Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Marx Vaadi Arth Shastr

Sanayal,bhupendar Nath · 2010/12

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मार्क्सवादी अर्थशास्त्र
लेखक
भूपेन्द्रनाथ सान्याल
( मेम्बर बाल इडिया कांग्रेस कमेटी, भूतपूर्व काकोरी
पडयन्त्र केस के वन्दी, उपसभापति प्रान्तीय ट्रेड
युनियन कांग्रेस, सभापति प्रान्तीय नौजवान भारत
सभा, तथा मार्क्स का दर्शन श्रादि ग्रन्थों के रचयिता)

प्रकाश
के०के०मित्रा
इण्डियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग
मृल्य दोप
पे० भृगुरान भागव
भागय प्रिटिंग-यरस, लखनऊ

भूमिका माक्सवादी अथशास्त्र माधारण अर्थशास्त्र से मिन्न है। साधारण अर्थशास्त्र निमको अग्रेजी में पोलिटिकल इकानमी कहते हैं पूनीवाट के युग का अयशास्त्र है । इन दोनों का मुग्य विभेद यह है कि पंजीवादी अपने प्रयों में वर्णित नियमों को चिरतन नियम मानते हैं और मास का यह कहना है कि ये नियम एक विशेष युग के, पंजीगदी युग के नियम है। समाज के विकास के साथ उसका आर्थिक दांचा बरखता रहता है। जैसे समाज गति शीन है उसी तरह आर्थिक ढाँचा मी गतिशील है। मूल ढांचा कायम रहने पर भी उसमें थोड़ा यहुत परिवतन होता ही रहता है । स्वय पूनोवाद में ही कितने ही परिवतन होते आये है । पहले उत्पादन प्रक्रिया में प्रतियोगिता थी फिर एकाधिकार की सृष्टि हुई एकाधिकार को ही श्राग्दिरी सीढ़ी है साम्राज्यवान, और पूँजीवाद की अपनति के युग में पाया फासिज़्म । इसीलिए माक्स के अथशास्त्र का रिपय ही है "पूजी की गति के नियम ।" अप्रतिरोध प्रतियोगिता से राष्ट्रों को सरक्षण नीति का क्यों भवलम्बन करना पडा, राष्ट्र को व्यक्तिगत उद्योग धधों में क्यों हस्तक्षप करना पड़ा, इत्यादि प्रश्नों का सही सही उत्तर इसी नियम से मिलता है।

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दूसरा स्थितिशील । पहला क्रान्तिकारी है, दूसरा सरतणशील । मारस ने ममाजगदी समाज के आर्थिक दांचा का कोई वर्णन नहीं किया है । लेकिन पंजीवाद के अतविरोधों के निरा करण से ही समानवादी व्यवस्था की स्थापना हो सकती है। इस लिए उस पवस्था के कुछ प्राधिक सिद्धान्ता का विवेचन हो जाता है । इससे अधिक और कुछ न कहना माक्स के लिए स्वाभाविक ही था क्योंकि समाजरादा समाज उस समय भविष्य के गर्म में ही था। लेकिन याज रस की योजनाधा से इस नवीन भार्षिक ढांचे की कुछ मजक था जाती है । इस नवीन ढाँचे का मूल मात्र है, उपादन-समाज की अावश्यकतामा की पूर्ति के लिए न कि व्यक्तियों के मुनाना के नि । इससे उत्पादा क्षेत्र म जावादी व्यवस्था का भौति काई अराजकता नहीं रहती थौर उत्पादन शक्ति की वृद्धि में कोई बाधा नहीं रहती। -लेखक

।
इसके अलावा इन दानाका मूल विभेद है इन अलग अलग
रष्टिकोणों में । पूँजीगती अथशाख्या का टिकोण है उपभोग
करनेयाना का और मारतयानी रष्टिकोणमिया या रिसी
घस्तु के भय की परिभाषा को ले लीनिये । पूंजीवादी विद्वानों के
अनुसार पर्य (Value) निर्धारित होता है सीमा त उपयोगिता
(Marginal theory of utility ) द्वारा । पर उदाहरण
ले नीजिये । पिसी मनुष्य को मेर पाने की सीय इच्छा है
लेकिन दो पार सेय पाने के बाद उसकी इमा घर जाता है।
फिर एक शारिरीसय यह यो साता है उससे उस हरक्षा की
पूर्ण सृप्ति हो जाती निमक याट सेय पाने की उसकी रच्छा
रहती हा नहीं। इस सीमrत रेया व सेर से ही सेय का अध्य
मिर्धारित होता है। लेकिन मारम को परिभाषा सम्पूण मि
है । 'अध्य' सचित श्रम-समय (Congealed Inbour time)
फा ही दूसरा नाम है। श्रर्यात उस वस्तु के निर्माण में जितना
श्रम लगा पाय उसी का पुन जोद है। नीरावी अयशा के
मूल के पफ पेडम रिमय और रियादों की परिभाषा माश्स की परि
भापा के अनुरूप ही है, लेस्नि इस परिभाषा का मार्स ने जो
परिणाम निकाला यह जोगिया को मान्य नहीं था। इसी
कारण पंजीयारियों के साथ को र केलि भास्ट्रियन अर्थ
शास्त्री बोयम यावर्क को मामra उपयोगिता १ सिमान्त को
पोज निकालना पड़ा।
माश्म के शापिंक सिद्धान्ता का प्राधार है दुनिया का
प्रायिक इतिहास । हमी भाधार पर माश्स ने यह प्रमाणित किया
कि पीयादीप्यम्यारानाश र समाजरादापमान का स्थापना
अपरयामायी है । लगिन यूजीसदी पपिस्तों ने यह माणिन करने
को पटा की है कि जीगदी व्ययम्या " प्राकृतिक स्पथग्या
है जिसमें मनुष्य पाद परिवान नहीं कर सकता । पर विशाल

है दूसरा स्थितिशील 1 पहना झातिकारी है, दूसरा सरक्षण तीन । माक्स ने ममाजरादी समान आर्थिक ढाँचा का कोड वर्णन नहीं किया है । लेकिन नीपाद के अन्तर्विरोधों के निरा करण से ही समाजवादी यरस्था की स्थापना हो सस्ती है। इस लिए उस यवस्था के कुछ प्रार्थिक सिद्धान्ता का विरेचन हो जाता है । इससे अधिक और कुछ न कहना माश्स के लिए स्वाभाविक हो था क्योकि समानयादी समाज उस समय भविष्य के गर्म में ही था । लेकिन घाज स्म की योजनायों से इस नवीन धार्थिक ढाँचे की कुछ मन्चक था आती है। इस नवीन ढाँचे का मूल मात्र है, उत्पादन-समान की धारश्यकताया की पूर्ति के लिए न कि व्यक्तियों के मुनामा कनिए । इसमे उत्पादा-क्षेत्र में पूजावादी व्यवस्था का भौति कोई अराक्वा नहीं रहती श्रीर उत्पादन शक्ति की वृद्धि में कोई बाधा नहीं रहती। --लेखक

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विषय-सूची
२
१७
२८
अध्याय विषय
पृष्ठ सरया
अर्थशास्त्र क्या है
1-श्रम और यस्तुधों का रत्पादन
२-अर्य का रूप और मुद्रा
३-अतिरिक्त अध्य
५-मजदूरी
५-मुनाफा और उत्पादन का मूल्य
६-व्यापारी जी तथा व्यापारी का मुनाफा
-लेनदेन की पूंजी और वज़
८- और यक
1- नोट और काज रपये
1.-जमीन पर लगान
"--पूँजी पूर्व युग में लगान के रूप तथा छोटे किसानों
७.
कलगान का प्रश्न
१२-पूजी का एकत्रीकरण और पूँजीवादी सम्म घों का
पुनस्पादन
१३-साम्रा यवाद थोर पंजीवाट का पतन
१४-प्रामिाम
१०३
१३७

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अर्थशास्त्र क्या है? सामाजिक जीवन निवाह के सिलसिले में मनुष्यों में जो सम्बघ स्यापित जाता है उन सम्बचो के अध्ययन के लिये रचित समाज विशान का नाम अर्थशास्त्र है। मनुष्यों में सम्बन्ध बहुत प्रकार के होते हैं लेकिन प्रर्यशास्त्र केवल उही सम्बन्धों का विचार करता है जो सामाजिक श्रम से उत्पन पैदावार के उत्पादन और अटवारा के कारण कायम होता है। इन सम्बघों को उत्पादन सम्बध भी कहते हैं। इन सम्बधों में भी अर्थशास्त्र विशेष रूप से पंजीवाद के अन्तर्गत ही सामाजिक सम्बधों का विचार करता है। ऐम समाज में कोई व्यवस्थित उत्पादन प्रणाली नहीं होती है । यहाँ उत्पादन प्रक्रिया नेत्रविहीन है। इस पूँजीवादी समाज के अव्यवस्थित सम्ब घो के भी कुछ नियम श्ररश्म ही है। परन्तु ये नियम जैसे अघों की क्रियायें हैं जिनको नियत्रित करने के लिए आर्थिक क्रिया में हिस्सा लेनेवाले अपनी स्वतत्रइन्छा शक्ति का प्रयोग नहीं करते।

पहला अध्याय ।
श्रम और वस्तुओं का उत्पादन
अर्घ्य का मूल श्रम
मास का अर्थशास्त्र इस पात को सकर प्रारम्भ होता है
विविना श्रम के मनुष्य-जीवन असम्मर है। चाहे मनुध्य-समाज
का सगठन कैसा हो हो। प्रकृति ही श्रम को मनुष्य-जीवन का
एक प्रावश्यक शत बनाया है। सी थम से यरतुना फा निमाण
होता है और वस्तुओं का सम पंजीवादा समान का सम्मद
है। जीगदी अर्थशास्त्र की मारी मुनियाद है यस्तु ।
बरतु यह चीज है अपने गुणों के कारण मनुष्य की
प्रायश्यकताओं की पूर्ति करता है 17 पेल पस्त जरूरतों को
हीरा करता है पल्कि पद गिनिमय के द्वारा एक पचि फेहायों
से दूसरे व्यकि पहायों में पहुँचती है जिसप व्यवहार के लिये

वह काम में लाई जा सकती है। इसलिए वस्तु वह चीज़ है जो उपयोगी हो और जिसका विनिमय हो सके। किसी काल में सामाजिक ढांचा को समझने के लिये यह जानना चाहिए कि समाज में श्रम का गठन किस प्रकार की है यानी उनकी उसादन क्रिया किस प्रकार की है। समाज का प्रथमावस्था में हर व्यक्ति उत्पादक हाता है। उत्पादन का केन्द्र मो हर व्यक्ति स्वय ही होता है। उत्पन्न माल को वह बाजार में पहुँचाता है और रिस माल की उसे खुद जरूरत है उसके मालिक से अपन माल का विनिमय करता है। इस उत्पादन और विनिमय का कोई म्यवस्थित रूप नहीं होता। श्रव प्रश्न उठता है कि मनुष्य की श्रम शक्ति का प्रयाग किन वस्तुप्रो के निमाण में किया जायगा, यह केस निधारित हाता है । दूसरे शब्दों में किसी अार्थिक ढाँचे का निराकरण कोन सी चीज करती है ? हमन यह समझ लिया कि समाज की प्रथमा वस्था में उत्पादक अपने श्रम + पल का बाजार में विनिमय के लिये उपस्थित करता है । यदि बहुत से लाग उसो यस्तु क पैदावार में लग जाय ता बाज़ार में पैदावार को माना बढ़ जाती है। उस वस्तु की माग उतनी ही रहने के कारण उसका मूल्य अपनी साधा रण सतह से नीचे गिर जायगा । स्वभावत उसर पैदावार की प्रक्रिया स कुछ लोग अलग हो जायेंगे और किसी दूसरे वस्तु को पेश करने में लग जायँगे जिससे अधिक मूल्य की प्राप्ति हो। पहले वस्तु की मारा घट जाने के कारण उसका मूल्य पिर अपनी सतह पर श्रा जायगा। इस प्रकार मूल्य ही सामाजिक श्रम का मटवारा करता है और सामाषिक श्रम शक्ति को विभिन्न वस्तु के पैदावार में नियोजित करता है। वस्तु के विनिमय के सिलसिले में उत्पादनकारियों क बीच एक सम्मघ स्थापित हो जाता है परन्तु समाज की प्रथमा ३ वस्था में ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसा कि यह सम्पप उत्पादक व्यक्तियों बीच नहाकर उत्पन्न वस्तुओं के बीच है। सारे समान की एक श्रम शक्ति होती है। यह समाज के अन्त गंत सार व्यक्तियों की मानसिक और शारीरिक शक्तियों का जोड़ है । माक्स ने दम समूनी शक्ति को सचित श्रमूर्त श्रम का नाम दिया है। इस अमूत श्रम फ प्रयोग से ही कोई विशिष्ट यस्तु बनता 'बुनना, यातना, जूते यनाना इत्यादि । तर इस श्रम को विशिष्ट श्रम कहेंग। परत शन्द की परिभाषा में ही दो अर्थ निहित है-एक यह कि प्रत्यक्ष या अपरोक्ष रूप से यह मनुष्य की यावश्यक्तायों की पूर्ति करता है, दूसरा यह कि इसका निर्माण बाजार में विनिमय के लिए किया जाता है। यानी यह उत्पादक के निजी खच के लिए नहीं पैदा पिया जाता है बल्कि किसी और के लिये जिसको इस चीज की जरूरत है। हर काम की चीज गुण की दृष्टि से कुछ गुणों का जमाव है। इस कारण यह विभिन्न प्रकार के कामों में लाया जा सकता है। दूसरे शन्दों में वस्तु का एक व्यवहार अभ्य है और कि व्यवहार अष्य उसकी प्रयोजनीयता पर निमर है और इसका उस यस्तु से अलाहिदा नही किया जा सकता है । यस्तु व्यवहार अर्प ही मन जाता है।भम के परिमाण से म्पबहार-अप्य का कोई सम्बध नहीं है। उदाहरण के लिए किसी यस्त्र के पनाने में चाहे एक घटा लगा हो चाहे दश उसकी प्रयोजनीयता उतनी ही रहती है यानी शरीर ढाको दी जरूरत को यह रता करता है। पिस परिमाण प अनुपात में एक व्यवहार अप्य का दूसरे म्पपहार अप्प स रिनिमय होता है टसको विनिमय अध्यं करते १! पह अनुपात परिवतनशील है। समय और स्थान पर यह निमी है। २. गज कपड़ा मनाने में आज किसी देश में जितना भम - लगता है कल दूसरे किसी देश में उत्पादन शक्ति में वृद्धि के कारण उससे कम समय लग सकता है। इसलिए यह अनुगात समय और स्थान के साथ बदलता रहता है। अब मान लीजिए कि एक मन गेहूँ का विनिमय 'क' परिमाण रेशम और 'ख' परिमाण सोने से किया जा सकता है। इसका यह अर्थ हुया कि 'क' परिमाण रेशम और 'ख' परिमाण साने का एक दूसरे से विनिमय हो सकता है क्योंकि ये दोनों हो एक ही परिमाण गेहूँ के समान है । इस उदाहरण से एक बात स्पष्ट है। यह यह कि जिन दो वस्तुयों में श्रापस में मिनिमय होता है उन दोनों वस्तुनों में कोई ऐसी बात होगी जा दानों में वतमान हो परन्तु दोनों से मिन हो। यह बात उन वस्तुओं का कोई गुण नहीं हो सकता क्योंकि उन वस्तुयों के प्राकृतिक गुण बिलकुन अलग-अलग है। जो बात दोनों में है वह यह कि दानां श्रम के उपज हैं। इस दृष्टि-कोण से मेज़, मकान या मोज़ा इनका एक ही रूप है- अमूर्त श्रम का रूप । उपरोच वस्तुनों में केवल इस श्रमूर्त श्रम के विभिन्न परिमाण हैं। विनिमय श्रभ्य ही किसी वस्तु का असली अर्घ्य है। इस अध्य का कारण है अमूर्त मनुष्य श्रम जो उस वस्तु में रूप ग्रहण करता है। इस अर्घ्य का परिमाण मापने के लिए हमें यह जानने की आवश्यकता है कि उस यस्तु में श्रम का परिमाण कितना है। इस श्रम का परिमाण हम समय से ही कर सकते हैं। अम-समय से ही किसी वस्तु के अर्घ्य का परिमाण किया जाता है । अर्थात् क्सिी वस्तु के निर्माण में जितने घटों या दिनों का मम लगाया गया है वही ठस वस्तु का अध्य है। ऊपर कही गई बातों से यह खयाल किया जा सस्ता है कि उत्पादक जितना धनाड़ी होगा या श्रालसी होगा उतना ही उसके द्वारा उत्पन वस्तु का अर्घ्य अधिक होगा। परन्तु यह बात नहीं है। किसी भी समय किसी विशेष समाज में एक यासत श्रादमी जितना श्रम-समय किसी वस्तु के निमाण में लगायेगा वा उस वस्तु का अध्य है। दूसरे शन्दों में यह श्रम-समय सामा जिक अास्था और श्रावश्यकता के अनुसार होना चाहिए। जैसे मशीन के अाविष्कार से किसी वस्तु के निर्माण का समय यदि घट जाय तो उसी समय से उस वस्तु के अयं का परिमाण किया जाना चाहिए। मस यह स्पष्ट है कि जब तक इस श्रम-समय का परिमाण घटता बढता नहीं है तब तक रिसी परतु के अध्य में परिवतन नहीं होता । श्रम की उरगदन शक्ति को हास वृद्धि के साप अध्यं की हास वृद्धि होती रहती है । उत्पादन शति पदने से अर्घ्य घटता है और उत्पादन शत्ति घटने से अध्य पदता है। गणित की भाषा में किमी वस्तु का अर्य उसमें निहित श्रम के परिमाण के अनुपात में है और इस श्रम की उत्पादन शतिरे विपरीत अनुपात में है। यदि कोई गिरा उत्पादर अपने व्यवहार के लिये किसी नई मशीन का प्राविधार करता है तो उससे सामाजिक प्रावश्यक भम में कोई अतर नहीं पड़ता। लेग्नि चूकि एक वस्तु के उत्पादन में उसका अपना भम सामाजिक प्रावश्यक श्रम से कम व्यय होता है और उस वस्तु का पाजार माव उसक भम पर नी, पलि सामाजिक धम-समय पर निर्भर है, उस विशिष्ट उत्पादक को अधिक मुनाका मिलता है और इसी से नई मशीन धादि के आविष्कार में प्रात्मान मिलता है। नई मशीनों मादि के श्राविकार में ही सामाशिक श्रम की उत्पादन थात मदती है और यस्यों का अध्य पान लगता है। अनुमिनियम का सच अाज पाठ हसार गुना बढ़ गया है और इस मुल्य में कमी का माग और प्रति म कोई सम्पध नहीं है बल्कि इसकी मांग इसीलिये पढ़ गई है कि यह सस्ता हो गया है और सस्ता होने का कारण यह है कि उसकाध्य घट गया है या दूरे शन्दों में इसके उत्पादन के लिये कम श्रावश्यक श्रम की ज़रूरत है। एक और प्रश्न का यहां समाधान करना है। क्या एक घन्टा का मामूली शारीरिक श्रम एक इंजिनीयर या लेसक के एक पाश्रम चरार है १ श्रम के एकक के लिये हम एक घन्टा का सादा श्रम ही लेते हैं जिसके लिये किसी विशेष प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता नहीं है । जिस श्रम में हुनर की श्रावश्यक्ता है वह अधिक कीमती है । उस हुनर के सीसने में जितना अधिक समय लगे यह उतनी ही क्रीमती है। हुनरमन्दों के श्रम समय को साधारण अम-समय में प्रोका जा सकता है। लेकिन आज के समाज में इसकी सठीक गणना सम्भव नदी। यदि कोई श्रम-समय के इस नियम को किसी कलाकार की कृति के ऊपर लागू करना चाहे और उसका प्राय निकालना चाहे तो यह सम्मय नहीं। इस प्रकार को पतियों ननोगे परत है और साधारण वस्तुना से इनकी तुलना नहीं की जा सकती। इसका एक कारण यह भी है कि इन कृतियों का पुनरुत्पादन नहीं हो सकता। ऐसे वस्तुयों का मूल्य जिनका पुनरुत्पादन नहीं हो सकता अध्यं के नियम से श्रीका नहीं जा सकता। ऐसा हो सकता है कि किसी चीज़ का व्यवहार अर्घ्य होपरतु कोई अर्ध न हो। उदाहरण के लिये खुली हवा, नई जमीन, जगल, उद्गमस्थान पर जल इत्यादि । एक और बात यहाँ मम लेने की है। उन्हीं दो वस्तुत्रों का विनिमय हो मरता है जिनका व्यवहार अयं एक दूसरे से भिन्न है । जैसे एक दुशाला से दूसरे दुशाला का विनिमय नहीं हो सकता लेकिन गेहू या सोने से हो सकता है। इस प्रकार विनिमय के मूल में है दो या अधिक व्यवहार श्रयों की मिनता।

अब यह समझो की ज़रूरत है कि किस वस्तु का मूल्य स्या है। यह मूल्य कैसे निर्धारित मिया जाता है। दो वस्तुनों फे मूल्यों में अन्तर इसलिये नहीं होता कि एक अधिक धाव श्यक है और दूसरा क्म और न इसलिये कि एक अधिक टिकाऊ है और दूसरा कम । एक उदाहरण ले लीजिये रोटी और हीरे का। किसी एक मनुष्य के लिये किसी वस्तु की जरूरत की मात्रा स्तिनी है। इसका कोई सठी अन्दाज़ा नहीं लगाया जा सकता है। यदि यह वहा जाय कि किमी वस्तु की कितनी मांग है और कितनी उसकी पृति है इसके ऊपर उस वस्तु का मूल्य निर्मर है तो यह मी सही नहीं होगा। यदि ऐसा होता तो जिन दो घस्तुओं की मांग और पूर्ति समान परिमाण में होता उन दोनो वस्तुओं का बाजार भाव भी एक ही होता। उदाहरण के लिये ले लीजिये चीनी और सिलाइ की मशीन । माग और पूर्ति का नियम देवल एक सीमित रूप से बाजार दर पे उतार चढ़ाप का अर्थ रतला सकता है। मांग के बढ़ने के कारण अपवा पूर्ति की कमी के कारण था और किसी कारण से मूल्य अत्यधिक यद जाने पर मांग घट जाती है । इसके विपरीत उदाहरण से भी यह सिद्ध होता है। यदि माज़ार में किसी चीज प अत्यधिक तादाद में होने के कारण उसका भाव गिर जाता है तो वस चीज्ञ पे पेरावार में कोई मुनाफा नहीं मिल सकता और उसका पैदावार मन्द रोजाता है। पैदावार पाने के कारण मूल्य रि पढ़ने लगता है। इस प्रकार मूल्य दो मांग और पूर्ति पर असर डालता हैन कि इसका उल्टा। तो स्या पैदावार पे लागत दाम से मल्य निर्धारित होता है। इसके गो सो पेयल इतनामा मिन विभि चीजो से कोई पस्तु यना हो उन विभिन्न चीजों पे दाम को जोड़कर उस यस्त का मूल्य पसा दिया जाय । इससे प्रा या समाधान नहीं

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हुअा। एक अशात परिमाण की परिमापा हम दूसरे अशात परिमाणों से करना चाहते हैं। आखिर तक हमें सब वस्तुओं के लागत दाम के लिये हमें वहीं पहुचना पड़ता है कि वस्तु के निर्माण में श्रम का व्यय कितना हुा। क्योंकि हम अपनी खोज के सिलसिले में उस जगह पहुचते है जहाँ श्रम के व्यय के सिवा फेवल वही चीजें रह जाती है जो प्रकृतिदच है यानी वे प्राकृतिक चीजें जिन पर कोई श्रम का व्यय नहीं किया गया हो। अम की प्रक्रिया में मनुष्यों को एक दूसरे पर निर्भर होना पड़ता है और इसलिये उनमें उत्पादन का एक सम्बध बन आता है। इस प्रकार व्यक्ति का श्रम सारे समाज के श्रम का एक हिस्सा बन जाता है। उत्पादन का सम्बध इस बात को अवश्यम्भावी बना देता है कि समाज में श्रम का विभाजन इस प्रकार हो कि समाज की श्रावश्यक्तायों की पूर्ति हो सके । बाजार में किस अनुपात में वस्तुओं का विनिमय होता है, यही निर्धारित करता है कि किसी विनिमयात्मक श्रार्थिक ढांचे में श्रम का विमाजन किस प्रकार हो। वस्तुओं का विनिमय मनुष्यों के बीच उत्पादन सम्बध को नियमित करने का एक विशेष उपाय है और यह इस प्रकार से नियमित होता रहता है कि अयं के पास पास मूल्य का उतार चढाव होता है। यह सम्बध ऐसा नहीं है कि हमेशा एक वरद कायम रहे लेकिन अर्घ्य ही इसका निर्णायक है। अव्यवस्थित समाज संगठन के कारण ही अर्घ्य कोविनिमया मक श्राधिक ढांचे के निर्णायक के रूप में काम करना पडता है। विनिमय ढांचे के कारण जिन अवस्थाओं का उत्पत्ति होती है उनसे मनुष्यों के बीच एक विशिष्ट सम्बध कायम हो जाता है और श्रय की जह इसी सम्बध में है। जब हम अपने सम्पपों को न्यानुसार नियन्त्रित कर सकेंगे तो अर्य का कोई काम ही नहीं रह जायगा। इस दृष्टिकोण से अार्य और व्यवहार अयं में बहुत अन्तर है। मनुष्यों के सामाजिक सम्र में कैसा भी परिवर्तन हो यस्तुओं प व्यवहार-अर्य में कोई परिवर्तन नहीं होता।

दूसरा अध्याय अर्घ्य का रूप और मुद्रा विनिमयात्मक श्रार्थिक ढांचे के अन्दर किसी वस्तु * अर्घ्य को सीधे सोपे श्रम के घी को तादाद में श्रोका नहीं जा सकता । वे वस्तु जिनका बाजार में विनिमय हाता है वे ही मनुष्यों के बीच उलादन सम्बध का प्रतीक बन जाते हैं। इसके बिना श्रम का फल केरल व्यवहार श्रध्य हो सकता है इसका कोई विनिमय-अर्घ्य नहीं होगा। कोई मी वस्तु अपना अभ्यं नहीं श्रांक सदता जब तक वह किसी दूसरे वस्तु के सम्पर्क में नहीं पाये । एक वस्तु का अभ्य दूसरे वस्तु के विशिष्ट तादाद में ही रूप ग्रहण करता है। ऐसा इसलिये है कि (१) आवश्यक सामाजिक श्रम समय का परिमाण कई चीजों पर निर्भर है जैसे किसी उत्पन्न वस्तु की कुल तादाद, जितने व्यक्ति उस वस्तु के उत्पादन में लगे हुए हैं उन कुल व्यक्तियों के श्रम रूप में चाहे जो भी यस्नुहोउन सबके अध्य का रूप एक विशिष्ट वस्तु ही होता है। जैसे एक कोर दोसेर पाल एक मोतल मिट्टी का तेल २. गज कपड़ा एक दर्जन अहे २० यस्स दियासलाई यह पहले के समीकरणों का पेवल उलटा नहीं है। इस प्रया से एक ऐसे वस्तु का माविष्कार हो जाता है जो सार्व मौमिक रूप से सब वस्तुनों के अर्घ्य का समरूप बन जाता है। यह सार्यभौमिक समरूप का स्वयं एक अर्घ्य है लेकिन यह सब पखनों के श्रयों का मानदण्डस्वरूप है। श्राज के समाज में सार्वभौमिक समरूप का काम करता है मुद्रा। यर्तमान काल में मिनिमय का माध्यम है मुद्रा । मुद्रा में सोना चांदी प्रादि का ही व्यवहार होता है। इसके कुछ कारण ये है कि समय योतने पर भी ये घिसते कम है, यासानी से छोटे छोटे हिस्सों में इनका विभाग किया जा सकता है, थोड़े परिमाण में ही इनका अन्य अधिक है, इनकी पहचान श्रासानी से की जा सकती है। मुद्रा के निज का श्रय है और जहाँ अध्य का प्रचलन है वहीं मुद्रा का भी प्रचलन है । वतमान पजीरादी समाज में अर्घ्य ही श्रम-संगठन को नियत्रित करता है और इसलिये इस समाज में मुद्रा की भी आवश्यकता है। सुज्यवस्थित प्राधिक ढाँचे में न अध्यं की आवश्यकता है न मुद्रा की। मुद्रा कोई रहस्यमय यस्त नहीं है। पर तु यह रहस्यमय इसलिये प्रतीत होता है कि नाज के समाज-सगठन में मनुष्य का प्रभुत्व वस्तुओं पर न होकर वस्तुओं का प्रभुत्व मनुष्य पर है। १४ जब किसी वस्तु के अर्थ को मुद्रा (रुपये पैसो) में धाकते है तो उसको उस वस्तु का मूल्य कहते हैं। किसी वस्तु का मूल्य इस पात पर निमर है कि कितना श्रम उस वस्तु में युजीकृत है और कितना श्रम मुद्रा में सम्मिलित है। उत्सादक शक्ति की वृद्धि २ सय वस्तुओं के मूल्य में हास होता है और यदि साना चांदी श्रादि का पैदावार सहज हो जाय तामूल्य में वृद्धि हाजायगी क्योंकि साना धादि में सामाजिक श्रम आदि का परिमाए पट पायगा। जा परिमाण साना या किसी वस्तु के अर्घ्य के समान है उस परिमाए में तो कोई अन्तर नहीं होता है परन्तु मिन देशों में इस परिमाण को मूल्य के विभिन्न रूप दिये जाते हैं क्याकि मूल्य फा एकक मिन देशों म भिन्न है । पहले पहल मूल्य का एक सोना चौदा माद के एक विशिष्ट वजन को माना जाता था जैस अग्रेजा पाउ बाघ सर के करीब ) म जाहिर है। साना चांदी के भाव में कुछ भी परिवतन । मूल्य में मापदण्ड में काई अन्तर नहीं पड़ता। उदाहरण के लिये चांदी का माव कुछ भी हो रुपये के चपनी सदा चार ही होंगे। अलग अलग देश के अलग-अलग सिक्के होन पर भी उनका सम्बन्ध स्थापित करना मुश्किल नहीं है क्योंकि सोने का श्रय सर देशों में ही समान है। श्रान के दिन वस्तुओं के अध्य को अम के घटो का रूप न देकर मुद्रा या सिका का रूप दिया जाता है। सिक्क के साथ वस्तु का वास्तविक विनिमय न होने पर भी उसका अर्य सिका में नाका जाता है। अर्य का परिमाण और मूल्य के मानदण्ड के अलावा सिधा वस्तुत्रों के विनिमय के माध्यम का भी काम फरता है। मुद्रा के बार बहुत से वस्तुओं का एक दूसरे के सम्पर्क में पाना असम्पा नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता । वस्तुओं फे रिमिय में सिक्के के माध्यम को एक चा का रूप दिया जा सकता है-वस्तु-मुद्रा-परतु । सिक्के का प्रचलन जितनी तेजी के साथ होगा उतने ही फम माध्यम को पाव- श्यकता होगी। यदि दिन भर में एक सिका पांच सौदों में मारा लेता है और कुल वस्तुओं का अध्य १००० पाया हो तो बाज़ार में केवल २०० रुपयों की जरूरत होगी। मूल्य की बुनियादी पात है अर्थ का नियम । श्रभ्य को रुपये पैसे में प्रोकना हो मूल्य है। हमने अभी तक ऐसा ही विचार प्रगट किया है कि मूल्य और अन्य एक ही है। परन्तु वास्तव में यह सम्मा तमी है जर वस्तुओं की मांग चोर पूर्ति बराबर हो । साधारणत यह व्यतिकम ही है। मूल्य और अर्प के अन्तर से दी मांग और पूर्ति में परावरी की चेष्टा होती रहती है और किसी वस्तु का उत्पादन पटाया जाता है और किसी का सदाया जाता है। फिर भी अर्य को ही बेन्द्र पनाकर मूल्य उसके इर्द गिर्द घूमा करता है। मुद्रा के एक्जी भी होते हैं, जैसे सिक्के जो अपने असली अयं से ज्यादह के द्योतक है या कागज के नोट जिनका अर्घ्य नक्षा के बराबर है। तो इनके लिये अयं का नियम कैसे लागू होता है। इस प्रश्न का उत्तर यही है कि इनका श्रयं तमी समझा जा सकता है जब हम मान लें कि ये एवजी मात्र है और जिनके ये एवजी है उन पर श्रभ्य का नियम लागू होता है। दूसरी बात यह है कि ये एवजी केवल वस्तुओं का विनिमय माध्यम के काम ही ना सकते हैं।

तोमरा अध्याय अतिरिक्त अर्घ्य साधारण प्राधिक ढांचे में वस्तुओं के छाटे छोटे उत्पादक होते हैं जो उत्पादन के साधन के स्वय मालिक हैं और जा मापने श्रम के उपज को विक्री से ही गुजर बसर करते हैं। ऐसी उत्पादन प्रथा में अपनी आवश्यकता पूरी करने के लिये ही वस्तुओं का विनिमय होता है। नाज के दिन विनिमय का यह उद्देश्य नहीं है। उत्पादन चक अब वस्तु-मुद्रावस्तु न होकर मुद्रा वस्तु-मुद्रा का रूप ले लेता है। पंजीपति की विनिमय निया श्रारम्भ होती है, रुपये से माल पराद कर उसको बेचना और रुपया बनाना। लेकिन पंजीपति के लिये विनिमय का तभी कोई अर्थ होता हे जर कि जितना रुपया यह खर्च करता है उससे ज्यादह उसकी शामदनी होती है। इसलिये वास्तविक जीवादी उत्पादन चक्र है मुद्रा-

रस्तु-मुद्रा अधिक मुद्रा या मु-व-मु+मुयह मुसहा मे
पाया।
अर्य के नियम के अनुसार पस्तुओं का मूल्य इस प्रध्य क
श्रास पास ही रहता है र मूल्य अाप से रह जाता है ना उम
वस्तु पे ज्यादा पैदावार म लाग लग जात है। पैदावार पर
जाने से मूल्य और घट जाता है और उपानकारों दूसरे यस्तु र
पैदावार में लग जाते है। मूल्य पटो नदी के साथ जो कमी
इस वस्तु में उसादन म लगाई जाता है कभी उस पस्तु क, जप
तक कि मूल्य और अयं परापर नहीं हो जाता। मूल्य के इस
बढने घटने के अवसर पर कोई पंजानि अपो प्रतिदनी मर
मुनाफा कमा सकता है। लेकिन यह क्षण स्थाया है और
के उतार चाय के अन्त माथ इसका भी अन्त हो
जाता है। इसलिये मांग और पूर्ति की रिपमता इस प्रश्न का
समाधान नहीं कर सकती कि सारे पंच पतिवग के मुनाफे फा
क्या कारण है। यह परल इतना ही रतला सकती है कि
व्यक्तिगत रूप से किसी पंजीपनि फे मुनाफे में कमी या मेशा क्यों
माक्स के शन्दा म प्रचलित प्रयों का जाइ उना विभागा
म कारण यत नहीं सफ्ता। जैसे कौमती सनिज पार्टी की
तादाद में कोई मी अतर नही सस्ता चाद थोड़े लोग
क्वीन (राना) श्राोषी पादिग (मा) को गिलो क दाम
क्यो न बेचते हो।
सम्भर है, मुनाने का कारण यह हा विवेचीयाला का यह
विशिष्टता है कि धे रस्तुश्रों को अपने अध्य से अधिक मूल्य में
रेनते हो। लेकिन नहर पंजी ति बेचनेवाला भी है
सरोदनेवाला भी है। व्यापारी व लिये भी यही बात है।
इसलिये विनिमय के कारण कुल यों के जोड़ में कोई अन्तर

