Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Vrittamauktika Of Chandrashekhar Bhatta
Front matter
सम्पादक
महोपाध्याय विनयसागर
साहित्य महोपाध्याय, साहित्याचार्य, दर्शनशास्त्री,
साहित्यरल, काव्यभूषण, शास्त्रविशारद
प्रकाशनकर्ता
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
सञ्चालक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान)
खिस्ताव्द १९६५
विक्रमाब्द २०२२
प्रथमावृत्ति १०००
भारतराष्ट्रीय शकाब्द १८८७
मूल्य-१८.२५
भुवफ- हरिप्रसाद पारीक, सापना प्रेस, जोपपुर
Vrittama uktik
of
Chandrashekhar Bhatta
with commentaries by Bhatt Lakshminath and Meghavijaya Gani
42935
RARY
Edited with
Appendices and elaborate preface
by
M. Vinayasagar,
Sahitya-mahopadhyaya, Sahityacharya,
Darshan-shanti, Sahitya-ratna, Shastra-Visharad etc.
Published under the orders of the Government of Rajasthaa
By
TIJE RAJASTHAN ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE
JODHPUR (Rajasthen)
V.S. 2022 )
I 1965 A.D.
सञ्चालकीय वक्तव्य राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला के ७६वें ग्रन्यांक के स्वरूप वृत्त-मौक्तिक नाम का यह एक मुक्तांकित ग्रन्यरत्न गुम्फित होकर ग्रन्थ- माला के प्रिय पाठकवर्ग के करकमलों में उपस्थित हो रहा है। जैसा कि इसके नाम से हो सूचित हो रहा है कि यह ग्रन्थ वृत्त अर्थात् पद्यविषयक शास्त्रीय वर्णन का निरूपण करने वाला एक छन्दःशास्त्र है। भारतीय वाङ्मय में इस शास्त्र के अनेक ग्रन्थ उपलब्ध होते है । प्राचीनकाल से लेकर आधुनिक काल तक, इस विषय का विवेचन करने वाले सैकडों ही छोटे-बड़े ग्रन्थ भारत की भिन्न-भिन्न भापानों मे ग्रथित हुए हैं । प्राचीनकाल मे प्रायः सब ग्रन्थ सस्कृत और प्राकृत भाषा मे रचे गये हैं। बाद में, जब देश्य-मापानों का विकास हुआ तो उनमें भी तत्तद् भापामो के ज्ञातानों ने इस शास्त्र के निरूपण के वैसे अनेक ग्रन्थ बनाये। राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला का प्रधान उद्देश्य वैसे प्राचीन शास्त्रीय एवं साहित्यिक ग्रन्थों को प्रकाश में लाने का रहा है जो अप्रसिद्ध तथा अज्ञात स्वरूप रहे हैं। इस उद्देश्य को पूत्तिरूप में, हमने इससे पूर्व छन्दःशास्त्र से सम्बन्ध रखने वाले पांच ग्रन्थ इस ग्रन्थमाला में प्रकाशित किये हैं । प्रस्तुत ग्रन्य का छठा स्थान है । इनमें पहला ग्रन्थ महाकवि स्वयंभू रचित है जो 'स्वयंभू छंद' के नाम से अंकित है । स्वयभू कवि ६-१०वी शताब्दी में हुआ है । वह अपनश भापा का महाकवि था। उसका बनाया हुमा अपभ्रंश भाषा का एक महाकाव्य 'पउमचरिउ' है, जिसको हमने अपनी सिंघो जन ग्रन्यमाला' में प्रकाशित किया है। स्वयंभू कवि ने अपने छन्द.गास्त्र में, संस्कृत और प्राकृतभापा के उन बहुप्रचलित और सुप्रतिष्ठिन छन्दों का तो पपायोग्य वर्णन किया हो है परन्तु तदुपरान्त विशेप रूप से अपना- - ] वृत्तमौक्तिक भाषा-साहित्य के नवीन विकसित छन्दों का भी बहुत विस्तार से वर्णन किया है । अपभ्रंश-भाषा-साहित्य को दृष्टि से यह ग्रन्थ विशिष्ट रत्न-रूप है। दूसरा ग्रन्य है 'वृत्तजातिसमुच्चय' । इसका कर्ता विरहांक नाम से अंकित कोई 'कइसिठ्ठ है । यह शब्द प्राकृत है, जिसका सही संस्कृत पर्याय क्या होगा, पता नहीं लगता । 'कइसिठ्ठ' का संस्कृत रूप कवि- श्रेष्ठ, कविशिष्ट और कृतशिष्ट अथवा कृतिश्रेष्ठ भी हो सकता है। वृत्तजातिसमुच्चय भो प्राचीन रचना सिद्ध होती है। इसकी रचना हवी-१०वी शताब्दी की या उससे भी कुछ प्राचीन अनुमानित की जा सकती है । यह रचना शिष्ट प्राकृत-भाषा में प्रथित है। इसमें सस्कृत को अपेक्षा प्राकृत के छन्दों का विस्तृत निरूपण है और साथ मे अपभ्रंश भाषा के भी अनेक छन्दों का वर्णन है। ग्रन्थकार ने अपन श शैलो के छन्दो का विवेचन करते हुए उसकी उपशाखाएँ- स्वरूप 'ग्राभोरी' और 'मारवी' अथवा 'मारुवाणी' का भी नाम-निर्देश किया है जो प्राचीन राजस्थानी-भाषा-साहित्य के विकास के इतिहास की दृष्टि से प्राचीनतम उल्लेख है। राजस्थानी के पिछले कवियों ने जिसे 'मरुभाषा' अथवा 'मुरधरभासा' कहा है, उसे हो कवि विरहांक ने 'मारुवाणा' नाम से उल्लेस किया है। इस मारुवाणी का एक प्रिय पौर प्रमिद्ध छन्द है जिसका नाम 'धोपा' अथवा 'घोपा' बताया है । इस उल्लस से यह ज्ञात होता है कि हवी-१०वों शाव्तादी में राजस्थान की प्रसिद्ध बोली 'मारई' या 'मारवी' का अस्तित्व और उसके कवि- मम्प्रक्षय तया उनको काव्यकृतियों का व्यवस्थित विकास हो रहा चा। प्राकृत पौर अपभ्रंश भापा मे पद्य-रचना के विविध प्रयोगों का इस ग्रन्य में बहुत महत्त्वपूर्ण निरूपण है। तोगरा अन्य है 'फविदर्पण' । यह भी प्राकृत के पद्य-स्वरूपों का निरुपण करने वाला एक विशिष्ट ग्रन्य है। इसकी रचना विक्रम की १४वीं पनामी के पारम्भ में हुई प्रतीत होती है। विक्रम की १२वी भातानी में भारम्भ गे राजस्यान पोर गुजरात में प्राकृत पोर मप- सञ्चालकीय वक्तव्य - भ्रश भापा के साहित्य में जिस प्रकार के अनेकानेक मानागणीय छन्दो का विकास और प्रसार हुआ है उनका सोदाहरण लक्षण-वर्णन इस रचना में दिया गया है । 'सदेशरासक' जैसी रासावर्ग की सर्वोत्तम रचना मे जिन विविध प्रकार के छन्दो का कवि ने प्रयोग किया है उन सब का निरूपण इस ग्रन्थ में मिलता है । प्राकृतपिंगल नाम के सुप्रसिद्ध ग्रन्थ में जिस प्रकार के छन्दो का वर्णन दिया गया है उनमें के प्राय सभी छन्द इस ग्रन्थ में, उसो शैलो का पूर्वकालीन पथप्रदर्शन करने वाले, मिलते है । जिस प्रकार प्राकृतपिंगल में दिये गये उदा. हरणभूत पद्यो में, कर्ण, जयचद, हमीर आदि राजानो के स्तुति-परक पद्य मिलते है उसी तरह इस ग्रन्य में भीमदेव, सिद्धराज जयसिंह, कुमारपाल आदि अणहिलपुर के राजानो के स्तुतिपरक पद्य दिये गये हैं। उक्त तीनो ग्रन्यो का सम्पादन हमारे प्रियवर विद्वान् मिन प्रो० एच० डी० वेलणकरजी ने किया है जो भारतीय छन्द शास्त्र के अद्वितीय मर्मज्ञ विद्वान् है । इन ग्रन्यो को विस्तृत प्रस्तावनायो में (जो अग्रजी में लिखी गई है) सम्पादकजी ने प्राकृत एव अपभ्र श ये पद्य-विकास का बहुत पाण्डित्यपूर्ण विवेचन किया है। इन ग्रन्यो के अध्ययन से अपभ्र श और प्राचीन राजस्थानी-गुजराती हिन्दीभापा के विविध छदो या किस अम से विकास हुपा है वह अच्छी तरह ज्ञात हो जाता है। विगत वर्ष में हमने इसी ग्रन्यमाला ये ६६ मणि के प में 'वृत्तमुक्तावली' नामय ग्रन्थ प्रकाशित पिया-जिममे रचयिता जयपुर के राज्यपण्डित श्रीकृष्ण भट्ट थे, महाराजा सवाई जयसिंह ने उनको बडा सम्मान दिया था। वृतमुक्तावली में वैदिय छन्दो पा भी निरुपण दिया गया है, जो उपर्युक्त ग्रन्यो मे पालेसित नहीं हैं। वृत्तमुक्तावली मे वैदिक धन्द तथा प्राचीन संस्कृत एव प्रारत-गाहित्य म सुप्रचलित वृत्तो पे मतिरिक्त उन अनेक देश्यभापा-नियर वृत्तो का भी निम्पण दिया गया है जो उफ प्राचीन ग्रन्पकारो के बाद हाने वाले मन्यान्य रवियो दाग प्रात हुए हैं। श्रीरण भट्ट सस्त-मापा में प्रोट ४ वृत्तमौक्तिक पण्डित थे । सस्कृत काव्य-रचना में उनको गति प्रखर और अबाध थी इसलिये उन्होने उक्त प्रकार के सब छन्दो के उदाहरण स्वरचित पद्यो द्वारा ही प्रदर्शित किये है । प्राकृत, अपभ्रंश और प्राचीन देशी भाषा के प्रधानवृत्तो के उदाहरण-स्वरूप पद्य भी उन्होने सस्कृत मे ही लिखे। हिन्दी-राजस्थानी-गुजराती भाषा मे बहुप्रचलित और सर्वविश्रुत दोहा, चौपाई, सर्वया, कवित्त और छप्पय जैसे छन्द भी उन्होंने सस्कृत मे ही अवतारित किये। इन ग्रथो से विलक्षण एक ऐसा छन्द-विषयक अन्य बडा ग्रन्थ भी हमने ग्रन्थमाला में गुम्फित किया है जो 'रघुवरजसप्रकास' है। इसका कर्ता चारण कवि किसनाजी आढा है, वह उदयपुर के महाराणा भीमसिंह जी का दरबारी कवि था । वि० स० १८८०-८१ मे उसने इस ग्रन्थ की राजस्थानी भाषा मे रचना की। जिसको कवि 'मुरधर भाखा' के नाम से उल्लिखित करता है। यह छन्दोवर्णन-विषयक एक बहुत ही विस्तृत और वैविध्य-पूर्ण ग्रन्थ है। कर्ता ने इस ग्रन्थ में छन्द शास्त्र-विषयक प्राय सभी वातें अकित कर दी हैं। वर्णवृत्त और मावावृत्तो के लक्षण दोहा छन्द में बताये है। उदाहरणभूत सब पद्य अर्थात् वृत्त कवि ने अपनी 'मुरघरभाखा' अर्थात् मरुभाषा में स्वय ग्रथित किये हैं। इस प्रकार सस्कृत, प्राकृत और अपभ्र श भाषा के सुप्रसिद्ध सभी छदो के उदाहरण उसने 'मरुभाखा' में ही लिखकर अपनी देशभाषा के भाव- सामर्थ्य और शब्दभडार के महत्त्व को बहुत उत्तम रोति से प्रकट किया है। इसके अतिरिक्त उसने इस ग्रथ में राजस्थानी भाषाशैली में प्रचलित उन सैकडो गीतो के लक्षण और उदाहरण गुम्फित किये हैं जो अन्य भाषा-ग्रन्थित छदग्रन्थो मे प्राप्त नहीं होते। प्रस्तुत 'वृत्त मौक्तिक' ग्रन्य इस ग्रन्थमाला का छद शास्त्र विषयक ६ठा अन्य है। यह ग्रन्य भी वृत्तमुक्तावली के समान सस्कृत में गुम्फित है। वृत्तमुक्तावली के रचना काल से कोई एक शताब्दी पूर्व इसको रचना हुई होगी। इसमें भी वृत्तमक्तावली की तरह सभी वृत्तो या पद्यो के उदाहरण ग्रन्यवार के स्वरचित हैं। वृत्तमुक्तावली की तरह इसमें सञ्चालकीय वक्तव्य वैदिक छंदों का निरूपण नहीं है पर संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश साहित्य में प्रयुक्त प्रायः सभी छदों का विस्तृत वर्णन है। जितने छंदों अर्थात् वृत्तों का निरूपण इस ग्रन्थ में किया गया है उतनों का वर्णन इसके पूर्व निर्मित किसी भी संस्कृत छंदोग्रन्थ में नहीं मिलता है । इस दृष्टि से यह ग्रन्थ छंदःशास्त्र की एक परिपूर्ण रचना है। संस्कृत-साहित्य में पद्य-रचना के अतिरिक्त अनेक विशिष्ट गद्य- रचनायें भी हैं जो काव्य-शास्त्र में वर्णित रस और अलंकारों से परि- पूर्ण हैं, परन्तु गद्यात्मक होने से पद्यों की तरह उनका गेय स्वरूप नही बनता । तथापि इन गद्य-रचनाओं में कहीं कही ऐसे वाक्यविन्यास और वर्णन कण्डिकाएँ, कविजन ग्रथित करते रहते हैं जिनमें पद्यों का अनुकरण-सा भासित होता है और उन्हें पढ़ने वाले सुपाठी मर्मज्ञ जन ऐसे ढंग से पढते हैं जिसके श्रवण से गेय-काव्य का सा आनन्द आता है। ऐसे गद्यपाठ के वाक्यविन्यासों को छन्दःशास्त्र के ज्ञाताओं ने पद्यानुगन्धी अथवा पद्याभासी गद्य के नाम से उल्लेखित किया है और उसके भी कुछ लक्षण निर्धारित किये है। प्रस्तुत ग्रन्थ में वृत्तमौक्तिक- कार ने ऐसे विशिष्ट गद्याशों का विस्तृत निरूपण किया है और इस प्रकार के शब्दालंकृत गद्य की कुछ विद्वानों की विशिष्ट स्वतंत्र रचनायें भी मिलती हैं जो विरुदावली और खण्डावली आदि के नाम से प्रसिद्ध हैं । ऐसी अनेक विरुदावलियों तथा कुछ खण्डावलियों का निरूपण इस वृत्तमौक्तिक मे मिलता है जो इसके पूर्व रचे गये किसी प्रसिद्ध छन्दोंग्रन्थ में नहीं मिलता। इस प्रकार को छन्दःशास्त्र-विषयक अनेक विशेषताओं के कारण यह वृत्तमौक्तिक यथानाम ही मौक्तिक स्वरूप एक रत्न-ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ को विशिष्ट मूल-प्रति राजस्थान के बीकानेर में स्थित सुप्रसिद्ध अनूप सस्कृत पुस्तकालय में सुरक्षित है। मूल प्रति ग्रन्थकार के समय में ही लिखी गई है-अर्थात् ग्रन्थ को समाप्ति के बाद १४ वर्ष के भीतर । यह प्रति आगरा में रहने वाले लालमणि मिश्र ने वि.सं. १६६० में लिख कर पूर्ण को।
वृत्तमौक्तिक ग्रन्थ की रचना कहां हुई इसका उल्लेख कही नही किया गया। परन्तु ग्रन्थकार तलगदेशीय भट्ट वश के ब्राह्मण थे और उनकी वश- परम्परा सुप्रसिद्ध वैष्णव सम्प्रदाय के धर्माचार्य श्री वल्लभाचार्य के वश से अभेद स्वरूप रही है। प्रस्तुत रचना में कर्ता ने सर्वत्र श्रीकृष्ण- भक्ति का और मथुरा वृन्दावन के गोप-गोपीजनो के रस-विहार का जो वर्णन किया है उससे यह कल्पना होती है कि ग्रन्थकार मथुरा- वृन्दावन के रहने वाले हों! इस ग्रन्थ का सम्पादन श्री विनयसागरजी महोपाध्याय ने बहुत परिश्रम-पूर्वक बडी उत्तमता के साथ किया है। ग्रन्थ से सम्बद्ध सभी विचारणीय विषयो का इन्होने अपनी विद्वत्तापूर्ण विस्तृत प्रस्तावना और परिशिष्टो मे बहुत विशद रूप से विवेचन किया है जिसके पढने से विद्वानो को यथेष्ट जानकारी प्राप्त होगी। ग्रन्थमाला के स्वर्णसूत्र में इस मौक्तिक-स्वरूप रत्न की पूर्ति करने निमित्त हम श्री विनयसागरजी के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते है और आशा रखते हैं कि ये अपनी विद्वत्ता के परिचायक इस प्रकार के और भी ग्रन्थ-सम्पादन के कार्य द्वारा ग्रन्थमालो की सेवा और शोभावृद्धि करते रहेंगे। मुनि जिनविजय जन्माष्टमी सं.२०२२% रामस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर दि.२०-८-६५ सम्माज्य सञ्चालक
समर्पण
सूरीश्वर - वंश-सागर - मणिर्वादीमपञ्चाननः,
तं श्रीजनविधौ गणे दिनमणिं ध्यायामि हद्ध्वान्तहम् ।
हिन्द्यामागमसंप्रसारमणिना प्रोद्धार येन श्रुतं,
भव्यानामुपदेशदानमणये तस्मै नमः सर्वदा॥
यस्मात्प्रादुरभून्मणेः शुभविधा श्रीगौतमाद्वागिव
वागीशानिव वादिनो जितवती वादेषु संवादिनः।
सौमत्यम्बुनिधेर्मणेः समुदयात् सज्ज्ञानमालोकते
ग्रन्थं मौक्तिकनामकं गुरुमणौ भक्त्या मया ह्यय॑ते ।।
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चारुचराचचरीक
विनय
क्रमपञ्जिका भूमिका विपय पृष्ठाक ४३-६० ७२-७४ ७४-७५ छावःशास्त्र का उद्भव और विकास कवि-वंश-परिचय वृत्तमोक्तिक का सारांश ग्रन्थ का वंशिष्टय वृत्तमौक्तिक और प्राकृतपिंगल वृत्तमौक्तिक और घाणीभूषण वृत्तमौक्तिक और गोविन्दविरुदावली वृत्तमौक्तिक में उद्धृत अप्राप्त गल्प प्रस्तुत संस्करण की विशेषतायें प्रति-परिचय सम्पादन-शैली प्राभार-प्रदर्शन पारिभाषिक शब्द ८०-८१ ८१-८६ ५६-६१ ६१-६२ ६२-६३ १. प्रथमखंड विपय पद्यसख्या पृष्ठांक -१२१ १-१३ १ १-२ २ २ ११-१२ प्रथमं गायाप्रकरणम् मङ्गलाचरणम् गुरुलघुस्थितिः विकल्पस्थितिः कायपलक्षणेऽनिष्ट फलवेदनम् मात्राणां गणव्यवस्थाप्रस्तारच मात्रागणानां नामानि वर्णवृत्तानो गणसजा गणदेवता गणामित्रो गणदेवाना फलाफलम मात्रोद्दिष्टम् १५-१८ १६-३८ ३६-४० ४ ४ ४२ ४३-५० ५१-५२ २ ] वृतमौक्तिक विषय पद्यमध्या पप्ठाम ५२-५४ ५ ६ ६ ५७-५८ ५९-६१ ६२-६६ ६६ ७०-७५ ७६-५ ७ द ८७-८८ द ८६-६० 8 ६-१० मानानष्टम् पोद्दिष्टम् वर्णनष्टम् वर्णमेह घणपताका मात्रामेरु मायापताका वृत्तद्वयस्थगुरुलघुज्ञानम् वर्णमर्फटी मात्रामर्कटी नष्टादिफलम् प्रस्तारसख्या गाथाभेदा गाथा गाथाया पञ्चविंशतिभेदा' विगाया गाहू उदगाथा गाहिनी सिहिनी स्कन्धकम् स्कन्धकस्याऽष्टाविशतिभा द्वितीय पट्पदप्रकरणम् दोहा दोहामा प्रयोविशतिभेदाः रसिका रसिकाया प्रष्टो भेदा रोला रोलाया. त्रयोदश भेवा माधानकम् चौपया पत्ता यसानन्दम् काव्यम् ६६-१०३ १०४-१०५ १०६-१०८ १०६-११० १११-११२ ११३-११४ ११-१२ १२ ११७-१२१ १-७१ १४.२६ १२-१५ १६ १८-२१ २२-२४ २५-२७ २८-३० ३१-३३ ३४-३७ १७-१८ १५-१६ १६-२० ऋमपत्रिका विषय पद्यसख्या पृष्ठांक २० ४०-४२ ४३-५२ २०-२२ उल्लालम् शक (काव्यभेदः) काप्यस्य पञ्चचत्वारिंशद्भदा पट्पदम् पट्पदवृत्तस्यैकसप्ततिभेदाः काव्यपट्यवपोर्दोषाः तृतीय रड्डाप्रकरणम् पग्झटिका प्रडिल्ला पावाकुलकम् घोबोला ६४-७१ १- २५ १-२ २३-२४ २५-२६ २७-३० २७ 7 २७-२८ T ७-८ रड्डाया सप्तभदा [१] फरभी ६-१२ १३-१५ १६-१७ १८ २८-२६ २६ २६ २६ २० २२ २३-२५ ३० ३१-४६ . [३] मोहिनी [४] चासेना [५] भद्रा [६] राजसेना [७] तालडिनी चतुर्थ पद्मावतीप्रकरणम् पद्मावती कुण्डलिका गगनाङ्गणम् द्विपदी भुल्लणा खजा शिखा माला चुलिमाला सोरठा हाकलि मधुभारः प्राभोर: ३२-३३ ६-१० ११-१२ ३५ १५-१६ १७-१८ १६-२१ २२-२५ २६-२७ २८-२९ .
वृत्तमौक्तिक विपय पद्यसख्या पृष्ठांक दण्डकला ३७ ३७ ३४-३५ . ४०-४१ ४२-४३ ४४-४५ ४६-४७ ४८-४६ ५२-५३ ५४-५५ -४२ ४२ ४३ ४४ . कामकला चिरा दीपकम् सिंहविलोकितम् प्लषनमः लीलावती हरिगीतम् हरिगीत[क] मनोहरहरिगीतम् हरिगीता अपरा हरिगीता विभङ्गी दुर्मिलका होरम् जनहरणम् मदनगृहम् मरहट्ठा पञ्चम सवयाप्रकरणम् सवया सवया भेदानों नामानि मदिरा सया मालती सदया मल्ली सच्या मल्लिका सया मापदी राधा भागधी सवया पनापारम् पष्ठ गलितकप्रकरणम् ससितम् विसतरम् मालिताम् मुगरणसिताम् भूपगमितरम् ५६-५६ ६०-६२ ६३-६४ ६५-६७ ६८-६६ १-१२ १-२ ३ ४७-४६ ४७ ४७ ४७ ५ ७ ४६ ९-१० ४६ १.३५ १-२ ५०-५१ क्रमपत्रिका [ ५ विपय पद्यसख्या पृष्ठांक ११-१२ ५१-५२ ५२ ५२ मुखगलितकम् विलम्बितलितकम् समलितकम् अपर समलितकम अपर सङ्गलितकम् पपर लम्बितागलितकम् विक्षिप्तिकागलितकम् ललितागलितकम् विषमितालतकम् मालागलितकम् मुग्धमालागलितकम् उद्गलितकम् प्रत्यकृत्प्रशस्ति १५-१६ १७-१८ १६-२० २१-२२ २३-२४ २५-२६ २७-२८ २६-३० ३१-३२ ५४ ३६-३६ ५६ द्वितीय खंड ५७- १८० १-६१७ १-२ प्रथम वृत्तनिरूपण-प्रकरणम् मङ्गलाचरणम् एकाक्षरम् श्री ७-१४ ५८ वचक्षरम् काम मही सारम् मधु ध्यक्षरम् ताली जाशी प्रिया रमण पञ्चालम् ११-१२ १३-१४ १५.३० - ५८ ५६.६० १७-१८ १६-२० २१-२२ २३-२४ ५६ वृत्तमौक्तिक विपय पद्यसख्या पृष्ठाक २५-२६ २७-२८ २६-३० ६० ६१ मृगेन्द्रः मन्दर: कमलम् चतुरक्षरम् ती धारी मगाणिका शुभम पञ्चाक्षरम् सम्मोहा हारी ३७-३८ ३६-४६ ४०-४२ ६२-६३ ६२ ६२ ६२ ६२ ४३-४४ ४५-४६ ४७-४६ ५०.६७ ५२-५३ प्रिया यमकम् पद्धक्षरम् शोधा विलका दिमोहम् धतुरसम् मापानम् पद्धनारी सुमासतिषा तनुमाया ६४ ५८-५९ ६२-६३ ६४-६५ ६५-६६ ७२-७३ ६६ सप्ताक्षरम सी समानिका गुवाहर काहन्धि सुमारससिता मपुमती मरसता गुममा ७४-७५ ७६-७६ ८.-८१ ८२-१ कमपन्जिका विषय पद्यसंख्या पृष्ठाक ६७ प्रप्टाक्षरम् विद्युन्माला प्रमाणिका मल्लिका ८४-१०१ ८४-८५ ८६-८७ ६८ तुङ्गा ६०-६१ ६२-६३ ६६ ७०-७२ ६६-६७ ६८-६६ १००-१०१ १०२-१२४ १०२-१०३ १०४-१०५ १०६-१०८ १०६-११० १११-११२ ११३-११४ ७० ७० कमलम् माणयकक्रीडितकम् चित्रपदा अनुष्टुप जलदम् नवाक्षरम् हवामाला महालक्ष्मिका सारङ्गम् पाइन्तम् कमलम् विम्वम् तोमरम् भुजगशिशुसृता मणिमध्यम् भुजङ्गसङ्गता सुललितम् दशाक्षरम् गोपाल: संयुतम् चम्पकमाला सारवती सुषमा अमृतगतिः ७२ ८२ . ७२ ७३-७५ ७३ ११७-११८ ११६-१२० १२१-१२२ १२३-१२४ १२५-१४६ १२५-१२६ १२७ - १२६ १३०-१३१ १३२-१३३ १३४-१३५ १३६-१३७ १३८-१३६ १४०-१४२ १४३-१४४ १४५-१४६ ७३ ७३-७४ ७४ ७४-७५ त्वरितगतिः मनोरमम् ललितगतिः ७५ - वृत्तमौक्तिक विपय पद्यरांस्या पृष्टीय -८७ १४७-१८६ १४७-१४८ १४६-१५० १५१-१५२ १५५-१५६ १५७-१५० १५६-१६० ७५-७६ ७६-८० ८. ८० SY ८४-८५ ५५ एकादशाक्षरम् मालती वाधुः सुमुखी शालिनी धातोर्मा शालिनी-बातोयुपजाति घमनकम् चण्डिका सेनिका इन्द्रषत्रा उपेन्द्रयन्ना उपजाति रथोद्धता स्वागता भ्रमरविलसिता अनुकूला मोटनकम् सकेशी सुद्रिका बकुलम् द्वादशाक्षरम् प्रापीड: भुजङ्गप्रयातम् लक्ष्मीपरम् तोटकम् सारङ्गकर मोक्किदाम मोदकम् सग्दरी प्रमिताक्षरा चन्द्रवत्म द्रुतविलम्बितम् बंशस्थविला १६५ -१६६ १६७-१६८ १६६-१७२ १७३-१७५ १७६-१७७ १७८-१७६ १८०-१८१ १८२-१८३ १८४-१८५ १८६-१८७ १८८-१८६ १६० २५४ १६.-१६१ १६२-१९३ १९४-१९५ १६६-१६७ ८६-८७ ८७ ८७ ८८-१०४ ८८ ८८ ८८-८९ 18 ६० ६०-६१ २००-२०१ २०२-२०३ २०४-२०६ २०७-२०६ २१०-२१२ २१३-२१६ २१७-२१८ ६१-६२ ६२-६३ प्रमपञ्जिका [. विपय पद्यसध्या पृष्ठाक ६३-६४ १४-६७ BE इन्द्रवंशा यशस्थविलेन्द्रवंशोपजाति जलोद्धतगतिः वश्वदेवी मन्दाकिनी कुसमविचित्रा तामरसम् मालती मणिमाला जलपरमाला प्रियवदा ललिता ललितम् कामदत्ता घसन्तचत्वरम प्रमुदितववना नयमालिनी तरलनयनम् प्रयोदशाक्षरम् धाराह माया मत्तमयूरम् तारकम् कन्दम् पडावलिः प्रहरिणी चिरा चण्डी मजुभाषिणी चन्तिका कलहस मगेन्द्र मुलम् क्षमा २१६ -२२१. २२२ २२३-२२४ २२५-२२६ २२७-२२८ २२६-२३० २३१-२३२ २३३ - २३४ २३५-२३६ २३७-२३८ २३६-२४० २४१-२४२ २४३-२४४ २४५-२४६ २४७-२४८ २४६-२५० २५१-२५२ २५३-२५४ १०१ १०१-१०२ १०२ १०२ १०३ १०३ १०३-१०४ १०४-११३ १०४ १०४-१०५ १०५-१०६ १०६ १०६-१०७ २५५-२६४ २५५ - २५६ २५७ - २५० २५६-२६० २६१-२६३ २६४-२६५ २६६-२६७ २६८-२७० २७१-२७२ २७३-२७४ २७५-२७६ २७७-२७८ २७६-२८० २८१-२८२ २८३-२८४ २०५-२८६ १०७-१० १०६ १०६ सता १० ] वृत्तमौक्तिक विषय पद्यसख्या पृष्ठाक चन्द्र लेखम् सुध ति: २०७-२८८ २६६ -२६० २६१-२६२ २६३- -२६४ ११२-११३ ११३-१२० २६५-३२६ २६५-२६६ २६७-२६६ २००-३०२ ३०३-३०४ ११४ ११४-११५ ११५-११६ ३०७-३०६ ३१०-३११ ३१२-३१३ ३१४-३१५ सक्ष्मीः विमलगतिः चतुर्दशाक्षरम् सिंहास्यः घसन्ततिलका चक्रम् प्रसम्याधा अपराजिता प्रहरणकलिका वासन्ती लोला नान्दोमुखी चवी इन्दुषदनम् दरभी महिपतिः विमला मल्लिका मणिगणम् पञ्चदशाक्षरम् लीलालेल: मालिनी घामरम् भ्रमरासिका ममोहम परभम् पणिगुणमिकर ११७-११० ११९ ३१८-३१६ ३२०-३२१ ३२२-३२३ ३२४-३२५ ३२६-३२७ ३२८-३२६ ३३०.३७२ ३३०-३३१ ३३२-३३६ ११६-१२० १२०-१२८ २४०-३४२ ३४३-३४५ २४६-३४० १२०-१२१ १२१-१२२ १२२ १२३ १२३ ३४८- ३५९ } १२२-१२४ निमिपामरम् विपिनतितरम् बामद्रा ३५१-३५७ २५८-३५६ १२४-१२५ १२५ क्रमपन्जिका [ ११ विषय पद्यसंख्या पृष्ठांक ३६२-३६३ ३६४-३६९ ३६६-३६८ ३६६-३७० ३७१-३७२ १२६ १२६-१२७ १२७ १२७ १२८ ३७३-४०४ १२८.१३४ १२८ १२६ १२६ १३० ३७५-३७७ ३७८-३७६ ३८०-३०२ ३५३-३८४ ३६५-३५६ ३८७ -३८८ ३८६-३६० ३६१-३१२ १३१ १३१-१३२ १३२ केसरम् एला प्रिया उत्सवः उङगणम् पोडशाक्षरम् रामः पञ्चचामरम् नीलम् चञ्चला मदनललिता पाणिनी प्रवरललितम् गवड़प्तम् चकिता गजतुरगविलसितम् सलशिला ललितम् सुकेसरम् सलना गिरिधरपतिः सप्तदशाक्षरम् लीलाष्टम् पुष्पी मालावती शिखरिणी हरिणी मम्दावान्ता এঘনিষ मटकम् कोकिलरम् हारिणी भारापाता मताहिमो ३६५-३६६ ३९७-३६८ ४.१-४०२ ४.३-४०४ ४०५-४४० १३५-१४२ ४०७-४०६ ४१.-४११ ४१२-४१७ ४१८-४२१ ४२२-४२४ ४२५-४२६ ४२७-४२० १३८-१३६ १४.-१४१ ४३१-३२ ४१५-४३४ १२ ] वृत्तमौक्तिक विषय पद्यसख्या पृष्ठाक ४३७ -४३८ ४३६-४४० ४४१-४७२ ४४१-४४२ ४४३-४४५ ४४६-४५२ ४५३-४५५ ४५६-४५७ ४५८-४६० ४६१-४६२ १४२ १४३-१५० १४३ १४३ १४४-१४५ १४५-१४६ १४६-१४७ १४८ १४८ १४८ १४८-१४६ १४६ १४६-१५० १५०-१५५ पकम वशमुखहरम् अष्टादशाक्षरम् लीलाचन्द्रः मजीरा पचंरी कीडाचन्द्रः कुसुमितलता मन्दनम् नाराच. चित्रलेखा भ्रमरपदम् शार्दूलललितम् सुललितम् उपवनकुसुमम् एकोनविद्याक्षरम् मागानन्दः शालविक्रीरितम् धन्द्रम् थवलम् शम्भु मेघनिष्फूजिता छाया मुरसा पुरूलवाम मदुलपुमुमम् विशाक्षरम् योगानन्दः गीतिका गरका पोभा मुवाना समगमनसम् मालितम् ४६५-४६६ ४६७-४६८ ४६६-४७० ४७१-४७२ ४७३ - ४१८ ४७३ -४७४ ४७५-४७८ ४७६-४८१ ४८२-४८४ ४५-४८७ ४८८-४६० ४६१-४६२ ४६३-४६४ ४६५-४६६ ४६७-४६८ १५२-१५३ १५५-१५६ ४६६-५१६ ४६६-५०० ५०१-१०३ ५०४-५०६ ५०७-५०८ १५६-१५७ ११२-११३ ५१४-११५ १५७-१८ १५८ १५८ मपजिश [ १३ विषय पद्यसंख्या पृष्ठाक ५१६-५१७ ५१८-१९ ५२०-५३८ ५२०-५२१ ५२२-५२५ ५२६-५२६ १५६ १६०.१६३ १६० भद्रकम् मनधिगुणगणम् एकविशाक्षरम् ब्रह्मानन्दः साघरा मञ्जरी मेरन्द्रः सरसी चिरा निरूपमतिलका द्वाविंशत्यक्षरम् विद्यानन्दः १६२ ५३३-५३४ ५३५-५३६ ५३७-५३८ ५३६-५५७ ५३६-५४० ५४१-५४३ ५४४-५४५ १६४-१६७ ५४०-५४६ ५५०-५५१ ५५२-५५५ ५५६-५५७ ५५८-५७५ ५५८-५५६ १६७-१७१ १६८ १६८-१६६ मदिरा मन्द्रकम् शिरम् अध्युतम् मदालसम् सदवरम प्रयोविशाक्षरम् बिध्यानन्द. सुन्दरिका पप्रातिका प्रद्रितनया मासतो मल्लिका मत्ताकरम् रनवसपम् चतुविशातरम् रामानन्द दुसिता हिरोटम तम्बी मापसे ५६२-५६३ ५६४-५६७ ५६८-५६६ ५७२-५७३ ५७४-१७१ ५७६.५८६ १७२ -१७४ १७२ १७२ ५७८-५८० ५८१-५८२ १८३-५८५ १६-१७ १४ ] वृत्तमौक्तिक विपय पद्यसस्या पृष्ठाक ५८८-५८४ १७४ ५६०-५६८ ५६०-५६१ ५६२-५६४ १७४ - १७६ १७४-१७५ १७५ १७५-१७६ १७६ ५६७-५६८ १७६ - १७६ १७६-१७७ ५६६-६१० ५६६-६०० ६०१-६०३ ६०४-६०६ ६०७-६०८ १७७-१७८ १७८ १७६ १७६-१८० ६११-६१७ १ तरलनयनम् पञ्चविशाक्षरम् कामानन्द कौञ्चपदा मल्ली मणिगणम् पटिशाक्षरम् गोविन्दानन्द भुजङ्गविजृम्भितम अपवाह मागधी कमलदलम् उपसहार प्रस्तारपिण्डसस्या ध द्वितीय प्रकीर्णक-प्रकरणम् भुजङ्गविजम्भितस्य चत्वारो भैदा द्वितीयत्रिभङ्गी शालूरम् उपराहार तृतीय दण्डक-प्रकरणम् घण्डवृष्टिप्रपात प्रचितक प्रोग्य सर्वतोभद्र प्रमोककुसुममञ्जरी कुसुमस्तव मत्तमातन प्रनगरोखर चतुर्य पद्ध-सम-प्रकरणम् प्रद समवृत्त सक्षणम पुष्पिताल বিগ वेगवती हरिणसुता १८१-१८३ १८१ १८२-१५३ १८३ ७ १-१७ १८४ १८७ १८४ १८४ १८५ १८५ १८६ १८६ १२-१३ १८७ १८८-१६१ ७-१९ १२-१३ १८८-१९६ १८६ १८६ १८६ प्रमपन्जिका विपय पद्यसख्या पृष्ठाक १८-२० २१-२३ २४-२५ २६-२७ २८-२९ अपरवपत्रम् सुन्दरी भद्रपिरण्ट तुमतो यामती पट्पदावली उपसंहारः पञ्चम विषमवृत्त-प्रकरणम् विषमवृत्तलक्षणम् उद्गता उद्गताभेदः सौरभम् ललितम् १८६-१६० १६० १६० १६१ १६१ १६१ १६१ १ १-२५ १ १६२.१६५ १६२ ૧૯૨ १६२ १६२-१६३ १६३ भाषः १६३ १९-२५ १.३४ १६६.२०० ४-५ ६-६ १६७ वक्त्रम् पथ्यावक्त्रम् उपसहार: पप्ठ वंतालीय-प्रकरणम् बेतालीयम् प्रौपचन्दसाम् प्रापतितिका मलिना नसिनमपरम् दक्षिणान्तिरा-बतातीपम् उत्तराप्तिका-वंतासीपम् प्राध्यत्तिवेतालीयम् उरीप्यपरिर्वतासीयम् प्रपत्ता तालीपम् प्रपतन्तित पाहासिमी सप्तमं पतिनिरपण-प्रकरणम् प्रप्टम गनिरपग-प्रकरणम् मानिसमपम् १२-१४ १७-२० १९७-१९८ ११० १९६-१९९ २४-२६ २७-1. १९९-२.. १:१० २०१-२०६ २०७-२१० १६] वृत्तमौक्तिक विषय पद्यसख्या पृष्ठाक २०७ २०० २०८ २०० २०८-२०६ २०६ २१० २११.२६७ १-२२ २११-२१० २११ ६ ६ ७ शुद्ध-चूर्णकम् प्राषिद्ध चूर्णकम् ललित चूर्णपम् प्रवृत्तिमुग्ध चूर्णकम् प्रत्यल्यवृत्तिमुग्ध चूर्णकम् उत्कलिकाप्राय-गद्यम् वृत्तन्धि-गद्यन प्रन्यान्तरे प्रकारान्तरेण चतुर्विय गद्यम् नयम विरुदावली-प्रकरणम् प्रथम कलिका-प्रकरणम् यिरुदावली-सामान्यलक्षणम् द्विगा कलिका राविफलिका माविकलिका नादिकलिका पलादिलिफा मिधालिका मध्याकलिका द्विभङ्गो कलिका नवधा त्रिभनी कलिका विवग्यत्रिभनी-कलिका तुरपत्रिभङ्गो कलिका पत्रिभनी कलिका हरिणप्लुतत्रिभनी कलिका मतंकत्रिमणी-कलिका मुनधिमनी-कलिका हिविषा विगता विभङ्गी-पलिका विषिण परसनु-विमङ्गी कलिका पपिया भेप्रभेदापिता शिपाहिला युग्मभङ्गा-कसित विदायल्यां द्वितीय चण्डवृत्तप्रकरणम् चगवृत्ताय सक्षणम् परिमापा २१२ २१२ २१२ २१२ २१२-२१३ द ६ १०-२२ १२ १२ १२ १२-१३ २१३-२१८ २१३ २१३-२१४ २१४ २१४ २१४ २१४-२१५ २१५ २१५-२१६ २१६-२१८ १३-१४ १७-२२ १.३६ २१६-२५४ २१६ २१६ क्रमपञ्जिका [१७ विषय पद्यसख्या पृष्ठांक पुरुषोत्तमश्चण्डवृत्तम् ६ तिलक घण्डवृत्तम् ११-१२ १२-१३ १८ मच्युत चण्डवृत्तम् घटित घण्डवृत्तम् रणरचण्ड वृत्तम् घोरचण्डवृत्तम् शाकश्चण्डवृत्तम् मातङ्गखेलित वणवृत्तम् उस्पल घवृत्तम् गुणरतिश्चण्यत्त कल्पद्रुमरचण्डवृत्तम् कम्वलाचण्यवृत्तम् अपराजित चण्डवृत्तम् मत्तंन घण्डयुत्तम् तररसमात घडवृत्तम् बैप्टन घणवृत्तम प्रस्वसित घडवृतम् पल्लवित घडवृत्तम् समप्रचण्यत्तम् तुरगचण्डवृत्तम् पदहश्चणवृतम् शितकम्जादिभेवामा सक्षणम् सितारगञ्यावृतोराहरणम् पाण्डूरसञ्णयप्तीबाहारमम् इन्दीवरचणवत्तोराहरणम् प्रपणाम्भोपहरुमातोराहरणम् पुल्ताम्युश पारवृतम् पापक धावृतम् पसम्परावृतम् कुपञ्चायतम् पुतभागुएन्चात्तम् एममतावृतम् मम्मी होणतम् पुष्पासातम् २०-२१ २१-२२ २२-२३ २३ २३-२४ २४-२५ २६-२८ २२० २२०-२२१ २२१-२२२ २२२-२२४ २२४-२२५ २२५-२२६ २२६ २२६-२२८ २२८-२२६ २२६-२३. २३.-२३१ २३१ २३१ २३१ २३१-२३२ २३२ २३२ २३२-२३० २३३-२४ २३४-२३५ २१५-२३७ २७ २३८-२३६ २३१-२४० २४०-२४२ २४२-२४३ २४३-२४४ २४१-२४६ २४९-२४७ २४७-२४ ૨૪ - ૨૪t २४१-२१. २११-२१२ २१२-२३ २९-३० १७-१८ वृत्तमौक्तिक विषय पद्यसस्था पृष्ठांक २५४ २५५- २५६ २५५-२५६ २५६-२५८ २५८-२५६ २६० २६०-२६७ २६१-२६२ २६२-२६४ २६४-२६५ २६६ २६७ २६७ कुसुमञ्चण्डवृत्तम ३६ विरुदावल्या तृतीय विभङ्गी-कलिकाप्रकरणम् १ - ६ दण्डकत्रिमङ्गोलिका सम्पूर्णा विदग्पत्रिभङ्गोकलिका मिश्रकलिका विरुदावल्यां चतुर्थ साधारणमत चण्डवृत्त- प्रकरणम् विरुदावली १.१६ साप्तविभक्तिकी कलिका प्रक्षमयी कलिका सर्थलघुक-फलिका सर्वकलिकास बिरुदानां युगपदेध लक्षणम १२-१८ विरुदावलीपाठफलम् दशम खण्डावली प्रकरणम् खण्डावली लक्षणम १ तामरस खण्डाधली २ मजरी खण्डाधली ३ प्रकरणोपसहार ४-६ एकादश दोष प्रकरणम् द्वादश अनुक्रमणी-प्रकरणम् १ प्रथमखण्डानुक्रमणी १ गायाप्रकरणानुक्रमणी २ पटपदप्रकरणानुक्रमणी १५-१६ ३ रड्डाप्रकरणानुक्रमणी २०-२२ ४ पद्मावतीप्रकरणानुक्रमणी २२-३० ५ संवैयाप्रकरणानुक्रमणी ३१-३३ ६ गलितकप्रकरणानुक्रमणी छन्द प्रकरणसख्या च ३६-४. २ द्वितीयखण्डानुक्रमणी १.१८८ १ वृत्तानुक्रमणी २ प्रकोषकवृत्तानुक्रमणी १३८-१४० ३ वकवृत्तानुक्रमणी २६८-२७१ २६८ २६८-२७० २७०-२७१ २७१ २७२ २७३-२८६ १-४० २७३-२७५ २७३-२७४ २७४ २७४ २७४-२७५ २७५ २७५ २७५ २७६ - २८६ २७६-२८५ २८५-२८६ २०६ क्रमपब्जिका [१९ विषय पद्यसख्या पृष्ठाक २८६ २५६ २८६-२८७ २८७ २८७ २८७-२८६ २८७ २०७-२८८ २८८ २८८ २८८-२८६ २८६ २८९ २८६ २६०.२६१ ४ भद्धसमवृत्तानुक्रमणी १४४-१४८ ५ विषमवृत्तानुक्रमणी १४८-१५१ ६ तालीयवृत्तानुक्रमणी १५१-१५५ ७ यतिप्रकरणानुक्रमणी १५५-१५६ ८ गद्यप्रकरणानुक्रमणी १५६-१५६ ६. विरुदावलीप्रकरणानुक्रमणी १६०-१८० (१) कलिकाप्रकरणानुक्रमणी १६०-१६२ (२) चण्डवृत्तानुक्रमको १६३-१७३ (३) त्रिभङ्गोकलिकानुक्रमणी १७३-१७५ (४) साधारणचण्डवृत्तानुक्रमणी १७६-१७७ (५) विदापलीवृत्तानुक्रमणी १७८-१८. १० खण्डावली प्रकरणानुक्रमणी १८१-१८२ ११ दोषप्रकरणानुक्रमणी १८२-१८३ १२. सण्डद्वपानुक्रमणी १८३-१८- प्रन्थकृत-प्रशस्तिः टीकाद्वय - क्रम - पञ्जिका १ वृत्तमौक्फिवात्तिकदुष्करोद्धार (१) प्रपमो विधाम (मात्रोद्दिष्टम्) (२) द्वितीयो विश्राम (मात्रानष्टम्) (३) तृतीयो विधाम (वर्णोद्दिष्टम्) (४) चतुर्यों विधाम (वणनष्टम्) (५) पञ्चमो विधाम (वर्णमेव) (६) पष्ठो विधाम (पर्णपतरका) (७) सप्तमो विधाम (मात्रामेव) () प्रष्टमो विधाम (मात्रापताका) (e) मवमो विधाम (वृक्षापगुरुलघुसंख्याज्ञानम्) (१०) दामो विधाम (धमकंटो) (११) एरारतो विधाम (मात्रामटी) पुत्तिरप्रशस्ति यतमौक्तिकदुर्गमयोध मात्रोहिष्टप्रकरणम् मात्रानष्टप्रकरणम् बोद्दिष्ट नष्टप्रकरणम् २६२-३२६ २६२-२६४ २६५-२६६ २६७-२६६ ३..-३०१ ३०२-०३ ३१७-३२० ३२१-३२५ ३२७.३६७ २२१-४२ २० ] वृत्तमौक्तिक www विषय पृष्ठांक ३४४-३४५ ३४६-३५१ ३५२-३५६ ३५७-३६० २६८-६७२ ३७३-३८७ ३७३-३७८ ३७६-३८५ ३८६-३८७ वर्णमेयप्रकरणम् पणंपताका-प्रकरणम् मानामेरु-प्रकरणम् मात्रापताकाप्रकरणम् घणंमकंटी-प्रकरणम मात्रामर्कटो-प्रकरणम् वृत्तिकृप्रशस्तिः परिशिष्ट - क्रमपञ्जिका प्रथम परिशिष्ट टपणादि कला-वृत्तभेद-पारिभापिक-दाद-सङ्केत द्वितीय परिशिष्ट (क) मात्रिक छन्दों का प्रकारानुक्रम (ख) णिक छन्दों का प्रकारानुक्रम (ग) विरुदावली छन्दों का प्रकारानुक्रम तृतीय परिशिष्ट (क) पद्यानुक्रम (ख) उदाहरण-पद्यानुक्रम चतुर्थ परिशिष्ट (क १.) मात्रिक छन्दी के लक्षण एव नामभेद (क २.) गायादि छन्द-भेवों के लक्षण एवं नामभेद (ख) पणिक छन्दों के लक्षण एव नामभेद (ग) छन्दों के लक्षण एवं प्रस्तारसख्या विषदावली छन्दों के लक्षण पञ्चम परिशिष्ट सन्दर्भ-प्रग्यों में प्राप्त वणिक वृत्त पष्ठ परिशिष्ट गापा एव दोहा-भेदों के उदाहरण सप्तम परिशिष्ट प्रन्यौद्ध त-प्रन्य-सालिका प्रष्टम परिशिष्ट छन्वः मात्र के प्राय पोर उनकी टीकायें सहायक-प्रन्य ३८८.४१३ ३८८-४०१ ४०२-४१३ ४१४-४६६ ४२१-४२६ ४३०-४५० ४५१-४६१ ४६२-४६६ ५१३-५१८ ५१६-५२१ ५२२-५३४ ५३५-५३८ भूमिका छन्दःशास्त्र का उद्भव और विकास किसी पदार्थ के पायतन को उसका छन्द कहा जाता है । छन्द के बिना क्सिी भी वस्तु की अवस्थिति इस ससार में संभव नहीं है । मानव-जीवन को भी छन्द कहा जाता है । सात छन्दों या मर्यादानो से जीवन मर्यादित है । छन्द या मर्यादा के कारण ही मनुष्य स्व और पर की सीमानो मे बघा हुआ है। स्वच्छन्दत्व उसे प्रिय होता है परच्छन्दत्व नही। मनुष्य स्वकीय छन्दो या सीमानो को विस्तृत करता हुआ, स्वतन्त्रता के मार्ग का अनुशोलन करता हुआ अपने जीवन का उद्देश्य प्राप्त कर लेता है। छन्द पद का निर्वचन- छन्द और छन्दस् पदो की निरुक्ति क्षीरस्वामी ने 'छद' धातु से बतलाई है। अन्य व्युत्पत्तियो के अनुसार छन्द शब्द 'छदिर् ऊर्जने, छदि सवरणे, चदि आह्लादने दीप्तौ च, छद सवरणे, छद अपवारणे' धातुओ से निष्पन्न है ।' वस्तुत इन धातुओ से निप्पन्न शब्द विभिन्न अर्थों में पृथक्-पृथक् रूप से प्रयुक्त होते रहे होगे । कालातर मे ये शब्द छन्द और छन्दस् शब्द-रूपो मे खो गये। यास्क ने 'छन्दासि छादनात्" कह कर प्राच्छादन के अर्थ में प्रयुक्त छन्द शब्द का अस्तित्व माना है। सायण ने ऋग्वेद-भाष्यभूमिका मे 'पाच्छादक- त्वाच्छन्द' कथन द्वारा यास्क का समर्थन किया है। छान्दोग्योपनिषद् की एक गाथा के अनुमार देव मृत्यु से डर कर घयो-विद्या में प्रविष्ट हुए। वे छदो से आच्छादित हो गये । प्राच्छादन करने से ही छदो का छदत्व है। ऐतरेय आरण्यक के अनुसार स्तोता को आच्छादित करके छद पापकर्मो से रक्षित करते हैं। इन स्थानो पर आच्छादन अर्थ वाला छद शब्द प्रयुक्त हुआ है। असीम चैतन्य-सत्ता को सीमानो या मर्यादामो मे वाघ कर ससोम बना देने वाली प्रकृति भी आच्छादन करने के कारण ही छन्द कहो जाती है । वैदिक-दर्शन के अनुसार छन्द 'वाक्-विराज्' का भी नाम है जो सास्य की प्रकृति या वेदात को माया के १-वैदिक छन्दोमीमासा, -प० युधिष्ठिर मोमासक, पृ० ११.१३. २-निरक्त ७.१२ ३-छान्दोग्योपनिषद् ११४२तुलनीय गाय का उपनिदोन सूत्र दार ४-ऐतरेय मारण्यक २१२ ++ मृत्तमोतिक " समकक्ष है । सारा विश्व इमी से विकसित होता है । आच्छादनभाव को स्पष्ट करने के लिए 'दिच्छन्द' नाम का विशेष रूप से इसमें उल्लेख किया गया है।' यह एक छन्द ही विविध रूपो में एक से अनेक हो जाता है। इन विभिन्न छन्दो मे अात्मा आच्छादित हो कर व्याप्त हो जाती है । प्रात्मा 'छन्दोमा' के रूप मे विविध छन्दो को प्रकाशित करती है। छन्द से छन्दित छन्दोमा स्वय छन्द है और ज्योतिस्वरूप होने से उसका सम्बन्ध दीप्ति से तथा आनन्दस्वरूप होने से पालाद से भी जुड़ जाता है। चदि धातु से निष्पन्न छन्द (भूल रूप चन्द) का प्रयोग ऐसे प्रसगो मे होता रहा ज्ञात होता है । प्राण (प्राणा चै छन्दासि)' सूर्य ( छ-दासि वै ब्रजो गोस्थान ) और सूर्य रश्मियो (ऋग्वेद १९२६) को छन्द कहने का कारण भी दीप्तियुक्त होना ही ज्ञात होता है । लोक मे भी गायत्री प्रादि पद्य, वेद, पार्षग्रन्थ, सहिता, इच्छा, अनियन्त्रित प्राचार आदि अर्थो मे प्रयुक्त छन्द शब्द देखा जाता है । ये सब एवं छन्द शब्द के विविध अर्थ नहीं हैं, वरन् इन-इन अर्थों में प्रयुक्त अलग-अलग शब्द हैं। किसी समय 'इतका सूक्ष्म भेद सुविज्ञान था । स्वर प्रादि द्वारा यह भेद स्पष्ट कर दिया जाता था। कालान्तर में अन्य शब्दो की तरह मे सारे शब्द एक छन्द शब्द मे श्लिष्ट हो गये और उनके स्वर-चिह नो ने भी उदातादि प्रबल स्वरो मे अपना भस्तित्व सो दिया। साहित्य मे छन्द- अपर छन्द के विविध प्रों में एक गायत्री प्रादि छन्द का भी उल्लेख किया गया है । वाड्मय मै छन्द का विशिष्ट महत्त्व है । कात्यायन के अनुसार सारा वाड्मय छन्दौरूप है - छन्दोमूलमिद सर्व वाड्मयम् । छन्द के बिना वाक् उच्चरित नहीं होती। कोई शब्द छन्द रहित नहीं होता। इसीलिए गद्य और पद्य दोनो को छन्दोयुक्त माना जाता है।" १-वैदिक दशन -डा-फतहसिंह, पृष्ठ १८२-१८३ रवैरिक दर्शन पृ. १८४ तथा उसमें उद्धृत ताण्ड्य महाब्राह्मण १४३११।१४ ३-कौपीता बारा ७६, १११८ १७४२ ४-तैत्तिरीय गण श६३ ५-वैदिक छन्दोमोम मा ५.७.६ ६-दो के विकास की मी प्रति के लिए देखें- ऋग्देद मे गोतत्व'-बद्रीप्रसाद पचौली ७-ऋग्यजुप परिशिष्ट ५, पुजनीय छ दोऽनुशासन जयकाति, १२ ८-नाच्छन्दसि वागुचरति इति -निरुवत ७२, दुर्गत्ति १-छ दोहीनो न शब्दोस्ति नाशास्त्र १४१५ १०-वैदिक छ दोमीमांसा पृ०० भूमिका [ ३ - . छन्द की परिभाषा करते हुए कात्यायन ने ऋक्सर्वानुक्रमणी मे अक्षर के परिमाण को छन्द कहा है-यदक्षरपरिमाण तच्छन्द. । अन्यत्र अक्षर सख्या का नियामक छद कहा गया है ।' छन्द का महत्व केवल अक्षर-ज्ञान वराना मान नहीं है । ऊपर के निर्वचनो पर विचार करने पर भावो को आच्छादित करके अपने मे सीमित करने वाली शब्द-सघटना को साहित्य मे छन्द कह सकते हैं। अर्थ को प्रकाशित करके अर्थचेता को आह्लादयुक्त कर देने में छन्द का छदत्व प्रकट होता है। वैदिक छद मनो के अर्थ प्रकट करने की विशेष शैली प्रक्रिया के द्योतक हैं। वेदो के व्याख्याकारो ने इस बात पर जोर दिया है कि ऋपि, देवता और छद के ज्ञान के बिना मत्रो के अर्थ उद्भासित नहीं होते। देवता मनो के विषय है, ऋपि वे सूत्र हैं जिनसे अर्थ सरलतया प्रकट हो जाते हैं और छद अर्थप्राप्ति की प्रक्रिया का नाम है । छदों की अर्थ प्रकट करने की विशिष्ट प्रक्रिया के कारण हो वैदिक-शैली को 'छादस्' कहा गया है। पारसी धर्म-ग्रथ 'जेन्द अवस्ता' का जेन्द नाम भी छद का अपभ्रष्ट रूप ज्ञात होता है । ब्राह्मण ग्रन्थो मे छादस्-प्रक्रिया का बडा ही सूक्ष्म व रहस्यात्मक वर्णन देखने को मिलता है । वहाँ छदो के नामो द्वारा सम्पूर्ण सृष्टि-प्रक्रिया को समझाने का प्रयल किया गया है। सब से अधिक रहस्यात्मक वर्णन गायत्री छद का है जो सूर्यलोक से प्राप्त होने वाले सावित्री प्राण का प्रतीक बन गया है । छदो का रहस्यात्मक वर्णन स्वतत्र रूप से अनुसंधान का विषय है। यहां छद के व्यावहा- रिक रूप पर ही विचार दिया जा रहा है । व्यावहारिक दृष्टिकोण से छद अक्षरो के मर्यादित प्रक्रम का नाम है । जहाँ छद होता है वही मर्यादा आ जाती है। मर्यादित जीवन मे ही साहित्यिक छद जैसी स्वस्थ प्रवाहशीलता और लयात्मकता के दर्शन होते हैं । मर्यादित इच्छा की अभिव्यक्ति प्राचीन गणराज्यो की जीवन्त छद परम्परा Voting System कही जाती है। भावो का एकत्र सवहन, प्रकाशन तथा प्राह्लादन छद के मुख्य लक्षण हैं। इस दृष्टि से रुचिकर और श्रुतिप्रिय लययुक्त वाणी ही छद कही जाती है- १-छ दोऽक्षरसख्यावच्छेदकमुच्यते -मथर्ववेदीय वृहत्सर्वानुक्रमणी २-ऋग्वेद के मत्रद्रष्टा ऋषि -बद्रीप्रसाद पचोली, वेदवाणो, बनारस । १२१ ३-वेदविद्या -~-डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल, प० १०२ ४-प्राचीन भारत मे गणतात्रिक व्यवस्था -बद्रीप्रसाद पचोली, शोधपतिका उदयपुर, १५२१ वृत्तमौक्तिक 'छदयति पृणाति रोचते इति छद जिस वाणी को सुनते ही मन आह्लादित हो जाता है वह वाणी ही छद है-'छदयति ग्राह्लादयति उद्यते अनेन इति छद ।" स्पष्ट है कि छद के रूप मे अक्षर-मर्यादा का निर्वाह करने का सम्बन्ध शब्द-संघटना से है और प्रकाशन एव ग्राह्लादन का सम्बन्ध अर्थ के साथ इसी तरह छद के प्रथम दो लक्षणो का सबध वयता से होता है और तृतीय का श्रोता । इस दृष्टि से छद, श्रोता और वक्ता के बीच में प्रभावशाली सेतु का काम करता है। शतपथब्राह्मण मे 'रसो वै छदासि' कह कर छद की रागात्मिका अनुभूति और अभिव्यक्ति की अोर स्पष्ट सकेत किया गया है। छन्द शास्त्र- छद शास्त्र मे छदो का विवेचन किया जाता है। भारतवर्ष मे वैदिक तथा लौकिक सस्कृत भाषा के छदो पर विचार अत्यन्त प्राचीन काल से ही प्रारम्भ हो गया था। वैदिक छन्दोमीमासा मे छद शास्त्र का आदि मूल वेद माना गया ह ।' छद शास्त्र के प्राचीन सस्कृत-वाड मय में प्रयुक्त अनेक नामो का उल्लेख भी इसमे है। यथा- (१) छदोधिचिति, (२) छदोमान, (३) छदोभाषा, (४) छदोविजिनि, (५) छदोनाम, (६) छदोविजिति, छदोविजित, (७) छदोव्याख्यान, (6) छदसा विचय, (६) छदसा लक्षणम्, (१०) छद शास्त्र, (११) छदोऽनुशासन, (१२) छदोविवृत्ति, (१३) वृत्त, (१४) पिंगल । छदोविचिति पद का अर्थ है-वह ग्रन्थ जिसमे छदो का चयन किया गया हो। यह पद पाणिनि के गणपाठ, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, सरस्वतीकण्ठाभरण, गणरत्नमहोदधि आदि में प्रयुक्त हुआ है। पिंगलप्रोक्त छदोविचिति, पतजलि- प्रोक्त छदोविचिति, जनाधयप्रोवत छदोविचिति, दण्डिप्रोक्त छदोविचिति तथा एक अन्य पालिभापा के छदोविचिति का नामोल्लेख श्रीमोमासकजी ने किया है। छदोमान नाम भी ग्रथवाची है । पाणिनि के गणपाठ, सरस्वतीकण्ठाभरण आदि मे यह नाम प्रयुक्त हुआ है, परन्तु अभी तक इस नाम का कोई अथ नही १-सस्कृत साहित्य का इतिहास --वाचस्पति गेरोला, पृ० ११० २-शतपथ ब्राह्मण ७३|०३७ ३-वैदिक छदोमोमासा, प० युधिष्ठिर मीमासक, पृ० ४३ ३६ भूमिका मिला है । जिस अथ मे छदो का भाषण या व्याख्यान मिलता हो उसे छदोभाषा कहा गया है । गणपाठो मे यह नाम पाया है ।' ऐसी भी मान्यता है वि छदो- भापा नाम प्रातिशारयो के लिए प्रयुक्त हुअा है ।२ विष्णुमित्र ने ऋक्प्राति- शास्य की वृत्ति मे छदोभाषा शब्द का अर्थ वैदिक भापा किया है। कुछ अन्य लोगो ने छद का अर्थ छद शास्त्र तथा भापा का अर्थ व्याकरण या निरुक्त किया है। परन्तु प० युधिष्ठिर मीमासक ने इन मतो को निराकृत करके छदोभापा- नामक छद शास्त्र के ग्रथो का अस्तित्व माना है उन्होने भी इस नाम को चरण- व्यूह आदि मे प्रातिशास्य के लिए प्रयुक्त माना है।" जिस अथ द्वारा छदो पर विजय प्राप्त हो सके उसे छदोविजिति कहा जाता है। चाद्र गणपाठ, जनेन्द्र गणपाठ, सरस्वतीकण्ठामरण आदि मे यह नाम प्रयुक्त हुप्रा है । छदोनाम के लिए मीमासकजी ने सभावना प्रकट की है कि यह छदो- मान का गपभ्रश हो सकता है । छदोव्याख्यान, छदमा विचय, ईदसा लक्षण, छदो- ऽनुशासन, छद शास्त्र प्रादि भी छदोविषयक ग्रथो के नाम हैं। वृत्त पद ये प्राधार पर वृत्तरत्नाकर प्रादि ग्रथो के नामकरण दिए गये हैं। हमारे विवेच्य ग्रथ वृत्तमौयितक का नाम भी इमी परम्परा मे उल्लेखनीय है। छन्द शास्त्र के लिए पिंगल-नाम छद शास्त्र के प्रमुग्व प्राचार्य पिंगल के कारण ही प्रयुक्त हुमा ज्ञात होता है । पिंगल नाम के अनेक प्राकृतभाषा के नथ प्रसिद्ध है। छन्द शास्त्र को प्राचीनता- वैदिक छदो के नाम सर्वप्रथम वैदिक सहितामा म हो प्रयुक्त हुए हैं । वैदिक पडगो मे छद शास्त्र का नाम भी प्राता है । वेदमत्रों के साथ उनके छतो का नामो- ल्लेस भी हुप्रा है । उनका विशुद्ध और लयवद्ध उच्चारण छद शास्त्र के शान से हो सम्भव है। इसलिए वेदार्थ के विषय में विवेचन परने वाले गभी प्रयो में छदो का भी प्रसगवश उल्लेख मिल जाता है । पाणिनि ने गणपाठ म छद सास्न-सम्बधी ग्रयों का उरलेम पिया है। उनके ममय में तो लौतिय सस्कृत भाषा म महापाथ्या की रचनाए लिमी जाने लगी - गरोला पृ.१५ १-वदिष पदोमीमांसा पु. ३७ २-समृत माहित्य का इतिहास -प्रय मतोंरे लिए देखो -दिस पोमोमामा, पृ. ३७-३६ ४-4दिर पसेमीमांसा, पु. ६४. ४२ वृत्तमौक्तिक थी । इसलिए वैदिक छदो के अतिरिक्त लौकिक छदो पर भी विवेचना होने लगी होगी और इस विषय के अनेक प्रथ विद्यमान होगे। विद्वानो की मान्यता है कि छद शास्त्र के प्रमुख प्राचार्य पिंगल पाणिनि के समकालीन थे। छद शास्त्र के विकास मे पिंगल का वही स्थान है जो व्याकरण-परम्परा मे पाणिनि का है। तण्डी यास्क, क्रोष्टुकि, सैतव, काश्यप, रात, माण्डव्य आदि आचार्य पिंगल से भी प्राचीन हैं। इससे छद शास्त्र की प्रतिप्राचीनता के विषय मे किसी प्रकार कोई सदेह नही रह जाता है । छन्द शास्त्र के प्राचीन प्राचार्य- वेदागो के प्रवक्ता शिव और बृहस्पति माने जाते हैं। महाभारत के एक उल्लेख के अनुसार वेदागी का प्रवचन बृहस्पति ने' तथा एक दूसरे उल्लेख के अनुसार शिव ने किया। परवर्ती अथकारो ने छद शास्त्र के प्रवक्ता प्राचार्यों की परम्परा का उल्लेख किया है । छद सूत्र भाष्य के अन्त में यादवप्रकाश ने छद शास्त्र के प्रवर्तक आचार्यों की परम्परा का उल्लेख किया है छदोज्ञानमिद भवाद् भगवतो लेभे सुराणा गुरु तस्माद दुश्च्यवनस्ततो सुरगुरुर्माण्डव्यनामा तत । माण्डव्यादपि सैतवस्तत ऋषिर्यास्कस्तत पिंगल , तस्येद यशसा गुरो वि धृत प्राप्यास्मदायै क्रमात् ॥ इसी प्रथ के अ त में किसी का एक अन्य श्लोक भी दिया हुआ है छन्द शास्त्रमिद पुरा त्रिनयनाल्लेभे गुहोऽनादित तस्मात् प्राप सनत्कुमारमुनितस्तस्मात् सुराणा गुरु । तस्माद्देवपतिस्तत फणिपतिस्तस्माच्च सपिगल तच्छिष्यर्बहुभिर्महात्मभिरयो मय प्रतिष्ठापितम् ॥ प० युधिष्ठिर मीमासक ने इनमें से प्रथम परम्परा को अधिक विश्वसनीय माना है । उ होने राजवार्तिक मे उल्लिखित शिवगिरिजानन्दिफणीन्द्रवृहस्पतिच्यवनशुक्रमाण्डव्या । संतवपिंगलगरुडप्रमुखा प्राद्या जयन्ति गुरुचरणा ॥ १-वैदिक छदोमीमांसा पृ० ४६ २-वेदांगानि तु बृहस्पति -महाभारत, शातिपर्व २१२।३२ ३-वेदात् पडगा युदत्य -महाभारत, शान्तिपव २८४६२ ४-उपयुक्त मतों के लिए पृष्य, वैदिक छदोमीमासा, पृ० ५७
भूमिका
तथा यति के प्रसग मे छद शास्न-प्रवक्ता जयकीति द्वारा उल्लिखित-
वाछन्ति यति पिंगलवसिष्ठकोंडिन्यकपिलकम्बलमुनय ।
नेच्छन्ति भरतकोहलमाण्डव्याश्वतरसतवाद्या केचित् ॥
परम्पराम्रो का उल्लेख भी किया है।'
पिंगल छद सून मे उल्लिखित प्राचार्यों का नाम ऊपर पा चुका है। इससे
प्रक्ट है कि आचार्य पिंगल से पहले छद शास्त्र के प्रवक्तामो की एक व्यवस्थित
एव अविच्छिन्न परम्परा विद्यमान थी।
वैदिक और लौकिक छन्द शास्त्र
छद दो प्रकार के कहे गये हैं -वैदिक और लौकिक ।' वेद सहितानो मे
प्रयुक्त गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, जगती, पक्ति, उष्णिक, बृहती, विराट् प्रादि
छद वैदिक कहे जाते हैं । छद शास्त्र के प्रारभिक ग्रथो मे केवल वैदिक छदो और
उनके भेद प्रभेदो पर ही विचार किया जाता था। बाद मे वाल्मीकि ने लोकिक
साहित्य में भी छद का प्रयोग किया। उन्हे आदि-कवि होने का श्रेय मिला।
इतिहास पुराण, काव्य आदि मे छदो का प्रभूत रूप से प्रयोग होने लगा। बाद
मे इन छदो के लक्षणादि के विषय मे छद शास्त्र मे विचार प्रारम्भ हुप्रा ।
सस्कृत-छद शास्त्रो के आधार पर परवर्ती काल मे प्राकृत और अपभ्रश भापामो
मे छदो के लक्षण ग्रथ भी लिखे गये।
छन्द के विषय मे उपलब्ध प्राचीनतम सामग्री
वैदिक सहितारो में गायत्री प्रादि छदो के नाम भनेकघा उल्लिखित हैं परन्तु
उनका विवेचन वहाँ प्राप्त नहीं होता । वस्तुत. उन स्थलो पर छ.दो के नामो
द्वारा प्राधिदैविक और प्राध्यात्मिक रहस्यो को प्रोर ही समेत दिया गया ज्ञात
होता है । मत्रो के ऐसे सकेतो का ब्राह्मण-ग्रयो मे विस्तार से स्पष्टीकरण किया
गया है । विराट् छद का मबघ विराज-गौ (प्रकृति) से बतलाते हुए ताण्ड्य-
महाग्राह्मण मे उसे छदो मे ज्योतिस्वरूप कहा गया है-विराड वै छन्दसा ज्योति ।'
विराट को दशाक्षग भी कहा गया है। अन्य छदो के विषय मे भी ऐसे ही
रहस्यमिश्रित विचार ग्राह्मण-ग्रयो में मिलते हैं।
१-जयकात्तिकृत छन्दोनुशासन. १।१३ एवं वैदिक पदोमीमांसा प०५८
२-नारदपुराण-पूर्व भाग २।५७१
-ताण्डयमहाब्राह्मण, ६३,१०२।२
४-शारा विराट् - तपषप्राह्मण, ११।१।२२, ऐतरेयब्राह्मण ६२०; गोपय ब्राह्मण
पूर्वाधं ४ २४, उत्तराध, १८, ६२, ६।१५ ताण्डपमहाबाह्मण, ३॥१३॥
वृत्तमौक्तिक नग्वेद-प्रातिशास्य को छद शास्त्र की प्राचीनतम रचना माना जाता है। यह महर्षि शौनक की रचना है । इसका विवेच्यविषय व्याकरण है परन्तु प्रसग- वश छदो की भी चर्चा की गई है। यह चर्चा नितात अधूरी है । छदो का ज्ञान प्राप्त किये बिना मत्रो का उच्चारण ठीक तरह से नहीं हो सकता। इसीलिए इस अथ में छदों का विवरण दिया गया है।' ऋग्वेद तथा यजुर्वेद को सर्वानुक्रमणियो में भी छदो का विवरण मिलता है । छदोऽनुक्रमणी में दस मडल हैं और उसमे ऋग्वेद के समस्त छदो का क्रमश. विवरण दिया गया है। यह भी शौनक की रचना है। शांखायन श्रौतसून में भी प्रसगवश छदो पर विचार किया गया है पतजलि ने निदानसून मे छदो का उल्लेख करते हुए कुछ प्राचीन छद - शास्न के प्रवक्ताओ के नामो का उल्लेख भी किया है । ये पतजलि महाभाष्कार पतजलि से भिन्न कोई प्राचीन प्राचार्य थे। एक अन्य गाग्यं नामक प्राचार्य ने उपनिदानसून में इन पतजलि के अतिरिक्त तण्डिब्राह्मण, पिंगल आदि प्राचार्यो तथा उक्थशास्त्र का उल्लेख किया है। उक्यशास्त्र, सभव है छन्द शास्त्र के लिए प्रयुक्त कोई प्राचीन नाम रहा हो। कोथ ने हलायुधकोश की साक्षी से इन वैदिक-परम्परा के प्राचीन ग्रथो को वेदाग छन्दस् कहा है।' यास्व ने अपने निरुक्त मे वैदिक छदो के नामो का निर्वचन किया है । यथा गायत्री गायते स्तुतिकमण.। मिना पा विपरीता। गायतो मुखात् उदपत्तत् दति च साह्मणम् । उष्णिगुत्स्नाता भवति । स्निह्मतेर्वा स्यारान्तिकर्मण । उणी पिणी त्योपमिकम् । उपोत स्नायते । कदुककुभिनी भवति । ककुच कुजश्च कुजतेर्षा । उजतेर्वा । अनुष्टयनुष्टोभनात् । गायत्रोमेय विपदा सती चतुर्येन पावेनानुष्टोमतीति इति घ साह्मणम् । महतो परिवहणात् । पक्ति पधपदा । त्रिष्टुयस्तोभत्युत्तरसदा । कातु विता पाता तोणतम पन्दः । विचित्तस्य स्तोमतीति वा । यत् विस्तोभ- सरित्रष्टुपयम्-इति विज्ञायते । जगती गततम छन्व । जलचरगति। जल्गल्यमानो पाजत् इति च ब्राह्मणम। विराइ विराजनादा । विराधनाari विप्रापणाबा । विरा- बनारसम्पूर्णाभरा। विरापनादूनाक्षरा । विप्रापणापिकासरा । पिपीलिकामध्येयो- पमिरम् । पिपीलिका पलतेतिकर्मण । -यदिप-साहित्य -रामगोविंद त्रिवेदी, पृ० २४० २-रात-साहित्य का इतिहाम -कोप (हिंदी अनुवाद, पोखम्बा) पु. ४६२ -निस, १२ भूमिका 1 यास्क ने गायत्री को अग्नि के साथ, त्रिष्टुप् को इन्द्र के साथ तथा जगती को आदित्य के साथ भाग लेने वाला कहा है।' छंदों का देवों के साथ संबंध तो वाजसनेयो-सहिता आदि मे भी मिलता है।' वैदिक छंदों के इस प्रकार के विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि रहस्यमिश्रित वर्णन से भी छंदो के स्वरूप पर प्रकाश पड़ता है और वेदार्थ-ज्ञान में उनकी उपयोगिता भी कम नहीं है। पाणिनि ने तो छंद को वेद का पाद कहा है -'छन्दः पादौ तु वेदस्य'।' पिंगल के पूर्ववर्ती छन्दःशास्त्र के प्राचार्य- पिंगल से पूर्व का कोई ग्रंथ छदों के विषय में प्राप्त नहीं है, परन्तु उनके पूर्ववर्ती अनेक ग्रंथकारों के नाम मिलते हैं। इससे पता चलता है कि उनके पूर्व छंदःशास्त्र की एक अविच्छिन्न परम्परा विद्यमान थी। उनके पहले के कुछ प्राचार्यो का परिचय यहां दिया जा रहा है- १ शिव व उनका परिवार- शिव को छद.शास्त्र के प्रवर्तक ग्रादि प्राचार्य के रूप मे यादवप्रकाश और राजवात्तिककार ने स्मरण किया है। व्याकरण के आदि प्राचार्य भी शिव माने जाते हैं । सभव है ये केवल शैव-सम्प्रदाय में ही प्रवर्तक माने जाते हो। वेदागो के शैव या माहेश्वर-सम्प्रदाय का प्राचीन काल में महत्वपूर्ण स्थान रहा ज्ञात होता है। शिव के साथ उनके पुत्र गुह व पत्नी पार्वती का नाम भी छद.शास्त्र के प्रवक्ता के रूप लिया जाता है। नन्दी शिव का वाहन माना जाता है। समव है यह किमी शिव-भक्त प्राचार्य का नाम रहा हो । राजवार्तिककार के अनुसार ये पतजलि के गुरु तथा पार्वती के शिष्य थे। वात्स्यायन ने कामशास्त्र के प्राचार्य के रूप में भी नन्दी के नाम का उल्लेख किया है जो शिव के अनु- चर थे। २. सनत्कुमार- यादवप्रकाश के भाष्य के अन्त मे दी हुई मजान लेसफ को परम्परा में १-निरुक्त ७.११ २-याजसनेयी-सहिता ११८-१९ मंत्रायणी-सहिता ॥११६ पाटा-महिमा १७३.४ जमिनीय ब्राह्मए र ३-पाणिनीय शिक्षा ४-पाममूत्रम्, १८ - १०] वृत्तमौक्तिक इनका नाम भी उल्लिखित है। कालक्रम से ये बृहस्पति के पूर्ववर्ती रहे होगे। उपर्युक्त साक्षी से तो ये बृहस्पति के गुरु ठहरते हैं। परन्तु, इस बात की पुष्टि क्सिी अन्य सूत्र से होती नही जान पडती। ३ बृहस्पति-- इनका नाम उपर्युक्त तीनो परम्परामो में पाया है । व्याकरण के बार्हस्पत्य- सम्प्रदाय का अस्तित्व प० युधिष्ठिर मीमासक ने माना है।' महाभारत की ऊपर दी हुई साक्षी से वेदागो के प्रवर्तक बृहस्पति हैं । ये माहेश्वर सम्प्रदाय से भिन्न परम्परा के प्रवर्तक ज्ञात होते हैं। बृहस्पति को भारतीय परम्परा मे देव- गुरु माना गया है और इन्द्र इनके शिष्य कहे गये हैं। ऐन्द्र-व्याकरण के प्रवक्ता इन्द्र का छन्द शास्त्र के प्रवक्ता के रूप में भी उल्लेख किया जाता है । यादवप्रकाश के भाष्य को दोनों परम्परामो में इन्द्र का नाम पाया है । राजवार्तिक के अनुसार फणीन्द्र ही इन्द्र ज्ञात होता है। प० युधिष्ठिरजी ने फणीन्द्र को पतजलि का नाम माना है और च्यवन को दुश्च्यवन मान कर इन्द्र से अभिन्न मानने की सम्भावना प्रकट की है। इस विषय मे अभी निश्चय-पूर्वक कुछ भी कहना सभव नही है । ६ शुक्र- यादवप्रकाश व राजवार्तिक दोनों मे शुत्र का नाम पाया है। सम्भव है शुमनीति के प्रवक्ता प्राचार्य शुक्र और छद शास्त्र के प्रवक्ता शुक्र अभिन्न हो । ७ कपिल- इनको मीमासक्जी ने कृतयुग का मन्तिम आचार्य माना है । जयबीति के एद शास्त्र में यति चाहने वाले भाचार्य के रूप में इनका नामोल्लेख दिया गया है । सोस्यदर्शन के आचार्य पिल और ये मभिन्न ज्ञात होते हैं । ८ माण्डव्य- माण्डय्य ये नाम का उल्लेख पिंगल, जयोति, यादवप्रकाश, चन्द्रशेखर भट्ट पादि द्वारा किया गया है। इनको मीमांसक जी ने प्रेतायुगीन माना है। १-रि-पदोमीमांसा, पु. १३.४ १८.१६ " भूमिका [११ ६. वसिष्ठ- जयकीर्ति ने इनका नाम छंद शास्त्र के प्राचार्य के रूप में लिया है। १० सैतव- इनका नाम सभी परम्पराग्रो मे पाया है। ऐसा ज्ञात होता है कि ये बहुत प्रसिद्ध प्राचार्य रहे होंगे । ११. मरत- ये नाट्यशास्त्र-कर्ता भरत से अभिन्न ज्ञात होते हैं। जयकोति ने छन्द शास्त्र के प्रवक्ता के रूप मे इनके नाम का स्मरण किया है। नाट्यशास्त्र के १४वें तथा १५वें परिच्छेद में भरत ने छन्दो पर विचार किया है । सम्भव है इनका कोई पृथक् ग्रथ भी इस विषय पर रहा हो। १२ कोहल- कोहल का नामोल्लेख भी जयकोति ने ही किया है। द्वापरयुगीय अन्य छन्द.प्रवक्ता- भीमासजी ने यास्क, रात, पौष्टुकि, कौण्डिन्य, ठाण्डी, प्रसतर, कम्बल, काश्यप, पाचाल (बाभ्रव्य) तथा पतजलि को द्वापरणालीन छद.शास्त्र के प्राचार्य के रूप में विभिन्न साक्षियों के माधार पर स्वीकार किया है। यास्क के किसी पृषक-छद सब धी प्रय का पता नही चलता । अन्य प्राचार्यों के मतों का हो यत्र. तत्र उल्लेख मिलता है। पलियुग के प्रारम्म में होने वाले छद.प्रवक्ता- मीमांसक्जी ने उक्थशास्त्रकार, कात्यायन, गरुड, गाग्य, शौनय मादिका पलियुग के प्रारम्भ में होने वाले पद शास्न-प्रयक्तामों के रूप में नामोल्लंग किया है। पिंगल या बाल भी उन्होंने यही माना है। उपयुक्त छंदशास्त्र-प्रवक्तामों में कोई अथ इस समय प्राप्त नहीं है, परतु उनके मतो के उदरण अन्य प्रयो में मिल जाते हैं। परवर्ती विद्वानो को मरमे प्रधिक प्रभावित करने वाले पाचार्य पिगल रहे हैं। माघा पिपल मौर पिपल-पन्द गूग- पिंगस को पौष ने प्राइस-पदो-विषयक-अप "प्रारत-पंगलम्" के रचयिता १-र-पदमीमामा ११ १२] वृत्तमौक्तिक से भिन्न अत्यन्त प्राचीन प्राचार्य माना है ।' पिंगलसूत्र ही छंदो के विषय मे हमारे सामने सबसे प्राचीन ग्रंथ है । कुछ लोगों ने पिंगल को पाणिनि से पूर्ववर्ती ग्रंथकार माना है। ऐसे लोगो में से कुछ पिंगल को पाणिनि का मामा मानते हैं, परन्तु युधिष्ठिर मीमासक तथा गैरोला ने पिंगल को पाणिनि का अनुज, अतः समकालीन ग्रन्थकार माना है।' पिंगल का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि बाद मे छन्दाशास्त्र का नाम ही पिंगल-शास्त्र हो गया। इनको ग्रन्थ सर्वाधिक प्राचीन होने के साथ ही प्रौढ तथा सर्वाङ्गपूर्ण है। इसमें वैदिक-छदों के साथ ही लौकिक छंदो पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। "प्राकृत-पिंगल" का आधार भी इनका पिंगल-सूत्र हो है । परवर्ती सभी छन्दःशास्त्रकार पिंगल के ऋणी हैं। पुराणों में छन्दों का विवेचन- नारदपुराण तथा अग्निपुराण भी छन्दों के विवेचन करने वाले प्रथ हैं । अग्निपुराण को भारतीय-साहित्य का विश्वकोश कहा जाता है। उसमे ३२८ से ३३५ तक ८ अध्यायों में छंदों का विवेचन किया गया है। अग्निपुराण में छदों के विवेचन का प्राधार पिंगलरचित छदःसूत्र-ग्रंथ ही रहा है- छन्दो वक्ष्ये मूलजस्तैः पिंगलोक्तं यथाक्रमम् । इसमें वैदिक व लौकिक दोनों प्रकार के छन्दो का विवेचन है। नारदपुराण में पूर्व भाग के द्वितीय पाद के ५७वें अध्याय में वेदांगो का विवेचन करते हुए प्रसगवश छंदों के लक्षण भी बताये गये हैं। वहाँ एकाक्षर-पाद छदों से लेकर दण्डक छंदो तक का वर्णन मिलता है । प्रस्तार-प्रक्रिया से छंदों के विविध भेदों की भोर भी सकेत किया गया है। परसती छन्द-सम्बन्धी राय तथा पन्यकार- परवर्ती चद.शास्त्र-प्रवक्तामो में कतिपय प्राचार्य ऐसे हैं जिनका नामोल्लेख- मात्र प्राप्त है पौर जिनके प्रन्यों के नाम मोर ग्रन्थ अद्यावधि अनुपलब्ध हैं। पथा:- " १-सरात साहित्य का इतिहास -कोप (हिन्दी) पृ. ४९३ --गरोसा, पृ. १९१-१२ तपा सम्पत-व्याकरणशास्त्र पा इतिहास पृ. १२२ -गरोता, पृ. १९२ ४.निपुरा, १२७१ " भूमिका [१३ काल नाम काल ६ शती m १. पूज्यपाद' (देवनन्दो) ४७०-५१२ वि. २. भामह' ३ दण्डी ७०० वि ४. पाल्यकोत्ति' ८७१-९२४ वि ५. दमसागर मुनि १०५० वि. ६. वृद्धकवि' ७. सालाहण" ८. हाल ६. मनोरथ १०. अर्जुन ११. गोसल" १२. गोविन्द १३ चतुर्मुख . १३ V छद शास्त्र के परवर्ती प्रथों मे से प्रसिद्ध कतिपय ग्रन्थ निम्नलिखित है। १. बृहत्सहिता:-यह वराहमिहिर की ज्योतिष विषयक रचना है। प्रसंग- वश इसके चौदहवें अध्याय मे ग्रह-नक्षत्रों की गति-विधि के साथ छदो का विवेचन भी मिलता है । कीथ के अनुसार वराहमिहिर का स्वतन्त्र छदःशास्त्र का प्रथ भी होना चाहिए किन्तु ऐसा कोई अथ अभी तक देखने में नही आया । २ जानाश्रयी-छन्दोविचिति :-जनाश्रय (?) नामक कवि ने इसकी रचना विष्णुकुण्डोन (कृष्णा और गोदावरी का जिला) के अधिपति माधववर्मन् प्रथम के राज्य मे-जिसका समय ६ शताब्दी A D पूर्व माना जाता है की है। यह ग्रथ ६ अध्यायो में विभक्त है । इसका प्राकृत-छन्दो का अन्तिम अध्याय महत्वपूर्ण है । गणशैली स्वतन्त्र है । युधिष्ठिर मीमासकजी ने गणस्वामी को ही इसका कर्ता माना है। ३. जयदेवच्छन्दस्---जयदेव को रचना होने से यह 'जयदेवच्छन्दस्' के नाम से . १-जयीत्ति -छदोनुशासन, ८.१६ २-कीय : ए हिस्ट्री प्राव सस्कृत लिटरेचर ३,४,५-वैदिक-दोमीमांसा, पृ.६०.६१ ६-विरहाक वृत्तजातिसमुच्चय २।८.६ तपा ॥१२ २१.६ ॥१२ १-कविपरण-राजस्थान प्राच्य विधा, प्रतिष्ठान जोधपुर, सन् १९६२ १.-११-एनरोखर : पन्दकोश (विदरण गत) १२.१५-स्वयम्भूपन्द- १४-वैदिक-पदोमीमांसा पृ.६१ . " " " " १४] वृत्तमौक्तिक - प्रसिद्ध है । प्रो० एच० डी० वेल्हणकर' ने इनका समय ६००-६०० वि० स० का मध्य माना है । जयदेव जैन कवि थे। इन्होने अपना यह ग्रंथ पिंगल के अनु- करण पर लिखा है । लौकिक-छदो की निरूपण शैली पिंगल से भिन्न है । छन्दो का विवेचन सस्कृत-परम्परा के अनुकूल और अत्यन्त व्यवस्थित है । इसमे पाठ अध्याय हैं। द्वितीय और तृतीय अध्याय में वैदिक-छन्दो का निरूपण है । सभवत जैन लेखक होने के कारण ही इस ग्रन्थ का विशेष प्रसार न हो सका। ४ गाथालक्षण-जैन कवि नन्दिताढ्य की यह रचना हैं। श्री वेल्हणकर' के मतानुसार इनका समय ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियो में माना जा सकता है । प्राकृत-अपभ्रश परम्परा के छन्दःशास्त्रीय ग्रन्थो में यह प्राचीनतम अथ है । नन्दिताढ्य द्वारा इस ग्रंथ मे जिन छदो का चयन किया गया है वे केवल जैना- गमो मे ही उपलब्ध हैं। ग्रथकार ने गाथावर्ग के विविध छन्दो का विस्तार से वर्णन किया है । लेखक के दृष्टिकोण से अपभ्र श-भाषा हेय है । ग्रथ की भाषा प्राकृत है। ५ वृत्तजातिसमुच्चय--विरहाक को यह रचना है। डॉ. वेत्हणकर' के के मतानुसार इनका समय हवी, १०वी शताब्दी या इससे भी पूर्व माना जा सकता है। पिंगल के पश्चात् मानिक छदो का सर्वाधिक विवेचन इसी ग्रथ मे प्राप्त है। इसमे ६ परिच्छेद हैं । भाषा प्राकृत है किन्तु पाचवें परिच्छेद में वर्णियवृत्तो के लक्षण सस्कृत मे हैं । अथ मे यति का उल्लेख नही है अत. सम्भव है ये यति-विरोधी सम्प्रदाय के हो। इस ग्रथ मे मगणादि गणो के स्थान पर पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग है जो कि पूर्ववर्ती ग्रथो मे प्राप्त नही है । ६ घन्दोनुशासन-इमके प्रणेता कवि जपदेव पन्नड प्रान्तीय दिगम्बर जैन थे। डॉ. वेल्हणकर' ने इन का समय १००० ई० लगभग माना है। पिंगल एव जयदेव की परम्परा के अनुसार यह प्रथ भी पाठ अध्यायो में विभक्त है। इसम अपभ्रश के मानिक छन्दो या विवेचन भी प्राप्त है । छदो के लक्षण वारिया-दौलो में हैं, उदाहरण स्वतन्त्ररूप से प्राप्त नही है । १-देखें, जयदामन को भूमिका-हरितोपमाला, बम्बई २-देरों, विपिंग -गापासक्षण की भूमिका-रा प्रा विप्र ओयपुर, सन् १९६२ 1-गापाससाण पग १ ४-देगें, दरामातिसमुपयको भूमिरा-राजापार प्राम्य विद्या प्रतिष्ठान ओपपुर, गन् १९६२ ५-देरी, जयसमम् की भूमिमा हरिवोपमामा, बम्बई মুন্ধি। ७ स्वयम्भूछन्द-इसके प्रणेता कविराज स्वयम्भू जैन है । कर्ता के सबध मे विद्वानो व अनक मत' है किन्तु डॉ० वेल्हणकर' ने इनका समय १०वी शती का उत्तरार्द्ध माना है । स्वयभू अपभ्र श-भाषा के श्रेष्ठ कवि हैं। अपभ्रश छन्द- परम्परा की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण कृति है । कवि ने मगणादि गणो का प्रयोग न करके 'उ प च त द' पारिभाषिक शब्दो के आधार से छन्दो के लक्षण कहे है। इस अथ मे छदों के उदाहरण-रूप मे विभिन्न प्राकृत-कवियो के २०६ पद्य उद्धृत हैं । लेखक ने कवियो के नाम भी दिये है । ८ रत्नमञ्जूषा-अज्ञातकर्तक जन-कृति है। वेल्हणकर ने इसका समय हेमचन्द्र से पूर्व स्वीकार किया है, अत ११-१२वी शती माना जा सकता है। इसमे पाठ अध्याय हैं लेखक ने वणिकवृत्तो का समान प्रमान और वितान शीर्षक से विभाजन किया है। मगणादि-गणो को परिभाषा भी लेखक की स्वतन्त्र है। यह पारिभाषिक शब्दावली सम्भवत पूर्ववर्ती एव परवर्ती कवियो ने स्वीकार नहीं की है। ६ वृत्तरत्नाकर-इसके प्रणेता कश्यपवशीय पव्वेकमट्ट के पुत्र केदार- भट्ट है। कीथ' ने इनका समय १५वी शती माना है किन्तु ११६२ को हस्त- लिखित प्रति प्राप्त होने से एव ११वी शती की इसी ग्रथ की त्रिविक्रम को प्राचीन टीका प्राप्त होने से वेल्हणकर' ने इनका सत्ताकाल ११वी शताब्दी ही स्वीकार किया है । पिंगल के अनुकरण पर इसकी रचना हुई है । जयदेवच्छन्दस् की तरह इसमें भी छन्दो के लक्षण लक्ष्य-छदो मे ही देकर लक्षण और उदाहरण का एकीकरण किया गया है । इस ग्रथ का प्रसार सर्वाधिक रहा है। १०. सुवृत्ततिलक-इसके प्रणेता क्षेमेन्द्र का समय वीथ ने हेमचन्द्र के पूर्व अथवा ११वी शती माना है। मेकडानल' के अनुसार क्षेमेन्द्र की बृहत्स्थामजरी १-डॉ. भोलाराकर व्यास प्राकृतपंगलम् भा. २ पृ० ३६५, डॉ. शिवनन्दनप्रसाद मात्रिक छदो का दिशास पृ० ४५-४६ २-देखें, स्वयम्भूधद की भूमिका-राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर, सन् १९१२ ३-तुलना के लिये देखें, इसी पप का प्रथम परिशिष्ट ४ देखें, रत्नमञ्जूषा की भूमिका-भारतीय ज्ञानपीठ काशी, १९४६ ई. ५-कीय ए हिस्ट्री मा यस्कृत लिटरेचर ६-देखें, बदामन को भूमिका-हरितोषमाला बम्बई ७-कोय : ए हिस्ट्री माय संस्कृत लिटरेचर, १० १३५ ८-पायर ए मेडॉनल . हिस्ट्री माद सस्थत लिटरेचर १. १७६ वृत्तमौक्तिक की रचना १०३४ ई० मे हुई थी । अतः क्षेमेन्द्र का समय ११वी शती निश्चित है । क्षेमेन्द्र ने इस ग्रथ मे पहले छन्द का लक्षण दिया है और तदुपरांत अपने ग्रंथों से उदाहरण दिये है । छदों के नाम दो बार पाये हैं, एक वार लक्षण मे और दूसरी बार उदाहरण में । यह ग्रन्ध तीन विन्यासों में विभक्त है। क्षेमेन्द्र के विचार में विशेष रसो या प्रसंगो के लिए विशेष छंद ही उपयुक्त और पर्याप्त प्रभावशाली होते हैं । अथकार के अनुसार उपजाति पाणिनि का, मन्दाक्रांता कालिदास का, वशस्थ भारवि का और शिखरिणी भवभूति का प्रिय छद रहा है । ११. थुतबोध-इसके लेखक कालिदास कहे जाते है। कीथ ने इस बात का कोई आधार नही माना । कुछ लोग वररुचि को भी इसका लेखक मानते हैं। कृष्णमाचारी' नी कालिदासों मे से तीसरा कालिदास मानते है। गैरोला के अनुसार ये ७ या वी शताब्दी के कोई अन्य कालिदास होगे । युधिष्ठिर भीमांसक' के अनुसार इस कालिदास का समय १२वी शती था । संभव है यह मान्यता उचित हो और यह कालिदास राजा भोज के सखा के रूप में लोक- स्थानों मे ख्याति प्राप्त कालिदास हो । लक्षण मे ही उदाहरण का गतार्थ हो जाना इस ग्रंथ की सब से बड़ी विशेषता है। इसका भी प्रसार सर्वाधिक रहा है । १२. पन्दोऽनुशासन-इमके प्रणेता कलिकाल सर्वज्ञ हेमचन्द्र पूर्णतलगच्छीय श्रीदेवचद्रसूरि के शिष्य हैं । अणहिलपुर पत्तन के नुपति सिद्धराज जयसिंह की सभा के ये प्रमुखतम विद्वान् थे और महाराजा कुमारपाल के ये धर्मगुरु पे। इनका समय वि० सं० ११४५-१२२६ माना जाता है। ये बहुमुखी प्रतिभा वाले लेराक और वैज्ञानिक दृष्टि-मम्पन्न प्राचार्य एव शास्त्र प्रणेता थे। हेमचन्द्र ने अपने इम प्रथ को पिंगल, जयदेव और जयकोत्ति के अनुकरण पर ही पाठ अध्यायों मे प्रषित किया है । वंतालीय और मात्रासमक के कुछ नये भेद जिनका उल्लेख पिंगल, जयदेव, विरहांक, जयकात्ति आदि पूर्ववर्ती प्राचार्यों ने नही किया, हेमचन्द्र ने प्रस्तुत पिये हैं। इसमें लगभग सातसो माठसौ छटो या निरूपण प्राप्त है । नवीन मात्रिय-दो की दृष्टि से इस ग्रंथ या सर्वाधिक महत्व है। ऐमचाद्र ने इस प्रप पर म्योपाटीया' भी बनाई है । दम टोमा मे हेमचन्द्र ने १-पीप: ए हिस्ट्री माय सम्पूत मिटरेचर, पृ. १६ २-एम. कृष्णमापारी : ए हिस्ट्री पाद बलाशिषम सरबत सिटरेपर, पु. ६०० ३-दंगे. पहिलपदोमोपोगा पृ.१२ Yati• एम० से. पेहरावर-सम्पादित माहित यह पप छिपी अनयमामा में प्रशशित है।
भूमिका [१७ ७ " " ४ . 1. जया " " " १० " " " " " " " " " ६ " छदो के नामान्तर देते हुये 'इति भरत.' कह कर जो नामभेद दिये हैं उनमे मे निम्नलिखित छद वर्तमान मे प्राप्त भरत के नाट्यशास्त्र में उपलब्ध नहीं हैं, और यति-विरोधी प्राचार्यों मे गणना होने से सभव है कि नाट्यशास्त्र मे निरूपित छदो के अतिरिक्त भरत ने छद शास्त्र पर कोई स्वतन्त्र प्रथ भी लिखा हो। भरत के नाम से उल्लिखित अनुपलब्ध छदो को तालिका निम्न है :- ३ अक्षर ६ अक्षर गिरा तडित् शिवा ललिता भोगवती द्रुतगति. भ्रमरी पुष्पसमृद्धिः वागुरा रुचिरा कुन्तलतन्वी अपरवनम् शिखा द्रुतपदगति कमलमुखी रुचिरमुखी नलिनी मनोवती वीथी १३ कविदर्पण-यह अज्ञात जैन-कर्तृक कृति है। छदो के उदाहरणो मे जिनसिंहसूरि-रचित चूडाल-दोहक' का उदाहरण है। जिनसिंहसूरि खरतर. गच्छीय द्वितीय जिनेश्वरसूरि के शिष्य हैं, इनका शासनकाल १३००-१३४१ तक का है । कविदर्पण का सर्वप्रथम उल्लेख स० १३६५ मे रचित अजितशाति- स्तव को टीका में जिनप्रभसूरि ने किया है जो कि जिनसिंहसूरि के शिष्य है । अत यह अनुमान किया जा सकता है कि इसक प्रणेता जिनसिंहसूरि के शिप्य और जिनप्रभसूरि के गुरुभ्राता ही होगे। यह अथ प्राकृतभापा में ६ उद्देश्यो मे विभक्त है। छन्दो के वर्गीकरण तथा लक्षण निर्देश से इमकी मौलिकता प्रकट होती है। प्राकृत-अपभ्र श की परम्परा मे इसका यथेष्ट महत्त्व है। १४. छन्द.कोष-इसके प्रणेता रत्नशेखरसूरि हेमतिलकसूरि के शिष्य हैं । इनका समय १५वी शती है । यह अथ प्राकृतभाषा में है। इसमे कुल ७४ पद्य हैं। इस ग्रथ के छदो का विवेचन छदो व्यवहार के अधिक निकट है और तयुगीन छदो के स्वरूप-विकास के अध्ययन की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण है। १-कविदर्पण, प० २४ "
वृत्तमौक्तिक
१५ प्राकृत-पिंगल-इसके प्रणेता के सम्बन्ध में विद्वानो मे मतभेद है
किन्तु डॉ० भोलाशकर व्यास' के अनुसार हरिब्रह्म या हरिहर इसका कर्ता
माना जा सकता है और प्राकृतपिगल का सकलन-काल १४वी शती का प्रथम
चरण मान सकते हैं। इसमे मात्रिक और वर्णिकवृत्त नाम से दो परिच्छेद हैं ।
लक्षणो मे ग्रन्थकार ने टादिगण, प्रस्तारभेद, नाम, पर्याय एव मगणादिगणो की
पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग किया है।
अपभ्र श और हिन्दी में प्रयुक्त मात्रिक-छदो के अध्ययन के लिए यह ग्रथ
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है । वणिकवृत्तो के लिए सस्कृत-साहित्य में जो स्थान
पिगलकृत छद सूत्र का है, मानिक-छदो के लिए वही स्थान प्राकृतपिंगल का है।
१६ वाणीभूषण-इसके प्रणेता दामोदर मिश्र दीर्घघोषकुलोत्पन्न मैथिली
ब्राह्मण है। डॉ० भोलाशकर व्यास ने प्राकृतपिंगल के सग्राहक हरिहर को
पितामह और रविकर को दामोदर का पिता या पितृव्य स्वीकार किया है।
विद्वानो के मतानुसार दामोदर मियिलापति कोतिसिंह के दरबार मे थे। अत:
दामोदर मिश्र और कविवर विद्यापति सम-सामयिक होने चाहिये । दामोदर मिश्र
का समय १४३१ से १४६६ तक माना जाता है ।
यह ग्रथ सस्कृत-भाषा में है। इसमें दो परिच्छेद हैं। लक्षणो का गठन
पारिभाषिक शब्दावली मे है और उदाहरण स्वरचित हैं । वस्तुत. यह अथ प्राकृत-
पिंगल का सस्कृत में रूपान्तर मात्र है।
१७ छन्दोमञ्जरी-गरोला' ने लेखक का नाम दुर्गादास माना है किन्तु
यह भ्रामक है । ग्रन्थ के प्रथम पद्य मे ही लेखक ने स्वय का नाम गगादास पौर
पिता का नाम गोपालदास वैद्य एव माता का नाम सतोपदेवो लिखा है। इनका
समय १५वी या १६वी शताब्दी है। ग्रथकार ने स्वरचित "प्रच्युतचरित महा-
काव्य' मौर 'पसारिशतक' एवं 'दिनेशशतक' का भी उल्लेख किया है। दो-
१-देमें, प्राकृतर्पगलम् भा० २, पृ. ६.२६
-
४
.
.
३-गरोसा : सस्कृत-साहित्य का इतिहास पृ० १९३
४-देव प्रणम्य गोपाल पंचगोपालदासस ।
सन्तीपातनयधयो गङ्गादासस्तनोद Aur
५-राग. पोभि समुगवलपदनभ्याधभव्याय-
मेनागारि सदष्युतस्य धरित काव्य कविप्रीतिदम् ।
हमारे पातक दिनेसातवटन्द प तस्यास्स्वयो,
मगादाराकवे तो पुषिनो सन्दसो मन्जरी॥६॥९॥
भूमिका [१९ मञ्जरी की शैली वृत्त रत्नाकर से मिलती-जुलती है। इसमें ६ स्तबक है । छठे स्तवक मे गद्य-काव्य और उनके भेदो पर विचार है जो कि इसकी विशेषता है। १८ वृत्तमुक्तावली'-इसके प्रणेता तैलगवशोय कवि कलानिधि देवर्षि कृष्णभट्ट हैं । इस ग्रन्थ का रचनाकाल १७८८ से १७६६ के मध्य का है । इसमें तीन गुम्फ हैं :-१ वैदिक छन्द, २. मानिक छद, और ३. वणिक वृत्त । पिंगल और जयदेव के पश्चात् प्राप्त एव प्रसिद्ध ग्रन्थो मे वैदिक-छंदो का निम्- पण न होने से इस ग्रय का महत्त्व बढ जाता है । मात्रिक-गुम्फ प्राकृतपिंगल और वाणीभूषण से अनुप्राणित है । इसमे ४२ दण्डक-छदो के लक्षण एवं उदाहरण प्राप्त हैं। १६ वाग्वल्लभ —इसके प्रणेता कवि दुखभजन शर्मा हैं जो कि काशी- निवासी कान्यकुब्जवशीय प्रताप शर्मा के पौत्र और चूडामणि शर्मा के पुन है । इसकी 'वरवणिनी' नामक टीका को रचना दुःखभजन कवि के ही पुत्र महोपा- ध्याय देवीप्रसाद शर्मा ने वि० स० १९८५ मे की है, अत इसका रचना समय १९५० से १६७० वि० स० का मध्य माना जा सकता है । गैरोला ने इनका समय १६वी शती माना है जो कि भ्रामक है ।' कवि दुखभजन ज्योतिर्विद् तो थे ही , इसीलिए जहां प्राज तक के प्राप्त छद शास्त्रो में प्रयुक्त छद प्रायश ग्रहण किये हैं तो वहां प्रस्तार का आधार लेकर संक्डो नवान छन्द भी निर्मित किये हैं । इस ग्रप मे कुल १५३६ छन्दो का निरूपण है । शंलो वृत्त- रत्नाकर की है । प्रत्येक वणिक्वृत्त प्रस्तार-सख्या के क्रम से दिया है । इनके अतिरिक्त छद शास्त्र के संकडो ग्रथ और उनकी टोकायें प्राप्त होती हैं जिनको सूची मेंने इसी ग्रय के ८वें परिशिष्ट में दी है। वृत्तमौक्तिक भी छद.शास्त्र का बडा ही प्रौढ और महत्त्वपूर्ण ग्रथ है । चन्द्र- शेखर भट्ट ने अपने इस ग्रथ मे जिस पाडित्य का परिचय दिया है, वह केवल उन ही तक सीमित नहीं था। उनकी वा-परम्परा में जैसा कि हम देखेंगे बडे बडे माने हुए प्रतिभा सम्पन्न विद्वान् हुए, और इसमें सदेह नही कि ऐसी ज्ञान-गमद्ध परम्परा मे जिसका व्यक्तित्व विकसित हुना हो वह अपने कृतित्व और व्यक्ति व के लिये उन पूर्वजो का सब से अधिक ऋणी होगा। इसोलिये कवि वे परिचय से पूर्व ग्रन्थ वे माहात्म्य की पृष्ठभूमि को समझने के लिए सर्वप्रथम कवि के पूर्वजो का परिचय प्राप्त कर लेना भी वाहनीय है। १-राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर से प्रकाशित २-गरोसा : सस्कृत साहित्य का इतिहास पृ. १६३ - २० ] वृत्तमौक्तिक कवि-वश-परिचय चन्द्रशेखर भट्ट वासिष्ठ-वशीय' लक्ष्मीनाथ भट्ट के पुत्र हैं । ग्रंथकार ने अपने पूर्वजो मे वृद्धप्रपितामह रामचन्द्र भट्ट , पितामह रायभट्ट' और पितृ- चरण लक्ष्मीनाथ भट्ट का उल्लेख किया है। भट्ट लक्ष्मीनाथ ने प्राकृतपिंगलसूत्र की टीका 'पिंगलप्रदीप' में अपना वश- परिचय इस प्रकार दिया है - भट्ट. श्रीरामचन्द्रः कविविवुधकुले लब्धदेह श्रुतो य: श्रीमान्नारायणाख्यः कविमुकुटमणिस्तत्तनूजोऽजनिप्ट । तत्पुत्रो रायभट्टः सकलकविकुलख्यातकीत्तिस्तदीयो लक्ष्मीनाथस्तनूजो रचयति रुचिर पिंगलार्थप्रदीपम् ।। [ मगलाचरण पद्य ५ ग्रथकार का वशवृक्ष इस प्रकार बनता है इस प्राधार :- रामचन्द्र भट्ट नारायण भट्ट राय भट्ट लक्ष्मीनाथ भट्ट चन्द्रशेखर भट्ट १-लक्ष्मीनाय गुभट्टवयं इति यो वासिष्ठयशोद्भव- स्तरगून पयिचन्द्रशेखर इति प्रख्यातकीति वि [वृत्तमौक्तिव प्रशस्तिः ५ ] २-प्रस्मदापितामहमहाविपतितीरामचन्द्रभट्टविरचिते .. । [ वृतमौक्तिक पु. १०७] ३-मामपितामहमहाविपरितीरायभट्टते [ हत्तमौक्तिक पृ० १२१] ४-निर्णयगागर गसरग मोर प्रातलम् भा• १ मे 'रामभट्टः' मुद्रित है, जो कि भूमिका [ २१ ग्रथकार के वृद्धप्रपितामह श्रीरामचन्द्र भट्ट वस्तुत. तैलगदेशीय वेलनाट यजु- र्वेदान्तर्गत तैत्तिरीयशाखाध्यायी आपस्तम्ब त्रिप्रवरान्वित प्रागिरस वार्हस्पत्य भारद्वाजगोनीय श्री लक्ष्मण भट्ट सोमयाजी के पुत्र है; जोकि वसिष्ठवशीय ननिहाल मे मातुल के यहाँ दत्तकरूप मे चले गये थे। प्रत भारद्वाजीय गोत्रापेक्षया वशवृक्ष इस प्रकार बनता है गोविन्दाचार्य :- - वल्लभ दीक्षित । यज्ञनारायण गगाधर भट्ट सोमयाजी गणपति भट्ट सोमयाजी । श्रीवल्लभ भट्ट (बालभट्ट) लक्ष्मण भट्ट सोमयाजी जनार्दन भट्ट महाप्रभु वल्लमाचार्य रामचन्द्र भट्ट रामकृष्ण भट्ट (नारायण भट्ट) विश्वनाथ भट्ट' नारायण भट्ट राय भट्ट लक्ष्मीनाथ भट्ट चन्द्रशेखर भट्ट वासिष्ठ एव भारद्वाज दोनो गोत्रो का उरलख होने से यहां यह विचारणीय है कि रामचन्द्र भट्ट भारद्वाज-गोनीय थे या वसिष्ठ-गोत्रीय ? या नाम-साम्य से रामचन्द्र भट्ट एक ही व्यक्ति हैं अथवा भिन्न-भिन्न ? और, यदि एक ही व्यक्ति है तो गोत्रभेद का क्या कारण है ? तथा रामचन्द्र भट्ट यदि वल्लभाचार्य के अनुज है तो वल्लभ-साहित्य एव परम्परा में रामचन्द्र एव इनकी परम्परा का उल्लेख क्यो नही है ? आदि प्रश्न उपस्थित होते है । अत इन पर यहां विचार करना असगत न होगा। १-दखें, कापरोली का इतिहास, द्वितीय भाग, एक वल्लभवरावृक्ष । २-दखे, वल्लभवचक्ष। ?
२२] वृत्तमोक्तिक रामच द्र भट्ट ने स्वप्रणीत 'गोपाललीला-महाकाव्य', 'रोमावलीशतक' एव 'रसिकरञ्जन' की पुष्पिकाओं मे स्वय को लक्ष्मणभट्ट का पुन स्वीकार किया है 'इति श्रीलक्ष्मणभट्टात्मजश्रीरामचन्द्रविरचिते गोपाललीलाख्ये महाकाव्ये कस- वधो नाम एकोनविंश सर्ग ।' [ गोपाललीला महाकाव्य की पुष्पिका ]' 'इतिश्रीलक्ष्मणभट्टात्मजश्रीरामचन्द्रकविवृत रोमावलीशृङ्गारशतक सम्पूर्णम् ।' [ रोमावलीशतक की पुष्पिका ] * 'इति श्रीलक्ष्मणभट्टसूनुश्रीरामचन्द्रकविकृत सटीक रसिकरञ्जन नाम शृङ्गारवैराग्यार्थसमान काव्य सम्पूणम् ।' [ रसिकरञ्जन की पुष्पिका ] कवि ने 'कृष्णकुतूहल' महाकाव्य मे स्वय को लक्ष्मणभट्ट का पुत्र और वल्लभाचार्य का अनुज स्वीकार किया है 'श्रीमल्लक्ष्मणभट्टवशतिलक श्रीवल्लभेन्द्रानुज ।' [ कृष्णकुतूहलमहाकाव्य प्रशस्तिपद्य ] रोमावलीशतक मे कवि ने स्वय को लक्ष्मणभट्ट का पुन, वल्लभ का अनुज और विश्वनाथ का ज्येष्ठभ्राता लिखा है 'श्रीमल्लक्ष्मणभट्टसूनुरनुज श्रीवल्लभ श्रीगुरो, अध्येतु सममग्रजो गुणिमण श्रीविश्वनाथस्य च ।' [ रोमावलीशतक पद्य १२५] इन उल्लखो मे भारद्वाजगोत्र का कही भी उल्लेख न होने पर भी लक्ष्मण भट्ट एव बल्लभाचार्य का उल्लेख होने स यह स्पष्ट है कि ये भारद्वाज- गोत्रीय थे। रामचन्द्र भट्ट ने 'कृष्णकुतूहल-महाकाव्य' के अष्टम सर्ग के प्रात मे स्वय का वसिष्ठगोन स्वोकार किया है १-भारते दु हरिश्चन्द्र द्वारा सन् १९२९ मे प्रकाशित २-राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर, प्रम. १९२३५ १-पाध्यमाला चतुर्ष गुदा मे प्रकाशित ४-गोपामसीसा भूमिरा भूमिका [२३ 'विद्यानिष्ठवसिष्ठगोत्रजनुषा तेन प्रणीते महा- काव्ये कृष्णकुतूहलेबरहुतिः सर्गोऽजनिष्टाष्टमः ।' अतः यह स्पष्ट है कि रामचद्र भट्ट स्वयं को लक्ष्मण भट्ट का पुत्र और वल्भभ का अनुज मानते हुए भी अपना वासिष्ठ-गोत्र स्वीकार करते है। चन्द्रशेखर भट्ट वृत्तमौक्तिक' मे कृष्णकुतूहल-महाकाव्य के प्रणेता रामचद्र भट्ट को 'प्रवृद्धपितामह' शब्द से सम्बोधित करते है । अतः यह निर्विवाद है कि नाम-साम्य से रामचन्द्र भट्ट पृथक्-पृथक् व्यक्ति नहीं है अपितु वही वल्लभानुज हो हैं । ऐसो अवस्था में गोत्रभेद क्यों ? इस सम्बन्ध में कोई प्राचीन प्रमाण तो उपलब्ध नहीं है, किन्तु गोपाललीला-महाकाव्य के सम्पादक श्री बेचन राम शर्मा सम्पादकीय-उपसंहार में लिखते हैं : 'इय वसिष्ठगोत्रोद्भवत्वोक्तिर्मातामहगोत्राभिप्रायेण ऊहनीया।' इसी बात को स्पष्ट करते हुये भारतेन्दु हरिश्चन्द्र 'वल्लभीय सर्वस्व'3 में लिखते है: 'लक्ष्मण भट्टजी के मातुल वसिष्ठ-गोत्र के ब्राह्मण अपुत्र होने के कारण इनको (रामचन्द्र को) अपने घर ले गये थे।' इससे स्पष्ट है कि लक्ष्मण भट्ट के मामा जो अपुत्र थे; उन्होंने लक्ष्मणभट्ट से अपने नाती रामचद्र को दत्तक रूप में ले लिया । दत्तक रूप में जाने के पश्चात् उत्तर भारत की परम्परा के अनुसार गोग-परिवर्तन हो ही जाता है। लक्ष्मण भट्ट के मातुल वसिष्ठगोत्रीय थे अत: रामचंद्र का गोत्र भी भारद्वाज न हो कर वसिष्ठ हो गया। यही कारण है कि रामचंद्र भट्ट ने स्वयं का गोत्र वसिष्ठ ही स्वीकार किया है। वसिष्ठ-गोत्र का उल्लेख करते हुए भी धर्म (दत्तक) पिता का नाम न देकर सर्वत्र लक्ष्मणभट्ट-तनुज और वल्लभानुज का उल्लेख करना अप्रासगिक सा प्रतीत होता है किन्तु तत्त्वतः विरोध न होकर विरोधाभास ही है । इसका मुख्य कारण यह है कि रामचद्र भट्ट ने पुरुषोत्तम-क्षेत्र में वल्लभाचार्य के सहवास में रह कर १-देखें, पृष्ठ १०५, १०७ २-देखें, गोपालसीला प० २५५ ३-मारतेन्दु अपावली भाग , पृ. १६८ २४ ] वृत्तमौक्तिक सर्वशास्त्र और सर्व दर्शनो का अध्ययन आचार्यश्री से ही किया था।' अतः पितृ- भक्ति, भ्रातृ-प्रेम एवं भक्तिवश ही इनका सर्वत्र स्मरण किया जाना स्वाभाविक अतएव यह तो स्पष्ट ही है कि रामचन्द्र भट्ट गोत्रापेक्षया पृथक्-पृथक् व्यक्ति न हो कर लक्ष्मण भट्ट के पुत्र एव वल्लभ के लघुभ्राता थे और दत्तकरूप में वसिष्ठ-वंश में जाने के कारण भारद्वाजगोत्रीय न रह कर वसिष्ठगोत्रीय हो गये थे। सभव है इसी कारण से पुष्टिमार्गप्रवर्तक वल्लभाचार्य के जीवनवृत्त- सम्बन्धी समग्र-साहित्य में रामचद्र भट्ट एव इनकी परम्परा का कोई उल्लेख नहीं हुपा हो ! अस्तु । वश-परिचय गोविन्दाचार्य से न देकर ग्रथकार-सम्मत वसिष्ठगोत्रापेक्षया रामचन्द्र भट्ट से दिया जा रहा है। रामचन्द्र भट्ट इनके पिताश्री का नाम लक्ष्मण भट्ट' और मातुश्री का नाम इल्लम्मागारू था। इनका जन्म अनुमानतः वि० स० १५४० मे काशो मे हुअा था। लक्ष्मण भट्ट का स्वर्गवास वि० स० १५४६ चैत्र कृष्णा नवमी को दक्षिण मे वेंकटेश्वर बालाजी नामक स्थान पर हुआ था । स्वर्गवास के पूर्व ही लक्ष्मण भट्ट ने अपने मातामह की सपूर्ण चल और अचल संपत्ति इनको प्रदान कर अयोध्या भेज दिया था। इस सम्बन्ध में भारतेन्दु हश्चिन्द्र 'वल्लभीयसर्वस्व" में लिखते हैं . 'लक्ष्मण भट्टजी साक्षात् पूर्णपुरुषोतम के धाम अक्षरब्रह्म शेपजी के स्वरूप हैं, इससे प्रापको त्रिकाल का ज्ञान है । सो जब आपने अपना प्रयाण समय निकट जाना तय काकरवार से बड़े पुत्र रामकृष्ण भट्टजी वो वालाजी मे धुलाया और वही मापने डेरा क्यिा । पुषो को अनेक शिक्षा देकर श्री रामकृष्ण भट्ट जी को श्री १-'श्रीमल्लबमभवतिसकः योवल्लभस्य प्रिय, लिप्यस्य चाणप्रमादशरणो मो रामचन्द्र पविः।' [ भारतेन्दु हरिश्चन्द्रः गोपाललीला-भूमिमा ] 'पुरपोरामशेने समागस्य ज्येष्ठधातुः श्रीवल्समाचार्यात्... "सकामात मणि शास्त्राणि मतानि एममधीत्य ।' [येपनराम शर्मा गोपाललीसा-उपत्र मवर्णन ] २-सक्षम भट्ट जीरे परिषय के लिए देखें, बाली का इतिहास भाग २ -गणमापारी:हिस्टोरी माफ दो क्लाहिरम यस्मृत मिटरेचर, पृ० २६१ ४-भारोतु पायी भाग ३, पृ. ५७२ - भूमिका [ २५ यज्ञनारायण के समय के श्रीरामचन्द्रजी पधराय दिए और कहा कि देश में जा कर सब गाव और घर आदि पर अधिकार और बेल्लिनाटि लग जाति की प्रथा और अपने कुल अनुसार सब धर्म पालन करो। ऐसे ही श्रीयज्ञनारायण भट्ट के समय के एक शालिग्रामजो और मदनमोहनजी श्रीमहाप्रभुजो को देकर कहा कि आप प्राचार्य होकर पृथ्वी मे दिग्विजय करके वैष्णवमत प्रचार करो और छोटे पुत्र रामचन्द्रजी को, जिनका काशी मे जन्म हुआ था, अपने मातामह की सब स्थावर-जगम-सपत्ति दिया ।' यहाँ लक्ष्मण भट्ट के वसिष्ठगोत्रीय मातामह और मातुल का नाम प्राप्त नहीं है । सम्भवत ये अयोध्या में ही रहते हो और इनकी स्थावर एव जङ्गम सम्पत्ति भी अयोध्या म हो हो। पो० कण्ठमणि शास्त्री' ने लक्ष्मण भट्ट का ननिहाल धर्मपुरनिवासी बह वृच् मौद्गल्यगोनीय काशीनाथ भट्ट के यहाँ स्वीकार किया है जब कि प्रस्तुत ग्रथकार चन्द्रशेखर भट्ट एव भारतेन्दु हरिश्चन्द्र' वसिष्ठगोत्र में स्वीकार करते हैं। मेरे मतानुसार सभव है कि लक्ष्मण भट्ट के पिता बाल भट्ट ने दो शादियां की हो। एक वह वच् मौद्गल्यगोत्रीया 'पूर्णा' के साथ और दूसरी वसिष्ठगोत्रीया के साथ। फिर भी यह प्रश्न तो रह ही जाता है कि लक्ष्मण भट्ट बह वृच् मौद्गल्यगोत्रीया पूर्णा के पुत्र थे या वसिष्ठगोत्रीया के? इसका समाधान तो इस वश-परम्परा के विद्वान् ही कर सकते हैं । कवि रामचन्द्र प्रादि चार भाई थे । नारायणभट्ट उपनाम रामकृष्ण भट्ट और वल्लभाचार्य बडे भाई थे और विश्वनाथ छोटे भाई थे। रामकृष्ण भट्ट काकर- वाह में ही रहते थे और पिताश्री लक्ष्मण भट्ट के स्वर्गारोहण के कुछ समय पश्चात् ही सन्यासी हो गये थे।' केशवपुरी के नाम से ये प्रसिद्ध थे और दक्षिण- भारत के किसी प्रसिद्ध मठ के अधिपति थे। डॉ० हरिहरनाथ टडनलिखित 'वार्ता साहित्य एक बृहत् अध्ययन" के अनुसार गोविन्दरायजी ( सत्ताकाल १-चाकरोली का इतिहास, भाग २, पृ०५ -'ये कांग्रवार मे ही रहते थे। ये कुछ दिन पीछे सयासी हो गये तब देशवपुरी नाम पहा। ये ऐसे सिद्ध पे कि सहाक पहिने गगा पर स्पन को भाति चलते पे।' भारतेन्दु प्रयावली भा० ३, पृ० ५६८ ४-'हरिरायजी के प्रागट्य से सम्बप मे सम्प्रदाय के प्रयों में यह प्रसिद्ध है कि जब श्री कल्याणरायषी इस वर्ष के थे, तब एक दिन श्रीमाचायजी के छोटे भाई नवपुरीको सपासी हो गए ये मोर दिसणभारत में पिसी बहे मठ के प्रपिपति थे वहा भाएं और उन्होंने थोगुसाईजी से अपनी गद्दी के लिये एक बासा मांगा, जिस पर मापने हा किजिस बालक में पाप टाकुरजी नहीं होंगे उन्हें दे दिया जायगा । धीरम्याण राजी रे पास ठाकुरजी नहीं थे। इसलिये उन्हे देना निश्चित वार्ता साहित्य एक रहत मध्ययन पु. ३९७ हमा २६ ] वृत्तमौक्तिक X x X १५६६-१६५०) के प्रथम पुत्र कल्याणरायजी (जन्म सं० १६२५) दस वर्ष की अवस्था मे केशवपुरी गुसाईंजी से मिले थे। अतः 'शतायु' से अधिक ये विद्यमान रहे यह निश्चित ही है। वि० स० १५६८ में रचित 'बद्रि काश्रमवृत्तिपत्रक" नामक एक पत्र आपका प्राप्त होता है ; जिसका आद्यन्त इस प्रकार है: गोभिवंतं प्रकृतिसुन्दरमन्दहास- भाषासमुल्लसितमजुलवक्त्रबिम्बम् । श्रीनन्दनन्दनमखण्डितमण्डलाभ, बालार्यमिश्रय(क)मह हृदि भावयामि ॥१॥ x विद्वद्भिः किल कृष्णदासकमुखैः शिष्यरनेकर्वृतः, सोऽहं श्रीबद्रो(दरी)वनान्तमगमं शुक्र (ज्येष्ठ)शकाब्दे तथा । देवाम्भःपतिभूमिते (१४३३) सह नरं नारायणं वीक्षितुं, तत्र व्यासमुनीशसङ्गतिरभूदाकस्मिकी मे शुभा ।।६।। x श्रीवल्लभाचार्य महाप्रभूणां नियोगतो वुद्धिमतां विभाव्य । श्रीरामकृष्णाभिधभट्ट एतल्लेखं व्यतानीत् पुरतश्च तेषाम् ।।११॥ द्वितीय बृहद्भ्राता महाप्रभु वल्लभाचार्य भारत के प्रसिद्धतम आचार्यों मे से है। इनका प्रतिपादित पुप्टिमागं आज भी भारत के कोने-कोने मे फैला हुआ है । इनहो के साहचर्य में रह कर रामचन्द्र भट्ट ने समग्र शास्त्रों का अध्ययन किया था और वे इन्हें केवल बड़ा भाई ही नहीं अपितु अपना गुरु भी मानते थे। रामचन्द्र भट्ट वेदान्त, मीमांसा, व्याकरण, काव्य और साहित्य-शास्त्र के विशिष्ट विद्वान् थे । न केवल विद्वान ही अपितु वादजेता भी थे। अहर्निश शास्त्रार्थ मे रतु रहने के कारण कई पराजित वादी मापके विरोधी भी हो गये थे और इसी विरोध-स्वरूप प्रापको विष भी दे दिया गया था ।' इससे ऐमा प्रतीत होता है कि ये अल्पायु में हो स्वर्गलोक को प्राप्त हो गए थे। महाकवि रामचन्द्र भट्ट ने भनेक ग्रंथों का निर्माण किया होगा ! वर्तमान में इनके रचित निम्नलिखित ग्रंप प्राप्त होते हैं। जिनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है:- १-यह पत्र पार्वा माहिप एक वृहत् पम्पयन पु. १५पर प्रकाशित है। २-भारतेन्दु पावमी, भाग 1, पृष्ठ ५६८ भूमिका [ २७ १. गोपाललीला महाकाव्य :-कवि ने इस काव्य में भगवान् श्रीकृष्ण का जन्म से लेकर कंस-वध पर्यन्त भगवल्लीला का वर्णन १६ सों मे किया है। प्रत्येक सर्ग की पद्यसंख्या इस प्रकार है :-७०,५८, ७८, ७१, ५१, ७६, ७६, ५२, ६२, ७५, ६१,६०,५१, ६१, ५६, ६१, ६६, ५७, ७६ । इसमें रचना. सवत् का उल्लेख नही है । प्रसाद एवं माधुर्यगुण युक्त रचना है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने इसका प्रकाशन वि० स० १९२६ मे किया है, जो अब अप्राप्त है। इस काव्य का सपादन काशिक राजकीय पाठशाला के सांख्यशास्त्र के प्रधाना- ध्यापक प० बेचनराम शर्मा ने किया है । इस काव्य का प्राद्यन्त इस प्रकार है:- प्रादि- शुभममितमचिन्त्यचिद्विचित्र श्रुतिशतमूर्धनि केशपाशकल्पम् । दिशतु किमपि धाम कामकोटि-प्रतिभटदीधिति वासुदेवसंज्ञम् ॥१॥ वहति शिरसि नागसम्भव यः स्फुटमनुरागमिवात्मभक्तियुक्ते । कटतटविगलन्मदाम्बुदम्भ-धितकरुणारसमाश्रये गणेशम् ॥२॥ कविजनरसनाग्रतुङ्ग रङ्ग-स्थलकृतलास्यकलाविलासकाम्या । कृतिषु सपदि वाञ्छितं यथेच्छ मयि ददती करुणां करोतु वाणी ॥३॥ इह विदघति भव्यकाव्यबन्धान् भुवि यशसे कवयस्तदाप्नुवन्ति । इति भवति ममापि कान्यवन्धे प्रजन इवाधिगिरि स्पृहाति पङ्गोः ।।४।। मयि विदधति काव्यबन्धमन्धाः स्तवमथवा पिशुनाः सृजन्तु निन्दाम् । अहमिह न बिभेमि कीर्तनीयं कथमपि कृष्णकुतूहल मया यत् ॥५॥ -विप्रेराद्योप्यजादेविधिवदुपनयादेत्य जन्म द्वितीय , हृद्गायथ्याः स्वय ता निजहृदि निदघद् ब्रह्म विच्चित्रकृयः । साङ्गे वेदेऽप्यधोती सपदि किल ऋचो यस्य विश्वासरूपा- स्तत्राभिव्यंक्तमूर्तिविभुरपि स मम श्रीधरः श्रेयसेऽस्तु ॥७६॥ इति श्रीलक्ष्मणभट्टात्मजश्रीरामचन्द्रविरचिते गोपाललीलास्ये महाकाव्ये कस- क्यो नाम एकोनविंशः सर्गः । २. कृष्णकुतूहल महाकाय्य :-कवि ने इस काव्य की रचना वि.स. १५७७ मै प्रयोध्या में रहते हुए की है। इसका भी प्रतिपाद्य विषय श्रीकृष्णलीला का १-मन्द गोत्रमुनीपुचन्द्रगणिने (१५७७) मापस्य पक्षे सिवे- योप्यायो निवसन सता परगुणप्रीत्यारमना सेवकः। श्रीमल्सदमणमट्टवादितथीपस्समेन्द्रानुजः, कास्य पणातहलास्यमयत श्रीरामधाः पवि.। [गोपामसीला पृ. २५५ ] अन्त- २८] वृत्तमास्तिक . वर्णन ही है। श्रीगोपाललीला काव्य को अपेक्षा इसकी रचना अधिक प्रौढ और प्राञ्जल है।' यह काव्य अद्यावधि अप्राप्त है। वेचनराम शर्मा ने गोपाललीला के सम्पादकीय उपसंहार मे अवश्य उल्लेख किया है कि प्रारम्म के दो पत्ररहित इसकी प्रति मुझे प्राप्त हुई है।' विशेप शोध करने पर संभव है इस महाकाव्य को अन्य प्रतियां भी प्राप्त हो जायें। प्रस्तुत ग्रन्थ मे चन्द्रशेखर भट्ट ने भी मत्तमयूर, प्रहर्षिणी, वसन्ततिलका, प्रहरणकलिका, मालिनी, पृथ्वी, शिखरिणी, हरिणी, मन्दाक्रान्ता, शार्दूलवि- क्रीडित और स्रग्धरा छन्द के प्रत्युदाहरण कृष्णकुतूहल काव्य के दिये हैं । इन कतिचित् पद्यों का रसास्वादन करने से यह स्पष्ट है कि वस्तुतः यह काव्य महा- काव्य की श्रेणि का ही है। ३. रोमावलीशतकम् :-१२५ पद्यों का यह खण्ड-काव्य है। वि० सं० १५७४ मे इसकी रचना हुई है। यह लघुकाव्य आलंकारिक-भाषा मे शृंगार-रस से प्रोत-प्रोत है । इसमें कवि ने अनेक छन्दों का प्रयोग किया है। इसका पाद्यत इस प्रकार है :- पादि-श्रीलावण्याधिवेलाकलितनववयोवासशालाविशाला , लीला नानाकलानां त्वरितमपसरद्वाल्यचेलाञ्चलश्रीः । ह्रोलामस्याग्रदूतीविहितपतिवशीभावशीलादिशिक्षा- भीलास्यं रोमराजी हरतु हरिरुचिर्वाच्यवाचां श्रिया नः ।।१।। ध्यासस्यादिकर्यः सुयन्धुविदुषो बाणस्य चान्यस्य वा वाचामाश्रितपूर्वपूर्ववचसामासाद्य काव्यक्रमम् । मच्चिो भवभूति-भारविमुखाः श्रीकालिदासादयः , सम्ञाताः कवयो वयं तु कवितां के नाम पुर्वीमहि ॥२॥ इत्यं जातविक्त्यनेपि कवितामागें कयं सञ्चर- नश्चयं फ.विफौसिमित्यतितरी जागत्ति चिन्तां चिरात् । सक्कि काय्यमुपत्रमेयकविमिः प्राङ्महिते या मये, भारत्या विभवेऽययाऽतिमुलमं कि कस्य नाम्यस्यतः ॥३॥ - १-गोपासनीसामी प्रपेशा कृष्णमुतूहल विप चमत्कृति बना है।' भारतेन्दु हरिपाद्र : गोपातमीमा भूमिका । २- पहलाल्य काम्पमारम्भे रितीपपरहिवं मपासादि।' पृ. २१५ भूमिका [ २६ अतिशस्तवस्तुवृत्तिर्बहुशस्तन्यस्तनवरसोपाधिः । अर्वाचीनकवीनामुपमाता कालिदासोऽभूत् ॥४॥ प्रभवति परनेकः पञ्चषाणां समाजे, निजमतगुणजातिदुर्जनस्त्याज्यमूर्तिः । श्रवणरसनचक्षुओणहत्त्वत्कदम्बे, प्रथममिह मनीपो वेत्तु दृष्टान्तमन्तः ॥५॥ श्रितभूपचेतसि सतां जातु न वक्रादिभावविदम् । भुवि कविभिरसुलभादौ विदितः सदृशः सतां सदालोडयः ।।६॥ कृतेराद्यश्लोके मतिमुपयता कत्तुंमधुना, न शक्यं केनापि क्वचन शतशो वर्णन मिति । मुहुः श्रुत्वा लोकाञ्जनितकृतिकोतूहलहृदा, मयोपक्रम्यान्यस्सपदि विहितं साहसमिदम् ॥७॥ अस्पृष्टपूर्वकविताच्छविता दधान, उर्वीधरेश्वरमनोतिविनोदनाय । श्लोकैः शतेन कुतुकात् कविरामचन्द्रो, रोमावलेः किमपि वर्णनमातनोति ॥ x x x अन्त- श्रीमल्लक्ष्मणभट्टसूनुरनुजः भोवल्लभश्रीगुरो- रध्येतुः सममग्रजो गुणिमणेः श्रीविश्वनायस्य च । अन्दे वेदमुनीपुचन्द्रगणिते (१५७४) श्रीरामचन्द्रः कृती, रोमालीशतकं व्यधात् सकुतुकादुर्वीघरप्रीतये ॥१२५।। इति श्रीलक्ष्मणभट्टात्मजश्रीरामचन्द्रकविकृतं रोमावलीशृङ्गारशतकं सम्पूर्णम् । x यह काव्य अद्यावपि प्रप्रकाशित है। इसको एक पूर्ण प्रति विद्याविभाग सरस्वती भंडार, कांकरोली में है,' पौर दो मपूर्ण प्रतियें राजस्थान प्राच्य- विद्या प्रतिष्ठान जोधपुर' एवं शाखा कार्यालय जयपुर' में है । १. बघ ६६।१२, पत्र संभ्या १२, प्रथमपत्र सिसित परिषय-"पुस्तामिद पश्चनदि- मधुसूदनस्य । गङ्गारशतके रामचन्द्राविकृते ।"-रिनारे पर-"सक्ष्मीनापभट्टीयम्।" २. प्रग्य नं. ११२३५ पत्र सस्या १७ 1. विश्वनाप पारदानन्दन संग्रह, पंपांक ३३४। .
३० ] वृत्तमौक्तिक X X ४. रसिकरञ्जन स्वोपज्ञटीका-सहित :- इस लघुकाव्य का दूसरा नाम 'शृङ्गारवैराग्यशतम्' भी है। इस काव्य की यह विशेषता है कि प्रत्येक पद्य शृङ्गार और वैराग्य दोनों अर्थों का समानरूप से प्रतिपादन करता है अर्थात् इसे द्वधाश्रय काव्य या द्विसन्धान काव्य भी कह सकते हैं। इसमें कुल १३० पद्य हैं । टीका की रचना स्वयं कवि ने वि० सं० १५८०, अयोध्या मे की है । ग्रंथ का आद्यंत इस प्रकार है। आदि-शुभारम्भे दम्भे महितमतिडिम्भेङ्गितशतं मणिस्तम्भे रम्भेक्षणसकुचकुम्भे परिणतम् । अनालम्बे लम्बे पथि पदविलम्बेऽमितसुखं , तमालम्बे स्तम्बेरमवदनमम्बेक्षितमुखम् ॥१॥ x एकश्लोककृती पुरः स्फुरितया सत्तत्त्वगोष्ठया समं , साधूनां सदसि स्फुटां विटकथां को वाच्यवृत्त्या नयेत् । इत्याकर्ण्य जनश्रुति वितनुते श्रीरामचन्द्रः कविः , श्लोकानां सह पञ्चविंशतिशतं शृङ्गारवैराग्ययोः ॥३॥ अन्त-प्रख्यातो य: पदार्थैरमृतह रिंगजश्रीसखैः श्लोकशाली , स्फीतातिस्फूतिरुद्यबुधमुदनुगिरं क्षीरधी रामचन्द्रः । भ्रान्तोऽस्मिन् मन्दराग: फणिपतिगुणभृञातुमज्जेत्कथं न, स्यादाघारोऽमुना चेदिह न विरचितः श्रीमता वाड्मुखेन ।।१३०॥ x टीका का उपसंहार-- शृङ्गारवराग्यशतं सपञ्चविंशत्ययोध्यानगरे व्यघत्त । प्रब्दे वियद्वारणबाणचन्द्रे (१५८०), श्रीरामचन्द्रोऽनु च तस्य टीकाम् ॥ श्रीरामचन्द्र कयिना काव्यमिदं व्यरचि विरतिबीजतया । रसिकानामपि रतये शृङ्गारार्थोऽपि संगृहीतोऽत्र । पुष्पिका-इति श्रीलक्ष्मणभट्टसूनु श्रीरामचन्द्र कविकृतं सटीक रसिकरञ्जन नाम शृङ्गारवराग्यार्थसमानं काव्यं सम्पूर्णम् । यह काव्य वि० सं० १७०३ को लिखित प्रति के आधार से संपादित होकर सन् १९८७ में काव्यमाला के चतुथंगुच्छक में प्रकाशित हो चुका है, जो कि अब प्रायः मप्राप्य है। x x भूमिका [३१ ५ शृङ्गारवेदान्त-इसका उल्लेख केवल भारतेन्दु हरिश्चन्द्र' ने ही किया है, अन्य किसी भी सूचीपत्र में इसका उल्लेख नहीं है । अप्राप्त ग्रथ है। मेरे विचारानुसार सम्भव है रसिकरजन के अपरनाम 'शृङ्गारवैराग्यशत' को 'शृङ्गारवेदान्त' मान कर मारतेन्दुजी ने लिख दिया हो । ६ दशावतार-स्तोत्रम्-यह स्तोत्र अद्यावधि अप्राप्त है। इसका केवल एक पद्य वृत्तमौक्तिक' मे पञ्चचामर छन्द के प्रत्युदाहरण-रूप मे उद्धृत हुआ है जो निम्नलिखित है अकुण्ठधार भूमिदार कण्ठपीठलोचन- क्षणध्वनद्ध्यनस्कृतिक्वणकुठारभीषण । प्रकामवाम जामदग्न्यनाम रामहैहय- क्षयप्रयत्लनिर्दय व्यय भयस्य जृम्भय ।। ७ नारायणाष्टकम्-यह स्तोत्र भी अद्यावधि मप्राप्त है। मदालस छन्द का प्रत्युदाहरण देते हुये चन्द्रशेखरमट्ट' ने यह पद्य इस रूप मे दिया है- कुन्दातिमासि शरदिन्दावखण्डरुचि वृन्दावनव्रजवधू- वृन्दागमच्छलनमन्दावहासकृतनिन्दार्थवादकथनम् । व-दारुविभ्यदरविन्दासनक्षुभितवृन्दारवेश्वरकृत- च्छन्दानुवृत्तिमिह नन्दात्मज भुवनकन्दाकृति हृदि भजे ।। कवि को प्राप्त रचनामो में स १५८० तक का उल्लेख है । अत अनुमान किया जा सकता है कि इसके कुछ समय पश्चात् ही विषप्रयोग से कवि स्वर्ग- लोक को प्रयाण कर गया हो। नारायण भट्ट- कवि रामचन्द्र भट्ट के पुत्र नारायण भट्ट के सम्बन्ध में कोई विशिष्ट उल्लेख प्राप्त नहीं है और न इनके द्वारा रचित क्सिी कृति का उल्लेख ही प्राप्त होता है। रायभट्ट- कवि रामचन्द्र भट्ट के पौत्र रापमट्ट के सम्बन्ध में भी कोई ऐतिह्य उल्लेस प्राप्त नही है। इनका बनाया हुमा शृङ्गारवल्लोल नामक १०४ पद्यो का सण्ड- १-भारतेन्दु प्रन्पावतो. भाप ३, पृ०१६८ २-यतमोरितर एष्ठ १२९ ३२] वृत्तमौक्तिक :- काव्य अवश्य प्राप्त होता है । इस लघुकाव्य मे पार्वती और शंकर का शृङ्गार- वर्णन किया गया है । इस का उपसंहार और पुष्पिका इस प्रकार है: उपसंहार-गुम्फो वाचां मसृणमधुरो मालतीनामिव स्यात्, अर्थो वाच्यः प्रसरणपरः सम्मित: सौरभस्य । भावयंग्यो रस इव रसस्तद्विदाह्लादहेतु:- र्मालेवाऽसौ सुकविरचना कस्य भूषां न धत्ते ।।१०४।। पुष्पिका-इति श्रीविद्यागरिष्ठ-वसिष्ठ-नारायणभट्टात्मजेन महाकविपण्डित-राय- भट्टन विरचितं श्रृङ्गारफल्लोलनाम खण्डकाव्यम् । चन्द्रशेखरभट्ट' ने मालिनी छन्द का प्रत्युदाहरण देते हुए लिखा है "अस्मपितामहमहाकविपण्डितश्रीरायभट्टकृते श्रृङ्गारकल्लोले खण्डकाव्ये- मन इव रमणीनां रागिणी वारुणीयं, हृदयमिव युवानस्तस्कराः स्वं हरन्ति । भवनमिव मदीयं नाथ शून्यो हि देश- स्तव न गमनमोहे पान्य कामाभिरामा ।" इस पद्य को देखते हुये यह कहा जा सकता है कि काव्य-साहित्य पर आपका अच्छा अधिकार या और यह लघु रचना आपकी सफल रचना है । यह खण्ड- काव्य अद्यावधि अप्रकाशित है। इसकी १६६५ को लिखित' एकमात्र १२ पत्रों की प्रति विद्याविभाग सरस्वती भंडार कांकरोली में सं. कां. बंध ६६।१० पर सुरक्षित है। इस प्रति फा द्वितीय पत्र प्राप्त है । केटलॉग केटलोगरम् भा. १ पृ. ४७१ के अनुसार रायम्भटरचित 'यति-संस्कार-प्रयोग' नामक ग्रन्थ भी प्राप्त है । रायंभट्ट यही है या अन्य कोई विद्वान् ? इसका निर्णय प्रति के सम्मुख न होने से नहीं किया जा सकता । लक्ष्मीनाय भट्ट- पन्द्रशेखर भट्ट के पिता एवं कवि रामचन्द्र भट्ट के प्रपौत्र लक्ष्मीनाथ भट्ट के सम्बन्ध में भी कोई ऐतिह्य उल्लेख प्राप्त नहीं है । प्राप्त रचनाओं में पिङ्गल- प्रदीप का रचनाकाल १६५७ है, अतः इनका आविर्भाव-काल १६२० से १६३० के मध्य का माना जा सकता है। इनकी प्राप्त, रचनामों को देखते हुए यह १. देरॉ, वृत्तमौक्तिक पृ. १२६० २. भूतारपट्विपुमिते (१९६५) व वारे निशस्य । पत्राणप्रतिपदि सिसित हरितदूरेगदम् ॥
भूमिका [ ३३ निःसंदेह कहा जा सकता है कि इनका अलद्वार-शास्त्र, छन्दःशास्त्र और काव्य- साहित्य पर एकाधिपत्य था । 'सकलोपनिषद्रहस्यार्णवकर्णधार' विशेपण से संभव है कि इन्होंने किसी उपनिपद् पर या उपनिषद्-साहित्य पर लेखिनी अवश्य ही चलाई हो ! वृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्करोद्धार की रचना १६८७ में हुई है, अतः अनुमान है कि यह रचना इनकी अन्तिम रचना हो ! इनके द्वारा सजित प्राप्त साहित्य का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है:- १. सरस्वतीकण्ठाभरण-टीका-धाराधिपति भोजनरेन्द्र-प्रणीत इस ग्रन्थ की टीका का नाम 'दुष्करचित्रप्रकाशिका' है । टीकाकार ने इसमें रचना संवत् नहीं दिया है । टीका के नाम से ऐसा प्रतीत होता है कि यह विस्तृत परिमाणवाली टीका न होकर दुर्गम स्थलों का विवेचन मात्र है । इसकी एकमात्र ४६ पत्रों की फोटभक्षित प्रति एशियाटिक सोसायटी, कलकता के संग्रह में सुरक्षित है । इसका प्राधन्त इस प्रकार है:- प्रादि स्मारं स्मारमुदारदारविरहव्याधिव्यथाव्याकुलं, रामं वारिधिबन्धबन्धुरयशःसम्पृष्टदिड मण्डलम् । श्रीमद्भोजकृतप्रवन्धजलघी सेतुः कवीनां मुदो हेतु संरचयामि बन्धविविधव्याख्यातकोतुलः ।।१।। श्रीरायभट्टतनयेन नयान्वितेन, धाराधिनायनपतेः सुमतेः प्रबन्धे । प्रोचे यदेव वचन रचनं गुणानां, वाग्देवताऽपि परितुप्यति तेन माता ॥१॥ नुवन्तु कवयः कण्ठे दुप्फरार्थसुमालिकाम् । लक्ष्मीनायेन रचितां याग्देवीकण्ठभूपणे ।।२।। पुष्पिका- इति श्रीमद्रायभट्टात्मज-श्रीलक्ष्मीनायभट्टविरचिता सरस्थती- कण्ठाभरणालद्वारे दुष्करचित्रप्रकाशिका समाप्ता । २. प्राकृतपिङ्गल-टीका-इस टीका का नाम पिङ्गलप्रदीप या छन्दःप्रदीप है। इसको रचना सं. १६५७ में हुई है। प्रौढ एव प्राञ्जल भाषा में विशद शैली में विवेचन होने से यह टीका चन्दः नास्त्रिों के लिये सचमुच प्रदीप के समान ही है । इसका माद्यन्त इस प्रकार है- अन्त- १. देखें, रामौक्तिक प. २६१, २९५, २६६, २९, ३.१ मार
३४ ]
वृत्तमौक्तिक
MAA
प्रादि गोपीपीनपयोधरद्वयमिलच्चेलाञ्चलाकर्षण-
वेलिव्यापृतचारुचञ्चलकराम्भोज व्रजकानने ।
द्राक्षामञ्जुलमाधुरीपरिणमद्वाविभ्रम तन्मना-
गद्वैत समुपास्महे यदुकुलालम्ब विचिन मह. ॥१॥
लम्बोदरमवलम्बे स्तम्बेरमवदनमेकदन्तवरम् ।
अम्बेक्षितमुखकमल य वेदो नापि तत्त्वतो वेद ॥२॥
गङ्गाशीतपयोभयादिव मिलद् भालाक्षिकीलादिव,
व्यालक्ष्वेलजफूत्कृतादिव सदा लक्षम्यापवादादिव ।
स्त्रीशापादिव कण्ठकालिमकुहूसान्निध्ययोगादिव,
श्रीकण्ठस्य कृश करोतु कुशल शीतद्युति. श्रीमताम् ॥३॥
विहितदयां मन्देप्वपि दत्त्वानन्देन वाड्मयं देहम् ।
शब्देऽर्थे सन्देहव्ययाय वन्दे चिर गिर देवीम् ॥४॥
भट्टश्रीरामचन्द्रः कविविवुधकुले लब्धदेह श्रुतो य ,
श्रीमानारायणास्य कविमुकुटमणिस्तत्तनूजोऽजनिष्ट ।
तत्पुत्रो रायभट्ट सकलकविकुलख्यातकोत्तिस्तदीयो,
लक्ष्मीनाथस्तनूजो रचयति रुचिर पिङ्गलार्थप्रदीपम् ।।५।।
श्रीरायभट्टतनयो लक्ष्मीनाय समुल्लसत्प्रतिभः ।
प्राय पिङ्गलसूत्रे तनुते भाष्य विशालमति ॥६॥
जलोफसा तुल्यतम खल किं रम्येपि दोषग्रहणस्वभाव ।
मतां परानन्दनमन्दिराणा चमत्कृति मत्कृतिरातनोतु ।।७।।
यन्न सूर्येण सभिन्न नापि रत्नेन भास्वता ।
तस्पिङ्गलप्रदीपेन नाश्यतामान्तर तम. ॥८॥
यद्यस्ति कौतुक वश्छन्द सन्दर्भविज्ञाने ।
सन्त पिङ्गलदीप लक्ष्मीनाथेन दोपित पठत ||
विञ्च मत्य तिरिय चमत्कृति चेन्न चेतसि सता विधास्पति ।
भारती ग्रजतु भारतीयया लज्जया परमसो रसातलम् ॥१०॥
इत्यादि गद्यकाव्यप मपा किञ्चित्प्रदर्शितम् ।
विशेषस्तत्र तत्रापि नोक्तो विस्तरादूया ॥१॥
माद पथ मास्ममि सत्पदार्पमित्यायलय्याशु मया प्रदीप्तम् ।
पन्द प्रदीप क्ययो विलोक्य छन्द ममस्त स्वयमेव वित्त ॥२॥
भूमिका [ ३५ मे यह टीका अन्दे भास्करवाजिपाण्डवरसक्ष्मा (१६५७) मण्डलोद्भासिते, भाद्रे मासि सिते दले हरिदिने वारे तमिस्रापतेः । श्रीमत्पिङ्गलनागनिर्मितवरग्रन्यप्रदीप मुदे, लोकाना निसिलार्थसाधकाममं लक्ष्मीपतिनिर्ममे ।।३।। विशिष्टस्नेहभरितं सत्पात्रपरिकल्पितम् । स्फुरवृत्तदशं छन्द.प्रदीप पश्यत स्फुटम् ॥४॥ छन्द.प्रदीपकः सोध्यमखिलार्थप्रकाशकः । लक्ष्मीनाथेन रचितस्तिष्ठत्वाचन्द्रतारकम् ॥५॥ पुष्पिका-इत्यालङ्कारिकचक्रचूडामणिश्रीमद्रायभट्टात्मजश्रीलक्ष्मीनायभट्टविर- चिते पिङ्गलप्रदीपे वर्णवृत्तास्यो द्वितीयः परिच्छेदः समाप्तः । डा. भोलाशकर व्यास द्वारा सम्पादित प्राकृतपङ्गलम्, भा. १ प्राकृत टेक्स्ट सोसायटी वाराणसी द्वारा सन् १९५६ मे प्रकाशित हो चुकी है। ३. उदाहरणमज्जरो-यह ग्रन्य अद्यावधि प्रप्राप्त है । लक्ष्मीनाथ भट्ट की यह स्वतन्त्र कृति प्रतीत होती है। इस ग्रन्थ में केवल छन्दो के हो नही, अपितु विपुल सख्या में प्राप्त छन्द-भेदो के उदाहरण भी दिये गये हैं। यही कारण है कि स्वय लक्ष्मीनाथ ने पिंगलप्रदीप' मे और भट्ट चन्द्रशेखर ने वृत्तमौक्तिक में गाथा, स्वन्धक, दोहा आदि छन्द-भेदो के उदाहरणो के लिये 'उदाहरणमन्जरी' देखने का प्राग्रह किया है । स० १६५७ में रचित पिंगलप्रदीप में उल्लेस होने से यह निश्चित है कि इसकी रचना १६५७ के पूर्व ही हो चुकी थी। वेटलॉगस् वेटलॉगरम्, भाग २ पृष्ठ १३ पर इसका नाम उदाहरणचन्द्रिका दिया है, जो कि भ्रमवाचक है। ४. वृत्तमौक्तिक-द्वितीपखण्ड का प्रदा-प्रस्तुत ग्रन्य के प्रथम-सण्ड की रचना चन्द्रशेसर भट्ट ने १६७५ में पूर्ण की है और द्वितीय-मण्ड की समाप्ति होने के पूर्व ही चन्द्रशेखर इस लोक से प्रयाण कर गये। प्रयाण परने के पूर्व इन्होंने अपनी प्रान्तरिक प्रमिलापा अपने पिता लक्ष्मीनाथ भट्ट यो यतलाई कि मेरे इम प्रथ को पाप पूर्ण कर दें। सुयोग्य, प्रतिभाशाली, पाण्डवचरित प्रादि महामान्यो के प्रणेता, विनयशील पुत्र यो मन्तिम अभिलाषा के अनुसार ही गोरसन्तप्त लक्ष्मीनाप भट्ट ने अपने पुत्र को कीति को प्राप्ण रखने के लिये तलास ही स० १६७६ कात्तिको पूर्णिमा के दिन इस प्रय को पूर्ण पर दिया । १-देगे, पृष्ठ २६२, ३६५, ३९७, ४.६.४०१, २-देग, पृष्ठ १०, १३, १४, १६, १७, २१, २४, ३६ ] वृत्तमौक्तिक याते दिव सुतनये विनयोपपन्ने, श्रीचन्द्रशेखरकवौ किल तत्प्रबन्ध । विच्छेदमाप भुवि तद्वचसव साद्धं , पूर्णीकृतश्च स हि जीवनहेतवेऽस्य ॥८॥ श्रीवृत्तमौक्तिकमिद लक्ष्मीनाथेन पूरित यत्नात् । जीयादाचन्द्राकं जीवातुर्जीवलोकस्य || X x X 7 सकता रसमुनिरसचन्द्र विते (१६७६) वैक्रमेन्दे , सितदलकलितेऽस्मिन्कात्तिके पौर्णमास्याम् । अतिविमलमति श्रीचन्द्रमौलिवितेने , रुचिरतरमपूर्व मौक्तिक वृत्तपूर्वम् ।।६।। यहां यह विचारणीय है कि द्वितीय खड का कितना प्रश चन्द्रशेखरभट्ट ने लिखा है और कितने अश की पूत्ति लक्ष्मीनाथ भट्ट ने की है इसका निर्णय वरने के लिये वृत्तमौक्तिक का अतरग पालोडन प्रावश्यक है । अथवार की शैली सूत्रकार की तरह सक्षिप्त शैली नही है, प्रत्येक छन्द का लक्षण वारिकारूप मे न देकर उसी लक्षणयुक्त पूर्ण पद्य में दिया है जिससे छन्द का लक्षण और विराम स्पष्ट हो जाते हैं और वह लक्षण उदाहरण का भी कार्य दे 1 पश्चात् स्वय रचित उदाहरण और प्राचीन महाकवियो के प्रत्यु- दाहरण दिये हैं । और दूसरी पात, तत्समय में या प्राचीन छन्द शास्त्रों मे प्रयोग- प्राप्त प्रत्येक छन्द का लक्षण देने या प्रयत्न किया है। इस प्रकार की शैली हमें द्वितीय-खण्ड के प्रथमवृत्तनिरूपण प्रकरण तक ही प्राप्त होती है । द्वितीय प्रकरण से छन्दो का सक्षिप्तीवरण दृष्टिगोचर होता है । कतिपय स्थलो पर छन्दो ये लक्षण उदाहरण-स्वरूप न होकर वारिया-सूत्ररूप में प्राप्त होते हैं। पौर, उस पारिवा यो स्पष्ट परने के लिये स्वोपज्ञ टीका प्राप्त होती है, जो कि प्रथम प्रकरण तक प्राप्त नही है । साथ ही, पीछे के प्रकरणो मे छन्द शास्त्री ये प्रचलित छन्दो के भी लक्षण न देकर अन्य ग्रप देखने का सकेत किया है एवं पई उदाहरणो के लिये 'ऊह्यम्' पह कर या प्रथमचरण मात्र ही दिया है । प्रत यह मनुमान पर सकते हैं हि प्रथम प्रवरण तय की रचना चद्रशेसर मट्ट पोपोर दितीय प्रारण से १वें प्रकरण तक की रचना लक्ष्मीनाय भट्ट पी है।रितु, तुतोप प्रवरण में 'प्रचितर' दण्डप पा लक्षण छन्द सूत्रकार प्रापार्य भूमिका [३७ पिङ्गल-सम्मत दो नगण, आठ रगण' का प्राप्त है, जब कि लक्ष्मीनाथ भट्ट ने "पिंगलप्रदीप" मे प्रचितक का लक्षण दो नगण, सात यगण स्वीकार किया है। दो नगण, सात यगण के लक्षण को 'वृत्तमौक्तिक मे 'सर्वतोभद्र' दण्डक का लक्षण माना है और मतान्तर का उल्लेख करते हुए लिखा है-'एतस्यवान्यत्र 'प्रचि- तक' इति नामान्तरम् । अत मेरे मतानुसार चतुर्थ अर्द्धसम-प्रकरण तक को रचना चन्द्रशेखर भट्ट की है और पचम विषमवृत्त-प्रकरण से अन्त तक की रचना लक्ष्मीनाथ भट्ट को होनी चाहिये । प्रस्तु ५. वृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्करोद्धार-चन्द्रशेखरभट्ट रचित वृत्तमौक्तिक- प्रमथ खण्ड के प्रथम गाथा-प्रकरणस्थ पद्य ५१ से ८६ तक के ३६ पयो पर यह टीका है । टीकाकार ने इसे ११ विश्रामो में विभक्त किया है । मानोद्दिष्ट, मानानप्ट, वर्णोद्दिष्ट, वर्णनष्ट, वर्णमेरु, वर्णपताका, मायामेरु, मात्रापताका, वृत्तस्थ लघुगुरुसस्या-ज्ञान, वर्णमकंटी और मात्रामकंटो नामक विथाम हैं। छन्द शास्त्र में यदि कोई कठिनतम विषय है तो वह है प्रस्तार । इसी प्रस्तार- स्वरूप का टीकाकार ने बहुत ही रोचक शैली मे विशद वर्णन किया है, जिससे तज्ज्ञगण सरलता के साथ इस दुष्कर प्रस्तार का अवगाहन कर सकते हैं। इस टीका की रचना स० १६८७ कात्तिकृष्णा पचमी को हुई है । यह टीका प्रस्तुत अथ में पृ० २६२ से ३२६ तक मे मुद्रित है। ६ शिवस्तुति-यह शायद भगवान् शिव का स्तोत्र है या अप्टक या कविकृत किसी ग्रथ का अश हैं निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता वृत्तमौक्तिक मे मदनगृह नामक मात्रिक छन्द का प्रत्युदाहरण देते हुए लिखा है - - 'यथा वाऽस्मरिपतु शिवस्तुतौ' । अत सभवत यह स्तोत्र ही होना चाहिए । पद्य निम्नलिखित है- परकलितकपाल घृतनरमाल भालस्थानलहुतमदन कृतरिपुक्दन । भवभयहरण गिरिजारमण सकलजनस्तुतशुभचरित गुणगणभरितम् । १-देणे, यत्तमौक्तिक पृ० १८४ २-'मप प्रपितको दसक -प्रचितसमभिधो धोरधीभि स्मृतो दण्डकोन यादुसरे सप्तभिर्य । गगणदयादुसरे सप्तभियंगणीरपौमि सप्तविंशतिवारमवचरण प्रचितकास्यो दरब [प्रातपंगलम् पृ. ५०६] ३-देखें, तमोक्तिम पृ. १८५ ४-" पृ. ३२६ ५- पृ०४५ स्मृत ।'
वृत्तमौक्तिक TFH कृतफणिपतिहार त्रिभुवनसार दक्षमखक्षयसक्षुब्ध रमणीलुब्ध । गलराजितगरल गङ्गाविमल कैलाशाचलधामकर प्रणमामि हरम् ।। यह पूर्ण स्तोत्र अद्यावधि अप्राप्त है । ७. नन्दनन्दनाष्टक-यह स्तोन भी अद्यावधि अप्राप्त है । इसका केवल एक पद्य चर्चरी छन्द के प्रत्युदाहरण-रूप मे प्राप्त है - "यथा वा, अस्मत्तातचरणाना श्रीनन्दनन्दनाष्टके-' मन्दहासविराजितं मुनिवृन्दवन्द्यपदाम्बुज, सुन्दराधरमन्दराचलधारि चारुलसद्भुजम् । गोपिकाकुचयुग्मकुंकुमपङ्करूपितवक्षस , नन्दनन्दनमाश्रये मम कि परिप्यति भास्करि । ८. सुन्दरीघ्यानाप्टकम्-यह अष्टवस्तोत्र भी अप्राप्त है। इसका भी केवल एक पद्य चर्चरो छन्द के प्रत्युदाहरण-रूप मे प्राप्त है। सेपामेव श्रीसुन्दरीध्यानाष्टके'. क्ल्पपादपनाटिकावृतदिव्यसौधमहार्णवे , रत्नसड घकृतान्तरीपसुनीपराजिविराजिते । चिन्तितार्थविधानदक्षसुरत्नमन्दिरमध्यगा , मुक्तिपादपवल्लरीमिह सुन्दरीमहमाश्रये ॥ ६ देयोस्तुति -यह देवीस्तोत्र भी अद्यावधि अप्राप्त है। इसका वेवल एक पद्य प्रस्तुत ग्रन्थ में 'हीर छन्द' के प्रत्युदाहरण-रूप मे प्राप्त है पाहि जननि । सम्भुरमणि ! गुम्भदलनपण्डिते ! तारतरलरत्नखचितहारवलयमण्डिते । भालरधिरचन्द्रकलशोमि सक्लनन्दिते । देहि सततभक्तिमतुलमुक्तिमखिलवन्दिते ! १० सङ्गवर्णन-इसका एक पद्य स्रग्धराछन्द के प्रत्युदाहरण-रूप में प्रस्तुत ग्रन्य में प्राप्त है। सभवत पविरचित यह स्फट पद्य हो, या हो सकता "यथावा, १.२ युत्तमोतिर ४ । पामोमिटर ४३ भूमिका [ ३६ है कि कोई लघुकाव्य का अश हो ! पद्य निम्न है:- संग्रामारण्यचारी विकटभटभुजस्तम्भभूभृद्विहारी, शत्रुक्षोणीशचेतोमृगनिकरपरानन्दविक्षोभकारी। माद्यन्मातङ्गकुम्भस्थलगलदमलस्थूलमुक्ताग्रहारी , स्फारीभूताङ्गधारो जगति विजयते खड्गपञ्चाननस्ते ॥' चन्द्रशेखरभट्ट- प्रस्तुत ग्रन्थ के प्रणेता चन्द्रशेखर भट्ट लक्ष्मीनाथ भट्ट के पुत्र हैं। इनको माता का नाम लोपामुद्रा' है । इन्होने अपनी अन्तिम रचना वृत्तमौक्तिक (सं० १६७५-७६) में स्वप्रणीत पाण्डवचरित महाकाव्य और पवनदूत खण्डकाव्य का उल्लेख किया है अतः ये दोनों रचनायें सं० १६७५ के पूर्व की हैं । महाकाव्य की रचना के लिए कम से कम २५-३० को अवस्था तो अपेक्षित है ही। इस अनुमान से इनका जन्म १६४० और १६४५ के मध्य माना जा सकता है। सं० १६७५ की वसन्त पंचमी और सं० १६७६ की कार्तिकी पूर्णिमा के मध्य मे इनका अल्पा- वस्था मे ही स्वर्गवास हो गया था। अनुमान के अतिरिक्त इनके सम्बन्ध में कोई भी ज्ञातव्य वृत्त प्राप्त नही है । चन्द्रशेखर लक्ष्मीनाथ भट्ट के एकाकी पुत्र थे या इनके और भी भाई थे? और चन्द्रशेखर के भी कोई सन्तान थी या नही ? इनको वश-परंपरा यही लुप्त हो गई या आगे भी कुछ पीढियों तक चली ? आदि प्रश्न तिमिराछन्न ही हैं। इस सम्बन्ध में तो एतद्देशीय भट्ट-वंश के विद्वान् ही प्रकाश डाल सकते हैं । ग्रन्थकार द्वारा सजित साहित्य इस प्रकार है- १. पाण्डयचरित महाकव्य-स्वय ग्रन्थकार ने प्रस्तुत ग्रन्थ में 'द्रुतविलम्बित, मालिनी, शार्दूलविक्रीडित और स्रग्धरा छन्द के उदाहरण एवं प्रत्युदाहरण देते हुये 'मत्कृतपाण्डवचरिते महाकाव्ये, ममैव पाण्डवचरिते,' लिखा है। अतः उल्लिसित पद्य यहाँ दिये जा रहे है-- मत्पृतपाण्डवचरिते महाकाव्ये कर्णवर्णनप्रस्तावे' नपु विलक्षणमस्यपुनर्वपुस्सहजकुण्डलवर्मसुमण्डितम् । सकललक्षणलक्षितमद्भुतं न घटते रथकारकुलोचितम् ।। १. वृत्तमौतिक पृ. १६० २. पन्दःशास्त्रपयोनिधिलोगमुद्रापति पितरम् । श्रीमल्लक्ष्मीनाथ सरलागमपारण बन्दे । पृ. २६० ३. वृत्तमौक्ति पृ.६२, ४.] पत्तमौक्तिक यथा वा, तव विदुरोक्तो- भिदुरमानसमाशुचिचक्षुप स विदुरो निनदैरतिभीषण । सकलबालपराक्रमवर्णनै सदसि भूमिपति समबोधयत् ।। X X x यथा वा, पाण्डचरिते भवनमिव ततस्ते बाणजालेरकुर्वन्, गजरथयपृष्ठे वाहुयुद्धे च दक्षा । विधृतनिशितखड्गाश्चर्मणा भासमाना विदधुरथ समाजे मण्डलात् सव्यवामात् ॥ x x यथा वा, ममैव पाण्डवचरिते अर्जुनागमने द्रोणवाक्यम्' ज्ञान यस्य ममात्मजादपि जना शस्त्रास्त्र शिक्षाधिक, पार्थ सोऽर्जुनसज्ञकोऽत्र सकलं कौतूहलाद् दृश्यताम् । श्रुत्वा वाचमिति द्विजस्य कवची गोधाङ्गुलित्राणवान्, पार्थस्तूणशरासनादिचिरस्तवाजगाम द्रुतम् ।। x X x यथा, ममैव पाण्डवचरिते' तुष्टेनाऽथ द्विजेन त्रिदशपतिसुतस्तत्र दत्ताभ्यनुज्ञ , कर्णोऽपि प्राप्तमानस्सदसि कुरुपतेर्द्वन्द्वयुन्दार्थमागात् । जम्भाराति स्वसूनोरुपरि जलधरस्सय्यघादातपत्र, चण्डाशुश्चापि कर्णोपरि निजविरणानाततानातिशीतात् ।। इन पाचो पद्यों की रचनाशैली, शब्दयोजना, लाक्षणिकता और पालका- रिप योजना को देखते हुये नि सदेह यह सकते हैं कि यह वाव्य गुणों से परिपूर्ण महाकाव्य हो है। लघुवयस्क पो रचना होते हुये भी इसमें भावो की प्रौढता मोर मापा की प्रांजलता परिलक्षित होती है। सेद है कि यह प्राय अद्यावधि प्रप्राप्त है। सभय है पोधकर्तामो को शोध करते हुये यह महाकाव्य प्राप्त हो जाय तो अन्धकार के जीवन और दर्शन पर पधित प्रकाश डाला जा सके। १-यूत्तपोषित पृ. १२१, २-पृष्ठ १५१, ३-१ १९० भूमिका [४१ - २ पवनदूतम्-यह खण्डकाव्य है । इसको 'दूतम्' शब्द से मेघदूत या किसी दूत-काव्य की पादपूर्तिस्प तो नहीं समझना चाहिए किन्तु रचना इसकी मेघदूत के अनुकरण पर ही हुई है । कृष्ण के मथुरा चले जाने पर राधा पवन के द्वारा संदेश भेजती है और स्वय की मानसिक अवस्था का दिग्दर्शन कराती है। यह खण्डकाव्य भी अद्यावधि अप्राप्त है। इसका केवल एक पद्य प्रस्तुत ग्रन्थ में शिखरिणी छन्द के प्रत्युदाहरण रूप मे प्राप्त है- यथा वा, ममैव पवनदूते खण्डकाव्ये' यदा कसादीना निधनविधये यादवपुरी, गत श्रीगोविन्द पितृभवनतोऽङ्करसहित.। तदा तस्योन्मीलविरहदहनज्वालगहने, पपात श्रीराधा कलिततदसाधारणगतिः ।। ३. प्राकृतपिङ्गल-'उद्योत' टोका-प्राकृतपिङ्गल मे दो परिच्छेद हैं-- १ मानावृत्त परिच्छेद और २ वणिक्वृत्त परिच्छेद । यह उद्योत नामक टीका प्रथम परिच्छेद पर है। इसकी रचना स १६७३ मे हुई है। वैसे तो इस पर वीसो टीकायें है जिनमे रविकर, पशुपति, लक्ष्मीनाथमट्ट, वशीघर आदि की मुख्य है, किन्तु इस टीका की विशेषता यह है कि प्रस्तार और मारिय-छदो का विवेचन लालित्यपूर्ण भाषा में होते हुये भी सरलीकरण को लिये हुय है । पाण्डित्य- प्रदर्शन की अपेक्षा वयं विपय का अधिक स्पष्टता के साथ प्रतिपादन किया है। इसकी १८वी शती की लिखित ४५ पत्रो को एकमान-प्रति अनूप सस्कृत लायब्रेरी, बीकानेर मे ग्रन्थ न ५४१२ पर सुरक्षित है । यह कृति प्रकाशन-योग्य है। इसका प्राद्यन्त इस प्रकार है- प्रादि- अहित हृदयकोल गोपनारीसुलील, सजलजलदनील लोक्सत्राणशीलम् । घरगि निहितमाल भरवृन्दस्य पाल, क्लय दनुजकाल नन्दगोपालवालम् ॥१॥ तातमरचितपिङ्गलदोपध्यस्तचितघनमोहनसतति (2) अर्थभारयुतपिङ्गलभायोद्योतमाचरति चन्द्रशेखर ॥२॥ श्रीमत्पिङ्गलनागोक्त सूत्राणा विशदापिका । शिप्यावबोधसिग सक्षिप्ता वृत्तिरुच्यते ॥३॥ १-वृत्तमोतिष १३६ ४२] वृत्तमौक्तिक अन्त- श्रीमत्पिङ्गलनागोक्तमात्रावृत्तप्रकाशकम् । पिङ्गलोद्योतममलमविस्तृतमपि स्फुटम् ।। हराक्षिमुनिशानेन्दुमितेऽब्दे (१६७३) मासि चाश्चिने । सित मिते चन्द्रशेखर सव्यरीरचत् ।। पुष्पिका-इति महामहोपाध्यायालङ्कारिकचकचूडामणि छन्द शास्त्रप्रस्थानपरमा- चार्य-वेदा-तार्णवकर्णधार-श्रीलक्ष्मीनायभट्टारकात्मज-चन्द्रशेखरभट्टविरचिताया पिङ्गलोद्योताख्याया सूनवृत्ती मात्रावृत्ताख्य प्रथम प्रकाश समाप्तः । समाप्त- श्चाय सूनवृत्ती प्रथम खण्ड । सयोज्य पाणियुगल याचे साधूनह किमपि । मत्सररहितैर्यत्नात् सशोध्य मे क्वचित स्खलितम् ।। भट्ट लक्ष्मीनाथ ने वृत्तमौक्तिक-वार्तिकदुष्करोद्धार' मे इस पिंगलोद्योत टीका के उद्धरण दिए हैं । ४ वृत्तमौक्तिकम् छन्द शास्त्र का प्रस्तुत ग्रन्थ है । इसमे दो खड हैं। प्रथम मात्रावृत्त खड, जिसकी १६७५ मे रचना हुई है और द्वितीय वर्णवृत्त खड है, जिसकी रचना १६७६ मे हुई है। इस ग्रन्थ का विशेष परिचय प्रागे दिया , जायगा। केटलॉगस केटलॉगरम् भाग १, पृष्ठ १८१ पर भट्ट चन्द्रशेखर रचित गगादामीय छन्दोमजरी की टीका छ दोमञ्जरीजीवन' का भी उल्लेख है । इसकी एकमात्र प्रति इण्डिया प्रॉफिस लायबेरी लन्दन मे है, यह प्रति बगला लिपि में लिखी हुई है। इस टोका का मगलाचरण निम्न है - वाणी कमलामभितो दोामालिङ्गितो योऽसौ । त नारायणमादि सुरतरुषल्प सदा वन्दे ॥१॥ छन्दसा मञ्जरी तप्ताभिधेया स्फुटमानुना । तस्या कि जीवन न स्याच्चन्द्रशखरभारती ।।२।। किन्तु, इस टीका के मगलाचरण म टीकाकार ने अपना नाम चन्द्रशेखर १-शामौक्तिर पु. ३.६, ३१३ २-राजस्थान प्राध्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर के उपसचालय श्री गोपालनारायणजी बहरा अधिया पोपिश सायरी मदन ये हायवाहनों से सम्पर करपे इस प्रति मे माचन्त भाग की पोटोसपी मंगवा कर उपसम्प को उसके लिए मैं उनका पाभारी हूँ।-स.
भूमिका भारती दिया है न कि चन्द्रशेखर भट्ट । चन्द्रशेखर भट्ट ने अपनी कृतियो मे अपने नाम के साथ कही भो 'भारती' शब्द का प्रयोग नहीं किया है। अपने नाम के साथ सर्वन भट्ट एव लक्ष्मीनाथात्मज का प्रयोग किया है । अत यह स्पष्ट है कि छन्दोमन्जरीजीवन के कर्ता चन्द्रशेखर भट्ट नहीं है, अपितु कोई चन्द्रशेखर भारती हैं। सभव है चन्द्रशेखर नाम-साम्य से भ्रमवशात् सम्पादक ने लिस दिया हो! वृत्तमौक्तिक का सारांश नामकरण- कवि चन्द्रशेखर भट्ट ने प्रस्तुत ग्रथ का नाम 'वृत्तमौक्तिकम्' रखा है, किन्तु द्वितीय-खण्ड के ग्यारहवें प्रकरण मे 'वात्तिक वृत्तमौक्तिकम्' तथा प्रथम खण्ड एव द्वितीय-खण्ड की पुष्पिका मे 'वृत्तमौक्ति के पिङ्गलवात्तिके' और प्रथम- खण्ड के १,३,४,५वें प्रकरणो की तथा द्वितीय-खण्ड के प्रकरण ५, ७ से १० की पुप्पिकानो मे 'वृत्तमौक्तिके वार्तिके' का उल्लेख है । लक्ष्मीनाथ भट्ट ने ग्रथ का नाम 'वृत्तमौक्तिक-वार्तिक' ही स्वीकार किया है, इसीलिए टोका का नाम भी 'वृत्तमौक्तिवात्तिकदुष्करोद्वार" रखा है। वस्तुत प्राकृतपिंगल, छन्द - सूत्र एव प्राकृतपिंगल के टीकाकार पशुपति और रविकर की टीकाप्रो और शम्भु' प्रणीत छन्दश्चूडामणि (२) के आधार एव अनुकरण पर पिंगल के वात्तिक-रूप मे ग्रन्थकार ने इसकी स्वतन्त्र रचना की है। प्रत वृत्तमौक्तिक- वात्तिक नाम स्वीकार कर सकते है, किन्तु मूलत अधिकाश स्थानों पर ग्रन्थकार ने एव टीकाकार महोपाध्याय मेघविजयजी ने 'वृत्तमौक्तिकम्' मौलिक नाम ही ग्रहण किया है , जो कि अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है । ग्रन्यका साराश- प्रस्तुत ग्रन्थ दो खण्डो में विभक्त हैं। प्रथम-खण्ड मात्रावृत्त खण्ड' और द्वितीय-खण्ड वर्णिकवृत्त खड' है । १-श्रीचन्द्रशेखरकविस्तनुते वृत्तमौक्तिकम् । ११ स्पष्टायं बरवृत्तमौक्तिकमिति अथ मुदा निर्ममे । पृ० २६० थोवृत्तमौवितवमिदम् । पृ. २६१ २-१० २७२ ३-पृ. ५६ एव २६१ ४-देखें प. १३, ३०, ४६, ४६, १६४, २०६, २१०, २६७, २७१ ५-देखें, वात्तिक-दुप्परोदार का मगलाचरण एव प्रत्येा विश्राम की पुष्पिरा ६-रविकर पशुपति पिङ्गल शम्भुप्रन्यान् विलोक्य निबन्धात्। पृ० २७३ ७-सत्र मात्रावृत्तसष्टे प्रपमे। प० २७३ ८-मय द्वितीयसण्डस्य वरणवत्तस्य । पृ. २७६ .
w] वृत्तमौक्तिक प्रथम खड मे छह प्रकरण हैं :-१ गाथाप्रकरण, २ पट्पदप्रकरण, ३ रड्डाप्रकरण, ४ पद्मावतीप्रकरण, ५ सवैयाप्रकरण और ६ गलितक- प्रकरण। द्वितीय-खण्ड मे बारह प्रकरण हैं ~१ वर्णवृत्त प्रकरण, २. प्रकीर्णक- वृत्त-प्रकरण, ३ दण्डक प्रकरण, ४. अर्ध-समवृत्त-प्रकरण, ५ विषमवृत्त प्रकरण, ६ वैतालीय पकरण, ७. यतिनिरूपण प्रकरण, ८ गद्य-निरू- पण प्रकरण, ६ विरुदावली-प्रकरण, १० खण्डावली-प्रकरण, विरुदावली-खण्डावली का दोपप्रकरण और १२. दोनों खण्डो की अनु. प्रमणिका। द्वितीय-खण्ड के नवम विरुदावली प्रकरण में चार अवान्तर प्रकरण है- १. वलिका-प्रकरण, २ चण्डवृत्त-प्रकरण, ३ विभङ्गीकलिका-प्रकरण और ४ साधारण चण्डवृत्त-प्रकरण । इस प्रकार दोनो खण्डो के १८ प्रकरण होते हैं और नवम प्रकरण के चारो अवान्तर प्रकरण सम्मिलित करने पर कुल २२ प्रकरण' होते हैं । - प्रथम खण्ड का सारांश १. गाया प्रकरण: पवि मगलाचरण एव प्रथ-प्रतिज्ञा करके वर्णों की गुरु-लघु स्थिति का उदा- हरण सहित वर्णन और लक्षण रहित काव्य का अनिष्ट फल का प्रतिपादन करता है। मात्रामो की टगणादि गणो की व्यवस्था और उनके प्रस्तार का निरूपण परते हुए माविक-गणो ये नाम तथा उनके पर्यायो की पारिभाषिर-सातिक दादो की तालिफा' देता है । पश्चात् वणिक्यतो के मगणादि गण,गरणदेवता, गणो की मंत्री पोर गणदेवो का फ्लापल प्रदर्शित है। प्रस्तार या वर्णन करते हुये मामोडिप्ट, मात्रानप्ट, वर्णोहिष्ट, वर्णनष्ट, बममेर, यणंपताया, मात्रामेछ, मात्रापतापा, वृत्तद्वयस्थ गुरु-लघुज्ञान, वर्णमपंटी पौर मात्रामवंटी पा दिग्दर्शन कराते हुये प्रस्तारपिंड-सस्था का निर्देश दिया है। जिगपे मनुगार ममप्रवृत्तो पो प्रस्तार गम्या १३,४२,१७,७२६ होती है । १-उपो पोरणापि गम्भूपंक प्रारितम् । तिमि प्राण रधिर दामोदितां ॥ पृ. २८६ वारिमनिरपरेतोंसिए प्रथम परिशिष्ट दरें।
भूमिका [४५ गाथा के विगाथा, गाहू, उद्गाथा, गाहिनी, सिहिनी और स्कन्धक आर्या- भेदो का नामोल्लेख कर गाथा का लक्षण और आर्या' का सामान्य लक्षण उदाहरण सहित दिया है । प्राचीन परम्परा के अनुसार भार्या का विशिष्ट भेद दिखाया है जिसके अनुसार एक जगणयुक्त प्रार्या कुलीना, दो जगणयुक्त आर्या अभिसारिका, तीन जगणयुक्त आर्या रण्डा और अनेक जगणयुक्त पार्या वेश्या कहलाती है।' गाथा छन्द के २५ भेदो के नाम और लक्षण देकर उदाहरणो के लिये स्वपिता लक्ष्मीनाथ भट्ट रचित 'उदाहरणमजरी' देखने का सकेत किया है। विगाथा, गाहू, उद्गाथा, गाहिनी, सिंहिनी और स्कन्धक छन्दो के उदा- हरग सहित लक्षण दिये हैं और स्कन्धक छन्द के २८ भेदो के नाम और लक्षण देते हुये उदाहरणो के लिये 'उदाहरणमजरी' का उल्लेख किया है। इस प्रकार प्रथम प्रकरण मे छन्दसख्या की दृष्टि से गाथादि ७ छद और गाथा के २५ भेद एव स्कन्धक के २८ भेदो का प्रतिपादन है। २. पट्पद प्रकरण इस प्रकरण मे दोहा, रसिका, रोला, गन्धानक, चौपैया, पत्ता, घत्तानन्द, काव्य, उल्लाल और पट्पद छन्दो के लक्षण एव उदाहरण दिये हैं । इसमें उल्लाल छन्द का उदाहरण नही है। साथ ही दोहा के २३ भेद, रसिका के ८ भेद रोला के १३ भेद, काव्य के ४५ भेद और षट्पद के ७१ भेदो के नाम और लक्षण दिये हैं तथा इन समस्त भेदो के उदाहरणो के लिए कवि ने 'उदाहरण. मजरी' देखने का सक्त किया है । इसमे काव्य के प्रथम भेद शकछन्द का उदाहरण भी दिया है। चौपैया छन्द के एक चरण मे ३० मात्रायें होती हैं। अथकार ने चार चरणो का अर्थात् १२० मात्रानो का एक पाद स्वीकार कर चार पदो की ४८० मात्रा स्वीकार की है। प्रकरण के अन्त में काव्य और पट्पद के प्राकृत और सस्कृत साहित्य के अनुसार दोपो का निरूपण है । १-सस्कृत साहित्य मे जिसे प्रार्या कहते हैं, उसे प्राकृत और अपभ्रश साहित्य मे गाथा कहते हैं । "प्रार्यव सस्कृतेतरभाषासु गापासज्ञेति ।" हेमच द्रीय छन्दोनुशासन, पत्र १२८ । २-एकस्मात्तु कुलीना द्वाभ्यामप्यभिसारिका भवति । नायकहीना रण्डा, वेश्या बहुनायका भवति ॥ पृ०६ .
