा । धातुभी इसमें हो सकता है। इसलिये " गच्छति इति गौः" ऐसा गो पदका निर्वचन करते है । " जो गतिमान है "यह इसका अर्थ है, इस पदके अर्थ- । गाय, वाणी, भूमि, सूर्य किरणें, सूर्य, चन्द्र, इंद्रियां आदि अनेक वेदमें आते हैं, सममे भिन्न भिन्न प्रकारको गति होती ही है। उदा- हरण देखिये- आयं गौः पृविरक्रमीत् । अग्मेद. १०९८१ (आय) यह (गौः) भूमि (पृश्निः) अंतरिक्ष में (अफ्रमीत्) जाती है।" इस मंत्र गौशद पृथ्वीयात्रफ है और यह पृथ्वीकी गतिका सूचक है । तथा- - 20 1 मया गायो गोपतिना सचम्यमयं वो गोष्ठ इह पोषयिष्णुः॥ ऋग्वेद ३ । १४।६ 'हे (गायः) गौवो ! (मया गोपतिना) मुझ गोपाल के साथ (सच, ) मिलकर रहो, (इह अयं) यहां यह (पोपयिष्णुः) पालन करनेवाली ( या गोष्टः ) तुम्हारी गोशाला है।" यहां गौ शब्द (अर्थात् गावः शब्द ) गाय का वाचक है, परंतु अलंकार से इन्द्रिय वाचक भी होना संभव है। इस प्रकार अन्यान्य अर्थोके उदाहरण वेदमें अनेक मिल सकते हैं। पेदमें कईवार " अंशके लिये पूर्णका प्रयोग किया जाता है। अर्थात् " गौ " शब्दका प्रयोग गौसे उत्पन्न होने वाले किसी भी पदार्य के लिये होता है । यह विषय वडा गहन है तथापि संक्षेप से यहां देखिए- "गो" शब्द "गाय के दूध" के लिये निम्नलिखित मंत्र में है, देखिये- गोभिःश्रीणीत मत्सरं। ऋ.९४६४ " (गोमिः) गायक दूध के साथ (धीणीत) पकाओ (मत्सर) सोमरसको।" अर्थात् गायका ध लेकर उसमें सोम रस डालो और दोनोंको साथ साथ पकामो। इसी मंत्र "मत्सर "शब्द सोम रसका वाचक है,मत्सर का दूसरा अर्थ लोम है, वह यहां अभीष्ट नहीं है। मत्सर शम्द"मद्" (हर्पित होना)इस धातुसे यनता है। उक्त प्रकार " गो" शब्द, "गायका दूध, दही, मक्खन, घी, धर्म, चर्मसे पनी रसियां" आदिके लिये प्रयुक्त होता है, क्योकि ये सय पदार्य गो से बनते हैं। देखिये इस के उदाहरण- अंगुं दुहन्तो अभ्यासते गयि । ऋग्वेद. १०। ९४९ '(अंशु) सोमका (दुइन्तः ) रस निचोहवाले (गाय) धर्मपर ( अध्यासते) येटते हैं।" यहां "गो" शब्द का अर्थ 1 चिर्म अथवा चर्म है। तथा और देखिये - गोभिः सनद्धी असि यील्यस्य । ऋग्वेद. ६४जा२६ " (गोमिः ) गोचर्म को रशियों से (सन्नद्धः ) यंधा हुआ रय है इससे (घोळयस्य ) त्दढ बनो" यहां गो शब्दका अर्थ मि से बनी हुई रसी है। इसी प्रकार गो शराब्दके अनेक अर्थ घेदमें होते हैं गायसे जितने पदार्थ धनते हैं उन सयका याचक एक गौ शब्द है। धनुष्य की डोरी चर्मकी तांत से बनती है। इसलिये उसका नाम भी गौ है । इस प्रकार अनुसंधानसे जानना चाहिये । दो धातुसे बने शब्द। कई शब्द एक धातु से बनते हैं, उसी प्रकार कई शब्द दो अथवा अधिक धातुओंसे भी यनते हैं अथवा वैसे सिद्ध किये जा सकते हैं देखिए- "हिरण्य" शब्द है, इसमें दो भागों की कल्पना हो सकती है। “हिर रपय" इसमे " रण्य "पद "रम- पीय " पदका संक्षिप्त रूप होगा, देखिये- रमणीय, रमणीय. रमण्य, रण्य, इस ढंगसे यह “रण्य" पद रमणीय पद का संक्षिप्त रूप स्पष्ट प्रतीत होता है, इस लिये यह "रम्" धातुसे सिद्ध दुआ मानना योग्य है । "हि " अथवा " हिर्" पद " है " धातुसे होना संभवनीय । हृदय शब्द का मापामें "हिर्दय" भी कई लोग कहते हैं उसमें दय "टाया जाय तो हिर" " शेष रह जाता है। यह हिर - रण्य = हिरण्य शब्द इस प्रकार वना है। हृदय लिये जो रमणीय लगता है यह हिरण्य है यह धन का नाम है। धन, दौलत, संपत्ति आदि हरएक मनुष्य के हृदयको रमणीय लगती है, इसलिये धनका यह नाम है। - " " -

400
" धातुका अर्थ हरण करना भी है, एक स्थानसे हरण
करके जो दूसरे स्थानपर लिया जा सकता है यह हिरण्य होता
है। धन एकके पाससे दूसरे के पास जाता रहता है इस लिये धन
को हिरण्य कहते हैं, इसका उदाहरण देखिये.-
हिरण्यपाणिमूनये सवितारमुपद्वये ॥
'(हिरण्य-पाणि) सुवर्ण के समान चमकदार हायोसे
अर्थात् किरणोंसे युक्त (सथितार) सूर्य की अपनी (ऊतये)
रक्षा होने के लिये (उपहये)प्रार्थना करते हैं।" यहां हिरण
शन्द धन रूपण सुवर्ण के समान चमकदार इस अर्थमें प्रयुक्त है।
इस प्रकार पाउक शब्दोंकी व्युत्पत्ति जाने ।
म.१।२२१५
वा. यजु. ३६R
पाठ२
इस पाठ में निम्न लिखित मंत्रोंका अध्ययन कीजिये-
६ नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा ।
शं न इन्द्रो वृहस्पनिः शं नो विष्णुरुरुकमः ॥
(मित्रः) सय का मित्र ईश्वर (न: श) हम सबको कल्याणकारी
होवे ।(वरुणः) सबसे श्रेष्ठ ईश्वर (0) कल्याण कार्ग होवे ।
(अर्यमा ) न्यायकारी ईश्वर (नःश) हम सबको कल्याणकारी
होत्र। (इन्द्रः ) परम ऐश्वर्यवान् प्रम् (म) हम सबका
कल्याण कारी होवे ।। (वृहस्पतिः) वडी वाणीका स्वामी ईश्वर
(२) हमारा कल्याणकर्ता हो। और (उस्क्रमः विष्णुः) महा
पराक्रमी व्यापक ईश्वर (नःशं) हमारा कल्याणकर्ता होवे ।
शं नो वातः पातां शं नस्तपतु सूर्यः ।
शं नः कनिदद्देवः पर्जन्यो अमिवर्षतु ॥या यज. ३६।१०
(वातः) घायु (नः) हम सपके लिये कल्याण कारी
होकर (पघतां) बहता रहे । (सूर्यः) सूर्य (ना) हम सब

करे।
लिये (शं तपतु) कल्याण कारक होकर तपना रहे । (कनिक्रदद)
गर्जना करनेवाला:( पर्जन्यः देवः) मेघराज देव (नः) हम सब
के लिये (शं अभिवर्षतु) कल्याण करने वाली वृष्टि का घर्षाव
अहानि शं भवन्तु नःशै रात्रीः प्रति धीयताम् ।
शं न इन्दाग्नी भवतामयोभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या।
शं न इन्द्रापूपणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयोः॥
वा. यजु. ३६ । ११
(मः) हम सयके लिये ( (अहानि शं भवन्तु ) दिन कल्याण
कारक हो । (रात्रीशं प्रतिधीयतां) रात्री का समय हम सबके
लिये कल्याण को धारण करे । ( अवोभिः) सब प्रकारके रक्षणों
साथ ( इन्द्राग्नी)ऐश्चर्य वान् और तेजस्वी (नः शं भवतां)
हम सबके लिये कल्याण कारक हो । (रातहव्यौ) अन्न देनेवाले
(इन्द्रावरुणौ) ऐश्वर्यवान और श्रेष्ठ (नः शं) हम सयका कल्याण
करें। (इंद्रापूषणौ) ऐश्वर्य वान्
और पोषणकर्ता (वाजसातौ)
(नाशं) हम सयका कल्याणकारी हों।
(इन्द्रासोमौ) ऐश्वर्यवान् और विद्वान् (सुविताय) उत्तम
गति के लिये और (शं योः) शांतिसुख और दुःख प्रतिकारके
लिये सहायक पर्ने । अर्थात् हरएक समय और हरएक शक्ति
हम सब के लिये लाभदायक बने ।
अभी पुणः सखीनामविता जरितॄणाम् ।
शतं भवास्यूतिभिः ॥
ऋ.४॥३१॥३
हे ईश्वर! तू (नः) हम सबका, (सखीनां) सब मित्रजनो
का और (जरितॄणां ) सब उपासकोका (शतं ऊतिभिः) सैकडो
रक्षणों के द्वारा (अभि सु अविता ) सय प्रकार से उत्तम रक्षक
अन्नके दानके समय
(भवसि) होता है ।

८
।
हम सयका, मिनों और उपासको का त् सैकडों प्रकारों से
अत्यत उत्तम रक्षण करता है । प्रभो! तुम्हारे जैसा दूसरा कोई
मी रक्षक नहीं है । तेरे रक्षा साधन अनत है और रक्षा मार्ग
भी अनत है।
अग्ने त्य ना अन्तम उत त्राता शिवो भवा वरूथ्य ।
वसुरग्निसुथवा अच्छा नक्षि धमत्तम रयिंदा ॥ ऋ० ५।२४।१
ह ( अग्ने ) तेजस्वी ईश्वर ! (न व अन्तम ) हमारे लिये
तूही समीप हो । इसलिये तू हमारा (प्राता) रक्षक (शिव)
कल्याणकता और (वाथ्य ) श्रेष्ठ हो । तू ( अग्नि ) तेजस्वी
(वसु )सबका निवासक (वसश्रया ) निवास करने के योग्य
अनादि देनेवाला (अच्छा नक्षि) हमे उत्तम प्रकार प्राप्त हो ।
और हमें (धुमत्तम) उत्तम तेजस्वी ( रयिं दा)धन
परमेश्वर ही हम सयका अत्यत समीप है। उससे अधिक समीप
और कोई नहीं है, यही सयका रक्षक, कल्याण करने वाला
और सयको भ्रष्ट प्राप्तव्य है । वही सयको सुरक्षा करता है और
सपका पोषण करता है। यह हम सयको प्राप्त हो और हमें उत्तम
धन वेधे।
स्या पर्वन्ति क्षितय पथिल्या त्या राय उगयासो जनानाम् ॥
व प्राता तरणे त्यो पिता माता सदमि मानपाणाम् ।
श६।१।५
देयर (क्षितय) पृथ्वीपर गहने पाले मनुष्य (स्या यन्ति)
तुमे यदाते, तेग महिमा पठाते हैं। (जनानां) मनुष्यों के
(उमयामा TIRE) दोनों प्रकार धन मा तेरी महिमा शशित
परत दें। तुमदी (प्राता मश तारपदी और (तरण पत्य)
बुग्यार तेर जान रिय (भ)यायदा तय महा (मनुप्पाणा)
मनुप्पोका पिता माना आदि (मय इन्) मदाही हम दी हो।

