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Samaj Sudhar

Swami Narayan · 2011/03

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*ॐ*
नमः विश्वम्भराय जगदीश्वराय !
Social Reform
समाज सुधार
-
--
भारर में श्रालस्य तथा प्रमाद को स्थान कैसे मिला, ईश्वर और
धर्म के नाम पर धोखा कैसे चला तथा इस के ठेकेदारों की नियुक्ति कैसे हुई,
और फिर इन ठेवेदारों ने जनता जगत को किस प्रकार धोखे में डालते हुए
और इनके द्वारा नाना प्रकार के द्रव्य सम्बन्धी भोग भोगते हुए अपना अर्थ
सिद्ध किया । सो सन बातें राष्ट्र तथा मनुष्य समाज के हितार्थ बहुत ही सरल
भाषा में लिख कर वर्णन किया गया है। युवकों का कर्तव्य है कि वे इन
सिद्धान्तों पर विचार करते हुए अविद्या का नाश कर विद्या का प्रचार करें,
ताकि देश तथा समाज से जो ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखाबाजी चल
रही है, वह सदा के लिये नाश को प्राप्त हो रसातल में प्रवेश कर जावे।
इसी में समाज तथा राष्ट्र की भलाई हो सकती है।
लेखक:-
श्री नारायण स्वामी ची० ए०
ग्राम कुन्डल पो० ओ० कुन्डल
निजामत दौसा (राजस्थान जयपुर)
4
1
प्रथम वार
1951
मूल्य प्रति कापी
२)
२०००

नमः विश्वम्भराय जगदीश्वराय विषय सूची bepe कमा विपय पृष्ट तक है । । । । । । १७ २६ २६-३२ - ३७ १. प्रस्तावना ५. ईश्वर के नाम पर धोखा ३. ज्योतिष विद्या के नाम पर धोखा ४. मन्दिर देवालय के नाम पर धोखा ५. मन्दिरों की सार्थकता कैसे हो ६. गङ्गा यमुना तथा तीर्थों के नाम धोखा ७. गौमाता के नाम पर धोखा ८. देवी देवता के नाम पर धोखा १. स्याने भोपे बन कर धोखा १०. धर्म सिद्धान्तों के समझने में घोखा ११. हनुमान जी कौन थे ? १२. रावण पर कल्पना १३. रावण के बाली की काँख में छः महीना तक रहना १४. हनुमान जी का द्रोणाचल ३२ ३६-४३ ४७ " ४७ - ४७ ४८ ५१-६२ ६२ ६६ .

पर्वत को उठाना ६६-६६ - ७५ - ६५ ।।। ह हैं १०० १०२ ms- १५. श्री कृष्णा का गोवर्धन उठाना १६. भारत का पतन, वर्ण व्यवस्था १७. पैशाचिक प्राण दंड की व्यवस्था १८. शुद्ध, ब्राह्मण बनो, नहीं तो जाह्मण कहलाना छोड़ो। १६. हमको ब्राह्मण शब्द प्रिय क्यों है ? २०. ब्राणों के दोनों हाथ लड्डू २१. समाज सुधार से ब्राह्मणों को भय २२. क्या मनुष्य शृद्र है ? २३. जाति पाँति तोड़ने पर सम्मतियाँ २४. हमारा सनातन धर्म नाश होगया २५. छूताछूत पर कुछ विचार २६. क्षात्र धर्म सुधार २७. ब्राह्मणों का पतन तथा उत्थान २८. नाटक, थियेटर तथा सीनेमादि २६, हुक्का बीड़ी सिगरेट तथा तमाखू पीना निषेध १२४ १२७ १२७ १३६ -- १३६ emiews १६२ -n १५१ १७१ and- १७१

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नमः विश्वम्भगय नगदीश्वराय ! प्रस्तावना मेरा इस पुस्तक को लिखने का अभिप्राय यह नहीं समझना चाहिये कि मैं किसी जाति विशेष की निन्दा या स्तुति कर रहा हूं, मुझको तो केवल जनता जगत को सत्याऽसत्य का निर्णय कराने हुए सचेत कर देना है, कि आज जो मानव-समाज में ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखाबाजी, नीचता तथा धृष्टता दिखाई देरही है वह केवल अपनी स्वार्थ परता, हन्द्रिय लोलुपता तथा नाना प्रकार के वैषयिक पदार्थों को अावश्यकता से अधिक संग्रह करके संसारिक भोगों को भोगने के कारण ही है। यदि प्राणी इस कलुपित कामना को हटा कर साधारण जीवन व्यतीत कर जनता जगत की सेवा में दृढ़ संलग्न हो जावे तो यही ईश्वर और धर्म की सेवा कहला सकती है। स्वार्थपरता वैसे तो संसार में कुछ महापुरुषों को छोड़ कर प्रायः सभी प्राणियों में स्व- भाविक हुया करती है, किन्तु इसकी कुछ अवधि चाहिये। "मैं जी और सब जीवें" इस भावना में प्राणी मात्र की भलाई निहित है, किन्तु इसी के स्थान पर "मैं जीऊँ और सत्र मर जावें। यह भावना नीचता है, और अन्य सभी प्राणियों की घातक है। अतः मनुष्य मात्र का कर्तव्य है कि संसार में जो कुछ भी किया जावे, उसमें अपने स्वार्थ के साथ २ दूसरों के हित पर भी अवश्य ध्यान देना चाहिये। .

(ख बाहाण का जीवन केवल संसारिक भोग भोगने के लिये नहीं है, यदि वह भी नाना प्रकार के बाग बगीचे, महल महलायत बना कर उन में संसारिक अनेकों प्रकार की भोग सामग्रियों को एकत्रित कर लखपति तथा करोड़पति कहलाने में ही श्रानन्द माने तो फिर उसमें और संसार के अन्य प्राणियों में अन्तर ही क्या होगा ? ऐसी स्थिति में "भूदेव" तथा "ब्रहा वाक्य जनार्दन" का दावा कैसे निभेगा। क्योकि आवश्यकता से अधिक संग्रह तथा लखपति व करोड़पति बनना तो अन्याय तथा अत्याचार पर ही अवल- म्बित है । अन्यायी तथा अत्याचारी मनुष्य शुद्ध वालण कैसे कहलायगा, और वह जनता जगत को उन्नति के मार्ग पर ले जाने वाला सत्यवक्ता बन कर सत्योपदेश भी कैसे करेगा ? और जब जनता उसके आचरणों को देखेगी कि यह तो हमसे भी गया बीता दुराचारी, दुराग्रही तथा दुरात्मा है, तो फिर उसको ईश्वर और धर्म का ठेकेदार कैसे कहेगी। उसको तो पाखण्डी, अनिष्टकारी तथा घोर नास्तिक ही कहा जायगा। और वाहाण कौन है ? इसकी परीक्षा होना भी कठिन हो जावेगा। अाज संसार में शुद्ध ब्राहाणों की पहिचान क्यों नहीं होती? इसका कारण यह है कि आज संसार में तीन चार करोड़ मनुष्य ब्राह्मण का झूठा दावा लिये बैठे हैं, और जनता जगत की परिश्रम युक्त कमाई को दान पुष्प के रूप में हड़प करके अपने संसारिक नाना प्रकार के विषय भोगो में तल्लीन हो रहे हैं, और अपनी कामनाओं की पूर्ति निमित्त अनेकों प्रकार के प्रपञ्च युक्त मायावी जाल फैला कर भोली जनता को फंसा कर अपना उल्लू सीधा करने में दृढ़ संलग्न हैं। अब ऐसी स्थिति में ब्राह्मण किसको कहा जाय इसका निर्णय जो वास्तविक में ब्राह्मण होंगे, वे ही यथार्थ में कर सकेगें ग श्रान एक ब्राह्मण है, वह सेटजी का भोजन बनाता है, प्याज पर पानी पिलाता है, बच्चों को खिलाता है, उनके कपड़े धोता है, और किसी के यहां जीमने का तथा दान दक्षिणा लेने का काम पढ़ता है तो वहां जाकर खीर पूरी खाने को तथा दान दक्षिणा लेने को भी तैव्यार रहता है । इसके अति- रिक्त एक और दूसरे प्रकार का ब्राह्मण है वह मन्दिर का बड़ा भारी पुजारी है, दान धर्म के नाम पर तथा चढावा के रूप में हजारों रुपया जनता से वसूल करता है, उन रुपयों से अपने रहने के लिये महल बनाता है, वैपयिक पदार्थी को संग्रह करता है, रुपया का स्टाक बनाता है, उसको व्याज पर चलाता है और नाना प्रकार के सुखोपभोग करता है। चौथे प्रकार का एक और ब्राह्मण है वह कृषि करता है, पशु पालता है, लेन देन के कार्य में भी हढ़ संलग्न है, और जब दान दक्षिणा तथा माल उगाने का समय प्राता है, तो दान दक्षिणा तथा माल उड़ाने को भी तैव्यार रहता है। पांचवां, एक ब्राह्मण हैं, कि जो गंगा यमुना का ठेकेदार बन हजारों रुपया उसके नाम पर दान पुण्य ले विषय भोगों में रत रहता है जनता सम्बन्धी कोई सेवा कार्य नहीं करता। छटे प्रकार का ब्राह्मण है वह ईश्वर के नाम पर जनता को धोखा देकर हजारों रुपया कमाता है। और संसारिक विषय भोगों में लगाता है। सातवें प्रकार का ब्राह्मण है, वह नौकरी आदि के द्वारा तथा व्यौपार और कृपि द्वारा हजारों लाखों रुपया अपने पुरुषार्थ से कमाता है, महल महलायत बनाता है, अपने स्त्री पुत्रों सहित उसका सुख भोगता है। गृह धन्धों से अवकाश पाकर समाज से अवकाश पाकर समाज सेवा का तथा राष्ट्र की सेवा का भी भाव रखता है, और सेवा का कार्य करता है। ईश्वर की भक्ति करता है। वह दान के नाम पर अपने लिये किसी से एक पैसा भी ग्रहण नहीं करता है किन्तु समय पड़ने पर अपनी कमाई में से शक्ति अनुसार ( प ) . दान करता है। श्राटवें प्रकार का नाताण है वह किसी को धोखा नहीं देता, अपने अोप जो कुछ अनायास प्राप्त हो जावे उसी में संतोष मानता है, बिना किसी स्वार्थ के जनता तथा राष्ट्र की सेवा करता है, संसारिक भोगों से दूर रहता है। श्रावश्यकता से अधिक अपने पास कुछ संग्रह नहीं रखता है। बाहाण को जो कुछ गुण शास्त्र में वर्णन किये हैं उन सबों पर पूरा अधिकार रखता है। इस श्राठवें नम्बर वाले ब्राह्मण को तो हमारी ओर से कुछ नहीं कहना है, यह तो शुद्ध वाहाण है । और जनता जगत को सदा वन्दनीय तथा सेवा करने योग्य है। सातवे नम्बर के बाह्मण को भी हम बुरा नही कहते, क्यों कि यह भी किसी को ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा नहीं देते, अपने पुरुषार्थ पर सदा श्रारूद हैं, और यथा शक्ति दान दक्षिणा देने में तथा राष्ट्र व समाज की सेवा में संलग्न हैं । अतः ऐसे व्यक्ति जो ब्राह्मण हैं उनसे भी हमारा कुछ कहना नहीं है, और न हमारा कोई विरोध है । नम्बर १ से और छः तक के जो ब्राहाण हैं, उनको न तो हम ब्राहाण मानते हैं, और न उनके लिये हमारे हृदय में स्थान है। क्यों कि जो श्रादमी ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देकर अपना माल उड़ाना चाहते हैं, वे न तो ब्राहाण हैं, और न मनुष्य है, किन्तु जनता जनार्दन को धोखा देने वाले कट्टर शत्रु तथा राक्षस हैं। दान पुण्य का जो पैसा दूसरों के नाम पर श्राता है, उसको नेकनीयती से उन्ही के निमित्त खर्च कर देना बुद्धिमानों का काम है, और जनता भी उसको उन्हीं के उत्तरदायित्व पर इसीलिये देती है, कि वे उस पैसे को जनता जगत की सेवा में तथा सार्थक परोपकार सम्बन्धी कार्यों में लगावें, किन्तु M । ये लोग उस पैसे का दुरुपयोग कर रहे हैं, और अपने भोगों में ही तल्लीन है। अतः यह पुस्तक हमने ऐसे ही मनुष्यों के उपकारार्थ लिखी है, और ऐसे प्राणियों से हमारा सानुरोध पूर्वक कहना है कि वे अपना चरित्र निर्माण कर अपनी यावश्यकताओं को जो सीमा से कहीं अधिक बढ़ा ली गई हैं उनको कमी करते हुए भोगों की अत्यन्त लिप्सा को दूर करें, और अपने को उस संस्था का कि निसका उत्तरदायित्व जनता ने हमारे हाथ में सौंपा तथा नो २ द्रव्य सम्बन्धी सामग्रियां हमारे आधीन की है, उस सब पर स्वार्म पने का अधिकार न रखते हुए सेवक भाव से अपनी सेवा की पूर्ति करें। और उसको यथोचित जनता जनार्दन की सेवा में सार्थक खरच करें। इसी में यापकी भलाई है । यदि श्राप मेरी इस बात पर ध्यान न देंगे और इसी प्रकार मनमाने अत्याचार करते रहेंगे तो एक दिवस निश्चय यावेगा, कि जब जनता लगत श्रापसे कट्टर विरोध करेगी, और आपके हाथों से सारी संस्थाओं को तथा अधिकारों को छीन कर अपने हाथ में लेगी, और आपको बेकार समझ कर रद्दी कागज की तरह रद्दी खाने की टोकरी में फेंक देगी । उस समय आपको कष्ट भी अधिक होगा, और आपको अपना यह अपमान मरण से भी अधिक दुखदाई होजायगा । यदि श्रापको सांसारिक सुख तथा भोगों से ही अधिक प्रेम हो, अंथवा लखपति व करोड़पति बनने की ही कामना है तो संसारी अन्य वर्ग जैसे २ अनेकों प्रकार के कार्यों को संपादन करते हुए हजारों तथा लाखों रुपया कमा रहे हैं, और अपनी स्वेच्छा से भोग भोग रहे हैं, और कोई मनुष्य उनके कार्यों में बाधा नहीं पहुंचा सकता, इसी प्रकार .

आप लोग भी किसी सीधे सच्चे कार्यों के करने में दृढ़ संलग्न हो जायो, उससे लाखों करोड़ों रुपया कमायो, नाना प्रकार के भोग भोगी, तथा स्वेच्छा से जो कुछ करना चाहते हो, वह सब कुल करो, तुम को कौन रोक सकेगा, किन्तु आप यदि ऐसा न करके जनता जगत की परमार्थिक सम्पत्ति को सुखोपभोग सामग्रियों में खर्च करके उसका दुरुपयोग करोगे, तो याद रखो ! जनता तुम्हारा शीघ्रातिशीन ही विरोध करेगी और तुम्हारा बहिष्कार कर देगी। क्यों कि इस समय बुद्धिमान पुरुप तुम्हारी चालाकियों को, स्वार्थपरता को तथा ईश्वर और धर्म के नाम पर जो धोखा दे रहे हो, उस धोखा देने को अच्छी तरह जान गये हैं। जिसको वे लोग कदापि स्वीकार न करेंगे, किन्तु तुम्हारी गुप्त मन्त्रणाओं को तथा धोखा देने के गूढ रहस्यों को भली भांति बता कर भोली जनता को सचेत कर देंगे, और फिर तुम्हारी यह ईश्वर और धर्म की मिथ्या ठेकेदारी धूलि में मिलकर रसातल को चली जावेगी । आशा है कि जो शुद्ध ब्राहाण होंगे, वे मेरी इस बात पर ध्यान देंगे, और मिथ्या नाम धारी ब्राहाण कि जो ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देकर श्राजीविका कमा रहे हैं, और ईश्वर, धर्म तथा ब्राह्मणों के नाम को बदनाम कर रहे हैं, ऐसे नाम मात्र ब्राह्मण बनने वालों का कट्टर विरोध करेंगे; और सही मार्ग जो ब्राह्मणों को अनुकरणीय है नो उसका पालन करावेंगे। इतना करने पर भी यदि ये लोग कुछ ध्यान न देंगे तो फिर इनको ब्राह्मणत्व पद से सदा के लिये बहिष्कृत कर देंगे। जनता जगत से मेरी यह अपील है कि वे ऐसी धोखा देने वाली संस्थाओ को जो धर्म और ईश्वर की श्राइ में शिकार खेल रही है, नाना { छ 'प्रकार के उत्तमोत्तम पदार्थों को संग्रह कर भोग भोग रहे हैं , उनको कदापि दान न देना चाहिये, किन्तु जो संस्थायें देश और राष्ट्र की सेवा में दृढ़ संलग्न हैं, और जिनके कार्यों से जनता तथा राष्ट्र का हित प्रत्यक्ष सिद्ध होता हो। ऐसी संस्थानों को अवश्य देना चाहिये । याज देश में मूर्खता अधिक बढ़ गई है, स्त्रियों की शिक्षा का भी अभी यथोचित प्रबन्ध नहीं है। अाज अापको भारत में १०० में २५ श्रादमी साक्षर कठिनता से मिलेंगे, और यही कारण है कि इस देश में ईश्वर धर्म के नाम पर पोप लीला चलती रही, और इसके ठेकेदार लोग जगत में इन दोनों के नाम पर अनेकों मायावी मिथ्या सिद्धान्तों की रचना कर के जनता जगत को धोखा देते रहे । अतः अाज अापको यावश्यकता है स्थान २ पर शिक्षा मन्दिर तथा स्वास्थ्य मन्दिर खोलने की । इनके खुलने से ७५ प्रति शत् मनुष्य साक्षरी हो जावेगे। जब देश में साक्षरता बढ़ जावेगी तब यह ईश्वर और धर्म के नाम पर चलने वाली पोप लीला भी यहीं समाप्त हो जावेगी। क्यों कि "Superstition flourishes in an atmosphere of Ignorance" अर्थात्:-मिथ्या भावना तथा मिथ्या विश्वास अविद्या रुपी क्षेत्र में पनपते रहते हैं। इस प्रकार न रहे बांस और न बजे बांसुरी' अर्थात्:- न अविद्या ही रहेगी और न देश में पोप लीला ही रहेगी। और देश की भलाई होगी। r . में इस बात को जानता हूँ कि मेरी इस पुस्तक को पढ़ कर साक्षरी तथा विद्वान पाठक हर्ष को प्राप्त होंगे; और ईश्वर तथा धर्म के नाम पर धोखा देने वाले नाम मात्र कुछ ब्राह्मण लोग इस पुस्तक को पढ़ कर अपने स्वार्थ हानि दोप को देख कर अपने मन में खेद प्रगट करेंगे, ( और मेरी ये सब बाते उनको सूई की भांति चुभती प्रतीत होगी। किन्तु याद रखो! जैसे कोई डाक्टर किसी रोगी के फोड़े को देख कर दया से व्याकुल हो अपने कठिन शस्त्र द्वारा चीर फाड़ डालता है, वह रोगी के चिल्लाने तथा रोने पर ध्यान नहीं देता है। इसी प्रकार मैंने इन नाम मात्र ब्राह्मणों के अहङ्कार रूपी फोड़े को जनता जनार्दन की सेवा हितार्थ अपनी लेखनी रूपी शस्त्र से फोड़ने की चेष्टा की है। इस मिथ्या अहवार रूपी फोड़े के नाश हो जाने पर ये ही लोग विशुद्ध वालण बनकर जनता जनार्दन की तथा अपने राष्ट्र की सच्ची सेवा कर सकते हैं । अब विशेष क्या लिखू। मुझको न किसी से राग है न द्वेष । किन्तु सच्ची बाते तो देश तथा राष्ट्र निर्माण हित में करना हो पाता अन्यथा मेरी तो इच्छा यही रहती है किः- " "देश का भला हो," "विश्व का कल्याण हो,' "अविद्या का नाश हो," "विद्या का प्रकाश हो," यह मेरी सुदृढ़ भावना है। सर्व हितैच्छुक, स्वामी नारायण बी. ए.

नमः विश्वम्भराव जगदीश्वराय ! SOCIAL REFORM -समाज सुधार- २. ईश्वर के नाम पर धोखा ईश्वर यह एक अाश्चर्य जनक विषय है, समस्त जगत ईश्वरवादी है। अखिल मनुष्य जाति में ईश्वर का नाम किसी न किसी बहाने घोषित हो रहा है। समस्त जन उसके नाम को जानते हैं, किन्तु ग्राश्चर्य की बात तो यह है कि उसकी सूरत को कोई भी नहीं पहिचानता और इसी कारण को लेकर संसार भर में ईश्वर के स्वरूप के विषय में करोड़ों कल्पनायें प्रचलित हो रही है। कोई कहता है, कि ईश्वर निराकार है, कोई कहता है साकार है, कोई निराकार तथा साकार दोनों को सिद्ध करता है, कोई कहता है कि न निराकार है और न साकार है, दोनों से विलक्षण है। और इन्हीं की कल्पनायों के कारण ईश्वर के नाम पर कई प्रकार के बाद खड़े कर लिये हैं। कोई अद्वैतवादी, कोई द्वैतवादो, कोई द्वैत-अद्वैत बादी, कोई विशिष्ट अद्वैतवादी, और कोई वेतवादी इत्यादि.। कहने का अभिप्राय यह है कि सृष्टि के अादि से लेकर आज तक ईश्वर के नाम पर न्यारी २ कल्पनायें की मा कर बड़े २ वाद विवाद रूपी शास्त्र खड़े किये किये गये हैं, और अपने (६) में अपने मत को सिद्ध करते हुए अनेकों प्रकार के मत मतान्तर खड़े कर लिये हैं। और ईश्वर तथा धर्म के नाम पर जनता को धोखा देते हुए अपने २ खंसारिक कार्यों की सिद्धि करने में दृढ़ संलग्न हो रहे हैं। और सबसे बड़े मज़े की बात तो इन ईश्वरवादियों में यह पाई जाती है कि ये लोग अपने २ कल्पना किये हुए ईश्वर को सच्चा और दूसरों की कल्पना किये हुए ईश्वर को मिथ्या कहने में तनिक भी संकोच नहीं करते। और जब इन ईश्वरवादियो से पूछा जावे कि:-क्या तुमने ईश्वर को देखा है ? तो इसके उत्तर यही कह कर लोगों को श्रद्धा दिलाते हैं कि अमुक ऋषि ने देखा, अमुक महात्मा ने देखा, अमुक भक्त के घर पर आकर भगवान ने भोजन किया, अमुक भक्त के छप्पर की छान छवाई, अमुक भक्त के यहां जाकर नापित (नाई) का काम किया, अमुक भक्त के यहां जाकर मृतक पुत्र को जिला दिया, अमुक भक्त के यहां जाकर भात भरा इत्यादि २ बातें बतलाते हुए लोगों को श्रद्धा दिलाते रहे हैं। किन्तु कोई आदमी दावे से यह नहीं कहता कि मैंने ईश्वर को प्रत्यक्ष देखा है। और फिर रूपों के विषय में भी भिन्न २ बातें बतला कर लोगों को धोखा दे रहे हैं। कोई कहता है हमारे भगवान ४ भुजा वाले हैं, कोई कहते हैं कि आठ भुजा वाले हैं, कोई २० भुजा स्वीकार करते हैं, इसी प्रकार मुख आदि की भी न्यारी २ कल्पनाये की जा रही हैं, कोई अपने भगवान को चार मुख वाला, कोई पाठ मुख, कोई १६ मुख और कोई २ हजार मुख वाला कहते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि ये लोग कल्पित भावनाओं के द्वारा अपने न्यारे २ ईश्वर और न्यारे २ रूपों को बतलाने में तनिक भी संकोच नहीं करते । इन भिन्न २ मतवादियों की ईश्वर और धर्म विषय भिन्न २ कल्पनाओं का जनता जगत पर यह परिणाम हुआ, कि संसार में फूट का वृक्ष बोया गया, मानव जाति का विश्व प्रेम नाश हुआ, अपनी र दफड़ी और अपना २ राग वाली कहावत चरितार्थ होने लगी, ईश्वर और धर्म के नाम पर लोग धोखा देकर अपना २ पेट पालने लगे, ईश्वर के नाम पर गली २ में मन्दिर और देवालय स्थापित होने लगे और उनमें नाना प्रकार की भोग विलास तथा वैषयिक सामप्रियां ला ला कर एकत्रित की जाने + , लगी, श्रावश्यकता से अधिक दान तथा भोगों की सुव्यवस्था हो जाने के कारण ईश्वर के नाम पर ठेकेदारी शुरू हुई। नदियों के नाम पर, पर्वतों के नाम पर, तीथों के नाम पर, देवालयों के नाम पर तथा स्वर्ग नरक के नाम पर भिन्न २ पार्टियों के लोग ठेकेदार नियुक्त हो गये। और इन सब के नाम पर जनता जगत में इतने टैक्स लगाये गये कि जिनको चुकाते २ मनुष्य मर भी क्यों न जावे किन्तु इनके टैक्सों की पूर्ति किसी भी तरह से नहीं हो सकती। इस प्रकार जब इन ईश्वर और धर्म के ठेकेदारों को श्रावश्यकता से अधिक धन तथा अावश्यकता से अधिक भोग विलासों की सामग्रियां प्राप्त होने लगी तब आलस्य और प्रमाद को स्थान मिला। और विद्या के स्थान पर अविद्या की उपासना चालू की गई, ईश्वर और धर्म केवल पेट पालने के साधन बना लिये गये, पढना लिखना बन्द किया गया। "स्त्री शूद्रो न घीयतामिति' अर्थात् स्त्री तथा शूद्रों को पढ़ना ठीक नहीं है। इस प्रकार की श्रुतियां प्रचलित कर स्त्री शूद्रों को न पढ़ने देने की अनधिकार चेटाय की जाने लगी। इस प्रकार असली ईश्वर तत्व तथा धर्म तत्त्व नाश किया गया और इन दोनों के स्थानों पर कृत्रिमता को स्थान दिया गया, अर्थात् इन दोनों के नाम पर केवल धोखा ही धोखा रह गया और सत्य, ईश्वर और धर्म का नाम लुप्त हो गया। अब पाठकों को स्पष्टीकरण करके बतलाया जाता है कि ये ठेकेदार लोग जनता जगत को किस प्रकार और किन २ बातों में धोखा दे रहे हैं सो सुनिये:--- आपको इनकी लो गुप्त मन्त्रणा (Secret Trade) है वह प्रत्यक्षीकरण करके क्तलाई जाती है। ३. ज्योतिप विद्या के नाम पर धोखा ज्योतिष कितनी सच्ची विद्या है, यह किसी से छिपा नहीं है। मनुष्य इतना अल्पज्ञ है कि इतना भी नहीं बतला सकता कि घंटे दो घंटे (४) रखा है। पश्चात् क्या होगा? अथवा हाथ दो हाथ के पीछे क्या रखा है ? सो इस विद्या के जानने वाले सूर्य और चन्द्र हम लोगों से कितनी दूर स्थित है, उनके विषय में लिख कर बतला देते हैं कि अमुक समय में चन्द्र ग्रहण वा सूर्य ग्रहण होने वाला है तो ठीक उसी समय चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण होगा। कारण इसका यह है कि इसमें गणित इतनी सच्ची विद्या है कि जिसके प्रताप से ये सब ग्रहण आदि की बाते ठीक २ वतलाई जा सकती हैं, और इस बात को हमारे देश के ही ज्योतिषी जानते हैं, बात यह नहीं है, किन्तु इस गणित विद्या के हिसाब से दूसरे देशो के ज्योतिषियों तथा गणितज्ञों ने भी प्रत्यक्ष कर और सब कोई जानते हैं। अब रही फलित इत्यादि की बातें सो इस विषय में न तो हमारे देश के ज्योतिषी ही यथार्थ जानते हैं और न दूसरे देश के ज्योतिषी ही जानते हैं। क्योंकि यह विषय गणित के साथ २ अध्यात्म से सम्बन्ध रखता है, और अध्यात्म (यात्म विद्या) है और श्रात्मा का सम्बन्ध ईश्वर के साथ है, और ईश्वर त्रिकालदर्शी है और भूत, भविष्यत् तथा वर्तमान की सब बातें जानता है। अतः ज्योतिष में फलित विद्या को बतलाने के लिये श्रात्म विद्या की भी श्रावश्यकता है। दूसरे, इस विद्या के साथ साथ आयुर्वेद विद्या का भी निकटस्थ सम्बन्ध है। इस प्रकार तीनों विद्याश्रों का जानने वाला सच्चा ज्योतिषी कहला सकता है। और फलित का विषय भी उसी ज्योतिषी से सम्बन्धित हो सकता है। जो इन तीन विद्याओं को भली भांति जानने वाला हो। अर्थात् ज्योतिषी बनने के लिये आयुर्वेद विद्या, योग विद्या तथा गणित जिसमें रेखा गणित और बीज गणित भी शामिल है, इन सब के जानने की परमाऽवश्यकता है। श्राजकल हम देखते हैं कि अध्यात्म विद्या तो केवल उपनिषद तथा गीतादि में बन्द पड़ी है, व्यवहारिक तथा सत्यता रूप में इसका कोई प्रयोग नहीं हो रहा है, और यदि हो रहा है तो वही धोखा देने के तात्पर्य से हो रहा है। यही हाल योग विद्या का है। जो मनुष्य दर्जनों बच्चे पैदा करने की इच्छा रखने वाले तथा सारे संसार की सम्पति मिल जाय तो भी सन्तुष्ट न होने वाले, ऐसी वासना वाले मनुष्यों से यह योग विद्या कैसे सिद्ध हो सकती है। योग और भोग में तो > ( ५ पृथ्वी श्राकाश का अन्तर है। तो फिर ये भोगों को चाहने वाले मनुष्य योग विद्या के अधिकारी कैसे हो सकते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि ज्योतिप विद्या के साथ २ इससे सम्बन्ध रखने वाली योग विद्या तथा अध्यात्म विद्या दोनों की जानकारी होना भी बहुत अावश्यकीय है। किन्तु अाजकल तो हम देखते हैं कि इस ज्योतिष विद्या वालों की भी एक अलग ही जाति बन गई है, कि जिनको ज्योतगी, भराड़े और डाकौत नाम से पुकारते हैं। ये रात दिन भोले मनुष्य तथा भोली भाली स्त्रियों को धोखा देने में दृढ़ संलग्न हो रहे हैं। और कई प्रकार से भूठे सच्चे ग्रह गोचर बता २ कर जनता जगत को धोखा दे अपना उल्लू (स्वार्थ) सिद्ध कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त जो ज्योतिष विद्या के जानने वाले विद्वान ज्योतिषी हैं, उनको छोड़ कर कुछ ऐसे भी ब्राह्मण लोग हैं कि जो होड़ा-चक्र श्रादि एक दो ज्योतिष की पुस्तकों को देख दाख कर ज्योतिपा- चार्य का मिथ्या पद लिये बैठे हैं, इनकी करतूतों को तो पूछिये मत ] ये जिस युक्ति तथा साहस के साथ जनता जगत को धोखा दे रहे हैं वह किसी से छुपा नहीं है। इनकी करतूतों का तथा धोखेबाजी का पता निम्नलिखित कविता द्वारा पाठकों को भली भांति प्रगट हो जावेगा। ज़रा सुनिये:- बस उच्च कुल में जन्म ही से लाभ कुछ होता नहीं। विद्या विना भू देव भी होते तिरस्कृत क्या नहीं जिनके चरण की रज कभी नर पति मुकुट पर धारते । भगवान भी सानन्द जिनके चरण उर पर धारते ॥१॥ - जो ऐन्द्र पद त्रैलोक्य सुख भी जानते वेकार थे। सुरराज भी जिनके अमोघ श्राप से लाचार ब्राहाण देवता ही भीखमंगे हो रहे । खोकर तपोधन ज्ञान धन अब मान धन भी खो रहे ॥२॥ वे ग्राज

उन उच्च वंशज ब्राहाणों का देख लो क्या हाल है।
पतितः भयङ्कर ग्राज उन पर ही विपत्ति कराल है ।।
सब दुर दुराते हैं उन्हें अब भीख मंगे जान कर।
बस श्वान सम रह गई संसार में उनकी कदर ॥ ३ ॥
अब अाजकल के पंड़ितों की भी दशा सुन लीजिये।
उस पुण्य ऋपि संतान के वर्तव्य को सुन लीजिये।
वेकाम दोनों टेम जाते हैं धनी के पास में।
मिल जाय वरणी पाट सब मनको लगा इस आस में ॥ ४ ॥
कुछ शीघ्रबोध रटा कि गणकाचार्य का पद पा लिया ।
डुपट्टा लगाया तिलक बँचे हाथ में पतदा लिया ।
फिर तुक मिलाते श्राज कल तुम को लगी केतु दशा।
वरणी बिठायो नप करायो तो मिटे थारी दशा ॥५॥
यो रच वितण्डा वाद वरणी पाठ उनको मिल गया।
तो फूलते मन में कि मानों भाग्य उनका खिल गया ।
जो शीघ्रबोध बिना रटे वो ज्योतिषी नहीं बन सके।
तो सेठजी के पास में जा पक्के रसोइये बन चुके ॥६॥
कुछ काल तक करते परिश्रम जो पाठशाला में कहीं।
तो फिर कभी चिरकाल घुटते पाकशाला में नहीं ॥
हे हे रसोये ! धन्य तुमको वा तुम्हारे काम को।
बट्टा लगाया हाय तुमने पूर्वजों के नाम को ॥ ७ ॥
जो पाठशाला पाकशाला दोनों ही में नहीं श्रम किया।
तो हर्न क्या वस फेर उनने मांगना खाना लिया ।
है मांगने में शरम क्या यह ब्राह्मणों का कर्म है।
लो देखलो यह उच्च जाति किस तरह बेशरम है ॥८॥

( ७ ) , अब पाटकों को पता लगा होगा कि विद्या न पढ़ने के कारण ये ज्योतिष विद्या के ठेकेदार ईश्वर और धर्म के नाम पर कितना घोखा दे रहे हैं, ज़रा इनकी मिथ्या करतूतों पर और भी ध्यान दीलिये। जब किसी के घर में कोई शादी होती है तब लड़के और लड़की के माता पिता विवाह का मुहूर्त निकलवाने के लिये इन ज्योतिषीजी के घर पर पहुंचते हैं। मानलो इनकी लड़की की आयु पांच वर्ष है और लड़के की श्रायु दश वर्ष है। ज्योतिषी जी इन लड़के और लड़कियों की अल्पायु पर कुछ व्यान नहीं देंगे, ये तो केवल मुहूर्त निकलवाने की फीस के दो चार रुपये ले लेंगे, और भूटी सच्ची दो चार बातें बना कह देंगे कि अमुक तिथि, अमुक चार तथा घड़ी लड़कियों की शादी के लिये बड़ी मंगल दायिनी है, फिर चाहे व्याह होने के पश्चात् ही दूल्हा मर जावो अथवा दुलहिन । इनको इसकी कुछ परवाह नहीं, इनको तो केवल इस प्रकार की भेट देने वाली शिकार मिलनी चाहिये । हाला कि ये लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि बाल विवाह कराने की अनुमति देना ठीक नहीं है। और शास्त्रों में भी कम से कम १६ वर्ष की लड़की तथा २५ वर्ष के लड़के की शादी कनिष्ठ दर्जे की मानी गई है, और आयुर्वेद (स्वास्थ्य) शास्त्र की श्राज्ञा से भी विरुद्ध है क्योंकि कच्चा बीज पृथ्वी में डाला जायगा तो उसका न पौधा ही लगेगा और न फल फूल ही, अर्थात् बाल विवाह स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हानिकर है। इतना सब कुछ होते हुए भी फिर ये मिथ्या ज्योतिषी भोले भाले मनुष्यों को केवल रुपया या दो रुपया लेने की नियत से शुभ लग्न या मुहूर्त बता विवाह करने की अनुमति दे देते हैं तो यह साक्षात् अनर्थ और धोखा नहीं तो फिर क्या है। इनका कर्तव्य तो यही था कि जब कोई अज्ञानी मनुष्य अल्पाऽवस्था में अपने पुत्र और पुत्रियों की शादी के लिये याज्ञा मांगे या मुहूर्त पूछे तो इनको साफ कह देना चाहिये कि इस शायु में लड़के लड़कियों की शादी करने का ठीक मुहूर्त नहीं है। तो विचारे यजमान का भी भला होगा और लड़के लड़की का नो भला होगा, वह तो सब जानते ही हैं, कि योग्य अवस्था में शादी करने से उनका कितना हित हो सकता है। ।

(८) इसी प्रकार दूसरा कोई मनुष्य पूछे कि महाराज मिश्रजी या ज्योतिषी जी मेरी लड़की की उम्र १० साल की है और दूल्हा (वर) की आयु ५० वर्ष है, ज़रा इनकी शादी का मुहुर्त निकाल दीजिये। फिर इसी प्रकार एक कोई तीसरा और पूछे कि महाराज मेरी लड़की की आयु १३ वर्ष है और लड़के की श्रायु १० वर्ष है। जरा दोनों का विवाह का लगन मुहूत निकाल दीजिये। तो ज्योतिपीजी पौरन दोनों का लगन मूहूर्त निकाल कर शुभ घड़ी, शुभवार और तिथि बतला कर यजमान से दो चार रुपया फीस का लेलेगे। ये लोग इस बात पर कभी ध्यान न देंगे कि बाल विवाह, वृद्ध विवाह तथा अनमेल विवाह देश और राष्ट्र के लिये कितना घातक होता है तथा इसका मानव समाज पर कितना कुछ प्रभाव पड़ता है। इनको तो चाहे व्याह होते ही बुड्डा मर नावे, तथा लड़की को कितना ही कष्ट हो जावे, इस बात की कोई परवाह नहीं है। इनका तो जनता रामाज को धोखा देकर अपना कर (rent in arrears ) वसूल होना चाहिये। और भविष्य में भी इनका इसी प्रकार कार्य चलता रहे यही एक मात्र इनकी हार्दिक इच्छा बनी रहती है। इसी प्रकार जब किसी का प्रिय पुत्र अथवा प्रिय बांधवादि बीमार हो जाता है, और उस बीमार के संरक्षक माता पितादिक किसी ज्योतिषी जी के पास में जाकर पूछते हैं कि महाराज इस बीमार के ग्रह गोचर कैसे हैं तो ज्योतिषीजी देखते ही प्रसन्न हो जाते हैं और दो चार टेढ़ी सीधी बातें बनाकर कह देते हैं कि इसके अमुक २ क्रूर ग्रह पड़े हैं उनकी शान्ति के निमित्त अमुक २ दान करावो, अथवा महामृत्युञ्जय का जाप करावो । देखिये ! इनकी इस करतूत पर ध्यान दे, कि ये लोग दूसरों को तो ऐसी २ बातें कह कर बहका देते हैं और जब इन ज्योतिषी जी के घर पर कोई बीमार हो जाता है तो फिर ये लोग ग्रह गोचर तथा महामृत्युञ्जय का ध्यान न देगे किन्तु फौरन वैद्यजी के पास में अथवा डाक्टर के पास में पहुंच . जावेंगे और उचित औषधि सेवन कराने में तल्लीन होजावेगे। प्रत्र अब बत.

लाइये ये इनका सरासर धोखा नहीं तो फिर क्या है ? इस प्रकार श्रापने बड़े २ शहरों की सड़कों के किनारे पटरियों पर आसन बिछाये बैठे हुए कई ज्योतिषियों को प्रश्न फल बतलाते देखा होगा, अथवा कई प्रकार की उलटी सीधी बातें बना कर धोखा देते देखा होगा ? श्रव सोचने की बात है कि जिनको शुद्ध लिखना और पढ़ना भी नहीं पाता है और वे फिर ज्योतिष विद्या का ठेका लेकर मनुष्यों के हानि लाभ, जय परालय, यश अपयश श्रादि के दूर करने का दावा करें तो यह एक दम धोखा देना नहीं तो फिर अतः मनुष्य मात्र का कतव्य है कि इस प्रकार के मिथ्या ज्योतिषी नो ईश्वर के नाम पर जनता नात को धोखा देकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं, उनसे सदैव बचने की चेष्टा की नावे, और अपने अच्छे, या बुरे कर्मों पर ध्यान दिया जावे। संसार में दुख सुग्न जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वह सब अपने कर्मों का ही फल है, अतः शुभ कर्म करते हुए कर्मवीर बनना ही मनुष्य मात्र का धर्म है और गीता का सिद्धान्त भी ही है कि:- क्या है? कर्मणिवाधि कारस्ते माफलेषु कदाचिनः । स्वयं भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि हे अर्जुन ! तेरा कर्म करने में ही अधिकार हो और फल में न हो। भगवान के कहने का अभिप्राय यह है कि जो कुछ तुमने कर्म किये हैं उनका फल तुमको अवश्य मिलेगा, अतः कमों के फलों को पूछने के लिये किसी ज्योतिषी ग्रादि के पास जाकर व्यर्थ अपने समय और धन की हानि न करो। क्यों कि यह वात प्रत्यक्ष देखी जाती है कि जब कोई दुखिया ज्योतिषी के पास में नाता है, और ज्योतिषी जो कुछ उसको दान दक्षिणा तथा जाप आदि बतला देता है और वह दुखिया ज्योतिषी जी के द्वारा बताये हुए सारे कार्यों को विधि सहित करके ज्योतिषी जी को दान दक्षिणा प्रेम सहित दे देने पर भी नन उसका दुख दूर नहीं होता है। तब ज्योतिपीजी भी उसको यही बात कह कर अपना पीछा छुड़ा लेते हैं, कि भाई-तुमने दान दक्षिणा देने में तो ( १० ) कोई कमी नहीं की, और हमने भी तेरा कार्य करने में कमी नहीं रखी, किन्तु ईश्वर और कमां के आगे किसी का कुछ वश नहीं चलता है। इस प्रकार प्यारे भोले भाइयों! जब दुख सुख की व्यवस्था कमों पर ही नियुक्त है और कर्म का फल भोगना अवश्य संमव है, तो फिर अपने भाग्य विधाता कर्म और ईश्वर को छोड़ कर इन ज्योतिषियों के चकर में पड़ कर क्यों दुखी होते हो? ४ मंदिर देवालय के नाम पर धोखा अाजकल देखा जाता है कि धर्म और ईश्वर के नाम पर मन्दिर और देवालय बना २ कर जनता जगत को कितना धोखे में डाला जा रहा है। पूर्व ज़माने में जब कभी मन्दिरों का प्रचार हुअा होगा, तब इस का सम्बन्ध ईश्वर और धर्म के नाम पर हो तो कोई पता नहीं। किन्तु अाज कल तो देखा जाता है कि ईश्वर और धर्म के नाम पर मन्दिर बना कर इनका दुरुपयोग कर रहे हैं कारण इसका यह है कि जब से मन्दिरों में वैषयिक पदार्थों का समावेश हुआ तब से ही इनमें कई प्रकार के अनर्थ होने लगे। इस बात को सब कोई जानते हैं कि बाहिरी.पदार्थों से तथा भोगों से सदा सत्य दूर रहता है, और इसलिये भोग लिप्सा को त्यागना जीवों का परम कर्तव्य माना गया है। जब जीव के लिये ही भोग भोगना तथा भोगों की सामग्रियों का त्याग श्रेष्ट है, तो फिर ईश्वर के नाम पर भोगों को संग्रह करना तथा भोगों को भोगना मूर्खता नहीं तो फिर क्या है ? जब मन्दिर के पुजारियों को ईश्वर के नाम पर आवश्यकता से अधिक द्रव्य ' तथा भोग सामग्रियां प्राप्त होने लगी तो इन्द्रिय संयम छूट गया, मनो वृत्तियां ईश्वर की ओर से हट कर संसारी पदार्थों की ओर को झुकने लगी, धर्म कर्म सब नाश हो गया, और ये मन्दिर तथा देवालय केवल पेट ( ११ ) पालने का लक्ष्य स्थान बन गया, और ये मन्दिर के पुजारी लोग मन्दिर के ठेकेदार बनकर नाना प्रकार की ईश्वर और धर्म सम्बन्धी बातें बना २ कर जनता जगत को धोखा देने लगे। जब इनके सहयोगी दूसरे लोगों ने देखा कि मन्दिर और देवालयों के नाम पर अनेको 'भोग तथा आवश्यकता से अधिक द्रव्य मिलता है तो हर एक मनुष्य की भावना में मन्दिरों को बनवा बनवा कर उनके द्वारा प्राप्त हुए भोगों को भोगना ही उचित जान पड़ा, और मन्दिर बनाने की स्कीम तथा पइयन्त्र स्थान २ पर चालू हुए। कोई साधक जंगल में मूर्ति दबा धाया और फिर लोगों में प्रचार करने लगा कि मुझको भगवान ने स्वप्न में दरशन दे कर अाज्ञा दी है कि अमुक स्थान से भगवान की मूर्ति प्रगट हो जावेगी। इस प्रकार गली २ में और कचे २ में अनेको देवी देवताओं के मन्दिर बनाये जाने लगे, और हर एक मन्दिर के पुजारी उनकी ठेकेदारी ग्रहण कर अनेकों प्रकार के भोग भोगने में दृढ़ संलग्न हो गये। किसी मन्दिर में ५००) रुपये रोज का भोग लगने लगा, सैकड़ों ग्राम मन्दिरों के नीचे लगाये गये, और अनेकों प्रकार के टैक्सेज रूपी ग्राजीविका खड़ी की गई। सैकड़ो स्त्री पुरुष दर्शनार्थ पाने लगे। इस प्रकार ये सब मन्दिर पुजारियों के लिये ही अड्डे मात्र रह गये । अाजकल जो कुछ अनर्थ और धोखेबाजी इन मन्दिरों में हो रही है वे किसी से छुपी नहीं है, कंचन और कामिनी दो ही संसार में विचित्र घाटी मोनी गई हैं ये दोनों जहां एक जगह एकत्रित हो जावें तो वहां अनथों की क्या कमी रहती हैं। मन्दिर में प्रायः ये दोनों वर्तमान रहती हैं, तो फिर मन्दिरों में जितने भी अनर्थ हो उतने ही थोड़े हो सकते हैं। विधर्मियों के अटेक मन्दिरों पर क्यों हुए ? सोमनाथ के मन्दिर को महमूद गौरी ने क्यों लूटा ? तो कहना पड़ेगा कि द्रव्य के लोभ से । श्राज भी इस प्रकार की कई दुर्घटनायें मन्दिरों में प्रायः होती ही रहती हैं। कहीं राधिका जी के कानों के कुन्डल तो कहीं गले का हार ही चुराया जा रहा है।