नहीं हो सकता, क्योंकि वेचनेवाले की हैसियत से उसकी जा
लाम होगा खरीदोवाले की हैसियत से उसको उतना ही नुन
सान हागा । वस्तुओं की श्रामदरफ्त से पंजीपति के मुनाफे का
मेद नहीं खुलता।
माक्स ने प्रश्न का यों रक्खा है-"हमारे दोनों की रुपये
की थैली का वस्तुओं का अपने श्रध्य पर खरीदना होगा और
अपने सर्य ही पर उनको बेचना होगा, पिर भी कारोबार के
श्रारम्भ में उसने नितने अध्य का लागत की थी कारागर फे
श्रन्त में उससे अधिक उसरा मिलना है।"
इस प्रश्न का समाधान तभी हो सकता है जब राजार में
एक ऐसा वस्तु हो जिसमें अर्घ्य पैदा करने का गुण हो ।
पूँजीवादी पाजार में नितने भी वस्तु है उनमें एक ही वस्तु है
जिसमें यह गुण हो और यह वस्तु है श्रम शचि । इसलिये श्रय
मूल में यही वस्तु है।
हरएक समाज निराध लिये श्रम शक्ति एक वस्तु नहीं है।
इसके लिये दो शतें जरूरी है--
(१) श्रमिक को व्यक्गित श्राजादी होनी चाहिए यानी वह
जैसे नाहे श्रम एत्ति का उपयोग करे । यह श्राजादा गुलामों को
माप्त नहीं।
(२) श्रमिक के पास निजी उत्सदन का साधन या जिन्दगी
यसर करने का जरिया न होना चाहिए ताकि उसका मनबूरा
अपनी श्रम शक्ति को बेचना पड़े।
अर्घ्य के नियम की बुनियाद पर श्रम शक्ति खरीदने पर
पूंजीपति को उसका पूरा अर्घ्य देना चाहिए । श्रम शक्ति क
श्रय या परिमाण कैसे लगाया जाता है। श्रम शक्ति पैक्टरी में
पैदा नहीं की जाती है । जीवन की प्राकृतिक प्रक्रिया में ही इसका
जाम और विकास है । श्रम शचि पूँजीपति के रिस काम की है।

इराफी उपयोगिता यही है कि यह श्रम शक्ति को एक निर्दिष्ट समय के लिए काम में लगा सस्ता है। यहाँ धम की परिभाषा मी करना चाहिए । श्रम मनुष्य को इन्धा जनित और प्रशात्मक किया है जिसके द्वारा यह प्राकृतिक चीज़ा को मनुष्य व्यवहार के उपयागी बनाता है। पादरी प्राति पर काम करते हुए श्रमिक एर निर्दिन परिमाण शागरिम, मानसिक और स्नायविक शक्ति का व्यय करता है। अपनी श्रम शक्ति को कायम रखने के लिये इस व्यय पिए गए, शति की पुन प्राप्ति हानी चाहिए । इसका श्रथ यह है कि जावन धारण की सामग्रियों का एक निर्दिष्ट परिमाण उसको चाहिए । उसको मकान कपड़े याहार सामग्री श्रादि चाहिए । श्रम की धाग अटूट रहे इमसे भमिक को पशरक्षा भी हानी चाहिए । जीवन धारण के लिए याहार सामग्री के अलावा कुछ सांस्कृतिक बारूरतें भी पूरी करनी पड़ता है। ये जरूरत मि7 देशों में श्रीर भिन्न कालों में मिन है। उन देशों में जहाँ पूँजोगद ने काफी उन्नति की है जैस ब्रिटेन और अमेरिका श्रार पिछड़े हुए रेशी में जैस भारत श्रादि य उपनिवेशा में इन जरूरतों के परिमाण और पयाय में बढ़ा अन्तर है। यह श्रम शक्ति, जिसमें हुनर का माद्दा अधिक है, अधिक कीमती है। इस अधिक कीमत की वह यहा है उसकी शिक्षा 7 लिए समाज ने श्रम समय लगाया है । यह भी सही है कि ऐसे हुनगम अमिक + जीपन और उनति के लिये माधारण श्रमिक से ज्यादह सहूलियतों को ज़रूरत है। जीवन धारण की सामग्री, उसके व्यय किए हुए श्रम की पुन प्राप्ति के लिए सामग्री, उसकी सांस्कृतिक और उसका वश हर एक वस्तु का एक श्रध्य है जिसको मापन वा यही जरिया है जो हर वस्तु के लिये है यानी इनके उत्पादन के लिये सामानिमश्राव

.
श्यक प्रम-समय } जीरन धारण की इन सा सामग्रियों का सम्मि
लित यस्य ही श्रम शचि का मध्य है।
ऐमा प्रतात हो रहा हागा कि पूंजीपति रहा परस्वार्थी जीर
है क्योकि न सिफ वह मज़दूर हो का हितचिन्तक है बल्कि उसके
परिवार का भी । लेकिन यह भूल है। इसक विपरीत यह हर
समय और असम्भव तरीके मे मादूरों क रहन मद्दन को नीचे
गिराना चाहता है। लेकिन इसके बावजूद भी जीति को
बाजार भाव के अनुसार मजदूरी देनी पड़ती है । प्रो. वस्तु
की तरह मजदूरी का मूल्य मा सरने अध्य के शास पास रहता है।
माग और पूर्ति के नियम ६ अनुसार मादूरी घटता बत्ती
रहती है।
जर याजार में पूँ नापति और मजदूर दोनों मिलते हैं तादानों
दो रगर वस्तु लो क मालिक की हैसियत से मिलत हैं-मजदूर
रहैसियत श्रमशक्ति के मालिक के और पूँ जीरति कन्ये व मालिक
के । श्रम शचि को सरोदकर पूंजीपति इन्छानुसार इसका
प्रयोग कर सकता है और इसक व्यवहार अभ्य सलाम उठाता
है । श्रम शकि का व्यवहार अर्घ्य है श्रम, जो अभ्य का सृष्टि
करता है। श्रम-शदि व्यवहार अर्घ्य के मानिक नाते
पूजापति श्रमिक को मिहनत करने के लिये याध्य करता है।
लकिन श्रम शक्ति की यदी महान् मिशिगता है कि नितना
य इमका अपना है उससे अधिक अर्घ्य यह मुष्टि करता है।
यदि यह मान लिया जाय कि उन सब वस्तुओं का समान में
লিনয় মধুৰ ভাৰৰ ঘৰ, যঘন্য শ্রীহ ম ফাই
५ घटा समय लगता है ता पूँजीपति मज़दूर से काम लेता है
१. घटे । इन श्राविणे ५ घरों में मजदूर जो कुछ पैदा करता
है वह अपने श्रध्य से अधिक पैदा करता है। "सा को अतिरित
अध्य कहते हैं।

पूजारादी उत्गदन प्रथा के पहले भी शरण जारी गा, लेकिन
उन प्रधाना में अमिक र मालिस का पूर्ण अधिकार या पार
श्रम शक्ति खरीदने देवने की सामग्री न थी, इसनि उस
समय के अतिरिक्त पैदावार को अतिरित्त श्रष्य का नाम नहीं
दिया जा सकता । यह अतिरित अप्य पूँजीपादा प्रथा में ही
सम्मय है।
पर श्रम शक्ति का संयोग उत्पादन र माधनों से होता है
जैस मशीनें, मकानात, फच्चे माल इत्याद तो उरगदन किया
मम्मर होता है और अतिरिक्त अध्ययोगशि होती है। ये तमाम
चा जिनका श्रध्य है और पिनय सम्पश में अतिरिक्त
अर्घ्य पैदा की जा सकती है पूँजी कहलाता है । श्रम-शत्ति भी
जिसका पूजारति सरीदता है पू जी में शामिल है।
नो अपा प्राकृतिक गुणों पे ही कारण जो नहीं बन
जातों बल्कि पूछ विशेष मामानि सपा के पारण जैस
पूंजीपति दाग मजदूरों का शोषण ।
काउट्स्की ने लिया है "कुछ लोग श्रीज्ञागे का ही पूँजी
करते हैं जिस माने यह हुए कि जब कोई पन्दर बदाम श्रादि
पाडता है तो वह पूजीपनि न जाता है। इसी प्रकार जिस
लकड़ी से काइ जगलो पल तोड़ना है वह भी पूँजी बन जाती
है। कुछ पोरों ने पूजी को परिभाषा की है कि यह पुजीभूत
अम है । इस परिभाषा के अनुसार चौटियाँ भी रॅपस्चाइल्ड
और मयूस के समकक्ष हो जाती हैं। कुछ अर्थनीनिशों ने उन सब
चीजों को पूँजो में शामिल दिया है जा श्रम करने में सहायक
हो और श्रम का उत्पादक बनाती हो। जैसे राष्ट्र मनुष्य की
बुद्धि और उसकी श्रात्मा । ये लड़कों की कहानियाँ पढने में
सुदर है लेकिन इनमे सामाजिक श्राकार, नियम और समाज
की अन्तनिहित शत्तियों का ज्ञान प्राप्त होता ।"
૨૨

उत्पादन के साधन और पुजाकृत भम यादि तभी पूँजी बनते हैं ये अतिरिक्त अय की प्राप्ति के साधन बन जाते हैं। पूँजी में जो विभिन्न चीजें शामिल हैं उनका महत्व समान नहीं है मशीन मी पूँजी का क हिस्मा है । किसी वस्तु के उत्या में मशान को रगद पिम य कारण अपना एक श्रश, चाहे पद स्तिना ही कम हो पोना पड़ता है। इस श्रश का अध्य उस वस्तु के श्रध्य में रूमानरित हा जाता है। परन्तु पूंजी का यह हिस्सा जिसमें क्या माल शादि शामिल है वे पूरे व पूर उत्पादनक्रिया में काम या नाते हैं और उनका पूरा अध्य नये उसन वस्तु म शामिन हो जाता है। यह कैस मालूम किया जाय कि मशान का कितना हिस्सा किसी उत्पादित वस्तु में शामिल हुया ! मान लीजिये मि उस मशीन में १०,००० दिन का श्रम शामिल है। यह भी मान लीजिये कि उत्पन्न वस्तु की तादाद ५०० है। अब यदि मशान १० साल चले तो इस अरसे म कुल उत्पन्न वस्तुओं की तादार होगी ५...। प्रत्येर वस्तु में जा मशीन का हिस्सा शामिल है यह हुश्रा २ दिन का श्रम। यहाँ देखने योग्य बात यह है कि उत्पादन के श्रीजार और कच्चा माल श्रादि का जास्सिा खच होता है उतना ही उत्पन वस्तु में शामिल रहता है। समान श्रर्य से समान अध्य की सृष्टि होती है। पिर अतिरिच अध्य कहाँ से आया जिसका पूँजीपति उस वस्तु का वार प्राप्त करता है। यह अतिरिक्त अर्घ्य श्रम की ही सष्टि है। मशीन और कथा माल श्रादि को श्रशत वस्तु में परिवर्तित करना यह मी अम ही का काम है। इस क्रिया में जो एक पात निशेष रूप से हो जाती है वह यह मि यह श्रम न पल अपना अश भी इस उत्पन्न वस्तु को प्रदान करता है बल्कि कुछ अधिक भी प्रदान करता है । २३

के शाषण
यही अधिक अश अतिरिच अध्य है। मशीन और कच्चा माल
का जो श्रश यस्तु में परिवर्तित हो जाता है उसमें कोई गुणात्मक
परिवतन नहीं होता । परतु उस यस्तु में श्रम ५ कारण श्रम
दे अपने प्राय से अधिक परिमाण अभ्य उस वरतु में सम्मिलित
हो जाता है । इस कारण माक्स ने मशीन और फचा माल
श्रादि का स्थिर पूजा या है और श्रम को अस्थिर पूँजी
कहा है।
मजदूर
का पता लगता है अतिरिच मर्य
और अस्थिर पूँजी प अनुपात से । जब यह अनुपात पीसदी
में श्रांका जाता है तो इसका अतिरिक्त श्रध्य प्रथया शाषण
का दर कहते हैं। एक उदाहरण ल लीजिय । मान लीनिये
स्थिर पूंजा है ६००) अस्थिर पूँजी है २००) श्रीर अतिरिक्त
अर्घ्य हे १००) तो शोषण या दर हुआ::५० पीसदी। यानी
हर पटा जो मजदूर काम करता है उसमें श्राधा ५ टा यह मालिक
फे लिए अतिरिक्त अन्य पेश करता है।
अगर यह दर १०० फीसदी है तो यद १ घटा पग्धिम
करता है अपन श्रम अध्य की प्राप्ति के लिये और १ घटा
श्रम करता है पूंजीपति का अतिरिक्त अध्य दिलान में । श्रम
के उस हिस्से को जिससे मजदूर को नपा श्रम के अध्य की
प्राप्ति होती है हम श्रावश्यक श्रम समय कहते हैं और जिस
हिस्से से अतिरिक्त श्रभ्य पेटा होता है उसको हम अतिरिक्त
श्रम-समय श्रथया कपल अतिरिक्त-समय कहते हैं।
पूंजीवादी उत्पादन प्रथा में पृ जीपति सता सवदा अतिरिक्त
श्रभ्य बढ़ाने का ही स्वप्न देखता है। यह दो प्रकार स चटाया
जा सकता है। इसको समान के लिये अगले पृष्ठ का रेसांक
दखिये-
२४

प्रायश्यक समय
अतिरिक्त समय
Fatm
घन्टा ५ घन्टा
इस रेसम के अनुसार शोषण का दर दो प्रगर से बढ
सकता है। या तो यावश्यक श्रम समय घटा दिया जाय या
अतिरिक्त समय बढा दिया जाय। अतिरिक्त समय बटाना थासान
है और श्रारम्भ म पूंजीपति यही करता है।
लेकिन यह अतिरिक्त समय एक सीमा से अधिक नहीं बताया
जा सकता । यह नीति गर्हित तो होगा ही, प्राकृतिक कारणों से
भी यह असम्भव है। दिन २४ घटे से अधिक नहीं हो सकता
और श्रमिक को याद दूसरे दिन काम करना है तो कुछ समय
उसको विश्राम के लिये भी चाहिये । पिर ऐतिहासिक क्रमविकास
और उनति के साथ एक सास्कृतिक धारा बन जाती है जिसकी
यह मांग होती है कि श्रम समय एक निर्दिष्ट सीमा को पार न
परे । १ म-समय को बढा पर जब अतिरिक्त अध्य की सृष्टि
होती है तो उसको निरपद अतिरिक्त नर्घ्य कहते हैं। श्रम-समय
समान रखकर उसी समय व अदर अधिक मिहनत कराने से भी
निरपेक्ष अतिरिक्त अध्य की वृद्धि होती है। अधिक देखरेख और
उत्पादन क बेहतर सगठन से यह नतीजा निकल सकता है ।
कटिन श्रम के साथ पैदावार की वृद्धि होती है और श्रम
शक्ति के अध्य की भी वृद्धि होती है क्योंकि श्रमिक की शारीरिक
कमियाँ बह जाती हैं और उसकी क्षति पूर्ति के लिये अधिक व्यय
परना पड़ता है। फिर भी एम सीमा के अन्दर श्रमिक का क्षति पूर्ण
करते हुए भा उसको इसने से पैंजीपति को लाम हो सकता है।
परन्तु मज़दूर श्रेणी के घोर विराध के कारण काम का घट
२५

बहुत अधिक नहीं पढाया जा सकता है । याप्प होकर पंजीपति का ऐसा रास्ता ढूंढना पाता है कि श्रावश्यक भ्रम समय घटे। इस प्रकार से अतिरिक्त अर्घ्य की जो वृद्धि होती है उसको श्राप क्षिक अतिरिक्त शर्ण्य कहते हैं । हमें यह याद रखना होगा कि मजदूर को मजदूरी श्रम के प्य के अनुसार मिलता है। थापक्षिक अतिरिक्त प्रर्य को प्राप्ति हो सकती है श्रावश्यक श्रम-समय को घराने से, या भम शक्ति के श्रष्य को पटाकर । यह घाया तब जा सकता है जब मजदूर के जीवन धारण की सामग्रियों का अभ्य घट जाय । इनके अर्घ्य के घटा का अथ यह है कि इनको पैग परने के लिये पहले से कम भम समय लगता है। यह तभी सम्भव है जय श्रम की उत्दा शत्ति पर जाय। मजदूर की उत्पादन शाक् बनाने प विमिस उपाय है। जिन श्रवस्थानों म मजदूर वस्तु उत्पादन करता है उन अवस्थानों में सुधार, श्रम की हालात म सुधार, नई मशीनें, चाज़ा क अपनय में मी, श्रमिको र लिये कुछ अधिर मुविधा, निससे उनकी काय क्षमता बढ जाय-इत्याद । श्रय यह स्पष्ट है कि श्रम शक्ति के श्रध्य की कमा दोहा प्रकार से हो सकती है-श्रम की उत्पादन शक्ति यह जानी चाहिए । यह चाहे मज़दूर क रोज़ क खच की चीजों क निस्वत चाहे उस साधनों के निस्पत जिनके जरिय ये चीजें पैदा की जाती है। निरपेक्ष अतिरिक्त अध्य क पलस्वरूप मजदूर श्रेणी की दशा खराब हो जाती है और समाज की उत्पादक शपियां में कोई वृद्धि नहीं होती है । इसप विपरीत श्रापेक्षिक अतिरिक्त अयं ही ममाज की याधिक उन्नति का मूल है। इससे यह 7 समझना चाहिए कि पैदावार की उन्नति के लिये ही पूँजीपति चेष्टित है-

सच तो यह है कि अतिरिक्त अर्घ्य को लालच पूँजीपति को मज
मूरन् उन्नति को राह पर ले चलता है।
पूजीवादी प्रया में मशीनों की उन्नति के साथ मजादूरों का
शोषण बनता जाता है । मजदूरों का नई और तेज मशीनों के
साथ कदम मिलाकर चलना पता है और अधिक एकाग्रचित्त
होकर काम करने के लिये मजबूर होने के कारण उनको स्वास्थ्य
हानि मा होती है । इती पर मो मशीनें मजदूरों को जगहें लेती
जाती हैं और मजदूर अधिक से अधिक सरपा में कार हाते
जात है।
२७

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पुछ तर पर मांग की पूर्ति, यह निभर करता है कई चीजों पर, लेकिन विराष तौर पर इस बात पर कि उद्योग धधा की साधारण पालत स्या है और राष्ट्रीय प्राधिक संगठन रिस प्रकार का है। जप उद्योग धा का विस्तार होता है और नये कारखाने खुलते हैं तो भमिकों की मांग कर गाता है। लेकिन उद्यागा के प्रसार के साथ मशीनों में भी उप्रति होती है और वस्तुयों का पैदावार जितना बढ़ता है मजदूरों को सख्या उम अनुपात में नहीं पढती। यह तो तर जब पपीवाद अपने दग हो। परन्तु जीवादी व्यस्था में अराजकता का प्राधान्य होने के कारण उद्योग पायों में प्रसार हाने के कुछ याद ही एक सकट काल उपस्थित हा नाता है और स्तिो ही कारखाने बन्द हो जाते हैं। फलस्वरूप मजदूरों की मांग घट जाती है और उनको कारखानो स छुट्टी दे दी जाती है । वेकार मजदूर्ग फी तादाद मजदूरों की मजदूरी घटान के काम अाती है । श्रर पंजीति यो इस बात की कोई मिनी कि मजदूर को अपना नए शक्ति पिर मिले। हजारों मजदूर फारसाने के फाटक के गदर सहे रहते हैं और मालिक को रोज़ नये मज़दूर मिल सकते हैं । अब मजदूर को अग्नो श्रम शक्ति के पूरे श्रध्य के मिलने की सम्भावना नहीं रहती। पंजीवादी ममाज में बेरोजगारी के साथ निम्न-मध्यम श्रेणी और किसानों की हालत भी गिरती जाती है और इसके कारण भी मजदूरी का दर घटता जाता है । क्योंकि इन श्रेणियों के लोग भी मज़दूरों में शामिल हाते जाते हैं। नई मशान भी इजाद होती ही जाती हैं और मजदूरों को बेकार करती जाती हैं । इस प्रकार न केवल संकटकाल में बल्कि पूँजीगद की साधारण अवस्था में भी वेकारी लगी ही रहती है। ३२

.
हर देश में उजड़ा हुश्रा किसान ही मज़दूर होता है। यही
नहीं बल्कि पिछड़े हुए कृषिप्रधान देशों से मजदूर काम की
खोज में ऐसे मुल्कों में जाया करते हैं जहाँ उद्योग ध घे बहुन
हो । मजदूरी के बाजार का नियंत्रण इसी प्रकार से
होता है।
मजदूरी के बाजार में पूंजीपति और मजदूर दाना हा अपने
वस्तुओं के मालिक होने के नाते सामानों के रूप में मिलते हैं।
परतु सुविधा पूरी तौर पर पूँजीपति को हो है। पूंजीपति अपना
रुपया कुछ दिन काम से न लगा सकने पर भी इन्तजार कर
सकता है, पर मजदूर अपनी श्रम शक्ति एक दिन भी न बेचे तो
भूखों मर जाय । मजदूर अफेला पूँजीपति का मुकाबला नहीं
कर सकता । इसीलिये सामूहिक रूप से मजदूर श्रेणी अपनी
श्रम शक्ति के अध्य को कायम रखने की कोशिश करती है।
मजदूर सभानों के दारा और राजनैतिक क्षेत्र में पूंजीपति और
मतदूर की लड़ाई जारी रहती है।

पाँचवाँ अध्याय
मुनाफ़ा और उत्पादन का मूल्य
यदि मान लिया जाय कि स्थिर पूँजी का परिमाण 'क' है,
अस्थिर पूँजी का परिमाण 'प' है यानी श्रम शत्ति का अप्य 'ख'
है शौर तिरित्त श्रर्य का परिमाण 'ग' है सो शोपण का
ग
दर या अतिरिक्त अध्र्य का दर है परन्तु पूँजीपति यह जानना
चाहता है कि उसने जो पूँजी लगाई है । उसके अनुपात में उसको
अतिरिक्त अर्घ्य रितना मिला । यह चाहता है मुनाफा और
मुनाफे का दर है यानी कुल पँनी के मुकाबले श्रति
कप
रित्त श्री का अनुपात ।
पंजीपति के निये यह जानना ज़रूरी है फि पिस व्यवसाय
में यह अपनी पंजी लगाये वह यहां अपनी पूनी लगाना
चाहता है जहाँ उसको सबसे ज्यादह माना मिल । वह
ग
३४

साधारणतया सालाना एक अच्छी रकम मुनाफा के लिये इछुक
रहता है।
एक कपडे का मिल और एक दियासलाई व कारखाने का
उदाहरण ले लाजिये । मान लीचिये कि दोनों में मजदूरों की
तादाद परापर है और दोनो जगह शोषण समान है। मान
लीजिये कि अतिरित अभ्य दोनों जगह ३०,००० रुपये है। परतु
कुल पुँजी कपड़ा मिल में ३ लास ये हैं और दियाम्लाइ के
कारखाने में डेढ़ लाख रुपये हैं, ता मुनाफे का दर पहले में १०
३०,०००
फीसदी
(३०...:) है
है और दूसरे में २० फीसदी (३३०,..)
क
यदि उपयुक्त उदाहरण में दियासलाई के कारसान में न
केवल कुल पनी की लागत अाधी हो बल्कि अतिरिन अर्ध्य मी
श्राधा हाता मुनाफे का दर समान ही रहेगा।
स्थिर और अस्थिर पूंजी के सम्बध का पूँजी का श्रातरिक
सगठन कहते हैं यानी । पूँजीपति जितना मजदूरी पर सर्च
करता है उसक अनुपात में जितना अधिक मशीन आदि पर खर्च
करता है उतना ही पूँजी के प्रातरिक संगठन का वृद्धि होती है
और मुनाफे का दर घटता जाता है। क्योकि मुनाफे का दर है
अब यदि दो कारखानों के एक में 'क' 'स' का दुगुना
हा और दूसरे में 'क' 'स' का चार गुना हो तो अवश्य ही पहले
में अान्तरिक सगठन कम है और मुनाफा ज्यादह है
और दूसरे म अान्तरिक संगठन ज्याद६ है और मुनाफे का दर
कम है। साधारण तौर पर मशीनों की उन्नति के साथ उतनी ही
तादाद श्रमिका की देखरेख में मशीनों की तादाद घटा दी जाती
ग
+ख.
३५

है और पूंजी का प्रान्तरिक संगठन बढ़ता जाता है। इस प्रकार याधिक उन्नति के साथ मुनाफे का दर घटता जाता है । पंजी और स्थिर पंजी और अधिर पूंजी के अनुपात के अलावा भी कुछ पाते हैं शिका असर मुनाफे के दर पर पहता है। पूँजीपति मुनाफे का यह भी हिसाब लगाता है कि उसको साल में स्तिना मुनाफा मिला और इसक लिये यह साल भर की श्रामदनी का अगमो सारी पूँजी से माग लगाता है। लेकिन किसी व्यवसाय की नी साल भर तक एक साँहीं रहती। उत्पादन प्रक्रिया के सिलसिले म ही इसका कुछ हिस्सा सैयार माल बन जाता है । वस्तु के अर्घ्य में मशीन का घिसा हुअा दिम्मा शामिल हो जाता है और उसादन प्रक्रिया में कच्चा माल और धम प्रादि का भी इस्तेमाल हो जाता है। तैयार माल बाजार में विकता है और विकी के रुपये से नये सिरे से क्या माल और श्रम शृत्ति की खरीद की जाती है और मशीन के पिसे हुए हिस्से की जगह ताजा हिस्सा जोड़ दिया जाता है। इस नई पूँजी से पिर वस्तु बनते हैं और ये यस्तु रुपये में रूपान्तरित होने है और ये रुपये फिर उत्पादक पूंनी पा जाते हैं श्रीर पिर पुराना मिलसिला जारा हा जाता है। इस प्रथा को पँजी पा दौरा कहते है। पूजी के भिन्न हिस्सों के दौरों का समय समान नहीं है । जैसे मशीन, मसन श्रादि का श्रयं धीरे धीरे करके बहुत छोटे टुकड़ों म यापम मिलता है । बहुत अरसे के बाद पूँजीपति को कहाँ पूरी मशीन का दाम वापस मिलता है जिससे वह नई मशीन खरीद कर उससे काम ले सकता है। जहाँ तक कच्चा माल और श्रम शक्ति का तालुक्क है एक ही दौरा में उनरा पूरा अभ्य हस्तान्तरित हो जाता है। जो जो कचा माल और श्रम राति म लगाई जाती है

उसको दौरा की पूंजी कहते हैं । जो पूँनी मशीन और मकानों म
लगाई जाती है उसका बंधी जी कहते हैं।
जितनी ज्यादह बँधी पूँजी होगी और नितना धीमा इसका
दौरा होगा उतनी ज्यादह पूँनी अचल रहेगी और पूँजीपनि के
लिये मुनाफे का दर घटता जायगा ! इसप विपरीत पूना का
दौरा कितना तेज हो और यदि दौरे की पॅनी का हेरफर साल
मर में अधिक बार हो ता सारी पूँनी पर मुनाफा बढ जायगा ।
इस दृष्टिकोण से दो बातें बहुत महत्त्व रसती हैं। एक
तो यह कि मशीनों की तरक्की के साथ मशानों में ज्यादह
दाम लगता है, बहुत यही और पचीदा मशीनों का इस्तेमान
होता है और मुनाफे का दर घटता जाता है । दूसर बात यह है
कि उपभोग की सामग्रियों के कारखाने में पूंजी का दौरा तेज़
होता है बनिस्बत उस गारखाने के जहाँ मशीनें बनाई जाती हो।
किसी मा व्यवसाय में पूजा के दौर का रफ्तार मालूम हा
सकता है, यदि हमको दो चीन मालूम हो । एक तो पूँजी का
परिमाण और दूसरा यह मिसाज में पूंजी का हेरफर कितनीधार
होता है। मशीनों की तरक्षा के साथ पूंजी क दौरे का रप्रतार
तेज हो सकता है यदि श्रामदरफ्त के ज़रियों में तरक्की हो,
क्योंकि तब चीजें खरीदोवालों के पास जल्दी पहुँच सकती हैं
और पूरे माल की निकी जल्दी आ जाती है। और भी कुछ ऐसे
कारण हो सकते हैं जिनसे पूँजा के दौरे का समय न रहकर
कुछ घटे हा। लेकिन पूरे तौर पर देसने से यह निम्विाद सिद्ध
है कि मशानों की तरक्की क साथ पूँजी का दौरे का समय बद
जाता है।
इस रफ़्तार का हिसाब समझने के लिये एक उदाहरण
लीजिये-
मान लीजिये बधी पूंजी है ८०,००० १०

दौरे की
,
"
(दौरे का समय ८ साल)
और दौरे की पूँजी है २०,००० १०
(दौरे का समय एक महाना)
साल भर में बंधी पूँजी या हेर फर है ० .
१०,००० रुपये
-२०,०००x१२
-२४०,००० रुपये
साल भर में कुल पूँजीया हेर फर है -२५०,०००रुपये
कारखाने में कुल पूजी का लागत है-57,000+२.,...
१ लाख रुपये
कुल पूँजी के हेरपर का कुल लागत पूंजी से भाग देने
से रफ्तार मालूम हो जायगा। यतमान उदाहरण में रफ्तार है
साल भर म दाई बार।
जो कुछ पिछले हिस्म में पृजा क अान्तरिक संगठन और
इस दौरे क रफ्तार का मुनाफे के दर के ऊपर असर के विषय
में कहा गया है उनसे इस यात का न भूलना चाहिए कि
मुनाफ क दर के ऊपर सबसे ज्यादह श्रसर है प्रातरित अश्य
का यानी शोपण के दर का।
अतिरित अध्य' का जो हिस्सा पूंजीपति को मिलता है
उसी का नाम मुनापा है ।मजदुर भेणो काशापण जितना अधिक
होगा, उनसे अतिरित्त अर्य का प्राति जितनी अधिक होगी
मुनाफे का दर भी उतना अधिक होगा यद्यपि यह सहा है कि
शाषण के अनुपात में हो मुनाफे के दर में वृद्धि नहीं होती।
पूँजीगदी समाज में मशीनों को उन्नति के साथ मजदूरों
का शोषण बरता जाता है और इससे मुनाफा क दर की वृद्धि
अवश्यम्भाया है। लेकिन सब समय यह को नहीं पाता स्यांकि

मशीनों की उनति के साथ पूँजी का अान्तरिक सुगठन भी बढ जाता है और पूँजी के दौरे धीमी गति से मुनाफे का दर घटता जाता है। शापण का दर और पूँजी का अान्तरिफ सगठन और मुनाफा का दर इनके श्रापसी सबध पर नीचे का अंक कुछ प्रकाश डालेगा-(इसमें मुनाफे का दर है 'मु', अतिरिक्त अध्य है 'श्र श्र', अतिरिक्त अर्घ्य का दर है श्र , स्थिर पूँजी है "स्थि पू', अस्थिर पूँजी है 'पू') मु स्थि पू+मपू ग्र श्र (१) D (२) जिसस अ श्र श्रअ' श्रपू अ य का यह परिमाण (१) में प्रयोग करने से अ' '४ पृ स्थि पृ+ पू जिसस यह स्पण है कि मुनाफे का दर अतिरिक्त अर्घ्य श्रथवा शाषण दर प्रत्यक्ष अनुरात म है । यह भी इससे स्पष्ट है कि मुनाफे का दर और पूंजी क अान्तरिक संगठन का क्या सम्बध है। मशीनों की तरक्को से पूँजी का मुनाफे का औसत दर प्रातरिक सगठन बढता है और इसकी और इसके घटने की गति घामो हो जाती है और इनके प्रवृत्ति कारण मुनाफे क दर का घटना ज़रूरी हो जाता है। पूँजीवादी समाज में जहां सभी मुनाफा के पाछे दौड़ते हैं पूंजी बारम्बार जगह बदलती रहती है, एक उद्योग से दूसरे उद्योग में लगाई जाती है और जहाँ मुनाफी ज्यादह मिलता ३.

