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Rigved Tatvam

Shastri,revashankar · 2012/08

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ऋग्वेद तत्त्वम्
किंवा
ऋग्वेदान्तर्गतो वेदान्त विषयः
श्री सायणाचार्य विरचित भाष्य सहितः
महेता इत्युपाख्य जीवनराम तनुजन्मना
रेवाशंकर शास्त्रिणा, .
मणीतेन (हिंदी) मापानुवादेन समेतः
।
छाया इत्युपाव्ह विजयशंकर ननुज
गुलावराय वकील,
इत्येतैः प्राकाश्यं नीतः
संवत् १९८२.
राजकोट.
सन् १९२६,
(अस्य पुनर्मुद्रणाधिकारः प्रकाशकाधीन एय.)
थी परमार प्रेस-राजकोट.

rammar
H
ब्रह्मनिष्ट महात्मा श्री रंगिन शर्मा,
(अन्तिमाश्रम ) ब्रह्मीभून शंकरानन्द सरस्वती.

॥ वद सत्परमात्मने नमः ॥ ऋग्वेदतत्व' याने 'वेदमें वेदान्त' नामके यह लघु पुस्तक मेरे परमगुरुश्री रंगिनशर्मा (और संन्यासानन्तर शंकरानन्द सरस्वती गुरुश्री कैवल्यानंद सरस्वती) को, उनोने भवभयतारण जन्ममरणविदारण परमपदकी प्राप्तिका मार्ग बतलाया इससे स्मरणार्थ परम अभेद भक्ति सहित अर्पण करता हुं. वकील गुलावराय विजयशंकर छाया. परम गुरुश्री रंगिनशर्माका उपकार उनके शब्दोंमें उनके भावमात्रको लेकरके विदित करता हूं, इससे उसमें वर्णित स्थितिको में प्राप्त हो चुका हुं ऐसा. मेरा कहनेंका आशय नहि, राग भजन. , अनु०१ अनुकंपा तारी अनूपम आम में जाणी, वाणीथी नाय ना वखाणीरे अनुकंपा० अंथि भेदाणी मारी, शंका छेदाणी सपळी कर्मनी कोटियो कपाणी, त्रिविधिना ताप मारा, चिंता अंगारा ठार्या, ज्ञानगंगानां पूर आणीरे. दृश्य प्रपंच सपळो समरस भासे प्रभु, न्यून अधिकता हणाणी; 'भाव अभाव केरी, भावना छुटी सर्वे, स्वप्नानी बाजी समजाणारे. अनु० २ गुरुए गोविंद मारा, घटमां प्रकटाव्या तेमां, मस्त रहे छे मन वाणी; 'घन्य रंगीन छूटी ताणमताणी शाणी, समताराणीथी सुख माणीरे. अनु० ३ - " N प्रकाशकका विज्ञापन. यह लधु पुस्तक की जिसका संक्षिप्त नाम 'ऋदतत्त्व याने 'वेदमें वेदान्त' दीया गयाहै, उसको प्रकाशित करने की शक्ति परमात्माने कौन कौनसी व्यक्तिद्वारा दी, उन् व्यक्तियाँके उपकार माननेको दो एक शब्द लिखनेको भावश्यकता मानताई. पुस्तकका नाम और तदन्तर्गत विषयों के लिये मेरे परमगुरुश्री रंगिन- शर्माका यथार्थ उपकार मानता हु. और उनके अप्रतिम उपकारको प्रदर्शित करके मेरे दिलको संतुष्ट करने के लिये यह पुस्तक उन महाशयको समर्पित किया है. जामनगर हाइस्कूलमें दूसरी भाषाके रूपसे संस्कृत भाषा ली थी. इससे स्कूलमें शिक्षणीय पुस्तकोंसें अतिरिक्तभी कइएक पुस्तकों का परिचय करने का विचार होनेके बाद मेरे सद्गत मित्र त्रिभुवन प्रेमजी (प्रश्नोरा नागर ) के पास मेरे सद्गत मित्र केशवलाल मणिशंकरके साथ खुवंश तथा किरातार्जुनीय काव्यके अमुक सोंका परिचय किया. इस वजहसें संस्कृत भाषामें कुछ अधिक अंशसे प्रीति हुई. राजकोटमें वकीलात् रोजगार के बादोलत निवास होनेसे श्रीयुत सद्गत वे. पू. आचार्य वल्लभजी हरिदत्तके तरफसे चारो वेदोंके पुस्तक मात्र ा रु. दाममें प्राप्त होते हैं ऐसी खबर मिलनेसें 'वेद परमात्माकी वाय प्रतिमा है और घरमें होय तो अच्छा, ऐसा विचार करके वे पुस्तक मंगवाये गये, और ऑफिस में प्रतिक्षण दर्शनार्थ पृथकू रक्खे गये. उस् मोकेपर महात्मा भीखाभाईके समागमका प्रारंभ हुवा, मेरे पिताजी के पास वे हरदम आया करते थे और रहा करते थे. मेरे पिताजीके शरीरका अवसान होने के बाद ऋग्वेदके अध्ययनार्थ स्फुरणा हुई. और मेरे मातृकुलके पुरोहित पूज्य पंड्या नावामाई मोतीरामको राजकोटमे युलाकरके उनसे कन्वे- दका नियमित सस्वर अक्षरोचारणात्मक अभ्यास किया. महात्मा भीखाभाई पिताजीके अवसानानन्तर भेरे यहांही निवास करने लगे. वे अच्छे वेदान्त- 7 [५] वित् थे. इससे उनोंने मेरी चितरूपभूमिकाको वेदान्तविपयके योग्य बनाने को प्रयास किया. दूसरी तरफसे ऋग्वेदका अर्थ समजने की भावश्यकता मानके सदत केशवलालजी के साथ विचार करके ऋग्वेदका सायणाचार्यरचितमाप्य, की जिसके आठ पुस्तक है वे मंगवाये. सार्थ वेदमाप्यके अध्ययनमें जामनगर राजकीय संस्कृतपाठशालाप्रधानाध्यापक और दूसरे समयमें राजकोट ट्रेनींग कोलेजके संस्कृत अध्यापक श्रीयुत शास्त्रीजी नारायणजी मूलनीने बहुत मदद दी, उनके साथ मेरा अत्यन्त स्नेह था, और उनके ज्येष्ठबंधु सद्गत भीमजी व्यासका मेरे पिताजी के साथ घनिष्ठ संबन्ध था. शास्त्रीजीका थोडे रोजके बाद काशीपयाण हुवा और थोडे दिनों में उन्का देहान्त हुवा, परंतु थोडे समयमेंमी उनोनें भाष्य समजनेकी ऐसी पद्धति बतलाई, की उनकी कृपासें भाष्य संपूर्ण परिपित हुवा. और उसके अनन्तर नित्य स्वाध्यायके रूपसे आवर्तन करते करते तदन्तर्गत संशय प्रायः निवृत हुवे. वेदमें व्यावहारिक विषय अनेक आते है, और ऐसा कोई प्रसंग नहि होगा की जिसकी विस्तृत या संक्षिप्त चर्चा वेदमें न हो. ऐसा विचार करके प्रत्येक ऋचाकी एक नोट की. सन १९११७ १९१५ तक वह पूर्ण हुई. उस् कालमें परमगुरु रंगिनशर्माका समागम हुवा और उनके बादो. लत वेदान्त विपयोंमें प्रवेश हुवा. और नित्यस्वाध्यायमें वेदके परिशीलन काल, अध्यात्मविषयमतिपादक ऋचार्य जितनी दृष्टिगोचर हुई उन् सोंका नोट की. श्री रंगिनशर्माकै अवमानकालने, प्रसंगवशात् 'वेद वेदान्तविषय आता है। ऐसे मेरे कथनसे उनोने स्वयं देखने का कहा परंतु शारीरिकस्थिति निर्मल होनेसे और अन्तसमय 'शंकरानन्द सरस्वती ' योगफ्ट धारण करके संन्यास लेनेके बाद समाधिस्थ हो गये इस वजहसे में उनको दिखलाने पाया नहि, लेकिन उसी समयमें उन् ( अध्यात्म विषयक) ऋचाओं को प्रसिद्ध करनेकी स्फुरणा हुई.

। [६] श्री रंगनशर्माके अवसानके पूर्व और पश्चात्मी परमहंस हरदेव भारतीके साथ निकट परिचय था. श्री रंगिनशर्माके पास जो कोई पढने योग्य उपनिषदें अपूर्णथी वे उन हरदेव भारतीजी के पास पूर्ण की, उसके अनन्तर करीब दो वर्ष के महाराजभी समाधिस्थ हुवे. उसके बाद परमहंस स्वामी हरिप्रसादजीसें भ्रांगध्रामे मुलाकात हुई. चे महाशयमी अध्यात्मविषयक ऋचाओंकी प्रसिद्धि संमत हुवे. महात्मा नवलशंकर मोतीराम की जिन्को बचपनसें वेदान्तका परिशीलन था, पे जामनगर और राजकोटमें रहाफरते थे. जब वे राजकोटमें आतेथे तब हमेशां मेरे पर कृपा करके मकान पर पधारतेथे और भिन्नभिन्न वेदान्त ग्रन्थों को बांचते, और इस तरह अपने अनुभवका लाभ देतेथे. मुजसे वे वयोवृद्ध तपोवृद्ध थे, तथापि उतना श्रम लेतेथे. उनका में उपकार मानता हुं. अखीरमें शास्त्रीजी रेवाशंकर जीवनरामका राजकोट में आगमन हुवा.. और उनोंने काशीजीमें व्याकरण और वेदान्तम परीक्षा दीथी इससे उनके संग अध्यात्मशास्त्रके परिशीलनका प्रारंभ किया. उनसे प्रसंगवशात् वातचित होनेसे ऋग्वेदान्तर्गत अध्यात्मविषयक ऋचाओंके छपवानेमें प्रोत्साहन मिला और प्रत्येक ऋचाके सायणाचार्योक्ति भाष्यका हिन्दी भाषा अनुवाद करनेका उनोंने मंजूर. किया. और बहुतही परिश्रम के साथ उनोंने यह कार्य किया. इस भाष्यके (हिन्दी) अनुवाद की संगतिके विषयमें, परमपूज्य परम- हंस स्वामी माधवानन्दपुरीका राजकोटमे अनायाससे चातुर्मास्यके लिये आगमन हुवा था, उनको थोडासा भाग बतलाया, उनोंने संमति के साथ पसंद किया. इस प्रकार पुस्तककी प्रसिद्धिमें जिन् जिन् महात्मा और गृहस्थोंने आश्रय दिया उन सोंका में उपकार मानता हुं. पुस्तकान्तर्गत विषयों के बारेमें यही वक्तव्य है की-वेद अपौरुषेय और अत्यन्त गंभीर है. ऋग्वेदमें समस्त ऋचायें १०७४० हैं. और उसके दशोपनिषद् हैं. उपनिषद् यह वेदान्तविद्यारूपही है. उस स्थिति इस पुस्तककी भीतर जहां मात्र १४८ ही ऋचार्य पृथक् की गई हैं इनकी कौन गणना हो सके ? निर्णय' यही है, की सायनाचार्य - [0] के भाष्यमें स्पष्टतया जिन जिन ऋचाओंकी अध्यात्मपरता मुझे अवगत हुई बेही ऋचायें पृथक की गई है. वेदान्तज्ञानकी उपलब्धिमें प्रथम निष्कामकर्मद्वारा चिचशुद्धिकी परम आवश्यकता है. और विक्षेपादि दोपोंके निवर्तनानन्तर आत्मानात्मवस्तु- विषयक विवेक प्रकट होता है. उसके बाद अनात्म वस्तु के तरफ वैराग्य होने मात्मवस्तुकी जिज्ञासा होतीहै. और तत्पूरणार्थ ब्रह्मनिष्ठ श्रेत्रिय गुरुके पास उपसदनविधिपूर्वक अध्यात्मविषयका श्रवण मनन और निदिध्यासन करने में परब्रम परमात्माका साक्षात्कार हो सकता है. यह पद्धति इस् पुस्तकों की सवा- मोमें क्रमसहित बतलाई है. यद्यपि ऋग्वेदमें वैनी संकलना बहुत करके वेदान्तज्ञान की प्राप्ति के लिये है ऐसा कहे सकें हैं, तथापि इस पुस्तकमें पैदा- न्तशास्त्रकी एक मुख्यप्रक्रिया यथार्थ संकलित विदित होतीहै. जैसे उच्चकोटिके मुमुक्षुके लिये आत्मपदार्थमें अनात्मपदार्थका अध्यारोप करके पश्चात् अपवाद पुरःसर शुद्धब्रह्मका स्वरूप उपदिष्ट किया जाता है. और उसी प्रकार सृष्टयु- सति श्रुतिमें अध्यारोप स्पष्ट प्रतीत होता है. और 'नासदासीत्' सूक्तसे 'सृष्टयु- सक्केि प्राकालमें क्या था, यह बतला करके 'सृष्टि कैसे हुई' यह कहा गया है. उसके बाद परमात्माका स्वरूप वास्तविक कैसा है यहभी कहा है. इस प्रकार अध्यारोप और अपमादसे परमेश्वरका वास्तविक स्वरूप कहा गया है. पूर्वोक्त संकलनाका सावधानतासे मनन होगा तो यह पुस्तक पारमार्थिक आत्मस्वरूपका प्रकाशकरूपसे प्रतीत होगा. मूल मंत्र (ऋचा) के पूर्व चार अंग दीयें हैं. वे सब प्रचलित संख्या, अष्टक संख्या, अध्याय संख्या, और वर्ग संख्या बतलाई गई है. और वे स. अ. अ. व. अक्षरोंसें प्रदर्शित की गई है. ॥ॐ तत्मत् ॐ ॥

[८] ॥ तत्सत्परमात्मने नमः॥ ऋग्वेद, (के अन्तर्गत विषय), १. मग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ऐसे चार वेद है, शास्त्रमें अमुक स्थलमें "वेदत्रयो " ऐसाभी कहा गया है, परन्तु अथर्ववेदका... मग्वेदमें समावेश करके वह वाक्य उच्चारित किया गया हो ऐसा समझा जाता है. ( अष्टक ३-८ १० ऋचा ३ में "त्रयो अस्यपादा" तीन वेद है एसा लिखा है, उसके अनन्तर पुरुष सूक्तके ८४-१८ में मचा ९ में तीन वेद प्रकट हुवे ऐसा लिखा है. २. शास्त्रीय रीतिसें वेद अपौरुषेय माने जाते है, याने किसी मनु- प्यके कृतिविषय वे है नहि, परतु बृहदारण्यक उपनिषद् ( अध्याय २ ब्राह्मण ४ म. १०) में वेद परमात्मा के निश्वासरूप कहे गयें है, वह श्रुति-" अस्य महतोभूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेद सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुरा- णम् " (इत्यादि) इस् सरहकी है, और इसी लीये वेदके प्रत्येक अ यायके प्रार- म्भमें सायणाचार्य- अपनें भाप्यमे मगलाचरणरूपसें लिखा है की- यस्य निश्वसित वेदा यो वैदेभ्योऽखिल जगत् । निर्ममे तमहवन्दे विद्यातीर्थमहे वरम् ॥ ३. दुसरी तरफ पुरुष सूक्त जो ऋग्वेदमें अष्टक ८ ४-१७, १८, १९, में है, उसके वर्ग १८ के ९ मत्रमें, और जो पुरुष सूक्त यजुर्वेदमें ३१ अध्यायके ७ मत्रमें है, जिसमें ऋग्वेदकी अपेक्षासे ६ मत्र अधिक हैं उसमें, और अथर्ववेदमें काड १९-२-६ में मत्र १३ में है, जिसमें १६ मत्र हैं, परंतु मत्रान्तर्गतशब्दोंकी रचनामें कुछ विशेष है, उसमेंभी, मग्वेदमें जैसा कहा है तैसाही बतलाया है यही ऋग्वेदका मत्र है की-" तस्माद्यज्ञासर्वहुत सच सामानि जज्ञिरे । छन्दासि जनिरे तस्माद्यजुम्तस्माद जयत" परतु उस का अर्थ ऐसा नहि है की जैसे आकाशादिककी उत्पत्ति परमात्मासे हुई है तैसे ही वेदोंकी उत्पत्ति भी परमात्मासे हुई, लेकीन उसका यही अर्थ है की महा- , , 7 [९]. प्रलयकालमें वेदभी परमात्माके स्वरूपमें लीन हो जाते हैं, और-पुनः मुष्टिकं समय उनका आविर्भाव होता है, उस रीतिसें अर्थ करनेसें. वृहदारण्यक श्रुतिके साथ विरोध आता नहि. इस विषयमें श्रीमद्वेदव्यासभगवत्मणीत वेदान्तसूत्रों- के जगद्गुरु श्रीमच्छ कराचार्यमणीत माप्यमें और " ब्रह्मामृत वर्पिणी" नामक उन् सूत्रोंकी (स्वतंत्र) टीका सविस्तर निर्णय किया है (वेदान्त सूत्र १-३-२८ तथा २९ में देखो) याने वेद किसी मनुष्य की कृति नहि हैं किन्तु अपौरुषेय है. १. वेद अपौरुषेय होनेपरभी किसी एक स्थानमें वेदोंकी रचना हुई है ऐसा कोइ लोक मानते हैं. दृष्टान्त रूपसे कहा जाय तो जिनकी विपुल शास्त्र- दर्शिता प्रतीत होती है वैसे लोकमान्य मरहुम श्रीवालगंगाधर तिलकर्ने वेदोंकी रचनाके कालनिर्णयमें प्रयास किया है, और यह प्रसंग उनोने रचे हुवे Artic Homes " आर्टिक होम " नामक पुस्तकमें उपलब्ध होता है: उसका यह अभिप्राय समझा जाता है की-कोसी एक प्राचीन समयमें मनुष्योंका निवास उत्तरध्रुबके निकटके प्रदेशमें संभवित हो सक्ता है, और उसी स्थानमें वेदोंकी रचना उसी समय हुई हो यह उपपन्न होता है. इसमें प्रमाणभूत ऋग्वेदकी ऋचा और पारसीओंके झन्ड भापाके ग्रन्थमेंसें फारेओंका परस्पर मिलान करके उस परसें ऐसा कहते हैं की-उसमें लिखे मुताबिक सूर्य चन्द्रकी गति छत्राकार वर्तुल दिख पडती थी, और यह वर्तुल गति उत्तरध्रुबके निकट प्रदेशमें रहनेवाले लोकों कोही प्रतीत हो सके, इसमें उत्तर ध्रुवके निकट मनु- प्यों का निवास सिद्ध होता है. परंतु वह कल्पना ठीक नहि पाई जातीहै ऐसा निम्न प्रदर्शित हकीकतसें मालुम पडता है. (१) अष्टक१-६-२५ रूचा १० में सूर्य के उदय और अस्तका वर्णन है.उत्तर ध्रुवके निकट प्रदेशमें वैसा होना दुर्घट है. ( वस्तुतः सूर्यका उदय और अस्त होता नहि. केवल जब मनुष्योंकी दृष्टि मयादासे वहार उनकी गति है तब अस्त माना जाता है) फिर २-७-७ ऋचा ९में प्रदर्शित किये गये सूर्यके विशेषणोसेंभी यह बात पाई जाती है. औरभी ४-७-३४ ऋचा २१में भी देखनेसें संशय निवृत्त हो सक्ता है. (२)सग्वेदमें किसी एक स्थलमे पांच कतु होनेका बतलाया है और अधिः कमास होनेकामी वृतान्त है (२-८-६ चा ३). परंतु उत्तरध्रुवके २ [१०] प्रदेशमें पांच या छ ऋतुयें होनेका संभव नहि है. ऋतुओंका विभागभी सूर्यको गतिकी अपेक्षा रखता है. वहांतो शिशिरसमय जादेतर रहना चाहिये. छ ऋतुओंकी जगापर पांच ऋतु लिखे हैं इसका समाधान यही है की हेमंत और शिशिर ऋतुको एक ही माने हैं ( अष्टक २-८-६ ऋचा ३के भाष्यमें और ऐ. बा. १-१ देखनेंसें नित होगा ). और अधिक मासको सप्तम ऋतु अष्टक २-३-१६ ऋचा १५ के भाष्यों कहा है. (३) प्रस्तुत विषयमें आनेपर ऋग्वेदमें जहाजके उपयोगके दृष्टान्त अनेक त्यलार हैं. (१-२०१७ ऋचा ७, १-४-२१ कचा २,४-३ २४ मचा २, ८-२-४ मचा १०) उसी प्रकार से ९९ नदीयां कहींहैं, मुख्य २१ उनमें भी प्रधान नदीयां ७ कहीं हैं. जहाजोंका उपयोग और उतनी बड़ी संख्यावाली नदीयोंका उत्तरध्रुव प्रदेशमें होनेका संभव पाया जाता नहिं. कारणकी विशेष वरफ होनेसें वैसा होना संभावित नहि है. नदीयोंके गंगादिक नाम दीये हैं इससे पूर्व कल्पनेमी वेही नाम होंगे ऐसा सूचित किया जाना है. नदीयोंकी अधिक संख्या के विषयमें १-२-३८ ऋचा १४ में ९९नदीयां होनेका बतलाया है. और ७-८.२४ ऋचा ३ और ८-२-१६ ऋचा १२ में ७ नदीयां मुख्य है ऐसा लिखते हैं, और ८-२-७ ऋचा ८ में २१ नदीयां होनेका लिखा है, और ८-३-६ चा १ और ५ में प्रधान तो ७ ही हैं ऐसा नाम निर्देश करके दिखलाया है. और ८-३-७ ऋचा ८ में ऊर्णावती नदी कही है, जिसके तीरपर ऊर्णासमान रोमवाले पशु होते हैं ऐसा भी लिखा है. (४) और नितिलक कहते है की किसी कालमें हिमके अधिक पातकी संभावना करके मनुष्यलोक अपनी जान मिल्कत बचानेको उपरसे नीचे अनु क्रमसे आये. मि. तिलकका यह कथन है की वैसा हिमपातका समय अमुक वर्षों के अनन्तर आता है, इससे यह अनुमान हैकी मनुष्यसष्टि उतर- चुपके निकट करीब अमुकसहस्त्र किंवा अमुकला वर्गाको पहिले था, लेकिन ऐसा हो वोमी इसी हेतुसे वेदोंकी रचना भी उसी स्थान और उसी समय होनी चाहिमे ऐसा शास्त्रविरुद्ध माननेका कारण नहि है. जहां परमारमा वेदोका आपिर्माय मानते है वहां उस स्यका उस प्रकारका वन वेने उपलब्ध हो तो कोई बाध नहि है.

“ [११] ५ वेदकी अपौरुषेयताके लिये मन्त्रों के दृष्टा ऋपिलोक भी कौन थे उस विषयपर सायणाचार्यने लिखा है उससे भी समझा जाता है, तस्य सूक्तम्य दृष्टत्वा तदीय ऋषिः। वेदप्रात्यर्थ तपोऽनुतिष्ठतः पुरुपान्स्वयंभूदपुरुपः प्राप्नोत् , तथाच श्रूयते-अजान्हवै पृश्नोस्तपस्यमानान्तर स्वयंभ्वभ्यानर्ष चषयोऽभवन्निति । तथा अतीन्द्रियस्य वेदस्य परमेश्वरानु- प्रहेण प्रथमतो दर्शनात् सपियमित्यभिप्रेत्य स्मयते- "युगान्तेऽन्तर्हितान्वेदान्सेतिहासान्महर्पयः । लेगिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयंभुवेति ।।" अटक १-१-१ अनुक्रमणिका ६ वैदिकमुनि हरिप्रसादकृत वेदसर्वस्वमें वेदका आविर्भाव और विभागके विषयमें लिखा है की- मनुष्य सृष्टिके आरम्भमें मनुष्यमात्रके लिये ईश्वरकी अपार दयासे ऋषियोंके हृदयमें जिस ज ना प्रकाश हुवा वही ज्ञान यहा वेद शब्दका ज्येष्ठ अर्थ विवक्षित है। वह जिस आनुपूर्वी विशेषयुक्तशब्दपिशेपसे मनुष्य मात्रमें फैलाया गया, उमको " वा " कहते है। (पृष्ठ ९) इस वाड्मय मन्त्रके तीन विभाग किये है। उनकी प्रतिपादक श्रुति यह है “ साना एषा वाक् त्रेधा विहिता, मचो यजूपि सामानि" उन मन्त्रों का नाम मचा है जिनमें अर्थवशपादोंकी व्यवस्था है, अर्थात् जिन मन्त्रों में अर्थ अधूग न रहे, पूरा कहा जाय. इस प्रकारके अर्थ- बन्धनसे 'एक एक पादमें इतने २ अक्षर हों, न्यून वा अधिक न हों,' इस प्रकार पादों की मर्यादा है, उनको नचा कहने है." गौतिपु सामाख्या ' (मी. २०११ ३६) जो मन्त्र गाये जाते है, उनकी सज्ञा साम है। 'शेपे यजुः शब्द " (मी. २१११३७) मत्रा और सामसे शेषमन्त्र यजु शब्दसे को जाते है. (पृष्ठ ११) जिन मन्त्रों मचा नामसे कहा गया है, वे अवान्तर भेदसे दो प्रकार है-एक चे, जिनका यज्ञादि कर्मों में स्थञ्चिद् उपयोग है. दुसरे थे, जिनका यज्ञादि कमों में कथश्चिदी उपमोग नहिं, किन्तु भैपज्य तथा राजनीति आदि अनेक सर्वजनसाधारण लौकिक विषयों का प्रतिपादन करते है। इन दूसरे प्रकारके मन्त्रों को सज्ञा " अथवा ङ्गिरस" है.

. . [१२] ७. ऋग्वेदमें ८ अष्टक है, १० मंडल है, ६४ अध्याय है, १०१७ सूक्त हैं, २००६ वर्ग हैं, और अचायें १०४७२ (परिशिष्ट वर्जित) हैं, इस प्रकारसे ऋग्वेदका विच ' ऐसा नाम यथार्थ है । ८. वेदोमें कर्म उपासना और ज्ञान इन् तीन कांडों का समावेश होता है, यजुदमें देखते हैं तो चालीसमें अन्तिम अध्यायमें ईशावास्य उप- निपहीका भाग पाते हैं, ऋग्वेदके अन्तिम अष्टम अष्टक वेदान्त भाग ही अधिक रूपसे उपलब्ध होता है, लेकिन उससे अन्तिम भागहीमें अध्यात्म विषय होनाही चाहीये ऐसा कहे सक्ते नहि, पहिले अष्टोंमेभी वेदान्त विषय बहोतसी ऋचाओंमें मालन पडता है. ज्ञानभाग अथवा वेदान्तको वेदका शिरोभाग कहा जाता है, इससे वेदके अन्त भागहीमें वह विषय होना चाहिये ऐसा संकुचित अर्थ सकारण नहि है, वेदकी कांडत्रयीने अध्यात्मविषय अमतिमफलक होनेसें उतको शिरोभाग कहते होय तो अनुचित नहि है. ९ ऋग्वेदके अन्तर्गत विषयोंके तलाशकी पहिले यह विषय अवश्य ध्यानगोचर करना चाहिये, वह यहकी पूर्वोक्त प्रकारसे वेद परमेश्वरके निवास रूपही है, मनुष्यकी कृति नहि हैं. इस विषयमें शास्त्रोंके वचनोंपर अचल श्रद्धा होनी चाहिये, और वेदमें ऐसे विषय, ऐसे नाम, और ऐसे इतिहास की गाथा उपलब्ध होती हैं की जिनसे साधारण लोकोंको वेदकी अंचिनिताका भ्रम हो जाता है. विशेषभे जनतामें विद्याके अधिक प्रचारसे और सुधारणा में प्रगति के वजहसे उन् नामादिकका उपयोग संमवित है इस लिये वेद परमेश्वरके निवासरूप न हो करके आधुनिक है ऐसी शंका निरवकाशही है, यह निम्नमस्ति विषय स्फुट होगा. १०. ऋग्वेदमें इस विषयका निर्णय पाया जाता है, और वह अष्टक ८-८-४८की तृतीय ऋवा स्फुट है, उसमें " यथापूर्वमकलयत् " ऐसे शब्द हैं. सायणाचार्य उसपर भाप्यके रूप लिखते है की • यथापूर्व पूर्वस्मिन् काले अकल्पयत् सृष्टवान् तथैवागामिन्यपि कसे कसायिव्यतीत्यर्थः।" व्यास सूत्रोममी इस विषय की चर्चा है, सो उसपर शहरमाध्यमे विशदी- करण होता है. देवता मोको ब्रमज्ञानका अधिकार है की नहि इस विषय संशय होनेवाद निराकरण के लिये वेदही नित्यतासदिश प्रसंमें स्व १-३- .

. . [१३] २८में उस विषयको सप्ट किया है. वहां ऐसा सिद्धान्त प्रदर्शित किया है की नाम और रूप याने आकार सर्वदा जो सनातन याने अनादि है उनहीं नाम रूपको चित्तमें याद करके सृष्टिको उत्तति प्रत्येक कलमें ईश्वर करते हैं, " अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा । आदौ वेदमयी दिव्या यतः सर्वाः प्रवृचय:"। सूत्र १-३-३०में वही विषय है, वहांनी ऐसे शब्द है की "समान नामरूपत्याचाऽऽचा वप्यविरोधो दर्शनास्मृतेश्च " उस सूत्रकी ब्रह्मामृत चर्षिणी" नामक (१-३-३० सूत्र की) टीका महाभारत का श्लोक प्रमाणरूपसे दिया है- “ यथर्तुप्यतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्वये । दृश्यन्त तानि तान्येव वथा भावा युगादिपु ॥ ऋषीणां नामधेयानि याश्च देवेषु दृष्टयः। शन्ते -प्रसूतानां तान्येभ्यो ददात्यजः ॥ " भगवान् भाष्यकारभी १-३-२८ सूत्रके माप्यमें लिखते हैं की-" नाम रूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् । वेदशब्देभ्य एखादौ निर्नमें स महेश्वरः ॥" इन सब प्रमाणों से स्पष्ट अवगम होगा की वेदमें नाम, आकार, इतिहास इत्यादिक सब प्रत्येक कल्पके बहके वही चले आ रहे हैं। इससे वेदको आधुनिक किंवा मनुष्यों की कृति कहनेका अवकाश नहिं है. ११. पूर्वोक्त प्रकारसे स्पष्ट रूपसे अध्यात्मविद्या कई एक सचामें पाई जाती है परन्तु दुसरे प्रकार प्रायः अधिक रूपसें देवताओंको परमेश्वर स्वरूपसें वर्णित किये हैं, इतना ही नहि लेकिन कई एक प्रसंगपर कई एक पदार्थो कोमी देवनारूपसे कहें हैं, और उती पद्धति गूह रूपसंतो सफल दृश्य परमात्मस्वरूपही हैं ऐसा देदका हार्द पाया जाता है ऐसा कहनेमे अति- अयोकि नहिं मानी जायगी. उसके बाद अज्ञातबादकी तरह किंवा विवर्तवाद की चरह अथवा लयचिन्तनी तरह प्रत्येक दृश्यों का मूल कारणमें लय (चिन्तन) करनेसे वे दृश्य परमात्मरूपही हैं ऐसा भाव उपलब्ध होता है. प्रकार से जो पुरुष जैसा अधिकारी हो सो अपनी अनुकूलतानुसार उस प्रक्रियाको ग्रहण करे इसी हेतुसे भिन्न भिन्न प्रकार आत्मज्ञानार्थ प्रदर्शित किये होय ऐसा मालुम होवा है. १२. इस अन्तिम विषयको समग्र रूपले ख्यालमें रखके सायणा- चाक माध्यपरसे वैसी प्रक्रिया जिस जिस ऋचामें दिख पड़ी है उस उसको . [१४] अलक अलक तारण करके "ऋग्वेदतत्त्व" याने "वेदमें वेदान्त" नामक इस. पुस्तकमें प्रदर्शन करनेको यथाशक्ति प्रयास किया गया है. १३. पूर्वोक्तक्रमानुसार सब मिलके ऋग्वेदमें १०४७२ ऋचायें हैं. उनमेंसें वेदके अलक अलक प्रसंगसें सात विभाग निम्न प्रदर्शित प्रकारसे व्यवस्थित किये हैं- (१) शुद्धवेदान्त किवा अध्यात्मविद्या जिन् उचाओंका अर्थ हमको स्पष्ट . रीतिमें अवगत हुवा है वैसी ऋचायें. (२) तत्तद्देवताको उद्देश करके किसीको परमात्मा, अन्तर्यामी, नियामक व्यापक, इत्यादि रूपसे जिनमें वर्णन किये हैं वैसी ऋचायें, (३) मनुष्यमैसें तप और मंत्रके प्रभाव जो लोक देवत्वको पाये हैं उन • विषयोंको बतानेवाली ऋचायें, (४) देवताओंकी शक्ति किंवा पराक्रम बतलानेवाली ऋचायें. (५) वैदिक मन्त्रों के जपसे अथवा प्रकारान्तरसें यथाविधि अनुष्ठान करनेसे.. प्राप्त होनेवाले प्रभावको बतलानेवाली चायें. (६) पुराणों में कहे हुवे अवतार सरिखे प्रसंगोंको बतलानेवाली चायें. (७) व्यावहारिक विषयों को बतलानेवाली झवायें. पूर्वोक्त विभागों में किस किस रीतिसे प्रसंग अथवा विषय प्रदर्शित किये है सो निम्न भागम प्रदर्शित किया है. प्रथम विभागमें अध्यात्मतत्य और उसको उपलब्ध करने के.. लिये उपाय और ज्ञानका प्रभाव बतलाया है. पारमार्थिक तत्वको उप- लब्ध करनेको उत्सुक मुमुक्षु जनोंको अज्ञानको निवृत्ति द्वारा कामकोषादिक, विकारोको निर्मूल करने के लिये चिचशुद्धि संपादनार्थ निष्काम कर्म करनेत्री, अत्यन्त आवश्यकता है, यह विषय २.२-७ ऋचा १२ में निकाम यज्ञयागादि कर्म चित्तशुद्धिके द्वारा निरतिगयानन्दरूपब्रह्मप्राप्तिमें सहायक होनेसे संसारसागर उतरने का साधनरूपसे कहे गये हैं. किंवा उस्का नौकाला, सामर्थ प्रदर्शित किया है. ऋचा १ और ५,२-२-२४ में विष्णुशका अर्थ सर्वतन्त्र स्वतन्त्र अगाए और अचिन्तनीय शक्तिवाला व्यापक परबस परमात्मा. 7 [१५] (अर्थरूपसें ) बतलाया है, और उसी तरह २-३-१४ में ऋचा १,४,५ में भी ब्रह्मका अचिन्त्यशक्तिमत्त्व प्रकट किया है. और ब्रह्म किसीमा ज्ञेय (ज्ञान विषयीभूत ) नहि है यह भी निर्दिष्ट किया गया है. सवा १६,२-३-१७ में स्त्रीपुरुषादिक मंज्ञा (नाम) को निरवकाशस्वमदर्शन सहित संपूर्ण यह जगत् ब्रह्मस्वरूपही है ऐसा निणात किया है. उसके बाद ऋचा २० और वर्ग १८ की ऋचा २१,२२ में जीवात्मा और परमात्माका वास्तविक अभेद स्फुट कहा गया है. (इन तीनो कचा सहित १६४ सूक्त २-३-२३ तकका वामन सूक्त कहा जाता है, वह सब अथर्ववेद ९ काण्डके ४ तथा ५ अनुवाकके अन्तर्गत है, उसमें थोडासा विशेष है. ऋचा ३०, २-३-१९ में वैराग्य प्राप्त करने के लिये शरीरकी असारता और क्षणिकता बतलाकरके तदन्तःप्रतीयमान जीवात्माको नित्य निरूपित किया है, और २० वर्गकी ३२ चामें गर्भवासके ससस क्लेशसे बचनेके लिये आत्मज्ञानकी आवश्यकता सिद्ध कही हुई है. यह सब प्रकार निष्काम कर्मोंसे चित्तशुद्धि होने के बाद विरक्ति होनेसें साधनचतु- थ्य संपादन करके ब्रह्म के अपरोक्ष विज्ञानमें पूर्ण उपकारक बतलाये गये है. १५. इस प्रकार चित्तशुद्धि होजानेके बाद साधनचतुष्टयसंपन्न झे करके साक्षादपरोक्षपरब्रह्मके स्वरूपका २-३ २१ ऋचा ३६ सें, ३९ तक प्रदर्शन किया गया है. और यह अवश्य अपरोक्षज्ञान होनाही चाहिये ऐसा फुट कहा गया है. और ऋचा ४६ अष्टक २-३-२२ में परमात्मा एक होने परभी उपाधिके भेदसें भिन्नतया प्रतीत होता है ऐसा कहा हुवा है. और इसके मनन्तर अध्यारोप और अपवादकी प्रक्रिया पतला करके ज्ञान प्राप्त करने के मार्गको बतलाने के लिये समग्र भूतभौतिक जगत् परमात्मासें ही उत्पन्न हुवा है ऐसा २.५-२ ऋचा १ में निरूपित किया गया है. और द्यावापृथिवीका कारण कौन है और द्यावापृथिवीमसे पहिले कौन उसन्न हुवा है ऐसा प्रश्न करके समस्त स्थावरजंगमात्मक प्रपंच परमात्मामें मोतप्रोत है ऐसा स्पष्ट प्रतिपादन किया है. अष्टक ३-४.१० ऋचा १० गायत्री मंत्र है. सायणाचार्यने उस मंत्रका शावर भाष्य दीया है उसमें व्याहृति और शिरःसाहित गायत्री सन्त्रके प्रत्येक पादोंका रहस्य प्रकट किया हुवा है. (तथाहि) 'भूरिति सन्मात्रम्' . [१६] लोकमें जो कुछ सद्रूपसें अवस्थित है सो ॐकारवाच्य ब्रह्मही है. 'भूबइति चिद्रूपम्' परमात्मा स्वयंप्रकाश होनेसें सबोंको प्रकाशित करते हैं, इससे वह चिद्भप है, और 'स्वरिति सुखस्वरूपम्' परमात्मा अखंडानन्द रूप हैं. याने भूरादिक- सीनो व्याहृतियोंसें परब्रह्म परमात्मा सच्चिदानन्दरूप है, यह निर्दिष्ट किया गया है. इसी तरह भूरादिलोकभी ॐकारवाच्य ब्रह्मरूपही है. सिवाय परमात्माके और कुछ हेही नहिं यह समुदित अर्थ विशद किया गया है. व्याहृति और शिरोभागसेंभी सर्वात्मक अखंड अद्वितीय सच्चिदानंदरूप अर्थ समझाया गया है. याने सर्वव्यापक, सर्वप्रकाशक, सर्वोत्कृष्ट, नित्यमुक्त, आत्मरूप सच्चिदानन्दात्मक ॐ कारवाच्य जो ब्रह्म है वह में हुं यह तात्पर्य सूचित कर दिया है. १७. अष्टक ३-५-२५ और २६ वह सूक्त १८ में है. उसमें ऋचायें १३ हैं. उन्में वामदेव ऋषिको गर्भस्थान में भी ज्ञान हो गयाथा वह वृत्तान्त प्रदर्शित किया है. वामदेव ऋपिको गर्भहीसे ज्ञान होनेके सबब गर्भवासका और योनिद्वारा बहार आनेका तिरस्कार होनेसे, याने गर्भस्थिति और योनिद्वारा अपसरण यह नापसंद होनेसे योनिद्वारसें वहार आना उनोने नामंजूर किया. और अपनी माता शचीदवीका. पार्श्वभाग ( कुक्षि) विदारण करके वहार आनेको तत्पर हुवे. ऐसा होनेसें उन् शचीदेवीने अपने प्राणनाणार्य इन्द्रकी माता अदितिका ध्यान किया, उसी समय अदितिभी इन्द्रको साथही में लेकरके वहांपर ला पहुंची की जिस आश्रममें वामदेवजीकी माता शचीदेवी तकलीफ पा रहीथी, वहांपर उपस्थित होकरके इन्द्र और आदितिने वामदेवजीको सम्झाये और उनके वचनोंको मंजूर करके वामदेवजी उसी योनिमार्गहीसे बहार आनेको स्वीकार करते भये. वामदेवजीका उसके अनन्तर द्वितीय जन्म हुवा नहिं. उनके अपरोक्षानुभवका माहास्य इसी (३) अष्टकमें अध्याय ६ वर्ग १५ ओर १६ में प्रदर्शित किया गया और वामदेवजीने "अहं मनुरभवं सूर्यच "इत्यादिक मंत्रोंमें सपना सार्यात्म्यमांव, प्रकटित किया है. गर्भही मेंसे उन्मान्तरानुष्ठित साधनोंसे ज्ञान होनेपरभी महामागोभी .गोनिद्वारहीसे बहार आना पडता है, और वैसे अपरोक्ष ज्ञानवाले महात्मा पुरुष अवशिष्ट प्रारब्धमानका उपभोगपर्यन्त इस लोकम । है. * - [१७ जीवन्मुक्त रूपसे रहेते है लेकिन उनका दूसरा जन्म होता ही नहि. यह तात्पर्य, भी उसी अष्टकमें बतलाया गया है. १८ अष्टक ३-७-१४ की ५ ऋचा आदित्य स्वरूपकी प्रत्यायक मालुम होती है. और वही ऋचा इतर उद्देशसे परब्रह्मके स्वरूपकामी निरूपण करती है. और वही मत्र कृष्णयजुर्वेदीय कठपल्ली उपनिप: २-२-२ मेंभी है. अष्टक ४.५-११ ऋचा २५ तकमें परमेश्वरका अत्यन्त गहन स्वरूप कहा है याने अपचीकृत पंच महाभूत और पंचीकृत पंच महाभूतके कार्य सूक्ष्म और स्थूल शरीर और सकल दृश्यवाले संसारमेंमी परमात्मा वस्त्रोंमे तन्तुओंकी तरह ओतप्रोत है. लेकिन हरएक लोक उसको यथार्थ समज सके नहि. जिस किसीका अज्ञानात्मक आचरण नष्ट हो गया हो वही सिर्फ जान' सक्ता है. और उमी अष्टक ४-७-३३ ऋचा १८ में इन्द्रको परमात्मम्वरूपसें चर्णित किये हैं. और वही इन्द्रशब्दके लक्ष्यार्थ परमात्मा अपनी मायाशक्तिसे प्रत्येक प्राणिमात्र के अन्तःकरण में प्रतिषिध स्वरूपसे भिन्न भिन्न स्वरूपसे (सुनों को) प्रतीयमान होते है. यह श्रुति "बृहदारण्यक उपनिषद् २-५-१९ में भी है. २० परिपूर्ण ज्ञानवाले वसिष्ठ ऋषिके दृष्टान्तसें ज्ञानका महत्त्व अधिक रूपसें पाया जाता है. अष्टक ५-३-२३ ऋचा ८ से १० तक और वर्ग २४ ऋचा ११ से १४ तक किसी प्रबलसंस्कारके प्रभावसे वसिष्ठ ऋपिको जब उर्वशीके उदरमें गर्मरूपसें प्रविष्ट होनेका संकल्प हुवा तब वसिष्ठजीने अपर्ने ज्योतिःस्वरूपका किस प्रकारले अतिक्रमण किया है उस वृतान्तकी प्रशंसा की गई है. अष्टक ६-७-१६ सूक्त १ मंडल ९ में परमानका प्रारंभ होता है. वह अष्टक ७-२-१८ तक है. एकादशी किंवा जयन्ती अथवा मर- णोन्मुख प्राणिकी समक्ष इस पवमानका पाठ करनेसे महत् पुण्य होता है और मरणोन्मुख प्राणिकी सदति होती है. इस पवमानमें कई एक देवताओं का नाम निर्देश किया है. और कई एकको परमेश्वर स्वरूप कहे है. २२ अष्टक ७-७-१६ सवा ९ और १० में और वर्ग १७ की रुची '११-१२-१३ में अध्यात्मविषयका निरूपण किया गया है. उसमें इन्द्रको २१ 3 [१८]. परमेश्वरस्वरूपसे कहा गया है. और हृदयाकाशमें अन्तर्यामिस्वरूप जो प्रत्यक चैतन्य उपलब्ध हो रहा है उस रूपसभी परमेश्वरको निरूपित किया है, और स्थावरजगमात्मक समग्रदृश्यसहित इस जगत्का की भी कहा है. स्त्री- स्वरूपसेंभी वह परमेश्वरही आविर्भूत हुवे है ऐसा कहा है. २३ अष्टक ८-२-२३ ऋचा १-४ में वेदका आविर्भाव किस सरह हुवा इसके ज्ञानका माहात्म्य बृहस्पति ने बतलाया है की- ॥ यज्जोतिः परमंब्रह्म यद्योगात्समुपाश्नुते । तज्ज्ञानमभितुष्टाव सूक्तनाथ वृहस्पतिमा और ८.३.१६ ऋचा १ से ६ में परमात्माने अपनी मायाशक्तिद्वारा विश्वकर्मस्वरूपसे जगनिर्माण किस तरह किया ? पहिले क्या था? प्रलयकालमें क्या था? और वह जगत् दृश्यकोटि कैस आया? और परमेश्वरने उसी जगत्में प्रवेश किस तरह किया ? किंवा चैतन्यरूपसे कैसे स्फुरित वे हुवे है ! यह सब वृत्तान्त विस्तारसे विशद किये गये है. और सृष्टि के प्रारममें परमात्माने किसी पदार्थकी सहायता ले करके जगत्की रचना की ? क्योंकी जैसे कुभ- कार घट बनाने में दंड, चक्र, चीवर, मृत्तिका, जल इत्यादिक पदार्थोंकी मदद विना लिये कार्यारंभ कर सक्ताही नहि, सेंही परमात्माने कौनकौनसे पदा- थोकी मदद ले करके रचना की है ? इत्यादिक विषयोंमें परमेश्वरकी अचिन्त्य- शक्तिका परिणाम और उसका महिमा ही है ऐसा उत्तर दिया गया है. और विशेषरूपसे यह कया गया है की परमेश्वरको जगन्निर्माण करने में किसी पदा- र्थको सहायता लेनी नहि पडी. वहीं खुद तत्तत्स्वरूपसे प्रतीत होता है. सृष्टिमें सोंके चक्षु, मुख, बाहु, चरण इत्यादिक सब यही है. और यहभी कहा है की एक मकान बनानेमे शिल्पी जंगलमैसें बडे बडे काष्ठ काट करके परिमाणानुसार उसको दुरस्त बना करके मकानके उपयोग लाता है जैसे इस विधभवनको बनानेमें उपयुक्त साधनसामग्री वे परमात्मा कहासें लाये होंगे? ऐसा प्रश्न करके उसका उत्तरभी दिया गया की ब्रह्महीने ब्रह्मा जंगल में समम साधनसामग्री अपनी शक्तिद्वारा लेकर विश्वात्मक भवनको रचा हो ऐसा प्रतीत होता है. परमेश्वर एकही होते हुवे उनोंने किस प्रकारसे विविष शरीरा- स्मक भुवनोंको रचे यह प्रश्न फिर रहता नहि. यही परमेश्वरको अचिन्तनीय " [१९] शक्ति है. उसी अध्यायके १७ वर्गकी २ ऋचामें प्राणिमात्रके शुभाशुभ- कमौके फलोंको देने वालेभी वही विश्वकर्माके लक्ष्यभूत परमात्मा है एसा कहा है. २४. पुरुष सूक्त ८-४-१७ और १८ और १९ वर्गमें है उसकी १६ ऋचायें हैं, यही पुरुषसूक्त यजुर्वेद और अथर्ववेदमें भी कुछ न्यूनाधिक- रूपसे प्रदर्शित किया गया है. वेदार्थके गौरव और रहस्यको यथार्थ न समझके कईएक लोक इस पुरुषसूक्तके उपरसें " नरमेध ( पुरुषयज्ञ)" की कल्पना कर के बैदको दूषित करते है. लेकिन सायणाचार्यने इस विषयको बहुतही सष्ट किया है ऐसा भाप्यसे पाया जाता है. उस पुरुषसूक्तके द्वारा वेद परमात्मा का व्यापकत्व निरूपण करतें हैं. वह " ऋग्वेदतत्व " पुस्तकके पृष्ट ७६ ७ ८५ तक देखनेसे अवगत होगा. पुरुषसूक्तमे नरमेधका प्रतिपादन करते है यह मन्तव्य विलकुल निर्मूल है. एकही परमात्मा सर्वव्यापक है और उनके अधीन रहनेवाली मायाके वजहसें आध्यासिक जगत् अनुभूयमान हो रहा है, और उसी मायाके वजहसें जगत् फिर लीन होता है इत्यादि उस पुरुपमूक्तमें प्रतिपादन किया है. और यज्ञ, हविष्य, अध्वर्यु, समिध प्रभृति सकलसामग्री तथा यजमान यह सब परमात्मस्वरूपही है और अन्य कुछ है ही नहि. ऐसा पुरुषसूक्तका अभिप्राय पाया जाता है. पुरुषसूक्तोक्त सृष्टिक्रममें संदिग्ध विषय पाया जाता है, याने तैत्तिरीय उपनिषदमें प्रथम पंचमहाभूतोंकी उत्पत्ति होने के बाद उनी भूतोंसें जगत्की सृष्टि वतलाई गई है, और छान्दोग्य उपनिषदें तिर्फ तीन ही भूतों- की याने तेज, जल, अन, (पृथ्वी) की उत्पति कही गई है. और ऐतरेयो- पनिषदें औरही प्रकार बतलाया गया है. उन सब विषयों में श्रीव्यास मा. वान् और जगद्गुरुश्री आद्य शंकराचार्य वेदान्तसूत्रमें ऐसा निर्णय करते है की उन उपनिषदों की श्रुतियोंका उद्देश सृष्टिका अनुक्रम बतलानेका नहि था किन्तु ब्रह्मविद्याका बोध करने के लिये और जगत् की अमारता और क्षणिकना प्रदर्शित करने के लिये मात्र कल्पना की गई है. भगवान् श्री शंकराचाजी २- १-३३ सूत्रके भाप्य लिखते है की " न चेयं परमार्थविषया दृष्टिश्रुतिः, अविद्याक्रसितनामरूपव्यबहारगोचरत्वान्, ब्रह्मात्मभावप्रतिपादनपरत्वाच्च, इत्येतद , [२९] पि नैव विस्मर्तव्यम्" इससे यह पाया जाता है की सृष्टिक्रम जिस कालमें जैसा अनुकूल हुवा तैसा आगे पीछे व्युत्क्रमसमी बतलाया गया है. वह सिर्फ अध्यारोप करके अपवादद्वारा ज्ञान प्रातिके लिये ही है. इससे सृष्टि प्रकारके व्युत्क्रममें लक्ष्म देनेशी आवश्यकता नहि. (वेदान्त सूत्र १.४१४ तथा १५ देखो). २५. अष्टम अष्टकके सप्तम अध्यायमें बहुतसें वर्गों में अध्यात्म- विषय उपलब्ध होता है. प्रथमवर्गमें परमात्माही मायाद्वारा जगत्का कारण है ऐसा प्रतिपादन किया है. उसी तरहसे ११ और १२ वर्गमे " अमृग महर्षि " की दुहिता (पुत्री)" चाग्" नामा ब्रह्मविज्ञानवाली अपने आत्माका उद्देश करके परब्रह्मस्वरूपता भिन्नभिन्न प्रकारसे प्रकट करती है, याने सकल देवतारूप मेंही हु, सोमभी में ही हु, सब लोक मेरीही सत्तासे अन्नप्राशन करतेहै, मेरीही सत्तास लोकोंकी चक्षुरादिक इन्द्रियां अपने अपने व्यापार तत्पर हो सक्ती है. वासोच्छ्वासकामी कारण मे ही हुं. सचराचर विधिका मूल- कारण में ही हु. रक्षितव्यकी रक्षा में ही करती हुं. ब्रह्मदेवको जगत्का सृष्टा में ही बनाती हु. और ऋषियोंको अतीन्द्रियदर्शिना मेंदी बक्षीस करती हु. बुद्धिमत्ताभी मेरे तरफसेही दी जाती है. सर्वान्तर्यामितया प्रविष्ट हो करके सर्वत्र में ही रहती हु. महादेवजीको त्रिपुरासुरके विजयसंग धनुप् बाण मनेही सज्ज कर दिये थे. पचमहाभूतोंको अपने अपने कार्यमें तसर मेंही करती हु, इत्यादिक सार्वात्म्यभानको वह अभृण कृषिकी पुत्री " वाग्देवी" प्रकट करके विनानशक्तिसे लभ्यमान सर्वशक्तिमत्व और सर्वज्ञत्वको पिशद कहती है. २६. इस ( अष्टम ) अध्यायमें (८-७ १७ में) " नासदासीत् । नामक सूक्त है. जिसको नासदीय (१२९) सुक कहते हैं. एतदन्तप्रक्रियाले मोपाधिक (मायाशवलित ) ब्राके स्वरूरका प्रवचन करके भेदाभास प्रत्या- यक वाक्योंसे ब्रह्मकी शक्ति सचा और स्पति यह बतला दिया. याने वेदान्त- शास्त्र के प्रधान प्रकरणानुसार अध्यारोप करो अब अप्रिमविषयों से अपारोपित पदार्थोफा अपवाद नियमित करते है. मतलब यह है की सरू। यद्यात मन और वाणीका अविषय । इस लिये उन असम्मको अपिगम के लिये शब्दकी प्रवृति करना उचित नदि, तथापि वानिक प्रतिक बिना समझने [२१] आना अशक्य होनेसें और वह स्वरूप वाचिक प्रवृत्तिका अगोचर होनेसें प्रथम अध्यारोपकी कल्पना करके उस अध्यारोपी पहिले वह स्वरूप किस हालत था और मायाद्वारा अध्यारोप कसित करने के बाद वह किस तरह प्रतीत होता है, और अगर उस अध्यारोपितका अपवाद कर दिया जायतो अवशिष्ट क्या और कैसा रहता है यह सब वर्णन करते हैं. इस सूकमें सृष्टिके माविर्भावकी पहिले याने महाप्रलयकालमें जो जगत्का मूलकारण था वह शशशृंगकी तरह अत्यन्त असत् नहि हो सक्ता. और आत्मतुल्य अबाधित सद्रूपमी वह मूलकारण नहि था, और भूरादि- लोक पंचमहाभूत भोक्ता भोग्य मृत्यु अमृत दिन रात केनिमित्त सूर्य चन्द्र तन्निमित्तक मास ऋतु का समष्टिरूप काल वगैरह नामरूपात्मक प्रपंच था ही नहि किन्तु सकल सिद्धान्तसिद्ध पारमार्थिक सत्य ब्रह्मतत्वहीं था. वर्तमानकालमें परिदृश्यमान जगत् सृष्टि के पूर्वकालमें नहि था. (पूर्वपक्ष ) जब यह दृश्यमान जगत् उसकालमें नहिं था तो उसकी उत्पति किस प्रकारसे हुई। (सिद्धान्त ) सृष्टिक पूर्वकालमें यह जगत् भावरूप अज्ञानतें आच्छादित था, जिस अज्ञानको " माया" भी कहते हैं. जब उसी मायासे "नाम""" का आविर्भाव हुवा तब उसका उत्पतिशब्दसें व्यवहार किया गया है. इसके बादकी ऋचाओं में प्रपंचोत्पत्तिका प्रकार प्रदर्शित किया है. इस प्रकार जब शुद्ध ब्रह्मके सिवाय कुछमी प्रथम था तब अध द्वारा सृष्टिके प्रादुर्भावका प्रकार कहा गया है. वैती यह सृष्टि कहासे उत्पन्न हुई और किसने की यह यथार्थ समझना देवौकोनी दुर्लभ है. क्योंकी जिस कालमें सृष्टि का प्रारंभ हुवा -उस समयमें कोई देवादिक थेही ना. २७. इसी अन्यायके २३ वनि कठवल्लीकी आख्यायिका कही है जिसमें यमराज और नचिकेताका संवाद बाजारसे प्रदर्शित किया है. नाच- केता अपने पिताजीकी आज्ञासे यमराजके पास गरें हैं और उनाने यमराजको संतुष्ट करके उनसे तीन वरदान प्राप्त किन है. उनमें के आन्तिम वरदानते ब्रह्मविद्याकी याचा की है. वह ब्रह्मविद्या न देने को और नचिता उस ब्रह्मविद्या अधिकारी हैं की ना इस वृत्तान्तको अवगत करने के लिये यमरानने दीर्घायुष दिव्यभोग वगैरह पदाथोंसे बहुतसा प्रलोभन किया परंतु जब नचिकेताने वास्त- [२२] विक वैराग्य प्रदर्शन करके भोगोपरति बतलाई तव यमराजनें ब्रह्मविद्याका बोका किया, यह सब कटवल्ली-यजुर्वेदीय उपनिषदमें है. और यह इस जगे (२३ वर्गमें) भी कहा गया है. २८. अष्टम अध्यायके ३५ वर्गकी प्रथम और द्वितीय ऋचामें जीवात्मा और परमात्माका अभेद आहितसंस्कार होनेसे अन्तर्मुख मनसे अव- गत हो सका है, याने साक्षात्कारकी योग्यता हो सक्ति है यह कहा गया है. और परमात्माने जगन्निर्माण करनेको किस तरह पालोचन करके जगदुत्पत्ति की है यहभी संक्षेपसें कहा गया है. इस प्रकार प्रथमवेदान्तविभाग संपूर्ण होता है, २९. दुसरे विभागमें कईएक देवताओंको और विशेष करके इन्दको वारंवार परमात्मरूपसें वर्णित किये हैं. वह संक्षिप्त प्रकारसे कहते है. अटक १-१-५ चतुर्थ ऋचामें इन्द्रका परमात्म स्वरूपसें वर्णन किया है. उस ऋचामें इन्द्रशब्दकी भिन्नभिन्न व्युत्पत्ति करके वह नामाभिधान परमात्माहीका है ऐसा कहा गया है. जैसे " भूतानि प्राणिदेहान् इन्धे जीव- चैतन्यरूपेण अन्तःप्रविश्य दीपयतीतीन्द्रः". वृहदारण्यकोपनिषदमें १-२-२, "इन्द्र" शब्द इन्ध माने "प्रकाशकतासे प्रत्यक्ष इस शब्द उपरसें परोक्ष रीतिमें प्रयुक्त होता है ऐसा आधिदैविक और आध्यात्मिक पद्धतिस अर्थावगम फरतें हैं. गौर ऐतरेयोपनिषदमें १-३-१४ मंत्रमें " इदन्द्र " ऐपा परमेश्व- रका नाम कहा है, और उसके बादोलत " " शब्दभी परमात्माको उद्देश करके प्रयुक्त होता है, इससे उन दोनोंकी समानता ( लक्ष्यार्थरूपसे) पाई जाती है. श्री सायणाचार्य (१.१.५ रू. ४ ) भाष्यमें लिखते हैकी- "ययस्मात्कारणात् एनं परमात्मरूपमिन्द्रं देवं प्राणचिक्षुरादीन्द्रियः प्राणापानादिवायुभिश्च सहितं समैन्धन् उपासमा ध्यानेन सम्यक् प्रकाशित- वन्तः तत्तस्मात्कारणादिन्द्रनाम संपन्नम्". ऑपमन्यव नामक ऋषि कहते हैं की- "इदंदर्शनादिन्द्र इति निर्वचनमाह, इदमित्यापरो६ यमुच्यते, विवेकैन हि परमा- स्मानमापरोक्ष्येण पश्यति इत्यादि उसी प्रकार अष्टफ २.१.२१ को पंचम मचा इन्द्रको अन्तर्यामी कहे हैं. और ३.३.१२ चतुर्थ ऋचामें इन्द्रदेव कार्यवशात् मिन भिन्न स्वरूप धारण करते हैं ऐसा कहे करके ३-३-२० की अष्टम ऋचाको देखनेका कहते हैं, और इस ऋचामें अष्टक ४-७-३३-१८ ऋचाका निर्देश किया हुवा है. जिसमें वृह- दारण्यक उपनिषद्का २-५.१९ मंत्र बतलाया है. इसी प्रकार वेदमंत्र और उपनिषद्की श्रुति ऐकमत्य करके 'इन्द्रदेव भिन्न भिन्न स्वरूप धारण करते हैं। ऐसा सिद्ध करते है. उनी इन्द्रदेवको “तदेतद् ब्रह्मापूर्व मनपर मनन्तरम- बाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् " यह श्रुति इस प्रकार कहती है. उसी प्रकार अमिदेवको १-४-२५ ऋचा १ में और ३-१-२० ऋचा ४ अन्तर्यामी नियामक रूपसे कहते हैं. और वर्ग २७ की सप्तम ऋचामें उनका सर्वात्मकत्व प्रतिपादन करके ब्रह्मत्व सिद्ध किया है. उसी तरह अष्टम ऋचामें उन अमिदेवको परमात्मस्वरूपसे कहते हैं, और अन्तर्यामी सर्वात्मकभी कहा है. वैदिक मुनि हरिप्रसादजीने अपने वेदान्तदर्शन नामक पुस्तक, पृष्ठ १३८, १३९ में इस विषयपर प्रत्येक वेदमेंसे मंत्रोको बतलायें हैं-ऋग्वेदमेसे २-३-२३ ऋचा ४६, यजुर्वेदमेर्स ३२-१ और अथर्ववेद से १३-४-४, ३-४-५, ३०. तीसरे चौथे और पंचम विभागके लिये तो वेदभगवान्के •उपर पूर्ण श्रद्धावाला अधिकारी ही योग्यतासंपन्न कहा जाता है. तीसरे विभा- तपोबलसें देवकोटिको भी पा सक्ता है इसका दृष्टान्त है. बृहदार- ण्यक उपनिपद् (४-३-३३) में और तैपिरीय उपनिषदमें (२-८) मनुष्य, पित, -गंधर्ष, कर्मदेवता, देवता, प्रजापति, इत्यादिकके आनन्दमें उत्तरोत्तर शतगुण उत्कृष्टता बतलाके परमात्माका आनन्द इनसेंमी उत्कृष्टतर है ऐसा बतलाया है. और उसी प्रसंगमें मनुष्य कोटिमस तपके प्रभावसें देव कोटिमें प्रविष्ट होते हैं ऐसा बतलाया है. वेदमेंभी मनुष्यभैसें तपके प्रभावसें देवकोटिको पाये भये "ऋभु" नामक तीन भाइओंके वृत्तान्तका अष्टक १.२.१ और २ वर्गमें प्रारंभ होता है. और उनके पराक्रमोंका प्रभाव कहा है. उन्ने अपने वृद्ध माता पिता को युवावस्था मंत्रबलसें बक्षीस कीथी और वे लोक निष्कपट और निष्पाप थे इससे उनको मंत्र सिद्धिप्रद होते थे. (१-२-१ ऋचा ४). चतुर्थविभागमे देवताओंके पराक्रम प्रदर्शित किये जबकी ऋभु" नामक बंधुओंने मनुष्य होनेपरभी अपने तपोबलते देवत्वको प्राप्त करके पूर्वोक्त पराक्रम किये है तब स्वतःसिद्ध देवत्ववाले इन्द्र, अश्विनी- गर्म मनुष्य . . .

[२४]] कुमार, मित्रावरुण, सूर्य इत्यादिक देवाने असाधारण पराक्रम किये होय इसमें आर्य नहि. उन पराक्रमोंका साक्षप्त प्रकार कहते है-(१) कई एक भक्तोंको संतति नहिं थी तो देवताओंने उनके लिय संतालका प्रबंध किया है, और जिनके भाग्यमेंसताते नहिं थी उनको देगेंने खुद अवतार धारण करके संतानवाले बनाये है यह वृतान्न १-१२० ऋचा ११ और ३५२३ रुवा १४ में है (२) किसी एक मनुष्यको किसी जलाशयमें फेंक देनेंसें वह गतासु हो गया फिरसे उसकों वहासे निकालके सजीवन किया. यह वृत्तान्त १-७-२४ ऋचा ६ और २३-१ चा ३ और ८-२-११ मचा १२ में है. श्री कृष्ण परमात्मानेभी अपने गुरु श्री सादापनिके समुद्रमें डुबे हुवे पुत्र को सजीवित ला करके गुरुश्रीको अर्पित किया था यह कथा श्रीमद्भागवतमें है (३) वृद्धावस्थाको पाये भये च्यवन " ऋषिको अश्विनीकुमार ( देववैध ) ने युवावस्था बक्षीस की और नेत्रोंकी विकलता दूर करनेके साथ साकल्य संपादनभी किया था. और कोई पुरुषत्वहीन था उसको पुरुषत्व प्राप्त करा दिया, यह तीनो वृत्तान्त सूक्त ११६, अष्टक १-८-९ मचा १० और १-८-१० ऋचा १३ में है, और भी शापप्रभावसे स्त्रीत्वको प्राप्त मये हुवेको पुन. पुरुषत्वप्रदानका (५७१० ऋचा १ से ४ तक) निरूपण किया गया है. स्त्रियों के गर्भाशयगत रोगोंकी निवृत्ति (६-६ १४ ऋचा १ से ५में) और हृदय रोगकी निवृत्ति कही हुई है. (४) अश्विनीकुमारका पराक्रम ऐमा बनलाया हैकी गायको प्रसव होनेकी पहिलेही दुध देनेवाली बनाई है. यह वृतान्त १.७ ३३ का ३ में है. ऐसी गाय ( काठियावाड मडलान्तर्गत) लखतर दरबारके वहा होने की खबर मुनीथी. उन लखतर दरबारके भृत्यवर्ग उस गायको कामधेनु कहा करते थे उसके बाद (फाठियावाड मंडलानर्गत) जेसपुर रियासदके दरवार "मुलाला" साहेब की राजधानीमेंभी वैसी गाय मुझे बतलाने में आईथी. वैसी गाय होना यह ईश्वरानुग्रहका चिह है (५) कोइ एक "सप्तवमि" नामक पिको अपने बन्धुओंने द्वपके मारे किसी सन्दुफमें बद्ध कर दीये उनोने भीतरही फसे हुवेमी भगवान् अधिनीकुमारकी स्तुति की, अश्विनीकुमारने उन सप्तधि ऋपिको उपी ममय उस सन्दुकसे बहार निकाले.इस देवदेयके चरित्रका वृचान्त ४-३-२० ऋचा ५ से ९ में है. और वैसे यह एक परामम अधिनीकुमारके ८-२-१७ ऋचा . .

