Adarsh Library, Jaipur
Ek Vivahita
Front matter
सन्मार्ग प्रकाशन, दिल्ली-110007
বিবাফিনা
विमल मित्र
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अनुवादक :
हर्पनाद
केसरीकांत शर्मा 'केसरी'
प्रकाशक:
सन्मार्ग प्रकाशन
वी. वैग्लो रोड, दिल्ली-110007
16, यू.
प्रथम संस्करण : 1984
मूल्य : पच्चीस रुपये
मुद्रक :
फमल प्रिंटर्स
9/5866, गांधीनगर, दिल्ली-110031
वंधुवर
राजेन्द्र अवस्थी
को
सादर समर्पित !
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करूँगा।
किंतु इस नये साल की शुरुआत हुई कि इस प्रकार के अनुरोध
के क्लेश का दौर फिर शुरू। और फिर किसी के मुंह पर 'ना'
नहीं बोल पाता।
जो दोस्त-वगैरह घर पर आते हैं, उनसे पूछता हूँ। उनके
जीवन के अनुभव सुनता हूँ। शायद कोई कहानी खोज पाऊँ !
उस दिन एक मित्र मेरे घर आया। परितोष। परितोप
सरकार। मुझे देखकर उसने पूछा-अरे, तुम्हारा चेहरा ऐसा
क्यों दिखायी दे रहा है ?
कहा-कहानी की चिंता में।
वंधु विभिन्न स्तर के लोगों से मिलता-जुलता है। ऊँचे समाज
में वैठता है । दस-बारह क्लवों का सदस्य है। महीने में अट्ठाईस
दिन पार्टी में जाता है। समाज के मस्तक, अर्थात वी० आई० पी०,
उनके साथ भी मेल-जोल है, और मध्यवर्ग के सांस्कृतिक
अनुष्ठानों का एक मठाधीश है। मेरी समस्या की बात सुनकर
बंधु परितोप ने कहा--तो फिर तुम मिस्टर गांगुली को लेकर
लिखो।
--मिस्टर गांगुली कौन?
परितोप ने कहा-तुम अब उन्हें नहीं पहचान पाओगे। वे
हमारे क्लब में आते ज़रूर हैं, किंतु शराव की एक बूंद भी नहीं
पीते। एक राउंड ताण का भी नहीं खेलते । जिसे पूरी तरह
चरित्रवान व्यक्ति कहा जा सकता है।
-ऐसे आदमी को लेकर कहानी बनेगी ?-मैंने कहा।
परितोप ने कहा-क्यों, शराव नहीं पीने से, ताश नहीं खेलने
मे, उन पर कहानी क्यों नहीं बन सकती ?
-ना, मैं यह नहीं कह रहा हूँ। किंतु आम तौर पर जो उल्टा-
सीधा नहीं करते, उनके जीवन में तनाव तो नहीं होता। कोई
8 / विवाहिता
-
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कार उस मछली-विक्रय के मूल्य का एक हिस्सा पायेगी।
और ग़रीब मछुवे भी भारी रकम पायेंगे।
मछुओं की बात सोचकर मेरा मन बहुत खुश हुआ। वे ग़रीव
लोग हैं। कपड़ा-लत्ता खरीदने को पैसा उनके पास नहीं । वे भोर
चार बजे नींद से उठकर समुद्र में नौका छोड़ते हैं, बारह बजे
किनारे को छूते हैं । महाजन उन्हें भारी रक़म देंगे।
मैंने मेरे एक दोस्त को सूचना दी। अपने दोस्त के अतिथि-ग्रह
में टिका था। वात-बात में उससे कहा कि आज बहुत मछली
आयी है।
दोस्त शराव का व्यवसायी है। बिहार, उड़ीसा में शराव
वेचना उसका धंधा है । सुनकर वह वहुत खुश हुआ।
-जो हो, एक अच्छी खवर तुमने दी।
दोस्त के शराव के कारवार के साथ झींगा मछली का क्या
संबंध है, समझ नहीं पाया। दोस्त ने कहा-आज मेरी शराव खूब
विकेगी।
?
.
-कैसे ? शराव की विक्री वेसी क्यों होगी?
दोस्त ने कहा--जब मछुवे जितनी ज़्यादा मछली पकड़ते हैं,
उतनी ही ज्यादा शराव विक्री होती है।
अव समझा, खबर पाकर दोस्त की इतनी खुशी का क्या
कारण था ! मछुवे जितना रुपया कमाते हैं, वह सब रुपया शराव
की दुकान में चला जाता है।
और उस दिन यहभी समझा कि चाहे गरीव आदमी हो अथवा
अमीर, नशा सनी करते हैं। फिर भी बड़े आदमी बड़ा नशा करते
हैं, और गरीब आदमी छोटा नशा करते हैं।
यह जैसे कि मेरा लिखने का नशा है। कब एक दिन लिखने
का नशा शुरू किया था, वह आज याद भी नहीं पड़ता। आज
इतने दिनों के बाद भी इस नशे को छोड़ नहीं पाया। अब मैं
10/ विवाहिता
लिखना नहीं चाहता, किंतु मेरा नशा ही मुझसे लिखाता है । अव लिखे विना रह नहीं सकता। अतः लिखता हूँ। परितोष का नशा कलकत्ता के बड़े-बड़े क्लवों का सदस्य वनने का है। कारण, उससे बड़े-बड़े आदमियों के साथ मिला जा सकता है। लोगों से यह कहा जा सकता है कि मेरा अमुक-अमुक से संपर्क है। यह भी एक प्रकार का नशा है। और क्या ? मिस्टर देवव्रत गांगुली जैसे कि शराव नहीं पीते, ताश नहीं खेलते फिर भी सपत्नीक क्लव में जाते हैं। जैसे परितोष अन्य वी० आई० पी० वगैरह से मिलता है वैसे ही मिस्टर देवव्रत गांगुली के साथ भी मिलता है। मिस्टर गांगुली, वी० आई० पी०, यही उनका गठजोड़। मिस्टर गांगुली का नशा उनकी एकमात्र कन्या है। वेटी हा मिस्टर गांगुली का ध्यान-ज्ञान-स्वप्न सव-कुछ है । किसी समय मिस्टर गांगुली आई० सी० एस० थे। ब्रिटिश शासन में आई० सी० एस० होना कोई हँसी-मज़ाक़ नहीं था। कहा जा सकता है कि उस वक़्त देश को वे ही चलाते थे। जब वे गौहाटी में नियुक्त थे, तो उन्होंने कांग्रेसी-गुंडों को पीटकर ठंडा कर दिया था। उन्हें ऊपर का हुक्म था कि कांग्रेसी को देखते ही किसी भी वहाने जेल में ठूस दो। कोई अपराध हो ही, यह ज़रूरी नहीं है। खद्दर पहने आदमी को देखते ही समझो कि वह देश- भक्त कांग्रेसी है। उस समय देशभक्त होने का ही मतलव सबसे वड़ा अपराध था। मिस्टर गांगुली ने उस वक्त कितने कांग्रेसियों को पीटकर मार डाला था, इसकी कोई गिनती नहीं है। उस वक्त के आई० सी० ० एस० जितने आदमियों का खून करते थे उतनी ही उनकी । नौकरी में तरक्की होती थी। मिस्टर देवव्रत गांगुली की तभी खूब उन्नति हुई थी जीवन में। किंतु जब ब्रिटिश सरकार 1947 में भारत छोड़कर चली गयी, तभी विपत्ति आ पड़ी। तब कांग्रेसा शासन में वह शान नहीं रही। जिन तमाम कांग्रेसियों को गांगुली साहब ने जेल में ठूसा था, जिन्हें एक दिन वेंत मारकर ठंडा कर दिया था, उन्हीं को सलाम ठोंकनी पड़ी गांगुली साहब को । 'सर' वोलकर संबोधित करना होता था। विमलप्रसाद चालिहा उस समय गौहाटी में मुख्यमंत्री थे। अंग्रेजी शासन में उन पर कितना अत्याचार किया था--- गांगुली साहब ने, किंतु वह असमी जव असम का मुख्यमंत्री वना तो गांगुली साहब को उसके सामने सलाम ठोंकना पड़ा। किंतु अकेले गांगुली साहव का भी दोष क्या है ? जो अंग्रेज़ आई० सी० एस० थे, वे देश स्वाधीन हो जाने पर, अपने देश लौट गये। सिर्फ वे ही रह गये जो भारतीय थे। उन्हीं को इतनी परेशानी थी! किंतु गांगुली साहब को कोई परेशानी नहीं हुई। उन्होंने साथ-साथ अपने मकान की दीवार पर गांधी, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल की तसवीरें लटका लीं। मकान की खिड़कियों- दरवाज़ों पर खद्दर के पर्दे लटका दिये। रातोंरात रंग बदलने में गांगुली साहब को क़तई कोई कप्ट नहीं हुआ। तव से ऑफ़िसर्स क्लब में उन्होंने खद्दर की धोती-कुर्ता पहन- कर आना शुरू कर दिया। और अंग्रेज़पना चलता रहा, सिर्फ़ ऑफ़िस में। वहाँ वे पूरी तौर पर साहब थे। फिर भी देशी मिल का कोट- पैंट। घर में देश के बड़े-बड़े कांग्रेसी नेताओं के चित्र देखकर कई एक लोग प्रश्न करते कि आप आई० सी० एस० होकर भी उनके 12 / विवाहिता चित्र लगाते हैं ? मिस्टर गांगुली का जवाब होता-नौकरी के लिए इतने दिनों उनके चित्र घर की दीवाल पर नहीं टाँग पाया। नहीं तो महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, पटेलजी ही मेरे सामने बराबर आदर्श रहे । मैं हमेशा अहिंसा का विश्वासी रहा हूँ। स्वाधीनता के बाद मिस्टर डी० गांगुली जो रातोंरात देवव्रत गांगुली बन गये, इससे बाहरी परिदृश्य तो वदला ही, साथ-ही- साथ मिसेज़ गांगुली का भी सव-कुछ आमूल बदल गया। मिसेज़ गांगुली माने रमा गांगुली। रमा गांगुली पहले अधि- कांशतः अंग्रेज़ी क़ायदे से ही चलती-फिरती थीं । अंग्रेज़ी क़ायदे से ही पार्टी में जाती, अंग्रेज़ी दुकान से खरीद-फरोख्त करतीं, न्यू मार्केट को छोड़कर दूसरी जगह की चीज़ उन्हें रास ही नहीं आती थी। कहा करती थीं कि और दूसरे बाज़ार तो सव गंदे हैं । गंदे बाज़ार में जाना मुझे ख़राब लगता है। वहाँ गंदे देशी लोगों का जमावड़ा है। मुझे विलकुल अच्छा नहीं लगता। घर में जब पार्टी देतीं तो प्रायः साहव लोगों को ही निमंत्रण दिया जाता था। देशी नेटिव के रूप में जो आते थे उनमें अधि- कांशतः आधा-विलायती लोग ही होते थे। इसके अलावा होते थे सरकारी सचिव अथवा उप-सचिव, बैंक के लोग। डिप्टी कमिश्नर से नीचे की पोस्ट वाले की तो मिसेज़ गांगुली की पार्टी में पहुँच ही नहीं हो पाती थी। किंतु 1947 के 15 अगस्त के बाद जो पार्टियाँ वे देती थीं, उनमें शरीक होने वालों में खद्दर पहनने वाले, पाँव-फटी विवाइयों के खद्दरधारी-कांग्रेसी होते थे। मिस्टर गांगुली को जो कुछ प्रतिष्ठा और उपलब्धि प्राप्त हुई विवाहिता / 13, वह सब उनकी स्त्री रमा गांगुली के कारण ही हुई। कहा जा सकता है कि उन्हें आई० सी० एस० से एकदम डिप्टी सेक्रेट्री के पद पर पहुँचाने वाली अगर कोई है तो वह रमा गांगुली हैं। मिस्टर गांगुली इसे जानते थे। तभी से वे साहित्य के साथ जुड़ गये थे। एक-एक आदमी की असल वृत्ति के साथ-साथ और भी एक नशा रहता है। किसी का नशा गोल्फ खेलने का होता है, तो किसी का ताश खेलने का नशा । अथवा किसी का पोशाक आदि पहनने का नशा होता है। दिल्ली की कालीबाड़ी के वे एक दफ़ा प्रेसीडेंट भी हुए थे। दफ्तर के बाहर एक गणमान्य व्यक्ति के रूप में विख्यात होने के लिए इन तमाम संगठनों के साथ जुड़ना होता है। इससे प्रतिष्ठा में दुगुनी वृद्धि हो जाती है। ऑफ़िस में तो एक अलग प्रकार की इज़्ज़त है ही, उसके ऊपर वढ़ती इज़्ज़त होने से और भी अच्छा लगता है । अ-राजनीतिक मामलों में जुड़ने से भीतर-बाहर इज्जत-ही-इज़्ज़त है । कालीवाड़ी एक ऐसी इज्ज़तदार जगह है, जिसका प्रेसीडेंट होने से समाज के नामी-ग्रामी लोग तुम्हारा अभिनंदन करेंगे। मिस्टर देवव्रत गांगुली ऐसा ही कहते हैं। वहाँ बीच-बीच में उत्सव होते हैं। उन उत्सवों में नाच-गान और नाटक होते हैं। उन उत्सवों में आगे सभी मिस्टर गांगुली को घेर लेते हैं। कहते हैं-आपकी लड़की का नाच होगा तो? उस वार आपकी लड़की ने जैसा नाच किया था, मैं भूल नहीं पाया। मिस्टर गांगुली की लड़की का नाम वूला है, स्कूली नाम शर्वरी। दिल्ली के सभी लोगों की जवान पर शर्वरी के नाच की प्रशंसा है। कोई-कोई घर आकर शर्वरी के नाच की तारीफ़ कर 14 / विवाहिता
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देवता प्रसन्न होंगे। मिस्टर गांगुली हैं, वह देवता, जिन्हें खुश कर पाने से सचिवालय में छोटी-बड़ी अथवा अच्छा-खासी एक नौकरी मिल सकती है। किंतु मिस्टर गांगुली की हठात् साहित्यिक होने की इच्छा हुई। सिर्फ कालीवाड़ी का प्रेसीडेंट होने से वे तुष्ट नहीं हो पा रहे थे । साहित्यिक होने की चाह वचपन से ही उनमें थी, जो अब तक .. पूरी नहीं हो पायी थी। इस वार नौकरी पर जमकर बैठने से उन्हें सम्मान और प्रतिष्ठा सव प्राप्त हुई। किंतु जिसे यश कहा जाता है वह उन्हें अब तक नहीं मिला था। उन्होंने सोचा, वही चाहिए। साहित्यिक होने के लिए अखवारों के आदमियों से परिचय चाहिए । अखवारों के लोगों के साथ उनका परिचय नौकरी प्राप्त करने के साथ ही था ! वे उनके ऑफ़िस में आते । रिपोर्ट लेने के लिए उनकी सहायता की ज़रूरत होती थी। एक दिन इंद्रनाथ तरफ़दार कुछ खवर लेने आये। अख़बार के आदमी होने से सचिव की हैसियत से उनकी कुछ ज्यादा ही ख़ातिर करते थे मिस्टर गांगुली । कारण, वे जानते थे कि अखवार एक समानांतर सरकार होता है। अगर वे इच्छा करें तो देश का मंत्रिमंडल बदलवा सकते हैं। वे अगर चाहें तो पार्टी का नुक़सान कर सकते हैं, सरकार को भी नेस्तनाबूद कर सकते । उस दिन इंद्रनाथ तरफ़दार के आने के साथ-साथ उन्होंने कहा-मैं एक उपन्यास लिख रहा हूँ इंद्रनाथ वावू । इंद्रनाथ ने कहा-आप उपन्यास लिख रहे हैं मिस्टर गांगुली ने कहा-साहित्य की ओर मेरा सदा से झुकाव रहा है । बचपन ही से, मैं साहित्यिक होऊँगा, ऐसी मेरी 16/ विवाहिता
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दर्पण' पत्र में प्रकाशित कर दूंगा । आपका लिखना पूरा हो गया
तो?
मिस्टर गांगुली ने कहा- हाँ, लिखना पूरा हो गया।
-~-तव आज संध्या ही मुझे वह रचना दे दीजिये, मैं रात
जगकर पढ़ लूंगा।
उनका वेतन
उसी दिन मिस्टर गांगुली ने इंद्रनाथ वावू को पांडुलिपि दे दी।
इंद्रनाथ तरफ़दार जानते थे कि रचना उतनी अच्छी नहीं होगी।
फिर भी यदि किसी प्रकार अपने 'देश-दर्पण' में छप जाये तो
वढ़
जायेगा।
इंद्रनाथ तरफ़दार कलकत्ता में अख़बार के दिल्ली के प्रति-
निधि थे। उनके द्वारा भेजी जाने वाली खवरों से कागज की
विक्री बढ़ती है।
उस उपन्यास की पांडुलिपि लेकर वे कलकत्ता चले गये।
जाकर संपादक को पकड़ा। कहा यदि इसे किसी प्रकार
छाप दोगे तो मेरा व्यक्तिगत उपकार होगा।
संपादक ने पूछा-वे कौन हैं ?
इंद्रनाथ ने कहा-भारत सरकार की कम्युनिकेशन मिनिस्ट्री
के सेक्रेट्री, बहुत बड़ा पद। उनकी रचना यदि छापते हैं तो अपने
पत्र के हक में बहुत ही अच्छा होगा। उनके हाथ में बहुत बड़ी
नाक़त है।
आखिर संपादक ने छाप ही दिया। उसके बाद विज्ञापनों में
भी वहुत प्रशंसा की गयी।
मिस्टर गांगुली खूब खुश । एक दिन वे सचिवालय के सचिव
थे। उसके बाद कालीवाड़ी के प्रेसीडेंट। उसके साथ ही वे
साहित्यिक भी हो गये।
किन्तु किताब तो लिख डाली। साप्ताहिक 'देश-दर्पण' ने छाप
18/विवाहिता
।
भी दिया। किंतु पुस्तक ? पुस्तक कौन छापेगा ?
मिस्टर गांगुली ड्यूटी लेकर कलकत्ता आये। उधर ऑफ़िस
से टी० ए० भी पायेंगे, और अपनी पुस्तक छपवाने की व्यवस्था
भी होगी।
तव तक उन्हें पता चल गया था कि वे प्रसिद्ध हो गये हैं।
--उस पर भारत सरकार के आई० सी० एस० अलग।
उन्होंने मन-ही-मन एक फंदा डाला। एक प्रकाशक के पास
पहुँचे । कहा-आप 'देश-दर्पण' में छपी मेरी किताव छापेंगे ?
प्रकाशक खुद भी साहित्य-वाहित्य करते हैं। आई० सी०
एस० को देखकर सम्मान न करें, ऐसे आदमी भारत में नहीं हैं।
वहुत सम्मान दिया। चाय पिलवायी।
कहा-हाँ, आपके उपन्यास का नाम क्या है ?
-मानव-सुंदरी। 'देश-दर्पण' में छपने पर खूव नाम हुआ
था।
प्रकाशक ने कहा-काग़ज़ का दाम बहुत बढ़ गया है। अभी
छापना मुश्किल है।
मिस्टर गांगुली ने कहा-इस दफ़ा राजस्थान में हमार
निखिल भारत वंग साहित्य सम्मेलन होने जा रहा है, आपको नुक
सभापति बना सकता हूँ !
मिस्टर गांगुली की वात से वर्फ गुछ गली । प्रकाशक ने कहा
वैसा होने पर मुझे आपत्ति नहीं है, किंतु किताव छापने के लिए
कागज़ का दाम आपको देना होगा।
- ठीक है, वही सही । रुपया तो बहुत है मिस्टर गांगुली के
पास। काग़ज़ का दाम उन्होंने दे दिया। 'मानव-मुंवर्ग
हासिक उपन्यास । मुख्य सभापति पहले अनेक बड़े-बड़े माहित
हुए हैं। रवीन्द्रनाथ से अतुलप्रसाद सेन, सभी। इस बार
पर गये 'मानव-सुंदरी' उपन्यास के प्रकाशक ।
मिस्टर गांगुली की रचना पढ़कर दिल्ली में उनके मकान पर
वहुत-से लोग उपस्थित। सभी की जवान पर वही एक ही वात ।
सभी ने कहा-नयी प्रतिभा का दर्शन करने आये हैं, आपको वधाई
देने आये हैं।
वड़े-बड़े लेखकों ने अभिनंदन-पत्र भेजना शुरू किया इस नयी
प्रतिभा को। किंतु कोई नहीं जान पाया कि 'मानव-सुंदरी' कैसे
लिखी गयी, कैसे साप्ताहिक में धारावाहिक छपी एवं किस तरह
किताव रूप में छपी। बीच ही में मिस्टर गांगुली की ख्याति बढ़
गयी।
-
इस वार परितोप रुक गया।
मैंने कहा--तुम्हारे गांगुली को लेकर कैसे कहानी लिखू ? अव
तक जो कुछ तुमने कहा है, उसमें कथा-तत्व कहाँ है ?
परितोप ने कहा- इतने दिनों दूसरे ढंग की अनेक कहानियाँ
लिखी ही हैं। इस वार एक अलग किस्म की कहानी लिखो तो
सही।
कहा-किंतु इस कहानी में नायक कौन है, अथवा नायिका
ही कहाँ है ?
परितोप ने कहा-सभी कहानियों में नायक-नायिका होना
जरूरी है ? मनुष्य की और भी तो समस्याएँ हो सकती हैं।
मैंने पूछा-तुम्हारे मिस्टर गांगुली की समस्या क्या है ?
परितोप ने कहा- उसी समस्या की बात तो अब आती है।
इतनी देर तो कथा की पृष्ठभूमि रही। इस बार होगी असली
कहानी। परितोप ने फिर वोलना शुरू किया-
असल में मिस्टर गांगुली की कोई ज़रूरी समस्या ही नहीं
थी। पति-पत्नी और लड़की बूला, माने शर्वरी ।
और रुपये-पैसे की अगर कहते हो तो वह कोई समस्या ही
20/ विवाहिता
.
नहीं थी, मिस्टर गांगुली के यहाँ । उस युग के जो आई० सी० एस० रहे हैं, वे सब जगह इतना सम्मान पाते, और इतना महीना पाते थे कि कहा जा सकता है कि महीने के रुपयों पर उनका हाथ ही नहीं पड़ता था। जैसे, किसी देशी रियासत में घूमने जाते तो राजाओं के गेस्ट हाउस थे ही । वहाँ उनके लिए गाड़ी से लेकर खाने-पीने तक सव फ्री होता था। यहाँ तक कि साथ में जाने वाले चपरासी अथवा सचिव तक का कुछ खर्च नहीं होता था। जबकि सभी का टी० ए० विल बनता था। ऐसे जीव जव रिटायर होते, तव उनकी अवस्था सोचनीय होती। तव आगे की तरह लोग उन्हें सलाम नहीं देते, कोई भेट नहीं देते थे। वग़ल से गाड़ी निकालने पर भी कोई पहचानता नहीं था। तव कोई और उपाय नहीं होने पर बड़े-बड़े क्लवों में उन्हें भर्ती होना पड़ता। सिर्फ़ बड़े-बड़े मेंबरों के सामने अपने भूतकाल के ऐश्वर्य का बखान करने के अलावा उनके पास और कोई काम ही नहीं रहता था। सचमुच उनकी हालत बड़ी दयनीय होती थी। बैंक में प्रचुर रुपया जमा होने पर भी कोई सुख नहीं। वह रुपया तो कोई देख नहीं सकता। नौकरी करते वक़्त जिसने उपन्यास लिखा, उस उपन्यास की टोकरी-टोकरी प्रशंसा हुई पत्रों में। रिटायर होने पर कोई उनकी परवाह नहीं करता। पहले घर में सुवह से अतिथि- अभ्यागतों का जमावड़ा लगा रहता । ऑफ़िस में भी मिलने वालों की प्रचुर संख्या होती थी। किसी के साथ तनिक मुसकराये कि वह गद्गद् । किंतु हर चीज़ का एक अंत तो होता ही है। हमेशा किसी की नौकरी तो रहती नहीं। उसी तरह मिस्टर गांगुली आई० Hिafar
सी० एस० की नौकरी की मियाद भी एक दिन ख़त्म हो गयी।
मिस्टर गांगुली की एकमात्र संतान । जव नौकरी थी, तब उस
संतान की कितनी ख़ातिर थी, कितना सम्मान था। शर्वरी के
नाम ही से सब कृपा-प्रार्थी भाव-विह्वल हो जाते थे।
तव शर्वरी के नाच की तसवीरें पत्रों में छपतीं। कलकत्ता,
दिल्ली,वंबई, अहमदावाद सभी स्थानों के जितने समाचार-पत्र हैं,
शर्वरी की नृत्य-भंगिमाओं को छापते थे। कलकत्ता के पत्र के
इंद्रनाथ तरफ़दार खुद कैमरामैन के द्वारा चित्र उतरवा लेते थे।
और पत्र को लिख देते कि इस चित्र को छापना ही है; अन्यथा
मिस्टर गांगुली आगे की तरह गोपनीय ख़बरें नहीं देंगे। सचि-
वालय में जो कुछ घटता था, उसकी सूचना मिस्टर गांगुली
व्यवस्था कर इंद्रनाथ तरफ़दार को दे देते थे। उससे अखबार
वालों को जैसे लाभ था, वैसे ही मिस्टर गांगुली को भी लाभ था।
मिस्टर गांगुली को खुश करने का अर्थ था उनकी बेटी को
खुश करना । सभी की यही नीति थी।
किंतु मिस्टर गांगुली समझते थे कि उनकी लड़की सचमुच
में
ही अच्छा नृत्य करती है।
अखवार वाले पूछते-आपकी बेटी तो एक प्रतिभा है। ऐसा
सुंदर नाच सीखा किससे?
मिस्टर गांगुली कहते-उदयशंकर से..'
उदयशंकर ! नाम सुनकर सभी श्रद्धा-भक्ति से गद्गद् हो
उठने।
मिस्टर गांगुली कहते-और कत्थक नृत्य सीखा है तमिलनाडु
के बाला सरस्वती से।
धोता लोग कहते-तभी तो ! आपने लड़की के लिए काफ़ी
रुपये खर्च किये हैं।
मिस्टर गांगुली कहते-शर्वरी की उम्र तो सिर्फ तेरह वर्ष की
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है, इसी वीच सिर्फ नाच के लिए पचास हजार रुपये खर्च किये हैं। -और पढ़ाई-लिखाई में भी तो आपकी लड़की खूब तेज़ है। मिसेज़ गांगुली कहतीं हर साल ही तो स्कूल में प्रथम स्थान आती है शर्वरी। सभी कहते-सच ही तो मिसेज़ गांगुली रत्न-गर्भा हैं। लड़की हो दिल्ली में कइयों के हैं । किंतु ऐसी प्रतिभा-संपन्न लड़की कितनों के हैं ? और भी तो कई सेक्रेट्री हैं, कहाँ ऐसी लड़की उनके यहाँ है ? । स्कूल में पढ़ती हैं, फिर कॉलेज में जाती हैं, और उसके बाद गादी करने तक उनके माँ-बाप नेस्तनाबूद हो जाते हैं । मिस्टर और मिसेज़ गांगुली की तक़दीर है। सुंदर माँ की बूव सुंदर लड़की। भगवान जिसे देता है ऐसे ही देता है । लक्ष्मी नौर सरस्वती का ऐसा मिलन अकसर दिखायी नहीं देता ! यह व मिस्टर गांगुली का भाग्य है । इतना ही नहीं, मिस्टर गांगुली आई० सी० एस० होने पर भी बहुत बड़े लेखक हैं। उनके 'मानव-सुंदरी' उपन्यास पर पत्रों में केतनी समीक्षायें निकली हैं । सभी ने पुस्तक की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। -इस वार नया कौन-सा उपन्यास लिख रहे हैं मिस्टर गांगुली कहते-उपन्यास लिखने का वक्त कहाँ मिलता है। आजकल मंत्री मुझे खटा-खटाकर मार डाल रहा है। किंतु फेर भी जव कभी कुछ समय पाता हूँ, एक पन्ना, दो पन्ना लिख डालता हूँ। -कब लिखते हैं ? -रात में जगकर। सभी धन्य-धन्य करते । कहते-और अव नौकरी क्यों करते है ? नौकरी छोड़ दीजिये ना। आप यदि होल-टाइम लेखक होते विव:
तो इससे बहुत ज्यादा रुपया कमा लेते।
मिस्टर गांगुली कहते--मैं तो नौकरी छोड़ना चाहता हूँ।
किंतु मंत्री नहीं चाहता है कि मैं नौकरी छोड़ें । मंत्री कहता है
गांगुली, तुम चले जाओगे तो हमारे सचिवालय की हालत खराव
हो जायेगी। अच्छा सचिव पाना भी कितना कठिन है। आजकल
के आई० ए० एस० आई० सी० एस० की तरह के काम के नहीं
हैं। हम लोगों ने सारे काम तेज़ ब्रिटिश अफ़सरों से सीखे हैं।
हमारे साथ आज के आई० ए० एस० की तुलना नहीं की जा
१
सकती।
--
लोग मिस्टर गांगुली की बातें मन लगाकर सुनते । कहते-
यह तो ठीक ही है, यह तो ठीक ही है।
परितोप ने कहा-इसके बाद ही तो कांड हुआ !
--कौन-सा कांड?
-उसके बाद मिस्टर गांगुली ने रिटायर किया। तभी
मिस्टर और मिसेज़ गांगुली के जीवन पर विपत्ति टूट पड़ी। शर्वरी
ने उस वक्त वी० ए० पास किया था । 'लॉ' पास किया था। एक
दिन वह घर छोड़कर लापता हो गयी।
विचित्र स्थिति है!