वृत्तमौक्तिक ३. रड्डा प्रकरण इस प्रकरण मे पज्झटिका, अडिल्ला, पादाकुलक, चौबोला और रड्डा छन्द के लक्षण एव उदाहरण हैं । अन्त मे रड्डा छन्द के सात भेद -करभी, नन्दा, मोहिनी, चारुसेना, भद्रा, राजसेना और तालकिनी के लक्षण मात्र दिये हैं और इनके उदाहरणों के सिए "सुबुद्धिभि स्वयमूह्यम्" कह करु प्रकरण समाप्त किया है। ४ पद्मावती प्रकरण : इस प्रकरण में पद्मावती, कुण्डलिका, गगनागण, द्विपदी, मुल्लणा, खजा, शिखा, माला, चुलियाला, सोरठा, हाकलि, मधुभार, आभीर, दण्डकला, काम- कला, रुचिरा, दीपक, सिंहविलोकित, प्लवगम, लीलावती, हरिगीतम, विभगी, दुर्मिलका, होर, जनहरण, मदनगृह और मरहठा छन्दों के लक्षण एवं उदाहरण है। हरिगीत छन्द के १ हरिगीतम्, २. हरिगीतकम, ३ मनोहर हरिगोत और ४, ५, यतिभेद से लक्षण द्वय सहित हरिगीता के लक्षण एव उदाहरण हैं । सोरठा, हाकलि, दीपक, हीर और भदनगृह छद के प्रत्युदाहरण भी हैं। ५. संवैया प्रकरण . इस प्रकरण मे मदिरा, मालती, मल्ली, मल्लिका, माधवी और मागधी सवैयो के लक्षण देकर क्रमश इनके उदाहरण दिये हैं । अन्त मे घनाक्षर छन्द का लक्षण एव उदाहरण दिया है । ६ गलितक प्रकरण इस प्रकरण में गलितकम्, विगलितकम, सगलितकम्, सुन्दरगलितकम, भूषणगलितकम्, मुखगलितकम्, विलम्बितगलितकम्, समगलितकम्, अपर समलितकम्, अपर सगलितवम्, अपर लम्वितागलितकम्, विक्षिप्तिकागलितकम्, लम्बितार्गालतकम्, विषमितालतकम्, मालागलितकम्, मुग्धमालागलितकम् पौर उद्गलितकम् छदो के लक्षण एव उदाहरण दिये हैं। प्रथमसण्ड के छन्द एव भेदो का प्रकरणानुसार वर्गीकरण इस प्रकार है- प्रकरण सस्या छदसस्या पद भेद नाम भेद सत्या मूलभदबोन्यूनता कुल १ २५ १ गाथा स्कन्पष }५८ २८ १ भूमिका [४७ प्रकरण संख्या छद सख्या छन्द भेद नाम भेद सख्या मूल भेद को न्यूनता कुल २ 8 २३ ५ १ १ १६४ दोहा रसिका रोला काव्य पटपदी रड्डा हरिगीत ७१ ३ १२ २७ ४ ३१ ७ . . ७ ६ . १७ ७६ २१८ ६ २८८ छन्द का मूल भेद, छन्द-भेद-सख्या में सम्मिलित होने से ६ भेद कम होते हैं । अत भेद सख्या २१८ मे से ६ कम करने पर २०६ होते हैं और ७६ छद सख्या सम्मिलित करने पर कुल २८८ छन्द होते हैं । अर्थात् मूल छद ७६ और भेद २०६ हैं। इस प्रकार कवि चद्रशेखर भट्ट ने वि स १६७५ वसत पचमी को इसका प्रथम-खण्ड पूर्ण किया है। द्वितीय-खण्ड का साराश १ वणिकवृत्त प्रकरण कवि चद्रशेखर 'गौरीश' का स्मरण कर वणिक छन्द कहने की प्रतिज्ञा करता है और एकाक्षर से छब्बीस प्रक्षरो तक के वणिकवृत्तो के लक्षण एव उदाहरण देता है, जो इस प्रकार हैं १ अक्षर-श्री और इ: छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं । २ अक्षर-काम, मही, सार और मधु नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं। ३ अक्षर-ताली, शशी, प्रिया, रमण, पञ्चाल, मृगेन्द्र, मन्दर और कमल नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं। ताली छन्द का नाम भेद नारी दिया है। ४ अक्षर-तीर्णा, पारी, नमारिएका और शुभ नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण है । ती छन्द का नामभेद कन्या दिया है।
४८ वृत्तमौक्तिक । ५ अक्षर-सम्मोहा, हारी, हस, प्रिया और यमक नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं । यमक का प्रत्युदाहरण भी दिया है । ६ अक्षर-शेषा. तिलका, विमोह, चतुरस, मन्थान, शखनारी, सुमाल- तिका, तनुमध्या और दमनक नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं । प्राकृत- पिंगल के मतानुसार विमोह का विज्जोहा, चतुरस का चतुरसा, मन्थान का मन्थाना और सुमालतिका का मालतो नामभेद भी दिये हैं। ७ अक्षर-शीर्षा, समानिका, सुवासक, करहञ्चि, कुमारललिता, मधुमती, मदलेखा और कुसुमतति नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं । ८ प्रक्षर-विद्युन्माला, प्रमाणिका, मल्लिका, तुङ्गा, कमल, मारणवक- क्रीडितक, चित्रपदा, अनुष्टुप् और जलद नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं । मल्लिका का नाम-भेद समानिका दिया ६ अक्षर-रूपामाला, महालक्ष्मिका, सारेग, पाइन्त, कमल, बिम्ब, तोमर, भुजगशिशुसृता, मणिमध्य, भुजङ्गसङ्गता और सुललित नामक छन्दो के लक्षारण एव उदाहरण हैं । प्राकृतपिंगल के अनुसार सारग का सारगिका और पाइन्त का पाइन्ता नामभेद दिये हैं। भुजगशिशुसृता के लिये लिखा है कि यह नाम प्राचार्य शम्भु एव प्राचीनाचार्यों द्वारा सम्मत है और आधुनिक छन्द - शास्त्री इसका नाम भुजगशिशुभृता मानते हैं। सारग का प्रत्युदाहरण भी दिया है। १० अक्षर--गोपाल, सयुत, चम्पकमाला, सारवती, सुपमा, अमृतगति, मत्ता, त्वरितगति, मनोरम, और ललितगति नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं। प्राकृतपिंगल के अनुसार सयुत का सयुता, चम्पकमाला का स्वमवती एव रूपयती तथा मनोरम का मनोरमा नामभेद दिये हैं। सयुत और त्वरितगति छन्दो के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं । ११ अक्षर-मालती, बन्धु, सुमुखी, शालिनी, पातोर्मी, शालिनी-वातो. युपजाति, दमनक, घण्डिका, सेनिका, इन्द्रवया, उपेन्द्रवज्रा, इन्द्रवोपेन्द्रवजो. पजाति, रथोद्धता, सागता, भ्रमरविलसिता, अनुकूला, मोटना, मुवेशी, सुभद्रिया पौर बगुल नामर छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं। बाघु या दोधप, चण्डिका पा सेनिका और थेणी नामभेद दिये हैं। रयोदता या प्रत्युदाहरण भी दिया है। पालिनी-यातोमी-उपजाति और इन्द्रवजा-उपेन्द्रवजा-उपजाति में ग्रन्थ मार ने १४-१४ भेद प्रस्तार-दृष्टि से स्वीकार दिये हैं किन्तु इन प्रस्तार-भेदो भूमिका { ४६ - के लक्षण एव उदाहरण नही दिये हैं। इनके उदाहरणो के लिये स्वपितृ-रचित ग्रन्थ' को देखने का सकेत किया है। १२ अक्षर--पापीड, भुजङ्गप्रयात, लक्ष्मीधर, तोटक, सारगक, मौक्तिक- दाम, मोदक, सुन्दरी, प्रमिताक्षरा, चन्द्रवर्म, द्रुतविलम्बित, वशस्थविला, इन्द्रवशा, वशस्थविला-इन्द्रवशा-उपजाति, जलोद्धतगति, वश्वदेवी, मन्दाकिनी, कुसुमविचिना, तामरस, मालतो, मणिमाला, जलघरमाला, प्रियवदा, ललिता, ललित, कामदत्ता, वसन्तचत्वर, प्रमुदितवदना, नवमालिनी और तरलनयन नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं। प्रापीड का विद्याधर, लक्ष्मीधर का स्रग्विणी, वशस्थ विला का वशस्थविल और वास्तनित, मन्दाकिनो का प्रभा, मालती का यमुना, ललिता का सुललिता, ललित का ललना और प्रमुदितवदना का प्रभा, ये नामभेद दिये हैं। सुन्दरी, प्रमिताक्षरा, चन्द्रवर्म, द्रुतविलम्बित, इन्द्रवशा, मन्दाकिनी और मालती के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं, जिसमे द्रुतविलवित और मालती के प्रत्यु- दाहरण दो दो हैं। १३ अक्षर-वाराह माया, तारक, कन्द, पड्कावली, प्रहर्पिणी रुचिरा, चण्डी, मजुभाषिणी, चन्द्रिका, कलहस, मृगेन्द्र मुख, क्षमा, लता, चन्द्रलेख, सुद्युति, लक्ष्मी और विमलगति नामक छन्दो के लक्षण एवं उदाहरण हैं । माया का मत्तमयूर, मजुभापिणी का सुनन्दिनी तथा प्रबोधिता, चन्द्रिका का उत्पलिनी, कलहस का सिंहनाद तथा कुटज, और चन्द्र लेख का चन्द्रलेखा नामभद दिये हैं । माया के ५, तारक, प्रहर्पिणी और चन्द्रिका के एक एक प्रत्युदाहरण भी दिये हैं। १४ अक्षर-सिंहास्य, वसन्ततिलका, चन, असम्बाधा, अपराजिता, प्रहरण- कलिका, वासन्ती, लोला, नान्दीमुखी, वैदर्भी, इन्दुवदन, शरभी, अहिधति, विमला, मल्लिका और मणिगण छन्द के लक्षण एव उदाहरण हैं | इन्दुवदन का इन्दुवदना नामभद दिया है। वसन्ततिलका, चक्र और प्रहरणकलिका के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं। १ भेदाश्चतुर्दशैतस्मा मतस्तु प्रदर्शिता । प्रस्ताय स्वनिबन्धेषु पित्रातिस्फुटस्तत || पृ ८१ इससे संभवत ग्रंथकार का सकेत लक्ष्मीनाथ भट्ट रचित 'उदाहरणमजरी' ग्रय की मोर ही हो। - ५० ] वृत्तमौक्तिक www . १५ अक्षर-लीलाखेल, मालिनी, चामर, भ्रमरावलिका, मनोहस, शरभ, निशिपालक, विपिनतिलक, चन्द्रलेखा, चित्रा, केसर, एला, प्रिया, उत्सव और उडुगए नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण दिये हैं । लीलाखेल का सारगिका चामर का तूणक, भ्रमरावलिका का भ्रमरावली, शरभ का शशिकला तथा यतिभेद से मणिगुणनिकर एव स्रग्, चन्द्रलेखा का चण्डलेखा, चित्रा का चित्र और प्रिया का यतिभेद से अलि नामभेद दिये हैं । लीलाखेल, मालिनी, चामर, भ्रमरावलिका, मनोहस, मणिगुणनिकर, स्रग् निशिपालक, और विपिनतिलक के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं, जिसमे मालिनी के ३ प्रत्युदाहरण है। १६ अक्षर-राम, पञ्चचामर, नील, चञ्चला, मदनललिता, नन्दिनी, प्रवरललित, गरुडरुत, चकिता, गजतुरगविलसित, शैलशिखा, ललित, सुकेसर, ललना और गिरिवरधृति नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण दिये हैं । राम का ब्रह्मरूपक, पञ्चचामर का नराच, चन्चला का चिनसग, गजतुरगविलसित का ऋषभगजविलसित और गिरिवरघृति का प्रचलधृति नामभेद दिये है । पञ्चचामर तथा चञ्चला के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं । १७ अक्षर-लीलाधृष्ट, पृथ्वी, मालावती, शिखरिणी, हरिणी, मन्दाक्रान्ता वशपत्रपतित, नईटफ, यतिभेद से कोकिलक, हारिणी, भाराकान्ता, मतङ्गवाहिनी, पद्मक और दशमुखहर नामक छन्दो के लक्षण सहित उदाहरण दिये हैं । मालावती का प्रावृतपिंगल के अनुसार मालाधर, वशपत्रपतित का वशपत्रपतिता और प्राचार्य शम्भु के मतानुसार वशवदन नामान्तर दिये हैं। पृथ्वी, शिखरिणी, हरिणी, मन्दाक्रान्ता, वशपत्रपतित, नइंटक और कोकिलक के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं, जिसमे शिखरिणी के तीन तथा हरिणी के चार प्रत्युदाहरण हैं। १८ अक्षर-लोलाचन्द्र, मजीरा, चर्चरी, कौडाचन्द्र, कुसुमितलता, न दन, नाराच, चित्रलेसा, भ्रमरपद, शार्दूलललित, मुललित और उपवनकुसुम नामक छन्दो के लक्षण सहित उदाहरण दिये हैं। नाराच का मञ्जुला नामान्तर दिया है। मजीरा, चरी, कोडाचन्द्र, कुसुमितलता, नन्दन और नाराच के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं जिसमें चर्चरी ये पाच पोर नन्दन के दो प्रत्युदाहरण हैं। १६ मक्षार-नामानन्द, शार्दूलवित्रीडित, चन्द्र, पपल, शम्भु, मेघ- विरपूजिता, माया, सुरसा, फुल्लदाम, मोर मृदुलकुसुम नामक छन्दो के लक्षण सहित उदाहरण हैं। प्राकृतपिंगलानुसार चन्द्र का चन्द्रमाला, और पवल या भूमिका [५१ - धवला नामभेद दिये हैं। शार्दूलविक्रीडित के दो, चन्द्र, धवल, शम्भु और मेघविस्फूजिता के एक-एक प्रत्युदाहरण भी दिये हैं । २० अक्षर-योगानन्द, गीतिका, गण्डका, शोभा, सुवदना, प्लवङ्ग भगमगल, शशाङ्कचलित, भद्रक, और अनवधिगुणगण नामक छन्दो के लक्षण सहित उदाहरण हैं । गण्डका का चित्रवृत्त एव वृत्त नामभेद दिया है। गीतिका के दो, गण्डका और सुवदना के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं । २१ अक्षर-ब्रह्मानन्द, स्रग्धरा, मञ्जरी, नरेन्द्र, सरसी, रुचिरा और निरुपमतिलक नामक छन्दो के लक्षण सहित उदाहरण हैं। सरसी का सुरतरु और सिद्धक नामान्तर दिया है। स्रग्धरा और मञ्जरी के दो-दो, नरेन्द्र और सरसी के एक-एक प्रत्युदाहरण भी दिये हैं । २२ अक्षर-विद्यानन्द, हसी, मदिरा, मन्द्रक, शिखर, अच्युत, मदालस और तरुवर नामक छन्दो के लक्षण सहित उदाहरण है । हसी का एक और मदालस के दो प्रत्युदाहरण भी दिये हैं। २३ अक्षर-दिव्यानन्द, सुन्दरिका, यतिभेद से पद्यावतिका, अद्रितनया, मालती, मल्लिका, मत्ताकोड और कनकवलय नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं । अद्वितनया का अश्वललित नामान्तर दिया है। अद्रितनया और अश्वललित के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं । २४ अक्षर-रामानन्द, दुर्मिलका, किरीट, तन्वी, माधवी और तरलनयन नामक छन्दो के लक्षण सहित उदाहरण हैं । दुर्मिलका और तन्वी के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं। २५ अक्षर-कामानन्द, क्रौंचपद, मल्ली और मणिगणनामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण हैं । क्रौंचपदा का प्रत्युदाहरण भी दिया है । २६ अक्षर-गोविन्दानन्द, भुजङ्गोवजू भित, अपवाह, मागधी और कमल- दल नामक छन्दो के लक्षण सहित उदाहरण दिये हैं । तथा भुजगविज भित और अपवाह के प्रत्युदाहरण भी दिये हैं । उपसहार मे कवि कहता है कि इस प्रकरण मे लक्ष्य-लक्षण-सयुक्त २६५ छन्दो का निरूपण किया है और प्रत्युदाहरण के रूप मे प्राचीन कवियो के क्वचित् उदाहरण भी लिये है। अन्त मे लक्ष्मीनाथभट्ट रचित पिंगलप्रदीप के अनुसार समस्त वृत्तो की प्रस्तारपिंड-सख्या १३,४२.१७,७२६ बतलाई है । - ५२ ] वृत्तमौक्तिक इस प्रकरण के वर्णाक्षरो के अनुसार प्रस्तारसख्या, छन्दसंख्या, उदाहरण सख्या, प्रत्युदाहरण संख्या और नामभेदो की तालिका इस प्रकार है:- वर्णाक्षर प्रस्तार छन्द उदाहरण प्रत्युदाहरण नामभेद सख्या सख्या संख्या सख्या सख्या २ २ X X ४ ४ X X ३ ८ ८ ८ x १ ४ ४ X १ ५ ३२ ५ ५ १ X ६ है x ४ x X X ६ १ . १२८ २५६ ५१२ १०२४ २०४८ ४०६६ १ २ १० ११ १२ १० २० ३० १८ १० २० २६ १ ८ १ ७ १५ १५ ૨ ५ १२ २ १२ १२ १० २ १४ १६,३८४ १५ ३२,७६० ६५,५३६ १७ १,३१,०७२ २,६२,१४४ ५,२४,२८८ २० १०,४८,५७६ २१ २०,६७,१५२ २२ ४१,६४,३०४ ८३,८८,६०० २४ १,६७,७७,२१७ २५ ३,३५,५४,४३२ २६ ६,७१,०८,८६४ ६ ६ ४ १ ७ ७ ६ 5 x ७ ६ २ २ १ x x ४ ४ १ ५ २ X ८७ भूमिका - इस प्रकार वालिकानुसार उक्त प्रकरण मै कुल २६५ छन्द है, उदाहरण २६५ है, प्रत्युदाहरण ८७ है और नामभेद ५० है। २. प्रकीर्णक वृत्त-प्रकरण : इस प्रकरण मे ग्रन्थकार ने पिपीडिका, पिपीडिकाकरम, पिपीडिकापणव और पिपीडिकामाला-नामक छन्दो के लक्षण की एक प्राचीन आचार्यों की सग्रह- कारिका दी है । स्वय के स्वतन्त्र लक्षण एव उदाहरण नहीं है । पश्चात् द्वितीय विभगी और शालूर नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण दिये है। ३ दण्डक-प्रकरण: इस प्रकरण मे चण्डवृष्टिप्रपात, प्रचितक, अर्ण, सर्वतोभद्र, अशोकमञ्जरी, कुसुमस्तबक, मत्तमातङ्ग और अनङ्गशेखर नामक दण्डक-वृत्तो के लक्षण सहित उदाहरण दिये है। ग्रन्थविस्तार-भय से अन्य प्रचलित दण्डकवृत्तो के लिये लक्ष्मीनाथभट्ट रचित पिंगलप्रदीप देखने के लिये आग्रह किया है । प्रचितक दण्डक का लक्षण ग्रन्थकार ने छन्द सूत्रानुसार दो नगण और ८ रगण दिया है जो कि छन्द सूत्र और वृत्तमौक्तिक के अनुसार 'अण' दण्डक का भी लक्षण है। छन्द सूत्र के अतिरिक्त समस्त छन्दःशास्त्रियो ने प्रचितक का लक्षण दो नगण, सात यगण स्वीकार किया है। अन्यकार ने इस लक्षण के दण्डक को सर्वतोभद्र दण्डक लिखा है । यही कारण है कि प्राचार्यो के मतो को ध्यान में रख कर ही 'एतस्यैव अन्यत्र 'प्रचितक' इति नामान्तरम्' लिखा है । ४ अर्धसमवृत-प्रकरण : जिस छन्द मे चारो चरणो के लक्षण समान हो वह समवृत्त कहलाता है; जिस छन्द के प्रथम और तृतीय चरण तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण एक सदृश हो वह अर्घसमवृत्त कहलाता है और जिस छन्द के चारो चरणो के लक्षण विभिन्न हो वह विषमवृत्त कहलाता है । इस अर्धसमवृत्त प्रकरण में पुष्पिताग्रा, उपचित्र, वेगवती, हरिणप्लुता, अपरवक्त्र, सुन्दरी, भद्रविराट्, केतुमती, वाड मती और पट्पदावली नामक छन्दो के लक्षण एव उदाहरण दिये हैं। पुष्पिताग्रा के तीन, अपरवक्त्र और सुन्दरी के एक-एक प्रत्युदाहरण भी दिये हैं। पट्पदावली का उदाहरण नहीं दिया है। . १. वृत्तमौक्तिक पृ १८५ ५४] वृत्तमौक्तिक ५ विषमवृत्त प्रकरण. जिस छन्द के चारो चरणो के लक्षण भिन्न-भिन्न हो उसे विपमवृत्त कहते हैं । विषमवृत्तो मे उद्गता, उद्गताभेद, सौरभ, ललित, भाव, वन, पथ्यावक्त्र और अनुष्टुप्-नामक छन्दो के लक्षण एवं उदाहरण दिये हैं । उद्गताभेद का ग्रन्थकार का स्वोक्त उदाहरण नहीं है किन्तु भारवि और माघ के दो उदाहरण हैं। अनुष्टुप् के लिये लिखा है कि कतिपय प्राचार्य इसे भी 'वक्त्र' छन्द का ही लक्षण मानते हैं और अनेक पुराणो मे नानागणभेद से यह प्राप्त होता है । प्रत इसे विषमवृत्त ही मानना चाहिये । पदचतुरूर्वादि और उपस्थित-प्रचुपित आदि विषमवृत्तो के लिये छन्द सूत्र की हलायुध को टोका देखने का सकेत किया है। ६ वैतालीम-प्रकरण वैतालीय, औपच्छन्दसक, आपातलिका, नलिन, द्वितीय नलिन, दक्षि- णान्तिका वैतालीय, उत्तरान्तिका-वैतालीय, प्राच्यवृत्ति, उदीच्यवृत्ति, प्रवृत्तक, अपरातिका और चारुहासिनी नामक वैतालीय छन्दो के लक्षण एक उदाहरण हैं। दक्षिणान्तिका-वैतालीय का एक, प्राच्यवृत्ति के दो, उदीच्यवृत्ति का एक प्रवृत्तक का एक, अपरान्तिका के दो और चारुहासिनी के दो प्रत्युदाहरण भी दिये हैं। इस प्रकरण में वृत्तो के लक्षण पूर्ण पद्यो मे न होकर सून-कारिका रूप मे प्राप्त हैं और साथ ही इन कारिकाप्रो को स्पष्ट करने के लिये टीका भी प्राप्त है। ७ यतिनिरूपण प्रकरण मे जहा पर विच्छेद हो, विभजन हो, विश्राम हो, विराम हो, अवसान हो उसे यति कहते हैं । समुद्र, इन्द्रिय, भूत, इन्दु, रस, पक्ष और दिक् प्रादि शब्द साकाक्षी होने से यति से सम्बन्ध रखते हैं। ग्रथकार मूल-शास्त्र अर्थात् छन्द मूत्र का पालोडन कर उदाहरण सहित इस प्रकरण पर विवेचन करता है। पद्य ४ से ७ तक प्राचीन प्राचार्यों की सग्रह कारिकायें और इनकी व्याख्या दी गई हैं। ये चारो पद्य और इनकी उदाहरणसहित व्याख्या छन्द सूत्र को हलायुध टीका मे प्राप्त है । विचित् परिवर्तन के साथ यह स्थल यहा पर ज्यो का त्यो उद्धत किया गया है। अन्त में प्राचार्य भरत, प्राचार्य पिङ्गल, जयदेव, स्वेतमाण्डव्य, पद्य भूमिका [५५ मुरारि, जयदेव (गीतगोविन्दकार), देवेश्वर, गगादास प्रादि के मतो का उल्लेख करते हुये यतिभग से दोप और यतिरक्षा से काव्य-सौन्दर्य को अभिवृद्धि प्रादि का सुन्दर, विश्लेषण किया है। ८ गद्य प्रकरण वाडमय दो प्रकार का है--१ पद्यात्मक और २ गद्यात्मक । पद्य-वाड्मय का वर्णन प्रारभ के प्रकरणो मे किया जा चुका है । अत यहां इस प्रकरण मे गद्य-वाड्मय का विवेचन है । गद्य के प्रमुख तीन भेद हैं-१ चूर्णगद्य, २ उत्कलिकाप्राय गद्य और ३ वृत्तगन्धि-गद्य । चूर्णकगद्य के तीन भद हैं -~१ प्राविद्धचूर्ण, २ ललितचूर्ण और ३ मुग्धचूर्ण । मुग्धचूण के भी दो भेद हैं -१ प्रवृत्तिमुग्धचूर्ण और २ अत्यल्प- वृत्ति मुग्धचूर्ण । इस प्रकार इन समस्त गद्य भेदो के लक्षण एव उदाहरण दिये हैं। उत्कलिकाप्राय का एक और वृत्तगन्धि गद्य के तीन प्रत्युदाहरण भी दिये हैं। यथा काव्य- वाडमय पद्य गद्य चूणकगद्य उत्कलिकाप्रायगद्य वृत्तगन्धिगद्य प्राविद्धचूण ललितचूरण मुग्धचूण प्रवृत्तिमुग्धचूरण अत्यल्पवृत्तिमुग्यचूरण अन्य ग्रन्थकारो ने गद्य के चार भद स्वीकार किये हैं १ मुक्तक २ वृत्तगन्धि, ३ उत्कलिकाप्राय और ४ कुलक । इन चारो भदो के लक्षण एव उदाहरण भी ग्रथकार ने दिये हैं । उत्कलिकाप्राय गद्य का प्राकृत-भाषा का उदा- हरण भी दिया है। ६ विरुदावली प्रकरण गद्य-पद्यमयी राजस्तुति को विरुद कहते हैं और विरुदो की आवली = समूह को विरुदावली कहते हैं। यह विरुदावली पांच प्रकरणो में विभाजित है - वृत्तमौक्तिक १. कलिका-प्रकरण, २. चण्डवृत्त-प्रकरण, ३. त्रिभंगीकलिका-प्रकरण, ४. साधारण चण्डवृत्त-प्रकरण और ५. विरुदावली। (१) द्विगादिकलिका-अवान्तर-प्रकरण कलिका के नव भेद माने हैं :-१. द्विगा-कलिका, २. रादिकलिका, ३. मादिकलिका, ४. नादिकलिका, ५. गलादिकलिका, ६. मिश्राकलिका, ७. ७ मध्याकलिका, ८. द्विभङ्गीकलिका और ६. त्रिभङ्गीकलिका । ७. मध्या- कालिका के दो भेद हैं। त्रिभंगी-कलिका के भी ह भेद माने हैं :-१. विदग्धत्रिभङ्गी-कलिका, २. तुरगत्रिभङ्गी-कलिका, ३. पद्यत्रिभंगी-कलिका, ४. हरिणप्लुतत्रिभंगी-कलिका, ५. नर्तकत्रिभगी-कलिका, ६. भुजंगत्रिभंगी-कलिका, ७. त्रिगतात्रिभंगी-कलिका, ८. वरतनुत्रिभंगी-कलिका और द्विपादिका-युग्मभगा कलिका । त्रिगताविभगी-कलिका के दो भेद हैं :-१. ललिता-त्रिगता-त्रिभंगी- कलिका और २. पल्गिता-त्रिगता-त्रिभगी-कलिका। वरतनु-त्रिभंगी-कलिका के भी दो भेद माने हैं। द्विपादिका-युग्मभंगा-कलिका के ६ भेद माने हैं :-१. मुग्धा-द्विपादिका युग्मभगा-कलिका, २. प्रगल्भा-द्विपादिका-युग्मभंगा-कलिका, ३. मध्या-द्विपा- दिका-युग्मभगा-कलिका, ४. शिथिला-द्विपादिका-युग्मभगा-कलिका, ५. मधुरा द्विपादिका-युग्मभगा-कलिका और ६. तरुणी-द्विपादिका-युग्मभगा-कलिका । इसमें मध्या-द्विपादिका-युग्मभगा कलिका के भी चार भेद माने हैं । इस प्रकार मूलभेद हैं और प्रतिभेद २५ कुल ३४ कलिकामो के लक्षण और उदाहरण अथकार ने दिये है । लक्षण पूर्णपद्यों में नही है किन्तु पद्य के टुकड़ो मे कारिका रूप मे है । इन लक्षणो को स्पष्ट करने के लिये टीका भी दी हैं। उदाहरण के भी पूर्णपद्य नहीं है किन्तु प्रत्येक उदाहरण के लिये केवल एक चरण दिया है । मध्याकलिका का उदाहरण नहीं दिया है । यथा- कलिका विरुदावली रादि मादि नादि गलादि मिश्रा विभगी मध्या द्विभगी (दो भेद) । विदग्ध । पद्य । -- तुरंग हरिणलुप्त नरीक भुजग विगता । वरतनु (दो भेद) द्विपादिका 'भूमिका ललिता वल्गिता । -- मुग्धा प्रगल्मा शिथिला मध्या (चार भेद) मधुरा तरुणी *] ५] वृत्तमौक्तिक w ३ (२) चण्डवृत्त-अवान्तर प्रकरण महाकलिकाचण्डवृत्त के दो भेद है -१ सलक्षण और २ साधारण । सलक्षण चण्डवृत्त के तीन भेद है -१ शुद्धसलक्षण, २. सकीर्णसलक्षण और ३ गभितसलक्षण । शुद्ध सलक्षण चण्डवृत्त के २० भेद है :-१ पुरुषोत्तम, २ तिलक, ३ अच्युत, ४ वद्धित, ५ रण, ६ वीर, ७ शाक, ८ मातङ्गखेलित, ६ उत्पल, १० गुणरति, ११ कल्पद्रुम, १२ कन्दल, १३ अपराजित, १४ नर्तन, १५ तरत्समस्त, १६ वेष्टन, १७ अस्खलित, १८. पल्लवित, १६ समग्न और २० तुरग। सकोसलक्षण चण्डवृत्त के ५ भेद है -१ पड्केरुह, २ सितकञ्ज, ३ पाण्डूत्पल, ४ इन्दीवर और ५ अरुणाम्भोरुह । गभितसलक्षण चण्डवृत्त के ६ भेद है -१. फुल्लाम्बुज, २ चम्पक, वजुल, ४ कुन्द ५ बकुलभासुर, ६. बकुलमगल, ७ मञ्जरीकोरक, ८ गुच्छक और ६ कुसुम । भेदकथन के पश्चात् रचना-वैशिष्टय में प्रयुक्त मधुर, श्लिष्ट, सश्लिष्ट, शिथिल और ह्रादि को परिभाषा और इनका विवेचन करते हुये उपर्युक्त ३४ महाकलिका-चण्डवृत्तो के क्रमश लक्षण एव उदाहरण दिये है । लक्षण पूर्ण पद्यो मे न होकर खण्डपद्यो मे करिका रूप मे है और इन लक्षणो को स्पष्ट करने के लिये व्याख्या भी दी है । ग्रथकार ने प्रथ विस्तार के भय से प्रत्यक चण्डवृत्त के उदाहरण मे एक-एक चरणमात्र दिया है। यीरूपगोस्वामिप्रणीत गोविन्दविरुदावली से निम्नलिखित चण्डवृत्तो के प्रत्युदाहरण दिये हैं -१ तिलक, २ अच्युत, ३ वद्धित, ४ रण, ५ वीर, ६ मातगखेलित, ७ उत्सल, ८ गुणरति, ६ पल्लवित, १० तुरग, ११ पके- रह, १२ सितकजा १३ पाण्डूत्पल, १४ इन्दीवर, १५ अरुणाम्भोरुह, १६ पुल्लाम्बुज, १७ चम्पक, १८ वजुल १६ बुन्द, २०. बकुलभासुर, २१ बकुल. मगल, २२ मजरीकोरक, २३ गुच्छ मोर २४ कुसुम । वीर या वीरभद्र, रण का समप्र मोर तुरग का तुरग नामभेद भी दिया है। (३) विभगो कलिका प्रयान्तर-प्रकरण विरुदसहित दण्ड निमगी पालिका, विरदमहित सम्पूर्णा विदग्यविभगी. रसिरा मोर मित्रवलिया के लक्षण एवं उदाहरण दिये हैं। सक्षण-वारिकापो भूमिका [५६ को टीका भी है। उदाहरण के एक-एक चरण है । तीनो ही विरुदावलियो के प्रत्युदाहरण दिये हैं जो कि रूपगोस्वामिकृत गोविन्दविरुदावली के हैं । ग्रथ- कार ने तीनों ही भेद चण्डवृत्त के ही प्रभेद माने हैं । (४) साधारण चण्डवृत्त अवान्तर प्रकरण इस प्रकरण मे साधारण चण्डवृत्ता के लक्षण एवं उदाहरण दिये गये हैं। (५) विरुदावली प्रकरण साप्तविभक्तिको कलिका, अक्षमयी कलिका और सर्वलघु कलिका के लक्षण देवर इन कारिकामो को व्यास्या दी है। इन तीनों के स्वय के उदाहरण नही हैं। तीनो ही कलिकामो के उदाहरण गोविन्दविरुदावली से उद्धृत हैं । अन्त मे समग्र कलिकामो में प्रयुक्त विरुदो के युगपद् लक्षण कहे हैं । देव, भूपति एव तत्तुल्यवर्णनो में धीर, वोर प्रादि विरुदो का प्रयोग होता है। संस्कृत प्राकृत के श्रव्यकाव्यो में शौर्य, वीर्य, दया, कीति और प्रतापादि प्रधान विपयो में कलिकादि का प्रयोग होता है। गुण, अलङ्कार, रोति, मन्यनु- प्रास एव छन्दाडम्बर स युक्त कलिका और विरद का निरूपण करन हुए समग्र विरुदावलियो के सामा य लक्षण दिये हैं। इसके अनुमार कलिका श्लोकविरद न्यूनातिन्यून पन्द्रह होते हैं और अधिक से अधिक नव्ये होते हैं। नव्व कलिका- श्लोक विरुद युक्त विरुदावली प्रखडा विरुदावली या महती विरदावली कहलाती है । मतान्तर के अनुसार क्सिी दलिका के स्थान पर केवल गद्य होता है या विरद होता है और कलिका एव विरुद पाशीर्वादात्मक पद्यो से युक्त होता है। प्रत्येक विरुदावली म तीन या पाच पलिकायें और इतन हो श्लोपो की रचना ऐच्छिक होती है । प्रत में विरुदावली या फ्ल-निर्देश है। १०. सण्डायली प्रकरण विपदावली के समान ही पडावलो होती है वितु इतना प्रतर है कि प्रादि और प्रत में पाशीर्वादात्मक पद्य विरुदरहित होते हैं । तामरमसहावली और मम्जरी-राहायलो के लदाणसहित उदाहरण दिये हैं। सक्षणारिवानी की टीमा भी है । प्रत में पति कहता है फि खडावली के हजारा भेद सम्भव है किंतु ग्रय विस्तारभय से मैंने इसपे भेदों ये उल्लस नही दिये है, येवल गुकुमारमतिया में लिये मार्ग-प्रदर्गन पिया है। ११ दोय प्रकरण इस प्रकरण में विपक्षावली भौर सण्डावली के दोको का दिनमराया ६० ] वृत्तमौक्तिक है । अमंत्री, अनुप्रासाभाव, दोवल्य, कलाहति, असाम्प्रत, हतौचित्य, विपरीतयुत, विशृखल और स्खलत्तालनामक ६ दोषो के लक्षण एवं उदाहरण देते हुये कहा है कि इन नव दोपो को जो विद्वान् नही जानता है और काव्य रचना करता है वह तमोलोक में उलूक होता है अर्थात् काव्य मे इन दोषो का त्याग अनिवार्य है। १२ अनुक्रमणी-प्रकरण रविकर, पशुपति, पिंगल एव शम्भु के छद शास्त्रो का अवलोकन कर चद्र- शेखर भट्ट ने वृत्तमौक्तिक को रचना की है। यह प्रकरण दो विभागो में विभक्त है। प्रथम विभागो ४० पद्यो का है जिसमें प्रथम-खण्ड की अनुक्रमणिका दी है और द्वितीय विभाग १८८ पद्यो का है जिसमे द्वितीय-खड की अनुक्रमणिका दी है । प्रथम खण्डानुक्रम इसमें मात्रावृत्त नामक प्रथम खड के छहो प्रकरणो को विस्तृत सूची है। प्रत्येक छद का क्रमश नाम दिया है और अत में छद- सख्या भेदो सहित २८८ दिखलाई है । द्वितीय खण्डानुक्रम :-प्रथम प्रकरण में प्ररूपित अक्षरानुसार अर्थात् एक से छब्बीस अक्षर पर्यन्त छदो के क्रमश. नाम, नामभेद और प्रस्तारभेद के साथ सूची दी है और अत मे प्रस्तारपिंड को सख्या देते हुये उल्लिखित २६५ छदो को सख्या दी है । द्वितीय प्रकरण से छठे प्रकरण तक की सूची मे छदनाम और नामभेद दिये है। सप्तम यतिप्रकरण का उल्लेख करते हुये पाठवें गद्य प्रकरण के भेदो का सूचन किया है और नवम तथा दसवें प्रकरण के समस्त छदो के नाम और नामभेद दिये हैं एव ग्यारहवें दोप प्रकरण का उल्लेख किया है। अत्त मे दोनो खडो के प्रकरणो को सख्या देते हुये उपसहार किया है। प्रन्यकृत्प्रशस्ति- वि०स० १६७६ कातिको पूर्णिमा को वसिष्ठवशीय लक्ष्मीनाथ भट्ट के पुत्र चद्रदोखर भट्ट ने इसकी (द्वितीय सड) रचना पूर्ण की है। प्रशस्तिपद्य ८ एव ६ में लिखा है कि चन्द्रशेखर भट्ट का स्वर्गवास हो जाने के कारण इस अप की पूर्णाहुति लक्ष्मीनाथ भट्ट ने की है। अन्य का वैशिष्टय प्रस्तुत ग्रप का धरशास्त्र की परम्परा में एक विशिष्ट स्थान है। इसी प्रप में पृष्ठार ४१४ में उल्लिखित छद शास्त्र के १६ ग्रय और दो टीका-अपों के साथ भूमिका [६१ तुलनात्मक अध्ययन करने पर इस ग्रथ का महत्त्व कई दृष्टियो से आका जा सकता है । न केवल सस्कृत और प्राकृत अपभ्र श छन्द-परम्परा की दृष्टि से ही अपितु हिन्दी छद-परम्परा की दृष्टि से भी इस ग्रथ को छद शास्न का सर्वश्रेष्ठ ग्रथ मान सकते हैं । इस ग्रथ की प्रमुख-प्रमुख विशेषतायें इस प्रकार हैं १ पारिभाषिक शब्द और गण इस ग्रथ में मात्रिक और वणिक दोनो छदो का विधान होने से अथकार ने सस्कृत और प्राकृत-अपभ्र श की मगणादिगण एव टगणादिगणो की दोनो प्रणा- लियो का साधिकार प्रयोग किया है। स्वयभू छद, छदोनुशासन और कवि- दर्पण प्रादि ग्रथो मे पट्कल, पञ्च कल, चतुष्कल आदि कलामो का ही प्रयोग मिलता है किंतु इनके प्रस्तार-भेद, नाम और उसके कर्ण, पयोधर, पक्षिराज आदि पर्यायो का प्रयोग हमे प्राप्त नहीं होता है । इसका सर्वप्रथम प्रयोग हमे कवि विरहाक कृत वृत्तजातिसमुच्चय में प्राप्त होता है । इसके पश्चात् तो इसका प्रयोग प्राकृतपिंगल, वाणीभूपण और वाग्वल्लभ आदि अनेक ग्रथो मे प्राप्त होता है। वृत्तमौक्तिक मे ट = पट्कल, 7 = पञ्चकल ड = चतुष्कल, ढ= विकल, = द्विकल गण स्थापित कर इनके प्रस्तारभेद, नाम और प्रत्येक के पर्याय विशदता के साथ प्राप्त हैं । साथ ही पृथक् रूप से मगणादि आठ गण भी दिये है । इस पारिभाषिक शब्दावली का तुलनात्मक अध्ययन के साथ परिचय मैंने इसी ग्रथ के प्रथम परिशिष्ट मे दिया है, अत यहां पर पुन पिष्टपेषण अनावश्यक है, किंतु रत्नमञ्जूपा और जानाश्रयो छन्दोविचिति मे हमे एक नये रूप मे पारिभाषिक शब्दावली प्राप्त होती है जिसका कि पूर्ववर्ती और परवर्ती किसी भी ग्रथ में प्रयोग नही मिलता है प्रत तुलना के लिये दोनो की सकेत सूची यहां देना अप्रासगिक न होगा। रत्नमञ्जूषा वृत्तमौक्तिक क् और पा मगण, हर यगण, इन्द्रासन मादि त् प्रो रगण, सूर्य, वीणा मादि ई सगण, करतल, कर मादि श तगण, हीर जगण, पयोधर, भूपति आदि भगण, दहन, पितामह मादि 555 ए 155 " SIS 11 IS म 551 " उ SIS S11 " ६२ ] वृत्तमौक्तिक ह, और इ SS 4414144 नगण, भाव, रस, भामिनी आदि कर्ण, सुरतलता, आदि ध्वज, चिह्न, चिरालय आदि सुप्रिय, परम हार, ताटक, नूपुर प्रादि शर, मेरु, कनक, दण्ड प्रादि S X X X X जानाश्रयो छन्दोविचिति S SS 5 SSS ISS SIS वृत्तमौक्तिक ग, हार, ताटंक आदि ल, शर, मेरु आदि गुरुयुगल, कर्ण, रसिक आदि वलय, तोमर, पवन मादि सुप्रिय, परम, मगण, हर, यगरण, कुञ्जर, रदन, मेघ प्रादि रगण, गरुड, भुजंगम, विहग आदि सगण, कमल, हस्त, रत्ल आदि तगण, होर, जगण, भूपति, कुच आदि भगण, तात, पद, जंघायुगल प्रादि नगण, रस, ताण्डव आदि विश, द्विज, बाण आदि अहिगण कुसुम शेखर चाप 551 151 ह गङ्गास् नदी ननुर नूनंसाग् कृशाङ्गीग धीवराश् कुरुतेल तेश्रीःक्व विभातिक सातवत् तरतिम् नचरतिद् चन्द्रननु नदीननु ननुचन्द्र कमलिनीय लोलमाला रोतिमयूरोन् धैर्यमस्तुतेट् ननुतरति जयनरयर । 1।। ।।। 15।। 1151 !!15 SISS 5.155 SISIS पापगण शालि भूमिका ३ :- पारिभाषिक शब्दावली का ग्रन्थकार ने सफलता के साथ विविध रूपों में प्रयोग किया है :-१. विशुद्ध दादिगण, २. टादि और मगणादि मिश्र, ३. टादि और पारिभाषिक मिश्र, ४. विशुद्ध पारिभाषिक, ५. विशुद्ध मगणादि और ६. पारिभाषिक एवं मगणादि मिथ । उदाहरण के तौर पर प्रत्येक प्रयोग का एक-एक पद्य प्रस्तुत है १. विशुद्ध टगणादि का प्रयोग-- प्रादौ षट्कलमिह रचय डगणत्रयमिह धेहि । ठगणं डगण द्वयमपि घत्तानन्दे धेहि ॥३२॥ [पृ० १६] अर्थात् घत्तानन्द नामक मात्रिक छंद में पट्कल = ६ मात्रा, डगणत्रय = चतुष्कल तीन १२ मात्रा, ठगण = पञ्चकल ५ मात्रा और डगणद्वय - चतुष्कलद्वय ८ मात्रा कुल ३१ मात्रा होती है । २. दादि और मगरणादि मिश्र का प्रयोग- इगणं कुरु विचित्रमन्ते जगणमत्र । मध्ये द्विलमवेहि दीपकमिति विधेहि ॥३६॥ [ पृ० ३८] अर्थात् दीपक नामक मात्रिक छंद में डगण = चतुष्कल ४ मात्रा, द्विल= दो लघु २ मात्रा और जगण = ४ मात्रा, कुल १० मात्रा होती हैं। ३. टादि और पारिभाषिक-मिश्र का प्रयोग- यदि योगडगणकृत - चरणविरचित-द्विजगुरुयुगकरवसुचरणा । नायक-विरहितपद - कविजनकृतमदपठनादपि मानसहरणा । इह दशवसुमनुभिः क्रियते कविमिविरतियदि युगदहनकला। सा पद्मावतिका फरिणपतिभणिता त्रिजगति राजति गुणबहुला ॥१॥ [पृ० ३०] अर्थात् पद्मावतीनामक मात्रिक छद में 'योगडगण' डगण = चतुष्कल, योग = आठ अर्थात् ३२ मात्रायें होती हैं जिनमे द्विज = || चार मात्रा, गुरु- युग% 55 चार मात्रा, कर= 115 संगण ४ मात्रा, वसुचरण = 51। भगण चार मात्रा का प्रयोग अपेक्षित है और नायक-15। जगण चार मात्रा का प्रयोग निषिद्ध है । इस छंद में यति १०, ८, १४ मात्रा पर होती है । ४. विशुद्ध पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग- द्विजरसयुता कर्णद्वन्द्वस्फुरद्वरकुण्डला, कुचतटगतं पुष्पं हार तथा दघती मुदा।
६४ ] वृत्तमौक्तिक ~ T विरुतललित सबिभ्राण पदान्नगनूपुर रसजलनिधिचिछन्ना नागप्रिया हरिणी मता ॥४१८।। [ पृ० १३७] हरिणी नामक छद १७ वर्णों का होता है। इसमे द्विज = [111, रस = ।, कर्णद्वन्द्व = 55 5 5, कुण्डल = 5 , कुच = 151, पुष्प %DI, हार = 5, विरुत = 1, नूपुर = 5 होते हैं अर्थात् इस छद मे, नगण, संगण मगरण, रगरण, सगण, लघु और गुरु होते हैं । ६, ४ और ७ पर यति होती है । ५ विशुद्ध मगणादिगणों का प्रयोग- कुरु नगणयुग धेहि त भगण तत , प्रतिपदविरतो भासते रगणोन्तत । मुनिरचितयति गराजफणिप्रिया, सकलतनुभृता मानसे लसति प्रिया ॥३६६॥ [पृ० १२७ ] १५ वर्ण के प्रियाछन्द का लक्षण है-नगण, नगण, तगण, भगण और रगण । ७ और ८ पर यति होती है। ६ पारिभाषिक और मगणादिमिश्र का प्रयोग- पूर्व कर्णनित्व कारय पश्चाद्धेहि भकार दिव्य , हार वह्निप्रोक्त धारय हस्त देहि मकार चान्ते । रन्धर्वर्णविश्राम कुरु पादे नागमहाराजोक्त, मजीराख्य वृत्त भावय शोघ्र चेतसि कान्ते स्वीये ।।४४३।। [ पृ० १४३ ] १८ अक्षरों के मजोराछन्द का लक्षण है -कर्णत्रित्व = 5 5 5 5 55, भकार= 5।।, हार वह्नि = 55 5, हस्त = 115 और मकार = 555, अर्थात् इसमे मगण, मगण, भगण, मगरण, सगण और मगण होते हैं। यति ६-६ पर है। इस पारिभापिक शब्दावली के कारण यह सत्य है कि वृत्तरत्नाकर, छदो- मजरी और श्रुतवोध की तरह वह वाल सरलता अवश्य हो नहीं रही किन्तु इसके सफल प्रयोग से इस ग्रथ में जैसा शब्दमाधुर्य, भाषा की प्राजलता, रचना सौष्ठव और लालित्य प्राप्त होता है वैसा उन ग्रथो मे कहाँ है ? २ विशिष्ट छन्द- वृत्तमौक्तिक मे जिन छदो के लक्षण एव उदाहरण ग्रन्थकार ने दिये हैं उनमें से कतिपय छद ऐसे हैं जिनका पृष्ठ ४१४ पर दो हुई सन्दर्भ-ग्रथ भूमिका [६५ सूची के प्रसिद्ध छदःशास्त्र के २१ ग्रन्थो मे भी उल्लेख नहीं हैं और कतिपय छद ऐसे हैं जो केवल हेमचन्द्रीय छदोनुशासन, पिंगलत छद.सूत्र, हरिहरकृत प्रातपिंगल और दु.खभजनकृत वाग्वल्लभ मे ही प्राप्त होते हैं। इन विशिष्ट छदों की वर्गीकृत तालिका इस प्रकार है: वृत्तमौक्तिक के विशिष्ट छन्द- मात्रिक छन्द :-कामकला, हरिगीतकम्, मनोहर हरिगीतम्, अपरा हरि- गोता, मदिरा सवया, मालती सवया, मल्ली सवया, मल्लिका सवया, माधवी सवया, गागधी सवया, घनाक्षर, अपर समगलितक और अपर सगलितक । रिगक छन्द. -१४ अक्षर - शरभो, अहिधृति, १६ अक्षर - सुकेसरम्, ललना; १७ अक्षर - मतगवाहिनी; १६ अक्षर - नागानन्द, मृदुलकुसुम, २० अक्षर - प्लवगभगमगल, अनवधिगुणगण; २१ अक्षर - ब्रह्मानन्द, निरुपमतिलक; २२ अक्षर - विद्यानन्द, शिखर, अच्युत; २३ अक्षर - दिव्यानन्द; कनकवलय; २४ अक्षर - रामानन्द, तरलनयन, २५ अक्षर-कामानन्द, मणिगुण; २६ अक्षर- कमलदल और विषमवृत्तो में भाव तथा वैतालीय छदो मे नलिन और अपर नलिन। इस प्रकार मात्रिक छंद १३ और वणिक छद २४ कुल ३७ छन्द ऐसे हैं जिनका अन्य छद शास्त्रों मे उल्लेख नही है । निम्नलिखित ११ छद केवल हेमचन्द्रीय छन्दोनुशासन एव वृत्तमौक्तिक मे ही प्राप्त है मात्रिक छन्द :-विलितक, सुन्दरगलितक, भूपणगलितक, मुखगलि तक, विलम्बितगलितक, समगलितक, विक्षिप्तिकागलितक, विपमितागलितक और मालागलितका वणिक छन्द-१३ अक्षर - सुद्युति और २१ अक्षर रुचिरा। १८ वर्ण का लीलाचन्द्र नामक छन्द प्राकृतपिंगल और वृत्तमौक्तिक मे ही प्राप्त है। निम्नांकित १७ वर्णिक छंद वृत्तमौक्तिक और दुःखभजन कवि रचित वाग्वल्लभ में ही प्राप्त हैं। ८ अक्षर- जलद; ६ अक्षर - सुललित; १० अक्षर - गोपाल, ललितगति; ११ अक्षर - शालिनी-वातोर्म्युपजाति, बकुल; १३ अक्षर - वाराह, विमलगति; १४ अक्षर - मणिगण; १५ अक्षर उडुगण; १७ अक्षर - लीलाधृष्ट; १८ वृत्तमौक्तिक अक्षर - उपवनकुसुम; २३ अक्षर-मल्लिका, २४ अक्षर - माधवी; २५ अक्षर - मल्ली, २६ प्रक्षर - गोविन्दानन्द और मागधी। दो नगण और माठ रगणयुक्त प्रचितक-नामक दण्डक का प्रयोग केवल छद सूत्र और वृत्तमौक्तिक मे ही है । चौपैया नामक मानिक छद अन्य ग्रथो में भी प्राप्त है। किन्तु जहाँ अन्य ग्रथो मे १२० मात्रा का पूर्ण पद्य माना है वहाँ इस ग्रन्थ मे १२० माया का एक पद और ४८० मात्रा का पूर्ण पद्य माना है। इस वर्गीकरण से स्पष्ट है कि अन्य अथो की अपेक्षा वृत्तमौक्तिक मे छदो का वैशिष्टय और बाहुल्य है । ३. छन्दो के नाम-भेद प्रस्तुत ग्रथ में ५० छद ऐसे हैं जिनका प्रथकार ने प्राकृतपिंगल, प्राचार्य शभु एव तत्कालीन प्राधुनिक छदःशास्त्रियो के मतानुसार नाम-भेद दिये हैं । इन नामभेदी की तालिका प्रथ के साराश मे और चतुर्थ परिशिष्ट (ख) मे देखी जा सकती है। इस प्रकार की नामभेदो की प्रणाली अन्य मूलग्रन्थो मे उपलब्ध नहीं है। हाँ, हेमचन्द्रीय छन्दोनुशासन की स्वोपज्ञ टोका और वृत्तरत्नाकर की नारायणभट्टी टीका आदि कतिपय टीका-ग्रन्थो में यह प्रणाली अवश्य लक्षित होती है किन्तु इतनी विपुलता के साथ नही। इससे यह तो स्पष्ट है कि ग्रन्थकार ने प्राचीन एव अर्वाचीन अनेक छन्द शास्त्रो का प्रामन्थन कर प्रस्तुत ग्रन्थ द्वारा नवनीत रखने का प्रयास किया है। ४ विरुदावली और खण्डावली ग्रन्थ के द्वितीय-खण्ड के नवम प्रकरण मे विरुदावली, दसवें प्रकरण मे खण्डावली और ग्यारहवें प्रकरण में इन दोनो के दोषो का वर्णन है । विरुदा- वली मे ३४ कलिका, ४० विरुदावली और २ खण्डावली के लक्षण एव उदाहरण ग्रन्थकार ने दिये हैं । यह विरुदावली कवि को मौलिक-सर्जना प्रतीत होती है, क्योकि अन्य छन्द-ग्रथो मे विरुदावली के भेद और लक्षण तो दूर रहे किन्तु इसका नामोल्लेख भी नहीं है। हां, इतना अवश्य है कि कवि ने २६ विरुदावलिगे के उदाहरण रूपगोस्वामी प्रणीत गोविन्दविरुदावली से दिये हैं, अत. यह अनुमान किया जा सकता है कि रूपगोस्वामी के पूर्व भी इसकी परम्परा विविध-रूपो में अवश्य विद्यमान थी, अन्यथा इतने भेद और प्रभेद कैसे प्राप्त भूमिका [६७ मधुरता के हो सक्ते थे ? संभव है, इसका कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ भी अवश्य रहा हो ! कतिपय स्फुट विरुदावलियां अवश्य प्राप्त होती हैं तथा शोध करने पर और भी प्राप्त होना संभव है किन्तु इनके भेद, प्रभेद उदाहरणों के साथ संकलन अद्यावधि अप्राप्त है । कवि ने इस विच्छिन्नप्राय परम्परा को अक्षुण्ण रख कर जो साहित्य जगत् को अमूल्य देन दी है वह श्लाघ्य ही नहीं महत्त्वपूर्ण भी है। अद्यावधि जो संस्कृत-वाङ्मय प्रकाश में आया है उसमें विरुदावली साहित्य पर नहीं के समान प्रकाश पड़ा है। अतः शोध-विद्वानों का कर्तव्य है कि वे इस अद्भुते और वैशिष्टयपूर्ण विस्दावली-साहित्य पर अनुसंधान कर इसके महत्त्व पर प्रकाश डालें। ५. यति एवं गद्य प्रकरण- समन छन्दःशास्त्रियों ने मात्रिक और वणिक पद्य के पदान्त और पदमध्य में यतिविघान प्रावश्यक माना है । वृत्तमौक्तिककार ने भी यति प्रकरण में इस का सुन्दर विश्लेषण और विवेचन किया है। इनके मत से काव्य लिये यति का बन्धन आवश्यक है । यति से काव्य मे सौन्दर्य को अभिवृद्धि होतो है। यति के बिना काव्य श्रेष्ठतर नही हो सकता। ग्रन्थकार के मत से भरत, पिंगल और जयदेव संस्कृत-साहित्य मे यति आवश्यक मानते हैं और श्वेतमाण्डव्य प्रादि मुनिगण यति का वन्धन स्वीकार नही करते हैं । जयकीत्ति के मतानुसार पिंगल वसिष्ठ, कौण्डिन्य, कपिल, कम्बलमुनि यति को अनिवार्य मानते है और भरत, कोहल, माण्डव्य, अश्वतर, सैतव आदि कतिपय प्राचार्य यति को अनावश्यक मानते हैं- वाञ्छन्ति यति पिङ्गल-वसिष्ठ-कौण्डिन्य-कपिल-कम्बलमुनयः । नेच्छन्ति भरत-कोहल-माण्डव्याश्वतरसैतवाद्या: केचित् ।। [छन्दोनुशासन, १.१३] स्वयम्भूछन्द में लिखा है- जयदेवपिंगला सवकय मि दुच्चिय जई समिच्छति । मडव्वभरहकासवसेयवपमुहा न इच्छंति ॥१,७१॥ [जयदेवपिंगतो सस्कृते द्वावेष यति समिच्छन्ति । माण्डव्यभरतकाश्यपसतधप्रमुखा न इच्छन्ति ॥] अर्थात् जयदेव और पिंगल यति मानते हैं और माण्डव्य, भरत, काश्यप, संतव आदि नहीं मानते हैं । १-पृ. २०४ पद्य ८ २-पृ. २०४ पद्य १० ६८ ] घृत्तमौक्तिक भरत के नाट्यशास्त्र के छन्द-प्रकरण मे पादान्त यति तो प्राप्त है ही साथ ही पदमध्ययति भी प्राप्त है।' ऐसी अवस्था में जयकीत्ति एव स्वयम्भू-छन्दकार ने भरत को यतिविरोधी कैसे माना, विचारणीय है । वृत्तमौक्तिकार ने भरत को यतिसमर्थक ही माना है। पति का सागोपाग विश्वोपण छन्द सूत्र की हलायुघटीका, हेमचन्द्रीय छन्दो. नुशासन की स्वोपज्ञटीका और वृत्तमौक्तिक में ही प्राप्त है। अन्य छन्द-शास्नो मे कतिपय छन्द-शास्त्रियों ने इसका सामान्य-वर्णन सा ही किया है। गद्य काव्य-साहित्य का प्रमुख अग है । प्रस्तुत ग्रन्थ मे इसके भेद, प्रभेदो के लक्षण और प्रत्येक के उदाहरण प्राप्त हैं । साथ ही अन्य प्राचार्यों के मतो का उल्लेख कर उनके मतानुसार ही उदाहरण भी ग्रथकार ने दिये हैं। इस प्रकार गद्य-काव्य का विवेचन अन्य छदग्रथो मे प्राप्त नहीं है। सभव है इसे काव्य का अग मानकर साहित्य-शास्त्रियो के लिये छोड दिया हो । ६ रचना-शैली- छन्दशास्त्र की प्राचीन और अर्वाचीन रचनाशैली अनेक रूपो मे प्राप्त होती है जिनमे तीन शैलिया मुख्य हैं - १. गद्य सूत्र रूप, २ कारिका-शैली (लक्षण सम्मत चरण रूप) और ३ पूर्णपद्य-शैली । गद्यसूत्ररूप शैली मे छन्द सूत्र, रत्नमञ्जूषा, जानाश्रयी छन्दोविचिति और हेमचन्द्रीय छन्दोनुशासन की रचनायें आती हैं । कारिकारूपशैली मे जयदेवछन्दस्, स्वयम्भूछन्द, कविदर्पण, जयकोत्ति- कृत छन्दोनुशासन, वृत्तरत्नाकर, छन्दोमजरी और वाग्वल्लभ की रचनायें हैं। पूर्णपद्यशैली मे प्राकृतपिंगल, वाणीभूषण, श्रुतबोध और वृत्तमुक्तावली की रचनायें हैं। भरत नाट्यशास्त्र में लक्षण अनुष्टुप् छन्द मे है, वृत्तमुक्तावली मे मात्रिक छन्दो के लक्षण गद्य मे हैं और वाग्वल्लभ मे मानिक-छन्दो के लक्षण पूर्ण पद्यो मे है। छन्द सूत्र, रत्नमञ्जूषा, जानाश्रयी छन्दोविचिति, जयदेवछन्दस्, जयकीय छन्दोनुशासन, हेमचन्द्रीय छन्दोनुशासन, कविदर्पण, वृत्तरत्नाकर, छन्दोमञ्जरी एव वाग्वल्लभ मे लक्षणमात्र प्राप्त है, स्वरचित उदाहरण प्राप्त नही है । स्वयम्भूछद, हेमचन्द्रीय छन्दोनुशासन की टीका और प्राकृतपिंगल मे कतिपय १-नाट्यशास्त्र (१६, ३६) भूमिका [६६ स्वरचित एवं अन्य कवियो के उदाहरण प्राप्त है। नाटयशास्त्र, वाणीभूपए और वृत्तमुक्तावली मे ग्रन्थकार रचित उदाहरण प्राप्त हैं । प्रस्तुत ग्रन्य की रचना-शैली हमें दो रूपो में प्राप्त होती है-१. पूर्णपद्य- शैली और २. कारिकार्शली। प्रारम्भ से द्वितीय-खण्ड के विषमवृत्तप्रकरण तक माविक एव वणिक छन्दो के लक्षण पूर्णपद्यशैली में हैं जिससे छन्द का लक्षण और यति श्रादि का विश्लेपण विशद और सरल रूप में हो गया है । वतालीय छन्द तथा विरदावली खण्डावली-प्रकरण कारिकाशैली में होने से विषय को स्पष्ट करने के लिये ग्रन्थकार ने व्यास्या का आधार लिया है। यह हम पहले ही कह पाये हैं कि ग्रन्थ के मूललेखक चन्द्रशेखर भट्ट का स्वर्गवास द्वितीय-खण्ड के रचनाकाल के मध्य में हो गया था और तदुपरान्त उसकी इच्छा के अनुसार उनके पिता लक्ष्मीनाथ भट्ट ने ग्रन्थ को पूर्ण करने का कार्य पूर्ण मनोयोग के साथ अपने हाथ में लिया था। पचम प्रकरण में तो उन्होने जैसे तैसे ही लक्षण स्पष्ट करने के लिये पद्यशैली को अपनाये रखनेका प्रयास किया प्रतीत होता है परन्तु छठे प्रकरण (वैतालीय) पर आते ही दोनो लेखको के व्यक्तित्व को भिन्नता का प्रतिबिम्ब हमें शैलीगत भिन्नता में मिल जाता है, क्योकि यहा से लेखक ने कारिका-शैली को इस कार्य के लिये सुविधाजनक समझ कर अपना लिया है और अन्त तक उसी का निर्वाह उन्होने किया है। कवि ने स्वप्रणीत मुक्तक पद्यो के माध्यम से ही समग्र छन्दो के उदाहरण दिये हैं । प्रत्युदाहरणो में अवश्य ही पूर्ववर्ती कवियो के पद्य उद्धृत किये हैं। हा, विरुदावलीप्रकरण में स्वप्रणीत उदाहरण एक-एक चरण के ही दिये हैं । लक्षणो के सीमित दायरे में वद्ध रहने पर भी पारिभाषिक शब्दावली के माध्यम से छन्दो के अनुरूप ही शब्दो का चयन कर कवि ने जो लयात्मक सौन्दर्य, माधुर्य और चमत्कार का सृजन किया है वह अनूठा है । यथा- पूर्णपद्यशैली का उदाहरण- हारद्वय स्फुरदुरोजयुत दधाना हस्त च गन्धकुसुमोज्ज्वलककणाढयम् । पादे सरुतनूपुरयुग्मयुक्ता, चित्ते वसन्ततिलका किल चाकसीति ॥२९॥ [पृ० ११३ ] कारिकाशैली का उदाहरण- अस्य युग्म रचितापरान्तिका ॥२७॥ तथा ७०] वृत्तमोक्तिक [व्या.] अस्य-प्रवृत्तकस्य समपादकृता'--'समपादलक्षणयुक्तश्चतुभिः पाद रचिताऽपरान्तिका। उदाहरण मुक्तक पद्यो में हैं। इसमें छन्द-नामो के अनुरूप ही शृंगार, वीर, रौद्र और शान्त आदि रसो के अनुकूल जिस गाब्दिक गठन, मालका- रिकता और लाक्षणिकता का कवि ने प्रयोग किया है वह भी दर्शनीय है । उदाहरण के तौर पर दो पद्य प्रस्तुत हैं- मनोहस-नामानुरूप उदाहरण- तनुजाग्निना सखि मानस मम दह्यते, नुसन्धिरुष्णगदारुवत् परिभिद्यते । अधर च शुष्यति वारिमुक्तसुशालिवत्, कुरु मद्गृह कृपया सदा वनमालिमत् ।।३४४॥ [पृ० १२३ ] सिंहास्यछन्द के अनुरूप उदाहरण- यो दैत्यानामिन्द्र वक्षस्पीठे हस्तस्याग्रे- भिद्यद् ब्रह्माण्ड व्याक्रुश्योच्चामृद्नादुप्रै । दत्तालीकान्युमिश्र निर्यद् विद्युबृद्धास्य- स्तूर्णं सोऽस्माक रक्षा कुर्याद् घोर (वीर ) सिंहास्यः ॥२६॥ [पृ० ११३ ] स्पष्ट है कि उल्लिखित ग्रन्थो की अपेक्षा इस ग्रन्थ की रचनाशली विशद, स्पष्ट, सरल और विविधता को लिये हुये है । ७. छन्दजाति- अद्यावधि उपलब्ध समस्त छन्द शास्त्रियो ने एक अक्षर से छब्बीस अक्षर- पर्यन्त के वणिक छन्दो की निम्नजाति-सज्ञा स्वीकार की है- बृहती अत्युक्ता २अक्षर पक्ति १० अक्षर मध्या ३ प्रक्षर त्रिष्टुप् ११ अक्षर प्रतिष्ठा जगती १२ अक्षर सुप्रतिष्ठा ५ अक्षर प्रतिजगती १३ अक्षर गायत्री शक्वरी १४ अक्षर उष्णिक प्रतिशश्वरी १५ अक्षर अनुष्टुप अष्टि १६ अक्षर 8 अक्षर D ४ अक्षर ६ अक्षर ७प्रक्षर ८ अक्षर - भूमिका [७१ % 3D % 3D - कृति अत्यष्टि १७ अक्षर प्राकृति २२ अक्षर घृति १८ अक्षर विकृति २३ प्रक्षर अतिधति १६ प्रक्षर सस्कृति २४ अक्षर २० प्रक्षर अतिकृति २५ प्रक्षार प्रकृति २१ अक्षर उत्कृति २६ प्रहार किन्तु प्राकृतपिंगल, वाणीभूपण और वृत्तमौक्तिक मे यह परम्परा दृष्टि- गोचर नही होती है। इन तीनो ग्रन्थो में एकाक्षर, द्वयक्षर, त्र्यक्षार आदि सज्ञा का ही प्रयोग मिलता है । सभवतः मध्ययुगीन हिन्दी-परम्परा के निकट मा जाने के कारण ही इन ग्रन्थकारो ने वैदिक-परम्परा का त्याग कर सामान्य प्रणालिका अपनाई है। ८ विषयसूची- प्रस्तुत ग्रन्थ के द्वितीय खण्ड के बारहवें प्रकरण में दोनो खण्डो के प्रत्येक प्रकरणस्थ प्रतिपाद्य विषय की विस्तृत अनुक्रमणिका ग्रन्थकार ने दी है । वर्ण्य विषय के साथ साथ छन्द-नाम, नामभेद और प्रत्येक अक्षर की प्रस्तारसख्या का भी उल्लेख है। इस प्रकार की अनुक्रमणिका अन्य छन्द-ग्रन्थो में प्राप्त नहीं है, केवल प्राकृतपिंगल में प्रथम परिच्छेद के प्रत में मात्रिक छन्द-सूची और द्वितीय परिच्छेद के अन्त में वणिकवृत्त-सूची गद्य में प्राप्त है। इस प्रकार की बृहत्सूची जिस विधिवत् ढग से दी गई है उससे यह प्रमाणित होता है कि लखक का ज्ञान बहुत विस्तृत रहा है और उसने छन्द शास्त्र के प्रतिपादन मे वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का प्रयल किया है और वह इसमें सफल भी हुआ है। निष्कर्ष-उपर्युक्त छन्द-ग्रन्थो के साथ तुलना करने पर यह स्पष्ट है कि सभी दृष्टियो से अन्य ग्रन्थो की अपेक्षा वृत्तमौक्तिक छन्द शास्न का सर्वश्रेष्ठ एव प्रौढ ग्रन्थ है । साथ ही मध्ययुगीन हिन्दी-साहित्य मे जो स्थान और महत्व प्राकृतपिंगल का है उससे भी अधिक महत्व इस ग्रन्थ का है क्यो कि जहा प्राकृतपिंगल मे सवैया छन्द के उद्भव के अकुर प्राप्त होते हैं वहा वृत्तमौक्तिक मे सवैया (मदिरा, मालती प्रादि ६ भेद) और घनाक्षरी छन्द सोदाहरण प्राप्त हैं । मध्ययुगीन हिन्दी-साहित्य की दृष्टि से इसमे वे सब छन्द प्राप्त हैं जिनका प्राय प्रयोग तत्कालीन कवि कर रहे थे। अत सस्कृत और हिन्दी दोनो के साहित्यिक दृष्टिकोण से वृत्तमौक्तिक का छन्द शास्त्र में विशिष्ट स्थान और महत्व सुनिश्चित ही है। प ७२] पृत्तमौक्तिक वृत्तमोक्तिक और प्राकृतपिंगल वृत्तमौक्तिक और प्राकृतपिंगल का पालोडन करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि चन्द्रशेखर भट्ट ने वृत्तमौक्तिक के मात्रावृत्तनामक प्रथम खण्ड में न केवल प्राकृतपिंगल का प्राधार ही लिया है अपितु पांचवां और छठा प्रकरण तथा कति- पय स्थलों को छोड़ कर पूर्णतः प्राकृतपिंगल को छाया या अनुवाद के रूप मे ही रचना की है । मुख्य अंतर है तो केवल इतना ही है कि प्राकृतपिंगल की रचना प्राकृत-अपनश मे है तो वृत्तमौक्तिक की रचना संस्कृत में है। दोनों ही ग्रन्थों को समानतायें इस प्रकार हैं- १. दोनों ही ग्रन्थ मात्रावृत्त और वर्णवृत्त-नामक दो परिच्छेदों में विभक्त हैं । वृत्तमौक्तिक मे परिच्छेद के स्थान पर 'खण्ड' शब्द का प्रयोग किया गया है । २. प्रारम्भ से अन्त तक विषयक्रम और छन्दःक्रम एकसदृश है जो विषय सूची से स्पष्ट है। ३. रचनाशली मे पारिभाषिक (सांकेतिक) शब्दावली और उसका प्रयोग एक-सा ही है। ४. गाथा, स्कन्धक, दोहा, रोला, रसिका, काव्य और षट्पद-नामक छन्दो के प्रस्तारभेद और नाम एकसमान हैं। नामों मे यत्किंचित् अन्तर अवश्य है, जो चतुर्थ परिशिष्ट (क) मे द्रष्टव्य है । दोनो मे भेदों के लक्षणमात्र ही हैं, उदाहरण नहीं हैं । वृत्तमौक्तिक में गाथा-छन्द के २७ के स्थान पर २५ भेद स्वीकार किये हैं। ५. रड्डा छन्द के सातों भेदों के उदाहरण दोनो मे प्राप्त नहीं हैं । ६. लक्षणो की शब्दावली भी प्रायः समान है। उदाहरण के लिये कुछ पछ प्रस्तुत हैं- वृत्तमौक्तिक दीर्घः सयुक्तपरः प्राकृतपिगल दीहो संजुत्तपरो बिंदुजुओ पाडियो य चरणते । स गुरू वंक दुमत्तो अण्णो लहु होप सुद एक्ककलो ॥२॥ पादान्तो वा विसर्गबिन्दुयुतः । स गुरुर्वको द्विकलो लघुरन्यः शुद्ध एककलः ॥६॥ x x x ७४ ] वृत्तमौक्तिक + सगणा भगरणा दिप्रगणइ सगणभंगण लघुयुतः मत्त चउद्दह पन पलई । सरल चरण प्रविरचितम् । सठइ वको विरइ तहा गुरुकेन च सर्व कलित हाकलि रूपउ एहु कहा ।।१७२।। हाकलिवृत्तमिदं कथितम्॥२२॥ [चतुपं प्रकरण + + प्राकृतपिंगल और वृत्तमौक्तिक में निम्न असमानतायें है- १. प्राकृतपिंगलकार ने छन्दों के उदाहरण पूर्ववर्ती कवियो के दिये हैं और वृत्तमौक्तिककार ने समन उदाहरण स्वरचित दिये हैं, प्रत्युदाहरण पूर्ववर्ती कवियों के अवश्य दिये हैं। २. शिखा, कामकला, रुचिरा, हरिगीत के भेद, मदिरा सवैया, मालती सवैया, मल्ली सवैया, मल्लिका सवैया, माधवी सवैया, मागधी सवैया, घनाक्षर और गलितक प्रकरण के १७ छन्द विशिष्ट हैं जो प्राकृत पिंगल मे प्राप्त नहीं है। ३ प्रथम खण्ड छह प्रकरणो में विभक्त है। वृत्तमौक्तिक के द्वितीय खड की रचना प्राकृतपिंगल के अनुकरण पर नही है। रचना-शैली, शब्दावली, प्रकरण आदि सब पृथक हैं। प्राकृतपिंगल के द्वितीय परिच्छेद मे केवल १०४ वर्णिक छन्द हैं और वृत्तमौक्तिक मे २६५ वणिक छन्द, प्रकीर्णक, दण्डक अर्धसम, विपम, वैतालीय छन्द, यति-प्रकरण, गद्य-प्रकरण और विरुदावली आदि कई विशिष्ट प्रकरण हैं जो कि अन्यत्र दुर्लभ हैं। वृत्तमौक्तिक और वाणीभूषण प्राकृतपिंगलकार हरिहर के पौत्र, रविकर के पुत्र दामोदरप्रणीत वाणी- भूषण प्राकृतपिंगल का सस्कृत रूपान्तर है और इस ग्रथ का वृत्तमौक्तिककार ने भी यथेच्छ प्रयोग किया ह । प्रत्युदाहरणो में सुन्दरी, तारक. चक्र, चामर, निशिपालक, चञ्चला, मजोरा, चर्चरो, क्रीडाचन्द्र, चन्द्र, धवल, गण्डका एवं दीपक (मात्रिक) के उदाहरणों का तो प्रयोग किया ही है किन्तु रुचिरा (मात्रिक) और किरीट (वणिक) छन्द के तो लक्षण एवं उदाहरण भी ज्यो के त्यों उद्धत कर दिये हैं । अतः यह नि.संकोच मानना होगा कि पूर्ववर्ती वाणीभूषण का वृत्तमौक्तिककार ने पूर्णतया अनुकरण किया है।
• ७६ ] वृत्तमौक्तिक रोलावृत्तमवेहि नागपिङ्गलकविभणित, प्रतिपदमिह चतुरधिक- कलविंशतिपरिगणितम् । एकादशमधि विरति- रखिलजनचिन्ताहरण, सुललितपदमदकारि विमलकविकण्ठाभरणम् ॥५६॥ + अक्षरगुरुलघुनियमविरहित भुजगराजपिङ्गलपरिगणितम् । भवति सुगुम्फितषोडशकलक, वारणीभूषणपादाकुलकम् ॥७॥ या चरणे कलाना चतुरधिकविशेगविता, सा किल रोला भवति नागकविपिङ्गलकथिता। एकादशकलविरति- रखिलजनचिन्ताहरणा सुललितपदकुलकलित- विमलकविकण्ठाभरणा ॥१६॥ [द्वितीय प्रकरण + गुरुलघुकृतगणनियमविरहित, फणिपतिनायकपिंगलगदितम् । रसविधुकलयुतयमकितचरण पादाकुलक श्रुतिसुखकरणम् ।।५।। [तृतीय प्रकरण + पट्पदवृत्त कलय सरसकविपिंगलभणित, एकादश इह विरति- रथ च दहनैविधुगणितम् । पटकलमादौ तदनु चतुस्तुरग परिसतनु, शेपे द्विकल रचय चतुप्पदमेव सचिन । उल्लालद्वयमत्र हि भवेदष्टाविंशतिकलयुत, यदि पञ्चदशे विरतिस्थित पठनादपि गुणिगणहितम् ॥५३॥ [दितीय प्रकरण + + पट्कलमादौ तदनु चतुस्तुरग परिसतनु, शेपे द्विकल कलय चतुप्पदमेव सचिनु । छद पटपदनाम भवति फणिनायकगीत, रुद्रे विरतिमुपैति नृपतिसुखकरमुपनीतम्। उल्लालयुगलमत्र च भवेदप्टाविंशतिकलमित, शृणु पञ्चदशे विरतिस्थित. पठनादपि पण्डितजनहितम् ।।७७॥ + द्वितीय परिच्छेद नरेन्द्रभुदेहि । मृगेन्द्रमहि ॥२१॥ द्वितीय-खण्ड--१ वृत्तनिरूपण प्रकरण नरेन्द्रविराज । मृगेन्द्रमवेहि ॥२शशा भूमिका [७७ + द्विजगणमाहर, भगणमुपाहर । द्विमिह धारय, भमनु च कारय । भणति सुवासकमिति गुणनायक ॥५६॥ भवति सुवामकमिति गुणलासक ॥७२॥ + + + विनिधेहि चतु सगण रुचिर, यदि व लघुयुग्मगुरुकमत रविसस्यकवणंकृत सुचिरम् । रविसम्मितवर्ण इह प्रमित । फणिनायकपिङ्गलसणित अहिभूपतिना फणिना भणित कुरु तोटकवृत्तमिद गरिगतम् ॥१३॥ सखि तोटकवृत्तमिद गणितम् ।।१९६।। + + + पादयुग कुरु नूपुरसयुत. पादयुग कुरु नूपुरराजित- मन कर वररत्नमनोहर, मत्र कर वररत्नमनोहर, वजयुग कुसुमद्वयसगत- वज्रयुग कुसुमद्वयसङ्गत- कुण्डलगन्धयुग समुपाहर। कुण्डलगन्धयुग समुपाहर । पण्डितमण्डलिकाहृतमानस- पण्डितमण्डलिकाहृतमानस- कल्पितसज्जनमौलिरसालय, कल्पितसज्जनमौलिरसालय, पिङ्गलपनगराजनिवेदित- पिंगलपन्नगराजनिवेदित- वृत्तकिरीटमिद परिभावय ॥२२१॥ वृत्तकिरीटमिद परिभावय ॥५८१॥ + + + वाणीभूपण की अपेक्षा वृत्तमौक्तिक में निम्नलिखित विशेषतायें पाई जाती है (१) वाणीमूपण में केवल ४३ मात्रिक छन्द हैं जब कि वृत्तमौक्तिक में ७९ मूल छन्द और २०६ छन्द-भेद है। निम्न छन्दो का प्रयोग वाणीभूपणकार ने नहीं किया है रसिका, काव्य, उल्लाल, चौबोला, मुल्लणा, शिखा, दण्डक्ला, वामकला, हरिगीत के भेद और पचम सवैया-प्रकरण तथा छठा गलितक प्रकरण के पूर्ण छन्द। (२) गाथा, स्कन्धक, दोहा, रोला, रसिका, काव्य, और पट्पद के प्रस्तारभेद, नाम एव लक्षण तथा रड्डा छन्द के सातों भेदों के लक्षण वाणीमूपण में नहीं हैं। (३) वाणीभूषण में ११२ समवणिक छन्द है जब कि वृत्तमौलिक में २६५ छन्द है। इसका वर्गीकरण चतुर्ष परिशिष्ट (ख) में देखा जा सकता है। + ७८] वृत्तमौक्तिक (४) वृत्तमौक्तिक में ७ प्रकीर्णक, ८ दण्डक, ८ विषम १२ वैतालीय, ७४ विरुदावली और २ खण्डावली छन्दो के लक्षण एव उदाहरण प्राप्त हैं जब कि वाणीभूपण मे इन छन्दो का उल्लेख भी नहीं है। (५) वाणीभूपण मे अर्द्धसम छन्दो मे केवल पुष्पिताग्रा छन्द है जब कि वृत्तमौक्तिक मे १० छन्द हैं । (६) वाणीभूषण मे यतिनिरूपण और गद्य-निरूपण-प्रकरण नहीं है । (७) वृत्तमौक्तिक मे दोनो खण्डो के प्रकरणो की सूची है जिसमे छन्द- नाम, नामभेद एव प्रस्तार सख्या दी है, जब वि वाणीभूषण में सूची नही है । तुलना से स्पष्ट कि वाणीभूपण एक लधुकाय' छन्दोग्नन्थ है जब कि वृत्तमौक्तिक छन्दो का पाकर और महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। वृत्तमौक्तिक और गोविन्दविरुदावली प्रत. वृत्तमौक्तिक के नवम विरुदावली प्रकरण मे चण्डवृत्तो के प्रत्युदाहरण देते हुए ग्रथकार ने श्री रूपगोस्वामी कृत गोविन्दविरुदावली का मुक्त हृदय से प्रयोग किया है । गोविन्दविरुदावली के एक या दो ही उदाहरण ग्रहण नहीं किये हैं अपितु समग्न विरुदावली ही उद्धत कर दी है, केवल गोविन्दविरुदावली का मगलाचरण और उपसहार मात्र ही अवशिष्ट रहा है।' विरुदावली छन्द-प्रम में दोनो में अन्तर है; जो तालिका से स्पष्ट है- गोविन्दा रायली वृत्तमौक्तिक क्रम-सस्या माम क्रम-सस्या नाम पृष्ठांक २२२ २२५ २२४ १ वद्धित वद्धित २ धीरभद्र वीर (वीरभद्र) ३ समग्र रण (समन) १-मादि-य मङ्गलरूपा स्याद् गोविन्दविरुदावमी। यस्या. पठनमात्रेण श्रीगोविन्दः प्रसीदक्षिा मन्त-पुरपन्नः मुस्पिरमतिर्गतम्लानिगलस्वन । भाताणे मवेद म त विदामिपाठा॥ 4 alति विरुदावल्या मपुरामाने हरिम् । भनया रम्पया तस्मै पूर्णमेप प्रसीदति ।।
भूमिका [ ७६ ४ ३ २० १० ७ ८ 8 १० पडूरुह ११ १२ अच्युत उत्पल तुरङ्ग गुणरति मातङ्गखेलित तिलक पकरुह सितकज पाण्डूत्पल इन्दीवर अरुणाम्भोरुह फुलाम्बुज चम्पक वजुल कुन्द बकुलभामुर वकुलमगल मन्जरीकोरक गुच्छ कुमुम दण्डकत्रिभगी फलिका विदग्धविभगी कलिका २ २१ २२ २३ २४ २५ २६ २७ १४ अच्युत २२१ उत्पल २२८ तुरग २३४ गुणरति २२६ मातङ्गखेलित २२६ तिलक २२० २३५ सिनकज २३८ पाण्डूत्पल २३६ इन्दीवर २४० अरुणाम्भोरह २४२ फुल्लाम्बुज २४३ चम्पक २४५ वजुल २४६ कुन्द २४७ बकुलभासुर २४८ बकुलमगल २४६ मजरीकोरक २५१ गुच्छक २५२ कुसुम २५३ दण्डकत्रिमगो कलिका २५५ संपूर्णा विदग्धनिमंगी- २८ २६ १८ १६ २० ३३ ३४ २२ २३ २४ २५ १ २ कलिका २५६ ३ २७ २८ २६ मिश्रा कलिका साप्तविभक्तिकी कलिका प्रक्षमयी कलिका १ २ मिश्रकलिका २५८ साप्मविभक्तिको कलिका २६१ प्रक्षमयी गलिका २६२ सर्वलघुक-कलिका सर्वलघुकलिका गोविन्दविरदावली के प्रतिरिक्त जिन चण्डवृत्तों के लक्षण वृत्तमौक्तिक में दिये गये हैं उनके उदाहरण एक-एक वरण के ही प्राप्त हैं. पूर्ण उदाहरण या प्रत्युदाहरण प्राप्त नहीं है । इन पण्डवृत्तों को सालिका इस प्रकार है- ८० J वृत्तमौक्तिक १ पुरुषोत्तम, ७ शाक, ११, कल्पद्रुम, १२ कन्दल, १३ अपराजित, १४ नर्तन, १५ तरत्समस्त, १६ वेष्टन, १७ अस्खलित और १६. समग्न । पल्लवित नामक विरुदावली गोविन्दविरुदावली म नही है। चन्द्रशेखरभट्ट ने इसका प्रत्युदाहरण गोविन्दविरुदावली में प्रदत्त फुल्लाम्बुज के उदाहरणस्थ अश का दिया है। वृत्तमौक्तिक में चण्डवृत्त के ३४ भेद, निभगी-कलिका के ३ भेद और विरुदावली के तीन भेद माने हैं जब कि गोविन्दविरुदावली में इनका वर्गीकरण इस प्रकार है- चण्डवृत्त-कलिका के दो भेद हैं-१ नख और २ विशिख । नख के ह भेद है-१. वधित, २ वीरभद्र, ३ समग्र, ४ अच्युत, ५ उत्पल ६ तरङ्ग, ७ गुणरति, ८ मातगखेलित और ६ तिलक । विशिख के ११ भेद हैं-१ पङ्केरुह, २ सितकञ्ज, ३ पाण्डूत्पल, ४ इन्दी- वर, ५ अरुणाम्भोरुह, ६ फुल्लाम्बुज, ७ चम्पक, ८ वज़ुल, ६ कुन्द, १० बकुलभासुर और ११. बकुलमगल । द्विगादिगणवृत्त-कलिका मजरी के तीन भेद हैं-१ मञ्जरी-कोरक, २ गुच्छ और ३ कुसुम। विभगी-कलिका के दो भेद हैं-१ दण्डकप्रिभगी कलिका और २ विदरध-निभगी-कलिका । मिश्रकलिका के ४ भेद हैं-१ मिश्राकलिवा, २ साप्तविभक्तिकी कलिका, ३ अक्षमयी-कलिया और ४ सर्वलघु कलिका । इस प्रकार गोविन्दविरुदावली मे विरुदावली के कुल २६ भेदोका दिग्दर्शन है तो वृत्तमौक्तिक में ४० विरुदावलियो और ३४ कलिकाओ का निरूपण है। वृत्तमौक्तिक में उद्धत प्राप्त ग्रन्थ प्रस्तुत अथ में चन्द्रशेखरभट्ट ने छन्दो के प्रत्युदाहरण देते हुए जिन जिन ग्रन्यकारी पौर जिन जिन प्रन्यो का उल्लेख किया है उनमें से कतिपय अन्य मद्यावधि प्रप्राप्त है। अप्राप्त ग्रन्थों की अक्षरानुन म से तालिका इस प्रकार है- प्रपमाम प्रन्पकार उल्लेख-पृष्ठार उदाहरणमन्जरी लक्ष्मीनाथ भट्ट १०,१३,१६ भादि भूमिका [८१ ४ चन्द्रशेखर भट्ट ७ " लक्ष्मीनाथ भट्ट " खङ्गवर्णन " ४ कृष्णकुतूहल-महाकाव्य रामचन्द्र भट्ट १०५,१०७ आदि दशावतारस्तोत्र १२६ नन्दनन्दनाष्टक लक्ष्मीनाथ भट्ट नारायणाष्टक रामचन्द्र भट्ट १६७ ६ पवनदूतम् पाण्डवचरित-महाकाव्य १२,१२१ प्रादि शिको काव्य शिवस्तुति १० सुन्दरीध्यानाष्टक १४४ इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे स्थल हैं जिनमें केवल ग्रन्यकार के नाम हैं और वयं विषय का संकेत है किन्तु उनके ग्रन्थों का कोई उल्लेख नहीं मिलता। १ राक्षसकवि दक्षिणानिलवर्णन १५३ २ लक्ष्मीनाथभट्ट १६० देवीस्तुति ४३ शम्भु छन्दःशास्त्र १०६,१३६,१६७प्रादि वृत्तरत्नाकर-नारायणी-टीका में (पृ. १४५) पर शम्मु-प्रणीत छन्दश्चूडामणि ग्रन्थ का उल्लेख है। संभवतः यही शम्भु हों ! किन्तु ग्रन्थ प्रप्राप्त है। मालती छन्द का प्रत्युदाहरण देते हुये भारवि रचित निम्न पद्य दिया है- मयि विजहीहि दृढोपगृहनं, त्यज नवसङ्गमभीरु वल्लभम् । अरुणकरोद्गम एप पर्तते, वरतनु सम्प्रवदन्ति कुक्कुटाः ॥ पृ.१०० इसका उल्लेख छन्दोमञ्जरी (प. ५६) में भी है किन्तु भारवि कृत किरा- तार्जुनीय काव्य (मुद्रित) में यह पद्य प्राप्त नहीं है । मतः भारवि कृत किस ग्रन्थ का यह पद्य है, अन्वेपणीय है। प्रस्तुत संस्करण को विशेषतायें अन्यकार ने प्रस्तुत प्रन्प में ६७१ छन्दों के लक्षण एवं उदाहरणो या निरूपण किया है। इन छन्दों के प्रतिरिक्त मैंने अपान्तरों से पाद-टिप्पणियों में ७७ मोर पंचम परिशिष्ट में १३८१ छन्दों के लक्षण दिये हैं। प्रति इम संकलन में २१२६ इन्दों का दिग्दर्शन है जो कि इस संस्करणको प्रमुख विशेषता है।
२] वृत्तमौक्तिक AAAAAN इस सस्करण मे मूल ग्रन्थ के पश्चात् दो टीकायें और ८ परिशिष्ट दिये हैं जिनका सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है (१) वृत्तमौक्तिक-वार्तिक-दुष्करोद्धार-टीका इम टीका और टीकाकार लक्ष्मीनाथ भट्ट का परिचय प्रारभ मे कवि- वश-परिचय मे दिया जा चुका है, प्रत यहाँ पिष्टपेषण अनावश्यक है । (२) वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध-टीका इस दुर्गमबोधटीका के प्रणेता महोपाध्याय मेघविजय १८ वी शताब्दी के बहुमुखी प्रतिभासम्पन्न विशिष्टतम विद्वान है। इनका जन्म सवत्, जन्म स्थान और गार्हस्थ्य जीवन का ऐतिहय परिचय अद्यावधि अप्राप्त है। श्रीवल्लभो. पाध्याय प्रणीत 'विजयदेवमाहात्म्य' पर मेघविजयजी रचित विवरण की स १७०६ को लिखित हस्तलिखित' प्रति प्राप्त होने से यह निश्चित है कि विवरण की रचना १७०६ के पूर्व ही हो चुकी थी। अत यह अनुमान सहज- भाव से लगाया जा सकता है कि इस रचना के समय इनकी अवस्था कम से कम २०-२५ वर्ष की अवश्य होगी। अतः १६८५ और १६६० के मध्य इनका जन्म-समय माना जा सकता है । मेघविजयजो श्वेताम्बर-जैन-परम्परा मे तपागच्छीय अकबर-प्रतिबोधक जगद्गुरु हीरविजयसूरि की शिष्य-परम्परा मे कृपाविजयजी के शिष्य हैं । विजयसिंहसरि के पट्टधर विजयप्रभसूरि ने इनको उपाध्यायपद प्रदान किया मेघविजयजी-गुम्पित साहित्य को देखने पर यह साधिकार कहा जा सकता है कि ये एकदेशीय विद्वान् न होकर सार्वदेशीय विद्वान् थे। काव्य-साहित्य, पादपूर्ति, व्याकरण, छन्द, भनेकार्थ, न्यायशास्त्र, दर्शनशास्त्र, ज्योतिष, सामुद्रिक पौर प्रध्यात्मशास्त्र मादि प्रत्येक विषय के ये प्रगाढ पण्डित ये भौर इन्होने प्रत्येक विषय पर साधिकार वर्चस्वपूर्ण लेसिनी चलाई है। इनका साहित्य-सर्जना पाल वि स १७०६ से १७६० तक का तो निश्चित ही है। वर्तमान समय में प्राप्त इनरी रचित साहित्य-सामग्रो की सूची निम्न है-- - १-विजयदेवमाहात्म्य प्रान्तपुष्पिका २-युनिवप्रकोप प्रशस्ति -देवामाद महासाम्प प्रशस्ति भूमिका [. प्रकाशित " अप्रकाशित १ सप्तसन्धान-महाकाव्य र. सं. १७६० २ दिग्विजय-महाकाव्य ३ शान्तिनाथचरित्र (नैषधीय-पादपूर्ति) ४ देवानन्द-महाकव्य (माघ-पादपूर्ति) ५ किरातसमस्यापूर्ति' ६ मेघदूत-समस्यालेख (मेघदूत-पादपूर्ति) ७ लघुत्रिपष्टिशलाकापुरुपचरित्र भविष्यदत्तचरिन ९ पञ्चास्यान १० पाणिनिधाश्रयविज्ञप्तिलेख' प्रकाशित ८ अप्रकाशित प्रकाशित अप्रकाशित प्रकाशित अप्रकाशित १२ विज्ञप्तिका १३ गुरुविज्ञप्तिलेखरूप-चित्रकोशकाव्य १४ विज्ञप्तिपत्र १५ अपूर्ण . " . प्रकाशित प्रपूर्ण चन्द्रप्रभा-य्याकरण (हैमकोमुदी) र० सं० १७५७। १६ हैमराम्दचन्द्रिका २० हैमराब्दप्रक्रिया" " प्रप्रकाशित १-विषामुनीन्दूना प्रमाणात् परिवासरे। [सप्तसम्धान प्रशस्ति . २-देणे, दिग्विजय महाकाव्य-प्रस्तावना ३-४ भागारकर मोरियन्टल रिसर्च स्ट्रीटए यूट पूना २९६A. १८८२.८३ -विज्ञप्तिसेखसंग्रह प्रथम भाग (सिपी जैन प्रापमाना, बबई) ६-प्रमपन-पासय, गोरानेर ७-राजस्थान प्राविधा प्रतिष्ठान, जोधपुर, सं. २०४१५ शासार्यालय बोगनेर, मोतीपद पापी-सह " ११-बिरसते ते पुरवः पंसारी दुवासरे। [VEHI १२-मापारकर मोरियन्टम रिए इम्पटीरप पूर, पूना ४ पोnिe . २१ पितामगिरीशा' (PEAREL माप. समपिमानापरीक्षण) sann २२ मुगियोप प्रमाण २३ मंगच्या पनि २४ मेपमहोदयपत्रोष grilor २५ हरममम मोप-रीरागतिक २१ रममनात उमंग, पोप-प्रयोग २७ उदयनीपिपा, १० १० १७५२ ममानि २८ प्रागुरी २६ पौगायत्रविधि ३. मातपामगार र. गं. १७४७. पात ३१ प्रायोप २२ महंगीता प्रशति ३३ विजयदेवमायविवरण २४ पृतमोतिर 'दुर्गमयोप' टोपा (प्रस्तुत) ३५ पम्मतीपस्तिति गटीक' मप्रगति १६ मामरस्लोज-रोका' ३७ पवितविजिनस्वप' ३८ प्रादिनापरतो. पपूर्ण गुगर-भाषा में रपित कृतिय ३६ बिजय पूरिनिर्वाणरास मप्रसारित ४० पाविजपनिर्याणरास' ४१ जनधर्मदीपरस्याध्याय'. ४२ जनशासनदीपपस्वाध्याय' पचाय . " " . " १-दमका में सम्पादन कर रहा हूँ पो राजस्थान प्राप्यरिता प्रतिष्टान, बोपपुर रो प्रकाशित होगा। २-सवरसरेऽश्ववाभ्यंश्वभूमिते पौष उग्रवसे । श्रोपर्मनगरे अपः पूर्णप्रियमश्रियत् । [मागाप्रसाद प्रशस्ति ३,४,५-देखें दिग्विषयमहापाम्य - प्रस्तावना ५-महोपाध्याय विनयसागर-सहा कोटा ७-राजस्थान प्रापचविद्या प्रतिष्ठान, पोषपुर, सं. २०४१५ -११-देखें, दिग्विजय महाकाव्य - प्रस्तावना . भूमिका [८५ ४३ पाहारगवेषणा-स्वाध्याय' अप्रकाशित ४४ चौवीस जिनस्तवन' ४५ पार्श्वनाथस्तवन ४६ मक्षोपाश्र्वनाथस्तवन वृत्तमौक्तिक को दुर्गमबोध नामक टीका की रचना मेघविजयजी ने अपने शिष्य भानुविजय के पठनार्थ सं० १६५५ में की है। भट्ट लक्ष्मीनाथीय 'दुष्करोद्धार' टीका के समान ही यह टीका भी वृत्तमौक्तिक के प्रथम खण्ड, प्रथम गाथा-प्रकरण के पद्य ५१ से ८६ तक अर्थात् ३६ पद्यों पर रची गई है । पूर्व टीका की तरह यह भी प्रकरणों में विभक्त है। इसमें वर्णोद्दिष्ट और वर्णनष्ट एक-साथ दे दिये हैं और वृत्तस्थ गुरु-लघु-ज्ञान का स्वतन्त्र प्रकरण नहीं है। प्रस्तार जैसे गहन विषय को मेघविजयजी ने अपनी लेखिनी द्वारा सरलतम बना दिया है । प्राकृत- पिंगल, वाणीभूपण और छन्दोरत्नावली आदि ग्रन्थों के उद्धरण और अनेकों चित्र देकर प्रत्येक प्रकरण के वयं विषय का विशदता के साथ स्पष्टीकरण किया है। भाषा मे प्रवाह और सरलता है । कहीं-कही देश्य शब्दों का प्रयोग मी मिलता है। यह टीका अद्यावधि प्रज्ञात और अप्राप्त थी। इसकी स्वयं टीकाकार द्वारा लिखित एक मात्र प्रति मेरे निजी संग्रह मे है । परिशिष्टों का परिचय प्रथम परिशिष्ट- इस परिशिष्ट में वृत्तमौक्तिककार द्वारा स्वीकृत पारिभाषिक शब्दावली दो गई है । टगणादि गण, इनका प्रस्तारभेद, नाम तथा उनके पर्याय यहाँ क्रमशः दिये हैं और अन्त मे इस पद्धति से मगणादि ८ गणों के पर्याय दिये हैं। पाद-टिप्पणियों में स्वयम्भूछन्द, वृत्तजातिसमुच्चय, कविदर्पण, हेमचन्द्रीय- छन्दोनुशासन, प्राकृतपिंगल, वाणीभूषण और वाग्वल्लभ के साथ इस पद्धति की तुलना की है अर्थात् इन ग्रन्यकारों ने इस प्रणाली को किस रूप में स्वीकार किया है, कौन-कौन शाब्द स्वीकृत क्येि हैं, कौन-कौन से दाद इन ग्रन्यों में नही हैं और कौन-कौन से नये पारिभाषिक शब्दों को स्वीकृत किया है। इन सब का दिग्दर्शन है। १.३-देखें, दिग्पिवय-महाकाव्य - प्रस्तावना. r-महोपाध्याय दिनयसागर-संग्रह, कोटा.
पृतमौक्तिक - द्वितीय परिशिष्ट--- (क) मात्रिक छन्दो का प्रकारानुक्रम-इसमें मात्रिक छन्द ७६ और गापा, स्कन्धक, दोहा, रोला, रसिका, काव्य और घट्पद प्रादि के २१८ भेदो के नामो को प्रकारानुक्रम से दिया है। (ख) वणिक छन्दो का प्रकारानुक्रम-~-इसमें वणिक सम-छन्द, प्रकीर्णक, दण्डक, अर्द्धसम, विषम और वैतालीय-छन्दो का एव टिप्पणियो में उद्धृत छन्दो का प्रकारानुक्रम दिया है । छन्दो के पागे ( ) कोष्ठक में प्रकीर्णक का प्र, दण्डक का द, अर्द्धसम का अ, विपम का वि, वैतालीय का वै और टिप्पणी का टि दिया है । सकेत-कोष्ठक में ग्रन्थकार ने जो छन्दो के नाम-भेद दिये हैं वे भी प्रकारानुक्रम में सम्मिलित हैं, वे नाम-भेद भी ( ) कोष्ठक में दिये (ग) विरुदावली-छन्दो का प्रकारानुक्रम - इसमें कलिका-विरुदावली, चण्डवृत्त-विरुदावली आदि समस्त विरुदावली-छन्दो का प्रकारानुक्रम दिया है । तृतीय परिशिष्ट- (क) पद्यानुक्रम- इसमे प्रतिपाद्य विषय के पद्यो और छन्द के लक्षण-पद्यो को अकारानुक्रम से दिया है । वैतालीय-प्रकरण की लक्षण-कारिकायें भी इसी मे प्रकारानुक्रम से सम्मिलित कर दो गई हैं। (ख) उदाहरण-पद्यानुक्रम-इसमे ग्रन्थकार द्वारा स्वरचित-उदाहरण, पूर्ववर्ती कवियों के प्रत्युदाहरण, गद्याश के उदाहरण और टिप्पणियो मे उद्धृत उदाहरण प्रकारानुक्रम से दिये हैं । गद्याश के लिये कोष्ठक ( ) मे ग, और टिप्पणी के लिये टि का मकेत दिया है । यति-प्रकरण में उद्धृत और विरुदावली में प्रयुक्त एक-एक चरण के पद्यो को भी प्रकारानुक्रम मे सम्मिलित किया गया है। चतुर्थ परिशिष्ट- क (१) मात्रिक छन्दो के लक्षण एवं नाम-भेद-प्रारभ मे सन्दर्भ-ग्रन्थ- सूची और सकेत देकर वृत्तमौक्तिक के अनुसार छन्द-नाम और उसके टगणादि में लक्षण एवं प्रतिचरण को मात्रायें दी हैं । पश्चात् सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची के २२ ग्रन्थों के साथ छन्द नाम मोर लक्षणो की तुलना की गई है । जिन-जिन ग्रन्थो मे वृत्तमौक्तिक-लक्षण-सम्मत छन्द का वही नाम है तो उन ग्रन्थो के अक दे दिये हैं और लक्षण यही होते हुये भी नाम यदि पृथक् है तो वह नाम-भेद देकर भूमिका [८७ उन-उन ग्रन्थो के अक लगा दिये हैं । ग्रन्थ-विस्तार-भय से यहा पर ग्रन्थो के नाम न देकर उनके अक दिये हैं। क (२) गाथादि छन्द-भेदो के लक्षण एव नामभेद-इसमे गाथा, स्कन्धक, दोहा, रोला, रसिका, काव्य और पटपद नामक छन्दो के प्रस्तार सख्या-क्रम से लक्षण, छन्द-नाम और नामभेद दिये हैं । इन छन्दो के प्रस्तारभेद कुछ ही ग्रन्यो मे प्राप्त है, समग्र ग्रन्थो में नहीं हैं, इसलिये अको का प्रयोग न करके ग्रन्थनाम- शीर्षक से ही दिये हैं। ख वणिक-छन्दो के लक्षण एव नामभेद-इसम वणिक-सम, प्रकीर्णक, दण्डक, अर्द्धसम, विषम और वैतालीय-छन्दो के वृत्तमौक्तिक के अनुसार छन्द- नाम और लक्षण दिये हैं। लक्षण मगणादिगणो के सक्षिप्त रूप 'म य र स त. ज भ न ल ग' रूप मे दिये हैं । पश्चात् सन्दर्भ-ग्रन्थो के अक, नामभेद और भक दिये हैं। यह प्रणालिका 'क १ मात्रिक-छन्दो के लक्षण एव नामभेद' के अनुसार ही है। केवल २६५ वर्णिक सम-छन्दो में से ६१ छन्द ही ऐसे हैं जिनके कि नाम- भेद प्राप्त नहीं है । एक ही छन्द के एक से लेकर आठ तक नामभेद प्राप्त होते हैं । नामभेदो की तुलना से यह स्पष्ट है कि इसका प्रयोग कितना व्यापक था। ऐसा प्रतीत होता है कि नाम निर्वाचन के लिये छन्द शास्त्रियो के सम्मुख कोई निश्चित परिपाटी नही थी, वे स्वेच्छा से छन्दो का नाम-निर्वाचन कर सकते थे, अन्यथा इतने नामभेद प्राप्त नही होते । ग छन्दो के लक्षण एव प्रस्तार-सख्या--इसमें वृत्तमौक्तिक में प्रयुक्त एका- क्षर से पड्विंशाक्षर तक के सम-वर्णिक छन्दो के क्रमश नाम देकर 's, 1' गुरु- लघुरूप में लक्षण दिये हैं पश्चात् उसकी प्रस्तारसख्या दिखाई है कि यह भेद प्रस्तारसख्या की दृष्टि से कौन सा है । मैंने यथासाध्य समन छन्दो को प्रस्तार- सख्या देने का प्रयत्न किया है, फिर भी कतिपय छन्द ऐसे है जिनकी प्रस्तार- सख्या प्राप्त नहीं हुई है । तज्ज्ञो से निवेदन है कि इसकी पूर्ति करने का वे प्रयत्न । करें। प्रकीर्णक, दण्डक, अघसम और विषम छन्दो के नाम और लक्षण 'ड' प्रणालिका से ही दिये हैं। पञ्चम परिशिष्ट- इस परिशिष्ट में जिन छन्दो का वृत्तमौक्तिक में उल्लेख नही है और जो सन्दर्भ-ग्रन्य-सूची के २१ प्रन्यो में प्रयुक्त हैं उन छन्दो को भी छन्द शास्त्रविषयक 4.] वृत्तमौक्तिक जिज्ञासुओं के लिये प्रस्तार-संख्या के क्रम से दिये हैं। प्रारंभ में प्रस्तार- सख्या, छन्द-नाम, लक्षण और सन्दर्भग्रन्थ के अंक, नामभेद तथा अंक दिये हैं। यह पद्धति 'क. (१) मात्रिक छन्दो के लक्षण एवं नामभेद' के अनुसार ही है । इसमें अक्षरानुक्रम से इतने विशिष्ट छन्द प्राप्त हैं :- :- ४ अक्षर छन्द अक्षर १२ २७ ३६ छन्द २७ 2 " " ६ " ७ " " " " " . ०.4 " " " ७७ " " १२० १६ २५ ८६ २० ६ ५७ २१ १८ २२ २० M १०३ २३ १८ १२ ११२ २४ १३ ६० २५ २० २६ २७ १५ ३८ इस प्रकार वणिक-सम के ११३६, प्रकीर्णक वृत्त २४, दण्डक-वृत्त ६६ तथा अर्धसमवृत्त १५२ अर्थात् कुल १३८१ अवशिष्ट प्राप्त-छन्दों का इसमे संकलन है। विषमवृत्त के भी सैकडो छन्द और वैतालीय के प्रस्तार-भेद से अनेकों भेद प्राप्त होते हैं .जिनका संकलन इस सग्रह मे समयाभाव से नहीं किया जा सका। पष्ठ परिशिष्ट- वृत्तमौक्तिक में गाथा, स्कन्धक, दोहा, रोला, रसिका, काव्य और पट्पद के प्रस्तार-भेद से भेदो के नाम एवं सक्षेप मे लक्षण प्राप्त हैं किन्तु इनके उदाहरण प्राप्त नहीं हैं। ग्रन्थान्तरो में भी इनके उदाहरण प्राप्त नहीं हैं। केवल कविदर्पण में गाथा-भेदों के उदाहरण और वाग्वल्लभ मे गाथा और दोहा-भेदों के लक्षणयुक्त उदाहरण प्राप्त होते है। अत: गाथा और दोहा-भेदों के स्वरूप का दिग्दर्शन कराने के लिये इस परिशिष्ट में पाग्यल्लम से गाथा मोर दोहा-भेदों के लक्षण-युक्त उदाहरण उद्धृत किये हैं। । am +- भूमिका [८६ AA ग्रन्थ सप्तम परिशिष्ट- इस परिशिष्ट मे ग्रन्थकार चन्द्रशेखर भट्ट ने वृत्तमौक्तिक में छन्दों के प्रत्युदाहरण देते हुए जिन ग्रन्थकारो और ग्रन्थो के उद्धरण दिये हैं उनकी अकारानुक्रम से सूची दी है। कतिपय स्थलो पर 'अन्ये च' 'यथा वा' कह कर जो उद्धरण दिये हैं, उनका भो मैंने इस सूची मे उल्लेख कर दिया है। अष्टम परिशिष्ट- इस परिशिष्ट मे मैंने अनेक सूचीपत्रो के प्राधार से 'छन्द शास्त्र और उनकी टीकायें' शीर्षक से ग्रन्थो को प्रकारानुक्रम से विस्तृत सूची दी है। इसमे ग्रन्थ का नाम, उसकी टीका, ग्रन्थकार एव टीकावार का नाम तथा यह ग्रन्थ कहा प्राप्त है या किस सूची में इसका उल्लेख है, सकेत किया है। शोध करने पर और भी अनेको ग्रन्थ प्राप्त हो सकते हैं । मैं समझता हूँ कि छन्द शास्नियों और शोधकर्ताप्रो के लिये यह सूची प्रवश्य ही उपादेय एव मार्ग दर्शक सिद्ध होगी। प्रति-परिचय मूल ग्रन्थ का सम्पादन पाच प्रतियो के आधार से किया गया है जिसम तीन प्रतिया प्रथम खण्ड की हैं और दो प्रतिया द्वितीय खण्ड की हैं । इन पाचो प्रतियो का परिचय इस प्रकार है- वृत्तमौक्तिक, प्रथम खण्ड क सज्ञक, प्रादर्श प्रति अनूप सस्कृत लायबरो, बीकानेर सरया ५५२७ माप-२६५ cm x११३८,m पत्र संख्या ४१, अक्षर ३६ लखन-काल १८वी शती का पूर्वाद्ध शुद्धलेखन, शुद्धतम प्रति ख सज्ञक प्रति अनूप सस्कृत लायब्रेरी, मोकानेर सख्या ५५२८ माप-२५२cmx१०६cm पत्र सख्या २३ । अक्षर ४२ लेखन काल १६६० के लगभग, सभवत लालमनि मिश्र को ही लिखी १ पक्ति ७, २ पक्ति १०, अपूर्ण प्रति। शुद्धलेखन, शुद्धतम प्रति ६.] वृत्तमौक्तिक पक्ति १८ । पक्ति ७ , ३ ग मज्ञक प्रति राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर सख्या ५८३ माप-२५५.cmx१०७m पत्र संख्या १० प्रक्षर ५६ लेखनकाल अनुमानत १८वी शती का प्रथम चरण, लिपि सुन्दर है किन्तु अशुद्ध है। इसमे रचना और लेखन-प्रशस्ति नहीं है। वृत्तमौक्तिक द्वितीय खण्ड क सशक. आदर्श प्रति अनूप सस्कृत लायब्रेरी, बीकानेर सख्या ५५३० माप-२५२ cm x१०६cm पत्र संख्या १६६। प्रक्षर ३६ लेखनकाल १६६० वि० लेखक-लालमनि मिश्र लेखनस्थान-मर्गलपुर (आगरा) शुद्धतम एव सशोधित प्रति है। लेखन प्रशस्ति इस प्रकार है- "सवत् १६६० समये श्रावणवदि ११ रवो शुभदिने लिखित शुभस्थाने अर्गलपुरनगरे लालमनिमिश्रेण । शुभम् । इद ग्रथसख्या ३८५०।" २ ख सज्ञक प्रति अनूप सस्कृत लायब्ररी, बीकानेर संख्या ५५२६ माप २६५०m x ११३ cm पत्रसख्या १६१, लेखनकाल १८वी शती का पूर्वाद्ध शुद्धलेखन, शुद्धप्रति लेखन प्रशस्ति नही है। दोनो टीकापो की अद्यावधि एक-एक ही प्रति प्राप्त होने से उन्ही के आधार से सम्पादन किया है। दोनो टीकापो की प्रतियो का परिचय इस प्रकार है- वृत्तमौक्तिक वात्तिकदुष्करोद्धार टी० लक्ष्मीनाथ भट्ट अनूप सस्कृत लायब्ररी, बीकानेर माप २७५cm x ११५cm पक्ति ७, अक्षर ३६ सख्या ५५३३ [१ पक्ति ७; शुद्ध एव सशोधित एकमात्र प्रति - पत्र संख्या ३०, अक्षर ३७ लेखनकाल १६६० वि० लेखक • लालमनि मिश्र लेखन स्थान • अगलपुर (आगरा) पूर्णप्रति लेखन-प्रशस्ति इस प्रकार है "। सवत् १६६० समये भाद्रपददि३ भौमे शुभदिने अगलपुरस्थाने लिखित लालमनिमिश्रेण । शुभ भूपात् । श्रीविष्णवे नम ॥" वृत्तमौक्तिकदुर्गमयोध टी० महोपाध्याय मेघविजय महोपाध्याय विनयसागर सग्रह, कोटा, प्रन ११ माप २५५cmx१०७ com परसख्या १०, अक्षर ६० लेखनकाल १८वी शती टीकाकार - महोपाध्याय मेघविजय द्वारा स्वय लिखित शुद्ध एव सशोधित एकमात्र प्रति पत्र २-५ तक पोथी २३, पक्ति २१ प्रस्तार चित्र सम्पादन-शैली सम्पादन मे प्रथम खण्ड की तीनो प्रतियो को क, ख, ग और द्वितीय-खण्ड की दोनो प्रतियो को क, ख, सज्ञा प्रदान की है। प्रथमखण्ड की स सज्ञक प्रति और द्वितीयखण्ड की क सज्ञा प्रति एक ही व्यक्ति को लिखी हुई और प्रथमखण्ड की क सज्ञक और द्वितीयखण्ड की ख सजक प्रति समवत इसी प्रति की प्रतिलिपि हो, क्योकि दोनो मे प्रतीव सामीप्य होने से विशेष पाठ-भेद प्राप्त नहीं होते। दोनो खण्डो की क सजक प्रति को मैंने अादर्श माना है और अन्य प्रतियो के पाठभेदो को मैने टिप्पणी में पाठान्तर-रूप में दिये हैं। कतिपय स्थलो पर प्रतिलिपिकार के भ्रम से जो अश या पक्तिया क सज्ञक प्रति मे छूट गई हैं वे ख सज्ञक प्रति से मूल में सम्मिलित कर दी गई हैं और कतिपय शब्द ख प्रति के शुद्ध होने से उसे मूल मे रखकर के प्रति के पाठ को पाठान्तर में दे दिया है। अथवार ने प्रत्युदाहरणों और नामभेदो मे जिन ग्रथो का उल्लेख किया है उन प्रयो के स्पन, सर्गसख्या और पद्य सख्या टिप्पणी में दी गई हैं और जिन प्रत्यु ६२ ] वृत्तमौक्तिर दाहरणो के कही-कही पूर्णपद्य न देकर एक-एक चरण-मात्र दिये हैं उन्हें पूर्णरूप मे टिप्पणी मे दे दिये है। इन्द्रवज्रा उपेन्द्रवज्रा-उपजाति, वशस्थविला-इन्द्रवशा-उपजाति और शालि. नी-बातोर्मी-उपजाति के प्रथकार ने १४-१४ भेद स्वीकार किये हैं किन्तु उनके नाम, लक्षण एव उदाहरण न होने से मैंने टिप्पणी मे इन्द्रवज्रा-उपेन्द्रवजा-उप- जाति और वशस्थविला-इन्द्रवशा-उपजाति के १४-१४ भेदो के नाम, लक्षण एव उदाहरण अन्य ग्रथो के माधार से दिये हैं तथा शालिनी-वातोर्मी उपजाति एव रथोद्धता-स्वागता-उपजाति के टिप्पणी मे लक्षणमात्र दिये हैं क्योकि अन्य ग्रथो मे इनके नाम और उदाहरण पूर्णरूप मे मुझे प्राप्त नहीं हुये। कतिपय स्थलो पर लक्षण स्पष्ट न होने से एव उदाहरण न होने से मैंने टिप्पणी मे लक्षणों को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है, साथ ही अन्य प्रथो से प्राप्त उदाहरण भी दिये हैं । गाथादि छदभेदो के लक्षण और नाम टिप्पणी में देकर इन भेदो को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। प्रतियो मे छन्द के प्रारम्भ में कही 'प्रथ' का प्रयोग है और कही नही है, कही नाम के साथ 'वृत्त' या 'छन्द' का प्रयोग है और कही नही है तथा छन्द के प्रत मे केवल नाम ही प्राप्त है, किन्तु मैंने ग्रथ मे एकरूपता रखने के लिये प्रारभ मे 'प्रथ' और छन्द का नाम और अत मे 'इति' और छन्द नाम का सर्वत्र प्रयोग किया है । इसी प्रकार श्लोक-सख्या में भी एकरूपता की दृष्टि से मैंने प्रत्येक प्रकरण की श्लोक-सख्या पृथक् पृथक् दी है । गोविन्दविरुदावली के पाठान्तर मैने राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर ग्रन्थाक २३४८० अक्षर ४१ की प्रति से दिये हैं। पाठान्तर, टिप्पणिया और परिशिष्टो द्वारा मैंने यथासम्भव इस ग्रन्थ को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास किण है किन्तु मैं इसमें कहाँ तक सफल हुअा हूँ इसका निणय तो एतद्विषय के विद्वान् ही कर सकेंगे। प्राभार प्रदर्शन- राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर के सम्मान्य सञ्चालक, मनीषो पद्मश्री मुनि श्री जिनविजयजी पुरातत्त्वाचार्य ने इस ग्रन्थ के सम्पादन का कार्य प्रदान कर मुझे जो साहित्य-साधना का अवसर दिया तथा प्रतिष्ठान के उप- सचालक, सम्माननीय श्री गोपालनारायणजी बहुरा, एम ए ने जिस आत्मीयता पत्र पक्ति १६.
भूमिका [६३ के साथ समय-समय पर परामर्श एवं सहयोग देकर कृतार्थ किया, उसके लिये मैं इन दोनो का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। श्री अगरचन्दजी नाहटा के सत्प्रयत्न से अनूप सस्कृत लायब्रेरी, बीकानेर के सरक्षक बीकानेर के महाराजा एव व्यवस्थापको ने वृत्तमौक्तिक को प्रतिया सम्पादनार्थ प्रदान की; अत मैं इन सब का आभारी हूँ। पो० श्री कण्ठमणिशास्त्री कांकरोली, श्री गगाधरजी द्विवेदी जयपुर, श्री भवरलालजी नाहटा कलकत्ता, डॉ० श्री नारायणसिंहजी भाटी एम ए, पी एच डी , सचालक राजस्थानी शोध सस्थान जोधपुर, श्रीबद्रीप्रसाद पचोली एम एव इण्डिया ऑफिस लायब्रेरी, लन्दन, के व्यवस्थापक आदि ने परामर्श देकर एव अन्थो की आद्यन्त-प्रशस्तिया भेज कर जो सहयोग प्रदान किया है उसके लिये मै इन सब का उपकृत हूँ। मेरे परममित्र श्री लक्ष्मीनारायणजी गोस्वामी का अभिनन्दन में किन शब्दो में वरू । इस ग्रन्थ को शुद्ध एव श्रेष्ठ बनाने का सारा श्रेय ही इन्ही को है। साधना प्रेस जोधपुर के सचालक श्री हरिप्रसादजी पारीक भी धन्यवाद के पात्र है जिन्होंने इसके मुद्रण मे पूर्ण सहयोग दिया है । अन्त मे, मैं अपने पूज्य गुरुदेव श्रीजिनमणिसागरसूरिजी महाराज का अत्यन्त हो ऋणी हूँ कि जिनकी कृपा और पाशीर्वाद से प्राज मैं इस ग्रन्थ का सम्पादन करने योग्य बन सका। श्रीमती सन्तोषकुमारी जैन (मेरी धर्मपत्नी) के सहयोग और प्रेरणा से मैं इस कार्य में सलग्न रहा इसके लिये उसको भी साधुवाद । -म विनयसागर पानमनिवास, जोधपुर २४.५-६५ परिभाषिक-शब्द शब्द गण. गण, पला-मात्रा पृष्ठ- सख्या पद्य- सख्या पृष्ठ- पद्य कला-माना सख्या सख्या ISS ३४ 150 SIS ४ गजपति गजाभरण गण्ड ३ २३ ३२ 1515 ३ S11 ४ अधिप अमृत अहि महिगण प्रानन्द इन्द्रासन ऐरावत s। ३ . SI २० २४ २० S15 ४ गन्ध गरुड पर्याय गुरुयुगल गोपाल ३ ३ २० Iss Iss ४ s ISI ।।5।। ।।। S ८४ १७६ ३ ३ चाप २० ३ ४ ॥ S ३ २६ ३५८ कमल SIS1 ३ १२५ चामर चित्त चिर चिरालय ३ IS ३ २६ २६ कर ।.5 ३ 15 ३ २३ २३ २३ परतल ३ चिह्न ३ . ३ २४ 15 ३ SS ३ 15. ४ 35 ३ चूतमाला जगण जतायुगल जोहल टपण SIL ३२ ३५ ss २८ करताल कर्ण पर्णपर्याय कर्णसमान पसि पाहल बुध-पर्याय पुस्मर-पर्याय ४ ३ ३ SIS पामात्रा 5.1 २ ४ ठगण - 151 ४ उगण २ ૨ I$$ ४ ३४ पञ्चमाया चतुर्मात्रा त्रिमात्रा दिमात्रा 331 दगण S ३ गण २ ४ पुन्तोमुत 55 तगण ३६ ६५ ३ 1511 S ६. २०४ साध्य ३ .. २५ तात तारापति Y ग चतुर्मात्रा ४ १६ तास S1 ३ २४ पारिभापिरनाम [ ६५ बाद गए मा-माना सख्या सध्या पृष्ठ- १७. शब्द गण, पृष्ठ पसा माना सख्या सख्या सुम्बुद ५२६ ४ पतुर्मात्रा ४ प्रहरणनामानि पञ्चमात्रा फणि । 111 ३ 1 घाण Y तूर्य-पर्याय तोमर २४ २३ I5 ३ बाण १८ - . ४ बलभद्र SIL ३२ २६ ४ ४ ३२ ३३ ३३ ४ ४० बाह भगण भामिनी-पर्याय भाष ४ ३ S1111 ३ ।।151 ३ १६ SIS २५ ३५ २६ २६ 11।। ३ ३ 15 ३ २३ ३ ४ Yo 151 ISI ४ sss ३६ भुजद भुगाभरण भूपति मपण मनोहर मानस मुग्धामरण मुनिगण II ४ ३ २५ S बहन दिगवाति द्विजवर धर्म पात भूष प्वज नगण नरेन्द्र पर्याय नायर नारी निर्याण नूपुर पक्षी पक्षिराज पञ्चरार पटह पत्र पदपर्याय पदाति पयोपर परम ३ ३ ३ ३ S ३ २६ S ४४ SIS मागेन्द्र S.5 SIS मेघ ISS ४ ३५ ३४ ३७ Y । ४ 51 ३ यक्ष SIS ४ IS ३ २४ २३ ३२ यगण रमण SIS .. धतुर्मात्रा 151 IS. .. ३ रति २१ २७ २३ ३२ २६ ३ रत्न 15 ३ पयन ४ ३ ४ चतुर्मात्रा रथ रदन 155 ३४ रस IS ३ २३ ३ पचन पाणि पापगण पितामह पुष्प २० ३२ 511 ४ रसना S ३ - 35 २८ रसलग्न रसिक ३ ३ ३ २६ SS वृत्तमौक्तिक गण, पृष्ठ- पद्य- कला-माथा सख्या सख्या गरण, पद्य- कला मात्रा सख्या सख्या ४ 1 IS. ३ २० लहलहित 55 ३ 11115 ३ वक्र S ३ 15 ४ 15 15 51 २६ २६ २३ ३ ३ ३ ३ २४ २५ वलय घलय S शिखर शेखर शेष संगण सागर सात्विकभाव सुनरेन्द्र सुप्रिय सुमतिलम्बित सुरतलता सरपति सूर्य सूर्य ३ ३ ISS s।। २२ २७ IS ३ 155 ३ ३ २२ SS ३ घसुचरण घास विप्र विराट विहा घीणा २८ २८ २४ SIS SI ३ SIS 15s. ३ १६ SIS ४ SIS SI15 ३ १६ SSS ३ ३ ३ २० १६ २६ ४ 115 शत शब्द - ४ ३८ I15 ३ S हस्तायुध-पर्याय हार हारावलि होर 155 ३ S ३ शशि पालि ३ १६ 551 ३ २.
राजस्थान पुरातन प्रन्यमाला वृत्तमौक्तिः JU Marश्रीगणेशायनम ॥श्रीपुरुभ्योनायुमायाचिरतनकिपितत्सत्यति दिखत्मघायचराचरात्मकमिदवाकतसायपरमायमाहिचसतिभातिवा यूतायस्मिन्पुतलीयतेयहिकीतवातरजमनसामानन्कदमहः। सचिब मददीकरवलितऽधषियममीतमाशास्त्रन्यापूचरितनासिता तयाथाराध्य श्रीपिरचरणसेवासुमतिनातदीयाभिर्वन्तिविरचितपयगम्यता हमश्रीलक्ष्मीनापनस्यचितुर्नवापोजमाधीचं तोरसर कविमनुतहत्ती लिका श्रीमसिगलनागोकछन्दशास्वमहेन्दधिमपिरप्रसादादावना राम यदेनिम सालसा पाशतकेरिपतिसदियावततत्ततामयभन्दा 10 - भानामरि ची भकिसविरमाधवलत्तपतपंचम्यान्दोवस्यकथा इत्यालकारिक faaकचूडामणिछद वासिकललोपनिषदहस्यार्णवकर्णधारमीन ग कामानापमहात्मजकदिशेयरधीचन्द्रशवराहविरचिोधीरर्तमतिकापा ४॥ लिवार्तिकमावारप पयामापरिछेद ॥बारस्तु। एभमकाय , सद 7 . ४॥ धनूप सरहत सामनेरी, बीकानेर से प्राप्त प्रपमरसड, व समर प्रति रे प्रायन्त पत्रों को प्रतिकृति
स्थान पुरातन प्रायमाला
वृत्तमौक्तिक
।-श्रीमना श्रीशलायनम विदिशामाजलगावकलालातकमला पलवाह!
'दाहिया विषयान्यारवयता जासष्टायाहिरसूदने नाममाइदश्रुगारीश पयतमन ।।
मनिकरम नाशिवाय मान सुकाको डला. फापानमाणिताना अथवादशी
कृती वाछिन्दासि कयतिस्फुरत याग सानी यया श्रामीमयान श्रीथर लाल
यथाशन कुरुर पिकान अथाको तान गावकामनागप्रोक्त यथावदेकन
केलीशलम काम अथाह लगानमहददायरमापतानमातामही " ARRITA
कालोपासारामनायबाकिस्त कालानरममधुलिकतिसमरिपियामतिमद
विपला
नीष योनिधितोपामापतिपिगतरमाधीमलानाथसकलागर्मपारगया गया
तिदिवसतनविनयापपत्ते रकवाकिलतत्ववध विछरमाया।
विसवसारी
जीवनइतवस्यावावीरक्रिकमिदन
मानायनहरितयनाजायामाचाजीचातुजीवलोक्स्यायो
१ तारिकचकन्डामाकदवास्वपराचार्यसकलापनिपठम्यासंद।
नाकर्णधारमाननीनार महाराजनविशेषत्रीचन्द्रनारवरभविस्यो
श्रीवतमाझिलपिड्नवार्तिकदीरनारयोहिताय परिखद समानमा राम
। यति हतीयार ॥ गपसरला ५०वरच्या शुभमस्त।
२
मनूप सस्त सायरी, बीकानेर से प्राप्त द्वितीय सण्ड सज्ञक प्रति के प्रपम पम मोर
स सनक प्रतिवेतिम पत्र की प्रतिति
राजस्थान पुरातन ग्रन्यमाला वृत्तमौषि 'श्रीगणेशायनमः प्रविधिमीवरात्रीचशावरनेवार्तिके तिनःसामानोराशदिशादिशामाग्रील मानाय भेटेन एका क्रियता शाप्रधान कानसिक परीक्षाझौतुकानमावाशामुदिष्टमुमोत्रित्रयोदशविभेदभिन्न उपद्रलप्रस्ताछिरानिमत्रपमिति लिविवारछपमष्टिमा यमप्रत्ययस्वजत्रको रमाहातदिन किनादयादितिदद्यार्वगोकानलारुपरिगस्पदभयत अपायक) राम शीस्थिवान्नितपस्या कोशाउग्लिश्वतधोकमीत्रादिष्टवितानाबाना तस्मिनालिपि तिपद मुगाहानदया। तत्रालंघारूपंपचारास्वमयत उपर्यवत्पर्धापया! । - रएकमात्रादिनिवासमा तारजातिमानामर्करीप्रतारोहानीकार 1.श्राम 1 समाप्रश्वासनमाक्तिकवानिकेडकरावासा भमतता गरातायनमः। संवाद साधारपददिभोगसमरिनीलपुरम्यानात सिमलालमनिप्रिय भेभ्याता ॥ श्रीविलनमः।। EAD नमाक्षिक ३- Duram अनूप संस्कृत लायब्ररी, बीकानेर से प्राप्त वृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्करोदार टीका के मायन्द पत्रों की प्रतिति वृत्तमौक्तिक VW NAAMमत emeगामायरिगम याशीमा Prafuser 13 मलाaatmRMATीकामना किराया NIMAVATMANOKarnatasavamharaPARIAAdar" जस्थान पुरातन प्राथमाला Heakiladarnea anirnars के पिपरिया EARNIRTHEATERaharlifteviarty MINISRHANNEMATTARAITAARAMETRIVATNTRENarayney सकिएकरपश्चन पHिAVARENERamanyaSHASTMA AAWANI Ana विलasteRANTERamxnRanasts BAERIKANERACatalava aaye MyIE TRAATREENA RAM RANAS शामपि RARमाAANUAsrderacesitar and SBreawaneanamstar.JASTRI नायक ARONARLIAM RETERMITTETarasRANSLAMUw नाsahaacharyanrasta AARYAsasstiheet जन्ममा JaanMar 4mARTAMAVRAOvs404145सावकका ANTRIKAryanarthak ( समषिकार RAENIMAR ARRANIPRITTENMALARISTMamaARATHषकल Halan AsianRaJVAAAEनिमा रमाका - HTaranamastaramounteer MARRAMMAntarfamannagar 944 मा BREAM मारनदीमामाचYVER fANRARYnaniy Mariesharam TarwariRANARTAVACHONE amaritmleelaman Ranारक नामाचा minshanNTISTAN PREMErthivraDHAMARHATHIERASHARAMबिलाव tomatiPAHIMAHARANARASHTRA F । न महोपाध्याय पिनयसागर सग्रह, कोटा से प्राप्त वृत्तमौक्तिकदुर्गमबोष टीका रे भायन्त पत्रों की प्रतिप्रति कविशेखर-भट्टश्रीचन्द्रशेखरप्रणीतं वृत्तमौक्तिकम् प्रथमः खण्डः प्रथमं गाथाप्रकरणम् गम्यत [ मङ्गलाचरणम् युप्मान् पातु चिरन्तन किमपि तत्सत्य चिदेवात्मक, प्रोत यत्र चराचरात्मकमिद वाक्चेतसोर्यत्परम् । यस्माद् विश्वमुदेति भाति च यतो यस्मिन्पुनीयते, यद्वित्त श्रुतिशान्तदान्तमनसामानन्दकन्द मह ॥ १॥ अमुग्मिन् मे दर्वी करकलितदुर्बोधविपमे, मति छन्द शास्त्रे यदपि चरित नास्ति विपुला । तथाप्याराध्यश्रीपितृचरणसेवा' सुमतिना, तदीयाभिर्वाग्मिविरचितपथे इह ॥२॥ श्रीलक्ष्मीनाथ भट्टस्य पितुर्नत्वा पदाम्बुजम् । श्रीचन्द्रशेखरकविस्तनुते वृत्तमौक्तिकम् ॥ ३॥ श्रीमत्पिङ्गलनागोवतच्छन्द शास्त्रमहोदधि पितृप्रसादादभवन् मम गोप्पदसनिम ॥४॥ अलसा प्राकृते केचिद् भवन्ति सुधिय क्वचित् । तत्सन्तोपाय भवतु वात्तिक वृत्तमौक्तिकम् ॥ ५ ॥ यो नानाविधमायाप्रस्तारात् सागर प्राप्य। गरुडमवञ्चयदतुल स हि नाग पिङ्गलो जयति ।। ६ ।। गुरुलघुस्थिति दीर्घ सयुक्तपर पादान्तो वा विसर्गविन्दुयुत । स गुरवंनो द्विकलो लपुरन्य शुद्ध एककल ॥७॥ १ ग सेवा २. सनिघो।
वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [१०८-१६ यथा- गौरीवर भस्मविभूषिताङ्ग, इन्दुप्रभाभासितभालदेशम् । गङ्गातरङ्गावलिभासमानमूर्धानमानन्दितमानमामि रेफहकारव्यञ्जनसयोगात् पूर्वसस्थितस्य भवेत् । वैकल्पिक लघुत्व वर्णस्योदाहरन्ति विद्वास ॥६॥ यथा- जयति प्रदीपितकामो मम मानसह्रदनिमज्जनान्नित्यम् । यस्य गलगरलदम्भान् मालिन्यमन्तरस्थित' लग्नम् ॥ १० ॥ विकल्पस्थिति यद्यपि दीर्घ वर्ण जिह्वा लघु पठति भवति सोऽपि लघु । वर्णास्त्वरित पठितान् द्वित्रानेक विजानीत' ॥ ११ ॥ पथा- अरे रे* । कथय वार्ता दूति तस्यातिचित्रा मम सविधमुपैष्यत्येप कृष्ण कदा नु । इति चट्ठ कथयन्त्या राधिकाया तदानी मति-डगमगदेह केशवोप्याऽऽविरासीत् ।। १२ ॥ काव्यलक्षणेऽनिष्टफलवेदनम् कनकतुला यद्वन्नहि सहते परमाणुवैषम्यम् । श्रवणतुला नहि तद्वच्छन्दोभङ्गेन चैपम्यम् ॥ १३ ॥ लक्षणविकल काव्य पण्डितससत्सु यो वुध पठति । हस्तानलग्नखङ्ग कृत्त शीर्प न जानाति ॥ १४ ॥ मात्राणां गणव्यवस्थाप्रस्तारश्च रसवाणवेददहन पक्षाभ्या चव सम्मिता मात्रा । येपा ते प्रस्ताराप्ट-3-ड-ढ णेत्येव सज्ञका प्रोक्ता ॥ १५ ॥ ट-त्रयोदशभेदा स्युरप्टो भेदोष्ठकारजा । डस्य भेदा पञ्च टस्य प्रयो ढान्तिमस्य तु ॥ १६ ॥ गुरो प्राद्यस्याधो लघुकमवधेहि प्रथमत- स्तत दोपान् वर्णानुपरितनतुल्यान् घटयत । १स मेन्तरपितं मात पितमिति पाट समाधान (सं.) । २ ॥ विजानीयात। ग प्रम नस्य पं स्मृतम् । ४. ग पूयायो। ५ च विषय। *पत्र 'रे' इति सपुपटनी स्त ।
प०१७ -३० ] १गाथा-प्रकरण [ ३ स्थले शून्ये तद्वद् घटय' गुरुमेवेति नियमी, लघु सर्वो वर्णो भवति पदमध्ये च शिशुकार ॥ १७ ॥ मात्राप्रस्तारै खलु यावद्भिः स्यात् कलापूर्ति । तावन्तो गुरुलघवो देया इत्यनियम प्रोक ॥ १८ ॥ मात्रागणानां नामानि हर-शशि-सूर्या शक शेषोप्यहि-कमल-घात-कलि-चन्द्रा । ध्रुव-धर्म-शालिसज्ञा पण्मात्राणा त्रयोदशव भिदा' ॥ १६ ।। इन्द्रासनमथ सूर्यश्चापो हीरश्च शेखर कुसुमम् । अहिगण-पापगणाविति पञ्चकलस्यैव सज्ञा स्यु ॥ २० ॥ गुरुयुग्म किल कों गुर्वन्त करतलो भवति । गुरुमध्यम पयोधर इति विज्ञ यस्तृतीयोऽपि ॥ २१ ॥ आदिगुरुर्वसुचरणो विप्रो लघुभिश्चतुभिरेव स्यात् । इति हि चतुष्कलभेदा पञ्चय भवन्ति पिङ्गलेनोक्ता ॥ २२ ॥ ध्वज-चिह्न-चिर-चिरालय-तोमर-पत्राणि चूतमाले च । रस-यास-पवन-वलया भेदास्त्रिकलस्य लघुकमालम्ब्य ।। २३ ।। करताल-पटह-ताला सुरपतिरानन्दतूर्यपर्याया । निर्वाण-सागरावपि गुर्वादिनिकलनामानि ॥ २४ ।। सात्विकभावास्ताण्डवनारीणा भामिनीना च । नामानि यानि लोके दिलघुगणस्यैव तानि जानोत ॥ २५ ॥ नूपुर-रसना चामर फणि मुग्धामरण-वनक-कुण्डलपम् । वको मानस-वलयो हारावलिरिति गुरोपच नामानि ॥ २६ ॥ सुप्रिय-परमो कथितो हिलघोरिति नाम सक्षेपात् । अथ कथयामि चतुप्प लनामान्यन्यानि पिङ्गलोक्तानि* ॥ २७ ।। सुरतलता गुरयुगल कणंसमानेन रसिक-रसलानी । लम्बित-सुमति-मनोहर-लहलहिताना च नाम्नापि ॥ २८ ॥ पर-पाणि-यमल-हस्ता प्रहरण भुजदण्ड-बाहु-रत्नानि । यथ' गजभुजयोरप्याभरण स्याच्चतुपले सज्ञा ॥ २६ ॥ पर्णपर्यायिा सब्दा गुरपग्मस्य वाचवा । हस्तायुधस्य पर्याया गुवन्तस्यंव बोधरा ॥ ३०॥ २ शनियन ४ तमामानि। ५. क्यो। • टि.टारमलम् । (परि... गापा २१-१२)। १ .पूष चय।
४ ] वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [१०३१.४३ भूपति-नायक-गजपति-मरेन्द्र-कुचवाचका शब्दा । गोपाल-रज्जु-पवना मध्यगुरोर्बोधका' ज्ञेया ।। ३१ ।। दहन-पितामह-ताता पदपर्यायश्च गण्ड-बलभद्रौ। जवायुगल रतिरित्यादिगुरौ स्युश्चतुष्कले सज्ञा ॥ ३२ ॥ द्विज-जाति-शिखर-विप्रा परमोपायेन पञ्चशर-बाणो । द्विजवर इत्यपि कथिता' लघुकचतुष्कले गणे सज्ञा ॥ ३३ ॥ सुनरेन्द्राधिप-कुञ्जरपर्याया रदन-मेघयोश्चापि । ऐरावत तारापतिरित्यादि लघोश्च पञ्चमात्रस्य ॥ ३४ ॥ वीणा-विराट-मृगेन्द्रामृत-विहगा गरुडपर्याया । जोहल -यक्ष-भुजङ्गा मध्यलघो पञ्चमात्रस्य ॥ ३५ ।। विविधप्रहरणनामा पञ्चकल पिङ्गलेनोक्त । गज-रथ-तुरङ्गम-पदातिसज्ञक स्याच्चतुर्मात्र ॥ ३६॥ ताटङ्क-हार-नूपुर-केयूरकमिति भवन्ति गुरुभेदा । शर-मेरुदण्ड कनक लघुभेदा इति विजानीत ।। ३७ ।। शब्द रूप-रस गन्ध काहल पुष्प शङ्ख-वाणनामभि । सत्प्रवन्ध इह वृत्तमौयितके ज्ञायता लघुकनाम पण्डिता ॥ ३८ ।। वर्णवृत्तानां गणसना मस्त्रिगुरुरादिलघुको यगणो रगणश्च लघुमध्य । अन्तगुरु सस्तगणोऽप्यन्तर्ल घुमध्यगुरुको ज ॥ ३६ ।। आदिगुरुभंगणोऽपि च नगणस्निलघुर्मत सद्धि । इति पिङ्गलप्रकाशित गणसज्ञा वर्णवृत्तानाम् ।। ४० ।। गणदेवता पृथ्वी-जल शिसि-पवना गगन द्युमणीदु-पनगान् क्रमत इत्यप्ती नगदेवान् पिङ्गलकथितान् विजानीत ।। ४१ ।। मणानामग्री मगणस्निलघू मित्रे भृत्यो भयगणी स्मृती। उदासीनो जतगणावरी रसगणो मतो ॥ ४२ ॥ मणदेषानो फलाफलम् मगणो ऋद्धिकार्य यगण सुखसम्पदो धत्ते । रगणो ददाति रमण 'सगणोदेशाद् विवासयति ॥ ४ ॥ १॥ बोषिका २ गगहा ३ ग परमोपासनन। ४ ग नारित पाठ-1५ गोस । ६ वग पपियोजलनिनिकासा गर्न सघ धमा माग । त्रिगुरु । ...गनगमोनमारयात्यंध। - ५० ४४-५५ ] १.गाया-प्रकरण [५ *तगण शून्य' तनुते जगणो रुजमादधात्येव । भगणो मङ्गलदायी नगण सफल फल दिशति ॥ ४४ ॥ इति पिङ्गलेन कथितो गणदेवाना फलाफलषिचार । ग्रन्यस्यादौ कविना बोद्धव्य सर्वथा यत्लान् ॥ ४५ ॥ मित्रद्वयेन ऋद्धि स्थिरकार्य भृत्ययोर्भवति । मित्रोदास्ताभ्यामपि कार्याभावश्च बन्धोऽपि ।। ४६ ।। मिनारिभ्या वान्धवपीडा कार्य च मित्रभृत्याभ्याम् । भृत्याभ्यामुग्रो ऽमुख-मुदास्तभृत्यौ धन हरते ॥ ४७ ॥ भृत्योदासीनाभ्या भृत्यारिभ्या च हाक्रन्द । अल्प कार्यमुदास्तान् मित्रात् सजायतेप्युदास्ताभ्याम् ॥ ४८ ॥ सम्यगसम्बड न भवत्युदास्त्सव व वरिष कुरत । शत्रोमित्रान फल स्त्रीनाश शनुभृत्ययोर्भवति ।। ४६ ॥ शनूदासीनाभ्या धननाश सर्वथा भवति । शत्रुभ्या नायकमृतिरिति फलमफल गणद्वये कथितम् ।। ५० ॥ मात्रोद्दिष्टम् दद्यात् पूर्वयुगाङ्कान् लघोरुपरि गस्य तुभयत । अन्त्याङ्क गुरुशीपस्थितान् विलुम्पेदथाङ्काश्च ।। ५१ ॥ उर्वरितैश्च तथाकत्रिोद्दिष्ट विजानीयात् । मात्रामष्टम् अथ मात्राणा नष्ट यददृष्ट पृच्छयते रूपम् ।। ५२ ॥ यत्कलकप्रस्तारो लघव कार्याश्च तावन्त । दत्वा पूर्वयुगाङ्कान पृष्ठाङ्क लोपयेदन्त्ये ॥ ५३ ।। उर्वरितोवरितानामङ्काना यत्र" लभ्यते भाग । परमात्रा च गृहीत्वा स एव गुरुतामुपागच्छेत् ॥ ५४ ।। धर्णोद्दिष्टम द्विगुणानङ्कान दवा वोपरि लघुशिर स्थितानवान् । एकेन पूरयित्वा वर्णोद्दिष्ट विजानीत ।। ५५ ॥ ++ ग प्रती-त्याजयति सोऽपि देश, तगरण शूयफल च विदधाति । मगल मगणो दायी, नगणात मवं समीपीनम । १ ख शूय फलन विधति । २ स ग मरें। ३ क सख । दिया। ५ ग महाकद । ६ ग वरिना । ७ ग पच्चरितश्च । यत्र। ६.ग प्रमाडू। १० ग नास्ति पार । ४ ग भत्मा ८ ग विद्भि वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [२०५६-६८ वर्णनष्टम् नष्टे पृष्ठे भाग कर्तव्य पृष्ठसख्याया । समभागे ल' कुर्यात् विपमे दत्वकमानयेद् गुरुकम् ।। ५६ ॥ वर्णमेह कोष्ठानेकाधिकान् वर्णं कुर्यादाद्यन्तयो पुन । एकाङ्कमुपरिस्थाङ्कद्वयैरन्यात् (न्? )प्रपूरयेत् ।। ५७ ॥ वर्णमेरुरय सर्वगुर्वादिगणवेदकम् । प्रस्तारसख्याज्ञानञ्च फल तस्योच्यते बुध ।। ५८ ।। वर्णपताका दत्वा पूर्वयुगाङ्कान् पूर्वाधेर्योजयेदपरान् । अङ्क पूर्व यो वं भृतस्तत पक्तिसञ्चार ॥ ५६ ।। अड्का पूर्व भृता येन तमङ्क भरणे त्यजेत् । अङ्कश्च पूर्व य सिद्ध स्तमक व साधयेत् ।। ६० ।। प्रस्तारसरयया चैवमङ्कविस्तारकल्पना । पताका सर्वगुर्वादिवेदिकेय विशिष्य तु ॥ ६१ ।। मात्रामेरु एकाधिककोष्ठाना द्वे द्वे पक्ती समे कार्ये । तासामन्तिमकोष्ठेप्वेका पूर्वभागे तु ।। ६२ ।। एकाङ्कमयुक्पक्ते समपडक्त पूर्वयुग्माङ्कम् । दद्यादादिमकोष्ठे यावत् पवित प्रपूर्ति स्यात् ।। ६३ ।। माद्याङ्कन तदीय शीर्वामभागस्थ । उपरिस्थितेन कोष्ठ विपमाया पूरयेत् पक्तौ ॥ ६४ ॥ समपक्ती कोष्ठानां पूरणमाद्याङ्कमपहाय । उपरिस्थाईस्तदुपरिसस्थैर्वामस्थितरके ॥ ६५ ।। मात्रामेरुरय प्रोक्त पूर्वोक्तफलमागिति । मात्रापताका प्रय मात्रापताकाऽपि कथ्यते कवितुष्टये ।। ६६ ।। दत्वोद्दिष्टवदवान् वामावर्तेन लोपयेदन्त्ये। अवशिष्टो वं योऽवस्ततो भवेत्' पक्तिसञ्चार ॥ ६७ ॥ एवं कास्य लोपे तु शानमेवगुरोर्भवेत् । द्विन्यादीनां विलोपे तु पक्तिद्वियादिवोधिनी ॥ ६८ ॥ रा वर्गान् । ३ त न वेदनम् । ४. भाग । ५ न.पर। ६ माति पाठ।
प. ६६-७६] १.माया-प्रकरण [७ वृत्तस्यस्यगुरुलधुतानम् पृष्ठे वर्णच्छन्दसि कृत्वा वास्तथा मात्राः । वर्णावेन कलाया लोपे गुरवोऽवशिप्यन्ते ॥६६॥ वर्णमकंटी मकंटी लिख्यते वर्णप्रस्तारस्यातिदुर्गमा । कोष्ठमक्षरसंख्यातं' पंक्ती रचय पट् तथा ।। ७० ।। प्रथमायामाद्यादीन् दद्यादवांश्च सर्वकोप्ठेषु। अपरायां तु द्विगुणान् अक्षरसंज्ञेपु तेप्वेव ॥ ७१ ॥ आदिपंक्तिस्थितर विभाध्यापरपंक्तिगान् । अङ्कांपचतुर्थपंक्तिस्थकोष्ठकानपि पूरयेत् ॥ ७२ ॥ "पूरयेत् पप्ठ-पञ्चम्याव (म)द्वैस्तुर्याङ्कसम्भवः । एकीकृत्य चतुर्थस्थ-पञ्चमस्थाङ्ककान् सुधीः ॥ ७३ ।। कुर्यात् पंक्तितृतीयस्थकोष्ठकानपि पूरितान् । वर्णानां मर्कटी सेय पिङ्गलेन प्रकाशिता ।। ७४ ।। वृत्तं भेदो मात्रा वर्णा गुरवस्तथा च लघवोऽपि । प्रस्तारस्य पडेते ज्ञायन्ते पक्तितः क्रमतः ॥ ७५ ॥ मात्रामर्कटी कोष्ठान् मात्रासम्मितान् पक्तिपटकं', कुर्मान मात्रामर्कटीसिद्धिहेतोः। तेपु द्वधादोनादिपंक्ति (का)वथाङ्का- स्त्यक्त्वाऽऽद्यात सर्वकोप्यु दद्यात् ।। ७६ ॥ दद्यादड्वान् पूर्वयुग्माङ्कतुल्या- स्त्यवत्वाऽद्या पक्षपंक्तावथाऽपि । पूर्वस्थाङ्घर्भावयित्वा ततस्तान्, कुर्यात् पूर्णान्नेत्रपक्तिस्थकोष्ठान् ॥७७ ॥ प्रथमे द्वितीयमझू द्वितीयकोष्ठे च पञ्चमाङ्कमपि । हत्वा वाणद्विगुण तद् द्विगुण नेत्रतुर्ययोर्दद्यात् ।। ७८ ॥ एकीकृत्य तथाङ्कान् पञ्चमपंक्तिस्थितान् पूर्वान् । दत्वा तथंकमई कुर्यात्तेमव पञ्चमं पूर्णम् ॥ ७९ ॥ १. ग विशिष्यते। २. ग. सनातं । ३. ग. पक्ति । ४. ग. पुरपत्यष्टपञ्चम्या बेधः ५. ग. प्रस्तारश्च । ६. ग. पटके । ७. ग. पञ्चा। ८. ग, पूर्णाम् ।
वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [५०८०-१० त्यक्त्वा पञ्चमम— पूर्वोक्तानेव भावमापाद्य । दत्वा तथैवमङ्क पष्ठ' कोष्ठं प्रपूरयेद्' विद्वान् ॥ ८० ॥ कृत्वक्य चाङ्कानां पञ्चमपक्तिस्थितानां च । त्यक्त्वा पञ्चदशाङ्क हित्वक पूरयेन् मुनेः कोष्ठम् ॥ ११ ॥ एवं निरवधिमात्राप्रस्तारेप्वङ्कबाहुल्यात् । *प्रकृतानुपयोगवशान कृतोऽङ्कविस्तारः ।। ८२ ॥ एव पञ्चमपक्तिं कृत्वा पूर्णां च प्रथममेकाङ्कम् । दत्वा पञ्चमपक्तिस्थितरथाङ्कः प्रपूरयेत् षष्ठीम् ।। ८३ ॥ एकीकृत्य तथाङ्कान् पञ्चम-पष्ठस्थितान् विद्वान् । कुर्याच्चतुर्थपक्ति पूर्णा नागाज्ञया तूर्णम् ।। ८४ ।। वृत्त प्रभेदो मात्राश्च वर्णा लघुगुरू तथा । एते पट्पंक्तित. पूर्णप्रस्तारस्य विभान्ति वै ।। ८५ ।। नष्टादिफलम् नप्टोद्दिष्टं यद्वन् मेरुद्वितयं तथा पताका च । मर्कटिकाऽपि तद्वत् कौतुकहेतुर्निबध्यते तज्ज्ञः॥ ८६ ॥ प्रस्तारसख्या पड्विंशतिः सप्तशतानि चैव, तथा सहस्राण्यपि सप्तपक्तिः । लक्षाणि दृग्वेदसुसम्मितानि, कोटयस्तथा रामनिशाफरैः स्युः ।। ८७ ॥ १३४२१७७२६ समस्तप्रस्तारपिण्डसंस्था। एकाक्षरादिपडधिकविंशतिवर्णान्तवर्णवृत्तानाम् । उवाः समस्तसंख्या लक्ष्यन्ते जातयश्चार्याः ॥१८॥ गापाभदाः मुनियाणकला गाथा विगाथापि तथा भवेत् । वेदवाणपला गाहू पष्टयो (यु)द्गाया भवेत् पुनः ॥ ८६ ॥ गाहिनी स्याद् द्विषष्टया तु मात्राणां सिहिनो तथा । चतुःपष्टया पलाना तु स्कन्धक कथ्यते बुधैः ।। ६०॥ १. ग. मास्ति पाठ । २. ग. पूरह। ३. प. मास्ति पाठः । ४. प. प्रतोपयोग- पाते। ५. ग. एतरम् । १. प. ग.मक्षाणि पञ्चाशरप्याटसया, होनानिकोटपो मध- पनिारयः। ७ ग. RRA जातपश्चा. स.बाः। ८. ग.मा।
प०६१.१०२ ] १गाथा-प्रकरण १ गाथा प्रथमे द्वादशमात्रा मात्रा हयष्टादश द्वितीये तु'। दहने द्वादशमात्रास्तुर्ये दशपञ्च सम्प्रोक्ता ॥ १ ॥ इति गाथाया लक्षणमार्यासामान्यलक्षण चाऽथ । पष्ठे जो वा विप्रो विपमे न हि जो गणाश्च गुर्वन्ता ॥ ६२ ।। सप्त हरय सहारा पष्ठे रज्जुद्विजोऽपि वा भवति । चरमदले लघु पष्ठ विषमे पवनस्तु नैव स्यात् ।। ६३ ॥ यथा- गोकुलहारी मानसहारी वृन्दावनान्तसञ्चारी। पमुनकुञ्जविहारी गिरिवरधारी हरि पायात् ॥ ६४ ।। एकस्मात्त कुलीना द्वाभ्यामप्यभिसारिका भवति । नायकहीना रण्डा वेश्या बहुनायका भवति ॥ ६५ ।। गापाया. पञ्चविंशतिभेदा सर्वस्या गाथाया मुनिवाणसमाख्यया कला ज्ञेया । प्रथमे दले खरामरपरेऽपि दलेऽश्वपक्षाभ्याम् ॥ ६६ ।। नखमुनिपरिमितहारा वह्निमिता यत्र लघव स्यु । सा गाथाना माथा प्रथमा खारन्यक्षरा लक्ष्मी ॥१७॥ एकैकगुरुवियोगाल्लघुदयस्यापि सयोगात् । अस्या भवन्ति भदा शरपक्षाभ्या मिता एव ।। १८ ।। मुनिपक्षाभ्या हारा लघवो दहनश्च स प्रथम । विधुवागर्लघव स्युगुरवो दहनश्च सोऽन्त्य स्यात् ।। ६E !! त्रिंशद्वर्णा लक्ष्मी वदते सर्वपण्डिता कवय । नश्यत्येकको यद्वणं कथयामि तानि नामानि ।। १०० ।।' लक्ष्मीऋद्धिबुद्धि'लज्जा विद्या क्षमा च वै देही, गौरी धात्री चूर्णा छाया कान्तिमहामाया ॥ १०१ ॥ कोति सिद्धिर्मानी रामा विश्वा च वासिता च मता। शोभा हरिणी चक्री कुररी" हसी च सारसी च मता ॥ १०२ ॥ १. गदि । २ प प्रपमदतं च सराम स्वरपसाभ्यो मिता एप । घरपक्षाम्याम् । ३.४ न पधर्य ६७६८ मास्ति। ५. सग. पचमा १.. मास्ति । ६ ग वृद्धि। ७ स ग देहो च। ८ ग पूर्णा। ६ ग मानिनी। १. ग. दुरणो।
१० वृत्तमौक्तिक-प्रयमखण्ड [प०१०३.१०४ २७ गुरु ७ लघु २५ गुरु २४ गुरु २३ गुरु इति भेदाभिधाः पित्रा रचितायामतिस्फुटम् । उदाहरणमञ्जयों बोध्येतासामुदाहृति: ॥ १०३ । इति गाथा २. विगाया यस्या द्वितीयचरणे मात्राः शरभूमिभि. प्रोक्ताः । सैव विगाया तुर्ये चरणे वसुभूमिसंख्यकाश्च कला. ॥ १०४ ।। * टिप्पणी-भट्टलक्ष्मीनाथविरचिताया पिङ्गलप्रदीपाख्याया प्राकृतपिङ्गलवृत्तौ गाथाच्छन्दसः सप्तविरातिभेदाः- १ लक्ष्मीः ३ लघु ३० अक्षर २ ऋद्धिः २६ गुरु ५ लघु ३१ अक्षर ३ वुद्धिः ३२ प्रक्षर ४ लज्जा ६ लघु ३३ अक्षर ५ विद्या ३४ प्रक्षर ६ क्षमा २२ गुरु ३५ अक्षर ७ देही ३६ अक्षर ८ गौरी ३७अक्षर ९घाची ३८ अक्षर १० चूरा ३६ अक्षर ११ छाया १७ गुरु ४०अक्षर १२ कान्ति १६ गुरु ४१ अक्षर १३ महामाया ४२ अक्षर १४ कोतिः ४३ अक्षर १५ सिद्धिः ४४ अक्षर १६ मानिनी १२ गुरु ४५ भदार १७ रामा ४६ अक्षर १८ गाहिनी ४७मदार १९ विश्वा गुरु ४प्रधार २. वाषिता ८ गुरु ४६अक्षर २१ शोमा ५. भार २२ हरिणी ५१ अक्षर २३ पकी ५२मार २४ सारसी २१ गुरु २. गुरु १६ गुरु •१८ गुरु ११ लघु १३ लघु १५ लघु १७ लघु १६ लघु २१ लघु २३ लघु २५ लघु २७ लघु २६ लघु १० गुरु ३३ लघु ३५ लघु ३७ लघु ३६ लघु ४१ लघु ४३ लघु ४५ लघु ४७ सयु ४६ लघु ५१मयु म ५५ मयु ६ गुरु ४ गुरु २ गुरु २६ सही २० हसी ५४ा ५५ र १६ र प्रग्यास्मिन् पिही-गाहिनीतिक भेो नैव स्वीका।
१० १०५.११.] १. गाथा-प्रकरण [ ११ यथा- तरणितनूजातोरे चीरेऽपहृतेऽपि वीरेण । हिमनोरे रमणीनामकुटिलधारेव मनसि संजज्ञे ॥ १०५॥ इति विगाथा ३. गाह' पूर्वार्द्ध च पराढ़े सप्ताधिकविंशतिर्मात्राः । अर्द्धद्वयेऽपि यस्याः पप्ठो लः सैव गाहू स्यात् ।। १०६ ॥ यचा अतिचटुलचन्द्रिकाञ्चितचन्चलनवकुन्तलं किमपि । राधावितनुज वाधासाधारणमौपचं जयति ॥ १०७ ॥ ययापा- कलशीगतदधिचोरं रदजितहीरं स्फुरच्चीरम् । राघावदनचकोर नन्दकिशोरं नमस्यामः ।। १० ।। इति गाए । ४. उद्गापा यस्या द्वितीयचरणे चतुर्थचरणे भवन्ति वै मात्राः । वसुविधुसस्यायुक्ता. सोद्गाथा पिङ्गलेन सम्प्रोक्ता ॥१०॥ यथा- उपवनमध्यादभिनवविलोकनासक्तराधिकावृप्पो । भन्योन्यगमनवेलामपेक्षमाणो'न जग्मतुः क्वापि ॥ ११० ।। रिपुद्गापा १. पाहिनी यस्या द्वितीयचरणे वमुविधुमात्रा भवन्ति तुर्य तु । पादे विशतिमात्रा सा गाहिनिका तु मिहिनी विपरीता ॥ १५॥ १.प. पाहा। २... पित्तन। १.प. मधयमाणो, ग.प्रषयमापौ।
१२] वृत्तमौक्तिक- प्रथमखण्ड ।०११२-१२० यथा- स जयति मुरलीवादनकेलिकलाभिविमोहयन् गोपीः । वृन्दावनान्तभूमौ रासरसाक्षिप्तविबुध विधिरुद्रमुखः ॥ ११२ ॥ इति माहिनी। ६. सिहिनी यस्या द्वितीयचरणे विंशतिमात्रा मनोहराकारगुणाः । सा सिंहिनी प्रदिष्टा नागाधिपपिङ्गलेन सम्प्रोक्ता ।। ११३ ॥ वन्देऽरविन्दनयनं वृन्दारकवृन्दवन्दितपदाम्भोजम् । नन्दानन्दनिधानं नवजलधररुचिरमन्दिरारमणम् ।। ११४ ।। इति मिहिनी ७. अय स्कायकम् यस्य द्वितीयचरणे चतुर्थचरणे च विंशतिर्भावाः स्युः । स स्कन्धक' इति कथितो यस्मिन्नष्टी गणाश्चतुर्मात्राभिः ।। ११५ ॥ यथा- राधामुखान्जतरणिः तरणिः संसारसागरोत्तरणविधौ । स जयति निजभक्तानां कामितदाता दुरन्तशक्तिसहायः ।। ११६ ।। स्कन्धकस्याऽष्टाविंशतिभेदाः नन्दो' भद्रः शिवः शेषः सारङ्ग-ब्रह्म-वारणा: । वरुणो मदनो नीलः तालाङ्कः शेखरः शरः ॥ ११७ ॥ गगनं शरभो विमतिः क्षीरं नगरं नरः स्निग्धः। स्नेहलु-मदकल-भूपा. गुद्धः कुम्भः सरिः कलशः ।। ११८ ।। शशीति सज्ञका भेदाः स्कन्धकस्य प्रकोतिताः । वमुपक्षामितास्ते स्युः गुरुह्रासाल्लवृद्धितः ।। ११६ ॥ विशद्गुरवो यस्मिन् वेदा लघवश्च स प्रथमः । वसुारलघवो यस्मिन् गुरुत्रयं चैव सोऽन्त्यः स्यात् ।। १२० ॥ १. ग.दिप ति पाटो मास्ति । २. ग. हा । ३... माहो.. ४. ॥ पारित : ५. ग. हलुकमसभूपालाः ।
प.१२१] १ गापा-प्रकरण [ १३ यसुपक्षपरिमितानामुदाहृति स्वप्रबन्धे तु । एतेपामतिरुचिरा पितृचररण स्फुटतया प्रोक्ता ॥ १२१ ।।* इति स्कायकम्। इति धीवृत्तमौक्तिरे वात्तिके' प्रथम गापाप्रकरण समाप्तम् । २६ गुरु ८ खघु ४ सारङ्ग २७ गुरु ५ शिव १४ लघु २५ गुरु २४ गुरु नील १ग नास्ति पाठ । *टिप्पणी-भट्टलक्ष्मीनाथविरचिताया पिङ्गलप्रदीपाख्याया प्राकृतपिङ्गलवृत्ती गुरुह्रास-लघु- वृद्धधनुपातेन स्कन्धस्याप्टाविंशतिभेदा प्रदशितास्तद्यथा- ३० गुरु ४ लघु ३४ अक्षर २ भद्र ६ लघु ३५ अक्षर ३ शेप २८ गुरु ३६ भक्षर १० लघु ३७प्रार १२ लघु ३८ प्रार ६ ब्रह्मा ३६मार ७वारण १६ लघु ४. भक्षर वह २३ गुरु १८ लघु ४१ प्रदार २२ गुरु २० लघु ४२ प्रार १० मदन २१ गुरु २२ लघु ४३मदार १. तालाडू २० गुरु २४ लघु ४४मक्षर २६ सयु ४५ अक्षर १८ गुरु ४६ मक्षर १४ गगनम् ३० लघु ४७मदार १५ धारभ १२ लघु ४८मदार ४० मगर ३६ लघु ५. अक्षर १८ नगरम् २६ लघु ५१भार १६नर ५२ पदार २० स्निग्ध २१ स्नेह १० गुरु ५४मार २२ मदरप्स ५५ प्रार २३ भूपान ८ गुरु ५६मगर २४ पुन १७मगर २. सरित ५८ असर गुप १२मगर ६०पदार ११मदार १२ शेखर २८ लघु ३४ लघु १६ विमति १७ क्षीरम १५ गुरु १४ गुरु ४. घु ७ गुरु ४४ सघु ४९ लघु ४८ सयु ५. लघु ५२ मयु ५४ मपु १६ भयु २८ एपी द्वितीयं पट्पद-प्रकरणम् १. दोहा विदशकला विषमे रचय सम एकादश धेहि । दोहालक्षणमेतदिति कविभि: कथितमवेहि ॥१॥ टगण-डगण-ढगणाः क्रमत इति विपमे च पतन्ति । समपादान्ते चैककलमिति दोहां कथयन्ति ॥ २॥ यथा- गौरीविरचिततनुशकल मस्तकराजितगङ्ग। जय वृषभध्वज पुरमथन महादेव नि सङ्गः ॥ ३ ॥ दोहापा: अयोधिशतिभेदाः यस्याः प्रथमतृतीये पादे जगणा भवन्ति सा कत्तुंः' । श्वपचगृहीतस्त्रीयद्' दोहादोपं प्रकाशयति ॥ ४ ॥ भ्रमर-भ्रामर-शरभाः श्येनो मण्डूक'-मर्कटौ करभः । मदकल-पयोधर-चलाः नरो मराल स्तथा त्रिकलः ।।५।। वानर-कच्छो मत्स्य: शार्दू लोप्यहिवरो व्याघ्रः । उन्दुर-शुनक-बिडालाः सर्पश्चते प्रभेदाः स्यु. ॥ ६ ॥ रसपक्षवर्णयुक्तो द्वाविंशतिगुरुक-वेदलघुसहितः । कथितः प्रथमो भेदः गुरुशून्यः सर्वलघुकोऽन्त्यः ।। ७ ॥ एकैकस्य गुरोर्लोपाल्लधुद्वयविवृद्धितः । दोहाभेदस्समुद्दिष्टास्ययोविंशतिसंस्यकाः ॥८॥ स्फुटतरमेते भेदाः समुदाहृत्य प्रदर्शिताः पित्रा। स्वनियाधे* फविवर्यस्तत एव विलोकनीयास्ते ॥६॥ पति दोहा। १. प. कडु:। २. ग. तावत्। ३. 1. सट। ४.ग. . ५.ग. १प९-७. मास्ति। टिप्पणी-भट्टलक्ष्मीनापप्रणीते पिङ्गलप्रदौपे गुरुहास-रघुपटपनुपातेन दोहा-द्विपपाच्छन्दराः योविंशभेदानो वर्गीकरणम्- २६ असर २प्रामद २७ पार ३रमः ८मपु २८ प्रार ४मधु २२ गुरु २१ गुरु २. गुरु प० १०.११] २. पट्पद -प्रकरणम् [ १५ २. राप्तका द्विजदरयुगलमुपनय, दहनलघुकमिह रचय। इति विधिशरभववदन- चरणमिह कुरु सुवदन । इति हि रसिकमनुकलय, भुजगवर कथितमभय ॥ १० ॥ यपा- जय जय हर वृपगमन, तरणिदहन विधुनयन । नयनदहन जितमदन, निजशरकृतपुरकदन । मम हृदयगतमपनय- मविनयमधिकमपनय ॥११॥ ४ श्येनः १६ गुरु ५ मण्डूकः २६ अक्षर ३० अक्षर १अक्षर ३२ प्रक्षर ६ मर्कटः १० लघु १२ लघु १४ लघु १६ लघु १८ लघु १७ गुरु १६ गुरु १५ गुरु ७ करमः ८नर. ३३अक्षर १४ गुरु २० लघु ३४ प्रक्षर १३ गुरु १२ गुरु २२ लघु २४ लघु २६ लघु २८ लघु ३० लघु ६ गुरु हमरालः १० मदकलः ११ पयोधरः १२ चलः १३ वानरः १४ विकल: १५ कच्छपः १६ मत्स्यः १७ शार्दूलः १८ अहिवरः १६ व्याघ्र २० बिडाल: ३५ अक्षर ३६ अक्षर ३७ अक्षर ३८ अक्षर ३६ अक्षर ४० अक्षर ४१ अक्षर ४२अक्षर ४३अक्षर ८ गुरु ३२ लघु ३४ लघु ३६ लघु ६ गुरु ४ गुरु ४४ अक्षर ४० लघु ४२ लघु ४४ लघु ४६ लघु २१ शुनकः २२ उन्दुरः २ गुरु १ गुरु ४५ अक्षर ४६ अक्षर ४७ अक्षर ४८ अक्षर २३ सपं ४८ लघु १६) वृत्तमौक्तिक - प्रथमसण्ड [१० १२.१७ रसिकाया प्रष्टो भेदाः यस्याश्चतुष्कलद्वयमादौ स्यात् पुनरपि मिकलः । एवं पट्पदयुक्ता या सौक्कच्छा' भुजङ्गमप्रोक्ता ॥ १२ ॥ प्रय लघुयुगवियोगादेकैकगुरोश्च संयोगात् । अष्टौ भवन्ति भेदाः शेषाः स्युदण्डकन्यायात् ।। १३ ॥ रसिका हंसी रेखा तालाङ्का कम्पिनी च गम्भीरा । काली कलरुद्राणी इत्यप्टो भेदनामानि ॥ १४ ॥ उदाहरणमञ्जर्यामुदाहृतिरतिस्फुटाः ।* एतेषामपि भेदानां द्रष्टव्या कविपण्डितैः ।। १५ ।। इति रसिका ३. रोला या चरणे कलानां चतुरधिकविशंर्गदिता, सा किल रोला भवति नागकविपिङ्गलकथिता । एकादशकलविरतिरखिलजमचिन्ताहरणा, सुललितपदकुलकलितविमलकविकण्ठाभरणा ॥ १६ ॥ यथा- अरिंगणमभितापयति विबुधलोकानुपगच्छति, धरणिविवरगतभुजगनिकरमभितापेनच॑ति । सकल दिगीशपुरमभिनिजतापरभियोजयति, भूप कथं प्रतापस्तव पोत्ति न शोपयति ॥ १७ ॥ १. ग. यासो कृया। ख. पासा फच्यो । २. ग. केचिद पण्डितः । ३. प. प्रस्तावस्तव । 'टिप्पणी-भट्टलक्ष्मीनायप्रणीते पिङ्गलप्रदीपे गुरुवृद्धि-लघुहासानुक्रमेण रसिकाया मट्टी भेदा:- १ रसिका " १गुरु २ गुरु ३ रेषा " ४ तालदिनी ६६ लघु ६४ लघु ६२ लघु ६० लघु ५८ सघु ५६ लघु ५४ सयु ५२ मधु ४ ५ कम्पिनी ६ गम्भौरा ७पाली सरदाणी . " ५० १८.२२] २. पट्पद-प्रकरणम् रोलायाः प्रयोदशभेदाः कुन्दः करतल-मेघौ तालाको रुद्र-कोकिलो कमलम् । इन्दुः शम्भुश्चमरो गणेश-शेपौ सहस्राक्षः ॥ १८ ॥ प्रयोदशगुरुयंत्र सप्ततिर्लघवस्तथा । स प्राद्यभेदो"विज्ञेयस्सोऽन्त्य एकगुरुयंतः ।। १६ ।। एककस्य गुरोर्नाशा' ल्लघुद्वयनिवेशतः । भेदास्त्रयोदश ज्ञया रोलायाः कविशेखरः ॥ २० ॥ त्रयोदशव भेदानामुदाहृतिरुदीरिता । उदाहरणमञ्जा' द्रष्टव्या तत एव हि ॥ २१ ।। इति रोला। ४. गन्धानकम् रचय प्रथमं पदं मुनिविघुवर्णरचितं, तथा द्वितीयमपि वसुविधुवर्णर्यमकचितम् तथान्यदलमपि यतिगणनियमरहितं, गन्धानकवृत्तमवधेहि कविपिङ्गलगदितम् ॥ २२ ।। १. ग. पादिभेदो। २. ग. हासात् । ३. ग. विद्धितः। ४ ग. रोलाया। ५: ग. युतम् । * टिप्पणी-भट्टलक्ष्मीनाथप्रणीते पिङ्गलप्रदीपे रोलाया: त्रयोदशभेदानां गुरुहास- लघुवृद्धयनुसारेण प्रदर्शनम:- ६६ मात्रा २ करतलः १२ गुरु ३ मेघ. ११ गुरु ४ ताला १० गुरु ७६ लघु ५ कालरुद्रः ६ कोकिलः ७ कमलम् ७ गुरु ८२ लघु ७० लघु ७२ लघु ७४ लघु " " ६ गुरु ७८ लघु ८० लघु . " . ६ शम्भुः " ५ गुरु ४ गुरु ८४ लघु ८६ लघु ८८ लघु ६० लघु ६२ लघु ६४ लघु १० चामरः ११ गणेश्वरः १२ सहस्राक्षः " ३ गुरु २ गुरु " " " " १ गुरु " " १८] वृत्तमौक्तिक- प्रथमखण्ड [प० २३-२६ यथा- लक्ष्मण दिशि दिशि विलसति घनमनु शम्पा, इयमपि चञ्चलतरङ्गचलजलरुहपम्पा । दयितोदन्त सम्प्रति' कथमपि न ह्यवगत, सोढ शक्यो विरह कथमिह हि मयकानुगत ।। २३॥ यथाया- गर्जति जलघर परिनृत्यति शिखिनिवह , नीपवनीमवधूय वहति दक्षिणगन्धवह । दूरे दयित कथय सखि } किमिह हि करवै, प्रज्वालय दहन कटिति शलभमनुकरवं ॥ २४ ।। इति गन्धानकम्। ५ चौपैया छद यया- चौपैया छन्द कविकुलचन्द्र कथयति पिङ्गलनाग , कुरु सप्तचतुष्कलगणमिह पुष्कलमधिगुरुचरणविभाग । इह दिग्वसुसूर्ये पण्डितवर्येर्यतिरिह मात्रास्त्रिशत्, यस्मिन किल' कथिते कविजनमथिते राजति नृपवरससत् ॥२५॥ या विशत्यधिकशतैर्मात्राणामेकपादेषु । सा चोपैया न्यस्यादशीत्यधिकशतचतुष्टयकलाका ॥ २६ ॥ चेत स्मरमहित कमलासहित दारितदारुणकस, हतधेनुकदानवमिच्छामानवमृपिजनमानसहसम् । यमुनावरतोरे तरलसमीरे कारितगोपीरास, भवबाधाहरण राधारमण कुन्दकुसुमसमहासम् ।। प्रजजवकुलपाल लालितवाल वादितमृदुरववश,' रोचनयुतभाल धृतवनमाल शोभिततरलवतसम् । दितिजबजकाल वादितताल कृतसुरमुनिगणशस, रुचिकलिततमाल जितपनजोल भासितयादववशम् ।। सरसीव्हनयन जगतामयन फण्ठतलस्थितहार, धृतगोपसुवेष कुञ्चितकेश स्मितजितनवधनसारम् । १ ग पितो तमिवानी । २ प ग म सहनमिद दुई मरण पारणमनुगत । ३ ग मारित पाठ। ४ गझटिति। १ ग कस. ६॥ मृदुतरवार।
प०२७- २. षट्पद-प्रकरणम् [ १९ जितनयनचकोरं नन्दकिशोर गोपीमानसपोरं, कृतराधाधारं सज्जनतारं दितिसुतनाशकठोरम् ।। नवकलितकदम्वं जगदवलम्ब सेवितयमुनातीरं, नन्दितसुरवृन्दं जगदानन्द गोपीजनहतचीरम् । धृतधरणीवलय करुणानिलय दन्तविनिर्जितहीरं, भवसागरपारं भुवनागारं नन्दसुत यदुवीरम् ।। २७ ।। इति चोपंया ६. घत्ता पिङ्गलकविकथिता त्रिभुवनविदिता घत्ता द्विरसकला भवति । कुरु सप्तचतुष्कल-मन्तत्रिकल-त्रिलघुकमेतदपि द्विपदि ॥ २८ ॥ प्रथम दशसु यतिः स्याद् वसुमात्राभिद्वितीयाऽपि । दहनावनिभिः पुनरपि यतिरिह(य)मेकार्द्धघत्तायाः ॥ २६ ॥ यथा- भववाधाहरण राधारमण नन्दकिशोर स्मर हृदय । यमुनायास्तीरे तरलसमीरे कृतमनुराम त्वमनुसर' ।। ३०॥ इति पत्ता। ७. घतानन्दम् अहिपतिपिङ्गलकथितमयुतगुणयुतमिह भवति घत्तानन्दम् । योकादशविरतिर्मुनिषु च भवति यतिरधिकजनितानन्दम् ॥ ३१ ॥ प्रादौ पट्कलमिह रचय डगणत्रयमिह धेहि । ठगण डगण द्वयमपि धत्तानन्दे धेहि ।। ३२ ।। पया- दितिसुतनिवहगञ्जनमसुखभजनमनुगतजनतापहरणम् । निखिलमानसरञ्जनमतिनिरञ्जनमस्तु किमपि महः शरणम् ।। ३३ ।। इति पत्तानन्दम् [१] काव्यम् अथ पट्पदहेतुत्वात् काव्य सम्यड निरूप्यते । लक्ष्यलक्षणसयुक्त प्रोल्लाल' सप्रभेदकम् ।। ३४ ।। १. ग. समनुसर । २. प. तद्यया ख. ग. प्रतौ सर्वत्रापि उल्लासं विद्यते । ३. स. ग. प्रोल्लासम् | उत्सालस्थाने २० ] वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [१० ३५-४३ टगणमिहादौ कलय जलधिकलत्रयमनु च कुरु । टगण चान्ते रचय दहनयुतविप्र ज कुरु ॥ ३५ ॥ एकादशकलविरतिरथ दहन विधुभिरपि भवति । काव्य भुजगकविरिति बुधजनसुखकरमनुवदति ॥ ३६ ॥ यथा- मुकुटविराजितचन्द्र चन्द्रकलोपमतिलकवर, तिलकदहनवरनयन नयनजितमदनमनोहर । अमरनिकरकृतमनन मनननिरवधिकरुणाकर, करधृतमनुजकपाल विवुधजनतिमिरविभाकर ।। ३७ ॥ ६. उल्लालम् प्रादौ त्रयस्तुरगास्तदनु विकलो रसस्तथा तुरग । त्रिकलश्चान्ते यस्मितुल्लाल त विजानीयात् ॥ ३८ ॥ पट्पदवृत्त द्वाभ्या वृत्ताभ्या जायते यस्मात् । काव्योल्लालो तस्मानिरूपितो वृत्तमौक्तिके स्फुटत ॥३६॥ प्रस्तारस्तु द्विधा प्रोक्तो गुरु लघ्वादिभेदत । अन लघ्वादिभेदेन प्रस्तारपरिकल्पना ॥ ४०॥ चतुरधिका इह चत्वारिंशद् गुरवो भवन्ति काव्येऽस्मिन् । यद् गुरुहीन वृत्त शक्र तन्नामतो वृत्तम् ॥ ४१ ।। पपा- अभिनवजलघरपटलसदृशतर कनकवसनधर, परिणतशशधरवदन समरविधिकरणचतुरतर । अविरतवितरणनिपुण सकलरिपुकुलवनकरिवर, विदलितगजदलतुरग विगतभय जय जय यदुवर ।। ४२ ॥ काव्यस्य पञ्चत्वारिमारा यथा यथाऽस्मिन् वलयो विवदंते, तपा तथा नाम विधिविधीयताम् । पठन्तु' शम्भु प्रथम ततो युधा, मग तदन्ते श्रुतियुग्मसम्भवम् ॥ ४३ ।। २.४ग पठति।
५०४४.५२ ] २. पट्पद-प्रकरणम् [२१ प्रादाय गुरु विहीन शक्र भेदान् वुधा पठत । इन्द्रियवेदैर्गणितान् नागाधिपपिङ्गलप्रोक्तान् ॥ ४४ ।। अथ लघुयुग्मविलोपा देककगुरोविवृद्धित क्रमश । वाणाम्बुधिपरिगणिता भेदा सम्यक् प्रदयन्ते ।। ४५ ॥ यपा- शक्र शम्भु सूर्यो गण्ड स्कन्धस्तथा विजय । तालाङ्क-दर्प-समरा सिंह शेषस्तथोत्तेजा ॥४६ ॥ प्रतिपक्ष परिधर्मों मराल-दण्डौ मृगेन्द्रश्च । मर्कट-मदनी राष्ट्रो वसन्त-कण्ठौ मयूरोऽपि ।। ४७ ॥ बन्धो भ्रमरोऽपि तथा भिनोऽय स्यान्महाराष्ट्र । बलभद्रोऽपि च राजा वलितो रामस्तथा च मन्यान || ४८ ।। मोहो बली तत स्यात् सहस्रनेत्रस्तथा बालः । दृप्त शरभो दम्भो दिवसोद्दम्भी तथा च वलिताङ्क ॥ ४६ ।। तुरगो हरिणोऽप्यन्धो भृङ्गश्चते प्रसख्याता. । वास्तुकारये छदसि वाणाम्बुधिभिमिता भेदा ॥ ५० ॥ पादे यत्यनुरोधात् तृतीयजगणानुरोधाच्च । वेदाङ्कलघुकयुक्तश्चन्द्रगुरुयं स आद्य स्यात् ॥ ५१ ।। शरवेदमिता भेदा काव्यवृत्तस्य दर्शिता । उदाहरणमञ्जर्या बोध्येतेपामुदाहृति ॥ ५२ ॥ इति काव्यम्। २ शम्भु ६४ लघु १ गहासाद । टिप्पणी - भट्टलक्ष्मीनापप्रणीते पिङ्गलप्रदीप काव्यवृत्तस्य गुरुवृद्धि-लघुह्रासक्रमेण पञ्च- चत्वारिंशद्भदाना वर्गीकरणम- १शक ६६ लघु ६६ अक्षर ६५ अक्षर ३ सूर्य २ गुरु ६२ लघु ६४ अक्षर ४ गण्ड ६. लघु अक्षर ५ स्कन्ध ४ गुरु ८८ लघु ६२ अक्षर ५ गुरु ६१ अक्षर ६. अक्षर ८ तालाक अक्षर ८. लघु प्रार १. सिंह ७८ लघु ८७ अक्षर ६ विजय ८६ लघु ८४ लघु ८२ लघु २२] वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड १० गुरु ८६ अक्षर ८५ अक्षर १२ गुरु ८४ अक्षर ८३ अक्षर १४ गुरु ८२ अक्षर ८१ अक्षर ८० अक्षर ७६ अक्षर १६ गुरु १७ गुरु ७० प्रक्षर . २३ मयूरः २४ गुरु ११ शेषः १२ उत्तेनाः १३ प्रतिपक्षः १४ परिधर्मः १५ मराल: १६ मृगेन्द्रः १७ दण्डः १८ मर्कट: १६ मदनः १८ गुरु २० महाराष्ट्र २१ वसन्त. २० गुरु २२ण्ठः २१ गुरु २२ गुरु २४ बन्धः २३ गुरु २५ भ्रमर; २६ द्वितीयो महाराष्ट्र: २५ गुरु २७ बलभद्र: २८ राजा २७ गुरु २६ वलितः ३० रामः ३१ मन्यान: ३२ बली ३३ मोहः ३२ गुरु ३४ सहस्रादः ३५ बालः ३६ दृप्तः ३७दारभः २८ दम्भः ३६महः ४० उद्दम्भः ४१ वसिताः ४२ मुरतः ४१ हरिए. ४ पन्थः ७६ लघु ७४ सघु ७२ लघु ७० लघु ६८ लघु ६६ लघु ६४ लघु ६२ लघु ६० लघु ५० लघु ५६ लघु ५४ लघु ५२ लघु ५० लघु ४८ लघु ४६ लघु ४४ लघु ४२ लघु ४० लयु ३८ लघु ३६ संघ ३४ लघु ३२ लघु ३० लघु २८ लघु २६ लघु २४ लघु २२ लघु २० लयु १८ लघु १६ सघु १४ म १२ म १. मयु २८ गुरु २६ गुरु , ७७ प्रक्षर ७६ अक्षर ७५ अक्षर ७४ अक्षर ७३ अक्षर ७२ अक्षर ७१ अक्षर ७० अक्षर ६६ अक्षर ६८ अक्षर ६७ अक्षर ६६ प्रक्षर ६५ अक्षर ६४ अक्षर ६३ भक्षर ६२ अक्षर ६१ अक्षर ६० अक्षर ५९ अक्षर ५८ अक्षर ५७ भार ५९ मदार ५५भधार ५४ मधार १३ पार ५२ मार १८ गुरु ५०५३ -६१ २. पट्पद • प्रकरणम् [२३ १०. षट्पदम् पट्पदवृत्तं कलय सरसकविपिङ्गनभणितं , एकादश इह विरतिरथ च दहनविधुगणितम् । पटकलमादी तदनु चतुस्तुरग परिसतनु , शेषे विकल रचय चतुष्पदमेवं सचिनु । उल्लालद्वयमत्र हि भवेदष्टाविंशतिकलयुतम् । यदि पञ्चदशे विरतिस्थितं पठनादपि गुणिगणहितम् ॥ ५३ ।। दहनगणनियमविरहितकाव्यं सोल्लालचरणयुगलेन । कथयति पिङ्गलनागः पट्पदवृत् मनोहारि ।। ५४ ॥ यया- . - तव जय जय नन्दकुमार मारसुन्दर वरलोचन लोचनजितनवकज कञ्जनिभाय भवमोचन । नूतनजलधरनील शीलभूपित गतदूपण दूपणहर धृतभाल भालभूपितवरभूषण ।। दूपणगणमिह' मम निखिलमपि कुरु दूरे नन्दकिशोर । चरणकमलयुगलमनुदिनमनुसेवे नयनचकोर ।। ५५ ।। षट्पववृत्तस्यकसप्तति दा. वेदयुग्मगुरून् काव्यादुल्लालाद् रसपक्षकान् । प्रादाय तस्य स्थाने तु लघुद्वयनिवेशतः ।। ५६ ॥ भेदाः स्युभूमिमुनिभिहीत्वान्त्य तु सर्वलम् । प्राद्यस्तु रविलो विन्दुमुनिग सोऽजयः स्मृत ॥ ५७ ॥ विजय-बलि-कर्ण-वीरा वैताल-बृहन्नरी मक्क. । हरि-हर-विधीन्दु-चन्दन-शुभकरा. श्वा च सिंहश्च ।। ५८ ।। शार्दूल-कूर्म-कोकिल-खर-कुञ्जर-मदन-मत्स्य-तालाङ्का । शेषः सारभोऽपि च पयोधरः कुन्द-कमले च ॥ ५६ ।। वारण-जङ्गम-शरभास्तथा द्युतीष्टोऽपि दाता च । शर-सुशर-समर-सारस-शारद-मद-मदकरा मेरु. ॥ ६॥ सिद्धिर्बुद्धिः करतल-कमलाकर-धवल-मानस-ध्रुवकाः। कनक कृष्णो सजन-मेघकर-ग्रीष्म-गरुड-शशि-सूर्याः ।। ६१।। १ ग दूषणमिह । २. ग. निवेशितः।
२४] वृत्तमौक्तिक-प्रयमखण्ड [१० ६२-६३ शल्यो नवरङ्ग-मनोहरी गगन-रत्न-नर-हीराः । भ्रमरः शेखर-कुसुमाकरी ततो दीप्त-शख-वसु-शब्दाः ।। ६२ ।। इति भेदाभिधा. पित्रा रचितायामपि स्फुटम् । उदाहरणमञ्जर्यामुक्त तासामुदाहृतिः ॥ ६३ ॥ इतिषर पदम् । १२ लघु १४ लघु १६ लघु ६७ गुरु ५वीरः ६ वैतालः २० लघु २२ लघु ८ मर्कटः २६ लघु ६२ गुरु ६१ गुरु ६० गुरु ५९ गुरु ५८ गुरु ३० लघु ३२ लघु ३४ लघु *टिप्पणी-भट्टलक्ष्मीनाथप्रणीते पिङ्गलप्रदीपे पट्पदच्छन्दसः गुरुह्रास-लघुद्धिपरिपाटया एकसप्ततिभेदानामुदाहरणानि- १अजय ८२ अक्षर २ विजयः ८३मक्षर ३ बलिः ६८ गुरु ८४अक्षर ४ करणः १६ लघु ८५ प्रक्षर ८६ अक्षर ८७ अक्षर ७ बृहनलः २४ लघु ८९मक्षर ८६ अक्षर २८ लघु ६. अक्षर ६१भक्षर ११ ब्रह्मा ६२ मार १२ इन्दु १३ अक्षर १३ चन्दनम् २६ लघु ६४मक्षार १४ शुभरः ५७ गुरु ६५ अक्षर ५६ गुरु ६मार १६ सिंहः ६७भार १७ शार्दूलः ६९ मार १८ पूर्मः ६६मदार १६कोक्तिः ५२ गुरु १०. भक्षर २० सर १०१मदार १०२ प्रदार २१ मदनः १०५मार २३ मरस्यः १६ सपु १.४मार १. प्रहार १.मदार २५ गार १२ मयु १.७मदार १.भार ५५ गुरु ३८ लघु ४० लघु ४२ लघु ४४ लघु ४६ सघु ४० सघु ५० सघु ५२ सघु ५४ सपु २४ तासार ५० लघु २५ ऐप: ४५ गुरु गुरु २० पयोधर ५.६४.१०] २. पदपद-प्रकरण [ २५ हाय्यपट्सदमोर्दोषा' काव्यपट्पदयोश्चापि दोपा पन्नगभाषिता । वक्ष्यन्ते यान् विदित्वैव काव्य यत्तुं मिहार्हति ।। ६४ ।। पददुष्टो भवेत्पड गु कलाहीनस्तु सञ्जकः । कलाधिको वातूलः स्यात् तेन शून्यफलश्रुतिः ॥ ६५ ।। अन्धोऽलङ्काररहितो बधिरो कलवजित.। प्राकृते सस्कृते चाऽपि विज्ञेय पददूपणम् ।। ६६ ।। गणोट्टवणिका यस्य पञ्चश्किलवा भवेत् । स मूक कथ्यतेऽयन विना स्याद् दुर्वलस्तथा ।। ६७ ।। ४३ गुरु ४२ गुरु ४१ गुरु ४० गुरु २८ कुन्द २६ वमलम् ३० वारस ३१रभ ३२ जङ्गम ३३ घुतीष्टम् ३४ दाता '५दार ३६ सुगर ३७ समर ३८ सारस ३६ शारद ६६ लघू ६८ लघु ७० लघु ७२ लघु ७४ लघु ७६ लघु ७८ लघु ८० लघु ३६ गुरु ३८ गुरु ३७ गुरु ३६ गुरु ३५ गुरु ८२ लघु ३४ गुरु ३२ गुरु ८४ लघु ८६ लघु ८८ लघु ६० लघु १२ लघु ६४ लघु १०६अक्षर ११० अक्षर १११ अक्षर १११ मार ११३मक्षर ११४ अक्षर ११५ अक्षर ११६ प्रक्षर ११७ अक्षर ११० अक्षर ११६ अक्षर १२० अक्षर १२१मक्षर १२२ अक्षर १२३ अक्षर १२४ अक्षर १२५ अक्षर १२६ अक्षर १२७अक्षर १२८ अक्षर १२९ प्रक्षर १३० अक्षर १३१ अक्षर १३२ अक्षर ४० मेह ४१ मदकर ४२ मद २६ गुरु ४३ सिद्धि ४४ वृद्धि ४५ करतलम् २७ गुरु ४६ कमलाकर २५ गुरु ४७ धवल २४ गुरु ९८ लघु १०. ला १०२ लघु १०४ लघु १०६ लघु १०६ लघु ११० लघु ११२ सयु ४५ मन ४६ ध्रुव २२ गुरु २१ गुरु ५१ कृष्ण २० गुरु वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [ ५०६ ७१ हठात्कृष्टाक्षरश्चापि कठोर केकरोऽपि च । श्लेष प्रसादादिगुणविहीन काण उच्यते ॥ ६८ ॥ सर्वैरङ्ग सम शुद्ध स लक्ष्मीक स रूपवान् । काव्यात्मा पुरुप कोऽपि राजते वृत्तमौक्तिके ।। ६६ ॥ दोपानिमानविज्ञाय यस्तु काव्य चिकीर्षति । न ससदि स मान्य स्यात कवीनामतदहण ॥ ७० ॥ एते दोपा समुद्दिष्टा सस्कृत प्राकृतेऽपि च । विशेषतश्च तत्रापि केचित्प्राकृत एव हि ।। ७१ ।। इति शाल्मलीप्रस्तारे द्वितीय पटपदप्रकरण समाप्तम । ५२ रजनम् १६ गुरु १८ गुरु १७ गुरु ५३ मेषकर ५४ ग्रीष्म ५५ गरुड ५६गी १५ गुरु १४ गुरु ५७ सूर्य ५० शल्य ५६ नवरग ६. मनोहर ६१ गगनम् ६२ रत्नम् ६० नर १२ गुरु ११ गुरु १० गुरु ६गुरु ११४ लघु ११६ लघु ११८ लघु १२० लघु १२२ लघु १२४ लघु १२६ लघु १२८ लघु १३० लघु १३२ लघु १३४ लघु १३६ लघु १३८ लघु १४० लघु १४२ लघु १४ लघु १४६ म १४६ लघु १५. मधु १५२ सयु १३३ अक्षर १३४ अक्षर १३५ भक्षर १३६ अक्षर १३७ अक्षर १३८ प्रक्षार १३६ मक्षर १४० प्रक्षर १४१ अक्षर १४२ अक्षर १४३प्रभर १४४ मार १४५ भार १४६ मगर १४७ मार १४८ भक्षर १४६ पचर १५० अक्षर १५१ मगर १५२ मगर(१५२मामा) ७ गुरु ६५ भ्रमर ६६पासर ६७ पुगुमावर ५गर ४ गुरु २ गुरु ७. घर तृतीयं रड्डा-प्रकरणम् १..पज्झटिका डगणाश्चतुरः पादे विधेहि, अन्ते गणमिह मध्यगमवेहि । इति पज्झटिका निखिलचरणेषु, पोडशमात्रा सर्वचरणेषु ॥ १ ॥ यथा- गाङ्ग वन्द्य परिजयति वारि, निखिलजनानां दुरिविनिवारि'। भवमुकुटविराजिजटाविहारि, मज्जज्जनमानसतापहारि ॥२॥ इति पज्झटिका । २. अडिल्ला प्ररिकला]] सर्वे डगणा अरिल्ला छन्दसि, नायकमत्र नयति तं नन्दसि । पोडशमात्रा विदिता यस्मि- नन्ते सुप्रियमपि कुरु तस्मिन ।। ३ ।। पचा- हरिरुपगत इति सखि ! मयि वेदय, कुञ्जगृहोदरगतमपि खेदय । इह यदि सपदि सविधमुपयास्यति, रदवसनामृतमिदमनुपास्यति ॥ ४ ॥ इति प्ररिल्ला। ३. पादाकुलकम् गुरुलघुकृतगण -नियमविरहित, फणिपतिनायकपिङ्गलगदितम् । रसविधुकलयुतयमकितचरणं, पादाकुलकं श्रुतिसुखकरणम् ॥५॥ १. ग. विनिवास। २.प.पाला ३. प. गुण।
२८ ] वृत्तमौक्तिका - प्रथमखण्ड यथा- जलभरदान'-हरितवनभागः, शीतलमारुतकृतपरभागः । चञ्चलचपत्ताधृतवनमालः, समुपागत इह जलधरकालः ॥ ६ ॥ इति पादामुलकम् । ४. चौवोता रसविधुकलकमयुगमवधारय, सममपि वेदविधूपमितम् । सर्वमपि पष्टिकलं विचारय, चौवोलास्यं फणिकथितम् ॥ ७ ॥ यया- दिशि दिशि विलसति जलघरगजित- मर्थ'तोकेका राजयते । सा मम चेतः कुरुते तजित- मपि का कान्तो भासयते ॥ ८ ॥ इति चौबोला। विषमचरणेपु ढगण मुपनय डगणनयमनुविरचय जगणमुत' विप्रमन्त्यमुपनय डगणत्रयमपि रचय समेऽन्ते' सर्वलघु विरचय । दोहाचरणचतुष्टयं तेषामन्ते धेहि । फणिपतिपिङ्गलमापितं रड्डा वृत्तमवैहि ॥ ६ ॥ विषमः शरविधुमात्रो द्वादशमात्रास्तथा द्वितीयोऽपि । तुर्यो रुद्रकलाक. प्रथमान्ते जगणविप्रनियमः स्यात् ॥१०॥ १. जसपरदाद। ६. स. ग. रामते। विद्यते । २. परिभाषः। ३.प.प्रवरमा ४.ग.पण । ५ ग. मनु । ..ग. रा! ग. प्रतो या स्थान मावि रणायाः प्रयोगो ५०११-१%] ३ रडा-प्रकरणम [ २६ अपरान्ते लघुयुगनियम स्यात् कलाद्वयम् । समादौ स्याच्चतुर्यान्ते बिलघुर्गप ईरित ५६ ११ ॥ यथा- पिकरुतमिदमनुविलसति दिक्षु किंशुककलिका विकसति' वहति मलयमरुदयमपि मुलघु विस्तमलिपि क्लयति विकसति मञ्जुल मजरिरपि च । इति मधुरनुवनमनुसरति वहुलीभूय सुकेशि हरिरपि विनमति चरणयुगमनुमर त हृदयेशि । ॥ १२ ॥ रड्डाया सप्तभेदा अर्थतस्या सप्तभेदा कथ्यन्ते पिङ्गलोदिता । यान् विधाय कवि काव्यगोप्ठ्या वहुमतो भवत् ।। १३ ।। प्रथमा करमी प्रोक्ता ततो नन्दा च मोहिनी। चारुसेता चतुर्थी स्यात्तथा' भद्रापि पञ्चमी ।। १४ ।। राजसेना तु पष्ठी स्यात् तथा तालकिनी मता। सप्तमी कथिता रड्डा भेदा लक्षणमुच्यते ॥ १५ ॥ ५[१] करभी विपमेऽग्निविधुकलाको रुद्रकलाको द्वितीयोऽपि । तुर्योऽपि रुद्रमात्र पञ्चपदानीह कथितानि ॥ १६ ॥ एव पन्चपदानामने दोहापि यस्यास्ताम । करभीति नागराज कथयति गएकल्पना तु दोहावत् ११ १७ ॥ इति करभी। ५[२] नवा विपमेपु वेदविधुनिद्वितीयतुर्यों च रुद्रमात्राभि । अन दोहा यस्या' ता न दामामनन्ति वत्तज्ञा ॥ १८ ॥ इति नदा। 4- १ ग विलसति। २ ग मजुर। ३ स ग प्रय। ४ गपस्या ३० ] वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [ ५० १६.२५ ५[३] मोहिनी अयुजि पदे नवमात्राः समेऽपि दिग्द्र संख्याभिः । पुरतो दोहा यस्यां शेपस्तां मोहिनीमाह ॥ १६ ॥ इति मोहिनी। ५[४] चारुसेना असमपदे शरचन्द्राः समयोरेकादशैव यस्यास्ताम् । दोहाविरचितशीर्पा भणति फणीन्द्रस्तु' चारुसेनेति ॥ २०॥ इति चासेना। ५[५] भद्रा विपमेषु पञ्चदश भिद्वितीयतुर्यों च सूर्यसंख्याभिः । या दोहाङ्कितशीर्षा सा भद्रा भवति पिङ्गलेनोक्ता ।। २१ ॥ इति भद्रा। ५[६] राजसेना पूर्ववदेव हि विषमे समे क्रमादेव सूर्यरुद्रेश्च । पूर्ववदेव हि दोहा यत्र स्याद् राजसेना सा ।। २२ ।। इति राजसेना। ५[७] तालकिनी विषमे पदेपु(च) यस्यां पोडशमात्रा विराजन्ते । पूर्ववदेव हि समयोदोहाऽपि च पूर्ववद्भवति ॥ २३ ॥ तालविनीति कथिता सा रड्डा नागराजेन । एव सप्तविभेदा विविच्य सम्यक् प्रदर्शिताः क्रमश: ॥ २४ ॥ उदाहरणमेतेपां ग्रन्यविस्तरशङ्कया। नोक्त सुबुद्धिभिस्तदि स्वयमूह महात्मभिः ॥ २५ ॥ इति श्रीपत्तमौक्तिकवात्तिके तृतीय रड्डा -प्रकरणं समाप्तम् । ४.ग. त। ५.ग. पिरचय। t..पद्रो। २.स.ग.प.। ३. ग. अमत: । ७. ग. पई।
चतुर्थ पद्मावती-प्रकरणम् . . १. पद्मावती यदि योगडगणकृत-चरणविरचित-द्विजगुरुयुगकरवसुचरणाः । नायकविरहितपद-कविजनकृतमद-पठनादपि मानसहरणा । इह दशवसुमनुभिः' क्रियते कविभिविरतिर्यदि युगदहनकला , सा पद्मावतिका फणिपतिभणिता ग्रिजगति राजति गुणवहुला ॥ १॥ पथा- करयुगधृतवंशी रुचिरवतंसी गोवर्द्धनधारणशीलः, प्रियगोपविहारी भवसन्तारी वृन्दावनविरचितलोलः । धृतवरवनमाली निजजनपाली वरयमुनाजलरुचिशाली मम मङ्गलदायी कृतभवमायो' वरभूपणभूषितभाली ॥ २ ॥ इति पद्मावती। २. कुण्डलिका दोहाचरणचतुष्टय प्रथम नियतमहि, कुण्डलिका फणिरनुवदति काव्य तदनु विधेहि । काव्य तदनु विधेहि पदं प्रतियमकितचरणं, तदुभयविरतो भवति पुनरपि च' तदुभयपठनम् । तदुभयसुपठनसमयरचितकरकविजनमोहा। कुण्डलिका सा भवति भवति यदि पूर्व दोहा ॥३॥ यथा- चरणं शरण भवतु सव मुरलीवादनशील, सुरगणवन्दितचरणयुग वनभुवि विरचितलील । वनभुवि विरचितलील दुष्टजनखण्डनपण्डित, दुर्जनजनहृदि कील गण्डयुगकुण्डलमण्डित । दुर्जनजनहृदि कील भीतमयतापविहरण', मुनिजनमानसहस हरतु मम तापं चरणम् ॥ ४ ॥ १. ग. मुनिभिः। २ ॥ तद्यथा । ग प्रतो पपा सदस्य स्थाने सर्वत्र तद्यपा पाठो दृश्यते । ३ ग माली। ४. नववरवायी। ५. ग मालो। ६. ग नास्ति ७ ग, नास्ति पाठ। ८ व विहाण । ६ स. चरण, ग परणंम् ।
वृत्तमौक्तिक - प्रयमखण्ड [ ५० ५.६ ३. गमनाङ्गणम् गण'मिहादी रचयत विरमित विनतानन्दन', मध्ये नियमविरहितं रविकृतयति कविवन्दनम्। गरपक्षकलितकलाक-नखमित वर्णविकासितं, गगनाङ्गणमिदं भवति फणिपतिपिङ्गलभाषितम् ॥ ५ ॥ यथा- मानस मिह मम कृन्तति कोकिलविरुतमकारणं, कलितशरासनसायकमतनुः कलयति मारणम् । मधुसमये कथमपि सखि ! जीवं निजमपि धारये, रुचिरमघुभिदमन्तरा क्षणमपि सोढुमपारये ॥ ६ ॥ इति गगनाङ्गणम् । ४.द्विपदी आदौ टगणसमुपरचितं तदनु च शरडगणसुविहितम् । गान्तं द्विपदीवृत्तं वसुपक्षकलं फणिपतिभणितम् ॥ ७ ॥ यथा- मम मानसमभिलपति सखि-कृतरासकेलिरसनायके । निजरुचिजितनूवनजलघर-मुरलीनादसुखदायके || " इति द्विपदी। ५. मुलगा'" प्रथममिह दशसु यतिरनु च तदवधि भवति, तदुपरि च मुनिविघुभिरत्र युक्ता । इति" हि विधियुगदला मुनिदहनकृतकला भुल्लमा भवति नमानियममुळMe पपा- करविधृतवंशरवकृतहृदय-चित्त भव गोकुलानन्दकररचिररासे। २. प. विरचित ३.ग. विनतानन्द । ४.ग. कविवाद । ५. प.हला ६. प. ममिति । ७. प. कपितमपि । ८. ग. सनी। भाषितम् । १... भालगा।
प०१०-
]
४. पद्मावती-प्रकरण
मम सविधमुपयासि मम वचनमनुपासि
वल्लवीरभिभूय जनितदासे' ।। १०॥
इति भुल्लणा।
१. ग. हासे ।
'हिप्पणी-श्रीकृष्णमट्टन वृत्तमुक्तावल्या द्वितीयगुम्फेऽस्य छन्दसः मुल्लण-उपमुरलण.