[२५] ३२. पंचम विभागमें वैदिक मंत्रोंके प्रभावका वृत्तान्त कहा गया है. अगर वैदिक मंत्रोका यथाविधि अनुष्ठान अधिकारी करे तो शासपद- शित फलको वह अवश्य पा सक्ता है. इस विषयके दृष्टान्त दीये गये हैं. (१) गौतम रूपिको जलकी जरूरत अपने आश्रमहीमें थी उनोने मंत्रोंके प्रभावेसे जल प्रकट किया था. (२) दीर्घकालके अनुष्ठानसे इन्द्रदेवके दर्शन प्रत्यक्ष होते है, (१-६-८ ऋचा १८). (३) किसी एक राजाके पुरोहित स्थाधिरूढ हो करके अपनें यजमानके पास आ रहेथे, मार्गमें कोइ एक राजकुमार चलते हुवे रथकी नीचे दब जानसें मर गया, उसको मंत्र बलसे पुरोहितजीने सजीवन किया. (४) मंत्रबलसें आकाशमें गमन हो सक्ता है. पातञ्जलयोगसूत्रमेंमी आकाशविहारका प्रयोग बतलाया है. (५) अटक २-५-६ मंडल १ सूक्त १८७के अनुष्ठानसें अन्नजन्य रोग निवृत्त होते है, और विष अमृतायमान होता है. मिरांबाइको अपने पति (मेवाड देशके नरेश मांडलिक राणाने) विषपात्र पानके लिये भेजा था उनोने उस विषका पान किया परंतु कुछभी हानि हुइ नहिं थी. वहमी मंत्र किंवा भक्तिका प्रभाव है. महादकोमी अपने पिता हिरण्यकशिपुने विष्णुभक्तिकी बहुत मनाइ की परंतु जब उसने माना नहिं तब अनेक उपद्रवोंके साथ विषमय भोजनमी करवाया परंतु वह सर्वत्र भगवत्स्वरूपही देख रहाथा इससे वह विष अमृतरूप हो गया, यह कथा श्री गद्भागवतमें है. (६) और १८९सूक्तमें, २-५-१० ऋचा १ में, ईशावास्योप- निषद्की १-१८ श्रुति अक्षरशः प्रदर्शित की है. उसमें अमिकी प्रार्थना अव- सानकालमें उपासक करता है. (७) विपनिहरिण्युपनिषद' १९१ सूक्तके १४से १६ वर्गमें प्रसिद्ध है. उसमें भिन्नभिन्न प्रकारके विष बतलाये है. और उसमें सर्पदंशकामी समावेश किया गया है. इस सूक्तको यथार्थ समझ मनुष्टान कर- नसें वियोचारण होता है ऐसाभी कहा गया है. (८) दुःस्वमके निरोधार्य अष्टक २-७.९ और १०, सूक्त २८ के जपका विधान है. और अनुष्ठान कर• नेकाभी कहा हुवा है. अष्टक ३-७.१४ की ५ चामें कठोपनिषदका मंत्र है, वह ४ मंडल के सूक्तमें है. अवसानकालमें उसका जप करनेसे शाश्चतिक सुख- की प्राधि कही है. (९) अष्टक ४-४-२७ मंडल ५का ८३ सूकका पाठ करनेसे अनावृष्टिकी निवृत्ति के साथ वृष्टि होती है. और २८ वर्गकी १० २६] ऋचामें अतिवृष्टि-उपद्रव निवारणार्थ जपमा कहा है. अष्टक ८-८-२२ का नित्य जप करनेसें दु स्वमका निरोध होता है. और जाग्रत किंवा स्वप्न कालमें किये हुवे अघटितकार्यजनित पापका प्रतिबंध होता है. अष्टक ५-४-३० की १२ ऋचामें मृत्युजयका महामंत्र है. उसका जप सकाम अनुष्ठानादिकमें किया जाता है. (१०) अष्टक ३-३-२३ वसिष्ठजी के शिष्योंने पढना नहि चाहिये. इसका कारण यही है की विश्वामित्रका 'सुदा' नामक एक शिष्य था, वह राजर्पि था, वह किसी कारणेसे वसिष्ठजीके साथ द्वेष करता था, इसमें विधा- मित्रने अपने शिष्यके रक्षणार्थ वसिष्ठजीको इस वर्गको चासें शाप दीया, इस वजहसें वसिष्ठानुयायि शिष्य इस वर्गका पठन पाठन या श्रवण नहिं करते है. ३३ पष्ठ विभागमें पुराणों के अवतार और कई एक अलौकिक कथायें प्रदर्शित की गई है. उनके पीजरूपसे वेदकी जिस किसी चामें कुछ कहा गया है वह संक्षिप्त लिखता हुं. (१) विरोचनके पुत्र और प्रहादके पौत्र बलिराजाका पराजय करनेके लिये समन देवसहित इन्द्रने की हुई विष्णु भगवानकी स्तुति स्वय वामनावतारसे विष्णु प्रकट हुवे. और बलि- राजासें चरणत्रयपरिमित भूमिका याचा की, तब बलिराजानें कबूल किया. उस समय विष्णु भगवाननें विराट स्वरूप धारण करके एक चरणसें पृथिवी, द्वितीय चरणसें अन्तरिक्षको परिमित करके तृतीय चरण बलिकी छातीके उपर रखके उसको पातालमें निहित कर दीया. इस वृत्तान्तसें मिलता हुवा वृत्तान्त अष्टक १-२-७ में दिस पडता है, उसी तरह अष्टक ६.२.२६ में भी है. (२) अष्टक ६-१-१६ मचा १३में नमुषि नामक दैत्यसै इन्द्रका युद्ध हुवा तय इन्द्र पकडे गये उस समय इन्द्रको दैत्यनें अपने मृत्यु के साधन कहे की -मेरे मृत्युकालमें रात्रि अथवा दिवस नहि होना चाहिये, शुष्क किंवा आई पदार्थ से मेरा मृत्यु नहिं हो सका इत्यादिक सब वृत समझ करके समुद्र फेन संध्या समय, बह दैत्य मारा गया. यह बात प्रहादजाके पिता हिर- प्यासिपुको परमात्माने नृसिंहावतार धारण करके मारा था उससे मिलती है। उनकोभी नमाजीने वरदान दीया था की-मनुमसें तु न मरेगा, रागिने या दिनमें और सबसे तेरा मृत्यु नहिं होगा इत्यादि. इससे परमात्माने नसदेवके . . [२७] ' चचनाको सत्य करने के लिये नृसिंह रूपसे प्रकट हो करके संध्यासमयमें अपने हाथों के नखूनसें उस हिरण्यकशिपुको मारा था. (३) अष्टक ३-८-९ चा ६-७ और ८-४- २८ ऋचा १४ में लोकमान्य तिलकने अपने आर्कटिक होम' नामक ग्रन्थों रामायणके तुल्य वृत्तान्त है ऐसा कहा है. (४) अटक ५-४-११ ऋचा १में अश्वा- भिमानिनी देवताका आवाहन करनेका बतलाया है इससे निष्कलंक की जो कल्कि ' स्वरूपसे अश्वाभिमानी देव प्रकट होनेके हैं उनसे यह कथा मिलती है. अथवा हयग्रीव किंवा यशिराः स्वरूप भगवानने धारण किया उस उद्देशसे यह प्रसंग हो. महाभारतके शान्तिपर्वके मोक्षधर्मप्रकरणमें ऐसी कथा हैकी-ब्रह्मदेवके पाससे मधुकैटभ नामक दोनों दैत्य वेदका हरण कर गये थे. ब्रह्मदेवकी स्तुतिसे प्रसन्नताको पाये भये विष्णुने हयशिराः स्वरूप धारण करके वेदको वापस ले ा दिये थे, उस प्रसंग पर उनका वह अवतार था. (५) अप्टक ८-७-३० ऋचा ७ मे स्तम्ममित्र नामक किसी ऋषिके स्था- नमें आग लगनेंसें उनान अपने स्थानके रक्षगार्थ अभिदेवकी स्तुति की है. और महाभारतमें कहा है इस तरह खांडव वनमें जैसे उत्तरोत्तर अमि जाताथा उसी प्रकार बढते हुवे अमिको शान्त करनेके लिये ऋपिने प्रयास किया है इत्यादिक वृत्तान्त है. (६) अष्टक ८-८-१३ मचा ३ में श्री जगन्नाथजीकी प्रतिमा और उनके स्थानके लिये कुछ विवेचन है-काष्ठमयप्रतिमावाले देव समुद्रतीर पर आये हैं ऐमा लिखनेसें यह श्री जगदीशजीका वृतान्त हो ऐसा पाया जाता है. औरभी पुरामाने मनुष्यों को शिक्षण दीया गया है यहभी वैदिक पाया जाता है, जैसे- (१) असत्यवादी नष्ट हो जाता है (५-७-६ मा ८). (२) सत्यवादी अनुकूल फलको पाता है. पुण्यात्माभी अनुकूल फलको प्राप्त होता है. और पापात्मा प्रतिकूल फलको प्राप्त होता है. अपनें अपनें शुभाशुभ कर्मानुसार परिणाम भोगना पडता है (७-६-१४ चा १). और किये हुवे काँको देवदूत देखते हैं, (७-६-७ ऋचा ८). (३) रात्रिसूक्त (८-७-१४) में रात्रिको देवताके रूप- कसे वह प्राणिमात्रके श्रमको दूर करनेवाली है ऐसा कहा है. (१)अष्टक ५-४-२१ और वर्ग २४, २५, २६ में नवीन मकानमें वास्तु करनेके प्रासंगिक मंत्र हैं, ३४. सप्तम विभागमें व्यावहारिक विषयों का निर्देश है. इसमें पहेला प्रसंग यह है की पहिले चार वर्ण थे की नहिं ? मिन्नभिन्न ज्ञातियें थी की चढता [२८] नहिं ? उस विषयपर रुग्वेदमें अष्टक १-७२७ ऋचा ७ में ब्राह्मणादिक वर्ण होनेका स्पष्ट पाया जाता है. और चारो वर्णोको परमात्माने बनायें है ऐसा पुरुषसूक्तोभी (८-१-१९) कहा है, यह प्रमाण बृहदारण्यक १-४ मंत्र ११-१२-१३ में भी पाया जाता है. इस तरहसे चारो वर्ण वैदिक ही है यह असंदिग्ध है. और ज्ञातिविभागका प्रकारभी वृहदारण्यक उ. ४-३-२२ के श्रीमज्जगद्गुरु भगवान् शंकराचार्यमाके भाष्य परसें स्पष्ट अवगत होता है. चारो वर्णमें आभ्यन्तर विभागके विपयम सूक्ष्म विचार करने की आवश्यकता है. पवित्रतादिक सद्गुणों से भ्रष्ट होने- वालोंका बहिष्कार होनेसें उनकी एक ज्ञाति ( मंडली) बने, इस तरह. उच्च नीच ज्ञाति वालोंमें लम व्यवहार होनेसेंमी अलग ज्ञाति बनें, ऐसा होते होते वैसी अनेक ज्ञाति होजानेमें कौतुक नहि है, . . - ३५. दूसरा प्रसंग यह हैकी पूर्व कालमें देशमें राजा नहिं था ऐसा कइ एक लोकोंका मन्तव्य है. और यह विचार सद्गत स्नेही साक्षर उत्तमलाल केशवलाल त्रिवेदीने अपने राज्यतंत्रव्यवस्थापक ग्रन्थमें प्रदर्शित किया है. परन्तु ऋग्वेदमें राजासे रहित देश नहिं होना चाहिये ऐसा ८-८-३१ में स्पष्ट उपलब्ध होता है. इस वर्गमें राज्याभिषेक प्रसंगके मंत्र दिये हैं. इस तरह " नराणां च नराधिपं " भ.गी. अ.१० श्लोक २७ में श्री कृष्ण भग- वाननेनी नृपकी अस्तिता बतलाई है. मतलब वेदको अपौरुषेय मानने यह राजा और राज्यका प्रकरण अनादि है ऐसा माननाही ,चाहिये. मंत्रोममी पर्वतोंकी तरह राजाका राज्य अचल रहे ऐसा आशीवाद उपलब्ध होनेसें राजा अनादि सिद्ध है यह सूचित किया जाता ३६. शुद्धव्यवहारपक्षमें देखें तो वर्तमान समयमें भिन्नभिन्न देशमें मुशिक्षित प्रजा जहातक उत्कर्ष नजर आता है वैसाही उत्कर्ष वेद भी उपलब्ध होनेसें पूर्व कल्पमें वहांतक मनुष्य पहुंचे थें यह पाया जाता है। और भविष्यत् में भी बुद्धिर्विकाश वहांतक रत्कर्ष करेगा यह मानना चाहिये. दृष्टान्त रीति (१) स्त्रीवर्गके लिये कहांता उत्कृष्टस्थिति थी यह समझने योग्य है- वे पठित थी (१-२-२५ ऋचा ३), उनको गाडी हांकना यादी (८-५-२० ऋचा २), तथापि परम सारलय रखती थीं, देवार्चनके लिये पुष्पा- .

[२९]. चय खुद करती थीं (१-४.२१ ऋचा २), अपने लम प्रसंगके लिये खीं अच्छी तरह तैयारी करतीथी, पतिगृहगमन प्रसंगपर आवश्यक संमार वही प्रयुक्त करती थी, यह सब विषय बहुत करके सूर्याविवाह सूक्तम दीयें गईं है, वह ८-३-२०से ले करके वर्ग २८ और १ अध्यायके वर्ग १ से १ तक है जो वर्ग सूक्त ८५-८६ के भाग है. यह सूक्त काठियावाड नागर ज्ञातिमें विवाह के पूर्व कन्याको सुनाया जाता है. नागरोंका दूसरे निवासस्थलोमेंमी यह रीवाज प्रचलित होगा. पवित्रवस्त्रपरिधान, सात्त्विक हविप्यानमोजन, और एकस्थाननिवासादिक नियमों का सूक्त श्रवण पर्वत वह कन्या पालन करती है. और वह आठ दिन तक सुनाया जाता है. वर्तमानमें अल्स समयनेंभी सूक्तका आठ आवर्तन सुनानेकी पद्धति शुरु हुई है. कइ एक जगापर प्रमादसें नहिं भी सुनाये जाने होंगे. सूर्याविवाहकी ऋचार्य अथर्ववेदके १४ काडमें नजर आती है, परन्तु उस जो अधिक रचा है. और बहुतसा लोम विलोमभी मालुम होता है. प्रकृतमें, इन सूक्तोमें कन्याके विवाह अनन्तर श्वशुरगृह जाने के समय अपने पतिके साथ, और उनके सम्बन्धि वर्गके साथ कैसा वर्तन उस कन्याने करना चाहिये यह वृतान्त सविस्तर बतलाया गया है. औरभी प्रसंगवशात् कम्वेदमें अनेक स्थलों में स्त्रीने नीची निगाहसें चलना, शरीरके अवयवों को जब तक बने तब तक छुपाना, सुंदर वस्त्र परिधान करना इत्यादिक (६- ३-१० ऋचा १९ में) विशद रूपसे बतलाया है. प्राम्य धर्मके बारेमें मिन- भिन्न ऋचा दृष्टान्त रूपसे कहा गया है. इन सब बार्तासें यह पाया जाता हैकी विवाह कालमें कन्या योग्य वयकी हो, छोटी अज्ञ (समझ) न हो. (२) अन्तरंग समन्मीयों में कन्याका दानादान व्यवहार असंगत है यह बातमी (७-६-६ से ८ तक) यम यमीके संवादरूसें प्रदर्शित की है. उसमें यमाने अपने भाइ यमके साथ ( अपने ही) विवाहकी अनुचित प्रार्थना की, यमने उपपत्ति के साथ उत्तर दीया और इस तरह के संबन्धी अोयना, अपशस्त- रता यतलाकरके समाधान किया. उससे निष्ट संबन्धीयोंमें कन्याका दानादान नहिं होना चाहिये यह वेदमें सिद्ध होता है. और स्त्री और पुरुष निकर संवन्ध होनेपरभी एकान्तमें नहि रहेना चाहिये यहभी पाया जाता है. .

[३] (२)- खोयोंके सामान्य स्वभावतें मिन्न प्रकारके वर्तनका निदर्शन लोपामुद्रा- और अगस्त्यमपिक संवादसे स्पष्ट प्रतीत होता है. विवाहित होनेपरमी वृद्धावस्थापर्यन्त गृहस्थाश्रममें ग्राम्यधर्म (वैपथिक सुख )का उपभोग न करनेसें समयानुसार ऋषिपत्नीने अपमें पति अगस्त्यरूपिसें प्रश्न कियाकी महाराज ? अन्य ऋपिलोक महात्मा होनेपरभी सांसारिक व्यवहारपरायण । उपलब्ध होते हैं और आप हमेशां सांसारिक व्यवहारसे उपरत क्यों हैं: ऋपिनें उत्तर दीया की देवि ? जहांपर नित्यकर्म श्रद्धापूर्वक होते रहते हैं वहांपर वैसी वृत्ति होती ही नहिं ( २.४.२२). इसमें नित्यकर्म और तपः परायण ऋषि महर्षि लोकोंकी धर्मपत्नीयोंके वर्तन सामान्य स्त्रीयोंसें विलक्षण, पाये जाते हैं. और कइ स्थलोंमें ऐसामी नजर आता है की ऋतुकालमें स्त्री. स्वयं अपने पतिकी पास जाती है. (८-२-२३ ऋचा ४). (४) स्त्रीयोंको एक ही,पति होना चाहिये यह प्रसंगभी ५-३.१० ऋचा ३ में प्रदर्शित किया है. और ७-६-२७ ऋचा ७ और ७-८-१९ ऋचा ८ में विधवाशब्दके प्रयो- गसें पुनर्लग्नका प्रचार न होनेका पाया जाता है. और पतिके पीछे सती होनेकाभी वेदको मान्य न हो ऐसा सिद्ध हो सक्ता है. ७-६-२७ ऋचा.. ८ में यहभी वृत्तान्त उपलब्ध होता है की पतिके अवसान अनन्तर उसकी विधवा स्त्रीको श्मशानमेसें अपने रिस्तदार ले आते हैं. कइएक जातिमें देवर परिग्रह (पतिके अवसान के बाद उसके कनिष्ट बन्धुके साथ सांसारिक व्य- वहार ) करनेकामी ७-८-१८ ऋचा २ में नजर आता है. और ७.६-२७ ऋचा २में धनुषबाणादि पदार्थों का वर्णन है. और क्षत्रियोंसे जादेतर उसका संवन्ध होनेसें प्राचीन क्षत्रियलोक धनुर्धर थे यहभी उपलब्ध होता है. (५) पुरुपनी एक स्त्री होनेपर दूसरी स्त्रीका परिग्रह नहि करना चाहिये यह वेद सिद्ध है. यह प्रसंग ७-८-१ ऋचा ३ और ८-८-३ मुक्त १४५में है. वहांपर सपत्नीका दुःख, और तन्निवारणोपाय, पति और अपनी सपत्नीको परस्पर विमुख करनेका प्रयास इत्यादिफ वृत्तान्त है. (६) उस ( प्राचीन कालमेंमी स्त्रीयोंमें दुर्गुणोकी अवश्य स्थिति भिन्नभिन्न ऋचामें दृष्टान्त रूपसे विशद है. और जारकर्मजन्य गर्भापान निवृत्ति के लिये दूर देश गमन, और जारस्तुति, जारसें एकान्तसमेलनपूर्वकरहस्यगोष्ठी, इत्यादिक प्रसंग दृष्टान्त. रूपसे, , [३१] नाये गये हैं. उन विषयों का उद्देश ऐसी बातोंसे बचनेके लिये शिक्षण रूपसे है ऐसा मानना आवश्यक है. वह अष्टक २-७-११ चा ९ में और ६-८- २२ ऋचा ५ और वर्ग २८ ऋचा ४में देखनेंसें मालुम पडेगा, (७) अष्टम अष्टकके ८६ सूतमें इन्द्र के वृषाकपि नामक पुत्रको अपनी सापत्न माता अघ- पंटित आक्षेपका पात्र बना करके अपने पति से उसके मिथ्या दोको प्रकट करने लगी यह बतलाया है. इससे यह सार पाया जाता हैकी संतान होने के बाद अगर स्त्रीका अवसान हो जायतो द्वितीय लग्न नहिं करना चाहिये. और सापल माता अनौरस पुत्रके तरफ दुर्भावद्वारा कहां तक दुर्वर्तन करती है यहमी तत्त्व पाया जाता है। ३७. जैसे स्त्रीयोंमें दुर्गुण उपलब्ध होते हैं तैसें ही पुरुषोभी दुर्गुण होनेका वेदने प्रदर्शित किया है. डाकु लोक पान्योंको लुट लेते है, गौर बन्धनमें फसा देते है. वैश्य ( वणिक ) लोकमी व्यापारादिक व्यवहार में एकमेसें अनेक द्रव्य बना लेते है, और प्रसिद्ध रूप से इस तरह चौर्यका कार्य करते है, और वे लोक अत्यन्त लोभी पायें जातें है. उस कालमें शिकारका अचार होनेकाभी उपलब्ध होता है. यह सब विषय अत्यन्त याने हदसे बादेतर होनेसें दुर्गुण है. ३८. वर्तमान कालानुसार औरभी कइएक सुधारणाके प्रचार उस कालमें मवजूद थे ऐसा पाया जाता है. (१) जैसें म्रियमाण शक्सकी जाय- दादका हकदार कौन हो सक्ता है ? और दोहित्र (पुत्री के पुत्र ) को धर्मपुत्र रूपसे स्वीकार करनेका कन्याके विवाह कालमें मुकरर किया जाता है. जिसकाकी मन्वादि स्मृतियोंमें ' पुत्रिका विधि' नामक विवाहविधि कहते है (३.२-५ चा १). एक मातृक पुरुषको भाइ शब्दसे व्यवहार करनेकामी लिखा है (४-८-२५ ऋचा २,) वह विषयमा मृतक मागदारके वारसा भनमें सापत्न और औरस भाइके सबन्धमें उपयुक्त होता है, याने 'औरस चन्धुके अवसानानन्तर सापत्न वन्धुको हिस्से का अधिकार न हो करके सिर्फ औरसहीको वह हिस्सा मिलता है. और अन्तमें पितामहाविद्रोपार्जित, चनकोपार्जित और ज्येष्ठबन्धुपानित ऐसी तीन तरह की जायदाद मानी . है, की जो सांपतसम्यमें हिस्सेदारों के मुकदमोंमे सवाल जवाबमें उपयुक्त है (५-३.२ ऋचा ७). (२) दुष्काल, अतिवृष्टिका भय और उन्निवारणोपाय 8-9- २७ वर्गमें और २८ वर्गकी मचा १० में प्रदर्शित है. और जल रहित देशों जलोंकी मपाओंके (अवडा याने परबके) प्रबंधका प्रकार उस कालीमी था ऐसा पाया जाता है (७-५.३२ ऋचा १). ३९. गोविद्या, अश्वविद्या, खगोळविद्या, ज्यौतिषविद्या, धनुर्विद्या, शिल्पशास्त्र,शरोदाशास्त्र, शकुनप्रचार और आयुर्वेद यह सब उस कालमें प्रच. लित थे ऐसा उपलब्ध होता है. इस विषयमें रा. भाइ मगनलाल कि. अमृतलाल बुच (प्रोफेसर बरोडा कोलेज) कृत "प्राचीन हिन्दुस्थान, करकसर" विषयका पुस्तक ( Economio life of ancient India) देखने मालुम पडेगा. इसमें वेद मंत्रोका आधार बतलाया है. ४०. वेदमें दूसरे विषयभी इस प्रसंगमें है जैसे- (१) गोवध के प्रतिबंधके साथ गोरक्षणका महत्त्व बतलाया है. और उसका देवताओंके साथ संबन्ध प्रदर्शित करके उसकी पूज्यता प्रकट की है. उसको अनेक रूपसे उपयुक्तता बताकरके उसके रक्षणार्थ देवोंकी प्रार्थनाभी (६-७-८ ऋचा १६, ८-८-२७ उचायें १ से ४ ). (२) दुर्बल स्थितिवाले भिक्षुकोने प्रातःकालमें भिक्षावृत्ति करनेको जाना यहभी (१-४-४ ऋचा ६ में ) प्रदर्शित है. याने प्रातःकालमें भिक्षुक लोक भिक्षावृत्ति के लिये निकलते है तो कइलोक उन विचारोंका तिरस्कार करते है यह अनुचित है; अशक्तोंके लिये उदर निर्वाह वेदको इस तरही मान्य है यद्यपि भिक्षुक यूथ वृद्धिको प्राप्त होनेसे लोक देनेवाले गभराते होंगे परन्तु दान सम अन्य अधिक पुण्य नहिं है यहमी पाया जाता है. (३) उस कालमें उष्ट्र (उंट) बोजा ढोनेके उपयोगी थे और रासमोसे देवता लोक सवारीका काम लेते थे. (४) युद्ध कालमे क्षत्रिय लोक पराडमुख नहिं होते थे ऐसा नियमित रीतिसें प्रचार थ (१-३-२ ऋचा १). (५) मनुष्य शरीरके अवसान होनेपर उसको श्मशान ले जाते है और उसको अमि संस्कार करते है, अस्थि संचय करते है, यह सब वर्णन सविस्तर (७-६-२३ सें २८) वर्ग और - 1 तक) उपलब्ध होता है. (६). व्यावहारिक विषयों में साधारण विषयभी वेदने वतलाया है. जैसेकी दुल जामाता ( दमाद.) हो तो उसको प्रातःकालसें सायं.. काल पर्यन्त अपने श्वशुरके मकानभैमी प्रसंगवशात् ठहरनेका होता है ऐसा ५-७-२० ऋचा २० में बतलाया है. और भंसको जादेत जल पसंद है वह जलहीमें बैठती है (६-३-१५ चा ७), मृगपभादिक पशु जलकी प्यासको शान्त करनेके लिये जलके तरफ दौडते रहते हैं (६-६-१० ऋचा ९ और ७-५-३२ चा ५). गवादिक पशु छोडनेसे 'गोठमें जाते हैं (७-५-३२ ऋचा ३). और शिशिर कालमें शीतनिवारणार्थ आतप (घाम ) में खडे रहे। (७.५-३२ रचा २), और अपनें भूनन बच्चाको चाटते हैं [७-४-२८ ऋचा ७). छोटे छोटे वत्सतर एक रस्सीसं बांये जाते है (८-६-१७ ऋचा ४), ऐसी छोटी छोटी अनेक हकीकत वेदमें उपलब्ध . ४१. पूर्वोक्त प्रकारसें बेद अपौरुषेय है, अति गंभीर है, इससे उसमें किस विषयका समावेश न हो इस विपयका अवगाहन करना यह मेरे समान अल्प मति और अल्पशक्तिवालोंका प्रयास बुद्धिमतापूर्वक तो नहिं ही कहा जायगा, बलकिन साहसहीमें गृणना होगी, तथापि कह दिनोंसे मनमें विचार-तरंग उछल रहेथे उनका शमन करने के लिये ऐसा प्रसंग पाकरके लाभ लिया है. इस प्रसंगपर (जुनागढके ) रा. रा. भाइ मोतीलाल वि. रविशंकर घोडाका उपकार मानताहुं. नामदार बडोदा सरकारने ऋग्वेदके सायण भाष्यका गुर्जर भापान्तर करनेका उनको सुप्रत किया है. और मुद्रित करादेनाका मंजूर किया है. रा. मोतीलालजीने उस ग्रन्थकी प्रस्तावनाके रूपसे विषय उपयुक्त होवें इस लिये नोट करके भेजने के लिये मुझे सूचना की. मैंने उसी उद्देशसे . इस विषयकी यथामति रचना की है. प्रमादकी क्षमाका पात्र हुं-में- वकील गुलावराय वि. छाया राजकोट. -

[३१]
नोट-पृठ ९फे पारिमाप में "द अशरय ६" इम् सिमा
न्त विरुद्ध लोकमान्य तिलकका अनिमाय और इसकी पुष्टिमें रात दीये
है ये यताये. यह पिपप इस Arethe stome नाम पुसमें
एष्ठ ४५ में छा गया है. इस तरह अधिक दिम पातके चमहसे मनुः
उपर भुरके निकट प्रदेशमें देते थे यदसि नीने आये इसका समय इ. स. पू.
दश हजार वर्ष पहिलेका मी.लिक मुकरर करते है (पृष्ठ ४२७). और
फोह महर्षि इ. स.
दो और चार अन वर्ष पहिले दोनेका करते हैं
(पृष्ठ ४२२).

शुद्धि पत्र. अशुद्ध पृष्ठ पंक्ति प्रकाशकका विज्ञापन ७ बतलाइ नहि है बतलाइ है Artic Home १२ Arctic Home. ऋग्वेदतत्त्व R १२ ३८ ५१ २० १५ २ १५ २५ ६२ हाकर प्राप्रमिच्छन्ति मातुर्जनयाः श्रुतिभ्यां आजनिबष्टि परित्रव जातभूतदा परमेश्वरमें तदन्याशांदिसौ महाम्तं आदिद्धावा अतीन्दिय सहस्रस्खाशीर्षा सहस्त्राक्षः नन्त्रमें दष्ट्य यज्ञादिकम होकर प्राप्तुमिच्छन्ति मातुर्जनन्याः श्रुतिभ्यः आजनिपीष्ट परिसब नातमभूतदा परमेश्वरसें तदन्वाशादिशो महान्तं आदिद्यावा अतीन्द्रिय सहस्रशीर्पा सहस्राक्षः मन्त्रमें देप्याय यज्ञादिकमें अतिमें महेश्वर्य माया कुमारो ४ ७१ ७२ १३ ७६ ८ १८ ૨ ९२ श्रुतिम १०१ १३३ २ २५ महाभाग्य मावा कुमारे [३४] नोट- २फे पारिमाफ. "येद अपारपेप" इस सिद्धा. त बिरुद लोकमान्य निरकका अनिमाय और इसकी पुष्टिम दृष्टान्त दीये है ये पता है. यह विषय इम Arette Home नामले पुकम पृष्ठ ४५ में छपा गया है. इस तरह अधिक हिम पावके वजहसे मनुस्य उगर मुरके निकट प्रदेशमै रहेते थे यहमि नीने आये इसका समय इ. स. पू. दश हजार वर्ष पहिलेका मी. तिलक मुकरर करते है (पृष्ठ १२७). और फोह महर्षि स. पू. दो और चार अन्न वर्ष पहिले होने का कहते हैं (पृष्ठ ४२२).

ॐ तत्सद्ब्रह्मणे नमः ऋक्संहितान्तर्गताना मध्यात्मविषयाणाचा सायणाचार्यविरचितं भाष्यम् भाषानुवादसहितं प्रारभ्यते । सं. अष्ट. अ. वर्ग १. ' १ १ ७ तरणिविश्वदर्शतोज्योतिष्कृदंसिसूर्य । विश्वमाभांसिरोचनम् ॥ ४ ॥ हे सूर्य ? अन्तर्यामितया सर्वस्यप्रेरक ? परमात्मन् ? तरणिः संसाराधे स्तारकोऽसि । यस्मात्त्वं विश्वदर्शतो विश्वः सबै मुमुक्षुभिर्दर्शतो दृष्टव्यः साक्षात्क- तव्य इत्यर्थः । अधिष्ठानसाक्षात्कारेबारोपितं निवर्तते । ज्योतिष्कृत् ज्योतिषः सूर्यादेः कर्ता, तथाचाम्नायते चन्द्रमामनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत" (ऋ. सं. ८-४-१९) इति । ईदृशस्त्वं चिद्रूपतया विश्वसदृश्यजातं रोचनं रोचमानं दीप्यमानं यथाभवति तथा आभाति प्रकाशयसि । चैतन्यस्फुरणेहि सर्व जगद् दृश्यते । तथा चाम्नायते-" तमेव भान्तमनुभातिस तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (कठ, २-२-१५) इति ॥ ४ ॥ अनुवाद-हे सूर्य सबके अन्तर्यामि होनेसे प्रेरणा करनेवाले हे परमा- स्मन् ? आप संसारसमुद्रसें (अधिकारीयोंको) तारनेवाले हो. क्योंकी आप समय मुमुक्षुजनसमूहके साक्षात्कार करने योग्य हो. याने अधिष्ठान के अपरोक्ष ज्ञानसे आरोपित जोकी. फल्पित प्रपंच है सो निवृत्त होजाता है. और सूर्यादिक ज्योतिके बनानेवाले याने अपना तेज उनमे निहित करके प्रेरणा करनेवाले भी आपहीहो. श्रुतिमी इसीअर्थका प्रतिपादन करती है-" आपके ( विराटस्वरूपा- न्तर्गत) मनसें चन्द्रमा और चक्षुसें सूर्य प्रादुर्भूत होताहै" वैसे आप शुद्ध ,

[३]
३. २,२:२४ प्रताद्वष्णुःस्तवतेवीर्येणमृगोनभीमाकुचरोगिरिष्ठाः।
यस्योरुघुत्रिपुविक्रमणेवाधिक्षियन्तिभुवनानिविश्वा ॥२॥
स महानुभावो विष्णुः वीर्येण स्वकीयेनवीरकर्मणा पूर्वोक्तरूपेण प्रस्तवते
'प्रकर्षण स्तूयते सः । वीर्येण स्तूपमानवे दृष्टान्तः-मृगान सिंहादिरिय यथास्य
विरोधिनी मृगयिता सिंहो भीमोभीतिजनकः कुचरः कुत्सितहिंसादिकर्ता दुर्गमप्रदेश
गन्तावा गिरिष्ठाः पर्वताद्युनतप्रदेशस्थायी सर्प : स्तुयते तद्वदमयपि मृगोऽन्वेष्टा
शत्रूणां भीमो भयानकः सर्वेषां भीत्यपादानभूतः, परमेश्वरानीतिः "भीपास्माहातः
पयते " (ते. २-८) इत्यादिश्रुतिपुप्रसिद्धा । किञ्च कुचर : शत्रुवधादिकुलित
कर्मकर्ता कुपु सर्वासु भूमिपु लोकत्रयेषु संचारीवा तथा गिरिष्ठा : गिरिवदुच्छ्रित
लोकस्थायी यद्वा गिरि मन्त्रादिरूपाया वाचि सर्वदा वर्तमानः ईदृशोऽयं स्वमहिम्ना
स्तूयते । किञ्च यस्यविष्णोरुरुपु विस्तीर्णेपु त्रिपु त्रिसंख्याकेषु विक्रमणेपु पादप-
क्षेपेषु विश्वासर्वाणि भुवनानि भूतजातानि आश्रित्य निवसन्ति सविष्णुःस्तूयते ॥२॥
अनुवाद-वह महाप्रतापी विष्णु वीरकर्भ-पराक्रमसे अत्यन्त स्तूयमान
होतेहै। इसमें दृष्टान्त हैकी जैसे अपने विरोधिवर्ग हरिणादिककी खोज करने-
वाला अयोग्य हिंसादि करनेवाला अथवा दुर्गमप्रदेशतक जानेवाला और पर्वता-
दिक उन्नत स्थलपर रहनेवाला परम भयानक सिंहादिक इतर लोकोसे याने उस
सिंहादिकके भक्ष्य समूहसें स्तुति किया जाता है तैसेंही वह विष्णुदेवी सब
शत्रुन्को दुराचारीयोको खोजनेवाला सबनको (अपराधिओंको) भय देनेवाला है.
तैत्तिरीय (२-८) श्रुतिमें भी कहा की "इसी देवसे भयभीत होकर वायु सदा
गतिमान होतीहै. और सूर्य, चन्द्र, अमि, मृत्यु वगेरह इसीके डरसे अपने
अपने कार्यमें मुस्तेइद हो रहै है"। और यह विष्णु सिंहादिककी तरह शत्रुव-
धादिक करनेवाले है, अथवा (कुचरः) पृथिव्यादित्रिलोकी सर्वत्र विहार करने
वाले है, और मन्त्रादि रूप वाणीमें रहनेवाले है, अथवा पर्वतवत् दुर्गम देश
(लोक) में स्थितिवाले है, सो विष्णु अपनी महत्वासे स्तूयमान होतेहै । और
जिस विष्णुके विस्तारवाले तीन पादप्रक्षेपमें समग्र भूत आश्रित - होकर निवास
करते है, ऐसे विष्णु स्तुति किये जाते है. ॥ २ ॥

[२] चिद्रूप होनेसे समस्त दृश्य वर्ग जैसे प्रकाशित हो तैसे मान कराते हो, क्योंकी चैतन्यकी स्फुरणाहीसे सकल प्रपंच दृश्यमान हो रहाहै. कठवल्लो भी कहाहैकी उस (परमेश्वर) के प्रकाशसे सब प्रकाशित होताहै और उसी के तेजसे सब तेजस्वी हो रहा है. इत्यादि. २. २ २ २४ विष्णार्नुकंधीयोणिमयोंचंय.पार्थिवानिविममेरसि। योअस्कभायदुत्तरंसधस्थविचक्रमाणवेधोरुगायः॥१॥ हे नराः विष्णो र्यापनशीलस्य देवस्य वीर्याणि वीरकर्माणि नुमति शीघ्रप्रवोचं प्रत्रवीमि । यो विष्णुः पार्थिवानि पृथिवीसंबन्धानि रजासि रजना- त्मकानि क्षित्यादिलोकत्रयाभिमानीनि अमिवारमादित्यरूपाणि रजांसि विममे विशेषेण निर्ममे । किञ्च यश्चोत्तरमुत्कृष्टतरं सर्वेषां लोकानामुपरिभूतमपुनरावृत्ते स्तस्योत्कृष्टत्वम्, सधस्थमुपासकाना सहस्थानं सत्यलोकमम्झभायत् स्कमित- वान् ध्रुवं स्थापितवान् । किंकुर्वन् ! त्रेधा विचक्रमाण स्त्रिपकार स्वस्टॉलोकान् विविधंक्रममाणः । विष्णास्त्रेधा कमणम् “ इदविष्णुर्विचक्रमे " (ऋ सं.१-२-७) इत्यादि श्रुतिपुप्रसिद्धम् । अतएव उरुगायः उरुभिर्महद्भिर्गीयमानः । यएवं कृत. वास्तादृशस्य विष्णोर्याणि प्रयोचम् । १ अनुवाद-हे पुरुषो' विष्णु व्यापफ जो परमेश्वर है उनके वीर्य वरि- कर्म पराक्रम बहुत जल्दी में कहताहु । जिस विष्णु देवने पृथिवी संवन्ति रञ्जनात्मक भूरादि तीनों लोकके अभिमानी आग्नि वायु और सूर्य स्वरूप सृष्टि का स्पष्ट रूपसे निर्माण किया है। और जोकी विष्णुदेवका धाम पुनरावृत्ति रहित हाकर सकल विश्वका सर्वोपरि विराजमान होनेसे अत्यन्त उत्कृष्ट है. और जिस विष्णु देवने उपासकोके सहनिवासरूप सत्यलोकको स्थिर निश्चल करके स्थापित किया है. स्वकीय अपरिमित शक्तिसें निर्मित लोकोंको मात्र पादत्रयाकान्त करके जिस विष्णु देवनें व्याप्त किये है. (ऋ. सं. १-२-७ श्रुतिमें विष्णुकृत पादत्रया क्रमण स्फुट प्रदर्शित किया है.) और जो विष्णुदेव वैसा आक्रमणादिक अनन्य साधारण पराक्रम करनेसे महापुरुषोसें स्तूयमान स्तुति किये जाते है. पैसे विष्णु कहता हुं.॥१॥ देवके पराक्रम ।

. [३] ३. २.२. २६: प्रताद्विष्णु स्तवतेवीर्येणमृगोनभीमाकुचरोगिरिष्ठाः । यस्योरुघुत्रिविक्रमणेप्वधिक्षियन्तिभुवनानिविश्वा ॥२॥ स महानुभावो विष्णुः वीर्येण स्वकीयेनवीरकर्मणा पूर्वोक्तरूपेण प्रस्तवते 'प्रकण स्तूयते सर्वः । वीर्येण स्तूपमानवे दृष्टान्तः-मृगोन सिंहादिरिव यथास्व विरोधिनो मृगयिता सिंहो भीमोभीतिजनकः कुचरः कुत्सितहिंसादिकर्ता दुर्गमप्रदेश 'गन्तावा गिरिष्ठाः पर्वताद्युन्नतप्रदेशस्थायी स : स्तूयते तद्वदमयपि मृमोऽन्वेष्टा शत्रूणां भीमो भयानकः सर्वेषां भीत्यपादानमृतः, परमेश्वरादीतिः "भीपास्माहातः पवते " (ते. २-८ ) इत्यादिश्रुतिपुप्रसिद्धा । किञ्च कुचर : शत्रुवधादिकुलित कर्मकर्ता कुपु सर्वासु भूमिपु लोकत्रयेपु संचारीचा तथा गिरिष्ठाः गिरिवदुच्छ्रित लोकस्थायी यद्वा गिरि मन्त्रादिरूपाया याचि सर्वदा वर्तमानः ईशोऽयं स्वमहिमा 'स्तूयते । किञ्च यस्यविष्णोरुरुपु विस्तीर्णेपु त्रिपु त्रिसंख्याकेषु विक्रमणेषु पादप- क्षेपेषु विश्वासर्वाणि भुवनानि भूतजातानि आश्रित्य निवसन्ति सविष्णुःस्तूयते ॥२॥ अनुवाद-वह महाप्रतापी विष्णु वीरकर्भ-पराक्रमसे अत्यन्त स्तूयमान होतेहै । इसमें दृष्टान्त हैकी जैसे अपने विरोधिवर्ग हरिणादिककी खोज करने- वाला अयोग्य हिंसादि करनेवाला अथवा दुर्गमप्रदेशतक जानेवाला और पर्वता- दिक उन्नत स्थलपर रहनेवाला परम भयानक सिंहादिक इतर लोकोसे याने उस सिंहादिकके भक्ष्य समूहसें स्तुति किया जाता है तैसेंही वह विष्णुदेवी सब शत्रुन् को दुराचारीयोको खोजनेवाला सबनको (अपराधिओंको) भय देनेवाला है. तैत्तिरीय (२-८) श्रुतिम भी कहाहै की "इसी देवसे भयभीत होकर वायु सदा गतिमान् होताहै. और सूर्य, चन्द्र, अमि, मृत्यु वगैरह इसीके डरसे अपने अपने कार्यमें मुस्तेइद हो रहैं है"। और यह विष्णु सिंहादिककी तरह शत्रुव- धादिक करनेवाले है, अथवा (कुचरः) पृथिव्यादित्रिलोकीमें सर्वत्र विहार करने वाले है, और मन्त्रादि रूप वाणीमें रहनेवाले है, अथवा पर्वतवत् दुर्गम देश (लोक ) में स्थितिवाले हैं, सो विष्णु अपनी महत्तासे स्तूयमान होतेहै । और जिस विष्णुके विस्तारवाले तीन . पादप्रक्षेपमें समग्र भूत आश्रित होकर निवास करतें है, ऐसे विष्णु स्तुति किये जाते हैं. ॥ २ ॥ .

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..
[४]
२०२:२४, प्रविष्णवेशूषमतुमन्मगिरिक्षित रुगायायप्णे।
यइदंदीर्घमयत संघस्थ मे विममे त्रिमिरित्पदेमिः ॥३॥
विष्णवे सर्वव्यापफाय शूपमस्मत्कृत्यादिजन्यं महत् वलत्वं मम मननं
स्तोत्रं मननीयं शूपं वलं वा विष्णुमेतु प्रामोतु । कीदृशाय ? गिरिक्षित वात्रि
गिरिवदुन्नतपदेशे वा तिष्ठते उरुगायाय बहुभिर्गायनानाय वृष्णे वपित्रे कामानाम्
एवं महानुभाव शूषं प्राप्नोतु । कोऽस्य विशेप इत्युच्यते-यो विष्णुरिदं प्रसिद्ध
दृश्यमानं दीर्घमतिविस्तृत प्रयतं नियतं सधस्थ सहस्थान लोकत्रयमेक इत् एक
एवाद्वितीयः सन् त्रिभिः पदेभिः पादैविममे विशेषेण मितवान् ॥३॥
अनुवाद-सर्वत्र व्यापक ऐसे विष्णुदेवको हमारे कृत्यादिकोसे उत्पन्न
होनेवाला बडा बलर (बलिष्ठता) अथवा मनन करने योग्य जोकी स्तोत्रादिक
है सो प्राप्त हो । जोकी विष्णुदेव मन्त्रात्मक वाणीमे अथवा पर्वतादिवत् उन्नत
स्थानापन्न है. जैसे पर्वतादिस्यलबहुत दुर्गम होता है सहीयह विष्णु मनधि-
कारियोंको दुर्गम दुष्प्रापद और अनेक लोकोसें स्तूयपान है सकल कामनाओंकों
पूर्ण करने वाले हैं ऐसे विष्णुदेव को हमारा कृत्यादि जन्य बल और स्तोत्र प्राप्त हो.
याने वह विष्णुदेव मन वाणीके अविषय होने परभी हमारी स्तुतिका लक्ष्य हो.
अब इस विष्णुदेवका विशेष बतलातेहै--जो विष्णु देव यह सुप्रसिद्ध याने
पुरोदृश्यमान अत्यन्त विस्तारयाला देशकालानुसार नियमपूर्वक स्थितिवाला
सचराचर प्रपंचको स्वयं आद्वितीय याने एकाकी होते हुवेमी मात्र चग्णत्रयाक्रम-
णसे
युगपत् परिमित करचुहै, सो परमदेव विष्णु हमारी स्तुतिका विषय हो ॥३॥
यस्य त्रीपूर्णा मधुना पदान्यक्षीयमाणास्वधा मदन्ति ।
यांत्रिधातु पृथिवी मुतयामेकांदाधारभुवनानि विधा । ५
यस्य विष्णोर्मधुना मधुरेण दिव्येनामृतेन पूर्णा पूर्णानि त्री त्रीणिपदानि
पादप्रक्षेपणानि अक्षीयमाणानि स्वधया अन्नेन मदन्ति मादयन्ति तदाश्रितजनान् ।
यउ यएव पृथिवी प्रख्यातां भूमि द्यामुत द्योतनात्मकमन्तरिक्ष' च विश्वा भुवनानि
सर्वाणि भूतनातानि चतुर्दशलोकाँश्च धृतवानुवादितवान्, तथाच श्रुतिः-ततेजो.
ऽस्जत तदपोऽसृजत ता आप ऐक्षन्त ता अन्नमसृजन्त (छा ६-२.-३,४)
इत्यादिः ॥ ४ ॥

.. [५] अनुवाद-जिस विष्णुदेवके अविनाशी और अमृतपूर्ण चरणत्रयके “आक्रमणसे उन (विष्णु) के आश्रित लोक अन्न ( आदिका) से तृप्तहोते हैं । और जिस विष्णुदेवने पृथिवी अन्तरिक्ष सकलभूत और चतुर्दश ब्रह्माण्ड वगैरहको उत्पन्न किये है। छान्दोग्यश्रुतिमे " उसने तेजको उत्पन्न किया उसने जिलको उत्पन्न किया और जलसे ईक्षणद्वारा पृथिव्यादि भूत भौतिक सकल सृष्टि उत्पन्न की" ऐसा कहा है. ॥४॥ ६. २ २ २४ तदस्यमियमभिपाअश्यांनो यत्रदेवयोमदन्ति । उरुकमस्य साहिबन्धुरित्याविष्णोःपदेपरमेमधउत्सः || अस्य विष्णोः प्रिमियभूतं तत् सः सेव्यत्येन प्रसिद्धं पाथः अन्तरिक्ष लोकाख्यंस्थानं अविनश्वरं ब्रह्मलोकमित्यर्थः अमिअश्यां व्यान्पुयाम, तदेव विशेष्यते यत्रस्थान देवयवः देवं द्योतनस्वभा विष्णुमात्पनइच्छन्तो यज्ञदा नादिभिः प्राप्नुमिच्छन्तो नरः मदन्ति तृप्तिमनुभवन्ति तदश्यामित्यन्वयः । पुनरपि तदेव विशेष्यते-उरुक्रमस्य अत्यधिकं सर्व जगदाक्रममाणस्य तत्तदात्मना अतएवविष्णो ापकस्य परनेश्वरस्य परमेउत्कृप्टे निरतिशये केवलसुखात्मकेपदे स्थाने मध्वः मधुरस्य उत्सः निष्पन्दो वर्तते तदश्याम् । यत्र क्षुत्तृष्णाजरामरण पुनरावृत्त्यादिभयं नास्ति, संकल्पमात्रेणामृतकुल्यादिमोगाः प्राप्यन्ते तादृश मित्यर्थः । ततोऽधिकं नास्तीत्याह-इत्था इत्थमुक्तप्रकारेण सहिबन्धुः स खलु सर्वेषां सुकृतिनां वन्धुभूतो हितकरो वा तस्य पदं प्राप्तवतोनपुनर वृत्तिः । "नसपुनरावर्तते" इतिश्रुते स्तस्य वन्धुत्वम् ॥५॥ अनुवाद-इस विष्णु देवको प्रिय और सब लोकोंको सेवनाय जो अन्त- रिक्ष स्थान, याने ब्रह्मलोक उसको में प्राप्त होउं की जिस स्थानमें यज्ञदानादि- कसे उस विष्णु देवको प्राप्त करनेकी इच्छावाले अधिकारिलोक तृप्तिका अनुभव करते हैं. और तत्तत्स्वरूपसे सचराचर विश्वका आक्रमण करनेवाले, और इसीलि। व्यापक जो परमेश्वर उनके परमश्रेष्ठ निर्विशेष केवल सुखरूरस्थानमे माधुर्य का प्रवाह बहेताहै, याने जिस विष्णुपद में भूख प्यास वाक्य मृत्यु पुनरावृति इत्यादिक भय नहोकर केवल संकल्पमात्रसे पीयूपपानादि भोग अनायामसे प्राप्त होतेहै, और जो विष्णु देव इसी प्रकारका अपना स्थान सकल सुकृतवाले [६] -अधिकारियोंको देनेसें सबोका - बन्धुहै. याने भोगोंकी- इच्छावाले पुण्यात्मा पुरुषोंकों ब्रह्मलोकान्तर्गत अनुकूल भोगप्रद होनेसे बन्धुहै, अगर वह पुण्यात्मा -पुरुष मुमुक्षु हो तो अनुकूल मोगानुभव होने के बाद आत्मज्ञानद्वारा अपुनरावृत्ति- रूप मोक्षपदका दायक होनेसेभी वह बन्धु है अथवा हितकरहै. उसके स्थानको प्राप्त भये हुवे अधिकारिलोक फिर वापस लौटते नहि.ऐसे विष्णुदेवके स्थान की में प्राप्त होउं । " नसपुनरावर्तते वह (अधिकारि) पुनरावृत्तिको पाता नहिं." इस श्रुतिके अनुसार विष्णु देवका बन्धुत्व सिद्ध है ॥५॥ ७. २ २ २४ तावां वास्तून्युश्मसिगमध्ये यत्र गावोभूरि श्रृङ्गा अयास। अत्राइतर्दुरुगायस्य वृष्णः परमपदमवभाति भार॥६॥ हे पत्नीयजमानौ ? वां युष्मदर्थ ता तानि गन्तव्यत्वेन प्रसिद्धानि वास्तूनि सुखनिवासयोग्यानि स्थानानि गमध्यै युवयार्गमनाय उश्मसि कामयामहे तदर्थ विष्णुं प्रार्थयामइत्यर्थः। तानि कानीत्याह यत्र येषु वास्तुपु गावो रश्मयो भूरि- शृंगाः अत्यन्तोन्नत्युपेताः बहुभिराश्रयणीयावा अयासः अयनागन्तारः अतिवि- स्तृताः यद्वा अयासः गन्तारः अतादृशा अत्यन्तप्रकाशयुक्ताइत्यर्थः । अत्राह- अत्र खलवास्त्वाधारभूते धुलोके उरुगायस्य बहुभिर्महात्मभिर्गातव्यस्यस्तुत्यस्य वृष्णः कामानां वर्पितुर्विष्णो स्तत्तादृशं सर्वत्र पुराणादिषु गन्तव्यत्वेन प्रसिद्ध परम निरतिशयपदं स्थान भूरिअतिप्रभूतमवभाति स्वमहिना स्फुरति ॥६॥ अनुवाद-हे पत्नी औरयजमान ? आप ( दोनो) के लीये आरामसे वास करने योग्य अवश्य प्राप्त करने योग्य जो (विष्णुदेवका) स्थान है, वहां आप जाइयें, आपका वहागमन हमलोक चाहते है. और इसीलीये भगवान् विष्णुदेवकी प्रार्थना करते है, जिन स्थानोमें अत्यन्त उन्नतिको पाये भये (दिव्य तेजके ) किरणोंको अनेक लोक आश्रय कर रहें हैं, और जो किरणो बहुत विस्तारवाले होकर अत्यन्त ही प्रकाशवाले है। और जिस निवासके आधारभूत दिव्य लोकमें महात्माओंसे स्तुति किये जाते सकल कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विष्णुदेवका पुराणों में प्रसिद्ध और अवश्य प्राप्त करने योग्य निर्विशेष धाम अपने माहात्म्यसे देदीप्यमान हो रहा है याने स्फुटतया चमक रहा है वहां आप (दोनों) जाइये ॥६॥ - , . [७],. ८. २ -३.१४. अस्य वामस्य पलितस्य होतुस्तस्य भ्रातांमध्यमो अत्यनः। तृतीयोमाता घृतष्ठिो अस्यात्रापश्यं विपति सप्तपुत्रम्॥१॥ अस्य वामस्य विश्वस्योगरितुःस्रष्टुः पलितस्य पालयितुः स्वसृष्टं जगत्पालन शीलस्य होतुरादातुः स्वस्मिन्सहर्तुः परमेश्वरस्य सृष्टयादिकर्तृत्वं श्रुतिस्मृतिपुरा- णादिपु प्रसिद्धम् , तस्यतादृशस्य परमेश्वरस्य भ्राता तद्भागहारी तदंशभूतसूत्रात्मा मध्यमः सर्वत्र मध्ये वर्नमानोऽस्ति जगद्धारकपन गर्तते । सचाश्नः व्यापनशीलः "वायुनावैगोतमसूत्रेण अयं च लोकः परश्च लेाकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि" (बृ. उ. ३-७-२) इति श्रुतेः । वक्ष्यमाणविराडपेक्षया वा मध्यमत्वम् । किन्च अस्य परमेश्वरस्य तृतीयो घृतपृष्ठः घृतमित्युदकनाम तेनतत्काः शरीरमुच्यते तदेवपृष्ठं स्पर्शनीयं सर्वस्यस्पर्श वा यस्य स तादृशः । यद्वाप्रदीप्तपृष्ठः पृष्ठशब्दः कृत्स्नशरीरोपलक्षकः प्रकाशितशरीराभिमानीत्यर्थः, नत्वयं सूक्ष्मशरीराभिमानि सूत्रात्मवत् स्पर्शनाविपयोभवति, अत्र एपु मध्ये विश्पति 'विशां प्रजानां पति मुपलक्षणमेतत् सर्वस्यपतिमित्यर्थः "सर्वस्यपतिः सर्वस्येशानः" इतिश्रुतेः सप्तपुत्रं सप्तलोकाः पुत्रायस्य तादृशं स्वमायया सृष्टसर्वलोकमित्यर्थः अपश्यं पश्येयम् साक्षात्करोमीत्यर्थः । अयमर्थः-स्वाधीनमायो जगत्कारणभूतः परमेश्वर एकः ततउत्पन्नौ स्थूल सूक्ष्मशरीराभिमानिनौ द्वौ विराट्सुत्रात्मानौ, पुमध्ये द्वयोः साक्षात्कारेण मोक्षाभावात् सृष्ट्यादिकारणं परमेश्वरं ज्ञेयत्वेन प्रसिद्धं श्रवणमनना- दिसाधनेन साक्षात्करोमीत्यर्थः ॥ १॥ अनुवाद-समस्त प्रपंचको उत्पन्न करनेवाले और उत्पादित प्रपंचको पालन करनेवाले और अपने स्वरूपही फिर लीन करनेवाले इस परमेश्वरका भ्राता याने उसका अंशायमान सूत्रात्मा सर्वत्र मध्यमें वर्तमान है. क्योंकी वह सकल जगतको धारण करता है. और वह व्यापक है. श्रुति कहती है की-चायु- इस सूत्रात्मासे यह लोक परलोक और सफल भूत प्रथित है। अथवा वक्ष्यमाण चिराट्की अपेक्षासें भी यह सूत्रात्मा मध्यम हो सकता है. एवं इस परमेश्वरका तृतीय (अंशायमान स्वरूप ) घृतपृष्ठ-सब भौतिक शरीरको स्पर्श करनेवाला अथवा स्पर्श करने योग्य है, याने समग्र देहाभिमानको प्रका- शित करनेवाला है (जिस को की " विराट् " ऐसा कहते हैं) यह (विराट् ) सूक्ष्मदेहाभिमानी सूत्रात्माकी तरह स्पर्शका अविषय नहि है किंतु प्रतिद्धतया वत् सर्वत्र वर्तमान . - [2] देहामिमानको प्रकाशिता फरनेवाला है. इन तीनों में जोकी सचराचर जगतकी ।' नियन्ता है, श्रुतिमी " सबका पति सबका ईश्वर ", इत्यादि वचनोसें उसीका नियन्तृत्व सिद्ध करती है, और सात लोकोंके पिता याने अपनी मायाहीसे जिसन सर्व लोकाकी उत्पत्ति की है ऐसे परमेश्वरको में साक्षात् अपरोक्ष करता हुं. यह तात्पर्य हुचाकी-स्वाधीन मायाशक्तिवाला जगत्का फारणभूत परमेश्वर एकही है. उसके स्वरूपसें स्थूल और सूक्ष्मशरीरके अभिमानी विराट् और सूत्रात्मा दोनो उत्पन्न हुवे. अब इन तीनो से विराट और सूत्रात्माके साक्षागार होने पर मुक्ति नहि होती. इस लिये प्रपंचकी उत्पत्ति स्थिति ओर लयका कारण और शास्त्रों जिसको जान से पुरुषार्थासद्धि बतलाइ है ऐसे कारणभूत परमेश्वर- का श्रवणमनननिदिध्यासनादि साधनोंसे साक्षात्कार में करताहुं. ॥ १ ॥ ९. २ ३ १४ सप्तयुञ्जन्तिरथमेक चक्रमेकोअर्धा वहति सप्तनामा । विनाभिचक्रमजरमनवयत्रेमाविश्वाभुवनाधितस्थुः ।।२।। एकचक्र एकरथाङ्गोपेतं, यद्यपि त्रीणि चक्र णि तथापि तेपामेकरूपत्वा देकचक्रमित्युच्यते, रथ, रहणस्वभावं सूर्यस्य सम्बन्धिन सप्त एतत्संख्याका अश्वा युञ्जन्ति अनुबन्नन्ति वहन्त्यहोरात्रनिर्वाहाय । कि वस्तुतः सप्त ? नेत्याह-एकोs श्वः सप्तनामा, एकएव सप्ताभिधानः सप्तधा नमनप्रकारोवा, एकएव वायुः सप्त रूपाणि धृत्वा वहतीत्यर्थः । , वायवधीनत्वादन्तरिक्षसंचारस्य एकच कमित्युक्तम् । कीदृशं तदित्यत आह निनाभि भूतभविष्यवर्तमानाख्यास्त्रयःकाला स्त्रिनामयः तद्विशिष्टम्, पुनः कीदृशम् ? अजरममरणधर्मझ गनर्वमाशथिल, पुनस्तदेय विरोप्यते-यत्रयस्मिंश्चके इमा विश्वा भुवना इमानि प्रसिद्धानि सर्वाणि भूतजातानि अधि आश्रित्य तस्थस्तिष्ठन्ति । ईदृशस्यकालस्य कारणभूतपरमेश्वरज्ञानेन मोश सद्भावाज्ज्ञानमोक्षाक्षरप्रशंसोक्ता ॥ २ ॥ अनुवाद-एक चक्रवाला और सात घोडे जिसमें नियुक्त होते है ऐसा जो सूर्यका रथ है, यद्यपि भूत भविष्य वर्तमान तीन काल होनेसे तीन चक्र कहना चाहीये परंतु काल सामान्य एक होनेसे एक चक्र" एसा कहा है, उसी तरहसे सात अर्थ यह अर्थ अभिप्रेत नहि है किंतु सप्तनामक एकही वायु उसका संचारक होनेसे, सप्त अश्व नियुक्त होते है ऐसा कहा है। क्योंकी अन्तरिक्षमें विहार करनासो वायुके अधीन है.। यानवायु एक, ही होने परभी ।

[१] सप्त स्वरूप धारणकरके जिस रथ )को चलाता है. और पूर्वोतं जो गत मवि- प्य वर्तमान काल वे जिस रथके चक्रके नाभिस्थानापन है । और उत्पत्ति नाशा- दिकसें राहिल-होकर जो चक्र बहुत मजबूत है । और जिस चक्रमें यह प्रसिद्ध समत्र भूतसमूह आश्रय करके रहते है, ऐसे यह काल चकवाले स्थला नियामक परमेश्वर के अपरोक्ष ज्ञानहाँसे मुक्ति होती है. इस वजहसे श्रवणादि साधनों करके उस परमेश्वरके साक्षात्कारंग तत्पर में होता हुँ. (इस तरहसे पूर्व मंत्रसें संबन्ध है.)॥२॥ १०. २ ३ १४ कोर्ददर्शप्रथम नानानमस्यन्वन्तं यदनस्याविभाति । भूम्याअसुरसंगात्माफ्वस्वित्कोविद्वांस पंगालमेतत् ॥४॥ एवं प्रपञ्चस्यकालायत्ततां प्रतिपाद्य तस्यकारणभूतस्य परमेश्वरस्याविषय- माह-नोदयर्श कोबटुं शकुयात् , कदा! प्रथमंतष्टेःपूर्व यन्याश्वावस्थायामित्यर्थः। कि ? जायमानं प्रथमभावविकारमापस मुत्पद्यमानं प्रपञ्चमित्रार्थः । दुर्जेयत्वेहेतु- माह-यद्यस्मात् अस्थन्वन्तमस्थिमन्तं, शरीरमुपलक्षणमेतत् , कार्यगावमापन मित्यर्थः, अनरसा अस्थिरहिता अशरीरा सांगासिद्धाप्रतिः वेदान्तप्रसिद्धा ईश्वरायसागाया विमति गर्भवदन्तर्धारयति, अन्याकृतावस्थायां अजयोऽशरीरः परमधरो निलर्ति. यदा केवलः परमेश्वरो मायाशबालितः सन् इदं जगनिर्मित. वान् , उत्पत्तिसमये देहादिसहितस्य कस्यचिदभावात् को ददर्श तदानी मनो नित्य आत्मा च नित्यस्तत्संयोगात्कश्चिदात्मा जानातीतिचेत्सोऽपिनसंभवत्यतआह- भूम्याःसंबन्धि पार्थिवं स्थूलशरीरं, असुः प्राणस्तदुपलक्षितं सूक्ष्मशरीरं, असृक् शोणितं सप्तधातूपलक्षकं, यद्यपिशरीरं पंचभूतात्मकं तथापि भूतद्वयप्रत्यक्षत्वा तदपेक्षयोक्तम् । आत्मा तैः संबद्धश्चेतनः कास्वित् कुत्रास्ते न कश्चिदम्तीत्यर्थः। "नान्यत्किञ्चनमिषत्" (ऐ. १. १. १.) इतिश्रुतेः । विद्वांसं जगत्कारणविषय- ज्ञानवन्त मन्यंगुर्वादिकं एतत्कारणं मष्टुं कः शिष्योऽल्पमतिरुपगात् उपगच्छति । तादृशोदेहेन्द्रियसंघातरूपः आत्मा तस्मिन्समयकुत्रास्ति प्रष्टाप्रतिवक्ताचोभाव- पिनस्तइत्यर्थः । “ नतु सद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विमक्कयत्पश्येत् " इतिश्रुतेः । यहा प्रथमं प्रथममाविनं जगतःकारणभूतं को ददर्श का साक्षात्करोति । जायमा- . ૨

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[१०]
नमस्थन्वन्तं मानुष मनस्थिकः, परमेधरः शरीरमशरीरो यस्माद्विमति द्रष्टुरपित
कार्यत्वादिति भावः॥ १॥
अनुवाद-उस तरहसे अपंचको कालाधीनता र प्रतिपादन करके
अपंचका कारणभूतः परमेश्वर (ज्ञानका ) अविषय है ऐसा कहते है-
- स्पष्टिक पूर्वमें याने अव्याकृतावस्थामें भावविकाररूपसे प्रथम उत्पन्न होनेशले
प्रपंचको देखने के लिये कौन समर्थ हो सक्ता है ? क्योंकी भावविकारात्मक इस
अपंचको शरीर ( आकार ) रहित जो सांख्यामिमत प्रकृति किंवा वेदान्त
प्रसिद्ध जो माया सो गर्भवत् अपनी भीतर धारण करती है. और अव्याकृताव
स्थामें शरीर (आकार) रहित परमेश्वर सो धारण करता है. याने परमेश्वर जयकी केवल
मायोपाधिक होकर इस प्रपंचका उत्पादक हुवा तो उस उत्पचि समयके प्राकालमें
देहेन्द्रियादिसंघातसहित कोइभी न होनेसें इस (प्रपंच) को कौन देख मक्ता है !
'कथंचित् ऐसा कहा जायकी मन नित्य है और आत्माभी नित्य है, उन दोनोका
। नित्य संयन्धवान् कोइ आत्मा जानता होगा, तो यह कहेनामी यथार्थ नहिं
है. क्योंकी-पार्थिवविकार जो स्थूलशरीर और तदन्तर्गत जो प्राणादिसहित
सूक्ष्मशरीर और शोणितादिक सप्तधातु इनसे संबन्ध रखनेवाला कोइभी चेतन
उस समय है नहिं. श्रुतिमी (ऐः १-१-१.) "व्यात भेदवान् पदार्थ है नहि"
ऐसा कहती है। याने विद्वान् जोकी जगत्के कारणरूप परमेश्वरको जानने-
वाला गुरु वगैरह है उनको इस प्रपंचके कारणको पूछनेके लिये अल्प प्रज्ञावाला
कौन शिष्य उपसदना वधिसे प्राप्त करसक्ता है, ऐसा देहेन्द्रियादिसंघात-
• विशिष्ट कोइ आत्मा है नहि. जबकी प्रष्टा और प्रतिवक्ता दोनों नहिं है तब
कौन पूछे और किस्से पूछे. यहतात्पर्य है. श्रुतिमी कहती है की " दूसरा कोई
पदार्थ है नहिं की जिसको परमेश्वरसे व्यतिरिक्त समझें" अथवा ऐसाभी
व्याख्यान हो सकता है-सबकी पहिले रहेनेवाले पुराणपुरुष परमेश्वरको मौन
(साधारण) साक्षात्कार करसक्ता है. क्योंकी उत्पन्न होने वाले भूत भौतिक
शरीरधारी सावयव है, और परमेश्वर निरवयव अशरीर है तो उसको मौन
अपरोक्षकरसके, याने जितने ब्रहत्वके अभिमानी है वे सब उनके बनाये भये
कार्य है. इससे उसको कोइ ( सत्वर मंद अधिकारी) अपरोक्ष करसक्ता
नहिं. ॥४॥