वह दिन, रिटायरमेंट का दिन । उन्हें ऑफ़िस के कर्मचारी
विदाई दे रहे हैं। मिस्टर और मिसेज़ गांगुली दोनों ही वहाँ गये
थे। प्रायः पचास फूलों की माला उनके गले में थीं। ब्रोंज के फ्रेम
में मढ़ा हुआ एक मान-पत्र उनके हाथों में थमा दिया गया ।
उन्होंने विदा-भापण दिया।
भापण में कहा-मैंने भारत सरकार की नौकरी कर तमाम
जीवन देश-मेवा की है। नौकरी को मैंने कभी नौकरी नहीं समझा।
24/विवाहिता
मैंने हमेशा यही सोचा कि देश-सेवा कर रहा हूँ। ब्रिटिश-काल में मैंने जो नौकरी की, वह सचमुच नौकरी थी, किंतु आज़ादी के बाद मैंने सोचा कि यह मेरी नौकरी नहीं, यह मेरी देश-सेवा है। देश के कल्याण के लिए मैंने जान लगाकर काम किया है। आज आपने जो सम्मान दिया है, उसका अधिकारी मैं नहीं हूँ, आपके इस सम्मान को मैं देशमाता के पास पहुँचा देता हूँ, जो वास्तविक सम्मान की अधिकारी हैं। यथारीति चटपट ताली पड़ी। वे सवसे विनम्रता के साथ विदाई लेकर घर की ओर चल पड़े। घर माने क्वार्टर। इस क्वार्टर को छोड़कर वे कलकत्ता में नये वने अपने मकान में चले जायेंगे। भविष्य में वहीं बैठे-बैठे जीवन का शेष अंश साहित्य करते काटेंगे। सारी योजना वन गयी है। और भी तो बंगाली आई० सी० एस० लेखक बने हैं, फिर वे ही लेखक क्यों नहीं वन सकते? घर आकर आवाज़ दी-बूला, वूला किसी ने जवाव नहीं दिया। मिसेज़ गांगुली ने आवाज़ दी- बूला कहाँ है रे ? नौकर-चाकर सभी दौड़े आये। बेवी कहाँ है ? सभी डर से थरथराने लगे। साहब-मेम सभी दृष्टि से प्रश्न करने लगे। बेबी कहाँ गयी ? माँ-बाप के लिए जो बूला अथवा शर्वरी है, नौकर-चाकर-आया-बावर्ची के लिए वही वेवी है। मिसेज़ गांगुली ने पूछा-घर में कोई आया था ? आया ने कहा-नहीं मेम साहव, कोई तो नहीं आया। तो क्या वह उड़ गयी। किसी के मुँह में कोई जवाब नहीं। कोई नहीं जानता, वेवी कहाँ गयी? एक बैरे ने कहा-मैंने तो देखा था कि वेवी पढ़ रही है। विनाशिता ।
। , । आखिर वूला नहीं मिली। मिस्टर गांगुली ने अनेक जगह फ़ोन किये। मिस्टर गांगुली के दोस्तों के घरों में खोज की गयी। किसी के यहाँ नहीं गयी। आख़िर गयी कहाँ ? मिसेज़ गांगुली अपनी सहेलियों के यहाँ टेलीफ़ोन करने लगीं। उन्होंने भी कहा वूला नहीं आयी। अंत में टेलीफ़ोन करना बंद कर दिया। ख्वामख्वाह लड़की के चले जाने की खबर की ज्यादा जानकारी होना ठीक नहीं है। उस दिन उनकी विदाई-सभा हो गयी थी। एक ही लमहे में सारा आनंद वे-स्वाद हो गया। और साथ-साथ एक अन्य भावना भी थी। भावना प्रत्येक रिटायर्ड व्यक्ति की होती है। अव पहले की भाँति उनको सलाम नहीं मिलेगा, सम्मान नहीं मिलेगा। सचिवा- लय में जाने पर कोई अव उन्हें उस तरह सिर नवाकर सम्मान नही देगा। और जो कई लोग उनके सामने रिटायर हो गये थे, कितने ही उनसे डरते, भक्ति करते थे। और ठीक रिटायर करने के दिन से दूसरी तरह पेश आने लगे। कपड़ा-लत्ता, कोट-पैंट पहले के तरह ही हैं, किंतु कहीं-न-कहीं जैसे कोई मेल नहीं है। स्टाफ वही है, फिर भी चौबीस घंटे में सब बदल गया है । सामने हठात् पड जाने पर कोई अपमान नहीं करता। किंतु वैसी भक्ति में गद्गद् होने वाली बात अब नही रही । फेयरवेल से लौटने के वक्त वे केवल ऐसी ही वातें रास्ते में सोचते रहे : तुम्हारी दशा भी वैसी ही होगी। सचिवालय में आने पर उनकी भी अब कोई भक्ति नही करेगा। तव उन्हें ही वुला-बुलाकर पूछना पड़ेगा, क्यों भई सरकार कैसे हैं ? सरकार उनके विभाग का प्रधान है। उस सरकार ने कितने दिनों खुशामद की, अपने दामाद की नौकरी के लिए। उसके दामाद के लिए एक नौकरी की व्यवस्था कर भी दी थी। उसके लिए मिस्टर गांगुली के प्रति उसे जीवन-भर कृतज्ञ होना उचित 26 विवाहिता ? था। किंतु ऐसा नहीं है। उनके स्थान पर जो आयेगा, तव उसी की खातिर वह करेगा। यही है दुनिया, यही संसार का उसूल है। एक आता है, और उसके चले जाने के वाद फिर कोई उसके स्थान पर आ जाता है। इसी का नाम तो नौकरी है। नौकरी ही तो सव-कुछ नहीं है। इसके बाद जीवन भी तो है। जीवन का भी यही नियम है। इस संसार से भी इसी तरह एक दिन चले जाना होगा। मंत्री चला जायेगा, सचिव चला जायेगा, हेडक्लर्क चला जायेगा, आज जो स्टाफ़ है, वह भी एक दिन चला जायेगा। रहेगा सिर्फ सचिवालय नामक मकान । यह मकान भी क्या चिरकाल के लिए रहेगा ? यह भी नहीं रहेगा। वह भी एक दिन नहीं रहेंगे। उसके बाद यदि कुछ रहेगा तो उनका उपन्यास 'मानव-सुंदरी' संभवतः रहेगा तो रहेगा। कारण, विक्री चाहे न हुई हो, सभी पत्रिकाओं ने प्रशंसा की है। किंतु यह भी हो सकता है, प्रशंसा लोगों ने की है, वह भी संभवतः आई० सी० एस० नौकरी के कारण ही की हो। आज नौकरी चली गयी, साथ-साथ हो सकता है, उनकी किताव की बात भी लोग भूल जायें। घर की ओर आ रहे थे, तव ये ही वातें उनके मन में आ रही थीं। मिसेज़ गांगुली भी पास में बैठी थीं। वे क्या सोचती थीं, क्या मालूम । पति के कारण उनकी भी एक ख़ातिर थी, समाज में। सभी पार्टियों में पति के साथ उनको भी निमंत्रण होता। उन्हें ऐश्वर्य दिखलाने का एक मौका मिलता। इसके बाद कलकत्ता जाने पर संभवतः ऐसे निमंत्रण नहीं मिलेंगे। किंतु जिस दिन नौकरी पकड़ी थी, उस दिन भी तो यह जानते थे कि यह कुर्सी हमेशा के लिए नहीं रहेगी। कुर्सी से एक दिन उन्हें विदा लेनी होगी। फलतः दोनों इस परिस्थिति के लिए मन- विवाहिता ही-मन तैयार थे। किंतु वह दिन इतना चटपट आ जायेगा, उसकी कल्पना तक नहीं की थी। हठात् मिसेज़ गांगुली ने कहा- इस वार वूला की शादी तो करनी ही है। मिस्टर गांगुली अन्यमनस्क थे। फेयरवेल में किसने क्या भापण दिया, वही सोच रहे थे। पत्नी का प्रश्न अचानक सुनकर बोले-वह वह तो करनी ही है। -तुम्हारे नौकरी में रहते-रहते शादी कर देने से अच्छा होता, अव क्या कोई हमारी बात सुनेगा ? क्यों, सुनेंगे नहीं ? मिसेज़ गांगुली ने कहा-और हम दिल्ली में तो रहेंगे नहीं। कलकत्ता में हमें कौन पहचानेगा ? मिस्टर गांगुली ने कहा-फिर भी सचिव की हैसियत से कलकत्ता में खातिर नहीं मिल सकती है, किंतु लेखक समुदाय तो मेरा सम्मान करेगा। कितने स्थानों पर लेखकों को सभापतित्व के लिए मौक़ा मिला है। मिमेज गांगुली ने कहा-लेखकों की बात छोड़ो, वे वेचारे गरीब आदमी है। उनसे हमारा क्या फ़ायदा होगा। उनका अपना उपकार ही कौन करता है, ठीक नहीं ? मिस्टर गांगुली ने कहा--फिर भी जो हो, एक उपन्यास तो लिखा ही है। किताव की प्रशंसा भी तो कुछ हुई है, विक्री चाहे न हो। -वह तो तुम इस नौकरी में थे, इसलिए उन्होंने प्रशंसा की। वह तो उनके मन की बात नहीं । तुम्हारी खुशामद करने के लिए उन्होने वैमा किया था। मिस्टर गांगुली ने कहा-वह जो कुछ हो, वूला की शादी की बात मैं नहीं सोचता। तुम भी मत सोचो। नाचने से ही उसका 28 } विवाहिता
खूब नाम हो चुका है। उस पर बी० ए० पास किया है, लॉ पास
किया है।
मिसेज़ गांगुली ने कहा-अखवार में एक विज्ञापन देने से
कैसा रहे?
मिस्टर गांगुली ने कहा-छी-छी, लोग क्या कहेंगे ? अपनी
लड़की की शादी के लिए अख़वार में विज्ञापन दूंगा ? और बात
छोड़ो, हमारे तो एकमात्र वेटी है। जो शादी करेगा, वह मेरा
सारा रुपया पायेगा। वह क्या कम दौलत है ? इस लालच में भी
कई हैं!
मिस्टर गांगुली अंदर-ही-अंदर चेष्टा कर रहे थे। मिस्टर
महेश सक्सेना का लड़का आई० ए० एस० हुआ था । आई० ए०
एस० माने पहले का आई० सी० एस० ।
महेश सक्सेना का लड़का गोबिंद सक्सेना ।
मिसेज़ गांगुली ने पूछा-लड़के का पिता क्या करता है ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-पिता महेश सक्सेना भाषा-विज्ञान
के प्रधान हैं । वेतन ज्यादा नहीं है, किंतु उनका लड़का अच्छा है।
लड़के की अच्छी नौकरी में पोस्टिग हो गयी है।
-कितना वेतन मिलता है ?
-फ़िलहाल आठ सौ रुपये मिलते हैं। बाद में भाग्य अच्छा
होने से मेरे जैसा विभागीय सचिव हो जायेगा।
मिसेज़ गांगुली की साध थी कि लड़की की शादी किसी
आई० ए० एस० अफ़सर से की जाये। आई० सी० एस० का
दामाद कम-से-कम आई० ए० एस० तो होना ही चाहिए। अन्यथा
सोसाइटी में इज़्ज़त नहीं रहती।
लोग जब पूछेगे, आपके दामाद क्या करते हैं ? तब मिसेज़
गांगुली क्या जवाब देंगी?
अपर डिवीज़न क्लर्क, अच्छा चरित्र, प्रमोशन पाकर एक
विवाहिता / 29
ही-मन तैयार थे। किंतु वह दिन इतना चटपट आ जायेगा, उसकी कल्पना तक नहीं की थी। हठात् मिसेज़ गांगुली ने कहा- इस वार वूला की शादी तो करनी ही है। मिस्टर गांगुली अन्यमनस्क थे। फ़ेयरवेल में किसने क्या भापण दिया, वही सोच रहे थे। पत्नी का प्रश्न अचानक सुनकर वोले-वह वह तो करनी ही है। —तुम्हारे नौकरी में रहते-रहते शादी कर देने से अच्छा होता, अव क्या कोई हमारी बात सुनेगा ? -~क्यों, सुनेंगे नहीं ? मिसेज़ गांगुली ने कहा- -और हम दिल्ली में तो रहेंगे नहीं। कलकत्ता में हमें कौन पहचानेगा ? मिस्टर गांगुली ने कहा-फिर भी सचिव की हैसियत से कलकत्ता में खातिर नहीं मिल सकती है, किंतु लेखक समुदाय तो मेरा सम्मान करेगा। कितने स्थानों पर लेखकों को सभापतित्व के लिए मौक़ा मिला है। मिसेज़ गांगुली ने कहा-लेखकों की बात छोड़ो, वे बेचारे गरीव आदमी हैं। उनसे हमारा क्या फ़ायदा होगा। उनका अपना उपकार ही कौन करता है, ठीक नहीं ? मिस्टर गांगुली ने कहा--फिर भी जो हो, एक उपन्यात तो लिखा ही है। किताव की प्रशंसा भी तो कुछ हुई है, विक्री चाहे न हो। -वह तो तुम इस नौकरी में थे, इसलिए उन्होंने प्रशंसा की। वह तो उनके मन की बात नहीं । तुम्हारी खुशामद करने के लिए उन्होंने बैगा किया था। मिस्टर गांगुली ने कहा-वह जो कुछ हो, बूला की शादी की बात मैं नहीं सोचता । तुम भी मत सोचो। नाचने से ही उसका 28/ विवाहिता
खूब नाम हो चुका है। उस पर वी० ए० पास किया है, लॉ पास
किया है।
मिसेज़ गांगुली ने कहा-अखवार में एक विज्ञापन देने से
कैसा रहे ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-छी-छी, लोग क्या कहेंगे ? अपनी
लड़की की शादी के लिए अखवार में विज्ञापन दूंगा ? और वात
छोड़ो, हमारे तो एकमात्र वेटी है। जो शादी करेगा, वह मेरा
सारा रुपया पायेगा । वह क्या कम दौलत है ? इस लालच में भी
कई हैं!
मिस्टर गांगुली अंदर-ही-अंदर चेष्टा कर रहे थे। मिस्टर
महेश सक्सेना का लड़का आई० ए० एस० हुआ था । आई० ए०
एस० माने पहले का आई० सी० एस० ।
महेश सक्सेना का लड़का गोविंद सक्सेना।
मिसेज़ गांगुली ने पूछा-लड़के का पिता क्या करता है ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-पिता महेश सक्सेना भाषा-विज्ञान
के प्रधान हैं । वेतन ज्यादा नहीं है, किंतु उनका लड़का अच्छा है।
लड़के की अच्छी नौकरी में पोस्टिंग हो गयी है।
-कितना वेतन मिलता है ?
---फ़िलहाल आठ सौ रुपये मिलते हैं। बाद में भाग्य अच्छा
होने से मेरे जैसा विभागीय सचिव हो जायेगा।
मिसेज़ गांगुली की साध थी कि लड़की की शादी किसी
आई० ए० एस० अफ़सर से की जाये। आई० सी० एस० का
दामाद कम-से-कम आई० ए० एस० तो होना ही चाहिए। अन्यथा
सोसाइटी में इज्जत नहीं रहती।
लोग जब पूछेगे, आपके दामाद क्या करते हैं ? तव मिसेज़
गांगुली क्या जवाव देंगी?
अपर डिवीजन क्लर्क, अच्छा चरित्र, प्रमोशन पाकर एक
विवाहिता
दिन, हो सकता है, हेडक्लर्क हो जाये, इस प्रकार के पात्र के साथ तो शादी नहीं की जा सकती। लोग तव क्या कहेंगे ? दिल्ली के समाज में तव हँसी उड़ेगी। शर्म के मारे किसी को मुँह नहीं दिखा पायेंगे। किंतु यदि यह सुनें कि पात्र आई० ए० एस० है, तो गांगुली परिवार की इज़्ज़त वढ़ेगी, कम नहीं होगी। मिस्टर देवव्रत गांगुली ने कहा-तो एक दिन गोविंद को भोजन के लिए निमंत्रण पर बुलाया जाये ? मिसेज़ गांगुली ने कहा-हाँ, ऐसा ही करो। मैं भी उसे देख लूंगी और वूला भी देख लेगी। तो यही ठीक व्यवस्था हुई। एक दिन रात को डिनर खाने का निमंत्रण दिया गया, गोविंद सक्सेना को। सक्सेना हुए कायस्थ और गांगुली हुए ब्राह्मण। किंतु आज- कल इन वातों के कोई आनी-मानी नहीं हैं । आज का युग धन का युग है। कायस्थ, ब्राह्मण, वैद्य का सव विचार उठ गया समाज से । आजकल देखना होता है कि पात्र कितना महीना पाता है । बाप ग़रीव हो सकता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पात्र के अच्छा वेतन पाने से ही लड़की के वाप की जात, कुल बदस्तूर कायम रहता है। उसी विचार में एक दिन निमंत्रण दिया गया। ताकि लड़की वर को देख सके । गाड़ी से आते-आते यही सब सोच रहे थे। रहा। सारी याद है, एक दिन गोबिंद सक्सेना खुद गाड़ी चलाकर मिस्टर गांगुली के घर आये। मध्यम श्रेणी का लड़का गोविंद। अपनी चेप्ता ने, किसी के यहाँ पहुँचने के बजाय, प्रतियोगिता-परीक्षा को एक चांम में ही पास किया उसने । साधारण हेडक्लर्क का लड़का होने पर भी अपनी प्रतिभा से बड़ा हुआ है। मिस्टर गांगुली आये। मिसेज़ गांगुली आयीं। दरवान ने 30 / विवाहिता स्वागत किया और गोविंद सक्सेना को ड्राइंग-रूम में बैठाया। मिसेज़ गांगुली शांतिपुरी ताँत की साड़ी पहने थीं। मुँह पर पाउडर-स्नो लगाकर तैयार हुई थीं। बूला ने पूछा-मैं कौन-सी साड़ी पहनूं ? -क्यों ? तुम अपनी काली जार्जेट की साड़ी पहनोगी, इसीसे तो मैंने शांतिपुरी डूरे साड़ी पहनी है जिससे कि मेरे पास तुमको कॉन्ट्रास्ट दिखलायी दे। याद रखो, जो आ रहा है वह कोई ऐसा- वैसा नहीं है। आई० ए० एस० ऑफ़िसर है। वूला कह रही थी-किंतु तुम तो कह रही थीं कि उसके पिता सचिवालय के हेड असिस्टेंट हैं ? मिसेज़ गांगुली कह रही थीं-उससे क्या हुआ ? तुम तो श्वसुर के घर में घर नहीं वसा रही हो? -क्यों, शादी होने पर श्वसुर के घर में रहना न होगा क्या? माँ कह रही थीं-यह बात तुम्हें कौन कह रहा था ? गोविंद आई० ए० एस० है। उसे क्वार्टर मिलेगा। वहीं तुम लोग रहोगे। -किंतु जितने दिन क्वार्टर नहीं मिलेगा, उतने दिन ? मिसेज़ गांगुली ने कहा-शादी की बात पक्की होते ही क्वार्टर पा जायेगा। ये सारी व्यवस्थाएँ तुम्हारे पिताजी कर देंगे। तुम्हारे पिता आई० सी० एस० सेक्रेट्री हैं, यह भूल क्यों रही हो ? आई० सी० एस० ही तो इंडिया चला रहे हैं, यह तुम अच्छी तरह जानती हो। मिनिस्टर क्या हैं ? तुम नहीं जानतीं कि तुम्हारे पिताजी ही मिनिस्टरों को चलाते हैं। मिनिस्टर लोग क्या तुम्हारे पिताजी की भाँति लिखाई-पढ़ाई जानते हैं ? मिनिस्टर लोग जेल गये थे, तभी तो वोट पाकर मिनिस्टर हुए। वे आज हैं, कल नहीं। किंतु तुम्हारे पिताजी ने विधिवत् लिखाई-पढ़ाई कर प्रतियोगिता-परीक्षा विलायत जाकर उत्तीर्ण की है और तव कहीं जाकर नौकरी पायी है। विवाहिर : 1 । वेटी को सजा दिया मिसेज़ गांगुली ने। काले जार्जेट के ऊपर सुनहरी ब्रोकेड का ब्लाउज़। इसके वाद मुंह, कान, वदन पर क्रीम का ग्राउंड तैयार कर उसके ऊपर माइक्रो-फैक्टर लगा दिया गया। कहा-तुम ज्यादा बात मत करना। सुन लो, लड़कियों की ज्यादा प्रगल्भता आई० सी० एस० वाले पसंद नहीं करते। आई० ए० एस० वाले चाहते हैं, वे वोलते जायें और वाक़ी अन्य सुनते रहें। हर तरह की रिहर्सल दे दी गयी वेटी को। ज्योंही गोविंद सक्सेना के आने की सूचना वैरा देकर गया, साथ-साथ दौड़े आये मिस्टर गांगुली। पीछे-पीछे आ रही थीं मिसेज़ गांगुली। -हैलो गोविंद, कैसे हो ? घर खोजने में तुम्हें कष्ट तो नहीं हुआ? गोविंद शर्माऊ प्रकृति का लड़का है। ज्यादा वात नहीं करता। हमेशा लिखने-पढ़ने में विताया है। हठात् आई० सी० एस० के घर में भोजन का निमंत्रण पाकर अकवका गया। कहा-नहीं, मुझे कोई तकलीफ़ नहीं हुई। इसी मौके पर वूला आ पहुँची। रिहर्सल पहले दी हुई थी ही। कहा गया था कि वात शुरू होने के कुछ वाद हा वह घर में प्रवेश करेगी। -यह देखिये, मेरी वेटी शर्वरी है। इसने वी० ए० पास कर लिया है। 'ला' पढ़ रही है। नमस्कार करो वूला, तुम एटीकेट नहीं जानती? बूला ने नमस्कार किया। गोविंद सक्सेना ने भी नमस्कार किया उसको। काली जार्जेट में, मुंह पर माइक्रो-फैक्टर लगाकर बूला लुभा- awan । 32/ विवाहिता वनी लग रही थी। मिस्टर गांगुली ने कहा-नयी नौकरी तुम्हें कैसी लग रही aic गोविंद ने कहा-खराव नहीं। मिस्टर गांगुली ने कहा--तुम लोगों ने तो ब्रिटिश शासन में चाकरी की नहीं। वह राजा की नौकरी थी। काम करने का सुख था। मैं जव असम में पोस्टेड था, तब मैक्फार्सन मुझे कितना चाहता था, जानते हो ? मैं जो करता उसके बारे में कहता-यस वेरी गुड, यू आर ए वेरी क्लेवर चैप। मेरे काम को खूब एप्रीशियेट करता। तुम लोग कांग्रेसी राज में पैदा हुए हो। उन दिनों की बातों की तुम लोग कल्पना तक नहीं कर सकते । उसके बाद काफ़ी देर तक बातचीत चलती रही। उस समय के साथ तुलनात्मक आलोचना। मिसेज़ गांगुली ने बीच में टोकते हुए कहा-तुम लोग क्या केवल वात ही करते रहोगे ? वात करने से ही क्या पेट भर जायेगा? मिस्टर सक्सेना को भूख लगी होगी। उसके बाद बूला से वोलीं-वूला, खानसामा को टेवुल लगाने को बोलो! खानसामा अब्दुल ने टेबुल लगा दी। मिसेज़ गांगुली ने भाँति-भाँति का आयोजन किया था। भावी दामाद, उसकी अच्छी तरह खातिर करनी होती है। खाने-पीने के बाद जब गोविंद चला गया तो मिसेज़ गांगुली ने वेटी को आड़ में लेकर पूछा- क्यों री, गोविंद सक्सेना तुम्हें अँचा बोल? बूला चुप रही । माँ ने फिर पूछा-जानती हो, गोविंद कोई ऐसा-वैसा उम्मीदवार नहीं है, आई० ए० एस० है । तुम्हारे पिता की तरह। विवाहिता , वूला ने कहा-किंतु माँ, वह काला है ! माँ ने कहा-काला है तो क्या है, तुम्हारे पिता भी काले हैं। पुरुष अगर काला हो, तो नुक़सान क्या है ? इंडिया में तो सभी काले हैं। फिर भी लड़की का मन माना नहीं। मिस्टर गांगुली ने मिसेज़ को पूछा-क्या कहा वूला ने ? गोविंद सक्सेना पसंद हुआ? मिसेज़ गांगुली ने कहा-नहीं। -क्यों? --कहा है आई० ए० एस० होने पर भी काले लड़के के साथ वह शादी नहीं करेगी। मिस्टर गांगुली ने कहा- यह क्यों नहीं कहा कि मैं भी तो काला हूँ। काले रंग से क्या आदमी की परख होती है ? पोस्ट न देखनी होती है ? कितने आदमी सलाम करेंगे, कितनी बड़ी गाड़ी। पायेगा, कितनी जगह सभापति होगा, फूलों की कितनी मालायें पायेगा वह ? जैसे मैं पाता हूँ। -यह लड़की एकदम जिद्दी है। काले से क़तई शादी न करेगी। इसी तरह और दस उम्मीदवारों को घर बुलाकर डिनर खिलाया। कितने डॉक्टर, कितने इंजीनियर, कितने-कितने बड़े- बड़े घरों के लड़के, कितने दूतावासों में नयी नौकरी प्राप्त लड़के। चेप्टा में कोई त्रुटि नहीं रखी मिस्टर गांगुली ने। कोई काला, कोई दुवला, कोई नाटा, और फिर कोई गरीव " - भी। । कोई पसंद नहीं हुआ वूला को। लड़की बड़ी हो गयी। उसकी इच्छा के विरुद्ध तो कुछ किया नहीं जा सकता। ग्रामीण अशिक्षिता कन्या होने पर तो किसी के भी गले में वाँधा जा सकता है, किंतु यह तो वह नहीं है। 34 / विवाहिता
ऐसा होते-होते एक दिन मिस्टर गांगुली रिटायर हो गये।
उसी रिटायरमेंट के उपलक्ष्य में आज यह विदाई-समारोह
हुआ।
वहाँ से घर लौटते ही घर में यह दुखद समाचार!
रात के आठ बजे, रात के नौ बजे, अंत में रात के दस भी
वज गये।
मिस्टर गांगुली और मिसेज़ गांगुली ने खा लिया। उनके न
खाने से नौकर-चाकर, खानसामा-बावर्ची कोई नहीं खा सकता।
अंत में खा-पीकर वह थाना गये। ओ० सी० ने वहाँ खूव
सम्मान से बैठाया। डायरी लिखी गयी लड़की की घटना को
लेकर।
ओ० सी० ने पूछा--किंतु सर, इसके पीछे कोई प्रेम-बम तो
नहीं था किसी के साथ ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-नहीं-नहीं, मेरी वेटी ऐसी नहीं है।
वह गाड़ी से कॉलेज जाती और गाड़ी से घर लौट आती। किसी
के साथ मिलाप का संयोग ही नहीं था उसका।
-बाक़ी वक्त में मिस गांगुगी क्या करती थीं ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-किताव पढ़ती और नहीं तो हमारे
साथ वाज़ार अथवा पार्टी में जाती थी।
---चिट्ठी-पत्री?
नहीं-नहीं, किसी की चिट्ठी-पत्री को उसके नाम घर आते
देखा नहीं कभी । मेरी बेटी उस ढंग की नहीं है।
ओ० सी० ने कहा- ठीक है सर, मैं खुद इन्क्वायरी करूँगा
इस मामले में।
मिस्टर गांगुली ने कहा-देखिये, ज़्यादा मालूम न होना
चाहिए । वात ज्यादा फैले, यह मैं नहीं चाहता।
ओ० सी० ने तसल्ली दी। कहा--नहीं-नहीं, वह मुझको
-
विवाहिता,
कहना नहीं पड़ेगा। वात मैं खूव गुप्त रखूगा। एक काम करें, सिर्फ़ एक पासपोर्ट साइज़ की फ़ोटोग्राफ़ मुझे दे जाइयेगा। और यदि कहें तो मैं खुद ही कल फ़ोटोग्राफ़ आपके घर से लेता आऊँ। आई० सी० एस० होने के कई फायदे हैं । यथार्थ जीवन में इससे कई काम होते हैं। पुलिस भी उनको इज्जत देती है। जबकि साधारण आदमी जव उनके पास जाता है तो वैसा सलूक नहीं करती। मिस्टर गांगुली यह जानते थे। अतः सभी मामलों में उसका फ़ायदा उठाते । साहित्य-सम्मेलन में उनका जो नाम था, वह इसी के बूते था। वह एक लेखक भी हैं, उसके पीछे भी वही एक ही वात थी । वे जानते थे, जब तक वे कुर्सी पर विराजमान हैं तव तक दुनिया के लोग उनको कृपा पाने के लिए उत्सुक रहेंगे। इतने दिनों वही सुयोग-सुविधा पाते रहे हैं। किंतु अब से और ऐसा नहीं होगा। अव उनकी कुर्सी गयी। फ़ेयरवेल पार्टी में उनको कितने ही फूलों की माला क्यों न मिली हो, ये फूल काँटों के अलावा और कुछ नहीं हैं। इसके बाद से उन्हें ऑफ़िस नहीं जाना होगा। उनके अभाव में ऑफ़िस भी अचल नहीं हो जायेगा। सचिवालय जैसे चलता है, चलता रहेगा। उसकी कुर्सी पर अब से जो वैठेगा, उसी को सभी सलाम करेंगे। जीवन का नियम ही ऐसा है । एक जन जाता है और दूसरा आता है। किमी के अभाव में संसार में कुछ अचल नहीं होता। इंग्लैंड का राजा पंचम जार्ज चला गया, द्वितीय महायुद्ध का नायक चचिल चला गया, जर्मनी का हिटलर चला गया, महात्मा गांधी चले गये, जवाहरलाल नेहरू तक चले गये, फिर भी किसी को असुविधा नहीं हुई, उनकी जगह फिर अन्य कोई आकर कुर्सी पर बैठ गये। तभी संसार चलता है। पहले जैसे चलता था, अब भी 3:, / विवाहिता
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अव उन्हें क्वार्टर छोड़ना होगा। क्वार्टर छोड़ने का नोटिस भी उन्हें मिल गया। उन्होंने तय किया कि क्वार्टर छोड़कर कलकत्ता चले जायेंगे। परितोष वोलता जा रहा था। इस वार कुछ रुका। प्रश्न किया-उसके वाद ? लड़की की खबर मिली ? परितोष ने कहा-ख़बर मिली कलकत्ता में। मिस्टर गांगुली साज-सामान के साथ कलकत्ता चले आये । जहाँ एक दिन राजसी ठाठ से रहे, वहाँ प्रजा की हैसियत से रहना उनके लिए लज्जा की वात थी। अतः चले आये। यहाँ आकर हमारे क्लब के मेम्बर हो गये । अव मात्र पेंशन ही एक भरोसा। किंतु ठाठ बनाये रखने के लिए गाड़ी रख लिये। स्त्री के साथ क्लव में आये। दिल्ली में ऑफिसर्स क्लब में जाते थे ठीक वैसे ही। यहाँ ऑफ़िसरों की खातिर ज्यादा थी। कलकत्ता में राजा और प्रजा में कोई फ़र्क नहीं । यहाँ तुम बड़े हो सकते हो, किंतु मैं भी छोटा नहीं । यहाँ मिनिस्टर हो अथवा सेक्रेट्री हो, मैं थोड़े ही तुम्हारी केयर करता हूँ। मैं टैक्स देता हूँ और तुम भी टॅक्स देते हो। तुम टैक्स ज्यादा देते हो, संभवतः मैं टैक्स कम देता हूँ, यही तो फ़र्क है। किंतु उससे हुआ क्या? कलकत्ता साम्य- वादी शहर है। यहाँ यदि गाड़ी चलाते जा रहे हो, तो मैं रास्ते के ऊपर खड़ा जैसे वात करता था, वैसे ही करता जाऊँगा। तुम्हारी गाड़ी आ रही है देखकर मैं रास्ते में खड़ा होकर बात करने के अपने अधिकार को छोड़ें गा नहीं। तुम्हारी गाड़ी हमें पास काट- कर चली जाये। तुम्हारी गाड़ी है इसलिए तुम्हारा अधिकार ज्यादा है, यह वात मैं नहीं मानता। निस्टर गांगुली ने बदलती परिस्थिति में खुद को मना लिया। किंतु दिक्कत हुई मिसेज़ गांगुली को लेकर । यहाँ इस कलकत्ते विवाहिता
में आकर वे बीमार हो गयीं।
आदमी बीमार पड़ता है और दवा खाने से एक दिन ठीक
भी हो जाता है।
क्लव में सभी ने पूछा- क्या हुआ, मिसेज़ गांगुली नहीं आयीं।
उनको क्या हुआ?