९
हे ईश्वर ! सय हानी जारी महिमा फैला रहे है, सय लोगों
स्थूल सूक्ष्म धन नहीं देता है, सयको दुःससे पार होने के
लेये तेरा ही मान प्राप्त करने योग्य है क्यों कि तू ही सय मनुष्यका
माई, माता, पिता आदि संबंधी हो ।
तं सभीनीमतयो वृपयानि पास्यानि नियुतः सधुरिन्द्रम् ॥
समुद्रं न सिंधव उपपाशुष्मा उपन्यचसं गिर आविशन्ति ।
म.६। ३६१३
(तं इन्द) उस प्रभुके पास (तपः सधीचीः) रक्षक शक्तियां
रहती है तथा (यानि पापानि ) उत्साहवर्धक शकियों
(नियुतः ) साथ साथ नियुक्त होकर (सधुः) सेवा करती हैं।
(सिंधयः समुदं न) नदियां जिस रीतिसे समुद्रको प्राप्त होती हैं।
उसी प्रकार ( उपयशुमा गिरः ) यलसे युक्त स्तुतिप्रार्थना-
पाली याणी (उझव्यचर्स) सर्वव्यापक ईश्वर के पास (आ
विशन्ति ) पहुंचती है।
परमात्माके पास सब प्रकारका संरक्षक सामथ्र्य है, अनंत पल
भी यहां ही है। हरएक मनुष्य अपनी पाणीसे उसीकी प्रार्थना
करता है अधया हरएक मनुष्यको उसी की प्रार्थना करना
चाहिये। किसीमी मापाद्वारा और कहां भी रहकर की हुई प्रार्थना
पूर्ण रीतिसे उसीके पास पहुंचती है।
सूचना ।
इस पाटमें आये हुए देवताओंके अनेक नाम एकही ईभरके
वाचक होते हैं। उस देयताका बोध करते हुए एक अद्वितीय
परमेश्वरके वाचक होते हैं क्यों कि " ही
सद्वस्तु का वर्णन
शानी लोग अनेक नामोसे करते हैं " यह पेदके मंत्रद्वारा ही स्पष्ट
किया गया है।
एक

समुद्र
पाठ३
शब्दोंकी निरुक्ति।
" शब्दमै " सं+उत्+द्र" ये तीन विभाग हैं इनका
अर्थ-(सं) मिलकर (उत् ) ऊपर (दू) गति करना है। जल
के अणु परस्पर मिलकर एकरूप होकर ऊपर उठने के लिये गति
करते हैं । जिन लोगोंने समुद्र देखा होगा उनको समुद्रकी इस
गतिका ज्ञान हो सकता है । समुद्र का जल स्थिर नहीं होता
परंतु लहरों के द्वारा सदा हिलता रहता है यही अर्थ इस शब्दमै
है। यहां सं उत् ये दो उपसर्ग हैं और द्र धातु है जिसका अर्थ
गति है।
इसीकी दूसरी व्युत्पत्ति सं+मुद्र " है, इसमें (सं) एक
होकर (मुद) आनंद (२) देता है । समुद्र में जल के
में मिलकर देखने वाले को आनंद देते हैं। यहां समुद्र शब्द सं
उपसर्गपूर्वक " मुद् " (आनंदित होना) धातुसे बना है ।
इसकी तीसरी व्युत्पत्ति "सं+ उन्द ' (भिगोना) इस धातु
की जाती है इसका अर्थ (सं) उत्तम रीतिसे (उनत्ति)
भिगोता है । समुद्र सयको भिगो सकता है या भिगोता है क्योति
उसमें अपरंपार जल होनेसे भिगोनेका कार्य करने में यह समर्थ है।
उदाहरण---
समुद्रमय जग्मुरापः॥
ऋ.१।३२।२
" (आप) जल ( समुद्रं ) जलनिधि प्रति (अब जग्मुः)
पहुंचे ।"
अणु आपस
आदिश्य सद" आ + दा"
आ + दा" (लेना, स्वीकार करना)
धातुसे बनता है." मादत्त इति आदित्यः" (जो लेता है यह

। आदित्य है । आदान अर्थात् स्वीकार करनेका धर्म इसमें होता है। इसके विविध म देखिये - १ आदत्ते रसान्जली अथवा रसोका आदान करता है अर्थात् शोषण करता है। सूर्य जलादि रस का आकर्षण करता है। २ आदत्ते मास-तंज का आदान करता है, किसी भी दूसरे तेजस्वी पदार्थका तेज खींचता है, इसलिये उसकी प्रभा कम हो जाती है। इसका उदाहरण देखिय- अथावयमादित्य वते तवानागसो अदितये स्याम ॥ मुग्वेद १।२४ । १. "हे (आदित्य )सूर्य ! ( अथ) अब ( वय ) हम सब (तव यते ) तेरे में रह कर ( अन् + आगस ) निष्पाप होते हुए अदितये) अखडित मुक्तिक लिय योग्य ( स्याम ) होंगे।' (३) 'वत्र " शब्द "" धातुसे बनता है, आवरण करता है, घेरता है, चारों ओर से घेर लेता है उसका नाम वृत्र है । प्राय वेदमें यह शब्द मेघ वाचक है क्यों कि वह आकाश में आकर घेरवा है, तथापि चारों ओरसे धेग्नेवाला शभु दुष्ट विकार आदि अनेक अर्थ में आता है, इसका उदाहरण यह है- अपा बिलमपिहित यदासीह जघन्दा अप तद्ववार ॥ ऋ० ११३२१११ " (यत् )जो (अपा बिल)जल के निकलनेका द्वार (अपि- हित)ढका हुआ था उसको खोलने के लिये (वत्र जघन्धान ) मेधको मार कर (तत् अपवचार) उसे खोल दिया।" यहा मेघको मार कर जल के प्रवाह मुक्त करनेका वर्णन है । अर्थात्

-
से
"
"
शक्ति इसमें रहती है इसी लिये इसको आत्मा कहते हैं। इससे
आत्मा का अर्थ "संचालक " होता है।
(१०)
वेदमें शब्द बननेके समय धातु के अक्षरोंमें उलट पुलट
भी
हो जाता है जैसे - “हिंस्" (हिंसा करना) इस धातु,
सिंह" शम्द पनता है जिसका अर्थ “हिंसक प्राणी
'हिस्" इस धातु के व्यंजन के स्थान बदले हैं और “सिंह'
शम्द बना है।
मापा भी चाकू के लिये “काच." बिलकुल के लिये "कुल.
बिल " आदि अनेक शब्द इसी प्रकार आदि और अंतका स्थान
विपर्यय होकर यने हैं। इसी प्रकार संस्कृत शब्दों के
धननेमें भी होता है। इस प्रकार अनुसंधान करनेसे कई शब्दोमें
में इसी प्रकार का साधर्म्य दिखाई देगा।
1

यं मयः पुरुस्पृहं विदद्विश्वस्य धायसे ।
प्रस्वादनं पितनामस्ततातिं चिदायवे ॥ऋ.५।७।६
(मर्त्यः) मर्त्य मनुष्य (य) जिस ईश्वर को (पुरुस्पृह) अन्यंत
प्रशंसनीय (विश्वस्य धायसे) सब विश्वका धारण करनेवाला
(पितूनां प्रस्वादनं ) अन्नोको मीठा पनानेघाला तथा (आयवे)
मनुष्य मात्रके लिये (अस्तताति) गृहके समान आश्रय रूप
(विदत् ) जानता है।
मनुष्य उस ईश्वर को उपास्य, जगत् का धारक, अन्न को रुची
अर्थात् उत्तम स्वाद देनेवाला और मनुष्योंका एक मात्र आश्रय
जानकर उसकी उत्तम उपासना करे और उस ईश्वरको अपने
अंदर पेसा ही अनुभव करे अथवा मनन से उसके उक्त गुण
जाननेका यत्न करे ।
स वज्रभृदस्युहा भीम उग्रः सहस्रनेता शतनीध कम्वा ।
चन्नीपो न शवसा पाञ्चजन्यो मरुत्वानो भविंद्र ऊती।
ऋ.१।१००।१२
(सः) वह ( मरुत्वान् इन्द्रः ) प्राणशकिसे युक्त प्रमु
(बज्रभृत् ) शस्त्र धारी, (दस्युहा) शत्रुका नाश करनेवाला,
(भीमा) भयंकर उप्र, ( सहस्रचेताः) सहस्रो प्रकारके शानीसे
युक्त, (शतनीयः) बहुत प्रकारसे जगत को चलानेवाला, (कन्या)
प्रकाशमान (चम्रीपान) रसयुक्तके समान सर्वत्र एक रस,
(शवसा ) पलसे (पांचजन्यः ) पंचजनोंका हितकर्ता प्रभु(न:
ऊती मयतु )हम सपका रक्षक होये ।
उन्न प्रकार विविध शक्तियों से युक्त प्रभुको रक्षामें रहनेसे
दो सय सुरक्षित रह सकते हैं।