। है . ॥ . [११] ११. २ ३ १४ पाकः पृच्छामि मनसा विज्ञानन्देवानमिनानिहितापदानी वत्सेवस्कधि सततन्तन्विततिरेकवयोतवार्ड ||५|| पाफ: ' पक्तव्योऽपाकमतिरह मनसा संस्कृतेनाविजानन्नति गहन तत्व विशेषेणज्ञातुमशकुयन् पृच्छामि प्रश्नं करोमि। अज्ञाने कारणमाह-एना एनानि पदानि सदेहास्पदानि तत्वानिदेवानां निहिता निहितानि तानिदेवानामपिगूढानी- त्यर्थः, यद्वा देवानां पदानितत्त्वानि निधिवद्गोपयित्वा स्थापितानि । अत पृच्छामि ज्ञानोपयोगायति'शपः। तानिकानीत्युच्यते-वत्से सर्वस्यनिवासमूते वकये, चट इति सत्यनाम तत्कपतीति बप्कयः तस्मिन्नादित्ये, अधि अधिकं सप्ततन्तून् ठायमानान् सप्तसोमसंस्थान्क्वयोमेधाविनो यजमाना ओतव जगद्रूपतिर्यकन्तून् वेतुं विततिरे वितन्वन्ति ॥ ५ ॥ अनुवाद-अपक्कबुद्धिवाला और संस्काररहित मन होनेसें अत्यन्त गहन तत्त्वको यथार्थ समझनेको अशक्त ऐसा में (आपसे पूर्वमन्त्रोक्त) प्रभ पुछताहुँ. अज्ञानभै कारण बतातेह-देवोंकोभी जो (गह्नतत्व) संदिग्ध है अथवा वे देवों के तत्त्व याने दिव्य अलौकिक होनेसें निधिवत् खजानाकी तरह गुप्त करके रक्खे गयेहै, इसलिये उनतत्त्वोमें ज्ञानका उपयोग होने के लिये (आपसे) पूछताहुं । वे तत्त्व कौनसे ? तो कहते है की-समस्त प्रपंचका निवास- रूप और सत्य त्रिकालाबाधित जिस आदित्यके लक्ष्यार्थभूत परमेश्वरमें अधिक- रूपसे विस्तारको पाये गये सप्त लोकरूप तन्तुओको बुद्धिमान् लोक विस्तृत समझते है. याने उसी परमेश्वरस्वरूप अधिष्ठानमें यह सर्व प्रपचको कल्पित समझते है. ऐसे गहनतत्त्वको में पूछता हु. १२. २ ३ १५ अचिकित्वाञ्चिकितपश्चिदत्रंकी'च्छामि विद्मने न विद्वान्। वियस्तस्तम्भपनिमारजांस्यजस्य रूपेकिमपि स्विदेवम्॥ ६॥ अचिकित्वान् देवतातत्त्वमजानन् अहं चिकितुप : विशेषेणतत्त्वम् जानतः क्वीनकान्तदर्शिनः अधिगतपरमार्थान् अन अस्मिस्तत्वविपये पृच्छामि, किमर्थम्। विद्मने वेदनाय परमार्थज्ञानाय. किंजानन्नेचपराभवाद्यर्थ नेत्याह-विद्वान्न पृच्छामि अपितु अज्ञानादेव, य. परमेश्वरः वितस्तम्भ स्तम्भितवान् । अथ य आत्मा - [१२] सेतुर्वितिरेषालोकानामसभेदाय." इति श्रुतेः। (छां. ८-४-१) किम् ! इमा इमानिपज्जांसि लोकान् “लोकारनांस्युच्यन्त" इति निरुतम् । यधपिलोकाः सप्त तथापि सत्यलोकस्य सर्वेषांकर्मिणां साधारणत्वाभावात्पडित्युक्तम् । ननु पढेवोकाः “सप्तमः किमिति ननिर्दिष्टः। इत्युच्यते-अजस्य जननादिरहितस्य चतुर्मुखस्यब्रमण : रूसे स्वरूपे एक, सत्यलोकाख्यंपुनरावृत्तिरहितस्थानं किमपि स्वित् ! किस्विदेव ! तन्न केनाप्यधिगन्तुंशक्यमित्यर्थः । श्चिदेवोपासकैराचिरादि मार्गेण गन्तव्यत्वादितिभाव :। यद्वाएड्रजांसि विलक्षणा : पतवः तानि य : स्तम्भयतत्त्वं अजस्य गमनशीलस्य जन्मरहितस्य वादित्यस्यरूपे प्यमाणे दृश्य- माने मण्डले एकमहितीयं किमपिस्वित् ? किंस्वित् ? यत्किञ्चिदवाइनसगम्यतत्वम- स्ति तत्पृच्छामि " यएपोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषोदृश्यते " इत्यादि (छां. १.६.६) श्रुतिप्रतिपादितंतत्त्वम् । अथवापडिमानि रजासि त्रिविधान्मूलोकाँश्च यः तस्तम्भ, "तिस्रोभूमीर्धारयन् त्रीतद्यौ" रितिनिगमः (ऋ. सं. २-७-७) तस्या- जस्य परहमणोपे नानाविकारमाणिजगति किमपि स्विदेकमेकात्मलमस्तीति प्रश्नः। विशेषमस्ति नाममान्मेकरूपमस्तीत्युत्तरविवक्षया प्रश्न :" अस्ती- त्येवोपलब्धव्यमि" तिश्रुते ॥ ६॥ अनुदाद-दिव्य तत्त्वसे अज्ञात में क्रान्तदर्शी यथार्थ तत्त्वके विज्ञान- वाले शिष्टोसें पारमार्थिक ज्ञानके लिये पूछता हुं, तो क्या जानते हुवे पराज- यादिक के अर्थ पूछते हो ? नहि. -फेवल में अज्ञात होनेहीसे पूछताहुं. की जिस परमेश्वरने इन् छ लोकोको स्तम्भित-नियमित कर रखे हैं. श्रुतिमी कहती है की "जो आत्मा इन् लोकोंके असभेद-असांकर्य के लिये सेतुभूत है याने सबको धारण कर रहा है"। यद्यपि पूर्व मन्त्रमें सप्त "लोक कहेंहै तशपि सत्य लोक सकल कर्मठोंको गम्य न होनेमे "छ लोक" ऐसा कहाहै । तथापि सप्तम- लोकका निर्देश क्यों न किया ? तो कहते है की जन्मादिरहित चतुर्मुख जो हिरण्यगर्भ उन्के स्वरूपमें एक सत्यलोकारमक पुनरावृतिरहित स्थान कोइ अनिर्वचनीय है. वह स्थान प्रायः किसीका गुम्य नहि है. याने सिर्फ उपासक लोक अचिरादि मार्गसें वहां जातेहै. और किसीसे जाया जाता नहिं. इससे उस सत्य लोक का निर्देश न करके अवशिष्ट छ लोगोंका प्रदर्शन कियाहै. अथवा छ जो विलक्षण ऋतु है उन् ऋतुओंको जो परमेश्वर नियमानुसार प्रवृत कररहा , द " [१३] है, अज याने . सर्वत्र गतिमान् अर्थका जन्मादिविकाररहित, उस' आदित्य (जोको पूर्व मन्त्रमें लक्ष्यार्थररूपसें कहा गया है. उस्') के दृश्यमान मंडलों सजातीय विजातीय और स्वगत. इन् भेदत्रयसें शून्य; वाणी और मनका अगो- चर तत्त्व कौनसा है सो में पूछता हुँ, “जो यह हिरण्यस्वरूप पुरुष आदित्य के अन्तर्गत दिख :पडता है." ऐसा 'श्रुतिमी कहती है. अथवा छ जो यह लोक है याने जिन्मे भुरादि त्रिलोकी प्रधान है, वैसें लोकोंको जो.नियमित रखता है उस परब्रह्मके स्वरूपभूत नानाविधर्विकारसहित . इस मंचमें "एकात्मक संत्त्व कौनसा है? "विकारोनामधेयं" नामरूप संघ विकार मूत होनेसे मिया है । अविनाशि अंचल और अधिष्ठानरूप तत्त्व तो एकही है " उर्चर के अमि- प्रायसें प्रश्न है. " केवल सत्स्वरूप है ऐसा उपलब्ध करना चाहीये " यह श्रुतिमी.इस मन्त्रके गूढ उत्तररूप अर्थके साथ संगति पातीहै: ।।६।। १३ २:३ १७ खियः संतीरताउँगेपुंसआहुःपश्यदक्षण्वान्नवितदन्धः। कविर्यःपुनः सईमाचिकेतयस्ताविजानात्सपितुप्पतासत् ॥१६॥ या इदानीस्त्रियः सती : स्त्रीत्वंप्राप्ता आहुलाकिका : तान्उ तानेव ने मह्यं पुंसः पुरुपानाहुः प्रतिपादयन्ति तत्त्वज्ञाः। कथमन्यस्यान्यभावः? उच्यते एक- स्यैवनिरस्तसमस्तोपाधिकस्यात्मन: । तदेहावस्थानमात्रेण.. तत्तद्यपदेशोपपत्ते: । श्रूयतेहि-" त्वंत्री स्वैपुमानसि व कुमार उतवा कुमारी " इत्यादि (श्वे०४-३) स्त्रीत्वपुस्त्वंचोभयमपि वस्तुतोनास्तीत्युक्तं भवति । स्मृतिरपितदमावबोधयति नैवस्त्रीनपुमानेपनैवचायं नपुंसकः॥ यद्यच्छरीरमादत्ते तेनतेनसचोद्यते " इति। अमुम् परमात्मानमक्षण्वान् ज्ञानदृष्टयुपेतः कश्चिन् महान् पश्यत् जानाति, अन्ध : अतथारूपः स्थूलदृष्टिर्न विचेतत् नविचेतयति न जानाति । किञ्चपुत्रो वयसाऽ. ल्पोऽपि यः कविः कान्तप्रज्ञोज्ञानीस्यात् ईम् इममर्थ संविचिकेत जानाति । एव- मुक्तलक्षणस्य परमात्मनस्ता तानि स्त्रीत्वपुंस्त्वादीनि योविजानात् औपाधिकानि जानीयात् स पितुः खोत्पादकस्यापि ज्ञानरहितस्य. पितासत् पितृवत् पूज्यो भवति ॥१६॥ अनुवाद-जिनको इस कालमें लोक "सी" ऐसा कहते है वे स्त्रीयों मेरे (समान अधिकारीक) लिये पुरुषरूपमी है ऐसा तत्त्वज्ञलोक प्रतिपादन करते है। .. " . [११] अन्य पदार्थको अन्य कैसे समझना : याने स्त्रीयोंको पुरुषो कैसे समझिं जाय ! तो कहते है की एकही जो परमात्मा समस्त औपाधिक भेद मात्रसे रहितहै उसी परमात्माको तत्चत् शरीरमें अवस्थित होनेसे तत्तत् (स्त्रीत्वपुंस्त्वादिक) व्यवहार उपपन्न होता है. श्वेताश्वतरउपनिषद् (४-३) में कहाहै की तुमही (परमात्माही) खी हो, तुमही पुरुष हो. तुमही कुमार हो, तुमही कुमारी हो. याने स्त्रीत्व पुंस्त्वादिक जो उपाधिगत धर्म है सो निरुपाधिक शुद्ध आत्मचैतन्य में वास्तविक नहि है." परमात्मा पुरुष नहि है, स्त्री नहि है, नपुंसक नहि है. जिस शरीररूप उपाधिको धारण करता है, उसी उपाधि स्त्रीत्वपुंस्त्वादिक) रूपसे व्यवहारका विषय वह बनताहै" ऐसा स्मृति भी कहा है. इसी परमात्माको ज्ञान- दृष्टिवाला कोइ महाशय यथार्थ अपरोक्ष करसक्ता है. और जो उससे विपरीत है याने स्थूलदृष्टिवाला है सो इस परमेश्वरको नहि जानसक्ता. और पुत्र होते हुवेभी अर्थात् जो अल्पावस्थावाला होते हुवेभी अपरोक्ष ज्ञान संपन्न हो चुका है सो इस अर्थको यथार्थ जानसक्ता है याने इस ज्ञानमें अवस्था कोइ नियामक नहि है. एवं इस परमात्मा के उपाधियोंको (स्त्रीत्वादिकको) जो (उपाधिरूपसे) यथार्थ जानताहै वह अपने उत्पादक पिता, की जो ज्ञानहीन है, उनकामी पितृवत् परमपूज्य है. ॥ १६ ॥ १४ २ ३ १७ द्वासुपर्णा सयुना साया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तोरन्यः पिप्पलं स्वादत्त्यनभनन्यो अभिचाकशीति ॥२०॥ अत्र लौकिकपक्षद्वयदृष्टान्तेन जीवपरमात्मानौ सूयेते । यथा लोके द्वौ सुपर्णो शोभनगमनौ सयुजा समानयोगौ सखायौ समानरव्यानो समान वृक्ष परिपस्वनाते एकमेव वृक्षं परिपस्वजाते माश्रयत: तयोरन्य पिप्पलं पक फलं स्वाति स्वादुतरमत्ति, अपरोऽनश्नन्नभिचाकशीति अभिपश्यति तद्वद् द्वौ सुपर्णस्थानीयो क्षेत्रज्ञपरमात्मानौ सयुजा योगौ, योगोनाम सम्बन्धः सचतादात्म्यलक्षणः, सएव आत्मा परमात्मनः सरूपं यस्य जीवात्मनः एवमेकस्वरूपावित्यर्थः । ननु सम्बन्धोद्विष्ठः सच पक्षिगोरेव भेदमपेक्षते अतः कथमैकात्म्यमिति चेन्न औपाधिकभेदं वास्तवाभेदं चापेक्ष्य प्रवृत्त , अतएव सखायो समानरव्यानो नान्यरध्यानौ । नन्वेकस्य यादृशंख्यानं तादश समान- [१५] मेवान्यस्येति व्युत्पत्त्या भेदः स्फुटं प्रतिभाति कथं तादात्म्य मुच्यत इति न वकन्यम् । नान परस्परं दृष्टान्तदान्तिकभावः अपितु यस्य याख्यान स्फुरण परमात्मनः तदेवख्यानमितरस्यापि जीवात्मन इति सखायाचित्युच्यते, एक रूपप्रकाशावित्यर्थः । अत उपपन्न भकात्म्यम्, अनेन वास्तवभेदोऽपि निरस्तः । समानं वृक्षं परिपस्वजाते इत्यत्र यथा आश्रयान्तराभावा दुभयोरेकाश्रयत्वमभ्युप- गन्तव्यम् तद्वत्सयुजा सखाया इत्युभयत्राप्येकयोगख्याने आश्रयणीये, वृक्ष्यत इति वृक्षो देहः, सचोभयोः समान एकएव, जीवस्यभोगार्थत्वात् परमात्मना सृष्टैर्महा मूतैरारब्धता तस्योपलब्धिस्थानत्वाचो भयोरपिसमानः, तादृशं समान वृक्षं परि- पस्वजाते परिप्वजत आश्रयतः, नच जीवस्य वस्तुत ईश्वरत्वे कथं जीवबुद्धया संमार शोकावितिवाच्यम्, तयोमोहकृतत्वान् तथा चार्वणिका अनुमन्त्रमानाय अस्य संदेहनिर्वतकमुत्तरंमन्त्र मेवमामनन्ति " समाने वृक्षे पुरुषो निममो अनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमान मितिवीतशोकः " इति (धे ४-७) अस्यायमर्थः-एकएव शरीरे पूर्णः पुरुषः परमात्मा निममो निगूढ :सन् स्वयमपीश्वरोऽप्यनीशत्वबुद्धया मुह्यमानो मूढःसन् शोचति संसारे अहंकर्ता सुखी दुःसीवि जननमरणेऽनुभवति, यदातुजुष्टं नित्यतृप्तमः; संसार शोकातीतमीशं परमेश्वरं पश्यति स्वानन्यतया साक्षात्करोति तदा वीतशोकः देहा- यतिरिक्तः स्वस्वरूपसाक्षात्कारेण गततापत्रयःसन् अस्य महिमानमिति, निरस्त समस्तोपाधिकस्य परमेश्वरस्य महिमानं सार्वात्म्यसर्वज्ञवादि महिमानमिति एति प्राप्नोति, नवतावादन्यत्र तन्महिमा प्राप्यते अतस्तद्रूपो भवतीत्यर्थः, तम्माद्वस्तुत एकएव, भेदस्तु मोहकृत इति प्रसिद्धम् । अनुभवदशाया लौकिकबु द्वया भेद मन्धुपयोध्या-तपोम्यो जपामा पिप्पलं कापलं स्वादु स्पायुभूत नाज मुक्ने, यस्य यदुपार्जितं ततस्य स्वादु भवति, अन्यः परमात्मा अनश्नन् आप्तकामना भुञ्जानः स्पृहाया अमावात् आप्तकामस्य का स्पृहा " इतिस्मृतेः। तत्माद वास्तविकभेदमुपजीव्य तयोरन्य इत्युक्तम् । वस्तुतस्त्वनीशया शोचति मुखमान इत्युक्तत्वादभेद एव, तादृशः परमात्मा अभिचाकशीति स्वात्मन्यध्यस्त जगत्सा- क्षित्वेनेक्षते ॥ २० ॥ अनुवाद-इस मन्त्रमें लौकिक दोनों पक्ष लेकर जीवात्मा और परमात्मा स्तुति किये जाते है. जैसें लोक उत्तम गमनवाले समानसम्बन्धवाले " . . समान अभिव्यक्तिवाले . दो (पक्षी) एकही वृक्षम आश्रित होते है। उन् (दोनों) मॅसे एक (पक्षी), पारसक (होनेसे) स्वादिष्ट फलका उपभोग करता है, और अन्य (पक्षी) उपभोग न करता हुवा समीपसे देखता रहता है. (सिद्धान्त) सही पशिस्थानापन्न जीवात्मा और परमात्मा समानसम्बन्धवाले हैं. यहां जीव परमात्माका सम्बन्ध पक्षिओंकी तरह संयोगादिक नहि है किन्तु तादात्म्य (अभेद) सम्बन्ध है. याने जीवात्मा परमेश्वरसें अभिन्न है और परमात्मा जीवात्मासें अभिन्न है. दोनों एक स्वरूपही है. (पूर्वपक्ष) ननुसम्बन्ध दोपदार्थ रहता है तो यहांपरभी पक्षिद्वयरूप दृष्टान्त होनेसे पक्षियगतभेद सिद्ध होता" है तो तादास्य कैसे कहते है ? (समाधान) अन्त:करणादिक उपाधियोंका स्वीकार करके जीवात्मामें भेद प्रतीत होता है, तथापि वास्तविक (निरुपाधिक). तो अभेद (तादात्म्य) ही है. इसीलिये कहते है की " सखायौ" समान प्रकाश- वाले है. (पूर्वपक्ष) ननु एक (आत्मा) का जैसा प्रकाश है तैसाही" अन्य (परमात्मा) का भी प्रकाश है, ऐसा कहनेसे भेद स्फुट सिद्ध होता है (जैसे "चन्द्रकी तरहमुख " ऐसा कहनेसें चन्द्र और मुखका भेद स्पष्ट अवगत होताहै तैसेंही "आत्मा और परमात्मा समान प्रकाशवालें है" ऐसा कहनेसें भी भेद स्फुट प्रतीत होता है) तो तादात्म्य कसे कहा जाय ? ( समाधान ) यहां परस्पर वैसा दृष्टान्तदान्तिकभाव नहि है किन्तु जैसा परमेश्वरका स्फुरण है वैसाही याने वही स्फुरण जीवात्माकाभी है. अर्थात् एकरूपप्रकाशवाले है (जैसें दीपक दो होनेसें भेद प्रतीत होनेपर भी प्रकाशत्वरूप सामान्य एकही है से यह भी दोनो अधिकारीयोंको भिन्न प्रतीत होनेपर भी वास्तविक अभिन्नहीं है.) इससे वास्तविक भेद निरस्त हुवा । (प्रकृतम् ) " समान वृक्षका आश्रय करते है" इस जगे जैसें दूसरा आश्रय न होनेसें दोनों (पक्षि) एकाश्रयक है तैसें ही " समानसम्बन्ध वाले और समानप्रकाशवाले " ऐसा कहनेसें एकही सम्बन्ध (तादात्म्य) और प्रकाशवाले है ऐसा मानना चाहीये. (जैसे वृक्ष छेदन भेदन करने योग्य है तैसें देह भी छेदन भेदन क्रियाकी योग्यता वाला होनेसें वह भी वृक्ष कहाजाता है) वृक्षस्थानापन्न देहमी दोनोंका समान है. जीवके भोगार्थ शरीर है और परमात्माने रचे हुवे पंचमहाभूतोसे बना है और परमेश्वरका उपलब्धि (प्राप्ति ) स्थान है. इस लिये यह देहमी " वृक्ष स्थाना- पन्न होकर दोनोका आश्रयभूत है " ऐसा कहा जाता है. , [१७] जीवात्मा'वस्तुतया ईश्वररूप होनेपरमी उसमें जीवबुद्धिसें संसरणं और शोकादिक जो होते है सो मोहमूलक है. श्वेताश्वतर उपनिषद् (४-७) में कहा हैं की शरीरमें पुराणपुरुप परमात्मा गुप्त रहा है और स्य' ईश्वर होतेहुवेभी अनीश्वरत्व बुद्धिसे मूढ बनकर शोक करता है याने संसारमें में कर्ता में सुखी में दुखी ऐसा प्रान्त होकर जन्ममरण अनुभवता है। और जिस समयमें नित्यं वृक्ष संसारशोकादिकसेरहित 'परमेश्वरको स्वकीयरूपमें अभिन्न समझता है याने साक्षात् करलेता है। उस समयमें शोक रहित बनकर याने देहादिकसे भिन्न होकर स्वरूपाभिन्न होने से आध्यात्मिकादि त्रिविधतापोसे रहित होकर समस्त उपाधि रहित परमेश्वर के सर्वात्मता सर्वज्ञतादिक महिमाको (जीवात्मा) प्राप्त होता है, याने उस परमेश्वरसे अभिन्न न होकर उस् (परमेश्वर ) का महिमा प्राप्त नहि होसक्ता इससे वह (जीवात्मा) ईश्वररूप होनेपरभी भ्रन्तिमें जीवभावापन्न हुवा था, परंतु प्रमापनयन करके तद्रूप होजाता है अर्थात् वास्तविक एकही होनेपरमो भेदप्रतीति मोह मूलक है यह सिद्ध हुवा । अनुभव दशामें लौकिकबुद्धिसें भेद खीकार करके कहते हैं की उन दोनों में से एक (जीवात्मा) खादिष्ट कर्मफलका उपभोग करता है, और यह उपपन्नमी है की जिसनें जो उपलब्धकीया हो सो उसको स्वादुतर होता है, और अन्य जो परमात्मा है सो नित्यतृप्त होनसे स्पृहाराहत होकर उस फलका उपभोग न करता हुवा स्वरूपमें अध्यस्न सचरा- चर प्रपंच को साक्षिभूत होकर देवरहा है । इसमें कलितभेदका अगीकार करके " उन दोनों से एक " ऐसा कहा है, और वास्तविकतो-“ अनीश्वरत्वमसे मूढ होकर (वहि ) शोचता है " ऐसा कहनेसें अभेद स्फुट पाया जाता है ॥२०॥ १५. २-३ १८ यासुपर्णाअमृतस्य मागमनिमेपविदयामिस्वरन्ति । इनोविश्वस्यभुवनस्यगोपाःसमाधीर पाकमनाविवेश ॥ २१ ॥ . - , यत्र यसिन्नात्मनि सुपर्णा शोभनपतनानि स्वस्सविषयग्रहणाय गमन कुशलानीन्द्रियाणि चक्षुरादीनि अमृतस्य भागम्, अन विषयावच्छिन्न चैतन्यममृत मित्युच्यते, तस्य भाग भजनीय स्वस्वाशमनिमेष निमेपरहित मनारत विदथा वेदनेन वृत्त्याच्छिन्नचैतन्येनावरुद्धान्यभिस्वरान्ति अभिप्रयन्ति आवरणापगमनेन स्फोरयन्ति । किश्च यस्त्यिन स्वाम्यस्य देहस्य विश्वस्य भुवनस्य गोपा गोपाविता 3 .. [१८] रक्षिता, यदा विश्वस्य भुवनस्य भूतजातस्य स्वामी अस्य देहस्य गोपाः, अनेन तत्त्वंपदार्थयोरेकत्वं प्रतिपादितं भवति । स परमेश्वरो धीरः समाधिनिष्ठः सर्वदाऽविक्रियः मा मां पार्क परिपक्वमनस्क यागदानादिनाऽपगतरजस्तमस्कत्वेन दर्पणवदविनिर्मलसत्त्वोद्रितमनरक मा आविवेश, उत्तरूपे चिचे तादृशं वस्तु स्फुरतीत्यर्थः । यद्वा अपरिपकमना अहं पूर्वमज्ञानदशाया मदन्य ईश्वरोऽस्तीति अविद्वान् ततः परमस्ति कश्चित् सर्वज्ञः सर्वेश्वरः सत्यज्ञानादिलक्षण इति निश्चित्य पश्चाद्गुरुशास्त्राभ्या स एवाहं अस्मीतिमत्वा एवपारंपर्येणावगत्य असभावनाविपरीत भावने व्युदस्य भावनया साक्षात्कृत्य परिपूर्णः परमात्मा अमूवमित्यर्थ । अयमेव समाधीरः पाकमत्राविवेश इत्यनेनोच्यते । नन्वनवच्छिन्नस्य परमात्मनः सर्वत्र व्याप्तत्वात्प्राप्तिरेव नोपपद्यते ? सम्प्रत्यत्र प्राप्तिद्विविधा, प्राप्तमाप्तिरप्राप्तमाप्तिश्चेति, प्राप्तस्यापि कण्ठेचामीकरन्यायेनावरणाज्ञानहानद्वारेण प्राविरुपपद्यते ॥ २१ ॥ अनुवाद-जिस परमात्मामें, स्वस्वविषय ग्रहण करनेमें निपुण चक्षुरादिक इन्द्रियाँ अमृत (इष्टविषयरूप स्वकीय अश) को अनिमेषवृत्ति से अर्थात् निरन्तर प्रमाणावच्छिन्न चैतन्यसे अभिन्न होकर आवरणाभिभव करके स्फूर्तिकोपाती है. और जो परमात्मा इस् शरीरका नियामक है, और ब्रह्माण्डका रक्षक है, अथवा समग्र भूतभौतिक समूहका जो स्वामी है, और इस् शरीरका रक्षक है, (इससे तत् और त्व पदार्थकी एकता सिद्ध होती है) वही परमेश्वर समाधिनिष्ठ याने सर्वदा निर्विकार होते हुवे, यागदानादिकसें रजोगुण तमोगुण रहित बनकर दर्पणवत् अत्यन्त निर्मल सत्वगुणकी (विशेष) अभिव्यक्तिवाले मेरे मनमें (सतत) आविष्ट है, याने निर्मल चित्तों वैसा तत्त्व स्फुरित होता है। अथवा संस्कारहीन मनवाला में पहिले अज्ञानदशामें मुझसे अन्य किसी ईश्वरको मानता नहिं था. उसके बाद ( संस्कार होनेसे ) कोइ सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् सत्यज्ञानानन्दरूप परमेश्वर है ऐसा परोक्ष ज्ञान संपादन करके गुरुशास्त्रादिकका परिचय होनेसे वह ईश्वर मेंही हु ऐसा परंपरासें असभावना विपरीत मावनाको करके सद्भावनाद्वारा अपरोक्ष अनुभव करनेसे में परिपूर्ण परमेश्वर हे चुका हूं, यही अर्थ "समाधिनिष्ठ वह ईश्वर मेरे विचमे आविष्ट है " वहा (पूर्व) कहा गया है. ननु देशकालादिसे अपरिच्छिन्न परमेश्वरकी प्राति कैसे उपपन्न हो सक्ती है ! (समाधान) अप्राप्त प्राप्ति और प्राप्त प्राप्ति ऐसे दो तरहकी प्राप्ति है. उसमें [१९) से यहां कण्ठमें रहते हुवेभी विस्मृत अलंकार की स्मृति होनेसे जैसे प्राप्तित्व- व्यपदेश होताहै तैसें यह नित्य प्राप्त परमेश्वरकीभी प्राप्ति उपपन्न है. ॥२१॥ १६.२ ३ १८. यस्मिन्क्षेमध्वदः सुपर्णानिविशंते सुर्वतेचाधिविश्चे। तस्येदाःपिपलंस्वाद्वयतन्नोन्नशधः पितरंनवेदं ॥२२॥ यस्मिन् परमात्मनि वृक्षे वृक्षवद्गमनादिरहिते अविक्रिये सुपर्णाः शोमन गमनानीन्द्रियाणि मध्वदः मधुनो ज्ञानस्य अत्रीणि तद्ज्ञानेन ज्ञानभाजि इत्यर्थः, निविशन्ते स्वापकाले स्वस्वविषयेभ्यः प्रतिनिवृत्तानि आत्मनि वृत्त्यालीयन्ते, पुन: प्रबोधकाले अधिविश्वे विश्वस्योपरि सुवते च उद्यन्ति स्वस्वविषयान् लभन्त इत्यर्थः, तस्यपरमात्मनः विपर्क पालक संसारत उद्धारकं स्वादु आस्वादनीयममृतत्वलक्षणं ज्ञानं, यत्फलास्वादने पुनः क्षुत्तृष्णाशोकमोहजरामरणादयो न भवन्ति तद्धिस्वा- दुतमम् , इतरस्वर्गादिफलानि पुनर्जननाद्यापादकत्वादापातस्वादूनि, तकल ममे स्वरूपज्ञानोत्तरकालमाहुः, यापुमान् पितरं पालकं ज्ञानफलं तकलाधार मात्मानं वा न वेद न जानाति गुरुयास्त्रात्स तत्फलं नोन्नशत् न प्रामोति, अत आत्मानं यो वेद सएव तन्मोक्षफलं प्रामोतीत्यर्थः । यद्वा "चर्मवदाकाश" मित्यादि श्रुतिर्ज्ञाना दन्योपायस्या मृतत्वमार्तिनिवारयति। "ब्रह्मवेदब्रह्मैवभवती" त्यादिकानुज्ञा प्राप्तिमाइ तस्मादीदृशं परमेश्वरं विदित्वा मुक्तो भ्यासमित्यर्थ ॥२२॥ अनुवाद-वृक्षवत् गतिरहित निश्च निर्विकार जिस परमेश्वरमें सुंदर, गमनवाली इन्द्रियाँ ज्ञानका उपभोग करके निद्राके समय अपने अपने विषयोसे निवृत्त होकर (परमेश्वरमें) वृति सहित लीन होती है, और जाग्रत्कालमें प्रपञ्चा- न्तर्गत पदार्थों (विषयों) को ग्रहण करती हैं, उस् परमेश्वरसम्बन्धि अमृतत्व रूप ज्ञान जोकी आस्वादके योग्य होकर संसारसे उद्धार करनेवाला है और जिस ज्ञानफल मोक्षके आस्वाद लेने से फिरसे भूखप्यास शोकमोह जरामृत्यु नगैरहसे (अधिकारी) रहित होजाता है, इसमें जो फल परम स्वादिष्ट है, नहि की स्वर्गा- दिफकी तरह पुनः पुनर्जन्ममरणादिक देने आपात (उपरसें ) स्वादिष्ट है, वह फल स्वरूपज्ञान होनेके बाद होसका है. जो पुरुष पितृवत् पालन करने वाला उस.ज्ञानफलको अथवा उस फलके आधारभूत परमात्माको गुरुदेगसें और शास्त्रावगाहन करके नहीं जानता सो (उस् फलको ) प्राप्त हो सका नहिं, . 1 [२०] माने जो परमात्माका अपरोक्षतया अनुभव करता है वही दम् . मोक्षरूस कलको उपलब्ध कर सक्ता है. अथवा "जिस समयमें लोक आकाशको चर्म की. सरह. लपेटलेंगे तमही आत्मज्ञानके सिवायही मोक्ष प्राप्त कर सकेंगे। यह श्रुति अमृतत्व मान्ति के ज्ञानातिरिक्त उपायान्तरको निवारित करती है. ब्रह्मको जाननेवाला ब्रमही बनता है "। यह युनिभी ज्ञानही मोक्ष प्राप्तिको बतलाती है. इसलिये परमेश्वरका यथार्थ ज्ञान संपादन करकेही में मुक्त होजाउं., ( ऐसा अधिकारिका कथन है) ॥२२॥ १७ २ ३-१९- अनच्छंयेनुरगाजीवमेनडुबमध्य आपस्त्यानाम् जीवामृतस्य॑चरतिस्वधाभिरयो मत्यैनासोनिः ॥३०॥' अनेन देहस्यासारता जीवस्य नित्यत्वंच प्रतिपाद्यते । इदंशरीरं जीवाव- स्थाया मनत् प्राणनं कुर्वत् जीवं जीवनवत् तुरगातु स्वव्यापाराय तूर्णगमनं.सदेज- । स्कंपमानंसत् शये येते वर्तते, पश्चात्पाणापगमनानन्तर मुक्तविलक्षणंसन् ध्रुव- मविचलितंसत् पस्त्याना गृहाणा मध्ये अथैतप्पाशेतेच स्थाणुवतिष्ठति । जीवस्य- वैलक्षण्यमाह-मृतस्य शरीरस्यसंबन्धी जीवः मत्र्येन मरणधर्मनिशरीरेण सयोनिः पूर्व समानोत्पत्तिस्थान , यद्यपि जीवस्य न जन्मास्ति तथापि वपुषस्तत्सद्भावात् ।।' तत्सम्बन्धेनोपर्यते तदेवाह-अमर्त्य. अमरणस्वभाव "जीवापेतंबावकिलम्रियते" इतिश्रुते (छा ६-११-३)। उक्तस्वमावोजीव स्वधाभिश्चरति, पुत्र : स्वधाकारपूर्वक दत्तैरनैश्चरति वर्ततइत्यर्थः ॥ ३० ॥ अनुवाद-इस भत्रसे शरीरकी असारता और जीवक नित्यता बत- लाते है- यह शरीर जीव सहित होनेसे श्वासोच्छास लेता है. जीवनवाला कहा- जाताहै. अपने व्यापार के लिये स वर गतिवाला होताहै. चञ्चल होकर रहता है. और प्राणोत्क्रमण (मरण ) होने के बाद पूर्वोक्त प्रकारसे विपरीत बनकर • अपने स्वभावसिद्ध गुणवाला याने जड होनेॐ अचल होकर , गृहोंकी मध्यमें : स्थाणु (कटा हुवा और शाखापत्रादि रहित वृक्ष) की तरह रहता है. और " जीव उसमें विलक्षण है" ऐसा कहते है-मृत शरीरके साथ (आपाततः) संबन्धवाला जीवात्मा मरण जन्म धर्मवाले शरीरके साथ समान उत्पति स्थान" . -- अन र वान होते हुवेभी स्वयं अमर्थ है याने देहादिगत जन्मादि विकारसे रहित है. श्रुतिभी फहती है 47जीवभिन्न सकल पदार्थ नष्ट हति जीवात्मा नष्ट होता नहिं" याने जीवारमा जन्म मरण रहित होते हुवे भी शरीरसंबद्ध होनेसे शरीर- गत विकरका आरोप पात्र उपचारसे बनता है. रेसा यह जीगरमा (अपनें ) पुत्रोनें “स्वधा" शब्दोचार पूर्वक' दीये हुव अन्नादिकको स्वीकार करक विवरता हैरहता है. ॥ ३०॥ १८. २ ३ २० यईचकारनसो स्यवेदयईददर्शाहिगि नुतस्मात् । समातुर्योनापरिवीतोअन्तर्बहुजानिमीतमाविवेश ॥३२॥ गर्भवासलेशपूर्वजननप्रतिपादनेन तत्परिहारायात्माज्ञातव्य इत्यत्ततिपाद्यते, य पुमान् पुत्रार्थीईएन गर्भ चक र करोति विक्षिपति वा तकारण- भूतस्यरेतमो विक्षेपद्वारेण न स पुमानस्यतत्त्ववेद कर्मणिपाठीवा एनंग न जानाति, कथंभूतः कथवा केनप्रयोजनेनेति सर्वात्मना न जानातीत्यर्थः । यश्चमातुरुदरस्थं ददर्श उदरवृद्ध्यन्यथानुपपत्त्याऽनुमानेन वा दर्शयति स तस्माद्दष्टु- सकाशात् सहिरुगिन्नुहि रुगित्यन्तर्हितनाम इच्छन्दः एवकारार्थ. नु निश्चये अत्यन्तमन्त- हित एवखल । यद्वा यः संसारावस्थायामीमनं कृषियाणिज्यवेदाध्ययनादिक चकार सोऽस्यएतनवेद लोकान्तरे जन्मान्तरे वा, तथा यईमेनं ददर्श गिरिनरी समुद्रवन्ध्वादिकं ददर्श जीवसमये तस्माद्दष्टाद्धिरुगिन्नु पृथगेव, अत्रानुभूतं सर्व न जन्मान्तरे लोकान्तरे वाऽनुभवतीय सतादृशो मातुर्जनायाः योना योनौ अन्तः परिचीत: उल्बजरायुभ्या परितोवेष्टित. सन् बहुप्रजाः बहुजन्ममा अथवा उत्पन्नः सन् स्वयमपि अपत्योत्पादनेन बहुपमा निर्मतिमाधिवेश, एव गर्भदुख मनुभवन निर्मत्यभिधान प्रदुःखमनुभवति यावत्स्वरूपमूतात्मज्ञान, अतस्तत्परिहा- रायात्माज्ञातव्य इत्युक्त भवति. ॥ ३२ ॥ अनुवाद-इम मन्त्रमें प्राणिमात्रका जन्म गर्भवासके क्लेशों का अनुभव पूर्वक होनेसे उसू महादुःखकी आत्यन्तिक निवृत्ति के लिये आत्मज्ञान संपादन करना अत्यन्त आवश्यक है सो प्रतिपादन करतें है जो पुरुष (गर्भाशयमें) गर्भ पारण कराताहै सा उस गर्भ स्वरूप को समझसक्ता नहि याने उसू गर्भाशयमें ।

प्रविष्ट होनेवालेमाणीको जो दुःख होता है उसको किसी हालतसे जान नाई. सक्ता. और जो माणी अपनी माताके उदर में स्थितहोकर माताके 'उदरकी वृद्धिरूप चिहसे अनुमानद्वारा (माताके ) गर्मिणीत्वको सूचित करता है सो मी बहारके लोक जोकी देखनेवाले (अनुमान करनेवाले) हैं उनसे अत्यन्त गुप्तही हैं याने गर्भाशयकी भीतर होनेवाले दुःखाविषयको अन्तःस्थित प्राणी बहारके जनसम्हको निरूपित करसक्ता नहिं. अथवा जो पुरुष संसारमें खेती रोजगार वेदशास्त्राध्ययनादिक करता हुवा हमेशा अपने कार्यमें तत्पर रहता है सो गर्भगत प्राणीके दुःखोखो किसी लोकमें या किसीजन्ममें हरगीज नहि जानस का, और जो प्राणी गर्भाशय के बहार निकलकर पर्वते नदीयाँ समुद्रे स्नेही संवन्धी इष्टमि- त्रोंका जीवदशामें अनुभव करता है सो इस स्थलमें अनुभूत विषयों का सर्व विषय किसी जन्ममें यातो किसी लोकमें पा सक्ता नाहे. ( क्योंकी विषय वर्ग सब दैवाधीन होनेसे सकल समयमें सकल विषय नहि पाया जाता) तो वह प्राणी माताके गर्भाशयमें आन्त्र और रुधिरमलमूत्रादिसें लपेटाहुवा अनेक जन्म धारण करनेवाला बनता है. अथवा स्वयं उत्पन्न होकरके फिर स्वयंही प्रजोत्पतिमें तत्पर होकर अनेक संतानवाला बनता हुवा " निति " नामक नरक (दुःख) को अनुभव तावत्काल पर्यन्त किया करता है की यावत्काल पर्यन्त. स्वरूपभूत आत्माका, अपरोक्षानुभव नहि करसक्ता. इस लिये जन्म मरणादि, और गर्भवासादिक महादुःखोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति के लिये आत्म- ज्ञान संपादनकरना यह परमावश्यकहै. ॥ ३२ ॥ १९. २' ३ २१ सातार्धग भुवनस्यरेताविष्णोस्तिष्ठन्तिमदिशाविधर्मणि । तेधीतिमिर्मनसातेविपश्चितः परिभुवःपरिभवन्तिविश्वतः३६॥ सप्तार्धगर्भाः सप्त महदहङ्कारी पञ्चतन्मात्राणीति मिलित्वा सप्तसंख्या- नितत्त्वानिअर्धगर्भाः, अविकृतरूपाः विकाराश्रयायाः मूलप्रकृतेः प्रकृतिविकृतेः उदा- सीनस्यात्मनश्चोत्पन्नत्वादाशन प्रान्चाकारेण परिणामादर्धगर्भाः पुरुषाशस्या- विक्रियवादित्यभिप्राय:, अतएव तेषामकृतिविकृतित्वं, यस्मादेवस्मालुवनस्य- रेतः कारणं कारणभूतानि तान्येव विष्णोर्याप्तस्य पुरुषस्य विधर्मणि प्रदिशाप्रदेशेन तिष्ठन्ति । किश्च ते धीतिभिः प्रज्ञाभिः मनसा जगदुपकारः कर्तव्य इति बुद्ध्या । .

च विश्वतः सर्वतः विश्वं परिभवन्ति परितो भावयन्ति कृत्स्नं जगद्व्याप्नुवन्तीत्यर्थः। यस्मादेवं तस्मात् ते त एव विपश्चितोवुद्धियु काः परिभुवः सर्वत्र व्याप्ताश्च ॥३६॥ अनुवाद-मह तत्व अहंकार पंचतन्मात्रायें यहसब मिलकर सप्ततत्त्व अधिकृतरूप, कोंकी-विकारोंच आश्रयभूत मूलप्रकृति और निर्विकार उदा- सीन आत्मासे यह सप्त तत्व उत्पन्न हुई. इसमें अर्थ अंशसे प्रपंचाकारेण परिवत हुई, और अर्थ अंक (पुरुषांश सचिदानन्दला) से अविकृतहै. इसीलिये उनतको पंडितलोक प्रकृतिविकृति" शब्दसें व्यवहार करते हैं. तो यह सात तत्व जोकी ब्रह्माण्डके रेतोवत् कारगभूतहै, वे व्यापक पुरुषके जगद्धारणरूप व्यापारमें तत्पर हैं, और बुद्धिपूर्वक जगदुपकार करना चाहेये इस हेतु समग्र विश्वको अपने स्वरूपसे व्याकर रहे हैं. इसी उद्दे से वे महदा दिक व्याप्त हो रहेहैं. ॥ ३६ ।। २० २ ३.२१ नविजानामियदिवेदमस्मिनिण्यासनोमनसाचरामि । यदामागन्मथमजाऋतस्यादिद्वाचो अभुवे मागमस्याः ॥३७॥ अहंयदिवे यदपीदंविश्वमामि कृत्स्नःपपञ्चोऽप्यमेवास्मि, नाम रूपांशमपरमार्थत्यत्वा सर्वत्रानुगतोऽस्मि, योयसच्चिदानन्दाकारोऽस्ति सोहमस्मी तिन विजानामि, विविच्य नाज्ञासिपं, परं शास्त्र जनितमिदमहमस्मीतिविज्ञानं न जा- तम् अविवेकी अहमित्यर्थः । कार्यकारणयोरेभेदात् कृत्स्नप्रपञ्चस्यापि ब्रह्मानन्य लेन बकत्वावगमे प्रपञ्चजातमपि स्वस्वरूपमेव भवति " इदंसर्व यदयमात्मा. प्रौवेदं सर्व" (मु. २-२-११) आस्मैवेदं सर्व “ सईक्षतबहुस्यां प्रजायेये " त्यादिश्रुतिभ्यां एकविज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञानात् " तदनन्यत्वमारंभग शब्दादिभ्य" (न. सू २-१-१४) इत्याधुपपतिभ्यश्च प्रचत्य ब्रह्मानन्यत्वसिद्ध. यदा इवशब्दः उपमार्थः यदिव यसरोक्षज्ञानं सर्वकाल्परूपमानुभविकमस्ति तदिव तदेवाह मस्मि, इदं सर्वमहमस्मीति ज्ञान मे जात मारत्वेतदान्तिक मूतमानुभवि सामिपं यदस्ति तन्नविजानामि नप्राप्तोऽस्मि, शास्त्र जनित सा. स्पं आत नत्वानुभविक मित्यर्थः। तत्र कारणमाह-यतोऽहं निण्य. अन्नहितः मूढचितः रितमत्यमवणामावेन परिच्छिनइत्यर्थः, सोपविनाइ-पद: अविद्यामकर्मभिः सम्यग्नोवेष्टितः अमएच मनसायुक्तः भावनासहिष्णुमा -- . . [२४] बहिर्मुम्वेन विक्षिप्नेनचेतसायुक्त सचरामि संसारे । अथवा मनसा सन्नद्ध चरानि इन्दियपरवेश एवसन्' संसारे दु खमनुभवामि, न सार्वात्य जानामांति परिदेवते, यास्कोऽपीम परिदेवनार्थत्वेनोदाजहार "अथापि परिदेवना कस्माचिद्भावात् न विजानामि यदिवेदमस्मीति, बहिर्मुखचेतस• स्वरूपापरिज्ञानजनित 'दु खमन्यत्र श्रूयते-पराक विश्वानि व्यतृमत् स्वयमूम्तस्मात्पराक् पश्यति नान्तरात्मनिति (फेठ २-१-१) तहि कदैतद्भातीत्याह-बदामाआगन् आगमिष्यति तदाकि ? तदुच्यते ऋतस्य परमार्थस्य परस्य ब्रह्मण प्रथमजा प्रथमोत्पन्न चित्तप्रत्यक् प्रवण जनितोऽनुभाव सयदा मा मा प्रामोति आदित् अनन्तरमेवात्य मनेन अस्या वाच ऐकाव्यप्रतिपादिकाया उपनिषद्वाच यदिवेदमस्मीयुक्ताया वा भाग भजनीय शब्दब्रह्मणा व्याप्तव्य पर ब्रह्मपद मभुवे प्रामोमि, चित्तस्य बहिर्मुग्वता परित्यज्यान्तर्मुखतैव दुःसपादा, सायदास्यात् तदानीमेव म्वरूप द्रष्टु सुशकभवति पश्चाद्विलवाभावान्, यथा गिरिशिखरापतन् पापाणोऽविलयेन पतति तद्वचिच प्रत्यङ्मुखत्वस्य दु शकत्वमिति तत्रैवश्रूयते, "कश्चिद्धीर प्रत्यगात्मानमैच्छदावृत र चक्षुरमृतत्वमिच्छन्नि" ति ॥ ३७ ।। अनुवाद-यद्यपि समग्र प्रपञ्च मेंहीहुर कल्पित जो नातरूप उनको छोडकर सद्रूपसे सर्वत्र अनुगत मेंही हु, सच्चिदानन्दरूप में हु, तथापि विवेकपूर्वक में जान सक्ता नहि, याने शास्त्रजनित जो " यह सकल प्रपञ्च मेंही हु, ऐसा ज्ञान सो मुझे (अपरोक्ष) हुवा नहिं, इससे में अविवेकीहु कार्य और कारणका अभेद होनेसे कारणीभूत ब्रह्मसें कार्यभूत प्रपच अभिन्न है याने प्रपच सब स्वरूप भूनही है, 'यह सकल प्रपच आत्मस्वरूप है, यह सब ब्रह्मही है, यह सर्च आत्माही है, उसने ईक्षण किया की में बहुत स्वरूप होउ, प्रजारूपसें प्रकट होउ" इत्यादिक श्रुतिओंसें एक विज्ञानपूर्वक सर्व विज्ञानकी प्रतिज्ञा करनेसें अपच ब्रह्मसें अभिन्न है. ब्रह्मसूत्रमेंभी (२२ १४) "आरम्भण शब्दादिकों के प्रयोगसे प्रपच ब्रह्माभिन्न है" ऐसा सिद्ध किया है जबकी मन्त्रगत " शब्द उपमार्थक है तब ऐसा अर्थ होता है, "सकल प्रपच एक ब्रह्मस्वरूप है" यह जो अनुभवसिद्ध परोक्षज्ञान है वैसाही में हु. “यह सब मेंहीहु" ऐसा ज्ञान मुझे हुवा परतु सिद्धान्तभूत अनुभवसिद्ध सर्वात्मता जो है सो में नहि जानसका याने शास्त्रजन्य परोक्षज्ञान होनेपरभी सार्वात्म्यका अपरोक्षानुभव हुवा नहिं . . इव [२५] क्योंकी अविद्याकामकर्मादिकोंमें मजबूत बंधा हुवा हुं. और इसीलिये असंभावना विपरीतभावनाधीन बना हुवा विक्षिप्त चिचसे में युक्त होकर संसारमें दुःखानु- भव कर रहा हूं लेकिन सार्वात्य भावको में पाता नहि, ऐसा (कोइ अधिकारी) खेद कर रहा है. यास्कर्नेभी इसमंत्रको खेदसूचनाही में प्रतिपादित किया है. "में सकल प्रपंचसे अभिन्न होनेपरभी मेरे यथार्थ स्वरूपको अपरोक्ष अनुभव कर सक्ता नहिं" इत्यादि. बहिर्मुख चिचवाले प्राणिको स्वरूपअज्ञानजनित दुःख उपनिषदोंमें सुनने में आता है " परमेश्वरने (मन सहित ) इन्द्रियाँ पराग्यू- त्तिवाली निर्मितकी है जिससे लोक पराक् (बाह्य) पदार्थका अनुभव कर सकें है परंतु प्रत्यक्पदार्थ अन्तरात्माका ज्ञानसंपादन कर सक्तं नहिं" यह प्रत्यपदार्थ दुर्लभ होनेपर भी अन्तःकरण जिस समयमें प्रत्यपदार्थकी ही उपलब्धि प्रवणहोगा तब इस सर्वात्मताप्रतिपादकउपनिपाणी के लक्ष्यार्थभूत प्रझपदको में प्राप्त कर सकुंगा. याने चित्तकी बहिर्मुखता-विषय लाम्पट्य छोडाकर दुर्घट जोकी अन्तर्मुखता है सो जिसमालमें हो सकेगी तबही स्वरूप साक्षात्कार विनाविलं- बसें हो सकेगा। जैसे पर्वतके शिखरसे गिरनेवाला पथ्थर विना बिलंबसें भूमिपर पोचता है सही चित्तकी अन्तर्मुखता होनेकेबाद त्वरितही अपरोक्षानुभव हो कोइ वीरपुरुष जन्म मरणसेरहित होनेको चाहता हुवा मन सहित इन्द्रियोंको विषयोंसे विमुख बना कर आत्मसाक्षात्कार कर लेता है" ।। ३७ ।। २१. २ ३ २१ अपाङ पाउंतिस्वधयागृभीतो मो मत्यैनासोनिः। ताशचन्ता विधुचीनोवियतान्या न्यचिक्युमेनिचिक्युरन्यम्॥३८॥ अमर्त्यः अमरणधर्मायमात्मा मनमरणधर्मणा भूतात्मना देहेन योनिः, समानस्थानत्रयपरिच्छेदको देहोऽस्ति तरसर्वत्र सोऽयमपितिष्ठन्नित्यर्थ , यद्रा स समानोत्पत्तिः सहवासेन; स्वस्मिन्नुत्पतिरुपचर्यते, एवंभूतःसन् स्वधया अन्नोपल- क्षिततत्तद्दोगेनगृभीत , यद्वा स्वधाशब्देनान्नमयं शरीरं लक्ष्यते, तेनगृहीतः सन्न- पाछेति मशुलं कर्मकृत्वा योगच्छति, प्राडेति ऊवं स्वर्गादिलोक प्रामोति, परमा- स्मैवसूक्षमशरीरोपाधिक.सन् नानाविधक कृत्वा तद्भोगाय 'जीवसंज्ञा लक्ष्य शरीस्त्रयेणसंबद्धो लोकान्तरेषुपंचरति । स्थूलसूक्ष्मो भयशरीरपारग्रहेण लोके गुण. यान्वित.सन् परिश्रमति, ताच,यते " गुणान्वयो य. फलकर्म कर्ता कृतस्य- सकेगा." , , .

[२६] तस्यवसचोपमोक्ता, सविधरूपस्त्रिगुणस्लिवामाणाधिपः संचरतिस्वकर्मभिः हति । इदानीगुभयप्राधान्येनाह ते तो भूतात्मक मानौ शवन्ता अविभागन सर्वदावर्तमानौ, यद्वासूक्ष्मशरीरपक्षे सर्वदासहवासउपपद्यते, स्थूलशरीरपक्षऽपि सात्विकजाते तत्कारणाना भूतसूक्ष्माणा सद्भावात् तत्रशरीरसम्बन्ध उपपयते विपूचीना इहलोके सर्वत्रगमनौ, वियन्तातचकलोपमोगाय सर्वत्र लोकान्तरेषु गच्छ- दावर्तेते, तत्रनराः अन्यभूतात्मानं निचिक्युः नितरां विशेषेण पश्यन्ति जानन्ति, अन्यमपरं देहवच्छायातिरिकननिचिक्युः न जानन्ति, केचन पामरा देहव्यति- रिक्तं न जानन्ति, केचन विवोकनः फर्तृमोकृत्वोपेतो देहातिरिक्तः कश्चिदस्ती- त्यनुमिमते, न केऽपि देहत्रयव्यतिरिक्तमात्मानं जानन्ति, अतोदुर्लभमात्मज्ञान- मित्यर्थ ॥३८॥ अनुवाद-जन्ममरणादिकसे रहित यह आत्मा मरणधर्मवाले भौतिक देहकेसाथ समान निवासवाला हुवाहै- याने देशकालवस्तुसे परिच्छिन्न देहमें अवस्थित होनेसे स्वयमपि तादृशधर्मवान् प्रतीत होता है, अथवा देहके साथ सहवास करनेसें देहादिगत जन्ममरणादिकवान् उपचारसें (आत्मा) कहाजाताहै, ऐसा यह आत्मा तत्तद्भोगोंसें अहीत होताहुवा अथवा "स्वधा " शब्दोपलक्षित अन्नमय शरीरसें ग्रहीत बनाहुवा अनुचित कर्म करके अधोगति को प्राप्त होता है. योग्य कर्म करके ऊर्ध्वगति स्वर्गादि लोकको प्राप्त होता है, यानें परमा- त्मा स्वयंही सूक्ष्म शरीररूप उपाधिको स्वीकारकरनेके बाद अनेक तरह के कर्म करके उन्कों के भोगके लिये “जीव" सनाको धारण करता हुवा स्थूगसूक्ष्म- कारण यह देहत्रयसे सबद्ध होकर लोकान्तर, पर्यटन कर रहा है. और स्थूल- सूक्ष्म दोनों शरीरका परिग्रह करके लोकमें सत्वगुण रजोगुण और तमोगुण इनसे युक्त होकर परिश्रमण कर रहा है, श्रुति भी कहाहैकी "गुणत्रयक साथ वर्तमान होता हुवा और फल सहित कर्म करता हुवा और किये हुवे कर्म के फलों को भोगनेवाला वह जीवात्मा विश्वरूप होनेपरभी गुणत्रयाधीन बनकर प्राण और इन्द्रियादिकका अधिपति नियामक होनेपरभी तीनगुण के तीनतरह के मार्गपर आने कोंसे सस- रणको पाताहै"। (अब जीवात्मा और परमात्माको उद्देश करके कहते हैं) भूतात्मा (देह) काला (जीवात्मा ) दोनों विनाविभागसे सदा वर्तमान है. याने एक रूाही है. अथवा सूक्ष्मशरीर पक्षों हमेशा ( दोनोका) सहवास उप- -- [२७] पन्न होसक्ताहै, और स्थूलसूक्ष्मशरीरपक्षमेंभी सात्विक जातिका और उस (जाति) के कारणभूत सुक्ष्म भूतोंके सद्भाव (विद्यमानता) से वहांरमी शरीर संबन्ध उपपन्न हो सकताहै. वह देह और जीवात्मा इसलोकमें सर्वत्र ततत्फलोप- भोगकेलिये गमनवाले बनतेहै. उनमें लोक देहको जान सक्तैहै. और जीवात्मा कीजो देहादिव्यतिरिक्त है उस्को नहिं जानसक्ते. याने कोइ पामर लोक आत्माको देहातिरिक्त नहि समझ सक्ते किंतु देह यही आत्मा है ऐसा मान रहें है, कोइ विवेकीलोक कर्तृत्वभोक्तृत्वधर्मवान् आत्मा है और वह देहेन्द्रिया दिसंघातसें अतिरिक्त है ऐसा मानते है, अनुमान करतहैं. लेकिन कोइभी देह- त्रयकासाक्षी आत्मा है, और निलेपहै, कूटस्थ है, ऐसा अपरोक्षकर मक्ते नहि. इस लिये आत्मज्ञान अत्यन्त दुर्लभहै ऐसा इस मन्त्रमें बतलायाहै. ॥३८॥ २२, २ ३ २१ ऋचोअक्षरे परमेव्योमन्यास्मन्देवाअधिविश्वेनिपटु ।। यस्तन्नवेद किमृचाकरिष्यति यइचद्विदुस्तइमे समासते॥३९॥ पूर्वमन्त्रे देहात्मजीवात्मानावुक्तौ तयोरन्यस्यजीवात्मनः पारमार्थिकरूपयद स्तितदत्रोच्यते-ऋचोअक्षरे, अत्रऋक्शब्देन ऋप्रधानभूताः सांगापरविद्यात्मका- श्चत्वारोवेदाउच्यन्ते, ऋगादीनामपरविद्यास्वंमुण्डकेश्रूयते ( मु. २-४-५) "वै विद्ये वेदितव्ये" इतिप्रतिज्ञाय "तत्रापरा ऋग्दो यजुर्वेदः सामवेद" इत्या- दिना, तस्याः सम्बन्धिन्यक्षरे अदृश्यादिगुणके क्षरणरहिते अनश्वरे नित्ये सर्वत्रव्याप्ते ब्रह्मणि, अक्षरशब्दस्य ब्रह्मवाचकत्वम् “ एतद्वैतदक्षरस्यप्रशासनेगानि" ययातद- क्षरमधिगम्यते " येनाक्षरपुरुपंवेदमत्य" मित्यादिश्रुतिपुसिद्धम् ( ३-८-९) ऋगक्षरयोः प्रतिपाद्यपतिपादकभावः सम्बन्ध सर्ववेदः खलु ब्रह्माधिगम्यते "तंत्वौप- निषद पुरुष पृच्छामि" इत्यादि (पृ. ३-९-२६) श्रुतेः। ननूपनिषद्भागानातथास्तु इतरेपातु कथंमाविषयत्वमित्युच्यते-यद्यपीतरभागानायागादिविषयत्वं तथापिबुद्धि- शुद्धभुत्पादनद्वारा वेदनसाधनत्वेन ब्रह्मविषयाभविष्यन्ति " तमेतंवेदानुवचेनन ब्राह्मणाविविदिपन्ति" इत्यादिश्रुते । तदेव विशेष्यते-परमे उत्कृष्टे निरतिशये व्योगन् व्योमनि व्योमसदृशे, अलेपत्वनीरूत्वव्यापिनादिसादृश्येन व्योमेत्युक्तन । यद्वा विशेषेणसर्वन्यरक्षके निरधिष्ठानोप्रमः कस्यचिदस्ति साध्यस्तस्य सर्वस्याधिष्ठानले. नाशकाचारशेतत्त्वे सर्वमध्यस्तमित्यर्थ.: पुनस्तदेवविशेष्यते यस्मिन्नरमात्मनि [२८] विश्वे सर्वे देवा अधिनिपेदुः निषीदन्ति आश्रित्यतिष्ठन्ति तस्मिन्, यद्राउक्तलक्षणे वस्तुनि ऋगुपलक्षिताः सर्वसागावेदाः पर्यवसिता इत्यर्थः, यः योमर्यः ततार्थ देवादीनां स्वरूपलाभास्पदंकृस्नवस्तात्पर्य प्रतिपाद्यं यदस्तुनवेद नजानाति समयः ऋचापूर्वोक्तिमऋगादिशजजालेन किरिष्यति, वेदनसाधनेन देन वेद्यमविदित्वाप्तिाघयतीत्यर्थः प्रयोजनाभावात्सर्वस्यापिवेदस्यवैफल्यादितिभावः, अथवा योऽक्षरमविदित्वाकर्मणा कर्ताभवति यागादीननुतिष्ठति तेनकिञ्चिदपि कर्म कृतं नभवतीत्यर्थ.। येइत् येएव ततत्त्वं विदुर्जानन्ति तइभे समासते तएवेमेज्ञावार समासते सम्यक्तिष्ठन्ति अपुनरावृत्त्यास्वस्वरूपेऽवस्थान समासनम् , यद्वा येविदु- रित येजानन्त्येव नानुतिष्ठन्ति इच्छब्दोऽवधारणे, तहमे तएवसमासते मवानयना- दिसहस्रसंवत्सरसत्रपर्यन्तानि सहोपयन्ति, सहार्थेसमशब्दः, सत्रादपिकाना यागा- नामभावात् तेषामपिफरमेतज्ज्ञानेनैवप्राप्तभवतीत्यर्थः वर्तणाबहुत्वाह हुवचन- - . निर्देशः। . अपरे प्रकारान्तरेण प्रतिपादयन्ति-ऋचोअक्षरे ऋगुपलक्षितसर्ववेदसम्ब- धिन्यक्षरे प्रणवरूपेॐकारे अविनाशिनि सर्ववेदेपुव्याप्तेवा, प्रणवस्यसर्ववेदसारत्वं ब्राह्मणश्रूयते " तान्वेदानभ्यतपत्तेभ्योऽभितप्तेभ्यस्वयोवर्णाअजायन्ताकास्तकारी- मकारइति तानेकधासमभरत् तदेतदो३ मिती" ति। परमेनिरतिशये, नहि प्रणवा- दपिककिञ्चिन्मन्त्रजातमस्ति, त्रिकालातीतस्यब्रह्मणः प्रतिपादकत्वात् “यच्चान्य त्रिकालातीत तदप्योंकारएव"(मा.१-१) "ओभिति ब्रह्मेति । वेदानाप्रणवस्यस्थान प्रतिनिधिभाव. सम्बन्ध. " यऋचोऽधीते" इत्याद्युपक्रम्य "यः प्रणवमधीते स सर्वमधीते ओमिति प्रतिपद्यते " 'एतद्वैयजुस्यीविद्याप्रत्येपावागेवत्वरमक्षर"मि- त्यादिश्रुतेः। यस्मिन्निधेसदेशाअधिनिषेदुः, प्रणवस्य सर्वमन्त्रात्मकत्वात् मन्त्रेषु सर्वदेवताना निवासात् सर्वदेवनिवाससम् , ब्रह्माविष्ठानत्वाद्रमणि सर्व- देवाना निवासात्, शिष्टमवशिष्टम्, अपरेवन्यथावर्णयन्ति ऋचः ऋगर्चनीयो जीव. तस्यसम्बन्धिन्यक्षरे अविनाशे व्याप्ते वा परमात्मनीत्यर्थः। अतएवजीवापेक्षयापरमे उत्कृष्ट निस्पापिके व्योमन् विशेषेण सर्वाधिष्ठानत्वेन रक्षके व्योमसदृशे वा यस्मि- परमात्मनि देवागमनवन्तो व्यवहरन्तो वा इन्द्रियसंज्ञका विश्वेसर्वेऽपि अधिनि- घेदुः निर्ष दन्ति, आश्रित्यवतन्ने, यस्तनवेद, नजानाति, उपाध्यशपरित्यागेन तदेव स्वरूपमिति न पश्यति स्थूलोजनः किमृचा करिष्यति, केवलेन जीवभावेन N . [२९] किंफलं प्राप्स्यतिजननमरणादिक्लेशस्यात्यागादितिभावः,, यइत् तद्विदुस्तइत्यादि- सिद्धम् ।। ३९ ॥ अनुवाद.-पूर्व मन्त्रमें भूताला और जीवात्माको निरूपण किया, उनमेसे जीवात्माका पारमार्थिक स्वरूप जेहि सो कहेते है-*गादि वेदमें प्रतिपादित अतीन्द्रियत्वादिकधर्मवाले अविनाशि सर्वव्यापक समस्त विशेपासेरहित परेम उत्कृष्ट आकाशवत् अपत्वनीरूपत्वादि धर्मवाले अथवा अच्छी तरहसे सब रक्षण करनेवाले सकल प्रपञ्चके अधिष्ठानरूप जिस् परमेश्वरमें सफल देव आरित होकर वर्तमान है. यहां मूलमन्त्रमें "ऋक" शब्दसे ऋग्वेदादिक सकल वेद मङ्ग सहित उपलक्षित होते है. मुण्डकोपनिपढ़ें ऋग्वेदादिक " अपरविद्या" शब्दसे कहे गये हैं-" दोविद्या अभ्यस्त करनी चाहिये परा और अपरा " ऐसा उपक्रम करके " उस्में " अपरविद्या ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद " इत्यादिक ऋग्वेदादिक सब अपरविद्या शब्द वाच्य है। और इस मन्त्रमें "अक्षर" शब्द ब्रह्मका वाचक है. याज्ञवल्क्य कहते हैं की-"हेगार्गि इस अक्षरके प्रशासनमें (हुकुममें) सूर्यचन्द्र अधीन हो रहें है", (४० ३-८-९) और "वह परा विद्या है की जिससे उस अक्षर (ब्रह्मा की प्राप्ति होती है " "जिससें त्रिकालाबावित जिस पुराण पुरुषरूप अक्षर (ब्रह्म) को (अधिकारी) जानता है" इत्यादि श्रुति अक्षर शब्द ब्रह्मवाचक बतलाया है. ऋग्वेद और अक्षरका प्रतिपाय प्रतिपादक भाव सम्बन्ध है "मैं (आपसे) उपनिषदसें (वेदसें ) जानने योग्य पुरुषका स्वरूप पूछताहुँ" इत्यादिक श्रुति सिद्ध हैकी सर्व वेदोसें परब्रह्महीका अधिाम होता है. ननु (शंका) उपनिषद्भाग परब्रह्मका प्रतिपादक भलै हो लेकीन् इतर वेदभाग. ब्रक्षाविषयक नहि हो सका । (समाधान) यद्यपि इतरवेदभाग (कर्मकाण्डादिक) यागादि विषयक है परतु वह निष्काम होनेसे अन्त करणको शुद्ध बनाकर ब्रह्म ज्ञानकी योग्यता संपादन करदेता है इसमें वह (कर्मकाण्डादि) भाग भी ब्रह्म विषयक कहा जाता है, श्रुतिमी "ब्राह्मणलोक वेदप्रदर्शित प्रकारसे याने यज्ञदा- नादिकसे उस. परमेश्वरको जाननेको चाहते हैं.", ऐसा कहती है. जिस परमेश्वरमें सावेद पर्यवसितहै याने जिस परमेश्वरके साक्षात्परंपरयावा प्रतिपादनहीमें परायण है, ऐसे परमात्मा की जिसके लाभसें ब्रह्मादिक देवमी स्वरूप लाम मान रहे है और वेदोंका रहस्यरूप जो परमेश्वर है उसको नहि जाननेवाला किंवा जानने के .