मिस्टर गांगुली ने कहा- उनका शरीर कुछ ख़राब है।
उन्होंने पूछा-ऐसा कैसे हुआ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-कलकत्ते का हवा-पानी मिसेज़
गांगुली को सहन नहीं हुआ। दिल्ली का हवा-पानी ठीक है।
दिल्ली का हवा-पानी कलकत्ता से ठीक है, इस बात से सभी
सहमत हैं । उसके बाद हवा-पानी की बात यूं ही उठी । किसी ने
मधुपुर का नाम लिया, किसी ने राजस्थान का और किसी ने
भुवनेश्वर का नाम लिया। हवा-पानी की बात करते-करते ही
संध्या बीत गयी। सभी क्लवों में ऐसा ही होता है। जो ड्रिंक करते
हैं, काफ़ी रात तक क्लव में रहते हैं। उसके बाद आता है ताश ।
ताश खेलने में हार-जीत होती है । अर्थात रुपये-पैसे का लेन-देन ।
मिस्टर गांगुली को ये सव रोग नहीं है । उन्हें तो वक्त काटना
है। स्त्री को लेकर नहीं आ पा रहे हैं, इसका दुख उन्हें सालता
रहता है।
शुरू में सिर्फ़ बुखार था। लोगों को बुखार होता है और
चला जाता है। मानसिक चोट पाने से मामूली बुखार भी आगे
जाकर बढ़ जाता है। रात में नींद नहीं आती।
मिस्टर गांगुली सांत्वना देने की चेप्टा भी करते हैं। कहा-
समझ लो तुम्हारी वूला मर गयी। जो हमारे ऊपर इतनी
अकृतन हो सकती है, उसकी बात न सोचना ही अच्छा है।
किंतु मोचना-न-मोचना क्या आदमी के बस की बात है।
उसके बाद वही बुखार कुछ कम होता है तो साथ ही बढ़ भी
40/ विवाहिता
A
।
जाता है। डॉक्टर को बुलाया गया। होम्योपैथी, एलोपैथी सभी चेष्टायें करके देखा गया । चाहे वह एलोपैथी हो अथवा आयुर्वेदिक हो । नींद से उठते ही मिस्टर गांगुली पूछते हैं—आज कैसी हो ? मिसेज़ गांगुली कहती हैं-कल रात एक मिनट भी नींद नहीं आयी। केवल बूला की बात याद आती है। कहाँ है, क्या खाती है, क्या पहनती है, यही सव सोचती रहती हूँ। —वह सब मत सोचो अव। वह अब बालिग हो गयी है। उसकी स्वाधीन इच्छा भी कोई चीज़ है । अव उसकी जो मंशा है, वह कर सकती है ! मिसेज़ गांगुली ने कहा-बूला ऐसा करेगी, यदि पहले जानती तो पकड़कर उसकी शादी कभी की कर देती। मिस्टर गांगुली ने कहा-वैसी लेष्टा तो हम लोगों ने कितनी बार की थी, उस गोविंद सक्सेना जैसे पात्र को उसने काला वतला- कर रिजेक्ट कर दिया। उसी समय यह समझ लेना उचित था कि उसके भाग्य में अनेक कष्ट वदे हैं। मिसेज़ गांगुली विछौने से उठती नहीं थीं उस वक़्त । केवल बेटी की यादों का स्मरण होता। उनके कष्ट का वयान नहीं किया जा सकता। प्रातः एक कप दूध पीने का उसे अभ्यास था। नहाने के पहले दूध की मलाई और संतरे के छिलकों को पीसकर शरीर पर मलने से बदन का चमड़ा अच्छा रहेगा सोचकर ऐसा करतीं। कॉलेज से लौटने पर पिस्ता-वादाम-आड़ -सेव उसका रोज़मर्रा का जलपान था। लड़की के लिए क्या नहीं किया माँ- बाप ने। वे तमाम बातें भूलकर वही लड़की घर छोड़कर चली गयी। क्लव में अकेले-अकेले बैठा करते मिस्टर गांगुली। ड्रिंक करने की आदत उन्हें कभी नहीं रही। होने से अच्छा होता। विवाहिता!
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-
कव आयेंगे?
-घर लौटते संध्या हो जायेगी
-और तुम्हारी मालकिन ?
-वे कोर्ट गयी हैं।
- तुम क्या इसी मकान में काम करती हो ?
-हाँ।
तुम्हारी मालकिन कोर्ट कब जाती हैं ?
नौकरानी ने उत्तर दिया-सुवह साढ़े दस बजे के बाद।
-इस मकान का भाड़ा कितना है ?
नौकरानी ने कहा- यह मैं नहीं जानती।
अव तक मिस्टर गांगुली कुछ नहीं बोल रहे थे। वे सिर्फ चारों
तरफ़ देख रहे थे । यह मोहल्ला, यह वस्ती, यह कष्ट-इसे वूला
ने कैसे सहन किया ! इसके वाद खड़े रहने में कोई तुक नहीं था।
पुलिस के साथ मिस्टर गांगुली भी चले आये। जीवन में
उन्होंने अनेकों लोगों को कष्ट दिये हैं, अनेकों कांग्रेसी नेताओं को
जेल में ठूसा है। असम में रहने के दिनों में कितने लोगों पर
अत्याचार किये हैं। कितने ही लोगों की, जो कांग्रेस की पताका
लिए जुलूस में जाते थे उन पर गोली चलाकर हत्या की है। कितनी
औरतों को विधवा बनाया है, तव भी उनकी आँखों में आँसू नहीं
आये। किंतु आज अपनी खुद की लड़की की ऐसी दुर्दशा देखकर
रो पड़े।
m-4
साँझ के वक्त विजन कारखाने से लौटा।
प्राय: वही पहले आया करता है। सारे दिन कार
काम में डूवे रहकर, इसी समय वर लोट स्नान आदिका -
कर पुनः साफ़-सुथरा हो उठता है !
उसके बाद घर आती है बूला । सारे दिन हाईका-
और जजों के इजलास में इस चेम्बर से उस चेम्बर में भाग-दौड़ करती हुई थकी-माँदी। उसके बाद वहाँ से निकलकर वस से घर पहुँचती है। उस दिन घर पहुँचते ही अचला ने सूचना दी। कहा-आज सुवह दो वावू आपको खोजते हुए आये थे। -मुझे? विजन सरकार जैसे हक्का-बक्का हो गये । कहा- मुझे खोजने आये थे, अथवा तुम्हारी दीदी मणि को ? अचला ने कहा-दोनों का ही नाम ले रहे थे। दोनों को ही खोज रहे थे। पूछ रहे थे, इस मकान का भाड़ा कितना है ? -तुमने क्या जवाब दिया? -मैंने कहा, बावू कारखाना गये हैं और दीदी मणि हाईकोर्ट --- गयी हैं। --और कुछ नहीं कहा तो? घर का भाड़ा तुमने कितना बतलाया? -मैंने कहा, मैं जानती नहीं । थोड़ी ही देर में वूला भी आ गयी। जिस दिन वह हाईकोर्ट गयी, उसी दिन उसे अच्छा सीनियर मिल गया। समीर वनर्जी, हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध एडवोकेट । उन्होंने खाम नज़र से शर्वरी सरकार को देखा। उन्होंने कहा--शुरू में ही कुछ आशा मत करना माँ। शुरू- शुरू में तुमको बूब दिक्कत होगी, किंतु हताश मत होना। नैं जब गुरू में हाईकोर्ट में घुसा तब कभी-कभी तो वस-ट्राम का भाड़ा भी जुटना मुश्किल था। किंतु मैं हताश नहीं हुआ। तुम भी धैर्य रखना, एक दिन सफलता मिलेगी ही। सफलता मिलने पर और भी नावधान रहना होगा । यह बहुत परिश्रम का काम है। और यह मच है कि शुरू के दो वर्षों काफ़ी मेहनत करनी पड़ी, पर्वरी नरकार को । दिन-भर सीनियर एडवोकेट, समीर बनर्जी 44 / विवाहिता . - ।
-
?
के साथ कोर्ट में घूमना होता । उसके बाद उनके घर जाना होता
संध्या को । संध्या से शुरू कर काफ़ी रात दस-ग्यारह वजे के पहले
उठ नहीं पाती थी। उसके बाद फ़ाइल लेकर घर जाना होता।
रात में जगकर कानून की किताबें टटोलनी होतीं।
तब तक रात वहुत बीत चुकी होती था। विजन पूछता
अभी तक जग रही हो? तुम सोओगी नहीं ?
शर्वरी कहती-आज मुझे कुछ ज्यादा ही खटना होगा, बड़ा
कड़ा केस है।
उन दिनों की वातें याद हैं शर्वरी को। तभी विजन के साथ
भाग आयी थी कलकत्ता में। पिता-माँ उसे खोजेंगे, पुलिस में
खवर देंगे, सारी बातें जानती थी। जानती थी कि पिता उसका
प्रतिशोध लेंगे ही एक दिन।
शुरू में सोचा था, वे दोनों भारत के बाहर चले जायेंगे। किंतु
रुपये, पासपोर्ट ? ये सारी व्यवस्था करने में यदि देर हो गयी तो?
खवर लग जायेगी। वहुत परेशानी, हैरानी होती।
इससे अच्छा है, कलकत्ता चला जाये। वहाँ आदमियों की
बहुत भीड़ है। वहाँ छिपकर रहना सहज है। आदमियों की भीड़
में उन्हें कोई देख नहीं पायेगा।
विजन को कुछ भय हुआ। कहा~यदि मुझे जेल में ठूस दें
तुम्हारे पिताजी ? तुम्हारे पिता आई० सी० एस० हैं।
शर्वरी ने कहा-मैं तो हूँ। मैं तुम्हें बचाऊँगी।
विजन सरकार बड़ा डरपोक आदमी है। दिल्ली के एक
मोटर-कारखाने में एक मामूली मिस्त्री का काम करता था वह ।
मामूली चार रुपया दैनिक मजदूरी ।
प्रथम जिस दिन भेंट हुई, उसी दिन शर्वरी को भा गया था वह ।
कॉलेज से लौटते वक़्त रास्ते के वीच गाड़ी ख़राब हो गयी थी।
विवाहित
ड्राइवर ने गाड़ी को धकियाते-धकियाते कारखाने में छोड़ा।
गाड़ी का इंजन खराब हो जाने पर कारखाना ले जाने के
अलावा कोई उपाय नहीं है। खराव गाड़ी को धक्का दे-देकर जव
कारखाना ले जाया गया था, तव विजन सरकार ही पहले दौड़ा
आया था, सहायता करने के लिए। ड्राइवर इब्राहिम अकेला गाड़ी
ठेल नहीं पा रहा था कारखाना के अंदर ।
विजन को बुलाना नहीं पड़ा। खुद उसने आकर पूछा---
किसकी गाड़ी है?
इब्राहिम ने कहा--आई० सी० एस० गांगुली साहब की गाड़ी
है।
विजन समझ गया था, अंदर जो वैठी हुई है, आई० सी० एस०
गांगुली माहव की लड़की है। गाड़ी का बोनेट खोलने के आगे ही
शर्वरी ने कहा- आप गर्मी में कैसे बैठी रह सकेंगी, आपको कष्ट
है
होगा।
.
शर्वरी ने कहा - नहीं, मुझे कप्ट नही होगा।
विजन कह रहा था-नहीं, इस गर्मी में इतनी देर तक गाड़ी
के अदर बैंग बैठी रहेंगी आग? मैं एक कुर्सी ला देता हूँ। तब तक
आप उम पर बैठे, पख के नीचे आराम कर सकेंगी।
यह कहकर कारखाने के टीन के शेड के नीचे से उसने गद्दी
वाली हडिल की चयर ला दी। उसके बाद सिर के ऊपर सीलिंग
फैन खोल दिया।
हवा के नीचे बैठने में शर्वरी को काफ़ी आराम मिला।
विजन ने कहा ---कुछ ठडा पानी पीयेंगी आप?
शर्वरी ने कहा-~~नहीं।
विजन ने कहा- नव युछ शरबत पीजिये। कहकर वह दौड़
पड़ा। और फिर एक ठडे कोकाकोला की बोतल लाकर बोला
-~-~~को पीजिये !
46/ विवाहिता
शर्वरी ने कहा-इसे लाने क्यों गये ? इसका दाम क्या है ?
कहकर अपने वैग से एक रुपया निकालकर देने जा रही थी।
विजन सरकार ने सिर हिला दिया। कहा-दाम आपको
नहीं देना होगा। आपको गर्मी लग रही थी देखकर ऐसे ही ले
आया।
शर्वरी ने कहा-दाम नहीं लेने से इसे मैं नहीं पीऊँगी।
विजन सरकार ने कहा-तव इसको विल के साथ एडजस्ट
कर दीजियेगा।
शर्वरी फिर भी आपत्ति कर रही थी। कहा-नहीं, तब मैं
इसे नहीं पी सकूँगी।
विजन सरकार ने कहा-तव समझ लीजिये कि कंपनी
आपको पिला रही है।
आखिर पंखे के नीचे बैठी शर्वरी ने उस शरवत को पी लिया।
और वैठी-बैठी देखने लगी, विजन सरकार को।
विजन सरकारने चिट्टमैला एक हाफ़-पैंट पहन रखा था, और
वदन ख़ाली । उस वक़्त उसने गाड़ी का वोनेट खोल रखा था और
यंत्र-पाती की जाँच कर रहा था। उसके शरीर के उतार-चढ़ाव
के साथ-साथ माँसपेशियाँ फूल-फूल उठती थीं। शुरू में, विजन
के व्यवहार से मुग्ध हो गयी थी शर्वरी, अब मुग्ध हो रही थी
उसके शरीर के गठन को देखकर।
प्रायः आधे घंटे तक शर्वरी को पंखे के नीचे धूल और गंदगी
के वीच वैठे रहना पड़ा उस दिन । किंतु एक पल के लिए भी
विजन के स्वास्थ्य की ओर से उसकी नज़र नहीं हटी।
उसके बाद गाड़ी सुधारने का काम ख़त्म हो जाने पर विजन
सरकार ने आकर कहा-गाड़ी ठीक हो गयी है, आपको कष्ट
दिया।
शर्वरी ने कहा--कितना लगेगा?
विवाहिता
विजन सरकार ने कहा-रुपया अभा नहीं देना होगा।
-कव देना होगा?
विजन सरकार ने कहा -मैं जव विल दूंगा, तव रुपया
दीजियेगा।
-बिल कव देंगे ?
विजन सरकार ने कहा-उसको लेकर आपको सोचना नहीं
होगा, मैं फुर्सत से विल ले जाऊँगा।
इब्राहिम ने तब तक गाड़ी स्टार्ट कर दी थी। विजन सरकार
ने कहा-आप गाड़ी में बैठ जाइये, गर्मी में आपको खूव कप्ट
हुआ।
---
शर्वरी ने कहा-कप्ट कैसा ? गाड़ी खराव हो गया थी, तो
मामूली कप्ट तो होना ही था ।
-अच्छा नमस्कार। फिर कभी गाड़ी खराव होने से मेरे
कारखाने में दर्शन दीजियेगा। यह मेरा ही कारखाना है।
शर्वरी ने कहा-पिताजी को ऐसा करने को कहूँगा, अच्छा
नमस्कार।
फिर एक दिन कॉलेज जाते वक्त शर्वरी ने इब्राहिम से कहा
- इब्राहिम, उस मोटर के कारखाने की ओर एक दफ़ा चलो
तो!
इब्राहिम गाड़ी लेकर उस कारखाने की ओर बढ़ा।
गाड़ी देखकर दौड़ा आया विजन सरकार। उस समय वह
दूसरी गाड़ी की मरम्मत के काम में लगा था। वह काम छोड़कर
भागा आया और बोला-नमस्कार ! क्या गाड़ी फिर खराब हो
गयी?
शर्वरी ने कहा-नमस्कार ! गाड़ी का खराव कुछ नहीं हुआ,
गिळं बोलने आये थे कि आपने विल तो भेजा नहीं ?
उन दिन भी विजन सरकार की वैसी ही पोशाक थी। सिर्फ
45 / विवाहिता
एक चिट्ट मैला हाफ़-पैंट और मांसल देहयष्टि। उसने कहा
जल्दी किस वात की ? कुछ फुर्सत मिलने पर मैं स्वयं आपके घर
जाकर विल दे आऊँगा।
शर्वरी ने कहा-मैंने सोचा कि आप भूल गये ।
विजन सरकार ने कहा-नहीं, महीना ख़त्म होने पर जाऊँगा,
ऐसा सोचा था।
शर्वरी ने कहा-महीना ख़त्म होने की क्या दरकार है ? मैं
आज रुपये लायी हूँ, लेंगे?
विजन सरकार ने कहा- नहीं अब तक बिल तैयार करने की
फुर्सत नहीं मिली। दिन-प्रति-दिन काम बढ़ रहा है। सुबह नौ
वजे से रात दस बजे तक लगातार काम करना होता है मुझे।
शर्वरी ने कहा-मेरा पता जानते हैं तो ?
विजन सरकार ने कहा-आपका ठिकाना कौन नहीं जानता।
आई० सी० एस० मिस्टर गांगुली का एक वार नाम बोलने से
कोई भी तुरंत मकान बता देगा।
-ठीक है, आइयेगा एक दिन। यह कहकर शर्वरी कॉलेज
चली गयी थी।
।
एक दिन शाम को विजन सरकार हठात् घर पहुंच गया। आया
से पता लगते ही वाहर निकल आयी शर्वरी । विजन का अलग ही
{ रूप उसने देखा।
उसने वह हाफ़-पैंट नहीं पहन रखा था। भूरे रंग का फुल-पैंट,
वदन पर लाल रंग का स्पोर्ट-शर्ट ।
-ओह आप ! मैं तो पहचान ही नहीं पायी।
हँसने लगा विजन सरकार। कहा-आई० सी० एस० के
घर वह पोशाक पहनकर आने में लज्जा मालूम हो रही थी।
शर्वरी ने कहा-किंतु मुझे तो उस पोशाक ही में देखना
विवाहिता
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शर्वरी ने वात पर विश्वास नहीं किया । वोली-आप आधे
घंटे तक गाड़ी के पीछे खटे और चार्ज़ किये सिर्फ दस रुपये।
जानते नहीं, आई० सी० एस० वड़े आदमी होते हैं। इतना कम
चार्ज करने से उन्हें खराब लगता है ?
विजन सरकार ने कहा-यह क्या !
हाँ, उससे उनकी इज्जत को चोट पहुँचती है ! आई० सी०
एस० वालों को यदि पेट की बीमारी होती है तो उनके लिए शर्म
की वात । पेट की बीमारी गरीव लोगों को होती है। कारण यह
कि ग़रीव लोग आलतू-फ़ालतू चीज़ खाते हैं और बड़े आदमियों
को रोग होने से होगा अपेंडिसाइटिस, अथवा डाइविटीज अथवा
ब्लड-प्रेशर । बड़े आदमियों को बड़े-बड़े रोग अगर न हों तो उन्हें
शर्म आती है। आपने आई० सी० एस० वालों की मोटर ठीक
करने का दस रुपये चार्ज क्या सोचकर किया ?
विजन सरकार ने कहा-यह तो आपके मुंह से मैं नयी बात
सुन रहा हूँ !
शर्वरी ने कहा-क्यों, आप जानते नहीं कि डॉक्टर लोग बड़े
आदमियों के वीमार होने पर कीमती दवायें प्रेसक्राइव करते हैं,
और ग़रीब आदमियों के लिए उसी वीमारी के होने पर सस्ती दवा
लिख देते हैं ?
विजन सरकार ने कहा-ऐसा तो मैंने आपसे पहली दफ़ा सुना
( है !
शर्वरी ने कहा-इसके अतिरिक्त आपने कोकाकोला का
दाम नहीं जोड़ा।
उसी समय एक ट्रे में कोकाकोला की बोतल सामने लाकर
नौकरानी ने रख दी !
वोतल लेकर विजन सरकार ने कहा-यह तो उसका पैसा
उतर गया। उसके बाद कुछ रुककर बोला-रहने दीजिये, मैं
विवाहिता
हैं
आपको और बोर नहीं करूंगा। मिस्टर गांगुली कहाँ हैं ? घर में
हैं?
---नहीं, वे तो ऑफ़िस में हैं।
विजन सरकार ने कहा-तब यह विल उनको दे दीजियेगा।
एक दिन आकर मैं रुपये लेता जाऊँगा।
शर्वरी ने कहा-घर में मिस्टर गांगुली भी नहीं हैं, मिसेज़
गांगुली भी नहीं हैं । वे बाज़ार करने गयी हैं। फ़िलहाल सिर्फ़ मिस
गांगुली घर में हैं। मिस गांगुली ही आपको रुपये दे देंगी, कहकर
वह भीतर चली गयी।
थोड़ी ही देर में एक दस का नोट लाकर उसने विजन सरकार
के हाथ में दे दिया। नोट लेकर विजन सरकार दौड़ने को हुआ।
दरवाज़े की ओर पहुंचकर वह घूमकर मुड़ा और खड़ा हो गया।
कहा---एक बात याद रखेंगी?
-क्या?
विजन सरकार ने कहा-आपकी गाड़ी जब कभी खराब हो,
मेरे यहां मुधरवाइयेगा।
शर्वरी ने कहा-और यदि गाड़ी खराव न हो तो?
विजन सरकार ने कहा-तव यही समझूगा कि मेरा दुर्भाग्य
है । गाड़ी खराब न होने पर मेरे कारखाने में स्वामख्वाह जाने की
बात तो मै नही कहूँगा।
शर्वरी ने कहा-गाड़ी के जल्दी-जल्दी खराब होने पर मेर
तो अच्छा ही है।
-क्यों?
शर्वरी ने कहा-एक वोतल कोकाकोला की फ्री जो मिलेगी
एक साथ दोनों ही हँस पड़े।
उसके बाद विजन सरकार अपने स्कूटर पर बैठकर च
52 विवाहिता
मज़ा यह है कि उसके बाद से गाड़ी प्रायः ही ख़राव होने लगी।
मिस्टर गांगुली ने कहा-तुम्हारी गाड़ी रोज-रोज ख़राब
क्यों होती है, वोल तो?
शर्वरी ने कहा-यह मैं कैसे बोल सकती हूँ ?
इब्राहिम को बुलाया मिस्टर गांगुली ने । कहा-दीदी मणि की
गाड़ी खराव क्यों होती है ? ठीक से क्यों नहीं सुधरवाते ? किस
वर्कशॉप में देते हो तुम?
इब्राहिम ने कहा-हुजूर, गाड़ी पुरानी हो गयी है, नया मॉडल
लेने से अच्छा रहेगा।
मिस्टर गांगुली ने भी बेटी से यही कहा। वोले-बूला, तुमको
एक नयी गाड़ी ख़रीद देंगे। यह पुरानी हो गयी है। इब्राहिम ने
कहा है।
शर्वरी ने कहा-नहीं-नहीं पापा, नयी गाड़ी मत खरीदना।
पुरानी गाड़ी होने पर भी यह गाड़ी शुभ है !
-क्यों, कैसे मालूम हुआ कि यह गाड़ी शुभ है ?
शर्वरी ने कहा-इस गाड़ी से मैं जहाँ भी गयी हूँ, कामयाव
हुई हूँ। आई० ए०, बी० ए० जितनी भी परीक्षायें मैंने दी हैं, सभी
में अच्छे नतीजे हासिल हुए हैं।
मिसेज़ गांगुली ने कहा-शुभ होने पर क्या हमेशा के लिए
इस गाड़ी को रखना होगा ? गाड़ी की भी तो उम्र होती है।
इसको एक नयी गाड़ी खरीद दो।
शर्वरी ने कहा-नहीं माँ, पहले लॉ पास करूँगी, तव गाड़ी
बदलूंगी। सचमुच यह बड़ी शुभ गाड़ी है।
दरअसल, जिस गाड़ी की मरम्मत के नाम पर विजन सरकार
से भेंट करना ही शर्वरी का उद्देश्य था, उसे बतलाया तो नहीं जा
सकता।
शर्वरी गाड़ी पर बैठने के साथ ही इनाहिम से कहती-वह
विवाहिता :
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दिये थे उसने। सच, अनेक दिनों की हाड़तोड़ परिश्रम की रक़म। वेचते वक्त उसको कुछ कष्ट हुआ था। रुपये नहीं, जैसे खुद उसके शरीर का खून हो। शरीर का रक्त कहना भी उसके लिए कम ही । एक रोज़ ख़ाली हाथ से व्यवसाय शुरू किया था उसने। ली लड़का विजन सरकार । न कोई सहायता, न कोई संवल। पैंट पहनकर मोटर सुधारता । और शुरू-शुरू में सस्ते मोटर रिता। उससे ही कुछ बँधे ग्राहक हो चुके थे। उन्हीं से उसकी वलती। किंतु जिस दिन शर्वरी ने गाड़ी को कारखाना में घुसाया, दिन से उसने रोज़ दाढ़ी बनाना शुरू कर दिया। उसी दिन एक-दो पैंट-शर्ट खरीदना प्रारंभ कर दिया। विजन सरकार विल लेकर जिस दिन मिस्टर गांगुली के घर [था, नयी पैट और शर्ट पहनकर गया था। उसी दिन समझ । था, शर्वरी मर मिटी। और उसको कोई वचा नहीं सकता। उसके बाद से शर्वरी की गाड़ी कारण-अकारण उसके कार- ने में आने लगी। तभी से उसको अपनी दरिद्रता पर शर्म आने । विजन सरकार ने पूछा-भागकर कहाँ जायेंगी ? शर्वरी ने कहा-और कहाँ जाऊँगी, जाऊँगी कलकत्ता, वहाँ ने से हमें कोई पहचान नहीं पायेगा । वहाँ जाकर तुम एक रखाने में नौकरी करोगे, और मैं हाईकोर्ट में प्रेक्टिस करूँगी। विजन सरकार ने कहा-जाकर रहेंगे कहाँ ? वहाँ किराये घर मिलेगा? शर्वरी ने कहा-क्यों नहीं मिलेगा ? पैसा देने से कलकत्ता में नहीं मिल सकता। जितने दिन मकान नहीं मिलता, उतने होटल में रहेंगे। रुपये तो हमारे पास हैं ही काफ़ी। हाँ, शर्वरी का काफ़ी रुपया बैंक में था। उसने उसी दिन बैंक, विवाहित से रुपये उठा लिये थे। विजन सरकार के पास भी कारखाने की विक्री का रुपया था। उसके बाद दिल्ली स्टेशन से ट्रेन पकड़कर सीधा कलकत्ता । गाड़ी पर चढ़कर शर्वरी ने कहा-कुछ देर के बाद ही माँ-बाप आकर खोज-खबर लेंगे। ---उसके बाद वे पुलिस में खवर करेंगे ? शर्वरी ने कहा-पुलिस में अभी खवर नहीं करेंगे। कारण, उससे लोग जान जायेंगे। खवर यदि देंगे भी तो दो-तीन दिन के बाद। तब तक हम लोग कलकत्ता पहुँचकर होटल में जा चुके होंगे। होटल में अपना वास्तविक नाम नहीं लिखेंगे। विजन सरकार ने कहा-इसी वीच शादी की रस्म पूरी कर लेनी होगी। शर्वरी क़ानून की पढ़ाई की हुई लड़की। किसी से उसे कानून सीखना नहीं होगा। वह जानती है कि वह एक ऐसे आदमी से शादी करने जा रही है, जिसको कोई सामाजिक मर्यादा प्राप्त नहीं है। पिता-माता उसे जीवन में कदापि दामाद स्वीकार नहीं करेंगे । वह जानती थी कि वह नावालिग नहीं है। उसकी उन्न हो गयी है। वह जो कुछ करने जा रहा है, सभी दृष्टि से सोच-समझ- कर ही कर रही है। घर छोड़कर जाने वाली लड़कियाँ प्रायः एक पत्र लिखकर छोड़ जाती है, 'तुम लोग मेरी खोज मत करना। मैं अपनी इच्छा से घर छोड़कर जा रही हूँ।' किंतु इस मामले में उसकी जरूरत नहीं । जीवन मे माँ-बाप मे कभी दुत्कार मिली हो, ऐसी बात नहीं, बल्कि इसके विपरीत माँ-बाप की वह आँख की पुतली रही। उनके भविष्य को लेकर ही माँ-बाप को एकमात्र चिंता रही। अनेक संभावित पात्र देये उन्होंने । किंतु विजन सरकार जैसा 56 विवाहिता
स्वास्थ्य, ऐसा अच्छा व्यवहार और किसी से मिला नहीं।
अभी तक मैं परितोष की कहानी सुन रहा था।
पूछा-उसके बाद?
परितोष ने कहा
इसके बाद तुम उसकी मनःस्थिति को लेकर कई पन्ने लिस
सकते हो। वह मैं नहीं कह पाऊँगा। सिर्फ इतना कहूँगा कि उन
दोनों का ही भाग्य अच्छा है। उनको महज़ दो दिन के लिए होटल
में रहना पड़ा। उसी के बाद एक सौ बीस रुपया भाड़े में कड़ेय
में एक मकान मिल गया।
उसके बाद शादी। शादी में तीन आदमियों की गवाही के
ज़रूरत होती है।
उसकी व्यवस्था करने में कोई ज्यादा ज़ोर नहीं आया। जिस
कारखाने में विजन ने नौकरी पायी, वहीं के तीन मिस्त्री गवाह के
रूप में प्रस्तुत हो गये। कोई उत्सव नहीं, कोई वाजा-शहनाई
नहीं, यहाँ तक कि लाल-नीली रोशनी तक नहीं । और खाने-पीने
की भी कोई व्यवस्था नहीं। यह शादी, सिर्फ शादी थी।
कहा जा सकता है कि उनकी शादी पहले ही हो गयी थी
उसी वक्त जव शर्वरी को लेकर गाड़ी चलाते-चलाते दिल्ली को
छोड़कर वहुत दूर के गाँव में किसी पेड़ के तले बैठकर वे अपने
सुख-दुख पर बात करते थे।
इस दफ़ा सरकारी छाप-मार शादी। इसीलिए इसमें जो
वाहरी आडंवर होता, वह नहीं है। महज़ एक अनुष्ठान। और
वह अनुष्ठान जितना सहज-सामान्य हो सकता है, उतना ही।
इसके अलावा और कुछ नहीं।
उसके वाद विजन सरकार जैसे नौकरी करने लगा, उसी
तरह एक सीनियर वकील की जूनियर होकर शर्वरी हाईकोर्ट में
विवाहित
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को देखकर शर्वरी को लगा, इन कुछ वर्षों में ही पिता कुछ
गये हैं
-बूला ! पिता की वही पुरानी लाड़ की पुकार।
पिता ने कहा- तुम यहाँ ? मैं कितने दिनों से तुम्हें खोज रहा
ह जानती हो? कह पिता चारों ओर के दारिद्र्य के दृश्य को
बकर अवाक रह गये।
कहा-तुममें कोई दया-माया नहीं है वूला ? तुम्हारी माँ
मृत्यु-शैया पर है। वह और ज्यादा नहीं बचेगी। मैं तुम्हें घर ले
जाने के लिए आया हूँ।
वूला ने कहा-मैं तुम्हारे घर चली जाऊँगी तो मेरा घर
कौन देखेगा?
मिस्टर गांगुली ने कहा-किंतु तुम्हारी अपनी माँ को वीमारी
में देखने के लिए तुम्हारा जाना उचित नहीं है क्या?