(१२) सब क्यों हो रहा है ? तो इसका यही तो कारण है, कि श्रावश्यकता से अधिक ईश्वर के नाम पर वस्तुओं का संग्रह करना। कभी आपने सुसलमानों की मसजिद अथवा ईसाइयों के चर्च में इस प्रकार की चोरी होते सुना है ? तो कहना पड़ेगा कि कभी नहीं। दूसरे, इनके चर्च तथा मसजिद भी कहीं २ शहरों में एक २ वा दो दो ही बनी हुई दिखाई देंगी हमारे मन्दिर तथा देवालय जैसे नहीं कि छोटे २ ग्रामों में भी दस दस बीस वीस की संख्या पाई जावेगी। और जिस उद्देश्य व लक्ष्य की पूर्ति निमित्त ये मन्दिर तथा मसजिद बनाते हैं तो उस उद्देश्य की पूर्ति इनके द्वारा अवश्य करते हैं। चर्च में श्राप रविवार को नाकर देखिये। प्रायः उस दिवस सब के सब ईसाई एक जगह एकत्रित हो जाते हैं और बड़े प्रेम से ईश्वर की स्तुति तथा व्याख्यान श्रवण करते हैं। इस प्रकार मुसलमानों को भी नित्य प्रति नमाज के समय एकत्रित होते हुए देखा जाता है। किन्तु शोक है, कि हमारे मन्दिरों में इस प्रकार का लक्ष्य कोई भी देखा नहीं जाता। इसका कारण यह है कि हमारे यहां पर मन्दिर केवल पुजारियों को भोग भोगने के लिये अड्डे मात्र बनाये गये हैं, और उनकी श्राजीविका के मुख्य केन्द्र स्थापित हो गये हैं। और इसीलिये ये लोग चरित्र भ्रष्ट होते जा रहे हैं। क्यों कि जहां श्रावश्यकता से अधिक सम्पति तथा भोग प्राप्त होते हैं तो वहां आलस्य और प्रमाद को स्थान मिल पाता है । इस कारण इन लोगों की भावना सदा ईश्वर से विमुख रहती है, जैसे बकुला मछली की ताक लगाये जल के किनारे बैठा रहता है, और मछली को देखते ही हड़प कर जाता है, यही हाल इन मन्दिरों के पुजारियों का देखा जाता है, ये लोग सदा मन्दिरों में बैठे हुए भोले भाले स्त्री पुरुषों को ईश्वर और धर्म के नाम पर कई प्रकार की मीठी २ बातें बना तथा कई प्रकार के महात्म्य की बातें बता २ कर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं। - किसी को कहते हैं कि सेठ आज तो भगवान को भोग नहीं लगा है, तू ही आज अपनी तरफ से भगवान को भोग लगवादे। किसी स्त्री को कहते हैं कि राधिका जी के कुन्डल नहीं है तू ही अपनी तरफ से बनवादे । किसी को कहते है श्रान एकादशी है, भगवान को फलाहार के लिये सेर भर कलाकन्द ही दिलवादे। कहने का अभिप्राय यह है कि इस प्रकार की बहुत सी चापलूसी की बातें करके संसार को धोखा दे रहे हैं और अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। फिर इन देवालयों तथा मन्दिरों से किसी को लाभ होता है सो भी बात नहीं है, हां अलबत्ता इस प्रकार के मन्दिरों से पुजारियों का काम अर्थात् ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करके संसारिक नाना प्रकार के भोग भोगना तथा द्रव्यो- पार्जन करके अनेकों अनर्थ में प्रवृत्त होना तथा मुलफा, गांजा, तथा भंग श्रादि का पीना तथा बालस्य और प्रमाद में पड़े रहने के सिवाय दूसरी उत्तम बातें कोई भी देखी नहीं जा रही है। ये लोग इन मन्दिरों में वेकार पड़े हुए रात दिन अपनी स्कीम में ये ही बात सोचा करते हैं, कि किस प्रकार अमुक सेठ या सेठानी को धोखा दिया जाय, किस प्रकार किसी भोली भाली शिकार को ईश्वर और धर्म के बहाने पासा कर अपना स्वार्थ सिद्ध किया जाय, इस प्रकार रात दिन इनकी भावनाओं में सिर्फ धोखा देने के सिवाय सद भावनाओं का विकास तो देखा ही नहीं जाता। फिर इन लोगों ने अपना पेट इतना बढ़ा रखा है, कि इनको चाहे मन्दिर और देवालयों से कितनी ही खाने पीने की चीजें मिल जाय और चाहे कितना ही दान दक्षिणा मिल जाय, तो भी इन पेट भरा हो ऐसा कभी देखा नहीं जाता, हर समय श्राप लोग इनको किसी न किसी वस्तु के बहाने चिल्लाते हुए ही देख सकते हैं। से मैं अभी थोड़े दिन हुए राजस्थान उदयपुर में गया था, नाथद्वारा एक बड़ी प्रसिद्ध जगह है, वहां पर श्री नाथ जी महाराज का मन्दिर है वनां नित्य प्रति ५००) या ७००) रुपया के लग भग भोग लगा करता है किन्तु आश्चर्य की बात तो यह है कि उस पदार्थ में से जरा भी गरीबों तथा अभ्या- गतों को मिलते नहीं देखा गया, वह सारा का सारा बाजार में दुकानदारों की १४ दुकानों पर बिकता हुया दृष्टि अाता है। अब विचारिये ! यह नाम तो भोग का है, किन्तु लक्ष्य कुछ दूसरा ही बना हुआ है। इसी प्रकार आप जहाँ भी इन बड़े बड़े नामी २ देवालय तथा मन्दिरों में जायगे, वहाँ सब जगह आपको ऐसी ही करतूत पाई जावेगी। ये लोग कहते ज़रूर है कि भगवान को भोग लगाते हैं किंतु भगवान का नाम लगा कर खा आप बते हैं। हाँ, एक प्रकार से भगवान ज़रूर खाया करते थे, पूर्व ज़माने में जो भगवान को भोग लगाने की प्रथा थी, वह अवश्य सद्भावना को लिये हुए थी , क्योंकि मन्दिरों में बड़े बड़े विद्वान संत महात्मा, गरीव तथा अभ्यागत लोग जाया करते थे, और इन मंदिरों में ठहरते थे, इनको वहां अतिथि रूप में हर प्रकार का याश्रय दिया जाता था और जो कुछ भगवान को भोग लगता था वह सब इनके खाने के लिये दिया जाता था, इस प्रकार अतिथियों की तथा विद्वान संत महात्माओं की कुछ सेवा होती थी, वह सव भगवान ही की सेवा समझी जाती थी, और जो कुछ भगवान का भोग बनता था, उसको ये लोग खाया करते थे, उसके विषय में यही समझा जाता था कि भगवान खाते हैं। किन्तु अब तो मन्दिरों में ऐसी कोई बात नहीं पाई जाती न तो किसी अतिथि को ठहरने ही देते हैं और न उनका किसी प्रकार सत्कार ही देखा जाता है, अाजकल तो चाहे जितना बड़ा मंन्दिर बना कर देदो और चाहे पांचसौ रुपया रोज की आजीविका लगा दो तो भी मन्दिर के ठेकेदारों का पेट नहीं भरता । कहने का अभिप्राय यह है कि जब से इन देवालय तथा मन्दिरों में ईश्वर और धर्म की झूठी (बनावटी) दुहाई देने वाले पुजारी रूप ठेकेदारों का अधिपतित्त्व हो गया, तब से इन मन्दिरों में केवल इनकी भलाई होने के सिवाय जनता जनार्दन को कोई लाभ होता है ऐसी बात नहीं देखी जाती। - देखिये ! आप लोग कोई शिक्षा मन्दिर अर्थात् स्कूल तथा पाठ- शाला खोलते हैं तो उनमें कितने ही विद्यार्थी पढ़ लिख कर योग्य होते हैं । इसी प्रकार जब आप स्वास्थ्य मन्दिर स्थापित करते हैं तो उसमें कितने ही रोगी आरोग्यता प्राप्त करते देखे जाते हैं। अर्थात् इस प्रकार की संस्थानो' के (१५ साथ २ उनमें जनता जगत के उपकार का प्रति फल भी साथ ही साथ प्रत्यक्ष दिखाई देता है। किन्तु इन बड़े २ देवालय तथा मन्दिरों से किसी को किसी प्रकार का लाभ होता है सो बात बिलकुल दिखाई नहीं देती। केवल बड़े २ महन्त तथा पुजारियों को छोड़ कर जनता जगत का कुछ उपकार होता हो सो कुछ भी दिखाई नहीं देता, और अनुपकार जो कुछ हो रहा है सो सबों को प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है, अर्थात् इन मन्दिरों के बहाने ईश्वर और धर्म का नाम ले लेकर कितने भोले भाले नर नारियों को ठगा जा रहा है, और कितने प्रकार के टेक उगाये जा रहे हैं। और फिर इन मन्दिरों तथा देवालयों के व्यवस्थापकों में इतनी बड़ी पोल बुसी हुई है कि जिसके कारण ये चाहे जब जनता जनार्दन को धोखा देकर हजारों तथा लाखों रुपया दान या चढ़ावा का ले लेकर, अथवा कितनी ही खाने पीने की उत्तमोत्तम सामग्रियाँ तथा कपड़े लत्ते प्राप्त करलें, तो भी इन से पूछने वाला या कहने वाला नहीं है कि तुम्हारी कितनी आय हुई और किस २ कार्य में कितना व्यय हुग्रा, अर्थात् इनसे लेखा नोखा लेने का किसी को अधिकार नहीं अब बुद्धिमान पाठक सोचे ! कि इन से अधिक स्वतन्त्रता तथा स्वच्छन्दता किस महकमे में पा सकते हैं। मेरी समझ में तो ऐसा कोई दूमरा महकमा दिखाई नहीं देता कि जहां पर इस प्रकार के अाय व्यय का नियन्त्रण न रखा नाता हो। प्यारे सजनो ! अाज इनकी स्वतन्त्रता तथा स्वच्छन्दता का ही यह परिणाम है कि ये सब बड़े २ मन्दिर तथा देवालय इन पंडे और पुलारियों के भोग भोगने को एक मात्र पढे बन गये हैं, जिनमें ये लोग निडर व निर्भीक बन कर जो चाहे सो कुकृत्य में रत हो सकते हैं, और जिसको चाह मन्दिर में प्रवेश करने दें, और जिसको चाहें न करने दें, सब प्रकार की आजादी अपने हाथ में ले रखी है। और अभिमान में इतने चूर हो गये हैं कि अपने समान किसी दूसरे को देख ही नहीं सकते, बस ये ही इनके पतन का कारण है। यदि सचमुच में देखा जावे, तो ये पंडे और पुजारी कंवल जनता जनार्दन की सेवा करने के लिये तथा अागन्तुक अतिथियों को मुख पहुँचाने (१६) के लिये नियुक्त किये थे, किन्तु अब ये लोग अपनी सेवा भाव को भूल कर खुद स्वामी बन बैठे हैं। हालांकि मन्दिरों में इनकी निजी कोई वस्तु दिखाई नहीं देती, क्योंकि मन्दिर बनाने में जो सम्पत्ति लगती है वह कोई दूसरा ही लगाता है, चढ़ावा जो कुछ चढ़ाया जाता है वह दूसरे ही चढ़ाते हैं, मन्दिरों की सुव्यवस्था के लिये जो जागीर प्रदान की है वह भी दूसरों के द्वारा ही प्रदान की गई है। और मन्दिरों में जो कुछ खाने पीने को माल उड़ता है वह भी दूसरों के द्वारा ही है। कहने का अभिप्राय यह है कि मन्दिर बनाने वाला, मन्दिर की व्यवस्था करने वाला तथा आवश्यकता से कहीं अधिक द्रव्य देने वाला तो जनता जगत है, और मालिक बनने वाला तथा माल उड़ाने वाला और भोगों को भोगने वाले ये सब पंडे पुजारी है। बस ये ही एक महा अन्धेर है, और ये ही बड़े २ पंडों पुजारियों के भ्रष्ट होने का मुख्य साधन है। क्योंकि इन पर जनता जनार्दन का कोई प्रति बन्ध देखा नहीं जाता, और तिस पर इनको आवश्यकता से कहीं अधिक सामग्रियां तथा द्रव्य की प्राप्ति होती है, तो ऐसी स्थिति में ये लोग जितना भी अनर्थ करें सो ही थोड़ा है अतः जनता जगत का कर्तव्य है कि वह इन पर कुछ प्रतिबन्ध लगावे ताकि जिन उद्देश्यों की पूर्ति निमित्त ये मन्दिर तथा देवालय बने हैं उन उद्देश्यों की पूर्ति विधिवत् होने लगे। विना प्रतिबन्ध लगाये न तो इन पंडे पुजारियों का ही उद्धार होगा, और न जनता जनार्दन ही की कुछ भलाई होगी, यह अटल सिद्धान्त है। अब इन पंडे पुजारियों की जो करतूत है, सो निम्नलिखित गायन द्वारा पाठकों को भान कराया जाती हैं। जरा सुनिये:- ये लोग मन्दिरों में क्या २ कुकृत्य करते हैं । गायन मन्दिर में मौजां उडे आनन्द अखण्डारे। माल मार सुस्टन्डारे ॥ टेक ॥ ठाकुर देख देख होय ठंडा रे।। माल मारे मुस्टन्डारे ॥ टेक ।। बड़ी जुगति पकवान बनावे, प्रभु जी के आगे पुरषावें, ܝܕ ( १७ ) घंटा छालर नाद, बनावे, प्रभु को ठोसा बताव पाजावे पंडारे। माल मारें मुस्टन्डारे ॥ १॥ फूल डौल हिन्डोल सनावें, लीला खेलें रास रचावे, तीसों दिवस त्यौहार मनावें । नाचें कूदें रात दिना सौ फैलाय अफन्डारे ॥ माल मार मुस्टन्डारे ॥ २ ॥ सांझ सवेरे पीवें भंगा, सुलफो सार रचावें रंगा, हो चकचूर हंसें हुर दंगा। तन जाराँ ताजा धना सो मन मांहि घमन्डारे॥ माल मारे मुस्टन्डारे ॥ ३ ॥ दर्शन को जब या नारी, प्रेम प्रफुल्लित होय पुजारी, मुलके, इसे निजारा मारी । जारी का जाने जीका सो कई हथकंडारे ॥ माल मारे मुस्टन्डारे ॥ ४ ॥ अण्ड बण्ड पाखएड र चावे, भोली दुनियां को बहकावे, अपना स्वार्थ सिद्ध करावें । वेद धर्म के भ्रम,का जिन फोड्यो भंडारे ।। माल मार मुस्टएडारे ॥ ५ ॥ समय देख कवि कहे समुझाई, धूर्त पोप लीला फैलाई, इनके कहे न चालो भाई । सिर में इनके धूल देई मारो दोय डंडारे ।। माल मारें मुस्टण्डारे ॥ ६ ॥ अतः इन सब पंडे पुजारियों का चरित्र निर्माण करने के लिये जनता जगत को उचित है कि वह इन पर कुछ ऐसा नियन्त्रण कायम करें कि जिससे इनका प्रभुत्व नाश होकर जनता जनार्दन की सेवा के सच्चे अधिकारी हो जायें। यही मेरी मुदृढ़ भावना है। १ ( १८ ) ५. मन्दिरों की सार्थकता कैसे हो - प्रपञ्च और पाखण्ड की वृद्धि जब ही होती है, कि जब इनके उपा- सकों की वृद्धि हो जाती है। अाजकल देखा जाता है कि अधिकांश मनुष्य भोगों के दास बनते जा रहे हैं, और इन भोगों को प्राप्ति के निमित्त सारा संसार दृढ़ प्रयत्नशील हो रहा है, कोई इनमें अपने नाना प्रकार के पुरुषार्थ द्वारा द्रव्योपार्जन कर भोग भोगने में संलग्न है, कोई कथा वार्ता सुना कर भोगों का संग्रह कर रहे हैं, तो कोई २ ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा दे अपने भोगों की पूर्ति में दृढ़ संलग्न हैं। कहने का अभिप्राय यह है, कि समस्त संसार को नाना प्रकार के भोग भोगने को भोगालय बना रखा है, और जिस किसी प्रकार भी भोगों की पूर्ति हो मनुष्य वेही कार्य करने में प्रवृत हैं। बस ये ही हाल लोगों ने हमारे मन्दिर और देवालयों का कर रखा है, इनको भी लोगों ने द्रव्योपार्जन करने तथा नाना प्रकार के भोग भोगने के लिये अड्डा बना रखे हैं। और ये ही कारण है कि मन्दिरों में जिन उद्देश्यों की पूर्ति निमित्त वे बनाये गये थे उन उद्देश्यों की पूर्ति देखी नहीं जाती । प्राजक्ल मनुष्य अपने नामों के लिये बड़े २ मन्दिर बना कर संसार भर के पदाथों को एकत्रित कर देते हैं और लाखों रुपयों की सम्पत्ति लगवा कर नाना प्रकार के भोग भोगते हैं, जिसका परिणाम यह निकलता है कि या तो उन पर विधर्मियों का अटेक (याक्रमण) होता है, या चोर अथवा लुटेरे श्राकर लूट मार करते हैं। अतः मन्दिरों में भोगों के निमित्त अथवा दिखावटी शोभा बढ़ाने के लिये कोई ऐसी चीज वा द्रव्य नहीं रखना चाहिये कि जिसको देख कर मनुष्यों की चित्त वृत्तियों में क्षोभ पैदा हो जावे अथवा उनके चुराने की इच्छा प्रगट हो जावे। मन्दिर जहा तक हो सके शुद्ध वातावरण में बनाने चाहिये और बहुत कम बनाने चाहिये, मन्दिरों की बहुतायत हो जाने से मनुष्यों का प्रेम भी कम हो जाता है और बहुधा मनुष्य उनसे अपना स्वार्थ सिद्ध किया करते हैं। मन्दिरों में एक बहुत बड़ा , १६ हाल Hall) बनाना चाहिये कि वहां पर भक्त लोग उपस्थित हो कर कथा, वार्ता अथवा व्याख्यान श्रादि श्रवण कर सकें। उनका सदुपयोग होने के लिये प्रत्येक मन्दिर में शिक्षालय स्थापित होने चाहिये कि जहां पर शिशु बालक अथवा बालिकायें विद्याऽध्ययन कर सकें और साथ ही मन्दिरों में स्वा- स्थ्य विभाग भी होना चाहिये, कि जिसमें गरीबों को साधारण रोगों की ग्रोप- धियां दी जा सकें। और अतिथियों के ठहरने की व्यवस्था भी मन्दिरों में ही होनी चाहिये कि जिससे बड़े २ विद्वान साधु महात्मा अा अाकर समय २ पर अपने सद् उपदेशों से जनता की भलाई कर सकें। मन्दिर के पुजारियों को मन्दिर कमेटी से उनके गुजारे का प्रबन्ध किया जावे, और मन्दिर की सारी सम्पति पर मन्दिर कमेटी का अधिकार रहना चाहिये। पुजारी का आचरण स्वराब हो जावे, अथवा सेवा करने में ग्रालस्य प्रमाद करे तो मन्दिर कमेटी उसको प्रथक करके उसकी जगह शुद्ध आचरण वाले पुजारी की नियुक्ति कर दी जावे। मन्दिर कमेटी के पास कोष की अधिकता होने पर उसको शिक्षा मन्दिरों की व्यवस्था, स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्था अथवा गरीब छात्रों के छात्र वृति की व्यवस्था में खर्च किया जावे। बालकल हम देखते हैं कि जिस सेठ माहूकार के पास पैसा हुया कि बस उसको अपने नाम के लिये या तो मन्दिर बनाना पड़ता है या धर्म- शाला। और वे इन संस्थानों में अर्थात् मन्दिर या धर्मशाला बनाने में लाखों रुपया खर्च कर डालते हैं। इस प्रकार प्रान हजारों तथा लाखों मन्दिर और धर्मशालायें बनी देख पड़ती हैं कि जिनसे जनता जगत को बहुत . कम फायदा पहुंचता है, हां, अलबत्ता जिस पुजारी को यह मन्दिर सौंप दिया जाता है, उसको अवश्य फायदा होता है, क्योंकि उस की तो आयु भर के लिये गुजारा की स्कीम चल जाती है। इस प्रकार ये मन्दिर आगे जाकर द्रव्योपार्जन करने के साधन अथवा भोग भोगने के केन्द्र स्थान बन जाते हैं। ये मन्दिर बनाने वाले यदि अपने नाम की भावना को हटा कर ईश्वरीय भावना अथवा जनता जगत के उपकार की भावना को लेकर बनाये नावे तो (२०) फिर इतने मन्दिरों की बनाने की आवश्यकता ही क्या है ? आज शहरों में या तीर्थों की जगह पर जो सैकड़ों मन्दिर बने दीख पड़ते हैं, उनमें दो भावना देखी जाती है, या तो अपने नाम की भावना या इनके द्वारा द्रव्य कमा कर संसारिक भोग भोगने की भावना। इन दो भावनाओं के अतिरिक्त जो संसार के उपकार की भावना है वह इन मन्दिरों में स्वप्न को भी नहीं दीखती है। इसका परिणाम यह निकल रहा है कि ईश्वर के नाम पर भी भेद भाव खड़ा होगया । कोई कहता है कि यह मन्दिर अमुक सेठ का बनाया हुया है, इस लिये हम उसमें नहीं जाते, कोई अमुक का नाम लेकर भ्रान्ति पैदा करता है। इस प्रकार लोगों ने ईश्वर के साथ में भी छोटा चढ़ा, ऊँच नीच तथा भेद भाव रूपी भ्रान्ति दीवार खड़ी करदी। यह सब क्यों हुया ? सो कहना पड़ेगा, कि लोगों ने अपने नाम के लिये सब काम किये। कोई ईश्वरीय भावना को लेकर ये सब कार्य नहीं हुए, यदि ईश्वरीय भावना को लेकर ये सब काम किये जाते तो नाज इतने मन्दिरों के विस्तार करने की आवश्यकता ही क्यों होती? ईसाइयों को देखिये। वे जहाँ भी चर्च (गिरिजा घर ) बनाते हैं उसको अकेला कोई नहीं बनाता, सब यूनियन मिल कर बनाते हैं, और बहुत थोड़े चर्च बनाते हैं, कि जिससे उनका ईश्वरीय भाव तथा प्रेम सदा एक सा बना रहता है, और उस चर्च में जो कुछ भी सामग्री जुटाते हैं, वह ऐसी होती है कि सब के उपकार में श्रावे और किसी को उससे मोह उत्पन्न न हो। चर्च में क्या चीज़ होती है सो सुनिये:- चर्च के ऊपर क्रोस की मूर्ति होती है जो लोहे की शलाका की बनाई जाती है। और चर्च के भीतर प्रभु कीष्ट की मूर्ति होती है जो साधारण फोटू जैसी बनी होती है, और एक बहुत बड़ा हाल (Hall) बना रहता है, जिसमें लकड़ी का ऊँचा स्टेज (stage) होता है, जहां पादरी साहब खड़े होकर श्रोत्राओं को प्रार्थना अथवा लेकचर (Lecture attend) कराते हैं। और नीचे श्रोताग्रो को बैठने के लिये कुर्सियां (chairs) लगी रहती हैं कि जिन पर बैठ कर श्रोतागण चुप शान्त ( २६ ) बेट कर पादरी मात्र का भाषण सुनते रहते हैं। बहने या अभिप्राय पर है, कि उनके ईश्वर के घर में (church) श्रापको कोई भी ऐसा वैयक पदार्थ देखने में नहीं श्रावेगा कि जिसको देख कर विव क्षोभ पैदा हो सके। अब इनकी कार्यव्यवस्था तथा दान व्यवस्था प्रसाद दाजिक गिरजाघर के पादरी साहब को सोसावी मिशन के मालिक तुन ME है और वे पादरी साहब अपनी तनख्यार के प्रतिसालापाई भी अधिक ग्रहण नहीं कर सकते। एक. २ पाटी लाह के अन्दर एक गिरिजा घर नियुक्त रहते हैं, और वे समय पर ME . शिरा घर को सम्भाला करते हैं। पादरी मादय के सात में काम कि लिसमें ये लोग अपनी रोजाना की सविसेना से पायो ! करने । इस प्रकार पादरी साहब अपने देश के कार्य में स्टायतिन ईसाइयों को ज्यादा गिरिना घर बनाने की श्रावश्यक्तान Mala लोग जानते है कि भगवान एक है, इसलिये उसके नाम पर अनावर बना कर खड़े करने की आवश्यक्ता पयानो मा ने चना कर ग्राजिविका के श्रद्धे थोड़ी ही खना यरना अथादर और कई के नाम पर धोखा थोड़े ही देना है। इसको तो बोबुछ याताया जनता जनार्दन की सेवा करनी है, और वा सेवा एक माय की की जा सकती है। प्यारे सजनो ! श्राप निश्चर जानिये कोई देश नहीं है कि जो ईश्वर, तशा धर्म के नाम पर घोग देवर सपना पेट पालता हो, किन्तु भारत ही एक ऐसा देश है, और किसी जाति है कि जिसमें ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देने की भावना प्रत्यक्ष दीख पड़ती है। संसारिक कामों में यदि किनी तस घोसाये तो वह भी जनता जगत को कितना दुखदाई हो जाता है फिर सिर पर यदि श्वर और धर्म के नाम पर भी धोखा होने लगे तो या समार जीवित रह सकती है, यह ईश्वर ही जान सकता है।

२२ अब आप ईसाइयों की दान व्यवस्था के विषय में सुन लीजिये:- इन लोगो के जैसे चर्च आदि अवेला कोई व्यक्ति नहीं बनाता, युनियन मिल कर बनाती है। इसी प्रकार इनके दान की भी व्यवस्था है, इन लोगों को न तो अकेले दान खर्च करने की आवश्यकता है। इनके दान एकत्रित करने वाली भी यूनियन है, और खर्च करने वाली भी यूनियन है। यूनियन में जो कुछ दान अाता है उसको ये लोग अपने देश में ही खर्च नहीं कर देते हैं किन्तु उसके द्वारा ये लोग अपने धर्म का प्रचार करते हैं और गरीबों का उपकार करते हैं। इस कार्य को कराने के लिये मिशिन स्थापित कर रखी है। और देश के विभाजन के अनुसार उस दान को अनेक भागों में विभाजित कर के जहां जहां जिस जिस देश में इनकी ये मिशिन कार्य कर रही है वहां २ उस मिशिन के पास भेज देती हैं। इस प्रकार इनकी कई एक मिशिन भारत में भी बड़े प्रेम से कार्य कर रही हैं, इस मिशिन के पास में भी वहां करोड़ों रुपये का दान पाता है और यहां पर आकर पादरी साहब के रजिस्टर में अङ्कित होता है, और फिर जहां २ जिस जिस हिसाब से खर्च होता है, उसमें एक एक पाई का पादरी साहब को रेकार्ड रखना पड़ता है। यह किन किन कार्यों में खर्च होना है सो सुनिये:- - ईसाई लोग अपने दान को दो बातों में विशेष खर्च करते हैं, या तो शिक्षा मन्दिरों में खर्च करते हैं या स्वास्थ्य मन्दिर में। अर्थात् ये लोग यातो गरीबों को औषधि अथवा वस्त्र बांटते हैं या मिशिन स्कूल चालू करके गरीब अनाथ बालक या बालिकाओं की शिक्षा का प्रबन्ध करते हैं। अब आप इन की जनता जनार्दन के निमित्त जो सेवा का भाव है उस पर भी ध्यान दीजिये। ये लोग अच्छे २ परिवारों की स्त्री पुरुष अथवा पादरी साहन सब मिल कर या तो भंगी कोलोनी में जाते हैं, या चमारों की कोलो- नी (Colony) में पहुँचते हैं, और वहां जाकर ये लोग ऐसे आदमियों को टटोलते हैं कि जिन को कई प्रकार के व्रण (घाव ) पड़े हुए हैं, फटे ( २३ ) पुराने कपड़े दीख पड़ते हैं, खाने को जिनका कोई ठिकाना नहीं है। ऐसे श्रादमियों को ये लोग छांट कर अपने हाथ से उनके व्रणों (घावों ) को धोते हैं, फिर सुन्दर २ घावों को शीघ्र भरने वाली मलहम लगाते हैं । गले सड़े पुराने वस्त्र उतरवा कर उनको नवीन वस्त्र धारण करवाते हैं और भोजन तथा चीनी का प्रबन्ध करते हैं। इस प्रकार दस पांच दिन तक उनकी बड़े प्रम से सेवा करके रोगों से मुक्त कर देते हैं और फिर चर्च में लेजा कर उनकी ईसाई बना डालते हैं। और उनके बच्चों को पढ़ा लिखा योग्य विद्वान् बना कर साहब बहादुर बना देते है । अब देखिये एक ओर तो इनकी दान व्यवस्था, जाति व्यवस्था तथा ईश्वर व्यवस्था पर ध्यान दो कि जो मनुष्यों को देवता बनाते हैं, और दूसरी ओर तो हमारे इन पंड़े व पुजारियों पर ध्यान दो कि जो करोड़ों रुपया दान का हजम कर टट्टी के रास्ते निकाल देते हैं, और विचारे गरीब मनुष्यों को अछूत बना डालते हैं। यह तो मैंने ईसाइयों की व्यवस्था वर्णन की है, अब आप हमारी हिन्दु जाति की मन्दिर व्यवस्था, दान व्यवस्था तथा ईश्वर व्यवस्था पर ध्यान दीजिये । मने अापको ऊपर लिख कर बतलाया कि ईसाई लोग कोई अकेला अपना नाम पैदा करने के लिये गिरिजा घर नहीं बनावेंगे, किन्तु सब मिल कर बनावेंगे, और बनाने के पश्चात् उसमें कोई वैषयिक पदार्थ संग्रह नहीं करेंगे, और न सोना चाँदी ही इकट्ठा करके कोप स्थापित करेंगे; किन्तु नितान्त शुद्ध वातावरण में कोई परिपद नहीं, चर्च में जाते ही विषयों से विरक्ति हो जाये और ईश्वर की और अनायास मन लग जावे। इस प्रकार का बनावेंगे। किन्तु हमारे देश में यह सब मिल कर नहीं बनावेंगे, एक २ अादमी अपने स्मार्थ को लेकर तथा अपने नाम उजागर के लिये मन्दिर बना- बेंगे। फिर उसमें सारी संसार सम्बन्धी भोगों की सामग्री एकत्र कर देगे। एक सेठ ने वृन्दावन में अपने नाम के लिये मन्दिर बनाया, उसके प्रांगन में एक सोने का लहा गाढ़ा गया और मन्दिर को नाना प्रकारको भोग सम्बन्धी खामग्रियों से सजाया गया; दूसरा सेठ वहां दर्शनार्थ पहुंचा, उसने मन्दिर ( २४ ) देखा, और उसके हृदय में भी ऐसा मन्दिर बनवा कर उससे भी अधिक अपना नाम पैदा करना चाहा; और अपनी भावना के अनुसार उससे भी कहीं अधिक विस्तार वाला मन्दिर पुष्कर जी में बना डाला, और वैसा ही सोने का लक्ष मन्दिर के प्रांगन में खड़ा कर दिया । अब देखिये ! इस सोने के लछे से न तो ईश्वर को ही कोई फायदा और न जनता जगत को। इससे किसी को भी कोई लाभ नही है हां अलबत्ता हानि अवश्य है, क्योंकि माया को देखकर विधर्मियों को तथा चोर डाकुओं को लालसा होती है कि इस द्रव्य को किसी तरह प्राप्त करले। कहने का अभिप्राय यह है कि भगवान को क्या हम बाहिरी कीमती २ वस्तुएं दिखा कर वश में कर सकते हैं, अथवा उसको सुन्दर २ व्यञ्जन बना कर इन्द्रियों के स्वाद में डाल सकते हैं, अथवा सुन्दर २ कपड़े सजा कर उनको क्या सुन्दर बना सकते हैं ? तो कहना पड़ेगा कदापि नहीं। ऐसा कहना मनों भगवान का अपमान करना है। क्यों कि ये सब हमारी क्रियायें ऐसी हैं कि जैसे चक्रवर्ती राजा धिराज को सम्पूर्ण वस्तुओं से हटा कर एक छोटी सी झोपड़ी का मालिक बनाना, अथवा सूर्य के सामने दीपक दिखाने वाली कहावत चरितार्थ करना है। ये सब चीजें तो आपको अपने घर में ही शोभा दे सकती हैं, यदि आपने भगवान के मन्दिर को भी अपनी घरेलू वस्तुओं से संग्रहित कर दिया तो फिर आपके घर और मन्दिर में अन्तर ही क्या रहा ? श्राप को सन्ध्या पूजन तथा भजन करने की आज्ञा वन उपवन तथा एकान्त स्थानों में जाकर करने की क्यों दी जाती है ? तो इसका कारण यही है कि यहां पर संसारिक वाता 5 वरण से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुओं का अभाव है, यहां आपका मन ध्यानावस्थित हो सकता है। यही हाल हमारे मन्दिरों का है, मन्दिर ऐसे वातावरण में होना चाहिये कि जहां किसी भी प्रकार की सामग्री न होनी चाहिये चाहे वह रस सम्बन्धी हो अथवा द्रव्य सम्बन्धी । तो वहां हमारा मन ईश्वर के ध्यान में लग सकता है। और जहां घर से भी अधिक सामग्रियां मन्दिरों में जुटा दी जावें तो फिर वहां पर यह चंचल चित्त स्थिर कैसे हो सकता है ?

२५ ) आज हमारे मन्दिरों की जो दुर्व्यवस्था देखी जाती है उस का मुख्य कारण यही है कि हमने भगवान के मन्दिर में नाना प्रकार की वैषयिक चीजों का संग्रह करा कर तथा उत्तमोत्तम खाने पीने की चीजें पहुँचा कर इन पंड़े पुजारियों को भोगों का दास बना कर ईश्वर से विमुख कर दिया, कि जिसके कारण विचारे ईश्वरीय भावना को भुला कर रात दिन विषयों की लालसा में ही ध्यान लगाये बैठे रहते हैं। मन्दिरों के अधिक बनने की लो स्कीम चालू हुई उसका भो कारण मुझको तो यही दिखाई देता है। क्योंकि जब लोगों ने देखा कि ईश्वर और धर्म के नाम पर मन्दिर बनवा लेने से आवश्यकता से अधिक सम्पति तथा भोग विलास की सामग्रियां प्राप्त होती है तो गली २ तथा कुचे २ में मन्दिर स्थपित किये गये और सत्र पर अपना २ प्रभूत्व जमाया गया। ईश्वर और धर्म के नाम पर नाना प्रकार की कल्पना करा लोगों को धोखा देना शुरू किया। अतः इनका पुनरुद्धार करने के लिये मन्दिरों को शुद्ध तथा सात्त्विक बनाने के लिये दिखावटी भोग सम्बन्धी जो संसारिक पदार्थ है उनका त्याग करना चाहिये । और मन्दिर जहां तक हो सके बहुत थोड़े बनाना चाहिये, क्यों कि हमारे देश में पहिले से ही इतने मंन्दिर बने हुए हैं कि जिनकी सुव्यवस्था करना कठिन हो रहा है, तो फिर नवीन २ निर्माण करना तो धन का दुरूपयोग करना ही कहा जावेगा, यदि श्रापको मन्दिर बनाने में ही श्रानन्द है तो बड़ी खुशी से शिक्षा मन्दिर बनाइये अथवा स्वास्थ्य मन्दिर बनाइये। इनके बनाने में देश तथा राष्ट्र दोनों का ही हित हो सकता है। अब पाप हमारो दान व्यवस्था पर ध्यान दीजिये- - . दान की व्यवस्था जितनी हमारे देश में हिन्दुओं में पाई जाती है उतनी और किसी देश व जाति में हो सो नहीं देखी जाती । तिस पर श्राश्चर्य यह है, कि यह दान कहाँ और किस प्रकार खर्च होता है, अथवा इसका क्या परिणाम निकलता है ? इसका किसी को पता नहीं। पहिला दान तो हमारे यहाँ पर बड़े बड़े धनी सेठ साहूकार अपने २ माल के क्रय विक्रय पर दूसरों वसूल करते हैं, यह दान की रकम (संपत्ति) मेरी समझ में भारतवर्ष की से (२६) सबसे बड़ी संपत्ति है। इसको ये सब सेठ साहूकार ही तो वसूल करते हैं। और येही अपनी स्वेच्छा से जिन जिन कमों में इसको लगाना चाहिये उस २ कार्य में लगा कर समाप्त कर देते हैं। इनके इस दान के हिसाब किताब पूछने का भी किसी को कोई अधिकार नहीं है हालांकि यह धर्मादा भी वैसे देखा जाय तो जनता जगत का है, किन्तु इस पर जनता जगत का कोई प्रति- बन्ध नहीं है। ये सेठ साहूकार लोग प्रायः इस धर्मादा को क्षेत्र, सदावर्त धर्मशाला, तथा मंदिर आदिकों की व्यवस्था में अधिक खर्च करते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि ये सेठ साहूकार इस सारे धर्मादा को जनता जगत की सेवा में अर्पण कर देते हैं किन्तु इनका यह अर्पण करना भी बिना विचार के ही देखा जाता है इसलिये जितना फल देश को मिलना चाहिये, उतना प्रतीत नहीं होता। यदि ये सेठ साहूकार इस धर्मादा रूपी द्रव्य को एक कमेटी बना एक जगह एकत्रित कर सब मिल कर विचार सहित खरच किया करें तो देश और राष्ट्र का बहुत कुछ सुधार तथा हित हो सकता है। दूसरा दान हमारे देश में ईश्वर और धर्म का ठेका लिये हुए ये पड़े और पुजारी लोग एकत्रित करते हैं। इनके इस दान की भी कोई सीमा नहीं है, और ये लोग जनता जगत को कितना धोखा देते हैं सो इनके इस धोखा देने की भी सीमा नहीं है । ये लोग वैसे तो नित्य प्रति ही दान दक्षिणा लेते रहते हैं और फिर इसके अतिरिक्त मन्दिरों में दान लेने के बहाने से इतने त्यौहार तथा तिथियां तथा फूलडौल, हिन्डोल, प्रतिपदा, अमावस्या, पूर्णिमा तथा संक्रान्ति श्रादि अनेकों ही पर्व तिथियां नियुक्त कर रखी हैं कि जिनकी कोई गणना नहीं, और इसी प्रकार इनके द्वारा जो पर्व तिथियां नियुक्त की गई हैं और इन तिथियों पर जो इनको दान मिलता है उस दान की भी कोई सीमा नहीं है। इस प्रकार इनके पास में दान की एक बहुत बड़ी सम्पत्ति पहुँच जाती है, यदि इस दान का हिसाब लगाया जाय और इसका सदुपयोग किया जाय तो इन मन्दिरों में कितने ही शिक्षा मन्दिर, स्वास्थ्य मन्दिर गुरुकुल तथा ब्रह्मचर्य आश्रम चलाये जा सकते हैं। किन्तु । २७ ) इनके इस दान का कोई लेखा जोखा नहीं है, अर्थात् कोई पूछने वाला नहीं कि तुम्हारे पास में दान का कितना द्रव्य आया, और उसको किस प्रकार कितना २ खर्च किया गया। और फिर इनके इस प्रकार दान लेने में जनता जगत का कुछ लाभ होता हो, सो भी बात नहीं है, इस दान का फल तो इनके पेट तक ही सीमित रह जाता है, कि जिससे ये लोग अनेकों दुर्व्यसनों में रत हो जाते हैं। प्रकृति का यह नियम भी है कि जहां पर आवश्यकता से कहीं अधिक द्रव्य तथा भोगों की सामग्रिया प्रास होने लगे तो वहां पालस्य और प्रमाद बढ़ता है और इनकी वृद्धि होने पर अनेको भ्रष्टाचार होने लगते हैं। बस यही कारण है कि आज हमारे मन्दिर और देवालय पेट भरने के साधन तथा अनेकों भोग विलासियों के अड्डे बनते जा रहे हैं, और ईश्वर तथा धर्म की भावना केवल जनता जगत को धोखा देने के लिये शेष रह गई है। अतः नब तक इन मन्दिर तथा देवालयों के पुजारियों पर कोई जनता जगत का प्रतिबन्ध नहीं लगाया जायगा, तब तक न तो जनता जगत का ही भला हो सकता है और न ईश्वर व्यवस्था तथा धर्म व्यवस्था ही ठीक हो सकती है। तीसग दान हमारे देश में स्याने, भोपे (मन्त्र तन्त्र तथा भूत विद्या) के नाम पर तथा मिथ्या ज्योतिपी वन और राहु केतु की दशा बता जनता लगत को धोखे में डाल कर वसूल कर रहे हैं। भारत में ऐसे लोगों की संख्या भी कुछ कम नहीं है। क्योंकि ये लोग भी प्रत्येक गावों में तथा शहरों के कोने २ में बैठे हुए अपना स्वार्थ तथा उल्लू सिद्ध कर रहे हैं। इनके पास जनता नात का कितना द्रव्य पहुँचता है और कहां खर्च होता है इसका कोई लेखा जोखा भी नहीं है। ये दुनियां के कितने ही भोले भाले स्त्री पुरुषों को धोखे में डाल रहे हैं, और उलटी मुलटी बातें बना कर लाखों तथा करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति पर हाथ मार रहे हैं। इनके इस कार्य से जनता जनार्दन की कुछ भलाई होती हो सो कुछ भी दिखाई नहीं देती। दो ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा वाजी अवश्य देखी जाती है। चौथा दान हमारे देश में बड़ी २ संस्थानों के नाम पर धोखा देकर २८ वसूल कर रहे हैं। कोई दस बीस विधवा स्त्रियों को इकट्ठा करके बैठ गया है, और विधवाश्रम के नाम से चन्दा करके अपना उल्लू सिद्ध कर रहा है। कोई दस बीस गायों को इकट्ठा करके गौशाला के नाम पर लोगों को धोखा दे रहा है, कोई दस पांच लड़कों को लेकर बैठ गया है और अनाथालय तथा पाठशोला के नाम पर चन्दा किया जा रहा है। कहने का अभिप्राय यह है कि आजकल लोगों ने इस प्रकार की संस्थानो को भी अपना (Secret Trade) गुप्त व्यवसाय मान लिया है, और जनता जनार्दन का करोड़ों रुपयो इन संस्थानों के नाम पर एकत्रित करके भोग भोगने में दृढ़ संलग्न हैं। भारत में कुछ ही ऐसी संस्था हैं कि जिनके द्वारो जनता जगत का बहुत कुछ उपकार होता हुआ प्रत्यक्ष दिखाई देता है। किन्तु अधिक संख्या ऐसे लोगों की है कि जिनसे जनता जगत को कोई लाभ नहीं है, और वे लोग इन संस्थानों के नाम पर लाखों करोड़ों रुपया दुनियां से वसूल करके संसारिक भोग भोगने में ही लगे हुये हैं। अतः जनता जगत को चाहिये कि वे सदा ऐसे लोगों से . सावधान रहें और जिसको चन्दा देना हो उसको सोच समझ कर दिया करें। पांचवाँ दान वसूल करने वाले भिक्षक लोग हैं, जो रात दिन किसी न किसी बहाने से भीख मांगते ही रहते हैं। इनमें भी जो भिक्षा के अधिकारी हैं उनको तो पेट का गुजारा भी नहीं मिलता है, किन्तु जो अनधिकार चेष्टा करते हैं और जिन्होंने भीख मांगने को अपना व्यौपार बना रखा है, वे लोग कई प्रकार से भीख मांग २ कर हज़ारों रुपया दुनिया से वसूल करते हैं । इस प्रकार भिक्षक समाज में भी जनता जगत का करोड़ों रुपया खर्च हो जाता है, और इससे लाभ कुछ नहीं, उल्टी संसार में बेकारी बढती है। अतः जनता जगत का कर्तव्य है कि इस भिक्षा वृति को जल्दी से जल्दी खत्म करे। होच यह प्रबन्ध राष्ट्र करे अथवा जनता । दोनों में से किसी एक को अवश्य करना चाहिये। इन भिक्षुकों में से कुछ ऐसे भिक्षक जो अन्धे, लूले लँगडे तथा कुष्टि आदि हों उनको अलग छांटे जावें, और इनके निमित्त पूअर हाऊसेज़ २६ (poor houses) की कल्पना की नावे, जिसमें ये लोग रहते हुए सुख के साथ भोजन, वस्त्र तथा औषधि आदि प्राप्त कर सकें और ये दुनियां में जगह २ मांगते हुए दिखाई न दे सकें। इसके अतिरिक्त जो भिक्षुक लोग चलने फिरने वाले तथा हृष्ट पुष्ट अथवा दुर्बल व खिन्न हैं और जगह २ भीख मांगना ही जीवन का लक्ष्य बना रखा है। उनको उनकी योग्यतानुसार किसी भी कार्य की सुव्यवस्था कर सबको कार्य में परिणित कर देवे। और भविष्य में मांगने वालों पर कठिन प्रतिबन्ध लगा दिया जावे ताकि संसार में यह भिक्षा वृत्ति सदैव के लिये नाश हो जावे, और राष्ट्र की वृद्धि होवे । इस प्रकार भारतवर्ष में अनेकों प्रकार से दान लेने तथा देने की व्यवस्था है, और ईश्वर तथा धर्म के नाम की दुहाई देकर करोड़ों रुपयों का दान लेकर अपने २ भोगों में खर्च कर रहे हैं। अतः जनता लगत तथा राष्ट्र का कर्तव्य है कि वह इस दान की सुव्यवस्था करे । ६. गङ्गा यमुना तथा तीर्थादि के नाम पर धोखा आजकल हम देखते हैं, कि गंगा यमुना के ठेकेदार किस प्रकार इनके नाम पर धोका देकर अपना टेक्स वसूल कर रहे हैं। इन टेक्स वसूल करने वालों को हमारे देश में पंडों की उपाधि दीगई है, इनमें से कोई गङ्गा का पंडा, कोई जमुना का पंडा, कोई सोरू का पंडा, कोई गया का पंडा, कोई बद्रीनाथ, द्वारका रामेश्वर तथा जगदीश का पंडा इत्यादि नामों से कितने ही प्रकार के पंडे बोले नाते हैं। इन पंडे लोगों का इन तीर्थ स्थानों पर तथा गंगा यमुना अादि नदियों के किनारे पर इतना जमघट तथा प्रभुत्व पाया माता है कि मानों ये लोग उन तीर्थ तथा गंगादि नदियों के स्वामी हो अथवा स्वर्ग व नरकादि का ठेका मानों इन्होंने ही ले रखा हो । जो लोग इनको टेक्स.

देकर संतुष्ट कर देवे वह चाहे कितना भी पापी हो, अवश्य पापों से छूटकर स्वर्ग का अधिकारी होजाता है, और जो आदमी इनको दान दक्षिणा देकर संतुष्ट नहीं करता वह चाहे कितना भी धर्मात्मा हो, अवश्य नरक का अधिकारी होजाता है। इस प्रकार दुनियां के भोले लोगों को फंसाने के लिये अपना सिद्धान्त बना रखा है। और कई प्रकार की ऊँची नीची बातें बनाकर जै यमुना मैया की तथा जै गंगा मैया की कहते हुए चिल्लाते रहते हैं । जहां कोई यजमान इनके पास पहुँचा कि उसको चारों ओर से श्राकर इस प्रकार घेर लेते हैं कि मानों मांस के एक छोटे टुकड़े को देखकर चील मंडरा रही हों । फिर उसे कई वर्म कान्डों का महत्व सुना कई प्रकार का अपना टैक्स वसूल कर लेते हैं । कहने का अभिप्राय यह है कि भाज हमारे भारतवर्ष में गंगा तथा यमुना के नाम पर जितना टैक्स इन पंडों द्वारा वसूल किया जाता है, इतना संसार में शायद ही कोई महकमा हो जो इतना बड़ा टैक्स वसूल करता हो, मेरी समझ में तो कोई भी ऐसा महक्मा न होगा। अब मैं आपको इनके टैक्सेज़ का साधारण रीति से अनुमान रूप से परिचय करा देता हूं कि जिससे आपको पता लग जायगा कि कितने करोड़ रूपया सालाना हमको गंगा यमुना के नाम पर इनको देकर संतुष्ट करना पड़ता है। सो सुनिये:- प्रत्येक हिन्दू जो मरता है, उस मृतक की अस्थियां गंगा यमुना में प्रवाहित करने के लिये वहां पहुंचना पड़ता है, और वहाँपर इन पंडों का ठेका होता है, इनका टैक्स चुकाये बिना कोई भी व्यक्ति गंगा यमुना में मृतक की अस्थियों को प्रवाहित नहीं कर सकता। इस प्रकार भिन्न २ देशों के लोग मृतक की अस्थियों को लेकर वहाँ पहुँचते हैं और इनका टैक्स चुकाना पड़ता है, गरीब से गरीब जो होता है उसको भी कमसे कम गंगा यमुना के नाम पर दस बीस रूपया अवश्य खर्च करना पड़ता है फिर अमीरों के खर्च करने की तो बात ही क्या है। यह टैक्स तो इनका मृतक टैक्स है जो प्रत्येक हिन्दू को चुकाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त गंगा यमुना में स्नान करने के निमित्त ।

( ३१ भी पर्व तिथियों पर लाखों ही हिन्दू एकत्रित होते हैं, और उनसे भी ये लोग लाखों ही स्पयों का टेक्स वसूल करते हैं। इस प्रकार ये लोग प्रति वर्ष गंगा यमुना के नाम पर लाखों करोड़ों रुपयों का टैक्स दान के रूप में वसूल करके अपने शारिरिक भोगों में खर्च करते हैं, और मुल्फा, गांजा तथा भंग पीकर हर समय नशे में चूर रहते हैं । अब सोचिये ! कि इनको इस प्रकार प्रति वर्ष दान देने से क्या लाम है ? इससे न तो राष्ट्र का ही कुछ उपकार है, और न जनता जनार्दन ही की भलाई है। अत्र यदि यह कहो कि इनको दान देने से मृतक को स्वर्ग की प्राप्ति हो जायगी। यदि बात ठीक है तो फिर कमों की व्यवस्था भंग हो जावेगी। फिर तो चाहे कैसा भी पापी हो इनके दान देने से स्वर्ग को चला जावेगा। किन्तु प्यारे भाइयो । याद रखो, ईश्वर के घर में कोई पोपो बाई का राज्य नहीं है जो इस प्रकार की रिश्वत (Bribe) ग्रादि से काम चल जावे। यह लीव जैसा कर्म करता है वैमा फल अवश्य भोगना पड़ता है, और इस कम व्यवस्था से ही मनुष्य दुर्थी सुखी तथा स्वर्ग नरक का अधिकारी हो जाता है। यदि इन पंडों के कथनानुसार ही मृतक की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो फिर शास्त्र ने ऐसा क्यों कहा है कि:- "मनोवाकाय शुद्धानं राजन् तीर्थे पद पदे, तथा मलीन चित्तानाम् गङ्गापि की कटाधिका ।" अर्थात् हे राजन् ? निसका चित्त शुद्ध है उसके चरण २ में गंगा विरानमान है और जिसका चित्त शुद्ध है उसके लिये गंगा भी नरक के समान है। अथ श्राप समझ सकते है कि इन गंगा यमुना के ठेकेदारों का यह कहना कि गंगा में स्नान करने से अथवा मृतक की अस्थियां गंगा में प्रवा- हित करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, तो यह साक्षात् जनता जगत को धोखा नहीं तो फिर क्या है ?