सुभुल्लन-प्रतिमुल्लमनाम भिश्चत्वारो भेदाः प्रदर्शितास्ते चात्राविकल समुध्रियन्ते-
प्रय भुल्लनच्छन्दः
यस्य चरणे सप्त पञ्चकलास्ततो द्वे कले तज् मुल्लन नाम । यद्यपि पञ्चकलभेदा अवि.
शेपेरणव गृहीतास्तथापि प्रतिगण द्वितीया कला परया कलया मिथितोजिकेत्यनुभव-
साक्षिकम् ।
यथा-
शेषपतगेशविबुधेशभुवनेशभूतेशसविशेषसुनिदेशधरणी,
कन्दलितसुन्दरानन्दमकरन्दरसमज्जनमिलिन्दभवसिन्धुतरणी।
ज्ञानमण्डनपरा कर्मखण्डनघरा शमनदण्डनपरा भूतिहरपी,
नित्यमिह वक्ति मुनिवृन्दमनुरक्तिमज्जयति हरिभक्तिरासक्तिकरणी ।। ६१ ।।
अष्टत्रिंशत् कल उपमुल्लम् । तस्मिश्चोपान्त्यो गुरुरन्त्यो लघुनियत ।
यथा-
चण्डभुजदण्डसदखण्डकोदण्ड(श)शिखण्डशरखण्डझरदण्डितविपक्ष,
पर्वभृतशर्वरीनायरुचिगर्वहरसर्वहृदखर्वसुखलीलनवलक्ष ।
दुष्टनररुष्टतरपुष्टनयजुष्टजनतुष्टमतिघुष्टचरितौषकृतिदक्ष,
तत्क्षरासमक्षकृतरक्षरएसपक्षगणलक्षितसुलक्षण जयेश गतलक्ष ।। ६२ ।।
क्लाद्वयाधिक्यन एकोनचत्वारिंशत्वलचरणमपि सभवति, तच्च सुभुल्लन नाम ।
यथा-
चूतनवपल्लवपायकलकण्ठबलमजुकलकोक्लिाकूजितनिदान,
माधुरीमधुरमधुपानमत्तालिकुलवल्लकीतारझटारसुखदानम् ।
चारुमलयाचलोद्यातपवमानजवजागरितचित्तभवसायकवितानम्,
पश्य सखि पश्य कुसुमाकरमुदित्वर मा क्लय मानसे मानमतिमानम् ॥ ३ ॥
चत्वारिंशत्कल प्रतिभुल्लनमपि स्वीकायम् ।
यपा-
कासकैलासमविलासहरहासमधुमाससविकाससितमारससमानत,
शारदतुपारकरसारधनसारमरहारहिमपारदविसारसमुदारमनि ।
बालकमृणालमृदुमालतीजालरुचिचालितविशालविबुधालयमरालतति,
राजमगराजवर राजते तव यशो राम सुरराजसुमभाजितसमाजनति ॥ ६४ ॥
वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [१० ११ - १६ ६. खञ्ज । नवजलधिकलमितगणमिह' समुपनय तदनु च कुरुत रगणमपि फणिभणितखञ्जके। इति विधिविरचितदलयुगमिह भवति निखिलभुवनगतवरक विजनहृदयसुखसञ्जके ॥ ११ ॥ पपा- निजतनुरु चिविजितनवजलधररुचि- विधृतरुचिरतर मुकुट हरिरिह मम हृदि भासताम् । मम हृदयमविरतमनुभवतु तव निजजनसुखवितरणरसिकचरणसरसिजदासताम् ॥ १२ ॥ इति खजा। ७. शिखा रसजलधिकलमुपनयत फणिरिति वदति सकलकविसखा हि । अपरदलमथ मुनिकृतमुभयमपि जगणविरतिगमिति ' भवति शिखा हि ॥१३ यया- विकचनलिनगतमधुरमधुकरकलरवमनुकलय सुकेशि ! हरिरिति विनमति चरणयुगमपि मयि कुरु हृदयमपरुपमति सुवेषि! ॥१४॥ इति शिखा। ८. माला जयनिधिकल मिह नवगणमुपनय तदनु च रगणमपि हि गुरुयुगमणमय कुरु पिङ्गलप्रोक्तम् । गायोत्तरार्द्धसहितं मालावृत्तं विजानीहि ॥ १५ ॥ यपा- अपितहृदय करयुगकृतवसन घसनहरण- परवरायुवतिकृतविनतिरभयमान्ततद्वासाः' (?)। तीरे कदम्बशाली वरवनमाली हरिः पायात् ।। १६ ।। इति यासा। 1 १. ग. कलमगुपनगरामिह । २. ग वर। ३. परिचितमिति । ४. ग. तम् । ५. गहदि पति।। ६. न. सिंह। ७. तित्रात:।
प०१७.२३ ४ पद्मावती-प्रकरण [ ३५ ६ चुलिमाला' यदि दोहादलविरतिकृत, शरकलकुसुमगणो हि विराजति । फणिनायकपिङ्गलरचित, चुलिमाला किल जातिपु राजति ।। १७ ।। पथा- क्षणमुपविश वनभुवि हरे, मम पुनरागमनाऽवधि पालय । उपयाता'मिह मम सखी', तामझे राधामुपलालय ।। १८ ।। इति चुलिमाला। १० सोरठा सोरठ्ठाख्य तत्तु फणिनायक भणित भवति । दोहावृत पतु विपरीत कविजनमवति ॥ १६ ॥ एपा- रूपविनिजितमार | सकलयादवकुलपालक जय जय नन्दकुमार | गोपगोपीजनलालक ! ॥ २० ॥ यथावा- गलकृतमस्तकमाल | भालगतदहन विराजित । जय जय हर ! भूतेश । शेपकृतभूषणभासित ॥२१॥ इति सोरठा ११ हाकति सगण भंगणनलघुयुत, सकल घरण प्रविचितम् । गुरुषेन च सर्व पलित, हापलिवृत्तमिद कथितम् ॥ २२ ॥ प्रथमद्वितीयचरणो रुद्रावय तृतीयतुर्यों च । दामों सक्लेषु च मात्रा वेदग्दमि प्रोक्का ।। २३ ।। ३ सग सती। ४ ग परासपा १. पूलीमाता। २ स. पाता। १. ग सगुण । ६ प्ररिरित।
वृत्तमौक्तिक - प्रपमखण्ड [ १० २४.२६ यथा- विकृतभयानकवेपकलं, चरणाङ्कितवरभूमितलम् । व्योमतलामलकम्बुगलं, नौमि विभूषितभालतलम् ।। २४ ।। यथा घा'- यमुनाजलकेलिपु कलितं, वनिताजनमानसवलितम् । सुरभीगणसवा च्चलितं, नौमि हृदा वलसम्मिलितम् ॥ २५ ॥ इति हाकलि। १२. मधुभारः डगणमवधेहि, जगणमनु देहि । मधुभारमाशु, परिकलय वासु ।। २६ ।। - यथा- उरसि कृतमाल, भक्तजनपाल । रुचिजिततमाल, जय नन्दबाल ॥ २७ ।। इति मधुभारः। १३. भाभीरः अन्ते जगणमवेहि, विधुयुगकला विधेहि। आभीरं परिशोभि, कविजनमानसलोभि ॥ २८ ॥ यथा- ब्रजभुवि रचितविहार, श्रुतिशतकलितविचार। यदुकुलजनितनिवास, जय भूतलकृतरास' ॥२६॥ इत्याभोरः। १.ग उपतञ्छ। २ ग संगात् । ३. ग. जय जय भुषि कृतरास ।
४. पद्मावती- प्रकरण प्रकरण प० ३.. [ ३७ १४. दण्डकला वेदडगणविरचितमनु 'च' टगणकृत मन्ते डगणद्वयविहित, गुस्कृतपदविरत कविजनसुमत दण्डकलास्यमिद विदितम् । वरफणिकुलपतिना विमलसुमतिना पक्षदहनकृतचरणकल, गगनेन्दुविराजित-योगविकासित-वेदावनिकृतयतिविमलम् ॥ ३० ॥ यथा- खरकेशिनिपूदन-विनिहतपूतन-रचितदितिजकुलबलदलन, बाणावलिमालित-सङ्गरपालित-पार्थविलोकितगुभवदनम् । कृतमायामानव-रणहतदानव-दुस्तरभवजलराशितरि, सुरसिद्धि-विधायक-यादवनायकमशुभहर प्रणमामि हरिम् ।। ३१ ॥ इति दण्डकला। कामकला यदि रस विधुमात्राणामन्ते विरतिर्भवेत्तदा संव। फामकलेति फणीश्वरपिङ्गलकथिता मता सद्भिः ॥ ३२ ।। यथा- कमलाकरलालितपदकमल निजजनहृदयविनाशित शमल, पीतवसनपरिभासितममल जितकम्वुमनोहरविमलगलम् । नाभिकमलगतविधिकृतनमन फणिमणिकुण्डलमण्डितवदन, नौमि जलधिशयमतिरुचिसदन दानवनिवहसमरवृतकदनम् ।। ३३ ।। इति कामकला. १६ धिरा सप्तचतप्कलकलितसक्लदल-मन्त्याहितकुण्डलरुचिरा। न कुरु पयोधरमिह पणिपतिवर-भणितमिद वृत्त रचिरा ॥ ३४ ॥ पपा- कस्य तनुमंनुजस्य सितासित-सङ्गममधिविधित पतिता। यस्य कृते परभोरु विपीदसि मिहिरातपनिहितेच ससा ॥३॥ इति हषिरा १.ग. तनु । २'घ मारित । ३.ग विरचित । ४ ग. सिवा ७ हरपपिमानित। ८॥ विधिनेव।
३८ ] वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [५०३६-४१ प्रथया- पथा४... १७. बोपकम् डगणं कुरु विचित्र- मन्ते जगणमत्र। मध्ये द्विलमवेहि', दीपकमिति विधेहि ।। ३६ ।। यथा- शेषविरचितहार, पितृकाननविहार । जय जय हर ! महेश, गौरीकृतसुवेप ! ॥ ३५ ॥ तुरंगकमुपधाय, सुनरेन्द्र मवधाय। इति' दीपकमवेहि, घु मन्तमधिधेहि ।। ३८ ॥ क्षणमात्रमतिवल्गु, जगदेतदतिफल्गु । धनलोभमपहाय, नम पद्मनयनाय ॥ ३६॥ इति दीपकम् । १८ सिंहविलोकितम् सगणद्विजगणविरचितचरणं, चरणे रसभूमिकलाभरणम् । फणिनायकपिङ्गलभणितवरं, वरसिंहविलोकितहृदयहरम् ।। ४० ।। हतदूपणकृतजलनिधितरणं, रणभुवि कृतदानवकुलमरणम् । रणरणितशरासन भङ्गकर, करकलितशिरो नम देववरम् ॥४१॥ इति सिंहविलोकितम् । १. ग. विकलमहि । २. ग, सुनवेन्द्र । ५. ग.'रण' नास्ति। ६ ग.वासन । ग. ममा यया- । ४, ग. उव ५.४२ - ४६ ४. पद्मावती- प्रकरण [३९ १६. प्लवङ्गमः आदावादिगुरु कुरु पट्कलभाषितं, [पञ्चकलं तदनु च डगणं विभूपितम् । अन्ते नायकमथ रचय गुरुविकासितं] वृत्तमिदं प्लवङ्गममहिपतिसुभाषितम् ॥ ४२ ॥ यथा- कुञ्चितचञ्चलकुन्तलकलितवराननं, वेणुविरावविनोदविमोहित 'काननम् । मण्डलनायकदानवखण्डनषण्डित, चिन्तय चण्डकरोपमकुण्डलमण्डितम् ।। ४३ ।। इति प्लवङ्गमः। २०. लीलावती लघुगुरवर्णरचित-नियमविरहित-वसुडगणकृत-चरणविरचिता, सगणद्विजवर-जगण-भगण-गुरुयुगकृतपदमतियमकसुकथिता। लीलावतिका पक्षदहनकृतकला वरकविजनहृदयमहिता, विरचितललितपद-जनहृदयकृतमद-फणिनायकपिङ्गलमणिता ।। ४४ ।। यथा- गुजाकृतभूपणमखिबजनहतदूषणमधिकतरासकलं, करयुगधृतमुरलिं नवजलधर नील वृन्दावनभुवि चपलम् । हतगोपीमान नारदकृतगान लीलाबलदेवयुतं, स्मर नन्दतनूज सुरवरकृतपूजं मम हृदयमुनिजननुतम् ।। ४५ ॥ तिमीसावती। २१[१] हरिणीतम् पणे प्रथम विरचय ठगण तदनु टगणविराजित, रचय शरकल तदनु दहनमिठमन्ते गुरुविकासितम् । वसुपक्षकमाक पविजनससदि हृदयसुखदायक, हरिगीतमिति पृत्तमहिपतिकविनृपतिजल्पितनायकम् ॥ ४६॥ १. कोरठातर्गतोय पाठः न.प. प्रतावेवास्ति । पाटेस्मिन् पञ्चास-सपो. विधाम स्यते तार तरंगसमावि र 'पषमस परमत गमा पहिरिए पति प्रियपात्। (स.) २. प.विमोदिता २ मपनजसपर।
४०] पत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [१० ४७.४८ यथा- रचय कदलोदलनवशयन कमलदलावलिमालित, वीजय मृदुपवनेन घनाघनसुन्दरविरहदालितम् । अङ्गकमपि धनसारविराजितचन्दनरचनलालित, कुरु मम वचनमानय कमलाननवनमालिनमालि तम् ॥ ४७ ॥ इति हरिगीतम् २१. [२] हरिगीत[कम अन्ते यदि गुरुयुगकृतचरण नून भवेदिद हि तदा । हरिगीतकिमिति फणीश्वरपिङ्गलकथित विजानीत ।। ४८ ॥ यथा- उरसि विलसिता'ऽनुपमनलिनकृतमधुकररुतयुतवनमाल, मुनिजनयमनियमादिविनाशकसकलदनुजफुलविकरालम् । १ ग विशलता। 'टिप्पणी-थीकृष्णभट्टे न वृत्तमुक्तावल्या द्वितीयगुम्फे 'हरिगीत' वृत्तस्य अनुहरिगीत मन्द्रहरि- गीत लधुरिगीतञ्चेति त्रयो भेदा स्वीकृतास्ते यथा- 'अन्त्यगुरुमात्रेण हीन अनुहरिगोतम । यथा - नवकोकिलाकुलललितकलकलकलितजागरकाम मतिधीरमलयसमीरघोरणिवलितमधुकरदाम । सखि भूरिकुसुमपरागपूरितकुञ्जमञ्जुलधाम, परिपश्य मानिनि मधुदिन रमणेन सन्तनु साम ॥ ४ ॥ यदा तु अनुहरिगीतस्यादौ कलाद्वय वी ते तदा मन्द्र (हरि)गीत उत्प्रेक्षित भवति । यथा- जलधरधामधारण मोहतारण भवनिवारणशील, मधुमुरनरकगञ्जन दुरितभजन नयनरजनलील । त्रिभुवनभव्यभावक निजजननायक कलितपावकपान, जय रसकेलिभाजन सुरभाजन कृतसभाजनमान ।। ५०॥ अथ कलाद्वयह्रामे लघुहरिगीतम ! यथा-- मल्लिकानवमल्लिकासुमल्लिकारसपीन, मालिकानवमालिकाकमलालिकामधुलीन । सोऽधुना विकरालकालकलाकुलोद्यत एव, कुन्दकाननकौतुकी मा घाव मधुकरदेव ॥५१॥"
१० ४६.५४ ] ४. पद्मावती-प्रकरण [४१ मुरलीरव'-मोहनमनु-मोहितनिखिलयुवतिजन -कृतरास, विलसतु मम हृदि किमपि गोपिकाजनमानसजनितविलासम् ।। ४६ ।। इति हरिगीत[क]म् । २१ [३] मनोहर हरिगीतम्। इयमेव यदि विरामे गुर्वन्त शरकल भवति । नयत्येन कवीन्द्रवसुपक्षकल मनोहर कथितम् ॥ ५० ॥ एतदनुसारेण पाठान्तर यथा- उरसि विलसितानुपमनलिनकृतमधुकररुतयुतमाल, मुनिजनयमनियमादिविनाशकसकलदनुजकुलकालम् । मुरलीरवमोहनमनुमोहितनिखिलयुवतिकृतरास, विलसतु मम हृदि किमपि गोपिकामानसजनितविलासम् ।। ५१ ।। इति मनोहर हरिगीतम् २१ [४] हरिगीता रन्ध्रर्मुनिभि सूर्यं कृतविरतिर्भाविता कविभि । इद(य)मेव हि हरिगीता फणिनायकपिङ्गलोदिता भवति ॥ ५२ ।। पचा- भुजगपरिवारित-वृषभधारित-हस्तडमरु विराजित, कृतमदनगञ्जन मगुभभजन-सुरमुनिगणसभाजितम् । हिमकरणभासित-दह्नभूपित-भालमुमया सङ्गत, धृतवृत्तिवाससममलमानसमनुसर सुखदमग तम् ॥ ५३ ।। इति हरिणीता। २१ [५] अपरा हरिगीता इयमेव वेदचन्द्र कृतविरतिर्माविता कविमि । पितृचरणरतिविशदा पिङ्गलयियतायुदाहृता स्पुटत ॥ ५४ ।। साहरण यपा- सखि ! वभ्रमीति मनो भृग जगदेव पूयमवेक्ष्यते, परिभिद्यते मम हृदयमर्म न दशमं सम्प्रति वीक्ष्यते । १. ग दर. २ ममा ३ ग 'मन मास्ति। ४. ग तो पदसोश्य सानो दाहरणे मत । ५. ग प्रतो नारयुराहरणमाम् ।
४२ यतमौक्तिक-प्रथमसण्ड [५० ५५ ५६ परिहीयते वपुपा भृश नलिनीव हिमततिसङ्गता, नुदती वने' वदतीति सा सुदती रतीशवरागता ।। ५५ ।। इस्यपरा हरिगीता। २२ विभङ्गो प्रथम दशसु च यतिरनु च वसुषु यतिरथ च तदधिकृति-रस कथित, शेपे गुरुगदित त्रिभुवनविदित जगणविरहित जगति हितम् । वसुडगणकृतचरण-मधिकसुखफरण-सकलजनशरण मतिसुमति , वदतीति विभङ्गीमिह निरनङ्गीकृतरतिसङ्गी फणिनृपति ।। ५६ ।। यथा- वरमुक्ताहार हृदि कृतभार विरहितसार कुरु मुपित, छादय विधुविम्ब न कुरु विलम्ब हर निकुरुम्ब कमलकृतम् । जाहि मलयजपवन लघु लघुवहन तनुकृतदहन मोहकर, मम चित्तमधोर रदजितहीर यदुवरवीर याति परम् ।। ५७ ।। इति त्रिभङ्गी। २३ दुर्मिलका यनाऽप्टी डगणा कविसुखकरणा प्रतिपदगुम्फनललितयुता गगनावनिरचिता वसुषु च कथिता यत्र वेदविधुयतिरुरिता । द्वात्रिंशन्माना स्युरतिविचिनाश्चरणे यस्मिन् कविगणिता जनहृदि सुखदात्री वुद्धिविधात्री सा दुर्मिलका फणिभणिता ॥ ५८ ।। पथा- हैयङ्गवचोर नन्दकिशोर तन्दुलकणरुचिसमरदन, धनकुञ्चितकेश मञ्जुलवेष विजितमनुजसुररुचिसदनम् । अपरिस्फुटगदन दधियुतवदन नौमि दितिजवरशकटहर, मुक्ताभूपालकमद्भुतबालकमखिलमुनिजनहृदि सुखकरम् ॥ ५६ ॥ इति दुनिलका। ३.कपथ । १ 'रुदती पर' इति पाठ पिङ्गलप्रदीपे। २ ग नास्ति । नास्ति। ५ 'मुक्ताभूषालकमदभुतबालकमृषिजनहृदपे सौस्यकरम' इति पाठे श्रुतिकटुत्व- दोपनिवृत्ति स्यात (स)
प०६०.६२]
४. पद्मावती
[४३
२४. होरम्
आदिगयुत-वेदलयुत-नागरचितपट्कलं,
वह्निगदित-लोकविदितमन्त्यकथितमध्यकलम् ।
भाति यदनु-पादमतनु-कान्तिसुतनुसङ्गत,
होरमहिपवीरकथितमीदृगखिलसम्मतम् ॥ ६ ॥
यया-
चन्द्रवदन-कुन्दरदन-मन्दहसनभूपणं,
भीतिकदन-नीतिसदन'-कान्तिमदनदूपणम् ।
धीरमतुलहीरवहुलचीरहरणपण्डित,
नौमि विमलघूतकमलनेनयुगलमण्डितम् ॥ ६१ ।।
यया वाऽस्मतातचरणानाम्-
पाहि जननि ! शम्भुरमणि ! शुम्भ'दलनपण्डिते !
तारतरलरत्नखचितहारवलयमण्डिते ।
भालरुचिरचन्द्रशकलशोभि सकलनन्दिते' !
देहि सततभक्तिमतुलमुक्तिमखिलवन्दिते ! ॥ ६२ ।।
इत्यादिमहाकविप्रबन्धेषु शतशः प्रत्युदाहरणानि ।
इति हीरम् ।
१ ग.नास्ति।
२. ग.शम्भु।
३. ग कलशोभि। ४. ग. सकलसनन्दिते।
*टिप्पणी-वृत्तमुक्तावल्यां द्वितीयगुम्फे 'होर'वृत्तस्य सुहीर होर लघुहीरक परिवृत्तहीरक-
चेति चत्वारो भेदा निवदास्तेऽत्र प्रदर्यन्ते-
प्रतिपट्कल यत्या रहित सुहीरम् ।
यपा-
रासललित लासकलितहासवलितशोभन,
लोक्सक्लयोक्शमलमोक्मसिललोमनम् ।
जातनयनपातजनितशातमुदितभारम,
भाति मदनमानक्दनमीशवदनसारसम् ॥ ५५ ॥
यया-
प्रतिपटक्स यत्या सहित होरम् ।
सजनवरगञ्जनकरमजनरचिराजित,
वामदभिराममतिसलामरतिसभाजितम् ।
नीलकमलगोलमुदितकोलविरहमोचन,
जातिकुटिलपाति. मुदति भाति तव विलोचनम् ॥ ५६ ॥
४४ ] वृत्तमौक्तिका - प्रथमखण्ड [ ५० ६३.६४ २५. जनहरणम् गगन विधुतिमहित-वसुजयतिसहित- मनु वसुजविहितचरणयति, कुरु मुनिमुनिगणकल'-विगत सकलमल- वरसगणबहुलपदविरतिम् । वसुडगणकृतचरण सकलसुखकरण- मधिकरुचिधरणकविशरण, फणिवरनपतिरचित-निखिलमनुजहित- सकलगुरुरहितजनहरणम् ॥ ६३ ।। यथा- वरजलनिधिजलशय निरुपमरुचिचय सुरगणहतभय गतकुमते, बहुदितिसुतकुलहर निजजनसुखकर सुरमुनिगणवरकृतसुमते । अमलकनकसुवसन कटिधृतसुरसन कुसुमनिभहसन सुखकरण, तव भवतु पदकमलमधिकतरविमल सुखद शुभयुगल भवतरणम् ।। ६४ ।। इति जनहरणम् । १ प्रत्र मुनिगणो विप्रगणपर्याय (स.)। २. ग. गलित। अत्र पटकलस्य सर्वलघुत्वे, तुर्याक्षरस्यैव गुरुत्वे वा छन्दोऽन्तरमुप्रेक्षित भवति । तञ्च लघुहीरक परिवृत्तहीएफ चेति व्यवहत्तव्यम । द्वयमपि यथा-- विरहगरलभरिततरल कुटिलसरसलोचना, चरणनखरकलितमदनयुवतिमदविमोचन।। अमल कमल रजनिरमणमुकुरविलसितानना, स्वमिह जयसि सुतनु किरणवलितसकलकानना ।। ५७ ।। विलसदङ्ग रुचितरङ्ग ललितरङ्गरजिनी, लसदपारपटिमभारमदनदारगजिनी। सक्लयामसुखदवामतरललामलीलना, जयसि नामहृदभिरामरतिनिकामशीलना ।। ५८ ॥
प०६५-६७] ४ पद्मावती-प्रकरण [ ४५ २६ मदनगृहम प्रथम द्विल' सहित वरगुरुमहित विरती विमलसकल-चरणे श्रुति-सुखकरणे, नवडगणविकासित मध्यविराजित- जनशुभदायकदेहघर पणिमणितवरम् । गगनावलिकल्पित-वसुमितजल्पित- वेदविधूदितयतिसहित यसुपतिमहित, गगनोदधिमात्र भवति विचित्र मदनगृह पवनविरहित' सकलकविहितम् ।। ६५ ।। यथा- सुरनतपदकमल हतजनशमल वारिजविजयिनयनयुगल वारिद"विमल, दितिसुतकुलविलय कमलानिलय क्ल करयुगलकलितवलय केलिपु सलयम् । चन्द्रकचित'-मुकुट विनिहतशकट दुप्टकसहृदि बहुविकट मुनिजननिकट, गतयमुनारूप कृतबहुरूप नमतारुढहरितनीप'' श्रुतिशतदीपम् ।। ६६ ।। यथा वास्मपितु शिवस्तुतो- करकलितकपाल धृतनरमाल भालस्थानलहुतमदन कृतरिपुकदन, भवभयभरहरण'"गिरिजारमण सकलजनस्तुतशुमचरित गुणगणभरितम् । कृतफणिपतिहार त्रिभुवनसार दक्षमखक्षयसक्षुब्ध रमणीलुब्ध, गलराजितगरल गङ्गाविमल लाशाचलघामकर प्रणमामि हरम् ॥ ६७ ।। इति प्रत्युदाहरणम् । इति मदनगृहम् । १ ग दिजसहितम् । २ गहमला ३ ग प्रति । ४ महितमा 'वसुतिमाहित नास्ति। ६ पवनविरहित मदन गृह' इति पाठात अतिशेषनिरास स्यात। (स.) ७ ग वारिज। ८ग दरकर। हरितानोपम् । ११ ख ग भवभवभयहरणम् । १२ , सोपहितम्।
वृत्तमौक्तिक- प्रथमखण्ड
[५०६८.६६
२७ मरहट्ठा [महाराष्ट्रम्]
प्रथमं कुरु टगणं पुनरपि डगण शरपरिमितमतिशोभि,
शेषे कुरु हार लघुमथ सार कविजनमानसलोभि ।
गगनेन्दौ विरतिं तदनु वसुतिं पुनरथ विधुयुगलेऽपि,
मरहट्ठावृत्ते कविजनचित्ते नवयुगरचितकलेऽपि ।। ६८ ।।
पथा-
गविलिभासुर हतकंसामुर भुवि कृतविमल विलास,
मुरलीभासितकर वृपभामुरहर वरतरुणीकृतरास' ।
दावानलवालक गोधनपालक हिमकरकरनिमहास,
कृपया कुरु दृष्टि मयि सुखवृष्टि मुनिहृदि जनितविकास ॥ ६६ ।।
इति मरहट्ठा।
इति श्रीवृत्तमौक्तिके पात्तिके चतुर्थ पद्मावतीप्रकरणम् ।
१. गहास ।
२. ग. मिहकर।
३. ग. मास्ति।
पञ्चमं सक्या-प्रकरणम् प्रय सदया' सप्तभकारविभूपित पिंगलभापितमन्तगुस्पहित', अन्यदथापि तथव भभूपितमन्तगुरुद्वयसविहितम् । अप्टसकारमयो गुरुसङ्गतमेतदथान्यदपि प्रथित, सप्तजकारविराजितमन्त्यलघु गुरु मासितमन्यदिदम् ॥ १॥ अन्यदिद मुनिनायकभापितमन्त्यलघु गुरुयुग्मसुयुक्त, योगचतुप्कलपूजित] मन्यदिद युगाह्नकलाभिरमुक्तम् । पण्डितमण्डलिनायकभूपतिमानसरज्जनमद्भुतवृत्त, सर्वमिद सवयाभिधमुक्तमशेषकवीन्द्रविमोहितचित्तम् ॥२॥ प्रयतेषां भेदाना नामानि मदिरा मालती मल्ली मल्लिका माधवी तथा । मागघीति च नामानि तेपामुक्तान्यशेपत ।। ३ ।। प्रमेणोदाहरणानि". यथा- १ मदिरा सवया भालविराजितचन्द्रकल नयनानलदाहितकामवर, बाहुविराजितशेषफणीन्द्रपणामणिमासुरकान्तिपरम् । भूधरराजसुतापरिमण्डितसण्डित नूपुरदण्डधर, नोमि महेशमशेपसुरेशविलक्षणवेपमुमेश' हरम् ॥ ४ ॥ इति मदिरा सधया। २ मालती सवया चन्द्रपचारुचमत्कृतिचन्चलमौलिविलुम्पित-''चन्द्रक्शिोभ, वन्यनवीनविभूषणभूषितनन्दसुत वनिताधरलोभम् । धेनुकदानवदारणदक्ष-दयानिधिदुर्गमवेदरहस्य नोमि हरि दितिजावलिमालित'" भूमिभरापनुद सुयशस्यम् ॥ ५॥ इति मालती सदया। १ ग सर्वापा। २ । पिहितमा ३ य ग सप। ४ग मुनि । ५ कोष्टक. गो नास्तिक प्रतो । ६ ग सारसमुक्तम् । ७ ग तास कमेगोराहरणानि । गतहपथा प्रतो 'सतिसाम्दोक। १० ग मुग पित. जिता १२ गरितिमावलिभारित।
४८] वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [प०६.१० ३ मल्ली सवया गिरिराजसुताकमनीयमनङ्गविभङ्गकर गलमस्तकमाल, परिधूतगजाजिनवाससमुदतनृत्यकर विगृहीतकपालम् । गरलानलभूपित दोनदयालु मदभ्रमरोद्धत'-दानवकाल, प्रणमामि विलोलजटातटगुम्फितशेप' क्लानिधिलालितमालम् ।। ६ ।। इति मल्ली सवया। ४ मल्लिका सवया धुनोति मनो मम चम्पककाननकल्पितकेलिरय पवन कथामपि नैव करोमि तथापि वृथा कदन कुरुते मदन । कलानिधिरेष बलादयि | मुञ्चति वह्निकलापमलीकहिम विधेहि तथा मतिमेति यथा सविधेन पथा व्रजभूममि ।। ७ ।। इति मल्लिका सवया। ५ माघषी सषया विलोलविलोचनकोणविलोकित मोहितगोपवधूजनचित्त , मयूरकलापविकल्पितमौलिरपारकलानिधिघालचरित्र । करोति मनो मम विह्वलमिन्दुनिभस्मितसु दरकुन्दसुदन्त , सखीमिति' कापि जगाद हरेरनुरागवशेन विभावितमन्त ॥८॥ इति माधयी सधया। ६ मागधी सवया माधव विद्युदिय गगने तव कलयति पीतवसनमभिरामम्, जलधरनीलगगनपद्धतिरपि तव तनुरुचिमनुसरति निकामम । इन्द्रशरासनमपि तव वक्षसि भासितवरवनमालाशोभ [कुरु मम वचन सफलय हृदय राधाधरमधुविरचितलोभम्'] || || इति मागधी सवया। उक्तानि सवयाख्यानि छन्दास्येतानि कानिचित् । ऊह्यानि लक्ष्यमालोच्य शेषाणि निजबुद्धित ।। १०॥ ३ ग मागघ । १ ग मदोधक। २ ग सखीरिति । प्रतो नास्ति । ५ ग मालोक्य । ४ चतुथचरण क ५० ११-१२] ५ सवया-प्रकरण [ ४६ ७ घनाक्षरम्' रसभूमिवर्णयतिक' तदनु च शरभूमिविरतिक यत्तु । विधुवह्निवर्ण सङ्गतमिदमप्रतिम घनाक्षर वृत्तम् ॥११॥ पया- रावणादिमानपूर-दूरनारानेति वीर राम किं विशालदुर्गमायाजालमेव ते, मैथिली विलासहास धूतसिन्धुवासर(रा)स भूतपतिशरासनभङ्गकर' भासते । दीनदु खदानसावधान पारावारपार'. यान-बीरवानरेन्द्रपक्ष किं महामते ', ते रणप्रचण्डबाहुदण्डमेव हतुमत्र वाणदावदग्धशत्रुसनिवा प्रकुर्वते ॥ १२ ॥ इति घनाक्षरम। इति तमौक्तिके घात्ति पञ्चम सथया' सरणम् । १ गतापापा। ५ गातारा THANI वायत ३ परमनु | ४ . पुिगों पहो। ७ ग पारागन' पप्ठं गलितकप्रकरणम् यया- अथ गलितकानि- १. गलितकम् शरकल पञ्चपरिमित जलधिकलयुग प्रविलसति यस्मिश्चरणे लघुगुर्वनुगम्'। विधुयुगकलारचितमहिपतिफणिकलितकं वरकविजनमानसहर' भवति गलितकम् ॥ १॥ मल्लि'-मालतियूथिपङ्कजकुन्दकलिके, कुमुदचम्पककेतकिपरिमलबलदलिके' । मलयपर्वतशीतल त्वयि जातपवनः, हरिवियोगतनोरिय मम कथं दहन. ॥ २॥ इति गलितकम् । २ विगलितकम् ठगणद्वय भवति चतुष्कलद्वयसङ्गत तदनु च शरकल भवति सुललितकविसम्मतम् । दहनपक्षकलाविलसितविमलसकलचरण, विगलितकमेतत् फणिपतिमधिकसुखकरणम् ॥ ३ ॥ यथा- भवजलधितारिणि' सकलतापहारिणि गङ्गे, अघदहनकारिणि रुचिधारिणि हरकृतसङ्गे। गिरिनिकरदारिणि मनोहारिणि तरलभङ्गे, स्वपिमि वारिणि हसहारिणि तव विलसदङ्गे ॥ ४ ॥ इति विगलितकम्। ३. सङ्गलितकम् डगणयुगेन विराजित, पञ्चकलेन सभाजितम् । सङ्गलितकमिति कल्पित, फणिपतिपिङ्गलजल्पितम् ।। ५॥ १. ग. गुर्वतुगः । २. ग मानसहर तवति । ३ ग. मल्लिका। ४. ग कुन्दधम्पकके परिमलवस्लिके । ५. स टगणद्वयम् । ६. प. भवजलषिर्तरणि ।
प० ६.१०] ६. गलितक -प्रकरण [५१ यथा- धृतिमवधारय मानसे, हरिमपि' गततनुरानशे। सखि 1 तव वचनं मानये, ननु वनमालिनमानये ॥६॥ इति सङ्गलितकम् । ४, सुन्दरगलितकम् ठगणद्वयेन भापित, लादित्रिकलविकासितम्। सुन्दरगलितकनामकं, वृत्तममलरुचिधामकम् ॥ ७ ॥ विगलितचिकुरविलासिनी, नवहिमकरनिमहासिनीम् । सुबलराधिकान्तामये', तनुजितकनकां कामये ॥ ८ ॥ इति सुन्दरगलितकम् । ५. भूषणगलितकम् ठगणद्वितय प्रथम चरणे, रसभूमिसुसख्यकलाभरणे। निकलद्वितय पुनरेव यदा, फणिभाषित-भूपणकेति तदा ॥६॥ रुचिरवेणुविरावविमोहिता द्रुतपदाः तरासरस. हिता । हरिमदूरवने हरिणेक्षणा स्तमनुजग्मुरनन्यगतेक्षणाः ॥१०॥ इति भूषणगलितकम् । ६. मुलसितकम् पट्कलं प्रथममय वेदनिकलयुत, पुनरपि यच्चरणरोपगतवलयचितम् । पपा- . १. ग.हरिमपगत। २.ग दिसापितम्। ३. ग. सुपसिरापिताम्। ४.ग.रा। ६.गक्षणम्।
५२ ] वृत्तमौक्तिक-प्रथम [ ५०११-१६ गगनपक्षकलाकृतचरणविकासित, मुखालितकमिद वरफणिपतिभापितम् ॥ ११ ॥ यंपा- - यथा- ब्रह्म भवादिकनुतपदपङ्कजयुगल, नाशितभकहृदयमतदारुणशमलम् । दीनकृपानिधि-भवजलराशितारक, नौमि हरि कमलनयनमगुभदारकम्' ॥ १२॥ इति मुखगलितकम् । ७. विलम्बितमलितकम् आदी पट्कल तदनु चान्तगेन सहित, जलनिधिकलचतुष्कमहिनायकेन विहितम् । समगणे जगणेन सहित फणीन्द्रभणित, विलम्बिताख्यमेतदखिलसुकवीन्द्रगणितम् ।। १३ ॥ नमामि पङ्कजानन सकलदु खहरण, भवाम्बुराशितारक निखिलवन्धचरणम् । कपोललोलकुण्डल' व्रजवधूजनसहित, विलासहासपेशल सरसरासमहितम् ॥ १४ ।। इति विलम्बितगलितकम । ८ [१] समलितकम् डगणविभूष प्रथममवेहि पञ्चकलयुगयुत', तदनु चतुष्कलयुगसहित विरतो लगुरुमहितम् । शरयुगमात्रासहितमनुत्तपिङ्गलभाषित, समगलितकमिदमतिसुखकरसुललितपदभासितम् ॥१२॥ निखिलसुरगणविनुतपङ्कजकोमलचरणयुगल, पीतवसनविलसितशरीरमनुत्तमकम्युगलम् । नौमि निगमपरिगदितमपारगुणयुतमिन्दुमुख, नन्दतनूज निखिलगोपवधूजनदत्तसुखम् ॥ १६ ।। इति समलितकम् । यथा- १ गदायकम् । २ प रहितम् । ३ ग गदितम् । ५ ग कुञ्ज । ६ ग ज्यूतम् । ७ ग सघगुरुसहितम् । ४. ग .धो चरणम् । -- २०१७ -२२] ६. गलितक-प्रकरण [५३ [२]. अपरं समालितकम् समगलितक प्रभवति' विषमे यदि डगणत्रिकलाभ्या कलितकम् । मुखगलितक समचरणे किल भवति निखिलपण्डितमुखवलितकम् ॥ १७ ॥ यथा- ८ विभूतिसित शिरसि निवसिता -नुपमनदीभवपङ्कजविलसितम् । अहिप-रुचिर किमपि विलसिता' मम हृदि वेदरहस्यमतिसुचिरम् ।। १८ ॥ इति द्वितीय समलितकम् । ८ [३] प्रपर सीलतकम् विपरीतस्थितसकलपदयुतमेव समगलितक सङ्गलितकम् ॥ १६ ॥ विपरीतपठितमिदमेवोदाहरणम् । यथा- शिरसि निवसिता नुपमनदीमव-पङ्कजविलसित विभूतिसितम् । किमपि विलसिता मम हृदि वेदरहस्यमतिसुचिर अहिप-रुचिरम् ।। २० ।। इति द्वितीय सङ्गलितकम् । [४] अपर लम्वितागलितकम् शरमित डगणे स्याद् भाविता" निखिलपादे विषमजगणमुक्ता चान्तगा "विगतवादे । युगयुगकृतमात्राः कल्पिता" यदनुपाद, फणिपतिर्माणतेय लम्विता त्यज विपादम् ।। २१ ॥ राजति वशीरुतमेतत् पाननदेशे, गच्छति वृष्णे तस्मिनथ मन्जुलक्शे। याहि मया सादमितो रासाहितचित्ते, तत्सविधे प्रेमविलोले तेन च विते"॥२२॥ इति रितीय लम्बितागलितकम् । ६ शिक्षिप्तिकागलितकम् दारोदितकलो यदि भाति" गणो विषमस्थितियुत समस्थित (ति)विभूपितेन तदनु चतुप्पलेन युत । पपा- १. । 'समलित' मास्ति, भवति च । २. ग. सतितरम् । ३ ग मुलपतिसकम् । ४.ग निवासिना। ५.ग फपिर। ६ प. विमतता। ७ ग.मास्ति विलासिता १.५ ग. फणिप। १.. भाषिता ११ ग पारतमाक्तिवाद। १२. ग रस्सिना १३. परक्षित १४...भावित ५४] वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [१०२३-२८ शरोदितगणः परिभावितसकलचरणः सहिता', कवीन्द्रकथितान्तगुरुः किल विक्षिप्तिका महिता ॥२३॥ यथा- पषा- चन्द्रकचितमुकुटमखिलमुनिजनहृदयसुखकरणं, धृतवेणुकलं वरभक्तजनस्याद्भुतं शरणम् । वृन्दावनभूमिषु वल्लवनारीमनोहरणं, रुचिरं निजचेतसि चिन्तय गोवर्द्धनोद्धरणम् ॥ २४ ॥ इति विक्षिप्तिकागलितकम् । १०. ललितागलितकम् पूर्व कथिता विक्षिप्तिकव चरणसुकलिता, ठगणे' चतुष्कलेन भूषिता प्रभवति ललिता ॥ २५ ॥ कमलापति कमलसुलोचनमिन्दुनिभाननं, मञ्जुलपरिपीतवाससमपारगुणकाननम् । सनकादिकमानसजनितनिवाससमस्तनुतं, प्रणमामि हरि निजभक्तजनस्य हिते निरतम् ॥ २६ ।। इति ललितागलितकम् । ११. विधमितागलितकम् पूर्व द्वितीयचरणे विपमस्थितिकपञ्चकल:, तुर्ये तृतीयचरणे प्रथम भवति चतुष्कलः । सकले समस्थित (ति)वेदकलो विरती विरचिता, या(यो)गेन शरोक्तगणेन च सा भवति विपमिता ।। २७ । पथा- येणु फरे' कलयता ससि ! गोपकुमारकेण, पीताम्बरावृतशरीरभृता भवतारकेण । प्रेमोद्गतस्मितरुचा वनजभूषणशोभिना, चेतो ममाऽपि कवलीकृतं मानसलोभिना ।। २८ ।। इति विपमितापलितकम् । १. प. साहिताः। २. ग. गुरु । विशिप्ति: कविता । ६. गगन । १०. ग वेणुहरे। ३. ग. महिताः। ४. प. धरणम् । ५.ग. ७. ग. तुपं। ६. ग. कली। १.ग. सागेन।
प० २६-३३ ] ६ गलितक-प्रकरण [ ५५ १२ मालागलितकम् पट्कलविरचित तदनु च दश'-सख्यडगण- परिभावितचरणमुदेति मालाभिध गलितकम् । मध्यगुरुजगणेन विरचितसमस्तसमगण- रसोदधिकलकमहीन्द्रफणिवदने' वलितकम् ।।२६।। यथा- कालियकुलविभञ्जक-मसुरविडम्बक-दनुजविलुम्पक- मखिलजनस्तुतशुभचरितमुनिनुत, नौमि विमलतर सकलसुखकर कलिकलुपहर, भवजलधितरि हरिं पालने सुनियतम् । क्सहृदि विक्ट मुनिगणनिकट विनिहतशकट परिघृतमुकुट जगद्विरचनेऽतिचतुर, भक्तजनशरण भवभयहरण वरसुखकरण स्वपदवितरण जगनाशने धृतधुरम् ॥ ३० ॥ इति मालासितकम् । १३ मग्पमालागलितकम् मालाभिख्यमेव हि भवति चतुप्कल- युगरहित फणिपविन्न' मुग्धपूर्वम् ॥ ३१ ॥ वन्दे नन्दनन्दनमनवरत मरकत सुतन धृतरुचि मुरारिमा(मी)श, वादितवशमानतमुनिजन-नारदविरचितगानमवनोमणीमनीपम् । कारितरामहासपरवशरत विरचितसुरत विततकुडकुमेन पीत, त देव प्रमोदभरसुविदित मुदितसुरनुत सततमात्मजेन गौतम् ॥ ३२ ॥ इति मुग्घमालागलितकम्। १४ उद्गलितकम मुग्धपूर्वकमेव दगणयुगलेन रहितपदमुद्गलितकम् ।। ३३ ।। यथा- यथा- नन्दनन्दनमेव कलयति न किञ्चिदिह जगति सारमपर, पुत्रमित्रक्लत्रमखिलमपि चित्रघटितमिव भाति न परम् । - १.ग पारसत्य। २. फणिपक्षनंद ३. महपमुराहरण उदाहरण नास्ति । ४ ॥ मायामासासिताम् । ५ ग मासाभितरपमेव । गपिता बाहर, बाहरण मास्ति। ८ । सागानुसारावरविमिराहरगमूहाम्, उगाहरण मारित। ७ गया ५६ ] वृत्तमौक्तिक - प्रथमखण्ड [५०३४ . ३६ सावधानतयैव लवमपि मन परमचलमिद न विदित भावयन्तु दिवानिशमनिमिपमात्मनि परमपद प्रमुदितम् ।। ३४ ॥ इत्युद्गलितकम् । एव गलितकादीनि वृत्तान्युक्तानि कानिचित् । लक्ष्याणि लक्ष्यमालक्ष्य शेपाणि निजवुद्धित ' ॥ ३५ ॥ इति पलितक-प्रकरणं षष्ठम् । [ ग्रन्थकृत्प्रशस्तिः] र ध्रसूर्याश्वसरयात मानाच्छन्द इहोदितम् । सप्रभेदवसुद्वन्द्वशतद्वयमुदीरितम् २८८ ॥ ३६ ॥ सोदाहरणमेतावदस्मिन्खण्डे मयोदितम् । प्रस्तारसरयया तेपा भापणे पिङ्गल क्षम ॥ ३७ ।। श्रीचन्द्रशेखरवृते रचिरतरे वृत्तमौक्तिकेऽमुप्मिन् । मामावृत्तविधायक्खण्ड सम्पूर्णतामगमत् ॥ ३८ ॥ वाणमुनितचन्द्र [१६७५] गणितेव्दे वृत्तमौक्तिके रचिरम् । माघे धवलपक्षे पञ्चम्या चन्द्रशेखरश्चक्रे' ।। ३६ ।। ५इस्यालद्धारिक्चरचूडामणि छन्द शास्त्रपरमादाय सकलोपनिषदरहस्यार्णव. वर्णधारपोलकमीनापभट्टारमन-विशेखर घोचन्द्रशेखर भट्ट विरचिते धीवृत्तमौक्तिके पिङ्गलवालिके मात्रास्य प्रथम परिच्छेद । श्रीरस्तु । 3 १. पूर्ण पक्ष नास्ति । २ । इति वृत्तमौबिसरे मसितक प्राण पठतदनन्तर ग प्रती निम्नवतते-- जनकुलपाल लालितवाल वाक्तिमत्तरशत, रोषनपुतभाल पत पनमाल शोभिततरसपासम् । दितिवजयाल वादितताल पृतासुरमनिगास, रविशक्षिततमाल धिन नास भासितपाषाम् ।। गति धीमध्यमारते रचिरपरे हामौक्तिरेऽमरिमन् मात्राप्तविधायरसण समाप्तम्। ४ ग पूर्ण पच मास्ति। ५ प 'स्याल प्रारम्य परिषदेर' पपस्तं पाठ नास्ति' ३ श्रीलक्ष्मीनाथभट्टसूनु-कविचन्द्रशेखरभट्टप्रणीतं वृत्त मौक्ति कम् द्वितीयः खण्डः प्रथमं वृत्तनिरूपण - प्रकरणम् [ मङ्गलाचरणम् } गिरोऽदिव्यद्' गङ्गाजलभवकलालोलकमला- न्यल गुण्डादण्डोद्धरणविपयान्यारचयता। जटाया कृप्टाया द्विरदवदनेनाथ रभसा, दुदश्रुर्गोरीश क्षपयतु मन क्षोभनिकरम् ।। १ ।। मात्रावृत्तान्युक्त्वा पोतूहलत फणीन्द्रभणितानि । अथ चन्द्रशेखरकृती वर्णच्छन्दासि कथयति स्फुटत ॥२॥ [प्रयंकाक्षर वृतम् ] १ थी यो ग । सा श्री ॥ ३ ॥ यया- श्री ओमव्यात् ॥ ४॥ इतिथी १ लरि-ति ।। ५॥ पपा- दा मयु८॥६॥ प्रकाधारस्य प्रस्तारगत्या दावेद भेदो भयत इत्येकाक्षरं वृत्तम्। १ प दीप्पद् । २ पतिरिय मास्तिरमतो, ५८] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१०७ - १४ अथ द्वयक्षरम् तत्र- ३. कामः गौ चेत् कामो। नाग-प्रोक्तः ॥ ७॥ वन्दे कृष्णम् । केली-तृष्णम् ।।८।। इति कामः ३. ४. अय मही लगौ महीम् । वदत्यहिः ।।६॥ यथा- रमापते । नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥ इनि मही ४. ५. प्रय सारम् वक्र-लौ च। सार-मत्र ॥११॥ यथा- कस-काल । नौमि बाल ॥ १२॥ इति सारम् ५. ६. प्रथ मधुः द्विलकृति । मधुरिति ॥ १३॥ यया- मतिमव । मम भव ॥१४॥ इति मधु.. प्रनापि द्वपक्षरस्य प्रस्तारगत्या चत्वार ४ एव भेदा भवन्तीति, तावन्तोप्युक्ताः । इति यक्षरम् ।
५०१५ - २२] १. वृत्तनिरुपण - प्रकरण [५६ अथ व्यक्षरम् तत्र- ७. ताली पादे या म प्रोक्ता। ताली सा नागोक्ता ॥१५॥ यथा- गोवृन्दे सञ्चारी। पायाद् दुग्याहारी॥ १६ ॥ इति ताली ७. 'भारी'त्यन्यत्र । ८ प्रथ शशी शशीवृत्तमेतत् । यकारो यदि स्यात् ।। १७ ॥ पया- मुदे नोऽस्तु कृष्णः । प्रियायां सतृष्णः ॥ १८।। इतिघाशी. ६. प्रय प्रिया वल्लको राजते। सा प्रिया भासते ॥१६॥' पपा- राधिका-रागिणम् । नौमि गोचारिणम् ॥ २० ॥ इति प्रिया .. १०.प्रय रमणः वियते सगणः । फणिना रमणः ॥ २१ ॥ पपा- ससि मे भविता। हरिरप्यचिता ।। २२ ।। इति रमणः१.. १. वृत्तमेत गोराहतेः। (8) ६० ] वृत्तमौक्तिक द्वितीयखण्ड [प०.२३ -३० ११. प्रय पञ्चालम्' पादेषु तो यहि । पञ्चाल-वृत्तं हि ॥२३॥ यथा-- शं देहि गोपेश । मन्दे महत्केश ॥ २४ ॥ इति पञ्चालम् ११. १२. अय मगेन्द्रः नरेन्द्र विराजि। मृगेन्द्र मवेहि ॥ २५ ॥ यथा- विलोलवतंस। नमो धृतवंश ॥२६॥ इति मगेन्द्रः १२. १३. प्रथ मन्दरः भो यदि मुन्दरि । मन्दरमेव हि ॥ २७ ॥ यथा- चञ्चलकुन्तल । नौमि सुमङ्गल ॥२८॥ इति मन्दरः १३. १४. अथ कमलम् नमनुकलय। कमलममल ।। २६ ।। २५1- अहिपवलय। शमिह कलय ॥ ३०॥ इति कमलम् १४. . अत्राऽपि त्र्यक्षरस्य प्रस्तारगत्या अप्टो भेदा भवन्तीति तावन्तोप्युदाहृताः । इति भ्यक्षरम् । १. क. प्रतो पाञ्चालवृत्तस्य लाएमुदाहरणे नोल्लिक्षिते ।
५० ३१ - ३८] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण [६१ अथ चतुरक्षरम् १५. तीर्ण यथा- यस्मिन् कौँ वृत्ते स्वों। सा स्यात् तोर्णा नागोत्कीर्णा ॥ ३१ ।। गोपीचित्ताकर्षे सक्तम् । न्दे कृष्णं गोभिर्युक्तम् ॥ ३२ ॥ इति तीर्णा १५. 'कन्या' इत्यन्यत्र । १६. प्रथ धारी पक्षिभासि मेरुघारि। वारिराशि वर्णवारि' ॥ ३३ ॥ पपा- यया- गोपिकोडुसङ्घचन्द्र । नौमि जन्मपूतनन्द ।। ३४ ॥ इति धारी १६. १७. प्रथ नगाणिका विधेहि ज ततो गुरुम् । नगाणिका भवेदरम् ॥ ३५ ॥ विलोलमौलिभासुरम् । नमामि संहतासुरम् ॥ ३६ ॥ इति नगारिएका १७. १८. अषमुभम् द्विजवरमिह यदि। विदधत, शुममिति ॥ ३७॥ प्रया- प्रमुभमपहरतु। हृदि हरिरुदयतु ॥ ३८॥ इति शुभम् १८. अत्रापि चतुरक्षरस्य प्रस्तारगत्या पोडश १६ भेदा भवन्ति, तेषु चाद्यन्तभेद- युक्ता अन्यविस्तररावयाऽय चत्वारो भेदा प्रदर्शिताः, शेषभेदा सुधीभिकहा इति । इति चतुरक्षरम् । १. स. वर्णयारि वेषभेदाः पञ्चमपरिशिष्टप्यारा - ६२] वृत्तमौक्तिक -दितीयखण्ड [ ५० ३६-४६ यथा- अथ पञ्चाक्षरम् १६ सम्मोहा प्रादौ म प्रोक्त पश्चात् कर्णोक्तम् । बाणाणैर्युक्त सम्मोहावृत्तम् ॥ ३६॥ वन्दे गोपाल दैत्याना कालम् । गोपीगोपाना पाल दीनानाम् ।। ४० ।। इति सम्मोहा १६ २० प्रय हारी यस्मिन तकार पक्षोक्तहार । पञ्चाणयुक्त हारीति वृत्तम् ॥ ४१ ॥ प्रानन्दकारी गोपीविहारी। मा पातु बाल केलीरसाल ॥ ४२ ॥ इति हारी २० २१ अथ हस आदिरथान्त कुण्डलयुक्त । मध्यगत सो यत्र स हस ॥ ४३ ॥ यथा- पथा- नन्दकुमार सुन्दरहार । गोकुलपाल पातु स वाल ।। ४४ ।। इति हस २१ २२ प्रथ प्रिया पषा- सगणाहिता लग-सयुता । भवतोह या किल सा प्रिया ॥ ४५ ॥ सखि । गोकुले सुससकुले'। ग्रजसुन्दरो ननु निर्दय ॥ ४६ ॥ इति प्रिया २२० १. 'सुखसकुले' मास्ति।
२०४७ - ५३ ] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण २३. भय यमरम् यथा- नमिह कुरु लयुगमय । इति यमकमनुकलय ॥ ४७ ॥ असुरयम शमिह मम। अनुकलय फणिवलय ॥ ४८ ॥ यथा या- लुपहर धरणिधर। दलितभव सुजनमव ॥ ४६ ॥ इति यमकम् २३ अत्र प्रस्तारगत्या पञ्चाक्षरस्य द्वात्रिंशद् ३२ भेदा भवन्ति, तेषु कतिच- नोक्ताः शेपास्तूह्या ।* इति पञ्चाक्षरम् । अथ पडक्षरम् २४ शेषा नागाधीशप्रोक्न सर्दीधयुक्तम् । पड्भिर्वर्णर्वृत्त' शेपास्य स्याद् वृत्तम् ॥ ५० ॥ सत्र- पपा- . क्सादीना काल गोगोपीना पाल । पायान्मायावाल मुक्ताभूपाभाल '।। ५१ ॥ इति शेपा ३४ २५ प्रपतिलका यदिसद्वितयाचित सर्व पदा। तिलकेति पणिवंदतीह तदा ।। ५२ ।। पपा- कमनीयवपु शकटादिरिपु । जयतीह हरि भवमिन्धुतरिः ॥ ५३॥ इनितिसका २१ १ ग पिन २ व मास। टिप्पणी-पभेदा पञ्चमपरिशिष्टे द्रष्टया ।
६४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१० ५४.६१ यथा- यथा- २६. पथ विमोहम् पक्षिराजद्वय यत्र पादस्थितम् । पिङ्गलेनोदित तद् विमोह मतम् ।। ५४ ॥ गोपिकामानसे य सदा व्यानशे । पातु मा सेवक सोऽहनद्यो बकम्' ।। ५५ ।। इति विमोहम् २६. 'विज्जोहा' इति स्त्रीलिङ्ग पिङ्गले । २७ प्रय चतुरसम् प्रथमनकार तदनु यकारम् । कुरु चतुरसे फणिकृतशसे ॥ ५६ ।। विनिहतकस तरलवतसम् । नम धृतवश सुरकृतशसम् ।। ५७ ।। इति चतुरसम् २७ 'चउरसा' इति स्त्रीलिङ्ग पिङ्गले। २८ प्रथ मन्यानम् पादे द्वित देहि पड्वर्णमाधेहि । जानीहि नागोक्तमन्थानमेतद्धि ॥ ५८ ।। धूतासुराधीश गोगोपकाधीश । मा पाहि गोविन्द गोपीजनानन्दः ॥ ५६ ।। इति मन्यानम् २८. स्त्रीलिङ्गमन्यत्र । २६ प्रयासनारी यदा स्तो यकारी रसप्रोक्तवणों । तदा शङ्खनारी फणीन्द्रोदिता स्यात् ।। ६०॥ बजे रासकारी मनस्तापहारी। वधूभि समेतो हरि. पातु चेत ॥ ६१ ॥ इति शवनारी २६ 'सोमराजो' त्यन्यत्र । यथा- यथा १.ख. पक्तिरिय नास्ति । २ क व. पुस्तके 'नकार' स्याने 'नमस्कार' पाह सोऽसमीचीन । (स०) ३. स.ममन्द । *टिप्पणी- प्राकृतपैङ्गलमपरिच्छेद २ पद्य ४५ "टिप्पणी-२ प०६२.६६ १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण पया- ३०. प्रघ सुमालतिका जकारयुगेन विभाति युतेन । अहिवंदतीति सुमालतिकेति ॥ ६२ ॥ व्रजाधिपवाल विभूपितवाल' । सुरारिविनाश नमाम्यनलाग ।। ६३ ।। इति सुमालतिका ३०. 'मालतोति पिङ्गले'। ३१. प्रय हनुमध्या यस्या शरयुग्मं कुन्तीसुतयुग्मे । ग्रन्यः खलु साध्या सा स्यातनुमध्या ।। ६४ ॥ यथा- राधासुखकारी वृन्दावनचारी। कसासुरहारी पायाद् गिरिधारी ।। ६५॥ इति तनुमघ्या ३१. ३२. प्रथ दमनकम् नगणयुगलमिह रचयत । दमनकमिति परिकलयत ।। ६६ ।। व्रजजनयुत सुरगणवृत। जय मुनिनुत व्रजपतिसुत ।। ६७ ॥ इति दमनकम् ३२. अन प्रस्तारगत्या पडक्षरस्य चतु पष्टि. ६४ भेदा भवन्ति, तेषु आद्यन्त- सहिता कियन्तो भेदा उक्ता, शेपभेदा सुधीभिरह्या । ग्रन्थविस्तरशङ्कया नात्रोक्ता इति । इति पडक्षरम् । अथ सप्ताक्षरम् ३३. मी वर्णा दीर्घा यस्मिन् स्युः पादेदीणा सख्याका । नागाधीशप्रोक्त तत् शीर्षाभिस्य वृत्त स्यात् ।।६८।। मुण्डाना मालाजाल- स्वत्कण्ठं भूतेशम् । कालव्यालः खेलन्तं वन्दे देव गौरीशम् ॥ ६॥ इति मोर्या ३३. यथा- तत्र- यथा- *टिप्पणी-१ प्राकृतपङ्गलम-परिच्छेद २ पद्य ५४ । 'टिप्पणी-२ शेपभेदा. पञ्चमपरिशिष्टे द्रष्टव्याः ।
वृत्तमौक्तिक -द्वितीयखण्ड [२०७०-७८ यथा- यया- । ३४ अय समानिका पक्षिराजभासिता जेन सविभूपिता। अन्तगेन शोभिता सा समानिका मता ॥ ७० ।। फुल्लपङ्कजानन केलिशोभिकाननम् । वल्लवीमनोहर नौमि राधिकावरम् ॥ ७१ ।। इति समानिका ३४. ३५ प्रय सुवासकम् द्विजमिह धारय भमनु च कारय । भवति सुवासक-मिति गुणलासक ।। ७२ ॥ विवुधतरङ्गिाणि भुवि कृत'रिङ्गिणि । तरलतरनिणि जय हरसङ्गिनि ।। ७३ ।। इति सुवासकम् ३५ ३६ प्रय करहञ्चि नगणमिह धेहि तदनु समवेहि । इति किल[श]राचि भवति करहञ्चि ॥ ७४ ।। व्रजभुवि विलास युवतिकृत[रा]स । जय निहतदैत्य जघन कृतशत्य ॥ ७५ ॥ इति फरहञ्चि ३६ ३७ मय कुमारललिता जकारयुतकर्णा मुनीन्द्रमितवर्णा । लघुद्वितयमध्या कुमारललिता स्यात् ॥ ७६ ॥ प्रजाधिपकिशोर नवीनदधिचोरम् । कुमारललित [त] नमामि हृदि सत्तम् ।। ७७ ॥ इति कुमारललिता ३७. ३८. मप मधुमती नगणयुगयुता तदनु ग-महिता । वदति मधुमती-महिरतिसुमतिः ॥ ७८ ।। यथा- या- १ 'सुम'। २. नयन ।
२०७६-८५] १ वृत्तनिरूपण • प्रकरण यथा- दितिसुतकदन शशधरवदन । विलसतु हृदि न तनुजितमदन ॥ ७६ ।। इति मधुमती ३८ ३६ प्रय मदलेखा आद्यन्ते कृतका शैलै सम्मितवर्णा । मध्ये भेन विशेषा नागोक्ता मदलेखा ।। ८० ।। यया- यथा- गोपाल कृतरास गो - गोपीजनवासम् । वन्दे कुन्दसुहास वृन्दारण्यनिवासम् ।। ८१ ॥ इति मदलेखा ३६. ४०. प्रप कुसुमतति द्विजमनुकलय नमनु विरचय । अहिरनुवदति कुसुमततिरिति ।। ८२ ॥ विषमशरकृत कुसुमततियुत । युवतिमनुसर मनसि-शयकर ॥ ८३ ।। इति कुसुमति ४०. अत्र प्रस्तारगत्या सप्ताक्षरस्य अप्टाविंशत्यधिक शत १२८ भेदा भवन्ति, तेषु प्राद्यन्तसहित भेदाष्टक प्रोक्त, शेषभेदा अहनीया सुबुद्धिभिनन्थविस्तर- शङ्कया नानोका इति ।। इति सप्ताक्षरम् । प्रथ अष्टाक्षरं वृत्तम् ४१. विधम्माला सर्व वर्णा दीर्घा यस्मिन्नप्टो नागाधीशप्रोका। अव्यावधी विश्राम स्याद् विद्युन्मालावृत्त तत् स्यात् ।। ८४ ॥ कण्ठे राजविद्युन्माल श्यामाम्भोदप्रस्यो बाल । गो-गोपीना नित्य पाल पायात कसादीनां बाल ॥८५ ॥ इति विद्यमाला ४१ . पपा- *१ऐपभेदा पञ्चमपरिनिटे इष्टम्या ।
६८ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प० ८६.९३ ४२. मय प्रमाणिका शरैस्तथा च कुण्डलः क्रमेण याऽतिशोभिता । गिरीन्द्रवर्णभासिता प्रमाणिकेति सा मता ॥८६॥ यथा- यथा- विलोलमौलिशोभितं व्रजाङ्गनासु लोभितम् । नमामि नन्ददारकं तटस्थचीरहारकम् ।। ८७ ॥ इति प्रमाणिका ४२. ४३. प्रथ मल्लिका हारमेरुमत्र देहि तं पुनः क्रमादवेहि । धेहि योगवर्णमासु (शु) मल्लिका कुरुष्व वासु ॥ ८॥ वेणुरन्ध्रपूरकाय गोपिकासु मध्यगाय । वन्यहारमण्डिताय मे नमोऽस्तु केशवाय ॥८६॥ इति मल्लिका ४३. इयमेव ग्रन्थान्तरे अष्टाक्षरप्रस्तारे समानिका इत्युच्यते। अस्माभिस्तु सप्ताक्षरप्रस्तारे समानिका प्रोक्त ति विशेष. । ४४. अय तुङ्गा द्विजवरगणयुक्ता तदनु करतलोक्ता । पुनरपि गुरुसङ्गा फणिपतिकृततुङ्गा ।। ६० ।। व्रजविहरणशीलः युवतिषु कृतलीलः । हृदि विलसतु विष्णुः दितिसुतकुलजिष्णुः ॥ ६१ ॥ इति तुङ्गा ४४. ४५. मष कमलम् नगण-सगणाचितं लघुगुरुविराजितम् । फणिनृपविकासितं कमलमिति भापितम् ॥ १२ ॥ यथा- प्रया- वरमुकुटभासुरः व्रजभुवि हतासुरः । प्रजनृपतिनन्दनः जयति हृदि' चन्दनः ।। ६३ ॥ इति कमतम् ४५. १. म यत।
प०६४-१०१) १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [६६ ४६ अय माणवककीडितकम भेन युत तेन चित दण्डकृत हारवृतम् । वेदयति नागमत माणवककीडितकम् ।। ६४।। यथा- पपा- वेणुधर तापहर' नन्दमुत बालयुतम् । चन्द्रमुख भक्तसुख नौमि सदा शुद्धहृदा ।। ६५॥ इति माणवपक्रोहितकम् ४६ ४७ प्रप चित्रपदा भद्वितयाचितकर्णा शैलविकासितवर्णा । वारिनिघौ यतियुक्ता चिनपदा फणिनोचा ।। ६६ ।। वेणुविराजितहस्त गोपकुमारकास्तम् । वारिदसुन्दरदेह नौमि कलाकुलगेहम् ।। ६७ ॥ इति चित्रपदा ४७ ४८ प्रय मनुष्टुप सर्वत्र पञ्चम यस्य लघु पप्ठ गुरु स्मृतम् । सप्तम समपादे तु ह्रस्व तत्स्यादनुष्टुभम् ।। ६८ ॥ कमल ललितापाङ्गि कालालिकुलसफुलम् । विलुलत् कुन्तल सुभ्र ! कलयत्यतुल सुखम् ॥६६॥ इति भनुष्टुप् ४. ४६ प्रय असदम् कुरु नगणयुगल मनु च लयुगमिह । परफणिपतिवृति' पलय जलदमिति ।। १००॥ नवजलदविमल शुभनयनकमल । कलय मम हृदप-मखिलजनसदय ॥ १०१॥ इति जसदम् ४६ प्रत्र च प्रस्तारगत्या अष्टाक्षरस्य पट्पञ्चाशदधिक द्विशत २५६ भेदा. स्तैप प्राद्यन्तसहित रियन्तस्समुदाहृता , शेषभेदा प्रस्ताय समुदाहत्तंय्या इति । इत्यष्टाक्षरम्। मथा- पपा- १. 'तारहर'कतो मास्ति । २ प फगिपतितमप। *टिप्पगो-पापातरेषु मप्राप्त पतास्ते परमपरिगिटे द्रष्टया ।
७० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ५० १०२ - १०८ अथ नवाक्षरम् तन- ५०. रूपामाला नेत्रोक्ता माः पादे दृश्यन्ते यस्मिन्नड्का वर्णा भासन्ते । यच्छ त्वा भूपाला मोदन्ते तद् रूपामालाख्य प्रोक्तं ते ॥१०२॥ यथा - भव्याभिः केकाभिः सम्मिश्राः कुर्वन्त' सम्पूर्णाः सर्वाशाः । एते दन्तीन्द्राणां संकाशा मेघाः पूर्णास्तस्मात् सन्त्वाशाः ॥ १०३ ।। इति रूपामाला ५०. ५१. महालक्ष्मिका बैनतेयो यदा भासते साऽपि चेद् वह्निना भूष्यते । रन्ध्रवर्णा यदा सङ्गताः सा महालक्ष्मिका सम्मता ॥ १०४ ।। यथा- कानने भाति वंशीरुतं कामबाणावलीसंयुतम् । मानसं भावनादाहितं शीतय स्वं मनो याहि तम् ।। १०५ ॥ इति महालक्ष्मिका ५१. ५२. मय सारङ्गम् नगणयकारप्रथितं लघुयुगगः' सकथितम् । कविजनसञ्जातमदं कलयत सारङ्गमिदम् ॥ १०६ ।। यथा- सखि हरिरायाति यदा विरचितकम्पेन हृदा । न किमपि वक्त कलये कथमपि दृष्टे वलये ॥ १०७ ।। पपापा- प्रणमत सर्वाधहरं दितिसुतगपिहरम् । सुरपतितहिरण विलसदसर्वाचरणम् ॥ १०८ ॥ इति सारङ्गम् ५२, इदमेव सारङ्गिति पिङ्गले नामान्तरेणोक्तम् । १. रु.पुगः। “टिप्पणी-1 प्रातपंगलम्-परि० २. पर प० १०६ - ११६] १ वृत्तनिरूपण-प्रकरण [७१ ५३ प्रप पाइन्तम यस्यादि मगणकृतश्चान्तो हस्तेन विरचित । मध्ये भो यस्य विलसित तत् पाइन्त फणिभणितम् ।। १०६ ।। यथा- गोपालाना रचितसुख सम्पूर्णेन्दुप्रतिममुखम् । कालिन्दीकेलिए ललित वन्दे गोपीजनवलितम् ।। ११० ॥ इति पाइन्तम् ५३ पाइ-ता इति पिङ्गले । ५४ प्रय कमलम् नगणयुगलमहित तदनु करविरचितम् । फणिकृतमतिविमल प्रभवति किल कमलम् ॥ १११ ।। यपा- पथा- तरलनयनकमल रुचिरजलदविमलम् । शुभदचरणकमल कलय हरिमपमलम् ।। ११२ ।। इति कमलम् ५४. ५५ मप विम्यम् द्विगवरनरेन्द्रकर्ण प्रविरचितनन्दस्वर्ण । फणिनृपतिनागवित्त कविसुखदविम्बवृत्तम् ॥ ११३॥ लुलितनलिनालसाक्ष शठललितवाचिदक्ष । कलयसि सुरागिवक्ष त्वमपि मयि जातभिक्ष ॥ ११४ ॥ इति बिम्बम् ५५. ५६ मय तोमरम सगण मुदा त्वमवेहि जगणद्वय च विधेहि । नबसपा वर्णविधारि कुरु तोमर सुखपारि ॥ ११५॥ फमलेपु 'सलुलितालि बकुलीकृत] वरमालि । अवलोक्ये वनमालि वपुरेति' किं वनमालि ॥११६॥ इति तोमर ५६ यथा- चिलमभ्या पाठो माहित र प्रतो । fryो-प्राशनसम-परि. २ ५५ .।
७४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१०१३३. १४० यथा- माधवमासि हिमाशुकर चिन्तय चेतसि तापकरम् । माधवमानय जातरस चित्तमिद मम तस्य वशम् ।। १३३ ।। इति सारवती ६४ ६५ प्रथ सुषमा प्रादौ ज(त)गण पश्चाद् यगण यस्यामनु पाद स्याद् भगण । हार कथितश्चान्ते महिता सेय सुपमा नागप्रथिता' ।। १३४ ।। प्रथा- गोपीजनचित्ते सवलित वृन्दावनकुञ्ज सललितम् । वन्दे यमुनातीरे तरल कसादिकदैत्याना गरलम् ।। १३५ ।। इति सुषमा ६५ ६६ प्रथ अमृतगति नगण-नरेन्द्र-नविहिता तदनु च चामरमहिता। अमृतगति कविकथिता फणिभणितोदधिमथिता ॥ १३६ ॥ यथा- सखि मनसो मम हरण हरिमुरलीकृत करणम् । भव मम जीवितशरण किमु कलये निजमरणम् ।। १३७ ।। इति प्रपतगति ६६. ६७ प्रथमता प्रादौ कुर्यान् मगणसुयुक्त ज्ञेय पश्चाद् भगणसुवित्तम् । अन्ते हस्त कुरु युतहार मत्तावृत्त कविजनसारम् ॥ १३८ ॥ यथा- वृ दारण्ये कुसुमितकुज्जे गोपीवृन्दै सह मुखपुज्जे । राससल जलश्रनील रेप बन्दे भुवि कृतलीलए। १३६।। इति मत्ता ६७ ६८ अप स्वरितगति नगणकृता जगणघृता नगणहिता गुरसहिता। इति ह फणिभणति यदा त्वरितगतिर्भवति तदा ॥ १४० ।। १ प्रहिता।
१० १४१.१४६ । १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [७५ यथा- सरसमतियंदुनृपति परमततिस्त्वरितगति । क्षपितमद कलितगद सफलतरिर्जयति हरि ।। १४१ ।। यथाधा- पपा- क्षितिविजिति स्थितिविहति-वंतरतय परगतम । उरु ररुधुरु दुधुवु-युधि कुरव स्वमरिकुलम ॥ १४२ ।। इति दण्डिनी" इति त्वरितगति ६८ ६६ प्रय मनोरमम् नगणपक्षिराजराजित कुरु मनोरम सभाजितम् । जगणकुण्डलप्रकाशित फणिप-पिङ्गलेन भापितम् ॥ १४३ ।। कलय भाव नन्दनन्दन सकललोकचित्तचन्दनम् । दितिज-देवराजधन्दन कठिनपूतनानिकन्दनम् ॥ १४४ ।। इति मनोरमम स्त्रीलिङ्गमिदमन्यत्र*२ । अत्रापि न तेन काचित् क्षति । प्रय ललितपति दहननमिह कलयत तदनु शरमपि पुरुत । वदति फणिनृपतिरिति पठत ललितगतिमिति ।। १४५ ।। यथा- ललितललिततरगति हरिरिह समुपसरति । तव मविधमयि सुदति ! सफलय निजजनुरति ॥ १४६ ॥ इति ललितति ७०. अत्र प्रस्तारगत्या दशाक्षरस्य चतुर्विशत्यधिक सहस्र १०२४ भेदा भवन्ति तेषु किमन्तो भेदा लक्षिता, पभेदा [स्तु सुधीभिरूह्या)।" इति दशाक्षर वृत्तम्। १ सातायं सभणीपा। गरपणी-१ माम्यादा वोय परिच्छर पद्य ६५ मटमनो...२ पोमंत्ररी स्ति.पा. ३४ *पो-३ पारेपूरला गेषभेदा पञ्चमपरिशिष्टे द्रष्टम्या ।
७२ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ५० ११७ - १२४ यथा- यथा- ५७ अय भुजगशिशुसता नगणयुगलसदिष्ट तदनु मगणनिर्दिष्टम् । भुजगशिशुसृतावृत्त कलयत फणिना वित्तम् ।। ११७ ।। अनुपमयमुनातीरे नवपवस (कमल)लसन्नीरे । प्रणमत कदलीकुञ्ज हरिमिह सुदृशा पुजे ॥ ११८ ॥ इति भुजगशिशुसता ५७ सृता इत्येव शम्भुप्रभृतिषु पाठ । भृता इति प्राधुनिका पठन्ति । ५८ प्रथ मणिमध्यम आदिभकार देहि तत सोऽपि गणा ते' नागमत । मध्यमकारो भाति यदा स्यान्मणिमध्य नाम तदा ॥ ११६ ।। वल्लवनारीमानहर पूरितवशीरावपरः । गोकुलनेता गोपुचर पातु हरिस्त्वा गोपवर ॥ १२० ।। इति मणिमध्यम ५८ ५६ मय भुजङ्गसङ्गता सगण विधेहि सङ्गत जगण ततोऽपि सयुतम् । रगण च नागसम्मता कथिता भुजङ्गसङ्गता ॥ १२१ ॥ मम दह्यते मनो भृश परिभावयाङ्गक कृशम् । कथयामि य तमानये धृतिमालि येन धारये ।। १२२ ।। इति भुजङ्गसङ्गता ५६ ६० प्रय सुललितम् दहन-नमिह वितनु चरणमनु च सुतनु । फणिपतिनृपतिकृति कलय सुललितमिति ।। १२३ ॥ कलितललितमुवुट निहतदितिजशकट । मम सुखमनुक्लय करयुगधृतवलय ॥ १२४ ॥ इति मुससितम् ६०. मात्र प्रस्तारगत्या नवाक्षरस्य द्वादशाधिवपञ्चरात भेदेपु ५१२ माघन्त- महिता एकादशभेदा प्रदर्शिता, रोपभेदा महनीया ॥६॥" इति नवाक्षरं वृत्तम्। पथा- पपा- टिप्पणी-१ पदोमारी हिस्स.पारिपरा २४ •पनी-२ अगिरा प्राप्तभेदा पञ्चमपरिशिष्टे पर्यासोम्या ।
प० १२५-१३२] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण [७३ यया- घषा- ययावा- अथ दशाक्षरम् सन प्रयमम्- ६१ गोपाल वह्नस्सख्याका मा पादे यस्मि नन्ते हारश्चको युक्तो यस्मिन् । नागाधोशप्रोक्त तद् गोपाल पक्त्यर्णैर्युक्त मुह्यद्भूपालम् ।। १२५॥ गो-गोपालाना वृन्दे मञ्चारी भूमी दप्यइत्याना सहारी। यदवेणुक्वरणर्मोह समापु गोप्य सोऽव्यान् मा य देवा नापु ॥ १२६ ॥ इति गोपाल. ६१ ६२. प्रय सयुतम् सगण विधाय मनोहर जगणद्वय च ततोऽपरम् । गुरसङ्गत पणिजल्पित सखि । सयुत परिकल्पितम् ॥ १२ ॥ समि गोपवेविहारिण शिखिपिच्छचूडविधारिणम् । मधुमुन्दराधरशालिन ननु कामये वनमालिनम् ।। १२८ ॥ व्रजनायिका हतकालिय बलयन्ति या मनसालि यम् । सदय मया सह शालिन कुरु तामु त वनमालिनम् ।। १२६ ।। इति सपुतम ६२ सयता इति स्त्रीलिङ्ग पिङ्गले ।* ६३ प्रय घम्पमाला प्रादिभकारो यय घृत स्यात् प्रेयमि पश्चान् मोपि मत स्यात् । अन्तममागे गेन युत स्यात् चम्पफमालावृत्तमिद स्यात् ॥ १३० ॥ सवमह जाने हृदय ते कामिनि । कि कोपेन कृत ते । पहजघानोंचनपान कामितमाप्त चेतसि ता ते ॥ १३१ ।। इति चम्परमाता ६५ ६षमयतोति अन्यत्र । रपयतीनि च क्वचित् नामान्तरेण इयमेव शेया। १. अप सारवती भनितयाचित गर्वपदा पण्डितमण्डलिजातमदा । गेन युता बिल सारवती नागमता गुणभारवती ।। १३२ ।। यपा- १. परंवानाए । *Ferryो- प्रागसम.परि. २, प८१.।
७६ ] वृत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड [५० १४७ - १५० अथ एकादशाक्षरम् ७१. मालती - यथा- यस्या पादै हारा रुद्रं सख्याता सर्वे वर्णास्तद्वद् यस्या विख्याता । सर्वेपा नागाना भूपेनोक्ता सा, मालत्युक्ते य लोकाना पूर्णाशा ॥ १४७ ॥ सिन्धूना पृष्ठा' यत्पृष्ठे लीयन्ते, दैत्यात् सर्वे वेदा येनादीयन्ते । यत्पुच्छोच्छालदेवेन्द्रा घूर्णन्ते, धर्म सोऽव्यान्मापामीनस्तूर्ण ते ।। १४८ ।। इति मालती ७१ ७२ प्रथबन्धु भत्रितय-प्रविकाशितवर्ण, शेषविभूषितभासुरकर्ण । पण्डितचेतसि राजति बन्धु, पिङ्गलनागकृतो गुणसिन्धु ॥ १४६ ।। श्यामललोलगजालिसदृक्ष- श्चण्डसमीरणकम्पितवृक्ष । वारिधरस्तरुभजितनीड , भूततिवृष्टि कृतावनिपीड ।। १५० ।। इति ब.थु ७२ इदमेवान्यत्र दोधकमिति नामान्तरेणोक्त , पिङ्गले* तु उट्टवणिकान्तरकृत- लक्षणान्तरमादाय रूपभेद इति न कश्चिद्विशेष फलत इति समञ्जसम् । ७३ पप समुली कुरु चरणे प्रथम नगण, तदनु च पक्षमित जगणम् । यथा- १.पप्रष्ठा। टिपगो-१ प्राकृतपंगलम् परि० २, पच १०० प०१५१ . १५६ ] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण [७७ यथा- लघुमथ ग च जनः सुमुखी, भवति' यतः किल सा सुमुखी ॥ १५१ ।। तरुणविधूपमितं वदन, मम हृदये कुरुते मदनम् । इति कथयश्चरणो नमते', हरिरनुधेहि दृश वनिते ॥ १५२ ।। इति सुमुखी ७३. ७४. अयशालिनी कृत्वा पादै नूपुरो हारयुग्म, धृत्वा वीणामसितां चामरेण । पुष्पप्रोत चापि कर्ण दधाना, नागप्रोक्ता शालिनीयं विभाति ।। १५३ ।। यपा- चन्द्राको ते राम कीतिप्रतापी, चित्र शत्रुक्षोणिपालापकीर्तिम् । भासागाढध्वान्तमध्वसयन्ती, लोक्यस्य श्वेतता सन्दधाते ॥ १५४ ॥ यतिरप्यत्र वेदलोकाया। इति शालिनी ७४. ७५ मप पातोमी पूर्व पादे मगणेन प्रयुक्ता, या वै पश्चाद् भगणेनाथ युक्ता। वातोर्मीय तगणान्तस्थकर्णा, वेदर्लोक स यती रद्रवर्णा ।। १५५ ।। पपी- मायामोनोऽवतु लोक समस्त, लीलागत्या शुभिताम्भोधिमध्य । पाने दास्यन्नयन वेदरप, य कल्पाब्धी जगृहे तियंगास्याम् ॥ १५६ ॥ इतिपातोमा ७५. २. भरते। ३.स.वाणि ४. य. मीन। १.प.भवत मत। विश्वस्यापित ७८ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीय खण्ड [१०१५७ -१५६ यथा- ७६. मथानयोरुपजातिः चेद् वातोर्मोचरणानां यदि स्यात्, पाठः सार्द्ध शालिनीवृत्तपादः । इन्द्रप्रोक्ताः सम्भवन्तीह भेदा- स्तेषां नामान्युपजातीति विद्धि ॥ १५७ ।। गोपं वन्दे गोपिकाचित्तचौर, हास्यज्योत्स्नालुब्धहष्यच्चकोरम् । शब्दायन्तं' धेनुसघे धुनानं, वक्त्रं वशीमधरे सन्दधानम् ॥ १५८ ।। इति शालिनी-यातोम्युपजातिः ७६. अनयोरेका पञ्चमाक्षरगुरुत्वादपरत्र च पञ्चमलघुत्वात् अल्पो भेद इति चतुर्दशोपजातिभेदाः, पदेन पदाभ्यां पदैश्च परस्परं योजनात् प्रस्ताररचनया जायन्त इत्युपदेशः । ७७. प्रथ दमनकम् दहनमितनगणरचितं, तदनु कुरु लघुगुरुयुतम् । फणिवरनरपतिमथित, दमनकमिद मिति कथितम् ॥ १५६ ।। .. १.स.पदन्त टिप्पणी-१ छन्दसोऽरय चतुर्दशभेदानां नामलक्षणोदाहृतयो ग्रन्यकृताप्यनुल्लिखिता, नैव चाम्पत्र ग्रन्थेषु भवन्ति समुपलब्धाः,मतश्चात्र प्रस्ताररीत्या चतुर्दशभेदानां लक्षणान्यधो निरूप्यन्ते---- पा. या. वा. ८. वा. वा. वा. शा. १.पा. २. वा. ३.पा. वा. वा. ६.दा. वा. या. शा. मा. वा. दा. शा. वा शा. ४. वा. घा. दा. या. वा. या. १०. वा. ११.वा. १२. वा. १३. वा. १४. या. वा. ५.शा. वा. ६.पा.पा. ७.दा.. दा. दा. या. पा. दा. वा. या. भत्र 'सा''माइति संरेतदयेन पालिनी-वातोमा क्रमशोये।
१६० - १६३ ] १. वृत्तनिरूपण-प्रकरण [७६ पचा- हदि कलयत मधुमथन, गिरिकृतजलनिधिमयनम् । रचितसलिलनिधिशयन, तरलकमलनिभनयनम् ।। १६० ।। इति दमनकम् ७७. ७८.प्रय चण्डिका प्रादिदोषशोभिहारभूपितो, बिभ्रती पयोधरावदूपितो। स्वर्णशङ्ख कुण्डलावभासिता, चण्डिकाऽहिभूषणस्य सम्मता ॥ १६१ ॥ यथा- व्यालकालमालिकाविकाशित, भालभासितानलप्रकाशिवम् । शैलराजकन्यकासभाजित, नौमि चारुचन्द्रिकाविराजितम् ॥ १६२ ।। इति धण्डिका। सेनिका इति अन्यत्र । क्वचिच्च श्रेणीति' रगण-जगण-रगण-लघु-गुरुभिर्ना- मान्तर, फलतस्तु न कश्चिद्विशेष । किञ्च इयमेव चण्डिका यदि लघुगुरुकमेण क्रियते तदा सेनिका इत्यस्मन्मतम् । अतएव भूषणकारोऽपि' हाराबविपरीता- भ्या रूपनूपुराभ्या लघुगुरुभ्या क्रमशो मण्डिता चण्डिकामेव सैनिकामुदाजहार । तन्मतमवलम्ब्य वयमपि सलक्षणमुदाहराम । ७६. भय सैनिका शरेण कुण्डलेन च मेण, महेश-वर्णसख्यया भ्रमेण । समस्तपादपूरण विधेहि, फणिप्रयुक्त-से निकामवेहि ॥ १६३ ॥ १ स रेलोति। *टिप्पणी-हारराह्नकुण्डलेन मण्डिता या पयोधरेण वीणपाङ्किता। स्पनूपुरेण चापि दुतमा सेनिका मुजङ्गराजवल्लमा ॥ २१९॥ [पापोभूपण दि.म.
८० वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ५० १६४ - १६८ यथा- सरोजसस्तरादि सविधेहि, पिकालिवक्त्रमुद्रण विधेहि । मुरारिवश्यजीवमालि देहि, मृतामथान्यथा च मामवेहि ॥ १६४ ।। इति सेनिका ७६. ८०. अथ इन्द्रधना हारद्वय मेरुयुत दधाना, पादे तथा नूपुग्युग्मक थे। हस्त सुपुष्प वलयद्वय च, सधारयन्ती जयतीन्द्रवजा ॥ १६५ ।। यथा- पालोक्य वेदस्य सुरारिभीति, यो दैत्यदाव दय (दद)दादिदेव ' । पाठीनदेह' कठिन वभार, मीन : स नो मङ्गलमातनोतु ।। १६६ ॥ इति इयत्रा ८० ८१ प्रथ उपेन्द्रवज्रा पयोधर कुण्डलयुग्मयुक्त, विधारयन्ती वरमेश्युग्मम् । रहारपुष्प दधती सुकर्ण- मुपै द्रवजा रभमेन भाति ।। १६७ ।। पपा- पराम्बुधावामिपयत्सुधाशु', विलोक्तुि पूर्वदरीगतस्य । महन्द्रसिंहस्य विभाति जिह्वा, सम पुर सामिसरामुविम्बम् ॥ १६८ ॥ इति उपेन्द्रवया ८२. १. सादिदेव २ प पाटामोह। १ प सामिमुधाविम्यम् । ३ विष्णु । ४ पास ५० १६६-१७२] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण [८१ पषा- ५२. अयानयोरपजातयः उपेन्द्रवज्राचरणेन युक्तं, स्यादिन्द्रवज्राचरणं यदव । नागप्रयुक्ताश्च तदैव भेदाः, महेन्द्रसंख्या उपजातयः स्युः ।। १६६ ।। मुखन्तवणाक्षि ! कठोरमानो:, सोढुं कर नालमिति ब्रुवाणः । पटेन पीतेन वनेषु राधां', चकार कृष्णः परिघूतवाधाम् ।। १७० ।। इति उपजातिः ८२. भेदाश्चतुर्दशंतस्याः क्रमतस्तु प्रदर्शिताः । प्रस्तार्य स्वनिबन्धेषु पित्राऽतिस्फुटस्ततः ।। १७१ ।। विलोकनीया भेदास्ते नास्माभिस्समुदाहृताः । कथितत्वाद् विशेपेण ग्रन्यविस्तरशङ्कया' ॥ १७२ ।। १.क्ष.राया। *टिप्पणी-१. ग्रन्पकृता वृत्तस्यास्य भेदानो लक्षणोदाहरणार्य स्वपितृश्रीलक्ष्मीनापभट्टरतो. दाहरणमञ्जरी द्रव्येति समूचितम्, किन्तु उदाहरणमञरीपुस्तरस्या- पाप्यनुपलब्धत्वादयास्माभिः 'प्राकृतपंगला' २(१२२) मामलक्षणानि, छन्द - सूत्र- (निर्णयसागरसस्करण) स्य भनन्तशर्मकृतटिप्पणीत उदाहरणानि समुद्घतान्यध प्रदर्शितानि- १. कीतिः [उ इ.इ. इ] ८. याला [इ. इ. इ. उ. २. धापी [इ. उ. इ.] ६. मा [उ. ६.६ ] ३. माला (उ. उ, इ. इ.] १० भद्रा . २.६ उ.J ४. शाला [इ. इ.स. इ.] ११. प्रेया उ. ३.६ उ] ५. हसी [उ. १ ३ १२. रामा १६ ..उ उ ६. माया [उ. उ. उ. इ.] १३. ऋ•ि [] ७. जाया [इ. उ. ३. उ] १४. बुद्धि [.उ. उ. उ.] (उ.) छ मानमीं मेहगराः रित गो, पन्या गुलस्य स्पितरे चिनिमः।
८२) वृतमौक्तिक - द्वितीयखण्ड मेना मुनीनामपि माननीया. मात्मानुरूपा विधिनोपयेमे । कुमारसम्भव ११८] २ चाणी- यः पूरयन् कीचकरन्ध्रभागान्, दरीमुखोत्थेन समीरणेन । उद्गास्यतामिच्छति किन्नराणा, तानप्रदायित्वमिवोपगन्तुम् ।। [कुमारसम्भव ११] ३. माला- कपोलकण्डू. करिभिविनेतु, (उ) विघट्टिताना सरलद्रमाणाम् । यत्र स्नुतक्षीरतया प्रसूत, शानूनि गन्ध सुरभीकरोति । [कुमारसम्भव १६ ४.शाला- उद्वेजयत्यङ्गुलिपाणिभागान्, मार्गे शिलीभूतहिमेऽपि यत्र । (उ.) न दुवंश्रोणिपयोधरार्ता भिन्दन्ति मन्दा गतिमश्वमुख्य' । [कुमारसम्भव १११] ५, हसो विपरीताख्यानिकी) (उ) पद तुपारस तिघौतरक्त, यस्मिन्नदृष्ट्वापि हद्विपानाम् । (3) विदन्ति मार्ग नखरन्ध्रमुक्त. मुंबजाफ्लः वेसरिणा किराता। (कुमारसम्भव १६J ६. माया- प्रसीद विश्राम्यतु बोरवय, दरमंदीय क्तम सुरारित। विभेतु मोपीकृतवाहुवीर्यः स्त्रीभ्योऽपि कोपस्फुरितापराभ्यः ॥ [बुमारसम्भव ३] पासरमेणाय सयो प्रश्रो, स्वस्पयोग्ये गुरतप्रस।
१ पत्तनिरूपण-प्रकरण [३ (उ) मनोरम यौवनमुद्वहन्या गर्भोऽभवद् भूधरराजपत्या ॥ [कुमारसम्भव १०१६] ८ बाला- य सर्वला परिकल्प्य वत्स, मेरो स्थिते दोग्धरि दोहदक्षे । (इ) भास्वन्ति रत्नानि महौषधीश्च, (उ) पृथूपदिष्टां दुदुहुधरित्रीम् ॥ कुमारसम्भव १२] ६ प्रा- दिवाकराद रक्षति यो गुहासु, लोन दिवाभीतमिवान्धकारम । क्षुद्रेऽपि मून दारण प्रपन्ने, ममत्वमुच्च शिरसा सतीव ।। [कुमारसम्भव ११२] १० भद्रा (पाख्यानिकी)- अस्त्युत्तरस्था दिशि देवतात्मा (उ) हिमालयो नाम नगाधिराज । पूर्वापरी तोयनिधी वगाह्य, स्थित पृथिव्या इव मानदण्ड || [कुमारसम्भव १।१] ११ प्रेमा- (उ) अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य, (उ) हिम न सौभाग्यविलोपि जातम् । एको हि दोषो गुणसनिपात, (उ) निमज्जतोन्दो किरणेप्विवा॥ [कुमारसम्भव ११३] १२ रामा- (इ.) यश्चाप्सरोविभ्रममण्डनानां सम्पादयित्री शिखरैबिभर्ति । (उ) बलाहकच्छेदविभक्तरागा मकालस ध्यामिव धातुमत्ताम् ॥ [कुमारसम्भव १४ (उ) ८४] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ १७३ - १७५ ८३. प्रथ रथोद्धता स्वर्णशङ्खवलयं रसाहितं, सुन्दरं करतलेन सङ्गतम् । पुष्पहारमथ राविनूपुरं, बिभ्रती विजयते रथोद्धता ॥ १७३॥ यथा- यथा - यामिनीमधिजगाम धामत., कामिनीकुलमनन्तसीरिणो[:] । नामनी कथयदाशु संगलत्- सामिनीवि सखि नन्दनन्दनम् ॥ १७४ ।। गोपिके तव सुतोऽपि केवलो, मायिनामयि' ममापि नायक. । 'नीतमेव नवनीतमेधय- त्येप यः कंपटवेपनन्दनः'२ ॥ १७५ ॥ इति रयोद्धता ८३. ४. अय स्वागता हारभूपितकुचाऽतनुवाण- भ्राजिता कुसुमकङ्कणहस्ता। १.क मायिनामय। २. ख, :-'चोरपत्यनुदिन गृहे गृहे, न तमेव नवनीतमेषयत् । १३. ऋद्धि प्रसन्नदिवपासुनिविक्तवात, शङ्खस्वनानन्तरपुष्पवृष्टिः। (3) शरीरिणां स्थावरजङ्गमाना, सुखाय तज्जन्मदिन बभूव ॥ [कुमारसम्भव १।२३] १४, युधिः- यत्रांशुकाक्षेपविलज्जिताना, (उ.) यदृच्छया किंपुरुपाङ्गनानाम् । (उ) दरोगृहदारविसम्बिबिम्बा- स्तिरस्करिण्यो जलदा भवन्ति ।। [दुमारमम्भव ११] (उ.)
१० १७६ - १७६ १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण [ नूपुरेण च विराजितपादा, स्वागता भवति चेत् किमिहाऽन्यत् ॥ १७६ ॥ यया वल्लवीनयनपङ्कजभानु, दानवेन्द्रकुलदावकृशानु । राधिकावदनचन्द्रचकोर , सकटादवतु नन्दकिशोर ॥ १७७ ।। इति स्वागता" ८४ ८५ अथ भ्रमरविलसिता पूर्व म स्यात् तदनु च भगण , पश्चाद यस्मिन् प्रकटितनगण । अन्ते लोग कविजनसहिता, सेय प्रोक्ता भ्रमरविलसिता ।। १७८ ।। यथा- स्वान्ते चिन्ता परिहर वनिते, नन्दादेशात् सपदि सुललिते । आगन्तास्मिन हरिरिह न चिर, कुञ्ज शय्या सफलय सुचिरम् ॥ १७६ ।। इति भ्रमरविलसिता ५५ -टिप्पणी-१ रथोद्धता-स्वागतोपजातिवृत्तस्यास्य न थेऽस्मिल्लक्षणोदाहरणा यनुल्लिखितानि, नेव च न थान्तरेषु समुपलब्धानि, अनोऽत्र चतुदशभेदाना प्रस्तारगत्या निम्न लक्षणा येव समुदध्रिय तेऽस्माभि स्वा र स्वा स्वा र स्वा र स्वा स्वा स्वा ८ स्वा २ स्वा र स्वा ३ र स्वा स्वा १० स्वा ४ स्वा स्वा र स्वा ₹ र स्वा र स्वा १२ स्वा ६ र स्वा ७ स्वा र र १४ स्वा पत्र 'र' कारेण रथोड़ता 'स्वा'शब्देन स्वागतेति च सबोध्या। र स्वा स्वा र र स्वा र र र ८६ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ५० १८०.१८४ ८६ अय अनुकूला नूपुरमुच्चैः कलितसुराव, पुष्पसुहारं सरससुवक्रम् । रूपविराजत्सवलयहस्तं, स्यादनुकूला यदि किमिहाऽन्यत् ॥ १८० ॥ यथा- गोकुलनारीवलयविहारी, गोधनचारी दितिसुतहारी। नन्दकुमारस्तनुजितमारः, पातु सहारः सुरकुलसारः ।। १८१ ।। इति अनुकूला ८६. ८७. अथ मोटनकम् वन्दे वलयद्वयसवलितं, हस्तद्वितय कलयन्तममुम् । गन्धोतमपुष्पसुहारधर, नागस्य सदा प्रियमोटनकम् ।। १८२ ॥ पपा- कृष्णं कलये वनितावलये, नृत्ये सरसे ललिते सलये। दिव्यः कुसुमैः कलित मुकुटे, स्तुत्य मुनिभिर्वलितं लकुटे ।। १८३॥ इति मोटनकम् ८७. ८८ भय मुकेशी विभ्राणा वलयो सुवर्णचित्रों, संराजत्करसङ्गशोभमानी। हाराभ्यां ललितं कुच दधाना- माद्यन्तं कुरुते न कं सुकेशी ।। १८४ ॥ पपा- गोपालं कलये विलासिनीनां, मध्यस्थं कलचारुहासिनीनाम् ।
५० १८५ - १८६] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण [८७ कुर्वन्त वदनेन वशराव, यस्तासा प्रकटीचकार भासः ॥ १८५॥ इति मुकेशो ८८ ८८. प्रप सुभरिका अतनुरचितबाणपञ्चकं, कुसुमकलितहारसङ्गतम् । कुचमनुदधती च नूपुरं, मुदमिह तनुते सुभद्रिका ॥ १८६ ।। पपा- हृदि कलयतु कोपि बालक, सुललितमुखलम्वितालकः । अलिविलसितपङ्कजथिय, परिकलयति य स मत्प्रियम् ।। १८७ ॥ इति सुभद्रिका ८६. ६०, प्रथ बकुलम् द्विजवरगणयुगलमिति, तदनु नगणमपि भवति। सुकविफणिपतिविरचित- मनुकलयत वकुलमिति ॥ १८ ॥ ग्रथय कमलनिचयमिह, बकुलशयनमनुरचय। कुम मणिहततिमिरगृह मिह हरिरुपसरति सखि ! ॥ १६ ।। इति बकुलम् .. अत्रापि प्रस्तारगत्या रुद्रसख्याक्षरस्य अष्टचत्वारिंशदधिक सहस्रद्वय २०४८ भेदा भवन्ति । तत्र कियन्तोऽपि भेदा प्रोक्ताः, शेपभेदा प्रस्तार्य सूचनीया इति।" इत्येकादशाक्षरम् । यथा- १. ख भायम् । २. पक्तिद्वय नास्तिक प्रती। *टिप्पणी-- ग्रन्थातरेषु समुपलभ्यमाना. पभेदाः पञ्चमपरिशिष्टे पर्यवेक्षणीया, SE .] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प०१९०-१९४ अथ द्वादशाक्षरम् तत्र- ११. प्रापीडा पया- - यस्मिन् वेदानां संख्याका मा दृश्यन्ते, पादे वर्णाः सूर्यः सम्प्रोक्ता जायन्ते । आपीडाख्यं दिव्यं वृत्तं धेहि स्वान्ते, सम्प्रोक्त नागानामीशेनंतत्कान्ते ! ॥१०॥ कूर्मो नित्यं मामव्यादत्यन्तं पीनः, यत्पृष्ठेऽद्रिः कस्मिंश्चित्कोणे संलीनः । यः सर्वेषां देवानां कार्यार्थ जात- स्त्रलोक्ये नानारत्नादाता विख्यातः ॥ १६१ ।। इति प्रापीडः ६१. अयमेवान्यत्र विद्याधरः। १२. प्रथ भुजङ्गप्रयातम् लघुः पूर्वमन्ते भवेद् यंत्र कर्णः, रवेः संख्यया यत्र चाऽभाति वर्णः। तकारत्रयं यत्र मध्ये सुयुक्त, भुजङ्गप्रयातं तदा भावि वृत्तम् ॥ १९२॥ चालत्कुन्तलं कलिलोलाकुलाक्षं, सदा वल्लवीलालितं नन्दवालम् । कपोलोल्लसत्कुण्डलालङ्कृताऽऽस्यं, विलोलामलस्रगललामं नमामि ॥ १६३ ।। इति भुजङ्गप्रयाता र. १३. प्रष लक्ष्मीधरम् मानुसंख्यामितरक्षर सितं, वेदसंख्येस्तथा पक्षिभिः शोभितम् । सर्वनागाधिराजेन संभापितं, सद्धि लक्ष्मीधरं मानसे लोभितम् ॥ १९४ ।। - वषा- *टिपणी-१ प्राकृतपंगनम्, परि. २, पद्य ११२, एवं वाणीभूपणम् हि प० २२६ ५० १६५ - १६६] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण यया- वेणुनादेन संमोहमन् गोकुले, वल्लवीमानसं रासकेली व्यधात् । यः सदा योगिभिर्वन्दितस्तं तदा', गोपिकानायकं गोकुलेन्द्रं भजे ॥ १९५ ॥ इति लक्ष्मीपरम् ६३. इदमेवान्यत्र स्रग्विणी* इति नामान्तरं लभते । ६४. प्रथ तोटकम् यदि वै लघुयुग्मगुरुक्रमतः रविसम्मितवर्ण इह प्रमितः । अहिभूपतिना फणिना भणितं, सखि तोटकवृत्तमिदं गणितम् ॥ १६६ ॥ अलिमालितमालतिभिललितं, ललितादिनितम्बवतीकलितम् । कलितापहरं कलवेणुकलं, कलये नलिनामलपादतलम् ।। १६७ ।। इति तोटकम् ६४. ६५. प्रथ सारङ्गकम् जायेत हारद्वयेनाथ शङ्खन, यद्वै क्रमात् सूर्यसख्यातवर्णेन । सारङ्गक तत्तु सारङ्गनेत्रेण, संभापितं सर्वनागाधिराजेन ॥ १६८ ॥ यपा- - पथा- श्रीनन्दसूनो कथं धृष्ट गोपाल, गोपीपु धाष्टयं विधत्से महामाल । प्रास्थाय वालैः सहाय सुखस्थस्य, भीतिर्न ते कंसतो गोकुलस्य ॥ १६ ॥ इति सारङ्गकम् १५. *टिप्पणी-छन्दोमञ्जरी, द्वि० स्त० का० ७१, एवं वृत्तरत्नाकर द्वि० ०।
९. ] घृत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड [५० २०० - २०४ यथा- ६६. अथ मौक्तिकदाम पयोनिधिभूपतिमन्न विधेहि, खराशुविराजितवर्णमवेहि। फणीन्द्रविकासितसुन्दरनाम, हृदा परिभावय मौक्तिकदाम ॥ २०० ॥ स्वबाहुबलेन विनाशितकस, कपोलविलोलललामवतस । समस्तमुनीश्वरमानसहस, सदा जय भासितयादववश ॥ २०१ ।। इति मौक्तिकदाम ६६ ६७ प्रथ मोदकम् वेदविभावितभ परिभावय, भानुविभासितवर्णमिहानय । भामिनि ! पिङ्गलनागसुभापित. मोदकवृत्त मितीह निभालय ॥ २०२॥ नन्दकुमार विपारगुणाकर, गोपवधूमुखकजदिवाकर। मद्वचन हितमाशु निशामय, कुञ्जगृह ननु याहि' निशामय ॥ २०३॥ इति मोदकम् ६७. १८. प सुन्दरी कुसुमरूपरसेन समाहिता, ललितनूपुररावविहारिणी। कुचयुगोपरिहारविराजिता, हरति कस्य मनो न हि सुन्दरी ॥ २०४।। यथा- . पषा- उदयदददिवाकरर्डर', ललितवर्तुलवाद्यविशेषणम् । समाधि २. ब. रतुं २०५० २१० ॥ १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण -- + यथा- सकलदिग्रचित विहगारवं, स रुतमातनुते विधिभिक्षुक || २०५ ।। पथा था, 'पाणीभूषणे.'- असुलभा शरदिन्दुमुखीप्रिया, मनसि कामविचेष्टितमीदृशम् । मलयमारुतचालितमालती- परिमलप्रसरो हतवासर । २०६ ।। इति सुन्दरी १८ ६६. प्रथ प्रमिताक्षरा सुमुगन्धपुष्पकृतहारकुचा', सरसेन शखरचितेन यथा । वलयेन शोभितकरा कुरुते, प्रमिताक्षरा रसिकचित्तमुदम् ॥ २०७ ।। हरपवत इ(ए)व बभुगिरय , पतगास्तथा जगति हसनिभा । यमुनापि देवतटिनीव बभी, हिमभाससा जगति सवलिते ।। २०८ ॥ भूषणे - अभजद् भयादिव नभो वसुधा, दधुरेकतामिव समेत्य दिश । अभवन् महीपदयुगप्रमिता, तिमिरावलीकवलिते जगति ॥ २०६ ।। इति प्रमिताक्षरा १०० प्रथचन्द्रवरम पक्षिराजमथन कुरु चरणे, स विधेहि भगण सुखकरणे। हस्तमत्र कुरु पिङ्गलकथित, चन्द्रवर्म कविभिहृदि मथितम् ॥ २१०॥ - यथा घा १कचा। *टिप्पणी-१ वाणीभूषणम् द्वितीय अध्याय, पद्य २५२ २ २०४ " " " वृत्तमौक्तिक -द्वितीयखण्ड [ २११-२१५ यथा- यथा घा- देवकूलिनि मिलद्वनसलिले, दिव्यपुष्पकलिते सुरनमिते। चन्द्रशेखरजटावलिवलिते, देहि शं मम सदा भुवि ललिते ।। २११ ।। चन्द्रवर्म पिहितं घनतिमिरै- राजवर्त्म रहित जनगमनः । इष्टवम तदलड्कुरु सरसे, कुञ्जवम॑नि हरिस्तव कुतुकी ॥ २१२ ॥ इति छन्दोमर्यामपि । इति चन्द्रधर्म १००. इति प्रथम शतकम् । १०१. भय द्रुतविलम्बितम् कुरु नकारमथो भगणं ततः, सरवनूपुरपुष्पगुरुं कुरु । कलय शब्दमतो गुरुरन्ततो, द्रुतविलम्वितवृत्तमिद सखि ! ॥ २१३ ।। अयापि समपादस्थयो. पादान्तलध्वोः वैकल्पिकं गुरुत्वम् । पथा-मस्कृत 'पाण्डवचरिते' महाकाव्ये कर्णवर्णनप्रस्तावे- नृप विलक्षणमस्य पुनर्वपु- स्सहजकुण्डलवर्मसुमण्डितम् । सकललक्षणलक्षितमद्भुतं, न घटते रथकारकुलोचितम् ।। २१४ ।। यथा पा, तव विदुरोक्तो- भिदुरमानसमाशुचिचापं, स विदुरो निनदैरतिभीपणः । सकलवालपरामवर्णनः सदसि भूमिपति समबोधयत् ॥ २१५ ॥ टिप्पणी-१ छन्दोमञ्जरी, द्वितीयस्तरम, पारिकाया ६५ उदाहरणम् ।
५० २१६ - २१६] १. वृत्तनिरुपण - प्रकरण [६३ यथा षा, छन्दोमजाम्। तेरणिजापुलिने नवपल्लवी- परिपदा सह केलिकुतुहलात् । मुतविलम्बितचारुविहारिणं, हरिमहं हृदयेन सदा वहे ।। २१६ ।। इत्यादि रघुवंशमहाकाव्यादिपु च सहस्रशो निदर्शनानि । इति दुतविलम्वितम् १०१. १०२. प्रथ वंशस्थविला पयोधरं हारयुगेन सङ्गतं, कर तथा पुप्पसुकवणान्वितम् । सुरावयुक्तं दधती च नूपुरं, विभाति वशस्थविला सखे ! पुरः।। २१७ ॥ यथा- चिलोलमौलिं तरलावतंसकं, व्रजाङ्गनामानसलोभकारकम् । करस्थवशं परिवीतबालक, हरि भजे गोकुलगोपनायकम् ।। २१८ ।। इति वशस्थविला १०२. नपुसकमिदमन्यन* : वशस्तनितमिति क्वचित् । १०३. अथ इन्द्रवशा कर्ण सुरूपं घृतकुण्डलद्वयं, पुष्पं मुनन्ध दधती च नूपुरम् । वक्षोजसंभूपितहारशोमिनी, स्यादिन्द्रवशा हृदि मोददायिनी ॥ २१६ ।। पपा- कूर्मः श(स)मन्यान् मम यः पयोनिधी, पृष्ठे महापर्वतघोरघर्पणात् । *टिप्पणी--१ छन्दोमञ्जरी, द्वितीय स्तबक, कारिकाया ७४ उदाहरणम् । २ 'वदन्ति वशस्पविलं जतो जरो' छन्दो मंजरी दि० स्त• का०६६ ६४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ५०२२० - २२२ कद्रू'विनोदेन सुखातिसभ्रमान्, निद्रां जगामालसमीलितेक्षणः ॥ २२० ॥ यथावा- कम्पायमाना सखि ! सर्वतो दिश, शम्पा दधाना नवनीरदावलिः । कम्पायित सविदधाति मानसं, मा पाहि नन्दस्य सुतं समानय ॥ २२१ ॥ इति इन्द्रवशा १०३. १०४. प्रधानयोरुपजातयः यदीन्द्रवशाचरणेन सङ्गता, पादोऽपि वंशस्थविलस्य जायते । भेदास्तदा स्यु. सुरराजसख्यकाः, नागोदितास्तेप्युपजातिसज्ञका ।। २२२ ।। इति वंशस्थ विलेन्द्रवशोपजाति..। अनयोरप्येकत्र प्रथमाक्षर लघुः, अपरत्र च प्रथमाक्षरं गुरुरिति स्वल्पभेदत्वा- च्चतुर्दशोपजातिभेदा पूर्ववदेव प्रस्ताररचनया भवन्ति । तथा चात्र सर्वत्र स्वल्प- भेदाच्छन्दोभ्यामुपजातयो भवतीति उपदिश्यत इति दिक् । १. ख. कुण्डविनोदेन । २. प. सङ्गत । "टिप्पणी-१ क.ख. प्रतो यशस्थविलेन्द्रवशोपजातेरदाहरण न विद्यते । *टिप्पणी-२ ग्रन्थकारेण वसस्पविलेन्द्रवयोपजाते तस्य मतुर्दशभेदा स्वीकृताः, पर तत्तद्- भेदाना लक्षणोदाहरणादिभि. प्रतिपादन नैव वृतम् । प्रतोत्रास्माभिरन्यग्रन्पा. पारेण तत्तन्नामलक्षणोदाहरणानि प्रस्तूयन्ते । १. वैरासिनी . वासन्तिका [इ. इ. ६ व.] २. रतास्यानिकी (इ. व. इ. इ.] ६. मन्दहासा न.इ. इ. व.] [व. व. इ.] १०. शिपिरा [इ. ५. इ. य.] ४. पुष्टिदा ११. वयात्री 14. व. द ..] ५. उपमेया [.. व. ६.] १२. पाखपून [इ. इ. प. प. ६. सौरभेयी [. द. ६.६] १३. रमणा [प. इ. ५. व.] ७. सीतातुरा [प. वं.द...] १४. कुमारी [.प. प. य. ३. इन्दुमा - १. वृत्तनिरूपण-प्रकरण [६५ व. इ इ १. धरासिको- महाचमूनामधिपा समन्ततः, सना सद्यःसुतरामुदायुधाः । इ. तस्थुविनम्रभितिपालसड्कुले, तस्याङ्गणद्वारि बहि प्रकोष्ठ । [कुमारसम्भव १५६] २ रतास्यानिको- परनन्वीतवधूमुखातो, गता न हस: श्रियमातपत्रजाम् । दूरेऽभवन भोजबलस्य गच्छत , लोपमातीतगजस्य निम्नगाः॥ [शिशुपालवधम् १२६६१] ३ इन्दुमा- चमूप्रभु मन्मथमर्दनात्मजं, विजित्वरीभिर्विजयथियाश्रितम् । श्रुत्वा सुराणा पृतनाभिरागत, चित्ते चिर चुक्षुभिरे महासुराः ।। [कुमारसम्भव १५।२J ४ पुष्टिदा- श्रुत्वेति वाच वियतो गरीयसी, क्रोधादहङ्कारपरो महासुर । वं प्रकम्पिताशेपजगत्त्रयोऽपि स- नाकम्पनोच्चैदिवमभ्यधाच्च स । [कुमारसम्भव १५३६] ५ उपमया (रामणीयकम्]-- नितान्तमुत्तुङ्गतुरङ्गहेपित- रुद्दामदानद्विपवृहित शतः। चलध्वजस्यन्दननैमिनि स्वन. श्चाभून्निश्च्छदासमयाकुल नभ । [कुमारसम्भव १४॥४१] इ सङ्गन बो गर्भतपस्विन शिशु राक एषोऽन्तमवाप्स्यति ध्र वम् । प्रतस्करस्तस्करसङ्गतो ययो, तद्वो निहन्मि प्रथम ततोप्यमुम । इ इ ६. इ. ६. सौरभयी-- इ [कुमारसम्भव १२४२] ६६ ] धृत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड RAM Amrammarnama व व इ व इ व ७. शीलातुरा-- निवार्यमाणरभितोनुयायिभि- व. ग्रहीतुकामैरिव त मुहुर्मुहु । अपाति गृध्र रभिमौलि चाकुल- भविष्यदेतन्मरणोपदेशिभि । कुमारसम्भव १।२६]] ८ वासन्तिका- अभ्याजतोऽम्यागतवर्णतर्णका- इ निर्यारणहस्तस्य पुरो दुधुक्षत । ३ वर्गाद्गवा हुकृतिचार नियंती- मरमंथोरक्षत गोमतल्लिकाम् । [शिशुपालवध १२:४१] ६ मन्दहासा- न जामदग्न्य क्षयकालरात्रिकृत्, स क्षत्रियाणा समराय वल्गति । येन त्रिलोकीसुभटेन तेन ते, कुतोऽवकाश सह विग्रहग्रहे। [कुमारसम्भव १५३७] १० शिशिरा-- साऽवज्ञमुन्मील्प विलोचने सकृत, क्षण मृगेन्द्रण सुषुप्सुना पुन । सैयान यात समयाऽपि विव्यये, कथ सुर ययाऽयवा। [शिशुपालवध १२२५२] ११ बंधात्री- प प्रयाति मत्र (4) प्रथम भुजङ्गमा य न मन्त्रसाध्यास्तु भवति घातव । पेचिच्च वञ्चिच्च दशन्ति पन्नगा', सदा च सर्व प तुर्दात घातव । सौन्दरानन्द १२ वाहपूडा- निम्ना प्रदेशा स्थसतामुपागमन् निम्नत्वमुचरपि सवंतपय ते । तुरममा जसो पुरं क्षता- रगत:परित समोहता ॥ Iकुमारगम्भव ॥ इ. व व. -- १ ५०२२३.२२३] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण [७ यया- १०५ अप जलोद्धतगति प्रवेहि जगण ततोऽपि सगण, विधेहि जगण पुनश्च सगणम् । फणीन्द्रकथिता जलोद्धतगति , चकास्ति हृदये कृतातिसुमति ॥ २२३ ।। नवीननलिनोपमाननयन, पयोदरुचिर पयोधिशयनम् । नमामि कमलासुसेवितहरि, सदा निजहृदा भवाम्बुधितरिम् ।। २२४ ॥ इति जलोद्धतगति १०५ १०६ पय वैश्वदेवी कर्णा जायन्ते यत्र पूर्व नियुत्ता, वह्नस्सख्याका य-द्वयेन प्रयुक्ता । वाणाणैश्विना वाजिभिश्चापि भिना, नागेनोक्का सा वैश्वदेवी विभाति ॥ २२५ ।। . पथा- वन्दे गोविन्द वारिधी राजमान, श्रीलक्ष्मीकान्त नागतल्पे शयानम् । अत्यन्त पीत वस्त्रयुग्म दधान, पार्वे तिष्ठत्या पद्मया सेव्यमानम् ॥ २२६ ।। इति वश्वदेवी १०६. व इ १३ रमणा- बली बलारातिबलाऽतिशातन, दिग्दन्तिनादद्रवनाशनस्वनम् । व महीघराम्भोधिनवारितक्रम, भयो रथ घोरमथाधिरुह्य स ।। [कुमारसम्भव१८, १४ कुमारी- कि बूथ रे व्योमचरा महासुरा, व स्मरारिसूनुप्रतिपक्षवर्तिन । मदीयवाणवणवेदना हि सा धुना कथ विस्मृतिगोचरीकृता। [कुमारसम्भव १५४०] व ६८] वृत्ताक्तिक- द्वितीयखण्ड [५० २२७ • २२६ १०७ अथ मन्दाकिनी इह यदि नगणद्वय जायते, तदनु च रगणद्वय दीयते । फणिपमुखसुमेरुमन्दाकिनी, प्रभवति हि तदैव मन्दाकिनी ॥ २२७ ।। यथा- सखि | मम पुरतो मुरारे कथा, कुरु न कुरु तथा वृथाऽन्या कथाम् । दि मधुरिपुरेति वृन्दावन, कलय मम तदा शरीरावनम् ॥ २२८ ।। इति मन्दाकिनी १०७ क्वचिदियमेव प्रभेति' नामान्तर लभते । 'सह शरधि निज तथा कार्मुकम्' इत्यादि किराते*२ ॥ यथा वा-'अतिसुरभिरभाजि पुष्पथिया' इति माघेऽपि । १०८ प्रथ कुसुमविचित्रा विरचय विप्र तदनु च कर्ण, पुनरपि तद्वत् कुरु रविवर्णम् । श्रुतिमितपादे विमलचरित्रा, परमपवित्रा कुसुमविचित्रा ॥ २२६ ।। टिप्पणी-१ उत्तरलाकर म०३, का० ६५ “टिप्पणी-२ सह शरघि निजस्तथा कामुक धपुरतनु तथव समितम् । निहितमपि तथैव पश्यन्नसि, उपभगतिरुपाययो विस्मयम् ।। [किरातार्जुनीयम् स० १८, ५० १६] टिप्पणी-३ प्रतिसुरभिरभाजि पुष्पप्रिया. मतनुतरतयेव सतानक । तरुणपरभूत स्वन रागिणा. मतनुन रतये वसन्तानक ॥ [शिशुपालवधम् स. ६,५०६७ १०२३० - २३४] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण यथा- भययुतचित्तो विगतविलम्ब, कथमपि यातो हरितक्दम्बम । तरणिसुतायास्तटभुवि कृष्ण, स जयति गोपीवसनसतृष्ण ॥ २३० ॥ इति कुसुमविचित्रा १०६. १०६ भय तामरसम् यया- सरससुरूपसुगन्धसशोभ, कुचयुगसङ्गमसवृत'लोभम् । रसयुतहारयुगाहितमुक्त, कलयत तामरस वरवृत्तम् ॥ २३१ ।। विलसति मालतिपुष्पविकास, न हि हरिदर्शनतो वनवास । सखि । नवकेतकिकण्टककर्ष, वनकलितोनुतनूरुहहपं ॥ २३२ ।। इति तामरसम १०६ ११. प्रथ मालती कलय नकारमतोपि नायको, तदनु विधारय पक्षिणा पतिम् । फणिपतिपिङ्गलनागभाषिता, कविहृदि राजति मालती मता ॥ २३३ ।। पया- कलयति' चेतसि नन्ददार, सकलवधूजनचित्त'हारकम् । निखिलविमोहकवेणुधारक, दितिमुतसवविनाशकारकम् ॥ २३४ ।। इति मालती ११. ३ सपोरहारम्। १ स समृतम्। २० सिमत।
१०० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ प० २३५.२३८ कुत्रचिद् इयमेव यमुना इति नामान्तर लभते । 'अयि विजहीहि दृढोपगृहनम' इत्युदाहरणान्तर भारविस्थिरम् । १११. प्रथ मणिमाला आदी विदधाना हारो वरमेरू, युक्ता रववझ्या सन्नूपुरकाभ्याम् । कर्णे रसपुष्पोद्यत्कुण्डलयुग्मा, छिन्ना रसयुक्त वर्णमणिमाला ॥ २३५ ॥ गौरीकृतदेह व्यालावलिमाल, नृत्ये विधुनान कृत्ति पुरकालम् । लोलानलकाले ' सभूपितभाल, कामै शरण त्व सप्राप्य शिवालम् ।। २३६ ।। इति मणिमाला १११ यथा- ११२ सय जलघरमाला यस्यामादी पदविरती वा कर्णा, पक्षप्रोक्ता दिनकरसख्यावर्णा । मध्ये विप्रो जलनिधिशलैश्छिन्ना, नागप्रोक्ता जलधरमाला भिन्ना ॥ २३७ ।। शीतै पुष्परभिनवशय्या कृत्वा, ताम्यच्चित्ता मलयजमूर्ति धृत्वा । वक्षस्पीठे तव सुचिर ध्यायाती, तिष्ठत्येपा शठविधिदोप पश्यन्ती ।। २३८ ॥ इति जलपरमाला ११२ १ ख कोला *टिप्पणी-१ प्रयि विजहीहि दृढोपगृहन त्यज नवसङ्गमभीरु ! वल्लमम् । मरुणवरोद्गम एप वतते, वरतनु । सप्रवदति बुक्कुटा । पामिद वृत्तमौक्तिककारेण पदोमजरीवृता च भारवे स्वीकृत कितु सराती किरातार्जुनीये तु नास्युपसन्धिरस्य । प्रतोऽपत्र घोहम । - प० २३६ - २४३ ] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण ११३. प्रथ प्रियंवदा कुसुमसङ्गतकरा रसाहिता, विमलगन्धकुचहारभूषिता। सस्तनूपुरसुशोभिता सदा, जयति चेतसि सखे ! प्रियंवदा ॥ २३६ । 1 यथा- ब्रजवधूजनमनोविमोहनं, सरसकेलिपु कलानिकेतनम् । सरसचन्दनविलेपचितं, कलय चेतसि हरि सदाचितम् ।। २४० इति प्रियदा ११३. ११४. पथ ललिता हारद्वयाचितकुन भूपिता, हस्तस्थितोज्ज्वलसुपुप्पकङ्कणा । पाद विरावयुतनूपुराञ्चिता, चित्ते चकास्ति ललिता विलासिनी ॥ २४१ ।। यपा- गोपीपु केलिरससक्तचेतसं, सूर्यात्मजा विलुलितातिवेतसम् । चित्तावमोहकरवेणुधारक, वन्दे सदा ललितनन्ददारकम् ॥ २४२ ।। इति ललिता ११४. इयमेव अन्यत्र सुललिता इति गणभेदेन उक्तम् । प्रतएव 'तो भो जरी सुललिता श्रुतौ यतिः।' इति वृत्तसारे सपति लक्षणं लक्षितमिति । ११५. प्रपललितम् धेहि भकारं तदनु प तगणं, धारय नं वा तदनु च सगणम् । वाणविराम फणिपतिकलितं, चेतसि वृत्तं कलयत ललितम् ।। २४३ ॥
१०२] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ५० २४४ - २४० पचा- यथा- चेतसि कृष्ण कलयति' ललित, गोकुलगोपीजनहृदि वलितम् । वादितवश तरलितमुकुट, कारितरास विनिहतशकटम् ।। २४४ ॥ इति ललितम् ११५ इदमेव अन्यत्र ललना' इत्युक्तम् । ११६ प्रथ कामदत्ता द्विजवर-सगणो विधेहि तूणं, जगणमथ ततोऽपि देहि कर्णम् । सरससुकविपिङ्गलेन वित्ता, लसति कविमुखेषु कामदत्ता ॥ २४५ ॥ कलपरिमलचञ्चलालिमाल, सुललितदलमालतीविशालम् । वनमिदमलिसलुलद्रसाल, हरिमिह हि विना सुखाय नालम् ।। २४६ ।। इति कामदत्ता ११६ ११७ प्रथ पसन्तघरवरम् यदा लघुगुरु क्रमेण भासते, खराशुवर्णकेन चेद् विकासते । फणीन्द्र नागभापित सुसत्वर, विधेहि मानसे वसन्त चत्वरम् ।। २४७ ॥ मुदा विलोतमौलिगोपनायक, हृदा सदैव चित्तमोददायकम् । यदा विमावयिष्यसि त्वमाशु रे, तदा सुसे निमज्जितासि भासुरे ॥ २४६ ।। इति वसन्तघावरम् ११७ यपा- -- सबसयत। २. निमा त्यति प्रभामुरे। "टिप्पणी-१ पत्र टि.पृ. १३७ १० २४६ - २५३ ] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [ १०३ १२८, अय प्रमुदितवदना सरसकविजनाहिता भाविता, भवति सुकविपिङ्गलेनोदिता। सकलरसिकचित्तहृया तदा, प्रमुदितवदना तु नौ रौ यदा ॥ २४६ ।। पथा- कलय सखि ! विराजि वृन्दावनं, सहचरि ! कुरु मे शरीरावनम् । यदि कथमपि मानसे भावयेः, यदुकुलतिलकं तदैवानये. ।। २५० ।। इति प्रमुदितथदना ११८. इयमेव अन्यत्र प्रभा'। ११६. अथ नवमालिनी यथा- सखि ! नवमालिनी रसविरामां, ननु कलयालि पूर्वतियुक्ताम् । नजभयकारभावितपदाढया, फणिपतिनागपिङ्गलविभक्ताम् ॥ २५१ ।। इह कलयालि ! नन्दसुतवाल, नवधनकान्तिनिजिततमालम् । सरसविलासरासतमाल, मुनिवरयोगिमानममरालम् ॥ २५२ ।। इति नवमालिनी ११६. १२०. प्रप तरलनयनम् जलधि-नगणमिह रचयत, रविमित लघुमिह कलयत । सकविफणिपतिरिति वदति, तरलनयनमिति हि भवति ॥ २५३ ।। *टिप्पणी-1 वृतरनारसप० ३.ा. ६५ १०४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० २५४ . २५७ पथा- तव कुसुमनिमहसितमयि, गततनुमनुकलयति मयि । इति हि सखि । हरिरनुवदति, परिकलय दृशमयि सुदति । ॥ २५४ ॥ इति तरलनयनम १२० । 'अत्र प्रस्तारगत्या द्वादशाक्षरस्य पण्णवत्यधिक सहस्रचतुष्टय ४०६६ भेदा भवन्नि, तेषु कियन्त प्रदर्शिता शेषभेदा, सुधीभि प्रस्तार्य सूचनीया इति'।" इति द्वादशाक्षरम्। अथ त्रयोदशाक्षरम् १२१ धाराह यस्मिन् पादे दृश्यन्ते सयुक्ता पटकर्णा , सूर्याणामेकेनाग्राणा सख्यांका वर्णा । कर्णस्यान्ते यस्मिन् सप्रोक्तश्चैको हार , सोऽय नागोको वाराहो वृत्ताना सार ॥ २५५ ।। यथा- कल्पान्तप्रोद्यदवारा राशो दृब्धा मग्न, य क्षोणीपृष्ठ दष्टाने कृत्वा सलग्नम् । हत्वा दैत्य दृप्यन्त सिन्धोमध्यादागात्, कुर्यात् काल ' सोऽय सर्वेपो रक्षा घेगात् ॥ २५६ ॥ इति वाराह १२१. १२२ अपमाया हारी मृत्या स्वर्णमुमेरद्वययुक्ती, प्रत्येक हस्तौ वलयाभ्यामपि सको। मिथ्याचित्तस्थस्य दयाना'वरवणे, माया सर्वपा हृदये राजति तूर्ण' ॥ २५७ ॥ १. प्रो - परिमार्षमारित २स रोल । ३ सपान परपम् । टिपणी-१ अग्यपापेषु प्राप्रपा पञ्चमपरिशिष्टंसमोपनीया ।
२५८ . २६० ] १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण [ १०५ एतस्या एवान्यत्र श्रृति नवयतिसहित मगण - तगण - यगण-सगण- गुरुयुत मत्तमयूरमिति गणान्तरेण नामान्तरमुक्तम् । तथा च छन्दोमर्याम् [द्वितीयस्तबके का ६७] 'वेदै रन्ध्रम्तो यसमा मत्तमयूरम् ।' इति लक्षणात् । यपा- वन्दे गोप गोपवधूमि कृतरास, हस्ते वश रावि दधान वरहासम् । नव्ये कुजे सविदधान नवकेलिं, लोलाक्ष राधामुखपद्माकरहेलिम् ॥ २५८ ।। इति माया १२२ यथा था, अस्मद्वृद्धप्रपितामहथीरामचन्द्रभट्टविरचित कृष्णकुतूहले महाकाव्य रासवर्णनप्रस्तावे- रासक्रीडासक्तवचस्कायमनस्वा, सस्कारातिप्रापितनाट्यादिविशेपा । वृन्दारण्य तालतलोदघट्ट नवाचा- मत्यासगाच्चकुरिमा मत्तमयूरम् ।। २५६ ।। यथा वा, छन्दोमञ्जर्याम् द्वितीयरतबके का० ६७] लीलानृत्यन्मत्तमयूरध्वनिकान्त, चन्चनीपामोदिपयोदानिलरम्यम् । कामक्रीडाहृष्टमना गोपवधूभि , कसध्वसी निर्जनवृन्दावनमाप ॥ २६० ॥ 'गौरीमम्बामम्बुरहाटीमहमोडे,' त ससारध्यान्तयिनारा हरिमोडे । टिप्पणी--१ 'लीलारयस्यापितलुप्तासिरामोको सोपातीतयोगिभिरतस्चिरमग्याम् । बालारियरिणशमानपतिपुजा गौरीमायामम्बुरहानीमहमोरे ॥१॥ [गराधायागौरीदारतोत्र प. १] स्तोप्ये भात्या विषणुमनादि वगनादि परिमग्नतत् समतिपत्र प्रमतीरपम् । यस्मिन् दुधे नस्पति तस्मतिषक, तससारमा नविनाय हरिमोट ।।१॥ [Pायरिमो स्टोर प..] गटिप्पणी-२ वृत्तमौक्तिक -द्वितीयखण्ड [. प०२६१-२६४ 'हा तातेति- इति च श्रीशङ्कराचार्यविरचिते गोरोदशके हरिस्तोत्रे च । ऋन्दितमाकर्ण्यविषण्ण' *' इत्यादि रघुवशे च सहस्रशो निदर्शनानि । इति मत्तमयूरम १२२ १२३ प्रथ तारकम् जलराशिविराजितहस्तसयुक्त, चरणस्य तथा विरतो गुरुवृत्तम्'। हृदये कुरुताखिलमोहितचित्त, फणिनायकभाषित-तारकवृत्तम् ।। २६१ ॥ यया- विमल कमल गरल मनुते सा, सरसेन विसेन सुसेवितवेपा । अवन गमन तदनन्दितचित्त, हृदये सदये तदये कुरु वित्तम् ॥ २६२ ॥ प्रथा वा, भूषणे - अतिभारतर हृदि चन्दनपङ्क, मनुते सरसीपवन विषशङ्कम् । तव दुस्तरतारवियोगपयोधि- नं हि पारमसो भविता परमाथे ॥ २६३ ।। इति तारकम् १२३ १२४. पथ कन्दम् शर हारयुग्म क्रमादत्र सधेहि, प्रय पवितसख्याकवर्ण तथा धेहि । इद कन्दसज्ञ समुक्त फणीन्द्रण, कवीना यथा मोदकन्द कवीन्द्रेण ।। २६४ ।। १ वित्तम् । *टिप्पणी-१ हा सातेति नन्दितमानपं विषण्ण. स्तस्यान्विप्यन् वेतसगूढ पभव स । शल्यप्रोत धोदय मधुम्भ मुनिपुत्र, सापादन्त शल्य इवासीत् क्षितिपोपि ॥ रिपुवा स. ९, १०७५]] "टिपणी-२ वारणीभूपणम् जि. प. पच २४८ प० २६५ - २६६] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण [१०८ पया- यथा- विलोलद्विरेफावलीनां विरावण, हिमाशोः कराणां च सद्धेन दावेण । वपुर्मे सदा दाहितं शीतयस्वालि, पुरो दर्शयित्वा वपुर्मालतीमालि ।। २६५ ।। इति कन्दम् १२४. १२५. मय पडावलिः भ कुरु तदनु नकारमिहानय, धेहि जमथ जगण परिभावय । शंखमिह तदनु भामिनि मानय, पङ्कपरिकलितावलिमानय ।। २६६ ।। कोमलसुललितमालति'मालिनि, पङ्कजपरिमलसलुलितालिनि । कोकिलकलकल कूजितशालिनि, राजति हरिरिह वजुलजालिनि ।। २६७ ।। इति पङ्कालि' १२५. १२६. प्रय प्रहषिणी कर्णाभ्या सुललितकुण्डलं दधाना, शखाभ्यामतिसुरसा कुचाढयहारा । विश्राम ननु रवनूपुरस्य युग्मे, बिभ्राणा सखि ! जयति प्रहर्षिणीयम् ॥ २६ ॥ यद्दन्ते विलसति भूमिमण्डल त- न्मालिन्यश्रियमुपयातमुज्ज्वलाभे। देवेन्द्ररभिकलितः स्तवप्रयोग- रस्माक वितरतु श स कोलदेहः ।। २६६ ।। पपा- ययावा, अस्मद्धप्रपितामह-महाकविपण्डितश्रीरामचन्द्रभट्टविरचिते कृष्णकुतहले महाकाव्ये श्रीमगवदाविर्भाववर्णनप्रस्तावे- १. स. कुन्दसुमालिनि । २. . कोकिलनवकल ।
१०८ वृत्तमौक्तिक -दितीयखण्ड [ २७० - २७४ w सत्य सद्वसु वसुदेवदेवकीभ्या, रोहिण्यामुडुनि नभस्य कृष्णपक्षे । पर्जन्ये कटति निशीथनीरवाया- मष्टम्या निगमरहस्यमाविरासीत् ॥ २७० ॥ इति प्रहपिणी १२६ १२७ प्रथ चिरा पयोधरे कुसुमितहारभूपिता, सुपुष्पिणी सरसविराविनूपुरा । रसान्विता सकनकरावकणा, चतुर्यति सखि | रुचिरा विराजते ।। २७१ ॥ यथा- क्लापिन निजदयिताविहारिण पयोधर सखि ! कलये विराविणम् । हरि विना मम सकल विपायित, हरे पुन सकलमिद सुखायितम् ।। २७२ ।। इति हचिरा १२७ २८. प्रय सण्डी पलय नयुगमिह धारय हस्त, तदनु च विरचय स किल शस्तम् । चरणविरतियुतभासुरहारा, त्रिजगति वरसखि राजति चण्डी ।। २७३ ।। पचा- सरतचरणयुतनूपुरशोभा, बहुविधविरनितमानसलोभा। हरिंगतवनमनुगच्छति राधा महि मनसिजवृतमानसवाधा ।। २७४ ।। पति घी १२८ प० २७५ - २७८] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण [१०६ AAM पपा- १२६. मय मजुभाषिणी करसङ्गिपुष्पयुतकणान्विता, रसरूपरावमितनूपुराञ्चिता। कुचशोभमानवरहारधारिणी, कुरुते मुद मनसि मञ्जुभाषिणी ।। २७५ ॥ जनितेन मित्रविरहेण दुखिता, मिलितु तथैव वनिता हरेर्हरित् । विधुबिम्बचित्तभवयन्त्रपूजन, कुसुमंस्तनोति नवतारकामयः ।। २७६ ।। इति मजुभाषिणी १२६ सुनन्दिनी इत्यन्यत्र । अन्यत्रेति शम्भो । क्वचिदियमेव प्रबोधिता च । १३०. प्रप धन्द्रिका कुरु नगणयुग धेहि पादे सतः, तगणयुगलक गोऽपि चान्ते ततः। चरणमनु तथा कामवर्णान्विता, हयरसविरतिश्चन्द्रिका पूजिता ।। २७७ ।। पया. कलयत हृदये शैलसधारक, मुनिजनमहित देवकोदारकम् । व्रजजनवनिता-दुःखसन्तारकं, जलघररुचिर देत्यसहारफम् ।। २७८ ॥ इति चन्द्रिका १२.. पथावा- 'इह दुरधिगमै किञ्चिदेवागम.।' इत्यादि किरातार्जुनीये*२१ मचिदियमेव उत्पलिनी इति प्रसिद्धा । १.स या उदाहरण मास्ति। *टिप्पणी-१ पन्दोमरी, द्वितीयम्तवक, पारिवा ६९ एवं १०२ । *टिप्पणी--२ 'इह दुरपिगमः विश्विदेवागम सततममुनर वायत्यन्तरम् ।। प्रमुमतिविपिन वेददिग्यापिन पुरुषमिव पर पपयोनि. परम् ।। [रिरातार्जुनीयम् म...१.१८ ११० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ २०२७६ - २८३ १३१ अथ कलहसः सगणं विधेहि जगणं च सुयुक्त, सगणद्वयं कुरु पुनः फणिवित्तम् । गुरुमन्तगं कुरु तथा हृतचित्तं, कलहंसनामकमिदं वरवृत्तम् ॥ २७६ ॥ यथा- नवनीतचोरममलद्युतिशोभं, व्रजसुन्दरीवदनपङ्कजलोभम् । लालतादिगोपवनिताकृतरास, कलये हरि निजहृदा वरहासम् ।। २८० ॥ इति कलहंसः १३१. कुत्रचिदयमेव सिंहनाद इति, क्वचिच्च फुटजाख्यमिति । १३२. अथ मगेन्द्रमुवम् कुरु नगणं तदनन्तरं नरेन्द्र, तदनु च जं कुरु पक्षिणामथेन्द्रम् । तदनु विधारय नूपुरं पदान्ते रचय मृगेन्द्रमुखं सुखेन कान्ते ! ॥ २८१ ॥ कुमुदवनोपु सखे ! विधूतवन्धः, कमलवनस्य सदा हृतातिगन्धः । विधुरुदितो घवलीकृतातिलोकः, प्रतिरजनीषु च दत्तकोकशोकः ।। २८२॥ इति मगेन्द्र मुखम् १३२. १३३. अपक्षमा द्विजवर-सगणो धेहि वैनतेयं, यगणमथ तथा पण्डितालिगेयम् । मुनिरचितयतिः सज्जनादिमेयं, फणिपति कथिता राजति क्षमेयम् ।। २८३ ॥ यथा- पा- कलयात हृदये नन्दगोपसून, फणिपतिदमनं न्यक्यतातिमानम् ।
५०२८४ - २८८] १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण 1 १११ शशधरवदन राधिकारसाल, सरसिजनयन पङ्कजालिमालम् ॥ २८४ ।। इति क्षमा १३३. इयमेव क्वचिद् गणान्तरेणापि क्षमेव" भवति । १३४ प्रष लता कलय नगण विधेहि तत कर, जगणयुगल च देहि तत परम् । चरणविरतो गुरु कुरु सम्मता, रसकृतयतिर्मुदा विहिता लता ॥ २५ ॥ पपा- कलय हृदये मुदा बजनायक, ललितमुकुट सदा सुखदायकम् । युवतिसहित प्रजेन्द्रसुत हरि, कनकवसन भवाम्बुनिधेस्तरिम् ॥ २८६ ॥ इति लता १३४. १३५ मय चन्द्रलेखम कुरु न-सगणो पक्षिराज च युक्त, रचय रगण कामवर्णरमुक्तम् । तदनु च पुन कुण्डल धेहि शेप, कलय फणिना भापित चन्द्रलेसम् ॥२८॥ यथा- नमत सतत नन्दगोपस्य सूनु, फणिप दमन दानवोलूकमानुम् । कमलवदन राधिकाया रसाल, तरलनयन परजालीमुमालम् ।। २८८ ॥ इति घसंतम् १३५ चन्द्रलेसा' इत्यन्यत्र । टिप्पणी-१ वृतरनाकरस्य (प्र. ३ का ७५) नारायणीटीबायो ' पद प्राचार्यों मतभेदेन सज्ञातरा पुनस्चे। पिणी-२ इन्दोममरी, दिलीयस्तरम, मारिता १.५
११२]
वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड
[५०२८६-२६३
१३६ प्रथ सुथति
कुरु न-सगणी पादे तकारौ तथा,
कलय वलय स्यु कामवर्णा यथा।
रसपरिमितर्वर्णैस्तथा स्याद यति ,
फणिपकथिता सशोभते सुद्य ति ।। २८६ ॥
यथा-
वदनवलित गर्युता सद्वया,
लुलितललिता लोलालसाक्षिद्वया ।
सखि हरिगृहाद् याति प्रगे राधिका,
सकलसुदृशा नित्य मनोवाधिका ॥२६॥
इति सुध ति १३६
१३७ अथ लक्ष्मी
कर्णे विराजिसरसकुण्डलान्विता,
गन्धाढयपुष्पयुतकरेण शोभिता ।
वक्षोरहे च विमलहारशोभिनी,
लक्ष्मी सदा फलतु ममातुल फलम् ॥ २६१ ।।
यथा-
वन्दे हरि फणिपतिभोगशायिन,
सर्वेश्वर सकलजनेप्टदायिनम् ।
पीताम्बर मणिमुकुटादिभासुर,
गो-गोपिकानिक्रवृत हतासुरम् ।। २६२।।
इति लक्ष्मी १३७
१३८ मप विमलगति
जलधिमित नगणमिह कलय,
सदनु च ससि लघुमिह रचय ।
पणिपतिसुकलितमिति भवति,
दिदनु यति विमलगति मुदति ! ॥ २९३ ॥
५० २६४ . २६७ ] १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण ~ यथा- अभिनवसजलजलदविमल, निजजनविहतसकलशमल'। कमलसुललितनयनयुगल, जय जय 'सुरनुतपदकमल ।। २६४ ।। इति विमलगति १३८ अत्रापि प्रस्तारगत्या त्रयोदशाक्षरस्य द्विनवत्युत्तर शतमष्टौ सहस्राणि च ८१६२ भेदा भवन्ति, तेपु कतिचन भेदा समुदाहृता, शेपभेदा सुधीभि प्रस्तार्य समुदाहरणीया इत्यल पल्लवेन ।' इति प्रयोदशाक्षरम्। अथ चतुर्दशाक्षरम् यपा- १३६ सिंहास्य यस्मिनिन्द्र संख्याता राजन्ते युक्ता वर्णा, पादे सूर्याश्व सख्याका सशोभन्त कर्णा । नागानामीशेनेतत् प्रोक्त सिंहास्य कान्ते । भूपालाना चित्तानन्दस्थान हि स्वान्त ॥ २६५॥ यो दैत्यानामिन्द्र वक्षस्पीठे हस्तस्याग्रे- भिद्यद् ब्रह्माण्ड व्याश्योज्वामृदनादुगे । दतालीकान्युन्मिथ निर्यविधु वृद्धास्य- स्सूर्ण सोऽस्माक रक्षा कुर्याद्घोर (वीर )सिंहास्य ॥ २६६ ॥ इति सिहास्य १३६ १४. पप सतहितका हारद्वय स्फुरदुरोजयुत दधाना, हस्त च गन्धयुसुमोज्ज्वलवणाढयम् । पादे तथा सरुतनूपुरयुग्मयुता, चित्त बसन्ततिलका क्लि चाक्सीति ।। २६७ ॥ १ स समस। २ पत्रिम मास्तिरो। * टिष्यको-प्रत्यारेषु समुपलपोपभेदा पञ्चमपरिशिष्टे पयोगपीया।
११४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प० २९८ -३०२ यथा- लोके त्वदीययशसा धवलीकृतेऽस्मिन, छायाभय निजशरीरकृत विमुच्य' । ज्योत्स्नावतीपु रजनीवभिसारिकाणा, सङ्घ प्रियस्य सदन सुखत प्रयाति ।। २६८ ॥ यथा वा, कृष्णकुतूहले- पातु न पारयति यत्कथित पयस्त- द्दध्नो विनाश्य दृढनाशयति स्वकीयान् । खण्ड निधाय दधिखण्डमखण्डमेव, क्षिप्त्वा मुखे निखिलमत्ति मुखे सुतस्ते ।। २६६ ।। इति वसन्ततिलका १४. १४१ प्रथ चक्रम कुण्डलकलितदहनमित नगण, शवसहितमिह विरचय संगणम् । कुण्डल नरपतिवरकविकलित, कमखिलकविजनहदि ललितम् ॥ ३०० ।। कोकिलकलरवसुललितसमये, शीतलमलयजपवनसुखमये। कामविशिस्त्रयविदलितहृदये, सुन्दरि ! परिहर हृदयमदमये ॥३०१।। यथा या पाणीभूषणे- [द्वितीयाध्याय, पद्य २५८] सुन्दरि । नभसि जलदचयरुचिरे, देहि नयनयुगमतिघनचिकुरे । मानमिह न कुरु जलधरसमये, कि तव भवति हृदयमिदमदय ।। ३०२ ॥ इति चक्रम १४१ १४२ प्रथमसम्बाया विभ्राणा को कलितललिवताटकी (डा), वाणं सञ्छिना द्विजविरचितगोमाढया । पथा- क विभक्त । २ स दृढमाशयति स्वकीयात् । ३ स कुण्डलो।
१०३०३ - ३०८ १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण हस्ताने राजविरचितवलयद्वन्द्वा, स्तुत्या सप्रोक्ता वरकविभिरसम्बाधा ॥३०३॥ यपा वन्दे गोपाल ब्रजजनतरुणीधीर, रासक्रीडायामभिगतयमुनातीरम् । देवाना वन्द्य हृतवरवनिताचीर, वाले सयुक्त दितिसुतदलने वीरम् ॥ ३०४ ।। इति प्रसम्मापा १४२ १४३ प्रय अपराजिता द्विजपरिकलिता करेण विराजिता, कुचयुगकलिता प्रलम्बितहारिणी। मुवननिगदितातिशोभितवणिनो, कृतमुनिविरतिर्जयत्यपराजिता ॥ ३०५ ॥ पदा- प्रतिरुचिदशनः सभातमसा हर , दितिसुतरुधिरं सुरक्तनखाङ्कुर । जलभृदुडुगणी सटाभिरुपाहरत्', जयति हरितनुभंटानपि सहरत्' ।। ३०६ ।। इति अपराजिता १४३ १४४ प्रप प्रहरणकलिका रचयत नगणद्वयमथ भगण, लघुगुरसहित फलयत नगणम । प्रहरणकलिया मुनियतिसहिता, फणिपतिकथिता कविजनमहिता ॥ ३०७ ॥ यपा- नम मधुमपन जलनिधिशयन, सुरगणनमित सरसिजनयनम् । इति गदनमतिर्भवति हदि यदा, भवजलनिधित]स्तरति ससि ! सदा ।। ३०८॥ १स पाहा.