है वह पूंजी लगती जाता है जब तक होड़ के कारण या का मुनापा घट नहीं जाता। घर जहाँ से मुनाफा कम है वहाँ से पूँजीहरते हटते मुनापा पिर पढ़ जाता है। मिन भिन्न उत्पादन क्षेत्रों में और भिन्न मिन पूँजियों से मिाफ अान्तरिक संगठन विमिन हैं इस प्रकार एक औसत मुनाफा कायम हो जाता है । लकिन मुनाफा बिलकुल बराबर नहीं हो पाता क्योंकि क व्यवसाय से दूसरे व्यवसाय में पूजी उठा कर लगाना पाई सहज काम नहीं है। मशीनें इतनी रहुमूल्य होने लगी है कि कम मुनाफा पाने पर भी पूजओपति उनक रेचकर रुपया नये कारोबार में लगा नहीं सकता। इस कठिनाहय कारण यह नियम रद्द तो नहीं होता है कि पूँजीवाद समान की एक श्रीरात मुनाफा की धार प्रवत्ति रहती है लेकिन इस नियम रे लागू होने में कुछ विलम्य होता है। पिछले दिये गये अब से हमको सारे समाज के लिये श्रोसत मुनाफे का दर मालूम हो सकता है यदि हम यह मालूम कर लें कि सार समाज की श्रीसत पूँजी क्या है और इस पूँनी में स्थिर और अस्थिर माग क्या है और औसत अतिरित अन्य स्सा है। जैसे पहले यहा जा चुका है यह औसत मुनाफ का दर इस पर भी निर्भर करेगा कि सारे समाज के लिये पुँजी के दौरे का रखनार क्या है । लेकिन यह तो स्पष्ट ही है कि हरएक पंजीरति को मुनाफा समान दर से नहीं मिलेगा। नई मशानों के प्रयोग के कारया क्सिा किसी जीपति को श्रोसत में अधिक मुनाफा मिल सकता है। यह एक प्रकार का अतिरिक्त मुनाफा है। जप इन नई मशीनों का प्रयोग साधारण रूप से होने लगता है तो इस प्रति रित अर्य का श्रत हो जाता है । यहाँ तक कि ऐसा भी होता है कि किसी वस्तु विशेष का मूल्य इतना घट जाता है कि औसत मुनाफा भी नहीं मिल पाता। तब पिर उल्टा चा चलता है । ४० और पूजी इस उत्पादन क्षेत्र से दूसरे उत्ादन क्षेत्र को ले जाई जाती है और फिर एक बार औसत मुनाफा कायम हो जाता है । श्रीसत मुनाफा से कम या ज्यादह मुनाफे का उतार चढाव बिल्कुल अर्ध्य के इर्द गिर्द मूल्य के घटने बढने के अनुरूप है। जिस समाज में लाग मुनापा के पीछे अधे की तरह दौड़ते हैं वहाँ पूँजीपति का व्यक्तिगत मुनाफा औसत मुनाफे के कांटे पर शायद ही क्षण भर रुकता हो, कमी इससे थोडा अधिक हो जाता है कभी इससे थोडा कम । जव नये यनों की इजाद जन साधारण की सम्पत्ति हो जाती है तो न केवल अतिरिक्त मुनाफा ही उड़ जाता है बाल्न साथ ही एक और नताना होता है इसका असर सारे समान की पूँजी के आन्तरिक उगठन पर पड़ता है और इसके फलस्वरूप मुनाफा का श्रीसत गिर जाता है । इसमे व्यक्तिगत रूप से किसी पँजीपति पर इसका असर भले ही न पडे लेफ्नि पंजीपति व्यक्तिविशेष के मुनाफे का नियामक और नियम यही है । मुनाफा ही पूँजीवादीसमाज का उत्पादन के मूल्य का जीवा है । पँजीपति का नारा है पूंजीवादी हिसाय अधिक्तम मुनाफा । अपनी इच्छा के अलावा प्रतियागिता के कारण मीउसको ऐसा करना पड़ता है। किन उपायों से उसको मुनाफा अधिक मिन्न सकता है। प्रतियोगिता केसमाम में चीजों या दाम बढाकर यह मुनाफा ना कमा सक्सा, वस्तुओं का उत्पादन मूल्य घटा कर ही वह प्रतियोगिता म टिके रहकर मुनाफा बढा सकता है या हासिल कर सकता है । उादन मूल्य का हिसाब लगाने के लिये हर खच का मालूम होना जरूरी है और प्रत्येक वस्तु के उलादन के लिये टीक कितना सच होता है इसका पता लग जाता है।

मुरय खर्च पचा माल का, इंधन का, दीगर जरूरत की
चाज्ञा का और मजदूरी का!
कचा माल का खरीद उन खगों म एक मुख्य स्थान रखता
है जिनसे उत्पादन गर्न का हिमाय लगाया जाता है । इसलिये
फचा माल मस्ता सरोदना ही मुनाफे का एक बहुत सहाय
होना है। इसलिये उस पंजीपतियों में जो क्या माल बेचते हैं
और उन जी तिया मजो क्या माल खरीदते हैं बहुत क्रामकरा
रहा करता है। इस तनातनी में विजय पाने व लिये कभी कम
अधिक धनी पंजीपति अपनी नोटिरियों के लिए रचा माल स्वयकी
उत्पन करते हैं। पिछड़े हुए मुल्को के क्या माल प्राप्त करने में
इनका अपने राष्ट्र की मी सहायता मिल जाती है।
न केवल कचा माल रास्ता खरीदना बल्कि उसका सबसे
लामदायर उपाय से उग्याग करना भी मुनाफा हाछिल परने का
सबमे बड़ा उपाय है। चीजें बहुत सस्ती कर सकती है यदि उन
चीजों की मी उपयोगिता दृढ निकाली जा सके जो इन चाजों के
मनाने में साधारणतमा बैंक दी जाती है। परन्तु यहाशान की
उन्नति पर ही निमर है।
पचा माल के बाद प्रर्चे का नम्बर पाता है इंधन का।
लकड़ी और कायल के बाद तेल और बिजली के इस्तेमाल से
इंधन का पच और घट गया है लेकिन श्रय भी कारसानों के
लिये धन का सच बहुत बड़ा सर्च है।
एक और प्रधान खर्च है मजदूरी का पँजापति इसके लिये
बहुत प्रयत्नशील रहता है कि मजदूरी का खच कम हो। हमने
पिछले हिस्से में ऐसा है कि किन उपायों से पूँजीपति मजदूरी का
खर्च कम करता है जैसे मजदूरों का उत्पादन शनि को रदाना,
श्रमिकों की एकामचित्तता को बदाना, और मजदूरी पटाना
इत्यादि।

मजदूरी, इंधन और कच्चा माल के अलावा भी कुछ खच है
जैसे मशानों का क्षय और पैक्टरी सञ्चालन का खर्च श्रादि ।
मशीनों पक्ष्य का सच कितना है १ माल की बिक्री पर
प्रजापति जो मुनापा हासिल करता है उसका एक हिस्सा बद
इसलिये अलग कर रखता है कि साल पर माल इमको जोड़कर यह
अपनी लागत पूजी को लौट पाना चाहता है। यही मशान के क्षय
का व्यय है। इस सिलसिले म एक और यात ध्यान रसो योग्य
है कि किसी एक वस्तु व उत्पादन के मशी। के चालू रहते रहते
नई और अच्छी मशीनों का प्राविष्कार हाता रहता है।
सञ्चालन क सच में शामिल हैं ऐसे खच से असर,
दरवान, मकान सफाई, मादूरों के लिए स्कूल, अस्पताल धादि
का खर्च । उत्पादन ये पेन्द्रीकरण से ये सच मी पट जात है।
नितनी बड़ी फैक्टरी होगी और जितने ज्यादह वस्तुओं का उगमें
उत्पादन किया जायगा फ्री रस्तु सञ्चालन का सर्च उतना ही
घट जायगा । व्यापारिक और एहर्टिजमेट श्रादि का सच मी
इसा मद म शामिल किया जाता है।
इस प्रकार खचों का मद अलाहिदा परा स दूगरे पंजा
पनियों की प्रतियोगिता में उसका पिशिण मदा पाराकम करन
में नासानी होती है।
ऊपर कही गद रातों में हम नीचे लिये नी पर
पहुँचते हैं
(१)हर पंजीपति यह कोशिश करता है कि श्र[ent
का बचकर यह पुनवत्पादन का पूरा सा हामि कर, Int
ज्यादह से ज्यादह मुनाफा हासिल पर।
(२) प्रतियोगिता क कारण और पूजी का प्रयोग।
साय स हट कर दूसरे व्यवमाय में होने के कारण यह
मुनाफा नौमत मुनाफा के पास-पास रहता है और न

मुनापा समाज को सारी जी के प्रान्तरिक सगटन पर निर्मर है।
(३) जिम मूल्य को पेन्द्र बनाकर पूँजीगदी समाज का
मूल्य घूमता है यह है उत्पादन का सच और औसत
सराफे का जाद। पूँजीरादी समाज को नियत्रित परनेवाले इस
मूल्य को उत्गदा का मूल्य कहते हैं।
जो मिल मालिक ग्रादि पड़ी पड़ा मशीनों से काम चलाते
हैं यानी लिनकी पंजी का धारिफ रागठन अधिक है और जो
उनादन के मूल्य पर चीजों को देते हैं उनको उनके मुकारले
में अधिक मुनाफा मिलता है जिनकी पूँजी का श्रातरिक सगठन
कम है। पहले चैत्र में कुल जी थे अनुपात में अतिरिक्त प्रप्य
या परिमाण पम है लेकिन मजदूर की उत्पादनशक्ति अधिक
है। लेकिन यह तो सही है कि दोनों क्षेत्रों में पूजीपति को औसत
मुनाफा मिलना है। वास्तविक मुनाफा शौसत मुनाफा स इधर
उधर होने का कारण यह है कि नी पय व्यरसाय से हटाकर
दूसरे व्यरमाय में डाल दी जाती है।
यदि समाज द्वारा उत्पन्न सब वस्तुओं के मूल्य को जोड़ा
जाय तो यह उनके अप्य फे जोड़ के समान होगा। यह यो भी
सष्ट है क्योंकि एक व्यवसाय में नीपति व नुकसान का दूसरे
व्यवसाय में पंजीपति का लाभ गबर पर डालता है।
यह बात पर सहज ही समझ में श्रा सकती है श्रय
पुँजीवादी समान में अतिर्हित नहीं हो जाता बल्कि सारे समाज के
लिये यह मूल्य का निर्णयप है। क्योकि उत्पादन का खच और
श्रोसत मुनाफा को जोड़कर हो मूल्य यनता है, और औसत
मुनाफा नोसर अतिरित्त श्रष्य पर निर्भर है और अतिरिक्त अार्य
श्रयं पर निर्भर है।
मूल्य धीर श्नध्य का यह सम्बध वास्तव में मनुष्यों पे बीच
था सम्बध है। इसी सम्बध से यह निणय दाता है कि सामा

निक श्रम का प्रयोग किस दिशा में किया जायगा । साधारण वस्तु उत्पादक श्रार्थिक संगठन प्रणाली के अन्तगत श्रयं ही श्रम की दिशा को निर्धारित करता है । जिस दिशा म मूल्य श्रय से अधिक होता है यहाँ पूँनी का प्रयोग होता है। लेकिन उनत पंजावादी समाज म अौसत मुनाफा स जहाँ अधिक मुनाफा मिलता है वहीं 4जी का प्रयोग होता है। और पूँजी के प्रयोग का असली अर्थ है सामाजिक श्रम के स्टवारे म परिवतन । इस प्रकार रस्तुया के मालिका र बाच एक विशेष सम्बन्ध स्थापित होता है और पनीरति और श्रमिक के बीच तथा जोपनि और 4जीरति क याच भो पिशिष्ट सम्बर कायम हो जाता है।

छठा अध्याय
व्यापारी पूँजी
तथा
व्यापारी का मुनाफा
हमी देख लिया कि अतिरिक्त अय पी सृष्टि कैसे हाती
है , कैसे यह मुनाफे में परिवर्तित हो जाता है और यह मुनाफा
किस प्रकार पूंजीपति के जेब में पहुँचता है । लेकिन पूँजीपत्ति
के अलावा जमीदार और व्यापारी भी विना परिश्रम के लाम
उठाता है । पूँजीवादी श्राषिक संगठन प्रणाली में इनका क्या
हिस्सा है १ हनरा मुनाफा कहीं से श्राता है।
दौरे में पूंजी भिन अवस्पात्रों
से होकर गुजरता है-
(1) उत्पादन प्रक्रिया थे श्रारम्भ में पंजीपति अपने
रुपयों की पूँजी लगाकर कार्यारम्भ करता है । इन रुपयों से वह
पूजी का दौरा
४६

उत्पादन प्रक्रिया के लिये शाषण का साधन, जैस मशान, कमा
माल और श्रम शक्ति सरोदता है । इस अचस्पा में रुपया
वस्तुओं में परिवर्तित होता है। इस अवस्था का चिद रेवा म
कह सकते हैं-~~-मुद्रा-वस्तु अथया देवल मु~ जहाँ ।' का
अप है उत्पादन के साधन और श्रम शक्ति का नोट।
(२) इसके बाद खरीदे हुए यस्तुया के द्वारा शापण
किया का प्रारम्भ हो जाता है। इस द्वितीय अवस्या का हम
चिड़ित कर सकते है ----मु-य । इसा प्रक्रिया म अतिरिक्त
श्रव्य की उत्पत्ति होती है। इसका हम चिह्नित कर सकते हैं
ब-उ-ब' (जहाँ 'उ' उत्पादन प्रक्रिया १ लिये है, और
- उसन वस्तुर्था र निसमें अतिरिक्त श्रध्य जुटा हुआ
रहता है।
(३) जिन चखा का लेकर कायारम्भ हुया उनमे
ज्यादह वस्तु पैदा किया गया। इन वस्तु को अर बचा जाता
है और इनके रुपये बनते हैं और फिर उत्पादन-वन चन्नता रहता
है। इस थाखिरा अवस्था या हम चिह्नित कर सक्त हैं -
यानो लागत रुपये से अधिक पय की प्राप्ति हुइ । म
इस सारे उत्पादनमक या पूंजी के दौरे का चिहित कर
सकते हैं
-
व्यापारिक दूजी का मरममा
ध्यापारिक जी
तीसरे हिस्से से है। यदि यह मान
लिया जाय कि कारखाने के मालिक को अपने कारखाने
दे उत्तर माल'को वचार रुपया वसूल करना होगा ता
उसका इस काम दे लिये कुछ पूँजा अलग कर रखना होगा।
कुल उत्पन्न वस्तुना में एक हिस्से से ही यह पूँजी उनती है।
माल के खरीद परास्त के सिलसिले म बहुत से सर्च होते हैं,

जैसे ऐडवर्ट मेट, दुकान रसना, दुकान के लिये नौकर रखना,
माल रवाना करो या सर्च इत्यादि । परीक्षार ढूंढने में और
माल बेचार रुपया वसल करो म कुछ समय लगता है। इसका
मतलब यह है कि इस बीच म जय कि तैयार माल शि नहीं
जाता पूंजीपति को कारखाना चालू रखने क लिये अलग पूँजी
चाहिए।
यह बिलकुल भी रूरी है कि माल बेचने का काम
फारसान का मालिक ही परे। माल बेचकर रुपया वयल करने
का काम एक दूसरे पूजीपति को मापा जाता है जा अपनी पू जी
उद्योग वामन गाकर पापार में लगाता है। यही यापारी
पूनी है।
व्यापारिक पूंजीपति अपनी पूंजी
येचनेवाले का मेहनत
लगाता है और मुनाना कमाता है।
उसका अतिरिक्त श्रय कहाँ से श्राता है क्या बेचोगले
उसी प्रकार से अध्य और अतिरिक्त अभ्य क सा है जैस मजदूर
होते हैं ! बेचनेवालों का श्रम किस प्रकार का होता है?
पर तो श्रम या प्रयोग वस्तुओं के सालन महाता है और
दूसरा एष जगह से दूसरी जगह ल जान म, दुकानों में रखने
में और उनको बाँधकर भेजने लायक बनाने म शादि।
इसको स्पष्ट करने की श्रापश्यता इसलिये है कि फे
दौरे के लिये जो श्रम किया जाता है उसस न अध्य को सृष्टि
हाती है न अतिरिक्त अर्घ्य की । एक मकान का उदाहरण ले
लीजिए। इसका मालिक बदल सकता है लेकिन मकान के हटने
की कोई जरूरत नहीं।
हम देख चुके हैं कि अतिरिक्त अj की वजह पूँजी या
स्तु का दौरा नहीं हो सकता । एक उगहरण इस सिलसिल
7 भी दिया जा सक्ता है। एक पूंजीपति का ले लीजिये जा

। पैक्टरी का मानिस है और अपना माल खुद ही वेचता है। जितने ही मजदूरों को यह काम मलगायेगा उतना ही उत्पन वस्तुओं की तादाद बढेगी और उसका मुनाफा बढेगा। बेचनेवालों की परिस्थिति बिलकुल भिन्न है । येचनेगलों की तादाद बढाने से उत्तर वस्तुनों की तादाद नहीं रह सकती। इसके विपरीत बेचने वाला की तादाद निर्भर है उत्पन वस्तुओं की तादाद पर और हस पर कि जितन माल की विक्री होनी है। एक बार ता पूजापति अपने कारखाने के हद के अन्दर मजदूरों की तादाद रदाना चाहता है और दूसरी भार बेचनरालों की तादाद बढ़ाना नहीं चाहता बल्कि घटाना ही चाहता है। बेचनेवालों की तादाद बमुकाबल मनुदूरों के निको श्रौद्यागिक पूंजीपति काम में लगाता है बहुत कम है । इस उदाहरण मे स्पष्ट है कि वस्तु के सञ्चालन में जिस श्रम का प्रयोग किया जाता है उससे श्रर्य या अतिरिक्त अय की सटि नहीं हारी। लेकिन यहाँ यह यह रसना श्रसगत न होगा कि मुनाफे का हिस्सा प्रौद्यागिक और व्यापारिक दोना प्रकार क पूंजीपतियों का परावर मिलता है । इसका कारण नाये बतलाया जायगा। पिछले हिस्से में कहे गये श्रम क सिलसिले में यह कहना जरूरी है कि समाजवादी समाज में भी यह श्रम कायम रहेगा। क्योकि यद्यपि उस समान म व्यापार की काई अावश्यकता नहीं रहेगी और उत्पन्न वस्तुमा बटवारे के लिये परीद फरोखन की जरूरत नहीं रहेगी पिरमी चीज्ञा कोएर जगह से दूसरी जगह मेजने की तथा दूसरा जगह भेजने के लिये उनको दाधने-बधने की जरूरत रहेगी। इसलिये इस प्रकार के श्रम का मूल्य वस्तु के उत्पादन के मूल्य में ही शामिल होना चाहिये। व्यापारी के मुनाफे का योगागिर पूँजीपति को यदि अपना माल स्वय बेचना पड़े तो उत्पादन के क्षेत्र से अपनी पूपी कुछ हरा लेना पड़ेगा। वह यह मार व्यापारिक पूंजीपति पर छोड़ता है और जारा कमटो से मुक्ति पाता है। उसयो पहला लाम तो यह होता है कि ध्या पारी उसकी चीजों को खरीद फर उसकी पूंजी लौटाल देता है ताकि वह फौरन ही उत्पादन के काम में जुट सके और दूसरा लाम यह है कि अपनी चीज़ों को सय वेचकर रुपया वसूल करो को परेशानी से यह पच जाता है। इस प्रकार श्रम और पूंजी के विभाग से वस्तुया के सञ्चालन फे सर में पूँजीगदी समाज काफी किफायत हासिल कर लेता है। यह किफायत या हाती है कि व्याारिक पूँजा का केन्द्रीकरण होता है और चीजों या खरीद फरोरत तेजी से हाता है। यदि श्रोद्योगिक पूँजीपति वय ही व्यापारी वन जाय तो अपनी पूँजी रो अपो ही माल की चिली में लग सकता है। और गिसकी सारी जीव्यापार ही में लगी हुई है वह अपनी पूंज से कई कारखानों का माल बेच सकता है। व्यापारी श्रौद्योगिक पूंजीपति का माल बेचकर न केवल उसक लिये वस्तु का अध्य दिला देता है बल्कि उसके लिये मुनाफा भी वसूल कर देता है । यह इस काम को तभी करगा जब इस मुनाफ का कुछ हिस्सा उसको भी मिले । श्रीयागिक पंजीपनि मी अपने ही लाम के लिये खुशी सुशी अपन मुनाफा का कुछ हिस्सा व्यापारिक दूजीपति के साथ बटा लेता है। जिस रीति से न्यारी को मुनाफे का स्मिा मिलता है वह यह है । वस्तु फई हाय रदल कर तब उरभोग करनेवाले के पास पहुँचता है। बनानेपाल के हाथ से यह पाक माल बेचने वाले के हाय जाता है, उससे जाता है छोटे दुशानदार के पास, उससे मिलता है ग्राहक को। हर सीटो पर वस्तु का दाम कुछ मदता है और इसका अाखिरी मूल्य यही है जिस दाम पर यह उपभोग करनेवाले के हाय विकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि उस वस्तु के अभ्य से मूल्य कहीं अधिक है । परन्तु गस्तव इसके विपरीत ही है। श्रौद्यागिक नीति वस्तु को अपने अर्ध्य से कम पर व्यापारी के हाथ बेचता है। उसको इसमें नुकसान नहीं, वह केवल अतिरित्त अर्य का उछ दिमा व्यापारा यादे देता है, क्योकि वस्तु में न केवल उत्पादन के साधन और श्रम शक्ति का श्रध्य है बल्कि नतिरित अर्घ्य मी उसमें शामिल है। व्यापारा वस्तु को उपमाग करनवाल के दायां पूरे अभ्य पर बच कर अतिरिक श्रष्य का वह हिस्सा वसूल पर लता है जिसका प्रौद्योगिक पूतीति । वस्तु के दाम में शामिल नहीं किया था। इसमे यह सिद्ध है कि उत्पन्न वस्तुओं को वेचकर करया पसल करने के काम के लिये नापति अपने शतेरित अध्य का कुछ दिस्सा व्यापारी को दे देता है और यहा मापारा का मुनाफा है। मुनाने के घर की सतह व्यापारा क मुनाफा का परिमाण चौर मुना का दर किस ऊपर नियर है और से यह स्थिर करने में पूजी का निधारित का नाती है। औद्योगिक न रतिया में प्रतियोगिता के कारण उत्पादन के सर क्षेत्रों में एक प्रोसत मुनाफा का दर कायम हो नाता है चाह अलग अलग क्षेत्रों में अतिरित्त प्राय का परिमाण कितना ही क्यो नहा। श्रय हम यह दस सकते है कि पति रिक्त श्रय पाता होता है अतिरिक श्रम के अनुरात में और इस पर निर्भर है कि किवना श्रम शक्ति का सच हाना है लेकिन इसका बटवारा निर्मर है इस बात पर किस क्षेत्र म दिना पूजा लगाई गई है। ঞ্চি দাবি ‘লারি ভিলার ম এক বিধি বনি पूंजी लगाता है, सब पूंजीपतियों की तरह वह भी श्रोसत मुनाफे का दर पाना चाता है। यदि व्यापारिक पूजी पर मुनाफे का ५१

दर प्रौद्योगिक पंजी के दर से पम हो तो माग अपनी पूँजी
व्यापार में न लगा कर उद्योग घदों में ही लगायेंगे । व्यागरिक
খুঁজনি মা aftধ গণ ফা গাব্যক্তি জীৱি বা মা
दावेदार है । श्रीवागिर जोगनि भी उमको अतिरिक्त अर्य
का बरावर दिस्मदार मानन के लिये मनपूर है । इस कारण
मुनापा का श्रीसत निकालो क निये कुन जी के जाह में
शोधागिय पूनियों के साथ तिजारती जी या मो शामिल करना
चाहिए । एक अरू से यह और भोसर हो जायगा-
श्रीयागिर पूभी = १०,००,00,000 करोड़ रुपये
अतिरिक्त अध्य = १,..,.,... करो या
था
मुगाफे का दर हुया x. १. सैकहा
पू
लेग्नि इसमें तिजारती यूँ जी शामिन रहा है। मान लीजिये
तिवारता पो २ करोड ५० लाए। अब मुनाफा का दर १०
पासदान होार होगा
१ करोड + करा
फीसदी
अतिरित श्रध्य में हिस्सा पटा कारण तिजारती पूँजी
मुनाफा र श्रीमन दर को घटाती है।
श्रोद्योगिक पूंजीपति मुनाफा का रिसेदार तो है परतु
मुनाफा सासर में भी सहायक है लेकिा व्यापारी तो केवल
लेता ही है देता कुछ मा नहीं। इस प्रसर सारे पूँजीवादी
समाज पष्टिकोण से दौर का खच और व्यापारी का मुनाफा
एक श्रावश्यक परतु अनुत्सादक खर्च है। और य" अनुत्पादक
दा माना में है । एक तो यह कि उत्पादन के क्षेत्र से बुध पूँजी
घटा लनी पड़ती है और दूसरा यह कि किसी प्रकार व श्रध्य की
सष्टि न करते हुए प्रौद्योगिक जी द्वारा सृष्ट अतिरिच अध्य

का एक हिस्सादार बन जाता है । इसलिये पूँजीगादी समार
इस बात के लिये चेष्टित रहता है कि उत्पन्न वस्तुयों को विक्री
कर रुपया वसूल करने में कोई साधा न डालकर तिजारत में
लगाई गई पूँजी घटाई जाय।
तिजारती पूंजी की रकम वस्तु के विनिमय के दौरे को
तेजी के द्वारा घटाई जा सकती है। एक ही रकम से, मान
लानिये १ तास रुपये से, व्यापार-चन एक बार मा चल सकता
है शोर दस बार मी । लेग्नि अगर सराद मिनी वा ना एक
पार न होकर दस पार होता है तो दसर्या हिस्सा पूँजी का ही
जरूरत रह जाती है। इस प्रकार तिजारत के लिये ग्रावश्यक
पूजा की रम घट जाने से अतिरिक अध्य का यह हिस्मा भी
घट जाता है जिसे श्रोद्योगिक पूजापति को बाध्य हार व्यापारी
को दे देना पड़ता है।
इसलिये व्यापारी वग तो तिजारत के चक के रफ्तार का
बढाना नहीं चाहता बल्कि धीमा ही करना चाहता है लेकिन
व्यक्तिगत रूप से व्यापारी रमतार तेज़ हा करना चाहता है क्योंकि
पिर उत्नी ही पूँजी पर वह व्यापार के ज्यादह हिस्से पर प्रभुत्व
पा सकता है और उसके मुनाफे के राम की वृद्धि हो जाता है।
यह वैसा ही है जैसे कि औद्योगिक पूंजीपति का नई मशीनों के
अाविष्कार से पतिगत रूप से लाम होता है यद्यपि इससे
मुनाफा का दर घट जाता है।
हर मुल्क में और व्यापार के हर क्षेत्र में व्यापार चक्र का
यानी किसी दुकान विशेष के सारा माल के विक जाने का एक
नौसत रमतार होता है और जिस किसी व्यापारी का व्यापार-चा
तेज होता है उसका से ज्यादा मुनाफा मिलता
है। यही कारण है कि व्यापारी प्रेगो अपनी अपनी पूजियों क
रफ्तार को रहाने में घटित रहते हैं।

देपनेवालों का शोषण
हम देख चुके हैं कि चोवालों
श्रम से न तो अघ्य की मुष्टि होती
है और न अतिरिक्त अध्यं को पिर पेचनेवालो का शोषण किस
प्रकार से होता है।
सा प्रश्न के उत्तर के लिये हमें यह जानने की जरूरत है
कि व्यापार क्रिया में बेचोवाले का स्थान क्या है। व्यापारीको
अपनी पूजा के अनुपात में मुनाफा मिलता है। परन्तु चिना
ननेवालो की मदद के उसको पृ जी का लाभ यह नहीं उठा
सकता और पूजी जितनी अधिय दोगी वनेवालों की तादाद
उतनी अधिक होगी। इस तरह यद्यपि बचनेवाल के भम से
अतिरिक्त अट्र की सृष्टि नहीं होती है तथापि व्यापार में पूजी
फ सेयाग के लिये इसका सहाग प्रत्यारश्यक है।
बचनेवालों की जरूरत तो है लगिन इस खच को व्यापारी
कम मचम रपना चाहता है। व्यापारी बेचनेवाले को इतना ही
देना चाहता है जिसस उसकी श्रम शक्ति पायम रहे, इससे
अधिक यह पितनी मेहनत करता है उसके द्वारा वह श्रौद्योगिक
पूँजीपनि फ मुनाफे पर ज्यादा हिस्सा पटाता है।
पूंजीवाद पे विकास के गाय बेचनेवाले की हालत
और भी बरार होती जाती है कारण यह है कि बेचने
और हिमाव रखने के छापदे इतने सरल हाते जाते है कि बेचने
याले के हुनर की कदर जाती रहती है और शिक्षा की तरक्की के
साप बेचनेवालों की तादाद और उनमें प्रतियोगिता पर जाती है।
पूंजीराद के उच्चतम विकास में
सहयोग या समवाय का
मा छोटे पैमाने + पैदावार के पुमने
मुनाका
तरीर कायम रहते हैं। इस तरह
व प. रनवाले अधिकांश व्यापारियों की पैंती पर निमार रहते
है । छाट उत्पन्न गरियो और व्यापारियों के बीच का सम्मध बहुत

र से होता है, जैसे नरे द्वारा उत्पन्न वस्तुओं की बिक्री के
रा, कच्चे माल को खरीद से और इनके भोग करनवालों की
ति और हैसियत से।
सब छोटे-छोटे पैदा करनेवाले अपन परतुओं
देवा करने
'ले के सिलसिले में, क्या माल क सरोदार की हैसियत से
और जीवनधारण को सामियो से खरीदार की हैसियत से
सागरी पॅजी स संसार में प्राते हैं । व्यापारी जब पंजीपति को
मलता है तो उसकी बराबरी पर ही मिलता है, लेकिन छोटे
माने पर पैदा करनेवाला जर व्यापारी को मिलता है तब उसकी
हालत उससे नीचे गिरी हुई होती है। इस बात का फायदा
उठाकर कि घाटे उत्पादनकारी को हर समय रुपये की जरूरत
रहती है । उसका बाजार के विषय में श्रधा शन नारे, श्रादि,
व्यापारी उसमे तिजारती माल सस्ता खरीदता है, उसको जीवन
धारण का सामग्री और उत्पादन का साधन मनमानी दाम पर
भेचता है और इस प्रकार उस शोषण के द्वारा अतिरिक्त
मुनाफा प्राप्त करता है। इस रीति से छोटे उत्सदनकारी का
अतिरिच श्रध्य व्यापारी का मुनाफा न जाता है।
तिजारती जी के शोषणरिया से बचने के लिये मजदूर
और छोटे उसादनकारी समवाय या सहयोग समिति कायम करते
है। ये समितियाँ अपने सदस्यों के लिये सस्ते दाम पर मचा
माल और श्राहार श्रादि की सामप्रिया खरीद देती हैं और
उनके बने हुए वस्तुओं को उचित दाम पर बेन देता है।
मजदूर विशेष तौर पर मोग करनेवानों की समाप समिति
के सदस्य होते हैं। इन समितियों के सदस्य को मामूली चन्दा
देना पड़ता है। एक साधारण बैठर में इसका कायकारिणी
का चुनाव होता है। हिसाव जांच करने के लिये और सबालन
के लिये मी एक कमेटी नियुच की जाती है, सिमवाय क कारोबारी

पारा उपामित मुनाफा के भटवारे के विभिन्न उपाय है। या तो
कारोबार के घस्तमदस्यों को सस्ते दाम पर दिया जाता है या
पाजार दर पर ही दिया जाता है परन्तु साल के 3 में उसकी
सरीदारी के अनुपात में मुनाफे का हिस्सा दिया जाय !
सत्याग समिति का मुनाफा म्यागरी के मुनाफा के अलावा
और कुछ नहीं है। जीसदी अयशानियों का यह कहना कि इस
मुनाफा का कारण यह है कि समितियाँ माल सरता सरीदती है
लत है क्योकि यह तभी सम्भा है जब चीजें अपने श्रस कम
पर बेची आमैं और ऐसा हाने से समितियां पादहरिन तक चल
नहीं सकता। व्यापारी की तरह ये समितियों भी श्रोधागिक नापति
से घस्तु लेती है सार ये उनी यस्तु प्य से कम पर बचते
हैं। इस प्रकार से मात अतिरित पहिस्से का ये ममितियां
अपने सदस्यों में किसी न किसी रूप में बांट देती।
पने हुए माल की पिझी घे लिये जो समयाय समितियां
बनती हैं उनक मुनाफा का उद्गम यही है कि उनके माल की
विशी व्यापारी मारपान नहीं होती । इस क्षेत्र में भी व्यापार को
जो मुनाफा होता है यही समिति का मुनाफा है। व्यापारी के
मुनाफे की बचत का समिति श्रपने सदस्यों में बांट देता है।
ये सहयोग समितियाँ घाट उत्पादनकारियों को व्यागरिक
4जी का गुलामी से रक्षा करते है और मजदूरों के नाग्न को
उनत बाने में कुछ मदद करते हैं । लेरिन पूँजीपाद इस उन्नति
के रास्ते में बहुत महा राधक है। मजदूरों के जीवन धारणा की
सामप्रियाँ सस्ता हो जाने पर श्रम शति वा श्रध्य र मूल्य
घर जाता है और नापति मजदूरों का मजदूरी पटा देता है।
इसलिये सहयोगसमितियों ५ लाभ का मजदूर ना कायम
रख सकता है जब यह अपने को व्यरसाय सघ और राजनैतिक
पार्टियों द्वारा मी सुरक्षित रखें।
।

इसके अलावा यह भी देखा गया है कि ये समवाय समि- तियों छोटे और मध्यम श्रेणी के पूंजीपतियों की जन्मभूमि का जन्मस्थल होती है। छोटे उत्पादनकारियों के खुशहाल हिस्से इन्हीं समितियों के जरिये पूंजीपतियों की चोटी पर चढने लगते हैं।

सातवाँ अध्याय लेनदेन की पूंजी और कर्ज़ क्रज और कागज का रुपया तथा सूद हम श्रम उस प्रक्रिया की छानवीन कर हैं जिसमें प्रति रिक्त अर्ध्य क विभाजन में वह हिस्सा पैदा होता है जिसका मालिक न तो श्रोद्यागिक पूँजीपति है न व्यापारिक पूँजीपति बल्कि वह जिसकी पूँजी रुपया है और जिसको सूद कहते हैं। पूजीवाद के विकास के उस अवस्था में जिसमें रुपया पूँजी बन जाता है सूद का श्राविमाव होता है । इसलिये पूँजी के दौर में रुपयों की पूँजी का क्या स्थान है, यह जानना ज़रूरी है। अतिरिक्त अध्य की प्राप्ति के हेतु वस्तुन्नों का उत्पादन श्रारम्म करने के लिये पूंजीपति का रुपया चाहिए । पूँजीवादी समाज की हालत में इस अतिरिक्त अभ्य का रूप रूपया ही होता है। इसलिये रुपया से ही कारोबार शुरूहोता है और रुपया पर हो ५८

कारोबार खत्म होता है। पूँजी के दौर की गति यदि श्रयाध कायम
रखनी है तो यह आवश्यक है कि हर प्रकार की पूंजी का
रुपया बनाया जा सके और रुपया को पूंजी में परिणत किया
जा सके।
पूँजीवादा समाज में रुपया रखने के माने न क्वल यह है
कि इसके बदले में इसक मालिक को समान मूल्य का वस्तु मिल
सकता है बल्कि यह मुनाफा पाने का हकदार बन जाता है और
अतिरिक्त अयं का हिस्सेदार हो जाता है। रुपया न केवल प्रर्थ्य
का सावनिक रूर हो जाता है बल्कि पूजी का भी सार्वजनिक
स्प ग्रहण करता है। साधारण विनिमयात्मक आर्थिक सगठन में
रुपये का जो काम है उसके अलावा एक नया काम इस सुपुर्द
हो जाता है ~~यह है धन पूँजी का काम ।
इसलिये मुनाफा के पीछे जो दौटता है यह रुपया के पीछे
दौड़ता है अथात् पूँजी व पीछे दौड़ता है । जिसका यह सार्च
जनिक रूप है। अतिरिक्त प्रध्य हामिल करने के लिये यह काफी
है कि पूजापति 7 पास पनजा हा, हमेशा के लिये नहीं, सिर्फ
एक सीमित समय क लिये जिस दान यह इसको उत्पादन कार्य
में लगा सके, वस्तु पैदा कर सक और इनका अध्र्य वसूल
कर मके।
जब कोई अपना रुपया दूसरे को बीमित समय के लिये व्यव
झार परन को देता है तो उस प्रिया को लेनदेन कहते हैं। यहाँ
हम लेनदेन १ उस रूप पर विचार कर रहे हैं जिसमें कर्श लिया
गया रुग्या धन पूँजी का काम करता है यानी अतिरिक्त चर्य
हासिल करने का साधन बन जाता है।
यकार जी
यह बतलाया जा चुका है कि
स्थिर पूँजा हर उत्सादन चक्र में
अपने अर्थ का क्यल एक अशा वस्तुधों का दे देती है।

मशीनों की रगह घिस के एवज में जो रुपया किसी उत्पादन चा में उत्पन्न माल की वित्री से पूँजीपति वसुल पाता है तब तक कार रहता है जब तक फि पुगनी मशीन विलकुल पिस नहीं पाता है और उसकी जगह नई मशीन बैठाई जाती है या इतना रक्कम मि 7 बार पिसारा नरमशीन और इमारत खरीपर उत्पादन में वृद्धि की जाय ! इस बीच में पूंजीपति का रुपया बेगार पर रहता है। छ रुपया तो यो भी काम में श्रा मक्ता है कि पुरानी मशीनों से ही ज्यादामाल पेश किया जाय और इस उद्देश्य से श्रम शक्ति और कच्चे माल की रागद की जाय । उदाहरण के लिये श्रगर मिल रात का भी चालू किया जाय तो उसी पुरानी मशीन पर नया पचा माल और मादूर लगाये जा सकते हैं और इस तरह बेकार रुपये एक हिस्से से पैदावार पाई जा सकती है। लेकिन वेगार रुपये का एक रहुन (अल्प) छाया अश की इस प्रकार श्रा सस्ता है और अधिकांश कार ही रहता है। पूँजी के उस स्सेि का भी एकाश पैकार रह सकता है जो क्या माल श्रोर श्रम शक्ति खरोदन में इस्तेमाल किया जाता है। यह श्रश कार इसलिये होजाता है कि पूंजीपति कारोबार चलाने 4 पहले कुछ पालत् रुपया इस कारण रसता है कि मारा उत्पन्न माल पिको फ समय तक उसका मिल या कारोबार बन्द म हो जाय और वह उत्पादन क्रिया को जारी रखना चाहता है परतु उत्पन माल अगर अन्दाज के समय से पहल रिक जाय ता यह फालत् रुपया बेकार हाबाता है। जिस रुपये सजीपति मजदूरी देता है उसका प्रयोगमीवह चाहे जैसे कर सकता है यद्यपि बहुत ही थोडे समय के लिये क्योंकि यह हफ्ताकारी या माहवारी मग्दूरा देता है। अतिरिक्त अध्य का भी जो उसको मिलता है वह हत्यानुसार प्रयोग परता है।