-माँ को क्या वीमारी है ?
मिस्टर गांगुली ने बतलाया-हजम नहीं होता, नींद नहीं
आती, और ज़्यादा दिन की मेहमान नहीं है, ऐसा मालूम होता
है। यदि अंतिम भेंट करना चाहती हो तो तुरंत अभी चलो।
तुम डॉक्टर को दिखा रहे हो तो?
-डॉक्टर तो देखता ही है। किंतु वीमारी तुम्हारी वजह से
है!
---मेरे कारण क्यों?
मिस्टर गांगुली ने कहा-तुम्हारी वजह से नहीं तो :
क्या? हम लोगों को विना कहे-सुने तुम घर छोड़कर चली अ
मन के ऊपर कितना दवाव पड़ा है कहो तो? तुम ही तो ह
अकेली संतान हो । तुम्हारे चले जाने पर आदमी को तकली
होगी?
वूला ने कहा- मैंने जव लड़की के रूप में जन्म लिय
विवा
?
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१
तुम्हें पछतावा होगा; यह भी कहे देता हूँ।
बूला ने कहा-तुम जो भी तर्क दो, मुझे मेरे रास्ते से डिगा
नहीं सकते। तुम लोगों की नकली शराफ़त मैंने दिल्ली में रहते
खूब देखी है । वे तमाम बनावटी चीजें मैं भूल नहीं सकती। तुम
लोगों के समाज में जो मनुष्य कहलाने के योग्य नहीं, उन्हीं के
बीच से असली मनुप्य को खोजकर पाया जा सके, उसको मैंने पा
लिया है।
-किंतु कल्पना करो, वैसे भगवान ऐसा न करे, यदि तुमको
कोई भारी वीमारी हो जाये तो उसके लिए किसी नसिंग होम में
चिकित्सा की व्यवस्था कर सकेगा तुम्हारा पति ?
वूला ने कहा- तुम मूर्ख की तरह यह वोले जा रहे हो ? कोई
दिन में तीन सौ रुपये नहीं खर्च पाते तो इसका मतलब यह है कि
इस कलकत्ता में जीवित नहीं हैं ?
मिस्टर गांगुली ने इस दफ़ा खड़े होकर कहा-~-तुम्हारे साथ
और वहस नहीं करूँगा। तुम मेरे साथ चलोगी अथवा नहीं, यही
कहो !
बूला ने कहा-नहीं।
तुम्हारे मन में माँ-बाप के प्रति क़तई कोई माया-दया नहीं
उपजती?
बूला ने कहा- जिस सस्ती माया-दया का कोई अर्थ नहीं
होता, वह माया-दया मेरे पास नहीं है। समझ लो, तुम्हारी लड़की
मर गयी, क्या ऐसा नहीं सोच सकते ?
मिस्टर गांगुली ने कहा--किंतु एक वात याद रखो कि जित
लड़के ने तुमने शादी की है, उसने ऐसा मेरे धन के लालच में
किया है।
-धन का लालच माने ?
~माने मेरे मरने पर मेरी सारी संपत्ति उसे मिल जायेगी।
62 / विवाहिता
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वूला ने कहा-कल की वात कल कह सकूँगी।
नहीं तो परसों?
वूला ने कहा-देखिये पिताजी, जिस दिन आप मेरे पति को
अपना दामाद स्वीकार करेंगे, उस दिन ही मैं आपके घर आऊँगी।
मिस्टर गांगुली ने कहा--तुम क्या यह कहना चाहती हो कि
एक लोफ़र को मैं अपना जवाई स्वीकार कर लूँ ? मेरा इतना
अधःपतन नहीं हुआ है।
बूला ने कहा-देखती हूँ, तुम्हारा तो अभी तक अहंकार गया
नहीं। तुम क्या सोचते हो कि तुम अभी भी आई० सी० एस०
और तुम्हारे नीचे हम नौकरी करते हैं ? हम तुम्हारी नौकरी नहीं
करते हैं। यह याद रखकर वात करो!
इसके बाद मिस्टर गांगुली के हक़ में वहाँ खड़े रहना संभव
नहीं था। इतनी बेइज्जती अपनी बेटी से उन्हें मिलेगी, सोचा तक
नहीं था।
पूछा-उसके बाद?
परितोप ने कहा-भाग्य का चक्र किसका किधर घूम जायेगा
यह स्वयं भगवान भी शायद नहीं वतला सकता।
मिस्टर गांगुली घर आये। पत्नी विछौने पर सोयी थी। पूछा
-क्या हुआ ? बूला के साथ भेंट हुई ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-भेंट नहीं होती तो शायद अच्छा
था।
मिसेज़ गांगुली ने कहा--क्यों ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-हमारी वेटी ने अपमान कर भगा
दिया।
---इराका मतलब?
मिन्टर गांगुली ने बतलाया-वह तुमको और क्या कहेगी !
64 / विवाहिता
--
जीवन में मेरा किसी ने ऐसा अपमान नहीं किया। मैंने निश्चय
किया है, अब मैं उसका मुँह नहीं देखूगा।
-मेरी बीमारी की वात तुमने कही थी ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-कहा था। किन्तु अपने उत्तर में
उसने क्या कहा जानती हो ? कहा, जिस दिन मैं चूला के पति
- को दामाद के रूप में मान लूंगा उसी दिन वह आयेगी, उसके पहल
नहीं । तो उसी लोफ़र को मैं दामाद मान लूं, क्या यही कहना
चाहती हो?
मिसेज़ गांगुली ने कहा-हाँ वह तो है ही। वह तो एक लोडर
से भी नीच है । एक मोटर-मिस्त्री को छोड़कर और है क्या ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-तुम्हीं बोलो ! मन या कुछ
ग़लत कहा है?
मिसेज़ गांगुली ने कहा-मैं होती तो भी यही कहती।
मिस्टर गांगुली ने कहा-जो हो, वूला की बात भूल जाओ
सोच लो कि वह मर गयी!
मिसेज गांगुली के मुंह से कुछ नहीं निकला।
आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे।
मिस्टर गांगुली ने अपने रूमाल से उनकी
।
maarners
डाली।
मिसेज़ गांगुली ने कहा-उसकी हालत ले -:
मिस्टर गांगुली ने कहा-गम-राम, बन
है, जिसको बस्ती का घर कहना ही ठीक होगा
और दो बिना हैडिन्द्र की कुसियाँ । नका,
होता है, घर में बिजली की लाइन भी नहीं है।
मिसेज़ गांगुली ने कहा-मी हालत में :
कैसे रह पा रहा है तो अपने यहाँ
ही नहीं पाती की मात्र
? नौकर-चाकर हैं ? मिस्टर गांगुली ने कहा-अरे तुम क्या कह रही हो, उसका कोई ठीक है ! सुना, वह एक लफंगा है। वह तुम्हारी वेटी को कैले आराम से रख पायेगा? -वैसे वह छोकरा देखने में कैसा है ? मिस्टर गांगुली ने कहा-वह छोकरा घर में मिलता तव न' देख पाता! वह तो सुबह सात बजे ही कारखाने में मिस्त्री का काम करने को निकल पड़ता है। -~ -और बूला -वह हाईकोर्ट में प्रेक्टिस करती है, कहा तो है। -प्रेक्टिस कैसी कर रही है ? मिस्टर गांगुली ने कहा-खाक-खाक, मैं जानता नहीं क्या नये एडवोकेटों के प्रेक्टिस की बात ! आधे वक़्त तो ट्राम-बस का भाड़ा जुटना भी सुलभ नहीं तो पाता। -~-तुमको कुछ खाने को नहीं दिया ? -खाने को देगी? और देने पर भी उसके पैसे को मैं खाता? मेरा इतना अधःपतन हुआ है क्या कि मैं उस लोफ़र के पैसों का खाता ? तुम बोल क्या रही हो? मिसेज़ गांगुली ने कहा-खाना न खाना तो दूर की बात है । किंतु उसको तो ऑफ़र करना उचित था, तुम इतने दिनों बाद; गये थे ! मिस्टर गांगुली ने कहा-मैं उसके घर गया यही उसके लिए महा सौभाग्य मानने की बात थी ! मैं कह आया हूँ, कि सब दिन किसी के एक-से नहीं होते, एक दिन उसे मेरे सामने हाथ पसारना ही होगा। -इम पर उसने क्या कहा ? मिस्टर गांगुली ने कहा-कहा कि मेरा भी समय एक-सा 66 / विवाहिता नहीं वीतेगा। और कहा, आई० सी० एस० होने का मुझे बड़ा वमंड है। वे मेरे अंडर चाकरी नहीं करते हैं जो मैं कहता हूँ उन्हें मानना पड़ेगा! मिसेज़ गांगुली सुनकर हतप्रभ रह गयीं। कहा-इसका मतलव उसने तुम्हारा अपमान किया है, वोलो ! अपमान ही तो किया। इसीलिए तो मैं और कुछ सुनने के पहले ही वहाँ एक मिनट भी खड़ा नहीं रहा, चला आया। मिसेज़ गांगुली ने कहा-ठीक किया। मैं अगर होती तो उसकी जूते से पिटाई कर डालती । मेरा शरीर ख़राव है, इसलिए जा नहीं पायी । अन्यथा गुस्से में मैं क्या नहीं करती, कहा नहीं जा सकता। मिस्टर गांगुली ने कहा-छोड़ो। वे सव वातें लेकर मगज- पच्ची मत करो तुम, मैं भी नहीं सोचूंगा। सोचने से झूठ-मूठ में तुम्हारा ब्लड प्रेशर बढ़ जायेगा। इससे अच्छा है, यह सोच लो कि हमारे वेटी-जवाई नहीं है । मिसेज़ गांगुली और क्या कहें, चुप हो गयीं। किंतु क्या मनुष्य की एक ही समस्या है ? कलकत्ता आने के वाद ही मिस्टर गांगुली कई बलवों के सदस्य बन गये। शुरू-शुरू में मिसेज़ गांगुली को लेकर आते । किंतु पत्नी के बीमार होने के बाद पहले की भाँति नियम से नहीं आ पाते थे। वीच-बीच में अकेले आते और परितोप के साथ वात करने के वाद उठ जाते। कहते-आज अव चलें! परितोष पूछता-मिसेज़ कैसी हैं ? मिस्टर गांगुली गंभीर होकर कहते-ठीक नहीं हैं। रोज़ाना एक ही वात। मिस्टर गांगुली कहते-लमाम जिंदगी नौकरी कर शेप जीवन तिता
हैं
कुछ आराम से गुज़ारेंगे, ऐसा सोचा था, किंतु कोई उपाय नहीं
है। यदि मिसेज़ मर जाये तो मेरी क्या गति होगी, ज़रा कहिये
तो? घर में अकेला कैसे रह पाऊँगा ?
-आप इतना सोचते क्यों हैं ? मिसेज़ तो ठीक भी हो सकती
हैं ?
-डॉक्टर लोग ऐसी आशा नहीं बँधाते।-मिस्टर गांगुली ने
कहा-इसके अलावा अब तो केवल सात सौ रुपये पेंशन पर ही
भरोसा है।
परितोष ने कहा-केवल सात सौ रुपये ?
मिस्टर गांगुली कहते-और एक नया झमेला हो गया। पहले
जो मकान बनवाया था कलकत्ता में, उसका भाड़ा मिलता है
अढ़ाई मौ रुपये । फ़िलहाल जिस मकान में रहता हूँ उसका प्रति-
मास पाच मी रुपये किराया है। जवकि मेरा निजी मकान है,
उसमें घम नहीं सकता। अब उस किरायेदार के साथ केस चल
रहा है। तीन बरस हो गये, अभी तक मामले का कोई फैसला नहीं
हो पा रहा है। वीच में जिस दिन मामले की तारीख पड़ती है,
उन दिन दो सौ रुपये वर्वाद हो जाते हैं।
परितोष ने कहा-वह तो आपका नया मकान है, फिर भाड़े
पर क्यो उठा दिये ?
मिन्टर गागुली ने कहा-उस समय मैं दिल्ली में रहता था।
गोचा. मकान खाली पड़ा रहेगा, भाड़े पर उठा दें । भाड़े पर देने
मे महान वैसे ठीक रहेगा। मकान खाली रहने से भूतों का डेरा
बन जायेगा। आज यदि यही मकान भाड़े पर दूं तो कम-से-कम
एक हजार रुपये भाड़े के आयेंगे।
अ मे मिस्टर गागुली का झंझट और भी बढ़ गया। एक
ओर नितेज गांगुली की बीमारी का व्यय, तो दूसरी तरफ़ मामले
का गर्न। इन पर उन्होंने काफ़ी रुपयों के शेयर खरीद रखे थे।
शेयरों में रुपया लगाने का मक़सद मोटी रकम डिवीडेंट के रूप में पाने का लोभ था। उन तमाम शेयरों की कीमत भी एक ही साथ गिर गयी। बैंक में रुपया रखने से व्याज कम और शेयरों में रकम लगाने से लाभ ज्यादा। अतः शेयरों में उन्होंने ज्यादा रुपये लगाये थे। इतनी दिक्कतें एक साथ आयेंगी, खास तौर पर रिटायर होने के बाद, इसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। आशा थी तो वस यही कि पेंशन के सात सौ रुपये मात्र ! इनसे गृहस्थी की गाड़ी इज़्ज़त के साथ चलायी नहीं जा सकती। उस दिन देखा मिस्टर गांगुली टैक्सी से क्लव आये। पूछा-गाड़ी क्या हुई ? मिस्टर गांगुली ने कहा-गाड़ी बेच दी। -यह क्या ? तव आपका चलेगा कैसे ? मिस्टर गांगुली ने कहा-ड्राइवर तीन सौ रुपये माँगता है, इतने रुपये दूंगा कहाँ से ? और खुद तो ड्राइवरी कर नहीं सकता। और ठीक इसी समय पेट्रोल के दाम भी बढ़ने थे। दस लीटर पेट्रोल ख़रीदा था, सत्तर रुपये नगद देने पड़े। इतने रुपये मैं कहाँ से जुटाऊँगा? मिस्टर गांगुली की हालत देखकर मुझे बड़ी दया आयी। आँखों के सामने एक आदमी को क़दम-क़दम नीचे उतरते सिर्फ़ देखता ही रहा। आई० सी० एस० आदमी। किसी समय कितने लोगों के प्राण-दंड के कर्ता थे। शुरू-शुरू में जव क्लब में आये थे तव भी ठाठ देखा था। सूट पहने तव भी देखा था। वैरों को दोनों हाथों से वख्शीश देते देखा था। उस वक्त भी वे ऐसा भाव दिखाते थे, जैसे अभी भी आई० सी० एस० हों। उसके वाद आदमी का और एक चेहरा देखा। पुराने-पुराने विवाहिता /69 सूट । मामला-मुक़दमा, स्त्री की रुग्णावस्था, गाड़ी वेच देना। और उसके बाद कई दिनों से उनका कोई अता-पता नहीं। । परितोप ने कहा- बहुत दिनों के बाद हठात् एक दिन फिर आये। देखा, उनका चेहरा सूखा-सूखा-सा है । वहुत दुवले हो गये थे। पूछा-ऐसा चेहरा कैसे हो गया? आप कई दिनों नहीं आये कारण क्या है ? बीमार हो गये थे क्या ? मिस्टर गांगुली ने कहा-मेरी पत्नी का देहांत हो गया। --आखिर क्या हो गया था ? मिस्टर गांगुली ने कहा-हार्ट तो आगे खराव था ही, इस वार हात् हार्ट-स्ट्रोक हुआ। एक दिन सुवह देखा अभी भी सो रही है। सोचा, नींद में है, सोने दो। घड़ी में सात वजे, आठ बजे, नौ वजने को हुए, जगा-जगू कर दवा तो दे दें। शरीर को छुते ही पता चला, वदन ठंडा हो चुका है एकदम । तभी डॉक्टर को बुलाया, किंतु ऐसी हालत में डॉक्टर बेचारे भी क्या कर सकते हैं। उसके काफ़ी पहले ही वह मर चुकी थी। पूछा-लड़की को सूचना दी थी ? -~खवर तो दी थी, किंतु लड़की आयी नहीं। मिस्टर गांगुली ने बतलाया। -उसके बाद? --उमके बाद क्या ? मिस्टर गांगुली बोले-लोगों को बुला- कर उमगान ले जाया गया। सती लक्ष्मी चली गयी। अंत तक अपनी टी उमकी दुश्मन बनी रही। दरअसल यह कहा जा सकता कि लड़की के कारण ही उसकी गौत हुई। जिस दिन दिल्ली का मकान छोड़कर लड़की चली गयी, उस दिन मे ही उसका हार्ट खराब हो गया था। मेरा सव गणित फेल हो गया। मैंने उन्हें सांत्वना देकर खूब समझाया। कहा-जिसका जो 70/ विवाहिता । - ।
भाग्य है, उसको कोई रोक सकता है ? लड़की की जगह अगर लड़का होता तो भी शायद एक-सी ही वात होती। मिस्टर गांगुली ने कहा-इसीलिए तो अव मैं भाग्यवाद का विश्वासी हो गया हूँ। पहले उसका यक़ीन नहीं था। उस वक्त सोचा करता था, जिंदगी जैसे चलती है, चलती रहेगी। यह कितनी बड़ी भूल थी, स्त्री की मृत्यु के बाद जिस क़दर समझा उसके आगे कभी न समझ पाया। मैं ब्रिटिश के ज़माने का आई० सी० एस० हूँ। उस युग में और आज के युग में कितना अंतर है, मुझे जिन्होंने पहले देखा है, और आज देख रहे हैं वे इसे समझ सकते हैं। कौन कह सकता है कि एक दिन मैंने 'मानव-सुंदरी' उपन्यास लिखकर कितना नाम कमाया था। उन दिनों मेरे साथ सिर्फ एक बार वात कर पाने से कितने आदमी धन्य हो जाते थे, यह मुझे अभी भी याद है । मैंने कितने लेखकों को उस समय कितने ही सम्मेलनों का सभापति बना दिया था, यह आज उन्हें याद नहीं । मैं उन्हें सभापति बना दूं, इसके लिए उन्होंने कितनी खुशामदें की थीं, यह मुझे सव याद है। आज हालत यह है कि भेंट होने पर वे मुझसे वात तक नहीं करते। मैंने कहा-यही तो नियम है। मिस्टर गांगुली ने कहा-आप कल्पना कर सकते हैं, अव मैं टैक्सी पर चढ़ता हूँ। और मेरी लड़की के अव दो गाड़ियाँ हैं । एक पर मेरा वही लोफ़र दामाद चढ़ता है, और एक पर मेरी लड़की ! मैं चकित रह गया। पूछा-दो गाड़ी कैसे हो गयीं ? मिस्टर गांगुली ने कहा-अव तो प्रेक्टिस करके लड़की ने खूब पैसा कमा लिया। सदर्न एवेन्यू पर एक तीन-तल्ला मकान खड़ा कर लिया है शर्वरी ने। -किंतु यह सब हो कैसे गया ? मिस्टर गांगुली ने कहा-मेरे दामाद ने एक मोटर वर्कशॉप विवाहिता/71
?
बनाया है। उसके कारखाने में अव क़रीबन चालीस आदमी काम
करते हैं।
-आपको यह सव मालूम कैसे हुआ ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-मैं श्राद्ध के पहले लड़की को कहने
के लिए गया जो था।
-श्राद्ध पर लड़की आयी थी?
-आये इसके लिए समय कहाँ ? दिन-रात क्लाइंटों में
व्यस्त। उसके क्लाइंट ही उसे नहीं आने देते। यहाँ तक कि उसी
आवारा लोफ़र जवाई ने, जिसे मैंने कभी आदमी ही नहीं समझा,
सुना है, उसने भी लास्ट ईयर में इनकम टैक्स का डेढ़ लाख
रुपया जमा किया है।
वात करते-करते परितोप रुक गया। कहा-उसके वाद ?
परितोप ने कहा-जाने के समय बैरे ने एक टैक्सी बुला दी।
उस पर चढ़कर वे घर चले गये। क्रमशः मिस्टर गांगुली का क्लव
में आना कम हो गया। उसके बाद कई दिनों तक उनके साथ
भेंट नहीं हुई।
संभवतः मिसेज़ गांगुली की मृत्यु के बाद से उनका दिल टूट
गया था। उस पर उम्र भी तो हो गयी। घर बैठे-बैठे ही शायद
वक्त काट रहे हैं। एक दिन सभी की उम्र बढ़ेगी, बुढ़ापा आयेगा।
तद सभी का बाहर निकलना कम हो जायेगा। यही नियम है।
पहले क्लब में कितने आदमी आते थे। उसके बाद उन्होंने धीरे-
धीरे आना बंद कर दिया। उनकी बात सभी
भूल गये हैं। इनने
दिनों ने यही देखता आ रहा हूँ। किंतु मिस्टर गांगुली ने इस नियम
को नोड़ा। वहीं घटना बता रहा हूँ।
उन दिन भी मैं दूसरे लोगों के साथ क्लब में बैठा वात कर रहा
72 / विवाहिता
-
था। हठात् देखा कि एक विलायती गाड़ी आकर रुक गयी है।
लगता था कि नयी ख़रीदी इंपोर्टेड कार है। यह गाड़ी क्लव में
पहले कभी नहीं आयी थी। ड्राइवर ने उतरकर पीछे का दरवाज़ा
ज्यों ही खोला कि मिस्टर गांगुली नीचे उतरकर आये।
इस ढंग की गाड़ी में मिस्टर गांगुली को देखकर मैं चकित रह
गया। उनका चेहरा बदल गया था। गैडिन का नया सूट पहन
रखा था।
उन्हें देखते ही मैं आगे बढ़ गया । कहा-क्या हुआ था, इतने
दिनों जो आप नहीं आये ?
--अव पहले की तरह समय नहीं मिल पाता है।
मैंने कहा-इतने व्यस्त किसमें हैं ?
सारा दिन दौहित्री के साथ कट जाता है।
-दौहित्री?
मिस्टर गांगुली ने कहा-हाँ, खूव सुंदर, चंचल एक वच्ची हुई
है बूला के। उसके नामकरण के लिए बूला ने मुझसे कहा था।
मेरा दिया हुआ नाम वूला को खूब अच्छा लगा। विजन को भी
नाम पसंद आया।
पूछा- क्या नाम रखा है
मिस्टर गांगुली ने कहा-वल्लरी। अच्छा नाम नहीं है ?
कहा-वाह, क्या सुंदर नाम दिया है आपने। मालूम होता
है, आप बंगला भाषा में भी प्रवीण हैं !
मिस्टर गांगुली बहुत प्रसन्न हुए। बोले-बूला के नाम का
प्रथम अक्षर 'वी' है और विजन के नाम का प्रथम अक्षर भी 'वी'
ही है- ऐसा नाम किसी का नहीं है।
पूछा-~-यह गाड़ी किसकी है ?
मिस्टर गांगुली ने कहा-लड़की की है। आज तो कोर्ट की
छट्टी है । अतः वूला ने कहा, पिताजी आप मेरी गाड़ी से ही क्लब
विवाहिता
जाय। मैंने पूछा--आप क्या अव लड़की के साथ ही रहते हैं ? मिस्टर गांगुली ने कहा-हाँ, और क्या करता, वोलिये ? लड़की खुद आकर मुझे अपने घर ले गयी। दामाद ने भी कहा, पिताजी, आप अकेले-अकेले इस मकान में कैसे रह पायेंगे? हमारे मकान में बहुत कमरे हैं। आप वहीं चलकर रहिये। वे दोनों ही मेरा खूब आदर करते हैं, जानते हैं ? पूछा-आपके उस किरायेदार वाला केस क्या हुआ ? मिस्टर गांगुली ने कहा-वह अनंतकाल तक चलता रहेगा। चलेगा। भई, मेरी बेटी तो खुद ही वकील है, उसी ने उस मामले का भार ले रखा है। किंतु मेरा उस मकान पर अब कोई लोभ नहीं रहा। कारण, अपनी स्त्री के लिए ही उस मकान को मैंने बनवाया था। वह औरत ही जब चली गयी तो मुक़दमा ही किस- लिए और मकान भी किसके काम आयेगा? उस मकान का मालिकाना यदि मेरे हाथों लौट भी आये तो भी उस मकान को लेकर मैं करूँगा ही क्या? उसमें तो किरायेदार ही न फिर रखने होंगे ! पूछा-वे किरायेदार क्या कह रहे हैं ? मिस्टर गांगुली ने कहा--किरायेदार और क्या बोलेंगे? उन्होंने जुद अपनी एक बड़ी इमारत खड़ी कर डाली है। उसको ऊँचे भाड़े पर उठाकर खुद सस्ते भाड़े पर रह रहे हैं। उस मकान का मानला आखिर तक सुप्रीम कोर्ट तक जायेगा। मेरी लड़की ऐना ही बोल रही थी। इसी बीच वकील, मुहरिर, पेशकार सभी मोटी घूम खा रहे हैं उसमे। उसके बाद कुछ हँसकर बोले-इस बार जिस काम से आया हैबही कहता हूँ। मैंने कहा-कहिये! 74 , विवाहिता
मिस्टर गांगुली ने कहा-आने वाले रविवार को मेरी
दौहित्री वल्लरी का अन्नप्राशन है, आपको किंतु कृपाकर एक वार
अपने पाँव की धूल देनी होगी। इस कार्ड पर ठिकाना लिखा हुआ
है। यह देखिये-कहकर एक छपा हुआ कार्ड मेरे हाथ में दे दिया।
देखा, कार्ड पर सदर्न एवेन्यू का पता लिखा हुआ था।
मैंने कहा-निश्चय ही आऊँगा, आप कुछ विचार न
कीजियेगा।
मिस्टर गांगुली ने कहा-थोड़ा जल्दी ही आइयेगा, वातें
होंगी!
रविवार के दिन मिस्टर गांगुली की लड़की के मकान पर जा
पहुंचा।
जाते ही देखा एक बड़ा तीन-तल्ले का मकान। चारों ओर
प्रकाश-ही-प्रकाश। सारी इमारत को घेरकर लाल-नीले छोटे
वल्ब जल-वुझ रहे हैं। मकान के सामने लान । प्रायः दो हज़ार
आदमियों की भीड़। वर्दीधारी खानसामे सिगरेट और कोल्डड्रिंक
की ट्रे लिए चारों ओर घूम-फिर रहे हैं।
मुझे देखकर मिस्टर गांगुली आगे बढ़कर आये।
-इतने आदमियों को निमंत्रण दिया है ? मैंने पूछा।
मिस्टर गांगुली ने कहा-सव मेरे दामाद की फैक्ट्री के
आदमी हैं और दोस्त हैं। दामाद के ऑटोमोवाइल वर्स में क्या
कम आदमी काम करते हैं। और मेरी लड़की के एडवोकेट,
वैरिस्टर और जज-मैजिट्रेस्ट तक सभी हाज़िर हुए हैं।
उसके बाद कहा-चलिये, मेरी दौहित्री वल्लरी को देखेंगे ?
चलिये!
मुझे भीतर ले गये। मकान के अंदर महिलाओं का जमावड़ा
था। वहाँ एक कमरे में मिस्टर गांगुली की वूला अपनी लड़की को
विवाहिता/75
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? थीं उन्होंने। कितना डर गये थे, लड़की के भविष्य की बातें सोचकर। उस दिन मिस्टर गोविंद सक्सेना आई० ए० एस० के साथ उनकी लड़की की शादी अगर सचमुच हो गयी होती तो क्या इतना बड़ा मकान बन पाता? दरअसल मिस्टर गांगुली के सामने प्रेम-बेम सवतुच्छ है, उनके सामने एकमात्र असली चीज़ है पैसा। आज मिस्टर गांगुली की यह जो हँसी-खुशी है, वह सव बेटी- जवाई की दौलत की वजह से ही है। दौहित्री यदि काली-कलूटी अथवा वदसूरत भी होती तो भी हो सकता है, इतनी ही सुंदर लगती; इतना ही प्यार करते ! कारण वही कि वेटी-जंवाई के रुपये। परितोष ने कहानी का अंत करके कहा-तुम अगर भाई इन मिस्टर गांगुली को लेकर यदि कभी भी उपन्यास लिखो तो उस उपन्यास का नाम देना 'अतीत-वर्तमान-भविष्य'। मैं उसकी बात समझ नहीं पाया। पूछा-क्यों ? परितोष ने कहा--मिस्टर गांगुली हुए अतीत, और लड़की शर्वरी हुई वर्तमान और वही दौहित्री वल्लरी हुई भविष्य । पुनः एक दिन ऐसा आयेगा जिस दिन लड़की शर्वरी हो जायेगी अतीत और वही दौहित्री वल्लरी होगी वर्तमान, और एक जो पैदा होगा वही बन जायेगा भविष्य। इसी अतीत, वर्तमान और भविष्य के चक्र में पृथ्वी अनादिकाल से घूमती आ रही है और चिरकाल तक घूमती रहेगी। यही पृथ्वी के घूमने का चक्र है, रहस्य है। " इतनी देर तक आपने विवाहिता शर्वरी की कहानी सुनी। अव सुनिये और एक लड़की की कहानी। इसका नाम कुम- कुम है। कुमकुम शर्वरी की तरह विवाहिता होने वाली नहीं, अविवाहिता है। किंतु वह अविवाहिता क्यों है, यह आप सारी कहानी पढ़ने पर ही समझ पायेंगे। किंतु यदि उसकी शादी होती तो संभवत: वह एक दिन अच्छी गृहिणी हो पाती, प्रेममयी स्त्री हो पाती अथवा परम स्नेहमयी माँ। किंतु विधि की विडंवना। कुछ भी तो वह नहीं हो पायी। क्यों उमे ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, पूरी कहानी पढ़ने पर ही तो जान पायेंगे। अखबारों में आप एक विशेप विज्ञापन बीच-बीच में देखते होंगे । विज्ञापन ऐसा होगा : "कुमकुम, तुम कहाँ हो मालूम नहीं। तुम पर मैंने घोर अन्याय किया है। तुम लौट आओ अथवा मेरे ठिकाने पर पत्र लिखो। मैं अपने तनाम अन्याय का प्रायश्चित करना चाहता हूँ। तुम्हारी खातिर मैं इंतजार में बैठा हूँ। इति-मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन । इसके नीचे एक पना लिखा होता था। कभी कलकत्ते का टिकाना, कभी वंबई का पता और कभी वनारस का ठिकाना। 'आनंद बाजार पत्रिका' में इस विज्ञापन को अनेकों ने देखा 73 | विवाहिता है। यही विज्ञापन भारतवर्ष की सभी पत्र-पत्रिकाओं में छपा है। कभी वंगला भाषा में, कभी गुजराती, कभी हिंदी तो कभी-कभी अंग्रेज़ी भाषा में भी। भारत में जितनी पत्र-पत्रिकाएँ निकलती हैं उन सभी में यही विज्ञापन निकला है। मेरी तरह कइयों ने इस विज्ञापन को देखा है। देखकर अवाक् हो गये। कौन कुमकुम ? और यह मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन कौन है, जिसे कोई नहीं जानता। और किस वजह से ऐसा विज्ञापन, यह भी कोई नहीं बता पाता। इसके अलावा एक मुसलमान के साथ एक हिंदू के ऐसे संबंध के वारे में भी हम नहीं जान पाते थे। फिर भी विज्ञापन जव वार-बार निकलता तव कल्पना कर लेते थे कि इन दोनों की अभी भी भेंट नहीं हुई है। इस विज्ञापन के पीछे कारण क्या था, उसका अनुमान भी हम नहीं लगा पाते थे। कहानी की सूचना यहीं से है। वाहर के आदमियों के लिए इतना ही कौतूहल पैदा कर देता। इस वार वनारस के जिस होटल में रुका, वहीं मामले की हदीस मिली। होटल में बहुत आदमी तरह-तरह के खयालों से मिलने को आते थे। विभिन्न विषयों पर वातें होती। होटल के समीप ही केशव शर्मा रहते थे। अतः मेरे पान जब- तव आते रहते थे। केशव शर्मा ऐसे आदमी नहीं थे कि एक झटके में ही सभी उन्हें पहचान जायें। नागरी प्रचारिणी सभा की संपादक-मंडली के कर्ताधर्ता थे। बड़े-बड़े विश्वकोश जो हिंदी भाषा में बारह खंडों में निकल चुके हैं, उनका प्रायः संपूर्ण कार्य अकेले केशव शर्मा ने ही किया था। एक ओर अंग्नेज़ी एवं हिंदी दोनों विषयों में ही एम० ए० एवं डॉक्टरेट । केशव शर्मा ने एक दिन आते ही बतलाया-आपके पास कल एक सज्जन को लाऊँगा। देखियेगा वे एक अद्भुत सज्जन हैं। विवाह
ऐसा आदमी आपने जीवन में देखा नहीं होगा।
-इसके माने ?