( ३२ ) अतः उठो! और जागो! इन धोखा देने वालों से दूर भागो व्यर्थ इन को इस प्रकार का दान देकर अपने समय तथा द्रव्य को हानि क्यों कर रहे हो ? यदि दान ही देना हो तो शिक्षा मन्दिरों को दो, गुरुकुलों को दो! अनाथ बालकों को पढ़ाई में दो! स्वास्थ्य सुधार में दो ! कहने का अभिप्राय यह है कि जिस दान के देने में जनता जगत का उपकार होता हो, तथा जिसमें देश और राष्ट्र का हित हो वहां दान देना चाहिये । इसके अतिरिक्त जो मनुष्य दान लेते २ श्रघा गया हो तथा आवश्यकता से कही अधिक पूंनी उसके पास पहुँच गई हो, और उस पूजी को उसने संसारिक भोगों में तथा दुर्व्यसनों में खर्च करना हो जीवन का लक्ष्य बना रखा हो, और फिर उसी मनुष्य को दान पर दान देते रहना यह भूल नहीं तो फिर क्या है ? इसलिये कर्तव्य है कि दान दीन को दीजिये, हरे दीन की पीर । औषध वाको दीजिये, ना के रोग शरीर ७. गौ माता के नाम पर धोखा जिस प्रकार लोग गंगा यमुना तथा ईश्वर धर्म के नाम पर अपना पेट पालने के लिये धोखा दे रहे हैं, इसी प्रकार इन्होंने गौ माता के नाम पर भी पेट पालने के लिये धोखा देना शुरू कर रखा है। ये गौमाता के नाम पर कई प्रकार से धोखा देकर पेट पाल रहे हैं। किसी ने गौशाला बना कर दूकान खोल रखी है, और उसके नाम पर जगह २ एजेन्ट भेज कर चंदा वसूल करते हैं और अपना पेट पालते हैं। दूसरे लोग कहते हैं कि गौ का दान करने से वैतरणी नदी को पार करके स्वर्ग को चला जाता है। इस प्रकार मृत्यु समय में ये लोग गौ का दान कराया करते हैं। और इस हिसाब से सैकड़ों गायें दान स्वरूप में लेकर क्रय विक्रय करते कराते रहते हैं। अब आपको इनकी सचाई पर ध्यान दिलाया जाता है। नत्र कोई श्रादमी किसी मृतक की अस्थियां लेकर गंगा यमुना में प्रवाहित करने को जाते हैं तब ये लोग उससे गौ का दान कराते हैं, उस समय साक्षात् गौ तो होती नहीं है ऐसी स्थिति में ये लोग उससे गी की कीमत का दान कराते है, पहिले उमसे १००) या ५०) रुपया दान का मांगते हैं, फिर यदि वह न दे तो ३०) या ४०) मपया पर श्राजाते हैं, इस प्रकार कमी करते कराने यहां तक हो जाता है कि केवल ११) रुपये में ही गौ दान समास हो जाता है। इस प्रकार के दान ये एक दो से ही नहीं कराते हैं किन्तु सैकड़ों से कराते रहते हैं। अब आप सोचिये! क्या कहीं १) रुपये में भी गाय प्रास होती है ? और जिस वैतरणी का भय दिखा कर ये लोग गी दान कराते हैं तो फिर इन्हीं के कथनानुसार जब वह मृतक वैतरणी पार करेगा तो गौ की पूच पकड़ने के लिये उस मृतक को गौ कहां से लाकर देंगे , और फिर ऐसा ११) रुपये का दान गौ के नाम पर सैकड़ों व्यक्तियों से कराया गया है, उन सत्र के लिये भी गौ कहां से लाई जावेगी, और जब गौ ही नहीं होगी तो फिर वह मृतक किम की पूछ पकड़ कर वैतरणी पार होगा? इससे सिद्ध होता है कि ये सब क्रियायें इनका धोखा देना नहीं तो फिर क्या है? इन्होंने तो अपने मन में ये ही सोच रखा है, कि यदि हम को १) सवा २ म्पया देने वाली १०० या ५० शिकार भी गौ के नाम पर मिल जावंगी तो इसमें हमाग क्या नुकसान है, "कोई मरो अथवा नीवो' "स्वर्ग जावा अथवा नरक' इससे इनको क्या पड़ी, इनको तो केवल द्रव्य मिलना चाक्ष्यि, चाहे ईश्वर के नाम पर अथवा धर्म के नाम पर या गौ माता के नाम पर जिस किसी के नाम से भी इनका उल्लू सिद्ध हो जावे, वही इनका परम मंत्र है। और इनको दान देने वाले भी कैसे भोले . हैं कि जो केवल १) सवा सवा रुपये में ही गौ की पूछ पकड़ वैतरणी पार होना चाहते हैं, बच्चा भी ऐसी भुलावे की बातों में नहीं पाता तो फिर क्या श्राप लोग बच्चे से भी ३४ ) अधिक भोले बन गये कि जो इन की मिथ्या बातों को स्वीकार किये जा रहे हो । भाइयो सोचो अब तो इस भारत को गारत में मत मिलावो। भाइयो जब २ भी हमारे यहाँ पर सोशियल रिफार्म (Social reform) की बारी श्राती है, तब २ ये ईश्वर और धर्म के ठेकेदार घबरा जाते हैं, और अपने मन में समझ जाने हैं, कि कहीं ऐसा न हो कि हमारा ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देकर पेट पालना बन्द होजावे। अभी नत्र हमारी गवर्न: मेन्ट ने कुछ थोड़ा सा सोशियल रिफार्म करने की इच्छा से हरिजन उद्धार करना चाहा तो ये सब पंडे पुजारी घबरा गये, और समझ गये कि कहीं गवर्नमेन्ट समाज सुधार द्वारा इमारा जो ईश्वर और धर्म के नाम पर पेट पाला जा रहा है, वह कहीं बन्द न हो जावे। देखिये मैं आपको इनकी करतूतों का थोड़ा सा परिचय करा देता हूं। १५ अगस्त को भारत स्वतन्त्र होता है और १६ अगस्त को ही लोगों ने श्रान्दोलन मचाना शुरू कर दिया कि हमारी गौ हत्या बन्द कर दो, और तब से अब तक यह गौ हत्या का श्रआन्दोलन बन्द नहीं हुआ है। यह नाम तो गौ हत्या का है किन्तु इस में इनका गौ से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस में केवल इनका लक्ष्य सोशियल रिफार्म को बन्द करा देना है। क्योंकि इनका लक्ष्य तो केवल मनता जगत को धोखे में डाल, ईश्वर और धर्म के नाम पर कई प्रकार से अन्ध विश्वास करा अपना स्वार्थ सिद्ध करना है। अत्र देखिये गौ हत्या के विषय में आपको थोड़ा सा प्रकाश डालता हूं । क्या गौहत्या बन्द होना गवर्नमेन्ट के आर्डर पर डिपेन्ड करती है ? मेरी समझ में तो यह गौहत्या गोवर्नमेन्ट के आर्डर से कभी भी बन्द नहीं होसकती। क्योंकि मैं प्रत्यक्ष में देख रहा हूँ कि गवर्नमेन्ट ने कई एक स्ट्रिक्ट आर्डर ईशू कर रखे हैं कि कोई मनुष्य रिश्वत (Bribe) घूस मतलो, किन्तु अाज देखिये ! प्रत्यक्ष में लोग कितना रिश्वत और धूस ले रहे हैं। हमारे मनीराम की भावना में सेल्फ गवर्नमेन्ट- (Self Government) की भावना न होजावे तबतक जनता जगत में रिश्वत बन्द नहीं होसकती। जबतक इसी प्रकार जकतक हमारी भावना में गौ को माता न समझलें, तबतक गौ हत्या बन्द नहीं हो सकती। हम लोग 'गौमाता' 'गौमाता' करके चिल्लाते रहते हैं किन्तु गौ को वास्तिकता में माता कोई नहीं समझता । हमतो. केवल पेट पालने के लिये गौमाता का नाम लेते हैं किन्तु गौमाता से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है। गौ को माता समझने का चाव लेना हो तो भगवान श्री कृष्णाजी की शिक्षा से ग्रहण करो भगवान श्री कृष्णा ने स्वयं गो को चराकर तथा उनकी सेवा करके किस प्रकार गौ को सुपाश दिया था तथा किस प्रकार उनको दुधारू बनाया था यह बात सवों पर भली भांति प्रकट है। किन्तु भगवान श्री कृष्णा को भी लोगों ने कलंकित करदिया। और उनको चोरचार बनादिया। किन्तु भगवान श्री कृष्णा की चोरी किसी भी प्रकार से सिद्ध नहीं होती। भगवान ने तो एक प्रकार से ग के लिये सत्यग्रह करके शिक्षा दी थी। जो गुजरियों घी दूध बेचने को बाजार में जाया करती थी, अथवा जिनकी चाट में घी, दूध तथा दधि का वेचना समा गया था। उनके सामने भगवान श्री कृष्ण अपने गुवाल बालों को साथ लेकर सत्यग्रह करने को खड़े होजाया करते थे और उनको समझाया करते थे, कि यह घी दूध वेचने की चीज नहीं है खाने की चीन है। यदि तुम्हारी मनोवृत्तियों में इसके बेचने की चाट लग जावेगी तो तुम्हारी जाति (Nation) (week) होजावेगी तुम स्वयं कमजोर होजावोगी, और तुम्हारी संतति भी कनजोर होजावेगी इस लिये वेचो मत किन्तु खायो। यह भगवान श्री कृष्ण का श्रादेश था। जो लोग भगवान श्री कृष्ण के इस श्रादेश को नहीं मानते तो भगवान श्री कृष्ण उनकी मथनियों को तोड़ देते थे और माखन को लुटादिया करते थे और कहते थे कि खावो १ तब यहां की संतान गौओं का माखन तथा दूध सेवन करने के कारण भीम पैदा होती थी। श्रान जो लोग विदेशियों को गौ भक्षक समझते हैं, उनको जानना चाहिये कि वे लोग पूरे गौ रक्षक हैं। उन्होंने गौनों को इतना सुपाश दिया है इतनी दुधारू बनाया है कि जिसकी कोई हद नहीं है। आप लोग नोर्वे, ?

. स्वीडन, हौलेन्ड, पौलन्ड तथा स्वाटलैन्ड में जाकर वहां की गौशाला (Dairy Farm) को देखिये ! तो आपको आश्चर्य होगा कि वहां की एक २ गाय एक २ टेम में तीस २ तथा पैंतीस २ सेर दूध देती है, अर्थात् मन २ तथा डेढ़ २ मन दूध एक २ दिन में देती हैं। उनके बांधने की जगह बड़ी सुन्दर छायादार बनाई जाती है, पीछे को उसमें नाली रहती है, गौमाता जो कुछ गोबर तथा मूत्र करती है वह जहां भी गौ के पास तथा गौ के अंग में नहीं लग सवता, वह नाली में चला जाता है और नाली पांच २ मिनिट में फ्लिड सिस्टम (Flord system ) के द्वारा साफ होती रहती हैं। सामने गौ माता को पीने के लिये तथा चारे के लिये दो पात्र होते हैं, एक में शुद्ध चारा भरा रहता है, और दूसरे में गौ माता के लिये पानी पिलाया जाता है। जब गौ को पानी की आवश्यकता होती है तो पाईपींग सिस्टम (Piping system ) के द्वारा नल खोल दिया जाता है, वह पानी पी लेती है तब बरतन को साफ करके नल बन्द कर दिया जाता है प्रत्येक डेरी फार्म में गायों को चरने के लिये (grazing ground) चारागाह होता है और उसमें हर समय कोई न कोई हरियाली लगी रहती है, जिसमें स्वच्छन्द होकर गायें चारा चरा वरती हैं, जब वे पेट भर कर वापिस लौटती हैं तब इनको चारा पाचन के लिये मेडीशन्स खिलाई जाती हैं, यहां मनुष्यों को रोगों के लिये मेडीशन नहीं मिलती, वहां पर गायों को जारा पाचन के लिये साल्ट ( salt ) या सोडा बाइ कार्य (Soda bi carb) खिलाया जाता है। इतना सुपास' देने पर गायें बीस २, तीस २ तथा ३५ पैंतीस २ सेर दूध देती हैं। और जब अाजकल जो लोग 'गौमाता गौमाता' कहकर चिल्लाते रहते हैं किन्तु सेवा कोई नहीं करता, ये लोग इसको पेट भरकर चारा भी तो नहीं देते, गौमाता बिचारी तृण के अभाव में सवेरे देखिये, विष्टा खाकर पेट पालती है, इसको ये लोग शुद्ध पानी भी तो पीने को नहीं देते जो पानी लोगों को स्नान करने के पीछे कुवे के पास डोबरियों में भर जाता है, और जिसमें कीड़े पड़- है ( ३७ ) जाते है, उस पानी को पीकर ये गौमाता अपनी प्यास को शान्त करती हैं। इतना गोत्रों के साथ निर्दयता करने पर भी ये लोग गौमाता गौमाता कहकर चिल्लाते हैं। तो इनका यह गौमाता कहना लोगों को धोखा देना नहीं तो फिर क्या है ? गौ के सेवक कहलाने वाले लोगों से क्या कभी गाय के साथ इतना निर्दयता का व्यवहार किया जा सकता है। कहने का अभिप्राय यह है, कि ग्रानकल लोग अपने स्वार्थ के लिये तथा गोमाता के नाम पर धोखा देने के लिये अपना पडयन्त्र चालू करते हैं। वास्तविक में यदि देखा जाय तो ये सब लोग गौमाता के कट्टर शत्रु हैं, जो केवल इसका दूध पीना ही जानते हैं किन्तु इसकी सेवा करना कोई नहीं चाहदे । अतः जो मनुष्य भगवान श्री कृष्ण के ग्रादेनुसार गौ को मुपास देते हैं और गौ को दुधारू बनाते हैं तो वेही गौयों को मरने से बचा सकते हैं ! एक गाय जो नित्य ३० सेर या डेढ़ मन दूध देती है, उसकी कीमत अाज दो तीन हजार रूपये हो सकते हैं। अब सोचिये ! कि ऐसे मूल्यवान पशु को किसकी सामर्थ्य है कि जो इत्याग्रह में भेजे ? अथवा मारे ? श्रतः केवल गोमाता गोमाता कहकर चिल्लाना ठीक नहीं है, किन्तु प्रत्येक हिन्दू का कर्तव्य है कि वह अपने घरों में गानों का पालना प्रारम्भ करें, और उनको शुद्ध चारा तथा शुद्ध पानी तथा नमक यादि का देना कमी नहीं भूले, अर्थात् उनको पूर्ण सुपाश देकर दुधारू बनावें । इस प्रकार आप यदि गौयों को मुपास देते हुए उनको दुधारू बना भगवान श्री कृष्ण के आदेशानुसार स्वयं दूध पान करोगे और अपनी संतानों को करावोगे तो इस उपाय से गोहत्या अवश्य बन्द हो सकती है, और वैसे आप गोमाता गोमाता कहते हुए चाहे वर्षी चिल्लाया करो, तो इस चिल्लाने मात्र से गौहत्या कभी भी बन्द नहीं होसकती । यह अटल सिद्धान्त है । गौ भक्तों को चाहिये कि ग्रालस्य तथा प्रमाद को त्याग कर गौ सेवा में दृढ़ संलग्न रहें। यह मेरी हार्दिक भावना है। n । ३८ ) ८ देवी देवता के नाम पर धोखा कोई कहता है कि मुझको देवी सिद्ध है, कोई कहता है कि मुझको भैरव सिद्ध है, इसी प्रकार कोई कहता है कि मुझको हनुमानजी सिद्ध हैं। और साथ ही साथ मनुष्यों को उनके संसार सम्बन्धी कार्यों को सिद्ध कराने का दावा भी किया करते हैं । कोई स्त्री देता है, कोई भूत निकालता है, कोई धन दौलत देता है है, कोई पुत्र की प्राप्ति कराता है, कोई रोगों को ठीक करने का दावा करता है । इस प्रकार अनेको संसार सम्बन्धी कार्यों की प्राप्ति कराने के लिये लोगों को धोखे में डाल अपने अर्थ की सिद्धि किया करते हैं, और हमारे देश के कितने ही भोले भाले स्त्री पुरूष इनके कपट रूपी वचनों में फंसकर अपने समय और द्रव्य की हानि करते दिखाई देरहे हैं। ये भोले भाले मनुष्य इस बात पर ध्यान नहीं देते कि क्या इनके पास खा, पुत्र तथा धन दौलत का खजाना रखा है कि जिसमें से ये लोग इन पदार्थों को निकाल कर लोगों को पकडा देवें? और यदि इस बात को सच भी मान लिया जाय, और यह भी मान लिया जाय कि इनके पास में देवताओं की सिद्धि के कारण स्त्री, पुत्र तथा धन दौलत का अखण्ड खजाना है कि जिसमें से दुनिया को निकाल कर देते रहते हैं। यदि इनके पास ऐसी ही सिद्धि है तो फिर ये लोग दुनियां से थोडे २ पैसे लेने की इच्छा क्यों करते हैं ! इन बहुत से सिद्धों के भी स्त्री पुत्र नहीं होते हैं तो फिर ये लोग अपने खजाने में से अपने लिये स्त्री पुत्र तथा धन दौलत क्यों नहीं निकालते ? जब ये लोग अपने लिये ही इनको प्राप्त नहीं कर सकते, तो फिर दूसरों को प्राप्त कराना यह साक्षात् घोखा देना नहीं तो फिर क्या है ? प्यारे भोले भाले भाइयों ! क्या आपने किसो चक्रवर्ती नरेश को भी थोडे २ पैसे के लिये कहीं हाथ फैलाते अथवा मांगते देखा है ? तो कहना पड़ेगा कि कहीं भी नहीं। किन्तु ये बेचारे सिद्ध बनने वाले तो इसी अाशा में ताक लगाये बैठे रहते हैं, कि कब कोई भोली भाली शिकार श्रावे और ( ३६ ) हमारे पेट का काम चले। और फिर ऐसे मनुष्यों से जो लोग धन दौलत तथा स्त्री पुत्रादि की इच्छा रखते हैं तो यह साक्षात् मूर्खता नहीं तो फिर क्या है ? कहने का अभिप्राय है कि संसार में जैसे ईश्वर और धर्म के नाम पर लोग धोखा देकर अपना पेट पाल रहे हैं, इसी प्रकार ये देवी और देवतात्रों के पुजारी भी इन देवी और देवताओं के नामपर धोखा देकर अपना पेट पाल रहे है । और दुनियां के भोले जीवों को बहका कर अपनी स्वार्थ सिद्धि में संलग्न होरहे हैं । क्या आप शास्त्र के वचनों को भूल गये हो ? देखो ! शास्त्र तो यह कहता है कि :- पुरुषार्थ सिंह मुपैति लक्ष्मीम् ।। अर्थात् पुरुषार्थ करने से कर्मवीर मनुष्य को लक्ष्मी प्रास होती है । देखिये योग शास्त्र के प्राचार्य श्री पतञ्जलि भी ऐसा ही अपने सूत्रयोग दर्शन में कहते हैं कि:-अस्तेय प्रतिष्टायां सर्व रत्नों पस्थानम् ।' अर्थात् चोरी का त्याग करके सच्चा कर्मवीर को सर्व रत्नाकर प्राप्त होते है। फिर गोस्वामी जी ने भी ऐसा ही रामायण में है कि:--"सकल पदारथ हैं जगमाही, कर्महीन नर पावत नाही' । अर्थात् संसार में सारे पदार्थ (स्त्री, पुत्र, धनादिक ) वर्तमान हैं, किन्तु कर्म- होन पुरुष को नहीं प्राप्त होते हैं, केवल कर्मवीर पुरुष ही इन पदार्थों को प्राप्त कर सकते हैं । अत्र श्राप विचार कर सकते हैं कि शास्त्र प्रापको डंके की चोट से बतला रहा है कि यदि श्रापको उपरोक्त पदार्थों की इच्छा है, तो इनकी प्राति के लिये कर्मवीर बनो। किन्तु श्राप शास्त्र के इन वचनों पर ध्यान न देकर इन देवी देवतायों के नाम पर धोखा देने वालों को हाथ लोड कर इनसे अपने इच्छित पदार्थों की इच्छा कर रहे हो। तो यह श्रापका श्रज्ञान और भोलापन नहीं तो और क्या कहा जावेगा । प्यारे भोले भाइयो ! याद रखो! ये धोखा देनेवाले श्रापको जबतक दी धोखा दे सकते हैं कि जबतक आप इनके पुजारी बने हुए हो, और जब लोग सच्चे ईश्वर और सच्चे धर्म को समझाने लगा जावेंगे तब अपने श्रापही इन धोखा देकर पेट पालने वालों की उपासना नष्ट होजावेगी, दूसरी बात यह है कि इन लोगों का धोखा तब ही तक चल सकता है कि जबतक आप अपने अर्थ की सिद्धि इन लोगों के साथ में लगाये हुए हो । और जब आप अपनी अर्थ सिद्धि को ईश्वर और कर्म के साथ जोड़ देंगे ४० ) तो इनका यह धोखा स्वतः ही नाश होजावेगा । -- हमारे भारत में ईश्वर तवा धर्म के नाम पर धोखा क्यों चला ? सो सुनिये । हम लोग कहने को तो ईश्वर तथा देवी देवतानों की उपासना करने वाले हैं, किन्तु सचमुच यदि पूछा जाय तो हम लोग ईश्वर तथा धर्म की उपासना करने वाले कोई भी नहीं हम तो केवल उपासना करने वाले हैं तो इन ईश्वर और धर्म का ठेका लेने वाले पंडे और पुजारियों की। ईश्वर का तो केवल एक नाम रह गया है। देखिये मैं आपको इसका प्रत्यक्षीकरण करके दिखाता हूं। एक स्त्री जब कभी मन्दिरो में अकेली ईश्वर दर्शनार्थ पहुँचती है, तो अपने साथ में श्रद्धानुसार मेवा मिटाई भी लेकर जाती है और वह वहां पहुंच कर प्रथम पुजारी जी को नमस्कार करके ठाकुर जी को नमस्कार करती है। और जो कुछ फल फूल मेवा मिष्ठान्न तथा रुपया पैसा ले गई थी, उसको पुजारी जी के सामने रख देती हैं, पुजारीजी उसको नाम मात्र के लिये ठाकुर जी को दिखा कर झट अपने कब्जे में कर लेता है, फिर वह भोली स्त्री क्या करती है सो सुनिये:-ठाकुर जी के साथ तो उसका सम्बन्ध केवल हाथ जोड़ने तक ही समाप्त हो जाता है। इसके बाद वह पुजारी जी के मुख पर पंखा झलती है, उसके चरण दाबती है, खूब बढ़िया माल खिलाती है। जो पति देव अपना साक्षात् ईश्वर है और स्त्री की सर्व कामनाओं को पूर्ण करने वाला है, उसकी सेवा में इसका मन नहीं लगता, किन्तु पुजारी जी की सेवा में यह अपना तन, मन धन सत्र न्यौछावर कर डालती है, उससे अपनी सारी मनोकामनायो की पूर्ति कराती है । आप विचार करिये कि यह सेवा ईश्वर की हुई कि पुजारी जी की । ईश्वर की ओर तो न पुजारी का ही भाव है और न ईश्वर के मानने वालो का । सम्बन्ध है तो केवल पुजारी से, गति मुक्ति चाहना है तो पुजारी से, माल ताल खिलाने अथवा रुपया पैसा देने का सम्बन्ध है तो पुजारी से। कहने का अभिप्राय यह है कि मन्दिर में जो ठाकुरजी विराजमान हैं वे तो केवल लोगों ने एक निमित्त मात्र धोखा देने के लिये और इनके सहारे संसार के नाना भोग भोगने के लिये एक मात्र पडयन्त्र रच रखा है। अब अन श्राप (४१ ) सोचिये! मन्दिर में जो कुछ सुपाश तथा अनुकूलता है वह पुजारी के लिये ग्रौर पूजन तथा सत्कार जो कुछ है सो पुजारी के लिये, अब ईश्वर के नाम पर क्या शेष रह जाता है, केवल धोखा तथा ईश्वर का अपमान । भला बतलाइये ! क्या ईश्वर अपने अपमान को तथा इस धोखे को सहन कर सकता है ? तो कहना पड़ेगा कि कदापि नहीं, ईश्वर ऐसे अन्याय करने वालों को अवश्य फल देंगे। क्योंकि:-"Good actions done with a bad motive, produce bad result.' अर्थात् अच्छे कर्म यदि बुरी भावना से किये जावें तो उनका फल भी बुरा ही होगा। मन्दिर वना कर ईश्वर की पूजा में दोष नहीं है, किन्तु मन्दिर बना कर ईश्वर के नाम पर धोखा देकर संसारिक भोग भोगने में बड़ा अपराध है, और ईश्वर ऐसे अपराधियों को याद रक्खेगा और इनको उचित दंड देगा। अब यदि यह कहा जावे कि स्त्रियों को पुजारियों के चरण दबाने, उनकी कई प्रकार की सेवा करने तथा माल खिलाने में क्या हानि है ? तो सुनियेः- इस सेवा के भाव से पुजारियों में संसर्ग दोष उत्पन्न हो जायगा, अधिक माल खाने से तथा भोगों के अधिक भोगने से और स्त्रियों के एका- न्तिक सहवास से काम वासना उत्पन्न हो जायगी, काम से क्रोष और क्रोध से बुद्धि का नाश हो जायगा जब बुद्धि का ही नाश हो गया तब उस मनुष्य में चाकी क्या रहा ? अर्थात् उसका भी नाश ही समझना चाहिये। इसीलिये तो शास्त्र ने ऐसा कहा है कि:-"मात्रा स्वस्रा, दुहित्रा वा नः विविक्तासनो भवेत् । बलवानिन्द्रयो ग्रामो विद्वान्समपकर्षति ॥ अर्थात् अपनी माता, बहिन, तथा लड़की के साथ में भी एकान्त में बैठ कर बात चीत नहीं करनी चाहिये, क्योकि इन्द्रियों का वेग बड़ा बलवान होता है, वह विद्वानों के चित्त को भी डुला देता है। अब जरा सोचिये! कि जब स्मृतियों ने इस कार्य की निन्दा की है, और फिर भी ये पुजारी लोग रात दिन स्त्रियों के सहवास में लगे रहते हैं, तो फिर इससे अधिक अनर्थ का कार्य क्या हो सकता है ? यही कारण है कि आज बड़े २ मन्दिरों तक में व्यभिचार फैला हुआ दीख ( ४२ ) पड़ता है। अतः मन्दिर प्रेमियों को चाहिये कि वे ईश्वर के नाम पर मन्दिर में कोई भी वैपयिक पदार्थ तथा भोगों की सामग्री उपस्थित न करें। बहुत सी भोली भाली स्त्रियां तथा पंडे पुजारियों के भक्त कहा करते हैं कि हमारे जो संतान पैदा हुई है वह अमुक पुजारी जी अथवा अमुक बाला जी की कृपा का फल है। तो भोले भाइयो ! मैं पहिले ही श्रापको लिख कर बता पाया हूं कि पुजारियों के पास में क्या पुत्रों का खजाना भरा है कि जिसमें से तुम को पुत्र दे देंगे, ये जो कुछ भी तुम को संतानादिक मिली हैं वह सब तुम्हारे कर्मों के फलं हैं, पुजारी लोग तो तुम को देवता के नाम पर धोखा देकर अपना पेट पालना ही जानते हैं। देखिये में इनकी करतूतों का तुमको कुछ और परिचय करा देता हूं। पाठक विचार कर सत्यासत्य निर्णय करें। मानलो पचास स्त्रियां संतान प्राप्ति की इच्छा से इन देवी देव- ताओ के पुजारियों की सेवा में उपस्थित हुई, पुजारियों ने भी इनसे न्यारी २ दक्षिणा धरा किसी को डोरा गंडा (ताबीज) देकर तो किसी को विभूति (राख) देकर बहका दिया और "पुत्रवती भवः", "पुत्रवती भवः' ऐसा शुभ प्राशी- वाद देकर निदा कर दिया। अब ये पचास स्त्रियां जो पुजारी के आशीर्वाद को लेकर घर पर आई क्या ये सब की सब स्त्रियां बांझ थोड़ी ही रह जावेंगी, इनमें से दस बीस को तो प्रकृति के नियमानुसार संतति अवश्य ही होगी अन ये स्त्रियां इस बात का कभी भी विचार न करेंगी, कि हम पचास में से दस बीस को ही संतति योग क्यों हुअा ? और दूसरी इतनी गई थी उनको क्यो नहीं हुआ १ ये तो यों ही कहेंगी, और परस्पर में जन एक दूसरी से मिलेंगी तन प्रचार भी ऐसा ही करेंगी। कि भाई ! हम तो अमुक देवता के पास गई थी और पुजारी जी ने हमको ११) रुपया का एक गंडा तात्रीज बना दिया, और उस ताबीज ही का यह फल है कि हमको संतान पैदा होगई। इस बात को सुन कर उसी के समान भोली भाली पांच पचास स्त्रियां फिर संतान कामना को लेकर उसी पुजारी जी की सेवा में उपस्थित हो जावेंगी। और पुजारी जी फिर उनसे सवा २ रुपया घरा लेंगे, और गंडा ताबीज देकर फिर + ( ४३ ) वहका देंगे। इस प्रकार दो चार दफा जहां स्त्रियों का इस प्रकार याना जाना शुरू हुआ कि पुजारी जी सिद्ध हुए। और थोड़े ही दिनों में पुजारी के विषय में स्पष्ट घोषणा हो जावेगी कि अमुक देवता के पुजारी के पास जाने से अवश्य संतति योग सिद्ध हो जाता है। इसी प्रकार रोगियों के विषय में भी कल्पना कर ली जाती है। जहां १०० या पचास रोगी किसी के पास पहुंचे, और उसमें कर्मानुसार दो चार अच्छे होगये तो उसके विषय में यह बात प्रमाणित हो जाती है, कि अमुक जगह जाने से सब रोग ठीक हो जाते हैं। प्यारे पाठको! यह सब क्या है ? तो कहना पड़ेगा कि सिद्ध साधक वाली कहावत चरितार्थ की जा रही है, और दुनियां भेड़ चाल की तरह इनके कपट युक्त वचनों से मोहित हे अविद्या रूपी कूवे में प्रवेश कर रही है। यह भोली दुनियां इस बात को नहीं जानती कि यदि इन पुजारियों के पास में जाने से ही प्रारोग्यता लाभ हो जाती, तो फिर ये बड़े २ शफारखाना जिनमें करोड़ों रुपया गवर्नमेन्ट के खर्च हो रहे हैं, इनके बनाने की क्या आवश्यकता थी ? रोगियों को इन देवी देवताओं के पुजारियों के पास में भेज देते और ये सब नीरोग हो जाते। इस प्रकार संतानों के लिये भी करते, फिर तो कोई भी मनुष्य संतान रहित नई होता, अर्थात् सब के संतान हो जाती। किन्तु हम तो देख रहे हैं, कि श्रान हजारों ही श्रादमी ऐसे होंगे, कि जिनको कोई संतान नहीं है, यदि ये लोग संतान देने वाले ही सिद्ध हैं तो फिर सत्र को संतान क्यों नहीं दे देते हैं। और हमने तो इस प्रकार सिद्ध बनने वाले कई पंड़े पुजारियों के स्वयं ही संतान नहीं देखी, फिर ये लोग अपने लिये ही संतान क्यों नहीं पैदा कर लेते ? कहने का अभिप्राय यह है कि ये सब बातें इन लोगों की भोले भाले स्त्री पुरुषों को धोखे में डाल अपना अर्थ सिद्ध करना है। अतः जनता जगत का कर्तव्य है कि वे सदा ऐसे देवी देवता के नाम पर धोखा देकर पेट पालने वाले पंडे पुजारियों से सदा दूर रहें। क्यों कि इनको पालने से धन और धर्म दोनों का नाश होता है।

करोड़ों रुपया सरकार का खर्च हो रहा है, और इतने मजिस्ट्रेट नियुक्त किये गये हैं, इनके नियुक्त करने की तथा पुलिस के रखने की क्या आवश्यकता थी? दो चार स्याने भोपों की नियुक्ति कर देते, और फिर जब कभी चोरी होती तो इनसे पूछ कर चोरी का पता लगा लिया करते । प्यारे भायों ये सब लोगों ने द्रव्य हरण करने के कई षडयन्त्र बना रखे हैं और इनके द्वारा लोगों को धोखा दे रहे हैं । जिस प्रकार ये स्याने भोपे देश को धोखा देरहे हैं, इसी प्रकार एक पार्टी और है, जो मारण मोहन मंत्र का प्रचार करने में दृढ़ संलग्न हैं । ये लोग जिसको जी चाहे वश में करलें और जिसको जी चाहे मार डालें। इस विद्या को ये लोग मूठ विद्या के नाम से पुकारते हैं । अब इनकी मूठ विद्या के विषय में सुनिये:- मैं एक गांव में भ्रमण करता हुआ जा पहुंचा, वहां पर एक मूठ विद्या का प्रचार करने वाला सिद्ध भी ठहरा हुआ था, और वहां के दो चार युवकों को अपना चेला बना उनसे आठ २ रुपया फीस का लेकर मूठ विद्या सिखा रहा था। मैं उस गांव में जब पहुंचा तो मुझसे लोगों ने पूछा कि स्वामी जी आप मूठ विद्या को स्वीकार करते हो ? मैंने कहा कि कैसी मूठ विद्या ? उन्होंने कहा कि यहां पर एक मूठ विद्या का जानने वाला ठहरा हुआ, है वह वहता है कि मूठ विद्या के बल से जिस विसी पर भी उड़द के जाय, वह आदमी कहीं भी हो फौरन मर जाता है। मैंने इस बात को सुनकर उनको कहा कि भाई यदि यही बात सच है तो उस सिद्ध से कहो कि मेरे ऊपर उड़द का प्रयोग करके बतलावे उन्होंने जब उससे यह बात कही तब उसने कहा कि वे महात्मा हैं, उनपर प्रयोग करने से कोई फायदा नहीं है, और ये विद्या क्या दिखाने की है। ऐसी २ बातें कह कर पीछा छुड़ा लिया अब इस मूठ विद्या की सचाई पर ध्यान दो। भाइयो, यदि इस विद्या के जानने वाले यहां पर होते और यह विद्या यदि सच्ची होती, तो गवर्नमेन्ट को यहां पर इतनी मिलीटरी रखने की क्या आवश्यकता थी ? और व्यर्थ अरबों रुपया खरच करने की भी क्या आवश्यकता थी। ये मूठ विद्या के जानने वाले दस (४७ ) - पांच श्रादमियों को दशों और भारत में बैठा देते, और जब शत्रु भारत पर अटेक करता तो ये मूठ विद्या के मानने वाले अपने उहद को फेंक कर सारी शत्रु सेना का संहार कर देते । अभी कुछ दिन हुए पाकिस्तान में कितनी खून की नदी बहाई गई थी, तब ये मूठ विद्या के जानने वाले यदि यहां से उड़द फेंक कर उनको मारते तो पता लगता, किन्तु पता नहीं, ये मूठ विद्या के जानते चुप क्यों रहे ? तो प्यारे पाटको ? इन बातों में क्या रखा है ? अाज कल हमारे भारत में सब बातों में धोखा देना शुरु, कर रखा है, और इसी लिये हमारे देश का पतन होरहा है, भगवान कब ऐसा दिन करेगें कि जब भारत से यह घोखा नाश होगा। १०. धर्म सिद्धान्तों को समझने में धोखा हमारे देश में अभी तक कुछ ऐसी बातें प्रचलित हैं कि जिससे शास्त्र मर्यादा का उल्लंघन होकर अर्थ का अनर्थ हो रहा है, अर्थात् उन बातों को समझना तो किसी दूसरे रूप में था और अब हम उनका अर्थ किसी दूसरे रूप में कर रहे हैं। कहने का अभिप्राय यह है, कि हमको बहुत सी शास्त्रोक्त बातों के समझने तथा समझाने में भी धोखा दिया गया है । अब मैं पाठकों के समक्ष में उन बातों को रखता हूं कि जिनके विषय में इमको रात दिन शङ्कायें बनी रहती हैं और फिर भी हम उनका समाधान नहीं कर सकते । मैंने इन बातों को जैसा समझा है वैसा ही पाठको को बोध करा रहा हूं, यदि इन बातों को किसी दूसरे विद्वानों ने किसी अन्य रूप में समझा हो, तो वे मुझको इनका अन्य रूप समझाने की कृपा करें क्योंकि परस्पर समझने तथा समझाने से वस्तुओं का मूल कारण समझ में श्रा जाता है। यत्र जिन सिद्धान्तों को हमको समझना तथा समझाना उनका विवरण निम्नलिखित प्रकार से शङ्का समाधान के रूप में लिखा जाता है। .

(४८) ११. हनुमान जी वानर थे अथवा मनुष्य ? अब इसके हनुमान जी को सब लोग जितेन्द्रिय, ब्रह्मचारी, शूरवीर तथा देवता करके अाज तक मानते चले आ रहे हैं, किन्तु अभी तक लोगों ने उनके शरीर के पीछे वानरों की जैसी पूछ लगा रखी है, और वह पूंछ अभी तक लोगों ने नहीं हटाई। इससे विदित होता है कि लोग हनुमानजी को देवता, ब्रह्मचारी, तथा जितेन्द्रिय मानते हुए भी उनमें अभी तक भावना बन्दर की ही बनी हुई है। तुलसीदासजी ने भी हनुमानजी की उपमा कपि शब्द करके ही दिया है और कपि करके ही सर्वत्र संवोधन किया है। बाल्मीकि जी ने भी हनुमान जी को कपीश कह कर पुकारा है। इससे विदित होता है कि हनुमान जी सब के लिये अभी तक मोनों बानर ही बने हैं। विषय में मीमांसा की जाती है, सो सुनिये: हनुमानजी को यदि लोग बानर मानते हैं तो हनुमानजी तो लगभग त्रेतायुग में हुए थे कि जिनको सनातन धर्म के सिद्धान्त अनुसार कई लाख वर्ष होगये, और उस समय से अब तक अनन्त कौटि वानर उत्पन्न होते चले आ रहे हैं, किन्तु इन वानरों में से तो आज तक कोई भी हनुमान जी प्रगट नहीं हुआ, यदि हनुमान बन्दर होते तो आज तक कोई तो वानर हनुमान जी जैसा प्रगट होता, अथवा हनुमान जी जैसा न सही कुछ हनुमान जी से थोड़ा बहुत कम भी रहता, तो . भी हृदय को कुछ संतोष हो जाता। इससे विदित होता है कि हनुमान जी वानर नहीं थे। अब यदि यह कहो कि हनुमानजी देवता थे, तो फिर इनके पीछे पूछ कैसे लगी ? सो सुनिये:- रामायण में लिखा है कि जब हनुमान जी लङ्का पहुँचे तो वहां पर लङ्का जलाने के लिये एक कृत्रिम पूछ का विस्तार किया था, और वह कृत्रिम पूछ अभी तक लोगों के हृदय में बनी हुई है और हनुमान जी के पीछे से नहीं हटी। अब यदि यह शङ्का हो कि हनुमान जी को शास्त्रों में वानर करके पुकारा है, और वानर नाम बन्दर का होता है तो फिर उनको मनुष्य कैसे समझा जावे । तो अब इसके विषय में सुनियः- स ( ४६ ) , हनुमान जी वानर नहीं थे किन्तु उनकी सेना का नाम ही वानर सेना तथा भालू सेना था, वानर और भालू से यह नहीं समझना चाहिये कि वह बन्दर और रीछों की सेना थी, किन्तु ये दोनों नाम उनकी इन्फेन्ट्रीयों के थे; और उनमें हनुमान, मुग्रीव, नल, नील तथा जाम्बन्त श्रादि हाईयर कमान्डर-इन-चीफ (Higher Commander in chief) थे। जैसा कि अाजकल इन्फैन्ट्रीयों के कई एक नाम होते हैं, जैसे मान इन्फैन्ट्री, फर्स्ट इन्फैन्ट्री तथा सेकिन्ड इन्फैन्ट्री इत्यादि। इसी प्रकार उनकी इन्फेन्ट्रियों के नाम भी वानर ट्रप तथा भालू टूप के नाम से पुकारी जाती थी। किन्तु शोक है कि बीच में ऐसी अविद्या (Dark) फैली कि जिसके कारण देवताओं को वानर तथा रीछ कह कर पुकारने लगे, और याज तक उनको रौंच वानर ही समझ रहे हैं। प्राचीन समय में कहीं २ तो वानर तथा भालू नाम की इन्फैन्ट्रियां थी और कहीं २ उनकी सेनाओं में कपि के चिन्ह की ध्वजायें (flags) लगी रहती थी, जैसा कि अर्जुन के रथ पर कपिध्वज लगा हुआ या। प्यारे सजनो! कहां तक कहें समय की बलिहारी है कि जिसके प्रताप से देवताओं को भी वानर तथा रीछ बनना पड़ा। और मनुष्यों की शादी विवाह नागों की लड़कियों के साथ करा दी गयी। नाग शब्द से बहुत से लोग सर्प का भाव कराया करते हैं, किन्तु प्यारे भाइयो ! कहीं सपा के साथ में भी मनुष्यों की शादी हो सकती है। पूर्व समय में नाग वंशज मनुष्य हुया करते थे। हमारे भारत में जो नागपुर शहर दीख पड़ता है, वह पूर्व में नाग वंशज राजानों का केन्द्र होने के कारण ही नागपुर पड़ा है । अाजकल हमारे ब्राह्मणों के कई एक वंशजों के साथ भी नाग शब्द लगा हुया है। इससे सिद्ध होता है कि यह नाग शब्द सर्प वाचक नहीं है किन्तु मनुष्यों के वंशजों का एक पद (title) है। पर अविद्या ने ऐसा नाल फैलाया कि उन पूर्व नाग वंशज मनुष्यों को सर्प बना दिया । और यही हाल हनुमानजी के साथ में किया गया कि उनको देवता से बन्दर बना दिया । + (५०) में -- प्यारे सजनो! यह अविद्या बढी दुखदाई है, जिस देश और जाति में यह धुसी कि बस उसको नाश हो कर डालती है। यह सदा सीधी को उलटी बनाती रहती है। यह बड़ी कुठाराघातिनि है कि जो सत्य सिद्धान्त और सत्य धर्म का नाश कर रही है। और इसके ठेकेदार अपने स्वार्थ के लोम से मीठी २ बातें बना अपने चाक जाल रूपी नल से सींच २ कर इसको और भी सुदृढ़ कर रहे हैं। क्योंकि ये धर्म और ईश्वर के ठेकेदार इस बात को श्रच्छी तरह जानते हैं कि यदि यह अविद्या देवी हमारे देश से विदा हो नायगी, तो फिर हमारा हलवा पूरी तथा संसारिक भोग भी हम से विदा हो जायेंगे। प्रथम तो इन ठेकेदारों ने सब पर अपना प्रभुत्व जमा रखा है, कि जिससे सब कोई इनकी बनाई हुई अविद्या देवी के मच्छर हो रहे हैं, और यदि कोई महापुरुप जैसे स्वामी दयानन्द तथा महात्मा गांधी जैसे कोई खड़े इन जीवो को इस अविद्या के फन्दे से छुड़ाने की चेष्टा भी करते हैं, तो फिर ये धर्म के तथा ईश्वर के ठेकेदार चिल्ला उठते हैं, कि सनातन धर्म नाश हो रहा है, अधर्म की वृद्धि हो रही है, और गौ माता नाश हो रही है ऐसी बातें कह कर पुनः लोगों को इस अविद्या की ओर ही खींचने की चेष्टा करते है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब तक इस अविद्या देवी से इन धर्म और ईश्वर के ठेकेदारों का स्वार्थ सिद्ध होता रहेगा, तब तक तो ये लोग इसको देश से बिदा न होने देंगे। अतः प्यारे भोले भाइयो १ इन धर्म और ईश्वर की मिथ्या दुहाई देने वाले ठेकेदारो से सदा होशियार रहो, इनकी खुराक बन्द करदो तो फिर ये वेचारे शुद्ध ईश्वर तथा धर्म के अनुयायी हो जावेंगे, और यह अविद्या देवी भी इनके साथ ही विदा हो जायगी। याद रखो। जब तक इनको ईश्वर और धर्म की ठेकेदारी के फल स्वरूप में नाना प्रकार के भोग सम्बन्धी पदार्थ तथा द्रव्यादिक मिलते रहेंगे, तब तक यह अविद्या देश से दूर न होगी। और जब तक यह अविद्या रहेगी तब तक देश में सत्य सिद्धान्त प्रगट'न होगा और जब सत्य ही दूर रहा तो फिर ईश्वर और धर्म तो हमारे पेट पालने का साधन ही हो जावेगा। अब इससे आगे अविद्या देवी के कुछ और चमत्कार वर्णन किये जाते हैं ।

। ५१ ) १२, रावण पर कल्पना देवता कहा। गवण को लोगों ने राक्षस कहा, और उसी के भाई विभीषण को अब उसके विषय में हमारा जो कुछ, मन्तव्य है, वह पाठकों के जानकारी निमित्त वर्णन किया जाता है। रावण को लोगों ने जो राक्षस शब्द से घोषित किया है यह हमारी समझ में उसके साथ अन्याय किया गया है, क्योंकि रावण के जीवन से ऐसी कोई बात घटित नहीं होती, कि जिससे उसको राक्षस कहा जावे। रावण तो अपने जमाने का बड़ा भारी पंडित अर्थात् वेद शास्त्रों का ज्ञाता, वड़ा भारी तपस्वी, योगी, भक्त, कला कौशल विज्ञान विशारद, नीतिज्ञ, आविष्कारक, महा वलवान, धर्मात्मा तथा अद्वितीय रिसर्च स्कोलर (Research scholar) था उसका शासन बड़ा कठोर और संसारिक यन्त्रणायें बड़ी कठिन तथा उसकी प्रत्येक वस्तु की आलोचनायें बढ़ी कठिन थी। वह प्रत्येक वस्तु की जानकारी के लिये बही तीन पालोचनाये किया करता था। और उसकी इन कटिन पालोचनात्रों से घबरा कर लोग उसको नास्तिक, वेद विरोधी तथा राक्षस कहने लग गये थे। वास्तविक में यदि देखा जावे यह बात ठीक भी है। संसार में जितने भी सुधारक (reformer) और याविष्कारक (Scientific researcher)हुए हैं उन सबके सामने यही कठिन समस्या श्राई है, ऐसा कोई भी देश मुधारक तथा आविष्कारक मनुष्य नहीं होगा कि जिसके सामने ये संसार सम्बन्धी दुर्घटनायें न हुई हों। जब संसार में दुर्बुद्धि पालसी तथा निन के स्वार्थ में निमग्न लोग इन याविष्कारक, देश सुधारकों की काटन अालोचनाओं से घबरा जाते हैं तब ये परस्पर में संघठित होने लगते हैं, और जब ये लोग देखते हैं कि इनके कार्य संसार में सराहनीय हो कर इनकी बल, विद्या तथा बुद्धि से बहुत दूर पहुँच जाते हैं, तब थे लोग परस्पर में संगठित होने लगते हैं; क्या करें अपनी बल विद्या बुद्धि से तो कुछ कर नहीं सकते, ऐसी स्थिति में ये लोग उसको नास्तिक, वेद विध्वंसक तथा राक्षस आदि । ५२ ) वतला कर जिस किसी युक्ति से उनका जीवन नाश कर डालते हैं। श्राज तक इन दुष्ट स्वार्थी लोगों ने न जाने कितने महा पुरुषों को मौत के घाट उतार दिया है, और देश का नुक्सान किया है। ये लोग अपने सामने किसी की उन्नति देख नहीं सकते । खुद से कुछ होता नहीं, दूसरे को करने देते नहीं, और यदि कोई इनसे विमुख होकर कुछ करना भी चाहे तो ये दुष्ट लोग उसको बीच में ही मार डालते हैं। देखिये स्वामी शंकराचार्य जी ने कुछ करना चाहा तो झट मौत के घाट उतार दिये गये। स्वामी दयानन्द जी ने कुछ देश का हित करना चाहा तो उनके साथ में भी वही वर्ताव करके मृत्यु के घाट उतार दिया। अाजव ल महात्मा गांधी जी ने देश के हितार्थ कुछ समाज सुधार करना चाहा तो दुष्टों ने इनके साथ भी वही कठिन बर्ताव किया, और अन्त में उनके भी प्राण ले डाले। कहने का अभिप्राय यह है कि ये मिथ्या नाम धारी, कार में चूर रहने वाले तथा ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देने वाले लोग किसी की उन्नति देखना नहीं चाहते। ये तो वेवल अपने आपको बड़ा समझते हैं, और जो इनसे विपरीत सत्यता को लेकर चलता है उसको नास्तिक, दुष्ट तथा राक्षस शब्दों का प्रयोग किया जाता है । रावण के साथ में भी यही बात हुई। रावण सब के पास में पहुँचता था, बाहु बल, विद्या बल, ज्ञानबल, रूपबल, आदि सत्र बलों की परीक्षा लिया करता था । शारीरिक, आत्मिक तथा भौतिक सब प्रकार की उन्नति को लिए हुए था, सब में अद्वितीय ज्ञानी, विद्वान, तपस्वी, अाविष्कारक, देश सुधारक तथा सबका शिरोमणि राजाधिराज था। यह क्योंकि प्रत्येक वस्तु के जानने निमित्त प्रत्येक साधु महात्मा, विद्वान, तपस्वी राजा महाराजा बलवान, धर्मात्मा तथा ब्राह्मणों के पास पहुँचा करता था, और उनसे प्रत्येक वस्तु की जानकारी प्राप्त करने के लिये तर्क द्वारा कठिन जांच पड़ताल किया करता था, और जिस किसी की आलोचना करता था तो बड़े कठिन शब्दों में किया करता था, शासन सूत्र भी उसका बडा कठिन था। इस प्रकार उसकी कार्य कारिणी नीतिज्ञता को देख कर तथा उसकी महान २ अन्त को तपस्या को देख कर लोग चकर खाने लगे थे। कर्म का लोप करने वाले तथा केवल ईश्वर और धर्म के नाम पर बैठे रहने वाले वाहाणों से उसका बड़ा द्वेश था, वह किसी को अकर्मण्य देखना नहीं चाहता था, वह चाहता था कि सब कोई कर्मवीर तपस्वी बनें, और छोटी २ बातों की पूर्ती के लिये ईश्वर और धर्म का प्राश्रय लेकर न बैठे रहें, किन्तु भगवान के द्वारा ही दी हुई बुद्धि का विस्तार करें, और उससे लौकिक तथा पारलौकिक दोनों क्रियाओं का सविस्तार करें। अपनी बात का इतना पका था कि जब तक उस बात की पूर्ती न कर लेता था तब तक उसका पीछा नहीं छोडता था, लोगों ने उसका कठिन व्रत देखा, तपस्या देखी, विद्या बल, बाहु बल देखा तो उसके सदगुणों को देख कर घबरा गये। ईर्षा और द्वेष करने लगे। किन्तु, रावण अपनी विद्या बुद्धि के द्वारा सबको नत मस्तक करता चला गया। लोगों ने उससे हार मान कर नास्तिक, वेद विध्वंसक तथा राक्षस बतला दिया । अब पाटकमा विचार कर सकते हैं, कि रावण में ऐसा कौनसा श्रवगुण था कि जिसके द्वारा उसको राक्षस मान लिया जावे। रावण की उसत्ति में भी कोई राक्षसी स्वभाव नहीं देखा जाता । देखिये गोस्वामी तुलसी दासनी ने रामायण में रावण की उत्सत्ति के विषय में कैसा सुन्दर लिखा है । जरा सुनिये:--'उत्तम कुल पुलस्त्य कर नाती, शिव विरच पूजे बहु भांती” । अर्थात् रावण उत्तम कुल में उतन्न हुया पुलस्त्य ऋपि का नाती था। और जिसने शिव और ब्रह्मा की कई प्रकार से थी। अब देखिये कितने अच्छे उत्तम कुल में उतन्न होने वाला और कितनी सुन्दर तपस्या करने वाले रावण को ब्राह्मण से राक्षस बना देना यह आश्चर्य नहीं तो फिर क्या है ? इससे ज्ञात होता है कि यह सब बातें ईर्षा द्वष के कारण की गई थी। ऐसी घटना रावण के ही साथ घटित हुई थी सो बात नहीं है, किन्तु ऐसी २ बहुतसी दुर्घटनायें उस ज़माने में की गई हैं। उनमें से कुछ पाटकों को जान कारी प्राप्त कराने के लिये वर्णन की जाती हैं। ये दुर्घटनायें श्रापको राम और रावण के जमाने की सुनाई जावेंगी। सो सुनिये:- पूजा की . (५४) श्री रामचन्द्र जी के शासन काल में कहते हैं कि शम्बुक नाम का एक कोई शूद्र विचारा भगवान की भक्ति करने लग गया पर, जब उसकी भक्ति का प्रभाव जगत में फैलने लगा तो ये वादाण लोग घबराये, और उसकी शिकायत रामचन्द्रजी से जाकर की कि महारान एक शूद्र वहा उग्र तप करके अनधिकार चेष्टा कर रहा है अतः उसको दंड मिलना चाहिये। भगवान रामचन्द्रजी ने इनके कहने से उसको प्राण दंड की श्राज्ञा दी थी। इस कथा से पता लगता है कि ईश्वर और धर्म की टेके.दारी तो पदिले ही से चली आती है, और इस के साथ ही साथ यह भी सिद्ध होता है कि सत् कर्म तथा विद्योन्नति वा ज्ञानोन्नति करने वालों से ये लोग सदा से ही ईर्ष्या और द्वेष करते पा रहे हैं। अब पाठक विचार कर सकते हैं कि यह न्याय है, अथवा अन्याय । ज्ञान है अथवा अज्ञान । क्या ईश्वर और धर्म किसी की पैतृक सम्पति है कि जिस पर किसी दूसरे का अधिकार हो ही नहीं सकता। तो कहना पड़ेगा कि ईश्वर और धर्म के नाम पर जब से यह ठेकेदारी शुरू हुई तब ही से सच्चे ईश्वर और धर्म का लुप्त हुश्रा। और इसके नाम पर धोखा देकर पेट पालने के लिये एक विलग ही पार्टी बनती चली गई। दूसरी कथा आती है विश्वामित्र और वशिष्ट की । कहते हैं विश्वा मित्र ने किसी समय परब्रह्म ऋषि बनने के लिये बहुत कठिन तपस्या की थी, किन्तु वशिष्ट ने विश्वामित्र को ब्रह्मऋषि की पदवी न दी। अन्त को बहुत कड़ी ( कठोर ) तपस्या करके जब विश्वामित्र ने वशिष्टजी से भी अधिक तपस्या कर ली। तब बाध्य होकर वशिष्ट ने विश्वामित्र को ब्रह्मऋषि का पद दिया ।. यह सर्वत्र प्रसिद्ध है। तीसरी कथा आती है रामायण में जहां राम और परशुराम संवाद चला है, वहां पर ऐसा लिखा है कि जब रामजी ने शिव धनुष तोड़ डाला तब परशुरामजी भी कहीं से पर्यटन करते हुए श्रा पहुँचे, और शिव धनुष टूटा देख कर बड़े क्रोधातुर हुए, और श्रीरामजी से अभिमान युक्त वचन बोले कि हे राम! दुनियां में जो राम है वह तो मैं अकेला ही परसराम ( ५५) - अब तुम दूसरा राम कहां से यागया ? तुलसीदासजी ने भी इस संग्राम के विषय में ऐसा ही लिखा है कि---करि परितोष मौरि संग्रामा, नातरू छांदि कहाउन रामा ! अर्थात् हे राम ! यातो मेरे को संतोष दे और मेरे साथ संग्राम कर। नहीं तो अपना राम नाम कहलाना छोड़ दे। इतना वचन जब राम ने मुना तब उनके इच्छानुसार परशुराम के मद को श्री राम ने विदीर्ण कर दिया। इन उपरोक्त बातों से पता चलता है कि यह अभिमान और ईर्षा देष लोगों में पहिले ही से चला आता है। रावण के साथ में भी उस समय ऐसाही बर्ताव किया। जब लोगों ने देखा कि रावण हमसे मान मर्यादा, बल, विद्या बुद्धि में कई गुणा अधिक बढ़ता जा रहा है और हम उससे अब किसी भी तरह समता नहीं कर सकते, तब उसको परास्त करने के लिये तथा बदनाम और नीचा दिखाने के लिये वेद विरोधी नास्तिक और राक्षस घोषित (announce) कर दिया। और अन्त में श्रीरामचन्द्र जी से मेल करके न्याय कुशल, पराक्रमी, बल बुद्धि निधान, तपस्वी, आविष्कारक कुशल रावण जैसे दिव्य देवता को नाश कर दिया । अब रावण के दिव्य गुणों का लोगों को परिचय करया जाता है। जग सुनिये:- रावण उस ज़माने का बहुत बड़ा पंडित माना जाता था। इस बात को सिद्ध करने के लिये याज तक लोग उसके दस मुख और मस्तक बनाते रहे हैं। ये मस्तक और मुख ऐसे नहीं थे जैसा कि लोग अाजकल राम लीला के समय बना कर दिखलाया करते हैं। ये तो लोगों ने ना समझी के कारण इतने सिर तथा मुखों की कल्पना कर ली है वास्तव में तो रावण का शरीर भी ऐसा ही था, जैसा कि सत्र मनुष्यों का देखा जाता है। अब ये तो रावण के दस मुख बनाये जाते है, और इसी से रावण का दूसरा नाम दशानन भी पड़ गया, सो क्या है ? रावण चार वेद और षट शात्रों का ज्ञाता था। और वेद तथा शास्त्रों का अध्ययन करने का काम मुख्य । ?