यदि यह उसको अपने काम के लिये इस्तेमाल न करे तो उसको
कुछ समय के लिये इन्तजार करना पड़ेगा जब तक इतनी रकम
नदहा हा जाय कि पैदावार में यह लगाया जा सके।
इस प्रकार विभिन्न कारणों से निका उल्लेख सपर किया
गया है कुछ रुपया हर समय हा बेकार रहता है और ना लन देन
कान में प्राता है।
11 सामित समय के अन्दर
व्यवहार निये कार पूँजीपति
रुपया उधार लेता है तो यह इसको उत्पादन के निस्तार के काम
में और नया अतिरिक्त अयं पैदा करन क काम में लगाता है।
का दन वाला कर्जतमा दे सकता है 7 उसको इस प्रति
रिक्त अर का च हिस्सा मिल।
तप इस प्रकार फ्रज दिया जाता है ता इसको लेनदेन को
पूँजो कहते हैं और कर्ज देनवाल का अतिरिच नाय का जा
हिस्सा मिलता है उसको सद कहते हैं।
पूरे देश के रकम निम
सूद कादर
अनुग में ला दनवाल को
मुनाफा मिलता है उसको मद का दर व्हवे हैं। इसका दर कैस
निश्चित किया जाता है। सूद अतिरित अभ्य का ही एक हिस्सा
होने के कारण यह तो स्पष्ट ही है कि अधिक से अधिक सूद
उतना हा हो सकता है जितना कि लनदेन की पूँजी का अति
रित सप हो। सारे समान क लिये अधिक स अधिक मुद हा
सकता है औसत मुनाफा के समान ।
सिप क्षेत्रों में सद श्रीमत दर से ऊँचा हो सकता है।
उदाहरण लिये यदि किसा नाति को अपनी पूंनी पर
मुनापान मिलता दासत्ता हा तो यह काशीद पर सस्या उधार
ले सकता है ताकि उसरे मुनामा म घाटा न हो। सा भी हो

सकता है कि अतिरिक मुनाफा पी धागा पर या ज्यादा सूद
देने को तैयार हो जाय ।
लेकिन साधारण तौर पर ऐसा होता नहीं। क्योंकि उस
हालत में कुछ पूंजी उद्योग धन्दों से उठार लेनदेन की पूजा
बन जाती और सूद का दर घर जाता । सामाजिक पैमान पर सद
वे दर की सीमा मुनाफा दर की शोसन होगी। साधारणत
यह सीमा से नीचे ही रहेगी क्योंकि जो कर्ज लेता है या फर्म के
रकम से उत्पन्न अतिरिक्त प्राय का अधिकांश ही स्वय हजम
कर लेता है और अल्पशिकला देनेवाले के लिये छोड़ता है।
कम से कम सूट क्या हो सकता है ? यह शप नहीं हो
सकता।
इन दोनो सोमायों के अन्दर सूद का उतार चार कज
की मांग और उसकी पूर्ति पर गिभर है । लेनदेन का ।
जितनी अधिक होगी सूद उतना ही कम होगा और यह पूंजी
जिती कम होगी सूद उनना हा अधिक होगा।
पूँजीवाद के विकास के साथ श्रीसत मुनाफे का दर गिरता
रहता है और इसलिये सूद थे दर का भी उतार पानी नाचे की
सोमा की ओर जाना अवश्यम्भावी है। इसके अलावा पिछड़े
हुए मुल्को में जहाँ श्रीसत मुनाफे का दर धिक है सूद का मा
दर अधिक है।
अधिकांश पूंजीपतियां मुनाफा और प्रोसत मुनाफा के
पीच का भातर फिर भी अधिक होता है लेकिा सूद के दरी का
तर बहुत कम होता है। इसका कारण यही है कि लनदेन
की पूँजी के प्रयोग क्षेत्रों का परिवत्तन श्रासानी से हो सकता है
लेरिन श्रौद्योगिक जो के लिये इतनी आसानी से चेन परिव
न सम्भा नहीं । श्रौद्योगिक पूँजी के प्रयोग
में जितनी
वैचित्रता है लेनदेन को जी क प्रयोग में उसका अल्पशि मी
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वैचित्रता नहीं है, इसलिये, और इसनिये भी कि लेनदेन के पूँजीपतियों को कर्ज की मांग और पूर्ति का बेहतर अनुमान रहता है। सूद का दर अधिक निश्चित रहता है। औद्योगिक और व्यापारिक पूंजी की तरह धन पूँजी का एक विशेष प्रकार की पूँजी बन जाती है। व्यापारियों की तरह धन पूँजियों का एक श्रेणी बन जाती है जिनका काम हाता है दूसरों को कर्श देना धीर सूद वसूल करना । जैसे इतिहास में श्रौद्यो गिक पूँजी के पहले तिजारती पूँजी का श्रावि र दाता है उसी प्रकार धन पूँजी का मा श्राविर्भाव होता है। मुद्रा क पारिभाव के साथ ही धन पूँजी का श्राविर्भाव सम्बन्धित है। पहले के युग के सूद में और शान के सूद में कुछ अन्तर है। पहले लोग रुपया इकहा करते थे और जब दूसरा कोई रुपया उधार लेता था तो वह कुछ मुआवजा देता था जिसका सूद कहा जा सकता है। श्राज के सूद के माने हैं छोटे उत्पादनकारियों का शाषण न केवज्ञ इन दारा उत्पन्न अतिरिक आय को ही पूँजीपति हइप करता है बल्कि उनके जीवन निर्वाह के लिये श्रावश्यक वस्तुओं का भी एक श्रश वह हड़प कर लेता है। लेकिन चूकि धन पूँजी के कारण उत्पादन का विस्तार होता है, इसालये जम कमी धन पूँजी का मालिक अतिरिन अध्य का हिस्सेदार बन जाता है, उसको एक अश श्रौद्योगिक पूँजीपति को दे देना पड़ता है। पूजापति मुनाफा का हिसाव लगाते समय अपनी पूँजी पर सूद को इससे घटा देता है और इस प्रकार से जा मुनाफा का अंक निकलता है वही उसके लिये खालिस मुनाफा है।

पाठवाँ अध्याय
क़र्ज़ और बंक
यदि लेन देन की प्रपा न होती तो धन पूजो को औद्योगिक
पूँजी में रूपातरित होने में बहुत
बक और तिजारती
विलम्ब लगता और इस क्रिया में
बहुत कायट पड़ती। बचे हुए रुपये खाली पड़े रहते जब तक
न कि इतना लम जाता कि उससे नई मशीनें और हमारते श्रादि
खरीदी जा सकती।
यही नहीं कि लेन-देन की पूँजी के प्रभाव में बचे हुए
रुपये का प्रयोग श्रौद्योगिक पूँजी के रूप में नहीं किया जा
सकता बल्कि उत्पादन क्रिया में भी काफ़ी रुकावट पड़ती क्योंकि
उत्तम माल सारा का सारा एक साथ विक नहीं सकता है और
वस्तुओं के रूप में पूँजी अटकी पड़ी रहती है।
पुराना माल विक जाने तक उत्पादन क्रिया की न रहे इस
लिये पूँजीपति को अधिक पूंजी चाहिए । पुराना माल पिक कर
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जर तक रुपया वसूल न हो जाय तब तक ये मरी हुई पूजा होती
है। नितनी जल्दी ये बिक जायें पूंजीपति ५ लिये अधिक पूजा
के परिमाण की उतनी ही कम श्नावश्यकता है।
लेन देन की पूँजी का दोनों ही काम होता है बचत
रुपये म इतनी वृद्धि कर देना मि उत्पादन का दायरा रद
जाय और जब तक उत्सन माल का रिकी न हो जाय तब तक
उत्पादन क्रिया को जारी रखना।
यह होता कैसे है ? मान लीजिये कि पूँजीपति के पास तैयार
माल है, समझ लीजिये घाट का कपड़ा। बहुत से कारण है
जिससे वह एकायक उनको पेच नहीं सकता। अब उत्पादन
किया चालू रखने के लिये उसको कोयले की जरूरत है नोर
कोयला उसको मिलता नहीं क्योंकि उसके पास रुपया नहीं है।
एक पोर उसके पास यस्तु है विकने के लिये और दूसरी ओर उसको
श्रावश्यकता है कोयले की और देरल रुपये के माध्यम की ताकि
दोनों का विनिमम हो सक । हाँ, यदि कोयले का मालिक इन्त
कार करने के लिये तैयार है जब तक कि छीट के कपड़े
विक न जाय तबता कारोवार चल सकता है। नकर देने के
बजाय वह एक निश्चित समय के बाद देने का वादा करता
है। इस प्रकार से वस्तुओं के दौरे का समय घट जाता है
चौर उसको उत्पादन किया जारी रखने के लिये अधिक जो
की श्रावश्यरता नहीं होता।
इस प्रकार के कर्ज को जा वस्तुपाक दौरे में सहायक होतो
है और उत्पन्न माल ( जो कि नहीं पाती) का पूँजा के दौरे
के माग में रोशनहीं बनने देती, तिजारती कर्ज कहते हैं।
उसकज को, जो बचत के रुपये को उद्योग के उपयोगी
बनाती है और परती पूँजी को जरखेज़ बनाती है, वह कज
कहते है।

- कर्ज की जमानत ऐठा हो सकता है कि व्यक्तिगत सिनिमय का यिल विश्वास पर एक पूंजीपति दूसरे को मर्ज दे सकता है लेकिन साधारण तया वह जमानत लेकर न देता है चाहे उस जमानत की शकल कुछ हो । जर कर्ज लेनवाला लिसित दस्तावेज़ में एक निश्चित समय के अन्दर कर्ज अदा करने का वादा करता है तो उसको साधारण विनिमय का शिल कहते हैं। यह विनिमय का बिल जिसमें कर्ज लेनेवाला सुद कज श्रदा करो का वादा नहीं करता बल्कि दूसरे पर अपना यह जिम्मेदारी हालता है उसको ड्राफ्ट कहते हैं। जैसे कपड़े के कारखाने का मालिक कोयले के सान के मालिक से १०,००० रुपये का कोयला कर्ज पर लेता है और अपना कपड़ा दूसरे व्यापारी के हाय बेचता है इस वादे पर पि रुपया याद में मिलेगा यानी विनिमय का विल लकर, तो इसको बतौर ड्राप के वह कायलय मालिक को दे सकता है। जय इस ड्राफ्ट पर उसका दस्तखत हो जाता है जो अन्तिम दर्जे पर रुपया देनेवाला है तो यह जमानत का काम करता है। विनिमय के दिल में शिरकत दो की हाती है।ड्राफ्ट में कम से कम तीन की। लेकिन ड्राफ्ट का विस्तार हो सकता है और इसमें तीन से ज्यादह का शिरस्त हो सकती है। विनिमय का बिल सरकारी कागज पर लिखा जाता है। विनिमय के 'रिल' से पंजी के दौर में श्रासानी होती है और विना नक्कद के ही पंजीपतियों का श्रापसी हिसाब तय हो जाता है। विनिमय का बिल शाहन्दा कर्ज डिस्काउन्ट अदा करने का वादा होता है। यदि निसके पास विनिमय का विल है उसको फौरन रुपये की जरूरत तो वह एक दूसरे पूँजीपति को अपना विल दस्तखत करके दे देव है। पंजीपति शिल के तारीख तक इन्तजार करता है और तब उसको मिल के रुपये मिल सकते हैं। तारीख के पहले बिल भुन- बाने को डिस्काउट करना कहते हैं। यह तो सहज ही समझा जा सकता है कि धन पत्रिक रिनि- मय के बिल के बदले पूरा रुपया नहीं देता है। वह एक रकम अपने पास रख छोड़ता है जिसका डिस्काउट सूद कहते हैं। इस कारोबार में वह बिल के मालिक को कुछ समय के लिये एक निश्चित रकम उधार देता है और बिल का भुनाना एक प्रकार का लेन देन हुन्या । यह बिल के भुनाने का काम बिल का नसली लिखनेवाला सय भी कर सकता है । इस प्रकार रिल का भुनाना लेनदेन की इद का बहुत बढा देता है और रक कर्ज और तिजारती कर्ज का एक सम्बन्ध स्थापित करता है। चमी तक क्रज का प्रत्यच रूपया जो कुछ व्यक्तियों के बीच महदूद था लेकिन यह साधा कर्ज उनके दरम्यान जिनके पास बचत का रूपया है और गिनको रुपये की जरूरत है सब समय सम्मप नहीं । इसीलिये पक की जरूरत होती है जो दोनों पक्ष की ओर से दलाल का काम करता है और जो कर्ज का व्यापार चलाता है। हर पूँजोपति के रचत का सामाय बेकार धन का परिमाण एकत्रित होने पर रक में एक मारी खजाना जमा हो जाता है जो काफी समय के लिये खुद पर उधार दिया जा सकता है क्योंकि रुपया जमा करनवालों में से हरएक का एक साथ रुपया निकालने की जरूरत नद पडती। हर क क यही दो मुख्य काम हैं--एक तो रुपया जमा करना और दूसरा रुपया उधार देना। वक की कुछ मूल पँजी होती है जिसके मालिक थोड़े से जो पति हाते हैं। इसक अलास ब का कुछ रिजाय पनी होती है जो सालाना मुनाफा का एक स्मिा दाता है और जो एक का

कारारार पदास, काम प्राता है अपशक में पया जमा
होता है जिसका नमाजा र पते हैं। कार धन पे मानिक
अपना अपना रुपया यंक में जमा करते हैं। पपा मादा प्रकार
सेदोका है, एष, जिसमें जमा करावाला रूपया जर जी नाई
निकाल ल सकता है और दूसरा, सिम जमा करनेगला अपनी
रजाम दी दस सात पर देता है कि एक निश्चित सारीख में
पहले यह रूपया नहीं किालेगा।
पद का मामसिद है कि वह उनी पादप खुद देगा तो
पक निश्चित तारीख से पहले अपरा रुपया नहीं निकालेंगे क्योंकि
दूसरों के लिये यक का पापो करया तैयार रखना पड़ता है ताकि
रुपयों की मांग होते ही पद असल जमा अदा कर सके।
मिना तिपि के रुपया जमा करावाले चालू हिसार में अपना
रुपया जमा करते है और जप चाहे अपना रुपया निकाल सकते है।
इनका कारोवार पहुत बारा पेक के जरिये होता है। धेक क
जरिये एक व्यक्ति अपरा या दूसरे का दे सकता है और इस
प्रकार दिना रुपया लिय दिये ही लोगों का हिसाब चुकता हो सकता
है।को में वापस में भी पारावार हाता रहता है और यदि
दो व्यक्तियों का हिसाब दो यकों में है तो भी उनका हिसाब
कितार दो सकता है।
लाख करोड़ों मजदर किसानों के बचत की छोटी छोटी रकमों
को जमाकर पंजीपति बड़े बड़े पक चलाता है और उनको नगण्य
सूद देकर चुद माटे रक्कम का मुनाफा कमाता है।
बैंक अपने जमा रपये का क्या करता है। बिना पर्यास जमा
नत के बक किसी को रुपया नहीं दे सकता। एक तो विनिमय के
बिल का हिसार होता है। इस ग्लि का मानिक पक मे बिल
मुनाता है और कुछ यहा देने पर बिल का रकम उसको मिल
जाता है। दिल का रुपया वसूल करने की जिम्मेदारी बक लेता

है। इस क्षेत्र में विनिमय काग्लि ही जमानत है । परि निश्चित तिथि पर शिन का उपया न मिल तार को हक है कि जिन वस्तु-समूह की बुनियाद पर रिल लिसी गद है उनको यह ल ले और इस प्रकार रुपया वसूल पाये। गिरा रखकर मो क रुपया उधार दे सकता है। पहलजमाने की तरह स्थल बाना, होरा, जवाहरात रसकर ही नहीं बल्कि कागजात की बुनियाद रमा रुपया उधार दिया जाता है। वस्तुमा का जमानत पर मास्या उधार मिल सकता है। कार जरूरीनहा वस्तु समूह यक की इमारत में ही रखा जाय। किसानादन में यह जमा किया जा सकता है जिसका रसीद उसको मिलता है। इस रमाद के बिना उसको सामान वापस नहीं मिल सकता । जब यक म वह यह रसीद जमा करता है तो इसका जमानत पर उसका रुपया उघार मिल सकता है। रेल या जहान र मो जर माल रवाना किया जाता है तो उनकी रसीट रिना पर मो म्पया उधार मिल सकता है। जमान या इमारत की जमानत पर भी रूपया उधार दिया जाता है। ये ही मर ज़मानत है। इन दान कामों के अलावा क एक और काम मी करता है। जैसे एक शहर के याशिन्द के क्रज का रकम दूसर शहर क वाशिदे वसूल करना इत्यादि । इस काम के लिये को अलग से कमीशन मिलता है। घर का मुनाफा क्या है ? 4 रुपया जमा करनेवाले का सूद देता है और सूद लेकर जमानन पर सय कर्ज देता है। इन दाना सदों का अन्तर हो वक का मुनाफा है। यह मुनाफा भी साधारण मुनाफा के शौरत के लगमग हा होगा नहीं तो लोग बकों में अपनी मीन लगाकर उद्योग धन्दों में लगायेंगे। A-

नयाँ अध्याय
कर्ज़ नोट और काग़ज़ के रुपये
हमने देख लिया कि फर सौदो पे दान एक विनिमय
का मिल रुपये की तरह वस्तुओं के दौरे के माध्यम का स्थान
लेता है। इसी तरह चेक मी रुपया की जगह ले सकता है।
विनिमय फे बिल को चुकाने की जिम्मेदारी होती है उस पर
जिसके नाम बिल चढ़ाया जाता है और चेक पर रुपया देने
का जिम्मेदार होता है बक ।
जैसे पंजीपति मद की जगह चेक से काम लेता, बक
के पन्जे में काफी रुपया होने के कारण, एक मी अपने ग्राहकों
को नोट देता है जो किसी समय भुनाये जा सकते हैं। चेक की
तरह बक नोट भी हाथों हाय रुपये की जगह घूम सकता है जब
क यह बक को वापस न लौट जाय ।
बक नोट भी क्सिी जमानत हो पर दिया जा सकता
७०

है। विनिमय का पिल भी इस जमानत का काम कर
सकता है।
बक नोट काफी समय तक चालू रहता है और सब नोट
एक साथ मनाये नहीं जाने , इसलिये यकसी उस पूंजी का जिसके
बिना पर नाट निकाल जाते हैं, एक हिस्सा दूसरे काम में लगाया
जाधकता है। दूसरे शब्दों में उन बक नोटों की रकम जा
भुनाये न गये हो एक प्रकार का कर्ज है जो बिना यद यक को
मिलता है। नोट निकालने का बर को यह बहुत बड़ा फायदा
है। एक नोट निकालने के इरा शधिकार का दुरुपयोग न कर
सके इसलिये इसको नियत्रित रखने के लिये सरकारी नियमन
की नावश्यकता है, क्योंकि श्रन्यथा यह कठिनाई पैदा हो
सकती है कि नोट भुनाने व लिये बद के पास रुपये न रहें ।
सरकार यह निश्चय करती है कि बक अधिक से अधिक कितने
नोट निकाल सस्ता है और नोटों के किस अनुपात में जमा
नत के तौर पर सोना रसना पडेगा । इस निय नण के
सिलसिले में सरकार बकों के मुनाफा का एक हिस्सेदार भी बन
जाती है।
घक नोट और मुना
यफ नाट एक प्रकार का कर्ज नोट
है जो मुद्रा का काम करता है।
लेकिन मुद्रा का सब काम नोट नहीं कर सकता। मुख्यत
मुद्रा के चार काम है। (१) अर्थ का परिमाण नापना,
(२) वस्तुओं के दौरे का साधन बनना, (३) श्रदायगी
के साधन का काम करना, तथा (४) जमा करने के काम
धाना { इसमें से (२) और (३) का काम तो नोट कर
सकता है लेकिन (१) और (४) को काम नहीं कर सकता।
(२) और (३) धन यजी का काम है और अतिरिक्त अध्य
पैदा करने की प्रक्रिया में एक सोढी मान है।

एक नाट सत काई चीज नहीं है। यह मुद्रा, वस्तु प्रादि
का प्रतीक मात्र है। वास्तव अप्य का यह क्षणिक एयजी है।
इसलिये नोट दूगरे यस्तुओं के श्रध्य को धिारत न । यर
सकता । पिपरात इसके जिन वस्तुओं के अर्घ्य का यह प्रतीक है
उदर्शक द्वारा इसका मूल्य निधारित होता है। साना चांदो से
ही वस्तु ऋष्य या परिमाण पिया जाता है। इस काम में
नाट माना चांदा को जगह नहीं ले सकता , क्योंकि साना, चाँदी
यतीक प नाते नाट का काई अलग श्रष्य नहीं होता। इसका
अभ्य माना चांदी के अयं के ऊपर ही निभर है। साथ ही वक
नाद कोइ जमा नहीं करता , जिसका 'नमा करना होता है वह
साना चाँदीही नमा करता है।
का अपने तिजारती भागार में नोटों का इस्तेमाल
क' उधार + रूप में करते हैं । इन नोरों का श्रापमा
विनिमय हो सकता है । इसको ला के लिये काई बाध्य
राष्ट्र का जब सरकार के ऊपर पाबना चुकाना होता है तो
वह नोर निगलता है जिससे राष्ट्र के खजाने को थामदो
हो जाता है । इन नोटों का विनिमय नहीं हो सकता है और हर
एक हम लेन के लिये बाध्य है।
यज़ नोट उतने ही निकाले नाते हैं
कागज़ के रुपये के
जितनों की जमानत क में होती है।
खरीदने की वाहत
बक नो की तादाद इस पर गिभर है
कि दौर में कितने रुपयों की मांगहै और नेश की साधारण धार्षिक
स्थिति क्या है ? राष्ट्र जो नोट निकालता है वह इस पर निर्भर
नहीं निवस्तु यों के दौरे के लिये हितन रुश्या की जरूरत है।
राष्ट तो ज्यादातर नोट तभी निकालता है जब उसकी श्रामद
स खच ज्यादह होता है।
Gર

ऐसी हालत यस्पा सोने को और कागज़ करय का
खादने की ताकत पर होगी। इसका उत्तर इस पर निमर है
कि किस तादाद में कागज्ञ कर निकाल गये हैं और वनुष्यो
क दौर व साधन र फिनो करयों की जरूरत है। किसी
विशेष समय पर कसा देश में दौर के लिये कितने सपा की
जरूरत है यह इस र निमा है कि पाजार में दौरे पर कुल
वस्तुयों का अध्य स्तिना है अौर पसा या इस एप के
दौरे का रफ्नार क्या है ? दौर पर वस्तुमा का अध्य नितना
अधिक हा उतना ज्यादह रुपयों की जरूरत होगाये
के दौरे का रफ्तार जितना अधिक होगा उतने हा कम रुपय
को सस्रत है । लेकिन दौरे पर कितने रुपये की जरूरत है
इसका निश्चय करन के लिये दौरे पर कुल वस्तुमा १ अर्य
स उन वस्तु का श्रमं घटा देना होगा । उधार पर बेचे
जान है। इस ताराद में उन पयो कर जा लगाना हमा
मिलन की रूरत तनख्वाह श्रादि देने के लिये पहता है।
उन दोनों का जाइन की जरूरत नहीं जा आपस म सिाय में
कर जाते।
दौर लिये जिन रुश्ये की जररत है उससे ज्यादह
रुपया रहन पर पालत् रुपया लाग जमा करते हैं या गलार
जेवरात बनाते हैं। अगर साना नांदी और गज के
रुपये साथ चलते हैं तो दोनो ६ से नितन काय पालन
बचते है उतना रक्कम जमा करन के काम आता है।
जन दौर पर यन्तुओं के अन्य से यादह नौर चालू होता
है तो कोई इसको धन के सिके के बराबर मूल्य पर लेने का
প্রধাৰ লৱী ধন্যি ধ্বংসার ব্যাঙ্ক হালার ধমান হন বং
जिसने यादह नोट चालू होंगे उनके खराद की ताकन उठनी
ही कम होगी। ऐसी दशा में जिहोने काग के पये यचा

राष्ट्र काराज का रुपया निकालकर अपना खच निबाहना चाहता है। इस प्रकार जनता के माथे यह अपना सर्च हाल देता है । यह राष्ट्र के लिये एक श्रामदनी की ज़रिया पन जाती है-एक विशेष प्रकार का टैक्स जिसका मार विशेषकर मजदूरों को उठाना पड़ता है। इस तरह की हालत ज्यादह दिन माधारण अवस्था का पुनरावर्तन नहा रह सकती और एक स्थाया मुद्रा प्रथा की यावश्यकता यदने लगती है। इस हालत के सुधार के लिये पहली यावश्यकता यह है कि राष्ट्र के बजट में सामञ्जस्य हो, खच और श्रामदना के पल्ले परावर ही यह कागज के रुपयों के जरिये नहीं हो सकता गल्कि टेक्स, विदेशों से पर्ज और सरकारी कारखानों के मुनाफा अादि से ही हो सकता है । परन्तु, हाँ, लड़ाई के समय, या इसके इद गिद ऐसी व्यवस्था सम्भव नहों । मुल्क का पार्थिक स्थिति में सुधार के साथ ही यह सम्भा है। और यह भी बात सही है कि मुद्रास्पिति के स्थायी होने से भी थाथिक दशा सुधर जाती है। यह इस प्रकार से होता है कि कागज के नये रुपये निकाले नहीं जाते और सरकार को टैक्स श्रादि व लिये जो पुराने रुपये मिलते जाते हैं उनको वह फिर से चालू नहीं करती। देशों के व्यापारिक सम्बन्ध भतराष्ट्रीय क्षेत्र में हिसाय का चुकता में दौर का माध्यम सोना ही हो सकता है काग़ज़ का रुपया नहीं। दो देशों के सोने के सिक्कों के परिवतन का अनुपात उन सिक्कों में सोने के परिमाण पर निर्भर है। इन सिक्कों के विनिमय क दरों में अन्तर का परिमाण उतना ही हो सकता है जितना कि सोना गलाने की कीमत हो।

परन्तु दा देशों ने बीच कारावार स्वल नकद नहीं कन' पर भी चलता है। यहाँ भी विनिमय का बिल रुरये की जगह ले सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय व्यागर क्षेत्र में इन बिलों का विदेशी विनिमय विन कहा जाता है। मिन्न समयों पर इन विदेशा रिला का मुनाने क जो दर होते हैं उनमें अन्तर कितना हागा यह इस पर निर्भर होगा कि एक देश से दूसरे देश को जहाज के जरिये सिक्के मरने का दाम कितना लगता है, तथा एक देश के दिलों की दूसरे देश में कितनी मांग है । जा दूसरे देश किसी एक देश বা होगे उन देशों में उस देश के बिलों को ज्यादह मांग होगा और वहाँ के बिलों का दाम चटायगा । यह चढाव पूर्वोक्त सीमा से अधिक नहीं हो सकता। दो देश के श्रापसी मज़' की स्थिति पर ही विदेशी रिलों का दर निर्मर है। निस देश का कर्ज दूसरे देश पर होता है उसकी स्थिति लामदायक होती है । किसा देश के श्रायात नियात से ही विशेष रूप से स्थिति का निदेशाता है, यद्यपि उधार कक्ष कामो इस पर असर पड़ता है। व्यापारिक स्पिति असुविधा नक हाने पर करयों का दर घट सकता है।

दमवाँ अध्याय
जमीन पर लगान
र पंजीपति के लिये जो एक पंजीवादी कारोबार चलाना
चाहता है न केवल मशीन, कच्चा माल और श्रम शक्ति चाहिये
पल्कि उसको जमीन भी चाहिये जिस पर ही उसका सारा काग
र चन सकता है। उद्योग धन्दों से भी ज्यादा, बतौर एक
उत्सादा व साधन के जमीन को जरूरत है जरायत के
लिये, गनिज पदार्थों के लिये और कच्चे माल के उत्पादन
के लिये।
ज़मीन, यदि इस पर प्रयोग किये गये श्रम का हिसाब न
लगाया जाय, प्रकृति की देन है जिस पर कोई दाम नहीं लगता।
इसलिये होना तो यह चाहिये कि हया, धूप, श्रादि की तरह
at को जमीन मी मुफ्त मिलनी चाहिये। परतु वास्तव ऐसा
है नहीं। जमीन का रकबा सीमित है और पंजीवाद की उत्पत्ति
.

.
के पद पहल स ही जमीन जागीरदारों को निजी सम्पत्ति हो
गर थी।
जमील सामित होने कारण और जमादारा की
व्यक्तिगत सम्पत्ति होने के कारण, इसके इस्तेमाल के लिये
वे लगान वसल करते हैं । लगान के दो हिस्से हैं। एक
हिस्सा तो उस पँजी पर देना पडता है जो जमीन की
तरक्की १ लिये, उस पर श्रावपाशी के लिये, और
मकार श्रादि बनाने के लिये लगाई जाती है। दूसरा हिस्सा
यह है जो पंजीपति पामींदार को जमीन के इस्तेमाल के
अधिकार के लिये देता है । अर्थशास्त्र लगान के इस दूसरे
हिस्से पर ही विचार करता है।
मान लीजिये कि लगान जा दे रहा है वह पंजीपति किसान
है और अपना किसानी के लिये मजदूर रखता है, जिनके श्रम
का यह शोपए करता है। यहां हम उन क्षेत्रों का विचार नहीं
करते जहाँ काई जमान रेहन पर लेकर खुद जोतता बोता है
अथवा कोई किसान जमीन खरीद लेता है और स्वय ही जमी
दार और पूंजीपति दोनों बन जाता है।
फिन हालात में पंजीपति जमादार को लगान देने के लिए
राजी हो ( सकता है ) जायगा ? केरल उस हालत म जाति
उसको जमीन पर नामदनी इतना हाकि लगान देने के बाद भी
औसत मुनाफा उसके लिये बचे। यदि उसको औसत मुनाफा
न मिल तो वह नि म देह जरायत से पूँजी हटाकर उद्योग धन्दा
में उसका प्रयोग करेगा जहां उसको कम से कम औसत मुनामा
मिले।
पजी का प्रयोगक्षेत्र जरायत से उद्याग-पन्दों में बदल
जाने के कारण किसानी से उपज महेंगे हो जायेंगे और यो उस
भी पर जो जमी पर लगाई गई होगा श्रीसन मुनाफा मिलने

लगेगा। इस प्रकार यह सिद्ध हा जाता है कि श्रीसत से अधिक मुनाफ्रा के रूप में ही लगान की कल्पना की जा सकती है। सोसत से अधिक मुनाश की उत्पत्ति कैसे होती है। Differential Rent उन्नत मशीन श्रादि के प्रयोग से वस्तु का दाम श्रीसत उत्पादन के मूल्य से मान्तरिक गान कम हो जाता है। जितना कम हा जाता है उतना ही अधिक मुनाफे का परिमाण है। निश्चय ही यही पर लगान का उद्गमस्थान है । एक उदाहरण से यह और स्पर हो जायगा। हर जगह ज़मीन परावर जरखेज़ नहीं है। एसी जमीर क तीन अलग अलग टुकड़ों को ले लीजिये । मान लीजिए कि हर टुकड़े पर पूँजी लगाई गई है २००) १० की जिस पर औसत मुनाफा है २० को सदी यानी ४०) रु. । श्रय देखा जाय कि दर टुकड़े पर एक सेर अनाज का दाम क्या होगा ! नीचे दिये गय नाशा से इसका अफ मालूम हो जायगा । दर उत्सम व कुल पैदा मुनामा नाज का पार की का श्रीसतानाज के फी सेर पैदावार पैदावार की कीमत परिमाण क्रीमत कामूल्य १/२०. सेर। २..) ४०) २४१) २१५० से २०० ४०) २४०) ३) १०० सेर २००) ४१) २०) जोसर ६००) १२०) ७२०) यदि यह मान लिया जाय जिपि में भी उद्योग धन्दों की तरह उत्पादन के नौसत मूल्य का निशय लागत दाम से ही होता है .. = ..