सत्रा मदासस्तव विश्वजन्या सत्रासयोऽध ये पार्थिवासः ।
सत्रा वाजानामभयो विभक्ता यद्देवेषु धारयथा असुर्यम् ॥
मा.६।३६१
हे ईश्वर ! (तय मदासः) तेरे आनंद (सत्रा विश्वजन्याः)
सच मुच सब जनोंके हितकारी हैं, (अध) और (ये पार्थिवासः
रायः) जो पृथ्वीपर के धन हैं, वे भी सयको लाभ कारी है । तू
(वाजानां विभक्ता) तूं धनौका विभाजक (समा अभवः)सच
मुच हुआ है और न ही (देवेषु असुर्य) प्राणोका बल (धारयथा)
धारण करता है।
परमेश्वरके जो आत्मिक और अलौकिक आनंद है वे सचमुच
सप लोगोंके हितकारी हैं । यही ईश्वर सयको यथा योग्य रीतिसे
धनौका विभाग करता है और यही सूर्यादि देवताओं में उत्तम
यल स्थापन करता है।
कविमग्निमुपस्तुदि सत्यधर्माणमायरे ।
देवममीयचातनम् ॥
०१।१२१७
(अध्वरे ) यश में सत्कर्म करने के समय (अमीव-चातनं )
'रोग दूर करने वाले (सत्य-धर्माण ) सत्य नियम पालन करने
घाले, (कवि) कवि (नानि देवं ) तेजस्वी परमात्मदेव की ही
(स्तुहि) प्रशंसा कर।
परमात्म देय आरोग्य दाता, मत्य नियमोका पालक. कवि
अर्यात शम्दका प्रवर्तक और अत्यंत तेजस्वी है. इसीलिये
यह स्तुति करने योग्य है। उसकी स्तुति करने से उपासक के अंदर
तेजस्यिता परती।
समान नीटयूषणो यमानाः सम्यग्मि मदिषा अग्यतीभिः।
मालम्ग पर क्ययो नि पति
गुदा नामानि दधिर पगणि॥
प्रा.१०।।२

(वृषणः ) बलवान् (महिपाः) यडी इच्छा धारण करनेवाले, (अर्धतीभिः सानाः)चालक शक्ति के साथ रहनेवाले सज्जन समानं नीलं )समान एक आश्रयस्थान को (संजग्मिरे ) एक धोकर पहुंचते हैं । (कवयः) ज्ञानी लोग (ऋतस्य पदं) सत्यके स्थानका (निपान्ति) संरक्षण करते है और (गुहा) बुद्धिमें (पराणि नामानि ) श्रेष्ठ नामोको ( दधिरे) धारण करते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य अपनी प्रयल इच्छा शक्ति के साथ उस एक ईश्वर के आश्रय स्थानको प्राप्त होते हैं । ज्ञानी लोग सदा सत्यका ग्रहण और असत्यका त्याग करते हैं। इसलिये हरएक को बुद्धिमें सदा श्रेष्ठ विचार धारण करके अपने आपको श्रेष्ठ बनाना चाहिये। ऋतस्य हि वर्तनयः सुजातमिषो वाजाय प्रदिवः सचन्ते । अधीवासं सोदसी पावसाने घृतैरन्नैर्वावृधाते मधूनाम् ॥ ऋ. १०५४ (भातस्य ) सत्यके (प्र-दिवः धर्तनया) अत्यंत तेजस्वी सनातन मार्ग (इपः वाजाय ) मनकी इच्छा और अन्न के लिये. । सचन्ते) सहाय्य करते है। (रोदसी) द्युलोक और पृथ्वी (सुजातं) उत्तम प्रसिद्ध (अधिवास) सर्य व्यापक को (पावसाने) पसाते हैं। (घृतः) घी और (मधूनां अन्नैः) माधुर्ययुक्त अन्नों द्वारा (घावृधात)सय को पुष्ट करते हैं। सनातन सत्य धर्म मार्ग का आक्रमण करनेस सय मनुष्यों के मनोगत पूर्ण होते हैं, और इसी ढंगसे सय लोग बलवान भी यन सकते हैं। क्यों कि प्रसिद्ध वर सर्व व्यापक है और यह सप को घी अन्न आदि द्वारा पुष्ट पनाता है, इसलिये उसकी उपासना से सबको पल प्राप्त होता है। २

+९०11
व्याम) अत्यत विस्तत आकाशम (सत्च) तीनों कालाने
असच्च सच्च परमे व्योमन्दक्षस्य जन्मन्नठितरुपस्थे ।
अग्निह न प्रथमजा तस्य पूर्व आयुनि वृपभश्च धेनु ।।
( दक्षस्य जन्मन् ) बलकी उत्पत्तिके समय (अ-दिते )
अविनाशी मून प्रकृतिके (उपस्ये) समीपके स्थानपर (परमे
एक जैसा रहने वाला अविकारात्मतत्व और (अ सत्व)
उस आत्मासे मिन्न पदार्य ऐसे दो पदार्थ थे। इस (पूर्व आयुनि)
पूर्व अवस्थामें (हन ) निश्चयसे हम सपके अदर (अनस्य
प्रथमजा ) सत्य धर्मका पहिला प्रवर्तक (अग्नि ) तजस्वी
ईश्वर प्रकाशित हुआ जिसके साथ (धृपम ) बल्यान आत्मा
और (धेनु )कामधेनु अर्थात युद्धि यो।
प्रकृति और ईश्वर अनादिकालसे ह । ईश्वर प्रकृति में घलका
सगर करता है । वहा सत्य धर्मा पहिला प्रवर्तक है। बल
पोषण शक्ति, यलपान आत्मा और सुबुद्धि, ये सब परमेश्वरके
साथ रहते हैं। अर्थात परमेश्वरसे सबको वल प्राप्त होता है।
और परमात्मा से उत्तम पल प्राप्त होकर ही सब अपना कार्य
योग्य रोतिस करनेमें सफलता और सफलता प्राप्त करते हैं ।
यमादन प्रयमा स्नस्य प्रजापतिस्तपसा ब्रह्मणेऽपचन् ।
यो लोकाना विधति मिरेपानीदनेनानि तराणि मृत्युम।।
अथर्व०४।३.१
और

पान है, उसके (तेन ओदनेन) पकाये उस सृष्टिरुपी चावलोसे हम
(मृत्यु अतितराणि ) मृत्यु के पार होते हैं ।
परमेश्वरने इस विश्व की हंडीमें सृष्टि रूपी अन्नका पाक किया है,
इसके बनने के लिये उसने अपनी ही उष्णता लगाई और अपने
तेजसे यह अन्न उसने सिद्ध किया है। वह ईश्वर लोकोंका धारक
और सब सटिक मध्यमें वर्तमान है। उसका यह अन्न सेवन
करता हुआ और उससे यल प्राप्त करता हुआ मैं मृत्युके परे
जाऊंगा।
सूचना-पाठक इस प्रकार मंत्रोका अभ्यास और अर्थ का
मनन करें।
पाठ५
प्रकार हिटिभ पक्षी
शब्दानुकरण से भी कई शब्द बनते हैं जैसे- कौवा "को काँ"
शब्द करता है इसलिये उस कौवेका नाम संस्कृतमें "काक"
हुआ है। यह केवळ उस कौयेके शब्दका अनुकरण ही है। इसी
टिट् टिट् " ऐसा शब्द करता है इस लिये
उसका यह नाम हुआ है।
औपमन्यय नामक व्याकरणाचार्य का मत है कि ये शन्द भी
इस प्रकार केवल शम्दानुकरणसे नहीं यने हैं परंतु इनका भी
यौगिक अर्थ है। परंतु कई अन्य आचार्य ऐसे शब्दों को केवल
सादानुकरण ही मानते हैं। इस विषयमें प्रायः सर्वसंमत निरुक्ति
(१) जिन पदोंमें स्वर धानु प्रत्यय आदि स्पष्ट प्रतीत होते हो
उनकी निरुक्ति प्याकरणोक्त रोतिसे ही करनी योग्य है। जैसा-
दिव् धातु + अ प्रत्यय-" देय " शम सिद्ध हुआ। यह स्पष्ट
व्युत्पत्ति है।
के नियम ये है-

२० । अर्थ के अनुसार धातु आदिकी कल्पना करके पदको निति नहीं दिखाई देता है वहां वर्ण को समानतासे योग्य धातुकी २ आदि अक्षर कालोप-जैसे धातु"अस्"है उसके प्रथम (२) जहां पूर्वोक्त प्रकार व्याकरण की स्पष्ट रीति से शब्द की व्युत्पत्ति नहीं दिखाई देती है वहां अर्थ की प्रधानता मानकर तथा अर्थ करना चाहिये । जैसा" नि गम् " धातुसे " निघण्टु' शब्द बनाना है, यहां स्पष्ट धातु नहीं है। (३)जहां अर्थ की भी समानता नहीं है और धातु भी स्पष्ट कल्पना करके अर्थ करना चाहिये- जैसा " गम्' धातुसे "in" शब्द बनाया । यहां केवल "" अक्षर की हो समानता है, त इस में गम् धातु स्पष्ट है और न अन्य कोई धातु । अक्षर और वर्ण की समानतासे जो निर्वचन करने का है उस विषय में निम्न लिखित नियम यान में रखने योग्य १ धातु के आदि अक्षर का अवशेष-जैसा "प्रदा" धातु "त" प्रत्यय होकर "त्त पाता है। इसमें दा धातुके आदि अक्षर द का अप्रशंप "द्+तन्त्त हुआ प्रदात 'रूप होना चाहिये था परंतु पैसा नहीं होता। यह उदाहरण इस नियम का है। से " है। वास्तविक न्या अक्षरका लोप होकर "म्तः, सन्ति " आदि रूप पनते ३ कई पदोंमें धातु के अंत्य अक्षरका लोप होता है जैसे गम्' धानुमे त्वा प्रत्यय लगकर रूप होता है। ४ कई उपान्त्य या मायाक्षर का लोप होता है जैसे-गम् धातु "जगमतः" पदोना चाहिये था, परंतु ऐसा न होकर "जग्मतुः ऐना द. यहां “गम्" धातुफ मध्यम अवर्णका लोप होता है जिस से बने है। "का दीर्घ हुआ। " याच है। सर्जका रस्जु पनकर गज्जु होता है। कस् घातुसे कसिता पननेक स्थानपर "सिकता" घनता है। कृत् धातुसे क पाने के २१ गम् का गम् बना और जग्मतुः, जग्मुः आदि गम् धातु के रूप ५कई पदों में उपान्य अक्षर की वृद्धि होती है। जैसे-"राजन्" सद का रूप "राजा" होता है, " दण्डिन्" शब्द का दण्डी रूप होता है। यहां अन्त्य न् का लोप हुआ और उपान्त्य "अ अथवा ६ कहीं किसी अक्षर का लोप हो जाता है। जैसे- (याचना करना) इस धातुका वेद में रूप " यामि " होता है और " याचामि " नहीं होता। बीच के " चा " अक्षर का लोप हुआ।" तत्त्वा यामि " (ऋ० १०२४।११) इस मंत्रम यामि शब्द याचामि" शब्द के लिये आया है। ७ कई शब्दों में दो वर्णों का भी लोप हो जाता है जैसे उच्" इस से “तृच्" बनता है। यहां त्रिके र+इ अर्थात् "रि" का लोप होकर फेवल " त्+ऋच्" मिलकर तृच् हुआ है। ८ किसी शब्दमें आदि अक्षर का विपर्यय होता है जैसे • 'द्युत्' से “धोति" शब्द बनने के स्थानपर " ज्योतिप्" शब्द बनता है। हन् धातुसे "धन" शब्द बनता है। मिद् धातुसे 'बिन्दु' राम्द होता है। ९.किसी शब्दमै अक्षरोंके स्थानमें बदल हो जाता है अर्थात् आदि अक्षर अन्त में और अंत अक्षर आदिमें हो जाता है जैसे- मज घातसे "सर्जु " शब्द पनना चाहिये परंतु " रज्जु " यनता "त्रि+ - धातु म्यानपर "त" धनता है।