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(५७) विद्या, अात्म विद्या तथा भौतिक विद्या तथा साइन्स आदि । कहने का अभिप्राय यह है, कि रावण के समय तक ये सब विद्यायें प्रफुल्लित थी किन्तु रावण को मार देने के पश्चात् सब विद्याओं का शनैः २ नाश होता चला गया। रावण की राजधानी में बड़े २ आयुर्वेद के ज्ञाता सुखेण जैसे वैद्य थे कि जो मृतप्रायः मनुष्यों को जीवित कर लेते थे। बड़े २ वैज्ञानिक इञ्जिनियर थे। रावण की राजधानी लङ्का का बड़े २ चतुर शिल्पी तथा वैज्ञानिक इञ्जिनियरों के द्वारा ही निर्माण किया गया था। उस समय की शिल्प विद्या से प्रभावित होकर एक फ्रेञ्च अंग्रेज़ ने अपने एक वक्तव्य में प्रकाशित करते हुए कहा है कि: A French scholar Victor Golep Bleeff lecturing some time ago in London, indicated how great has been the influence of ludian art. The Great Indian art, he said, "Spread over Eastern Asia just as the great plastic ideal inspired the Coun trips of the Mediterranean and extended beyond the Alps." And India's Ideals, taken up by Budh - ism touched and trans-formed the life of Japan. The Indian Students needs but understand to appreciate India's past. . रावण अपने ज़माने में विज्ञान (Science) का जानने वाला भी अद्वितीय हो था। देखो रावण ने काल को पाटी के बांध रखा था, हवा उसकी बुहारी देती थी, इन्द्र उसकी वर्षा करता था इत्यादि २ बातें यान तक लोक में प्रसिद्ध हो रही है, किन्तु हम लोग उसकी इन सब विचित्र बातों को कुछ का कुछ ही समझ रहे हैं। कोई तो काल को पाटी के वांधने का अर्थ कर रहे हैं कि मौत को रावण ने बांध लिया था, और -- ५८ ) इसी प्रकार हवा के विषय में भी समझ रहे है कि यह जो हवा चलती है इसको बांध लिया था। सो बात ठीक नहीं है। अब हम आप को वास्तविक अर्थ बतलाते हैं। जरा सुनिये:-पहिले पाठकों को बतला दिया है कि रावण बड़ा भारी साइन्स का ज्ञाता था, उसने काल को पाटी के बांध रखा था उसका अर्थ यह है, कि जैसे अाजकल साइन्स के जानने वाले अंग्रेज लोग हैं इन्होंने काल को हाथ के बांध रखा है, दीवार पर लटका रखा है, मेज पर रखा है। काल नाम समय है। आपने घड़ी को हाथ के बांध रखा है, घड़ी को दीवार के बांध रखा है, घड़ी को मेज़ पर धर रखा है। अभी आपको समय देखने की आवश्यकता हुई, श्रापने झट हाथ पर देख लिया, दीवार पर देख लिया कि दो बजा है। इसी प्रकार यदि आपको सवेरे चार बजे उठना है, श्राप अपनी टाइमपीस में चानी देकर सो जाइये, यह घड़ी आपकी ठीक टाइम पर जगा देगी, बस यही काल का बांधना है। रावण भी अपने समय का बड़ा पावन्द था और इसी प्रकार मन्त्रों द्वारा अपने समय का विभाजन कार्य किया करता था। . हवा उसकी बुहारी देती थी सो कैसे देती थी सुनिये:--अाज कल विदेशियों ने बिजली के पंखे बना रखे हैं। इनको यदि आप फुल पावर से खोल देगे तो आपको उस हवा में बैठना कठिन हो जावेगा। मतलब यह है कि आप इस हवा से जैसा चाहें वैसा काम ले सकते हैं। इसी प्रकार रावण के पास में भी इस हवा से काम लेने के लिये कई प्रकार के यन्त्र बने हुए थे। इन्द्र उसकी वर्षा किया करता था सो कैसे किया करता था, इस बात को सुनियेः आजकल आप योरुप तथा अमेरिका आदि देशों में जाकर देखिये, वहां पर जब क्षेत्रों को पानी की श्रावश्यकता होती है, तब ये लोग वहां पर पाइपिङ्ग सिस्टम (piping system) के द्वारा अथवा फिलड सिस्टम (flood system) के द्वारा मन चाहे जितने (area) क्षेत्र में पानी वर्षा लेते हैं। इसी प्रकार रावण भी अपने बाग बगीचो में इसी प्रकार पानी वर्षा लिया करता था।

(५६) सब बोम्ब ही थे कहने का अभिप्राय यह है कि रावण के शासन काल में सब प्रकार की साइन्स विद्या का प्रचार था। अाजकल जैसे हवाई जहाज अाकाश में उड़ते हैं वैसे ही रावण के समय में भी पुष्पक विमान प्रादि अाकाश में उड़ा करते थे। रावण के शासन काल में बड़ी २ तोपें तथा मशीन गन्स मौजूद थी कि जिनको उस समय में भुसन्डी तथा शतघ्नी श्रादि कहा करते थे। रावण के समय में बड़े २ बोम्ब (Bomb) अणु बम्ब, परमाणु बम्ब भी प्रचलित दीख पड़ते थे। अग्नेय श्रन्न, गस्ड अस्त्र तथा वरुणऽस्त्र ये अर्थात् अाजकल इस भौतिक वाद के समय में आपको ये सब वस्तुयें प्रत्यक्ष दीख पड़ती है। इसी प्रकार रावण के समय में भी इन सबका विधिवत् प्रयोग किया जाता था । अत्र श्रापको पता लगा होगा कि रावण जैसा तत्त्व विद्या (Knowledge of science) का जानने वाला क्या कोई दूसरा और देखा जाता है जो इतना बड़ा विद्वान, तत्त्ववेत्ता तथा फिलोस्फर रावण को एक्दम राक्षस बना देना देश की मूर्खता नहीं तो क्या है ? राक्षस बनाने में लोगों के पास कोई खास प्रमाण भी नहीं है, कि जिससे उसको राक्षस मान लिया जावे। हां, उसके देवता बनने के तो हमारे नेत्रों के सामने अनेकों उदाहरण हैं। प्राजक्ल लोग उसकी एक दो बाते सुनाकर कह देते हैं कि रावण राक्षस था, किन्तु इन लोगों की एक दो बातों से भी राक्षस होना सिद्ध नहीं होता। नहीं होता। अब रावण में जो कुछ दोष राक्षसपने का लगाते हैं, सो मैं उसको निर्दोष ठहरा कर सिद्ध कर देता हूँ कि ये सब दोप रावण पर ईर्ष्या तथा द्वेष के कारण श्रारोपण किये गये हैं। किन्तु इनका न्याय दृष्टि से विचार किया जाय तो रावण का इसमें कोई दोष नहीं है। पहिली बात जो इस पर दोपारोपण के लिये लगाई गई सो यह है:- नृप श्रभिमान मोह वश किम्बा। हर यानेसि सीता कर दम्भा ॥ अर्थात् उसने सीता महारानी को अभिमान तथा मोह के वश होकर (.) , चुरा लाया। अब देखिये यहां तो लोग उस पर सीता को चुरा लाने का अारोप लगाते हुए राक्षस प्रमाणित करते हैं, और दूसरी ओर कहते हैं कि रावण को यह वरदान होगया था कि उसकी मृत्यु भगवान श्रीराम के हाथ से होगी, और रावण रामकी भक्ति करेगा किन्तु चैर भाव से समर्ण करेगा, और इसीलिए तुलसीदासजी ने लिखा है कि 'तुलसी अपने राम को रीझ भजो चाहे खीज । उलटे सुलटे जामिये ज्यों खेती में बीज' अर्थात् अपने गम को चाहे प्रेम से रिझावो और चाहे खीन अर्थात् नाराज होकर रिझायो, भक्ति दोनों तरह भगवान की ही होगी। जैसे खेती में बीज उलटा डालो, चाहे सुलटा डालो वे तो उगेंगे ही। इसी तरह भगवान की भक्ति किसी भी तरह करो, कही जायगी भगवान की ही भक्ति। और रावण ने इसी भक्ति को सिद्ध करने के निमित्त ही तो सीताजी को चुराया था, वह जानता था कि इस तरह सीता को चुरा लेने से भगवान जल्दी अाकर मुझ से युद्ध करेगे, और मैं उनके हाथों से मारा जाकर शीघ्र ही गोलोक का अधिकारी हो जाऊँगा। फिर दोष लगाने वालों को यह भी अच्छी तरह ज्ञात है कि रावण की सीताजी में जार बुद्धि नहीं थी, वह सीताजी को अपने हृदय से माता समझता था । अब आप सोचिये कि एक तरफ श्राप रावण को दोषी ठहराते हैं, और फिर दूसरी तरफ आपके वचनों से ही निर्दयी भी प्रमाणित करते हो, तो यह 'आपका भोलापन कहा जायगा या नहीं ? कहने का अभिप्राय यह है, कि रावण में यह स्वाभाविक गुण था, कि वह किसी भी प्रकार के ज्ञान को प्रास करने के लिये उन ज्ञानियो के पास पहुँच जाता और वहां जाकर ज्ञान बल से बाहु बल से, विद्या बल, से जिज्ञासा से किसी भी प्रकार से उस ज्ञान को प्राप्त कर लेता था क्योंकि वह प्रत्येक वस्तु जानने के लिए रिसर्च स्कोलर बना हुआ था। बाली के पास में वह कई समय बाहुबल की परीक्षा के लिये पहुँचा था, और उसकी कई प्रकार से परीक्षा ली थी। इसी प्रकार उसने भगवान राम के भी कई दिव्य गुणों की प्रशंसा सुनी-थी, किन्तु उन सब की परीक्षा कैसे लेवेंः इसलिये समय पाकर सीताली को चुरा लाया, और उनको अशोक वाटिका में ठहरा दिया। यदि रावण को सीताजी में जार वृद्धि होती तो वह उनको सीधा बाईरेक्ट अपने महलों में ले जाता, और वह फिर सीताजी को इतने दिन तक छोड़ भी कैसे सकता था। लो कामी होते हैं वह स्त्री को थोड़ा अकेला पाते ही अपनी काम वासना की पूर्ति कर लेते हैं। किन्तु रावण ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह अपनी भावना में सीताजी को माता समझता था। उसने तो श्राप लोगो की मौवनानुसार भावान के दरशन करने के निमित्त तथा उनके हाथ से मर कर मुक्त होने के निमित्त सीताली का अपहरण किया था । यदि श्राप अपनी भावनानुसार समझो, तो गवण दोषी नहीं है, और यदि हमारी भावना अनुसार समझो तो भी रावण टोपी नहीं है। अतः उसको स्त्री चुराने का दोष लगाकर राक्षस बनाना ठीक नहीं है। फिर दूसरा दोष रावण पर लगाया जाता है खाने पीने का, अर्थात् ये लोग मांस मदिरा का सेवन किया करते थे। और मांस मदिरा का सेवन करना ही राक्षसपना होता है। अत्र इसके विषय में सुनिये:-- रावण की राजधानी लता थी, और लङ्का के चारों तरफ समुद्र था। खाने पीने की दूसरी चीजें इतनी अधिक नहीं होती थी। अतः ये लोग प्राण रक्षार्थ मांस प्रण किया करते थे। ग्राजक्ल भी जो मनुष्य समुद्र के तट पर निवास करते हैं, वे अपना जीवन विशेष कर मछली यादिकों पर ही विताया करते हैं। जहां पर दूसरी चीज़ अधिक रूप में नहीं मिलती वहां पेट पालने के लिये कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है। अब यदि आप यह कहो कि नहीं साहब! हम इस बात को नहीं मानते। जो मांस मदिरा सेवन करते है उनको हम राक्षम ही मानेंगे। यदि आपके कथनानुसार ऐसा ही माना जावे तो भारत में रूपये में चार पाना ही ऐसे मनुष्य होंगे कि जो फल फूल अथवा रोटी दाल खाते हैं, और रूपये में बारह श्राना ऐसे मनुष्य हैं, कि जो मांसादि खाकर पेट पालते हैं। तो आपकी भावनानुसार तो ये सब ही राक्षस कहला सकते हैं। किन्तु ऐसा नहीं है, हमतो किमी की भी राक्षस शब्द का संबोधन (६२) करते हुए नहीं देखते हैं । सब ही मनुष्य कहलाने का अधिकार लिये हुए है। यदि आप कहो कि जो वाहाण होकर मांस मदिरा खाता है वह हमारी दृष्टि में राक्षस है । यदि यही बात सही है, तो बंगाल के अधिक से अधिक ब्राह्मण मांस मछली खाते हैं, तो वे सब राक्षस ही कहलाने चाहिये। किन्तु हमने तो कहीं भी उनको राक्षस कहलाते हुए नहीं सुने हैं । फिर रावण ने ही ऐसा क्या अपराध किया है कि जिसको ब्राह्मण से राक्षस बना दिया है ? अतः मेरी समझ में तो ये सब रावण के साथ अन्याय किया गया है। १३. रावण का बाली की कांख में छः महीना रहेना १ तुलसीदास जी ने रामायण में लिखा है कि रावण को बाली ने अपने कक्ष ( बगल ) में छः महीने तक दवा कर रखा था। रामायण में अङ्गद और रावण का जो संवाद है, उसमें अङ्गद ने भी रावण से पूछा है कि:- एक कहत मोहि सकुचि अति, रहा बालि की काख ।. तिनमें रावण कौन तू, सत्य कहहुँ मोहि भाख ॥ अर्थात् हे रावण ! मैं आप से एक बात पूछने में बहुत सकुचता हूं, श्राप मुझ को सत्य करके बतलाइये, मैने श्राप के विषय में सुना है कि आप मेरे पिता बालि की कक्ष में छः महीने तक रहे थे। सो श्रापं वही रावण है क्या ? इस संवाद से भी पता चलता है कि रावण को बालि ने 'छः महीने तक अपनी कक्ष बगल में दबा कर रखा था। सब कोई आज तक यही कहते और मानते चले आरहे हैं, किन्तु इस बात पर किसी ने कोई विचार नहीं किया कि रावण को बालि ने छः महीने तक बगल में दबा रखा। क्या रावण शरीर की जू वा (एक प्रकार का कीड़ा जो शरीर के कपड़े और सिर के बालों में उप्तन्न होती है) थी कि जो बालि की कांख में छः महीने तक दनी पड़ी रही। रावण उस जमाने में कोई साधारण व्यक्ति तो - - था नहीं, वहादुर ( शूरवीर) योद्धा था, यदि ऐसे प्रसिद्ध योद्धा को कोई किसी तरह से परास्त करके कारागार में डाल कर लोहे की जंजीर से बांध कर छः महीने तक रखले तो यह बात संभव हो सकती है किन्तु उसको बगल में दावे रखना यह बात का संभव हो सकती है, और फिर कोई घंटा दो घंटा किसी की बगल में दवा ले तो भले ही वाले। किन्तु छः महीने तक बगल में दावे रखना तो बुद्धि, स्त्रीकार नहीं करती। आप क्रिसी यादमी को घंटा दो घंटा तो बगल में दबा कर देखिये यापको कैसा अानन्द श्राता है। ग्राप एक दम घंटा दो घंटा में ही परेशान हो जायेंगे, और यही चित्त चाहेगा कि इस व्यक्ति को छोड़ दें। फिर रावण को बालि ने छः महीने तक वगल में दत्रा कर रखा है , तो यह बात बड़ी ही श्राश्चर्य की होती है, जिसको बुद्धि किसी भी तरह स्वीकार नहीं करती है। बीच २ में इस अविद्या देवी की भारत पर ऐसी कृपा हुई कि इन मुत्य सिद्धान्तों को समझना और समझाना मी दूर हो गया जिसने जो कुछ कह दिया अथवा बतला दिया वही करने और मानने लग गये, उसका परिणाम यह हुआ कि सत्य सिद्धान्त लुप्त हुए और उसकी जगह कृत्रिमता को स्थान मिल गया। अब हम आप को यह चतलाते हैं कि रावण बालि की कक्ष में छः महीने तक किस प्रकार रहा सो सुनिये:- - . पूर्व प्रकरण में पाठकों को लिख कर बता दिया गया है कि रावणं बड़ा भारी आविष्कारक शूरवीर, विद्वान, तपस्वी तथा प्रत्येक विद्या का लिज्ञानु (research scholar ) या । यह योग के परिचय के लिये योगियों के पास पहुँचता, ज्ञान के लिये ज्ञानियों के पास, साइन्स के लिये बड़े २ तत्व वेत्ताओं के पास तथा बाहुवल की परीक्षा के लिये बड़े २ शूरवीरों के पास पहुँचता था , और जब तक उन विद्याओं का पूर्ण परिचय न कर लेता था तब तक वह उनका पीछा नहीं छोड़ता था चाहे उसको इस विषय में कितना ही कष्ट श्रावे अथवा उसका कोई कितना ही मान भंग करे, इस बात की वह कभी भी परवाह नहीं करता था । वह तो केवल सत्य का ( ४ ) ? पुजारी था, सत्य सिद्धान्त जिधर से भी मिलें उधर से ही प्राप्त करने का बड़ा इच्छुक था। साम्प्रदायिक भावनाओं से उसको बड़ी घणा थी। रावण बाली की कांख में जो छः महीना रहा, उसका क्या कारण था ? इसका यही कारण है कि वह सदा सत्य की खोज में रहता था। बाली भी बड़ा शूरवीर और भुन दण्डों में पराक्रम रखने वाला आदर्श व्यक्ति था और रावण तथा बालि में अपूर्व मित्रता थी। यह रावण अपने मित्र बालि के पास बाहुबल की परीक्षा निमित्त कई समय पहुँचा करता और परास्त हो कर श्राजाता था, किन्तु वह इस बात की कोई परवाह नहीं करता था। यही कारण था कि रावण अपने बाहुबल की परीक्षा निमित्त बाली की कांख में छः महीना तक रहा। अब वह किस प्रकार बगल में रहा जू बन कर बगल दन रहा अथवा और किसी दूसरे प्रकार से दब कर पड़ा रहा सो सब बाते. कथा के प्रसंग में संक्षेपतया पाठकों की जानकारी निमित्त वर्णन किया जाता है। में रावण किसी समय बाहुबल की परीक्षा निमित्त भ्रमण करता हुआ वाली की राजधानी किष्किन्धा में सूर्यास्त से कुछ पूर्व पहुँच गया । बाली उस समय अपने भवन से निकल कर भृत्यों सहित सायङ्काल की सन्ध्या करने उपवन को जा रहा था, कि बीच ही में रावण और बाली की भेट हो गई । बाली ने बड़े प्रेम से मिल कर मुस्कराते हुए रावण से पूछा कि अहो दशानन प्रानन्द से तो हो १ कहो कहां से शुभागमन हो रहा है ! इस पर रावण ने बाली से कहा कि हे बाली! मैं अमुक राजा से मिलने जा रहा था, बीच में जाते २ आपकी नगरी पड़ गई, इससे इच्छा हुई कि बाली से भी मिलता चलू-बस यही सोच कर आपके मिलने को शा गया हूं। इस पर बाली समझ गया कि रावण मेरी बाहुबल की परीक्षा निमित्त श्राया है। इसको इस समय बाहुबल की परीक्षा तो क्या कराऊं, क्योंकि यह समय संध्या करने का है अतः इसको इस समय अपनी योग विद्या का परिचय दे देना चाहिये, ऐसा सोच समझ कर बाली ने रावण से कहा कि हे दशानन ! बड़ी ( ६५ ) खुशी की बात है कि आप पधारे ! किन्तु इस समय सन्ध्या करने को जा रहा हूं, अतः आप भी मेरे साथ उन्थ्या करने के निमित्त उपवन को पधारिये । इस प्रकार रावण और बाली दोनों मिल कर उपवन में पहुंच और अपना २ वासन बिछा कर सन्ध्या करने को बेट गये। रावण बाली की कक्ष में अर्थात् वगल में ग्रासन लगा कर बैठा। इस प्रकार दोनों सन्ध्या करने लगे। जब सन्च्या में प्राणायाम मंत्र यावा, तब वाली ने रावण को योग का परिचय कराने के निमित्त छः महीने का प्राणायाम स्थिर कियाः अर्थात दो महीने का पूरक, दो महीने का कुम्भक और दो महीने का रेचक इस प्रकार छ: महीने का प्राणायाम नाधा। रावण ने देखा कि बाली ने प्राणायाम का सावन कर लिया है तो उसको भी चान्नी की बगल में बैठे रहना पड़ा, क्योंकि रावण बाली से पूर्व खड़ा हो जाता तब तो उसकी हँसी हो जाती अतः वह भी चुपचाप सन्ध्या करता हुग्रा तथा प्राग का निरोध करता हुना बाली की बगल में छः महीने बैठा रहा, जब उसने देखा कि बाली की समाधि छ: महीने में भी भंग नहीं हुई, तब रावण ने बाली की समाधि मंग करने की कुछ युक्ति चलाई। तब बालो की समाधि मंग हुई और रावण योग विद्या में परास्त हो लजित होता हुया अपनी राजधानी को चन्ता गया। इस प्रकार राव को बाली की कांख में छः महीना रहना पड़ा था। लोक में भी कहा जाता है कि अमुक अादमी भोजन करने के लिए अमुक अादमी की बगल से बैटा। इससे कहने वाले का यह अभिप्राय थोड़े ही है कि वह उमकी बगल में जू बनकर बैठ गया। किन्तु उसके समीप में बैठने को ही बगल में बैटनो कहा जाता है। इसी प्रकार रावण का वाली की कक्ष में छ: महीने तक रहने का भी अभिप्राय है, कि वह वाली की काल में जू वन कर नहीं बैठा रहा और न बाली उसको कांख में दवा कर बेटा रहा। किन्तु वह बाली की कन्न ( बगल ) में बैटा बुआ छ: महीने तक सन्ध्या करता महा अथवा बाली की समाधि भंग होने की आश में ध्यान लगाये बैग रहा। यही सिद्धान्त उपयुक्त हो सकता है, जो सदा सर्वदा माननीय है। किन्तु उसका जू बन कर बगल में बैठा रहना अथवा उसको बगल में दवा कर ६८ ) सागया। इसका भी यह अभिमाय नहीं कियाघर मी सागरोटियों को खागया, किन्तु श्रावशता से अधिन, स्वागया। यही झाल हनुमानजी का हुया, वे क्योकि अावश्यता से काटियों को मार लेआम घे, और इसीलिचे उनको साना पर्वत उठाने की उपाधि दे दीगई। शिला अविद्या देवी ने सारे द्रोणाचल पर्वत को उटा कर ले आना ही हिन्दू समाज को बोध करा दिया है, जो किसी भी श्राद्ध द्वारा नही हो सकता। १५. श्री कृष्ण का गोवर्धन उठाना इसका रहस्य भी वैसा ही है कि सा गुमान जी का प्रोगानल पर्वत का उठाना है। श्रन्तर इतना है पि. हनुमान जी ने यिनी ग्रंश में द्रोणाचल पर्वत की कुलटियों को लाये थे, और श्री या गावान ने सोने कोई पर्वत विशेष चीज न उठा कर केवल गोवर्सन उटवाया था। सो को और किस तरह ? इस पर अपने विचार प्रगट किये जाने हैं। कहा जाता है कि यादवों की संख्या ५६ कोटि ( करोड़ ) थी और प्रत्येक यादव के घर में लक्ष २ गायें थी। अब यदि यादवों की संख्या ५६ यरोन्द्र मानी जाय तो इनके साथ में ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्रों की संख्या कितनी होनी चाहिये । और फिर ये सब इस भारत में कैसे समाते थे। बाज हम देखते है, कि भारत में ४० या ४५ करोड़ जन संख्या में ही यह हात हो रहा है। कि खाने को अन्न नहीं है, पहिनने को कपड़ा नहीं है, तथा रहने को स्थान नहीं मिलता है तो फिर उस पूर्व स्थिति में जब कि भारत में अरब से भी अधिक मनुष्य रहते थे तब ये सब यहां पर किस प्रकार समाये हुए थे। इससे सिद्ध होता है कि यादवों की संख्या ५६ कोटि नहीं थी। यहां कोटि शब्द करोड़ वाचक सिद्ध नहीं होता किन्तु इस कोटि शब्द के दो अर्थ समझना चाहिये, पहिला कोटि नसल (Kind)दूसरा कोट=किला-दुर्ग (Fort) अब ५६ कोटि का अर्थ हुआ ५६ प्रकार के यादव, अथवा यादवों के श्राधीन में ५६ निवास स्थान थे कि जिनमें ये यादव सुरक्षित रहते थे। जैसे ३३ कोटि देवता कहे जाते हैं, यहां पर ३३ कोटि से ३३ करोड़ देवता नहीं 'किन्तु ३३ प्रकार के देवता ही सिद्ध होते है। इसी प्रकार यादवों के विषय में भी समझना चाहिये। अब रही दूसरी बात गौत्रों की। यहां पर यादवों के प्रत्येक घर पर लक्ष २ गायें थी। अब यदि इस लक्ष शब्द को संख्या वाचक अर्थ लेते हैं तब तो यह निसन्देह सिद्ध हो जाता है कि यादवों के घरों में लाख २ गायें रहती थी, कि जिसने इनके रहने की अव्यवस्था सिद्ध हो जावेगी। क्योंकि एक २ गाय के बांधने की जगह मी तजवीज की जाय तो कितनी होनी चाहिये, और फिर लाख गायों के लिये कितनी होनी चाहिये। और फिर जब एक ही परिवार का यह हाल होगा तो अनेकों परिवारों का क्या हाल होगा? और फिर इतनी सब गायों के चरने के लिये चागगाह कितने लम्बे चौड़े होने चाहिये। इस लिये बुद्धि इस बात को स्वीकार नहीं कर सकती कि प्रत्येक यादवों के घर में लाख २ गायें रहती हो । इसलिये इसके वास्तविक अर्थ पर विचार किया जाता है। मुनिये:--- "यादवों का लक्ष्य गाय थी। यहां लक्ष्य शब्द का अर्थ होता है ध्येय (aim)| अथात यादवों का ध्येय ही गौ पालना बन गया था। अर्थात् प्रत्येक यादव अपने हृदय से गौ पालना अपना लक्ष्य समझता था, और यही मुख्य कारण था कि भगवान श्रीकृष्ण को ही गोपाल की पदवी मिली जो अाजतक संसार में किसी को भी प्राप्त नहीं हुई । भगवान श्री कृष्ण ने स्वतं गौत्रों की सेवा की थी, और उनको स्वयं चराया करते थे। और वे स्वयं माखन खाते थे और दूसरों को बाध्य कर के खिलाया करते थे। भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा ही यह थी कि:-"स्वयं गौ पालो किन्तु बाजार से घी दूध खरीदो नहीं। भगवान श्री कृष्ण ने इन दोनों बातों का प्रत्यक्षी कर गा करके बतला दिया था। श्राजकल लोग गौत्रों के नाम पर तो श्वांस लेते हैं, किन्तु कुत्तों को बड़े प्रेम से पालते हैं। ऐसे मनुष्यों को भगवान श्री कृष्ण से शिक्षा लेती चाहिये। गगवान राम को वशिष्टजी हर समय ( ७२ ) गोवरंधन की पूजा सदैव से ही चली आती है, और श्राज भी हम लोग इसकी पूजा कार्तिक मास के अन्तर्गत दीपावली के दूसरे दिन बड़े प्रेम से करते हैं। गोवरधन किस चीज का बताते हैं ? सो सुनिये ! यह गोवरधन हमारे यहां पर आजतक गाय के गोबर का बनाते हैं, और इसमें गौ से सम्बन्ध रखने वाली प्रायः सब चीजें यथा दूध, दधि, माखन आदि प्रयोग में लेते हैं। और प्रसाद के लिये माखन मिश्री युक्त चूरमा बनाते हैं, और फिर इस प्रसाद को गुवाल बालों को बड़े प्रेम से खिलाते हैं क्योंकि इस गोवरधन के अधिकारी वे ही होते हैं, जो गोपाल बन कर गौयों की सेवा करते हैं । अब आप सोचिये ! यदि गोवरधन के उठाने का अर्थ पहाड़ होता तो हम उसकी मूर्ती गोबर की नहीं बनाते । किन्तु मिट्टी योर पत्थर के संयोग से बनाते क्योंकि पहाड़ में विशेष कर मिट्टी और पत्थरों का ही संयोग पाया जाता है । इससे सिद्ध होता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने पहाड़ों को नहीं उठाया, किन्तु उन्होने तो यादवो से अगुली के इशारे पर गौनों से सम्बन्ध रखने वाले सारे पदार्थों को उठवा कर पहाड़ के समीप सुरक्षित रखवा दिया। यदि भगवान श्रीकृष्ण उस समय इस असली गोवरधन को न उठवाते, तो सारे यादव मर जाते । क्योंकि यादवों का लक्ष्य तो गौऐं ही थी, इसलिये भग- वान श्रीकृष्ण ने असली गोवरधन उठवा कर यादवों के प्राणो की रक्षा करली। -- इस पर यदि आपको यह शङ्का है, कि गोवरधन को तो भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अंगुली पर धारण किया था, सो यहां तो यह बात सिद्ध न हुई, क्योंकि यहां तो गोवरधन का उठवाना यादवों से सिद्ध होता है। सो सुनिये- इसका उत्तर यह है कि जैसे सैना में कमान्डर इन चीफ होता है, और उसके इशारे पर सेना सब काम करती है, अर्थात् शत्रु को मरने मारने का-सब कार्य सेना करती है, और विजयी भी सेना ही होती है । किन्तु लोक में प्रसिद्ध होता है कि अमुक कमान्डर इन चीफ ने विजय प्राप्त की । यहाँ पर कोई ऐसा नहीं कहता कि सेना ने विजय प्राप्त करली। बस यही हाल भगवान श्रीकृष्ण के विषय में जानना चाहिये क्योंकि उस समय बड़ी भयङ्कर वर्घा के चिन्ह बन चुके थे, और बादलों की गोवरधन सम्बन्धी मारी चीजें तितर बितर हो रही थी, अर्थात् कहीं गायों का चारा पड़ा था, कहीं गायों के कोमल २ वच्छ इधर उधर ग्रामोद प्रमोद में फिर रहे थे, कहीं गायों का गोबर इटा किया पड़ा था, कहीं गायें इधर उधर चर रही थी, कहीं खाने पीने की चीजें वथा अन्न, माखन तथा मिश्री रखी हुई थी, उन सब पदार्थों को यादवों में श्रेष्ट भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी अंगुली के इशारे (सङ्केत) से यादवों द्वारा उन सब पदार्थों को उठवा कर पहाड़ की कन्दरानों के समीप सुरक्षित रखवा दिया। इसी को भगवान श्रीकृष्णा का असली गोवरधन उटाना कहा जाता है। क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का तथा यादवों का असली गोवर्धन (गौ की सेवा सुश्रुपा द्वारा वृद्धि करना, प्रसन्न करना अथवा रक्षा करना) ही कहा जाता है। अतः भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों को उचित है, कि वे भगवान श्रीकृष्ण के ग्रादेशानुसार अपनी परम पवित्र गौमाता की रक्षा तथा सेवा द्वारा गौ सम्बन्धी सारे पदार्थों को एकत्रित करके असली गोवरधन स्थापित करो, और नकली गोवर्धन के पीछे न पड़ो क्योंकि यह तो पंडे पुजा- रियों की कूट नीतिज्ञता है, कि उन्होंने असली गोवरधन को भुलावे में डाल कर अपने स्वार्थ की पूर्ती के लिये नकली गोवरधन की पूजा करवाना शुरू करवा दिया। प्यारे पाटको ! इन पंडे पुजारियों की लीला अपरम्पार है, उन्होंने अपने स्वार्थ के लिये न जाने जनता जगत को कितने धोखे दिये हैं, रात दिन दे रहे हैं, और फिर भी जनता इनसे पास लगाये बैठी है, कि ये पन्डे पुजारी हमारा उद्धार करेंगे, बस यही एक आश्चर्य की वार्ता है। ये भोले लोग इस बात को नहीं जानते हैं, कि जिन व्यक्तियों के रोम २ में धोखा देना और ससारिक भोग भोगना ही समाया हुआ है, फिर ऐसे व्यक्तियों से क्या यह यारा की जासकती है कि वे संचार में किसी का जब ये लोग स्वयं ही अपने कुकृत्यों के द्वारा डूबे जा रहे हैं फिर डूबते हुए प्राणियों को ये लोग निकालें, यह बात कब संभव हो सकती है। और प्रत्यक्ष में उद्धार करेंगे।

( ४ ) देखिये ! ये लोग भगवान श्रीकृष्ण के असली गोरधन की पूजा करवाते अर्थात् गोत्रों की सेवा सुना हा भाव जनता के सामने रखते तो इनको न तो इतनी श्राय होती, और न इनको इतने भोग ही मिल सकते थे। क्योकि सब लोग गोगों की सेवा मुनया करते, इनको मौन पूछता ? इसलिये इन्होंने जनता को भी विशेष की सेवा न पतला कर पर्वत विशेष का महान्य बतला दिया। कि जिसके बहाने यदों पर श्रावें और हमारे को दान दक्षिणा तथा भोगों की सामग्री प्राप्त हो। इस प्रकार जगत में अर्थ का अनर्थ होगया। इतना समझाने पर भी फिर यदि कोई मनुटात् यही कहे, कि नहीं, भगवान श्रीकृष्ण ने तो अगुली पर घर कर पर्वत ही उठा लिया था, तो फिर इसके विषय में भी वही बात होगी, कि जैसा हनुमानजी का दोगानल पर्वत के उठाने के बारे में पीछे लिख कर समझाया गया है। अर्थात् पर्वत का उठाना आश्चर्य ही नहीं किन्तु असम्भव भी है, क्योंकि बुद्धि इस बात को स्वीकार नहीं कर सकती। दूसरे गोवर्धन शब्द का वाच्यार्य तथा लक्ष्यार्थ करने से भी कोई पर्वत का उठाना सिद्ध नहीं होता। अतः जनता जगत को चाहिये कि भगवान श्रीकृष्णा के उपदेश को तथा असलो गोबरधन उठाने के प्रभाव को सोचे और विचार करे, अर्थात् जिस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण ने यादवों से गोवरधन धारया करा कर उनकी रक्षा की थी, इसी प्रकार आप सब मिलकर अपनी तथा देश व राष्ट्र की रक्षा करें। याद रखो ! बिना गौ पाले अाप गोपाल नहीं बन सकते, और गोपाल बने बिना श्रापको खाने के लिये शुद्ध दूध व माखन नहीं मिल सकता। श्रतः सब लोग गोवर्धन हितकारी बने अर्थात् गौमात को सब प्रकार ने सुपाश देते हुए इनकी वृद्धि करें और तन मन से सेवा करें। यही भगवान श्रीकृष्ण का अमृतोपम गोवरधन रूपी मंगलमयी दिव्य सन्देश है । जो सदा पालन करने योग है।

(७५) १६. भारत का पतन, वर्ण-व्यवस्था यह वर्ग व्यवस्था कैसे चली, और कब चली, और इसका प्रभाव भारत पर क्या पड़ा? इसके विषय में कुछ पाठकों को परिचय कराया जाता है। यादि मुष्टि में पहिले कोई ऐसी वर्ण व्यवस्था नहीं थी कि जैसी बाल भयङ्कर रूप धारण किये खड़ी है, और जिसने भीषण सम्प्रदाय का रूप लेकर फूट रूपी कुल्हाड़ी से भारत की स्वतंत्रता को काटना ही मुख्योद्देश्य मान रखा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जो माने गये हैं वे किस प्रकार माने गये हैं ? वेद में इनकी उत्पत्ति के विषय में ऐसा लिखा गया है कि:- ० मं० १० सूक्त ६०, मंत्र ११ तथा १२ देखो। , MA- ? यत्पुरुषं व्यदधुः कतिघा व्यकल्पयन। मुखं क्रिमस्य को बाह कावूरू पौदा उच्यते ।। ब्राह्मणोऽस्य मुखं मासीहाइ राजत्यः कृतः । उक्तदत्य यद्वैश्यः पद्धयां शुद्रोऽजायत ।। अर्थः-~-प्रजापति ने मानव समान रूपी जिस पुरुष का विधान किया उसकी कल्पना कितने प्रकार की हुई ? इस पुरुष का मुख क्या है ? इसके दोनों बाहु कौन हैं ? कौन इसकी दोनों बा है, तथा इसके दोनों पैर कौन हैं ? इन ऋतिश्यप्रश्नों के उत्तर इस प्रकार कहे गये हैं। इस पुरुष का मुत्र ब्राह्मण है, बाहु क्षत्रिय हैं, नाचे वैश्य हैं, और पैर शूद्र है यहां पर मुग्छ, बाह, जांघ तथा पैरों के कहने से यह नहीं समझना चाहिये कि भगवान का कोई साकार स्वरूप है कि जिसके ये सब अङ्ग माने गये हों, यहां पर ये शब्द केवल अलंकार के रूप में प्रयोग किये गये हैं। इस लिये इनका वास्तविक अर्थ यह है, कि जो अपने बुद्धि बल से समाज के मुखिया बन गये वे ब्राह्मण कहलाये, और जिन्होंने बाहुबल से समाज की रक्षा ( ७६ ) की, वे क्षत्रिय कहलाये, और जिन्होंने अपने जांघ के बूते कृषि, वाणिज्य तथा गो सेवा प्रादि करके समाज का भरण पोपण किया वे वैश्य हुए। तथा जिन लोगों ने इन तीन ग्रकार की योग्यतायों में से किसी भी योग्यता का परिचय नहीं दिया, वे समाज की सेवा करके शूद्र संज्ञा के भागी बने । पूर्व अवस्था में इन चार वर्णों की कोई आवश्यक्ता नहीं थी, एक ही परिवार में अनेक प्रकार के काम धन्धे करने वाले व्यक्ति रहते हुए भी उस परिवार में किसी प्रकार की विषमता नहीं होती थी। जैसा कि आजकल योरुप तथा अमेरिका आदि समुन्नत देशों में पाया जाता है, वहां पर मनुष्य न्यारे न्यारे धन्धे करते हुए भी मानव जाति के नाते से एक माने जाते हैं। अर्थात् वहां पर ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र की कोई वल्पना नहीं है। उसी प्रकार हमारे भारत में भी यही सुव्यवस्था थी। अर्थात् वैदिक काल में परस्पर नाति सम्बन्धी कोई भेद भावना न थी न उनमें तजन्य कोई राग द्वेष ही था, किन्तु जैसे २ परिस्थिति बदलती गई, तथा जैसे २ अायों की जन संख्या, भौगोलिक प्रसार तथा जीवन की आवश्यकताए और समस्याएँ बढ़ने लगी, तैसे २ यहां के लोग भी इस बात को महसूस करने लगे कि संसार के विविध २ कार्यों को सुचारु रूप से सम्पादन करने के लिये अलग २ दल होने चाहिये कि जिनके सदस्य अपने २ निर्धारित कमों में विशेष रुचि तथा प्रवीण तो रखते हों। इससे समाज में कभी अव्यवस्था न आवेगी, और प्रत्येक व्यक्ति अपनी २ समाज के द्वारा निर्धारित किये हुए कायों के करने में सदा तत्पर रहेगा, और अपने किये कुल कार्यों का उत्तरदायित्त्व भी रहेगा। ऐसा सोच विचार कर लोगों ने वर्ण व्यवस्था कायम कर दी। और यह वर्ण व्यवस्था गुण, कर्म तथा स्वभाव पर निर्धारित की गई थी। , इसका फल यह हुआ कि जो जिस काम में दक्ष निकला, उससे वही काम कराया जाने लगा। और अन्य कामों से उसको छुटकारा मिलता चला गया इस प्रकार प्रत्येक वर्ण अपने २ कर्म में रुचि रखता हुआ पारस्परिक में अनुराग और सहानुभूति बढ़ाता चला गया। इस वर्ण व्यवस्था की उस समय कोई ठेकेदारी न थी, किन्तु जो जिम कर्म के करने का अधिकारी होता था, उससे बैना ही कार्य लेते थे, और वह उस कार्य के अनुसार ही वर्ण विभाग में लिया जाता था। यदि कोई मनुश्य ब्राह्मण वर्गा में रहता हुआ उस वर्ग के कार्य में अनधिकारी समझा जाता था तो उनको नीचे वर्ष में डाल देते थे। और नीचे वर्ग में कोई उत्तम अधिकारी समझा जाता था तो उसको उत्तम वर्ग में डाल देते थे। इस प्रकार चारों वर्ग परस्पर में सहानुभूति रखते हुए, अपने २ समाज द्वारा साँपे हुए कार्यों को सहर्ष संगदन किया करते थे। इस वर्ग व्यवस्था की चार दिवारी इतनी कठोर और दुर्भेद्य उस समय नही दिखाई देती थी। किन्तु अपनी २ योग्यता तथा अयोग्यता के अनुसार ही अपनी उन्नति का द्वार बन्द तथा खुला हुया रहता था। समय मनुष्य अन्य जातियों में पैदा होते हुए भी गुण कर्म तथा स्वभाव के कारमा ब्रह्म ऋषि मान लिये माने थे। जैसे वशिष्ट, पाराशर तथा व्यासादि इसमें प्रमागा देविये:-महा भारत में लिखा है। गशिक गर्भ संभूतो वशिष्टश्च महामुनिः । तपाठा ब्राहाणो जातः संस्कार तत्र कारणम् ।। जानी व्यासस्तु, केवाः श्वपाकयास्तु पराशर । वहयोऽन्येऽपि विप्रत्वं प्रासये पूर्वमद्विजाः ॥ अर्थात्:--मदा मुनि वशिष्ट वैश्या के गर्भ से उत्पन्न हुए थे, पर वे तपस्या के कारण ब्राह्मणत्र को प्राप्त हो गये। यहां पर संस्कार ही कारण माना जाता है, व्यास केवती (केवट कन्या) से और पाराशर चांडाली से उत्पन्न हुए थे। इनकी तरह बहुत से दूसरे भी जो ब्राह्मण नहीं थे वे भी अपने शुभ कमी के द्वारा ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो गये। इसी प्रकार राजा विश्वामित्र तपस्या करके ऋषि पद अर्थात् ब्राह्मणत्व को प्राप्त हो गये। कहने का अभिप्राय यह है कि उस समय वर्ण व्यवस्था पर किसी का कोई ठेका नहीं था। अर्थात् सब वर्ण अपनी २ मान मर्यादा पर कार्य करते रहते थे। - 1 १ ७८) किन्तु धीरे २ यह वर्ण व्यवस्था अपने मौलि महत्त्व गुण, कर्म तथा स्वभाव को खोकर केवल जन्मगत तथा वंशगत में परिगित हो गया। इसका पल यह हुआ कि इन बों की जो संतान दुई उनकी योग्यता तथा अयोग्यता पर कोई विचार न किया जाकर अपने सम्बन्धित वर्ग की ही उत्तराधिकारिंगी मानी जाने लगी। और धीरे २ वर्गों में ग्रालय तथा प्रमाद फैलने लगा। ब्राहाण तथा क्षत्रियों ने अपनी अपनी गुम्वन्दी करना शुरू कर दिया और विचारे वैश्य तथा शूद्रों की उन्नति का द्वार सदा के लिये बन्द कर दिया गया। पंडे पुजारियों का प्राधिपत्य, दर दना तथा प्रभाव साधारण जनता पर पड़ने लगा। और हमारा हिन्दू धर्म इन पंटे पुजारियों के द्वारा अन्धविश्वास का कारण बनाया गया। पदी देवी देवता के नाम पर, वहीं स्वर्ग नरक का भय दिखा कर, कहीं ना यमुना का भय दिखा कर जनता जगत को उल्लू बनाया गया। और धीरे २ पढ़ने पढ़ाने की प्रणाली बन्द करने के लिये "स्त्री शूद्रो न धीयतामिति" अर्थात् स्त्री शूद्रों को पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसी २ बनावटी श्रुतियों की रचना की जाने लगी। क्योंकि ये लोग जानते थे, कि भविष्य में हमारी संतान यदि मूत्र रह जाय, और दूसरे लोग पढ़ लिख जायगे तो फिर हमारी यह पोप लीला न चल सकेगी। इस का परिणाम यह हुआ कि संसार में अविद्या व्यापी, और पढ़ने पढ़ाने की व्यवस्था केवल ब्राहाणों में ही रह गई। श्राज हम देखते हैं कि जितने धर्म ग्रन्थ, श्रुति स्मृति तथा पुराणादिक की रचना जो हुई है, वह सब केवल ब्राह्मण के ही द्वारा होती रही है, और प्रशाशन कार्य सूत्र क्षत्रियों के हाथ में रहता रहा, और ईश्वर की कल्पना हटा कर केवल क्षत्रियों में से ही अवतार आदि का होना सिद्ध करते रहे। इस प्रकार संसार के वैश्य तथा शूद्र दोनों समाज उभय पदों से भ्रष्ट समझे जाने लगे। प्यारे पाठको। ब्राह्मण समाज ने जिस उच्च पद को कठोर परिश्रम तथा तपस्या के द्वारा उपजित किया था, अथवा लोक कल्याणार्थ जिन उत्तमोत्तम कामोंका संग्रह किया था, उनको अपने ही कुल में सीमित रखने (७६) की उन्हें स्वभावतः एक प्रबल इच्छा हो गई, उन्हें फिर यह भय होने लगा कि कहीं भविष्य में ऐसा न हो कि अन्य वर्ण के लोग भी गुण कमों के द्वारा उन्नति करते २ हमारे पद को छीन न लें तथा हमारी भावी संतान अयोग्यता कारण अन्य वर्गों में न ढकेल दी जावे। अतः उन्होंने पूर्व रचित गुण, कर्म तथा स्वभाव के अनुसार वर्ण व्यवस्था को मिटा कर केवल जन्म सिद्ध स्वतः अधिकार दे दिये, और इन अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिये तथा अन्य वर्ण की जनता को बहकाने के लिये अपनी ब्राह्मण जाति के महात्म्य में निम्नलिखित श्लोकों की रचना करनी शुरु करदी। ब्राह्मणो जायमानोहि पृथिव्या मधि जायते । ईश्वरः सर्व भूतानाम् धर्म कोशस्य गुप्तये ।। सर्वस्वं वालणस्येद यक्तिचिजगती गतम् । अष्टयेनामिजनेनेदं सर्व वै ब्राह्मणोऽहति ।। स्वमेव ब्राह्मगो भुक्त स्वं वस्ते स्वं ददाति च । श्रानृशंस्याद ब्राहाणस्य भुजते हीतरे जनाः ॥ अर्थात्:-ब्राह्मण जन्म लेते ही पृथ्वी के समस्त जीवों में श्रेष्ट होता है, वह सब प्राणियों का ईश्वर है और धर्म के खजाने का रक्षक है । और इस जगत में जो कुछ सम्पति है, वह सब ब्राह्मण की ही निजी सम्पति हैं, वह सब ब्राह्मण की ही निजी सम्पत्ति है, अपने उत्तम जन्म के कारण ब्राह्मण सकल सम्पत्तियों के पाने योग्य है । ब्राह्मण यदि पराया अन्न भोजन करता है, पराया वस्त्र पहिनता है, और पगये के धन को लेकर दूसरे को देता है, तो वे सब उसके ही अन्नादि हैं, क्योकि अन्य सब लोग ब्राह्मण की दया से ही भोजनादि पाते हैं। मनु० १० १ श्लोक ६६, १००, १०१ में देखो । अब देखिये इन ब्राह्मणों की लीला एक तरफ तो लिखते हैं कि:- जन्मना जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते । वेदपाठी भवेद्विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राहाणः ॥