तो इस क्षेत्र में पैदावार का मूल्य होगा: रु०%D१६६० ॥ यह जाहिर है कि (१) के काश्तकार को फी सेर .. मुनाना होगा योर (२) के काश्तकार को श्रीसत मुनाफा मिलेगा। लकिन (३) के काश्तकार का क्या हाल होगा ? उद्योगधन्दा में तो यह सम्मव है कि पूंजीपति मशीनों की उनति के द्वारा श्रीमत उत्पादन शक्ति का पहुँचे, लेकिन (१) और (३) फ उत्सादन का अन्तर मशीनों के कारण नहीं है, इसका कारण है प्राकृतिक जमीन का अधिक या कम उरनाक हाना । अगर बाकी बातें पराबर हों तो समान पूँजी क प्रयाग से अधिक अनाऊ भूमि में कम उपजाऊ भूमि से ज्यादह पैदावार होगा। इसलिये यदि श्रीसत लागत दाम से ही अनाज का मूल्य निधारित हो तो (३) के काश्तकार का सदा क लिये ही श्रीसत मुनाफे से कम पर सन्ताप करना हो और कार पंजीपति ऐसा करना नहीं चाहेगा। इसलिये (३) को जमान परतीपही रहा करेगी। लेकिन ऐसा उमो सम्मर हो सकता है जब (१) और (२) उपज से ही बाजार की मांग की पूर्ति हो सफे। लेकिन जब माँग इससे बढ जायगी ता तीसरी भूमि भी काम में लानी पड़ेगी और अनाज का दाम हा जायगा (३) के समान यानी २२० । अब तीसरी भूमि के काश्तकार को भी श्रीसत मुनामा मिलने लगेगा । इससे सप्ट है कि उद्यग धन्दों की तरह कृषि के उपज का मूल्य श्रोसत लागत दाम से निर्धारित नहीं किया जाता । चूँकि जमीन के प्राकृतिक गुण क्षणिक नहीं बल्कि स्थायी है और मनुष्य के प्रमाव से मिट नहीं सकते (जैसे यांत्रिक उन्नति प्रादि के द्वारा मनुष्य उद्योग- धन्दों को प्रभावित करता है) और चकि अच्छी जमान का रकमा सीमित है और इच्छानुसार इसकी वृद्धि नहीं हो सकती, कृषि के उपज का मूल्य उत्पादन के औसत दाम से लगाया

नहा जा सकता बल्कि उस दाम स जो कि सवस सराय जमीन
पर पेदा करने में लगता है।
इसक पलस्वरूप यादह जरदोज़ जमीन से कम जरखेला
जमीनों के निस्वत कुछ अतिरित श्रामदनी होगी। इस अति
रित्त श्रामदनी का परिमाण इस पर निर्भर है कि सबसे खराब
जमीन के उपाये दाम से उन जमीनों के उपन का दाम
कितना कम है।
यह स्पष्ट है कि इन हालात में (1) और (२) के
मानिक तभी अपनी जमीनों के इस्तेमाल की इजाजत दे सकते
है जब उनके काश्तकार अपनी अधिक थामदगी जिसकी
उत्पति का कारण उनकी जमीनों का यादद उपनाकरन
है उनके मालिकों को दे देने के लिये तैयार हो । फाश्त
कार भी यह लगान दो को तभी तैयार होगा जब लगान
देने के गद भी यह पौधत मुनाफा कमा सके। इस प्रकार यह
अतिरित श्रामदगी ही लगा है। पिछले उदाहरण में (१)
और (२)जमीन से ही लगान मिल सकता है । यदि
(१), (२) और (३) के सम्मिलित उपज से समान की
जरूरतें पूरी न पड़े तो नई जमीन (४) भी काम में लानी
पड़ेगी और तब (३) से भी लगान वसूल किया जावेगा।
जमीनों की मिन स्थिति के कारण भी लगान सधि हो
सकती है | जरायत में, उद्योग धन्दो से कहीं ज्यादह, इस बात
का असर होता है कि जमीन याज्ञार से कितनी दूरी पर है।
इसका कारण यह है कि कथा माल या जरायती उपज का दाम
इतना नहीं है जितना कि उन को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने
का दाम | अगर हम पिछले उदाहरण की तरह तीन अलग
अलग जमीन के टुकड़ों को लें जिनकी दूरी बाजार से (१) से
(२) की और (२) से (३) को ज्यादा हो तो पिछले

मिसाल की तरह (१) और (२) को अतिरित आमदनी
होगी और उन जमीनों पर लगान वसूल किया जायेगा।
इस बामदनी में फर्क का एक और भी कारण हो सकता
है । इन जमीनों का उपज बढाने के लिये मान लीजिये, पिछले
उदाहरण की तीनों ज़मीना पर समान पूजी का प्रयोग होता है।
लेकिन इन तीनों क्षेत्रों में अतिरिच उपज का परिमाय समान न
हो। (१) से (२) में और (२) से (३) में इस प्रतिरिक
उपज का परिमाण घटता जाता है। इस देश में भी (१) और
(२) की अधिक प्रामदनी होगी और उन जमीनों पर लगान
वसूल किया जावेगा।
इन उदाहरणों से ऐसा मालूम होता होगा कि सर्वदा पहले
ज्यादा जरखज जमीन जोती बोई जाती है और फिर चढते बढ़ते
कम उपजाऊ जमीन पर हाथ लगाया जाता है। परन्तु वास्तव में
कभी कभी इसके विपरीत भी होता है। इसका कारण यह है कि
जगलात होने के कारण अथवा बाजार दूर होने के कारण कम
उपजाऊ जमीन ही पहले जोती योई जाती है। इन्हीं कारणों से
पूँजी का प्रयोग भी कम उपजाऊ जमीन पर हो सकता है। बहर
झाल अलग अलग जमीनों की श्रामदनी मिन होने
कारण ही
लगान की उत्पचि होती है।
ऐसा प्रतीत हो सकता है कि लगान
का उद्गम स्थल है जमीन का उपाऊ
पनजसका सामाजिक सम्य धो मे याई नाता नहीं है। यह सही
नहीं है। मनुष्य प्रम केापना किसी जमीन सलगान की उत्पत्ति
नहीं हो सकती। यह हम देख चुके हैं सियादा जरवेज जमीन
पर, या उस जमीन पर निमकी स्थिति लामोशाय या जिम
पर पूँजो के प्रयोग से उपम की बद्धि श्रोधक होती है, श्रम की
उत्पादन शचि अधिक होती है और यही लगान का कारण होता

है। यहां पूजायादो कपि का सात हा रही है । पूँजीवादी कारव
कार अपने हाथों सेत जोतता बोता नहीं है बल्कि इस काम के
लिये मजदूरों को लगाता है । इसलिय लगानी प्रोसत
मुनाता से अतिरिक्त मुनाफा का दूसरा नाम है-को पष्टि होती
है अधिन उपना जमीन पर मजदूर को अधिक उत्पादा शक्ति
मे । दूसरे शब्दों में लगान मजदूर द्वारा सष्टि अतिरिक्त अन्य का
एक हिस्सा है। अधिक उपजाऊ जमीन पर अमही उत्पादनप्रति
अधिक होने के कारण मजदूर द्वारा सृप सम्बधित अतिरिक अभ्य
काश्तकार के लिये अतिरिक्त मुनापा का उद्गम हो जाता है।
काश्तकार अौसत मुनाला अपने पास पफर पाकी हिस्सा लगान
के रूप में जमींदार का दे देता है।
यह पाल ही कहा जा पुका है कि
विशुद्ध लगान
पूंजीपति यदि लगान न दे तो जमींदार
4जीपति को अपनी जमीन नहीं देगा। यह मी, कि जमीन की
काश्त काद तमा ररेगा जय ज़मींदार का लगान देने के बाद उसको
श्रीसत्त मुआपा मिल सके । जमीन न० (३) से कोई अतिरिक
लगान नहीं वसूल हो सकता। लेकिन जान चाहे कितनी ही खराब
क्या न हो वह बिना लगान के किसी काश्तकार को जमीन न
देगा चाहे उसको परती ही क्यों न हाल रखनी पड़े । दूसरी धोर
काश्तकार भी जमींदार को अपनी औसत मुनाफा का साझीदार
महा बनाना चाहता। इसके पलस्वरूप अनाज का पैदावार घट
जायगा । यदि साथ ही साथ पाजार में अनाज की मांग भी एट
न जाय तो अनाज का दाम बढ़ जायगा । दाम बढ़ता ही जायगा
जब तक न कि खराब से खराब जमीन, जिस पर कोई आन्तरिक
लगान नही मिल सकता, के काश्तकार को भी मुनाफा मिले
और वह जमींदार को लगान द सके।
अब हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि खराब से खराब जामीन

पर मा लगान देना पड़ता है। लेकिन इस लगान का कारण
मिन्न भूमियों के विभिन्न उपजालपन के हेतु भम की उत्पादन शक्ति
को मिलता नहीं है बल्कि भूमि का सीमित होना और यह व्यक्ति-
गत समति होना ही है। जमीन का व्यक्तिगत सम्पत्ति हो और
सीमित होने के कारण जो लगान दिया जाता है उमको माक्स
ने निरपद लगान का साक्ष्य दिया है।
जरायती पंजीक अान्तरिक संगठन
विशुद लगान का
की कमीस इस लगान का विशेष सम्बध
है। उद्योग धन्दों की अपेक्षा रातो में
मशानो का प्रयोग कम होता है, कारीगरी कम करनी पड़ती है,
कच्चा माल कम लगता है और यह कम दाम का होता है। इस
कारण, उद्योग पन्नों की अपेक्षा खेता में स्थिर पूजो
का परिमाण अधिक होता है और इसमें लाम का दर यात्
अधिक होता है। कृषि में मजदूर जो
थि पू+अपू
अधिक अतिरित अर्ध्य का उत्पादन करते हैं वही निरपक्ष लगान
का उद्रम है।
६म देख चुक है कि उद्योग के क्षेत्र में औसत पंजी के
मुकाबले उस पैंजी पर मुनाफा का दर अधिक नहीं हो सकता
जिसका अान्तरिक सुगठन कम है। क्या ज़गयत का अधिक
मुनाफा जीवादी उत्पादन र कुल शाखाओं में पूजी के
परिमाय के अनुपात में टने के लिये मुनापा वे कुल रक्रम में
सम्मिलित हो जाता है?
उद्योग धदा 'से जरायत म पूजी के प्रयोगतंत्र का
परिवतन इतना सहज नहीं क्योकि उमीन का परिमाण सीमित
है और कुल ज़मीन कामींदार श्रेणाया व्यक्तिगत सम्पत्ति है । जरायत
दे अतिरिक्त मुनाफा को घटाने के लिये (उसमें हिस्सेदारों की

तादाद यदाकर) पूँजो का मुक्त प्रवाह मम्भर पर न हाने ५
कारण जमींदार इस अतिरिक्त मुनाफा का निरपेक्ष लगान र
रूप में हड़प लेता है।
खराब से खराब जमीन पर निरपत लगान वसूल किया
माता है । लेकिन अच्छी जमीन पर भी था तरिक लगान के
साथ हा साथ निरपेक्ष लगान भी वसूल किया जाता है।
अच्छी कमीन पर प्रातरिक लगान वसूल होने के कारण
इसका मालिक अपने पैदावार का उस दाम से कम पर नहीं
वेचता जिस पर खराब जमीन का पैदावार विकता है। हर
जामान का पैदावार खराय से सराब जामीन फे पैदावार के दाम
विक्ता है और यह दाम ही बाजारभाव है जिसम निरपेक्ष
लगान सम्मिलित है। इससे यह स्पष्ट है कि अन्धी जमीन
पर अान्तरिक लगान फे आप निरपेक्ष लगान भी वमूल
होता है।
येतों के अलावा भी और जमीन है जिन पर उद्याग
ध, व्यापारिक केन्द्र और इमारत थादि अवस्थित है और
जिनके गर्म में सोना, कोयला, तेल आदि खनिज पदार्थ है।
इन जमीनों के मानिको को जरायती जमीन के मालिका क
मुक्काबले कहीं अधिक लगान मिलता है।
लगान और जरायती
पूर्वोक्त माग से यह सिद्ध है कि
जरायती पैदावार के मूल्य * तान
भाग है-सबस खराब कामी पर
पैदावार का लागत दाम, औसत मुनाफा और निरपेत लगान ।
मांग और पूर्ति के प्रभाव में ह हो ताना के बाद के इद गिर्द
जरायती पैदावार के दाम चढते गिरते रहते हैं।
लेनिन के शब्दों में "जमीन का व्यक्तिगत सम्पत्ति हाना
निरपेक्ष लगान का कारण है। इसमें एकाधिकार का एक अग
पैदावार के मूल्य

है-एकाधिकार मूल्य का यह जनक है। भूमि सम्मचि का वैयस्ति
करण खुनी प्रतियागिता में बाधक होता है, और जरायती तथा
गैर जरायती पैदावारननित मुनाफा का एक सम्मिलित श्रीमत
मुनाफा का रूप प्रण करने सकता है । इसके अलावा
उद्योग के मुकाबले जरायत का कला कौशल नीचे दर्जे का है
और पूंजी क सगठन में स्थिर पूजी के मुक्कायले अस्थिर पूँजी
का माग अधिक है। इस कारण जरायती पैदावार का मूल्य
सब पैदावारों के पोसत मूल्य से अधिक है। भूमि सम्पत्ति का
चैयक्तिकरण जरायती केन्द्रों के मुनामों की घरारी को राकत
हुए इस बात की सम्भावना की सष्टि करता है कि चन
क्वल अधिक से अधिक उत्पादन मूल्य पर यल्कि वस्तु विशेष
के निधी अध्यं पर बि।"
यदि पूंजीवाद के अस्तित्व काल में हो भूमि समति का
वैयक्तिकरण मिटा दिया जाय तो निरपेद लगान का अन्तधान
हा नायगा और जरायती पैदावार का उत्पादन मूल्य हागा लागत
दाम और औसत मुनाफा का जाद । निरपक्ष लगान ही के
कारण परायती पैदावार का दाम अधिक चढा होता है।
अान्तरिक लगान का जरायती पैदावार के मूल्य पर काइ
प्रभाव नहीं पड़ता। क्योंकि
(१) सबसे खराब जमीन पर पैदावार के लागत दाम म
हो मूल्य का निराकरण होता है, और
(२) इस जमीन से प्रान्तरिक लगान वसूल नहीं होता।
भूमि का मूल्य
पूजावादी वातार में जमान
बहुत जल्दी विक जाता है क्योंकि-
(') लगानक रूप में इससे एक बैंधी ग्रामदनी मिलती है।
(२) उद्योग धन्दा व्यागर अादि क लिय मा मका
जरूरत है।

(३) जरायती उत्पादन के लिये इसकी आवश्यकता तया (४) भूमि सम्पत्ति स पहल स अधिकार प्राप्त होते है जैसे बाट अादि । इस मूल्य का निणय फैस किया जाता है। हमके उत्पादन में काई श्रम का व्यय नहीं होता । यह प्रकृति का देन है । यह और वस्तुयों से भिन्न है और अयं के बिना पर इसके मूल्य फा निर्णय नहीं हो सकता । भूमि में जमींदार का सबसे बड़ा स्वार्थ यह है कि सके थधिकार से चिना श्रम के उसका लगान मिलता जाता है । जमीन बेचते समय वह इसका मूल्य इस बुनियाद पर लगायेगा कि इससे लगान के रूप में उसको कितनी आमदनी हाता है ? मान लानिये कि लगान सालाना ५००) रुपया है। यह यह उम्मीद रखता है कि जमीन की बिक्री पाद उसका यह श्रामदनी कायम रहेगी। यह सम्भय है कि जमीन बेचने व माद यह विक्री के रूपये यक में डाल दे और इस पर उसका सालाना सूट मिल ५०७) २० । यदि सूद का दर ५ पीमदी हो तो ५००) रु. मालाना सूद के लिये पूंजी चाहिये १०,०००) 50 की। रम प्रकार जमीन का मूल्य लगान की परिणत पूजो है अर्थात् लगान धन पूजा के रूप में परिवर्तित धा नाता है जिससे सूद के रूप म अतिरिक्त श्रध्य का उत्पादन होता रहता ह । यह क्रोमन रिसा वास्तविक अर्घ्य के बदले नहा दी जाती क्योंकि जमीन का निजस्व काई अर्घ्य नहीं है लेकिन इस लियेशि भविष्य में इस प्राधार पर ग्रामदनी का एक जरिया हो जाता है। जमान का मूल्य निर्भर करता है दो बातों पर-एक तो बक रुपया मा करनेवाला को किस दर से सूद देता है, और दूसरी यह मि उस जमीन पर लगान कितना मिलता है । यदि जमीन का मूल्य है तो यह स्पष्ट है अपीसदा सूद का दर- १०

लगाना अथवाx -ल या नौशल x १० जहाँ
स
''हैद का दरोल है नगान लगान जितना अधिक
होगा और सूद का जितना कम होगा जमीन का मूल्य उतना
अधिक गा| इसका विपरीत भी उतना ही सही हैं।
पूंजीवाद में लगाना स्थान
जावाद के विकास के
साय लगान में वृद्धि का विकास के साथ उद्योग धन्दा में
यहुत महत्वपूर्ण है। पूंजीवाद के
मुकाव
मजदूरों की तादाद बढ़ जाता है शोर
जगता काचार का बाज़ार कर जाता है। कमान जन तक
तक गित सम्पत्ति रहती है जरायता पैदावार की बदती हुई
मांग से उनका दाम बरसता है जिस कारण हर प म जमान
के लगान का दर वर जाता है। श्रान्तरिक लगान इसलिये द
जाता है जिजा जमान पहले जाता कोई नहीं जाती थी बाद अब
जाती बाई जान लगती है। बरती हुई पूँजीवाद का जगयता
पैदावार का मांग धिक होने के कारण इनका दाम चर जाता
है और इस कारण विश्व के तिजारत में दूर दूर क देश और
जिन दाखिल हो जाते है और उनके पैदावार का दूर यात्रा में
मेनमा मलामदायक होता है।
पूँजी र प्रयोग से मिन मित्र नमीनों की उत्पादन शक्ति में
जो अधिक या कम दृद्धि होता है उससे भी श्रान्तरिक लगान
की सृष्टि की है । कृषि कला को उमति र साय इन उनादन
शक्तियों का अन्तर भार बढ जाता है। जरायती पैदावार को
मांग में वृद्धि, उनका बढता हुना मूल्य और भूमि का मित
परिमाण के हेतु भूमि की उत्पादन शति को खाने में लिये
भिकाधिक पका के प्रयोग की आवश्यकता हो जाती है ।
जी तक निरपेक्ष लगान का सम्पप है इस उद्गम हैं
A

का अर्थ भू सम्पति की वैयत्तिक्ता तथा ज़रायती पती फे अान्तरिक सग ठन का कम हाना । थौद्योगिक कला न केवल कृषिक्ला क साथ कदम मिला कर चलती है बल्कि उससे कहीं आगे बढ जाता है और इस कारण उद्योग भोर कपि की जो के श्रातारक सगठना का अन्तर घटता नहीं बल्कि बढता जाता है जिसके परिणामस्वरूप निरपेक्ष लगान का निर तर वृद्धि होती जाती है। इस प्रकार पूँजोराद के विकास के साथ हर रूप में लगान की चूद्धि होती रहती है और इसका पल यह होता है कि पंजावादी समाज म ज़मीदार श्रेणी ५ पावना का हिस्सा या जाता है और सारे समाज के ऊपर इस श्रेणी का भार बढता जाता है। समान के लिये लगान पहले समाज के उस हिस्स को लीजिये जा पंजीसदी काश्तकार हैं। उसको अतिरिक्त अघ्य का एक हिस्सा जाशर को दे देना पड़ता है। यदि वह अपने को इससे मुक्त करना चाहे जमीन खरीदकर तो उसको इसमें बहुत पूँजी लगानी पडेगी जिराका प्रयोग जरायती पैदावार के सिलसिले में नहीं होगा और कृषि की उत्पादन प्रथा से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। जमान से कृषिकाय करके लाम उठाने के लिये अलग जी की जरूरत है। इस प्रकार पूँजीवादी उत्पादन प्रथा के लिये लगान दोहरा शनु है, एक तो इसलिय कि पूंजीपतियों में बांटने के लिये कुल अतिरिक्त अर्घ्य का परिमाण घट जाता है और दूसरा इसलिये कि उस पँजी का हास हो जाता है जिसका प्रयोग जरा यती पदावार के लिये हो सकता था और जिससे अतिरिक्त अर्य की सष्टि होती। इससे भी अधि: भूमि का वैयक्तिक सम्पत्ति हाना कृषि की उत्पादन शक्ति के विकास में बाधक है। कैमे ? पंजीपति काश्त । १२

कार का स्वार्थ इतना ही है कि कृषि की उन्नति इस प्रकार से
करे और 4जी इस प्रकार से लगाये कि उसी को इसका लाभ
मिल सके नहां तो उसके रेदन का समय बीत जायगा और उसने
जा कुछ उन्नति की है उसका लाम उसको नहीं बल्कि ज़मींदार
को होगा जो लगान भी बढा सकता है। इसलिये भूमि रे व्यक्ति
गत सम्पत्ति होने के कारण उसकी उन्नति में बाधा पडता है।
फिर, अधिक लाम का लाभ ही पूँजीपति को लगातार उन्नति
माग पर ले जाता है लेकिन जरायत म सारा अधिक लाभ
जमींदार को दे देना पडता है इसलिये उसकी उन्नति की प्रवृत्ति
हा नहीं रह जाती।
भूमि सम्पत्ति की वैयक्तिक्ता स मजदूर्ग को पौर मी हानि
होती है । निरपेक्ष लगान की लगातार वृद्धि से जरायती
पैदावारा के मूल्य में वृद्धि होती है । मजदूर श्रेणी के
ऊपर यह काहा जैसा पड़ता है। मजदूरों का जीरन धारण की
मामग्रियों के मूल्य में वृद्धि होने के कारण श्रम शक्ति के अध्य
का वृद्धि होनी चाहिये जिसके फलस्वरूप मजदूरी बदनी चाहिये।
लकिन श्रम शक्ति सब समय अपने अध्य पर नहीं दिक्ता।
यह अवश्य है कि मजदूर अपनी सम्मिनित शक्ति और सपष
के द्वारा मजदूरी में कुछ वृद्धि करया लता है लेकिन साधारण
तौर पर चीजों का दाम जितना बढता हे मजदूरी उस अनुपात
म नहीं बढती और इस दशा में जमींदार का लगान अतिरिक्त
अध्य से ही नहीं बल्कि मजदूरी क अश से भी दिया
जाता है।
छोटे काश्तकारों का शोषण इसस भी अधिक होता है
जा लगान की सीमा पार कर जाता है । छोटा काश्तकार तो
मुनाफा मी नहीं चाहता । वह तो अपनी मजदूरी का मी एक
अश देकर लगान पर जमीन लेने को तैयार है। इस कारणा

लगान के रूप में काश्तकारों का प्रावश्यक सामग्रियो ।
एक अंशमी जमोदार उनमे ले लेता है।
भूमि का राष्ट्रीयकरण
মুদি বা লকিন বন্তি বানা
पंजौरवियों प लिये नुकसानदेह है
और लगान
और इसलिये वे ममि के राष्ट्रीयकरण
के मिन्न मन मसरिदे पेश करत है। नवा सार यही है
भूमि-सम्पति राष्ट्र के हाय होनी चाहिये । पीवादी समाज में
भूमि का राष्ट्रीयकरण अान्तरिक लगान का अन्त नहीं करता
है केवल इसे जीवादी राष्ट्र ५ हाय सौंपता है और राष्ट्र ठीक
जमीदार की तरह काश्तकार 4जापति और किसानों को जमीन
लगान पर देता है। इसका कारण यह है कि थान्तरिक लगान
की बुनियाद है पूँजीवादी सम्मा का अस्तित्व और मिन
भूमियों में भ्रम को उत्पादन शक्तियों में अन्तर, जो जमीन का
उपजाऊपन और उसकी स्थित धादि पर निर्भर है । ये चीज
प्राकृतिक कारणों से होती है और राष्ट्रीयकरण में इनको मेटा
नहीं जा सकता । व्यक्तिगत सम्पत्ति के दिमाश से कृषि का पंजा
पादी विकास सुगम हो जाता है। पातु अच्छीजामान का परिमाण
सीमित होने के कारण सबम पराय जमीन पर पैदावार के
लागत के बिना दाम पर जगयती पैदावार के मूल्य का
निणय होता है और अच्छी जमीन पर औसत से अधिक मुनाफा
जाता है।
लेकिन निरपेत लगान का जिसकी उत्पत्ति भूम के व्यक्ति
गत सम्पत्ति होने के और 4जी के श्रान्तरिक संगठन की कमी
के कारण होती है हम दूसरा होता है । वर्धित अतिरिक्त अध्य
को जमीदार स्वयं हड़प लेता है और यह पंजीपतिवर्ग में
घर नहीं पाता । भूमि का राष्ट्रीयकरण जरायती जी के श्रान्त
रेव संगठन को बढ़ाता है और मुनाफा को सारे 4जोरति वर्ग
१४

में बाँट देता है। भूमि क राष्ट्रीयकरण से यानी जमान में व्यक्ति
गत सम्पत्ति के विनाश से पंजीवाद का और मी विकास हाता
है क्योंकि
(१)जा ना जमीन खरीदने में लग जाता है उसका
उसादन की वृद्धि के लिये लगाया जा सकता है।
(२) नि का नब निरपेक्ष लगान नहीं देना
पड़ता है।
(३) जरायती वैशासार का मूल्य घट जाता है, और
इस प्रकार मजर भूस्वामियों को कर देने से मुक्त हो
जाता है।
(४) और इसस मस्वामियों द्वारा किसानों का पैजावाद के
पूर्व युग क शापण का अन्त होता है।
यद्यपि पूजीपतियों का भूमि के राष्ट्रीयकरण म लाम है
तथापि इसके लिये वे चेष्टित नहीं है क्योंनि बहुतेरे पूंजीपति
ने जमान खरीद लिया है और वे डरते हैं कि भूमि में व्यक्ति
गत सम्पत्ति 7 निाश से व्यक्तिगत सम्पत्ति की सारा
भुनियाद ही हिल जायगी और पूंजीवाद का मात (मित्ति)
गिर जायगी।
-

शोषण का पात्र नहीं बन सकता । पूँजीपति को शोषण के लिये
ठीक ऐसा ही मज़दूर चाहिए जिसके पास न जमीन हैन
उत्पादन के साधन और जो अपनी श्रम शक्ति खुले बाजार में
बेचे। तीसरा अन्तर यह है कि साम तशादी में किसान का व्यक्ति
गत रूप से सामन्त प्रभु के अधील दोना ज़रूरी है, नहीं तो वह
यदि अपनी ज़मीन का मालिक हो तो वह बिना परवस के अपने
प्रभु के लिये काम नहीं करेगा । इस अर्थनैतिक प्रथा से गैर
नथनैतिक दवाव की सृष्टि होती है-जैसे गुलामो, कानूनी
अधीनता, तथा असमता इत्यादि और दूसरी ओर, पूँजीवाद
(श्रादश) खुले बाजार में पूँजीपति और मजदूर के बीच
सौदा करने की पूरी श्राजादी देता है।'
गुलामा से प्राप्त सामन्त प्रभु की आमदनी को पूँजीवादी
श्रथ में लगान नहीं कहा जा सकता।
पूँजीवादी लगान वह अतिरिक्त वर्ण्य है जो काश्तकार
पूजीपति को औसत मुनाफा के अतिरिक्त मिलता है और
जिसको उसे दे देना पड़ता है जमींदार को, इस अधिकार के
लिये कि उसकी जमीन का यह इस्तेमाल कर सके । इसमें तीन
श्रेणियों का श्रापसी सम्बध है-(१) ज़मींदार, (२)
पूँजीपति काश्तकार तथा (३) मजदूर ।
पृ जीवाद पूर्व लगान पूँजीवादी लगान की तरह कृषि
मजदूर के शापण से प्राप्त ग्रामदनी का एक अश मान नहीं है
बल्कि पूरी हो यामदनी है । लगान के रूप में सामन्तप्रभु दास
के अतिरिक्त श्रम को पूरा पूरा हड़प लेता है। इसका सम्बध
दो श्रेणियों के अस्तित्व से है-(१) जमींदार वग जो
काश्तकार के अतिरिक्त पैदावार को हड़पता है और (२)
क्सिान, निनके निज के मकानात और उत्पादन के साधन हैं
जिसके कारण शोषण का रूप श्रम शक्ति का बेरोक टोक

खरीद बिका नही हो सकता बल्कि इसका रूप और खुला होता
है। इस क्षेत्र में ग्रावश्यक और अतिरिक्त श्रम का रिभेद बहुत
स्पष्ट है परतु पूंजीवाद में उत्पादन सम्बध गुप्त रहता है।
पूंजीवाद के पूर्व युग क लगान के विकास का मार्स ने
तान स्तर बताया है-लगान श्रम के रूप में, जिन्स के रूप
में तथा रुपयों मा जब लगान जिन्स में न देकर रूपयों में दिया
जाता है तो इसका अथ यह है कि न केवल अतिरिक्त
पैदावार का उत्पादन होता है बल्कि बाजार में इसकी बिकी होती
है। यह तभी सम्मर हे जर विनिमय-सम्मघ का विकास हो।
रूपयों में लगान देना वह जाहिर करता है कि पूजामाद के
पूर्व युग के लगान की अन्त्येष्टि किया हो रही है। इसके उत्तरी
तर विकास से पूँ नीवादा कृषि और पूँजीवादी लगान की सृष्टि
हातो है अपवा छाटे पेमाने पर किसानी हाती है जो सामन्तवादी
शृखला से मुक्त होती है और जिसकी बुनियाद होती है जमीन में
াির শবি।
छोटे पैमाने की कि
पूजावाद छोटे किसानों को तबाद
सानीचौर आन्तरिक
कर देता है। यद्यपि इसमें मे पाडे
धनी किसान मी हो जाते हैं जो बाद
में मध्यम श्रेणी के या रहे पूँजीपति
बनाते हैं तथापि अधिकांश सहारा दल में परिणत हा जाता
है। लेकिन उद्योग की तरह यह ध्वस लोना बहुत दूर तक नहीं
जाती और पूंजीवादी मुल्कों में श्रा मी छाटो क्सिानी महत्व
लगान
छाती किसानी सामन्तशाहो से मिन है क्योकि किसान
जमान का तथा उत्पादन के साधनों का मालिक होता है। क्या
इन किसानों को शान्तरिक लगान मिल सकता है। जहाँ तक
मिन भूमिपों पे उपजाऊपन या उनकी स्थिति जमीन के प्राक

तिक गुणों के ऊपर निमर है उस छोटे किसान का बिमकी जमौन रखेज़ होगी या किसको जमीन की स्थिति श्रन्छी होगी, अतिरिक्त पैदावार प्राप्त होगा। लेकिन पूँजीवादी काश्तकार और घाटे फिान में श्रन्तर यह है कि यह अपने परिवारसहित स्वयं मेहनत परता है और जमीन उपमाऊपन के कारण उत्पन अतिरिच पैदावार उसका निज का होता है। इस क्षेत्र में कोई जमीदार ही होता जिसको यह लगान दे और न तो कोई मज़दूर रसता है जिसष द्वारा उत्पन्न अतिरित्त श्रष्य का वह जमींदार के साझे में बांट लेता हो। इसलिये पूजीवादी श्रावेष्ठन के बिना छोटी किसानी में प्रान्त रिक लगान की सष्टि नहीं हो सकती। अान्तरिक लगान के सिलसिले में यह देखना चाहिये कि पू जीवादी लगान का छोटे किसान पर क्या असर पड़ता है। माक्स के शब्दों में- "पू जीवादी प्रतियोगिता के बिना पर अर्घ्य को नीन हिस्सो में चौटा जाता है-मजदूरी, लगान, व मुनाफा। इस तरीके का प्रयोग उन क्षेत्रों में भी किया जाता है जहाँ अर्घ्य को इस प्रकार पाँटने को अवस्थाएँ मौजूद नहीं है। दूसरे शब्दो में, तुननात्मक रूप से हर क्षेत्र में इस प्रकार के विमाग किये जाते हैं। यदि कोई छोटा किसा। जिसके लिये श्रध्य के ये तीनों विमाग लागू हैं अपने हरिये काम करता है तथा अपना दी पैदावार बेचता है, वह पहले स्थान में अपने को पूँजीपति की नाई नियुक्त करता है एक मजदूर को भांति और अपने ज़मीदार की तरह निज को नियुक्त करता है एक किसान की मांति । मजदूर की हैसियत में वह अपने को मजदूरी देता है और पूँजीपति की हैसियत में मुनाफा तया जमींदार की हैसियत में लगान । पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली को मानकर और इस प्रणाली में प्रचलित १००

अवस्यायों में यह धारणा सहा है-इस अर्थ में कि उसका
मुनाफा अपने श्रम के कारण नहीं मिलता पल्कि इसलिये कि
यह उत्सादन के साधन का मानिक है। अपना अतिरिक्त श्रम
उसका ही प्राप्त होता है। इस प्राति का परिमाण इव पर निमः
नहीं है कि इस अम द्वारा उसन्न पैदावार का परिमाय कितना
है बल्कि इस पर कि औसत मुनाफा का दर क्या है । इसी
प्रकार अतिरित्र अध्य मे अधिक माग तिसरा प्रोसत मुनाफा
से सम्पप है उसको इसलिये मिलता है कि यह जमान का
मालिक है । चूकि इस प्रकार पूजावादी उत्पादन प्रणालीन
हाते हुए मा अर्य का इस प्रकार दिमाग किया जा सकता है,
यह भ्रम हा जाता है मिति में एक प्रकार को उत्पादन
प्रणाली है और वह है पूँजाबादा उत्पादन प्रपालो।
इस प्रकार एक सीमित अर्थ में और कुछ शती र साथ
छाग किमाना में श्रान्तरिक लगान की उत्पचि होती है। यह
सम्मर सालिय है कि घाटा किछान अपना जमान का मालिक
है और उसके उत्पान का साधन एक प्रकार का पूजी है और
उसक द्वारा उत्पन पैदावार को क्रिी पूंजीवाली बाजार में
दाता है।
निरपेद वगान और
एक अय में पूँजीवादी यावेष्ठन
छोट किमान
में भी निरपेक्ष लगान नहीं होता
यद्यपि प्रान्तरिक लगान हाना है।
माक्स क शब्दों में छोटे किसान क शोषण की मात्रा, यदि वह
छोटा पंजीपति है, इस बात से सीमित नहीं होती कि उसको औसत
मुनाफा मिलना चाहिए, और न इस बात से कि उसको लगान
का मम मिलनी चाहिये, यदि यद जमोदार है। छाटे पूजीपति
का हैसियत से यह तय तक सन्तोष करेगा जब तक सारा खर्च
निकालकर उसका मजदूरों की रकम मिलती रहे । जब तक उसका

-
इस तरह की मजदूरी मिलती रहे यहाँ तक कि जब तक उसको
प्राप्न मजदूरी से फेवल मात्र किसी प्रकार से जीया धारण होता
हो तब तक यह जमीन जोतता गोता रहेगा। अधिक से अधिक
वह अपने पैदावार को पेचकर अपनी श्रम शक्ति का पूरा
श्रध्य चाहता है इस बात पर यह उतारू नहीं है कि
उत्पन वस्तु का पूरा अध्य या पैदावार का मूल्य उसको मिले।
इसके माने यह नहीं है कि छोटे किसान द्वारा उत्पन्न
पेदावार ग्राहको यो सस्ता मिल जायगा। होता यह है कि वीच के
लोग-धनी किसान और व्यापारी श्रादि-उनके पैदावार को
खरीद लेता है और पाजार भाव पर पेचता है। छोटे
किसान के अतिरिक्त भा का एक हिस्सा टैक्स श्रादि में चला
जाता है।
मांग और पत्ति का नियम यदि छोटे मिशन के लिये
अनुकूल है तो उसके अतिरित पैदावार का श्रश निम्नतम
सीमा से कुछ उठ सकता है और श्रीसत मुनाफा तक पहुँच
सकता है यहाँ तक कि निरपेक्ष लगान की सीमा तक पहुँच
पकता है। परन्तु पूँजीवादी अवस्था में हजारों करोड़ों किसानों
के लिये यही सत्य है कि उसके अतिरिक्त पैदावार का प्रश
उसकी मजदूरी से थधिक न होगा।
१०२

पारहवाँ अध्याय
पूँजी का एकत्रीकरण और पूँजीवादी
सम्बन्धो का पुनरुत्पादन
हमें पहिले निम्नलिखित प्रश्नों
पूजी का प्रायमिक
एकत्रीकरण
का उत्तर देना पड़ेगा।
(१) पूजावाद-पूर्व सरी
से पूंजीवादी प्रया की उत्पत्ति पैसे हुइ !
(२) पूँजीगदी प्रया का विकास किस पार है। पहला
परन ले लीनिये।
सामन्तवादी समान की टूटती हुई मीठ पर और साधारण
वस्तु उत्पादन प्रपा से पूँजीवाद का टलचि हाता है। एक नये
प्रकार के सम्बयों के विकास के लिये धारश्यक अरस्थाग्रा का
सृष्टि उस युग में होती है जिसको पूंजी के एकवाकरण का
प्रारम्म युग कह सकते हैं । एक शोर तो इससे मुद्यामर पूजा-

पतियों के हाय उत्पादन के साधनों का फेद्रीकरण होता है और
दूसरी पोर दासों को मुक्ति मिल जाती है और कारीगर अपने
उत्पादन क साधनों से वञ्चित हो जाते है और इस प्रकार दोनों
सवहारा के दल में सम्मिलित हो जाते हैं।
मामन्तवाद या जागीर प्रथा का अवसान एक दुखद
प्रक्रिया थी। जागीर प्रथा मुरय तौर पर एक स्वावलम्बित
(श्राम निमर) प्रथा थी । सामन्तप्रभु अपने दलपल सहित
सामतराष्ट्र
में उत्पन यस्तुओं पर जीरन धारण करता था।
विशिमय का असर श्रवश्यक वस्तुओं पर न था फेल पिलासिता
की सामग्रियां पर था निनकी मांग होती थी साम प्रभुयों को।
जय तक नागारदारी प्रथा के श्रदर विनिमय सम्मघ साधारण
रूप से प्रचरित नहीं हो गया था और जब तक उत्पादन का
उद्देश्य विनिमय अघ्य नक्ष वलि व्यवहार अर्घ्य था तप तक
किसानों का शोषण एक सकीर्ण सीमा के अन्दर था। माक्स
न कहा है कि जर फभी समाज की पहला अवस्था में
प्रतिरित श्रध्य की सृष्टि होती है तो श्रम असह्य होता है।
अतिरिक्त श्रम का रूप हाता है वह श्रम जो मिक के शरीर
काक्षीण कर देता है। मनुष्य और मनुष्य के चाच नावा होता है
स्वार्य का और नाद देना पावना का । श्रम का लगान और
चाज वा का लगान दोनों श्रवस्थानों को पार कर रुपये
पैसे में लगान दिया जाने लगता है । सामतप्रभुत्रों के लिये
नौकर चारों का मुण्ड और पड़ी पडी सेना रखना बहुत
महँगा पडता है और अनावश्यक भी हो जाता है और इसलिये
इसका श्रत होना ही पड़ता है।
दूसरी ओर घरेलू उद्याग धधों की अवनति होने लगती है।
घनी कारीगरों ने काफी तादाद में सहकारी रक्खे । उनके बीच
विरोध बता । धनी कारीगर श्रेणी रूप में संगठित हो गये।
१०४