. होजाते हैं. अथवा [३०] लिये यत्नभी नहि करनेवाला मनुष्य ऋगादिक वेदवर्गसे क्या लाभ लेसकेगा याने ज्ञानसाधनभूत वेदसें ज्ञेयका ज्ञान प्राप्त न करके किस कार्यको वह (मनुष्य) सिद्ध करेगा, निष्प्रयोजन होनेसें उसके लिये तो वह बेद निकलही है. अथवा जो मनुष्य अक्षर ब्रह्म को न जानकर यागादिक कर्मका अनुष्ठान करता है वह (अखंड) फलको प्राप्त न होनेसें किसी कर्मका करनेवाला नहि हो सक्ता, याने किया हुवा कर्म स्वर्गादिफलदायक होनेपरभी अविनाशिपदप्रद न होनेसें परिश्रमरूपही है. और जो मनुष्य उस तत्त्वको यथार्थ जानते हैं वे सम्यग ज्ञानवाले होकर पुनरावृत्तिरहित जो स्वस्वरूप है उसमें अवस्थित (स्थिर) जो मनुष्य केवल जानतेंही है और अनुष्ठान नहि करते वे स्वरूपलाभापन्न होनेसें यागादिकको विना फेिये उनके फलको पाते हैं. के इ पण्डित लोक इस मन्त्रका ऐसा व्याख्यान करते है की ऋक् उपलक्षित सकल वेद फा सम्बन्धि अक्षर अविनाशि अथवा व्याक निरतिशय ऐसे जिस प्रणवमें समग्र देव आश्रित हैं " वह प्रजापति उन वेदोमें पर्यालोचनात्मक तपश्चरण करने लगे. उनमें से अकार उकार और मकार यह तीन वर्ण प्रकट हुवे. उन तीनोंको सहोच्चारण करने से ॐ ऐसा (प्रणवरूप) होता है" त्रिकालातीत पर- ब्रह्मका प्रतिपादक होनेसें प्रणवाधिक कोइ मन्त्र हैं नहि. "जो कुछ कालत्रयातीत है वह सब प्रणवही है" यह ब्रह्म है" इत्यादिक श्रुतिमें प्रणवको ब्रह्मवरूप प्रतिपादन किया है. वेद यह स्थान है और प्रणव परमेश्वरकी प्रतिमा कहा जाता है. "जो प्रणव का स्वाध्याय करता है सो सबका स्वाध्याय करने के फलको पाता है" इत्यादिक श्रुतिसें प्रणव परब्रह्म रूपही है यही प्रणव सकल देवों का निवासरूपभी है क्योंकी सकल मन्त्रात्मक प्रण है और मन्त्रों साल देवका निवास है, इस लिये परंपरा संबन्धसें सर्व देव के निवासभू' यह प्रणव है. ब्रह्मसें अभिन्न होनेसें और समग्र देवोंका अधिष्ठान ब्रह्म होनेसेमी यह प्रणव देवोंके निवासरूप है. दूसरे प्रण्डितलोक अन्यथा वर्णन करतें है. . पर- ऋचासे प्रतिपादन करने योग्य जो जीवात्मा उसके संबन्धी अक्षर याने अपिनाशि अथवा व्यापक जीवकी अपेक्षासें उत्कृष्ट निरुपाधिक सर्वाधिष्ठान होनेसें सर्वका रक्षक अथवा आकाशवन् असंगत्वनिर्लेपत्यादिधर्मयुक्त जित परमेश्वरमें व्यवहार विषयक देवशब्दवाच्य समस्त इन्द्रियां आश्रय करके वर्म- - [३१] मानहैं. जो ऐज्ञा जानता नहि याने उपाधिरूप अंशका अनादर करके निरुपा- धिक स्वरूपको यथार्थ जो नहिं समझ सक्ता सो स्थूलबुद्धिवाला मनुष्य केवल जीवमावर्से व्यवहार करता हुवा ऋवासें क्या करसकेगा- किम् फलको पावेगा ? क्योंकी यथार्थ अपरोक्ष ज्ञानके विना जन्ममरणादिक क्लेशोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो सक्ती नहिं और उसके सिवाय निरतिशय सुखभी पायाजाता नहि, तो नो ऋगादिकका पठनपाठन जन्मादिकेशका निवर्तक नहि होसक्ता सो खाली परि- श्रम रूपहै, ऐसा कहागया ॥ ३९ ॥ २३. २ ३ २३ इन्द्रमित्रवरुणमग्निमाहुरथोदिव्यः ससुपर्णो गरुत्मान्। एकं सद्विबिहुधावदन्त्यग्नियमातरिश्वानमाहुः ॥४६॥ अमुमादित्यमश्चर्यविशिष्टमिन्द्रमाहुः, तथामित्रं प्रमीतैमरणात्रातारमहर- भिमानिनमेतन्नामके देवमाहुः, वरुणपापस्यनिवारक राज्यभिमानिनं देवमाहुः, तथामि मङ्गानादिगुणविशिष्ट मेतनामकमाहुः, अयो अपिचायमेव दिव्यो दिविभवः सुपर्णः सुपतनोगरुत्मान् गरणवान् पक्षवान् वैतन्नामकोयः पक्ष्यस्ति सोऽप्ययमेव, कथमे- कस्य नानात्वमिति उच्यते-अमुमेवादित्यमेकमेव वस्तुतः सन्तं विप्रामेधाविनः देवतातत्त्वविदो बहुधावदन्ति, तत्तत्कारणेनेन्द्राधात्मानं वदन्ति “एकैववा महाना- स्मा देवता ससूर्य इत्याचक्षते" इत्युक्तत्वात्, किञ्च तमेव वृष्टयादिकारणं वैद्युता- मिं यम नियन्तारं मातरिधान मन्तरिक्षेश्वसन्तवायुमाहुः सूर्यस्य ब्रह्मणोऽ नन्यत्वेन सार्वात्म्यमुक्तंभवति ॥ ४६॥ अनुवाद-इस् आदित्य शब्दके लक्ष्यार्थभूत परमेश्वरको समस्त ऐश्वर्य विशिष्ट " इन्द्र " ऐसा विद्वान् लोक कहतेहै. और इसी परमेश्वरको मरणर्से बचानेवाला दिवसाभिमानी " मित्र " नामकदेव कहतेहैं. और इसीपरमात्माको पापोका निवारक राज्यभिमानी देव " वरुण" ऐसा कहतेहै, और इसी परमे- श्वरहीको गमनादिगुणविशिष्ट " अमि" देव ऐसाभी कहतेहै. दिव्यस्वरूप सुंदर पक्षवाला उत्तमगतिवाला अथवा " सुपर्ण" ऐसा नामवाला जो कोइ पक्षी है सोमी यह परमेश्वर हीहै. ननु (शंका ) परमात्मा एक होनेपरमी नाना ( अनेक ) रूपवाला कैसे कहाजाताहै ? (समाधान ) आदित्य शब्दके लक्ष्यार्थ भूत इसी परमेश्वरको वास्तविक एक होनेपरभी देवतातत्वको जाननेवाले पण्डित- ,

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[३२]
लोक नाना (अनेकरूपवाली.) कहतेहैं. याने तत्तत्कार्यका स्वयं कारणरूप
होनसे इसी परमात्माहीको इन्द्रादि स्वरूप कहते है. अन्यस्थलमें कहा की यह
आत्मा महान् है औरएकही देवताह तथापि इसको (कार्यकारण अभेदहोने से.)
सूर्य; अमि, वरुण, इत्यादि रूपात्मक कहतेहै" और इसी परमात्माको वृष्टया-
दिकका कारणभूत " वैद्युतानि" (बीजली) ऐसा कहतेहै. सकल विश्वका 'निय-
न्ता अन्तरिक्षमें विहार करनेवाला "महावायु" भी इसी परमात्माको कहतेहैं.
इस्मन्त्रों आदित्यकी ब्रह्मसें आभिन्नता बताकर लक्ष्यार्थरूपमें 'सवात्मता
बतलाइहै ।। ४६॥
२४. ३, ३ .१ : ॐम् इन्द्रत्वाभिवयंसुतेसोमहवामहें।
सपाहि मध्वो अन्धसः ९॥
... इदं सर्वे जंगसाक्षाद्दर्शयतीतीन्द्रः तत्संबुद्धौ हे इन्द्रः वृषभकामानां
वर्षकं त्वानांसुतैग्रावमिरमिपुते सोमें वयंहवामहे; सोमपानार्थमाह्वयामः सत्वं मध्वः
मंदकरमन्धसः अन्नलक्षणं सोमंपाहिं पिब.. अथवा 'इदं ब्रह्म साक्षात्पश्यतीतीन्दः
तत्सम्बुद्धौ हे इन्द्र ? ॥१॥
अनुवाद-इस संकलप्रपञ्च को साक्षात् (हस्तामलकवत् ) बतलाने-
वाले याने अधिष्ठानसाक्षात्कार कराके उस (अधिष्ठाममें कल्पित नामरूपात्मक
प्रपंचका मिथ्यात्व यथार्थ अनुभव करानेवाले अथवा इस प्रपंचको (कार्यकारण
अभेदद्वारा) ब्रह्मस्वरूप समझनेसें सम्यग् ज्ञानवाले हे. इन्द्र ? ( इन्द्र गदके
लक्ष्यार्थ भूत हे उत्तमाधिकार संपन्न ? ) आपको आत्मसुख (निजानन्द ) रूप
अलभ्य लाभदायक समझके (इस् यज्ञमें ) पत्थरसें सिद्धकिये हुवे सोमरसके
पान के लिये निमन्त्रित करते हैं..(इस निष्कामयज्ञसे अन्तःकरणको शुद्धि होनेपर
आपके यहां आगमनसे सोमरससे आपका सत्काररूप शुश्रूषण करके हम ज्ञान .
संपादन करें) वह आप मदवाले याने अहंतानमतादि धासें व्याप्त. सोमशब्दित
अनोपलक्षित इस देहको याने आत्मामें अविद्याद्वारा अध्यस्त. इमू देहेन्द्रियादि.
संघातको उपभोग (स्वीकार) करें. अर्थात् आवरणको हटाकर कल्लित पदार्थों का
बाधपूर्वक स्वरूप लामका अधिकारी . हम को आप बनावै. इस मन्त्रमे प्रयुक्त,
इन्द्र शब्दका विशेष विशदीकरण ऐतरेयोपनिषद (१-३-१४ ) में किया है
उसी अभिप्रायसे यहां लक्ष्यरूप अर्थ गृहीत किया है. ॥ १ ॥

- ३१] २५.३ ४१० नमवितुर्वरेण्यंभंगोदेवस्य धीमाई ! धियोयोनः प्रचोदयात् ॥ १० ॥ यः सवितादेवोनोऽस्माधियः कर्माणि धर्मादिविषयावाबुद्धीः प्रचोदयात् प्रेरयेत् तत्तस्य सर्वासु श्रुति'मंसिद्धस्य देवस्य द्योतमानस्य सवितुः सर्वान्तर्या- मितया प्रेरकस्य जगत्संप्टुः परमेश्वरस्य आत्मभूत वरेण्यं सर्वैरुणस्यतया ज्ञेय- तयां च संभजनीयं भर्गः आविद्यारिकार्ययोजनाद्भर्गः स्वयंजोतिः परब्रह्मात्मक तेजाधीमहि "तद्योऽहंसोऽसौ योऽसौ सोहमिति" वयंध्यायेम। यद्वा तादेति भाँ- विशेषणम्, सवितुर्देवस्य तत्तादृशं भर्गोधीमहि " किंतदित्यपेक्षायामाह-इति- लिङ्गव्यत्ययः, यद्भर्गोंधियः प्रचोदयादिति तद्धयायेमेति समन्वय : । यहा तदिति भाँविशेषणं, सवितु देवस्य तत्ताशं भर्गों धीमहि किंतदपेक्षायामाह यद्भोधियः प्रचोदयात् इति तद्वायेमेति समन्वयः, यद्वा यः सवितासूर्यः धियः कर्माणि । प्रचोदयात् मेरयति, तस्य सवितु : सर्वस्यप्रसाधितुर्देवस्यद्यो- “तमानस्य सूर्यस्य तत्सदृश्यमानतया प्रसिद्धं वरेण्यं सर्व. संभजनीयभर्ग: -पापानांतापकं तेजोमण्डल धीमहि ध्येयतया मनसा धारयेम । यद्वा “भर्ग:" शब्देनानमभिधीयते,'य सवित्रादेवोधियः प्रचोदयात, तत्यप्रसादाद्वान्नादिलश- णंफलंधीमहि धारयामः तस्याधारभूता भवेत्यर्थः अस्यमन्त्रस्य शाङ्करभाष्यम्। अथ सर्वदेवात्मनः सर्वशक्तेः सर्वावभासक तेजोमयस्यपरमात्मनः सर्वात्मकत्वद्योतनाथ सर्वात्मकत्वप्रतिपादकगायत्री महाम- बस्योपासनभकार: 'प्रकाश्यते-तत्र गायत्रीप्रणयादिसप्तव्याहृत्युपता शिर समेवा सर्ववेदसारमितिवदन्ति । एवविशिष्टा गायत्री प्राणायामैहास्या, सपण नव्याह- वित्रयोपेता प्रणवान्ता गायत्री जपादिमिरुपास्या, वत्रशुद्धगायत्री प्रत्यग्सस्य- चोधिका थियोयोनः प्रचोदयादिति, नोऽस्साकवियोबुद्धीः यः प्रचोदयात् प्रेरयेत् इति सर्वबुद्धिसंज्ञान्त करणप्रकाशकः सर्वसाक्षी प्रत्यगात्मेत्युच्यते, तस्य प्रचो- त्याच्छन्दनिर्दिष्टस्यात्मनः स्वरूपभूतपरब्रह्म तत्सवितुरित्यादिपदैनिर्दिश्यते, तत्र ओतत्सदितिनिर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः इति तच्छब्देन प्रत्याभूतं खतः सिद्ध परंपझोच्यते, सवितुरिति दृष्टिस्थितिलयलक्षमकस्य सर्वप्रपञ्चस्य सम- स्तद्वैतविभ्रमत्यापिष्ठान लक्ष्यते । वरेण्यमितिः सर्ववरणीयं निरतिशयानन्दरूपम्। ५ [३१] मगइत्यविद्यादिदोपभर्जनात्मकज्ञानकविषयत्वम् । देवस्थेति सर्वद्योतनाम काखण्डचिदेकरसम् । "सवितुर्देवस्ये" त्यत्र पष्ठयोराहोः शिर इतिवदौरचारिका, बुद्धयादिसर्वदृश्यसाक्षिलक्षणं यन्मेवरू तत्सर्वाधिष्ठानम्तं परमानन्द निस्त- समस्तानर्थरूपं स्वप्रकाशचिदात्मक ब्रझेत्येवधीमहिध्यायेम। एमति सह बनगा स्वपिवर्तजडप्रपश्येन रज्जुसपन्यापनापवादसामानविकरण्यरूपभेकर सोऽयमितन्या- येन सर्वप्ताक्षिपत्यगात्मनो ब्रह्मणासह तादात्म्यरूवं भवतीति सर्वात्मक- ब्रह्मयोषकोयं गायत्रीमन्त्रः संपद्यते। सहव्याहृतीनामयमर्थ.-भूरिति सन्नात्रनु. च्यते, मुव इति सर्व भावयति प्रकाशयतीति व्युस्त्या चिपमुच्चो, विश्व इति- व्युत्पत्त्या स्वरिति सुप्ठुसपैत्रियमाणसुम्वस्वरूरमुच्यते। महइति महीयते पूज्यतइति व्युत्पत्त्या सर्वातिशयस्वमुच्यते। जनइति जनयतीरिजनः सकलकार गत्वमुच्यते। तप- इति सर्वतेजोरूपत्वम्। सत्यमिति सर्वबाधरहितम् । एतदुक्तम्भवति-पल्लो के सद् पंतदोकारवाचौप, आत्मनोऽस्य सचिास्य पावादिक्षिण अथ भाइयः सई- लोका ओंकारवायब्रमालकाः न तद्यनिरिक्तं किञ्चिदस्तीति। व्याहृतयोऽपि सई- मानवोधिकाः, गायत्रीशिरसोऽव्ययभवार्थ:-आपइत्यामोतीतियुसत्या मापित- मुच्यते. ज्योतिरीितप्रकाशरूप वम् , रसइतिमतिशयलर, अमृतमिति मरगादि- संसारनिर्मुक्तत्वम्, सर्वव्यापिसर्वप्रकाशकसर्वोत्कृष्ट नित्य नुक्तमात्मरू सचिदानन्दा- मकं यदोंकारयाच्यं ना तदहनस्मीति गायत्री मन्त्रस्यार्थः। गुहाशय नमः चाशनोऽई कदमंशाख्यविहुँ सित् ॥ विलीयतेने इमभवानापकारस्तुविनिध- तेऽत्र । यदस्ति यद्धति तदातरूपं नान्यवतोभातिनचान्यदति ॥ स्वभावविध. विभाति के वला ग्र ांगृहीतेतिमपैयर विकल्पना ॥१०॥ इतिश्रीमच्छ करभावन. कृती गायत्रीमाण्यं समाप्तम् ॥* तत्सत् ।। अनुवाद-जो सविता देव हमारे कर्मोको अथवा धर्म अर्थ काम और मोक्षविषयक बुद्धिको प्रेरणा करताहै, सकल श्रुति को प्रसिद्ध सन्निमि होनेसे नियन्ता, सचराचरविश्व की सृष्टि करनेवाले देदीप्यमान परोधाका मात्मभून और सत्रों का उपास्य और क्षेत्र होने से मननीय भजन करने योग, यज्ञान और तत्कार्यकाने स्यज्योतिः परनमानक ते नको हम (लोक) इशान करते हैं, याने " जो वह तेज हैसो में हु, और जो में हुं सो वह तेन है" ऐसा अमेद चिन्तन करते हैं. अथवा देदीप्यमान उत् सविता देशका वैसा ते का .

हम ध्यान करते हैं की जो तेज हमारी बुद्धिको धर्मार्थकाम और मोक्षमें तत्पर करे. अथवा जो सवितादेव बुद्धिको सुकृत के तरफ प्रेरणा करतेहैं, समस्त लोकों- का अपरोक्ष, और सर्वका भजनीय, पापोंको दूर करनेवाला, जगत् के उत्पादक श्री' स्र्थक तेजोमण्डलका हमलोक चिन्तन करतेहैं. अथवा जो सवितादेव बुद्धिको प्रेरणा करताहै, उसकी कृपासें अन्नादिरूप भोगोंको हमलोक प्राप्त होतेहै. इस्मन्त्रका शाङ्करभाष्य-अब सर्वदेवात्मक सर्व शक्तिमान् समाविष- योका अस्ति भाति और प्रियरूपसे प्रकाश करनेवाला तेजोमय परमेश्वरको सर्वस्वरूपता द्योतनकरने के लिये सर्वात्मकतापतिपादक " गायत्री "महान् मन्त्रका उपासनाप्रकार प्रकाशित करतेहै-सकलवेदोंमें प्रणवादिक सप्तव्याहृति और "आपोज्योति" इत्यादि शिरःसहित केवल गायत्रीहीको सर्व वेदका सार- रूप विद्वान्लोक कहतेहै, याने शिरःसहित कारपूर्वक व्याहृतिसप्तकसमेत गायत्रीमन्त्रही सिर्फ वेदोंमें सारभूतहै, इस्लिये वह उपात्यहै. यह शुद्ध गायत्री प्रत्यग्बमका बोध करानेवाली है. (धियो योनः प्रचोदयात्) " हमारी बुद्धि को जो देव प्रेरणा करें " ऐसा कहने से सफलबुद्धिसंज्ञक अन्तःकरणका प्रकाशकग्ने- वाला सर्वका साक्षी प्रत्यगाला उपलशित होताहै। " प्रचोदयात् " शब्दनिर्दिष्ट ने. आत्माका स्वरूप परब्रह्म सो " तत्मवितुः" इत्यादिग्दोंसे उपलक्षित होताहै. इसमें " तत्" शब्दसे प्रत्याभूत स्वतःसिद्ध परब्रह्म अगत होताहै. श्रीमद्भ- गवद्गीतामें कहाहैकी" ॐ तत्सत् " यह परब्रह्मका निदेशहै, और वह तनिफा- रका है. सवितुः इस पदसे उत्पत्तिस्थितिप्रलयवान् समग्रमपश्चात्मक द्वैत भ्रमका अधिष्ठान उपलक्षित होताहै. " घरेण्यन " इस पदसे सर्वोको प्राप्तकरने योग्य निर्विशेष आनन्द स्वरूप उपलक्षित होताहै. "" इस पदसें अविद्या- तत्कार्य का निवर्तक ज्ञानस्वरूप उपलक्षित होताहै. " देवस्य " इस पदसें सर्वका प्रकाश करनेवाला एकरस अखण्ड चैतन्य उपलक्षित होताहै. यद्यपि मन्त्रमें " सविता देवका सर्वप्रकाशक तेज" ऐसा कहनेस सविनासें तेनकी भिन्नता उपलब्ध होते है, क्यों की जैसे " देवदत्त का कम्बल " ऐसा कहनेसे संबन्ध प्रत्यायक पष्ठीविभक्ति के द्वारा देवदत्त और कम्बलका भेद स्फुट पाया जाताहै, " सविता देवका तेज" ऐमा कहसिना पष्ठीविभक्तिद्वारा भेदकी प्रतीति होनस यह मन्त्र भेट्योधक याने द्वैतप्रतिपादक हुवा ऐसा भ्रम होताहै, तथापि " इस् - - 1 - -- ॥ [३६] यह षष्ठीविभक्तिका प्रयोग लौकिकव्यवहारानुसारसे कियाहै, नहिंकी, पारमार्थिक भेद प्रतिपादन करने को, जैसे लोक कहते है की "राहुका मस्तक" पुरुषका चैतन्य "शिलाका शरीर " राहु स्वयं मस्तकरूपहीहै । क्योंकी एक अपराधी असुरका, विष्णुने जब शिर छेद किया तब मस्तकका नाम राहु हुवा और कबन्ध (घड)। का नाम केतु हुवा, जबकी मस्तकही राहुहै तब राहुका मस्तक कैसे हो सका। तथापि लोक " राहुका मस्तक ऐसा कहा करतेहै. याने और मस्तकमें भेद न होने परभी बलात् भेद कल्पित करके व्यवहार होताहै. और जैसे " पुरुषका चैतन्य" पुरुष और चैतन्य भिन्न नहोनेपरमी कसित भेदसे व्यवहार होताहै। "शिलाकाशरीर " इसमेंमी शिला यही शरीराकारहै, शिला अन्य पदार्थ और शरीर अन्य पदार्थ ऐसा है नहिं तथापि औपचारिक भेदसे व्यवहार होताहै. तैसे' ही "सविता देवका तेज" ऐसा भेद अवास्तविक (कल्पित) है, याने अधिष्ठानात्मक परब्रह्म स्वयं तेजःस्वरूपही है, तथापि भेददृष्टिवाले लोको बोध कराने के लिये भेदसे मात्र व्यवहार कियाहै, याने औपचारिक (फल्पित ) भेदसे वास्तविक अद्वैत बाधित हो सक्ता नहि. (प्रकृत प्रसंग कहतेहै ) " देहादिबुद्धिपर्यन्त सकलदृश्यका साक्षी में समग्र कल्पितप्रपंचका अधिष्ठान समस्त अनर्थरहित स्वप्रकाश परमानन्द चैतन्यात्मक परब्रह्मही " ऐसा ध्यान करतेहैं. प्रपंच का अधिष्ठान परब्रह्म मेंही." ऐसा कहनेसें ब्रह्म के साथ स्व (ब्रह्मका) विवर्त जडप्रपंचका बाधसामानायिकरण्यरूप एकत्व सिद्ध होताहै. जैसे रज्जुरूप अधिष्ठानका सर्पकेसाथ अविद्याद्वारा एकत्व तैसही परब्रह्मका प्रपचकसाथ अज्ञानद्वारा अभेदहै. और जैसे " वहीयह देवदत्तहै " इस् वाक्यमें देशकाला- दिक उपाधिका त्याग करके शुद्ध देवदत्तरूप देहेन्द्रियादिसंघातात्मक व्यक्तिका बोध होताहै तैसेंही सर्वज्ञता सर्वशक्तिमत्तादिक ईशधर्म और अल्पज्ञतासुख- त्वदु खित्वादिक जीवधर्मका बाध करके में प्रत्यगभिन्न निरतिशयानन्द चिदेकरस हु" ऐसा चिन्तन करनेसे ब्रह्म मैक्य सिद्ध होता है. " उस ऐक्यको बतलानेवाला यह गायत्रीम-त्र होनेसे " सर्वात्ममताप्रतिपादक यह मन्त्रहै ऐसा कहाजाताहै. सात व्याहृतीयोंका यह अर्थ है- "म" इस शब्दसें सन्मात्र याने केवळ सदूम कदाजाना है. " भुव" इस् शब्दसें सबको प्रकाशनेवाला शुद्ध चैतन्य काजाताहै. सकल -- - [" - " स्व:' इस शब्दसें सर्वको परमइट निरतिशय, सुखस्वरूप कहाजाताहै.। " महः" इस शब्दसें परमपूज्यत्वरूप अर्थ प्रतीतहोकर सर्वोत्कृष्ट पदार्थ । कहाजाताहै. " जनः" इस शब्दसे सर्वका उत्पादक याने परसकारणरूप अर्थ कहाजाताहै. "तप:' इस शब्दसें देदीप्यमानता याने नित्य तेजस्वितारूप अर्थ कहाजाता है. " सत्यम् " इस शहसें समग्रवापरहित और निखिलबाघका अवधिरूप अर्थ कहाजाताहै, इससे यह समझना चाहियेकी जो कुछ लोकमें सदूप है सो ओंकारका वाच्य ब्रह्महीहै. और जीवब्रह्मकी एकता प्रतिपादित होनेसें यह जीवात्माभी ब्रह्मरूप याने सच्चिदानन्द रूपहै. और यह "भू" रादि लोक ( सप्तक) है सोमी फारवाच्य परब्रमात्मकहीहै, उम् (ब्रह्म ) से भिन्न नहि हैं. सकल व्याहतियाँमी सर्वात्मकब्रह्मकी बोधकहै. गायत्री शिरः “मापोज्योतिः" इत्यादिक्रकामी यही अर्थ होताहै-" आपः" कहने से व्यापक पदार्थ कहाजाता है, आकाशकोमी लोक व्यापक कहेते है. इससे अतिव्याप्तिके परिहारार्थ कहते हैंकी " ज्योतिः सकल जड का प्रकाशक, याने आकाश स्वयं यथाकथंचि- ध्यापकहोनेपरभी प्रकाश न होनेसें वह इसमन्त्रका लक्ष्य (उपास्य ) नहि है. "रस" कहने सर्वातिशयतारूप अर्थ प्रकट करते हैं. अमृतम् " कहने से जन्ममरणादिसंसारसे निर्मुक कहाजागहै. इस मन्त्रका समुदित अर्थ ऐसा होता है । " सर्वव्यापक, सर्वप्रकाशक, सर्वोत्कृट, नित्यनुक्त, सचिन दानन्दात्मक कारवाच्य परब्रह्म परमात्मा सो में हीइं". गुहागत पदार्थ जैसे गुप्त होताहै तैसें यह ब्रह्मखरूपमी अज्ञलोकोंसें गुप्त है इसलिये गुहागत इस ब्रह्मरूप हुताशन ( अग्मि ) में इस सचराचर प्रपंच का होम (विलय) करके याने फलित भेदोका बाध्पूर्वक, अधिष्ठानसाक्षात्कारद्वारा में (जीवात्मा) स्व (परब्रह्म) स्वरूरसें अगिन याने तद्रूप हो जाउं, जो नित्य, चैतन्य है और स्वयं प्रकाशितहोकर जड़वर्गको प्रकाशित करताहै, सो आत्मस्वरूपहीहै. उस् (आत्मस्वरूप)को छोडकर अन्य पदार्थ हेभी नहिं और प्राशकरसतामा नहि. मित्य ज्ञानरूम चित्कला, की जो सद्रूपेण सर्वत्र अनुस्यूत है, वही यथार्थहै. और जो "प्रायगृहीता" इत्यादिक " - । A [३८] कल्पनाहै सो इस व्यवहारान्तर्गतहोनेमे मिथ्याहै. इतिश्रीमच्छङ्कराचार्य भग वान्का गायत्री भाष्यका अनुवाद संपूर्ण ॥ १० ॥ १६. ३ ५ २५ अयंपन्याअनुवित्तःपुराणोयतोदेवाउदायतविश्व । अधिदानिपीष्टप्रद्धामामातरममुयापत्तवकः ॥१॥ गर्भस्थो ज्ञानसंपन्नो वामदेवो महामुनिः मतिंचक्रनजोयययोनिदे शतुमातृतः ॥१॥ किंतुपार्थादितश्चतिज्ञात्वानुजननी त्वदम् दध्यौशांत्यैशचीदेवी मदिति विन्द्रमातरम् ।।२।। अदितिस्त्विन्द्रसहिता , गर्भिणीमभ्यगाद्वने अदितीन्द्रवामदेवाः संवादमथचक्रिरे ।। ३ ॥ इत्याद्युक्तत्यानेषांवादभूता इमा ऋचः:- पुराणः अनादिः अयंप्रत्यक्षेणोपलभ्य मानः पन्था योनिनिर्गमनरूपोमार्गः अनु आनुपूर्येण विचः सर्वैर्जायमानैर्लब्धः, यतो यस्म,योनिमार्गात् विश्वेतर्वेदेवाउद- जायन्त उत्कर्षणोत्सन्ना भवन्ति तस्माद्योनिमार्गान्मनुष्याउत्पन्ना भवन्तीति किमुवक्त- व्यम्, अतश्चिदस्माद्योनिमार्गादेवप्रवृद्धः गर्मेप्रकर्षण वृद्धिंगतो वामदेवः आजनिषष्टि । आसमन्ताज्जायतां अमुयाअमुंमातरंपतवेपतनाय मरणायइत्यर्थः माकः माकरोतु ॥१॥ श्रनुवाद-वेदान्तसिद्धान्तमें पूर्ण अपरोक्ष अनुभव कानेवाले जैसे वसिष्ठव्यासादिकहैं तैसे एक " वामदेव "भाहै, जिनों ने गर्भ स्थिति होनेपरभी ज्ञान संपादनकरके अपना सात्म्यिभाव "अहंमनुरभवंसू श्चि" इत्यादिकम- न्त्रोमें बतलायाहै, उन् वामदेवकी संक्षिप्त कथा कहतेहैं, "गर्भमें रहनेवाले वामदेव महामुनि ज्ञान संपादन करके "माताके योनि प्रदेशसें में बहार नहि निक- सुंगा किंतु पार्श्वभाग (कुक्षि) का विदारण करके में बहार आउं॥" ऐसा विचार फरने लगे, जब माता "शची " ने इस विचारको समझकर अपनें दुःखको दूर करनेकेलिये इन्द्रकी माता अदितिका ध्यान कीया तब अदितिमी अपर्ने पुत्र इन्द्रको साथलेकर उस जंगल में आपहुंची की जहां सगर्भा "शवी" शोकातुर होकर बैठीथी, वहांपर आकर आदेति इन्द्र वामदेव परसर प्रश्नोतरा- स्मक संवाद करनेलगे, ऐसी आख्यायिका है वह ऋचासे कहते है. . - ।

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यह योनिद्वाग-बहार आनेका प्रत्यक्ष उपलब्ध होनेवाला जो अनादि
मार्ग है उसी मार्गस सब देव भी बहार आते है तो मनुष्यों के लिये क्याकहना:
इसलिये पृद्धिको पायभये अथवा ज्ञानीचनेहुयमी वामदेव इसी योनिमार्गही
बहार निकलें जिससे विचारी इस माताके मरणमें निमित्त (स्वयं) न बनें ॥१॥
२७. ३ ५ २५ नाहमतोनियादुर्गहे तत्तिरथतापाचानिर्गमाणि ।
'वहनिमेअकृताकोनियुध्यत्वेन संस्वेन पृच्छै ॥ २ ॥
वामदेव एवमुक्तवन्तनिन्द्रमत्याह-अहमतो योनिमार्गान निरय न निरया-
णि ननिर्गच्छानि, एतयोनिनिर्गमनरूसंवर्म दुर्गहा दुर्महं दुःखेन ग्राह्यं नप्राप्यं
भवतीत्ययः, किंतु तिरश्चता तिरश्चीनाताचा नमानि निरिछानि, योनिदेशाइनि
तोहं पामित्वा निर्गच्छानीत्यर्थः, अन्धरकृजनिदमेवन केवमयाक्रियते किन्तु
अन्यैरकृता अकृतानि बहूनिकर्माणि मे फर्वानि कर्तव्यानिसन्ति त्वेन एकेनसपरनेन
विवद मानेन सहयुध्यै युद्धकरवाणि. लेन एकेनबुमुत्सुना संपृच्छै सम्यक्
पृच्छानि ।। २॥
अनुवाद-पूर्वोक्त प्रकार से कहनेवाले इन्द्रदेवको वामदेव उत्तर कहने
लगे में इस् योनिमार्ग के द्वारा बहार निमसुंगा नहि, कयोंकी योनिनिर्गमनरूप
यह मार्ग दुर्भहहै दुःखदहै, परंतु विभाग याने पार्धदेशको विदारणकरके
वहार निकसुंगा. अनन्य साधारण याने दूसरोंसे नहि होनेवाले इस एकही कार्य
को में करताहं ऐसा नहिचि औरभी वैसे कार्य मुझे बहुत कर्तव्यहैं. जैसे एक
सपल (प्रतिपक्षी ) वादी साथ में वादात्मक युद्ध करूंगा और एक ज्ञातासें-
भीमें (अनन्य साधारण ) प्रश्न पुर्छा. ॥ २ ॥
२८. ३ ५ २५ परायतीमातरमवष्टननागान्यनुनूगंमानि ।
स्वगृहे अपिबत्तोममिन्द्र शतधन्यंचम्बो:सुतस्य ॥३॥
भविगर्भस्थसजि इन्द्रः मदीयांमातरंपरायती परेतामियमाणामन्यंचष्ट
अन्वनवीद, एमपीदानी गस्थिकोई पुराणंपन्यानं नानुगानि नानुगच्छानी-
तिन किंतु क्षिप्रमनुगमानि अनुगच्छान्येव ॥ ३ ॥

--- - [४०] अनुवाद-इन्द्र जबामेरे तिर्यगमनसें माता के भरण की सूचना करते है तोगस्थित में प्राचीनमार्ग योनिद्वारा निर्गमनको क्या नहिं अनुसरुंगातु विश्यासस्वरी अनुसरण करताहुँ,या- 'मेरी माता के मरणमें में। निमित नहि होउगा.॥३॥ २९. ३.६ १५-अहंमनुरभवं सूर्यश्चाईकशीवासपिरस्मिविः । अकुत्समार्जुनेयन्यूओइंकविरुशनापश्यतामा ॥ १ ॥ इदमादिमत्रत्रये अयंगर्भवसन्वामदेव. उत्पन्नतत्त्वज्ञानः सन् सार्वात्म्य स्वानुभवं मन्वादिरूपेण प्रदर्शयन्नाह-अहवामदेव. मनुरभवं सर्वस्य मन्ता प्रजापति रस्मि अहमेव सूर्यश्च सर्वस्यप्रेरक सविताचास्मि, विनो मेधावी कक्षीवान्दीर्घतमसः पुत्रः एतत्संज्ञक ऋषिरप्यहमेवामिम, आर्जुनेयं आर्जुन्या. पुत्रः कुत्समेतन्नामक ऋपिमहमेवन्यूजे नितरा प्रसाधयामि, कवि क्रान्नदर्शी उशना एतदाख्य मपि रहमेवास्मि, उक्त मुपलक्षण, परमार्थदृष्टया कृत्स्नमप्यहमेवास्मीत्यर्थः । हेजनाः मा सर्वात्मके पश्यत यूयमध्येवमेव स्वरूपमनुभवतेत्युक्त भाति ॥ १॥ अनुवाद-गर्भस्थित यह वामदेव तत्त्वज्ञान उदित होनेसे सर्वात्मतारूप अपने अनुभवको मन्वादिरूपसें बतलाते हुवे, कहने लगे-में (वामदेव ) सबका प्रजापति हु और मेंही सर्वका प्रेरक और प्रकाशक हुं. मेधा (बुद्धि) रूप उपा- घिका स्वीकार करके विप्र शब्दका वाच्यमें ही बनाई, दीर्वतमा नामफ ऋषिका पुत्र कक्षीवान् नामक ऋषिभी में होहु. आर्जुनीका पुत्र कुत्स नामक ऋषिको मेंही सिद्ध करताहूं. अतिक्रान्त याने भूतभविष्यादिककोजानने वाले उशना (भूगु) नामक ऋषिमी मेंहीहुँ, (यह सब उपलक्षण है) पारमार्थिक दृष्टि से विचार करनेपर सकल प्रपञ्चमी मेंही हुं. हे लोकों में सर्वात्मक हुँ ऐसा तुमलोक देखो, और तुमलोकभी इसी तरहका स्वरूप न्यानें। सौर्वात्म्यता संपादन करो ॥१॥ ३०. ३ ६ १५ अहंभूमिमदामार्यायावृष्टिदाशुषेमयाय । अहमपोभनयंवावशानामर्मदेवासोअनुकेतमायन् ॥ २ ॥ अई वामदेव इन्द्रोवा' आर्याय मनवे भूमि पृथ्वीमवदा दयानस्मि, दाशुषेहविर्दत्तवते माय मनुष्याय यनमानायाष्टिंसस्याद्यमिवृद्धयय वृष्टिलक्षण .

[११] मुदकं अहमेव अददां, किंच अहं वावशानाः शब्दायमाना अपः उदकानि अनयं सर्वमपिप्रादेशमगमय, देवासो वयादवोदेवाः ममकेत मदीयं संकल्लं अन्यायन् अनुयन्ति ॥२॥ अनुवाद-(एतदादिक मंत्रोंसे ज्ञानकी महत्ता बतलाते है ) वामदेव अथवा इन्द्रका लक्ष्यार्थम्त मैनें ग्नु (प्रजापति ) को भूमि दीहै. और (उसी ) मैंने हविष्यप्रदान श्रनेवाले यजमानात्मक मनुष्यों के लिये अन्नादिकओषधियोंकी वृद्धि होनेको वृष्टयात्मक जलमी दीयाहै. और शब्दायमान (शब्द करते) जलको अपने स्थान (समुद्रादिक)में पहुंचानेवाला महीहुँ. अमि, वरुण, यम, कुबेदिक सब देव मेरे संकल्पानुसार आचरण (वर्तन ) कररहेहै. ॥ २ ॥ ३१. ३ ६ १५ अहंपुरो मन्दसानोव्यैर नवसाकन्नवतीः शंवरस्य । शततमवेश्यं सर्वतातादिवोदासमतिथिग्वं यदायम् ।। ३ ।। अहं वामदेव इन्दोवा मन्दसानः सोमेन माद्यन् नव नवसंख्याका नवती- नेवतिसंख्याकाश्च शंबरस्यैतन्नामकस्यासुरस्य संवन्धीनि पुरः पुराणि साकं युगप- देव व्यरं अध्वंसयं शततमं शतसंख्यापूरणं पुरं वेश्यं दिवोदासनाम्ने प्रवेशाह अकरवं, सर्वताता सर्वतातीयज्ञे अतिथिग्वं अतिथीनामभिगन्तारं दिवोदास दियो- दासनामकं राजाप यद्यदा आवमपालयं तदा पुरो व्यैरमितिपूर्वेणसंवन्धः ॥ ३ ॥ अनुवाद-वामदेव अथवा इन्द्रका लक्ष्यार्थभूत में सोमरससे तृप्त होता हुवा ९९ नेन्यानवे दैत्योंके नगरोंका युगपत् ( साथही) विध्वंसकरचुकाहु, और शततम याने १०० सोम नारी दिवोदास नामके राजर्षि को प्रवेशयोग्य करचुकाहुं. जिस समय अतिथि के पालक उस् दिवोदासराजर्षिके रक्षणमें में तत्पर हुवाथा उस समय पूर्वोक नगगेंको विध्वंस करचुकाहुं ॥ ३ ॥ ३२. ३ ६ १६ गर्भेनुसन्नन्वेपामवेदमहदेवानाजानमानिविश्वा । शतमापुरआयसीररक्षन्नपश्येनोजवसानिरंदीयम् ।। १ ।। अनैप.लोकः पठ्यते-इयेनभासमास्थायगीद्योगेन निःसृतः। ऋषिगर्भ , शयानःसन् ब्रूते-गर्मेनुसन्निति ॥ १ ॥ मर्मेनु गर्भएबसन् विद्यमानोहवामदेवः एषा- , .

[१२] मिन्द्रादीनां देवानां विधा विधानि सर्वाणि जनिमानि जन्मानि अन्ववेदं आनु- पूष्यणाज्ञासिष, परमात्मनः सकाशात्सदेवाजाता इत्यवेदिषमित्यर्थः, इतः पूर्व शतं बहूनि आयसी: अयोमयान्यभेद्यानि पुरः शरीराणि मा मामरक्षन् अपालयन् यथा इशरीराव्यतिरिक्तमात्मानं न जानीयां तथामामरक्षन्नित्यर्थः, अघ अधुना श्येनः श्ये- नवस्थितोहं जवसावेगेन निरदीयं शरीरान्निरगम अनावरणमात्मानंजाननिर्गतोस्मो- त्यर्थः " पुरुपेहवा अयमादितोगर्भ" इति खंडे (ऐ, २-५) गर्भएवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाचेत्यादिना अयमर्थः सम्यक्प्रतिपादितः॥२॥ अनुवाद-श्येन पक्षीकी तरह बहुत वेगसे योग मार्गका आश्रय करके वह वामदेव गर्भके बहारनिकलके कहतेभये- मेरी गर्नमें स्थिति होने परभी इन इन्द्रादि देवोंके जन्मोंको में यथार्थ जानता था (हं) यानें परमात्मरूपपरमकारणसें वे सब उत्पन्न हुई ऐसा में बानता था (हुं). और इस गर्भवासके पहिले अनेकलोहमय अभेद्यशरीर मेरा रक्षण कर रहे थे, याने में देहेन्द्रियादि संघातसें अतिरिक्त आत्माको यथार्थ ज्ञान प्राप्त न करसकुं ऐसे में ममत्व और अहंताद्वारा लोहादिककी तरह कठिनतर दुर्भद जो अविद्या (कारण ) शरीरसें बद्ध होरहाथा, सो अब इस समय श्येनपक्षीकी वरह बडेवेगसे शरीरकोछोडकर बहारआयाहुं, यार्ने अविद्यासें अनावृतात्मा- को यथार्थ अवगतफरके बहारआयाहुं. ।। १ ।। ३३. ३ ६ १६ नपासमामाजोपंजभाराभीपासत्त्वताचीण। ईमापुरंघिरजहादरांतीरुतवाताअतरच्छ्झुवानः ॥२ ॥ स गर्भ:मां वामदेवं जोपं पर्याप्तं नघ नैवापजभार अपजहार गर्भपिवस तो मे मोहो माभूदित्यर्थः, अहंतु ई इदंर्गभस्थं दुःखं त्वक्षसा तीक्ष्णेन वीर्येण ज्ञान- सामर्थेन अभ्यास अभ्यभवं, ईर्मा सर्वस्य प्रेरकः पुरंधिः पुरांधारकः परमात्मा भरातीः गर्भसंस्थितान् शत्रूनजहात् अत्यजत् जपान, उतापिच शूशुवानः वर्धमानः परिपूर्णः परमात्मा वातान गर्भक्लेशकरान्वायूनतरत् अतारीत् ॥२॥ . ..

[१३] अनुवाद-उस गर्भस्थितिने मुझको (वामदेवको) स्वरूपसे प्रष्ट किया नहि है, याने में गर्भस्थ था तथापि " गर्भवास जानेत दुःखवान् में हुं." ऐसा मोह मुझे हुवा नहिं. क्योंकी उस दुःखका तीक्ष्णवीर्यसे याने ज्ञानसामर्थ्यसे अभिभव (पराभव) मेंने करदिया. सकल देहका धारण करनेवाला (अधिष्ठानात्मक) परमात्माने गर्ममें (दुःखानुभवद्वारा प्राप्त होनेवाले मोहादि) शत्रुओं का नाश करके संग छोडादिया है. और इसी परमात्माने स्वापरोक्षज्ञान संपादन कराके क्लश समुद्र के पार मुझे पहुंचा दीया है. ॥ २ ॥ ३४. ३ ७ १४ हंसाश्रुचिपदसुरन्तरिक्षसद्धोतवेदिपदातिथिर्दुरोणसत् ।। नृपरसतसद्योगसजागोजातजाद्रिजाऋतम् ॥ ५ ॥ अनया सौर्य! "यएपोन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्म, थुरि"इत्यादि (छां. १-६-६) श्रुत्योक्तो मण्डलाभिमानी देवोत्ति, यश्वसर्वपाणि हृदि चिद्रूपः स्थितः परमात्मा, यच्च निरस्तसमस्तोपाधिक परब्रह्म तत्सर्वमेकमेवेति प्रतिपाद्यते. हंसः हन्तिर्गत्यर्थः सर्वत्र सर्वदागन्ता योहंसोऽसावित्यादिश्रुत्युक्त प्रकारेणैकीकृत्योपास्यः, परमात्ममंत्रप्रतिपाद्य आदित्यः सच शुचौबीते द्युलोके सीदतीति शुचिपत्, “अथ यदतः परोदिवोज्योतिर्वीप्यते" इत्यादि (छां. ३-१३.७) श्रुतेः। अनेन ह्युस्थान आदित्यः प्रतिपादितः, सएव मध्यस्थानो वायुरित्याह-वसुः सर्वस्य वासयितावायुः सचान्तरिक्षसत् अन्तरिक्षसंचारी, अथ तस्यैव क्षितिस्थान वैदिकामिरूपतामाह-होता देवानामाहाता होमनिष्पादकोवा, वेदिपत् वेद्यां गाह. पत्यादिरूपेणस्थितः, अतिथिरतिषिवत्सर्वदा पूज्योमिः, दुरोणसत् दुरोणगृहनाम तत्रपाकादिसाधनत्वेनस्थितः, अनेन लौकिकाम्न्यात्मत्वमुक्त, नृपत् नृषुमनु- प्येपुचैतन्यरूपेण सीदतीतिनृपत् , अनेन परमात्मरूपत्वमुक्तं, पुनरप्यादित्यात्मता- माह-वरसत् वरेवरणीये मंडले सीदतीति वरसत् आदित्यः “वरंवाएतत्सद्मनायस्मि नेपासनस्तपती" तिहिश्रूयते (ऐ. बा. ४-२०), ऋतंसत्यं ब्रह्म यज्ञोवा तत्र सीदतीत्यृतसत् अमिः, व्योमान्तरिक्षं तत्रसीदतीति व्योमसहायुः, इदानीमादित्यतो च्यते, अन्नाः उदकेपुजातः उदकमध्येखस्वयं जायते, गोजाः गोपुरश्मिपुजातः, ऋतं सत्यं सर्वश्यखेन सत्याजातः, नह्यसाविन्द्रादिवत्परोक्षो भवति, यद्वोदकेषु वैद्युतरूपेण वा चाडवरूपेणबाजानः, अद्विजाः अद्राबुदयाचलेजातः. एवं महानुभाव RA [४४] मादित्यः, ऋतं सत्यमयाध्यं सर्वाधिष्ठानं ब्रह्मतत्त्वं तद्रूपो बसावेव आदित्यस्योक्त रूपलं "हंसः शुचिपदित्येपवेहंसः शुचिपदि"त्यादिना ब्राह्मणे समाग्नातम् ॥५॥ अनुवाद-"आदित्य के अन्तर्गत हिरण्यश्मथु हिरण्मय पुरुष जो दिख पडता है" इत्यादिक श्रुतिमें सूर्यमण्डलाभिमानी जो देव उपास्यतया निर्दिष्ट किये है, और सकल प्राणिके हृदयमें अनुस्यूत प्रत्यक्चैतनरूपसें जो परमात्मा अवस्थित है याने यह दोनों सोपाधिक है, और समस्त उपाधियोंसे रहित जो परब्रह्म है वह सब (तीनो) एकहींहै ऐसा इस (सौरी) ऋचासे प्रतिपादन करते है- (हंस ) हमेशा सर्वत्र गमनवाला और देदीप्यमान द्युलोको प्रतीतहोनेवाला परमात्मप्रतिपादक मन्त्रका विषयभूत यह जो आदित्य याने तदन्तर्गत मण्डला- भिमानी देव है "सो मेंहूं और में वह है ऐसा अभेदद्वारा वह उपास्य है. "प्रपञ्चातीत और धुलोकमें देदीप्यमान परमात्मा" इत्यादिक श्रुतिसें सूर्यमण्डला- भिमानी देवकी प्रतीति होती है. वही देव पारमार्थिक रूपसें निरुपाधिक होनेपरभी जैसे मण्डलरूप उपाधिका स्वीकारकरके मण्डलाभिमानी हुवे है तैसें औरभी उपाधियोंका स्वीकारकरके तत्तदभिमानी बनें है, जैसें मध्य-अन्तरिक्षमें सचार करनेसे और सबको वासित करनेसे वह वायु कहा जाताहै इसी तरह वही देव भूमिमें अव- स्थित होकर "होता" याने इतर देवोंको निमन्त्रित करनेवाला अथवा होम करनेवाला बनता है, और यज्ञकुण्डमें "गार्हपत्य" अग्निरूपसे वही स्थित होता है, की जो अग्नि अतिथिकीतरह परमपूज्य है, गृहादिकमेंभी पाकादि निर्वर्तक अमि वही बनता है, मनुष्यों में अनुस्यूत चैतन्यरूपसें रहनेवाला परमात्मामी वही है, और वही परमात्मा जो अनुस्यून चेतनात्मक है सो सूर्यमण्डलममी (तदभिमानी वनकर) स्थित है "यह परम उत्तम स्थान निवास करने योग्य है की जिसमें यह (परमात्मा) निकट रहेकर प्रकाश कर रहा है" इस श्रुतिसें वह मण्डला- स्मकस्थान इतरस्थानोंसें उत्कृष्ट होकर वरणीय याने उपासनादिक उपायसे प्रापणीय अवश्य प्राप्त करनेयोग्य बतलाया गया है. और यह परमात्मा "मत" याने त्रिकालाबाधितपरबलस्वरूपका साक्षात्कारहोनेकपाद उपलब्ध होनेसे तद्रूपही है. अथवा यज्ञमें रहनेवाला अमिरूप है, अन्तरिक्षमें संचारकरनेवाला वायुभी यही है, और यही परमात्मा जलसें प्रकट होनेवाला . सत्यस्वरूप [१५] सूर्यमी है (सूर्यका जलसें प्रादुर्भाव और जलहीमें तिरोभाव होता है क्योंकी उदयके पहिले और अस्तके बाद सूर्य निमप्रदेश जोकी जलस्थान है, वहींपर तिरोहित हुवे ऐसा प्रतीत होता है ). और किरणरूपसे वर्तमानमी यही परमात्म देव है, सत्यरूपसे यही प्रतीत होता है, याने इन्द्रादि देवों की तरह यह देव परोक्ष न होकर सबको चेतनरूपसें अपरोक्ष होरहा है. अथवा जलमें (मेघादिकमें) बिजलीरूपसें रहनेवाला अथवा जलात्मक समुद्रमें वाडयामिरूपमी यही है. अदिमें उदयाचलमें प्रकट होनेवाला यही सूर्यमण्डलान्तर्गत तदभिमानी देव सर्वस्वरूप है. यानें वही सब बनाया उससे अतिरिक्त कुछमी नहिं है क्योंकी सर्वाधिष्ठान रूप जो परब्रह्म है वही सर्वस्वरूपसे प्रतीत होता है, तो अर्थात् सफल प्राणिके हृदयान्तर्गत अनुस्यूत चैतन्य और मण्डलामिमानी देव और परब्रह्म परमात्मा जो निरुपाधिकहै सो सोपाधिकनिरुपाधिक सब चेतन उपाधियोंका वाघ करनेसें एकही है. ॥५॥ ३५. ४ ५ ११ नाहंतन्तुंनविजानाम्योतुनयंवयन्तिसमरेतमानाः । कस्यस्वित्पुत्रइहवक्त्वानिपरोवदात्यवरेणपित्रा ॥ २ ॥ रूपकतया जगत्सप्टेदुनित्वमनया प्रतिपादयतीत्यात्मविदोमन्यन्ते, तन्तुं तन्तून् तन्तुस्थानानि सुक्ष्माणि वियदादीन्यपञ्चीकृतानिभूतानि न विजानामि, मोतुं मोतुन् पञ्चीकृतानि स्थूलानि ओतुस्थानीयान्यपिवियदादीनि न विजानामि, नच तत्काथै पटस्थानीय प्रपंचं विजानामि, यं प्रपंच समरे तंतूनामोतूनां च संगमने मतमानाः सततंचेष्टमानाः संसारिणः वयन्ति उत्पादयन्ति, तेषां भोगार्थ- मीश्वरः सृजतीति कर्तृत्वमुपचर्यते, इहास्मिन्विषये परः परस्ताहुद्धेरविषये वर्तमा- नानि वक्त्वानि वक्तव्यानि इमानि अवरेण अर्वाचीनेन सृष्टयुत्तरकालमुत्पन्नेन पित्रा स्वजनकेन अनुशिष्टः सन् कस्यखलपुत्रः वदाति वदेत् स्वोलचेः प्राचीन वृत्तान्तं अजानानः, कश्चिदपिनवदेत् इत्यर्थः ॥ २ ॥ अनुवाद-तन्तु और वस्त्रका रूपक बताकरके "जगत्दृष्टि दु य?" ऐमा इसमन्त्रसे प्रतिपादन करते हैं. तन्तुस्थानापन्न सूक्ष्म जो सपञ्चीकृत आकाशादिक महाभूत है उनको में नहि जानता, और ओतुस्थानापन्न पञ्चीकृत पञ्चमहाभूतोंकोभी में नहि जानता, [१६] सूक्ष्म और स्थूल भूतोंको (कारणको) जब में नहि जानता तय इनके कार्यरूः वस्त्रस्थानापन्न प्रपञ्चको में कैसे जानें जिस प्रपञ्चको उत्पन्न करनेकेलिये तन्तु और मोतुका (तुरीवेमादि पटकार्य के साधनकी तरह विषय बनाकर) संगम याने प्रथन करनेको निरन्तर संसारिलोक तत्पर होरहें है. प्राणिमात्रके उपभोगार्थ परमेश्वरही प्रपश्चोत्पत्ति करता है वैसा व्यपदेश किया जाताहै, बुद्धि के अवि- पयरूप इन् सूक्ष्म और स्थूल महाभूतोंको, उन् भूतों के बाद होनेवाला प्राणी अपने पितृपितामहादिकसे शिक्षणपानेपरमी कौन जान सक्ता ! और कौन कहे सक्ता ? क्योंकी कोइमी लोक अपनी उत्पतिसें प्राचीन पदार्थोके व्यापारका यथार्थरीतिसें अपरोक्षानुभवकरनेको योग्य है ही नदि, तो इस सफल प्रपंच के कारणभूत सूक्ष्म और स्थूल भूतोंको भौतिक सृष्टि के अन्तर्गत कौन प्राणी जान सक्ताहै ! इससे भूत भौतिक सृष्टिकी दुशेयता बताकर जिसमें वह भूत भौतिक सृष्टयात्मक प्रपंच ओतप्रोत है उस् परमकारणभूत परमेश्वरकी परम दुईयता अर्थात् सिद्ध होतीहै. ॥ २ ॥ ३६. ४ ५ ११ सइतन्तुंसविानात्योतुंसवक्त्वान्त्थावदाति । यईचिकेतदमृतस्यगोपाअवश्वरंपरोअन्येनपश्यन् ॥ ३ ॥ सइत् सएव तन्तुं तन्तुस्थानीयानि सूक्ष्मभूतानि विजानाति नान्यः कश्चित्, तथा ओतुं ओतुस्थानीयानिस्थूलभूतानिच सएव विजानाति, सएववक्त्वानि वक- न्यान्युपदेष्टव्यानि, इमानि ऋतुथा कालेकाले यदायदाविद्यासंप्रदायोच्छेदः तदा- तदा वदाति वदेत् , कोसौ योविजानीयात् वदेचैत्यतआह, योवैश्वानरः विश्वनरा- त्मकः परमात्मा अमृतस्य अमृतत्वस्य विमोक्षणस्य गोपाः रक्षिता अवः अवस्वात् संसारदशायाचरन् अन्तःकरणोपेतोजीवात्मभावेनसंचरन् परः परस्तादविद्याया: ऊर्ध्व वर्तमानेनान्येन उक्तविलक्षणेन निरुपाधिकेन सचिदादिलक्षणेनरूपेण पश्यन् सर्वं जगत्प्रकाशयन् ई इमानिचिकेतज्जानाति, तथाच परमात्मा प्रकृत्य श्रूयते-(कल. २-२-१५) "तमेवमान्तमनुभाति सर्वतस्यभासासर्वमिदंविभाति" ॥२॥ अनुवाद-यद्यपि पूर्वमन्त्रोक्तप्रकारसे भूतभौतिक समुदाय दुपहै तथापि उसको जाननेवाला " वैश्वानर" पदवाच्य कोई है ऐसा इस मन्त्रसे प्रतिपादन करते है. - [१७] तन्तुस्थानापन्न सूक्ष्मभूतोंको और ओतुस्थानापन्न स्थूल महाभूतोंको वहीजान सक्ता है, और जिस जिस समयमें (ब्रह्म विद्यासंप्रदायका उच्छेद होता है उसका जीर्णोद्धार करके यही लोकोंको फिरसे स्वकार्य तत्पर करता है की जो "वैश्वानर " पदवाच्य है याने जो परमात्मा विश्वनर समग्र प्रपञ्चसे भभिन्नहोकर सर्वानुस्यूत प्रत्यक्चेतनस्वरूप है, और अमृतत्वका रक्षक है, पाने अपर्ने कृपापात्रोंको जो परमेश्वर मुक्तिपद याने सात्म्यिभाव अर्पण करता है, और स्वयं संसार दशामें अन्त:करणोपहित चेतन "जीव" भावसे संचरण करता है, और अविद्यासे पर वर्तमान सच्चिदानन्दात्मक निरूपाधिक स्वरूपसे सचराचर प्रपञ्चको जो परमात्मा प्रकाशता है वही इस भूतभौतिक सृष्टिको जानता है, "उस परमेश्वरका सामान्य बोध होने के बाद दूसरे पदार्थोंका बोध होता है और उसीके नित्यप्रकाशसे सब प्रपञ्च प्रकाशित होता है" इत्यादिक कठोपनिषत्की श्रुतिभी इस अर्थसे संगत होती है. ॥ ३ ॥ ३७. ४ ५ ११ ध्रुवंज्योतिर्निहितंदृशयेकंमोजविष्ठपतयत्स्वन्तः । विश्वेदेवाःसमनस सकेताएकंक्रतुभिवियन्तिसाधु ॥५॥ पतयत्सु गच्छत्सु प्राणिप्वन्तर्मध्ये हृदये मनोजविष्ठं मनसोप्यतिथयेन वेगयुक्त ध्रुवं निश्चलं निर्विकल्प, तथाच वाजसनेयकं "अनेजदेकं मनसोजबीय" इति (ई. उ. ४)। ज्योतिः ब्रह्म चैतन्यं निहितं नकेनचित् स्थापितं “योवेदनिहित गुहायां परमेव्योमन्निति" हि श्रूयते । किमर्थ दृशये दर्शनार्य ज्ञानेनहि सर्वजानन्ति, अपिच दीव्यन्तीति देवाइन्द्रियाणि विश्वे सर्वेदेवाः सर्वाणीन्द्रियाणि चक्षुराद्याः समनसः मनसा सहवर्तमानाः सकेताः सतेजस्काः सन्तः एकमद्वितीय क्रतुं सृष्टया- दीनां कर्मणां कर्तारं विश्वनरात्मकं परमात्मानम् अभिलक्ष्य साधु सम्यक् वियन्ति विविध गच्छन्ति देवाएवा इमं अभिवियन्ति आभिमुख्येन विविधमुपयन्ति उपासत इत्यर्थः, तथाचश्रूयते "तद्देवाज्योतिषांज्योतिरायुहोपासतेमृतमिति" ॥५॥ अनुवाद-यही " वैश्वानरात्मक " ज्योति जंगम-चलनेवालेप्राणियों के हृदयों में रहेकर मनसेंमी अत्यन्त वेगवाला है, और निरुपाधिकरूपसेतो निश्चल है-निर्विकल्प है, "यह परमात्मस्वरूप एक ज्योति निश्चल है और मनसेंमी वेगवचर है" इत्यादिक श्रुतिमी "निरुपाधिक रूपसे निश्चल और सोपाधिकरूपसे [४८] वेगवचर है "इत्यादिक बतलाती है. यह परमात्मज्योति याने ब्रह्मचैतन्य हृदयरूप गुहामें निश्चलस्वरूपसे स्वयमवस्थित है, किसी, वहांपर स्थापित किया महि, श्रुतिभी कहती है " हृदयरूस गुहामें रहे हुये इस ब्रह्मचैतन्यको जो जानताहै", इत्यादि । और यह ब्रह्मचैतन्य ज्ञान के लिये हृदयावस्थित हुआ है यद्यपि सर्वत्र अवस्थित है परंतु हृदयहोंमें उपलब्धि होने में " हृदयावस्थित है " ऐसा कहा जाता है। और सब चक्षुरादिकइन्द्रियाँ मनके साथ वर्तमान होकरके भेदत्रयशून्य और प्रपञ्चके निर्माणकरनेवाले इस परमात्माके चैतन्यात्मक प्रकाशको ग्रहण करके अनेक प्रकारका व्यवहार कर रही है, अथवा देवतालोक जिप्त परमेश्वरकी अनेक प्रकारसे उपासना कर रहे हैं, श्रुतिभी कहती है "देवतालोक सूर्यचन्द्रादिक ज्योतिकामी नियामक जिस परमज्योतीरूप परमेश्वरकी उपासना कर रहे है अधिक आयुष्य और अमृत (मुक्ति) प्राप्त करने के लिये" इत्यादि ॥ ५ ॥ ३८. ४ ७ ३३ रूपंरूपप्रतिरूपोवभूवतदस्यरूपमैतिचक्षणाय । इन्द्रोमायाभिःपुरुरूपईयतेयुक्ताबस्यहरयागृतादर्श ॥१८॥ 'इदिपरमैश्वर्य इत्यस्यघातो रर्थानुगमादिन्द्रः परमात्मा सचाकाशवत् सर्वगतः सदानन्दरूपः सएवोपाधिभिरन्तःकरणैः प्रतिशरीरमवच्छिन्नः सन् जीवात्मेति व्यपदिश्यते, सएव अनादिमायाशक्तिभिः वियदादिजगदात्मना विवर्तते, शब्दादिविषयहरणशीलाः इन्द्रियवृत्तयश्चतेनैव संबद्धाः, एतत्सर्वतस्य- परमात्मनोयद्वास्तवंरूपं तस्यदर्शनायेतिअयमर्थोऽनयाप्रतिपाद्यते-रूपंरूप रूप्यत- इतिरूपं शरीरादि प्रतिशरीरंचिद्रूपः सर्वगतः परमात्मा प्रतिरूपः प्रतिबिंबरूपः सन् सर्वाणिशरीराणिबभूव प्राप्नोत् , तच्चप्राप्त प्रविषिवरूपं अस्य परमात्मनः प्रतिचक्ष- गाय प्रतिनियताकारस्य दर्शनायभवति, सचेन्द्रः परमेश्वरः मायाभिर्मायाशक्तिभिः पुरुरूपः वियदादिमिर्वहुविधतौरुपेतः सन्नीयतेचेष्टते, एतदपि अस्यपरमात्मनः प्रतिचक्षणायभवति, अस्यचदशशता सहस्रसंख्याका हरयः इन्द्रियवृत्तयः युक्ताः विषयग्रहणायोयुक्ताः सन्ति, तदपि अस्य वास्तवरूपस्य दर्शनायभवतिइति, एवं स्थूलसूक्ष्मशरियोर्वियदादिमहाप्रपंचस्यच तत्त्वज्ञानहेतुत्वमनया प्रत्यपादीति।१८। अनुवाद-परमात्मा ही आकाशकी तरह सर्वव्यापक सद्रूप आनन्दरूप होतेहुवेभी अन्तःकरणरूप उपाधि संबन्धसें प्रत्येक शरीरोसें अवच्छिन्न (युक्त) .

[५०]
"ज्यायान् पृथिव्याज्यायानन्तरिक्षात् ज्यायान् दिवोज्यायानेभ्योलोकेम्य" इति श्रुतेः"
(वृहदारण्यक) ॥५॥
अनुवाद-हे परमात्मन् ! आपके प्रतिमान-परिच्छेदके लिये सकडो
युलोक हो तौभी आपको परिच्छिन्न करसते नहि. और आपके स्वरूपके प्रति-
बिकेलिये सेंकडो भूलोक हो तोभी आपको व्याप्त करस नहि. दुराचारियों
के नाशार्थ और साधुपुरुषोंकि रक्षणार्थ इन्द्रादिस्वरूपको धारण करके वादि-
सस्त्र के धारण करनेवाले हे परमात्मन् ! आपको असंख्य सूर्यमी पाशित नहि
फरसक्ने, कठवल्लामें कहाहैकी-"उस् परमेश्वरको सूर्य चन्द्र तारा विजलि अमि
इत्यादिक प्रकाश करसक्तै नहि. " विशेष क्या कहें उत्पन्न हुवे जितने तत्त्व है
उनमेंसे कोइभी आपको प्रकाशित नहिं करसक्ता परंतु आपले प्रकाशसे वे प्रका-
शित होतहै. द्युलोक भूलोक और तदन्तर्गतदेवमनुष्यादिक कोइभी आपको
विष्य करसक्ता नहि, याने आप सर्वोत्कृष्ट होनेसे सर्वातिरिक्तहीहैं, "पृथिवीस
अन्तरिक्षसे घुलोकसें और इतर लोको भी यह आत्मतत्व परम ज्येष्ठहै, श्रेष्ठ है।
इत्यादिक वृहदारण्यक उपनिषद भी कहाहै ॥ ५॥
४०. ७ ५ २७ यत्रज्योतिरजसंयस्मिलोकेस्वहितम् ।
तस्मिन्मांधेहिपवमानामृतेलोफेक्षितइन्द्रपिन्दोपरिसव ।।
हे पवमान यत्र यस्सिन्लोके ज्योतिः सतेजः अजसं सर्वदा अविनश्वर
वर्तते। यस्मिश्चल के स्वरादित्याख्यं 'ज्योतिर्हित निहितमस्ति तस्मिन् अमृते
मरणधर्मरहिते अतएव अक्षिते अक्षीण लोके मां सोमाभिषवं कुर्वन्तं धेहि तस्मान्मा-
मुत्तमलो के प्रापयितुं त्वमिन्द्रायपरिस्रव ॥ ७ ॥
अनुवाद-हे पवमान ? जिस् लोकमें समग्रतेज सदा अविनाशिरूपसे
अवस्थितहै, और जिलोकमे आदित्यात्मक तेजभी निहितकियागयाहै, याने
जिस लोकसे सूर्यभी तेजस्विताको पाये हुवेहैं, ऐसे मरणादिवरहित अपि-
नाशी लोकमें सोमाभिषवण करते हुवे मुझो तुम् पहुंचा देओ. याने उत्तम लोक,
की जहाँसे वापसआना नहिं होता वैसें लोकमें मुझे पहुचानेको म् इन्द्रके
लक्ष्याभूत परमेश्वरकी प्रार्थना करो ॥ ७ ॥

- . ११..७ ५ २७ पत्रानन्दाश्चमोदचिमुर्दाप्रमुदआसते ।। कार्मस्थयत्राप्ताःकामास्तत्रमाममृतंकृधी कधीन्द्रायेन्दोपरिखव॥११॥ यत्र यस्मिन् लोके आनन्दादय आसते, तेषामल्पमिदोद्रष्टव्यः, यत्रलोके कामस्य काम्यमानस्य देवस्य सर्वेकामा आताः प्राप्ताभवन्ति, तत्रमाममृतं कृषि एतत् त्वयाविना नघटत इति हे सोम सं परिसव ॥ ११ ॥ अनुवाद-जिस् लोकमें आनन्दप्रमोदहदिक सततनिवास करते हैं, और जिस लोमें देयोंकमी सकल मनोरथ पूर्ण होतेहै, वहांपर मुझे अमृतस्व- रूपसे याने जन्ममरणादिविकाररहित स्वरूपसे तुम् स्थापित करो, यह कार्य तुमारे सिवाय बननेकानहिं, इसी लिये हे सोम! तुम इन्द्र के लक्षाभूत परमेश्वरको प्रात हो ।॥ ११ ॥ ४२. ७ ५ ३३ असंचमर्चपरमेव्योमन्दस्यिजन्मन्नदितेरुपस्थे । आग्निहनः प्रथमजाऋतस्यपूर्वआयुनिपभश्चयेनुः ॥७॥ असदव्याकृतं सञ्चव्याकृतं " असदेवेदमग्रआसीत् " (छां ६-२-१) वत्सदासीत् तत्समभवत् " इतिश्रुतेः । सदसदात्मकं जगत्सर्व परमेउत्तमेज्ञानसहिते व्योमन् व्योमनि कारणात्मनि जातमभृत्तदा अदितेः पृथिव्याउपस्थे उपस्थाने समी दक्षस्य प्रज्ञापतेः यद्वा दक्षस्य " सत्रेधात्मानं विभजतादित्यंतृतीयवायु तृतीयमि" तिधुनेः । तृतीयस्य द्युलोकस्याधिष्ठातृत्वादादित्यस्य जन्मन् जन्मनि तत्तएवं सति मनुष्यस्य सृष्टिक्रमात् पूर्व अग्निर्ह अभिरेव ऋतस्य कर्मफलस्य भोक्तृणां नोस्माकं प्रथमजाः प्रथमजातः समुत्पन्नः " तेजोरसोनिरवर्तनाग्निरि" तिश्रवणान्। पाचन- करणे ततोमनुष्या अजायन्तेति प्रथमतएव मनुष्यसृष्टेभिहितत्वात अनन्तरं पूर्व उचर सृष्टिमपेक्ष्य पूर्वस्वं, आयुनि काले अयमग्निरेव वृषभश्वासीत् धेनुश्चाभवत् सीपुसवत् सीपुंसात्मकोभवदित्ययः ॥ ७॥ अनुवाद-" सदेवसौम्येदम् " " असदेव" इत्यादिक श्रुतिसिद्ध, अध्याक्त और व्याकृत याने अनिर्वचनीय समग्रप्रपंच ज्ञानात्मक कारणरूप जिस परमेश्वर प्रादुत हुवा उस समय पृथ्वी के समीप झुलोकके अविष्ठाता सूर्य आविर्भूतहो, और इसके बाद मनुष्यष्टिके पहिले कर्मफलों को भोगने. वाले हम लोंकोसें प्रथम अनिदेवप्रादुर्भावको प्राप्तहुवे, " तेजोरसात्मक अग्निदेव .. , , [५] ११.७५ २७ यत्रीनन्दाश्चमोदायमुर्दममुदभासते। कास्पयप्राप्ताःकामास्तत्रमाममृतंकवीन्द्रायेदोपरित्रव॥११॥ यत्र यस्मिन् लोके आनन्दादय आसते, तेषामल्योभेदोदपव्यः, यत्रलोके कामस्य काम्यमानस्य देवस्य सर्वेकामा आप्ताः प्राप्ताभवन्ति, तत्रमाममृतं कृषि एतत्तु त्वयाविना नघटत इति हे सोम परिस्रव ॥ ११ ॥ अनुवाद-जिस लोकमें आनन्दप्रमोदहर्षादिक सततनिवास परतें है, और जिस लोकमें देवों केभी सफल मनोरथ पूर्ण होतेहै, वहापर मुझे अमृतस्व- रूपसे याने जन्ममरणादिविकाररहित स्वरूपसे तुम् स्थापित करो, यह कार्य तुमारे सिपाय बननेकानहिं, इसी लिये हे सोम? तुम इन्द्र लाभूत परमेश्वरको प्रात हो ॥ ११ ॥ ४२. ७ ५ ३३ असच्चसर्चपरमेव्योमन्दस्यिजन्मन्नर्दितेरुपस्थे । अग्निहनः प्रथमजातस्यपूर्वआयुनिवृषभश्चयेनुः ॥७॥ असदव्याकृतं सच्चव्याकृतं "असदेवेदमग्रआसीत् " (छा ६-२-१) तत्सदासीत् तत्समभवत् " इतिश्रुते. । सदसदात्मकं जगत्सर्व परमेउत्तमेज्ञानसहिते व्योमन् व्योमनि कारणात्मनि जातममृत्तदा अदितेः पृथिव्याउपम्थे उपस्थाने समीर दक्षस्य प्रजापतेः यद्वा दक्षस्य " सत्रेधात्मानं विमजतादित्यतृतीयवायु तृतीयमि" तिश्रुतेः । तृतीयस्य धुलोकस्याधिष्ठातृत्वादादित्यस्य जन्मन् जन्मनि ततएव सति मनुप्यस्य दृष्टिक्रमात् पूर्व अग्निर्ह अमिरेव ऋतस्य कर्मफलस्य भोक्तृणा नोस्माकं प्रथमजाः प्रथमजातः समुत्पन्नः "तेजोरसोनिरवत समिरि" तिश्ररणात् । पद्यातत्य- करणे ततोमनुप्या अजायन्तेति प्रथमतएव मनुष्यस्टेरभिहितत्वात् अनन्तरं पूरे उत्तरष्टिमपेक्ष्य पूर्यत्वं, आयुनि काले अयममिरेव वृषभश्चासीत् धेनुश्चाभवत् सीपुंसवत् स्त्रीसात्मकोभवदित्यर्थः ।।७।। " असदेव" इत्यादिक श्रुतिसिद्ध अव्याकृत और व्याकृत याने अनिर्वचनीय समप्रप्रपंच ज्ञानात्मक कारणरूप जिस परमेश्वर, प्रादुत हुया उस समय पृथ्वी के समीप युरोकके अविष्ठाता सूर्य आविर्भूतहो, और इसके बाद मनुष्यवृष्टके पहिले कर्मफलों को भगने घाले हम लोकोसे प्रथम अमिदेवमादुर्भावको मातहुवे, "तेजोरसात्मक गमिव अनुवाद-" सदेवसौम्येदम् ॥

(५२] प्रकट हुवे " ऐसा श्रुतिमी कहती है. उसकेबाद उसीक्रममें मनुष्यलोक उत्तनं: हुवे, उस् मनुष्यसष्टिके प्रथम प्रादुर्गावपायेहुवे अमिदेवलक्ष्यार्थ परमेश्वर वृषम धेनु स्त्रीपुरुष इत्यादिक सर्व स्वरूप हुवे ॥ ७ ॥ ५३. ७ ७ १६ संयद्वर्ययवसादोजनानामहंयवादउर्वने अन्तः । अायुक्तोवसातारंभिच्छादयोअर्युक्तंयुनजद्वन्वान् ॥ ९ ॥ अनया ऋपिरिन्दप्रसादलव्यं स्वस्य सात्म्यिं प्रकाशयति जनानांजे- कानांमध्ये ये यवसादः तृणस्याचारः पशवः ते वयमिति सं सम्यक जानीहि, ये च यवादः यवोपलक्षितस्थानस्याचारो मनुष्यास्तेपिवयमिति संजानीहि । वस्तुतस्तु उर्वजेविस्तीर्ण अजिरेंगणे हार्दाकाशरूपे यत् अंतः अंतर्यामिरूपं ब्रह्म तदहमस्मि. अत्रास्मिन हार्दाकाशे युक्तः समाहितोभवानिन्द्रः अवसातारं आत्मनः संमक्तारं इच्छात् इच्छति आत्मसाक्षात्कर्तुं । अथो अपिच अयुक्त अयोगिनं ववन्यान् . वयन्या अतिशयेन विषयान् सेवमान पुरुष युनजत् युनक्ति संसारे शापानुग्रह- समर्थो भवद्रूपोहमेवास्मीति भावः ॥ ९ ॥ अनुवाद-इस मन्त्रसें परमेश्वरको कृपाद्वारा होनेवाला अपना सारी- म्यभाव प्रतिपादित करतें है-लोकोंकीमध्यमें जो घांस खानेवाले - पशुलोक है, वे हमही है, याने उन्का हमारा वास्तविक भेद नहिं है. ऐसा, जानो. और जो लोक यवादिक अन्न खाते हैं ये मनुष्यभी हमही है, याने प्रत्येक मिन भिन्न देहादिरूप उपाधिद्वारा भेदप्रतीतिहोनेपरभी निरुपाधिक तात्विक स्वरूप को एकही है ऐसा जानो. वास्तविक रीतिसें इस हृदयाकाशमें अन्तर्यामिरूप परब्रह्म (भागत्याग लक्षणासें ) ही हु. । इस हृदयाकाशमें अवस्थित जीवात्मा अपर्ने नियामक बिम्बस्थानापन्न परमेश्वरका साक्षात्कारको चाहता है. और अत्यन्त विषयलंपट अयोगि याने अजितेन्द्रिय पुरुषोंको दंड देनेवाला याने संसार, निग्रहानुग्रह करने में समर्थ प्रत्यक्चेतनात्मक परमेश्वर मेंही हुं ॥ ९॥ ४४. ७ ७ १६ अत्रेदमंससेसत्यमुक्तद्विपाञ्चयचतुष्पासंसृजानि । स्त्रीभियोअषणंपृतन्यादयुद्धोअस्यविभजानिवेद॥१०॥ में मम अत्रास्मिन्स्तोत्रेउक्तं मयाकथितं सत्यमित् यथाभूतमेव मंससे त्वं जानीहि अर्थवादरूपेण तदध्यारोपितमित्यर्थः। किञ्च द्विपाच मनुष्यादिर .