२२ १० किसी शब्दमें अन्त्य अक्षर का विपर्यय हो जाता है, जैसे. मिह धातसे " मेघ," वह धातुसे "ओध," गाह् धातुसे "गाध शब्द बनते हैं, यहा धातु के अन्तिम हकारफे स्थानपर अन्य अक्षर हुआ है । इसी प्रकार यह धातु से "व" बनता है, मद् धातुसे मधु बनता है। ११ कहीं नया अक्षर वीचमें घुस जाता है जैसे- अस्(क्षेपण) धातुसे " आस्थत् " बनता है। यहा बीचमेंस्कार घुसा है। निया- रण अर्थ के र (वार) धातुसे द्वार बनता है इसमें दकार बीचमै घुसा है। ये नियम पाठक ध्यान में धारण करेंगे तो उनको शब्दोंकी सिद्धिके विषय में उत्तम शान हो सकता है। क्योंकि इन नियमों के अनुमार ही प्राय सय शब्दोंकी व्युत्पत्ति सिद्ध की जाती है । पाठक इन नियमोका सूय मनन करें और वैदिक शब्दों में इन नियमों के कार्य का अनुभव करें। ये अपर साधारण नियम दिये हैं, परंतु और भी कुछ विशेष नियम है जिनमें धातुका रूप ही यदल जाता है ऐसे नियम देखिये - १२ संप्रसारण होता है । धातुके य र ल य इन अक्षरोंके स्थान पर कल उ होते हैं, इसका नाम सप्रसारण है-जैसे "यज धातुसे " प्टि" शब्द होता है तथा" इष्टवान्, इष्ट्या इष्ट' आदि शाद यनते हैं, यहा यकार के स्थान में इकार हुआ है । अय् पातु के बार म्यानएर उकार होकर "अति" शध्द रक्षा अर्थम पनना है । प्रय् धातुसे "पृथ 'शद दोना है। यहा रकार के स्थानपर ऋकार दुआ । इसी प्रकार प्रद् धातुसे “मृदु" शब्द हुआ दे। " परमात्माये इसके अर्थहै। इसी प्रकार अर्थकरने में सहायता मिलती है " १३ दो शब्दोंके मेल से कई शब्दबनते हैं जैसाघेद का "पुरुष" शब्द है यद्यपि यह समास प्रतीत नहीं होता है तथापियह आरंभ में समास ही है देखिये - पुरुष, (पुर्-उप, पुर-यस, पुरि-वस, पुरि-उप ) अर्थात् जो पूरी नगरीमें बसता है, रहता है, यासोता है घद्द पुरुष कहलाता है । यह शब्द "पुर वस " इन दो शब्दों से बना है, और यस के धकारका उ बन कर पुर+उप-पक्षप" ऐसा शब्द हुआ। इसका उदाहरण देखिये- वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ॥ ऋग्वेद ॥ वृक्षक समान स्तब्ध होकर (दिपि) धूलोकमे (एक) एक (तिनि) ठहरता है (तेन पुरुपेण इदं सर्व) उसमें आत्मा ने यह सब ( पूर्ण ) परिपूर्ण हुआ है।" इस मंत्रमें पुरुष शब्द आत्मा अर्थ में आया है। नगर निवासी मनुष्य इस अर्थ में भी पुरुष शब्दका प्रयोग होता है । देहनिवासी यह भी प्रकार मर्यादा के न्यूनाधिक होनेसे पुरुष शब्दके अनेक अर्थ हो सकते हैं । अर्थात् शरीर रूपी पुरी में रहने वाला जीवात्मा, नगर रूपी पुरीमें रहने वाला नागरिक मनष्य, जगत् रूपी पुरीमें रहने- वाला परमात्मा इत्यादि अनेक प्रकार से अनेक अर्थ" 'पुरुष'शब्द । इसका अर्थ है । इस वेदके शब्दोको क्षेत्र के अनुसार देखना होता है यह बात विशेष है। कई शब्द ऐसे हैं कि जो क्षेत्र विस्तार से भिन्न अर्थ बताने है जैसा देखिये इन्द्र शब्द है, शरीरके क्षेत्रमें रहनेवाला जीवात्मा, राष्ट्रक क्षेत्रमें रहने वाला राजा और जगत् के क्षेत्र में रहने वाला " पाठ ६ इस पाठमें निम्नलिखित मंत्रोंका अभ्यास कीजिये- इळा सरस्वती मही तिनो देवीर्मयोभुवः । धार्हिः सीदन्त्वनिधः ॥ ऋ.१।।१३।९ (इळा ) मातृभाषा, (सरस्वती ) मातृसभ्यता और (मही) मातृभूमि ये (तिम्रः दवाः) तीन देवताएं (मयोभुवः) कल्याण करनेवाली हैं । इसलिये ये तीनों देवताएं (धर्हिः) अंतःकरण में (अ-निधः) न भूलते हुए (मीदन्त)बैठे । इला" शब्द भाषा पाचक है, इळा और इडा ये दोनों शब्द इल " धातुसे यने हैं । इडा अथया इला शब्दके अर्थ बहुत है परंतु यहाँ भाषा अर्थ अपेक्षित है। अर्थ स्पष्ट होने के लिये यहां पूर्वोक्त मंत्रक अर्थमें “मातृभाषा" ऐसा अर्थ लिया है । जो जिन लोगों की जन्म भाषा होती है यह उनकी मातृभाषा कही जाती "सरस्वती " शब्दका मूल अर्थ (सरस् ) प्रधाहसे युक्त है। अनादि प्रयाहसे गुरुशिष्यपरंपराद्वारा जो विद्याकी संस्कृति और सभ्यता आती है, उस प्रवाहमयी सभ्यताका नाम सरस्वती है। "मही" शब्दभुमिका याचक है अर्थात् इसका अर्थ यहां मातृ- भूमि ही अमीर है। ये तीनों देवियां हरएक मनुष्य के लिये उपासना करनेके योग्य हैं। इन तीन देवियों के उपासक राके अंदर जितने अधिक होंगे उतना गएका अधिक अभ्युदय निःसंदेह होगा। इसलिये गेदका फहना है कि इन देवियोंकलिय योग्य स्थान हरपक के हदय में मिलमा चाहिये। ये तीन देवियां कल्याण करनेवाली रसलिये हरएक मनुष्य मममें इन के विषय में मादर धारण करें और इन के लिये अपना तन मन धन न करें।

तिम्रो देवीर्वहिरेनं सदन्तामिडा सरस्वती मही । मारती गृणाना ॥ अथर्व. ५।०७।९ तिम्रो देवीर्य हिरेदं सदन्विडा सरस्वती भारती। मही गृणाना। वा. यजु. २७। १९ (इडा) वाणी, (सरस्वती) विद्या और (मही भारती) भरण- की भूमि ये (तिस्रः देवीः) तीन देवतायें (गृणाना)प्रशंसित होती हुई (बहिः सदन्तां) मनके अंदर चैटें । अर्थात् इनके लिये मनके अंदर योग्य आदर का स्थान हो। सरस्वती साधयन्ती धियं न इळा देवी भारती विश्वतूर्तिः ॥ तिम्रो देवीः स्वधया वर्हिरेदमच्छिन्द्नं यान्तु शरणं निपद्य ॥ क.२।३1८ (नः धियं साधयन्ती) हमारी बुद्धियोंका साधन करनेवाली (सरस्वती) विद्या, (इळा ) मातृभाषा, तथा (विश्वर्तिः भारतो )सबसे विशेष मातृभूमि ये (तिस्रः देवीः) तीन देवियां (स्व-धया) अपनी धारणा शक्तिके साथ ( इदं बर्हिः) यह यक्षस्थान अर्थात् यह मन अपना (शरणं निपद्य) आश्रय देकर (अ-छिद्र) दोषरहित रीति से (पान्तु)सुरक्षित करें। विद्या, भाषा और मातृभूमि ये तीन देवियां बडी शक्तिशाली । अपनी शक्तिसे हमें आश्रय देकर हमारेसे यह हमारा शत सांवत्सरिक यज्ञ पूर्ण करावें । अर्थात् हमारी पूर्ण आयुनक इन तीन देवियोंकी भक्ति हमारेले होती रहे। आभारती भारतीभिः सजोषा इळा देवैर्मनुष्येभिरग्निः । सरस्वती सारस्वते भिर्वा तिस्रो देवीर्वहिरेदं सदन्त ३.७।२।८ भारतीमिः भारती) भारतीके अर्थात् भूमिकी उपरकी जनता के साथ मातृभूमि (देवैः मनुष्यैः इळा) दिव्य मनुष्यों के "