११६] वृतमौक्तिक-दितीयखण्ड [१०३०६-३१३ यथा था, कृष्णकुतूहले- वजयुवतिभिरित्यभिमतवचसि, प्रतिपदममृतद्रवमिव विकिरति । मनसिजविशिखप्रपतनविधुत- स्वविरहदहनप्रशमनमकलि' ॥ ३०६ ।। इति प्रहरणकलिका १४४ १४५. भय घासन्ती कों कृत्वा कुण्डलसहितो गन्ध पुष्प, हस्ते धृत्वा कङ्कणमथ हार राजन्तम् । स्वर्णेनाढ्य नूपुरमथ धृत्वा राजन्ती, नागमोक्ता राजति कविचित्ते वासन्ती ॥ ३१० ।। यथा- वन्दे गोपीमन्मथजनक कसाराति, भूमे कार्यार्थं नृषु कृतमिथ्याविख्यातिम् । रासे वशीवादननिपुण कुञ्ज कुजे, लीलालोल गोकुलनवनारीणा पुजे ॥ ३११ ॥ इति वासन्ती १४५. १४६. प्रय लोला कर्णे कुण्डलयुक्ता हस्त स्वर्णसनाय, बिभ्राणा वलयाढय हारी चोज्ज्वलपुप्पो । सध्वान च दधाना दिव्य नूपुरयुग्म, नागोक्ता कविचित्ते कान्ता राजति लोला।। ३१२ । पया- गोपाल कलयेऽह नित्य नन्दकिशोर, वृन्दारण्यनिवास गोपीमानसचौरम् । वशीवादनसक्त नव्ये पुजकुटीरे, नारीभि. वृतरास कालिन्दीवरतीरे ।। ३१३ ॥ इति लोला १४६. १ क मलि। २. म. घोर।
प० ३१४-३१८] १. वृत्तनिरूपण प्रकरण [ ११७ १४७ अपनान्दोमुखी द्विजपरिकलिता हस्तयुक् कङ्कणाड्या, विरुतविलसिती नूपुरो धारयन्ती । रसकनकयुतं हारमुच्चैर्दधाना, स्वरविरतियुता भाति नान्दीमुखीयम् ॥ ३१४ ।। पथा- नखगलदसृजा पानतो भीपणास्यः सुरनृपतिमुखैर्देवसघरुपास्य.। भयजनकरवर्नादयद्दिड मुखानि, प्रकटयतु स व. सिंहवक्त्र. सुखानि ॥ ३१५ ।। इति नान्दोमुखी १४० १४८. अपयंदी कणे कृत्वा कनकसुललित साटव सबिभ्राणा द्विजमय वलय हस्ताने। दिव्य हारद्वितयमय दधाना युक्त' वेदरिछना जगति विजयते वैदर्भी ।। ३१६॥ पथा- वन्दे नित्य नरमृगपतिदेह व्यग्र, दत्येशोर स्पलदलनविधावत्युग्रम् । प्रह्लादस्याभिलपितवरद सृक्काने, सलिह्यन्त रुधिरविलुलितं जिह्वाग्रम् ॥ ३१७॥ इति दी १४. १४६. प्रय इन्दुधवनम् घेहि मगण तदनु पारय जकारं, हस्तमय कारय ततोऽपि च नकारम् । हारयुगल तदनु देहि चरणान्ते, नागरतमिन्दपदन भवति यान्ते ! ॥ ३१८ ।। नौमि पनितावितठरासरसयुक्त, गोदुसवपूजनमनोहरणसतम्। यपा- ११८] वृत्तमोक्तिक-द्वितीयखण्ड [ ५० ३१६-३२३ देवतिगर्वहरखण्डनसुदक्ष, भूमिवलये निहतदैत्यगणलक्षम् ।। ३१६ ।। इति इदुवदनम् १४६ स्त्रोलिङ्गमन्यत्र । १५० मय शरभी कणं स्वर्णोज्ज्वलललितताटङ्कयुक्त, सबिनाणा द्विजमथ रुत नूपुराढयम् । हार पुष्प वलययुगल धारयन्ती, वेदैश्छिन्ना जयति शरभी पिङ्गलोक्ता ।। ३२० ।। या- - वन्दे कृष्ण नवजलधरश्यामलाङ्गः वृन्दारण्ये व्रजयुवतिभिर्जातसङ्गम् । कालिन्दीये सरसपुलिने क्रीडमान', कालीयाहे प्रथितयशसो धूतमानम् ॥ ३२१ ॥ इति शरभी १५० १५१ अप महिपति रचय नयुगल कुरु ततो भगण, लघुगुरुसहित कुरु तथा जगणम् । मुनिविरतियुता फणिनृपस्य कृति , जगति विजयते सुविमलाऽहिति ॥ ३२२॥' सकलतनुभृता जलमपेयतर, विगतवि[प]भय रचयितु कृपया । पतति तरुवराच्छिरसि नन्दसुते, भुवनभरसहा विजयतेऽहिति ॥ ३२३ ।।* इति महियक्ति १५१. १५२ प्रथ विमला रचय न-भूपती पुरु तथा भगण, लघुवलयाचित च विरतो जगणम् । पपा- व समान। २ पूर्ण पत्र मास्तिक प्रती। टिप्पणी-१ रत्नापर.स.२२ ५० ३२४ - ३२६ ] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [ ११६ पपा- फणिपतिभापिता रविहयविरति- वरकविमानसेऽतिविमला जयति ।। ३२४ ।। ब्रजजनमागरीदघिहतावतुला, तरणिसुतातटे हरितनुविमला'। वरवनितादृशा सुसुकृतककला, मम विमले सदा भवतु हृद्यचला ।। ३२५ ।। इति विमला १५२ १५३ मय महिलका कुरु गन्धयुग्मसहित मृगाधिपति, रचयाशु सन्ततमथो नरावपि सम् । इह मल्लिका कलयता विलासवती, नवपञ्चर्यतियुता मुदो जननीम् ॥ ३२६ ।। यपा- , सखि । नन्दसूनुरिह मे मनोहरण , जनताप्रसादसुमुखस्तमोहरण । भविता सहायकरणो जनानुगत , करवं कमा शरण बने सुखत ॥ ३२७।। इति मल्लिका १५३ १५४ प्रथ मणिमणम जलधिमित नगणमिह कलयत, तदनु च लघुयुगमपि रचयत । सफलफणिन्पतिविरचितमिति, निजहृदि कलयत मणिगणमिति ॥ ३२८ ।। भुज युगलविलसितपणिवलय, कृतसपलदितिमृतकुलविलय । प्रलयसमयमयजनय सलय', पगमनमपि सुममनुक्सय ॥ ३२६ ।। दति मणिगणम १५० । पचाय पूर्व भाग मालितो । २ प मुरा समनसराय।
१२० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० ३३० - ३३२ यथा 'अत्रापि प्रस्तारगत्या चतुर्दशाक्षरस्य चतुरशीत्यधिकानि त्रिशतानि पोडश- सहस्राणि च भेदास्तेषु कियन्तो भेदाः प्रदर्शिताः, शेषभेदाः सुधीभिराकरतः स्वमत्या का प्रस्तार्य समूहनीया इति दिक् । इति चतुर्दशाक्षरम् । अथ पञ्चदशाक्षरम् तत्र प्रथमम्- १५५. लीलाखेलः यस्मिन् वृत्ते रव्यश्वः संख्याता दृश्यन्ते कर्णाः, पादे पादे तिथ्या सम्प्रोक्ताः संशोभन्ते वर्णाः । हारश्चैकोऽन्ते यस्मिन्नागानामीशेन प्रोक्त, लोके वृत्ताना सारं लीलाखेलाख्यं तवृत्तम् ॥ ३३०॥ देवैर्वन्द्य त्रैलोक्यास्थानं देहं खर्वीकुर्वन्, दैत्यानामीशं भूम्यां स्यातः पातालस्थं कुर्वन् । स्वाराज्यं देवेशा यान्त्यन्तं स्थर्याढ्य संयच्छन्, मामव्याद् गोविन्दो वैरोच्यानाशी: पद्य गर्जन् ॥ ३३१ ॥ इति लोलाखेलः १५५. 'मा कान्ते पक्षस्यान्ते पर्याकाशे देशेस्वाप्सी:', इति ज्योतिषिकाणां कालपरि- माणपरं उदाहरणमिति कण्ठाभरणे । लीलाखेलस्य एतस्यैवान्यत्र सारङ्गिका* इति नामान्तरमुक्तम् । १५६. मथ मालिनी द्विजकरवलयाढ्या नूपुरारावयुक्ता, थवणरचितपुष्पप्रोतताटङ्कयुग्मा । वसुरचितविरामा सर्वलोककवर्णा, फणिपनृपतिकान्ता भासते मालिनीयम् ।। ३३२ ।। पथाधा- १. पषितत्रयं नास्तिक.प्रती २.प. चातः। ३.ब.रोधण्या: टिप्पणी-१ ग्रन्थान्तरेषु प्राप्तरोषभेदाः पञ्चमपरिशिष्टे पर्यालोच्याः। "टिप्पणी-२ मा पान्ते ! पक्षस्यान्ते पर्यावह देशे स्वाप्सी, पान्त वक्त्र पूरा पूर्ण चन्द्र' मत्वा रात्री घेत् । क्षसामः प्राटदचेतरतो राहुः कर प्राचात, तस्माद्वान्ते हायस्यान्ते शम्यगान्ते पराव्या । [पन्डामरण] टिपणी- सातपंगसम-हितीएपरिमोद, पर १५९ ।
'१० ३६३.३३८] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण [१२१ पथा- अयममृतमरीचिदिग्वधूकर्णपूरं सपदि परिविधातु कोऽपि कामोव कान्तः । सरस इव नभस्तोऽत्यन्तविस्तारयुक्ता- दुड़गणकुमुदानि प्रोच्चकच्चिनोति ॥ ३३३ ।। पथा घा, पाण्डवचरिते- भवनमिव ततस्ते वाणजालंग्कुर्वन्, गजरथहयपृष्ठे वाहुयुद्धे च दक्षाः । विघृतनिशितखङ्गाश्चर्मणा भासमाना, विदधुरथ समाजे मण्डलात् सव्यवामात् ॥ ३३४ ॥ यया वा, अस्मपितामहमहाकविपण्डितश्रीरायभट्टकृते शृङ्गारकल्लोले खण्डकाव्ये- मन इव रमणोनां रागिणी वारुणीयं, हृदयमिव युवानस्तस्करा: स्व हरन्ति । भवनमिव मदीय नाथ शून्यो हि देश- स्तव न गमनमोहे पान्थ कामाभिरामा ॥ ३३५ ।। पया था, कृष्णकुतूहले- निरवधिदिनमाना य विना गोपवध्व- स्तमभिकमभिसायं वीक्षमाणा ननन्दुः । स्मितमधुरमपाङ्गालोकन प्रीतिवल्या., कुसुममिव तदीयं वीक्ष्य कृष्णोप्यतुष्यत् ।। ३३६ ॥ इति मालिनी १५६ १५७ प्रथ घामरम् पक्षिराजभूपतिक्रमेण यद् विराजते, याणभूमिसख्ययाक्षरं च यत्र भासते । नागराजभापित तदेव चारुचामर, मानसे विधेहि पाठतोऽपि मोहितामरम् ॥ ३३८ ॥ नौमि गोपकामिनीमनोविनोदकारण, लीलयावधूतकंसराजमत्तवारणम् । फालियाहिमस्तकोल्लसम्मणिप्रकाशित, नन्दनन्दन सदैव योगिचित्तभासितम् ॥ ३३८ ॥ पपा- १२२ ] वृत्तमौक्तिक -द्वितीयखए [५० ३३०-३४२ यथावा, भूषणे* रासलास्यगोपकामिनीजनेन खेलता, पुष्पपुञ्जम कुञ्जमध्यगेन दोलता। तालनृत्यशालिगोपवालिकाविलासिना, माधवेन जायते सुखाय मन्दहासिना ॥ ३३६ ॥ इति चामरम् १५७. एतस्यैव अन्यत्र पूरणकं *२ इति नामान्तरम् । १५८, पथ भ्रमरावलिका चरणे विनिधेहि सकारमिपूपमितं, कुरु वर्णमपीपुनिशाकरसंप्रमितम् । फणिनायकपिङ्गलचित्तमुदः कलिका, सखि ! भाति कवीन्द्रमुखे भ्रमरावलिका ।। ३४० ॥ पपा- कलकोकिलकूजितपूजितनू (न)वनं, वनजाक्षिनवीनसरोजवनीपवनम् । हिमदीधितिकान्तिपय.परिधोतमिदं, जगदाशु विलोक्य' परित्यज मानमिदम् ॥ ३४१॥ या पा, भूषणे - सखि ! सम्प्रति क प्रति मौनमिदं विहितं, मदनेन धनुः सशरं स्वकरे निहितम् । नतिशालिनि का वनमालिनि मानकथा, रतिनायकसायकदुःखमुपैपि' वृथा ।। ३४२ ।। । इति भ्रमरावलिका १५८. भ्रमरावलीति पिङ्गले * १. स. भगराधि लोक्य । २. 'मुपति' पाणीभूपणे । *टिप्पणी-१ वाणीभूपणम्, द्वितीयाध्याप, प. २६२ २ इन्दोमञ्जरी, द्वितीयस्तवन, कारिका १३७ ३ वापीभूपणम्, दितीयाध्याय, पच २६१ ४ प्राङ्गलम, द्वितीयपरिच्छेद, प० १५४ ५.३४३- ३४८ १. वृत्तनिरूपण-प्रकरण [ १२३ यथा- यथा पा- १५६. प्रथ मनोहस प्रथम विधेहि कर जकारविराजित, जगण ततो भगणेन कारय भूषितम् । विनिधेहि पक्षिपति ततस्तिथिजाक्षर, कुरु हसमेणविलोचने मनस परम् ॥ ३४३ ।। तनुजाग्निना सखि | मानस मम दह्यते, तनुसन्धिरुप्णगदारवत् परिभिद्यते । प्रवर च शुष्यति वारिमुक्तसुशालिवत्, कुरु मद्गृह कृपया सदा वनमालिमत् ॥ ३४४ ।। नवम वञ्जुलपुजबूजितकोकिले. मधुमत्तपञ्चलपञ्चरीककुलाकुले । समयेतिधीरसमोरकम्पितमानसे, किमु चण्डि मानमनोरथे न विसिद्यसे ।। ३४५ ।। इति मनोहस १५६ १६० प्रपरभम जलनिधिकृतमिह विरचय नगण , चरणविरतिमनुपिरचय सगणम् । वरफणिपतिविरचितमतिरचिर , पारभमसिलहृदि विलसति सुचिरम् ॥ ३४६ ॥ नभसि समुदयति सखि ' हिमकिरण, वहति सुलघुलधुमलयजपपनम् । त्यजति तिमिरमिदमपि (भि) जननयन द्रुतमनुविरचय मधुरिपुरायनम् ।। ३४७ ।। पति कारभम् १६० इदमेवा या शिफ्ला*"इति नामान्तरेण उक्तम् । प्रय मणिगुणनिकरसृजो पदसी, विश्व- इदमेव हि यदि यमुपति ८ मणिगुणनिपरात्पमीर्यते हि तदा । यदि तु रसे ६ वियाम गिति समास्या तदा लभते ॥ ३४८ ॥ पपा- पिणी-१ घयोमन्जरी विमाना, गरिमा ११ १२४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ३४६-३५३ m अपिच मणिगुणनिकरोदाहृतिरिह शरभोदाहृतो ज्ञेया । स्रगुदाहरण शेयम् लक्षणवाक्ये तु शरभस्य ॥ ३४६ ।। पथावा- नरकरिपुरवतु निखिलमुरगति- रमितमहिमभरसहजनिवसति' । अनवधिमणिगुणनिकरपरिचित , सरिदधिपतिरिव धृततनुविभव ॥ ३५० ॥ अयि । सहचरि । रुचिरतरगुणमयो , म्नदिमवसतिरनपगतपरिमला। स्रगिव निवसति लसदनुपमरसा , सुमुखि ! मुदितदनुजदलनहृदये ॥ ३५१ ॥ इति छन्दोमर्यामुदाहरणद्वय 'यतिभेदेनोक्तम् । प्रकृत तु शरभमेव इति न कश्चिद् विशेष । १६१ अय निशिपालकम धेहि भगण तदनु भूपतिमथो कर, देहि नगण च रगण कुरु तत परम् । नागनृपपिङ्गलसुभाषितमुदीरित , वृत्तममल हृदि निधेहि निशिपालकम् ॥ ३५२ ॥ पपा- गोरतरुणीजनमनोहरणपण्डित, हस्तयुगधारितसुवेणुपरिमण्डितम् । चन्द्रकविराजितविलोलमुकुट हृदा, नोमि हरिमकतनयातरमत्त सदा ।। ३५३ ॥ या वा, भूपणे''- चन्द्रमुसि ! जीवमुखि (पि)! वाति मलयानिले, याति मम चित्तमिव पाति मदनानिले । क सनिखिल सुगति । २ गार वाणीभूषणे'। रणनी-१ इन्दोरजरी, द्वितीयस्तवक, मारिता १२३, १३२ २ वारणीभूपणम् द्वितीयाध्याय, प २५६ पा० ३५४ • ३५६ ] १. वृत्तनिरूपण-प्रकरण [ १२५ यदा- पथावा- तापकर-कामशर-शल्यवरकीलितं', मामिह हि पश्य जहि कोपमतिशीलितम् ॥ ३५४ ॥ इति निशिपालकम. १६१. १६२. मय विपिनतिलकम् रचय नगणं तदनु धेहि हस्तं मुदा, नगणसहितं रगणयुग्ममन्ते सदा । रसनवयति फणिपभापितं सुन्दर विपिनतिलकं कलय बाण विध्वक्षरम् ।। ३५५ ॥ नरवरपतेरिव नराः शशाङ्कांशवः, तिमिरनिकरः सपदि चोरवद् गच्छति । अयमपि रविः सखि ! हृताधिकारिप्रभः, कथयति विघोः खगकुलं जयं वदिवत् ॥ ३५६ ।। जयति करुणानिधिरशेपसत्तारकः, कलितललितादिवनितामनोहारकः । सकलधरणीपकुलमण्डलीपालकः, परमपदवीकरणदेवकीबालकः ॥ ३५७।। इति विपिनतिलकम् १६२. १६३. भय चन्द्रलेखा कर्णे ताटङ्कयुग्म पुप्पाढयहारी दपाना, विभ्राणा नूपुरस्य द्वन्द्वं सुराव सुचित्तम् । पादान्ते धारयन्ती वीणा सुवर्णावियुक्ता, नागोक्ता चन्द्रलेखा सप्ताप्टछेदैरमुक्ता ।। ३५८ ।। नित्य वन्दे महेश गौरीशरीरार्द्धयुरा, दग्याऽनङ्ग पुरारि वेतालसचरमुक्तम् । विधाण चन्द्रलेखा नृत्येप वृत्ति धुनान, गङ्गासन्जातसङ्ग दृष्टया त्रिलोकी पुनानम् ॥ ३५॥ इति चन्द्रसेला १६४. चण्डलेसा इत्यन्यन । पपा- १. तापमासोसितम्, 'बागीभूषणे। २. शेषमतिसञ्चितम् 'वाणीभूषणे। 1 १२६) वृत्तमौरितक-दितीयखण्ड [५० ३६०.३६४ awan पपा- १६४. मय चित्रा कर्णद्वन्द्वं ताटङ्काभ्यां योजितं फारयित्वा, हारो विभ्राणा स्वर्णाढय पुष्पयुक्तं तथैव । तिथ्युक्तर्वर्णः संयुक्ता कङ्कणी धारयन्ती, शोभां धत्ते चित्रां चित्रा शब्दवन्नूपुराभ्याम् ।। ३६० ।। कालिन्दीकूले केलीलोलं वधू'सवयुक्तं, वन्दे गोपालं रक्षायां नन्दगोपस्य सक्तम् । हस्तद्वन्द्वे धृत्वा श्वासर्वशिकां पूरयन्तं, दैतेयान् हत्वा देवानां संकटं दूरयन्तम् ।। ३६१ ॥ इति चित्रा १६४. चित्रमिदमन्यत्र' । १६५. मय केसरम् कुरु नगणं ततोऽपि च विधेहि भूपति, भगणपयोधरौ तदनु पक्षिणां पतिम् । फणिपतिभाषितं तिथिविभाविताक्षरं, सुकविमनोहरं हृदि निधेहि केसरम् ।। ३६२ ॥ यषा- चिरमिह मानसे कलय नन्ददारकं, वरवनमालिनं दितिसुतापहारकम् । व्रजवनितारसोदधिनिमग्नमानसं, रवितनयातटे कलितपीतवाससम् ।। ३६३ ।। इति केसरम् १६५. १६६. प्रय एला प्रथमं कर रचय जगणमनु कान्ते ! नगणद्वयं तदनु कुरु यगणमन्ते । फणिभाषिता शरपरिकलितविरामा, कृतसंस्तुतिः सकलवरकविभिरैला ॥ ३६४ ॥ -- १. स. बन्यू टिप्पणी-१ छन्दोमञ्जरी, द्वितीयस्तबक, कारिका १३६ प. ३६५ - ३७.] १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण [ १२७ पपा- . . हृदि भावये विमलकमलनयनान्त , जनपावन नवजलधररुचिकान्तम् । व्रजनायिकाहृदयघिजनितकाम , वनमालिन सकलसुरकुलललामम् ॥ ३६५ ।। इति एला १६६ १६७ प्रय प्रिया कुरु नगणयुग धेहि त भगण तत प्रतिपदविरती भासते रगणोऽन्तत । मुनिरचितमतिगराजणिप्रिया , सकलतनुभृता मानसे लसति प्रिया ।। ३६६ ॥ इदमेव हि यदि वसुयति रलिरिति सज्ञा तदाप्नोति । लक्षणवाक्ये मुनितिरुदिता वसुकृतयतिश्च यथा ।। ३६७ ।। कलय दशमुखारि हताखिलदानव , मुनिजनमखपालमृपा भुवि मानदम् । सरसिजनयनान्त शरासनमञ्जक , कपिकुलवरराज्ञ सदा प्रियसजकम् ॥ ३६८॥ इति प्रिया १६७ १६८ प्रप उत्सव पक्षिराजनगणो भगण द्वितय तत कारयाशु पदशेपकृतो रगणो मत । उत्सव फणिनागकृत सखि । भासते, पछक्तिजाक्षरविरामयुत कविमानसे ॥ ३६६ ॥ बभ्रमौति हृदय जलो तरणियथा , दह्यते सखि! तनुनंलिनीव हिमागमे । वायुलोलकदलीव सनुमंम वेपते , चन्दन मुषि सरोवविद परिसुप्यति ।। ३७०॥ इति शासप १६९ यथा- १॥ यति ।
१२८] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [२० ३७१-३७४ पथा- १६६. अथ उड़गणम् । भुवनविरचितमिह लघुमुपनय , तदनु विधुतलघुमिह विरचय । उडुगणमखिलहृदयकृतसदन- मृपिकृतविरतिमनुकुरु सुवदन ! ॥ ३७१ ।। दह्नगतमलकनकनिभवसन, कटिधृतविरुतरुचिरवररसन । सुरकृतनमन जलनिधिनिवसन, शमनुविरचय कुसुमनिभहसन ।। ३७२ ॥ इति उडुगणम् १६६० 'अत्रापि प्रस्तारगत्या पञ्चदशाक्षरस्य द्वानिशत्सहस्राणि सप्तशतानि प्रष्ट पष्टय त्तराणि ३२७६८ भेदास्तेषु पाद्यन्तसहिताः कियन्तः प्रोक्ताः, शेपभेदा. प्रस्तार्य लक्षणीया इति दिक्' । इति पञ्चदशाक्षरम् । अथ पोडशाक्षरम् 2 n तत्र- सपा- १७०. राम यस्मिन्नप्टौ पादस्थित्या युक्ता. संदृश्यन्ते कर्णाः, संशोभन्ते पादे पादे शृङ्गारैः सख्याता वर्णाः । यस्मिन् सर्वस्मिन् पादे स्याद् वेदैर्वेदयद्विश्रामः, सर्पाणामीशेन प्रोक्तः सच्छन्दः स्युः (स्तु) प्रेष्टो राम. ॥३७३।। इन्द्राद्यर्देवेन्द्रनित्यं वन्द्यः पायाल्लोकं रामः, लक्षाणा दातृत्वे दक्षः सर्वेषा क्षत्राणां वामः । अङ्गीकृत्यात्यन्वं पित्रा दत्तामाज्ञा शस्त्र वेगात्, मातुमूनि च्छेदे विभ्रद् यो वै हस्ते कम्प नागात् ॥ ३७४ ।। इदमेवाऽन्यत्र ब्रह्मरूपकम् इति नामान्तरं लभते । इति राम: १७०. १. पक्तित्रय नास्ति क. प्रती। २. ख. मातमद्धच्छेदे । * टिप्पणी-१ ग्रन्थान्तरेषु पञ्चदशाक्षरवृत्तस्योपलब्धशेषभेदाः पञ्चमपरिशिष्टे द्रष्टव्याः । * टिप्पणी-२ प्राकृतपंगलम् द्वितीयपरिच्छेद, प० १७४ ५. ३७५ - ३७९] १. वृत्तनिरूपण- प्रकरण । १२६ यथा- १७१. प्रष पञ्चचामरम् शरेण नूपुरेण यत्क्रमेण भाविताक्षर, वसुप्रयुक्तभेदभाग् भवेच्च पोडशाक्षरम् । फणीन्द्रराजपिङ्गलोक्तमुक्तमत्र भासुरं, विधेहि मानसे सदैव चारु पञ्चचामरम् ।। ३७५ ।। कठोरठात्कृतिध्वनत्कुठारधारभीपणं, स्वयं कृतप्रतिज्ञया सहस्रवादूपणम् । समस्तभूमिदक्षिणे मसे मुनीन्द्रतोपणं, नतो महेन्द्रवासिनं भृगुन्तु' वशभूपणम् ॥ ३७६ ।। पया या, अस्मद्वृद्धप्रपितामह-धीरामचन्द्र भट्टमहाकविपण्डितविरचित-दशाव- तारस्तोत्र जामदग्न्यवर्णने- अकुण्ठधार भूमिदार कण्ठपोठलोचन- क्षणध्वनवनत्कृतिक्वणत्कुठारभीपण । प्रकामवाम जामदग्न्यनाम राम हैहय- क्षयप्रयत्ननिर्दय व्यय भयस्य जृम्भय ।। ३७७ ॥ इति पञ्चचामरम् १७१. एतस्यैव अन्यत्र नराचम्" इति नामान्तरम् । १७२. प्रथ नीलम् वेद-भकारविराजितमद्भुतवृत्तवरं, भामिनि ! भावय चेतसि कङ्कणशोभि करम् । पिङ्गलनागसुभापितमालि विमोहकर, नोलमिद रसभूमिविभावितवर्णधरम् ।। ३७८ ।। पर्वतधारिणि गोपविहारिणि 'नन्दसुते, सुन्दरि हारिणि सविदारिणि वालथुते। पङ्कजमालिनि केलिषु शालिनि मे सुमति- वेणुविराविणि भूमाभ)रहारिणि जातरति ।। ३७६ ।। इति नीलम् १७२. एषा- १. ख. भूगुरुः। '-'२. क. प्रतो नास्ति। *टिप्पणी-१. वाणीभूपणम्, द्वितीयाध्याय, प० २७३ १३. ] पत्तमौक्तिक - द्वितीयलण्ड [१०३८०-१०४ यथा- १७३. प्रप धञ्चला 'हारमेरुजक्रमेण यद्विराजते सुकेशि !, पोडशाक्षरेण यद् विकासित भवेत् सुवेपि ! । पिङ्गलेन भापित समस्तनागनायवेन, तद्धि चञ्चलाभिध कवीन्द्रमोददायकेन ॥ ३८०।। प्रालि ! रासजातलास्पलीलया सुशोभितेन, गैरियादिधातुवन्यभूपणानुभूपितेन । गोपिकाविमोहिराववशिकाविनोदितेन, मन्मनो हृत बजाटवीपु केलिमोदितेन ।। ३८१॥ यया बा, भूषणे *- प्रालि ! याहि मन्जुकुञ्जगुज्जितालिलालितेन, भास्करात्मजाविराजिराजितीरकाननेन । शोभिते स्थले स्थितेन सङ्गता यदूत्तमेन, माधवेन भाविनी तडिल्लतेव नीरदेन ।। ३०२।। इति चञ्चला १७३. एतस्यैवान्यन चित्रसङ्गम् इति नामान्तरम् । १७४. अथ मदनललिता कणं कृत्वा कनकरुचिर ताटङ्कसहित, सबिभ्राणा द्विजमथ पुन. स्वर्णाढयवलया । हारौ धृत्वा कुसुमकलितो हस्तेन रुचिरा, वेदै पद्भिर्मदनललिता छिन्ना रसयति ॥ ३८३ ।। कालिन्दीये तटभुवि सदा केलीसु ललित, रायाचित्तप्रणपसदन गोपेपु(पीस) वलितम् । सबिभ्राण विरतरुचिर वश करतले, ध्यायेनित्य व्रजपतिसुत चित्तेऽतिविमले ॥ ३४॥ इति मदनललिता १७४, यथा- १स हारमेरुजक्रमेण सदविराजते पुरेण, यद्विकासित भवेत् सुकेशि षोडशाक्षरेण । २ र रम्यतीरकाननेन । ३ ख. तटपरिसरे। • टिपणी-१ वाणीभूषणम्, द्वितीयाध्याय, पद्य २७८ २. छन्दोमञ्जरी, द्वितीयस्तबक, कारिका १४८ प. ३८५- ३८६] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [ १३१ १७५ प्रष पाणिनी कुरु नगण विधेहि जगण ततो भकार, जगणमयोऽपि रेफयुतमन्तजातहारम् । पडधिकपक्तिवर्णकलित सुवृत्तसार, कलयत वाणिनीति पविभि कृतप्रचारम् ॥ ३८५।। पपा- अनवरत खरागुतनयाचलज्जलीघे , तटभुवि सलुप्ते"ऽसिलनृणा विनाशिताघ । द्विजजनसाधिताऽनुपमसप्ततन्तुमोक्का, पशुपजनहरि सह वनोदन जघास' ॥ ३८६ ।। इति धागिनी १७५. १७६ अथ प्रथरललितम् यकार पूर्वस्मिन् रचय मगण धारयाशु, नकार हस्त च प्रथय रगण धेहि वासु । गुरु पादस्यान्ते विरचय फणीन्द्रेण गीत, सुहास्ये विश्राम प्रवरललित नाम वृत्तम् ॥ ३८७ ।। तडिल्लोलर्मेदिशि दिशि महाध्वानवद्भि- गंजानीकाकारैरनवरतमाप सृद्धि । वज भीत' वोक्ष्य द्रुतमचलराज कराग्रे, दघद्रक्षा कुर्यात् भवजलनिघावत्युदये ॥ ३८८ ।। इति प्रवरललितम् १७६ १७७ प्रथ गण्डरुतम् द्विजवरमन धेहि रगण नकार तत कुरु रगण ततोऽपि रगण पदान्ते मत । पडधिकपक्तिवर्णकलित समस्ते पदे, गरुडरुत समस्तफणिराजचित्तास्पदे ॥ ३८६ ।। १ख विटपितले लुते । २ क बतोदन भुक्ति । ३ श छन। टिप्पणी-१ अन पादे नगरामनु जगणोपस्थितियुक्ता किन्त्वय 'संलुप्ते' इति पाठ गयो जायते तदयुक्तम् ।
१३२ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयपण्ड [१० ३३० - १६४ पपा- , मृगगणदाहके वननदोसर गोपके, ग्रसति तरून् विलोलनिजहेतिजिह्वाशते । भयभरखिन 'डिम्भवदन निरीक्ष्यागु य , दवदहन पपौ स दिगतान् मनोवाञ्छितम् ।। ३६०॥ इति गडक्तम् १७७ १७८. प्रय चकिता देहि भमिह स कर्ण हारौ कुण्डलमवले !, धारय कुमुम पुष्पद्वन्द्व कामिनि । तरले । । रूपवलयक पादप्रान्ते स्यादिह चकिता, पडसु च विरति काव्यव्यक्ति स्मरले भविता ।। ३६१ ॥ यथा- कामिनि । सुघने वृन्दारण्ये नन्दय नयन, भामिनि । भवने भव्याकारे भावय शयनम । शीतलपवने धन्ये पुण्ये खञ्जननयने, त्वामिह कलये तल्पेऽनल्पे कुञ्जरगमने ।। ३९२ ।। इति चकिता १७८ १७६ अथ गजतुरगयिलसितम् धारय रोहिणेयमथ पतगवरपति, कारय वह्निमेय नगणवरगुरुयतिम । पोडशवर्णधारि गजतुरगविलसित, भामिनि । भावयेदमपि मुनियतिरचितम ।। ३६३ ।। सुन्दरि । नन्दनन्दन मिह धरणिवलये, मानिनि । मानदानमपि न हि न हि कलये । भावय भावनीयगुणगणपरिकलित, चेतसि चिन्तयाशु सखि । मुनिजनवलितम ।। ३९४ ।। इति गजतुरगविलसितम १७६ क्वचिद इदमव नपभगजविलसितम्"* इति नामान्तरेणोक्तम् । । १ ख भिन्न । २ स सरले। ३ ख मानगोचरमुमिह न कलये । “टिप्पणी-१ वृत्तरत्नाकर अ० ३, का० ६१, छदोमञ्जरी द्वि० स्त० का० १४६ १०३६५-४०० १ वृत्तनिष्टपण- प्रकरण [१३३ WAAMAA WANA w यथा- १८. प्रथ शलशिखा धेहि भकारमत्र खगराजमवेहि तत कारय न ततोऽपि भगणो भगणेन युत । नूपुरमेकसख्यमवचेहि पदान्तगत शैलशिखाभिध त्वमवधारय नागकृतम् ।। ३६५ ।। गोपवधूमयूरवनितानवमेधनिभ , दानवसङ्घदारणविधावतिसप्रतिभ । तुम्वरुनारदादिकमन सरसीपु गज , वाञ्छितमातनोतु तव गोपपतेस्तनुज ॥ ३६६ ।। इति शलशिखा १८० १८१ अथ ललितम कारय भ ततोऽपि रगण विधेहि नगण पक्षिपति विधारय पुनस्तथैव नगणम् । कङ्कणमन्तग कुरु समस्तपादविरतो घेहि मन सदैव ललिते फणीश्वरकृती ॥ ३६७ ।। अनापि सप्तभिनंवभि प्रायो विरतिभवतीति उपदिश्यते । गोपवधूमुखाम्बुजविकासने दिनपति , दानवसङ्घमन्तकारिदारणे मृगपति । लोकभयापह सकलवन्द्यपादयुगल , श कुरता ममापि च विलोलनेनकमल ॥ ३९८ ।। इति ललितम १८१ १८२ अय सुकेसरम् नगण-सगणी विधेहि जगण तत पर, सगण-जगणौ च नूपुरमगोऽनन्तरम । फणिनृपतिभापित रसविधूदिताक्षर, क्लय हृदये सदा सुखकर मुकेसरम ।। ३६६ ।। नरपतिसमूहकण्ठतटघट्टनोद्भव रुडुगणनिभं स्फुलिङ्गनिकरर्भयानक । विलसति नृपेन्द्रशत्रुगणघूमकेतुवत तव रणविधौ स्थित करतले कृपाणक ॥ ४०० ।। इति सुकेसरम १८२ यथा- यथा- बत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड [ प०४०१.४०४ १५३ प्रय ललना प्रथम कलय करतलमात्मना ह्यपथा', ललना नगणयुगलवती जमाकलिताम् । फणिराजभणितगुण(5)विराजितामतुला, कलयाशु सपदि सुजनमानसे वलिताम् ॥ ४०१ ॥ यथा विदधातु सकलफलमनारत तनुते, सनकादिनिखिलमुनिनतो वने वनिते ब्रजराजतनय इह सदा दा कलित , स चराचरजनतनुमहोदधौ फलित ।। ४०२ ॥ इति ललना १८३ १८४ अप गिरिवरपति शरपरिमितमिह नगणमनु कुरुत, विधुविरचितमथ लघुमपि रचयत । फणिपतिरिति किल मधुरमनुवदति, कलयत निजहृदि गिरिवरघृतिरिति ।। ४०३ ॥ पथा- जय विशिखनिचयहतनिखिलरजनिचर 1, निजभुजयुगवलरणविनिहतखर विबुधनिहतभय | दशमुखकुलहर 1, दशरथनृपसुत । जय रघुवर 1॥४०४॥ इति गिरिधरति १८४ अचलधृति '*इत्य यन। नापि प्रस्तार गल्या पोशाक्षरस्य पञ्चपष्टिसहस्लाणि पञ्चशतानि पट विशदुत्तराणि ६५५३६ भदास्तेपु किय तो लक्षिता शपभदा प्रस्ताय स्वेच्छया नामानि चारयज्या (विचार्य) लक्षणीया इत्युपदिश्यत ।' इति षोडशाक्षरम् । १ ख ह्यय ताम। २ ख दलितमा ३ पक्तित्रय नास्ति क प्रती। *टिप्पणी-१ छदोमञ्जरी द्वितीयस्तबक, का० १५५ ~२ पोडशाक्षरवृत्तस्योपलब्धशपभदा पञ्चमपरिशिष्टे पर्यालोच्या ।
५० ४०५ - ४०६] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [ १३५ www पथा- प्रथ सप्तदशाक्षरम् तत्र प्रपमम्- १८५. तीलापृष्टम् वृत्ते यस्मिनप्टो पादे कर्णा सयुत्ता सदृश्यन्ते, हारश्चंक प्रान्ते यस्मिन् वर्णा शैलश्चन्द्र शोभन्ते । सर्वपा नागाणामीशे तत्सप्रोक्त धेहि स्वान्ते, भूपालाना चित्तानन्दस्थान लीलाघृष्टाख्य कान्ते ! ।। ४०५ ।। वारा राशो सेतु बदध्वा लङ्कायामातकोष दास्यन्, नानावणे सुग्रीवाद्य लङ्काया' भिन्न दुर्ग कुर्वन् । सीताचित्ते प्रेमाधिक्य लोहै कोलंणीयोत्कीर्णा, काकुत्स्थ क्याण वुर्याद युप्मा ऋच्यादाब्धि तीर्ण ॥ ४०६।। इति लीलाधृष्टम् १८५ १८६ प्रय पृथ्वी पयोघरविराजिता करसुवर्णवत्कवणा, सुगन्धकुसुमोज्ज्वला सरसहारसशोभिनी। सुरूपयुतकुण्डला कनकरावसुनूपुरा, वसप्रथितसस्थितिब्रगति भाति पृथ्वी सदा ।। ४०७ ।। हरि जगनायक निजगिरि भवानीपति , गजेन्द्र ममराधिपो निजमरालमब्जासन । द्विजा विवुधकूलिनी जगति जायमाने नृप । त्वदीययशसोज्ज्वले किल गवेषयन्त्यातुरा ।। ४०८ ।। पथा घा, कृष्णकुतहले- अनेन नयताऽधुना महदुलूखल शाखिनो, रयातियुगमन्तरा क्कुभयोरिह कामता। इतीरयति केचन श्रदधुरागु गोपान्हृदा, पुरो विहरति स्वके शिशुकदम्बके नापरे ॥ ४०६ ।। इत्यादि शतशो निदर्शनानि काव्येषु । इति पथ्यो १६ यपा- १. ख सकाया।
१३६ ] इत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड [ ५० ४१० - ४१४ १९७ मष मालावती द्विजविलसिता पयोधरविराजिता हारिणी, सरसकरयुक्सुवर्णवलया लसत्कुण्डला । विरुतयुतनूपुरा मुनिदिगीशसस्याक्षरा, भुजङ्गपतिभापिता जगति भाति मालावती ॥ ४१० ॥ यपा- वनचरकदम्बकैरपरसिन्धुशोभाधरै, करजदशनायुधंजलधिनीरमाच्छादयन् । रघुपतिरुपागत सखि ! निशाचराधीश्वर, रणभुवि निहत्य दास्यति तवातुल सम्मदम् ॥ ४११ ।। इति मालावती १८७ मालाधर इति पिङ्गले'* नामान्तरम् । १८८ प्रथ शिखरिणी सुरूप स्वर्णादय थवणमधिताटङ्कयुगल, सदा सविभ्राणा द्विजमथ सुपुप्पाढयवलयो । सुरूप हस्ताग्न तदनु दधतो राजति रस , शिवैश्छिन्ना नागप्रथितमहिमेय शिखरिणी ॥ ४१२ ।। यथा- दिशि स्फारीभूतै कविनिकरगीतस्तव रण- स्तवैर्वात्याचदिगुणितरय क्षोणितिलक । प्रतापो दावाग्निस्तव खरकरस्पर्शकठिनो, विपक्षक्षोणीन्द्र प्रथितवनमत्र प्रभवति' ।। ४१३ ॥ यथा था, ममैव पवनदूते खण्डकाव्ये- यदा कसादीना निधनविधये यादवपुरी, गत श्रीगोविन्द पितृभवनतोऽङ्करसहित । तदा तस्योन्मीलदविरहदहनज्वालगहने, पपात श्रीराधाकलिततवसाधारणरति ॥ ४१४ ।। १स प्रदति। *टिप्पणी-१ प्राकृतपैगलम्, द्वितीयपरिच्छेद, पद्य १७८ १०४१५ - ४१६] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण [१३७ - पया पा, कृष्णकुतूहले- विना तत्तद्वस्तु क्वचिदपि च भाण्डानि भगवत्, प्रसादान्ताऽभूवन् प्रतिभवनमित्यद्भुतमभूत् । भयोद्यद्वैलक्ष्याऽवितथवचसस्तच्चरणयो- निपेतुस्ता हस्ताहृतवसनमुक्तामणिगणा ।। ४१५ ॥ यथा था, रूपगोस्वामिकृत-हसदूतकाव्ये*- दुकूल विभ्राणो दलितहरितालद्यु तिहर, जपापुष्पश्रेणीरुचिरुचिरपादाम्वुजतल. । तमालश्यामाङ्गो दरहसितलोलाञ्चितमुख , परानन्दाभोग स्फुरतु हृदि मे कोऽपि पुरुपः ।। ४१६ ।। पपा या, श्रीशङ्कराचार्यकृत-सौन्दर्यलहरोस्तोत्रे *- दृशा द्राघोयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा, दवीयास दीन स्नपय कृपया मामपि शिवे । अनेनाऽय धन्यो भवति न च ते हानिरियता , वने वा हर्षे वा समकर निपातो हिमकर ॥ ४१७।।' इत्यादि महाकविप्रबन्धेपु शतशो निदर्शनानि द्रष्टव्यानि । इति शिखरिणी १८ १८६ प्रथ हरिणी द्विजरसयुता कर्णद्वन्द्वस्फुरद्वरकुण्डला, कुचतटगत पुष्प हार तथा दधती मुदा । विरुतललित सबिनाण' पदान्तगनूपुर, रसजलनिधिश्छिन्ना नागप्रिया हरिणी मता ॥ ४१८ ॥ सपदि कपय शौर्यावेशस्फुरत्करज द्विजा, गिरिवरतस्नुन्मृद्नन्तस्तथोत्पथगामिनः । अहमहमिका कृत्वा वारानिधेरतिलचने', तटभुवि गता सप्रेक्षन्ते मुखानि परस्परम् ।। ४१६ ।। यथा- ३. ख. लघते। १. क. प्रती नास्तीदम्पद्यम। २ ख सबिभ्राणा । *टिप्पणी-१ श्रीरूपगोस्वामिकृत-हसदूतम् प्रथमपद्यम् २ शकराचार्यकृत सौन्दर्यलहरी पद्य ५७ १३८ । वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प०४२०.४२३ - यथा घा, कृष्णकुतूहले-- हसितवदने दृष्ट्वा चेप्टा सुतस्य सविस्मये, ययतुरथ ते गोपापत्यौ तदद्भुतमन्यत । तदनु कतिचिद् बाला मात्र बलेन सहोचिरे, मृदमनुपद कृष्ण प्राशीदिति प्रतिभाजुप ॥ ४२० ॥ यथा वा, लक्ष्यलक्षणयुक्त तनव- ग्रहिलहृदयोदञ्चत्तत्तद्गतिप्रतिभाजुषा, त्रिभुवनपतिप्रत्यासत्तिस्फुरत्पुलकस्पृशाम् । शिथिलकबरीवन्धस्रस्तस्रजा हरिणीदृशा, न समरसत कायप्रायो लघुर्गुरुरप्यभूत् ।। ४२१ ।। श्लेषार्थ ऊहनीय । यथा वा- 'अथ स विषयव्यावृत्तात्मा यथाविधिसूनवे*।' इत्यादि रघुवशे महाकाव्यादिसत्कविप्रबन्धेषु च भूमनिदर्शनानि । इति हरिणी १८६ १६० प्रथ मन्दाक्रान्ता कणों पुष्पद्वितयसहितो गन्धवद्धस्तयुक्ता, हार रूप तदनु वलय स्वर्णसञ्जातशोभम् । सविभ्राणा विरुतललितो नूपुरी वा पदान्ते मन्दाक्रान्ता जयति निगमश्छेदयुक्ता रसश्च ॥ ४२२ ॥ पपा- सिन्धोपारे दशमुखपुरी वानरास्तत्र दूता, पम्पाशम्पाशतयुतचलन्नीलमेघावलीका । वास केकाकवलिततटे मादृशामृष्यमूके, देवो वाम पुनरयमतो भावि किं किं न जाने ॥ ४२३ ।। *टिप्पणी-१ मथ स विषयव्यात्तारमा यथाविधिमूनवे, नृपतिककुद दावा यूने सितातपवारणम् । मुनिवनतरच्छाया देव्या तया सह सिधिये, गलितवयसामिदवारणामिद हि मुलग्रतम् ॥ [रघुवरा, स. ३,५०७०) ५० ४२४.४२७] १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण [ १३६ ww यया था, कृष्णकुतूहले- हृत्वा ध्वान्त स्थितमपि वसुप्रक्षिपत् पक्ष्म[राजि-] स्पन्द विन्दन् व्रजति कुहचित् कश्चनालक्ष्यमाणः । छिद्राणि द्राक् कलयति शयाशक्यशिक्यस्थभाण्डे', निद्रा भक्त्वा द्रवति जवतस्ताडयत् सुप्तबालात् ।। ४२४ ॥ (१) इति मन्दाक्रान्ता १६०. १६१ प्रय वशपत्रपतितम् कारय भ ततोऽपि रगण रचय न-भगणौ, धेहि नकारमेरुवलयान् तदनु सुललितान् । व्योमसुधाशुभि कुरु हयै सदनु च विरति २, चेतसि वशपत्रपतित रचय फणिकृतम् ॥ ४२५ ।। जान कि । नव चेतसि कृथा रजनिचरमति, राघवदूततामुपगत कलय हृदि निजे । जल्पति मारताविति तदा जनकतनयया- दत्त' न मुद्रिकाऽपि कलिता जलपिहितदृशा ।। ४२६ ।। यथा- पाया- 'सम्प्रति लब्धजन्म शनकं कथमपि लघुनि ।' इति किरातार्जुनीये। इति वशपत्रपतितम् १६५ स्त्रीलिङ्गमिति केचित् । वशवदनम् इति शाम्भवे तस्यैव नामान्तरमुक्तम् । १६२ प्रय नहटकम कुरु नगण तत कलय ज द भ च ततो, जगणयुग ततो रचय कारय मेरुगुरू । फणिपतिभाषित मुनिविघूदितवर्णधर, कविजनमोहक हृदि विधारय नईट्रकम् ॥ ४२७ ।। १ख भारो। २ ख विति। ३ ल हन्त । *रिपणी-१ मम्प्रति लब्धजन्म शनकै कथमपि लघुनि, क्षीणपयस्युपेयुषि भिदा जलघरपटले। खण्डितविग्रह बलभिदो धनुरिह विविधा, पूरयितु भवन्ति विभवशिखरमणिरुच ॥४३॥ [किराताजु नोयम् स० ५, प० ४३] १४. ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१० ४२८.४३१ यथा- १ जय । अनुलवमूर्च्छया क्षपितदेहलता गलता, नयनजलेन दूपितमुखी' तव भूमिसुता । रघुवरमुद्रिका हृदि निधाय सुखातिशय- मुकुलितलोचना क्षणमभूदमृतस्नपिता ।। ४२८ ।। यथा वा, श्रीभागवते दशमस्कन्धे वेदस्तुती जय ! जयजामजितदोषगृहीत गुणाम् । इत्यादि । इति नइंटकम् १९२० अथ कोकिलकम् मुनिरसवेदैविरतिर्यदि कोकिलक तदेदमेव भवेत् । तदुदाहरण लक्षणवाक्ये ज्ञेय सुधीभिरिति ।। ४२६ ।। पथा घा, छन्दोमञ्जर्याम् लसदरुणेक्षण मधुरभापणमोदकर, मधुसमयागमे सरसकेलिभिरल्लसितम् । अलिललिता ति रविसुतावनकोकिलक, ननु कलयामि त सखि ! सदा हृदि नन्दसुतम् ।। ४३० ॥ गणविरचना सैव, विरतिकृत एवात्र भेद इति नामान्तरम् । इति कोफिलकम् । १६३ प्रथ हारिणी कणं कृत्वा कनकललित ताटकसराजित, सविभ्राणा द्विजमय रुतस्वर्णाचितौ नूपुरौ । पुष्प हारौ सरसवलय सधारयन्ती मुदा, वेदै पदिविरचितयतिः दलोदिता हारिणी॥ ४३१ ।। १. ल. दूषितमुखा। २. गृभीतगुणाम् । • टिप्पणी-१ जय जय जजामजितदोपगभीतगुणा स्वमसि यदारमना समवपदसमस्तभाग । भगनगदोक्सामतिलसापत्यवयोषक ते वचिदजयारमना घ घरतोऽनुपरेनिगमः ।। [भागवत दशमस्कन्ध,म० ८७, दलो०१४] २. छन्दोमरी, तिस्ता० १६७ ।
प० ४३२. ४३६ ] १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण [१४१ पथा- बद्ध्वा सिन्धु नगरमिह मे राम समायात्यय, रोद्ध ' श्रुत्वा दशमुख इति प्रीतोऽभवत्तत्क्षणम् । वाह्वो कण्डू गमयितुमना पश्चान्नर राघव, श्रुत्वाऽवज्ञाकलुपितमना लकेश्वरोऽभूत्तदा ।। ४३२ ।। इति हारिणो १६३ १९४ अथ भाराकान्ता पादो कुर्यान् मगण-भगणी ततो नगणो मत , रेफ दद्यात्त दनुरुचिर विधेहि कर तत । मेरु हार विरचय तत फणीश्वरभापिता, भाराकान्ता जलनिधिरसविरामयुता मता ।। ४३३ ।। यथा-- सिन्धोर्वन्ध रघुवरकृत निशम्य दशाननो, दध्यो मूद्ध नर्ना सपदि बहुधा व्यधाच्च विधूननम् । शङ्के च्योतन्मणिकपटतो रघूत्तमरागिणी, सत्यामाख्या जगति तनुते तदा कमलालया ।। ४३४ ।। इति भाराकान्ता १६४ १९५ प्रथ मतङ्गवाहिनी हारमेरुजक्रमेण जायते यदा विराजिता, शैलभूमिसख्यकाक्षरस्तथा भवेद् विकासिता । पण्डितावलीविनोदकारिपिङ्गलेन भापिता, जायते मतङ्गवाहिनी गुणावलीविभूपिता ॥ ४३५ ।। यथा- नौम्यह विदेहजापति शरासनस्य 'भञ्जक, बालिजीवहारिण विभीषणस्य राज्यसञ्जकम् । लक्ष्यवेधने तथा सदा शरासनस्य' धारिण, रावणद्रुह कठोरभानुवशदीप्तिकारणम् ॥ ४३६ ॥ इति मतङ्गपाहिनी १९५ १७. योद्धम् । २ ० मूर्दन । ३,-' चिह नगतोऽशा क प्रतो नास्ति ।
१४२] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१० ४३७ ४४० १९६ नथ पद्मकम रचय नगण स तस्यान्ते धेहि पश्चान्मकार, तदनु चरणे तस्य द्वन्द्व कारयाशु द्विहारम् । समुनिविधुभि पादे छिन्न पिङ्गलेन प्रयुक्त, कलय हृदये छन्द श्रष्ठ पद्मक वृत्तसारम् ।। ४३७ ॥ यथा- अयमिह' पुर पारावार चेतसा गम्यपार , सपदि सहित पाद सङ्घर्भापणो वीचिहस्तै । कपिगणमहासेना चेय पारमुत्प्रेक्षमाणा, रचय यदिह न्याय शीघ्र वानराणा पते ' तत् ॥ ४३८ ।। इति पनकम १६६ १६७ प्रथ दशमुखहरम जलनिधिपरिमित नगणमिह विरचय, तदनु च शरपरिमितलघुमपि कलय । सकलफणिगणनरपतिारेति हि वदति, सखि ! कलय निजहृदि दशमुखहरमिति ॥ ४३६ ।। यपा- - जय जय - रघुवर । जलधितरणनिपुण 1, दशरथसुत । विबुधनिकर कथितगुण सुरविमतदशवदनकुलकदनकर सुरगणनुतचरण । शमिह मम वितर ॥ ४४० ॥ 1 इति दशमुखहरम् १९७ 'प्रनापि प्रस्तारगत्या सप्तदशाक्षरस्य एक लक्ष एकत्रिंशत् सहस्राणि द्विसप्त- तिश्च १३१०७२ भेदास्तेपु कियन प्रोक्ता, शेपभेदा प्रस्तार्य समुदाहरणीया, इत्यलमतिविस्तरेण । इति सप्तदशाक्षरम् । १त प्रयमपि। २ ल पते। ३ पमित्रप मास्तिक प्रती। टिप्पणी १-सप्तदशामरस्त्तस्यावनिप्रापराभेदा परचमपरिशिष्टेजमोहनीया ।
१०४४१.४४५] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण ।१४३ अथ अष्टादशाक्षरम् १९८ प्रथ लोलाचन्द्र अश्व सरयाता यस्मिन् वृत्ते पादे पादे शोभन्ते कर्णा, पश्चाद् वेदै सरयाता हारा योगैश्चन्द्रस्सयुक्ता वर्णा । लीलाचन्द्रारय वृत्त प्रोक्त नागानामीशे तत् कान्ते ', रन्ध्राईवणे सविच्छिन धेहि स्वान्ते भास्वनेनान्ते ॥ ४४१ ।। यथा- हालापानो र्णनेत्रान्तस्तुच्छीकुर्वत्कलास भासा, नीलाम्भोजप्रोद्यच्छोभावत् स्कन्ध द्वन्द्वे सराजद्वासा । माला वक्ष पीठे विभ्राणो न्यक्कुर्वन्ती कान्त्यालीन् तूर्णं, तालाकस्सर्वेषा लोकाना कल्याणोध दद्यात् सम्पूर्णम् ॥४४२॥ इति लीलाचन्द्र १६८ १६९ अय मजीरा पूर्व ' कर्णत्रित्व कारय पश्चाद्धेहि भकार दिव्य, हार वह्निप्रोक्त धारय हस्त देहि मकार चान्ते । रन्ध्रवणविश्राम कुरु पादे नागमहाराजोक्त , मञ्जीराख्य वृत्त भावय शीघ्र चेतसि कान्ते । स्वोये ॥ ४४३ ॥ पया- सिन्युर्गम्भीरोऽय राजति गातार कपयस्तत्तार, शेल शैले केकी कूजति वातोऽय मलयाद्रेति । लङ्काया वंदही तिष्ठति कामोऽय पुरत सज्जास्त्र , सामग्रीय तावल्लक्ष्मण सर्व पूर्वकृतस्याधीनम् ।। ४४४ ।। यथा पा, भूषणे*- प्रौढध्वान्ते गर्जद्वारिदधाराधारिणि काले गत्वा, त्यक्त्वा प्राणानग्र कोलसमाचारानपि हित्वा यान्ती। कृत्वा सारङ्गाक्षी साहसमुच्चै केलिनिकुञ्ज शून्य, दृष्ट्वा प्राणत्राण भावि कथ वा नाथ ! वद प्रेयस्या ॥४४५॥ इति मञ्जीरा २९६ १ स पूणमा *टिप्पणी-१ वाणीभूपणम, द्वितीयाध्याय, पद्य २६४ १४४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० ४४६ - ४५० २००. अय चचरी कुण्डलं दधती सुरूपसुवर्णरावरसाहितं, नूपुरं कुचयुग्मसङ्गतदिव्यहारविभूषिता । हस्तयुक्तसुरूपकङ्कणभासिता फणिभाषिता, चर्चरी कविमानसे परिभाति भावुकदायिनी ॥ ४४६ ॥ यथा- रासकेलिरसोद्धतप्रियगोपवेष! जगत्पते ! दैत्यसूदन ! भोगिमईन ! देवदेव ! महामते ! कंसनाशन ! वारिजासनवन्द्यपाद ! रमापते !, चिन्तयामि विभो ! हरे ! तव पादुके विदशैर्नु ते ॥ ४४७ ।। 'यथा वा, अस्मत्तातचरणानां श्रीनन्दनन्दनाष्टके- मन्दहासविराजितं मुनिवृन्दवंद्यपदाम्बुजं, सुन्दराधरमन्दराचलधारि चारु लसद्भुजम् । गोपिकाकुचयुग्मकुङ्क मपङ्करूपितवक्षसं, नन्दनन्दनमाधये मम किं करिष्यति भास्करिः ॥ ४४८ ।। * यथा वा, तेषामेव श्रीसुन्दरीध्यानाष्टके- कल्पपादपनाटिकावृतदिव्यसौधमहार्णवे, रत्नसङ्घकृतान्तरीपसुनीपराजि विराजते, चिन्तितार्थविधानदक्षसुरत्नमन्दिरमध्यगां, मुक्तिपादपवल्लरीमिह सुन्दरीमहमाश्रये ॥ ४४६ ।। या वा, भूषणे फोकिलाकलकूजितं न शृणोषि सम्प्रति सादरं, मन्यसे तिमिरापहारि सुधाकर न सुधाकरम् । दूरमुज्झसि भूपणं विकलासि चन्दनमारते, कस्य पुण्यफलेन सुन्दरि ! मन्दिरं न सुखायते ॥ ४५० ।। १. २. नन्दनम्दनाष्टक-सुन्दरीध्यानाप्टपञ्चेनि पायं नास्ति क. प्रतो। ३. चारणीभूपणम्, द्वितीयाध्याय, पद्य २६६ २. ४५१ - ४५४ ] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण [१४५ यथा था, मार्कण्डेयमहामुनिविरचितचन्द्रशेखराष्टके-[प्रथम पद्यम्] रत्नसानुशरोसन रजतादिशृङ्गनिकेतन, सिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम् । क्षिप्रदग्धपुरत्रय त्रिदशालयरभिवन्दित, चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम ॥ ४५१ ।। यथा घा, शङ्कराचार्यकृत-नवरत्नमालिकास्तोने'- कुन्दसुन्दरमन्दहासविराजिताघरपल्लवा- मिन्दुबिम्बनिभाननामरविन्दचारुविलोचनाम् । चन्दनागुरुपक रूपिततुङ्गपीनपयोधरा, चन्द्रशेखरवल्लभा प्रणमामि शैलसुतामहम् ॥ ४५२ ।। इत्यादि महाकविप्रवन्धेषु सहस्रशो निदर्शनानि अनुसन्धेयानि । इति चर्चरी २०० इति द्वितीय शतकम् । २०१ प्रयोहाचन्द्र: यकार रसेनोदित सर्वपादेषु सधेहि युक्त, तथा धेहि पादे नगाधीशशीतागु सख्यातवर्णम । कवीनामघोशेन नागाधिराजेन सभापित तत्, मुदा क्रीडया शोभित चन्द्रसज्ञ हृदा धेहि वृत्तम् ।। ४५३ ।। पया- मुनीन्द्रा पतन्ति स्म हस्त नृपा कर्णयुग्मे तथाधु , सभाया नियुक्ता दधु कम्पमुच्चस्तदा स्तम्भमङ्घा । सुराणा समूहेन नाथावि लोके तथान्योन्यवाच'- स्तदा रामसभिन्नबाणासनाढघातपूर्णो निलोके ।। ४५४ ॥ पपा बा, भूषणे' भ्रमन्ती धनुर्मुलनाराचधारानिरुद्धे समस्ते, नभः प्राङ्गणे पक्षिवाय्वो प्रयाते निरन्ते प्रशस्ते । १. नपरनमासिकाया पद्मक प्रती मास्ति। २ 'शीतांशु प्रती नास्ति । घोहि । ४ स. पाणी। ५ स सनापातपूर्व। टिपनी-१ राप्रावि प्र० स० १४२५० स्य उपरोक्तपच नास्ति, विन्यस्य स्थाने निम्नोडत पद्य वर्तते। 'पदान्यासनम्रीकृतशोरिणचक्रवटम्ममंजूम प्रमत्तुङ्गमङ्गादविक्षेपकोरेवर ध दर्पम् । भुजङ्गपानि वासवातोन्चलचक्रयामाचरेद्र शिवापास्तु चन्द्रन्दुनूडामणेस्नाण्डवाडम्बर व ॥२६॥ विाणीभूपणम्,दिप प २२०] १४६ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ४५५-४५६ तथा चण्डगाण्डीवबाणावलीनीचरक्षाविरक्ष', वभूवाङ्गराजो यथा न स्थितोऽसौ विपक्ष स्वपक्ष ॥ ४५५ ।। इति क्रीडाचन्द्र २०१ २०२ अथ कुसुमितलता कर्णी ताटङ्कप्रथितयशसो धारयन्ती द्विज च, प्रोद्यदरूपाढय कनककलित कङ्कण चादधाना । पुष्पाक्ती हारी तदनु दधती राववनूपुरौ च, छिन्ना बाणाणे कुसुमितलता स्याद् रसैर्वाजिभिश्च ।।४५६।। घूर्णनेत्रान्त हलकलनया भिन्नपातालमूल, तालाङ्के गाङ्ग क्षिपति रभसान्नागसाङ्क प्रवाहे । हाणा सङ्घ कुरुभिरभितश्चूर्णित घूर्णित च, क्रीडार्थ बालरिव विरचिते' क्रीडित शैलराजे ।। ४५७ ॥ 'गोड पिप्टान्न दधि सकृशर निर्जल मद्यमम्लम् ।' इत्यादि वाग्भटे चिकित्सानन्थे ।' इति कुसुमितलता २०२ २०३ प्रथमदनम रचय नकारयुक्त-जगण विधेहि पश्चाच्च भ, कुरु जगण ततोऽपि रगण विधेहि रेफ तत । शिवरचिता विधेहि विरति तथा हयैर्भासिता, कविजननन्दन कुरु सखे । सदा हृदा नन्दनम् ॥ ४५८।। तव यशसा त्रिलोकवलये वलक्षतामागते, बहुलनिशास्वपि प्रकटिताश्चकोरकैश्चञ्चव । जगति पम प्रवाहमतिभि सुख मरालत, सपदि गुहा गता हिमधिया मुनीश्वरा दुबला ॥ ४५६ ॥ यथापा- यमा- १ स विलो। २ स यशसो। २ सहलालजया। ४ प्रवाहो। 1 स विचित कौतुपात । 'टिप्पणी-1 प्राम्याग्जानूप पिगितमवल गुष्वना तिसान, गोड पिटान दषि सलवण विज्जल मधमालम् । पानावर रामानमयो गुवंसारम्प विदा हि सप्न पारात्री दययपुगवान् यजये मयुन च।। वारमर-प्रप्टाङ्गहृदय, म.१७ दलो.४२] प. ४६०.४६२ ] १ वृत्तनिरूपण- प्रकरण [१४७ यया था, छन्दोमाम्" तरणिसुत्तातरङ्गपवन सलीलमान्दोलित, मधुरिपुपादपङ्कजरज सुपूतपृथ्वीतलम् । मुरहरचित्रचेष्टितकलाकलापसस्मारक, क्षितितलनन्दन व्रज सखे । सुखाय वृन्दावनम् ॥ ४०॥ ययावा, "प्रहृत धनेश्वरस्य युधि य समेतमायोधनम्'। इत्यादि मट्टिकाव्ये*। इति नन्दनम् २०३ २०४ प्रय नाराच रचय न-युगल समस्त पदे वेदसस्याकृत, तदनु च कलयागु पक्षिप्रभु भासमान पदे । वसुहिमकिरणप्रयुक्ताक्षरोद्भासमान हृदा, परिकलय फणीन्द्रनागोक्त-नाराचवृत्त मुदा ।। ४६१ ।। सुरपतिहरितो गलत् कुन्तलच्छाद्यमान मुख, सपदि विरहजेन दुखेन मित्रस्य पाण्डप्रभम् । अनुहरति धनेन सञ्छादित किञ्चिदुद्यत्प्रभ , समुदितवरमण्डलोऽय पुर शीतरश्मि प्रिये । ॥ ४६२ ।। ययापा, 'रघुपतिरपि तात वेदो विशुद्धो प्रगृह्य प्रियाम् ।' इत्यदि रघुवशे* । पोडशाक्षरप्रतारे नराच , अत्र तु नाराच इत्यनयोभैद । इति नाराच २०४. मजला इत्यन्यत्र । यथा- " १ पवितरिय मास्तिक प्रती। *टिप्पणी-1 छदोमञ्जरी, दि० स्तबक, का. १७५ या उदाहरणम् २ महत पनेश्वरस्य युधि य समेतमायो धन, तमहमितो विलोक्य विवुधं कृतोत्तमा योधनम् । विभवमदेन निह, नुतहियाऽतिमात्र सम्पन्नक ध्यपयति सत्पपादधिगताऽपवेह सपान कम् ॥ [भट्टिकाव्य, सगं .. ५० ३७) ३ रघुपतिरपि जातवेदोविशुद्धा प्रगृह्य प्रिया, प्रियसुहृदि विभीषणे संगमय्य धिय बरिण । रविमुतहितेन तेनानुपात स सौमित्रिणा मुजविजितविमानरत्नाघिस्ट प्रतस्ये पुरीम् । रघुदा, स० १२, प. १४] " १४८] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५०४६३.४६७ ww २०५. प्रथ चित्रलेखा कर्ण कृत्वा कनकसुललित कुण्डलप्राप्तशोभ, सबिभ्राणा द्विजमथ च कर कङ्कणेन प्रयुक्तम् । पुष्प हारद्वयमथ दधती राववन्नूपुरौ च, वेदैरश्व, निरचितयतिर्भासते चित्रलेखा ।। ४६३ ।। यथा- श्रीमद्राजन्नयमिह गगने त्वत्प्रतापाहितस्य, छिद्रस्येन्दु. कलयति सुपमा मुद्रणे सोसकस्य । ताराशोभा विदधति वियतो हारिसस्य प्रताप- स्फोटस्यपा दिगपि किमु हरे कुङ्क मै ति कीर्णा ।।४६४।। इति चित्रलेखा २०५. २.६. प्रय भ्रमरपवम् कारय भ ततोऽपि रगणमथ नगणयुगल, धेहि नकारक तदनु च विरचय करतलम् । भासितमक्षरंगिरिवरहिमकरपरिमिते , पिङ्गलभाषित भ्रमरपदमिदमतिललितम् ॥ ४६५ ।। यथा- . नीलतम पटाधिगतमिद'मुडुगणमखिलं, मौक्तिकमेप कालनरपतिरतिललिततरम् । वासव दिग्गतद्विजपतय इह कलितकर, यच्छति सोऽपि ताननुकलयति निजकरगण ॥ ४६६ ।। इति भ्रमरपदम् २०६. २०७. मप शार्दू समलितम् प्रादी में सतत विधेहि तदनु ज्ञेय सरसिज, तत्पश्चाद् विरचय ज कलय स कर्ण तदनुगम् । तस्यान्ते युह स्पहस्तमतुल जानीहि सरस, नव्यप्रेमभरालसे मुललिते शार्दूलललितम् ।। ४६७ ।। १ मिमा प. ४६८-४७२] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण [१४९ यथा- श्रीगोविन्दपदारविन्दमनिश वन्देऽतिसरस, मायाजालजटालमाकुलमिद मत्वाऽतिविरसम् । वृन्दारण्यनिकुञ्जसञ्चरणतः सञ्जातसुपम, 'दम्भोल्यंकुशसध्वज सरसिजनोद्भासमसमम् ॥ ४६८ ॥ इति शार्दूलललितम् २०७. २०६, प्रय सुललित कलय नयुगलं पश्चाद्व तथातिमनोहर, तदनु विरचयेः कणों पुष्पान्वितो भगण ततः । वितनु सुललित पक्षीन्द्र वा विलासिनीसुन्दरं, मुनि विरतियुत वेदैश्छिन्न हयश्च विभावितम् ॥ ४६६ ।। क्या- निजगति जयिनरते ते भावा नवेन्दुकलादयः, परिणतिमधुरा. काम सर्वे मनोरमतां गताः। मम तु तदखिल शून्यारण्यप्रभ सखि ! जायते, मुररिपुरहित तस्माद् भद्रे समाहृय त हरिम् ।। ४७० ॥ इति सुललितम् २०८. २०६. अथ उपवनकुसुमम् सलिलनिधिपरिमित नगणमिह विरचय, तदनु च रसनिगदितलघुमपि यलय । कविजनहितसकलफणिपतिकथितमिह, हृदि क्लय सुललितमुपवनकुसुममिति ।। ४७१ ।। यथा- प्रसितबसनवरललितहल मुशलपर 1, निजतनुरुचिविजितपुरमथनगिरिवर! 1 द्विविदरपियरषदनकर ! नयरुचिचय!, जय ! जय ! कुरुनरपतिनगरजनितमय ! || ४७२ ।। इति उपवनसमम् २०१. १. म रामोत्तमाथिर सभ्योममरामम् ।
१५० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयसण्ड [ ५० ४७३ - ४७६ 'अत्रापि प्रस्तारगत्या अष्टादशाक्षरस्य लक्षद्वय द्वापष्टिसहस्राणि चतुष्वत्ला- रिंशदुत्तर च शत २६२१४४ भेदास्तेषु कियन्तो भेदा प्रोक्ता, शेपभेदास्तूह्या सुधीभिरिति दिक् ।' इति अष्टादशाक्षरम् । अथ एकोनविंशाक्षरम् तत्र प्रथमम्- २१० प्रष नागानव अश्वाना सख्याका यस्मिन् सर्वस्मिन् पादे सदृश्यन्ते कर्णा, पश्चाद् वाणं सप्रोक्ता हारा युक्ता रन्धर्भूम्या चोक्ता वर्णा । सर्वेषा नागानामीशेनंतत् प्रोक्त नागानन्दाख्य वृत्त, विश्वेषा यच्छ त्वा समज्जत्यानन्दाना वारा राशौ चित्तम् ॥ ४७३ ।। यथा- जैनप्रोक्ताना धर्माणा सर्वेभ्यो लोकेभ्य शिक्षा सदास्यन्, यज्ञाना हिंसाङ्गाना तन्मूलाना वेदाना वा निन्दा कुर्वन् । सर्वस्मिस्त्रलोक्ये भूताना रक्षारूपा धर्मानवाधास्यन्, कल्याण कुर्यात् सोऽय गोविन्द क्रीडाथं बौद्धाभिख्यां गृह्णन ॥४७४।। इति नागानन्द २१० २११ अथ शाई लविक्रीडितम कर्ण कुण्डलपुष्पगन्धललित हार च वक्षोरुहे, हस्त कङ्कणयुग्मसुन्दरतर शब्दोल्लसनूपुरौ । रूपाढया रसना तथैव च दधत्तीक्ष्णाशुविच्छेदित, श्रीमत्पिङ्गलभापित विजयते शार्दूलविक्रीडितम् ।। ४७५ ।। यथा ते राजनतिचण्ड'कोतितटिनीडिण्डीरपिण्डाकृति- ब्रह्माण्डातिलसत्करण्डनिहितश्वेताण्डजप्रोज्ज्वलम् । तन्वीगण्डविपाण्डुरद्युतिपुरस्फूजंदवियोमण्डल, राहोर्मण्डकाल)खण्डमेतदुदयत्यासण्डलाशामुखे ॥ ४७६ ।। १ पक्तित्रय नास्ति तो। २ स राजाते परिपूणोति । *टिप्पणी-१ प्रष्टादगारवृतस्य प्रपातरेपूरलम्पोषभेदा पञ्चमपरिशिष्टे इष्टप्या ।
प. ४७७.४८१] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण [ १५१ यया था, ममैव पाण्डवचरिते अर्जुनागमने द्रोणवाक्यम्- ज्ञान यस्य ममात्मजादपि जनाः शस्त्रास्त्र शिक्षाधिकं, पार्थः सोऽर्जुनसंज्ञकोऽत्र सकलः कौतूहलाद् दृश्यताम् । श्रुत्वा वाचमिति द्विजस्य कवची गोधामुलित्राणवान्, पार्थस्तूणशरासनादिरुचिरस्तवाजगाम द्रुतम् ।। ४७७ ।। यथा वा, कृष्णकुतूहले- उन्मीलन्मकरध्वजवजवघूहस्तावधूताञ्चल. व्याजोदञ्चितवाहुमूलकनकद्रोणीक्षणादीक्षणे । उद्यत्कण्टककंतवस्फुटजनानन्दादिसंख्यामित- ब्रह्माद्वैतसुखश्चिरं स भगवांश्चिक्रीड तत्कन्दुकः ।। ४७८ ।। इत्यादि महाकविप्रवन्धेषु सहस्रश उदाहरणानि प्रत्युदाहरणत्वेन' द्रष्टव्यानि । इति शार्दूलविक्रीरितम् २११. २१२. प्रथ चन्द्रम् प्रतिपदमिह कुरु नगणनितयमथ कलय, जगणमिह नगणयुगलं तदनु च विरचय । चरणविरतिमनु रुचिरं कुमुममथ वितनु, सकलफणिनृपतिकृत-चन्द्र मिति शृण सुतनु ! ॥४७६ ।। नवकुलवनजनितमन्दमरुदिह वहति, किरणमनुकलयति विधुस्त्रिजगति सुमहति । सपदि सखि ! मम निजहित वचनमनुकलय, समनुसर वनगतहरि तनुमतिसफलय ॥ ४८० ॥ यावा, भूषणे* मनुपहतकुसुमरसतुल्यमिदमघरदल- ममृतमयवचनमिदमालि विफलयसि चल । यदपि यदुरमणपदमीश मुनिहृदि लुठति, तदपि तव रतिवलितमेत्य बनतटमटति ॥ ४८१॥ इति धाद्रम् २१२. चन्द्रमाला इत्यस्येव नामान्तरं पिलले"। पपा- *. - १.स. 'प्ररपुवाहरणस्वेन' मास्ति । रिपो-१. वाणीभूषणम्, द्वितीयाध्याय, पच ३.. टिप्पणी-२. प्राकृतपंगमम्, परिच्छेद २, पर ११.
१५२ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प०४८२.४८६ २१३. प्रथ धवलम् द्विजवरगणमिह रचय जलनिधिपरिमितं, तदनु कलय सगणमथ चरणविरतिगतम् । सकलकविकुलहृदयतसविलुठनकरणं, फणिपतिभणित-धवलमिह शृणु सुखकरणम्' ॥४८२॥ यथा- जलमिह कलय सखि ! कनकयुतमिव विमलं, गगनतलमपि विगतजलधरमतिधवलम् । गतवचनरचनमिदमपि शिखिकुलमवलं, नववपुरिदमव मम कुसुमविशिखतरलम् ॥ ४८३ ।। पपाषा, भूषणे'. उपगत इह सुरभिसमय इति सुमुखि ! वदे, निघुवनमधि सह पिब मधु जहि रुपमपदे । कमलनयनमनुसर सखि ! तव रभसपरं, प्रियतमगृहगमनमुचितमनुचितमपंरम् ॥ ४८४ ॥ इति धधसम् २१३. घयला इति पिङ्गले । २१४. मष शम्भुः कुरु हस्तं स्वर्णविराजत्कवणपुष्पोद्यद्गन्धयुक्त, श्रवणं ताटङ्कसुरूपप्राप्तरसं हारद्वन्द्वं पश्चात् । रसनायुग्मं फनकेनात्यन्तविराजद्वाभ्यां प्रान्ते, नवभूवर्णः कथितं नागाचितशम्भ्वाख्यं वृत्तं कान्ते ! ॥४८५।। पया- नवसन्ध्या यह्निजीत्या पश्चिमसिन्धी मित्र संमग्ने, नलिनीयं पङ्कजने मोलयतीवात्यन्तं शोकेन । हरितो यध्वः पतगोधानां विस्तरच्नोदिं संदध्रुः, घरभूत्यांश्चाम्बरमुच्चर्मानुसमूहारक्त संबभ्रुः ॥ ४८६ ॥ १.१. मुसारणम् । २. संघः। टिप्पणी-1 पाणीभूपणम्, हितोपाप्याय, पच ३०२ २ प्रातपंगतम्, परि० २, पच १९२ " ५०४८७ - २६१] १ वृत्तनिरपण-प्रकरण [१५३ पपा घा*. जय । मायामानवमूर्ते दानववशध्वसव्यापारी', बलमाद्यद्रावणहत्याकारण लड्कालक्ष्मीसहारी। कृतकसध्वसन-काशसन गो गोपी-गोपानन्दी', वलिलक्ष्मीनाशन-लीलावामन दैत्यश्रेणोनिष्कन्दी' ।। ४८७ ॥ इति सम्म २१४ २१५ प्रघ मेघविस्फजिता यकार सदेहि प्रथममथ म देहि पश्चानकार, कर तस्याप्यन्ते रचय रुचिर रेफयुग्म ततोपि । गुरु तस्याप्यन्ते कलय ललित पडसच्छेदयुक्त, कुरु च्छन्द सार फणिपकथित मेघविस्फूजितास्यम् ।। ४८८ ।। यथा- विलोले 'कल्लोलस्तरणिदुहितु क्रीडन कारयन्त, लसद्वश कसप्रमृतिकठिनान् दानवानईयन्तम् । सुराणा सेन्द्राणा ददतमभय पीतवस्त्र दधान, सलील विन्यासश्चरणरचितैमूमिमाग पुनानम् ।। ४८६ ।। पथापा, कविराक्षसकृतदक्षिणानिलवर्णने- उदञ्चत्कावेरीलहरिपु परिप्वगरने लुठन्त कुहूकण्टी कण्ठीरवरवलवत्रासितपोषितेभा । अमी चने मनावरुणितरुणीकेलिकहल्लिमल्ली- चलदवल्लीहल्लीसकसुरमयश्चण्डि चञ्चन्ति वाता ।।४६०॥ इत्यादि। इति मेघविस्फजिता २१५ २१६ पप धाया सुरुपाढय कर्म फनक्ललित ताटवमुग्मान्वित, द्विज गन्ध स्वर्ण पलययुगल पुप्पाढयहाग्द्वयम् । दघाना पादा ते ललितविस्तप्रोद्भासित नूपुर, रसं पडभिरिधता पणिपकथिता माया सदा राजते ॥४६१॥ ४ ९ गोपानचिन्। १स प्यापारिन् । २ स हिसागरण। ३ संहारिन् । स निमन ६ स पपूटो । *रिणी-१ या भूपणम, दितीयापार, प३.४ १५४ 1 वृत्तमौक्तिक - द्वितीय खण्ड [ प. ४६२-४६६ यथा- भवच्छेदे दक्ष दितिसुतकुलध्वान्तस्य विध्वसने, सदाळभ वक्ष स्थलगतलसद्रनाशुभिभू पितम् । वधूभिर्गोपाना तरणितनयाकुजेपु रासस्पृह, सदा नन्दादीनाममितसुखद गोपालवेप भजे ॥ ४६२॥ इति छाया २१६ २१७ अथ सुरसा कर्णद्वन्द्व विराजत कुसुमसुललित कुण्डलयुग, सविभ्राणा ततोपि द्विजमथ च कर कङ्कणयुतम् । रूपाढ्या दिव्यरावा कुसुमविलसिता नूपुरयुता, शैलरश्वश्च वाणविरचितविरतिर्भाति सुरसा ॥ ४६३ ।। पथा- गोपाल केलिलोल ब्रजजनतरुणी-रासरसिक, कालिन्दीये निकुञ्ज पशुपसुतगणर्वेष्टिततनुम । वशीरावेण गोपीसुललितमनसा मोहनपर, कसादीनामराति ब्रजपतितनय नौमि हृदये ॥ ४६४ ।। इति सुरसा २१७ २१८ मय फुल्लदाम कणों स्वर्णाढयौ कुसुमरसमयी रूपरावान्वितौ चेद्, पुप्पोद्यद्रूपो कनकविरचित नूपुर पुष्पशोभम् । हारौ रावाढयौ विलसदमलगौ कङ्कणेनातिरम्यौ, शस्वल्लोकाना सुकथितमतुल फुल्लदाम प्रसिद्धम् ।। ४६५ ।। सपा- दीव्यद् देवाना परमधनकर कामपूर जनाना, पास्वद्भक्ताना परिकलितकलाकौशल कामिनीनाम् । दिव्यानदाना परम'निलयन वेदगम्य पुराण, पुण्यारण्यानां गहनमहमिम नौमि मूर्द ना नितान्तम् ।।४६६।। इति फुल्लदाम २१८ १. पिन दानो परम' इति नास्तिक प्रतो।
१० ४६७ - ५०० ] १. वृत्तनिरूपण-प्रकरण [ १५५ २१६. अथ मदुलकुसमम् रचय नगणमिह रसपरिमित 'मनुकलय, शिशिरकिरणरचित कुसुमगणनमपि कुरु । सकलभुजगनरपतिकथितमिदमतिशय- सुललितमृदुलकुसुममिति हृदि परिकलय ॥ ४९७ ॥ यथा- 1 अयि । सहचरि ! निरुपममृदुलकुसुमरचित- मनुकलय सरसमलयजकणलुलितमिति । वरविपिनगततरुवरतलकलितशयन- मनुसर सरसिजनयनमनुपमगुणमिह ।। ४६८ ॥ इति मृदुलकुसमम् २१९ अत्रापि प्रस्तारगत्या एकोनविंशत्यक्षरस्य लक्षपञ्चक चतुर्विशतिसहस्राणि अष्टाशीत्युत्तर शतद्वय ५२४२८८ भेदास्तेषु कतिपयभेदा प्रोक्ता , शेषभेदाः सुघोभि प्रस्तार्य उदाहरणीया, इत्युपदिश्यते । इत्यूनविंशत्यक्षरम् । अथ विशाक्षरम् तत्र प्रथमम्- २२. योगानन्द यस्मिन् वृत्ते दिवसस्याता सलग्ना शोभन्तेन्त्यन्त पूर्णा कर्णा- स्तद्वल्लीलालोले पादप्रान्ते विस्याता ख्याप्यन्तं नख्या वर्णा । श्रीमन्नागाधीशप्रोक्त विद्वत्सार हारोद्धार धेहि स्वान्ते, तद्ववृत्त योगानन्द सर्वानन्दस्थान धैर्याधान कान्ते IYEET - पपा- एन्देह त रम्प सम्म सात सध्यक्ष देव दीप्त धीर, नाथ नव्याम्भोदप्रस्य काम श्रव्य राम मित्र सेव्य वीरम् । सर्वाधार भव्याकार दक्ष पाल सादीना काल वाल, प्रानन्दाना कन्द विद्यासिन्धु सेवे येन क्षिप्त मायाजालम् ॥५००। इति पोगानन्द २२० १. स. परिणम् । २ पतिपय नास्तित प्रती। टिप्पणी--1.म्पोषभेदाः पञ्चमपरिशिष्टे विलोपनीया., वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प० ५०१ - ५०५ २२१ प्रय गीतिका कुरु हस्तसगिसुशवकर्णरूपरावसमन्वित, वरपक्षिराजविराजित नवगन्धयुग्मविभूप्तिम् । कुरु वल्लकोरवधारिण रसमुग्धसुन्दररूपिणो- रवयुक्तनूपुरमत्र धेहि विधेहि भामिनि । गीतिकाम् ॥५०१ ॥ यथा- अयि । मुञ्च मानमवेहि दानमुपैहि कुञ्जगत हरि, नवकजचारुविलोचन भयमोचन भवसन्तरिम् । कुरुषे विलम्बमकारण सखि । साधयाशु मनोरथ, ननु खिद्यसेऽतिभृश वृथैव जनुर्विधारयसे कथम् ॥ ५०२ ।। यथाषा- अलमीश-पावक-पाकशासन-वारिजासनसेवया, गमित जनुर्जनकात्मजापतिरप्यसेव्यत नो मया । करुणापयोनिधिरेक एव' सरोजदामविलोचन , स पर करिष्यति दुखशेप'मशेषदुर्गतिमोचन. ॥ ५०३ ॥ 'अथ सालतालतमालवजुलकोविदारमनोरमा' इत्यादि । शिको काव्य च प्रत्युदाहरण मिति । इति गीतिका २२१ २२२ प्रय गण्डका' हारपुप्पसुन्दर विवेहि तन्मनोहर मनोहरेण, नागराजकुञ्जरेण भापित च रेण यत्पयोधरेण । अन्तगेन चामरेण राजित विराजित च काहलेन, गण्डकेति यस्य नाम धारित सुपण्डितन पिङ्गलेन ।। ५०४ ॥ देव! देव' वासुदेव ते पदाम्बुजद्वय विभावयेम, नाम पुप्पदाम धामतेजसा सदा हृदा विधारयेम । तावदेव सारवस्तु नान्यदस्ति किञ्चनात्र धारितेन, वाजिराजिकुञ्जरादिसाधनेन तेन किं विभावितेन ।। ५०५ ।। पथा- २ ख दुसना ३. स तदुवाहरणम् । ४. पुष्पवान । टिप्पणी- १ इतस्यास्य निर्दिष्टलक्षणकारिका परिस्फुटा नवास्ति किन्तु अन्यतमंद- भीष्ट तदुदाहरणेनव परिज्ञायते-'यच्छन्दसि हारपुष्पयो (51) नयधारमनु प्रमेण मोजन तदनु पामर-काहलयो (1)यसन मवेतद् गायत्त स्यादिति ।
५० ५०६-५१०] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [ १५७ यथा- यया था, भूषणे प्रत्युदाहरणम्- दृष्टमस्ति वासुदेव विश्वमेतदेव शेपविक्नक तु', वाजिरत्नभृत्यदारमूनुगेहवित्तमादिवन्नव तु । त्वत्पदान्जभक्तिरस्तु चित्तसीम्नि वस्तुतस्तु सर्वदेव, शेपकाललुप्तकालदूतभीतिनाशनीह हन्त सैव ॥ ५०६ ।। क्वचिदियमेव चित्तवृत्तम् इति । केवल वृत्तमात्रमन्यत्र * इति गण्डको २२२, २२३. प्रयशोभा यकार प्रागस्ते तदनु च मगण कथ्यते यत्र वाले I, ततोऽपि स्यात् पश्चाद् यदि नगणयुग स्यातकारद्वय च । ततश्चान्ते हारद्वयमुपरितन कारयागु प्रकाम, रसरस्वैश्छिन्ना मुनिविरतिगता भासते काऽपि शोमा ॥५०७१॥ रमाकान्त बन्दे त्रिभुवनशरण शुद्धभावकगम्य, विरञ्चे स्रष्टार विजितधनरुचि वेदवाचावगम्यम् । शिव लोकाध्यक्ष समरविजयिन कुन्दवृन्दाभदन्त (वदात), महम्रा रूप विघृतगिरिवर हार्दकजे वसन्तम् ॥ ५० ॥ इति शोभा २२३ २२४ मप सुबदना श्रादौ मो यर बाले । तदनु च रगणो जवासुघटित., पश्चाइयो नकारस्तदनु च यगणस्तातेन रचित । फायौं तत पावंदेशे तदनु लघुगुरू ज्ञेया सुवदना, नागाधीमेन नुम्ना नयमितचरणा नव्या सुमदना ॥ ५०६ ।। यीमनारायण त नमत बुधजना मसारसारण, सर्याध्यक्ष बसन्त निजदि मदय गोपीविहरणम् । पल्याणाना निधान फलिमलदला वाचामविषय, क्षोराब्धो भागमान दमितदितिसुत वेदान्तविषयम् ।। ५१०।। १. रोपणप्रभागि 'पापोभूषणे'। टिप्पणी-१ वाणीभूपराम दि. १५३.८ २ पदमार्ग, दिमा. २.१ एव वृत्तसार,.३।१.१ १५८ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [पल घ० ५११.५१५ यया घा, हलायुधभट्टविरचित छन्दोवृत्ती*- या पीनाङ्गोरुतुङ्ग स्तनजघनघनाभोगालसगति- यस्या कर्णावतसोत्पलरुचिजयिनी दीर्घ च नयने । सीमा सीमन्तिनीना' मतिलडहतया या च त्रिभुवने, सम्प्राप्ता साम्प्रत मे नयनपथमसौ दैवात् सुवदना ॥ ५११॥ इति सुवदना २२४. २२५. प्रथ प्लवङ्गभङ्गमङ्गलम् यदा लघुर्गुरु निवेश्यते तदा प्लवङ्गभङ्गमङ्गल, जरी जरी जरी रसप्रयुक्तमुच्यते लगी सुमङ्गलम् । कवीन्द्रपिङ्गलोदित सुशङ्ख हारभूपित मनोहर, प्रमाणिका-पदद्वयेन पूर्यते च यच्च पञ्चचामरम् ।। ५१२॥ यथा- नवीनमेघसुन्दर भजेम भूपुरन्दर विभु वर, प्रकामधामभासुर दधानमद्भुताम्बर' दयापरम् । विलासिनीभुजान्तरानिरुद्धमुग्धविग्रह स्मरातुर, चराचरादिजीवजातपातकापह जगधुरन्धरम् ।। ५१३ ।। इति प्लवङ्गभङ्गमङ्गलम् २२५ २२६. प्रथ शशाडूचलितम कर्ण पयोधरकरौ यदा च भवतो विलासललिते, ज्ञेयस्तत सुतनु । ज सुहस्तकलित. शशाङ्कचलिते । ततोऽपि चेद् भवति ज सुपाणिघटितो वसौ च विरति- स्ततो रसैरपि यति कलावति भवेत् पुना रसयति ॥५१४।। यया- कृष्ण प्रणोमि सतत बलेन सहित सदा शुभरत, फरयाणकारिचरित सुरैरभिनुत प्रमोदभणितम् । कसादिदर्पदलन च कलाकुतुकिन विलासभवन, समारपारकरण परोदयकर सरोजनयनम् ॥ ५१५ ।। इति शालितम् २२६ १. मा पोनो गादतुग-हलायुधे । २. श्यामा सोमन्तिनोना 'हलायुधे । मदभूत परम्। ४ स भरितम् । टिप्पणी-१ अध्याय ७,बारिवाया २३ उदाहरणम् ।
प. ५१६.५१६ ] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [ १५६ २२७ प्रय भद्रकम वेदसुसम्मितमादिगुरु कुरु जोहल कमल प्रिये, अन्तगत कुरु पुष्पसुकङ्कणराजित विजितक्रिये । रन्ध्ररसैरपि वाणविभेदितविंशक कुरु वर्णक, कामकलारसरासयुते निजमानसे कुरु भद्रकम् ।। ५१६ ।। यथा- चेतसि पादयुग नवपल्लवकोमल किल भावये, मञ्जुलकुन्जगत सरसीरहलोचन ननु चिन्तये । प्रानय नन्दसुत सखि मानय मेदुर रजनीमुख, कृञ्चितकेशममु परिशीलय कामुक कुरु मे सुखम् ॥ ५१७ ।। इति भद्रकम २२७ २२८ अथ अनधिगुणगणम रसपरिमितमिति सरसनगणमिति' विरचय विकचकमलमुखि ' लघुयुगमनुमलमनुनय । सुतनु । सुदति ! यदि निगदसि बहुविधमनवधि गुणगणमनुसर नखलघुमितमनुलवमयि । ॥ ५१८ ।। यथा- अनुपमगुणगणमनुसर मुरहरमभिनव- मभिमतमनुमत मतिशयमनुनयपरमव । सकपटयदुवरकरधृतगिरिवरपरमपि कुरु मम सुवचनमफलय सखि न हि न हि मयि ।। ५१९ ।। इति मनधिगुणगणम २२० 'ममापि प्रस्तारणत्या विंशत्यक्षरस्य दशलक्षमष्टचत्वारिंशत्महस्राणि पद- सप्तत्युत्तराणि पदातानि च १०४८५७६ भेदा भवन्ति, तेषु चाद्य तसहिता' विस्तरभीत्या क्यि तो भेदा लक्षिता , पभेदा सुघुद्धिभि प्रस्तायं सूचनीया इति दिए । इति विशाक्षरम् । 1 मिह। २ स मनुगत। ३ पस्तिचतुष्टप मारित प्रतो । हप्पणी-सम्पोषभेदा पञ्चमपरिशिष्ट समोरोक्नीया ।
१६० ] वृत्तमौक्तिक -द्वितीयखण्ड [ १० ५२०-५२४ अथ एकविंशाक्षरम् तत्र प्रथमम्- २२६ अथ ब्रह्मानन्द यस्मिन् वृत्ते पक्ति रयाता शोभन्तेऽत्यन्त कर्णा प्रान्ते चैकोहार , नागाधीशप्रोक्तोऽपार सारोद्धारो ब्रह्मानन्दो वृत्ताना सार । विश्रामश्च प्रायो यस्मिन् वेध श्रोनै शैलेन्द्र शस्त्रैर्वा स्यात् प्रान्ते, विशत्या वर्णरेका सयुक्तीलालोले सोऽय ज्ञेय कान्ते ॥५२०॥ यथा- सर्व कालव्यालग्रस्त मत्वा स्त्रीषु व्यासङ्ग हित्वा कृत्वा धैर्य, कालीन्दीये कुञ्ज कुजे भ्राम्यद्भुङ्ग सगोते भ्रातृमुक्त्वा कौर्यम् । श्रीगोविन्द वृन्दारण्ये मेघश्याम गायन्त वेणुक्वाणर्मन्द, ब्रह्मानन्द प्राप्याजस्र ध्यात्वा चेत साफल्य धेहि स्वान्तेऽमन्दम् ।।५२१ इति ब्रह्मानद २२६ २३० प्रथ स्रग्धरा श्रादो मो यन वाले । तदनु च रगण स्यात् प्रसिद्धस्तु यस्या, पश्चाद् भ चापि न च त्रिगुणितमपि य धेहि कान्ते विचितम् । शैलेन्द्र सूर्यवाहैरपि च मुनिगणदृश्यते चेद् विराम , कामव्यासक्तचित्ते सुदति । निगदिता स्रग्धरा सा प्रसिद्धा ।। ५२२ ॥ पथा, ममैव पाण्डवचरिते- तुष्टेनाथ द्विजेन त्रिदशपतिसुतस्तत्र दत्ताभ्यनुज, कर्णोपि प्राप्तमानस्सदसि कुरुपतेर्द्वन्द्वयुद्धार्थमागात् । जम्माराति स्वसूनोपरि जलघरस्सव्यधादातपत्र, चण्डाशुश्चापि कर्णोपरिनिजकिरणानाततानातिशीतात् ॥५२३।। पथा घा, मत्पितु सङ्गवर्णने- सनामारण्यचारी विक्टभटभुजस्तम्भभूभृद्विहारी, राक्षोणीशचेतोमगनिवरपरानन्दविक्षोभकारी। माद्यन्मातङ्गयुम्भस्थलगलदमलस्थूलमुक्तापहारी, सारीभूताङ्गपारी जगति विजयते खङ्गपञ्चाननस्ते ।। ५२४॥
प० १२५ - ५३० ] १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण पपा था, कृष्णकुतूहले- केशिद्वेषिप्रसूश्च क्वचिदय समये सद्मदासीपु कार्य- व्यग्रासु प्रग्रहान्तग्रहणचलभुजाकुण्डलोद्ग्रीवसूनु । पुत्रस्नेहस्नुतोरुस्तनमनणुरणत्कङ्कणक्वाणमुद्यत्- कम्पस्विद्यत्कपोल दविकचविगलद्दामबन्ध ममन्थ ।।५२शा इति अग्धरा २३०० २३१ अथ मजरी कङ्कण कुरु मनोहर तदनु सुन्दर रचय तुम्बुर, सुन्दरी कलय सुन्दरी तदनु पक्षिणामपि पति तत । भावमातनु तत पर सुतनु । पक्षिण च कुरु सङ्गत, भावमेव कुरु मञ्जरी (तदनु] जोहल विरचयातत ॥५२६।। रगणनगणक्रमेण च सप्तगणा भान्ति यन सरचिता । नव-रस-रसयतिसहिता वदन्ति तज्ज्ञास्तु मज्जरीमिति ताम् ।। ५२७ ।। हारनूपुरकिरीटकुण्डलविराजिता वरमनोहर, सुन्दरायरविराजिवेणुरवपूरिताखिलदिगन्तरम् । नन्दनन्दनमनङ्गवर्द्धनगुणाकर परमसुन्दर, चिन्तयामि निजमानसे रुचिरगोपगोधनधुरन्धरम् ।। ५२८ ।। पचा पा, श्रीशङ्कराचार्याणा नवरत्नमालिकायाम्- दाडिमीकुसममन्जरीनिकरसुन्दरे मदनमन्दिरे, यामिनीरमणखण्डमण्डितशिखण्डके तरलकुण्डे (कुण्डले)। पाशमशमुदञ्चित दधति कोमले कमललोचने ! तावके वपुपि सन्तत जननि ! मामक भवतु मानसम् ।।३२६।। इति मञ्जरी २३१ २३२ मष नरेन्द्र कुण्डलवचरज्जुमुनिगणयुतहस्तविराजितशोम, पाणिविराजिशययुगवलयित-बङ्कणचामरलोभ । कामविशोमयोगवरविरतिगचन्द्रविलोचनवणं, पनगराजपिङ्गल इति गदति राजति वृत्तनरेन्द्र ।। ५३० ।। *टिप्पणी-१ मञरीशास्य ससाणोदाहरण प्रस्मुदाहरणानि नैव सविन प्रमो।
१६२ वृत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड [ ५० ५३१ - ५३४ मानिनि । मानकारणमिह' जहिहि नन्दय त सखि । कृष्ण, चिन्तय चिन्तनीयपदमनुमतमाकलयाशु सतृष्णम् । जीवय जीवजातमुपगतमपि मा कुरु मानसभङ्ग, केवलमेव तेन सह सहचरि ! सन्तनु तत्तनुसङ्गम ।। ५३१॥ यथा वा- पङ्कजकोषपानपरमधुकरगीतमनोज्ञतडाग , पन्चमनादवादपर परभृतकाननसत्परभाग । वल्लभविप्रयुक्तकुलवरतनुजीवनदानदुरन्त , कि करवाणि वक्षि' मम सहचरि सनिधिमेति वसन्त । ५३२। इति नरेन्द्र २३२ २३३ अय सरसी सहचरि । नो यदा भवति सा कथिता सरसी कवीश्वर- यदि तु जभौ जजौ च भवतोपि जरौ समनन्तर परै । इह विरती यदा शरविलोचनजे भवतो मुनीश्वर , शिशिरकरस्सदा भवति लोचनतो गणनापदाक्षर ।। ५३३॥ बया- नमत सदा जना प्रणत कल्पतरु जगदीश्वर हरि, प्रवलहृदन्धकारतरणिं भवसागरपारसन्तरिम् । सकलमुरासुरादिजनसेवितपादमरोरह पर, जलरुहराव चककमनीयगदाधरसुन्दराम्बरम् ।। ५३४ ।। यथावा- 'तुरगशतावुलस्य परित परमेकतरङ्गजन्मन ।' इत्यादि माघकाव्ये"* । इति सरसो २३३ सुरतरिति प्रन्यत्र । सिद्धकम् * इति क्वचित् । १क मानकारिणिमिह । २ ख पञ्चमनादगानपर। ३ ख परिष "टिप्पणी-१ तुरगमताकुलस्य परित परमेक्तुरहन मन , प्रमपितभभूत प्रतिपय मथितस्य भा महोभता । परिचलतो बलानुजवलस्य पुर सतत घृतथिय चिरविगतधियो जननिषेच तदाभवदतर महत् ॥ २॥ [f]पालवधम्-१० ३, ५० ८२] २ वृत्तरतावर , नारायपोटीरायाम्-म ३, का १०४ १० ५३५. ५३८ ] १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण २३४. प्रय चिरा कुरु नगण ततो रचय भूमिपति दहन च सुन्दर, तदनु विधेहि ज त्रिगुणित ललित विहग तत परम् । मुनिमुनिभिर्भवेद्विरतिरप्यतुला सुक्ला मनोहरा, सुकविवर, परा निगदिता रुचिरा परमार्थतो वरा ॥ ५३५ ।। यथा- नयनमनोहर परमसौख्यकर सखि ! नन्दनन्दन, कनकनिभाशुक निजगतीतिलक मुरलीविनोदनम् । भुवनमहोदय घनरुचिं रुचिर कलये सदोन्नत', सुरकुलपालक श्रुतिनुत सदय दयित श्रिय पतिम् ।। ५३६ ।। इति चिरा २३४ + २३५ अय निरुपमतिताम् सुतनु । सुदति ! सरसमुनिमितनगणमिह रचय, शिशिरकरजनयनमितसुपदमपि परिकलय । कनककटकवलयकलितकरकमलमुपनय, फणिपतिमणितमिह निरुपमतिलकमिति यथय ।। ५३७ ।। यथा- जय । निरपम दिशि दिशि विलसितगुणनियर करधृतगिरिवर । विगणितगुणगणवरसुकर ।। कनक्वसनकटकमुकुटवलित ! मिलितललन । विजितमदन । दलितशकट सवलदितिजदलन ॥ ५३॥ इति निरुपमति २३५ 'अवापि प्रस्तारगत्या एकविंगत्यक्षरस्य नग्यलक्ष सप्ननवतिगहसागि द्विसमधिकपञ्चाशदुत्तर शत २०६७१५२ भेदा भवन्ति, तेषु भेदमगर छ, शेपभेदा सुधीभि. स्वबुद्धधा प्रस्तापं गूचनीया इति दिए ।' पति एरविशातरम्। 'च पोति। २ पतित्रय नातिर प्रती। पनी-१ एविरारपरस्पयामरंतु सायरमेना पम्पमारिदिन्टेरा वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० ५३१-५४३ हन प्रथमम- अथ द्वाविंशत्यक्षरम् २३६ विद्यानद यस्मिन् वृत्ते रुद्रप्रोक्ता कुन्तीपुत्रा नेर्ने नर्वर्णा पादप्रान्ते, पड्भि कर्णविश्राम स्यात् तदवद् यस्मिन् रम्य पाण्डो पुत्र स्यात् तस्यान्ते । श्रीमन्नागाधीशेनोक्त सार वृत्त श्रव्य भव्य नव्य काव्य कान्ते ', बाले ' लीलालोले । मुग्धे । विद्यानन्द दिव्यानन्द सम्यग धेहि स्वान्ते ॥५३९।। पचा- काशीक्षेने गङ्गातीरे चञ्चन्नीरे विश्वेशाघ्रिद्वन्द्व सम्यग् ध्यात्वा, कृत्वा तत्तन्मात्रायुक्तप्राणायाम शोच्य नश्यत्तत्तसङ्ग मुक्त्वा । मायाजाल सर्वं विश्व मत्वा चित्ते रम्य हम्यं पुत्रा किञ्चिनंत- च्छस्वकामक्रोधकार्याक्रान्त श्रान्त प्रान्ते नाह देह सोऽह तत्सत् ।।५४०।। इति विद्यानन्द २३६ २३७ मथ हसी यस्यामष्टो पूर्व हारास्तदनु च दिनपतिमित वरवर्णा , दण्डाकारा कान्ते । चञ्चतकरयुगविलसितवलयविलोले । तद्वदीर्घाव-त्यौ वो *यतिरिह विलसति वसुभुवनाणे , सा विज्ञ या हसी बाले । प्रभवति यदि किल नयनयुगा* ॥५४१॥ प्रौढध्वान्ते प्रावृट्काल क्षितितलविलसिततरलितकन्दे, कालिन्दीये कुञ्ज कुञ्ज त्वदभिसरणकृत सरभसवेषा। राधात्यन्त वाधायुक्ता प्रमरति मनसिजविशिखविलूना, वन्यस्त्रग्भिविरचितभूषस्त्वमपि च विहरसि सरसकदम्बे' ॥ ५४२ ।। पया- , यथा धा- श्रीकृष्णेन कीडन्तोना क्वचिदपि वनभुवि मनसिजभाजा, । गोपालीना चन्द्रज्योत्स्नाविशदरजनिगुरुजनितरतीनाम् । धर्मभ्रश्यतपत्रालीनामुपचितरभसविमलतनुभासा, 'रासकोडायासध्क्सी मुदमुपनयति' मलयगिरिवात ॥ ५४३ ॥ इति हमो २३७ "चिह नगतोऽय पाठो नास्ति के प्रनो। क रात कोडायापासध्वसमुदमुपनयमिद । टिप्पणी-१ पादोश्य सवधाऽशुद्ध वणद्वयवद्धनाद्दीघद्वयरहितत्वाच्च । प्रतोऽस्मिन् पादे यदि विरचित पदस्याने सृष्टा पदयोजना स्यात्तद्दोपपरिहारसभव ।
प० ५४४ - ५४० १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण २३८ प्रथ मदिरा आदिगुरु कुरु सप्तगण सखि । पिङ्गलभाषितमन्तगुरु, पक्तिविराजि-यति च तत कुरु सूर्यविभासियति च तत । चिन्तय चेतसि वृत्तमिद मदिरेति च नाम यत प्रथित, सप्तभकारगुरुपहित बहुभि कविभिर्वहुधा कथितम् ।। ५४४ ॥ यथा- मा कुरु माचिनि | मानमये वनमालिनि सन्तति'सालिनि हे, पाणितलेन कपोलतल न विमुञ्चति सम्प्रति किं मनुपे । यौवनमेतदकारणक न हि किञ्चिदतोऽपि फल तनुपे, कुञ्जगत परिशीलय त परिलम्बमिद सखि । किं कुरुषे ।। ५४५ ।। इति मदिरा २३८ इयमेव अस्माभिर्मानाप्रस्तारे पूर्वखण्डे सवयाप्रकरणे मदिराभिसन्धाय सवया इत्युक्ता, सा तत एवावधारणीया । २३६ अथ मन्द्र कम् कारय भ ततोपि रगण ततो नरनरास्ततश्च न गुरू, दिग्र विभिभवेच्च विरतिविलोचनयुगेरपीन्दुवदने । कल्पय पादमत्र रुचिर कवीन्द्रवपिङ्गलेन कथित, मन्द्रकवृत्तमेतदवले सुभाषितमहोदधे सुमथितम् ।। ५४६ ।। यथा- दिव्यसुगीतिभि सकृदपि स्तुवन्ति भवये (भुवि ये) भवन्तमभय, भक्तिभरापनमसिरस कृताञ्जलिपुटा निराकृतभवम् । ते परमीश्वरस्य पदवीमवाप्य सुखमाप्नुवति विपुल, मत्यंभुव स्पृशति न पुनमनोहरसुताङ्गनापरिवता ॥ ५४७ ।। इति मदम् २३६ २४०. पप शिपरम् मन्द्रकमेव हि वृत्त यदि दारमयुगविरति भवेत । गिपर तदन माते । कथित रविपिङ्गलेन तदा ॥ ५४८ ॥ १ स सप्रतिमासिनी।
वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड {१४२-५५३ यथा- यथा- कृष्णपदारविन्दयुगल नमन्ति ननु ये जना सुकृतिन , ससृतिसागर सुविपुल तरन्ति मुदितास्त एव कृतिन । दिव्यधुनीतरङ्गललिते तटे घृतकुटा स्मरन्ति परम, धाम निरन्तर मन सि तज्जराकवलित जनुन चरमम् ॥ ५४९ ॥ इति शिषरम् २४० मन्द्रकस्य गणा एव अवापि यतिकृत एव पर भेद । २४१ अथ अच्युतम् सलयुग-निगमनगणमिह* कुरु पक्षि-पाणिसभाजित, तदनु च रचय कमलमुखि । सखि | पुष्पहारविराजितम् । निगमशिशिरकरविरचितयतियोगबद्ध विभावित, कविवरफणिपतिसुभणिमिति' मानसे कलयाच्युतम् ॥ ५५० ।। सघनतिमिरभरभरितविपिनमात्मनैव विभावित, न खलु सहचरि । वितनु विदलितमाश्रयामि सुजीवितम् । कनकनिभवसनमरुणनयनमानयाशु मनोहर, मसृणमणिगणखचिततनुमपि हारयामि तमोहरम् ।। ५५१ ॥ इति मच्युतम् २१ २४२ प्रथ मदालसम् कणं जकार रसयुग्म विधेहि सखि । कर्णं तत कुरु रस, हार नकारमथ कर्ण नरेन्द्र मिह हस्त विधेहि च तत । सूर्याश्वसप्तयति कुर्याद् यथाभिरुचि पश्चाद् वसौ च विरति', नेत्रद्वयन कुरु पादान्तवर्णमिति वृत्त मदालसमिदम् ॥ ५५२ ॥ शम्भो । जय प्रणमदम्भोजनामविधिदम्भोलिपाणितरणे- रम्भोरुगाढपरिरम्भोपभोगदिवि रम्भोपगीतसततम् । स्तम्भोदयप्रणतजम्भोपघाति शिशुदम्भोपकल्पिततनो', रम्भोदरप्रतिमशभोजयामलविदम्भोधि वर्द्धनविधो । ॥ ५५३।। यथा- 1 १ क सुभाषितमिति । २ ख विति । ३. ख जम्भो घ घाति । ४ ख चिदम्भोधि । "टिप्पणी-१ सलयुगनिगमनगणमिह' इह - अच्युतवृत्ते लघुद्वयसहितच तुर्नगणमर्थात् चतुर्दशलघ्वक्षरमत्र 'कुरु' रचयेत्यथ ।
५० ५५४.४७] १. पानिरूपण -प्रकरण [१६७ यथावा- मन्दाकिनीपुलिनमन्दारदामशतवृन्दारकाचितविभो'! नारायणप्रखरनाराचविद्धपुरनाराधिदुष्कृतवता । गङ्गाचलाचलतरङ्गावलीमुकुटरगावनीमतिपटो! गौरीपरिग्रहणगौरीकृतार्द्ध तव गौरीदृशी श्रुतिगता ॥५५८॥ मया वा, अस्मद्वृद्धप्रपितामहकविपण्डितमुस्यश्रीमदरामचन्द्र भट्टकृतनारायणाष्टके- कुन्दातिभासि भरदिन्दावखण्डरुचि वृन्दावनत्रजवधू- वृन्दागमच्छलनमन्दावहासकृतनिन्दार्थवादकयनम् । वन्दाविभ्यदरविन्दामनक्षुभितवृन्दारकेश्वरकृत- च्छन्दानुवृत्तिमिह नन्दात्मज भुवनकन्दाकृति हृदि भजे ।। ५५५ ।। इत्यादि महाकविरवन्धेषु शतशः प्रत्युदाहरणानि । इति मदारसम् २४२. २४३. अयं तवरम् सहचरि ! रविहयपरिमित सुनगणमिह विरचय, तदनु शिपिरकरपरिमित कुमुममिह परिकलय । कविवरमकलभुजगपतिनिगदितमिदमनुसर, नवरससुघटित-नरवरसुपठित-तरुवरमिति ।। ५५६ ॥ पथा- अवनतमुनिगण ! करघृतगिरिवर । सदवनपर !, त्रिभुवननिरुपम । नरवरविलसित ! सक्पटवर दमितदितिजकुल ! कलितसक्लबल ! सततपदय !, सरमसविदलितकरिवर जय जय ! निगमनिलय ! ॥ ५५७ ॥ प्रय प्रायोऽष्टाप्टरसविरतिरित्युपदेश. । इति सरधरम . प्रनापि प्रस्तारगत्या द्वाविशत्यक्षरस्य एकचत्वारिताल्लक्षाणि चतुर्नवति- सहस्राणि चत्तरतर रातयं ४१९४३०४ भेदा , तेषु भेदाप्टक मुहम् । पभेदास्तु पास्त्ररीत्या प्रस्ताय प्रतिभावद्भिरदाहतव्याः । इति दिइ मानमुपदिश्यते। इति द्वाविशत्यक्षरम् । . १. विमान २५ गतिपटो। *रिपो-१. सम्पा: पेषभेदा इष्टध्या पञ्चमपरिशिष्टे।
१६८ ] वृत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड २०५५८-५६२ अथ त्रयोविंशाक्षरम् तत्र पूर्वम्- २४४ दिव्यानन्द कुन्तीपुना यस्मिन् वृत्ते दिक्सख्याता सका शोभन्ते प्रान्ते चैको हार, रौद्रौर्यस्मिन् सवर्ण सोऽय दिव्यानन्दश्छन्दोग्रन्ये सार । विश्राम स्यात पड्भि कर्णयस्मिस्तद्वत् सार्द्ध ' पाण्डो पुत्रर्वा स्यात्तस्यान्ते, वाले । लोलालोले कामक्रीडासक्तै पूर्वोक्त दिव्य वृत्त धेहि स्वान्ते ।।५५८।। यथा- वन्दे देव सर्वाधार विश्वाध्यक्ष लक्ष्मीनाथ त क्षीराब्धौ तिष्ठन्त, यो हस्तीन्द्र भक्त ग्राहग्रस्त मत्वा हित्वाप्त सर्व स्त्रीवर्ग भासन्तम् । आरूढ सौपणे पृष्ठेऽनास्तीर्णेपि प्राप्तश्चक्री वेगादेवोच्च. क्रीडत्, व्यापाद्याम् नक्त' मध्ये वक्त्र सद्यस्त दन्तीन्द्र ससारान्मुक्त कुर्वन् ॥५५६॥ इति दिव्यानन्द २४४ २४५ [१]. प्रथ सुन्दरिका करयुक्तसुपुष्पद्वयललिता ताटङ्कमनोहरहारधरा, द्विजकर्णविराजत्पदयुगला गण्डेन सुमण्डितकुण्डलका । यदि सप्तविभिन्ना शरविरति शर्वैरपि चेद्विहतिविहिता, किल सुन्दरिका सा फणिभणिता नेत्राग्निकला कविराजहिता ॥५६०॥ यथा- सखि । पङ्कजनेन मुरहरण विज्ञ कमनीयकलाललित, वरमौक्तिकहार सुखकरण रम्य रमणीवलये वलितम् । तरुणीजनचित्त वरतरुण भव्य भवभीतिविनाशकर, धनकुञ्चितकेश मुनिशरण नित्य कलयेऽखिलदैत्यहरम् ॥ ५६० ।। इति सुन्दरिका २४५[१] २४५[२] अप पद्मावतिका सुन्दरिकव हि बाले । यदि मुनिरसदशविरामिणी भवति । विज्ञापयन्ति तज्ज्ञाः पद्मावतिकेति नयनदहनकमलाम् ॥ ५६२ ।। सखि । नन्दकुमार तनुजितमार कुण्डलमण्डितगण्डयुग, हतकसनरेश रचितसुवेश कुञ्चितकेशमशेपसुगम् । पथा- १ व शेष । १ ख मक।
प० ५७२ - ५७५ ] १. वृत्तनिरूपण -प्रकरण 1 ७१ - पपा- इयमेवास्माभिः पूर्वखण्डे मल्लिका सवया इत्युक्ता । सा तत एवावधारणीया। २४६. मथ मत्ताकोडम् यस्मिन्नष्टी पूर्व हारास्तदनु च मनुमित लघुमिह रचयेत्', पादप्रान्ते चैक हारं विकचकमलमुखि ! विरचय नियतम् । मत्तात्रोड वृत्तं वाले ! वसुतिषियतिकृतरतिसुखनिवह, कुन्तीपुन वेदैरुक्त निगमनगणमपि विरचय सगणम् ।। ५७२ ।। नव्ये कालिन्दीये कुजे सुरभिसमयमधुमधुरसुखरस, रासोल्लासकीडारङ्गे युवतिसुभगभुजरचितवरवशम्' । सान्द्रानन्द' मेघश्याम मुरलिमधुर रवविमुपितहरिण, वृन्दारण्ये दोव्यत्पुण्ये स्मरत परममिह हरिमनवरतम् ।। ५७३ ॥ इति मत्ताकोडम् २४६. २५० प्रप कनकवलयम् सुतनु ! सुदति ! मुनिमितमिह सुनगणमिति ह विरचय, तदनु विकचकमलमुखि ! सखि ' खलु लघुयुगमुपनय । दहननयनमितलघुमिह पदगतमपि परिकलय, कनकवलयमिति कषयति भुजगपतिरिति तदवय ।। ५७४ ।। पथा- फनक्वलयरचितमुकुट । विघतलकुट ! दिकटवल ।, शमितशफट । कनसुपट ' दलितदितिजसुभटदल । कमलनयन* विजितमदन । युवतिवलयरचितलय !, तरलवसन ! विहितभजन ! परणिधरण ! जय ! विजय !॥ ५७५ ।। इति पनवयसयम् २१० प्रमापि प्रस्तारगत्या प्रयोविंशत्यक्षरस्य व्यतीतिलक्षाणि अष्टाशीतिमहस्राणि अष्टोत्तराणि पशतानि प ८३०८६०८ भेदा भवन्ति, तेषु प्रप्टो भेदा प्रोता., शेपभेदा. प्रस्ताय गणयतिवर्णनामसहितास्गमदाहरणीया इति दिगुपदिश्यते। इति प्रयोनिशातरम्। साधावा. २. पपरपा ४ मसिमपुर। ..त पसरय। ६. पक्तित्रय सारित । '-दिलोर पाटन प्रमोनालि हो-१ मोरिसरएसम्म मपान्तरेगु सम्परा. पञ्चम पामोप्या।
१७२] वृत्तमौक्षिा-द्वितीयखण्ड [00 ५७६ ५८० २५१ रामानन्द अथ चतुविशाक्षरम् तत्र प्रपमम्- प्रादित्य सख्याता यस्मिन् वृत्ते दिव्ये श्रीनागाख्याते शोभन्तेऽन्यन्त वर्णा , पनि कर्णेद्वित्व प्राप्तद्विश्राम स्यात् सत्तत्वरसाख्य रयातास्तद्ववर्णाः । कामक्रीडाकूतस्पीत प्राप्तानन्दे भव्याकारे चन्द्रागव्ये नव्ये कान्ते', वेदनेत्रैर्यस्मिन् पादे हारा सपत्कन्द रामानन्द वृत्त धेहि स्वान्ते ।। ५७६ ।। रासोल्लासे गोपस्त्रीभिवृदारण्ये कालि दीये कुजे कुजे गुञ्जभृङ्गे, दिव्यामोदे पुप्पाकीर्णे धृत्वा वशी मन्द मन्द दिव्यैस्तान सङ्गायन्तम् । कामकीडाकूतस्फीत तासामङ्गेऽनङ्ग साङ्ग कुर्वन्तत काम कान्त, सर्वानन्द तेजोरूप विश्वाध्यक्ष वन्दे देव भासन्त प्रात सायान्तम ||५७७।। इति रामानन्द २५१ २५२ अथ दुर्मिलका विनिधाय कर सपि । पाणितल कुरु रत्नमनोहरयाहुयुग, सगण च तत कुरु पाणितल सखि । रलविराजितपादयुतम् । यदि योगरसैरपि पतिविराजित-तत्त्व विभासितवर्णधरा, भवतीह तदा किल दुर्मिलका सखि । नेत्रविभावसुभासिकला ॥५७८।। . मया- गिरिराजसुताकमनीयमनङ्गविभङ्ग कर नृकपालधर, परिधूतगजाजिनवाससमुद्धतनृत्यकर शशिखण्डवरम् । गरलानलभूपित दीनदयालमदभ्रमदोद्धतनीलगल, प्रणमामि विलोलजटातटगुम्फितशेषकलानिधिभालतलम् ।। ५७६ ।। यथा पा, भूपणे''- कति सन्ति न गोपकुले ललिता स्मरतापहताश्च विहाय च ता, रतिकेलिकलारसलालसमानसमागतमुज्झितमानरसम् । वनमालिनमालि नमस्य नमस्य नमस्य मुदस्य चिरस्य वृथा, भविता परितापवती भवती युवती जनससदि हासकथा ।। ५८०॥ इति दुर्मिलका २५२ "टिप्पणो-१ वाणीभूपणम, द्वि० प्र० पद्य ३१८ प० ५६३ -५६६ ] १. वृत्तनिरूपण - प्रकरण यमुनातटकुञ्ज सतिमिरपुञ्ज कारितरासविलासपरं, मुखनिजितचन्द्रं विगलिततन्द्रं चिन्तय चेतसि चित्तहरम् ॥ ५६३ ॥ इति पद्मावतिका २४५[२]. २४६. अथ अद्वितनया सहचरि ! चेन्नजी भजगणी भजी च भवतस्ततो भलगुरू, शिवविरतिस्तथैव विरतिः प्रभाकरभवा भवेच्च नियता'। प्रतिपदमत्र वह्निनयनाक्षरंगणय पादमिन्दुवदने !, जगति जया प्रकाशितनया जनः किल विभाविताऽदितनया ॥ ५६४ ।। प्रकारान्तरेणापि लक्षणं यथा- सुदति ! विधेहि नं तदनु जं ततोऽपि भगणं ततश्च जगणं, तदनु च देहि भं तदनु ज ततोऽपि भगणं ततो लघुगुरू । कुरु विरति शिवे दिनकरे यति सुरुचिरां विभावितनयां, दहनविलोचनाक्षरपदां विधेहि सुभगे ! मुदाऽद्रितनयाम् ।। ५६५ ।। यथा- नयनमनोरम विकसित पलाशकुसुमं विलोक्य सरसं, विकचसरोरुहां च सरसी विभाव्य सुभृश मनोऽतिविरसम् । गगनतल च चन्द्रकिरण: कर्णरिव' विभावसोस्सुपिहित, सहचरि ! जीवनं न कलये विना सहचरं विधेहि विहितम् ।। ५६६ ।। यथावा- "विलुलितपुप्परेणुकपिशप्रशान्तकलिकापलाशकुसुमम् ।।' इत्यादि भट्टिकाव्ये* इति मदितनया २४६. प्रश्वललितमिदमन्यत्र , तथाहि- १.स. नियमान २.स. सुभग। ३. स. करणेरिया *टिप्पणी- विलुलितपुष्परेणुकपिरा प्रशान्तकलिका-पलाशकुसुमं, समनिपातविचित्रवसुयं सदनिपतद् द्रमोत्कराकुनम् । शकुनिनादनादिक्कुविलोलविपलायमानहरिए, हरिणविलोचनाधिवसति बभञ्ज पवनारमजो रिपुवनम् ॥ भिट्टिकाम्य, स०६, प. १३१] २ वृत्तरत्नाकर-नारायणीटरीवा म. ३,०१०६ ।
१७० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [२०५६७ - ५७१ . पवनविधूतवीचिचपल विलोकयति जीवित तनुभृता, न पुनरहीयमानमनिश जरावनितया वशीकृतमिदम् । सपदि निपीडनव्यतिकर यमादिव नराधिपानरपशु , परवनितामवेक्ष्य कुरुते तथापि हतवुद्धिरश्वललितम् ।। ५६७ ।। इति प्रत्युदाहरणम'। 'अत्रापि गणयतिवर्णविन्यासस्तु पूर्ववदेव, नाममात्रे भेद, फलतो न कश्चिद् विशेष । २४७ मष मालती अत्रैव सप्तभगणानन्तर गुरुद्वयदानेन मालतीवृत्त भवति । लक्षण च यथा- इयमेव सप्तभगणादनन्तर भवति मालतीवृत्तम् । यदि गुरुयुगलोपहिता पिङ्गलनागस्तदाख्याति ।। ५६८ ।। यय- चन्द्रकचारुचमत्कृतिचञ्चलमौलिविलुम्पितचन्द्रकिशोभ, वन्यनवीनविभूपणभूपितनन्दसुत वनिताधरलोभम् । धेनुकदानवदारणदक्ष-दयानिधि दुर्गमवेदरहस्य, नौमि हरि दितिजावलिमालितभूमिभरापनुद' सुयशस्यम् ।। ५६६ ।। इति मालती २४७ इयमेव अस्माभि पूर्वखण्डे मालती सवया इत्युक्ता। [सा तत एवावलोकनीया] किञ्च- २४८ प्रथ मल्लिका सप्तजगणादनन्तरमपि चेल्लघुगुरुनिवेशन भवति । जल्पति पिङ्गलनाग सुकविस्तन्मल्लिकावृत्तम् ॥ ५७० ॥ 0 यथा- धुनोति मनो मम चम्पककाननकल्पितकेलिरय पवन , कथामपि नैव करोमि तथापि वृथा कदन कुरुते मदन । कलानिधिरेष बलादयि मुञ्चति वह्निकलापमलोक हिम', विधेहि तथा मतिमेति यथा सविधेन पणा व्रजभूमहिम' ।। ५७१ ।। इति मल्लिका २४८ १ ख उदाहरणम। २-२ चिह्नगोऽयमयो नास्तिक प्रतो । ४ ख हित । ५ ख व्रजभूहित । ३ ख भरापनुदे।
५० ५६०-५६५ ] १ वृत्तनिरूपण - प्रकरण [ १७५ पया- तत्त्वरात्मा यस्मिन् वृत्ते वर्णे रयाता' छन्दोविद्धि सद्भि ससेव्य सर्वानन्द, सोऽय नागाधीशेनोक्तो वृत्ताध्यक्ष ससाध्य पुम्भिश्चित्ते काम कामानन्द ।५६० । वन्य पीत पुष्पर्माला सड्नथ्नत श्रीमद्वृन्दारण्ये गोपीवृन्दे' खेलन्त, मायूरै पत्रंदिव्य छत्र कुर्वन्त वृक्षाणा शाखा धृत्वा हिन्दोले दोलन्सम् । वशीमोप्ठप्रान्ते कृत्वा सगायन्त तासा तनाम्नान्युक्त्वा गोपीराह्वायन्त, दक्ष पाद वामे कृत्वा सतिष्ठन्त काल्पेवाः मूले वन्दे कृष्ण भासन्तम्।।५६१॥ - इति कामानन्द २५७ यचा २५८ मथ कोचपदा कारय भ म धारय स भ निगमनगणमिह विरचय रुचिर, सञ्चितहारा पञ्चविरामा शरवसुमुनियुतसुरचितविरति । क्रौञ्चपदा स्यात् काञ्चनवणे गतिवशसुविजितमदगजगमने, तत्त्वविभेदैवर्णविरामा बहुविधगतिरपि भवति च गणने ।। ५९२ ।। या तरलाक्षी कुञ्चितकेशी मदकलकरिवरगमनविलसिता, फुल्लसरोजश्रेणिकटाक्षा मधुमदसुमुदितसरममगमना । स्थूलनितम्बा पीनकुचाढ्या बहुविधसुखयुतसुरतसुनिपुणा, सा परिणेया सौख्यकरा स्त्री वहुविधनिधुवनसुखमभिलपता ।। ५६३ ।। यथा वा, हलायुधे" या कपिलाक्षी पिङ्गलकेशी कलिरुचिरनुदिनमनुनयकठिना, दीर्घतराभि स्थूलशिराभि परिवृतवपुरतिशयकुटिलगति । आयतनवा निम्नकपोला लघुतरकुचयुगपरिचितहृदया, सा परिहार्या क्रौञ्चपदा स्त्री ध्रुवमिह निरवधिसुखमभिलपत। ।। ५६४ ॥ इति प्रत्युदाहरणम। इति क्रौञ्चपदा २३८ २५६ अथ मल्ली सगणाष्टकगुरुघटिता शरपक्षकवर्णविलसिता या स्यात। तामिह पिङ्गलनाग कथयति मल्लीमिति स्फुटत ।। ५९५ !! १ स स्यात । २क सङग्रीहमन्त। ३ ख गोपीवन्द ४ ख त तिष्ठत सरकादम्बे। ५ क कृष्णे। *टिप्पणी-१ छद शास्त्र हलायुधीयटीकाया प०७, कारिकाया ३० उदाहरणम् ।
१७६ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ प० ५६६ - ५९६ यथा- यथा- गिरिराजसुताकमनीयमनङ्गविभङ्गकर गलमस्तकमाल, परिघूतगजा जिनवाससमुद्धतनृत्यकर विगृहीतकपालम् । गरलानलभूपित-दीनदयालमदभ्रमदोद्धतदानवकाल, प्रणमामि विलोलजटातटगुम्फितशेषकलानिधिलालितभालम् ॥ ५६६ ॥ इति मल्लो २५६० इयमेव मात्रावृत्ते मल्लीसवया इत्युक्ता। २६० अथ मणिगणम् सुतनु ! सुदति ! वसुमितनगणमिह विधुसुमुखि ! सुविरचय, तदनु विकचकमलसदृशमुखि । सुरभिकुसुममपि कलय । गतिवश विदलितमदकलकरिवरगमन इह सुरमणि, मणिगणमिति फणिपतिरपि कथयति विमलमतिरतिरणि' ।। ५६७ ।। निगमविदित सततमुदित परमपुरुपसुकृतसुललित', सकलमनुजकलुपदहन तरलयुवतिवचनविचलित । विकटगहनदहनकवल पिहितनयन मिलितसखिबल ! कलितविविधविबुधसुखचय जय जय दलितदितिजदल ।। ५६८ ।। इति मणिगणम् २६. अत्रापि प्रस्तारगत्या पञ्चविशत्यक्षरस्य कोटिनय पञ्चनिशल्लक्षाणि चतु पञ्चसहस्राणि द्वात्रिंशदुत्तराणि चतु शतानि च ३३५५४४३२ भेदास्तेषु दिगुपदर्शनार्थ भेदचतुष्टयमुक्त वृत्तान्तराणि च प्रस्तार्य सुधोभिरूह्यानीति शिवम् । इति पञ्चविंशत्यक्षरम् अथ षड्विंशाक्षरम् तत्र प्रथम सर्वगुरुम्- २६१ श्रीगोविन्दानन्द यस्मिन् वृत्ते दिक्सख्याता कर्णा राम. सपन्ना शोभन्तेऽत्यन्त वाम व्याकारा, विश्राम. स्यात् षड्भि कर्णे पश्चादन्ते कुन्तीपुत्रर्मोनस्तेषा लोक ख्याताहाराः । सर्वेषा नागानामीशेनाय प्रोक्त. सर्वान्त्य प्रस्तार: पड्विंशत्याहारस्तार, सोऽय श्रीगोविन्दानन्दरच्छन्दस्सारः सर्वाधार कार्यश्चित्तेपारश्छन्दस्कार. 11५६६ १. क विलमतिरतितरणि । २. ख. सुफलित । ३. पक्ति चतुष्टय नास्तिक प्रतो । टिप्पणी-१ पञ्चविंशत्यक्षरवृत्तस्योपलब्धशेषभेदा पञ्चमपरिशिष्ट लोकनीया ।
९.५८१. ५५१] १. पानिधान -प्राण 1१७३ पपा- २५. पप गिरम् पारयुगं र नूपुरराभिवमा यरं परररनमनोहर- पच गुगं पगमापराजतपुरलग-पगं रामपाहर । पन्डितमण्डनिपाहतमानगम स्थितगरजनमौसिग्मालय, शिमलपरागनियनित फिरीमिर परिभावप । ५८१ ।। मल्लिसते मतिनामि मिमिसिना रहिता भवतो यत यद्यपि, सा पुनरेति गरदनी राय या सगुने धवलागि जगन्यपि । पदादोटिपिपट्टिताण्डलगायानगंतमोरमगपदि, नसयि मोऽपि विधास्यति गादरमन्तरगुत्तरमागरमंसदि ।। ५८२ ॥ सिसिर २५३, २४. प्रपतम्या पारप न त मुगरितरित न पर स रामि ! सुमहतवृत्ते, धेहि भयुग्म नगपाहत माग्य गुन्दरि ! यगमिहान्ते । भूजमनीनयंतिरिह पथिता द्वादशनिश्च सुक बगनायित्ता, सत्यविरामा गुजगविरचिता राजति चेतसि परमिति बन्यो ॥५८३॥ :- मा पुर मान युर मम वचन युजगत भन सहचार ! पृष्ण, पारितराग बलमितपनि त गोपयधूजनयुयतिगतष्पम् । कोकिलरावमधुकरविग्न' स्फोटितवर्णयुगलपरिसिना, दाहमुपेता मलयजसलिलरसम्प्रतिदेहजधारभरभिन्ना ।। ५८४ ॥ पपा पा, पन्दोयतो"द्वादशाारविरति:- पन्द्रमुगी सुन्दरधनजघना कुन्दममानशिसरदानाग्रा, निष्कलयीणा श्रतिमुगवचना प्रस्तफरगतरलनयनान्ता। निसपीनोग्नतपुचय लशा मतगजेन्द्र ललित गतिभावा, निर्भरतीला निधुवनयिधये मुज्जनरेन्द्र ! भवतु तय तन्वी ॥ ५८५॥ इति प्रत्युदाहरणम् । इति तम्की २५४. १. पपुदमल । २. क मधुकरविरतिः । हिएगी-१ छन्दशास्त्र हलायुधोयटीका प०७, कारिकापा २६ उदाहरणम् ।
१७४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० ५८६ - ५८६ यपा- २५५. प्रय माययो तत्त्वाक्षरकृतवृत्तं यदि वसुभिर्नायकपटितम् । तत्सखि ! पिङ्गलभणितं कथितं त्विह माधवीवृत्तम् ।। ५८६ ॥ विलोलविलोचनकोणविलोकितमोहितगोपवधूजनचित्तः, मयूरकलापविकल्पितमौलिरपारकलानिधिबालचरित्रः । करोति मनो मम विह्वलमिन्दुनिभस्मितसुन्दरकुन्दसुदन्तः, सखीमिति कापि जगाद हरेरनुरागवशेन विभावितमन्तः ॥ ५८७ ॥ इति मापयो २५५. इदमेवास्माभिः पूर्वखण्डे माधवी सवया इत्युक्ता । २५६. प्रप तरलनपनम् वसुमितलघुमिह सहचरि ! विकचकमलमुखि ! विरचय, तदनु घटय सखि ! रसदशलघुमपि तरलनयन इह । सकलचरणमिति वसुमितसुनगणमनु कुरु सुरमणि, फणिमणिरिह विभुरनुवदति सुरुचिरमिति परिकलय ॥ ५८८ ।। कुसुमनिकरपरिकलितमपुरवनविहरणसुनिपुण, सरभसविदलितकरिवरनरवरदलितदितिजगण । करघृतगिरिवर विलसितमणिगण मुनिमतमुरहर, फणिपतिविगणितगुणगण जय जय जय सदवनपर ।। ५८६ ॥ इति तरलनयनम् २५६. 'अत्रापि प्रस्तारगत्या चतुर्विशत्यक्षरस्य एकाकोटिः सप्तपष्टिलक्षाणि सप्त- सप्ततिसहस्राणि पोडशोत्तरं शतद्वयं च १६८७७२१६ भेदास्तेषु भेदपटकमुदा- हृतं, शेषभेदाः प्रस्तार्य सुधीभिरुदाहरणीया, इति दिक् । इति चतुर्विशत्यक्षरम्। अथ पञ्चविंशाक्षरम् तत्र प्रथमम्- २५७. कामानन्ः यस्मिन् वृत्ते सावित्राः कौन्तेयाः कान्ताः यत्सादप्रान्ते कान्ते ! चैको मुक्ताहारः, विश्रामः स्यात् पड्भिः कर्गर्भव्याकारः सार्द्धस्तैरेव स्यात् सोऽयं वृत्तानां सारः । यषा- . १. पक्तित्रय नास्तिक. प्रती। *दिपगी-१ चतुर्विश मरवृत्तस्य लभ्यशेगमेदाः पञ्चमपरिशिष्टे पर्यवेक्षणीयाः ।
५० ६००.६०४ ) १ वृत्तनिरूपण -प्रकरण | १७७ wwwww Awarnwww यपा- यया- श्रीगोविन्द सर्वानन्दश्चित्ते ध्येय वित्त मित्र स्वाराज्य स्त्रीवर्ग सर्वो हेय , वृन्दारण्ये गुजद्भुङ्गे पुप्प कोणे श्रीलक्ष्मीनाथ श्रीगोपीकान्त शश्वद्गेय । द्वारे द्वारे व्ययं ससारे रे रे रे भ्राम भ्राम काम किं कुर्यास्त्व क्षाम घेत , मायाजाल सर्व चतत् पश्यच्छ विन्भ्राम्यतानायोनी पूर्व खिन्नोऽसि व भ्रात ॥६०० ॥ इति श्रीगोविन्दान ६ २६१ २६२ प्रय भुगङ्गविज़म्भितम् श्रादौ यस्मिन् वृत्ते काले' मगणयुग-तनननगणा रसौ च लगौ ततो-२ वस्वोशाश्वच्छेदोपेत चपलतरहरिणनयने विधेहि सुखेन वै । पादप्रान्त यस्मिन् वृत्ते रसनरनयनविलसित मनोहरण प्रिये 1, नागाधीशेनोक्त प्रोपत' विवुधहृदयसुखजनक भुजङ्गविजृम्भितम् ।। ६०१ ॥ ध्यानकानालम्बादृष्टिकमल मुखि । लुलितमलक करे स्थितमानन, चिन्तासक्ता शून्या बुद्धिस्त्वरितगतिपतितरशनातनुस्तनुता गता। पाण्डुच्यायक्षाम वा मदजनति रहसि सरसा करोपि न सकथा, को नामाय रम्यो व्याधिस्तव सुमुसि ' कथय किमिद न खल्वसि नातुरा* ।। ६०२॥ पपा घा, हलायुधे*- ये सनद्धानेकानोकै रतुरगकरिपरिवृतै सम तव शनव , युद्धश्रद्धालुब्धात्मान'स्त्वदभिमुखमथ गतभिय पतन्ति धृतायुधा । तेऽद्य त्वा दृष्ट्वा सग्रामे तुडिगनृपकृपणमनस पतन्ति दिगन्तर किं वा सोढु शक्य तेस्तैर्बहुभिरपि सविपविपम भुजङ्गविज़म्भितम् ॥ ६०३ ।। इति प्रत्युदाहरणम् । इति भुजङ्गविम्भितम २६२ २६३ प्रय अपवाह श्रादौ म तदनु च कुरु सहचरि । रसपरिमितमिह नगण गण्य, हस्त सविरचय सखि । विकचकमलमुखि । तदनु च रुचिर कर्णम । विश्राम सुतनु । सुदति ' नवरसरसशरपरिमित इह वोमूयात् नागो जल्पत्ति फणिपतिरतिशयमिति रतिकृतिधृतिरपवाह स्यात ।। ६०४ ।। । १ ख चाले। २ ख तनो। ३ ख पता सारसा। चातुरा। ६ ख लध्वात्मान। *टिप्पणी--१ छद सास्त्रहलायुधटीकाया प्र०७ कारिकाया ३१ उदाहरणम् ।
१७८] वृत्तमौक्तिक -दितीयखण्ड । ६०५-६०८ श्रीकृष्ण भवभयहरमभिमतफलकरणनिपुणतरमाराध्य, लक्ष्मीश दलितदितिजमव जितपरमवनतमुनिवरससाध्यम् । सर्वज्ञ गरुडगमनमहिपतिकृतरुचिरशयनमनघ नव्य, त बन्दे कनकवसनतनुरुचिजितजलदपटलमजित दिव्यम् ॥ ६०५॥ पपा या, हलायुधे-- श्रीकण्ठ त्रिपुरदहनममृतकिरणशकलकलितशिरस रुद्र, भूतेश हतमुनिभयमखिलभुवनमितचरणयुगमीशानम् । सर्वज्ञ वृषभगमनमहिपतिकृतवलयरुचिरकरमाराध्य, त वादे भवभयनुदमभिमतफलवितरणगुरुमुमया युक्तम् ।। ६०६ ॥ इति प्रत्युदाहरणम् । इति अपवाह २६३ २६४ अप मागधी अनव वसुभगणानन्तर गुरुद्वयदानेन मागधीवृत्त भवति । तल्लक्षण यथा-- भगणाष्टकगुरुयुगला रसयुगवर्णा रसाग्निराशिकला। पन्नगपिङ्गललपिता विज्ञ या मागधी सुधिया ॥ ६०७ ॥ यथा- माधव विद्यु दिय गगने तव सतनुते नवकाञ्चनरञ्जितवस्त्र , नीरदवृत्तमिद गगनेऽपि च भावयति प्रसभ तव देहमहास्नम् । इन्द्रशरासनजालमिद तव वक्षसि भावयत' वनमालतिमाला, मानय मे वचन कुरु सम्प्रति सुन्दर चेतसि भावयतामिह बालाम ॥६०८।। इति मागधी २६४ इयमेव च द्वात्रिंशत्कलका मागधी सवया इत्युक्ता पूर्वखण्डे । अत्र तु गुरुद्वयमधिक मिति पत्रिंशत्कले ति, ततो भेद । वर्णप्रस्तारत्वाच्च पडविंशत्य- क्षरनियम । *अतएव च जातिवृत्तसाकर्येण छन्द सन्दर्भवैचित्रीमावहतोति सर्वत्र रहस्य चाकसीति छ द शास्त्रोषु ।* । १ ख सतनुते। * *चिह नगतोऽय पाठ क प्रतो मास्ति । टिप्पणी-१ छद शास्त्रहलायुघटोकायां प्र० ७, कारिकाया ३२ उदाहरणम् ।
प०६०६. १ वृत्तनिरूपण-प्रकरण [१७६ www Hin अथान्त्य सर्वलघु- २६५ प्रप कमलदलम् सहचरि । विकचकमलमुखि ! वसुमितसुनगणमिह विरचय, स्दनु सकलपदविशदसुरभिकुसुमयुगमपि परिकलय । रसयुगपरिमितपदगतलघुमनुकलय कमलदलमिति, तदिह मनसि कुरु सुरुचिरगुणवति ! कथयति फणिपतिरपि ॥ ६०६ ।। यथा- कलुपशमन । गरुडगमन । कनकवसन । कुसुमहसन ! [जय, ललितमुकुट ' दलितशकट' कलितलकुट ! रचितकपट ! जय । कमलनयन I]' जलधिशयन ! घरणिधरण । मरणहरण ' जय, सदयहृदय । पठितसुनय । विदितविनय । रचितसमय । जय ।। ६१०॥ इति कमलदलम् २६५. अनापि प्रस्नारगत्या रसलोचनवर्णस्य कोदिपटक एकसप्ततिलक्षाणि वसुसहस्राणि चतु पष्टय तरामि अष्टौ शतानि च भेदाः ६७१०८८६४ तेषु भेदपञ्चकमभिहित, शेपभेदा प्रस्तार्य गुरूपदेशत स्वेच्छया नामानि आरचय्य सूचनीया इति सर्वमवदातमिति।* इति पपिंशत्यक्षरम् । उक्तग्रन्थमुपसहरति -- लक्ष्यलक्षणसयुक्त मया छन्दोऽत्र कीर्तितम् । प्रत्युदाहरणत्वेन क्वचित् प्राचामुदाहृतम् ॥ ६११ ॥ सुजातिप्रतिभायुक्त सालङ्कार स्फुरद्गुणम् । कुर्वन्तु सुधिय कण्ठे वृत्तमौक्तिकमुत्तमम् ॥ ६१२ ।। सर्वगुर्वादिलघ्वन्तप्रस्तारस्त्वतिदुष्कर । इति विज्ञाय वाद्यन्तभेदकल्पन मोरितम् ॥ ६१३।। पञ्चषष्टयधिक नेत्रशतक समुदीरितम् । स्यक्त्वा लक्षणमित्राणि वर्णवृत्तमिति स्पुटम् ।। ६१४ ॥ यथामति यथाप्रज्ञमवधार्य मनीपिभि । शोधनीय प्रयत्नेन बद्ध सन्तोऽयमन्जलि ॥ ६१५ ॥ १ [-] कोष्ठगोश क प्रतो नास्ति । २ पक्तिचतुष्टय नास्ति के प्रतौ । ३ नास्ति पाठ । ४१ पृत्तानि । गटप्पणी-१ सम्पपभेदा पञ्चमपरिशिष्टे पर्यालीच्या ।
वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१०६१६ - ६१७ अत्र चैकाक्षरादिपड्विंशत्यक्षरावधिप्रस्तारपिण्डसंख्या- रसलोचनसप्ताश्वचन्द्रदृग्वेदवह्निभिः । आत्मना योजितमिगत्या ज्ञेया मनीषिभिः ।। ६१६ ॥ इत्यस्मपितृचरणप्रदीपित 'पिङ्गलप्रदीपभाष्य निर्दिष्टदिशा 'त्रयोदश कोटयो द्विचत्वारिंशल्लक्षाणि सप्तदशसहस्राणि पड्विंशत्युत्तराणि सप्तशतानि च १३४२१७७२६ समस्तप्रस्तारस्य । पड्विंशतिःसप्तशतानि चैव तथा सहस्राण्यपि सप्तपंक्तिः । लक्षाणि दृग्वेदसुसम्मितानि कोट्यस्तथा रामनिशाकरैः स्युः ॥६१७।। इति मदुपदिष्टपूर्वखण्डोक्तपिण्डसंख्या च सिंहावलोकनशालिभिरनुसन्धा- तव्या इति सर्वमनवद्यम् । इति श्रीलक्ष्मीनाथभट्टात्मज-कविशेखरचन्द्रशेखरभट्टविरचिते 'श्रीवृत्तमौक्तिके एकाक्षरादिपपिंशत्यक्षर- प्रस्तारवाद्यन्तभेदसहितवृत्तनिरूपण- प्रकरणं प्रथमम् । १ ख. वृत्तमौक्तिके पिङ्गलवात्तिके एकाक्षरादिपविशत्यक्षरान्तप्रस्तारै । टिप्पणी- लक्ष्मीनाय भट्टकृताया प्राकृतपङ्गलवृत्तौ २११ पद्यस्य टीकायाम् ।
द्वितीयं प्रकीर्णक-प्रकरणम् अथ प्रस्तारोतीर्णानि कतिचिद वृत्तानि वर्णनियमरहितान्यभिधीयन्ते । तत्र प्राचीनानां संग्रहकारिफा-- १-४. अप भुजङ्गविम्भिसस्य चरवारो भेदाः वेदैः पिपीडिका स्यानवभिः करभश्चतुर्दशभिः । पणवमिदं तु शरश्चेन्माला इह मध्यगर्लघुभिरधिक. ॥ १।। इति भुजङ्गविम्भितभेदनिरूपणम् १-४." सण्डस्य “टिप्पणो-१ ग्रन्यकारेण द्वितीयखण्डस्य द्वादराप्रकरणे विज्ञापितमिद यदस्य द्वितीय- द्वितीयप्रकरणे पिपीलिका-पिपीलिकाकरभ - पिपीलियापरणव- पिपीलिकामालाच्छन्दांसि लक्षणोदाहरणसहितानि निरूपितानि' । परमन चतुवंताना लक्षणोदाहरणानि धचिदपि नैव दृश्यन्ते, वेवल त्वत्र प्राचीन- सग्रहकारिकव समुपलभ्यते । वारिकायाः पूर्वापरप्रसङ्गरहितत्वात् लक्षणा- ग्यपि न प्रस्फुटीमवन्ति । मत कलिकालसर्वज्ञ हेमचन्द्राचार्य प्रगीतान्यग्दोन. शासनादेपा चतुर्दृत्ताना लक्षणोदाहरणान्यध. प्रस्तूयन्ते । वृत्तान्येतानि सन्ति पविदास्यक्षरात्मक-भुजङ्गविम्भितस्यय भेदरूपाणि । "मातमीजभ्रा पिपीलिका मणः।११५॥ [च्या०] मदय सगणो नगणचतुष्टय जभरा. । जगरिति अष्टभिः पञ्चदभिश्च यतिः । पथा- निष्प्रत्यूह पुण्यो लक्ष्मीमविरतमभिलपसि यदि रमपितु सुप प यदीच्छसि, स्थातु न्यायोन्मोलयुद्ध लघुभिरपि सह यहमिरिह पुर मा विरोधपद तदा । विस्फूर्जत्यूत्कार पीडाक्यलितरालमगकुलमजगरं भुजङ्गममुग्मद, राहात कृत्वा पश्यता ग्लपितयपुपमनपधिरचितरजा पदन्ति पिपीलिया ॥३८॥ एपंप नीपरत. पञ्च दा-पञ्चदशतयुद्धात्रमेण करमः ॥३५॥ पणयः ॥४०॥ मासा ।।४५||-॥३८६॥ म्या०] एपेव पिपीलिका घतो नगणेग्य. परत पम्पमि, दामि , पञ्चदशामिदच सभिवंता शेषगणेप तव स्थितेषु रमेण परमादयो भवन्ति । सेन पञ्चभियना- पिीसिताररभ । पधा- १८२] वृत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड [५०२ ५, पथ द्वितीयत्रिभङ्गी प्रथमत इह कुरु सहचरि । दश-परममपि च भ कुरु शेपे गुरुयुग्म हस्तसुयुक्त, पुनरपि गुरुमुग-लघुयुग-गुरुयुगमपि कुरु, जल्पति नाग कृतराग पीतविभाग । श्रुतिपदमिह सखि | सममिति विरचय शुभदति' वेदगुक्ता विरतो मात्रा फुरु युक्ता, वसुरसशशिमितकलमिह कलय सकलपद- मङ्गदभगी सुलरङ्गी सज्जनसङ्गी ।। २ ।। १ ख वरतन। *टि-कण्ठस्येय दासी श्यामापरभृतयुवतिरपि मधुपरिचयकलविरुतिनिसर्गकलध्वने , भ्र वल्लीभङ्गे छेकाया हरिण नयनमचतुर- मतिललिततनु करभोर ते सदृश दृश ॥ ३८६ ॥ वशभियंतापिपीलिकापणव । यथा- रुदोऽमन्द कुन्दच्छाय शरदमलघनतुहिनविकच- कुमुदवनहरहसितसित शशाङ्ककरोग्ज्वल , तार पारावारापार स्थलजलगगनतलसकल- भुवनपथधवलनपरिचित प्रसाधितदिङ्मुख । लोकालोकच्छेद गत्वा दृढकठिनविकटदिग- वधितटघटनविषलनचलयितो विशुद्धयशश्चय प्रोत ग श्वेतप्ताकारो ध्वनितगुणपणव तव जयति नृपवर नवललितवसतेजगत्रितधिय ॥३७॥ पञ्चदशभिसा पिपीलिकामाला । यथा- उस्फुल्लाम्भोजाक्ष्यास्तस्या कुसुमशरसुभग तव विरहदव इह हि जयिनि समुपवरणविषये व्यधायि सखीजन , अङ्गे वास कर्पूराम्मस्तिमितशुचितुहिनकिरणकरपरि. भवचतुरघवलिमकुचतटयुगे सुमौक्तिक्दाम च । रम्भागुल्म लीलागार मलयजरसकलितवसुधामभिनव- विकचकुमुदवनदलसमुदयश्च तल्पककल्पना, नव्या मौलो मल्लीमाला तदिदमखिलमपि दवहुतवहरुहि- परिचितमहिम विरचयति मुह प्रदाहमहाज्वरम् ॥ ३८॥' छि दोनुशासनम् द्वि० म०] प. ३-६] २. प्रकीर्णक-प्रकरण [१३ द्वकलघुदशकस्यान्ते भगण-गयुग-सगण-गुरुयुगलम् । लघुयुगलं गुरुयुगलं यदि घटित स्यात् त्रिभङ्गिकावृत्तम् ॥ ३॥ पया स जयति हर इह वलयितविषधर तिलकितसुन्दरचन्द्रः परमानन्दः सुखकन्दः । वृपभगमन डमरुधरण नयनदहन जनितातनुभङ्गः । कृतरङ्गः सज्जनसङ्गः। जयति च हरिरिह करघृतगिरिवर विनिहतकंसनरेशः परमेशः कुञ्चितकेशः। गरु डगमन कलुषशमनचरणशरणजनमानसहंसः सुवतंसः पालितवंशः॥ ४॥ इति द्वितीयनिभङ्गी ५. ६. मप शालूरम् कर्णद्विजवरगणमिह रसपरिमितमतिसुरुचिरमनुकलय करं, शालूरममलमिति विकचकमलमुखि ! सखि ! सहचरि ! परिकलय वरम् । नेवानलकलमिदमतिशयसहृदय विशदहृदय सुखरसजनकम् । नागाधिपकथितमखिलविवुधजनमथितमगणितगुणगणकनकम् ॥ ५॥ यपा- गोपीजनवलयित - मुनिगणसुमहितमुपचितदितिसुतमदहरणं, व्यर्थीकृतजलधर-करघृतगिरिवर-गतमय-निजजनसुखकरणम् । वृन्दावनविहरण - परपदवितरण - विहितविविधरसरभसपरं , पीताम्बरधरमरुणपरणकरमनुसर सखि ! सरसिजनयनवरम् ॥ ६॥ इति शासूरम् ६. इति प्रकीर्णकं वृत्तमुक्त सद्वृत्तमौक्तिके । प्रस्तारगत्या वृत्तानि शेपाप्यूह्यानि पण्डितः ॥ ७॥ इति प्रकीर्ण-प्रकरण द्वितीयम् ।
तृतीयं दण्डक-प्रकरणम् प्रय दण्डवा तन यत्र पावे द्वौ नगणी रगणारच सप्त भवन्ति स दण्डको नाम पड- विशत्यक्षरपादस्य वृत्तस्यानन्तर 'दण्डको नौ र' [१७।३३।।]"* इति सूत्रकार पाठात् सप्तविंशत्यक्षरत्वमेव युक्त दण्डकस्य । प्रथम तावदेकाक्षरथयादिवृत्ताना मेककाक्षरवृद्ध या प्रस्तारप्रवृत्तिरत ऊर्य पुनरेककरेफवृद्धया प्रस्तार । तल्लक्षण यथा- १ प्रय घण्डवृष्टिप्रपात नगणयुगलादनन्तरमपि यदि रगणा भवन्ति सप्तव । दण्डक एप निगदितश्चण्डकवृष्टिप्रपात इति ।। १॥ यथा- इह हि भवति दण्डकारण्यदेशे स्थिति पुण्यभाजा मुनीना मनोहारिणी, त्रिदशविजयिवोर्यदृप्यद्दशग्रीवलक्ष्मीविरामेण रामेण ससेविते । जनकयजनभूमिसम्भूतसोमन्तिनीसीमसीतापदस्पर्शपूताश्रमे, भुवननमितदिव्यपद्माभिधानाम्बिकातीर्थयात्रागतानेकसिद्धाकुले ॥२॥ इति चण्डवृष्टिप्रपात १ २ अथ प्रचितक 'शेप प्रचितक' [७।३६] * इति सूनकारोक्तदिशा [चण्डवृष्टिप्रपातादूवं अधिकैकरेफदानेन प्रस्तारे कृते दण्डक प्रचितक इति सज्ञा लभते । लक्षण, पथा- यथा- यदि ह न-द्रयानन्तरमपि रेफा स्युर्वमुप्रमिता । प्रचितक इति तत्सज्ञा कथिता श्रीनागराजेन ।। ३ ।। प्रथमकथितदण्डक ]' चण्डवृष्टिप्रपाताभिधानो मुने पिङ्गलाचार्यनाम्नो मत प्रचितक इतितत्पर दण्डकानामिय जातिरेकैकरेफाभिवृद्धया यथेष्ट भवेत । स्वरुचिरचितसज्ञया तद्विशेषरशेष पुन काव्यमन्येपि कुर्वन्तु वागीश्वरा, भवति यदि समानसख्याक्षरस्तन पादव्यवस्था ततो दण्डक पूज्यतेऽसौ जन इति प्रचितब ३. ॥४॥ २ 'प्रचित्त इति तत पर' इति हलायुधे । १ [-1 कोष्ठका तगतोऽशो नास्तिक प्रती। *टिप्पणी-१ छद शास्त्र । २ छद शास्त्र हलायुधटीका।
प०५-६] ३. दण्डक प्रकरण [ १८५ ३ प्रय अर्णादयः पितचरणं रिह कथिताः प्रतिचरणविवृद्धिरेफा ये । दण्डकमैदाः पिङ्गलदोपे *प्यर्णादयः स्फुटतः ॥ ५॥ तत एव हि ते वियुधः विज्ञेया रेफवृद्धितः प्राज्ञैः । प्रस्तायं ते विधेया इत्युपदेशः कृतोऽस्माभिः ॥ ६ ॥ अनापि समानसख्याक्षर एव पादो भवतीति ध्येयम् । तत्राों यथा- जय जय जगदीश विष्णो हरे राम दामोदर श्रीनिवासाच्युतानन्त नारायण, त्रिदशगणगुरो मुरारे [मुकुन्दासुरारे]' हृषीकेश पीताम्बर श्रीपते माधव । गरुडगमन कृष्ण वैकुण्ठ गोविन्द विश्वम्भरोपेन्द्र चक्रायुधाघोक्षज श्रीनिधे, बलिदमन नृसिंह शोरे भवाम्भोधिघोराणसि त्व निमज्जन्त मभ्युद्धरोपेत्य माम्७ इत्यवाहरणम्' इत्यादयो रण्डका: ३. ४ मय सर्वतोभदः रसपरिमितलघुकान्ते यदि यगणा स्युमुनिप्रमिताः । दण्डक एप निगदितः पिङ्गलनागेन सर्वतोभद्रः ॥ ८ ॥ पथा- जय जय यदुकुलाम्भोधिचन्द्र प्रभो वासुदेवाच्युतानन्तविष्णो मुरारे, प्रबलदितिजकुलोद्दामदन्तावलस्तोमविद्रावणे केसरीन्द्रामुरारे। प्रणतजनपरितापोगदावानलच्छेदमेघोषनारायण श्रीनिवास, चरणनख(जसुधांमुच्छटोन्मेपनि शेपिताशेषविश्वान्धकारप्रकाश ||811 एतस्येव अन्यत्र प्रचितक इति नामान्तरम् । इति सर्वतोभद्रः ४. १.-रोष्ठगतोंशो मास्ति क. प्रतो । २. पस्तमग्नन्त । ३. रु.इति प्रायदाहरणम् । •टिप्पणी-१. "प्रयादियः-प्रतिपरणवितिरेपाः स्युराएंवम्यालजीमूतनीसागरोद्दामran.
१८६] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१० १०.१५ ५. पथ प्रशोककुसुममञ्जरी रगण-जगण-क्रमेण हि रन्ध्रगणा या लघ्वन्ताः । पिङ्गलनागनिगदिता ज्ञेया साऽशोककुसुममञ्जरिका ।। १० ॥ यथा- राधिके विलोकयाद्य केलिकाननं पिकावलीविरावराजितं मनोरमं च, सुन्दराङ्गि चारुचम्पकस्रगावली-विराजिते विलोलहारमण्डितेऽपरं च ।' मद्वचः शृणुप्व ते हितं च वच्मि हे सखि प्रमोदकारणं मनोविनोदनं च, फुल्लनागकेसरादिपुप्परेणुभूपितं भजाद्य नन्दनन्दनं मनोहरं च ॥ ११ ॥ इति अशोककुसुममञ्जरी ५. ६. प्रथ कुसुमस्तबकः सखि ! यत्र रन्ध्र-सगणाः श्रुतिपदघटिता विराजन्ते । कुसुमस्तवकं दण्डकमाह तदा तं तु पिङ्गलो नागः ॥ १२ ॥ घया- सखि ! नन्दसुतं कमनीयकलाकलितं करुणावरुणालयमीशहरिं, रजनीशमुखं भवभीतिहरं नवनीतकरं भवसागरपारतरिम् । चपलारुचिरांशुकवल्लिधरं कमलावलिमालितमालि तमालरुचि, भवमोचन-पङ्कजलोचनरोवनरोचितभालमहं शरणं कलये ॥ १३ ।। इति कुसमस्तवकः ६. ७. प्रय मत्तमातङ्गः यन स्वेच्छा घटिता भवन्ति विहगा: सरोजाक्षि ! । पिङ्गलभुजगाधिपतिः कथयति तं मत्तमातङ्गम् ॥ १४ ।। बया- यामुने संकते रासखेलागतं गोपिकामण्डलीमध्यगं वेणुवाद्य तरं, मञ्जुगुजावतंस जगन्मोहनं चारुहासश्रिया सञ्चितं कुन्तलरञ्चितम् । दिव्यकेलीकलोल्लाससम्भावितं दासवृन्दापदुन्मूलक कामनापूरक, कल्पवृक्षस्य मूले स्थितं चन्द्रिकोत्तसहाराञ्चित चेतसा कृष्णचन्द्रं भजे ॥१५॥ इति मत्तमातङ्गः७. १.स. द्वितीयचरणं क. प्रतो नास्ति । २. क. मे वच. । ३. ख. विहगा ।
प०१६-१७
३.दण्डक-प्रकरण
[१८८
८. अनङ्गशेखरः
जगण-रगण-क्रमेण च रन्ध्रगणा यत्र लघ्वन्ताः(गुर्वन्ताः) ।
फणिपतिपिङ्गलभणिताः' स शेयोऽनङ्गशेखरः कविभिः ।। १६ ।।
घया-
विलोलचारकुण्डलः स्फुरत्सुगण्डमण्डलः सुलोलमौलिकुन्तल स्मरोल्लसत्,
नवीनमेघमण्डलीवपुविभासिताम्बरप्रभातडित्ममाश्रितः स्मितं दधत् ।
मयूरचारुचन्द्रिकाचयप्रपञ्चचुम्बितोल्लसकिरीटमण्डितः समुच्छ वसन्,
विलासिनीभुजावलीनिरुद्धवाहुमण्डलः करोतु वः कृतार्थतां जनानवन् ।।१७।।
इति अनङ्गोखरः ८.
इति दण्डकाः
एवमन्येपि नकारद्वयानन्तरमनियतस्तकारः दण्डकाः प्रवन्येषु दृश्यन्ते । तेऽस्मा-
भिरपि यतत्वादेवोपेक्षिताः अन्यविस्तरभयाच्चेह न लक्षिता, इत्युपरम्यते ।
इति श्रीयुत्तमौक्तिके[तृतीय] एण्डकप्रकरणम् ।
चतुर्थ अर्द्धसम-प्रकरणम् अथ अर्द्धसमवृत्तानि लक्ष्यन्ते- चतुष्पद भवेत् पद्य द्विधा तच्च प्रकीर्तितम् । जातिवृत्तप्रभेदेन छन्द [शास्त्रविशारद ॥१॥ मात्राकृता भवेज्जातिवृत्त वर्णकृत मतम् । तच्चापि विविध प्रोक्त समाच] ' समक तथा ।। २।। विषम चेति तस्यापि लक्ष्यते लक्षण त्विह । चतुष्पदी समा यस्य तत्सम परिकीर्तितम् ॥ ३ ॥ यस्य स्यात् प्रथम पादस्तृतीयेन समस्तथा । द्वितीयस्तु चतुर्थेन भवत्यर्द्ध सम हि तत् ॥ ४ ॥ यस्य पादचतुष्क स्याद् भिन्न लक्षणभेदत । तदाहुविषम वृत्त छन्द शास्तविशारदा ॥ ५ ॥ सम तत्र मया प्रोक्तमथार्द्धसममुच्यते । यथा श्रीनागराजेन भाषित सूनवृत्तिभि ॥ ६ ॥ तन प्रथम- १. पुष्पिताना यदि रसलपुरेफतो यकारो, विषमपदे परिभाति पन्नगोका' । सम इह चरणे च नो जजो रो, गुरुरपि चेज्जयतीह पुष्पिताना [1७ ।। सहचरि । कथयामि ते रहस्य, न खलु कदाचन तद्गृह व्रजेथा। इह विषमविपमा गिर सखीना, सकपटचाटुतरा पुरस्सरन्ति ।। ८॥ यथा- यथा था- प्रसरति पुरत सरोजमाला, तदनु मदान्धमधुव्रतस्य पक्ति । तदनु धृतशरासनो मनोभू स्तव हरिणाक्षि विलोकन तु पश्चात् ॥९॥ इति वा- दिशि दिशि परिहासगूढगर्भा , पिशुनगिरो गुरुगञ्जन च तादृक् । सहचरि ! हरये निवेदनीय, भवदनुरोधवशादय विपाक । १०॥ - ४ह १ कोष्ठगोंडा क. प्रतो नास्ति। २ स पनगोषतः । ३ स. व्रजेषाम् । मनोहर।
५.११.१८ ४ प्रदंसम-प्रकरण [१८१ इह पलु विषम पुरा वृताना, विलसति जन्तुपु कर्मणा विपाय । क्व जनक्तनया क्य रामजाया, मन च रजनीचरसङ्गमापवाद ॥ ११ ॥ इत्यादि महाकविप्रया धेषु शतश प्रत्युदाहरणानि' । इति पिताप्रा १. २ प्रय उपषित्रम् विपमे यदि मौ सलगा प्रिये । भौ च समे भगगा सरमाश्चेत् । पणिना भणित गणित गण वृत्तमिद पथित ा पचिगम् ॥ १२ ॥ यथा- पया- नवनीतकर करुणापर, कालियगञ्जनमन्जनवर्णम् । भवमोचन पङ्कजलोचन, चि तय चेतसि है सग्नि कृष्णम् ।। १३ ।। इति उपचित्रम २ ३ प्रय वेगवती विषमे यदि साशनिर्गो, भपितय समके गुग्युग्मम् । कविना पणिना भणितव, वेदय चेतसि वेगवतीयम् ॥ १४ ॥ सग्नि । नदमुत कमनीय, यादववराधुरन्धरमौशम् । सनकादिमुनी द्रविचिन्त्य, पुजगत परिशीलय कृष्णम् ।। १५॥ इति धेगवती ४ अपहरिणस्ता विपमे यदि सौ सगणो लगी, ससि ! समे नगणे भमरा कृता । पविना पणिना परिजल्पिता, सुमुगि सा गदिता हरिणप्लुता ॥ १६ ॥ नवनीरदवृत्तमनोहर', मनक्षीतपटद्य विसुन्दर । अलि तिलकीतच दन-स्तव तनोतु मुद मधुसूदन ॥१७॥ इति हरिगप्तता ४ ५ मप परवपत्रम् विषम इह पद त नौ रतो, गुरपि चंद घटित मुमध्यमे । सम इह चरणे ननी जरी, तदारवक्त्रमिद भवेन पिम् ॥१८॥ - पथा- १ त मुशाएरणानि । २० वदमनोहर १६० ] वृत्तमौक्तिक-द्वितीयसर [प०१६-२५ www यथा-- - स्फुटमधुरवचः प्रपञ्चनैः, कलितमिदं हृदयं सदैव ते । अलमलमधुना तवाननं, न खलु कदापि विलोकयाम्यहम् ॥ १६ ॥ यया था, हर्षचरिते [प्रथमोच्छ्वासे]- तरलयसि दृशं किमुत्सृका-मविरतवासविलासलालसे' । अवतर कलहसि वापिका, पुनरपि यास्यसि पङ्कजालयम् ॥ २० ॥ इति प्रत्युदाहरणम् । इति प्रररवत्रम् ५. ६. प्रथ सुन्दरी विपमे यदि सौ लगो लगो, समके स्भौ रलगा भवन्ति चेत् । धनपीनपयोधरे ! तदा, कथिता नागनृपेण सुन्दरी ।। २१ ॥ पया- अयि मानिनि ! मानकारणं, ननु तस्मिन्न विलोकयाम्यहम् । कुरु सम्प्रति मे वचोऽमृत, प्रियगेहं व्रज किं विडम्वनैः ॥२२॥ यथा वा- अथ तस्य विवाहकोतुकं, ललितं विभ्रत एव पार्थिवः । वसुवामपि हस्तगामिनी-मकरोदिन्दुमतीमिवापराम् ॥ २३॥" इति रघुवंशादिमहाकाव्येषु शतशः प्रत्युदाहरणानि । इति सुन्दरी ६. ७. अय भद्रषिराट यस्मिन् विपमे तजौ रगौ चेद्, मः सो जः समके गुरू भवेताम् । तद्वै कथितं कवीन्द्रवर्य-स्तज्ज्ञ भद्रविराडिति प्रसिद्धम् ।। २४ ।। यथा- यद्वेणुविरावमोहितास्ता, गोप्यः स्वं वसनं च न स्मरेयुः । द्वार्येव निवारिता जनोप-यातव्ये कृतनिश्चया बभूवुः ।। २५ ॥ इति भद्रविराट् ७ २. ख..समुदाहरणानि । १. मालुपमानसबासलालिते 'हर्षचरिते' । स्मरन्ति ४. क. द्वाप्पेत्र। * टिप्पणी-१ रघुवंश, स० ८, पद्य १ प० २६.३१] ४ प्रर्द्धसम-प्रकरण [ १९१ ८ मय केतुमती विषमे सजी सखि । सगौ चेद्, भ समके रनी गुरुयुगाभ्याम् । मिलितौ यदैव भवतस्तो, केतुमतीति सा भवति वृत्तम् ।। २६ ॥ यथा- यमुनाविहारकलनाभि , कालियमौलिरलनटनाभि । विदितो जनेन परमेश , केवलभक्तितस्तु भुवनेश ॥ २७ ॥ इति केतुमती ८. ६ अथ वाङ्मती यद्ययुग्मयोः रजौ रजौ कृती च, जरी जरौ च युग्मयोर्गसगतो वा । हारशङ्ख कक्रमरयुग्मतश्च, समानयोविपर्ययेण वाड मतीयम् ॥ २८ ॥ यथा- काञ्चनाभ-वाससोपलक्षितश्च, मयूरचन्द्रिकाधविराजितश्च । नन्दनन्दन पुनातु सन्तत च, मनोविनोदन प्रकामभासुरश्च ॥ २६ ॥ अत्र समयो पादयो पादान्तगुरुत्वमवधेयम् । इति घाइ मती ६. १. प्रय घट्पदावली वाड्मत्येव हि सुकले, विपरीता भवति चेद् वाले । कथयति पिङ्गलनागस्तामेता पट्पदावली रुचिराम् ।। ३० ॥ ऊह्यमुदाहरणम् । इति षट्पदावली १०. इत्यर्द्धसमवृत्तानि कथितान्यत्र कानिचित् । सुधीभिरूह्यान्यान्यानि प्रस्तायं स्वमनीपया ॥ ३१ ॥ इति योवृत्तमौक्तिके [चतुर्य ] पद्धसमप्रकरणम् ।
पञ्चमं विषमवृत्त-प्रकरणम् प्रय विषमवृत्तानि भिन्नचिह्नचतुष्पादमुद्दिष्ट विषम मया । अथेदानी तदेवात्र सोदाहरणमुच्यते ॥ १ ॥ तत्र प्रथमम्- १ उद्गता सजसा लघु प्रथमतस्तु, नसजगुरुकाणि युग्मत । स्युस्तदनु भनभा गयुता, सजसा जगौ चरमतरपदोद्गता ॥ २ ॥ यथा- विललास गोपरमणीपु, तरणितनयातटे हरि । वशमधरदले कलयन्, वनिताजनेन निभृत निरीक्षित ॥ ३ ॥ इति उद्गता १. प्रथोद्गताभेद सजसा लघु प्रथमतस्तु, नसजगुरुकाणि युग्मत । स्युस्तदनु भनलजा गयुता , सजसा जगी च खलु तुर्यतो भवेत् ॥ ४॥ तृतीयचरणे वा स्याद् भेद समुपलभ्यते । ततो भारवि माघादौ उद्गते. यमुदीरिता । यथा- अथ वासवस्य वचनेन, रुचिरवदनस्त्रिलोचनम् । क्लान्तिरहितमभिराधयितु , विधिवत्तपासि विदधे धनञ्जय ।। ५॥" यथा पा, माघे तव धर्मगज इति नाम, सदसि यदपष्ठ पठ्यते । भौमदिनमभिदधत्यथवा, भृशमप्रशस्तमपि मङ्गल जना ॥ ६ ॥ इति उद्गताभेद १. २. प्रथ सौरभम् प्रथम द्वितीयमथ तुर्य-मिह सममुशन्ति पण्डिता । सौरभ यदि तृतीयपदे, विहगो नभी गुरुरपीह दृश्यते ।। ७ ।। टिप्पणी-१ किरातार्जुनीयम्, स. ११. पद्य १। २ शिशुपालवधम्, स० १५, पद्य १७॥
५०-१५ ५ विषमवृत्त -सरण [१३ पचा- यमुनातटे विहरतीह, सरसविपिने मनोहरे । रासकेलिरभसेन सदा, वजसुन्दरीजनमनोहरो हरि ॥ ८॥ इति सौरभम् २ ३ मय ललितम् न-युग च हस्तयुगल च, सुमुखि ' चरणे तृतीयके । भवति सुकविविदित ललित, कथित तदेव भुवने मनोहरम् ॥६॥ पधा- ब्रजसुन्दरीसहचरेण', मुदिनहृदयेन गीयते । सुललितमधुरतर हरिणा, करुणाकरेण सतत मुरारिणा ॥ १० ॥ इति ललितम् ३ ४ प्रथ भाव पट्सख्याता हारा, पादेषु विष्वेवम् । अन्ते कान्त यस्मिन्, भ-त्रय-ग-द्वितय वद भावम् ॥ ११ ॥ यथा- राधामाधायना, चित्ते वाधा त्यक्त्वा । फल्पान्ते य क्रीडेत्, त किल चेतसि भावय नित्यम् ।। १२ ।। इति भाव ४ ५ प्रष घवत्रम् कदाचिदर्द्धसमक, वक्त्र च विपम भवेत् । द्वयोस्तयोरुपान्तेषु, वृत्त तदधुनोच्यते ॥ १३ ॥ सन्न वक्त्रम्- मुग्भ्मा इन मा स्थानां, सगाराद् य स्त्रनुम्दुभि । ख्यात सर्वगणरेतत्, प्रसिद्ध तद्धलायुधे ।। १४ ।। पपा- मुखाम्मोज सदा स्मेर, नेत्र नीलोत्पल फुल्लम् । गोपिकाना मुरारातेश्वेतोभन जहारोच्च ॥ १५ ।। इति यात्रम् ५ १. ख समुदयेन । २ . यत्रयस्सियम । ३ धतुर्याक्षरादन तर यगणो देय इत्ययं ।
१९४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितोपखण्ड [0 प०१६.२५ ६ प्रप पम्यायक्त्रम् पिच- यथा- प्रयदा- युजोश्चतुर्थतो येन (जेन), पथ्यावश्यं प्रकीर्तितम् । [एवमन्येऽपि भेदास्तु, विज्ञ या गणभेदतः ॥ १६ ॥]' रासकेलिसतृष्णस्य, कृष्णस्य मधुवासरे । पासीद् गोपमृगाक्षीणा, पथ्यावक्त्रं मधुश्रुति. ॥ १७ ॥ इति पप्यायनम् ६. एवमन्यान्यपि गणविभेदात् ज्ञ यानि वक्त्रवृत्तानि । पञ्चम लघु सर्वत्र सप्तम द्विचतुर्थयो । गुरुषष्ठ तु पादाना शेषेप्वनियमो मतः ।। १ ।। अत. श्रीकालिदासश्च स्वप्रवन्धे समुज्जगो। तथान्येऽपि कवीन्द्राश्च स्वनिवन्धे बबन्धिरे ।। १६ ॥ वागर्थाविव सम्पृक्ती वागर्थप्रतिपत्तये । जगत. पितरौ वन्दे, पार्वतीपरमेश्वरी ॥ २० ॥" प्रयोगे प्रायिक प्राहु. वे प्येतद् वववलक्षणम् । लोकेऽनुष्टुविति ख्यातिस्तस्याप्टाक्षरता कृता ।। २१॥ तथा नानापुराणेषु नानागणविभेदत.। वृत्तमष्टाक्षर वक्न, विपमाख्या प्रयाति हि ॥ २२ ॥ एव तु विपम वृत्त दिड मात्रमिह कीर्तितम् । शेषमाकरतो ज्ञेय, सुधीभिर्भावनापरैः ॥ २३ ॥ पदचतुरूर्द्ध व वृत्त मात्रासमकमेव च । उपस्थितप्रचुपित-मथान्यदपि वृत्तकम् ॥ २४ ॥ हलायुधे, प्रसिद्धत्वादन [नात्यपी योगिन । तदग्रन्थगौरवभीत्या च मयका न प्रपञ्चितम् ॥ २५ ॥ इति श्रीवत्तमौक्तिके वातिके द्वितीये वृत्तपरिच्छेदे विषमवृत्त प्रकरण पञ्चमम् । [-] कोष्ठवरयंशो नास्ति फ प्रती। *टिप्पणी-१ रघुवश, स. १,५०१ टिप्पणी-२ पदचतुरूद्ध दिवृत्ताना लक्षणानि श्रीहलायुधरचित छन्द सूत्रटीकानुसारेण सक्षेपेणोध्रियन्ते- ५ विषमवृत्त - प्रकरण १६५ पदचरूध्वम्-प्रथमचरणे अष्टौ वर्णा द्वितीयचरणे द्वादशाक्षरवर्णा, तृतीयचरणे पोहस वर्णा , चतुर्थचरणे च विशतिवर्णा भवति। अस्मिन् वृत्तै गुरुलघुनियमो नास्ति। - भापीह [प्रच] लघु ६, गुरु २१ [द्वि च ] लघु १०, गुरु २। तिच] लघु १४, गुरु २ । [च व ] लघु १८, गुरु २ । प्रत्यापीड [प्रच ] गुरु २, लघु ६॥ द्वि च ] गुरु २, लघु १०। (तृ च ] गुरु २, लघु १४ । [च च ] गुरु २, लघु १८ । प्रत्यापीड [प्रच] ग २, ल ४, ग २ । (द्वि च ] ग २ ल , ग २ । [त च ग २ ल १२ ग २। [च च ] ग २, ल १६, ग २। मजरी-- प्रच] १२ वर्णा । [द्वि च] - वर्णा । तिच] १६ वर्णा । [च च ] २० वर्णा । लवली- [प्रच] १६ वर्णा । [द्विच] १२ वर्णा । [तु च । वर्ण । [च च ] २० वर्णा । अमृतधारा - [प्रच) २० वर्णा । [द्वि च ] १६ वर्ण । [तृ च] १२ वर्णा । [च च] ८ वर्णा । उपस्थितप्रचुपितम्- प्रच] म स ज भ ग ग। [द्वि च स न.ज र ग [तृ च ननस [च च ] न न न जय वर्तमानम- [प्रच.] म स ज भ ग ग द्वि च | स न ज र ग [तृ च न न स न न स [च च] न न न जय शुद्धविराटवपम - [प्रच] म स ज भ ग ग [द्वि च.] स न ज र ग [तु च] त जर च च] न न न जय पष्ट वैतालीय-प्रकरणम् यथा-- १. प्रय यंतालीमम् विपमे रससस्यका: कलाः, समकेऽष्टी न कलाः पृथक्कृताः । न समात्र पराधया कला, वैतालीयेन्त्ये र-दण्ड-गाः ॥ १॥ विपमे रसमात्रा. स्युः समे चाप्टौ कलास्तथा। वैतालीयं भवेद् वृत्त' तयोरन्ते रली गुरुः ॥ २॥ तव तन्वि ! कटाक्षवीक्षितः, प्रचरद्भिः थवणान्तगोचरः। विशिखैरिव तीक्ष्णकोटिभिः, प्रहतः प्राणिति दुष्करं नरः ॥३॥ अस्य च भूयासि सप्रपञ्चमुदाहरणप्रत्युदाहरणानि पिङ्गलवृत्तौ सन्ति, तानि तत एवावधेयानि । निषधकाय्ये च द्वितीये सर्गे सन्ति तानि तत एवावधेयानि]' इति तालीयम् १. २. अय प्रौपच्छन्दसकम् तत्रवान्तेऽधिके गुरौ स्या-दौपच्छन्दसक कवीन्द्रहृद्यम् । फणिभाषितमुत्तम रसालं, पठनीयं कविपण्डितैरुदारैः ॥ ४ ॥ परमर्मनिरीक्षणानुरक्त, स्वयमत्यन्तनिगूढचित्तवृत्तिम् । अनवस्थितमर्थलुब्धमाराद्, विपरीतं विजहीहि मित्रमेवम् ॥ ५ ॥ इति प्रौपच्छन्दसकं तालीयम् २. ३. प्रथ प्रापातलिका आपातलिका कथितेयं, भाद् गुरुकावथ पूर्ववदन्यत् ।। ६ ।। पथा- यथा- पिङ्गलकेशी कपिलाक्षी, वाचा या विकटोन्नतदन्ती । आपातलिका पुनरेपा, नूपतिकुलेऽपि न भाग्यमुपैति ॥ ७ ॥ इति प्रापातलिका . ४. मथ नलिनम् विषमपदैः रयानलिनाख्यम् ॥६॥ १. क. वृत्ते । २. कोठगतोमो: नास्ति क. प्रतो।
२०६-१७ ६ बैतालीय-प्रकरण [ १९७ पया- यपा- [च्या०] विपमंरेव चतुभिरापातलिकापदैनालनास्य वैतालीयमित्यर्थः । कुञ्चितकेशी नलिनाक्षी, स्थूलनितम्बा रुचिकान्ता । पद्मसुहस्ता रुचिरोष्ठी, गोष्ठीरसिका परिणेया || ६ || इति नलिनात्य वैतालीयम् ५. अथापर नलिनम् समचरणरपि चान्यदुदीते ॥ १० ॥ [प्या•] समरेव पतुभिरापातलिकापादरपर नलिन भवतीत्यर्थ । पङ्कजलोचनमम्बुददेह, बालविनोद-मुनन्दितगेहम् । पद्मजशम्भुकृतस्तुतिमीश, चिन्तय कृष्णमपारमनीपम् ॥ ११ ॥ इति अपर नलिनास्प वैतालीयम् ५ ६ प्रय दक्षिणान्तिका देतालीयम् द्वितीयलस्यान्त्ययोगत , पदेषु सा स्याद् दक्षिणान्तिका ।। १२ ।। [ध्या०] द्वितीपतघोरन्स्येन-तृतीयेन योगतश्चतुर्यु पादेषु यत्र सा दक्षिणान्तिका इत्यर्थः। प्रतएष शुद्धतालीयस्य विषमपदे क्षिणा तका, समपदहतरान्तिका इति शम्भुरयाह । ववी मरुदक्षिणान्तिको, वियोगिनीप्राणहारक । प्रकम्पिताशोकचम्पको, वसन्तजोऽनङ्गबोधक ॥ १३ ॥ मया वा, ममप्रत्युदाहरणम्'- नमोऽस्तु ते रुक्मिणीपते, जगत्पते श्रीपते हरे । भवाम्बुधेस्तारयाशु मा, विधेहि सन्मति शुभाम् ॥ १४ ॥ इति दक्षिणान्तिका बैतालीयम् ६ ७ अथ उत्तरान्तिका तालीयम शुद्धवैतालीयस्य समपदरुत्तरान्तिका ।। १५ । सहसा सादितकस भूपति, घृतगोवद्धनीलमुख रम् । यमुनाकुजविहारिण हरि, यदुवीर कलयाम्यहनिशम् ॥ १६ ॥ इति उत्तरातिका वंतालीयम ७ ८ अय प्राच्यवृत्ति तुर्यस्य तु शेपयोगत , प्राध्यवृत्तिरिह युग्मपादयो ॥ १७ ॥ मया- यया- १. स मम(यो)दाहरणम् ।
१६८ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प०१८- २४ । [ध्या०] [चतुर्यलकारस्य शपम-पञ्चमेव योगत प्राच्यवृशिर्नाम घेतानीय युग्मपादयो- समपादयोरिस्पथ ।' यथा- हलायुधे-" विपुलार्थसुवाचकाक्षरा , कस्य नाम न हरन्ति मानसम् । रसभावविशेषपेशला प्राच्यवृत्ति कविकाव्यसम्पद ॥ १८ ॥ पथा घा, सुल्हणे- स्वगुणैरनुरञ्जितप्रज, प्राच्यवृत्तिपरिपालने रत । रणभूमिपु भीमविक्रमो, विन्ध्यवर्मनृपतिर्जयत्यसौ ।। १६ ।। यथा घा, मम' प्रत्युदाहरणम्- कति सन्ति न गोपबालका , कामकेलिकलनासुकोविदा । अयि माधव एव केवल, चेतना ननु' परिक्षिणोति मे ॥ २० ॥ इति प्राच्यत्तिर्नाम वैतालीयम् ८ ६ प्रथ उदीच्यवृत्तिवेतालीयम उदीच्यवृत्तिस्त्वयुग्मयो , भवति तृतीयस्याद्ययोगत ॥ २१ ॥ [व्या०] अयुग्मयो-प्रथमतृतीययो पादयो तृतीयस्य लघोराय न-द्वितीयेन योगादु- दोच्यवृत्तिर्नाम वैतालीयम् । यथा- यया- हलायुधे २ अवाचकमनूजिताक्षर, श्रुतिदुष्ट श्रुतिकप्टमकमम् । प्रसादरहित च नेष्यते, कविभि काव्यमुदीन्यवृत्तिभि ॥ २२ ॥ यथा घा, ममापि उदाहरणम- प्रवञ्चकमनिन्दित पर, परमेश परमार्थपेशलम् । अनाकलितवैभव विभ, जगता वन्धमनारत भजे ।। २३ ।। इति उदीच्यवृत्तिवतालीयम् ६ १० मय प्रवृत्तक वैतालीयम प्रवृत्तक पद्भिरेतयो । २४ ।। [व्या०] उदीच्यवृत्ति-प्राच्यवृत्त्योयुगपरप्रवृत्तयो पदं प्रवृत्तक, युपाये पञ्चमन पूर्व सयज्यते प्रयकपादे सतीयेन पूषमित्यय । १ [-कोष्ठागांशस्य स्थान 'समयोरित्यर्थ इत्यश एवास्तिक प्रतो। १ ख ममबोदाहरणम् । २ ख न तु! *टिप्पणी-१ छद शास्त्र हलायुधटीका प्र. ४ का० ३७ उदाहरणम् . " .