पाजार को वृद्धि और विनिमय-सम्बध के विकास के साथ
घरेलू उद्योग पथों में तिजारती पूंजो का प्रवेश होता है और
सहकारीवर्ग धनी कारीगरों का अधीनस्म हो जाता है। व्यापा
रियों के लिये विनिमय एम्बधों को विस्तार करने की श्रावश्यकता
होती है, और बाजारों की परिधि इतना बढ़ जाता है कि चाज
मनानेवाले और खरीदनेवाले के बीच सीधा सम्बघ कायम
नहीं रह सकता । बढती हुई यानार की मांग को घरलू उद्योग
घधा पूरा नहीं कर सकती। घरेलू उद्योग धधों म व्यापारियों
का दखल अरता जाता है। कारीगरों का शोषण भी बढता है,
बहुतेरे बरबाद हो जाते हैं और सवहारात्रों की श्रेणीमुक्त हो
जाते है।
पूजी के एक प्राकरण के प्रारम्भ 4 मूग में है उत्पादक का
उत्पादन सम्बन्धों से पिच्छेद।
इस विकास की क्रिया से अम शक्ति नामा घस्तुओं की
उत्पत्ति होती है। इसी निया के कारण धीरे धीरे बडे श्रौद्या
गिक पूंजीपति पेदा होते हैं । उत्पादन के साधन दि हुए
कारीगरों / हाथ से छिनकर व्यापारिक पूँजीपतियों के हाथ
इकहा होने लगते हैं। कारीगरों के शोषण से पूँजीत को
प्रचूर मुनाफा मिलता है । इसम जोहिये उपनिवेशों के साथ
व्यापार जो करीब करीब उपनिवेश का लूट ही होता है और
दासों का व्यापार इत्यादि । उत्पादक और भागा दान के शोषण
में व्यापारिक पूँजीपति के हाय रहुत सा धन इकहा हो
जाता है और इस प्रकार पड़े पैमाने पर उत्पादन की बुनियाद
पड़ जाती है।
घर दूसर प्रश्न को ले लीजिये-
पुनरूपादन
पूंजीरादी उत्पादन को किस
प्रकारता और यह किस ओर जा रहा है।

तमान वे पैदावार जिनसे मनुष्य जाति की विभिन ज़रियात
पूरी होती हैं मनुष्य श्रम की ही सृष्टि हैं।
चूंकि उसन वस्तु हमारी जरूरियात को थोड़े ही समय के
लिये पूरा कर सकता है जिसके याद फिर दूसरे यस्तुओं को
जरूरत होती है इसलिये समाज के लिये जिन वस्तुओं को
जरूरत है उनकी पृत्ति के लिये श्रावश्यफ शत है उत्सादन किया
का बारम्बार दोहराना तथा नये सिरे से काम चाल रसना।
लेकिन उत्पादन मिया मनुध्यक्त उत्पादन के यो दारा
होता है । इसलिये यह स्पष्ट है कि समाज की जरूरियात को
पूरा करने के लिये न केवल उन वस्तुओं का जरूरत होती है
जिनसे ये जरूरियात पूरी हो सकती है बल्पि सामाजिक श्रम
का एक माग इसलिये नियाजित करना पड़ता है कि नियमित
रूप से उन श्रीजारों को भी पैदा किया जा सके, जिनस इन
वस्तुओं का उत्पादन होता है । उत्पादन निया फ दोहराने और
नये सिरे से चालू करने का ही नाम पूँजीवादी समान में
पुनरुत्पादन है।
यह पुनरुत्पादन होता है सीधा, पत्ता हुआ,
घटता हुआ।
सीधा पुनरुत्पादन उस क्षेत्र में होता है जहाँ हर साल
पुनरुत्पादन की मिया उसी सतह पर रहती है ।यानिक उन्नति
जहाँ कम है वहीं ऐसा होता है , उदाहरण के लिये श्रारम्मकाल
के देहाती पञ्चायतों और घरेलू उद्योग धधों श्रादि में । पिछठे हुए
श्राधिक संगठन का रूप ही है कि जहाँ अार्थिक उन्नति न होती
हो, उत्पादन की निया में वही पुरानी परम्परा चली पाती हो,
जरा हर नवीनता का पिरोध होता हो और जहां रूनियाद की
प्रधानता हो, सीधे पुनरुत्पादन में उन्नति सिकास की गुजाइश
नहीं है।
या

बढता हुधा पुनरुत्सादन वहां होता है जहां पैदावार फटता हुआ पैमाने पर होता है । यह उन आर्थिक संगठनों का रूप है बहाँ उत्पादक शरियों का तेजी से विकास हो रहा हो। उति और विकास का यही रूप है। घटता हुश्शा पुनरुत्पादन वहाँ होता है जहाँ उत्पादन को किया इस प्रकार अपने को दुहराती है कि पैदावार घरते हुए पैमाने पर होता है। इस प्रक्रिया के जारी रहने से उस समाज की अवनति अवश्यम्भावी है जैसे यूनान, रोम आदि में दुधा । उत्पादन किया क सिलसिल में मनुष्या के बीच कुछ उत्पादन सम्बन्धों की मी सृष्टि होता है । इसलिये वस्तुओं के साय इन सम्पर्धा का मी पुनरुत्पादन होता रहता है। उत्पादन की क्रिया के सिलसिले में मनुष्यों के बीच जा सम्बन्ध स्थापित होते हैं उनसे पैदावार का बटवारा इस प्रकार होता है कि भविष्य में भी शासक्वर्ग की स्वापरया होती है और उनका स्थान बतौर शासक के सुरक्षित रहता है या शोषित वर्ग अपने अधीनस्य स्थान पर ही कायम रहता है। किसी विशिष्ट समाज में उत्सादन सम्बध के पुनरुत्पादन का यही मर्म है और जब तक कोई नया समाज प्रथा इसकी जगह नहीं लेती यही व्यवस्था चलती रहती है। नवनिर्मित समाज में मी पुनरुत्पादन प्रिया के साप उत्पादन सम्बधा का भी पुनरुत्पादन होता रहता है। सीधा पूजीवादी पूँजीवादी पुनस्त्यादन भी सीधा दता हुधा या घटता हुश्रा होता है। पुनस्पादन पूँजीवादी उत्पादन विशिष्टताएँ है (१) उत्पादन साधन पंजीपतियों की व्यक्तिगत सम्पत्ति होती है। को कुछ (२) कानून की रूह से मज़दूर श्राजाद होता है लेकिन उत्पादन के साधनों का मालिक न होने के कारण वह अपनी श्रम- शति की पंजीपति के हाथ चेचो के लिये मजबूर हाता है। ( ३ ) पोपति द्वारा मजदूर का शोषण अतिरिक्त श्रध्य का रूप ग्रहण करता है जो कि पूँजीवादी उत्पादन का उद्देश्य है। इन तमाम पूँजीवादी सम्बधों का जिनकी उत्पत्ति पूँजीवाद- पूर्व और साम त तथा घरेलू उद्योग पर्धा न युग से होता है, पुनपत्पादन होना प्रावश्यक है। • जहाँ तक एक मजदूर का सम्र घ है, जो कि उत्पादन के साधनों स यश्चित है, एक श्रम-शक्ति के पेचनेवाले की हैसियत से, उत्पादन किया फ याद उसी स्थिति का पुनरुत्पादन होता रहता है, क्योकि उसकी मजदूरी इतनी ही होती है कि श्रम शक्ति नामक वस्तु को वह विकी के उपयुक्त बना रस सकता है यानी वह श्रम के उपयोगी बना रहता है और अपने परिवार का भरण पोषण कर सकता है, इसस अधिक नहीं । यदि कुछ अरसे तक उसको श्रम शचि के अर्घ्य से अधिक श्रध्य मिलता हो तो उसके पास काफी धन पहा हो जायगा कि वह पूँजी क अधीनता पाश का छिन्न कर हालेगा । लेकिन साधारण तौर पर ऐसा हाता नहीं है। उत्पादन क्रिया में पूंजीपति के अधिकार की जगह का पुनरुत्पादन तभी सम्भव है जबकि उसके पास पुनरुत्पादन प्रक्रिया के लिये, श्रम शक्ति की खरीद के लिये जी हो, जिस श्रम शचि और उत्पादन के साधनों के सयोग से अतिरिक्त अर्य की सृष्टि होती है। सीधे पुनरुत्पादन में यह किस प्रकार होता है ? वस्तुओं की बिक्री के द्वारा पूँजीपति अपनी पूँजी का अध्यं लौट पाता है और इसके अलावा अतिरित श्रर्य भी उसका मिलता है। सीधे पुनस्सादन में उत्पादन प्रिया को उसी पैमाने पर दुहराया जाता है इसलिये पूँजीपति को उद्योग में दूसरी बार मा उतनी हा पूँजी लगानी होगो जितनी उसने पहली बार लगाइ था। अतिरिक्त शुध्य को यह उद्योग में ही डालेगा बल्कि अपने जाती खच के लिये इस्तेमाल करेगा। सिा मगदूर क श्रम के दो रूप हैं। एक बार ता उसका श्रम स्पिर पूजी अर्थात् मशीन, इमारत, कन्चामान आदि का एक श्रय तैयार माल में रूपातरित करता है और दूसरी बार यह नये अध्य की दृष्टि करता है। इस नये अध्य केएर राम मजदूरी दा जाती है और दूसरा यश होता है पूंजीपति का प्रतिरिक्त अप्य । स्थिर और अस्थिर पूँजी का अर्घ्य जाति र लिये सो नहीं जाता, ये तैयार माल में मौजूद होते हैं और उत्सा दन निया के बाद पूंजीपति को यह लोट मिल ाता है। प्रति रिक्त अध्य यदि पूँजीपति अपने निजी सच में इस्तेमाल करता है तो यह उसको नये पैदासर के अध्य में लौट नहीं मिलता, यह निरा खर्च ही खच हाता है। सीधे पुनवत्पादन में पूंजीपनि मजदूरी के शेषण से मूलपूजा का जगह एक बिलकुल नद पूंजी खड़ा कर देता है। जर हम किसी उत्पादन चा को अगल या पिछले उत्पादन चक्र से स्वतन्त्र रूप से देगे माना उत्पादन क्रिया एक ही बार हुर और यह दुहराइ नहीं गह ता हमें ऐसा दौखेगा कि पूजी पति जो मजदूरी बाजार में माल विकने के पहले ही मजदूर को देता है वह अपने पास से देवा है। पुनरुत्पादन ६ टिकाय से इन उनादन चको को हम विशिष्ट रूप से नही देखते परिक एक दूसरे से सलग्न रूप में देखते हैं और तब यह सर हा 1

जाता है कि पिछले
कि पिछले उत्पादन चक्र म मजदूर द्वारा उत्पन्न
अर्प से ही अगले उत्पादन चक्र में मजदूरों को मजदूरी दी
जाती है।
पुनकत्सादन के सिलसिले में और एक महत्त्व की याव हमारी
नज़र में पड़ती है। जप उत्पादन की क्रिया में मजदूर उत्पादन
के साधनों का यथा मशीन कचा माल श्रादि का इस्तेमाल
करता है तो वह यह काम फैक्टरी के अन्दर फरता जो
फैक्टरी मजदूर को नहीं बल्कि पूँजीपति की सम्पत्ति है। इस
क्रिया को उत्पादक इस्तेमान कहते हैं । यहाँ मजदूर पूंजीपति
के लिये काम करता है । लेकिा श्रम शक्ति के पुनरुत्पादन को
बात मिन है। श्रम शक्ति की पुनम्त्पादन क्रिया क्या है ? यह
है मजदूरों की सप श्रावश्यक्तानों जैसे खाना, कपड़ा, परिवार
पालन, यशरक्षा इत्यादि की पूर्ति । श्रम शक्ति के उत्पादन या
श्रमिक फैरी में नहीं बलिा घर पर करता है । इसलिये ऐसा
प्रतीत होता है कि श्रमिक की जरूरियात का पूरा होना उसका
निजा काम है। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। जब वह
फेक्टरी में काम नहीं भी करता है तो भी वह पूंजीपति के लिये
जीता है। वह साता पीता अपने लिये नहीं बल्कि इसलिये
कि वह पूजीपति श्रेणी के लिये अपनो श्रम शनि को कायम
रख सके।
सीधा पुनरुत्पादन कोई क्षणिक क्रिया भले हो हा लेकिन
अधिकांश रूप से यह श्रानुमानिक है। वास्तव में ऐसा विरले ही
होता है।
पूँजीवाद पूर्व पुनरुत्पादन की
यदता हुधा
विशेषता है कि इसका उद्दश्य है भोग ।
पुनरुपादन
छोटे पैमाने पर वस्तुओं के उत्पादक का
उद्देश्य है एक निर्दिष्ट पैमाने के रहन सहन तक पहुँचना ।

दास समाज और सामन्त-समाज का उद्देश्य है गुलामों के दारा अतिरिक्त पैदावार की प्राप्ति और दासों मालिकों के लिये और सामतप्रमुत्रों के लिये एक विलासिता के जीवन को सम्भा बनाना । पूजीवादी समा में पुनरुत्पादन का उद्देश्य बिलकुल मिन है । यह है अतिरिक्त श्राय के सोन की अथक चेष्टा । पूँजीवादी उत्पादन प्रया में ही इस उद्देश्य को सिद्धि हो सकती है । मुनाफा का पीछा करने के कारण उत्पादन का अभूतपूर्व विस्तार होता है। व्यत्तिगत रूप से भी पूँजीपति को और पूंजीपतियों के हाड़ में पैदावार में वृद्धि करनी पड़ती है। इसलिये पूँजीवादी समाज में सीधा पुनस्यादन मिरल ही है। यढते हुए पुनरुत्पादन के लिये यह श्रावश्यक है कि पूँजी যরি গুণন নিবি স্ব জা হক গুহ স্থাৰ চাৰীক্ষা কী भढाने में यानी मशीन, कब्जामाल, और श्रम शक्ति श्रादि खरादने के काम में लगाये। इस प्रकार पूँजी के कलेजर की वृद्धि के द्वारा वह अतिरिका अध्यक परिमाण को बढ़ाता है। इस मकार पूंजी के रूप में अतिरिक्त-राध्य के प्रयोग को सास ने पूंजी का 'सञ्चय' नाम दिया है । इसलिये हर बढते हुए उत्पादन को पूँजी का 'सञ्चय' नहीं कहा जायगा बल्कि केवल उनको जिनकी बुनियाद है पूजीवादी सम्प ध पर । पूँजी का सन्चय रुपया का देर लगाना नहा है । यह तो अतिरिक्त अभ्य के ऊपर निर्भर है। अतिरिक्त अयं इकहा होता है पूंजीपति की सञ्चयवृत्ति के अनुपात में नहीं बल्कि जिस अनुपात में कि चद श्रम शक्ति का शोषण करता है और शोषण की मात्रा पर यह निभा है कि कितना अतिरिक्त प्रर्य वह इकटा करता है। इस प्रकार हम नीचे लिखे नतीनों पर उपनीत होते हैं..- (१)मन्वय बदवा हुश्रा यूँ जीवादी पुनरुत्पादन तय होता है जरकि पूँजीपति निजी खर्च के लिये कुन अतिरित १११

अध्यं को सच नहीं करता बल्कि इसके एक भाग को उत्पादन
में लगाता है और इससे अपनी पूंजी के कलेवर यो पुर
करता है।
(२) पूँजो के राशिफरण से पूँ मी और अतिरिक्त
अयं दोनों की वृद्धि होती है।
(३) पूंजीवादी राशिकरण की विशेषता यही है कि
उसी बढते पैदावार में पूजापति को दिलचस्पी है जिससे
उसको अतिरिक्त श्रध्य को प्राप्ति हो। व्यवहार अध्य के पटत
हुए पुनवत्गदन के साथ यदि अतिरिक्त प्रर्य की वृद्धि न हो
तो पूँजीवादी अथ उसको पत्ता हुया पुनरुत्पादन नहीं कहा
जायगा।
पूंजी का एकनीकरण
प्रय पूँजीवादी विकास की दिशा
और केन्द्रीकरण
और मुकाव की अोर हमको गौर करना
चाहिये । जो पहली बात हमारी नजर
में पढ़ती है वह है यही फैक्टरियों का उद्भव और पूँजी का
एकत्रीकरण और पेद्रीकरण ।
सञ्चय से पूँजीपति अपना मुनाफा बढ़ाता है और प्रतियोगिता
में टिक सकता है क्योंकि कारोबार बढ़ जाने व कारण वह
टिकाऊ अधिक होता है।
गीपतियों के प्रापसी प्रतिस्पधा में सबसे बडा हथियार
है वस्तयों को कम मूल्य पर वेचना । और यह करीब करीब स्वय
सिद्ध यात है कि बड़ा कारोबारवाला सस्ते दाम पर चीज़ वेच
सस्ता है। घाटे कारखानों के मुकाबले में बड़े कारखानों को
कई सुविधायें है, जैसे-
(१) यह अपने काम में वैज्ञानिकों गौर यात्रिकों को
लगा सकता है और यात्रिक उन्नति के द्वारा कम समय में
और कम दाम पर ची पैदा कर सकता है।

१ मार्स
(२) वस्तुविशेष को पैदा करने में वह कुशलता प्राप्त
कर सकता है और आम के विमाजन के द्वारा वस्तु का पदा
करने का लागत दाम कम करता है।
(३) कारसाने के विलार के साथ नफरी खच यट
जाता है।
(४) वस्तुओं को रिको और कच्चा माल के खरीद में
इसका अधिक सुविधा प्राप्त है।
(५) तिजारता दुनिया में इसका मयादा अधिक है और
इसको ज्यादा रकम कम सूद पर अधिक समय के लिये कर्ज
'मिल सकता है।
पंजीवाद के विकास के साथ उत्पादन और पँनी दानों का
एकत्रीकरण और केन्द्रीकरण होता रहता है।
एकनीकरण और केन्द्रीकरण में अन्तर क्या
फे शब्दों में हर पृषक पूंजी उत्पादन के साधनों का कमावेश
एकत्रीकरण है और इसका छोटी या रड़ी श्रमिक सेना पर
अधिकार होता है। हर सञ्चय नये सच का साधन बन जाता
है । भटता हुश्रा समद् सञ्चित पूंजी का काम करता है और
इससे व्यक्तिगत रूप मे पूँजीपति के हाथों में सम्पदाणि
एकत्रित होत है और इस प्रकार उत्पादन को बुनियाद बढती है
और विशिष्ट प्रकार के पूँजीवादा उत्पादन को नींव पटता है।
पूंजीपतियों की तादाद बढ़ने से सामाजिक पूँजी में वृद्धि हाती
है। बाकी हालात के समान रहने पर पृथक् पूजा कुल सामानिक
मी का जोश है उसा अनुपात में इसकी और इसक साय
उत्पादन के केन्द्रीकरण में वृद्धि होती है। साथ ही साथ मूल
बजी क श्रश अलग अलग हो जाते है और स्वतत्र जी बन
जाते हैं। पॅजी के समय के साथ पूजीपतियों की सरा बढ़ती
जाती है।

इस प्रकार पंजी या एकत्रीकरण और सामानिक जी की वृद्धि का पारस्परिक सम्पप बहुत निष्ट है । कुल सामाजिक पूँजी प इस प्रकार टुकड़े हाने के बाद इनका रि श्रापण हाने लगता ह । स थायषण का रूप पूँजी का सञ्चय नहीं है। यह यना ग्नाई पूँ जियो का एकत्रीकरए है, जो उन पृथक अस्तित्व का श्रत करता है, एक पूँजीपति की पूंजी का दूसरे पूँजापति द्वारा हड़प लेना है, बहुत स छोटे पूँजीपनियों का थोड़े स पूंजीपतिया में रूपान्तरित हाना है । पहले की प्रानया से इसकी भिन्नता यह है कि इसमें जो पूँजो वर्तमान है उसी क यटवारे में परिवर्तन हाता है । यह प्रक्रिया कुल सामाजिक पूँजी की वृद्धि से सीमित नहीं है न सका कोई प्रत्यक्ष सम्बध पूँजी के सञ्चय से है । यहाँ एक श्रादमी की जो बहुत पर जाती है इसलिये वि बहुतेर अपनी पूजा सो बैठते हैं। यही केद्रीकरण है जो एकनीए और सञ्चय से भिन है। पत्रीवाद फ विरास के साथ नया फारखाना चलाने के लिय जो कम से कम पूँजी को श्नावश्यकता होती है उसकी मात्रा पर जाता है। पूँजी का ये द्रीकरण पंजो की ताकत का बहुत बढ़ा देती है श्रीर पंजी का सञ्चय भी तेजी से होता रहता किसी भी समाज के, और पूंजीवाद का उसमें पँजीवादी समाज सम्मिलित है, यान्त्रिक विकास विकास में यात्रिक उन्नति का पिशप स्थान है। घरलू उद्योग धधा शोर दस्तकारी क ऊपर ही पूँजीगद की बुनियाद है। यद्यपि घरलू उद्योग घघा और दस्तकारी दानों के लिये शारीरिक श्रम की अावश्यकता है लेकिन पहल ज्यादा दूसरे में भ्रम का विभाजन है। घरेलू धधों में से कहीं ११४

पूरा काम हो पा लोन धादमा और दनार
हायों से गुजर कर वैशर माल बनता है श्री हर प्रारमा पूर
काम एक गिरा करता है। दोन
समानता है कि उसादन का किराया नियमापन
नहीं है। बाद का या िनयना यह है हि सागर
धमका र मयान तता है। मास में नया
के विमानित ग्रामों मुबारकोडार
বন না ? হাঁ ন দয়াল কা মুখৰ শৰা ।
मानों का प्रा. मरात' हा शिम भाग
धापा है । पहले माने दार बनाइ , नियन
বলার ৭ দিয়া স্কা আনা প্রান্ত্রেণার চিন্তা " ,
कापला यो विपनामचनना है। अब ममान कर
न वन्न गरिक अप हा मासा है कि हर
को मा काई उनमयान' आदेशमा
अब बहुत बगमा है और मयानोका पाका मा प्राय
जना में रहा है।
पारी मयान-युग की विनता यह है कि हर बस्दा
फ प्रकार सदा न त प चुने हुए कार सवार
दें या और मम्मी च रहनु बट्टा तादाद में पेश
जाता है।
शितला म मशान युग का पाना अपर माम्न
(१) इसमे दराज अमित मग्रा चलाने
का सात पैदा की जा सका, (२)मने न मला
पैदा को ना मुहता है 33 रमन्ना बाता राना
श्रादि, (३) प्रातिक सनि र प्रभाव में मा इसमें मग
जलाइ जा सकता, (४) मत प्राद राम
११५

बिजलीघर पैदा करपे जहाँ चा माल पेश हाता हो वहाँ
मशीनें पदी की जा सकती है, (५) विजनी के इस्तेमाल के
कारण काम करने की अवस्था में स्वारस्य के अनुकूल
परिपतन हो सकता है, (६) और इसका इस्तेमाल हर जगह
हो सकता है, रहे या घाटे कारसानों में तथा घरों में मा जैसे
मशीनों के प्राकार में वृद्धि हुई है उसी प्रकार बिजलीर मी
अव बहुत बड़े-बड़े बनते हैं, यहाँ तक कि कुल देश में चार
छ केन्द्र से सारे मुल्क को जिन्ना पहुँचाई जाती है।
पूंजीपाद में
पंजीवाद की उच्च विकसित
भोटे उद्योग
अवस्था में मी पढ़े बड़े उद्यागा क
बगल में ही छोटे छोटे उद्योग मी
चलते रहते हैं। दस्तकारी के काम मी जगह जगह पर चालू
रहते हैं। घरेलू पधा में व्यक्ति की मी को पूरा करने के
लिये पैदा किया जाता है। नावाद को अवस्था में दस्तकारी
और फैक्टरी की चीजें व्यक्ति की मीं की परवाह नहीं करती।
जन-साधारण के व्यवहार लिये तैयार माल विकता है।
गांवों के निस्वत शहरों में और अधिक कारीगर के लिये कोई
जगह नहीं रह जावt | कारीगर ही क्षेत्रों में टिका रहता है
जहाँ प्राहकों की जाती ज़रूरियात को अलग थलग पूर्ति की
जरूरत हा जैसे दरजा का काम । गांवों में कारीगर का इन कहीं
अधिक विस्तत है। उसका कच्चा माल दिया जाता है और
बहुत कम मजदूरी पर वह घर पर तैयार माल बनाता है।
जीवाद में कारीगर के लिये क्वल गरीबी ही होती है।
दस्तकारी की विशेषता यही है कि यह बाजार के लिये
काम करता है। कारीगर का सम्बन्ध सीधे ग्राहक से है लेकिन
दस्तकार के लिये जरूरत है एक रोचक श्रादमी की जो उसकी
चीज को खरीदकर बाजार में रेचे दस्तकारी का स साधा

रणत इस प्रकार होता है-उद्योग के सिरे पर होता है एक माल खरीदनेवाला जिसक नीचे होते हैं हज़ारों मजदूर जा घर पर काम करते है। इनको वह क्या माल देता है और तैयार माल उनसे खरीदता है । कुल माल को वह अकेले देव नहीं सकता और विक्री के लिये कुछ बीच के लोगों की सहायता लेता है। मामूली तौर पर काम के परे अधिक और मजदूरी कम, यही हालत रहता है। औरतें और बच्चे भी काम में लगाये जाते हैं। काम करने को हालात बहुत खराब होती हैं । बिखरे हुए हाने के कारण मजदूर संगठित रूप से अपनी हालात को सुधार नहीं सकता । फैक्टरी के कानून इन पर लागू नहीं होते। मालिक के लिये यह विशेष रूप से लामजनक है क्योंकि उसको स्थिर पंजी में कोई रकम नहीं लगानी पड़ती । लाभ के समय था- सानी से वह काम बढा सकता है और मन्दा के समय पिना किसी हर क वह मजदूरों का का काम नहीं देता। लेकिन पंजीराद में यह अधिक दिन टिक नहीं सकता और इसका अन्त श्रनिवाय है। पंजीवाद में कृषि पूँजीवाद में कपि का विकास छोट उद्योग का अवस्था से धागे नहीं चढा होता है । इस प्रकार उद्योग के मुकाबले कृरि बहुन विछहो हुई होती है । लेनिन के शब्दों "शारीरिक श्रम का श्राधिक्य, साधारण सहयोग, जहाँ तहाँ मशीनों का प्रयोग, तुल नात्मक रूप से छोटे पैमाने पर उत्पादन, ये सर चीजें सावित करती हैं कि कृषि श्राधुनिक मशीन उद्याग की अवस्था को नहीं पहुँचा है। फैक्टरी में उत्पादन प्रक्रिया को तरह कृषि की प्रक्रिया का एक सिलसिला नहीं है।" पिछड़ी हुई यात्रिक स्थिति के साथ कृषि में साधारण तौर भर छोट पैमाने पर दावार होता है । इसका कारण बतलाते हुए क्षेनिन ने कहा है

"उद्योग म भी पड़े पैमाने पर पैदावार का प्राधान्य इतना
निरपेक्ष नहीं है जितना कि लोग सममते हैं। वहाँ भी यह तभी
होता है जब पानी सब हालात परावर हो ना शायद ही
होता है । कृषि में इस नियम २ प्रयोग की सामा चौर भी
सकुचित है क्यारि यहाँ के उत्पादन २ हालात और भी
विचित्र है।"
बड़े पैमाने पर कृषि पे रास्ते में रुकावट क्या है ? कपि में
मशीनों के प्रयोग में ही कर पग्निाइयाँ है। मशीनों का प्रयोग
हर प्राकृतिक अवस्था में लामायक नहीं होता । उद्योग म माल
के सब समय मशीनों का काम चलता रहता है लेकिन कृषि में
ऐसा नहीं होता, कुछ मौसमों में ही मशान का प्रयोग हो सकता
है हर मौसम में नहीं।
मशीन का प्रयोग तभी होता है जब यह मनुष्य श्रम से
सस्ता हो । कपि में श्रम शचि का दर बहुत सस्ता होता है और
यही कारण है कि यहाँ मशीन पनपने नहीं पाता।
भूमि-सम्पत्ति जमीदार का एकाधिकार होन के कारण,
मशीन का मालिक अपने इच्छानुसार कृषि की जमीन की मीमा
को बढा नहीं सकता । उसी जम्पेन में जो के अधिकाधिक
प्रयोग से पैदागर उसी अनुपात में बढता नहीं यह भी कषि
में मशीन क प्रयोग के लिये बाधा उत्पन्न करता है।
अतिम बात यह है कि पिछड़े हुए मुल्को में मशीनों की
उनति म भूस्वामियों की कोई रिलचस्पी नहीं होती क्योंकि वह
न केवल अतिरिक्त पैदावार का ही मालिक है, वह श्रावश्यक
पैदावार को हड़प लेता है।
यदी क्सिानी और छोटी
ऊपर जो कुछ कहा गया है वह
किसानी
सत्य होने पर भी बड़े पैमान पर सेती
की कुछ मुविधायें हैं। रफ्तार धीमो

भले ही हो लकिन पड़े पैमाने परसेनी मे उत्पादन का एकनाकरण
छ न कुछ होता रहता है।
बड़े पैमाने पर पिसानी करने स ऐदावार का लागत मूल्य
कम हाता है। मान और दीगर खर्च मा कम हाते हैं । खेत
बड़े होने फ कारण अन्ली मशीनों का इस्तेमाल दिया जा सकता
है। श्रम शक्ति का मा बहतर इस्तेमाल हो सकता है। श्रमिकों
की तादाद अधिक हाने के कारण श्रम का विमानन मी ढग से
हो सकता है। बड़ी किसानी का यह मो फायदा है कि काफी
हुनरमाद कृषि के विशेषश भी काम में लाया सक्त हैं। इन
श्रीर निमारत के विषय में भा इस क्षेत्र में विशेष मुविधा रहता है।
एक से भा इसका सम्बध जुट जाता है और कुछ सुविधायें प्राप्त
हाती है।
कृषि में उत्पादन का एक
कृषि में उत्सदन के एकाकरण
श्रीकरण और छोटा का यह श्रवश्यम्माचा परिणाम है कि
किसान
बाट सिानों का खातमा हाने
लगता है। बड़े किसान की मुविधाओं
का मुकाबला छोटा किसान कैसे करता है। उसक पास इसके
मुहावन के लिये है क्या सिवा अत्यधिक श्रम, भूसा रहना और
इस प्रकार की खेती करना जिससे जमीन को उत्पादन शक्ति का
क्षय होता रहे।
किसानों को तीन श्रेणी में रटा जा सकता है -
(१) धनी क्सिान जो तिजारत या सूदखोरी से अपना प्रत्यक्ष
मा अप्रत्यक्ष रूप से श्रम वे शोपए से लीपन धारण करता है।
(२) मध्यम किसान जो किराये पर मजदूर नहीं ग्रता,
निसके पास अपने श्रीज्ञा की कमा नहीं है अपने पैशवार का
अधिकांश माग जो अपने लिये सब करता है और याहा हिस्सा
'धना किसान, व्यापारी और कर्मादार को देता है।
११६

(३) गरीब किसान जोजमींदार तथा उपरोक् दोनों श्रेणियों
द्वारा शोषित होते है।
किसानों का अवस्था के विकास के सिलसिले म किराये पर
मजदूरी का असर बहुत पड़ता है। पूंजीवाद नियमित रूप से
थोड़े स मध्यम वर्ग क किसान को धनी किसान यनाता है जो
प्रमश छोटे फिर बड़े पूंजीपति बन जाते हैं और अधिकांश
को किराय का मजदूर पनाता है जो सम्पत्तिहीन होकर अपनी
श्रम शक्ति बेचने, क लिये पाध्य है।
धीरे धीरे ही सही पूँजीगद कृषि में प्रवश करता रहता है
और इसका कुछ कुछ पल भी होता रहता है । जिन पाधायों
के कारण कृषि म पँजीवाद पैल नहीं पाता उनसे छोटे किसान
की हा मुसीबत बढ़ती जाती है। वह अपनी जमीन के टुकड़े से
चिपटा रहता है और उपवास, नारीबी और अत्यधिक श्रम के
श्रन्दर जीवन निर्वाह करता है।
कृषि में सहयोग का साधारण
पूजीवाद में कृषि
रूप होता है-सरीद, विक्रो या फ्रज
समवाय
समवाय । कृषि म खरीद या चित्री
के समवाय का वणन पहले ही किया जा चुका है। छोटे पैमाने
पर पैदा करनेवालों के लिये कर्ज समवाय लामदायक
हाता है क्योकि इससे उसका सूदखार महाजनों के पजे से
छुटकारा मिलता है और उसको कम सूद पर रुपया मिलने
लगता है। कृषि में खरीद, विक्री, या फर्ज के समवाय चारों
श्रोर पैले रहते हैं। लेकिन उत्पादन के क्षेन में समवाय के लिये
यह सही नहीं है। इसका उद्देश्य और गम्भीर है क्योंकि यह
उत्पादन के सगठन की प्रक्रिया को सहयोग की बुनियाद पर
प्रतिष्ठित करता है । उत्पादन के क्षेत्र में सहयोग के माने है
जमीन के टुकड़ों को एक साथ मिलाना, सपके मवेशी और
१२०

प्रौजारों को इस्तेमाल के लिये एकत्रित करना इत्यादि पानी
एक शन्द में उत्पादन को सामाजिक बुनियाद पर सगठित
करना । पंजीवाद में यह पनप नहीं सकता, क्योंकि न तो यह
पंजीवादा तरीकों को अपना सकता है और न जीवादी
उद्योग को प्रतियोगिता में टिक सकता है । जीवादी
बाजार, जहाँ व्यक्तिगत रूप से पूंजीपतियों में मीपण प्रतिस्पधा
जारी रहती है, को परिवर्तनशील हालत में मह श्रासानी से
अपने को खपा नहीं सकता। किसान के दिमाग में सम्पति क
रयाल की परलता भी इसके रास्ते में एक बहुत बड़ा रोहा है।
किसानी के लिये समवाय के संगठनों में प्रतियोगिता के कारण
श्रापसी मगढ़े भी बहुत होते है। इन मय कठिनाइयों के बीच
मी यदि यह जोता रहता है तो यह किराये के मजदूरों के
शाषण के लिये पूंजावादी समवाय का रूप ले लेता है।
सेती के थगांग के रूप में, जैसे डेयरी श्रादि में, इसको काफी
सफलता मिलती है क्योंकि इसमें निजी सम्पति के त्याग का
प्रश्न नहीं उठता।
पूँजीवादा अयस्था में समाय समितियों की कमी नहीं
होती है लेकिन इनसे छोटी किसानो का विकास समाजवाद की
दिशा में नहीं हो सकता है । सब किसानों का सहयोग का
प्रायदा नहीं मिल सकता। पूँजीपतिया की प्रतियागिता में यह
अपन सगठन के अंदर घना किसानों का ही सम्मिलित करना
चाहता है और छोटे किसानों को दूर रखता है। इसकी प्रवृत्ति
जावादी संगठन में रूपान्तरित होने की होती है।
भीवादी सचय का
पूंजीपति का मत्र है 'सचय---
सार्वभौमिक नियम
किसी प्रकार स मी हो । पूँजोपाद
का नियम ही उसका इस रास्ते पर ले
आता है। जिस प्रकार स मी सचय हो सकता है वह उसके

लिये अच्छा है। पूजापति का उद्देश्य केनल अतिरिच श्रय
या मुनाफा या परिमारा दाना नहीं है यल्कि इनका अधिका
धिक सय का साधन बनाना है।
इस दृष्टियोण म मजदूरों से अतिरिक्त अध्य पैदा करने
का तरीका, भ्रम को कार्य शक्ति का पाना, और श्रमिक
थी उत्पाद शक्ति का बाना महल को पाते हैं। साथ ही साथ
पूँजीवाद पून शोषण प्रथा, विशपर किसान का शोपए
इसका एक विशेष श्रग है।
पूँजो फे एकत्रीकरण योर केद्रीकरण परिणामस्वरूप
নান রুপা ফী তার হব। -যানী, ঘুণী * পাৰি
सगटन म वृद्धि होती है। जब तक इस नयान या िक बुनि
याद पर उत्पादन क्षेत्र का विस्तार होता रहता है तब तक
श्रमिकों की संख्या में अवश्यमेव वृद्धि होती है । लेकिन
श्रमिकों की सरया वद्धि को माँग स्थिर पूंजी को वद्धि के
अनुपात में घटती जाता है। इसस बेकारों का एक रिसना
माती जाती है। पूचोपलिया ये यापसी प्रतिस्पर्धा के कारण,
छोटे और मध्यम प्रजापतियों की वरयाद। स भी इस मना
थी बलि होती रहती है। यपि में पंजाबाद प्रवरा म मी
भकारों को भा रत्ती रानी है । पूँजीवादी उत्पादन क्ला की
उन्नति के साथ मजदूरों की मांग तो घट जाती है लेकिन प्रौरत
और बच्चे अधिक सरया में काम में लगाये जाते हैं। इनकी
और मदों की प्रतियोगिता होने लगती है और इस प्रकार भी
कुछ मजदूर येकार हो जाते हैं । यार्थिक सकट के समय और
पूंजीवाद के स्थविर हालत में बहारों की सेना और ती
रहता है।
हस रिजर सेना र अस्तिन से भम शति के शायण की
अनुकूल अवस्था को उत्पत्ति होती है और पूँजी के सञ्चय में