२८
पोपक के समान (नः) हमारे लिये (सनि रद) धनादि भोग दे ।
सरस्वती विद्यादेवीसे अनेकानेक धन प्राप्त होते हैं । विद्यासेही
सुख साधन बढते रहते हैं। तथा वैयक्तिक और सामुदायिक
उन्नति भी विद्याके बढने से हो सकती है।
यस्या अनंतो अतस्त्येपश्चरिष्णुरर्णवः ।
अमश्चरति रोरुवत् ।।
ऋ०६।६१।८
(यस्याः ) जिस विद्याका (अनन्तः) अंतरहित (अ हरुतः)
अकुटिल सीधा, (चरिष्णुः ) आगे बढनेवाला ( अर्णवः) समुद्र
के समान गंभीर (रोरुवत् ) शब्दमय (त्येषः) तेजस्वी (अमः)
सामर्थ्य (चरति ) फैल रहा रहै ।
इस जगत् में विद्याका वेग ऐसा वढ रहा है कि उसका कोई
अंत नहीं है, जो सीधा यढने वाला, गंभीर, तेजस्वी और धडा
प्रभावशाली है। इसलिये इस विद्याके वेग को अपने अनुकूल
बनाना, तथा स्वयं उत्त ज्ञानके वेगसे वेगवान् बनना चाहिये।
सूचना-विद्या प्रशंसा ये मंत्र पढ़ें, अर्थ का मनन करें और
उसपर बहुत विचार करें।
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। "अंशु " नाम सोमका है। सोमवल्लि या विशेषतः सोम रस का यह नाम है । यह शब्द “ अश्+ शं" इन दो शब्दोंसे बनाया जाता है (अशनाय शं भवति ) अशन अर्थात् खाने के लिये शं अर्थात् हितकारी होता है । इस का उदाहरण यह है- अंशुं दुहन्तो अभ्यासते गवि ॥ ऋ.१०।९४।९ “(अंशु) सोमका (दुहन्तः ) रस निकालनेवाले (गवि) चर्म पर (अध्यासते ) बैठने हैं । " यहां अंशु शब्दका प्रयोग सोम अर्थ में किया है । भक्षण करनेसे आनंद देनेवाला इस अर्थ में यह शाद यहां है। (चलना) धातुसे बनता है, शरीरके संपूर्ण बाह्य भागपर यद चलता है, जाता है या फैलता है। पश्च " (छेदन करना ) इस धातुसे पना है जो छेदा जाता है अथवा जिससे शत्रुको छेदा जाता है इस अर्थ में यह शब्द बनता है । पहिले अर्थ में वृक्ष अर्थ और दूसरे अर्थ में लकडीसे चननेवाला धनुष्य अर्थ है इस दूसरे अर्थका उदाहरण चर्म शब्द " " देखिये- वृक्षे वृक्षे नियता मीमयद्गौस्ततो चयः प्रपतान्पूरपाद.॥ ऋग्वेद. १०१२७ १२२ "(वृक्षे वृक्षे ) प्रत्येक धनुष्य पर (नियता ) चढाई या तनी हुई (गौः) चर्म से पनी डोरी (अमीमयत् ) शब्द करती है और (पुरुषादः) मनुष्यको खानेवाले (वयः) पक्षियों के सदृश बाणोंको (प्रपतान ) फेंकती है।" यहां तीन शब्द मनन करने योग्य हैं- १ वृक्ष- लकडीसे बना धनुष्य २ गौ- गोचर्मसे बनी धनुध्यकी डोरी ३ वय:- पक्षियोंके पंख लगे बाण यहां मूल शब्द ही उससे बने हुए पदार्थ के लिये प्रयुक्त हुआ है । वृक्ष शब्द खटिया, मंचक, मेज इस अर्थ में भी वेदमें प्रयुक्त है क्योंकि वृक्षकी लकडीसे ये पदार्थ बनते हैं। वेद की यह विशेषता पाठकोंको ध्यानमें धारण करनी चाहिये । अंश के लिये पूर्णका प्रयोग वेदमें बहुत स्थानपर होता है और उसके ये उत्तम उदा- हरण हैं। याणपर पक्षियों के पंख लगते हैं इस लिये पक्षियोंका एक अंग वाणोंपर लगता है इस कारण वाणों के लिये पक्षिवाचक शब्द का प्रयोग होता है। इसी प्रकार गोचर्म से धनुष्यकी ज्या दोरीबनती है इसलिये ज्या के लिये गो शब्दका प्रयोग होता है, दूध गौ से मिलता है इस लिये दूधके लिये गो शब्दका उपयोग होता है। इसी प्रकार पाठक विचार करके जाने । " निर्गति " शब्द पृथ्वीका पाचक है क्यों कि यह (नि+रमू- निरमयति ) मनुष्यादि प्राणियों को पारंवार रममाण करती है, इससे प्राप्त होने वाले फलों या फूलोंसे प्राणिमात्र रममाण होते हैं। "निळति" शब्दका दूसरा अर्थ "कष्ट, दुर्गति, पुरी अवस्था" आदि प्रकार होता है। यह शब्द उपरोक्त शब्द से भिन्न शब्द है । यह शब्द निर+अच्छ" (कप्ट प्राप्त होना) इस धातुसे बनता है । पाठक यहां देखें कि यद्यपि ये दोनों शब्द एक जैसे दोसते हैं तथापि इनके यनने में कितना अंतर है और इनके अर्थ में भी किनना मेद हैं । वस्तुतः ये दो शब्द एक दूसरे से भिन्न ही हैं। "अंतरिक्ष"शब्द मध्य अवकाश अंतरिक्ष लोक का वाचक है (अंतरि) धीचमें (क्ष)निवास देनेवाला । क्षि धातु निवास करनेके अर्थ में है । यह शब्द पृथ्वी और सूर्य के बीच के स्थान का याचक है। यह लोक अपने अंदर (अंतरि) अनेक पदार्थों को (क्ष)म्यान देता है यह इसका अर्थ है।

१ तन की तुलना करें। पुरोहित " स्वः) ये दो "शंतन " शब्द "शं+तनु" इन दो शब्दोंके योगसे धना है, (शं) सुखको जो (तन) फैलाता है। धातु फैलाने के अर्थमें है। इसका दूसरा भी अर्थ होता है, (शं) सुख है (तनु )शरीरमें जिसर्फ अथवा शरीरसे जो सुखी है। इस रीतिसे शब्द सिद्ध करनेमें तन् धातुसे यह शब्द नहीं थना, परंतु दो शब्दोंका समास हुआ है। पाठक पूर्व शब्दसे इस शब्द शब्दमें दो शब्द हैं। पुरः + हितः । इसका अर्थ (पुरः) आगे अग्र भागमें (हितः) रखा हुआ। सब कार्य में जिसको आगे रखा जाता है । स्वः" शब्दके वेदमें अनेक अर्थ हैं, परंतु उसका आदित्य" भी एक प्रधान अर्थ है । (सु + अर्% स्वर् = शब्द इसमें हैं । (स) उत्तम प्रकारकी (अर् ) गति से युक्त शब्द आदित्य वाचक होता है । इसी प्रकार शोभन गतिसे युक्त पदार्थोका यह नाम हो सकता है। इसीप्रकार से दूसरा + ईरण: " अर्थात् उत्तम प्रकार सु दूर करनेवाला. सूर्य अंधकारको दूर करता है, इसलिये उसका चाचक यह शब्द है। .' शब्द सूर्य चाचफ है । नायक शब्द के मध्य यकार को उडानेसे " नाक" शब्द होता है अर्थात् यह नायक अर्थमें है । सूर्य अपनी ग्रहमाला का नायक होने से इसका यह नाम है। इसका दूसरा अर्थ " न + अ + क " इसप्रकार व्युत्पत्तिसे बनता है । क शब्द सुखवाचक है । अक शब्द दुःख वाचक वना, फिर उसका नकारने निषेध किया, इससे न + अक (नाक) शब्द सुख वाचक धना । यह सूर्य सयके सुख का हेतु है इसलिये इस का यह नाम है। । होने के कारण " अर्थ नाक 1 " दिशा" शब्द "दिश् ' धातुसे बना है, दिशा बताने का भाव इसमें है। " काटा "शब्द भी दिशा वाचक है, (फ्रान्त्वा स्थिताः) उलांयार ठहरती है, जितना भी आगे देखा जाय उतनी आगे भी वहीं दिशा रहती हो है, सच मर्यादा को उल्लांघकर वह रहती है इसलिये उसका यह नाम है। सूर्यका भी नाम " फाटा" है इसलिये कि यह सबको उल्लांघ फर ठहरता है। इसीप्रकार अन्यान्य पदार्थोका नाम काष्ठा होता है । जिनमें उक्त गण होगा। " शरीर " शब्द "शु ' (हिंमा फरना) इस धातुसे यनता है। शरीर नष्ट होता रहता है, क्षीण होता रहता है इस अर्थ का यह धातु इसमें है। तमः शब्द अंधकार वाचक है, यह अंधकार फैला हुआ होता है, इसलिये "तन्" (फैलना) इस धातुसे यह शब्द बनता है, जो एकदम सत्र फैल जाता है। दास " शब्द "दस ' (क्षयको प्राप्त होना) इस धातुसे बनता है । जो दुष्ट कर्मों द्वारा अपना नाश करता है यह दास शन्द द्वारा योधित होता है । गुलाम, हीन, दस्य आदि जो हीन कर्ममें रमता है और अपने हीन कर्माद्वारा अपना नाश करता है उसका यह नाम है। सूचना। पाठक इस प्रकार येदिक नाप्दोंके अर्थ देखें और उनकी व्युत्पत्ति करनेका निधि जाने । इस पुस्तक कई शादों की व्युत्पत्तियां और निरुक्तियां दी हैं. इनका विचार पूर्वक मनन करनेमे पाठकों को यह पात जात हो सकती है।

पाठ ८ इस गाउमै निम्न लिसित मंत्री का आययन कीजिये-- सरस्थती देवयन्तो यन्ते सरस्वतीमधरे तायमाने । सरस्वती सुकृती अद्वयात सरस्वती दाशुषे वार्य दात् । (देवयन्ता देयता बननेकी इच्छा करने वाले (सरस्वती) विद्यादेवी को (इयन्ते ) यलाते हैं, प्राप्त करते हैं। ( अध्वरे ताय. माने ) या फैलाने के समय (सरम्यती) विद्यादेवी की उपासना होती है। (स-कृतः) अच्छा कर्म करने वाले (सरस्वती अइयन्त ) विद्या देवी को ही पुकारते हैं। यह सरस्वती अर्थात् विद्यादेवी (दाशुषे ) दाताको (चार्य दात् ) सामर्थ्य देती है। उक्त अवस्थाओं में विद्यादेवी की उपासना लोग करते हैं। विधासे पल बढता है और सब उन्नति और पुरुषार्थ करना मनुष्य के लिये स्कर होता है । इस लिये हरएक मनुष्यको अपने अंदर विद्याका बल पढाना चाहिये । शानसे अपने सय सखसाधन परि- पूर्ण करने चाहिये। (अथर्व- १२११) वैदिक धर्म " में राष्ट्रीय भावना और सार्वजनिक हित की कल्पना प्रमुख होने के कारण “ मातृभूमि " के विषय में अत्यन्त आदर का भाव होना स्वाभाविक ही है। अथर्व वेदमें एक "वैदिक राष्ट्रीय गीत " अथवा "मातृभूयिका सूक्त " इसी मातृभूमि की भक्तिकाद्योतक प्रसिद्ध है सूक्त कारों ने इसका विनियोग निम्नधकार किया है- ३ ३ (१)ग्राम पत्तनादि रक्षणायें। (२) पुष्टिकाम , कृपिकाम , श्रीहियवानकाम , पुत्रधनादि काम, मणिहिरण्यादिकाम , पथिवीमहाशातिकाम , भूमिकाम पृथिवी उपतिष्ठते । (अथर्य सा० भा० ) "(१) ग्राम पत्तन नगर राष्ट्र आदिकी रक्षा के समय, तथा (२) पुष्टि कपि,धनधान्य आदिकी प्राप्तिक प्रयत्न करने के समय, भूमिकी प्राप्तिके लिये प्रयल करने के समय तथा मातृभूमिमे जिस ममय अशाति होती है, उस समय देश में पुन शान्ति प्रस्थापित करने के अवसर पर इस "भूमि सूक्त " का पाठ किया जाता है । इस लिये हर एक वैदिक धर्मी को इस सूक्त का अध्ययन तथा मनन करना आवश्यक है। इस सूतके कई मत्र यहा दिये जाते हैं। सत्य यहनमुन दाक्षा तपो ब्रह्म या पृथिवीं धारयन्ति । सा ना भूतस्य भन्यस्य परस्युरुं रोक पृथिरी न कृणोतु ॥ १ ॥ (सत्य) सत्य, (यहत् ) , (मत) न्याय्य व्यवहार (उप्र) भाग तेज, (दीक्षा) दक्षता (तप) बन्द सहन करनेकी शकि. (प्रल) भान (यक्ष ) सत्कार सगति दानात्मक शुम कर्म, ये. आट गुण (पृथिवी) मात भूमि का (धारयन्ति) धारण करते हैं । सा) य६ (न) हमारी ( पृथ्वा) मातभूमि, जो हमारे (भूतस्य ) मत और ( मन्यस्य) भविष्य तथा वर्तमान अवस्था की (परना ) पान करने वाली है, यह (न) हमारे लिय (डर HIN) स्तृित गान (णोत ) कर। मातभूमि की स्वतत्रताकTRIक्षण जिन श्रेष्ठ सदोस होता है ये आठ गुण य है- (१)मयनिष्टा (6)यर सपर्धन, (३) न्याय्य प्ययधार, (५) क्षात्र नप, (.)क्नंप्य दसता, (६) शात उग्ण महन करन यी शनि (७) शान आध्यात्मिक,