प० २५-३१] ६ चैतालीय -प्रकरण [ १६९ Mwnwww पथा ,हलायुधे"- जयो भरतवशस्य', श्रूयता श्रुतमनोरसायनम् । पवित्रमधिक शुभोदय, व्यासवक्त्रकथित प्रवृत्तकम् ॥ २५ ॥ यमा पा, मस प्रत्युदाहरणम्- हरि भजत रे जना पर, श्रूयता परमधर्ममुत्तमम् । न काल इह कालयत्यसो, सर्वघस्मरघनाघनद्युति २ ॥ २६ ॥ इति प्रवृत्तक वैतालीयम् १० ११ प्रय अपरान्तिका अस्य युग्मरचिताऽपरान्तिका ।। २७ ।। [ध्या ] अस्य-प्रवृत्त कस्य समपदकृता-समपादलक्षणयुक्तंश्चभि पाद रचिताऽपरान्तिका। पथा, हलायुधे" स्थिरविलासनतमौक्तिपेशला', [क्मलकोमला] ङ्गी मृगेक्षणा । हरति कस्य हृदय न कामिन , सुरतकेलिकुशलाऽपरान्तिका ।। २८ ।। यथा पा, सुल्हणे- तुङ्गपीवरधनस्तनालसा, चारुकुण्डलवती मृगेक्षणा । पूर्णचन्द्रवदनाऽपरान्तिका, चित्तमुन्मदयतीयमङ्गना ।। २६ ।। यया चा मम प्रत्युदाहरणम्- चारुकुण्डलयुगेन मण्डितो, बहिबर्हकृतमौलिशेखर । ब्रूत भो पनसपिप्पलादयो, नन्दसूनुरिह नावलोकित ।। ३० ॥ इति अपरान्तिका ११ १२ अथ चारहासिनी अयुकृता चारुहासिनी ।। ३१ ।। [ध्या०] प्रवृतकस्यत्र विषमपादलक्षण युक्तश्चतुभि पादविरचिता चारहासिनी नाम चैतालीयम् । कि तल्लक्षणम् ? चतुर्दशमात्ररव तृतीयेन च द्वितीययोग । १ इद परतभूभृताम्। २ ख यति । ३ कापली 'हलायुधे। ४. कोष्ठगतोऽनो नास्तिक प्रती। 'टिप्पणी-१ छद शास्त्रलायुघटीका म० ४, का ३६ उदाहरणम् । २ ,४१ उदाहरणम्। " " 7 २०० ] वृत्तमौक्तिक -द्वितीयलण्ड [ प० ३२-३४ N +- - यथा, हलायुधः प्राह' मनाप्रसृतदन्तदीधिति , स्मरोल्लसितगण्डमण्डला । कटाक्षललिता च कामिनी, मनो हरति चारुहासिनी ॥ ३२ ॥ पया पा, वृत्तरलाकरटोकाया सुल्हणः प्रोवाच-- न कस्य चेत समन्मय, करोति सा सुन्दराकृति । विचित्रवाक्योक्तिपण्डिता, विलासिनी चारुहासिनी ॥ ३३ ॥ यथा घा, मम प्रत्युदाहरणम्- सुवृत्तमुक्तावलोघर, प्रतप्तचामीकराम्बरम् । मयूरपिच्छविराजित, नमाम्यह नन्दनन्दनम् ॥ ३४ ॥ इति धावहासिनी वैतालीयकम् १२ इति श्रीवृत्तमौक्तिके वेतालीयप्रकरण षष्ठम् । - *टिप्पणी-१ छद शास्त्रहलायुषटोकाया प्र० ४, कारिकाया ४० उदाहरणम् सप्तमं यतिनिरूपण-प्रकरणम् अथाभिधीयते चात्र यतिविच्छेदसजिता। विरामधृतिविश्रामावसानपदरुपिणी ॥ १ ॥ समुद्रेन्द्रियभूतेन्द्ररसपक्षदिगादय । साकाक्षत्वादिमे शब्दा यत्या सम्बन्धमाविता ॥२॥ तस्यास्तु लक्षण सम्यगुच्यते वृत्तमौक्तिके । आलोच्य मूलशास्त्राणि सोदाहरणमञ्जसा ।। ३ ।। यति सर्वत्र पादान्ते श्लोकस्याढे विशेपत । समुद्रादिपदान्ते च व्यक्ताव्यक्तविभक्ति के ॥ ४ ॥ क्वचित्तु पदमध्येऽपि समुद्रादौ तथैव च । अत्र पूर्वापरौ भागौ न स्यातामेकवर्णको ॥५॥ पूर्वान्तवत् स्वर सन्धी क्वचिदेव परादिवत् । द्रष्टव्यो यतिचिन्ताया यणादेश परादिवत् ।। ६ ।) नित्य प्राक्पदसम्बन्धाश्चादय प्रापदान्तवत् । परेण नित्यसम्बन्धा प्रादयश्च परादिवत् । ७ ॥ 'यति सर्वत्रपादात' इत्यादि कारिकाचतुष्टय ययास्थान व्याकरिष्याम ! तर यति सर्वत्र सर्यवृत्तपु इत्यय , पादान्त एव भवति । पथा- [ विशुद्धज्ञानदेहाय, शिवाय गुरवे नम । इत्यादि। तस्यैव प्रत्युदाहरण यया]' नमस्तस्मै महादेवाय शशाङ्कार्द्धमौलये । इति । श्लोकस्याऽर्थी विशेषत' इत्यत्र सन्धिकार्यामाध, स्पष्टविभक्तिकरव च विशपतो पत्र भवति । तद्यथा- नमस्यामि सदोदभूतमिन्घनीभूतमन्मथम् । ईश्वरास्य पर ज्योतिरज्ञानतिमिरापहम् ॥ प्रश्वरमित्यस्प मकारेण सयोगो न कत्तव्य । समासे तस्यैव प्रत्युदाहरण । यथा- सुरासुरशिरोरत्नस्फुरकिरणमञ्जरी- पिजरीकृतपादाब्जद्वन्द्व वन्दामहे शिवम ॥ इति । 'समुद्रादिपदा ते घ ध्यक्ताव्यस्तविभक्तिके ।' तत्र स्वतन्नध्यक्तविभक्तिक ममासान्तभूत भव्यक्तविभक्तिमम् । यथा- १ [] क प्रतो नास्ति कोष्ठगोमा ।
- २०२ ] वृत्तमौक्तिक-दितीयखण www यक्षश्चके जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु । इत्यादि व्यक्ताध्यक्तविभक्तिक इति । यतिः सर्वत्रपादान्ते इस्पनेन तम्यप्यते । यथा- प्रपिघ- वशीकृतजगत्कालं कण्ठेकालं नमाम्यहम् । महाकाल कलाशेष शशिलेखाशिखामणिम् ।। नमस्तुङ्गशिरश्चुम्बिचन्द्रचामरचारवे । त्रैलोक्यनगरारम्भमूलस्तम्भाय शम्भवे ॥ क्वचित्तु पदमध्येऽपि समुद्रादौ यतिर्भवेत् । यदि पूर्वापरो भागो न स्यातामेकवर्णको ॥ ५ ॥ इति । चतुरक्षरा यतिभवति । यथा- पर्याप्त तप्तचामीकरकटकतटे श्लिप्टशीतेतराशी। इत्यादि । यथा पा- उन्मीलन्नीलपङ्केरुहरुचिररुचो देवदेवस्य विष्णोः । इत्यादि । तथा- कूजरकोयष्टिकोलाहलमुखरभुवः प्रान्तकूलान्तदेशाः । । इत्यादि । तथा- वैरिञ्चाना' तथोच्चारितरुचिरऋचा चाननानां चतुर्णाम् । इत्यादि। समुद्रादौ इति किम् ? पादमध्येऽपि यतिः। पदान्ते तु माऽभूत् । तपा- प्रणमत भवबन्धक्लेशनाशाय नारा. यणचरणसरोजद्वन्द्वमानन्दहेतुम् । इत्यादि। पूर्वोत्तरभागयोरकाराक्षरत्वे तु पदमध्ये यतिष्यति । यथा- एतस्या गण्डमण्डल-ममलं गाहते चन्द्र कक्षाम् । इत्यादि। पथा- एतस्या राजति मुखमिद पूर्णचन्द्रप्रकाशम् । इत्यादि । तथा- सुरासुरशिरोनिघृष्टचरणारविन्दः शिवः । इत्यादि १.क.चराचिना। २. ख. गाहतेन्द्रकक्षाम् । .
७. यतिनिरूपण-प्रकरण [ २०३ पूर्धान्तवत् स्वरः सन्धो पचिदेव परादिवत् । अस्थायमर्थ:-योऽय पूर्वपरयोरेकादेशः स्वरः सन्धी विधीयते । स पचित् पूर्वस्यान्तवद् भवति, पवचित् परस्यादिवद् भवति । तथा च पाणिनि. स्मरति-'अन्तादिषच्च' [पा०सू० ६।१।८५] इति । तत्र पूर्वा-तबद्भावे यथा स्यात् । यथा- स्यादस्थानोपगतयमुनासङ्गमे चाभिरामा' । इत्यादि । तथा- जम्भारातीभकुम्भोद्भवमिव दधत. सान्द्रसिन्दूररेणुम् । इत्यादि । तथा- दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्माप्रमूर्तये । स्वानुभूत्येकमानाय नम. शान्ताय तेजसे ।। इत्यादि। परादिवद्भावे यया- स्कन्ध विन्ध्याद्रिमूर्द्धा निकपति [महिपस्याहितोऽसूनहापीत् । इत्यादि । तपा- शूल शूल तु गाढ प्रहर हर हुपीकेश] केशोऽपि वक्त्र- श्चक्रेणाऽकारि कि ते । इत्यादि । प्रत्र हि स्वरूपस्य परादिषद्भावे व्यजनमपि तदमयतत्वात् तदादिवद् भवति । 'यदि पूर्यापरी भागो न स्यातामेकघर्णको' इत्यन्तादिबद्भावे विधावपि सम्बध्यते । तेन- अस्या वयाब्जमवजितपूर्णेन्दुशोभ विभाति । इत्येषिधा यति[नभवति । यथा वा स्वरः सन्धौ- राकाचन्द्रादधिकमवलावनचन्द्र विभाति । तथा शेषेऽपि, यथा- रामातरुणिमोद्दामानगरङ्गप्रसङ्गिनी। इत्यादि उन्नेयम् । 'यणादेश पादिधत्' भवतीति शेष । यथा- विततजलतुपारास्वादुशुभाशुपूर्णा- स्वविरलपदमाला श्यामलामुल्लिखन्तः । इत्यादि। 'नित्यं प्रापपदसम्बन्धाश्चादयः प्राक्पदान्तयत् ।' तेभ्य पूर्ण पतिनं कर्तव्या इत्ययं । १ ख.नाभिरामा। २. कोष्ठगोंश ख. प्रतो नास्ति । ३ ख. त्यावस्यवद् ।
२०४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ पृ०८.११ यथा स्वादु स्वच्छ सलिलमपि च प्रीतये कस्य न स्यात् । इत्यादि। नित्य प्राश्पदसम्बन्धा इति किम् ? अन्येषां पूर्वपदान्तवझायो माऽभूत् । तद्यथा- मन्दायन्ते न खलु सुहृदामभ्युपेतार्थकृत्या । इत्यादि। 'परेण नित्यसम्बन्ध प्रादयश्च परादिवत् ।' तेभ्यः परा यतिनं भवतीत्यर्थ । तद्यथा- दुख मे प्रक्षिपति हृदये दुस्सहस्तद्वियोग । इत्यादि। "परेण नित्यसम्बन्धा' इत्यादि किम् ? कर्मप्रवचनीयसशकेभ्य प्रादिभ्य परापि यतियंपा स्यादिति । तच्च यया- प्रिय प्रति स्फुरत्पादे मन्दायन्ते न खल्विति । श्रेयासि वहुविघ्नानि भवन्ति महतामपि । इत्यादि। प्रपतु चादीनां प्रादीनां चकाराणामनेकाक्षराण पा पादांते यतावाविवद्भाव इष्यते, न त अनेकाक्षराणा पारमध्ये यतो । तत्र हि पदमध्यपि च घामौकरादिष्विष यतेरभ्यनुज्ञा- तत्वात् । तत्र चादीनां यथा- प्रत्यादेशादपि च मधुनो विस्मृतभ्रूविलासम् । इत्यादि। प्रादीनामपि, यथा- दूरारूढ प्रमोद हसितमिव तथा दृष्टमारात् सखीभि । इत्यादि। एव माधुर्यसपत्तिनिमित्त यतिवन्धनम्' । न विना यतिसौन्दर्य काव्य भव्यतर भवेत् ॥ ८॥ भरतादिमुनीन्द्ररप्येवमेवाभिधीयते । तथाऽन्येपि कवीन्द्रास्तु यति बध्नन्त्यनुत्तमाम् ॥ ६॥ अन्यैरप्युक्तम- एव यथा यथोद्वेग सुधिया नोपजायते । तथा तथा मधुरतानिमित्त यतिरिप्यते ।। १० ॥ इति। किञ्च- पिङ्गले जयदेवश्च सस्कृते यतिमिच्छत. । श्वेतमाण्डव्य मुख्यस्तु मुनिभिर्नानुमन्यते ॥ ११ ॥ १ ख यतिसम्बन्धनम् । २ ख श्वेतर्माण्डष्य १० १२.१५ ७ यतिनिरूपण-प्रकरण । २०५ तेम सस्कृते पतिरक्षा गुण । यतिमङ्गेन दोपोऽपीति तेषामाप । अतएव मुरारिः"- याच्चादत्यपराचि यस्य कलहायन्ते मियस्त्व वृणु, त्व वृण्वित्यभितो मुखानि स दशग्रीव. कथ वण्यताम् ।। इत्यादि। जयदेवोऽपि - भाव शृङ्गारसारस्वतमयजयदेवस्य विष्वग् वचासि । इति । एवमन्येऽपि- कोष्ठीकृत्य जगद्धन कति वराटीभिमुंद यास्यति । इत्यादि, महाकवीनां स्वरसादिति दिक् । अपि च- 'यतिभङ्गो नामधातुभागभेदे भवेद् यथा । पुनातु नरकारिश्चक्रमूपितकराम्बुज ।। १२ ।। दिविषद्वन्दवन्द्य वन्दे गोविन्दपदद्व यम् । स्वरसन्धौ तु न श्रीशोऽस्तु भूत्यै भवतो यथा ॥ १३ ॥ न स्याद्विभक्तिभेदे भात्येप राजेति कुत्रचित् । क्वचित्तु स्याद् यथा देवाय नमश्चन्द्रमौलये ॥ १४ ॥ चादयो न प्रयोक्तव्या विच्छेदात् परतो यथा । नम कृष्णाय देवाय च दानवविनाशिने ॥ १५ ॥ *टिप्पणी-१ 'सतुष्टे तिसृणा पुरामपि रिपो कण्डूलदोमण्डली- श्रीडाकृत्तपुन प्ररूढशिरसो वीरस्य लिप्सोवरम् । यात्रादित्यपराञ्चि यस्य कलहायन्ते मियस्त्व वृणु, खा वृण्वित्यभितो मुखानि स दशग्रीव कथ वर्ण्यताम् ।। [मुरारिकृत मनधराघवम् अक-३, ५० ४१] २ 'साध्वी माध्वीकचिन्ता न भवति भवत शर्करे कर्कशाखि, द्राक्षे द्रक्ष्यन्ति के स्वाममृतमृतमसि क्षीरनीर रसस्ते । माकन्द क्रन्द कान्ताघर घर न तुलां गच्छ यच्छन्ति भाव, यावच्छ ङ्गारसार शुममिव जयदेवस्य वैदग्ध्यवाच । [जयदेवकृत-गीतगोविन्द. स. १२.५० १२] ३ देवेश्वरकृत-कविकल्पलताया राब्दस्तवकच्छ दोऽभ्यासप्रकरणे ।
वृत्तमौक्तिक -दितीयखण्ड [प० १६-१८ एकस्वरोपसर्गेण विच्छेद: श्रुतिसौख्यहृत्' । यथा पिनाकपाणि प्रणमामि स्मरशाशनम् ॥ १६ ॥ इत्यादि, कविकल्पलतायां वाग्भटनन्दनेन देवेश्वरेणाभ्यधायि । छन्दोमञ्जर्या 'तु- यतिजिह्वेष्टविधामस्थान कविभिरुच्यते । सा विच्छेदविरामाये. पदैर्वाच्या निजेच्छया ॥ १७ ॥ इति सामान्यलक्षणमुक्तम् । किञ्च- क्वचिच्छन्दस्यास्ते यतिरभिहिता पूर्वकृतिभिः, पदान्ते सा शोभा ब्रजति पदमध्ये त्यजति च । पुनस्तत्रैवासी स्वरविहितसन्धिः श्रयति तां, यथा कृष्णः पुष्णात्वतुलमहिमा मां करुणया ॥१८॥ इति छन्दोगोविन्दे' गङ्गादासेनाप्युक्तमित्युपरम्यते । इति सर्वमङ्गलम् । इति श्रीवृत्तमौक्तिके धातिके द्वितीयपरिच्छेदे यतिनिरूपण-प्रकरण सप्तमम् । १. क. ख. तौस्यकृत। *टिप्पणी-१. छन्दोमञ्जरी, प्रथमस्तबक, प० १२, १३ । २. गोविन्दे' इत्यस्य स्थाने 'मञ्जयाँ' इति पाठ एव समीचीनोऽस्ति गङ्गादास. कर्तत्त्वात्।
अष्टमं गद्यनिरूपण-प्रकरणम् प्रषगद्यानि वाडमय द्विविध प्रोक्त पद्य गद्यमिति कमात् । तत्र पद्य पुरा प्रोक्त गद्य सम्प्रति गद्यते ॥ १॥ असवर्ण सवणं च गद्य तत्रासवर्णकम् । निविध कथित तच्च कवीन्द्रर्गद्यवेदिभि ।।२॥ चूर्णकोत्कलिकाप्रायवृत्तन्धिप्रभेदत । अकठोराक्षर स्वल्पसमास चूर्णक विदु ॥ ३ ॥ तद्धि वैदर्भरीतिस्थ गद्य हृद्यतर भवेत् । पाविद्ध ललित मुग्धमिति तच्चूर्णक त्रिधा ॥४॥ दीर्घवृत्ति-कठोरार्णमाविद्ध परिकीर्तितम् । स्वल्पवृत्त कठोराणं ललित कीय॑ते वुधं ॥ ५ ॥ मुग्ध मृद्वक्षर प्रोक्तमवृत्त्यत्यल्पवृत्ति वा । भवेदुत्कलिकाप्राय दीर्घवृत्त्युत्कटाक्षरम् ॥ ६॥ वृत्त्यक'देशसम्बद्ध वृत्तगन्धि पुन स्मृतम् । प्रथान मतश्चषामुदाहरणमुच्यते ॥ ७ ॥ तत्र- तत्र प्रथम यथा- १ शुद्धचूणकम् स हि खलु त्रयाणामेव जगता गति परमपुरुप पुरुषोत्तमो दृप्तसमस्तदैत्य- दानवभरेण भङ्ग राङ्गीमिमामवनिमवलोक्य करुणरसामृतपरिपूर्णाहृदयस्तथा भुवो भार अवतारयितु रामकृष्णस्वरूपेण यदुकुलेऽवततार । य प्रसङ्गनापि स्मृतो- ऽभ्यचित प्रणता वा गृहीतनामा पुस ससारसागरपारमवलोकयति । इति शुद्धचूर्णकम् १ १४१] अय प्राविध चूर्णकम् दलदलि'सहकारमञ्जरीविगल-मकरन्दबिन्दुसन्दोहसन्दानितमन्दानिलवीज्य- मानदशदिगाभोगमुरभिसमय समुपाजगाम । इत्यादि । इति भाविद्ध चूर्णकम् १[१] यथा- १ ख वृत्तकदेश। २ ख दरदलित।
२०८] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० यथा- १[२]. अप ललित चूर्णकम् सदाभिराम नाभिजितकाम रामणीयकधाम माधुर्यसौन्दयंशौर्यादिगुणग्रामाभि- राम भक्तजनपरिपूरितकाम सकललोकविश्रामधाम वामदेवाभिनन्द्यपौरुप राम जय जय । इत्यादि। इति ललित चूर्णकम् [२] मुग्धमपि द्विविधम् । प्रवृत्ति-अत्यल्पवृत्ति चेति । तत्र- २[३]. प्रवृत्तिमुग्म पूर्णकम् पथा- यथा- यत्र च नायिकाना नयनः कमलमयमिव, वदनैः परिपूर्णचन्द्रमण्डलमयमिव, हस्तैः मृणालमयमिव, जघनै.' कदलीस्तम्भमयमिव विराजित भवनकुलम् । इत्यादि । इत्यवृत्तिमुग्ध चूर्णकम् १[३]. १[४]. अथ प्रत्यल्पवृत्तिमुग्ध चूर्णवम् कमलमिव चन्द्रविम्वमिव मुखं, मृणालमिव कामपाशमिव भुजयुगल, मोन- वृन्दमिव खञ्जरीटयुगमिव नीलोत्पलमिव एणनयनमिव नयनयुगलं, कोकयुग्म- मिव सिन्दूरसमूहकमिव पुष्पगुच्छमिव कनककलशयुगलमिव वक्षोजयुगलम् । इत्यादि । इत्यल्पवृत्तिमुग्ध चूर्णकमिवम् १[४]. २, प्रयोत्कलिकाप्रायम् सङ्ग्रामसीमकण्डूलदोर्दण्डकुण्डलितकोदण्ड निर्गलितकाण्डप्रचण्डाघातखण्डि- तारातिवृन्दनरपतिसीमन्तिनीनयनारविन्दाविरलविगलदम्युनिकरकीर्णसप्तार्णवान्त- भ्रंमत्कमनीयकोत्ति हस , निजगत्कामिनीकर्णावतसानन्तसामन्तसन्तानशिरो- मुकुटरत्नरागद्विगुणिताघ्रिनखमयूखानवरतक्लघौतदानसम्मानसन्तोषिताशेषयाचक चयविकर्णवाक्पीयूषप्रयाणकालकोलाहलसमुच्छल त्पाथोधिपाथ प्लाविता- शेषभुवनमण्डल , भयङ्करभेरीभावारसम्मसभ्रान्तखण्डलातिचपलचलच्चारुचतुर- चतुरङ्गचमूचकचक्रमणभरभङ्ग रितफणिपतिफणानिकायविश्वविख्यातनिजा- न्ववायप्रखरतरतुरगखुरपुटोद्भूतधूलीधारान्धकाराकुलितचक्राङ्गनासमूहनीति- निरस्तसमस्तप्रत्यूहव्यूहा तिनृपतिविलासिनीताटकापसारणसावधानचतुर्दशविद्या - यथा- ११. चरणः २. ख कोदण्डि। ३. समल्लसत् ।
-- ८. गद्यनिरूपण-प्रकरण [२०६ - निधानदानपयातीतमुरद्रुमकथासमारम्भरम्भादिविपनारीगणोद्गीयमानकमनीय कीतिमरभरणीयजनप्रवृद्ध कृपापारावारवारणेन्द्रसमानसारसादितारातियुवतिषचो वर्णदत्तकर्णकर्णवलिदीयमानोपमानमानवतीमानापमानोदनविशारदशारदेन्दुकुला- वदातकीर्तिप्रोणिताशेपजनहृदयानुम्पसमरसीमव्यापादितारातिवर्गचक्रवत्तिमहा महोग्रप्रतापमार्तण्डसमरविजयी महाराजाधिराज. समाज्ञापयत्यशेषसामन्तगणान् । इत्यादि । यया था- प्रणिपातप्रवणप्रधानाशेपसुरासुरादिवृन्दसौन्दर्यप्रकटकिरीटकोटिनिविष्टस्पष्ट- मणिमयूखच्छटाच्छुरितचरणनखचक्रविम्मोहामवामपादाङ्ग प्ठनखरशिखरखण्डिस- ब्रह्माण्डमाण्डविवरनिस्सरत्क्षरदमृतकरप्रकरभाम्वरसुरवाहिनीप्रवाहपवित्रीकृत विष्टपत्रयकैटभारे क्रूरतरससारापारसागरनानाप्रकारावर्तविवर्तमानविग्रहं मामनु- - गृहाण । इत्यादि। इस्युत्कलिकाप्राय गद्यम २. ३. अथ वृत्तगन्धि गद्यम् । यथा- - समरकण्डूलनिविडभुजदण्डमण्डलीकृतकोदण्डसिञ्जिनीटड्कारोज्जागरितवैरि- नागरजनसस्तुतानेकविस्दावलीविराजमानमानोन्नतमहाराजाधिराज जय जय । इत्यादि। यथा था, मालतोमाघवे* गतोऽहमवलोकिताललितकौतुक ' कामदेवायतनम् । इत्यादि । यया था, कादम्बर्याम्- पातालतालुतलवासिषु दानवेषु । इत्यादि । हरद्रवजितमन्मथो गुह इवाप्रतिहतशवितः । इत्यादि । यथा वा-- जय जय जनार्दन सुकृतिजनमनम्तडागविकस्वरचरणपद्म पद्मनयन पमिनो विनोदराजहसभास्वरयश.पटलपूरितभुवनकुहर हरक्मलासनादिवृन्दारक्वृन्दवन्द- नीयपादारविन्द द्वन्द्वनिमुक्त 'योगीन्द्रहृदयमन्दिराविष्कृतनिरञ्जनज्योति स्वरूप नीरूप विश्वस्प स्वथनाथ जगन्नाथ मामनवधिदुखव्याकुल रक्ष रक्ष । इति वृत्तगन्धिगद्यम् ३ - १. स. जॉनसकौतुकः। २ ख. इन्द्र द्वन्द्वनिमयत । टिप्पणी-१ मालतीमाधवम, प्रथमारे विशतिपद्यानन्तर गद्यभागः।
२१.] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [८.६ ग्रन्थान्तरे तु प्रकारान्तरेण चतुर्विधमेव गद्य तल्लक्षणमुपलक्षितं विचक्षणः । यथा- . वृत्तवन्धोग्मित गद्य मुक्तकं वृत्तगन्धि च । भवेदुत्कलिकाप्राय कुलकं च चतुर्विधम् ॥ ८॥ आद्य समासरहित वृत्तभागयुतं परम् । अन्य दीर्घसमासाढय तुर्य चाल्पसमासकम् ॥ ६ ॥ तत्र मुक्तक, यथा- गुरुवचसि' पृथुरुरसि । इत्यादि । वृत्तान्ध-'समरकण्डूल' इत्यादिनवोदाहृतम् । उत्कलिकाप्राय तु-व्यपगतघनपटलममलजलनिधिसदृशमम्वरतलं विलोक्यते अजन- चूर्णपुजश्यामल शार्वर तमस्त्यायत । इत्यादि । प्राकृते चापि- अणिसविसुमरणि' सिदसरविदलिदसमरपरिगदपवरपरबलहणिदमअगलहल- हलिदसमलजलणिहिसरिससमत्तुसमूहसखुहिअवैरिणभरणारीणिवह जन महारा चक्कवट्टि करुणारा ! इत्यादि । पथावा, कुलकम्, यथा- गुणरत्नसागर जगदेकनागर कामिनीमदनजनचित्त रज्जन करणापरायणनारा- यणचरणस्मरणसमासादितपुरुषार्थचतुष्टयप्रार्थनीयगुणगण शरणागतरक्षणविच- क्षण जय जय । इत्यादि । इति श्रीकविशेखरचन्द्रशेखरविरचिते धीवृत्तमौक्तिके वात्तिके गद्यनिरूपणाष्टम प्रकरणम् ॥८॥ १. स. गुरुवञ्चसि । २. प. सुमरणि ।
नवमं विरुदावली-प्रकरणम् [प्रथमं कलिकाप्रकरणम् ] प्रय विरुदावली अथाऽत्र विरुदावल्याः सोदाहरणमुच्यते । लक्षणं लक्षिताशेप-विशेषपरिकल्पनम् ।। १ ।। गद्य-पद्यमयी राजस्तुतिविरुदमुच्यते । तदावली समाख्याता कविभिविरुदावली ॥२॥ कलिकाभिस्तु कलिता विरुदावलिका मता। सवर्णा कलिका प्रोक्ता विरुदाढ्या मनोहरा ॥३॥ तत्रच द्वादशार्द्धकलाः कार्याः चतुःपष्टिकलावधि । तभेदाश्चात्र कथ्यन्ते लक्ष्यलक्षणसंयुताः ।। ४ ॥ द्विगा रादिश्च मादिश्च नादिर्गलादिरेव च । मिथा मध्या द्विमङ्गी च विभङ्गी कलिका नव ॥५॥ १. द्विगाकलिका चतुभिस्तुरग. निजदिंगा मैत्री हयद्वये । यथा- जय जय वीर! क्षितिपति हीर ! इत्यादि । एष धरणचतुष्टयं बोध्यमत्र । प्रत्यविस्तरमयादस्मिन् प्रकरणे सर्वत्र पाबमान. मुदाहियते । इति दिगाकलिका १. २. अपरादिकलिका वेदैः पञ्चकलेः कार्या मंत्र्यढे रादिका कला ।। ६ ।। यथा- कामिनीकलितसुख यामिनीरमणमुख । इत्यादि इति रादिकलिका २.
२१२ । वृत्तमौलिक - द्वितीयवाद ३. प्रप माविकलिका अष्टभिः पट्कलादिमंत्र्यद्धे विरतिमंता। भूमीभानो प्रभवसि भुवने बहलारम्भः सत्तत्तदा नोन्नता बहुमानोज्वलतरदम्भ. । इत्यादि। इति मादिकलिका ३. ४. प्रय नादिकलिका सानुप्रासस्तु नो नादिः-- यया- दलितशकट कलितलकुट ललितमुकुट रचितकपट। इत्यादि। इति नादिकलिका ४. ५. प्रप गलादिकलिका -गाद्या गलादिरुच्यते ॥ ७ ॥ यया- वीरवर हीररद चीरहर तीरचर। इत्यादि इति गलादिकलिका ५. ६. प्रय मिश्राकलिका तिमतन्दुलवन्मिश्राः- गसयोस्तिलतन्दुलवद्विन्यासो मिश्रा. । यथा- क्षीरनीरविवेकधीर सङ्गरवीर गोपिकाचीरहर हरे जय जय । इति मिश्रालिका ६. ७. अय मध्याकलिका -मध्या कलिकयोयदि ।
५०८.११ है यहदावली-प्रकरण [ २३ मध्ये गद्य कलावापि गद्ययो रसपद्ययो:' ॥८॥ [प्या०] प्रस्यार्य-मध्याकलिका तायत् द्विभेदा, तथा घादायन्ते च कलिका तयोः कलिकयोमध्ये यदि गद्य भवतीत्येको भेदः॥१॥ तण प्रसवर्णयोमंत्रीरहितयोगंधयोमप्ये या कला- कलिका भवतीत्यपरो भेदः । इत्येवं द्विभेदा मध्यालिका भवति । उह्ममुदाहरणम् । इति मध्याकलिका ७. ८. प्रथ द्विभङ्गो कलिका द्वितुर्यो मधुरश्लिष्टी पड्गा लान्ताश्चतुर्गुरुः । अत्र भङ्गात्तयोमैत्री पड्भङ्गा स्यात् द्विभङ्गिका ॥ ६ ॥ पया- रङ्गरक्त सङ्गसक्त चण्डचक्र दण्डशक चन्द्रमुद्र सान्द्रभद्र विष्णो जिष्णो! इति द्विभङ्गीलिका ८. ६, अय विभङ्गी कलिका सत्र- त्रिभिर्भगस्त्रिभङ्गी स्यान्नवधा सा तु कथ्यते । विदग्ध-सुरगो पद्य-हरिणप्लुत-नर्तका ॥ १० ॥ भुजग-त्रिगते साद्धं वरतन्वा द्विपादिका । युग्मार्णभङ्गो व्यावृत्तो तनो भो मित्रितो ततः ॥ ११ ॥ [१] विदग्य-त्रिभङ्गो कलिका विदग्धे- ग्रपा सदीपितशर-मन्दीकृतपर-नन्दीश्वरपद-भावन-पावन । इस्पादि। इति विदग्यविभङ्गी कलिका ६ [१]. [२] अथ सुरगत्रिभङ्गी कलिका -तुरगे तद्वत् तमला. शेषगो गुरु. । १. क. ख. रसवर्णयोः।
२१२ । वृत्तमपिता- द्वितीयप [७- MAN- ३ प्रय मादिशलिका अष्टभि पट्कलैर्मादिमत्र्य विरतिर्मता। भूमीभानो प्रभवसि भुवने बहलारम्भ सत्तत्तदा नोन्नता बहुमानोज्वलतरदम्भ । इत्यादि। इति मादिकलिका ३. ४ मय नादिकलिका सानुप्रासस्तु नो नादि- यया- दलितशकट कलितलकुट ललितमुकुट रचितकपट। इस्पादित इति नादिकलिका ४ ५ प्रप गलादिकलिका -गाद्या गलादिरुच्यते ॥७॥ या- वीरवर हीररद चीरहर तीरचर। इत्यादि इति गलादिकलिका ५. ६ प्रथ मिश्राकलिका तिलतन्दुलवन्मिश्रा.- गमयोस्तिसप्तन्दुलवद्विन्यासो मिश्रा । पया- क्षीरनीरविवेकधीर सङ्गरवीर गोपिकाचीरहर हरे जय जय । इति मिश्राकलिका ६ ७ प्रय मध्याकलिका --मध्या कलिकयोर्यदि ।
५०८.११] ६ घरदावली-प्रकरण [ २१३ मध्ये गद्य कलावापि गद्ययो रसपद्ययोः॥८॥ [ध्या०] प्रत्यार्थ'-मध्याकलिका तायत् दिभेवा, तथा चादायन्ते च लिया तयोः कलिक्योमध्ये यदि गद्य भवतीत्येको भेद 1 ११ तथा प्रसवणं योमंत्रीरहितयोगद्ययोमध्ये या कला- कलिका भवतीत्यपरो भेद 11 इत्येष विभेदा मध्याकलिका भवति । उह्यमुदाहरणम् । इति मध्याकलिका ७ मय द्विभङ्गी कलिका द्वितुर्यो मधुरश्लिष्टौ पड्गा लान्ताश्चतुर्गुरु । अत्र भङ्गात्तयोमैत्री पड्भङ्गा स्यात् द्विभङ्गिका ॥ ६ ॥ यथा- रङ्गरक्त सङ्गसक्त चण्डचक दण्डशक चन्द्रमुद्र सान्द्र भद्र विष्णो जिष्णो। इत्यादि। इति द्विभङ्गी कलिका ८ ६, प्रय त्रिभङ्गी पलिका तत्र- विभिर्भगस्त्रिभङ्गी स्यान्नवधा सा तु पथ्यते । विदग्ध-तुरगौ पद्य हरिणप्लुत नर्तका ॥ १०॥ भुजग-त्रिगते सार्द्ध वरतन्वा द्विपादिका । युग्मार्णभङ्गो न्यावृत्ती तनो भो मित्रिती तत ॥ ११ ॥ सत्र- [१] विदग्ध-निभङ्गी कलिका विदग्धे- यथा- सदीपितशर मन्दीवृतपर-नन्दीश्वरपद भावन-पावन । इत्यादि। इति विदग्धत्रिभङ्गी कलिका ६ [१]. [२] अथ तुरपत्रिभङ्गी कलिका -तुरगे तद्वत् तभला शेषगो गुरु । १ क ख रसवणयो ।
२१४] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० १२-१४ यथा- चण्डीपतिप्रवण-पण्डीकृतप्रबल-खण्डीकृताहितविभो । इत्यादि। इति तुरगनिभनी कलिका ६[२]. ६[३]. अप पद्यप्रिभङ्गी कलिका विभङ्गीभिः पदैः पद्यत्रिभङ्गी- पया-पद्मावती विभडोदण्डकलादयोऽत्र स्पष्टाः पूर्वखण्डे समुदाहृतास्तास्तत एव द्रष्टव्याः ।" इति पनिभङ्गो कलिका [६]३. ६[४]. पथ हरिणप्लुतत्रिभङ्गो कलिका -हरिणप्लुते ॥ १२॥ पष्ठभङ्गा भिरावृत्ता नयभा'मित्रितौ च भो । अतिनत-देवाराधित बहुविधसेवासाधित सुरतरुरेवासि प्रिय-दायक यया- यिक ! इत्यादि। इति हरिणप्लुतनिभगी फलिका [४]. ६[५]. अय नर्तकनिभङ्गो कलिका हरिणो नजलान्तश्चेन्नर्तक:- [ध्या०] हरिणप्लुत एव नयभानन्तरं यदि नगण-जगण-लघ्यन्तो भवेत् तदा नत को भवतीति शेषः । यथा- मनसिजरूपाराधित वहुवलभूपाबाधित बहुतरयूपासञ्जक निजकुलरञ्जक । इत्यादि। इति नत्तकत्रिभङ्गो कलिका ६[५]. ६[६]. अय भुजङ्गत्रिभङ्गो कलिका -भुजगे पुनः।। १३ ॥ त्र्यावृत्ता मभला लान्ता युग्मे तुर्ये च भगिनः । क्वचित्तुर्ये न भङ्गः स्यान् मित्रितो भगणी ततः ॥ १४ ॥ १.क. नयना । १टिप्पणी-३१, ३७, ४२, पृष्ठे द्रष्टव्याः ।
२०१५-] है. विदायली-प्रकरण [ २१५ यथा- दम्भारम्भामितवल जम्भालम्भाधिकबल जम्भासम्भावितरण-मण्डित पण्डित । पचित्तुर्य न भङ्गः, इति समुदाहियते । यया- जम्भारातिप्रतिवल-दम्भावाधानतदल सम्भारासादनचण-दारणकारण। इति भुजगविभगी कलिका [६]. [७]. अय निगता विमङ्गी कलिका तृतीये कृतभङ्गा निमंनना भौ च वल्गिता। त्र्यावृत्तास्तनमा भोऽन्ते ललिताविगता द्वये ॥ १५ ।। [10] अस्याय:-विगता त्रिभनी कलिका तावद् द्विविधा, या मनमा:-मगण नगण- नगणास्त्रयो गणास्त्रिरित्रयं भवन्ति, मन्ते भो-भगणद्वयं, तृतीयेच धनु भङ्गः सा धलिगता- भिधाना शिगता निभङ्गी कलिका । यस्यां घश्यावृत्तास्तनभा:-तगण-नगण-भगणास्त्रयो गणा भवति, एतस्यान्ते भो-भगण एक एव भवति । परन्तु द्वये-द्वितीय वर्णे भङ्ग. सा ललिता- भिधाना गिता निभङ्गी कलिका इति वैविध्यम् । प्रमेण यथा- [७-१]. अप पल्गिता गिता विमङ्गी कलिका वाणाली-हरिपुगण तालोली-तत-शरवण मालालो-वृततनुवर-दायक नायक इत्यादि । इति वालगताभिधाना त्रिगता विभगी कलिका [ [७-२]. प्रय ललिताभिधाना निगता निभङ्गी कलिका नाकाधिपसमनायक पाकाधिकसुखदायक राकाधिपमुखसायक सुन्दर ! इति ललिताभिधाना त्रिगता त्रिभङ्गो कलिका एघ त्रिगता त्रिभनी कलिका द्विविधोदाहृता[७] * ] ६. अथ बरतनत्रिभनी कलिका पठभगा वरतनुस्श्यावृत्ता नयना लघुः । 1 भौ च- पथा- अविकलताराधिपमुख अधिगतनारायणसुख बहुविधपारायणपर पण्डित मण्डित ! [-] कोष्ठगतोश क. प्रतो नास्ति ।
२१६ ] वृत्तमौक्तिक -दितीयलष्ट [०१६ -१६ W इत्यादि । किञ्च- -भङ्गान्तसंयुक्ता छविरेपेव कथ्यते ।। १६ ।। यथा- चतुरिमचञ्चद्गुणगण विवलदुदञ्चद्रणचण मधुरिमचन्द्रस्तवकित कुङ्कुमभूपित । इत्यादि। इति द्विविधा बरतनुनिभङ्गी कलिका [८]. [६]. मय द्विपादिका यामभङ्गा कलिका द्विपादिका च कलिका पविधा परिकीर्तिता । द्वयावृत्ता सा तु विज्ञया छन्दःशास्त्रविशारदः ॥ १७ ॥ मुग्धा प्रगल्भा मध्या च शिथिला मधुरा तथा । तरुणी चेत्यमो भेदा द्विपदाया उदीरिताः ।।१८।। ६[[-]. मुग्धा द्विपादिका द्विभङ्गो कलिका मतला मतलाश्चय युग्मभङ्गा भयुग्मकम् । मुग्धा स्यात्- यथा- दण्डादेशाकम्पित चण्डाघोशालम्बित वन्दन नन्दन ! इत्यादि। इति मुग्धा द्विपादिका द्विभङ्गो कलिका [६-१]. [E-२]. अथ प्रगल्भा द्विपादिका द्विभङ्गो फलिका -भद्वये कणों चेत् प्रगल्भा तदा मता ॥ १६ ॥ [ध्या०] भदपे-भगणद्वयस्थाने मावेशरूपेण चेत् कणो' भवतस्तदा मुग्यौव प्रगल्भा मता इत्यर्थः। यथा- देवाधीशाराधक सेवादेशासाधक भूमीभानो इत्यादि इति प्रगल्भा-द्विपादिका-द्विभङ्गी कलिका [६.२].
प०२०- ६. विरुदावली -प्रकरण [२१७ ६[E-३]. अय मध्या द्विपादिका द्विभङ्गी कलिका उक्ता मभी समो मध्या भी नली वा भनौ जलो। ननसा लद्वय वापि शेपे वा नजना लघू ॥ २० ॥ [व्यो०] प्रस्यायं-मध्यायातायत् चत्वारो भेदा लक्ष्यन्ते । पया-मभी-मगण-भगणी, पर च समो-गण-मगणी, ततो भौ-भगणद्वयं यत्र भवति, एतादृशो मध्या उस्ता-कपिता इत्यर्य । इति प्रथमो भेदः । यया- नित्यं नृत्यं कलयति काली केलीमञ्चति चञ्चति । इत्यादि। इति मध्यायाः प्रथमो भेटः ।। प्रय मध्याया द्वितीयो भेदः [प्या०] 'नलौ या भनौ जलौ' इति । यत्र नली-नगगलघू, पप घ भनौ-भागनगणी, ततश्च जलो-जगणलघू भवत । इति द्वितीयो भेद । यपा- रणभुवि अञ्चति रणभुवि चञ्चति । इत्यादि। इति मन्याया द्वितीयो भेव । - अप मध्याया तृतीयो भेद [च्या 'ननसा लय वापि' इति । ननसा -नगण-नगण सगगा, अप घ लघुश्य भवति पन्न म तृतीयो भेद । यथा- अतिशयमधिरणमञ्चति । इत्यादि। इति मध्यापा- तृतीयो भेद ।। प्रय मघ्यायाश्चतुर्थो भेदः [ध्या०] 'शेपे था नजना लपू' इति । शेये-चतुर्थे भेदे नजना:-नगण-नगणनगणाः, अथ च लघु-लघुद्वय पत्र भवति स धनुयों भेद । यथा- अतिशयमञ्चति रणभुवि । इत्यादि। इति मघ्यायाश्चतुर्थो भेदः ।।
२१८ ] वृत्तमौक्तिक-हितोयखण्ड [प० २१-२२ एव मध्याया असकीर्णाश्चत्वारो भेदाः सलक्षणाः समुदाहृत्य प्रदर्शिता. । इति मध्या द्विपादिका द्विभङ्गी कलिका [९-३]. ९-४]. अथ शिथिला द्विपादिका दिमङ्गी कलिका मुग्धाया भद्वये विप्रो यदि सा शिथिला मता। [च्या०] मुग्याया-प्रथमोक्ताया भये-भागणद्वयस्थाने प्रादेशन्यायेन यदि विप्र- चतुलध्यात्मको गणो भवति तदा सा शिथिला,मता भवतीत्ययं । पथा- केलीरङ्गारञ्जित-नारीसङ्गासञ्जित मनसिज । इत्यादि। इति शिथिला द्विपादिका द्विभङ्गो फलिका [[-४]. [९-५] मथ मधुरा द्विपाविका द्विभङ्गी कलिका द्वयावृत्ता मभला लान्ता भद्वयं मधुरा मता ॥ २१ ॥ ब्या०] प्रत्रत्य द्वधावृत्तत्व पूर्वत्र सर्वत्र सबद्धम् । तथा च मभला.-मगण-भगणलपवश्चेत् देघावृत्ता सन्तो लान्ता-लघ्वन्ता भवन्ति । अथ च भद्धप-भगणद्वयं भवति तदा मधुरा मता- सम्मता भवतीत्यर्थः । यथा- तारादाराधिकमुस-पारावाराशयसुख-दायक नायक । इत्यादि। इति मधुरा द्विपादिका द्विभङ्गो कलिका [E-५]. [[-६] प्रय तरुणी द्विपादिका द्विभनी कलिका मधुरा भद्वये कर्णी तरुणी समनन्तरम् । [च्या०] उक्ताया-मधुराया मगरणभगणलान्ताया. भद्वये-भगरणद्वयस्थाने पूर्वोक्तन्यायेन यदि को भवतस्तदा तरणी भवति । ताराहारानतमुख पारादारागतसुख-पाता-दाता । इत्यादि। इति तरुणी द्विपादिका द्विभङ्गी कलिका [E-६]. इति द्विपादिका कलिका युग्मभगिनो भेदा प्रोक्ता इति शेषः । इति विरुधावल्यामवान्तर-द्विभङ्गी-निभङ्गीकलिकाप्रकरण प्रथमम् ।
[ विरुदावल्या द्वितीय चण्डवृत्त प्रकरणम् ] प्रथाभिधीयते चण्डवृत्त विरुदमुत्तमम । शुद्धादिभेदसहित कलिका-कल्पनान्वितम् ॥ १ ॥ [प्या०] प्रादिपदेन सकोर्णा गभितमिथिता गा ते ताश्च यथास्थानमुदाहरिष्याम । पष महाफलिकारुप चण्डवृत्तम, तच्च द्विविध-सलक्षण साधारणभेदेन । उक्तलक्षणसम्पूर्ण सलक्षणमुदीरितम् । अन्यत् साधारण प्रोक्त चण्डवृत्त द्विधा बुध ॥२॥ मथ परिभाषा मधुर श्लिष्ट-सश्लिष्ट शिथिल ह्रादिभेदत । सयोगा पञ्चहस्वाच्च दीर्घाच्च दशधा मता ॥ ३ ॥ अनुस्वारविसौ तु न दीर्घव्यवधायको । स्वस्ववर्गान्त्यसयुक्ता मधुरा इतरे पुन ॥ ४ ॥ शिलप्टा सरेफशिरस सश्लिष्टास्त्वन्ययोगिन । यमात्रयुक्ता इत्युक्ता शिथिला हादिनस्त्वमी ॥ ५ ॥ हशेखरा साम्यमत्र नणयो खपयोस्तथा। जययोर्वध्वयोरह ' सच्चयो' सशयोरपि ॥ ६ ॥ ह्यप्ययो वध्वयोश्चैव क्षच्छयोरित्सवर्णयो । शपयो सच्छयोश्चैव क्षख्ययोरपि वणयो ।॥७॥ श्लिष्टसश्लिष्टयोरुक्ती समाह्या मधुरेतरा । इत्येपा परिभापाऽत्र राजते वृत्तमौक्तिके ।। ८ ।। इति परिभाषा प्रय पण्डवृत्तस्य महाकलिकास्पस्य श्यापकस्य व्याप्यध्यापकभावेन पुरुषोत्तमादि-कुसु- मा त चतुतिशति ३४ प्रभेदा भवन्ति । तेषा चोद्दशक्रमोऽनुक्रमणिकाप्रकरणे स्फुटनर वाय- माणत्याप्नेह प्रपञ्च्यते। १ ख बययो वषयोरह। २ ख सच्चयो। ३ क त्यायो।
२२० । वृत्तमौक्तिक- द्वित्तीयखण्ड [E-१. तत्र प्रयमम्- १ पुरुषोत्तमश्चण्डवृत्तम् एवं सर्वत्र- श्लिष्टी तुर्याष्टमी दीघौ त्रि-पष्ठी सगणौ च भ । पुरुषोत्तमचण्ड स्यात्- [पा०] अस्यार्थ-यत्र चतुर्याप्टमो वो लिप्टो-सरेफशिरस्को च, तृतीय षष्ठी घ दीपो भवत । तत्र गणनियममाह-'सगरो' इति । सगणो भवत । ततश्च भ-भगरगो भवति तत् पुरुषोत्तमाय महाकलिकारूप चण्डवृत्त भवति । नवाक्षरमिद वृत्तम् । अस्मिन् प्रकरणे सर्वत्र विरामद्वयमेव भवतीत्युपदिश्यते । यथा- दितिजाईन जातप्रभ । इत्यादि। इति पुरुषोत्तमश्चण्डवृत्तम् १ २ भय तिलक चण्डवृत्तम् -सादौ नौ शेषगौ च नौ ॥ ९ ॥ मधुरो दशमो वर्णस्तिलकम्--- [ व्या०) प्रयमर्थ - यत्र सादौ-सगणस्यादिभूतो नौ-नगणौ यत्र च सगणस्य शेषगौ- शेपे च धत्तमानौ नगए।येव भवत । मध्यभूतस्प सगणस्यायन्तयोनगी भवत इति फलितोऽर्थ । किञ्च-दशमो वर्णो मधुर -स्ववर्गान्त्यसयुक्त परसवर्णो भवति । तत्तिलक नाम चण्डवृत्तस्यावान्तरो भेद इति । पञ्चदशाक्षरमिद पदम् । था- विपमविशिखगणगजितपरबल । इत्यादि । यया बा- अमलकमलरुचिखण्डनपटुपद नटनपटिमहृतकुण्डलिपतिमद नवकुवलयकुलसुन्दररुचिभर घनतडिदुपमितवन्धुरपटघर तरणिदुहितृतटमञ्जुलनटवर नयननटन जितखञ्जनपरिकर भुजतटगतहरिचन्दनपरिमल पशुपयुवतिगणनन्दन वरकल नवमदमधुरदृगञ्चलविलसित मुखपरिमलभरसञ्चलदलिवृत ५०१०-११ ] E विषदावली -प्रकरण [ २२१ w शरदुषमितशशिमण्डलवरमुख कनकमकरमयकुण्डलकृतसुख युवतिहृदयशुकपञ्जरनिम(ज)भुज परिहितविचकिलमन्जर(जुल)शिरसिज सुतनुवदनवियुचुम्वनपटुतर दनुजनिविडमदडुम्बनरणखर धीर! रणति हरे' तव वेणी नार्यो दनुजाश्च कम्पिता खिन्ना । वनमनपेक्षितदयिता करवालान्प्रोझ्य धावन्ति । कुकुमपुण्ड्रक गुम्फितपुण्ड्रक- सकुलकङ्कण कण्ठगरगण देव। सारङ्गाक्षीलोचनभृङ्गावलिपानचारुभृङ्गार । त्वा मङ्गलशृङ्गार शृङ्गाराधीश्वर स्तोमि । विरदमिद तिलकम् २. ३. प्रथ अच्युत चण्डवृत्तम् - वाऽच्युत पुन । [ध्या०] मत्राय शब्दार्थश्चकार । तेन अच्युताय चण्डवृत्तमुच्यत इत्युक्त भवति । लक्षण गरानियमपूयकमाह- नयो चेत् पञ्चमो दीर्घ पष्ठ श्लिष्टपरो नजी ।। १० ।। सर्वशेषे- [च्या० प्रस्यायं-पत्र नया-नगरणयगणो चेद् भवत , किञ्च पञ्चमी पर्णो यत्र दीर्धी भवति, यष्ठो वर्ण श्लिष्टपर-दिलष्ट पर स सप्तमो यस्य स सादशो भवति । एव चत्वारो. प्टो वा पादा यथेष्ट भवन्ति । सवशेषे नजो-नगण जगणो भवत सोऽध्यताल्यश्चण्डमृत्तस्या- थान्तरो भेद इति । चतुर्विधात्यक्षरमिद पदम् । यपा- प्रसरदुदार-द्युतिभरतार-प्रगुणिवहार-स्थिरपरिवार । इत्यादि । शेषेसु- कृतरणरग । इत्यादि। यथा था- जय जय वीर स्मररसधीर द्विजजितहीर प्रतिभटवीर स्फुरदुप(रु)हार-प्रियपरिवारच्छुरितविहार-स्थिरमणिहार १. क. हते।
२२२] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयलण्ड [११ M 1 प्रकटितरास स्तवकितहास स्फुटपटवास-स्फुरितविलास ध्वनलिजाल-स्तुतवनमाल व्रजकुलपाल प्रणयविशाल प्रविलसदस-भ्रमदवतस क्वणदुरुवश-स्वनहृतहस प्रशमितदाव प्रणयिपु तावद्विलसितभाव स्तनितविराव स्तनधनरागश्रितपरभाग क्षतहरियाग त्वरितघृताग कृतरससग' वीर! स्थितिनियतिमतीते धीरताहारिगीते, प्रियजनपरिवीते कुड कुमालेपपीते । कलितनवकुटीरे काञ्च्युदन्चत्कटीरे, स्फुरतु ग्सगभोरे गोप्ठवीरे रतिर्न ।। अम्बाविनिहतचुम्बामलतर- विम्बाधरमुखलम्वालक जय देव! दृष्ट्वा ते पदनखकोटिकान्तिपूर, पूर्णानामपि शशिना शतैर्दुरापम् । निविण्णो मुरहर मुक्तरूपदर्पः, कन्दर्प स्फुटमशरीरतामयासीत् ।। इति अच्युत चण्डवृत्तम् ३ ४ अय द्धितश्चण्डवृत्तम् -यदि श्लिप्टा, द्वि-नव-द्वादशा अपि । वद्धितो भनजा जोल:- [च्या०] एतदुक्त भवति, यदि द्वि नव द्वादमा अपि वर्णा स्तिष्टा-सरेफशिरस्काश्चेत- स्यस्तदा द्धित इति नाम चण्डवृत्त भवतीति । तत्र च गणनियममाह-भनजा -भगरण- नगरजगणा, अप च जो-जगण , ततो ल-लघुरित्यर्थ । प्रयोदशाक्षरमिद पदं स्वेच्छया यत्र विनिवेशित भवति तद वद्धितास्य चण्डवृत्तम् । यथा- दुर्जयपरवलगर्जनवर्जित । इत्यादि। या वा, श्रीगोविन्दविरुदावल्याम्- ब्रह्मा ब्रह्माण्डभाण्डे सरसिजनयन स्रष्टुमाक्रीडनानि, स्थाणुभक्तु च खेलातुरलितमतिना तानि येन न्ययोजि । - १. गोधिः कृतरससङ्ग नास्ति ।
- प. ६. विरुदावली-प्रकरणे [ २२३ ww अपि- तादृक्क्रीडाण्डकोटीवृतजलकुडवा यस्य वैकुण्ठकुल्या , कर्तव्या तस्य का ते स्तुतिरिह कृतिभिः प्रोझ्य लीलायितानि ।। निविडतरतरापाडन्तरीणोप्मसंपद्'- विघटनपटुखेलाडम्बरोमिच्छटस्य । सगरिमगिरिराजच्छनदण्डायितथी- जंगदिदमघशत्रोः सव्यवाहू'धिनोतु ।। अभ्रमुपतिमदमहिपदक्रम विभ्रमपरिमललुप्तसुहृच्छ म दुष्टदनुजदलदर्पविमर्दन तुष्टहृदयसुरपक्षविवर्द्धन दर्पकविलसितसर्गनिरर्गल सर्पतुलितभुजकर्णगकुण्डल निर्मलमलयजचिंतविग्रह नर्मलसितपरिवजितविग्रह' दुष्करकृतिभरलक्षणविस्मित- पुष्करभवभयमद्देनसुस्मित वत्सलहलघरतक्कितलक्षण वत्सरविरहितवत्ससुहृद्गण गजितविजयिविशुद्धतरस्वर- तजितखलगण दुर्जनमत्सर धीर! तव मुरलीध्वनिरमरीकामाम्बुधिवृद्धिशुभाशु । अचटुलगोकुलकुलजाधैर्याम्बुधिपानकुम्भजो जयति । धृतगोवर्द्धन सुरभीवर्द्धन पशुपालप्रिय रचितोपक्रिय वीर! भुजङ्गरिपुचन्द्रकस्फुरदखण्डचूडाकरे, निर शदृगन्चलभ्रमिनिवद्ध भूङ्गभ्रमे । १. गोवि सम्यग् । लितकृतसविनिग्रह । २. गोवि. सत्यवाहु। ३. गोवि. कुड्मल। ४. गोवि. नर्मल.
२२४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५०११-१२ in पतङ्गदुहितुस्तटीवनकुटीरकेलिप्रिये, परिस्फुरतु मे मुहुस्त्वयि मुकुन्द शुद्धा रतिः । इति विदमिद पद्धित ४. ५ प्रय रणरचण्डवृत्तम् -नि पञ्च-नव-सप्तमा ॥११॥ श्रादिरेकादशश्चैव श्लिष्टा जो रो जरौ लघु । सर्वशेषे रणाख्ये स्यात्-- [या०] इदमाकूतम । यत्र नि-पञ्च-नघ-सप्तमा पर्णा, प्रादिरेकादशश्चेति । पडवर्णा श्लिष्टा भयन्ति । तत्र गणनियममाह-'जो रोजरी लघु' जो-जगण रो-रगण भवतीति शेप । अथ च जरो-जगारगणी एव भवत , सत सोये पदे चको लघुभवति । तत् रणास्य सविश्व महाकलिकारूपचण्डवृत्त भवति । द्वादशाक्षरमिद पदम् । चतुर्दशाक्षर चात्य पद भवति । विरामतयेपि एककस्याधिस्य लघोर्दानादित्याशय ' 1 पदविन्यासस्तु स्वेच्छया भवतीत्युपदेश । तथा चान्त्यपदे यिरामपि लघुदानाउनभला-जगण-भगणो लघवो भवन्तीति वा । यया- प्रगल्भविक्रम प्रसपिसत्कम । इत्यादि। प्रपन्नवर्द्धनक प्रसन्नगर्द्धनक । इत्युत्तरम् । एतस्य चान्यत्र समग्र इति नामान्तरम । तथोदाहृतमपि श्रीरूपस्वामिभि धौगोविन्द- विरुदावल्याम् । यथा- अनिष्टखण्डन स्वभक्तमण्डन प्रयुक्तचन्दन प्रपन्ननन्दन प्रसन्नचञ्चल स्फुरदृगञ्चल श्रुतिप्रलम्बक-भ्रमत्कदम्बक प्रविष्टकन्दरप्रकृष्टसुन्दर- स्थविष्ठसुन्दरक-प्रसर्पबन्धुरक' देव । वृन्दारकतरुवीते वृन्दावनमण्डले वीर। नन्दितवान्धववृन्द सुन्दरवृन्दारिका रमय । १ ख लध्वोर्शनादिरयाशम । २ ख च । ३ ख. इत्यन्तम् । ४. गोधि परिष्ट- ५ गोवि, स्यविष्ठसिन्धुरप्रसपंवन्धुर । सडन ।
प० १२-१३] ६. विददायली [ २२५ AM MAMAN वीर। [च्या०] प्रस्या खलिनीडुम्बक मुरलीचुम्बक जननीवन्दक - पशुपीनन्दका अनुदिनमनुरक्तः पधिनीचळवाले, नवपरिमलमाद्यच्चच्चरीकानुकीं । कलितमधुरपनः कोऽपि गम्भीरवेदी, जयति मिहिरकन्याकूलवन्याकरीन्द्रः । इति सविरद समग्रोवाहरणम् । इति रणश्चण्डवृत्तम् ५. ६. अथ वीरश्चण्डवृत्तम् ----मभौ नौ वीरचण्डके ॥ १२ ॥ प्राद्यवर्णातु चत्वारो वर्णाः स्युमधुरेतराः। -यत्र मभौ-मगणभगणो, अथ च नौ-नगणी भवतः । किञ्च, पाद्यवर्णात- प्रथमाक्षरात् घत्वारो वर्णाः मधुरेतरा - केवल श्लिष्टा एवेत्यर्थः । तत् पोरचण्डकास्य घण्ड- प्त भवति । इदमपि द्वादशाक्षरमेव पदम् । प्रत्रापि पदविन्यासः पूर्ववदेव । बाहुल्येन द्वादश. पमिद भवति, तथा दृष्टत्वादिति । युद्ध क्रुद्धप्रतिभटजयपर। इत्यादि। एतस्यैव अन्यत्र वीरभद्र इति नामान्तरम् । यथा- उद्यद्विधु द्युतिपरिचितपट सर्पोत्सर्पस्फुरदुरुभुजतट स्वस्थस्वस्थविदशयुवतिनुत रक्षक्षप्रियसुहृदनुसृत मुग्धस्निग्धव्रजजनकृतसुख नव्यश्रव्यस्वरविलसितमुख हस्तन्यस्तस्फुटसरसिजवर सज्जद्गजत्सलवृपमदहर युद्ध कुद्धप्रतिभटलयकर वर्णस्वर्णप्रतिमतिलकघर रुप्यत्तुप्ययुवतिषु कृतरस भक्तव्यक्तप्रणय मनसि वस वीर! यथा- २२६ ] वृत्तमौक्तिक -दितीयसस ।१०१३-१५ प्रचुरपरमहंसः काममाचम्यमाने, प्रणतमकरचक्रः शश्वदाक्रान्तकुक्षी । अघहर जगदण्डाहिण्डिहिन्दोलहासे, स्फुरतु तव गभीरे केलिसियो रतिर्नः। उद्गीर्णतारुण्य विस्तीर्णकारुण्य गुजालतापिञ्छपुजाढयतापिन्छ । धीर! उचितः पशुपत्यलंश्यिाय नितरां नन्दितरोहिणीयशोदः । तव गोकुलकेलिसिन्युजन्मा जगदुद्दीपयति स्म कीर्तिचन्द्रः । सविरुदं वीरभद्रोदाहरणमिदम् । इति धीरश्चण्डवृत्तम् ।। ७. प्रय शाकश्चण्डवृत्तम् भी रो ल: पञ्चमः श्लिप्टो दीघौ नवम-सप्तमौ ॥ १३ ॥ द्वितीयो मधुरः शाके- [व्या०] अयमपं.-शाफे-शाकास्ये चण्डवृत्ते प्रथम भौ-भगणो, अप व रो-रगणः, ततो लो-लघुः । किञ्च-पञ्चमो पर्ण लिप्ट:-संयुक्तो भवति, नवमसप्तमो दीघों भवतः, द्वितीयो मघुर:-परसवर्णो वर्णो यत्र भयतीत्यर्थः । तत् शाकनामकं पण्डवृत्त भवति । दशा- क्षर पद, विन्यास: पूर्ववत् । यषा- सञ्चितचक्र-भुजाभिराम । इत्यादि। इति शकिरचण्डवृत्तम्। ७। ८ मथ मातङ्गखेलित चण्डवृत्तम् -ह्यथ मातङ्ग खेलितम् । श्लिष्टो वा मधुरो वाणदशमो रौ यलो यदि ॥ १४ ॥ बाणे भङ्गश्च' मैत्री च प्रथमाष्टमयष्ठकाः । तृतीयश्चात्र दीर्घा. स्यु- [व्या०] इदमत्रानुसन्धेयम् - प्रथ मातङ्ग खेलित-मातङ्गखेलिताभिधान चण्डवृत्तं लक्ष्यत इति शेषः । अन्न चार्य याकार. । तथा च यत्र बाणदशमी' बाण-पञ्चम दशमश्चेति तो धणी श्लिष्टो मधुरो-परसवर्णां च भवतः। तथा रो-गणो, अथ च यलो-यगणलघू यदि १. क. बाणभङ्गश्च ।
] १. विरुदावली-प्रकरण [ २२७ यया- भवतस्तथा बाणे-पञ्चमे भङ्गश्च-मैत्री च यदि भवति, तथा प्रपमाष्टमषष्ठका: वर्णा. स्तृतीयश्च वर्णश्वेश्चत्वारोऽत्र वर्णा दो: स्यातदा मातङ्गलिताभिधानं पण्डवृत्तं भवति । वशाक्षरं पदमिदम् । पत्र पयिन्यासः स्वेच्छया विधेयः । साधितानन्तसारसामन्त। इत्यादि। यथा पा- नाथ हे नन्द-गेहिनीरान्द पूतनापिण्डपातने चण्ड दानवे दण्डकारकाखण्ड- सारपोगण्डलीलयोद्दण्ड गोकुलालिन्दगूढ गोविन्द पूरितामन्द-राधिकानन्द वेतसीकुज-मापुरीपुज लोकनारम्भजातसंरम्भ- दीपितानगोलिभागङ्ग- गोपसारङ्ग-लोचनारङ्ग- कारिमातङ्गखेलितासङ्ग- सोहृदाशङ्कयोपितामङ्क- पालिकालम्ब चारुरोलम्ब- मालिकाकण्ठ कौतुकाकुण्ठ पाटलीकुन्दमाधवीवृन्द- सेवितोतुङ्गशेखरोत्सन मा सदा हन्त पालयानन्त वीर! स्फुरदिन्दीवरसुन्दर सान्द्रतरानन्दकन्दलीकन्द । मां तर पदारविन्द नन्दय गत्येन गोविन्द। कुन्ददान मन्दहसन' पदरसन स्वमवसन' देव। प्रपन्न जनतातमाक्षपणशारदेन्दुप्रमा- ग्रजाम्युगविलोचना स्मरसमृद्धिसिद्धीपधिः ।
२२८] वृत्तमौक्तिक -द्वितीयखण्ड [प०१५-१६ www विडम्बितसुधाम्बुधिप्रवलमाधुरीडम्बरा, विभर्तुं तव माधव स्मितकदम्बकान्तिमुदम् । इति श्रीगोविन्दविरुदावल्यां मातङ्गखेलितप्रत्युदाहरणम् । सविरुदमिदं मातङ्गसेलितम् ।। ६. प्रथ उत्पलं चण्डवृत्तम् -भद्वयं चोत्पलं मतम् ।। १५ ॥ श्लिष्टौ द्विपञ्चमी- [ध्या०] प्रयमय:-भय-भगणयोयं, भगणचतुष्टयमित्यर्थः । लक्ष्ये सपा दर्शनादेवं एयातम् । किञ्च-तस्मिन्न व भगणदये द्विपञ्चमो-द्वितीयपञ्चमो धो लिष्टी-सरेफ- शिरस्को च भवतो यत्र तद् उत्पलनामकं चण्यवृत्तं भवतीत्यर्थः । परक्षरं भगणद्वयप, भगण. चतुष्टयपक्षे तु द्वादशाक्षरमेव पदम् । पदविन्यासस्तु पूर्ववदेव । यथा- सर्वजनप्रिय सर्वसमक्रिय इत्यादि । यथा था, थोगोविन्दविरुदावल्याम्-- नत्तितशर्कर-चकृतकर्कर- वृद्धमरुद्भर-तईन निर्भर- दुष्टविमर्दन शिष्टविवर्द्धन सर्वविलक्षण मित्रकृतक्षण सद्भुजलक्षित-पर्वतरक्षित- निष्ठुरगर्जन-खिन्नसुहृज्जन रुष्टदिवस्पति-गर्वसमुन्नति- तर्जनविभ्रम निर्गलितभ्रम- शमलवस्तव विस्फुरदुत्सव वीर! बुद्धीनां परिमोहनः किल ह्रियामुच्चाटन: स्तम्भनो दर्भोदनधियां' मनःकरटिनां वश्यत्वनिप्पादनः । कालिन्दीकलहंस हन्त वपुषामाकर्षणः सुभ्रुवां, जीयाद् देणवपञ्चमध्वनिमयो मन्त्राधिराजस्तव । १. गोवि. दर्भोदनभियाम् ।
५०१६ ] १ विरुदावली प्रकरण [ २२६ काननारब्ध काकलीशब्द- पाटवाकृष्ट-गोपिकादृष्ट चातुरीजुष्ट-राधिकातुष्ट कामिनीलक्ष-मोदने दक्ष भामिनीपक्ष' माममु रक्ष, देव । प्रजर्जरपतिव्रताहृदयवञभेदोधुरा, कठोरतरमानिनी'-निकरमानमर्मच्छिद । अनङ्गधनुरुद्धतप्रचलचिल्लिचापच्युता , क्रियासुरघविद्विपस्तव मुद कटाक्षेषव । सविरुवमिदमुत्पलम् । १०. अप गुणरतिश्चण्डवृत्तम् -सो नो, लश्च दीर्घ तृतीयकम् । गुणरत्याख्य- [ध्या०] अस्या -पत्र स-साण नो-नगण ततो लश्च-लघुभवति । अत्र चतुर्दशाक्षर पदविन्यासस्य मयत्रापि वृष्टत्वात् सनलानामावृत्तिरवगन्तव्या, तेन प्रकृतोदृषणिका सिद्धि भंषति । किञ्च, तृतीयक-तार्तीयमक्षर दोघं भवति । तद् गुणरत्याहय चण्डवृत्त भवति । चतुर्दशाक्षर पदम । पदविन्यास पूर्ववदेव । यथा- विदिताखिलसुख सुख (प)माधिकमुख । इत्यादि पचा वा- प्रकटीकृतगुण शकटीविघटन निकटोवृतनवलकुटीवर वन- पटलीतटचर नटलील मधुर सुरभीकृतवन सुरभीहितकर मुरलीविलसित-खुरलीहृतजग- दरुणाघर नव-तरुणायतभुज' वरुणालयसमकरुणापरिमल कलभायितवल शलभापितखल १ गोवि भाविनीपक्ष । ४ गोवि कपणापतभुज । २ गोवि कठोरपरवगिनी। ३ पोधि घर्मच्छिद ।
२३०] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयाण्ड [प०१६-१७ धवलाधृतिधर' गवलाश्रितकर सरसीकृतनर सरसीरहघर कलशीलितमुख कलशीदधिहर ललितारतिकर ललितावलिपर घोर! हरिणीनयनावृत प्रभो फरिणीवल्लभकेलिविभ्रम । तुलसीप्रिय दानवाङ्गनाकुलसीमन्तहर प्रसीद मे ।। चन्दनचचित गन्धसमचित गण्डविवर्तन-कुण्डलनर्तन सन्दलदुज्ज्वल कुन्दलसद्गल वजुलकुन्तल' मञ्जुलकज्जल सुन्दरविग्रह नन्दलसद्ग्रह वीर! रतिमनुवध्य गृहेभ्यः कर्षति राधां वनाय या निपुणा । सा जयति निसृष्टार्था' वरवंशजकाकली दूती। सविरुदा गुणरतिरियम् ॥१०॥ ११. अय कल्पदुमरचण्डवृत्तम् -अन्त्यान्त्यो नवमः श्लिष्टपूर्वगः ।। १६ ॥ कल्पद्रुमे तजो यश्च श्लिष्टाः षट्-त्रि-नव-द्विकाः। व्या०] कोऽर्थः ? उच्यते-पत्र कल्पद्रुमे घण्वृत्त अन्त्यो-यमणः तस्यान्त्यो मधमो वर्णः श्लिष्टपूर्वग:-श्लिष्टो वर्ण. पूर्वगो यस्य स ताशो भवति । तत्र च गनियममाह- तो-तगणनगणों, अथ च यश्च-यगणोपि भवति । एवं गणत्रयं यत्र भवनि तदेतत् कल्पद- माल्यं चण्डवृत्त भवति । नवाक्षरमिद पदम् । पदविन्यासोपि पूर्ववत् । किञ्च-पतिनवद्विका:- षष्ठतृतीयनवद्वितीयका वर्णाः श्लिष्टा भवन्ति । पत्र घनवमश्लेषादेव द्वितीये पवे प्रथम- वर्णस्य गुरुत्वं भवतीति भाष. । तत्र- पथा- उद्रिक्ततरस्थितगर्व प्रव्यक्तपरिस्थितसर्व। १. गोषि. हर। २. गोपि. कुड़मल । ३. गोवि. निसृष्टा तब। प्रत्यक्तपरिस्थितशवं।
५० १७.१६]
६.विदावली-प्रकरण
1 २३१
-
एवं पदान्तरमपि वोद्धव्यम् ।
इति कल्पद्रुम ।११॥
१२ मथ फावलश्चण्डवृत्तम्
कन्दले पञ्चम. श्लिष्टी द्वितीये मधुरोऽनु भो ।। १७ ॥
[ध्या०] कन्दले-कन्दलाएपे चण्डवृत्ते पस्तमो धणं लिप्टो भवति । द्वितीयो धों
मधुर -परसवर्णो भवति । तत्र गणनयत्यमाह-प्रवास्मिन् भौ-भगणो एव स्तः । षडक्षरमेव
पदम् । तत्कन्दलाभिधान चण्डवृत्त भवतीति । यथा-
पण्डितवर्द्धन ।
इत्यादि ।
इति कन्वलः ॥१२॥
१३. प्रय अपराजितञ्चण्डवृत्तम्
पडप्टदशमा दीर्घा द्वितीयो मधुरो यदि ।
अपराजितमेतत्तु भसजाश्च गुरुलंघु ॥ १८ ।।
(व्या०] एतदुक्त भवति । यत्र पडष्टवशमा-पष्ठाष्टमदशमा वर्णा दीर्घा भवन्ति ।
द्वितीयो ध! यदि मधुर-परसवर्णो भवति । यदि च भसजा -भगएसगजगरणा भवन्ति ।
भय च गुरुस्ततो लघुश्चेद् भवति । तदेतत् अपराजिताय चण्डवृत्त भवति । एकादशाक्षर
पदम् । यथा-
गजितपरवीर धीर हीर ।
इत्यादि।
इति अपराजितम् ॥१३॥
१४ अथ नत्तंनञ्चण्डवृत्तम्
चतु सप्तमको श्लिप्टो सौ रो लौ यदि नर्त्तनम् ।
अष्टमो मधुर
चतु
[ध्या०] अस्थार्थ-यदि
(सप्तमको वर्णो लिष्टौ भवतः, अष्टमो वर्णो मधुर -परस-
धों भवति । किञ्च, यदि सो-सगणो स्थाताम् । अथ च रो-रगण , ततो लो-लघुद्वय स्यात्
तदा नर्तन-मर्तनास्य घण्डवृत्त भवति । इदमप्येकादशाक्षर पदम् । यथा-
भुवनत्रयशनुम्प्रमईय।
इत्यादि ।
इति ननम् ॥१४॥
१५. अथ तरत्समस्तञ्चण्डवृत्तम्
-श्लिष्ट-सश्लिष्टमधुरा यदि ॥ १६ ॥
२३२ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प० २० - २३ यथा- पट्विपञ्चमका जो मः सगणो लघुयुग्मकम्।। तरत्समस्तमित्याहुः- [ध्या०] एवमुक्त भवति । यदि पत्रिपञ्चमका -पष्ठतृतीयपञ्चमा वर्णाः श्लिष्ट- सश्लिष्ट-मधुरा. स्युः । तत्र गणनियममाह-जो-जगणः, मो-माणः, सगणः गुर्वन्तश्चतुष्कलो गणस्ततो लघयामक-लघुयुगल च यदि भवति तदा तरस्समस्तमिति नामक घण्डवृत्तमाहश्यान्द. सिका.। एकादशाक्षरमेव पदम् । यथा- निरस्तचण्डद्वेपिघराघर इत्यादि। इति तरत्समस्तम् ॥१५॥ १६. अथ वेष्टनञ्चण्डवृत्तम् -~दीपों पट्पञ्चमी यदि ।। २० ॥ वेष्टने सप्तमः श्लिप्टो नयौ लघुचतुष्टयम् । [ध्या०] अयमयः-वेष्टने-वेष्टनात्ये चण्ऽवृत्तप्रभेदे यदि षट्पञ्चमो-पष्ठपञ्चमको घों दो?' स्याताम् । सप्तमश्च वर्णः श्लिश्टो भवेत् । पणनियममाह-नयो-नगणयगणो स्तः, ततो लघुचतुष्टय यत्र भवति । दशाक्षर च पद भवति । तत् वेष्टनाभिधान चण्डवृत्त भवतीति। मलयजसाराच्चितहर। इत्यादि। इति वेष्टनम् ॥१६॥ १७. प्रथ अस्खलितञ्चण्डवृत्तम् तरी भलावस्खलिते व्यष्टपञ्चमसप्तमा ॥ २१ ॥ सश्लिष्टा दीर्घ प्रायः स्यात्- [व्या०] कोऽर्थ ? उच्यते-अस्खलिते-अस्खलिताभियाने घण्डवृत्ते यदि तरो-तगणरगणो स्याताम् । अथ च भली-भगणलघूस्तः । किञ्च, श्यष्टपञ्चमसप्तमातृतीयाष्टमपञ्चम. सप्तमा वर्णाश्चेत मश्लिष्ग अन्त्ययोगिन स्युः । पारा -प्रथमो वर्णाचेद् वीर्घ स्यात् तदा अस्खलिताभिधान चण्डवृत्त भवति । दशाक्षरमेष पद भवति । यथा- आबद्धशुद्धयुद्धप्रणय। इत्यादि। इति अस्खलितम् ॥१७) १८ प्रथ पल्लषितञ्चण्डवृत्तम् -दीघौ चेत्तुर्यपञ्चमो। शिथिलो मधुरो वाऽन द्वितीयो भतनद्विजा. ।। २२ ।। एतत् पल्लवितम् - प० २४-२५ ] । विरुदावली - प्रकरणम् [२३५ पुन्तललुठदुरुरङ्ग कुडकुमरुचिलसदम्बर लङ्गिमपरिमलडम्बर नन्दभवनवरमङ्गल- { मञ्जुसघुसूणसुपिङ्गल हिड्गुलरुचिपदपकज सञ्चितयुवतिसदगज' सन्ततमृगपदपशिल सतनु मयि कुशलङ्किल वीर । गिरितटीकुनटीकुसपिङ्गले खलतृणावलिसज्वल दिङ्गले । प्रखरसङ्गसिन्धुतिमिनिले मम रतिर्वलता व्रजमङ्गले । जय चारुदाम ललनाभिराम जगतीललाम रुचिहारिवाम' वीर। उन्दितहृदयेन्दमणिः पूर्णकल कुवलयोल्लासी । परित शार्वरमथनो विलसति वृन्दाटवीचन्द्र । इति तुरण १२०० एते महाकलिकारूपस्य चण्डवृत्तस्य विंशति शुद्धा प्रभेदा । प्रपथ सङ्कीर्णा २१. पङ्क रह चण्डवृत्तम् पङ्केरुह नयाँ पप्ठे भङ्गो मैनी च दृश्यते ।। २४ ।। सा चेत् कवर्गरचिता यथा लाभमनुक्रमात् । तथैव षष्ठो मधुर स्वरभेदेऽपि तद्भिदा ।। २५ ।। च्या०] एतस्यार्थ -यत्र नयो-नगणयगणो भवत्त । तथा षष्ठे धणे भगो मैत्री च दृश्यते । किच, सा मंत्री चेत् कघर्गेण यथालाभमनुक्रमात रचिता स्यात । तया पष्ठो वर्णो मधुर- परसवर्णो यदि स्यात तदा पड्करह नाम घण्डवृत्त भवति । विच, स्वरभेदेपि-इकारादिस्वर- भेदेपि सति तद्भिदा पहभेदो भवतीति बोद्धष्पम । पदक्षरमेव पदम । पदविन्यासोपि पूर्व धदिति बोद्धव्यम् । १ [-] कोष्ठगतोंश नास्तिक प्रती। २ गोवि रुचिहुतवाम ।
२३४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ प० २३-२४ मदिन्त्य पदे 'ल:-एको लधुरधिको देय इत्यर्थः, तेनास्य पदं प्रयोदशाक्षर भवति । तच्च, जरनभलान्तमित्युपदिश्यते । पदविन्यासस्तु स्वेच्छया विधेयः । यथा- अनङ्गवर्जन प्रसङ्गसज्जन । इत्यादि। अनङ्गमङ्गल प्रसङ्गसजनक । इत्यन्तम्। अन च मधुरतृतीयत्वादेव विरुदावल्यन्तर-समपाद भिन्नमिदं सममिति । इति समग्रम् ॥१६॥ २०. प्रय तुरग'श्चण्डवृत्तम् -भनी जलो ॥ २३ ।। मधुरौ' युग्मनवमौ चेच्चण्डतुरगाह्वयम् । [व्या०] अयमयं.- 1.--यत्र भनौ-भगण नगणो भवतः, सतो जलो-जगणलघू स्याताम् । किञ्च, युग्मनवमी वणों चेत् मधुरौ-परसवों स्तस्तदा तुरगाह्वयचण्डवृत्त भवतीत्यर्थः । दशाक्षर पदमिदम् । पदविन्यास: पूर्ववत । यथा- पण्डितगुणगणमण्डित । पथावा- ५ सँवल विचकिलकुण्डल मण्डितवरतनुमण्डल कुण्डलिपतिकृतसङ्गर दण्डित भुवनभयङ्कर शङ्करकमलजवन्दित किङ्करनुतिलवनन्दित गञ्जितसमदपुरन्दर चञ्चलदमनधुरन्धर बन्धुरगतिजितसिन्धुर चन्दनसुरभितकन्धर सुन्दरभुजलसदङ्गद' सन्ततसखिगणरङ्गद झड कृतिकरमणिकङ्कण ४. गोधि खण्डित । १. गोवि. तुरंग। २. क. मधुर । ३. गोवि सचल । किरतुलितवनन्दित । ६. क. भुजबलवङ्गद।
प. -- ६. विरुदावली-प्रकरण [ २३४ कणिकारकृतकणिकायुति मणिकापदनियुक्त गरिका । मेचका मनसि मे चकास्तु ते मेचकाभरण भारिणी' तनु । मदनरसङ्गत सङ्गतपरिमल युवतिविलम्बित लम्बितकचभर कुमुमविटङ्कित टङ्कितगिरिवर मथुरससञ्चित सञ्चितनरवर' वीर। भ्रूमण्डलताण्डवितप्रसूनकोदण्डचित्रकोदण्ड । हृतपुण्डरीक्गर्भ मण्डय मे पुण्डरीकाक्ष । सविरद सितरजमिदम् ॥२२॥ २३ प्रय पाण्डूत्पलञ्चण्डयुत्तम् जय जय दण्ड- प्रिय कचखण्ड- ग्रथितशिखण्ड- दूज शशिखण्ड- स्फुरणसपिण्ड- स्मितवृतगण्ड प्रणयकरण्ड द्विजपतितुण्ड स्मररसयुण्ड क्षतपणिमुण्ड प्रक्टपिचण्ड- स्थितजगदण्ड पवणदण्पष्ट स्फुटरणपष्ट रफुरदग्गुण्डा- वृतिभुजदण्डा- हतगसचण्डा- सुरगन पण्डा- १. गोषि मादिनी। २. गोवि पसिरिय मास्ति। ३. गोषि. मम।
२३८ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [व्या०] एतेषां सितकमादिभेदानाम्, शेषं स्पष्टम् । तन- २२. सितकजञ्चण्डवृत्तम् जय कचचञ्चद्- धुतिसमुदञ्च- न्मधुरिमपञ्च- स्तवकितपिञ्छ- स्फुरित विरिञ्च- स्तुत गिरिगञ्ज'- व्रजपरिगुज- न्मधुकरपुज- द्रुतमदुशिञ्ज द्विषदहिगञ्ज व्रततिपु खञ्ज- नवरजसञ्ज'- न्मरुदतिपिञ्ज प्रवलित'मुजा- नलहर गुजा- प्रिय गिरिकुञ्जा- थित रतिसञ्जा. गर नवकञ्जा- मलकर झञ्जा- निलहर मञ्जी- रजरवपञ्ज. परिमलसजी- वितनवपञ्चा- शुगशरसञ्चा- रणजितपन्चा- ननमद धीर। १. गोवि. गिरिक 'गोवि. रसमज-। ३. गोवि. प्रणित ।
व्यम् । पडक्षरमेव पदम् । पदविन्यासोऽपि पूर्वयदेवति ॥२६॥ उदाहरणमेतेपा अमेणे योध्या १२८ ॥ अथ सितकजादयश्चण्डवृत्तस्य चत्वारो भेदा लक्ष्यन्ते । तर- (ध्या०अस्यार्थ--यन्त्र एतो-नगणयगणो एय-यूर्योक्तोमणी भवत पिच्च,मलोमंत्री पूर्वपद इत्यनेनवोपस्थापितत्वात । किञ्च, सापि मंत्रो धादि-मिग पूर्वधन पपास रचिता चेद् भवति । अपि शब्दात स्थरातरेणाभेदेपि सति तदा तद्भवो भवन अरुणाम्भोरुहज्चेति नेय मेश्याष्यम् 1000 विरुदेन सम चापि पण्डवृत्तस्य । थ्यिा० सितकज, पाण्ड्रत्यल, दीयर, प्रणामी विदरताप गए तुष्टय पण्डित-प्रपीतचन्द शास्त्रनिपुणमतिभिशेयमिति पर। है. विरदावली-प्रकरण । २३७ प० २६ - २८ ] कृपय सप किल मयि धीर। उत्तनोदयाङ्गसङ्गमजुपा विभ्रत्पतङ्गविपा, वासस्तुङ्ग मनङ्गसङ्गरलाशोटीयंपारङ्गत । स्वान्त रिगदपाङ्गङ्गिभिरल गोपाङ्गनाना क्लि', भूयारत्व पशुपालपुङ्गव दृशोरव्यङ्ग गाय मे ॥ विलसदलिक्गतकुड वुमपरिमल कटितटधृतमणिरिद्विणिवरसप्त नवजलघरबुलाङ्गमरुचिभर मसृणमुरलिक्लङ्गिमधुरतर घोर। अवतसितमञ्जुमजरे तरुणीनेत्रचकोरपञ्जरे। नवकुड कुमपुजपिजरे रतिरास्ता मम गोपजरे । पङ्कव्ह सविरदमिदम् । २१॥ एतावेव गणो यत्र भङ्गो मैत्री च पूर्ववत् । क्रमेण चादिवर्गस्तु रचिता सापि पूर्ववत् ॥ २६ ॥ तद्भदचतुष्टयमाह मार्द्धन इलोकेन- सितकञ्ज तथा पाण्डूत्यमिन्दीयर तथा । १. गोवि स्तुल्य । २ गोवि गिलन् ।
२४० । वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड --- ww जनितवितण्डा- जितबल भण्डी- रदयित खण्डी- कृतनवडिण्डी- गण कलकुण्डी'- कृतकलकण्ठी- कुल मणिकण्ठी- स्फुरितसुकण्ठी- प्रिय वरकण्ठी- रवरण वीर ! दण्डी कुण्डलिभोगकाण्डनिभयोरुद्दण्डदोर्दण्डयोः, श्लिष्टश्चण्डिमडम्बरेण निविडश्रीखण्डपुण्ड्रोज्ज्वलः । निर्द्ध तोद्यदचण्डरश्मिघटया तुण्डश्रिया मामकं कामं मण्डय पुण्डरीकनयन त्वं हन्त हृन्मण्डलम् । कन्दर्पकोदण्ड-दर्पक्रियोद्दण्ड- दृग्भङ्गिकाण्डीर संजुष्टभाण्डीर धीर! त्वमुपेन्द्र कलिन्दनन्दिनी-तटवृन्दावनगन्धसिन्धुर । जय सुन्दरकान्तिकन्दलः स्फुरदिन्दीवरवृन्दवन्धुभिः । सविरुदं पाण्डुत्पलमिदम् ॥२३॥ २४. अथ इन्दीवरम् जय जय हन्त द्विप दभिहन्त- मधुरिमसन्त- पितजगदन्त- मृदुल वसन्त- प्रिय सितदन्त- [ स्फुरितदिगन्त प्रसरदुदन्त ] १. गोवि. कुण्ठी। २. पंक्तिद्वयं नास्तिक. प्रती।
प०२६-२८] &, विरुदावली -प्रकरण [ २४१ प्रभवदनन्त- प्रियसख सुन्त- स्त्वयि रतिमन्त. स्वमुदहरन्त ] प्रभुवर नन्दा- त्मज गुणकन्दा- सितनवकन्दा- कृतिधर' कुन्दा- मलरद तुन्दा- त्तभुवन वृन्दा- वनभवगन्धा- स्पदमकरन्दा- न्वितनवमन्दा- रकुसुमवृन्दा- चितकच वन्दा- रुनिखिलवृन्दा- रकवरबन्दी- डित विधुसन्दी- पितलसदिन्दो- वरपरिनिन्दी- क्षणयुग नन्दी- श्वरपतिनन्दी- हित जय वीर ! स्मितरुचिमकरन्दस्यन्दि वक्त्रारविन्द, तव पुरुपरहसान्विष्ट गन्ध मुकुन्द । विरचित पशुपालीनेत्रसारङ्गरङ्ग, मम हृदयतडागे सङ्गमङ्गीकरोतु । अम्बरगतसुरविनतिविलम्बित तुम्बरुपरिमविमुरलिकरम्बित २. गोवि. तिधर । ३. स.पंक्तिरिय [-1 १. पक्तिचतुष्टय नारित क. प्रतो । मास्ति। ४. गोवि. परिचित।
२४२ ] वृत्तमौक्तिक-द्वितीयसण्ड [ ५०२६-२८ शम्बरमुसमृगनिकरकुटुम्बित सभ्रमवलयितयुवतिविचुम्बित धीर! अम्बुजकुटुम्बदुहितुः कदम्बसम्वाधयन्धुरे पुलिने । पीताम्बर कुरु केलि त्व वीर ! नितम्बिनीघटया ।। सविरुदमिदमिन्दीवरम् ॥२४॥ २५. अय अरुणाम्भोरहञ्चण्डवृत्तम् जय रससम्पद्-विरचितझम्प स्मरकृतकम्प-प्रियजनशम्प प्रवणितकम्प-स्फुरदनुकम्प धु तिजितशम्प-स्फुटनवचम्प- श्रितकचगुम्प श्रुतिपरिलम्ब- स्फुरितकदम्ब स्तुतमुख डिम्भ- पिय रविविम्बो-दयपरिजृम्भी- न्मुखलसदम्भो-रुहमुख लम्बो. द्भटभुज लम्बो-दरवरकुम्भो- पम चबिम्बो-ष्ठयुवतिचुम्बो- द्भट परिरम्भोत्सुक कुरु श भो- स्तडिदवलम्बो-जितमिलदम्भो- घरसुविडम्बो-धुर नतशम्भो रपिजितदम्भो'-लिगरिमसम्भा- वितभुजजृम्भा-हितमद लम्पा- कमनसि सम्पादय मयि त पा- किममनुकम्पालवमिह धोर ! दिव्ये दण्डधरस्वसुस्तरभवे फुल्लाटवीमण्डले, वल्लीमण्डपभाजि लब्धमदिरस्तम्बेरमाडम्बरः। कुर्वन्नञ्जनपुञ्जगञ्जनमति श्यामागकान्तिश्रिया, लीलापाङ्गतरङ्गितेन तरसा मा हन्त सन्तर्पय । १. गोवि. परिजितदम्भो। २. ख. तुम्भा; गोवि. जम्भा।
प० २६-३० ] ६. विरदावली-प्रकरण [२४३ अम्बुजकिरणविडम्वक खञ्जनपरिचलदम्बक चुम्बितयुवतिकदम्बक कुन्तललुठितकदम्बक वीर! प्रेमोद्वेल्लितवल्गुभिर्वलयितस्त्व वल्लवीभिविभो ! रागोल्लापितवल्तकीविततिभिः कल्याणवल्लीभुवि । सोल्लुण्ठं मुरलीकलापरिमलं' मल्लारमुल्लासयन्, वाल्येनोल्लसिते दृशौ मम तडिल्लीलाभिरत्फुल्लय । सविरुदमिदमरुणाम्भोरहम् ॥२५॥ एते कादिपञ्चवर्गोत्यापिताः पञ्चचण्डवृत्तस्य महाकलिकास्पस्य सङ्कीर्णाः प्रभेदा.. अथ गभिताः तत्र प्रभेदा:- २६. फुल्लाम्बुजञ्चण्डवृत्तम् पष्ठे भङ्गश्च मैत्री च नयावेव गणौ यदि । अन्तस्थस्य तृतीयेन यदि मैत्रीकृता भवेत् ॥ २६ ॥ स्वरोपस्थापिता श्लिष्टा रमणीयतरा क्वचित् । फुल्लाम्बुज तद्दिष्ट चण्डवृत्तं सुपण्डितः ॥ ३० ॥ [ध्या०] कोऽर्थः ? उच्यते--यदि नयावेव-नगगपगणावेव गणो स्तः। षष्ठे वर्णे भङ्गो मैत्री च यदि अन्तस्यस्य यवर्गस्य तृतीयेन लकारेण कृता भवेत् । सापि क्वचित् स्वरोपस्थापिता श्लिष्टा च स्यात् । तदा एतद्देशादतमिद नामतः फुल्लाम्बुज इति प्रसिद्ध सुपण्डितश्चण्ड- वृत्तमुद्दिष्टं कथितमित्यर्थः । यया- व्रजपृथवल्ली'-परिसरवल्ली. वनभुवि तल्लीगणभृति मल्ली- मनसिजभल्ली-जितशिवमल्ली- कुमुदमतल्लीजुपि गत झिल्ली- परिपदि हल्ली-सकसुखभिल्ली- रत परिफुल्ली-कृतचलचिल्ली- १. गोवि. कलाभिरमनं। २. गोवि. पल्ली। ३. गोवि. भल्ली।
२४४ ] पृत्तमौक्तिक- द्वितीयखण्ड [ प० २६-३० जितरतिमल्लीमद भर सल्ली- लतिलक कल्या-तनुशततुल्या हवरसकुल्या-चटुतिलखल्या- प्रमथन कल्याणचरित धीर । गोपी सम्भृतचापल-चापलताचित्रया ध्रुवा भ्रमयन् । विलस यशोदावत्सल वत्सलसद्धेनुसवीत । *वल्लवललनालीलावलयित पल्लवरचना मल्लीविलसित वल्लभकलनाखेलासमुदित तत्लवघटना नीलालकवृत। तव चरणाम्बुजमनिश विभावये नन्दगोपाल । गोपालनाय वृन्दावनभुवि यद् रेणुरञ्जिता धरणी ।* सविरुद फुल्लाम्बुजमिदम् ।२६॥ * *टिप्पणी-सङ्घतान्तर्गताशस्य स्थाने निम्नाशो वर्तते गोविन्दविरुदावल्याम । परञ्च वृत्तमौक्तिक्ता चायमश पल्लवितञ्चण्डवृत्तस्य शिथिलद्वितीयवर्णोदा- हरणरूपेण स्वीकृत , स च २३३ पृष्ठेऽवलोकनीया विद्वद्भि । वल्लवली लासमुदयसमुचित पल्लवरागाधरपुटविलसित वल्लभगोपीप्रवरिणत मुनिगण दुर्लभकेतीभरमधुरिमकरण मल्लविहारादभुततरुणिमधर फुल्लमृगाक्षीपरिवृतपरिसर चिल्लिविलासापितमनसिजमद मल्लिकलापामलपरिमलपद रल्लकराजीहरसुमधुरकल हल्लकमालापरिवृतकचकुल वोर वल्लवललनावल्ली करपल्लवशीलितस्कन्धम् । उल्लसित परिफुल्ल भजाम्यह कृष्णकल्लिम् ।
प० ३१.३२ १ पिपावली-प्रारण [ २४५ २७. प्रप धम्पाञ्चगवृत्तम् द्वितीयो मधुगे यत्र दिलप्ट. पवापि भवेद् यदि । मनी परक्षर घेता म्वेच्छात पदयसनम् ॥ ३१॥ सम्पर पप्पत स्पात- [प्या०] परसायं.-'या द्वितीयो पों मपुर -परसदाँ भये । गपि-पुत्रचित् यदि सिप्टोपि स्यात् ।' नियमगाह-भनौ-मगणनगो गणो भदेताम् । परसरं पैतत् पदम् । रिय, पदर पा रहातो पत्र ननिसचम्पर नाम घट्यत्त स्यात् । पा- मञ्चलदरण' सुदरनयन पदरायन यलयभरण पल्लवचरण मनलघुगण- जिलमगृण चन्दनन्चन नन्दनवचन पप्टिताक्ट दन्तिपिपट-गवितदनुज पवितमनुज रक्षितघवल लक्षितगवल पन्नगदलन मनगलन व.धुरवलन मि.घुग्घलन' कल्पितमदन'. जल्पितमदन' मन्जुलमुकुट यजुललकुट-रजितकरम गम्जितदारभ-मण्डलवलित कुण्डलचलित-मन्दितलपन नन्दिततपन-अन्यकमुपम घन्याकुमुम'-गर्भक धरण - दर्भकसरण तर्ण क्वलित वर्णकललित श यरवलय डम्बर मलय देव १.१.स. प्रतो नास्ति पाठ । २. गोवि. सचलदपणचञ्चलरणसुन्दरनयन । पदन । ४. गोवि. मदन । ५. गोवि. सदन । ६. गोवि. वन्यपकुमुम । ७. गोवि. विरण।
२४६ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प० ३२ दानवघटालवित्रे धातुविचित्रे जगचित्रे । हृदयानन्दचरित्रे रतिरास्तां वल्लवोमिने । रिङ्गदुरुभृङ्ग-तुङ्गगिरिशृङ्ग- शृङ्गरुतभङ्ग-सङ्गधृतरङ्ग वीर ! त्वमत्र चण्डासुरमण्डलीनां रण्डावशिष्टानि गृहाणि वृत्वा । पूर्णान्यकार्विजसुन्दरीभिर्वृन्दाटवीपुण्डकमण्डपानि ।। सविरुदं चम्पकमिदम् ॥२७॥ २८. अथ पञ्जुलञ्चण्डवृत्तम् -वजुलं नजला यदि। पञ्चमो मधुरस्तत्र पद मुनिमित मतम् ।। ३२ ॥ [ध्या०] अयमर्थः-यदि नजला:-नगणजगणलघवः स्युः । किञ्च, तत्र पदे पञ्चमो वर्णा मधुरः-परसवर्णो भवति । पदमपि मुनिभिः-सप्तभिर्वर्णमितं-परिमितं यत्र तत् वञ्जुलं- घजुलायमतिमञ्जुलं चण्डवृत्तं मतं-सम्मतमित्यर्थः । पदकल्पनं तु पूर्ववत् । यया- जय जय सुन्दर-विहसित मन्दर- विजितपुरन्दर निजगिरिकन्दर- रतिरसशन्धर मणियुतकन्धर गुणमणिमन्दिर हृदि वलदिन्दिर गतिजितसिन्धुर परिजनबन्धुर पशुपतिनन्दन तिलकितचन्दन विधिकृतवन्दन पृथहरिचन्दन- परिवृतनन्दन'-मधुरिमनिन्दन'- मधुवन वन्दित-कुसुमसुगन्धित- वनवररञ्जित रतिरभसन्जित' शिखिदलकुण्डल-सहकृतभण्डिल नवसिततण्डुल-जयिरदमण्डल रतिरणपण्डित वरतनुभण्डित नखपदमण्डित दशनविखण्डित धीर! १. पंक्तिरियं नास्ति ख. प्रतौ। २. फ. मधुरिमनन्दन-। ३. गोवि. रतिभरसजित ।
-- प०३३ १ विरुदावली-प्रकरण [२४७ निनिन्द निजमिन्दिरा वपुरवेक्ष्य यासा श्रिय, विचार्य गुणचातुरीमचलजा च लज्जा गता। लसत्पशुपनन्दिनीततिभिराभिरानन्दित, भवन्तमतिसुन्दर ब्रजकुलेन्द्र बन्दामहे । रसपरिपाटी स्फुटतरुवाटी मनसिजधाटी प्रियनतशाटी'. हर जय वीर । सम्भ्रान्त सपडङ्गपातमभितो वेदैर्मुदा वन्दिता, सीमन्तोपरि गौरवादुपनिपद्देवी भिरप्यर्पिता। पानम्र प्रणयेन च प्रणयतो तुप्टामना विकृतो', मृद्वी ते मुरलीरतिर्मुररिपो शर्माणि निर्मातु न । राविरुद ध लमिदम् ॥२८॥ २६. अय कुन्दञ्चण्डवृत्तम् द्वितीयपष्ठी मधुरो श्लिप्टो वा क्वापि तो यदि । स्याताम् भजी तदा कुन्दम्- (व्या०] एतदुक्त भवति । यदि द्वितीयषष्ठी वणों मधुरौ-परसवर्णो स्वापि पदे श्लिष्टी या, तो वौँ स्माताम् । अथ च भजौ-भगणनाणी भवत , तदा कुन्द इति नाम चण्डवृत्त भवति । पडक्षरमिद पदम् । पदविन्यासस्तु पूर्ववत् । यया- नन्दकुलचन्द्र लुप्तभवतन्द्र कुन्दजयिदन्त दृष्टकुलहन्त रिप्टसुवसन्त मिष्टसदुदन्त सदलितमल्लि-कन्दलितवल्लि- गुञ्जदलिपुञ्ज-म तरकुञ्ज- लब्धरतिरङ्ग हृद्यजनसङ्ग- शर्मलसदन हर्पकृदनङ्ग मत्तपरपुष्ट-रम्यकलघुष्ट गन्धभरजुष्ट पुष्पवनतुष्ट कृत्तखलक्ष युद्धनयदक्ष १. गोवि. प्रियनवशाटी-। २. गोवि हृष्टारमना। ३. गोपि. भिष्टुता। ४. गोवि यक्षा २४८ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प० ३३-३४ - १ वल्गुकचपक्ष-[वशिखिपक्ष] पिष्टनततृष्ण तिष्ठ हृदि कृष्ण वीर । तव कृष्ण केलिमुरली हितमहित च स्फुट विमोहयति । एव सुधोमिसुहृदा विपविपमेणापर ध्वनिना। सनीतदैतेयनिस्तार कल्याणकारुण्यविस्तार पुप्पेपुकोदण्डटङ्कार-विस्फारमन्जरीझड्कार धीर। रङ्गस्थले ताण्डवमण्डनेन' निरस्य मल्लोत्तमपुण्डरीकान् । कसद्विप चण्डमखण्डयद यो हृत्सुण्डरीके स हरिस्तवास्तु । सविरुद कुन्दमिदम् ॥२६॥ ३०. अय यकुलभासुरञ्चण्डवृत्तम् -अथो वकुलभासुरम् ।। ३३ ।। चतुर्भिस्तुरगं निर्जे पद यनातिसुन्दरम् । रसेन्दुमात्र सोल्लाल- [व्या०| अस्यायं -प्रय-कुन्दान तर बकुलभासुर इति नामा चण्डवृत्त कथ्यत इति शेप । यत्र चतुभि -चतु सख्याकै निर्ज-जगणविरहित चतुर्विधस्तुरगे -चतुष्कले द्विजगण-कर्ण भगण- सगणरेवातिसुन्दर-प्रतिरमणीयं रसेन्दुमात्र-पोडशमात्र पद भवति । तच्च पद उत्सगसिद्ध पोडश विंशकावधियाणाधिक विधेयमित्युपदेश । किञ्च, सोलाल-उल्ललनमेव उल्लाल परावर्तन तेन सहित शृङ्खनावद्ध-यायेन घटितमित्ययं । तदोदृश बकुलभासुर चण्डवृत्त सविरुद भवतीति वाक्याथ । यया- जय जय वशीवाद्यविशारद शारदसरसोरुहपरिभावक- भावकलितलोचनसञ्चारण चारणसिद्धवधूधृतिहारक हारकलापरुचाश्रितकुण्डल* कुण्डलसित गोवर्द्धनभूषित भूपितभूपणविच्छन विग्रह विग्रहखण्डितखलवृपभासुर १ [-] क ख नास्ति पाठ । २ गोवि मण्डलेन । ३ ख प्रथ। ४ ख तगणसगणे-1 ५ गोवि रुचाञ्चितकुण्डल । ६ गोवि कुण्डलसद् । ७ गोवि चिद्धन-।
प० ३४ - ३५] ६. विरुदावली -प्रकरण [२४६ भासुरकुटिलकचापितचन्द्रक चन्द्रकदम्ब रुचाभ्यधिकानन काननकुञ्जगृहस्मरसङ्गर सङ्गरसोधुरवाहुभुजङ्गम जङ्गमनवतापिन्छनगोपम गोपमनीपितसिद्धिपु दक्षिण दक्षिणपाणिगदण्डसभाजित भाजितकोटिशशाङ्कविरोचन रोचनया कृतचारु विशेपक शेपकमलभवसनकसनन्दन- नन्दनगुण मा नन्दय सुन्दर 'सुन्दर मामव भीतिविनाशन' वीर। भवत प्रतापतरणावुदैतुमिह लोहितायति स्फीते । दनुजान्धकारनिकराः शरण भेजुपे हाकुहरम् ॥ पुलिनतरङ्ग-युवतिकृतसङ्ग मदनरसभङ्ग-गरिमलसदङ्ग धीर । पशुपु कृपा तव दृष्ट्वा दुष्ट महारिष्टवत्सकेशिमुखा । दपं विमुच्य भीता पशुभाव भेजिरे दनुजा ॥ सविरुद बकुलभासुरमिदम् ॥३०॥ ३१. प्रय बकुलमगलञ्चण्डवृत्तम् -~~-अन्तो वकुलमङ्गलम् ॥ ३४ ।। चतुभिर्भगणरेव हर्यत्र पद भवेत् । रसेन्दुकलक तत्र तृतीये शृङ्खलास्थिता ।। ३५ ॥ [घ्या०] कोऽयं ? उच्यते । अन्त –बपुलभासुरानन्तर वकुलमङ्गल-बकुलमङ्गलास्य चण्डवृत्तमुच्यत इति शेष ॥३४|| पत्र चतुर्भि-चतु सख्याकं देवलरादिगुरुक -भगणरेव हयं -चतुष्कलं रसेन्दुफलक- षोडशमात्र पद भवेत् । किञ्च, तब-तस्मिन्पदे तृतीये अर्थात् तृतीये भगणेशृश्यलास्थिता चेद- १ गोवि चन्द्रक्ताप-1 २-२. गोवि.पवितरिय नास्ति। ३ गोवि. नून।
२५० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ ५० ३४ - ३५ ma भवति, तदा बकुलमङ्गलाभिधानं चण्डवृत्तं सविरुदं भवतीति वाक्यायः । पदविन्यासोपदेशस्तु पूर्ववदेव । षोडशमात्रत्वमुभयत्र समानं । परं तु चतुर्थभगणघटनमध्यसलायन्धनमात्रमेव बकुलभासुराद् भेदं बोधयतीत्यवधेयं सुधोभिरिति शिवम् ।।३५॥ यथा- त्वं जय केशव केशवलस्तुत वीर्यविलक्षण लक्षणवोधित केलिपु नागर नागरणोद्धत गोकुलनन्दन नन्दनतिक्त- सान्द्रमुदपक दर्पकमोहन हे सुपमानवमानवतीगण- माननिरासक रासकलाश्रित सस्तंनगौरवगौरवधूवृत' कुञ्जशतोपित तोपितयौवत रूपभराधिकराधिकयाचित भीरुविलम्बित लम्बितशेखर केलिकलालसलालसलोचन शेषमदारणदारुणदानव- मुक्तिदलोकन लोकनमस्कृत- गोपसभावक भावकशर्मद हन्त कृपालय पालय मामपि देव ।" पलायन फेनिलवक्त्रता च बन्धं च भीति च मूर्ति च कृत्वा । पवर्गदातापि शिखण्डमौले त्व शात्रवाणामपवर्गदोऽसि ।। प्रणयभरित - मधुरचरित भजनसहित - पशुपमहित देव ! अनुभूय विक्रम ते युधि लब्धाः कादिशीकत्वम् । हित्वा किल जगदण्ड प्रपलायाचक्रिरे दनुजाः । सविरुदं बकुलमङ्गलमिदम् ॥३१॥ २ गोवि. केलिकुलालस-। ३. गोवि. धीर । ४. गोवि. पराभवं। १ क कृत। ५. गोवि. भित्त्वा।
با है विरुदावली - प्रकरण [२५१ ३२ प्रय मञर्या कोरकरचण्डवृत्तम् मञ्जरी चात्र पूर्व श्लोको लेखस्तदनन्तरम् । कोरकाख्य चण्डवृत्त पदसख्यानसर्यदि ।। ३६ ॥ (व्या०] प्रस्यायं-अभिधीपत इत्यर्थ । प्रथमतो मञ्जरी तत कलिका भवतीति लौकि- काना प्रसिद्ध । तत्र चतुभि भगणे सुद्धराद्यन्तयमकाति कोरकाख्य चण्डवृत्त । यदि पदस्य आद्यन्तयोयमकाङ्कितं -यमकेन अङ्कितं सम्मकैरिति पावत, शुद्ध -शृङ्खलारहितश्चतुभि भग-प्रादिगुरुकंगणे पदम् । अथ च पदसख्या यदि नखे -विशत्या भवति, तदा कोरकास्य चण्डवृत्त भवति । शृङ्खलाराहित्यमेवात्र पूर्वस्माद् भेद गमयतीति ॥३६॥ तत्र प्रथम मञ्जरी, यथा- नवशिखिशिखण्डशिखरा' प्रसूनकोदण्डचित्रशस्त्रोव । क्षोभयति कृष्ण वेणी श्रेणीरेणीदृशा भवत ।। कोरकम, पथा- मानवतीमदहारिविलोचन दानवसञ्चयघूकविरोचन डिण्डिमवादिसुरालिसभाजित चण्डिमशालिभुजार्गलराजित दीक्षितयौवतचित्तविलोभन वीक्षित सुस्मितमार्दवशोभन पर्वतसम्भृति निर्युतपीवर- गर्वतम परिमुग्धशचीवर रञ्जितम परिस्फुरदम्बर गञ्जितकेशिपराक्रमडम्बर कोमलताङ्कितवागवतारक सोमललाममहोत्सवकारक हसरथस्तुतिशसितवशक कसवधूश्रुतिनुम्नवतसक रङ्गतरङ्गितचारुदृगञ्चल सङ्गतपञ्चशरोदयचञ्चल लुञ्चितगोपसुतागणशाटक सञ्चितरङ्गमहोत्सवनाटक तारय मामुरुससृतिशातन १क शिखण्डिशिखरा । २ गोवि. पर्वतसति- ३ खालीवर।
२५२ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प० ३७ - ३८ Mm धारय लोचनमत्र सनातन धीर! तुरगदनुसुताङ्गग्रावभेदे दधानः, कुलिशघटितटड्कोद्दण्डविस्फूर्जितानि । तदुरुविकटदष्ट्रोन्मु (म्)प्टकेयूरमुद्रः, प्रथयतु पटुता वः केशवो वामवाहु । माधव विस्फुर दानवनिष्ठुर योवतरञ्जित सौरभसञ्जित वीर! पलितकरणी दशा प्रभो मुहुरन्धकरणी च मा गता। सुभगकरणी कृपा शुभने तवाढ करणी च मय्यभूत् ।। सविरुद. कोरकोऽयम् ॥३२॥ ३३. अथ गुच्छकञ्चण्डवृत्तम् नसौ जनी जलो अमात् प्रयोजिती बुधा यदा । तदा त चण्डवृत्तक विभावयन्तु गुच्छकम् ॥ ३७ ॥ [च्या प्रयमर्थ -हे बुधा ! यदा नसौ-नगणसगणो, अथ च जनो-जगणनगणौ, ततश्च जलौ-जगणलघू क्रमात-प्रतिपद प्रयोजितौ भवत , तदा तु गुच्छक नाम चण्डवृत्त विभावयन्तु-कुर्वन्तु । अत्रोभयत्र स्वार्थे क ॥३७॥ किञ्च- षोडशाणं पद चात्र पदान्यपि च पोडश । सानुप्रासानि यमकरङ्कितानि च गुच्छके ।। ३ ।। [व्या०] सुगमम् । यया- जय जलदमण्डलीद्य तिनिवहसुन्दर स्फुरदमलकौमुदीमृदुहसितबन्धुर वजहरिणलोचनावदनशशिचुम्बक प्रचलतर'खजनद्य तिविलसदम्बक स्मरसमरचातुरोनिचयवरपण्डित प्रणययुतराधिकापटिमभरभण्डित क्वणदतुलवशिका हृतपशुपयौवत स्थिरसमरमाधुरीकुलरमितदैवत १ गोवि प्रचुरतर-। २. क.वीक्षिका प०३६ ] ६. विरुदावली-प्रकरण [ २५३ ग्रथितशिखिचन्द्रकस्फुटकुटिलकुन्तल श्रवणतट'सञ्चरन्मणिमकरकुण्डल प्रथित तव ताण्डवप्रकटगतिमण्डल द्विजकिरणधोरणीविजितसिंततण्डुल स्फुरित तव दाडिमीकुसुमयुतकर्णक' छदनवरकाकलीहृतचटुलतर्णक' "प्रकटमिह मामके हृदि वससि माधव स्फुरसि ननु संततं सकलदिशि मामव' धीर! पुनागस्तवकनिबद्धकेशजूटः, कोटीरीकृतवरकेविपक्षफूटः । पायान्मां मरकतमेदुरः स तन्वा, कालिन्दीतटविपिनप्रसूनधन्वा । गर्गप्रिय जय भर्गस्तुत रस सर्गस्थिरनिज-वर्गप्रवणित धीर! दनुजवधूवैधव्यव्रतदीक्षाशिक्षणाचार्यः । स जयति विदूरपाती मुकुन्द तव शृङ्गनिर्घोपः । सविरुदं गुच्छारयं चण्डवृत्तम् ॥३३॥ ३४. अय कुसुमञ्चण्डवृत्तम् चतुभिर्नगणर्यत्र पदं यमकितं भवेत् । अनन्तनेत्रप्रमित कुसुम तत्प्रकीर्तितम् ॥ ३६॥ [च्या०] अनन्त-शून्यं नेत्रं-द्वयं ताभ्यां प्रमितं-गणितं पदं यत्र तत्, विवालिपदमित्यर्थः । शेषं सुगमम् ॥३६॥ कुसुमनिकरनिचितचिकुर' नखरविजितमणिजमुकुर सुभटपटिमरमितमथुर विकटसमरनटनचतुर यथा- १. गोवि. श्रवणनद-। २. गोवि. प्रथितनव-1 ३. गोवि. स्फुरितवरदाडिमोतुमुमयुग- कर्णक। ४.४. गोवि.पंक्तिद्वयं नास्ति । ५.क. नत्वा। ६. गोवि. रचितचिकुर।
२५४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वित्तीयखण्ड [१० ३६ समदभुजगदमनचरण निखिलपशुपनिचयशरण' अमलकमलविशदचरण सकलदनुजविलयकरण' मुदितमदिरमधुरनयन शिखरिकुहररचितशयन रमितपशुपयुवतिपटल मदनकलहघटनचटुल विषमदनुजनिवहमथन भुवनरसदविशदकथन कुमुदमृदुलविलसदमल- हसितमधुरवदनकमल मधुपसदृशविवलदलक मसृणघुसृणकलिततिलक निभूतमुपितमथितकलश सततमजित मनसि विलस धीर ! सखि! चातकजीवातुर्माधव सुरकेकिमण्डलोल्लासि । तव दैत्यहंसभयद शृङ्गाम्बुदगर्जितं जयति ॥ पुरुषोत्तम वीरव्रत यमुनाद्भुतसोरस्थित मुरलिध्वनिपूरक्रिय सुरभोव्रजनादप्रिय ! वीर! जगतीसभावलम्ब: स तव जयत्यम्बुजाक्ष दो.स्तम्भः । रभसाद्विभेद दनुजान् प्रतापतृहरिर्यतोऽभ्युदितः ॥ सविरुदं फुसुममिदम् ॥३४॥ एते महाकलिकारूपस्य चण्डवृत्तस्य नवभिर्मताः प्रभेदाः । इत्येवं चतुरिंत्र- शतिः ३४ प्रभेदाः। *इति धीवृत्तमौक्तिके विरुदावल्यां महाकलिकाहप-पुरुषोत्तमादिकुसुमान्त' सविरुदभवान्तरं चण्डवृत्तप्रकरणं द्वितीयम् ।। १. क. चरण । २-२, गोवि. पंक्तिद्वयं नास्ति । ३. ख. नवगभिताः। ४-४. पंक्तिरिय नास्तिक, प्रती।
प० १-२] ९. विरुदावली प्रकरण [ २५५ [विरुदावल्या तृतीय त्रिभनी कलिकाप्रकरणम् ] १. प्रथ दण्डकत्रिभनी कलिका अथ त्रिभङ्गीकलिकरसु दण्डकत्रिभगोकलिकाभित तद्गतव' लक्ष्यते । तद्भङ्गाना' बाहुल्यादेवास्या कलिकाया दण्डकत्रिभङ्गीति सज्ञा । अथाऽस्या लक्षण सम्यक् सोदाहरणमुच्यते । भगवाहुल्यतश्चास्या सज्ञाप्यान्वयिका' भवेत् ॥१॥ यथा- नगणयुगलादनन्तरमिह चेद् रगणा भवन्ति रन्ध्रमिता । विरुदावल्या कलिका कथितेय दण्डकत्रिभङ्गीति ॥ २ ॥ [च्या०] रन्ध्राणि-नव कथिता इत्यत्र तदित्यध्याहार । भङ्गबहुत्वाच्चास्या दण्डक- त्रिभङ्गी सज्ञेति फलितोऽयं । अत्र च पदरचनाया पदविन्यास स्वेच्छया भवतीति सिंहाव- लोकनरीत्यावगन्तव्यम् । यया- चित्र मुरारे सुरवरिपक्ष- स्त्वया समन्तादनुवद्धयुद्ध । अमित्रमुच्चरविभिद्य भेद, मित्रस्य कुर्वन्नमित प्रयाति ॥ श्रितमधजलधेर्वहिन चरित्र सुचित्र विचित्र फणित्र समिन पवित्र लविन रुजाम् । जगदपरिमितप्रतिष्ठ पटिप्ठ बलिष्ठ गरिष्ठ 'म्रदिष्ठ सुनिष्ठ लघिष्ठ दविष्ठ धियाम् । निखिलविलसितेऽभिराम सराम मुदा मजुदाम- नभाम ललाम धृतामन्दधाम नये । मधुमथनहरे मुरारे पुरारेरपारे ससारे विहारे सुरारेरुदारे च दारे प्रभुम् । स्फुरितमिनसुतातरङ्गे विहङ्गेशरङ्गेण गङ्गे- ऽष्टभङ्गे भुजङ्गेन्द्रसङ्गे सदङ्गन भो । १. ख अन्तर्गतव। २ क. तानां । ३. ख, सज्ञाप्यानथिको। कुर्वनमत । ५-५. गोवि. वरिष्ठ प्रदिष्ठ सुनिष्ठ ददिष्ठ । ४. गोवि २५६ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ प० ३-४ शिखरिवरदरीनिशान्तं प्रयान्तं सकान्तं विभान्त नितान्तं च कान्तं प्रशान्तं कृतान्तं द्विपाम् । दनुजहर भजाम्यनन्तं सुदन्तं नुदन्तं दृगन्तं हसन्तं 'भजन्तं चरन्तं' भवन्त सदा । वीर ! पीत्वा बिन्दुकण मुकुन्द भवतः सौन्दर्यसिन्धोः सकृत्- कन्दर्पस्य वशं गता विमुमुहुः के वा न साध्वीगणाः । दूरे राज्यमयन्त्रितस्मितकला भ्रूवल्लरीताण्डव- क्रीडापाङ्गतरङ्गितप्रभृतयः कुर्वन्तु ते विभ्रमाः ॥ चारुतट रासनट गोपभट पीतपट पद्मकर दैत्यहर कुजचर वीरवर नर्ममय कृष्ण जय नाथ ! ससाराम्भसि दुस्तरोमिंगहने गम्भीरतापत्रयी- कुम्भीरेण गृहीतमुग्रगतिना क्रोशन्तमन्तर्भयात् । दीप्रेणाद्य सुदर्शनेन विवुधक्लान्तिच्छिदाकारिणा, चिन्तासन्ततिरुद्ध मुद्धर हरे मच्चित्तदन्तीश्वरम् । इति सविरुदा दण्डकत्रिभङ्गी कलिका ।। २. अय सम्पूर्णा विदग्धत्रिभनी कलिका अथापरा सम्पूर्णा विदग्धविभगी कलिका लक्ष्यते । यथा- युग्मे भगस्तनौ त्र्युक्तो भौ चान्ते यन मित्रितौ। वसुसख्यं परे ह्यत्र' पदे सा स्यात् त्रिभङ्गिका ॥३॥ विदग्धपूर्वा सम्पूर्णा कलिकाऽतिमनोहरा । प्राद्यान्ताशी.पद्ययुक्ता- [व्या०] एतद् युक्तं भवति । यत्र पदे-यस्यां कलिकाया या युग्मे-द्वितीयाक्षरे भङ्गो भवति । तथा तनौ-तगणनगणौ स्तः । तौ घयुक्तो-वारत्रयमुक्तौ श्रेत् । अन्ते-तना प्रयान्ते मिश्रितो- २. गोवि. मतिना। ३. ख. भवेद् यत्र। ४. स १. गोवि. वसन्तं भवन्तं.. तनत्रयान्ते।
प. ३०४ ] ६. विपदावली-प्रकरणम् [ २५७ सलानो भौ-भगणौ च यदि स्त । यत्र चवविध घसुसस्य पद भवेत्, सा विदग्धपूर्वा-विदरध- शब्दपूर्वा सम्पूर्णा प्रथमलक्षितलक्षणविलक्षणा प्रतिमनोहरा विदापत्रिभङ्गीकलिका स्यात् इत्पन्वय । अष्टपदत्वमेव पूर्वोक्ताया सकाशात् बलक्षण्ये स्फुटमेव लक्षयति । एतदेव चास्या सम्पूर्णत्वमिति । किञ्च, प्राद्यन्तयो कलिकाया इति शेष, प्राशी पद्ययुक्ता-पाशी पद्याभ्या युक्ता माशीर्वादयुक्तपद्याभ्यां सयुक्ता इत्पर्य । प्राद्यन्तपदसाहित्यं च तत्कलिकायुक्तेषु पूर्वो- क्तेषु सर्वेषु धण्डवृत्तषु शेप सुधीभिरित्युपदेशरहस्य, अप्रैपि तथैव वक्ष्यमाणत्वादिति । इयमेव च सण्डावलौति ध्यपदिश्यते, तथा चाप्रेतयंय लक्षयिष्यमाणत्वादिति । यथा- उद्वेलत्कुलजाभिमानविकचाम्भोजालिशुभ्राशव ' केलीकोपकपायिताक्षिललनामानाद्रिदम्भोलय । कन्दर्पज्वरपीडितव्रजवघूसन्दोहजीवातवो, जीयासुभंवतश्चिर यदुपते स्वच्छा कटाक्षच्छटा ॥' चण्डीप्रियनत चण्डीकृतवलरण्डीकृतखलवल्लभ वल्लव पट्टाम्बरधर भट्टारक बककुट्टाक ललितपण्डितमण्डित नन्दीश्वरपति-नन्दीहितभर सदीपितरससागर नागर अङ्गीकृतनवसङ्गीतक वर-भगीलवहृतजङ्गमलङ्गिम गोत्राहित कर गोवाहितदय गोत्राधिपतिशोभनलोभन वन्यास्थितबहुकन्यापटहर धन्याशयमणिचोर मनोरम शम्पारुचिपट सम्पालितभव-कम्पाकुलजन फुल्ल समुल्लस उर्वीप्रियकर खर्वीकृतखल दर्वीकरपतिगवितपर्वत वोर! पिष्ट्वा सड़ ग्रामपट्टे पटलमकुटिले दैत्यगोकण्टकाना, कीडालोठीविघट्टै स्फुटमरतिकर नचिकीचारकाणाम् । वृन्दारण्य चकाराखिलजगदगदडारकारुण्यकारो', य सञ्चारोचित व सुखयतु स पटु कुञ्जपट्टाधिराज । पिच्छलसदघननीलकेश चन्दनाँचतचारुवेश खण्डितदुर्जनभूरिमाय, मण्डितनिर्मलहारिकाय । धीर। १ क शुभ्राशन । २ गोवि पद्य नास्ति । चाहकाणाम ५ गोवि कारुण्यधार । ३ क पदलमकुलिते। ४ गोवि २५८ ] वृतमोक्तिक - द्वितीयखण्ड [२०४-६ गीर्वाण स्फुटमखिल विवर्द्धयन्त, निर्वाण दनुजघटासु सघटय्य । कुर्वाण व्रजनिलय निरन्तरोद्यत्- पणि मुरमथन स्तुवे भवन्तम् । द्वितीया सम्पूर्णा सविरुदा विदाधनिभङ्गो कलिका १२१ एते चण्डवृत्तस्य गर्भितान्तर्गताः प्रभेदा । अथ मिश्रिताः ३. मिश्रकलिका -मिश्रिता चाथ कथ्यते ॥ ४ ॥ आद्यन्ताशी पद्ययुक्ता गद्याभ्या चापि सयुता। मध्यत कलिका कार्या सदण्डर्भनर्गण ॥५॥ विरुदेनान्विता चापि रमणीयतरा मता। पट्पदा सापि विज्ञेया छन्द शास्त्रविशारदै ॥ ६ ॥ [प्पा०] अस्यार्य ~अथ-विदग्धत्रिभङ्गीकलिकानन्तर मिश्रिता मिश्रालिका प्यते- उच्यत इत्यर्थ । ता विशिनष्टि- कलिकाया प्राद्यन्तयोराशी पद्याभ्या युक्ता, तथा प्रान्तियोरेव गद्याभ्या च सपुता मध्यतस्तयोरित्यर्थ , कलिका कार्या। कलिकां विशिनष्टि सदण्ड -दण्डो लघु.' तत्सहित भनजे -भगणनगणनगरन्विता सयुक्ता इत्यर्थ ॥४५।। तथा विरुदेन चाप्यन्विता । अतएवातिरमणीयतरा मता-सम्मता। सापि च चन्द - शास्त्रविशारदं षट्पदा विज्ञेया इत्युपदिश्यत इति वाक्यार्थ । विरुदसाहित्य च विदाध- विभङ्गोलिकालक्षणकारिकायामप्यवधेय सुधीभिरिति शिवम् ॥६॥ अत्र चादौ प्राशी पद्य , ततो गद्य , ततश्च पटपदीकलिका, तदनन्तरमपि गध , ततो घिरद, अनन्तरमपि गद्यमेव । ततोपि विरुद घोर सम्बोधनोपलक्षित, सन्तेि चाशी पद्यम, इति क्रमेणोक्तलक्षणोपलक्षिता मिश्रा कलिका कार्या, इति फलितोऽर्य । प्रया- उदन्चदतिमन्जुलस्मितसुघोमिलीलास्पद, तरङ्गितवराङ्गनास्फुरदनगरगाम्बुधि । दृगिन्दुणिमण्डलोसलिलनिरस्यन्दनो, मुकुन्द मुखचन्द्रमास्तव तनोतु शर्मातुलम् ।' २. गोदि तनोति शर्माणि न ।
५० ४.६] है. विरुदावली-प्रकरणम् [२५६ दुष्टदुर्दमारिप्टकण्ठीरवकण्ठविखण्डनसेलदष्टापद नवीनाष्टापदविस्पद्धिपदा- म्बरपरीत गरिप्टगण्डशैलसपिण्डवक्ष पट्ट पाटव- दण्डितचटुलभुजङ्गम कन्दुकविलसितलड्डिम भण्डिल'विकिल मण्डित सङ्गरविहरणपण्डित दन्तुरदनुजविडम्बक कुण्ठितकुटिलकदम्बक । खचिताखण्डलोपलविराजदण्डजराजमणिम[य] कुण्डलमण्डितमञ्जुलगण्डस्थ- लविशङ्कटभाण्डीरतटीताण्डवकलारञ्जितसुहृन्मण्डल नन्दविचुम्बित-कुन्दनिभस्मित गन्धकरम्बित शन्दविवेष्टित तुन्दपरिस्फुर-दण्डकडम्बर। "दुर्जनभोजेन्द्रकण्टककण्ठकन्दोद्धरणो दामकुद्दाल विनम्रविपदारुणध्वान्त- विद्रावणमार्तण्डोपमकृपाकटाक्ष शारदचन्द्र मरीचिमाधुर्यविडम्बितुण्डमण्डल लोष्ठीकृतमणि कोष्ठीकुलमुनि- गोष्ठीश्वर मधुरोष्ठीप्रिय पर- मेष्ठी]'डित परमेष्ठीकृतनर धीर । उपहितपशुपालीनेत्रसारङ्गतुष्टि, प्रसरदमृतधाराधोरणीधौतविश्वा । पिहितरविसुधाशु प्रागुतापिञ्छरम्या, रमयतु बकहन्तु * कान्तिकादम्बिनी व । इति मिश्रकलिका १३॥ प्रय चण्डवृत्तस्य मिथित प्रभेद । एवमन्येपि । इति विरुदावल्या चण्डवृत्तमेव दण्डकत्रिभङ्गयाद्यवान्तर- त्रिभङ्गीकलिका प्रकरण तृतीयम् ।। इति श्रीवृत्तमौक्तिके वात्तिके सलक्षण चण्डवृत्तप्रकरण समाप्तम् ॥१॥ १. ख तण्डिल। २ क. विचकित। ३ गोदि मणिम[य] नास्ति । ४ गोवि दुर्जनभोजेन्द्रकटककदम्बोद्धरणो। ५. गोवि. शारदाचण्ड-। ६ 1-1 कोष्टगतोंशो नास्ति क प्रती। ७ क.ख. बहकतु ।
२६० ]] वृत्तमौक्तिक-द्वितीयखण्ड [१-४ [विरुदावल्यां साधारणमत चण्डवृत्त चतुर्थप्रकरणम्] अथ साधारणं चण्डवृत्तम् तत्र- स्वेच्छया तु कलान्यासः साधारणमिद मतम् । न च सप्तदशादूवं न वर्णत्रितयादधः ।। १ ।। क्रियते यर्गणराद्यान्तैरेव सकलाः कलाः । प्रस्वादिवर्णसयोगेप्यत्र वर्णस्य लाघवम् ॥ २॥ [च्या०] अस्याः- स्वेच्छया इत्यादि सुगमम् । तत्राक्षरनियममाह-न चेति । न च सप्तदशावर्णादूधं न वा वर्णनितयादधः कला कार्या इति शेषः । किञ्च नियमान्तरमाह- वियत इति । प्राद्यात्-पति यैरेव गणः कलाप्रारम्भः क्रियते तैरेव सकला अपेक्षिताः कला. कर्तव्या इति शेषः । अपि च 'प्रस्वादीति' प्रस्वेति प्रादिशब्देन-ग-प्र स्फु-स्मि-स्म-ववेत्यादीना सयुक्तानां वर्णाना सयोगेपि सति अत्र छन्दःशास्त्रे तत्प्रकरणस्थले वा पूर्वपूर्ववर्णस्य लाघवं-लघुत्वं अवगन्तव्यमित्युत्सर्गः। तत्र अक्षरे, यथा- अङ्गण रिङ्गण। इत्यादि । संयुक्ते, यया- प्रणयप्रवण। इत्यादि । एव गणान्तरेपि बोद्धय्यम् । चतुर्वणे सर्वलघौ यया- विधुमुख कृतमुख । इत्यादि । एव प्रस्तारान्तरेपि सर्वलघ्वादिस्यले स्वेच्छातः फलान्यासोद्रष्टव्यः । मानावृत्ते, यया- चतुष्कलद्वयेनापि कला जगणवजिताः । [प्या०] फतव्या इति शेषः। यया--- तारापतिमुख सारापितमुख। इत्यादि। प्रस्तारद्वितयेप्येव कलान्यासः स्वतः स्मृतः ।।३॥ [च्या०] स्वत. स्वेच्छातो भवतीति स्मृत इत्यर्यः॥३॥ साधारणमतं चैतद् दिङ्मात्रमिह दशितम् । विशेषस्तत्र तत्रापि नोक्को विस्तारशङ्कया ।। ४ ।। [म्या०] सत्र सत्रायोति-तत्तत्प्रस्तारेपु इत्यः॥ प्रति विपरायल्यामवान्तरं गाधारणमतं पण्डवृत्त-प्रकरण चतुषम् ।। .
प०१.६] है विरदावली-प्रकरण www . १ अथ साप्तविभक्तिकी कलिका स्तुतिविधीयते विष्णों सप्तभिस्तु विभक्तिभि । यत्र सा कलिका सद्भि या साप्तविभक्तिको ॥१॥ अथोच्यते विभक्तीना लक्षण कविसम्मतम् । तत्तद्गणोपनिहित यथाशास्त्रमतिस्फुटम् ॥ २ ॥ भसो तु घटितो यन प्रथमा सा प्रकीर्तिता। नयाभ्या तु द्वितीया स्यात् तृतीया ननसा लघु ॥ ३॥ विभिस्तस्तु चतुर्थी स्यात् यन यो पञ्चमी तु सा । ताभ्या तु पष्ठी विज्ञया यत्र सौ सप्तमी तु सा ।। ४ ।। विहाय प्रथमा ज्ञेया सर्वा साधारण मते । स्थितास्तु गणसाम्येन स्वेच्छयैव यत कला ॥ ५॥ उदाहरणमेतासा क्रमतो वृत्तमौक्तिके । कथ्यते कविसन्तोपहेतवे* हरिकीर्तन ॥६॥ व्या०] सुलभार्थास्तु कारिका इति न व्याख्यायन्ते । क्रमेणोदाहरणानि, यथा- य स्थिरकरुण स्तजितवरुण । तर्पितजनक सम्मदजनक ॥१॥ प्रणतविमाय जगुरनपायम् । घनरुचिकाय सुकृतिजना यम ॥२॥ सुजनकलितकथनेन प्रबलदनुजमथनेन । प्रणयिषु रतमभयेन प्रकटरतिषु किल येन ॥३॥ यस्मै परिध्वस्तदुष्टाय चक्रु स्पृहा माल्यदुष्टाय' । दिव्या स्त्रिय केलितुष्टाय कन्दर्परङ्गण पुष्टाय ॥ ४ ॥ धृतोत्साहपूराद द्युतिक्षिप्तसूरात । यतोऽरिविदूराद भय प्राप भूरात् ॥५॥ यस्योज्वलाङ्गस्य सञ्चार्यपाङ्गस्य । वेणुर्ललामस्य हस्तेऽभिरामस्य ॥ ६ ॥ स्मितविस्फुरित ऽजनि यत्र हित । रतिरुल्लसित सदृशा ललिते ॥ ७ ॥ इति सप्तविभक्तय ।* *.*.चिह्नान्तगतोयमशो नास्ति ख प्रतो। १ ख यता। २ गोवि जुष्टाय ।
२६२ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० ७-६ *अथ सम्बुद्धि तनी [तु] घटिती यत्र तत्सम्बोधनमीरितम् । एव सम्बोधनान्तेय विभक्ति सप्तकीत्तिता ॥७॥ यथा- सत्व जय जय दुष्टप्रतिभय ! भक्तस्थितदय'! लुप्तवजभय ।।।। वीर। मित्रकुलोदित नर्मसुमोदित रञ्जितराधिक शर्मभराधिक । विरुदमिदम्- धीर। हसोत्तमाभिलपिता सेवकचकेषु दर्शितोत्सेका । मुरजयिन कल्याणी करुणाकल्लोलिनी जयति । इति साप्तविभक्तिकी कलिका ।। २ प्रक्ष प्रक्षमयी कलिका अकारादि-क्षकारान्त-मातृकारूपधारिणी। विष्णो स्तुतिपरा सेय, कलिकाऽक्षमयी मता ॥ ८ ॥ अत्र स्युस्तु रगा सर्वे गणा जगणवजिताः। मातृकावर्णघटिता क्रमात् भगवत स्तुतौ ।।६।। [च्या०] अस्यार्य - अत्राक्षमयो भगवत स्तुतौ सर्वे तुरगा-चतुष्कला कर्ण द्विजगण भगण- सगणा , जगणजिता गणा क्रमात् मातृकावणेषु ययायय घटिताश्चेत स्पुस्तदा पूर्वोक्तविशेषण- विशिष्टा सेय प्रक्षमयो कतिका मता-सम्मता इति पूर्वश्लोकेन अवय । मात्रावृत्ते तु 'चतुष्पल- द्वयेनापि कलाजगणजिता' इत्यत्रय उस्तत्वाद प्रक्षमयोमात्रावृत्तमेवेति युक्तित समुत्प- ग्याम । सर्वत्र ध मायावृत्तप्वेव जगणस्य हेयत्वेन निर्देशाच्च । यया- मधुरेप ! माधुरीमय माधव मुरलीमतल्लिकामुग्ध । मम मदनमोहन मुदा मर्दय मनसो महामोहम् ।। अच्युत जय जय मार्त्तवृपामय । इन्द्रमसाईन ईतिविशातन ॥१॥ उज्ज्वल विभ्रम जिनवित्रम! ऋद्धिधुरोधुर' ऋभुदयापर ।। २॥ १. गोवि भरतस्थिादय । २. गोवि पुरोटर। *."घितगतोंसो मास्ति र प्रतो ।
प० ७.६] 8. विरुदावली -प्रकरण लदिवकृपेक्षित ल वदलक्षित । एधितवल्लव ऐन्दवकुलभव ।। ३ ।। प्रोज.स्फूर्जित औग्र्यविवर्जित । अंसविशङ्कट अष्टापदपट ॥४॥ इति षोडशस्वरादयः। प्रय कादयः पञ्चवर्गाः कङ्कणयुतकर खण्डितखलवर' । गतिजितकुञ्जर घनघुसृणाकर ॥ ५ ॥ हुतमुरलीरत चलचिल्लीलत। छलितसतीशत जलजोद्भवनस' ॥६॥ झपवरकुण्डल मोडू पितदल। टङ्कितभूधर ठसमाननवर ॥७॥ डमरघटाहर ढक्कितकरतल । णखरघृताचल तरलविलोचन ।।।। थूत्कृतखञ्जन दनुजविमर्दन । धवलावर्द्धन नन्दसुखास्पद ॥६॥ पङ्कजसमपद फणिनुतिमोदित । बन्धुविनोदित भड्गुरितालक ॥ १० ॥ मञ्जुलमालक- इति कादिपञ्चवर्गाः। प्रय यादयः -यष्टिलसद्भुज रम्यमुखाम्बुज ललितविशारद ।। ११ ॥ वल्लवरङ्गद शर्मदचेष्टित । पट्पदवेष्टित सरसीरधर ।। १२ ।। हलधरसोदर क्षणदगुणोत्कर ॥ १३ ॥ इति यादयः। वीर। १. क. खलपर। २. गोवि. धनघुसशाम्बर । ३. गोपि. जलजोद्भवनुत । ४. गोयि. ठनिभाननवर।
२६४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१० १०.११ . कर्णे कल्पितकणिकः कलिकया कामायितः कान्तिभिः, कान्तानां किलकिञ्चितं किसलयं कीलालधिः कीतिभिः । कुर्वन् कूर्दनकानि केशरितया कैशोरवान् कोटिशः, कोपीकोकुलकंसकुष्टकृतिकः' कृष्णः क्रियात् कांक्षितम् । सौरीतटचर गौरीव्रतपर- गौरीपटहर चौरीकृतकर। धीर! प्रेमोरुहट्टहिण्डक कक्खटसुभटेन्द्र कण्ठकुट्टाक । कुरु कौकुमपट्टाम्बर भट्टारक ताण्डवं हृदि मे ।। इति प्रक्षमयी कलिका ।। ३. अय सर्वलघुककलिका प्रथ सर्वलघुकं कलिकाद्वयं युगपदेय लक्ष्यते । तत्र- नगणर्पञ्चभिर्यत्र लघ्वन्तर्वापि तैः पुनः । प्रमेण पञ्चदशभिर्वर्णः षोडशभिस्तथा ॥ १० ॥ प्रस्तारद्वयमन्त्यं स्याल्लघुभिः सकलाक्षरः । तत्सर्वलघुकं प्रोक्तं कलिकाद्वयमुत्तमम् ।। ११ ॥ [प्या०] अस्पायमर्य:-यत्र पञ्चभिः-पञ्चसंख्याकनंगणः-निलयुकगणः पर्व पत्र, घ- पुनः लघ्वन्तपितरेव पञ्चभिनंग:-क्रमेण पञ्चदशभिर्वणः पोडाभिर्वा पदं भवति । या सग्देन सप्तदशाक्षरमपि पवं कर्तव्यम् । एतदूवं तु न कर्तव्यमेवेत्युपदेशः । न च सप्तदशा- दूप्पमित्यत्रंथ निषेघस्य उक्तत्वात् । स्वेच्छया कलान्यासस्तु सप्तददायर्णपर्यन्तमेव साधारण- मते घमत्कारकारी नेतद्वंमिति, प्रस्तारद्वपेपि सर्वलघुभिस्समस्तर्यगर्यदन्त्यं प्रस्तारद्वयं भवति तत् सर्वलघुकमुत्तमं कलिकादयं भवतीत्यर्थः। तत्र पञ्चदसातरी सर्वलपुका कलिका यथा- गोपस्त्रीविद्युदालीवलयितवपुपं नन्दगोपादिकेकि- व्यूहानन्दैक हेतु दनुजशतभमोद्दामदावाग्निशम् । ईपदास्याम्बुधारावितरणभृतमद्वन्धुचेतस्तडागं, चित्तं श्रीकृष्ण मेऽद्य श्रय सारणमहो दुःसदाहोपशान्त्य' । चरणचसनहतजठरराकटक रजवदलन पागतपरकटक १. गोवि. कोपोरोपुरसरष्टातिरः। ४. गोषि.मरठापटक। २. पूर्टि। ३. गोवि. पूर्णपत्र मास्ति ।
५० १०-११] ६ विरुदावली - [ २६५ प्रकरण नटनघटनलसदगवरकटक सकनकमरक्तमयनवकटक ॥१॥ इति पञ्चदशाक्षरी सर्वलघुका कलिका । अथ पोडशाक्षरी सर्वलघुका कलिका कपटरुदितनटदकठिनपदतट- विघटितदघिघट निबिडितसुशकट रुचितुलितपुरटपटलरुचिरपट- घटितविपुलकट' कुटिलचिकुरघट । रविदुहितृनिकटलुठदजठरजट-' विटपनिचितवटतटपटुतरनट- निजविलसितहठविचटितसुविकट- चटुलदनुजभट' जय युवतिष शठ । धीर! स्फुटनाट्यकडम्बदण्डित-द्र ढिमोड्डामर दुप्टकुण्डली । जय गोष्ठकुटुम्बसवृतस्त्वमिडाडिम्वकदम्बगुम्बक ॥ रशनमुखर सुखरनखर दशनशिखर-विजितशिखर । वीर! विवृतविविधबाधे भ्रान्तिवेगादगाधे, धवलित भवपूरे मज्जतो मेऽविदूरे । अशरणगणबन्धो हा' कृपाकौमुदीन्दो, सकृदकृतविलम्ब देहि हस्तावलम्बम् ॥ नामानि प्रणयेन ते सुकृतिना तन्वन्ति तुण्डोत्सव, धामानि प्रथयन्ति हन्त जलदश्यामानि नेत्राञ्जनम् । सामानि श्रुतिशप्कुली मुरलिकाजातान्यलकुर्वते, कामा निर्वृतचेतसामिह विभो । नाशापि न शोभते ॥ इति पोडशाक्षरी सर्वलघुका कलिका ३॥ ४. क. १. गोवि विपुलघट। २. गोवि. जरठजट। ३ गोवि. चलदनुजघट। घटितोडामर। ५. गोवि बलवति। ६. गोवि. है।
२६६ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ प० १२-१८ प्रय सर्वासु कलिकासु स्थिताना विरुदाना युगपदेव लक्षणमुच्यते--- वसुपट्पक्तिरविभिर्मनुभिश्चापि सर्वत.। कलिकासु कवि कुर्याद् विरुदाना तु कल्पनम् ।। १२ ।। व्या०] अस्यार्य --सर्वासु कलिकासु वस्वादिभि पञ्चभि सस्यासकेतश्चकारोक्तरपि कविविरुदाना कल्पन कुर्यात । तथा हि-कस्याश्चित् कलिकायामप्टकलिक विरुद, कस्याश्चित पटकलिक विरुद, अपरस्या दशकलिक विरुद, अन्यस्याञ्च द्वादशकलिक विरुद, कस्याश्चित् कलिकाया चतुर्दशकलिक विरुदम् । कुत्रापि चकारोपदिष्ट च विरुदत्रितयमिति क्रमेण सर्वत्र विरुदकल्पन कविना कार्यमित्युपदिश्यते ॥१२॥ किञ्च- धोर-वीरादिसवुद्धया कलिका विरुदादिकम् । देव-भूपतितत्तल्यवर्णनेपु प्रयोजयेत् ॥ १३ ॥ सस्कृतप्राकृतश्रव्य शौर्यवीर्यदयादिभि । कीतिप्रतापप्राधान्य कुर्वीत कलिकादिकम् ॥ १४ ॥ [थ्या०] सुगमम् ॥१३, १४॥ अपि च- गुणालङ्कारसहित सरस रीतिसयुतम् । म यानुप्राससच्छब्दाडम्बर' जीवित द्वयो । १५ ।। [प्या०] द्वयो -कलिकाविरुदयोरित्ययं ॥१५॥ कलिकाश्लोकविरुदनिक विंशत्लिकावधि । पञ्चनिकोवं विरुदावली कविभिरिप्यते ॥ १६ ॥ च्या०) प्रस्यार्थ -अस्यां कारिफायां सम्पूर्णा विरुदावली लक्षयति-विरदायली तायत् पलिकाश्लोषविरदस्त्रिभि सम्पद्यते । तत्र कलिकाश्लोकविरुदमिति त्रिक, पञ्चनिषो. प्व-पञ्चत्रिक, पञ्चदश तयं एतदारभ्य इत्यर्ष । वियदयधीत्यपेक्षायामुच्यते-त्रिशत्रिका पि-प्रयस्त्रियावधिश्चेत् क्रियते तदा प्रखण्डा विरदायली भवति । एतादृशी विपदावसी कपिभिरिप्यते यत्तुं यत्यत इत्यर्थ । यया श्रुतय्याख्याने तु महतो विरदावली स्यात् । तया प पञ्चदशादारभ्य त्रिशतत्रिकं नवतिस्सम्पद्यते, तत्पर्यन्त सति महतो विरुदावली भवतीति । सकोचाप्तया व्याख्यातमस्माभिरिति सर्व समन्जसम् ॥१६॥ पवचित्तु पलिकास्थाने केवल गद्यमिप्यते । पदमाद्यन्तयोराशी. प्रधान सुमनोहरम् ।। १७ ।। विचतुःपञ्चकलिका श्लोकास्तावन्त एव हि । १. स. पारम्बर।
प०१८ - १६] ६. विपदावली-प्रकरण [२६७ च. [घ्या.) इति, साढेन इलोक्न विरुदावलीलक्षणे कस्यचिन्मत उपन्यस्यति । क्वचित्त- कस्याश्चित् कलियायां-कलिकास्थाने गद्यमेवोभयत्र केवल सविरुदं वा भवतीतीप्यते । किञ्च, प्राचन्तयो -कलिकाविरदयो, प्राशी प्रधान-आशीर्वादोपलक्षित पद्यमतिसुमनोहर भवतीति ॥१७॥ घ्या०] कियन्त्य कलिका, कियतश्च श्लोका कार्या इत्यपेक्षरयामुच्यते त्रिचतु • पञ्चकलिका स्वेच्छया पतंग्या । श्लोका अपि तावन्त एव हि स्वेच्छयैव विधेया इत्युपदेश । एतत् सर्वं यथास्थानमस्माभि समुदाहृतम् ।। १८ ॥ घ्या०) सुगमम् ॥१६॥ विरुदावलीपाठफलमुपदिशति-- रम्यया विरुदावल्या प्रोक्तलक्षणयुक्तया । स्तूयमान प्रमुदित श्रीगोविन्द प्रसोदति ॥ १६ ।। श्री इति धीवृत्तमौरितके वात्तिके विरुदावली- प्रकरण नवममा १. ख 'च'नास्ति। 'श्री'नारति। २. व इत्युपेक्षायामुच्यने । ३. गोवि. वासुदेव ।
दशमं खण्डावली प्रकरणम् प्रय खण्डावली आशी:पद्यं यदाद्यन्तयोः' स्यात् खण्डावली त्वसो । विनव विरुदं नानागणभेदैरनेकधा ॥१॥ १. अथ तामरसं खण्डावली पदे चेद् रगणः सौ च लघुद्वयनिवेशनम् । तदा तामरसं नाम साधारणमते भवेत् ॥ २॥ (व्या०] अनयोः कारिकयोरयमर्यः । यदा कलिकाया आद्यन्तयोः विरुद विनं व प्राशी:- पद्य भवति तदा नानागणभेदरनेकधा असो पण्डावली स्यादित्यन्वयः । किञ्च, तम पदे चेत् रगणो भवति, अथ च सो-सगणौ भवतः, ततो लघुद्धपनिवेशनं-लघुद्वयस्थापनं चेत्-स्यात्तदा साधारणमते स्वेच्छाकलाविन्यासलक्षणे तामरस इति नाम मण्डावली भवतीति वाक्यार्थः। १-२॥ यथा- कलक्वणितवंशिकाविकलनागरीसागरी- भवद्विपमशायकद्विगुणवृद्धिशुभ्रद्युति । पतङ्गतनपातटी-वननटो-भवद्विग्रह, नवीनघनमण्डलीरुचिरमाविरास्ता महः ।। देव! जय वंशीरवोल्लास ! जय वृन्दावनप्रिय !! जय कृष्ण ! कृपाशील! जय लीलासुधाम्युधे ।। वीर छन्दसामपि दुर्गमसन्तत- मिन्दुबिम्बसमानगुभानन ! मन्दहासविकस्वरसुन्दर ! युन्दकोरफदन्तचिहज ! १.स. पदापन्तयोः।
प०२ १०. खण्डावली प्रकरण [२६६ सुन्दरोजनमोहनमन्मय चन्दनद्रवरज्यदुर.स्थल नन्दनालयशीलितसद्गुण- वृन्द कच्छपरूपसमुद्धृत- मन्दराचलवाहभुजार्गल- कन्दलीकृतसारसमर्थ पु- रन्दरेण चिरं परिवेपितः' नन्दिनाथसमञ्चितदिव्यक-र लिन्दशैलसुताजलजन्पर- विन्दकाननकोपकदम्बमि- लिन्दशावक निर्जरनायक वृन्दया सह कल्पितकौतुक दन्दशूकफणावलिगञ्जन चन्द्रिकोज्ज्वलनिर्गलितामृत- बिन्दुदुदिनसूनृतसार मु- कुन्ददेव कृपाल दशि (दृशि) त्वयि किं दुरापमिहास्ति ममेश्वर किं दयावरुणालय दुर्जन- निन्दयापि जगत्त्रयवल्लभ ! कन्दनीलिमदेहमह कुरु- विन्दखण्डजपाकुसुमस्फुरद् इन्द्रगोपकबन्धुरिताधर चन्द्रकाद्भुतपिञ्छशिरस्तद- रिन्दम स्वमति दयसे यदि विन्दते सुखमेन जनस्तव बन्दिवद्गुणगानकर ध्रुव- मिन्दयन् विदितो गरुडध्वज नन्दयन्निजयासनयानय नन्दगोपकुमार जयीभव । देव! १. स. परिषेवितः। २. ख. दिक। ३. स. कृपालु । ४. स. मेव।
२७० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ प०३ जय नीपावलीवास जय वेणुसुधाप्रिय । जय वल्लभसौभाग्य जय ब्रह्मरसायन । धीर। पशुपललनावल्लीवृन्दै थित करपल्लव- विपुलपुलकश्रेणि'स्फीतस्फुरत्कुसुमोद्गम । तपनतनयातीरे तीरे तमालतरुप्रभ , कलयतु मम क्षेम कश्चिन्नव कमलेक्षणम् ॥१॥ इति तामरस नाम वण्डावली ।। २. अथ मन्जरी खण्डावली नरेन्द्रजिता यत्र रचिता स्युस्तुरङ्गमा । प्राद्यन्तपदसयुक्ता मञ्जरी सा निगद्यते ॥ ३॥ [च्या०] अस्याय यत्र-पस्या मजर्या नरेन्द्रेण-जगणेन वजिता-रहिता तुरङ्गमा चतुविधाश्चतुष्कला रचिता यदि स्यु । किञ्च, पाद्यन्तयो पद्याभ्या सयुक्ता चेद् भवति सदा सा मजरीति नामा प्रसिद्धा खण्डावली निगद्यते छान्दसिकरिति शेष ॥३॥ यथा- पिशङ्गसिंचयाञ्चित चटुलनचिकीचारक', चमत्कृतदृगञ्चलेश्चलुकिता बलानिश्चयम् । चलचिरचन्द्रिकाभरणचुम्बिचूडाञ्चल, तमालदलमेचक सुचिरमाविरास्ता मह ।। देव । जय लीलासुधासिन्धो । जय शोलादिमन्दिरम' । जय राधैकसौहाई जय कन्दपं विभ्रम ॥ वीर। . जय जय जम्भारि भुजस्तम्भा- कलिताहम्भा-वाहिनजम्मा-' मुदवप्टम्भा-पहसररम्भा. श्रय निर्दम्भा-सादितरम्भा- लघुकुचकुम्भा दरपरिरम्भा- निघुवनपुम्भा-वप्रारम्भा- १. स. धेणी। २. स.कमलेक्षण । ३. स. वारक । मन्दिर। ६. वाहितम्भा । ७ स पहसरमा। ४.७. चुनुषिता । १. ख ५०४-६] १०. सण्डावली-प्रकरण [ २७१ धिकसुरससम्भा वनविश्रम्मा- भापणसम्भारंरिह सम्भा- वय न सम्भावितमुज्जम्भा- म्बुजसदृशम्भाषणमधुरम्भा- रत्यालम्भा-ग्यायतनम्भा- क्तमुख सम्भालयत' किम्भा. लाक्षरसम्भावनया देव ! कुमारपत्रपिञ्छेन विराजत्कुन्तलधियम् । सुकुमारमह वन्दे नन्दगोपकुमारकम् ।। धीर! नित्य यन्मधुमन्थरा मधुपरायन्ते सुधास्वादिन- स्तन्माधुर्यधुरीणतापरिणते प्राय परीक्षाविधिम् । कत्तुं स्वाघ्रिसरोरुह करपुटे कृत्वा मुहु सलिहन्, दोलान्दोलनदोलिताखिलतनु पायाद् यशोदार्भक । इति मञ्जरी खण्डावली ।। इत्य खण्डावलीमा तु भेदा सन्ति सहस्रश । साकल्येन मया नोक्ता ग्रन्थविस्तरशङ्कया ॥४॥ सुकुमारमतोना च मार्गदर्शनतो भवेत् । विज्ञानमिति मत्वंव मया मार्ग प्रदर्शित ॥५॥ सहस्रण मुखेनैतद् वक्तु शेपोऽपि न क्षम । कथमेकमुखेनाहमशेष वाडमय ब्रुवे ।।६।। श्री इति श्रीदत्तमौक्तिके वात्तिके खण्डावलीप्रकरण दशमम ॥१०॥ धी १. ख वत्सुकं सम्भालय ।
एकादशं दोप-प्रकरणम्
प्रय दोषाः
अर्थतयोनिरूप्यन्ते दोषाः कविसुखावहाः ।
यान्विदित्वैव सुकविः काव्यं कर्तुं मिहार्हति ॥१॥
[व्या०] अथेति । विरुदावली-खण्डावली-कथनानन्तरमेतयो:-विरुदावली-खण्डावली-
भेदयोर्दोषाः निरूप्यन्ते । शेषं सुगमम् ॥१॥
तान् पाह-
अमैत्री निरनुप्रासो दौर्बल्यं च फलाहतिः ।
असाम्प्रत हतौचित्यं विपरीतयुतं पुनः ॥ २ ॥
विशृङ्खलं स्खलत्तालं नवदोपान वेत्ति यः ।
कुर्यच्चतत् तमोलोके उलूकोऽसौ भवेन्नरः ॥३॥
[व्या०] अस्यायः- प्रमैत्री-अक्षरमंत्रीराहित्यं । निरनुप्रासः-अनुप्रासाभावः । दौर्बल्यं-
श्लयवर्णता इति निगदेनेव व्याख्यातं । कलाहतिः-अन्यपदे पूर्ववर्णस्थानेऽन्यवर्णपाठः । यया-
कमलवदन सुविमलजल ।
रञ्जितरण सञ्जितगुण।
प्रयुक्तवर्णनं-हतौचित्यं । स्पष्टमुदाहरणम् । श्लिष्टवर्णस्याने मधुरवणस्थितिः, मधुरस्थाने
घा श्लिष्टस्थापन, विपरीतयुतं । विशृङ्खलं-न्यूनाधिकश्लिष्टादिवर्णानां प्रपनम् । स्सलत्ताल-
यतिभ्रष्टं लक्षणानुसाराद् ऊह्यानि उदाहरणानि । इत्येतावन्नवदोषान् यः कविः न वेत्ति-न
जानाति प्रविद्वांश्च यदि एतन्-पूर्वोक्तं विरुदावली-सण्डावलीलक्षणं यो नरः कविः काव्य
कुर्यात् तदा तमोलोके-गादान्धकाराज्ञानलक्षणे लोके प्रसौ उलूको-दियान्धःपक्षी भवे.