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इसका पल यह होता है कि पंजीपति को ग्रामदनी त बढ़ती रहता है लेक्नि मजदूरों की मजदूरी पटती रहती है यद्यपि वे अधिकाधिक अर्घा की सृष्टि करते रहते हैं। पूची के एकत्रीकरण और पेन्द्रीकरण की क्रिया से पड़ी पड़ी फैक्टरियों में मजदूर एकत्रित होते जाते हैं। हुनर और औरहुनर के कामों में प्रभेद की मात्रा घटती रहती और उनका एका पता रहता है तया मजदूरों के एफ देश से दूसरे देश में जाते रहने के कारण उनमें भाइचारा का सम्पप स्थापित होने लगता है। इन्हीं तमाम उपाय से पंजावाद अपनी मन खोदने वालों को भी पैदा करता है। वस्तु की विग्री के लिये किननव पुनवत्पादन घौर पैदावार कमूल्य की पसूली स्थानों की अावश्यकता है ? इसका कोई निश्चय नहीं कि श्रावश्यकता रहने पर वस्तुओ की खरीद होगी ही। जहरत यह है कि वस्तु याजार में बिक सके या दूसरे शब्दों में ऐसी अवस्था होनी चाहिए कि खरादनवाला देर सर उस वस्तु का मूल्य चुका सके। पूँजीवादी समाज में साम्यावस्था के लिये और पुनरुत्पादन पीपारा जारी रसने के लिय उत्पन्न वस्तु और उनके पाजार के बीच एक सामञ्जस्य होना जरूरी है। यह साम्यावस्था टूट जाती है और फिर नवीन अवस्था में साम्यावस्था स्थापित हो जाती है और इस प्रकार 4जीरादी पैदावार के विभिन्न अशों में धामञ्जस्य कायम हा जाता है। पुँजीवादी उत्पादन और विनिमय के विभिन्न श्रश तराजू के दो पल्लो की तरह बराबरी पर धाते रहते हैं और इसी के साथ साथ विकी का माल और स्वरोदन की ताकत ये दोनों पल्ने भी चरायर इतेि रहते हैं। भम के विभाजन और पूजीसादी समाज में उत्सादन के विभिन्न श्रश सम्बन्धित होने के कारण किसी एक उद्योग में १२४ विस्तार या एकाच का प्रभाव दूसरे उद्योगों पर पड़े बिना नहीं रह सकता। हर उद्योग दूसरे उद्योग के लिए बाजार है और अपनी वस्तुओं के लिये इसका बाजार दूसरे उद्योग हैं। इससे यह स्पष्ट है कि पंजीवादी पुनपत्पादन में वस्तुओं की रिकी का और उत्पादन और उपभोग के सम्बध के प्रश्नों का उत्तर किसी एक पंजीपति या किसी एक उद्याग के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि सारे समाज के राष्टिकोण से ही दिया जा सकता है लकिन सारे समाज के कोण से दृष्टि डानते हुए यह भूल न जाना चाहिए कि समाज क ष माग है जिनके पल्ले एक दूसरे को बराबर करते रहते हैं और हा भागों को मिलाकर ही पूरा समान है। पंजायादा उत्पादन की तमाम सीधे पुनरुत्पादन में शाखाका को दो हिस्सों में बांटा जा पंजीयादी उपादन के सकता है-(१) वे उद्योग जिनमें लिये धावश्यक श उत्पादन साधनों को पैदा किया जाता है और (२) वे जिनमें मागपदाथ पैदा किये जाते हैं । मान लीजिये कि उस उद्योग में जिसमें उत्पादन का साधन पैदा किया जाना है (श्रेणी १) पंजी लगाई गई है ५०.१) जिसमें स्थिर पूँजी है ४०००) • श्रोर अस्थिर पूँजी है १००० रु. और उस उद्योग में उपमाग के साधन पैदा किये जाते हैं (धेशी २) पँजी लगी है मात्र २५००) ३० मान लीजिये कि दानों पियां में 4जी के श्रान्तरिक संगठन का अनुपात है ४ १ दानों में शोषण कादर है १०. फीसदी, यह मा मान लीजिये कि पूतो का हेर फेर एक ही उत्पादन चा में हो जाता है और यह मामान लीजिये कि एक ही बार में स्थिर पंजी का पूर्याश बने हुए मान म स्थानान्तरित हो जाता है, तब यह समीकरण सिद्ध है. १२५

४००० स्थिा पू+ १००० पू+ १००० श्र श्र-६०००
श्रेणी २
२००० स्थि पू+ ५०० श्र पू+ ५०० - ३०००
प्रय बाजार में पिस प्रकार से उत्पादन के साधन जिनका
श्रभ्य है ६००० श्रार उपभोग के साधन तिनका श्रध्य है ३०..
रिकमा १ मिनिमय क्वल रही दोनों श्रेणियां के बीच नहीं
बल्कि दानो क्षेणियों में श्रापसी मिनिमय भी होता है।
श्रय सीधे पुनरुत्सादन के लिये देखा जाय कि दो श्रेणियों
से माल की रिको फिस प्रकार से होती है। एक उत्पादनन्चक
के बाद काम फिर से चालू करने के लिये श्रेणी १ को चाहिये
४०००) रु० की मशीन । श्रय मजदूर या १०००) २० की
और चफि सीघे पुनरुत्पादन में पूंजीपति कुल अतिरिक्त अभ्य
अपने लिय खर्च कर डालता है इसलिये पूजीपति को भी
१०००) १० को उपभाग को चीजें लेनी पड़ेंगी श्रणी २ से ।
श्रेणी२ को भी चीजें चाहिये घेणी १ मे। भणी २ को
२००१) रु० की मशाने श्रेणी १ से ही लेनी पड़ेगी। श्रेणी १
के पँजापति और मजदूर दानों को मिलाकर २०००) रु. की
चीजें उपभाग के लिये चाहिये जा उसको श्रेयी २ से ही मिल
सकती है । इस प्रकार श्रेणी १ की याको २०००) रु. की
मशोने विक जाती है और इसके बदले उसको उसा अर्घ्य की
उपभाग की चीजें मिल जाती है। श्रय श्रेणी २ को २००१)
का चीजें तो बिक गई । बाकी रही १००० रु. की चीजें या
५०० अपू+ ५०० श्र श्र। लकिन इसमें सीधे पुनरुत्पादन
के नियमानुसार ५००) रु० की चीजें जायँगी मजदूर को और
५०) १० को चीजे जायेंगी पूंजीपति को। इसलिये इन दोना
श्रेणियों के रिनिमय का थक है-
१२६

श्रेणी ( (१) ४००० स्थि पू+१००० श्र पू+१००० अ६००० और श्रेणी (२) २००० स्थि पू+ ५०० + ५०० श्र -३००० इस प्रकार श्रेणी (१) को स्थिर तो की यानी ४०००) २० की खपत अपना हा श्रेणी में हो जाता है। और श्रेणा २ की १०००) ० की चीजों की सपन अपनी ही श्रेणी में हो जाती है। अब इन दानां श्रेणिया में सामञ्जस्य स्थापित हा जाता है यदि (१) श्रेणो (२) श्रेणी की स्थिर पूनी का मांग को पूरी कर और श्रेणी (२) प्रेणा (१) क अ पू+श्र के जाड क परिमाण की उपमाग की चाज्ञा के दे । इसका इस प्रकार मा चिह्नित कर सकते है-(१) श्रेणी के अ पू+श्र अ-श्रणी (२) क स्थि । और मी प्रश्र ૨ मास के शब्दों में-"सञ्चय के यदते हुए पुनरूपादन की साम्यावस्या के लिये लिये अतिरिक्त पैदावार व एक अंश धावश्यक शते का पूती में रूपान्तरित करना जरूरी है। लेफ्नि हम उन्हीं वस्तुओं का जी में परिणत कर सकते हैं जिनका प्रयोग श्रम की क्रिया में हो सकता है (अयात् उत्पादन के साधन ) और जिनसे मज़दूर जोवन धारण कर सस्ता है (अथात् जीयन क साधन) इसलिये जो पंजी की रकम पहले लगाई गई थी उतनी रकम और उद्योग में नियुक्त मजदूरों के लिये साने पीन की रकम को पूरा करने के गद कुछ उत्सादन के अतिरिक्त साधन और जीरन धारण की अतिरिक सामग्री का पैदा करने के लिये अतिरिक्त श्रम के एक ग्रंश का प्रयाग करना पड़ेगा। एक शन्द में अतिरिक्त अयं इसलिये पंजी में रूपातरित हो सकता १२७ है कि जिस अतिरिक पैदावार का यह श्रर्य है यही नई पंजी या वस्तुगत श्राधार है।" उत्पादन के अतिरिक साधनों के अलावा अतिरिच भम शक्ति की मी आवश्यकता है । माक्स के शब्दों में, "पूजीवादी उत्पादन शैलो पहले से ही इसका इन्तजाम कर रखती है। यह इस प्रकार से कि मजदूर श्रेणी एक ऐसा श्रेणी बना दी जाती है कि उसको सम्पूर्ण रूप से मजदूरी पर निर्भर करना पड़ता है और जिस श्रेणी की साधारण मजदूरी न केवल उसक जीवन धारण के लिये बल्कि उसकी वशरक्षा के लिये भी काफी हाती है। 4जी के लिये इतना ही श्रावश्यक है कि इस अतिरिक्त भम शति का, जो कि मजदूरों की तादाद में सालाना वृद्धि के रूप में प्रकाश पाता है, उत्पादन के अतिरिक्त साधनों, जो कि सालाना पैदावार में ही उत्पन्न होता है, प साथ जाड़ देता है और फिर अतिरिच श्रर्ध्य का पंजी में रूपान्तरण सम्पूण हो जाता है।" इस प्रकार बढ़ते हुए पुनरुत्पादन को यह आवश्यक शर्त है कि पूँजो म अतिरिक्त उत्पादन के साधन और श्रम शक्ति का समावेश हो। सीध पुनकलादन में श्रेणी (1) का ध पू+ अ अ- भेणी (२) के स्थि पू के । लेकिन पढते हुए उत्पादन के लिये पहली भणी के अस्थिर पुँजी और अतिरिक्त अभ्य के जोड को न केवल द्वितीय श्रेणी की स्थिर पूँजी की मांग को पूरा परना है बल्कि उत्पादन के विस्तार के लिये कुछ अधिक पच रहना भी चाहिए । इसलिये बढते हुए पुनरुत्पादन के लिये श्रेणी (१) के श्र पू+मश्र का जोड़ भेणी (२) की स्थि पृ से अधिक होना चाहिए। मान लीजिये श्रेणी (१) के पूंजीपति अतिरिक्त अर्ध्य क आधा उत्पादन के विस्तार म लगाने हैराश्रय यह अंक लीजिये

श्रेणा (१) ४...स्थिपू+8...+20..६...
भेणी (२)१५०.यि पू+५० पू+७५.५ अ-१...
शोषण का दर दोनों में ... प्रामदी है घ्नि आन्तरिक
संगठन का अनुपात पहली श्रेणा में ४ है और दूसरा देवी
में २ १ है। यदि श्रेणा (') में का पापा पानी
१०० उलादन के रिम्नार में लगाया जाय तो नप प्रा में
४०० जायगा स्थिर पूजा का और १.. जयगा अपिर
पूँजी का | अब दग्विये कि ५०० १ अध्य का ठसादन का माधन
बाज़ार में है या नहीं ६... अध्र्य का उत्पादन का मापन
उत्सन किया गया है। इसमें से ४००० श्रेया (१)का जाता
है और १५०० श्रेणी (२) का जाना है । अब ५.. का
उत्पादन का साधन यच रहा । अान्तरिक संगठन के पूर्वोन
अनुपात में ४.. उसादन क साधनों में विस्तार में जाता है
और १०० जाता है मजदूरों को, आइसका उपभाग ६ पलु की
खरीद में लगाते हैं।
अंगी (२)में क्या होता है । इसके १५०० का घम्नु भैया
(१)का जायगा उत्पादत का साधन सारोदने में। ४५.
जायगा मजदूरी में। श्रव अतिरित श्रभ्य का ७५० बच रहा।
इसमें से १०० जायगा घेधी (१) नय मजदूरों का माग
की सामग्री देने लिये। इसक बदल में १०० का टवादन का
साधन श्रेयी (२) को मिलेगा। हमसे श्रेया (0) मी उत्सा-
दन का विस्तार सम्मर हाता है। यहाँ जा का प्रान्तरिक संगठन
१२ १। इसलिये जर स्थि पू को १०० जायगा तो ५०
जायगा मजदूरों को । श्रय ७५० श्रातरिच अयं मनीपति के
अपने लिये बचा ७५०-(१..+५.)-६.. 1सलिये
बढ़ते हुए पुनरुत्पादन का नया ग्रंक होगा-
भेणी (6)४.स्थिा पू+१०+५.०६...
१०९

मेणा (२) १६००स्थि पू+८००ापू+६००-३०००
अपर कही गई बातों से प्रेशो (१) और पेशी (२)
में बटते हुए पुनरुत्पादन के लिये कुछ समय सिद्ध किये जा
सकते हैं। (१) श्रेणी (१) या श्रेणी (२) के किसी
उद्योग में विस्तार तमा सम्मर हे जर दूसरी भेगी कभी किसी
उद्योग में विस्तार हो।
(२) उत्सम वस्तु और खरीद को ताकत दोनों में साम
जस्य होता है।
अपर का अक वैसे तो बहुत सरल है लेकिन वास्तव उत्पादन
क्षेत्र में सरप बहुन जटिल होता है। इस प्रकार उत्पादन घे विस्तार
के साथ पूंजी के श्रान्तरिक सगठन में वृद्धि होती है जिसको
इमने अपरिवर्तित भान लिया था । विभिन्न उद्योग में
विनिमय का सम्बध प्रत्यद नहीं होता बल्कि मुद्रा के जरिये
होता है।
उपरोक्ष श्रको से दूँजीवादी उत्पादन और विनिमय के
विभिन्न अंशों के विकास में सामंजस्य का महत्व बहुत स्पष्ट है।
स्वल्लोश अव्यवस्था से भी, किसी भी उद्योग में प्रत्युत्पादन या
अनुत्पादन से, सारी जीवादी प्रथा में अव्यवस्था बन जाती है
স্ত্রী স্বামস ব্লু লারা।
मामजस्य के लिये ऊपर दो गई
उत्पादन में राजकता
और मार्थिक संकट
शनों से यह स्पष्ट है कि पूंजीवाद के
विकास का रास्ता सरल नहीं है। इसके
रास्ते में काली उतार चटाव है।
पूँ जीवाद पूर्व युग में भी समाज में अकाल अादि पड़ता
या और धाँधी तफान श्रादि के कारण दुर्मिक्ष भी शेते थे और
वर्तमान पूँजीवादी समाज में भी प्रार्थिक संकट हो जाते हैं
लेकिन धान के सकट अनुत्पत्ति के कारण नहीं रल्कि अत्यु

त्पत्ति के कारण होते है, जब बाजार में माल भर जाता है और
उनकी विक्री नहीं हो पाता।
पूँजीवादी उत्पादन में सामजस्य कायम करने का दा शर्ते
है-पूँजीवादी उत्पादन की पिमिन शाखाओं का अानुपातिक
विकास और रारीद की ताकत और उत्पादन में समता | पूजा
वादी ढांचा के विभिन्न हिस्स एक स्त्र म बंधे होने के कारण
पिसा एक हिस्स की गहरडी स सारे दांचे में उलट पलट हाने
लगता है।
पूँजीवादी उत्पादन क ानुपातिक विकास में बाधा डालने
की चानें क्या है ?
जो ताकतें पूंजीवादी उत्पादन को विस्तार की पार ल
जाती है वे है-(१) अतिरिक्त अH की तथा जो मुनाफा का
दर गिरते रहने के कारण और तीन हा जाती है। (यह पहले
ही कहा जा चुका है कि मुनाफा का दर गिरने का मुरय
कारण है, अस्थिर पूँजी की तुलना में स्थिर पूजा की
वृद्धि)।
(२) प्रतियोगिता, जिसके कारण पूँजीपति का अपनी जगह
पर गिन रहने क लिये ही उत्पादन में वृद्धि करना होगा।
नतीजा यह है कि पैदावार बढता जाता है और इसके
साय ही साय पूंजी का अान्तरित संगठन मा रत्ना जाता
है । यह वृद्धि उत्पादन को हर शासा में समान नहीं
है। श्रेणी (२) की तुलना में श्रेणी (१) में वृद्धि अधिक
होती है।
सचय का श्रथ है कि अतिरिक्त अध्य का एक अश
उत्पादन में लगाया जाता है। यानी पूंजीपति अतिरिक्त अर्ध्य
का कुल श्रश श्रेणी ( २ ) से मांग की वस्तु सरीदने
में खर्च नहीं कर डालता बल्कि इसका एक अश

उत्पादन का साधन खरीदो में लगाता है और अल्पांश मजदूरों के लिये भोग के वस्तु प्रेणी (२) से खरीदने में लगाता है। श्रेणी (२) में भी पूँजी के संचय का यही श्रर्य होता है । इस प्रकार रहते हुए पुनरुत्पादन में उपभोग के साधनों की यनिस्वत उत्पादन के साधनों में अधिक वृद्धि होती है। विमिन उद्योगों का असम विकास और भी असम हो जाता है क्योंकि पूँजी के श्रान्तरिक संगठन के विभेद के कारण पूनी पति द्वारा प्राप्त मुनाफा के परिमाण में अन्तर पड़ जाता है। पूँजीगदी समान में लागत पुंजी के अनुपात मुनाफा मिलता है। चूंकि श्रेणा (१) में पूंजी की लागत श्रेणी (२) से कहीं अधिक होती है इसलिये श्रेणी (१) में मुनाफा का कुल परिमाण श्रेणी (२) परिमाण से अधिक होता है। इसलिये श्रेणी (२) के बनिस्वत श्रेणी (१) का पूंजीपति उत्पादन के विस्तार म अधिक पूँजी लगा सकता है । इस प्रकार दोनों श्रेणियों के उत्पादन में पूंजी का सचय श्रसम होता है और इससे पूँजीवादी उत्पादन में अनुपात का प्रभाव और भी अधिक होता जाता है। पूँजीवादी सचय के प्रभाव में श्रेणी (१) के वस्तुओं की मांग बढ़ती रहती है और इसके साथ ही साथ उत्पादन के साधनों का मूल्य बरता रहता है । मूल्य की वृद्धि के साथ मुनाफा पढता रहता है । अब सभी पूँजीपति श्रेणी (१) में पूँजी लगान के लिये मुक पडते हैं । इस श्रेणी क उद्योगों का विस्तार तेजी से होता रहता है। स्थिर पूँजी का परिमाण बहुत बद जाता है और बड़ी बड़ी फैक्टरियाँ बनने लगती हैं। लेकिन यह माल बाजार पहुँचने तक काफी समय लगता है और तब तक मूल्य काफी चढा रहता है और इन उद्योगों में पूजी आकर्षित होती रहती है। १३२ लेस्नि श्रेणी (२) में उत्सम उपभोग के वस्तुओं की मांग धापेक्षिक रूप से घट जायगी। ऐसा होने का कारण यह है कि ज्यो ज्यो सचय बढता जाता है दाना श्रेणियों पे पंजीपति अपने अतिरिक्त श्रयं का अधिकाधिक अश श्रेणी (१) के उद्योगों म लगाते हैं और इसकी तुलना म बहुत कम प्रश अपने या नये नियुक्त मजदूरों के लिये भोग की वस्तु की सरीद में लगाते हैं। अतिरिक्त प्रर्य का परिमाण बढता जाता है। इसव अनु पात में वह हिस्सा जा पूँजीपति अपने ऊपर खर्च करता है घटता जाता है । पूँजीवादी समाज को कुल ग्रामदनी में मजदूर का हिस्सा घटता जाता है । इमक मुख्य कारण दो है, अस्थिर पूंजी की तुलना में स्थिर जी की वृद्धि होती है और शोपण का दर मदता रहता है । बढती हुई सम्पति का घटता हुअा हिस्सा मजदूर श्रेणी के भाग में लगता है। उपभोग की सामग्रियों और साधनों की मांग कम हो जाने के कारण उनका मूल्य और साथ ही साथ मुनाफा का दर भी 'भट जाता है । कुछ फैक्टरिमा अपना पैदावार घरा देती हैं और कुछ परमादा जाती हैं। मजदूर बेकार हो जाते हैं । उपभाग के साधनों की मांग में और भी कमी हो जाती है। पलस्वरूप कुछ समय तक उन उद्योगों का उत्पादन संकु चित्त हो जाता है जिनमें उपभोग के साधन पैदा किये जाते हैं। इसके कारण उत्पादन के साधनों की मांग में भी कमी पट जाती है। क्योंकि जर पैदापार घटने लगता है तो नह मशीनें कौन खरीदेगा ! नतीजा यह होता है कि जब उत्सादन के साधन पैदा करनेवाले उद्योगों का माल बाजार पहुँचता है तो उनका कोई खरीदार नहीं रह जाता। बाजार की जरूरत से ज्यादा माल उत्पन्न किया गया है। रने हुए माल की रिशी हा जाती है धौर इसस लेनदेन पर बहुत असर पड़ता है और पूजीवादी

प्रया में होन मेन का मुनाम बहुत नाक होता है । साधारणतया
खुशहाला की शुरुवात के समय वकार पूंजो काफी रहती है,
जिसको उद्योग में लगने की तलाश होती है और इसी कारण
सूद का दर बहुत कम होता है। इसके सद उद्योग पनपने
लगता है और कर्ज की मांग बढ़ जाती है और सूद सदर
पढने लगता है। राजा का श्राशाजना स्पिति से बको का
फारोबार बढ जाता है और ये कर्ज काफी देने लग जाते हैं
तथा काफी तादाद में नोट और धेश निकालो लग जाते हैं।
लेफिन बाजार की बिक्री के एक जाने का खबर मिलते ही सूर
का दर एकदम चढ़ जाता है। बकम रुपया जमा करनेवाली में
भीति पैदा हो राती है और सर लाग नोट और चेक और
कागज़ों को पदलकर साना लेने के लिये ब पर टूट
पड़ते हैं। लेकिन यक एक साथ सबको या नहीद सकती।
माक्स क शब्दों में, "प्राधिक सकट के ठीक पूर्व अपनी
श्राधिक स्वच्छन्दता के घहकार में पूजापति कहता है fr मुद्रा
थलीक कल्पना मात्र है वास्तव फेवल है वस्तु । लेकिन अब
चारों शोर पुकार मच नम है, क्वल मुद्रा हो वस्तु है। जैसे
ताजा पानी के लिये जी तड़पता है वैसे ही धारमा मुद्रा लिये
तहपती है।
कि विभिन्न विभाग और सार उद्योग लेन देन के सूत्र में
बधे होते हैं इसलिये लेन देन के सकर में जो उत्पादन के सक्रीका
सायी होता है, बहुत से उद्योग नदी गम में डूब जाते हैं जो
शायद २ डूबते यदि वे और उद्योगोंगसे लेन-देन के सूत्र में बंधे
न होते।
सूद का दर एकाएक चट जाने के बाद चाज का दाम तेजी
से घटता रहता है और बिना रिके हुए माल का ढेर लग जाता
है। बहुत-सी फैक्टरियां पूरे समय तक काम नहीं करती,
-
1-11

कुछ चिल्कुल बन्द हो जाती है और बहुतेरे जीरति वरवाद हो
जाते हैं।
-
सकट काल के बाद हालत सुधरने लगता है उन उद्योगों
काहाँ उपमाग के साधन पैदा किये जाते हैं। पारधारे
उमा हुअा माल कम दाम पर रिक आता है। नये सिरे से उपभोग
के साधनों की मांग होने लगती है और इसके कारण मेणी
(२)के उद्योगों का मी पुनरुत्थान होने लगता है। पिर
मजदूरों की मांग रह जाती है, मनों के खाने पीन की चालों
की मांग बढ़ जाती है और माधारण तौर पर एक मुशहाली
का काल प्रारम्म हा जाता है और अन्त में सिर एक नया
सकटकाल मस्पित हा जाता है।
सकट और भीषण प्राकार इसलिए पाह लता है कि
काफी समय तक अत्युत्पादन होता रहता है और इसका पता
तर लगता है उन ची बाजार को पहुँचती है। लेन देन की
प्रया कारण सकर और गहराइ तक पहुँच जाता है । खुश
हाला समय पंजीपतिया का कर्ज को सुविधा के कारण नये
उद्याग पुलने में काफी सहायता मिल जाता है। अत्युतादन
कभारम्भकाल में लनदेन का प्रया दस बात का जाहिर नहा
हान देती कि अत्युत्सादन हो रहा है। बाजार म माल विकने की
कठिनाई हाते हुए मा विभिन्न उग्रागा का उत्सादन घट जाता
है क्योंकि बको से उनका मुविधा प्राप्त होती रहती है। यदि
ऐण न होता तो प्रत्युत्तरादन की रात उनको जल्दी मालूम हो
जाती (इस प्रकार अत्युत्पादन होते हुए भी कृत्रिम उपायों से
कुछ काल तक खुशधानी बना रहता है।
पंजीपनि किन उपायो म सकट को पार करता है। मास
फे शन्दों में, "एक और ता उत्सादक शक्तियों का कद अश
घरबस विनर किया जाता है और दूसरी ओर नप बाजारों पर

अधिकार होता जाता है और पुराने बाजारों का शोषण र
जाता है। लेकिन इसका अन्तिम परिणाम यही हाता है कि
सकट थोर विस्तृत और गहरा हो जाता है और इसको पार
करने की ताकत जीवादी घटती जाती है।
इसका नतीजा यह हाता है कि
(१) प्रतिस्पो यहुत पद जाती है और इसमें केवल
मजबूत उद्याग ठिक पाते । पूँजी का एकत्रीकरण और केन्द्री
करण धोर बढ़ जाता है।
(२)श्रम की उत्पादन शचि और उत्पादनकला में उन्नति
झाती है। कोशिश यह होती है कि वस्तुओं के लागत मूल्य में
अमी हा ताकि उनका मूल्य पम होने पर भी मुनाफा में कमी
(३) मजदूरों का शापण या जाता है।

तेरहवां अध्याय
साम्राज्यवाद और पूँजीवाद का पतन
पूंजीराद म काल से ही प्रति
धीराद और उत्पादक यागिताक ऊपर प्रतिष्ठित है। जब
राधियों का विकास
पूँजीपति उनत मशीनों का प्रयोग
करता है तो उसको श्रावरिक मुनापा मिलता है, रि, धारे धारे
वे मशीनें आम इस्तेमाल में श्राने लगती है। प्रतियागिता मे
कुर उद्योगों को परमादा हा जाती है लेकिन सारे समाज की
उत्पादन थचियों का रिकाम होने लगता है। अन्तिम विरलेपण
करने पर सकट काल से ही उत्पादन की उनति और उसका
'विकास होता है । पूरी सकट के बिना पूँ गदादा उमान में
अत्युत्पदन का सवाल उठता हो नहीं । सकट के कारण सैकड़ों
छोटे उमादनकारियों का जो पिठो दुइ उद्योगाला में काम
लेते है विनारा हो जाता है और अाधुनिक मशीनों की बहुत
बड़े कारखाने की सृष्टि की बुनियाद पड़ जाती है। ठसा

शक्तियों को विनष्ट करफे ना उत्पादक शक्तियों की स्फूति के लिये
यावश्यक अयस्थामा की यह सटि करता है । यह छोटे उत्पादन
कारियों को दूर दिहात से निकालकर फैक्टरिया में काम करने के
लिये बाध्य करता है और उनकी मानसिक शक्तियां को कि
सित कर मजदूर सेना का क्लेवर बढाता है और इस प्रकार
एक नगन समाज के उत्पादन की सृष्टि करता है। पूँजीवाद
फे यह उन्नतिशील अंग है । लेकिन वर्धिष्णु पूँजीवाद जय
साम्राज्यवाद की अवस्था का पहुँचता है तो उसको प्रगतिशीलता
का श्रन्त हो जाता है।
यीय कारोबार
पूँजोयाद के अन्तिम वकास की
अवस्था की विशेषता यह है कि इसमें
एकत्रीकरण और पेन्द्रीकरण विराट रूप धारण कर लेता है।
यह एकत्रीकरण और केन्द्रीकरण बिलकुल नया रूप धारण कर
लेता है।
किसी एक की पूंजी से नितना बड़ा कारखाना बन सकता
है उसस कहीं बहा कारखाना बन जाता
जब वह लेन देन
की सहायता लेता है।
विशेषकर कद्रीकरण का एक नया रूप, यौय कारोबार
का महत्व बहुत बढ़ जाता है। पूंजीवादी समाज में कई पूँजी
पनि मिलकर कम्पनी चलाते हैं। इनमें से हरएक पूँजीपति की
पूंजी के कई अशीदार होते हैं और कारोशर का मुनाफा सबमें
बँट जाता है।
यीय कारोबार में यह जरूरी नहीं है कि हरएक का अश
समान हो। कारोपार की सम्पत्ति और इसके मुनाफे के ऊपर उसका
कितना अधिकार होगा यह निर्भर है इस पर कि कारोबार में
उसका श्रश कितना है। ऐसे कारोबार में रुपया लगानेवाला में
से हरएक को हिस्सेदारों को एक रसीद मिलती है। कारोबार
१३८

को व्यवस्था के लिय, अथवा डाइरेक्टर या मैनेजरों के चुनाव के लिये हर हिस्सदार उतने वोट डाल सकता है जितनी उसके पास रसीदें है। इन रसीदों को यह वैच भी सस्ता है और इसके साथ ही साथ उसके अधिकार मी दूसरे के हाथ में चले जाते हैं। पूजावाद की इस अवस्था में यौय कागेरार का इतना विस्तार क्यों होता है? हमने देस नियाकि स्पिर पूनी की वृद्धि के साथ और मनाला सम्पत्ति की तेजी से वृद्धि होती है, यया इमारत, मशीन, श्रीजार इत्यादि की । गैर मनकूला सम्पत्ति की वृद्धि के दो नतीजे होते है (१) पूँजी को प्रय उद्योग से हटाकर दूसरे उद्योग लगाने में बड़ी कठिनाइ हो जाती है और इस कठिनाइ के कारण विभिन्न उद्यागी के मुनाफे राबरी पर नर्ग पर पाले और अौसत मुनाफा मे इनकी दूरी बढ़ जाती है। (२) नय कारागार चलाने के लिये कम से कम श्राव श्यक पूजी की रकम इतनी पट जाती है कि किसी एक व्यक्ति के लिये इसमा चलाना असम्भव हो जाता है । यौथ कारारार को विशिष्ट सुविधा यह है कि पूँजी श्रासानी से एक कम्पनी से दूरी कम्पनी में लगा जा सकता है । श्राधु निक बड़े उद्यागों में पूजी के हेरफर को गति बहुत धीमी हाने पर भी, व्यक्तिगत रूप से पूंजीपति किसी उद्योग से अपना पू जी हटा सकता है क्योंकि यह अपना हिस्सा (या हिस्से पोरसोद) बच सक्ता है। इक अलाया भी यौथ कारोबार इसके लिये दरवाज़ा खोल देता है कि आम जनता को छोटी-मोटी चत्त की रकमों को बड़े कारोबार में लगाया जा मके । योष कारोबार बहुत छोटी रकम की शयर निकालकर इस उद्देश्य को हासिल करता है और इस प्रकार जा नया कारोबार कोई एक पूंजीपति नहीं खड़ा कर १३४ सकता था उसकी प्रतिष्ठा श्रय सम्भव हो जाती है। पूँजी इकहा करने के साथ ही साथ पूर्ण हासिल करना भी श्रासान हो जाता है। यौथ कारोबार का सामानिक रूप होने के कारण बकों के लिये भी उनक पों को नियन्त्रित करना सहज हो जाता है। डिवेन्चर निकालकर मी ज्वाइन्ट र कम्पनी (योप कारोवार) अपने फ्रज मिलने की रकम बढा लेती है। डिवेन्चर एक प्रकार का सर्टिफिकेट होता है जिसका मालिक सूद का एक निश्चित दर पाने का हकदार हो जाता है। लेकिन शेयर होल्डर की तरह कम्पनी प पदोबस्त में उसकी कोई श्रायाज नहीं होती। किसी एक व्यक्ति की सम्पत्ति न होने के कारगा यौय कारोबार बहुत जनप्रिय हो गया है। किसी एक व्यक्ति की सम्पत्ति न होने पर भी योय कारोबार में विराट पूजी लगती है और छोटे पारोबार या छोटे पैमाने पर उत्पादन करनेवाले इसका मुकाबला नहीं कर सकते। यौय कारोवार और पूँजीवादी विकास की हर अवस्था पूजी का फन्द्रीकरण- में यौथ कारोबार मिलते हैं लेकिन धनुचर कम्पनियों की इसकी अाखिरी अवस्था में इनका महत्व बहुत बढ़ जाता है। इससे पूँजी- वादी समाज में कौन सी नई पात पैदा हो जाती है। वोट की व्यवस्था के कारण यौथ कारोबार धनी शेयर होल्डरों के हाथ में रहता है। देश भर में पेले होने के कारण छोटे छोटे शेयर होल्डर अक्सर कम्पनी के जलसों में शामिल नहीं होते। उनको अपने श्रश का मुनाफा मिलने से मतलब । इस प्रकार मुट्ठी भर पूंजीपतियों के हाथ में सारे समाज की पूँजी के केन्द्रीकरण के लिये योय कारोबार एक बहुत बड़ा औजार प्रथा १४०

बन जाता है। यह केन्द्रीकरण और भी बढ़ जाता है जब एक
कम्पनी दूसरी कम्पनी में हिस्सेदार बन जाती है और इसको
अपने प्रभाव में लाने की कोशिश करती है। वर्तमान कम्पनी
एक नई कम्पनी के संगठन के लिये शेयर की बिली कर सकती
है थोर इन शेयरों का प्राधा खुद सरीदकर इस नई कम्पनी
का पूग नियंत्रण अपने हाथ में रख सकती है। यह नई कम्पनी
पुरानी कम्पनी की अनुचर कम्पनी कहलाती है। सारे के सारे
उद्योग और बड़े बड़े कारोबार इस प्रकार मुट्ठी भर बड़े पूंजीपति
शेयर होल्डरों के हाथ में पड़ जाते हैं।
यौय कारोबार पर मुट्ठी भर पूँजो
Dividends, Foun.
der's Profit and पतियों का प्रभुत्व मुनाफा के विभाजन
Fictitious Capital
में अपना असर डाले बिना नहीं
रहता । मुनाफा का कुल भाग
विभानित होता भी नहीं। बड़े पूंजीपतियों को दोहरा फायदा
मिलता है।
(१) मुनाफा का असली सत्य तनख्वाह के रूप में उनको
मिल जाता है।
(२) उनके शेयरों की तादार अधिक होने के कारण
मुनाफा का मोटा अश उहा के पास रह जाता है, यानी शेमर
होडरों को डिपिडेह के रूप में बँट जाता है।
कोई यदि अपना शेयर बेचे तो उसको उतना ही रुपया
मिलेगा, जिसका सूद उसके शेयर के हिपिडे ड के समान हो।
शेयर की खरीद की रकम वास्तत्र म किसी अश्य का मूल्य
नहीं है। उस रुपये से यह ऐछी यस्तु नहीं खरीदता जिसके
उत्सादन में श्रावश्यक अम-समय लगा हो पल्कि उसमे वह
केवल डिविडेन्ह के रूप में एक बॅधी प्रामदनी मात करने के
अधिकार का सरीदता है।
१४१