1
आधिभौतिक और आधिदैविक-ज्ञान तथा विज्ञान, और (८)
श्रेष्ठों का सत्कार, आपस को पता और अनायों की सहायता
करने के लिये आवश्यक कर्तव्य कर्म करना। इन गुणों से अर्थात्
ये गुण जनातमें घढनेसे-मातृभूमि का धारण होता है। इन गुणों
से जिस मातृभूमिका धारण हुआ है, ऐसी मातृभूमि यहां के
लोगोंके भूत भविष्य और वर्तमान कालीन अवस्था का संरक्षण
करती है । और वहां के लोगों को अपने देशमे जितना चाहिये
उतना विस्तृत स्थान, अर्थात् फैलाने के लिये स्थान देती है।
तात्पर्य यह है कि उक्त आठ गुणों से मातृभूमि की स्वतंत्रता
का संरक्षण हो और अपने देश हरएक को अपने विस्तार के
लिये पर्याप्त विस्तृत क्षेत्र प्राप्त हो ॥ १॥
असंबाधं मध्यतो मानवानां यस्या उद्वतःप्रवतः समं बहु ।
नाना वीर्या औषधीयर्या विभर्ति पृथिवी नः प्रथतांगष्यतांन॥२॥
(यस्याः) जिस मातभूमिफे (मानवानां ) मननशील मनुष्यो
के (मभ्यतः ) अंदर (उत्-वत ) उच्चता और (प्र-चतः)
नीचता तथा (समं ) समता के विषयमें (बडु) बहुत ही (अ-
सं-बाधं ) निरता है । और (या) जो (नाना वीर्या ओपधी)
नाना प्रकारके वीयों से युक्त औषधियों को (विभर्ति) धारण
पोपण करती है. (नः पृथियो ) यह हमारी मातृभूमि (नः
प्रथता ) हमारी कीर्तिका (रायतi) साधन हो ।
लिस हमारे राष्ट्र के विचारशील मनुष्यों में परस्पर द्रोहमाव
नहीं है प्रत्युत उनमें पूर्ण ऐक्यभाव है, और उनमें उच्चता,नीयता
और समता के विषय के कोई झगड़े नहीं हैं। तथाजो हमारी
मातृभूमि विविध गुणों से युक्त अनन्त औषधिवनस्पतियों को
उपजाती है, यह इमारी मातृभूमि हमारे यश को फैलाने के लिये
कारणीभूत हो ॥२॥

३६ यस्यां समुद्र उत सिन्धुरापो यस्थामन्नं कृष्टया सं बमूवः । यस्यामिदं जिन्वति प्राणदेजत्सा नोभूमिःपूर्वपेये दधातु ॥३॥ (यस्यां) जिसमें समुद्र (उत ) और (सिन्धुः) नदी तथा (आपः ) जलाशय बहुत है और (यस्यां ) जिसमें (कृष्टयः) खेतियां ( अन्नं ) अन्न की (सं बभूवुः) उत्पत्ति करती हैं (यस्यां) जिसपर (इदं प्राणत्)यह श्वास लेने और (पजत्) हलचल करने वाला प्राणिजात (जिन्वति) चलता फिरता है, (सा) वह (भूमिः) हमारी मातृभमि (नः ) हमको (पूर्व पेये) पूर्ण पेय अर्थात् समस्त खानपान के पदार्थ (दधातु)दे । जिस हमारी मातृभूमि में समुद्र, नद, नदियां, तालाब, कूप, झील, झरने आदि यहुत हैं, उनके जलसे सब कृषीवल अनेक प्रकार को खेतियां करके जहां विवि धान्यादि उत्पन्न करते है, तथा उस अन्न और पान का सेवन करके अनेक उत्तम उत्तम प्राणी जहां आनन्द से रहते हैं यह हमारी मातृभूमि उत्तम सानपान हमें देती रहे । अर्थात ऐसा कभी न हो कि हमारी मातृभूमि से उत्पन्न हुए अन्नसे दूसरे पुष्ट होते रहें और हमको खाने को कुछ भी न मिले ॥३॥ यस्यां यतस्रः प्रदिशः पृथिव्या यस्यामन्नं हटयः संयम्युः। या विभति पहुधा प्राणदेजत् सा नो भूमिर्गौप्यस्यग्ने दधातु ॥४॥ (यस्याः पृथिया) जिस मातृभूमि की (घतम्नः प्रदिशः) घागे दिशाओं में (पथ्यः) विविध गतियां (यस्यां ) जिसमें (अ) अन्न को (मं यम्युः ) उत्पन्न करती है और उससे (या) ओ भूमि (पजन प्राणत) घूमनेयाले प्राणिमात्र को (पा-धा) बाल प्रकार मे (विमति ) पट करती है (मा) (नो भूमि )मार्ग मातममि में (गो) गीनों में और (भन्ने मगि) अभी (धान) रक।

जिस हमारी मातृभूमि में चारों दिशाओं में खेती से विविध
प्रकार का अन्न उत्पन्न होता है, जिस को खा कर सा प्राणिमात्र
हर पुष्ट होते हैं और आनन्द से जिस पर विचरते हैं। वह भूमि
हमें विपुल अन्न और गौ देनेवाली हो । अर्थात् हम सदा
अन्न और गौवों के वाचमें मातमूमि की कपासे रहें। ऐसा कभी
न हो कि हमारी मातृभूमि की गांवों का दूध और कृषि से उत्पन्न
हुआ अन्न दूसरे ही ले जाय और हम वंचित हो रहे ॥४॥
यस्यां पूर्व पूर्वजना चि चकिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन् ।
गयामश्वानां वयस विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु ॥५॥
(यस्या) जिस मातृभूमि में हमारे (पूर्व) प्राचीन (पूर्व जना)
पुर्यजी ने (वियकिर ) विविध कर्तव्य किये ये और ( पस्या)
जिस में (देवाः ) देयों ने (असुरान ) असुरों को (सभ्यपर्त-
यन् ) हराया था। तथा जो (ग) गौओं, (अश्वानां) घोडों
(वयपसः) और पक्षियों का (विस्था) विशेष निवास स्थान
है, वह (नः पृथिवी) मारो मातृभूमि हमें (भग) ऐश्वर्य
और (चर्च)नेज (धातु )देवे।
जिस मातृभूमि में हमारे प्राचीन पूर्यगोने विविध प्रकार के
पराकम किये थे, जिसमें सजनों ने दुशों का परामय किया था
और जिसमें गौ, घोडे तथा अन्य पशुपक्षी मी आनन्द मे रहते
है, यह हमारी आश्रयदायी मातृभूमि हमें ऐश्वर्य और तेज देने
विमरा वसुधानी प्रतिष्ठा हिरण्ययक्षा जगतो निवेशनी ।
घेश्यानरं पिसती भूमिरम्निमियपमा पिणे नो दधातु ॥६॥
(विशे-मरा) सप की पोपण करनेपाली, (यपधानी)
रनों की खान, (प्रतिष्ठा)सप का आधार (दिरण्य यक्षा)
जिसके अन्दर सुपर्ण है, (जगतः नियशनी) प्राणियों का नियात
पाली छोये ॥५॥