केशव शर्मा ने कहा-उनके आते ही मेरी वात समझ जायेंगे।
उसके पहले मैं कुछ बोलूंगा नहीं।
जीवन में अनेक अद्भुत सज्जनों को देखा है, इस वार और न
सही भोर एक अद्भुत सज्जन को देख लूंगा।
केशव शर्मा ने कहा-मैं हलफ़ लेकर कह सकता हूँ कि इस
तरह के किसी अद्भुत महाशय से आपका पाला पड़ा ही नहीं है।
मेरा कौतूहल और भी बढ़ गया।
मैंने कहा-ठीक है, तो ले आइयेगा। और नहीं तो मैं खुद ही
उनके पास जाऊँगा। मेरे यहाँ तो कोई काम है नहीं। उनके काम
का हर्जा हो, यह मैं नहीं चाहता।
केशव शर्मा ने कहा-नहीं, उनका कोई काम नहीं है । वे कुछ
भी नहीं करते।
जो कोई काम नहीं करते उनके पास पैतृक धन ज़रूर
होगा कुछ। अथवा उत्तराधिकार में उन्हें प्रचुर रुपया मिला
होगा।
केशव शर्मा ने कहा--कभी वे एक एडवोकेट थे। उस वक्त
काफ़ी रुपये कमाये उन्होंने।
-और अब?
-~-अब वकालत नहीं करते हैं।
-~-क्यों, उम्र काफ़ी होगी मालूम होता है ।
केशव शर्मा ने कहा-नहीं, उम्र का जहाँ तक संबंध है, यही
कोई बयालीम-तितालीस होगी ज्यादा-से-ज्यादा।
--उनके परिवार में और कौन-कौन है ?
काव शर्मा ने बतलाया-पत्नी है और है एक लड़की।
लड़की की शादी हो गयी है। और नहीं है संसार में। वे ज्यादातर
"/विवाहिता
-
।
समय वनारस के बाहर ही बिताते थे।
-क्यों?
केशव शर्मा ने कहा-यही तो कहानी है। आप उनके साथ
भेंट करने पर कहानी का प्लाट भी पा सकते हैं।
मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन क्यों बाहर घूमते-फिरते रहते हैं
उसका भी एक कारण है, नहीं तो उनको लेकर कहानी कैसे
बनती। जो गाड़ी सीधे रास्ते चलती है, अपनी मंजिल पर पहुँचती
है वह कथा की विषयवस्तु नहीं बन सकती।
केशव शर्मा की कहानी सुनकर मैंने कहा-एक दिन उन्हें
लाइये ना अपने यहाँ, अथवा मैं ही चले चलूँगा उनके पास।
केशव शर्मा ने कहा-उनको मैं आपके पास लेता आऊँगा।
कल ही उन्हें देखा है, काफ़ी दिनों के बाद वनारस में लौटने पर।
-ठीक है, यही तय रहा।
दूसरे दिन मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन का इंतज़ार कर रहा था।
किंतु काफ़ी प्रतीक्षा करने के बाद भी वे नहीं आये। केशव शर्मा
भी काफ़ी देरी से आये।
कहा-नहीं सर, भेंट नहीं हुई।
-क्यों?
केशव शर्मा ने कहा-वे आज सुवह ही वनारस से चले गये।
पूछा-कहाँ गये हैं ?
केशव शर्मा ने कहा-यह कोई वतला नहीं सकता। किसी के
बाप की यह सामर्थ्य नहीं है जो यह वतला सके कि वे कहाँ गये
itics
हैं।
--जो आदमी सारा जीवन घूमने में विताता है-उसका
संसार चलता कैसे है ?
केशव शर्मा ने कहा-खुद तो कुछ करते नहीं हैं।
-~-उनके घर में कौन है ?
विवाहिता/
-वही एक स्त्री। लड़की की शादी होने के बाद और कोई खर्च नहीं है उनका । जव वनारस आते हैं । खवर पाने पर हम दो- एक दोस्त उनके साथ भेंट कर लेते हैं। इसके बाद मैंने प्रश्न किया-रुपया उनके पास कहाँ से आता the केशव शर्मा ने कहा-वे तो ज़मींदार आदमी हैं। इतने दिनों काफ़ी ज़मीन-जायदाद रही। ज़मींदारी जब उठा ली गयी, तव काफ़ी रुपये पाये, और काफ़ी ज़मीन भी बचा लिए। केशव शर्मा से ही कहानी सुनी थी। अद्भुत आदमी हैं ये मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन । एम० ए०, बी-एल०। किसी समय प्रसिद्ध वकील मिस्टर मुल्ला के जूनियर थे ये । मिस्टर मुल्ला उस समय जज नहीं हुए थे। उस वक़्त मिस्टर मुल्ला खूव मदद करते। शफ़ीकुल हुसैन साहब के वे दिन चले गये। रुपया कमाने के लिए नहीं, एक गणमान्य व्यक्ति की हैसियत से समाज में प्रसिद्धि पाने का ही उनका मक़सद था। हुसैन साहव जानते थे कि दुनिया में प्रचुर रुपया होने से ही कोई सम्मान अथवा इज्जत प्राप्त नहीं की जा सकती। इज़्ज़त ही असली चीज़ है जीवन में। इज़्ज़त मिलने से मनुप्य की सभी उपलब्धियाँ सार्थक हो जाती हैं। हर रोज़ सुवह नींद से उठने के बाद काम करने के लिए तैयार हो जाते शफ़ीकुल हुसैन । मुक़दमे के काग़ज़-पत्र देखना-पढ़ना शुरू कर देते थे। इस एकाग्रता से पढ़ते मानो उस मुक़दमे की सफलता के साथ उनका खाना-पीना जुड़ा हुआ हो। अधिकांशत: लोग जीवन में तरक्की के लिए काम करते हैं । जीवन में उन्नति करने का एकमात्र अर्थ है, उपार्जन ज्यादा करना । जो आदमी पर्याप्त पैसा नहीं कमा पाता उसे लोगअनफल कहते हैं। लोग उसकी उपेक्षा कर आगे बढ़ जाते हैं, उसे आदमी ही नहीं मानते। पैतृक धन पाकर जो आदमी बड़ा होता है उसकी समाज में ज्यादा इज़्ज़त नहीं होती। कारण, वह पैसा जन्मसूत्र से प्राप्त हुआ है। किंतु जो आदमी अपनी विधा-बुद्धि- हिम्मत के साथ धन पैदा करता है और काफी धन का मालिक वन जाता है, उसकी इज़्ज़त अलग! शफ़ीकुल हुसैन साहब की खुद की घोड़ा-गाड़ी थी। आगे- पीछे कोचवान और सईस रहते थे। वे वर्दी पहनते, उसी के रंग में रंग मिलाती सिर पर पगड़ी वाँधते थे। जब वे घर से बाहर निकलते तो एक देखने लायक दृश्य होता। सभी दाँतों तले अंगुली दवाकर उस नजारे को देखते रह जाते ! सभी जानते थे वंशानु- क्रम के इस बड़े आदमी को । उनकी इस विलासिता से वे ईर्ष्या नहीं करते थे, बल्कि क्षमा करते थे ! उन्हें मानते भी खूब थे ! उनके बारे में सभी कहते-ये हुसैन साहव कोर्ट जा रहे हैं ! मुल्ला साहव का तव तक इतना नाम नहीं हुआ था। किंतु उनकी भी उम्र हो गयी थी, काफ़ी दौलत के मालिक भी बन गये थे। आखिरी दिनों में जिस-तिस की बीफ वे नहीं लेते थे। तनिक छोटी होने पर बीफ को अपने शिप्य शफ़ीकुल हुसैन साहब को दे देते। कहते-यह केस तुम करो! हुसैन साहब भी मिस्टर मुल्ला के द्वारा दिये गये केस ले लेते। रुपया कमाने की नज़र से नहीं, केवल सीनियर की वात डने की खातिर ! सब मामले उन्हें पसंद होते ऐसी बात नहीं, किंतु सीनियर का हुक्म, नहीं मानने का मतलब मीनियन का अपनान करना होता। सीनियर और जूनियर में गुरु-शिष्य जैसा संबंध ! सीनियर मुल्ला की तरह जब उम्र बढ़ने लगी तो उन्होंने फीस भी बनाना शुरू कर दिया। एसा नहीं होने के नर्वाचन मात्र विवाहिता हो जाती है। मामले के बारे में सोचते-सोचते रात की नींद गायव हो जाती है, सांसारिक शांति नहीं मिलती। रुपया एक ज़रूरी चीज़ है, किंतु ज़रूरत से ज्यादा रुपया अनीति पैदा करता है। तब वैरिस्टर पत्नी के पास वक्त नहीं काटते, बुरे विचार दिमाग पर कब्जा कर लेते हैं। वहुतों को औरतों का नशा हो जाता है। वैरिस्टर मुल्ला एक चिंतनशील व्यक्ति थे। वे हुसैन साहब को कहा करते थे--तुम लोगों की उम्र अभी कम है, तुम लोग विना थके काम करते जाओ। भले-बुरे के बारे में सोचो मत । तुम लोगों की उम्र में मैंने भी यही किया हैं। जब उम्र बढ़े तव काट-छाँट करके देखना-किस केस को लोगे अथवा किसको नहीं । फ़िलहाल सिर्फ़ मेहनत और मेहनत । तुम्हारे बच्चे कितने हैं ? हुसैन साहव कहते--मात्र एक लड़की है। मिस्टर मुल्ला कहते-वह एक ही काफ़ी है। उस एक से ज्यादा होने का मतलब ही दुनिया भर का झंझट । उस वक्त अपने पेशे में पूरा मन नहीं लगा पाओगे। तुम्हारी स्त्री उस संतान को लेकर व्यस्त रहे और तुम अपना पूरा वक्त दो अपने पेशे को। और कहते-जीवन आराम के लिए नहीं है। अविराम संघर्ष करना ही मनुप्य को वदा है। कार्ल मावर्स को एक दफ़ा पूछा गया सुख क्या है ? ह्वाट इज हैपीनेस ? उन्होंने क्या जवाव दिया था, जानते हो ? कहा- स्ट्रगल । और हमारे एक भारतीय कवि टैगोर ने कहा था-तुमार काछे आराम चेये पेलाम शुधू लज्जा, एवार सकल अंग घिरे पराओ रणसज्जा। इससे बढ़कर सत्य और कुछ नहीं है। इस स्ट्रगल के दौरान ही सुख को खोजकर निकालना होगा। जो आराम करता है उसका भाग्य भी आराम करता जो चलता-फिरता रहता है, आगे बढ़ता है उसका भाग्य भी साथ- माथ चलता है। मिस्टर मुल्ला समय और फुर्सत मिलने पर ही शफ़ीकुल हुसैन 8./ विवाहिता
को ये बातें सुनाते थे। हालांकि, इस प्रकार का मौक़ा उन्हें ज्यादा
नहीं मिलता था। उन्होंने जो सीखा-जाना, पढ़ा, वही वतलाते थे
शफ़ीकुल साहब को । और शफ़ीकुल को भी सुनना अच्छा लगता।
मुल्ला साहब भी अपनी बातों को जी-जान से मानते थे। इसीलिए
वकालत करते-करते जव थक गये तो स्वास्थ्य की खातिर उन्होंने
परिश्रम को कम कर दिया। वे खुद ज्यादा केस नहीं लेते थे,
जूनियर शफ़ीकुल साहब को देने लग गये।
दूसरी ओर शफ़ीकुल की मेहनत बढ़ गयी। सुबह से रात दो बजे
तक लगातार मेहनत करने लगे वे। धन तो पहले से था ही, अव
और पहाड़ की तरह जमने लगा। आराम वे करते नहीं। मुल्ला
साहब ने उन्हें यही परामर्श दिया था।
हुसैन साहब की पत्नी बड़ी निरीह महिला।
पूछती-तुम सोओगे नहीं ?
हुसैन साहब होश में आते।
कहते-मेरा सोने का समय नहीं है, तुम मुझे अभी सोने को
कह रही हो?
-किंतु रात के दो वज चुके हैं घड़ी में !
शफ़ीकुल साहब आँख उठाकर घड़ी को देखते । देखा-नत्र
ही तो रात के दो बज चुके हैं।
कहा- मुझे भान भी नहीं हो पाया कि रात के दो बज के
हैं।
उसके बाद ज़रा रुककर कहते-तो तुम रात जगकर क्यों
तकलीफ़ पा रही हो । तुम तो सो सकती थी !
वेगम साहिवा ने कहा-सोई हुई तो थी हो. अचानक नोद
टूटने पर देखा कि तुम्हारे कमरे में रोशनी हो रही है। इसीलिए
तुम्हें बुलाने आ गयी। इतनी रात जगने पर शरीर खराब हो
जायेगा न । कल सुवह उठते-उठते फिर मुवक्किलो की भीड़ जुट
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सकें। सभी, जव कोई किसी को पूछे कि ब्रीफ किसको दिये हो ? जवाव में, कोई यदि कहे-हुसैन साहव को, तभी लोग समझें कि काविल आदमी को ही ब्रीफ दी गयी है। दुनिया में आदमी क्या चाहता है ? रुपया? किंतु जिसके पास काफ़ी रुपया है वह क्या चाहता है ? रवीन्द्रनाथ ने कहा है, उस प्राप्ति में मनुष्य को चरम आनंद मिलता है जिस प्राप्ति के दौरान कुछ अप्राप्ति जुड़ी हुई रहती है। अर्थात परमार्थ! जिसे रुपया चाहिए, वह व्यक्ति रुपया मिलने पर कृतार्थ हो जाता है। जिसे भूख लगी है, वह व्यक्ति भोजन मिलते ही कृतार्थ हो जाता है ! किंतु संसार में ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें सव-कुछ प्राप्त हो जाने पर भी ऐसा लगता है जैसे उन्हें कुछ मिलना बाक़ी रह ही गया है ! मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन भी उसी कोटि के व्यक्ति हैं। इसी- लिए मिस्टर मुल्ला के जूनियर होकर काफ़ी मामलों में जीतने पर भी उन्हें पूरा संतोष नहीं होता। वे चाहते कि उनके पास और मामले आयें और वे उन सभी में विजय लाभ करें। पराजय की वात तो उन्होंने कभी कल्पना में भी न सोची थी। जीत का तो उन्हें जैसे नशा है । मिस्टर मुल्ला कहा करते थे-आने वाले दिनों में तुम खूब वड़े वकील होओगे मिस्टर हुसैन, यदि इसी तरह निरलस-भाव से काम करते रहोगे तो। हुसैन साहब का जवाब होता-अभी भी मैं दिन में वाईस- तेईस घंटा खटता हूँ सर, और कितना काम करूँ ? मिस्टर मुल्ला बोलते-नहीं-नहीं, इतना काफ़ी है ! अपने विवाहित
स्वास्थ्य की रक्षा करते हुए काम करो।
हुसैन साहव कहते-~यही तो खटने की उम्र है हमारी । आप
तो हमारी उम्र में काफ़ी खटे हैं !
मिस्टर मुल्ला कहते-खटे तो हैं। खटे हैं, इसीलिए तो मेरा
स्वास्थ्य चौपट हो गया। मैंने अब निज में बीफ लेना कम कर
दिया है।
?
कहानी कहते-कहते केशव शर्मा रुक गये।
मैंने पूछा-उसके वाद ? उसके बाद क्या हुआ
-उसके बाद एक कांड हुआ। मिस्टर मुल्ला के पास एक
अद्भुत केस आया। एक बलात्कार का केस ।
इस प्रकार के केस मिस्टर मुल्ला साधारणतः नहीं लेते थे।
प्रथमतः विवेक की मजबूरी थी, उसके ऊपर अन्याय को प्रश्रय
देना होता!
मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन साहब की पुकार हुई ।
हुसैन साहब ने आकर पूछा-क्या सर? आपने मुझे बुलाया
था?
मिस्टर मुल्ला ने कहा-यह देखो, ये कहना चाहते हैं। इन्हीं
के मुंह से सुनो। मैं इनकी ब्रीफ नहीं लूंगा। मैं चाहता हूँ कि तुम
इस केस को करो।
शफ़ीकुल ने पास बैठे सज्जनों की ओर देखा । देखकर मालूम
हुआ, खूब बड़े आदमी हैं एवं संभ्रांत भी हैं।
हुसैन साहब सज्जन को अपने कक्ष में ले आये।
पूछा-आप आसामी पक्ष की तरफ़ से हैं अथवा फ़रियादी
पक्ष की ओर से?
मज्जन ने कहा-~-आसामी पक्ष की ओर से।
-आसामी कौन है ?
००11-
सज्जन ने कहा-मेरा लड़का !
-आपका लड़का अकेला ही है ? अथवा साथ में और भी
कोई है?
सज्जन ने कहा- साथ में और दो दोस्त हैं ! उन सभी को
जामिन से मैंने छुड़ा लिया है।
-क्या है, मामला क्या है ?
सज्जन ने कहा-औरत के साथ बलात्कार !
हुसैन साहब का चेहरा काला पड़ गया। इस प्रकार के केस
से साधारणतः वे वचते आ रहे थे।
उन्होंने कहा-अच्छा, आप अव जाइये। कल सुवह नौ के
बीच आप एक दफ़ा मेरे घर आयें। तव सारी बात होगी।
सज्जन ने कहा-आप रुपयों की बात मत सोचियेगा सर।
मेरे पास बहुत रुपये हैं। आपका जो ख़र्च-व्यय होगा वह सभी
दूंगा। कारण, मेरे लड़के को सज़ा हो जाने से हमारा वंश-वृक्ष
कलंकित हो जायेगा। इस केस से छुट्टी मिलते ही मैं बेटे की शादी
कर दूंगा । वह अभी वी० ए० में पढ़ता है। आप तो जानते ही हैं,
अगर अभी लड़के को लंवी जेल की सज़ा हो जायेगी तो मुझ पर
क्या वीतेगी?
हुसैन साहब ने पूछा-और दोनों ? वे क्या करते हैं ?
उस सज्जन ने कहा- उनको जेल हो अथवा न हो कोई फ़र्क
नहीं पड़ने का। मैंने घर में लड़के को खूब आड़े हाथों लिया है।
खूब पीटा है। किंतु अब पुलिस ने केस हाथ में लिया है तो मारने
से कोई फायदा नहीं। इसीलिए उसे अव और कुछ नहीं कहता !
अव आप ही मुझे बचा सकते हैं।
यह कहकर उस सज्जन ने सचमुच में हुसैन साहब के पाँव
छूने के लिए दोनों हाथ वढ़ा दिये।
हुसैन साहव ने कहा-कर क्या रहे हैं, कर क्या रहे हैं ?
विवाहिता
आप ब्राह्मण होकर मुसलमान के पाँव छू रहे हैं ?
उस सज्जन ने कहा-मैं हिंदू-मुसलमान में कोई फ़र्क नहीं
देखता। मैंने मुल्ला साहव के पाँव भी छुए हैं। मेरा एक यही
लड़का है, हुसैन साहब। उसे यदि अभी सज़ा हो जाये तो मैं फिर
किसका मुंह देखकर जीऊँगा। मेरी उम्मीद थी, हुसैन साहब, कि
मैं लड़के को कानून पढ़ाकर वकील वनाऊँगा, किंतु संगत के दोप
से उसका तमाम भविप्य चौपट हो गया।
हुसैन साहव और ज्यादा सुनना नहीं चाहते थे। कारण, उस
वक्त उन्हें कोर्ट जाने के लिए तैयारी करनी थी।
वे सज्जन चले गये।
हुसैन साहब को उस सज्जन के लिए बड़ा दुख होने लगा।
एकमात्र लड़के के दुख में बाप का मन टूट जाता है, इसमें
अचंभे की कोई बात नहीं। किंतु वाप की बात से जो मालूम हुआ,
उससे यही समझा जाता है कि लड़के ने अन्याय किया है, एवं
दोपी है।
कोर्ट में जाने पर हुसैन साहब ने मिस्टर मुल्ला को अकेला पा
कहा-सर, आपने मुझे यह क्या केस दिया है ?
मिस्टर मुल्ला ने कहा-क्यों ?
हुसैन साहब ने कहा-यह तो देखता हूँ कि रेप केस है ?
मिस्टर मुल्ला ने कहा--इससे क्या ? तुमको तो रुपया।
मिलेगा! और अच्छा रुपया मिलेगा! मैं तुम्हें वचन देता हूँ।
मिस्टर हुसैन ने कहा---रुपया ही सव-कुछ है सर? मैं तो
रुपये के लिए इस लाइन में नहीं आया। मैंने चाहा था मनुप्य का
उपकार करना!