प्रतिफन महावीर माग, और पर पाया
पर किया कामात पडेगा और E FT मंडा पोरको
भागेगा। मरी माग में यदि ने inा मनले रकमीमा
अन्याय गायनान ।
पारे पाको पूर्व कमाने में मार डायः मांगा इमा
fonfrary होते , श्री अन्य शाहिकों में पढ़ने का दा बन्द गर दिया मा.
लेला विantीने में, प्रा होने की भी मार से मोती
पारनी को जानिय मेहरारनामा निद्र
कर लिया। श्राइन्ही मायनेको केसरी सोम में
विक्षिप्त रूप में भरे पल पल हैं। इनोशन करने की
सीधी सी बात यह है कि गाय विमामा कुबुद्धि को बढ़ाने माली
मलीन भात पाई मान ता २ सय लेना चाहिये कि काम की
अपने जिसे हार्य के लिये नया गानमा हामी ने
यहीं तक गन्गाय ना किया किन्तु ये लोग सुन भी पाप कराल, अथवा
किसी को धोखा देवें, पालिसी को मार आले, ने भी उनके ऊपर कोई गल.
नैतिक तथा धार्मिक विमान कायम नदी । पेसा सोच समझकर
उन्होंने अपने ऊपर से सारे राउनैतिर कामलों के मद मरवा दिया गया,
अर्थात् होई राज व्यवस्था हनको फित्री अराध में न दे सके। देखिये
मनु० अध्याय श्लोक १२४ में लिखा है कि:-
दश स्थानानि दण्डल मनुकत्वाचे भुवो चीन् ।
त्रिभु वणे यानि स्युरक्षतः बामणो गान् ।।
अर्थात् महापराध में मतुजी ने मून्द्रिय प्रादि जो दश स्थान दंट के
वर्णन किये हैं, वे क्षत्रिय आदि केवल तीन वर्गों के लिये ही है ! 'माहाल
इन शारीरिक दडों से मुक्त हैं। अब भला बतलाइये कि जिस जाति को
प्रतिबन्ध रहित स्वतन्त्रता, स्वच्छन्दता तथा स्वेच्छाचार पूर्वक भोगों का
।

में अधिकारी मिल जाय तो वह जाति का तलक स्वार्थ अन्याय पूर्ण दोषों से बचे सकती है, यह पाटक ही जान सकते हैं। तुलसीदास जी ने भी कहा है कि "प्रभुता पाई काहि मद नाई" अर्थात् प्रभुता पाकर किसे मद नहीं हुआ अर्थात् सभी मदोन्मत्त होजाते हैं। यही हाल ब्राह्मणों का हुआ। क्योंकि जिस जाति में श्रावश्यकता से अधिक विद्या, आवश्यकता से अधिक धन व वैभव प्राप्त होते हैं वहाँ बालस्य और प्रमाद बढ़ते हैं। आलस्य और प्रमाद फसा हुया मनुष्य अपने सत पथ से भ्रष्ट होजाता है। इस प्रकार लोगों ने वर्ण व्यवस्था में कम प्रधान न रखते हुए जन्म प्रधान रखा। फिर भी इन लोगों को यह भय बना रहा, कि कहीं हमारी करतूतों का पता लगाकर अन्य वर्गी लोग उस वर्ण व्यवस्था को पुनः कर्म व्यवथा में परिणित न कर देखें । अतः उन लोगों ने इसको और भी दृढ़ बनाने के लिये राज्य व्यवस्थापकों द्वारा कठिन प्रतिबन्ध चालू कराये, ताकि भविष्य में कोई भी मनुष्य अपने सिद्ध वर्ण व्यवस्था से तनिक भी बाहिर न निकलने पावे | इस वर्गा व्यवस्था को जन्म प्रधान मान लेने से जो हमारे देश का पतना हुआ है वह पाठकों से किसी प्रकार छुपा नहीं है । जब इसके दृश्य सामने या जाते हैं तो क्रोध और शोक से हृदय उद्विग्न हो जाता है। इस जन्म मूलक वर्ण व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति का वर्ण तथा कर्म उसके वैयक्तिक योग्यता व अयोग्यता पर नहीं बल्कि कुल विशेष वा नाति विशेष में उसके जन्म लेने पर निर्भर हो गया। और राजकीय प्रतिबन्ध द्वारा इसको और भी सुदृढ़ करवा दिया गया ताकि कोई भी मनुष्य अपने से ऊची जाति का कर्म नहीं कर सकता, देखिये मनु० अध्याय १० श्लोक ६६ पढ़िये:- यो लोमादधमो ज्यात्या जीवेदुत्कृष्ट कर्मभिः । तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ।। अर्थात्:- यदि कोई नीच जाति का व्यक्ति लोभ वश ऊ ची जाति की जीविका करे तो राजा उसका सर्वस्व छीन कर उसे शीघ्र ही देश से निकाल (Ey ) दे। अब देखिये गितना पटोर दण्ड बिचारे नीच जातियों के मनुष्यों के लिये लिखा है, क्या यह शासक वर्गका न्याय नहीं है? इसका परिणाम यह हुआ कि संसार में वेवल नाम और क्षत्रियों काही स्वार्थ सिद्ध होता रहा, और बिचारे श्रन्य वर्ग वैश्य तथा शूद्रों की उन्नति में यह बता बाधक सिद्ध हुा। किन्तु भविष्य में जाकर इस स्वार्थ पूर्ण अत्याचार ने इन दोनो ही वर्गों के प्राणियों को श्रालस्य तथा प्रमाद गें रत कर दिया। यदि वैश्य और शूद्रों की उन्नति यातून हारा बन्द न की गती तो क्या वैश्य तगा.शद्र बिचारे शूरवीर व विद्वान धन पर न निकलते। आज तक वैश्य विचारे डरपोक ही बने रहे और शूद्र विचारे अपना जीवन मूक पशुओं की तरह चला रहे हैं यह ब्राहाण तथा क्षत्रियों का अन्यायपूर्ण कानून का ही प्रतिफल इस प्रकार भविष्य में ब्राहाण और क्षत्रियों की गुटबन्दी छोती चली गई, और हिन्दू जाति दो वर्गों में विभक्त हो गई। शासक वर्ग अर्थात स्वराज्य वादी। साम्राज्य वादियों में ब्राहारण और क्षत्रिय रहलाये और स्वराज्य वादियों में वैश्य तथा शूद्र रह गये कि जो अपने स्वरार प्राप्ति विषयक अधिकारों के लिये इन दोनों की श्रोर मुह ताकते ही रह गये। फिर आगे जाकर इन दोनों साम्राज वादियों ने अपने सामान को सुरक्षित रखने के लिये श्रापस में यह मन्त्रणा करनी शुरू की। इनकी मन्त्रणा के विषय में मनु० अध्याय ६ श्लोक ३२२ में लिखा है कि:- ना ब्रा क्षत्र मृघ्नोति नाक्षत्रं नहा वर्द्धते । ब्रा क्षत्रं च सम्पृक्तमिह चामुत्र वर्द्धते ॥ अर्थात्:- ब्राह्मण विहीन क्षत्रिय कभी भी वृद्धि नहीं पा सकता, ओर ब्राह्मण भी क्षत्रिय के बिना वृद्धि नहीं पा सकता। परस्पर भावयतः श्रेयः परमुवपस्यथः । अर्थात् परस्पर के भाव से मनुष्य परम कल्याण को प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार ब्राहाणत्त्व और क्षत्रियत्त्व एकत्र मिलने पर इस लोक और परलोक में परस्पर वृद्धि पाते हैं। - ( ८५ ) इस प्रकार जब इस शासक वर्ग अर्थात् साम्राज वादियों में परसर गुह बन्दी हो गई तब इन्दोंने इसको भविष्य में स्थाई बना रखने के लिये परस्पर में दृढ़ प्रतिज्ञायें की गई। ब्राह्मणों ने क्षत्रियों से प्रतिज्ञा की, कि इम तुम्हारे पूर्वजों को मन्दिर बनवा कर पूजेगे और लोगों से ईश्वर का अवतार बतलाते हुए उनकी पूजा चालू करेंगे, किन्तु इन मन्दिरों में जो कुछ ईश्वर के नाम पर चढ़ावा व भोग पदार्थ मिलेंगे उसके लेने के अधिकारी हम होंगे। और इन मन्दिरों का ठेका सदा के लिये हमारा ही रहेगा। इस पर क्षत्रियों की प्रतिज्ञा यह हुई कि जो कोई अन्य जाति नुम्हारे स्वार्थ पूर्ण कार्यों की पूति में रोड़ा अटकावेगी उसको हम राजनैतिक प्रतिबंध द्वारा अथवा शाशन शक्ति द्वारा दूर करके तुम्हारी रक्षा करेंगे। इस प्रकार साम्राजबादी आपस में दृढ़ प्रतिज्ञ करते हुए अन्य शासित वर्ग वैश्य तथा शुद्रों पर अनधिकार चेष्टा करते रहे। और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये अनेकों प्रकार के टेक्स लगाये। पाठक शाल श्राप देख सकते हैं कि ब्राह्मणों के जनता जगत पर इतने टेक्स लगाये दीख पड़ते हैं, कि मनुष्य जन्म से मरण पय॑न्त देता २ समांत हो जाय तब भी उनके टेक्स चालू ही रहते हैं । अर्थात् जीत ली तो विचार मनुष्य स्वयं ही उनके टैक्सेज चुकाता है, और मरने के पश्चात् उसके कुटुम्बी स्वर्ग तथा नरक के बहाने चुकाया ही करते हैं। इन माम्राजवादियों के अनेकों प्रकार के टैक्सेज जनता जगत पर लादे गये हैं। प्यारे पाटको । साम्राजवादी लोग इतने टेक्सेज लगा कर ही चुप नहीं रह गये, अर्थात् इतने से ही इनका पेट न भरा, किन्तु बलात्कार से मी उनका धन लूटने के लिये प्रार्टिनेन्स कायम किये। अब जरा श्राप इनके पार्टिनेन्सेज पर ध्यान दीजिय:-~-मनु० १० ११ श्लोक १२ में लिखा है कि- यो वैश्यः स्याद् बहु पशु न ऋतु रसोमपः कदम्बात्तस्य तद्रव्यमाहरेगन सिद्धये ॥

* (८६) अर्थात्:-जिस वैश्य के पास बहुत से पशु हो और वह यज्ञ से हीन तथा सोम रस का न पान करने वाला हो उसका धन (क्षत्रिय और विशेष कर ब्राह्मण के) यज्ञ को पूरा करने के लिये छीन लेवे। पासमें प्रचुर धन रखते हुए भी जो वैश्य अपनी कंजूसी के कारण यज्ञादि शुभ कर्म न करे तो उसका धन जबर्दस्ती से छीन कर किसी ब्राह्मण वा क्षत्रिय के यज्ञ में खर्च कर देवे । अब देखा आपने कठिन श्रार्डिनेन्स। राजा होय चोरी करे न्याय कौन पर लाय." इस कहावत के अनुसार श्राप ही तो शासक बन कर आर्डिनेन्स निकाले, और आप ही उसके द्वारा माल उड़ावें। अब देखिये:- इस यश से अधिक लाभ किसको पहुँचता है तो कहने पड़ेगा कि इन्हीं पन्डे पुजारियों को । क्योंकि इस यज्ञ के बहाने पूड़ी, कचौड़ी, मालपूवे तथा तस्मै आदि हविष्य पदार्थ खाने को मिलते हैं, नाना प्रकार के शाल दुशाले तथा कीमती कीमती वस्त्र अनायास प्राप्त हो जाते हैं। सुन्दर २ दुधारू गायें दूध पीने को मिल जाती है, और दान दक्षिणा के बहाने मोटी २ रखमैं अर्थात् सोना चांदी प्राप्त हो जाते हैं, कहने का अर्थ यह है कि ये पड़े और पुजारी यज्ञ के नाम पर, धर्म तथा ईश्वर के नाम पर और संस्कृति के नाम पर अन्धविश्वासिनी हिन्दू जनता को स्वर्ग नरक का बहाना बना जनता की गाढ़ी कमाई पर खूब मौज उडा रहे हैं। और विचारे भोले जीवों के रक्त को जौंक बन कर खून चूस रहे हैं । धनवान वैश्य यदि स्वयं यज्ञादि किया करता है तो उसका धन ब्राह्मणों के हक में लगता रहता है, इसलिये इनको इस वैश्य के लूटने को आवश्यक्ता, नहीं है, किन्तु लूटा कौन वैश्य जाता है ? कि जो इन पंडे पुजारियों को दान, मानादि के द्वारा खुश नहीं अब पाठक विचार सकते हैं कि इनमें और डाकू में क्या अन्तर है ? डाकू को तो विचारे को पकड़े जाने का भय, मृत्यु का भय तथा और भी कई प्रकार के भय सदा बने ही रहते हैं। किन्तु इनके डाका देने के समय किस माई के लाल की हिम्मत थी कि जो इनको रोक सके । लोग निडर और निर्भीक बन कर जनता जगत को धोखा देकर लूटते ही रहते हैं। रखता। अतः ये ( ; و مع अब इन्होंने सोचा कि वैश्य को तो यज्ञ का बहाना बता कर लूटने का अाडिनेन्ड बना लिया, किन्तु विचारे शुद्र को किस बहाने लूटें, क्योंकि शुद्र को तो यज्ञ करने का भी अधिकार नहीं है। अतः इन्होंने वैश्यों की अपेक्षा उनके साथ और भी कटिन बर्ताव किये गये, और यहां तक अत्याचार कर डाला कि उनक्षा धनोपार्जन ही निषिद्ध करार दे दिया गया, और ब्राह्मणों को याना दी गई कि वे शूद्रों का धन जब चाहे तब ही लूट लिया करें। देखिये याज्ञा पत्र मनु० अ० १० श्लोक १२६ तथा अ०८ श्लोक ४१७ ॥ - शक्त नापि हि शूटेशन कार्यों धन संचयः । शुद्री हि धनमासाद्य ब्राह्मणनेक बाधते ॥ वितब्धं नाझरणः शूद्राद द्रव्योपादान माचरेत् । नहिं तस्यास्ति किंचित्स्वं भन्नु हार्य धनोहि सः ॥ अर्थात्:--समर्थ हो कर भी शद्र धन का संचय न करे, क्योंकि धन पाकर यूट्ट ब्राह्मण को पीडा पहुंचाता है। ग्रामगा को उचित है कि वह शुद्र का धन बिना किसी भय बा संकोच के ले लेवे। क्योंकि शूद्र का अपना कुछ नहीं है। उसका वन मालिक द्वारा हरण करने से रोका, फिर उसके धन को भी हड़प कर लिया अब मला बताइये कि ऐशा निर्दयता का व्यवहार कसाई पशु के साथ भी नहीं कर सकता, सो निर्दयता का व्यवहार मानव समान में ब्रह्म कहलाने वाले वाहनों का है। इनमें और कसाई में चचा भेद रहा? ET भी है कि "दया बिन सन्त कमाई प्याने पाटको विचारे शह को तो लोगों ने प्रेमा दवाया कि इसको तो अाज तक सम्भलने ही नहीं दिया। क्योंकि ये लोग जानते थे कि शूद्र के पास में यदि धन तथा विद्या हो जायगी तो ब्राह्मणों की गुलामी कौन करेगा ? इन लोगों ने शूद्रों फो दामता की चकी में सदा पीमते रहने के लिये ही एमे २ अमानुयिक कानून बनाये, और वैश्य तथा शूद्रों को अपने २ कर्म में सदा नुटाये रखने के लिये मी कानून बनाये गये। देखो मनु० अ०८ श्लोक ४१८ तथा अ० १० श्लोक १६ ८८ ) वैश्य शूद्रो प्रयत्नेनस्वानि कर्माणि कारयेत् । तौ हि च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयतामिदं जगत् ॥ अर्थात्:-राना को चाहिये कि वैश्यों और शूद्रों को अस्ने २ कर्मों में यत्नपूर्वक लगाये रहे, क्योंकि यदि वे अपने २ कमी से भ्रष्ट होंगे अर्थात् उन्हें छोड़ देंगे तो ये जगत को व्याकुल कर देंगे। फिर आगे देखो इसके लिये कर्म छोड़ने पर कैसे कठिन दण्ड की व्यवस्था की है। यो लोभादधमो जावा जीवेदुत्कृष्ट कर्मभिः । तं. राना निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ अर्थात्:-~-यदि कोई नीच जाति का व्यक्ति लोभ में पढ़ कर ऊंची जाति की श्रानीत्रिका करे तो राजा उसका सर्वस्व छीन कर उसे शीघ्र ही देश से निकाल दे। अब देखिये:-ये तो करतूत हैं हन साम्राजवादी ब्राह्मण तथा क्षत्रियों की। हमारा देश क्यों उत्तरोत्तर हीन अवस्था को प्रास होता चला गया ? तो कहना पड़ेगा कि शासक वर्ग के कठिन अमानुषिक अत्याचारों से । इस प्रकार शास्त्रकारों ने ऐसे २ कानून बना कर वैश्य और शूद्रों के लिये उन्नति का द्वार सदा के लिये बन्द कर दिया । क्या भारत में हिन्दू धर्म के अतिरिक्त और भी कोई दूसरा धर्म है कि जो अपने भाइयों को लूटने की अनुमति देता हो अथवा अपने भाइयों को उन्नति करने में किसी के आगे रोड़ा अटकाता हो। ईस्लाम, इसाई, बौद्ध तथा जैन श्रादि कितने ही धर्म हैं किन्तु इनके धर्म शास्त्रों में कभी भी अपने सहधर्मियों को लूटने की तथा नीचे गिराने की किसी को भी श्राज्ञा नहीं दी। इनके यहां पर धार्मिक दृष्टि से सभी धर्म बराबर हैं, इनमें न कोई बड़ा है और न कोई छोटा है। सभी को उन्नति करने का समानाधिकार है। उनके अधिकारो को किसी भी धार्मिक आदेश के बहाने कोई छीन नहीं सकता। यही कारण है कि उनमें परस्पर इतना प्रेम, सहानुभूति तथा सुदृढ़ संगठन है।

(६ ) प्यारे पाठको, मंसार में कोई भी एसा देश तथा धर्मशास्त्र नहीं है कि वो अपने सधर्मियों को धर्म और ईश्वर के नाम पर धोखा देकर लूटते देत्र नाते हो। किन्तु हमारा ही देश ऐसा है, विनिमने धर्म श्रीर ईश्वर के नाम पर लुटेरापन कायम किया, तथा लोगों को वाग्वा देकर पेट पालने की अनेको स्कीम तैयार की ये सब बाने हमारे देश में मूवी ने नहीं की, किन्नु विद्वता का दावा रखने वाले अथवा धर्म के ठेकेदार बनने वाले पंडे पुजारियों द्वारा की गई, कि जो श्रान तक उमी कुकृत्य को करते हुए अपना पेट पाल रहे है, और ऐले निलम हो गये हैं कि इन्दनि अपनी स्वार्थ सिद्धि के निमित्त किसी दूसरे के हित पर ध्यान ही न दिया। देश चाहे रसातल को प्राप्त हो जावे, गरीब प्राणियों को चाहे कितने ही कर बरलें, किन्तु इनके यानन्द में कोई कमी न होने पाव ! बस वही इनका मूल सिद्धान्त है, और यही इनके बीज मंत्र है। अब इन्होंने वैश्य तथा शुद्रों को लूटने के लिये बड़े र ग्राढिनन्त कायम कर लिये, और जब देखा कि इन पर अब हमारा यूग माल अाना अधिकार चल चुका है, किन्तु फिर भी हनको इतने पर मंतोष न हुना, क्योंकि इन्होंने सोचा कि भविष्य में कदाचित जमाना बदल जावे, और विद्या की लाइट द्वारा कोई इनको हमारी नकालियत का भाव कगवे, तो हमारे ग्रानन्द में कमी हो जावेगी। प्यारे पाठको। कहावत प्रसिद्ध है कि 'चोर की दादी में तिनका इससे इनको सदा भव और शक्षा ही बनी नहीं। और इन सब की निवृत्ति निमित्त धर्म शान्त्र के रूप में कानून बनाते रहे, और नव धर्म शास्त्र के कानूनों से भी काम न चलता देखा, तब गजात्रों द्वारा पार्डिनेन्न चालू कराने लगे। हम पहिले पाटकों को लिख कर बता चुके हैं कि इन्होंने अपने ऊपर से तो सारे कानुनी विभाग उठा लिये थे। अब ये कानूनी विभाग लागू होने थे तो विचारे वैश्य और शूद्रों पर । ननिय लोग क्योंकि शासक वर्ग के लोग ये और नालागा तथा क्षत्रियों में पत्थर गुटबन्दी थी। अतः इनको अपने २ मागी में पूर्ण स्वतन्त्रता थी।

(६०) १७ पैशाचिक प्राण दंड को व्यवस्था -- न वैश्य और शूद्रों को लूटने का आर्डिनेन्स पास हो ही चुका था । और इनके रक्त को चूस २ कर ब्राह्मण लोग अपने पेट को पाल ही रहे थे, किन्तु इतने से इनकी तृप्ति न हुई। कहावत प्रसिद्ध है कि "मारे और रोने न दें। ये लोग बिचारों पर इतना अत्याचार करें और वे विचारे उफ ! कहकर इनकी ओर अगुली भी न दिखा सके, और यदि कोई रोवे चिल्लावे. अथवा इनका सामना करें तो और भी कठिन दंड की व्यवस्था में पाजावें । वे कठिन दंड क्या थे ? पाठक इनको निदर्शन करे ? तो आपको ज्ञात होगा कि कसाइयों में और इनमें कोई अन्तर नहीं है। जरा सुनिये:- शतं ब्राह्मण माक्रुश्य क्षत्रियो दण्ड मर्हति । वैश्योप्यर्द्ध शतं देवा शूद्रस्तु वधमर्हति ।। अर्थः- यदि क्षत्रिय किसी ब्राहाण को दुर्वचन कहे तो उस पर एक सौ पण दण्ड लगावे, इसी अपराध पर वैश्य से १५० या २०० पण का दंड लेवे, किन्तु · शूद्रःतो इस 'अपराध के लिये वध्य ही हैं अर्थात् जान से मार देना चाहिये । 'एक पण कितने का होता है सो सुनिये:-- "अशीति भिर्वराटकै पण इत्यभिधीयते'' अर्थात् ८० कौड़ियों का एक पण होता हैं, हमारे यहाँ अभी एक पैसे में १६ गन्ड़े अर्थात् ६४ कौडियां आती थी, जिसके हिसाब से पण सवा पैसे के लगभग होता है। अब देखिये ! इस हिसाब से जिस अपराध के लिये क्षत्रिय को केवल १०० पण अर्थात् १२५ पैसे- १) और वैश्य को अधिक से अधिक इसका दुगुना अर्थात् ३॥-)॥ जुर्माना होता था, और शूद्र बिचारे को उसी अपराध के लिये अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता था। यह कितना बड़ा अपराध तथा भयङ्कर अत्याचार था। फिर आगे देखिये:- मनु० अध्याय ८ में। एक जाति जिातोस्तु वांचा दारुण्या क्षिपन् । जिह्वायाः प्राप्नुयाच्छेदं जघन्य प्रभवो हिसः ॥

(
६१)
अर्थः-~-यदि शूद्र जाति ब्राह्मणादि तीन वणों को कटोर वचन कहे या
आक्षेप करे तो उस शूद्र की जीभ काट लेनी चाहिये, क्योंकि वह सबकी
अपेक्षा नीच वर्ण में उत्पन्न हुआ है । पुनः देखियेः
धर्मापदेशं दर्पण विप्रमाणामस्य कुर्वतः।
तप्तमासे च येतैलं वक्त श्रोते च पार्थिवः ॥
येन केन चिद न हिस्याचे च्छृष्ट मन्त्यवः ।
छेत्तव्यं तत्तदेवास्य तन्मनोरनुशासनम् ।।
पाणि मुद्यग्य दण्ड वा पाणिच्छेदन मर्हति ।
पादेन प्रहरन् कोपात् पादेच्छेदेन महति ॥
सहासन मभिप्रेग्सु रत्कृष्ट स्यापकृष्टजः ।
कटया कृताङ्कः निर्चास्य स्फिचं वास्यान कत्तयेत् ॥
अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वाबोष्टौ छेदयेन्नृपः ।
अवमूत्रयतो मेद मवशर्धयतो गुदम् ॥
केशेपुगृह तो हस्ती छेदयेद विचारयन् ।
पादयोढ़िकायां च ग्रीवांया वृपर्णपुच ।।
मार्जार नकुलो हत्वा चापं मंडूक मेव च ।
श्रगोधोलूक काकांश्च शुद्र हत्यानतं चरेत् ॥
अर्थः- शुद्रं यदि किसी द्विज का नाम तथा जाति का उच्चारण
करता हुश्रा, जैसे देवदत्त ब्राह्मण अधम है, इस प्रकार वोलता हुआ निन्दा
करे, तो उसके मुंह में दश अंगुल की याग में लाल की हुई लोह की कील
घुसेड़ देवे ॥ १॥ यदि शूद्र गर्व से, "तुमको यह धर्म करना चाहिये ऐसा
धर्मोपदेश ब्राह्मण को करे, तो उस शूद्र के मुंह और कान में राजा तत तेल
डलवादे ॥२॥ शूद्र हाथ पैर आदि जिस अंगसे श्रेष्ट जाति के ऊपर प्रहार
करे तो राजा उसको वही अंग कटवादे, यह मनुकी याज्ञा है ॥ ३ ॥ शूद्र

(६२ ) यदि श्रेष्ट जाति को मारने के लिये हाथ वा डंडा उठावे तो उसका हाथ कटवा लेना चाहिये, और यदि क्रोध में श्राकर चरण से प्रहार करे तो उसका पैर कटवा लेना चाहिये । ॥ ४ ॥ शूद्र यदि ब्राह्मण के साथ एक अासन पर बैठे तो राजा उसकी कमर में तपाई हुई लोह की शलाका से दाग कर उसे देश से निकाल देवे, अथवा उसका चूतड़ घटवा देवे ॥ ५ ॥ शूद्र यदि दर्प से किसी ब्राह्मण के शरीर पर थूक दे तो रानी उसके दोनों होट कटवादे, यदि पैशाव करे तो मूत्रेन्द्रिय को और अधोवायु छोड़े तो गुदा को कटवाले ॥६॥ शूद्र यदि अहवार से किसी ब्राहाण का केश, चरण, डाढ़ी, गरदन वा अण्डकोष पकड़े तो राना विना विचारे उसका हाथ कटवाले ॥ ७॥ बिल्ली, नेवला, नीलकंठ, मेढ़क, कुत्ता, छिपकली. उल्लू और काग पर प्रायश्चित करे । अभिप्राय यह है कि मनुके मत में शूद्र की जान कुत्ता बिल्ली की जान से बढ़ कर नहीं है । 11८॥ मारा को इत्या करने । प्यारे पाठको। यह हमारे भारत का धर्म कानून (Religious Law) है। ऐसी राक्षसी दण्ड व्यवस्था क्या किसी अन्य धर्माऽवलम्बियों में किसी भी जगह पासकते हैं । जिस देश में मनुष्य को शुद्र बना कर उसको कानूनी हथकंडों में जकड़ उसके सारे मनुष्योचित अधिकारों को अपनी मुट्टी में ले लेवें, तथा उसकी हालत को पशु से भी बदतर बना देवे। तो वह देश अपनी मान मर्यादा स्थिर रखकर कब तक जीवित रह सकता है। यह बुद्धिमान ही समझ सकते हैं। प्यारे सपनो। न तो यह धर्म है और न राजनीति यह तो केवल ब्राह्मणों का रचा हुका पाखन्ड रूपी दुर्ग है कि जिसको फांद कर कोई भी मनुष्य इनकी प्रामानुपिक पोप लीला से बाहिर न जा सके। और इनके संसारिक सुख रुपया पैसा, हलवा, पुड़ी तथा मलाई श्रादिक किसी भी पदार्थ में कमी न पावें । अब इनसे पूछना चाहिये कि जब वशिष्ट, विश्वामित्र तथा पाराशर अन्त्यज योनियों से पैदा होकर भी शुद्ध ब्राह्मण तथा ऋषि कहला गये, तो फिर विचारे भोले मनुष्यों ने ही तुम्हारा क्या अपराध किया, कि जो इनको आजीवन पुस्त दर पुस्त शूद्र ही बनाये रखने के लिये ६३ ? इतने कठिन २ श्रार्डिनेन्स जारी करवाते हुए कठिन यान्त्रणाओं के बीच में कस दिया। अर्थात् इनकी शारीरिक, मासिक तथा यात्मिक उन्नति में रोड़ा अटकाने के लिये कुटार रूप क्यों चनें ? क्या यह तुम्हारा मनुष्यपन है कि श्राज भारत में १६ करोड़ मनुष्य के लगभग शूद्र कहला कर तुम्हारी जान को रो रहे हैं। और करीब १० करोद या १२ करोड़ के लगभग तुमसे जान छुड़ाने के निमित्त विधर्मी बन कर ईसाई तथा मुसलमान कइला रहे हैं । और फिर भी तुम उसी जाल को फैलाये हुए विचारे भोले लोगों का रक्त चूस २ कर धर्म और ईश्वर की ठेकेदारी में हलवा, पूड़ी, तथा मलाई उड़ाते हुए संसारिक भोग भागने में दृढ़ संलग्न हो रहे हो। भाइयो ! तुमको ये मौजें तो और दूसरे संसार में करने योग्य बहुत से कार्य हैं, उनको विधिवत संपादन करने से भी मिल सकती हैं। देखो ! एक व्यापारी है, वह अपने पुरुषार्थ द्वारा नाना प्रकार के व्यापारों को चलाता हुश्रा लाखों करोड़ों रुपया कमा कर डाल देता है, सैकड़ों महल महलायत बना लेता है. और उनमें संसार भर की भोग सम्बन्धी सामग्रियां एकत्रित करके सर्व प्रकार के भोगों को अानन्द से भोगता है। इसी प्रकार यदि तुम्हारी भी संसारिक पदार्थों के संग्रह करने की अथवा भोग भोगने की इच्छा हो तो तुम भी उसी के समान किसी भी सीधे सच्चे कार्य की साधना में लग जावो, और बढ़ी खुशी से भोग भोगो, महल बनायो, रुपया पैसा इकट्ठा करो। तुमको कोई भी व्यक्ति दोप न देगा। दोप तो तुमको जब ही दिया जाता है कि जब तुम ईश्वर और धर्म के नाम पर लोगों को हर तरह से धोखा देकर उनके द्वारा बड़े २ निवास बनाते हो, उनमें बड़े र वैषयिक पदार्थों को एकत्रित करके संसारिक भोग भोगते हो, दर्जनों बच्चा पैदा कर देने पर भी लोगों को जितेन्द्रियता का ढोग दिखाते हो। बस यही कारण है कि अाज संसार तुमको घणा की दृष्टि से देख रहा है।

. 1 १६. हमको ब्राह्मण शब्द प्रिय क्यों हैं ? पूर्व जमाने की तो भगवान जानें, किन्तु अाजकल ब्राह्मण शब्द जो हमको प्रिय हो रहा है, उसका कारण यह है कि इस ब्राह्मण शब्द के नाम पर हमको आवश्यकता से कहीं अधिक भोग सामग्रियां, मान प्रतिष्ठा तथा द्रव्यादि का सुपाश मिल रहा है, इसलिये ये शब्द हमको बहुत प्रिय हो रहा है। अन्य जातियां भी जो ब्राह्मण बनना चाहती हैं; उसका भी मुख्य कारण यही है कि सब लोगों को बिना हाथ पैर हिलाये मान प्रतिष्टा तथा द्रव्य की अनुकूलता मिल जावे, इससे बढ़ कर दूसरा साधन क्या हो सकता है। इस प्रकार यह ब्राह्मण शब्द लोक में प्रिय बना है। किन्तु इसका संपादन बुरी तरह से किया जा रहा है, इसलिये लोक में इसकी निन्दा भी हो रही है। यदि आज ब्राह्मण शब्द के नाम से दिखावटी संसारिक भोग तथा द्रव्यादि की बहुतायत को दूर कर दो जावे, और फिर पूछा जावे कि कौन २ ब्राह्मण बनना चाहता है, तो मेरी समझ में कोई भी वाहाण बनना स्वीकार न करेंगे। और दूसरा तो क्या जो ब्राह्मण बने हुए हैं, उनसे भी यदि संसारिक भोग तथा द्रव्यादिकों की बहुतायत को दूर कर दो, तो ये लोग भी अपने ब्राह्मण शब्द से त्याग पत्र दे देंगे। इससे विदित होता है कि ये दोनों प्रकार के ब्राह्मण हैं कि जो केवल ब्राहाण के नाम पर मौज उड़ाना चाहते हैं । अब प्रश्न यह उठता है कि जब इन दोनों की नाम धारी संज्ञा हो गई, तो फिर शुद्ध ब्राह्मण किसको कहते हैं ? तो इसका उत्तर यह है कि जो संसारिक भोग सम्बन्धी पदार्थों से दूर है, अर्थात् पदार्थों के सग्रह से दूर है और आवश्यकता से अधिक प्राप्त होने वाले द्रव्य का त्यागी है, तपस्वी और विद्वान है तथा ईश्वर और धर्म का उपयोग अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये नहीं किन्तु जनता जगत की भलाई के लिये है। ऐसा जितेन्द्रिय, त्यागी तथा जनता के हितार्थ काम करने वाला है वह कोई भी वर्ग का मनुष्य होवे, सभी ब्राह्मण कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं। और ब्राह्मण नाम धराने वालों में यदि ये गुण न हों तो जनता को सदा बहिष्कृत .

(६७ ) करने योग्य है। क्योंकि नामधारी ब्राह्मण केवल जनता जगत को धोखा देने के लिये ही पैदा हुआ है। यदि इस दृष्टि से ब्राह्मणों की घटती की जावे तो ब्राह्मण वर्ग का बहुत शीघ्र ही निश्चित हो सकता है। श्रापको इसका स्पष्टीकरण कर देता हूँ, मुनिये:- अब मैं मन्दिर और देवालय के पुजारियों को ब्राह्मण शब्द क्यों प्रिय है, और देवता से इनका क्या सम्बन्ध है ? इसका उत्तर यह है कि इस ब्राह्मण की छाप लगी रहने से इनके हाथ में मन्दिर और देवालय श्रा जाते हैं । देवता तथा ईश्वर के नाम पर इनको अावश्यकता से अधिक द्रव्य तथा हरिक भोग प्रात होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि मन्दिरों के पुजारियों, 'देवताओं के प्रति पेट पालने का ही सम्बन्ध है। अब इनकी परीक्षा कैसे हो? तो सुनिये:-यदि मन्दिरों में से दिखावटी भोग सामग्रियां, तथा द्रव्य की बहुतायत और जागीरी रूप में प्रदान की हुई गांव तथा जमीनें पुजारियों के हाथ से छुडाली जावें और पुजारी का साधारण भोजन वन्त्र का प्रबन्ध कर दिया जावे तो मेरी समझ में सब की गुजारी बनने की इच्छा निवृत्त हो जावेगी। श्रान ठाकुरजी के नाम पर जो नाना प्रकार के व्यञ्जन बना कर भोग लगाये जाते हैं तथा दूध रबड़ी चढ़ाई जाती हैं। इसके विषय में पुजारी खूब जानता है कि यह पदार्थ टाकुरजी के नाम पर मेरे खाने के काम में यावेगा, इसलिये बड़े प्रेम से बना कर ठाकुरजी को भोग लगाता है। यदि इनके भोग लगाये हुए पदार्थों को ठाकुरजी स्वयं खाने लग जाय तो मेरी समझ में इस समय के पुजारी शायद ही कोई हो कि जो भगवान को भोग लगावे, नहीं तो सत्र के सत्र बन्द हो जायेंगे। इससे विदित होता है, कि ब्राहाण को ठाकुरजी के नाम पर नाना माल तथा द्रव्यादि मिलता रहता है इसलिये वह ठाकुरजी से प्रेम करता है और दुनिया में उनका गीत गाता हुया अपना स्वार्थ सिद्ध करता है। इसके अतिरिक्त ठाकुरजी से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है।

(१००) २०. ब्राह्मणों के दोनों हाथ लड्डू . में गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, कि:- "चातुर्वर्ण मया स्रष्टम् गुण म विभागशः। अर्थात्:-चार वर्णों को मैंने सृजा अर्थात् बनाया, उनके गुण और कर्मों के अनुसार । भगवान श्री कृष्ण ने यहां कर्मगत व्यवस्था कायम की है, यदि ब्राह्मण लोग इसी व्यवस्था के अनुसारं चलते, तब तो संसार में केवल इन्हीं की ठेकेदारी न होती, बिचारे और बनियों में से भी ब्राह्मण बनने का किसी न किसी समय नम्बर अवश्य ही श्रा जाता, किन्तु इन ब्राह्मणों को कब यह स्वीकार हो सकता था कि संसार के दूसरे जीव भी इनके समान सुखी . होकर मनुष्योचित अधिकारों को प्राप्त करें इन्हें तो केवल अपने ही दोनों हाथों लड्डू रखना था। अतः इन्होंने उस कर्म गत वर्ण व्यवस्था को अपने निजी स्वार्थ के लिये जन्म गत वर्ण व्यवस्था में परिणित कर वेद भगवान तथा श्री कृष्ण दोनों के कथन पर मिट्टी डालदी। इसका परिणाम यह हुश्रा कि जो कुछ मान मर्यादा तथा विद्यादि का सम्बन्ध था, वह सब केवल ब्राह्मणों तक ही सीमित रह गया। अब पाठकों को यह बतलाया जाता है कि इस जन्म गत वर्ण व्यवस्था से ब्राह्मणों को कितना नाजायज फायदा हुआ सो सुनिये:- आज एक ब्राह्मण है, जो बहुत ही चरित्र भ्रष्ट है। मांस मदिरा तथा अनेकों दुर्व्यसनों में संलग्न है । पढ़ाई लिखाई के हिसाब से काला अक्षर भैंस के बराबर है। इतना सब कुछ होते हुए भी इस जन्म सिद्ध वर्ण व्यवस्था की कृपा से आज भी ब्राह्मण पद से सुशोभित हो रहा है। यदि कर्म गत व्यवस्था रहती तो यह ब्राह्मण देवता न जाने अपने नीच कमों से किस अधम योनि में ढकेल दिये जाते। इस प्रकार ब्राह्मण के दोनों हाथ लड्डू हैं। निन्दनीय कर्म करे तो भी ब्राह्मण और अच्छे कर्म करे तो भी ब्राह्मण । .

। १०१ ) इसी प्रकार एक और ब्राह्मए है, वह सेटनी की रोटी बनाता है, पानी पिलाता है, उसके बाल बच्चों को भी खिलाता है, अर्थात् सेवा का पूरा कार्य करता है। क्या ऐसा कार्य करने वाला ब्राहाग रह जाता, न मालूम कर ही उसको शुद्रों की योनि में डाल दिया जाता, किन्तु इस जन्म गत वर्ण व्यवस्था ने उसको बाज तक शुद्ध, ब्राह्मण ही बना रखा है। इस प्रकार वालाण के दोनों हाथ लड्डू है। एक तीसरे प्रकार का एक और बादाय है, वह नौकरी भी करता है, सूद (व्याज) पर माया भी चलाता है। लेन देन के कार्य में भी बढ़ संलग्न है और इतना सब कुछ करते हुए भी जन्मगत वर्ण व्यवस्था ने उसको बाहारण ही बना रखा है, नहीं तो उसको फौरन वैश्य बना दिया जाता। इस प्रकार वाहाणा के दोनों हाथ में ला है । अब चौथे नम्बर पर श्राप एक शब्द को ले लीजीये, यह बढ़ा विद्वान जितेन्द्रिय, तपस्वी तथा संतोपी है किन्तु इस जन्म गत वर्ण व्यवस्था ने बिचारे गरीब को श्राज शूद्र ही बना रखा है, यदि वर्म गत वर्गा व्यवस्था होती तो न जाने कब का ऋषि कहला कर वशिष्ट तथा विश्वामित्र बन जाता, किन्तु इन ब्राह्मणों द्वारा काटिन तथा पैशाचिक प्रतिबन्धों ने उस विचारे गोले मनुष्य को ब्राह्मण बनने से रोक रखा। इससे विदित होता है कि ग्राम तक ब्राह्मण के दोनो हाथ लठ्ठ हैं। इस जन्म गत वर्ग व्यवस्था का ही यह प्रताप है कि श्राज नीच से नीच कर्म करने वाला, अर्थात् रोटी बनाने वाला, पानी भरने वाला, तथा दुनिया को धोखा देने वाला धूर्त मनुष्य भी अपने अापको बाहागा कहलाने का अभिमान रखता है। और श्रेष्ट से श्रेष्ट कर्म करने वाला, अद्वितीय विद्वान सर्व गुण सम्पन्न परोपकारी मनुष्य आज तक इन ब्राह्मणों के सामने शुद्र ही बना हुया है। यह क्या है ? माह्मणों की कृतघ्नता, नीचता तथा धूर्तता का ही कारण है, कि तनिक मीठे स्वाद में पड़कर जनता जगत का कितना महान अपकार किया है। यद्यपि अाल यह (१०२ ) दुष्ट कुठाराघातिनि वर्ण व्यवस्था बौद्धिक विकास के कारण अपमानित होकर रसातल को प्रास होती हटि अाती है, किन्तु ये पंदे पुजारी कि जिन्होंने इसके नाम पर खूब धोखा दे २ कर माल उढ़ाया है, वे अभी तक इसका हृदय से स्वागत कर रहे हैं, और बिचारी भोली दुनियां को कई प्रकार की ऊंची नीची बातें बना कर बहकाने में दृढ़ संलग्न है। किन्तु जनता जगत को इनके द्वारा किये हुए कुकृत्यों का तथा अमानुपिक अत्याचारों या गली गांति पता लग गया है, और वह जानती है, कि अब इनके वचनों में कुछ सार नहीं है। इस समय इनका यह रोना, चिल्लाना तथा सनातन धर्म को दुहाई देना केवल अपने पेट की पूर्ति निमित्त है, जनता जगत की भलाई का इनके वचनों में कुछ सार नहीं है। अतः इनकी ये सब क्रियायें निपल है। २१ समाज सुधार से ब्राह्मणों को भय जो जाति दूसरों को नाश करके अथवा धोखा देकर माल उन्नाती है, वह सदा सशक्षित तथा भयभीत बनी ही रहती है। जैसे राजा को अपने राजपाट तथा सुख भोगों की सदा चिन्ता बनी रहती है, कि दूसरा कोई अन्य मुझसे प्रबल राजा मेरे राजपाट तथा मेरी सुख चैन की सामग्री को छीन न ले। वह अपने समक्ष में किसी अन्य राजा की वृद्धि को देख नहीं सकता और जहां तक उसकी सामर्थ्य होती है, वहां तक वह अपने सामने किसी विशेष शक्ति को पनपने भी नहीं देता है, उसको किसी न किसी तरह राज- नैतिक कूट नीतियों द्वारा निर्बल बनाये रखने में ही अपना हित समझता है । बस यही हाल ब्राह्मणों का रहा है, कि जो मनुष्य इन से ज्ञान ध्यान, विद्या बुद्धि में महान हुया, कि बस ये लोग घबरा जाते हैं कि हमारी इस मौज को यह अन्य व्यक्ति किसी तरह हम से छीन न ले। बस इस भय से भयभीति हो ये लोग सदा ऐसे व्यक्तियों को दबाते ही रहे हैं। जैसे किसी जमाने में अगरेज लोग अपने बैठने के फर्स्ट क्लास गाड़ी के डब्बे में किसी अन्य व्यक्ति को बैठने न देते थे। इसी प्रकार ये लोग भी ईश्वर और धर्म रूपी १०३ रेलगाड़ी के समक्ष में ब्राह्मण रूपी फर्स्ट क्लास के डब्बे में किसी अन्य को प्रवेश नहीं होने देते । मानों ईश्वर और धर्म रूपी रेल गाड़ी के यही ठेकेदार हों। जब कोई व्यक्ति अपनी योग्यता धारण करके इनके सामने श्राता है, तो ये लोग अपनी मिथ्या ठेकेदारी के बल पर उसको समाप्त कर देते हैं । कहने का अभिप्राय यह है कि इन ब्राह्मणों की कूटनीति में सदा यही समाया हुया है कि जिस तरह भी हो दुनियां को ऐसा मार्ग बताते रहे कि जिससे कोई भी व्यक्ति अपना किसी भी प्रकार का सुधार न कर सके, और हमारे सुख चैन की बंसी जैसी सदा से बनती लाई है उसी प्रकार बजती रहे । और हमारे सामने कोई भी मनुष्य प्रास्त्र उठा कर न देख के। प्यारे पाठको संसार में जब २ देश सुधारक, अाविष्कारक तथा समाज सुधारक महान पुरुषों का जन्म होता है और वे अपने मासिक विचारों को लोगो के कल्याणार्थ जनता जगत में प्रसारित करते हैं। तत्र २ ये नाम धारी ब्राह्मण लोग घबराने लगते हैं, और, महापुरुषों के कार्य को शिथिल करने की चेष्टा करते हैं। दुनिया को बहकाने के लिये इन के पास में दो शस्त्र होने हैं, इन दोनों शस्त्रों का प्रयोग नब अावश्यकता होती है, अर्थात् इनके स्वार्थ में किसी प्रकार की हानि हुई देखते हैं, तब ही कर डालते हैं । वे दो शस्त्र कौन से हैं सो मुनिये:-- R - पहला शस्त्र है "सनातन धर्म नाश हो गया" और दूसरा शस्त्र है "गौ माता नाश हो गई"। ये दोनों बातों को कह २ कर जनता को बहकाते हैं। प्यारे पाठको! यह सनातन धर्म तथा गौ माता का तो एक इन्होंने बहाना ले रखा है। वास्तविक में तो न इनको गौ माता से सरोकार है और न इनको सनातन धर्म से ही सम्बन्ध है, इनको तो केवल इन दोनों के सहारे संसारिक विषय भोगों को सुख चैन से भोगना है। समाज सुधार से इनके विषय भोगों में अर्थात् स्वार्थ में कमी होती है। इसलिये इसका नाम सुनते ही वारा जाते हैं | अब में इनकी कुछ करतूतों का परिचय कराता हूं ( १०४ ) कि जिससे पाठकों को पता लग जायगा कि जब २ सोशियल रिफार्मर (समाज सुधारक संसार में आये, तब २ इन लोगों ने उनके सामने कैसी २ कठिन समस्यायें करदी, और जब इनका विद्या बुद्धि द्वारा उन पर कोई वश न चला तब अपनी नीचता द्वारा उनके शरीरों को नाश कर दिया | सुनिये इनकी पैशाचिक घटनाओं पर ध्यान दीजिये:- , , पूर्व जमाने में जबकि शासक वर्ग इनकी मुट्ठी में थे, तब तो किस माई के लाल की ताकत थी कि इनकी कुचाले तथा भयङ्कर उत्पातों के विषय में किसी को कुछ कहे, अथवा कुछ बतलावे, क्योंकि उस समय के इनके द्वारा निर्धारित कानून ही ऐसे थे "कि जीभ काटलो, हाथ उड़ादो, पैर विहीन करदो, अांखें फोड़ दो तथा शरीर को नाश कर दो” इत्यादि २। ऐसी स्थिति में इनसे कौन · बोल सकता था, बस यही कारण था कि "जिसकी लाठी तिसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ होती रही। और इनकी स्वार्थपरता तथा नीचता से भारत का अधपतन होता ही रहा । इन लोगों ने देश को अपने पेट में हड़प कर बिल्कुल खोखला तथा निर्वल बना डाला, तब देश पर विदेशियों के इमले (attack) होना शुरू हुओ और देश की आजादी दूसरे देश वालों के हाथों में चली गई। मुसलमानों के शासन काल में तो हिन्दुओं पर बड़ी आपत्ति आई, क्योंकि इन लोगों ने कोई न्याय युक्त शासन नहीं किया। धर्म शास्त्रों को जलाया, खड़ग के बल पर मुसलमान बनाये, मन्दिर तथा देवों देवताओं की मूर्ति तोड़ डाली। और इन ब्राह्मणों के मन्त्र तन्त्र जिनके बल पर ये लोग फूले नहीं समाते थे, और जिनके द्वारा ये लोग जनता को बहका २ कर महात्म्य सुनाया करते थे, और उनके नाम पर धोखा देकर खूब माल उड़ाया करते थे। सो वे इनके मन्त्र तन्त्र, देवी देवता तथा मन्दिर में विराजमान ठाकुरजी कोई भी जनता के काम न आये। और यवनों ने सबको ध्वंश करके उनके स्थानों पर अपनी मसजिदें कायम करली। और ब्राह्मणों के बीज मन्त्र "सनातन धर्म नाश हो गया तथा "गौ माता नाश हो गई" ये सब कुछ काल के लिये अन्धेर कोठड़ी में जा ( १०५) छुपे। इस प्रकार ब्राह्मणों की चालबाजी, धूर्तता तथा स्वार्थपरता का भंडा फोद सारे संसार में फैल गया, और जनता जगत का विश्वास इनकी श्रोर से कम हो गया। 'समय किसी का भी सदा एकसा नहीं रहता' इस कहावत के अनुसार मुसलमानों का भी समय समाप्त हो गया, और इसके पश्चात् सोशियल रिफार्म के सांचे में ढली हुई और मानव जीवन के उच्च सिद्धान्तों को समझने वाली न्याय शील गवर्नमेन्ट प्राई कि जिसको ब्रिटिश गवर्नमेन्ट के नाम से पुकारते थे। इसने यहां पर श्राकर सब लोगों के धर्म कमी को शान्ति पूर्वक स्थान दिया, बड़े २ सोशियल रिफार्म किये, रेल तार तथा डाक की सुव्यवस्था की, बड़े २ वन काट २ कर सुन्दर २ सड़कें तथा नहर निर्माण की, डाकुओं को पकड़ा, मुन्दर २ गढ़ किले निर्माण किये, जगह २ स्कूल तथा कालेज खोल कर जनता को विद्वान बनाया | कोली, चमार तथा मेहतर यादि कि जिनके नाम सुनने से लोगों को घृणा होती थी उन सबको पढ़ा लिखा कर शुद्ध नागरिक बनाया, मनुष्योचित अधिकार प्राणि मात्र को दिये गये। स्त्रियों का गौरव बढ़ाया और उनके पढ़ने के लिये अलग ही स्कूल और कालेज स्थापित किये गये। बड़े २ कला कौशल के कारखाने खोले और निरुद्यमी भारत को पुनः उद्यमशील बनाया। लोगों ने मनुष्यों को मारने के लिये कई प्रकार के धार्मिक हथकंडे रच लिये थे, जैसे काशी करोत, देवताओं के नाम पर नर बलि तथा सती सिस्टम के नाम पर श्रवोध बालिकाओं की हत्या। इन सब अत्याचारों पर राजनैतिक पार्डिनेन्स लगा कर बन्द किया। इस प्रकार जो देश कटिन उत्पातों के कारण दुखी तथा भय भीत हो रहा था, वह इनकी राजनीति द्वारा एकदम सुखी हो गया। सर्वत्र देश में अमन की बंशी बजने लगी। अब पाठक सोच सकते हैं कि देश में सोशियल रिफार्मरों की कितनी श्रावश्यवाता है, और सोशियल रिफार्म में जनता का कितना हित छिपा हुन्या ( १०६ ) है। जिस सोशियल रिफार्म को देख कर ये नहाए रूप पंडे पुजारी घबड़ा जाते हैं, और उनके सामने कई प्रकार के स्वार्थ सम्बन्धी ईंट रोना अटकाने में तनिक भी संकोच नहीं करते। अब भला बतलाइये इन वाहाणों को हम लोग देश रक्षक कहे कि देश भक्षक ? प्यारे पाठको! निश्चय जानो ऐसे नाम मात्र वाहाण बन कर दुनिया में माल उड़ाने वालों पर अब तक ननता की ओर से अथवा राष्ट्र की ओर से कोई कठिन प्रतिबन्ध न लगाया जायगा, तब तक देश का उद्धार शेना कठिन है। सोशियल रिफार्म में और इनमें पृथ्वी श्राकाश का अन्तर होता है। सोशियल रिफार्नर कहता है कि:--"Nation's duty is the religion' "जाति सेवा अर्थात् मानव सेवा ही धर्म है" और इन नाम मात्र ब्राहाण की शिक्षा है कि "दान दक्षिणा द्वारा हमारा पूजन तथा नाना प्रकार के भोजन करा कर हमको तुम कर देने का नाम ही धर्म है"। यही कारण है कि ये ब्राहाण लोग सोशियल रिफार्म को सहन नहीं कर सकते हैं, अब इन ब्राहाणो ने सोशियल रिफार्मरों के सामने क्या २ नात पांत की तथा क्या २ विघ्न बाधायें उपस्थित की सो सुनिये:--जब देश में सोशियल रिफार्मर विदेशों से आये तब हमारे देश में भी सोशियल रिफार्म का लोत बहा, और अनेको समाज सुधारक प्रेमी देश में उत्पन्न होने लगे, और ब्राह्मण लोग उनसे घबराते रहे, और विरोध भी करने लगे। देश सुधारको में पहिला नम्बर महर्षि स्वामी दयानन्द का या कि जिन्होने इन पंडे पुजारियों को पोपों की संज्ञा दी थी और इनकी कपटमयी कई एक करतूतों को तथा जिन सिद्धान्तों के द्वारा ये लोग जनता जगत को घोखा देकर माल उड़ा रहे थे, उस सबके गूढ रहस्यों को 'सत्यार्थ प्रकाश' नामक पुस्तक में लिखकर प्रकाशित कर दिया, ताकि भविष्य में ये लोग अपनी वाङ्गमयी कपटी चातुर्य्यता से जनता को धोखा न दे सकें। स्वामीजी ने कई एक गुरुकुल, अनाथालय तथा विद्यालय स्थापित कराये कई स्थानों पर गौशालाचे स्थापित होने लगी, जनता के लिये स्थान २ पर आर्य समाज स्थापित होने लगी, घर २ में वेद मन्त्र तथा हवनादि का प्रचार बढ़ा । जन्म गत वर्ण व्यवस्था मिटा कर पुनः गुण कर्म स्वभाव वाली वर्ण व्यवस्था कायम ( १०७ ) - हुई। कन्याओं के पढ़ने के लिये भी विलग २ गुरुकुल तथा पाठशाला स्थापित किये, बाल विवाह तथा वृद्ध विवाह का घोर अपवाद चलाकर दोनों में अच्छा सुधार किया और स्थान २ पर व्यायाम शाला तथा स्वास्थ्य मन्दिर कायम किये। इनको देख कर ये सारे पंडे पुजारी भयभीत हो गये थे, और मन में विचार करने लगे थे कि यह स्वामी दयानन्द हमारे लिये काल की मूर्ति वन कर कहां से आगया है। पीछे से ये लोग स्वामीजी की निन्दा किया करते थे, किन्तु सामने कुछ नहीं कह सकते थे। क्योंकि इन लोगों में और स्वामी दयानन्द में पृथ्वी श्राकाश को अन्तर था। देखो! स्वामी दयानन्द सत्य के पुजारी थे, ये लोग झूट के पुजारी थे। स्वामी जी ब्रह्मचारी थे, किन्तु ये लोग कामी तथा इन्द्रिय लोलुप थे। स्वामीजी परोपकारी थे, ये लोग केवल अपनी मौज चाहते थे। स्वामी जी ईश्वर और धर्म का प्रचार करते थे, ये लोग सब के सब ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देकर अपना पेट पालने वाले थे। इन लोगों ने स्वामी जी के सामने कई प्रकार के विघ्न वाधा रूप ईंट, पत्थर तथा रोड़ा अटकाये यहां ही तक नहीं किन्तु इनमें से कई एक दुष्टों ने विष का प्रयोग भी किया, और अन्त में जोधपुर पहुँचते २ तो स्वामी जी के प्राण दुष्टों ने ले ही डाले। अन पाठक गण सोच सकते - है कि समाज सुधारकं के प्रयत्नों में जनता की कितनी भलाई हैं। और इन पंडे पुजारियों की कितनी नीच वृत्ति है, कि लो ऐसे महान देश सुधारक परोपकारी महा पुरुषों के मारने में भी तनिक संकोच नहीं करते, तिस पर अभिमान इतना कि जिसके द्वारा भू देव तथा जगत गुरु का मिथ्या पद लिये बैठे हैं। ऐसे दुष्ट क्रूर कर्मी भू देवों को तो लजा रूपी शोक समुद्र में डूब मग्ना चाहिये। अब पाठक हमारे देश प्रेमी समज सुधारक नेता के विषय में सुन- चुके, अब दूसरे समाज सुधारक प्रेमी की बातें सुनिये:-जव अंग्रेजों का भारत पर पूर्ण अधिकार हो चुका, उस समय हमारे बंगाल में एक बहुत प्रसिद्ध देश भक्त नेता राजा राममोहनराय सुनामी विद्वान हो गये हैं।