३ मायके साथ रहते हैं।" अर्थात दिन और रात्री अपने विरुद्ध पाठ ९ पणि" शब्द यनियेका वाचक है, यह पण " (व्यवहार करना) इस धातुसे बनता है । " वणिक" शब्द भी उसी पणि शब्द का ही रूप है। पणि पणिक यणिक चणिक इस प्रकार इस की उत्पत्ति है । (पण्यं नेमेक्ति) बेचने के पदार्थ नित्य ले जाता है। इसलिये उसको वणिक् कहते हैं । " विल ' शब्द की उत्पत्ति वडी विचित्र है । "भृ" (भरण करना) इस धातुसे " भर " शब्द बनता है । भर भल- भिल. बिल इस प्रकार अंतमें बिल शब्द बना । म अक्षर का च बनता है और अकार का इ भी बनता है। शब्द रूप धातुसे बना है। जिसमें कर्षण अथवा निकृष्टता होती है उस वर्णका नाम कृष्ण (काला) है । अह. " शब्द दिनवाचक है ( उपाहन्ति अस्मिन् कर्मणि) इस दिनमें सब कर्म किये जाते हैं। अ+हर शब्द में यहां "आह" धातकी कल्पना की है। इन दोनों शब्दों के उदाहरण के लिये निम्म लिखित मंत्र देखिये- अहश्च कृष्णमहर्जुनं च विवर्तेते रजसी वेद्याभिः ।। ("कृष्णं अहः च ) काला दिन अर्थात् रात्री और (अर्जुन अहःच) श्वेत दिन अर्थात् दिन ये दोनों (रजसी) शोमा चाल (घेद्यामिः) सातव्य निज प्रकृति के साथ (वियर्तेते) सदा विरुद्ध गुणों से युक्त है। र और ल का अमेद होता है। वेदमें यह नियम यहुत स्थानों में दिखाई देता है जैसा मेघधावक "उपर, उपल" ये शाद लीजिये। " कृष्ण " " ऋ०६।९।१ इन्द्रसे जिसपर वृष्टि होती है, ऐसी हमारी (भूमिः) मातृभूमि कराने वाली, (वैश्वानरं ) सर मनुष्य समूह रूप (अग्नि) अग्निका (यिनती) धारण पोपण करनेवाली और (इन्द्र वृषभा) (नः) हमको (दविणे) धन और बल के बीच (दधातु) रखे। जो हमारी मातृभूमि सय प्रकारके रल, सोना, चांदी आदि की खान है, सब प्रकार के खान पान देकर जो सब प्राणियों का पोपण कर रही है मनुष्यसमुदायापी राष्ट्रीय अनिको जो जगाती है और जहां स्वयं इन्द्र ही टि करता है वह हमारी श्रेष्ठ मातृभूमि हम सब प्रकारके घनों के बीच में रखे ॥६॥ यो रक्षस्यस्थप्ना विश्वदानी देवा भूमि पृथिवीमप्रमादम् । मधु वर्चसा ॥ ७॥ ( विश्व-दानी) सब कुछ देनेवाली ( यां पृथिवीं भूमि) जिस विस्तृत मातृभूमि की (अ-स्थप्नाः ) सुस्ती न करने पाल (देयाः) देवता लोग (अ-माद) प्रमाद रहित होकर(रक्षन्ति) रक्षा करते हैं, (सा) यह (ना) हमको (प्रियं मधु) प्रिय मधु (दुहां)देती रहे (अयो) और (वर्चसा ) तेजके साथ ( अक्षतु) यढाये। जिम हमारी मातृभूमि की रक्षा शानी और पूर पुश्प प्रमाद रहिम होकर और मुम्नी को छोटकर करते आये है, प६इम सत्र कुछ देने वाली मातृभूमि सदा हमारे लिये मीठे मीठे पदार्थ देती द और मारा तंज और पल पलाती रहे॥७॥ प्रियं दुहामयो उशनु " पाठ ९ पणि " शब्द यनियेका वाचक है, यह पण " (व्यवहार करना) इस धातुसे बनता है। "वणिक" शब्द भी उसी पणि शब्द का ही रूप है। पणि-पणिक- यणिक-यणिक इस प्रकार इस की उत्पत्ति है । (पण्यं नेनेक्ति) बेचनेके पदार्थ नित्य ले जाता है। इसलिये उसको वणिक् कहते हैं । " बिल " शब्द की उत्पत्ति बडी विचिका है । "भृ" (भरण करना) इस धातुसे " भर " शब्द बनता है । भर भल भिल- बिल इस प्रकार अंतमें पिल शब्द बना । म अक्षर का य यनता है और अफार का इ भी यनता है। कृष्ण " शब्द कृष् धातुसे बना है। जिसमें कर्षण अथया निकटता होती है उस वर्णका नाम कृष्ण (काला) है । अह. " शब्द दिनवाचक है ( उपाहन्ति अस्मिन् कर्मणि) इस दिनमें सब कर्म किये जाते हैं। अहर् शब्द में यहां "आनह' धातुकी कल्पना की है। इन दोनों शब्दों के उदाहरण के लिये निम्म लिखित मंत्र देखिये- अहश्च कृष्णमदरर्जुनं च विधतेते रजसी वेधाभिः॥ ऋ०६।९।१ ("कृष्णं अहः च) काला दिन अर्थात् राम्रो और ( अर्जुन आःच) श्वेत दिन अर्थात् दिन ये दोनों (रजसी) शोमा पाले (पेद्यामिः) ज्ञातव्य निज प्रकृति के साथ (विवर्तते) सदा विरुद्ध मायके साथ रहते हैं। " अर्थात दिन और राती अपने विरुद्ध गुणों से युक्त है। र और ल का अभेद होता है। वेदमें यह नियम बहुत स्थानों में दिखाई देता है जैसा मेघवावक "उपर उपल"ये शब्द लीजिये।

र के स्थानपर ल हुआ है। वास्तवमै उपल शब्द पत्थरका वाचक है। मेघोंसे ओले (पत्थर जैस) गिरते है इस लिये मघोंका ही यह नाम हुआ। उपर " शब्द में 'उपरम्" धातु है । जिस में लोग रमते हैं, जिसकी शोभा देखकर जन रमते हैं उसका नाम उपर " (मेघ) है। प्रथम शब्दकी भी उत्पत्ति देखिये प्रष्टतम प्रतम प्रथम इस प्रकार बीचके दो अक्षर लुप्त हो गये हैं और तके स्थानपर यहुआ " शुष्म" शब्द बलवाचक है, "श " (शोषण करना)इस धातुसे बनता है । बल से शत्रु की शक्ति शुष्क की जाती है । सानु" शब्द पर्वत शिखर का वाचक है, इसकी निरुक्ति ऐसी है । ( स + उत् + गुन्न) समुनुन्न-समुनु-सन्नु सानु मूल शब्द का संक्षिप्तरूप इस प्रकार घना । समुन्नन्न शब्द का अर्थ अत्यत उच्च स्थान, " यही सानु शब्दका अर्थ है। शब्द का ही रूप है, पर शब्द का अर्थ M "पर' शब्द पार " "मुहर्त शब्द कुच्छ कार का पाचक है, इसकी उत्पति"मुटु + मनु" मुहु+ऋतु- मुहर्त " यह है । यह है । स्तुका अर्थ कालनिमाग है, वारवार होने वाला काल विभाग मुहूर्त कहलाता है। फल् ' (गतो) धातुसे बनता है। यह समय सदा चर रहा है इसलिये इसको फार कहते हैं। कल् धातुका नाश भी है । काल सयका संहार करता है इसलिये इसका यह नाम। "पाणि 'शब्द हाय का याचक है । पण धातु व्यवहार काम कामना आदिका याचक है। इससे पाणि शद प्रनता है। हाप पाम पास पिया जाता है इस लिये यह नाम सार्य है।

" " अपत्य" इस पथ, पन्था" शब्द मार्ग वाचक हे, पत् अथवा पथ् धातुसे यह बनता है, पावसे चला जाता है, एक स्थानसे दूसरे स्थानतक पहुंचाता है, इसलिये इसका यह नाम हुआ है। . शब्द में (अ+पत्य) ये दा शब्द हैं। अपतन अर्थात् जिससे पतन नहीं होता, कुलका अधःपात जिससे नहीं होता, उसका नाम अपत्य अर्थात् संतान है । "दुहिता " शब्द पुत्रीका वाचक है, "दूर+हिता" अर्थात् दूर रहनेपर हितकारी यह इसका आशय है । दूरेहिता- दुर्हिता- दुहिता इस प्रकार इसकी निरुक्ति है। श्मशान "शब्द तदाह करने के स्थान का वाचक है में दमनशान ये दो शब्द है । श्म शव शरीर वाचक और शान शन्द शयन वाचक है। जहां शरीर अंतमें शगन करता है उस स्थानका याचक यह शब्द है। श्मश्रु" शब्द यालोका वाचक, दाढीमंछका पाचक है। इस का अर्थ (श्म+ध्रु) म अर्थात् शरीरमें श्रित अर्थात् जो आश्रित है, शरीरके आश्रयसे जो रहता है, उसका नाम श्मश्रु है । "लोम " शब्द बालका वाचक है। यह "लु '(काटना)हम धातुसे बना है । जो काटे जाते हैं उनका नाम लोम है। "जामि' शब्द यहिनका याचक है, "जन्” (उत्पन्न करना) म धातुसे यह शब्द पनता है। इसमें पति पुत्रको उत्पन्न करता है। "निपाद " शब्द पंचम वर्णका याचक है, "नि+पद" (नीचे पैठना ) इस धातुसे इसकी उत्पत्ति है, सबसे नीचे बैठनेका अधि. कारी यह है। आर्य धर्म में पांच जन है, उसका वर्णन निम्नलिखित मंत्रमें पाठक रेस- यत्पांचजन्यया विशेन्द्र घोपा असृसत । अस्तृणाद यहणा विपोऽयों मानस्य स क्षयः । ऋ० ८४६३ । " ।

यल
"
(यत् ) जो (पांचजन्यया विशा) पांचों जनोंके समूहरूप
प्रजासे (इन्दे) राजाके लिये (घोपः असृक्षत ) शब्द निकलते
हैं तव (सः विपः) वह बुद्धिमान. (अर्यः) समर्थ श्रेष्ठ, (मानस्य
क्षयः ) संमान का अधिष्ठाता राजा (बर्हणा अस्तृणात् ) अपने
सामर्थ्य से शत्रुओं को दूर करता है ।
इसमें पंच जनोका वर्णन है और पंचजनों की शक्तिका भी
वर्णन इसमें है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र और निषाद ये पंचजन
है। इनकी सहायता राजाके लिये मिलनी वाहिये। यह भाव
उक्त मंत्रमें है।
अन्न " शब्द " अद् " (साना) इस धातु से बना है । जो
साया जाता है उसका नाम अन है।
शन्द शक्तिका याचक है । यह "भृ" (धारणपोषण
करना) इस धातुसे बनता है। भृ धातुसे भर शब्द बनता है और
उसले भर-घर-घल इस प्रकार रूपान्तर को प्रात होता है।
शन्द इव्य अथवा संपत्ति का पावक है। यह शन्द
तर्पण अर्थवाली "धि " अथवा "धन्" धातुसे बना है । जिससे
तृप्ति होती है, जिससे धन्यता प्रतीत होती है उसका नाम धन है।
क्षिप्र"शन्द शीघ्रताका वाचक है, इसका माम्य "सं-
क्षिप्त" शन्द के साथ है । समयको संक्षिप्त रूपमें लाने का नामही
शीघ्रता करना है।
"यहु' शब्द प्रसिद्ध है, यह "प्रमु" शब्दक साय संबंधित
है। प्रम पम पहु बहु इस प्रकार यह शन्द बन गया।
"गृह' शब्द घरका याचक है यह " प्रह" (लेना)धातु से
यना है । (गृहानि इति गृह) जो फुटयियोको लेता है उसका नाम
घर है।
'सुस 'शम्द सय जानते ही है। (सु) उत्तम प्रकारसे (प)
"
धन"

रंद्रिय जिससे रहता है उसका नाम सुख है। जिससे इंद्रियों को आराम होता है। 1 सूचना। 1 इस प्रकार पाठक शब्दोको व्युत्पत्तियां देखें और अनुभव करें कि यौगिक अर्थ इस रीतिसे देखे जाते हैं। पाठ १० पार्णवेऽधि सलिलमन आसीधा मायाभिरन्वधरम्मनीषिणः । यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः॥ सा नो भूमिस्त्विर्षि वलं राष्ट्र दधातूत्तमे ॥ ८॥ (अग्रे ) प्रारंभ में (या) जो ( अर्णवे) समुद्र के (अधि) अपर ( सलिलं ) जलरूप (आसीत् ) थी। और (मनीषिणः) गुद्धिमान् लोग (मायाभिः) बुद्धि और कशलता आदि से (यां) जिस की (अन्यचरन् ) सेवा करते आये हैं ( यस्याः पृथिव्याः हृदयं ) जिस पृथ्वीका हृदय (परमे व्योमन् ) बड़े आकाश में (सत्येन आवृतम् ) सत्य से आवृत होने के कारण ( अ-मृतं) अमृतरूप है । (सा) वह (ना) हमारी (भूमिः) मातृभूमि हमारे (उत्तमे राष्ट्र) उत्तम राष्ट्र में (विपि) तेज और (वलं)वल (धातु) धारण करे। प्रारंभमें जो समुद्र के बीच में थी, जिसका यीचका भाग भी सत्य आत्मा से व्याप्त है, जिस की सेघा शानी लोग धुद्धि से और कुशलता से करते आये हैं, यह मातृभूमि हमारे श्रेष्ठ राधमै उत्तम तेजस्थिता और पल की वृद्धि करे ॥८॥ पस्यामाप परिवराः समानीरहोगये अप्रमाद क्षरन्ति । सानो भूपिरिधारा पयो दुहामयो उझनु यर्वसा।"