दित्ययः । तस्माद् दोषज्ञाने महान् गुणः, तद्वपरीत्ये महदनिष्टं इत्यन्वयष्यतिरेकसिद्धोऽयमयः।
इति सर्व निर्मल मङ्गलम् ।
लक्ष्मीनाथतनूजेन चन्द्रशेखरसूरिणा।
छन्द.शास्त्र विरचितं वात्तिक वृत्तमौक्तिकम् ॥
इति दोषनिरूपण-प्रकरणमेकादशम् ॥११॥
द्वादशं अनुक्रमणी - प्रकरणम् प्रथमखण्डानुक्रमणी रविकर-पशुपति-पिङ्गल-शम्भुप्रन्यान् विलोक्य निर्वधान् । सद्वत्तमौक्तिकमिदं चक्रे श्रीचन्द्रशेखरः सुकविः ॥१॥ प्रथाऽभिधीयते चाऽत्राऽनुग्रमो वृत्तमौक्तिके । अत्र खण्डद्वयं प्रोक्त मात्रा-वर्णात्मकं पृथक् ॥ २॥ तब मात्रावृत्तखण्डे प्रयमेऽनुक्रमः स्फुटम् । प्रोच्यते यत्र विज्ञाते समूहालम्बनात्मकम् ।। ३ ।। ज्ञानं भवेदसण्डस्य' खण्डस्य छन्दसोऽपि च । मङ्गलाचरण पूर्व ततो गुरु लघुस्थितिः ।। ४ ।। तयोरुदाहृतिं पश्चात् तद् विकल्पस्य कल्पनम् । काव्यलक्षणवलक्ष्ये अनिष्टफलवेदनम् ॥ ५॥ गणव्यवस्थामात्राणां प्रस्तारद्वयलक्षणम् । मात्रागणानां नामानि कथितानि ततः स्फुटम् ।। ६ ॥ वर्णवृत्तगणानां च लक्षणं स्यात् ततः परम् । तद्देवता च तन्मैत्री तत्फलं चाप्यनुक्रमात् ॥७॥ मात्रोद्दिष्ट च तत्पश्चात्तन्नष्टस्याथ कीर्तनम् । वर्णोद्दिष्ट ततो ज्ञेयं वर्णनप्टमतः परम् ।।८।। वर्णमेरुश्च तत्पश्चात् तत्पताका प्रकीर्तिता । मात्रामेरुश्च तत्पश्चात् तत्पताका प्रकीर्तिता ॥ ६ ॥ ततो वृत्तद्वयस्थस्य गुरोर्ज्ञानं लघोरपि। वर्णस्य मर्कटी पश्चात् मात्रायाश्चापि मर्कटी ॥१०॥ तयोः फलं च कथितं पप्रकारं समासतः । ततस्त्वेकाक्षरादेश्च पड्विंशत्यक्षरावधेः ।। ११ ॥ प्रस्तारस्यापि संख्याऽत्र पिण्डीभूता प्रकीतिता। ततो गाथादिभेदानां कलासंख्या प्रकीर्तिता ।।१२।। १. ख, भवेदखण्डलस्य। २.ख. 'खण्डस्य नास्ति।
२७४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ प० १३ -२७ गाथोदाहरणं पश्चात् सप्रभेदं सलक्षणम् । विगाथा च तथा ज्ञेया ततो गाहू प्रकीर्तिता ॥१३॥ अथोद्गाथा गाहिनी च सिंहिनी च ततः परम् । स्कन्धकं चापि कथितं सप्रभेदं सलक्षणम् ।। १४ ॥ इति गाथाप्रकरणं प्रथमं वृत्तमौक्तिके । द्वितीयं षट्पदस्याथ द्विपथा तत्र संस्थिता ॥ १५ ॥ सलक्षणा सप्रभेदा रसिका स्यात् ततः परम् । अथ रोला समाख्याता गन्धाणा स्यात् ततः परम् ।। १६ ।। चौपैया च ततः प्रोक्ता ततो घत्ता प्रकीत्तिता। घत्तानन्दमतः काव्यं सोल्लालं सप्रभेदकम् ।। १७ ॥ पट्पदं च ततः प्रोक्तं सप्रभेदमतः परम् । काव्यपट्पदयोश्चापि दोषाः सम्यड निरूपिताः ॥१८॥ प्राकृते संस्कृते चापि दोषाः कविसुखावहाः । द्वितीयं षट्पदस्यतत् प्रोक्तं प्रकरण त्विह ।। १६ ।। रड्डाप्रकरणं तृतीयं परिकीत्यते । पज्झटिकाछन्दोऽडिल्लाछन्दस्ततः परम् ॥ २०॥ ततस्तु पादाकुलकं चौबोला - छन्द एव च । रड्डाछन्दस्ततः प्रोक्तं भेदाः सप्तव चास्य तु ॥२१॥ रड्डाप्रकरणं चंव तृतीयमिह कीर्तितम् । पद्मावतीप्रकरणं चतुर्थमय कम्यते ॥२२॥ तत्र पद्मावती पूर्व ततः कुण्डलिका भवेत् । गगनाङ्ग ततः प्रोक्तं द्विपदी च ततः परम् ।। २३ ॥ ततस्तु मुल्लणा-छन्दः खजा-छन्दस्ततः परम् । शिखाइन्दस्ततश्च स्यात् मालाछन्दस्तती भवेत् ॥ २४ ॥ ततस्तु चुलिमाला स्यात् सोरठा तदनन्तरम् । हाकलीमंधुभारश्चाऽभीररच स्पादनन्तरम् ।। २५ ॥ भप दण्डकला प्रोक्ता ततः कामकला भवेत् । पपिरास्य ततश्छन्दो दीपकरच ततः स्मृतम् ।। २६ ।। सिंहावलोक्तिं सन्दस्ततश्च स्यात् प्लवङ्गमः। पप सोसायतीधन्दो हरिगीत तत. स्मृतम् ॥ २७॥ प्रथ प० २८ - ४० ] १२. अनुक्रमणी - प्रकरण [ २७५ हरिगीतं' ततः प्रोक्तं मनोहरमतः परम् । हरिगीता ततः प्रोक्ता यतिभेदेन या स्थिता ॥२८॥ अथ विभङ्गी छन्दः स्यात् ततो दुर्मिलका भवेत् । हीरच्छन्दस्ततः प्रोक्तमथो जनहरं मतम् ॥ २६॥ ततः स्मरगृहं छन्दो मरहट्ठा ततः स्मृता। पद्मावतोप्रकरणं चतुर्थमिह कीर्तितम् ।। ३० ।। सवैयाख्य प्रकरण पञ्चम परिकीर्त्यते । तत्र पूर्व सर्वयाख्यं छन्दः स्यादतिसुन्दरम् ।। ३१ ।। भेदास्तस्यापि कथिता रससंख्या मनोहराः । ततो घनाक्षरं वृत्तमतिसुन्दरमीरितम् ।। ३२ ॥ पञ्चमं तु प्रकरणं सर्वयाख्यमिहोदितम् । अथो गलितकाख्यं तु षष्ठं प्रकरणं भवेत् ।। ३३॥ पूर्व गलितकं तत्र ततो विगलितं मतम् । अथ सङ्गलित ज्ञेयमतः सुन्दर-पूर्वकम् ।। ३४ ।। भूपणोपपद तच्च मुखपूर्व ततः स्मृतम् । विलम्बितागलितक समपूर्व ततो मतम् ।। ३५।। द्वितीय समपूर्व चापर सङ्गलित ततः । अथापर गलितकं लम्बितापूर्वक भवेत् ॥ ३६ ।। विक्षिप्तिकागलितक ललितापूर्वक तत.। ततो विपमितापूर्व मालागलितक ततः ॥ ३७॥ मुग्धमालागलितकमयोद्गलितक भवेत् । पष्ठ गलितकस्यतत् प्रोक्त प्रकरण शिवम् ॥ ३८॥ रन्ध्रसूर्याश्वसख्यात (७६) मानावृत्तमिहोदितम् । सप्रभेदं वसुद्वन्द-शतद्वय-(२८८) मुदीरितम् ।। ३६ ।। तथा प्रकरण चात्र रससस्य' प्रकीतितम् । मानावृत्तस्य खण्डोऽय परिकीतितः ॥ ४० ।। इति मयमखण्डानुक्रमणिका । प्रथमः १. हरगीतं स.. २. क. रससहया।
२७६ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [.५०१ - १२ wwwwwww द्वितीयखण्डानुक्रमणो अथ द्वितीयखण्डस्य वर्णवृत्तस्य च क्रमात् । वृत्तानुक्रमणी स्पष्टा क्रियते वृत्तमौक्तिके ॥१॥ आरभ्यकाक्षरं वृत्तं पविंशत्यक्षरावधि । तत्तत्प्रस्तारगत्याऽत्र वृत्तानुक्रमणी स्थिता ।। २॥ तत्र श्रीनामकं वृत्तं - प्रथमं परिकीर्तितम् । तत इ: कथितं वृत्तं द्वौ भेदावत्र कीर्तितो ॥ ३॥ एकाक्षरे, द्वचक्षरे तु पूर्व कामस्ततो मही। ततः सारं मधुश्चेति भेदाश्चत्वार एव हि ॥ ४॥ ध्यक्षरे चात्र ताली स्यान्नारी चापि शशी ततः । ततः प्रिया समाख्याता रमणः स्यादनन्तरम् ॥ ५॥ पञ्चालश्च मृगेन्द्रश्च मन्दरश्च ततः स्मृतः कमलं चेति नात्र स्युरष्टौ भेदाः प्रकीर्तिताः ॥६॥ अथातो द्विगुणा भेदाश्चतुर्वर्णादिपु स्थिताः । यथासम्भवमेतेपामाद्यान्तानुक्रमात् स्फुटम् ॥ ७ ॥ वृत्तानुक्रमणी सेयमसंकेततः कृता । प्रतिप्रस्तारविस्तारं पविंशत्यक्षरावधि ॥ ८॥ न चतुर्वर्णप्रभेदेषु तीर्णा कन्याऽपि चान्यतः। धारी ततस्तु विख्याता नगाणी च ततः परम् ।।६।। गुभं चेति समाख्यातामत्र भेदचतुष्टयम् । शेपमेदा संप्रोक्ता ग्रन्थविस्तरशङ्कया ॥१०॥ प्रस्तारगत्या ते भेदाः पोडशेय व्यवस्थिताः । सुघोभिरूहयाः प्रस्तार्य यथाशास्त्रमशेषतः ॥११॥ प्रय पञ्चाक्षरे' पूर्व सम्मोहा वृत्तमीरितम् । हारी तत: समाख्याता ततो हंसः प्रकीर्तितः ॥ १२ ॥ १. स. भेवः कमात् स्थिता । २. स. पारी। ३.क.पञ्चाक्षरः।
२०१३-२६ ] १२. अनुक्रमणी - प्रकरण - [ २७७ प्रिया तत: समाख्याता यमकं तदनन्तरम् । प्रस्तारगत्या चैवान भेदा द्वात्रिंशदीरिताः (३२) ॥१३॥ पडक्षरेऽपि पूर्व तु शेपाख्यं वृत्तमीरितम् । ततः स्यात्तिलका वृत्तं विमोहं तदनन्तरम् ॥ १४॥ विजोहे 'त्यन्यतः स्यातं चतुरंसमतः परम् । पिङ्गले चउरसेति स्त्रीलिङ्ग परिकीर्तितम् ।। १५ ।। मन्थान च ततः प्रोक्तं मन्यानेत्यन्यतो भवेत् । शवनारी ततः प्रोक्ता सोमराजीति चान्यतः ॥ १६॥ स्यात् सुमालतिका चान मालतीति च पिङ्गले। तनुमध्या ततः प्रोक्ता ततो दमनकं भवेत् ॥ १७ ॥ प्रस्तारगत्या चाप्यत्र भेदा वेदरसमंता: (६४)। प्रथ सप्ताक्षरे पूर्व सीरिय वृत्तमीरितम् ।।१८।। ततः समानिका वृत्तं ततोऽपि च सुवासकम् । करहञ्चि ततः प्रोक्तं कुमारललिता ततः ।। १६ ॥ ततो मधुमती प्रोवता मदलेसा ततः स्मृता । ततो वृत्त तु कुसुमततिः स्यादतिसुन्दरम् ॥ २० ॥ प्रस्तारगतिभेदेन वसुनेत्रात्मजेरिता' (१२८) । भेदाः सप्ताक्षरस्यान्या कह्याः प्रस्तायं पण्डितः ॥ २१ ॥ प्रय यस्वक्षरे पूर्व विद्युन्माला विराजते । तत. प्रमाणिका झया मल्लिका तदनन्तरम् ॥ २२ ॥ तुझावृत्त तत प्रोक्तं कमलं तदनन्तरम् । माणवकग्रीडितक ततश्चिमपदा मता ॥ २३॥ ततोऽनुष्टुप समारयाता जला च ततः स्मृतम् । पत्र प्रस्तारगत्यंव रायाणयुगंमंताः (२५६) ॥ २४ ॥ भेदा यम्वक्षरे शेषाः सूचनीयाः सयुतिभिः । नयारेश्य पूर्व स्याद् स्पागाला मनोरमा ॥ २५ ।। सतो महालदिममा स्यात् सार तदनन्तरम् । सानिया पिङ्गले तु पाइल तदनन्तरम् ॥२६॥ १. स. शिमोरे । २. पात्रारमशिलाः ।
२७८] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [प० २७.४० A- प्रथ पाइन्ता पिङ्गले तु स्यात् कमलं तदनन्तरम् । बिम्बवृत्तं ततः प्रोक्तं तोमरं तदनन्तरम्]' ॥२७॥ भुजगशिशुसृतावृत्तं मणिमध्यं ततः स्मृतम् । भुजङ्गसङ्गता च स्यात् ततः सुललितं स्मृतम् ॥ २० ॥ प्रस्तारगत्या चात्रास्य नेत्रचन्द्रेशरैरपि (५१२) 1 भेदा नवाक्षरे शिष्टाः सूचनीयाः सुवुद्धिभिः ।। २९ ।। पंक्त्यर्णके पूर्व गोपालः परिकीर्तितः । संयुतं कथितं पश्चात् ततश्चम्पकमालिका ।। ३०॥ क्वचिद् रुक्मवती चेयं क्वचिद् रूपवतीति च । ततः सारवती च' स्यात् सुषमा तदनन्तरम् ॥ ३१॥ ततोऽमृतगतिः प्रोक्ता मत्ता स्यात्तदनन्तरम् । पूर्वमुक्ताऽमृतगतिः सा चेद् यमकिता भवेत् ॥ ३२॥ प्रतिपादं तदोक्तपा त्वरिताऽनन्तरं गतिः । मनोरमं ततः प्रोक्तमन्यत्र च मनोरमा ।।३३॥ ततो ललित-पूर्व तु गतीति समुदीरितम् । प्रस्तारान्त्यं सर्वलघुवृत्तमत्यन्तसुन्दरम् ॥ ३४॥ प्रस्तारगत्या भेदाः स्युः तत्त्वाकाशात्मसंख्यकाः (१०२४) । दशाक्षरेऽपरे भेदाः सूच्या: प्रस्तार्य पण्डितः ।। ३५॥ अथ रुद्राक्षरे' पूर्व मालतीवृत्तमीरितम् । ततो बन्धुः समाख्यातो ह्यन्यत्र दोधकं भवेत् ।। ३६ ।। ततस्तु सुमुखीवृत्तं शालिनी स्यादनन्तरम् । वातोर्मी तदनु प्रोक्ता छन्द.शास्त्रविशारदः ॥ ३७॥ परस्परं चैतयोश्चेत् पादा एकत्रयोजिताः। तदोपजातिनामानी भेदास्ते च चतुर्दश ॥ ३८॥ ततो दमनकं प्रोक्तं चण्डिका तदनन्तरम् । सेनिका श्रेणिका चेति तथा नामान्तरं क्वचित् ॥ ३६ ।। नाममात्र परं भेदः फलतो न तु किञ्चन । इन्द्रवचा प्रोक्ता ततश्चोपेन्द्रपूर्विका ॥४०॥ ततः १. [-1 कोष्टगतॊशो नास्ति क.स. प्रतौ। २ ख. 'ततः सारवती च'नास्ति । ३. क. रद्वाक्षरः।
०४१-५३ ] १२. अनुक्रमणो - प्रकरण [ २७६ उपजातिस्ततः प्रोक्ता पूर्वोक्तेनैव वर्मना । भेदाश्चतुर्दशैतस्याः विज्ञेयाः पिण्डतो बहिः ।। ४१ ॥ ततो रथोद्धतावृत्तं स्वागतावृत्ततस्तथा। भ्रमरान्ते विलसिताऽनुकूला च ततो भवेत् ।। ४२ ॥ ततो मोट्टनकं' वृत्तं सुकेशी च ततो भवेत् । सतः सुभद्रिकावृत्तं बकुलं कथितं तत.॥४३॥ रुद्रसंख्याक्षरे भेदा वसुवेदखनेत्रकः (२०४८) । प्रस्तारगत्या जायन्ते शिष्टान् प्रस्तार्य सूचयेत् ॥ ४४ ।। अथ रव्यक्षरे पूर्वमापीडः कथितोऽन्यतः। विद्याधरस्ततश्च स्यात् प्रयातं भुजगादनु ॥ ४५ ॥ ततो लक्ष्मीधरं वृत्तमन्यत्र स्रग्विणी सतः । तोटकं स्यात् ततः सारङ्गकं मौक्तिकदामतः ॥४६॥ मोदकं सुन्दरी चापि ततः स्यात् प्रमिताक्षरा । चन्द्रवर्म ततो ज्ञेयमतो द्रुतविलम्बित्तम् ॥ ४७॥ ततस्तु वंशस्थविला क्वचित् क्लीबमिदं भवेत् । क्वचितु वंशस्तनितमिन्द्रवशा ततो भवेत् ॥ ४८ ।। अनयोरपि चैकत्रपादानां योजनं यदि। तदोपजातयो नाम भेदाः स्युस्ते चतुर्दश ।। ४६ ।। सर्वत्रैवं स्वल्पभेदे भवन्तीहोपजातयः । वृत्ताभ्यामल्पभेदाभ्यामुपदेशः पितुर्मम ।। ५० ॥ ततो जलोद्धतगतिवैश्वदेवी ततो मता। मन्दाकिनी ततो ज्ञेया वतः कुसुमचित्रिता ॥५१॥ ततस्तामरस वृत्तं ततो भवति मालती। कुत्रचिद् यमुना चेति मणिमाला ततो भवेत् ॥ ५२ ।। ततो जलघरमाला स्यात् ततश्चापि प्रियवदा। ततस्तु ललिता संव सुपूर्वान्यत्र लक्षिता ॥५३॥ १. स. मोटनकम् ।
२८० ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [५० ५४ - ६७ ततः ततोऽपि ललितं वृत्तं ललनेत्यपि च क्वचित् । कामदत्ता ततः प्रोक्ता ततो वसन्तचत्वरम् ॥ ५४ ।। प्रमुदितवदना-मन्दाकिन्योर्भेदो न वास्तवो घटितः । नामान्तरेण भेदो गणतो यदितो न चोद्दिष्टः ।। ५५ ।।' प्रमुदिताज़' वदने वदनाऽन्यत्र च प्रभा । विख्याता कविमुख्यस्तु ततः स्यान्नवमालिनी ।। ५६ ।। सर्वान्त्यं नयनात् पूर्व तरलं वृत्तमीरितम् । अत्र प्रस्ताररीत्या तु भेदा रव्यक्षरे स्थिताः ।। ५७ ।। रसरन्ध्रखवेदैस्तु(४०६६) शेषाः सूच्याः सुवुद्धिभिः । त्रयोदशाक्षरे पूर्व वाराहः कथितो मया ॥ ५८ ॥ मायावृत्तं ततस्तु स्यात् क्वचिन्मत्तमयूरकम् । ततस्तु तारकं वृत्तं कन्दं पड्कावली तथा ।। ५६ ।। प्रहर्षिणीवृत्तं रुचिरा तदनन्तरम् । चण्डीवृत्तं ततः प्रोक्तं ततः स्यान्मञ्जुभाषिणी ।। ६० ॥ शम्भौ सुनन्दिनी चेयं चन्द्रिका सदनन्तरम् । क्वचिदुत्पलिनीवृत्तं चन्द्रिकवोच्यते बुधः ।। ६१ ।। कलहंसस्ततश्च स्यात् सिंहनादोप्ययं क्वचित् । ततो मृगेन्द्रवदनं क्षमा पश्चात् ततो लता ।। ६२ ।। ततस्तु चन्द्रलेखाख्यं चन्द्रलेखेत्यपि क्वचित् । ततश्च सुध तिः पश्चाल्लक्ष्मीवृत्तं मनोहरम् ॥ ६३ ।। ततो विमल-पूर्व तु गतीतिरुचिरं भवेत् । प्रस्तारान्त्यं वृत्तमेतद् भावितं कविपुङ्गवः ॥ ६४॥ प्रस्तारगत्या विजेया भेदाः कामाक्षरे बुधः । नेत्रग्रहेन्दुवसुभिः (८१९२)शेषान् प्रस्तार्यसूचयेत् ॥६५॥ अथ मन्वक्षरे पूर्व सिंहास्पः कथितो बुधैः । ततो वसन्ततिलका ततश्चक्रं प्रकीर्तितम् ॥ ६६ ॥ मसम्बाघा ततश्च स्यात् ततः स्यादपराजिता । कलिकान्तं प्रहरणं वासन्ती स्यादनन्तरम् ।। ६७॥ १. प मास्तिक.प्रतो। शेपास्तूह्याः। २. स. प्रमुदितावस्यान्ते। ३.क. वान्ते ।
५० ६८• २१] १२. अनुक्रमणी-प्रकरणम् [ २८१ लोला नान्दीमुखी तस्माद् वैदर्भी तदनन्तरम् । प्रसिद्धमिन्दुवदन स्त्रीलिङ्गमिदमन्यत ॥ ६८ ॥ ततस्तु शरभी प्रोक्ता ततश्चाहिधुतिः स्थिता । ततोऽपि विमला ज्ञेया मल्लिका तदनन्तरम् ।। ६६ ।। ततो मणिगण वृत्तमन्त्य मन्वक्षरे भवेत् । प्रस्तारगत्या चात्रापि भेदा वेदाष्टतो गुणा ॥७॥ रसेन्दुप्रमिताश्चापि(१६३८४) विज्ञेया कविशेखरं । यथासम्भवसम्प्रोक्ता शेपास्तूह्या स्वबुद्धित ।। ७१ ।। लीलाखेलमथो वक्ष्ये वृत्त पञ्चदशाक्षरे। सारङ्गिकेति यनाम पिङ्गले प्रोतमुत्तमम् ।। ७२ ।। ततस्तु मालिनीवृत्त तत स्याच्चार चामरम् । तुणक चान्यतश्चापि भ्रमरावलिका तत ।। ७३ ।। भ्रमरावली पिङ्गले स्यान् मनोहसस्ततस्तत । शरभ वृत्तमन्यत्र मता शशिकलेति मणिगुणनिकर सगिति च भेदी द्वावस्य यतिकृती भवत । तत्प्रागेवाभिहित वृतद्वयमस्य शरमतो न भिदा ॥७॥ ततस्तु निशिपालास्य विपिनात्तिलक तत । चन्द्रलेसा तत भोका चण्डलेसाऽपि चान्यत ॥७६॥' उतश्चित्रा समास्याता चित्र पान्यत्र कीर्तितम् । वृतमेला स्यात्तदनन्तरम् ।। ७७ ॥ तत प्रिया समाख्याता यतिभेदादलि पुन । उत्सवस्तु तत प्रोक्तस्ततश्चोड़गण मतम् ।।७।। प्रस्तारगत्या सम्प्रोक्ता भंदा पञ्चदमापारे। यसुशास्त्राप्यनेनाग्निप्रमिता (३२७६८) कविपण्डित ॥७॥ प्रस्ताय दोपभेदास्तु कृत्वा नामानि च स्यत । प्रस्मदीयापदेशन सूचनीया सुयुद्धिमि ॥८०॥ प्रय प्रथमतो राम प्रस्तारे पोरसासरे। ब्रह्मरूपपमित्यस्य नाम मोक्न प पिङ्गले ॥१॥ च।।७४।। ततस्तु पसर २. पर मास्ति।
२५२ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१०८२-६५ ततः। नराचमिति यन्नाम ततः स्यात् पञ्चचामरम् । ततो नीलं समाख्यातं ततः स्याच्चञ्चलाभिधम् ।। २२॥ इदमेवान्यतश्चित्रसङ्गमित्येव भापितम् । ततस्तु मदनादूवं ललिता स्यादनन्तरम् ॥ ८३ ।। वाणिनीवृत्तमाख्यातं प्रवराल्ललितं अनन्तरं तु गरुडरुतं स्याच्चकिता ततः ॥८४॥ चकितव यतिविभेदात् क्वचिदपि गजतुरगविलसितं भवति । क्वचिदिदमेव ऋषभगजविलसितमिति नाम संधत्ते ॥८५ ।। ततः शैलशिखावृत्तं ततस्तु ललितं मतम् । ततः सुकेशरं वृत्तं ललना स्यादनन्तरम् ॥ ६॥ ततो गिरिधृतिः कुत्राप्यचलानन्तरं धृतिः । प्रस्तारगत्यैवात्रापि भेदाः स्युः पोडशाक्षरे ।। ८७॥ रसाग्निपञ्चेपुरसः (६५५३६) मिताःप्रख्यातबुद्धिभिः । प्रस्तार्य सूच्याश्चान्येपि भेदा इत्युपदिश्यते ।। ८८ ।। प्रथ सप्तदशे वर्णप्रस्तारे वृत्तमीर्यते । लीलाधृष्टं प्रथमतस्तत: पृथ्वी प्रकीर्तिता ॥ ६ ॥ ततो मालावतीवृत्त मालाघर इति क्वचित् । शिखरिणीवृत्तं हरिणीवृत्ततस्तथा ॥ ६॥ मन्दाक्रान्ता वंशपत्रपतितं पतिता क्वचित् । शम्भो तु वंशवदनमेतनाम प्रकीर्तितम् ।। ६१॥ ततो नईटकं वृत्तं यतिभेदातु कोकिलम् । ततस्तु हारिणीवृत्त भाराकान्ता ततो भवेत् ।। ६२॥ मतङ्गवाहिनीवृत्तं ततः स्यात् पद्मकं तथा'। दशशब्दान्मुसहरमिति वृत्तं समीरितम् ॥ ६३ ॥ प्रस्तारगत्या भेदाः स्युरन सप्तदशाक्षरे। नेपाश्वव्योमचन्दाग्निचन्द्रः (१३१०७२)परिमिताः परे ॥१४॥ भेदाः सुवुद्धिमिस्तूह्याः प्रस्तायं स्वमनीपया । मयाप्टादशवर्णानां प्रस्तारे प्रथम भवेत् ।। ६५॥ तत:
प०१६-१०६ ] १२. अनुक्रमणी-प्रकरण [ २८३ लोलाचन्द्रस्ततश्च स्यान्मजीरा चर्चरी तत । क्रीडाचन्द्रस्ततश्च स्यात् तत कुसुमिताल्लता ॥ ६ ॥ ततस्तु नन्दन वृत्त नाराच स्यादनन्तरम् । मञ्जुलेत्यन्यत' प्रोक्ता चिनलेखा ततो भवेत् ।। ६७ ।। ततस्तु भ्रमराच्चापि पदमित्यतिमुन्दरम् । शार्दूलललित पश्चात् ततः सुललित भवेत ॥१८॥ अनन्तर चोपवनकुसुम वृत्तमीरितम् । प्रस्तारगतितो भेदा ह्यष्टादशाक्षरे ||६|| वेदश्रुत्यवनीनेत्ररसयुग्म (२६२१४४)मिता मता । शेषा स्वबुद्धया प्रस्तार्य विज्ञेया स्वगुरूक्तित ॥१०॥ अथ प्रथमतो नागानन्दश्चकोनविंशके। शार्दूलानन्तरं विक्रीडित वृत्त तत स्मृतम् ॥ १०१॥ ततश्चन्द्र समाख्यात चन्द्रमालेति च क्वचित् । ततस्तु घवल वृत्त धवलेति च पिङ्गले ॥१०२॥ तत शम्भ समाख्यातो मेघविस्फूर्जिता तत । छायावृत्त ततश्च स्यात् सुरसा तदनन्तरम् ।। १०३ ।। फुल्लदाम ततश्च स्यान्मदुलात् कुसुम ततः । प्रस्तारगत्या भेदाश्चकोनविंशाक्षरे कृता ।।१०४॥ वस्वप्टनेत्रश्रुतिदृग्भूतं (५२४२८८) परिमिता परे । भेदा प्रस्तार्य बोद्धव्या स्वबुद्धमा शुद्धबुद्धिमि ॥१०५ ।। अथ विशाक्षरे पूर्व योगानन्द ' समीरित । ततस्तु गीतिकावृत्त तदनन्तरम् ।।१०६॥ गण्डकब क्वच्चित्रवृत्तमन्यत्र शोमावृत्त तत प्रोक्त तत सुवदना भवेत् ।। १०७ ॥ प्लवङ्गभङ्गाच्च पुनर्मङ्गल वृत्तमुच्यते । शशावचलित ततो भवति भद्रकम् ।। १०८।। ततो गुणगण वृत्तमन्त्य स्यादतिसुन्दरम् । प्रस्तारगत्या पावत्या भेदा रसमुनीपुमि ॥ १० ॥ गण्डका वृत्तकम् । तत १.समागानर ।
२८४ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [१० ११०.१२३ वसुवेदखचन्द्रश्च (१०४८५७६) मिता स्युश्चापरे' बुध । प्रस्तार्य बुद्धया ससूच्या छन्द शास्त्रविशारदै ॥ ११०॥ अथैकविंशत्यक्षरेऽस्मिन् ब्रह्मानन्दादनन्तरम । स्रग्धरा मञ्जरी च स्यानरेन्द्रस्तदनन्तरम् ।। १११।। ततस्तु सरसीवृत्त क्वचित् सुरतरुर्भवेत । सिद्धक चान्यत प्रोक्त रुचिरा तदनन्तरम् ।। ११२ ॥ ततश्च स्यान्निरुपमतिलक वृत्तमन्त्यगम् । प्रस्तारगत्या चानापि भेदा नेनेपुचन्द्रकं ॥ ११३ ॥ मुनिरन्ध्रखनेत्रश्च (२०६७१५२) विज्ञेया कविशेखरै । प्रस्तार्यान्यत्समुन्नेय भेदजात सुबुद्धिभि ॥ ११४ ।। प्रथ प्रथमतो विद्यानन्दवृत्तमुदीरितम् । द्वाविंशत्यक्षरे हसीवृत्त स्यात्तदनन्तरम् । ततस्तु मदिरावृत्त मन्द्रक तदनन्तरम । ११५ ।। तदेव यतिभेदेन शिखर परिकीर्तितम् । स्यादच्युत वृत्त मदालसमनन्तरम ॥ ११६ ॥ ततस्तरुवर वृत्तमन्त्य भवति सुन्दरम् । प्रस्तारगत्यैवात्रापि भेदा वेदसवह्निभि ॥११७॥ वेदग्रहेन्दुवेदैश्च (४१९४३०४) भवन्तीति विनिश्चितम । तथैवान्येपि ये भेदास्ते प्रस्तायं स्वबुद्धित ॥ ११८॥ सूचनीया कविवरै छन्द शास्त्रविशारदै । अथात्र ज्यधिके विशत्यक्षरे पूर्वमुच्यते ॥ ११६॥ दिव्यानन्द सर्वगुरुस्तत सुन्दरिका भवेत । ततस्तु यतिभेदेन सैव पद्मावती भवेत् ॥ १२० ।। ततोऽद्वितनया प्रोक्ता सेवाश्वललित. क्वचित । ततस्तु मालतीवृत्त मल्लिका स्यादनन्तरम ॥ १२१॥ मत्ताक्रीड तत प्रोक्त कनकाद्वलय प्रस्तारगतितो भेदास्त्रयोविंशाक्षरे स्थिता ॥ १२२॥ वसुव्योमरसक्ष्माभृदवस्वग्निवसुभिर्मिता (८३८८६०८) । शेषभेदा सुधीभिस्तु सूच्या प्रस्तार्य शास्त्रत ॥ १२३ ॥ तत तत । १ क चाक्षरे ।
प० १२४-१३८] १२. अनुक्रमणी-प्रकरण [ २५ तत । प्रथ अथ तत्त्वाक्षरे पूर्व रामानन्दोऽय दुर्मिला । किरीट तु सत प्रोक्त ततस्तन्वी प्रकीर्तिता ।। १२४ ।। ततस्तु माधवीवृत्त तरलान्नयन प्रस्तारभेदेन भेदा पड्भूमियुग्मक ॥ १२५ ॥ सप्तर्षिमुनिशास्नेन्दु(१६७७७२१६)मिता स्युरपरे पुन । गुरूपदेयामार्गेण सूचनीया मनीपिभि ॥ १२६ ।। पञ्चाधिके विशत्यक्षरे पूर्वमुच्यते । कामानन्दस्तर क्रौञ्चपदा मल्ली ततो भवेत् ।। १२७ ॥ ततो मणिगण वृत्तमिति वृत्तचतुष्टयम् । प्रस्तासात्या चावापि भेदा मेवाग्निसिन्धुभि ।। १२८॥ वेदपन्चेपुवह्निभ्यामपि (३३५५४४३२)स्युरपरेपि च । छन्द शास्त्रोक्तमार्गेण सूचनीया स्वबुद्धित ।। १२६॥ पभिरभ्यधिके विशत्यक्षरेऽप्यथ गद्यते । श्रीगोविन्दानन्दसज्ञ वृत्तमत्यन्तसुन्दरम् ॥ १३० ॥ ततो भुजङ्गपूर्व तु विजृम्भितमिति स्मृतम् । अपवाहस्ततो वृत्त मागधी तदनन्तरम् ॥ १३१॥ ततश्चान्त्य भवेद् वृत्त फमलाऽनन्तर दलम् । प्रस्तारगत्या चावत्या भेदा सम्यग् बिभाविता ॥ १३२ ॥ वेदशास्त्रवसुद्वन्द्वखेन्द्वश्वरससूचिता । (६७१०८८६४) । प्रस्तार्य शास्त्रमार्गणापरे सूच्या स्वबुद्धित ॥ १३३ ।। एकाक्षरादिपविंशत्यक्षरावधि कीर्तितम् । यथालाभ वर्णवृतमन्यदूह्य महात्मभि ॥ १३४॥ रसलोचनमुन्यश्वचन्द्रनेत्राब्धिवह्निभि । शशिना योजितरह, (१३४२१७७२६)पिण्डसम्या भवेदिह ॥ १३५ ।। भेदेवतेषु पाद्यन्तसहित भेदकल्पनं । पञ्चषष्ठयधिक नेत्रशतव (२६५) वृत्तमीरितम् ।।१३६ ।। द्वितीय राण्डके पर्णवृत्ते सयसमौषितः । रुपमाघ प्रपरण त्विदम् ।। १३७ ।। प्रकीर्णकप्रकरण द्वितीयमप प्रस्तारोतीर्णवृत्तानि कानिचितन पामहे ।। १३८ । वृत्तानुवमणी पप्यते ।
२८६ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ २०१३६. १५२ आदी पिपीडिका तत्र ततस्तु करभ. स्मृतः । अनन्तर च पणव माला स्यात्तदनन्तरम् ।। १३६।। द्वितीयाऽथ विभङ्गी स्यात् शालूर तदनन्तरम् । इति प्रकीर्णक नाम द्वितीय वृत्तमौक्तिके ॥ १४० ।। प्रोक्त प्रकरण चाथ तृतीयमिदमुच्यते । दण्डकाना प्रकरण क्रमप्राप्त मनोरमम् ॥ १४१ ॥ चण्डवृष्टिप्रयातस्तु प्रथम परिकीर्तित । सत. प्रचितकश्चाथ ततोऽप्यादयो मताः ।। १४२।। ततस्तु सर्वतोभद्रस्ततश्चाऽशोकमञ्जरी। कुसुमस्तबकश्चाथ मत्तमातङ्ग एव च ॥ १४३ ।। अनङ्गशेखरश्चेति तृतीय परिकीर्तितम् । अथाद्धसमक नाम चतुर्थ परिकीर्त्यते ॥ १४४॥ पुष्पिताग्रा भवेत्तत्र प्रथम वृत्तमुत्तमम् । ततश्चैवोपचित्र स्यादथ वेगवती भवेत् ।। १४५ ॥ हरिणाऽनन्तर चापि प्लुता सपरिकीर्तिता। ततश्चापरवक्त्र स्यात् सुन्दरी च ततो मता ॥ १४६ ॥ अथ भद्रविराट् वृत्त तत केतुमती स्थिता। ततस्तु वाड्मतीवृत्तमथ स्यात् षट्पदावली ॥ १४७ ।। इत्यर्द्धसमक नाम तुर्य प्रकरण मतम् । प्रथोच्यते विषम वृत्तमौक्तिके ॥ १४८।। पञ्चम यत्र पूर्व स्याद् उद्गता वृत्तमुत्तमम् । ततस्तु सौरभ वृत्त ललित तदनन्तरम् ।। १४६ ॥ अथ भावस्ततो वक्त्र पथ्यावृत्तमत स्मृतम् । ततस्त्वानुष्टुभ वृत्तमष्टाक्षरतया कृतम् ॥ १५० ॥ इत्थ विषमवृत्ताना प्रोक्त प्रकरण त्विह। प्रकरण वैतालीय प्रकीर्त्यते ।। १५१॥ वैतालीय प्रथमतस्तत्र वृत्त निगद्यते । ततश्चौपच्छन्दसिकमापातलिकमेव च ।। १५२ ।। प्रकरण अथ पष्ठ प०१५३-१६५ ] १२. अनुक्रमणी- प्रकरण [२८७ www vi द्विविध नलिनास्य च ततः स्याद् दक्षिणान्तिका। अथोत्तरान्तिका पश्चात् [प्राच्यवृत्तिरुदीरिता ।। १५३ ।। उदीच्यवृत्तिस्तत्पश्चात् प्रवृत्तकमतः परम् । अथापरान्तिका पश्चा]'च्चारुहासिन्युदीरिता ॥१५४ ॥ वैतालीय प्रकरण पष्ठमेतदुदीरितम् । यतिप्रकरण चाय सप्तमं परिकीर्त्यते ।। १५५॥ यतीना घटन यत्र सोदाहरणमीरितम् । अथ गद्यप्रकरणमष्टम वृत्तमौक्तिके ॥ १५६ ॥ नानाविधानि गद्यानि गद्यन्ते यत्र लक्षण। तन तु प्रथम शुद्ध चूर्णक गद्यमुच्यते ।। १५७ ॥ अथाऽऽविद्ध चूर्णक तु ललित चूर्णक तत.। ततस्तूत्कलिकाप्राय वृत्तगन्धि तत. स्मृतम् ।। १५८ ॥ ग्रन्थान्तरमत चार लक्षित गद्यलक्षणे । इति गद्यप्रकरणमष्टम परिकीर्तितम् ॥ १५६ ।। विरुदावलीप्रकरण नवमं चाथ कथ्यते। द्विगाद्या च त्रिभङ्गयन्ता कलिका नवधा पुरा ।। १६० ॥ ततस्त्रिभङ्गी कलिका 'नोघा साऽपि प्रकीर्तिता । विदघाद या द्विपाद्यन्ता सापि पोढा तत स्मृता ॥ १६१ ।। मुग्धादिका तरुण्यन्ता मध्ये मध्या चतुर्विधा। अवान्तरप्रकरण कलिकाया प्रकीर्तितम् ।। १६२ ।। अथातो व्यापक चण्डवृत्त विरुदमीरितम् । सलक्षण तथा साधारण चेति द्विधैव तत् ॥ १६३ ॥ ततोऽस्य परिभाषा स्यात् तद्भेदानां व्यवस्थिति। पुरुषोत्तमाख्य प्रथम ततस्तु तिलक भवेत् ।। १६४ ।। अच्युतस्तु प्रोक्तो वद्धितस्तदनन्तरम् । ततो रणः समाख्यातस्तत. स्याद् वीरचण्डकम् ॥ १६५ ।। ततः १. [-] कोष्ठगतोंशो क. प्रतो नोपलभ्यते । २-२. 'नवधा सा' इति सुष्ठ ।
२८८ ] वृत्तमौक्तिक - द्वितीयखण्ड [ प० १६६ - १७६ मातङ्गसेलितं अन्यत्र वीरभद्रः स्यात् ततः शाकः प्रकीर्तितः । पश्चादयोत्पलमुदीरितम् ।। १६६ ॥ ततो गुणरतिः प्रोक्ता ततः कल्पद्रुमो भवेत् । कन्दलश्चाथ कथितस्ततः स्यादपराजितम् ।। १६७ ।। नर्तन तु ततः प्रोक्त तरत्पूर्व समस्तकम् । वेष्टनास्यं चण्डवृत्तं ततश्चास्सलितं मतम् ॥ १६८ ।। अथ पल्लवितं पश्चात् समग्रं तुरगस्तथा । पङ्केरुहं ततः प्रोक्तं - सितकञ्जमतः परम् ॥ १६६ ।। पाण्डूत्पलं ततश्च स्यादिन्दीवरमतः परम् । अरुणाम्भोरुह पश्चादथ फुल्लाम्बुजं मतम् ॥ १७०॥ चम्पकं तु ततः प्रोक्त वज़ुलं तदनन्तरम् । ततः कुन्द समाख्यातमथो बकुलभासुरम् ॥ १७१॥ अनन्तर तु बकुलमङ्गल परिकीर्तितम् । मञ्जयाँ कोरफश्चाथ गुच्छः कुसुममेव च ॥ १७२।। अवान्तरमिदं चापि प्रोक्त प्रकरणं त्विह । अथ त्रिभङ्गी फलिका दण्डकाख्या प्रकीर्तिता ॥ १७३ ।। विदग्धपूर्वा सम्पूर्णा विभङ्गी कलिका ततः । ततस्तु मिश्रकलिका कथिता वृत्तमौक्तिके ।। १७४॥ अवान्तर प्रकरणं तृतीयमतिसुन्दरम् । इत्थं सलक्षणं चण्डवृत्तप्रकरणं कृतम् ॥ १७५ ।। ततः साधारणमतं चण्डवृत्तमिहोदितम् । साधारणमतं चैकदेशतः प्रोक्तमत्र हि ।। १७६ ।। अवान्तरप्रकरणं साधारणमते स्थितम् । चतुर्थ विरुदावल्यां' विज्ञेयं कविपण्डितः ।। १७७ ।। ततस्त्वत्रव कलिका ज्ञेया सप्तविभक्तिकी। अनन्तर चाक्षमयीकलिका' कथिता विह ॥ १७८ ॥ ततस्तु सर्वलघुक कलिकाद्वयमीरितम् । ततश्च विरुदाना तु युगपल्लक्षणं कृतम् ।। १७६ ॥ १. स. विरुदावल्यो। २. क. कलिका प०१८०.१८८ १२. अनुक्रमणी-प्रकरण { २८६ नवम दशम ततस्तु विरुदावल्या. सम्पूर्ण लक्षण कृतम् । विरदावलीप्रकरण वृत्तमौक्तिके ।। १८०॥ अथ खण्डावली तत्र पूर्व तामरस भवेत् । ततस्तु मन्जरी नाम भवेत् खण्डावलो विह ।। १८१ ।। खण्डावलीप्रकरण परिकीर्तितम् । प्रथानयोस्तु दोषाणा निरूपणमुदीरितम् ॥ १८२ ॥ एकादश प्रकरणमिदमुक्तमतिस्फुटम् । तत. खण्डद्वयस्यापि प्रोक्ताऽनुक्रमणी क्रमात् ।। १८३ ।। एतत् प्रकरण चात्र द्वादश परिकीर्तितम् । वृत्तानि यत्र गण्यन्ते तथा प्रकरणानि च ॥ १८४।। पूर्वखण्डे पडेवात्र प्रोक्त प्रकरणं स्फुटम् । द्वितीयखण्डे चाप्यत्र रविसख्यमुदीरितम् ।। १८५॥ अवान्तर प्रकरण चतु सख्य प्रकीर्तितम् । गदित रसेन्दुमितमुत्तमम् ॥ १८६ ।। उभयो खण्डयोश्चापि सम्भूयव प्रकाशितम् । द्वाविंशति प्रकरण रुचिर वृत्तमौक्तिके ॥ १८ ॥ मात्सर्यमुत्सार्य मुदा सदा सहृदयरिदम् । प्रकरण विरालोक्यता मम ॥१८८ ।। इति खण्डद्वयानुक्रमणीप्रकरण द्वादशम् ॥१२॥ सम्भूय चाय अन्तर्मुख १. स. नेत्रद्वय ।
ग्रन्थकृत्-प्रशस्तिः दुस्थीभूतमिम जलाशयमधिस्थित्वा नयान्त क्वचि- म्मोहान्धीकृतगोव्रज मनसिजस्फूर्जद्विषज्वालया। गर्वाग्नि पदपद्मयुग्मवलननिर्वाप्य सर्वात्मना, स्व निर्वासय मन्मनोह्रदगत दुर्वासनाकालियम् ॥ १॥ यहोर्मण्डलचण्डमन्दरतटीनिप्पेपणालोडिता, दैत्याम्भोनिधयो विनाशमगमनिस्सारभूता भुवि । कालिन्दीतटगन्धसिन्धुरममु लीलाशतैर्वन्धुरै'- राभीरीनिकुरुम्बभौतिशमन' वन्दे गभीराशयम् ॥२॥ नि कामतुच्छीकृतकामधाम- श्रव्यस्फुरनाम जगल्ललाम । उद्दामचिन्ताशतदामबद्ध, श्रीराम मामुद्धर वामबुद्धिम् ॥ ३॥ श्रीचन्द्रशेखरकृते रुचिरतरे वृत्तमौक्तिकेऽमुष्मिन् । अक्षरवृत्तविधायकखण्डस्सम्पूर्णतामगमत् ॥ ४ ॥ लक्ष्मीनाथसुभट्टवर्य इति यो वासिष्ठवशोद्भव- स्तत्सून कविचन्द्रशेखर इति प्रख्यातकोतिर्भुवि । बालाना सुखबोधहेतुमतुल सच्छन्दसा मन्दिर, स्पष्टार्थं वरवृत्तमौक्तिकमिति ग्रन्थ मुदा निर्ममे ॥५॥ रसमुनिरसचन्द्र विते (१६७६) वैक्रमेऽब्दे, सितदलकलितेऽस्मिन्कात्तिके पौर्णमास्याम् । प्रतिविमलमति श्रीचन्द्रमौलिवितेने, रुचिरतरमपूर्व मौक्तिक वृत्तपूर्वम् ।। ६॥ श्छन्द शास्त्रपयोनिधिलोपामुद्रापति पितरम् । श्रीमल्लक्ष्मीनाय सकलागमपारग बन्द ॥ ७॥ १. ख बन्धुरा । २. स. भातिशमन । ३. ख. पिपन्तर।
५०८-६ ] प्रन्यकृतप्रशस्ति [ २६१ याते दिवं सुतनये विनयोपपन्ने, श्रीचन्द्रशेखरकवौ किल तत्प्रवन्धः । विच्छेदमाप भुवि तद्वचसैव सार्द्ध, पूर्णीकृतश्च स हि जीवनहेतवेऽस्य ॥८॥ श्रीवृत्तमौक्तिकमिदं लक्ष्मीनाथन पूरितं यत्नात् । जीयादाचन्द्राकं जीवातुर्जीवलोकस्य ॥ ६ ॥ श्रीः इत्यालङ्कारिकचकचूडामणि-इन्दःशास्त्र'परमाचार्य-सकलोपनिषद्रहस्यार्णव- कर्णधार लक्ष्मीनायभट्टात्मज-कवि'-चन्द्रशेखरभट्टविरचिते श्रीवृत्तमौक्तिके पिङ्गलवात्तिके वर्णवत्ताख्यो द्वितीयः परिच्छेदः ।। श्रीः समाप्तश्चायं पात्तिके द्वितीयः खण्डः । श्रीकृष्णायानन्तशक्तये नमः । श्रीरस्तु । समाप्तमिदं धीवृत्तमौक्तिकं नाम पिङ्गलवातिकम् । शुभमस्तु । सवत् १६६० समये यायनवदि ११ रवो शुभदिने लिखितं शुभस्याने अर्गलपुरनगरे लालमनिमित्रेण । शुभम् । इदं प्रन्यसख्या ३८५०॥ १. ख. छन्द शास्त्र। २. स. कविशेखरयी। ३. ख. द्वितीयखण्डः।
छन्दःशास्त्रपरमाचार्यश्रीलक्ष्मीनायभट्टप्रणोतो वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुष्करोद्धारः प्रथमो विश्रामः श्रीगणेशाय नमः प्रणम्य जगदाधारं विश्वरूपिणमीश्वरम् । श्रीचन्द्रशेखरकृते वात्तिके वृत्तमौक्तिके ।। १ ।। अन्तःसारं समालोच्य नष्टोद्दिष्टादिदुष्करम् । श्रीलक्ष्मीनाथभट्टेन सुकरीक्रियतेतराम् ॥ २ ॥ अथानन्तरं छान्दसिकपरीक्षार्थ कौतुकार्थञ्च मात्राणामुद्दिष्टमुच्यते । तत्र त्रयोदविभेदभिन्नेषु पट्कलप्रस्तारगणेषु इदं कातिम रूपम् इति लिखित्वा पृष्ठं रूपमुद्दिष्टं प्रथमप्रत्ययस्वरूप, तन्प्रकारमाह सार्द्धन श्लोकेन । दद्यात् पूर्वयुगाद्वान् लघोरुपरि गस्य तूभयतः । अन्त्याङ्के गुरुशीर्षस्थितान् विलुम्पेदयाडांश्च ॥५१॥ उर्वरितश्च तथा त्रिोद्दिष्ट विजानीयात् । दद्यादिति । तस्मिन् लिखिते रूपे पूर्वयुगावान् दद्यात् । तत्र च लघोरुपयेव गुरोस्तु उभयत.-उपर्यघश्चेत्यर्थः । अथ पश्चादन्त्याङ्के-शेषाङ्के गुरुशीपंस्थितान् अङ्कान् विलुम्पेत् । तथा कृते सति उर्वरितश्च अङ्कः मात्राणामुद्दिष्ट जानीयात् । एत- दुक्त भवति । पट्कलप्रस्तारे तावदेको गुरु , द्वौ लघू, एको गुरुश्च एवरूपो गण: SIS कुत्र स्थानेऽस्तीति प्रश्ने कृते, तदाकार गण लिखित्वा पूर्वयुगेन समाना. ऋमादका दातव्याः २ तः १३ [त]त्रादिकलाया प्रथमोऽड्ो देयः, ततः पूर्व- सुगावाभावादुत्सर्गसिद्धो द्वितीयोऽङ्कस्तदधः । तदनन्तर पूर्वाङ्कद्वयमेकीकृत्य उत्सख्यकोऽड्कोऽग्ने देय. । एवं च पूर्वयुगसमानाडास्त्रिपञ्चादिदेय इति पूर्व- पुगक्रमार्थः । अत्र गुरोरुपर्यधश्चाको देयो द्विकलत्वात् । एतच्च गुरुशीर्पपदा- लभ्यते । एवं तेषु अङ्केषु अन्त्याङ्के-चरमाझे त्रयोदशरूपे १३ यावन्तो गुरुशीर्ष- स्थितान् अवास्तान् विलुम्पेत् । ते च नव तथा च त्रयोदशात्मनि चरमेऽङ्के नवाङ्के लुप्ते सति उर्वरित रकंश्चतुर्भिश्चतुर्थ स्थान लिखित्वा तत्समानाङ्क- स्थानको यद्गण इति जानीयात् । तदेतन्मात्राणामुद्दिष्टम् । उद्दिष्टस्य गणस्य स्थानमात्रानयनादिति भावः । .
१. प्रथम विधाम [ २६३ एवं चाप्टभेदविभिन्नो पञ्चकलप्रस्तारे-द्वी लघू, एको गुरुः, एको लघुश्च इत्येवंरूपो गण: 151 कुत्र स्थानेऽ स्तीति प्रश्ने, प्रथमलघोरुपरि प्रथमावस्तदनु द्वितीयलघोरुपरि द्वितीयाङ्कस्ततो गुरोरुपरि तृतीयाङ्कस्तदधः पञ्चमाङ्कस्तदनु लघोरुपरि अष्टमाङ्कश्च देयः। अतोऽन्त्याङ्के-अष्टमा ८ गुरुशिरोद्धस्तृतीयो- ऽड्को ३ लोप्योऽवशिष्टः पञ्चमाको भवति । तस्मात् पञ्चमो गणस्तादृशो भवतीति एव जानीयादिति । तथा च पञ्चभेदे चतुष्कलप्रस्तारे जगणः ।। कुत्रास्तीति प्रश्ने, प्रथमलघो- स्परि प्रथमाङ्गस्तदनु गुरोरुपरि द्वितीयाङ्कस्तदधस्तृतीयाङ्कः शेपो लघोरुपरि पञ्चमाङ्को देयः । अतः शेपे पञ्चमाझे ५ गुरुशिरोऽङ्को द्वितीयो लोप्यः । अवशिष्टस्तृतीयाऽड्को भवति । तस्मात् तृतीयस्थाने जगणो वर्तत इति जानीया- दिति । एवञ्च सप्ताप्टकलादिकेषु समस्तेषु प्रस्तारेषु प्रथमे शेपे च गणे शव नावतरीतीति । द्वितीयस्थानादारभ्य उपान्त्यस्थानपर्यन्त प्रश्ने कृते प्रोक्त- प्रकारेण उद्दिष्ट बोद्धव्यमतिविशुद्धबुद्धिभिरित्यास्ता विस्तारेण इत्युपरम्यते । इति शिवम् । श्रीनागराजाय नमः प्रस्तारविस्तारणकोतुकेन प्रस्तारयन्तं पतगाधिराजम् । मध्येसमुद्र प्रविशन्तम-तर्भजामि हेतु भुजगाधिराजम् ॥ अथ मात्रा-वर्णोद्दिष्टो वक्तव्ये तर प्रस्तारमन्तरेणोद्दिष्टादीनामशक्य- कथनत्वात् समस्तप्रस्तारस्य वसुधावलयेऽप्यसमावेशात् केचन प्रस्ताराः प्रस्तुतो- पयोगिनो लिख्यन्ते । एवं अन्येपि पड्विंशत्यक्षरपर्यन्त प्रस्ताराः बोदव्याः सुबुद्धिभिः । द्वि कलप्रस्तारो यथा- S चतुष्कलप्रस्तारो यथा- ॥ २ 55 १ त्रिकलप्रस्तारो यथा- २ ३ 15 १ 151 s" 1I २ ३ 111 ५
२६४ ]
वृत्तमौक्तिक-यात्तिक-दुष्करोद्धार
पञ्चकलप्रस्तारो यथा-
पट्कलप्रस्तारो यथा-
155
555
or
SIS
२
।।55
२
।।।
३
ISIS
SSI
SIS
५
।।।।
५
।।5।
।5।।
15sI
६
S11।
७
SI51
८
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1।।5।
55||
E
11sI
१०
Is।।
१२
मात्राणामुद्दिष्टं द्विलोप्यः
S
३
मात्राणामुद्दिष्टं प्रथमप्रत्ययः
३
१
५
-
S
.
S
२
१३
लोपो नवाः ६
इति श्रीमन्नन्दनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्वादमोदमानमानसचञ्चरीकालङ्कारिकचक्र-
चूडामणि-साहित्यार्णवकर्णधार-छन्दःशास्त्रपरमाचार्य-श्रीलक्ष्मीनाथभट्टारक-
विरचिते श्रीवृत्तमौक्तिके धात्तिके दुष्करोद्धारे मात्राप्रस्तारो-
द्दिष्टगणसमुद्धारो नाम प्रथमो विधामः॥१॥
द्वितीयो विश्राम: अथ मात्राणामदृष्ट रूप नष्ट द्वितीयप्रत्ययस्वरूपम् । तच्च पट्कलप्रस्तारे प्रस्तारान्तरे वा अमुकस्थाने कीदृश इति प्रश्नोत्तरमध्यन श्लोकद्वयेनाह- प्रय मात्राणां नष्ट यददृष्ट पृच्छयते रूपम् ।। ५२ ।। पत्कलफप्रस्तारो लघव. कार्याश्च तावन्त । दत्त्वा पूर्वयुगाङ्कान् पृष्ठाडू लोपवेदन्त्ये ।। ५३ ।। उर्वरितोर्वरितानामभाना यत्र लम्यते भाग । परमाना च गृहीत्वा स एव गुरुतामुपागच्छेत् ॥ ५४॥ अथेति । पूर्वाद्ध अवतारिकर्यव व्याख्यातप्रायम् ।। ५२ ।। यत्कलकप्रस्तार कृत तत्कलकप्रस्तारकृते तावन्त एव लघव कार्या । चकारोऽवधारणार्थ । तत्र च दत्वा पूर्वयुगाड्वान् एक-द्वि-त्रि पञ्चाप्ट-प्रयोदशा- दीन् । यथा-।।।।।। तत पृष्ठाङ्क अन्त्ये-शेपे लोपयेत् ॥ ५३ ।। एव चोर्वरितोर्वरिताना अवशिष्टानामड्काना यत्र यत्राङ्के भागो लभ्यते स स एवाङ्क शेषाङ्के लोपयितु शक्यते । स पुनस्तदध स्थितकल परमात्र च गृहीत्वा गुरुतामुपागच्छेत् --गुरुर्भवतीत्यर्थ । गुरुत्वे चाध स्थितकलाया अपि सग्रहोऽर्थाद् भवतीति । अन्यथा लघुगुरुरित्येव द्रूयादिति ॥ ५४ ।। अनेन व्याख्यानेनाव्युत्पन्नतम शिष्यो बोधयितु न शक्यत इति स्फुटीकृत्य सोदाहरण विलिख्यते । यथा-- पट्कलप्रस्तारे द्वितीयस्थाने कीदृशो गण ? इति प्रश्ने, पूर्वोक्ताङ्कसहिता लघुरूपा षट्कला स्थापनीया । पूर्वयुगलसदृशा अड्का देया । तत शेषाङ्के त्रयोदशे १३ पृष्ठावलोपे द्वितीयाङ्क २ लोपे सति एकादशावशिष्टा ११ भवन्ति । तत्राव्यवहिताप्टलोपे शेषकलाद्वयेन एको गुरुर्भवति । अवशिष्टाङ्क त्रय भवति । तत्र च पञ्चलोपाशक्यत्वात् परमात्रा गृहीत्वा गुरुर्भवतीत्युक्तत्वाच्च त्रिलोपे ३ तृतीयचतुर्थाभ्यामपरो गुरुभवति । शेपाको नावशिष्यत इति । प्रथम लघुद्वयमेव । तथा चादी लघुद्वयमनन्तर गुरुद्वयमित्येतादृशो ।। 5s द्वितीयो गणो भवतीत्यर्थ । एवमन्यनापि। यद्यप्याद्यन्तयोस्सन्देहाभावस्तथापि प्रथमे कीदृशो गण ? इति प्रश्ने, गुरु- अयात्मक प्रथम गण लिखित्वा तत्रोपर्यध क्रमेण पूर्वयुगाका एक-द्वि-त्रि-पञ्चाष्ट-
२९६ ]
वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुष्करोद्धार
त्रयोदशाकारा देयाः । यथा-555 तत्र शेपाड् त्रयोदशात्मनि १३ गुरुशीर्षस्था
ये अड्का एकत्र्यष्टरूपास्तर्जातो द्वादशाको लोप्यस्तथा च लुप्ते तस्मिन्
प्रथमो गणस्तादृशो भवतीति वेदितव्यम् ।
अथ च त्रयोदशस्थाने कीदृशो गणः ? इति प्रश्ने, पूर्व विदेव लघूनामुपर्यङ्करन्
दत्त्वा शेषाई त्रयोदशात्मनि पृष्ठाङ्कलोपे अवशिष्टाद्वाभावान गुरुकल्पना ।
अतो लघव एवावशिष्यन्ते इति ।।।।।।
चतुर्दशादिप्रश्ने चाङ्कलोपासम्भवादसत्यत्वमात्रं वाच्यम् । तदधिकप्रस्तारा-
भावादित्थं च मात्राप्रस्तारे सर्वत्रैव शेषाङ्कसमसंख्यागणा भवन्तीत्यपि निश्ची-
यते । इति गुरुमुखादवगतार्थो लिखित इति शिवम् ।
मात्राणां नष्टम्
१
२
३
५
१३
-
-
S
S
-
द्वितीयः प्रत्ययः
इति श्रीमनन्दनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्वादमोदमानमानसचञ्चरीकालङ्कारिक-
चक्रचूडामणि-साहित्यार्णवकर्णधार-छन्दःशास्त्रपरमाचार्य-श्रीलक्ष्मीनाय-
भट्टारफरविरचिते श्रीवृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्फरोद्धारे मात्रा-
प्रस्तारनष्टगणसमुद्धारो नाम द्वितीयो विधामः ॥२॥
तृतीयो विश्रामः मय तपय प्रमप्राप्त यर्णानामुद्दिष्टमाह~-द्विगुणानिति श्लोरेन । द्विगुणानदान दत्त्या वर्णोपरि सशिर स्थितानद्धान् । एपेन परपिरया योंदिष्ट विजानीत ॥ ५५ ।। यर्णानामपरिप्रमताना इति मध्याहार्यम् । तया च तेपामपरि द्विगुणानदा दत्त्या ततो सशिर स्थितानवान् सयाग्येति दोष । तया च स-सात अड एपेनाधित प्रझेन पूरयित्वा-एकोयत्य वर्णोहिष्ट विजानीत शिष्या इति पोप ॥ १५ ॥ एवमुक्त भवति । एयाभरादिपद्विशत्यदारावधिप्रस्तारेषु प्रतिप्रस्तारमाद्य- भेदे सध्यामायादुद्देश सर्वथा नास्त्येव । प्रतो द्वितीयभेदादारभ्य उपा त्यभेद- पर्यत उद्देशो भवतीति तत्पमारवोधनायं शिप्यानभिमगीकृत्य प्रस्तारा निर्धार- पूर्वर वर्णोद्दिष्टमुच्यते । तया प- एकाक्षरप्रस्तारे भेदद्वय भयति । तत्र प्रथमभेदस्य उद्देशासम्मवात । द्वितीय भेदे च एक्लपुम्पे द्वितीयाक्षरामावादेर मेवाड़ तस्मिन् दत्त्वा तदुपरि एक मट्कमधिर दत्त्या द्वितीयभेदमुद्दिशेत् । इत्येवाक्षरप्रस्तार । द्वपक्षरप्रस्तारे भेदचतुष्टय ४ भवति । तत्र द्वितीये एको लघुरेकोगुरुरित्येक भेदे । , प्रथमे लपायेकोऽट्को, द्वितीये गुरौ द्वितीयोग्डो दातव्य तदनु लघोरपरि एक मधिय दत्त्वा द्वितीयभेद उद्दिशेत् । एव तृतीये एको गुरुरेको लघुरित्येव भेदे ।।, प्रथमे गुरावेकोऽवो, द्वितीये लघौ द्वितीयोग्यसो त्यस्ततो लघोपरि स्थिते द्वितीये.के एकमधिर दत्वा तृतीय भेदमुद्दियोत् । एवमेव लघुद्वयात्मके ॥ चतुर्थे भेदे प्रथमे लघौ प्रथमाञ्इ दत्वा, द्वितीयेपि लघौ द्वितीयमङ्क विधाय तयोरुपरिन्थयो प्रथमद्वितीयाद्वयोमलने वृत जात निके एका अधिक दत्त्वा तस्य चतुष्टय सम्पाद्य चतुर्थ भेदमुद्दिशेदिति । इति द्वयक्षरप्रस्तार । "यक्षरप्रस्तारे तु भेदाप्टक ८ भवति । तत्र एको लघु द्वौ गुरू चेति गण कुत्रास्तोति प्रश्ने कृते पृष्ठ गण । 55 लिखित्वा तत्र प्रथमे लधौ प्रथमाको दातव्य , द्वितीये गुरौ तद्विगुणो द्वितीयोऽड्डो दातव्य , तृतीये गुरौ तद्विगुण श्चतुर्थाऽवो दातव्य । अत्र सर्वत्र प्रथमादिपदेन वर्णो लक्ष्यते, ततो लघोरपरि योऽस्तस्मिन्नेकमधिक दत्त्वा तेन सह एकीकृत्य द्यको भवति तस्मात द्वितीयो यगणाख्याक्षरप्रस्तारे गणो भवतीत्यूव वेदितव्यम् । , २६८ ] वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुप्फरोबार एवं चाव प्रथमं लघुद्वयं ततो गुरुरित्येवं गणः ।। ३ कस्मिन् स्थानेऽस्तीति प्रश्ने कृते तदाकार गण १, २ लिखित्वा प्रथमे लघावेकाई, दत्त्वा १, द्वितीयेऽपि तद्विगुणं द्वयङ्क २ विधाय, तृतीये गुरौ तद्विगुण चतुर्थमई कृत्वा ४, ततो लघोरुपरिस्थयोः प्रथमद्वितीयायोः सयोगकृतत्रयं भवति ३, तस्मिन्नेकेऽधिके दत्ते सति चतुरङ्को भवति ४ । अतश्चतुर्थस्सगणाख्यस्त्र्यक्षरप्रस्तारे गणो भवतीति ज्ञेयम् । एवमन्यत्र । इति ब्यक्षरप्रस्तारः । अथ चतुरक्षरप्रस्तारे पोडश भेदा १६ भवन्ति । तत्र द्वौ गुरू, एको लघुरेको गुरुश्चेत्येवरूपो गण. कुत्रास्तीति प्रश्ने कृते, त पृष्ठं गणं लिखित्वा 55 1 5 तत्र प्रथमगुरोरुपरि प्रथमाको १ देयः, ततो द्विगुणान् द्विगुणान् अङ्कान् दत्त्वा, ततश्च द्वितीयगुरोरुपरि द्वितीयोऽड्को देयः, तृतीयो लघी चतुरङ्गः, चतुर्थो गुरा- वष्टमानो देयः ।। इति द्वैगुण्यम् । ततो लघोरुपरिश्चतुर्थोऽवस्त एकेन पूर- यित्वा तस्य पञ्चत्व विधाय तत्समानाङ्कस्थाने स गणोऽस्तीति विज्ञातव्यम् । इत्युद्दिष्ट वर्णप्रस्तारे प्रथमप्रत्ययस्वरूपं विजानीत शिष्या इति । अत्र सर्वन गणशब्देन तत्तद्भेदो लक्ष्यते । तथा चात्रैव प्रथम लघुत्रय- मनन्तर एको गुरुरित्येवमाकारको गणः कुत्र स्थानेऽस्तीति प्रश्ने कृते तदाकार गण लिखित्वा ।।। तत्र प्रथमलघोरुपरि प्रथमा दत्त्वा, ततोऽपि द्विगुणान् द्विगुणान् अङ्कान् दत्त्वा, तदनु द्वितीयलघोरुपरि तद्विगुण द्वितीयमई विलिख्य, तृतीये लघौ तद्विगुण चतुरई विधाय, चतुर्थे गुरावष्टमाङ्क तद्विगुण दत्त्वा, एव द्विगुणत्व सम्पाद्यते । लघुशिरःस्थितान् एक-द्वि-चतुरट्वान् एकीकृत्य जात सप्ताङ्क ७, एकेन ग्रन्थिस्थेन पूरयित्वा तस्याष्टत्व विधाय तत्समानाङ्कस्थाने स गणोऽस्तीति ज्ञेयम् । इत्युद्दिष्टं विस्पष्ट विजानीत विज्ञाः । इति चतुरक्षरप्रस्तारः । किञ्च- विपरीतप्रस्तारोद्दिष्टे क्रियमाणे लघुशिर स्थितान् अङ्कान् इत्यत्र गुरुशिर.- स्थितान् इति पाठस्तवोद्दिष्टप्रकारः सुलभः । एवञ्च सर्वप्रत्ययेषु पाठविपर्ययः कार्य इत्युपदिश्यते । एवञ्च ते सर्वेऽपि प्रत्यया विपरीता भवन्तीति रहस्यान्तरम्। एवमन्येष्वपि प्रस्तारेषु तत्तद्गणस्थानावस्थान बोद्धव्यमिति विशदबुद्धिभिः । इति संक्षेपः । इति सर्वमवदातम् । एकाक्षरप्रस्तारो यथा- १ २
३. तृतीय विधाम
[ २६९
द्वयक्षरप्रस्तारो यथा-
चतुरक्षरप्रस्तारो यथा-
SS
१
SSS
S
15
।
S
S
S
२
२
३
31
3
।
5
S
३
४
।
S
S
४
S
5
-
S
५
त्र्यक्षरप्रस्तारो यथा-
S
S
S
S
S
७
।
S
S
२
.
॥
S
८
S
5
३
S
5
S
1
S
-
S
-
-
S
S
S
S
1
S
-
S
१२
S
।
-
S।
-
-
5 ।
-
1
-
वर्णानां उद्दिष्टं तथव प्रथमः ।
[इति] श्रीवृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्करोद्धारप्रस्तारे विस्तारप्रकारः ।
इति श्रीमनन्दनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्वादमोदमानमानसचञ्चरोकालङ्कारिक-
चऋचूडामणि-साहित्यार्णवकर्णधार-छन्दःशास्त्रपरमाचार्य-श्रीलक्ष्मी-
नायभट्टारफविरचिते श्रीवृत्तमौक्तिक-वात्तिकदुष्करो-
द्वारे वर्णप्रस्तारोद्दिष्टगणसमुद्धारो नाम
तृतीयो विश्रामः ॥३॥
चतुर्थों विश्रामः अथ क्रमप्राप्तं तथैव वर्णानां नष्टमाह-'नष्टे पृष्ठे' इति श्लोकेन । नष्टे पृष्ठे भागः फर्तव्यः पृष्ठसंख्यायाः । समभागे ल कुर्याद् विषमे दत्त्वकमानये गुरुकम् ।। ५६ ।। नष्टे-प्रदृष्टरूपे पृष्ठे सति पृष्ठसंख्यायाः-पृष्ठायाः सख्यायाः भागः कर्तव्य:- विधेयः । तत्र समभागे सति-ल-लघु कुर्यात्, विपमेऽवशिष्टे सतीति शेपः। एक दत्त्वा तस्यापि भागं कृत्वा गुरुकमानयेत्-गुरुं लिखेदित्यर्थः। एवं कृते सति प्रकृतप्रस्तारस्थितादृष्टरूपंगणस्थानसिद्धिर्भवतीति भावः ।। ५६ ॥ इदमत्रानुसन्धेयम्- प्रत्र तावद् भागो नाम नष्टाङ्कस्य यावत्संख्यापूरणम् । तथाहि सोदाह- रणमुच्यते । यथा- चतुरक्षरप्रस्तारे पष्ठो गणः किमाकारः ? इति प्रश्ने, पडङ्गभागं कृत्वा तदर्द्ध त्रयं ३ स्थापनीयम् । अयं च समों भागः, उभयकोटिसाम्यात् । अंथ एको १ गुरलेख्यः । अनन्तरं अवशिष्टस्य त्रयस्य विषमत्वात् एकं १ दत्त्वा चतुष्टयं सम्पाद्य तरय भागं कृत्वा द्वयं २ स्थापनीयम् । तदा एको गुरुलेख्यः, ततो द्वयोर्भाग कृत्वा एक १ स्थापनीयम् । तदा एंको १ लघुर्लेस्यः । ततोप्यवशिष्टे विपमे एकं १ दत्त्वा द्वित्वं सम्पाद्य तस्यापि भागं कृत्वा एकमेव स्थापनीयम् । तदा एको गुरुलेख्यः । एवञ्च प्रथम लघुरनन्तरं गुरुस्ततो लधुरन्तरे गुरु रेवमाकार- श्चतुरक्षरप्रस्तारे षष्ठो। ऽ । गण इति वेदितव्यम् । तथा चाव सप्तमस्थाने किमाकारको गणः ? इति प्रश्ने, विषमत्वात् पूर्वमेको गुरुर्लेख्यः । ततः सप्तसु एक दत्त्वा अष्टौ कृत्वा विभागः कार्यस्तेन अवशिष्टाश्चत्वारः । अयं च समो भागस्तत एको १ लघुलेख्यः । पुनश्चतुष्टयस्यावशिष्टस्य भागं कृत्वा द्वय समं स्थापनीयम् । अत एको लघुरेव लेख्यः । अनन्तरं अवशिष्टस्य एकाइस्य विषमीभूतत्वाद् गुरुरेव लेख्यः । एवञ्च प्रथमं गुरुरनन्तरं लघुस्ततोऽपि लघुरेव चरमे च गुरुरेवं ।।। प्राकारश्चतुरक्षर- प्रस्तारे सप्तमो गण इति च विज्ञेयम् । एवं पुनः पुनर्भागे समे विभजनोये लघु. सप्तमस्य नानाविपमे दत्त्वा भागेकले गति पकतेलासावधिको
४. चतुर्थ विश्राम
[ ३०१
आयातीति पड्विंशतिवर्णप्रस्तारपर्यन्तं विषमस्थलेषु एकक दत्वा गुरुर्लेख्य
इति सक्षेप. । सर्वमिदमतिमञ्जुलवञ्जुलवर्णनष्टमिति शिवम् ।
वर्णाना नष्टम्
S
६
S
।
।
S
७
तर्थव द्वितीयप्रत्ययः ।
इति श्रीमन्नन्दनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्वादमोदमानमानसचञ्चरीकालद्धारिकचक्रचूडा.
मणिसाहित्यार्णवकर्णधार-छन्द शास्त्रपरमाचापंधीलक्ष्मीनाथभट्टारक-
विरचिते श्रीवृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्करोद्धारवर्णप्रस्तार-
नप्टगणसमुद्धारो नाम चतुर्यों विधामः ॥ ४ ॥
पञ्चमो विश्रामः अथ तृतीयप्रत्ययस्वरूपवर्णमेरुमाह-श्लोकद्वयेन कोष्ठानिति । कोष्ठानेकाधिकान् वर्णं कुर्यादाधन्तयोः पुन । एकाङ्कमपरिस्थाद्वयरन्यान् प्रपूरयेत् ॥ ५७ ।। वर्णमेरुरय सर्वगुर्वादिगणवेदकम् । प्रस्तारसख्याज्ञानञ्च फल तस्योच्यते बुधै ॥५८ ।। तत्र च क्रमाद् एकाधिकान् कोष्ठान् वर्णरक्षररुपलक्षितान्, पुनराधन्तयो- रेका च कुर्याद् विलिरय रचयेत् । ततश्च मध्यस्थकोष्ठकस्योपरि स्थिताङ्क- द्वयरेकीकृतरित्यर्थ । अन्यान् शून्यान् कोष्ठान् प्रपूरयेत् ॥ ५७ ।। एव कृते सत्यय वर्णमेहमरुरिव भवतीति शेप । तस्यैवप्रकारेण विरचि- तस्य मेरोबुंघ-अधीतछन्द शास्त्र भाष्यवात्तिकतात्पर्याभिरिति यावत् । सर्व- गुरुरादौ येषामेव विधाना गणाना वेदक-ज्ञापक अवबोधकमिति, यावत् प्रस्तार सख्याज्ञान च यतो भवतीति उभयमपि फलविशेषणम् । तथा च तत्तत्पक्तिस्थ- कोष्ठगत तत्तद्वर्णप्रस्तारसख्याव्यापक फल उच्यते-प्रकाश्यत इत्यर्थ ॥८॥ अस्य निर्गलितार्थस्त्वेव समुल्लसति- एकाक्षरादिषड्विंशत्यक्षरपर्यन्त स्वस्वप्रस्तारे कति सर्वगुरव , कत्येकादि- गुरव , कति सर्वलघव , कति वा प्रस्तारसरयेति प्रश्ने कृते वर्णमेरुणा प्रत्युत्तर देयम् । तत्र एकाक्षरादिक्रमेण यावदिप्ट कोष्ठकान् विरचय्य, प्रादावन्ते च कोष्ठके प्रथमाको दातव्य । ततो मध्यस्थकोष्ठके च तदीयशिर कोष्ठकद्वयाङ्क शृङ्खला. बन्धन्यायेन एकीकृत्य पर शून्य कोष्ठक एकीकृताङ्के पूरयेत् । एव अन्यत्रापि पूरणीये कोष्ठके कोष्ठानामुपरिस्थितकोष्ठद्वयाङ्कमुक्तबन्धन्यायेन पूरण विधेय इति सक्षेप । एव पूरितेषु कोष्ठेषु एकाक्षरप्रस्तारे आदावेकगुत्मिकस्तदन्ते च एकलवात्मक सकेत इति । द्वधक्षरप्रस्तारे तु सर्वगुरुरादौ त्रिगुरु-द्विगुरुर्वारिभावात् स्थानद्वयेप्येक- गुरुरन्ते च सर्वलघुरिति । यक्षरप्रस्तारे चादौ सर्वगुरुस्त्रिगुरोरन्यत्रासम्भवात्, स्थानत्रये द्विगुरु , स्थान- त्रये च एकगुरुरन्ते च सर्वलघुरिति । चतुरक्षरप्रस्तारेपि सर्वगुरुरादौ च चतुर्गुरोरन्यत्राभावात्, स्थानचतुष्के त्रिगुरु , स्थानपट्के द्विगुरु , स्थानचतुष्टये च एकगुरुरन्ते च सर्वलघुरिति । - -
५. पञ्चम विधाम
[३०३
एवमन्या प्रणालिकया सुघोभि षड्विंशत्यक्षरप्रस्तारपर्यन्त अङ्कसञ्चार-
प्रकार समुन्नेय ।
किञ्चात्र तत्तत्पङ्क्तिकोष्ठगततत्तवर्णप्रस्तारपिण्डसरयापि तत्तत्पड्क्ति-
स्थिताई समुल्लसतीति वर्णमेरुरय मेरुरिवादिभागसकुचितान्तविस्ताररूपो
विभातीति श्रीगुरुमुखादवगतो वर्णमेरुलिखनतमप्रकार प्रकाशित इति शिवम ।
श्रीलक्ष्मीनाथभट्टन रायभट्टात्मजन्मना ।
कृतो मेरुरय वर्णप्रस्तारस्यातिसुन्दर ।।
अस्य स्वरूपमुदाहरणमन द्रष्टव्यम् ।
वणंमेरुर्यथा तृतीय.
१
१
२
१
३
३
१
१
१
५
१०
५
१
६
६
२० | १५
३५ | ३५
२१
१
१
.
२८
८
8
३६
३६
८४|१२६ [१२६
नववर्णमेरुरयम् । एव अग्रेपि समुग्नेय सुधीभि ।
थोमन दनदनपरणारविन्दमारदास्वादमोदमानमानाबञ्चरीरासारित.
पघूममणि साहित्यावरचंपारपद शास्त्रपरमाचार्य-पौसमोनाप-
भट्टारतविरचिते योवृत्तमौरितरदातिश्परोडारे एराक्षरा
परियारपपिवयंप्रातारमेसारो माम
पञ्चमो विधाम ॥५॥
पष्ठो विश्रामः अथ मेरुगर्भा चतुर्थप्रत्ययस्वरूपां वर्णानां पताकामाह-श्लोकत्रयेण दत्त्वेत्यादि। दत्त्वा पूर्वयुगाङ्कान् पूर्वाङ्के योजयेदपरान् । अङ्कः पूर्व यो वै भृतस्ततः पंक्तिसञ्चारः ॥५६॥ अङ्काः पूर्व भृता येन तमङ्कभरणं त्यजेत् । प्रद्धश्च पूर्व यः सिद्धस्तमद्धं नैव साधयेत् ॥६०॥ प्रस्तारसंख्यया चैवमद्धविस्तारकल्पना । पताका सर्वगुर्वादिवेदिकेयं विशिष्य तु ॥ ६१ ॥ तत्र पूर्वयुगावान् एक-द्वि-चतुरष्टादीन् अवान् प्रथमं दत्त्वा पूर्वाधेरेकद्वया- दिभिरपरान् श्यादीन् अड्वान् योजयेत् बिभृयात् भरणं कुर्यादिति यावत्। किञ्च, य एवाङ्कः पूर्वं भृतः-पूरितः, ततस्तस्मादेव अद्वात् वै-नियमेन पक्तिसञ्चारः विधेय इति शेषः ॥ ५६ ॥ अड्का इति । नियमान्तरं च, येन-अङ्घन पूर्वमका भृताः-पूरिता: तमद्धं पुनर्भरणं त्यजेत्, प्रयोजनाभावात् । किञ्च, अश्य पूर्व यः सिद्धस्तमङ्घ पुनर्न साधयेत्-न स्थापयेदित्यर्थः ॥ ६ ॥ पताकाप्रयोजनमाह- प्रस्तारेति । एवं प्रस्तारसंख्यया अत्राङ्क विस्तारकल्पना भवतीति शेषः । एतादृशी चेयं पताका विशिष्य-विशिष्टां कृत्वा, तु-अवधारणे, सर्वगुर्वादिसर्व- लघ्वन्तवेदिका-ज्ञापिका विज्ञातव्यवेति वाक्यार्थः ॥ ६१ ॥ एवमुक्तं भवति- भो शिष्याः ! उद्दिष्टसदृशा अड्का देयाः। पूर्वाईः परभरणं कुर्यात्, पूरयितव्यः । पंक्तेः प्रधानाङ्कस्य पश्चात् स्थिताः पूर्वाका भरणं पूरणम् । एकत्राधिकस्य अङ्कस्य प्राप्तौ सा पंक्तिरेव तदंङ्कभरणे त्यज्यत इत्यवधेयम् । एवञ्च मेरूक्तप्रस्तारसंख्यया पताकाङ्का वर्द्धयितव्याः । तथाहि- चतुर्वर्णप्रस्तारे एक-द्वि-चतुरष्टाङ्का देयाः । यथा-१।२। ४ । ८ । अत्रकाङ्कस्य पूर्वाकासम्भवात् द्वितीयाङ्कादारभ्य पंक्तिः पूर्यते । तत्र ६. पप्ठ विधाम [ ३०५ पूर्वाका एकाइ एव प्रस्तारादिभूतः सर्वगुरुरूपः, तस्य परे द्वितीयादयः ते च अव्यवहितानतिक्रमेण पूर्यन्ते । तया च एकेन द्वाभ्यां मिलित्वा श्यहो भवति सः द्वितीयाकाघस्तात् स्थापनीयः । तत एकेन अष्टभिश्च मिलित्वा नवाको भवति स पञ्चमाकाधास्थात् स्थापनीयः । तत: पंक्तिपरित्यागः । मेरी निगुरूणां रूपाणां चतु:संख्यादर्शनादिति भावः । एतेन चतुर्वर्णप्रस्तारे प्रथम रूपं सर्वगुरु ब्रूयात् । द्वि-नि-पञ्च-नवस्थानस्यानि चतूरूपाणि त्रिगुरूणि जानीयादिति । एवमङ्कचतुष्टयं सापयित्वा, ततश्चतुरस्य अपस्तात् पूरित- पंक्तिस्था: परामिलिताः पडट्का देयाः। तत्र प्रथमः पूरित एवेति त्यज्यते । ततो द्वाभ्यां चतुनिर्मिलित्वा पष्ठोऽको ६ भवति, स चतुरद्वापस्तात् स्थापनीयः । ततः निभिः चतुर्भिः सम्मूय सप्तमोऽको भवति, स च पडवाधस्तात् स्थापनीयः । एवं च पञ्चभिश्चतुर्मिमिलित्वा जायमानो नवाको न स्यापनीयः। 'प्रकारच पूर्व यः सिद्धस्तमङ्घ नैव साधयेत्' इत्युपत्वात् सिद्धस्य साधनायोगादिति युक्ति- सिद्धत्वाच्च इति । ततो द्वाभ्यां अष्टभिमिलित्वा दशाको भवति, स च सप्नाङ्का- घस्तात् स्थापनीयः । ततश्च निमिरप्टभिमिलित्वा एकादशाहो भवति, स च दशादास्तात् स्थापनीयः । ततः पञ्चभिरप्टभिमिलित्वा प्रयोदशाको भवति, स चान्त एकादयावाचस्तात् स्थापनोय इति । तत पपिपरित्याग. ! मेर- मस्यापरिमाणदर्शनादिति पूर्ववद् हेतुरिति भावः । एतेन च चतुर्वर्णप्रस्तारे चतु . पट्-मप्न-एकादश-त्रयोदशस्थानस्यानि पद्पाणि द्विगुणि जानीयादिति । एवमपटक पूर्ववदेव सापयित्वा, ततोऽष्टाद्वापरतात् पूरितपक्तिस्थाः पराभू- मिलताश्चत्वारोऽङ्का देयाः तया च चतुभिरष्टमि सम्भूय द्वादशाको भवति, म चाप्टमामाघस्तात् स्थापनीयः । ततः पभिरष्टभिश्च सभूय चतुर्दशादी भवति, म तु द्वादशाधस्तात् पापनीयः । तत. सप्तभिरष्टमिश्च सभूय पञ्चदशानी भवति, सोपि चतुदंशानुग्धस्तात् स्थापनीयः । ततोऽपि पविनारित्याग । मेरावेक गुणां धतुम्सस्यादर्शनादिति भावः । एतेन चतुर्वर्णप्ररतारे प्रष्टमादा. पतुदंदा पञ्चदशस्थानस्यानि स्पाणि एक गुरुणि धूयादिति । एव पदपतुष्टय साययित्या, ततो दामिरप्टमिस्तु प्रस्ताराधिकागमवासष्टादमागचार । सहि पोशारः सर्वलधुरुपः १६ ३वास्यामिरपटायामष्टमारवादीमता मयं. मयुमानामिति सम्प्रदायः । सपा प प्रपमारपग्माया ममामायेन पयग्थान मवतीति शेपम् । पताराप्रमोग्नं तु मेरौ धनुर्वर्णप्रसारस्य पर rप पनपलशिगम् । मरंगुरिमा पन्चार निगुनि , पद दिगुण नि, पारिएर गुरुनि मानि, एक सर्वसामारमा पनि।
वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुष्करोद्धार
तत्र षोडशभेदाभिन्ने चतुर्वर्णप्रस्तारे कतमस्थाने सर्वगुर्वात्मकं, कतमस्थाने
च त्रिगुत्मिक, कतरस्थाने द्विगुर्वात्मकं, कतमस्थाने च एकगुर्वात्मकं, कुत्र वा
सर्वलघ्वात्मक रूपमस्ति, कति वा प्रस्तारसंख्येति प्रश्ने कृते पताकया उत्तरं
दातव्यमिति ।
पताकाज्ञानफलमिति श्रीगुरुमुखादवगतो वर्णपताकालिखनप्रकार: प्रकाशित
इति दिगुपदर्शनम् । उत्तरत्र च पड्विंशतिवर्णपर्यन्तं पताकाविरचनप्रकार:
समुन्नेय. सुधीभिः, ग्रन्थविस्तरभयानेहास्माभिः प्रपञ्च्यत इति शिवम् ।
अत्र चतुर्वर्णपताकायों तु सिद्धाङ्कान् पिङ्गलोद्योताख्यायां प्राकृतपिङ्गलसूत्रवृत्ती
श्रीचन्द्रशेखरः श्लोकाभ्यां संजग्राह । यथा-
एक-द्वि-त्रि-शराडाश्च वेदतु-मनि-दिक्-शिवाः ।
फामाष्ट-सूर्य-मनवस्तियि-क्षोणीशसम्मिताः ॥१॥
सिद्धाङ्काः स्युश्चतुर्वर्णपताकानुक्रमे स्फुटम् ।
पञ्चकोष्ठे लिखेदवान् शेषामेवं लिखेदिति ॥२॥
शेषान् प्रस्तारान्त रपताकाद्वान् एवं क्रमात् कोष्ठवर्द्धनपूर्वकक्रमात् लिखेत-
विन्यसेदित्यर्थः ।
प्रत्र अङ्कविन्यासक्रमस्तु श्रीगुरुमुखादेवावगन्तव्य इति सर्व मङ्गलम् ।
चतुर्वर्णपताका यथा प्रत्ययकाख्यः-
१६
३
१२
१
५
७
६
१०
इति श्रीमनन्दनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्वादमोदमानमानसचञ्चरीकालङ्कारिफचक्रचूदा-
मणि-साहित्यार्णवकर्णधार-छन्दः-शास्त्रपरमाचार्य-श्रीलक्ष्मीनायभट्टारकविरचिते
श्रीवृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्करोद्वारे वर्णपताकाडोद्धारो
नाम षष्ठो विधामः ॥६॥
सप्तमो विश्रामः
अथ तृतीयप्रत्ययस्वरूपमेवात्र मात्रा मेरुमाह-एकाधिककोष्ठानामित्या-
दिना सार्द्धन श्लोकचतुष्टयेन-
एकाधिककोप्ठानां द्वे पक्ती समें कार्य ।
तासामन्तिमकोष्ठप्वकाङ्क पूर्वभागे तु ॥२॥
एकाङ्कमयपक्तेः समपक्ते पूर्वयुग्माम्।
दद्यादादिमकोष्ठे यावत् पक्तिप्रपूर्तिः स्यात् ।।६३।।
प्राद्याडून तदीयः शीर्वामभागस्य ।
उपरिस्थितेन कोप्ठ विषमाया पूरयेत् पक्ती ॥६४॥
समपक्तो कोष्ठाना पूरणमाद्याङ्कमपहाय ।
उपरिस्थाईस्तदुपरिसस्यैर्वामस्थितरद्धः ॥६५॥
मात्रामेरुरय प्रोक्तः पूर्वोक्तफलभागिति ।
तत्र क्रमादेककेनाधिकेन कोप्ठेनोपलक्षिताना कोष्ठाना मध्ये द्वे हे पक्ती समे-
समाने कार्य-लिखनीये इत्यर्थ । तासा-सर्वासा पक्तीना अन्तिमकोप्ठेषु एकाङ्क-
प्रथमात्र यावदित्य दद्यात् इत्यन्वय । अथ च सर्वासा पक्तीना पूर्वमागे तु
प्रशविन्यास उच्यत इति शेष ॥ ६२ ।।
एकाङ्कमिति । तनायुक्पक्त -विपमपक्रादिमकोप्ठे-प्रथमकोष्ठे एकाक-
प्रथमा समपक्तरादिमकोप्ठे-प्रथमकोष्ठे पूर्वयुग्मा एकान्तरित प्रथमाके,
यावत् पक्तिप्रपूत्ति-पूरण स्यात्-भवति तावद् दद्यात्-विन्यसेद् इत्ययं ।। ६३ ।।
तदेवाह-
आद्याकैनेति । ततश्च सर्वत्र चिपमाया पडत्तो उपरिस्थितेन प्राधान-
प्रयमाङ्कन वामभागस्थ तदीय शीपाश्च कोष्ठन्यमिति शेष प्रपूरयेत-
साङ्क कुर्यादित्यर्थ. ॥ ६४॥
किञ्च-
समपड क्ताविति । समपङ्क्ती चाद्या अपहाय-त्यक्त्वा उपरिस्थिताई-
तदुपरिसस्थ. वामभागस्थितरईच शून्याना कोप्ठाना पूरण विधेयमिति
शेय.॥६५॥
३०८ ] वृत्तमौपितफ-वात्तिक-दुष्करोद्धार उक्तं मात्रामेरुमुपसंहरति-मायामेरुरयमित्यर्द्धन । भो शिष्याः ! पूर्वोक्तफलभागयं मात्रामेरुरिति प्रकारेणोक्तः । यथा, वर्णमेरोः फलं तथा मात्रामेरोरपीत्यर्थः। प्रौतदुक्त भवति । द्विमात्रादि-निरवधिकमात्रापंक्तिपर्यन्तं स्वस्वप्रस्तारे कति सर्वगुरवः, कत्येकादिगुरवः, फति सर्वलघवः, कति वा प्रस्तारसंख्येति प्रश्ने कृते मात्रामेरुणा प्रत्युत्तरं देयम् । तत्र च क्रमेणैव एककेनाधिके कोष्ठेनोपलक्षितानां कोष्ठकानां मध्ये द्वे द्वै कोष्ठे अर्थात् पड क्ती समे-सदृशे लिखनीये । तत्र प्रथमे कोष्ठद्वयं । तथा द्वितीयेऽपि कोष्ठद्वयमेव । तृतीये कोष्ठत्रयं । चतुर्थेऽपि कोष्ठत्रयमेव । पञ्चमे चत्वारि । पष्ठेऽपि चत्वार्येव । अत्र कोष्ठपदेन कोष्ठाङ्कः पंक्तिश्च लक्ष्यते, उपचारात् एककलायाः प्रस्तारो नास्तीति प्रथमं न कोष्ठगणनाकल्पना। अतः कोष्ठद्वया- त्मिकव प्रादौ पक्तिरिति प्रथम इत्युक्तिरिति समञ्जसम् । एवञ्च कोष्ठपक्तिषु अघोधः क्रमेणाङ्कान लिखेत् । सर्वत्र च शेषकोप्ठे प्रथमाङ्को देयः । तत्र तत्र च कोष्ठद्वयमध्ये प्रादावुपरिकोष्ठे च एकरूपोऽङ्को देयः। उपरिस्थितस्योपरिस्थिताङ्काभावाद् उत्सर्गसिद्धकरूपाङ्केन सहितं कृत्वा द्वितोयकोष्ठे द्वितीयाको देयः इति । तृतीयकोष्ठे तु उपरिस्थिताङ्कसहितं कृत्वा अर्थात् शिर स्थेनाद्वयेन मिलितं कृत्वा, प्रतस्त्रिरूपोऽङ्कस्समायाति । तथा चार्थात् शिर.स्थेनाङ्केन सह प्रथमो द्वितीयेऽधःस्थे मेलनीयः । यद्वा, पाद्यद्वयमधो मिलतीयं तु प्रक्रिया। तथा च प्रथमकोष्ठद्वयस्य पूरित- त्वात् द्वितीयादारभ्याङ्का दातव्याः। तत्र द्वितीये द्वयं, तृतीये पुनरेक, चतुर्थे त्रयम्, पञ्चमे पुनरेकं, पष्ठे चत्वारि, सप्तमे पुनरेक, अष्टमे पञ्च, नवमे पुनरेक, दशमे षट्, एकादशे पुनरेक, द्वादशे सप्तमेति प्रक्रियया अड्का देयाः । एवमाये । तदध कोष्ठेऽन्तकोष्ठे च पूर्णे मध्यस्थशून्यकोष्ठे चैषा प्रक्रिया पूरणीया । कोष्ठशिर:-कोप्ठस्थाङ्कः परकोष्ठस्थाको द्वावको चैकीकृत्य ' मध्यकोष्ठे-शून्यकोष्ठे मेलितोऽङ्को देयः । एवं सर्वत्र निरवधिकत्वात् यावदित्यं कोष्ठकं विरच्य मात्रामेरुः पूर्वीक्तरूप: कर्तव्य इति । अयं त्रयोदशमात्रामेरुलिखनक्रमप्रकार: श्रीगुरुमुखादवगतः प्रकाशित इत्यु- परम्यते । अनेदं अनुसन्धेयम् । समविषमरूपा द्वि-द्वि-मात्रादिप्रस्तारमारभ्य निरवधि- कमात्राप्रस्तारपर्यन्तं स्वस्वप्रस्तारे कति समकले लघवः, कति च गुरवः, कति ७. सप्तम विभाम [ ३०६ विपमकले सघव, पति प गुरय , अति योभयत्र प्रस्तारसस्येति प्रश्ने गृते मात्रा- मेरुणा प्रत्युत्तर देयम् । सत्र द्विषले समप्रस्वारे एक सर्वगुरु , द्वितीयो द्विकलात्मय सर्वलघुरिति द्विभेद प्रस्तारसमेत । वियले विषमप्रस्तारे द्वावर क्लयावेस गुरुको घान्ते विपसारमा सर्वलघु- रिति विभेद प्रस्तारमवेत । समयले चतुप्पस प्रस्तारे पादौ द्विगुर• स्थानत्रये घ एप गुगतिफलश्चान्ते चतुप्यलात्मक सवलपुरिति पञ्चभेद प्रस्तारसमेत । यिपममले पञ्चपसप्रस्तारे प्रयो गणा एक्लघव , चत्वारो गणास्त्रिलपव , स्थानत्रये द्विगुरु , स्पानचतुष्टये घरगुरुरन्ते च पञ्चकलात्मक सर्वलघु- रित्यप्टभेद प्रस्तारसपेत । समफले पटकलप्रस्तारे आदी सर्वगुण , पड्गणा द्विकला , पञ्चगणाश्चतु- कला , स्पानपट्ये द्विगुरु, स्थानपञ्चवे चक्गुरुरन्ते च पट्कलात्मक सवंलघुरिति प्रयोदयभेद प्रस्तारमवेत इति । एवमनेन प्रकार प्रमेण यावदित्य मात्रामेवंभीष्टमात्राप्रस्तारे लघुगुर्वादि- प्रचारप्रत्रिया अवगन्तव्या। प्रथवा पूर्वरूपप्ररने यावदित्य यावतक्लकप्रस्तारमात्रामर कोष्ठकविरच्य समक्सप्रस्तारे यामत क्रमेण द्वौ चत्वार पडप्टावनेन प्रकारेण गुरज्ञानम् । विषमकलप्रस्तारे तु एक नि पञ्च-सप्तानेन प्रकारप्रमेण लघुज्ञानम् । प्रत च सर्वत्र लघुरिति । उभयत्रापि एक द्वीपय पञ्चेत्याधनया सारण्या दक्षिणतो व्युत्तमेण शृङ्खलावन्ध यायन तत्तत्प्रभेदज्ञानम् । फिन्चार वाममागे सर्वत्र वाङ्कस्पले सर्वगुरुज्ञान भवतीति विज्ञातव्य- मित्युपदेशरहस्यम। इति शिवम् । सर्वत्रास्त्र च दक्षिणभागे शृङ्खलाबन्धयायेन अग्रिमाङ्कपिण्डोत्पत्तिर्भवतीति रहस्यान्तरमिति छ । श्रीलक्ष्मीनायभट्टन रायभट्टात्मजन्मना । कृतो मारय मात्राप्रस्तारस्यातिदुर्गम ॥ प्रस्य स्वरूपमुदाहरणमत्र द्रष्टव्यम्।
३१० ]
वृत्तमौक्तिक-यात्तिक-दुष्करोद्धार
तथैव तृतीयप्रत्ययः मात्रामेरुः। मात्रामेल्यथा -
वि०१
स० २
5
१
वि०३
15
२
स०४
55
३
वि० ५
155
३
१
स०६
SSS
६
५
वि०
I555
४
६
स०
5555
१
१
वि०
ISSSS
५
२०
२१
G
स०
SSSSS
३५
२८
है
१
वि०
I55.55
६
एकादशमात्रामेरुरयम् । एव अग्नेऽपि समुन्नेयः ।
इति श्रीमन्नन्वनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्वादमोदमानमानसचञ्चरीकालङ्कारिक-
चक्रचूडामणि-साहित्यार्णवकर्णधार-छन्दःशास्त्रपरमाचार्य-श्रीलक्ष्मीनाय-
भट्टारकविरचिते धीवृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्करोद्धारे
एकमात्रादिनिरवधिकमात्राप्रस्तारमेरुद्धारो
नाम सप्तमो विधामः ॥७॥
अष्टमो विश्रामः - अथ मरुगी चतुर्थप्रत्ययस्वरूपामेव मात्राणा पताकामाह-प्रथेत्यादि अर्द्धन श्लोकद्वयेन- अथ मायापताकापि कथ्यते कवितुष्टये ।।६६॥ दत्त्वोद्दिष्टवदडान् वामावत्तन लोपर्यदन्त्ये । प्रवशिष्टो वै योऽस्ततोऽभवत् पक्तिसञ्चार ॥६७।। एकंकास्य लोपे तु ज्ञानमेकगुरोर्भवेत् । द्विश्यादीना विलोपे तु पवितद्वित्र्यादिबोधिनी ॥६८।। अथेति । मायामेरुकथनानन्तर मात्राणा पताकापि कवितुष्टये-कवीना सन्तोपार्थ कथ्यते-उच्यत इत्यर्थ ॥६६॥ तत्प्रकारमाह- दत्त्वेति । तत्र उद्दिष्टवत्-उद्देशनमवत् अड्डान्-एक-द्वि-नि-पञ्चाप्ट-त्रयो- दशादीन् दत्त्वा-लिखित्वा, ततो वामावर्तेन-वामभागत अन्त्ये-त्रयोदशाङ्के लोप- येत् पूर्वमङ्कमिति शेप । अवशिष्टो वै योऽत्र लोपे सतीति शेष । ततोऽङ्कात् पक्तिसञ्चारो भवेदिति-जानीयादित्यर्थ ॥६७।। अपराङ्कलोपेन प्रकारमाह- एककाङ्कस्येति । एकैकाङ्कस्य लोपे तु अन्त्य इति शेष । एकगुरोर्ज्ञान भवेत् । द्विव्यादीना अङ्काना विलोपे तु पक्ति द्वि यादिगुरुबोधिनी भवतीति शेप ॥६५॥ अयमर्थ --उद्दिष्टसदृशा अड्डा स्थाप्या । ते यथा-१, २, ३, ५, ८, १३ । एक. द्वित्रिपञ्चाष्टत्रयोदशाद्या । ततो वामावर्त्तन पर लोपयेत् सर्वान्तिम अङ्क तत्पूर्वेणाङ्कन लोपयेदित्यर्थ । तत एकनाङ्केन अन्तिमाङ्कलोपे कृते सति एकगुरुरूपज्ञान भवति । द्वाभ्या भी तमाङ्के लोपे सति द्विगुरुरूपज्ञान भवति । विभि- रन्तिमाङ्कलोपे सति त्रिगुरुरूपज्ञान भवतीत्यादि ज्ञेयम् । एव कृते मात्रापताका सिद्धयति । तत्र पटकलप्रस्तारे यथा-उद्दिष्टसमाना अड्का एकद्वित्रिपञ्चाप्टत्रयोदश- रूपा स्थापनीया । तत सर्वापेक्षया परस्त्रयोदशा तत्पूर्वोऽष्टमाङ्क, तेनाप्ट- मान त्रयोदशाङ्कावयवे लुप्ते सति अवशिष्टा पञ्च । तस्य पञ्चमासस्य ३१२ ] वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-नुष्करोद्धार तत्पूर्व विविद्यमानत्वात् अष्टमाइलोपात् परकलया सह गुरुभावाच्च पञ्चमाद्वाद् एकगुरुपंक्तिकमो विधेय इति । तत्र च पञ्चमस्थाने पादौ चतुर्लघुकमन्ते चैक- गुरुकमेवं ।। ।। माकार रूपमस्तोति ज्ञानपताकाफलम् । एवमन्यत्रापि गुरुभावो ज्ञातव्यः। भतश्च तथा पञ्चभिस्त्रयोदशकावयवे लुप्ते सति प्रप्टावशिष्यन्ते, ते तु पञ्चायो लेख्यः । तथा त्रिभिस्त्रयोदशाकावयवे लुप्ते सति दशावशिष्यन्ते ते च अष्टाधो लेख्या. । तथा द्वाभ्यां द्वाभ्यां त्रयोदशाहावयवे लुप्ते सति एकादशावशिष्यन्ते तेऽपि दशाधो लेख्यः । तथा एकेन त्रयोदशाहावयवे लुप्ते सति द्वादशावशिष्यन्ते त एकादशाधो लेख्याः । अत्र सर्वत्र पूर्व एव हेतुरुन्नेयः । मेरावेकगुरुकचतुर्लघुकरूपगुरुस्थानानि प्रस्तारगत्या पञ्चव भवन्तीति नाग्ने पंक्तिसञ्चारः । एतेन पट्कलप्रस्तारे पञ्चमाष्टमदशर्मकादश- द्वादशस्थानस्थानि रूपाणि एकगुरुकानि ब्रूयादिति । एवं अद्भपञ्चमके एक- गुरुकमुक्तम् । अथ द्विगुरूणि रूपाणि उच्यन्ते-तत्र द्वाभ्यामद्धाभ्यां अन्तिमाङ्कलोपे कृते सति द्विगुरुक रूपमिति । पञ्चाष्टभिस्त्रयोदशाकावयवे लुप्ते सति भागाभावात् तद्वामावर्तस्थैस्त्रिभिस्तदप्रस्थरप्टभिश्च जातैरेकादशभिस्त्रयोदशाङ्कावयवे लुप्ते सति द्वावशिष्येते, द्वयोस्तत्पूर्वत्र छिद्यमानत्वात् । तत्रैकादशाङ्कलोपात् पर- कलया सह गुरुभावाच्च द्वितीया मारभ्य द्विगुरुकपक्तिसचारो भक्तीति । तथा च द्वितीयस्याने प्रथम द्विलघुक ततो द्विगुरुक ।। 55 एवमाकारकं रूप- मस्तीति पूर्ववदेव पताकाफलमुदेतीति । एवमन्यत्रापि प्रस्तारान्तरे गुरुभावोऽवगन्तव्यः । तथा च द्वाभ्या अष्ट- मिश्च जातर्दशभिः त्रयोदशाहावयवे लुप्ते सति प्रयोऽवशिष्यन्ते, तै द्वयधो लेख्या. । तत एकेन अष्टभिश्च जातैवभि.'त्रयोदशाकावयवे लुप्ते सति चत्वारो- ऽवशिष्यन्ते, ते च अधो लेख्या: । ततः पञ्चभिस्त्रिभिश्च जातरष्टभिस्त्रयोदशाका- वयवलोपाद् अवशिष्टः पञ्चमाको वृत्त एवेति न स्थाप्यते । 'प्रद्यश्च पूर्व यः सिद्धस्तमङ्क नैव साधयेदिति ।' वर्णपताकातो अनुवृत्तित्वादिति । ततः पञ्चभि- भ्यिां च जातो सप्तभिस्त्रयोदशाङ्कावयवे लुप्ते सति सप्तावशिष्यन्ते, ते तु षडधो लेख्याः। द्वित्रिलोप. पञ्चमात्मको वृत्त एवेति न स्थापनीय , अनुवृत्तसिद्धयादि- निषिद्धत्वादिति । तत एकेन त्रिभिश्च जातश्चतुभिस्त्रयोदशाकावयवे लुप्ते सति नवावशिप्यन्ते, तेऽपि सप्ताधो लेख्याः । एषु च पूर्ववद् हेतुरुन्नेयः । प्रतश्च मेरी द्विगुरुक-द्विलघुकरूपस्थानानि प्रस्तारगत्या पडेव भवतीति नाग्ने पक्तिसञ्चारः ।
८. प्रष्टम विधाम तेन पट्कलप्रस्तारे द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पष्ठ-सप्तम-नवमस्थानस्थानि स्पाणि द्विगुरूणि ब्रूयादिति । तथा च त्रिलोपे विगुरुक रूप भवतीति, त्रिपञ्चाष्टलोपे भागो नास्तीति, दि-त्रि-पञ्चलोपोऽप्यष्टात्मको वृत्त एवेति, पश्च-द्वये क्लोपोऽप्यप्टलोपारमको वृत्त एवेति । एक-द्वि-त्रिलोपोपि वृत्त इति प्रकारेण जायमाना अङ्का न स्थापनीया प्रकृतप्रस्तारसमाप्तेरिति भाव । ननु प्रथम रूप सर्व गुर्वात्मक कुत्रास्तीत्यपेक्षाया एक-न्यष्टभिमिलित्वा जातदिशभिस्त्रयोदशाकावयवे लुप्ते सति एकोऽवशिष्ट , स आद्य स्थाने विगुर्वात्मक रूप भवतीति विज्ञातव्यमिति । चरम रूप तु अष्टमानाने उद्दिष्टा- काऽकारत्वेन स्थापितमेवास्ति । तथा चात्रापि प्रथमाकचरमाङ्कयो पूर्वोकन्यायेना- ध्वस्थान भवतीति वेदितव्यम् । पताकाप्रयोजन तु मेरौ पट्कलप्रस्तारस्यक प्रथम रूप विगुरूपलक्षित सर्वगुर्वात्मक, पड्द्विगुरूणि रूपाणि, पञ्चैकगुरूणि रूपाणि, एक सर्वलध्वात्मक रूपमस्ति। तत्र त्रयोदशभेदभिन्ने पट्कलप्रस्तारे कुन स्थाने सर्वगुर्वात्मक, कतमस्थाने द्विगुर्वात्मक, कतरस्थाने चैकगुर्वात्मक, कुत्र वा सर्वलघ्वात्मक, कति वा प्रस्तार- सख्येति प्रश्ने कृते पताकयोत्तर दातव्यमिति पताकाज्ञानफलमिति । श्रीगुरुमुखाद- वगतो मात्रापताकालिखनप्रकार प्रकाशित । एवमन्यत्रापि निरवधिकमाना- प्रस्तारेषु पञ्चसप्ताष्टकलाना यथाक्रम मात्रापताकाविरचनप्रकार समुनेय सुधीभि, ग्रन्यविस्तारभयानेहास्माभि प्रपञ्चित इति शिवम् । अत्रापि पिङ्गलोद्योताख्याया सूत्रवृत्ती सार्द्धन इलोकेन पण्मात्रापताकाया सिद्धाङ्का सगृहीता । यथा- एक-द्वि-त्रि समुद्राङ्ग-मुन्यड काश्च अयस्तथा। पञ्चाष्ट-दिक् शिवेना स्यु तथाप्टौ च त्रयोदश ।। पण्मात्रिकापताकायामकानुक्रमणी स्मृता । इति । इहापि च पक्त्या विन्यासक्रमो गुरुमुखादवगन्तव्य । किञ्च- एक-द्वि-त्रि-समुद्राङ्ग-मुनि-वह्नि-शरस्तथा। वसु-दिग्-रुद्र-सूर्याष्टक्रमादद्वान् समालिखेत् ।। पञ्चमात्रापताकायामङ्कानुक्रमणी मता।
३१४ ]
वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुष्करोद्धार
इति सार्द्धन श्लोकेन सूत्रवृत्तौ पञ्चमात्रापताकायां सिद्धाङ कानुक्रमणिका
सगृहीता इति ।
अत्राप्यचविन्यासक्रमः पूर्ववदेव । इत्यं सप्ताष्टनवसु कलासु अड कान्
समुन्नयेत् । दिड मात्रमुक्तमस्माभिः ग्रन्थविस्तरशङ्कया इति सर्वमनवद्यम् ।
पञ्चमात्रापताका यथा-
१
२
३
८
६
७
पण्मात्रापताका यथा-
१
२
३
३
४
६
१२
६
इति श्रीमन्नन्दनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्थादमोदमानमानसपञ्चरीकालङ्कारिक
घरचूडामणि-साहित्यार्णवकर्णधार-छन्दःशास्त्रपरमाचार्य-श्रीलक्ष्मीनाप-
भट्टारकविरचिते प्रोवृत्तमौक्तिकवात्तिकदुष्करोदारे मात्रा-
पताकोदारो नामाप्टमो विधामः॥5॥
नवमो विश्रामः अथ वृत्तजातिसमार्चसमविषमपद्यस्थगुरुलघुसंख्याज्ञानप्रकारमाह 'पृष्ठे' इति श्लोकेन । पूछे वर्णच्छन्दसि कृत्या वास्तथा मानाः । वर्णाङ्कन फलाया लोपे गुरवोऽवशिष्यन्ते ।। ६६ ।। तत्राऽमुकसख्याक्षरप्रस्तारेऽमुके छन्दसि कति गुरख, कति च लघव इति प्रश्ने कृते गुरुलघुसख्याज्ञानप्रकारप्रक्रिया प्रकाश्यते । तत्रोद्भावितचतुष्पदे वर्णप्रस्तारच्छन्दसि समवृत्ते पृष्ठे सति वर्णान्-तत्रस्य वर्णान् गुरुलघुरूपतया समुदायमापनान् माना -कला. कृत्वा, तथा गुरुलघुरूपसमु- दायतयंव कलारूपतामापद्य त्यर्थः। ततः कलाया इति जात्या एकवचन । अतः कलाना मध्यत इत्यवधेयम् । वर्णाड केन पृष्ठस्य वृत्तस्य वर्णसख्याकन लोपे लोपावशिष्टकलासख्यया गुरवोऽवशिघ्यन्ते, तत्तवृत्तगतगुस्न् जानीयादित्यर्थः । गुरुज्ञाने सति परिशेपादवशिष्टवृत्ताक्षरसख्यया लघूनपि जानीयादित्यर्थ. ॥ ६६ ।। अत्र समवृत्तस्यकपादज्ञानेनैव चतुर्णामपि पादानामुट्टवणिका विधाय लिखनेन गुरुलघुज्ञान भवतीत्यनुसन्धेय सुधीभिः । यथा- समवृत्त एकादशाक्षरप्रस्तारे पोडशमात्रात्मके ग्थोद्धतावृत्तपादे ‘रात्परन्नर- लग रथोद्धता' इत्यत्र 515,111,515, 15 वर्णा ११, माना १६ पोडशकलासु पिण्डरूपासु सस्यातासु वृत्तस्यैकादशवर्णसख्याया लुप्ताया सत्यामवशिष्ट- पञ्चगुरव पड्लघव परिशेपाद् विज्ञेया । इति समवृत्तस्थगुरुलघुजानप्रकार । एव पादचतुष्टयेऽपि पादसाम्यात् विशतिगुरव चतुर्विंशतिर्लघवश्च भवन्तीति नेयम् । एव प्रस्तारान्तरेऽपि समवृत्तेपु गृहलघुज्ञानमूह्य सुघोभिरित्युपदिश्यते । एवञ्च पत्रिंशदक्षरायाम्- गोकुलनारी मानसहारी वृन्दावनान्तसञ्चारी। यमुनाकुजविहारी गिरिवरधारी हरि पायाद् ।। इत्यस्या देहीसमाख्याया गाथाजातौ सप्तपञ्चाशत् सत्यातासु पिण्डरपासु कलासु पत्रिंशदक्षरलोपे वृते सति एकविंशतिगुरवोऽवशिष्यन्ते । पारिशोप्यात् पञ्चदश लघवोमीति च ज्ञेयम् । इति गायाजातिपु गुरुलघुज्ञानप्रकार.।
३१६ वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुष्करोद्धार उट्टवणिका यथा- sil SSS s 555 151 SCS IIS SIL SSI ॥ SS SXS पूर्वाद्ध ३० मात्रा, उत्तरार्द्ध २७ मात्रा । माया ५७, अक्षर ३६ । एवमेवापरास्वपि जातिषु गुरुलघुज्ञानप्रकार ऊहनीय इत्युपदेशः । एवमेव अर्द्धसमवृत्तेपि प्रथम-तृतीयविषमपादे द्वितीयचतुर्यसमपादे च- सहचरि कथयामि ते रहस्यं, न खलु कदाचन तद्गृह व्रजेथाः । इह विष-विषमागिरः सखीनां, सकपटचाटुतराः पुरस्सरन्ति । इति पुष्पितामाभिधाने छन्दस्य[प्ट]पष्टिकलात्मके ६८ पिण्डे छन्दोक्षर- संख्यां पञ्चाशदात्मका ५० लुम्पेत् । एवं लोपे सति अष्टादश १८ गुरवोऽव- शिष्यन्ते, परिशेषाद् द्वात्रिंशल्लघवोऽपि ३९ तत्र वर्तन्त इत्यर्द्धसमवृत्तस्थ- गुरुलघुज्ञानप्रकारः। उट्टवणिका यथा- [१२] SIS ISS (SI 151 SIS s SIS ISS 151 SI 515 5 [१२] [१३] १८ गुरु, ३२ लघु, अक्षर ५०। एवमन्येष्वप्यर्द्धसमवृत्तस्थगुरुलघुज्ञानप्रकारः । एवमन्येप्वप्यर्द्धसमवृत्तेपूदा. हरणमूह्यं इन्युपदिश्यते । तथा च भिन्नचिह्नचतुष्पादे विषमवृत्तेऽपि- विललास गोपरमणीषु तरणितनयातटे हरिः। वंशमधरदले कलयन् वनिताजनेन निभृतं निरीक्षितः। इत्युद्गताभिधाने छन्दसि सप्तपञ्चाशत् ५७ कलात्मके पिण्डे छन्दोऽक्षर- सख्या त्रयश्चत्वारिंशदात्मिका ४३ लुम्पेत् । एवमक्षरसंख्यायां लुप्ताया सत्या चतुर्दशगुरवोऽवशिष्यन्ते । परिशेषाद् ऊनत्रिशल्लघवोपि २६ विज्ञया । इति विषमवृत्तस्थगुरुलघुज्ञानप्रकारः।
E-10. नवम-दशम विधाम
[ १७
उट्टवणिका यथा-
ns IS1 115
TIS ASI S
SII 111 SII 5
IS 15 115 11
[१०]
5 [१३]
मात्रा ५७. अक्षर ४३ ।
एवमन्येष्वपि विषमवृत्तेषु गुरुलघुज्ञानप्रकार अहनीय: सुबुद्धिभिर्ग्रन्थवि-
स्तरभयान्नेहास्माभिः प्रपञ्च्यत इति सर्वं चतुरस्रम् ।
वृत्तस्थगुरुलघूनां युगपज्ज्ञानं न जायते येषाम् ।
तेषां तदवगमार्थे सुकरोपायो मया रचितः॥१॥
इति थीमनन्दनन्दनचरणारविन्दमकरग्दास्वादमोदमानमानसपञ्चरोकालडारिकचक्र-
चूडामणि-साहित्यार्णवकर्णधार-छन्दःशास्त्रपरमाचार्य-श्रीलक्ष्मीनायभट्टारक.
विरचिते श्रीवृतमोक्तिकवात्तिकदुष्करोद्धारे वृत्तजातिसमार्ट-
समविषमसमस्तप्रस्तारेषु तत्तवृत्तस्थगुरुतघुसख्यानान-
प्रकारसमुदारो नाम नवमो विधामः॥६॥
दशमो विश्रामः
प्रथ पञ्चमप्रत्ययस्वरूपां वर्णमकंटीमाह-'मर्कटो लिख्यते' इत्यादिना
श्लोकपटकेन--
मर्कटी लिएयते वर्णप्रस्तारस्पातिदुर्गमा ।
कोप्ठमक्षरसंख्यातं पड्वती रचय पद तथा ॥ ७० ॥
प्रथमायामाचादीन् दद्यावद्धांपच सर्वकोप्ठेषु ।
अपराा तु द्विगुणानक्षरसख्येषु तेप्येष ।। ७१ ॥
प्रादिपक्तिस्थितरविभाय्य परपक्तिमान् ।
प्रशपिचतुर्यपत्तिस्यकोष्ठकानपि पूरपेत् ॥७२॥
पूरयेत
पष्ठपञ्चम्यावस्तुर्याएसम्भवः ।
एकीकृत्य पतुर्यस्य-पञ्चमस्पाजूफान सुपीः ॥७३॥
३१८ ] वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुष्करोद्धार कुर्यात् तृतीयपषितस्यकोष्ठकानपि पूरितान् । वर्णाना मकंटी सेय पिङ्गलेन प्रकाशिता ।। ७४ ॥ वृत्त भेदो मात्रा वर्णा गुरवस्तथा च लघवोपि । प्रस्तारस्य पडेते ज्ञायन्ते पक्तित. क्रमतः ।। ७५।। तत्र एकाक्षरादिषड्विंशत्यक्षरावधिवर्णवृत्तप्रस्तारेषु तत्तद्वर्णवृत्तप्रस्तारे कति कति प्रभेदा , कियन्त्य कियन्त्यो मात्रा, कियन्त कियन्तो वर्णा , कति कति गुरव, , कति कति च लघव ? इति महाप्रश्ने कृते, वर्णमकंटिकया वक्ष्यमाण- स्वरूपया प्रत्युत्तर देयमिति । वर्णमर्कटीविरचनप्रकारो लिख्यते- मकंटीति । भो शिष्य | वर्णप्रस्तारस्य एकाक्षरा दिपड्विंशत्यक्षरावधि कृतस्येति शेष । अतिदुर्गमा अतिदुष्करा मर्कटीव मकंटी-तन्तुजालैरिव विरचिता अङ्कजालपक्तिस्तावल्लिख्यते-विरच्यत इति प्रतिज्ञा । तत्र वा स्वेच्छया अक्षर- सख्यात-कोष्ठ रचय तथा पट्सस्याविशिष्टा पक्तीश्च रचय-कुरु इत्यर्थ ॥७०॥ अथ प्रथमा वृत्तपक्ति साधयति- प्रथमायामिति । तत्र प्रथमाया-पथमपक्तौ वृत्तपक्ताविति यावत् सर्वकोष्ठेषु पूर्वविरचितेषु प्राद्यादीन्-प्रथमादोन एकद्वित्र्यादीन् अङ्कान् १ २ ३ यावदित्थ दद्यात्-विन्यसेत । एव कृते प्रथमवृत्तपक्ति सिद्धयति । अथ द्वितीया प्रभेदपक्ति साधयति- अपरायामिति । चकार -प्रानन्तर्यार्थ । तत अपराया तु द्वितीयाया प्रभेद- पक्तावित्यर्थ । अक्षरसख्येषु-तत्प्रस्ताराक्षरसख्येषु तेष्वेव विन्यस्तेषु कोष्ठेषु द्विगुणान्-द्विचतुरष्टादिक्रमेण द्विगुणानकान् २ ४ ८ यावदित्यमित्यस्य सर्व- त्रानुवृत्ति , दद्यात् इति पूर्वेणैव अन्वय ।। ७१॥ एव कृते द्वितीयाप्रभेदपक्ति मिद्धयति । अथ क्रमप्राप्तामपि तृतीया मात्रापक्तिमुल्लघ्य त-मूलभूता चतुर्थी वर्ण- पक्ति साधयति- प्रादिपक्तिस्थितरिति । प्रादिपक्तिस्थित -प्रथमपक्तिस्थित वृत्तपवितस्थित रेकद्विन्यादिभिरङ्क परपक्तिगान्-द्वितीयपक्तिस्थितान् द्विचतुरप्टादिक्रमेण स्थितानङ्कान् विभाव्य-गुणयित्वा, ततस्तदगुणिते -द्वयष्टचतुर्विशत्यादिभिरक २४ चतुर्थपक्तिस्थकोष्ठकान् पूरयेदित्यन्वय । अपि एवार्थे । अवि- चारित पूरयेदेवेत्यर्थ । ७२ ॥ एव कृते चतुर्थी वर्णपक्ति सिद्धयति ।
१०. दशम विधाम [ ३१६ अथ पप्ठ-पञ्चमपक्त्यो पूरणोपायमुपदिशति- पूरयेदिति । पष्ठपञ्चम्यौ पड क्ती कर्मीभूते तुर्याङ्कसम्भव -चतुर्थी पक्ति स्थिताङ्कोत्पनरई रेफचतुर्दादशादिभिरड के १ ४ १२ पूरयेत् । एव कृते पप्ठपञ्चम्यो गुरुलघुपक्ती सियत.। अत्र पक्त्योयत्यय छदोऽनुरोधेन कृत फलतस्तु न कश्चिद् विशेषोऽड कसाम्यादिति पक्तिद्वय सिद्धम् । प्रयोर्वरिता तृतीया मात्रापक्ति साधयति- एकीकृत्येति उत्तरार्द्धपूर्वार्दाभ्याम् । तत्र सुधी-प्रड कमेलनकुशलो गणक चतुर्यपक्तिस्थितान् द्वधष्टचतुर्विशत्यादिकान् अइ कान् पञ्चमपक्तिम्थितान् एकचतुर्दादशादिकानदाश्च, अब चकारोऽध्याहार्य , एकीकृत्य-मैलपित्वा नि-द्वादश- पत्रिंशदादिरूपतामापद्यति यावत् उर्वरितान-तृतीयपक्तिस्थितकोष्ठकानपि विन्द्वादश-पत्रिंशदादिस्पर्मेलितरड के ३ १२ ३६ पूरितान् कुर्यादि- स्यन्वय । अत्राप्यपि एवार्थ । अविचारित पूरितान् कुर्यादेवेत्यर्थ । एव कृते तृतीयामायापक्ति सिद्धयति । फलितार्थमाह-परमार्द्धन 'वर्णाना' इति । सोऽय पूर्वोक्तप्रकारेण घटिता वर्णाना मकंटीव मर्कटी-प्रथजालरूपिणी पिङ्गलेन-श्रीनागराजेन प्रकाशिता-प्रकटीकृता ।। ७४ ।। एव विरचनप्रकारेण पक्तिपट्क साधयित्वा वर्णमटीफ्लमाह- वृत्तमिति । वृत्त वृत्तानि-एकाक्षरादौनि 'एकवचन तु जात्यभिप्रायेण' भेद -प्रभेद वृत्ताना प्रभेदा इत्यर्थ । पूर्ववदवाप्येकवचननिर्देश । मात्रा-तत्तद्- वृत्तमात्रा, वर्णा -तत्तवृत्तवर्णा , गुरव - तत्तद्वत्तगुरख , तथा च सपवोऽपि- तत्तद्वतलघव इत्ययं । प्रस्तारस्येवि सम्बन्धे पष्ठी । एते वृत्तादय पट्-पट- सस्यादिमिष्टा पक्तित-पट्पक्तित मत -प्रमाद् शायते-हृदयङ्गमतां मापद्यन्त इत्ययं ॥७॥ प्रीलक्ष्मीनायकृतो मटिमाया प्रकाशोध्यम् । तिष्ठतु युपजनकष्ठे घरमुक्ताहारभूषणप्रस्य । मस्या. स्वरूपमुदाहरणमत्र द्रष्टव्यम् । इरपल परसवेनेति । . ,
वर्णमर्कटी यथा-
३२० ]
वृत्त
१
२
३
४
७
१२
५
.
प्रभेद
४
२
३२
५
६४
१२८
१०२४
२५६
५१२
२०४८
माना
الله
१२
३६
५७६
१३४४ | ३०७२
१५३६०
३३७६२
७३७२८१५६७४४
वर्णः
२
द
२४
३२४
२०४८ | ४६०८
१०२४०
२२५२८ |४६१५२/२०६४६६
वृत्तमौक्तिक-यात्तिक-दुष्करोद्धार
गुरवः
स
४
८०
४४८
१०२४।२३०४
५१२०
११२६४
२४५७६५३२४८
लघवः
१
४
८०
४४८
१०२४, २३०४
११२६४
२४५७६/५३२४८
इति त्रयोदशवर्णा मर्कटी । एवमन्यापि वर्णमर्कटी समुन्नेया । पचमः प्रत्ययो वर्णमर्कटिकाख्यः ।
इति श्रीमाभन्दनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्वादमोदमानमानसत्रञ्चरीकालद्वारिकचकचूडा-
मणि-छन्द शास्त्रपरमाचार्य-साहित्यार्णवकर्णधार-श्रीलक्ष्मीनायभट्टारक-
विरचिते श्रीवृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुप्करोद्धारे एकाभरादि-
पविशत्यक्षरावधिवर्णप्रस्तारेषु वर्णमर्कटोप्रस्तारोद्धारो
नाम दशमो विधामः॥१०॥
एकादशो विश्रामः धीनागराजमानम्य सम्प्रदायानुमानत । श्रीचन्द्रशेखरकृते वात्तिके वृत्तमौक्तिके ॥१॥ वर्णमर्कटिकामुक्त्वा मात्रामर्कटिकामपि । दुष्करा दुष्करोद्धारे सुकरा रचयाम्यहम् ॥२॥ अथ पचमप्रत्ययस्वरूपामेव मानामकंटीमाह -'कोष्ठान्' इत्यादिना 'नष्टोद्दिष्ट' इयन्ते एकादशश्लोकेन- कोष्ठान मात्रासम्मितान् पक्तिपट्क, कुर्यान्मात्रामर्कटोसिद्धिहेतो । तेषु यादीनादिपक्तावथाङ्का स्त्यक्त्वाऽऽद्याङ्क सर्वकोष्ठेषु दद्यात् ।। ७६ ॥ दद्यादान् पूर्वयुग्माकतुल्यान्, त्यक्त्वाऽद्याडक पक्षपड्वतावथापि । पूर्वस्थाकंर्भावयित्वा ततस्तान् पुर्यात् पूर्णान्नेत्रपक्तिस्यकोष्ठान् ॥ ७७ ॥ प्रयमे द्वितीयमक द्वितीयकोष्ठे च पञ्चमाड्कमपि । दत्वा बारराद्विगुण तद्विगुण नत्रतयंयोर्दद्यात् ।। ७८ ।। एकीकृत्य तथाऽड्कान् पञ्चमपक्तिस्थितान् पूर्वान् । दत्त्वा तथंकमक कुत्तिनैव पञ्चम पूर्णम् ॥ ७ ॥ दत्त्वा पञ्चममड क पूर्वाड्कानेकभावमापाद्य । दत्त्वा तयकमड फ षष्ठ कोष्ठ प्रपुरयेद विद्वान् ॥१०॥ कृत्वैक्य चाड काना पञ्चमपक्तिस्थितानां च । त्यवत्वा पञ्चदशाड क हित्वक पूरयेन् भने कोष्ठम् ॥ १॥ एव निरवधिमात्राप्रस्तारेष्वड फबाहुल्यम् । प्रकृतानुपयोगवशान न कृतोऽड काना च विस्तार || ८२ ।। एव पञ्चमपक्ति कृत्वा पूर्णा प्रथममेकाड कम् । दत्त्वा पञ्चमपक्तिस्थितरथाड के प्रपूरयेत् षष्ठीम् ॥ ८३11 ३२२ ] वृत्तमौक्तिक-वात्तिक-दुष्करोद्धार www . एकीकृत्य तथाऽड कान् पञ्चमषष्ठस्थितान् विद्वान् । कुर्याच्चतुर्थपक्ति पूर्णा नागाजया तूर्णम् ॥ ४ ॥ वृत्त प्रभेदो मात्राश्च वर्णा लघुगुरू तथा । एते पट्पक्तितः पूर्णप्रस्तारस्य विभान्ति वै ॥८५ ॥ नष्टोद्दिष्ट यद्वन् मेरुद्वितय तथा पताका च । मर्कटिकापि च तद्वत् कौतुकहेतोनिबद्धयते तज्जः ॥८६॥ तम च एकमात्रादिनिरवधिकमात्राप्रस्तारेषु च तत्तज्जातिप्रस्तारे कति कति प्रभेदा:, कियन्त्यः कियन्त्यो मात्राः, कियन्तः कियन्तो वर्णाः, कति कति लघव, कति कति गुरवः ? इति महाप्रश्ने कृते मात्रामर्कटिकया वक्ष्यमाणस्वरूपया प्रत्युत्तर दातव्यमिति टीविरचनप्रकारो लिख्यते-- कोप्ठानिति । तत्र-तावन्मात्रामर्कटीसिद्धिहेतो.-मात्रामर्कटीसिद्धयर्थ पक्ति- घटक यथा स्यात्तथा मात्रासम्मितान्-मात्राभिः परिमितान् मात्राणां सख्यया सयुक्तानि ति यावत् कोष्ठान् कुर्यात्-विरचयेदित्यर्थः । तेषु-कोप्ठेषु आदिपड़ती- प्रथमपड क्तो वृत्तपड क्तौ इति यावत् द्वयादीन-द्वितीयादीन् द्वितीय-तृतीय- चतुर्थ-पञ्चम-षष्ठादीनवान् २ ३ ४. ५. ६ इत्यादीन् क्रमेण मावदित्य प्रथम दद्यात्-विन्यसेत् । किं कृत्वा? अथ चेत्यर्थः । सर्वकोष्ठेपु-षट्स्वपि कोष्ठेषु प्राद्याङ्क- प्रथमावं त्यक्त्वा-परित्यज्य । अत्र सर्वकोष्ठेषु प्रथमाङ्कत्यागो न सर्वथा सर्व- कोष्ठत्यागपरः, किन्तु पष्ठगुरुप्रथमपक्तिकोष्ठत्यागपर इति प्रतिभाति । तत्र गुरोरभावादेवेति ब्रूमः। अतश्च सम्प्रदायात् पञ्चसु कोष्ठेपु प्रथमाकविन्यासः कर्तव्य । अन्यथा वक्ष्यमाणाङ्कविन्यासभङ्गापत्तेरिति भावः ।। ७६ ।। एव अङ्कविन्यासे कृते सति प्रथमा वृत्तपक्तिः सिद्धयति ॥ १॥ अथ द्वितीया प्रभेदपक्ति साधयति- दद्यादिति । अयेति-प्रथम पक्तिसिद्धयनन्तर पक्षपड क्तावपि-द्वितीय- पंक्तावपि आद्याङ्क-प्रथमावं त्यक्त्वा-परित्यज्य, प्रथमावस्य पूर्वाड्याभावात् द्वितीयकोप्ठादारभ्य प्रथमाङ्कशिर स्थ प्रथमाङ्क गृहीत्वा पूर्वयुग्माङ्कतुल्यान् उद्देशत्रमानुसारेण एक-द्वि-त्रि-पञ्चाप्ट-त्रयोदशादीन् अङ्गान् १, २, ३, ५, ६, १३ शृङ्खलाबन्धन्यायेन क्रमतो यावदित्य दद्यात्-विन्यसेदित्यर्थः । एव अङ्कविन्यासे कृते सति द्वितीयाप्रभेदपक्तिः सिद्धयति ।। अथ तृतीया मात्रापक्ति साधयति- पूर्वस्थावरिति । पूर्वस्थाई:-प्रथमपक्तिस्थिताङ्कः ततो द्वितीयपक्ति- पूरणानन्तरं तां द्वितीयं प्रत्येकं-प्रतिकोष्ठं भावयित्वा-गुणयित्वा इत्यर्थः । नेत्र-
११. एकादश विधाम
[ ३२३.
.
पंक्तिस्थकोष्ठान्-तृतीयपंक्तिस्थितकोष्ठान पूर्णान् कुर्यात् । प्रतश्चात्रकचतुर्नव-
विंशति-चत्वारिंशदष्टसप्तत्यादिमिरहू: १, ४, ८, २०, ४०, ७८ तृतीय
पंक्तिस्थितकोष्ठान् पूरितान् कुर्यादित्यर्थः । अत्र नेत्रमंख्या रौद्रीति विज्ञातव्या ।
पाठान्तरे--अग्निपर्यायत्वात् स एवाऽर्थः । एवमन्यत्रापि । शालिनीछन्दसि ।।७७।।
एवमङ्कविन्यासे कृते सति तृतीया मात्रापंक्तिः सिद्धयति ॥३॥
अथ क्रमप्राप्तां चतुर्थी वर्णपंक्तिमुल्लंघ्य चतुर्थ पप्ठपंक्तयो युगपदेव
साधनार्थं तन्मूलभूतां प्रथम तावत् पञ्चमपंक्ति साधयति-
प्रथमे इति । तत्र पट्स्वपि प्रथमपंक्तिपु प्रथमकोष्ठस्य त्यक्तत्वात्, द्वितीय-
कोष्ठकमेवात्र प्रथमं कोष्ठकम् । अतः तस्मिन् प्रथमे कोष्ठके द्वितीयमद्धं तद-
पेक्षायाः द्वितीयकोष्ठके च पञ्चमाद्धं च दत्त्वा, ततो बाणद्विगुणं-पञ्चद्विगुण
दश १०, तद्विगुणं-दशद्विगुणं विंशतिश्च २०, तो-द्वावको नेत्रतर्ययोः तदपेक्षयव
तृतीयचतुर्थयोः कोष्ठकयोः दद्यात्-विन्यसेदित्यर्थः ।।७८||
तथा चात्र पञ्चरपंक्ती प्रथमकोष्ठं विहाय द्वि-पञ्च-दश-विंशतिभिरङ्क:
२, ५, १०, २० कोष्ठचतुष्टयं पूरयित्वा अग्रिमैतत्पञ्चमकोप्ठपूरणार्थ उपाया-
न्तरमाह-
एकीकृत्येति । तथा च इति आनन्तर्यार्थे । ततः पञ्चमपक्तिस्थितान् पूर्वान्
पूर्वाड्वान्-यादीन् चतुष्कोष्ठस्थान् एकीकृत्य-मेलयित्वा, तथा ततोऽपोत्यर्थः ।
तस्मिन्नेकीकृताङ्के एकमधिकं दत्त्वा निष्पन्ने एतेनाइन अप्टशिता ३८ अङ्घनव
पञ्चमं पूर्वापेक्षाया पञ्चमं कोष्ठकं पूर्ण कुर्यात् ।। ७६11
अत्रत्य पष्ठकोष्ठपूरणोपायमाह--
त्यक्त्वेति । विद्वान्-अङ्कमेलनकुशलो गणकः पूर्वाद्वान्-द्वितीयादीन् एक-
भावमापाद्य-एकीकृत्य सयोज्येति यावत् । ततः पिण्डीकृतेषु एतेषु अङ्केषु पञ्चमाङ्क
प्रथमावत् त्यक्त्वा । तथा पुनरित्यर्थ, एकमङ्कमधिकं दत्त्वा पूर्ववज्जातेन तेन
एकसप्तत्या ७१ पष्ठ कोष्ठ प्रपूरयेदिति ॥८॥
अथ तथैवात्रस्थसप्तमकोष्ठपूरणोपायमाह-
कृत्वेति । पञ्चमपंक्तिस्थितानां द्वयादीना एकसप्तत्यन्तानां पण्णामड्डा-
नामंक्य-पिण्डोभाव कृत्वा तेषु पूर्ववत् पञ्चदशाङ्क, त्यक्त्वा । ततस्तेष्वपि चैक
हित्वा मुनेः कोष्ठं-सप्तम कोष्ठ त्रिंशदधिकेन शताङ्कन १३० पूरयेत् । इति
सप्तमकोष्ठकपूरणप्रकारः ॥१॥
३२४ ] वृत्तमौक्तिक-यात्तिक दुष्करोद्धार - एवमङ्कसप्तकेन द्वि-पञ्च-दश-विंशत्यप्टत्रिंशदेकसप्तति-त्रिशदधिकशतक- रूपेण २, ५, १०, २०, ३८, ७१, १३० पञ्चमपड्क्तो कोष्ठसप्तकं पूरयेदिति । एव चात्रत्ये पूरणीये तत्तत्कोष्ठे अत्रत्यानां द्वयादीनामटानां एकीभावं कृत्वा, यथासम्भवं तत्तदद्धं त्यक्त्वा, तेष्वपि यथासम्भवं एकादिकं हित्वा तत्तत्कोष्ठक पूरयेदिति संक्षेपः। एवं अङ्कविन्यासे कृते सति चतुर्थषष्ठपंक्तिगर्भाः पञ्चमी लघुपक्तिः सिद्धयति । ननु अस्यां पडवतावनिमकोष्ठाऽससञ्चारः क्रियतां इत्याकाक्षाया प्रकृतानुपयोगादकवाहुल्याद् ग्रन्थविस्तरशङ्कया न क्रियत इत्याह- एवमिति । सुगमम् ।।८२॥ अथ पंचमपक्तिपूरणमुपसंहरन् पष्ठगुरुपंक्तिपूरणप्रकारमुपदिशति- एवमिति । एव पूर्वोक्तप्रकारेण पञ्चमपंक्ति पूर्णां कृत्वा तत्र गुरुस्थानीय प्रथम कोष्ठ विहाय अग्रिमकोष्ठं-प्रथम प्रथमत एवाङ्क दत्वा पूरणीयम् । अथ-अनन्तर पञ्चमपक्तिस्थितः द्वितीयादिभिरकः पूर्वस्थापितैरेव प्रतिकोष्ठं पष्ठी प्रपूरये- दिति । तथा च षष्ठपड्क्तौ ०, १, २, ५, १०, २०, ३८, ७१, १३० शून्यैक- द्वि-पञ्च-दश-विंशति-अप्टत्रिंशदेकसप्तति-त्रिंशदधिकशताङ्कविन्यस्ता दृश्यन्त इति ।। ८३ ॥ एवमङ्कविन्यासे कृते सति षष्ठी गुरुपक्तिः सिद्धयति ।। ६ ॥ अयोर्वरितचतुर्थवर्णपक्तिपूरणप्रकारमुपदिशति- एकीकृत्येति । विद्वान्-अङ्कमेलनकुशलो गणकः तथा पूर्वोक्तप्रकारेण पञ्चम- पष्ठपक्तिस्थितान् द्वय कादीन् अड्वान् प्रतिकोष्ठ एकीकृत्य-संयोज्य नागाज्ञया- श्रीपिङ्गलनागोक्तमार्गेण चतुर्थपक्तितत्पक्तिस्थकोष्ठकरूपां तूर्ण-अविचारितमेव पूर्ण कुर्यादिति । अत्रत्यप्रथमकोष्ठे असंयुक्तः पञ्चमकोष्ठस्थप्रथमांकः सम्प्रदाय- लभ्यो देय इति रहस्यम् ॥ ४ ॥ तथा चतुर्थपड क्तौ १, ३, ७, १५, ३०, ५८, १०६, २०१ एक-त्रि-सप्त- पञ्चदश-त्रिशद्-अष्टपञ्चाशन्-नवाधिकशतकोत्तरद्विशताका विन्यस्ता दृश्यन्त इति ! एवं अइविन्यासे कृते सति चतुर्थी वर्णपंक्तिः सिद्धयतीति ॥ ४ ॥ एवं विरचनप्रकारेण पक्तिपटकं साधयित्वा मात्रामर्कटीफलमाह- वृत्तमिति । वृत्तं-वृत्तानि एकमात्रादिनिरवधिकमावाजातयः । एकवचनं । जात्यभिप्रायेण । प्रभेदजातीनां प्रभेदा इत्यर्थः । पूर्ववदत्राप्येकवचन निर्देशः ।
११. एकादश विधाम [ ३२५ मात्रा.-तत्तजातिमात्रा, वर्णाः-तत्तज्जातिवर्णाः तथा तत इत्यर्थः । लघुगुरू- तत्तज्जातिलघवस्तत्तज्जातिगुरवश्चेत्यर्थः । एते वृत्तादय. पप्रकाराः पूर्णप्रस्ता- रस्य समुदिताः पट्पक्तितो निश्चित विभान्ति-प्रकाशन्त इत्यर्थ. ॥१५॥ ननु एतत्करण आवश्यकमनावश्यक वा ? इति परामर्श छान्दसिकपरीक्षा- रूपत्वात् केवल कौतुकमात्राधायकत्वाच्च अस्य करण अनावश्यकमेवेत्याह- नष्टोद्दिष्टमिति । यथा नष्टोद्दिष्टादिकं कौतुकावह तथैव तद्विरचनमपीत्यर्थ इति सर्वमवदातम् ।। ८६॥ मात्रामर्कटी यथा- वनम् १ २ ४ ८ प्रभेदाः २ ३ ५ २१ ८६।१४४ मानाः १ ४ २. १४० २७२/४६५/ ८१०/१५ वर्ण १ ३ १५ ५८ १०६.२०१४३६५ लघव' २ १० २० ३८ १३०२३५ गुरव' . १ २ २० इति एकादशमात्रामर्कटी । एव अन्येऽपि मात्रामर्कटी समुन्नेया । तथैव मात्रा- मर्कटिकास्य पचम प्रत्यय ।
३२६, पृत्तमौक्तिक-यात्तिक-दुष्करोद्धार [वृत्तिकृत्प्रशस्तिः] श्रीमत्पिङ्गलनागेन प्रोक्तो यो मकंटीक्रमः । .विविच्य स मया प्रोक्तः शिष्यानुग्रहहेतवे ॥ १ ॥ मुनीभभूपतिमिते १६८७ वैक्रमेऽब्दे प्रमाथिनि । कात्तिकेऽसितपञ्चम्यां लक्ष्मीनाथो व्यरीरचत् ॥२॥ वात्तिके दुष्करोद्धारमुदारं छान्दसप्रियम् । अन्तःसारं स्फुटार्थ च कवीनां कौतुकावहम् ।। ३ ।। इति श्रीमनन्दनन्दनचरणारविन्दमकरन्दास्वादमोदमानमानसचञ्चरीकालङ्कारिकचक्र- चूडामणि-साहित्यार्णवकर्णधार-छन्द शास्त्रपरमाचार्य-श्रीलक्ष्मीनाथभट्टारक- विरचिते श्रीवृत्तमौक्तिकवातिकदुष्करोद्धारे एकमावादिनिरवधिक- मात्राप्रस्तारेषु तत्तज्नातिमात्रामफंटोप्रस्तारोद्धारो नामकादशो विश्रामः॥११॥ समाप्तश्चार्य वृत्तमौक्तिकवात्तिके दुष्करोद्धारः । शुभमस्तु । श्रीनागराजाय नमः । संवत् १६६० समये भाद्रपदशुदि ३ भौमे शुभदिने प्रगलपुरस्थाने लिखित लालमनि- मित्रेण । शुभं भूयात् । श्री णवे नमः।
महोपाध्यायधीमेघ विजयगणिसन्दृब्ध वृत्त मौक्ति क दुर्गम वो धः [उद्दिष्टादिप्रकरणण्याख्या] [ मङ्गलाचरणम् ] प्रणम्य फणिना नम्य सम्यक् श्रीपाश्चमीश्वरम् । उद्दिष्टादिषु सूत्रार्थ कुर्वे श्रीवृत्तमौक्तिके ॥ १॥ अथ वृत्तमौक्तिके उद्दिष्ट नष्ट वर्णतो मात्रातो वा विवियते- दत्या पूर्ययुगाङ्कान लघोरुपरि गस्य तूभयत । अन्त्याङ्के गुरुशोस्थितान् विलुम्पेदयाङ्काश्च ।। ५१ ॥ उद्वरितश्च तयाईर्मायोहिष्ट विजानीयात् । पड्भि पदै सून तदव्याख्या- केनापि नरेण लिखित्वा दत्त । ।।5। इद कतमत् रूपम् ? इति प्रश्ने उद्दिष्ट शेयम् । तत्र पुर्वयुगलाका प्रत्येक धार्या । पुर्वयुगलाका इति सज्ञा अङ्का- नाम् । तत्कथम् ? इति चेत, माधोद्दिष्टे १।२।३।५।८।१३।२११३४१५५।८६ इति । अत्र १ मध्ये २ योजने ३ । पुन ३ मध्ये पूर्वाङ्क २ मेलने ५। पुन ५ मध्ये स्वपूर्वाङ्क ३ मेलने ८ । तत्रापि स्वपूर्वाङ्क ५ मेलने १३ । तत्रापि स्व- पूर्वा क्षेपण २१ । तस्मिनपि स्वपूर्वाङ्क १३ एकीकरणे ३४ । तन्मध्ये स्व- पूर्वाङ्क २१ क्षेपे ५५ । अत्रापि स्वपूर्वाङ्क ३४ योगे ८६ इत्येव योजनारीति । पूर्वं पूर्वमेलनाज्जातत्वात् पूर्वयुगाड्वा इति सज्ञामाज । तद्धरणरीति - २ २१ - १ ५ ८ 5 5 - ३ एव लघोपरि एक अकन्यास गस्य-गुरोस्तु उभयत --उपरि अधश्च पार्श्व- द्वयेऽपि अङ्कधरणम् । एतत कृत्वा अन्त्याचे २१ रूपे गुरोरुपरिस्था असता २।८ मेलने १०, एते २१ मध्यात् विलुम्पयेत्-पराकुर्यात्, उरितोऽङ्क ११ एव निश्चित ज्ञात सप्तमात्रे मानाच्छन्दसि एकादश रूपमिदम् । ईदृश 15151 अन्यत्रापि।
३२० यत्तमौक्तिक - दुर्गमयोध त्रिकले छन्दसि । इदं कतम रूपम् ? इति पृच्छायां पूर्वयुगाङ्कधरणं १ २ S ३ तत्रांत्याङ्कः ३ तन्मध्यात् गुरुशीर्षस्थाङ्क २ विलोपने दोपं १ इति प्रथम रूपम् । 5 ईदृशम् । परवाऽपि 5। इदं कतमत् ? इति प्रश्ने १ ३ अन्त्याङ्के ३ 5 २ गुरुशीर्षस्थ १ विलोपे शेयं २ इति द्वितीयं रूपं विकले ऽ। ईदृशम् । चतुःकले छन्दसि 55 इदं कतमत् ? इति पृच्छायाँ १ ३ अङ्केषु धृतेषु .5 S २ अन्त्याङ्कः ५ तन्मध्याद् गुरुशीर्षस्थ अद्वयं ११३ एतयोर्मेलने ४ तद्विलोपने शेष १ प्रथमं रूपम् s; द्वितीऽयेऽपि १ २ ३ अङ्केषु न्यस्तेषु अन्त्याः ५ - । S ५ तन्मध्यात् २ गुरुशिर.स्थाङ्कः ३ तल्लोपे शेपं २ इति द्वितीयं रूपम् । तृतीये । । । ईदृशेऽङ्काः १ २ ५ अन्त्याङ्कः ५ ततः गुरुशिरःस्थः २ लोपे शेषं ३ तृतीयं । 5 ३ रूपम् । तुर्ये । । । ईदृशेऽङ्काः १ ३ ५ अन्त्याः ५ ततः गुरुशिर.स्थ १ S - २ लोपे शेषं तुर्य रूप 5113; पञ्चमं सर्वलघुकम् । पञ्चकले । 55 ईदृशेऽवा: १ २ ५ अत्रान्त्याङ्क: ८ ततः गुरुशिरःस्थ S S ३ २।५ एवं ७ लोपे प्रथमं रूपम् ।।5 ईदृशेऽङ्काः १ ३ ५ अन्त्यः 5 २ ८ ८ तन्मध्यात् ११५ एवं ६ तल्लोपे शेष द्वितीयं रूपम् । तृतीयं ।115 ईदृशेऽङ्काः १ २ ३ ५. अत्र प्राग्वत् ८ मध्यात् गुरुशीर्षस्थ ५ लोपे शेष । S - द मानोद्दिष्ट-प्रकरण [ ३२६ ३ तृतीयम् । तुर्येपि १३ ८ प्राग्वत् ८ मध्यात् ११३ गुरुशीर्षस्थ ४ 5 S - २ लोपे शेष ४ तुर्य स्पम् । पञ्चमेऽपि १ २ ३ ८ इत्यत्र गुरुशीर्षस्थ S । ५ ३ लोपे अन्त्यामध्ये शेप ५ इति [पञ्चम रुपम्] । पप्ठे १ २ ५ ८ 5 - - ३ मन्याङ्क मध्यत गुरुशिरःस्थ २ लोपे शेष ६ [इति पष्ठ रूपम्] । सप्तमेऽपि ८ तत्र अन्त्याक ८ मध्यात् गुरुशीपस्थ १ लोपे शेष ७ इति १ 5 २ सप्तम रूपम् । एव पटकले मात्राच्छन्दसि १ ३ ८ अत्रान्त्याङ्क १३ तत गुरशीर्ष- S 5 S २ ५ स्थिताडू ११३८ एपा लोपे शेप १ प्रथम रूपम्, १ २ ८ अत्रापि 1 1 S s ५ प्राग्वत् ३।८ एव ११ तेषां १३ मध्याल्लोपे दोष २ द्वितीय रूपम् । तृतीये ८ अन्त्याङ्क १३ तत २८ एव १० गुस्शीर्षस्थ लोपे शेष ३ । १ २ ५ 5 S ३ or २ ५५ अत्र गुरुशीर्षस्थाडू सर्वमेलने ८३ तल्लोप S S - S S ८३ ८९ मध्ये शेष ६ रूपमिद दशकले छन्दसि । पुव्व जुयल सरि अका दिज्जसु, गुरु सिर अक सेस मेटिज्जसु । उवरिल अक लेखि बहुप्राण, ते परि धुप उद्दिठ्ठा जाण ॥ [प्राकृतपङ्गलम, परि १, पद्य ३६]
३३० ]
वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध
दत्त्वा पूर्वयुगाङ्कं गुरुशीर्षाकं विलुप्य शेषाङ्के।
अइंरितोऽवशिष्टः शिष्टरुद्दिष्टमुद्दिष्टम् ॥
[वारणीभूपणम् परि. १, पद्य ३१]
मत्त मत्त धुम मंक, लघु सिर गुरुतर हूं धरो।
जोर मंक सरवंक, सम्बहि घाट उद्दिठ्ठ कहु ।
लघोः शीपं एवाङ्कः धार्यः गुरोः शीर्षे तथा 'तर' इति भाषाविशेषात् तले
अघोऽपि अतः धार्यः । यथा-पञ्चकले प्रस्तारे १ २ ५ अत्रान्त्यारे
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S
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ततः गुरुशीर्षस्थाङ्काः २, ५......७ सप्तम रूपम् ।
२१ गुरु सिर अंकेयोजने १० ते २१ मध्ये ऊन शेषं ११
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5
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३
संख्या प्राप्ता इति एकादशमिदं रूपमिति छन्दोरत्नावलीग्रन्थे ।
१३ २१ पत्र प्रश्नः-सप्तकलप्रस्तारे एकादशं
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रूपं कीदृशम् ? इति, तदा प्राप्तं ।।।5। इदम् ।
इति मात्रोद्दिष्टसूत्रव्यास्था पूर्णा ।
मात्रानष्ट-प्रकरणम् मथ मानानष्ट यथा- पत्कलकः प्रस्तारो लघव. कार्याश्च तावन्त । दत्त्वा पूर्वयुगाङ्कान् पृप्टा लोपवेदन्त्ये ।। [॥ ५३ ॥] उरितोरितानामटाना पन लभ्यते भाग । परमात्राञ्च गृहोत्या स एव गुरुतामुपागच्छेत् ।। [१॥ ५४ ॥] अस्याएं ~यावत्य कला. प्रस्तारे एककलस्य एक एव लघु । ईदृश द्वि- फलस्य द्वे रूपे, प्रादी एक एव गुरु 5 ईदृश , द्वितीयरूपे लघुद्वयम् ॥ ईदृशम् । अत्र पृच्छानवकाशात् न इप्टरूपलाम , असम्भवात् । निकले मावाच्छन्दसि त्रीणि रूपाणि । चतु कले पञ्चरूपाणि १।२।३।५ इति पूर्वयुगाद्वात् । पञ्चकले अष्ट- रूपाणि १२१३।५।८ इति पूर्वयुग्मासात् । षट्कले १३ रूपाणि तावत् एव पूर्व- युग्माद्वात् । सप्तकले २१ रूपाणि तथैव । एव कलाप्रमाणा लघवो लेख्या , यथा-सप्तकले मात्राच्छन्दसि इष्ट एकादश रूप कीदृश ? इति, मुखेन केनचित् पृष्टम्, तदा सप्तव लघव ।।।।।।। अनया रीत्या लेख्या । तेपासुपरि १।२।३।।८।१३३२१ एते धार्या । अत्र पृष्टे इण्टाक ११, तस्य २१ मध्याल्लोपे शेष १।२।३।८।१३।१० इति । सदा दश- मध्ये त्रयोदश न पतन्तीति भागाभाव , सदा ८ अङ्क १३ मध्ये पात्य , एव अष्टाध कलामाकृष्य त्रयोदशाधो गुरु स्थाप्य , दशाध एका कलाऽवशिष्टा, अष्टकस्य लोप परमात्राग्रहेण गुरुभावात् । अथ त्रिकस्य कला पञ्चके न गृह्यते, मुख्यककस्य द्विवेन गृह्यते तदा 555। इंदश नवमरूपतापत्तै । यद्वा त्रिकस्य कला पञ्चके न गृह्यते ११२ अनयो कलादय लघुरूपमेव ध्रियते तदा दशम रूप ईदृश स्यात् ।। 5 5, तेन पञ्चकाऽध कला एका भिन्नव रक्ष्या, अग्रे द्वितीयाङ्कस्य त्रिके कलाग्रहेण त्रिकाधो गुरु , मुख्यककलाशेषात्, एव ।।5। ईदृश एकादश रूप व्यवस्थितम । द्विकाष्टकयोर्लोप 'उवरिल प्रकलोपके लेख' इति वचनात् । यदुक्त छन्दोरत्नावल्पाम्- सब लघु सिर ध्रुव प्रक, प्रश्नहीन शेषाङ्क धरि । पर लघु ले लिख वडू उवरि भाग जह जह परइ ।। यहा, दशाना भागस्त्रयोदशे प्राप्यते 'दश एके दश' शेष ३ विषमत्वात् परस्य-प्रन्यस्य त्रयोदशात् पूर्वस्य अष्टकस्य कलाग्रहेण त्रयोदशस्थानजातत्रिकायो ३३२ ] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमयोध गः, त्र्यप्टकलोपः, दशाधो ल:, पञ्चके त्रिकस्य भागे शेपं २ इति समत्वात् पञ्चायो लः ।, द्विकस्य त्रिके भागाप्ती शेपं १ इति विषमाङ्कत्वाद् गुरुः, द्वि कस्य कलाग्रहात् द्विकलोपः, मुख्यकाधो यथास्थितो लघुरेव, एवं । 5 1 5 । इत्येका- दशं व्यवस्थितं सप्तकले। अथ बालबोधाय इयमेव व्यास्या विस्तरत:- प्रथमं त्रिकले मात्राच्छन्दसि दिलघुकरणं तस्य न्यासः १ २ ३ तदुपरि - द्विकाधो गः, पूर्वयुगाङ्कदानम् । तत्र पृष्टं प्रयमरूपं विकले कीदृग ? इति, एवं इष्टं एकरूप तत् त्रिकात् अन्त्याद्वात् पराकृतं-लुप्तमिति यावत् शेपं १।२।२ 'उद्वरितो- द्वरितानां प्रज्ञानां यन लभ्यते भागः' इति वचनात् द्विकस्य द्विकेन भागे पर- पूर्वस्य द्विकस्य कलाग्रहात् तस्य लोपः, शेपं 1 5 इति प्रथम रूपम् । पृष्टे द्वितीये, अन्त्यत्रिकात् २ लोपे शेषं १।२।१, अत्र अन्त्यककस्य भाग- लाभो द्विके तदधो गः, मुख्यककलाग्रहात् तस्य लोपः, अन्त्यकाघो लः । इति द्वितीयं रूपम् । तृतीयं सर्वलघुकमेव । अथं चतुःकले १ २ ३ ५ मा पृष्टे १ लोपे शेष १।२।३।४, । निकस्य भागः चतुप्के प्राप्यः तदधो गः, त्रिकस्य कलाग्नहात् विकलोपः, द्विकेपि मुख्यकस्य भार्गः तेन द्विकाधो गः, एककस्य लोपः, जातं 5 प्रथमम् । पृष्टे २ लोपे शेषं १ । २ । ३ । ३, त्रिके-त्रिकस्य भागे परत्रिकाधो गः, पूर्व विकलोपः कलाग्रहात्, शेपे द्विके एकस्य भागापत्ती कलावसाम्यादपि पूर्वरूपापत्तिः, तेन नकस्यापि लोपः, लघुद्वयं ।। 5 द्वितीयम् । पृष्टे ३ लोपे शेष १।२।३।२, एवं द्विकम्य अन्त्यस्य भागस्त्रिके तदघो गः, पूर्वद्विकस्य कलाग्रहोल्लोपः, एवं 15 । तृतीयम् । पृष्टे ४ लोपे शेषं १।२।३ । १ एकस्य भागोऽत्र त्रिके, एवमन्त्यकाधो लः, त्रिकेपि शेषाभावादधो लः, 'त्रिण एक ' लघु १ तस्य भागः द्विके तदधो गः, एकलोपः, अत्र मुख्यकस्य भागो द्विके तदधो गः, कलापूर्तेः त्रिके चान्त्यकके च प्रत्येक कला मुख्यककलोपः, 5।। तुर्यम् । पञ्चमं लघुसकलरूपम् । पञ्चकले १ २ ८ अत्र पृष्टे १ लोपे शेषं १, २, ३, ५, ७, ३ । । - अत्र सप्तके पञ्चकस्य भागः, तेन सप्ताघो गः, पञ्चकस्य लोपः, द्विकस्य त्रिके भागः तदधो गः, द्विकलोपः, मुख्यकाधः कला स्थितव । 55 प्रथमम् । पृष्टे २ लोपे शेषं १, २, ३, ५, ६, पटके पञ्चकस्य भागे मात्रानष्ट-प्रकरण [ ३३३ . पडधो ग, पञ्चकलोप, त्रिके-बिकलस्य द्वितीयरूपस्य गुर्वधिकत्वे ताद्रप्यात् द्विकस्य भाग पूर्वरूपे कृत तेनात्र द्विके एकस्य भागे द्विकाघो ग, मुख्यकलोप, त्रिकाध कला, द्वितीय 5 1 5 रूपम् । पृष्टे ३ लोपे शेष १, २, ३, ५, ५, पञ्चकेन पञ्चकस्य भागे परपञ्चकाधो ग, पूर्वपञ्चकलोप , शेष कलानयमङ्कनय चेति साम्यात् ५, ५ इति समभागाच्च प्रत्येक लघवस्त्रय , एव ।।। 5 तृतीयम् । पृष्टे ४ लोपे शेष १, २, ३, ५, ४, अत्र चतुप्के पञ्चकभागो न प्राप्य , पञ्चके चतु कस्य भागात् पञ्चकाघो ग, त्रिकस्य क्लाग्रहाल्लोप, चतु काध कला, एव फलात्रये सिद्ध शेषमङ्कद्वय कलाद्वय चेति साम्याल्लघुद्वय कार्यमिति न विचार्य हाम्या कलाम्या गुरुसिद्धेगुर स्थाप्य । पञ्चकलेऽप्टस्पारमके तुर्यस्पे लघ्वन्ते गुरु- द्वयेनापि कलापूर्ते इति एकस्य द्विके भागात द्विकाघो ग , मुख्यकलोप , एव 55 । तुर्यम । पृष्टे ५ लोपे शेष १, २, ३, ५, ३, प्रत्र विकस्या-त्यस्य पञ्चके भागात पञ्चकाधो ग , अत्यत्रिकाघो ल , पूर्वत्रिकलोप , अयापि समकलाङ्कत्वे गुरुरिति न कार्य पूर्वरूपापत्ते , अझैपरि लघूनामेव वृद्ध । तेन लघुद्वय ।।5। पञ्चमम् । पृष्टे ६ लोपे शेप १, २, ३, ५, २, अत्र पञ्चकस्य त्रिके भागो नेति द्वि कस्य त्रिक भागात् त्रिकाधो ग , द्विकलोप , पञ्चायो ल , अन्त्यद्विकाधो ल , मुख्यकाधोऽपि ल, तेन । 5 ।। षष्ठम् । पृष्टे ७ लोपे शेप १, २, ३, ५, १, अत्र पूर्वरूपे द्वि- कस्य निके भागलामात् निकाधो ग, उक्त सप्तमे पुना रूपे द्विके एकस्य भागात द्विकाधो ग, मुख्यकलोप त्रि-पञ्च अन्त्यकानामध प्रत्येक लघुत्रय, 5।।। सप्तमम । पर सर्वलमप्टमम् । पटकले १, २, ३, ५, ८, १३, इह पृष्टे १ लोपे शेप १, २, ३, ५, ८, १२, . 1 । , अन १२ मध्ये ८ भागे द्वादशाधो ग , अष्टकलोप , एव पञ्चके निकस्य भागात पञ्चकाधो ग, त्रिकलोप , द्विके मुख्यैकस्य भागात् हिकाधो ग , मुस्यकलोप सर्वत्रकलाग्रहात 55s प्रथमम् । पृष्टे २ लोपे शेष १, २, ३, ५, ८, ११, अत्रापि ११ मध्येऽष्टभागात् तत्कलाग्रहे ११ अधो ग, ८ लोप , पञ्चके त्रिकस्य भागात् पञ्चायो ग, त्रिकलोप शेषाङ्ककलासाम्यात् । 155 द्वितीयम् । पुन पृष्टे ३ लोपेऽत्यदशाधो ग, अष्टाना भागे तत्कलाग्रहात् त्रिकाधो ग, द्विकस्य कलाग्रहात् पश्चाधो ल , मुख्यकाधो ल, एव । । । तृतीयम् । पुन पृष्टे ४ लोपे शेष ६, अन्ते तत्राप्यष्टकलाग्रहादघो ग, द्विके एक्स्य भागात कलाग्रहे द्विकाघो ग , त्रिकाधो ल , परस्य अष्टकस्य लोपात पञ्चायो ल , भागासम्भवात्, एव ।। चतुर्थम् । पृष्टे ५ तस्य १३ मध्यात् लोपे शेष १, २, ३, ५, ६, ८, पूर्वाष्टककलाग्रहात् पराष्टकायो ग, पूर्वाष्टकलोप, शेपे कलाइसाम्यात् बृतमौक्तिक-दुर्गमयोध - - चतस्र कला एव । यद्यत्र पञ्चके त्रिकभागात् द्विके एकस्य भागात् कलाग्रहणादि क्रियते तदा पूर्वरूपापत्ति , सा तु सर्वत्रापि निषिद्धा 'उवरिल अक लोपिके लेख' इति वचनात्, ।। ।। 5 पञ्चमम् । षष्ठे पृष्टे १३ मध्यात् ६ लोपे अन्ते ७, तदष्टाना भागो नाप्य , किन्तु सप्ताना भागोऽष्टके, तेनाष्टाधो ग, सप्ताधो ल पञ्चकस्य लोपोष्टकेन कलाग्रहात् द्विकस्य त्रिके भागात् त्रिकाधो ग , द्विकलोप , मुख्यकाधो ल , एव । 55। षष्ठम् । पृष्टे ७ तल्लोपेऽन्ते ६, तदधो ल , अष्टके पटकस्य भागात् अष्टाधो ग, पञ्चके लोपात द्विके एकस्य भागात् द्विकाधो ग, एकस्य कलाग्रहात् एकस्य लोप , त्रिकाधो ल , एव SIS । सप्तमम् । पृष्टे ८ तल्लोपेन्ते ५ तदधो ल , पञ्चकस्य अष्टके कलाग्रहात् अष्टाधो ग, पञ्चकस्य अन्त्यस्य भागलाभाच्च शेषे कलाकसाम्यात् त्रय प्रत्येक लघव , ।।15। अष्ट- मम् । पृष्टे : लोपे शेष १, २, ३, ५, ८, ४, चतुष्कस्य अष्टसु भागात् चतु काधो अष्टाधोऽपि ल , पञ्चके विकभागात तत्कलाग्रहेण पञ्चायो ग , विकलोप", द्विके एकस्य भागात् तत्कलाग्रहे द्विकाधो ग , एकस्य लोप , एव 551 नवमम् । अत्र पञ्चकस्य कला नाष्टके क्षेप्या पूर्वरूपापत्त , गुरूणा रूपाद्यभागसञ्चारात् पश्चिमभागे लघूनामाधिक्याच्च । पृष्टे १० लोपे, शेष १, २, ३, ५, ८, ३, तदा त्रिकस्यान्त्यस्य अधो ल , अष्टाधोऽपि ल , त्रिकस्य पञ्चके भागात् पञ्चाधो ग, त्रिकोप , शेप १ । २ कलाकसाम्याल्लघुद्वय । । । । दशमम् । पृष्टे ११ लोपे प्रान्ते २, तदधो ल द्विकस्य निके भागात् कलाग्रहे निकाधो शेष १, ५, ८, एषु प्रत्येक ल , एव 15।।। एकादशम् । पृष्टे द्वादशे १२ लोपे, शेप १, २, ३, ५, ८, १, अत्र द्विकेन मुख्यकाध , कलाग्रहात् द्विकाधो ग , मुख्यक- लोप , शेष ३, ५, ८, १, एपामधो लघव , एव ।।।। द्वादशम् । पर सर्वलघुकम्। सप्तकले १ २ ३५ ८ १३ २१ अत्र पृष्टे १ लोपे शेष १, २, ३, ५, ८, १३, २०, अत्र विशतो १३ भागप्राप्ति तेन विशाधो ग, १३ लोप , अष्टाधी ग, पञ्चलोप , त्रिकाधो ग, द्विकलोप मुख्यककला स्थितव, एव । 555 प्रथमम् । पृष्टे २ लोपे, शेष १६, तदधो ग , १३ लोपात् अष्टाधो ग , पञ्चलोपात् त्रिने द्विक्कलाग्रह प्रथमरूपे, पत्र द्विके मुख्यककलाग्रहात् द्विकायो ग , एक्लोप , त्रिके कला, एक 5155 द्वितीयम् । पृष्टे ३ लोपे मते १८, तदधो ग, १३ भागात् १३ सोप , मप्टापो ग, पञ्चमलाग्रहात् तल्लोप शेष समकलाकत्वात् ३ लपव. 1155 तृतीयम् । पृष्टे ४ लोपे शेष १७, तदधो ग, १३ लोप पञ्चायोग', विकलाग्रहात् मष्टापोल , दिमायो गः, मुख्यस्य कला स्थिता 5515 तुयंम् । ग. द्विकलोप, A । - - मात्रानष्ट-प्रकरण [ ३३५ , . - पृष्टे पञ्चलोपे शेपमन्ते १६, तदधो ग , १३ कलाग्रहात् लोप, अष्टाधो ल, पञ्चकेऽधो ग , त्रिके कलाग्रहाल्लोप, शेषे समकलात्वाल्लघुद्वय ।।5। पञ्च मम ! पृष्टे ६ तल्लोपे शेषमन्ते १५, तदधो ग, अष्टाधो ल, पञ्चाधो ल, त्रिकाधो ग, द्विकस्य कलाग्रहात् मुख्याध कला एव, एव ।5।। 5 पष्ठम् । पृष्टे ७ तल्लोपेन्ते १४, तदधो ग, १३ न्यूनत्वात् लोप ८५३ अधो ल, द्विकाधो ग, मुस्यकलाग्रहात लोप 15 सप्तमम् । पृष्टे ८ लोपे शपम ते १३, पूर्व १३ अघो ग , समभागवलात् पूर्व १३ लोपः, एव कलाद्वय, शेषपञ्चाङ्का पञ्चकला चेति साम्यात् पञ्च लघव एव ।।।।। 5 अष्टमम् । पृष्टे ६ लोपे शेपमन्ते १२, तेन भाग पूर्व १३ मध्ये, यदुक्त वाणीभूषणे- नष्टे कृत्वा कला सर्वा पूर्वयुग्माङ्कयोजिता । पृष्ठाङ्कहीनशेषाङ्क येन येनैव लुप्यते ॥ परा कलामुपादाय तत्र तत्र गुरुर्भवेत् । मात्राया नष्टमेतत्तु फणिराजेन भापितम् ॥ (वारणीभूपणम् परि १, पद्य ३२-३३) सन १३ अधो ग, १० अधो ल , अष्टकस्य लोप फलाग्रहात् एव पञ्चायो ग, त्रिकभागेन कलाग्रहात् द्विकापो ग , मुख्यलोपात, एव 55 5 नवमम् । पृष्टे सप्त- कले छ दसि दशम रूप कीदृग् ? इति, तदा १ २ ३ ५ ८ १३ २१ एव - कला कृत्वा पूर्वयुग्मायोजिता पृष्टाङ्क १०, ते २१ मध्यात् अपकृष्टा शेष ११, तपा १३ मध्ये भागात् तदधो ग, ११ अधो ल, अप्टकलोप , पञ्चायो ग, विककलाग्रहात्, शप कलाङ्कयो माम्याल्लघुद्वय ।।5। दशम स्पम् । पृष्टे ११ तस्य लोपे १०, तत १३ मध्ये भागात् १३ अधोग, अष्टलोप, पिके द्विकभागात् त्रिकाधो ग द्विकलोप , एव उप । 5151 एकादशम् । पृप्टे १२ सल्लोपे शेष ६ तस्य १३ मध्ये भागात् १३ अधोग, ६ अधो ल , अष्टलोप , द्विके मुख्यमस्य भागात् द्विकाधो ग, मुस्यलोप त्रिकपञ्चक्यो प्रधो ल प्रत्येक, एव ।।। द्वादशम् । पृष्टे १३ तल्लोपे आप ८ तस्य १३ मध्ये भागात् १३ अधो ग, ८ पूर्वाष्टकलोप, शेप समाइक्लाभावात १, २, ३, ५ एपामधो लपव प्रत्येक, 115। योदमम् । पृष्टे १४ तस्य २१ मध्याल्लोपे सप ७, तस्य १३ मध्ये भागे शेष ६ इति परात्-सप्तमात् न्यूनता इति हेतो १३ अधो ल , सप्ता घोऽपि ल , अष्टके पञ्चकभागात प्रप्टापो ग, पञ्चक्लोप , निये द्विकमागात त्रिकाधो ग, द्विक्लोप , मुस्यकाध पला,1561। चतुर्दशम् । पृष्टे १५ लोपे अघोल, ३३६] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध - शेष ६ तदधो ल , १३ अधोऽपि प्रागसिद्धत्वात् ल एव, अप्टके पञ्चकमागादप्टायो ग , पञ्चकलोप , द्विके एकस्य भागात् द्विकाघो ग , त्रिकाधो ल , एव 515।। पञ्चदशम् । पृष्टे १६ तल्लोपे शेप ५ तस्य १३ मध्ये भागे शेष ८ तदधो ल, पञ्चाधो ल , अष्टके पञ्चकमागात् अप्टाघो ग , पूर्वपञ्चलोप , शेपे समकलाङ्कत्वात् त्रयोपि लघव , ।।15।। पोडशम् । पृष्टे १७ तल्लोपे शेष ४ तदघो ल, तस्य १३ मध्ये भागे शप ६, अय परोक पूर्वस्थाप्टकादधिक इति हेतो तस्याप्यघो ल पञ्चके विकस्य भागात पञ्चाधो ग, त्रिकलोप , द्विके मुख्यकभागाद् द्विपाधो ग, मुख्यकलोप , 5 ||| सप्तदशम् । पृष्टे १८ तल्लोपे शेप ३ तदधो ल तस्य १३ मध्ये भागे शेष १० तदधो ल , अप्टफादधिका १० इति अष्टकाघो ल, पञ्चके त्रिकभागात पञ्चाधो ग, विकलोप , शेपे समकलाङ्कत्वात् लघुद्वय, 115।।। अष्टादशम् । पृष्टे १६ तल्लोपे शेप २ तस्य १३ मध्ये भागे शेप ११ तस्य अष्टमध्ये भागाभावात, अष्टकस्य पञ्चके भागाभावात् सर्वत्र ५, ८, ११, २ एषु द्विकस्य त्रिके भावात् त्रिकाधो ग , द्विकलोप , मुख्याधो ल , एव ।।।।।। एकोनविंशम् । अथ पृप्टे २० तस्य २१ मध्याल्लोपे शेप १ तत्र १३ मध्यात् भागे शप १२ तम्य नाष्टसु भाग , अप्टाना न पञ्चके भाग, पञ्चकम्य न त्रिके इति सर्वत्र लघव पञ्चस्वङ्केषु द्विके मुख्यकभागात द्विकाधो ग , एकस्य लोप, एव ।।।।।। विशतितम रूपम् । परत सर्वलघुकम् इति भाव्यम् । एव सर्वत्र मात्राच्छन्दसि इष्टज्ञानम । एककल- पञ्चकले अष्ट- - लघव, १ ISS द्विकले द्व- २ s15 11 IS ३ 5 १ 551 ४ २ त्रिकले त्रीणि- ६ 5 १ २ . चतुष्कले पञ्च- SS 15 १ २ ३ ।।
मात्रानष्ट-प्रकरण [३३७ 15 ।। । । १६ पटकले अष्टs १ २१ .55 २ ३ सप्तकलं पूर्णम् । 515 ।। ।।। 15 प्रप्टकले चतुस्त्रिशत्- SS SS 513 ७ 1"SSS २ । ८ IS ISS Ss1 ४ ५ s।।। १२ ७ SIISS ।।।। ISS IS 5।। ।।।। 3।। ।।। IS IT IS ।।5 पट्कलं पूर्णम् । ६ सप्तकले एकविंशति-~- .55 १२ Siss २ १४ ।।।55 SS IS 11 IS ५ ।।5 ६ । sss 15s ।।5।। sss ।।5।। 151।। SII । ७ १८ ६ ...S 1 । । । 15 5 5 51 MISSI .5 151 s1 ।।।।। ६ १० २० २१ २२ sss.. 15 IS 11 १४ । ।।।।। 5।।। ।। ।।.. 153 .. २४ २५ २९ २७ 11।1।
३३८ ] वृतमौक्तिक-दुर्गमबोध . SS । IS IS 1151 15 IS ।।। २६ 151। 1 । । । 5।।51 ।।३।। 15।।।। ।।. 1।। ।। 15 । ISS Si ३२ ३३ अपकलं पूर्णम् । नवकले पञ्चपञ्चाशत्- SSS.. SSSS ३७ ।। ।। IISISS SS SS ૨ ३ ४ ५ ६ ३८ ।।5।। ३६ Is II ।। । । । । । ।। ४२ sss 11। ४३ "55 ।। 15.5 ।।। ४५ । । । ।। ४७ ७ ८ ।।।5ss SSI S s ।।। 55 15 ।। s ।।। ss .।।।। ss sss 15 ।।5515 15.51 51.55 ।।।।s.s IS SIIS ४४ १२ 38 IS SITI ४८ 515।।।। ।।।।।।। ।।। IS ५२ SIIS IS 1. ।।5 SS... १७ ।। 15 5.1।।।।। ...।। ५५ sif1151 १६ is s1।। नवकलं पूर्णम् । २० ।। ।। 1 ।। २१ ssss! २२ 11 SSS! 15I551 २४ ।।551 दशकले नवाशीति- 55555 ।।SSSS 1.555 $1 tsss २ ३ । ISISS! २७ ४ मात्रानष्ट-प्रकरण [ ३३६ ।।।।555 15515 ६ S .।। ।।।।।5। ४२ 5555 SIS I55 ७ 555 ८ S है 15.55 ।।।।ss ।।।।। ।।।।।।55 15555 १४ SISSIS ।।।5।। 55 ।। 1।5।। 1।।। १६ ....S २० ।।।।। 15 २१ SS SIIS २२ ।।5।। २३ ISISIS २४ ।।5।।5 २५ २६ ISSNiis S.5 ।।।5 5।।। २६ 55.।। ३० ।।।।।। ३१ 15।।।।। ३२ 11।। ४५ s। ।।।।।। ४७ 15s.15 । ४८ ।। । ४६ ।।।।।। ५० 55।।।। ५१ 115 ।।।5. ५२ 15।।।।5।५३ ।।।।। ५४ ।।।।।।।। ५५ SS SSI ।।555 ।। ISISSIT ।।5।। ।।।।5।। ६. 1555 ।। ..।। ६२ ".55 ।। ६३ 5 ।। ।। ६४ ।।।।5।। 15।।।।। .।।।5।। ।।।।।।।।। ६८ 1555।।. 5 ।।। ।।।।।। SSISTI ७२ ।।।।।।।।।३४ 15555. 51551 II ISSS 55 ।। 115 15।।5। IS ।।।। ।।।।। 1111111७६ ३४०] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमयोध SSS I ।।। 11 । ८४ 55।। Go Is ।।55 I ।। 15. 51 15।। ।।।।।।।। ८१ ।।।।।। ८२ SIS।।।।। ८३ SI ।। ।।।। ८६ दशकल सम्पूर्णम् । इप्टशब्देन चित्तेष्ट पृष्टरूपमिहोच्यते । प्राचा वाचा नष्टमिहममाङ्गल्य न चोदितम् ॥१॥ उसल्यतोऽत्येभ्यधिक हायोग साम्येपि गो लस्तु ततोऽन्त्यहानी । पश्चाद्गुरोर्लोपनमकस्य, कलासाम्ये लघवो निधेया ॥२॥ शेषाङ्कपूर्वापरयोरघो ग., स्थाप्योत्र वृद्धस्य ल एकशपे । न पूर्वरूप पुनरेव कार्य, यो यत्र लुप्येदिति तद्विचार्यम् ॥ ३॥ पृष्ट पञ्चकले पञ्चम १ २ ३ ५ ८, तदा पृष्ट पञ्चम तस्य अन्त्येष्टके लोपे शेषमन्ते ३ तस्याधो ल , उपान्त्यात् हीनत्वात् शेषाका १, २, ३, ५, अत्र त्रिकस्य पञ्चके भाग वृद्धत्वात् तदघो ग , पश्चात् त्रिकस्य लोप , शेप शर कलाना अनाना च साम्यात प्रत्येक लघव , इति । । । पञ्चम रूपम् । यद्यत्र एकात् द्विकस्य वृद्धस्याध गुरुर्दीयते तदा तु पञ्चकले तुर्यरूपापत्ति । अत्र हि प्रथमरूपतये विकलवत् यिस्ते प्रान्तगुरुत्वम् । पञ्चकत्वाच्छन्दस त्रिकले पूर्व- पूर्वत्वात् प्रश्ने तदतिक्रमे चतु कल स्वत पूर्वस्य द्वितीयरूपप्राप्तिस्तदभगश्च दोपश्च । अथ यो नर पूर्वरूप न जानाति तस्य का गति ? इति चेत, तेन पुसा विचायं यत् पञ्चकले सर्वरूपाण्यप्ट, तहि त्रिरूपव्यतिकान्ते गुर्वधिकता न युक्ता । यस्य यावत् कलच्छन्दस स्वपूर्वच्छन्दस ५१ परस्य यावद् रूपाधिक्य तावति रूपे अर्द्ध प्रान्तगुरुता च। यथा- अत्र पञ्चकले स्वपूर्वचत्तु कलात् पञ्चरूपात्मकात् रूपत्रयमधिकमिति त्रिरूपी यावदन्तगुरुता च ।
मात्रानष्ट-प्रकरण [ ३४१ पूर्व-पूर्वत्रिकलरूपतापि । तत्र गुर्वाधिक्य परार्द्ध लघूनामाधिक्य प्रान्तलघुता च । यथा, निकलत चतु कले रूपद्वयाधिवय तेन प्रथमरूपद्वये न गुरुत्व, शेपद्वये चान्तलघुत्व, पञ्चम तु चतुर्लम् । पञ्चकलेपि प्रथमविरूपोत्रिकलस्य पश्चात् पञ्चरूपी चतु कलस्य तत्रापि प्रान्तलघुता । पञ्चसु रूपेष्वपि द्विकलाद् रूपद्वय प्रान्तगुरक तस्याप्यने एक लघु । ततोऽपि रूपद्वय निकलवत् प्रान्तलघुद्वय चतु - कलापेक्षया पञ्चम, पञ्चकलापेक्षयाऽष्टम सर्वलघुकम् । पञ्चकलात् पट्कले पञ्चरूपाधिक्य, पञ्चापि रूपाणि चतु कलवत् प्रान्ते एकगुरोरधिकस्य दानात् कलापूर्ति , पञ्चमे रूपे एको गुरुरन्ते शेष लघुचतुष्टयम् । परतोऽप्टरूपाणि पञ्चकलवत् प्रान्ते एकलघुनाऽधिकानि । तनाप्यष्टमे प्रान्ते एकगुरु शेष लघुपञ्चक, अष्टावपि रूपत्रय विकलवत् प्रान्ते गुरुलघुभ्यामधिक पट्सप्तमाप्टरूप, पर रूपपञ्चक चतु कलवत् प्रान्ते लघुयाधिक इत्यादी विचार एव बलवान् । एव पृष्टे पञ्चकले पष्ठरूपे तदा प्रान्त्याप्टमध्ये ६ लोपे शेप १, २, ३, ५, २, अन्त्यद्विकाधो ल , तस्य पञ्चके भागात् उपान्त्यादूनत्वाच्च पञ्चकेपि द्विकस्य भागे लब्ध २ शेप १ तेन पञ्चकाधोपि ल , त्रिकाधो ग , द्विकलोप, तुर्ये पञ्चमे च रूपे पञ्चकाधो ग , विकलोप । पञ्चकले हि विकलवत् त्रिरूपी गुरुणान्तेऽधिका इद पृष्ट पष्ठ रूप इति विचारात् लब्धस्य द्विकस्य निके भागाच्च, मुख्यकाघ कला ।5।। इति पष्ठ रूपम् । यथा उपान्त्ये-अ त्यस्य भागे उपान्त्याधो ग, अन्त्याधो ल, उपान्त्यपूवस्य लोप , तथा द्विकस्य पञ्चके शेष १ तस्य त्रिके भागेपि सभवति त्रिकाधो ग, पञ्चकस्थानीयद्विकाधो ल, पूर्वद्विकलोप, मुख्याधो ल । इति रूपनिर्णय । पञ्चकले सप्तमेपि अन्त्याष्टके सप्तलोपे शप १ तदधो ल शेपैकरयापि पञ्चके भागे शेष पूर्णम् । अन त्रिकस्य द्विके भागाभाव वृद्धत्वात् मुख्यकस्य द्विके भागात द्विकाधो ग , मुख्यकलोप , त्रिकाधो ल , इति । । । सप्तमम् । यो यस्मात पूर्वपूर्वोऽस्तावद्रूपेषु चान्स्यग । तत्पर प्रान्त-लान्येव स्वत पूर्वाङ्कसख्यया ।। ४ ।। एव सप्तकले पृष्टे एकादशे रूपे अन्त्याङ्क २१ मध्ये ११ पाते शेप १० तस्य उपान्त्याझे १३ मध्ये भाग प्राप्त , तत्र अष्टकस्य कलाग्रहात् १३ स्थानीयनिकाधो ग अष्टकलोपः, दशाधो ल , द्विकस्य त्रिके भाग , तेन त्रिकायो द्विकलोप , मुख्यकाधो ल , पञ्चकाधो ल , एव 1515। इत्येकादशरूपसिद्धि ।
३४२ ] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोष - - ननु अन पञ्चके प्रयोदशस्थानीयनिकस्य भागात् पञ्चकाधो ग , पूर्वत्रिक- लोप , अग्रे १,२ अनयोरध कलाद्वयमिति कथ न क्रियते ? इति चेत्, न, दशम- रूपापत्ते । परस्य १० अङ्कस्य पूर्वस्मिन् १३ अङ्के भागाधिकारात् पूर्वत्रिके भागश्चेत् सम्भवति तदाऽय विधियुक्त । यद्यपि प्रयोदशस्थानीयत्रिकस्य परस्य पूर्वस्मिन् पञ्चके भागसम्भव , पर मध्येप्टकलोपेन व्यवधानानाय विधिर्घटते । यद्यपि सप्तकले दशमे रूपे अयमेव विधिदृश्यते, तथापि सप्तकले पूर्वपूर्व पञ्चकल तस्याप्टरूपाणि प्रथमतोऽतिक्रान्तानि शेष ६।१०।११ इति पट्कलस्य तृतीय रूप प्रश्ने प्राप्त, तच्च । । । 5 ईदृशमिति, तद्भङ्गापत्तेरानीयमध्वाप्रध्वर । पट्कलेपि तादृग् रूप चतु कले स्वपूर्वपूर्वे तृतीयरूपे । । । ईदृशे प्रान्ते गुरु- दानात सिद्धम् । चतु कलेपि द्विकलवत् रूपद्वये प्रान्ते गुरुणाधिकेप्यतीते त्रिकलस्य प्रथम रूप प्राप्त, चतु कलापेक्षया तृतीय, तत्रान्ते लघोरधिकारात् प्रश्ने ।। ईदृशस्यैव सिद्धे । स्वपूर्वपूर्वस्य कलाप्रमाणे, गोऽन्त स्वपूर्वस्य कलाप्रमाणे । लोऽन्तो विचिन्त्येति निवेद्यमेव, छन्दोविदा पृष्टमिहेऽप्टरूपम् ॥ न8 सव्व कला कारिजसु, पुव जुयल सरि अका दिज्जसु । पुच्छिल अक मेटावहु सेख, उवरिल अक लोपि के लेख ।। जत्थ जत्य पाविज्जह भाग, एह कहे फुर पिंगलनाग । परमत्ता लेइ गुरुताइ, जत लेवेहु तत लेवेहु आइ । नष्टाङ्के कल्पयेद् भाग समभागे लघुर्भवेत् । दत्वैक विषमे भागे कार्यस्तन गुरुभवेत् ।। [वाणीभूषणम्, परि० १. पद्य ३५) अथ सिलमिली [शाल्मली] प्रस्तार गुरु पढम हिट्ठ ठाण, लहुया परि ठवहु अप्पयुद्धेण । सरिसा सरिसा पत्ती, उज्वरिपा गुरु-लहू देहु । इति मागानष्ट न्यास।
वर्णोद्दिष्ट-नष्ट-प्रकरणम् अथ वर्णोऽ? दिप्टरूपज्ञानमाह- द्विगुणानद्धान् दरवा वर्णोपरि लघुशिरःस्थितानद्धान् । प्रङ्कन पूरयित्वा वर्णोद्दिष्ट विजानीयात् ॥ ५५॥] अस्यार्थः सोदाहरण. । यथा, 1515 इद चतुरक्षरे छन्दसि कतम रूपम् ? इति, उद्दिष्टे द्विगुणा अड्डा उपरि देयाः १ २ ४ ८ इति न्यासे लघूपरि १,४ । - मेलने ५, तत्र संककरणे पष्ठ रूप इत्युद्देश्यम् । उद्दिष्टे वर्णोपरि दत्त्वा द्विगुणनमेणाङ्कम् । एक लघुवर्णात दत्वोद्दिष्ट विजानीयात् ॥ [वाणीभूषणम्, परि० १. पद्य ३४] इ[? न]प्टज्ञानमपि पाह- मप्टे पृष्टे भागः फर्त्तव्य पृष्टसरयायाः । समभाग ल फुदि विषमे दत्त्वकमानयेद् गुरुकम् [॥५६॥] यथा चतुरक्षरे छन्दसि षष्ठ रूप कीदृशम् ? इति पृष्टे पण्णा भागोद्धं त्रय एव समभागात् लघुः प्राप्तः, पुनस्त्रयाणामद्धकरणाभावात् संस्करणे ४, तदढे २ एव गुरुः प्राप्त., द्वयस्याद १ एव लघु प्राप्त., तस्याप्यसिम्भवात् संक- करणे २ तदर्थे १ एव गुरुप्राप्ति । जात।5। 5 एव इ(? न)ष्टरूपज्ञानम् । इति दर्णोद्दिष्टनष्टप्रकरणम् ।
वर्णमेरु-प्रकरणम् वर्णमेरुमाह- कोष्ठानेकाधिकान् वणे. कुर्मादाद्यन्तमो. पुन । एकाङ्कमुपरिस्याङ्क - द्वयैरन्यान् प्रपूरयेत् [॥ ५७ ॥] १ १ २ १ १ ३ ३ १ ४ ६ ४ यस्य छन्दसो यावन्तो वर्णास्तावन्त कोष्ठा एकेनाधिकाः कर्तव्या । तत्रापि माधन्तकोशद्वये एकावन्यास , तत पुन उपरिस्थाङ्कयो कोशयोर्मीलनेन विचाल- स्थकोशपूरण कार्यम् । यथा-द्विकवर्णच्छन्दसो द्वे रूपे-एक गुरुक १, एक लघुक च २, एव कोशद्वयम् । द्विवर्णच्छन्दसोपि चत्वारि रूपाणि-55, 15, 51, 11, इति । एक सर्वगुरुक, द्वे रूपे एकगुरुके, एक सर्वलघुक, एव उपरितनकोशद्वयाको १५१ तयोर्मेलने द्वाविति मध्यकोशे द्विकन्यास । त्रिवर्णच्छन्दसोप्टरूपाणि-एक सर्वगुरु 555, त्रीणि द्विगुरूणि २, ३, ५, त्रीणि एकगुरूणि ४, ६, ७, एक सर्व- लघु मध्ये कोशद्वये ३।३ न्यास , उपरिस्थ १२ मेलने जात । चतुर्वर्णच्छन्दसि पोडशरूपाणि-एक सर्वगुरु आध, चत्वारि एक गुरूणि ८, १२, १४, १५, पद द्विगुरूणि ४, ६, ७, १०, ११, १३, चत्वारि त्रिगुरूणि २, ३, ५, ६, एक सर्वलघु, एव पोडशरूपाणि । विचालकोशत्रये १३ मेलने ४ प्रथम-मध्य- कोशपूरण, उपरितन ३।३ मैलने ६ द्वितीयमध्यकोशे, तृतीयेपि १२३ मैलने ४ इति, एवमग्रेपि । . 'वर्णमेरुरय' इत्यादि स्पष्टम ॥ ५८ ।।
वर्णमेह-प्रकरण [३४५ १ १ ४ १ ८ ३ ३ १६ ४ ६ ४ १ ५ १ ६४ ६ २० ६ १ १ १२८ ७ २१ || ७ २५६ १ ८ २८ ७० २८ ८ (५१२ १ E ८४ |१२६|१२६ ८४ ६ ४५ १२०२१०२५२२१०१२० ४५ १०२४ इति वर्णमेरु । द्वयक्षरे छन्दसि ४ रूपाणि-एक सर्वगुरुरूप, द्वे रूपे एक गुरुके, एक सर्वलघुः । त्र्यक्षरे छन्दसि ८ रूपाणि-१ सर्वगुरु, त्रीणि एकगुरूणि, त्रीणि द्विगुरूणि, एक सर्वलघु । चतुर्वर्णे छन्दसि १६ रूपाणि-४ एकगुरु, द्विगुरु ६, त्रिगुरु ४, एक सर्वगुरु , एक सर्वलघु । पञ्चवर्णे छन्दसि ३२ रूपाणि । पड्वर्णे ६४ रूपाणि । सप्ताक्षरे १२८ रूपाणि । अष्टाक्षरे २५६ रूपाणि। ९ वर्णे ५१२ रूपाणि । दशाक्षरे छदसि १०२४ रूपाणि । इति वर्णमेरु-प्रकरणम् । .