[५३]
चतुष्पाच पधादिकंच यत्स्थायरजंगमात्मकं जगत्संसृजानि बहमुत्सादया मोति
अत्रास्मिञ्जगति स्त्रीभीः स्त्रीसहशैर्यलादिहानैः पुरुषैः सह यः शूरंमन्योजनः पर्ण
अभिलषितस्य बर्षितारं मां परित्यज्यविशेषः । पृतन्या युद्धं कर्तुमिच्छीि, अहं
अस्येदृशस्य स्वभूतं वेदोधनं अयुद्धः तेन पुरुपेणायोद्धा सन् बलादपहत्य विभजा-
नि स्तोतृभ्यो यष्टुभ्यश्च ददामीत्यर्थः ॥ १० ॥ १६ ॥
अनुवाद-इसके पूर्वमन्त्रमें कहा हुवा, नृत्तान्त यथार्थवादात्मक है,
सर्थवादरूपसे अध्यारोपित नहि है, में (परमात्मा) मनुष्यादिक और पश्चादिक
स्थावरजंगमात्मक सकल विश्वको उत्पन्न करता हुं, इस जगत्में स्वीयोंके तुल्य
चलपराक्रमादिरहित पुरुषों के साथ अपनेंको शूरमाननेवाला याने शुरत्वाभिमानी
(पुरुष) सकल कामको पूर्ण करनेवाले मुझको छोडकरके युद्ध करनेको चाहता
है, याने स्वयं निर्वलहोनेपरमी बलपद परमेश्वरका अनुसन्धान न करके
((वागादि) युद्ध करनेको जो चाहता है उसका सर्वस्व बलात्कारसें लेकरके स्तुति
करनेवाले और ईश्वरयजन करनेवाले अधिकारियोंको में अर्पण करदेताहुं ॥१०॥
२५. ७ ७ १७ यस्यांनादुहिताजात्वासकस्ताँविद्वाअभिमन्याते अन्धान।
कतरोमेनिपतितंमुंचातेय वहातेयईवावरेयात् ॥११॥
,
यस्येन्द्रस्य मम कारणरूपेणावस्थितस्य अनक्षा अभिनिता दर्शनहीना
अचेतनेत्यर्थः दुहिता प्रकृत्याख्या जातु कदाचित् आस-महाप्रलये मय्येव लीना
सती सर्वत्र वर्तते । तो प्रकृति विद्वान् मम्येवलीनां जानन मचोन्यौदेवको भवति
नसोपीत्यर्थः । अपिच अंधां दर्शनहींनामचेतनां तां अभिमन्याते आत्मन्याश्रय.
प्रदानेन कोदेवोमिपूजयति, यद्वा क्षीरोदकवत् घटाकाशवञ्च मया सहकीभूतां तां
आभिमुख्येन कोजानाति अहमेव सर्वज्ञः स्वामन्याश्रयप्रदानेनाभिपूजयामि
मया सहकीभूतां तां तत्त्वताहमेव जानामि नान्यइति किम्य कतरोदेवः मेनि वजी
प्रसिद्ध वृत्रादिश प्रतिमुचाते मुंचति, स्वयमेव प्रश्नमुत्थाप्येदानी पति मूने-योवेव-
इमेनं शत्रु वहाते वहति अपिवा यईमेनं वरेयात् धारयितुमिच्छति सचाइमेय
चान्योमराशास्त्रीत्यर्थः ॥ १९॥

.
इस् नियम
[५]
: अनुवाद-
-कारणरूपसे सर्वत्र अवस्थित परमात्मस्वरूप जो मे हुं उसको.
मेरो) दुहिता यशवतिनी अचेतन प्रकृति है सो महालय में मेरे स्वरूपहीमें
जान होती है, उस प्रकृतिको “मेरी भीतर लीन होतीहै। ऐसा जाननेवाला
मुझसें अन्य दुसरा कोइ है नहि. याने प्रकृतिको अपने स्वरूप, अन्तर्गत सम-
शनेवाला आत्मज्ञ कहाजाता है, और " ब्रह्मवेद ब्रसवभवति"
वह आत्मज्ञ परब्रह्मरूपसें अवस्थित होताहै । और अचेतन उस प्रकृति को निज
स्वरूपमें आश्रयं दे र यौन देव सत्कार करसकाहै ? अथवा नीर और क्षीर-
की तरह और घट आकाशकी तरह किंवा घटाकाशमहाफाशकी तरह मेरे'
स्वरूपसे एकीभावको पाइ हुइ इस् प्रकृतिको ( उससे संबन्ध होनेपरमी निलेर-
रूपसे) कोन जान पक्ताहै ? याने में ही सर्वज्ञ जो परमेश्वर हुँ सो निज स्वरूप
में आश्रय देकर उसको तात्त्विकरूपसे जानताएं, दूसरा (अज) जान सक्तानहि.
और मुझसे अतिरिक्त कौन देव वृत्रादिक शत्रु ( कामादिक ) को नाश करनेके
लिये (विवेकरूप) वज्र को लेकर उपयोग करसक्ताई? स्वयंही प्रश्न' करके उत्तर'
देते हैं की-- जो देव इन (कामादिक) शत्रुको वहन करताहै
अथवा निवारण करताहै सो मेंही हुँ. मेरे सिवाय दुसरेकी वैसी शक्तिः ।
नहि. ॥ ११ ॥
४६. ७ ७ १७ कियंतीयोपामर्यतोवधूयोस्परिमीतापन्यसावार्येण ।
भद्रावधूभवतियत्सुपेशा स्वयंसामित्रवनुतेजनेचित् ॥१२॥
कियती किंपरिमाणा योषा स्त्रीजातिः मर्यतो मनुष्यसंबंधिनो भोगानाच-
रतः वधूयोः स्त्रीकामस्य सर्वात्मकस्यान्तर्यामिरूपेणावस्थितस्येन्द्रस्य परिणीतर,
अनुरक्ता वशवर्तिनीत्यर्थः। कीदृशस्य वार्येण वरणीयेन पन्यसा स्तोत्रेण स्तुतस्य
सतइतिशेषः । अपिच यत् या वधूः मद्रा कल्याणी सुपेशाः शोभनरूपा च भवति
सा द्रौपदीदमयन्त्यादिका वधुः स्वयमात्मनै जने चित् जनमध्धेऽवस्थितमरि मित्रं
प्रियमर्जुननलादिकं पति वनुते याचते स्वयंवरण प्रार्थयते, सच प्रीयमाणो वरज-
चोहमेवेत्यभिप्रायः ॥ रूरूपंप्रतिरूपो बभूवेति (ऋ. सं. ४-७३३) मन्त्र-
लिगात्सर्यात्मकत्वादिति ॥१२॥

[५५] अनुवाद-मनुष्यसम्बन्धि भोगोंका निष्पक्षपातसे उपभोग करनेवाले और वरणीयपरमयोग्य स्तोत्रसें स्तुत्य याने स्टुति किये जाते सर्वात्मक और अन्तर्वामि स्वरूपसे सर्वत्र अवस्थित इस परमेश्वरको स्त्रीविषयक अमिलाप जर हुवा तब उनको वशवर्तिनी याने उनके अधीन रहनेपाली और उनके उपर परम अनुरक्त होती हुइ कितनी स्त्रीयाँ उपलब्ध होतीहै ? जो स्त्री परमकल्याणवाली होकर सौन्दर्यवाली हो, जैसे द्रौपदी दमयन्ती सीता इत्यादिक स्वयंखुद जनस- मूहमें बैठे हुवे अर्जुन नल श्रीरामचन्द्र इत्यादिक को प्रियपति बनाने को स्वयंवर धर्मसे प्रार्थना कररही है, याने उन् पुरुपोंमें वैसा शोभनांश जो है सो मेंही हुँ. श्री कृष्ण भी कहते हैं की " यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूजितमेववा, ततदेवावग-- च्छत्वममतेजोऽशसंभवम् " लोकमें जितने पदार्थ सफलप्रकारसे उत्कृष्टतरहै के मेरे दिव्यतेजके अंशवालेहै ऐसा तुम जानो. तो द्रौपद्यादिकको वरणीय और प्रेमपात्र जो अंश देहेन्द्रियादिसघातमे प्रतीत हुवा वह अंश में ही हुँ, यह इस मन्त्रका भावहै. (ऋ. सं. ४.७.३३) श्रुतिनेभी कहाहै की " प्रत्येक पदार्थो में अनुस्यूत बनके यह (परमात्मा) रहाहै याने सर्वात्मक सवस्वरूप है॥१२॥ "१७, ७ ७ १९ सातेजीवातुरुततस्यविद्धिमास्मैतागपंगृह समर्ये । आविस्वकृणुतेगूहतेयुसंसपादुरस्यनिर्णिजोनमुच्यते ॥२१, अत्रान्तरात्मनेन्द्रः स्तूयते-हे अन्तरात्मन् तेतब सा तादृशी आदित्या- बमका देवता जीवातुः जीविका जीवनहेतुः, उतापिच तस्यादित्यस्य च एताहक् ईदृशं स्वरूपं समर्थे, संग्रामवाची समर्यशब्दोअत्र यज्ञवाची, यज्ञे विद्धि जानीहि, स्तुत्यत्वेनैतिशेषः । मास्मापगूहः माखल्यपवृणोः । किञ्च निर्णिजः सर्वस्य शोध- यितुरस्यादित्यस्य सपादुः तच्च पादनं गमनं रश्मिद्वारण गत्वा स्वः सर्व त्रैलोक्यं आविष्कृणुते प्रकाशीकरोति । वुसमुदकं गूदते संवृणोति आदते इत्यर्थः। अस्नै प्रयोजनदयायादित्येन निदनात् अमेणवा गमनं न मुच्यते नकदाचिसरित्यज्यद इत्यर्थः ॥ २४ ॥ अनुवाद-इस् मन्त्रमें अन्तरात्मस्वरूपसे इन्द्रकी स्तुति करतेहै- अन्तरात्मन् ? आदित्यस्वरूप देवता सो तुमारे जीवनमें हेतुभूत है. सूर्यके उस स्वरूपको यज्ञमें तुम स्तुति करने योग्य समझो, उस सूर्यका अपवारण अन्तर्धान

[५६].
मत करो, जो सूर्य रश्मिद्वारा त्रिलोकीमें गमन करके सकल. पदायाँको प्रका-
शित करतेहै, और अपने किरणोद्वारा जलको ग्रहण करते हैं, सूर्य इन्दोनो
प्रयोजनके लिये याने प्रकाश और जलग्रहण करने के लिये परिश्रमपूर्वक गमन.
भारतें हैं, किसी समयभी अपनी सतत गतिको छोडत नहिं ।। २४ ॥
१८, ८ १ २० ययम वैवस्वतं मनोजगाम दकम् ।
तत्तु आवर्तयामसीहक्षयाय जीवसे ॥१॥
यत्तेयमामति द्वादश पोडश सूक्त आनुष्टुभ बच्चादयऋषयः सुबन्धु-
देहानिर्गतस्येन्द्रियवर्गसहितस्य मनसः पुनखस्मिन्प्रवेशनार्थमिदं सूक्तं दृष्टा
संपन् इत्यादि.
पुरुषस्य नियमाणस्य मनोनाम महद्भूतं बहुधा विशिणमवति, तस्यपुनः
सेमरणमंत्रोच्यते-हे प्रियमाण पुरुष तेतवमनोवैवस्वत विवस्वतः पुत्रं यम दूरक
अत्यन्त दूरं अथाभवति तथा जगाम; ते तव तन्मन आवर्तयामसि आवर्तयाम:
किमर्थ इह क्षयांय इह लोके निवासाय जीवसे चिरकालजीवनायं ॥१॥
अनुवाद.-बन्ध्वादिक तीन भाइ थे उनमेसें सुबन्धुनामक भ्राता के स्थूल,
शरीरमेंसे इन्द्रिसमुदायसहित मन उपलक्षित लिंगशरीर निकलकरके परलोकमे जब.
चला गया तब दूसरे भाइओने आत्माको अविनाशी और विमु. समझके उसी मृत
शरीरमे वापस बुलाया है सो कथा अग्रिम मन्त्रोसें कहते हैं-हे नियमाण मरनेवाले
पुरुषः तुमारा मन सूर्यके,पुत्र यमराजके पास अत्यन्तदूर पहुंचा हो तो उस
मनको इस् लोकमे चिरकाल पर्यन्त निवास करनेको याने जीवन भोगनेको (हम)
जुलाते है. ॥ १ ॥
४९.८ १.२० यत्ते दिवं यत्पृथिवींमनोजगान दूरकम् ।
तत्त आवर्तयामसीहायाय जीवसे ॥२॥
हे जुबन्धो यन्मनोंदिवंजगाम, यच पृथिवी दूरक, दूरकमिति किया-
विशेषणं, तदिह निवासाय जीवनाय चावर्तयामः ॥२॥
...अनुवाद. हे मुबन्धो? अगर तुमारा मन स्वर्गमें अथवा पृथयों में दूर गया,
होतोभी इसी जगापर निवासके लिये और चिरकाल जीवन धारण करनेको हम;
मुलाते हैं ॥२॥

. [५७] ५०. ८ १ २० यत्तेभूमिचतुष्टिं मनोजगामदूरकम् । तत्वावर्तयामसीहक्षयायजीवसे ॥ ३ ॥ हे सुवन्धो यन्मनोभूमि चतुभृष्टिं चतुर्दिषु भ्रंशो यस्याः सा ता जगाम तदावर्तयामः ॥ ३ ॥ अनुवाद-हे सुबन्धोः अगर तुमारा मन सकल दिशापर्यन्त पृथ्वीमें गया हो वोमी उसको वापस बुलाते है. ॥ ३ ॥ ५१. ८ १ २० यत्तेचतस्रापदिशोमनोजगामंदूरकम् । तत्तआवतेयामसीहक्षयोपजीवसे ॥ ४ ॥ हे सुबन्धो, यत्तेमनःप्रदिशःप्रकृष्टामहादिशः चतसोजगाम, सदावर्तयामः॥ अनुवाद-हे सुबन्धो ? अगर तुमारा मन पूर्वपश्चिमादिक महादिशा- ओंमें गयाहो तो उसको हम यहा वापस जीवनार्थ बुलातेहैं ॥ ४ ॥ ५२. ८ १ २० यसमुद्रमर्णवमनोजगामंदरकम् । तत्तआवर्तयामसीहक्षयायजीवसे ॥ ५ ॥ हे सुबन्धो, यत्तेमनः अर्णवंउदकं तद्वन्तं समुद्र मेघ वा जगाम तदिति गता५] अनुवाद-हे सुबन्धो ? अगर तुमारा मन जलवाले पदार्थ समुद्र अथवा मेध मंडल में गया होतो उसको हम इस जगे निवासार्थ वापस बुलाते हैं ॥ ५॥ ५३. ८ १ २० यत्तेमरीची प्रवतो मनोजगा दूरकम् । ततआवर्तयामसीहक्षायजीवसे ॥ ६ ॥ हे सुबन्धो यत्तेमन प्रवत प्रगच्छन्तीमरीचीदीतीर्जगाम तदितिगत ॥६॥ अनुवाद-हे सुबन्धो ? अगर तुमारा मन सर्वत्र व्याप्त होनेवाली कान्तिमें गयाहो तो तुमको इस जगे वापस हम वुलगते है. ॥ ६ ॥ ८ [५८] ५४. ८ १ २१ यतेअपोयदोपधीर्मनोजगार्म दूरकम् । सतआवर्तयामसीहक्षायजीवसे ॥ ७ ॥ अनुवाद-हे सुबन्यो ? अगर तुमारा मन जलमें या ओपधि दुर गया हो तो उस मनको हम यहां निवासकेलिये वापस बुलाते हैं.॥७॥ ५५. ८ १ २१ यत्तेसूर्ययदुपसंमनोजगामदूरकम् । तत्तआवर्तयामसीहक्षायजीवसे ॥८॥ अनुवाद-हे सुबन्यो ? अगर तुमारा मन सूर्यमें अथवा प्रातःकालादि समयमें दूर गया हो तो हम उसको वापस बुलाते है. ॥ ८॥ ५६.८ १ २१. यत्तेपर्वतान्हतोमनोजगामकम् । तत्तआवर्तयामसीहक्षयोयजीवसे ॥ ९ ॥ अनुवाद-हे सुबन्धो ? अगर तुमारा मन बड़े बड़े पर्वत हिमालया- दिकमें दूर गया हो तो उसको हम वापस बुलाते हैं. ९॥ ५७. ८ १ २१ यविश्वमिदंजगन्मनोजगारकम् । तआवर्तयामसीहक्षयायनीवसे ॥ १० ॥ अनुवाद-हे सुबन्धो ? अगर तुमारा मन इस् समग्र जगतमें कहींभी गया हो तो उसको हम बुलाते हैं.॥ १० ॥ ५८.८ १ २१ योपराम्परावतोमाजगामदूरकम् । ततआवर्तयामसीहसोयजीवसे ॥ ११ ॥ है सुबन्धो यते मनः पराः परावतः अत्यन्त दूरदेशान् जगाम तदिति . गतं ॥११॥ अनुवाद-हे सुबन्धो ? अगर तुमारा मन अत्यन्त दुर देशमें गया हो तो उसको हम वापस बुलाते हैं. ॥ ११ [५९] ५९. ८ १ २१ यत्तेभूतंचभव्यचमनोजगामंदूरकम् । तनावतयामसीहक्षयायजीवसे ॥ १२ ॥ हे सुवन्धो यत्ते मनोभूतंचभव्यं चेत्यनेन भूतभव्यात्मकन्यतिरेकेण कस्य. चिदभावातमानस्य पृथगेवाभिधानात् कृत्स्नमपंचमुक्तं भवति, तत्र सर्वत्र गतं मनो जीवनाय निवासायचावर्तयामः ॥ १२ ॥ अनुवाद-हे सुबन्धो ? अगर तुमारा मन भूत भविष्यत् और वर्तमान कालमें अवस्थित प्रपञ्चके किसी पदार्थ, गयाहो तो उसको हम जीवनार्थ इस् लोकमें निवास करनेको वापस बुलाते है. ॥ १२ ॥ ६०. ८ २ २४ सर्वेनन्दन्तियशसागतेनसमासाहेनसरव्यासखायः किलिपस्पृत्पिनुपाणिोपामरहितोभवतिवाजिनाय ॥१०॥ अध्यात्मरीत्या रावणमाप्यं-यशसापरमात्मना आगतेन प्राप्तेन सर्वे- नावाः नन्दति, परमानन्दं प्राप्नुवन्ति. यथा नृपशुपक्षिप्रभृतयः सनीवाः सुषुप्ति- समये परमभुखिनो भवन्ति तद्वदात्मप्राप्तावित्यर्थः। किंभूतेन यशसा सभासाहेन समांस्तेजारूपानर्थप्रकाशकान् चक्षुरादीसहते आक्रमतसतथा । पुनः कथंभूतेन सख्याउपकारकेणापि विषयभोगनिमित्तत्वेनेत्यर्थ । किंभूनाः जीवाः सखायः समान- ज्ञानाः सदृशसुखानुभवाः अथैषां जीवानां मध्ये यः पितुपणिः पितुरित्यन्ननाम पितुः सुनोति सपितुषणिः केवलमुदरंभरः सकिल्बिषस्पृक् दुःखभागी भवति । हि यस्मात् कारणात् अरमत्यर्थं वाजिनाय इन्द्रियवीर्याय हितः तत्परोभवति. अयैतदुक्तं भवति सुखशब्दव्यपदेश्य भात्मसुखमेव मुखं, इन्द्रिय सुखंतु दुःखपक्षान्तर्भूतमि- त्यर्थः ॥ १०॥ अनुवाद-दस मन्त्रका अध्यात्मविषयक रावणभाष्य-" न तस्य प्रति- मास्ति यस्य नाम महद्यशः उस् परमेश्वरका परिमाण-परिच्छेद है नहिं के जिसका नाम "ऐसा है, दस वेद वाक्य के अनुसार "यशम् शब्दका अर्थ परमेश्वर होताहै. जैसें मनुष्य पशु पक्षी इत्यादिक प्राणी सुपुति अवस्थामें परम सुखी होते हैं तैसें ही इम् ॥ शब्दवाच्य परमेश्वर महत्" यशः यशः [६०] वादात्यअभेदपाकरके निरतिशय आनन्दको अनुभवते हैं, की जो परमात्मा (“ गृहीता वागू गृहीतं चक्षुः" (बृ. २-१-१७) उस सुपुष्टि के समयमें वागादिक इन्द्रियों अपने कारणमें लीन होनेमें उस समय आत्मा स्वयं एकही अवशिष्ट रहता है इत्यादिक श्रुतिसें ) तेजो रूप और अर्थ पदार्थको प्रकाश फरनेवाले चक्षुरादिक करणोंका आक्रमण करनेवाला याने नियन्ता है. और स्वयं अपनी चैतन्य शक्तिकी सहायता देकरके तत्तदिन्द्रियद्वारा नीवात्माके विषय भोगमें उपकारक बनता है. और वहजीवभी उत् परमेश्वरके समान ज्ञानवाले याने तुल्यसुखानुभव वाले है. इन् जीवोंकी मध्यमे कोइ जीव अगर उदरंभर याने सिर्फ अपने पेटमरनेहीमें सावध हो तो वह दुःखभागी बनता है. क्योंकी उदरपोषणहीमें तत्पर जो जीवहै सो इन्द्रियोंको प्रबल बनाने में मुस्तेइद है, और इन्द्रियवर्ग प्रबल होनेसे विषय लंपट होकर अधः पातको पाताहै. याने निरतिशय निर्विशेष अखडित जो आत्मसुख है वही सत्य सुख है और इतर वैषयिक इन्द्रिय व्यापार जन्य जो सुखहै सो सुखाभास होकरके दुःखरूपहीहै ॥१०॥ ११. ८ ३ १ ॐग्देवानांनुवयंशानामाचामविपन्यया । उक्थेपुंशस्यमानेषुय पश्यादुत्तरेयुगे ॥॥ १ ॥ अदितिर्दाक्षायण्यनेन सूक्तेन स्वयं यथादित्यानजनयत् तद्रवीति, वृह- पतिऋषिपक्षे सऋषिः अदितेः सकाशात् आदित्योत्पत्तिप्रकारमाह, वयंदेवाना मादित्याना जाना जन्मानि प्रवोचाम प्रकथयाम, विपन्यया विस्पष्टया वाचा, वय- मिति बोचामेति चोभयत्र पूजार्थ बहुवचन । अथैकवदाह योदेवानांगण. पूर्व- युगे उत्पन्नोपि उक्थेषु शस्यमानेषु यागे शस्त्रेप्वनुष्ठीयमानेषु उत्तरे युगे वर्तमान स्तुवन्तं स्तोतारं पश्यात् पश्यति अनेकेष्वपि युगेषु गतेषु कर्मसु स्तूयमानो- वर्तत इत्यर्थः ॥ १॥ अनुवाद-दाक्षायणी अदितिने जैसें आदित्य-देवोंको प्रकट किये सो इन् मन्त्रोसे कहतीहै. बृहस्पति ऋषिके पक्षमें वह मपि अदितिसे आदित्य. प्रादुर्भावका प्रकार कहते हैं. हम देवोंका जन्म स्पष्टवाणीसे कहते है की-जो देवसमुदाय पूर्व युगमें आविर्भूत होनेपरभी यज्ञयागादिकमें शस्त्रानुष्ठान प्रवृत होता है तब उत्तर युगमें वर्तमान अपनी स्तुति करनेवाले को देखता है, याने अनेक युग व्यतीत होजानेपरभी कर्मक प्रसंगमें जो देवगण स्तूयमान होता है उस् देव गणका प्रादुर्भाव हम कहतेहैं. ॥ १॥ ६२ ० ३ १ ब्रह्मणस्पतिरेतासंफर्मारइवायपद । देवानांपूर्यपुगतासदजायत ॥ २ ॥ ब्रह्मणोन्नस्य पतिरदितिः एताएतानि देवाना जन्मानि कर्मार इव सयथा भस्रया अमिमुपधमति प्रज्वलनार्थम् एव समधमत् उदपादयदित्यर्थः। देवाना पूर्फे युगे आदिसृष्टावित्यर्थः तेषामुपादानकारणादमतो नामरूपजिसवेना- सत्समानाद्ब्रह्मणः सकाशात् सत् नामरूपविशिष्ट देवादिकमजायत प्रादुरभूत् । " असद्वाइदमन आसीचतोवैसदजायते" तिहिश्रुतिः (चिरीय २-७)-न सदा- स्मकस्य प्रपंचस्यासत् कारणवं युक्तमितिवाच्यं, छदोगैः "कथमसतः सजायेत" इत्यसकारणत्वमाक्षिप्य "सदेवसोम्येदमग्रासीदित्यवधारितत्वात् "(छा. ६. २-२, ६-२-१) तर्हि असत्कारणमतिपादकवाक्याना कागतिरिति चेत् तेपाम- व्याकृतत्वाभिप्रायत्वात् " तद्धयेदंतीव्याकृतमासीदि " त्यादिश्रुतेः। (बृ. उ. १-४-७) यद्येवं तदितः सकाशात्कथं देवाद्युत्पतिः ? वायोरमिरित्यादिवत् अधिष्ठानसकाशादुत्पतेः. यद्वादेवाना कारणभूतं सदसतोब्रापः सकाशादुत्पन मिति योजनादुक्तन्यायोस्मिन्पक्षेपिसमानएवं ॥२॥ अनुवाद-लोहकार जैसे भस्खा धमनीद्वारा अमिको घमन करके (अपने कारणमें विशेष रूपसें ) अभिव्यक्त करताहै तैसेही अन्नपालन करने- चाली अदितिनेभी आदिसृष्टिमें देवोंका प्रादुर्भाव किया । व्यवहारका अविषय होनेसे असद्रूप उपादान कारण जो ब्रह्महै उसमें सत् याने व्यवहारके विषयमूत नामरूपविशिष्ट देवादिकसमुदाय प्रादुर्भावको प्राप्त हुवा. श्रुतिभी कहती हैकी " सृष्टि के प्रथम भागमें यहसम असद्रूपहीथा" उससे " सत् " का मादुर्भाव हुवा है। छान्दोग्यमें कहा हैकी " असत् पदार्थसें सत्पदार्थका प्रादुर्भाव कैसे होसका " ऐसा कहकरके असत् पदार्थका कारणभाव बाधित करके " सदेवसौम्येदमन आसीत् " हे सौम्य : यह प्रथम सद्रूपहीथा, ऐसा सद्रूप पदार्थको कारण बतानेसे व्यवहारसमयमें सरस्वरूपसे प्रतीयमान यह प्रपथ असत्कारणक नहि हैं, याने असद कोइ कारणसे यह जगत् प्रादुर्भावको पाया [६२] ? हुवा नहिं । अगर ऐसा कहा जायकी पूर्वोक्त मन्त्र असद्वा इदमन इसकी क्या गति होगी ? याने एक वाक्यों " असत् " को कारण बतलाया है और " सदेवसाम्येदमन" वाक्यमें सत्" को कारण कहाहै तो यह वेद वाक्यका परस्पर विरोध कैसे उद्धृत होगा ? तो समाधान यहहैकी इस वाक्यमें " असत् " पद अव्याकृतका वाचकहै. श्रुतिमी कहती हैकी "तद्धयेदं तहव्याकृतमासीत् सृष्टि के प्रथम समयमें साल विध अव्याकृत रूपहीथा याने यह समस्त प्रपञ्च सत् कारण होनेपरभी नामरूप अन्याकृत रूपही में था ऐसा कहनेसें ॥ असत् " और " सत् " को कारणतामें जो विरोध बतायाथा सो अकिचित्करहै यानें सो विरोध है ही नहि.। अगर ऐसा कहा जायकी जब सद्धेतुफ प्रपंच है तब अदितिसें सकल देवगणका प्रादुर्भाव कैसे हुवा ? तो समाधान ऐसा हैकी जैसे सकल प्रपंचका परम कारण परमात्मा है तथापि "आकाशसे वायु और वायुसे तेज और तेजसें जल इत्यादिक सष्टि बताइहै तैसे परम कारण सत् " है तथापि गौण कारण अदिति है ऐसा समझनेसें व्याख्यान निर्दोष है. अथवा देवोका कारणभूत जो वहार विषयक पदार्थ है सो " असत" याने व्यवहारागोचर परब्रह्मसे प्रादुर्भुत हुवा ऐसा कहेनेमेंभी निर्दोष है. ॥ २ ॥ ६३. ८ ३ १ देवानांयुगेभैथमेसतःसदजायत । तदाशाअन्वजायन्ततर्युठानपदस्परि॥ ३ ॥ पूर्वार्घमुक्तं त दन्वाशौदिशो जायन्त, तत्परि तदन्वित्यर्थः उत्तानपदः उत्तानमूर्ध्वतानं पद्यन्ते इत्युत्तानपदो वृक्षाः ते अजायन्त प्रादुरभवन् ॥ ३ ॥ अनुवाद-पूर्वार्द्ध पूर्व मन्त्रकी तरह है याने अव्याकृतसें नामरूपसहित प्रपंच उत्पन्न हुवा, अदितिसें देवादिक प्रादुर्भूत होनेके बाद दिशायें उत्पन्न हुइ. और उसके बाद वृक्ष प्रादुर्भूत हुवे ॥ ३ ॥ ६४. ८ ३ १ भूर्जनउत्तानपदोभुपआशाभजायन्त । अदितेर्दक्षोअजायतदक्षाद्वदितिःपरि ॥ ४ ॥ भूरुत्तानपदोवृक्षान् जज्ञे, तथा भुवः सकाशादाशाअजायन्त, तथा अदिते दक्षः अजायत उत्पन्नः दक्षादु दक्षादपि अदितिः पर्यजायत, न स्वोतनं कार्य स्व- सत्" व्य- -

-
[६३]
स्यैव कारणमपिमवतीति विप्रतिषिद्धमइति वाच्यं, यास्काचार्यः इदमेव वाक्य-
मुदाहत्य विरोधमाशंक्य पर्यहरत् तथाहि-अदिदिक्षोजायत दक्षाद्वा अदितिः
परीतिच, तत्कथमुपपोत समानजन्मानौस्याताभित्यपिया देवधर्मणेतरेतरजन्मानी
स्यातामित्तरेतरमकृती इति ॥ ४ ॥
अनुवाद-पृथ्वीने वृक्षोंको उत्पन्न किये. और अन्तरिक्षसे दिशायें
उत्पन्न हुइ. और अदितिसें दक्ष उरान हुवे, दक्षसें अदिति उत्पन्न हुइ.
यद्यपि अपने उत्पन्न होनेवाले कार्य अपना कारण नहि होता याने जो
जिसका जन्य है वही पदार्थ उसका जनक (उत्पादक ) नहि होसक्ता
तथापि यास्काचार्यनें इस विरोधका परिहार इस तरहसे कियाहै की दक्ष और
अदिति समानजन्मवालेथे अथवा देवधर्मद्वारा परस्पर जन्मवालेथे परस्पर
प्रकृतिवाले थे, याने " दक्ष " नामक किसी व्यक्तिसें अदितिका प्रादुर्भाव हुवा
और " अदिति " नामक किसी व्यक्तिसे " दक्ष उत्पन्न हुवा अथवा किसी
कालमें यानें पूर्व कल्पमें अदितिमें दक्ष हुवे और इतर कल्पमें दक्षसे अदिति
उत्पन्न हुइ. अथवा दक्षोपलक्षित सोपाधिक चेतन अदिति उपलक्षित सोपाधिक
चेतनसें अभिव्यक्त याने " उत्पन्न " शब्दसें व्यबहियमाण हुवा और अदिति
उपलक्षित सोपाधिक चेतन दक्षोपलक्षित सोपाधिक चेवन से उत्पति
शब्दसे व्यवहारविषय हुवा ऐसा मान से विरोध है नहि ॥ ४ ॥
६५. ८ ३ १ अदिति जनिष्टदायादुहितातर्थ ।
नांदेवाभन्जायन्तभद्राअमृतबन्धवः ॥ ५॥
हे दक्ष या तब दुहिताभूत् सा अदितिरजनिष्ट हि पुत्रानादित्यान् । तदे-
चाह तादेवामन्वजायन्त, भद्राः स्तुत्या भजनीया अमृतबन्धवः अमरणबन्धनाः ।।
अनुवाद-हे दक्ष ? जो तुमारी अदिति नामक पुत्री है उससे मरण
रहित और मजन सेवन करने योग्य आदित्यनामक देव प्राईत हुवे ॥५॥

६६. ८ ३ १६ यस्माविश्वाभुवनानिपिहोतान्यसीदत्पितानः ॥.. समाधिपादविणामिच्छानःप्रथमच्छदवराआविवेश ॥१॥ यो विश्वकर्मा परमेश्वर इमा विश्वा भुवनानि जुद्दत् , प्रलयकाले पृधि- व्यादीनिमान्सप्लोकान् स्वात्मन्याहुतिप्रक्षेपवत् संहरन्, ऋपिरतीन्द्रियदृष्टा सर्वज्ञो होता संहाररूपस्यहोमस्यकर्ता नोस्माकंपिताजनको निपसाद स्वयं स्थित्तवान्। अयमर्थः प्रलयकाले प्राप्सति सर्वान् लोकान् संहृत्यास्माकमपि संहर्ता पुनः सृष्टा च सन् सर्वज्ञो यः परमेश्वर स्वयमेकएवासीत्। तथाब्रुवतेहिश्रुतयः-" आत्मावाइद- मेकएवाम आसीत् " (ऐ. उ. १-१) “ सदेवसोम्येदमप्रासीदित्यादिकाः" (छां, ६-२-१) । सतादृशः परमेश्वरः आशिषा बहुः स्यांप्रजायेयेत्येवंरूपया पुनः पुनः सिमुक्षया द्रविणमिच्छमानः धनोपलाक्षतं जगद्भोगमाकांक्षमाणः प्रथमच्छन् प्रथममुख्यं निष्प्रपंचं पारमार्थिक रूपमावृण्वन्, अवरान् स्वसृष्टान् प्राणिहृदयप्रदे- शानाविवेश आविष्टवान् जीवरूपेण! तथाचश्रूयते " सोकामयत बहुः स्यांग्जाये- येवि सतपोतप्यत सतपस्तप्त्वा इदंसर्वमस्जत यदिदंकिंच तत्मा तदेवानु प्राविशदिति " (ते. उ. २-६) ॥ १ ॥ अनुवाद-जो परमात्मा समप्रब्रह्माण्डको यानें पृथिव्यादिक सप्त लोकोंको स्वस्वरूपमें आहुतिके प्रक्षेपकीतरह, प्रलयकालमें लीन करता है. अतीन्द्रिय पदार्थोके ज्ञानवाला सर्वज्ञ, संसारका संहार रूप होम (अपने स्वरूपमें) करनेवाला हमारा (पाणिमात्रका) जनक स्वयं सर्वदा अवस्थित है. याने प्रलय- कालमें सकलविश्वका संहार करके हमारा भी संहार करनेवाला और फिरसें (अपनी भीतरहीसें) सर्वको उत्पन्न करनेवाला स्वय एकही है. याने किसी की, सहायता न लेकरकेभी यथास्थित विश्वकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय कररहाहै। श्रुतिभी "प्रथम (सृष्टिके पूर्व) आत्मा एकहीया" और "यह नामरूपात्मक प्रपंच भी प्रथम सद्रूपही या " इत्यादिक प्रतिपादन करती है। वैसा परमात्मा " में अनेक रूप होजाउ " ऐसी सृष्टि करने की इच्छासें धनोपलक्षित प्रपंचके भोगोंको चाहता हुवा अपने पारमार्थिक निष्प्रपंच स्वरूपकों (अपनी शक्तिरूप मायासें) आवृत करके अपनी मायाद्वारा निर्माण कियेहुरे प्राणी मात्रके हृदयप्रदेशमें जीव स्वरूपसे पाविष्ट-प्रविष्ट हुवा। श्रुतिमी कहती हैकी-"वह परमात्माने संकल - [६५] किया की में अनेकरूप होजाउं. वह परमात्मा (आलोचनात्मक) तपश्चरण करने लगा और वैसा तपश्चरण करके इस प्रपंचकी सृष्टि करने लगा. इस प्रपंचको उत्पन्न करके उसी प्रपंचके भीतर स्वयंही अनुप्रविष्ट याने प्रतीत हुवा। ऐसे औरभी श्रुति इस अर्थसें संगत होती है. ॥१॥ ६७. ८ ३ १६ किस्विंदासीदधिष्ठानमारम॑णंकतमत्स्वित्कथासीत् । यतोभूमिननयन्विश्वकर्माविद्यामार्णेन्महिनाविश्वचक्षा॥२॥ पूर्वमंत्रे जगत्मलयकाले संहृत्य, पश्चासिसृक्षायां सर्व सृष्ट्वा तत्र प्रविष्ट इत्युक्तं यत्र तस्य द्वितीयस्याधिष्ठानं जगदुपादानकारणाद्यसंमवात् सृष्टिरनुपप- नेत्याक्षिपति। लोके हि घटं चिकीर्घ कुलालो गृहादिकंचित्स्थानमविष्ठाय, मृदूपे- गारंभकद्रव्येण चक्रादिरूपरुपकरणैर्घटें निप्पादयति, नद्वदीश्वरस्य जगदाश्रयद्या वापृथिव्योरुत्पादनवेलायामधिष्ठानं किंस्विदासीत् किनामाभूत् न किंचिदित्यर्थः, तथा तयोरारंभणं कतमस्वित्, आरभ्यते अनेन इति आरंभण उपादानकारणं तदपि कतमद्भवेत् तदपि नेत्यर्थः यद्यपि संभवेदारंभणं कथासीत् कथमभूत् । कि स्वयं सदसद्वाभवेदित्यर्थः उभयमपिनोपपद्यते, सच्चेदद्वैतभंगप्रसंगः असञ्चेत्स- दात्मकयोर्यावापृथिव्यो रुपादानानहत्वात् "नान्यत् किंचनामिपदि"त्यादि (ऐ-१-१) श्रुतेश्चेत्यभिप्राय: । यतो यस्मादधिष्ठानादारंभणाच विधचक्षाः सर्वदृष्टा विश्व- कर्मा परमेश्वरोभिजनयन् वर्तते, तथा द्यां दिवंब्यौर्पोत् व्यवृणोत् सृष्टवान्, महिना स्वमहत्त्वेन किस्विंदासीदिति ॥ २॥ अनुवाद-"प्रलय समयमे जगत्को प्रलीन करके फिरसे सृष्टि करने के प्रसंगमें सफल प्रपंचको उत्पन्न करके उसमें वह परमात्मा प्रविष्ट हुवा" ऐसा , पूर्व मन्त्रमें कहा, उसमें प्रपंचरूप कार्यका अधिष्ठान क्या था और उसका उपा- दान कारण कौन था? क्योंकी "अधिष्ठान और उपादानके सिपाय किसी कार्यको रचना हो सक्ती नहिं , इत्यादिक पूर्व पक्षरूपसे इस मन्त्रमें प्रतिपादन करते है. लोकमें घटको निर्माण करने की इच्छावाला कुम्भकारादिक. गृहादि किसी 1

एक पर-
"
मात्मा और
[६६]
स्थानमें अधिष्ठित होकरके याने रहेकरके मृचिकारूप आरम्मक द्रव्योंसे दण्डचक्र-
चीवरादिसापनद्वारा घटको बनाता है, वैसेंही इस परमात्माको प्रपंचका आश्रय-
रूप आकाश पृथिव्यादि भूतोंको उत्पन्न करने के समय अधिष्ठान (गृहादि)
क्या था ? (याने कुछभी नहि था, क्योंकी माकाशादिक भूत रहे सकें वैसा गृह
आकाशादिककी पहिले कैसे हो सकता जितना अन्य पदार्थ है वह सब आकाशा-
दिक मूतोहीसें तो उत्पत्तिको पायाभया उपलब्ध होता है ) उसी तरह आकाशा-
दिकका आरम्भक उपादान कारण (उस समयमें ) कौन था यद्यपि उपादान
कारण होसक्ताहै लेकिन सत् और असत् को छोडकरके दूसरा नहिं होसक्ता,
सत्को उपादान कहींसें अद्वैत सिद्धान्तका भग होताहै. क्योंकी "
दूसरा सत्" रूप उपादानकारण " ऐसा कहनेसे द्वैतसिद्धि
होतीहै. और " असत् " को उपादान कह से आकाशादिक भूतोंमें " सत्त्व
प्रतीति बाधित होनी चाहिये क्योंकी सकलकार्य अपने कारगके सनातीय होते
हैं, तो यह आकाशादिरूप कार्यभी अपना उपादान कारणभूत जो " असत्"
है तदात्मक होना चाहिये और वैसा होनेसें सद्रूप प्रतीति जो होती है सो असं-
गत होजायगी। और श्रुतिभी कहताहैकी "दूसरा कुछ है नहिं " याने परमात्मा
के सिवाय द्वितीय पदार्थ सदात्मक नहिं है तो उस् सृष्टिके समय वैसा कौन
अधिष्ठान और उपादान था की जिसको स्वीकार करके सर्वद्रष्टा जगदुत्पादक
परमेश्वरने अपने महत्त्वद्वारा आकाशादिक भूतोंको उत्पन्न किये होय ॥२॥
६८. ८ ३ १६ विश्वतश्चक्षुरुतविश्वतोमुखोविश्वतोवाहुरुतविश्वतस्पात् ।
संबाहुभ्याधर्मतिसंपर्यावाभूमीजनयदेवए: ॥३॥
अनया सर्वात्मकत्वेन कुलालादिविलक्षणत्वादधिष्ठानायभावेपि सप्टुः शक्नो.
तीत्याह, विश्वतश्चक्षुः सर्वतोव्याप्तचक्षुः, उतापिच विश्वतोमुखः, तथा विश्वतोबाहुः
उवापिच विश्वतस्पात् स एवंविधः परमेश्वरः स्वस्मिन् त्रैलोक्यमुत्सादयतीत्यर्थः ।
कथमित्युच्यते-बाहुभ्या दिवं सघमति धमतिर्गतिकर्मा सम्यक् प्रेरयति, तथा
पतत्रैः गमनशीलैः पादैः पृथिवी संघमतीत्युभयोरेवश्रवण प्राधान्याभिप्रायम्, एवं
द्यावामी जनयन् दिवं च पृथिवीं चोत्पादयन् देवो द्योतमानः स्वयंप्रकाशः परमेश्वर
एकोऽसहाय एव वर्तते ॥ ३ ॥

[६७] अनुवाद-"कुम्भकारादिकसे विलक्षण याने सर्वात्मक यह परमात्मा अधिष्ठान उपादानादिक किसी पदार्थकी सहायता न लेकर फेभी स्वतन्त्ररूपसे अपंच निर्माण कर सता है " ऐसा इस मन्त्र से प्रतिपादन करते हैं, सर्वत्र व्यातदृष्टिवाला और सर्वत्र व्याप्तमुखवाला, और सर्वत्र व्याप्तबाहुवाला और सर्वत्र व्याप्तचरणवाला यह परमात्मा किसीकी सहायता न लेकर के विश्वोत्पत्ति करता है। जैसे? बाहुद्वयसे आकाशको (उत्पचिके लिये ) प्रेरणा करता है, और चरणोंसे पृथ्वीको (उत्पत्ति के लिये ) प्रेरणा करता है. आकाश और पृथिवीका नामोच्चारण, मात्र उनकी अधिक प्रसिद्धि होने से किया है, तथापि तदुपलक्षित सकल प्रपंच इसी तरहसे उत्पत्ति के लिये परमात्माने प्रेरित किया है। इस प्रकारसे आकाश पृथ्वी और तदुपलक्षित समग्र प्रपंचो उत्पन्न करनेवाला स्वयंप्रकाशी यह परमात्मदेव एकही है या किसीकी सहायता न ले करके - वर्तमान है ॥ ३ ॥ ६९. ८ ३ १६ किंस्विद्वनकउसवृक्षासयताद्यावापृथिवीनिष्टताः। मनीषिणोम सापृच्छतेंदुतघद्ध्यात हुवनानिधारयन्॥४॥ पूर्वस्यामृच्युक्तं ब्रमय भूम्यादिकारणमिति, तदेवानया प्रश्नकथनब्याजेनो- च्यते, लोकेहि प्रौढं प्रासादं निर्मिमाणः कस्मिंश्चित्प्रौढे बने कंचिन्महान्तं वृक्षं छित्त्वा तक्षणादिना स्तंभादिकं संपादयति, इह तु परमेश्वरप्रेरिता जगत्वष्टारो यतो यस्मा- द्वनात् यं वृक्षमादाय द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः तक्षणेन द्यावापृथिव्यौ निष्पादितवन्तः' तद्वने फिस्वित् किनाम स्यात्। तथा क उ स वृक्ष आस कस्तादृशो महान् वृक्षोभूत्। हे मनीषिणो मनस ईश्वरास्तदुभयं मनसा जिज्ञासायुक्तेन पृच्छतेदु पृच्छरेवा किंचेश्वरो मुवनानि धारयन् यत्स्थानमध्यतिष्ठत्तदपि पृच्छत एतस्य सर्वस्याप्युत्तर ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष आसीदित्यादिकमुत ॥ ४ ॥ अनुवाद-पूर्व मन्त्रमें परब्रह्म परमात्मा हो. आकाशादिक प्रपंचका कारण कहा, वही कथा यहां प्रश्नाचररूपसे कही जाती है, लोकमें प्रौढ विस्तीर्ण महेल ( मकान ) को बनानेवाला कोइ शिील किसी विस्तारवाले जंगलमें जा करके और महान् वृक्षों को काट करके उनसे स्तम्भादिक बनाता है. इस ब्रह्माण्डरूप प्रासाद ( महेल ) बनाने में परमेश्वरने जिन शिपियों को नियुक्त [६८] किये है वे लोक जिस अरण्यमैसें वृक्षादिकनको काट करके आसामादिमूत- मौतिकसृष्टयात्मक मासादको बनानेमें तपर हुवे वह अरण्य और वह वृक्ष कौनसा होगा ! हे बुद्धिमान् लोकों ? इन दोनों बातोंको मनमें जिज्ञासा रखके (किसी योग्य पुरुषसे) पूछो. और परमात्माने ब्रह्माण्डको धारण करने के समय जिस स्थानको अधिष्ठित (स्वीकृत ) किया वह बातमी तुम (किसी योग्य पुरुषसे) पूछो. इस प्रश्नमा यही उत्तर है की परब्रह्म परमात्माही भरण्य (सदृश विस्तीर्ण होनेसे वन ) है. और विश्वका अभिन्ननिमिचोपादान होनेसे इस प्रपंचरूप प्रासाद कार्यमें वृक्षादिकरूप उपादानकारणभूतमी वही है" (ते. बा. २-८-९) " आत्मैवेदं सर्व " श्रुतिमी परमात्मासें अतिरिक्त साध्य साधन और साधकका चाधरूपसे अभाव बताती है. ॥ ४ ॥ ७०. ८ ३ १६ यातेधामानिपरमाणियावमायामध्यमाविश्वकर्मन्नुतेमा । शिक्षासखिम्योहविपिस्वधावःस्वयंयंजस्वतन्वधानः।।५।। अनया भौवनो विश्वकर्मा जगत्कारण विश्वकर्मदेवं स्तौति-हे विश्वकर्मन् या यानि ते तव परमाणि घामानि शरीराणि सन्ति, या यानि च मध्यमान शरीराणि सन्ति उतापि च या यानि अवमानि धामानि शरीराणि सन्ति उतापि- च तानीमानि सर्वाणि शरीराणि सखिभ्योस्मभ्यं यष्टु हविपि मयि हविर्भूतेसति शिक्ष देहि। हे स्वधावो हविलक्षणान्नवन् । स्वयमेव त्वं तन्व स्वकीय पूर्वोक्न त्रिविधं शरीरं वृधानो हविषा वर्धमानः सन् , अनेन धामत्रैविध्योपन्यासेन उत्तम- भूतानि देवादिशरीराणि मध्यमभूतानि मनुष्यादिशरीराणि निकृष्टभूतानि कृमि- कीटादिशरीराणि च परिगृहीतानि, किंबहुना सर्व जगदुपात्तं भवति, उक्तव्यति- स्केण निरवयवस्य परमेश्वरस्य विग्रहाभावात् " तदैक्षत बहुः स्या प्रजायेथे " त्यादि (छा. ६-२-३) श्रुतिभ्यः परमेश्वरस्यैव देवादिभेदेन बहुभावावगमात्॥५॥ अनुवाद-मुवन सम्बन्धी (भुवनोंको बनानेवाला ) विश्वकर्मा जगतका कारणरूप विश्वकर्मदेव-परमात्माकी स्तुति करता है सो इस मन्त्रसे प्रतिपादन . हे विश्वकर्मन् ! जो आपके परम उत्तम शरीर है, और मध्यम कोटि- चाले जो आपके शरीर है और अवमानि याने अधम जो आपके शरीर है, वे शरीर (आपके ) सखि याने (पवित्र प्रेमद्वारा ) आश्रित बने हुने हमको यजन करनेके लिये (आप) प्रदान करें. जैसें अनिमें आहुतिपक्षेप करनेसे अमि और आहुतिका अभेद होताहै, तैसेही अमिस्थानापन्न आपके महा स्वरूपमें जीवभावापन मेरे स्वरूपका आहुतिरूपसे प्रक्षेप करके अभेद बनाने को आप स्वीकार करो, हविष्यरूप अन्नवाले हे परमात्मन् (यज्ञादिकमें अर्पि- वकिये हुवे) हविष्यसे पूर्वोक्त उत्तम मध्यम और अधम स्वरूपोंकी वृद्धि करने- वाले आपस्वयंही हैं. । इन तीनो शरीरों-स्वरूपोंसें उत्तम देवशरीर, मध्यम मनुष्यशरीर और अधम कृमिकीटादिशरीर गृहीत होते है. विशेष कथा कहें सकल प्रपञ्चका ग्रहण होता है. क्योंकी निरवयव परमात्माका शरीर देव मनुष्य और कीटादिक (प्रपंच ) से अतिरिक्त हो सक्ताही नहिं. श्रुतिमी कहती है- उस् परमेश्वर। ईक्षण (आत्मक संकल्प ) किया की में एकही हुं, तथापि अनेक रूप हो जाउं." इत्यादिक प्रमाणोंसें परमेश्वरही देवादिक भेदसें प्रतीय. यमान होता है ।। ५॥ ७१. ८ ३ १६ विश्वकर्मन्हविपावाधानः स्वयंयजस्वपृथिवीमुतद्याम् । मुह्यन्त्वन्येअभितोजनांसहहास्माकमासूरिरस्तु ॥६॥ हे विश्वकर्मन् विश्वविषयकर्मन् एतन्नामक परमेश्वर हविषा हविर्भूतेन मया विधर्मणा मया दत्तेन वा हविषा वावृधानो वर्धमानः विश्वकर्मा सर्वाणि भूतानि जुहवांचकार “सआत्मानमप्यन्ततो जुरवाचकारे " ति निरुक्तं पूर्वमुदाहृतं. स्वय- मेव पृथिवीमुतापिच द्या दिवं च स्वसृष्टे द्यावापृथिव्यौ स्वयंप्रवृद्ध. सन् यजस्व पूजय अन्ये मचोन्ये जनासो जना अयष्टारोऽस्मद्यागविरोधिनो वा मुह्यन्तु मुग्या भवन्तु, अभितः सर्वत. अथ परोक्षकृत. इहास्मिन्यागेस्माक मघवास्मत्पन्न हरि लक्षणेन धन धनवान् ससूरिः स्वर्गादिफलस्य प्रेरकोस्तु भवतु, अत्र विश्वकर्मन् हविषा वर्धमान इत्यादि निरुक्तदृष्टव्य ॥ ६ ॥ अनुवाद-है विधविषयककृतिवारे विश्वकर्मनामा देव! (आपके अमिस्थानापन्न महास्वरूपमें अपने जीवभावापन्न स्वरूपको हविष्यद्वारा अभेद - .

-- [७०] करनेकी इच्छावाले ) मैंने अर्पण किये हुवे हविष्यसें वृद्धि (प्रीति) को प्राप्त होकरके आपने सकल भूतोंका (अपनी भीतर) होम किया है याने पारमार्थिक रूपसें सकल प्रपञ्च एतदात्मक होनेसे इस परमेश्वरसें अभिन्नहींहै। निरुत (१०-१६) में भी कहा हैकी " उस परमात्माने अखिरमें अपने स्वरूपकोभी होमद्वारा सफल प्रपञ्चसें अभिन्न किया है । हे परमात्मन् ? यही आप पृथिवीको और आकाशको याने अपनी शक्तिसें निर्मित किये हुवे (तदुपलक्षित) प्रपञ्चको स्वय (प्रीतिमान होकरके) यजन करें, याने हमको विपरीत भावनाद्वारा आपके स्वरूपसे प्रपञ्चकी भिन्नप्रतीति जो होती है उसको निवृत्त करके वास्तविक जैसा अभेद है तैसीही प्रतीति करानेको याने विपरीत भावना दूर करनेको आप कृपा करें और जो लोक हमारे इस (ज्ञान) यज्ञके विरोधी है (याने भेदभ्रमसे भरपुर अतःकरणवाले और हमारे इस अद्वैत मार्गमें विघ्नकरनेवाले है) वे सदा मुस मोहाक्रान्त रहे । और जो इन्द्रदेव (के लक्ष्यार्थ आप) हमारे परोक्ष है सो हमर्ने आदरपूर्वक (अभेदके लिये) अर्पितकिये हुवे इस (जीव रूप) हविष्यसें संपन्न होकरके स्वर्गादिक (उपलक्षित आत्मानुभवात्मक निरतिशयानन्द) के आप प्रेरक होय, यानें अभेदद्वारा हमको अबाधित सुख प्रतीत होने के लिये आप स्वीकार करें ॥६॥ ७२, ८ ३ १६ वाचस्पातिविश्वकमाणम्तयेमनोजुवाजेअद्याहुवेम । सनोविश्वानिवनानिजोपाद्वैश्वशंभूरर्वसेसाधुर्मा ॥ ७ ॥ वाचस्पति मंत्रात्मकस्य वचसः स्वामिनं विश्वकर्माण विश्वकर्तारं मनोजुवं मनोवेगगमनं देव वाजे यज्ञे अद्याम्मिन्दिने ऊतये तर्पणाय हुवेम आहृयाम, स देवो नोस्माकं विश्वानि सर्वाणि हवनानि जोपत् सेवता । किमर्थ अवसे अस्माकं रक्षणाय, स विशेष्यते-विश्वशंभूः विश्वस्य सुखस्योत्पादकः साधुकर्माच ॥७॥१६॥ अनुवाद-मन्त्ररूपवाणी के स्वामी और मनके समान वेगवाले (सर्वत्र व्याप्त) जगन्नियन्ता विश्वकर्मदेवको इस (ज्ञान) यज्ञमें तृप्त होनेके लिये (हम) निमन्त्रित करते हैं. वह विश्वकर्मा देव हमारे सकल (ज्ञानात्मक) यज्ञ का उपभोग करें की जिससे हम (आत्मलाभ संपादन करके) सुरक्षित होंय । और वह विधर्मा ।

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[१]
देव सकल जगत्को सुख देनेवाला है (इससे मुझेभी निर्विशेष सुख अवश्य देगा)
इससे उनको निमन्त्रित करते हैं. ॥७॥
७३. ८ ३ १७ चक्षुपः पिताम साहिधारो घृतमैनेअजनन्नम्नमाने ।
यदेदन्ता अदंदृहन्तपूर्व आदिद्धावापृथिवी अप्रथताम् ॥१॥
चक्षुषः चक्षुरुपलक्षितस्येन्द्रियसंघातात्मकस्य शरीरस्य पिता उत्पादयिता
यद्वा चक्षुः ख्यापकं तेजः तस्योत्पादयिता, मनसा नहि मत्समोस्तिकश्चिदिति
वुद्ध्या हि खलु वीरो धृटो विश्वकर्मा प्रथमघृतमुदकमजनत् अजनयत् , "आपोवाइंद-
म"अपएक्सस दा"पित्यादिश्रुतिस्मृती स्याता, पश्चादेने द्यावापृथिव्यौ नम्नमाने
तस्मिनुदके इतस्ततश्चलन्त्यौ यःअजनयत् , अथ यदेत् यदेवान्ताः पर्यन्तप्रदेशः
पूर्व पुराणाः द्यावापृथिव्योः संबन्धिनः अदद्दहन्त दृढाअभवन् विश्वकर्मणा दृढाः
संपादिता इत्यर्थः, आदित् अनन्तरमेव द्यावापृथिवी द्यावापृथिव्या अप्रथेतां यथा
कामं प्रथिते अभूतां ॥१॥
अनुवाद-चक्षुरिन्द्रियोपलक्षित सकलेन्द्रियसंघातात्मक देहका उत्पन्न
करनेवाला अथवा चक्षुरिन्द्रियकी ख्याति करनेवाले तेजको उत्पन्न करनेवाला
(यच्चन्द्रमसि यच्चामे। तत्वेजो विद्धि मामकम् , सूर्य चन्द्र अमि इत्यादिक तेजस्वी
देवों में रहाहुवा तेज हमारा-नित्य प्रकाशात्मक परमेश्वरका है ऐसा श्रीमद्भगवद्गीतामें
भी कहा है) और " मेरेतुल्य दुसरा हेही नहिं " ऐसी बुद्धिसें परमधीररूपसे
अवस्थित इस विश्वकर्मदेवने प्रथम जलको उत्पन्न किया " जल प्रथम सृष्टि में
उत्पन्न हुवा", इत्यादिक श्रुतिस्मृतिमी इससे संगत होती है। उसके अनंतर
उस जलमें चंचलरूपसे रहेनेवाले आकाश और पृथ्वीको जिस देवने उत्पन्न
किये और उन आकाश पृथ्वी के संबन्धी जो प्राचीन प्रान्त प्रदेश है उनको जिस
देवने दृढतर बनाये और जिन (प्रदेशों) के दृढ होनेसें आकाश पृथ्वी यथेष्ट
ख्यातिपाले हुवे. (वह देव एकही है. ऐसा अभिम मन्त्रसें संबन्ध है) ॥ १ ॥
७४. ४ ३ १७ विधर्माविमना आविहायाघाताविधातापरमोवसंदृक् ।
वेपोमिष्टानसमिपामदन्ति यत्रो सतपीपरएकमाहुः॥२॥

[२] .. . १... : विश्वकर्मा या परमात्मा, प्राणप्रकाशाभ्यामुपेतः सन् बहुकर्मा भवति सब विमनाः विभूतमनाः विहायाः वस्तुतो महान . विशेषेण सुकृतदुप्कृतफलस्याप्ता: धाता विधाता च परमोतसन्हक परमश्च सन्दृष्टेन्द्रियाणां, तेषां सप्तपींगां दृष्टणा- मिन्द्रियाणां इष्टानि स्वरूपाणि इपानेन सह संमदन्ति संमोदन्ते यत्र यस्मिन्ना- मनि, तनात्मानं सप्तपीन सप्तसंग्ज्याकेभ्यः सर्पणस्वभावेभ्यो वा परः परस्ताद्वत- मानमिन्द्रियाद्यतीतमेकं परमात्मानमाहुस्तत्त्वविदः. अत्रविश्वकर्मा विभूतमना व्याप्तेत्यादि निरुक्तमनुसंधेयं ॥ २ ॥ अनुवाद-जो विश्वकर्मवाच्य परमात्मा माण और प्रकाशसे युक्त हो. करके अनेक फोका कर्ता बनता है, याने देहेन्द्रियादिसंघातको ममत्वाभिनि-: वेशपूर्वक स्वीकृत करके अनेक क्रियावाला होता है, पारमार्थिक स्वरूपसे (वह परमात्मा ) महान् विमु होनेपरमी अन्तःकरणरूप उपाधिहीमें अभिव्यक्त होवाहै , और (प्राणिमात्रके) पुण्यपापात्मक कमौके फलोंको धारण करनेवाला और तनद- धिकारीयोंको (फल) देनेवाला स्वयं निरिन्द्रिय अतीन्दिय होनेपरभी इन्द्रियों का द्रष्टा-साक्षाहै, और जिस परमेश्वरात्मक अधिष्ठानमें अध्यस्त कल्पित इन्द्रियवर्ग' अपने अपने इष्ट स्वरूपको अन्नोपलक्षित विपर्योका (निर्षिन) उपभोग कररहाहै सप्तसंख्यावाले याने चक्षुरादिक पांच और मनबुद्धि सहित होकरके सप्तसंख्यावाले अथवा चंचल स्वभाववाले उस इन्द्रिय वर्गसें दूर याने अतीन्द्रिय उस परमेश्वरको तत्त्वज्ञानिलोक "एफही है" ऐसा कहते हैं. इस अर्थमें निरुक्तभी संमत होता है. (नि. १०-२६) ॥२॥ ४५. ८ ३ १७ योनःपिताजनितायोविधाताधामानिवेदभुवनानिविश्वा योदेवानांनामधाएकएवर्तसमश्यंभुर्वनायन्त्यन्या.॥३ ॥ यो विश्वकर्मा नोस्माकं पिता पालयिता न केवलं पालकः किंच जानता उत्पादकः किमनेनास्माकमुत्पादक इति संकोचेन, यो विधाता सर्वस्य जगत उत्पादकः यो विश्वकर्मा नोस्माकमुत्पन्नानि घामानि देवानां तेजःस्थानानि वेद वेचि, किंबहुना" विश्वा विश्वानि भुवना भूतजातानि वेद वेत्ति, यश्च देवानाममिवारवादीनां नामधाः । नानां धाता, इन्द्रादीनिर्माय तेषां इन्द्रादि नाम कृत्वा तत्सदेषु स्थापयिता एकएव, तदेवं अन्यानि भूवना भूतजागनि प्रश्नं "क: परमेश्वर" इति पृच्छौ यन्ति' प्रामुवन्ति ।। ३॥ ..