पाठ ११ भूम्यां देवेभ्यो ददति यज्ञ हव्यमरं कृतम् । भूम्यां मनुप्या जिन्यंति स्वघयानेन मत्याः । सानोममिःप्राणमायर्टधातु जरदष्टिमा पृथिवी कृणोतु ॥२२॥ (भूम्यां ) हमारी मातृभूमि में (देवेभ्यः) अग्न्यादि देयो के लिये (अरंकनं ) सुसंस्कृत किये हुए (हन्यं) हवनीय पदार्थों का (य) या ( ददति ) करते हैं । इसी (भूम्यां) भूमिपर (माः मनुष्याः) मरण धर्म वाले मनुष्य (स्थ-धया) अपनी धारणा शक्तिसे और अन्न से (जिन्यन्ति ) जीवित रहते हैं। इस प्रकार की (सा)यह (नः पृयिनी भूमिः) हमारी विस्तृत मातृ भूमि हमारे लिये (प्राणं) प्राण का यल, (आयुः) दीर्घ आयु ( दधातु ) देये और (मा) मुझे (जरदष्टिं) वृद्ध अर्थात् अति दीर्घ आयुसे युक्त (कृणोतु ) करे॥ जिस भूमिमें देवों के प्रीत्यर्थ यध्याग और इटियां करते हैं और जहां सब मनुप्य उत्तम अन्न का मोग करके अपनी निज धारणा शक्ति से उन्नत होते रहते हैं, यह हमारी मातृभूमि हमारे लिये आयु आरोग्य और दीर्घ जीरन तथा यल देघे । शिला भूमि रहमा पांसुः पा भूमि. संघृता धृता।) तस्यै हिरण्यवक्षसे पृथिन्या अकरं नमः ॥ २६ ॥ (शिला) शिला ( अदमा) परयर तथा (पांसुः) धूलिरूप यह (भूमिः ) मातृभूमि है।(सा) उसका (सं-घृता)धत्तम मंतिसे धारण होने पर ही यह (धता) समरक्षित होती है। (नस्ये) उम (हिरण्य-पक्षमे ) अपने अन्दर मुर्ण धारण करनेवाली (पृथिव्यै ) मातृभूमि के लिये मैं (नमः) नमन (अफर) करता हूं। जिस में मिठ्ठी, पत्थर, शिला आदि हैं और सोना चांदी आदि खनिज पदार्थ भी विपुल हैं वह हमारी मातृभूमि है। इसका प्रथम मंत्रोक्त आठ गुणों से उत्तम प्रकार धारण होने से ही इसकी स्व . तंत्रताकी रक्षा होती है । इस लिये इस प्रकारको वंदनीय मातृ.. भूमि के लिये मेरा प्रणाम है। यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुधास्तिष्ठन्ति विश्वहा । पृथिवीं विश्वधायसं धृतामच्छावदामसि ॥ २७ ॥ (यस्यां) जिसमें (वानस्पत्याः वृक्षाः) वनस्पतियां और वृक्ष (विश्वहा ) सदा (ध्रुवाः ) स्थिर (तिष्ठन्ति ) रहते हैं। उस (विश्व-धायसं) सय को धारण करनेवाली और जिसका हमने (धृतां) धारण किया है ऐसी (पृथिवीं) मातृभूमिका (अच्छ आवदामसि) हम स्वागत करते हैं। जिस हमारीमातृभूमि में वृक्ष, वनस्पतियां और विविध औषधि यां सदा फूलती और फलती है, जो हम सब का धारण कर रही है और हम सय (प्रथम मंत्रोक्त आठ गुणों के द्वारा) जिसका धारण कर रहे हैं, अर्थात् जिसकी स्वतंत्रता की रक्षा कर रहे हैं, उस यंदनीय मातृभूमि का हम सय स्वागत करते हैं । उदीराणा उतासीनास्तिष्ठलः प्रकामन्तः। पद्भ्यां दक्षिणसव्याभ्यां मा व्यथिमदि भूम्याम् ॥ (उदौराणाः) उठते हुए, (उत आसीनाः) और पैठे हुए, (तिष्ठन्तः)खहे होते हुए, तथा (प्रजामन्तः) चलते फिरते और दौडते हुए (दक्षिण-सय्याभ्यां) सीधे और यांएं (पद्यां) पांग से (भूम्यां) भूमि में (मा व्यथिमदि) न कष्ट उत्पन्न करें। हमारी हरएकप्रकारकी हलचस कट स्पन्न करनेवाली नहो।

१८ विमृग्वरी पृथिवीमा पदामि क्षमा भूमिं ब्रह्मणा वावधानाम पुए गिनतीमन्नभागं धृतं स्वाभि नि पोदेम भूमे ॥२९ (वि-मम्बरी) विशेष खोज करने के योग्य, (ब्रह्मणा) ज्ञा जिसको ( वावधानां ) वृद्धि होती है, (ऊर्जे) बलकारक ( पुष्टिकारक (घृतं अन्नभाग) घी और अन्न आदि भोग्य प. (विनंती) धारण करनेवाली, (क्षमा ) निवास करने में (पृथिवीं) विस्तृत (भूमि ) मानभूमि की मैं ( आ वदामि प्रार्थना करता हूं कि हे (भूमे) मातृभूमि' (त्या) तुझपर (अ नि पोदेम) हम सब वैठे। हमारी भूमि अत्यंत उत्तम है, इस लिये उसको अनेक प्रकार खोज होनी चाहिये । खोज करके उसका अधिकाधिक उपयं करके अन्नपेयादि भोग्य पदार्थ विशेष प्रकारसे प्राप्त करके ह अपना घल, पति, शक्ति और अन्य प्रकारका तेज बढायेंगे और अधिक विस्तृत प्रदेश प्राप्त करके आनंदसे धटेंगे। शुद्धान आपस्तन्वे क्षरन्तु यो नः सेदुरप्रिये तं निदध्मः । पवित्रण पृथिवि मोत् पुनामि ॥३०॥ हे (पृथिवि ) मातृभूमि ! (शुद्धा आप') शुद्ध निर्मल जल (नः तन्ये) हमारे शरीर के लिये (क्षग्न्तु ) यहत्ता रहे 2:) जो (नासेदुः) हमारा नाश करनेका यल करेगा (तं, उस दुपको हम (अप्रिये) अप्रियता में (नि-दध्मः ) रखेंगे, मैं (मां) अपने आप को ( पविण) पवित्रता से (उत् पुनामि) उत्तम पवित्रता करता हूं। हमें सदा शुद्ध जल प्राश होता रहे और जल आदिर्स हमारे शरीर परिष होते रहे । हम राम, सरल और श्रेष्ठ आचार और विचारों से अपने आपको सदा पयिय यनायेंगे । और जो शत्रु हमाग नाश करने का यत्न करेगा उसको हम योग्य दण्ड देंगे।

संस्कृत पाठ माला।
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बारह पुस्तकोंका मूल्य म. आ. से ३) रु. और वी.पी से४)ह.
प्रति भाग का मूल्य 1- ) पांच आने और डा. व्य.-) एक आना।
अत्यंत सुगमरीतिसे संस्कृत भाषाका अध्ययन करनेकी अपूर्व पद्धति
इस पद्धतिकी विशेषता यह है-
१ प्रथम द्वितीय और नृतीय भाग।
इन भागों में संस्कृत के साथ साधारण परिचय करा दिया गया हे
२ चतुर्थ भाग।
इस चतुर्थ मागमें संधि विचार बताया है।
३ पंचम और पष्ठ भाग।
इन दो भागोंमें संस्कृतके साथ विशेष परिचय कराया गया है।
४सप्तम से दशम भाग।
इन चार भागोंमें पलिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसकलिंगी मामों के
रूप धनानेकी विधि बताई है।
५पकादश माग।
इस भागमें "सर्वनाम " के रूप यताये हैं।
६द्वादश भाग।
इस भागमें समासीका विचार किया है।
रहसे अठारहवें भाग तक ६ भाग।
इन छ: भागों में क्रियापद विचार की पाठविधि बताई है।
८ उन्नीससे चीयांसवे भागतकके भाग।
इन छः मागों में यद साथ परिचय कराया है।
अर्थात् जो लोग इस पद्धतिसे अध्ययन करेंगे उन को अल्प
परिशमसे पडा लाम हो सकता है।
पाण्याय मंडल, आंध (जि. सातारा)

महाभारता
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है
4
(हिंदी भाषाभाष्य- समेत),
दयार है
(१) आदिपर्वा पृष्ठ संख्या ११२५ मूल्य,म. आ. से६) रू.
(२) सभापर्व 1 पृष्ठ संख्या ३५६ मुल्य मां, से) रु.
(३) वनपर्व, । पृष्ठ संख्या १५३८ मूल्य म. भा. से)
(४) विराटपर्व । पृष्ठे संख्या ३०६ मूल्य म, आ. से)रु.
(५) उद्योगपर्व । पेट संख्या ९५३ मूल्य मा.से) ६.
(६) भीष्मपर्व ।., संख्या ८०० म. म. ओ. से ४) रु.
[७] महाभारत.समालोचना।
प्रथम भाग म. म. आईरेसे ॥ 5-धी. पी से hi)आने ।
२ द्वितीय भाग । मू. म. आईरसे । ) पी. पी. से 1)आने ।
महाभारत के स्थायी ग्राहकों के लिये १२०० पृष्ठोंका). मूल्य होगा।
मुद्रक तथा प्रकाशक-श्री.दा. सातवळेकर,
भारतमुद्रणालय- स्थाध्यायरल, आध (जि. सातारा)

Sanskrit Path Mala Bhag 19

Author
Satavlekar,damodar
Title
Sanskrit Path Mala Bhag 19
File name
Sanskrit Path Mala Bhag 19
Text
OCR done
Citation
1931
Published
2012/08
Publisher
Aund., Swadhyay Mandal
Language
Sanskrit
Pages
143
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405583
Barcode
99999990292640.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
v9DYfE5iusl
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