मिन्टर मुल्ला ने कहा- इससे मनुष्य का कल्याण होगा।
हुसैन साहब ने कहा-किंतु ये लड़के तो बदमाश हैं। इनके
पिताओं के मन में कितना ही कप्ट हो, किंतु इन्होंने तो पाप किया
90/विवाहिता
है। इन्हें तो सज़ा होनी उचित है ! कैसे समझ बैठे कि ये दोषी हैं, इन्होंने पाप किया है ? -इनमें से एक का पिता मेरे पास आया था, वह कह गया है। सव स्वीकार कर गया है। उसने कहा है कि उसके लड़के के द्वारा हरेक पाप संभव है। किंतु फिर भी उसे जेल से बचाना होगा । मैं जान-बूझकर इस केस को नहीं ले पाऊँगा। मिस्टर मुल्ला ने कहा-तुम इतने दिनों मेरे पास काम करने पर ऐसी वात वोलते हो? हुसैन साहव कहने लगे-किंतु मेरा विवेक आड़े आ रहा है ! विवेक वड़ा है या रुपया ? मिस्टर मुल्ला ने कहा-विवेक भी वड़ा नहीं है, रुपया भी बड़ा नहीं है, वड़ा है इवीडेंस। तुम बीफ जाँचकर देखो। यदि ३ इवीडेंस पाओ कि लड़के दोषी हैं, तो उन्हें सज़ा हो, न हो, यह हाकिम समझेगा, तुम फ़ैसला देने वाले कौन होते हो ? हुसैन साहव निरुत्तर हो गये। सीनियर की वात का ज्यादा विरोध करना ठीक नहीं है। इसके अलावा मिस्टर मुल्ला प्रवीण क़ानूनदाँ हैं। जिंदगी में उन्होंने अनेक केस किये हैं, अधिकांश मामलों में वे जीते हैं। जब उन्होंने देखा कि हुसैन साहब ने उनकी वात का और प्रतिवाद नहीं किया, तब उन्होंने शांत-भाव से समझाया-कानून क्या चीज़ है ? क़ानून में सच-झूठ को कोई स्थान नहीं है। वकील तटस्थ होता है। वह केवल इवीडेंस को देखता है। इवीडेंस का अर्थ है प्रमाण । तुम जो कुछ आँख के सामने प्रमाण पाओगे उसे लेकर ही काम चलाओगे। उससे एक सूत ज्यादा भी नहीं, एक सूत कम भी नहीं । तुम्हारा यह जानने का अधिकार नहीं है : तुम न्याय के पल में प्लीड करते हो अथवा अन्याय के पक्ष में वकालत कर रहे हो। तुम एडवोकेट हो, तुम हो सिर्फ़ आईन-मानव विवाहिता - ने मिस्टर मुल्ला ? ? ? कानून के अलावा और कुछ सोचने की तुम्हें दरकार नहीं है। हुसैन साहब की बातों को मनोयोग से सुना, किसी प्रकार का प्रतिवाद भी नहीं किया। घर आते ही रोज की तरह ही स्त्री आयी। पूछा- क्या हुआ ? तुम्हारा चेहरा ऐसा कैसे हो गया ? क्या हुआ ? हुसैन साहब ने कहा-नहीं, कुछ नहीं हुआ। बेगम साहिबा ने कहा-ज़रूर कुछ हुआ है। नहीं तो फिर ऐसे कैसे दिखायी दे रहे हो? हुसैन साहब ने कहा-जानती हो, मिस्टर मुल्ला ने आज मुझे जो कहा उसे सुनकर मेरा मन बड़ा ख़राब हो गया है। -क्यों, क्या कहा है ? हुसैन साहब ने कहा-वह तुम नहीं समझोगी। मेरे सामने कानून और विवेक एक ही चीज़ है, किंतु उनके सामने यह नहीं है। उनके पास कानून ही बड़ा है। उनके अनुसार मैं वकील हूँ, मैं न्याय अथवा अन्याय कुछ भी नहीं देखूगा, मैं महज़ क़ानून का स्वार्थ देखूगा! वेगम साहिवा इस पर भी कुछ समझ नहीं पायीं। -इसका मतलव? हुसैन साहब ने कहा-इसका मतलब तुम नहीं समझ 'पाओगी । कहकर वे अपनी ब्रीफ को लेकर पढ़ने लगे। हर आदमी का एक वास्तविक जगत होता है, और होता है एक उसकी इच्छा का जगत। बहुत कम मामलों में ही वास्तविक जगत के साथ इस इच्छा के जगत का मेल होता है। वास्तव मनुष्य को कहता है-यह मत करो, इससे तुम्हारा खराव होगा, ऐसा करना दोपपूर्ण है। और इच्छा का जगत केवल कहता है- अपनी इच्छा को पूरा कर लो किसी भी उपाय से । तुम्हारी इच्छा 92 / विवाहिता ।
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को छोड़, इच्छा के जगत में तैरते हैं। उस जगत में राजा-महा- राजा-सम्राट क्या चीज़ हैं ? उनकी इच्छा की पूर्ति करने में रुका- वट पैदा करने वाला कौन है ? हुक्म तामील करने के लिए जो आईन-कानून है, उसे भी वे नहीं मानते । अतः वे सम्राट हैं। कभी भाँग खा विस्तरे में स्वप्न-विभोर हुए रहते हैं, कभी रवड़ी-मलाई खाकर अमृत का स्वाद पाने की साध मिटाते हैं। यही है इस तीनमूर्ति का दैनिक प्रोग्राम। पिता के सामने हाथ पसारकर रुपया लेते हैं, इससे उन्हें शरम नहीं आती। कारण, बाप ने जव जन्म दिया है तो भरण-पोपण की ज़िम्मेदारी भी उसी की है। लिखाई-पढ़ाई के लिए उन्होंने एक दिन स्कूल को दर्शन दिया था, किंतु अब उसके बग़ल से भी नहीं निकलते। पिता अपने धंधे-रोज़गार में व्यस्त रहते हैं। सुबह से काम-धंधे में ग्राहक आने लगते हैं, जो रात दस वजे कहीं विदा लेते हैं। तव तक शहर भाग के नशे में जैसे सो जाता है। भाँग खाने का रिवाज़ शायद एक दिन पूजा के अंग के रूप में रहा होगा। किंतु अब तो यह रोजमर्रा की चीज़ बन गयी है। बुधुआ, चौवे और रामखेलावन भाँग खाकर गंगा के किनारे बैठे हवाखोरी करते हैं। उसके साथ मलाई। मलाई में भाँग जब मिल जाती है तो नशा जोरदार वन उठता है। और तव तीनों अंटशंट वोलते हैं। कभी-कभी वंवइया फ़िल्म देखकर पागल हो उठते हैं। उस समय सिनेमा की तसवीरें प्रत्यक्ष हाड़-मांस के मनुप्य के रूप में हाज़िर हो उठती हैं। तीनों के अंदर सुरमुराहट होने लगती है। उनकी इच्छा होती है कि अत्याचार करने का अधिकार उन्हें भी है। सिनेमा के नायक-नायिका को अगर वे पा जाते नो वे भी उनके अत्याचार से नहीं बच पाते। बुधुआ कहता-साली दुनिया भूकंप से नेस्तनाबूद हो जाती 94 / विवाहिता तो अच्छा था। चौबे कहता-तव तो हम भी मारे जायेंगे ! रामखेलावन कहता-नहीं, सिर्फ हम तीनों के घर सलामत रहेंगे, और कुमकुम का घर ! कुमकुम! नाम का उच्चारण करने से ही आराम । किंतु सिर्फ नाम का उच्चारण करने से ही क्या आशा मिटती है ! चौबे ने कहा--आज कैसी पीले रंग की साड़ी पहनी थी उसने देखा? हल्दी रंग की साड़ी में कुमकुम कितनी शानदार दिखायी देती है, इस पर तीनों एकमत थे। वुधुआ ने कहा- मैं उसे बुलाकर कह दूंगा। --क्या कह दोगे? -कहूँगा तुम हर रोज़ हल्दी रंगी साड़ी पहनो! -कहने का साहस होगा? -शायद होगा! बुधुआ ने कहा-तुम्हारी हिम्मत का पता चल गया है। कुमकुम को देखते ही तुम्हारे हाथ-पाँव-कलेजा काँपने लगता है, मैंने देखा है। और तुम्हारा तो नहीं काँपता है ना? -मेरा हाथ-पाँव काँपेगा? मैं अगर उसे अकेला पाऊँ तो ज़ोर करके चुंबन खा जाऊँ, देखना। रामखेलावन ने कहा-अपने मुँह मियाँ मिळू वन रहे हो ! काम के वक़्त भाग जाओगे। तुम्हें पहचानते हैं। एक चुंबन-माल खाते ही तो तुम ज़मीन सूंघने लगोगे ! वुधुआ ने कहा-सच यार, कुमकुम को देखते ही मेरा हाथ- पाँव और शरीर पता नहीं कैसे वर्फ़ हो जाता है। इच्छा होती है, विवाहिता/ उसके पैरों में लोट जाऊँ। वह जिस रास्ते से जाती है, उस रास्ते की मिट्टी को चूमने की इच्छा होती है। इच्छा होती है, उस धूल में लोट जाऊँ। वेकार लड़के सब। वेकार होने पर भी फटेहाल नहीं। पिता का रुपया जेब में झन-झन करता है। पढ़ाई-लिखाई ज्यादा नहीं। पढ़ाई-लिखाई की दरकार भी क्या है ? बड़ा होने पर किसी को नौकरी तो करनी नहीं है। रुपये का पेड़ है। जितना हिलाओगे उतना ही रुपया झरझर कर गिरेगा! शुरू में उन्होंने गंगा की सीढ़ी पर बैठकर भाँग खाना प्रारंभ किया। भांग के नशे में धुत्त होकर कल्पना में कुमकुम का सपना देखा। स्वप्न में कुमकुम उनके पास आकर बैठ जाती, उनके साथ आलिंगन करती और उछल-कूद करती। उसी तरह गले में बाँहें डाले तीनों के साथ सोती। एक कुमकुम तीन कुमकुम वन जाती। सोये-सोये सभी सोचते कि कुमकुम उसी के साथ सोई हुई है। जव सुबह के दस वज जाते तब उन्हें आवाज़ देकर जगाना होता! पिता कुछ नहीं कहते। कहने का किसी के पास समय ही नहीं था। भोर में नाश्ता कर वे अपनी-अपनी दुकान पर चले जाते। दुकान जितनी सुवह खुले उतना ही लाभ है। ग्राहक भोर से ही आना शुरू कर देते हैं। काशी के ग्राहक माने भारत के सभी इलाकों के लोग। वे तीर्थ करने को आते हैं, और तीर्थ स्थान पर आकर खरीद भी कर ले जाते हैं। घर में लड़का-लड़की-बहू क्या करते हैं, यह देखने-सुनने- मोचने का समय उनके पास कहाँ है। वे तो सिर्फ़ रुपया समझते हैं, पया और रुपया। किंतु एक दिन उन्हें होश आया। तीनों पिताओं के घर एक दिन पुलिस का दारोगा आ पहुंचा। -~~-क्या बात है? 96/ विवाहिता -वात बहुत ही ख़राब है। बुधुआ, चौबे और रामखेलावन, तीनों ही पुलिस के हाथों पकड़े गये हैं। चौरासे की एक निर्जन गली में कुमकुम मिली। उसकी साड़ी से खून बह रहा था। -क्या माजरा है ? -उसे अस्पताल ले जाया गया। अभी तक उसे होश आया नहीं है। -किंतु यह हुआ कैसे ? दारोगा साहव ने बतलाया-सुबह कुमकुम भी अन्य सहेलियों के साथ स्कूल गयी थी। किंतु दोपहर के बाद से वह मिल नहीं रही थी। उसके माँ-बाप दुपहर से उसका इंतज़ार घर में कर रहे थे। जैसा कि और दिन भी करते हैं। साँझ के पाँच वज गये, छह वज गये, सात बज गये, तब भी जव वह नहीं आयी तो खोजवीन शुरू हुई। । आखिर कहीं जब पता नहीं लगा तो पुलिस थाने में सूचना देनी पड़ी। उन्होंने पूरे इलाके को छान डाला। तलाशी ली। अंत में दूसरे दिन जिस स्कूल में कुमकुम पढ़ती थी, वहाँ भी गये। किंतु वहाँ भी कुछ पता नहीं था। अंत में संकटा देवी के मंदिर के पीछे एक सुनसान गली में अँधेरे स्थान पर कुमकुम पायी गयी। खून में उसकी साड़ी कई- एक स्थान पर भीग गयी थी। तव तक उसे होश आ गया था। वह वहाँ बैठी-बैठी सिर्फ़ रो रही थी। क्या करे, कहाँ जाय, किसकी मदद ले ! ऐसी सूरत में पता नहीं किसने उसको देखा। कुछ संदेह होने पर पूछा-वेटी तुम कौन हो? कुमकुम रोने लगी! कैसे कहे वह कौन है ! सभी पूछने लगे-तुम्हारी ऐसी हालत किसने की है ? कुमकुम ने कहा-मैं उन्हें पहचान नहीं पायी। उन्होंने कपड़े से मेरा मुँह ढूंस दिया था, आँखें दवाकर ढक रखी थीं। विवाहिता 107
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? दारोगा साहव ने कहा-जिन्होंने आपकी लड़की का सर्व- नाश किया है वे सभी पकड़े गये हैं। उन्हें आसामी बनाकर हम मुक़दमा खड़ा करेंगे। आपको एक पैसा खर्च करना नहीं पड़ेगा। सारा खर्चा सरकार का। मुक़दमे की वात सुन माँ-बाप का मन और भी खराव हो गया। मुक़दमा होने का मतलब अखवार में खवर छपेगी। उससे बड़ी कलंक की और कोई बात नहीं होगी। उससे तो और मालूम होगा । अव तक जिन्हें यह खबर नहीं लगी है, उन्हें अखवार पढ़- कर मालूम हो जायेगा । नाते-रिश्तेदारी के लोग आकर पूछेगे- क्या हुआ वहन ? कुमकुम को क्या हुआ था ? हमने तो कुछ सुना नहीं! क्या सिर्फ इतना ही ? आखिर इस लड़की की तो एक दिन शादी करनी है। इतना बड़ा कांड होने पर इस लड़की से शादी कौन करेगा? माँ-बाप को जितनी लड़की के स्वास्थ्य के बारे में चिंता नहीं थी, उससे कहीं ज्यादा चिंता थी, वंश की बदनामी की ! कुमकुम के वाद और एक छोटी बहन है। एक दिन वह भी बड़ी होगी। उस वक्त उसकी शादी का सवाल भी उठेगा। एक मजेदार खवर पाने पर क्या कोई छोड़ेगा ? पूरे मुहल्ले में पता करने के बाद उनको चैन पड़ेगी ! सचमुच सारे मुहल्ले में बड़ी चक-चक मच गयी। केस कोर्ट में उठा। आदमियों की भीड़ के कारण पुलिस तक कोर्ट में नहीं घुस पा रही थी । ऐसी हालत थी। -हटो, हटो सब, हट जाओ! किंतु हटे कौन ? जिसे देखने को सभी उतावले हो रहे विवाहिता उसने तो अपना मुंह साड़ी से ढक रखा था। मुंह दिखाने में शर्म आ रही थी कुमकुम को । शर्म की तो वात थी ही। किंतु चूंघट की फाँक से देखने वाले लोगों का जंगल चारों ओर था। लज्जा के मारे उसका सिर नीचा हो गया था। और जो आसामी थे, वे तीनों सीना फुलाये सिर ऊँचा किये खड़े थे। पुलिस के दारोगा ने मामले का श्रीगणेश किया। लंवा भाषण । सभी उस तक़रीर को सुनने लगे चुपचाप। मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन आसामियों के पक्ष में उठ खड़े हुए। मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन ने सीनियर मुहम्मद मुल्ला के कहने पर केस में हाथ दिया। मुहम्मद शफ़ीकुल हुसैन महज़ एक कुशल वकील ही नहीं, बल्कि एक बड़े धार्मिक मुसलमान भी हैं। मामला जब उनके हाथ में आया, उन्होंने आसामियों के पिताओं से वात- चीत की। उनकी बात सुनकर मालूम हुआ कि लड़कों के पिता अपने लड़कों के बारे में कुछ नहीं जानते। वे नहीं जानते कि लड़कों ने पढ़ाई-लिखाई छोड़ दी। पूछा -आप लोग खबर ही नहीं रखते कि लड़के सारे दिन क्या करते हैं ? एक ने कहा-हमारे पास समय कहाँ है वकील साहब ? हम' अपने कारवार को लेकर सुबह आठ बजे से रात दस बजे तक व्यस्त रहते हैं। इस बीच लड़के क्या करते हैं, यह देखने के लिए समय कहाँ है, वताइये तो? ----फिर उन्हें धंधे में लगा दीजिये ! सभी ने कहा यदि ऐसा कर पाते तो अच्छा ही होता । बहुत कहते हैं हम किंतु वे कुछ सुनते ही नहीं। शफ़ीकुल साहब ने कहा-तब तो कोर्ट में भी वे बात नहीं 100 / विवाहिता सुनेंगे । अव मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा। भले आदमी बड़ी मुश्किल में पड़ गये। कहा-आप जितना रुपया लगे लें, हमें बचायें। शफ़ीकुल साहब ने कहा- मुझे रुपयों का लालच दिखाइये मत-मैं रुपयों के लिए केस नहीं लेता। यह तो मेरे सीनियर ने कहा था इसलिए वीफ ले ली. विलकुल ठीक ! मिस्टर मुल्ला की वात को टाल नहीं सके, शफ़ीकुल साहव । शफ़ीकुल साहब अपने जीवन के लिए रुपया पैदा करने की ख़ातिर इस लाइन में नहीं आये थे। शिष्ट शिक्षित परिवार के मनुष्य शफ़ीकुल साहव । पैतृक संपत्ति भी उनके यहाँ काफ़ी थी। उनका आदर्श वड़ा महान था। एक तरह से पारि- वारिक दृष्टि से सुखी इन्सान । अपने धर्म के मुताविक रोज संध्या नमाज़ पढ़ा करते । वकालती में पिता ने ही लगाया था। पिता कहते थे-पेशे की दृष्टि से ऐसा धंधा और दूसरा नहीं । समाज का भला करने के लिए वकालत सबसे ज्यादा उप- कारी है। शोषित इन्सान की सेवा करने के लिए यही पेशा सबने उपयुक्त है! सोनियर मिस्टर मुल्ला एक अच्छे शिक्षक थे। उनके जैसा धार्मिक व्यक्ति इस पेशे में दुर्लभ है। एक दफ़ा उन्होंने मुल्ला साहब से प्रश्न किया था-आप जैना कानूनदाँ किस प्रकार हुआ जा सकता है ? मुल्ला साहब ने उत्तर में कहा था-देखो, इस लाइन का खराव पक्ष भी है और अच्छा पक्ष भी है। किंतु वकील की हैसियत से जो कुछ देख पाओगे उसी को अपना मूलधन स्वीकार करना उचित है। न्याय अथवा अन्याय देखना अपना काम नहीं है। उन्होंने एक मूल्यवान बात और भी कहीं भी अच्छा वकील होने के लिए साहित्य पढ़कर आनंद प्राप्त कन्ना चाहिए, काना mio -- सुनकर आनंद प्राप्त करना चाहिए, चित्र देखकर आनंद प्राप्त करना चाहिए, तभी अच्छा वकील बना जा सकता है। शफ़ीकुल साहब अपने तमाम जीवन में इस बात को मानते आ रहे थे। चित्र-प्रदर्शनी देखी, गाने के जलसे सुने और मौका मिलने पर क्लासिक साहित्य को भी पढ़ा। शफ़ीकुल साहब के धर्मभीरू मनने केवल इन्सान और समाज का अच्छा करना चाहा । जीवन में कभी भी रुपये के लिए उन्होंने लालसा नहीं की। वे जानते थे, ख्याति के साथ रुपया भी जुड़ा हुआ है एकाकार होकर। प्रसिद्धि होने पर रुपया आयेगा ही। अतः वकील के बतौर उनका नाम हो, ऐसी ही चेष्टा वे करते। घर से निकलने के वक्त रोज़ भिखारियों का एक झुंड उनके गेट के बाहर बैठा रहता। वे उनकी गाड़ी वाहर निकलने का इंतज़ार करते। वे जानते थे कि वे किसी को निराश नहीं करते हैं। ठीक साढ़े दस बजे नियम के अनुसार शफ़ीकुल साहब की गाड़ी निकलेगी। उनका ड्राइवर गेट के पास आकर गाड़ी को धीमा कर देता कुछ समय के लिए। गाड़ी रुकने पर शफ़ीकुल साहब पाकेट से खुदरा पैसा निकाल- कर प्रत्येक के हाथ में देते। किसी को निराश नहीं करते। यह उनका नित्य-कर्म है। इससे उनका मन प्रसन्नता से भर उठता। उस वक्त उनको अपने पिता की याद आ जाती। पिता भी ऐसे ही करते थे। लेकिन रोज़ नहीं, रोजों के दिन। रोजा के महीने में वे हर रोज़ भिखारियों को पैसे दान करते थे। उसमें हिंदू-मुसलमान का फ़र्क नहीं करते थे। जो आकर उनके सामने हाथ पसारता उसको अपनी श्रद्धा मुताविक दान देते। पिता कहते-~-अल्लाह इससे खुश होता है। शफ़ीकुल उस वक्त छोटे थे। अल्लाह के खुश होने से क्या 102/विवाहिता होता है अव्वा जान ?-पूछते। पिता कहते—अल्लाह के खुश होने परआदमी भी खुश रहता है। मन में आनंद रहता है । उसको कोई दुख नहीं होता। अल्लाह- ताला ही इस दुनिया का मालिक है। बचपन के दिनों में वावा से सुनी ये वातें बड़े होने पर भी शफ़ीकुल साहव को याद थीं। अतः वकील होने पर भी इन बातों को वे भूले नहीं थे। कोर्ट में जाने पर कितनी तरह के आदमी बुरे कर्म के लिए उनको ब्रीफ देने आये, कितने ही ढेर सारा रुपया देने आये, किंतु उन्होंने उनको भगा दिया। कहते थे-पाप करने के वक्त याद नहीं था, और अब आये हो मेरे पास ? जाइये, चले जाइये मेरी आँखों के सामने से, अन्यथा अपमान करके निकाल दूंगा आपको। मुवक्किल लोग वात सुनकर डर के मारे भाग खड़े होते जब कि अन्य वकील वे तमाम ब्रीफें लपक लेते। केशव शर्मा कहानी कहते-कहते रुक गये। मैने पूछा-उसके बाद? केशव शर्मा ने कहा- शफ़ीकुल साहब से इसीलिए सभी इसे थे। यही वह कारण था, जब मिस्टर मुल्ला ने उस बात को लेन के लिए कहा था तब वे हिचकिचा रहथे। किंतु मीनिक का अनुरोध टालना मुश्किल था। मुवक्किल लोग जानते थे कि लिया मुल्ला के पकड़ने से ही शफ़ीकुल हुसन साहब को राह किया जा सकेगा। । आसामी पक्ष के लोग बड़े-बड़े पैसे वाले थे। वे जानते हैं कि रुपये से संसार की सभी गीते सकती हैं। तमाम जिंदगी भर उन्होंने ऐसा ही किया कोर्ट का मुहरिर, पेशकार, पुलिस सभी को खरीदा जा सकता है। रुपया देने से दुनिया तक खरीदी जा सकती है। यह उनकी बनी हुई धारणा थी। शफ़ीकुल हुसैन साहव को बीफ पढ़ते-पढ़ते मालूम हो गया था कि आसामी दोपी हैं। अत: बीफ लेकर सीधे मिस्टर मुल्ला के पास पहुंचे। मिस्टर मुल्ला, अनुभवी वकील । पूछा-द्रीफ कैसी लगी? शफ़ीकुल हुसैन ने कहा---पुलिस रिपोर्ट तो आसामियों के पक्ष में है। ----इसका मतलव ? शफ़ीकुल साहव ने कहा-मालूम होता है, पुलिस ने रिश्वत खायी है। कैसे मालूम हुआ? शफ़ीकुल साहब कहा- आसामी पक्ष ने अपने मुंह से मुझे बतलाया है कि उन तीनों के ही लड़के शैतान हैं। तीनों ही लड़के बापों की कमाई से मौज-मस्ती लेते हैं। माँ-बाप के कंट्रोल से वाहर हैं। वे घर से कब निकल जाते हैं, कहाँ जाते हैं, क्यों जाते हैं एवं कब लौटते हैं यह कोई जान नहीं पाता। इसके अलावा 'भाँग का नशा भी वे करते हैं । इससे मालूम होता है कि पुलिस ने ठीक रिपोर्ट नहीं दी। मिस्टर मुल्ला ने कहा-तब तो केस पुलिस के खिलाफ जायेगा। शफ़ीकल हुसैन ने कहा-जानता नहीं। ऐसी हालत में मेरे हल में बीफ लेना क्या उचित होगा? मिस्टर मुल्ला ने कहा-तुम जो प्रमाण पाओगे उसी के अनु- सार चलोगे ! तुम वकील हो! तुम्हारा काम न्याय-अन्याय का ने - 104/विवाहिता
फैसला देना नहीं है।
मिस्टर मुल्ला ने जव कह दिया तो शफ़ीकुल हुसैन के पास
कोई आपत्ति नहीं रही।
उन्होंने केस ले लिया । मुवक्किल लोग फ़ीस चुका गये।
इसके बाद कोर्ट में सुनवाई का दिन पड़ा। उस दिन कोर्ट में
लोगों की अपार भीड़। जैसे सभी ने मज़ा पा लिया हो। इस
प्रकार की घटना की नायिका और नायकों को देखने का लोभ
कौन छोड़ सकता है ?
कोर्ट के एक कोने में, कठघरे में खड़े थे-बुधुआ, चौवे और
रामखेलावन । लंबी-लंबी जुल्फ्रें। चेहरा-मोहरा देखने से ही
मालूम हो जाता है कि अपने बाप के कुपुत्र हैं। लाल, नीली,
विचित्र पोशाक, हाथी पैंट । सिगरेट पीते-पीते अँगुलियाँ पीली हो
गयीं। वेफ़िक्री का उनका भाव ।
कोर्ट के अंदर उन्हें देखने से लोगों के मन में आनंद था एक
प्रकार का। यह आनंद उन्हें कैसे मिल रहा था, यह तो वे ही
जानते हैं। हो सकता है, यह स्वाभाविक हो ! जिसे खुद भोग नहीं
पाये, तो जिन्होंने भोग किया है उन्हें आँखों के सामने देखने पर
ही एक प्रकार का विकृत आनंद प्राप्त हो जाता है। संभवतः यह
भी यही था।
कोर्ट-रूम विशाल था। एक ओर आसामियों के अभिभावक
वगैरह व्यग्रता से वैठे हुए थे। वे नहीं जानते कि उनके भाग्य में
क्या वदा है। प्रचुर रुपये के मालिक हैं वे। किंतु यह विधि की
विडंबना ही कहिये कि आज वकील और जज साहब की दया के
ऊपर आत्मसमर्पण कर बेक़रारी से इंतज़ार कर रहे हैं।
सरकारी वकील ने अभियोग का विवरण पढ़कर सुनाया।
अभियोग में यही था कि आसामियों ने एक स्कूल की कन्या
की मजबूरी का फायदा उठाकर उसको एक निर्जन गली में
विवाहिता | 105
पुराने मकान के अंदर ले जाकर एक-एक कर तीनों ने ही तीन
वार वलात्कार किया। महामान्य हाकिम इसका यथायोग्य
विचार करें।
फिर लंबी लिस्ट
जब सरकारी वकील ने घटना का विवरण दिया तव सभी
खामोश थे। किसी के मुंह से एक भी बात नहीं। उन्होंने भी
घटना के विवरण का उपभोग किया। वेचारी लड़की ने तब अपना
मुंह ढक लिया था ताकि कोई उसका चेहरा देख न सके । उसके
मुंह की तनिक-सी झलक पाने के लिए लोग व्यग्र थे। उसके मुंह
अथवा शरीर के किसी हिस्से के एक मामूली-से अंश को भी अगर
वे देख सकें तो जैसे धन्य हो जायेंगे।
उसके बाद डॉक्टर ने अपनी रिपोर्ट दी।
डॉक्टर ने खुद ही अपनी रिपोर्ट पढ़नी शुरू की।
वह रिपोर्ट बड़ी मार्मिक और कारुणिक थी। डॉक्टर ने
परीक्षा कर देखा कि पुलिस की रिपोर्ट सच है।
केशव शर्मा कहानी कहते-कहते रुक गये।
मैंने पूछा-~-उसके वाद ? उसके वाद आसामियों को सज़ा
मिली?
केशव शर्मा ने कहा--आसामी यदि सज़ा पा जाये तो फिर
शफ़ीकुल हुसैन साहब आसामी-पक्ष की ब्रीफ लेते ही क्यों ?
-उसके बाद?
-उसके बाद मामला चलने लगा। कोर्ट के अंदर जवरदस्त
भीड़। जितने दिन गुज़रते हैं, भीड़ बढ़ती ही जाती है। सभी जगह
लोग यही चर्चा करते। चाय की दुकान, शरावखाने, चाट की
दुकान, गंगाघाट, क्लव, पुस्तकालय, सभी जगह यही एक चर्चा।
परनिंदा से बढ़कर आनंददायक चीज़ और कुछ नहीं है !
106 / विवाहिता
स्कूल की अनेक लड़कियाँ थीं। उनका वलात्कार तो कोई नहीं करता? एक अनुभवी आदमी जो अब तक चुपचाप बैठा था, बोला--- समाज-दुनिया सवका भट्टा बैठ गया भाई। आजकल अच्छाई का ज़माना नहीं रहा । अच्छा होने का अर्थ ही है पाप! बड़े दुख, वड़ी लज्जा के दिन थे वे । कुमकुम को, तव पुलिस हिफ़ाज़त में, एक नारी-कल्याण आश्रम में रखा गया था। लड़की रात-दिन रोती रहती थी। रोने से दोनों आँखें फूल गयी थीं। जिस दिन कोर्ट में तारीख़ पड़ती है, उस दिन उसे लाखों आँखों का लक्ष्यवेध होना पड़ता है। उसके बाद जव कोर्ट की सुनवाई शेष हो जाती है, तब वे हताश हो जिस-तिस के मकान में चले जाते हैं। -और कुमकुम के मकान में ? कुमकुम के मकान से सुनवाई के दिन कोई भी कोर्ट में नहीं आया। जगमोहन वावू के मन में शुरू में फुर्ती थी। पहले वे गंगा में जाकर स्नान कर आते । जगमोहन दास! बहुत दिनों पहले नौकरी कारण यहाँ आये थे। आकर सोचा था, शेष जीवन यहीं काटेंगे। पेंशन के रुपयों आदि के भरोसे जीवन काट देंगे। दो ही तो संतान हैं। दोनों लड़कियाँ । एक लड़की का नाम कुमकुम और दूसरी का नाम चंद्रा। सोचा करते थे, एक लड़का अगर होता तो अच्छा था। शादी बड़ी उम्र में की थी। संतान भी हुई थी ज्यादा उम्र में ही। पत्नी ने कहा-तुम यहाँ आकर दोनों लड़कियों की शादी कैसे करोगे? जगमोहन वाबू कहते-जिसने जीवन दिया है, आहार भी वही देगा।
? पत्नी ने कहा-किंतु शादी ? लड़कियों की शादी तो करनी होगी। लड़कियों की शादी करते वक्त भरपूर रुपया लगता है। तव ? तव रुपया कहाँ से पाओगे? जगमोहन बाबू ने कहा-वही जो कहा तुम्हें, जिसने जीवन दिया है, वह आहार भी देगा। पत्नी खफ़ा हो जाती। कहती-अपने भगवान की बात छोड़ो। मुझे तो सोचते-सोचते रात में नींद भी नहीं आती। जगमोहन बाबू कहते--इतना सोचती ही क्यों हो? लड़की हुई है तो ? लड़कियों का रूप देखते ही लोग बहू बना लेंगे। उनकी शादी में एक पैसा भी खर्च नहीं होगा देख लेना। पत्नी कहती-अव क्या वह युग है जो तुम्हारी लड़की को देखकर राजपुत्र लोग आकर वैसे ही रानी वना लेंगे ! इस कलि- युग में यह नहीं होता है। अव चाहे लड़की का रूप हो, चाहे गुण हों, रुपया खर्च किये बिना शादी नहीं होती। जगमोहन बाबू कहते--तुम्हारा रूप देखते हो तो पिताजी ने तुम्हारे साथ शादी कर दी। मैंने क्या शादी में एक भी पैसा दहेज लिया था? -उस युग की बात छोड़ दो। जगमोहन वाबू कहते-उस युग, इस युग में कोई अंतर नहीं है। लड़कियों को पढ़ा रहे हैं। किसी-न-किसी लड़के के बाप की नज़र पड़ेगी ही। तब देखोगी, हठात् कोई हमारे मकान में आकर अपने से ही अपने लड़के के साथ शादी का प्रस्ताव देगा ! पत्नी कहती-उसी भरोसे तुम बैठे रहो। इस ओर लड़की की उम्र बढ़ती जा रही है, उधर तुम्हारा ख़याल ही नहीं है। मैं लड़की की माँ हूँ, इसलिए लड़की का भला-बुरा मुझे ही देखना होता है। तुम तो अपने गंगा-स्नान और पूजा वगैरह ही लेकर पड़े हो। । .
हु
जगमोहन वाबू कहते--तो फिर क्या करूँ, कहो ? मेरे पा
क्या रुपया है जो मैं लड़की के लिए पात्र की खोज में फिरूँ ?
पत्नी ने कहा--जो तुम्हारी मर्जी में आये, करो। सिरप
हाथ धरे बैठे रहो।
इसके वाद पति-पत्नी में इस प्रसंग को लेकर और चर्चा
नहीं इतने दिनों से । कुमकुम और चंद्रा स्कूल में पढ़ने जाती और
लौट आतीं।
दिन, मास, वर्ष धीरे-धीरे आगे की ओर बढ़ रहे थे।
इसी बीच वही दुर्घटना घट गयी!
चंद्रा रोती-रोती अकेली घर आयी।
माँ ने पूछा-क्यों री, तुम्हारी दीदी कहाँ ? उसके स्कूल की
छुट्टी नहीं हुई?
लड़की ने शुरू में कुछ उत्तर नहीं दिया। केवल रोती रही !
माँ ने कहा-क्यों री, रो क्यों रही है ? तुम्हारी दीदी गयी
कहाँ, वोल?
चंद्रा ने कहा-दीदी को पकड़कर ले गये हैं !
-कौन पकड़कर ले गया है ? कहाँ ले गया है पकड़कर ?
चंद्रा ने कहा—यह मैं नहीं जानती। दीदी का मुंह कपड़े से
बंद कर, तीन जने, पता नहीं कहाँ पकड़कर ले गये।
तीन जने ? मुँह कपड़े से बंद कर पकड़कर ले गये हैं ? वे
कौन हैं?
-नहीं जानती माँ, गुंडे जैसे चेहरे थे। मैं उन्हें पहचान नहीं
पायी।
माँ को हठात् पागलपना हो गया। कहा-सत्यानाश, तुम
कुछ बोल नहीं पायीं ? चिल्लाकर लोगों को इकट्ठा नहीं कर
की?
इसके बाद कुछ नहीं बोली माँ । सीधी जगमोहन वावू के
कमरे में चली गयी। जगमोहन वावू तव गीता पढ़ने में मशगूल थे। -अरे सुना? तभी भी मालूम होता है, ध्यान-भंग नहीं हुआ, जगमोहन बावू का। सिर उठाने के पहले ही पत्नी ने उनकी गीता को खींचकर दूर फेंक दिया। जगमोहन बाबू ने कहा-क्या कर रही हो, क्या कर रही हो? पत्नी ने कहा-ठीक किया है, अच्छा किया है। इसे मैं आज ही चूल्हे में डाल दूंगी, आग में जला दूंगी। इधर तुम गीता पढ़ रहे हो और उधर अपना सर्वनाश हो चुका है ! -सर्वनाश ! और क्या सर्वनाश अव हो गया ? —तुम्हारी बड़ी बेटी कुमकुम घर नहीं लौटी। स्कूल से चंद्रा रोती-रोती अकेली लौट आयी है। कहती है, तीन गुंडे उसके मुंह में कपड़ा ठूसकर, न जाने कहाँ उठा ले गये। जगमोहन वावू तुरंत गीता के आध्यात्मिक जगत से यथार्थ जगत में लौट आये। किंतु घटना को सुनने के बाद क्या करना है, यह समझ नहीं पाये। वोले-मैं अब क्या करूं? पत्नी ने कहा-तुम क्या करो, यह औरत की जात होकर मैं तुम्हें वतलाऊँ ? फिर आदमी होकर क्यों पैदा हुए ? लड़की का बाप क्यों बने ? जाओ, अभी थाने जाओ, पुलिस में खबर दो। पुलिस-कोर्ट-अदालत-वकील ये काम कभी नहीं किये जग- मोहन वावू ने । पुलिस का नाम सुनते ही वरावर डरते रहे जग- मोहन वावू । भाग्य का ऐसा चक्कर आ पड़ा कि अब उसी पुलिस के पास हो जाना पड़ेगा ! वहाँ जाकर वे क्या बोलेंगे ? 110/विवाहिता
पत्नी ने कहा-पुलिस को क्या बोलना होगा, वह भी क्या
मुझे ही बतला देना होगा ? तुम पुरुष होकर कुछ नहीं जानते,
और मैं स्त्री होकर जानती हूँ ? उठो, क्या सोच रहे हो वैठे-बैठे ?
यदि कुछ नहीं ही जानना है तो लड़की को जन्म ही क्यों दिया
था?
---
इसके बाद जगमोहन बाबू और बैठे नहीं रह सके। कहा-
मेरी कमीज़ दो, देखें, चेष्टा करें, थाना कहाँ है ?
कमीज़ पहनकर जगमोहन बाबू घर से निकल पड़े। उसके
बाद गली लाँघकर बड़े रास्ते पर पाँव रखे। रास्ते में लोगों से
पूछते-पूछते थाने का पता पा लिये।
किंतु थाने के अंदर घुसते वक्त हृदय की धड़कन बढ़ गयी
उनकी। किस मुसीवत में फंस गये वे। उन्हें याद आया जितने
दिन शादी नहीं किये थे, उतने दिन अच्छे थे। शादी करने की
जरूरत ही क्या थी? और फिर शादी की तो इतनी देर के बाद
क्यों की?
थाने के दारोगा ने केस लिख लिया।
उसने अपना फ़र्ज़ अदा किया।
जगमोहन बाबू ने कहा-वही मेरी बड़ी लड़की है सर, देखने
में खूब सुंदर । आज रात ही उसे खोज निकालें सर, चेष्टा करके।
नहीं तो हम पागल हो जायेंगे। कुछ जल्दी कीजियेगा।
दारोगा वाबू ने पूछा-लड़की की कोई तसवीर दे सकते हैं ?
-तसवीर ? तसवीर तो नहीं है। कभी उसकी तसवीर
उतारी ही नहीं गयी!
--तसवीर मिलने से सुविधा होती है और कोई बात नहीं !
छोड़िये, जब तसवीर नहीं है तो अव सोचने से होगा भी क्या?
फिर भी ऐसी सुंदर लड़की की तसवीर आपने बनाकर रखी क्यों
नहीं, मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। सभी माँ-बाप तो लड़की की
विवाहिता / 111
- । । तसवीर बनाकर रखते हैं, शादी के वक़्त काम आये सोचकर। जगमोहन बाबू ने कहा-मैंने इन बातों पर आगे सोचा ही नहीं सर । मैं सोचता था, लड़की के रूप को देखकर ही पात्र के वाप विना खर्च अपने घर ले जायेंगे। पुलिस के दारोगा के पास इतनी फ़ालतू वात सुनने का वक्त नहीं होता। कहा-ठीक है, डायरी तो कर ली है। आपकी लड़की की खोज-खबर मिलने पर आपके ठिकाने पर आदमी जाकर बतला आयेगा। । जगमोहन बाबू घर लौट आये। तब तक संध्या उतर गयी थी। घर आते ही पत्नी ने पूछा-क्या हुआ ? थाना गये थे ? -हाँ, वहीं से तो आ रहा हूँ। दारोगा वावू ने डायरी लिख ली है । और पूछा, कुमकुम को फ़ोटो है या नहीं। मैंने कहा, फ़ोटो वनवाये नहीं थे। --तो दारोगा वावू ने तो ठीक ही कहा था। बेटी की फ़ोटो इतने दिनों क्यों नहीं उतराये ? ---तुमने ही इतने दिनों कब कहा था, उनकी फ़ोटो उतराने के लिए? पत्नी ने कहा-तुम पुरुप हो, यह सब तुम्हारा काम है ! मैं नारी होकर कहूँ तभी तुम करोगे ? तुम्हारी अपनी कोई बुद्धि- विवेक कुछ नहीं है ? उसके बाद कुछ रुककर कहा-डायरी करने में कितना खर्च हुआ? -खर्च ? डायरी करूँगा, उसमें फिर खर्च कैसा? यह तो पुलिस की ड्यूटी है। पत्नी ने कहा-आजकल विना ख़र्च के क्या कुछ होता है ? 112 / विवाहिता
ने तो कुछ
दारोगा वाबू के हाथ में तुम कुछ थमाकर नहीं आ सके ?