. -- [३] अनुवाद-जो विश्वकर्मा देव हमारा पालन करनेवालाहै, फेवल पाल कहींहै ऐसा नहिं किंतु उत्पादक है. अगर संकोचरहित होकरके कहें तो फेवल हमाराही उत्पादकहै-ऐसा नहिं परंतु सचराचा विश्वका उत्पादकहै. और जो परमेश्वर देवों के तेजास्थानों को यथार्थ रीतिसे जानता है, विशेष क्या कहें, समग्र भूतसमूहको यथार्थ जानता है, और जो परमात्मदेव अमि वायु यमा- दिकोंका नामाभिधान स्वयंही करताहै. इन्द्र अमि वायु वरुण यम इत्यादिक देवोंका तत्तन्नामाभिधान करके जो परमेश्वर तवत्स्थानमें नियोग-स्थापन करनेवाला है, और स्वयं अमहाय-एकही है, उस परमेश्वरदेवको अन्य भूतभौतिकवर्ग "वह परमेश्वर हमलो फोका जो नियन्ताहै सो कौनहै?' इत्यादिक प्रश्न किया करतेहैं (परन्तु भेदनम पर्यन्त उसको यथार्थ जानसक्ते नहिं ) ॥ ३ ॥ ७६. ८ ३. १७ परोदिवापरएनायिव्यापरोदेवेभिरसुरैयदस्ति । कंस्विद्गर्मप्रथमर्दध्रआपोयत्रदेवाःसमपश्यन्तविधे ॥ ५॥ यदीश्वरतत्त्वं दिवा परः धुलोकादपि परस्तात् वर्तमानं, तथा एना अस्याः पृथिव्याः परः परस्ताद्वर्तमानं, तथा देवेभिर्देवैः परस्ताद्वर्तमानं, असुरैश्च यत् परः परस्तात वर्तमानं, गुहायामवस्थितं, कखित् गर्भ गर्भवत् सर्वस्य ग्राहक तत्त्वमापः प्रथमं दधे, धृतवत्यः, यत्र यस्मिन् गर्ने देवा इन्द्रादयो विश्वे सपि समपश्यन्त, संगताः परस्परं पश्यन्ति, एवंजानन्नेव कश्चित्तत्ववित् प्रश्नं करोति ॥ ५ ॥ अनुवाद-"धुलोक-आकाश अथवा स्वर्गसें पर इस् पृथ्वीसें भी पर वर्त- मान और देवदानवादिकसे पर वर्तमान गुहागत पदार्थकी तरह दुर्शय और सर्व का ग्राहक जिस ईश्वरतत्त्वको जलने अपनीभीतर गर्भकी तरह धारण किया, और जिस गर्भमें इन्द्रादिक सकल देव परस्पर संगत होकरके उम् ईश्वरतत्त्वका पर्यालोचन करते हैं " ऐसा जाननेवाला कोइ तत्त्वज्ञानी प्रश्न पूछनाहै. ६ ॥ ७७. ८ ३ १७ तामदर्भमयमंध्रापोयत्रदेवाःसमगच्छन्तविश्धे । अजस्यनाभावधयेकमार्पतयस्मिन्विश्वांनिभुवनानितस्थुः॥६॥ - . - . - [७] अनया पूर्वमंत्रोक्तस्य प्रश्नस्योत्तरमभिधीयते, तमित् तमेव विश्वकर्मा गर्भ- गर्भस्थानीयं प्रथममितरसृष्टेः पूर्व मापो दधे धृतवत्यः । यत्र गर्ने विधे सर्वे देवाः इन्द्रादयः समगच्छन्त संगता भवन्ति, तस्याजस्य नाभावघि एकमर्पितमित्य. ण्डाभिमायणोक्तम्, अण्डं हि प्राक् सर्गानाभिस्थाने तिष्ठति, यस्मिन्नण्डे विश्वानि भुवनानि सर्वाणि भूतजातानि तस्थुः तिष्ठन्ति, अथवा अजस्य जन्महितस्य ब्रह्मणः स्वसृष्टे जले शयानस्य नामी सर्वजगद्वन्धक उदके एकं ब्रह्माण्डमर्पितं स्थापित शिष्टंसमानं । अथास्मिन्नर्थस्मृतिः-अपएक्सस दौतासुवीर्यमवाकिरत् । तदण्ड- मभवमं सूर्यकोटिसमप्रममिति ॥ ६॥ अनुवाद-पूर्व मन्त्रोक्त प्रश्नका उत्तर इस् मन्त्रसें कहेतेहैं-इतर सृष्टि के पूर्वकालमें उस् "विश्वकर्म " शब्दवाच्य परमात्मदेवको गर्भरूपसे जलने धारण किया, की जिस् गर्भमें सकल देव (इन्द्रादिक ) संगत होतेहै, जन्मरहित जिस् परमेश्वरके नाभिस्थानापन्न उदरमें एक अण्ड अवस्थित है, जिस अण्डमें सकल भूतभैतिक समुदाय स्थानको पाया हुवा है, वह अण्ड सृष्टिके पूर्वकाले परमे- श्वरके उदरमें था । अथवा अपनी शक्तिसें निर्मित किये हुवे जलमें शयन करते हुवे और जन्मरहित जिस परमेश्वर के नाभि शब्दके लक्ष्यभूत सकल जगत्को अपनी- भीतर अवस्थित करनेवाले जलमें एक ब्रह्माण्ड स्थापित कियाहै. “परमेश्वरने प्रथम जलहीको उत्पन्न करके उसमें वीर्यापान किया, जिससे असंख्य सूर्योके समान तेजोमय सुवर्णके तुल्य ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुवा " इत्यादिक स्मृतिभी इससे अनुकूल है ॥ ६॥ ७८. ८ ३ १७ नतंविदाथयइमाजजानान्ययुष्मारुमन्तरंबभूव । नीहारेणमाताजलप्यांचासुदृपउत्थशासंचरन्ति ।।७।।१७।। हे नरास्तं विश्वकर्माणं न विदाथ न जानीथ य इमा इमानि भूतानि जजान उत्पादितवान्, देवदत्तोहं यज्ञदत्तोहमिति वयमात्मान विश्वकर्माणं जानीम इति यदुच्यते तदसत्, नाहंप्रत्ययगम्यं जीवरूपं विश्वकर्मणः परमेश्वरस्य तत्त्वं, किन्तु युप्माकमहंप्रत्ययगम्याना जीवानामन्तरं अन्यत् अहंप्रत्ययगम्यादतिरिक्त सर्व वेदान्तवेद्यमीश्वरतत्त्वं बभूव भवति विद्यते, जीवरूपवतदपि कुतो न विद्यइति चेत् श्रूयतां-नीहारेण प्रावृता यूयं नीहारसदृशेनाज्ञानेन आच्छन्नाः अतो न जानीथ, स्यत्वात्, , [७५] यथा निहारो नात्यन्तमसद् दृष्टेरावरकत्वात, नात्यन्तं सत् काठपापाणादिवत्संबोद्धमयो- एवमज्ञानमपि नात्यन्तमसत्, ईश्वरतत्त्वावरकत्वात् नापि सत् बोधमात्र- निवर्त्यत्वात, ईदशेनाज्ञानेन भवन्तः सर्वे जीवाः प्रावृताः। नकेवलं प्रावृतत्वं किन्तु जल्प्या च, देवोहं मनुप्योहमित्याद्यनृतजल्पनेन प्रावृताः किंच असुतृपः केमाप्यु- पायेनासून्प्राणान् तृप्यन्तः उदरंभरा इत्यर्थः, नतु पारमेश्वरं तत्त्वं विचारितवन्तः, नकेवलमिहलोके भोगमात्रतृप्ताः उक्थशासः नानाविधेषु यज्ञपु उक्थं प्रउगनिके- वल्यादिकं शंसन्तश्चरन्ति, पृथिव्यां वर्तन्ते, केवलमहिकामुमिकभोगपरा वर्तध्ये, अतो विश्वकर्माणं देवं न जानीयेत्यर्थः ॥ ७ ॥ १७ ॥ अनुवाद-हे पुरुषो ? उस् विश्वकर्मदेवको ( तुम) नहि जानते, जिम् विश्वकर्मदेवने इन् भूतोंको उत्पन्न किये हैं. "में देवदत्त हुं, में यज्ञदत्त हुं, इत्यादिक रूपसे हम आत्मस्वरूप विश्वकर्मदेवको जानते हैं ? यह कहना ठीक नहिं, क्योंकी अहमाकारप्रतीतिका विषयभूत जो जीवस्वरूप है सो विश्वकर्म वाच्य परमेश्वरका पारमार्थिक स्वरूप नहि है, परंतु अहमाकारप्रतीतिके विषय भूत जीव स्वरूपसें वेदान्तवेद्य वह पारमार्थिक तत्त्व अतिरिक्त है, जीवात्माके स्वरूपकी तरह उसको हम क्यों नहिं जानते ? सुनो, तुमलोक नीहारसदृश अज्ञानसें आवृत हो गये हो, इससे यथार्थ नहिं जान सक्ते, जैसे नीहार (तुपार) दृष्टिको आवृत करता है इस लिये अत्यन्त असत् नहिं है, क्यों की असत् होता तो आवरण कैसे करसक्ता ? उसी तरह काष्ठपाषाणादिककी तुल्य अत्यन्त सत् भी नहिं है, अगर सत् होता तो काष्ठादिककी तरह दानादानादिक व्यवहा- रका विषय बनता, इस लिये "सत्" और "असत्" इन दोनोंसे विलक्षण कहना चाहिये, तैसेही अज्ञानभी अत्यन्त "असत्" नहिं है, क्योंकी पारमार्थिक स्वरूप को आवृत कररहा है, और अत्यन्त "सत्" भी नहिं है, क्योंकी केवल ज्ञान- मानसें निवृत्त-वाधित होता है, इससे सत्त्व और अमवसें विलक्षण याने अनिर्व- चनीय अज्ञानसें तुम सब जीव दृढतर आवृत-प्रच्छ न होगयेहो, मात्र आवृनहीं होगये हो इतनाही नहि. किंतु में देवहूं में मनुप्पहुं अनुशर्माका पुत्र इत्यादिक व्यर्थ वादपरायण हो, याने व्यवहाराविषय पारमार्थि कस्वरूप होने परभी उसको छीपाकरके देहेन्द्रियादिसंघातकोही आत्मा समझके “" और मेरा" इत्यादिक व्यवहार किया करतेहो, और प्रागपोपणको परम पुरुषार्थ N "[७६] समझके यल किया करते हो, यानें हमेशां पेटही मरनेकी फिकर रखते हो, परंतु पारमार्थिक तत्वके विचारार्थ कभी प्रवृत्ति करतेही नहि, और केवल इसलोकहीमें भोगतृप्त नहि हो, लेकिन यज्ञयागादिक संपादन करके पारलौकिक भोग भी मुस्तेइद हो, याने आत्मविचारणासे शून्य होकरके फेवल ऐहिक और आमुमिक (पारलौकिक) भोगोंको संपादन करने ही में प्रान्तिद्वारा बहिर्मुख वृत्तिवाले बनके इधर उधर परिभ्रमण किया करते हो, यह सब उपाय उस विश्वकर्मदेवविषयक पारर्थिकज्ञानका बाधक है साधक नहिं है. ॥ ७ ॥ ७९. ८ ४ १७ सहवाशीपुरुषः सहस्त्राक्षः सहस्रपात् । सभूमिविश्वतोवृत्वात्प॑तिष्ठदशाङ्गुलम् ॥ १ ॥ सर्वप्राणिसमष्टिरूपो ब्रह्माण्डदेहो विराडाख्यो यः पुरुषः सोयं सहस्र- शीर्पा सहस्रशब्दस्य उपलक्षणत्वादनन्तैः शिरोभिर्युक्त इत्यर्थः । यानि सर्वप्राणि- नां शिरांसि तानि सर्वाणि तदेहान्तःपातित्वाचदीयान्थेवेति सहसशीर्षवं, एवंसह- साक्षित्वं, सहस्रपादत्वंच । स पुरुषो भूमि ब्रह्मांडगोलकरूपां विश्वतः सर्वतो वृत्वा परिवेष्टय दशांगुलं दशागुलपरिमित देशमत्यतिष्ठत् अतिक्रम्य व्यवस्थितः। दशां. गुलमित्युपलक्षणं ब्रह्माण्डाद्वहिरपि सर्वतो व्याप्यावस्थित इत्यर्थः ॥ १ ॥ अनुवाद-स -सफलपाणिसमष्टिरूप “विराट् " नामक ब्रह्माण्डदेहात्मक जो यह पुरुष है सो अनन्त मस्तकोंसे युक्त है, याने सकल प्राणिवर्गके जितने मस्तक है वे सब मस्तक तत्तद् शरीरमें अनुप्रविष्ट प्रतीत होनेसे इसी परमेश्वरके मस्तक है, ऐसा व्यपदेश किया जाता है. उसी तरह सफल प्राणिवर्ग के जितने नेन और चरणादिक अायव वे मन परमात्माके तरफ व्यपदेशद्वारा समझे जाते है । वह पुराणपुरुष ब्रह्माण्डगोलकरूप भूमिको चारो तरफसे परिवेष्टन करके दश अंगुल परिमित देशको अतिक्रमण करके व्यवस्थित हुवाहै, याने ब्रह्माण्डके बहार और भीतर सर्वत्र व्याप्त होकरके अवस्थित है. ॥१॥ ८०. ८१ १७ पुरुपएवंदसर्वपद्धतपञ्चभव्यम् । उतामृतत्वस्येशानोपदभेनातिरोइति ॥ २ ॥ L

इस (विराई) पुरुषका सामथ्योतिशय है, उस पुरुषका वास्तविक स्वरूप यह
-
अनुवाद-मूत, भविष्यत् और वर्तमान जितना प्रपंच है। वह सब
[७]
यदिदं वर्तमानं जगत्सर्व-पुरुष एवं, यवभूतमंतीतं जगत् यच्च मन्य
भविष्यजगत् तदपि पुरुपएव, यथास्मिन् कसे वर्तमानाः प्राणिदेहाः सपि
विराट् पुरुषस्यावयवाः तथैवातीतागामिनोरपि कसयोदृष्टव्यमित्यभिमायः उपिच
अमृतत्वस्य देवत्वस्यायमीशानः स्वामी, यद्यस्मात् कारणात् अन्नेन प्राणिनामनेन
भोग्येन निमित्तेनातिरोहति स्वकीयां कारणावस्थामतिक्रम्य परिदृश्यमानां जगद-
वस्थां प्रामोति, तस्मात् प्राणिनां कर्मफलभोगाय जगदवस्थास्वीकारानेदं तस्य
वस्तुतत्त्वमित्यर्थः ।। २॥
अनुवाद-जो यह वर्तमान भूत और भविष्यदात्मक जगत् है वह
'सम पुराण पुरुष रूपही है, जैसे इस कल्पमें वर्तमान प्राणिमात्रके शरीर विराट
पुरुपके अवयवमूत हैं तैसेही व्यतीत-भूत और अनागत-भविष्यत् प्राणिमात्रके
देह उस् विराट् पुरुपके अवयवभूतही हैं. और यह विराट् पुरुष अमृतत्वका
स्वामी है, प्राणिमात्रके भोगोपभोगके लिये अपनी कारणावस्थाको छोडकरके
दृश्यमान कार्यावस्था याने प्रपञ्चस्वरूपताको प्राप्त हुवा है, याने प्राणिसमूहको
कर्मफलोपभोग करानेके लिये इस्ने जगत्स्वरूप स्वीकृत किया है, उस विराट
पुरुषका पारमार्थिक स्वरूप तो कोइ विलक्षणही है. ॥ २ ॥
८१. ८ ४ १७ एतावानस्यमाहिमातोज्यायाँश्चपूरुपः ।
पादोस्यविश्वाभूतानित्रिपादस्यामृतदिवि ॥ ३ ॥
अतीतानागतवर्तमानरूपं जगघावदास्त एतावान् सर्वोप्यस्य पुरुषस्य
महिमा स्वकीयसामर्थ्यविशेषः नतु तस्य वास्तवं स्वरूपं, वास्तवस्तु पुरुषः, अतो
महिनोपि ज्यायानतिशयेनाधिकः। एतच्च उभयं स्पष्टीक्रियते-अस्य पुरुषस्य
विश्वा सर्वाणि भूतानि कालत्रयवर्तीनि प्राणिजातानि पादधतुर्थोशः, अस्य पुरुष-
स्यावशिष्टं त्रिपास्वरूपममृतं विनाशरहितं सत् दिवि द्योतनात्मके स्वकाश-
स्वरूपे व्यवतिष्ठत इतिशेषः। यद्यपि " सत्यज्ञानमनन्तंब्रह्मे " त्यामातस्य तस्य
परब्रह्मण इयचाया अभावात्. पादचतुष्टयं निरूपपितुमशक्यं तथापि जगदिदं ब्रह्म.
स्वरूपापेक्षयाल्पमिति विवक्षितत्वात्पादत्वोपन्यासः ॥ ३ ॥

[७८] प्रपंच नहि है, वास्तविक स्वरूपतो पुरुषरूपही है, इसलिये महिमासेमी अत्यन्त अधिक है, इन दोनों बातोंको स्पष्ट करते हैं-भूत भविष्यत् और वर्तमान इन् तीनो कालफे प्राणिसमूह इस पुरुषका चतुर्थ अंश है, और इस पुरुषका अवशिष्ट जो अंशत्रय सो नाशरहित है, और दिव्य याने स्वप्रकाश है. यद्यपि " सत्यं ज्ञानमनन्तंब्रह्म" इत्यादिक श्रुतिके अनुसार ब्रह्मस्वरूप देशकाल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न होनेसे उस (ब्रह्म ) का पाद ( अंश ) चतुष्टय निरूपण करनेको अशक्य है, तथापि "ब्रह्म स्वरूपकी अपेक्षासें यह सकल प्रपंच अल्प है" इस अर्थको प्रतिपादन करने के लिये पाद (अंश) त्वका उपन्यास है, याने प्रपंचकी भीतर रूपकद्वारा चतुर्थांशत्वरूप न्यूनत्व प्रदर्शित करके परब्रह्मका भूमत्व कहने के लिये यह अंशांशिभावकल्पना है. ॥ ३ ॥ ८२. ८ ४ १७ त्रिपादूर्ध्वउदैत्पुरुषः पादोस्येहाभवत्पुनः । ततोविष्वव्यंक्रामत्साशनानशनेअभि ॥ ४ ॥ • योयं त्रिपात्पुरुषः संसारस्पर्शरहितः ब्रह्मस्वरूपः योयमूर्ध्वः उदैत् अस्मा दज्ञानकार्यात्संसाराद्वहितः अत्रत्यैर्गुणदोषैरस्पृष्टः उत्कर्षेण स्थितवान् तस्यास्य सोय पादोलेशः सोयमिह मायायां पुनरभवत् सृष्टिसंहाराभ्यां पुनःपुनरागच्छति। अस्य सर्वस्य जगतः परमात्मलेशत्वं भगवताप्युक्तं-विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितोजगदिति । ततः मायायामागत्यानन्तरं विष्वड् देवतिर्यगादिकोण विविधः सन् व्यकामत् व्याप्तवान् । किं कृत्या? साशनानशने अमिलक्ष साशनं भोजनादि- व्यवहारोपेतं चेतनं प्राणि नातं लक्ष्यते, अनशनं तद्रहितमचेतनं गिरिनद्यादिकं, तदुभयं यथास्यात्तथा स्वयमेव विविधो भूत्वा व्याप्तवानित्यर्थः ॥ ४ ॥ अनुवाद-दिव्य और अविनाशि पाद (अंश) त्रय वाला संसारसंसर्ग. शून्य ब्रह्मस्वरूप अविद्याकार्यसंसारसे बहिर्भूत याने संसारान्तर्गत गुणदोप- समुदायसें असंपृक्त सर्वोत्कृष्ट जो यह पुरुष है इस पुरुषका एकही यह पाद (अंश अथवा लेश) इस मायामें उत्सत्ति और संहाररूपसे वारंवार गमनागमनको पाता है, याने उत्पति और नाशको पानेवाले घटपटादिक पदार्थ उस पुरुषकी सचासें अतिरिक्त सतावाले नहिं है, श्रीकृष्णनेंमी जगत्को ईश्वरांश बताया है " में (परिपूर्ण सचिदानन्दपन ) एक अंशसें इस समन प्रपंच को व्याप्त करके.

[७९] रहाहुं"। उसके बाद मायामें अवस्थित हो करके याने गायास्वरूपका स्वीकार करके देव, मनुष्य, पशु, पक्षी इत्यादिक विविधरूपसे विधमें व्याप्त हुबा, याने भोजनादिव्यवहारसहित सचेतन प्राण; और अनशन-भोजनादिव्यवहार- रहित अचेतन गिरिनदी इत्यादिक सकल विविधस्वरूपसें (एक अंशद्वारा) यह पुरुष सचराचरमें व्याप्त हुवा ॥ ४ ॥ ८३. ८ ४ १७ तस्माद्विराळंजायतविराजोअधिपूरुपः । सजातोअत्यरिच्यतपश्चाद्भूमिमयोपुरः ५॥ १७ ॥ विप्वङ् व्यकामदिति यदुक्तं तदेवात्र प्रपंच्यते-तस्मादादिपुरुषात् विराट् ब्रह्माण्डदेहः अजायत उत्पन्नः, विविधानि राजन्ते वस्तून्यत्रेतिविराट , विरा- जोषि विराड्देहस्योपरि तमेव देहमधिकरणकृत्वा, पुरुषः तदेहाभिमानी काश्चत् पुमानजायत, सोयंसर्ववेदान्तवेद्यः परमात्मा सएरा स्वकीयया मायया विराड्देहं ब्रह्माण्डरूप सवा तत्र जीवरूपेण प्रविश्य ब्रह्माण्डाभिमानी देवतात्मा जीवोऽभवत्। एतच्चावणिका उचरतापनीये विस्पष्टमामनन्ति-"सवाएपभूतानीन्द्रियाणि विराज देवताः कोशांश्चसधा प्रविश्यामूदोमूदइव व्यवहरनास्तेमायये"ति । स जातो विराट पुरुषः अत्यरिच्यत अतिरिक्तोमूत् विराव्यतिरिक्तो देवतिर्यड्मनुप्यादिरूपोभूत् , पश्चाद्देवादिजीवभावादूर्ध्वं भूमि ससर्जेतिशेपः. अथो भूमेः सृष्टेरनन्तरं तेषां जीवानां पुरः ससर्ज, पूर्यन्ते सप्तभिर्धातुभिरिति पुरः शरीराणि ॥ ५ ॥ १७ ॥ अनुवाद-पूर्व नन्त्रमें देवमनुष्यतिथंगादिक विविध स्वरूप जो कहे हुवेहैं उसीवातको विस्तारसे कहते हैं-उस आदि पुरुपसे विराट् ब्रह्माण्डदेह उत्पन्न हुवा, विविध प्रकारसे अनेक पदार्थ जिसमें विराजमान हो उसको "विराट् ॥ कहतेहैं । उस विराडू देहकी भीतर उस (देह) का अभिमानी कोइ पुरुष उसी (विराड्देह ) में प्रतीत हुवा, उसी (अभिमानी) पुरुषको समग्र वेदान्तका पेद्य बतातेहैं, वही पुरुष अपनी मायासें विराड़ देहात्मा ब्रह्माण्डको उत्पन्न करके और उसी देहमें जीवस्वरूपसें प्रविष्ट होकरके सकलब्रह्माण्डका अभिमानी देह जीव "ऐसे अभियानको प्राप्त हुवा. इसी बातको आवणिक लोक उचर- वापनीयोपनिषदमें स्पष्ट कहतेहैं " वही परमात्मा भूत इन्द्रियवर्ग विराड्देहे तदिन्द्रियादिककी देवता और अन्नमयादिक पञ्चकोशोंको प्रकट करके और [40] उसी समुदायमें स्वयं प्रविष्ट हो करके नित्यप्रकाश ज्ञानस्वरूप होते हुवेभी। मुहकी तरह मायासें व्यवहार करता हुवा अवस्थित है." विराड् देहमें पादु- र्भावको पायाभया यह तदभिमानी देव विराड् देहसें अतिरिक्त है, देव मनुष्य तिर्य- गादि, विविध रूपसे प्रतीत होता है. देवमनुप्यादि करके (व्यष्टि ) शरीरमें जीव. भावापन्न होनेकेबाद भूमिको वह (देव) उत्पन्न करतामया, और भूमिके बाद उन् जीवोंके निवास योग्य शरीरोंको रसादिक सप धातुओंसे उत्पन्न करता भया ॥५॥ ८४. ८ ४ १८ यत्पुरुपेणहविष देवायज्ञमन्वित । वसन्तोअस्यासीदाज्यप्रष्मिइंधम शरदविः ॥ ६ ॥ यद्यदा पूर्वोक्तक्रमेणैव शरीरेपूत्पन्नेषु सत्सु देवा उत्तरसृष्टिसिद्धयर्थ बाब- द्रव्यस्यानुत्पन्नत्वेन हविरन्तरासंभवात् पुरुषरूपमेव मनसा हविष्टेन संकल्प्य पुरुषेण पुरुषान्येन हविषा मानसं यज्ञमतन्वत अतनिषत, तदानीमस्य यज्ञस्य वसन्तो वसन्तर्तुरेवाज्यमासीत् अभूत् तमेवाज्यत्वेन संकल्पितवन्त इत्यर्थः, एवं प्रीम इधम आसीत् तमेवेध्मत्वेन संकल्पितवन्तः, तथा शरद्धविरासीत् तामेव पुरो- डाशाभिघहविष्टेन संकल्पितवन्त इत्यर्थः । एवं पुरुषस्य हविःसामान्यरूपत्वेन संकल्पः, अनन्तरं वसन्तादीनामाज्यादिविशेषरूपत्वेन संकल्प इति द्रष्टव्यं ॥६॥ अनुवाद-जिस समय पूर्वोक्त 'क्रमसें समग्रदेह उत्पन्न हो चुके उसके बाद उचर सृष्टिफेलिये बाह्य द्रव्यको उत्पत्ति न होनेसे और हविष्यान्तरके अभाव होनेसे देवोंने पुरुषस्वरूपहीको हविष्यके तौर पर संकल्पित करके मानस यज्ञका विस्तार किया. उस समय उस मानस यज्ञमें वसन्त ऋतुको आज्य (हवन करने योग्य घृत) स्वरूपसें संकल्पित किया, और ग्रीष्मऋतुको समिद्रूपसें संकल्पित किया, और शरस्तुको पुरोडाशादिक हविष्यरूपसे संकल्पित किया, याने "प्रथम पुरुषस्वरूपका हविष्यसामान्य रूपमें संफल्म करने के वाद वसन्तादिक ऋतु- ओंको आज्यादिविशेष स्वरूपसे (देवोन) संकलित फिये" ऐपा समझना.॥६॥ ८५. ८ ४ १८ तंयज्ञबहिपिपांक्षन्पुरंपंजातर्मग्रतः । ते देवायजन्तसाध्यामपंपश्चये ॥ ७ ॥ .

14 - [१] यज्ञं यज्ञसाधनभूतं तं पुरुपं पशुत्तभावनया यूपे नई बहिरि मानसे यहे, प्रौशन प्रोक्षितवन्तः, कीटशामित्यवाह-अमृत सर्ववृष्टे पूर्व पुरुष जातं पुरुषत्वेनोपन, एतच्च मागेवोक्तं "तस्माद्विराळजायत विराजो अधिपूरुष" इति। तेन पुरुषलोण पशुना देवा जयजन्त, मानसयागं निष्पादितवन्त इत्यर्थः, के ते देवा इत्यत्राह-साध्या: सृष्टिसाधनयोग्याः प्रजापतिप्रभृतयः तदनुकूला ऋरयो मंत्रद्रष्टारश्च ये; सन्ति,ते सर्वेप्ययजन्त इत्यर्थः ॥ ७॥ अनुवाद-सृष्टिके पूर्वालमें प्रादुर्भूत और यज्ञीय कर्म साधनभूत उस पुरुषको पशुत्व भावनासे यूप ( यज्ञीयपशु बन्धनस्थान ) में (स) बद्ध करके मानसिक यज्ञमें देवतालोक मोक्षण करनेलगे. यह कथा पश्चममन्त्रमें कहचुके हैं की "उस आदि पुरुषसे ब्रह्माण्डदेह उत्पन्न हुवा और उसी देहमें तदभिमानी कोइ पुरुष प्रतीयमानं हुया"। इस पुरुषरूप में देवताने मानपयाग सिद्ध किया, सृष्टिके सामनों तत्पर प्रजापति वगैरह और उनके अनुकूल मन्त्रद्वेष्टा ऋषि लोक जो हैं वे सभी लोक मानस याग करने लगे. ॥ ७ ॥ ८६. ८ ४ १७ तस्माबजारसर्वहुनः संभृवं पृपदाज्यम् । पशून्तोश्चक्रे वायव्यो नारण्यान्याम्पाश्चये ॥ ८ ॥ . - सर्वहुतः सर्वात्मकः पुरुषो यस्मिन्यज्ञे हुयो सो। सर्वहुतः तादृशात. स्मात् पूर्वोत्तात् मानसाधना पदाज्यं दविभिश्रमाज्यं संभृत संपादित दधि चाज्यं चेत्येवमादि भोगातं स संपादितमित्यर्थः, तथा वायव्यान् वायुविता. कान् लोकप्रसिद्धान् आरण्यान्पशूश्चक्रे उत्पादितवान् आरण्या हरिणादयः । तथा येच प्राम्या गवाश्चादयस्तानपि चक्रे ॥८॥ अनुवाद-पमिक पुरुषका जिसमें यजन होता है ऐने इस मानसिक यजय दधिभित्रित आज्य (1) संपादित हुवा, यानें . यह उपलक्षम है, दषि और आज्यको आदि लेकरके सकल भोपसमूह- संपादित किया. और वायु- देवतावाले हरिणादिक जंगली प्राणी ओंको; संपादित किये, और जो ग्राम्य पशु गो अध महिप्यादिक हैं. उनकोभी संपादित किये ॥८॥ ११ - [८२] . १७.८ ४ १८. तस्माज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जझिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्माधजुस्तस्मादजायत ।। ९॥ सबहुतस्तस्मासूक्तिाद्यज्ञाद ऋचः सामानि च जज्ञिरे उत्पन्नाः, तमाय- ज्ञात् उन्नांसि गायच्यादीनि जज्ञिरे तस्माद्यज्ञात् यजुरप्यजायत ॥९॥ अनुवाद-सर्वहुत नामक उसी मानसयज्ञमें ऋग्वेद और सामवेद प्रादुर्भावको पाये, और उसी यज्ञमें गायत्री उष्णिक यहतीत्यादिक छन्द मी प्रादुर्भावको पाये, यजुर्वेदभी उसी यज्ञहीसे प्रादुर्भूत हुचा ॥९॥ २८. ८ १ १८. तस्मादचा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावे ह जज्ञिरे तस्माचस्माज्जाता अंजावर्यः॥१०॥१८॥ तस्मात्पूर्वोक्ताद्यज्ञात् अश्वा अजायन्त उत्पन्नाः, तथाये के चाधव्यतिरिक्ता गर्दभा अश्वतराश्चोभयादत ऊर्ध्वाचोभागयोः उभयोर्दन्तयुक्ताः सन्ति येषां तेषि तस्मादजायन्त, तथा तस्माद्यज्ञात् गावश्च जज्ञिरे, किंच तस्माद्यज्ञादजा अवयश्च जाताः ॥ १० ॥१८॥ अनुवाद-उसी पूर्वोक यज्ञसें अध प्रादुर्भावको पाये, और जोकी अश्वातिरिक्त गर्दम अश्वतरादिक (मुखान्तर्गत) उपरनीचे दोनों जगापर दन्तवाले पशु उष्ट्रादिक वेभी उसी यज्ञसे प्रादुर्भूत हुवे. और उसी यज्ञमेसें गो अज अधि याने गैया बकरी भेडी (मेटी ) इत्यादिक सब प्राहुर्भूत हुवे ॥ १० ॥ ८९, ८ ४ १९ यत्पुरुपं व्यदधुः कतिधा व्यंकल्पयन् । मुकिमस्य को वाहू का ऊरू पादौ उच्यते ॥ ११ ॥ प्रश्नोत्तररूपेण ब्राह्मणादिसष्टं वक्तुं ब्रह्मवादिनांप्रनाउच्यन्ते-प्रजापतेः प्राणरूपा देवा यद्यदा पुरुष विराडपं व्यदधुः संकल्लेनोत्पादितवन्तः तदानी कतिया कनिमिः प्रकारे व्यकल्पयन् विविध करितवन्तः, अस्य पुरुषस्य मुसं किमासीव, को बाह अभूतां, का ऊरू, कौ च पादो उच्यते, प्रथमं सामान्यरूप- प्रश्नः पश्चात मुख किशमत्यादिना विशेषविषयाः प्रभाः ॥ ११ ॥ --

?
[८]
अनुवाद-प्रश्नोत्तररूपसे व हागादिककी सृष्टिको प्रतिपादन करने
लिये ब्रह्मवादियों के प्रश्न कहते है-प्रजापतिले प्राणरूप देव जिस समय उम्।
विराट् पुरुषको संकल्पित करते भये उस समयमे कितने प्रकारसे कल्पना हुइ,
इस पुरुषका मुख क्या था ? उस् पुरुषके वाहुद्रय कौन थे ? और ऊद्वय तथा
पादद्वय कौन थे ? यह प्रश्न पहिले सामान्यरूपसे कहे करके इसके बाद मुखा.
दिकमवयविषयक विशेष प्रश्न है. ॥ ११ ॥
९०. ८ ४ १९ ब्राह्मणास्यमुखमासद्धिाहूराजन्यःकृतः ।
अरूतदस्ययद्वैश्यः पद्यांशूद्राअंजायत ॥ १२ ॥
,
इदानी पूर्जेक्तप्रश्नानामुत्तराणि दर्शयति-अस्य प्रजापते ब्राह्मणो ब्राह्मणत्व-
जातिविशिष्टः पुरुषो मुखमासीत् मुखादुत्पन्न इत्यर्थः, योय राजन्यः क्षात्रेयस जाति-
विशिष्टः स बाहकृतः बाहुत्तेन निष्पादितः बाहुभ्यामुत्पादित इत्यर्थः, ततदानी-
मस्य प्रजापतेः यद्यौ उरू द्रूगे वैश्यः संपन्न करुभ्यामुत्पन्न इत्यर्थः, तथास्य पद्भ्यां
पादाभ्यां शूद्रः शूद्र वजातिमान् पुरुषोजायत, इयंतु मुग्वादिभ्यो ब्राह्मणादोना-
मुत्पत्तिः यजुःसंहितायां सप्तमकाडे" समुखतात्रवृतनिरमिमीत" इत्यादौ विस्पष्ट-
मामाता । अतः प्रश्नोतरे उभे अपि तत्परत्वेनैव योजनीये ॥ १२ ॥
अनुवाद -अब पूर्वोक्त प्रश्नों के उत्तर कहते है-ब्राह्मणत्वजातिवाला
पुरुष इस् प्रजापति ( परमात्मा ) का मुख है, याने ब्राह्मणोंको मुखसे प्रकट
किये है. क्षत्रियत्व जातिवाला पुरुष इस (प्रजापति ) का बाहु (हस्त ) है,
यानें क्षत्रियोंको बाहुदयसे प्रादुर्भन किये है. ऊरुद्वयसें वैश्यका प्रादुर्भाव किया
है. और चरणद्वयसे शूद्रका प्रादुर्भाव किया है. मुवादिकसे ब्राह्मणादिकके
प्रादुर्भावका यजुःसहिताके सप्तमकाण्डमें स्पष्ट कथन कियाहै, "परमेश्वरने मुग्वसें
त्रिवृतका निर्माण किया " इत्यादि । इस लिये इन् प्रश्न और उत्तरों का
इसमें तात्पर्य है ॥ १२ ॥
९१. ८ ४ १९ चन्द्रमामनसोजातश्चक्षोः सूर्योअजायत ।
मुखादिन्द्रश्यामिश्चमाणाद्वायुरंजायत ॥ १३ ॥

[८१] यथा दध्याज्यादिद्रव्याणि गवादयः पशः ऋगादिवेदाः ब्राह्मणादयो मनुष्याश्च तस्मादुत्पन्ना एवं चन्द्रादयो देवा अपि तस्मादेवोत्पन्नाइत्याह-प्रजापते ननसः सकाशात् चन्द्रमा जातश्चक्षाश्चक्षुष. सूर्योप्यजायत, अस्य मुखादिन्द्रश्चाग्नि- श्च देवावुत्पन्नौ, अस्य प्राणाद्वायुरजाय स. ॥ १३ ॥ अनुवाद-जैसे दधिवृतादिक द्रव्य गैयाअजादिक पशु ऋगादिक वेद ब्राह्मणादि मनुष्य यह सब उस परमेश्वरसें प्रादुर्भूत हुवे हैं तैसेही चन्द्रादिक देवभी उसी (परमेश्वर) से प्र दुर्भाव पाये हुवे हैं ऐसा कहते है-उस प्रजापति (परमेश्वर ) के मनसें चन्द्र प्रादुर्भुत हुवे, और चक्षुसें सूर्य प्रादुर्भूत हुवे. और मुखमैं इन्द्र और अग्नि, और प्राणसे वायु यह सब प्रादुर्भूत हुवे॥१३ ।। ९१. ८ ४ १९ नाभ्याआसीदन्तरिसंशीर्णो द्यौः समवर्तत । पयांभूमिर्दिशःश्रोत्रात्तालोकाँकल्पयन् ॥१४ ॥ . यथा चन्द्रादीन् प्रजापतेमनःप्रभृतिभ्यो कल्पयन्, तथान्तरिक्षादीन् लोकान् प्रजापते भ्याविभ्यो देवा अकल्पयन् उत्पादितवन्तः, एतदेवदर्शयति-नाभ्याः 'प्रजापते नमिरन्तरिक्षमासीत् , शीनः शिरसो द्यौः समवर्ततोत्पन्ना, अस्य पद्यां भूमिरुत्पना, अस्य श्रोत्रादिश उत्पन्ना इति ॥ १४ ॥ अनुवाद-जैसें चन्द्रदिक प्रादुर्भावकी कल्पना देवी ने प्रजापति (पर- मेश्वर ) के मनआदिक इन्द्रियों से की है तैसेही अन्तरिक्षादिक लोकोंकोभी देवोंने प्रजापतिके नाभ्यादिक अवयवोंसे सकल्पित किये हैं, सो कहतेह-उस् प्रजापति की नाभिसे अन्तरिक्ष लोक प्रकट हुवा. मस्तम्से द्युलोक ( स्वर्ग) प्रकट हुवा. चरणद्वयसे भूलोक प्रकट हुवा, और इस प्रजापति (परमेश्वर) के श्रोत्र (कर्ण) से दिशायें प्रकट हुई ॥ १४ ॥ ९३. ८ ४ १९ सप्तास्यासन्परिधयात्रिः सप्तसामि कृताः । देवायद्यतन्वानाअन्पुरुषपशुम् ॥ १५ ॥ अस्य साकल्पित्य यज्ञस्य गायत्र्यादिनि सप्तच्छंदांसि परिचय आसन् ऐष्टिकस्याहवनीयस्य त्रयः परिधयः, उत्तरवेदिकासया, मादित्यश्च सप्तमः परिविः [८५] प्रतिनिधिरूपाः, असएचाम्नायते " नपुरस्तात्परिवघ्यादित्यादित्यापोधन पुरस्ताद- सांस्यपहन्तीति। तत एते आदित्यसहिताः सप्त परिचयोन सप्तच्छंदोरूपाः, तथा सामिष त्रिसप्त त्रिगुणिताः सप्तसंख्या का एकविंशतिः कृता । द्वादश मामा पंच वषय इमे लोका अभावादित्य एपिंग इति. एते पदार्था. एकशिनिदाहालमत्वेन भाविताः यद्यः पुरुषो वैगजोस्ति पुरुषं देगः प्रजापतिमाणेन्द्रियरूगः यज्ञ तन्वानाः मानसं यज्ञं कुर्वाणाः पशुभयनन् विगट्पुरुपमेव पशुत्वेन भातिवन्तः, एतदेवाभिप्रेत्य पूर्वत्र पुरुषेण हविषेत्युक्तम् ॥ १५ ॥ अनुवाद-संकल्पासिद्ध इस मानस यज्ञके गायञ्यादिक सप्तन्छन्द परिधि (तेजोमण्डलस्थानापन) थे, याने ऐष्टिक जो माहनीय है, उसके तन परिधि और तीन उत्तर वेदिका और सप्तम परिधेि सूर्य, यह सब प्रतिनिधिरूप है. श्रुतिौभी कहा है की- " अग्र भागसें परिधान करना नहि, क्यों की उद- याभिमुख सूर्य अग्र भागसें राक्षसों का संहार करते हैं." इस लिये गायब्यादिक सप्तछन्द आदित्य सहित सप्त परिधि है, और एकवीश समिध है. १२ मास ५ ऋतु भूरादि ३ लोक और १ सूर्य यह सब पदार्थ समिधरूपसे संभावित किये हैं. जो वैराज पुरुष है उसको प्रजापति प्राण और इन्द्रियरूप देव मानस यज्ञ निमित्त पशुत्वकी भावनासे यज्ञीय यूपमें बन्धन करने लगे. इसी अभिप्रायसे पूर्वमें पुरुषकोही विषय कहाहै, नरमेध करने के लिये पुरुषको पशु कहा नहिं है ॥ १५॥ ९१. ८ ४ १९ यज्ञेनयज्ञमयजन्तदेवास्तानिधर्माणिपयमान्यांसन् । तेहनामहिमान सचन्तयत्रपूर्वसाध्या सन्तिदेवाः॥१६॥ १९ ॥ . है पूर्व प्रपंचेनोक्तमर्थ संक्षिप्यात्र दर्शयति-देवाः प्रजापतिपाणरूपाः यज्ञेन यथोक्तेन मानसेन संकलेन यज्ञ यथोक्तमजसरू प्रजापतिमयजन्त पूजित- वन्तः, तम्मापूजनात् तानि प्रसिद्धानि धर्माणि जादूरविकाराणा धारकाणि प्रथ- मानि मुख्यभूतान्यासन् , एतावता सृष्टिपतिमादितसूक्तभागार्थ. संगृहीत । अयो- पासनवत्फलानुवादकमागार्थ. संगृह्यते-यत्र यास्मन्विराट प्राप्तिरूपे नाके में साध्याः पुरातना विराडु मस्तिसाधका देवाः सन्ति तिष्ठन्ति, तन्नाकं विराट- [८६] प्रातिरूपं स्वर्ग ते महिमानः तदुपासका महात्मानः सचन्त समवयन्ति प्राप्नु वन्ति ॥ १६ ॥ १९॥ अनुवाद-प्रथम विस्तारसें कहे हुवे अर्थको अब संक्षेपसे कहते हैं- प्रजापति और प्राणरूप देव मानस संकल्प पूर्वोक्त यज्ञस्वरूप प्रजापति (पर- मेश्वर ) का यजन करते भये, उस् यजन (पूजन ) से प्रपंचरूप विकारोंको धारण करनेवाले सुप्रसिद्ध मुख्य धर्म प्रचलित हुवे. इम् अर्थसे सृष्टि प्रतिपादित सूक्तभागका अर्थ गृहीत हुवा। अब उपासना और उसके फलको अनुवाद करनेवाला भाग संगृहीत करतेहै- जिस् विराट् ( परमेश्वर ) की प्राप्तिरूप स्वर्गमें साध्य-विराकी उपासना करनेवाले प्राचीन देव अवस्थित है परमेश्वरको प्राप्तिरूप उस स्वर्गको उस विराट्की उपासना करनेवाले महात्मा लोक अवश्य प्राप्त होते है. ॥ १६ ॥ १९ ॥ ९५. ८ ६ १६ धर्मा समन्ता त्रिस्तं व्यापतुस्तयोर्जुष्टिं भातरिश्वा जगाम। दिवस्पयोदिधिपाणा अवेपन्विदुर्देवाः सहसा मानम॥१॥ समंतौ संगतौ धर्मों स्वयंदीप्यमानी जीवेश्वरी त्रिवृतं सत्वरजस्तमोगुणा- त्मिकां माया व्यापतुः नियन्तृनियन्तव्यभावेन । मातरिश्वा परमात्मा तयोर्जुष्टिं संभोक्तव्यपदार्थैः संजातां प्रीति जगाम गतवान् , तं परमात्मानं वेदमयम् इमं "सूर्यम्" इति देवा जानन्ति ॥ १ ॥ अनुवाद-हमेशा साथ रहनेवाले और स्वयंप्रकाशरूप जीव और ईश्वर नियम्यनियन्तृभावसे सत्व रज और तमः इन् तीन गुणवाली मायाको व्याप्त करते भये, अर्थात् ईश्वर मायाको वश करके उसका नियन्ता, और जीव मायाका वशीभूत होके उसका नियम्य बना, और परमात्माकी जो सोपाधिक चेतनात्मक जीवेश्वरसें पर है सो उन दोनोंकी तत्तत्वार्यविषयक प्रवृत्तिको जानते भये. उस वेदमय परमात्माको "यह सूर्य है " ऐसा देवतालोक जान है. १ ॥ ९६. ८ ६ १६ तिस्रोदेष्टायनितारुपासतेदीर्घश्रुगोविहिजाननियः । तासानिचिपयुकपोनिदानपरेपुयागुरोपुव्रतेषु ॥ २ ॥ "

[८७]
निर्गती निशेिषण ऋच्छने गरछनीति निर्जयः वास्तिसः सृष्टि-
रितिसं इतीः देष्ट्र य अत्मनः कर्मभोगदानाय उपासते, ते दीर्घश्रुतः दी समारे
श्रृतः मन्तव्यदृश्यादिग्दार्थ जानन्तः मंत्रदृष्टयादिरूपमजानन्द इत्यर्थः
.अतएव वद्वयः स रस्य वोदार. ता न जानन्ति, कवयः कान्तदर्शिनस्तु तासा
सृष्टयादीनामान्यादीनां वा निदान मूलकारणं परमात्मनं निचिक्यु नितगं चिन्वन्ति
जानन्ति, परेषु उत्कृष्टेषु वा गुह्येप गोतव्येषु कर्मसु यमनियमादिषु वनेषु याः
प्रकृतयः सन्ति तासा निदानं निचिक्युः जानन्ति. ॥ २ ॥
अनुवाद-वेदान्तशालोपदिष्टसाधनसमूहद्वारा तत्त्वदृष्टिकोन संपा-
दन करनेसें आदिभूत परमेश्वरको यथार्थ नहिं जाननेवाले और इसी लिये
समग्र प्रपंचका अवास्तविक भारको ढोने ( उठाने ) वाले अज्ञ लोक हसवर्ण-
न्तर्गत किसी एक अनुत्तम पदार्थके ज्ञानसें अपने को कृतार्थ मान करके कर्म-
फलोपभोगार्थ (देहकी ) उत्तति स्थिति और प्रलयरूप निमंतिकी उपासना
करतेहै, याने आत्मसाक्षात्कारमें विमुख होकर बाद्यवृत्तिद्वारा शोभनाध्याममें तन-
पदार्थकी प्राप्तिमें कृतार्थता मानते हुवे विविध योनियोंमें जन्म लेने के बाद
पूर्वोपार्जित पुण्यपापके फलको तवत् लोकमें स्थित होकरके भोगते है, और फलके
अवसानमें स्वयंमी अवसन्न होकरके मलयात्मक मृत्युको प्राप्त होते है, एवं
जन्मानन्तर मरण और मरणानन्तर जन्मको हमेशा पाते रहते है. लेकिन अन्त-
मुखचिद्वारा आत्मसाक्षात्कारमें प्रवृत्त होवे नहि. और कवि-पान्तशी
सम्यग्ज्ञानवाले महात्मा लोक सृष्टि और संहारका कारण अथवा अग्न्यादिकका
कारणरूप परमेश्वरको यथार्थ रीतिसें जानते है, और उत्कृष्ट अथवा गुप्त जो
जपादिक कर्म है, किंवा यमनियमादिक अथवा ब्रह्मचर्यादिवतो जो प्रवृत्ति है
सोकिनिमित्तक है ? याने उस प्रवृतिमा उद्देश क्या है ? उम् उद्देशको भी
परमात्मरूपही जानते है, याने जपादि यमनियमादिक साधनसमूहसें चिव
वृचिकी एकामत द्वारा परमात्मस्वरूप परमपदकी प्रा होती है ऐसा ज्ञानी
लोक समझते है, और अज्ञानीलोकनकी भावना इससे विपरीत होती
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रहती है. ॥२॥

भवत', . [८८] ९७. ८ ६ १६ चतुष्कपर्दायुवतिः सुपेशौ घृतमतीकावयुनानिवस्ते । तस्यासुपर्णावृषणानिपेदतुर्यदेवादधिरेभागधेयम् ॥३॥ चतुष्कपर्दा नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्चत्वारः कपर्दस्थानीया यात्या सा युवति स्तरुणी नित्या घृतप्रतीका दीप्यमानवर्णावयवा एषा औपनिपदी वाक् वयु- नानि ज्ञानानि वस्तै आच्छादयति, तस्यां वाचि सुपर्णा सुपौँ जीवपरमात्मानी निषण्णौ यया वाचा देवा भागं धारयन्ति ॥ ३ ॥ अनुवाद-शब्द तिड्प्रत्ययान्त धातु उपयर्ग और निपात (अव्यय) एतच्चतुष्टयात्मक वर्णन्दरूप कबरी (पेणी) को धारण करनेवाली और देदीप्य- मान वर्णरूपअवयववाली और पूर्ण यौवनवाली यह उपनिषत्संवन्धि वाणी ज्ञानको आच्छादित करके याने ज्ञानको अपनी भीतर रख करके सदा वर्तमान है, उसी उपनिषद्वाणीमें जीवात्मा और परमात्मा गुप्तरूपसे रहे हुवे हैं, की जिस वाणीसें देवतालोक अपने अपने भागले ग्रहण करते है. ॥ ३ ॥ ९८. ८ ६ १६ एकः सुपर्णः ससंमुद्रमाविवेश सहदविश्वंभुनविचष्टे । तंपानमनसापश्यमन्तितस्तंमातारेहिसरोहिमातरम्४॥ मुपर्णः पक्षवान् निराधारसंचारी एकः प्राणवायुः परमात्मा वा समुद्रं समुद्रन्ति आपोस्मादिति समुद्रमन्तरिक्ष, यद्वा समुद्रव सर्वनोगमनं तच्छील प्रपंच. जातमाविष्टवान् "सृष्ट्रातदेशानुप्राविशदि" ति श्रुते -(तेचिरीय २-२-६) वायु पक्षे वाय्वादिरूपेणाविवेश सइदं विश्व सर्व लोकं विचष्टे विशेषेण ख्यापयति, सति हि प्राणे परमात्मनि वा जीवन्त. पुरुषा लोक विरयात कुर्वन्ति, त देव उपासहं पाकेन परिपक्वज्ञानेन मनसा अन्तित अन्तिके समीपे स्वहइये अपश्यं, तंमाणं माता वाक् रेहि वाक् प्राणेन्तर्भवतीत्यर्थ ।स्वापे हि वा यापागे न दृश्यते प्रण. व्यापारस्तु दृश्यतइति ॥१॥ अनुवाद-रक्षवान् निराधार अन्तरिक्षादिक स्भलमें गमन करनेवाला असहाय प्राणवायु अथवा परमेश्वर अन्तरिक्ष अथवा प्रपचमें प्रधिष्ट हुवा "तत्त- वा तदेवानुपाविशत् " उस् प्रपंको उत्पन्न करके उसमें (परमारमा ] अनु- .

. - उथ उपथानि उत्कृष्टान्यङ्गानि विद्यन्ते। प्राणिदेहपु जातेषु द्यावापृथिव्योः याव- [८२) प्रविष्ट हुवा, वायुपक्षमें वारवादिस्वरूपसें आविष्ट हुवा, वही - परमात्मा ; इस समग्र विश्वको अधिकरूपसें विस्तृत करता है, और यह बात उपपन्न भी है की परमात्मा किंवा प्राणात्मक वायुकी सहायताहीसे लोक जीवनको धारण कर सकें। है. उस देवको में उपासक परिपकज्ञानवाले मनसे अपने हृदयमें साक्षात्कार करता हुं. इसी (परमात्मा किंवा प्राण में यागिन्द्रिय अन्तर्भूत होताहै; निद्रित होने पर वाव्यापार : बंध होता है, “तयापि प्राणव्यापार तो यथापूर्व, अवस्थितही रहता है. ॥ ४ ॥ १९. ८ ६ १६ सुपर्णधिमकवणेवचौभिरेकंसन्तंबहुधाल्पयन्ति । छन्दांसिचदुर्घतोअध्वरे पुग्रहान्त्सोमस्पीममतेद्वादश ॥५॥१६॥ विप्रा मेधाविनः कवयः कान्तमज्ञाः मनुभ्याः सुपर्ण सुपतनने सन्तं. परमात्मानं वचोभिः स्तुतिलक्षणैर्वचनै बहुधा बहुप्रकारं कल्पयन्ति कुर्वन्ति ।' किंच त एवं कवयः अध्वरेषु यज्ञेषु छन्दासि गायध्यादीनि सप्त छंदासि दस्तः स्तोत्रशलादिना धारयन्तः द्वादश संख्याकान् सोमस्य ग्रहान् ग्रहणसाधनानि, पात्राणि उपाधतर्यामादीनि मिमते. ग्रहान् गृह्यते एभिरिति ग्रहाः ॥५॥१६॥ अनुवाद-बुद्धिवान् और सर्वातिकान्त पदार्थको जाननेवाले पण्डित- लोक, सर्वत्र व्यापक इस परमात्माको स्तोत्रात्मक वचनोंसें यह पारमार्थिक स्व- रूप एक होनेपरभी अनेक प्रकारसे कहते हैं. और वहीं पण्डितलोक यज्ञादिकम , स्तोत्रशस्त्रादिकसे गायत्र्यादिक सप्त छन्दोंको धारण करके सोमके धारक अन्त- यामादिक द्वादशपात्रों का निर्माण करते हैं.।।५।। १००. ८ ६ १७ सहस्रधार्पञ्चदशान्युक्थायावद्दयावापृथिवीतापदित्तत् । सहलघामहिमानःसहयाद्रमविष्ठिनंतावतीवाक् ॥८॥ सहस्रधा सहस्रसंख्याकेषु ब्रह्मादिस्तवपर्यन्तेषु देहेषु पंचदशानि चक्षुः. श्रोत्रं मनो वाक् प्राण इत्येतानि पंच, तदाधारत्वेन मातात्रिोः सकाशात् आगतानि पृथिव्यप्तेज बाध्यकाशरूपाणि भूतानि मिलितानि दश, एवं पंचदशसंख्या कानि - परिमाणमस्ति तावदित् तत्परिमाणमेव आत्माधिष्ठित माणिदेहजातं गति । किंच सहस्रधा सहसंख्याकेषु सहस्र महिमानः सहस्रसंख्याका महान्तो व्यवहार विशेषा भवन्ति, प्रतिविषय प्रतिलक्षणं दर्शनश्रवणादिव्यवहारनिप्पत्तेः, सहस्र- धेत्यत्र ब्रह्म जगत्कारणं वस्तु यावत् नानाविषप्राणिदेहरूपेण यावत्परिमाणं भूता' विष्ठित विशेषेण स्थितं, वाक् तावती तत्परिमाणा भवति, एकैकस्याभिधेवार्थ- स्यैकैकनामापेक्षणात् । अन्यत्रापिश्यते- "सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नाम नि कृत्वाभिवदन्यदास्त " इति (वैतिरीय आरण्यके ३-१२-७) 11८11 अनुवाद-मासे लेकरके स्तम्बपर्यन्त अनेक देहम कार्यात्मक अपंचीकृत चक्षुः श्रोत्र मन वाणी और प्राण यह पांच, और कारणात्मक अपंचीकृत पंच महाभूत, और पंच पंचीकृत महामून की जो अपने मातापिताके पाससे शरीरमें अनुगत है, एवं सब मिलके पंचदश उत्कृष्ट अंग उत्पन्न होनेवाले प्राणिदेहन्में होतेहैं । आकाश और पृथ्वीका जितना परिमाण है उत्तनाही परिमाणवाले आत्माधिष्ठित प्राणिके शरीर होत है, और अनेक : (त्व ) संख्यावाले उन् देहोंमें बडे बडे बहुत व्यवहार हो रहे हैं. प्रत्येक विषयों में और प्रत्येक लक्षणों में दर्शनश्रवणादिक व्यवहार प्रत्यक्ष अनुभूयमान है. जगत्का कारणभूत परमात्मा विविध प्राणिन्के देहस्वरूपसें तावत्परिमा- णक मायाद्वारा बनके अवस्थित हैं, उतने परिमाणसे वाणीभी विस्तृत है, क्योंकी सचराचर प्रपंचमें जितने अभिधेय अर्थ हैं उनका बोध करनेके लिये नाम- वांग्रूपशब्दकी आवश्यकता है, श्रुति भी कहा है की " सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर नामरूपात्मक इस् प्रपंचको उत्पन्न करके और जीव स्वरूप, उसीमें प्रविष्ट हो करके अभिवदन-वचनादिव्यापारवान होता है " ||८|| १०१. ८ ६ १७ कश्छन्दसायोगमाघीर कोधिष्ण्यांपतिवाचंपपाद । : फमृत्विनामष्टमंशूरमाहुईरोइन्द्रस्यनिचिकायकःस्वित् ॥९॥ धारो धीमान् को मानुपः छन्दसां गाय यादीनां योगं स्तुतशखात्मना योगमावेद आजानाति । कोवा पिण्यां विष्ण्यानि होत्रादीनां सप्त स्थानानि तदही वाचं प्रतिपपाद प्रतिपादयति करोति । किंच ऋविजा होत्रादीनां सपानां अष्टम अष्टसंख्यापूर शूरं स्वतंत्र कमाहुः वदन्ति | क: स्वित् कः खलु इन्द्रस्य हरी ऋसामरूपो दापश्वी " ऋक्सामे वा इन्द्रस्य हरी" इत्याम्नायते, ताइची हरी 1 . [११] निचिकाय नितरां पूजयति जानाति वेदिता प्रतिपादायिता अष्टसंख्यापरिपूरकस्य देवस्य ज्ञाताया परमात्मनोऽन्योनास्तीत्यर्थः ॥९॥ अनुवाद-कौन बुद्धिमान् पुरुष गायत्र्यादिकछन्दके योगको स्तुशल- स्वरूपसे जानता है। कौन पुरुष होता अध्वर्यु इत्यादिकके समस्थानोंको और तदुचित वाणीको प्रतिपादन कर सका है ! और होता इत्यादिक सप्त ऋत्विजोंमें अष्टम पुरुष स्वतन्त्र कौन है ? इन्द्रके ऋक्सामरूप दोनों अश्व कौन हैं। और वैसे अश्वकी पूजा ( कौन ) करताहै?। गायब्यादिक छन्दोंके योगको जानने चाला सप्तस्थान और तदुचित वाणीको करनेवाला अष्टमत्व संख्यावाले स्वतंत्र देवको यथार्थ जाननेवाला परमात्मासे अतिरिक्त कोई हैही नहि.॥९॥ १०२. ८ ७१ ॐम् तदिदास भुवनेपुज्येष्ठयतोजज्ञउग्रस्त्वेषम्गा सयो जंज्ञानोनिरिणातिशत्रूननुयविश्वेमदन्त्यूमाः ॥१॥ तत् जगत्कारणत्वेन सर्ववेदान्तप्रसिद्ध भुवनेषु (भूसचायां) सत्सु पृथिव्यादिषु लोकेषु मध्ये जगत्कारणं ब्रह्मैव ज्येष्ठं प्रशस्ततममास बभूव । तस्य परमार्थत्वात् तद्यतिरिक्तानां व्यावहारिकत्वाच । यद्वा ज्येष्ठं वृद्धतमं जगत्कारण- खेन सर्वेपामादिभूतं बभूव । यद्वा वृद्धं तदेव ब्रह्म स्वप्रकाशतया आस. यतउपादान. भूतात् यस्माद्ब्रह्मणः उग्रःउद्गुर्णः त्वेषनम्णः प्रदीप्तबल: सूर्यात्मक इन्द्रः जज्ञे जातो बमूव । श्रूयते हि-" चक्षोः सूर्यो अजायतेति " (ऋ. सं. ८-१.१९) "सूर्या चन्द्रमसौघाता यथा पूर्वमकल्पयदि " तिच (क्र. सं. ८-८-४८ )। सच जज्ञानो जायमान एव सद्यः शीघ्रं गत्रून् राक्षसान् निरिणाति निहिनस्ति. यद्वा उपासकानां पापरूपान् शत्रून् निहन्ति, तथाचब्राह्मणं-"सद्योोष जातः पाप्मानमपाहतेति" विश्वे सर्वे ऊमाः अवन्ति रक्षन्तीत्यूमाः प्राणिनः सर्वप्राणिनो ये सूर्यास्तकमुद्यन्तमिन्द्रमनु- लक्ष्य मदर्थमुदगात् मदर्थमुदगादिति मदन्ति हृप्यन्ति, तथाच बाह्मणं- भूतानि वैविश्वऊमास्तएनमनुमदन्ति उदगादुद्गादितीति, तिरीयकंच-तस्मात्सर्वएवमन्य- न्गांमत्युदगादिति। यद्वा यं स्वत्यादिभिर्माचन्तमनु पश्चात्सर्वे प्राणिनोऽभीष्टप्राप्या हृष्यन्ति स इन्द्रो जज्ञ इत्यन्वयः ॥१॥ अनुवाद-विन्यादिक लोकोंकी मध्यमे जगत्के कारणरूपसे बेदान्त- - शास्त्रमें प्रसिद्ध परब्रह्मही प्रशंसनीय है, क्योंकी वह ब्रह्म पारमार्थिक है और [९] . है समसें व्यतिरिक्त प्रथिव्यादि लोर्क और तदन्तर्गत विषयवृन्द सत्र व्यावहारिक है, अथवा वह ब्रह्म ज्येष्ठ अत्यन्त वृद्धा याने समस्त प्रपञ्चका कारण होनेसें सोंका आदिभून है. किंवा वृद्ध ऐसा यह परब्रम स्वयंप्रकाशरूपसें है, याने नित्य अर्स- हित स्वप्रकाश चैतन्यरूपसे देदीप्यमान है, भौर उमादान कारणभूत जिस परत्र- असे उग्र स्वभाव (प्रताप ) वाले प्रदीप्तवलवाले सूर्यात्मक देव आनिर्माणको पायें हैं, श्रुनिम भी कहाहैवी " उस परमेश्वरके चक्षुरिन्द्रियसें सूवि प्रादुर्भाव- हो पा परमेश्वरने पूर्वकसानुसार सूर्य चन्द्रको प्रफट किये है" और नहीं सूदेव आविर्भावको पातेहुवे त्वरित शत्रुओं का याने मन्देहादिक राक्षसोंका नाश करते हैं. अथवा उपासकों के पापरून शत्रुओं को नष्ट करते है, वेदवाक्यभी हैती-"यह सूदिर प्रादुर्भावको पाते हुवे परित पापों को नष्ट करते भये"। सकर प्राणी उदयाभिमुख इस सूर्यात्मक देवको लक्ष्य करके आनन्दित होते है, ब्राह्मणभागमें कहाहे की “ भूतभौतिकसृष्टि के अन्तर्गत सफल प्राणी उदयाभिमुख होते व इस सूर्यदेवको लक्ष्य करके हर्षित होते है "तैत्तिरीयक आरण्यक श्रुतिमें भी कहा हैनी "सब लोक ऐसाही मानते हैं की यह सू देव मेरे (शुभ) लिये उदित 'हुवे"। अथवा स्तुतिनमनादिका जिस् सूर्य देव के संतुष्ट होने के बाद स्तुत्यादि करनेवाले प्राणि इष्ट पदार्थी प्रतिद्वारा मुदित होते है, वैसे सूर्य देव प्रादुर्भावको प्राप्त हुचे ॥१॥ १०३. ८ ७ १ त्वेकतुमपिअन्तिविश्वेद्रियदेतेत्रिभवन्त्यूमाः । स्वादोःस्वादीय स्वादुनासजासमदःसुमधुम(नाभियोधी॥३॥ हे इन्द्र ते सयि विश्वे म यजमाना. ऋतुमनुष्ठेयं कर्म वृक्षन्ति समाप- यन्ति । अपिशब्दो घामणोक्त सर्वभूताना सर्वमनसा समुच्चपार्थः, सर्वाणि पृषि- व्यादीनि भूतानि सपा प्राणिना मनासि सर्वे यज्ञकरवश्व व्याप्ते त्वय्येव यजमानैः परिसमाप्यन्त इत्यर्थ । तथाचनाह्मण- त्वयीमानि सर्वाणि भूतानि सर्वाणि मनासि स ऋतयोपि वृजन्तीत्येवतदाहे"ति । यद्यस्मात् एते उमाः तर्पकाः ईदृशा यजमानाः पूर्वनि. सन्तः पश्चादद्धि विचार सीरूपेण पुरुपेणच जाताः सन्तः पुनरपत्न सानि त्रिवार जन्ममानो मन्ति, एक एवात्मा स्त्रीकोण जाय, "अर्थे,वाएप. मामोतो"ति, पुत्रोप्यात्मैव "मात्माचे पुत्रनामासी" तिश्रुतेः, अनएव- ।

EPRE भेवाभिवृद्धा भवन्ति ततोवगम्यते त्वय्येवानुष्ठित स क परिसमापयन्ति इति । तथाचब्राह्मणं "द्रौवासन्तौमिथुनी प्रजायेते प्राजापत्या" इनिगाहे इन्द्र वंच स्वादों: प्रियादग्रहपनादरपि स्वादीयः स्वादुतर प्रियतरेमपत्यः स्वादुनाः स्वादुम्तेन मिथुनेन मातापित्रात्मकेन सहज संयोजय । यहा स्वादुना भावन उत्सनं तदपत्यापि संयोजय । एतदेवाह-अदः तदपत्यं मधु मधुरं मधुना मदहे ना मिथुनान्तरेण, पौत्रेण तु.मधु अभियोधी अभियोधयामितः की डय ॥ ३ ॥ . .. हैं अनुवाद-हे इन्द्रदेवः समग्रयजमानलोक की जो हमेशा यज्ञयागादि फर्भ में परायण होकरके आपहीके भीतर सशल कर्मों को समाप्त करते है. मन्त्रोक्त " अवि" शब्दसें ब्राह्मणभागमें कहे हुवे सकल भूतों मन, गृहात होते है, 'याने पृथिव्यादिक समस्त भूत सफल प्राणिके मन और सफल यज्ञादिक 'कत्वात्मकर्म यजमानलोक (इन्द्र के लक्ष्यार्थ भूत ) व्यापकस्वरूवाले •आपहीमें समाप्त करते हैं, अर्थात फलदानका स्वातव्य आपहीको होनेसे 'उन् कमाको आपको समर्पित करतेहैं। ब्राह्मणभागमें कहा हुवा है की-"हे परमात्मन् ? ) सकलभूत समस्तमन और समस्त ऋतु सत्र आपहीको मासर (रह करके अपने अपने व्यापारमें ) तत्पर होरहेहैं-व्याप्त हैं" ! और (यज्ञो- दिकसे देवोंको ) तृप्त करनेवाले यजमानलोक पूर्वमें अकेले होनेपरभी पश्चात् खीरूपसें और पुरुषरूसे आविर्भून होतहे, और फिरतमी संतान के साथ 'तीसरी दफे जन्मवाले होते हैं, याने एकही आत्मा है नथापि स्त्रीरूप और पुरुष रूपसे और फिरसे अपत्य ( संतान ) रूपसे प्रतीत होताहै, श्रुतिमी केह- तीहै ।" यह जो धर्मपत्नी है सो आत्माका अर्धभाग ( रूसे कसि ) है" "पुत्र-यह आत्माही है" इत्यादिक श्रुत्यनुसार आत्माही सफल रूमें अवे- द्याद्वारा प्रतीत हो रहाहै, जबकी इसी प्रकारसे सफल प्रपंच आत्मा, अ-यति- रिक्त है तब क्रियमाण (कर्म)कर्ता करण इत्यादिक सब आन (परमेश्वर) हीको भीतर पर्यवसित होता है. । हे परमात्मन् ! गृहधनाविक की गोप्रिय है - उसमेंमी प्रियतर अपत्य ( संतान ) को प्रेमपात्र जननीवनका कामथुम-युग्मों पसंयुक्त करें । अथवा स्वादिष्टभावसे उत्पतिको माये हुवे उस संतानकोली आयुक करें । यही बात कहते हैं की प्रीतिपात्र, इस अपत्य को .महेतुक - , [९४] प्रेमयुक्त पौत्रसे (संयोगद्वारा) अच्छी तरह से क्रीडा करवाओ याने पुत्रपात्रा- दिक संततिकी (आप) वृद्धि करें ॥३॥ १०४. ८ ७ ३ हिरण्यगर्भःसमवर्तताऽभूतस्य॑ जातःपतिरेकआसीत् । सदाधारपृथिवींद्यामुतेमांकस्मदेवायहविषाविधेम ॥१॥ हिरण्यगर्भः हिरण्मयस्यांडस्य गर्भभूतः प्रजापतिहिरण्यगर्भः। तथाचतैति- रीयकं "प्रजापति,हिरण्यगर्भः प्रजापतेरनुरूपत्वाये"ति। यदा हिरण्मयः अंडो गर्भव- द्यस्य उदरेवर्तते सोऽसौ सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ इतिउच्यते, अग्रे प्रपंचोत्पत्तेः प्राक् सम- वर्तत मायाध्यक्षात् सिसृक्षोः परमात्मनः समजायत, यद्यपि परमात्मैव हिरण्यगर्मः तथापि तदुपाधिभूतानां वियज्ञादीनां सूक्ष्मभूतानां ब्रह्मणः उत्सत्तेः तदुपहितोप्युत्पन्न इत्युच्यते, सच जातो जातमात्र एव एकः अद्वितीयः सन् भूतस्य विकारजातस्य ब्रा- डादेः सर्वस्य जगतः पतिरीश्वर आसीत् , न केवलं पतिरासदेिव अपि तर्हि स हिरण्य- गर्भः पृथिवीं विस्तीर्णा द्यां दिवं, उतापिच इमां अस्माभिदृश्यमानां पुरोवर्तिनीमिमा भूमि, यद्वा पृथिवीत्यन्तरिक्षनाम अन्तरिक्षं दिवं भूमिंच दाधार धारयति । कस्मै अत्र किंशतः अनि तस्वरूपत्वात्मजापतौ वर्तते, यद्वा सृष्टयर्थ कामयते इति का, यद्वा फं सुखं तद्रूपत्वाक इत्युच्यते, अथवा इन्द्रेण पृष्टः प्रजापतिः मदीयं महत्तं तुभ्यं प्रदाय अहं कः कीदृशः स्यामित्युक्तवान् , स इन्द्रः प्रत्यूचे यदिदं ब्रवीपि महं कः स्यामिति तदेव त्वं भवेति, अतः कारणात् क इति प्रजापतिराख्यायते। कं प्रजापति .देवाय देवं दानादिगुणयुक्तं हविषा प्राजापत्यस्य पशोर्वपारूपेण एककपालात्मकेन पुरोडाशेन वा विधेम वयमृत्विजः परिचरेम ॥ १ ॥ अनुवाद-हिरण्मय ब्रह्माण्डके गर्भमत हिरण्यगर्भ-प्रजापति, श्रुतिमी "हिरण्यगर्भका अर्थ प्रजापति" ऐसा कहती है. अथवा हिरण्मय अंड जिसके उदर गर्भवत् वर्तमान है सो सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ कहा जाताहै, वह हिरण्यगर्म अपश्चोत्पत्तिके पूर्वकालमें माया के अध्यक्ष होनेसें जगत्को उत्पत्तिम परायण पर- मात्मासें प्रकट हुवे, यद्यपि हिरण्यगर्भमी परमेश्वरस्वरूप होनेसें माकट्यवान् नहि हो सका तथापि उस हिरण्यगर्मका उपाधिस्त वियदादिक स्थूल सूक्ष्म सब मपंच परमसहीसें उत्पन्न हुवाहै इसलिये सदुपहित हिरण्यगर्भभी प्रकट" शन्दसे .. [९] व्यपदिश्यमान होतेहै. और वह हिरण्यगर्म प्रकट होकरके त्वरितही स्वयं अहि- तीय समग्र विकृत वर्ग (मपंच) का ईश्वर-नियन्ता हुवा, केवल अपंचका निक- वादा हुवा' इतनाहिं नहिं किंतु वह हिरण्यगर्भ पृथ्वी विस्तृनद्युलोकको अथवा मूर्लोक मुवीक और स्वोकको धारण करता भया. सृष्टिको विस्तृत करनेको कामनावाले अथवा अखंड सुखरूप अथवा प्रजापतिस्वरूप दानादिगुण- संपन्न उस हिरण्यगर्भ देवको एककपालात्मक पुरोडाशरूप हविष्यसें हम (ऋत्विज्) लोक विधिपूर्वक परिचर्या करते हैं. ॥१॥ १०५. ८७ ३ यात्मदावलदायस्यविश्वउपासतेमाशिषयस्यदेवाः ।। यस्यछायामृतंयस्यमृत्युःकस्मैदेवायहविपाविधेम ॥ २॥ यः प्रजापतिः आत्मदा आत्मनां दाता, आत्मानो हि सर्वे तस्मात्परमात्मन उत्पद्यन्ते, ययामेः सकाशात विस्फुलिंगा जायन्ते तद्वत्, यद्वा आत्मनां शोषयिता, बलदाः बलस्य च दाता शोधयिता वा यस्य च प्रशिप प्रकृष्टं शासनमाज्ञां विश्वे प्राणिन उपासते प्रार्थयन्ते सेवन्ते वा, तथा देवाअपि यस्य प्रशासनमुपासते, अपिच अमृतं अमृतत्व, भावप्रधानो निर्देशा यद्वा अमृतं मरणं नास्ति अस्मिन्निति अमृतं सुघा, तदं- पि यस्य प्रजापतेः छाया छायेव भवति, मृत्युर्यमश्च प्राणापहारी छायेव भवति, तस्मै फस्मै देवायेत्यादिसमान, पूर्वेण हविषा पुरोडाशात्मनेति तु विशेषः ॥२॥ अनुवाद-जो प्रजापति आत्माको प्रकट करनेवाले हैं, जैसे अमिस अमिका प्रकट होतेहैं है ही प्रजापतिसें चिदाभासात्मक जीवात्मा प्रकट होताई. अथवा आत्मा-अन्तःकरणको जो प्रजापति शुद्ध करनेवाले है, और बलको देने- वाले अथवा शुद्ध करनेवाले हैं, और सकलपाणी जिनकी प्रकृष्ट आज्ञाकी प्रार्थना करते हैं, अथवा आशाको उठातेहैं, और देवतालोकभी जिनकी आज्ञाको उठाते हैं, और अमृत (मरण जन्म रहित पदार्थ) जिनकी छायारूपहै, और मृत्युभी जिनकी छायारूपहै वैते पूर्वमन्त्रोक्त प्रजापति देवको एककपालात्मक पुरोडाशरूप हविष्यसें हम (ऋविज्) लोक परिचर्या करतेहैं. ॥ २॥ १०६. ८ ७ ३ यामागतीनिमिषतोमहित्वैकइदाजाजर्गतोषपूर्व । यईशेअस्यद्विपदश्चतुष्पदाकस्मदेवायहविषाविधम ॥३॥ .