पति इस प्रकार प्रतियोगिता विकास प्रास होकर अपनी विपरीतावस्था में परिणत हो जाती है। पूँजीवाद के विकास की इस अन्तिम अवस्था को एकाधिकार पूँजीवाद कहते हैं। क्रान्तिकारी मजदूर अान्दोलन भी पूँजीपतियों में एका लाने का एक कारण बन जाता है। एकाधिकार के एकाधिकार का यहुत प्रारम्भिक रूप है काल । किसी वस्तु विशेष विभिन्न रूप के बनानेवाले श्रापस में समझौता कर लेते हैं, मूल्य फ, बाजार में हिस्सा बांटने के, फज फे और कचा माल खरीद के निस्पत। फाल का सगठन इस प्रकार स होता है कि इस बात की निश्चयता नहीं होती कि पूंजीपति अपने समझौता का पूरी तरह पालन करेंगे। होता यह है कि जिन हालात में पूंजी यह समझौता करते हैं उनके बदलते ही कार्टेल टूट जाता है। मुद्रास्थिति में परिवर्तन होने से, या दाम अधिक घटने बढने पर भी काल का समझौता टूट जाता है। वे कार्टेल की क्म जारिया है। काटेल का स्थायित्व कम होने के कारण पूँजीपति अधिक स्थायी संगठन की तलाश म रहता है। यह अब सीनीकेट का सगठन करता है । सीडीकट उद्योगों का पूँजीवादी सम्मेलन है जिसमें सम्मिलित उद्योगों की व्यापारिक स्वत पता लुप्त हो जाती है। सीडीकेट सम्मिलित उद्योगों के कुल माल की विक्री का बन्दोबस्त करता है और यह भी निश्चय करता है कि किस दाम पर माल विके। इन कामों के लिये एक कम्पनी मनती है जो इन सम्मिलित उद्योगों के कुल माल का सरीद लेती है और एक एकाधिकारी संगठन के तौर पर अपने निश्चित दाम पर ग्राहकों को माल बेचती है, इस तरह के संगठन के १४४

उप प्रतियोगिता करने को कोई रह नहीं जाता । सम्मेलन के
न मिन उद्योग इस कमनी के शेषर सरोद लेते हैं।
सीन्टीकेट में सम्मिलित उद्योगों को स्वतन रूप से
पना अपना रास्ता अखिनयार करने को प्रासानी नहीं होती
योकि सीडीकेट इनका बाज़ार से प्रत्यक्ष सम्बध होने नहीं
ता। लेकिन यह सम्मिलित उद्योगों की श्रापसी प्रतियोगिता
खतम नहीं कर सकता। जब चीज़ों का दाम बढ़ जाता
तो सीट का हर सदस्य अधिक से अधिक मुनाफा के
ये अधिक से अधिक माल पैदा करना चाहता है लेकिन
डिकेट को इसमें कोई दिलचस्री नहीं क्योंकि ज्यादह माल
राजार पहुँचने से माल का दाम घट जाता है। इस अन्तर्विरोध
कारण सी र केट भी टिकाऊ नहीं हो पाते।
श्रय पूंजीपति और मी सुपरद्धित मगठन कायम करना चाहता
३, यह ट्रस्ट सालता है । इसमें सम्मिलित उद्योगों की स्वतत्रता
नम्पूर्ण रूप से चली जाती है । ट्रस्ट का पूरा अधिकार होता है
के इसमें सम्मिलित उद्योगों का चाहे जैसा प्ररथ करे, यहाँ
क कि जगदह पिछड़ी हुई शासानों को यह बन्द भी कर
उकता है।
ट्रस्ट उन फैक्टरियों को पन्द करके जहाँ पैदावार का
लागत मूल्य अधिक होता है और उन फैक्टरियों को उत्पादन
का येद्र बनाकर जहाँ लागत मूल्य क्म होता है, अपने लिये
मुनाफा अधिक कमाता है और मजबूती से उनकी प्रतियोगिता
करता है जो ट्रस्ट के बाहर पैकारियों में चीजें पैन करते हैं।
इस्ट को सबसे बड़ी सुविधा यह है कि यह अपने
अन्तगत उद्यागों में पापमो प्रतियोगिता बिलकुल भी नहीं
होने देता।
ट्रस्ट उस प्रतियोगिता का तो अन्त कर देता है जो
१४५

ही प्रकार को चौते पनानेवाले उद्योगों में होती है लेकिन इससे उन उद्योगों को प्रतियागिता सत्म नहीं हो जाती जिनमें ट्रस्ट के ही फैक्टरिया के लिये पश्चा माल इत्यादि उत्पन्न किया जाता है । जैसे, मान लीजिय कोई स्टील का ट्रस्ट है , इसको फेवल स्टील की पटरियों का ही महाबला नहीं करना होता बल्कि कथा लोहा पैदा करनेवाले उद्योगों से भी इसकी प्रतियोगिता हो सकती है शोर मचा माल ज्यादह दाम पर मिलने से इसको प्रतियोगिता में कठिनाई पड़ेगी। इस कटिनाई पो दूर करने के लिये विमिन अब स्थानों पर कच्चे माल के उत्पादन के मिन्न मिन्न उद्योगों को एक सूत्र में याँधा जाता है। इसमें वे उद्योग भी शामिल हैं जिनमें मुख्य पैदावार के साफ्साय गौथ पैदावार भी किया जाता है। इस प्रकार से इन उद्योगों के एक सूत्र में बंधने के कई साम (१) मह व्यापार को चञ्चलता को रोकता है। (२) इसमें मुनाफा का दर प्रीप करीब एकसा रहता है। (३) इससे यानिक और उद्योग कला की उसति होती है। (४)मदी के समय भी इनके टिकने की शकि थधिक होती है। पूंजीरादी एकाधिकार की जीवादी एकाधि स्थापना से विरोधी संगठनो का कार और विरोधी एक्दम अन्त नहीं हो जाता । इनसे लदो में पूँजीपतियों को सार भी काफी करना पडता है। वे लड़ने के बो विभिन्न तरीके इस्ते माल करते हैं वे ये है- (१) विरोधियों को परबाद करने के लिये वे घाटा था कर अपना माल बेचते हैं। - (२)पयन या करारनामा के जरिये प्रतिस्पर्धियों के पाठ कथा माल पहुंचने से रोकते हैं। (३) ट्रेड युनियन या व्यवसाय सघ स समझौता करक प्रतिस्पषियों को श्रम शनि का इस्तेमाल करने से रोकना। (४) प्रतिधियों को रेलकर्ष श्रादि को सहलियतों से वचित करना, यहाँ ता कि उनके मालगुदाम प्रादि को भा विस्फोट से उड़ा देना। नतीजा यह होता है कि या तो ये प्रतिस्पर्धी बरबाद हो जाते है या इन प्रतिस्राधियों का अलग एकाधिकारी गुट बन जाता है जो संगठित रूप से अपना विरोध चनाते रहते है। ये पूँजीवादी एकाधिकारी गुट केवल उही चीजों का उत्पादन प्रसगठित उद्योगों के लिये छोड़ देते हैं जिनकी मांग के परिमाण की स्थिरता नहीं है। इस प्रकार मन्दी के समय ये घागठित आयोग इस एकाधिकारी गुट को रक्षा का काम करते है। जी ঐক্য গীব ঘর্ষীক্ষা पीयोगिक एजी का की एक सीमा के बाद एकाधिकार सम्मिश्रण ~ फाइन-स एक नया रूप धारण करने लग जाता इपिटल की अरपति है, जब वक अपनी पूँनी श्रौद्योगिकों के क्षय उनके कारोबार दाने के लिये देता है। बों को सहायता से उत्पादन वृद्धि की नई सम्भावनायें पैसा हो जाती है और प्रतियोगियों को कुचलने के लिपे भीपक एक नया अध पन जाता है। कम्पनियों के शेपर और विनर श्रय यकी के जरिये विकने लगता है। मामी अपनी स्थिति के कारण उद्योगों पर अधिकार जमा लता है और उत्सादन निया को अपनी इच्छा के अनुसार सञ्चालित करवा है। स्वयं ही चौद्योगिक कारोबार का एक हिस्सादार बन --

जाता है। ये ट रटाफ कम्पनियों के शेयरों की खरीद रिकी
भी यों के मारपत होने लगती है और इस प्रकार का विशिष्ट
उद्योगों में पू मी या परिमाण पटा पदा सकता है और उद्योग
पायों या पूरी तरह निय प्रण पर सकता है और प्रौद्योगिक
कागेरार का सामीदार बन जाता है । यक को पूँजी और
प्रौद्योगिक पूँजी इस तरह मिल जुल जाती है कि मंक का मालिक
उद्योग का मालिक और उद्योग का मालिक क का मालिक
बन जाता है। इस तरह की मिली जुली पूँजी को फाइनेछ
पूंजी कहते हैं।
जिस प्रकार उद्योग घ घों को आपसी प्रतियोगिता में पड़े बड़े
उद्योगही रह जाते हैं और यह भी एकाधिकार के रूप में उसी प्रकार
मो की प्रतियोगिता में भी बहे बहे पक रह जाते है और उनका
एक गुर बन जाता है। एक और उद्योगों के गुरों की सम्मिलित
चमी अब सारे देश के और कभी कभी कर देशों क उत्पा
दन के साधनों और कच्च माल को नियत्रित करने लग जाता
} চোথা বা জ্বী হট বিনি স্কা ডান্নাঘর
कहते है।
पाइनेंस जी और जी
पूंजीगद के विकास के साथ
पादी राष्ट्र का पोरण राष्ट्र और कुल पूँजीपतियग का स्वार्थ
एक होता जाता है। मानस पूजी
की उत्पति के साथ राष्ट्र पूंजीतिवर्ग के केवल उस स्मि का
प्रतिनिधित्व करता है जो पाइनै स पूनीतियों का गुट होता है।
याधुनिक सरसर चलाने के लिये विशाल धनराशि की
नावश्यकता होता है और अक्सर उसको सूद पर रया कहा
करना पड़ता है। इस काम के लिये पर सहायक होता है धौर
इस मकार राष्ट्र पास पू जीपतियों के अधीन हो जाता है।
जब राष्ट्र भरनी पटरियां और रेल भादि चलाता है तो

बढेसियत एक पूंजीपति के वह पाइनस पूंजीपतियों की प्रति योगिता से बच नहीं सकता और फलस्वरूप या तो उसका फाइ- ने पूंजीपतियों के गुट के साथ मिल जाना पड़ता है नहीं तो पानस पूंजीपति उसके साथ वैसे ही पेग श्राते हैं जैसे और प्रतियोगियों के साथ। वे देश के असारों को भी अपने अधीन करके उन अपना स्वार्य सिद्ध करते हैं। इस प्रकार एकाधिकार पूँजो, यक पोर राष्ट्र का एक जब दस्त सम्मिश्रण बन जाता है। एकाधिकार उत्पादन और हर मुल्क का नियारण एक एका- विनिमय का नियम धिकारी पूंजावादी गुट के द्वारा होने का यह अय लगाया जा सकता है कि हर देश एक श्रार्थिक एकक बन जाता है और कम से कम उस देश की सीमा के अन्दर उत्पादन के सिलसिले में कोई गड़बड़ी रह नहीं जाती लेकिन ऐसा समझना भूल होगा। पू नोवादी एकाधिकार में थर्य के नियम का व्यतिकम नहीं होता। न तो निजी सम्पचि का ही विनाश हाता है। बहुतेरे छाटे छाटे उद्योग अब भी बत्तमान रहते हैं। यही काफी मात्रा में प्रतियोगिता का अन्त हो जाता है लेकिन उद्योग के बड़े बड़े सदागे के स्वार्थों का सघात होता रहता है । कच्चा माल एकाधिकारी यूँ जोरलियों से उद्योगी गुट का पिराध बना रहता है क्योंकि ये कच्चा माल सत्ता दर में लेना चाहते हैं। गुरु उद्याग में, जैसे उन उद्योगों में जहाँ लोहा श्रादि का माल पैदा किया जाता है और इसे उद्योगों में अर्थात् उन उद्योगों में जिनमें उरमाग के साधन पैदा किये जाते हैं, विरोध होता रहता है। इन कारणों के अलावा मुनाफा का पीला करने के कारण उत्पादन को विभिन शाखाओं का समान विकास नहीं होता। इन सब कारणों से उत्पादन के क्षेत्रों में अराजक्ता ववमान रहती है और शासकवग में विरोध और सघष होता रहता है एफाधिकारी उत्पादन में अर्थ्य के नियम में सामान्य परिवर्तन होता है। (१)पूंजीवादी एकाधिकार में भी वस्तु का मूल्य मनमाना नहीं लगाया जा सकता है। इसका कम से कम मूल्य होगा उत्पा दन का लागत दाम और ज्यादा से ज्यादा जिस मूल्य पर श्राम लोग खरीद सकें। इससे अधिक दाम होने पर वस्त की मांग पट जायगी और सम्भर है पूंजीपति का मुनाफा भी घट जाय। (२) लेकिन प्रतियोगिता कायम रहने पर जो मूल्य होता है उससे एकाधिकार में अधिक मूल्य होता है क्योंकि एकाधिकार एक उद्योग स दूसरे उद्योग में पूंजी के प्रवाह को रोकता है। (३) एकाधिकार में पनीरति उस मूल्य पर चीज पेचता है जिसस उसकी सबसे पिछड़ी हुई पैक्टरी में मी पनी चीज़ के ऊपर उसको शौसत मुगाफा मिल सके। इस कारण अधिक उन्नत फैक्टरियों को श्रीसत से अधिक मुनाता मिलता है जिसको 'काल' का प्रान्तरिक लगान कहते हैं। (४) एकाधिकारी के अतिरिक्त मुनाफ़ा का उद्गम है (क) असगठित पारोबारों, जो एकाधिकारी के उत्पादन के दायरे में पड़ जाते हैं, के अतिरिच श्रभ्य का एक अश (ख) वास्तव मजदूरी में कमी, क्योंकि मजदूरों को अधिक दाम पर अपनी जरूरत की चीखरीदना पड़ता है। (५) सारे समाज की कुल वस्तुओं का मूल्य बराबर होता है उनक लागत मूल्य और कुल मुनाफे के जोड़ के अर्थात् उनके अर्घ्य के हो, इस मुनाफा का बंटवारा असमान होता है और हूँजीवादी एकाधिकार की अवस्था में मजदूरों का शोषण कहीं अधिक होता है। (१) ट्रस्टों के अतिरिफ मुनाफा के कारण उनके मुकाबले लिये स्वतत्र उत्पादनकारी अलग ट्रस्ट कायम करते हैं जिससे १५० कमा-रचा कर अतिरिक्त मुनाफा घट जाता है और मुनाफा का दर समान होने लगता है । लेकिन वर्तमान असम पूँजीवादी विकास में मुनाफा का विलकुल बराबर होना असम्मव है। विदेशों के बाजारों पर हमने देख लिया कि मूल्य की सतह कायम रखने के लिये उत्पादन घटाना पड़ता है । लेकिन एक हद तक ही ऐसा करना लाभदायक होता है और पूजीवादी विकास का पहाव इस पोर नहीं हो सकता । ऐसा घटित होना पूँजीवादी उत्पादन प्रक्रिया के नियमों के विरुद्ध होगा क्योंकि मुनाफा का खोज और उचय वृत्ति ही इस प्रक्रिया के मुख्य अंग है। उसादन के सकोच से वस्तु के लागत दाम में वृद्धि होती है और इस प्रकार मुनाफा में कमी हो जाती है। लेकिन एक सीमा तक कुछ उपाय है। देश की सीमा में वस्तुओं के उत्पादन का सकाच करते हुए भी उनकी विक्री विदेश के बाजारों में हो सकती है । इस तरह उत्पादन के सकोच की आवश्यकता नहीं रह जाती और अधिक उत्पादन के साथ अधिक मुनाफा की सम्भावना पैदा हो जाती है। विदेशो का बाजार एक कुएँ की तरह है जिससे श्रावश्यकता पड़ने पर पंजीपति अपनी तृषा मिटा सकता है। विरेशों के बाजारों की जरूरत को पूरा करते हुए पूँजीपति अपने देश में महेंगे दामो चीज़ बेचता है । विदेशों में यह उही चीजों को सस्ते दामों पर यहां तक कि नुकसान पर मी बेचता है और इस कमी को देशवासियों से वह पूरा करता है। विदेशों में सस्ते दाम पर चीक बेचकर वह उस देश के पूंजीपतियों का मुकाबला करता है और इस प्रकार से जव यह उनक कारोबार का नष्ट कर देता है फिर वह साधारण मुल्य पर चीजों को बेचने लगता है, यहाँ तक कि फिर वह अपने मुल्क में प्रचलित दाम से अधिक मूल्य

के पाय पहले उपाय के प्रयोग का कोई जरिया नहीं था। इसलिए
उसको दूसरे उपाय का अवलम्बन करना पड़ा। लेन यह
परना हतना आसान नहीं पा! उनीसवी सदी के प्रारम्भ में,
मजदूगे की रिज़र्य सेना के कारण मजदूरी मनमानी घटापी जा
सकती थी लेकिन अब मजदूर संघ ने शनिशाली हो गए
ये कि ये बेकार मजदूरों के पार रहते हुए भी मजदूरी को घटने
नहीं देत थे। कार रेकार ही रहते हैं लेकिन जो मजदूर काम
पर लगे रहते हैं उनकी मजदूरी घटने नहीं पाती है । इसलिए
इजीपतियों को इन मरदूर घों को दबाने की बावश्यकता
पड़ी। हिसार पसीपतियों के इस उद्देश्य में हाप पटाया।
स्टिना, हिफ, मिसेन धादि बड़े बड़े अद्योगियों के सहारे
हिटलर फासिस्ट गष्ट्र कायम करने में समर्थ हुमाया और
शक्ति प्राप्त करने के शद उसने पंजीपतियों को मित्रता आम
निभायी। परी १६३४ के एक फर्मान से मिलमानिक 'नेता'
पनाया गया और मैटरी फ मजदूरों को साध्य होकर उसका
असामी बना पदा । अर वय नेता को ही निम्नलिखित
विषयों पर प्रान निकालो का धस्किार मिला-
(१) मजदूरी के लि के प्रारम्भ अन्त के समय
कारिय।
(२) मागेकाने का तरीका और समय का निर्णय ।
(২) উদ্য জীব সুনাম ই ক্লাগাং ফা নিযুখ।
(v)ो की किरम, मम और प्रदाया! के तरीके
पाय। सपा
(५) साधारों का निराप जिनके बिना पर रिना
नोटिस दिये हुए मजदूरों को निकाला था उक्त्ता है।
दूपरे शब्दों में भर की राते, काम के परटे, सुवरे काम
कार भी मिल मालिक की पर निर्भर है। यह सवरे

बाड़ारों को अगत् इन देशों को विदित देश या निवेर बना कर रखना पड़ता है। पूजी का निर्यात यह स्वत मिद है कि यदि प्रायात-कर के कारण बने हुए माल का पाना बन्द हा डाय तो दूसरे देश वहां पूजी का नियात करेंगे। सोना में किसी देश विशेष का छाप नहीं लगा रहता और ने हुए माल के दलित यह यादह श्रासानी से देशों की मीमायें पार कर सकता है। पूंजी के नियाव का एक रूप होता है यह कि एक देश का पंजीति या सरकार दूसरे देश को न देते हैं। इसक लिये उनको क चे दर पर सूद मिलता है और भ्यारिक या दूमरे प्रकार का सन्धियों के रूप में शिकाधिकार मिलते हैं और रेल यादि बनाने का मी इजाजत मिलती है। प्रत्यक्ष रूपम मानी का नियात होता है । एक देश का जापति दूसरे देश में यह खोलता है, उद्योग ध घे खोला है तया यहां कारावारों का हिस्सा (शेयर) खरीदता है । कई के लिये चैस उसका सूद मिलता है वैस हो उद्योग धयों के कारण मुनाफा मिलता है। जिन पिछड़े हुए देशों में यान्त्रिक टप्रति नहीं हो पाई है वहाँ धागे वढे हुए मुल्कों के बनिस्बत मुनाशा का दर अधिक होता है और इसलिये वही पूँजी श्रावर्षित होती है । वहाँ पूनी का थान्तरिक सगटन कम होता है और श्रम शक्ति सस्ती हाती है । बच्चा माल मी वहाँ प्रचुर मिलता और वहाँ कच्चा माल मिलता है उस स्थान पर तैयार मान बनाना ज्यादा सस्ता पड़ता है। जमीन का लगान तया दूसरे कारणों से आगे बढ़े हुए उपनिदेशों की लढाई और दुनिया का पटारा १५३ पर ची चने लग जाता है। इस प्रकार से एक सीमा तक पैदावार बढ़ाई जा सकती है, इसके याद नये बाजारों की खोग होने लगती है। इस तरह पाजारों पर पूजा पाने के लिये एक शेड़ पड़ जाती है और मगड़ा बढ़ता ही जाता है। श्रय विदेशों के बाजारो पर अधिकार पाने के लिये पिमित्र मुल्को क एकाधिकारी सगटनों में सघप और विरोध होने लगता है। या विरोध विश्वव्यापी हो जाता है और मिन मिन देशों के विराट पंजीपति दैत्य जमकर लड़ने लग जाते हैं। देश विशेष का एकाधिकारी संगठन अपनी रक्षा के लिये राष्ट्र के साथ सम्पूर्ण रूप स सम्मिलित हो जाता है और अपने देश के बाजार को विदेशियों की प्रतियोगिता के क्षेत्र से अलग रखना चाहता है । इसके लिये राष्ट्र अपने मालिको कथादेश पर बाहर से श्राा वाली वस्तुओं पर श्रायात-कर लगाता है। इसके कारण बाहर से श्राइ हुई चीज़ों का दाम देश में उत्पन्न यस्तयों के मुकाबले पढ़ जाता है। फाइनेंस जी की उत्पत्ति के पाले पिछड़े हुए मुल्क रक्षा कर इसलिये लगाते थे कि चीजों की त्रिी स उत्पादन का लागत दाम और श्रीसत मुनाफा मिल सके तथा देश की उत्रादक शतियों के विकास के लिये अनुकूल श्रवस्था की उत्पचि हो। फाइनेंस जी की उत्पत्ति के बाद यह कर इसलिये लगाया जाता है कि एकाधिकार का अतिरिक्त मुनाफा कायम रहे। इस कर के प्रयोग का क्षेत्र जितना विस्तृत होता है उस देश के एका घिकारी पंजीपतियों का बोलबाला मी उतना अधिक रोता है। विदेशी बाजारों पर अधिकार जमाते हुए देश विशेष का पूँजीवादी गुट उनको हन करों के प्रयोगक्षेत्र की सीमा के अन्दर लाना चाहता है और उनको दूसरे पूंजीवादी गुटों के सस्पर्श से अलग रखना चाहता है। इसका परिणाम यह होता है कि इन १५२

बाजारों योमर्थात् इन देशों को विजित देश या उपनिवेश पना
कर रसना पडता है।
पूजी का निर्यात
यह स्वत सिद्ध है कि यदि
आयात वर के कारण बने हुए माल
का थाना पद हो जाय तो दूमर देश वहाँ पूँजी का निर्यात
करेंगे। सोना में किसी देश विशेष का छाप नहीं लगा रहता और
बने हुए माल के निस्वत यह ज्यादह शासानी से देशों की
-सीमायें पार कर सकता है।
पूँजा घे निर्यात का एक रूप होता है यह कि एक देश का
पूँजीपति या सरकार दूसरे देश को कर्ज देते हैं। इसके लिये
उनको ऊँचे दर पर सूद मिलता है और व्यापारिक या दूसरे प्रकार
को सन्धियों के रूप में विशेषाधिकार मिलते हैं और रेल यादि
बनाने की भी इनाज़त मिलती है।
प्रत्यक्ष रूप से भी पूँजी का निर्यात होता है। एक देश का
पूँजीपति दूसरे देश में यक खोलता है, उद्योग प पे खोलता है
सपा यहां के कारोबारों का दिसा (शेयर) खरोदता है। कई
के लिये जैसे उसको सूद मिलता है वैसे ही उद्योग घ घों के कारण
मुनाफा मिलता है।
उपनिवेशों की लडाई जिन पिछड़े हुए देशों में यान्त्रिक
और दुनिया का
उन्नति नहीं हो पाई है वहाँ आगे बढ़े
पटवारा हुए मुल्कों के बनिस्बत मुनापा का
दर अधिक होता है और इसलिये वहाँ पूँजी श्रावर्तित होती है।
वहाँ पूजी का थान्तरिक संगठन कम होता है और श्रम शकि
सस्ती हाती है। कचा माल भी यहाँ प्रचुर मिलता है और जहाँ
कच्चा माल मिलता है उस स्थान पर तैयार माल बनाना यादह
सस्वा पड़ता है।
जमीन का लगान या दूसरे कारणों से आगे बढ़े हुए
१५३

मुल्कों में, उद्योग के मुकाबले कृषि का विकास धीमे होता है। लेकिन वहाँ के उद्योगों के लिये कच्चा माल सो चाहिए ही। यह पिछड़े दुए मुल्को स मिलता है जो प्राय उध्य प्रदेश भी। और कुछ विलिष्ट प्रकारचा माल जैसी नादि उध्य प्रदेशों में ही मिलते हैं। अक्सर कोयला और सोना भी यहां मिलने इन पिछड़े हुए मुल्कों में प्राकृतिक चीजें क्या मिलती हैं इसका पूरा पता नहीं लगाया गया है। न पिछड़े हुए मुल्कों का उपनिवेश बनाने का और वहां के निवासियों के रस शाषण का इतिहास पूँजीवादी विकास के इतिहास के सबसे काले पन्ने है। उपनिवेशों में दापया लिप रूप में वर्तमान रहती है। उछ देश क मजदूरों की मज़दूरा इतनी कम होती है कि उनको भूखा मरना पड़ता है। इधर महादूरों की पावनधारण की सामपियाँ মমী হা সানা ই কাজি ধুলদিনি বা অমন গনী पारूस्त की चीजों को पैदा करने के लिये ले लेता है। वहाँ की जनता को उसी सेना को जिलाने के लिये रुपया देना पड़ता है जो उनको गुलाम बनाये रखती है। अन्तर्राष्ट्रीय पूँजीवादो बाजार थोर मचा माल के लिये गुट और पृथ्वी के पुन- पूँजीवादी गुगे को लडाई का यह विभाजन की लड़ाई परिणाम है कि शतिशाली पूँजीसदी मुल्को है सारी दुनिया को बाँट लिया है। श्रयेले ग्रेटनिटेन के पाठ १४० करोद वर्ग कीलामोटर हैं यानी सारा दुनिया की सतह का हिस्सा | खुद मिटेन का रकया है ३ लाख धर्म कीलोमाटर और उसकी शाबादी। करोड ७० लास । फ्रांस का रकश है ५० लाख वर्ग कोलोमीटर तथा उसकी यायादी ४ करोड़ और इसकी अधिकृत जमीन का मचा है १ करोड़ दस लाख वर्ग कीलोमीटर और लोक सख्या ५३ करोड़।

दुनिया के बँटवारे में जो हिस्सा श्रौद्योगिक पूँजीवादी गुटों को मिलता है उससे वे सतुष्ट नहीं रहते । वर्धिष्णु सचय, और मुनाफ़ा की तृषा पूंजीपतियों को उत्पादन के तथा बढते हुए माल के बाजार के, और वृद्धिमान पूंजी के प्रभाव के दायरे के विस्तार के लिये बाध्य करता है । इस चेष्टा में एक देश दूसरे देश और उसके कब्जे में उपनिवेशों पर हमला करता है और छोटे-छोटे अर्धस्वत न राष्ट्रों को अपने प्रमाव के अधीन रखना चाहता है। अत्यधिक रक्षा कर निससे जनता की यरवादी होती है, विदेशों का सस्ते माल से छा देना और उनमें बहुत कम सूद पर तथा नुकसान सहकर कर्ज देना, मजदूरों का शोषण और उपनिवेशों का रच-शोषण, यही तरीक है जो पू जीवादी अस्तियार करता है। पिराधी जो कमजोर होता है वह बरबाद हो जाता है या शकि- के प्रभाव में आ जाता है और जब विरोधी शक्तिशाली होता है तो उनमें एक प्रकार का समझौता हो जाता है। इस प्रकार एक अन्तराष्ट्रीय पूंजीवादी गुट की सृष्टि होती है जो बाज़ार और प्रभाव के क्षेत्रों का बंटवारा कर लते हैं । लकिन यह समझौता टिकाऊ नहीं होता और विरोध उमह ही पढ़ता है। किसी गुट को बँटवारे में कितना हिस्सा मिलेगा, यह उसकी शक्ति के कपर निर्भर है। किसी मी साझीदार की ताकत के घटने या बढने से समझौता टूटने लगता है और नये सिरे से बँटवारे की जरूरत पड़ जाती है । हालत कुछ भी हो, हर पूँजीपति अपना ही स्वायें देखता रहता है। सममीता से सधप की तीनता घट जाती है, उसका अन्त नहीं होता। रक्षा कर, पढ़यन, धूम जारी रहते हैं। सारी दुनिया पहले ही पैंट जाने के कारण अब विस्तार उसी हालत में सम्भव है जर एक का हिस्सा दूसरा बीन से। और इसके माने हैं लड़ाई। छाली गुट

फे पाय पहले उपाय के प्रयोग का कोई जरिया नहीं था। इसलिए
उसको दूसरे उपाय का अवलम्बन करना पड़ा। लेकिन यह
करना इतना आसान नहीं था। उन्नीसवीं सदी के प्रारम्म में,
मजदूगे की रिजर्व सेना के कारण मजदूरी मनमानो घटायी जा
सरती थी लेकिन अर मजदूर संघ इतने शरिशाली हो गए
थे कि ये कार मजदूरो फे कार रहते हुए भी मजदूरी को घटने
नहीं देत कार रेकार हो रहते हैं लेकिन जो मजदूर काम
पर लगे रहते हैं उनकी मजदूरी पटने नहीं पाती है । इसलिए
पजीपतियों को इन मजदूर सां को दबाने की आवश्यकता
पड़ी। हिटलर ने पंजापतियों के इस उद्देश्य में हाप पटाया।
स्टिन्स, फिडफ, यिसेन श्रादि बड़े बड़े उद्योगियों के बारे
ही हिटलर फासिस्ट ग कायम करने में समर्थ हुअा था और
शक्ति प्राप्त करने के बाद उसने पंजीपतियों को मित्रता स.स
निमायो। जनवरी १९३४ के एक मान से मिलमालिक 'नेता'
बनाया गया और फेक्टरी के मजदूरी का वाध्य होकर उसका
अनुयायी बनना पड़ा । श्रय स्वय नेता कोही निम्नलिखित
विषयो पर फर्मान निकालने का अधिकार मिला
(१) मजदूरी के दिन के प्रारम्म अन्त के समय
का निणय।
(२) मजदूरी चुकाने का तरीका और समय का निर्णय ।
(३) ठेका और खुचरे काम के आधार का निर्णय ।
(४) जुर्माने की किरम, रक्कम और प्रदायगी तरीके
का निर्णय तया
(५) उन श्राधारों का निणय जिनके रिना पर बिना
नोटिस दिये हुए मजदूरी को निकाला जा सकता है।
दूसरे शब्दों में मम की शर्ते, पास के घरटे, सुचरे काय
का दर सभी मिल मालिक की इच्छा पर निर्भर है। यह सब है

कि तयापित "मजदूरों के ट्रस्टी के पास मजदूरनपान कर सकता है लेकिन यह नाम मात्र का अधिकार है क्योकि अधिकांश ट्रस्टी या तो पूँजापति या उनके प्रतिनिधि ये (जैसे हेन मग का ट्रस्टी लो पहल राहलने में लोहा गलाने के कारखानों का मैनेजर था)। नारसी शासन मे जर्मन एकाधिकारी पूंजी क्या लाम हुप्रा यह १६३३ में हिटलर क हाथ में शासन की बागडोर श्री जाने के बाद के मजदूरी और मुनाने के आँकड़े बताते हैं। सेकर काल में मरदूरियाँ पैसे ही पट गई थी, १६३३ में यह और भी घटा दी गई और तय से श्रर तक मजदूरियाँ बढी नहीं यद्यपि कुछ दिनों में वेकारों का सल्ला बहुत घट गई । और कि जीवनधारण की सामपियों का मूल्य १६३८ में करीब पांचवा हिस्सा बद चुका था, इसनिए. पास्तविक मजदूरी और मी घट गई। इधर काम के घरटे और बढ़ गये। विशेषकर पियारों के कारस्थानों में जहां मजदूर साधारणतया हस्ते में ए. पपटे काम करते थे। लेकिन शेयर होल्डरों के हिवीडे दुगुने हो गये। सरकारी शाकदी की बुनियाद पर जे, कुजीस्की के गण नानुसार १६२९ ३० के बीच सारे मजदूरों और तनख्वाद पानेवाले नौकरों की कुल ग्रामदनी केरल २४ श्रीसदी बढी पी। जबकि वही सनराइ पानेवालों तथा मिन्नमानिको को कुल आमदनी १४ फीसदी रही। बहुत लागों का विश्वास है कि नात्सो राष्ट्र ने मजदूर और मिनमालिक दोनों को नियत्रण में रखा । लेकिन यह भूल है। राष्ट्र नियनित उद्योगों को जिस प्रकार व्यक्तिगत पंजीपतियों के यो सौग गया वही जमन पिनान्स यू जी और नासो गष्ट्र के सम्पप के सच्चे स्वरूप को प्रगट करता है। प्रजातन्त्र शासन काल में कोयले को सानो तया जहाज पनाने के कारखानों के अधिकाश शेयर राष्ट्र के हाप में । सक्ट काल में दिवालियेपन से बचाने के लिये भी बहुत से कारखाने राष्ट्र ने अपने हाथ में ले लिए ये । इस प्रकार चीन बड़े-बढ़े या मी राष्ट्र के हाथ में थे लेकिन १६२६ तक ये सबके सय पूँजीपतियों की व्यक्ति सम्पचि बन गए । इसी तरह १९३२ में सरकार ने, स्टोल ट्रस्ट जो दिवालिया हा रही थी, के vिate शेयरों का तिगुदाम पर खरीद लिया था। लेकिन १६३६ स्टोल टूरट को उसकी पुन लौटा दी गई । जहाजों के कारखानो की भी यही कहानी है। इसी तरह उत्तरी साइलीशिया के लोग गलाने के कारखानों के राष्ट्र के शेयर कुरत के हवाले कर दिये गये । एकमात्र गेरिंग के विगट कारखाने में अधिकांश शेयर सरकार की सम्पत्ति थी लेकिन वह इसलिए कि सि लाहे का यहाँ इस्तेमाल किया जाता या यह बहुत सगर किस्म का था और हर प्रदेश क स्टोल छन्नाट यह समझते थे कि इससे उनको अधिक मुनाफा नहीं मिल सकता मजदूरी का मसला हल करने के बाद नासी सरकार का ध्यान गया उपनिवेशों की प्रार। पंजीगदी व्यवस्था का समन विनाश से रोक्ने का यही दूसग उपाय या। न केवल यूरोप के पाहर के देशों के बल्कि सारे यूरोप यो हो उहाँने एक मन बड़ा उपनिवेश बनाना चाहा । एक विश्वव्यापी समर पर ही इसकी বলা নিষ যা স্ত্রী ও এবিয়াম চুম্মা নাম সুখ नीति जिसका मूलमन गरिंग के शो में है-'मसन नहीं, अधिक बन्दूक' । युद्ध के समय बाहर से चीजें नदी मिल सकती। इसलिए इस नाति का यह भी अय हुआ कि ऐसी चीजें देश म हो पैदा की जायें चाहे इस प्राधिक नुकमान मले हो हो । इससे मजदूरों और साधारण जनता का क्या हानि पहुँची, वतमान जमनी ही इसका साक्षी है। १६०

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Marx Vaadi Arth Shastr

Author
Sanayal,bhupendar Nath
Title
Marx Vaadi Arth Shastr
File name
Marx Vaadi Arth Shastr
Text
OCR done
Citation
1959
Published
2010/12
Publisher
Prayag,indian Press Ltd.
Language
Sanskrit
Pages
162
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Economics
DLI number
515007
Barcode
4990010022669.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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