जगमोहन बाबू ने कहा-कहाँ, दारोगा
वावू
माँगा नहीं।
पत्नी ने कहा-धूस क्या कोई मुंह खोलकर मांगता है ? वह
तो पाकेट में ठूसनी होती है। यह मामूली-सी बात भी तुम्हें
बतलानी होगी, तभी तुम समझोगे ?
जगमोहन वावू ने कहा-मैं ठीक समझा नहीं।
उसके बाद वह रात उस घर में कैसे उन्होंने काटी, यह बाहर
का कोई व्यक्ति जान नहीं पाया।
मनुष्य की मौत होती है, मनुष्य के ऊपर दुर्दिन की काली घटायें
आती हैं, मनुष्य की सारी जिंदगी यंत्रणा में छट-पट करती है,
फिर भी मनुष्य चेष्टा करता है, वचने में कोई कमी नहीं रखता।
वह अपने जीवन को बचाने का उपाय करता है। वीमार होने से
डॉक्टर को दिखाता है, विपत्ति में ज्योतिषी की शरण में जाता
है। यही ढर्रा है, तरीक़ा है। उपनिषद् के युग से यही चला आ
रहा है।
फिर भी मनुष्य आशा को छोड़ता नहीं। मनुष्य आशा करता
है, एक दिन उसके यहाँ पुत्र होगा, लक्ष्मी आयेगी। एक दिन
. उसके दुख के वादल छंट जायेंगे। एक दिन वह सुखी होगा।
किंतु सुख ? सुख की व्याख्या क्या है ? शब्दकोश को छोड़कर
कहीं सुख है क्या?
जगमोहन वावू ने भी औरों की तरह सुख की कामना की
थी। उन्होंने सोचा था, संतानों की शादी होते ही वे सुखी हो
जायेंगे। पेंशन की रक़म से उनको कोई अभाव नहीं होगा।
जितने दिन जिंदा रहेंगे, उतने दिन इस पेंशन के रुपयों से ही
?
उनकी कट जायेगी।
किंतु किसी की जिंदगी इतनी सहज नहीं होती। वह करोड़- पति हो या साधारण मनुष्य । सभी का जीवन जटिल है। इस जटिलता के बंधन से छुड़ाने के प्रयास का नाम ही है, विधिलिपि। इस जटिलता के बंधन से छुड़ाने की कोशिश के दौरान ही मनुष्य- जीवन का महाइतिहास है। जगमोहन वाबू के भाग्य अच्छे हैं। लड़की को दूसरे दिन ही ढूंढ़ डाला गया। किंतु यदि वह नहीं ही मिलती तो अच्छा होता। एक टूटे-फूटे बेकार मंदिर में बेहोश-अचेतन अवस्था में वह पड़ी थी। पुलिस आकर उसे उसी अवस्था में स्ट्रेचर पर अस्पताल ले गयी। उस वक़्त खून से सरावोर थे उसके कपड़े। उसके बाद जगमोहन वावू के घर ख़बर पहुँचाई पुलिस ने। जगमोहन बाबू ख़बर पाकर भौंचक रह गये। पूछा-अव मैं क्या करूँ ? -आप और क्या करेंगे, लड़की को अगर देखना चाहते हैं तो अपनी स्त्री के साथ देखने जा सकते हैं। -उसके बाद? -उसके बाद आसामियों पर मामला होगा। हमने तीन आसामियों को पकड़ लिया है। -मामला करने पर तो ख़र्च है। मेरे पास इतने रुपये कहाँ हैं ? पुलिस ने कहा-आपका कोई ख़र्च नहीं लगेगा। पुलिस तमाम ख़र्च देगी। अस्पताल का खर्च भी पुलिस देगी। और आपके वकील का खर्चा भी नहीं लगेगा। तमाम खर्च पुलिस का होगा। पुलिस के चले जाने के बाद जगमोहन वावू थर-थर काँपने लगे। पत्नी ने देखते ही कहा-क्यों, इतना काँप क्यों रहे हो ? 114 / विवाहिता
?
पुलिस क्या कह गयी ? कुमकुम मिली ?
जगमोहन बाबू ने कहा- हाँ, पुलिस ने उसको खोज डाला
है।
-~-खोज लिया है वह तो ठीक है। घर कब आ रही है ?
-वह तो अस्पताल में है।
-~-ज्यों?
जगमोहन वावू ने कहा- मैं सोच रहा हूँ कि उसको घर में
लाना ठीक होगा ? वह तो वर्वाद हो गयी। तीन गुंडों ने मिलकर
उस पर अत्याचार किया है।
पत्नी भी चिंतित हो गयी। वोली-यह भी तो सोचने की
बात है!
-इसीलिए तो मैं सोच रहा हूँ। चंद्रा की शादी तो करनी
होगी। तब ? तब लोग यदि सुनें कि उनकी बड़ी लड़की बर्बाद
हो गयी, तो क्या वर मिलेगा?
-तो क्या होगा?
जगमोहन बाबू ने कहा-यही तो मैं भी सोच रहा हूँ कि क्या
करें? अस्पताल जाकर एक बार देख आऊँ ?
पत्नी ने कहा-नहीं-नहीं, देखने मत जाना। जो करना है
पुलिस करे। पुलिस है, डॉक्टर हैं, जो करना है वे करें। अब उस
लड़की को घर ले आयें तो मुहल्ले के लोगों को मुंह कै
दिखाऊंगी?
-मुझे भी तो वही डर लग रहा है।
- इसका मतलब यह हुआ कि जीवित लड़की वेर्मात मार्ग
जायेगी ? तो वह कहाँ जायेगी!
जगमोहन बाबू ने कहा-फिर भी छोटी लड़की की बात नी
ना है। एक बार सोचो । एक दिन उसका विवाह भी ना करना
होगा!
विवाहिता
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की पुस्तकों में सिर डुवाये रहते हैं ।
वेगम साहिवा ने पूछा-तुम्हारी सेहत खराव है क्या ?
शफ़ीकुल साहब ने कहा-कहाँ, नहीं तो।
-फिर सारे वक्त क्या सोचते रहते हो ?
शफ़ीकुल साहव ने कहा-कोर्ट के एक केस को लेकर बड़े
मेले में फंस गया हूँ।
इसके बाद भोजन छोड़कर उठ खड़े हुए। एक लड़की थी,
शफ़ीकुल साहब के । बीच-बीच में उसके साथ ही वे वात करते।
कैसे उसकी पढ़ाई चल रही है, सव पूछते । किंतु उस दिन कुछ भी
नहीं पूछा।
उस रोज़ रात में उन्हें नींद भी नहीं आयी। वार-बार
कुमकुम का चेहरा आँखों के सामने आ जाता । कुमकुम फ़रि-
यादी और वे आसामी पक्ष के एडवोकेट हैं । साँप-नेवले का संबंध ।
'किंतु दिन-दिन जिगर के किसी कोने में एक सहानुभूति का अंकुर
फूट रहा था। वे वार-बार चेष्टा करने लगे, यह अन्याय है।
उन्होंने आसामी-पक्ष से ढेर सारे रुपये लिए थे, उन्हें जिता देने के
लिए। यह सचमुच अन्याय है । आसामियों ने जितना अन्याय किया
था, उससे कहीं ज्यादा अन्याय उन्होंने स्वयं किया है। वे ही बड़े
अपराधी हैं, आसामी लोग इतने बड़े अपराधी नहीं हैं। कारण,
इनकी तो उम्र कम है, किंतु वे तो उम्र में बहुत बड़े हैं । उनके खुद
के पास भी काफ़ी रुपये हैं, इसके अलावा पैतृक रुपया अलग से
है। उन्होंने जान-बूझकर ऐसा अन्याय किया कैसे, ऐसा अपराध
क्यों किया?
उस दिन कोर्ट के कॉरीडर में सीढ़ियों पर चढ़ते ही मिस्टर
मुल्ला के साथ भेट हो गयी।
मिस्टर मुल्ला ने कहा-इस क़दर रूखा-सूखा तुमको कने
देख रहा हूँ ? तुम्हारा स्वास्थ्य खराव है यया ?
?
Franiरता 117
पूछा-क्यों? thca शफ़ीकुल साहब ने कहा- नहीं, मैं खुद को गिल्टी, माने निज को अपराधी समझ रहा हूँ। मिस्टर मुल्ला ने शफ़ीकुल साहब ने कहा-आपके कारण ! -मेरे कारण ? हाउ इज़ इट दैट ? मैंने तुम्हारा क्या किया है ? -आपने ही तो सर उस रेप केस की ब्रीफ मुझे दी थी। अन्यथा मैं उस केस को सिर पर नहीं लेता। मिस्टर मुल्ला ने कहा-आओ-आओ, तुम मेरे चेम्बर में आओ । देख रहा हूँ, तुम खूब एजीटेटिड हो उठे हो। कहकर शफ़ीकुल साहब का हाथ पकड़ वे अपने चेम्बर में ले गये। ? उसके बाद उन्हें बैठाकर पूछा-अव बोलो, क्या हुआ? शफ़ीकुल साहव सव खुलकर बोलने लगे। कहा- केस मेरे फेवर में है। आसामी सभी रिहा हो जायेंगे। -कैसे समझे ? इवीडेंस कुछ मिला है ? -हाँ। -क्या इवीडेंस? -मैंने प्रमाणित कर दिया है कि जिस दिन इस रेप की घटना हुई उस दिन तीनों आसामी ही यहाँ नहीं थे। पुलिस ने कहा है कि वे एक विवाह-घर में उस दिन निमंत्रण पर गये थे। ~~~-विवाह-घर के लोगों की इवीडेंस क्या है ? -वे भी गवाह बन कोर्ट में आकर बोल गये हैं कि आसामी लोग उस दिन शादी-घर में थे, सुबह से दूसरे दिन सुबह तक । मिस्टर मुल्ला ने कहा-तव तो जजमेंट तुम्हारे फ़ेवर ही में होमा। शफ़ीकुल साहब ने कहा-यह तो जानता हूँ सर, किंतु यह 118/ विवाहिता
भी जानता हूँ कि आसामी लोग उस दिन घर नहीं गये थे। रुपया
देकर जाली गवाह बनाये गये हैं।
-उससे तुम्हें मतलव ? जैसा इवीडेंस मिला, तुमने वैसा ही
किया है।
शफ़ीकुल साहव थोड़ा रुक गये। बात कहने में उन्हें कुछ देर
हु
4ux
?
कहा- नहीं सर, देखा, इतने दिनों से मामला चल रहा है,
किंतु लड़की के पिता, माँ कोई भी एक दिन भी कोर्ट में नहीं आ
रहे हैं।
मिस्टर मुल्ला ने कहा-वे नहीं आते हैं, इसका तुम क्या कर
सकते हो? तुम ज़ोर-जवरदस्ती कर उन्हें कोर्ट में बुला तो नहीं
सकते।
शफ़ीकुल साहब ने कहा-लड़की को देखकर मुझे बहुत कष्ट
होता है सर। लड़की तो इनोसेंट है।
-हो न इनोसेंट। तुम सिर्फ अपने इवीडेंस से केस पर
सोचोगे । इतना सेंटीमेंटल होने पर तुम कभी भी बड़े वकील नहीं
हो सकोगे।
शफ़ीकुल साहव ने कहा--किंतु इसे जानते हुए भी मन को
रोक नहीं पाता । मैं भी तो पिता हूँ। मेरे भी वैसी ही एक लड़की
है।
मिस्टर मुल्ला ने कहा-मैं जानता हूँ तुम्हारे तो एकमात्र
लड़की है।
-नहीं सर, मेरे और एक लड़की थी। वह दसवीं क्लास में
पढ़ती थी। उसका नाम था कुमकुम । मेरी स्त्री ने बड़े स्नेह से
उसका नाम रखा था कुमकुम ।
मिस्टर मुल्ला ने कहा-मुसलमान लड़की का हिंदू नाम ?
-मेरी स्त्री सर ईस्ट बंगाल की लड़की है। मेरी शादी ईस्ट
विवाहिता | 119
बंगाल के एक घर में हुई थी।
-उसके बाद?
शफ़ीकुल साहब ने कहा-वह दसवीं क्लास में पढ़ती थी।
अपनी लड़की को मैं बहुत चाहता था। ठीक इसी कुमकुम के
शरीर जैसा ही रंग था उसका। वह हठात् मर गयी। उसके बाद
से मेरी स्त्री का शरीर, मन सव-कुछ खराब हो गया। बहुत दिनों
तक उसे सेंट्रल हॉस्पिटल में रखना पड़ा। आज जिन आसामियों
के पक्ष में मैंने बीफ ली है, उन्होंने उसी कुमकुम का रेप कर उसके
जीवन को नष्ट कर दिया है। यह बात मैं भूल नहीं पाता।
मिस्टर मुल्ला ने पूछा-तो फिर क्या करना तय किया है ?
शफ़ीकुल साहब ने कहा-केस किया है, केस करता जाऊँगा।
-गुड । वेरी गुड। प्रोफ़ेशन के साथ फ़ेमिली लाइफ़ को न
जोड़ना ही अच्छा है। तुम क्या सोचते हो, आसामी रियल कलप्रिंट
हैं ?
शफ़ीकुल साहब ने कहा--हाँ।
-उसके लिए तुम्हारा विवेक रोक तो नहीं लगा रहा है ?
शफ़ीकुल साहब ने कहा-मैं विवेक के गले की टूटी दवाये
डिफेंस करता आ रहा हूँ।
--गुड । वेरी गुड। तुम्हारे जीवन में और भी उन्नति होगी
शफ़ीकुल । आई विश यू ऑल सक्सेस ! यदि हो सके तो अपनी
स्वर्गीय लड़की की कथा भूल जाओ।
शफ़ीकुल साहब ने कहा-भूलने की चेप्टा तो करता हूँ जी-
नोड़।
-अपनी औरत को इस मामले के बारे में मत बताओ।
फमिली इज़ फ़ेमिली, प्रोफ़ेशन इज़ प्रोफ़ेशन। दोनों को एक मत
करो। अपने इस मामले को लेकर औरत से बात मत करो।
कहकर मिस्टर मुल्ला अपने काम से चले गये।
120/विवाहिना
जगमोहन वावू के दिन अव कट नहीं रहे थे। लड़की को लेकर
मामला हो रहा है। मुहल्ले के लोगों को चेहरा नहीं दिखा पा रहे
हैं। मुहल्ले के लोग, खासतौर से महिलाएँ आती हैं।
कहती हैं तुम्हारी लड़की की ख़बर क्या है दीदी ? कुककुम
की?
जगमोहन वाबू की पत्नी प्रश्न सुनकर और भी दुखी होती।
वह क्या जवाव दे? लड़की की वात सोचने पर रात में नींद नहीं
आती, दिन में पति का चेहरा देखकर डर लगता। फिर भी दुनिया
विलकुल रुक नहीं जाती। रात के अंधकार में जगमोहन बाबू
बाज़ार का थैला लेकर, जो-सो, कुछ शाक-पात-आलू-अरबी
खरीद लाते हैं। भाग्य में कुछ भी हो, पेट तो यह सुनता नहीं।
प्रकृति अपनी माँग की पूर्ति जैसे-तैसे कर ही लेती है। इसीलिए
इस दुनिया में गृहिणी को रोज़ चूल्हे में आग फूंकनी ही पड़ती है,
खाना भी बनाना पड़ता है, खाना भी पड़ता है।
ऐसी ही हालत में एक दिन दरवाजे पर खट-खट की आवाज़
हुई।
पहले जगमोहन वाबू दरवाज़ा नहीं खोलना चाहते थे। किंतु
खट-खट शब्द अभी भी हो रहा था।
अंदर से उन्होंने पूछा-कौन ?
वाहर से किसी के गले की आवाज़ आयी-हम 'नारी-
कल्याण आश्रम' से आ रहे हैं ।
'नारी-कल्याण आश्रम' से उनका क्या संबंध है, यह वे समझ
नहीं पाये। जिस बात को वे भूलना चाहते थे, उसी बात को फिर
सुनाने के लिए आये हैं क्या?
जगमोहन वावू ने दरवाजा खोलकर देखा कि वाहर 'नारी-
कल्याण आश्रम' के सेक्रेट्री खड़े हुए हैं।
सज्जन ने कहा-मैं आपकी लड़की के बारे में कहने आया
हु
विवाहिता / 121
हूँ। आपकी लड़की कुमकुम आपके पासआना चाहती है। माँ-बाप को वह देखना चाहती है वहुत, उसकी एक छोटी बहन है, उसको भी वह देखना चाहती है। जगमोहन वावू तो गुस्से में थे ही। यह वात सुन और भी क्रोधित होकर उन्होंने दरवाज़े के पल्ले झट से बंद कर दिये। सज्जन के साथ और बात करना उन्होंने ज़रूरी नहीं समझा। किंतु पता नहीं क्या सोचकर उन्होंने फिर दरवाज़ा खोल दिया। कहा-मेरी लड़की को कह दीजियेगा कि वह मेरी कुछ नहीं है। हम उसको भूल गये हैं ! कहकर पिछली बार की भाँति झट-से दरवाजा बंद कर निःश्वास छोड़ दम लिया। गृहिणी भी पीछे से सब सुन रही थी। पूछा-वह आदमी फिर आया था ? जगमोहन वाबू ने कहा-हाँ, देखो ना, लड़की को देखने जाने के लिए कह रहे थे। मैंने साफ़ कह दिया है कि वह मेरी कोई नहीं उसे भूल गृहिणी ने कहा-ठीक किया, ठीक किया ! है। हम गये हैं। -- केशव शर्मा कहानी कह रहे थे। इस बार कुछ दम लिया। पूछा-उसके बाद? -उसके बाद एक दिन केस का फ़ैसला हुआ। -जज साहब ने क्या राय दी? केशव शर्मा ने कहा-आसामी लोग वेकसूर घोपित हो गये। -यह क्या? केशव शर्मा ने कहा-हाँ, रुपये के बल पर आज के युग में सब-कुछ संभव है। गवाहों ने सावित कर दिया कि घटना के दिन 122 / विवाहिता
बुधुआ, चौबे और रामखेलावन तीनों दोस्त मिलकर रिश्तेदार के
यहाँ शादी निमंत्रण पर गये हुए थे। शफ़ीकुल हुसैन साहब ने भी
फ़ैसला सुना। उसके बाद वहाँ खड़े नहीं रहे। अपना गाउन खोल
सूटकेस में रख, तुरंत अपने घर चले गये।
बेगम साहिबा घर लौटे पति को देखकर जैसे अवाक् रह
गयीं।
पति के माथे पर हाथ लगाकर पूछा-इतनी जल्दी कोर्ट से
आ गये ? तुम्हें बुखार तो नहीं है
उसके बाद फिर पति के माथे पर हाथ लगाकर देखा।
कहा-हाँ, जो कहती हूँ, ठीक ही है। तुम्हें बुखार है।
डॉक्टर को बुलवाती हूँ।
शफ़ीकुल हुसैन साहब ने मना किया।
कहा-नहीं, डॉक्टर साहब को नहीं बुलाना होगा। यह
बुखार नहीं है।
वेगम साहिबा ने कहा-यह बुख़ार नहीं है तो और कर
है फिर?
-यह यूँ ही ठीक हो जायेगा। मैंने अपनी लड़की के
एक बार खून किया है !
-यह तुम क्या कह रहे हो ?
-हाँ, ठीक कहता हूँ। कुमकुम मर गयी है।
वेगम साहिवा और भी भौंचक रह गयीं।
-तुम कह क्या रहे हो ? वह तो बहुत पहले
-
थी।
शफ़ीकुल हुसैन साहब ने कहा-बहुत -
आज मैंने खुद अपने हाथ से खून किया है !
उसके बाद अपने दोनों हाय दिन्द्राकर करावं
भी दोनों हाथों में खून के दाग लगे हैं।
-
वेगम साहिवा भौंचक्की हो पति की ओर निहारने लगीं।
कहा-कहाँ रक्त के दाग़? तुम क्या कह रहे हो? तुम पागल
हो गये हो क्या ?
शफ़ीकुल हुसैन साहब ने कहा-हाँ-हाँ, मैं पागल ही हो गया
। तुम मुझे और परेशान मत करो, तुम जाओ, चली जाओ यहाँ
-
Phccilm
!
कहकर उन्होंने वेगम साहिवा को हाथ से धक्का दिया और
धकेलकर दरवाज़े से बाहर कर दिया तथा अंदर से दरवाजे की
जंजीर लगा दी।
दूसरे दिन जव अच्छी तरह भोर भी नहीं हुई थी। वे किसी
को बिना बताये पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गये । धीरे-धीरे
सड़क पर चलने लगे । अभी भी अच्छी तरह लोग-बाग सड़क पर
चल-फिर नहीं रहे थे। साइकिल-रिक्शे भी ज्यादा नहीं निकले
थे। कुछेक दूर पैदल चलने पर एक साइकिल-रिक्शा मिला।
उसी साइकिल-रिक्शा पर चढ़कर बोले-चलो!
ठिकाना उनको स्मरण था। नंदन शाहू गली, चौक। धीरे-
धीरे सुबह हो गयी। आकाश क्रमशः रक्तिम हो उठा। रास्ते में
लोग चलने-फिरने लगे। अधिकांश आदमी गंगा-स्नान को जा रहे
थे।
पुलिस-चौकी के क़रीव वे उतरे। रिक्शावाले को भाड़ा
चुकाये । उसके बाद रास्ते के लोगों से पूछकर ठिकाने की अच्छी
तरह जाँच कर ली। नंदन गाहू गली, चौक । यथास्थान पहुँचकर
एक दफ़ा इधर-उधर देखा। दोनों तरफ़ बड़े-बड़े तीन-चार-तल्ले
आपस में अटे-सटे मकान। वीच से सीधा बंधा हुआ रास्ता।
इतने सुवह भी दो-एक साँड गली को रोके पागुर कर रहे थे।
एक आदमी से पूछा-जगमोहनजी का मकान कौन-सा है ?
एक राहगीर ने बतलाया वहीं, वही तो।
124 / विवाहिता
शफ़ीकुल हुसैन साहब ने घर के सामने जाकर दरवाजा
खटखटाया।
अंदर से कोई क्रुद्ध होकर चिल्ला उठा-फिर आये हो? कह
तो रहा हूँ, मेरी कुमकुम मर गयी है
शफ़ीकुल साहब ने कहा-मैंने ही उसे मार डाला है
जगमोहनजी !
अंदर से उसी गुस्से वाले गले से आवाज़ आयीं-वार-बार
आप क्यों आते हैं ? मेरी लड़की नहीं है। हमारी कुमकुम मारी
गयी है। आप चले जाइये और कभी मत आना'निकलो,
निकलो यहाँ से
शफ़ीकुल हुसैन साहव और वहाँ नहीं खड़े रहे। समझ गये कि
कुमकुम के माँ-बाप नहीं चाहते कि वह लड़की घर लौटे।
फिर रिक्शे पर चढ़ घर लौट आये। उस वक्त दल-के-दल
पुण्य-संचयकारी लोग गंगा-स्नान को जा रहे थे संस्कृत के श्लोक
का उच्चारण करते हुए।
अपने घर के जिस रास्ते से जिस तरह निकले थे, उसी तरह
वापस आ गये।
किंतु बेगम साहिवा की नज़रों से बच नहीं पाये।
वेगम साहिवा ने पूछा-क्या हुआ, इतने भोर में कहाँ गये
थे तुम?
शफ़ीकुल साहव उनकी वात का जवाव न दे अपने कमरे के
अंदर चले गये।
वेगम साहिवा भी पीछे-पीछे गयीं।
पूछा-सच, क्या हुआ है तुमको, बतलाओ तो?
शफ़ीकुल हुसैन साहब ने कहा-एक ही वात वार-बार क्यों
पूछती हो ? कह तो रहा हूँ, मैंने अपनी कुमकुम का फिर खून
किया है।
?
विवाहिता / 125
?
वेगम साहिबा ने कहा-तुम क्या अंटशंट वक रहे हो ? तुम
पागल हो गये हो क्या ?
शफ़ीकुल साहब ने कहा-पागल ? पागल अगर हो जाता
तो वच जाता। मैंने जो पाप किया है, उससे पागल होना ही मेरे
लिए ठीक था ! सच, क्या करने से पागल हुआ जा सकता है ज़रा
बताओ तो सही?
वेगम साहिबा ने उसी दिन डॉक्टर को बुलवा लिया।
डॉक्टर दवा दे गया। कहा-ज्यादा काम करने के कारण
ही ऐसा हुआ है। कुछ आराम करना होगा।
कोर्ट जाना बंद। मुवक्किल लोग घर आकर लौट जाते।
मिस्टर मुल्ला भी खवर पाकर एक दिन आये।
पूछा-क्या हुआ है तुम्हें हुसैन ?
शफ़ीकुल हुसैन साहब ने सव वतला दिया। नींद नहीं आती।
सारी रात जगकर काटते हैं। भूख भी नहीं। चलने में कप्ट । दोनों
पाँव बड़े भारी मालूम होते हैं । सिर भारी रहता है और कुछ भी
अच्छा नहीं लगता।
मिस्टर मुल्ला भी कह गये कुछ दिनों रेस्ट लो। तुम्हें तो
और रुपयों की ज़रूरत नहीं है। तुम कुछ दिनों के लिए और ब्रीफ
मत लो।
सच ही तो रुपये का अभाव नहीं है शफ़ीकुल हुसैन साहब के
यहाँ । पैतृक प्रचुर संपत्ति ! पूर्व-पुरुष उत्तर प्रदेश के ज़मींदार
थे। जीवन में उन्होंने कभी नौकरी अथवा व्यवसाय नहीं किया
कभी। केवल हुकूमत की है और वैठे-बैठे ज़मीन की फ़सल का
हिस्सा लिया है। विभिन्न शहरों में मकान बनवाये । इलाहाबाद,
वाराणसी, गोरखपुर, कानपुर--सभी स्थानों पर उनके मकान
रहे। वे तमाम एक-एक मकान अब पाँच-छह लाख रुपयों में विके
है । शफीकुल साहब ही अपने वंश में एकमात्र व्यक्ति हैं, जिन्होंने
--
वकालत करतेमादा किया और इसे भी शौजिला बालन
ही कहना चाहिए।
एक नाम विजाने पर पड़े-पड़े दे दलांत हो । उसको बाद
और सो नहीं सके। एक दिन उठ खड़े हुए।
वेगम साहिबा चकित!
पूछा-किधर जा रहे हो?
बाहर!
वेगम साहिबा ने कहा-तुम्हें जो डॉक्टर साहब ने सोये रहने
को कहा था ?
-बोलने दो! कहकर उन्होंने गाड़ी जोतने के लिए :
दिया। गाड़ी जुतने पर वे उस पर बैठ गये।
उसके वाद वोले-चलो नारी-कल्याण आश्रम ।
'नारी-कल्याण आश्रम' इस शहर के एक कोने में बहुत-शी
जगह को घेरकर खड़ा था वहुत अर्से से। जिनका कोई नहीं, जिन
महिलाओं को देखने वाला कोई नहीं, अथवा अनाथ नि:संतान
उन्हीं का आश्रय-स्थल है यहाँ का यह 'नारी-बाल्याण आश्चग'।
कुमकुम को भी पुलिस ने यहीं रखा था।
कई दिनों से विछौनें पर सोये-सोये सोचते रहते थे कि जिस
प्रकार लड़की की मदद की जाये। खुद के माँ-बाप तया ने जिरी
२ नहीं अपनाया, उसे निश्चित रूप से तकलीफ़ हो रही है। उन्होंने
जो अन्याय किया है, उसकी क्षतिपूर्ति करना चाहते हैं।
'नारी-कल्याण आथम' के सामने गेट पर पहरे की व्यवस्था
हैं दिन-रात। ऊँची दीवार में मकान घिरा हुआ है।
शफ़ीकुल हुसैन साहब ने आश्रम के सामने जाकर भीतर जाग
की आज्ञा माँगी। अंदर आदमी गया। साथ-साथ एक राजन
वाहर आये।
शफ़ीकुल साहब ने अपना परिचय दिया।
,
उक्त सज्जन ने कहा-आप कुमकुम के मामले में आसामी-
पक्ष के वकील थेन?
शफ़ीकुल हुसैन साहब बोले-हाँ, इसीलिए मैं उसके साथ
एक दफ़ा भेंट करना चाहता हूँ।
-~~-क्यों?
--मैंने उस पर जो अन्याय किया है, उसके लिए प्रायश्चित
करना चाहता हूँ।
-----प्रायश्चित ? कैसे करेंगे प्रायश्चित ?
-~-मैं उसे कुछ रुपये दूंगा। मैं उससे माफ़ी माँगूंगा। मैं उसके
घर पर भी गया था। किंतु वहाँ किसी ने मुझसे भेंट नहीं की।
इसीलिए इस 'नारी-कल्याण आश्रम' में आया हूँ।
-किंतु उससे तो भेंट नहीं हो सकती।
-~-क्यों?
-वह अव यहाँ नहीं है।
-यहाँ नहीं तो गयी कहाँ ?
--यह हम नहीं जानते। हमें या किसी को विना वताये एक
दिन सभी की नज़र बचाकर पता नहीं किस देश में अज्ञातवास
किया है। हमने काफ़ी तलाश की, किंतु उसे कहीं भी खोज नहीं
-
पाये।
वह कितने दिन पहले यहाँ से चली गयी ?
-एक मास से भी ज्यादा दिन हो गये।
गफ़ीकुल हुसैन साहब समझ गये कि मामले का फैसला होने
पर जब वे एक महीने विस्तर पर पड़े थे, तभी यह हादसा हो
गया । वे पुनः उसी गाड़ी से घर लौट आये।
वेगम साहिबा उनका चेहरा देख दंग रह गयीं।
पूछा-तुम्हारा चेहरा ऐसा कैसे हो गया ? कहाँ गये थे ?
शफ़ीकुल हुसैन साहब ने कहा-वह सब तुम नहीं समझ
128/विवाहिता
--
पाओगी। इतने दिनों मैंने जो कुछ पढ़ा अथवा किया वह सव
ग़लत था। मैं तमाम जीवन भर भूलें ही करता रहा।
अचानक ऐसी वात क्यों कहते हो ?
-यह मुझसे न पूछो। इतने दिनों मैंने झूठ-मूठ की नमाज़
पड़ी है, ईद का रोजा किया, उपवास किया। मेरी जिंदगी ही
वेकार हो गयी।
-इसका मतलव ?