११० ) कोई ध्यान न देकर शारदा बिल भी पास हो गया। और इसके पास होने से न तो सनातन धर्म नाश हुआ और न हिन्दू ही नाश हुए। अब पाठक सोच सकते हैं कि ये नामधारी ब्राह्मण कितने दुराग्रही होते हैं कि जो देश के उन्नति शीर्षक रिफामों को भी देख नहीं सकते। क्यों कि ये लोग जानते हैं कि देश में यदि सोशियल रिफार्मर इस प्रकार के रिफोर्म करगे तो.भविष्य में हमारी पोप लीला समाप्त हो जावेगी। इसलिये ये लोग सदैव भय भीत बने रहते हैं । और अपनी हलवा पुड़ी की खैर मनाते हैं । अब चौथा नम्बर पाता है सोशियल रिफार्म में हिन्दू कोड विल का । इस का तो नाम सुनते ही पंडे पुजारी चिल्ला उठे, और ऊपरी श्वांस छोड़ने लगे। क्योंकि ये बिल स्त्री जाति के उद्धार निमित बनाया गया है कि स्त्रियो का भारत में इस समय कोई श्रादर नहीं देखा जाता है और इनकी अवज्ञा के लिये कई प्रकार के वचन भी बना रखे हैं, यथाः-ढोल गंवार शूद्र और नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी' अब देखिये! जो स्त्री रनों की खान समझी जाती थी कि जिनकी कोख से अर्जुन और भीम जैसे योद्धा तथा ध्रुव व प्रह्लाद जैसे भक्त रत्न पैदा होते थे, उन्हीं के विषय में आज कहते हैं कि ढोल, गवार, शूद्र और स्त्री ये सब ताड़न के अधिकारी हैं, तो यह कितनी नीचता की बात है। इस स्त्री जाति के साथ मनुष्य इतना अन्याय किया है, कि इसको शूद्र संज्ञा दी है और इसके साथ कई प्रकार के अत्याचार कर रहे हैं। देखिये ! जब किसी के पुत्र पैदा होता है तो नकारा बजाते हैं और कई प्रकार की खुशी मनाते हैं। किन्तु यदि किसी के पुत्री होती है तो श्रानन्द मनाना तो दूर रहा उल्टे शोक सागर में डूब जाते हैं। लड़के को बाजार से लाकर मिठाई खिलाते हैं, दूध पिलाते हैं, किन्तु लड़की के लिये भर पेट रोटी भी नहीं देते। 'जब लड़का पांच छः वर्ष का हो जाता है तो उसके हाथ में बस्ता देकर पाठशाला में पढ़ने निमित्त भेज देते हैं, और लड़की के हाथ में गोबर लाने के लिये टोकरी देते हैं, पानी लावो, गोवर लावो; चौका लगावो, रोटी बनानो। अर्थात् सारा दासी का जैसा में ने काम मुपुर्द कर देते हैं। लड़की पिता के घर पर भी दामों की तरह काम करती है, और पति के घर पर तो साक्षात् दासी ही बन जाती है । प्रकार स्त्री जाति के साथ में सत्र योर से अन्याय ही अन्याय किया गया अापको देहातों में सैकड़ों लड़के ग्रेजुवेट मिल जावेगे, किन्तु लड़कियां कहीं शहरों में दो चार कटिनता से हूँढने पर मिलेगी। इससे साफ प्रगट होता है, कि सब ओर से स्त्री जाति का अपमान हो रहा है। यही सोच समझ कर हमारे भारत के प्रसिद्ध और अद्वितीय विद्वान लोगों ने हिन्दू कोड बिल बना कर स्त्री जाति के मुधार निमित्त भारत सरकार के समक्ष में रख दिया है। इस पर स्वार्थी लोग अपने स्वार्थ के निमित्त विरोध कर रहे हैं। इन विरोध करने वालों में दो दलों के लोग अधिक दिखाई देते हैं । पहिले नम्बर पर तो पंडे पुजारियों के रूप में ब्राह्मण लोग हैं, और दूसरे नम्बर पर कुछ पूजी पति लोग। सो ये सब लोग स्त्री जाति के हित के लिये विरोध नहीं कर रहे है, किन्तु इनका विरोध केवल अपने पेट के लिये है, सो कैसे हैं ? जरा मुनिये! ? पंडे पुजारी नामक ब्राह्मण लोग क्यों विरोध कर रहे हैं ? इसका यह कारण है कि इनकी दान दक्षिणा तथा नाना प्रकार का माला उड़ाने का सब कुछ कार्य इन भोली भाली स्त्रियों से चल रहा है, स्त्रियाँ मूर्खा रहने से इनके बहकाने में जलदी आती हैं, मैंने कई जगह इन पंडे पुजारियों के मंदिरों में जाकर देखा है, वहाँ पर मनुष्य कम पाये हैं, स्त्रियां बहुत सारी देखी जाती हैं। इसका कारण यह है कि मनुष्य कुछ साक्षरी होगये हैं, और पंडे पुजारियों की पोप लीला को भी जान गये हैं, इसलिये बहुत कम लोग इनसे प्रेम करते है, किन्तु स्त्रियां विचारी अभी तक भोली भाली तथा निरक्षरा है, इसलिये ये इनके फन्दे में खूब फंसती है। मैंने कई बड़े २ सुनामी मन्दिरों में प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देखा है, कि स्त्रियों का अपने पतिदेव की सेवा में तो मन नहीं लगता है, किन्तु ये लोग जब मन्दिरों में जाती हैं, तो पंडे पुजारियों के मुख पर पंखा झलती है, उसके चरण दाबती है, उनको नाना प्रकार के माल - ( ११२ ) खिलाती हैं, और अनेकों प्रकार की दान दक्षिणा देकर उनका संतुष्ट करती हैं, और फिर उनसे अपनी मनो कामनानों की पूर्ती कराती है। कहने का अभिप्राय यह है कि स्त्रियां मूर्खा होने के कारण से हन पंडे और पुजारियों के चक्कर में फंसी हुई हैं। जब हिन्दू कोड बिल स्त्रियों के सुधार में बन जावेगा तो स्त्रियां पढ़ लिख जावेंगी. और पढ़ी लिखी स्त्रियों पर इन पंडे पुजारियो के बहकावट का कोई प्रभाव न पड़ेगा, और इस प्रकार इनकी दान दक्षिणा तथा वैपविक भोगों की सामग्री का प्राप्त होना भी दुस्तर हो जावेगा। इसलिये ये सब पंडे पुजारी नामक ब्राहाण अपने भोगों के लिये चिता रहे हैं और हिन्दू कोड बिल का विरोध कर रहे हैं, ताकि स्त्रियाँ पढ़ लिख कर विद्वान न होजावें। . और इनकी भोग लीला तथा दान लीला का कार्य संसार में इसी प्रकार से चलता रहे। इसलिये जनता जगत का कर्तव्य है, कि वे इन पंडे पुजारियों की बहकावट में न श्राकर शीघ्र ही हिन्दू कोड बिल की स्वीकृति निमित्त गवर्नमेन्ट से अपील करे। क्योंकि इसके पास हुए बिना स्त्री जाति का उद्धार होना कठिन है, और अब रहे दूसरे नम्बर के कुछ पूजीपति लोग कि जो हिन्दू कोड बिल का विरोध कर रहे हैं । सो मालूम होता है, कि इन विचारों को इन पंडे पुजारियों ने अपना अर्थ सिद्ध करने के निमित्त बहका दिया है। क्योंकि कई एक घुजी पति मुझ से भी से भी पूछा करते है कि स्वामी जी यदि हिन्दु कोड़ मिल पास हो जायगा तो क्या लड़की हमारी पूजी में से अपना हिस्सा बांट लेगी? अब देखिये इन भोले भाइयों को हिन्दु कोइबिल के पास होने तथा न होने की चिन्ता नहीं, इनको तो चिन्ता है केवल पूजी बट जाने की । कहावत भी प्रसिद्ध है कि "चमड़ी जावे किन्तु दमड़ी न जावे" देश बरबाद हो जावे, घर बरबाद हो जावे, इसकी इनको चिन्ता नहीं है। जब ये लोग समझते हैं कि पुत्र और पुत्रियाँ हमारा ही अश हैं तो फिर ये लोग पुत्र के समान अपने द्रव्य विभाजन अधिकार पुत्रियों को क्यो नहीं देते हैं। अपने पुत्रों को जिस प्रकार अच्छा २ खिला पिला कर उनको पढ़ाने खिलाने का सुन्दर सुप्रबन्ध रखते हो, ऐसी व्यवस्था लड़कियो को भी क्यो नहीं देते। तुम अपने मन में यही तो सम- झते हो, कि लड़कियाँ तो विवाह होने के पश्चात् दूसरों के घर में चली जॉयगी, और लड़का हमाग घर में रह कर हमारी सेवा करेगा। तुम्हारी इस विधमता को दूर करने के लिये ही हिन्दू कोड बिल की श्रावश्यकता समझी गई है। इसके द्वारा जब तुमको ज्ञात हो जावेगा कि राजनैतिक नियमों की दृष्टि से तुम्हारी पुत्री तथा पुत्र आ समानाधिकार है, तो फिर तुम अपनी पुत्रियों को पढ़ाने लिखाने में संकोच न करोगे ! श्रन रहा द्रव्य विभाजन का प्रश्न ? सो द्रव्य कहां जायगा अर्थात् जितना द्रव्य तुम्हारी लड़की लेकर दूसरे के घर में जावेगी, इसी प्रकार तुम्हारे लड़के की शादी में दूसरे का द्रव्य तुम्हारे घर में भाजावेगा। इस प्रकार दोनों तरफ का वेलेन्स बरा- वर रहेगा। और अब नो तुम शादी विवाह करने हो उसमें भी यही बात है कि जितना द्रव्य अपनी लड़की की शादी में खरच करते हो उतना ही द्रव्य तुम अपने लड़के की शादी में दूसरों से वापिस ले लेते हो। अतः तुम लोगों की यह धारणा कि द्रव्य दूसरे के घर में चला जायगा सो हिन्दू कोड बिल के रहस्य को न जानने के कारण है। इससे तुम्हारा, तुम्हारे पुन और पुत्रियों का तथा देश और राष्ट्र सबका भला होगा। इसलिये इसका विरोध करना ठीक नहीं है। पंडे पुजारी तो अपने स्वार्थ के लिये अर्थात् पेट पालने के लिये इसका विरोध करेंगे ही। और सदा से ये तो समाज सुधार के कार्या में विरोध करते चले ही याये है, क्योंकि इन लोगों की धारा में तो यही समाया हुआ है, कि देश में जितनी मूर्खता रहेगी उतना ही अधिक हमारा लाभ होगा। किन्तु जनता को समान सुधार के कार्यों में विरोध करती है वह केवल पडे तथा पुजारियों की बहकावट है, कि जो जनता को इधर उधर से कुछ झूटो सी बातें बता कर अपना अर्थ सिद्ध करती है । अतः जनता को चाहिये कि वे ऐसे कपटमय वाक चातुर्य्यता द्वाग धोखा देने वाले जीवों से सदा सावधान रहें। और समाज सुधार के कार्यों को अपना अझ समझे। क्योंकि इमी के अाधार पर जगत के समस्त प्राणियों का जीवन चल रहा है। अतः सदा सर्वदा इनका स्वागत करना राष्ट्र तथा देश दोनों के लिये हितकर है।

( ११४ ) २२. क्या मनुष्य शुद्र है ? -- शास्त्र कहता है, कि भगवान ने ८४ लक्ष (लाख) योनियां उत्पन्न की हैं, उनमें २१ लक्ष अण्डज (अण्डे से पैदा होने वाली जैसे कवृतर, मोर तथा चिड़िया आदि जीव), २१ लक्ष उष्मज (उष्णता से होने वाले जीव जैसे मच्छर, खटमल तथा युवका (जू) आदि जीव), २१ लक्ष स्थावर (जमीन को फोड़ कर निकलने वाले जैसे वृक्ष तथा पौधा, घास आदि), और २१ लक्ष पिण्डज जैसे मनुष्य, गाय, घोड़ा तथा बैल आदि पेट से पैदा होने वाले जीव)। इस प्रकार चार खानि के जीवों के हिसाब से ८४ लक्ष योनि सृष्टि कर्ता ने बनाई। अब इनमें से मानव जाति के विषय में यहां विचार किया जाता है। क्योकि इन चार प्रकार की योनियों में मानव जाति को ही सर्व श्रेष्ट माना जाता है जैसा कि शास्त्र में कहा है कि "सर्वेषामेव जीवानाम् मानुष्यत्त्वं सुदुर्लभम्" अर्थात्:-सब जीवो में मनुष्य योनि सुदुर्लभ है। इसीलिये इसकी श्रेष्टता सभी शास्त्रों में वर्णन की गई है। अब यह योनि क्यों श्रेष्ट मानी गई? तो इसका उतर शास्त्र में यों दिया है किः- "श्राहार निद्रा भय मैथुनं च, समान मेतत् पशुभि नराणाम् । ज्ञानं नराणामधिको विशेषः, ज्ञानं विहीना पशुभिस्समानाः ॥" अर्थात्:-अहार, नींद, भय तथा मैथुन अादि ये चार बातें तो मनुष्य में तथा पशु पक्षियों में समान रूप से ही पाई जाती हैं, किन्तु मनुष्यों में ज्ञान अधिक होने के कारण सर्व श्रेष्टता दी है। इसीलिये पशुओं को भोग योनि और मनुष्य को कर्म योनि कहा जाता है। यह मनुष्य अपने ज्ञान बल से बहुत कुछ उन्नति कर सकता है जैसा कि कहा है: "पशु की तो पनिया बने, नर का बने न कोय । नर से तो ऐसा बने, कि नर नारायण होय" ।।

( ११५ ) अर्थात्:-पशु के तो मर, जाने के पश्चात् उसके चमड़े से कई प्रकार की उपकारी चीजें यथा बना यादि बन सकते हैं, किन्तु मनुष्य का मरने के पश्चात् कुछ नहीं होता है। और यदि होता है तो ऐसा होता है, कि नर का नारायण बन जाता है अर्थात् ज्ञान के द्वारा यात्म साक्षात्कार कर सकता है। इस प्रकार मनुष्य की अन्य प्राणियों से सर्व श्रेष्टता सिद्ध होती अब यहां प्रश्न होता है, कि जब मनुष्य की सर्व श्रेष्टता ही सिद्ध है तो फिर मनुष्य में मंद क्यों हुया ? सो मुनि:- है। . मनुष्य में यदि देखा जाय तो कोई भेद नहीं है, वह भेद भाव की कल्पना तो मनुष्यों ने अपने निजी स्वार्थ के लिये बनाई है। मनुष्य एक जाति है, इसमें यदि मंद ही मानना हो तो ली जाति तथा पुरुष जाति करके मान सकते हो, किन्तु मनुष्य जाति के कहने से भेद मानने की कोई कल्पना शेष नहीं रहती। क्योंकि स्त्री साति तथा पुरुष गति दोनों का समावेश मनुष्य जाति में हो जाने के कारण यह भेदभाव की कल्पना समाप्त हो जाती है। अब यहां पर प्रश्न यह है कि जब मनुष्य २ में कोई भेद नहीं है तो फिर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र श्रादि करके भेदभाव कहां से उत्पन्न हुया ? सो मुनियः-मैं आपको कह चुका हूँ कि यह मनुष्य बौद्धिक जीव (rational being) है यह सदा अपनी बौद्ध शक्ति से काम लिया करता है। सृष्टि तथा कर्ता के नियम सुचारु रहें, और मनुष्य अपनी शक्ति से मनुष्य को दुखी न कर सके अर्थात् सब जीवों के स्वभाविक कमी में कोई बाधा न उपस्थित हो चावे यह सोच विचार कर हमारे यहां के पुरुषों ने इस मानव जाति को चार भागों में अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य तथा शूद्र श्रादि में बांट दिया। और चारों को अपनी २ योग्यतानुसार कर्म (ब्यू टी) बता दी। इस प्रकार सब प्रागी अपनी २ योग्यतानुसार कर्मों में प्रवृत्त हो गये। अब यहां पर फिर प्रश्न उपस्थित होता है कि मनुष्यों को चार भागों में बांटा यह तो हमारी समझ में कुछ अन्याय हुया ? क्योंकि एक मनुष्य को तो सब से बड़ा अर्थात् सब का शिरोधार्य बना दिया, दूसरे क्षत्रियों को सब पर ( १८ ) (शूद्र) ही बना हुआ है, बस यही कारण है कि यह बाहाण समाज नाज अन्य समाज की दृष्टि में नीच समझा जाता है आज यह ब्राहाण समाज गंदा क्यों हुया ? तो इसका कारण यह है इस समाज में स्वार्थ की मात्रा अावश्यकता से अधिक बढ़ी, और कुछ मनुष्य इसमें अपने स्वार्थ के निमित्त गंदगी का काम करने लगे, शुद्ध ब्राहाणों ने ऐसे गंदे ब्राह्मणों पर कुछ ध्यान न दिया, और यह गंदगी उत्तरोत्तर बढ़ती रही। प्रारम्भ में ये शुद्ध ब्राह्मण लोग उन गन्दे ब्राहाणों को गुण कर्म तवा स्वभाव के अनुसार उनको श्रन्य यणों में ढकेलते रहते, और अन्य वर्गों मेंसे गुण कर्म स्वभाव के अनुसार ब्राह्मण बनाते रहते तो इस ब्राह्मण समाज में इतनी गन्दगी न फैलती। अब क्योंकि यह गन्दगी वाहाण समाज में सिर से पैर तक फैल गई है, इतना ही नहीं, किन्तु सर्वत्र अर्थात् रोम २ में समा रही है। ऐसी स्थिति में इस ब्राह्मण समाज का शुद्ध होना सहज ही नहीं, अपितु असम्भव है। जैसे कोई डाक्टर विसी फोड़े को ठीक करने के लिये प्रोपरेशन करता है, तो वह देखता है कि इस फोड़े की गंदगी कहां तक फैली है, जब उसको गंदगी का पता लग जाता है तब वह उस फोड़े को उतनी ही मर्यादा में चीर फाड़ कर ठीक कर लेता है, किन्तु उस फोड़े की गंदगी यदि सारे शरीर में फैल जावे, और सारा शरीर उस गंदगी से सड़ जावे तो फिर डाक्टर बिचारा क्या करेगा, ऐसी स्थिति में शरीर ही नाश हो जावेगा। यही हाल श्राज इस ब्राह्मण समाज का है, आज इस ब्राह्मण समाज की छटती गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार की जावे, तो कितने शुद्ध ब्राह्मण निकल सकते हैं। और थोड़े बहुत निकल भी आवे तो उनकी स्थिति भी इस कृत्रिम ब्राह्मण समाज में ऐसी होगी कि जैसी हज़ार नकटों में एक नाक वाले की होती है, अर्थात् उसको भी नकटों के समान ही बन कर रहना पड़ेगा। इस प्रकार ब्राह्मण समाज गंदा हो जाने से इसका प्रभाव दूसरे वों पर भी पड़ा है। और श्राज यह वर्ण व्यवस्था परस्पर की खेंचातानी से दुखी हो बिचारी रसातल को भाग चली है । और इसके स्थान पर नवीन ( ११६ ) गुण व्यवस्था दूसरे देशों से दौड़ी चली आ रही है। जिस के स्वागत के लिये बड़े २ युग धर्म के मानने वाले (देश काल और स्थिति पर विचार करने वाले) बड़े २ प्रसिद्ध नेता लोग हाथ बांध कर सामने खड़े हैं। इसके पदार्पण करने से संभव है कि देश का तथा राष्ट्र का शीघ्र ही कल्याण होगा। और ब्राहाण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र कि जो कल्पना मात्र हैं, वह नवीन युग धर्म में प्रवेश होकर समस्त मानव जाति के उच्च सिद्धान्तों के रूप में परिणित हो जावेगी। अतः युग प्रवृतक युवकों का कर्तव्य है कि देश तथा राष्ट्र की उन्नति के लिये इसके प्रभाव को समझ और हृदय से स्वागत करें। " मानव जाति के उच्च सिद्धान्तों पर यदि विचार किया जाय, ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य तथा शूद्र कोई भी नहीं है। हमको मनुष्यों में जो परस्पर भेद भाव प्रत्यक्ष दीखता है, वह केवल संसार की बाहिरी उपाधि कृत तथा हमारी भूल का ही द्योतक चिन्ह कहा जा सकता है। भगवद्गीता में तो कहा है कि सदाचारी ब्राहाण, अज्ञानी, दुराचारी, चांडाल, मानव प्राणी तथा गाय, हाथी तथा कुत्ता यादि पशु सत्र में सम दृष्टि रखना चाहिये। देखिये । जब गीता में दुराचारी, अज्ञानी ब्राह्मण, गाय, कुत्ता तथा पशु में सम दृष्टि लिखा है, तो फिर ये लोग भंगी, चमार, तथा कोली श्रादि जीवों को शूद्र की संज्ञा देकर विलग दृष्टि से क्यों देखते हैं, तो इसका कारण यह है कि कुछ मनुष्यों ने अपना बढ़ापन रखने के लिये इनको स्वार्थ वश नीच संज्ञा देदी है। इनमें जो सम और निदोष तत्वहँ उसको नहीं देखते हैं। अब यहाँ प्रश्न यह है कि:- क्या ब्राहाण तथा चाण्डाल समान है ? क्या मानव प्राणी और पशु समान है ? क्या गाय और कुत्ता समान है ? क्या मच्छर तथा हाथी समान है इत्यादि २ ? सर्व साधारण प्राणी इसी प्रकार की शङ्कायें किया करते हैं। अब ये समष्टि क्या चीज़ है ? इस पर विचार करते हैं। उदाहरण के लिये सोने के बने हुए नाना प्रकार के प्राभूपणों को ले लीजिये, काई प्राभूपण सिर में धारण किया जाता है, कोई हाथ में धारण किया जाता है, तो कोई पैर में धारण किया जाता है, शरीर के भिन्न २ ( १२२ ) तथा भेदा भाव की कल्पना कहां से आगई ? उसका कारण यही है कि मनुष्यों के द्वारा किये हुए अन्याय तथा अत्याचारों से अथवा स्वार्थ मय पैशाचिक वृत्तियों से पीड़ित से श्राज भोले भाले गरीब लोग करोड़ों की संख्या मनुष्य होते हुए भी शूद्र कहलाने का अधिकार लिये बैठे हैं। जो राष्ट्र और देश के लिये बहुत ही कलंकित वार्ता है। जो सेवा का कार्य हमारे देश में ये भोले लोग कर रहे हैं, उन्हीं सब कार्यों को अन्य देश में वहां के निवासी हर्ष पूर्वक संपादन कर रहे हैं, किन्तु वहां के मानव समाज में कोई भी व्यक्ति शूद्र नाम से नहीं देखा जाता है, और न उनमें राष्ट्रीय नाता से अथवा धार्मिक नाता से छूता ऽ छूत ही देखी जाती है, और न छोटे बड़े का प्रश्न ही चलता है। इसका परिणाम यह हुआ कि वहां का मानवसमाज बल, बुद्धि, विद्या तथा कला कौशल आदि सभी विषयों में अधिक उन्नति करते चले गये, और हमारा भारत देश बल विद्या तथा बुद्धि के नाते से सबका गुरू कहलाता हुया भी इस ऊंच नीच के मिथ्याभिमान में पड़ कर कला कौशल सम्बन्धी सारी बातों को भूल कर सब का दास बनता चला गया। अाज हमारी कला कौशल क्यों मारी गई, अाज हम मूर्ख और गंवार क्यों समझे गये ; आज हमारे सत्य विचार तथा सत्य सिद्धान्त क्यो नाश होगये ? तो इसका कारण यहीं है, कि हमारी सारी बातों में कृत्रिमता (Imitation) आगई, सत्य सिद्धान्त तथा सत्य विचारों के स्थान पर अपने स्थार्थ के लिये मिथ्या सिद्धान्त तथा मिथ्या बातों के प्रचार करने में लग गये और कला कौशल से सम्बन्ध रखने वाले सारे कार्यों को शूद्र का काम समझने लग गये। श्राज हमारे देश में खेती का काम करने वाला शूद्र, लुहार का काम करने वाला शूद्र, मिट्टी का काम करने वाला कुम्हार शूद्र, लकड़ी का काम करने वाला खाती, शूद्र, गाय तथा पशुओं का पालने वाला गुवाल शूद्र, पत्थर का कार्य करने वाला शिल्पी शूद्र इत्यादि । देखिये ये सब मनुष्य जो कला कौशलसे सम्बन्ध रखने वाले उत्तमोत्तम कर्मों के करने वालों को तो शूद्र बना दिये और झूठ बोलने वाले, धोखा देने पत्र .

( १२३ ) वाले, चोरी जारी, माम मदिरा सेवन करने वाले ब्राह्मण ही बने रहे । बस यही कारण है कि देश में से ऋता कौशल से सम्बन्ध रखने वाले सारे कार्य समाप्त होगये। और इनके स्थान में लाखों मन्दिरों के नाम पर, गंगा यमुना के नाम पर, स्वर्ग नरक के नाम पर तथा सनातन धर्म और गौ माता के नाम पर धोखा देने के लिये अनेकों प्रकार के (हथकंडे) पड्यन्त्रों रूपी अनुपयोगी व्यवसायों में प्रवृत्त होगये। अत्र पाठकगण सोच सकते हैं, कि श्राज इस कृत्रिम वर्ण व्यवस्था के चक्कर में पड़ कर देश क्तिना रसातल को प्राप्त हो गया। श्राज यह वर्ण व्यवस्था देश के कुछ स्वार्थी लोगों के चक्कर में पड़ी हुई और इनके कृत्रिम हथकंडों से दुखी हुई अपना पछा सदैव के लिये छुड़ाना चाहती है, किन्तु ये कुछ स्वार्थी लोग जिन्होंने इसके अाश्रय दूसरे गरीब लोगों के अधिकारों को छीन कर बड़ापन का पद प्राप्त करके मौज उड़ाई है, वे लोग इस विचारी को बलात्कार से पकड़े हुए इसको जाने न देने के लिये बाध्य कर रहे हैं, अतः नवयुवकों का कर्तव्य है कि वे सब मिल कर इन स्वार्थी लोगों के पढ़यन्त्र रूपी हाथों को कि जिनसे इन्होंने इस को पकड़ रखा है अपनी स्वार्थी रहित देशोपकार की भावना से युक्त तर्क बुद्धि रूपी तलवार से काट कर इस विचारी दुखिया के बन्धनों को ढीला करदें। ताकि यह विचारी इनके हाथों से मुक्त हो अपने निवास स्थान अविद्या रूपी क्षेत्र में सदा के लिये भारत से कूच कर जावे। याद रखो ! जब तक इस भारत में इस कृत्रिम वर्ण व्यवस्था का चक्कर चलता रहेगा तब तक यह ब्राह्मणपना, क्षत्रिय पना तथा वैश्य पने का झूठा दावा दूर न होगा, और इस दावे के दूर हुए बिना देशोन्नति न होगी। और मानव समाज के उच्च सिद्धान्तों पर कोई विचार न रहेगा। अतः देश काल तथा स्थिति को देखते हुए इस मानव युग परिवर्तन के समय नवीन युग धर्म प्रवेश के लिये नवीन मानव गुण व्यवस्था कायम कर देनी चाहिये । और यह जन्मता वर्ण व्यवस्था जो वेद तथा शास्त्रों के सिद्धान्त से सदा विरुद्ध है, इसको सदा के लिये समाप्त कर ( १२४ ) देना चाहिये। क्योंकि इसी के प्रताप से भारत में ऊँचता तथा नीचता श्राई, परस्पर में खेंचातानी करते हुए पृट पैदा हुना, भारत की संतानों को घटना होने से रोका, बौद्धिक शक्ति का हास हुआ, ईश्वर और धर्म के ठेकेदार पैदा किये। मनुष्यों को देवता से राक्षस बनाये, पोप लीला चालू हुई, कला कौशल को बढ़ा धक्का पहुंचा, ब्राह्मण तथा अब्राह्मणों की पहिचान जाती रही। सत को असत् में, धर्म को धर्म में, मनुष्य को शूद्रों में, और सच को झूठ में परिणित कर दिया, यहां तक कहें इसने श्रायों की कीर्ति तथा गुण रूपी रत्न की खानि को रेत से बने मिट्टी के ढेलों में परिणित कर दिया। और देश की स्वतन्त्रता को छीन कर विदेशियों के हाथ में सौंप दिया। अब क्योंकि भारत कुछ वर्षों से आजाद हो गया है, इससे भय है कि कहीं यह कृत्रिम वर्ण व्यवस्था इमारी इस अाजादी को आपस में फूट डाल कर पुनः परतन्त्रता की शृङ्खला (लोहे की, जंजीर) में न बांध दे। अतः हमारा कर्तव्य है कि सब मिल कर परस्पर में स्वतन्त्रता आनन्द को प्राप्त होते हुए इसको शीघ्रातिशीघ्र समास करदें। यह मेरी ही राय है, ऐसा नहीं समझना चाहिये, किन्तु भारत के प्रमुख २ देशोद्धारक विद्वान नेताओं की तथा महापुरुषों की भी राय है, कि वर्तमान समय को देखते हुए इसको 'शघ्र ही पतन करदें। क्योंकि भारत वा पतन इसी से हुश्रा है अतः इसके तोड़ देने में ही देश की भलाई है। अव महापुरुषों की इस विषय में जो कुछ सम्मत्तियाँ हैं वह जनता जगत के सूचनार्थ प्रकाशित की जाती है। जनता इनके वचनों पर ध्यान दें, और देश की भलाई के लिये वर्ण व्यवस्था को हटा कर गुण व्यवस्था कायम करें। गुण व्यवस्था की परिभाषा तथा लाम लोहे की बनी हुई भिन्न भिन्न चीजों को एकत्रित कर के देखें तो देखने वाले को सब चीजों में लोहा ही दृष्टि श्रावेगा किन्तु ( १२५) उपकार की दृष्टि में अर्थात् गुण करके किसी को कैंची, किसी को उस्तरा, किसी को तलवार, किसी को कुदाल, किसी को फावड़ा तो किसी को परात अादि नामों से उच्चारणा करेंगे, और जब इनकी आवश्यकता होगी, तव समय २ पर इनको प्रयोग में लेते हुए अपने अनेकों कार्यों की साधना करेंगे। अब देखिये ये सब वस्तु जाति करके तो लोहा है, किन्तु गुग्ण कर के कुदाल, फावड़ा तथा परात अादि नामों से पुकारे जाते हैं ! इसी प्रकार गुण व्यवस्था में जाति करके तो सब मनुष्य हैं किन्तु, किसी को शूर, किसी को योद्धा, किसी को चमार, किसी को लुहार, किसी को सुनार किसी को कुम्हार किसी को किसान तथा किसी को व्यापारी श्रादि नामों से घुकारे जावेगे। और राजनैतिक समाजिक, धार्मिक तथा मानव जाति के उच्च सिद्धान्तों के समझने तथा पालन करने के लिये सत्र को समानाधिकार होगा। कोई छूत अछूत, भेदाभेद तथा ऊँच नीच का भाव न रहेगा। इससे परस्पर प्रेम होगा, गुणों कि वृद्धि होगी, ईश्वर और धर्म की मिथ्या ठेकेदारी न चलेगी। हर प्रकार की विद्याओं का विस्तार होगा, अनुपयोगी व्यवसाय सब बन्द हो जायेंगे, निस्धमता नाश होगी, और इसके स्थान पर नाना प्रकार के कला कौशल सम्बन्धी कार्यों का प्रचार होगा, अधर्म का नाश होगा। पोप लीला समाप्त हो जावेगी और देश तथा गष्ट्र का हित होगा। और भारत की स्थतन्त्रता सुरक्षित रहेगी। अब यदि कोई जन्मतः वर्ण व्यवस्था के नाम पर माल उड़ाने वाला यह शदा करे अथवा भोले लोगों को बहकावे कि इस वर्ण व्यवस्था के नाश हो जाने और दूसरी नवीन गुण व्यवस्था श्रा जाने से देश का सत्यानास हो जायगा और सनातन धर्म मिट्टी में मिल जावेगा? तो इस पर मेरा कथन यह है कि यापकी वर्ण व्यवस्था तो इसी . भारत में देखी जाती है, और वह भी अब नाम मात्र को रूढ़ि वादियों ने अपने बड़प्पन के लिये अथवा इसके आश्रम जीवों को धोखा देकर पेट पालने के लिये कृत्रिम रूप से बना रखी है, किन्तु अन्य बड़े २ राष्ट्र यथा योरुप, अमेरिका, रूस, जापान, चीन, फ्रान्स यदि देशों में नहां आपकी इस वर्ण व्यवस्था का नाम भी नहीं है, फिर भी वहां के लोग विद्या बुद्धि में ( १२६ ) " तथा कला कौशल में बढ़े चढ़े अर्थात् उन्नति के शिविर पर पहुँचे हुए हैं। और हमारा भारत दस वर्गा व्यवस्था रूपी महान् चल्वर में पं.स पर कितना पतन हो गया है, अतः प्यारे भाइयो। अब तुम्हारा कृत्रिम वर्गा व्यवस्था का झूठा दावा, तथा ईश्वर धर्म की ठेकेदारी में पेट पालने का दाया जनता जगत में किसी तरह भी न चल सकेगा। और फिर इस भारत में भी बहुतसी ऐसी जातियां हैं, जैसे सिख, पारसी, जैन, ईसाई तथा मुसलमान जो तुम्हारी इस वर्ण व्यवस्था को न मानते हुए भी स्तिनी उन्नति कर रही है। जब इन्हीं का नाश नहीं हुआ तो फिर तुम्हारा और तुम्हारे सनातन धर्म का ही नाश कैसे हो जावेगा ? श्रतः यह बात तुम्हारी बिना सिर पैर की येवल भोले जीवों को धोखा देकर अपने चंगुल में फंसाये रखने के लिये है। इस गुण व्यवस्था से तुम्हारा धोखा देना तथा दुनियां का माल उठाना बन्द हो जावेगा इसी से तुम चिल्ला रहे हो। किन्तु तुम्हारे इस चिलाने में जनता जगत की कोई भलाई नहीं है अतः निरर्थक है। वर्ण व्यवस्था की परिभाषा तथा हानि प्राचीन समय में यह वर्ण व्यवस्था गुण, कर्म तथा स्वभाव पर निर्धारित होती थी किन्तु श्राजकल लोगों ने इसको जन्म से ही मान ली है। अर्थात् प्रत्येक आदमी की जाति का ठेका उसके जन्म से ही सिद्ध हो जाता है, और आज यही कारण है, कि ब्राह्मण चाहे कितना भी नीच कर्म करने वाला, मूर्ख तथा दुर्व्यसनी हो तो भी वह ब्राह्मण है और अन्य जाति का व्यक्ति लाख विद्वान, सदाचारी तथा धनिक होता हुश्रा भी सामाजिक दृष्टि में हीन (तुच्छ) समझा जाता है। इस जाति पांति के कारण हिन्दुओं में शिल्प कला की यथेष्ट उन्नति न हो सकी। इसका कारण यह है कि जिन जातियों का पैत्रिक व्यवसाय शिल्प कला है, जैसे कुम्हार, दर्जी, लुहार नाई तथा तेली आदि ये सब के सब सामाजिक दृष्टि में छोटे देखे जाते हैं। अतः किसी भी जाति ने इस विषय में जी जान से उन्नति न की, किन्तु सब लोग - ( १२७ ) उपेक्षा दृष्टि से अपने धन्वे करते रहे। इस जाति पांति के कारण हिन्दुओं का हृदय विशाल नहीं हुया और हर एक की सहानुभूति अपनी जाति विरादरी तक ही सीमित रह गई। हर एक यादमी की भावना में अपनी जाति विरादरी की सेवा और दूसरी बिरादरी की उपेक्षा समझी गई। ऐसा करने से न्याय अन्याय तथा औचित्य अनौचित्य का कुछ भी विचार नहीं करता। इस जाति पांति के बन्धन में पढ़ कर अाल १६ करोड़ भारत के लाल अछूत तथा पद दलित बन कर कूकर शूकर के समान जीवन व्यतीत कर रही है और इनके पहिनने को कपड़ा तथा रहने को घर और पेट भरने को सूखा अन्न तक नहीं है। इस जाति पांति के कारण ही हिन्दुओं की एक बड़ी संख्या ईसाई तथा मुसलमानों के फन्दे में फंस कर जीवन बिता रही है। इस जाति पांति के कारण ही परस्पर प्रेम तथा सहानुभूति का ऐमा प्रभाव हो गया है, कि जिसके कारण एक दूसरे को मरने और मारने को तैय्यार हो रहे हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि इस बात पांति रूपी वर्ण व्यवस्था ने देश और धर्म दोनों का नाश कर दिया है (श्रतः इसका शीघ्र ही नाश कर देना बुद्धिमानों का कर्तव्य है। २३ जाति पांति तोड़ने पर सम्मतियां १. पं. जवाहर लाल नेहरू भारतवर्ष में जाति पाति प्राचीन काल में चाहे कितनी उपयोगी क्यों न रही हो, पर इस समय सब प्रकार की उन्नति के मार्ग में यह बड़ी भारी बाधा और रुकावट बन रही है। 'हमें इसको जड़ से उखाड़ अपनी सामाजिक रचना एक दूसरे ढग से करनी होगी। २. स्वर्गीय सर रखीन्द्र नाथ ठाकुर यदि हिन्दू धर्मान्मत्त विमियों के घातक आक्रमणों से अपनी रक्षा

( १२८ )
करना चाहते हैं, तो उन्हें जाति पाति का सर्वथा त्याग करके अपने को
संगठित करना होगा।
३. स्वर्गीय पं. मोतीलाल नेहरू
जब तक जाति का नामो निशान मिटा नहीं दिया जाता तब तक
भारतवर्ष संसार के सभ्य राष्ट्रों में अपना उचित स्थान नहीं ले सकता ।
४. श्री विनायक दामोदर सावरकर
शुद्धि, छूतछात निवारण और संगठन इत्यादि-इस प्रकार के
उद्देश्य इस एक ही वाक्य के अन्दर पाये जाते हैं कि:-
"जाति पांति का झंझट तोड़ दो"।
५. श्री राजा खलक सिंह जूदेव बहादूर,
खनिया धाना राज्य
मेरा यह पक्का विचार है कि जन्म पूलक जाति पांति और छुपा
छुत जैसी कुरीतियों के रहते हुए हिन्दू जाति कभी उन्नति नहीं कर सकती।
६. श्री. भगवान दास एम. ए. (काशी)
वर्तमान काल में जाति प्रथा जिस रूप में प्रचलित है, उसका
एकान्त रूप से विनाश करना ही होगा। अगर भारत की जनता को नया
जीवन प्राप्त करना है, तो उसे वर्ण भेद के वर्तमान रूप को मिटा देना होगा,
क्योकि वह उन्नति के सभी भागों में भयङ्कर रूप से बाधा उपस्थित कर
रहा है।

( १२६ )
V
७. स्वर्गीय श्री गणेश शंकर विद्यार्थी
मेरा पूर्ण विश्वास है कि जाति पांति के जंजाल के टूटे बिना हिन्दुओं
का उद्धार न होगा।
८. स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानन्द
मैंने अपना यह नियम बना लिया है कि किसी ऐसे विवाह संस्कार
में सम्मिलित न हँगा और न उस जोड़ेको आशीर्वाद दूगा, जिसमें जाति पांति
का प्रबन्धन तोड़ा गया हो।
8. स्वर्गीय लाला लाजपत राय
जाति पांति हिन्दू धर्म का सब से बड़ा कलंक है, ब्राहाण और
अब्राह्मण, जात और गैर जात और नाम मात्र ऊँच नीच जातियों के वैमनस्य
का यही कारण है और इसी ने छूता छूत को जन्म दिया है ।
हिन्दू जाति पाति की वेढ़ियों से मुक्त नहीं होते, तब तक उनका एक जाति
बनना असम्भव है।
१०. विश्व वन्य महात्मा गाँधी
जाति पांति तोड़क विवाह आपत्ति जनक नहीं है, शुद्र पुरुष ब्राह्मण
स्त्री से विवाह कर सकता है।
११. डाक्टर मुंजे
अन्तर्जातीय विवाह द्वारा ही हम जाति पांति को मिटा सकते हैं।
१२, स्वामी सत्य देव
जाति पांति की दिवारों को गिरा दो, फूट के कारण को मिटा दो,
तभी वास्तविक संगठन हो सकेगा।

- ( १३० ) १३. श्री सी. आई. चिन्ता मणि वर्ण व्यवस्था मनुष्य की बनाई हुई है वह ईश्वर की ओर से कदापि नहीं हो सकती। जातीय भाव, जो इसकी कृपा से हमारे हृदय में जम गये हैं, लानत के योग्य है। आज इस बात की आवश्यकता है कि इसका खूब विरोध किया जावे। निसन्देह इस घातक प्रथा ने हमारी उन्नति को बहुत दूर फेंक दिया है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिन्दुओं के इस भेद भाव के कारण हम पूरा २ प्रयत्न करने पर भी पूर्ण और स्थायी स्वतन्त्रता प्राप्त नहीं कर सकते। १४. सर पी. सी. राय जब तक जन्म मूलक जाति भेद का अन्त न होगा और वर्ण व्यवस्था गुण कर्मानुसार न मानी जायगी, तब तक देश स्वतन्त्र नहीं हो सकता । जाति पाति के कृत्रिम भेद भाव हमारे देशकी उन्नति के मार्ग में बाधा सिद्ध हो रहे हैं। इसलिये इन्हें शीघ्र दूर कर देना चाहिये । १५. सर हरी सिंह गौड़ जाति पांति हिन्दुओं की एकता और उन्नति में रुकावट है। इस हानिकारक जाति पांति के विरुद्ध नव युवकों को आन्दोलन करना चाहिये । १६. स्वामी राम तीर्थ देश और धर्म तुमसे आशा करता हूँ कि जाति पांति के अत्यन्त कठोर नियमों को तुम ढीला कर डालोगे और भ्रातृ भाव के प्रकाश के लिये तुम कड़े वर्ण भेदों को नियन्त्रित कर दोगे। १७, पं० सन्त रामजी बी० ए० जाति पांति ने शुद्धि, संगठन और दलितोद्धार की सभी चेष्टाओं को विफल कर दिया है। जब तक जाति पांति है, ये तीनों बातें असम्भव हैं । - ।

। १३१ ) , हिन्दू समाज के सभी सच्चे हित चिन्तक और नेता इस बात को मुक्त कंठ से स्वीकार करते हैं। १८. महाशय देव राज, प्रधान, कन्या महा विद्यालय, जालंधर जाति पांति के अयोग्य बन्धनों ने हमें ऐसा अभिमानी, आलसी और कर्म हीन बना दिया है कि हम मनुष्य कहलाने के भी योग्य न रहे । यह कुप्रथा तोड़ने योग्य है। १६. श्री नारायण स्वामी जाति पांति का बन्धन हिन्दू जाति के लिये कलंक का टीका है, और इसने सारी जाति को छिन्न भिन्न कर रखा है। हिन्दु जाति में प्रणा और परस्पर द्वेप का प्रचार इसकी कृपा का फल है। इसलिये आर्य जाति की उन्नति इस बन्धन के तोड़ने पर ही अवलंबित है। २० श्रीमाली ' राव जयकर एक बात जो हमने स्वराज संग्राम में सीखी है वह यह है कि हमें नाति पांति को सर्वथा मिटा कर जन्म की बड़ाई का त्याग कर देना चाहिये । २१. श्री के. नटराजन वर्तमान जाति पांति शास्त्र और तर्क दोनों के विरुद्ध है। हिन्दुओं की वापस की फूट का यही कारण है। यह राष्ट्रीय भावना के विरुद्ध है। जितना शीघ्र इसमें क्रान्तिकारी सुधार होगा, उतना ही इससे देश और विशेष . कर के हिन्दुओं का कल्याण होगा। २२. श्री रजनी कान्त शास्त्री, पी० ए०, बी० एल० कहते हैं कि इस जाति पांति के कारण ही हिन्दुओं में परस्पर इतना द्वेप भाव फैला कि वे एक होकर विदेशियों का सफल सामना न कर सके, ( १३२ ) जिसका फल यह हुना कि भारत पराधीन होगया। अतः इसको शीघ्र ही समाप्त कर देना चाहिये। । २४, हमारा सनातन धर्म नाश हो गया प्यारे पाठक ! जब २ कोई समाज सुधारक (Social reform) अपने देशोन्नति के निमित्त समाज सुधार के लिये मानव समाज की सेवा में खड़ा होता है। और अपने वचनों द्वारा ईश्वर और धर्म के ठेकेदार की प्रवृत्तियों के विषय में जनता जगत को सावधान करता है। तब ये मिथ्या ठेवेदार लोग घबरा जाते हैं और उनके ठोस (Solid) कार्यों में नाना प्रकार के विघ्न बाधा उपस्थित करते हुए कहना तथा चिल्लाना शुरू करते हैं कि देखो ये लोग जाति पांति को तोड़ना चाहते हैं। भंगी, चमार तथा कोली को ब्राह्मणों के साथ बिठा कर एक पंक्ति में भोजन कराते हैं। हमारे ठाकुरजी के मन्दिर में इनको प्रवेश करा कर ठाकुरजी का अपमान करते हैं। ये लोग हमारे सनातन धर्म को नाश करने के लिये कुठाराघात कहां से पैदा हो गये। अब देखिये ! जो महापुरुष देश सेवा निमित्त कुछ समाज सुधार करना चाहता है, तब तो ये लोग उनको खोटी खरी कहने में तनिक भी संकोच नहीं करते। किन्तु जब ये स्वयं ही अपने स्वार्थ के लिये सनातन धर्म को नाश कर डालते हैं तब ये स्वयं के लिये ऐसा क्यों नहीं कहते कि हम लोग केवल पेट पालने के लिये सनातन धर्म को नाश कर रहे हैं, उस समय तो सब चुप होकर गिद्धों वाली दावतें उड़ाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जब इनके स्वार्थ का प्रश्न सामने आता है तब ये लोग उसकी पूर्ति के निमित्त चाहे सारे सनातन धर्म के सिद्धान्त नाश हो जावें तो भी उसकी परवाह नहीं करते, किन्तु जब कोई सजन महापुरुष इनकी नीच करतूतों के विवरण जनता के समक्ष में रखता है तब इनका सनातन धर्म शीघ्र ही नाश हो जाता है । कहावत प्रसिद्ध है कि:- "लखत फिरे पर की फूली देखे नहीं निज टैट" , १ १३३ ) अर्थात्:---दूसरों को तो ये लोग दोष देना चाहते हैं, किन्तु अपने दोपों पर ध्यान नहीं देते। अतः यहां पर लिख कर पाटकों को बताया जाता है कि ये लोग अपने स्वार्थ के निमित्त सनातन धर्म के सिद्धान्तों को किस प्रकार नाश करने में लगे हुए हैं। जरा सुनिये:- देखो! जब कोई गरीब हरिजन इनके कुवे पर पानी भरना चाहता है, तब ये लोग उसको कुवे पर चढ़ने नहीं देते हैं, क्योंकि हरिजन के कूवे पर चढ़ने से इनका सनातन धर्म नाश हो जाता है। किन्तु वही हरिजन यदि ईसाई तथा मुसलमान हो जावे, तब वह इनके कुवे पर चढ़ कर पानी भर सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जब तक वह हरिजन इनकी मिथ्या वर्ण व्यवस्था में बंधा रहा तब तक तो वह इनके कुवे पर पानी भरने का का अधिकारी नहीं हुआ किन्तु जैसे ही वह इनकी वर्ण व्यवस्था से मुक्त हुआ त्यो ही वह इनके कुवे पर चढ़ने का तथा इनके पास में बैठ कर वातचीत करने का अधिकारी हो गया । अव पाटक सोच सकते है कि इनका सनातन धर्म बढ़ा हुश्रा या ईसाई तथा मुसलमान धर्म! तो कहना पड़ेगा कि इनके नीच सिद्धान्तों से तो ईसाई तथा मुसलमान धर्म की ही श्रेष्टता सिद्ध होती है। अाज यदि कोई हरिजन मार्ग में जा रहा हो तो ये नकली सनातन धर्मी उससे छूतछात का भाव रखेंगे। किन्तु जब ये रेलगाड़ी में सफर कर रहे हो, और वह हरिजन भी रेलगाड़ी में जा रहा हो तब ये कुछ न बोलेंगे, बक्लि वह हरिजन रेलगाड़ी में उनके पास में बैठने का अधिकारी हो जायगा । क्योंकि भूतपूर्व गवर्नमेन्ट ने सच मनुष्यों के लिये मनुष्योचित अधिकारों को प्राप्त करने के लिये पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की थी। इससे ज्ञात होता है कि इन नकली सनातन धर्म के मानने वालों का यह भाव हमारे देश वासियों को केवल भ्रम में डालने के लिये है, बाकी छूता छात कोई परमात्मा के घर से नहीं पाई है, यह तो वर्ण व्यवस्था के दुष्परिणाम का तथा परस्पर खेंचा- तानी के द्वारा दूसरे प्राणियों पर अपना प्रभुत्व जमाये रखने की ही भावना . ( १३४ ) है। क्योंकि इनकी यदि यह भावना सच्ची होती तो इनका यह छूताछूत सर्वत्र बना हुश्रा दिखाई देता, किन्तु विदेशियों की सच्ची नीति तथा सत्य सिद्धान्तों के सामने इनका नकली सनातन धर्म दूर भाग जाता है। अभी जब भारत को स्वतन्त्रता मिली, और यहां का शासन सूत्र हमारे देश वासियों के हाथ में पाया तय हमारी वर्तमान कांग्रेस गवर्नमेन्ट ने भी महात्मा गांधीजी के हरिजन उद्धार के सिद्धान्तों के अनुसार समाज सुधार करना शुरु कर दिया, तब इनका वही नकली सनातन धर्म का सिद्धान्त सामने श्राया, और उसको सामने रखते हुए पुनः लोगों को बहकाना शुरू कर दिया, कि कांग्रेस गवर्न- मेन्ट समान सुधार के बहाने हमारे सनातन धर्म को नाश करना चाहती है। इससे सिद्ध होता है कि इनका सनातन धर्म का ढोंग केवल हमारे देश वासियों पर ही चलता है, किन्तु विदेशियों के सामने टप्प हो जाता है। अतः हमारे देश वासियों को हमारे इन नकली सनातन धर्म वालों से सावधान रहते हुए अपने असली सनातन धर्म कि जिसमें समस्त संसार के प्राणियों का समावेश तथा समस्त मानव जाति के उन्ध सिद्धान्त सुरक्षित हैं, उसको पालन करना चाहिये । और सुपाश देते हुए इस योग्य बना लेने चाहिये कि जिससे कोई मनुष्य उनसे घृणा न करे, और हमारे राजनैतिक, सामाजिक तथा धार्मिक प्रत्येक कार्यों में हमारे सहयोगी हो सकें। देखो। ये नकली सनातन धर्मी जब कुवे पर स्नान करते हैं, और जिस रस्सी और डोल से पानी निकालते हैं, तो उसको हजारों दफा ही मिट्टी और जल से साफ करते रहते हैं। अापने प्रत्येक धार्मिक कुनों पर तथा बगीचियों के कुत्रों पर धार्मिक डोल बाल्टी पड़े देखे होंगे, वहां पर ये लोग सायं प्रातः शौच तथा स्नानादिक के बहाने सैकड़ों ही पहुँचते हैं और प्रत्येक आदमी उस डे ल (पात्र) को अनेकों ही समय मार्जन करते हैं, क्योंकि इनका तो सिद्धान्त ही यह है कि एक दूसरे के हाथों से छू जाने पर ही पात्र अशुद्ध हो जाता है। अब देखिये ! धार्मिक बगीची तथा देवालयों पर तो इनका यह हाल है, किन्तु जब ये लोग रेलगाड़ी में सफर करते हैं तो .