- R यो हिरण्यगर्भः प्राणता पर्श्वसतः निमिषता अर्पिमंचननं कुत्त: जाति जंगमस्य प्राणिजातस्य महित्वी माहवन माहात्म्येन पंक इत् अद्वितीय एव: सन राजा बमूब ईश्वरी भवति, अस्य परिदृश्यमानस्य द्विपद पादद्वययुक्तस्य भनु प्यादे, चतुष्पदो गवाश्चादश्च यः प्रजापतिरीश ईष्टे, ईदृशो यः प्रजापतिः-तसो फस्मा इत्यादि।सुबोध, हविपा हृदयाद्यात्मनेत्ययमत्र विशेषः ॥३॥ (' अनुवाद-जो हिरण्यगर्भ, श्वासप्रश्वासवाले और निमेपोन्मेपवाले सचरा चर प्रपचान्तर्गत समग्र प्राणिवर्गका (अपनी') महत्तासें अद्वितीय होकरकेमी नियन्ता है, और दृश्यमान द्विपद-मनुष्यादिक 'चतुप्पात्-गोमहिपाश्चादिकका-: भोजो प्रजापति (हिरण्यगर्म ) नियन्ता है, उनको हृदयादिस्वरूप हविप्यसें हम (ऋखिन) लोक परिचर्या करतेहै. ॥ ३ ॥ १०७. ८ ७ ३ यस्येमोहिमन्तोमहित्वायस्यसमुद्ररसयांसहाहु यस्पेमामदिशीयस्यवाहूकस्मैदे॒वाय॑हविपाविधेम ॥ ४ ॥ हिमा अस्मिन्मन्तीति हिमवान, तेन बहुवचनान्न सर्वे पर्वता लक्ष्यते, यथा छत्रिणो गच्छन्तीति, हिमवन्तो हिमवदुपलक्षिताः इमे दृश्यमानाः सर्वे पर्वता: यस्य प्रजापतेः महित्वा महत्त्व माहात्म्यमैश्वर्यमित्याहुः, तेन स्टत्याचदूषणायस्था- नाद्वा, तथा. रसया रसो जलं तद्वती रसा नदी रसाभि नदीभिः सह समुद्र, पूर्वव- देकवचनं, स्वान्समुद्रान् यस्य महाभाग्यमित्याहु कथयन्ति सृष्टयभिज्ञाः, यस्य च इमाः प्रदिशः प्राच्यारंभा आग्नेय्याद्या. कोणदिशः ईशान्यन्ताः तथा बाहू, वनव्यत्ययः, वाहवः भुजाः भुजवत्प्राधान्ययुक्ताः, प्रदिशश्च यस्य स्वमूनाः तस्मै कस्मा इत्यादि समान पूर्वेण ॥ ४ ॥ अनुवाद-हिमालयादिक समग्र पर्वत, इस प्रजापतिने अपनी शक्ति , निर्मित किये. अथवा यह प्रजापति स्वयं ततदाकार 'प्रतीत होतेहै, इमलिये. (उन प्रजापतिका यह हिमालयादिक पर्वत ) ऐश्चर्यरूप है, यद्यपि इस् मन्त्र "हिमवान् " शब्दका प्रयोग करनेसे केवल हिमालय पर्वतही गृहीतहोना , चाहिये तथापि "छत्रिणो गच्छन्ति" "छत्रधारी लोक जारहे हैं. इस वायस छत्रसहित और छोरहित सबलोकों का महणजैसे होताहै सैसेंही "हिमवान्" 1 .

ऋन्दितवान् रोदितवाननयोः प्रजापतिरिति क्रन्दसी द्यावापृथिव्यौ, श्रूयते हि"यदरोदीत्तदनयोरोदस्त्वमिति । ते अवसा रक्षणेन हेतुना लोकस्य रक्षणार्थ, [९७] शब्दके प्रयोगसें हिमालयादिकं समस्त पर्वत गृहोत होते हैं, तो यह हिमालया- "दिक सब पर्वत उन प्रजापतिका ऐश्वर्यरूप है क्योंकी उनोने यह सब (पर्वत) रचे हुवे हैं, अथवा उनी (पवतों) के स्वरूप यह प्रजापति अवस्थित है, याने ततदाकार रूपसे प्रतीयमान होरहें है. और उसीतरहसें समग्र नदीयों के साथ सब समुद्रमी जिन (प्रजापति) का महत् ऐधर्यरूप हैं, ऐसा सृष्टिके रहस्यको जाननेवाले कविलोक कहते हैं. और यह पूर्वदक्षिणादिक दिशायें और आमि- कोणसें लेकरके ईशान कोण पर्यन्त सब कोणदिशायें यह सब जिन (प्रजापति) के बाहुस्थानापन्न हैं, याने बाहु जैसें प्रधानअवयव है तैसेंही दिशा और प्रदिशा यह जिनके वाहुरूप मुख्य अवयवस्थानापन्न हैं, उन प्रजापति देवकी हम (ऋत्विज) लोक हविष्यादिको परिचर्या करते हैं. ॥४॥ १०८. ८ ७ ३. येनद्यौरुग्रापंथिवीचढायेनस्वःस्तभितंयेननाकः। योअन्तरिक्षेरजसोविमानःकस्मैदेवार्यहविपाविधेम ॥५॥३॥ येन प्रजापतिना द्यौः अन्तरिक्ष उग्रा उद्गुणविशेषा गहनरूपा वा पृथिवी भूमिश्च दहा येन स्थिरीकृताः, स्वः स्वर्गश्च येन स्तभितं स्तब्धं कृतं यथाधो न प- तति तथा उपर्यवस्थापितमित्यर्थः, तथा नाक आदित्यश्च येनान्तरिक्ष स्तमितः यश्चा- न्तरिक्षे रजस उदकस्य विमानो निर्माता तस्मै कस्मा इत्यादिगतं ॥ ५॥ ३ ॥ अनुवाद-जिस प्रजापतिने अन्तरिक्ष और उत्पद्यमान पदार्थविशेष किंवा गहनस्वरूपवाली पृथिवी स्थिर की है, और स्वर्गभी जिनोंने नीचे न गिरजाय तैसें उपरितनभागमें स्थिरतासें स्थापित किया है, और सूर्यकोभी जिन्ने अन्तरिक्षमें स्थापित किया है, और जो प्रजापति (हिरण्यगर्भ) अन्तरिक्षमें (सें) जलका (वृष्टिद्वारा) निर्माण करनेवालें है, उन् प्रजापति देवको हम (ऋ- लिज ) लोक पुरोडाशादिक हवियोंसें परिचर्या समर्पण करतेहैं ॥५॥३॥ १०९. ८ ७ ४. यंक्रन्दसीअवसातस्तभानेअभ्यैक्षेताम सारेजमाने । यत्राधिसूरउदितोविभातिकस्मैदेवार्यहविषाविधेम ॥६॥ १३ 8 [९८] तस्तभाने प्रजापतिना सृष्टे लब्धस्थैर्य सत्यौ यं प्रजापति मनसा बुद्ध्याध्यक्षतामावयो- महत्त्वमनेनेत्यभ्यपश्येतां, कीदृश्यौ द्यावापृथिव्यौ रेजमाने राजमाने दीप्यमाने यत्राधि यस्मिन्नाधारभूते प्रजापती सूरः सूर्यः उदितः उदयंभाप्तः सन् विभाति प्रकाशते तस्मै कस्मा इत्यादि सुज्ञानं ॥६॥ अनुवाद-देदीप्यमान और लोकरक्षाके लिये प्रजापति, जिन् धुलोक मूलोकको निर्मित किये है और जो द्युलोक और भूलोक स्थिरताको पा करके हमारा महत्त्व इन् (प्रजापति) केही अधीन है " ऐसा अपनी बुद्धिमें पर्या- लोचन किया करते है. और जिन् आधारभूत प्रजापतिमें सूर्यनारायण उदयको प्राप्त होकरके प्रकाशमान होते है, उन् प्रजापति (हिरण्यगर्भ) देवको हम लोक हरिप्यादिकसें परिचर्या समर्पण करतें है. ॥६॥ ११०. ८ ७ ४. आपोहयन्देहनीश्चिमायन्ग दानाजनयन्तीग्निम् । ततोदेवानांसमवर्ततासुरेक कस्मैदे॒वाय॑हविपाविधेम।।७।। बृहती. वृहत्यो महत्यः आमं, उपलक्षणमेतत् , अग्न्युपलक्षितं सर्व वियदादि- मूतजातं जनयन्ती जनयन्त्यः तदर्थ गर्भ हिरण्मयाडस्य गर्भभूतं प्रजापतिं दधानाः धारयन्त्यः आपो ह आप एव विश्वमावन् सर्वं जगद्व्याप्नुवन् यद्यस्मात् ततस्तद्धे तोर्दवाना देवाडीना सर्वेषा प्राणिना असुः माणमृत एकः प्रजापतिः समवर्तत समजायत । यद्वा यत् य गर्न दधाना आपो विश्वात्मनावस्थिताः ततो गर्भभूता- प्रजापतेः देवादीना प्राणात्मको वायुः अजायत, अथवा उक्तलक्षणा या आप: विश्वमावृत्य स्थिता: ताः ततः ताभ्योद्भवःसकाशात् एकोऽद्वितीयः असु. प्राणात्मकः प्रजापतिः समवर्तत निश्चक्राम, तस्मै कस्मा इत्यादि गतं ।। ७ ।। अनुवाद-तेज, आकाश इत्यादिक सकलभूतोंको उत्पन्न करनेवाला और उसी उत्पत्ति के लिये हिरण्मय अंडका गर्भभूत प्रजापतिको धारण करनेवाला वृहत् स्वरूपवाला जल सकल जगतको व्याप्त करता भया, जिसके करते देवादि- फ समग्र प्राणिमात्रका प्राणभूत एक प्रजापति प्रकट हुवे. अथवा जिस गर्भको धारण करनेवाला जल जगत्स्वरूपसें अवस्थित हुवा उस गर्नभूत प्रजापतिसे देवादिकोंका प्राणवायु प्रकट हुवा. अथवा सकल विधको व्याप्त करके जो जल अवस्थित है उसी जलसें एक अद्वितीय प्राणात्मक प्रजापतिदेव प्रकट हुवे, उन् प्रजापति देवको हम लोक हविप्यादिकसे परिचर्या समर्पण करते हैं. ॥७॥ . . -

९९] .
१११. ८ ७ ४ पश्चिदापोमहिनापर्यपंपदसंदधानाजनयन्तीर्यनम् । :
योदेवेष्वाधदेवएकआसीत्कस्मदेवायहविषाविधेम १८ ॥
यज्ञं यज्ञोपलक्षित विकारजातं जनयन्तीरुत्पादयन्तीः, तदर्थ दक्ष मपञ्चा-
स्मना वर्धिष्णुं मनापति आत्मनि दधाना धारयित्रीः ईदशोरापः व्यत्ययेन प्रथमा
अपः प्रलयकालीनाः महिना महिला स्वमाहात्म्येन यश्च प्रजापतिः पर्यपश्यत्
परिता दृष्टवान् यश्च देवेष्वधि देवेषु मध्ये देवः तेषामपीश्वरः सन् एकः अद्वितीयः
आसीत् भवति, तस्मै कस्मा इत्यादि गतं ॥ ८ ॥
अनुवाद-यज्ञोपलक्षित विकृतवर्गको उत्पन्न करनेवाले और उसी लिये
प्रपंचस्वरूपसे वृद्धिको प्राप्त होनेवाले प्रजापति देवको अपनी भावर (गर्भरूपसे)
धारण करनेवाला प्रलयकालिक जलको जो प्रजापतिदेव अपने माहात्म्यसें परि-
दर्शन करने लगे, और जो देवोंके मध्यमें देवहै, याने देवोकेभी नियन्ताहै,
और स्वयं अद्वितीय-असहाय है, उन प्रजापति देवको हम लोक हविष्यादिकसे
परिचर्या समर्पण करतेहैं. ॥ ८ ॥
११२. ८ ७ ४ मानोहिंसी जानतायधिच्यायोवादिवसत्यधर्माज्ञानी
यश्चापश्चन्द्रावृहती जानकस्पैदेवार्यहविपाविधेय ॥ ९॥
स प्रजापतिः नोस्मान् मा हिंसीत् मा बाधता, यः पृथिव्या भूमेः जनिता
जनयिता सप्टा, यो वा यश्च सत्यधर्मा सत्यमवितथं धर्म जगतो धारणं यस्य स ता-
दृशः प्रजापतिः दिवं अन्तरिक्षोपलक्षितान् सर्वान् लोकान् जजान जनयामा, यश्च
वृहतीः महतीः चन्द्राः आहादिनीः अप उदकानि जजान जनयामास, तस्मै कस्मा
इत्यादि गतं ॥९॥
अनुवाद-जो प्रजापतिदेव भूमिका उत्पादक है. और जो. देव यथार्थ
शतिसे जगत्को धारण करनेवाला है, और जिन प्रजापति देवने अन्तरिक्षोपल
क्षित सकल लोकोंको उत्पन्न कियेहै, आनन्ददायक यार्ने निर्वाहोपयुक्त जलकौमी
लिन पैदा किया है वह प्रजापतिदेव हम लोकोंको बाधित न करें, उन
प्रजापतिदेवको हम लोक हविष्यादिकसे परिचर्या समर्पण करते हैं. ॥९॥

इश्वराः स्याम भम [१००] ११३. ८ ७४ प्रजापतेनत्वदेतान्यन्योविश्वाजातानिपरितार्वभूव । यत्कोमास्तेजु मस्तन्नेअिस्तुवयंस्यामपर्तयोरयीणाम् ॥१०॥४॥ हे प्रजापते त्वत् त्वनोन्यः कश्चित् एतानि इदानी वर्तमानानि विश्वा विश्वानि सर्वाणि जातानि प्रथमविकारभांजि ता तानि सर्वाणि भूतजातानि न परि- वभूव न परिगृह्णाति न व्यामोति स्वमेव एतानि परिगृह्य सृष्टुं शक्नोपातिभावः । परिपूर्वोभवतिः परिग्रहार्थः, वयंच यत्कामाः यत्फलं कामयमानाः ते तुभ्यं जुहुमः वीपि प्रयच्छामः तत्फलं नोस्माकं अस्तु भवतु, तथा वयंच रयीणां धनानां पतय ॥१०॥४॥ अनुवाद-हे प्रजापते ? आपके सिवाय दुसरा कोइभी इस कालमें वर्तमान प्रथम विकारवाले सकल भूतोंको व्याप्त करसक्ता नहिं, याने आपही समग्र भूतोंको व्याप्त करके उत्पन्न करसक्ते हो। और हम लोक जिस फलको चाहते हुवे आपको हविष्य समर्पण करतें है वह फल हम लोकों को प्राप्त हो, और हम लोक धनके मालिक होय ऐसी आपकी दया हो. ॥ १० ॥ ११४. ८ ७ ११ अहंरुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुतविश्वदेवैः। अहमित्रावरुणोभाविभयहमिन्द्रग्निीअहमश्विनोमा ॥१॥ अहं सूक्तस्य द्रष्ट्री वाक् आंभृणी यद्ब्रह्म जगत्कारणं तद्रूपा भवन्ती रुद्रेमिः रुद्रैः एकादशमिः तदात्मना चरामि, एवं वसुमिरित्यादौ तत्तदात्मना चराभीतियोज्यम् । उभोभावहमेव ब्रह्मीभूता विभा धारयामि इन्द्रामी अप्यहमेव धारयामि, उभोमावश्विनाधिनावप्यहमेव धारयामि, मयि हि सर्व 1. जगत् शुक्तौ रजतमिवाध्यस्तं सद् दृश्यते, मायाच जगदाकारेण पिवर्तते तादृश्या मायया आधारत्वेन असंगस्यापि ब्रह्मण उपतस्य सर्वस्योत्पतिः॥१॥ अनुवाद-" अम्भृण" नामक महर्षिकी " वा " नामक पुत्री या- ज्ञानको पाइहुइ आत्माकी स्तुती करती है-में सूतज्ञ वाग्देवी जगत्का कारण- मूत ब्रमस्वरूप होती हुइ एकादशरुद्रस्वरूपसे (जगदमें ) विहार करती हूं. और मेंही वाग्देवी ब्रमस्वरूप होनेसे मित्र और वरुण देवको धारण करती हूं. और इन्द्र अमि और अश्विनीकुमारफोभी मेंही धारण करता हूं, शुक्तिका - संगमनी संगमायत्री उपासकाना प्रापत्रिी चिकितुपी यत्साक्षाकर्तव्यं परब्रह्म वज्ञानवती स्वात्मतया साक्षात्कृतमी, अतएव यज्ञियानां यज्ञाहांगां प्रथमा मुख्या 'मूरीणि बहूनि भूतजातानि आवेशयन्ती जीवभावेन आत्मानं प्रवेशयन्तीमीदृशी मां . मूत [११] रजतकी तरह मेरी भीतर सकल विश्व अध्यस्त होनेपरभी भ्रान्तिसें सत्यवत् प्रतीत होता है. माया जगत्स्वरूप परिणत होती है, उसी मायाका अधिष्ठान- असंग जो परब्रह्म है, उसीका वह प्रपंच विवर्त कहा जाता है. ॥ १ ॥ ५१५. ८ ७ ११ अहंसोभमाहनसंपिमहत्वष्टारमुतपूपर्णमर्मम् । अहंदधामिद्रविणंहविष्मतेसुमाग्येश्यजमानायसुन्वते ॥२॥ आहनसं आहन्तव्यं अभिषोतव्यं सोमं, यद्वा शत्रूणामाहन्तारं दिवि वर्त- मानं देवतात्मानं सोमं अहमेव विभर्मि, तथा त्वष्टार मुतापिच पूपणं भगंच अहमेव विभर्मि, तथा हविष्मते हविर्मियुक्ताय सुप्राव्ये शोभनं हविः देवानां प्रापयित्रे वयित्रे सुन्वते सोमामिपवं कुर्वते ईदृशाय यजमानाय द्रविणं धनं यागफलरूपं अहमेव धारयामि, एतच्च ब्रह्मणः फलदातृत्तं " फलमतउपपत्ते " रित्यधिकरणे भगवता भाष्यकारेण समर्थितम् (. सू. ३-२-८) ॥२॥ अनुवाद-अभिषव करने योग्य सोमको अथवा शत्रुओंको निर्मूल करनेवाले देवतात्मक सोमको में (वाग्देवी) ही धारण करतीहुं. और खप्टा पूषा और भग एतन्नामक देवको भी, ब्रह्मस्वरूप मेंही (वाग्देवी) धारण करतीहुं. और उत्तम हविष्य देवोंको समर्पण करके तृप्त करनेवाले सोमामिषव करनेवाले हपिप्युक्त यजमानके लिये यागका फलभूत धनको भी मेंही धारण करतीहुं. भगवान् माप्यकारनेभी "फलमत उपपत्तेः" इस ब्रह्मसूत्रके अधिकरणमें ब्रह्मके तचतफलदातृत्वका समर्थन किया है. ॥२॥ ११६. ८ ७ ११ अहंराष्ट्रीसंगमनीवसूनांजिकिनुपमयमायशियानाम् तामादेवाव्यदधुःपुरुषाभूरिस्थात्रांभूयोवेशयन्तीम् ॥३॥ अहं राष्ट्री, ईश्वरनाम एतत् , सर्वस्य जगत ईश्वरी तथा वसूनां धनाना यैवंगुणविशिष्टाहं तां मां भूरिस्थात्रा बहुभावेन प्रपंचात्मनावतिष्ठमानां मार [१०२] पुरत्रा बहुपु देशेषु व्यदधुः देवाः विदधति कुर्वन्ति, उक्तप्रकारेण विश्वरूपेणाव- स्थानात् यद्यत्कुर्वन्ति तत्सर्वं मामेव कुर्वन्तीत्यर्थः ॥३॥ अनुवाद-सकल जगत्को नियमन करनेवाली और उपासकोंको धना- दिक द्रव्य पहुंचानेवाली साक्षात्करनेयोग्य परब्रह्म के अपरोक्ष ज्ञानवाली ओर यज्ञिय देवोंमें प्रधानभूत प्रपंचस्वरूपसें अवस्थित और अनेक भूतभौतिकधिकृत वर्गमें जीवस्वरूपसे अनुपविष्ट होनेवाली ऐसी मुझको देवतालोक यागादिक कर्मरूपसे विधान करते है, याने जो जो कर्म करते है वे सब कर्ता करण क्रिया और फलरूप मेंहीहुं. (ऐसा वाग्देवीका सार्वात्म्यभाव प्रतीत होताहै) ॥३॥ ११७. ८ ७ ११ मयासोअन्नमत्तियोविपश्य॑तियःमाणितियईशृणोत्युक्तम् । अमन्तोमान्तउपक्षियन्तिश्रुधिर्भुत द्धिवंतेवदामि ॥४॥ यः अन्नमत्ति स भोक्तृशक्तिरूपया मयैवान्नमत्ति, यश्च विपश्यति आलो- कयतीत्यर्थः, यश्च प्राणिति श्वासोच्छ्वासादिव्यापारं करोति सोपि मयैव, यश्चो- तं श्रृणोति, य ईदृशीमन्तयामिरूपेण स्थितां मां न जानन्ति ते अमन्तवः अमन्य- मानाः अजानन्तः उपक्षियन्ति उपक्षीणाः संसारण हीना भवन्ति । माममन्तवः मद्विषयज्ञानरहिता इत्यर्थः, हे श्रुत विश्रुत सखे श्रुधि मया वक्ष्यमाणं श्रृणु, किं तत् श्रोतव्यं? अद्धिवं श्रद्धिः श्रद्धा तयायुक्तं श्रद्धायत्नेन लभ्यमित्यर्थः, मत्वर्थी- यो वः, ईदृशं ब्रह्मात्मकं वस्तु ते तुभ्यं वदामि उपदिशामि ॥ ४ ॥ अनुवाद-जो प्राणी अन्नका भक्षण करता है सो भोक्तृशक्तिरूप मेरी सहायताहीसे भक्षण करता है, और जो प्राणी दर्शन करता है दिखता है) और श्वासोच्छ्वासादिक व्यापारको करता है, और जो प्राणी कहे हुवे (वचनों) को सुनता है सो सब मेरी ( वाग्देवीकी ) सहायताहीसें है, इस प्रकार सर्वके अन्तर्यामिस्वरूपसे अवस्थित ऐसी मुझको यथार्थ रीतिसे जो लोक नहि जानते वे उपक्षीण होतेहै, यानें सांसारिक विषयोपभोगोंसेभी रहित होते हैं, हे विश्रुत ? श्रद्धासहित यत्नसें उपलब्ध करने योग्य ब्रह्मतत्त्व में तुमको सुनाती हुँ, सो तुम सुनो ॥ १॥ .

अनुवाद-पूर्वकालमें त्रिपुरासुरके विजयसमयमें ब्राह्मणोंके शत्रुभूत निविष्ट होकरके देवादिकन्सें क्रियमाण कार्यको में (वाग्देवी) ही करतीहुं. और मेंही भक्तजनोंके हितार्थ शत्रुओके साथ सग्राम करती, और द्यलोक और मूलोकमें अन्तर्यामिस्वरूपसें मेंही भनुप्रविष्ट हुं. ॥६॥ [१०३]- .. . १८. ८.७ ११ अहमेवस्वयमिदंवदामिजुटदेवेभिरुतमा पेभिः । यंकामयेततमुग्रंकृणोमितंत्रमाणतमृप्तिसुमेधाम् ।।५॥११॥ अहं स्वयमेव इदं वस्तु ब्रह्मात्मकं वदामि उपदिशामि, देवेभिर्देवैः इन्द्रा- दिभिरपि जुष्टं सेवितं, उतापिच मानुषेभिः मनुष्यैरपि जुष्टम्, ईदृग्वस्त्नालिका अहं कामये यं पुरुष रक्षितुमहं वागामि तं तं पुरुषमुग्रं कृणोमि सर्वेभ्योधिक करोमि, तमेव ब्रह्माणं स्रष्टार करोमि, तमेव ऋषि मतीन्द्रियार्थदर्शिनं करोगि, तमेव सुमेघां शोभनप्रज्ञं च करोमि ॥५॥११॥ अनुवाद-में स्वयंही इस ब्रह्मतत्त्वका उपदेश करतीहुँ की जिस तत्तको इन्द्रादिक देव और इतरमनुष्यलोकभी पर्यालोचनात्मक सेवन करते है, इसी परब्रह्मतत्वस्वरूप में (वाग्देवी) जिस पुरुषको रक्षित करनेको चाहती हु उस पुरुपको उग्र-सबसे अधिक बनाती हु, और उसी पुरुषको सृष्टिका रचनेवाला ब्रह्माभी बनादेतीहुँ, और उसी पुरुषको अतीन्द्रियविषयदर्शी ऋषि बनादेतीहुं, और उसी पुरुषको उत्तम प्रज्ञावान् भी बना देतीहुं. ॥५॥ २१९. ८ ७ १२ अहंरुद्रायधनुरातनोमिनमद्विपेशवहन्तवा : अहंजनायसमदंकृणोम्यहंद्यावापृथिवीआविवश ॥६॥ पुरा त्रिपुरविजयसमये रुद्राय रुद्रस्य महादेवस्य धनुश्चापं अहमातनोमि ज्ययावतं करोमि, किमर्थं ब्रह्मद्विषे ब्राह्मणाना द्वेष्टारं शरपे शरुं सिकं त्रिपुरनिवासि- नमसुरं हन्तवै हन्तुं हिसितु महमेव समद समान माधन्त्यस्मिन्निति समत् संग्रामः स्तोतृजनार्थ शत्रुभिः सह संग्राम अहमेव कृणोमि करोमि, तथा द्यावाप्यथिवी दिवंच पृथिवीच अन्तर्यामितया अहमेवाविवेश प्रपिष्टवती ॥६॥ . त्रिपुरनिवासी असुरको हनन करने के लिये महादेवीके धनुषको (पिनासको) ज्या(मोपी)से विस्तृत-सज्ज मेंदी करती ,याने तत्वों कभी देहमें अनिमनिस्वरूपसे . [१०४J १२०० ८ ७ १२ अहंसुवेपितरमस्यमूर्धन्ममयोनिरस्वरन्तःसमुद्रे । ततोवितिष्ठेभुवनानुविश्वोता द्यावर्मणोपस्पृशामि ॥७॥ "द्यौः पितेगतिश्रुते पिता द्यौः पितरं दिवमहं सुर्वे प्रसुवे जनयामि "आत्मन आकाश• सभूत"इतिश्रुते (ते. २-६.) कुत्रेति तदाह-अस्य परमात्मन. मूर्धन् मूर्धनि उपरि कारणभूते तस्मिन्हि वियदादिकार्यनात सर्व वर्तते तन्तुषु पटइव मम च योनि कारण, समुद्रे समुद्रवन्त्यस्माद्भूतजातानीति समुद्रः परमात्मा तस्मिन्, आसु व्यापनशीलासु धोवृत्तिषु अन्तर्मध्य यद्ब्रह्मचैतन्य तन्ममकारणमित्यर्थ , यत ईदृग्भूताहमस्मि ततोहेतोविश्वा विश्वानि सर्वाणि भुवनानि भूतजातानि अनुपविश्य वितिष्ठे विविधंव्याप्य तिष्ठामि, उतापिच असू द्या विप्रकृष्टदेशेऽवस्थित स्वर्गलोक मुपलक्षणमेतत्, एतदुपलक्षित कृत्स्न विकारजात वर्मणा कारणभूतेन मायात्म केन मदीयेन देहेन उपस्पृशामि, यद्वा अस्य मूलोकस्य मूर्धन् मूर्धन्युपरि अह पितरमा- काशं सुवे, समुद्रे जलघौ अप्सु उदकेषु अन्तर्मध्ये मम योनि' कारणभूतो भृणाख्य ऋषिर्वर्तते, यद्वा समुद्रेऽन्तरिक्ष अप्सु अम्मयेषु देवशरीरेषु मम कारणभूत ब्रह्म- चैतन्य वर्तते ततोह कारणात्मिका सती सर्वाणि भुवनानि व्यामोमि । अन्य समानम् ॥ ७ ॥ अनुवाद-आकाशकोभी में (वाग्देवी) उत्पन्न करतीहुँ । एतस्मादात्मन आकाश. सभूत. इस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुवा" इत्यादिक श्रुतिमें भी कहा है, और वह आकाशप्रभृतिक सकल भूतात्मककार्य तन्तुनमें पटकीतरह जिस परब्रह्मके कार्य हैं वहीब्रह्म मेराभी (देहेन्द्रियादिसघातका कारण है, और मायावच्छिन्न चेतन की जो ईश्वरशद्वित हे, और गुणोंसे सकल अपचका निर्माता है, उसकामी वह नियामक होनेसे कारण है, सर्वत्र व्याप्त होनेवाली बुद्धि- वृत्तिओंकाभी वह नियामक है, वही ब्रह्म मुझसें अभिन्न है, यार्ने " तत्वमसि" अयमात्माब्रह्म इत्यादिक श्रुत्यनुसार में तस्वरूप दीहु, और में पूर्वोक्त ब्रह्मस्वरूपसे अन्यतिरिक्त हु, इसलिये समप्रभूतभौतिक पदामेिं तत्तनियामकस्वरूपसे अनुपविष्ट होकरके विविध स्वरूपसें व्याप्त हुँ, और उस द्युलोकोपलक्षित 'समग्र विकृतवर्गको मायात्मक होनेसें कारणमूत इस मेरे देहसें में व्याप्त करतीहु. अथवा इस भूलोको उपरिमागमें आकाशको . .

"तपसस्तन्महिना जायतैकमि"त्यादिना अग्रे सृष्टि. 'प्रतिपादयिष्यते, अधुना प्रलयदशायामवस्थितं यदम्य जगतो मूल कारणं तन्नासत, शशविपाणवनिरुपाख्य [१०५] में ही उत्पन्न करतीहुँ, समुद्रान्तर्गत जलको मध्यमें मेरा कारणभूत "अमृण " नामक ऋषि ह, किंवा समुद्र में अन्तरिक्ष में और देवों के देहामें मेगमी कारणभूत ब्रह्मचैतन्य अनुम्यूतरूपसें वर्तमान है, इसलिये कारणत्वरूप ऐसी में सालभुवनों को ब्याप्त करताहुं. (दूसरा सब पूर्वोक्तअनुदानुसारहीहै ) ||७|| १२१. ८ ७ १२ अहमेववात इवाम्यारभमाणाभुवनानिविश्वा । परोदियापरएनापृथिव्यैतावतीमहिनासंबभूव ॥८॥१२॥ विश्वा विश्वानि सर्वाणि भुवनानि भूतजातानि कार्याणि आरममाणा कारणरूपेणोत्पादयन्ती, अहमेव परेणानधिष्ठिता स्वयमेव प्रवामि पर्ते, वातइव यथा वातः परेणाप्रेरितः सन् स्वेच्छौय प्रवाति तद्वत्, उक्तं स निगमयति, परोदिया परइति परस्तादित्यर्थे वर्तते यथा अधइति अस्तादर्थे तद्यांगेच तृतीया सर्वत्र दृश्यते, दिव आकाशस्य परस्तात् एना पृथिव्या इदम एनादेशः, अस्याः पृथिव्याः परः परस्तात् द्यावापृथिव्योरुपादानमुपलक्षणम्, एतदुपलासितात्सर्वस्माद्वि- कारजातात्परताद्वर्तमाना असगोदासीनकूटस्थब्रह्मचैतन्यरूपाहं महिना महिना एतावती संबभूव, एतच्छब्देन उक्तं सर्व परामृश्यते, एतत्परिमाणमस्याः, सर्व- जगदात्मना अहं संभूतास्मि ॥ ८ ॥ १२ ॥ अनुवाद-जैसें वायु किसीसें प्रयुज्यमान न होकरके स्वयं स्वकीय' इच्छासें ही गतिमान होताहै सही में (वाग्दवी) भी किसीसें प्रयुज्यमान न हो करके स्वसत्तासें ही कारणस्वरूपमें सकल भूत भौतिक पदार्थाका प्रारंभ (उत्पत्ति) करतीहुँ द्युलोक भूनाकादिकी उपक्षित सफल विकारवृन्दसे पर और सबके अभिन्ननिमितोगदानरूप असंग उदासीन नित्य कदम्थ ब्रह्म चैतन्यरूप एसी में अपर्ने माहात्म्यसें तत्तद्रूप हुइहु, याने सकल प्रांचस्वरूपसें मेंही बनी हुँ ॥८॥ १२२. ८ ७ १७ नासदासीनोसामीत्तदानानाप्तीद्र मोनोन्यामापरोयन किमारीव कुहास्यशर्मन्नम्भाकिमासीद्नंगभीरम्॥१ ततः प्रागवस्था निम्तसमस्तप्रपचा या प्रलयाचम्या सा निरूप्यते, तहानी १४ . - [१०६] नासीत्, नहि वादशात् कारणादस्य सतो जगतउत्पत्तिः संभवति । तथा नोसत् नैव सह आत्मवत् सत्वेन निर्वाच्यमासीत्, यद्यपि सदसदात्मक प्रत्येक विलक्षणं भवति, तथापि भावाभावयोः सहावस्थानमपि न संभवति, कुतस्तयोस्तादात्म्यमित्यु- भयविलक्षणा निर्वाच्यमेवासीदित्यर्थः । ननु नोसनिति पारमार्थिकसत्वस्य निषेधः तस्मिनोप्यनिर्याच्यत्वप्रसंगः, अयोच्यते, 'न, आनीदवातमित्ति. तस्य सत्वमग्रेव- श्यते, परिशेषान्मायाया एवात्र सत्वं निषिध्यते इति, एवमपि तदानीमिति विशेषणा- नर्थक्य, व्यवहारदशायामपि तस्याः पारमार्थिकसत्वाभावात् । अथ व्यावहारिक- सत्वस्य तदापि व्यावहारिकसत्ता पृथिव्यादीनां भावानां तदापि विद्यमानत्वात् कथं नोसदिति निषेधः। तत्राह नासीद्रजइत्यादि-लोकारजांस्युच्यन्त इति यास्कः। अत्रच सामान्यापेक्षया एकवचनं व्योम्नो वक्ष्यमाणत्वात्, तस्यावस्तनाः पातालादयः पृथिव्यता नासन् इत्यर्थः, तथा व्योमान्तरिक्षं तदपि नो नेवासीत्, परः व्योन्नः परस्तादुपरिदेशे युलोकप्रभृतिसत्यलोकान्तं यदस्ति तदपि नासीत् इत्यथी, अनेन चतुर्दशभुवनगर्भ ब्रह्मांडरूपेण निषिद्धं भवति । अथ तदावरकत्वेन पुराणेषु प्रसिद्धानि यानि वियदादिभूतानि तेपामवस्थानप्रदेशं तदावरणनिमित्तं चाक्षेप- मुखेन क्रमेण निषेधयति-किमावरीवरिति । किमावरणीयं तत्वं आवरकभूतजातं आवरीयः अत्यन्तमावृणुयात् आवार्याभावाचदावरकमपि नासीदित्यर्थः । यदा किमिति प्रथमैव, किं तत्वमावरकमावृणुयात् आवार्याभावात् आत्रियमाणवत्तदपि स्वरूपेण नासीदित्यर्थः । आवृण्वत् तत्तत्वं कह कुत्रदेशे अवस्थायावृणोति आवा- रभूतस्तादृशो देशोपि नासीदित्यर्थः । कस्य शर्मन् कस्यवा भोक्तुः जीवस्य शर्मणि सुखे सुखदुःखसाक्षात्कारलक्षणेवा निमिचभूतसति तदावरक तत्वमावृणुयात, जीवानामुपभोगार्था हि सृष्टिः, तस्यां हि सत्यां ब्रह्मांडस्य भूतैरावरणं, प्रलयदशायां च भोक्तारोजीवाः उपाधिपिलयात् प्रविलीना इति कस्य कश्चिदपि भोक्ता न संभवति, इत्यावरणस्य निमित्त्वाभावादपि तन्न घटत इत्यर्थः। एतेन भोग्यप्रपञ्चवत् भोक्तृप्रपंचोपि तदानी नासीदित्युक्तं भवति । यद्यपि सावरणस्य ब्रह्मांडस्य निपेधेन तदन्तर्गत मप्सत्वमपि निराकृतं, तथापि " आपोवाइदमने सलिल मासीत् " इत्यादिश्रुत्या कधिदपां सद्भावमाशंकेत, ते प्रत्याचष्टे, अंभः किमासीदिति । गहन दुःप्रवेशं गभीरं दुरवस्थानं अत्यगाधर ईदृशमभः किमासीतदपि नेवासीदित्यर्थः । सुविस्त्ववान्तरमलयविषया ॥१॥ , -- ।

आवरकपदार्थ अपनी आवरणशक्तिसे आवृत करे, जबकी कोई आवरणीय- संभवित होसक्ता? अथवा आवरकतत्व कोन् था? की जो आचार्यको आवृत करे. - [१७] अनुवाद-"तपसस्तन्महिना जायत" इत्यादिक मन्त्रसें अग्रिमभाग सृष्टिका प्रतिपादन करेंगे, एतदादिक मन्त्रोंसें समस्तप्रपंचरहित सृष्टिके पाका- लिक अवस्था जिसको प्रलयावस्था " कहते हैं उस्का निरूपण करते हैं-उस् प्रलयकालमें अवस्थित इस् जगत्का मूलकारण सो शशशृङ्गकी तरह निरुपाख्य- अत्यन्ताभावका प्रतिगेगि नहि था, क्योंकी अभावात्मककारण से भावात्मक जगत्ती उत्पत्ति नहि होसक्ती, और ( इस प्रपंचका मूल कारण ) आत्मा कीतरह सद्रूपभी नहिथा, यद्यपि सदसरस्वरूप प्रत्येक विलक्षण है तथापि भाव और अभावकी स्थिति एकत्र मंभवित नहि है. तो भावाभावका तादात्म्यतो कैमेहो सके ? इसलिये भावाभावसे विलक्षण कोइ अनिर्वाच्यही था ऐसा कहना चाहिये. ननु "नोसदासीत्" इस वाक्यसें पारमार्थिक सत्त्वका प्रतिषेध करनेसें आत्म- तत्त्वकी पारमार्थिक सत्ताकामी निषेध होना चाहिये ? और वैसा स्वीकार करनेसे आत्मतत्त्वमी तत्त्वातत्त्वरूपसें अनिर्वचनीय है ऐसा कहना चाहिये. अगर "नआनीदवातम्" इस् मन्त्रसें आगे आत्माकी पारमार्थिक सत्तामा निरूपण किया जायगा तो आत्मतत्त्व सत्स्वरूपही है, अनिर्वाच्य नहि है, किंतु परिशेपा- नुमानसें मायाफे सत्वका निषेध किया जाता है ऐसा कहाजायतो "तदानी" "उस् कालमें" यह विशेषग व्यर्थ होजायगा, क्योंकी व्यवहार कालमें मायाका पारमार्थिक सत्र कहां है की जिस व्यवहारकालके व्युदासार्थ “तदा- नम्" इस् विशेपणका चारितार्थ्य मिल, इलिये मायाके सत्त्वकाभी "नोसदासीत्।" इस् वाक्यो निषेध किया जाता नहि । अगर ऐसा कहानायकी-व्यावहारिक पदार्थोकी (तदानीम् ) उस कालमें व्यावहारिक सत्ता है तो पृथिव्यादिक पदार्थों का उस कालमें सत्त्व होनेसे " नोसदासीत् " यह निषेध कैसे संगत हो सक्ता ? दलिये कहते है "नासीद्रजः" रजःशब्दवाच्य पातालादिक पृथिवी- पर्यन्त लोक और अन्तरिक्ष और उस्के उपरितनलोक द्युलोकसें लेकरके ब्रह्मलोक- पर्यन्तके चतुर्दशभुवनात्मक सबलोक थेही नहि. अब उनके आवरकरूपसे पुरा- णादिकमें प्रसिद्ध वियदादिकभूत उन्की स्थितिका प्रदेश और आवरणके निमि- तकामी प्रतिषेध करते हैं-आवरण करनेयोग्य वैसा तत्त्व कौन था? की निको आवरणकरनेयोग्य पदार्थ नहिया तो उस्को 'आवरणकरनेवाला पदार्थ में - है [१०८] याने आवार्य और आवरक दोनों स्वरूपसें थेही नहि. और आवरकतत्व किम् देशमें अवस्थित होकरके आवृत करे ? क्योंकी उस्का आधारभूत देशही नहिथा. और भोगोपभोगमें तत्पर किस् जीवात्माके सुखार्थ अथवा सुखदुःखके साक्षात्कारार्थ किसी निमित्तको लेकरके वह आवरकतत्व आवार्यका आवृत करे ? क्योंकी जी. वोंके उपभोगार्थ सृष्टि है, उस् सृष्टिको विद्यमानदशामें ब्रह्माण्डका भूतकर्तृक आवरण होसक्ता है, परंतु प्रलय कालमें उपाधिका लय होनेसे तदुपहित चेतना- स्मक भोक्ता जीवात्मामी स्वरूपसें लीनही होजाता है इसमें कोइभी किसीका भोक्ता बनही सका नहि, इस्लिये आवरणको भोकृतामे निमित्त्व न होनेसे आवरण संगत होसक्ता नहि. याने भोग्य और भोक्ता एतदुभयात्मक प्रपंच उस् कालमें थाही नहि. यद्यपि आवरण सहित ब्रह्माण्डका निपेर करनेसे तदन्तर्गत जलकामी निषेधही सिद्ध होताहै तथापि "आपोवाइदमग्रे सलिलमासीत्। “पूर्व- कालमें जलहीया" इस् श्रुतिके अनुसार कोइ जलके सद्भावकी शंका करसक्ता इस्लिये उस जलका भी प्रतिषेध श्रुति करती है-गंभीर अत्यन्त अगाध ऐसा जलकी क्या उस् कालमें था? अर्थात् वहभी नहिथा. तब " आपोवा" इस् श्रुतिकी क्या गति होगी ? तो इसका जवाब यही हैकी वह श्रुति तो अवान्तर- प्रलयविषयक है. और यहतो महाप्रलयका निरूपण हो रहा है. इस्लिये उस् श्रुतिको अवान्तरविषयकत्व होनसें निरवद्य है. ॥ १ ॥ १२३. ८ ७ १७ नमृत्युरासीदमृतनतार्हनराव्याअहआसीत्मकेतः।। आनीदवातस्वधातदेकंतस्माद्धान्यन्नपरकिंचनास॥२ ननूक्तस्य प्रतिसंहारस्य संहस्रपेक्षत्वात् सएव संहर्ता मृत्युर्विद्यत इत्यत आह- मृत्युरासीदिति । ननु यदि स नासीत् तर्हि तदभावकृतममृतममरणं प्राणिनामवस्थानं तदानीमपिस्यात् तत्राह-अमृतं न तहीति । तर्हि तस्मिन् प्रति- हारसमये । अयंभावः-सर्वेषां प्राणिनां परिपक्वं भोगहेतुमृतं सर्व कर्म यदोपभुक्त- मासीत तदा भोगामावात् निष्प्रयोजनमिदं जगत् इति परमेश्वरस्य मनसि संजिही जायते, तयैव स मृत्युः सर्व जगत्संहरत इति । किमनेन मृत्युना संहा तदमावकृतं वा कथममरणं स्यादित्ये तदेवाभिप्रेत्य कठेरामायते-"यस्य ब्रह्मचक्षांचोमेभवत मोदनं, गृत्युर्यस्योपसेचनं कइत्या वेद यन्त्र मनि(क.१-२-२५)ानन्वेतस्य सर्वस्या- - ननु रहश्यौ इति द्वावेव पदार्थो, आनंदवातस्वधयेति, तौचेदंगीक्रियेते तरिकमपरम वशिष्यते यनासीद्रज इत्यादिना प्रतिषिध्येत, तत्राह-तस्मादिति तस्माद्ध तत्माखल पूर्वोक्तान्मायासहिताब्रह्मणः अन्यत्किंचन किमपि वस्तु भूतभौतिकात्मकं जगन्नास नचमूव, ननु तदानीमन्यस्य सत्वनिषेधो न शंक्या, असत्त्वे चाप्रसक्तस्वान्न निषेधोप [१०९] पिकरणभूतः कालो विद्यत इत्याह-नराज्याइति, राज्या अश्य प्रतः प्रतान नासीत, तदेवभूतयोः सूर्याचन्द्रमसोरभावात्, एतेनाहोरात्रनिषेयेन तदात्मको मास - संवत्सरप्रभृतिकः सर्वः कालः प्रत्याख्यातः । कथं तर्हि नोसदासीवदानी मिति कालवाची प्रत्ययः? उपचारादिति ब्रूमः, यथेदानीन्तन निषेधस्य कालोवच्छेदकः तथा मायापि तदवच्छेदहेतुरिति अवच्छेदकत्वसाम्येन अकालेपि कालवाची प्रत्ययः । यदवादिप्म ब्रह्मणः परमार्थसत्वमग्रे वक्ष्यन इति तदिदानी दर्शयत्यानादिति। तत्स- कलवेदान्तप्रसिद्धं ब्रह्मतत्त्वमानीत् प्राणितवत्, नन्वेचं पाणनकर्तुः जीवभावापन्न- स्यैव ब्रह्मणः सत्त्वं स्यान्न विवक्षितस्य हिपाधिकस्य ब्रह्मणः-“ अप्राणोधमनाः शुद्ध " इति (मुण्डक २.२) तस्य प्राणसंबन्धाभावात्, तत्राह-अवातमिति, अयमाशयः-आनीदित्यत्र धात्वर्थः क्रिया तत्कर्ता तस्यच भूतकालसंबन्धइति त्रयोर्थाः प्रतीयन्ते, तत्र समुदायो न विधीयते यथामयेष्टाकपाल इति । येन ब्रह्मणः सत्त्वं न स्यात्। किंतर्हि अनेन कर्तृत्वमनूद्य भूतकालसत्चालक्षणो गुणो विधीयते, दना जुहोतीति वाक्यान्तरविहितामिहोत्रानुवादेन तत्र गुणविधानं तत्राप्यनेन कर्तृत्व- - विशिष्टस्य न पूर्वकालसत्ता विधीयते तन्निधानुपपतिप्रसंगात् अतोनकर्तृत्वेनेदानी- तनेनोपलक्षितं यन्निरुपाधिक परब्रह्म तस्यैव भूतकालसत्ता विधीयत इति न कश्चि- होप इति । नवीदृशस्य ब्रह्मणः मायया सह संबन्धासंभवात् सांख्याभिमता स्वतंत्रा सद्रूपा सत्वरजस्तमोगुणात्मिका मूलपकृतिरेवाभिमतेति कि नोसदिति निषेव.. तमाइ- स्वधयेति । स्वस्मिन् धीयते धियते आश्रित्य वर्तते इति स्वधा माया, तया तद्रम एकमविभागापनमासीद, अत्र प्रकृतिप्रत्ययाभ्यां तस्याः स्वातन्त्र्यं निवार्यते, यद्यप्यसंगस्य ब्रह्मणः तया सह संबन्धो न संभवति तथापि त स्मन्नविद्यया तत्स्वरू- पमिव संबन्धोप्यध्यस्यते यथाशुक्तिकायां रजतस्य, एतेन सद्रूपत्वमपि तस्याः प्रत्या- ख्यातं । ननु यदि माया ब्रह्मणा सहाविभागापन्ना ताई तम्या अनिर्वाच्यत्वा- ब्रह्मणोपि तत्प्रसंग इति कथं तस्य सत्वमुक्तमानीदवातमिति, ब्रह्मणो वा सत्त्वा स्या अपि सत्वप्रसंग इति कथं नो सदासीति सत्वप्रतिषेधः? मैवं, अनुभवदृष्ट्या ऐक्यावभासेपि युक्त्या विविच्य मायांशस्यानिर्वाच्यत्वं ब्रह्मणः सत्वंच प्रतिपादितः . . [११] योग इत्यत आह-परः इति, परः परस्तात्सृष्टेः ऊर्ध्व वर्तमानं इदं जगत तदानी न बभूवेत्यर्थः अन्यथा उक्तरीत्या क्वचिदपि निषेधो न स्यादितिभावः॥ २ ॥ अनुवाद-ननु पूर्वोक्त प्रलय किसी संहती के अधीन होने से उस पलयका हेतुभूत संहारक मृत्यु उस समय अवश्य होगा? . इम् संशयके निवृत्त्यर्थ कहते हैंकी, " न मृत्युरामीत् " संहारक-मृत्युभी उस कालमें नहिथा. तब मृत्युका अभावरूप अमृत था ? इस्का यह उत्तर हैकी " अमृतं न तर्हि " उस् प्रलय- कालमें अमृत अमरणस्वरूप प्राणिका अवस्थानी नहिथा, याने इस्का यह आभ- प्राय है-परिपक्क होनेसे भोगोपभोगमें हेतुभूत प्राणिमात्रका कर्म जब उपभुक्त हो चुका तव इतर कोइ भोग अवशिष्ट न होनेसे यह विश्व निरर्थक है क्योंकी जग- दन्तःपाती प्राणिमात्रकी स्थिति अपने अपने कर्मफलोंके उपभोगार्थही है, जब परमेश्वरके मनमें प्राणिमात्रके अनवशिष्ट भोगोंका पालोचन हुवा तब संहार करनेकी इच्छा की, जिस्को "संजिहीर्षा" कहते है, सो इच्छा हुई, उसी इच्छाके अधीन संहारक मृत्युनें सकल विश्वका संहार कियाथा परंतु स्वतन्त्ररूरसे नहि "मृत्युर्धावति पञ्चमः" जिस् परमेश्वरका वशवर्ती मृत्यु इधरउधर दौडा करता है इत्यादिक श्रुतिमी है. जबकी परमेश्वरकी संजिहीपीके अधीनी होकर के मृत्यु संहारक बनसक्ता है तब उस्का स्वतन्त्र संहारकत्व कैसे होसक्ता. और उस् मृत्युके अभावात्मक अमरणरूप अमृतभी कैसे उम् कालमें उपपन्न होसक्ता ? इसी अभिप्रायसें कठवल्लीमें कहाहै-"जिस् (परमेश्वर) का ब्राह्मण क्षत्रिय और तदुप- लक्षित सकल विश्व-ओदनोपलाक्षत भक्त (भक्ष्य) बनता है, और मृत्यु जिस्का उपसेचन-व्यञ्जनस्थानापन्न है उस परमात्नदेवको कौन जानसक्ता" ? इस् सफल प्रपञ्चका अधिकरण (आधार) भूत काल तो उस समयमें जरूर होगा तो इसका यह उचर है "न राज्याः" रात्रि और दिनका ज्ञानही नहिंथा, क्योंकी अहो- रात्रके हेतुभूत जो सूर्यचन्द्र है वे उस् कालमें नहिं थे. जनकी सूर्यचन्द्र भी नहिं थे तर उनके अधीन मास ऋतु संवत्सरादिक समयसमयभी नहिथा, ऐसा कहनेसें कालकामी प्रत्याख्यान हुवा. अगर ऐसा कहाजायकी-जय समयकामी निषेध किया जाता है तो ; नौसदायाचदानीम" इस वाक्यमें " तदानीम् । "उस् फालमें" ऐसा क्यों कहा ? याने "तदानी" यह पद कालवाचिप्रत्ययान्त है तो उससे फालकी प्रतीति होती है ? तो इसका यह समाशान है की यह . .

नाका माया के साथ संपर्क न होनसें सांख्यशास्त्राभिमत स्वतंत्र सद्रूप सत्व रज और तमोगुणात्मक प्रकृतिही अभिमत हो, " नोसदासीत् " इस निषेधसें क्या मतलब? इसका उत्तर कहते हैं "स्वधयेति" स्व-परब्रह्मरूप अधिष्ठान धा- [१९१] कालबाचिमत्ययान्त पदका प्रयोग तो उपचारसे किया गया है. जैसे वर्तमान- कालिक निषेधका अवच्छेदक काल है तैसे प्रलय कालिक निषेधकी अवच्छेदिका माया है, यह सिर्फ अवच्छेदक साम्य होनसें अकाल अभी कालवाचीप्रत्यय हुवा है, इसलिये पूर्वोक्त दूषण है नहि। पहिले ब्रसके पारमार्थिक सब कहनेको स्वीकार कियाथा सो अब पारमार्थिक सत्व कहते हैं-सकल वेदान्तशास्त्र में प्रसिद्ध वह ब्रह्मस्वरूप प्राणनक्रिया प्राणघारणानुकूलव्यापारविशिष्ट हुवा. ननु वह परब्रम प्राणधारणानुकूलव्यापारविशिष्ट होनेसें जीवभावापन्न हुवा, एवंच जीवात्मकब्रह्मकासत्व सिद्ध होता है, निरुपाविकतया विवक्षित शुद्धब्रह्मका सत्व पाया जाता नहि, और शुद्ध ब्रह्ममें तो "अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः" वह पार- मार्थिकस्वरूप प्राण मन इत्यादिकसे रहित है, और स्वयं शुद्ध निष्कलंक है इत्यादिक श्रुतिसें प्राणसंबन्धका अभाव बताया जाता है, इसका उत्तर कहते हैं। "अबातम्" यह भाव हैकी "आनीत (प्राणघारणानुकूलव्यापारविशिष्ट हुवा ) इस क्रियापदसें धात्वर्थात्मक कर्ता क्रिया और भूतकालका संबन्ध ऐसे तीन अर्थ प्रतीत होते हैं, एतभितयात्मक समुदायका विधान " 'आनीत्" इस् पदसे किया जाता नहि, जैसे अग्न्युदेश्यफ अष्टाकपाल पुरोडाश, इसमें केवल पुरोडाशहीका विवान है नहिकी अष्टत्वविशिष्ट कपालका, तैसेही "आनीत्" इम् पदसें ब्रह्माविष्ठानक कर्तृत्व अनूदित करके भूतकालिक सचात्मक गुणका विधागरूपसे व्यपदेश किया जाता है, यह व्यपदेश ब्रह्मविषयक सत्वका बाधक नहि है किन्तु साधक है, जैसे "दन्नाजुहोति" "दहीसे होम करता है" यह वाक्य " अग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्ग- कामः" स्वर्गकी इच्छावाला अग्न्याधानपूर्वक होम करें इस् वाक्यका अनुवादक हो करके दधिरूप गुणका विधान करता है तैसेंही यहांपरभी प्राणन क्रियाके कर्तृत्वानुवादपूर्वक भूतकालिक सत्तात्मक गुणमात्रका विधान किया जाता है, याने नोसदासीत्" इत्यादिक निषेधान्यथानुपपत्यर्थ कर्तृत्वविशिष्ट परब्रमका पूर्वकालिक सत्व विहित नहि किया जाता किंतु प्राणन क्रियानिरूपित कर्तृत्व- द्वारा वर्तमान कालिक जो निरुपाधिक ब्रह्मचैतन्य है उसी भूतकालिक सत्के विधानका व्यपदेश करते हैं, इसलिये कोइ दोष नहिं हैं. ननु इस् निरुपाधिक [११२ अध्यासात्मक सम्बन्धद्वारा आश्रयको प्राप्त करनेवाला मायात्मक पदार्थको स्वधा कहते है, उसी मायाके साथ वहब्रह्म अविभागापन्न (अविभक्त) था. यहां "स्वघया"' इस् सहार्थक तृतीयाविभक्त्यन्त पदका प्रयोग होनेसें उस् " स्वधा " वाच्य मायाका स्वातन्त्र्य निवारित होता है, क्योंकी सहशब्दके अर्थकी जहां योग्यता रहेता है वहां सहशब्दका प्रयोग न होनेपरमी "सहयुक्तेऽमधाने" इस पापिनीय (व्याकरण) शास्त्रानुमार तृतीया विभक्ति होती है, और वह तृतीयाविभक्ति. स्वनिष्टावधेयतानिरूपितोद्देश्यताक्रान्तप्रकृतिमें अपवानतारूप अर्थको निरूपिका (निरूपण करनेवाली) होती है, याने वह माया कार्यद्वारा अनुभवका विषयभूत होनेपरभी अधिष्ठान सत्तासें अनतिरिक्त सत्ताक होनेसे स्वयं अप्रधान-गौगही है ब्रह्मकी तरह वह (माया) स्वतन्त्र नहिं है, और इस विषयमें यह उपपन्नभी है की ब्रह्मस्वरूप असंग होनेसे मायाका संबन्ध उममें पारमार्थिक होमक्ताही नहिं किंतु आरोपितापरपर्याय काल्पनिक अध्यासात्मक संबन्ध है, जैसे रज्जुरूप अधिष्ठानमें अज्ञानद्वारा प्रतीयमान सर्प अध्यस्त है तैसेंही ब्रह्मरूप अधिष्ठानमें मृलाज्ञानद्गारा माया और तत्कार्य मचराचरविश्वकी प्रतीति होरही है, इस्से वह प्रतीति आविद्यक होनेसें अयथार्थ है, याने जैमें अविद्यासें प्रतीयमान साके अप्राधान्य सहित अधिष्ठानभूत रज्जुकी प्रधानता है तैमेही मूलाविद्या प्रती- यमान मायिकअपंचके अप्राधान्य सहित अधिष्ठानभूत परब्रह्महीकी प्रधानता है, माया तो वास्तविकरूपसे हैही नहिं, यह निष्कृष्ट तातर्य है. ननु माया जब ब्रह्मसें अविभागापन है तो सत्व असत्वरूपसें व्यपदेश करने को अयोग्य होनेसे वहमाया अनिर्वाच्य है इस्लिये ब्रह्ममें भी अनिर्वाच्यता प्रसक होग, ? जबकी ब्रह्मभी सत्त्वामत्यरूपसे आनेवाच्य है तर आसीत् " इत्यादिक क्रियापदासे उसका सत्व कहना असंगत होगा. अथवा ब्रह्ममें पारमार्थिक मत्त्व होनेसें तत्पबद्ध माया भी पारमार्थिक सत्त्व मानना चाहिये । जबकी माया पारमार्थिक सा है तब "नोस. दामीत् " ऐसे सत्वका निषेध अनुपपन्न होगा ? इसका यह उचर हैफी-अनुभय दृष्टिमें ऐक्य प्रतीत होनेपरी युक्तिद्वारा विवेक करने से माया अंश अनिर्वाच्य है, और ब्रह्म पारमार्थिक सद्रूप है ऐमा प्रतिपादन किया है. ननु द्रष्टा और दृश्य वह दोनो पदार्थ " आनादवातम्या " इत्यादिकसे जप पाये जाते है तब इन दोनोंमे बाकी क्या यचा की जिम्का "नासीद्रमः" इत्यादिक मन्त्रोंसे निषेध किया जाता है ? इस शंकाका यह समाधान है की उस माया विशिष्ट व्रतसें मन्य भूत नन्वावरत्वादावरकं तमः कर्तृ आवार्यत्वात जगकर्म कथं तयोः कर्मकों स्तादात्म्य, तत्राह अपन मिति। अपकेनं अपनायमानं, अयमर्थः यद्यपि जगत: नामरूपाभ्यां विस्पष्टं न ज्ञायत इति तादात्म्यवर्णनं । अतएव मनुना स्मयते- आमीदिदंतमो भूतमप्रज्ञामलक्षणं। अप्रतीमनिर्देश्यं प्रसुप्तमिव सर्वत इति। कुतो न प्रज्ञायते तत्राह-सलिलं सलगताइ दृश्यमानं सर्व जग सलिलं कारणन संगतं अविभागापन्नं आः आसीत, यद्वा सलिलमिति लुप्तोपमं सलिलमिव यथा क्षीरेणाविमागापन नारं दुर्विज्ञान तथा तमसा अविभागापन्न जगत् न शक्यविज्ञान . १.२१३]. भौतिक कोइभी पदार्थ थाही नहि. ननु उस कालमें अन्यके असत्वको शंका, महिं होनी चाहिये, और असद फहनेंसें अनुपलभ्यमान होनेसें निषेप करना असंगत होता है ? इसका समाधान यह हैकी दृष्टिके पश्चाकालमें वर्तमान यह पांच उस् पारमार्थिकदशामे नहिंथा, अगर ऐसा न कहें तो किसी जगापर निपेष प्रसक्तही नहिं होसक्ता यह भाव है. ॥२॥ १२४. ८ ७ १७ तमंआसीत्तमसागूढमग्रेमकेतसलिलंमर्वपाइदम् । तुच्छयेनाभ्वपिहित्यदासीनसस्तन्महिनाजायतकम् ॥३॥ ननूक्तप्रकारण यदिपूर्वमिदं जगन्नासीत् कथं तर्हि तस्य जन्म, जायमा- नस्य जनिक्रियायां कर्तृत्वेन कारकत्मत् कारकं च कारणावान्तरविशेष, इति कारकस्य सतो नियतपूर्वक्षणवर्तित्वस्यावश्यंभावात् , अवैतद्दोषपरिजही या जनिक्रियायाः मागपि तद्विद्यतइत्युच्यो, कथं तस्य जन्म अत आह-नमसागूहममइति। अग्रे सृष्टः प्राक् प्रलयदशायां भूतभौतिकं सर्व जगत् तमसा गूढं यथा नैशेतमः सर्व पदार्थजातमावृणोति तद्वत् 'आत्मतत्त्वस्यावरकत्वान्मायापरसझं भावरूपाज्ञान मत्र तमइत्युच्यते, तेना तमसा निगूढं संदृत कारणभूतेन तेनाच्छादितं भवति, आच्छादकाचस्मात् तमसो नामरूपाभ्यां यदाविभवनं तदेवतस्यजन्मेत्युच्यते एतेन कारणावस्थायामसदेव कार्यमुत्पद्यत इत्यसदिनोऽपरकार्यवादितो ये मन्यन्ते ते प्रत्याख्याताः । ननु कारणे तमसि तज्जगदात्मकं कार्य वियते चेतक नासीद्रन इत्यादिनिषेधः। तत्राह-तमासीदिति तमो भावरूपाज्ञानं मूलकारणं वद्रूपता तदात्मनां, यतः सर्व जगत् प्राक् तम आसीद भतो निषिध्यत इत्यही - तमसश्च कर्मकर्तृभावो यौक्तिको विद्यते तथापि व्यवहारदशायामिव त-यां दशाणां ܢܢ [११] मित्यर्थः । ननु विविधविचित्ररूपभ्यसः प्रपंचस्य कथमतितुच्छेन तमसा क्षीरेण नीरस्येवाभिभवः तथा तमपि क्षीरवलवदित्येवोच्यते ता दुर्बलस्य जगतः सर्गसमयेपि नोद्भवसंभव इत्यतआह-तुच्छयेनेति । आसमन्ताद्भवतीत्यातुच्छयेन तुच्छेन तुच्छकल्पनेन सदसद्विलक्षणेन भावरू राज्ञानेनापिहित छादितमासीत्, एक एकीभूत कारणेन तमसा अविभागतां प्राप्तमपि वकार्यजातं तपसः स्रष्टव्य पर्याले चनरूपस्य महिना माहात्म्येनाजायत उत्तनं । तपसः स्रष्टव्यपर्यालोचन- रूपत्वं चान्यत्रामायते, "यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तप" इति ॥३॥ अनुवाद-ननु पूर्वोक्त प्रकारसे यह जगत् जब पूर्वकालमें नहि था तब उसका जन्म कैसे हुवा ? " नासतो विद्यते भावः" असत्-अविद्यमान पदार्थका भाव-सत्त्व हो सका नहि. और इसमे युक्तिभी हैकी-जायमान-उत्सद्य- मान पदार्थ उत्पत्त्यनुकूल व्यापारार्थक "जन्" धातु, कर्तृत्वद्वारा अन्वित होनसे वह "कारक" कहाजाता है, कारण के अवान्तर भेदको "कारक" कहते हैं, तो जैसे छेदनभेदनादिक्रियाका कर्ता और कुठारवास्यादिककरण उस किया पूर्वकालमें वर्तमान है तैसेही इस "जन्" धातुका कर्ता प्रपंच (जगत्) है उसकी भी स्थिति जनिक्रिया (उत्पत्त्यनुकूल व्यापार) से पूर्व में होनी चाहिये- जबकी यह प्रपंच जनिक्रियासे .पूर्व में भी विद्यमान है तब उसका जन्म के होसका है ! अगर इस दोषकी निवृत्ति के लिये "जनि क्रिया पूर्वमी यह जगत- विद्यमान है। ऐसा कहा जाय तोभी विद्यमानका जन्मही नहि होसका", इससे वही दोष स्थिर है. इसी के समाधान के लिये भगवान् वेदनारायण कहते है के "उमसागूदमन" इजि, सृष्टिक पूर्वकालमें भूतभौतिकसमम जगत् “ तम:' पदवाच्य माया" परनामक भावरूप अज्ञानसे आच्छादित-आवृत था. रात्रिसम्बन्धी अन्धकार पदार्थसमूहको आवृत-आच्छादित करता है तैले मायाम आत्मतत्त्वको आवृत करनेवाली होनेसे प्रपंचको भी आच्छादित करदेती है, औ वही प्रपंच अपने आच्छ.दक मायात्मक आवरणसें नामरूप सहित प्रादुर्भावक पाताहै, वही उस प्रांचका जन्म है ऐसा कहने से "कारणावस्था अविधमान पदार्थ कार्यरूपसे उत्पन होता है। ऐसा माननेवाले असरकार्यवादि पण्डि लोकका कहना असंगत हुवा. ननु कारणरूप तमः पदवाच्य माया नगरस्वरु कार्य सूक्ष्मरूपसे जन विद्यमानही था तब "नासीदना" " रजः चन्दवा - सतोक्न्धुमतंतिनिरविन्दन्हृदिमतीप्याकवयोमनीषा||४॥ . लोकात्मक प्रपंच नाहथा" ऐसा निषेर पहिले क्यों कहा है, इसका उतर कहाँ हैंकी-मूल कारण मावात्मक अज्ञान स्वरूपही यह प्रपंचया, इस लिये उसका निषेध करते है, यानें अज्ञानसें अतिरिक्त कार्यरूपसे इस प्रपंचकी प्रतीति नहि होती थी यह तात्पर्य है. ननु अज्ञ न आवरण करनेवाला होनेसे आवरणात्मक व्यापार (क्रिया) का कर्ता है, और जगत उस अज्ञानसें आवृत होता है इसलिये वह कर्म है, तो कर्ता (अज्ञान) और कर्म (प्रपंच) इनका तादात्म्य कैमे होसका: इसका समाधान कहते है की अप्रकेतमिति-अज्ञायमान है, याने अज्ञान और जगतका कर्मकर्तृभाव यद्यपि युक्तिसिद्ध है तथापि व्यवहारकालमें जैसे नामरूपकी प्रतीति होती है तैसी प्रतीति उस (प्रलय ) कालमें स्पष्ट नहि हे ताथी, यही इन (कर्ता कर्म) दोनोंका तादात्म्य है. मनुस्मृतिभी कहा है की यह परोवर्तिदृश्यसमूहात्मक प्रपंच पूर्वकालमें तर्क और निर्देशका अविषय और नामरूपात्मक लक्षण-चिहमें रहित और अप्रकाशस्वरूप होनेसें मानों चारो तरफसे प्रसुप्त-मूर्छित हो वैसाथा. वह प्रपंच ज्ञानगोचर क्यों नहिं होताथा ! इसका उत्तर कहते है की-यह दृश्यमान जगत् कारणसें संगत-अविभक्तथा। अथवा सलेलको लुप्तोपमझ समझना चाहिये. सलिल-जल जसे दुग्धसें मिला हुवा दुर्वि- ज्ञेय होता है वैसेंही अज्ञानसें अविमक्त प्रपंच ज्ञानगोचर होसका नहिथा। ननु विविध और विचित्र अनेक रूपवाले प्रपंचका अतिकुच्छ अज्ञान अभिभव कैसे हुवा ? नीरकी अपेक्षासें क्षीर बलिष्ठ होनेसे क्षीरसे नीरामिभव उपपन्न है, परंतु तुच्छ अज्ञान की जो निर्बल है उनसे बलिष्ठ प्रपंचका अभिभव कैसे हुवा "अज्ञानभी क्षारकी तरह बलवत्तर है" ऐसा कहें तो दुर्बल जगत्का सृष्टिकालमें उद्भव कैसे संभवित है. इसका जवाब हैकी तुच्छ्येनेति-आभु-उद्भवको पानेवाला प्रपंच सत् मौर अमत्में विलक्षण भावरूर कसित तुच्छ अज्ञानसें आच्छ दिव था, या कारणायक अज्ञानसे अविभक्त होनेपरभी वह कार्यस्वरूपमपंच सव्य पयालोचनात्मक तपश्चरणके महत्व प्रादुर्भूत हुवा है. सटव्यपर्या मोचनको "त" शब्दसें वेदमें व्यवहार किया है-जो परमेश्वर सर्वज्ञ है, और जिस परमेश्वरका तपश्चरण ज्ञानमय-पालोचनात्मक है इत्यादि. ॥३॥ १२५. ८ ७ १७. कापस्तदग्रेसमवर्तताधिप सोरेतामयमयदासीत .