शफ़ीकुल साहब ने कहा-इसका मतलव जानने की इच्छा मत
करो। मेरे जो मन में आता है, वही तुम्हें कह रहा हूँ। मैं कुछ
दिनों के लिए बाहर जाना चाहता हूँ, इन सब से बाहर। यदि
मेरी इच्छा पूर्ण हो गयी तो पुनः आ जाऊँगा। तुम लोगों को तो
कोई कमी नहीं है । मैं तुम लोगों के लिए भरपूर संपत्ति छोड़े जा
रहा हूँ। रुपये के लिए तुम लोगों को कोई तकलीफ़ नहीं होगी,
यह विश्वास करो।
यह कहकर अपने कमरे में चले गये और फिर दरवाज़ा बंद
कर लिया
कितने ही दिन बड़ी अशांति के रहे। बेगम साहिवा ने सोचा,
जरूर उनके पति पागल हो गये हैं। ये सव ही तो पागलपन की
निशानी हैं । इसे ही तो विकार कहते हैं। मनोविकार।
वेगम साहिवा ने डॉक्टर बुलवाया। मन के रोग का डॉक्टर।
किंतु शफ़ीकुल साहव ने वग़ावत कर डाली। डॉक्टर से क़तई
नहीं मिले। डॉक्टर हताश हो फ़ीस लेकर चला गया।
उस दिन चपरासी ने आकर खवर दी-तीन आदमी मिलना
चाहते हैं । वे बैठकखाने में बैठे हैं।
अनिच्छा होने पर भी शफ़ीकुल साहव वैठकखाने में गये।
देखा, तीन लड़के हैं। वे ही तीन आसामी वुधुआ, चौवे और
विवाहिता | 129
रामखेलावन, जिनको उन्होंने कठघरे से, आसामियों के कठघरे से, कानून के कूट-दाँव से, मुक्त करवा दिया था ! -तुम लोग ? तीनों ही कुर्सी छोड़कर खड़े हो गये। कहने लगे-~आपके लिए कुछ इनाम लाये हैं वकील साहब ! -इनाम ? कैसा इनाम ? लड़कों ने एक थैले में से दो ह्विस्की की बोतल और जेब से कुछेक बंडल नोट निकालकर टेविल के ऊपर रख दिये। --ये सब आपका इनाम है। आपकी मेहरवानी की खिदमत है। आपने हमें जेल से बचा दिया। आपने हमारा जो उपकार किया है, उसी की यह मामूली भेंट है, और कुछ नहीं-ये दो बोतल असली स्कॉच ह्विस्की की हैं, और इसमें दस हजार रुपये उनकी बात ख़त्म होने के पहले ही शफ़ीकुल हुसैन साहब की दोनों आँखें करौंदे जैसी लाल हो उठीं। उसके बाद उन्होंने एक कांड कर डाला। लड़कों के सिर को निशाना बनाकर उन्होंने दोनों बोतलें फेंक मारी। लड़कों के सिर वचा लेने पर, वोतलें दीवार से टक- रायी और झन-झन की आवाज़ हुई। और नोट भी उनके ऊपर फेंक मारे। मुंह से शब्द निकलने लगे-हरामजादे, बदतमीज़, शैतान ! निकलो यहाँ से! तीनों लड़के वहाँ नहीं रुके, घर छोड़ बाहर आ, इधर-उधर जहाँ-कहीं रास्ता मिला, ग़ायब हो गये। शफ़ीकुल साहब का शोर सुन, अंदर से उनका चपरासी दौड़ा आया । वेगम साहिबा भी दरवाजे के पीछे आकर खड़ी हो गयीं। किंतु शफ़ीकुल माहब का ऐसा शोर, ऐसा गाली-गलौज़ उनके चपरानी ने कभी सुना नहीं था। 130/ विवाहिता ( ---मुझे इनाम देने आये थे ! इनाम ! उसके बाद चपरासी को देखकर वोले-एक दियासलाई लाओ! चपरासी दियासलाई ले आया। शफ़ीकुल साहव ने उसे आदेश दिया—इन रुपयों में आग लगा दो, जलाकर खाक कर दो! अव बेगम साहिवा खुद को रोक नहीं पायीं । वोलीं-यह सव क्या हो रहा है ? --मुझे इनाम देने आये थे वे। जानती हो ?-- शफ़ीकुल साहव ने कहा। --कौन ? कौन इनाम देने आये थे ? कैसा इनाम ? शफ़ीकुल साहब ने कहा-मैं आग से जल रहा हूँ और वे मेरे चावों पर नमक छिड़कने आये थे''मुझे नरक में पहुँचाना चाहते थे, इतने बड़े शैतान, हरामजादे, वदतमीज़ वे... -कौन ? तुम किसकी बात कह रहे हो ? शफ़ीकुल साहब ने कहा-वह तुम नहीं समझोगी। तुम औरत की ज़ात होकर सव वातें क्यों समझना चाहती हो ? तुम भीतर जाओ, दफ्तर के कमरे में क्यों आयी हो ? वेगम साहिवा फिर भी नहीं गयीं। देखने लगीं, नोटों को दियासलाई की तीली से जलाकर राख होते हुए। जव सब नोट जलाये जा चुके, पूरे दस हज़ार रुपये राख हो गये, तव शफ़ीकुल हुसैन साहब अपने निजी कमरे में चले गये। बेगम साहिबा भी पीछे-पीछे आ रही थीं। बोलीं-तुम खाओगे नहीं? शफ़ीकुल साहब ने कहा-आज मुझे भूख नहीं है—कहकर अपने कमरे में चले गये, दरवाज़ा बंद कर बिस्तर पर लेट गये। कुछ मुवक्किल घर आये। एक के बाद एक। सभी निराश ? - 41 होकर लौट गये। वकील साहब की तबीयत खराव । आज किसी के साथ भेंट नहीं होगी। सिर्फ उसी दिन नहीं दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ । और उसके बाद वाले दिन भी ऐसा ही। उसके बाद कोई भी शफ़ीकुल हुसैन साहब को देख नहीं पाया। उन्होंने किसी के साथ भी भेंट नहीं की। वेगम साहिवा ने पूछा-क्या हुआ ? तुम कोर्ट नहीं जाओगे? शफ़ीकुल साहब ने कहा-नहीं, और कोई मामला नहीं लूंगा। किंतु तुम कुछ चिंता मत करो, तुम्हें खाने-पहनने का कोई कष्ट नहीं होगा, किसी भी दिन । दुनिया के बहुत-से लोगों के जीवन में अचानक एक ऐसी घटना घटती है जिसके फलस्वरूप उनके जीवन की यात्रा के मोड़ ने उलट कर उन्हें विलकुल एक दूसरे इन्सान के रूप में परिवर्तित कर दिया है। । शफ़ीकुल हुसैन साहब की जिंदगी में भी ठीक ऐसा ही हुआ। एक दिन सुबह नींद से उठने पर बेगम साहिबा ने अपने पति को कहीं नहीं पाया। घर की नौकरानी, चपरासी, बावर्ची, खान- सामा सभी से पूछा । कोई भी उन्हें कोई संकेत नहीं दे पाया। काफ़ी देर बाद जबकि दिन काफ़ी ऊपर चढ़ आया था, वेगम, माहिया ने पति के तकिये के नीचे एक पत्र पाया। साहब अपने हाथ से लिखकर गये थे। चिट्ठी यूँ है : "प्यारी वेगम साहिवा, तुमको न कहकर आज घर छोड़कर जा रहा हूँ। चला ज़रूर जा रहा हूं, किंतु हमेशा के लिए नहीं। तुम मुझे ग़लत मत समझना ! मैं न तो पागल हुआ हूँ और न दीवाना ही हुआ हूँ। कह सकती हो, मैं खुद को खोजने जा रहा हूँ। जब 132 / विवाहिता - मैं खुद को पा लूँगा, तो फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगा। तुम्हारे लिए काफ़ी रुपये रखे हुए हैं, जो तुम जानती हो। इतना ही क्यों, मैं जनाता हूँ, तुम लोगों को रुपये की कभी कमी नहीं होगी। यह मत सोचो कि मैं हमेशा-हमेशा के लिए चला जा रहा हूँ। हमेशा के लिए जाने में अभी देरी है। अभी तो मैं 'खुद' को खोजने में भटक रहा हूँ। पूछ सकती हो कि जब जा रहा हूँ तो तुम्हें विना वतलाये क्यों जा रहा हूँ ?किंतु बतलाने पर क्या तुम मुझे जाने देती ? जो हो, मैं चला। सिर्फ यही कहकर जा रहा हूँ कि मेरा दिमाग़ ख़राब नहीं हुआ है। मैं फिर आऊँगा, वचन देता हूँ। इति मेरा..." सके बाद और कोई समाचार नहीं है, शफ़ीकुल हुसैन साहब का। मिस्टर मुल्ला ने खवर लेकर मालूम किया कि शफ़ीकुल हुसैन अपना घर छोड़ कुछ दिनों के लिए लक्ष्यहीन हो गये हैं। उन्होंने खवर सुनते ही महसूस किया कि शफ़ीकुल हुसैन वकील होने के लायक नहीं हैं । दया-माया अभी भी जब है तो उनके लिए और कामयाव वकील बनना मुमकिन नहीं है। उधर शफ़ीकुल हुसैन साहव पास ही इलाहाबाद जा पहुंचे साथ में ट्रेवलर्स चेक रखे थे। ज़रूरत होने पर बैंक से भुना लेंगे। होटल में रुके थे। होटल के मैनेजर ने सवाल किया-किस काम से आये हैं यहाँ ? शफ़ीकुल साहब ने जवाव दिना-यूं ही, घूमने । -कितने दिन रहेंगे? -कोई ठीक नहीं है। ठीक का पता कैसे चले ? हो सकता है, पाँच दिन भी लग जायें, और पच्चीस दिन भी लग सकते हैं। फिर भी चेप्टा करनी होगी। इलाहावाद छोटा शहर नहीं है। कोई भी शहर छोटा नहीं रहा। कम-ज्यादा आजकल सभी शहर बढ़े हैं। जनसंख्या बढ़ती विवाहिता
।
ही जा रही है। भीड़ के अंदर कहाँ छिपी हुई है कुमकुम, उसे खोज
निकालना ही होगा।
एक-एक दिन, एक-एक वस्ती में जाकर खड़े हो जाते।
कुछ लोगों को पूछते-अच्छा वतला सकते हैं, यहाँ कुमकुम
नाम की कोई लड़की है।
इस तरह रोज़ ही विभिन्न पेशे के लोगों से एक ही सवाल
करते बाज़ार में घूमते रहते । सभी प्रश्न सुनकर चकित रह जाते
पूछते-कितनी उम्र?
--यही पंद्रह-सोलह होगी।
लोग समझते आदमी पागल है। पूछते-आपकी लड़की है
खो गयी है ?
शफ़ीकुल साहव कहते-हाँ, मेरी लड़की। घर से भाग गर्य
थी!
-तो पुलिस में खबर नहीं दी ?
शफ़ीकुल साहब इस बात का कोई जवाब नहीं देते। वहाँ से
फिर चले जाते। एक मामूली-से होटल में चले गये। बड़े होटल में
रहने के लिए पैसे कहाँ हैं उनके पास जो ठहरें।
इसीलिए बड़े होटल से तुरत-फुरत सामान समेटकर किर्स
छोटे होटल में ठहर जाते।
मैनेजर से पूछते-कुमकुम नाम की किसी भी लड़की को देखें
हैं ?
-- कुमकुम ? वह आपकी क्या है ?
शफ़ीकुल हुसैन साहब कहते-वह मेरी बेटी है।
~~~घर से भाग गयी है ?
-~जी।
--उसे खोजने ही, मालूम होता है, इलाहाबाद आये हैं ?
हैं
?
-~-जी।
?
तव तो हो गया। इलाहावाद को छोटा शहर समझ लिया
है क्या ? पुलिस में खवर दी ?
-हाँ।
-वे क्या कहते हैं ?
जफ़ोकुल साहब ने कहा-पुलिस की बात छोड़ दीजिये । वे
अपनी ड्यूटी करते हैं क्या ? वे अगर अपनी ड्यूटी करते होते तो
देश कुछ और ही होता। उनका दोष भी फिर क्या है ? हमारा
भारत क्या एक छोटा देश है ? साठ-सत्तर करोड़ लोगों का यह
देश है, यहाँ कौन किसकी खवर रखता है ?
होटल के मैनेजर को काफ़ी कौतूहल हुआ।
-उसी लड़की को आप खोजने निकले हैं क्या?
-हाँ ।
-कहाँ-कहाँ गये हैं ?
-यहीं इलाहाबाद में ही पहले आया हूँ। कुछ दिनों
वाराणसी में खोजा, वहाँ न पाकर इलाहाबाद में आया हूं।
-और कहाँ-कहाँ घूमेंगे ?
-सारे भारत में खोचूंगा।
-यदि खोज न पाये तो? कितने दिन खोजते रहेंगे ?
अगर नही खोज पाया तो घर वापस नहीं जाऊंगा।
-आप क्या आशा करते हैं कि अंत में उसको खोज सकंग ?
यदि आत्महत्या कर ली हो तो?
शफ़ीकुल माहव ने कहा-यह भी मुमकिन हो सकता है।
किंतु मैं जितने दिन जीवित हूंगा, उतने दिन उमे बांजता न्हंगा ।
हो सकता है, एक जिंदगी में न बोज पाऊँ, किन जितनी बार
धरती पर जन्म लूंगा, उतनी बार खोजना रहेगा। व्ही मंग
प्रायश्चित है।
पता नहीं, मैनेजन ने वान सुनकर क्या मात्रा । हाम्क
? पागल समझा हो । वेगम साहिबा ने भी उन्हें पागल समझा था। उन्हें क्या हुआ ? पागल होना क्या आसान है ? मैनेजर ने कहा-आज के अख़बार में एक विज्ञापन देखा था, यह क्या आपने ही दिया है ? कहानी कहते-कहते केशव शर्मा रुक गये । मैंने पूछा-उसके बाद? उसके बाद एक के बाद एक वर्ष बीतने लगे। शफ़ीकुल साहब भी एक प्रांत से दूसरे प्रांत गये। कश्मीर से कन्याकुमारी, डिग- वोई से द्वारका, चारों ओर घूमने लगे शफ़ीकुल साहब । दिन, महीने, बरस, शीत, ग्रीष्म, वर्ग, शरद्, हेमंत देखते-देखते कट गये। सभी स्थानों पर जाने पर होटल में ठहरते । जहाँ होटल नहीं, वहाँ धर्मशाला। जहाँ यह भी नहीं, वहाँ स्टेशन के वेटिंगरूम में । सिर के बाल धीरे-धीरे पक गये । शरीर टूट गया। एक बार अपने शहर में आये। आने पर सुना, बेगम साहिबा का इंतकाल हो गया है। शफ़ीकुल साहव घर आये हैं, सुनकर हम सभी उन्हें देखने गये। देखा, चेहरा एकदम बदल गया है। चेहरे पर उम्र की छाप थी। उनकी संपत्ति की जो देखभाल करते हैं, वे भी आये। उन्होंने सभी के साथ वात की। किसको क्या करना है इस वारे में निर्देश दिया। लड़की ससुराल में थी। उसकी बात भी बोले । अपनी वेगम साहिवा की बात कही। बोले-देखिये शर्माजी, मेरे जीवन में ऐसी दुर्घटना घटेगी इसकी पहले तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी। कहते जा रहे थे-आप नहीं जानते शर्माजी, मैंने अपनी बेगम साहिवा के ऊपर किस तरह के अत्याचार किये हैं जबकि उसका - 136/ विवाहिता
?
तो कोई दोष नहीं था। उसको घर में छोड़कर मैं वर्षों अकेला
सारे भारत में घूमता रहा और उसने मेरे तमाम अत्याचारों को
चुपचाप वर्दाश्त किया।
मैंने कहा-किंतु क्या आप सोचते हैं कि आप किसी दिन
कुमकुम को खोज पायेंगे?
शफ़ीकुल ने कहा-नहीं ही खोज पाया, किंतु चेष्टा करने में
हर्ज क्या है ? अल्लाह-ताला को भी तो आज तक कोई नहीं खोज
पाया, किंतु उसकी खोज में क्या विराम आया है ? उसे खोजना
एक तरह से अपने आपको खोजना ही तो है ! आत्मानुसंधान ।
उसके बाद एक दिन एक आश्चर्यजनक घटना हुई।
एक दिन राजकोट गये हुए थे। ठीक इसी ढंग के होटल में
रुके थे और उन्होंने राजकोट के अखवार में विज्ञापन दिया था।
एक दिन होटल में एक महिला आ पहुंची।
आप कुमकुम को खोज रहे हैं, मैं ही वह कुमकुम हूँ !
शफ़ीकुल साहव ने अच्छी तरह देखा।
पूछा-तुम्हारा नाम कुमकुम है ?
लड़की ने कहा-हाँ, आप तो कुमकुम ही को खोज रहे थे
न ? मैं ही वह कुमकुम हूँ।
शफ़ीकुल साहब ने पूछा- तुम लोग क्या वाराणसी के हो ?
लड़की ने कहा-नहीं, तमिलनाडु के ।
-तुम्हारे पिताजी का क्या नाम है ?
-थीरन रामचंद्रन।
शफ़ीकुल साहव ने कहा-नहीं, मैं खोज रहा हूँ वाराणसी
के जगमोहन दास की लड़की कुमकुम दास को।
लड़की हताश होकर चली गयी। उसी दिन शफ़ीकुल हुसैन
साहब रोजकोट छोड़कर चले आये।
उसके बाद यूँही कई वरस बीत गये। फिर एक दिन यहाँ
।
लौटे । खबर पाने पर मैं भी गया मिलने। देखा, वे और भी बूढ़े
हो गये हैं। लड़की वाप के घर आयी हुई है।
वाप ने लड़की से पूछा-कैसी हो तुम?
लड़की अब्बाजान को अपने यहाँ ले जाना चाहती है। चाहती
है, अब्बाजान की सेवा करना।
शफ़ीकुल साहब ने कहा-मुझे काम बहुत हैं, मैं जा नहीं
सकूँगा। तुम्हें यदि रुपयों की ज़रूरत हो तो वोलो। तमाम स्टेट
से दिया जायेगा।
उसके बाद मैनेजर को बुला सब समझाकर वतला दिया।
और फिर उद्देश्यहीन यात्रा पर चल पड़े।
मैंने पूछा-उसके वाद?
केशव शर्मा ने कहा-आप क्या इस कहानी को पुस्तक में
लिखेंगे?
मैंने कहा-पहले पत्रिका में छपवाऊँगा, उसके बाद पुस्तक
रूप में निकलेगी
केशव शर्मा ने कहा-यदि पत्रिका में लिखें तो धारावाहिक
उपन्यास के रूप में लिखें। पत्रिका के पूजा-विशेपांक में पूरे
उपन्यास के रूप में न लिखें। उससे सारा रस ही वर्वाद हो जाता
है। वहुत जल्दी-जल्दी लिखना होता है, जिससे ठीक रस जमता
नहीं है। हमें पढ़ने में ही आनंद नहीं आता।
मैंने पूछा-वह जो कुछ भी हो, उसके बाद क्या हुआ, यह
कहिये।
उसके बाद फिर अचानक शफ़ीकुल हुसैन साहव यहाँ लौटे।
खबर पाते ही हम लोग भेंट करने गये । और भी कई आदमी थे।
मैं लौटकर आ ही रहा था।
उन्होंने इशारे से मुझे बैठने को कहा।
138 / विवाहिता
कई तरह का काम । इतनी बड़ी सम्पत्ति का मामला। उसके
निरीक्षण का भार मैनेजर पर छोड़ चले जाते हैं। जव लौट आते
हैं, तब देने-लेने वाले सभी उन्हें घेरकर बैठ जाते हैं। मैनेजर हर
तरह की देखभाल करते हैं । अतः उनको भी हर वक़्त सभी प्रश्नों
की जवाबदेही करनी होती है।
जव सभी चले गये तो उन्होंने अपने मैनेजर को भी चले जाने
के लिए कहा।
तव हम दोनों एकांत में वैठकर बातें करने लगे।
शफ़ीकुल हुसैन ने कहा-जानते हैं शर्माजी, इस दफ़ा कुमकुम
से भेंट हुई।
पूछा-कहाँ ?
कुमकुम ?
-वृन्दावन में । वृन्दावन के एक आश्रम में।
वृन्दावन का वह एक विचित्र आश्रम है। शफ़ीकुल साहव
आगरा से दिल्ली, दिल्ली से मथुरा, मथुरा से घूमते-घूमते सीधे
वृन्दावन जा पहुँचे । वहाँ भी वही एक ही सवाल-कुमकुम नाम
की कोई लड़की यहाँ रहती है क्या ?
-कौन
-वाराणसी में मकान, कुमकुम दास ! यहाँ वह मिलेगी ?
-~-नहीं साहब । यहाँ भी सभी ने एक ही जवाब दिया।
वृन्दावन के पंडे सभी तरह की ख़बरें रखते हैं। सभी का
नाम, धाम, परिचय वही में लिखकर रखते हैं। किसी की बही
में वह नाम लिखा हुआ नहीं।
एक दिन एक गली से रास्ते पर जा रहे थे। हठात् कान में
एक समवेत कंठ-स्वर सुनायी दिया-
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
सिर्फ ये दो पंक्तियाँ। और कोई पंक्ति नहीं। पास जाने पर
एक मकान नजर आया। खिड़की से अंदर झाँककर देखा। प्रायः पचासेक महिलाओं के कंठ-स्वर आपस में मिलकर उसी गीत- पंक्ति को गा रहे थे। इस गीत की दो पंक्तियाँ ही वार-बार वे गाती जा रही थीं। सभी का सिर मुंडा हुआ था। किसी के सिर पर वाल नहीं। काफ़ी देर से वे उस जगह खड़े लड़कियों का गीत गाना देख रहे थे। घंटे-पर-घंटे यही देखते रहे । देखा सामने एक कुंड में आग जल रही थी। मालूम होता था कि यज्ञ हो रहा था। उसके बाद होटल में लौट आये। उसके बाद दोपहर को फिर गये। देखा, उस वक्त भी वही एक स्वर में एक ही गीत चल रहा था ! किंतु वह दूसरा दल था। सुवह जो गीत गा रही थीं, वे नहीं थीं। ये भी वे ही दो पंक्तियाँ सिर्फ गा रही थीं। सभी का सिर मुंडा हुआ था। किसी के सिर पर वाल नहीं। होटल में आकर मैनेजर से खुलकर इस बारे में बोले । मैनेजर ने कहा-हाँ, वह कलकत्ता के एक सेठजी ने कर । दिया है। -वे कौन हैं ? वे सब लड़कियाँ ? मैनेजर ने कहा-वे सब अनाथ हैं। जगत में उनका कोई नहीं है। होने पर भी कोई शायद उनको नहीं देखता। अत: यहाँ पेट चलाने के लिए यही काम करती हैं। --उन्हें क्या मिलता है ? मैनेजर बाबू ने कहा-साल में दो गमछे । चार कपड़े, सप्ताह में एक सेर आटा और आधा सेर चावल । और प्रतिदिन आठ आने पैसे । यही उनका रोजगार है । इसके बदले में दिन में आठ घंटे गाना गाने की ड्यूटी । सुवह छह से दोपहर दो तक, दो से 140/विवाहिता
रात दस बजे तक, और रात दस बजे से सुबह छह बजे तक।
तीन पाली काम होता है।
शफीकुल हुसैन ने पूछा-अच्छा, उनमें कोई कुमकुम दास
नान की महिला है, बतला सकते हैं ?
नैनेजर बाबू ने कहा--नहीं, ऐना कह नहीं सकता।
-आप एक बार खोज लेने के लिए कह सकते हैं? मंगड़ा
उपकार होगा। यह उपकार यदि आप मंगा करता में आजीवन
आपका कृतन रहूंगा।
मैनेजर बाबू ने कहा-अच्छा, मैं एक बार जो मुंशी कहाँ है
उसनेमाकन्न आकर आपको बतलाऊँगा।
दिन नैनजर आया। आकर बोला-हा,
नाह है. वाराणसी में उनका मकान भी है, लड़की ने आकर
यही कान लिया है।
उसका नाम क्या है?
मनवान
दिल का नाम क्या है जानते हैं?
जानीहन वाम।
पद का आनंदमलान
आज सारं भारत में भी जान में मनादिर
रहा है- माउलट आज आने मंगल
उपकार किया है। आज
अनजान हैं?
-क्रितु की अवमान है। अंग
हिंद हैं। साथ है?
किट भी है। आरा वाद :
and
1
उनका महाकुल हुन सहन ,
उमी. ई.
उन्न
कहा- इन्हीं को एक बार कुमकुम दास से भेंट करनी है। शफ़ीकुल हुसैन साहब ने हाथ के एक केस को खोला। खोल- कर उसके अंदर से एक बंडल वाहर निकाला। पीले काग़ज़ में लिपटा एक बड़ा वंडल। सचमुच तव वही कुमकुम आयी। सिर मुंडा हुआ। उस समय उसकी ड्यूटी नहीं थी। सारी रात जगकर भगवान का नाम लिया। सुबह छह बजे ड्यूटी खत्म होने पर स्नान कर खाना वनाने जा रही थी। इसी समय मुंशीजी उसको वुला लाये। पास ही भगवान-नाम-गान चल रहा था-चौवीस प्रहर से। सामने दो अपरिचित आदमियों को देखकर असमंजस में पड़ गयी। किंतु दोनों ही एक-दूसरे को पहचान नहीं पाये। कहा-कौन मिलने आया है मुझसे ? शफ़ीकुल हुसैन साहव आगे बढ़े। वोले-मैं । तुम्हारा नाम कुमकुम है न ? कुमकुम दास ? कुमकुम ने कहा-हाँ । किंतु आप कौन हैं ? -~~-मुझे पहचान नहीं सकती हो तुम। तुम्हारे पिताजी का नाम जगमोहन दास है न ? तुम वाराणसी में नंदन साहू गली में रहती थीं । तुम्हारी एक छोटी बहन है; उसका नाम चंद्रा है। कुमकुम ने कहा- हाँ, किंतु आप कौन हैं ? शफ़ीकुल साहव ने कहा- मुझे तुम पहचान नहीं पाओगी। किंतु आज से पंद्रह वर्ष पहले तुमको लेकर कोर्ट में मामला हुआ था, वह क्या तुम्हें याद है ? मैं आसामी-पक्ष का वकील था। मैंने आसामियों को दोषी समझते हुए भी मामले से उनको मुक्ति दिलवायी थी। मैं पापी हूँ। मैं महापापी हूँ। मैं इसीलिए तुम्हारे पास माफ़ी माँगने आया हूँ। मैं जानता हूँ, तुम पर जघन्य अत्या- चार हुआ था, किंतु मैंने रुपये के लिए आसामी-पक्ष का वकील होकर उनको निर्दोप सावित किया। उसके परिणामस्वरूप घर ? ? 142/ विवाहिता में तुम्हें आश्रय नहीं मिला। वोलो-सच है कि नहीं ! कुमकुम कुछ वोली नहीं । सिर झुकाये खड़ी रही। उसके बाद सभी ने देखा कि उसकी आँखों से टप-टप कर आँसू गिर रहे थे। शफ़ीकुल हुसैन साहब ने कहा-उसके बाद से मैंने वकालत छोड़ दी। मैं आज पंद्रह वर्षों से तुम्हें ढूँढ़ता फिर रहा हूँ। सिर्फ़ तुमसे क्षमा पाने के लिए। सिर्फ एक बार मुझे 'क्षमा' बोल दो। कुमकुम ने फिर भी कुछ नहीं कहा। उसी तरह उसकी आँखों से आँसू बहते रहे। शफ़ीकुल हुसैन साहब ने हाथ वाले बंडल को उसकी तरफ़ बढ़ाकर कहा -- इसे पकड़ो, इसमें मेरी संपत्ति के क़रीब आधे हिस्से का दान-पत्र लिखा हुआ है, और दो लाख रुपये नक़द हैं। ये लेकर तुम मेरे पाप का प्रायश्चित कर दो। मेरा उद्धार करो। मेरी पत्नी मेरी लापरवाही के कारण मारी गयी। फिर भी मैं मरा नहीं ! किंतु यदि तुम यह न लोगी तो सचमुच मैं मारा जाऊँगा... लो शफ़ीकुल साहव के हाथ बढ़ाते ही कुमकुम उसे लेकर पास के कमरे में चली गयी। वहाँ से वह स्थान दिखायी दे रहा था। कुमकुम ने उस दान-पत्र और नक़द दो लाख रुपयों को होम के जलते कुंड के बीच फेंक दिया और साथ-साथ आग पर जैसे घी की आहुति डाल दी गयी जैसा हो गया। उसके बाद वह वहाँ और नहीं रुकी। उस वक्त घर के अंदर जो कीर्तन चल रहा था, उसी भाँति चलता जा रहा था- हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।। होटल के मैनेजर वावू तव तक सब सुन रहे थे, देख रहे थे। इस बार शफ़ीकुल साहब के मुंह की ओर उन्होंने देखा । देखा शफ़ीकल सादर रो रहे हैं। उनकी आँखों से भी टप-टप कर आँसू की बूंदें गिर रही थीं। इस वार पाकेट से रूमाल निकालकर आँखों को पोंछ डाला और मुँह घुमा लिया। मैनेजर बाबू से कहा--चलिये चला जाये, कुमकुम ने मुझे क्षमा नहीं किया। ठीक है, फिर भी मैं आशा नहीं छोड़ें गा। फिर आऊँगा, फिर क्षमा चाहूँगा, देखूगा कितनी बार कुमकुम मुझे क्षमा नहीं कर पायेगी। कहकर उसी दिन वृन्दावन छोड़कर चले आये। आते वक़्त मैनेजर बाबू को कह आये- कुछ ही दिनों में मैं फिर आ रहा हूँ। देखता हूँ कितनी वार वह मुझे लौटायेगी। जीवित रहते मैं आशा नहीं छोड़ें गा। केशव शर्मा ने कहानी को यहीं समाप्त किया। मैंने पूछा-उसके वाद? केशव शर्मा ने कहा--उसके बाद और क्या ? उसके बाद एक वार यहाँ आते हैं, फिर उसके बाद वृन्दावन चले जाते हैं। कुमकुम माफ़ नहीं करती है। कभी भी अव भेट भी नहीं करती। फिर भी शफ़ीकुल साहब हताश नहीं होते हैं। वे बार-बार वृन्दावन जाते हैं, और हताश हो लौट आते हैं। अब उम्र भी हो गयी है। ज्यादा नहीं जा पाते । फिर भी वृन्दावन जाते हैं। जाकर उसी होटल में टिकते हैं। नया दान-पत्र तैयार कर ले जाते हैं, वकील से वनवा- कर, और साथ में नक़द रुपये। प्रत्येक वार ही कुमकुम उसे होम के कुंड के बीच फेंक देती है और वे लौट आते हैं। किंतु फिर भी । जाते हैं। ऐसी घटना की बात आपने कभी भी कहीं भी आगे सुनी है ? शायद नहीं। इसीलिए कहता हूँ, यदि कभी यह कहानी लिखें तो किसी पत्रिका के पूजा-अंक में लिखकर नष्ट नहीं करेंगे।
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