( १३५ ) - अपने सारे सनातन धर्म के सिद्धान्तों को स्वयं नाश कर डालते हैं। आपने देखा होगा कि जब रेल गाड़ी में सफर करते हुए इन लोगों को प्यास लगती है, तब ये लोग वाटर मेन जो रेलवे की ओर से नियुक्त होता है उससे पानी मांगते हैं, और वह वाटर मेन अपनी उस बाल्टी से मुसलमान, ईसाई, हरिजन, ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य आदि सब को ही पानी पिलाता है, और उस बाल्टी को वह कभी मृतिका से शुद्ध नहीं करता । और फिर इसी पानी को ये नकली सनातन धर्म का बहाना करने वाले लोग भी बड़े प्रेम से पीते हैं। और इनके इस सिद्धान्त से सनातन धर्म नाश हो जाता है तो फिर ये लोग ऐसा क्यों करते हैं ? इससे ज्ञात होता है कि जब इनको अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है तब तो ये लोग अपने सनातन धर्म को नाश कर डालते हैं, और दूसरे अन्य समय में सनातन धर्म सनातन धर्म कह कर चिल्लाते रहते है तो ऐसी स्थिति में इनका यह चिल्लाना ढोंग नहीं तो और क्या कहा जावेगा। इनके इस दिखावटी रहस्य का ही यह प्रताप है कि यान मनुष्य अपने सजातीय मनुष्य में घृणा तथा छूताछूत करने लग गया है। अतः युवकों को इससे सदा सर्वदा बचना चाहिये। इसी प्रकार जब ये नकली सनातन धर्म का ठेका लेने वाले ठेकेदार किसी कुवे पर अपना डोल बाल्टी लेकर पानी भरने को जाते हैं, और उसी समय बिचारे गरीब लोग माली, जाट तथा कुम्हार श्रादि भी पानी लेने के लिये अपनी डोल बाल्टी तथा रस्सी लेकर पहुंच जाते हैं। और श्रापस में पांनी बँचते हैं, तब ये धर्म के ठेकेदार इस बात का ध्यान रखते हैं, कि वे माली जाट तथा कुम्हार अपना डोल उनके डोल पर कुबे में डाल न देखें अर्थात् इनके डोल में उनका डोल न छू जावे । यदि किसी गलती से डोल से डोल कुवे में छू भी जावे तब ऐसी स्थिति में वे लोग अपने सनातन धर्म के सिद्धान्त से इस डोल को अपवित्र मान लेते हैं, कई समय लोगों में इस विषय पर झगड़ा भी होते देखा होगा ? अब वह डोल शुद्ध कैसे होता है ? सो सुनिये। थोड़ी सी मिट्टी नाम मात्र को डोल के भीतर डाल दी और ( १३६ ) थोड़ी सी बाहिर बुरकादी, बस इतना करने से ही इनका डोल पवित्र हो गया, और उस मिट्टी वाले डोल को ही पुनः कुवे में डाल दिया। मैंने इन धर्म के ठेकेदारों को कई समय देखा है कि जब ये शौच कर वापिस आते है। तब ये लोग लोटा भर कर गिट्टी लाते हैं, क्योंकि यहां इनको मिट्टी की कोई कीमत नहीं देनी पड़ती, किन्तु बम्बई श्रादि शहरों में जाकर इनकी यह भावना नष्ट हो जाती है, क्योंकि वहां पर मिट्टी नही मिलती, और जो मिलती है तो बड़ी मंहगी दामों से मिलती है, अतः वहां पर तो नाम मात्र से ही अपना काम चला लेते हैं। किन्तु जहां पर मिट्टी मुफ्त मिलती है, वहां पर इनको लोटा भर कर चाहिये। श्रन ये लोग उस मिट्टी को लाकर कुवे पर ढेर लगा देते हैं, डोल को मांजने का काम नहीं किन्तु एक मुट्ठी मिट्टी डोल के भीतर डाल दी और एक मुद्दो डोल के ऊपर बुरकादी कि बस डोल मार्जन हो गया और कुबे में छोड़ कर पानी निकाल लिया, इस प्रकार एक २ श्रादमी तीन २ समय डोल को मार्जन करते हैं, और मार्जन करने वाले सैकड़ों ही लोग कुवे पर पहुंचते हैं। अब इस हिसाब से पाठकगए सोच सकते हैं, कि दिन भर में कितनी मिट्टी कुवे में पहुँचती होगी और उसका कुप्रभाव मनुष्यों के स्वास्थ्य पर कितना खराब पड़ता होगा, किन्तु ये लोग अपनी अज्ञानता के कारण किसी के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देते। और जिस डोल मांजने के उद्देश्य से ये लोग इस क्रिया को करते हैं उससे इनका उद्देश्य भी पूरा नहीं देखा जाता। यदि कोई मनुष्य मन लगा कर एक ही समय डोल को मिट्टी से रगड़ कर मांज लेवे तो वह चांदी की भाति चमक जाता है किन्तु इनके द्वारा हजारों बार मार्जन किये हुए डोल को भी यदि आप ध्यान पूर्वक देखेंगे तो डोल का चमकना तो दूर रहा, किन्तु उसके पैदे में काई जमी हुई पाठको को दृष्टि में प्रावेगी। -4 कहने का अभिप्राय यह है, कि इनकी ये जितनी भी क्रियाये हैं, सब दूसरों को दिखाने के लिये और अपना बड़प्पन रखने के लिये केवल घोखा मात्र हैं। पाठक इस बात का विचार करें कि जन कुवे पर इनका ( १३७ ) डोल पानी निकालते समय किसी दूसरे डोल से छू जाता, और उस छू जाने को ये अपने बनावटी सनातन धर्म के सिद्धान्तों से अपवित्र समझते हैं ! किन्तु जब ये लोग पानी लेने के लिये अपनी डोल बाल्टी लेकर किसी नल पर पहुँचते हैं, और वहां भीड़ में एक दूसरे के ऊपर दूसरा अपने वर्तन डालते ही रहते हैं तो वहां पर इनका सनातन धर्म क्यों नहीं नाश होता है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि यह सनातन धर्म विचारा इनका खरीदा हुया निज का सिद्धान्त है कि जब जी चाहे इसको अपने स्वार्थ के लिये नाश कर दिया और जब जी चाहे तब इसको अपने स्वार्थ के निमित्त सनातन धर्म सनातन धर्म कह कर पुनर्जीवित कर लिया। इससे सिद्ध होता है कि इनकी ये सब क्रियायें न तो धर्म है और न सिद्धान्त, केवल दूसरे लोगों पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिये और छूताछूत का भेदाभेद डालते हुए देश और राष्ट्र को नाश करने के निमित्त ही है। जो बुद्धिमानों को सदा सर्वदा त्यागने योग्य है। इसी प्रकार खाने पीने की चीजों के विषय में भी इन्होंने कई प्रकार की कपोल कल्पनायें बना रखी है। माली, जाट तथा कुम्हार यादि को तो इन्होंने शूद्र संज्ञा देते हुए इनके हाथ से बनाया हुया भोजन नहीं करते हैं, चाहे वे ब्राह्मणों को कितनी ही शुद्धतापूर्वक रोटी दाल बना कर खिलायें किन्तु ये लोग उनके बनाये हुए भोजन को कच्चा भोजन कह कर छोड़ देते है, और कहते हैं, तुम्हारे यहां का कचा भोजन स्वीकार नहीं करते; किन्तु हां! अलबत्ता यदि तुम लोग पुरी कचौड़ी, हलवा तथा खीर आदि बनाकर खिलायो तो अवश्य तुम्हारे हाथ का बनाया भोजन स्वीकार कर सकते हैं। "व देखिये एक तरफ तो दाल रोटी यादि कच्च। भोजन करने से तो इनका सना- तन धर्म नाश होजाता है किन्तु दूसरी तरफ उन्ही व्यक्तियों के द्वारा बनाये हुए खीर पुरी तथा हलवा यादि पदार्थों को झट ही भोजन कर लेने में इनका सनातन धर्म नाश नहीं होता है यही एक श्राश्चर्य की बात है। जहाँ इन को सूखी रोटी खाने को मिलती, वहाँ तो इनका सनातन धर्म नाश हो जाता ( १३८ ) । है, और जहाँ इनको माल खाने को मिला तो वहां सनातन धर्म वसा काही बना रहता है। धर्म क्या है ? मानों मोम की नाक है, कि जिसको जिधर घुमाना चाहो उधर ही घूम जावेगी। अब देखिये। जिस दाल रोटी को इन्होंने कच्चा भोजन कह दिया और हलुवा पुरी श्रादि पदार्थों को पका भोजन समझ लिया, अब इनके इस मिथ्या सिद्धान्तों को कीन मान सकता है क्या दाल रोटी कच्ची है ? कच्ची रोटी को कोई खाकर तो देखे। कंगा जोर से पेट में दर्द चलने लग जाता है। अतः यह सिद्धान्त इनका दुनिया को बदका कर अपना अर्थ सिद्ध करना है। अब मैं अपने पाठकों को इस कच्चे तथा पक्के भोजन का जो वास्तविक सिद्धान्त है, सो समझाता हूँ। पदार्थ लोक में दो प्रकार से सिद्ध होता है। एक तो वस्तु अग्नि और जल द्वारा सिद्ध हो जावे वह पक्की होती है जैसे दाल, रोटी तथा शाकादि। और दूसरी जो समय पाकर पक जावें, जैसे श्राम, अमरूद, अजीर, सेव, तथा अंगूर आदि फल जो समय पाकर पक जाते हैं, वे तो पक्के कहलाते हैं। और न पके हुए फल कच्चे कहलाते हैं। अब इसके अतिरिक्त जो तीसरा साधन घी दूध तथा मिष्टान के संयोग से बनी हुई चीज ही पक्की होती है यह अपने स्वार्थ का रचा हुअा सिद्धान्त है। क्योंकि इसके द्वारा दूध की मात्रा अधिक खाने को मिल जाती है इसलिये इन्होंने पक्के तथा कच्चे का सिद्धान्त स्थिर (कायम कर लिया है। जो प्रकृति तथा धर्म के सिद्धान्तों से विरुद्ध है। और देश तथा राष्ट्र दोनों को पतन करने वाला है। द्वारा घी अब इसके अागे पाठकों को इनकी कुछ और करतूतें वर्णन की जाती हैं । लुहार, सुनार तथा खाती आदि या कोई माली जाट तथा कुम्हार आदि लोग इन ब्राह्मणों को अपने घर पर निमन्त्रण करके बुलावे कि महा- राज मेरे घर पर चल कर प्रेमपूर्वक शुद्धता से बना हुआ दाल भात का भोजन कर लीजिये तो ये लोग झट से उसको कह देंगे, कि हम तुम्हारे यहां कच्चा भोजन स्वीकार नहीं करेगे । क्यों कि इस प्रकार करने से हमारा सनातन धर्म नाश हो जाता है, किन्तु किसी समय वे ही माली जाट तथा , ( १३६ ) कुम्हार श्रादि अपने घरों के सामने मिट्टी की चिलम लेकर तमाखू पी रहे हो, और कदाचित् कहीं से धूरते घामते पंडितजी की भी लार टपक पड़ी तो एकदम उन पीने वालों की पंक्ति में बैठ कर प्रेम से तमाखू पीने लगते हैं। कई समय तो देखा जाता है कि पीने वालों के मुख का थूक तथा लार तक पीते समय चिलम को लग जाता है। अब मला बतलाइये। क्या यह चिलम गंगाजी की रेणुका से बनाई है, कि जो पवित्र मान ली गई, और जो भोजन बड़ी पवित्रतापूर्वक बनाया गया था उसको अशुद्ध मान लिया गया ! बस यही सनातन धर्म को भ्रष्ट करना है श्रब पाटकों को पता लग गया होगा, कि ये नाम मात्र ब्राह्मण लोग अपने स्वार्थ के लिये किस प्रकार रात दिन इस सनातन धर्म को नाश कर रहे हैं किन्तु इनको "स्वार्थी दोपो न पश्यति'' इस वार्ता के अनुसार अपना यह महान् दोष दिखाई नहीं देता। किन्तु जब कोई समाज सुधारक अपने समान सुधार तथा राष्ट्र के हित के लिये प्रचार करता है कि माई "जाति पांति तोहदो, सब मनुष्यों को योग्य बना कर अपने समान समझो, भेदाभेद को दूर करो, कृताळूत को पानी में बहा दो।" तब ये लोग चिल्लाने लगते हैं, कि हमारा सनातन धर्म नाश हो रहा है। अब यह इनका चिल्लाना केवल अपने स्वार्थ के निमित्त भोले भाले जीवों को धोखे में डालने के लिये है। अतः मनुष्य मात्र का कर्तव्य है कि वह सदा ऐसे मनुष्यों से कि जो ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देने वाले हैं इनसे सदा सर्वदा सावधान रहना चाहिये । २५ छूताछूत पर कुछ विचार यदि ज्ञान दृष्टि से देखा जाय तो संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है कि जिसको हम अछूत कह सके। इस समय जो हमको छूताछूत दिखाई दे रहा है वह केवल हमाग मिथ्याभिमान तथा स्वार्थ पूर्ण कामनाओं की विशेष ( ) प्रवृत्तियां हैं, अथन यो कहिये कि हम ने अपने बड़प्पन को रखने के लिये ऊँच नीच तथा भेदाभेद की कल्पना करते हुए श्रात्म ज्ञान के स्तर से बहुत नीचे गिरा लिया है। इसका परिणाम यह हुआ कि हमने मनुष्य होते हुए भी इतर प्राणियों से घ्रणा उत्पन्न की और अपने श्रापको अनेको फिरकों तथा जातियों में विभाजित करके. एक दूसरे का प्राग लेने पर कटिबद्ध हो गये। श्रान ब्राण ब्राहाण में भेद, क्षत्रिय क्षत्रिय में भेद, इसी प्रकार अनेकों जातियों में भी अनेकों प्रकार के भेदों की कल्पना करादी। इस भेदाभेद की कल्पना से ही एक दूसरे के हाथ का खाने पीने में, उटने बैठने में, तथा विश्व बंधुत्व प्रेम से सब को विमुख बना दिया। यह मेदाभेद केवल हमारे शरीरों तक ही सीमित न रह गया, किन्तु इसने हमारे धार्मिक, राज- नैतिक तथा सामाजिक क्षेत्र पर भी हाथ मारा, और सब तरह से भारत को खोखला बना दिया। श्राज पशु पक्षियों को देखिये ! कितना प्रेम तथा संघठन है, क्या इन में भी आपको खाने पीने, वैटने उठने की कोई पंक्ति भेद दिखाई देता है। किन्तु इस मिथ्या भेदाभेद की कल्पना ने बौद्धिक शक्ति का दावा करने वाले मनुष्य समाज को इस पशु पक्षियों के समाज से भी नीचा गिरा दिया है। हमारे इस भेदाभेद के कारण ही बिचारे ईश्वर को, देवी, देवताओं को तथा तीर्थादिकों को भी छोटा बड़ा बना दिया है। श्राज एक मन्दिर में ठाकुरजी के सामने हजारों स्त्री तथा पुरुषों के मुण्ड के झुण्ड एकत्रित होकर हाथ जोड़ रहे हैं, नाना प्रकार के हविष्य पदार्थ भोग लगा रहे हैं। ठाकुरजी खाने पीने तथा वस्त्राभूपण पहिनते २ अघा गये हैं। किन्तु बिचारे दूसरे ठाकुरजी के सामने एक पुजारी को छोड़ कर दूसरे स्त्री पुरुषों का दर्शन ही दुर्लभ है। और खाने को हविष्य पदार्थ तो दूर रहे, किन्तु सूखा चना भी मिलना कठिन हो रहा है। इसी प्रकार तीर्थादिक तथा देवी देवताओं में भी अनेकों प्रकार के भेदों की कल्पना पाई जाती है। कहने का अभिप्राय यह है कि इस छूताछूत का प्रभाव मनुष्य क्षेत्र से भी बढ़ कर ईश्वर तथा देवी देवताओं तक पहुंच चुका है जो हिन्दू जाति के लिये बहुत ही कलंक की बात है।

१४१) प्राकृतिक नियमों से पता चलता है कि मनुष्य किसी भी तरह अछूत नहीं माना जा सकता। आज जो मनुष्य महतर तथा चमार श्रादि हरिजनों को अछूत समझ रहे हैं, उनसे पूछा जाता है, कि ये विचारे क्या प्रणित कार्य कर रहे हैं, कि जो अछूत कहलाने के अधिकारी समझ गये ? क्या समाज की सफाई अर्थात् गंदगी को दूर करने वाले अछूत कहला सकते हैं ? मुझको तो संसार में दो ही शक्तियां ऐसी दिखाई देती हैं कि जिनको महा पुरुष कहा जा सकता है। एक तो वे ज्ञानी महात्मा है, कि जो निस्वार्थ भाव से अपने बचनामृत द्वारा सहा उपदेशों से जनता- जगत के अन्तः करता रूपी मलों को धो २ कर साफ कर रहे हैं, और दूसरे नम्बर ये विचारे हरिजन लोग हैं, कि जो जनता जगत के द्वारा फैलाई हुई बाहरी गंदगी को दूर करके उनको सदा पवित्र बनाये रखते हैं। इस प्रकार ये दोनों महापुरुप मिल कर संसार की बाहिर तथा भीतरी शुद्धि को सदा बनाये रखते हैं। मनुष्य इन हरिजन को अछूत बनाये रखने में ही अपना गौरव समझता हो, उसको लना रूपी समुद्र में डूब मरना चाहिये, क्या किसी एक भी देश का उदाहरण बता सकते हो, कि जहां पर मनुष्य अछूत समझा जा सकता हो ? संसार में बड़े २ सभ्य राष्ट्र हैं, किन्तु किसी भी राष्ट्र निवासियों ने यह घोषणा नहीं की, कि मनुष्य अछूत है, फिर हमारे देश के पंडे पुजारियों में ही यह भावना कहां से भागई, कि जिसके द्वारा संसार का महान उपकार करने वाले करोड़ों की संख्या में रहने वाले भोले भाले हरिजनों को अछूत बना कर उनके मानव जीवन को नष्ट कर दिया। क्या इनका यह अन्याय उस दुष्ट कसाई से कुछ कम है, कि नो एक भोले जीव को अपने स्वार्थ के लिये उसके गले पर हुरी चलाने में तनिक भी संकोच नहीं करता। धन जो यदि कोई यह कहे कि हरिजन गंदा काम करते हैं अर्थात् मल मूत्र उठा कर साफ करते हैं, तो प्यारे भाइयो! क्या मल मूत्र उठाने में या सफाई का काम करने में कोई पाप होता है ? देखो! तुम लोग नित्य शौचादि के निमित्त पाखाने में जाते हो, उसमें जब तक शौच से निवृत्त न । १४२ ) हो जावे तब तक बैठा रहना पड़ता है, फिर तुमको अपनी गुन्द्रिय को तथा मल त्याग इन्द्रिय को अपने हाथ से साफ करना पड़ता है। इस प्रकार प्रति दो टेम तो मेहतर का काम समी जीवों को करना पड़ता है, किन्तु कोई भी श्रादमी तुम में से अपने श्रापको गेहतर नहीं कहता, सब लोग अपने नामों के साथ में शर्मा तथा वर्मा का पद लगाये बैठे हो। फिर और देखो। तुम्हारे घरों में तुम्हारी लियां सब अपने बच्चों की रहियां अपने हाथ से साम करती हैं, उनके गंदे कपड़े घोती है, किन्तु कोई भी तुम में से उनको मेहतरानी नहीं कहते । ये पियां अपने परिवार के बच्चों की तो रट्टियां उठा लेती हैं, किन्तु दूसरे परिवार के बचों की टट्टी उठाने में मणा करती हैं। क्योकि इनकी श्रात्मा शक्ति केवल अपने परिवारिक भावना में ही समात हो जाती है। किन्तु जिन मनुष्यों की आत्म शक्ति बढ़ जाती है वह जगत में विश्व बन्धु की भावना लेकर सेवा करता है। इसी प्रकार ये हरिजन लोग भी अपनी राष्ट्रीय भावना में बंधे हुए जनता जगत को अपना परिवार समझते हैं, और आप लोगों को अपनी इस परिवारिक भावना से अपना बाल बच्चे समझते हैं, तथा श्राप लोगों की रही पेशाब साफ करते हुए श्रापकी गंदगी दूर करके श्रापको अनेक प्रकार के रोगों से बचाते हैं। यदि ये हरिजन लोग एकत्रित होकर आपकी टट्टी पैशाब उठाना चन्द करदें, तो आपका सारा संसार नरकालय बन जावेगा। फिर आपको स्वयं वही पेशाब उठाना पड़ेगा, और हर एक के लिये मेहतर बनना पड़ेगा। अत: आप लोग व्यर्थ इनको अछूत बना कर अपने शिर पर कलंक का टीका क्यों , लगाते हो ? फिर यदि आप लोग ये कहें कि ये हरिजन लोग सदा गंदे क्यों रहते हैं ? तो इसका कारण यह है कि श्राप लोगों ने इनके साथ इतने अन्याय तथा अत्याचार किये हैं कि जिसकी कोई हद नहीं है, आप लोगों की ये जितनी सेवा करते हैं उतना आप लोग उनको फल नहीं देदे हैं अर्थात् आपकी ओर से न इनको खाने पीने का सुपाश है और न पहिनने तथा ( १४३ ) तो रहने का ही मुपाश है। कहीं आपने ऐसा भी प्राणी देखा है कि जिसको सर्व प्रकार का सुख होते हुए भी फिर अपने श्रापको गंदा बनाये रखे। मेरी समझ में तो ऐसा कोई भी प्राणी देखने को न मिलेगा। किन्तु आप लोगों के अन्याय अत्याचारों के कारण तथा आप लोगों के द्वारा निर्धारित किये हुए कठिन प्रतिबन्धों के कारण ही अाज भारत की १६ करोड संतान फूट २ कर श्रापको कोस रही है, तो फिर क्या आप इनके श्रार्तनाद से सुखी हो सकते हैं ? अतः भाइयो! अब तो विचारे गरीब जीवों के वे कठिन प्रतिबन्ध तोड़दो। और इनको मनुष्योचित अधिकारों की व्यवस्था करो अाज अन्य देशों को देखो। क्या वहां पर कोली, चमार तथा मइतर नहीं हैं कहना पड़ेगा कि सब कुछ हैं। किन्तु वहां पर कोई भी यादमी गंदा नहीं नहीं है। क्योंकि उन लोगों ने इनको सर्व प्रकार का सुपाश दे रखा है। देखो। वे लोग समय के अनुसार अपनी ड्यूटी देते हैं. ज्य टी देने के पश्चात् सब को तेल साबुन तथा बाथ रूम (नहाने के क्रमरे) की व्यवस्था है, कपड़े बदलने की व्यवस्था है, होटल में जाकर सत्र के हाथ बैठकर खाने की व्यवस्था है, गिरिल घर में जाकर सब के साथ भगवान की प्रार्थना करने की व्यवस्था है, राजनैतिक तथा सामाजिक क्षेत्र में भाग लेने की व्यवस्था है। कहने का अभिप्राय यह है जिउन देशों के लोगों में किसी भी व्यक्ति के साथ में कोई अन्याय तथा अत्याचार की भावना नहीं है। क्योंकि वहां पर प्रत्येक मनुष्य को अधिकार है कि वह राजनैतिक, सामालिक तथा धार्मिक प्रत्येक क्षेत्र में जा सकता है, और मनुष्योचित अधिकारों को प्राप्त कर सकता है। यही कारण है कि वहां के लोग सर्व प्रकार के सेवा सम्बन्धी कार्यों के करते हुए भी कोई अछूत (गंदा) नहीं रहा । मानव जीवन के उचित अधिकारों को प्राप्त किये हुए सहर्ष जीवन व्यतीत कर रहे हैं। किन्तु यहां पर हरिजनों के साथ में इतने अन्याय तथा अत्याचार किये गये है, कि जिनकी कोई सीमा नहीं है। मनु० अध्याय १० मन्त्र २५ में लिखा है। सन लोग ( १४४ ) उच्छिष्ट मन्नं दातव्यं जीर्णानि वसनानि च । पुल्काश्चैव धान्यानां जीर्णाश्चैव परिच्छदः ।। अर्थात्:-शूद्र को भोजन के लिये जूठा अन्न, पहिनने के लिये पुराने वस्त्र तथा बिछाने के लिये धान का पुयाल एवं पुराने गुदड़े आदि देना चाहिये। फिर लिखा है कि- न शूद्राय मति दद्यान् नोच्छिष्टं न हविष्कृतम् । न चास्योपदिशेद्धर्म न चास्य व्रतमादिशेत् ॥ यो ह्यस्य धर्म माचण्टे यश्चैवादिशति व्रतम् । सौऽसंवृतं नाम तमः सहते नैव मजति अर्थात्:-शूद्र को बुद्धि नही देनी चाहिये। अपने सेवक के अतिरिक्त दूसरे शूद्र को जूठन तया हव्य के हुतावशिष्ट भाग को न देवे । शूद्र को धर्म उपदेश न करे, अथवा उसे किसी व्रत का भी उपदेश न देवे । जो पुरुष शूद्र को धर्मोपदेश वा प्रायश्चित्तादि किसी व्रत का उपदेश करता है, वह उस शूद्र के साथ असंवृत नाम नरक में डूबता है। अब पाठक विचार कर सकते हैं कि जब शूद्रों के लिये इतनी कठिन व्यवस्था करदी है । तब ये बिचारे क्या उन्नति कर सकते हैं, और यदि कोई उन्नति भी करे तो इनके लिये कठिन २ दंड विधान किये गये हैं। अर्थात् जिस प्रकार ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्टता बता कर संसार सम्बन्धी सारे भोग भोगने का ठेका ले लिया, इसी प्रकार बिचारे शूद्र को संसार के सारे सुखों से पृथक् करके सब से गया बोता नीच से भी नीच बना दिया। इस प्रकार बिचारे भोले जीवों को सब प्रकार से अपने बन्धन में डाल कर नर पशु बना लिया। पहिले इन मनुष्यों को शूद्र कह कर शरीर सम्बन्धी सारे कार्य लिया करते थे किन्तु इनके लिये अछूत कहीं नहीं समझा जाता था। कल जो मनुष्य इनको अछूत समझ रहे हैं, उसका कारण क्या ? तो कहना पड़ेगा, कि वही अन्याय तथा अत्याचार का फल है कि जो इनको कई प्रकार अब आज , ( १४५ ॥ प्रतिबन्ध बना २. कर जकड़ लिया था। अब जो मनुष्य यह कहते हैं, कि इन लोगों की गंदगी को देखकर अछूत समझ लिया। तो प्यारे भाइयो ! इसमें दोष किसका है, आप जैसे इनसे काम लेते हो वैसा इनको फल क्या देते हैं ? वही झूठी रोटी, वह भी पेट भर कर नहीं; फटे पुराने कपड़े वे भी पुष्कल नहीं, रहने को गांव या नगर से बिल्कुल वाहिर और फिर भी मकान श्रादि की कोई व्यवस्था नहीं, नहाने की तो कौन कहे नव विचारों को पीने के लिये शुद्ध पानी ही नहीं, पढ़ने लिखने की तो यात ही क्या, जब विचारे को सत्य उपदेश सुनने का ही अधिकार नहीं। और तिस पर सबसे बड़ा अत्याचार यह है कि उसको सामाजिक, धार्मिक तथा राजनैतिक किसी भी विषय में उसको प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं। ऐसी स्थिति में पद विचारा गंदा न रहे तो क्या करे ? अतः जनता जगत को चाहिये कि वह इन हरिजनों को प्रत्येक वस्तु का सुपाश तथा प्रत्येक क्षेत्र में कार्य करने का अधि- कार देते हुए इस अछूत रूपी कलंक के टीके को शीघ्र ही समाप्त करदे । क्योंकि किसी भी देश तथा सभ्य राष्ट्रों में मनुष्य के रूप में अछूत नहीं देखा जाता है। आज लोग अछूतोद्धार ! अछूतोद्धार !! तो चिल्लाते हैं, किन्तु वास्तविक में अछूतोद्धार क्या चीज है ? इस पर ध्यान नहीं देते। श्राजकन का अछूतोद्धार भी केवल चिल्लाने वालों के पेट तक ही सीमित रह जाता है । क्योंकि यह बात प्रत्यक्ष में देखी जाती है कि जो मनुष्य अछूतोद्धार का बहाना लेकर सामने आता है। और जनता जगत को अछूतोद्धार का पाठ पढ़ाता है, तब जनता के सामने वह सौ दो सौ अछूतों को एकत्रित करता है और हलुवा पुड़ी श्रादि किसी भी चीज़ को बनवा कर उन अछूतों के हाथ जनता के सौ, दो सौ श्रादमियों में बटवा देता है। और ज्यादा से ज्यादा अछूतोद्धार करते हैं तो सौ, दौ सौ अछूतों को एकत्रित करके किसी मन्दिर या देवालय में प्रवेश कर देते हैं बस यहीं पर इनका अछूतोद्धार समाप्त हो जाता है। तो प्यारे भाइयो । यह अछूतोद्धार न तो अछूतों को ही हित कर ( १४६ ) है, और न जनता जगत को ही हितकर है ।, यह अछूत क्यों है ? इस बात पर जब तक विचार न किया जायगा, अर्थात् इनका अछूतपना जब तक शरीर से दूर न किया जायगा, तब तक वास्तविक में अछूतोद्धार न होगा ! इसलिये बुद्धिमानों का कर्तव्य है कि वे सब से पहिले इनकी गंदगी को कि जिसके कारण ये बिचारे अछूत कहला रहे हैं उसको दूर करें। । यह गंदगी कैसे दूर होगी ? तो जाने रहो, यह गंदगी केवल अछूतोद्धार अछूतोद्धार चिल्लाने से अथवा उन अछूतों को उपदेश देने मात्र से ही दूर न होगी। क्योंकि उपदेश तो केवल श्रद्धा दिलाने के निमित्त ही होता है, किन्तु यथेष्ट फल की प्राप्ति तो करने से ही सिद्ध होती है । अतः उपदेश देने के साथ ही साथ उनके लिये तथा उनके लड़कों के लिये स्थान पर जहाँ २ हरिजनों की कोलोनी हैं वहाँ २ पढ़ने के लिये सुन्दर व्यवस्था की जावे, भोजन के लिये सुन्दर प्रबन्ध किया जावे। वस्त्रों की ठीक व्यवस्था की जावे, रहने के लिये साफ मकानों का प्रबन्ध किया जावे, जल के लिये उनकी कोलोनी में सुन्दर कूप निर्माण किये जावें। इस प्रकार उनको प्रथम शारीरिक सुपास देकर उनको गंदगी कि जिसके कारण ये लोग अछूत माने गये हैं उसको दूर करके फिर इनको राजनैतिक, धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों में भाग लेने के अधिकारी समझे जावें। इससे पूर्व, यदि उनकी गंदगी दूर न करके इनको धार्मिक तथा सामाजिक क्षेत्रों में प्रवेश किये जायगे तो इनकी गंदगी के कारण समाज में भी वे ही दोप पाजावेंगे। समाज ने इनसे घ्रणा क्यों की ? तो कहना पड़ेगा, इनकी गंदगी से। और ये गंदे क्यों रहे ? तो कहना पड़ेगा, कि समाज के अन्याय तथा अत्याचारों से पीड़ित होकर उचित शारीरिक व्यवस्था तथा सुपाश न मिलने के कारण । अतः सबसे पहिले हमको इनके लिये हर प्रकार का शारीरिक सुपास देते हुए इनकी गंदगी को दूर करो, और कुछ समाज सुधारक इनकी कोलोनियों में जा जा कर इनको धार्मिक तथा राज नैतिक बातों से परिचय कराते हुए स्वच्छता तथा प्रकृतिक नियमों पर उपदेश दें, इस प्रकार जब इनकी शरीर की बाहिरी गंदगी दूर हो जावेगी तो समाज पर इनसे स्वयं ही घृणा न करेगी। हमारे यहां पर भूत पूर्व विदेशी ( १४७ ) गवर्नमेन्ट ने क्या किया था ? जब उसको अपनी शारीरिक सेवा के लिये कुछ व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ी तब उसने हमारे देश में मुसलमानों को तथा इरिजनों को अपनी सेवा के लिये खोज निकाला था। हरिजन उनके गृह सम्बन्धी परिचर्या के सभी काम करते थे, उनके टट्टी पेशाब भी साफ करते थे, घर की शुद्धि करते थे, विछौना विछाते थे, भोनन बना कर भी खिलाते थे, उनके साथ उनके गिरिजाघरों में भी लायाकरते थे। , कहने का अभिप्राय यह है कि ये लोग अंग्रेजों की गृह सम्बन्धी सारी सेवा करते थे। तो अब पूछना चाहिये कि वे गंदे रह कर उनकी सेवा किया करते थे? तो कहना पड़ेगा कि उन्होंने इन हरिजनों को सर्व प्रथम शारीरिक सुपाश की व्यवस्था की, अर्थात् उनको खाने, पीने तथा पहिनने का यथोचित प्रबन्ध करते हुए उनकी शारीरिक ऊपरी गंदगी को दूर कर दिया। फिर उनको राजनैतिक क्षेत्रों में प्रवेश करने के लिये तथा उनको मानुषी अधिकार देने के लिये जनता पर कई प्रकार के प्रतिबन्ध लगा कर अपने राजनैतिक क्षेत्र में इसके अछूतपन को दूर किया । यथा रेल गाड़ी में हरिजन सब के साथ बैठ कर सफर करते थे, नलों पर सबके साथ पानी भर सकते थे। स्कूल और पाठशालायों में उनके लड़कों को प्रवेश करके विद्या पढ़ा सकते थे। पढ़े लिखे हरिजनों के लिये राजनैतिक क्षेत्र में कार्य करने का पूर्ण अधिकार था, अर्थात् जैसे अन्य वर्ग के लोग तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यादिको को वाबू बनने का अधिधर था, उसी प्रकार इन हरिजनों को भी पूर्ण अधिकार था। अतः मेरी जनता जगत से तथा हमारी वर्तमान गवर्न- मेन्ट से अपील है कि वे इन हरिजनों को सर्व प्रथम इस गंदगी से दूर करें। अर्थात् उनको खाने, पीने नहाने धोने, रहने पढ़ने लिखने तथा हमारे साय बेठने उठने की उचित व्यवस्था करें तो यही अापका इन गरीबों के लिये सच्चा अछूतोद्धार होगा, और हमारे राष्ट्र पिता स्वर्गीय महामा गान्धीजी की श्राज्ञा का पालन करना भी कहा जावेगा। यदि श्राप इनके प्रति अपने खजाने में से पैसा पाई कुछ भी खर्च न करते हुए नाम मात्र के लिये अछूतोद्धार २ (१४८) बच्चे चिल्लाते रहेंगे तो आपका दिलाना ऐसा होगा कि जैसे कोई मनुष्य अपने दोनों हाथों की मुट्ठी बन्द करके किसी अनोध बालक को प्रलोभन देते दुए दौड़ता लिये चले, और वह बच्चा इनके प्रलोभन के मोह से मोहित हो कोसी उसके पीछे दौड़ता चला जावे और वह आदमी आगे जाकर अपने दोनों दायों की रीती मुट्ठी खोल कर बता दे और वह बच्चा उस श्रादमी का मुंह ताकते रह जावे। यही हाल अाज अाप अछूतों के साथ में कर रहे हैं, कि उनके लिये अपनी जेब में से कुछ खरच न करते हुए अछूतोद्धार २ चिल्ला रहे हो, तो आपको यह चिल्लाना इन हरिजनों के लिये ऐसा ही है, कि जैसा उस को लड्डु के लिये झूठा प्रलोभन देना। इसे चिल्लाने से दरिजनों को कोई लाभ न होगा। श्रतः जनता जगत तथा राष्ट्र का कर्तव्य है कि वे इन हरिजनों के लिये सच्चा अछूतोद्धार करके बतलावे, ताकि देश और राष्ट्र दोनों के माथे से यह अछूत रूपी वलंक का टीका सदैव के लिये दूर हो जावे । प्यारे पाठको। सच मानिये, वि.सी भी धर्म शास्त्र, देश तथा राष्ट्र में यह बात नहीं पाई जाती कि जहां पर मनुष्य अछूत देखे या सुने जाते हों। मेरी दृष्टि में तो भारतवर्ष में कुछ पंडे और पुजारियों को छोड़ कर मनुष्यों को अछूत कहने वाला दिखाई देता नहीं है, हां ? यदि मुझको कोई अछूत दृष्टि आता है तो ये सिह, विछू तथा सर्प आदि हैं कि जिनके छूने से ये काट खाते हैं, और मनुष्य को घोर पीड़ा होती हैं। किन्तु थे बिचारे हरिजन जो रात दिन जनता की सेवा में दृढ़ संलग्न रहते हैं, और ये जनता की सेवा में अछूत बने हुए हैं, बस यही एक शोक की बात हैं। श्रतः, इसका दूर करना मनुष्य मात्र का कर्तव्य है। २६. क्षात्र धर्म सुधार पूर्व में वर्ण व्यवस्था प्रकरण में पाठकों को लिख कर बता दिया गया है कि वेदों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों की जो कल्पना की गई है, वह मानव जाति के उच्च सिद्धान्तों को तथा राष्ट्र के नियमों को सुचारु रूप , ( १४६ ) से चलाने के निमित्त मनुष्यों के न्यारे २ गुण, कर्म तथा स्वभावों के अनुसार निर्धारित की गई थी.। यह गुण कर्म तथा स्वभाव के अनुसार चालू की गई वर्ण व्यवस्था जब तक मानव समाज में ठीक २ चलती रही तन तक संसार सम्बन्धी तथा राष्ट्र सम्बन्धी सभी कार्य विधिवत् पालन होते रहे, किन्तु पीछे जाकर यह गुण कर्म स्वभाव वाली वर्ण व्यवस्था नाश को प्राप्त होकर जन्म गत वर्ण व्यवस्था कायम फी गई, उसका परिणाम यह हुआ कि वादाण तथा क्षत्रियों को छोड़ कर सब के लिये उन्नति का मार्ग सदैव के लिये बन्द होता चला गया। विद्या, बुद्धि, कला कौशल तथा धन दौलत और संसार सम्बन्धी सर्व प्रकार के पदार्थों पर इन दोनों का ही प्रभुत्व दिखाई देने लगा, और वैश्य तथा शूद्र विचारे इनके बनाये कठिन प्रतिबन्धों के द्वारा मूक पशु की भांति अपना जीवन चलाने लगे। ब्राह्मण तथा क्षत्रियों का जब तक सम्पर्क बना रहा तब तक भी कुछ विद्या, बुद्धि की उन्नति होती रही। क्षत्रिय विद्वान होने के कारण ब्राह्मणों को भी अपनी विद्या बुद्धि तथा अध्यात्म शास्त्रों में प्रवृत्त होना पड़ता था । और इन दोनों वर्गों में परस्पर शालार्थ भी होता रहता था। इस प्रकार क्षत्रियों को ब्रह्ममपि बनने की अभिलाषा रहती थी, और ब्राह्मणों को सदा अपनी ब्रह्मऋषि पदवी को सुरक्षित रखने के लिये सावधान रहना पड़ता था । इस प्रकार परस्पर उन्नति के मार्ग को ग्रहण करते हुए विद्यादि सद्गुणों की बाढ़ सारे संसार में उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही थी। इसी का यह प्रताप था कि विश्वामित्र जैसे क्षत्रिय राजाधिराज को भी ब्रा- ऋषि बनने के लिये कितनी कठिन तपस्या करनी पड़ी थी और वशिष्ट जैसे वहानपि से इस पद की प्राप्ति के लिये, उसको कितने समय नीचा देखना पड़ा था। किन्तु कहावत प्रसिद्ध है कि पुरुषार्थी संसार में क्या नहीं कर सकता अर्थात् पुरुषार्थ करने से संसार में ऐसा कोई कार्य नहीं है कि जो सिद्ध न हो सके, बस इसी के प्रताप से विश्वामित्र ने अपने मनोभिलषित पद की प्रानि करली, और वशिष्ठ को भी विश्वामित्र के पुरुषार्थ के सामने झुकना पड़ा और उसको ब्रह्मऋषि की पदवी देनी पड़ी। उस समय क्षत्रियों को ही नहा- विद्या (Divine knowledge) प्राप्त करने के निमित्त बाहाणों के पास ( १५० ) धाना पड़ता था, सो बात नहीं है किन्तु मााणों को भी क्षत्रियों के पास में ब्रहाविद्या अध्ययन करने के निमित्त समय समय २ पर उपस्थित होना प्रमता था। इस बात को सब जानते हैं कि व्यारानी ने अपने पुत्र शुकदेव के लिये राजा जनक के पास में प्रात्म विषा सीखने के निमित्त भेजा था। इसी प्रकार उद्दालक ऋषि के पुत्र श्वेतकेनु ने अपने पिता से पंचाग्नि विद्या (जो पूर्व जन्म के सिद्धान्त जानने की परम विद्या है) उसके विषय में पूछा था तो उसके पिता ने कहा कि वेटा में इस विद्या को नहीं जानता, कैकय देश का नरेश इस विद्या को भली भांति जानता है तो उसके पास में चल कर यह 'विद्या अवश्य प्राप्त करना चाहिये। उन दोनों पिता पुत्रों ने जिस प्रकार उस नरेश के पास जाकर पंचाग्नि विद्या को अध्ययन किया, सो सब छांदोग्योप- निपद में पूर्ण प्रकार से वर्णन है सो पाठक वहां देख लेवें। ३ . - , कहने का अभिप्राय यह है कि जब तक वाहाण तथा क्षत्रियों में यह परस्पर विद्याऽध्ययन तथा अध्यापन की प्रणाली बनी रही तब तक नाहाय लोग भी पढ़ने पढ़ाने में लगे रहे और अनेकों प्रकार की विद्या प्रचार में दृढ़ संलग्न रहे। किन्तु समय सदा एक सा नहीं रहता। इन दोनों को मात्र नावश्यकता से अधिक धन तथा विद्या बुद्धि तथा संसार सम्बन्धी भोगैश्वर्य प्राप्त होने लगा, तब श्रालस्य तथा प्रमाद की वृद्धि हुई, और क्षत्रियों ने अपनी प्रभुता (धनैश्वर्य) तथा राज मद श्रादि से चूर हो विद्या पढ़ना छोड़ दिया, और राजवैभवादि मिथ्याभिमान में पड़ कर अविद्या रूपी घोर निद्रा में शयन करते चले गये, जब नाहाणों ने देखा कि क्षत्रियों ने विद्याऽध्ययन करना छोड़ दिया है तो फिर ये लोग क्यों पढ़ने में परिश्रम करने लगे, इस प्रकार अविद्या का क्षेत्र उत्तरोत्तर बढ़ता चला गया और ईश्वर और धर्म के नाम पर नाना प्रकार का घोखा चलने लगा। और सत्य विद्या तथा ईश्वरीय भावना शनै २ हास को प्राप्त होती हुई रसातल को कूच करने लगी। इन ब्राहाणों ने देखा कि हमको गांठ के पूरे और आंख के अन्धे क्षत्रिय रूप शासक वर्ग यजमान मिल गये हैं तो फिर इन्होंने इन पर खूब माया की कर- जन 1 ( १५१ ) . तूत चलाना शुरू किया गया और इन से कितने ही प्रकार के राजनैतिक प्रबन्ध अपने स्वार्थ के लिये चालू कराये गये, इस प्रकार संसार में वैश्य तथा शूद्र समाज के लिये परमार्थिक सर्व प्रकार की उन्नतियां सदैव के लिये बन्द करदी गई। - अब पाठकों को पता लग गया होगा कि क्षत्रिय समाज का पतन क्यों हो गया ? तो इसका कारण यही कहा जा सकता है कि अविद्या देवी का ही यह प्रताप है। यह अविद्या देवी सदा सीधी बात को उलटी बनाती रहती है, यह अविद्या जिस देश व नाति में उत्पन्न हो जाती है, बस उसको शीघ्र ही नाश कर डालती है। यह अवकाश पाकर बड़े २ ज्ञानी तथा ध्यानियों को भी धोखे में डाल दुखी कर डालती है। अतः प्राणी मात्र का कर्तव्य है कि इससे सदा बचने की चेष्टा करते रहें। क्षत्रियों में जन विद्या प्रचार की कमी होगई और अनेक प्रकार के भोगेश्वर्य तथा पृथ्वी का राज मिल गया तो स्वतः ही ग्रालस्य तथा प्रमाद को स्थान मिलना चाहिये। इस बालस्य तथा प्रमाद में फँस जाने के कारण इनमें अनेकों प्रकार के दुर्व्यसन भर गये, कोई मांस मदिरा में रत होगये, कोई अफीम तथा भंग खाकर नशे चूर हो गये, तो कोई कबूतर, शशक तथा लोमड़ी ग्रादि के मारने में ही अपनी वीरता का परिचय देने लगे। तो कोई २ इनमें से प्रजा के रक्त चूसे २ कर पेट पालने को ही मुख्य कर्तव्य मान बैठे । इस प्रकार यह क्षत्रिय जाति जो सब जीवों की रक्षा के लिये नियुक्त हुई थी वह अब सबको घातक प्रतीत होने लगी। श्रीमद्भगवद्गीता में क्षत्रियों के पालन करने के लिये निम्नलिखित प्रकार से वर्णन किया गया है यथा:- में . शौर्य तेजो धृतिदीक्ष्यं, 'युद्धे चाप्यऽपलायनम् । दानमीश्वर भावरच, क्षात्र कर्म स्वभावजम् ॥ अर्थात्-~बहादुरी, तेज, धृति, चतुरता, युद्ध से न भागना; दान देना तथा ईश्वर भावनायें क्षत्रियों के स्वभाविक कर्म बतलाये गये हैं । इसी ( १५२) । 7 प्रकार मनुस्मृति (Religious Law) श्रादि में भी क्षत्रियों के पालन करने के लिये नियम वर्णन किये गये हैं। ये क्षत्रिय लोग पूर्व नमाने में प्रजा की सब प्रकार से रक्षा किया करते थे, और मानव समाज की मुख्यवस्था के लिये ये अपने प्राणों तक को न्योछावर करके जनता जगत के कल्याण फरने को सदैव तत्पर रहा करते थे और इन्दी सद्गुणों के कारण इनका नाम क्षत्रिय रखा गया था। आज कल ये ही क्षत्रिय लोग राजपूत नाम से पुकारे जाते हैं। क्षत्रियों का नाम राजपूत क्यों पड़ा ? इस पर विद्वानों के कई प्रकार के मत प्रचलित है। वेद शास्त्रों में क्षत्रियों के लिये राजपूत शब्द का प्रयोग किसी भी स्थान पर देखा नहीं जाता, अमर कोप जो संस्कृत का मूल कोष है, उसमें क्षत्रियों के पर्यायवाचक शब्द निम्न लिखित प्रकार से वर्णन किये गये हैं। मूर्धाभिपिक्तो राजन्यो बाहुनो क्षत्रियो विराट् । राजा राट् पार्थिवक्ष्मा भृन्न प भूप महीक्षितः ।। अर्थात्:--मू पिक्को, राजन्य, बाहुज, क्षत्रिय, विराट, रामा, राट्, पार्थिव, क्ष्माभृत, नृप, भूप और महीक्षित् ये क्षत्रिय शब्द के पर्याय वाचक हैं। देखियेः-इनमें कहीं राजपूत शब्द का तदर्थक कोई भी अन्य शब्द नहीं श्राया है। इसी प्रकार आजकल जो क्षत्रियों ने अपने नाम के साथ सिंह लगा रखा है सो यह सिंह शब्द भी प्राचीन काल में क्षत्रियों के नाम के साथ में कही भी लगा हुआ दिखाई नहीं देता। चन्द्र बंशी तथा सुर्यवंशी श्रनेको प्रकार के शूरवीर राजा हो गये किन्तु किसी के नाम के साथ सिंह शब्द लगा हुआ दिखाई नहीं देता। इससे ज्ञात होता है कि क्षत्रियों में राजपूत तथा सिंह शब्द का प्रयोग मुसलमानी शासन काल से प्रचलित दीख पड़ता है। शब्द सम्भव है कि पृथ्वीराज तथा जयचन्द के शासन काल पीछे ही नियुक्त हुया विदित होता है। भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों ने इस राज- पूत काल का ऐतिहासिक दृष्टि से पूर्णतः पता लगा लिया है। जिस काल में इस जाति का भारत के राजनैतिक क्षेत्र में पदार्पण हुआ, उस काल में यह ये ( १५३ एक नवागन्तुक समझी जाती थी। बंगाल के अद्वितीय विद्वान स्वगीय रमेश चन्द्र दत्त महोदय अपने (Civilization in Ancient India) नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ में लिखते हैं कि:- - The Rajputs were scarcely reckoned am. ong Aryan Hindus before the eighth Century. We find no mention of tbis name in the literature of the country or in the records of foreign travellers and no traces of their previous culture Dr. H. H. Willson has held that they were the descendents of the Sakas and other invaders who swarmed into India for centuries before the time of Vikramaditya (Vol. II. Page 164) अर्थात्:-आठवीं शताब्दी के पूर्व राजपूत जाति आर्य हिन्दू नहीं समझी जाती थी। देश के साहित्य तथा विदेशी पर्यटकों के भ्रमण वृतान्तों में उनके नाम का उल्लेख हम लोगों को नहीं मिलता और न उनकी किसी पूर्व संस्कृति के चिन्द ही देखने में अाते हैं। डाक्टर एच० एच० विल्सन ने यह निर्णय किया है कि ये राजपूत उन शक अादि विदेशीय अाक्रमण कारियों के वंशधर हैं कि जो विक्रमादित्य से पहिले, सदियों तक, भारत में झुन्ड के सुन्ड श्राए थे। विद्वान् लोग जो कुछ भी इन राजपूतों के विषय में सममें सो समझे। किन्तु इसमें सन्देह नहीं है कि यह राजपूत जाति अपने जमाने की एक बहुत ही पराक्रमशालिनी, विजयी तथा वीरप्रसू जाति सिद्ध हुई है। जो अपनी वीरता के कारण सर्वदा क्षक्षिय कहलाने के योग्य है । इस जाति ने मुसलमानों के उत्थान के मध्यवर्ती काल में जिसको राजपूत काल कहा जाता है, और जिस का मान लगभग ५०० वर्षों का माना जाता है। उस समय इन लोगों ने अपने विजय नाद का डंका भारतवर्ष के एक छोर से दूसरे ३ ।