। . - [११]-55 नक्तरीत्या यदीश्वरस्य पर्यालोचनं जगतः पुनरुत्पत्तौ कारणं तदेव कि निबन्धनमित्यंत आह-कामस्तदग्रइति । अग्रे अस्य विकारजातस्य सृष्टेः प्रागवस्थायां.. परमेधेरस्य मनसि कामः समवर्तत, सभ्यगजायत सिसृक्षा जातेत्यर्थः । ईश्वरस्य सिसृक्षा वा किं हेतुकेत्यत आह-मनस इति । मनसः अन्तःकरणस्य संबन्धिवासना- शेषेण मायायां विलीनेन्तःकरणे समवेतं, सामान्यापेक्षमेकवचनं, सर्वप्राण्यन्त:कर- गेषु समवेतमित्यर्थः, एतेनात्मनो गुणाधारत्वं प्रत्याख्यातं । तादृशं रेतः भाविनः प्रपंच स्य बीजभूतं, प्रथममतीतेकल्पे प्राणिभिः कृनं पुण्यात्मकं कर्म यत्, यतः कारणात् वृष्टिसमये आसीत्, अभवत्, भूष्णु वर्षिष्णवजायत परिपक्वं सत् फलोन्मुखमासीत् इत्यर्थः, तत् ततोहेतोः फलपदस्य सर्वसाक्षिणः कर्माध्यक्षस्य परमेश्वरस्य मनसि सिसृझाजायत इत्यर्थः। तस्यांच जाताया स्रष्टव्यं पर्यालोच्य ततः सः जगत्सृजति । तथाचाम्नायते-"सोकामयत बहुःस्यां प्रजायेयेति सतपोतप्यत सतपस्तप्त्या इदंसर्व मसृजत यदिदकिंचेति" (तैतिरीय २-६) । श्रुतिरात्मना इत्यमवगमितेथे विद्व- दनुमवमपि अनुपाहकत्वेन प्रमाणयति-सतइति । ततः सत्वेनेदानीमनुभूयमानस्य सर्वस्य जगतो बन्धु बन्धकं हेतुभूत, कल्पान्तरे प्राण्यनुष्ठितं कर्मसमूह, कवयः क्रान्त- दर्शनाः अतीतानागतवर्तमानाभिज्ञा योगिनः हृदि हृदये निरुद्धया मनीषा मनीषया बुद्धया प्रतीष्य विचार्यः असति सद्विलक्षणे अव्याकृते कारणे निरविन्दन् नि:कृप्यालभन्त विविच्याजानन्नित्यर्थः॥४॥ A अनुवाद-ननुपूर्वोक्तप्रकारसे ईश्वरकर्तृकपालोचन, प्रपंचोत्पत्तिम कारण है तो वह पालोचन किम्मूलक है ? इसका प्रत्युत्तर कहते हैं-की इविकृत वर्ग-प्रपंचकी पूर्वावस्था में परमेश्वरके मनमें प्रपंचासमक्षात्मक काम प्रादुर्भूत हुवा. वह सिरक्षात्मक काम फिस् हेतुसे हुवा ? उसका उत्तर कहते है की मायामें वासनावशेषरूपसे विलीन सकल प्राणिके अन्तःकरणों से संबद्ध जो रत' है सो भाविप्रपंचका बीजभूत है, याने प्रथम अतीत कल्समें प्राणिन्ने पुण्यात्मक कर्मजिस कारणसें संपादित कियेथे वे कर्म राष्टिकालमें परिपकावस्थापन्न होने से फलोन्मुख हुवे. उसी हेतुमें सकलकर्मफलोंके दाता सर्वसाक्षी कर्माध्यक्ष परमे- श्वरफे मनमें सिरक्षात्मक कामका आविर्भाव हुवा, यह तात्पर्य है. और वह सिसक्षा जब परमेश्वरके मनमें हुइ तब स्रष्टव्य प्रपंचका पोलोचन करके सफल सृष्टिका'ईश्वरने मादुर्भाव किया. मुविभभी कहा है-वह परमेधर इच्छा करते 7. -- [११५३ मये की में अनेक रूप होजाउं, आलोचनात्मक तपश्चरण करके वह परमेश्वर इस - समग्र प्रपंचको रचतेभये श्रुति (मन्त्र) ने जिस अर्थका बोध लिया उसी अर्थ दया करके श्रुति विद्वान्लोकों का अनुभव भी बताती है-इस कालमें सद्रूपसें अनुभूयमान जगत्का हेतुभूत क्लान्तरमें अनुष्ठित प्राणिमात्रके कर्मसमूहको कवि-भूनावि- प्यद् और वर्तमानको जाननेवाले योगिलोक हृदयमें वुद्धिके निरोधद्वारा विचार - करके असत् सद्विलक्षण अव्याकृत कारणमें विवेकपुरःसर पूर्योक्ति कर्मसमूहको यथार्थ जानते हैं. ॥४॥ १२६ ८ ७ १७. तिरवीनोविततोरश्मिरेपामधास्तिदासीरुटुपरिविदासीरुत्। रेतोधाआसन्महिमा आसन्त्स्वधाअवस्तात्मयतिःपरस्तात॥५॥ एवमविद्याकामकर्माणि सृष्टेहेतुलेनोक्तानि, अधुना तेषा स्वकार्यजनने शैब्धं प्रतिपाद्यते, येय नासदासीदित्यविद्या प्रतिपादिता, यश्च कामस्तदन इति .. फामः, मनसोरेत. प्रथम यदासीत् इति यत्कर्म, एपामविद्याकामकर्मणा वियदादि- . भूतनातानि सृजता, रश्मि. रश्मिसदृश , "यथासूर्यरश्मिरुदयात्तन्तर निमेषमात्रेण युगपत्सर्वं जगद्यानोति तथा शीघ्र सर्वत्र व्याप्नुवन् , यः कार्यवर्गो विततो विस्तृत आसीत, स्विदासीदिति वक्ष्यमाणमत्रापि संबध्यते, स कार्यवर्ग. प्रथमत. किंदिर-- चीनः तिर्यगवस्थितो मध्यस्थित आसीत् किंवा अधः अधस्वादासीत् आहोस्वित् उपरि उपरिचारिकमासीत्, उपरिस्विदासीदितिच! " आत्मना आकाशः संभूतः आकाशाद्वायु:शयोरमिरित्यादिकया पञ्चमीश्रुत्या तत जातारं ततो होतारमितिवत् क्रमप्रतिपती सत्यामपि विद्युत्प्रकाशवत् सर्गस्य शीघ्रव्यापनेन तस्य क्रमस्य दुर्लक्षणल्यात् एतेषु त्रियु स्थानेषु प्राथम्यं कुत्र इति विचार्यते, एव नाम थीम सर्वतो दिक्षु सो निष्पन्न इत्यर्थ । एतदेव विभजते-सृष्टेषु कार्येषु मध्ये केचिद्भावा स्वाषा रेतसो बीजभूतस्य कर्मणो विघातार: कर्तार. भोकारश्च जीवा आसन्, अन्ये भावा महिमान: महान्तो वियदादयो भोग्या आसन् , एव मायासहितः परमेश्वर. सर्व जगत् सदा स्वय चानुपविश्य भोक्तृभोग्यादिरूपेण विभाग कृतवानित्यर्थ.. अय- मेवायतिरायके-"सासमा तदेवानुप्राविशत्" इत्यारभ्य मतिपाय। तत्र च मोक्त- मोग्ययोर्मध्ये स्वधा, अन्ननामैतत्. भोग्यमपंचः अवस्तात् अवर. निकृष्ट आसीत्, ।

. - [१९८]. प्रयतिः प्रयतिता भोक्ता परस्तात् परः उत्कृष्ट आसीत् भोग्यप्रपंचं भोक्तृप्रपंचत्य शेषभूतं कृतवानित्यर्थः ॥५॥ अनुवाद-इस प्रकार सृष्टिमें हेतुभूत अविद्याकामकर्मका प्रतिपादन किया. अब "वह अविद्यादिक अपनें अपने कार्यको अतिशीघ्र रचते भये" ऐसा निरूपण करते है-"नामदामीन" इस मन्त्रसें जो मूलगावेद्याका प्रतिपादन किया, और "कामस्तदने" इसमन्त्रसें जो कामका प्रतिपादन किया, और "मनमोरेत: प्रथमं यदासीत्" इससे जो कर्मका प्रतिपादन किया, आकाशादिकमहामूनों को कार्यरूपसे बनानेवाले इन अविद्यादिकसमुदायका कार्यवर्ग सूर्यके किरणों को तरह सत्वर विश्व व्याप्त हुवा, जैसे सूर्यके किरण सूरोदयके अनन्तर निमेष मात्रमें समस्त जगत्को अपने स्वरूपसे व्याप्त करते हैं, तैसेंही अविद्यार्दिक समुदायरूपकारणसे उत्पन्न भया हुवा कार्यवर्ग त्वरितही विश्वको व्याप्त करता भया. और यह विस्तृत कार्यवर्ग क्या मध्यप्रदेशमें अवस्थित था ? अथवा अधस्तन (नीचे) प्रदेशमें अवस्थित था? किंवा उपरितन प्रदेशमें अवस्थित था? "उस आत्मासे आकाश उत्पन्न हुवा, आकाशसे वायु और वायुसे अमि" हत्यादिक मन्त्रोमें पञ्चमी विभकिके अवणसे "आचार्यादिकन्के बाद होताको और होताके बाद उताको " इत्यादिक मन्त्रप्रतिक्रमानुसार यहांमी अविद्यादिसमूहसे उत्पद्यमान प्रपंचात्मक कार्यवर्गमें अनुक्रम प्राप्त होता है. परंतु बिजली के प्रकाशकी तरह यह कार्यवर्गके अतिशीघ्र सर्वत्र व्याप्त होनेसे क्रम अत्यन्त दुज्ञेयहै. इन्तीनों स्थानों में प्राथम्य कहां हैं सो विचार किया जाता है, याने बहुतही जल्दी कार्यवर्ग फैला हुवा है की जिसमें अनुक्रम पाया जाता नहि. यही बात स्पष्ट कहतेहैं :-रचे हुवे कार्य वर्गके मध्यमें कोइ पदार्थ बीज- भूत कर्मके विधान करनेवाले और उन् कमों के फलों को भोगनेवाले जीव थे. और. मन्य पदार्थ वियदादिक सब भोग्यवर्गके अन्तर्गत ये. इस प्रकार मायासहित परमेश्वर सकल जगतो अविद्या कामकर्मद्वारा उन करके उगमे अनुपविष्ट हो करके भोक्ता और भोम्यादिरूपसे विभागको काते भये. तेतिपको भी कहा है की-अपंचको स्चारके उसमें अनुप्रवेश परमेधरने किया है. इस मोक्कृत भोग्यात्मकमपंचमें भोपपप निकृष्ट था और भोमांच उतम था याने मोगा- मपंचका निर्माण मोक्त्रात्मक प्रपंचक शेषरूपसे किया गया है. ॥४॥ .

[१९९] १२७. ८ ७ १७. फोभदोदकइहमवाचकृतमानाताकृतं यविष्टष्टिः । अर्वाग्देवाअस्यविसननेनायाकोवेदयतआबभूव ॥६॥ एवं भोक्तृभोग्यरूपेण सृष्टिः संग्रहेण प्रतिपादिता, "एतावद्वाइदं मन्नचै- बानादश्च सोम एवान्नमगिरनाद" इतिवत् , अदानी सा सृष्टिः दुर्विज्ञानेवि न विस्तरेणामिहितेत्याह-कोअद्धति । फापुरुष: अदापारमार्थेन वेद जानाति, को वा इहास्मिन्तो के भयोचत् प्रयात्, इयं दृश्यमाना विसृष्टिः विविधा भूतमाविक- भोक्तृभोग्यादिरूपेण बहुप्रकारा सृष्टिः कुतः कस्मादुपानकारणात, कुतः कस्माच निमित्तकारणादाजाता समन्ताजाता प्रादुर्भूता, एतदुभयं सम्यक् को वेद को वा विस्तरेण वक्तुं शक्नुयादित्यर्थः । ननु देवा अजानन्तः सर्वज्ञास्ते ज्ञास्यति वस्तुंच शक्नुवन्तीत्यत आह-अगिति देवाचास्य जगतो विसर्जनन वियदादिभूतो- सत्यनन्तरं विविध यौतिक सर्जनं सृष्टिः तेन अर्वाक् अर्वाचीनाः कृताः भूतसृष्टेः पश्चाजाता इत्यर्थः तथाविधास्ते कथं स्वोत्पतेः पूर्वकालीना सृष्टिं जानीयुः, अजा- नन्तो वा कथं प्रयुः, उक्तं दुनित्वं निगमयति-अथ एवं सति देवाअपि न जानन्ति, किल तद्यतिरिक्तः कोनाम मनुष्यादि तत् जगत्कारणं जानाति यतः कारणास्कृत्सं जगदाबभूव मजायत ॥ ६ ॥ अनुवाद-इस प्रकार भोग्यमोक्तृत्वरूपसे सृष्टिसंमहका प्रतिपादन किया, पब यह सृष्टि दुर्गेध है इसलिये विस्तारसे नहि कहा सो कहते है कौन पुरुष पारमार्थिक रीति जानसक्ता ? अथवा कौन पुरुष इस लोकमें (इस पपंचका) प्रवचन करसता है ? भूतभौतिकभोक्तृभोग्यादिकस्वरूपसे विविधा- कार प्रतीयमान यह सृष्टि किस उपादान कारणसें और किस निमित कारणसे प्रादुर्भूत हुइ है इन दोनो वृत्तान्तोंको कौन पुरुष यथार्थ जानसका और कौन पुरुष सविस्तर कहेसक्ता है. ननु देवतालोक अज्ञात होनेपरमी सर्वज्ञहोनेसे जान सकेंगे और विवेचनभी करसकेंगे। इसका उत्तर हैकी-देवालोक आकाशा- दिक भकी उत्पत्तिके अनन्तर भौतिक सृटिसें अर्वाचीन है, यार्ने मूतमुधिके अनन्तर प्रादुर्भाव को पाये हुवे देवतालोक अपनी उत्पतिस प्रामालिक सृष्टिको कैसे ज्ञानसत! और स्वयं (उस सृष्टिके ) ज्ञानरहित होते हुवे कैसे प्रवचन कर सके। जवकी देवतालोकभी इस कार्यरूपमपंचको नहिं जानसक्ने तक - -- १२०] । दूसरा कौन मनुष्य कार्यरूप मपच और ( अभिन्नानिमिचोपादास ) कारणात्मक.. परमेश्वरको कैसे जान सके ? सर्वथा कार्य और कारण दुर्जेयहै ॥ ६ ॥ १२८. ८ ७ १७ इयविष्टियतआवभूवयादिवादिवान । योअस्याध्यक्ष परमेव्योमन्सोवेदयदेिवानवेदं ॥७॥१७॥ उक्तप्रकारेण यथा इद जगत्सर्जन दुर्विज्ञानम् , एव मृष्ट जगत् तटुंधरम- पीत्याह-इयमिति । यतः उपादानभू तात्परमात्मनः इयं विमृष्टिः विविधा गिरि- नदीसमुद्रादिरूपेण विचित्रा सृष्टि आवभूव आजाता सोपि किल यदिवा दधे धार- यति यदिवा न धारयति एव च कोनामान्योधत शक्नुयात् , यदिधारयेत् ईश्वरएव धारयेत् नान्यइत्यर्थः. एतेन कार्यस्य धारयितृत्वपतिपादनेन ब्रह्मगउपादानकार- णत्वमुक्तं भवति । तथाच पारमार्प सूत्र-प्रकृतिश्चप्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधादिति (ज. सू१-४-२३)।यद्वा अनेनार्धन पूर्वोक्त सृष्टिदु नत्वमेव दृढपति-कोवदेत्य- नुवर्तते, , इयं विविधा सृष्टिर्यत आवभूव आसमन्तादजायतेति को वेदा नकोपि, नास्त्येव जगतो जन्म कदाचिदनीदृशं जगदिति बहवो भ्रान्ता भवन्त्यपि, यत. यस्मात्परमा मन उपादानभूतादायभूव तं परमात्मानं कोवेद न कोपि, प्रकृतितः परमाणुभ्योवा जगजन्मेति हि बहवो भ्रान्ताः । तथा स एव उपादानभूतः परमात्मा स्वयमेव निमिचभूतोपि सन् , यदिवा दधे विदधे इदं जगत्ससर्ज, यदिवा न ससर्ज । असंदिग्वे संदिग्धवचनमेतत् शास्त्राणि चेत्प्रमाण स्युरिति यथा । स एव विदधे तं कोवेद! 'अजानन्तोपि बहवो जडात् प्रधानादकर्तृकमेवेदं जगत्स्वयमजायतेति विपरीत प्रतिपन्नाः, विदधतो विधानमजानन्गोपि सएव आदानभूत इत्यपि को वेद ! नकोपि, उपादानादन्यः तटस्थ एवेश्वरो विदध इति बहवः प्रतिपन्ना, देवा अपि य नमान- न्ति तदर्वाचीनाना मेषां तत्परिज्ञाने कैव कथेत्यर्थः। यद्येवं जगत्सृष्टिरत्यन्तदुर- वबोधना तर्हि सा प्रमाणपद्धतिमध्यास्त इत्याशंक्य तत्सद्भावे ईश्वरः चेदं प्रमाण- यति-यो अस्येति, अस्य भूतभौतिकात्मकस्य जगतो योध्यक्ष ईधरः परमेउत्कृटे सत्यभूते व्योमन् व्योमनि आकाशे आकाशवनिर्मले स्वप्रकाशे द्वा व्योमनि विशेषण हप्ते निरतिशयानन्दस्वरूप इत्यर्थः। यद्वा अतिर्गत्यर्थ , होमनि विशेषण गन्तव्ये देशकालबस्नुभिरपरिच्छिन्न इत्यर्थः। अथवा अतिशीनाः व्योमनि विशेषेण ज्ञातरि विशिष्टज्ञानात्मनि ईदशे स्वारमनि प्रतिष्ठितः। भूपवेहि , ३ [१२१] सनत्कुमारनारदयोः संवाद "स भावः झस्मिन् प्रतिष्ठित" इति " से महिमोति" (छादोग्य उ.७-२४-१) ईदृशो यापरमेश्वरः सो अंग अमेतिसद्धौ, सोपिनाम वेद जानाति यदिवा न वेद न जानाति कोनामान्यो जानीयात् सर्वज्ञ ईश्वर एaf सृष्टिं जानीयात् नान्य इत्यर्थः ॥ ७॥ १७ ॥ अनुवाद-पूर्वोक्त मकारसें 3 'इस जगतकी रचना दुऐ है सेही रचेवे इस जगत को धारण करना दु शक है याने दुर्धर है," यह वृत्तान्त इस मन्त्री कहते हैं-गिरि नदी समुद्रगदे अनेक विचित्र प्रफारसे प्रतीत होता हुवा यह जगत् जिस उपादान कारणरूप परमात्मासे प्रकट हुवा है, यह परमेश्वरमी ३म् जगतका धारक है, किस नहिं ! यानें अगर इस बात्को अधिष्ठानरूपमें धारण कोइ करता है तो यह परमेश्वरही है, इसके सिवाय अन्य कोइभी धारण परनेको शक्तिमान् नहि है, यह तात्पर्य है " जगद्रूप कार्यका परमेश्वरही धारक है" ऐसा प्रतिपादन करनेसे उस परमेश्वरका उपादान (कारण) सिद्ध होताहै और इसमें ब्रह्मसूत्र (१-४-२३) भी अनुमत होताहै प्रकृति-- श्वपतिमाहटानानुपरोपात् ". एकविज्ञानसे सविज्ञान की प्रतिज्ञा श्रुतिमें कदी गई है, और " एक मृत्तिकाविज्ञानमात्रसे जैसे सर्व मृण्मय विकृतपदार्थ विज्ञ त होते है, तो ब्रह्मरूप आदान कारण के विज्ञानसें सफल विकृतर्ग विज्ञात होता है " इत्य दिक दृष्टान्तों के अनुपार ब्रह्म जगत् । (प्रकृति ) उपादान कारणभी है, या निमित्ततो है ही है, एवच अभिन्ननिमित्तोपादा- नता सिद्ध होती है. यद्वा इस् अर्धसे पूर्वोक्त सटिकी दुर्जेयनाही दृढ करते है-यह विविधसृष्टि जिस् (उपादार ) कारणसे प्रादुर्भूत हुई, उस् (कार्य; को कौन जानता है कोहनी नल, "जगत्का जाम किसी कालमें है ही नहि, यह जगत् पूर्व काल ऐसाही?" इस प्रकार अनेक लोक प्रान्त होत है. और जिस् उपादानमारणभूत परमेश्वरसे यह विविध सृष्टि आविर्भूत हुई उत् परमेश्वरको यथार्यरूपसें कौन जानसक्ता है ? कोइभी नर्सि. ओक लोक प्रकृति से अथवा पमाणुसें जगत्मा जन्म मान करो मानिने पडे हुऐं हैं. उसी तरह वही उमादान कारणभून परमेश्वर स्यय निमित्तभूत होकरकेभी अगर जगजम करता हो तो करता हो, यान यह निश्चित अर्थ, सदेहजनक वाक्य है। जैसे।" आर शास्त्र प्रमाण हो इत्यादि पाक्यों निश्चित अर्थ होनेपरी ।

. [१२२] - संशयम तात्पर्य है, तैसेंदी यह वेदवाक्य है. तात्पर्य इस्का यही है की वही परमेश्वर जगज्जन्मादिक कर्ता है उस्को कौन जान सक्ता है ? अनेक -अज्ञानी लोक " जड प्रधानसे कर्तृनिरपेक्ष जगत् स्वयं बना हुवा है " ऐसा विपरीत ज्ञानको पाये हुवे हैं, जगज्जन्मको नहिं जानकेभी " वही परमात्मा उपादान कारणरूप है" ऐसा कौन जानसक्ता है ? कोइ लोकतो ऐसा कहते हैकी उपादानकारणसें अतिरिक्त-तटस्थ होकरके ईश्वर निर्माण करताहै. देवतालोक भी जिस तत्वको यथार्थ रीतिसे नहिं जानसक्ते तो अर्वाचीनकालके लोक न जाने इसमें कौन आश्चर्य है ? यदि इम् प्रकार यह सृष्टि परम दुर्योध है तो इस के सद्भावमें प्रमाणभूत वेदको परमेश्वर खुद कहते हैकी-भूतभौतिकात्मक इस जगत्का अध्यक्ष जो ईश्वर है सो सर्वोत्कृष्ट त्रिकालाबाधित आकाशवत् निलप- निर्मल स्वकीयप्रकाशमें अथवा स्वकीय निरतिशय आनन्दरूप अथवा देश- कालादिकसे अपरिच्छिन्न निजस्वरूपमें अथवा विशिष्टज्ञानात्मकस्वरूपमें प्रतिष्ठित है. श्रुतिमें (छां. ७.५४-१) सनत्कुमार और नारदके संवादरूपसें कहाहैकी-हे भगवन् ! यह आत्मा किस्में प्रतिष्ठित है ? (उत्तर) स्वकीय महि- मामें वह (आत्मा) प्रतिष्ठित है. ऐसा वह परमेश्वर अगर जानता होतो जान सक्ता है. इससे अन्य कोइ जान सक्ता नहि, याने सर्वज्ञ ईश्वरही स्वयं रची हुई सृष्टिको जानता है, अन्य नहि. ॥ ७ ॥ १२९. ८ ७ १८ योयज्ञोविश्वतस्तन्तुभिस्ततएकशतंदेवकर्मेभिरार्थतः। इमेवयन्तिपिनरोयाययुःभवयापरयेत्यांसतेतते ॥१॥ तन्तुभिस्तनितृभिः विस्तारयितृभित्रियदादिभूतैर्यः सर्गात्मको यज्ञः विश्वतः सर्वतस्ततो विस्तृतः, तथा एकशत मे च शतं च एकशतं संख्येति एकोतरशतमि- स्यर्थः, ब्रह्मा थेपु शतसंख्येघानीयसंवत्सरेषु जीवति तदभिमायणात्र शतसंख्या, ' जीवता तेन प्रजापतिना सानेकशतानित्युच्यते, यथाशतायुपुरुषः शतवीर्यान- फशत इति ब्रह्मणः शतसंवत्सरपर्य- देवनिर्देवानुद्दिश्य भोक्तृभिः कृतः फर्म भिरायतः दीघा भूतः तावत्कायस्थायी प्रयमायामविस्तारयान्, पितरः पालकाः प्रजापतेः प्राणभूताः विधमत्रो देशः वयन्ति निर्मिमते, ये देश आययुः सय सबै भगत् स्वक्यनेन व्यापुः, अपिच प्रत्याप्रवति, प्रयागं नाम प्रकृष्टय वेतनाप , . L ५ . [१३] भोकृप्रपंचस्य सर्जनम् , अपवानं नाम अपकृष्टस्य निकृष्टस्याचेतनस्य भोग्यपपंच- स्य सर्जन, प्रवयापवयति वयन्तः प्रवाणमफ्यानं च कुर्वन्त इत्यर्थः, एवंभूताः सन्त: चे विश्वसृजः तते विस्तृते सत्यलोके आस्ते प्राणरूपेण प्रजापतिमुपासते ॥ १ ॥ अनुवाद-जगत्को विस्तारनेवाले इस आकाशादिक भूतोंसे जो यह सर्गात्मक यज्ञ सर्व (तरफ ) फारसे विस्तारको पाया है, एकाधिकशतसंव- त्सर पर्यन्त स्वकीयकालपरिमाणसे (गिस् सर्गमें ) ब्रह्मा प्राण धारण करतें है " शतायुर्वं पुरुषः शतवीर्य आत्मा एकशतः इस श्रुतिसिद्ध नियमानुमार ब्रह्माफे एकोतरशतमख्यापरिमितसंवत्सरपर्यन्त देवोंका उद्देश करके फलोपमो- गमें आसक्त अधिकारिलोकने अनुष्ठित किये हुवे कर्मसें यह सर्गात्मक यज्ञ आयत-दोर्घ है, याने तावत्सरिणामक आयाम विस्तारवान् है की गवत्परिमाणक ब्रह्माका प्राणधारणानुकूलव्यापार है. जो देवतारीक स्रष्टव्यसमग्रजगत्को अपनी वयन (सर्जन) क्रियासें व्याप्त करते है, वही देवतालोक पालक-रक्षक होते हुवे और प्रजापति के प्राणरूप होते हुवे " विश्वसन" नामक होते हुवे निर्माण करते हैं. और वही विश्वसृज" नामकदेव प्रवाण-भोत्कृष्पचकी रचना, अप- बान-अपकृष्ट निकृष्ट अवेतन भोग्यप्रपंचकी रचना करते हुवे विस्तृत सत्य- लोकमें प्राणरूपः प्रजापतिको उपासना करते है. ॥ १॥ १३०. ८ ७ १८ पुमाएनंतनुतणत्तिपुमान्वितत्नाधनाकेस्मिन् । इमेमयुखाउपसेदुरूसदःसामानिचक्रुस्तसराण्योतवे ।। २ ॥ पुमान् पुरुषः आदिपुरुषः प्रजापतिः एनं यजं तनुते विस्तारयनि सृष्ट- वानित्यर्थः। तथा च ब्राहाणं "स प्रजापतिर्यज्ञमतनुत तमाहरत्तेनायजतेति।"प्रजाप.. तिर्यजममृजत यजं सृष्टमनुब्रह्मक्षेत्रे असृज्येतामि"तिच । सएव पुमान सृष्टं तं यज्ञ- मुत्कृणति, सएव पुमान् प्रजापति अन्मिन् भूलोक नाक, अकं दुःखं नास्त्यस्मिन्निति नाकः स्वर्गो लोक , तत्र च वितत्ने इमं यज्ञ विस्तारयति, तस्य मयूखाः रश्मिभूताः तस्य प्रजापतेः प्राणात्मका इमे विश्वसृजो देवाः सदा सदनं देवयजनं स्थान मुपसेदुः, विश्वसर्जनहेतुभूतं विश्वमृजामयनाख्यं यज्ञ कर्तुमुपसीदन्ति, उपसय च सामानि रथन्तरादीन्योतवे वयनाय यज्ञाख्यं वस्त्रमोतुं तसराणि तिर्थक्सराणि तिरधीन-- सूत्राणि चक्रुः ॥ २॥ - ६१२८] १३४ ८ ७ २३. यस्मिन्क्षे सुंपलाशेदेवः संपितेयमः। अत्रांनोविश्पतिः पितापुराणों अनुवनति ॥ १ ॥ वृक्षे लुप्तोपममेतत्, वृक्षवत् सुपलागे शोभनपलाशोते शोभनोगन- सहिते यद्वा शोमनपणापेते वृक्षे तादृशस्य वृक्षस्य मूलं यथा ऊमजानेतश्रमा- पनोदनेन मुखकरं भवति तद्वत्सुखकरे यस्मिन्म्याने देवैः परिजनभूनः यमो नियन्ता वैवस्वतः संपिपते सहमुके पियतीत्यर्थः । विश्पतिर्विशां प्रजानामधिपतिः पिता नः व्यत्ययेनबहुवचनम् मम नचिकेतसो जनको वाजश्रवसः अत्रा स्मिन् यमस्यस्थाने पुराणान् पुरातनान् अचिरकालं निवसतः पितृननु तेपां पश्चात्तत्समीपे निवसत्वयमिति वेनति मा कामयते "नचिकेता नाम कुमारः वाज श्रवसेन पित्रा यमलोक प्रस्थापितः सन् यमं दृष्ट्वा प्रसाद्य पुनरपी लोकमाज गाम" अयमर्थः इदमादिभन्ः प्रतिपाद्यते । यद्वा कुमारो नाम नचिकेतसोऽन्यः कश्चिदपिः यच्छताति यम आदित्यः तमनेन सूक्तेन तुष्टाव सुपलाशे वृक्षइव यस्मिन् शोभने स्थाने यम आदित्यः देवैः दीव्यन्तीति देवा रश्मयः तैः सपिरते संगच्छते । अत्रास्मिस्थाने स्थितो विश्पतिर्विशां प्रजाना प्रकाशनप्रवर्षगादिना पालयिता प्राणात्मना सर्वेषां जनकः स आदित्यः पुराणान् चिरंतनान् स्तोतॄन् नोऽस्मानपि वेनति अनुमाह्यत्वेन कामयते । यद्वा अवस्थाने स्थितान् नोऽस्माकं पुराणान् पूर्वपुरुषान् अनुवेनति अनुक्रमेण कामयते ॥ १ ॥ अनुवाद-सुन्दर पत्रवाले वृक्षकी छाया जैसे परिश्रमको दूर करनेमे सुखकर होती तैसे सुखप्रद जिस स्थानमें परिजनभून देवोंके साथ सफलफा, नियन्ता वैवस्वत यमगज सुसानुभव करते है प्रजाके अधिपति मेरे (नचिकेता) पिता वाजश्रवस इसी यमराजके स्थानमें चिरकालसें निवास करते हुवे पितृओंके, साथ “यह बालक भी निवास करे" ऐभी मेरे (नचिकेताके ) लिथे इच्छावाले हुवे है । (नचिकेता नाम बालकको वाजश्रवस नामके महर्षिने यमलोममें भैजा, वहा यमराजका दर्शन करके और उनसे प्रसन्न करके फिरसे वह बालक इम मर्त्यलोकमें आया है यह अर्थ एतदादिक मन्त्रों से प्रदर्शित किया जाता है. (और यही वृत्तान्त कठवल्ली भी विशद और विस्ताररूपमें कहा है ) अर्थवा कुमारनामा नचिकेतासे अन्य कोइ ऋषिविशेष सूर्धनारायणी इस सूक्तसे 1 । ।

शिवि करतें भये. सुन्दरपत्र्याले यूक्षकी तरह जिम, उचम स्थानमें आदित्य- देव अपें किरणों के साथ प्राप्त होते है, उस् स्थानमें प्रजाका प्रकाशन और वर्षणादिकनमें पालन करनेवाले और प्राणस्वरूपसे सर्पका जनफ यह यादित्य- देव, चिरकालसें स्तुति करते हुवे हमको अनुग्राय मानके चाहते है। अथवा इस स्थान में रहे हुवे हमारे पूर्व पुरुषोंको अनुक्रमसें चाहते हैं. ॥१॥ १३५. ८ ७ २३ पुराणाअनुवनन्तचरन्तपापयामुया असूयन्नभ्यंचाकशंतस्माअस्पृहयंपुनः ॥ २ ॥ पुराणान् पुरातनान् पितॄननुवनन्त मामनुगतं कामयमानं ममुया अनया पापया निकृष्टया बुद्धया सह चरन्तं वर्तमानं पितर वाजश्रवस मसूयन् सुखेन जीवन्त मा " मृत्युसमीपं प्रेही युक्तवान् " इति मानसेनोपतापेन टुक्तः सन् प्रथम- मभ्यवाफशम्, अभ्यपश्यम् । पुनः पश्चात्तम्मा अस्पृहय पितुराज्ञया वं मृत्युमाप्तु. मैच्छम् । यद्वा पुराणान् चिरन्तनान् स्तोतॄन् पुर्वपुरुषान् पितृन्वा अनुवेनन्त- मनुक्रमेण कामयमान चरन्त मुदयास्तमयाभ्या दिवि परिवर्तमानमनया पापया निकृष्टया स्तोतुनसनर्थया बुद्ध्या असूयन् " गुणेपुदोपाविष्करणमसूया " पर- कीयगुणेसु दूषणान्याविष्कुर्वन् अभ्यचाकशम्, अयमपि कश्चिदिति सामान्यरू- पेणाभ्यपश्यम्, इदानी तु पुनः तस्यादित्यस्य माहात्म्यं जानन् तस्मा अस्पृहयम्, तमेवादित्यं स्तुतिभिः परिचरणात्मकै कर्ममिश्च आप्तुमैच्छम् ॥ २ ॥ अनुवाद-प्राचीन पितृोंके पास मेरे गमनको चाहते हुवे और निकृष्ट इस् वुद्धिसे युक्त वाजश्रवस-पिताके गुणोंमें दोषारोपणरूप असूया करते हुवे, और सुखपूर्वक जीवनको व्यतीत करते हुवे मुझको “तुम मृत्यु-यमराजके समीप जामो " ऐसा कहनेसे मानसिक परितापमेंयुक्त में प्रथम देखता भया। उस्के अनन्तर पितामें स्पृहातुर में हुवा, याने पिताकी आज्ञासे उस् मृत्यु यम- राजके पास जाने में इच्छता भया । अथवा स्तुति करनेवाले प्राचीन पुरुषोंको अथवा पितृओंको अनुक्रमसें चाहते हुवे और उदय और अस्त- आकाशमें बिहार करते हुवे आदित्व देवको स्तुति अशक्त ऐसी बुद्धिसे गुणों में दोपारोपण. रूप असूयाको करता हुवा में " यहभी कोइ है" ऐसा सामान्य अवलोकन १७ .. . . [१२६] १३३. ८ ७ १८ विरामित्रावरुणयोरमित्रीरिन्दस्यत्रिष्टुविहभागोअहह। विश्वान्देवाजगत्याविवेशतनचालभपयोमनुप्या॥५॥ अपिच मित्रावरुणयोर्दैवयोः विराट्छन्दः अभिश्रीः अभिश्रिता आश्रिता आसीत , विराजा सह मित्रावरुणावपि प्रजापतेः सकाशादजायतामित्यर्थः। इहामि. न्यज्ञे अहः सक्नत्रयरूपस्य भागो मध्यंदिनमयनास्योंशः त्रिष्टुप्छन्दश्च इन्द्रस्य अभिनयणीयावास्तां, ताविन्द्रश्च प्रजापतेः सकाशादजायन्त इत्यर्थ । तथाचतैचिरी यकम् “उरसोबाहुभ्यांपञ्चदशंनिरामिति तमिन्द्रोदेवतान्वसृज्यत तत्रत्रिष्टुप्छन्दो. बृहत्सामेति । तथा विश्वान् सर्वान्देवान जगतीछन्दः आविषेश प्रावष्टवती, विश्वेदेवा जगतीच प्रजापतरेजायन्तेत्यर्थ । तथाच तैत्तिरीयकम् "तविश्वेदेवादेवताअन्वसृज्यन्त जमतीछन्दोवैरूपंस.मे"तिउक्तेन प्रकारेण प्रतिना कासीत्, छन्दः किमासति, प्रउग किमुक्थमिति त्रयाणा मुचरं जातं । आज्यं किमासीत, परिविः कआसीत् इत्य- नयोरुत्तरं पुरुपसूक्ते दृष्टव्यं । तत्र ह्येषमाम्नायते "देवायज्ञमतन्वत वसन्तो अस्यासी दाज्यंग्री मध्मः शरद्धविः । सप्तास्यासन्परिधय स्त्रिः सप्तसमियः कृता." इति । अयमर्थः-सर्वरसोत्पादको वसन्तस्तस्य जगत्सर्जनमाधनस्य.यज्ञस्य अज्यमासीत्, आज्यदध्यादिभी रसैः सार्ध तादृशो वसन्तोऽजायतेत्यर्थः। सर्वरसानां शोषको ग्री- प्मऋतुः इध्म आसीत् , शुष्कः काष्ठैः सार्थ श्रीप्मोऽजायतेत्यर्थः । पच्यमानीहि- युक्तः शरहतुः तम्य यज्ञस्य हविरासीन , सप्तछन्दासि निःसप्त एकविंशतिधी भूत्वा अष्टादश समिधः त्रयः परिधयश्चासन् । कासीनमा प्रतिमा ff निदानमि- त्यनयोरपि प्रश्नयोरप्येवमुत्तरं पूर्व विश्वस्रनोऽमृताः शतं वर्षसहस्त्राणि दीक्षिताः सत्रमासतेति ॥ एतेनविश्वसृजइदंविश्वमसृजन्ते "ति च तैत्तिरीयके समानायते। अतस्तस्य यज्ञस्य सहनसंवत्सरपरिमितः कालः प्रमाणं, विश्वस्य जातः सर्जनादि कारण प्रवर्तकं फलनित्यर्थः। एतदुक्तं भवति-यदा विश्वसृजोदेशः देव प्रजापति विश्वसृजामयनाख्येन यागनायजन् तदा उक्ताः सर्वा यागोपकरणाः प्रजापतेः सका. शादजायन्तेति। यतोन्यादिदेवताभिः सह गाय यादीनि सप्त छन्दासि जातानि, अतोतोः तेषां छन्दता अग्न्यादयो देवता इति। छन्दोनिचितौ सूत्रितं च "अग्निः सवितासोमो वृहस्पति मित्रावरुणा विद्रोविश्वेदेवादेवता" इति। एवं प्राजापत्यो यज्ञो. बुनितः तेन यशेन ऋषयो मनुप्याश्च चाल चलपिरे हताः सृष्टा आसन तैय यज्ञेन सर्व जगदसृजन्नित्यर्थः ॥५॥ :- । .

[१२७].
अनुवाद-मित्रावरुणनामक उभयदेवमें विराट्छन्द आधय करके
रहा है याने विराट्छन्दके साथ मित्रावरुण देव प्रजापति प्रकट हुये। और
इस यज्ञमें सवनत्रयात्मक दिनका भाग मध्यंदिनसवनाढ्य अंश और त्रिष्टुप्-
छन्द इन्द्र देवके आश्रयणीय हुवे, याने पूर्णक्त अंश और त्रिष्टुप्छन्द और इन्द्र
देव प्रजापतिसे प्रकट हुवे। निरीयक में कहा है की "प्रजापति के उसस्थ उसे
और बाहुसै पञ्चदश" का निर्माण हुवा. उसके अनन्तर इन्द्र देव वृहत् साम
और त्रिष्टुप्छन्दके साथ प्रकट हुथे. और उनी तरह विश्वेदेव और जगतींच्छन्द
प्रजापति से प्रकट हुये, यह ब.तभी उसी तिरीयफ श्रुतिमें कही है। पूर्वोक्त
मकारसें प्रतिमा छन्द और उथ एतद्विषयक प्रश्नका समाधान हुवा. आज्य
और परिधिक विषयमें पुरुपसूनो उत्तर संगत है, पुरुषसूक्तमें कहा है की
"सकलरसोलादक वसन्त ऋतु जगदुत्पादक साधनात्मक यज्ञ का आज्य था, ग्रीष्म
समिघ था, और शरद् हविष्य था, याने शुप्फकाष्ठादिकन केसाथ शोषक श्रीम
भकट हुवा. और परिपक्क होते हुवे नीहियवादिसे युक्त शरतु हविष्यरूरतें
प्रकट हुवा, सप्त छन्द एकविश प्रकारसे वन करके अष्टादश समिव और तीन
परिधिस्वरूपसे प्रकट हुवे। प्रतिमा और आदिकारणविषयकप्रश्नद्वयकामी,
इसी प्रकार उत्तर है, पूर्व " विश्वसृज " नामक देव शतसहस्रवर्षपर्यंत दीक्षित.
हो करके इस महायज्ञको विस्तृत करते भये, यह प्रसंग तैत्तिरीयमें स्पष्ट प्रति-
पादित किया है. "विश्वसृन देव इस विश्वको उत्पन्न करते भये", इस हेतुसे उस
यज्ञका सहस्रसंवत्सरपरिमित समय प्रमाण है, और जगतका सर्जनादिकारण
याने प्रवर्तक फल है। इसका यह तात्पर्य है की जब विश्वमृज नामक देव
प्रजापतिदेवको विश्वसृजके अयनारूप यागसे यजन करते भये तय पूर्वोक्त
सकलयागके उपकरण प्रजापति प्रकट हुये, और अग्न्यादिक देव साथ
गायत्र्यादिक छन्द प्रकट हुवे हैं, इसी लिये उन् छन्दोंकी अग्न्याविक देवता है
याने जिस छन्दके साथ जिस देवताका आविर्भाव हुवा है उस छन्द की वहीं
देवता है. छन्दोविचितिमें सूत्र हैकी "अमि, सूर्य, सोम, बृहस्पति, मित्रावरुण,.
इन्द्र और विधेरैव यह सब तत्तच्छन्दकी देवता है". इस प्रकार प्रजापत्युद्देश्यक
यज्ञक अनुष्ठानते ऋषि और मनुष्य . प्रकट हुवे, याने उमी यज्ञ सकलविश्व
.
"
आविर्भावको पाया भया है ॥ ५ ॥

[१३०] करता भया । परंतु इस् समय उन् आदित्य देवकी कृपाद्वारा उन्ले माहात्म्यको जाननेसे उन् आदित्य देवहीमें स्पृहा करता भया, याने उनी आदित्य देवको स्तुति और परिचर्यात्मक कौसे प्राप्त होनेको चाहता भया ।। २।। १३६. ८७ २३ यकुमारनवरथमचक्रमनसाकृणोः। एकेविश्वतःमाञ्चमपश्यन्नधितिष्ठसि ॥ ३ ॥ नचिकेतसंज्ञं कुमारं यमः अनयोचरया च प्रलोभयति, हे कुमार ? नवममि- नवम् इतःपूर्वमदृष्टं, अभिनवत्यमेव व्यनक्ति-अचक्रं चक्ररहित मेकेपं एका ईपा यस्य तादृशं तथापि विश्वतः सर्वतः प्राचं प्रकरणाञ्चन्तं गच्छन्तं यं रथं मनसा अकृणोः मत्समीपं प्रतिगमनाय अध्यवसायात्मकम् ईदृशं यं रथमकरोः, कृत्वा चापश्यन् कर्तव्याकर्तव्यविभागमजानन्नधितिष्ठसि रथमारोहसि । यद्वा स्तोतारं कुमाराख्यमृषिमादित्यः प्रत्यक्षः सन् देहात्मनोविवेक बोधयति-हे कुमार ऋषे चक- रहितं एके एकः प्राण ईषास्थानीयो यस्य ईदृशमभिनवं सर्वतोगच्छन्तं शरीरा- त्मक यं रथं मनसा अन्तःकरणेन अकृणोः अफरोः संकलात्मकेन मनसा हि कामो जोयते, सत्या हि कामानायां पुण्यपापात्मकं कर्म क्रियते तेन च भोगप्रदानायेदं शरीरमारभ्यत इति परंपरया मनसः शरीरनिप्पादकत्वं, तं शरीरात्मक रथं अपश्य- नजानन् सरस्वरूपापरिज्ञानाद्धेतोरवितिष्ठति भोगायतनत्वेन स्वीकरोषि ॥३॥ अनुवाद-नचिकेता नामक कुमारको यमराज इस ऋचासे और अग्रिम ऋचासे प्रलोभन करते हैं-हे कुमार ? आज नि पर्यन्त अदृष्ट अत्यन्तनतन चारहित एकही लागलदण्डके सहित, तथापि सर्वतरफसें उतमगतिवाडे अथ. यसायात्मक जिस स्थको बना करके मेरे समीप आनेके लिये तुम तसर हुवे, और कृत्याकृत्यके विभागको न जानने हुवेभी उसीरथमें अविष्ठित हुवे हो । अथवा स्तुति करनेवाले कुमारनामक ऋषिको आदित्य प्रत्यक्ष हो करके देह और आत्माका विवेकविषयक बोध करते हैं. हे कुमार ऋषे ! चक्ररहित प्राणा- स्मक ईपादण्डबारे अयम्तनवीन, और सर्वतःगमनवाले इस देहात्मक रथको अन्तःकरणसें तुमने रचा है, संझल्लात्मक मनसे कामना होती है और कामना- द्वारा पुण्यपापारमक फर्म होते है, और उनी कमांसें भोगोपभोगार्थ इस शरीरका [१३१] आरंग होता है, इसलिये परंपरासे ममही देहका निष्पादक है। उसी देहात्मक रथको नहि जानते हुवे उसका भोगार्थ स्वीकार तुम करचुके हो. और इसमें मात्माका अपरिज्ञानही हेतु है ॥ ३ ॥ इस पूर्वोक्त आख्यायिका का सविस्तर निरूपण कठवल्ली में किया है जब नचिकेता यमराजके परोक्ष उनके स्थान में पहुंचे तब तीन रात्रि पर्यन्त असस्कृत रूपसे रहे, याने यमराज न होनेसें उनोने खानपानादिकसत्कारका स्वीकार किया नहि. यमराज जय बहारसे आये तब कहने लगे की हे कुमार ? तुम हमारे स्थानमें आयके तीन रानि पर्यन्त उपोपित-असत्कृत रहे हो, इसलिये हमसे तुम तीन वर (दान) मागो. तब नचिकेताने एक वरमे ब्रह्मविद्याके बोधकी भी या श्वा किया, उसके अनन्तर यमराजनें उसके अधिकारकी परीक्षा के लिये प्रियतर पदार्थों का प्रदर्शन करके प्रलोभन किया है. यह बात प्रलोभनरूपसे इस मन्त्रमें कहते हैं. पक्षान्तरमें कुमारनामक ऋषिविशेपने सूर्यकी स्तुति की, तब सूर्यनारा- यण प्रत्यक्ष होकरके ज्ञानोपदेश करते भये ।। १३७. ८ ७ २३ यकुमारमावर्तयोरर्थविभेभ्यस्परि तंसामानुपावर्ततसमितोनाच्याहितम् ॥ ४ ॥ हे कुमार नचिकेत: यं पूर्वोक्तमधिष्ठितं रथं प्रावर्तयः मत्समीपं प्रत्यगमयः विभ्यो मेधाविभ्यः परि उपरि भूलोके वर्तमानानां मेधाविना बान्धवानामुपरिष्टा- दन्तरिक्ष इत्यर्थः । तं रथं साम पित्रा कृतं सान्त्वनं यमसमीपं गत्वा एवमेव त्वया वक्तव्यमिति प्रत्यागमनकारण मुपायोपदेशन मनुप्रावर्तत इतोस्माल्लोकादन्य- गच्छत् , कथंभूतं नावि नौवत् तरण साधनायां बुद्धौ समाहित सम्याधृतं. यद्वा हे कुमार करपे यं शरीरात्मकं स्थम् अधिष्ठितं प्रावर्तयः संसार प्रवर्तितवानसि, मेघा- विनां मध्ये तं रथं अनुसाम, उपलक्षणमेतत् , सामादिसाध्यं स्तोत्रं नावि नौवत्तारयित्र्यां वाचि वेदात्मिकायां समाहितं सम्यक् प्रतिपाद्यत्वेन हितं. कर्मच ईतः अस्मिन् लोके प्रावर्तत प्रवृत्तमभूत् , इत्थं आत्मस्वरूपापरिज्ञानेन शरीर- बन्धन न कर्तव्य व्यवहारजात चोक्तं । 'अथतु · सत्यज्ञानादिस्वरूपमकर्तारं, परमात्मानं यदि स्वात्मतया साक्षात्करोति तदोक्तं न संभवतीत्यभिप्रायः ४ ॥'

[१३२] अनुवाद-हे कुमार-:(नचिकेत :!) पूर्वोक्त अधिष्ठित जिस् रथको भूलोकमें वर्तमान मेधावि-बान्धवोंफ उपरितन-अन्तरिक्ष -भागमें मेरे समीप आने- के लिये तुमने चलाया, उसी रथके भीतर संसारतरण नौकाकी तरह साधन- मूत बुद्धिमें सम्यक्पकारसे धारण किया हुवा " यमराजके निकट जाकरके तुमने ऐसा ऐसा कहना" इत्यादिक पिताने कहा हुवा सान्त्वन प्रत्यागमनकारण- उपायोपदेश अनुगत-अवस्थित है, याने तुमारे अध्यवसायात्मक रथमें पित्रुपदिष्ट उपायोपदेशात्मक आगमनकारण अवस्थित है. अथवा सूर्यपक्षम-हे कुमार ऋपे? जिस् अविष्ठित शरीरात्मक रथको संसारमें तुम चला रहे हो ? मेधारियों के मध्यमें उसी रथमें अक्सानादिसाध्य नौकाकी तरह तारनेवाली वेदवाणीमें सम्यक् प्रतिपादित स्तोत्र और हितकर्म इस् लोककी भीतर आश्रित है, याने आत्मस्वरूपके अज्ञानसे देहबन्धन और देहसे करने योग्य व्यवहार बताया, और जबकी सत्यज्ञानानन्दस्वरूप अकर्ता परमात्माको स्वस्वरूपत्वेन साक्षात् करता है तब देहबन्धन और कर्तव्यकार्य संगत होसका नहि. ॥ ४ ॥ १३८. ८ ७ २३ काकुमार जनयद्रथंकोनिवर्वयत् । कः स्वित्तयनोव्यानुदेयीयथावत् ॥ ५ ॥ कः पुरुषः इमं कुमार मजनयत् , अधिक्षेपे किंशब्दः कीदृशं बालं यम- समीपं पहिण्वन् कथं पिता समीचीनः स्यात्, ततावदास्तां, कोया पुरुषः अत्य बालस्य यमसमीपं प्रतिगमनाय तं रथं निवर्तयत् नितितवान् सोपि मूर्ख इत्यर्थः। या शेजारीण असं कुमारः अनुदेशी अनुदानमारबह भवति उस मनुगुणा वचन मुपायकथनं अद्यास्मिन्काले नोस्माकं कास्वित् को नाम ब्रूयात् आभिदध्यात् प्रथमं यमसमीपं गत्वा पयानतोनिर्गमनोपायं ब्रुवन्नपि न प्राज्ञ इत्यर्थः। अथवा कुमाराख्य ऋषिः आत्मनः सात्म्यिमवगच्छन् स्वव्यतिरिक्तस्यान्यस्यासंभव किंशवेन आक्षेपवाचिना, दर्शयति-कुमार मां का पिता अजनयन् न कोरि, " अजीनित्यः शाश्वत" इति (क. १२-१८) श्रुत्युक्तरूपोहं भवामि, कश्च शरी. रात्मक र निरयर्तयत् निर्वतयति मद्यतिरिक्तस्य निवितुरभावात, तथा निर्व- बस्यान्यस्यासंभवाच्च अद्यास्मिन्काले सात्म्यिानुमवदशायां तं तं प्रकार का स्वित् [१३३] कोनाम नोस्माकं ब्रूयाउ, यथा येन प्रकारेण अनुदेयी अनुदातव्या मद्यतिरिक्ता पदार्थसत्ता अभवत् भवति स प्रकारोपि दुर्वच इत्यर्थः ॥ ५ ॥ अनुवाद-इस कुमारको किस्ने उत्पन्न किया होगा ! यह (वाक्य अधिक्षेपार्थक है ) याने बाल्यावस्थावाले इस कुमारको यमराजके पास भेजता हुवा इस्का पिता सम्यग्बुद्धिवान् कैसे कहा जाय ! । यह बात छोडो. किम पुरुपने यमराजके समीप इस बालकको भेजनेको उस स्थको चलाया होगा। याने जिसनें इस् (यमलोकमें आने संमति दीहो वहमी मूर्खही है । और यह बालक प्रतिगमन (वापस ) करने योग्य है, तो उसके अनुकूल वचन याने उपायकथन इस समय हमारे पास कौन करेगा ? याने प्रथम यमराज के पास जाकरके अनन्तर वहासे निर्गमनका उपाय बतानेवालाभी प्राज्ञ नहि होना चाहिये । अथवा कुमारनामक ऋषि अग्ने सार्वात्म्यमायका अनुभव करते हुये आत्मच्यातिरिक्त इतर पदार्थ असंभवको आक्षेपवाचक कि" शब्दसे बताते है-मुझ (कुमार) को किसने उत्पन्न किया है ? किसीने नहि. कयोंकी " अगो नित्यः शाश्वतोऽयंपुराणः "यह आत्मा अजन्मा अविनाशी-अखंड और प्राचीन- पुराण है, इस लिये मेरा ( आत्माका ) जन्म संगत हो सक्ता नहिं । और इम् देहात्मक रथको किसने बनाया है ! मेरे सिवाय दूसरा कुछमी न होनेमें शरीरका बनानेवाला संगत होसक्ता नहिं, और बनाने योग्यमी पदार्थ मेरे (आत्मस्वरूप) से मिन्न नहि, याने बनानेवाला और बनाने योग्य और बनाना- रचनात्मक क्रिया यह सब कलाप पारमार्थिक आलस्वरूाही है, तो कौन बनाये और किस्को बनाये ? इस् कालमें याने सात्म्यिानुभवदशामें उस प्रकारको हमारे पास कौन कहे सक्ता है की जिस प्रकारसे मुझने व्यतिरिक्त पदार्थको सवा सिद्ध होसके ? याने आत्मभिन्न पदार्थकी सत्तामा निरूपण दुःशकह। १३९. ८ ७ २३ यथाभंवदनुदेयीततो अप्रेमजायत । पुरस्सीडधानतःपश्वानिरवणकृतम् ॥ ६ ॥ अनुदेयी अनुदातव्यः यथा येन प्रकारेण पितरमनुलक्ष्य अयं कुमारे योन दत्तीभवत् भवति, तथा ततः तस्माद्वाज प्रसारिपतु: अपं यमसमीप ।

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[१३]
गच्छेति वचनस्य अग्रतो वर्तमानं नचिकेतसा यमेन सह वदितव्यं, तंवैप्रवसन्त
गतासोतिहोवाचेत्यादिकं ब्राह्मणान्तरोक्त मजायत मादुरभवत् पितोपदिष्टवानि-
त्यर्थः, पुरस्ताततः पूर्व वुध्नः उक्तस्याग्रस्य मूलभूतं यमगृहं प्रति गच्छेति वच-
नमाततः अतिविस्तृतमासीत् अतस्तदशक्यपारहारामात पश्चात्त्रोधं परित्यज्य
निरयणं तस्माद्यमान्निर्गमनोपायं कृतं पित्रा आचरितं । यद्वा अनुदेयी आत्मानम-
नुदातव्या आत्मस्वरूपव्यतिरिक्वान्यपदार्थसत्ता यथा भवत् भवति तदनुगुणं
खतः तस्मान्मायाविशिष्टादात्मनः अयं सप्टव्यविकारजातस्य आय मनस्तत्व
सिसृक्षाकारणमजायत उदपद्यत, पुरस्तात्सृष्टे प्रागवस्थायां बुनो मूलम् अव्याकृत
मायात्मकं कारणमेव आततः आसमन्तात्ततं विस्तृतमासीत्, पश्चात्तमसः उत्पत्त्य-
नन्तरं निरयणमुद्गतानां कार्याणा मस्मात्कारणानिर्गमनं घटपटादिभेदेन स्वरूपा-
लमनं कृतं ब्रह्मणा निर्मितं, तथामृद्विकारोघटादिमृदान्यो न भवति आदित्यानुग्रहास-
भावं प्राप्तस्य मम विकारः प्रपंचो मदन्यो न भवति इति व्यतिरिक्तस्य पित्रादे-
राक्षेपः पूर्वोक्तः सथितः ॥ ६ ॥
अनुवाद-जिस प्रकारसें वाजश्रवस पिताके पास इस कुमारको यम-
राजनें वापस भेजा वह प्रकार यम लोकमें भेजने के प्राकालमें पिताने बताया
था. क्योंकी प्रथम क्रोधाधीन होकरके " तुम यमराजके पास जाओ" ऐसे
कथनको अन्यथा न करनेसे क्रोधरहित होकरके वहांसे निर्गमनका उपायभी पिताने
बताया, अथवा आदित्यपक्षमें आत्मस्वरूपसे व्यतिरिक्त अन्य पदार्थको
सत्ता लोकौ प्रतीत हुई, तदनुगुण उस्के अनुकूल स्रष्टव्यविकृतवर्गका आदिभूत
सृष्टि की रचनाका कारण मनरूप तत्व आत्मासे उत्पन्न हुवा. सृष्टिके पूर्व.
कालमें अव्याकृतमायात्मक तत्व कारणरूपहीसे विस्तृत था. उस्के अनन्तर
अज्ञानकी उत्पत्तिके वाद कारणसे उद्गीत' कार्योंका 'घटपटादिभेदसे स्वरूपालंभन
निर्माण ब्रह्माने किया, जैसे मृत्तिका का विकार घटशरावादिक मृचिकासे अन्य
नहिं है तैसेंही आदित्यके अनुग्रहसे ब्रह्मभावको पाये हुये मुझसे निकारात्मक
प्रपंच-अन्य नहि है, तो मुझसे अतिरिक्त पिता माता इत्यादिकका संभव कैसे
हो सका है। ॥६॥

[१३५]
११०, ८८ ३५ पतङ्गमक्तमसुंरस्यमायर्यादापश्यन्तिम साविपश्चितः ।
समुद्रअन्तःकवयोविक्षनेमरीचीमांपदपिच्छन्तिवेधसः॥१॥
माययाअक्तं जीवरूपेणाभिव्यक्तमात्मानं विपश्चितो वेदान्तामिज्ञाः हस्थेन
अन्तर्मुखेन मनसा पतंग पतति व्यामोतीति पतंगः परमात्मा तं पश्यन्ति उपाधि-
परित्यागेन जीवात्मनः परमात्मना तादात्म्य सक्षात्कुर्वन्तीत्यर्थः । अपिच ते कवयः
कान्तदर्शिनो वेदान्ताभिज्ञाः समुद्रे समुद्रवत्यस्माद्भूतानीति समुद्रः परमात्मा
तस्मिन्नधिष्ठानभूतेन्तर्मध्ये सर्व दृश्यजातं अध्यस्तत्वेन विचक्षते विपश्यन्तीति अतो-
ग्व्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वात् वैधसः विधातारस्ते मरीचीना वृविज्ञानानां परमधि-
शानभूतं सच्चित्सुखात्मकं यत्परब्रह्म तदेवेच्छन्ति तद्भावप्राप्तिमेव कामयन्ते ॥१॥
अनुवाद-माया-अविद्याद्वारा जीवस्वरूपसें अभिव्यक्त आत्माको
वेदान्तविज्ञानवाले पण्डितलोक मनको अन्तर्मुख करके सर्वव्यापक परमात्माको
अपरोक्ष अनुभवते है, याने उपाधिपरित्याग करके जीवात्माका परमात्मा
वास्तविक अभेदको साक्षात् करते हैं. और वही वेदान्तवित् पण्डितलोक "सम-
स्वदृश्यप्रपंच के अधिष्ठानभूत परमात्मामें सकलपपंच अध्यस्त-कल्पित है
ऐसा समझते हैं. इसलिये द्रष्टासे अतिरिक्त सकल पदार्थ कल्पित होनेसे उनको
मिथ्या समझ करके तत्तदाकारवृत्तिज्ञानके अधिष्ठानभूत सचित्सुखात्मक परन-
महीको चाहते है, याने ब्रह्मभावापन्नहीं होना चाहते हैं. ॥ १ ॥
१४१. ८ ८ ३५ पतझोवाचनसाविभर्तितांगन्धर्वोक्दगर्भ अन्तः ।
तांद्योतमानांस्वयमनीपामृतस्यपदेकवयोनिपान्ति ॥ २॥
पतंगः सोपाधिशून्यो व्याप्तः परमात्मा स सृष्ट्यादौ वाचं मनसा
बिभर्ति कानि कानि सृष्टव्यानीति पर्यलोचनेन मनसा सकलार्थपतिपादक दं
पसमृष्टयानित्ययः ।स्मतेहि-वेदशब्देम्पएवादी निर्ममे स महेश्वर इति गहिर-
ज्यमये ब्रह्माडे अन्तर्वर्तमानो गंधर्वो हिरण्यगर्भः तां वाचमवदत् प्रथममुच्चारितवान्
योवमानत्वादिगुणपिशिष्टां तां वाचं कवयः क्रान्तदर्शिनो देवः तस्य सत्य त्य
ब्रह्मणः पदे स्थाने निपान्ति निभून रक्षति ॥२॥

[१३६१
अनुवाद-समंस्तोपाधिरहित व्यापक परमात्मा सृष्टिके प्रारंभमें मनसे
चाणीको धारण करते है, याने "कौन कौनसे पदार्थ सृष्टव्य है" ऐसा पर्यालोचन
करके मनसें सकलार्थप्रतिपादक वेदका परामर्ष-ज्ञान करते मये. स्मृतिमी कहा
हैकी "परमेश्वरने वैदिक शब्दोंसे सृष्टि का निर्माण किया है " हिरण्मय ब्रह्माण्डमें
(भीतर) वर्तमान हिरण्यगर्भ उस वाणीको प्रथम बोलने भये की जो वागी अध्या
स्मस्वरूपका प्रकाश करनेमें समर्थ है, और क्रान्तदर्शी देवतालोक ब्रह्मपदमें
जिस वाणीका रक्षण-सेवन करते हैं. ॥२॥
अनुवाद-सर्वतः
१४२. ८ ८ ४८ ऋतंचसत्यंचाभीदात्तपसोध्यंजायत ।
ततोरायजायतततःसमुद्रोअर्णवः ॥ १ ॥
अभीद्धात् अभितः प्रकाशमानात् परमात्मनो मायाधिष्ठानरूपादुपादानभू-
तात् ऋतं सत्यं चाजायत ततस्तस्मादेवेश्वरात् रात्री उपलक्षणमेतदहोपि,
महश्चरात्रिश्चाजायत, ततः तस्मादेवेश्वरादर्णवः अर्गसोदकेन युक्तः समुद्रश्चाजायत
समुद्रशब्दोन्तरिक्षोदध्योः साधारणइति अभिमतार्थस्य प्रकाशनाय अर्णवशब्देन
विशेप्यते ॥ १॥
त: प्रकाशमान मायाकेभी अधिष्टानरूप और उपादान-
कारणभूत परमात्मासें ऋत और सत्य प्रकट हुवे, और उसी परमात्माहीसे
समुद्र अथवा अन्तरिक्षमी प्रकट हुवा ॥ १ ॥
१४३. ८ ८ ४८ समुद्रादर्णवादधिसंवत्सरबजायत ।
अहोरात्राणिविदधद्विश्वस्यमिपतोवशी ॥२॥
अर्णवात् समुद्रात् सृष्टात् बधि ऊर्ध्व संवत्सरः संवत्सरोपलक्षितः सर्व-
कालः अजायत । श्रूयते हि-सनिमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुपादपि कला मुहूर्ताः
काठाश्चेति । सचेश्वरः अहोरात्राणि एतदुपलक्षितानि सर्वाणि भूतजातानि विदधत्
कुन सृजन मिपतो निमिपादियुक्तस्य विश्वात्य सभ्य प्राणिजातस्य वी स्वामी
भूत्वा वर्तते ॥२॥

[१३७] अनुवाद-रचे हुवे समुद्रके अनन्तर संवत्सरोपलक्षित सकलकाल प्रकट हुवा, श्रुतिौभी कहा है की "उस पुराण पुरुषसे निमेषसे आदि समयसमय विद्युत् कला मुहूर्त काठा यहसब प्रकट हुवे"। यह परमात्मा अहोरात्रोपलक्षित समग्र मृतभौतिक सृष्टिकी रचना करता हुवा निमेपादियुक्त सकल मूतभौतिक प्रपंचका नियामक-स्वामी बनकरके अवस्थित है ॥ २ ॥ १४४. ८ ८ ४८ सूर्याचन्द्रमसौधातायथापूर्वम कल्पयत् । दिवंचधार्थवींचान्तरिक्षमयोस्वः ॥३॥ सूर्याचन्द्रमसौ कालस्य ध्वजभूतो दिवंच पृथिवीं चान्तरिक्षच इत्थं त्रिभुवनं स्वः, स्वाशब्दः सुखवाची दिवोविशेषणं, सुखरूपों दिवं तदेतत्सर्व धाता विधाता यथा पूर्व पूर्वस्मिन् काले अकल्पयत् सृष्टवान् तथैवागामिन्यपि कल्पे कल्प- मिप्यतीत्यर्थः ॥ ३॥ अनुवाद-कालके ध्वज-प्रकाशक सूर्य चन्द्र सुखप्रद स्वर्ग पृथ्वी अन्तरिक्ष याने त्रिलोकी इनसोंका विधान करनेवाले उन् परमेश्वरने जैसे पूर्व कल्पमें पूर्वोक्त पदार्थोंका निर्माण किया था, तैसेही ( इस कालमें निर्माण किया है और ) अनागत कल्पमें भी निर्माण करेंगे ॥ ३ ॥ ॥ ॐ तत्सत् परमात्मने नमः॥ समाप्त.

Rigved Tatvam

Author
Shastri,revashankar
Title
Rigved Tatvam
File name
Rigved Tatvam
Text
OCR done
Citation
1926
Published
2012/08
Publisher
Rajkot.,parmar Press
Language
Sanskrit
Pages
172
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Classification
Devotional
DLI number
405014
Barcode
99999990292127.00
Scanning centre
Banasthali University
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