वर्णपताका-प्रकरणम् वर्णपताकामाह- दत्त्वा पूर्वयुगाङ्कान् पूर्वाईर्योजयेदपरान् । प्रद्धः पूर्व यो ये धृतस्तत. पक्सिसञ्चारः ॥ [1॥ ५६ ॥] प्रङ्काः पूर्व भृता येन तमङ्क भरणे त्यजेत् । प्रद्धश्च पूर्व यः सिद्धस्तमद्धं नैव साधयेत् ॥ ॥ ६० ॥] चंवमविस्तारकल्पना । पताका सर्वगुर्वादिवेदिकेय विशिष्यतु ।। [॥ ६१ ॥] पूर्वयुगावाः वर्णच्छन्दसि १।२।४।८।१६॥३२॥६४ इत्यादयः, न्यासवेद्यम् । प्रस्तारसख्यया तद्धरण २ २ ४ २ २ ४ ३ प्रथ तान् यथायोगं पूर्वाक योजयेत् तदा अधोऽधस्तनी अतश्रेणिर्जायते । प्रथम एकवर्णच्छन्दसि रूपद्वयमेव, तत्र २ पङ्क्तिस्थापना । द्विवर्णे मध्यस्था एका- पक्ति । त्रिवणे मध्यस्थ पड क्तिद्वय । चतुर्वणे मध्यस्थ पक्तित्रयम् । पञ्चवर्णे मध्यस्थ पड तिचतुष्टयम् । प्रादी एक वर्णे ऽ गुरु । लघुश्चेति रूपद्वयम् । द्विवर्णे ११२ इत्यनयोर्योजने ३ द्विकाध. । अत्र पूर्व अङ्क धृत. तत. पड क्तिसञ्चारः, एकव द्विकाद्यापड क्ति परतः सिद्धोऽङ्कस्तस्य साधना नास्तीति । तत्र एक रूप सर्वग प्रथम, द्वे स्पे द्वितीय-तृतीयरूपे एकगुरुके, तुर्य सर्वलम् । एव द्विवर्णच्छ-दस चत्वार्येव रूपाणि भवन्ति । १ २ ४ १ २ 5 ३ ५ वर्णपताका-प्रकरण [३७ त्रिवर्ण छन्दसि ११२ योजने ३ द्विकाधः, पुन: २१४ मेलने ६ परतः सिद्धोऽङ्कः, पुन: २।३ योजने ५, पुन: ४१३ योजने ७, पुनः ४१३ योगे ७ शेषाङ्काभावात् । एवं एक रूपं सर्वगं, द्वितीय-तृतीय-पञ्चमानि रूपाणि एकेन गुरुणा ऊनानि त्रीणि रूपाणि द्विगुरूणि, ४, ६, ७ रूपाणि गुरुद्वयोनानि एक गुरूणि त्रीणि, एकं अष्टमं सर्वलघुकमिति अग्रेपि मन्तव्यम् । सुखेन अग्रेपि करणज्ञानाय विधि:- १ २ ४ १६ १ ૨ ८ ३ ६ १२ ५ ७ १२ योजने ३, पुनः ४।२ योजने ६, पुनः ८।४ योजने १२, द्वितीया कोश- श्रेणिः, १६ त्याग. सिद्धाङ्कत्वात् । अस्याः घेणेरप्यधः २।३ योजने ५, पुन: ४।३ योजने ७, पुनः ८।६ योजने १४ तृतीया थेणिः । तस्या अध. ४१५ योजने ६, पुनः ४.६ योजने १०, पुनः ८१७ योजने १५ तुर्याश्रेणि । ६।५ योजने ११, पुनः ६७ योजने १३, एव श्रेणिद्वय एककोशम्। एव रूप सर्वग प्रथमपडतो। द्वितीयपक्ती २।३।५६ चत्वारि रूपाणि एक गुरुणा ऊनानि त्रिगुरूणि । [तृतीयपड तो] ४॥६७।१०।११।१३ इति षड्पाणि द्विगुरूणि । [चतुर्थपड तो] ८।१२।१४।१५ एतानि एकगुरूणि । पञ्चमपड क्तौ] पोडश सर्वलघु, एव पोडशरूपाणि ।
३४८ ] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमयोप १ २ . ३ ६ १२ २४ १४ २८ E १० ११ १५ २० ७ २२ १८ १६ २६ २१ २७ २५ २९ . पञ्चवर्णे बन्दसि २२ योजने ३ द्विकाध , २।४ योजने ६ चतु काध , ८४ योजने १२, अष्टाध , १६८ योजने २४ द्वितीयश्रेणि । तदध २१३ योजने ५, पुनः ४१३ योजने ७, पुन ८६ योजने १४, पुन १६।१२ योजने २८ तृतीय- श्रेणि । ४।५ योजने ६, पुन ४।६ योजने १०, पुन ८७ योजने १५, पुन १६।१४ योगे ३० तुर्याणि । ८६ योजने १७, ४।७ योजने १ , पुन ८।१२ योजन २०, पुन १६।१५ योजने ३१ पञ्चमऽणि । ६७ योजने १३, पुन ७.११ योजने १८, पुन ६१० योजने १६, पुनः १०।११ योजने २१, पुन १०।१५ योजने २५, पुन ८।१४ योजने २२, पुन ८।१५ योजने २३, पुन १२।१४ योजने २६ पुन १२।१५ योजने २७, पुन १४।१५ योजने २६ एव पताकया सर्वगुर्वादिज्ञापनम् । एक सर्वगुरुरूप । २।३।५।६।१७ पचरूपाणि चतुर्गुरूणि । ४।६।७।१०।११। १३.१८१६४२११२५ एतानि त्रिगुरूणि । ८।१२।१४।१५।२०।२२।२३।२६।२७। २६ एतानि द्विगुरूणि। १६।२४।२८।३०।३१ एतानि एकगुरूणि । ३२ एक सर्वलघुरूपम् ।
वर्णपताका-प्रकरण [ ३४६. पूर्वाई, उपरितनः पावस्थैर्वा पङ्क्तयन्तरेप्युपरिस्थरवानां योजना स्यात् ११२ इत्यादयः, साम्ये योज्याः २३ इत्यादयः, उपरितनः ३६४ इत्यादयः, पक्त्यन्तरस्थयोंगो भाव्यः । येन येन अझेन मीलितेन य अकः रूपस्य पताकायां, भृतस्तमङ्क पुनर्जायमानं न पूरयेत्, यावद्रूपः प्रस्तारस्तावदस्पः कोपभरणमिति ज्ञेयम् । उद्दिट्ठा सरि अंका दिज्जसु, पुव्व अंक परभरण करिज्जमु । पाउल अंक मढ परितिज्जसु, पत्थर संख पताका किज्जसु ॥ एकवणंपताका १ २ २ - द्विवर्णपताका २ ४ 55 २ (१) (२) 15 ३ 51 (४) द्विवणे एकं सर्वगुरु, द्वे रूपे एकगुरुके द्वितीय-तृतीये, तुर्य सर्वलघुकम् । त्रिवर्णपताका १ २ SSS SSI 155 (२) 151 ३ ६ SIS 11 (७) एकं सर्वगुरु, द्विगुरु २।३।५, एकगुरु ४,६,७ रूपाणि, अष्टमं सर्वलम् ।
३५० ] वृत्तमौक्तिक-दुर्गममोप चतुर्वर्णपताका १ २ ४ F SSSS SSS1 ISSS १२ ISSI 5.S. Sss ।।SS EcCE31 ।। 555 ६ | १० (१२) (१३) (४) (१५) SIS 1511 ११ 5.11 115 1।। (1) पोडशके प्रस्तारे एक सर्वगुरुरूपम, २३६५६ एतानि त्रि-गुरूणि, ४,६७,१०,११,१३ एतानि द्विगुरूणि, ८।१२।१४।१५ एतानि एकगुरूणि, १६ एक सर्वलघुरूपम् । पञ्चवर्णपताका २ ४ ८ १६ ३२ १२ २४ ७ १४ २८ ६ ० १ २० २२ १६ २६ २७ २१ २५ २६ वर्णपताका-प्रकरण [ ३५१ पन्चवर्णपताका श्री ग १ त ५ ૨ ३ ५ ६ १० ४ G or १० १३ २५ M १२ ४ २० २२ २३ । २६ २६ २४ २८ १ ३२ रो एकद्वयोर्योगे ३, द्विचतुरोर्योग ६, चतुरष्टयोयोंगे १२, अष्टपोडशयोगे २४ । ऊधि २१३ योगे ५, चतुस्त्रियोगे वक्रत्वे ७, ८१६ योगे १४, १६:१२ योगें २८॥ १०३।५ योगे, ४६ योगे १०,८७ योगे १५, १६।१४ योगे ३०); ४।६।७ योगे १७, ११३७ योगे ११, १२ योगे २०, , [११४२० योगे ३१,६७ योगे १३, ७१११ योगे १८, ६।१० योगे १६, १०११ योगे २१:१०।१५ योगे २५॥] ८.१४ योगे २२,१५१८ योगे २३,१२०१४ योगे २६, १५३१२ योगे २७, १५६१४ योगे २६ । SSSSS 35551 SSSS (२) 55s" 5555 1550 (१९) MISS $ USSI SSiss SSIS) (२१) ISISS ... (२२) SIIS 5 .05. (२३) 115s JUISI (२४) ssss sss.. 15515 ISS) (२६) 5) SIS s11 (२७) 155 $$IIS (१३) 55JIU (२ 15115 ISI" s।।। 5.11" ।।। (३२) इति धणंपताका-प्रकरणम् । -- मात्रामेरु-प्रकरणम् अथ मानाछन्दो मेरुमाह- एकाधिककोष्ठानां तु द्वे पड़पती समे कायें। तासामन्तिमकोष्ठप्वेका पूर्वभागे तु ॥६२॥] एककलच्छन्दसः ५१ अधिककोप्ठानां द्वि कल-विकलादीनां दे द्वे समे पड़ती कार्ये । कोऽर्थः ? द्विकल-विकलयोः समे पङती द्वयोरपि चतु.कोशात्मिके कार्ये । एव चतु.कलाप्टकलयोः पट्कोशस्पे। त्रयोदशकल-एकविंशतिकलयो. अप्टकोशा- त्मिके कृत्वा अन्त्यकोशे एकाइ एव धार्यः । पूर्वभागे तु पुनः अयुग्पड क्त: १। ३ । ५ । ७ इत्यादिकायाः प्रथमकोशेपु सर्वत्र एककः स्थाप्य , समपड क्तेः २।४। ६ । ८ इत्यादिकाया पूर्वभागे प्रथमकोशे पूर्वयुग्माङ्काः । इह मात्रा छन्दसि ११२ ३ । ५। ८ । १३ । २१ इत्याद्या योज्याः। एतत्तु दुर्बोधम् । सर्वपंक्तिषु प्रादो पूर्वयुग्माका देयाः । द्विकलाद्यपेक्षया अयुग्पतीनां द्वितीयकोशे एककः, सम- पक्तीनां द्वितीयकोशे २।३।४।५।६।७।८ इत्यादयः स्थाप्याः यावता पक्ति. पूर्यते । माद्य एककललघुकोशापेक्षया २।४।६। एताशु पक्ति सु एकक इति । श्राद्याड फेन तदीयैः शीर्वाड कैर्वामभागस्थ. । उपरिस्यितेन कोष्ठ विषमायां पूरयेत् पक्तौ ॥६३॥] १ २ २ ज ३ २ -- १ १ E ४ १ १ ६ ७ २१ . . ३४ १५ - . 8 ५५ ५ २० २१ १ मात्रामेरु-प्रकरण [ ३५३ यथा द्वाभ्या एककाभ्या मेलने जात २ । अग्रे अन्तकोप्ठे एक सिद्ध एव इति द्वितीया पक्ति ! अस्या प्रथमकोश निकस्त विहाय कोशभरण एव तृतीय पड क्तो। विषयामा द्वितीयपड क्तिगत द्विक तदुपरि वामस्थित एक , एव १०२ मीलने जाता ३ मध्यकोशे, अन्तकोशे पुन एक सिद्ध एव । प्रथमकोशे तु 'एकाङ्कमयुग्पड क्ते ।' इति सूत्रणात् एकाङ्क स्थाप्य एव, तस्याप्यादौ पूर्व- युग्माङ्क पञ्चक सकोशभरणेन ग्राह्य । एव प्राप्त चतु कले पञ्चरूपाणि एक सर्वग, त्रीणि एकगुरूणि, एक अन्ते सर्वलघुरूपम । एव पञ्चकलमेरुकोशेषु द्विकलेन समकोशत्वात चतु कलस्य ११३ एतौ सयोज्य उपान्त्ये ४ अन्ते एक सिद्ध एव । तत विकलपक्तिग द्विक त्रिकलपक्तिग एकञ्च सयोज्य त्रिक स्थाप्य , तस्याप्यनेऽप्टक पूर्वयुग्माङ्क । एव च त्रीणि रूपाणि द्विगुरूणि, चत्वारि एक गुरुणि । कानि कानि ? इत्याशङ्का पताकया निरस्या । अत्र मेरो लग क्रियावत् रूपसस्यैव । पटकले तु चतु कलस्यैक, पञ्चकलस्य चतु क च सयोज्य उपा त्ये पञ्चक , अन्त्ये तु एक सिद्ध एव चतु कलगतत्रिक तथा पञ्चकलगतत्रिक सयोज्य जाता ६ । ततोप्याद्यकोशे एकक पटकलत्वात प्रादौ सर्वगुरकरूपज्ञानाय ततोप्यादी १३ युग्मा । एवञ्च एक रूप त्रिगुरुक, पटरूपाणि द्विगुरुकाणि, पञ्चस्पाणि एकगुरुकाणि एकमन्त्य सर्दलघुकम । एव सर्वाणि १३ रूपाणि । सप्तकलके पञ्चकलस्य त्रिक पटकलस्यक सयोज्य प्रादौ ४, तस्याप्यादी २१ युगमाङ्क । चतु कात परकोशे पञ्चकलगत चतु क पटक्लगत पटक सयोज्य १०, तत पर पञ्चकलगत एक पटकलगत पञ्चक सयोज्य पट ततोऽ ते एक सिद्ध एव । एव च चत्वारि रूपाणि त्रिगुरूणि, दशरूपाणि द्विगुरूणि पपाणि एकगुरूणि, एक सर्वलघु एव २१ सर्वस्पाणि । अष्टकलके समपडक्तित्वात् एक सर्वगुररूप तदङ्क १, तस्यादौ ३४ युगमाङ्क, एकस्य कोशादग्रतनकोशे पटक्लपवितगत पटक, सप्तकलपक्तिगत चतुक सयोज्य १०, तदन पट्कलगत पञ्चक सप्तकलगतदशक १० योगे १५ धरण, तदने पट्कलगत एक सप्तकलगत पटक सयोग्य ७, अन्त चक । एव च एक सर्वगुर, दशरूपाणि त्रिगुरक णि, १५ रूपाणि द्विगुरूणि, सप्त एक्गुरुणि, एक सर्वल, इति ३४ रूपाणि । एव नवले उपरितनपक्तिगत ४११ योगे ५, पुन १०१० योग २०, पुन ६।१५ योगे २१, पुन १७ योगे ८ इति ५५ रूपाणि । इति मात्रामा । ।
३५४ ] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध मायामेरु-कर्तव्यता- सिर अके तसु सिर पर अके, उवरल कोट्ठ पुरुहु निस्सके । मत्तामेरु अक सचारि, बुज्झइ बुज्झइ जन दुइ चारि ॥ [प्राकृतपङ्गलम् परि० १, पद्य ४७) दुई दुई कोठा सरि लिहहु, पढम अक तसु अत । तसु भाईहि पुणु एक्कु सउ, पढमे बे बि मिलत ।। . २ 5 १ १ ३ २ १ ४ SS १ ३ १ ५ ५ ।55 ८ ३ ४ ६SSS ६ १ ७ 15ss २१ ४ ६ १ ८.ssss ३४ १ ७ E. ISSSS 1५५ १ F६ १०.sssss १ २८ E ११. Isssss १ १२555555 १ २३३ ४५ २१ | ७० ५६ /१२६ १२०५५ १३ 15sssss ३७७ १२ १ १४ 5555555 २८ १२६२१०१६५] ६६ १५ 155555ss १८७ २५२३३०१२२. १४ १ अयुग्पड क्ते पूर्वभागे एकाइ दद्यात, समकोष्ठकपडक्तिद्वयमध्ये प्रथम- पक्ते आदिमकोष्ठे इत्यर्य । समकोष्ठकपक्तिद्वयमध्ये द्वितीयपड क्तेराद्यकोष्ठे Emमाम दाात ।
मानामेरु-प्रकरण [ ३५५ एककलो लघुरेख । द्विकले २ रुपे-एक गुरु, एक लघु इति । विकले त्रीणि रूपाणि-द्वे रूपे एक गुरुके, एक सर्वलघुरूपम् । चतु.कले ५ रूपाणि-एक सर्वगुरुक, त्रीणि एकगुरूणि, एक सर्वलघु । पञ्चकले ८ रूपाणि-रूपत्रयं द्विगुरुक, रूपचतुष्टय एकगुरुक, एकं सर्वलघु । प्रय मात्रासूचीमैयः अक्खर संखे कोट्ट करु, प्राइ अंत पढमक । सिर दुइ अंके अवर भरु, सूई मेरु णिस्सक ।। [प्राकृतर्पङ्गलम् परि. १, पद्य ४] ० १ २ २. 5) गु | १ ३.। शु . १ ३ SSH मु. ३ ५ 155 ८1 दिए गए १६दुग ५ ६. १३ गुर ७ 1555 ४ १० ६ २१ २१ १ ३४ ८ssss १ ५ २० १.5555 १ ११. 1555 ६ १० १२.5555s ४. १४ १ २३३ १३.15555 १२६/१२. १ २८ ६१. १२६२१.१६५ १ वृत्तौक्तिक-दुर्गमबोध मानासूचीमेर रोसनागगरुरसवादे जानीयात् ३०००२७७० । एककलस्य एक रूप-सर्वलघु तदेव । द्विकलस्य द्वे रूपे-एक गुरु 5 रूप, द्वितीय ल-द्वयम् । चिकलस्य रूपाणि ३, द्वे एकगुरुके, एक जिलघुकम् । चतुःकले-एक सर्वगुरु, त्रीणि द्विगुरूणि, एक सर्वल एव ५। पञ्चकले च त्रीणि द्विगुरूणि, चत्वारि एकगुरूणि, एक सर्वल एव ८१ पट्कले-एक सर्वगुरुरूप, पट् रूपाणि द्विगुरूणि, पवरूपाणि एकगुरूणि, एक सर्वल, एव १३। सप्तकले चत्वारि त्रि- गुरूणि, दश द्विगुरूणि, पट् एकगुरूणि, एक सर्वल, एव सर्वाणि २१ । अष्टकले- एक सर्वगुरु, दश निगुरूणि, १५ द्विगुरूणि, सप्त एकगुरूणि, एक सर्व ल, एव सर्वाणि ३४ । ܘܕܦ ७ ६ ५ १ २ ६ ७ १ १ ३ अत्र '१० एक दश' इति । ततः पुनर्दशाना नवतिर्गुणने ६०, तत्र द्वाभ्या भागे ४५, ततः ४५ अष्टगुणे ३६०, तत्र ३ भागे लब्ध १० तेषा सप्तगुणत्वे ८४०, तत्र ४ भागे लब्ध २१०, तेषा यड्गुणत्वे १२६०, तत्र पञ्चभिर्भागे लब्ध २५२, तेषा पञ्चगुणत्वे १२६० लब्ध, तत्र पड्भिर्भागे २१०, तेषा चतुर्गुणत्वे ८४०, सप्त- भिर्भागे लब्ध १२०, तेपा निगुणत्वे ३६०, तत्र ८ भागे लब्ध ४५, तेपा द्विगुणत्ये ९०, तमह भागे लब्ध १०, तत्राप्येकगुणने तदेव १०, तत्र एकेन भागे लब्ध १। एव मेवंता सिद्धा १।१०।४५।१२०१२१०।२५२।२१०१२०१४५११०११ इति । . इति मात्रामे-प्रकरणम् । "-: विहानान्तर्गतोऽयमा वस्तुतस्तु वर्णमेप्रकरणे पार ३४५ स्प-पए मेचिन्तिा. कोष्ठन सम्बदोऽस्ति ।
मात्रापताका-प्रकरणम् प्रथमावापताका.- दत्त्वोद्दिष्टवदक्षान् वामावर्तेन लोपयेदन्त्ये । अवशिष्टो वै योऽद्धस्ततोऽभवत् पक्तिसञ्चारः ॥६॥ अत्र उद्दिष्टाद्वाः १५२१३१५८ इत्यादयः प्रागुक्तास्तेषु द्विकापेक्षया वामस्थ एकः तयोर्योगे ३ इति त्रिके पंक्तित्यागः, द्विकाधरित्रकः तदधः ४, तदघः ६, तदधः ७, तदधः ६ । पुनः, उद्दिष्टाः ५ द्विकत्रिकयोर्योगे जातः, तदधः ८ उद्दिष्टाङ्क- स्तस्य पंक्तित्यागः । पञ्चकाध:स्थितेः तदधोऽध: १०।११।१२; पुनः पंक्ती १३, एवं षट्कलस्य पताका । तस्यां त्रिक-पचञ्कयो एकस्य चतु.कस्य उद्दिष्टे लोपात्-प्रदर्शनात् त्रिषु गुरुपु प्रथमरूपस्थेपु एकस्यैव लोपः । एतावता २।३।४।६। ७६ रूपाणि द्विगुरूणि, पञ्चकारनन्तर उद्दिष्टे ६७ अङ्कयोर्लोपात् द्विगुरुलोपेन जातानि ५।८।१०।११।१२ रूपाणि एकगुरूणि इत्यर्थः, एकं १३ सर्वलघुरूपम् । एवं सर्वत्र पताका प्रागेव न्यासेन दर्शिता-उदाहृता दशमात्रिकस्य ६८ पूर्णरूपः। चतुकले न्यासः २ ५ ३ ४ पञ्चकलपताका १ २ ५ ४ ३
३५८ ]
वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध
विषमकले पञ्चकलस्य अष्टरूपाणि । तत्र श२।४ रूपाणि द्विगुरूणि, ५।३।
६७ रूपाणि त्रिकस्य एकस्य लोपात् एकगुरुलोपेन एकगुरुकानि ।
चतुःकले एक सर्वगुरुकं, २।३।४ रूपाणि एकलोपात् एकगुरूणि, पञ्चम
सर्वलम् । इति पताकाकरणम् ।
समाङ्कमात्रायां, विषमे तु लोपं प्राप्तोऽङ्कः परोद्दिष्टानाधः स्थाप्य एकलोपे।
सप्तकले तत एव लुप्तस्त्रिकः पञ्चकाधः त्रिकाधः, परेपि पडाद्याः सप्तदशान्ता
अष्टकषोडशवर्जा उद्दिष्टद्विकाधः ४।६ इत्यङ्कद्वयमेव त्रिगुरुक-एकलघुरूपज्ञा-
पकम् । उद्दिष्टपञ्चकाधः ३।६७।१० इत्यादीनि रूपाणि द्विगुरुक-त्रिलघुरूपाणि ।
पुनः त्रयोदशोद्दिष्टाकाधः ८।१६।१८।१९।२० एकगुरु-पञ्चलघुरूपाणि । एकं २१
रूपं सर्वलघुकम्।
पञ्चकलेपि १।२।४ द्विगुरु-एकलघूनि, ५।३।६।७ एकगुरु-त्रिलघूनि, ८ सर्वलम् ।
मात्रापताका
उद्दिट्टा सरि अंका थिप्पहु, वामावत्ते परलइ लुप्पहु ।
एक लोपे इक गुरु जाण, दुइ तिणि लोपे दुइ तिणि जाण ।
मत्तपताका पिंगल गाव, जे पाइअ तापर हि मेलाव ।।
[प्राकृतपैङ्गलम् परि. १, पद्य ४८)
चतुःकले ५ भेद
द्वि-त्रि-चतुर्थानि एकगुरूणि
२
५
पञ्चकले ८ भेद
२
८
१।२१४, स्पद्वयं द्विगुरु
४
३
५।३।६७ एकगुरु
मष्टमं सर्वलघु
मामा- पट्कले पताका २ १३ ३ ६ पटकले १ एकं सर्वगुरु ।३।४।६।७।६, द्विगुरूणि पञ्चाष्टदशादीनि ५।८।१०।१।१२। एकगुरूणि त्रयोदशं सर्वलघु ४ १० G १२ सप्तकलपताका १ २ ५ २१ । ३ ८ सप्तकले ११२।४।६ रूपाणि त्रिगुरूणि । ६ ५।३।६१७४१०१११११२।१४।१५।१७, रूपाणि द्विगुरूणि। १८ १० १३।८।१६।१८।१६।२० रूपाणि एक- गुरूणि । २० २१ एकं सर्वलघुरूपम् । १२ ३६० ] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध ww १, २, ३, ५, ८, १३, २१, ३४, ५५, ८६ २ दशमात्रिकस्य पताका ३४ ४ १० ६८ २६ २६ ६ ८४ 8 १४ ४७ ८८ २० २३ २२ २४ उद्दिष्टवदड्डा देयाः । श२।३।। १३।२११५५।८९ अत्र १२ मेलने ३ इति त्रिकस्य लोपोऽस्ति, ३.५ मेलने ८ तस्य लोपः । ८।१३ मेलने २१ तल्लोपः, २११३४मेलने५५तल्लोप. । ते लुप्ताड्का द्वितीयपक्तो प्रथम- पंक्तेरधः स्थाप्याः। २।३।४।६ इत्यादि चतुर्गुरुकाणि रूपाणि । ५।८।१०।११।१२ इत्यादीनि त्रिगुरु- काणि रूपाणि । १३।२।२६।२६ इत्यादीनि द्विगुरूणि ३४।५।६८७४ इत्यादि एकगुरूणि, ८६ सर्वलम् । ५२ ३५ २७ ४३ २८ ३७ ६७ ४१ ४४ ४६ ४८ ४६ ७६ ८० ५७ २ ५८ ५६ ७.
वर्णमर्कटी-प्रकरणम् अथ वर्णमर्कटीकरण यथा- प्रथमायामाद्यादीन् दद्यादद्धाश्च सर्वकोप्ठेषु । प्रपरस्या तु द्विगुणान् अक्षरसरयेषु तेष्वेव [॥ ७१॥ प्रथमाया पड क्तौ श२।३।४।२६.७ इत्याद्यान् लिसेत् । अपरस्या द्वितीय- पङ्क्ती द्विगुणान् २।४।८।१६।३२६४।१२८ इत्यादीन् लिसेत् । ऊर्ध्वाध पट्- पत्य कार्या । प्रथमपक्तिस्थरङ्कद्वितीयपक्तिमान् अवान् विभावयेत्-गुण- येत्, जातरइंश्चतुर्थपक्तिकोशान् पूरयेत् । २।८।२४।६४।१६०1३८४८६६ इत्यादि । तत पञ्चमी पक्ति षष्ठी च पक्ति चतुर्थपक्तिकोशाङ्कार्द्धन २४।१२। ३२।८०।१६२।४४८ ईदृशाङ्करूपेण पूरयेत् । तत तुर्यपक्तिस्थ पञ्चमपक्ति- स्थान् अड्वान् सम्मोल्य तृतीयपतिस्थकोशान् [३।१२।३६।६६।२४०१५७६। १३४४] पूरितान् कुर्यात् । एवमनया मर्कटया वर्णवृत्त १, तद्भेदा. २, तेपा माना ३, वर्णा ४, गुरव ५, लघव ६ पडपि पदार्था ज्ञायन्ते । प्रस्तारस्यते प्रकारा बोध्या । यन्नन्यास प्रागुक्त ।' . एव एकाक्षर वृत तस्य भेदद्वय, मात्रास्तिस्न , वर्णद्वय, एको गुरु , एको लघु । द्वयक्षरे वृत्ते चत्वारो भेदा , द्वादशमात्रा, अष्टौ वर्णा , चत्वारो गुरवस्तावत एव लघव । एव सर्वत्र ज्ञेयम् । आदीति । पूरयेदिति । कुर्यादिति । वृत्तमिति । सूत्रचतुष्टय गतार्थम । [॥ ७२-७५॥ अक्सरसखे कोठा किज्जसु, छह पती तहि अका दिज्जसु । एक्कहि प्राइहि पढमा पती, दूसरि दूणा वेवि णिभती ।। पाइ वेवि गुण चौढ ठविज्जसु, ता अद्धे पचमि छकृमि किज्जसु । चौथो पचइ दुहु मेलिज्जसु, तीसरि पती अका दिज्जसु॥ वित्त पन भेय मत्त अरु वण्णह, पचमि छट्टमि लहु गुरु गण्णह । १ यत्र यास ३६२ पत्रा द्रष्टव्य ।
३६२] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध गुरु लहु माला जुयलं, वेय वेय ठाबिज्जें गुरु-लहुयं । तिस पिच्छे इम ठाविज्जइ, अद्ध गुरु अद्ध लहुयाई ।। वर्णमर्कटी वृत्त १ २ ३ ४ ७ भेद २ ४ ६४|१२८ मात्रा ३ २ ३६ ६६/२४०५७६१३४४ घण २ ५ २४ ६४।१६०३५४०६६ लघु+ १ ४ १२ ३२ १६२/४४८ १ ४ १२ ३२ १६२/४४% + अत्र लघुसख्या वृत्तमौक्तिके पष्ठपक्तावुक्ता युक्ता च । पादिपंक्तिस्थित एकः तेन द्वितीयपक्तिगः द्विकः गुणितः जातं २, एवं तुर्यपक्तिगः द्विकः सिद्धः । प्रादिपक्तिगद्विकेन तदधः ४ गुण्यते जातं ८, एव त्रिकेन अष्टगुणने २४, चतुष्कन पोडशगुणने ६४, पञ्चकेन ३२ गुणने १६०, पटकेन ६४ गुणने ३८४, सप्तकेन १२८ गुणने ८६६, जातं तुर्यपंक्तिभरणम् । तुर्यपक्तिस्थावाना अर्द्धन पञ्चमी पष्ठी च पंक्ति पूरयेत् । तुर्यपंक्तिस्थं मत पञ्चमपंक्तिस्थाईन योज्यते तदा तृतीयपंक्तिस्था अड्डा जायन्ते । इति वर्णमकंटीकरणम् ।
मात्रामर्कटी-प्रकरणम अथ मात्रामकंटीमाह- कोष्ठान मात्रासम्मितान् पवितपटक, कर्यान्मात्रामकंटीसिद्धिहेतो । तेषु यादीनादिपड्क्तावथाङ्का- स्त्यक्त्वाऽद्याडू सर्दकोशेष दद्यात् ।। ७६ ॥] दद्यादथान पूर्वयुग्माङ्कतुल्यान्, त्यक्त्वाऽऽद्या पक्षपक्तावथापि । पूर्वस्थाड्कर्भावयित्वा ततस्ता, फर्षात् पूर्णाग्नत्रपक्तिस्यकोष्ठान [॥ ७७ ॥ वृत्त १ २ ३ ६ भवा २ ३ ૨૧ ३४ ५५ मात्रा १ ४ ६ २० ४० ७८ १४७|२७२|४६५ वर्गा १ ३ ३० ५८१०६/२०१३६५ लघव १ २ २० १३०|२३५ . १ २ १० २० ३८ १३० प्राद्याङ्क एकक मुक्त्वा द्वितीयपड क्तो द्वयादीन्-द्वयादिभिरेव भावयित्वा- गुणयित्वा, नेत्रशब्देन अत्र हरनेत्राणि श्रीणोति तृतीया पवित पूरयेन्, तदवा ४।६।२०४०।७८1१४७१२७२।४६५ इय तृतीया पक्ति । तुर्यां पक्ति विमुच्य पञ्चमी पवित वक्ति-प्रथमे द्वितीयम, द्वितीयकोप्ठे च पञ्चमाङ्कमपि दत्त्वा बाणद्विगुण तद्विगुण नेत्र (३) तुर्य (४) यो दद्यात् । द्विकस्य द्विकेन गुणकारकरणापेक्षया प्रथमकोश , द्विकाधस्तन वर्णावापेक्षया निकापस्तन कोश , तत्र द्विक ततोऽने द्वितीयकोष्ठे पञ्चमाङ्क दत्वा तत नेत्र- (३) तुर्य (४) कोशयो वाणा-पञ्च, तद्विगुण-दशक, पुन तद्विगुण-दिशति २० दद्यात् । .
३६४ ] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध एकीकृत्येति । २।५।१०।२० एतान् अङ्कान् सम्मील्य जाते ३७ अङ्के एक अङ्क दत्त्वा ३८ गुणकारापेक्षया पञ्चमपड क्तेः पञ्चमं कोशं पूर्ण कुर्यात् [॥७९॥ त्यक्त्वा पञ्चममिति । २।१०।२०।३८ एव ७० एकं तत्रापि दत्त्वा ७१ पञ्चमपते पष्ठ कोश पूरयेत् [11 ८० ॥] कृत्वैक्यमिति । २।५।१०।२०।३८७१ एपां ऐक्ये-मेलने जातं १४६ तत्र पञ्चदशाङ्घ १५ एक च हित्वा पोडशोनत्वे १३० पञ्चमपंक्तेः सप्तमकोशं मुनि- (७) प्रमितं पूरयेत् [१८१॥] एवमिति । स्पष्टार्थम् ॥२॥] एवमिति । अनया रीत्या पञ्चमपक्ति पूरयित्वा प्रथमं गुणकारापेक्षया प्रथमकोशे द्विकाधस्तने एकाङ्क दत्वा पञ्चमपंक्तिस्थैरकैः षष्ठी पक्ति पूरयेत् [॥३॥ एकीकृत्येति । पञ्चमपक्तिस्थैरकः षष्ठपंक्तिस्थाङ्कानां मीलनेन चतुर्थ- पंक्ति पूर्णां कुर्यात् । यथा-श२ योगे ३, पुनः ५।२ योगे ७, पुनः ५२१० मीलने १५, पुनः २०११० मीलने ३० इत्यादि ज्ञेयम् ॥८४॥] प्रथ मात्रामटी छह छह कोठा पंती पार, एक्क कला लिखि लेहु विचार । बीए आइहि पढमा पंती, दोसरि पुन्य जुअल निम्मंती ॥ पढम बेवि गुणि अका लिज्जसु, छ पंती तिहि भरि दिज्जसु । चौथी अका पुव्व हि देय्यहु, तीसरि सिर पर तहि करि लेखहु ।। तीसरि सम छह माले अंका, घाचे पंचमि भरहु निसंका । पच इकट्ठहु ताहि समानहि, चौथो लिखहु लिखाग्रह आनहि ॥ सोरठा लिहि सागर परजन्त, इहि विहि कइ पिंगल ठिपउ । अक भरण यह मत्त, पढम भेन भणि भणि भरहु ।। दोहा वित्त भेन गुरु लघु सहित, अक्खर फला कहन्त । पिंगलक इम करि कहिन, जिह गइंद उरभंत ॥
मानामर्कटी-प्रकरण [ ३६५ मात्रामकटो १ २ ४ ८ ३ य. १ २ ३ . २० १३० गु १ २ १० २० १३०१२३५ ल १ ३ ७ ३० ५८ [१०६/२०१1३६५ व १ २० ७८ १४७/२७२/४६५ मा. १ एक तृतीयपक्तिस्थ, द्विक तुर्यपक्तिस्थ एकीकृत्य पञ्चमपत्तौ त्रिक.। एव २१५ ऐक्ये ७, तथा ४१० ऐक्ये १५, १०।२० ऐक्ये ३०, पुन ३८२० ऐक्ये ५८, पुन ३८७१ ऐक्ये १०६, पुन. ७१।१३० ऐक्ये २०१, पुन तृतीयपक्तिस्थ १३० तत्र तुर्यपक्तिस्थ २३५ ऐक्ये ३६५; एव पञ्चमीपक्ति पूरणीया । द्वयोद्विगुणत्वे ४, त्रिकस्य त्रिगुणत्वे ६, चतुष्कस्य पञ्चगुणत्वे २०, पञ्चाना अष्टगुणत्वे ४०, अयोदशाना षड्गुणत्वे ७८, सप्ताना २१ गुणे १४७, अष्टाना ३४ गुणे २७२, नवाना ५५ गुणने ४६५ इति षष्ठी पक्ति । प्रथमद्वितीय- पक्तिभ्या निष्पन्ना। चतुर्थीपक्तिस्तृतीयपक्तिसमा पर पूर्णाघ एक, तत २॥ ५॥१०॥२०॥३८॥ ७१।१३०। अथ तृतीयपक्तिस्थ १३० तस्याघ तुर्यपड क्तौ २३५ । वृत्त प्रभेदो मात्रा च, वर्ण लघुगुरू तथा। एते पट् पवितत. पूर्ण-प्रस्तारस्य विभान्ति वै [ ॥ ८५ ।। ] अत एव लघूना वर्णाना सख्यावाः पञ्चम्या पड क्तौ न्यस्ता । गुरव पष्ठयाम् । वर्णमकंटया लघुन्यास पष्ठपक्तो, गुरुन्यास पञ्चमपङ वतौ वर्णेषु गुर्वादित्वात् । मात्रामकंट्या लघुसख्या पञ्चम्या युक्ता लघ्वादित्वात् । तथापि अप्टमकोष्ठे २३५ भरण, अनुक्तमपि ।।१०।२०।३८७१।१३० एपा ऐक्ये २७६, तत्र ४० होनकरण, न्यासे ५ अङ्कादुपरि तिर्यक् १५ ततोप्युपरि पड क्तो तिर्थक्कोशे ४० सद्भावात् । एव शेप २३६ ततोऽपि सप्तमकोशभरणवत् एकोनले २३५ लघवो नवकलच्छन्दसि ।
३६६ ] वृत्तमौक्तिक-दुर्गमबोध ४ ८ अत्र उद्दिष्टादिवत् सर्वे प्रत्ययाः चतुर्विशति याः। प्रस्तार १, नष्ट २, उद्दिष्ट ३, लगक्रिया ४, संख्या ५, अध्वा ६, मेरुः ७, पताका ८, मर्कटो , समपाद १०, अर्धसमपाद ११, विपमपादता १२ । एते वर्णमात्राभ्यां चतुर्विंशतिः । कौतुकहेतु:-- वृत्तभेदाः वृत्तभेदाः १. [एकाक्षरे] १४. [चतुर्दशाक्षरे] १६,३८४ २. [द्वयक्षरे १५. [पञ्चदशाक्षरे] ३२,७६८ ३. [त्र्यक्षरे १६. [पोडशाक्षरे] ६५,५३६ ४. (चतुक्षरे] १७. [सप्तदशाक्षरे] १,३१,०७२ ५. [पञ्चाक्षरे १८. (अष्टादशाक्षरे] २,६२,१४४ ६. [पडक्षरे] १६. एकोनविंशाक्षरे]५,२४,२८८ ७ [सप्ताक्षरे] १२८ २०. [विंशाक्षरे] १०,४८,५७६ ८. [प्रष्टाक्षरे] २५६ २१. [एकविंशाक्षरे] २०,६७,१५२ ६. [नवाक्षरे ५१२ २२. द्वाविंशाक्षरे] ४१,६४,३०४ १०. [दशाक्षरे १,०२४ २३. [प्रयोविंशाक्षरे ८३,८८,६०८ . ११. [एकादशाक्षरे) २,०४८ २४. [चतुविशाक्षरे] १,६७,७७,२१६ १२. [दादशाक्षरे] ४,०६६ २५. [पञ्चविंशाक्षरे]३,३५,५४,४३२ १३. [त्रयोदशाक्षरे] ८,१६२ २६. [पड्विंशाक्षरे] ६,७१,०८,८६४ [वृत्तिकृत्प्रशस्तिः] कोटयस्त्रयोदश-द्वाचत्वारिंशल्लक्षका: नगाः ।- भूः सहस्राणि पड्विंशत्यया सप्तशती पुन. ॥ १ ॥ प्रस्तारपिण्डसंख्येय विधृता वृत्तमौक्तिके। वोधनात् साधनाल्लभ्या येषां नालस्यवश्यता ।।२।। उद्दिष्टादिषु वृत्तमौक्तिकमिति व्याख्यातवान् श्वेतसिक, श्रीमेवाद्विजयास्यवाचकवरः प्रौढ्या तपाम्नायिकः । यत्सम्यग्विवृत्त न वाऽनवगमान्मिथ्यात सज्जन- स्तत्संशोध्य शुभ विधेयमिति मे विज्ञप्तिमुक्तालता ॥३॥ समित्यश्वभू १७५५ वर्षे, प्रोढिरेषाऽभवलिश्रये । भान्वादिविजयाध्यायहेतुतः सिद्धिमाश्रिता ॥४॥ इति श्रीवृत्तमौक्तिकदुर्गमबोध औरस्तु । वाचकपाठकानाम् ।
प्रथम परिशिष्ट टगणादि कला-वृत्तभेद-पारिमापिक शन्द सत १.गिन' ६ माता, भेद १३- २. 115 त ३ .. ' ४.SI.S ५. ।।शेप १. पहि ७.5151 ८. पात' .... सि १०.11511 ११. 1511 भव १२.S.IN धर्म १६.।।।।।।पालि. १ ट४ १.१. ए गणों को पलायें, प्रातार-भेद, नाम तथा पाप प्राइतपैगम, वाणी. भूपण भोर वाग्वल्लभ मे वृत्तमौक्तिको अनुसार ही हैं किन्तु प्राकृतपंगल मै ट ४ र द. ण के स्थान पर ५ प, ध, स. ८ गए नाम भी स्वीकृत हैं । स्वयम्भूछन्द मौर कविदर्पण मे टादि के स्थान पर छ प. प. १.६ मोर पत... क. स्वीकृत है । इन दोनो ग्रयो मे देवल छ पाच, घार पादि बलाविधान ही दिए हैं किन्तु इनके प्रस्तार-भेद, नाम तथा पर्याय की सूची नहीं है। हेमचन्द्रीय छन्दोनुशासन मे प प च स ६ गण और प्रस्तार भेद दिये हैं किन्तु नामादि की सूची नहीं है। २ यापीमूपण और वाग्वल्लम मे हर के स्थान पर शिव है। ३ सूर्य के स्थान पर प्राकृतपंगल मे सूर, वाणीभूषण मे दिनपति, भोर वाग्वल्लभ में दिनेश्वर है। ४. शक्र के स्थान पर वाणीभूषण मे सुरपति पौर वाग्वल्लभ में सुरेश है । ५ कमल के स्थान पर वाणीभूषण भौर वाग्वल्लभ मे सरोज है। ६. धातु के स्थान पर प्राकृतपंगल मे ब्रह्मा मौर वाग्वल्लभ मे धाता है। शालि के स्थान पर प्राकृतपंगल, वाणीभूषण और वाग्वल्लभ में शालिकर है ।
प्रयम परिशिष्ट २. ठगण ५. मात्रा, भेद ८- १. 155 इन्द्रासन, सुनरेन्द्र, मधिप, कुन्जर पर्याय', रदन, मेघ, ऐरावत', तारापति । 5. सूर्य, वीणा, विराट, मगेन्द्र, अमृत, विहग, गड पर्याय', मोहल, पक्ष, भुजंगम', पक्षी ३. ।।15 चाप 5। हीर ।। शेखर ६. 15 कुसुम ७. ।।। पहिगण पापगण सया प्रहरण (पापुष) के विविध नाम पंचकल के वाचक हैं। १. मुजर के पर्यायवाची शब्दों में वृत्तमानितक के मतानुसार गज' शब्द सम्मिलित नहीं है । 'गज' को धतुर्मात्रिक स्वीकार किया है। २. वृत्तजातिसमुच्चय के अनुसार पञ्चमात्रिक । ऐरावत के निम्न पर्याय और स्वीकृत हैं-मुरगज, सुरवारण, सुरहस्तिन् । ३. प्राष्टपंगल के अनुसार पञ्चमात्रिक 155 में गगन, झम्प पोर लम्प तपा वायसम में दन्तावल पयोददन्त भी स्वीकृत हैं। ४ मूर के स्थान पर प्राकृतपंगल, वाणीभूपण और वाग्यल्लम में 'सूर' है। ५. विगट के स्थान पर प्राकृतपंगल मोर वाणीभूषण में विहाल है। १. वृत्तजाप्तिसमुध्धय में गडपर्यायों में निम्न शम्द मौर स्वीकृत हैं--पक्षिनाय. विहगनाप, विहगाधिपति, विहगत, सुपर्ण। ७. प्राकृतपंगल पाणीभूषण और वृत्तमौक्तिक में 'भुजंगम' को ।। पचमात्रिक स्वीकार किया है जबकि वृत्तजातिसमुच्चय में 'मुजगेन्द्र, मोगिन विषधर' को।।। पचमात्रिक माना है। ८. वृत्तमौक्तिवार नै प्रहरण (पायुषों) के विविध नाम पञ्चकन रे पाचक माने हैं. ऐमा मानते हुए भी 'प्रहरण' और 'क्य' को।।। चतुप्पस मे पञ्चशर ॥ पमुणसवाची. 'तोमर' को निमाविप पोर 'माण को।।।। धनुष्यलपाधी पौर एपमात्रिक भी स्वीयर लिया है । वृत्तजातिममुग्धपार नै तोमर, प्रहरण पौरमाए मोपचममवापी हो माना है। साथ ही प्रहरण के नामों की निम्नलिखित तामिरा भी दी है-प्रशनि, मति, मायुम, परम, राम, सुरण, पाप, तोमर, धनुम्. पाहा, प्रासम्म बाण, भालाधन, मुद्गर, रपानु, शमिता ,गर, परागन, शिमीमुख। दृरामातिममुना में पुरोहित, पुरोषस् पोर मन्छिन्' सदों से अनुपम एव परम बापी स्वोर है । यत्त मौषिता, प्राइनगम और पारणीभूगण में इनका कोई भी उस्लेख नहीं है।
३७० ] वृत्तमौक्तिक ३ डगण ४. मात्रा, ५ भेद- . १. ss (गुरुयाम)' कर्ण, सुरतलता गुरुयुगल, कर्णसमान, रसिक, रसलाम, सुमतिलम्बित, मनोहर', लहलहित' २. ।। (गुर्वन्त) परतल, कर', पाणि, कमल, हस्त, प्रहरण, भुजदण्ड, बाहु, रल, बच गगाभरण, भुजाभरण ।। (गुरुमध्य) पयोधर, भूपति, नायक, गजपति, नरेन्द्र, कुच वाचक शव, गोपाल, रज्जु, पवन ।। (प्रादिगुरु) पसुचरण, दहन, पितामह, तात, पद-पर्याय, गण्ड, बलभद्र, जङ्घायुगल, रति ।।।। (सर्वलघु) विप्र, द्विज, जाति, शिखर, पचशर, बाण, द्विजवर तथा गज, रथ, तुरगम और पदाति ये सब चतुष्कल के वाचक हैं । १ चतुर्मात्रिक 5 5 के और ।।।। के पर्याय वाणीभूषण में प्राप्त नही है । २. मनोहर के स्थान पर प्राकृनपैगल मे 'मनहरण' है । ३ प्राकृतपैगल मे 55 चतुर्मात्रिक मे सुवर्ण अधिक है। ४. 'करपल्लव' को भी ।। चतुर्मात्रिक, वृत्तजातिसमुच्चयकार ने माना है । वाग्वल्लभ- कार ने अलकृति भी स्वीकार किया है । ५ वृत्तजातिसमुच्चय मे पयोधर के वाची 'स्तन, स्तनभार' भी स्वीकृत है, जब कि स्तनादि का प्रयोग वृत्तमौक्तिककार ने कुचवाची शब्दो मे किया है । वाग्वल्लभ मे पयोघृत्, पयोद, जलद, जलघर, वारिद भी स्वीकृत हैं। ६ भूपति के पर्यायो मे वृत्तजातिसमुच्चय मे नराधिप, पार्थिव, भूमिनाथ, राजन् पोर सामन्त भी स्वीकृत है। प्राकृतपंगल मे नरपति, उद्गतनायक अधिक है। वाणी- भूपण मे मनुजपति अधिक है । प्रा.पं. और वाणीभूषण मे अश्वपति और चक्रवर्ती अधिक है, जब कि प्रा., वृत्तजातिसमुच्चय और वाणीभूषण द्वारा समर्थित वसु- धाधिप अधिक है । वाग्वल्लभ मे मनुजपति, चक्राधीश, तुरगपति और वर्ष अधिक हैं । ७ प्राकृतपंगल मे चतुर्मात्रिक ।। मे नूपुर भी स्वीकृत है; जव कि प्राकृतपंगल, वृत्त. मौक्तिकादि मे द्विमात्रिक 5 मे स्वीकृत एव प्रयुक्त है। वाग्वल्लभ मे दहन, बलभद्र, जङ्घायुगल और रति शब्द है एव पिता. हलायुध और पावक अधिक है । ८ वृत्तजातिसमुच्चय मे चतुष्कलवाची गजादि के निम्नपर्याय स्वीकृत है-करि, कुजर, गज, मातग, वारण, वारणेन्द्र, हस्तिन् सुरग, हरि, योष, स्यन्दन । जव कि वृत्त. मौक्तिककार ने गजातिरिक्त कुञ्जर पर्यायो को । पचमात्रिक स्वीकार किया है ।
प्रयम परिशिष्ट [ ३७१ IS ४. ढगण ३ माना भेद, ३- ध्वज', चिह्न, चिर, चिरालय, तोमर, पत्र, चूतमाला', रस, बास, पवन, वलय, तुम्बुरु, २. 1 करताल, पटह', ताल सुरपति मानन्द, तूयं निर्वाण सागर' ।।। भाव', रस, ताण्डव और भामिनी के पर्यायवाची शब्द ५ गण २ माया, भेद २- 5 नूपुर, रसना, चामर, फणि, मुग्धाभरण कनक, कुण्डल, चक्र, मानस, वलय, करण, हारावती, ताटक, हार, केयूर' २. ।। सुप्रिय, परम एक लघु के नाम निम्न प्रकार हैं- शर, मेष, दण्ड, कनक, शब्द, रूप, रस, गग्ध, काहल, पुष्प, शख, तथा वाण १. वृत्तजाति समुच्चय मे। 5 विकलवाची निम्न शब्द और अधिक हैं- बदलिका, बज- पट, ध्वजपताका, ध्वजाग्र, पताका, वंजयन्ती । वाग्वल्लभ मै पटच्छदन अधिक है। २ वाणीभूषण मे चूतमाला के स्थान पर चूडमाला है। वाग्वल्लभ मे चूतभवा, सा, भाम्रमाला है। ३. वृत्तमौक्तिककार मै तूर्य और पटह को । विकलवाची माना है, जब कि वृत्तजाति. समुच्चयकार ने तूयं मोर पटह को।।। त्रिक्लवाची माना है । ४ प्राकृतपंगल मे 'छन्द' त्रिक्लयाची अधिक है। वाग्वल्लभकार ने ससा, भय, माय' अधिक स्वीकार किये हैं मोर सुरपति के स्थान पर स्व पति तथा प्रानन्द के स्थान पर नन्द पर्याय स्वीकार किये हैं। ५. वृत्तमौक्तिक मे भाव पौर रस ।।। त्रिकसवाची स्वीकृत हैं, और रस । एककल- पाची भी। जब कि इसमातिसमुच्चय मे ।। भाव और रस ।। द्विमातिर स्वीकृत हैं । वाग्वल्लम में ।।। मे कुलभाविनी भी स्वीकृत है। ६. वृतजातिसमुच्चय ये 5 दिमात्रिक मे निम्न राद भी स्वीकृत हैं-कटक, पपराग, भूषण, मणि, मरक्त, मुक्ता, मौक्तिर, रल, विभूषण, हारमसा । वाणीभूपण में 'मञ्जरी' भी स्वीकृत है। वाग्वल्लभ मे मनुद, मन्त्रीर. कटक भी स्वीकृत हैं। ७ प्रातपंगल मे सप्रिय, परम के स्थान पर नित्रप्रिय, परमप्रिय हैं। 1. मधुवाधक । राम्दों में प्राकृतपंगत मे 'सवा' मोर वाणीभूपण एक वादल्लभ में स्पर्श भी स्वीर है।
३७२] वृत्तमौक्तिक इस पद्धति से मगणादि गणों के पर्याय निम्नलिखित होते हैं-- १.मगण- २. यगण- इन्द्रासन, सुनरेन्द्र, अधिप, पुजरपर्याय, रदन, मेघ, ऐरावत, तारापति । ३. रगण - सूर्य, वीणा, विराट्, मृगेन्द्र, ममत, विहग, गरुड-पर्याय, जोहल, यक्ष, भुजंगम। ४. सगण-करतल, कर, पाणि, कमल, हस्त, प्रहरण, भुजदण्ड, बाहु, रत्न, यय, गजाभरण, भुजामरण ५. तगण-हीर। ६. जगण- पयोधर, भूपति, नायक, गजपति, नरेन्द्र, कुच वाचक शब्द, गोपाल, रस्जु, पवन ७. भगण-वसुचरण, दहन, पितामह, तात, पद-पर्याय, गण्ड, बलभद्र, जंघा- युगल, ८. नगण-भाव, रस. ताण्डव और भाभिनी के पर्यायवाची शब्द । रति।
द्वितीय परिशिष्ट (क) मात्रिक-छन्दों का प्रकारानुक्रम हत्तनाम पृष्ठ संख्या वृत्तनाम पृष्ठ सख्या प्र २३ " अतिमुल्लनम् (टि.) अन्धः अनुहरिगीतम् (दि.) अरिल्ला अहिवर. २१ ४० २७ कनकम् कमलाकर. कमलम् (रोला) (पट्पद कम्पिनी करतल करतलम् करभ.. १७ भाभीर ३६ करभी (रड्डा) इ इन्दुः (रोला) इन्दुः (षट्पद) उ ६ उत्तेजा. २१ ५५ उद्गलितकम् उद्गाया कर्ण.. कलरद्राणी कलश. कान्ति. कामकला काली काव्यम् कोति.. पुनरः कुण्डलिका कुन्दः (रोला) पुग्दः (पदपद) उहभ.. २१ H २३ उन्दुर: उपभुल्लणम् (टि.) उल्लालम् ऋ २० २३ हादि ६ क पुर पुसुमारर. कच्छप.. रण्ठ २४ २३ २१ चिहित चन्द गापा, सन्या, दोहा, रोसा, रसिया राय पोर पटपर र भेद हैं। (12)-टिप्पणी मे उदत छन्द ।
३७४] वृत्तमौक्तिक वृत्तनाम पृष्ठ सध्या पृष्ठ संख्या . २३ वृत्तनाम घादसेना (रडा) घूर्णा चुलिमाला घोबोला चौपया कोपिल (रोला) (पट्पद) क्षमा क्षीरम ६ ६ २८ छाया स्वजा खर ज २३ २३ जनहरणम् म १२ २४ ३२ गगनम् (स्कन्धक) (पट्पद)- गगनाङ्गणम् गण्ड . . भुल्लण (टि) भुल्लणा Ice गणेश १७ तालकिनी (रड्डा) तालाङ्क (स्कन्धक) ताताडू (रोला) १२ २३ गन्धानकम् गम्भीरा गरुड गलितकम् गाया ग्राहिनी " २१ २३ " ६ (षट्पद) तालाङ्का तुरा त्रिकला त्रिभङ्गी (टि) २१ " गाहू ४२ ग्रीष्म गौरी ६ दण्ड २१ दण्डकला घत्ता घत्तानन्द घनाक्षरम ४६ दम्भ दर्प दाता दिवस दीप २१ २१ २३ २१ ૨૪ च चकी चन्दनम दोपकम् दुर्मिलका चमर ४२ चल द्वितीय परिशिष्ट [ ३७५ पृष्ठ संख्या वृत्तनाम पृष्ठ सस्या वृत्तनाम देही दोहा धतिप्टम् द्विपदी बिडाल बुद्धि (माया) (षट्पद)" E .. पहनर. ब्रह्मा २३ २३ १२ घ भ २३ ६ २३ भद्र धवल धात्री प्रव १२ भद्रा (रड्डा) १२ न भूपाल भूपपलितकम् नगरम १२ १२ २६ भ्रमर (दोहा) (काव्य) (पटपद) " २१ . " नन्दा (रडा) नर (दोहा) (स्कन्या) (पट्पद) नवरङ्ग नील १२ २४ भ्रामर " म १२ मण्डूक मत्स्य (दोहा) (पटपद) प . २३ २३ २७ मदकर परझटिका पद्मावती पयोधर (बोहा) (षट्पद) परिधर्म २१ २. परिवृत्तहीरकम् (टि) पादावुलम् प्लवङ्गम मदक्त (सन्यक) (दोहा) मदन (स्मन्धक) (काव्य) (पटपद मदनगृहम् मदिरा रावया मधुभार मन्द्रहरिगीतम् (दि) २३ " प्रतिपक्ष मयान मनोहर २४ बलि यसो २३ २१ २१ मनोरएरिणीतम ३७६ ] वृत्तमौषितक www वृत्तनाम पृष्ठ सस्या वृत्तनाम पृष्ठ सख्या राम रामा रुचिरा ६ ३७ " १४ मरहठ्ठा गराल (दोहा (काव्य) मकंटः (दोहा) (काव्य) (पदपद) मल्लिका सवया मल्ली सयया महामाया महाराष्ट्र रेखा रोला २३ ४६ ४६ लक्ष्मी ६ ६ २१ ४४ प्रपर.. " ६ मागधी सवया माधवी सवया लघुहरिगीतम् (टि.) लघु होरकम् (दि.) ললঃ लम्बितागलितकमपरम् ललितारालितकम् लीलावती ४८ ५४ मानस २३ ३६ मानी E व मालती सवया ४७ माला ३४ १२ २१ २१ ५५ वरुण.. वलित वलिताडू वसन्त मालारालितकम् मुखलितकम् मुधिमालागलितकम् २४ वानर मेध मेघकर १४ १२ चारण. (स्कन्धक " (षट्पद मेरु २३ E मोह मोहिनी (रड्डा) र पासिता विक्षिप्तागलितकम् विगलितकम् विगाया विजय. (काव्य) (पटपद) विद्या বলন २३ २६ २४ . . २३ रत्नम रसिका (टि) राजसेना (रड्डा) राजा विधि विमति ५२ विलम्बितगलितकम् विश्वा & द्वितीय परिशिष्ट [ ३७७ वृत्तनाम पृष्ठ संख्या वृत्तनाम पृष्ठ संख्या . श्येन.. श्या विपमितागतितकम् वीर.. वंताल.. व्याघ्रः २३ १४ प पट्पदम् स दशमल २४ २४ शब्द.. ५२ ५३ ५२ " २१ १२ सङ्गलितकम् अपरम् समगलितकम् समगलितकमपरम समर (काव्य) (पटपद) सरित सर्प.. सहस्रनेत्र.. " शम्भुः (रोला) (काव्य) शरः (स्कन्धक) (पट्पद) शरभः (दोहा) (स्कन्धक) (काव्य) शारभः (पट्पद " १२ " १४ २१ . सहस्राक्ष घाल्या सारंग (स्कन्धक) (पट्पद) " शाशी (स्कायक) (पटपद) सारस . २३ २३ शारद ६ पालः (दोहा) (पदपद) शिसा २३ ३४ १२ १२ २१ २३ " शियम सारसी सिद्धि (गाया) (पट्पद) सिंह (काव्य) (पटपर) सिविलोक्ति सिहिनी सिंही (टि.) मुभुल्लन (दि.) गुन्दरगतितरम् शुद्ध गुनक १२ १० सुमधुर १२ २४ .. गुगर दोखर (स्कन्धक) (पटपद) दोपः (रोला) (स्वयक (भाग्य) (पटपर) शोभा " १२ २१ गुरम् (दि.) गर्य (वाम्य) " २१ २३ ६ सोरठा ३७६] वृत्तमौक्तिक वृत्तनाम पृष्ठ सस्या वृत्तनाम पृष्ठ संख्या स्कन्ध. २१ १२ स्कन्धकम् स्निाय. स्नेह ४१ २१ हरिगीता हरिगीता अपरा हरिणः हरिणी हाकलि हीरम् (पट्पद ६ ३५ ह २३ ४३ " हरिः हरिणीतम् हरिगीतकम् (दि.) हंसी (गाथा) (रसिका) . " (ख) वणिक-छन्दों का अकारानुक्रम संकेत- () वृत्तमौक्तिक मे दिया हुआ नाम-भेद, प्र=प्रदं सम छन्द, द=दण्डक छन्द, प्र=प्रकोएंक छन्द, वि-विपमहत्त, वंतालीय वृत्त, टिटिप्पणी मे उद्धृत छन्द । वृत्तनाम पृष्ठ सस्या वृत्तनाम पृष्ठ संख्या इ १३४ Co प्रचलति. (गिरिवरधति) अच्युतम् अदितनया (अश्वललितम्) अनङ्गशेखरः (२.) अनवधिगुणगणम् अनुकूला इन्द्रवत्रा इन्द्रवंशा इन्दुमा (टि.) इन्दुवदनम् (इन्दुवदना) इन्दुववना (इन्दुपदनम्) १५६ उ " १६४ १८६ १२८ १६६ १७७ अपरयत्नम् (म.) अपराजिता अपरान्तिका (4.) अपवाह अमृतगति ममतयारा (टि.वि.) प्रर्णादय (द.) अलि (प्रिया) प्रशोर कुसुममन्जरी (६.) प्रश्पतसितम् (अद्वितनपा) असम्यापा महिपति उडुगणम् उसरान्तिका (4) उत्पलिनी (घन्द्रिका) उत्सव उग्रता (वि.) उद्गताभेदः (दि.) उदीच्यपति (.) उपचित्रम् (प.) उपजाति. उपमेया (टि.) उपवनामुमम् उपस्थितप्रपितम् (टि. वि.) उपेन्द्रवाया १०६ १२७ १६२ १६२ १६८ १८६ १८५ १२७ १५६ १४९ १६५ ११० ८. मात्यानिरी (टि. भद्रा) मापातमिरा (पं.) प्रापोर. (विद्यापर:) मापो (टि.वि.) मार्श (टि.) मुक्षि (दि.) अपभगरिसरितम् (गन्तुरगविल. सितम्) ए एता १२१ ८६ ११५ ८१ ३८२ ] वृत्तमौक्तिक-द्वितीय परिशिष्ट (प.) वृत्त नाम पृष्ठ सख्या वृत्त नाम पृष्ठ सख्या प्रत्यापीड दि. (वि.) भुजगशिशुसृता (भुजगशिशुभता) ७२ भुजङ्गप्रयातम् भुजङ्गविज़म्भितम १७७ भुजङ्गयिजम्भितस्य चत्वारो भेदा (प्र.) १०६ ७२ १४८ भुजङ्गसङ्गता भ्रमरपदम् भ्रमरयिलसिता भ्रमरावलिका (भ्रमरावली) १०३ १२२ १६८ प्रबोधिता (मजुभाषिणी) प्रभा (मन्दाकिनी) (प्रमुदितवदना) प्रमाणिका प्रमिताक्षरा प्रमुदितवदना (प्रभा) प्रवरललितम् प्रवृत्तकम (4.) प्रहरणकलिका प्रहषिणी प्राच्यत्ति (व.) प्रियम्बदा प्रिया प्रिया (अलि ) प्रेमा टि. म १०७ टि. (वि.) १०१ ५६ ६२ १२७ ८१ मञ्जरी १६५ मजोरा मजुभाषिणी (सुन दिनी प्रबोधिता) १०६ मजुला (नाराच) मणिगणम " " ७२ ८७ १८६ फुल्लदाम ब बकुलम बन्धु (दोधकम) ब्रह्मरूपकम् (राम) ब्रह्मानन्द घाला दि बिम्बम बुद्धि टि भ ७६ १२८ १६० मणिगुणनिकर (शरभम्) मणिमध्यम मणिमाला मतङ्गवाहिनी मत्समयूरम् (माया) मत्तमातङ्ग (द) मत्ता मताक्रीडम मदनललिता मदलेखा मदालसम् मदिरा मधु मधुमती मन्यानम् (मथाना) मन्दर मन्द्र कम् भद्रकम ६६ ૬૪ भद्रविराट (प्र.) भद्रा टि. (पाल्यानिकी) भाराकान्ता भाव (वि) १४१ धणिक पदों का प्रकारानुक्रम [ ३८३ वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या मदहासा टि १३८ ६४ मन्दाक्निी (प्रभा) मन्दावान्ता मनोरमम (मनोरमा) मनोहस मल्लिका ६८ रतास्यानिकी (टि.) रयोद्धता रमण रमणा (टि) राम (ब्रह्मस्पाम) रामा (टि) रामानन्द दरमवती (चम्पकमाला) हचिरा ६४ १२८ . १७० १७२ मल्ली महालक्ष्मिका मही मागधी माणवरकोडितकम माधवी .. ५८ १७८ ६६ १३४ ८१ १०४ ७३ माया दि हपामाला रुपवती (चम्पकमाला) ल सदमी सदमीधरम् (स्रग्विणो) सता सलना ललितम् (मलना) ललितम् (वि) माया (मरामयूरम) माला टि मालती मालती (मुमालतिका) (पमुना) ८८ १६ १६३ १३६ १२० १६२ मालावती (मालायर ) मालिनी भूगेद्र मोमुखम् मृदुलपुमुमम् मेषविरमिता मोटनवम् मोदरम् मौषितरदाम १५३ १४३ ६० ससितगति सलिता (मुसलिता) सवली टि (वि) सोलाखेल (सारगिवर) सीसाचन्द्र सोलापष्टम सोला य पात्रम् (वि) वर्षमानम मि (वि) बसन्नधत्वरम् पसरततिरा पामती () ६. प ३ यमुना (माती) योगानगर ३८० । वृत्तमौक्तिर वृत्तनाम पृष्ठ संख्या वृत्तनाम पृष्ठ सख्या औ भौपच्छन्दसक (पं.) क गण्डका (गण्डक, चित्रवृत्तम् वृत्तम्) गडदतम् सिरियरपति (अचलपति ) गीतिका गोपाल गोविन्दानन्द १५६ ७३ कनकयलयम् कन्दम् कन्या (तो) कमतम् . १७६ ११० १५४ १०२ १७४ १७३ ८१ कमलदलम् फरहञ्चि कलहस (सिंहनाद , कुटजम् } क्षमा काम कामदत्ता कामानन्द किरीटम् क्रीडाचन्द्र कौति (टि.) कुटज (कलहस) कुमारललिता कुमारी (दि.) कुसुमतति कुसुमविचिना कुसुमस्तबक (द.) कुसुमितलता केतुमती (प्र.) केसरम् कोकिलकम् कौञ्चपदा चउरसा (चतुरसम्) चक्रम् चकिता १३२ चञ्चला (चित्रसङ्गम्) चण्डलेखा (चन्द्रलेखा) चण्डवृष्टिप्रपातः (द.) चण्डिका (सेनिका) चण्डी १०८ चतुरसम् (चउरसा) चन्द्रम् (चन्द्रमाला) १५१ चन्द्रलेखम् (चन्द्रलेखा) चन्द्रलेखा (चण्डलेखा) १२५ चन्द्रवर्ती ६१ चन्द्रिका (उत्पलिनी) १०६ चम्पकमाला (रुक्मवती, रूपवती) ७३ वर्चरी १४४ चामरम् (तूणकम्) १२१ चारुहासिनी (4.) चित्रवृतम् (गण्डका) चित्रम् (चित्रा) १२६ चित्रपदा चित्रसगम् (चञ्चला) चित्रलेखा १४८ चित्रा (चित्रम्) ६८ १५६ १४६ १२६ १४० १७५ ग गजतुरगविलसितम् (ऋषभगज- विलसितम) १३२ छाया वणिक छन्दों का प्रकारानुकम वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ सस्या ज जलदम् जलपरमाला जलोद्धतगति ६६ १०० जाया दि. ८१ १७३ तन्वी तनुमध्या तरलनयनम् १०३ १७४ १६७ तरवरम त्वरितगतिः ७४ ६६ १०६ तामरसम् तारकम ताली (नारी) तिलका तीर्णा (कन्या) ६८ १२२ न नगाणिका नन्दनम् नईटकम् (कोकिलकम्) नराचम् (पञ्चचामरम) १२६ नरेन्द्र नलिनम् (4.) मलिनमपरम् (वे.) १६७ नवमालिनी १०३ नागानन्द १५० नान्दोमुखी नाराच (मञ्जुला) १४७ नारी (तालो) निरुपमतिलकम् निशिपालकम् १२४ नीलम् १२९ प पडायसी पञ्चचामरम् (नराचम्) पञ्चालम् ६० पथ्यापकत्रम् (वि. १६४ पदचतुरुभ्यम् टि. (वि.) १६५ पपकम १४२ पातिका प्लवङ्गभङ्गमङ्गलम् पाइन्तम् (पाइन्ता) पिपीदिशा टि. (प्र.) पिपीडियाररभ टि. (प्र.) १८१ पिपीटिकापणय टि. (प्र) पिपीडियामाला टि. (प्र.) १८२ पुप्टिदा टि. पुष्पिताणा (प.) १८८ पृथ्यो १८४,१८५ सूणकम् (चामरम) तोटकम तोमरम द दक्षिणान्तिका (4.) दामुपदरम् दिव्यानन्द तपिम्मितम दुमिलश द्वितीयविभङ्गी (प्र.) बोपरम् (धन्यु) घ पपलम् (पपला) पारी १७२ १८२ प्रचितक (द.)
३८४] वृत्तमौक्तिक - द्वितीय परिशिष्ट (स.) हत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या १२३ शशिकला (धरभम्) शशी शार्दूलललितम् मार्दूलविक्रीडितम् वाला टि. ७७ ७८ 55 १८३ धाणिनी याणी (टि.) यातोर्मी दाराहा वासन्तिका (टि.) पासन्ती विज्जोहा (विमोहम) ६४ विद्याधरः (मापीरः) विद्यानन्दः विद्यमाला ६७ विपरीतास्यानिकी टि. (हंसी) ८२ विपिनतिलकम् १२५ बिमलगतिः विमला विमोहम् (विज्जोहा) ६४ वृत्तम् (गण्डका) वेगवती (अ.) १८६ यतावलीयम् (4) बंदी ११७ बंधात्री (दि.) वरासिकी (दि.) वैश्वदेवी ६७ यशपत्रपतितम् (वशपत्रपतिता, वंश- घदनम) १३४ वास्थविला (वशस्थविलम्, वंशस्त- नितम्) ६३ यशस्थविलेन्द्रवशोपजातिः शालिनी शालिनी-पातोम्युपिनातिः शालूरः (प्र.) शिखरम् शिखरिणी शिशिरा टि. दशी सीलातुरा टि. शुद्धविराट्वृषभः टि. (वि.) शुभम् शेषा बालशिखा शोभा १३३ १५७ श्र श्रीः श्रेणी १६१ पदपदावली (प्र.) स १६० शङ्खचूडा टि. ६४ समानिका सम्मोहा सर्वतोभद्रः (द.) राधरा सरसी (सुरतरु., सिद्धकम) सारम् सारङ्गम् (सारङ्गिका) सारङ्गकम् सारङ्गिका (सारङ्गम्) १६२ शवनारी (सोमराजी) शम्भुः शरभम् (शशिकला) शरभी शंशावलितम् ७० १२३ ८६ ७. १५८ वणिक छन्दों का प्रकारानुक्रम [ ३५५ वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या १२० सारङ्गिका (लीलाखेलः) सारवती सिद्धकम् (सरसी) सिंहनादः (कलहंसः) सिंहास्यः सुकेशी सुकेसरम् ७६ ७६ सुवदना सुवासकम् सुषमा सेनिका (चण्डिका) सेनिका सोमराजी (शासनारी) सौरभम् (वि.) सौरभेयो टि. सयुतम् (सयुता) स्रम् (शरभम्) स्रग्विणी (लक्ष्मीधरम्) स्वागता १६२ सुच तिः ११२ १६८ ७३ १२३ ८६ ८४ " १६० १०६ ७ ho सुन्दरिका सुन्दरी (प्र.) मुनन्दिनी (मञ्जुभाषिणी) सुभद्रिका सुमालतिका (मालतो) सुमुखी सुरतर (सरसी) सुरसा मुललितम् १८६ हरिणप्लुता (प्र.) हरिणी हारिणी हारी १४० १६२ १५४ ७२ १४६ मुललिता (ललिता) हंसी हसी टि. (विपरीताख्यानिका) ܐܘܐ (ग.) विरुदावली छन्दों का अकारानुक्रम वृत्त नाम पृष्ठ सध्या पत्त नाम पृष्ठसंख्या श्र २१३ २६२ २२१ प्रक्षमयीकलिका अच्युतं चण्डवृत्तम् अपराजितं चण्डवृत्तम् अरुणाम्भोरुहञ्चण्डवृतम् मस्खलितन्चण्डवृत्तम् विगता निभनी कलिका विभगी फलिका द दण्डकत्रिभनी कलिका द्विगा कलिका द्विपादिका युग्मभंगा कलिका द्विभङ्गी कलिका २४२ २३२ २५५ २११ इग्दीवरं पण्डवृत्तम् २४० न उ नर्तकत्रिभङ्गी कलिका उत्पलं चण्डवृत्तम् २२८ नर्तनं दण्डवृत्तम् क नादिकलिका २३१ २१२ प कन्दलश्चण्डवृत्तम् कल्पद्रुमरचण्डवृतम् कुन्दञ्चण्डवृत्तम् कुसुमञ्चण्डवृत्तम् २३५ २३० २४७ २५३ परहं चण्डवृत्तम् पद्यविभङ्गो कलिका पल्लवितं चण्डवृत्तम् पाण्डूत्पलञ्चण्डवृत्तम् पुरुषोत्तमश्चण्डवृत्तम् २२० प्रगल्भा द्विपादिका द्विभंगी कलिका २१६ ग २३६ गलादिकलिका गुच्छकञ्चण्डवृतम् गुणरतिश्चण्डवृत्तम् २१२ २५२ २२६ २४३ २६० घण्डवृत्तम् साधारणम् चम्पकञ्चण्डवृत्तम् फुल्साम्बुजञ्चण्डवृत्तम् व बकुलभासुरम् बकुलमङ्गलम् २४॥ २४३ भ भुजङ्गा त्रिभङ्गी कलिका २१४ तरत्समस्तं चण्डवृत्तम् तरुणी द्विपादिका द्विभंगी कलिका २१८ तामरसं खण्डावली २६८ तिलकं चपडवृत्तम् २२० तुरगश्चण्डवृत्तम् तुरगत्रिभङ्गी कलिका २१५ मजरी खण्डावली मजया कोरकश्चण्डवृत्तम् २७० २५१ विरुदावली छन्दों का प्रकारानुक्रम [३८७ वृत्त नाम् पृष्ठ सख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या मध्या कलिका २१२ मध्या द्विपादिका द्विभङ्गो कलिका २१७ मधुरा द्विपादिका द्विभङ्गी कलिका २१८ मातङ्गखेलित चण्डवृत्तम् ૨૨૬ मादिकलिका २१२ मिथकलिका २१२ मिश्रकलिका २५८ मुग्धा द्विपादिका द्विभनी कलिका २१६ विदाय त्रिभनी कलिका विदग्प त्रिभनी कलिका सम्पूर्णा २५६ धीरश्चण्डवृत्तम् (धीरभद्रम्) २२५ घीरभद्र चण्डवृत्तम् (पोर) २२५ २३२ वेष्टन चण्डवृत्तम् २२६ शशावरचण्डवृत्तम् शिथिला द्विपादिका विभगी कलिका रणरचण्डवृत्तम् (समग्रम्) रादिकलिका २२४ २११ २२४ रामन (रण) समप्र घडवृत्तम् रावलघुकलिका साप्तविभक्तिकी कलिश सितकज प्रवृत्तम् ललिता त्रिगता निभनी कलिका व पजुलञ्चपदवृत्तम् २४६ परतनु-विभङ्गी कलिका २१५ पद्धितरचण्डपत्तम् २२२ पहिगता बिगता त्रिभङ्गो कलिका २१५ २१४ ho हरिणप्तुत-निमलो कलिका तृतीय परिशिष्ट (क.) पद्यानुक्रम वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या प्र अय विशाक्षरे अथ पट्पद- अय सप्तदशे २८३ १६ २८२. २७६ २८७ अथातो द्विगुणा २०१,२१६,२७३ २८७ २५५ २०४ २७२ २६ प्रकारादिक्षफारान्त- २६२ प्रका: पूर्व भूता अच्युतस्तु ततः २७ प्रतनुरचित- ८७ प्रत श्रीकालिदास- प्रत्र लघुयुग- अत्र स्युस्तुरगः २६२ अथ खण्डावली २८९ प्रय तत्त्वाक्षरे २८५ प्रय त्रिभङ्गी- २७५ अथ दण्डकल २७४ प्रय द्वितीयखण्डस्य प्रय पंक्त्यर्णके २७८ अथ पञ्चाक्षरे २७६ प्रय पञ्चाधिके अथ पल्लवितं प्रय प्रथमतो २८१,२८३,२८४ अथ भद्रविराट २८६ प्रय भावस्ततो २०६ अथ मन्वक्षरे २८० अथ रड्डाप्रकरण २७४ अथ रठ्यक्षरे २७६ प्रय रुद्राक्षरे २७६ २७६ अथातो व्यापक प्रथात्र विरुदावल्या- प्रथाभिधीयते प्रथाविद्धं चूर्णकं अथास्या लक्षणं प्रयकविंशत्यक्षरे अर्थतयोनिरूप्यन्ते प्रय तस्याः सप्त- प्रयोच्यते विभक्तीना प्रयोगाथा अनगोखरश्चेति अनन्तरं चोपवन- अनन्तरं तु बकुल. अनयोरपि चकत्र अन्ते जगणमवेहि अन्ते यदि गुरु- अन्धोऽलद्धार- अन्यत्र वीरभद्रः अन्यदिदं मुनि- अनुस्वारविसगौ २८५ २७४ २८६ २८३ २८८ २७६ ४० २५ २८६. २१६ २९ भय लघुयुग्म अपरान्त लघु- भय घस्वक्षरे २१ २७७ अमुस्मिन् मे दर्वी पद्यानुक्रम । ३८९ इत्त नाम पृष्ठ सख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या ६२ २७२ १६६ - १५७ १ २८८,२८६ २८८ अमंत्री निरनुप्रासो अपुरुकृता अयुजि पदे नव- अलसाः प्राकृते 'प्रयान्तरं प्रकरण अवान्तरमिदं प्रवेहि जगण प्रश्वानां सस्याका प्रश्वः सत्याता अष्टभिः पटकले प्रसमपदे ..असम्बाधा ततश्च प्रसवर्ण सघणं अस्प पुग्मरचिता महिपतिपिङ्गल- प्रादौ म प्रोक्तं प्रादौ म तदनु प्रादौ म सततं प्रादौ मो यत्र प्रादो मो यन प्रादौ यस्मिन् पत्ते मादौ विदघाना प्रादौ पटवल- यादी पट्पले प्राधाडून तदीयः प्राद्यन्ताशी पद्य- प्राद्यन्ते कृत- मासमास- आद्यवत्त मापातलिका प्रारभ्यासारं वृत मासी पचं पदा- १७७ १०० १६ ५२ १५० १४३ २१२ २५८ ६७ २८० २०७ १६६ १६ २२५ . २७६ २६८ २१ इ २७४ ४ ५ ७ प्रादाय गुरु प्रादायादिगुरु मादिगयुतवेद- मादिगुरुभंगणो प्रादिगुरुपूर मादिगुरुवंगु- प्रादिप सहयाता मादिपवितस्वितं. पाविभवार पादिभारो प्रादिरपान्तः मादिरेवादमा पाधिोपमोमि पारोन्मगन पारोगणराम- मागे तगग. पारी प्रगानुमा प्रारी पिरित १०, २४ २७१ २८६ ७२ इति गाया प्रकरण इति गापाया इति पिगलेन इति प्रकीर्णक- इति भाभिषाः इत्यं सण्डावलीनी दरय विषम दरपदं समक दरपदंसमवृत्तानि इदमेव हि परि रमेवान्यतः इन्द्रासनमय यमेव यदि इयमेव देवयानः इयमेव सप्त. पर यदि नमन. १६१ ६२ ૨૨૪ ७६ ७४,१४१ ३२ १२३, १२७ २८२ २० २८१ ६८ ३६० ] युत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (फ.) वृत्त नाम पृष्ठ सस्या हा नाम पष्ठ सस्या उ एव पचमपक्ति एय माधुर्य- २१६ ४८ ܨܪ; २१७ १६ २ ३ उक्तलक्षण- उक्तानि सषया- उवता मभौ समो उदाहरणमम्जयां उदाहरणमेतासा उदाहरणमेतेषां उदीच्यवृत्ति- उपजातिस्ततः उपेन्द्रवज्रा उभयो खण्डयो- उर्वरितश्च उर्वरितोवरिताना ३ १६८,२८७ २७८ ८१ २८६ कदाचिदद्धसमक कनकतुला- करतालपटर- करपाणिकमल- करयुक्तसुपुष्प- करसङ्गिपुष्प- कर्णद्वन्द्व ताटङ्का- कर्णद्वन्द्व विराजत् कणद्विजवर- कर्णपर्यायिन कर्णा जायन्ते कर्णाभ्यां सुललित- कर्ण कुण्डलयुक्ता कर्ण कृत्वा कनक- १६८ १०६ १२६ ५ १५४ ५ ए ३ ९७ १०७ E ८,२८५ २७६ ६ कर्ण ताटङ्क- १२५ २८६ ६ १४६ एकस्मात्तु कुलीना एकाक्षरादि पड- एकाक्षरे द्वयक्षरे एकाङ्कमयुक्पयते एकादशकल- एकादश प्रकरण एकाधिककोष्ठाना एकीकृत्य तथा एककगुरुवियोगाद एफकस्य गुरो एफकाइस्य एतत्पल्लवित एतत्प्रकरण एतावेवगणो कर्ण विराजि कणों कृत्वा कुण्डल- कणों ताटङ्क कणौ पुष्पद्वितीय- कणों स्वर्णाढयो कर्ण कुण्डल- कणं कृत्वा कनक- कर्ण जकार- ६ १३०१४०,१४८ कणं सुरूप २३२ २८६ २३७ २६ २३ ११८ १५८ कर्ण स्वर्णोज्वल. कर्ण पयोधर- कलय नकार- एते दोषा सम. एव गलितका- एव तु विषम एव निरवधि- कलय नगण F २१ कलय नयुग- कलय नयुगल एव पञ्चपदाना १४६ पद्यानुक्रम [ ३६१ वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ सरया २८० क्वचित्त पद- क्वचिद् रुक्मवती २०१ २७८ ख खण्डावती प्रकरण २८६ ग गगनविघुपति- गगन दारभी गणव्यवस्था- गणोदृवणिका गण्डवंच क्वचित् १२ २७३ २५ २८३ २११ २७४ कुण्डल दधति गद्यपद्यमयी गायोदाहरण गाहिनी स्याद् ३ कलहसस्ततश्च कल्पद्रुमे तजो २३० कलिकाभिस्तु कलिका श्लोक- कारप भ ततो १३३,१३६,१४८,१६५ कारयमत १७३ कारय भम काव्यपट्पदयो २५ कोति सिद्धिर्मानी ६ कुण्डलकलित- कुण्डलवजरज्जु- १४४ कुन्तीपुत्रा यस्मिन् कुन्द करतल- कुरु गन्धयुग्म कुरु चरणे ७६ कुरु नकारमयो कुरु नगण- ६६ कुरु नगण ११० १२६, १३१, १६३ कुरु नगण तत १३६ कुर नगणयुग १०६, १२७ कुर नसगणो १११ ११२ कुरु हस्तसगि कुरु हस्त स्वर्ण- कुर्यात पक्ति- कुमुमरूप- कुसुमसङ्गतकरा कृत्वा पादे नूपुरी ७७ करवंश्य चाहाना कोष्ठानेकाधिकान् कोष्ठान् मात्रा ७ क्रियते यंगण. २६० गुणालङ्कार- गुरुयुग्म किल गुरुलघुकृत- गुरो पूवस्यान्ते गो चेत् कामो प्रन्यान्तरमत २ २८७ २८२ २८६ चकितव यति- पण्डवृष्टिप्रयात चतुरधिका इह चतुभिनंगणं- धतुभिभंगण- चतुर्वर्णप्रभेदेषु चतुर्भिस्तुरंग चतुष्क्तदये- २५३ २४६ ८ २११,२४८ २६० १८८ चतुष्पद भवेद चतु सप्तमको श्यिते सगण धम्पक घण्डवृत्त चम्पक तु तत धरणे प्रथम २४५ २८८ क्वचित्त कलिका.
३६२] पृत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (क.) M उच नाम पृष्ठ सध्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या गणांश्चतुर २७ १२२ २०७ घरणे विनिहि चूर्णकोत्कलिफा- घेद् यातोर्मी धोपैया च तत ५ २७४ चौपया धव छन्द शास्त्रपयो. २६० ज २८७ नकारयुगेन नफारस्त नगणरगण- नलधिनगणमिह नलधिमित चलनिधिकल- जलनिधिकृत जलनिधिपरि जलराशिविरा- नायत हारद्वये ज्ञान भवेदखण्डस्य ११२, ११६ ३४ १२३ १४२ तगण शून्य तत एव हि ते ततम्चन्द्रसमा ततश्च स्यानिरुपम- ततस्चान्त्य भवेद् ततश्चिमा समा- ततस्तदयर ततस्विभङ्गी ततस्त्वयंव ततस्तामरस ततस्तु चद्रलेखा ततस्तु चुलिमाला ततस्तु भुल्लणा ततस्तु नन्दन ततस्तु निशिपाला- ततस्तु पादाकुलक ततस्तु भ्रमरा ततस्तु माधवी ततस्तु मालिनी ततस्तु विरुदावल्या ततस्तु वशस्थविला ततस्तु शरभी ततस्तु सरसी ततस्तु सर्वतोभद्र- ततस्तु सर्वलघुक ततस्तु सुमुखी ततो गिरिधति २८३ २८४ २८५ २८१ २८४ २८७ २८८ २७६ २८० २७४ २७४ २८३ २८१ २७४ २९३ २८५ २८१ २८६ २७६ २८१ २८४ CE २७३ ट टगणडगण- त्रयोदशभेदा टगणमिहादो २०, ३२ ठ ५० ठगणद्वय गणद्वयेन उगणद्वितय २८८ २७८ ड २८२ २८३ २८ २७६ ५० ततो गुणगण ततो गुणरति ततो जलधरमाला ततो जलोद्धतगति- ततो दमनक डगणद्वयन गणमवधेहि डगमविभूष गण कुरु विचित्र ५२ २७F पद्यानुक्रम [ ३६३ हरा नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या तयोरुदाहृति २७३ तस्यास्तु लक्षणं ४ ૨૨૨ २७७ २९४ २८२ २७७ २६० २९५ २८१, २९५ २७७ २७७ २८२ २७८ २७६ २७६ २७६ २७ २०० २७३ २९७ १६७ २१५ ततोऽद्वितनया ततो नहटक ततोऽनुष्टुप् ततोऽपि ललितं ततो भुजङ्गपूर्व ततो मणिगणं ततो मधुमती ततो महालक्ष्मिका ततो मालावती ततोऽमृतगतिः ततो मोट्टनकं ततो रयोद्धता ततो लक्ष्मीघरं ततो ललित- ततो विमलपूर्व ततो वृत्राद्वयस्था ततोऽस्य परिभाषा ततः प्रहर्षिणी ततः प्रिया समा- ततः शम्भु समा. ततः शलशिखा ततः समानिका ततः साधारणमतं ततः स्मरग्रह तन पद्मावती तत्र मात्रावृत्त- तत्र थानामक तत्रवान्तेऽधिके तत्याक्षरकृत- तथा नानापुराणेषु तया प्रकरणं पात्र तदेव पतिभेदेन तद्धि वंदर्भ सनो तु घटितो तयोः फलंच ताटकहार- तालाडुनीति तिलतन्दुलवन् तुङ्गा वृत्तं तत. तुरगंकमुपधाय तुरगो हरिणो तुर्यस्य तु शेष- तृतीये कृतभङ्गा त्यक्त्वा पंचम. नयोदशगुरु. त्रयोदर्शव भेदाना विचतु-पञ्च- त्रिदशकला त्रिभिस्तैस्तु विभिभङ्गस्त्रिभङ्गी निशद्गुरवो शिवर्णा लक्ष्मी ८ २१३ २८१ त्र्यक्षरे चात्र & २७६ २१४ घ्यावृत्ता ममला द २६३ २८२ २७७ २८८ २७५ ૨૭૪ २७३ २७६ १६६ १७४ दहनगणनियम- दहननमिह दहनपितामह- दहनमित दत्त्या पूर्वयुगाङ्कान् दत्त्वोद्दिष्टवद् दद्यात् पूर्व दद्यादथान् पूर्व दिव्यानन्द सर्व. दीर्घवृत्तिकठोरा- ७ २७५ २४ २०७ २६२ २७३ २८४ २०७ दोघः संयुक्तपरः दुस्योमूतमिम २६.
३६४ ] पृत्तमौक्तिफ-तृतीय परिशिष्ट (प.) वृत्त नाम पृष्ठ सत्या हत्त नाम पृष्ठ संख्या १३२ २६६ १०१ धीरवीरादिसंयुद्धघा धेहि ममारं धेहि भकारमर घेहि भगणं प्वजचिह्नचिर- २११ ११७, १२४ १८३ न १२० ७४ ४ ७४ ६७ ७० १३७ ६८, ८७ १५२ ७१, ७२ १८४, २५५ देहि भमिह दोहाचरणचतुष्टयं दोपानिमान- द्वादशार्टफला द्विकलघुदशक- द्विगारादिश्च द्विगुणानडान् द्विजकरवलया. द्विजजातिशिखर- द्विजपरिकलिता द्विजमनुकलय द्विजमिह धारम द्विजरसयुता द्विजवरगण. द्विजवरगणमिह द्विजवरनरेन्द्र- द्विजवरमत्र द्विजयरमिह द्विजवरयुगल- द्विजवरसगणी द्विजविलसिता द्वितीयलस्यान्त्य- द्वितीयषष्ठी द्वितीयाध्य विभङ्गी द्वितीये खण्डके द्वितीयो मधुरः द्वितीयो मधुरो द्वितीयं समपूर्व द्वितुयौं मधुरि- द्विपादिका च द्विलकृति द्विविधं नलिना. १३१ ६८ २६४ १०२, ११० नसमुनिपरिमित- मगण कृता नगणनरेन्द्र- नगणपक्षि- नगणमिह नगणयकार- मगण युग नगणयुगल. नगणयुगला नगणयुगलं नगणसगणा- नगणसगणः नगणे पञ्चभि- नन्दो भद्रः शिवः नमनुकलय नमिह कुरु नयुमं च हस्त- नराचमिति नरेन्द्रजिता नरेन्द्रविराजि नर्त्तनं तु ततः नवजलधिकल- नष्टे पृष्ठे भागः नष्टोद्दिष्टं यद्वन् नसो जनो जलो नागाधीशप्रोक्तं नानाविधानि गद्यानि नाममात्रे पर १६७ २४७ २८६ २८५ २२६ २४५ २७५ १६३ २८२ २७० २८८ ३४ ६ . २५२ २८७ २८७ धारय रौहिणेय- १३२ पद्यानुक्रम [ ३६५ दृत्त नाम पृष्ठ सत्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या २०४ २१० नित्यं प्रावपद- निष्कामतुच्छीकृत- भूपुरमुच्चैः नूपुररसना- नेत्रोक्ताः भाः १८५ ४ ३ प २८९ २०१ २७५ ६१ २७५ पक्षिभासि पक्षिराजद्वय पक्षिराजनगणी पक्षिराजभूपति- पक्षिराजभासिता पक्षिराजमयन पञ्चम तु प्रकरण पञ्चम तु यत्र पञ्चम लघु पञ्चपष्टयधिक पञ्चालश्च मगेन्द्रश्च पदचतुरूवं पददुष्टो भवेत् पदे चेद् रगणः पयोधरविरा- ८५ ४ २६ १६४ १७६ २७६ १६४ पिङ्गले जयदेवश्च पितवरणरिह पुनरेन्द्राधिप- पुष्पिताणा भवेत् पूरयेत् षष्ठ पूर्वखण्डे पडेवात्र पूर्ववदेव हि पूर्वान्तवत् पूर्वाद्ध च पराद्ध पूर्व कयिता पूर्व कर्णत्रितय पूर्व गलितक पूर्व द्वितीयचरणे पूर्व पादे मगणेन पूर्व म स्यात् पुषिधीजल- पृष्ठे वर्णच्छन्दसि प्रकीर्णकप्रकरण प्रतिपक्ष परियमों प्रतिपदमिह प्रतिपाद तदो- प्रथमत इह प्रयमद्वितीय- प्रयमनकार प्रथममिह दशसु प्रथमा करभी प्रपमायामाधान प्रपमेद्वादशमात्रा प्रपमे द्वितीय प्रथमकर प्रथम कलय प्रपम कुछ देगम २५ २६८ २७८ १८२ १०० पयोघरे कुसुमित पयोधर कुण्डल. पयोपरं हार- ६० ३२ २६ २५८ २७६ ७ २८८ ६ पयोनिषिभूपति- परस्पर चेत्तयो पाइन्ता पिङ्गले पात्पल ततश्च पादपुण कुरु पावे द्विस देहि पादे यस्यनुरोपात् पारेयाम प्रोक्ता पादेषु तो पिङ्गसककिपिता २१ प्रथम दशसु प्रथम दिनसहित १६७४२ ४५ ३६६ ] वृत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (क.) वृत्त नाम पृष्ठ सस्या पृत्त नाम पृष्ट संस्था ७३ ८९ प्रथम द्वितीय प्रपम विहि प्रमुक्तिपदना प्रमुदितादूय प्रयोगे प्रायिक प्रयतर्फ पनि- प्रस्तारगतिभेदेन प्रस्तारगत्या धात्र प्रस्तारगत्या चाप्यत्र प्रस्वारगत्याते मस्तारगत्या भेदाः प्रस्तारगस्या विज्ञेया प्रस्तारगत्या सम्प्रोक्ताः प्रस्तारद्वय प्रस्तारस्तु द्विधा प्रस्तारसस्पया प्रस्तारस्यापि प्रस्तार्यशेष- प्राकृते सस्कृते प्रिया तत. समा. प्रोक्त प्रकरण प्लवङ्गभङ्गाच्च १६२ १२३ २८० २८० १६४ १९८ २७७ २७८ २७७ २७६ २७८,२८२ २८० २८१ १६२ २१३ २७८ १२८ भत्रिरायाचित- भद्वितयाधित- भरतादिमुनी भसा तु घटितो भानुसत्यामित- भिन्नचिह्न चतुष्पाद- भुजगत्रिंगते भुजगशिशुसत्ता भुवनविरचित- भूपतिनायक- भूपणोपपदं भृत्यौदासीनाभ्यो भेदा वरपक्षरे भेदाश्चतुर्दश- भेदास्तस्यापि कथिता भेवा सुद्धिभिः भेदा. स्युः भूमि- भेदेष्वेतेषु भेन युक्त तेन भो यदि सुन्दर भ कुरु तदनु भ्रमरभ्रामर- भ्रमरावली पिङ्गले म २७५ ५ २७७ ८१ २७५ २२ २३ २८५ २० ६ २७३ २८१ २७४ २७७ २०६ २८३ १०७ १४ २८१ फुल्लदाम ततश्च २८३ ४ ब ४ बन्यो भ्रमरोऽपि वाणमुनितर्क- बाणे भङ्गश्च विभ्राणा कणों विभ्राणाचलयो २२६ ११४ मगणो ऋद्धिकार्य मगणस्त्रिलघु मञ्जरी चात्र मणिगुणनिकरो मणिगुणनिकरः मतग वाहिनीवृत्त मतला मतला. मताक्री ततः मदिरा मालती मधुराश्लिष्ट- २५१ १२४ २८१ २८२ भ २८४ ४७ मगणाष्टक- भत्रितयप्रविका- पद्यानुक्रम [ ३६७ वृत्त नाम पृष्ठ सस्या वृत्त नाम पृष्ठ सख्या मधुरा मद्वये मधुरो दामो २०१ २८७ २१८ २२० २३४ २७७ १६५ २८२ ५ ४२ यकार:प्रागस्ते यति सर्वत्र- यतीना घटन यत्कलप्रस्तारो यत्र स्वेच्छा यत्राष्टो डाणा यथामतियंपा यथा ययास्मिन् यदा लघुगुरु यदा स्तो यकारी यदि दोहरदलविरति- यदि योगगण- ४ २० १०२, १५० १८८ ३ मपरो युग्म- मन्थान चतत मन्द्रकमेघ हि मन्दाक्रान्ता वा- मकटो लिख्यते मस्त्रिगुरुरादि- मात्राकृता भवे- मात्राप्रस्तार मात्रामेहरय मात्रावृत्तान्यक्त- मानोद्दिष्ट च मात्मर्यमुत्सार्य मायावत्त ततस्तु मालाभिस्यमेव मिरहयेन मित्रारिभ्या मुग्धपूर्वकमेव मुग्घमालागलितक मुम्बादिका तरण्याता मुग्धा प्रगल्भा १८६ २७३ २८६ २८० यदि रसलघु- यदि रसविधा यदि वं लघु- ८६ २६० २ १६१ २७५ २८७ २२६ २१८ २०७ मुग्धाया भये ६ मुम्प मृतसर मुनिपक्षाम्या मुनियाणकला मुनिरन्ध्रसन- मुनिरसवे. यदि स द्वितया- यदि हनदयानन्तर यदीन्द्रवशा यद्दोमण्डलचण्ड- यद्यपि दीर्घ यद्यपामयो पस्मिन् कणों यस्मिन् तकार यस्मिन्नष्टौपाद यस्मिनष्टौ पूर्व यस्मिन्निन्द्रैः सत्याता यस्मिन् पादे दृश्यन्ते यस्मिन् विषमे यस्मिन् वेदानां यस्मिन् वृत विक् यस्मिन वृत्ते पक्ति यस्मिन् वृत्ते रायव यस्मिन् वृत्त द. यस्मिन् वृत्त सावित्राः २८४ १०४ २६० मोदक सुन्दरी २७६ मोहो बली तत. य १६० १२० पकार पूर्वस्मिन् यार रसेनोदित पार सदेही १४५ ३९८ वृत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (क.) इत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या १८८ १०, ११, १२ १६४ १०० १६ ६५ यस्य पावचतु यस्य स्यात् प्रथमः पस्या दितीयचरणे यस्यादि मगण. यस्यामप्टो पूर्व यस्थामादोपद. यस्याश्चतुकल. पस्या शरयुग्म यस्या पादे हारा यस्पा प्रथमतृतीये या चरणे क्लाना याते दिव सुतनये या विशत्यधिक याभ्यां धपत्र पग्मे भङ्गस्तनो युजोश्चतुर्थतो युष्मान् पातु योगः साधी यो नानाविधमात्रा रसजसपिकल. रसपक्षवणं- रसपरिमित- रसवाणयेद- रसभूमिवर्ण- रसमनिरसचन्द्रः रसरन्ध्रखवेदैः रसलोचनमापश्व- रसलोधनसप्ताश्व- रसविधुकलक- रसाग्निपञ्चेषु रसिका हसो रेखा रसेन्दुप्रमिता- राजसेना तु षष्ठी रुद्रसंख्याक्षरे रेफहकार- १४ १५६,१८५ २ ४६ २६० २८० २८५ १८० १४ २८ २८२ २६१ १६३ २५६ १६४ २८१ २६ २७६ २ ल इरिति र ૨ २७२ २६० रगणजगण- १८६ रगणनगण- . १७६ रचयत नगण- १४६ रचय नकार- रचय लगामिह- लक्षणविकलं लक्ष्मीनाथतनूजेन लक्ष्मीनाथसुभट्ट- लक्ष्मीऋद्वितिः लक्ष्यलक्षण- लगौ महीम् सधुगुरुवर्ण लघुः पूर्वमन्ते लीलाखेलमयो लीलाचन्द्रस्ततश्च लोला नान्दोमुखी ३९ रचय नगणं १२५, १४२ ८८ ११८,१७ २८१ २८३ २८१ २७४ रचय नभूपती रचय नयुगल रचय प्रथम पद रडाप्रकरण चंव रन्ध्रसूश्व- राधमुनिभि. रम्यया विरुदावल्या रविकरपशुपति- व ५८ २६७ २७३ चक्र लो च बन्दे घलयदप- वर्णमेदरय ६ पद्यानुक्रम [ ३६६ वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ सख्या २७३ ६४ ३० १८६ १८६१६० २८४ २८४ १७४ वर्णमेश्व पर्णवृत्तसगाना धर्मा दीर्घा यस्मिन् वल्लकी राजते घस्पष्टपरि- धसुवेदखचन्द्र- पसुव्योमरस- सुमित लघु. पसुषट्पवित- पस्वष्टमेश्रुति- पह्न सल्याका मा वाड मस्येव हि पाड मय द्विविध वाणिनोवृत्तमा वानरकच्छौ धारणजङ्गमशरमा विक्षिप्तिकागलितक विजयबलिकर्ण- बिजोहेरपन्यतः विदाधपूर्वा विदग्धपूर्वा सम्पूर्णा विषमपदः विषमे पदेषु विषमे यदि विषमे यदि सौ विषमे रसमात्राः विषमे रससहपकाः विषमेषु पञ्चदश- विषमेषु वेद. विषमे सजो विषमोऽग्निविध विपम चेति विषम शरवियः विहाय प्रथमा घोणाविराट- वृत्तवघोभित वृत्तानुक्रमणी वृत्ते यस्मिन्नष्टो २८३ २६ १६१ २६ १८८ २८ १६१ २८२ २१० वृत्त प्रमेवी २३ २७५ २३ २७७ २५६ २८८ २०७ २८४ विदाये तुरगे ४ २८५ वृत्त भेदो मात्रा वृत्त्यकदेश- वेदग्रहेन्दुवेद- वेदहाणविरचित- घेवपञ्चेषु पति- धेदभकार- वेदपग्मगुरुन् घेदविभावित पेदशास्त्रवसु- घेदयुरयवनी- १२६ १७२ २८५ २८७ বিধিমাল- विहि ज विनिधाप करें विपरीतस्थित- विरचय विप्र विपदावली प्रकरण विदेन सम विषदेनाग्विता विलोकनीया विभडल स्खलताल विषम हपदे विषमधरणेषु घेष्टने सप्तमः २३२ २५८ वेदसुसम्मित. घेर पिपीलिका १८१ २७२ २८७ १८६ २८ वंतासीय प्रकरण वंतालीय प्रपम. धनतेमो यदा २८ ४०० ] पृत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (फ.) वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या का २३ २० २७४ शक प्राम्भु ११ ५ पटपक्वृत्तं कलय पट्पदवृत्त द्वाभ्या षट्पद चतत पट्सप्याता हारा पष्ठभङ्गा षष्ठभङ्गावरतनु- २८० २१४ २१५ २४३ २७७ षष्ठे भङ्गश्च पडक्षरेऽपि पूर्व १३४ ५३ २१ २३१ पडप्टदशमा पोर्चा पडभिरप्यधिक २८५ ७६ १२६ पविशति सप्त- पोडवर्ण पद ८,१८० २५२ स शदासीनाम्या धाब्दरूपरस- शम्भौ सुनन्दिनी शरकल पञ्च- शरपरिमित- হাংরিম্ভ मारवेदमिता शरण कुण्डलेन शारेण नूपरेण शरस्तथा च शरोदितकलो शर हारयुग्म शल्यो नवरङ्ग शाशीति सज्ञका शशीवृत्त- शार्दूलकमकोकिल. शिरो दीव्यद् गङ्गा शुद्धवंतालीयस्य शुभ चेति समा- श्रीचन्द्रशेखरकृते श्रीमरिपङ्गलनागोक्त- श्रीलक्ष्मीनाय भट्टस्य योवृत्तमौक्तिक- शिलष्टसश्लिष्ट- शिलष्ट। सरेफ. लिष्टी तुर्याष्टमी शिलष्टो द्विपञ्चमा २३ १०६ २४ १२ १६६ १७५ २३ ३५ ७३ ७२,११० १६२ २७६ ५६,२९० १ १ २६१ २१९ सखि नवमालिनी सखि यत्र रन्ध्र सगद्विजगण- सगणाष्टक सगणाहिता सगणभंगण- सगण मुदा सगण विधाय सगण विधेहि सजसा लघु सप्तचतुष्कल. सप्तजगणा- सप्तभकार- सप्तर्षिमुनि- सप्तहरय समगलितक समचरण- समपक्तो समुन्द्रिय सम तत्र मया सम्यगसम्पग १७० ४७ २८५ २२० २२८ प ६ २०१ षट्कलविरचित पट्कल प्रथम पत्रिपञ्चमका २३२ ५ पद्यानुक्रम [४०१ वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या २३२ २६६ १६८ ३ ३ ६६ १७६ २८४ २५१ २२१ संश्लिष्टा दोघं- संस्कृत-प्राकृत- सरसफविजना. सरससुरूप- सर्वगुदि- सर्वत्र पञ्चम सर्ववं स्वल्प सर्वशेपे सर्वस्या गाथायाः सन्त्यिं नयतात् सर्वे हाणामरिला सर्वे धर्णा दीर्घा सरङ्गः सम. सलक्षणा सप्रभेदा सलयुगनिगम. सलिलनिधि- सर्वयाय प्रकरण सग्दरिकव सुप्रियपरमो सुरतलता सुरूपं स्वर्णादप सुरुपाढ्यं कर्ण सुसुगन्धपुष्प सूचनीयाः कवि- सोदाहरणमेतावद् सोरट्ठास्य तत्त स्तुतिविधीयते स्फुटतरमेते स्यात् समालतिका स्वरोपस्थापिता स्वर्णगड्सवलय स्वेच्छया तु कला २८० २७ ६७ २७७ २७४ २६. १४६ २७५ सहचरि चेन्नजो ३ १६२ १६७ १७६ २७१ हठात्कृप्टाक्षर. हरतिसूक्षः हरिणानन्तर हरिगीत ततः हलायुधे २७५ १६४ २१६ हसरा. हारद्वय मेद- सहचरिनो यदा सहचर रविहय- सहचरि विकघ. सहस्रण मुखेनतद् सा चेत कवर्ग- सात्विकभावा साधारणमत सितकज तमा सिदिqद्धिः करतत. सिंहावलोकित सुकुमारमतीनां নিমণিমা सुति वियहि ३ २६० २३७ २३ हारट्य स्फुरद हारदपाचित- हारपुष्पसुन्दर हारभूपितषुधा हारमेरम- हारमेहमत्र हारी हरपा स्वर्ण हप्पयोभ्य २७१ १३०, १४१ सुगनु तदति १६३,१७१, १७६ २१६ (ख.) उदाहरण-पद्यानुक्रम वृत्त नाम पृष्ठ सख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या १२६ २२० २४१ २२२ २६२ २२६ २१० २१४ २४२ १२१ १४२ १६० २१७ २१७ १०० १२४,१५५ १९० १६२ १३८ मफुण्ठधार पगण-रिगण प्रच्यत जय जय प्रजजरपतिव्रता प्रणिसविसमरणि (ग.) प्रतिचटुलचन्द्रिका- प्रतिनतदेषा- प्रतिभारतरं अतिरुचिदशनः अतिशयमञ्चति मतिशयमधि- अतिसुरभि- अथ तस्य विवाह- प्रय वासवस्य अथ स विषय- अथ सालताल- अनङ्गवर्जन अनन्तरत्न- (टि.) अनवरतं अनिष्टखण्डन अनुदिनमनुरक्तः अनुपमगुण- मनुपमयमुना- मनुपहतं अनुसूविक्रम अनुलवमूर्खया अनेन नयता अभजद् भयादिय भभिनयजलघर- अभिनयसजल- अभ्याजतोभ्यागत- (टि.) अनमुपतिमद- अमलकमल- अम्बरगतसुर- अम्बाविनिहत अम्बुजकिरण- प्रम्बुजकुटुम्ब- अयममतमरीचि- अयमिह पुरः अयि मानिनि अयि मुञ्च मान- अयि विजहीहि (दि.) अपि सहचरि अरिगणमभि- अरे रे कथय अलमीशपावक- अलिमालित- अवञ्चकमनिन्दितं अवतसितमजु- अवनतमुनिगण प्रवाचकमनू- अविकलतारा- अशुभमपहरतु प्रसितवसन- प्रसुरयम असुलभा शर- अस्त्युत्तरस्यां (दि.) अस्या वक्त्राब्ज- अहिपवलय प्रहृत धनेश्वर- (दि.) प्रा मानन्दकारी २ १५६ ८६ २३४ २३७ ८३ १६७ १६८ २२४ २२५ ७२ ६१ २५० १४० २० उदाहरण-पद्यानुक्रम [४०३ वृत्त नाम पृष्ठ सख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या २३२ एतस्या राजति एवं यया ययो. २०२ २०४ प्रावद्धशुद्ध. प्रालि याहि मजु- प्रालि रासजात. पालोक्य वेदस्य क go कठोरठात्कृति- १२६ कण्ठे राजद् इन्द्राय देवेन्द्र १२८ १८६ इह कलयालि इह खलु विषम इह दुरधिगम. वह हि भवति १७२.१६८ १७१ २४० २६५ ८२ उ उचित पशुपत्य. २२६ २३७ १८२ २०८ २७२ ६६ ६४ उत्तुङ्गोदयशृङ्ग- उत्फुल्लाम्भोज-(टि.) उदञ्चत्कावेरी उदश्चदतिम - उदयदद्ध दिवाकर- उद्गीर्णतारुण्य उद्यद्विद्य च ति- उद्रिक्ततर- उद्वेजयत्यगुलि. (दि.) उद्येलत्कुलजा उन्दितहृदयेन्दु- उन्मीलन्मकर- उम्मीलनील- उपगत बह उपयनमध्या- उपहितपशुपाली- उरसिकृतमाल उरसि विलासिता २५८ ६० २२६ २२५ २३० ८२ २५७ २३५ कति सन्तिम कनकवलय. कन्दपकोदण्ड- कपटरुदितनटद- कपोलकण्डू (टि.) कमनीयवपु कमलमिवचन्द्र (ग.) कमलबदन- कमलाकरलालित. कमलापति कमलेष सलुलि- कमल ललिता. कम्पायमाना कसकाल कसादीनां दाल करकलितरपाल फरपुगधृतवा- करयुगपतवशो कणिकारकृत वर्ण कल्पितरणिक फलकोक्सि- पलवयणितवशिष क्लपरिमल क्लयत हृदये । क्लयति चेतसि स्प दामुपारि लय भाय क्लय सखि कलय हृदये ३२ २२ २०२ १५२ २६४ १२२ २६८ १०२ १०६,११० २५६ ए १२७ एक्स्यरोप- एतस्या मण्यमन्टस- २०२ ४०४ 1 वृत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (प.) वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या कृष्ण प्रणौमि १५८ २१८ केल रङ्गा ७२ १७६ ६३ १४४ केपि पिप्रसश्च कोकिलकलरव. कोकिलाकल- कोमलसुललित- कोष्ठीकृत्य क्वचिच्छन्दस्यास्ते क्षणमात्रमति- क्षणमुपविक्ष क्षितिविजिति- क्षीरनीरविवेक- १४४ १०७ २०५ २०६ १०४ १६१ २२६ ७० २१२ १३२ २११ ख ८२ १३० कलशीगतदधि- कलापिनं निज. कलितललित- कलुषशमन कलुपहर कल्पपादप. कल्पान्तप्रोद्यद् कस्य तनुमनुजस्य काञ्चनाभ- काननारब्ध. कानने भाति फामिनि सुधर्ने कामिनीकलित कालक्रमेणाय (टि.) कालिन्दीकूल कालीन्दीये तट- कालियकुल- काशीक्षेत्र गंगा- कासकैलास- (टि.) किं बूथ रे (टि.) कुकुमपुण्डक कुञ्चिलकेशी कुञ्चितचञ्चल- कुन्ददशन कुन्दसुन्दर- कुपातिभासि कुमारपत्रपिच्छेन कुमुववनीषु कुसुमनिकर- कूजत्कोपष्टि- कूर्मो नित्य मा कूर्मः शमव्यान् कृष्णपदारविन्द कृष्णं फलये चिताखण्डलो (ग.) सजनवर- (टि.) खरकेशिनिषूदन खलिनीडम्बक ३७ २२५ १६४ ग ६७ २२१ ३६ २२७ गजितपरवीर २३१ गतोऽहमवलोकिता (ग.) २०६ गर्गप्रिय जप २५३ गर्जति जलघर १५ गर्वावलिभासुर गलकृतमस्तक ३५ गाङ्ग वन्द्य परि- २७ गिरितटीकुनटी- २३५ गिरिराजसुता ४८, १७२, १७६ २५८ २७१ १७४, २५३ २०२ EC गीर्वाणं स्फुट- ३६ गुजाकृतमूषण गुणरत्नसागर (ग.) गुरुर्यचसि २१.
उदाहरण-पद्यानुक्रम [ ४०५ वृत्त नाम पृष्ठ सस्या वृत्त नाम पृष्ठ सख्या ६.८६ २३० ५४ ४७, १७० १२४ १२४ २६४ ४३ १२ गोकुलनारी गो गोपालाना गोपतरुणी- गोपवधूमयूर- गोपवधूमुखा. गोपस्त्रीविद्य दा. गोपालाना रचित. गोपालं कलये गोपालं कृतरासं गोपाल केलिलोलं गोपिकामानसे गोपिके तव गोपिकोदूसंघ. गोपीचित्ताकर्य गोपीजनचिशे गोपीजनयल- गोपीषु फेलिरस- गोपीः संमृतचापल- गोपं वन्दे गोपिका- चन्दनचचित चन्द्र कचित. चन्द्रकचार- चन्द्रमुखि चन्द्रमुखीसुन्दर- चन्द्रवदनकुन्द चन्द्रवर्मपिहितं चन्द्राको ते राम चमूप्रभु मन्मय (दि) चरणचलनहत. चरणं शरणं भवतु चलत्कुन्तलं चादयोन चारुकुण्डल. चारतट २६४ ६४ २०५ १६६ २५६ २५५ १२६ १८३ चित्रं मुरारे चिरमिह मानसे चूतनयपल्लव- (टि.) २४४ ७८ १०२ गोवृन्दे सन्चारी ५८ १४६ घेतसि कृष्ण चेतसि पादयुग चेत स्मरमहितं २ घदसामपि २६० गौड पिष्टान्न (दि.) गौरीकृतदेह गोरीवर भस्म. गौरोविरचित- प्रयप कमल- पहिलहृदयो घ ज ८७ २५४ घूर्णन प्रान्त च जगतीसभाव. जनकुलपाल (टि.) अनितेन मित्र जम्भाराति- जम्भारातीभकुम्भो. जय कचचञ्चद जय गता जय चापदाम जय धापहास जय जय जगदीश २१५ २०३ २८ ६० चन्चलकुन्तल चारभुजदण्ड• (टि.) घडीपतिप्रषण. पाडीप्रियनत परिमचभ्यद् २१४ २५७ २१६ १८५ ४०६ ] वृत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (ख) And वृत्त नाम पृष्ठ सरया वृत्त नाम पृष्ठ संख्या २०६ २७० १४० १६० ७७ २३६ १०४ २४८ जय जय जनार्दन (ग) जय जय जम्भारि जय जय जह्य- (टि) जय जय दण्डप्रिय जय जय नन्दकुमार जय जय निरुपम जय जय यदुकुला जय जय रघु- जय जय वशी- जय जय वीर जय जय हन्त जय जय हर जय जलदमण्डली जयति करणा- जयति प्रदीपित- जय नीपायलीवास जय मायामानव जय रससम्पद जय लीलासुधा जय वशोरवो जय जय सुन्दर १४२ २४८ २११, २२१ २४० १६२ २२३ १४६ तरलनयन- तरलयसि तरुणविभूपमित तव कुसुमनिम तव कृष्णकलिमुरली तव चरणाम्बुज- तव तन्वि कटाक्ष तव धर्मराज तव मुरलीध्वनि तव यशसा तारादाराधिक तारापतिमुख ताराहारानत तुङ्गपीवर- तुरगदनुसुता तुरगशताकुल (टि) तुष्टेनाथ द्विजेन ते राजन्नति- तो भो जरी अपितहृदय त्रिजगति जयिन त्वमन चण्डासुर- त्वमुपेन्द्र कलिन्द २६० २१८ १६६ २५२ २५२ १२५ २ २७० १५३ २४२ २७० २६८ २४६ १०१ ३४ १४६ २४६ २४० २५० जयो भरत वजय केशव जलधरदान जलधरधाम- (टि) जलमिह कलय जानकि नव जैनप्रोक्तानां १५२ द ज्ञान यस्यममा २५६ २४० २५३ २१५ त दण्डादेशा दण्डितचटुल दण्डीकुण्डलिभोग- दनुजवधूवैधव्य- दम्भारम्भामित दलदलिसहकार (प्र) दलितशकट दहनगतमल दाडिनाकुसुम तडिल्लोलमधे तनुमाग्निमा तरणिजापुलिने तरणितनूजा तरपिता १२३ २१२ १२८ १६१ उदाहरण-पद्यानुक्रम [ ४०७ वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ सख्या न २०३ २२० ११७ ८३ २०५ ६२,६० २४७ ૨૪૨ १८६ २६ २५६ १२३ दानवघटालवित्र दिक्पालाधन- दितिजार्दन दितिसुतकदन दितिसुततिवहः दिवाकराद् (दि.) दिविषद्मन्द- दिथ्यसुगीतिभिः दिव्ये दण्डधरस्वसु. दिशि दिशि परि- दिशि दिशि विलसति दिशि स्फारीभूतैः बीट्यद् देवाना दुकूलं विभ्राणी दुःख मे प्रक्षिपति दुर्जनभोजेन्द्रकण्ट- (ग.) दुर्जयपरवल. दुष्टदुर्दमारिष्ट- (ग.) दूरारूढः प्रमोद दुशा द्राधी यस्या दृष्टमस्ति वासुदेव दृष्ट्वा ते पदनख देवकूमिनि देव देव वासुदेव देवाधीला. देवयंन्ध त्रैलोक्या. २०२ २०१ ५२ १३७ २०४ २५६ २२२ १६६ न कस्य चेतः नखगलदसजा न जामदग्न्यः (टि.) नन्दकुमार. नन्दकुलचन्द्र नन्दनन्दनमेव मन्दविचुम्बित- नभसि समुद. नमत सतत नमत सदा जना नमस्तुङ्गशिरो- नमस्यामि नमामि पद्धजाननं नमोऽस्तु ते नयनमनोरम नयनमनोहर नरवरिपु- नरपतिसमूह- नरवरपते नतितशावकर- नवकोकिला. (दि.) नवजनद. नवनीतकरं नवनीतचोर नवनीरद. नववालवन- नवमम्जुलवजुल. नवशिसिशिपण्ड. नवसन्ध्यावह्नि- नवीननलिनो. नवीनमेघमुन्दरं २५६ २०४ १२४ १५७ २२२ १२५ २२८ ४० ६६ १८६ १२० २५६ घ १२३ ४६, १७० २२३ धुनोति मनो मम पूतामुराधीश धृतगोवर्द्धन पृतिमषधारय पतोन्साहपूराद् ध्यानराणा ६७ २६१ नव्य शालिन्दीये न स्याद् विभक्ति- २०५ ४०८] वृत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (ख.) वृत्त नाम पृष्ठ संख्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या २५० नाकाधिप. नाथ हे नन्द- नामानि प्रणयेन निखिलसुरगण. निगमविदित निजतनुरुचि नितान्तमुतन- (दि.) नित्यं नृत्यं कलयति २२७ २६५ ५२ १७६ ३४ २५२ १७० २७० २४६ २०६ ४३ नित्यं यन्मधु- २१७ २७१ १८१ १२५ २४७ २६ १६६ नित्य लक्ष्मच्छाया (टि.) नित्यं धन्दे महेशं निनिन्द निजमिन्दिरा निम्नाः प्रदेशाः (टि.) निरवधिदिन- निरस्तचण्ड- निवार्यमाण- (टि.) निविडतरतुराषा- निष्प्रत्यूहं पुण्यां (टि.) नीलतमः पटा. पलायनं फेनिल- पलितंकरणी पवनविधूत- पशुपललना. पशुपु कृपां तय पातालतालुतत. (ग.) पातुन पारयति पाहि जननि पिकरुतमिदमनु- पिङ्गलकेशी पिच्छलसद्घन- पिशङ्गसिचा पिष्ट्वा संग्रामपट्ट पौत्वा बिन्दुकणं नागस्तबक- पुरुषोत्तम वीर पुलिनधृतरग. प्रकटोकृतगुण प्रगल्भविक्रम प्रचुरपरमहसः प्रणतविमार्य प्रणमत भवबन्ध- प्रणमत सर्वा- प्रणयप्रवण प्रणयभरित- प्रणिपातप्रवण- (ग.) प्रत्यादेशादपि च प्रयमकथित- २२३ १८१ १४८ २७० २५७ २५६ २५३ २५४ २४६ २२६ २२४ २२६ २६१ २०२ नृषु विलक्षण- ६२ नौमि गोपकामिनी नौमि धनिता- मौम्यहं विदेहजा. १२१ ११७ ७० २५० २०६ २०४ १६४ २२७ १६७ २३४ २३१ ८२ प पङ्कजकोपपान- पङ्कजलोचन- पण्डितगुणगण. पण्डितवर्द्धन पद तुपार- (टि.) परनन्वीत. (टि.) परममंनिरी- पराम्बुधावा- पर्याप्त तप्तचामी. पर्वतधारिणि प्रपन्नजनतातमः प्रयान्ति मन्त्र: टि.) प्रसरति पुरतः १८८ २०२ प्रसरदुदार- प्रसनदिक-(दि.) प्रसीद विश्राम्यतु (दि.) ८२ उदाहरण-पद्यानुक्रम [ ४०६ त्तिनाम पृष्ठ सख्या वृत्तनाम पृष्ठ संख्या १२१ प्रिय प्रतिस्फुरत प्रेमोवेल्लितवल्गु. भेमोरहट्टहिण्डक মীদ্ধান २०४ २४३ २६४ २१४ २०० फ फुल्लपङ्कजानन ब २०४ १४४ ७२ वाभ्रमीति हृदय १२७ मन इव रमणीना मनमानसपभि मनसिजल्या- मनाकप्रसृत मन्दाकिनीपुलिन मदायते न खतु मन्वहाराविरा- मम दह्यते मम मधुमयन मलयजसारा- मल्लिकानव (दि) मल्लिमालती मल्लिलते मलिना महाचमूना (टि) मा कान्ते पक्षन (टि) मा कुर मान २३२ ४० बली भलाराति (टि) वाणालीहत बुद्धीना परिमोहन ब्रह्मभवादिष- ब्रह्मा ब्रह्माण्डमाण्डे २२८ २२२ भ १२० ६६ मा कुर मानिनि ५० २४६ १६ भपयुतचित्तो भवच्छेदे दक्ष भवजलधितारिणि भवत प्रताप भवनमिय भवबाधाहरण भव्याभि केकाभि भालविराजित. मिदुरमानस- भुजगपरिवारित भुजहरिपुचन्द्र भुजयुगल भुषनत्रय भूमीभानो १७६ २५२ २५१ ४७ ૨૨ २२३ मागविद्य दिय माधयमासि माधवविध दिय माधवधिस्फुर- मानयतीमाहारि- मानसमिह मम मानिनि मान- मामामोनोवतु मित्रकुलोदित मुकुटविराजित मुखम्तवेणाक्षि- मुखाम्भोज मुण्डाना माला- मुदा विलोलमौलि. मुदे नोस्तु मुनीन्दा पतन्ति मृगगणदाह के २६२ २० भमन्ती धनु- २१२ १४५ २३६ भ्रमण्डलताण्डवित ६५ मतिभव मदनरसगत मपुरेश मापुरी १४५ १० ] वृत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (ख.) वृत्त नाम पृष्ठ सख्या वृत नाम पृष्ठ संख्या २३० १४५ १५७ २०२ २०५ २०६ २०० २६५ ८४ २०३ १०७ १२ ६५ ५६ १६१ य यक्षश्चके जनक- पतिभङ्गो नाम यतिजिह्वष्ट- यत्र च नापिकाना (म.) पत्राशुकाक्षेप - (टि.) पदा कंसादीनां यहन्ते विलसति- यद्वेणविराव- यमुनाजलके लिषु यमुनातटे पमुनाविहार- पश्चाप्सरो (टि.) यस्मै परिध्वस्त- यस्योज्वलाङ्गस्य या कपिलाक्षी या तरलाक्षी या पीनाङ्गोरु- यामिनीमधि- यामुने सकते युद्धक्रुद्ध- य: सनद्धानेक- यो दैत्यानामिन्द्र यं सर्वशैलाः (टि.) यः पूरयन् (टि.) यःस्थिरकरणः रतिमनुवध्य रत्नसानुशरासनं रमाकान्तं वन्दे रमापते रसनमुखर रसपरिपाटी राकाचन्द्राधिक राजति वंशौरुत- राधामाधार्यन राधामुखान्जतरणिः राधासुखकारी राधिकारागिण राधिके विलोक- रामातरुणिमोद्दामा- रावणादिमानपूर- रासकेलिरसो. रासकेलिसतृष्ण- रासक्रीडासक्त- रासललितलास (टि.) रासलास्यगोप- रासोल्लासे रिगदुरुभुङ्ग रुचिरवेणु- रुन्दोऽमन्दः (टि.) रूपविनिजितमार २०३ ४६ २६१ १७५ १७५ १६४ ४३ ८४ १५६ २२५ १७७ १२२ १७२ २४६ १५२ ८३ ८२ र १८ ७५ २४८ रगरक्त- रङ्गस्थले ताण्डव- रघुपतिरपि (टि.) रचय कदलीवल- रजितनारी- रणति हरे तव रणभुवि अञ्चति लक्ष्मण दिशि दिशि ललितललित- लसदरुणेक्षण लीलानृत्यन्मत्त. लीलारब्ध. (टि.) लुलितनलिना. लोके त्वदीय यशसा लोष्ठीकृतमणि- १०५ १०५ २३३ २२१ २१७ २५६ ४१२ ] यत्तमौक्तिक-तृतीय परिशिष्ट (प.) वृत्त नाम पृष्ठ सस्या वृत्त नाम पृष्ठ संख्या १४८ २०२ २१० ७६ ११६ श्रीमद राजन् श्रीमन्नारायण श्रीर्मामव्यात् थत्येति याचं (टि.) श्रेयांसि बहुविघ्नानि स ६५ ७३ २४३ वेदरम्तों वरियाना तयो- ध्यपगतधन- (ग.) ध्यालकालमालिका. प्रजजननागरी ग्रजजनयुत प्रजनापिका प्रजपृथुवल्ली ग्रजभुवि रचित- प्रजभुविविलास ग्रजयुवतिभिः प्रजवधुजन- अजविहरण- बजमुन्दरी प्रजाधिपकिशोरं अजाधिपवाल बजे रासकारी सफलतनुभृता सखि गोकुले सखि गोपवेश- सखि चातकजीवातुः सखि नन्दकुमारं सखि नन्दसुतं દર ७३ २५४ १८६, १८६ ११६ सखि नन्दसूनुः ४२ ६५ ६४ श ५६ १२२ ७० १०० २०३ २०६ सखि पशुजनेत्र सखि यम्भ्रमीति सखि मनसो मम सखि मम पुरतो सखि मे भविता सखि सम्प्रति के सखि हरिरायाति सघनतिमिर- सङ्गन वो (टि.) राड ग्रामसोमकण्डूल- (ग.) सड ग्रामारण्यचारी स जयति मुरली- स जयति हर सञ्चलदरुण- सञ्चितच सत्य सदवसु- स त्व जय जय सदाभिराम (ग) सन्तुष्टे तिसृणां (टि.) सदीपितशर- सन्नीतदेतेप- शम कुरु शम्भो जय प्रण- शिरसि निवसिता शीतं पुष्परभिनव- शूल शूल तु गाढ शेषपतगेश (दि.) शेषविरचितहार- श देहि गोपेश श्यामललोल- श्रितमघजलधे श्रीकण्ठ त्रिपुर- श्रीकृष्णेन क्रीडन्तीना श्रीकृष्ण भवभय- श्रीगोविन्दपदार- श्रीगोविद श्रीनन्द सूनो. ६० १८६ २४५ २२६ २५५ s १७८ १४६ २६२ २०८ २०५ २१३ २४८ १७७ F8 चतुर्थ परिशिष्ट क मात्रिक छन्दों के लक्षण एवं नाम-भेद सन्दर्भ-प्रत्य-सूची- प्रन्यनाम प्रन्थकार १ वृत्तमौक्तिक चन्द्रशेखर भट्ट २ छन्द सूत्र पिङ्गल ३ नाटयशास्त्र प्राचार्य भरत ४ वृहत्साहिता वराहमिहिर ५ स्वयम्भूछन्द स्वयम्भू ६ कविदर्पण अज्ञात ७ वृत्तजातिसमुच्चय कवि विरहाङ्क ८ सुवृत्त तिलक क्षेमेन्द्र ६ प्राकृतपंगल हरिहर (?) १० छन्दोनुशासन हेमचन्द्राचार्य ११ छन्दोनुशासन-स्वोपज्ञटीका १२ वाणीभूषण दामोदर १३ वृत्तरत्नाकर केदारभट्ट १४ वृत्तरत्नाकर नारायणोटोका नारायणभट्ट १५ छन्दोमञ्जरी गगादास १६ वृत्तमुक्तावली श्रीकृष्णभट्ट १७. वागवल्लभ दुखभजन १८ जयदेवच्छन्द जयदेव १६ छन्दोनुशासन जयकोति २० रनमजूपा अज्ञात जैन कवि २१ गाथालक्षण नन्दिताढ्य २२ छन्दोविचिति जनाश्रय सकेत- छन्दनाम-वत्तमौक्तिक के क्रमानुसार है । मात्रासख्या--छन्द के प्रत्येक चरण की मात्रायें। लक्षण ==६ मात्रा, 8-५ मात्रा, ड-४ मात्रा, ढ=३ मात्रा, ण-२ मात्रा, ग-दो मात्रा, ल= मात्रा । सन्दर्भ-गन्थ-सङ्कताङ्क=ऊपर सूचित सन्दभ ग्रन्य सूची की क्रम-सूचक सख्या है । छन्द नाम एव लक्षण के प्रागे के अक यह मूचित करते हैं कि इन-इन प्रको के ग्रन्थो में भी यह छन्द इसी नाम से स्वीकृत है और नाम भेद के आगे के अक यह सूचित करते है कि इन इन प्रन्यो मे इसी लक्षण का छन्द इस नाम से प्रचलित है। जिन छन्दो का इन ग्रन्थो मे उल्लेख नहीं है उनके अक यहां नहीं दिए गए हैं।
मात्रिक पदों के लक्षण एव नामभेद [ ४१५ पदनाम माषा सस्या एव लक्षण सदम-ग्रय सङ्कसाद गाया ७ [१२ १८ १२ १५, है १५६७,६१०, १२, १४ १६ ग, इसमें छठा 'ह' जगण होता १७ २१ मार्या- १० १४, १७ १८ है या चार लघु होते हैं। इसके १९ २०, २२ विषम गणों में प्रर्यात १ ३ ५७ ई' म जगण निषिद्ध है। चतुय चरण में छठा ' वेवल एक लघु होता है। ११२ १५ १२ १८ १६ १२ १४ १६ १७ २१,उद्गीति- ५६ १०, १४ १७,१५ १६, २१ (१२ १५ १२, १५] १६ १४, गायिका-११, गाह-२१ उपगीति-५६७,१०, १२, १४, १७, १८ १९ २१ [१२ १८, १२ १८] १.६, १४ १६ १७ २१, गीति-५,६ ७१० १२ १४, १७, १८ १९ २० विगाया गाहू उदगाथा गाहिनी सिहिनी स्व धकम दोहा [१२ १८ १२ २०] १.६ १२ १४ २१, गायिनी-१६,१७ ललितावल्गुगीति- १४ [१२ २० १२ १०] १६ १२ १४ १६ १७ ललितावल्गु- गीति-१४ [१२ २० १२ २० १५६७६१.१२ १४१६ १७ २१,पार्यानोति-१४ १७ १८ १९ २० 1१३ ११ १३, ११ प्रयम १,९ १० १२ १४, १७ दोहक-६ और ततीय चरण मेट ड ढ द्विपया-१६ द्विपय्या-१७ द्विपयक-७, और द्वितीय तया चतुय चरण एव ५ २१ के अनुसार मात्राए-१४ १२, मेट हल, अद्धसम] [११ पटपदी ४ ड ढ] १६ १७, रसिक-१६ उत्कृष्टा-१४, सुतलित- १७ सुतलितमति १२ [२४, चतष्परी] १६ १२१४१६ १७ [१७ १८ १७ १८ वण असम] १ ६ १२ १६ गधा-१४ १७ के अनु सार १७ दण २० मात्रा १८वण २४ मात्राएं होती हैं। [३० चतुष्पदी पोपदी १.६ १२ १७, चतपदा-१४ चतुष्पदी- समप्रमात्रा४८० 3-७ ग] १६ रसिका रोला गचानक चौपया वृत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (क.) छन्द-नाम पत्ता घतानन्द काव्यम् उल्लालम् पट्पद मात्रा-सख्या एक लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्य-सङ्कताइ {३१, द्विपदी; 3-७, 8, 'ढ' १, ६, ८, १२, १४, १६, १७, ६ के निलघुफ होता है। अनुसार पट्पदी है, लक्षण भिन्न-भिन्न है- १२, ८, १३ । ८,८,११। १०, ८, १११ १२, ८, ११॥ १२,८,१२।१०, ८. १२ १०,८,१३ । १०,८, १४ ॥ १०, ८, २२। ५ के अनुसार चतुष्पदी, लक्षण-६,१४, ६, १४।१२, १२, १२. १२ । १६, १६, १६, १६ है । [३१; 2. ड. इ. . 8. इ. उ.] १, ६, १२, १४, १७. [२४; चतुष्पदी; ट. . . . १, ६, १२, १४, १६; वस्तुवदन- ६. ट; तीसरा 'ड' जगण हो या चार लघु हों। [२८, चतुष्पदी; ड. . . ढ. १, ६, १२, १४, १६; कपूर-१०. र ड.] [२४, २४,२४, २४, २८, २८, १.६.६.१२.१४,१६,१७, वस्तुक-२१ मिथित षट्पदी; 2. इ. ड. ड.ड. दो चरण उल्लाल के लक्षणानुसार [१६; चतुष्पदी; 3.४ ; चौथा १, ६, १२,१४, १६, १७, पद्धटिका-५, 'ड' जगण होता है। १०,२१: पद्धतिका- ६. [१६; चतुष्पदी; 3-४; इसमे १, ५, ६.७, ६, १०; अरिल्ला- १२; जगण वजित है और चरण अरिल्लम्- १६, १७, अलिला- १७; के अन्त मे दो लघु होने अलिल्लिह- १४. चाहिए [१६, चतुष्पदी; गणनियम- १, ५, ६, ६, १२, १४, १६, १७, १८, हित] १६, २२; १० के अनुसार १२ मात्रा धतु- पदी होती है। [१६, १४, १६ १४ अ०स०] १, ६, चतुर्वचनं-१६. १, ५, ६, ७, १०,१४,१७, नवपदं- दोहा के चार चरण नवपदी; ६, १२, १४, १७. प्रथम चरण में 8. ड... अन्तिम 'ड' जगण हो या चार पज्झटिका अडिल्ला पादाकुलकम् चौबोला मात्रिक छदों के लक्षण एवं नाम-भेद [ ४१७ यदनाम मात्रा सख्या एवं लक्षण सन्दर्भ-प्रत्य सङ्घताङ्क करभी रड्डा नन्दा रड्डा मोहिनी रड्डा भद्रा रड्डा लप हों, द्वितीय चरण मे 'तीसरा 'ड' चार लघुरूप मे हो, ततीय और पञ्चम चरण मे ४ ड ' अन्त मे दो लघु आवश्यक हैं, चतुर्थ चरण मे 'ड ड ढ' और अन्तिम चार चरण दोहा लक्षणानुसार होते हैं। [१३ ११, १३, ११ १३ दोहा) १,७६, कतभी-१४ [१४, ११, १४, ११, १४, दोहा) १.६ १४, मोदनिका-७ [१६, ११, १६, ११, १६, दोहा१.६ १४ चारसेना रड्डा [१५, ११.१५ ११, १५, दोहा] १, ६, १४, चारुनेत्रा-७ [१५, १२, १५ १२, १५, दोहा] १, ६, १४ राजसेना रड्डा [१५, १२, १५ ११, १५ दोहा] १,६, १४ तालक्निी रडा [१६ १२ १६ ११, १६, दोहा] १.६ १४, राहुसेनिका-७ पद्मावती [३२, चतुष्पदी, इ. ८, ये १ ६ १२ १४ १६, पद्मावतिका- ड'stis SIL रूप मे होने चाहिये। जगण का निषेध है। कुण्डलिका [दोहा-काव्य मिश्रित १६, १२ १४, १६, १७, प्राकृतपिङ्गला. नुसार दोहा उल्लाला-मिश्रित गगनाङ्गणम २५ मात्रा, २० वर्ण, चतुष्पदी १ १२ १७, गगनाङ्ग-१६ मदनातक- १ ड ड ड ड ल ग] द्विपदी [२८, र इ इ इ इ ग] १,६, १२ १४, १६, ५के अनुसार २६ मात्रा द्विपदी, एच१ १०, १६, २१ के अनुसार २० मात्रा चतुष्पदी, द्विदला- १७ माण्डीरकीडनस्तोत्र की टीका मे १२ मात्रा, चतुष्पदी माना है। अलणा [३७ द्विपदी, गणनियमरहित] १ भुल्लन-६, १६ सञ्जा [४१, द्विपदी, ड.६ रगण, १, ६, १२, १४, १६, खञ्जिका-१७ ड' चार लध्वात्मक हों] खजक-५६,१० के अनुसार २३ मात्रा चतुष्पदी है। १७ पृत्तमौक्तिक-चतयं परिशिष्ट (फ.) छन्द नाम मासा सस्या एवं लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ सकता शिखा १६.१२, १४, १६, १७. [विषम द्विपदी; प्रथम पद में २८ मात्रा, २७ वर्ण; . ६. जगण, द्वितीय पद में ३२ मात्रा, ३१ वर्ण; १-७, जगणः दोनों पदों मे '' चार लघु- रूप मे हों। माला . चुलिमाला सोरठा हाकलि [विषम द्विपदी; प्रथम पद मे १,६.१२, १४, १६, १७. ४५ मात्रा, ४१ वर्ण; .. राण, गुरुदयः द्वितीय पद में गाथा छन्द का तृतीय और चतुर्य धरण प्रर्यात् २७ मात्रा [१३, १६, १३, १६ अर्द्धसम] १,६, १२, १६, १७, चूलिका-१४. [११, १३, ११, १३ अर्द्धसम १, ६, १२, १७, सौराष्ट्र- १६, १७; सौराष्ट्रा-१४; सौराष्ट्री- १७. [१४; चतुष्पदी; प्रथम-द्वितीय १,६, १२, १६ १७; काहलि- १४. चरण में ११-११ वर्ण और तृतीय चतुर्थ चरण मे १०-१० वर्ण, सगण या भगण दो गण हो और नगण तथा लघु गुरु हों] [८; चतुष्पदी; 3, जगण] १, १, १२, १६, मधुभारतम्-- १४, वसुकता-१७ तालवनचरित की दीका में 'कलगीत' [११; चतुष्पदी; चरण के १. ६, १२, १४, १६, १७; यमलार्जुन. अन्त मे जगण अपेक्षित है।] भजनस्तोत्र की टोका मे 'अनुकूला' [३२; चतुष्पदी; ड, ड. ड. १, ६, १६ दण्डकाहल- १४. ड. ट. ड. ड. गुरु] [३२; चतुष्पदी; यतिभेद- दण्डकला मे १०, ८, १४ पर यति होती है और इसमे १६, १६ पर यति होती है [३०, द्विपदी; -७, गुरु; जगण १,१२, १७ नि1ि मधुभार भाभीर दण्डकला . कामकला १७ रुचिरा मात्रिक छन्दो के लक्षण एव नाम-भेद [ ४१६ छन्द नाम माना सख्या एव लक्षण सन्दभ ग्रन्थ सङ्केता दीपक [१० चतुष्पदी, ड लघु २, १७६ १२, १४, १६, १७ जगण] सिहविलोकित १६, चतुष्पदी, संगण और १ १२, १६, १७, सिंहावलोक-६, १४. ४ लघु का यथेच्छ प्रयोग प्लवङ्गम [२१, चतुष्पदी, ट ठ ड १,६१२,१६, १७ जगण, गुरु लीलावती [३२, चतुष्पदी, लघु गुरु घण- १, ६, १२, १६, लीलावतिका-१७ नियम रहित, ड६, ड' मे सगण, ४ लघु जगण भगण, गुरुद्वय का प्रयोग अपेक्षित है] हरिगीतम [२८, चतुष्पदी, ठट ४ ठ १, १२, १६, हरिगीतक-१७ ठ, गुरु] हरिगीतकम [३०, चतुप्पदी, ठ ट ठ 8 १ ठ गुरुद्वय] मनोहर २६, चतुष्पदी 8 ट ठ 8 हरि गौतम 8 गुरु, विराम पर ठ' गुर्वत अपेक्षित है, यति १६ १२ 10 हरिगीता . अपरा हरि गीता विभगी [३२ [२९, चतुष्पदी, 8 ट ठ 8 ठ गुरु विराम ६ ७ १२ पर अपेक्षित है] [२८ चतुष्पदी, ठ ट ठ ४ गुर, विराम १४.१४ पर अपेक्षित है] चतुष्पदी, ड. ८, १६,१२ १६, १७ जगण निषिद्ध है [३२, चतुष्पदी, ड ८,] १ १२ दुर्मिला-६,१६, १७, [२३, चतुष्पदी, ट ट ट १ ९ १६, होरक-१२, १७ रगण ट' एक गुरु और ४ लघु. रूप होना चाहिए। [३२, चतुष्पदी, ड ८, जिसमे १,१६ जलहरण- ६, १२, १७ २८ लघु और अन्त मे सगण हो] दुर्मिलका हीरम जनहरणम् ४२० ] वृत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (क.) मदिरा सवया मल्ली सवया १ छन्द-नाम माया-सध्या एक लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केता मदनगृहम् (४०, चतुष्पदी; ड- १०; १, ६, १२, १७, मदनदीपन-१६. पहला 'ड' सगण होना चाहिए मरहठ्ठा [२६) चतुष्पदी; 2. ड. ड. ड. १,६, १२, १६, १७. ड. 3. गुरु, लघु] [३०; चतुष्पदी; भ.-७, ग.] १ मालती सवया [३२; चतुष्पदी, भ.-७, ग.२] १ [३४; चतुष्पदी, स.-८, ग.] मल्लिका सवया [३१; चतुष्पदी, ज.-७ ल.ग.] १ माधवी सवया [३३, चतुष्पदी, ज.-७, ल.ग.ग.] १ मायधी सवया [३२; चतुष्पदी; ड.-८] घनाक्षरम् [४८ मात्रा, ३१ वर्ण, चतुष्पदी १ गलितकम् [२१; चतुष्पदी; 3. ठ. इ. ड. १.६, १०, संपिण्डितागलिता-७. लघु, गुरु] विगलितकम् [२३; चतुष्पदी; 3. 8. ड. ड. , संगलितकम् [१३, चतुष्पदी; इ. ड. ४.] १.१०%3 पदालिता-७. सुन्दरगलितकम् [१३; चतुष्पदी; . ठ. लघु. १, १०. गुरु;] भूषणगलितकम् [१६; चतुष्पदी ठ. ठ. ढ. ढ.] १.१०. मुखगलितकम् २०; चतुष्पदी; 2. ढ. ढ ढ १ विलम्बित- गलितकम् समगलितकम् 7 अपर सम- गलितकम् 1२२; चतुष्पदो; ट उ. ड. 3; अन्तिम 'ड' गुर्वन्त हो] [२५, चतुष्पदी; इ. ठ. ४. ड. ड लघु गुरु] [३२; द्विपदी; प्रथम पद मे- १ ड. ठ.ठ. ड.ड, ल ग. ड.ढे, द्वितीय पद मे-ट. ढ. ढ. ढ. द. ग. ड ड.डा] [३२; द्विपदी; अपर सङ्ग १ लितकम् की पदस्थिति पूर्ण- स्पेण विपरीत होती है अपरं सङ्ग लितकम् मात्रिक छन्दों के लक्षण एव नाम भेद [४२१ छन्द नाम माया सख्या एवं लक्षण सन्दर्भ ग्रन्य-सङ्केता अपरं लम्बिता. [२२; चतुष्पदी, इ.ड. द. १. १; लम्बितागलितकम्-७, १०. गलितकम् ६. गुरु, प्रयम और तृतीय घरण मे जगण नहीं;] विक्षिप्तिका [२५, चतुष्पदी; प्रथम और १; विच्छितिर्गलितकम-१.. गलितकम् तृतीय चरण में 1.ठ. 8.7 ४, द्वितीय और चतुर्थचरण मे 8.8 1.3ग होता [२४; चतुष्पदी; इ.६.] ललिता- गलितकम् विपमिता- गलितकम .. १. विषमागलितक-१० [२५, चतुष्पदी; प्रथम और द्वितीय चरण मे ठ... ड, ड. ड, तृतीय एव चतुर्थ चरण होता है। मालागलितकम् [४६; चतुष्पदी; 2.-१०, १,१०. अर्थात् १ ३, ५, ७, ६ यो '' जगण, २, ४, ६. ८ ai ई चार लध्यारमक, या 'ई' सगण होना चाहिये] मुग्धामाला [३८) चतुष्पदी, 2. ड.८] १, मुग्धलितकम- ५, १० गलितकम् उद्गलितकम् [३०, चतुष्पदो, द. 1-६]] १, उद्गाता-७, उपगलितकम् - ५, १० और १० क (२) गाथादि छन्द-भेदों के लक्षण एवं नाम-भेद गाया, स्पन्धक, दोहा, रोला, रसिका, पाय्य एवं पट्पद नामक छन्दों के प्रस्तार-क्रम से भेद, लक्षण एव नाम-भेद निम्नलिखित ग्रन्यों मे ही प्राप्त है- गाथा-प्रस्तार-भेद प्रस्तार- गुरु लघु वर्ण वृत्तमौविता प्राकृत. वृत्तरत्ना- वाग्वल्लभ गापालक्षण पंगल और कवि. नारायणी-टीका दर्पण क्रम २७ ३ २ ५ २५ बुद्धि ४ ३२ ३३ ३४ ५ ११ ६ २३ २२ २१ २० ७ ३७ ६ १६ १० ४० १२ १३ २५ ४१ २७ ४२ १४ लक्ष्मी. लक्ष्मी लक्ष्मी लक्ष्मी कमला ऋद्धि ऋद्धिः ऋद्धि ऋद्धिः ललिता घुद्धि बुद्धि बुद्धि. लोला लज्जा लज्जा लज्जा लज्जा ज्योत्स्ना विद्या विद्या विद्या विद्या क्षमा क्षमा क्षमा क्षमा मागधी देही देही गौरी देही लक्ष्मी गौरी गौरी देही गौरी विद्युत् धात्री घात्री रात्री घात्री (रात्री) माला चूर्णा चूर्णा पूर्णा चूर्णा हसी छाया छाया छाया छाया शशिलेखा कान्ति कान्ति कान्ति कान्ति जाह्नवी महामाया महामाया महामाया महामाया शुद्धि कीत्ति कोत्ति कोत्ति कोत्ति काली सिद्धि सिद्धि सिद्धा सिद्धा कुमारी मानी मानिनी मानी मानिनी (मनोरमा) मेधा रामा रामा रामा सिद्धि विश्वा गाहिनी गाहिनी गाहिनी ऋद्धि वासिता विश्वा विश्वा विश्वा कुमुदिनी शोभा वासिता वासिता वासिता घरणी हरिणी शोभा शोभा शोभा यक्षिणी चक्री हरिणी हरिणी हरिणी घीणा कुररी चक्री चकी चक्री ब्राह्मी (वाणी) हसी सारसी सारसी सुरसी गान्धर्वी सारसी कुररी कुररी कुररी मञ्जरी x सिंही सिंही सिंही गौरी x हसी सो हसो x (हसपदवी) ४४ ४५ रामा ४७ ६ ३३ ४८ २० ८ ४E ४३ ५० २२ ६ ४७ २४ ४६ ५२ ५३ ५४ ३ २५ २६ २ २७ गायादि पद-भैवों के लक्षण एव नाम भेद [ ४२३ स्कन्धक प्रस्तार-भेद प्रस्तार- क्रम गुरु लघु वण वृत्तमौक्तिक वाग्वल्लभ प्राकृतपङ्गल वृत्तरत्नाकर नारायणी टीका ४ नन्द नन्द X २ २६ ६ ३५ x भद्र शेय भद्र शिव शेष सारङ्ग ब्रह्मा वारण 43 Axx २७ २६ २५ सारग शिव ५ ३८ शेष १२ १४ ६ सारग शिव ७ ग्रह्मा वारण वरुण नील x नन्द्र भद्र शेप सारङ्ग शिव ब्रह्मा वारण वरुण मोल निशङ्क मदन द धरण ब्रह्म २३ २२ ६ २० ४१ ૪૨ ४३ चारण १० मदन २२ २४ वरुण नील २० ४४ मदन नील तालाडू शेखर शर गगनम् तालाङ्क शेखर १६ मदन १२ १३ २८ ४६ शर तालङ्क शेखर गगनम ३० ३२ ३४ ताल शेखर ४८ ४६ गगनम १७ १६ १५ १४ १३ १२ विमति क्षीरम ५. नगरम दशरभ विमति क्षीरम गगनम सरभ विमति क्षीरम १६ विमति क्षीरम नगरम नर स्निग्ध स्नेहलु मदकल ४० ५२ २० नगरम . ४२ ४४ नर स्निग्ध स्नेह मदकल मूपाल नग्नम २२ 8 ४६ ५५ ६ ४ भूप नर स्निाय स्नेहनम मदकल लोभ नर स्निाधम स्नेह मदकल भूपाल २५ ६ ५२ ५ सरि सरित कुम्भ कलश शशी सरित २७ २८ २६ ३ सरित कलश शशी + + २ ६२ कला १ ६३ + शाधर शशी ४२४ ] पत्तीवितर-चतुयं परिशिष्ट (२) दोहा प्रस्तार-भेद प्रस्तार गुरु सपु वर्ण वृत्तमौषितक प्राप्त पैङ्गल वृत्ताना धावल्लभ करनारा यणी टीका लक्षण + २ २५ ४ २६ + भ्रमर २ २२ a भ्रामर भ्रामर ४ २० ८ २८ १० २६ १२ शरभ श्येन श्येन मण्डूक मकट मण्डूक मकंट करभ ३२ ६ नर १५ २० १४ २२ २४ १२ भ्रमर भ्रमर भ्रामर भ्रामर शरभ भ्रामर स्पेन समर श्येन मण्डूक सञ्चार मण्डूक मकंट मकरन्द मकंट' करम मर्कटक करभ नर मराल मराल मराल मदकल मदकल मदकल पयोधर पयोधर पयोधर चल बल यानर वानर त्रिकल विकल कच्छप कच्छप मस्य मत्स्य भादूल शादूल अहिवर + अहिवर व्याघ्र व्याम विडाल विडाल श्वा + श्वा उदुम्बर (उदुरु)+ उन्दुर सप सर्प शशपर. २६ ३७ +++ है मदकल नर पयोधर मराल मटकल नर पयोघर मराल चल श्रिकल वानर धानर निकल कच्छ कच्छप मत्स्य मत्स्य शार्दूल भार्दूल अहिबर अहिवर व्याघ्र व्याघ्र विडाल शुनक शुनक बिडाल उन्दुर सर्प २८ ३० ३६ ३२ ४० ३४ ४१ ३६ ४२ ४३ १७ ७ ५ ४ ४० ३ २ २२ ४२ ४५ ४४ ४६ ૪૬ ४८ ४८ ++ . सप गाथादि छन्द-भेदों के लक्षण एवं नाम-भेद [ ४२५ रोला-प्रस्तार-भेद प्रभ. लघु गुरु मात्रा वृतमौक्तिक प्राकृत• लघु गुरु मात्रा वृत्तरत्नाकर वाग्वल्लभ नारायणी टीका १ २ ३ ६४ १ ३ रसिका रसिका ६६ • ६६ लौहाङ्गिनी लोहानी हंसी हंसी ५८ ४ ६६ हंसी हंसिनी रेखा रेखा ५० ८६६ रेखा रेखा तालाथा तालथिनी ४२ १२ ६६ तालाङ्कनी तालाद्धी कम्पिनी कम्पिनी ३४ १६ ६६ कम्पी गम्भीरा गम्भीरा २६ २०६६ गम्भीरा गम्भीरा काली काली १८ २४ ६६ काली काली कलरुद्राणी कलरुद्राणी १०२८६६ कलरुद्राणी कलरुद्राणी ५८ ४ कम्पी ७ ६ ५२ ७ रसिका-प्रस्तार-भेद उत्तरत्नाकर वाग्वल्लम प्रक. गुरु लघु मात्रा वृत्तमौक्तिक प्राकृतः। प्रथम-चरणे पङ्गल गुरु लघु मात्रा नारायणी-टीका ७० २ २ १२ ૭૨ ६६ ६६ ૨૪ २४ २४ २४ करताल कांसल मेघः मेघः ७४ ६ ६ कुन्द करतल' करतल मेघ मेघः तालाडू तालाडू कालरुद्रः कोकिल कोकिल: कमलम् कमलम् १० ५ है ७८ २४ ६ द ८० ६ १२ २४ ७ ७ ८२ ५४ ६ २४ २४ २४ तालडू तालाडूः कालः कालरुद्रः रुद्रः कोकिलः कोकिल. कमल: कमल: चन्द्रः शम्भु शम्भु चामर. चामरः ग्रणेश्वरः गणेश्वर. + १० ४ शम्भु चमर. गणेश २२० २४ शम्भु चामरः गणेश्वरः सहस्राक्ष. ३ १० १ २२ ० २४ शेष २४ २४ २ ६२ १ ६४ ६६ सहस्राक्ष. शेष रसिका छन्द के केवल प्रथम चरण के हो वाग्वल्लभ के मतानुसार ११ भेद होते हैं और वृत्तरत्नाकर के टीकाकार नारायणभट्ट के मतानुसार १२ भेद होते हैं। घाग्वल्लभ और नारायणी टीका के अनुसार प्रवशिष्ट द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ चरण २४ मात्रा सहित येथष्ट गुरु, लघु निर्मित होते हैं।
वृत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (क २) काव्य-प्रस्तार-भेद प्रक. लघु वरण वृत्तमौक्तिक प्राकृत. पंङ्गल उत्तरत्नाकर नारायणी-टीका . १६ २ १ शम्भु ३ ૨૨ २ ३ ४ ६० गण्ड ५ ८५ ६२ ५ ८६ ८४ शम्भु सूर्य गण्ड स्कन्ध विजय तालाडू दर्प समर सिंह स्कन्ध विजय दर्प तारा ६० ८ ७ ८२ शम्भु सूर्य मण्ड स्कन्ध विजय दर्प तालाडू समर सिंह शेप उत्तेजा प्रतिपक्ष परिधर्म ८९ ६ 5 20 १० ६ ८७ सिंह १० शीय १२ ८५ १२ ७२ ८४ फणि उत्तेजा प्रतिपक्ष परिधर्म मराल ८३ रक्ष १४ मराल प्रतिधम ८२ ८१ दण्ड भृगेन्द्र ८० मगेन्द्र दण्ड मराल मृगेन्द्र दण्ड ७६ मकर मकट ६२ ६० मदन मकट ७७ १६ २० मदन राष्ट्र वसन्त महाराष्ट्र वसन्त अनुबन्ध घासण्ठ २० २१ २२ २३ कण्ठ कण्ठ कण्ठ २२ ७४ २५ ४८ ૨૪ २५ ७३ ७२ ७१ २७ ४४ मयूर मयूर मयूर बन्ध भ्रमर भ्रमर भ्रमर भिन्नमहाराष्ट्र द्वितीयो महाराष्ट्र भिन्नमहाराष्ट्र बलभद्र बलभद्र बलभद्र राजा राजा राजा यलित वलित धलित राम मयूख भयान मथान मथान ६६ २८ २१ ३० २७ २८ ४२ ४० गायादि छन्द-भेदों के लक्षण एवं नाम-भेद लघु वरणं वृत्तमौक्तिक प्राकृत- वृत्तरत्नाकर नारायणी टीका ३२ ३१ ६५ ३२ मोह बली सहस्रनेन बाल बली मोह सहस्राक्ष वाल दृप्त बली मोह सहस्राक्ष. बाल दपित ३४ २८ ३६ ३७ सरभ २२ दम्भ ३६ दम्भ दिवस उद्दम्भ दलिताक तुरग हरिण यह उद्दम्भ वलिताक तुरङ्ग हरिण उद्दम्भ वलिताक: तुरग हार हरिण अन्ध ४१ ४३ ४२ ४३ १० ५३ ४५ ८ पट्पद-प्रस्तार-भेद प्रक लघु चरण वृत्तमौक्तिक प्राकृत पङ्गल वृत्तरत्नाकर नारायणी टीका ७० ८२ २ १४ ६८ ४ ४ ८५ ५ १८ २० २२ २४ ८६ अजय विजय बलि कर्ण वीर वैताल बृहन्नर मक हरि अजय विजय बलि वर्ण वीर देताल घहन्नल मकट अजय विजय बलि कर्ण वीर वंताल बहनल मकट हरि ६ ८७ ७ ८६ द है २६ २८ . ६२ ६० विधि ब्रह्मा १२ ३४ ५८ चन्दनम चन्दनम् शुभङ्कर शुभङ्कर ४२८ ] वृत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (क. २.) w लघु वर्ण वृत्तमौक्तिक प्राकृत- पङ्गल वृत्तरत्नाकर. नारायणी-टीका ४० ४२ श्वा सिंहः शार्दूल कूर्म कोकिल ६८ श्वा सिंह शार्दूल कूर्मः कोकिल शालः सिंह शार्दूल १८ ६६ ४८ कोकिल १६ २० ५१ सर. खर ५२ कुञ्जर. मदन कुजर मदन ४६ २२ २३ २४ ४८ १०४ मत्स्य. मत्स्य १०५ ४६ सारङ्गः शेष सारस पयोधरः ६२ १०७ ६४ कुञ्जर मदनः मत्स्य तालाडू शेषः सारङ्ग पयोधरः कुन्द कमलम् वारण जङ्गम शरभ धतीष्टम् दाता तालाद्ध शेष सारङ्ग पयोधर कुन्द कमलम् वारणः २८ ४२ ६८ कमलम् ३० ७२ पारण: ३२ ३९ ७४ शरभ. जङ्गमः युतीप्टम दाता ११४ ११५ जगम' ७८ ८० शर सुशरः ८२ मसर सुशर समर ३४ ८४ सारसः ३८ सारस सुशर समर सारस शारद मेरुः सरसः मेरुः ८.८ शारद मद ४० सकल मदकर. १२१ १२२ १२३ १२४ ४२ ४३ २६ २८ ६६ मदकर मेर सिद्धि बुद्धि करतलम् कमलाकर मद सिद्धिः पुद्धि करतलम् मग सिद्ध बुद्धि बलपल दमलाकर ४४ ६ १२५ १२६ १२७ कमलाकर प्रवलः १०२ १०४ घयल घवस मतक गायादि छन्द भेदों के लक्षण एव नामभेद [ ४२६ प्रश लघु वणं वृत्तमौक्तिक प्राकृन- पैगल वृत्तरत्नाकर- नारायणी टीका ४८ १२६ मानस मन ४६ २३ २२ २१ २० प्रय वलय किन्नर ११२ १३२ प्रवक कनकम् कृष्ण रञ्जनम् मेधकर प्रव कनकम कृष्ण रञ्जनम् मेषकर प्रोम १६ १३४ १३५ ११८ १२० १२२ गड जन मेघाकर प्रीम गर पाशी सूर्य शल्य शती सूर्य ५८ १२ १२६ १२८ १३० १३२ नर. शाशी सूर्य दाल्प नवरङ्ग मनोहर गगनम् रलम् १४० १४१ १४२ ६० नवरङ्ग मनोहर गगनम् रत्नम् नर ६२ ६ तुरग मनोहर गगनम रत्नम् नव १४४ १४५ ६४ ६ १३८ १४० १४२ ५ होर ध्रमर शेखर कुसुमारर दीप्त ४ ६७ ६८ १४८ १४१ भ्रमर शेखर पुसुमार दीप दाह पमु ३ समर शेखर कुसुमाकरवीप पार यमु २ ७० १४८ १५० १५२ यमु १५१ १५२ ७१ ख. वणिक छन्दों के लक्षण एवं नाम-भेद सतत-क्रमाङ्क एवं छन्द-नाम वृत्तमौक्तिक के अनुसार हैं । लक्षण छन्द लक्षण में प्रयुक्त गगुरु, ल-लघु, म=मगरण, ययगण, रगरग. स=सगरण तम्-तगण, ज=जगण, भ भगण और न=नगण के सूचक है 1 सन्दर्भ-अन्य संकेताडू: सन्दर्भ-ग्रन्थ सूची एव सदनुसार क्रमसूचक सस्या चतुर्थ परिशिष्ट क. पृ. ४१४ के अनुसार है। एकाक्षर छन्द सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केताङ्क क्रमाक छन्द-नाम लक्षण १,६,१०, १२, १३, १५, १६, १७,१६, २२. उक्तम्-५; गी-६, गौ-७. १, १६ स्नु-१७. २. ३. कामः [ग. ग.] ४. मही सारः [स. ग.J [ग. ल.] द्वयक्षर छन्द १, ६, १२, १६, अत्युक्तं-५, नौ-७; स्त्री- ६,१०, १२, १३, १५, पम्-११,१६॥ प्राशीः-२२. १६, १२, १६, १७, सुख-१० १६. १. १६६ साए-६. १२ दुख-१०चार-१७, जत्रु-१६ १,६,१२,१६,१७, मद.-१० पुष्पम्-११॥ वलि-१६ [ल. ल. ७ ताली मि] सशी ९. प्रिया [२] व्यक्षर छन्द १,९,११७ नारी-१,६,७,१०, १३, १५, १७, श्यामागी-१६ १,६,१२,१६ मध्यम-५, केशा-१०; पू:- ११७ बलाका-१७, बनम्-१६. १, ६, १२, १६, मध्यम-५; मृगी-६, १०, १३, १५, १७; तडित्-११, सुधी-१६, चञ्चला-२२० १, ९, १२, १६, १७, मध्यमं-५मदन.- १०. रजनी-११७ प्रवरः-१६. १, ६, १२, १६, १७, सेना-1. १. ६.१२.१६, मृगेन्दु-१७, सुवस्तु-१६. १०. रमण ११. पञ्चात्तम् १२. भूगेन्द्रः ४३२7 वृत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (ख) क्रमांक छ द नाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ सङ्केता २८ १६.१२ १६, मन्याना-१ म थानम् [त त] शखनारी [य य] सुमालतिका [जज] १,६,१६, सोमराजी-१६१०, १५ १७, शखधारी-२० द्रुतम्-१६ १ १२, मालती-१, ६, मालतिका-१७, मनोहर-१६ १,२,३ ६ ७ ८, १०, १३,१५ १८, १६ २०२२ १.६ १२ १६, उपवलि-१७ २१ तनुमध्या तय] ३२ दमनकम् [नन] सप्ताक्षर छन्द शी [म म ग] ३४ समानिका रजग] २५ सुवासकम (नजल] ३६ फरहाच नसल] १ १२, शीयरूपक , गान्धर्वी-१०, १६, मुक्तागुम्फ-१६, शिप्रा-१७ १, ६, १२, १६, उष्णिक-१०, शिखा-११, घामरम-१७, गोभिनी-१६, १६, १२, १६ वासकि-१७, सवासनि-१७, १, १२, करहञ्च-६, करहस-१६, प्रहरि- १७, करहन्तु-१७, गोपिकागीते मुखदेवम । १.२,९,१०,१४,१५, १८, १९, २०, २२. १ १४, १५, हरिविलसित-१०, हरिविलसिमफ- ७, चपला-११, द्रुतगति -११, लटह -१६ १,६७, १०, १३, १५, १६ में लक्षण 'भ सग' है। १. प्रचट-१७ ३७ कुमारललिता [ज सग] ३८ मधुमती [न नग] मदलेखा मिस ग] कुसुमतति [मनल) अष्टाक्षर छन्द विद्यमाल ममगग] १.२, ३, ६,७८,६१० १२ १३,१५, १६, १८ १६ ४२ प्रमाणिका [ज र ल ग.] १,६,८,६१२, १३, १५, १६, १६, प्रमाणी-१०, १८, स्थिर-४, मत्त- चेष्टितम्-३, ११, यालगभणी २२ १, ६, १२ १६, समानिका-१, ५, ६, ४३. मल्लिक रिज गल] वणिक छन्दों के लक्षण एवं नाम-भेद [४३३ क्रमांक छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केता ४४. तुगा [न.न.ग.ग.] ४५. कमलम् न स.ल.ग.] ४६. माणवकक्रीडितकम् (भ-त ल.ग.] १०, १३, १५, १७; समानी-१८, १६% समानं-२२० १; तुग-६, १२, रतिमाला-१०, तुरङ्गा- १२. १६.१२, १६ लसदसु-१७. १, २,७. १२ २०, २२; माणवकक्रीडा- १६, माणकम्-५, ६, १०, १३, १५, १७, १८, १६. १,२,५,६,१०, १३, १५, १८, १६ वितानं-७ १८, १६ चित्रपदम्-२०॥ हंसप्तम्-२२ १, १२, श्लोक-७, ८, १६. १: कृतयु-१७, कृायु:-१७. चित्रपदा [भ.भ.ग.ग] ४८. अनुष्टुप ४६. जलदम् [न.न ल.ल.] नाक्षर छन्द ५०. पामाला ५१. महालक्ष्मिका ५२. सारङ्गम् [म म.म] [र.र.र.] [न यस.] ५३. पाईत्तम् [म भ स.] १.६७ रुपामाली-१२, १५ १६, १७. १. ६, १२, १७, महालक्ष्मी-१६. १; सारङ्गिका-१, ६, १२, १६. १७ मुखला-१७. १, पाइत्ता-१, ६, १२, १६, पापित्ता- १७; सिंहाक्रान्ता-१०, थोरा-१७, प्रवीरा-१७. १, ६. १२; कमला-१५, १६, लघुमणि- गुणनिकर-१०; मदनक-१७, रतिपदम्- ५४. कमलम् [न न.स ] ५५. बिम्बम् (मस य.] ५६. सोमरम् [ सजज.] ५७. भुजगसिगुप्ता निमम ] १,६, १२, १६, १७, गुळ-७, १८, विशाला-६, १०. १.६, १२, १६.१७ १,२,५,१०,१७, १८.२०, २२. भुजगशशुसतम्-१९, भुजगशिशुभृता-१, ६, १३, १५, १७, भुजगशमुक्ता-१७, मधुकरी-३; मधुररिका-१५.
४३४ ] वृत्तमौक्तिक-चतुर्य परिशिष्ट (ख.) क्रमांक छन्द नाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ सङ्केता मणिमध्यम् [भ म स] १, १५, १७ १८, २२, मणिबन्धम्-१६, ५६ भुजङ्गसङ्गता [सन र] ६० सुललितम् नन न ] १, चुलरुम-१७ दशाक्षर छन्द गोपाल सयुतम [मममग] (स ज जग] चम्पकमाला [भ म स ग] - १, पद्मावर्त -१७ १, १६, सयुता-१, ६, १७ सयुगा- १७, रागतिका-१२, सहतिका-१७ १,२,६,७,६,११,१२,१६,१७, १८, रुक्मवत्ती-१, ८, १०, १३, १५ १७, १८, १९, २०, रुमवती-२२, रूपवती- ५, १७, सुभावा-११, पुष्पसमृद्धि -११ १, ६, १६, १७, हारवती-१२, चित्रगति- १०, १६, विश्वमुखी-१७, १५,६,१२,१६, १७ १, ६. १६, १७, मुगलतिका-१७ ११० १३, १५, १७, १८, १६ २०, हसी-१६, विलासिता-२२ ६४ सारवती [भ भ भग] सुषमा ६६ अमृतगति तय भ] [नज नगा [म भ स ग] त्वरितगति ६६. मनोरमम ललितराति [न जन ग] [न र जग] [न न न ल] १, मनोरमा-१, ६, १०, १३, १५ १७ १, कृतकवलि-१७ ७० एकादशाक्षर छन्द ७१ मालती मम माग] ७२ बन्धु [भ भ भ गग) १.६ १२, माला-१६, मारती-१७, भारती-१७ १, ६, १२, १७; दोघकम्-१, २, ३, ४, ५,६,७,८,९,१०,१२ १३,१५,१७ १८, १९, २०, २२. उपचित्रा-१, सरोरुह-१६ ७३ सुमुखी [न ज ज ल ग.] मृतपदगति-११ पणिक छन्दो के लक्षण एवं नाम-भेद [४३५ क्रमाक छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्य-सङ्कताइ शालिनी [म.त.त.ग.ग.] १,२,३,४,५,६,७,८,९,१०, १२, १३,१५,१६,१७, १८, १९, २०, २२. ७५. बातोमा ८.. [म.भ.त.ग.ग.] १, ३, ५, ६, १०, १३, १५, १७, १८, १६ उर्मिला-४; बातोर्मामाला-२०,२२. १० एवं १६ में [म.भ.भ.ग ग.] सक्षण भी माना है। ७६. उपजाति: [शालिनी-यातोर्मोमिषा] १, ७७. दमनकम् न.न.न.ल.ग] १.६.१२.१६.१७. चण्डिका [र.ज.र.ल.ग.] १; णिका-१, धेणिः-१, श्येनी-२, १०.१५, १७ १८, २०, २२, श्येनिका- ५,१३, १७ सैनिका-१२, १७:नि.णिका- ५. निणिकम्-११, ताल-१६. ७६ सेनिका [ज.र.ज.ग.ल.] १.६ सैनिकम् -१७ इन्द्रवत्रा [त-त ज.ग.ग.] १, २, ३, ४, ६ ७, ८, ९, १०, १२, १३, १५, १६, १७.१८,१६.२०, २२, उप- स्पिता-६, ११. ८१. उपेन्द्रपया [जत प.ग.ग.] १,२,३.४.६,७,८,९,१०,१२, १३, १५,१६ १७,१८,१६,२०, २२. ६२. उपजाति: [इन्द्रवसोपेन्द्रपचामिमा] १, २, ४, ७.८, ६, १०, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १६ इन्द्रमाला-१,२०,२२. ८३. रपोटता रिन.र.ल.ग.] १,२,३, ४, ५, ६.८, १०, १२, १३, १५,१६, १७, १८, १९,२०,२२. स्वागता (र.न.म.ग.ग.] १,२,३,४,५,६,७,८,१०,१२,१३, १५,१६, १७ १८, १९, २०, २२. ८५. भ्रमरविलासिता [म.म.न.स.ग.) १,४,५, १५, १७, १९, २०, २२ भ्रमरवितसितम्-२, ७, १०, १३, १९ वानवासिका-११. ८६. मनुकता [भ.स.न.ग.ग.] १.१५, १७ पुइमलदन्ती-२,१०;पी:-- १.१२, १७.१८ सादपदम-1१.१९%, पधिरा-११ मौक्तिकमासा-१७ ७. मोटनकम् [.द.ज.ल.ग.) १,३,१०, ११, १७ मोटरम-१६.
वृत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (स.) ऋमाक छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ सता ८८. सुकेशी [म.स.ज.ग.ग.] ८६. सुभद्रिका [न.न र.ल.ग.] १, एकरूपम्-५, १०, १६% विश्व विराट-- १७, मणिः-१६. १, ५, १२, १७, २०, भद्रिका-६, १०, १३, १५, १८, १९, प्रसभम्-४ अपर- धक्तम्-११, उत्तरान्तिका-११ समुद्रिका- १०. बकुलम् [न.न.न.ल.ल.] १, अगरिम-१७. द्वादशाक्षर छन्द पापीडा [म.म.म.म.] १, विद्याधरः-९% विद्याधार-१२, १५, १७; विद्याहारः-१६; कल्याण-१०; काञ्च- नम्-११. १,२,४,६,६, १०, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १९, २०, २२, अप्रमेया-३, ९२. भुजंगप्रयातम् [य.य.प.य.] ६३. लक्ष्मीधरम् [र.र.र...] ६४. तोटकम् [स स स स. १. ६,६,१०, १२, १६, १७, स्रग्विणी- १, २,१३ १५, १७, १८, १६%पमिनी- ३, ११; शृङ्गारिणी-१७. १, २, ३, ४, ६, ७, ८, ९, १०, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १९, २०, २२. १, सारङ्ग-१२, १५, १७; सारङ्गरूपम्- १६; सारङ्गरूपकम्-६, कामावतार:-१०, १६, मेनावली-१७, रगक्रीडास्तोत्र में 'भृङ्गार'. ६५. सारङ्गकम् तत तत] २६. मौक्तिकदाम [ज ज.ज ज.) २७. मोदकम् [भ.भ म भ.] १८. सुन्दरी [न.भ भ.र] मुक्तादाम-१६. १, ६, १२, १६, १७; मोटक-१५ १, ६, १२, १६, हरिणप्लुता-३, मत्त. कोकिलकम्-१६. १, २, ३, ४, ६, १०, १२, १३, १५, १७, १८, १९, २० प्रतिमाक्षरा-२२. १,१०.१५, १५, १७, १८, १६. t६. प्रमितासरा स ज स स.] १००. चन्द्रपमं [रन.भ.स.]
वणिक छन्दों के लक्षण एवं नाम-भेद [ ४३७ क्रमाक छन्द-नाम सन्दर्भ-प्रत्य-सङ्कताइ १०१. दुतविलम्बितम् नि भ भार] १०२. वंशस्थविला {ज त.न.] १, २, ६, ७, ८, १०, १३, १५, १७ १५, १६, २०, २२, हरिणप्लुतम्-३, ११. १, वंशस्थदिलम-१, १५, १७, शस्त- नितम्-१, वंशस्यम्-३, ६, ७, ८, १०, १३,१६, १७, १८, १९, २२, वंशस्था- २, २०; वसन्तमञ्जरी-७, ११; अभ्र- वंशा-११. १०३. इन्द्रवंशा त त ज र] १०४ उपजाति विशस्यविला-इन्द्रवंशा मिधा] १०५ जलोद्धतगतिः (ज सज.स.] १०६ वैश्वदेवी [ममय य] १०७ मन्दाकिनी (न न.रर] १०८ कुसुमविचिना [न य.न ] १८, १९, २०, २२; इन्दुवशा-१७, वोरा- सिका-१७. १, १७; करम्बजाति-१६ कुलालचत्रम्- १९ वंशमालिका-१६ वशमाला-२.. १, २, १०, १३, १५, १७, १८, १९, २०, २२. १,२,४, ६, १०, १३, १५, १७, १८, १६.२०,२२: चन्द्रलेखा-३. १, १५, १७, गौरी-२, प्रभा-१, १७. १, २. १०,१३, १५, १७, २२, मदन- पिकारा-११; गजलुलितम्-११, गजल- लिता-१६ १,६.१०, १३, १५, १७, ललितपदा- ४,१६; कमलविलासिनी-११. १,४, ६, १०, १३, १५, १७, वरतनु-२. ११,१४, १६ यमुना-१. १,६,११,१३, १५, १७, १६ प्रदज. विचित्रा-१६, पुष्पविचित्रा-१०, १८. १, २,१०, १३, १४, १५, १७, १८. १९, कान्तोत्पीडा-२, ११, सौदामिनी-२२ १,६,१०, १३, १५, प्रियम्वद -१५% मत्तकोक्लिा-११. १,१०, १३, १५, १७, मुललिता-१. १; ललना-१, २,१०; धीरणमाला-१७, रति-१६ १०६ तामरसम् [न ज.जय ११०. मालती निज ज.र] १११. मणिमाला (तपतय. ११२. जलपरमाला [म.भ.स.म.] ११३. प्रियम्वदा [न.भ.ज.र.] ११४, ललिता ११५, ललितम् [त.म.ज.र. [भतान स] ४३८ ] वृत्तमौक्तिक-चतर्य परिशिष्ट (ख) कमाक छन्द नाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ सकता ११६ कामदत्ता [मन र य] १,३,१०, १६, परिमितविजया-१७ ११५. वसन्तचत्वरम् [ज र ज र.] १, ६, ११, विभावरी-१०, पञ्चचामरम्- १३, १५, ललामललिताधरा-१७, ११० प्रमुदितवदना निन र र १, ६,१०, १३, १७, १९, २२, प्रभा-१, ११, १३, १७, चञ्चलाक्षी-२, ११, मन्दाकिनी-१७, गौरी-१४. ११६ नवमालिनी न ज भ य] १, २,१०, १४, १८,१६, २० नयमालिका-१३, १५, नयमालिनी-१७, वनमालिका-१७ १२० तरलनयनम् [न.न न न ] १.१२,१५,१७, तरलनयना-१६, तरलनयनी- त्रयोदशाक्षर छन्द १२१ वाराह {म म म म ग] १, सव्याली-१७ १२२ माया म त य स ग] १, ६, १२, १६, मत्तमयूरम्-१, २, ३, ४, ६,९,१०, १३, १५, १७ १८, १९, २२, मत्तमयूर -२० १२३ तारकम [स स स स ग] १,६, १२, १६, १७ १२४ कन्दम् {पपपपल १,६, १२, १६, कन्द-१७, कन्दुकम- १२५ पडावलि [भ न ज ज ल] १, ६, १२, पडवती-१७, कमलावली- १२६ प्रहर्षिणी म न जर ग] १२७ रुचिरा [ज भ सज ग] १२५ चण्डी (न न स स ग] १२,३४,६८,१०, १३, १५ १६ १७, १८, १६ २०, २२, मयूरपिच्छम-७ १२,४,५,६ १०, १३, १५ १७, १८, १९, २०, २२, प्रभावती-३, सदा- गति.-७, प्रतिरुचिरा-१४ १७ १, १५, १७, कमलाक्षी-१०, हाकलिका- १७, कलावती-१६ १, १३, १५, १७ सुनन्दिनी-१, नन्दिनी- ५, १०, १९ २२, प्रबोधिता-१ १५, कनकप्रभा-२, १४, मनोवती-११, १९ में न ज स ज प' और १० मे ज त ज स. ग'लक्षण भी माना है। १२६ मजुभापिणी [स जस जस जग] पणिक छन्दों के लक्षण एवं नाम-भेद [ ४३६ क्रमाङ्क छन्द नाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ-मद्दे ताइ १३० चन्द्रिका हनन त त ग.] १, १३, १५, १७, उत्पलिनी-१,१७, कुटिलमति -२; कुटिलगति -१०; ६ मे घन्द्रिका का लक्षण 'न. न त र ग' है और १६ मे 'य म र रग' है। १, १५.१७; सिंहनाद -१, १७, कुटज- १,१०, १६, कुटजा-१७, भ्रमर'-११, भ्रमरी-१६, क्षमा-१७ १, १५, १७, मुववना-१०, १६, प्रचला १३१ पलहस fस ज स स ग.] १३२ मृगेन्द्रमुखम् नि जनरग] १३७ लक्ष्मी १३३ क्षमा [नन-त.रग] १, १३, १० में 'न त तर ग' लक्षण है। १३४ लता हन स ज जग] १; लप-१०; उपगतशिखा-१७, १३५ चन्द्रलेखम् न स र रग] १,१४, चन्द्रलेखा-१,१०, चन्द्ररेखा-१५ १३६ सुध ति. [न स त त ग] १; विद्यमालिका-१० [त भ.स जग] १, ४, १०, १६, प्रभावती-१५, १६, १७ दचि-१६ १३८. विमलगति नि न न न ल.] १; प्रडमरू-१७ चतुर्दशाक्षर छन्द १३६ सिंहास्य [ममम म.गग १, सकल्पासार--१७, सकल्पाधार-१७. १४०. वसन्ततिलका त भ.ज ज ग ग १, २, ३, ४, ५, ६,६,१०, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १६%3 काश्यपमते सिंहोन्नता-२,७, ११, १३, १७, २२, सैतव- मते उद्धर्पिणी-२, १०, १३, १७, राम- मते मघुमाघको १७; भरतमते सु दरो- १७, घसन्ततिलकम्-८, २०, २२, संतव- र इन्दुमुखी-२२० १४१ चक्रम् [भ न न न लग] १, १२, १७, चक्रपदम-६, १६ १४२ असम्बाधा [मत न स ग ग.] १, २, ३, ५, ६, १०, १३, १५, १७, १८,१९,२०, २२ १४३. अपराजिता न न र सलग] १,२,५६,१० १३,१५,१७,१८, १६,२०,२२ १४४. प्रहरणकलिका [न न भ न लग] १,५,६,१५, १७, १९, २०, प्रहरण- कलिता-२, १०, १३, १५, प्रहरणगलिता- २२.