छोर तक बजवा दिया था। महाराजा पृथ्वीराज, राणा संग्राम सिह तथा वीर केशरी राणा प्रताप सिंह इसी वीर जाति में पुरुष सिंह पैदा हुए थे कि जिनका प्रातः स्मरणीय नाम भारत के कोने २ में निनादित होता हुआ उनकी यशोकीर्ति पताका फहरा रहा है। और जिनके भय से भयभीत हो महमूद गौरी आदि विदेशी आक्रमणकारी भी लोहा मान गये थे। इन सत्र का मूल कारण इनकी ओर से प्रजा की सद्भावना ही थी । पूर्व जमाने से क्षत्रिय लोग प्रजा को अपने प्राणों से भी अधिक प्यारी समझते थे, वे लोग तनिक भी अपनी प्रजा के कष्ट को सहन नहीं कर सकते थे। यदि कोई अन्यायी, अत्याचारी तथा आक्रमणकारी दुष्ट मनुष्य' अपने अन्याय तथा अत्याचार से जनता जगत को तनिक भी दुखित करते थे तो ये लोग अपने हाथ में तलवार ले अन्यायी तथा दुष्ट अाक्रमणकारियों को दमन कर सदा रक्त की नदी बहाने को तत्पर रहा करते थे। किन्तु शोक है ! कि आज कल ये क्षत्रिय लोग अपने परम पुरुषार्थ सिंह स्वरूप को भुला कर प्रजा को इतना दुखी तथा विपत्तियो से ग्रसित होने पर भी दुख दूर करने की चेष्टा नहीं करते । और अविद्या देवी की गोद में सुख की ऐसी खर्राटे युक्त नींद सो रहे हैं कि तोप के गोले की अावाज का भी पता नहीं लगता। म इसमें सन्देह नहीं कि मुसलमानों के उत्थान के मध्यवर्ती काल तक तो क्षत्रिय लोग अपनी तलवार का परिचय कराते हुए शत्रुओं के दांत खट्टे करते रहे, और समय २ पर अपनी बहादुरी का परिचय देते रहे । किन्तु जैसे ही मुसलमानों का शासन काल समाप्त हुआ और विदेशी गवर्नमेन्ट का बोल बाला भारत में हुआ, तैसे ही राजपूतों की तलवारों को मोर्चा (जंग) लगना शुरू हो गया। और ये लोग धीरे २ हुकूमत के मद में चूर हो नाना प्रकार के विषय भोग भोगने में दृढ़ संलग्न हो गये, प्रजा की अोर का इनको कुछ भी ध्यान न रहा। सरस्वती तथा शक्ति दोनों का ह्रास होने लग गया, क्योंकि (Sarswati and Shakati dwell not with Bhoga) भोगों का दास हो जाने पर सरस्वती और शक्ति दोनो दूर भाग जाती हैं ।

१५५ भोग लिप्सा अधिक बढ़ जाने के कारण मांस तथा मदिरा में प्रवृत्ति होने लगी। और मदिरा के नशे में चूर हो एक नशेबाज का जैसा जीवन बनता चला गया । इतने से नशे से ही ये लोग सन्तुष्ट न हो पाये, किन्तु साथ ही साथ अफीम तथा पोस्त यादि का सेवन करते २ पूरे अफीमची बन बैठे। इस प्रकार के नशों ने क्षत्रियों के जीवन को वेकार तथा निकम्मा बना दिया। श्रान हम देखते हैं कि संसार में पार्थिक स्थिति जितनी क्षत्रियों की कमजोर है, उतनी और किसी वर्ग की नहीं देखी जाती। इसका कारण यह है कि ये लोग संसार सम्बन्धी नाना प्रकार के विलास प्रियता के भोगों में फंसे रहने के कारण तथा अनेकों अनुपयोगी दुर्व्यसनों में तथा मादक पदार्थों को अधिक सेवन करने के कारण अार्थिक स्थिति के संकटों में सदा प्रसित रहते हैं। मैंने इनमें से कितने ही बड़े २ जागीरदारों को तथा भूमिपतियों को देखा है कि इन लोगों के पास में बड़ी २ जागीरें तथा मान प्रतिष्टा होते हुए भी कर्जदारों के झमेले में फँसे ना रहे हैं, हजारों रुपयों का कर्जा लेने पर भी इनका काम नहीं चलता। यदि इतनी जागीर किसी वैश्य के हाथ, में श्राजावे तो वह थोड़े ही समय में उससे लाखों रुपया कमा कर करोड़पति तथा लखपति बनकर दिखला सकता है। किन्तु इन लोगों का इन नागीरों से स्वयं ही कार्य नहीं चल सकता है। फिर लखपति तथा करोड़पति की तो बात ही क्या है। इसका कारण क्या है ? तो कहना पड़ेगा वही अपनी सम्पति का दुरुपयोग तथा पुरुषार्थ का अभाव । मैंने इस प्रकार के कई क्षत्रिय परिवारों को देखा है कि श्रावश्यकता से अधिक मांस मदिरा तथा अफीम अादि सेवन करने के कारण बड़ी २ जागीरें होते हुए भी दरिद्री तथा कंगाल बने हुए हैं। और किसी भी प्रकार के संसार सम्बन्धी उन्नति के कार्य करने को समर्थ नहीं होते। किन्तु रात दिन खाने पीने की चिन्ता ही में सदा तल्लीन न रहते हैं। प्यारे पाठको ! याद रखो, जिस किसी भी परिवार में यह नशे आदि का दुव्र्यसन घुस जाता है कि बस वह उस परिवार को थोड़े ही समय में दरिद्री १५६ , तथा कंगाल बना शोघ्र ही समाप्त कर डालता है, मैंने क्षत्रियों में देखा है कि ठाकुर साहब जितना अफीम नित्य प्रति खाते हैं उतना ही ठकुरानी साहिब, कुवर साहिन तथा कुवरानी साहिब भी सेवन करती हैं और तिस पर मदिरा यादि का सेवन तो लगातार बना ही रहता है, और तिस पर संसार के अनेकों विषय भोगों में तल्लीन, ऐसी स्थिति में यह सारा परिवार रोगों का दास बन जाता है। और आलस्य तथा प्रमाद का पुजारी बनने में तो सन्देह ही क्या है। और फिर इन्ही दुर्व्यसनों के साथ २ बीड़ी, सिगरेट तथा तमाखू आदि का पीना। इससे शीघ्र ही फेफड़े खराब हो जाते हैं अल्प समय में ही राजयक्षमा (टी. बी.) ग्रादि का शिकार होना पड़ता है और द्रव्य की जितनी हानि होती है यह तो प्रत्यक्ष ही है। कहां तक कहें यदि सचमुच पूछो तो क्षत्रियों का पतन ही इन दो कारणों से हुआ है। पहिला विद्या न पढ़ना और दूसरा मादक (नशे सम्बन्धी) पदाथों में अधिक शासक्त होजाना। इन दो वातों ने क्षत्रियों को रसातल में बैठा दिया, इतना सब कुछ होते हुए भी क्षत्रिय लोगों की बाभी तक याखें नहीं खुल रही हैं, और उसी प्रकार अविद्यो रूपी देवी की गोद में शयन करते हुए नाना प्रकार के मादक सम्बन्धी भोगों के भोगने में ही इतिश्री मान रहे हैं। श्रतः क्षत्रियों को चाहिये कि वे अपने सिह स्वरूप का परिचय राष्ट्र की सेवा में सिंह बन कर देना प्रारम्भ करें, और ये विषय विकार तथा नशे सम्बन्धी पदार्थों को शीघ्र ही अपने शरीर से दूर करें। यदि श्राप लोग इस समय सचेत न होकर राष्ट्र की सेवा में तल्लीन न होंगे तो आपके इस क्षात्र धर्म को भी लोग रद्दी कागज की तरह रद्दी खाने की टोकरी में उठाकर फेंक देंगे। आशा है कि क्षत्रिय लोग मेरी इस बात पर अवश्य ध्यान देंगे और अपने शरीरों से नशे सम्बन्धी पदार्थों को दूर करते हुए अपनी स्वसंतानों को योग्य शिक्षा से सुशिक्षित बनावेगे। ब्राह्मण का,जीवन जिस प्रकार विषय विकार तथा आवश्यकता से कहीं अधिक भोग विलास से दूर रहना चाहिये, ( १५७ ) " उसी प्रकार क्षत्रियों को भी अत्यन्त भोग लिप्सा करना ठीक नहीं है। क्योंकि अधिक भोग भोगने से शरीर में कोमलता पाती है, और एक प्रकार की उत्तेजना पैदा होती है कि जो ब्रह्मचर्य के लिये बहुत ही हानिकार सिद्ध हुई है। सैनिक विभाग में सैनिकों के लिये इस बात का सदैव ध्यान दिया जाता है कि उनका जीवन भोग सम्बन्धी पदार्थों में पड़ कर कोमल न बन जावे, और उनको ऐक्टिव (active) बनाये रखने के लिये कई ड्रिल तथा फिजिकल एक्सरसाइज कराते ही रहते हैं। क्षत्रियों का जीवन भी सैनिक की भांति ही हुआ करता है। सच्चा क्षत्रिय ही वास्तविक सैनिक कहला सकता है। और देश को पालादी का सच्चा पाठ पढ़ा सकता है। देश की आजादी को सुरक्षित रखने के लिये सच्चे क्षत्रियों की बहुत श्रावश्य- कता है। अतः आप लोगों को भोगों से दूर रहते हुए सच्चे क्षात्र धर्म के दांचे में टलना भी बहुत अावश्यकीय है। शास्त्र में क्षत्रियों के लिये श्राखेट करने की जो अाज्ञा दी गई है, उसका कारण भी यही था कि क्षत्रियों में शौर्यता, वीरता तथा तेजस्विता आदि सद्गुणों की वृद्धि उतरोत्तर होती रहे। किन्तु अाजकल क्षत्रिय लोग अपने इस अाखेट वर्म को भी भूल कर इनका दुरुपयोग कर रहे हैं। यह आखेट कर्म (Hunting) क्या है तथा इसका सदुपयोग क्या था सो सुनिये:- ग्राज अाजकल क्षत्रिय लोगों ने ग्राखेट कर्म का रहस्य केवल छोटे २ जानवर विल्ली, चूहा, कबूतर, शशहा (खरगोश), हिरण तथा बकुला श्रादि पशु पक्षियों के मारने में ही अपना गौरव समझ रखा है। किन्तु याद रखो क्षत्रियों के लिये इन विचारे तुच्छ निरपराध जीवों को मारना श्राखेट नहीं कहा जाता है। मैं पहिले पाठकों को बता पाया हूँ कि क्षत्रिय शब्द का अर्थ प्रजा की तथा जीवों की रक्षा करना ही कहा जाता है। इसलिये क्षत्रियों के इस याखेट कर्म से भी प्रजा को सुख तथा जीवो की रक्षा होनी चाहिये, सो कैसे होता है सो सुनियेः --याखेट कर्म का अर्थ छोटे जीवों को मारना नहीं किन्तु हिंसा के जन्तु जैसे- व्याघ्र, तथा भालू अादि जो जनता को तथा - १५८ ) जीवों को दुख पहुंचाते हैं, इनको मारना ही आखेट कर्म कहा जाता है। फिर अपनी बहादुरी तथा हिंसा परिचय के लिये भी इन हिंसक जन्तुओं को मारना ही उपयुक्त विदित होता है। अब यदि ये लोग केवल कबूतर, बिल्ली, चूहा तथा चिउँटा चिउटी के मारने में ही अपनी बहादुरी का परिचय देने लग जायगे, तो फिर जब इन लोगों को किसी समय सिंह का सामना करना पड़ेगा तो ये लोग उसके सामने कैसे ठहर सकेंगे। आजः क्षत्रियों का कर्तव्य है कि ये लोग ऐसे निरपराध जीवों को न मार कर केवल हिंसक तथा दुखदाई जन्तुओं को ही प्रजा हितार्थ श्राखेट द्वारा हनन किया करें। इनमें से बहुत से भोले भाले मनुष्य यह कहा करते हैं कि हम छोटे २ जानवरों की ग्राखेट इसलिये किया करते हैं कि इससे हमको शस्त्र अस्त्र चलाने का अभ्यास हो जाता है। किन्तु इनका यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि जीवों को मारने से किसी को भी शस्त्र अस्त्र चलाने का बोध नहीं हुआ करता है, इसके लिये तो प्रथम कृत्रिम पदार्थों द्वारा अभ्यास करना पड़ता है। देखिये जब कोई देहाती सैनिक सेना विभाग में नया भर्ती होकर जाता है तो उसको बन्दूक आदि चलाना सब ही विधिपूर्वक सिखलाया जाता है; क्या उनको बन्दूक श्रादि का निशाना बनाने के लिये जानवर आदि मारना पड़ता है ? तो कहना पड़ेगा कदापि नहीं। इसके लिये उसकी चान्दमारी के रूप में कई प्रकार के लक्ष्य (निशान) बनाना पड़ता है और इस प्रकार अभ्यास कराते २ एक दिवस बस हन्टर (Hunter) तथा शूटर (Shooter) बन सकता है । अतः क्षत्रियों का कर्तव्य है कि वे लोग आखेट के नाम पर छोटे २ निरपराध जीवों को न मार कर हिंसक (मोटे जीवों) को प्रजा हितार्थ मृगया किया S करें। इसके अतिरिक्त क्षत्रियों में एक और कुप्रथा पाई जाती है कि जिसको पर्दा सिस्टम कहा जाता है, यह पर्दा सिस्टम भी मुसलमानी शासन काल से ही चालू हुआ प्रतीत होता है क्योंकि इससे पूर्व क्षत्रियों में किसी 'समय भी पर्दा प्रथा दिखाई नहीं देती । इससे क्षत्रियों का इस समय कितना १५.६ . अनिष्ट हो रहा है बद्द किसी से छुपा नहीं है। इस दुःख का अनुभव तो उस कैदी को ही हो सकता है कि जिस किसी विशेष कठिन प्रतिबन्ध के द्वारा चहार दिवारी की कठिन फोटरी में बन्द होने की याज्ञा दी गई. हो । च्या हमारे देश की शूरवीर क्षत्रानियों की दशा इस कैदी से किसी प्रकार से कम है कि जिनकी शारीरिक, मासिक तथा यात्मिक सर्व प्रकार की उन्नतियां चार दिवारी में बन्द रहने के कारण कोई भी विकास को प्रात नहीं होती। कितने गरीब क्षत्रियों के घरों में ये देवियां पुष्कल पानी के अभाव में भी सदा दुखी रहती है, समय पर न स्नान करने की ही व्यवस्था है, और न वन्न साफ करने की। पर्दा सिस्टम के कारण कई बातों में इन देवियों को नर्क का जैसा दृश्य देखना पड़ता है। संसारी वातावरण से तो ये सदा अपरिचित रहती हैं। श्राज इस पर्दा सिस्टम के कारण ही नत्रानियों में विद्या प्रचार की कमी रही। यदि इनमें ये कुप्रथा न होती तो क्या हमारे क्षत्रियों के घरों में ये देवियां साक्षरी न होती, अाज अन्य वर्गों में ब्राह्मण तथा वैश्यों में तथा अन्य जातियों में देखिये! कितनी अधिक लड़कियां विदुषी पद प्राप्त कर बी० ए० तथा एम० ए० पास कर २ के प्रति वर्ष स्कूल तथा कालेजों से निकल रही हैं। यदि ये भयङ्कर कुप्रथा क्षत्रियों में न होती तो क्या ये क्षत्रिय देवियां तथा इनकी पुत्रियां वी० ए० तथा एम० ए० पास कर के सैकड़ों की संख्या में विदुषी पद प्राप्त न करती। जब क्षत्रिय देवियों में तथा कन्याओं में विद्या प्रचार की कमी रही तो इनके पुत्रों में भी विद्या प्रचार की कमी होनी चाहिये। श्राज अन्य वर्ग के पुत्रों की शिक्षा के विषय में देखें और फिर उन्हीं का समानाधिकरण इन क्षत्रिय बालकों से करें तो क्षत्रिय बालकों में विद्या प्रचार की बहुत ही कमी दिखाई देगी। अतः मुबोध क्षत्रियों का कर्तव्य है कि वे लोग अपनी जाति से इस पर्दा रूपी कुप्रथा को शीघ्रातिशीघ्र समाप्त करने की चेष्टा करें। क्योंकि इस समय इस पर्दा सिस्टम की कोई विशेष उपयुक्तता दिखाई नहीं देती। यह प्रथा तो केवल मुसलमानी शासन काल में एक यापत्ति धर्म के रूप में चालू की गई थी, वह यापत्ति धर्म ( १६० ) . इस समय दूर हो गई है, अतः ऐसी स्थिति में इस कुप्रथा को भी नाश करना ही बुद्धिमान क्षत्रियों का मुख्य कर्तव्य है। क्षत्रियों को मनन करने योग्य कुछ बातें १. क्षत्रिय बनना है तो क्षत्रिय शब्द का सार्थक करना सीखो। अर्थात् जनता जगत की सर्व प्रकार से रक्षा करना ही क्षत्रियों का मुख्य वर्तव्य होना चाहिये। २. श्रीमद्भागवद्गीता में कहा है कि:- "नरणांच नराधिपम्"। अर्थात्:--मनुष्यों में राजा का रूप इश्वर तुल्य ही है। जिस प्रकार ईश्वर सब जीवों की रक्षा करता है, उसी प्रकार राजा भी सब प्रजा की रक्षा करता है। जिस प्रकार ईश्वर सब जीवों के कर्मा की उचित न्याय व्यवस्था करता है, उसी प्रकार राजा को भी सब जीवों के कमी की व्यवस्था न्यायानुकूल करनी चाहिये। जिस प्रकार ईश्वर की दृष्टि में कोई साम्प्रदायिक भावना नहीं होती है उसी प्रकार राजा की दृष्टि में भी कोई साम्प्रदायिक भावना नहीं होनी चाहिये। , ३. अपनी शौर्यता, वीरता तथा तेजस्विता आदि सद्गुणों पर सदैव ध्यान देना चाहिये, और इसके लिये व्रहाचर्य का विधिवत् पालन स्वयं भी करे और अपनी संतानों को भी इसका पालन करना सिखावे । ४. अपने शरीर को भोग विलास के पदार्थों में कोमल न बनाने देवें, किन्तु एक शुद्ध सैनिक की.भांति रहते हुए अपना जीवन व्यतीत करें। ५. मादक पदार्थ जैसे मद्य (मदिरा), अफीम, सुलफा, गांजा, भड्ग, तमाखू तथा बिड़ी सिगरेट आदि पदाथों से सदैव दूर रहें । ६. पर्दा सिस्टम एक महान कुप्रथा है, इससे देवियों के चरित्र ( १६१ ) निर्माण का तथा स्वास्थ्य को बहुत ही हानि होती है । अतः इसको सदा सर्वदा बन्द कर देना ही मुख्य कर्तव्य है। ७. विद्या की उपासना करना जीवन तथा अविद्या की उपासना ही मृत्यु समझना चाहिये। ८. क्षत्रियों में विद्या प्रचार की बहुः कमी है। अन्य वर्गों की अपेक्षा इसमें क्षत्रिय बालक तथा वालिकायें बहुत कम साक्षरी हैं। श्रतः इन सब को विद्वान बनाना क्षत्रियों का मुख्य कर्तव्य है। ६. इनको पढ़ने के लिये स्थान २ पर शिक्षा मन्दिर खोलना चाहिये, राजपूत वोर्डिङ्ग हाउस कायम करें, और साथ ही साथ राजपूत वालकों के लिये सैनिक शिक्षा का भी सुप्रबन्ध करना चाहिये। १०. राजपूत कन्यानों के पढ़ने के लिये अलग ही स्कूल तथा पाटशालायें कायम करना चाहिये। और इसमें कन्याओं की शिक्षा का सर्व सुपास रखना चाहिये। राजपून (क्षत्रियों की दशा पर गायन अब तुम जागियोरे क्षत्रिय वीर वृत नृपाला टेर॥ पूर्व समय में क्षात्र धर्म की, महिमा बड़ी विशाला । जिनके घर में स्वयं हरि ने, लिया जन्म हो लाला ॥१॥ गौ ब्राह्मण की रक्षा करते, प्रजा धर्म तिन पाला । कुल की करनी ब्रह्म कहा कार, जीत लिये दिक पाला ॥२॥ धर्म ध्वंसक वेद विदूषक, जो कहीं वे सुन पाते। तुरत मार यमराज पठा कर, धर्म ध्वजा फहराते ॥३॥ अहिंसक धर्म वाद किया जारी, हिंसा वाद मिटाया। अाजकल तो क्षत्री देखो, मदिरा मांस चलाया ॥४॥ .

( १६२ ) - - ," - . काम सभी सिंहन के कीने, जब नाम दास पद डाला। जब से नाम पर सिह लगा, तब हुए हाल बे हाला ॥५॥ धर्म राज हा ! मिटा जगत में, पाप चक्र अब चाला। स्वामी नारायण आज कल तो, क्षत्रिन ने घर घाला ॥६॥ २६. ब्राह्मणों का पतन तथा उत्थान . के में मैं पूर्व प्रकरण में लिखकर बता आया हूँ कि जब तक ब्राह्मण तथा क्षत्रियों में परस्पर पठन पाठन की प्रणाली चालू रही तब तक ये दोनों वर्ग मिलकर लौकिक तथा पारलौकिक कार्यों की अन्वेषणा में लगे रहे। क्षत्रियों ने ब्राह्मणों को बड़ा बनाया, और ब्राह्मण लोग क्षत्रियों को बड़ा बनाते रहे। इस प्रकार गीता के कथनानुसार "परस्परं भावयन्तः श्रेषपरमवाप्स्यथा” अर्थात् परस्पर के भाव से परम श्रेष्ठपद को प्रात होते हैं। ऐसे दोनों वर्ग श्रापस में मिलकर एक दूसरे के सह्योगी होते रहे। और जब तक क्षत्रिय लोगों हाथ अखण्ड राज्य रहा तब तक तो ब्राह्मण लोग भी इनके साथ लगे रहे। और इनके पुरुषाओं की मूर्तियों को मन्दिरों में स्थापना करा २ कर उनको ईश्वरीय अवतारो में घोषित कर. उनके द्वारा मिलने वाले अनेकों प्रकार के भोगैश्वर्य को भोगने में दृढ़ संलग्न होगये। और ब्राहाण तथा क्षत्रिय का तो जोड़ा होता है ऐसी भावना क्षत्रियों को दिखाकर उनसे अपने हित सम्बन्धी अनेकों प्रकार के. आर्डिनेन्द्र कायम कराये, ताकि भविष्य में कोई इनके सामने आँख उठा कर न देख सके। किन्तु शनैः २ क्षत्रियों ने पढ़ना लिखना बन्द किया, और देश में मूर्खता व्यापने लगी, तो आपस में फूटा फाटी मचने लगी, विदेशियों के आक्रमण होना शुरू हुआ और देश की हकूमत सैकड़ों वर्ष तक मुसलमानों के आधीन हो गई। मुसलमानों का शासन देश को घातक सिद्ध हुआ, और यहाँ के निवासी इनके चंगुल से - निकलने के लिये कई प्रकार से पुरुषार्थ करते रहे। इसी बीच में भारत में एक अोर दूसरी विदेशी गवर्नमेन्ट प्राधमकी, जिसको ब्रिटिश गवर्नमेन्ट ( १६३ ) के नाम से पुकारते थे। इसने हिन्दू तथा मुसलमान दोनों को अपनी मुट्ठी में कर लिये। मनुष्य मात्र के लिये इसने अपने धर्म तथा कमा में अाजादी प्राप्त कराई। वैश्य तथा शूद्र जो किसी जमाने में विचारे मूक पशु की तरह जीवन व्यतीत करते थे, उनको इनके शासन काल में पढ़ने लिखने की तथा व्यापार व कला कौशल द्वारा द्रव्योपार्जन करने तथा उसको अपने याधीन संग्रह करने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त होगई। इनके शासन काल में अनेकों प्रकार के व्योपारों की वृद्धि हुई और इम वैश्य समाज ने इन व्यौपारों द्वारा हजारों तथा लाखों रुपया कमाये, इनमें से बहुत से लखपति तथा करोड़पति सेठ बन गये। और भारत के सारे व्यापार के केन्द्र को अपने श्राधीन कर लिया। उस समय जब ब्राह्मणों ने देखा कि क्षत्रियों के हाथ से राज्य शासन का सूत्र निकल चुका है, और अब थोड़े से राजा शेष , रहे हैं और वे भी दूसरे के हाथों की कठपुतलियां बने हुए हैं। अधिक तर क्षत्रिय लोग निर्धन बनते जा रहे हैं। और वैश्य लोग अधिकं रूप से मालदार बनते जा रहे हैं। तब इन्होंने जो किसी समय ब्राह्मण क्षत्रिय का जोड़ा बतलाते थे उसको मिटाकर अब ब्राहाण · बनिये का जोड़ा स्थापित कर', दिया। श्राप जहां देखो वहां ये लोग ब्राह्मण क्षत्रिय न कह कर ब्राह्मण (बामन) बनियां कहने में ही अपना गौरव समझेगे। कहने का अभिप्राय : यह है कि इनको ईश्वर तथा धर्म से प्रेम नहीं है इनको तो केवल अपने स्वार्थ से प्रेम है, कहावत प्रसिद्ध है कि "जिसका खाइये उसका गाइये। जब तक क्षत्रियों का भारत में प्रशाशन रहा तब तक ये लोग क्षत्रियों के गौत गाते रहे। अंव क्योंकि क्षत्रियों का प्रशाशन नष्ट हो गया है और बनिये (वैश्य) लोग स्मृद्धिशाली हो गये हैं अतः ये लोग अब इनके गीत गा रहे है। मैं तो जहाँ जाता हूँ वहां इन नाम मात्र ब्राह्मणों को सेठजी के श्रागे हाथ जोड़ते तथा गिड़गिड़ाते ही देखा करता हूँ। और तीर्थों के किनारे भी इन लोगों को जै लालाजी की, जे सेठजी की, जे यजमान की इस प्रकार जै जै कार की दुहाई देते हुए सुना करता हूँ। जैसे माँस के टुकड़ों को देख कर हज़ारों चील तथा कौवे मंडरा जाते है। इसी प्रकार तीर्थों की जगह .

( १६४ ) पर सेठों को देख कर ये ब्राह्मण लोग उनको चारों ओर से घेर लेते है। उन विचारे सेठों को इन वाहाणों से उस समय छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है। अब देखिये:- -- r जो ऐन्द्र पद त्रिलोक सुख भी जानते बेकार थे। सुर राज भी जिन के अमोघ श्राप से लाचार थे। वे श्राज ब्राहाण देवता ही भीख मंगे हो रहे । खोकर तपोधन ज्ञान धन श्रय मान धन भी खो रहे।। - अव पाठक सोच सकते हैं कि श्राजवल ये ब्राहाण लोग अपने थोड़े से पैसों के लोभ के लिये सेठजी के आगे कैसे गिड़गिड़ाते हैं। बस ये ही ब्राह्मणों के पतन का कारण है। । 1 क्षत्रियों के शासन काल में इन ब्राह्मणों ने जैसा उनको कहा वैसा ही उन्होंने मान लिया, इनके सत्यासत्य पर कुछ विचार न किया। इससे विदित होता है कि क्षत्रिय लोग बड़ी भोली जाति थी, जैसा इन लोगों ने ' अपने स्वार्थ के लिये उनको बहकाया वैसा ही वे लोग इनकी सारी बातों को मानते चले गये। श्रघ ये ब्राह्मण लोग वाहाण क्षत्रिय के जोड़े को ध्यान न देते हुए ब्राह्मण (बामन) बनिया कहलाने में ही अानन्द मानते हैं तो बस इस बामन बनिया कहलाने में ब्राहाणों के पास में जो कुछ बचा बचाया गुण कर्म तथा विद्या थी, वे सब समाप्त हो गई। क्षत्रिय क्योकि भोले जीव थे इसलिये उन्होंने इनकी मान मर्यादा बढ़ाने की ही चेष्टा की, किन्तु इनको उन्होंने किसी तरह भी नीचा न गिराया । किन्तु जब से इन्होंने द्रव्य के लोम में पड़ कर बामन बनिया की उपाधि प्राप्त की, कि बस उसी दिन से माह्मणों का सत्यानाश होता चला गया । ये वैश्य (बनिये) बड़े बुद्धिमान तथा चतुर हुआ करते हैं। क्षत्रियों के शासन काल में ब्राह्मणों के कठिन प्रतिबन्धों के द्वारा ये लोग दवे पड़े थे, ( १६५ ) किन्तु जैसे ही विदेशी गवर्नमेन्ट के शासन काल में इनके प्रतिवन्ध ढीले पड़े कि एक दम अपनी बुद्धिमानी से इन्होंने अनेको व्यवसायों को अपने प्राधीन करते हुए थोड़े समय में कुवेर के खजाने के अधिपति बन बैठे। जब इनके पास में सर्व प्रकार की संपदा प्राप्त हो गई तो उसको देख कर विचारे ब्राह्मणों की भी लार टपक पड़ी, कहते हैं कि "द्रव्येण सर्वे वशा' अर्थात् द्रव्य से सब वशीभूत हो जाते हैं। बम ये ही हाल इन ब्राह्मणों का हुया ! और इन्होंने इन वैश्यों को प्रसन्न करने के लिये झटपट (खुशामद में ग्रामद) समझते हुए वामन बनिया का जोड़ा स्वीकार कर लिया। जब इन वैश्य लोगों ने देखा कि वे ही ब्राह्मण लोग जिन्द्रोंने हमारे ऊपर काटिन २ प्रतिबन्धों को लगा कर हमारी सामाजिक, राजनैतिक तथा धार्मिक सर्व प्रकार की उन्नति क्षेत्र को सदैव के लिये बन्द कर दिया था। अब वे ही लोग हमारा यशोगान करते हुए हमारी शरण में आ गये हैं तो बस फिर क्या था। इन्दोंने भी अपनी बुद्धिमानी से ब्राह्मणों पर ऐसा हाथ फेरा कि बस इनकी बची बचाई विद्या . बुद्धि तथा मान मर्यादा सब को मिट्टी में मिला दिया, और ब्राह्मगा वामन, वम्मन बना दिया। से अब मैं पाठकों को इन वैश्य लोगों की चतुगई की कुछ बातें ब्राह्मणों के हितार्थ वर्णन करता हूँ कि इन्होने कसी बुद्धिमानी के साथ में ब्राह्मणों को धोखा दिया। जिस प्रकार इन लोगों ने वैश्य तथा शूद्रों को अपना भोग भोगने के लिये नर पशु बना लिया, इसी प्रकार इन्होंने भी ब्राह्मणों को अपना मनोरजन के लिये नर पशु बना लिया । वीरवल तथा अकबर के संवाद में संसार प्रसिद्ध एक गाथा ग्राती है। कहते हैं कि एक समय अकबर बादशाह ने अपने मंत्री वीरबल को याज्ञा दी किः --- "लायो कोई ऐसा नर । पीर, बबरची, भिश्ती, खर" | इस पर कहते हैं कि बीरबल ने बादशाह के सामने एक ब्राह्मण को लेजा कर खड़ा कर दिया। अब पाठक सोच सकते है कि हिन्दू समाज में ब्राह्मण ही एक ऐसा जीव बना दिया गया है कि जिसको पीर, बबरची, भिश्ती तथा खर की उपाधि लागू हो सकती है। क्या कहीं म ( १६६ ) श्रापने दुनियां के किसी और समाज में भी ऐसा व्यक्ति देखा है कि जिस पर उपरोक्त कथन की हुई चारों प्रकार की उपाधियां लागू हो सकती हो। मेरी समझ में तो हमारी इस हिन्दू समाज को छोड़ कर किसी दूसरी समाज में मिलना मुश्किल है। जो ब्राह्मण भू देव कहलाते थे वे पान इन चार उपाधियों से सुशोभित देखे जाते हैं। ये सब कैसे और क्यों हुआ? तो कहना पड़ेगा कि ब्राहमणों को अपने स्वरूप के भूल जाने से तथा सेठ जी की कृपा से ये पद प्राप्त हुए। पाठक! इस बात को सेठ जी के यहां जाकर प्रत्यक्ष देखलें कि उनके यहां पर दान दक्षिणा लेने वाला ब्राहाण, जीमने वाला ब्राह्मण, भोजन बनाने वाला (बबरची) ब्राहाण, पानी पिलाने वाला (भिश्ती, ब्राह्मण, बोझा उठाने वाला (खर) ब्राह्मण, सेठजी का लड़का खिलाने वाला ब्राझण, चारपाई तथा बिस्तर बिछाने वाला ब्राह्मण । कहां तक कहे जो कुछ परिचर्या सम्बन्धी कार्य हैं वे सब इन सेठ जी ने ब्राह्मण को सौंप रखे हैं। क्योंकि ब्राह्मणों के सिवाय सेठजी को ऐसा सर्व गुण सम्पन्न मनुष्य और किस समाज में से मिल सकता है। यह सेठजी की असीम कृपा का यह फल है कि जो भू देव का दावा करने वाले ब्राह्मणों को ऐसे सुन्दर पद प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुश्रा है। श्रतः प्यारे ब्राहाणं बनने वाले भाइयो! अब तो सोचो अपने ब्रह्मवंश का नाम पानी में न बहावो। याद रखो! ब्राह्मण बनिया कहलाने में तो ब्राह्मणों को पर, बबरची, भिश्ती तथा खर की पदवी लादी. गई है । पहिले नम्बर पर ब्राह्मण क्षत्रिय कहलाये, दूसरे नम्बर पर ब्राह्मण बनिये बने, तीसरे नम्बर पर अब ब्राह्मण नाई बनने जा रहे हैं। अर्थात् शादी विवाह में अव ब्राह्मणों से नाई का काम भी लिया जा रहा है। . ऐसी स्थिति में ज्ञात नहीं होता कि ब्राह्मरों का इस दासत्त्व वृत्ति से कत्र उद्धार होगा। . शरीर सम्बन्धी कार्यों को संचालन करने के लिये शरीर के मुख्य चार अङ्ग माने गये हैं यथाः-हाथ, पैर, मस्तक तथा पेट आदि। इन्हीं (. १६७ ) प . चार मांगों पर समाज की रचना की गई है, अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की कल्पना की गई है। ये समाज के चार अङ्ग कहे जाते हैं । जिस प्रकार शरीर के चारों प्रधान अङ्ग ठीक २ काम करने वाले तथा सुदृढ़ होते हैं तो शरीर के सारे कार्य सुचारु से चला करते हैं, यदि इनमें किसी भी भाग में कोई खराबी हो गई तो शरीर के सारे कार्य ठप्प हो जाते हैं। इसी प्रकार मनुष्य समाज का हाल भी समझना चाहिये। यदि ये चारों वर्ग मिल कर अपने २ गुण तथा स्वभाव के अनुसार राष्ट्र तथा देश सेवा श्रादि का कार्य विधिवत् करते रहें तो देश तथा राष्ट्र बसन्त ऋतु के समान फूलता और फलता रहता है। श्राज मनुष्य समाज में ब्राह्मण वर्ग के खराब हो जाने से अन्य सारे वर्गों में खराबी पहुँच गई है। यदि यह ठीक हो, जावे तो सारे वर्ग ठीक हो सकते हैं। ब्राह्मण जीवन संसार में भोग भोगने के लिये तथा संसारिक नाना प्रकार के द्रव्य सम्बन्धी पदार्थों को संग्रह करने के लिये नहीं है; किन्तु सादा जीवन व्यतीत करते हुए अपने श्रेष्टाचार से अन्य वर्गों को सत्य शिक्षा से सुशोभित कर देश को समुन्नत करना है। पर ग्राज यह ब्राह्मण वर्ग अपने स्वरूप को भुला कर अन्य वर्गों की देखा देखी भोगों का दास बनता जा रहा है। और नाना प्रकार के महल महलायत तथा लखपति व करोड़पति बनने को ही अपने जीवन का मुख्य लक्ष्य मान बैठा है। इसमें सन्देह नहीं कि संसार में अन्य जितने भी वर्ग है वे सत्र भी संसार के भोगों के भोगने की तथा लखपति व करोड़पति बनने की भावना को लिये बैठे हैं। किन्तु इनमें और ब्राह्मणों में पृथ्वी आकाश का अन्तर है। ये लोग ईश्वर और धर्म की ठेकेदारी से दूर हैं, ये लोग ईश्वर और धर्म के नाम पर धोखा देकर लखपति तथा करोड़पति बनने की इच्छा नहीं कर रहे हैं किन्तु अपने परम पुरुषार्थ कृषि, वाणिज्य तथा कला कौशल सम्बन्धी कार्यों में दृढ़ संलग्न हुए लाखों करोड़ों रुपया कमाते हैं, उससे मइल महलायत बनाते हैं, नाना प्रकार के भोगों को संग्रह करते हैं, स्त्री पुत्रों सहित उनका उपभोग करते हैं, समय पड़ने पर जनता जनार्दन के निमित्त अपनी कमाई में से दान भी करते है। ऐसी स्थिति में हम इन लोगों को बुरा नहीं कहते। किन्तु ब्राह्मण । १६८ ) लोग ईश्वर और धर्म की ठेकेदारी को भी अपने हाथ में रखते हैं और संसार के भोगों के भोगने तथा लखपति व करोड़पति बनने की इच्छा में भी दृढ़ संलग्न रहते हैं। बस यही ब्राह्मण समाज का पतन होने का कारण है। तुलसीदासजी ने ठीक कहा है: 7 - , -- "चाहे हरि की भक्ति कर, चाहे चहो तुम दाम । तुलसी दोनों ना मिलें, रवि रजनी इक ठाम कहने का अभिप्राय यह है कि ईश्वर और धर्म की ठेकेदारी ऐसे मनुष्यों को नहीं मिल सकती कि जिनको संसारी भोग भोगने की तथा लखपति व करोड़पति बनने की इच्छा रहती हो। - इसकी ठेकेदारी के तो वे ही अधिकारी होने चाहिये कि जो पूर्ण विद्वान, संयमी तथा त्यागी होते हैं और जो अपने सत्योपदेश तथा सत्याचरण से जनता जगत का कल्याण करते हैं और ऐसे ही मनुष्यों को ब्राह्मण कहा जाता है क्यों किः-सादा जीवन उच्च विचार, यही है जीवन का सार" । आज श्राप कहीं भी किसी भी देश में जाकर देखें तो धर्म और ईश्वर के नाम पर धोखा देने वाले व्यक्ति नहीं पाये जायगे। क्यों कि वे लोग जानते हैं कि संसारी विषय सुख तथा द्रव्यादिक की प्राप्ति तो संसार सम्बन्धी कला कौशल तथा व्यौपारादि साधनों से भली भांति हो सकती हैं । फिर इस तुच्छ कामना के लिये ईश्वर और धर्म को कलंकित करके जनता जगत को धोखे में क्यों डालें। यही कारण है कि आज अन्य देशों के कार्य सब विधिपूर्वक चल रहे हैं। किसी भी कार्य में उनके धोखा दिखाई नहीं देता। किन्तु भारत हो एक ऐसा देश है और इसमें हिन्दू धर्म ही एक ऐसा धर्म है कि जिसमें इतनी गंदगी श्रागई है कि मनुष्य समाज के प्रत्येक कार्य में अर्थत् सिर से पैर तक केवल धोखा ही धोखा दीख पड़ता है। श्राज आर प्रत्यक्ष देखलो। देवी देवता के नाम पर धोखा, गंगा यमुना के नाम पर धोखा, ईश्वर धर्म के नाम पर धोखा, गौ माता के नाम पर धोखा, मन्दिर देवालय के नाम पर धोखा, विद्यादि के नाम पर धोखा, योग यज्ञ के नाम पर धोखा, खान पान ( १६६ ) धोखा, कहां तक गिना; अाज मानव में सिर से पैर तक कूट २ कर धोखा ही धोखा भर गया है। यह सब ब्राह्मणों की असीम कृपा का फल है। यह घोग्खा जब तक नहीं निकल सकता कि जब तक ब्राह्मण समाज शुद्ध नहीं होता है। अतः जो शुद्ध ब्राह्मण का दावा करते हों उन्हें चाहिये कि वे अपनी इस ब्राह्मण समाज की गंदगी रूपी कूड़ा कर्कट को दूर करें। और शुद्ध मात्विक, विषय विकारों से दूर रहने वाले, साधारण जीवन व्यतीत करने वाले, तपस्वी, विद्वान सदाचारी, संयमी तथा त्यागी ब्राह्मण निर्माण करें। और यदि ऐसा करने में असमर्थ हो तो यह नाम मात्र ब्राह्मण शब्द को समाप्त कर देवें ताकि जनता जगत इन कृत्रिम ब्राह्मणों के हथकंडों से छूट कर सत्य मार्ग के अनुयायी बन सके । यदि श्राप ऐसा न करेंगे तो निश्चय है कि जनता जगत तथा जनता राष्ट्र आप लोगों का बहिष्कार कर देगी। क्यों कि ग्राज संमार में चारों ओर से विद्या का प्रकाश फैलता यारहा है तो क्या हमारा भारत ग्राज भी अन्धकार में ही फंसा रहेगा? यह कदापि नहीं हो सकता। अब श्रापकी यह दुतर्फा द्विगरी सुरक्षित नहीं रहेगी, अर्थात एक तरफ तो तुम संसारिक नाना प्रकार के भोग भोगो और लख- पति तथा करोड़पति बनने की कामना करो और दूसरी और “ब्रह्म वाक्य लनार्दन" का ढिंढोरा पीटकर ईश्वर और धर्म के ठेकेदार बनते रहो। अब श्राप संसारी अन्य बों की तरह अपने निजी पुरुषार्थ कला कौशल व्यापार तथा कृषि प्रादि द्वाग लखपति तथा करोड़पति बन कर अपने साथ से ईश्वर और धर्म की मिश्या दुहाई तथा ठेकेदारी को दूर करदो और यदि आप ईश्वर और धर्म की ठेकेदारी को दूर नहीं करते हो तो शुद्ध सात्विक ब्राह्मण बन जावो। इसी में तुम्हारी तथा जनता नगत की दोनों की मलाई है। क्यों कि ईश्वर तथा धर्म की ठेकेदारी तो उसी मनुष्य को मिल सकती है कि जो इसके अधिकारी हो । श्रारम्भ में आप लोगों के पूर्वजों को इसकी ठेकेदारी उनके गुण, कर्म तथा स्वभावों के अनुसार ही दीगई थी, किन्तु ग्रान श्राप लोग उन गुण कर्म, तथा स्वभाव को भुला कर इस को ما * ॐ * - नमः विश्वम्भराय जगदीश्वराय आवश्यक सूचना (१) यदि आप अपनी संतानों को ब्रह्मचारी, तेजस्वी तथा शूरवीर बनाना चाहते हो? (२) यदि आप अपनी कन्याओं को वेदोक्त शिक्षा से सुशोभित कर आदर्श देवी बनाना चाहते हो ? (३) यदि आप बिना किसी वैद्य तथा डाक्टर की सहायता के अपने तथा अपने परिवार के रोगों की चिकित्सा स्वयं करना चाहते हो ? (४) यदि आप बैठे हुए हो, और इस वेकारी को हटा कर थोड़े से.. पैसों से अपना रोज़गार चला कर सीधे सच्चे दंग से धन कमा कर धनपति. बनना चाहते हो? तो आप राजस्थान के सुप्रसिद्ध महात्मा श्री नारायण स्वामी बी० ए द्वारा लिखी हुई पुस्तकों को बड़े प्रेम से पढ़ने का अभ्यास करें। इन पुस्तकों में श्री स्वामी जी महाराज ने इन सब विषयों का तथा गृहोद्योगिक कार्यों को संपादन करने का बहुत ही सहज व सुगम मार्ग लिख कर बताया है जो सद् गृहस्थियों के, वेरोज़गार हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए मनुष्यों के और विद्यार्थी, तथा अध्यापकों के काम आने वाली बड़ी ही सुन्दर पुस्तकें प्रकाशित की गई है। साधक अपनी २ रुचि अनुसार इन पुस्तको को अवलोकन करके उपरोक्त कथन किये हुए लामों से लाभान्वित हो सकते हैं।

श्री स्वामी जी की पुस्तकों का सूचीपत्र १॥)- १) . . १. फेमिली डाक्टर श्री नारायण चिकित्सा २. आदर्श नारी जीवन ३. पेटेन्ट मेडीशन्स ४. ब्रह्मचर्य ५. विद्यार्थी जीवन ६. धन कमाने की मशीन श्री नारायण सुगम १) व्यौपार माला १) ७. श्रीमद्भगवद्गीता भाषा . . ॥). ।) ... १) . - साम्राज्य वाद तथा स्वराज वाद ६. स्वास्थ्य कुजिका १०. कृषि विज्ञान तथा वृक्षों में अद्भुत चमत्कार ११. योग तत्त्व १२. विचार सागर सार संग्रह १३. ज्वर रोग चिकित्सा १४. विद्या महिमा १५. श्री नारायण भजन विलास १६. बी० ए० का प्रसिद्ध पेड़ा १७. स्तोत्र सार संग्रह २८, बाल रोग चिकित्सा २६. स्त्री रोग चिकित्सा ।) ) D. . . २०. अमृत धारा

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Samaj Sudhar

Author
Swami Narayan
Title
Samaj Sudhar
File name
Samaj Sudhar
Text
OCR done
Citation
1951
Published
2011/03
Publisher
Dosa, (rajasthan Jaipur)gram Kundal P,o,kundal
Language
Sanskrit
Pages
168
Library
Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Classification
Devotional
DLI number
550723
Barcode
4990010031535.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
vIlP7m6ECoH
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