४४० ] वृत्तमौक्तिक-चतुयं परिशिष्ट (स.) क्रमाक छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सतात १४५. यासन्ती १४६. लोला [मत न मग.ग] मिस म भ ग.ग.] [न न त त ग ग.J . १४७ नान्दीमुखी १४८. वैदर्भी [म भ.न.य ग.ग. ग.] १, १५, १७. १, १३, १५, १७; अलोला-१०, १७. १, ५, १५, १७; नन्दीमुखी-११; वसन्त - १०,१६. १, १४; कुटिला-२, १४, फुटिल-१०, १४; हसश्पेनी-११, हंसश्यामा-१६% मध्यक्षामा-१४; चूडापीडम्-१७. १ इन्दुवदना-१, १३, १७; वरसुन्दरी-२, स्खलितम्-१० वनमयूर -११, १६ इन्द्र वदना-१७; विलासिनी-२२% १० मे 'भ.ज.स न.ल ग.' लक्षण है। १. शरभा-३. १४६. इन्दुवदनम् [भ.ज स न.ग ग.) १५०. शरभी १५१. अहिपति १५२ विमला [म भ न त रा ग.] [न,न भ.ज.ल ग.] [न ज भ.ज ल ग्र.] १ १, धूति -१०; मणिकटकम्-११. १६% प्रमदा-१४ १, मञ्जरी-१४; कुररोरुता-१७. १, प्रकहरि-१७, प्रकुहरि--१७ १५३ मल्लिका १५४ मणिगणम् [स.ज स ज.ल ग] (न न न न लल] पञ्चदशाक्षर छन्द १५५ लीलाखेल [म म म.म म १५६ मालिनी नि न म य य.] १५७ चामरम रिजरकर १, १५, सारगिका-१, सारंगी-१२, १६, १७; कामक्रीडा-१०. १४, १७, लीलालेख.-१७, ज्योति-१६, मित्रम्-१६. १, २, ४, ५, ६, ७, ८, १०, १२, १३, १५, १६, १७, १८, १९, २०, २२, नान्दोमुखी-३, ११, १, १२, १६, तूपकम्-१, १०, ११, १७; तोणकम्-५; तोटक-७, पंचया- मल-१७; महोत्सव -१६. १,१७, भ्रमरावली-१, ६, १२, १६. १, ६, १२, मणिहस -१७, पदहंस- कम्-१६. १६.१२, १६, १७, शशिकला-१, ५, ६, १०, १३, १५, १७, १८, १६% मणि- गुणनिकर:-१, २, ४, ५, ११, १३, १५, १७ १५८ भ्रमरावलिका {स.स.स स स ] १५६. मनोहस स.ज.ज भर] १६०. शरभम् [न.न.न न स] वणिक छन्दों के लक्षण एवं नाम-भेद [४४१ क्रमाक छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ सङ्केता १८.१६, २०, २२, स्रक-१, ११,१३, १५, १७, १८, १९; चन्द्रावर्ता-२, ११, २२, माला-२, ११, २०, २२, मणिनिकर- १७, रुचिरा-१६ चन्द्रवर्मा-२०. १.६, १२, १६, १७. १६१. निशिपालकम् [भ.ज स न र.) १६२. विपिनतिनकम् [न स.न.र.र.] १६३. चन्द्रलेखा मिर.म य य] १, ६, १०, १३, १५, १७; चण्डलेखा-१; ७, १०, १४ में र.र.म.प य' और १९ मे 'र.र.त तम' लक्षण है। १, ५, ६, १०, १३, १५, १७, १८, चित्रम्- १, मण्डुको-११, १५, १६, चञ्चला- १६४. चित्रा [मममय य. १६५. केसरम [न.ज.न ज.र. १६६. एला १, प्रभद्रकम्-६, १०, १३, १७, सुकैसरम्-१४, १६० १.१०, १३, १७, १६. १७ उपमालिनी-६,१० रुपमालिनी-१४ १, सुन्दरम्-१० मणिमूषणं-११, १६% रमणीयं-११, १६ नूतनं-१७; सवकणं- [सजन.न.य. (न.न.त भर] [र न भ भर. १६७, प्रिया १६८. उत्सव. १६९. उडुगणम् [न.न.न मन] १, शरहतिः-१७. षोडपाक्षर छन्द १७०. रामः [म.म मममरा] १७१ पञ्चचामरम् [ज र.ज र जग] १७२ नौलम् [भ.भ.भ भ.भ.ग.] १, ब्रह्मरूपकम्-१,६,१६; ब्रह्मरूपम्-१५ ब्रह्म-१२० १७, कामुकी-१०; चन्द्रापीडम्-- १७. १५.६, १०, १४, १५, १६, नराचम्- १,६,१२,१४,१५, १६, १७. १,६, १२, १६, १७; अश्वगतिः-६, १४, १५; सङ्गतम्-१०, पप्रमुखी-१२, १६% मुरता-११, सद्यमुदरण-११, सोपानक- ११७ रवाति.-१७; विशेषिका-१७ १.६, १२, १६, १७, चित्रसंश-१, १४, १५. चित्रं-५, ६.१७, चित्रशोभा-५, १, १०, १५, १७, मदनललित-५. १७३. चञ्चला [रज र जरल. १७४. मदनललिता [मभन म.न.प] ४४२ ] वृत्तमौरितक-चतुर्थ परिशिष्ट (ख) क्रमांक छन्द नाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ सङ्केता १७५ पाणिनो [म ज भ ज र ग] १७६ प्रवरललितम् य म न स र ग] १७७ गरुडरुतम् न ज भ ज त रा] १७८ चकिता {भ समत.न ग] १७६ गजतुरा. [भर न न न ग} विलसितम् १, ६, १०, १३, १५,१७ १६% १०में याणिनी का 'नज ज जर ग' लक्षण भी स्वीकार किया है। १, ३, १५, १७, जयानन्दम्-१०, १९ १, १५, १७, चन्द्रलेखा-२२ १,१५, १७ १, ऋषभगजविलसितम्-१, २, ३, १०, १३, १५, १७, १८, १९, गजवरविल. सितम्-५, मत्तगजविलसितम-११, वृषभ गजविलसिता-२०, ऋपभाजविलसिता- १८० शैलशिखा [भ र न भ भग] १५१ ललितम [भ रन र नग। १, २, १०, १४, भामिनी-१६ १, ४, घोरललिता-१४, १५, महिषी- १ १८२ सुकेसरम नि स ज स जरा ] १८३ ललना [स न न ज भ ग] १८४ गिरिवरति [न न न न न ल १ १, अचलपति -१, ५, ६, १०, १५, १७, सप्तदशाक्षर छन्द १८५ लीलाधृष्टम् [म म म म म ग ग] १५६ पृथ्वी [ज स ज स य ल ग] १८७ मालावती [न स ज स य ल रा) १८८ शिखरिणी [यम न स भ ल रा] १, मानाकाता १७ १ २ ५ ६,७,६,६१०, १२, १३, १५, १६, १७,१५,१६ २०, २२, विलम्बितगति ३, ११ १, मालाधर-१,६,१२ १६, १७ १,२,३,४,५,६ ७,८ १०, १२ १३, १५, १६, १७, १८, १९, २० २२, १,२,३,५,६,७,८१०, १२, १३, १५, १७, १८, १९, २०, २२, वृषभचरितम्- ४, वृषभललितम ११ १, २, ४, ५, ६, ७ ८, १०, १२, १३, १५ १६, १७, १८, १९, २०, २२ धीघरा-३, ११ १८६ हरिणी [न सम र स ल ग] १६० मदाक्रान्ता [म भ न त त गग] चणिक छन्दो के लक्षण एव नाम-भेद [ ४४३ क्रमांक छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्य-सङ्केताइ १६१ वशपत्रपतितम् [भ र न भ न लग] १८, १९, २२, वशपत्रपतिता-१, २०, वशदलम्-१, ११, वशतल-५, वरपत्रललितम्-५, वशपत्रम्-१७ १६२. नईटकम् [न ज भ ज ज ल ग] ११७ नकुंट-८, नकुंटकम्-४, ७, ११, १३, १५, १८, १६, अवितयम-२१०, १४ कोकिकलम [न ज भ ज ज ल ग] १,२,१०, १३, १४, १५.१७, १६ १६३. हारिणी [म भ न म य ल ग] १,५,१०,१५, १७ मे 'मभनयमलग' लक्षण है। १९४. भाराकान्ता [म भ न र सलग] १६५ मतगवाहिनी [रज र ज र लग] १६६ पद्मकम नि स मत त गर] १, १०, पद्मम्-५ २९७ दशमुखहरम् [नन न न न ल ल.. १. प्रचलनयनम्-१७ अष्टादशाक्षर छन्द १६८ लीलाचन्द्र (म म म म म म] १,६ १६४ मञ्जीरा [म म भ म सम.] १,६,१२ १६ १७ [र स ज ज भर १, ६, १२, १६, १७, विवुधप्रिया-२, १४, उज्वलम- १०, मालिकोत्तरमालिका- ११. १६, मतकोकिलम्-१७, कूर्पर-२७; चञ्चरी १७, रूपगोस्वामी कृत मुकुन्दमुक्ता. वली मे रियिणी' और गोवर्द्धनोद्धरण मे 'मुग्घसौरभम्' नाम दिए हैं। २०१ क्रीडाचन्द्र [य य य य य य] १, १२. १७, क्रीडाचक्रम्-१६% धार- याणा-१७, क्रीडगा-१७, चन्द्रिका-१७ २०२ कुसुमितलता [मत न य य य] १, २, ५, १०, १३ १५,२२, चित्रलेखा- ३, चन्द्रलेखा-७, कुसुमलतावेल्लिता-१७, १८, कुसुमितलतावेल्लिता-१६, २० २०३ नन्दनम [न ज भ ज र र. १.१५, १७. २०४ नाराच [न न र र र र] नाराचवम-२, मजुला- १, महामालिका-१७, तारका-६, वरदा- १६, निशा-18 २.५ चित्रलेखा [म भ न य य य] १, ५, १०, १४, १५.१७, चन्द्रलेखा- १७, महाराणा कुम्भकर्ण रचित पाठयरल. लक्षाण 'नई टकम् का है परन्तु यतिभेद के कारण अपर नाम 'कोक्लिकम्' दिया है। २००. चर्चरी ४४४ ] युत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (प.) प्रमाक छद नाम लशण सदर्भ प्रथ-साता कोप के अनुसार म त न य य स' लक्षण है। २०६ भ्रमरपदम [भ रमन न स] १,५,६,१० १४,१५. २०७ शार्दूलललितम्[म स ज स त स ] १,५,१०,१४,१५,१७ २०८ सुललितम् [नन म त भर] २०६ उपवनकुसुमम [न न न न न न ] १. तुमुलफम-१७ एकोनविंशाक्षर छन्द २१० नागानद [म म म म म म ग] १, २११ मार्दूलविक्री- म स ज स त त ] १,२,३,४,५,६,७,८,६, १०, १२, डितम १३, १५, १६, १७ १८, १६.२०, २२, शार्दूलसट्टफम-६ २१२ चन्द्रम [न न न ज न न ल] १,१२,१६, चन्द्रमाला-१,६ २१३ धवलम [न न न न न ग] १,१२,१६,१७, धवला-१,६ २१४ दाम्भु [स तय भ म मग] २१५ मेघविस्फूजिता [य म न स र रग] १,१०.१४, १५, १८, १९, विस्मिता- २, सुवृत्ता-४, रम्भा-५, ११, १६, घद्रकाता-७ यमन सतत ग] १, ५, १० १४ १५, १७ २१७ सुरसा [म र भ न य न ग] १,१५,१७ २१८ फुल्लदाम [मत न स र रग] १, १५, १७, पुष्पदाम-५, १०, १४ २१६ मृदुलकुसुमम न न न न न न ल] १, विशाक्षर छन्द २२० योगानद [म म म म म म ग] २२१ गीतिका [स ज ज भ र स ल ग्र] १, १२, १५, १७, गीता-६, हरिगीतम १ २२२ गण्डका [र ज र ज र जगल] १, ६, १२ १७, चित्तवृत्तम-१, चित्र--६, वृत्तम-१ २ १० १४, १५ १८, १९, २२, मुण्डक-१६, ईदृश-१७, मादश- - २२३ शोभा पि मन न त त गन] [म र भ न य भ लग] २२४ सुवदना १,२,३,४५, ६, १०, १३, १५ १७, १८, १९, २०, वृत्तम-७, २२ के अनुसार 'म र भ न य भ ल ल लक्षण है।
वणिक छन्द-भेदों के लक्षण एव नाम-भेद [ ४४५ mAR भमाक बदनाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ-सङ्केताङ्क २२५ प्लवङ्गभङ्ग- [ज र ज र ज.र लग] १, २३१. मञ्जरी २२६ शशाडूचलितम् [त भ ज भज भलग] १, माशाक्चरितम-७, शशाकरचितम्-१.. २२७. भरकम [म.भ भ भ र स ल ग] १, नन्दकम्-१०, नासुरम्-१६. २२८ प्रनवपिगुणगणम न न न न न न ल ल. १, एकविंशाक्षर छन्द २२६ ब्रह्मानन्द [ममम मम मम] २३० स्रग्धरा म र भ म य म प] १, २, ३,४,५६, ७, ८, ६, १०, १२, १३ १५, १६, १७, १८, १९, २०, २२ [रन रन र न र. १. तरग.-१०, तरगमालिका-१९, कनकमालिका-१७. {भ र न न ज ज ज] १,६,१२,१६. [नन म ज ज ज र] १. १५ १७, मुरतरु-१, सिद्धकम्-१६ सिद्धि -५, १०, सिद्धिका-६, शशि- घदना-२, ११, चित्रलता-११, चिन- लतिका-१६, सलिलम-१४, श्री-१४, चम्पकमालिका-१७, १६ चम्पकावली- १७, पञ्चकावली-१७ २३४. रुचिरा नि ज भ ज ज ज र] २३५ निरुपम (न न न न न न न] तिलकम द्वाविशाक्षर छन्द २३६. विद्यानन्द [ममम ममममग.] २३७ हसी [म मत न न न सम] १, ६, १२, १५, १६, १७, रजतहसौ- २३२ नरेन्द्र २३३. सरसी २३८ मदिरा [भ भ भ भ भ भ भग] १, ५, १०, १४, १५, १७, लताकुसुमम-६, ११, १६, सबंया-१६, मानिनी-१७ २३६. मन्द्र कम् [भर न रन र नग.) १, मद्रकम-२,३,५, १०, १८१६, २२, भद्रकम्-६, १३, १५ २०, विशुद्ध चरितम्-७, १७ मे 'भ रन स न रन ग' लक्षण है । भद्रक-१७, भतिका-१७, २४० शिखरम् म रन र न र नग] १ वृत्तमौक्तिक-चतुर्य परिशिष्ट (स.) ma क्रमांक छद-नाम सक्षण सन्दर्भ-प्र-प-सद्धता २४१. अच्युतम् [न न न न स ज जग] २४२ मवालसम् [तभ य ज.स र.नग] १, सितस्तयक-१७; परिस्तवक-१७ २४३ तरवरवृत्तम् [न न न न न न न स ] प्रयोविशाक्षर छन्द २४४. दिव्यानन्द [मममममममग ग] २४५ सुन्दरिका [स स भ स त ज ज सग] १.६, १२; सुग्दरी-१६. पद्मावतिका [स स भ स त ज ज साग] १, १२ २४६ प्रद्वितनया (नज भ ज भ ज भ ल ग] १, १५, १७, अश्वललितम्-१ २, ३, १३, १७, १८, १९, २०, २२, ललित- ५, १०, हयलीलागी-७ २४७ मालती [भ भ भ भ भ भ भ ग ग] १, सर्वया १६; मत्तगजेन्द्र -१७ २४८. मल्लिका [ज ज ज ज ज ज ज स ग] १, मानवती-१७; मानिनी-१७. २४६ मत्तात्रीडम् [म मत न न न न लग] १,१५. १८, १९मत्ताक्रीडा-२, ५, ६, १०,१३,१७,२०,२२. २५० कनकवलयम् [न न न न न न न ल ल] १, चतुधिशाक्षर छन्द २५१ रामानन्द [म म म म मममम] २५२ दुर्मिलका [स स स स स स स स] १ १२, दुर्मिला-२, १६, द्विमिला-१७% सर्वया-१६, २५३. किरीटम् [भ भ भ भ भ भ म भ ] १६, १२, १७, सुभद्र-१०, सुभद्रकम्- ६, सर्वया-१६, मेदुरदन्त-१७; मेदुरद- [भ त न स भ भ न य] १,२.५, ७, १०, ११, १५, १७, १८ १६, २०, २२ २५५ माधवी [ज ज ज ज ज ज ज ज १, प्रनामय-१७ २५६ तरलमयनम् [न न न न न ननन] १ पचविशाक्षर छन्द २५७ कामानन्द [म म म म म म म म ग.] २५८ क्रौञ्चपरा [भ म स,भ न न न नग] १, २, ३, ५, ६, १०, १३, १५, १६, १९, २०, क्रौंचपदी-७, कोषापवा-१७, कौञ्चीपदा-२२ २५४ तन्वी ] १ वर्णिक छन्दों के लक्षण एवं नाम-भेद [४८७ कमाक लक्षण छन्द-नाम सन्दर्भ-ग्रन्य-सत्ताक २५६. मल्ली [सस.स स स.स.स.स ग.] 1. मुदिरम्-१७ २६०. मणिगुणम् न न न न न न न न.ल] १. पविशाक्षर छन्द २६१. गोविन्दानन्दः (म.म.म.म.ग.म.म मगग] १, जीमूतापानम्-१७. २६२ भुजङ्गवि- [म.म त न न न.र स.ल.ग.) १, २, ३, ४, ५, ६, ७, १०, १३, १५, जम्भितम् १७, १८, १९, २०, २२. २६३. अपवाहा मिन.न.न.न न.न.स.ग ग्र] १, ५, १०, १३, १५, १७, १८, १९, २० अपवाहक:-२, २२; अवबाघम्-६; २६४. मागयो (म.म.म.भ.म.म.म.भ.ग.ग.] प्रियजीवितम्-१७. २६५. कमलदलम् [न न न.न.म.न.म.न.ल.ल.] १. प्रकीर्णक छन्द १ पिपीडिका [म म त न न न न ज भ.] १,५,१०3 जलद दण्डक-२२ २ पिपीडिकाकरभः मम त न न न.न.ल-५, न भ.र] ३ पिपीटिकापणवः [मम तन मन नल-१०, ज.म.र] १, ५, १०. ४ पिपीडिकामाला [म मत.न न न.न.ल-१५, ज.भर] १, ५.१०. ५ द्वितीयत्रिभङ्गी (ल-२०, भ.ग.ग.स ग.ग.ल.ल.ग.ग.] १, १६. ६ शालूर. [ग.ग. ल-२४, स] दण्डक छन्द १. चण्डवृष्टिप्रपात नि.न.र-७] १, १०, १३, १५, १७, मेघमाला-३ चण्डवृष्टि:-५, १०, १६, चण्डवृष्टि- प्रयात'-२, ६,१८, १९, २०, २२. १,२ १,५,६,१०,१३,१५, १६,१७,१८, १६ अर्णवः-२२० २. प्रचितकः [न न.र.८] [न न.र-८ ३. अर्णः ४४८] वृत्तमौक्तिक-चतुपं परिशिष्ट (स.) क्रमांक छद-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्य सद्धता ४. सर्वतोभद्र. [न न य य य य य य य.] १३ प्रचितक-६, १०, १३, १५, १६. १७,१८ १६. ५. अशोककुसुम• रिजरज रज रज रस.] १७ अशोकपुष्पमजरी-५, ६, १०, १५ मञ्जरी १७ अशोकमजरी-१६ ६ कुसुमस्तबक [सस स स स स स स स ] १, १५, १६, १७, कुसुमस्तर-५, कुसुमस्तरण-१०. ७. मत्तमातङ्ग [.र.र रररररर] १,१०; मत्तमातगलीलाकर'-५, १५, १७, मतमातगखेलित-१६. ८ अनगशेखर [ज रज र जरजर जग] १, ५, ६, १०, १५, १६, १७ अर्द्ध समवृत्त " १ पुष्पितामा १३* निन र य.] २.४ [न जज.र ग] १, २, ३, ५, ६, १०, १३, १५, १७, १८, १९, २०,२२. २ उपचित्रम् (स स स ल ग.] , [भ भ भ ग ग] १, ६, १०, १३, १५, उपचित्रा- १७, उपचित्रकम्-२, ५, १८, १६, २०, २२० ३ वेरावती ,, [स स स ग ], [भ भ भ ग ग.], १, २, ५, ६, १०, १३, १५, १७, १८ १९, २०, २२. ४ हरिणप्लुता [स स स ल ग] [न भ भर] १.२,१०, १३, १५, १६,१७, १८,२२, हरिणीप्लुता-१६, २०, हरिणपदम-५, हरिणोद्धता-६ ५ अपरवक्त्रम् ॥ [न न र लग] [न ज जर] १, २, ३, ४, ५, ६, १०, १३ १५, १७, १८, १९, २०, २२ ६ सुन्दरी (स स ज ग] , [स भ र लग] १, १५, १७, प्रबोधिता-१०, विबोयिता-18; सुरमालिका-१७, वियोगिनी-१७ ७ भद्रविराट ति जरग] [मस न ग ग] १, २, १०, १३, १७, १८ १९, २०,२२, भद्रविराटिका-५ *-१,३. अर्थात् प्रथम और तृतीय चरण का लक्षण । •-२४. अर्थात द्वितीय और चतुर्थ चरण का लक्षण । " " वणिक छन्दों के लक्षण एवं नाम-भेद [४४६ क्र. छन्द नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सतात ८. केतुमती १.३ [स ज स ग] २,४. [भ.र.न.ग.ग.] १, २, ३. ५, ६, १०, १३, १७, १८, १९, २०, २२० ६. पाड मतो . [र ज.र.ज. ज.र.ज.र.ग.] १; यथमती-२, ५, ६, १०, १३, १८ अमरावती-१७ यमवती- १७, २०, २२. यवयनि-१९% २० के अनुसार र.ज.र.ज.ग.' 'ज.र.ज.र प.' लक्षण है। १०. पट्पदावली , [ज.र.ज.र. [रज.र ज.ग.] १, ५, १०, १४. " विषमवृत्त १. उद्गता [*१. स ज स.ल. *२. न स.ज.ग. १,२,४,५,६,१०, १३, १५, *३. भ.न.भ ग. *४. स ज स ग.] १७, १८, १९, उग्रतः २०, २. उग्रताभेदः [१. स ज स ल. २. न.स.ज प. ३. भ न ज ल ग. ४. स.ज.स ग.] १,१५, २२ ३. सौरभम् । • सल. २. मस.जग. १, १७; सौरभकम्-२, ५, ३.रन.भ.ग. ४. स.ज स.ज.ग.) १०, ११, १५, १८, १६ सौरभक.-२०, सौरभक्तं-२२. ४, ललितम् [१. स ज स ल. २. न.स जग. १, २, ५, ६,१०, १३, १५, १७, ३. नन स.स. ४. सज.स जग.] १८, १९, २२, ललित-२० ५, भाव [१. मम, २. मम. ३ मम. ४. भ.भ.भ.ग.] १. ६, वक्त्रम् [लक्षण अनुष्टुप् के समान है किन्तु द्वितीय और चतुर्थ चरण में म ग य ग.' होता है] १, २, ३, ४, ५, ६, १०, १३, १५, १७, १८, १९, २०, २२ ७, पथ्याववत्रम् (लक्षण अनुष्टुप् के समान है किन्तु द्वितीय एवं चतुर्थ चरण का पाचवा छठा और सातवां अक्षर 'जगण' होता है। १,२.६.१०,१३, १५, १७, १८ पथ्या-५,१६,२०,२२. ३-तृतीय चरण का लक्षण, *-१-प्रथम चरण का लक्षण, २-द्वितीय चरण का लक्षण, ४-चतुर्थ चरण का लक्षण ।
४५० ] वृत्तमौक्तिक-चतुर्य परिशिष्ट (ख) वैतालीय-छन्द माङ्क छ दनाम लक्षण सदभ अथ सङ्केता १ वैतालीयम *१,३ [१४ मात्रा-फला ६, र ल ग] १,२४६,७ १० १३ १५ *२४ [१६ मात्रा-कला छ र लग१७,१८, १६ २०, २२ २ प्रौपच्छन्दसकम १३ [१६ मात्रा-कला ६, र लग ग] १,२ ४६ ७ १० १३ २४ [१८ मात्रा-कला, र य] १५ १७,१८,१६ २०२२ ३ पापातलिका १३ [१४ मात्रा-कला ६, भ ग ग] १ २ ६७१० १३, १७ २,४ [१६ मात्रा-कला ८ भ गग] १८ १६ २० २२ ४ नलिनम [१४ मात्रा-कला ६, भ गग] १. ५ अपर नलिनम [१६ मात्रा-फला ८ भ ग ग] १, ६ दक्षिणातिका बैतालीयम[१४ मात्रा-लस, कला ३ र लग]१, ६, १०, १३ १७, २२ ७ उत्तरान्तिका वंतालीयम [१६ मात्रा-कला ८ र लग] ८ प्राच्यवृत्ति १,३ [१४ मात्रा-कला ६ र लग. २४ [१६ मात्रा-कला ३ ग, कला १८, १९ २० २२ ३ र ल ग.] ६ उदीच्यवृत्ति १३ [१४ मात्रा-लग कला ३ १,२६,१३, १७ १८ र लग] १६२०, २२ २४ (१६ मात्रा-कला र लग] १० प्रवृत्तकम १,३ [१४ मात्रा-स ग कला ३ १,२६, १०, १३, १. र लग] १८, १९, २०, प्रसक्तकम- २,४ [१६ मात्रा-कला ३, ग कला २२ ३ र लग] ११ अपरान्तिका [१६ माया-कला ३, ग कला ३, रसग] १८, २२, अपरातिकम्- १६ १२ चारहासिनी [१४ मात्रा-स ग कसा ३, १,२६, १०, १३, १७, र लग) १८,१६ “१३. अर्थात् प्रथम पोर ततीय घरण का लक्षण। •२,४ मर्यात् हितोय मोर पनुप परण का लक्षण ।
(ग.) छन्दों के लक्षण एवं प्रस्तारसंख्या क्रमाक छन्द नाम লম্বা प्रस्तार सख्या एकाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद २ S १ श्री इ २ २ द्वयक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ४ SS १ २ काम मही सार मधु ५ . ६ ध्यक्षर छन्द-प्रस्तारभेद - ७ SSS द ताली शशी प्रिया २ Iss SIS ६ ३ १० SS! १ पाञ्चालम मृगेन्द्र मन्दर १२ १३. ६ s ७ कमलम चतुरक्षर छन्द-प्रस्तारभेद १६ 55sS १ S1s तीर्णा धारी नगाणिका शुभम् 1515 ६ पञ्चाक्षरछन्द-प्रस्तारभेद ३२ १५ 535 १ १ सम्मोहा हारी हस प्रिया यमकम SsI 55 SI SS २१ २२. २३ ७ 15 15 • यहाँ क्रमाङ्क और छद नाम वृत्तमौक्तिक के अनुसार दिए गए है। चिहन गुरु अक्षर का सूचक है मौर । लघु का । मंतिम कोष्ठक में प्रस्तार भेदो की सख्या दी गई है।
४५२ ] वृत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (ग.) ~ क्रमाक छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केता २४. २५ २६. ३७ २८. २६. ३२. ६४ १२ षडक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ६४ शेषा S55 555 तिलका ।। विमोहम् SIS SIS चतुरंसम् 155 मन्यानम् ss 550 शंखनारी 155 155 सुमालतिका 1st 151 तनुमध्या 551 ISS दमनकम् सप्ताक्षर छन्द-प्रस्तारभेद १२८ सी 355 Sss S समानिका 515 151 S सुवासकम् 15. करहञ्चि 115 कुमारललिता 151 ।। S मयुमती S मदलेसा 555 5 कुसुमततिः अष्टाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद २५६ विद्यमाला Sss SSS SS মালিক। 15 SIS मल्सिका SIS 151 . तुला ।।।।।। मसम् 115 15 माणवीडितकम् 1 चित्रपरा .. SS मनुष्ट्रप जसरम नवासर एन्द-प्रस्तारभेद ५१२ रुपामाता SSS Sss महासदिमा 315 ३० ६४ २५ १२८ ४०. १०३ २५६ छन्दो के लक्षण एवं प्रस्तारसंख्या [४५३ क्रमाक एन्द नाम लक्षण प्रस्तारसख्या २०८ २४१ ५३. ५८. S.S १६६ १७२ ५१२ ६०. १ ६२. १६६ सारङ्गम् 155 115 पाइंत्तम् SSS SHI 15 कमलम् बिम्बम् 155 तोमरम् 115 15. 151 भुजाशिशुसता sss मणिमध्यम् S1 555 भुजङ्गसङ्गता 15 सुललितम् दशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद १०२४ गोपालः SSS SSS 555 S सयुतम् TIS 151 151 5 चम्पकमाला S11 SSS 1155 सारवती st सुपमा ss 155.1 5 अमृतगति ।।.151 S मतता SSS S11 15 S त्वरितगति Ist मनोरमम ।।।5.5 S ललितगति. एकादशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद २०४८ मालती Sss 555555 55 बन्धु 511 5।। 511 55 सुमुखी ISI 151 IS शालिनी Sss SSI 551 SS यातोमाँ Sss S.. 551 SS उपजाति [ शालिनी वातोमी मिश्रित ] दमनकम् चण्डिका SIS SIS IS सेनिका SIS 151 51 इन्द्रवच्चा 551 S51 151 S उपेन्द्रवज्रा 15. 551 15) 55 उपजाति [ इन्द्रवज्रोपेन्द्रवत्रा मिश्रित || ४६६ २४१ 5 ६७ ६८. ६६ २०२४ ७२ ७५ ७७. ७८. 150 ७६ ३५७ ८१. ८२.
४५४ ] वृत्तमौक्तिक-चतुर्थ परिशिष्ट (ग.) नमक छन्द नाम लक्षण प्रस्तारसस्या S13 SIS IS 5।। SS SIS SSS ६६६ ४४३ २००६ s.. 15 ।। SSI SS ४८७ रयोद्धता स्वागता भ्रमरविलसिता अनुकला मोटनकम सुकेशी सुभद्रिका बकुलम् SSI IS. 15. 15 ८७७ ८८. 555 ।।5 151 SS ३४५ ७०४ SIS 15 ।।। २०४८ द्वादशाक्षर छन्द-प्रस्तारभद ४०६६ SSS SSS SSSSSS ६२. ISS IS. 155 ISS ५८६ SIS SIS SIS ६३ SIS २७५६ २३४१ २६२६ 15 ।15 . 15 SS SSI sss. 151 151 ISI 151 SI। SI 5।। 51. 511 511 SIS IS IS I15 ।। E८ ६६ १४६४ १७७२ १६७६ १०० SIS TIS SIL 5।। SII SIS १०२ प्रापीड भुजङ्गप्रयातम लक्ष्मीधरम तोटकम सारनकम मौक्तिकदाम मोदकम सुन्दरी प्रमिताक्षरा चन्द्र वर्म दृतविम्बितम वास्थविला इन्द्रवशा उपजाति जलोदतगति वैश्वदेवी मन्दाकिनी कुसुमविचित्रा तामरसम मालती मणिमाला असपरमासा प्रियम्बदा सलिता १३०२ १३८१ १८८६ IS. SSI 151 SIS 551 ss S.S [वशस्थविलेन्द्रयशा मिश्रित ] 11 151 sss Sss 155 155 ।।। SISSIS 35 155 151 II Iss १२१६ ११० Is। SIS 531 351 133 ७८१ २४१ sss 11 S: S11 15. SIS SST ॥ 515 १६.
छन्दों के लक्षण एवं प्रस्तारसत्या [ ४५५ प्रमांक छद नाम लक्षण प्रस्तारसख्या २०२३ ७०४ ललितम् कामदत्ता यसन्तचत्वरम प्रमुदितवदना नधमालिनी 11 551 15 ।।। SIS 15s 151 SIS 11 SIS SISS15 151 511 155 ६४४ ४०६६ १२० तरलनयनम त्रयोदशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ८१६२ १२१ १२२ १२३ १२४ १२५ १२७ १२८ १२६ १७५६ ४६८२ ७०३६ १४०१ २८०६ १७६२ २७६६ २३६८ १७७२ १३६२ वाराह SSS SSS SSS SSS S माया SSS 551 155 IIS S तारकम IIS 115 Its S 135 ISS 155 153 । पावलि SIL 15। 15. । प्रहपिणी SSS 151315 S रुचिरा ISISI IIS 151 S चण्डी 1।। II ।।5 S मजुभाषिणी 115 151 1.5." S चन्द्रिका 551 551 S कलहस |15 151 15 115 S मगेन्द्रमुखम 151 ISISIS ss1 SIS S लता 115 151 15.5 चन्द्रलेखम् ।। ISSIS:15 S सुद्यति 115551 SSI S लक्ष्मी SSI SIL IIS 151 S विमलगति चतुर्दशाक्षर छन्व-प्रस्तारभेद १६३८४ सिंहास्य 555 Sss 555 SSS SS यसन्ततिलका 55 151 151 SS चक्रम् SI प्रसम्बाधा SSS SSI SS अपराजिता SIS प्रहरणकलिका SII IS घासन्ती 555 3. 111 sss SS १३४ १३५ १३६ २६१२ ११८४ २३३६ २८०५ ८१६२ १४०. १४२ ८१६१ २०१७ ५८२४ ८१२८ १४३ १४४ १४५ ४५६ ] वृत्तमौक्तिक-चतुर्य परिशिष्ट (प.) MMMMW क्रमांक छन्द-नाम लक्षण प्रस्तारसख्या Sss 15 SSS SS ss. १४६ १४७ १४८ १४६ s1 $s ISS SS SSS SIL २३६६ १००६ ३८२३ लोला नान्दोमुखी धवी इन्दुवदनम् शरभी अहिपति विमला मल्लिका मणिगणम् 511 IS. 15 SS 555510 SSI ss ।। ।।।5।। I51 । S ।।।1।। SE! 151 115 II 15 151 ७०६६ १५२ ७०८८ १६३८४ - - पञ्चदशाक्षर छन्द प्रस्तारभेद ३२७६८ 555 SSS Sss SSS SSS १ लीलाखेल मालिनी SSS ISS 155 SIS 151 515 515 । ४६७२ १०६२३ १४०४४ ११६२८ ।। 15 115 TIS 15 151 १५६ ISH SIT SIS ।।5 s. 15. IS SIS चामरम् भ्रमरावलिका मनोहस शरभम् निशिपालकम् विपिनतिलकम चन्द्रलेखा चित्रा केसरम् एला प्रिया 515 SIS SSS SIS S33 155 155 १६४. 555 555 555 155 155 SIS 151 s1 ISI 15 १२०१५ ६६६६ ४६२५ ४६०६ ११०८४ १७२ ११५८४ ११७०७ ३२७६८ 15 Iss १६७. 551 SI SIS उत्सव SIS । s।। SIS उडुराणम् पोडशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ६५५३६ SSS S55 555 555 sss 5 १ १७० १७१ १७२ ISI S पञ्चचामरम् नीलम चञ्चला भदनललिता वाणिनी S SIS 151 515 ।। S.. s।। S1. 5।। ISI SIS SIS s1I SIS २१८४६ २८०८७ ४३६६१ २६१६६ 151 १७४ Sss SI Sss 5 । 5।। 11 SIS 5 छन्दों के लक्षण एवं प्रस्तारसस्या [४५७ क्रमाक छदनाम लक्षण प्रस्तारसख्या १०,१७८ १६.३७६ ३०.७५१ ३२,७२७ ३०,१५१ १ १७६. प्रवरललितम् 155SSS 15SSS १७७ गरुडरुतम् ।। ISIS Is 551 S १७८ चकिता ।। ।।555555।।।। 5 १७६ गजतुरगविलसितम् ।। 51s ।।।।।।।।। 5 १८० शैलशिखा ।। 515 ।।।।। 515 १८१. ललितम् 511 SIS ILISIS !!! S १८२ सुकेशरम् MILTIS IS! LIS 151 S १८३ ललना 115 ।।।।।1 15।। S १८४ गिरिवरति सप्तदशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद १,३१,०७२ १८५ लीलाधृष्टम् SSS SSS SSS SSS SSSSS १८६ पृथ्वी 151 |15 I50 ।। 155 15 १७ मालावती ... I15 II ।। ISS Is १८८ शिखरिणी 155555 ।।। 115515 १८६ हरिणी ।।। 1555555 IIs Is १६०. मन्दाक्रान्ता SSS SIT 11 SS SS SS १९१ वशपत्रपतितम ।। ।। ।।।।।।।।। १६२ मटकम् ।।।।।5।। ।।।5।। कोकिलकम् ।।।।।5।। ।।।5। २६३ हारिणी 5555।।।।।5555s is १६४ नाराकान्ता 555 Sil los $15 115 is १६५. मतङ्गवाहिनी s15 151 5.5 ISISIS । १६६ पद्मकम् ।।। ।।sssssssss १६७ दशमुखहरम् अप्टदशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद २,६२,१४४ १९९ सीलाचन्द्रः 5555555555ssssss १६९ मजीरा Sssssss.. SSS ।।sss ss 1511.।। SIS २०१ कोडाचन्द्रः 155 15 155 155 155 Is: २०२ कुमुमितलता 5555।।।।ss 155 २०३ नन्दनम् ।।।।।।।।।।ssis २०४ नाराच ISISISSISIS SSS SII III ISS ISS 155 ३८,७५२ ५६,३३० ४६,११२ १८९२६ ६४,६८३ ५६.२४० ५६,२४० ३७,७३ १.३१,०७२ १ १२.६७२ ६३,०१६ २०. चर्चरी ३७,८५७ ७६.७२० ७४.६४ ३७,६७३ २०५. चित्रलेखा ४५८ ] वृत्तमौक्तिक-चतुयं परिशिष्ट (ग.) क्रमांक छन्द नाम लक्षण प्रस्तारसख्या १ २०६ भ्रमरपदम् ISIS।।।।। ।.15 १,३०,६७१ २०७ शार्दूलललितम् Sss IIS 151 ।IS SSITIS १,१६,५६६ २०८ सुललितम् ।।।।11555551511515 २०६ उपवनकुसुमम २.६२४४ एकोनविंशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ५,२४,२८८ २१० नागानन्द SSS SSS SSS SSS SSS SSS S २११ शार्दूलविक्रीडितम् 55s IIS IS 11ssssss १.४६,३३७ २१२. चन्द्रम ।।।।।।।। ५,२३,२६४ २१३ धवलम् ।।।।।।।।।।।।।।। ।।15 २,६२,१४ २१४ शम्भु Is 551 SS $11 SSS SSS S ३,१७२ २१५ मेघविस्फूजिता 1 SS S SS TISSISSISS २१६. छाया Isssss I।। I155515515 १४६,४४२ २१७ सुरसा 55SSISS111।। I55 ।।। 5 २.३७,४५७ २१९ फुल्लदाम Sssss ।। I.SSSSSS ८५,७४५ २१९ मृदुलकुसुमम् ५,२४,२८८ विशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद १०,४८,५७६ २२० योगानन्द SSS SSS SSS SSS ssssss 55 २२१ गीतिका ।। II ISSISIS 15 15 ३७२,०७६ २२२ राण्डका SIS 151515 15.15 ISISI १६६,०५१ २२३ शोभा 1sssss... SS. SSI 35 १५१,४६० २२४. सुवदना ssssss।। ।।। ISS SBI 15 ४,६६८३३ २२५ प्लवङ्गभङ्गमङ्गलम् 151515 ISIS.5 15515 । २२६ दाशावचलितम् S51 SI 1515151 SL 15 २२७ भद्रकम 511 s1ISISISIS IIS IS २२८ 'अनषिगुणपणम् एकविशाक्षर छन्द-प्रस्तार भेद २०,६७,१५२ २२६ ब्रह्मानन्द SSS SSS SSS SSS SSS SSS SSS १ २३० स्रग्धरा ssssss ।।। Iss I55 155 ३,०२६६३ २३१ मञ्जरी S.S ।।। 515 ।।।SIS ISIS ७६५,६२७ २३२ नरेन्द्र ISIS I1। ।।।151150 15. ४,५०,५१६ २३३ सरसी 11 I5115115111515 ७.११६०० २३४ रुचिरा 1151111115.151 515७,११,६०० २३५ निरुपमतिलकम् ।।।।।। 1।।।।।।।।। २०६७१५२ छन्दों के लक्षण एवं प्रस्तारसंख्या [ ४५६ प्रमाक छन्द-नाम लक्षण प्रस्तारसस्या द्वाविशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ४१,९४,३०४ २३६. विद्यानन्द १ SSS SSS SSS SSS SSS SSS SSS S २३७ हसो 5555ssss. I।। II 1.55 २३ मदिरा S।।।।।।।SIISISIS २३६ मन्द्रकम् ISIS ।।। SIS1 S15 11: २४० शिखरम् ।।55 S11 SIS ।।।। २४१ प्रच्युतम् ।।।।।।।।।।।। II5 10 15।। २४२. मदालसम 551 SL 155 151 115 SIS 115 २४३. तरुवरवत्तम् ।।1।।।।।। १०,४८.३२१ १७.६७,५५६ १६,३१,२२३ १६.३१,१२३ १६,१५,५०६ ४१,६४,३०४ त्रयोविशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ८३,८८,६०५ २४४. दिव्यानन्दः :55555sssssssssssssssss २४५, सुन्दरिका 115 115 SIITIS SSI ISI 15 IS पद्मावतिका IS HIS SITIIS SSI ISI ISI 15 २४६ अद्रितनया ISI SI1 IST SIT 151 511 15 २४७ मालती SSSSSS11 SIIss २४८ मल्लिका 15. ISIS. 15. IS. 15118I15 २४६ मत्तामोडम 555 sssss .।।।।।।।।।। २५०. कनक्वलयम् ।।।।। १ ३५,६०,०४४ ३५,६०,०४४ ३८,६१,४२४ १७,६७५५६ ३५,६५११८ ४१,६४.०४६ ८३,८८,६०० चतुविशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद १,६७,७७,२१६ २५१. रामानन्द SSS SSS SSS SSS SSS SSS SSS SSS १ २५२ दुमिसका 115 1 15 115 15 ।। ।। ७१,९०,२३६ २५३ किरीटम् SUSIL 51. SIISIS 1150१,४३,८०,४७१ २५४ तन्वी 5।।5। ISSI।। || 155 ३६,५५३६७ २५५. मापवी ISIS) ISI ISI 151 151 151 ।।१,१६,३,७२६ २५६ तरलनयनम् ।। १.६७,७७,२१६ पञ्चविंशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ३,३५,५४,४३२ २५७ वामानन्द:5555555555555 ssssss:: २५८. कौञ्चपदा 11555 Is St।।। 11।।।। ७१.६३,७६३८१ २५६ मन्ती Is His 115 15 15 HIS 115 ७१६०.२३६ २६० मणिगुणम् ।।।।।।।।।।। ।।।।।।।।।३,३१,५४,४३२ ४६० । वृत्तमौक्तिक-चतुर्य परिशिष्ट (ग.) क्रमाक छन्द-नाम लक्षण प्रस्तारसच्या पविशाक्षर छन्द-प्रस्तारभेद ६,७१,०८,८६४ २६१. गोविन्दा. 555555555555555555553 SSSSS नन्द २६२. भुजङ्ग Ssssssss1111 ।। SIS IS 15 २,३८,५४,८४३ विम्भितम् २६३ अपवाह 555..." ।।। ........sss ८३.८६,६०१ २६४. मागधी s||SII ।। 511 SI15.15।।5।।55 १,४३,८०,४७१ २६५. कमलदलम् ।।। III 11।।।। ।।।।।।।।। ।। ६,७१,०८,८६४ प्रकीर्णक-छन्द १. पिपीडिका SSS SSS SSI III IN 15151515 २. पिपीटिकाकरभ:55ssssss।।। SIS IS IS ३. पिपीडिकापणव.55555555।।।। 1.15 155 ४. पिपीडिकामाला 55555555।।।।।।।।।। ।।।।। ISISIS15 ५. द्वितीयत्रिभंगी ।।।।151551 SSS ।। ६ शालूरः ss।।।।।।।।।।।।। ।।।। दण्डक-छन्द १. चण्डयाष्टिप्रपात 11।।।।515SISSISSISSIS515515 २ प्रचितक MIT SIS SIS SIS SIS SIS SIS Sis sis ३ अर्ण ।।।।।।SISSISS15 SIS S15515515 Sts ४. सर्वतोभद्र ।।। ।।। Iss 1ss ISS 155 Iss ISSI55 ५ प्रशोककुसुम 515 ISISIS ISISIS 15ISIS IST SIS. मञ्जरी ६ कुसुमस्तबक ।। IIS IIS 115 115 II IIS 115 ७. मत्तमातङ्ग' SIS SIS SIS SIS S15 SISSISSISSIS ६. अनङ्गशेखर 151 SISISI SISISI SISISI SISISI S IS छन्दों के लक्षण एवं प्रस्तारसख्या अर्धसम-वृत्त प्रथम और तृतीय चरण का लक्षण द्वितीय और चतुर्थ चरण का लक्षण समान छन्द-नाम SIS ISS ।। 1 151 151 SISS 15 115 15 15 IIS 115 115 :15 15 115 15 १. पुष्पितामा २. उपचित्रम् ३. वेगवती ४. हरिणप्लुता ५. अपरवक्त्रम् ६. सुन्दरी ७. भद्रविराट ८. केतुमती ६. घाडमती १० पट्पदावली ।।।।।।SISSS 11S IS IS1 S SSI 1SSIS: I15 . 11SS S1।5।।।।55 II.ISIS ।।।11511515 ।।।।।।51 51s Is sIl SIS IS Sss Its Sss SISIS ।।।55 ISISIS ISISISs IS ISISIS 11: SIS ILS15 151 15ISIS I51 SIS विषमवृत्त १. उद्गता (म.चTIS ISI 15 । [सघ ..।।।। ।। २ उद्गताभेदः [च.] ।।।।।।।। तिघ.] 1 ।। । ३. सौरभम् [प्रच.] 11511 तप] SIS 1 [विच.11 ISIS [च च.TES ISI ||ss [द्विप।।। ।। ISIS [प.घ] II ।।।ss [हिंघ] ।।।। [घ.प.] II II ISIS [हिंघ. ।।।।1515 [ध घ.] IISSIS ISIS ४ ससितम् [च ] Is Its। [तु च ।।। ।। ISIS 15.5 ५ भाष [प्रच] 55:56 तिच] 8:555 [वि.] Sss 555 [पघJ51515 [समचरणे] 535555 [समपरणे] 11 (५६७ वा वर्ण) ७. पप्यावात्रम भावप] प्रथम चरण का मक्षण । [प.ततीय परला मारा। दि.प. रितीय पररा मारा [प] पतुएं घर का मारा (घ.) विरुदावली छन्दों के लक्षण' छन्द-नाम विशेष यम्सख्या लाग या मापासख्या द्विगा कलिका रादिकलिका चतुकुल को मैत्री १६ मा०च०४-चतुष्कल २० मा००४-पञ्चकल १-२ और ३-४ पचकलों की मंत्री ४८ मा०च. मराण, पट्कल-७ २४ मा०प० निकल-८, अर्थात् नराण ८, अनुप्रासयुक्त २० मा०च. ४-पचकल, प्रत्येक पचकल मादिकलिका नादिकलिका गलादिकलिका के प्रादि में गुरु मिथाकलिका २७ २०३० गुरु-लघु-मिथ तिल-तंदुल के समान गुरु पौर लघु मिथित हों। (१) मध्या कलिका प्रादि और अन्त मे कलिका पौर मध्य मे गद्य (२) मध्या कलिका प्रादि और अन्त में मंत्री- रहित गद्य और मध्य में कलिका। द्विभगी कलिका २८ २०५० गुरु-लघु-क्रम से २४ वर्ण, ६ भंग होते हैं इनमे भंग अन्त मे ४ गुरु होने पर भी मंत्री होती है। द्वितीय और चतुर्थ मधुर एव श्लिष्ट होते हैं। विदग्धत्रिभङ्गी कलिका २४ ५०० तन,त न,त.न,भ.भ. युग्मार्ण-भग और दोनों भगणो को मैत्री कलिका मे प्रत्येक के चार चरण होते हैं । चण्डवृत्तों में प्रत्येक मे ६, ८, १०, १२, १४ तक कलिका विरुद होते हैं । विरुद तीन होते हैं। धीर, धीर, देव प्रादि सम्बोधन होते हैं । यहाँ केवल चण्डवृत्त छन्दो के लक्षण मात्र दिये गये हैं, कलिका विरुदादि के नहीं दिये गये हैं क्योंकि ये ऐच्छिक होते हैं । सकेत-म = मगण, य-यगण, र=रगण, स=सगरण, त-तगरण, ज-जगण, भ- भगण, न=नगण, ग= गुरु, ल-लघु, पट्कल-६ मात्रा, पञ्चकल=५ मात्रा, चतुष्कल=४ मात्रा, त्रिकल=३ मात्रा, व=चतुष्पदी, प-वर्ण, मा=मात्रा विरुदावली छन्दों के लक्षण छन्द-नाम लक्षण विशेष वर्णसख्या था मात्रासख्या . तुरगविभगी कलिका २२ २०५० त भ ल त भल,त.भ लग पद्य ३२ मा०च. देखें, प्रथम खंड के चतुर्थ प्रकरण मे पद्मावती, त्रिभनी, दण्डकलादिछन्द हरिणप्लुत ३३०० च० न य भ,न य भ,न य भाम.भ. ६ भग हों और दोनों भगणों को मंत्री हो। नतंक ३४व०च० न.य.भान यमन याभ,न.जल भुजङ्ग ३०३०५० मभल ल,मभललामभ दूसरे और घोये मे भग, ल.ल,भ भ. क्वचित् चौथे मे भग न भी हो, दोनों भगणों को मंत्री " . " " " " " " " . "" . " . . " यस्मितागिता ... ३३५०च० मन न,म न.न,मन नभ भ तृतीय वर्ण मे भय हो । सलिता ३०व०च. तन.भ,तान मत नभ.भ. द्वितीय वर्ण मे भंग हो। यरतनु । ३६५०च. न.यन त,नय नल,न य न ल. ६ भग होते हैं। भभ मुग्धा द्विपादिका युग्म-२००५० मत.ल मतल,भ.भ, युरमभग भगा कलिका प्रगल्भा १८५०च. मतल,मसल.ग.गाय ग. मच्या(१). १८.५० मभ समभभ (२) १४२०५० मसभन जल. ११५०च. नन स ल ल ११३०५० मज न ल स. शिथिला, १८५०१० मत ल,म तल,ललनस मपुरा २२व०५० मभ ल ल,मभल ल भाभ तरुणी २०१०च. ममलत,मभ सलग गग.ग. प्रति परणवणं पुरुषोत्तम घडवत ६ सम.भ. ४.८ वर्ण दिलष्ट, ३,६ वर्ण वीर्य तिलक नन सन.न १०वा वर्ण मपुर: प्रध्युत २४ मपनपान य.न.प. पठा वर्ण शिलष्टपर, ४ शेष चरण मे-न.पन यान यमज. पा ८ पर होते हैं। वदित १३ भ.न.नमस. २.६.१२यो पर्ण सिष्ट U . . . " ॥ . .
४६४] पृत्तमौषितक-चतुर्य परिशिष्ट (प.) छन्द-नाम प्रति चरण-वर्ण लक्षण विशेष . धीर शाक . मातङ्गरोलित, - १२(१४) ज.रज र. १, ३, ५, ७, ६, ११यां मन्तिम चरण में-ज.म लाज वणं लिप्ट; पद - संख्या भस. ऐच्छिक होती है। १२ मभनन १, २, ३, ४, वर्ण दिलष्ट; पद-संख्या १२ भभ.रल ५वा यण सिष्ट; ७, स्या धर्ण दीर्घ, दूसरा वर्ण मपुर १.रय.स. ५,१०वां वर्ण शिलष्ट या मधुर; ५ वर्ण पर भंग और मंत्री; १, ३, ६, दो धर्ण दीर्घ पद संख्या ऐच्छिक ६(१२) भाभ २. ५वां वर्ण श्लिष्ट, पद- मतान्तरे-भ भ.भ.म. सण्या ऐच्छिक ७(१४) सनल ३रावर्णदीर्घ, पद-सख्या मतान्तरे-स ननसनल ऐच्छिक १ तज.य. २. ३, ६, ६वां वर्ण शिलप्ट स्वां घर्ण लिष्टपर; पद- संख्या ऐच्छिक २ रा वर्ण मधुर, ५वां वर्ण श्लिष्ट भस.जाल. २ रा वर्ण मधुर, ६, ८, १०वां वर्ण दीर्घ स.सरलल. ४, ७वा वर्ण श्लिष्ट वां उत्पल " गुणरति कल्पद्रुम कन्दल " अपराजित . नर्तन धर्ण मधुर तरन्समस्त ११ जमसलल. वेष्टन १० नायललल ल. ३,५६ वर्ण शिलष्ट, संदिल- ब्ट एवं मधुर, ७वा वर्ण श्लिष्ट, ५, ६, वर्ण दीर्घ ३, ५.७, ८वा वर्ण सश्लिष्ट, प्रयम वर्ण दीर्घ २ रा वर्ण शियित या मधुर, ४, ५वा वर्ण दीर्घ अस्खलित " १० तरभ ल. पल्लवित १३ भतनललल ल.
विरुदावली छन्दों के लक्षण [ ४६५ छन्द-नाम प्रति चरणवर्ण लक्षण विशेप समग्रम् ॥ १२(१३) जर जर. अन्तिम चरण मे-ज र ज र ल १० भनज ल. तुरग . पडुरुह ६ " सिताज ६ नय. पाण्डूत्पल ६ नय इन्दीवर ६ नय प्ररणाम्भोरुह, नप ३रा वर्ण मधुर, ५वा वर्ण श्लिष्ट, पद-सस्या ऐच्छिक. २. हां वर्ण मधुर, पद- सत्या ऐध्छिन; छठा वर्ण क्वर्ग रचित छठा वर्ण मधुर और इसी वर्ण पर भग और मंत्री भी। इकारादि स्वरभेद होने पर इसी छन्द के भेद पनते हैं। पद-सख्या ऐच्छिक । छठा वर्ण चवर्गीय, शेप पकेरह के अनुसार। छठा वर्ण टवर्गीय, दोष पकेएह के समान। छठा वर्ण तवर्गीय, शेष पकेव्हवत् । छठा वर्ण पवर्गीय; शेष पकेव्हवत्। एठे वर्ण का भग और मंत्री यवर्गीय लकार से होती है। २ रा वर्ण मधुर एव परचिन दिलप्ट, पद सरया ऐच्छिक । ५र्धा यणं मधुर, पद सहया ऐच्छिक। २,६वर्ण मधुर एव चित शिलष्ट पद सरया ऐयिक शहमावद तृतीय भगण गृहलापता पद-संख्या ऐच्चिर प्रयम मजरी पचात कोर, मन्जरी सक्षण नही, प्राधन्त यमवास्ति रहता रहितः २० पर फुल्लाम्बुज ६ " चम्पक ६ भन ७ नजस ६ भ.ज " बालभामुर बकुलमङ्गल। १६मा० ४ चतुष्पल, जगण रहित १२५० भमाभ.भ. मज्जरीकोरक १२०० वृत्तमौक्तिक-चतुयं परिशिष्ट (घ.) छन्द-नाम प्रतिचरण वर्ण लक्षण विशेष गुच्छक " नसजनज.ल. सानुप्रास एवं यमकांक्ति; नननन तन तन त.न. भभ धाशी पद्ययुक्त कुसुम २० पद, पादान्तपमक: दण्डकमिभनी- नन.र-६. पद-सख्या ऐच्छिक कलिका सम्पूर्णविदग्ध- ८ पद: त्रिभंगी कलिका द्वितीयाक्षर मे भग, मिश्रकलिका कलिका लक्षण-भ.न.ज स. ६ कलिका, साधन्त में प्राशी पद्य, मध्य में कलिका विरुदसहित. साधारण चण्डवृत्त सामान्यलक्षण--फलान्यास ऐच्छिक; वर्ण सस्या ३ से कम नहीं और १७ वर्ष से अधिक नहीं । जिस गण से प्रारम्भ हो वही गण अन्त तक रहना चाहिये । प्र, ङ्गा प्र स्फु. स्मि, स्म, क्व इत्यादि सयुक्त वर्णो के सयोग होने पर भी इस प्रकरण मे पूर्व-पूर्व वर्ण का लघुत्व होता है । मात्रिक मे चतुष्कलद्वय होने पर जगण का प्रयोग निषिद्ध है। इसके अनेक भेद होते हैं। साप्तविभक्तिकीकलिका (प्रथमा विभक्ति) भ. स; (द्वितीया०) न. य; (तृतीया०) न.न.स ल.; (चतुर्थी०) त त. त., (पचमो०) यय; (पष्ठी०) त. त, (सप्तमो०) म. स, (सम्बोधन) त न, सब विभक्तियो के चार-चार चरण होते हैं । अक्षमयी कलिका असे क्ष पर्यन्त प्रत्येक अक्षर के दो चतुष्कल होते हैं। चतुष्कल मे 55,III, STI, IIS का यथेच्छ प्रयोग, जगण का प्रयोग निषिद्ध है। सर्वलधुकलिका १५,१६ या १७ सर्व लघु कलिका सहित खण्डावली तामरस खण्डावली रस.स ल.ल कलिका के प्राद्यन्त मे विरुद- रहित प्राशी पद्य प्राद्यन्त मे प्राशी पद्य मञ्जरी खण्डावली १६मा० चार चतुष्कल जगण रहित पञ्चम परिशिष्ट सन्दर्म-गन्थों में प्राप्त वणिक-वृत्त' प्रस्तार. छन्द-नाम सहका लक्षण मन्दर्भ-प्रन्य- सतात ग्रीडा समृद्धिः सुमतिः ४. सोमप्रिया मुमुखी मृगयधू चतुरक्षर-छन्द १०.६ क्रीडा-१७ वृद्धि.-१६ १०, पुण्य-११७ नन्द -१७; द्धि ११ सग १०, १९% भ्रमरी-११; दोला-१७ रामा-१७, तग १०. घरा-१७ तारा-१६. भग १०.१६% ललिता-११, पला-१७. नग ७, १०, १५, सती-१७, मधु-१६ कुसुमिता- २२; तरणिगा-१७ मल १७; गोपाल-१७, पल्ली-१९. यल १७; प-१७, सप-१६ १७ वीद-१७, पदलो-16 तस १७; कृष्ण- पु-16 जपा-१६. भल निधि-१७; पञ्चाक्षर-छन्द ९ मुग्धम् वारि १० १२ १३ काद तारि २४. १५ मन्जु २ यगम ३ नाली प्रीति. घनपक्नि रगम सगग १०, १६, मूरिणी-१७. १०. प्रगुणं-७, पतुवंशा-१७; गुदतो-१६ १०,१९शिवा-११ वटी-१७ ६. सती क्लति नगग 'जिन पदों का रामौवितर में समायेग नहीं पा है और जो अग्य सन्दर्भ प्रन्पों में प्राप्त होते हैं घे प्रयशिष्ट पद प्रस्तार-यम से इस परिशिष्ट में दिए गए हैं। प्रारम में प्रस्तागनकम से उस पद को प्ररतार-मस्या दो है, सरपचार दशनामोर उमरेमक्षण दिए हैं। सदनन्तर सन्दर्भ-ग्रम्प बासरेत पोर पर नाम-भेद एव सरनं-प्रत्यारे. तार दिया है । सन्दर्भ प्राप-गची और सतार पूर्ण के अनुसार है।
४६८ ] पत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-मकता प्रस्तार. छन्द-नाम सख्या सावित्री मलरा यसग विदाधकः १०; हासिका-१७ ६,१०, नरी-१७. १०; यागुरा-११, चनस-१७शामिनी- २२, पति-१६ ६,१०,१६: फणिका-१७ तसग जल ग १४ १५. नन्दा शिला रतिः अभिमुखी भलग नलग १०; मण्डलम्-१७, शर्म-१६ १० मगचपला-११, कनकमुखी-११ धुति -१६ सुलू-१७ १७. कुम्भारि मरास रगल सगल तगल २२. २३. २४. भागल नगल १७ ह्री. पालि किञ्जल्कि धाद्धि विट पाशु मालीनम् वरीय कल्किः जतु छिद्रम् क्षपम् क्षत् मल ल यल ल १७. रल ल २७ २८ २६ सलल तल ल शिखण्डिनी मालिनी सूचीमुखी जलल १७, हरम-१७ भलल १७; विष्णु-१७. पडक्षर-छन्द यम १०,२०% पन्या-१७ ३, १०, करेणु-१७. सम १०, २०, अभिल्या-१७. तम वभ्र. wr » very is ७. भम १., सिन्धुरमा-१७ ८. फजा विक्रान्ता गुणवतो सुनन्दा पिकाली नम मय १०, तन्त्री-१७; तटी-१६ सन्दर्भ-अन्यों में प्राप्त पणिक वृत्त [४६६ लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-साद प्रस्तार- छन्द नाम सख्या विमला सय कमनी-१७ जय १७ १० ईति-१७; कामललिता-१६ १०, प्रबोढा-१७ १७. २७. मर पर २० २१ २२० तर १०, स्याली-१७. भर १०, सुनकम्-१७ १७, मणिरुचि-१६ १०, १६, पीयी-११,निस्का-१७ मस यस रस २७ २६ तस १०,१७ जस भस १७. ३१. ३२ नस प्ररजस्का कामलतिका तटी कच्छपी मृदुकीला जला बलीमुसी लघुमातिनी निरसिका मुकुलम गरागा कर्मदा यसुमती पुही सौरभि सरि साहूति विन्दू मन्त्रिका दुष्टि क्षमापालि राढि अनिभृतम् मड कुरम् वृत्तहार मार्भवम मधुमारकम हाटकशालि पाकलि पुटमदि कसरि सोमश्रुति सोपधि यत ३४ ३५ सत जत ३८. ३६. ४० भत नत मज ४२ रज १७. १७ १७. १७. ४७. भज नज ४६ रभ १७ ४७० । वृत्तमौषितफ-पञ्चम परिशिष्ट manawwwww प्रस्तार. सख्या छन्दनाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ सङ्केता ५२ १०, शखध ति -१७ तभ नभ भभ १७ गुरुमध्या इन्धा सावटु मन्दि प्रयमितम प्रोया अत्ति फच्छपी विससि प्रतिकलि मुदामि भनति यन प्रतरि-१७. ५६ ६० सन १७ ६२. जन भन सप्ताक्षर-छन्द २. यमग १७. ३ रमग X तमग जमग १७. भमा नमग ६ म यग यायम ११. प्रहाण सरयो शम्बूक निम्नाशया सुमोहिता प्रधीरा होला इभभ्रान्ता प्रभीक अहिंसा रसधारि बेधा पद्या किणपा कुमुदवती किरिम वयस्य हसमाता दीप्ता भीमार्जनम स यग तय ग १७. जयग भयग न यग १०, सुरि-१७ मरग १६. र रग २० सर ६, १०, भूरिधाम-१७ १०, हसमाला-१७ १४. १७. २१ तरम सन्दर्भ ग्रन्यों में प्राप्त वणिक वृत्त [ ४७१ छद नाम लक्षण प्रस्तार सस्या सन्दभ-अन्य सङ्केताङ्क २२. सरग १०, पुरोहिता-१७ २६. २७ नरग यस ग रसग १०॥ सरकरा-१७ १०, महनीया-१७ १०,३, शरगीति-१७, उद्यता-२२ २८ सस ग तसग २६ १०, ३, १६, स्यूला-१७ वश्चक-२०. १०, रुचिर-१७, मदलेखा-१९ भ सग मस ग मतग १७ १७ ३५ यत ग र त ग सतग तत ग जतग सुभद्रा होडपदा मनोज्ञा मुदिता उदता करभित भ्रमरमाला विघुवक्ता दृति हिन्दीर ऊपिकम् मृष्टपादा मायाविनी राजराजी कुठारिका कल्पमुग्यो परभृतम महो नुखी महोद्धता विमला पूर्णा पहिवलि शारदी पुरटि सरलम देगवती सौरकाता प्रधिकारी चूममणि महोधिका मौरलिकम ३६ १७ १७ १७ १७ १७ १७ १७ १०, कठोद्गता-१७ भतर न तग म जग ४० ४२ यजम सजप ४५ तजग जजग भना १०, उन्दरि-१७, पुनी-१६ ४८ न जग गभग १०, १६, दारिता-१७ यभग ५२ स भ प्र त भग १४, निर्वाधिका-१७ भभग १७, कलिका-१० १६, सोमन-११ २२, भोगवती-११ स्वनकरी न भग ५७ नपसरा मनग ४७२ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ अन्य-सङ्केताक प्रस्तार- सख्या यन ग रन ग सन ग तनग १७. १७. १७. १७; मधुकरिका-१०; वज्रम्-११. १७, १०, १६ उलपा-१७ ६२. जनग भनय मामल यमल रमल समल ६८. ६६. १७. १७. १७. १७ शूर-१७. १७. तमल जमल भमल ७२. ७३. नमल मयल यय ल ७५. चिरचिः बहुलया यमनकम होरम् स्विदा चित्रम् नीहारी कंसासारि खविणी गहिणी वधिष्णु घोणी घ्याहारी किशलयं देवलम् नद्दि अनासादि मलालापि गुजा ऋचा नन्दथु अनु अम्मेथी मयूरी सामिका प्रोञ्छिता घृन्दा प्रतदि मीनपदी मणिमुखी मौलिनक परभानु मेयिका गोधि १७. रयल सयल १७. १७. ७८. जयल ७६. भयल ८०. नयल मरल ८२. ३. १७. सरल ८५. तरल जरल ८७. भरल १७. ५८. नरल १७. मसल यसस १७. ११. रसस १२. ससल सन्दर्भ-प्रन्यों में प्राप्त वणिक-वृत्त [ ४७३ प्रस्तार- बदनाम सख्या लक्षण सन्दर्भ प्रत्य-सङ्कताच ६३ तसल जसल सरलानि विरोही वरजापि सम्पाक पद्धरि भस ल मत ल १७. १७. १७ १७ यतल ६. मूर्णिका रतस स तल ततल १७ जतल १०१ १०२. १०३ १०४ १०५ १७, लीला-१७ काही कामोद्धता खपरि शन्तनु मुरजिका कालम्बी उपोहा कापिका न तल म जल यजल १७. सजल १०७ १०८ १०६ ११० तजल जजल १७ भजल म भल ११५ र भल दोपा उपोदरि जासरि भूरिमधु मूरिवसु हपिणी लोलतनु कोडान्तिकम् स्तरधि पौरसरि वीरवट प्रमति त भल १७ ११७ ११५ जभल भभल मन ल यमल १७ १७ अहति १२१ १२२ १२३ १२४ १२५ १२६ १२७ सनल १७ वराशि घनपरि मुशकि कुरदि कोशि तनल १७ १७ जनल भनल ४७४ 1 वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट लक्षण प्रस्तार. छन्द नाम सख्या सन्दर्भ ग्रन्थ-सङ्केताङ्क अष्टाक्षर-छन्द २. यमग ग भ मग ७ १७, इन्द्रबला-१७. न मग ग १० यय गग रय राग सय गग १७ १२ १४ ज यग ग १५ भ य ग ग नय गग १८. यर ग १७. शुद्धगा-१७ २२ २०. सरगग तरगग १०. १७. २२ २४ अनिर्भार इन्द्रफला गोपावेदी भूमधारी मौलिमालिका युगधारि विराजिकरा वात्या पाञ्चालानि कुलाधारी पद्मिनी परिधारा विभा यशस्करी कुररिका मनोला पञ्चशिखा भानी गुणलयनी पारान्तचारी कोचमार कराली वारिशाला वृत्तभार सिहलेखा दिगीश सारावनदा कृष्णगतिका चित्रविलसितम् प्रतिसीरा प्रतिमोहा २८ जरग ग न र गग यस गग ससग ग जस गग न स ग ग य त गग सतरारा तत गग जत गग १७, रमणीयशिखा-१७. १७ १०, रुद्राली-१७ ३२ ३४ १७, केतुमाला-१६ १७, वितान-१७ ४० न त गग रजगग ३,१०,१७, मालिनी-७ सजग ग तज गग ४५ ४७ भज ग ग ४८ न जगग ३ ४६ मभग ग ५२ सभ ग ग १७, वितानम्-१०, १३, वितान के १३ और ११ के अनुसार 'त र ल ग.' एवं 'त य ल ल लक्षण भी है।
सन्दर्भ-प्रन्यों में प्राप्त पणिक-वृत्त 1 ४७५ प्रातार मम्पा पदनाम सक्षण सन्दर्भ-ग्रम्ब-पसार न मग ग नभग प मनगग तनगम याय सग १७. १७. चतरोहा तमुखी हसरतम् साध्या विहावा मनुष्टा क्षमा हेमरूपम् पल्सरप्लुतम् माराषिता ७५. रस मरसग १६. सरलग ८४. सरसग तरल ग १४.१७ नाराषम-५,१० माराया- ८९. मुमासतो मही प्यामा ₹२ नरसग रासस तस सग १.१६, उपसिनी-१७, पती-१७ १.सिला-१७ नरिसा-१७ ७ सतमय १.४ १.५ मस सग मजस १७ १७ १७ः उद्धरा-१० १७. उपया-१७: मानप्दा-१८. १जसग १.१. तमसम मायपरम हारनी घद्धरा दिया এবি सलितगति गुरपरी गमति নিরিবিসি ११२. नमसम १०प्रयनि-१७. ११,१० १२. १२१ ममम. ममसग १०, ईशा-७. 1i. परि भमम ममRM रिप-र-10. १४. १४७ गुमम् मानाति लामो १७ १. মানি ता वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छन्द नाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ सङ्केता प्रस्तार. सख्या १८० १८१ १८२. सभगल १७मृतनम-१७ त भगल जभगल जनगल अनुतनम अमरन्दि कुलचारि करञ्जि वन्तम् शाखोटकि पञ्जरि अप्रीता समल ल १९८ १७ १७ जमल ल भमल ल १६६ २०० न म ल ल १७; प्रीता-१७, अतिप्रीता-१७, अलिप्रीता-१७ मयलल २०१ २०२ २०४. २१.. मन्यरि चातुलि सफुल्लक भाषा पाकलि यायल ल तय ल ल य र ल ल १७ रूपगोस्वाभिकृत नन्दाहरणस्तोत्र १७, सभाषा-१७, सभासा-१७ १७ १७ नरलल अमना ससल ल २२०. २३० २३५ २४१. जतलल रजलल १७ मभल ल २४४ सभल ल ज भलल आकतनु आखेटम् प्रतिजनि सृतमधु मरु चयनम् कुशकम् निरुदम् सिन्धुक् क्षरम् वेशि यनलल १७ २४६. २५० २५१ २५२ २५३. २५४. २५५ रन लल सनल ल तनल ल जनल ल १७, क्षर-१७ १७ देषि-१७ भनल ल नवाक्षर-छन्द २ यमम भमम मेघालोक वक्त्रम् मायासारी खेलाढयम् तारम् नयम म सम २८ १०, उतरश्रि-१७, उदरखक-१७, उदरास्त्रक- ७ सन्दर्भ-प्रन्यों में प्राप्त वणिक-वृत्त [४७७ प्रस्तार. सध्या छन्द नाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्प-सईताङ्क २६. तसम जसम वसाय निविन्ध्या कमिष्ठा पृतहाला कलहम् प्रयनपताका १७ वंसारम्-१७ १७, निवन्ध्या-१७. १७, किमिष्ठा-१७. भसम म भम ५२ सभम मन म मकरलता तनम १०० रम्भा-१७ ६ के अनुसार- 'मन य लक्षण है ७४ ययय १७; बृहत्य-१६ १७, सुन्दरखेखा-१६ म तय सतय भतय ११२ न जय १. भारतीढा-१७. तभय मन य १२४ विशल्यम् अर्घक्षामा सम्बुद्धि शम्बरधारी शशिलेखा रुचिरा कासीकम सुगन्धि कामा हतिका निभालिता चाहासिनी कामिनी रयोन्मुखो प्रबनिजा समय १७ १२५- १५२ सतर जतर १७ १६ १०, तरगवली-११, २.. १७१ रजर त जर प्रबह लिका जजर भज र नजर १७ २७५ १७६ १८० १५२ हलोदगता मधुमल्ली सहेलिका मदनोत्रा जभर भभर १७. उत्सुकम्-१०, १९ १८४ कारवाया नभर १८७ भदिया १मर १९२० ननर उपयुतम् निषषम् भरत १७.
४७८] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केता प्रस्तार- सख्या मसस ससस भस स १०० गाथा-१६. १०; अर्धकला-१७. १७. १०,१६. १०, विद्युत-१६. २१७. २२०. २२३. २३६. २३६, २४४. २४७. २५१. २५३. २५५. २६३. सभस १७. कनकम् सौम्या रञ्जकम् अक्षि उदयम् अनवीरा प्रियतिलका हलमुखी पाकेकरम् धौनिकम् वल्गा कीटमाला मसूणकम् तीला धारिधियानम् रनस तनस २, ५, ६, १०, १३, १७, १८, १६, १७. १७. ततत सजत ३२.. नन त न यज १७. १७. भतज न जज भनज १७ अहोरी-१७० ३५६. ३६६. ३८३. ४००. ४०६. ४३६. कठिनास्थि विकचवती धन्दाः दधि स्फुटघटिता नयभ भसभ भभभ १७, उदधि-१७. नयन दशाक्षर-छन्द २. १७. यम मग यायमग २०. सरमग ज समग न तमग १७. १७. शैफाली धूमाली नीरोहा धीरान्ता निर्भधा मध्यापारः धशारोपी मन्धक कुलम् मन्थूकम् बोधातुरा मभमग मभ मग १७. १७. १६. १७. १५. भभमग नमग भनमग ६३. ६६. ममयग १७, सकृदयोषा-१७.
४८० वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छन्द-नाम प्रस्तार- सख्या लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्कता भजतग तभत ग ३०३. ३०६. ३१७. ३२७. ३३१. खेटकम् बर्हातुरा नीराञ्जलि दीपकमाला पंक्तिका तनता भमज ग रय जग ५, १०, कर्णपालिका-१७; मौक्तिकम्-१६. जर जग ३४२. ३४५. सराविका शुद्धविराट मसजग २, ५, ६, १०, १७, १८, १९, २०, २२; विराट-१७. १७. रसजग ३४७. ३४८. स सजग तसजग १७. ३५१. अक्षरावली सहजा प्रहिला कुप्यम् अनुचयिता यमिता उपस्थिता नसजग रज जग तज जग १७. १७. २,५,१०,१३, १७, १८, २०, २२. १०. जरा-१७. जज जग ३७५. भ भजग न भजग मन जग नन जग १७. १३, १७ ३७७. ३८४. ४००. ४१२. नयभग सस भग भस भग १७, कटिका-१७. उषिता भिन्नपदम् वडिशभेदिनी पणवः चितिभृतम् फलिनी सुरयानवती विरलम् छलितकम् प्रधादपदा हंसक्रीडा चारवती परिचारपती काण्डमुखी भारत गहना फलपरम् ४२४. ४२८. ४३३. न त भग सज भ मभभग १६. स भ भग तभभग जभभग १७. ४४० ४४७. १७. १७. ४८. न न भग ४८२ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट प्रस्तार छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ सङ्कताक सख्या ३६ भतम गग ४३ रज मगरा १७; कूलिका-१७ १७ नजमगग ६४. १७ १७ मन मगग नन मगम रययगग न ययग ग जर यगग ससय गग ८० स तयगग सजय गरा १०० ११२ १२२ १२४, लक्षणलीला कूलचारिणी विलुलितमञ्जरी भूरिघटकम् कलितकमलमाला पल्लवीविलास विकसितपद्मावली अमोघमालिका ललितागमनम ससूतशोभासार ललितालवलम् वार्ताहारी कडारम् उदितदिनेश जालपाद दारदेहा रोचकम सुधाधारा कुपुरुषजनिता कन्दविनोद विलम्बितमध्या विष्टम्भ फ्रोशितकुशला उपहितचण्डी धितकमला वृन्ता १७ १७. १७ १७. न ज य गग यनय गग सन य गरा समर गग रर र गग भभर गग रनर गग १४७ १७; दारुदेहा-१७ १८७ १६२. नन र गग भमस गग १४. १७ मस स गग स स स सग भ स स गग सभ स ग ग में भसगग २२० २२३ २४४ २४७ २५६ २७ ननस गग २८६ उपस्थितम जस त गग २,१०,१३,१८,१९,२०, रथ- पद-१७. वृत्ता-१७, सुकृति -१७ ६, १०, १३, १७, १८% शिखण्डित- १५ टी. १७; लयग्राहि-१०, १८, विध्वं- कमाला-१५ टी. १७, भासिनी-१७ २६३ प्राकारवन्ध त ततगग विहारिणी स ज त गग २१५ टी-छदोमजरी 'प्रभा' टीका, हरिदास कृत ।
४८४ ४] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट लक्षण प्रस्तार-छन्द नाम सख्या सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केता ७०१. १७. ७२० ७२० ७३१ नीला सौरभवद्धिनी भुजसहारिणी अच्युतम विदुषी तनरल ग नयस लग नरस लग रस सलग ७३२ स स स ल ग १७,१६ १०, उपचित्रम्-१७, १४; सुचित्र- १७; नरेश -१७. १७. ७४२ ७४७. ७४८ म स सलग ज तसलग र ज स लग १५ टी०, उपदारिका-१७ सजसलय ७४६ तज सलग ज जसलग ७५१ ७५२० ७५३ भज सलग न ज स लग १७ १७ १७ १७. १७ १७ म में सलग ८२०. ८२३. ८३२. सम्मदमालिका कनककामिनी द्रुता दारिका मालविका नाभसम् सौभगकला वीवध प्राशापाद भुजलता हरिकान्ता कलस्यववश मदनया खटका शल्कशकलम् उत्थापनी कुशलकलावतिका प्रयशिखा निरवधिगति दामघटिता धिमला कमलदलाक्षरी सामपदा मुखचपला गम्भारि कामुकलेखा सधयश्री न स त लग सभ त लग भभ त लग नन त लग जज ज लग Ess १७. १७. १७. १०, जिह्माशया-१७ त भज लग ८७६. ८८५ ८८६. ८६५ ६२८ मन जल ग भन जल ग १७ ने सभ लग नन भल ग समन ल ग नयन लग म सन सग तन न लग रररगस भमसगल तत त गब १०, रुचिरमुखी-११, समित-१७ १७. ६८५. १०२१ १७ १२१३ सन्दर्भ-अन्यों में प्राप्त वणिक-यत्त [४८५ लक्षण प्रस्तार. छद नाम सख्या सन्दर्भ-प्रत्य सङ्केता १३७२. १४००. १७७७. २०००. ३१ ६४ १२ पिवुलम् स सजगल कालवर्म म भ ज ग स सान्द्रपदम् भत न चल १७, १५री. दोपापीडम् मम स सस केलिचरम् नयमसल द्वादशाक्षर-छन्द भाषितभरणम् भसमम विषमय्याली नसमम तनम म मिथुनमालो न न मम विगुणस्तरणम् रसायम रसलौता ससयम १७. विशालाम्भोजाली तसयम १७. अम्माजाती-१७ धोणादण्डम् ज सयम मताली मतपम यसनविशाला ननयम लोलारत्नम् ममसम विवरविलसितम् त में सम १७ सुद्धान्तम् मनस म सासी स्वरपिणी यसररी मन भ म सुम्बाक्षी समम १७, सुधाक्षी-१७ मलयपुरभि मनमम पाहिनी तममय २० मममप २,३,४,६,१०, ११, १७, १८, १९, २२, पुरा-२. भाषिकी यमपये १७. समपहिला सरायप मिहिरा नसन १७ पारपासीसि प १७. प्रगुपारा प्रर १७, प्रसपारा-1७. बमोनिमा १७. १६७ प्रहपा-13. २५६. ३४८. ४८ १२५. .४.
४५६ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट लक्षण प्रस्तार. छन्द-नाम सख्या सन्दर्भ-ग्रन्थ- सङ्केताक म भरय ६८६. ६६२. ६६५. स भरय भभ रय ७१६ सय सय शसस य मत सय ७३७ ७४१ ७४२. तत सय १७ १७. १०; महेन्द्रवज्रा-१६% शिविका-१६. १०. १७. १७. १७. १७. १६. १६. १७, श्वेतमणिमाला-१७. जत सय मभ सय तभ सय जभ सय पुण्डरीकम् बधिरा घलभी केकीरवम् कोल लोढाल. वनिताविलोक. कुमुदिनीविकामा वसन्तहासः श्रुतिः स्मृतिः सिक्तमणिमाला विद्रुमदोला सुखश लम् करमाला विजयपरिचया कासारका-ता मापा परिलेखः घरमा कुम्भोनी शरमेया नीरान्तिकम् कलहसा ७५७ ७५८. ७८३. ७८४. भय तय न य तय १७. १७ ८१७. ८२०. ८३२. मभ तय सभ तय नन त य म त जय १७. त ज ज य जज जय ८७८. ८७६ भज जय म भ जय ८८१ ८८४. १७, धारी-१७. १७. १७. १७. १७. १०, १६ द्रुतपदम्-१७ दुतपदा-४, ११. १९; मुखरम्-११. ८८५. तभ जय ८८. न भजय ८६t. ₹न जय सन जय तन जय ८९३. ०६४. अदितपादम् परितोपा छलितकपदम् उपधानम् पथिकान्ता कुमुदिनी जन जय १७. ८६५. भन जय रयन य १७. १० कुमुदयिभा-३, तया ३ के अनुसार 'नयर य'लक्षण भी हैं। १९. प्रपितमदना भस नय सन्दर्भ-प्रन्यों में प्राप्त वणिक-वृत्त [ ४७ छन्द-नाम प्रस्तार- सस्या लक्षण सन्दर्भ-प्रत्य-ससाद नभनय १०१६. द्रुतपदम् १०२१. विरतिमहतो १०८०. ततम् तन नय ननमर २,१०,१८; ललितम्-१७, १४; गौरी-१७. १० वसन्तः-११. ११४२. गलितनाला जभयर ११६२. सरोजावली परर ११७६. मेधावली नररर ११६६. विप्लुतशिखा १२००. यिशितलता नजरर १२३६. सुतलम् २३६५. अन्तविकासवासक. तर जर १३७१. परिपुद्धिता रस जर १३७६. प्रसूमरमरालिका न सजर १३९०. विधारिता १३६१. पिालिका भज जर १४०४. सिरसा सनजर १४०७. अविरलरतिस भनजर रापिपा सभ भर १४७२. उज्ज्वसा मनभर पिपायिनी-१७. १७ पोरला-१७. १७. १०,१३,१७पपसनंगा-११ चलनेत्रिका १८ १५१५ विपुलपालिका ननर १५२४. उपलेखा १५२१. भससविनोदिता उ मनर १५२७. विरतप्रभा भभमर १५३१. मुसितासिमावनि रमन र प्रतियोगिता सपम १६६१. भुगतनुपी सरस १९६५. प्रतिक्षित भास १७.३. समना १०२८. ही १७१५. सपना भममम १३t बाग १७७४. दिसायनम् ..स मीगिरिता मारास १७:१ौ.
४८८ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छन्द नाम लक्षण सदर्भ ग्रन्य सङ्घताडु प्रस्तार- सख्या भभसस म त तस मस जस यस ज स सस जस तसजस १७, उपवनमालिका-१७ १७ क्रमुकवती-१७ सभभस भभभ स १७ जन भस न स न स सतनस १७६३. यनिताभरणम् १८२५ सुभद्रावतरणि १८८१ विरलोद्धता १८८२ सुविहिता १८८४ उदकरचिता १८८५, मुवनमालिका १९७२ नगमाहिता १९७५ सम्मदवदना १६५२. कुमारराति २०१६ उदयनमुखी २०२० रसिकपरिचिता २०२६ घ्यायोगवती २०३० वियोगवती २०३१ सममवती २०४४ ज्वलिता २०४५ रूपायलि २०४६ अनीचकम २०४७ भासितसरणि २०४८. कृतकृतिका २३६८ विकलबकुलवल्ली २४०६. निमानकीला ३२६५ धासरमणिका ३५०५ अरिला १७ त जनस जजनस भजन स सननस त मनस जननस १७. भन न स १७. न ननस १७, फतिका-१७ नन तत १७ ज तजत भ स स भ सभ भभ प्रयोदशाक्षर-छद म त स मग म भ समग १७ भ भ ज मग १७ भ भ भ म ग नरममग १७, विपन्नकलन-१७, विपन्नकवलम- उल्काभास २२५ २४१ लीलालोल कलाधाम वासविलासक्ती ४३६ ४७२ विपन्नकदनम ७४ नयतयाग विक्षा ६७५ रसधारा १००६. प्रज्ञामूलम नयन यग १७ १७ १७, भद्रा-२२ मभनय ग सन्दर्भ-ग्रन्थों में प्राप्त वणिक-वृत्त [ ४८६ लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ सङ्केता प्रस्तार- छन्द-नाम सख्या ननमरग यमर रग याप र रग त यररग ररररग मनर र ग ननर रग म त स रग क्षमा १,१५४. चञ्चरीकावल १,१६२. दर्पमाला १,१६५ মাললীলা १,१७१. श्रद्धरान्ता १.२०६ धानता १.२१६. प्रमोदः कोडुम्भ १,३६८ सुकर्णपूरम् १,३७२ जगत्समानिका १,३६०. अतिरहः १,४६१ माणविकाविकाश १,४६६ कोरलेखा १,६३६ प्राननमूलम् १.७५३ लोध्रशिखा उपस्थितम् गौरी १०. १७, १४; चन्द्रणी-१०; चन्द्रिका-१६. दर्भमाला-१७. १७. १७. १७. १७, चन्द्रिका-१०. १०. १७ न र जरम स सजरग ज ज जर ग तभभ र ग न र न रग भ त य स ग म स स स ग ज सतसग न न त सग १०; २ के अनुसार 'न न न सम' लक्षण है। ययज सग म स ज स ग स स ज स ग १७. जसजसप भस ज सय न नभसग १७, साला-१७ १७ १७. १.. २६. न जनस तत ततग १,८६६ शलभलोला १,८८१ पकजधारिणी १५.४ पुबेरकटिका १८८६ रुचिव १,८८७ मयूखसरणि १,६८४. विधुरवितानम् मदललिता पारायत. २,४२. प्रवाहिका २.३४३. स्विन्नसरीरम् २,३४४. उर्वशी २.३५१. चामवदना २,३५२. किरात. विपत् २.३६६ भसप्तमंदम् २,४००. कटिनी ज तत तय भ तत तप न त स त ग भजतत १०, परिवटम्-१७, कौमुदी-१६ नजततग मन ततग भ सजत ग मसवत ग १४, पुटिलपति -१४ १७. भमसपदम-१७. १७.
४६० ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छद नाम लक्षण सदभ ग्रथ सङ्कता प्रस्तार- सख्या तत जतरा ७ तभजतग २४०५ वृद्धधामा २,४२१ ममस्फुरम २७०६ पपदवती २७१० प्रखण्डमण्डनम २७३१ कलापतिप्रभा २,७५२ अशोकपुष्पकम २,७६२ करपल्लवोदगता २,७६३ साद्ध पदा २७६४ सुदन्तम तररज ग जर र जग रज र जग १७ १७, निस्तुपा-१७, १७ १७ १७, प्रशोकम-१७ ननरजग य यस जग रथसजग सय सजग १०, अम्बुदावली-१७ मणि कुण्डलम-१६ १० मजुहासिनी-१४ १७, मजुभाषिणी-१९ १७ १७ २७६० मजुभाषिणी जत सजग २,७६५ मजुमालती रज सजग २८०५ विरोधिनी नभ सजग २८१६ नलिनम न न सजग २,९०७ चद्रहासकरा २६०८ द्रुतलम्बिनी सस ज़जग २६.६ कनककेतकी त स ज जग २६१० गरुदवारिता जस जज ग २६११ अमितनगानिका भ सजज ग्र २६१० प्रापणिका जत ज ज ग २,९२६ गुणसारिका जजजजग प्रमोदतिलका तभ जज ग २६३६ सारसनावलि न भ ज ज ग २९४३ उपचितरतिका भनज जग २६८२ उदात्तहास जत भज ग ३०४६ कलनायिका जतन जग अभ्रभ्रमशीला तय सभाग विदला नसतभग ३,४२३ प्रपातलिका भ सजभग कर्मठ भभ भभग लवलीलता भरन भग अनिलोडतमुखी नररनग ३७७१ प्रमोधफलिता ३७८८ कोमसकल्पकसिका सय सनम १७ १७ गणसारिका-१७ १७, अभ्रकम-१० १७ १७ १७ १७, प्रगचि '-१६ १७ सन्दर्भ ग्रयों में प्राप्त वणिक वृत्त [ ४६१ छद नाम प्रस्तार सख्या लक्षण सदभ प्रध-सताङ्क रन स नग स भ त नग सन मग नयनमग सस ननग १७, परिवगिता-१७ भ सननग सभनन ग १७. वनिताक्षी-१७ १७, निरावलि-१७ तभननग ३,८३५ परगति ३ E६२ अभिरामा ३६६४ उपसरसी ४,०४८ मदनजवनिका ४०६० परिवशिता ४.०६३ अर्धकुसुमिता ४,०८४ विनताक्षी नरावलि प्रभीरका ४,०८७ कनकिता त्वरितपति ४४६. सुखकारिका ५,८१३ अट्टहासिमी प्रङ्गरुचि ७८.७ पालि ८,००० पमानि ४०६५ ४०८६ जभननग भभननग ननननग १०. हरवनिता-१७, उपनमिता-१७ सजजमल तभरसल भ भभभस भमायनल नमतनम चतुर्दशाक्षर छन्द १७, पातप्यान्तम्-१७ १७, गुपिदु-१५, पूर्व-१७ २०५ यशोत्सा ६१ कालध्यानम पारावार १,२६३ प्रपन्नपानीयम १.२६६ पनि दगुविदु १५३७ धीरध्यानम १७४४ ललितपताका २,०२२ सम्बोधा विध्याहटम् २२१ सामी त यस मग ममन पगग त ननय गग तयतरगग ममतगण मममस गग नयसस गग जतनस गग मरमतगग मरतत गग १७ च्याटम-१७ धगगासा-.६ बिम्बासम्यम-१७ २.१२२ दृप्तये। बघ्र लक्ष्मी शरभासरणि २४ पुष्परा नियत्ताराचार परततगग ररततग ससतत भसतगग मतततगग १६, मामी-11 ४६२ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट प्रस्तार छद नाम लक्षण सन्दभ ग्रथ सङ्केता सख्या १७ र त त त गग न त त तग ग नभन तगग भन यज्ञराग २,३३६. कल्पकान्ता २,३४४ परीवाह शरभललितम २,६८७ वाटिकाधिकाश २७३१ अकशेपा २७४० मदावदाता २८०४ वशमूलम २,८०५ चेलाञ्चलम १०, शरभा-११ १७, वाटिकाविलास-१७, वाटिका- १७ १७ १७, सुनन्दा-१६ १७, वेलाञ्चलम-१७ वेलातरम सभरज गग सभ स ज गग तभ सज गग जभ स ज ग ग नभ सजग ग मम स जगग मन त ज ग ग नजनज गग त जयभगग त यस भगग २.८०६ कुसुम्भिनी २,८०८ विलम्बनीया २८१६ अनन्तदामा नदी कुमारी कृतमालम ३२८७ शारदचन्द्र ३,३१३ परिणाही रतिरेखा ३४८४ मन्मथ २.५११ जाहमुखी वलना ३,८९२ प्रतिभादर्शनम राजरमणीय १४ १७ १७ १७ मभस भगग तय भ भग सस भ भ ग ग भभभभ गग रन भ भ ग ग सभत नगग १७ १०, लता-११, धनलता-१६ ज सरन गग वरसुदरी सुपवित्रम ४००६ उपचित्रम ज्योत्स्ना ४६७२ करिमकरभुजा ४,६८२ प्रपात जलदरसिता ४.४४ पच्या ५२६७ कल्पमीलिता सुधाघरा भजसनगर त र ननगग ननननन ग म र मयल ग नन म य लग याय य य ल ग न स य य लग स ज स यल ग १०, २०, रूपगोस्वामिकृत वत्सचार णादिस्तोत्र मे 'प्रफुल्ल कुसुमाली' है। १४ १४ १० १६, अलिपदम-१७ ५, १०, ज्योस्निका-५ १०, कामला-१५ १७, प्रथिता-१९ रजत र लप सन्दर्भ ग्रन्यों में प्राप्त वणिक वृत्त [४६३ प्रस्तार. सख्या छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ अन्य सई ताक २रजर लग १७ १०, १४. जरजरलग नरन र लग सजनरल ग नमन र लग न परसलग मरस लग १७, अलिकालका-१७ २०१६ तभर सलग भभरस लग रनर सलग ससस सलग स समतल ग स स स तेलग १७, क्रीडावसथम्-१७ तय भतले ग भभभत लम कलाधर ५,४६२ फुडशिका सुकेसरम् सुदर्शना वितानिता सिंह जया मलकालिका ५८१५. दर्दरक ५५१६ गगनोदगता ५.९५२ विनन्दिनी ६,१७२ भूरिशिखा ६३६४ क्रीडायतनम ६५४१. नासाभरणम् ६५८३ कणिशर ७,०३२ विपाकवती ७.०८६ काकिणिका ७,०७७ कारविणी ७,३१५. फूललितम ७,५३२ कलहेतिका ७५३५ प्रञ्चलवती ८,०२७ गगनगतिका .०८१ निमुवतमाला कामशाला उन्नर्म उपकारिका ११६३१ हेममिहिका ११.६३२ हेति १४,०४४. मधुपालि १६,०००. वेशम्भरि १७ ज ज भज लग भजभजत ग रररभ लप भलय भजजभलग ₹सजनलग १७ म र भन लग भभस सगल १७ राजजभ गल गजजभयल 2 2 ܃ ܃ ܃ ܃ ܃ १७ नजज भगल ससस सलल मन य न लल १७ पञ्चदशाक्षर-छन्द १३. पन्नाली १६ स्फोटकीडम् तमममम मयममम १७ ४६४ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट प्रस्तार- छन्द नाम सख्या लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ सङ्घताङ्क भासस मम १७ मागमम र नसत म ररत तम सभसभ म ममतनम ययययय १७ मनर यय ननर यय १० भय ससय तजससय सज ससय भत न तय १०,१६ नयन जय जसन भय न न समय १६. २२३ क्रीडितकटका ४३३. चावंटकम् २२६६. यानद्धम् चन्द्रलेखा ३,३१६. बहुलाभ्रम् ३,११ घाणीभूषा ४,६८२ सिंहपुच्छम् ५,५२५ कुमारलीला ५,५३२. भोगिनी केतनम् शिशु पभ ६,६३१ दीपकम् ७१२० परिमलम् मयूरललितम् शरकल्पा चन्द्रोद्योत लास्यकारी ६,६६८. मदनमालिका मृदङ्ग प्लवगम ११.६३१. मयूवदना ११.६३२ कलभाषिणी ११,७१२ गौ ११,९६३. सारिणी ११.९६८ चमरीचरम् १२,४६६. जननिधिवेला १३,०५७ लीलाच द्रम् १३,५०२ धोरितम् १४,०१५ शान्तसुरभि १४,२६० कर्णलता विशकलिता १५,७५७ शीर्षविरहिता १६.०५३ पाडावली ननमरर नरन र र १७ तभज जर भभतभर भजज भर न ज ज भर नम भ भर १७ १० १६, अरविन्द -११, १६ १७ ननरन र नय समस मम त यस १७ १७ भने रस भन रसस सभभस स 22 मभस भस १७ तय भभस तभर न स सन्दर्भ प्रन्यों में प्राप्त णिक-यत्त [ ४६५ प्रस्तार- छन्द-नाम सक्षण सन्दर्भ-ग्रा सङ्केतार २३.१३१ महिनी २३.२६४ मितमश्यि रसय जज मस सजज पोडशाक्षर-छन्द १०, २०. १,०२४ माल्योपस्थम् ४.६६. कल्पाहारी येल्लिता ५.५३६. प्रतीपवल्ली ७.१५६ प्रारमटी २,२८० बकावलोक सुरतललिता १७ मननयमग नननन माग सस सन मग सस भरमग भभन जयग मनमरर ग मम सतरग रजरजर ससस जरग समत यसप मायनय सग तन न यस ससस ससप चित्रम् १०. १७. १७. २०१६२ प्रभिधात्री १३,१०८ अनिलोहा बान्तम् १३३०९ भोगावलि १४,०४४. कामुकी कलपीत- १०, सोमडकम-११ पदम्-१७ १०. कमलदलम्-१६. ननन जस ग नयम भसय तय समसग १७ परिखापतन-१७ ससस भसग म भसभ सग १०, स्मरशरमाला-१९ ससितपदम् १५,३७६ घलिवदनम् १५,५६५ सूतशिखा १२,५८०. परिसायतनम् १५,६०१ मालावलयम् दारमाला १६,३६६ भीमावत्तं १६,३५४ शिशुभरणम कोमललता २३,२६४. तरवारिका मङ्गलमगना २५.५५२. कमलपरम २७,८२४ मणिकल्पलता १७. १०, २० भभभभ सग मभन म सग न न न न स ग मत सततग न स स जब नभ जज जग नयन यभग नजर भ भग ६, १०, १४; त्रोटकम्-१७% चिन्तामणि-१६७ इन्दुमुखी-१९ ननन नभग २८,६७२ कलहकरम् प्रमुदिता भरनरनग १ ४६६ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छन्द नाम लक्षण सन्दर्भ ग्रन्थ-सडेताव प्रस्तार- सख्या न भजस नग भ तन तन ग भर यनन ग रन न न न ग २,१०, १४ १०, २०, २२. ३०,५८४ नरशिखी ३१.२०७ सारवरोहा घरयुवतिः ललना ३२,७६८ चलति ३६,६६७. दन्तालिका ४३,६६७ कल्पधारि ५२,४१७ कुल्यावर्तम् न न न न न ग त म रमायल रर र ज र ल ममस भतल १७; चारि-१७. १७; कुल्यावृत्त-१७ सप्तदशाक्षर-छन्द नमरमरगग ११.६६८ वीरविश्राम १६,१०३ वल्वनम् १६,१८१ राशनम् भभ तन सगग तनातन सगग २०,३६६. कामरूपम् मरभनत गग स स ज भज गग २३,६०० प्रतिशायिनी १७, वल्गुजम-१७ १७, कूराशनम्-१७, सिनं-१७) कूरासन १७, १७. २.१०, १४, १७,१६ यादवी-११, चित्रलेखा-१४ १७ १० १८. १७ १७ १०, १६ २३,९०४ शायिनी पाणिनी ३२,३२० सलेखा ३२,३८३. तितिक्षा ३२,७६८ वसुधारा रोहिणी ३८,७५१. बालविक्रीडितम् ३८,७५८ कालसारोद्धत कान्ता हरि. ५२,४६५ विरुदस्तम् ५२,६६३ कासारम् ५६,१६७ घशल विलासिनी ६४,६१२. विधुरविरहिता ६४,६२४. शुकवनिता ६४,६४७. वाहान्तरितम् न स ज भ ज ग ग न ज भ ज ज गग नन मननगग भने यननगग न न न न न राग न स मम य ल ग भस जसय लग जत जसाय लग यभ नरसल ग ननमरस सग ममें सभ त लग म मत न त ल ग भ त ज ज जलग न ज भ ज भ ल ग सतय भन लग स सभाभन लग तन मभन लग १७, शिगुरुवनिता-१७ सन्दर्भ-ग्रन्यों में प्राप्त वणिक-वृत्त [ ४६७ प्रस्तार- सस्या छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्य सतात ६६,३६२. कर्णस्फोटम् ७४,८६६ प्रतीहार: ७५,७१४, कान्तारम ८१,१४०. फल्गु ललितभृङ्ग न च तनमगल रररररगल यमन सरगल सभ समसयत भसन जनगल १७ स्पगोस्वामित रास कीडास्तोत्र अष्टादशाक्षर-चन्द १७ ३१,४५०. परामोद. यस सजनम ३२,२३०. विलुलितवनमाला न न मन न म अनङ्गलेखा नसममयय चन्द्रमाला नन ममयाय ३७,४४०. नीलशार्दूलम् ननमय याय १७, नीलशालूर-१७; नील- मालूरम्-१७ १६ मन्दारमाला ४४,०२५ सत्वेत पङ्कजवक्ता सतनय यय मन नजर य नन स स तय भभभभनय १०, पडूनमुना-१६० १०, विधित्ति -११. १. वाचालकाची-११,२०. ५, १०,१४ काञ्ची फेसरम् ७४,८६६ सिन्धुसौवीरम् निशा मर भयरर म मन परर रररररर ननरररर १०, तारपा-११, महा. मालिश-१४ ननरम नर ७७,५०४ पविणी ७७,८०६ कोडकोटम् युदगुदम् ८६... यमुपदमञ्जरी हरिणोपदम् ९३,०१७ हरिणम्लुतम् पुरणिका धलम् ९५,७०४ पटपटेरितम् ६.६४ पायिवम् गुन्दार ममननरर सज सज तर नज भज जर न समतभर मसजजभर मसन जमर ममननभर ननरमर जमजसनर नमन मनर १०,१४, भषलम्-१. उपगोस्वामित-प्ररिष्टयपरतोत्र ४६८ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केता प्रस्तार- सख्या १,१२,३४८ परिपोषकम् क्रीडा स स स स सस यमन स त स १०. सुधा-१४; मुक्तामाला- १४, १७. १०,१६. १०.१६ १६ १७, प्रद्धान्तरालापि-१७ १७. सुरभि सन जनभस मणिमाला भभभमभस १,२६,३६१. अश्वगति भभ भभभ स १,४६,७६७ अर्धान्तरालापि तततततत १,४६,७६८ पतङ्गपादः ज तत त त त २,२४,६६५ होरकहारधरम् भभभभभभ २,४६,६६१. दण्डी तन तन तन एकोनविशाक्षर-छन्द २०,४६६. झिल्लीलीला नयमम जम ग ३१,२२५. विधुनिधुवनम् मन न त नमरा ४८,१८६. माराभिसरणम् त न म भ सय ग ७४,८६६. लोललोलम्बलीलम् र र र र र र ग विस्मिता यमन सरर ग मुग्धकम यमन नररग माधवीलता मरनस सजग रतिलीला जस जसजसरा तरुणीवदनेन्द ससस सस सय १,३०,३४६. किरणकोत्ति तज तभन सग बञ्चितम् मत न स त त ग १७ १०,२० १०, चन्द्रबिम्बम्-५, बिम्ब- १४, विचितम्-१४. १७ १७, प्रपञ्चम्-१७ १,५५,४८१. शिलीमुखोज्जृम्भित म स ज न ज त ग १,७४,७६३ कलापदीपकम रज रज रज ग १,७४७८४ प्रपञ्चचामरम् नरज रजप पञ्चचामर नन स ज रज ग १,७८.१३६ कल्पलतापताफिनी मन न स स जग मकरन्दिका यमन स ज ज ग मणिमञ्जरी यभनय ज जग तरलम् न भर स ज ज ग अजितम् रस स त ज जग १,९२,१६२ निर्गलितमेखला ननर नभजग वायुवेगा मसज सन जग ५, १०, १४. १०,१६ १०, शाङ्गि-१६. १०, २२.
५०२ ] वृतमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट छन्द-नाम लक्षण स दर्भ ग्रन्थ सङ्कता प्रस्तार- सख्या ३.१० २२ १७ १९. १०,२० १७ १० १०. १७ १६. १७ ४७,६३ ४६१ गङ्गोदकम मेघमाला ननरररररर ४८,४८,३०१. उत्कटपट्टिका त जर जन सरर महामदनसायक नभ ज भ ज भ जर विभ्रमगति म सज सततभ र ५६.६३ ६१२ शम्बरम नभ भरम भ भर ८३,६८,५६७ वेल्लितवेलम् भभभ म सननस द्रुतलघुपदगति भ भ भ त न न न स सम्भ्रान्ता नयभत न न न स ८३,८८,६०० अतुलपुलकम ननननननन स पञ्चविंशाक्षर-छन्द मन्तेभ ममम ममत यमग २६,७६,६०३ शरभूरिणी रस ज ज भ र सयग ४७,६३,४६१ ह्रीणहयगवीनम् र र र र र र र र ग ७२,०२,८१५. नोपवनीयकम् भनन सभ स स सग ७५,७६,८०८ कुमुदमाला न त स भ प न त सग ८२.८३,६०४ रसिकरसाला मन स स भ तन सग ५३,६२,४८६ विरहविरहस्यम मन न त य न न स ग ८३,८१,३११ भास्करम भन जय भनन सग ९५,६२,४६७. चित्तचिन्तामणि र र र न ज त त त ग १,१३,८५,९७३ व्याकोशकोशलम तब भ ससस जग हसलय नननन सभभभ ग १,४३८०,४७१ शिविका भभभभभभ भभग १,५४,४५.६६१. भाविनीविल- ₹न र नरन र नग सितम् १.६१.७५.१६८ विशेषक्वलितमान न मम ज ज ज नग चपलम् न ज ज य नमनन ग १,६७,७४,७१७ घभ्रमणम तनम सननन नग हसपदा तय भ भ नननन ग १६७,७७.२९६ अलका नमन न न न न न ग १६१,७३६६२ मल्लपल्ली पय य य य य य य स प्रकाशम् २,३५,२५,०८४ सौदामनदाम ससस स न पसल १७ १७ १७ १७ १०,१६ १७ १७ १७, विशेपित-१७. १० १७, प्रतिका-१७ .
सन्दर्भ-प्रन्यों मे प्राप्त वणिक वृत्त [५०३ सन्दर्भ-ग्रन्थ सङ्केता १७ २७ प्रस्तार सख्या छन्द-नाम लक्षण पविशाक्षर-छन्द ३३,९६,१६६ तनुक्लिवि मममनजनतामग ञ्चितम ३६,६४,५७६. विनयविलास. नयनयनयन यग ग ६५,११,४१७ विश्वविश्वास मय यय१रत त गग २५.३४,६६१ प्रशोकानोकहम म भन भन र त त ग ग ६५,८७,०६१ आभासमानम् य यय यत तत तग में २५.८७.०६५ वीरविक्रान्तः मनजतततततम १,११,८४.८११. विकुण्टकण्ठ रजरजरजरजमग १,१२,०२८१६ चारगति ननस मन जरब गग १,५७,९०,३२१. भमनशलाका मन समनयतनगग १,६७,६७,८७१ उभितकदनम भ न च ज ज न न न गग मकरन्द नयन घनननन गग चनलतिका ननननननननगम १६१,३२,६६२ कुहक्कुहरम मन मयन न मयलग १.९२,४६.२८५ सूरसूचक मस ज स स स य य लग १,६८,१५,६१०. विषाणाश्रितम् य न र भ ज त स य ल ग २.२३,६९,४२७ पिनिद्रसिन्धुर र र र र ग र जर लग २.२३,८०,१७७ शान्तकुतत मररने नरजर लग २,८१,४२,४२७ काक्लोक्ल रसबमरस जलग कोकित सुपावला मन भ ज ज ज भज लग २,९३,३०,६४३ शृङ्खलवलयित भन न भ म न न ज लग ३,२१,७१७९२. विरामवाटिका न ज रस नजर न ल ग ३,३५,९२,८२१ वर्णाटकम् तभमभज मनन लग मापीड भनमस मनन नलग वेगवती नवन समन मन नग २,८३,४७,६६८. कुम्भकम न न ररररररग स ५,७५.२१.८५४ ससस सससस ससस १६ १७ १०,१६. १. प्रवीणर-चन्द २७ मानावृत विषसितमम् मासाराम मततततनयाय म भनननननस ममतमममम मम ५, ६, मातापित्र-1. १६, मातापत्तम्-१६. २७ ५०४ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट वणंसस्या छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केता २८. २६. त्रिपदललितम् विभङ्गी प्रमोदमहोदयः १६. १०. १६. नननन भन भन स न समन त जत सय म त य त ननन र सलग नननन न न न न न लग नन भन जन न न न लग भ ज स न भ ज स न भय न न न न न न न न न नग ३१ वर्ण २६. ३०. ३१. १०; वृत्तललितम्-१६. ३१. मणिकिरण नृत्तललितम् लहरिका विशाल खञ्जविशालं उपविशाल खजोपविशालं चक्र चित्रलय प्रतिच्छन्दः ललितलता पिपीलिकादण्डक: पणवदण्डकः ३१ वर्ण ३२ वर्ण ३२ वर्ण ३२. ३३. ३४. ३४. ३८. ३८. ४२. भन नभनन भन न भय भनन भनन भन न भ न ग १६. म मत न न न न न स ज ज ग २० मेघदण्डक-२२ न-१२, लग १०,१६. ममतननननननन र सलग २२. ममतनननननननम जभर २२. मम तनननननननन ४६. करभदण्डक. न सज जरा ममत नननननननन ५०. ललितदण्डकः २२० धारी उपवारी ननन र सलग ४६ मात्रा ४२ मात्रा अर्णवः व्याल: दण्डक-छन्दः [न न र-६ ] ५,६,१०,१३.१५, १६, १७, १८, १९ अर्ण-२२. [न न र-१० ५, ६,१०,१३,१५, १६, १७,१८,१६, प्सवः-२२. [न न र-११ ] ५, ६,१०,१३, १५, १६, १७, १८, १६) ध्याल:-२२. [न न र-१२] ५, ६, १०, १३, १५, १६, १७, १८, १६% जीमूत-२२० ३६. जीमूत: लीलाकरः सन्दर्भ प्रन्यों में प्राप्त वणिक्-वृत्त [ ५०५ वर्ण- छन्द नाम लक्षण सन्दभ प्रायन्सकैताइ स उद्दाम [न न र-१३] ४८. नाद्ध विश्यवाद निन र-१५] ५४. कालदण्ट [न न र-१६ ] ५७ पौण्डक [न न र-१७ ५६,१०,१२,१५,१६,१७,१८१६, लीलाकर-२२ ५,६१०.१३,१५,१६,१७,१८१६ ज्दाम-२२ १७, समुद्र -६, १0 प्रकं - १६, माराम - १४, माला-५, सिह -२२ १७, सग्राम-१४, १७ भुजग-६, १०, चन्द्रश -१६, माला-५, समुद्र-२२ १७, सुराम -१४, भोगोड-१६, माला-५, भुगन-२२ १७, बैकुण्ठ -१४, पीयूष '-१६,माला- प्रचिव-२२. १४,१७, धाराह-१६, माला-५ प्रचिताः-२२ १४ १७, यात-१६. माला- १४,१७, माला-५, महापण्डवृष्टि-१६ १४१७ माता-५,महाचण्यष्टि-१६, उदारपाद मिन २-१८॥ ६३. सोत्कण्ठ न न. र-१६] सार [न 7 र-२० । [न न र-२१ ] ६६ कासार . ७२ " 1 ७८ . " " १ ८४ " . . " . " . . विस्तार (न न र-२२ । सहार (नन र-२३ नोहार नन र-२४ ] मवार निन र-२५ ] वेदार (नन र-२६ ] साधार [न न -२७ ] सकार (नन र-२८ । साशर नन र-२६ ] विम मन २-३. ] ओपनाती नम ~it] सानर मार-१२ ] सदोह [नम -३३ ] निम र-३४ पन्नग सम्भोस मग we ऐसारसी मिर-१.] मामती [RT-18 ] . १७, मारद-१४.माता- १७, गोविड-१४,. . H . १०२ W " । . - २८ १७ ५०६ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट वर्ण- सख्या छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सङ्केता ४०. २८. २६ २८. २६. ३१. ४८. १७. ५७ केलि [नगर-१२] ककेल्लि. [न ग र-१३] लीलाविलासः [न.ग २-१४] १०, १६, शकायतनम् [भ-ग ] भुजगविलासः [भ-६, ग ग ] लावण्यलीला- [न. य-८, ल प्लुतम् मालानिकम् [न न र य-६, ल] १७. स्मारमाला [स, य-८, ल ग ] १७ कुल प्रास्तबक [न य न य न य न य न य ल] १७. विदग्धसुभगी [त न त न त न भभ तन तन तन भ भा विशेषस्तवकम् [न य न य न य नयभ सभस भसमभस भस] चण्डपाल [ल ५, र-] ५, घण्डकील-१६ चण्डफाल-१०. [ल ५, र-१० सिंहविक्रान्त [ल ५, य-६] ५.१०.१४, १७. मेघमाला [न न म म, य-६] ५, १६ [न न यथेष्ट मगण] १६, [न म यथेच्छ यगण१०] चण्डदेग [न न. य-१.] सिंहक्रीडा [य-१०, गग] कामवाण [त-१० ५, १०, दाम-१६, [यपेच्छ त, ग २, स, ग २, ज, ग २, य, २] १६. सिंहविक्रान्त [ल-५, य-८ ] उद्दातरः [म-१२ लिपिकोर [प-१६ १०.१६; सिंहविक्रान्त-१४. वितानम् {ग-१२ वतुंम [भ-१२ २६ ३२. ३२ 1 २६ ) ४८ --- -- सन्दर्भ-प्रन्यों में प्राप्त पणिक-वृत्त [ ५०७ घणं- सस्या छन्द-नाम लक्षण सन्दर्भ-ग्रन्थ-सदाद ३६. १०. ३०. ८६ प्रचलः नि-१२ वर्णक: नि न. म-७, ग.] ४. नन. र ज रनर जर ज रल.ग] उत्कलिका नि न, पचमात्रिकाण यथेष्ट पाललीलातुरः १० गण ऐच्छिक) मनोहरणकविरा १० गण ऐच्छिक, स-२] १७. कुसुमितफायः मिम त न त य ज त रभस समसभस भस भतय समेत यस भन न पग] १७. मकरालपः निगर, सप्ताक्षरगण यथेच्छ सिंह. [ल ३, यथेच्छ गण] १६. लि. ४, पच्छ गण] |स. ५, ययेच्छ गण } धात (ल. ७, यच्छ गण] १. महादण्डक. [नन, र-३३३ 1 राममगुन्दरत विज्ञप्तिपत्रो मन्दः चण्ड घणं पृतनाम सध्या (३) तमिनी (३. १२) शिसो (३,१६) नितम्बिनी (३,२०) पाणी पद्धंसमवृत्त विषमघरो समबरणों सन्दर्भ-प्रम्प-गरेताr बालक्षरप. पापक्षण ] [जरस ] १०. [र 1 [अरहर ] १.. ] [जरसरबर (३.२४) पतसिनो fr-पणंमाबारे पार मे प्रदुम पहला नाम भारतीय परोपर पूरा पाहिलीय मोर पतुप पररा रे पाचोर है। • पिम परा पनि प्रम दौर तमोर पाए Berms • गम पर दिलीप प्रौर तुपं पर मारा।
५०८ ] पत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ठ wwwwwred वर्ण सख्या वृत्तनाम विपमचरणो समचरणों सन्दर्भ-ग्रन्थ-सकेताक का लक्षण का लक्षण (५, ११) इला [स लग ] [स स स ल ग १० (५, २४) मगामुखी {स लग ] [स स स स स ससस १० (5,३) वानरी [ज र लग ] [र ] १० (८) प्रवर्तकम् र ज ग ग ] [ज र ल ग्र ] १६ (६ १०) सारी [त ज र ] [म स जग ] १७ (१०, १०) अतंलम् [ज त त ग ] [त त त ग 1 १७ अत्तिलम्-१७ (१०, १३) शुकावली [त जर ग ] [म न ज र ग ] १७. (१०, १२) समुद्र कान्ता ] [म स सय ] १७. (१०, १४) विलासवापी [त ज र ग ] स भ र ज ग ग] १७ (१०, १०) विश्वप्रमा [त त त ग ] [ज त त ग १७ (१०, १२) सम्पातशीला तिम र ग ] [स न मय ] १७ (१०, १०) घटिका [त स ज ग ] [स स ज ग ] १७ (१०, १३) जारिणी [न त तरा ] [र र न त रा ] १७ (१०,१) वासववन्दिता [म स जरा ] [त जर ] १७, (१०, ११) करधा [म स जग ] [न न र लग ] १७. (१०, ११) सुधा [म स ज ग ] [सभ र ल ग 1 १७ (१०,१०) प्रभासिता [म स ज ग ] [स स जरा ] १७ (१०, १२) मकरावली म स स ग ] स भ भ स ] १० (१०, १०) पालोलघटिका [स सजग ] [त स जग १७. (१०, १२) अरुन्तुद [स स जग ] न ज ज र ] १७. (१०, १०) प्रभासिता [स स जग ] [म स जग ] १७. (१०, १२) नवनीलता [स स जग ] स भ ज र ] १७, अवनीलता-१७ प्रवलीलता-१७ (११, ११) विपरीताख्यानिकोनि त ज ग ग ] [त त ज ग ग ] २, ५, १० १३. १७, १८,१६,२२ (११, ११) प्रास्यानिकी [त त ज ग ग ] [ज त ज ग ग ] २, ५, १० १३, १७ १६, प्राख्यानिका-१८ २०, २२ (११, १२) किन्नटक [त जज लग] [स स स स ] १७ (११,११) समयवती [त न त ल ग ] [समन लग] १७ (११, १२) शिशिराशिखा [न न र ल ग 1 [न ज ज र । १७ (११.१०) वयालो [न न र लग] [म स ज ग ] १७. (११, ११) पाटलिका [न य न ग ग ] भ भ भ ग ग] १७ (११, १२) साचीतवदना [न य भ गग] [त न भ स ] १७ सन्दर्भ-ग्रन्थों में प्राप्त वणिक-वृत्त ५०६ वर्ण-सस्या वृत्तनाम विपमचरणो समचरणो सन्दर्भ ग्रन्य का लक्षण का लक्षण सन्ताक (११, ११) प्रौपगवम् [ना रगग ] [भर र लग] १७ (११. १२) उपाढयम् [न स ज ग ग] [भ भ र य ] १७. (११, ११) करमोद्धता (म त र सग] [सन र लग१७ (११, १३) विलसितलीला भ भ त स ग } [न ज न स ग ] १०, १६. (११, १२) द्रुतमध्या {भ भ भ ग प्र] [म ज ज य २, ६, १०, १३.१७ १८, १६ २०, २२, चलमध्या-५. (११, ११)ोरस्तिा मम म ग ग] [न य न ग ग ] १७. (११.१२) पमलाकरा भि भ भ ग ग] [मन पाय ] १७ (११, १०) वगंयती [भ भ म गग] [स स स ग ] १७ (११, ११) प्रवाहिया [भ म भ ग] [स स स ल ग ] १७ (११, १०) केतु [भर न गग] (स ज सग (११, ११) प्रोपगवानम् [भर र स ग ] न र रग 1 १७ (११, १३) यदास्यम् [म भ न सग] [स स न न ग ] १७ (११, १०) युद्धविराट [म स ज ग ] [त ज र ग (११ १२) प्रमुरादमा (म स ज ग ग ] [न न रय ] १७ (११, ११) दणिनी बरन भग] [रन रस 10 (११ १२) किलपिता [रन रस ग ] [न न जर ] १७ (११, ११) सारिका रिम र सग] [र न भ ग 1 १७ (११, १०) सलिता [र स स स ग] [स उ जग 1 १४. (११ ११)शालभजिश [सन र स[भ त र लग ) १७ (११, १२) विमानिनि [सभ र सग] [मन जर १७. (११ १०) पमुपा [सभ र सग] [म सजग 1 १७ (११ १०) सुन्दरी [सभ र लग] सि सजग १७. गुरमालिश- १७. पियोगिनी-१७ ११. ११) प्रसरती [स मन स[तम त Arjs (११, १२) मासमारिणी [मसज प] [स भरम १०.२०. निम्बिनी- ११. उपोहाना-१७ वगतमासिरा-१७. परिपना-१७ पुगे पिना-१६,प्रिया-११ (११) हरिनुप्ता [म RAJ गमभर J१. (१२, १२) दातनिधि म तर ] [ RT } १५ गुरिती-१६ (१२ १२) पिपरीमामा गम ] [Rani | (१२. far ५१. ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट वर्ण-सख्या वृत्तनाम विषमचरणो समचरणो सन्दर्भ-ग्रन्थ- का लक्षण का लक्षण सकेताक (१२, १३) पद्यावती ति म जय 1 [स ज स स ग ] १७. (१२, १२) सरसीकम् [त भ ज य 1 स भ जय ] १७ (१२, १२) पानिधिः [त त जर ] [ज त ज र ] १९% नन्दिनी-१६ (१२, ११) प्रवाचीकृतवदना [त न भ स ] [न य भ ग ग ] १७. (१२, १२) भामा [त भ सय ] [जभ सय ] १९ (१२, १२) सिंहप्लुतम् त म सय 3 [ज भ स य ] १६; (थति-स्मति- उपजाति) (१२, ११) ईहा [न ज जय ] [भ भ भ गग] १७. (१२, ११) अपरवक्त्रम् न ज ज र ] [न न र लग] १७; मृदुमालती-१७. (१२, १०) अनूपकम् [न ज ज र ] स स ज ग ) १७. (१२. १३) मञ्जुसौरभम् [म ज ज र ] स ज य ज ग ] १४ (१२, ७) क्षान्ति. [न न नय ] [म मग J१६; चूडा-१६. (१२, १२) कौमुदी [न न भ भ ] (न न रर ] १४. (१२. ११) सुराख्या [नन र य 1 [म स ज ग ग] १७. (१२, १५) शरावती [न न र य ] [स भ न ज र ) १७ (१२, ११) किलकिती [न भ जर ] [र न र ल ग ] १७. (१२, ११) प्रकुसुमचरम् [भ न जय ] [भ भ भ ग ग ] १७. (१२, ११) आमलकी [भ भ भ भ [भ भ भ ग ग] १६; चुक्षा-१६. (१२, ११) उपाढयम् [भ भ र य ] [न स ज ग ग ) १७. (१२, १२) उलपोहा भिभ र य ] स भ र ज (१२, ११) विमानिनी [भ न ज र ] [स भ र ल ग } १७ (१२, १६) अहीनताली [म न जर ] [स भ स ज र ग] १७. (१२, १३) वियद्वाणी [म स ज म ] [सभ र यग१७. (१२, १०) कान्ता [म स स य ] [त ज र ग 1१७. (१२, १३) मृगीयवानो हर ज र ज ] [ज र जर ग] १४, १८. (१२, १३) चमूरुभीरुः [र नजर ] [स न ज र ग ] १७. (१२, १०) पातशीला (स न मम ] [तम र ग ] १७. (१२, १२) उपसरसोफम् [सभ जय ] [त भ ज य ] १७ (१२, १०) करीरीता [स भ जर ] [स सज़ " J१७. (१२, ११) लुप्ता [स भ भ र ] [स स स ल ग ] १७. (१२, १२) प्रभक्पक्ति [स भ र ज ] [भ भ र य ] १७. (१२, १३) अप्रमायिनी [सभ र य ] [न ज ज र ग ] १७ (१२, ११) प्रमालिका [स भ र य ] [स स ज ग ग J१७; उपोद्गता-१७ सौरभसचितम्-१७.
सन्दर्भ-ग्रन्थों मे प्राप्त वणिक-वृत्त [ ५११ वर्ण-सस्या वृत्तनाम विषमचरणो समचरणो सन्दर्भ प्रथ- का लक्षण का लक्षण सकेताक (१२, ११) नटक [स स स स ] [त ज ज ल ग ] १७ (१३. १३) प्रकीर्णकम् [ज भ स जग] [त म स ज ग] १९; (रुचि रुचिर. उपजाति) (१३, १३) निर्मधुवारि त भ र सल] [स ज स ज य ] १७. (१३, ४) लास्पलीलालय [त य र र ग ] [भ स त त ग ग] १७. (१३, १२) अञ्चिताना न ज ज र ग] [नन र य (१३, १२) प्रमायिनी नि ज ज र ग] [स भ र प ] १७ (१३, १४) मालेपनम् [न त त त य ) न भ य य ल ग] १७ (१३, १६) परप्रीणिता नि न त त ग ] [न न स त त प] १७ (१३, १३) विमुखी [न न भ स ल ] [न न स स ग ] १७. (१३, १५) प्रमोदपरिणीता. [नन र ज ग ] [न ज ज भ २] १७ (१३. १३) सुरहिता [न न स स ग ] [त न न न ग ] १७ (१३, १३) रुचिमुखी [न न स स ग ] [नन म स ल ] १७ (१३, १३) शिशुमुखी म मज ज ग] [न भ स ज ग ] १७. (१३, १३) अनिरया [न भ स ज ग] [न भ ज ज ग] १७ (१३ १४) प्रतिविनीता [न य ज र ग] [सभ र न गग) १७ (१३, १३) प्रत्परतम् [भ न ज ज ग] [भ न प न ल ] १७ (१३ १३) मरुतम् भि न य न ल] [भ न ज जग१५ (१३ १३) अनङ्गपदम् [भ भ भ भ ग ] [स स स स ग ] १७ (१३, १३) धीरापत म त प स ग] [म भ स म ग 1 १७. (१३, १३) धीरावतं. [म भ समग] [म त य स ग ) १७. (१३ १०) विशुशवती [म न ज र ग ] [त ज र ग ] १७ (१३. १३) मलिपदम् [र र न त ग] [न त त त ग ] १७ (१३, १३) मघुयारि [स ज स ज ग ] [त भर स स ] १७ (१३, १३) क्लनावती [स ज स ज ग ) [सज स स ग ] १७. (१३, १२) पद्मावती स ज स सग] [त भ जय J१७ (१३. १३) कसना सि ज स स ] [No सजग ] १७ (१३, १२) चमूरः [सन नरग] [रनजर ] १७. (१३ १२) विपद्वाणी स म र य ] [म सब म (१३, १४) मन्दाक्रान्ता [स स ज र ग] [म समरगय] १७ (२३, ११) कामामी (सन न ग ] (म मनग 1 १७ (१३. १३) भुजङ्गभूता [स स स स ] [भ भ म भ ग ] १७. (१४, १५) प्रवरोपवनिता [नभ भर सग] [स स न भ प ) १७. (१४, १३) पनासंपनम् [म म प यस] [नत तत ] १७.
षष्ठ परिशिष्ट गाथा एवं दोहा भेदों के उदाहरण गाथा-भेदों के उदाहरण १. लक्ष्मी यत्रार्यायां वर्णास्त्रिशत्संख्या लघुत्रयं तत्र । Cस्तारातुल्याश्चेत्स्युः गोक्ता तदा लक्ष्मीः ॥१॥ २. ऋद्धिः यनार्यायां वर्णा एकशिन्मिता यदा पञ्च । लघवः पड्विंशत्या दीर्घा ऋद्धिः समा नाम्ना ॥२॥ ३. मुद्धिः यत्रार्यायां वर्णा दन्तस्तुल्या भवन्ति चेद् दीर्घाः । तत्त्वस्सप्तलघूनां नाम्ना बुद्धिस्तदा भवति ॥३॥ ४. सज्जा यथार्यायां वर्णा देवस्तुल्या जिनोन्मिता गुरवः । नवलपवश्चेत्तत्र प्रोक्ता नाम्ना तदा लज्जा ॥४॥ ५. विद्या वर्णा वेदाग्निमिता गुरवो रामाश्विनिर्मिता यत्र । रुद्रमिता लघवश्चेनाम्ना विद्या तदा प्रार्या ॥५॥ ६. क्षमा याणाग्निमिता वर्णा प्राकृतितुल्यास्तु यत्र गुरवस्स्युः । ह्रस्वा विश्वनियमिता प्रोक्ता नाम्ना क्षमा सार्या ॥६॥ ७: दही पविशन्मितवर्णाः प्रकृतिमिताः सम्मवन्ति चेद् दीर्घाः । बाणेन्दुमिता लपवः कथिता सार्या तदा देही ॥७॥ वृत्तमौक्तिक में गाया और दोहा छन्द के प्रस्तार-भेद से नाम एव सक्षेप में माण प्राप्त है किन्तु इन मेदों के उदाहरण प्राप्त नहीं है मत: वाम्बल्लभ-प्रन्प पे इनके मायुक्त सदाहरण यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
५१२ ] वृत्तमौक्तिक-पञ्चम परिशिष्ट } १७. वर्ण-सख्या वृत्तनाम विषमचरणो समचरणो सदर्भ-प्रथ- का लक्षण का लक्षण सकेताक (१४, १३) लास्यलीला {भ स त त गग] [त य र र ग] १७. (१४, १३) सम्मदाक्रान्ता [म स ज र ग ग] [स स ज र ग] १७. (१४, १८) मादशी [स न स न ग ] [म न जन जय] १७, मातङ्गी-१७. (१४.१०) प्रकोशकृष्टा [स भ र ज ग ग] [त ज र ग ] १७. (१४, १३) प्रतिप्रतिविनीता [सभ र न गग) [न य ज र ग ] १७. (१५, १४) उरुगी [म न न न स ] [न न भ न ल ग] १६. (१५, १५) देवगीति [र ज र ज र ] [ज र ज र य ] २२. (१५, १३) प्रमोदपदम् [न ज न भ य] [न न र ज ग ] १७. (१५, १६) पासववासिता [न भ ज र य] [सभर ज स ग] १७. (१५, १२) बृहच्छरावती [स भ न ज र } [न न र य (१५, १४) प्रबरोधवनिता [स स ज भ य ] निमभ र ल ग] १७. (१६, ३) सारसी ज र ज र जय] [र ] १.. (१६. १६) वासिनी [त ज भ ज ज ग] न ज भ ज ज ग] १७. (१६, १६) वासघवासिनी इन ज भ ज जग] [त जन ज ज ग] १७ (१६. १३) अपरप्रीणिता [न न स त त ग] [न न त तग 1 १७. (१६, १५) अनासववासिता [सभ र ज स ग] [न भ ज र य ] १७. (१६, १२) हीनताली [सभ स ज र ग] [म न ज र ] १७. (१७, १८) मानिनी [भ रन जन [न ज भ स न स] १०. लस (१७, १८) मानिनी [भ र न भर [न ज भ स न स] १६. लग] (१८, १४) मादंगी हम न ज न म य] {स न स न ग ग] १६. (२०, ३) अपरा [ज र ज रज ] १. रल ग (२४, ३) हंसी [ज र ज रज र [र ] १.. जर (२६, ३१) सिसा [न न न न न न न न न न न न २. ५, १०, १३, १८, मन न लग] न न न न ग] १६.२०, २२. (३१, २६) सना निन न न न न न न न न न न २, ५, १०, १३, १८, मननन ग]] मन न लय] १९, २२.
गाया एवं दोहा-भेदों के उदाहरण
[ ५१५
१८. गाहिनी
नवयुगपरिमितवर्णा यदि दश गुरवो भवन्ति नियत चेत् ।
नगगुणपरिमितलघवस्तदनु भवति गाहिनी किल सा ॥१८॥
१६. विश्वा
वसुयुगपरिमितवर्णा यदि नव गुरवो भवन्ति लघवश्चेत् ।
इह नवहुतभुगभिमिताः प्रभवति फणिपतिभणितविश्वा ॥१६॥
२०. वासिता
नवयुगपरिमितवर्णा यदि वसुगुरवः शशियुगमितलघवः ।
फणिगणपतिपरिभणिता भवति तदनु वासिता किल मा ॥२०॥
२१. शोभा
इह यदि मुनिमितगुरखो हुतभुग्जलनिधिमितास्तथा लघवः ।
फणिगणपतिरिति निगदति भवति सनियममियमिति शोभा ॥२१॥
२२. हरिणी
यदि रसपरिमितगुरवः शरयुगपरिमितलघव इह तदनु चेत् ।
फणिपतिपरिभणिततनुः प्रभवति नियत सदा हरिणी ॥२२॥
२३. चक्री
नगयुगमितलघुगण इह शरमितगुरवो भवन्ति यदि नियतम् ।
फणिगणपतिरिति निगदति भवति ननु सनियममिह चक्री ॥२३॥
२४. सरसी
जलनिधिपरिमितगुरवो यदि नवजलधिपरिमितलघव इह चेत् ।
भुजगाधिप इति कथयति भवति नियतविहिततनु सरसी ॥२४॥
२५. कुररी
स्युरथ गुणमितगुरव इह यदि शशधरशरपरिमितलघव इति च ।
फणिगणपतिरिति निगदति भवति लसद्यतिरियं कुररी ॥२५॥
२६. सिंही
द्विकगुरुगुणशरपरिमितलघुविरचितंतनुरिह यदि च भवति किल ।
अहिगणपतिरिति कथयति नियतजनितविरतिरथ सिंही ॥२६॥
२७ हंसी, हंसपदवी ध
शशिमितगुरुशरशरमितलघुविरचिततनुरियमिह यदि विलसति ।
फणिगणपतिभणितविरतिहसपदविरथ
नियतकृतयति ॥२७॥
वृत्तमोक्तिक-पष्ठ परिशिष्ट
८. गौरी
सप्ताग्निमिता वर्णा नखमितगुरवो धनोन्मिता लघवः ।
यत्र स्युः किल सार्या तर्हि भवेन्नामतो गौरी ।।८।।
६. धात्री, रात्रीच
वसुगुणतुल्या वर्णा गुरवो लघवो यदातिधृतितुल्याः ।
फणिपप्रोक्ता सार्या भवति तदा नामतो धात्री ॥६॥
१०. चूर्णा
नवगुणपरिमितवर्णा धृतिमितदीर्घा भवन्ति चेद्धस्वाः ।
प्रकृतिमिता यदि सार्या प्रोक्ता नाम्ना तदा चूर्णा ॥१०॥
११ छापा
द्विगुणितनखमितवर्णा घनमितदीर्घा भवन्ति चेद्धस्वा: ।
विकृतिमिता यदि सार्या कथिता नाम्ना तदा छाया ॥११॥
१२. कान्तिः
शशियुगपरिमितवर्णा अष्टिप्रमिता भवन्ति चेद्गुरवः ।
शरकृतिपरिमितलघवो नाम्ना सार्या भवेत् कान्तिः ।।१२।।
१३. महामाया
यमयुगपरिमितवर्णास्तिथिमितगुरवश्च भोन्मिता लघव. ।
सार्या भवति तदानी फणिना कथिता महामाया ।।१३।।
१४. कौत्तिः
गुणयुगपरिमितवर्णा मनुमितगुरवो नवाश्विमितलघव. ।
स्युर्यदि यत्र च सार्या फणिना कथिता तदा कीत्तिः ।।१४।।
१५. सिद्धा
श्रुतियुगपरिमितवर्णा अतिरवितुल्या भवन्ति चेद्गुरवः ।
शशधरगुणमितलघवः प्रभवति सा नामतस्सिद्धा ॥१५॥
१६. मानिनी, मनोरमा च
शरयुगपरिमितवर्णा रविमितगुरवश्च देवमितलघवः ।
यदि फणिगणपतिभणिता सार्या खलु मानिनी ज्ञेया ॥१६॥
१७. रामा
रमयुगपरिमितवर्णाः शिवमितगुरवो भवन्ति यदि नियतम् ।
सरगुणपरिमितलघवो यत्र भवति सोदिता रामा ॥१७॥
गाया एवं दोहा-भेदों के उदाहरण
[ ५१५
१८. गाहिनी
नवयुगपरिमितवर्णा यदि दश गुरवो भवन्ति नियतं चेत् ।
मगगुणपरिमितलघवस्तदनु भवति गाहिनी किल सा ॥१८॥
१९. विश्वा
वसुयुगपरिमितवर्णा यदि नव गुरवो भवन्ति लघवश्चेत् ।
इह नवहुतभुगभिमिताः प्रभवति फणिपतिभणितविश्वा ॥१६॥
२०. वासिता
नवयुगपरिमितवर्णा यदि वसुगुरवः शशियुगमितलघवः ।
फणिगणपतिपरिभणिता भवति तदनु वासिता किल सा ॥२०॥
२१. शोभा
इह यदि मुनिमितगुरवो हुतमुग्जलनिधिमितास्तया लघवः ।
फणिगणपतिरिति निगदति भवति सनियममियमिति शोभा ॥२१॥
२२. हरिणी
यदि रसपरिमितगुरवः शरयुगपरिमितलघव इह तदनु चेत् ।
फणिपतिपरिमणिततनुः प्रभवति नियतं तदा हरिणी ॥२२॥
२३. चकी
नगयुगमितलघुगण इह शरमितगुरवो भवन्ति यदि नियतम् ।
फणिगणपतिरिति निगदति भवति ननु सनियममिह चक्री ॥२३॥
२४. सरसी
जलनिधिपरिमितगुरवो यदि नवजलधिपरिमितलघव इह चेत् ।
भुजगाधिप इति कथयति भवति नियतविहिततनु सरसो ॥२४॥
२५. कुररी
स्युरथ गुणमितगुरव इह यदि शशधरशरपरिमितलघव इति च ।
फणिगणपतिरिति निगदति भवति लसद्यतिरियं कुररी ॥२५॥
२६. सिंह
द्विकगुरुगुणशरपरिमितलघुविरचितंतनुरिह यदि च भवति किल।
अहिगणपतिरिति क्रययति नियतनितविरतिरप सिंही ॥२६॥
२७. हंसी, हंसपदवी घ
शशिमितगुरुशरारमितलघुविरचिततनुरियमिह यदि विलसति ।
फणिगणपतिमणितविरतिहसपदविरण
नियतवृतयति ॥२७॥
वृत्तमौक्तिक-पष्ठ परिशिष्ट
दोहा-भेदों के उदाहरण
यत्र
स्युर्दीर्घास्त्रयोविंशत्या तुल्याश्च ।
द्वो ह्रस्वी स्याता यदा पूर्वःस्यानाम्ना च ॥१॥
२. भ्रामर:
द्वाविंशत्या सम्मिता दीर्घा ह्रस्वा यत्र।
चत्वारः स्युमिरो नाम्नाऽसौ स्यादन ॥२॥
३. सरभः
चेत्स्युर्भू दस्रोन्मिता
पण्णागेशेनोदितो
दीर्घा ह्रस्वा
यहि ।
नाम्ना
सरभस्तहि ॥३॥
४. श्यनः
दीर्घा विशत्या मिता अष्टौ लघवो यत्र ।
पिङ्गलनागप्रोदितः श्येनः स्यादित्यत्र ॥४॥
५. मण्डूकः
दीर्घा अतिधृत्युन्मिता हस्वाः स्युर्दश यहि ।
ब्रूतेऽनन्तो नामतो मण्डूकं किल तहि ॥५॥
६. मर्कट.
दोर्घाः स्युर्घ तिसम्मिता ह्रस्वा द्वादश यत्र ।
पिङ्गलनागेनोदितो मर्कटनामा
तत्र ॥६॥
७. करमः
दीर्घाः स्युर्घनसम्मिता इन्द्रमिता. लघवश्च ।
ब्रूते शेषो यदि तदा नाम्नाऽसौ करभश्च ॥७॥
८. नरः
षोडश गुरवः सन्ति चेल्लघवो यत्र किलापि ।
पिङ्गलनागेनाऽसको
मालापि ॥८॥
नाम्ना
६.मराल:
अष्टादश लघवो यदा गुरवः पञ्चदशैव ।
मरालनामेत्यहिपतिः शेपो वक्ति
तदैव ॥६॥
।
गाया और दोहा-भेदों के उदाहरण
[ ५१७
१०. मदकल:
मनुमितगुरवो विशतिलंघवः सन्ति यदा च।
मदकलनामाऽसौ भवेदित्य शेष उवाच ॥१०॥
११. पयोधरः
नाम पयोधर इति भवेदतिरविगुरवस्सन्ति ।
न्यस्ता प्राकृतिसम्मिता लघवो यत्र भवन्ति ॥११॥
१२. चल:
लघवश्च
चतुर्विंशतिगुरवो
द्वादश
यत्र।
स्युः फणिगणपतिरिति वदति चलनामाऽसावत्रं ॥१२॥
१३. पानरः
एकादश गुरवो यदा रसयममितलघवश्च ।
नाम्ना वानर इह तदा फणिनायकमणितश्च ॥१३॥
१४. विकल:
वसुयममितलघवो यदा दश गुरवश्च भवन्ति ।
तदा विशिष्य त्रिकल इति नाम बुधा निगदन्ति ॥१४॥
१५. कच्छप:
लघवो द्विगुणिततिथिमिता गुरवो नव यदि सन्ति ।
नाम्ना कच्छप इति भवति सुधियो नियतमुशन्ति ॥१५॥
१६. मत्स्पः
रदपरिमितलघवो यदा वसुमितगुरवस्सन्ति ।
भवति मत्स्य इह खलु तदा विबुधा इति कथयन्ति ॥१६॥
१७. पालः
अतिगणपरिमितलपव इह नममितगुरवो पत्र ।
फणिगणपतिपरिणित इति शार्दूलः स्यात्तन ॥१७॥
१८ प्रहिवर
रसगुणपरिमितलघव इह रसमितगुरवो यहि ।
प्रहिवर इति सलु नामतः फणिपतिमणितस्तहि ॥१॥
१६.यामा
वसुगुणपरिमितलघय इह • परमितगुरवरचापि ।
व्याघ्रक इति भवति सनियममहिगणपतिनाऽसापि ॥१॥
५१८ ]
वृत्तमौक्तिक-पष्ठ परिशिष्ट
M
AAPAN
२० विडाल
गगनजलधिमितलघव इह जलनिधिमितगुरवश्च ।
प्रभवति यदि फणिपतिभणित इति नाम विडालश्च ॥२०॥
२१ श्वा
यदि यमयुगमितलघव इह गुणपरिमितगुरुकाणि ।
श्वा फणिपतिगुरुमतिभिरिति भवति सनियममभाणि ।।२१।।
२२ उदुम्बर, उन्दुरश्च
द्विगुरुजलधियुगलघुभिरिह नियमिततनुरनुभवति ।
फणिपतिरिति तत उन्दुरु सुनियतकृतयति भवति ॥२२॥
२३ सर्प
शशिगुरुरसयुगमितलघुभिरथ कृततनुरिह लसति ।
फणिगणपतिरधिकृतविरति सर्प इति समभिलपति ॥२३।।
२४ शशधरम्
वसुजलनिधिपरिमितलघुभिरभिनियमिततनु भवति ।
शशधरमिदमिति नियतयति फणिगणपतिरनुभवति ॥२४॥
सप्तम परिशिष्ट ग्रन्थोद्धत ग्रन्थ-तालिका नाम ग्रन्थकार पृष्ठाक प्रयच १८६. अथवा अनघराधयम् अन्येऽपि अष्टाध्यायी इति वा उदाहरणमञ्जरी कविकल्पलता कादम्बरी काव्यादर्श किरातार्जुनीयम् कृष्णकुतूहलमहाकाव्यम् मुरारि २०५. २०५. पाणिनिः २०३. १८८. लक्ष्मीनाथभट्टः १०, १३, १६, १७, २१, २४, ८१. देवेश्वर २०५. बाणः २०. दण्डी भारधिः ६८, १००,१०६.१३६. १६२. रामचन्द्र भट्टः १०५ १०७. ११४, ११६.१२१, १३५, १३७,१३६, १३९,१११, कण्ठाभरणम् पनवर्णने गौरीवशकस्तोत्रम् गोविन्दविरुदावली पीतगोविन्दम् चन्द्रशेखराष्टकम् पन्य सूत्रम् छन्द सत्रवृत्ति १२०. सक्ष्मीनापभट्ट. १६.. डराचार्य १०५. धीरपगोस्वामी २२२, २२४, २२८. मयदेवः मार्कण्डेय पिङ्गसः १९४,२०४. हलायुष १५९,१७५, १.५, १७७, १७८, १६,१६, १६९,२... प्रमरचमः (?) ३०, ३१. शम्भु १.१.११९ १९७.२७२, २८., २८२,२८१. प्रसादासः १२.११.१,१२,१४., छन्दोरत्नावली पवागमणि? पन्दोमभ्यरी ५२.] वृत्तमौक्तिक-सप्तम परिशिष्ट नाम प्रन्थकार पृष्ठांक जयदेवच्छन्दस् दक्षिणानिलवर्णने दशावतारस्तोत्रम् देवीस्तुतिः नन्दनन्दनाष्टकम् नवरत्नमालिका नारायणाष्टकम् नषघकाव्यम् पवनदूतम् (खण्डकाव्यम्) पाण्डवचरित-महाकाव्यम् (प्राकृत) पिङ्गलम् . प्राकृतपैगल-टीका " जयदेवः २०४. राक्षसकधिः १५३. रामचन्द्रभट्ट. १२६. लक्ष्मीनायभट्टः ४३. लक्ष्मीनाथभट्टः १४४. शङ्कराचार्यः रामचन्द्रभट्टः १६७. थीहर्ष: चन्द्रशेखरभट्टः १३६. चन्द्रशेखरभट्टः ६२, १२१, १५१, १६०. ३, ६४,६५,७०,७१,७३,७६, १२२, १३६,१५१,१५२, २७२, २७७,२८१,२८३, ३२६, ३५४, ३५५, ३५८. पशुपति. २७३. रविकरः २७३. लक्ष्मीनाथभट्टः ४१, १८०, १५५, १९६. चन्द्रशेखरभट्टः ३०६, ३१३. भट्टिः वेदव्यासः १४०. भवभूतिः २०६. ११,१८,३५,३६, ६३, ७०, ७३, ७५, ८४, ६२,६४, १२३, १२४, १२५,१५६,१६२,१६४, १६७, १८, २०२, २०६,२१०. १६७, १६८,१६६,२००. कालिदास १०६, १३८,१४७, १६०,१६४. वाग्भट. १४६. दामोदर ७६६१,१०६, ११४, १२२, १२४, १३०, १४३. १४४, १४५,१५१,१५२,१५७.१७२, ३३०, ३३५, ३४२, ३४३. सुल्हणः १९८, १९६,२००. १०१. पिङ्गलप्रदीपः पिङ्गलोद्योतः भट्टिकाव्यम् भागवतपुराण मालतीमाधवम् यथा वा- " यथा घामम- रघुवशम् घाग्भटः (अष्टांगहृदयसंहिता) वाणीभूषणम् वृत्तरत्नाकर-दीका वृत्तसारः
प्रत्यीढ़त प्रत्य-तालिका
[ ५२१
नाम
ग्रन्थकार
पृष्ठांक
रायभट्टः
१२१.
शृङ्गारल्लोलम् (खण्डकाव्यम्)
शिको-काव्यम् (?)
शिवस्तुतिः
शिशुपालवधम्
सुन्दरीघ्यानाष्टकम्
सौन्दर्यलहरोस्तोत्रम्
हर्षचरितम्
हरिमहमी स्तोत्रम्
हंसतम्
लक्ष्मीनायभट्टः ४५.
माघः
१८,१६२, १९२.
सक्ष्मीनायभट्टः १४४.
शंकराचार्य: १३७,
याण.
१६..
माङ्कराचार्यः १०५.
धीरूपगोस्वामी १३७.
अष्टम परिशिष्ट छन्दःशास्त्र के ग्रन्थ और उनकी टीकायें नाम कर्ता एव टीकाकार उल्लेख सी. सी, 1 " " १ अभिनववृत्तरत्नाकर ૨ टिप्पण ३ एकावली ४ कर्णतोप भास्कर थीनिवास फतेहशाह वर्मन् ? मिथिला केटलॉग मुदगल अनूप; सी सी. मे इसका नाम 'कर्णसन्तोष' है। कृष्णदास हि. एस, प्रकाशित जयमंगलाचार्य हि एस, प्रीतिकर अयस्थी हि. एस, सी. सी, शिवराम S/o कृष्णराम सी. सी. नागवर्म कन्नडप्रान्तीय ताडपत्रीय प्रन्यसूची रामानारायण S/o युनिवर्सीटी लायरी यम्बई विष्णुदास केटलांग ५ फर्णानन्द ६ कविदर्पण कविशिक्षा फाव्यजीवन है काव्यलक्ष्मीप्रकाश १० काव्यावलोकन [कन्नडभाषीय] ११ कौतिच्छन्दोमाला ८ १२ " टीका क्षेपक विग्जाहला जैन-प्रन्यायलो. • सोत-सी सी.- पेटलॉगस पेटलॉगरम्। मिपिता बेटलॉग - ए डिम्प्रिप्टिव पेटलॉग घॉफ मेन्युस्मिष्टा इन मिपिला; अनूप : पेटलॉग माफ दी भनूप संस्कृत सायरी बीकानेर हि.एस - ए हिस्ट्री प्रॉफ पलासिक्स सस्पृस लिटरेपर, एम. पृष्णमापारी; पुनियाटो सायमेरो पम्बई रेटसांग: ए हिस्त्रिष्टिय पेटलॉग भॉफ दो सस्थत एण्ड प्रायड मेन्युनिष्टए इन दो मास मेरी मांक दो युनियटी मोफ शम्बे; एयम मि. टिक सोसायटी पायरेटनाग= एन हिनिप्टिय पेटसोंग मॉफ सात एक प्रात मेग्युस्तिष्ट्रा इन दो सापरी पॉफ दी बॉम्बे पांच पॉफ दो रायम एशियाटिक सोसा- प्रटी बोरा रेरोग = एन पल्पाटिल निर पॉफ मेन्युस्त्रिदा नदी मोरिपाटस गटोटपूट परोहा रापाप्र. मोपपुर = रास्थान प्राप्यविधा प्रतिष्ठान जोधपुर, राप्रा.प्र. [url] = रामापान प्रायपिया प्रतिष्ठान, anा बासय पिसोड राप्रा.प्र. बोना = रासपाम प्रायरिया प्रतिष्ठान, MIT पामिप बीमार; राप्रा. जयपुर : पान प्रायपिया प्रतिष्टानमाताागपचार।
छन्द शास्त्र के अन्य और उनकी टीकायें [ ५२३ नाम पर्ता एव टीकारार उल्लेस जन-प्रन्यावली १४ गायारत्नकोष १५ गायारत्नाकर १६ गायातक्षण नन्दिताहर रलचन्द्र? रायव भा १८ छन्द कन्दली १६ छन्द कल्पतरु २० छन्द कल्पलता २१ पन्दकोष २२ टीका छन्द कौमुदी २४ छन्द कौस्तुभ २५ टीका प्रकाशित रॉयल एशियाटिक सोसा- यटी यम्बई केटलांग उल्लेपः कविदर्पण मिथिला फेटलॉग, हि. एस हि एस प्रकाशित सी सी प्रकाशित बडोदा पेटलांग सी सी, हि एस सी सी मयुरानाय रत्नशेषरसूरि चन्द्रकीत्ति नारायणशास्त्री पिस्ते दामोदर राधादामोदर विद्याभूषण "कृष्णराम पर्मनन्दन वाचक " " " २८ पन्दस्तत्वसयम् २६ पद पयोनिधि ३० छन्द पीयूष पन्दप्रकार टीश ३३ दन्द प्रशस्ति जरानायS/०राम शेपचिन्तामणि सोमनाथ थीहर्ष " राप्रा जोधपुर মনি राप्राप्र जोधपुर, सीसी बडोदा पेटलॉग,हि एस, सी सी सी सी [उल्लेख-नेपथ १७/२१६) बौदा केटलॉग प्रशमित सी सी प्रकाशित जी प्रत्यावी प्ररामित সারি ३४ पन्द प्रस्तारसरणि ३५ धन्दामात्र ३६ ३७ पद शिक्षा ३८ इन्दौसर ३६ ४. धन्दाचन्दिरा ४१ पदश्चिह्नम् ४२ पदविहाराशनम् पृष्णदेव जयदेय हट परमेश्वरान्द शास्त्री जयोसर राजशेपर . " भारमस्वाप उदासीन/0 गगाराम उदासीन सम्भु उत्तेरा वृत्तरतारिनारायण ४३ पाहामगि भट्टो टोग पापाटामान गणराम जयपुर) हि एम, ५२४ ॥ वृत्तमौक्तिक-प्रष्टम परिशिष्ट नाम कर्ता एव टीकाकार उल्लेख " " ? " . ४५ घन्द श्लोक सी सी. ४६ छन्द सार चिन्तामणि पुनिवर्सीटो सायमेरी बम्यई केटलांग जगन्नाथ पाण्डेय प्रकाशित पाद सारसंग्रह चन्द्र मोहन घोष ४६ घन्द सारायली छन्द सिद्धान्तभास्कर केशवजीनन्दS/0पूरजी मिथिला केटलॉग ५१ पद सुपाकर कृष्णराम हि. एस ५२ पन्द सुधादिल्ली जानीमहापात्रS/oजयदेव अनूप, हि.एस. याज्ञिक धन्द सुन्दर नरहरि सीसी. ५४ पद सध्या ५५ पद पर [ उल्लेख-तन्त्रसार ] [पत्तयोप.] प्रकाशित ५७ पन्दोल्पक जनप्रपायली ५८ पन्दोदर गंगासहाय प्रशसित ५६ पन्दोऽवतस लालबन्द्रोपाध्याय प.प्राप्र.चित्तौर ६. परदोग्रन्य सीसी ६१ पन्दोगोविन्द गगादास सी सी., (उल्लेस-वृत्ताना परा और पप्तमौषितर ६२ पन्बोपंग गोविन सीसी. १३ पन्दोदीपिण पुमारमणि s/०हरिवल्सम, ४ टोश १५ पदोनियष्ट अनूप, (पिंगससारित हरिदिन राप्राप्र.बोराने मटोहियाण) १७ पदोगुमापन जयति प्रकाशित मिनापर हिए. बाग्मद गोली (जोरा प्रसार रितर] ऐपपार प्रति रोग कृष्णराम .. . माना गोपिार और मीनो एप।
छन्द शास्त्र के अन्य और उनकी टीकार्य [ ५२५ नाम कर्ता एवं टीकाकार उल्लेख ७२ घन्दोऽम्बुधि ७३ पन्दोमजरी ७४ टीका सी सी गगादास 5/0 गोपालदास प्रकाशित बंध कृष्णराम सी सी. कृष्णवल्लभ हि एस गोवर्धनदास हि एस,सो सो चन्द्रशेखर भारती " . " ७६ . " . . " [छन्दोमञ्जरीजीवन ७८ छन्दोमञ्जरी टीका " ७६ ८० " हि एस, ८२ ८३ " ८४ पदोमञ्जरी ८५ जगनाय सेन s/o हि एस , सी सी जटायर कविराज जीवानन्द प्रकाशित दाताराम हि.एस, सीसी रामधन प्रकाशित पशीपर सीसी हरिदत्तशास्त्री प्रकाशित दावरदत्तपाठकवच गोपाल सस्मृत शॉलेज बनारस रिपोर्ट सा१६.६.१७ गोपालदास हि एस गोपालचन्द्र सीसी. प्रकाशित दामोदरभट्ट/० रघुनाप बोवा पेटलांग सो सो [उल्लेख-यत्तराना- Kura मणिसाल बरोदा बेटांग पापर हि एस. प्यारेलाल सीसी माम्मुराम / सीताराम हि.एम सीसी पपतामह सीसी सीसी ८७ गुरुप्रसाद शास्त्री धन्दोमन्दापिनी ८८ पन्दोमहाभाष्य ८६ छन्दोमातङ्ग १० पन्दोमातंत्र ११ पंदोमाला १२ पोमुग्तावतो .. १४ ददोरन ९५ ६ोरस्नहलायुप ? • पदोमरी गोपाम पुत्र गमाग है । पाप है प्रतिमिविकारों में प्रम से गोपाल. गोपालदाग, गोरामा माग गे भिन्न २ प्रणेमा प्रम हो गया है।
५२६ ] पतमौक्तिक-प्रप्टम परिशिष्ट नाम कर्ता एवं टीवापार उल्लेस ६६ घंदोरलाकर ६७ छंदोरनापली सी सी.,हि.एस. [उल्लेख संगीतनारायण और लक्ष्मी- नायभट्टकृत-पिगलप्रदीप]] अमरचन्द्र कवि जैन • प्रयायली [उल्लेख- मेघविजयकृत वृत्तमौक्तिक दुर्गमयोप] घनसागर P/o गुणवल्लभ राप्राप्र. जोधपुर उपाध्याय सी सी. २८ एंदोरहस्य जगद्धर सी.सी. बडोदा केटलॉग, सी सी. सी सी. [उल्लेख-काव्यादर्श१।१२] " सुखदेव पतञ्जलि दण्डी यादवप्रकाश ? शंकरभट्ट स्वामी चन्दनदास श्रीकण्ठ ? ६६ घंदोलक्षण १०० छंदोलघुयिवेक १०१ छंदोऽलङ्करण १०२ धंदोविचय १०३ चंदोविचार १०४ धंदोविचिति १०५ भाष्य टीका १०८ छंदोविन्मण्डन १०६ छंदोविलास ११० छंदोविवेक १११ छदोवृत्तरत्न ११२ छन्दोवृत्ति ११३ छन्दोव्याख्या ११४ छन्दश्शतक " .. हि.एस. प्रकाशित सी सी. . " . श्रीनिवास हर्षकीति ११५ छन्दोऽष्टादशक रूपगोस्वामी अनूप राजस्थान के जैनशास्त्र- भण्डार, जयपुर भा. ४ सो. सो. उल्लेख-वैष्णव- तोपिणी] सी सी. प्रकाशित ११६ छन्दोहृदयप्रकाश ११७ जगद्विजयछन्दः ११० जगन्मोहनवृत्तशतक ११६ जनाश्रयो १२० पिङ्गलछन्द शास्त्रसग्रह वासुदेवब्रह्मपण्डित जनाश्रय हि एस. मधुसूदन पुस्तकालय, लाहोर सूचीपत्र সাবিন १२१ पिङ्गलाद मूत्र पिङ्गल पद शास्त्र के प्रग्य और उनसीटीशायें [५२७ नाम की एव टीकार उन्लेय " . राप्राप्र., जोधपुर १२२ १२३ १२४ टोरा मिताक्षरा रोग रा . 13 सी सी सो सो जगन्नामिष दामोदर पद्मप्रभमूरि पिंगल, पशुपति? भाररराचार्य मयुरानाप शुगर मनोहरहण यावयपराग " " " " १२६ १२७ १२८ १२६ " " " " " दि एस . [भाष्यराज " १३. १३१ १३२ .. . " वामनाचार्य सी सी. वेदांग्रराज पौरपदार्माs/o हि. एस मारण्य हसायुध प्रशासित . " . [मृतमजोवनी] पिगलसारोटार সংবাদপি अंग-प्रपावली मपुप्रग्न पुरानप, साहोर १३१ चितामणि ५२८ ] छन्द शास्त्र के प्रत्य और उसकी टीका नाम पा एय टीकाकार उल्लेख " सी.सी बड़ोदा पेटलॉग १४८ " [पिंगलपंदोथिति पापति यादयन्द्र [दसायान भट्टा. घायं उपनाम रविकर S/o [धीपति, हरिहर उप नाम] राजेन्द्रवशायपान १४६ प्रकाशित " " [पिंगलसारविकाशिनी] १५० सी.सी 1. [पिंगलतत्वप्रकाशिका] लक्ष्मीनाथ भट्ट प्रकाशित " १५१ १५२ [पिगलप्रदीप] [विद्वन्मनोरमा " " [पिंगल प्रकाश विद्यानन्दमिश्र मिथिला केटलॉग विश्वनाय S/o हि. एस. सी सी. मिथिला विद्यानिवास केटलॉग, बंशीधरSo/कृष्ण सी. सी. [पिंगलप्रकाश .. . श्रीपति घाणीनाय हरिप्रसाद मिथिला फेटलॉग हि. एस सी सी. .. अनूप, सी. सी. १५८ 1 " " . गोपीनाथ अनूप, प्रकाशित १६० दुखभजन प्राकृत पिंगलसार टीका बन्धकौमुदी रत्नमञ्जूषा भाध्य घाग्वल्लभ टीका [वरणिनो] पाणीभूषण वृत्तकल्पद्रुम वृत्तकारिका वृत्तकौनुक वत्तकौमुदी ,, देवीप्रसाद " हि. एस दामोदर जयगोविन्द नारायण पुरोहित विश्वनाथ जगद्गुरु रामचरण शिवरामS/०कृष्णराम सी सी. १६८ " . " १७० वृत्तकौस्तुभ-टीका सी सी.
छन्द.शास्त्र के अन्य और उनको टीकार्य [ ५२६ MARA ऋमाक नाम क्र्ता एव टीकाकार उल्लेख १७१ वृत्तचन्द्रोदय १७२ वृतचन्द्रिका १७३ वृत्तचिन्तामणि भास्करावरिन् रामदयालु गोपीनाथ दाधीच " हि. एस, सी, सी, , मधुसूदन० रा. प्रा. प्र. लक्ष्मीनाय- सग्रह जयपुर हि. एस, प्रकाशित १७६ " " १७४ वृतचिन्तारत्न १७५ वृत्तजातिसमुच्चय टीका १७७ वृत्ततरङ्गिणी १७६ वृत्तदर्पण १७६ सी सी. मिथिला केटलॉग . " " १८० १८१ १८२ शान्तराज पण्डित विरहाक गोपाल कृष्ण गगाधर जानकीनन्द कवीन्द्रS/0 रामानन्द भीममिथ मणिमिथ मथुरानाथ वक्टाचार्य सीताराम कृष्ण दक्टेश यशवंत S/o गगाधर गंगाधर शकरदयालु " " हि. एस. सी सी, सो सी, सी सी सी सी, हि. एस, सी.सी, M 1. १८४ १८५ वृत्तदीपिका " " . १८७ वृता मणि १८८ १८९ वृत्तप्रत्यय १६० वृत्तप्रत्ययकौमुदी १९१ वृत्तप्रदोप पडोदा के हि एस, मो सो हि एस, सी. सो, सी सी M ,हि एस, जनार्दन बद्रीनाथ थीनिवास गणपतिशास्त्री श्रीनिवास हि एस, प्रकाशित हि. एस हि एरा, बडोदा पेटसान सी.सी १९३ पुत्तमणिकोष १९४ वृरामणिमाला १६५ परामणिमालिका १६१ वृत्तमहोहधि १९७ वृसमाविषयमाला १६ बुरामाला १६९ २०. पृतमुक्तावली २०१ २.२ गुपेण पस्लभावि विपासपम्पन् " " प्रराशित हि एस. सोसो " पणराम गगादाम IN 2 ५३० ] वृत्तमौक्तिक-अष्टम परिशिष्ट क्रमांक नाम कर्ता एव टीकाकार उल्लेख २०३ वृत्तमुक्तावली २०४ दुर्गादत्त मल्लारि टीका [तरल] " शकर शर्मा मिथिला केटलॉग अनूप, रा प्रा प्र जोधपुर बडोदा केटलॉग सी सी, केटलॉग प्रॉफ संस्कृत मेन्युस्त्रिप्टस् इन अवध भा० २१, सन् १८६० हि एस, सी सी.. हि एस अनूप सी सी. हि. एस अनूप " हरिव्यास मिथ शृगराचार्य चन्द्रशेखर भट्ट लक्ष्मीनाथ भट्ट २०८ वृत्तमुक्तसारावली २०६ वृत्तमौयितक २१० टीका दुष्करोद्धार टीका [दुर्गमयोप] २१२ वृत्तरत्नाकर २१३ टीका 'नौका' २१४ मेघविजय विनयसागर साह, कोटा केदार भट्ट . " " . . [कपिचिन्तामणि .. प्रकाशित अयोध्याप्रसाद हि एस सी सी, "मात्माराम हि एस, सी. सी, ठापासल रा प्रा प्र, जोधपुर परुणाकरदास S/o बडोदा वेटलॉग कुलपालिका "कृष्णराम सी सी कृष्णवर्मन हि एस, "कृष्णसार क्षेमहस रा प्रा प्र. शोधपुर, सी सी, हि एस सो सो चिन्तामणि सी सी " . . २१६ " हि एस, २२० . गोबिन्द भट्ट . JI २२२ . , [वृत्तपुष्पप्रहातान [मुघा] " ३ . २२४ घिन्तामणि पण्डित हि एस, सी सी चूडामणि दीक्षित .. जगताप S/राम सो सो .. " . विसरलार रखातिर मनात पियुष " [भाषापंरोपित हि एस, सी सी, बशेरा पंटसांप ५३२ ] वृत्तमौक्तिक-अष्टम परिशिष्ट क्रमाक नाम कर्ता एव टीकाकार उल्लेख २५० वृत्तरत्नाकर टीका [अर्थदीपिका " " केदारभट्ट, सदाशिव S/o अनूप विश्वनाय " सारस्वत सदाशिव हि. एस. सी. सी, मुनि सुल्हण S/o भास्कर अनूप [वृत्तरलावली २५२ . [सुकविहृदयानन्दिनी सोमपण्डित " " २५३ २५४ , सोमचन्द्रयाण [मुग्धबोधकरी] अनूप रा.प्रा.प्र. जोधपुर अनूप २५५ " हरिभास्कर So मापाजी भट्ट २५६ ? " [वृत्तरलाकरसेतु] वृत्तरत्नाकर, प्रवचूरि यालावरोध वृत्तरत्नार्णव " " २५८ वृत्तरत्नावली २५६ २६० २६२ A " . . अनूप. मेरसुन्दर रा. प्रा.प्र. जोधपुर नरसिंह भागवत हि एस. Po रामचन्द्र योगीन्द्र कालिदास कृष्णराम चिरजीव भट्टाचार्य मिपिता और बड़ोदा केटलॉग यशवंतसिंह हि. एस, सी सी. रा.प्रा.प्र.जोधपुर दुर्गादत्त नारायण मणिराम So वसत सी.सी, कालिकाप्रसाद मिथ सानन्द हि एस, सी. सी. रविकर रामनूरामणि . [उल्लेख- काम्पापंग] रामदेव चिरंजीव रामास्वामी मगरको वटेश S/o सरस्वती प्ररासित वि Pho रामानुगाचार्य को को. २६४ " " " + टोका चक्किा २६७ २६८ २६६ " " " . . . २७१ २७२ २७३ " वरारामायण वृत्तमौक्तिक-अष्टम परिशिष्ट AAMA क्रमांक नाम कर्ता एवं टीकाकार उल्लेख २६६ धृतबोध-टीका " . " ३०१ ३०२ कालिदास, नयविमल हिमांशुविजयजी ना लेखो नाराजी s/o हरजी सी सी, नेतसिंह रा.प्रा.प्र. जोधपुर मनोहर शर्मा हि. एस, सी. सी. रा.प्रा.प्र. जोधपुर , माघव S/o गोविंद " " [सुबोधिनी] ३०३ " [ज्योत्स्ना] " " , मेघचन्द्र हि. एस. सी. सी. में कर्ता का नाम नहीं है और Pro के स्थान पर मेधचन्द्र का नाम है हि. एस, सी.सी. प्रकाशित सी. सी. हि. एस, सी. सी. ३०७ " ३०८ " " " " " " " " " ३१२ " लक्ष्मीनारायण " बजरत्न भट्टाचार्य वररुचिः? वासुदेव [श्रुतबोधप्रबोधिनी शुकदेव हंसराज [बालबोधिनी] हर्षकीति मानंदधिनी समवृत्तसारः नीलकण्ठाचार्य सुवृत्ततिलकम् क्षेमेन्द्र संगीतराज-पाठ्यरत्नकोप महाराणा कुंभा संगीत सह पिंगल स्वयम्भू छन्द स्वयंभू पुराणादि ग्रंथ अग्निपुराण गरुडपुराण पूर्वखण्ड नारदपुराण पूर्वखण्ड विष्णुधर्मोत्तर तृतीयखण्ड महत्संहिता पराहमिहिर भरताचार्य ३१४ प्रकाशित हि. एस, सी. सी. प्रकाशित तृतीय उल्लास जैन प्रन्यावली प्रकाशित ३१७ प्रध्याम ३२८-३३५ २०७-२१२ " , ३२१ ३२२ ३२३ " नाट्यशास्त्र मध्याय १४-१५ सहायक-ग्रन्थ २. ३. . ५ द ६ अग्निपुराण अथर्ववेदीय वृहत्सर्वानुक्रमणी अनर्घराघवननाटक मुरारि मरिष्टयधस्तोत्र रूपगोस्वामी प्रप्टागहृदय घाभट उपनिदान सून ऋग्यजुप परिशिष्ट ऋग्वेद के मनद्रप्टा कवि बद्रीप्रसाद पचोली ऋग्वेद मे गोतत्व ए हिस्ट्री प्रॉफ क्लासिकल सस्कृत लिटरेचर एम. कृष्णमाचारी ए हिस्ट्री मॉफ संस्कृत लिटरेचर मायर ए. मेकडॉनल ए हिस्ट्री ऑफ सस्कृत लिटरेचर कीय ऐतरेय प्रारण्यक कविकल्पलता देवेश्वर कविदर्पण स० एच. डी. वेल्हणकर कावरोली का इतिहास पो० कण्ठमणि शास्त्री काटक सहिता कामसूत्रम् पात्स्यायन काट्यावश दण्डी किरातार्जुनीय पाय्य भारवि कुमारसम्भय काव्य कालिदास कौषीतकि महाग्राह्मण गाथालक्षण स० एच से बेल्हणकर गीतगोविन्द जयदेव गोपाललीलामहाय्य स. येचनराम शर्मा गोयनोद्धरण स्तोत्र एपगोस्वामी गोविन्दविरदावली गौरीदास्तोत्र शंकराचार्य सं० एच. से वेहणार पद पूत्र-हसापुप रीवा सहित पद सूत्र-टिप्पणी अनन्तराम शर्मा पद पत्रमाप्य यादवप्रता १८. १६. २१. २२ २५ २७. " पन्दकोश २३. ३०. पिंगस, हलापुष ५३६ ] सहायक-प्रन्य ३४. ३५. जयकोति, सं० एच. डी. वेल्हणकर हेमचन्द्राचार्य गंगादास चन्द्रशेखर भारती ३८. एच. डी. घेल्हणकर सं. जनाधया " ४२. ४३. ४५. महो० मेघविजय " रूपगोस्वामी ४८. भरताचार्य छन्दोनुशासन छन्दोनुशासन स्वोपजटीकोपेत छन्दोमञ्जरी टीकासहित छन्दोमञ्जरी जीवन छान्दोग्योपनिषद् जयदामन् जयदेवच्छन्द जनाधयीछन्दोविचिति जन प्राथवावली जैमिनीय बाह्मण तांडयमहाब्राह्मण तैत्तिरीय ब्राह्मण दिग्विजय महाकाव्य देवानन्द-महाकाव्य नन्दाहरणस्तोत्र नन्दोत्सवादिचरितस्तोम टीका नाटयशास्त्र नारदपुराण निष्पत-दुर्गवृत्तिसहित पाठपरलकोप पाणिनीयशिक्षा पिंगलप्रदीप प्राकृतपिपलोद्योत प्राकृतपंगलम् प्राचीन भारत में गणतांत्रिक व्यवस्था पहत्संहिता भट्टिकाव्य भागवतपुराण १. मस्कन्य भारतेन्दु प्रन्यावलो भा० ३ महाभारत शान्तिपवं मानिकपदों का विकास मालतीमापद मुरुग्धमुतायलोस्तोत्र मैत्रायणीहिता पुक्तिमयोप रपुरा ५१. ५२. ५३. ५५. यास्क, दुर्गासिंह महाराणा कुम्मा पाणिनि लदमीनाय भट्ट चन्द्रशेखरभट्ट डा. भोलानकर व्यास बद्रीप्रसाद पंचोली वराहमिहिर भट्टि ५६. ५८. संजरत्नदास ६२. ता. शिवनन्दनप्रसाद भवमूति हपगोस्वामी महो. मेपविनय हिसारा सहायक-प्रन्य ७१. स्पगोस्वामी रामचन्द्र भट्ट रूपगोस्वामी रामचन्द्र भट्ट रूपगोस्वामी ७२. ७३. ७४. " ७५. ७६. ७७. स.पो. कण्ठमणिशास्त्री स्पगोस्वामी दुखभजन कवि ७८. ८० रगक्रीडास्तोत्र रसिकरजनम् रासक्रीडास्तोत्र रोमावलीशतक वत्सचारणादिस्तोत्र यशरदविहारचरितस्तोत्र घल्लभवशवृक्ष वस्त्रहरणस्तोत्र वाग्वल्लम वाजसनेयो सहिता घाणीमूषण घार्ता साहित्य एक पहत अध्ययन विजयदेवमाहात्म्य विज्ञप्तिपत्री विज्ञप्तिलेख-सग्रह प्रथम भाग वृत्तजातिसमुच्चय वृत्तमुक्तावली वृत्तरत्नाकर नारायणीदोकायुत वेदविद्या वैदिक धन्दोमोमासा वैदिक दर्शन वैदिक-साहित्य दातपय बाह्मण शिशुपालय युतबोध शृङ्गारपल्लोत मुदर्शनादिमोचन स्तोत्र मुवृत्ततिलक सौन्दर्यलहरी स्वयमूपन्द सप्तसन्धानमहाकाय्य सभाध्या रत्नमजपा रास्कृत साहित्य इतिहास सरस्वतीकण्टाभरण-रोश हंसतम् हरिमौनतोत्र हिमांशुविमपनी मा लेसो दामोदर डॉ. हरिहरनाय टटन घीवल्लभोपाध्याय समयसुन्दरोपाध्याय स० मुनि जिनविजय स० हरिदामोदर येल्हणकर देवपि कृष्णभट्ट केदारभट्ट, नारायणभट्ट डॉ घासुदेवशरण अप्रपाल युधिष्ठिर मीमांसक #. फतहाँसंह रामगोविन्द त्रिवेदी ८७ ८६. ६०. ६२. ६३. ६७ माघकवि कालिदास रायभट्ट रूपगोस्वामी क्षेमेन्द्र शकराचार्य स.हरिरामोदर वेल्हणकर महो. मेघविजय सहरि दामोदर वेल्हणकर पाचस्पति गरोता सक्षमीनाय भट्ट स्पगोस्वामी दरिराचार्य १०१. १०२ " ५३८ । वृत्तमौक्तिक सूची-पत्र I 2 3 A descriptive Catalogue of Sanskrit HD Velankas and Prakrita Manuscripts in the Library of the Bombay Branch of the Royal Asiatic Society An alphabetical list of manuscripts in Raghavan Nambryar the Oriental Institute, Baroda. Shiromani A descriptive catalogue of manus Kashi Prasad Jayaswal cripts in Mithila A descriptive Catalogue of the HD Velankar Sanskrit and Prakrit Manuscripts the Library of the University of Bombay कन्नड प्रातीय ताडपत्रीय प्रन्थ सूची के भुजबली शास्त्री Catalogue of Anupa Samskrita Lib. Dr C Kunhan Raja 4 5. 6 rary, Bikaner 8. 7 Catalogue of Samskrita manuscripts in Avadha Part-15, 1882 Part-21, 1890 Catalogus Catalogum T. Aufrecht मधुसूदन पुस्तकालय, साहौर, का सूचीपत्र 10. राजस्थान के जैन शास्त्रभडार कस्तुरचर कासलीवाल II. राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान जोधपुर का सूचीपत्र 12 राजस्थान प्राध्यविद्या प्रतिष्ठान शाखा कार्यालय, चित्तौड़, यति बालचन्द्रजी सग्रह का सूचीपत्र 13 राजस्थान प्राध्यविद्या प्रतिष्ठान शाला-कार्यालय, जयपुर, लक्ष्मीनाय दाधीच संग्रह का पूचीपत्र 14. राजस्थान प्राध्य विद्या प्रतिष्ठान शाखा कार्यालय, वीरानेर का सूघोपत्र 15 साहत सज बनारस, रिपोर्ट सन् १९०६-१९१७ राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला में प्रकाशित (क) संस्कृत-प्राकृत-ग्रन्य १. प्रमाणमञ्जरी, (ग्रन्थाङ्क ४), ताकि चूडामणि सर्वदेवाचार्य कृतः प्रत्यारण्य, बलमा, वामनभट्ट कृत टीकात्रयोपेतः सम्पादक - मोमासान्यायकेमरी पं० पट्टाभिराम शास्त्री, विद्यासागर (G+१०६), १९५३ ई० । २. यात्रराज-रचना, (ग्रन्यास ५), महाराजा सवाई जयसिंह शारित; सपादक- स्व. पं. केदारनाथ ज्योतिविद् (+२८), १९५३ ई० । ३. महषिकुलवंभवम् भाग १, (प्रन्याङ्क ६), स्व. पं० मयुसूदन प्रोझा प्रणीत, म.म. प. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित एवं हिन्दी व्याख्या सहित (५६+२६१). १९५६ ई। मू.१०.७५ ४. महर्षिकुलवंभवम् (मूलमात्र), (प्रपा ५६), स्व. प. मघुमूदन योमा प्रणीत, संपादक-प. प्रद्युम्न भोमा (१६+१३+१०), १९६१ ई.। ५. तसंग्रह. (ग्र०६), मनभट्ट फूत टीकाकार -क्षमारल्याण गणि; मुंगदा-टा० जितेंद्र जेटली, (१७+७४), १९५६ ई० । ६. कारकसयघोद्योत, (प्र०.१८), पं० रभसनन्दी कृत, कातन्त्रव्याकरणपरक रचना संपादक - डा. हरिप्रसाद शास्त्री (२२+३४), १९५६ ई० । ७ वृत्तिदीपिका, (ग्र०७), मोनिकृष्ण भट्ट वृत; मुंपादक -स्व. प. पुष्पौतम शर्मा चतुर्वेदी, साहित्याचार्य (६+४+१२), १६५६ ई० । मू. २... ८. कृष्णगोति, (६०१६), कवि सोमनाप विरचित, रामाया मम्बन्धी प्रेमकाव्य सपादिका-डॉ. प्रियवाला पाह (२७+३२), १६५६ ई.। १. दादररनवोप, (२०१६), प्रजातात, बदर्षक सम्दकोश मपादक डॉ. हरिप्रमाद शास्त्री (१२+४),.१९५६६.। १०. नुक्तसह, (प्र. १७), प्रजातपतृप, संपादिक्षा-... प्रिय मामा पाह(+४५), १९५६६ ११. भारहारायसी, (प्र. १५), पो हपंपावि विरचित समत-गीताम्य; संपादित #.. प्रियवाला शाह (t.+०२) १९५६० मू२.७५ १२. रामरिमोद महाशय, (३.८), महावि उदय प्राणीत. प्रहमदाराने मुमतान महमूद बेगाना परिव-वर्णन; संपादक - श्री गोगामनारायण महरा (२८+1) १९५६.। मु. २.२५ १३ चक्रपाणिविजय महाकाव्य, (प्र०२०), भट्ट लक्ष्मीधर विरचित; उषा-परिणय सबधी अद्यावधि अज्ञात काव्य संपादक-के. का. शास्त्री (+११२), १९५६ ई. । मू. ३.५० १४ नृत्यरत्नकोश (प्रथम भाग), (ग्र०२५), महाराणा कुम्भकर्ण कृत, सगीत राजरत्न- कोपा-तर्गत; सपादक -प्रो. रसिकलाल छो० परीख एव डॉ. कु. प्रियबाला शाह (७+१४४). १६५७ ई० । १५ उक्तिरत्नाकर, (प्र० १२), साधुसुन्दर गणि विरचित, सस्कृत एव देशी शब्दकोष सपादक - मुनि जिनविजय पुरातत्त्वाचार्य (१०+११८), १९५७ । मू. ४.७५ १६. दुर्गापुष्पाञ्जलि, (ग्र० २२), म. म. प. दुर्गाप्रसाद द्विवेदी प्रणोत; सपादक ५० श्री गङ्गाधर द्विवेदी (३६+१४७). १९५६ ई० । मू. ४.२५ १७ कर्णकुतूहल एव कृष्णलीलामृत, (ग्र० २६), महाकवि भोलानाथ, जयपुर नरेश सवाई प्रतापसिंह समाश्रित विरचित, सपादक - श्री गोपालनारायण बहुरा (२५+३०), १९५७ ई.। १८ ईश्वरविलास महाकाव्यम्, (प्र० २६), विक्लानिधि श्रीकृष्णभट्ट विरचित, जयपुर निर्माता सवाई जयसिंह द्वारा अनुष्ठित अश्वमेघ यज्ञ का प्रत्यक्ष वर्णन एवं जयपुर राज्येतिहास सम्बन्धी अनेक सस्मरण सवलित महाकाव्य, सपादक - कविशिरोमणि भट्ट श्री मथुरानाथ शास्त्री (७६+२९३), १९५८ ई० । मू. ११.५० १६ रसदीधिका, (प्र० ४१), कवि विद्याराम प्रणीत, सस्कृत रसालकारपरक सरल एक मघु कृति, सपादक - श्री गोपालनारायण बहुरा (१२+८०) १९५९ ई. । भू २०० २० पद्यमुक्तावली, (म० ३०), कविकलानिधि श्रीकृष्णभट्ट विरचित, भनेक साहित्यिक एव ऐतिहासिक पद्य सग्रह; सपादक - कविशिरोमणि भट्ट श्री मयुरानाप शास्त्री । (२०+१४६), १९५६ ई. । काव्यप्रकाश भाग १, (०४६), मूल ग्रन्यकार मम्मटाचार्य के समकालीन भट्ट सोमेश्वर कृत 'काव्याद समेत सहित, जैसलमेर के जैन ग्रन्प-महारों से प्राप्त प्राचीन प्रति के माधार पर सपादित; संपादक - थी रसिकलाल छो० परीख (+३५२), १९५६ई.. मू १२... काम्यप्रकाश भाग २. (म० ४७), सपादक श्री रसिकलाल प्रो. परीक्ष (२२+११+९४), १९५६ ई. । मू८.२५ २३ पातुरनकोश, (म० ४५), प्रमातस्तक, सस्कृत का सामान्यज्ञान-कोश; सपादर- •• प्रियवाला शाह (8+६४), १६५६६० २४ बाटमयम्, (प्र. २३), म. म. दुर्गाप्रसाद वित, रामपरिवारमा यसत. पा, सपादर-श्री गङ्गाधर द्विवेदी (४+१५६). १९६.१०। श्री भुवनेवरी महारतोत्रम (प० ५४), पृप्योपरापापं विपित, विपनाम प्रणीत भारयान्वित, पूमापञ्चाङ्गादि संयमित, संपादर-पी गोपालनारायण बहरा (१+१९९), १२...। - २२ - [ ४ ] (ख) राजस्थानी हिन्दी ग्रन्थ १. कान्हडदे प्रयन्ध, (म. ११) : महाकवि पद्मनाभ विरचित, सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के द्वारा जालोर दुर्ग के प्रसिद्ध घेरे भादि का वर्णन, सम्पादक • प्रो. के. बी. ध्यास (३३+२७५) १९५३ ई.। मू. १२.२५ २. क्यामखो रासा, (प्र. १३) : कवि जान कृत, फतेहपुर के नवाब अलफखान तथा राज- पूताने के क्यामखानी मुस्लिम राजपूतो के उद्गम भोर इतिहास का रोचक वर्णन; सम्पादक - डॉ. दशरप शर्मा और अगरचन्द भवरलाल नाहटा (५०+१२८) १९५३ई. मू. ४.७५ ३. लावा रासा, (प्र. १४) अपर नाम कूर्मवशयशप्रकाश, गोपालदान कविया कृत, नरूका (कछवाहा) राजपूतो मोर पिंडारी पठानो के बीच हुए पांच युद्धों का समकालीन प्रोजस्वी वर्णन, सम्पादक - श्री महताबचन्द खारेड, (१६+६६) १९५३ ई.। मू. ३.७५ ४. यौकीदास री स्यात, (म.२१) बाकीदास कृत, राजस्थान के प्राचीन ऐतिहासिक विवरणों का प्रमुख ग्रन्थ; सम्पादक • यो नरोत्तमदास स्वामी (E+२१८) १९५६ ई.। ५. राजस्थानी साहित्य सग्रह भाग १, (प्र. २७) राजस्थानी भाषा में रचित प्रतिनिधि गद्य क्या सपहा सम्पादक - श्री नरोत्तमदास स्वामी (१४+५२) १९५७ ई.। मू. २.२५ ६. राजस्थानी साहित्य समह भाग २, (प. ५२) सीन ऐतिहासिक वार्ताए बगड़ावत, प्रतापसिंह महोकमसिंह पौर वोरमदे सोनगिरा सम्पादक - पुरुषोत्तमलाल मेनारिया; (२४+१०८) १९६० ई.। मू. २.७५ ७. योन्द्र कल्पलता, (ग्र. ३४) : मुगल बादशाह शाहजहाँ के समकालीन पवीन्द्रापार्य सरस्वती कृत ; सम्पादिका - रानी सक्ष्मीकुमारी चूण्डायत (u+५५+५) १६५८ ई. मू.२... ८. जुगलवितास, (प्र. ३२) पुशमगढ़ के महाराजा पृथ्वीसिंहजी पपरनाम कवि पीएस वृतः सम्पादित • रानी लक्ष्मीकुमारी मूण्डावत, (५+५०) १९२० ई.। मू. १.७५ २. भगतमाळ (४३) चारण ब्रह्मदास दादूपंयो इत; गम्पादक थी उदयराज उपवास (+६४) १९५६६. मू.१.७५ १०. रामापान पुरातत्व मन्दिर के हाततिक्षित पुग्यों को प्रधी भाग १. (प. ४२).. १९५९ ता संग्रहीत ४... पंपों पा वर्गात सूचीपत्र ; सम्पादक - मुनि किनविनय, पुरातत्वापार्य. (२+२+२०) १९५९ ११. रामापान मायनिता नियामक पतिसित पापों गुणो, भाग २. (प्र.५१), ७०.५ करे अन्यों का पो-पत्र: RTEE. श्री गोपामनारायण महा. एमए (२+) १५... - [ ५ ] १२ राजस्थानी हस्तलिखित ग्रन्थ सूची भाग १, (प्र ४४) मार्च १९५८ तक के प्रयों का विवरण , सम्पादक - मुनि जिनविजय, पुरातत्त्वानाय, (३०२+१६), १९६० ई , राजस्थान हस्तलिखित प्रत्य सूची भाग २, (ग्र ५८) १९५८ ५६ के संगृहीत अथो का विवरण , सम्पादक - पुरुषोत्तमलाल मेनारिया (२+६१) १९६१६ । मू ६५० " " १४ स्व पुरोहित हरिनारायणजी विद्याभूषण प्रथ सग्रह, (म ५५), सम्पादक . श्री गोपालनारायण बहुरा और श्री लक्ष्मीनारायण गोस्वामी (+१६३+३८) मू ६२५ १५ मुहता नैणसी री हयात भाग १, (४८), मुंहता नैणसी कृत साधारणत राजस्थान देशीय एव मुख्यत (मारवाड) राज्य का प्रथम प्रामाणिक व ऐतिहासिक प्रय, सम्पादक माधी बदरीप्रसाद साकरिया (११+३६५), १९६० ई । मू ८५० १६ मु० ने० री स्पात भाग २, (म ४६), मा श्री बदरीप्रसाद साकरिया (११+३४३) १९६२ई। १७ मु० न० री त्यात भाग ३, (२+२६४) १९६४ ई। मू ८०० १८ सूरजप्रकास भाग १, (म ५६) धारण करणीदान कविया कृत, सामान्य रूप से मारवाड का ऐतिहासिक विवरण और विशेषत जोधपुर के महाराजा अभयसिंहजी व सरबुलन्दखान के बीच हुए अहमदावाद के युद्ध का समकालीन घणन , सम्पादक . श्री सीताराम लाळस (२०+३१०+३७), १९६१ ई । सूरजप्रकास भाग २, (ग्र ५७), सम्पादक - श्री सीताराम लाळस (s+३६३+६१) १९६२ ई । मू ६५. भाग ३, (५८) (E+२७५+८४), १९६३ ई । म ९७५ २१ नेहतरग, (ग्र ६३) बूदी नरेश राव बुधसिंह हाडा कृत, काव्य शास्त्रीय प्रय, - श्री रामप्रसाद दाधीच, (३२+१२०) १९६१ ई । मू४०० २२ मत्स्य प्रदेश को हिंदी साहित्य को देन, (म ६६) लेखक हाँ मोतीलाल गुप्त, पूर्वी राजस्थान में हस्तलिखित ग्रयों की खोज विषयक शोध प्रबन्ध (+२६६), १९६० १६ २० सम्पादक २३ राजस्थान में सस्कृत साहित्य की खोज (म ३१) मनु० श्री ब्रह्मदत्त त्रिवेदी, प्रोफसर एस मार भाण्डारकर द्वारा हस्तलिखित सस्कृत ग्रयो की खोज में मध्यप्रदेश व राजस्थान में (१९०५६) मे को गई खोज की रिपोट का हिंदी अनुवाद (२+७+te), २४ समदर्शी प्राचाय हरिभद्र (६८) लेखक-पं० सुखलालजी, हिंदी अनुवादक-शान्ति. लाल म जैन, राजस्थान के गणमा य साहित्यकार एव विचारक मापाय हरिभद्र का जीवन-चरित्र भोर दशन, (+१२२), १९६३ ई.।